Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Prem Kahani

Mamta Kaliya · 2011/03

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प्रेम कहानी
ममता कालिया
राम्गनिय समालोचना के लिए
प्रशासक की घोर से सादर में
राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली

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उन असंख्य पाठकों के नाम
जिनको सराहना, सद्भावना, और स्नेह का
एक लम्बा सिलसिला
लगातार चलता रहा

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पदोन्नति के साथ-साथ पापा का तबादला इस छोटे-से शहर में हो गया। जिस दिन पापा ने दफ्तर से आकर हमे यह खबर सुनाई हमें विश्वास नहीं हुआ कि इतने छोटे शहर मे भी रेडियो स्टेशन हो सकता है । जब पापा ने जी० ओ० दिखा दिया, तब भी मैं ममी से कहती रही, 'ममी, दाइपिस्ट ने गलती से मदुरा को मथुरा टाइप कर दिया है । मथुरा मैं पेड़ा हो सकता है, पण्डा हो सकता है, परमात्मा हो सकता है, लेकिन रेडियो-स्टेशन नहीं हो सकता पता नहीं क्यो मैं रेडियो को हमेशा महा- नगरों से सम्बद्ध करती रही थी । पर ममी एक अच्छी पत्नी की तरह पापा की हर बात पर विश्वास करती थी। उन्होने फौरन स्टोर में जाकर देखना शुरू कर दिया कि पैकिंग के लिए कितनी पेटियां है व कितनी और खरीदनी पड़ेंगी। तबादलों के अन्तर्गत शहर बदलते-बदलते पापा- ममी का दिमाग कुछ इस तरह अभ्यस्त हो गया था कि सरकारी आदेश मिलने के साथ ही ये अपने को पुराने शहर से काटकर नए शहर से जोड़ने लगते । पापा कही से ढूंढकर नए शहर का नवशा और गाइडवुक ले आते, फुरसत के वक्त वहा की मड़को, अस्पतालों और सिनेमाओं के नाम रटे जाते और वहा की विशेषताओं का पता लगाया जाता । वे उस शहर में पहुंचने से पहले ही उससे इतना लगाव पैदा कर लेते कि वहां जाकर उन्हें ऐसा लगता मानो ये किसी नितान्त परिचित जगह पर आ गए हैं । फिर मथुरा को लेकर तो इस ताम-झाम, तैयारी की भी जरूरत नहीं थी। यह महर तो लहू बनकर उनकी धमनियो में दौडता था। मेरे लिए यह काम इतना आसान न था । तबादले की सुनते ही मुझे धक्का लगता, हालांकि हर तीन साल बाद यह धक्का लगना पक्की वात यो। हर बार मैं अपनी सहेलियों, टीचरों, पड़ोसियों को छोड़ते बिलख प्रेम-कहानी/7 पड़ती। फिर इस बार का अफसोस तो और भी गहरा था। खास तौर पर तब जब मुझे अभी-अभी मराठी में डिस्टिन्कशन मिला था और बी. ए. मे फर्स्ट डिविजन होने की वजह से योग्यता-छात्रवृत्ति भी मिलनी निश्चित थी। विल्सन कालेज में, जहां एक-से-एक अफलातून पढते थे, मैंने इस साल टाप किया था। रहे तो हम केवल तीन साल थे, पर बम्बई को बाहो मे मुझे बड़ी आत्मीयता, बड़ा अपनापन मिला था। इस वक्त मुझे लग रहा था कि समुद्र के विना, नारियल के बिना, किटी और मिटू के बिना, चौपाटी और प्रोफेसर चौबल के बिना कोई शहर, शहर नहीं हो सकता, वह घुड़साल होगी, या टकसाल होगी या ससुराल होगी। लेकिन ममी और पापा का जोश बुलन्द था, मानो पहली बार कोई नई-नवेली नौकरी हाथ आई हो। वे जोर-जोर से नौकरों को आदेश देते, ट्रंक पैक करते, पुरानी कण्डम चीजें दरियादिली से पडोसियो को बांटते, मिकन्दर-अन्दाज में दावतें खा रहे थे। जिस सरलता से वे मेरा जाना भी माने ले रहे थे उससे लगता था मैं भी असबाब का ही एक नग हूं। सो एक दिन सोफे, पलग, रेडियो, कनस्तर और किताबो के साथ- साथ मैं भी मथुरा पहुच गई । मन बेहद मुझला रहा था। मुझे होस्टल मे आसानी से छोड़ा जा सकता था, लेकिन ममी का खयाल था कि उनकी गैरहाजिरी मे मै न खाऊगी, न नहाऊंगी, न पढूंगी, नजीवित रह सकूगी। वह मुझे, मुझसे भी अच्छी तरह जानती थी। लिहाजा मक्खियो से भिन्- भिन् करते इस शहर में मैं पहुंच ही गई। दरअसल पापा इसी शहर की पैदावार थे । यही वह पले, बढ़े और पढे । यही से एक दिन अपनी प्रतिभा के बूते वह छलाग मारकर दिल्ली पहुच गए और एक आला अफसर के रूप में नाम कमा गए । अब हैड- क्वार्टर में हालत यह थी कि उनकी पोस्टिंग केवल ऐसे स्टेशनो पर की जाती थी, जहां कई स्तरो पर प्रशासन सुधारने की जरूरत होती या जहां धांधली के मारे व्यवस्था चरमरा कर टें बोलने वाली होती । पापा ने यहा अपनी नियुक्ति एक चुनौती की तरह स्वीकार की थी। जहां एक ओर उन्हे इस पौराणिक नगरी के रोएं-रेशे से रम-सागर खीच इसके कार्यक्रमो को पुनरुज्जीवित करना था, वही दूसरी ओर उन्हे अपनी ऐति- 8/प्रेम-कहानी हासिक तटस्थता, निष्पक्षता और मनोबल भी बरकरार रखना था। इस शहर मे उनके बेशुमार बाल सखा थे, गुरुजन थे, मित्र थे, शत्रु थे, पूर्वाग्रह थे। पर पापा की खासियत थी कि चुनौतियों के आगे जी-जान से लडते थे। वह तो दफ्तर की लड़ाई में लग गए । ममी नए मकान की सफाई, नौकर की तलाश और पड़ोमियों में पहचान मे लग गईं। रह गई मैं । मुझे नया कालेज ढूढना था। पापा ने मेरे हाथ मे फीस के रुपए थमाए और कालेजों के नामों की सूची कि जहा पसन्द आए, प्रवेश ले लो। यह तरीका वह तबसे आजमाते आए थे, जबसे मैं दर्जा आठ में थी। सबसे पहले मैं उस कालेज मे पहुची जो इस शहर का सबसे बड़ा, पुराना और प्रतिष्ठित कालेज था । इमारत काबिले-बरदाश्त थी, लेकिन मेरे विषय मेल नहीं खाते थे । दूसरे कालेज के फाटक पर गाय बंधी थी और अन्दर विल्कुल गौशाला-जमा माहौल था। वहा भी मेरा विषय नही था । सारा दिन भटकने के बाद मैंने पाया कि एम० ए० में मगठी-माहित्य का अध्ययन करना इस शहर मे नामुमकिन है । मैं पैर पटकती हुई घर आई और पापा पर बरस पड़ी। पापा बोले, 'न मही मराठी, तुम हिन्दी मे एम० ए० कर लो, फिला. सफी में कर लो, ये भी तुम्हारे विषय थे।' 'पर नम्बर तो हमारे मराठी में सबसे अच्छे थे।' मैंने जिद की। 'जो काम नहीं हो सकता उमकी जिद नहीं करनी चाहिए। पढ़ाई का निर्णय नम्बरो से नहीं रुचि से लेना चाहिए । फिर जहां जो उपयुक्त 'कल को आप कहेगे, ब्रजभाषा मे एम. ए. कर लो, यहां यही उप- गुक्त है। 'मूर्ख, ब्रजभाषा में नहीं भापा-विज्ञान मे कहो । तो उममे क्या है । कई बड़े-बड़े विद्वानों ने बहुत देर तक अध्ययन करने के बाद अपना विषय बदला है। तुम कौन-मी ऐमी मराठी साहित्य की आचार्य बन गई हो।' प्रेम-कहानी/9 । पापा के समझाने का कोई असर नहीं हुआ। सबमे अलग कुछ कर गुजरने की ललक मन मे हिलोरें मारती थी। में जिद पर अडी रही। पापा भी ! वह मुझे वापस बम्बई भेजने को तैयार नहीं थे। यों हमारे घर ही में इतनी पुस्तकें थी कि मैं बखूबी अपनी पढ़ाई घर बैठे कर सकती थी। पाच कमरो के मकान में तीन कमरे केवल पुस्तकों से भरे थे। हमारे यहा पहले पुस्तकें गिन कर रखी जाती थी, फिर तुलकर रखी जाने लगी। जब-जब पापा का तबादला होता घर का वाकी सामान औने-पौने दानों मे बेच दिया जाता मा दोस्तो, पड़ोसियों में बाट दिया जाता, लेकिन कितावो के लिए हर बार पेटिया बनवाई जाती, बड़े करीने से पैक की जाती और एक अलग कागज पर फेहरिस्त बनाई जाती कि किस पेटी में कितनी किताबें है । इस सबके बावजूद पता नही कैसे मेरे जेहन में भी पढाई का मतलव केवल बी० ए०, एम० ए० पास करना ही था। पड़ोस में जगमोहनलाल खण्डेलवाल की कोठी थी। उनकी लड़की मेरी हमउम्र थी। वह छुट्टियो में घर भाई हुई थी। वह दिल्ली में इन्द्र. प्रस्थ कालेज में बी० ए० द्वितीय वर्ष में पढ़ रही थी। पहली मुलाकात में ही हम दोनो की अच्छी दोस्ती हो गई। शाम को हम डम्पियर पार्क की सडको पर घूमते । दोपहर में कभी-कभी नदी किनारे चले जाते । इसी धुमक्कड़ी के दौरान हम दोनों ने सोचा कि कितना अच्छा हो अगर हम दोनो साथ-साथ दिल्ली में पढे । कहने को उसके घरवाले काफी दकिया- नूस थे, पर उसके पिता का खयाल था कि आई०पी० की पढी लडकी को आसानी से और अच्छा-सा वर मिल जाता है, इसी आशा से उन्होंने यह कदम उठाया था। उनकी देखा-देखी पापा भी खतरा उठाने को तैयार हो गए। लेकिन वह मुझे होस्टल में छोड़ने को कतई तैयार न थे। उनका ख्याल था कि होस्टल में केवल यशस्विनी जैसी चुस्त और दबंग लड़किया हो रह सकती थी। मेरी समझ में नहीं आया कि अपनी चुस्ती साबित करने के लिए उनके सामने मैं कसरत शुरू कर दू या दौड । बहरहाल, भान जाने के सिवा और विकल्प भी क्या था! ममी ने अपना दिमाग दौड़ाया तो पाया कि उनकी एक दूर की रिस्तेदार यादीपुर डिपो में रहती थी। उनसे चिट्ठी-पत्री हुई, तय हुआ 10/प्रेम-कहानी कि मैं युनिवर्सिटी में पड़गी लेकिन रहूंगी आण्टी के पास, घर में । बात कोई स्फूर्तिजनक तो नहीं थी, फिर भी सहमति में ही गति थी। एक दिलासा यह था कि दिल्ली में यगा से मिलना तो होता ही रहेगा। । शादीपुर डिपो से इक्कीस नम्बर वस सीधी मौरिस नगर जाती थी और करीब पंतीस मिनट लेती थी। शुरू में युनिवर्सिटी पहुंचते-पहुंचते इतनी थकान हो जाती कि क्लास में बैठना दूभर हो जाता। कभी-कभी बस-स्टाप से किसी और लड़की के साथ शेयर करके स्कूटर ले लेती। लेकिन दो-चार बार बैठ लेने के बाद मैंने पाया, यह बस से भी बदतर है। मुझे लगा ससार में निर्मित समस्त सवारियों में सबसे विचित्र सवारी थी दिल्ली का स्कूटर । बैठने वाले की हड्डियों का झुनझुना बजा देने की अद्भुत काबिलियत थी उसमे। फिर कभी भी बीच रास्ते में स्कूटर को खराब धोपित कर देना या ड्राइवर का अपनी सीट पर एक शोहदेनुमा साथी को बैठा लेना तो आम बात थी । जिस तरह दिल्ली के अनुशासन- हीन ट्रैफिक के बीच से रास्ता काटकर स्कूटर-ड्राइवर अपनी गाड़ी निकाल भगाता, उससे लगता कि बस यह ज़िन्दगी का आखिरी लमहा है । लेकिन धीरे-धीरे इस सबकी भी आदत उसी तरह पड गई जिस तरह आण्टी के दड़बे-जैसे घर और ऊदबिलाव जैसे बच्चो की । अगर मैंने यह सोचा होता कि आण्टी के घर में मेरे स्वागत के लिए लोग ऐसे तत्पर होगे जैसे एयर इण्डिया का महाराजा तो मैं सरासर गलत होती । मैं रास्ते भर अपने को एक खुश्क प्रतिक्रिया के लिए तैयार करती आई थी। लेकिन घर पहुंच जव मैने देखा कि आण्टी ने मुझे घपची में भर लिया और बच्चों ने फौरन मुझे दीदी कहना शुरू कर दिया तब मैं आश्वस्त हो गई । घर बहुत छोटा था। कमरा केवल एक । कमरे के पीछे बालकनी थी, तीन तरफ से ढंककर अंकल ने एक कमरा अपनी वर्कशाप के लिए निकाला था। इससे घर मे अंधेरा तो हो गया था, लेकिन आमदनी में इजाफा हुआ था। अंकल दीपक इलेक्ट्रानिक्स मे काम करते थे। सुबह आठ बजे वह अपना टिफिन का डब्बा हाथ में थामे निकलते प्रेम-कहानी/11 और बस की कतार में खड़े हो जाते। शाम सात बजे वह वापस टिफिन का डब्बा थामे घर मा जाते। उनके जाते और आते ममय आण्टी इतनी व्यस्त रहती कि उन्हें पसीना पोंछने की भी फुरसत न मिलती। कपड़े बदलने के बाद प्रकल मठरी खाते, चाय पीते और अपनी वर्कशाप में घुस जाते । वह ट्राजिस्टर बनाने का काम करते थे। बहुत सस्ते में, महज पचहत्तर रुपये में वह ट्राजिस्टर बनाकर बेच देते थे। तीन तरफ से बरसाती ढकी उस बालकनी मे दर्जनो प्लास्टिक के टुकड़े, तार, बल्य, कन्डन्सर वगैरह पड़े रहते । असल में घर का खर्च इसी आमदनी से चलता था । अंकल की तनवा का काफी हिस्सा तो उधार पूरा करने में निकल जाता, जो उन्होंने बहनो की शादी के लिए समय-समय पर लिया था। अंकल पचास रुपये एडवांस लेते सामान खरीदने के लिए और पच्चीस बाद मे। ठीक नौ बजे वह अपनी वर्कशाप से निकलते, बच्चों से थोड़ी-बहुत बात- चीत करते और खाना खाते ही सो जाते । उनका पूरा कार्यक्रम कुछ इस तरह क्रमवद्ध रहता कि मुझे लगता वह इन्सान नहीं, चलती-फिरती घड़ी । कई बार मुझे भ्रम होता कि उनके अन्दर से वाकई एक 'टिक-टिक' आवाज आ रही है। कमरा क्योकि एक था, हम सब साथ सोते थे। दो खाटें तो वहां पहले से ही पड़ी थी अब तीसरी खाट मेरे लिए भी वहीं फंसा दी गई । एक वच्चा मेरे पास सोता था, एक आण्टी के पास। मुझे साथ देने के ख्याल से आण्टी हर वक्त बात करती रहती, महंगाई की बातें, बच्चो की बातें, बच्चों के स्कूल की बातें, साड़ियो की बातें । ऐसे में मेरी पढाई मे खलल पड़ता। इसकी क्षतिपूर्ति मैं लायब्रेरी मे बैठकर करती। शहर मे और भी कई लायब्ररी की मै सदस्या बन गई थी। देखा जाए तो मेरे पास समय ही समय था । दर्शनशास्त्र की पढाई मुझे ऐसी मुश्किल नहीं लगती थी कि कालेज के अन्य कार्यक्रमो में हिस्सा न ले सकू। घर की कोई ज़िम्मेदारी मुझ पर थी नही । मैं इन्ही सबमे लगी रहती। 12/प्रेम-कहानी कालेज में कई समितियां थी। उन्हीं में से एक समिति 'सागर-पार- छात्र-समिति' की मैं सचिव चुनी गई। उसका खास काम था । सागर-पार से आने वाले सभी छात्र-छात्राओं से सम्पर्क कर उनकी समस्याएं, उनका स्वभाव और सहूलियतों का पता लगाना मेरे जिम्मे था। उनके मनोरंजन के लिए कार्यक्रमों का आयोजन भी करना था। इनमें कई छात्र ऐसे थे, जिनके पूर्वज भारतीय थे और जो पीढियो से पश्चिमी अफ्रीका, मलेशिया, अमेरिका, मारिशस आदि सुदूर देशो मे नौकरी या व्यवसाय की खातिर जम गए थे। कुछ जापानी छात्राएं थी, कुछ तिब्बती। मैंने पाया ऊपर से वे भले ही विदेशी कपड़े पहने हुए थे, अन्दर टटोलने पर सबके सपने, सुख- दुख, सुविधा-असुविधा एफ-सी थी। सभी अपनेपन के प्यासे, मां, भाई- वहन की यादों से भरे, जरा-सा कुरेदे जाने पर बरसाती वादल से बरस पड़ते । घर-द्वार की याद आते समय मुझे लगता में भी सागर-पार से आई हू, इतनी दूरी दिल्ली और मथुरा के बीच है। जब यशस्विनी को पता चला मैं 'सागर-पार-छात्र-ममिति' की सचिव बन गई हूं, तव वह बहुत अधीर हो गई । दरअसल वह विदेशी चीजो की दीवानी थी । जापानी साड़ियां और छतरिया तो दिल्ली में कभी-कभी मिल जाती थी, लेकिन ट्राजिस्टर, टेपरिकार्डर और कैमरा अभी दुर्लभ थे । मुझे वैन्गर्भ में कोक पिलाते हुए यशा बोली, 'यार, कोई लडकी पटा कर अभी से मेरे लिए कमरे का इन्तजाम तो करा दी दो । गर्मियो में जो छात्राएं घर जाएंगी, उनमें से कोई भी आसानी से ला सकती है।' 'हिन्दुस्तानी कमरे में क्या खराबी है, क्या उसमें तस्वीर सुन्दर नही पाएगी?' 'नहीं रे, वहां की चीज़ की बात ही और है । अगली गर्मियों में जीजी की शादी है। रंगीन मूवी खीचेंगे। फिर अपने भी तो काम आएगा।' यशा और मैं कई बार साथ पिक्चर गई। दिल्ली की यशा और मथुरा की यशा में जमीन-आसमान का अन्तर था। यहां यशा हसी और चुहल का खजाना थी। कई बार हम सड़कों पर भटकते-भटकते ही इतना खुश हो लेते कि कही जाने की नौबत ही न आती। दिल्ली की दीवारें पढना हम दोनो का शुगल बन गया था। दीवारों पर जगह-जगह लिखा था, प्रेम-कहानी / 13 .. 'योग्य जीवन-माथी के लिए मिलिए : प्रोफेसर धर्मा, रंगड़पुरा, दिल्ली।' यशा मुझे कसकर च्यूटी काटती, 'चलो रंगड़पुरा चलें ।' मैं कहती, 'क्यो युनिवसिटी के ये वीस हजार लड़के क्या कम पडते है, जो रंगड़पुरा से दुढ़ाई शुरू की जाए !' वह कहती, 'नही यार, जरा चलकर देखें यह प्रोफेसर धर्मा पाक्ल- सूरत में कैसा लगता है । ज़रूर मेरे वाप-जैसा खबीम लगता होगा, तभी तो प्रोफेसरी छोडकर दलाली करता है।' देखा जाए तो हम दोनों की यौन-शिक्षा का पहला सबक इन दीवारों से ही शुरू हुआ। कई विज्ञापन पढकर हम सोचते रह जाते कि इनका क्या अर्थ है, पर फिर पाते कि समझना इतना मुश्किल नहीं है जितना कि पहले-पहल लगा था। एक और विज्ञापन जो समूची दिल्ली में लिखा पाया जाता, वह था, 'मदन-लोक फार्मेसी, कमजोरी का इसाग विजली से...।' थी तो मुझसे साल भर छोटी, पर यशा ने ही कहा था, 'जया, यह इश्तहार ऐसा होना चाहिए, 'मदन-लोक फार्मेसी-थके-हारे कामदेवों की यहा मरम्मत की जाती है।' यशा का मुंहफटपन मुझे उत्तेजक लगता था। वह मुझसे ज्यादा मुक्त थी और कुण्ठाहीन । जीवन से उसकी अपेक्षाएं भी ज्यादा थी। लेकिन अपने मां-बाप का रवैया उसे हमेशा सिन्न कर देता। 'तू अपने घर की इकलौती औलाद है जया, तुझे क्या पता चार लडकियो के बाप को अपनी बेटिया ब्याहने की कैसी उतावली रहती है । वे रिस्ता ढूढते समय यह नहीं देखते कि रिश्ता लडको के लायक है या नहीं, वे तो गिनती पूरी करते है । मेरी दोनो दीदियो के एक-एक कर ब्याह हुए तो पिताजी ने हर बार हाथ झाडकर कहा-'यह भी गई, अव बवी तीन । यह भी पार लगी, अब वची दो.. उनके लिए हमें कुएं में धकेलना या ब्याह में धकेलना एक बराबर है । बस दो पैर, दो हाथ का जीव होना चाहिए, इतना भर देखते हैं वह । वाय गाड, मैं तो ऐसे शादी नहीं करूंगी।' 'कर देंगे तो क्या करेगी?' 'आत्मदाह, कपड़ों पर तेल छिड़ककर जल महंगी, देरा लेना ! 14/प्रेम-कहानी पानिवार को मेरी क्लास जल्दी सत्म हो जाती थी, यशा की भी। हमने तय किया कि मद्रास कैफे में चलकर दोसा साएंगे, वहा से शंकर मार्केट जाएंगे। दरअसल शंकर मार्केट में एक दर्जी बहुत बढिया और सस्ते कपडे मीता था, साथ ही वक्त पर कपड़े तैयार कर देता था। यह तीनों दुर्लभ गुण एक ही दर्जी में ढूंढे थे यशा ने और अव आई० पी० होस्टल की तमाम लड़कियां उससे कपड़े सिलाने लगी थी । यशा बोली, 'मेरी मा ने मथुरा से झोले-जैसे ब्लाउज बनवा कर दे दिए है, उनमें एक की जगह दो लड़कियां भी घुस जाएं तो पता न चले।' मेरे ब्लाउज भी फीके पड़ने लगे थे। हम दोनो ने जनपथ से कपडा खरीदा और न्यू इरा टेलसं में घुस गए। दूकान में बड़ी भीड थी। टैलर- मास्टर ट्रायल रूम मे माप ले रहा था । मैं यशा के साथ अन्दर गई । उसने पहले यशा का माप लिया। वह इतनी जल्दी-जल्दी माप के अंक बोल रहा था कि मुझे लगा कि कोई उतनी जल्दी लिख ही नहीं सकता। फिर उसने मेरा माप लिया । उतनी ही जल्दी वह मेरा माप बोल गया । मैंने सोचा जरूर हम दोनों के माप गड्डमड्ड हो जाएंगे। यशा का बदन मेरी अपेक्षा ज्यादा गदराया हुआ था। लेकिन यगा को ये छोटी-छोटी बातें व्यापती नही थी। वह आलू की टिक्की खाने, बरामदे में अटक गई। उस दिन हम दोनों ने काफी मटरगश्ती की। फिर थक कर हम रीगल के सामने वाले मैदान में बैठ गईं। यशा ने कहा, 'यार, अगर तू मेरी पक्की सहेली है तो तेरी एक सलाह लेनी है।' 'वया? 'अगर कोई तुझे प्यार करे, बहुत प्यार करे तो जो वह कहे तू मान लेगी! 'क्या कहे ?' 'अरे वह नहीं जो तू समझ रही है । यार, सच्ची-सच्ची बताऊं। मेरी एक सहेली थी फरीदा । इसी साल वी० ए० पास कर वापस घर चली गई शिकागो ! वह पक्की सहेली थी। मेरे दो-चार फोटो भी उसके साथ चले गए । उसका बड़ा भाई है मुहम्मद । जब से मेरे फोटो देखे हैं, मुझ प्रेम-कहानी/15 ! पर दिलोजान से फिदा है। ऐसे-ऐसे खत लिखता है कि हाय ! तुझे क्या बताऊं, तू खुद ही पढ ले ।' उसने पसं मे निकाल कर एक नीला लिफाफा मुझे पकडाया । सत क्या था पच्चीस-तीम पन्ने का पोथन्ना था जिसे पढ़ने मे आध-पौन घण्टा तो कम से कम लगता। मैं झवती शाम देख कर डर रही थी कि घर जाने को देर हो रही है। पर जीवन में पहली बार किसी प्रेम-पत्र को हाथ लगाया था । उमे छुने मात्र से मेरे बदन में कंप- कंपी उठ गई । अन्दर ही अन्दर जिज्ञासा से मेरा बुरा हात था, फिर भी मैंने कहा, 'न बाबा, मैं नही पढती किसी दूमरे का सत! तुझ मुबारक !' यशा ने लिफाफा दुलार मे वापम पसं मे रख लिया, 'चल तुर्भ, मजमून ही बता दू । यार, उसने पहले तो सात दिनों के अपने सात ख्वाब बयान किए है । स्वाब मे कभी मेरे साथ रोम धूम लेता है तो कभी मिलान कभी न्यूयार्क तो कभी मैक्सिको । जाने कौन-कौन-सी जगहों के नाम लिखता है कि वहां पहुच उसने मुझे चूम लिया।' बात किसी और की, किसी और के लिए थी, लेकिन मैं ऊपर से नीचे तक दहक उठी। 'सातवा वाव बयान करते हुए तो उसने हद कर दी। कहता है उसने देखा दोनों समुद्र में तैर रहे हैं, दोनो ने अपने-अपने जज़बातो के सिवा और कुछ नही पहना है, अचानक तूफान उठता है। आगे लिखता है, मैं आपको कन्धो पर उठा कर भागने लगता हूं, भागता चला जाता हूं, भागता चला जाता हूं, किसी महफूज जगह की तलाश मे यहां तक कि ठोकर खा कर गिर पडता हू।' सुनाते-मुनाते यशा का चेहरा तप उठा था, उसकी मस्ती, चुलबुलापन सब गायव थे, वह महज़ एक अहसास थी, एक जिन्दा, कापता, फडकता अहसास । ऐसा लग रहा था जैसे ये लफ्ज़ अंगुतियां बन कर यशा की कलाइया जकड़े हुए थे अनजाने मे वह अपनी कलाइयां सहला रही थी। 'यशू, बातें तो बड़ी दिलफरेब हैं, पर वता इनका कोई अंजाम भी हो। इस साल तेरी पढाई पूरी होते ही तेरे पिताजी तेरे लिए एक सुन्दर, सुशील सजातीय वर ढूढ कर तेरे हाथ पीले कर देंगे। फिर तू क्या करेगी, बता. 16/प्रेम-कहानी 'अल्लाह कमम ! मैं या तो हत्या कर डालूगी या आत्महत्या।' 'मैं कई दिनों से सोच रही थी कि आखिर यशा इतनी उर्दू मे क्यों बोलने लगी है !' 'यार, ऐसी नफीस भाषा मे लिखता है फरीदा का भाई कि मर-मर जाती हूं मै । यों ही नहीं, फिल्म वाले उर्दू पर फिदा हैं । कम्बख्त खत के कोने पर इतना भर लिख देता है -आप कैसी हैं, कहां है? तो मन होता है अभी प्लेन पकड कर उड चलूं।' 'ऐसी बेवकूफी न करना। तू उसके बारे मे कुछ भी तो नही जानती, क्या करता है, कितना पढा है, कैसा स्वभाव है ? फिर तुझमे सिर्फ मुहब्बत फरमाता है या शादी का इरादा भी?' यशा गुलावी पड़ गई, 'इस बार लिखा है उसने, आप आएं तो मैं एयरपोर्ट पर ही मौलवी लेकर मौजूद रहूगा।' 'पर तू सोच, तेरे पिता, मा, दादी तुझे इतनी छूट देंगे?' 'सोच रही हूं. जया। पिता तो भनक पडते ही बन्दर की तरह खिवर जाएंगे मुझ पर । अम्मा को तू भी अच्छी तरह जानती है, सगी होते हुए भी हमेशा सौतेली बनी रही है । मुझे होस्टल मे भी इसीलिए पटका था उन्होने । जब नई-नई होस्टल आई थी, तब रातो को अकेले डर लगता था, इसी फरीदा से लिपटकर सुकून पाया करती थी तव। इन्ही उलझनों मे पढाई-लिखाई आजकल चौपट हो रही है, पता नही पास भी हो पाऊंगी या नहीं।' 'यह नफीम उर्दू तेरे पल्ले पड जाती है, मैं अभी भी खत बारे में सोच रही थी। 'नही यार, अभी उस दिन हिन्दी-उर्दू डिक्शनरी खरीदकर लाई, तब तो अपना मुहब्बतनामा समझ में आया।' मुझे यकायक अपना आप बड़ा अकेला और अभागा लगने लगा। यशा से साल भर बडी होने पर भी मेरे जीवन मे ऐसी एक भी घटना नहीं थी, जो मै गुपचुप अलमारी मे बन्द रखना चाहू । मेरे अन्दर एक बियावान सहसा भन्नाने लगा। प्रेम-कहानी/ 17 मैं उठ खड़ी हुई, 'हाय, आज तो बहुत देर हो गई। जाने आण्टी कितनी परेशान हुई होंगी। हमें विपरीत दिगाओं में जाना था। यशा नौ नम्बर वम की क्यू में खड़ी हो गई और मैं इक्कीस नम्बर में। जब मैं घर में घुसी, तव अच्छा-खासा अंधेरा हो गया था। आण्टी मुंह फुलाए चौके में कुछ सटर-पटर कर रही थीं । अंकल अपनी वर्कशाप से बाहर बनियान और तहमद में खिड़की के पास बैठे बाहर देख रहे थे। मैंने आते ही बताया कि मुझे कहा देर हो गई और कैसे । आष्टी ने धप से लाकर खाने की ट्रे रख दी, 'हमारी वला से जहां चाहे, जिसके साथ घूमो-फिरो, लेकिन फिर यह न हो कि लोग कहें, आण्टी के यहां काम कर-करके लाडो रानी फेल हो गई। मुझे अपनी इस नासमझ आण्टी पर बडा तरस आया। फेल-पास तो मेरे जीवन का खतरा था ही नहीं। हमेशा रिकार्ड तोड़ने वाली मैं ज्यादा से ज्यादा धुरा परीक्षाफल लाती तो बस यही कि युनिवर्सिटी पोजीशन न आ पाती। लेकिन इस वक्त चुप रहना बेहतर था। अंकल बोले, 'तुम्हें मुबह बता कर जाना चाहिए था।' स्पष्ट ही दोनों को बुरा लगा था। इसका अन्दाज मुझे था। लेकिन यह अनुमान मैंने बिल्कुल नहीं किया था कि मेरे ऊपर बेवजह दाक भी किया जा सकता है । पापा-ममी की विगेपता थी कि आज तक उन्होंने मेरे सच को झूठ नहीं समझा। मन खिन्न हो आया। खाना खाने की इच्छा खत्म हो गई। अंकल बोले, 'बाहर खा आई लगती है।' सफाई देनी मुझे हमेशा नागवार रही है। मैं चुपचाप किताब लेकर लेट गई। तभी विटू ने कहा, 'ममी बत्ती बन्द कर दो, नीद नहीं आ - दी। आपटी ने वर्तन समेट, भटपट बिजली बुझा लो, हो गई पढाई, मैंने मोचा । भुभताकर बिटू के साथ लेट गई। 18/प्रेम-कहानी जाने कितनी देर नीद नहीं आई। कमरे में याकी सब सो रहे हों और एक आप जाग रहे हों तो एफ अजीव भय लगता है, सूनेपन फा। हरेक के गुर्राटे सुनते, ढोले बदन देखते आप कितने अकेले हो जाते हैं। छह साल के विट्ट ने चारपाई का अधिकांश हिस्सा अपनी टागों से हथिया लिया था। पाटी से लगी लगी मैं न जाने क्या-क्या बेसिलसिला गोचती रही, ममी-पापा का अकेलापन, बम्बई के ग्राफर्ड मार्केट में देगे हुए मंजीर, अपने मेन्सेस की तारीख, ट्यूटोरियल का पहला पंरा, बलराज माहनी की आवाज, यशा या पागल प्रेमी.."इन्ही दिमागी तस्वीरो को देसते-देखते आंस पता नहीं कब लग गई। । यडी गहरी नीद रही होगी, इसीलिए बडे भटके से टूटी। दरअसल हुआ यह कि नीद में यकायक लगा जैसे कोई मारे बदन का माप ले रहा हो । आभास नीद के समुन्दर में डूबा, उतराया, फिर ऊपर आ गया। लगा मैं दर्जी की दूकान पर है। लेकिन यह कूल्हे और जांघ के दरम्यान मंसा माप ? ""अचकचा कर बैठी हो गई। देखा-पायताने अंकल मिटपिटाए खडे हुए थे। अंधेरे में भी उनकी आतंकित, सिसियाई आकृति मुझो दीख रही थी। मैंने मुंह पलटकर आंटी की ओर देखा । गायद मैं जोर से पुकारना चाहती थी। पर आवाज को न जाने क्या हो गया था। उसमे से जान ही निकल गई थी। तभी मुझे अपने पैरो पर स्पर्श का स्पप्ट अहसास हुआ। अकल मेरे पैरो पर सिर टिकाए हुए थे। पता नहीं कैसे, म्यामोशी ही खामोशी में, क्षण के अणु अंश मे यह इतनी बड़ी दुर्घटना हो गई। अंकल फौरन विस्तर में छुप गए और उन्होने दीवार की तरफ मुंह कर लिया। मैं सुबह तक जागी रही। मुझे लगता रहा अभी मुझे, उलटी आएगी या बुखार चढ़ेगा या मेरे दारीर का कोई हिस्सा काला पड़ जाएगा या मेरे मुंह मे बदबू होगी. मेरा कोई अनिष्ट होने ही वाला है । नफरत से वदन काप रहा था।

। सुबह आण्टी ने हमेशा की तरह हम सबको चाय दी तो मैं दुविधा मे पड़ गई। आण्टी की खीझ भरी 'लोन' पर प्याला मैंने ले लिया। माय सट्टी लग रही थी और प्याला चिपचिपा। मैं बडे गौर मे आण्टी को देखती रही । विस्तरे उठाती, दरवाजा खोलती, गरम पानी की बाल्टी लाती, बाजार से सब्जी का भारी थला उठाकर लाती मेरी आष्टी आखिर किम विश्वास पर इतनी मशक्कत करती थी। फिर वह पसीने से भरा चेहरा लिए अंकल के जूते पालिश करने लगी। मुझे उनपर क्रोध और तरस एक साथ आया। मैं बड़ी मुश्किल से वे जूते उनकी गोद से उठाकर दूर फेंकने की अपनी इच्छा पर काबू पाने की कोशिश कर रही थी। बिटू और अप्पू स्कूल के लिए तैयार होते-होते अपने पापा को स्कूल में हुए जादू के खेल का हाल सुना रहे थे। उनके अंग-अंग में सवेरे की स्फूर्ति समाई हुई थी। यह नन्हें-नन्हे इलाही लमहे जो अपनी गृहस्थी में ही नसीव होते है, अभी कुछ घण्टे पहले अंकल किस तरह अपने बूट के नीचे कुचलने जा रहे थे। मेरी आण्टी जिन्होंने न जाने कितना शीत-ताप सहकर इस मकान को घर बनाया था, कितनी बेवकूफ बनी थी अपने विश्वास में। जिसे वह पति मानती थी, जिसके बच्चो की वह मां थी, वह महज एक लपलपाता हुआ जिस्म था। मुझे लगा अंकल के मन में सोई हुई आण्टी और मुर्दा पडी आण्टी के बीच कोई फर्क नही था । सम्पर्कों के बारे में कोई ज्ञान न होते हुए भी मुझे यह जरूर लग रहा था कि अंकल ने आण्टी के अधिकारों का अतिक्रमण किया था। मुझे याद आया पिछले साल हमारे पड़ोस में रह रहे एक युवक ने अपनी पत्नी की मृत्यु के ठोक हफ्ते भर वाद अपनी साली से विवाह कर लिया था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि आदमी की वह कौन-सी भभक थी, जिसके आगे सम्बन्धो की शाश्वतता भी सिर पीट लेती थी। मैं इस घर को, बच्चों को, आण्टी को देखकर हद दर्जा भावुक हो रही थी। मुझे चिढ हो रही थी उम आदमी से जो सामने बैठा हजामत बना रहा था, जिसके सिर के दस-बीस सफेद बाल मुझे यही में बैठे-बैठे साफ दिखाई दे रहे थे। और जिसके कारण पिछले दिनो आण्टी ने अबॉर्शन कराया था व पीली पड़ गई थी। रात की खिसियाहट इस चेहरे से एक- 20/ प्रेम-कहानी प्रै-1 दम गायब थी, हजामत के साथ-गाथ ही शायद उसने उसे भी छीलकर उतार दिया था। एक जिम्मेदार आदमी की हैमियत से अंकल बंटे अपने दैनिक कार्यक्रम निपटा रहे थे, इम वात मे बिल्कुल भेखबर कि उन्होंने मिनटों में मुझे कितना ध्वस्त कर डाला था। मैं जल्द तैयार होकर विश्वविद्यालय चली गई। लेकिन वहां पहली बार किताबो में मन नहीं लगा। मन उड़-उड़कर रात की बात पर पहुंच जाता। मुझे यशा से बेहद ईयां हुई । एक उमका अनुभव था, पहले प्यार का वह पागल मुहब्बतनामा; एक मेरा तजुर्वा था-तलखी, तनहाई और तोवा से भरा हुआ। इस क्षण मुझे लग रहा था कि शायद अब ताउम्र में प्यार के काबिल नही रहूंगी या गायद मदं प्यार के काविल नहीं होते। इम एक वारदात के बाद मुझे लग रहा था मर्दो के चेहरे, चेहरे नहीं, घुले-पुंछ श्यामपट होते हैं, कुछ भी लिखो, कुछ भी मिटा लो। सुबह उठो, कपड़े बदलो, शेव करो, सब माफ ! एक बात तय थी। अब आण्टी के यहा रहना नामुमकिन था। दोपहर को मेरा मन घर लौटने को जरा भी नहीं हो रहा था। यह सब घर पर भी नहीं लिखा जा सकता था । आण्टी को बताना भी असम्भव था । कई घण्टे भयानक पेशोपेश में विनाकर मैंने अन्तत: चार बजे शादीपुर डिपो के लिए बस पकड़ी। आण्टी बैठी स्वेटर बुन रही थी। उनके स्वभाव मे सरतता और मैदा कुछ इस कदर घुले-मिले थे कि मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि ममी के पास नहीं हूं। आज भी मुझे देखते ही वह उटी श्रीर. माना गर्न कर परोस दिया। मेरा कलेजा मुह को आ रहा था । उनी शिमलवान, महज हंसी और वेफिक्र वातें मेरी जुबान पर ताला डाटादत मा. पोह के बाद मैं बस इतना कह सकी, 'आण्टी गाथ होस्टल में कमरा मिल रहा है । यहां मे बार बारी जाती हूँ, आप कहें तो मैं चली जाळं : आधार पर मैं इतना बडा झूठ बोल गई । अब मुझे gird आना है, मैं बुर भी नही जानती थी, सिर्फ एक बार भी नही थी, यहां नहीं रहना है, फिलहाय PARTI मना है, .? ; ;ނަތިދި ކިބޯ को निश्छल आंखो से दूर कही जाना है।' आण्टी ने यह बात गाम को अंकल से कही। 'अकल ने कुछ नहीं कहा, सिर झुकाए दाजिस्टर में कन्डेन्सर फि करते रहे । आप्टी बोली, पहले हम घर चिट्ठी डाल लें, जवाब आ जाए तव चली जाना।' मैंने कहा, 'जवाव आता रहेगा । तत्काल नहीं गई तो कमरा हाय से निकल जाएगा। मेरी मुद्रा देखकर आण्टी ने मुझे समझाने की कोशिश छोड़ दी। मेरे जाने की बात बच्चों को भी पता चल गई। घर के वातावरण में मुझे एक बदलाव नजर आ रहा था। वह शायद इसलिए भी था कि मेरी चारपाई सीढ़ियो के पास वाली दुछत्ती में रखवा दी गई थी। जाने की वात कहने के बाद से ही मै उस घर के लिए 'गई हुई हो गई थी। सोमवार को ट्यूटोरियल के लिए कालेज जाना होता था। कालेज के दर्शनशास्त्र विभाग के अध्यक्ष हमारी आखिरी क्लास लेते थे। हफ्ते में दो ही दिन हमे डेढ-डेढ घण्टे के लिए कालेज जाना होता था । कालेज की भलासी की खासियत यह थी कि हमारी ये क्लामें ज्यादातर कैप्टीन के लॉन पर हुआ करती थी और कॉफी या कोक पीते हुए हम पढा करते। उस दिन क्लास खत्म होने के बाद मैं विभागाध्यक्ष के साथ उठ खड़ी हुई। कैण्टीन-लॉन से स्टाफ रूम तक के रास्ते मे, संक्षेप में मैंने उनसे अनुरोध किया कि किसी तरह मुझे होस्टल में जगह दिलवा दें, नहीं तो मेरा आगे पढ़ना मुश्किल होगा। मैंने यह भी कहा कि कुछ बातें ऐसी हैं, जिन्हें मैं खोलकर कह भी नही सकूगी। प्रोफेसर समझदार थे। उन्होने प्रिन्सिपल से बात करके एक डबल रूम में मेरे लिए तीसरा बिस्तर डलवा दिया। यह व्यवस्था मेरे लिए और भी अच्छी थी, क्योंकि जब तक मुझे उबल रूम में उचित सीट नहीं मिलती तब तक इस अतिरिक्त प्रवन्ध का 22/प्रेम कहानी कोई किराया देय नहीं था। मैंने घर पर भी यही लिख दिया, जो प्रोफेसर से कहा था और सब सामान लेकर होस्टल आ गई। कमरे को दोनों लड़कियों ने मुझे उपेक्षा से देखा और अपने-अपने में व्यस्त हो गई। डवल रूम में तीसरा बिस्तर देख उन्हे चिढ़ होनी स्वा- भाविक थी। मैंने अलमारी में किताबें टिकाई और वाटर-बॉटल में पानी भर लिया। यहां बडी सहुलियत हो गई। विश्वविद्यालय पहुंचने में न तो थकान होती थी, न देर । न ही लायब्रेरी में बैठने पर बस छूट जाने की धुकपुक । आत्मनिर्भर व आजाद रहने से जीवन में एक नई ताजगी आ गई। वक्त- बेवक्त दिल्ली की धूल फांकने में, बस की धक्का-मुक्की में, जनपथ की पटरी-शापिंग में एक निराला मजा आने लगा । यशा इस सबमें साथी थी ही। होस्टल को अन्य लड़कियो से भी पट निकली। कभी-कभी हम बीस- बीस लड़कियां इकट्ठी निकलती और जिस दुकान में घुसती दुकानदार की नाक में दम कर देती । बस में बैठती तो हमारी ही-ही, हा-हा में और कुछ सुनाई न पड़ता। कालेज में 'सागर-पार-छात्र-समिति' के उद्घाटन के अवसर पर परम्परानुसार मभी कालेजों के सागर-पार-छात्र आमन्त्रित किए गए। अमेरिकी दूतावास के राजदूत मुख्य अतिथि थे। सांस्कृतिक कार्यक्रम में नताशा ने जापानी नृत्य दिखाया, केटी व प्रवीणा ने अफ्रीकी जनजाति के लोकगीत सुनाए और कुछ लड़कों ने जैज का मिनी संस्करण प्रस्तुत किया। मैंने सचिव की हैसियत से आगामी कार्यक्रमों का प्रारूप बनाते हुए रिपोर्ट पढ़ी । इसके बाद पार्टी थी। कालेज-हाल में मेजें जोड़कर एक लम्बा बुफेकाउण्टर बना लिया गया था। वह शाम दिलचस्प चेहरों का जमघट थी। प्रिन्सिपल भी हमारे साथ स्वागतार्थ खड़े थे। मुख्य अतिथि द्वारा पहल करने पर पार्टी शुरू हुई। हम लोगों नहाल बिरजोर सझम बाजार था। रातभर अम कहानी/23 - आपस छह छात्राओं ने मिलकर कलश रंगे थे । सूखी पत्तियों व ताजे फूलों से हमने दीवारों पर आकृतियां बनाई थी। मेज पर वडी-बडी प्लेटो में सैण्डविचेज, वेफर्ज, तले काजू, तली मछली और चीजलेट्स के ढेर थे। रंगविरंगे कुल्हड़ों में कोक डाला गया। लेकिन युवा लोगो मे से अभी किसीको मेज पर जाने की जल्दी नही थी। उन्होंने कुछ कानाफूसी की । एक थाई लड़की व अरव लडके ने आकर प्रिन्सिपल से नृत्य के लिए अनुमति मांगी। मुझे लगा कि प्रिन्सिपल अभी आपे से बाहर हो जाएंगे और उनकी त्यौरिया स्वयं अस्वीकृति दे देंगी। पर उन्होने हंसते-हसते सहमति मे गर्दन हिला दी। फिर क्या था ! रेकार्ड- प्लेयर पर वे-वे धुने बजाई गई कि बैठे-बैठे हमारे पैर थिरक उठे। कसे-ढीले लिबासों में शेक और शूग व बग करते हुए जोड़े बहुत खूब- सूरत लग रहे थे। प्रिन्सिपल कुछ देर बैठे, फिर यह कहकर कि उन्हे एक जरूरी मीटिंग में पहुंचना है, चले गए। वह यह भी ताकीद कर गए कि पार्टी दस बजे तक हर हालत में खत्म हो जानी चाहिए। मैंने कुछ देर के लिए अपने को अजीब स्थिति में पाया। वेयरों के अलावा मैं ही थी, जो नृत्य नही कर रही थी। बाकी सब जल्दी-जल्दी पार्टनर बदलते, थिरकते मगन थे। सभी लड़के गहरे रंगों के सूट्स मे थे । लडकियां अपनी-अपनी राष्ट्रीय पोशाको मे गजव ढा रही थी। माहौल में जलवा और जोश था। सेण्ट की उत्तेजक गंध, रेशम की सरसराहट, युवा पसीने की दिलफरेब दमक, सब मिलाकर एक जादुई असर डाल रहे थे। मैं अपने को सम्भालने की पूरी कोशिश कर रही थी, क्योकि मुझे पता था कि यहां से जाकर मुझपर फिर धुंधली उदासी छा जाएगी। यों मैं मूलतः मनहूस नहीं थी, फिर भी न जाने क्यो कभी-कभी लगता था कि मेरे व्यक्तित्व का आधा हिस्सा खुश और आधा उदास ही रहता है। मैंने मुट्ठी में चार-पांच काजू दबाए हुए थे। जब एक काजू का स्वाद मुंह से बिल्कुल खत्म हो जाता और जुबान फिर से फीकी हो जाती, मैं दूसरा काजू मुंह में डाल लेती। .24/प्रेम कहानी नभी गहरे भूरे रंग के सूट में एक लम्बा-चौडा खूबसूरत लडका मेरी तरफ आया, और बोला, 'इफ यू डोण्ट माइण्ड...' मैंने बीच में ही कहा, 'माफ कीजिए, आय डोण्ट डान्स !' उमने मुझसे भी जल्द कहा, 'आय डोण्ट वाण्ट टु डान्स, मे आय जायन यू !' उसने हाथ आगे बढाया। मैं बेहद अटपटा गई । दाएं हाथ में काजू थे । आधे उठे हाथों से मैंने जल्दी से नमस्ते कर दी। भूरे सूट वाला लड़का मुस्करा दिया, 'आप पहली लड़की है जिसके साथ मुझे नाचना नहीं पड़ा, शुक्र है । नहीं तो पिछले डेढ घण्टे से जैसे ही मैं किसी लडकी से बात करने की कोशिश करता हूं, वह नाचना शुरू कर देती है।' मैं हंसी। वह बोला, 'एक अच्छी मेजबान की तरह क्या आप मुझे कुछ साने के लिए नहीं कहेगी।" मैं ऊपती हुई उठी और उसे खाने की मेज़ तक ले आई। हम लोग अपनी-अपनी प्लेटें लेकर वापस उसी जगह जब आए, एनट वहां बैठी जोर-जोर से होफ रही थी। भूरे सूट वाले लड़के ने धीरे-से उसमे कुछ कहा और वह मुस्करा दी। मेरी ओर मुखातिब होकर वह बोला, 'आप फ्रेंच समझ लेती हैं ?' 'मैं न फ्रेंच समझती हूं न कानाफूसी,' मैंने कहा। 'आप चाहें तो मैं आपको दोनों सिसा दूंगा, वह शरारत से मुस्कराया, फिर गम्भीर हो गया, 'दरअसल मेरे देश की भाषा फेंच है।' मैंने गौर से देखा, वह मुझे जरा भी फ्रोसीमो नहीं लगा। बल्कि उसका रंग गहरा भूरा था, उसके सूट की तरह । दोनों कुछ इस अन्दाज मे घुलमिल रहे थे कि एक-दूसरे के लिए अनिवार्य और अविभाज्य लग रहे थे। मुझे यह लड़का शत-प्रतिशत भारतीय लग रहा था। उसने कहा, 'मारिशस मे रोजमर्रा का सब काम फ्रेंच में ही होता है। फ्रेंच अथवा भोजपुरी।' 'यह तो भेलपुरी से भी विचित्र मिक्मवर है।' में हंसी। उसने पूछा में क्या कर रही हूं। प्रेम कहानी/25 मैंने बताया। 'तव तो सबसे पहले आप नीत्शे के स्पेलिंग बताइए।' 'आप क्या करते हैं ? 'मैं वीमार को और ज्यादा बीमार व स्वस्थ को और अधिक स्वस्य बनाने का कारोबार शुरू करने वाला हूं। मैं इस वर्ष हास्पिटल में हाउस- जॉब कर रहा हू । यहा अपनी दोस्त मेरिना के साथ आया हूं। इसके बाद मुझे वापस चले जाना है, घर ।' मैंने मारिमस द्वीप को एटलस में एक बिन्दु भर के रूप में जाना था। उसके बारे मे कभी जिज्ञासा भी नहीं हुई । भूगोल मे मेरी दिलचस्पी शून्य । नाचने वाले जोड़े बिखर रहे थे। कई थककर बैठ गए थे। उनके माथे पसीने से बचेहरे उल्लास से चमक रहे थे। मैंने सबसे अनुरोध किया कि वे कुछ खाएं । जल्द ही एक छोटी भीड़ खाने की मेज के पास जमा हो गई। मैं चाहती थी कि भूरे सूट वाला लड़का अपना नाम-पता दे ताकि बातचीत मे सुविधा हो जाए। लेकिन वह मुझसे ऐसे बोल रहा था जैसे हम वर्षों से परिचित हो। जाते समय उसने मुझमे हाथ मिलाया और हम दोनों हंस पड़े। उसने कहा, 'शायद आपसे फिर मिलने का मौका मिले!' यशस्विनी अपने कालेज-ट्रप के साथ गुजरात का भ्रमण कर लौटी नो ने उसे पार्टी के बारे में बताया। उसने गुजरात के दिलचस्प वाकये सुनाए । उसने बताया कि यहां उन सबने गरवा और टिपणी नृत्य देखा। वे अपने साथ मंगडा और गिद्दा की टीम लेकर गए थे। यह कार्यक्रम अखिल भारतीय तोकसंस्कृति प्रतियोगिता के अन्तर्गत गुजरात विश्व- विद्यालय द्वारा आयोजित किया गया था। यशा बोली, 'यार गरबा तो बड़ा बोर होता है । हां, टिपणी नृत्य में डण्डों की सम-आवाज जरूर रास का मजा देती है। पर उस रास में 26/प्रेम कहानी यह रंग कहां, जो अपने वृन्दावन में बांकेबिहारीजी के मन्दिर की रासलीला में होता है। 'अपनी-अपनी खिचड़ी सभी को सौंधी लगती है, मैंने कहा। 'लेकिन मैं तो पंजाब की खिचड़ी मे शामिल थी।' 'सच तो यह है यशा, कि घर से दूर, दिमागी तौर पर अब न तो हमारा कोई प्रान्त बचा है, न धर्म । छात्रों की जाति भी अन्तराष्ट्रीय जाति होती है । हां और सुना तेरे आशिक की क्या खवर है ? अभी तुझे लिखता है या कोई मेम-वेम ढूढकर ठण्डा हो गया है !' 'मत पूछ जया, हाल दिले-दीवाने का! लौटकर आई तो तीन खत मिले उसके । देख, कितने डालर का तो डाका-टिकट लगाया है ! और यह ग्रीटिंग कार्ड...' एकदम लाल रंग का लम्बा-सा कार्ड था, उसके अन्दर एक नन्ही-सी हरी रवड़ की बोतल चिपकी हुई थी। नीचे लिखा था, 'दिस माइट सर्व यू इन माय एबसेन्स' (मेरी गैरहाजिरी मे शायद इससे तुम्हारा काम चल जाए)।' गजब शरारत थी। शब्दो-ही-शब्दों मे उसने यशा को सितार-सा झनझना डाला था। उसके चेहरे पर आरोह-अवरोह दोनो थे । मुहम्मद ने यशा को अपना चित्र भी भेजा था। पारिवारिक चित्र था वह । टी० वी० के इर्द-गिर्द सभी बैठे हुए थे, उसकी बहन फरीदा, मां और छोटे भाई-बहन । वाकई मुहम्मद चित्र में बेहद हसीन और जहीन लग रहा था । रंगीन फोटो मे लाल टी-शर्ट उसके कसे बदन पर खूब फब रहा था। वह तो बिल्कुल स्पोर्टसमैन लग रहा था । कौन कह सकता था कि यह लडका इतने शायराना खत लिख सकता है। यशा कहने लगी, 'इसकी आंखें देख, झील-समन्दर सब भूल जाएगी।' मैंने फिर से देखा । वाकई मुहम्मद की आंखें एक ख्वाब थी। इतनी कशिश, इतनी गहराई, इतना रंग-राग उन आंखों में था, सागर मैं सुराही का असर। यशा बोली, 'जब से फोटो मिली है न, मै मोई नही हूं। जाने कितने प्रेम कहानी /27 घण्टे टकटकी लगाकर बैठी रही हूं। अब इसके सिवा मुझे कुछ दिख ही नही रहा । मुझे तग रहा है, मेरे जिस्म के हर मोड पर इसकी आधे चिपक गई है, मुझसे जुड़ गई है। मुझे लग रहा है यह लड़का मुझे आंखों-ही-आंखो में प्रेगनेंट कर देगा।' कहकर यशा गुलावी पड गई। इस बार उसकी गुलाबी रंगत देख मैं पीली नहीं पडी। वात तो कुछ भी नहीं थी, फिर भी जाने क्यो, लग रहा था, आज मैं उसकी स्थिति बेहतर समझ रही थी। जोबन वाकई बहुत सुन्दर था। जीने योग्य, हंसने, दौडने, खिल. खिलाने योग्य । मुझे हर चीज में अर्थ नजर आने लगा था। चलते-चलते लगता था मेरा मस्तक ऊंचा हो गया है या मेरा कद बढ रहा है या में किसी विराट ज्योति का एक प्रदीप्त खण्ड है । मुझे लगता सुख मेरी अगु. लियों की पोरो तक आकर सनसना रहा है । हर समय लगता कि कुछ शुभ व सुन्दर होने जा रहा है। विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी ब्रिटिश काउन्सिल ने पुस्तको की प्रदर्शनी आयोजित की थी। ब्रिटिश काउन्सिल लायब्रेरी में ही प्रदर्शनी लगी थी। पहले तो हमारी पूरी क्लास ने तय किया था कि साथ ही जाएगे लेकिन फिर एक-एक कर दो-चार छात्र देख पाए और आकर उन्होंने घोषित कर दिया कि दर्शनशास्त्र पर कितायें कुछ खास नहीं हैं। लिहाजा सयका जोरा टण्डा पड़ गया। पर मैं फिर भी जाना चाहती थी। एक तो मुझे वह लायनरी व उसका माहौल पसन्द था, दूसरे मैं यह मानती थी कि मतलव की वितायें सोज निकालनी हरेक के बस की बात नहीं होती। लेकिन इम अन्वेषण में यशा साथ जाने को राजी नहीं हुई । दरअमल आजकल उसे हर वक्त साकिए का इन्तजार रहता । होस्टर की लकियां उमे चिढ़ाया करती, 'तू तो डाकिए में ही प्रेम कर बैठी है ' किताबें यास्विनी को कभी भी आकषित नहीं करती थी। अपने पाठ्यक्रम के 28/प्रेम कहानी अतिरिक्त अन्य किताबों में उसका सरोकार नहीं था । वह पत्रिकाएं भी बस उलट-पलट कर छोड़ देती थी। उमसे पूछना भी बेकार था। युनिवमिटी में प्रदर्शनी का पोस्टर देख में चली गई। कुछ किताबें उपयोगी थी। मैं डायरी में वे तारीखें नोट करने लगी जब वे कितावे इगु होने के लिए रिलीज की जा रही थी। तभी पोछे से . एक पहचानी आवाज ने कहा, 'एक्सक्यूज मी...' . मैं मुड़ी। वही लड़का था । आज भूरे सूट की जगह, ट्राउजर्स और बुशर्ट में। एक बार फिर मिल जाने पर हम दोनों को खुशी हुई। उसने कहा, 'यहा किताबें सेल पर भी होनी चाहिए थी।' 'क्या आप लायरी के सदस्य नहीं हैं ?' 'है, पर एक-एक किताव के लिए हफ्तो भटकना मैं एन्जाय नहीं करता।' तभी लायनेरी के एक सुपरवाइजर ने आकर धीमे से कहा, 'आप सभी लोगों के अध्ययन में बाधा डाल रहे हैं।' मैं अटपटा गई। उसने बुरा नहीं माना। अधिकारी को 'सॉरी' कहकर मुझसे बोला, 'इफ यू डोण्ट माइण्ड...' और लायरी का दरवाजा खोलकर मेरे निकलने का इन्तजार करने लगा। असमंजस-ही-असमंजस में मैं बाहर आ गई। उसने कहा, 'यह बोरि- यत और असन्तीप अव कॉफी के बिना हट नहीं पाएगा।' मैं सोच ही रही थी कि वापस लायब्रेरी जाने की अनुमति मांग लू या सहेली-संग होने का बहाना बना दू कि वह सीढियां भी उतरने लगा। लायनेरी का दरवान मुझे कौतुक-से देख रहा था । जब हम स्कूटर से उतरकर क्वालिटी में घुस रहे थे, मुझे यह संकोच हो रहा था कि हमे एक-दूसरे का नाम तक नही पता। मेरे संकोच से वेखवर वह वैठते ही मुझे मारिशस में रहने वाले भारतीयों के बारे में बताने लगा, 'वे बड़े मेहनती होते हैं, आज उनके पास फार्म है, शरावसाने हैं, होटल है, फैक्टरियां है, लेकिन एक वक्त था प्रेम कहानी | 29 । . यहा?' उनके पास कुछ भी नहीं था, अपने दो हाथों के सिवा, कहते हुए उमने अपने चौड़े, मजबूत हाथ मेरे आगे फैला दिए । मैं एकबारगी काप उठी। इतनी नजदीक से दो युवा पुरुष-हाय मैंने पहले कभी नही देखे थे। उसको तुलना में मेरी बाहें वडी कृश और कोमल थी। मैंने उन्हें साडी में अच्छी तरह लपेट लिया । मैंने कहा, 'हाउस-जॉब खत्म कर आप वहां जाकर प्रेक्टिस करेंगे या 'मैं अपने देश जाकर प्रेक्टिम करूंगा । मेरी प्रतिभा में मेरे देशवासी फायदा उठाएंगे । यहा तो लाखों डाक्टर हैं, एक के चले जाने से कुछ नही विगडेगा।' 'इसीको तो ग्रेन-ड्रेन कहते हैं, मैंने कहा। 'गलत, मैं तो पढने के लिए सागर-पार से आया हूं, पढकर वापस सागर-पार चला जाऊंगा। मेरे लौट जाने से ब्रेन-ड्रेन कैसे होगा? हा, अगर तुम-जैसी जहीन लडकी अपना देश छोड़ वहा वस जाए तो 'ब्रेन- ड्रेन' होगा, सिर्फ 'ब्रेन-ड्रेन' क्यो 'चार्म-ड्रेन' भी !' वह मुस्कराने लगा। मैं कानो तक दहक उठी। यह उसने क्या कह दिया। यह मेरी अठारह रुपये की साडी, उन्नीस साल की उम्र और बीस मिनट के परिचय की क्या इससे बडी कोई सराहना हो सकती है ? लेकिन अब इस वक्त मैं इसका नाम कैसे पूछू, इमका कमरा नम्बर और इसका पता ! चाय खत्म होते ही हम बाहर निकल आए। उसने कहा, 'उसकी ड्यूटी आज वच्चों के वार्ड में है, समझो सारी रात पैरो पर रहना होगा।' 'क्यो ?' मैं इस विषय में बिल्कुल कोरी थी। 'वच्चो का हाल कोई नहीं बता सकता, अभी सामान्य होगे, अभी क्रिटिकल हो जाएंगे, अभी एक्सपायर्ड !' । 'वह कैसे?' 'वच्चो में सुधार और विगाड दोनों ही एक्सफैक्टर्स हैं। ऊपर से उनके नासमझ मा-बाप मिसाल के तौर पर बच्चे को गेस्ट्रोइण्टराइट्स हो गया 30/प्रेम कहानी है, गरीर का पानी उल्टी और दस्त से निकला जा रहा है, पर पानी नही पिलाएंगे। डिहाइड्रेशन हुआ नही कि वच्चा गया।' 'यह एक्स-फैक्टर कैसे हुआ, यह तो डिहाइड्रेशन हुआ।' 'पर कई बार डिहाइड्रेशन नहीं होता, तव भी बच्चा भर जाता मैं बहुत डर गई। अभी तक इतनी मोहक बातें करने वाला यह आदमी अब कसी क्रूर बातें कर रहा था। मैने कहा मेरे सामने अगर किसी की मौत हो तो मैं भी माथ ही मर जाऊं।' वह एक समझदार आदमी की तरह हंसा, 'लडकियां मरने को लेकर बहुत भावुक होती हैं। 'और लड़के ?' 'लडके, लड़कियो को लेकर भावुक होते है,' उसने कहा । फिर उसे जाने की जल्दी हो गई। उसने निहायत डाक्टरी अन्दाज में घडी देखी और दोनो के लिए दो स्कूटर रोके । अपने स्कूटर पर बैठने से पहले उसने कहा, 'सी यू सैमेडी नेक्स्ट टु नेक्स्ट...' 'क्या,' मैंने अचकवाकर पूछा। 'अगले-से-अगले सटर-डे, यही ।' उसका स्कूटर रवाना हो गया । मैं अनश्चित-सी अपने स्कूटर पर बैठ गई। उसने समय नहीं बताया था। । आज था मंगलवार । कल के लिए मुझे ट्यूटोरियल लिखना था। इम्तहान भी शुरू होने वाले थे, तैयारी करनी थी। एक किताव जो रिजर्व सेक्शन से सिर्फ एक दिन के लिए मिली थी, पढ़कर नोट्स बनाने थे। घर चिट्ठी लिखनी थी, सारे कपडे इस्त्री करने थे। और इस अनाम लड़के ने मुझे बहुत झनझना दिया था। जब होस्टल पर स्कूटर का, तब झटका-मा लगा। आल्हाद की घडी कितनी तेजी से चलती है । अहाते में कुछ लडकियां शाम के वक्त भी किताबें हाथ में लिए चहलकदमी करते हुए पढ रही थी । वेवकूफ', प्रेम कहानी/31 मैंने मन-ही-मन कहा, 'इस तरह तो अब तक का पटा-लिसा भी चौपट हो जाएगा।' मेरा मन हो रहा था मैं जोर-जोर में किसीसे कहूं, देसो में सुश हू, मुझे आज एक बेहद अच्छे लडके ने एक बेहद अच्छा कॉम्पलीमेन्ट दिया है। इसके आगे नोवल पुरस्कार भी क्या चीज है ? लेकिन यह मव किसीसे कहना मुश्किल था। मैंने देखा किसीको इम सबसे सरोकार नहीं था। अपनी खुशी मे भी मैं उतनी ही अकेली थीं, जितनी अपनी उदासी मे हुआ करती थी। बरामदे की दीवार पर लोहे की एक वडी-सी जाली थी । उसमे छात्राओं की डाक लगी रहती थी। ममी की चिट्ठी मैंने दूर से पहचान ली। ममी कभी-कभी ही लिखती थी । अक्सर पापा को संक्षिप्त लेकिन नियमित चिट्ठी आती। फिर मैं बहुत-सा साहित्य बघारते हुए जवाब लिखती। कभी-कभी पापा उसपर कोई मौलिक टिप्पणी कर देते तो मजा आ जाता। ममी का पत्र कुछ लम्बा था। इस बार केवल बीमारी, मौसम और नौकर ही नहीं, वरन कुछ और भी समाचार था। एक बार पटा तो समझ ही नही आया। दूसरी बार पढा, हा ममी ने यही लिखा था, 'परीक्षा खत्म होते ही घर के लिए चल पडो । तुम्हारे भविष्य को लेकर कई वात अव तय होनी है । तुम्हारे पापा तुमसे इतमीनान से बात करना चाहते पत्र पढ़कर मन मे बड़ी गुदगुदी हुई । यकायक अपना भविष्य उढका हुआ द्वार लगने लगा, जिसे खोलना मेरे हाथ में था। अव तक किताब पढकर मैंने यही जाना था कि भविष्य समाज का होता है, देश का होता है। फिराक का शेर इसलिए मेरा प्रिय था: तकदीर तो कीमो की हुआ करती है, एक शख्स की किस्मत मे तकदीर कहा ! 'हुआ करे,' इस समय मुझे लगा। निजी भविष्य कितना रहस्यमय, कितना मोहक बनता जा रहा था। अपने भाग्य, अपने भविष्य को लेकर 32/प्रेम कहानी असह्य जिज्ञामा होने लगी। मुझे लगा गायद पढाई में मैं मन भी नहीं लगा पाऊंगी। इम पत्र का उत्तर देना बड़ा मुश्किल काम था। कई बार जवाब मैने लिखे और फाड़े । अन्त में मैंने ममी को ऐसे चिट्ठी लिखी, जैसे अभी उनकी यह चिट्ठी मुझे मिली ही न हो। मैंने लिसा मुझे घर को बहुत याद आ रही है और पर्चे खत्म होते ही मैं चल पडूगी। हमेशा की तरह इस बार भी पर्चे बहुत अच्छे हुए । परीक्षा का परि- णाम मन ही मन पता भी चल गया था, लेकिन जब मेरी सहेलिया पूछती, 'कसे पर्चे हुए ?' मैं मुंह बना देती, 'बहुत खराव ।' यह वाक्य मेरा नजरबटू था। एक यगा थी, जिसे मैं सब कुछ सच-सच बता देती थी। उसके पर्चे मुझसे हफ्ते भर वाद खत्म होने वाले थे। उसे घर जाने की बहुत जल्दी भी न थी। मैंने जब सुझाया कि मै कुछ दिन ठहर जाती हूं, इकट्ठे चलेगे तो वह बोली, 'नही यार, अभी मैने घर लिसा ही नही है कि पर्चे कब खत्म होंगे । जब होस्टल वन्द होने लगेगा, तब जाऊगी, घर में मनहूस दादी, दकियानूम मां के बीच गर्मी की जानलेवा छुट्टियां बिताना आसान है क्या ?' मैंने कहा, 'असल बात क्यों नहीं कहती ? तेरे पैगम्बर के पैगाम मिलने बन्द जो हो जाएंगे!' 'सच, अभी तू बुद्ध है, जब किसीको दिल दे बैठेगी तो जानेगी कि प्यार के आगे घरवाले भी नागवार हो जाते हैं ! मेरा मन करता है किमी निर्जन टापू में वस जाऊं, उसके माथ, जहां न उसके घरवाले हो न मेरे। अगर दस दिन भी मुहम्मद का खत नहीं मिलता तो मेरा मन करता है सारे डाकघरों को आग लगा दू।' मेरी हालत तो और भी खस्ता थी। मेरे दिल की बस्ती न वीरान थी, न आबाद । मैं मंजिल मे न दूर थी, न पास । कभी-कभी अपना सम्पूर्ण वडा अच्छा अच्छा लगता था। कभी बेवजह घबराहट होने लगती, मन हर वात मे उचट जाना । लगता किसीका इन्तजार है फिर लगता, नहीं इन्तजार नहीं । अरे, यह तो शुक्रवार है । हा, मुझे शनिवार का इन्तजार है !

शनिवार का दिन सरक नही रहा या। मैं सोच रही थी इसी शनिवार के लिए तो कहा था उसने । ग्यारह दिन पहले की बात, कही भूल ही तो नही गया था वह ? फिर समम तो तय नहीं हुआ था। क्या उसी समय मिलेगा ! मैं असमंजस में थी, जाऊं या न जाऊ ? यशा को मैं साथ ले जाती, अगर पक्का होता कि वह मिलेगा। मैंने सोचा मान लो वह ने आया तो यशा के सामने कितनी भद्द होगी मेरी। दोपहर दो बजे मैंने अपने बाल फिर से शंम्पू कर डाले । मेरी रूममेट आज छुट्टियों के लिए जा रही थी। उसके सामान की बांधाजूडी मुझे खलने लगी। वालो मे गर्द उलझ सकती थी, मैने कस कर तौलिया लपेट लिया सिर पर और अद्वैत वेदान्त पर एक पुस्तक पढ़ने की कोशिश करने लगी। मनोरमा हस पडी, 'इम्तहान खत्म होते ही इम्तहान की तैयारी ! पागल हो जाओगी जया रानी।' - । क्वालिटी के वाहर, गलियारे में पत्रिकाओं की बिक्री होती है । एक बार रेस्तरा के अन्दर चक्कर लगा आने के बाद मैं वही खड़ी होकर पत्रिकाएं पलटने लगी। मन ही मन मैने तय किया कि पांच बज कर दस मिनट तक प्रतीक्षा करूंगी, फिर वह नही आया तो चल दूगी। वह नही आया, या मैं नर्वसनेस मे जल्दी चल दी, जो रहा हो, मैंने अपने को जनपथ पर पाया। वहां पटरी पर एक ओर बहुत खूरसूरत झोले बिक रहे थे । टाट के टुकडों पर रेशम की थिगलियां थी और उन्हें मूंज की रंगीन रस्सी से जोड़ा गया था। मैने मन ही मन चेहरे से पसीना पीछा 'मैं तो पटरी-शापिंग करने आई थी, ममी के लिए झोला ले लूं ।' रोगल से वापस बस तेनी थी। रीगल से कई बसें शुरू होती थी। जगह-जगह क्यू की कतरनें बिखरी थी। दफ्तर छूट चुके थे। थके-हारे चेहरे, बिखरे बाल, टिफिन के खाली डब्बे लिए लोग एक ढीला-ढाला इन्तजार कर रहे थे। मैं भी एक क्यू के छोर पर खड़ी हो गई । कितना अच्छा है कि दिल्ली मे क्यू का कोई अर्थ नहीं होता मैंने सोता। क्यू तभी तक क्यू 34/प्रेम कहानी और कहा, होता है जब तक वस नही आती, फिर वह व्यूह बन जाता है। उसमें से कोई अभिमन्यु ही बस मे चढ सकता है। बस अभी आई न थी, लेकिन क्यू इंच-इंच सरक रहा था। दरअसल कई लोग इन्तजार से थककर स्कूटर, फोरसीटर आदि मे रवाना होने लगे थे। तभी किसी भरपूर स्पर्श से मैं अचकचा गई । मुड़कर देखा तो वही लडका था, भूरे सूट वाला। 'तुम वापस जा रही हो ?' उसने अविश्वास से पूछा । 'मैं इन्तजार कर चुकी थी। 'आयम सॉरी, एक एमरजेन्सी केस में ड्यूटी लगी थी, जल्द नहीं आ पाया। पर फिर भी पाच दस पर मै आ गया था।' मैं कुछ नही बोली, क्यू से हट आई। क्वालिटी दफ्तरी लोगों से ठसाठस भरा था। वहां हम नहीं बैठे । हम कही नही बैठे । हम कनॉट प्लेस के पिछवाड़े में धूमते रहे । उसने मुझे एमरजेन्सी केस के बारे मे बताना शुरू किया : 'सुबह ग्यारह बजे केस आया था। रोड-एक्सीडेण्ट हुआ था। रिंग रोड के मोड़ पर पेशेण्ट के स्कूटर की वस से टक्कर हो गई। ब्रेन में चोट आई है, लेकिन सांस दुरुस्त है । पेशेण्ट बेहोश है। उसे यह नहीं पता कि उसकी बीवी और बच्चा दोनों तत्काल दुर्घटनास्थल पर ही मर गए।' 'आप आते ही मौत की बातें क्यों कर रहे है ?' 'मेरा विषय ही ऐसा है, जिन्दगी और मौत दोनों अकेडमिक हो जाती हैं इस पेशे में।' 'आपका पेशेण्ट जो कर भी क्या करेगा अब । जब उसका परिवार ही खत्म हो गया है।' "परिवार खत्म होने से संसार खत्म नहीं होता'"तुम्हारा नाम मेंने पिछली बार नही पूछा। कही ऐसा न हो, इस बार भी विना नाम बताए चल दो?" 'जया।' 'शार्ट, सिम्पल एण्ड स्वीट ! मैं सोच रहा था कही तुम्हारा कोई भारी भरकम, फिलासफिकल नाम हुआ तो मेरी जुवान का क्या होगा !' प्रेम कहानी /35 मैंने उससे कहा नहीं, पर मन ने चुपके से मुझसे कहा, 'नाम तो जुबान अपने आप छोटे-बड़े कर लेती है, है ना !" वह कह रहा था, 'मेरा नाम गिनेस । कमा है ?' 'इसका अर्थ क्या है?' 'नामो का भी अर्थ होना चाहिए ?' वह हंसा, 'वास्तव में डैडी ने नाम रखा गणेश । पर मंच के अमर से उच्चारण हो गया गिनेम । और स्पेलिग हो गई-जी. यू. आई. एन. ई. एस. एम. मुझे गणेश नाम में कोई सौन्दर्य या सुरुचि नजर नहीं आई, बल्कि गोवर गणेश का ही ध्यान आया । किन्तु गिनेम एक अच्छा संशोधन लगा। उसके पास ज्यादा समय नही था । वापस अस्पताल जाना था । हमने एक जगह खड़े-खडे आइसक्रीम खाई । उसने मेरा होस्टल का फोन नम्बर लिया। मैंने कहा, 'मैं जल्द घर जानेवाली हूं। जुलाई में लौटूंगी।' उसने तारीख पूछी। मैंने कहा, 'अभी तय नहीं है। मेरी एक फ्रेण्ड के इम्तहान अभी चत रहे है, वह फुर्मत पा जाए तो जाएंगे।' 'मुझे अपना शहर नहीं दिवाओगी ?' उसने मुस्कराते हुए कहा । मैं पेशोपेश में पड़ गई। वह हंसा, 'मथुरा मेरा देखा हुआ है । इट्स ए स्लीपी टाउन । वह लगभग ममुवा हिन्दुस्तान देख चुका था। लेकिन पगन्द उसे सिर्फ दो शहर आए थे, बम्बई और बंगलौर । उसने कहा, 'वे दोनों गहर ही मुझे मारिशस को याद कराते है।' धीरे-धीरे सारा होस्टल ही खाली हो गया। सभी लडकिया घर चली गई । सुपरिन्टेण्डेण्ट ताज्जुब कर रही थी कि मैं घर क्यों नहीं गई। मुझे भी बेवजह टालमटोल करना अच्छा नहीं लग रहा था। मैंने यशा पर जोर दिया कि पर चलें । लेकिन वह बोली, 'तू जा, मैं हफ्ते भर बाद आऊंगी। उसने तेरह को मुझे चिट्टी डाली है, अठारह को मिलेगी, बस तभी चल पड़ गी।' 'तेरी वार्डन गुस्सा न करेगी ?' 36/प्रेम कहानी प्रे-2 - 'इसकी तू चिन्ता न कर। मैंने अकेले ही जाने का फैमला कर लिया । यशा के चक्कर में दस- एक दिन यों ही निकल गए। लेकिन अब और रुकना नामुमकिन था । थोडा-सा सामान ले जाना था। एक अटैची मे आ गया। दोपहर को मैं मैस का बिल अदा करने सुपरिन्टेण्डेण्ट के पास गई । पैसे देकर लौट ही रही थी कि फोन किरकिराया। सुपरिन्टेण्डेण्ट ने बड़ी रुखाई से फोन में कुछ शब्द बुदबुदाए, मेरी तरफ गुस्से से देखा और विना कुछ कहे, रिसीवर मुझे पकड़ा दिया। 'मैं हूं गिनेस,' आवाज आई, 'कैसी हो? अभी गई नहीं। मेरा अन्दाजा ठीक था । आज शाम मिल सकोगी ?.."क्या कहा, आज ही जा रही हो.."नहीं, मैं दो महीने नहीं रुक सकता। वह बात मुझे आज ही कहनी होगी, अभी । अगली गाड़ी से चली जाना या उससे अगली से । ठीक है, मैं इन्तज़ार करूंगा।"नहीं, इस तरफ तो बड़ा शोर है।' मैं नहीं चाहती थी कि गिनेम होस्टल आए और इस शक्की बुढिया को उपदेश देने का मौका मिले। उसने कहा वही आ जाएगा, कॉफी-हाउस, बंगलो रोड । जितनी अकस्मात फोन आया था, उतनी अकस्मात ही बन्द हो गया । मैं अवाक् खडी रह गई । सुपरिन्टेण्डेण्ट ने व्यंग्य से मेरी और देखते हुए मेरे हाथ से रिसीवर लेकर फोन पर पटक दिया । तब कहीं मेरी चेतन तन्द्रा टूटी। बेवजह 'थैक्यू मैडम' कहकर मैं भागती हुई अपने कमरे मे आ गई। मुझे अनायास अच्छा लग रहा था । जाने का मारा कार्यक्रम हिल गया था । कार्यक्रम क्या, दिल तक हिल गया था। घर पहुंचने का इरादा और जोश, दोनों लडखड़ा रहे थे। परमों ही मैंने घर चिट्ठी डाली थी कि मैं आज पहुंचूगी । पर गिनेम से मिले बिना रवाना होने की जरा भी मर्जी न थी । मैं अभी से घर पर बताने के लिए एक मौलिक बहाना ढूढ़ रही थी। इस वक्त दिमाग यह भी नही सोच रहा था कि वक्त पर स्टेदान पर मुझे न पा घरवालों को कैसी परेशानी होगी। जहां सूरज चमक - प्रेम कहानी /37 रहा था, वहा मिन्दुरी रंग से लिसा एक शब्द बार-बार कौंध रहा था 'गिनेम'। . बंगलो रोड कॉफी हाउस कोई वडा नहीं था, लेकिन हर वक्त भरा रहने के कारण वडा लगता था। हर कॉफी-हाउम की तरह यहा भी वेहिसाब शोर और ताजी कॉफी की तेज गन्ध फैली रहती। यहा का दोसा और फिश फ्राय मुझे पसन्द थे । लेकिन इस वक्त में अपनी पसीजी हुई हथेलियों में एक मन्-सन् अहसाम लिए सड़क को ओर टकटकी लगाए खड़ी थी। जिधर मैं देख रही थी, ठीक उससे विपरीत दिशा से आकर एक बलिष्ठ हाथ ने मुझे भरपूर थाम लिया । 'आय न्यू स्वीट हार्ट ! तुम आओगी !' मैंने सिर उठाकर उस लम्बे-चौडे लड़के को देखा, जिसका नाम मुझे पता था, जिसे मेरा नाम पता था और जिसकी आवाज और छुअन ने मेरा सर्वाग कपकपा डाला था। वह इतना सुन्दर, इतना पौरुपमय, इतना बलिष्ठ लग रहा था, मानो किसी मंगजीन मे काटी हुई तस्वीर यकायक चलती हुई, बोलती हुई मामने आ जाए । सिमटने और लिपटने के दोहरे अहसास पर किसी तरह काबू पा मैं मुस्कराई। अन्दर दो मामूली-सी मेजो और चन्द कुसियो को जोड़ कर केबिन का रूप दिया गया था। वाहर एक मैला पर्दा लटका था, जिस पर पन्नी मे गलत हिज्जों में लिखा था फैमिली केबिन । गिनेस ने बैठते ही कहा, 'मे जून मे कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अगले महीने मारिशस जा रहा हूं, लेकिन अकेला नहीं । तुम्हे मेरे साथ चलना है। हम दोनों के बीच कोई गम्भीर बात हुआ चाहती है। आय वाण्ट ? मैरी यू।' आश्चर्य, असमंजस और अस्थिरता की भी कोई भापा होती ही होगी । मैं नि.शब्द थी, मेरा रोम-रोम मशब्द था। कुछ पल के लिए मेरी आंखों के आगे से सब कुछ गायब हो गया, कमरा-दीवारें, कुर्सी-मेज, 38/प्रेम कहानी शोर, शरीर, केवल एक गूज सरगम-सी कान में वजती रही, 'आय वाण्ट टु मैरी यू."आय वाण्ट टु मैरी यू. आय वाण्ट...' गिनेम ने कहा, 'मैंने बहुत सोचा, बहुत सोचा है, यह महज आवेश नहीं है । इतनी जल्दी, कुल पैतीस दिनों मे यहां यह सब निपटाया नहीं जा सकता। वेहतर हो तुम वहां मेरे साथ चलो। कुछ हफ्ते मेरे परिवार को निकट से देखो, हमारे रहने का ढंग, रीति-रिवाज, हमारे सम्पर्क, हमारी दुनिया--मेरा मतलब है हमारी ज़िन्दगी का तापमान पहचान लो..' विचित्र प्रस्ताव था यह। जहां एक पल पहले मैं आह्लाद से डगमगा गई थी, वहां इस क्षण कनपटी पर केवल एक शब्द पटपटाने लगा, 'कुछ हफ्ते ।' मैं होशोहवास में आ गई । 'तुम्हारा मतलब है तापमान रास न आने पर 'हां, कोई मजबूरी नहीं, तुम वापस आने के लिए आजाद होगी या वही किसी और से, मुझमे अच्छे आदमी से नाता जोड़ने को स्वतन्त्र ।' 'मैं तो तुम्हारी तरह इतने ठण्डेपन से अपनी आजादी की बात नहीं कर सकती। रिस्ते, रिश्ते होते हैं, प्रयोगशाला के नमूने नहीं।' 'हां, लेकिन शादी, शादी होती है, फांसी नहीं। आज हम मन्दिर में जाकर बड़ी भावुकता मे माला बदल लें और फिर उम्र भर एक-दूसरे को कोसें, क्या यह अच्छा होगा ?' 'क्या यह अजीब नहीं कि तुम मुझसे शादी और तलाक का प्रस्ताव साथ-साथ कर रहे हो !' 'डोण्ट टैल मी, कि तुम भी इस सबको लेकर उतनी ही स्टुपिड हो जितनी एक औमत लड़की होती है। मैंने अपने जेहन में तुम्हारी एक लिबरेटेड तस्वीर देखी है।' मैं असहमति में चुप अन्दर ही अन्दर खलबला रही थी। मेरी संवेदना उसको सारी बातचीत मे आपत्ति के बिन्दु ढूंढ रही थी। 'मैं तो तुम्हें अभी तक जान ही नहीं पाई। तुम्हारा नाम अभी आठ दिन पहले मुझे पता चला । हम मुश्किल से कुल चार बार मिले होंगे। में प्रेम कहानी / 39 नही जानती तुम कहां रहते हो, तुम्हारा स्वभाव, तुम्हारी आदतें, तुम्हारा चरित्र.. 'अब तुम बिल्कुल अपनी अम्मा की तरह बोल रही हो या अम्मा अम्मा । ये बातें हमे कही नहीं ले जाएंगी।' 'तुम क्या मोचते हो, मैं इत्ती-सी पहचान पर इतनी बड़ी रिस्क उठा लूगी! 'विना रिस्क उठाए तो इन्सान कुछ भी नहीं कर सकता, सांस भी नहीं ले सकता। धुछ रिश्ते लगातार रिस्क होते हैं।' 'और कुछ लगातार सुरक्षा, मैंने कहा। 'हां, एकदम मृत सुरक्षा-वे जड़ रिश्ते होते हैं, ताउम्र अठानवे डिग्री तापमान पर चलनेवाले । मैं यह नहीं कह रहा कि तुम इसी वक्त अपनी दुनिया छोडकर मेरे साथ चलो। आज घर जाओ, सोचो, समझो, अपने आपको कन्विन्स करो, अपने माता-पिता को कन्विन्स करो, फिर मुझे लिखना, मै आ जाऊंगा, टु टेक अवे माय डॉल।' मेज़ पर पडी चाय एकदम ठण्डी हो गई थी। उसकी हमें जरूरत भी नही थी। हम वहां से युनिवर्सिटी आ गए, आम प्रेमियो की तरह हाथ मे हाथ डाले नहीं, अपने-अपने तर्कों में उलझे । गिनेस कुछ-कुछ गम्भीर, कुछ-कुछ चिन्तित, कुछ-कुछ उद्वेलित लग रहा था। चुप और चिन्तित मैं भी थी, किन्तु आन्दोलन न जाने कहा पहुच कर निस्पन्द होता जा रहा था। आज मुझे यह अजनबी और भी अजनवी लग रहा था। उसकी ओर देखते हुए मैं सोच रही थी, यह एक छह फुट लम्बा तिलिस्म है। मैंने हमेशा कल्पना की थी कि जिस दिन मुझसे कोई विवाह का इशारा भी करेगा, दसों दिशाओ से फूल बरसने लगेंगे, उनचास पवन सुगन्धियां लुटा देंगे, सूरज-चाद हाथ मे हाथ डाले मुझे आशीर्वाद देने आएंगे और मैं छुईमुई-सी लाज के मारे लरज-लरज जाऊंगी। पर इस वक्त ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था, जबकि एक लम्बा-चौड़ा, खूबसूरत, भूरा-सा लड़का मेरे पहलू में चल रहा था, पहले मुझे जीवन-साथी बनाने का खुला इरादा किया था। 40/प्रेम कहानी जिसने कुछ मिनट गिनेस साथ चलते-चलते बीच-बीच में मुझे एकटक देखने लगता, 'तुम मेरे साथ नहीं चलोगी तो में वापस मारिशस जाकर बाहरी तौर पर मसरूफ तो हो जाऊंगा, अन्दरूनी तौर पर तुम्हारी यह कच्ची कौमार्य भरी आवाज, तुम्हारा यह रजनीगंधा व्यक्तित्व, तुम्हारी लजीली हंसी की यह बारीक खनखनाहट कही मेरे दिल के बहुत करीब टकराती रहेगी, हिलोरती रहेगी, मेरी व्यस्तताओं का पीछा करती रहेगी।' इतनी खूबसूरत और खतरनाक बातों के आगे मैं क्या कर सकती थी। गिनेस युनिवसिटी-गार्डन की रेलिंग से टिककर खडा हो गया, 'मेरे दिमाग में तुम्हारी एक भूबी चलती रहती है, अस्पताल जाते, केस देखते, नोट्स लेते, सोते-जागते, बैठते-उठते मैं अचेतन आखो से तुम्हें देखा करता हूं। तुम हर समय मेरे आस-पास रहती हो जैसे मौसम...' 'लेकिन मौसम तो बदलते रहते है ?' ‘पर तुम नही बदलोगी, मुझे यकीन है ।' गिनेस ने मुझे स्टेशन पर बिदा दी, 'ईश्वर करे जिस रफ्तार से यह गाडी तुम्हें ले जा रही है, उसी रफ्तार से वापस ले आए, मैं यही मिलूंगा --एज मच योर्स एज एवर।' उसने दाहिने हाथ की मेरी अंगुलियों पर अपने होंठ रख दिए और कमर से थाम मुझे सरकती गाडी में चढ़ा दिया। सभी कुछ अप्रत्याशित हो रहा था । या मुझे ऐसा लग रहा था । वह ईश्वर पर विश्वास करता है या नहीं, यही सोचती हुई मैं अपनी सीट पर जा बैठी । थोड़ी देर बाद मुझे हंसी आ गई। यह मैं क्या बूढ़ी पुजारिनो- सी ईश्वर-चिन्ता में सिर खपा रही हूं ! मेरी उम्र केवल उन्नीम है, मेरे पास एक खूबसूरत मगेतर है, अंगुलियो पर उसका दिया हुआ चुम्बन है और मन उनको वातों से लबालब है । मुझे जल्द-से-जल्द घर पहुंचना है, जाकर ममी-पापा से खुलासा बात करनी है, अपने नये-पुराने सर्टिफिकेट्स सहेजने हैं और फिर तो बस चला-चली है। कैसे शुरू करूंगी? क्या कहूंगी ! और कही पापा ने उसके पापा का नाम पूछ लिया तो? मैं तो मुछ भी नही जानती उसके बारे मे, सच कुछ भी नहीं। क्या यह कहूंगी प्रेम कहानी/41 एक दिन अकस्मात पार्टी में एक लडका मिला था, यह मुझमे शादी करना चाहता है, टा-टा। अंगुलियों की जो जगह उसने होंठों से छ दी थी, शरीर से अलग- अलग किस्म का स्पन्दन कर रही थी, उसका वाकी धड़कन से तालमेल नहीं बैठ रहा था। यहां तक कि रेल की रफ्तार का दिल की रफ्तार से कोई तालमेल नहीं बैठ रहा था। गाडी आगे जा रही थी, दिल पीछे। घर पहुंचकर भी यही हाल रहा । पहले वाली चक, न जाने कहा गायब हो गई । ममी-पापा को जोग भरी बातें कानों मे दुरागत सी अस्पष्ट सुनाई दी। आवाजो- खाना खाने के बाद सब बैठ गए आराम से । 'यही मौका है,' मैंने मोचा, 'टाइमबम हमेशा टाइम से फोड़ा जाता है।' मैंने कई वाक्य मन मे बनाए, विगाड़े । जब किसी तरह कोई भी वाक्य नही बन पाया, तब मैंने सीधे-सीधे कह दिया, 'पापा, गिनेस हमसे शादी करेगा। 'कौन ?' पापा एकदम अचकचा गए। 'मेरा परिचित एक अस्पताल में हाउस-जाव कर रहा है, अगले महीने छुट्टी लेकर मारिशस जा रहा है, मुझे भी जाना होगा...' 'ऐसे कमे...?' ममी एकदम भडक गई, दिल्ली जाकर यही सब चक्कर करती रही, बड़े पर निकल आए हैं। तभी मैं कहूं, आण्टी के यहा तकलीफ क्यों होती थी। मैं तो भेजना ही नहीं चाहती थी इसे...' फिर वह पापा पर बरस पडी, 'लो और बना लो होशियार इसे, सिर पर धर रखा है इसे, मुगतो अब !' 'जिसे हम जानते नही, बूझते नही, उसके साथ तुम्हे कैमे जाने देंगे ? ऐसी वेवकूफी की बात तुम्हे सोचनी भी नहीं चाहिए,' पापा बोले । 'क्या-क्या सोच रखा था इसके लिए,' ममी लगातार पापा से सम्बोधित थी, 'जो रिश्ता हमने देखा था, कितने बड़े मिल-मालिक का बेटा है वह और कितना सीधा । आण्टी-आण्टी कहते जुबान नही थकती उसकी । 42/प्रेम कहानी -- , सोचा था राज करेगी। पर इसके भाग में रोना ही लिखा है। हमें क्या पता था, यह हमारी ही छाती पर पांव धरकर निकल जाएगी ! 'मेरी मर्जी के विना मेरा सम्बन्ध आप कैसे तय कर सकती है, मैने विरोध किया। 'चुप रह वदतमीज़ ! तेरी-मेरी मर्जी अलग-अलग होने लगी अव ।' पापा ने आगे वहस नहीं की। कुछ पूछा भी नहीं । चुपचाप कमरे से वाकआउट कर गए। मैं भी अपने कमरे में मोने चली गई। नीद न जाने कब आई । उससे पहले बहुत-कुछ आया, गुस्सा, रोना और उदासी । अपनी वात, अपनों को समझाना कितना मुश्किल होता है | वे लड़ते हैं या रोते हैं, तर्क मही करते । मेरे पास क्या तर्क था, यह मैंने नहीं सोचा, पर प्यार का तर्कहीन तर्क तो था ही । यह एक मुख्तसर-सी बात उन्हे कैमे समझाऊं, यही सोचती न जाने कब मैं मो गई। । सुवह दिन चढे जब मैं उठी, तव देखा एक प्याला चाय सिरहाने पडी है, ठण्डी । मैं प्याला उठा रमोई मे गई कि गर्म कर लू । मुझे देखते ही ममी की मुद्रा तन गई। उन्होंने वर्तन पटकते हुए चाय गर्म कर दी। मेरी समझ मे नहीं आया मुझे दिन का पहला वार्तालाप कमे शुरू करना चाहिए। पापा का सामना करने में और भी अधिक दिक्कत थी। एक ही रात मे मैंने अपने स्नेही माता-पिता को दस-दम साल बूढा कर दिया था। वे इतने अकेले, मेरे जाने पर भी नहीं हुए थे, जितने मेरे आने पर हो गए। मुझे बहुत बुरा लग रहा था। यह मेरे ही हाथो होना था। अपने घर की अलमस्त तिकड़ी मबसे ज्यादा मुझे पसन्द थी और मैंने ही उसे तोड़ दिया। प्रेम कहानी 143 'ममी, हफ्ते भर बाद यशा भी घर आ गई। पता चला तो मैंने कहा, हम जाएं, मिल आएं।' ममी ने आखें तरेर दो, 'बहुत मिलना-जुलना हो चुका । बैठी चुप- चाप घर मे।' मुझे बहुत बुरा लगा । ममी का व्यवहार लगातार मुझे आहत व अपमानित कर रहा था। उन्होने अपने को एक ऊंचे आसन पर न्यायाधीश की तरह स्थापित कर लिया था और यह मानकर चल रही थी कि में जरूर कोई कुकृत्य कर बैठी हू और उन्हें मुझे सही रास्ते पर लाना है। इससे पहले उन्होंने मुझ पर कभी शक नहीं किया था। इससे पहले ऐसी नौवत भी नहीं आई थी। फिर भी इसकी बनिस्वत कि यह पूछे गिनेस कौन है, कैसा है, क्या करता है, वह मुझे उन दुखी लड़कियो की दास्तान परोक्ष रूप से सुनाती रहती, जिन्होने धोखे में लम्पटों से शादी कर ली और बाद में जीवन भर रोती रही। घर में पैदा हुए तनाव से विचित्र स्थिति यह हो गई कि मैं जो अब तक गिनेस के प्रस्ताव को लेकर काफी अनिश्चित, अनाश्वस्त और संशयाल हो रही थी, अब निश्चय, आश्वस्ति और अनुकूलता की ओर बढने लगी। मुझे लगा यह कितनी बड़ी बात थी कि एक अजनवी मुझ जैसी अगडम बगडम लडकी में सौन्दर्य देख सका और मुझे जीवन-साथी बनाने ,पर आमादा हो गया । जितना ममी मुझे दुतकारती उतना मेरी ज़िद मुझे ललकारती। पापा ने बात करना ही निलम्बित कर रखा था । वह अपने दफ्तर में और भी जोरों से व्यस्त हो गए थे । आजकल घर उनके लिए एक चुनौती था और दफ्तर शरणस्थल । मेरे एक वाक्य ने मेरा निर्वासन कर दिया था। बिना अपराध के मैं अपराधो थी । लौटकर पापा गिने-चुने वाक्य बोलते वह भी ममी से, मानो मैं वापस होस्टल चली गई होऊ। उन्होंने पहली बार ममी को वरिष्ठता का अधिकार भी दे दिया था । उनकी भंगिमा देखकर लगता जैसे इस सबमे सबमे बडा दोष उन्हीका है। ममी ने फैमला सुना दिया अब आगे पढाई करने की जरूरत नहीं है, न ही दिल्ली जाने की। 44/ प्रेम कहानी वह यही मानती रही कि सख्ती से मै ठीक हो जाऊंगी। जब यशा मुझसे मिलने आई, तब भी वह चौकीदार की तरह हमारे बीच बैठी रही। वह मेरा इलाज ऐसे कर रही थी जैसे मलेरिया या फ्लू का इलाज किया जाता है, उन्हें पता ही नहीं चला कब इस सारी चौकसी के बीच मैं घर से सरक गई और दिल्ली पहुंच गिनेस के सामने कुछ इस अन्दाज में हाफते हुए खड़ी हो गई, मानो मैने अभी-अभी ब्रिटिश चैनल क्रॉस की है। वह मुझे यो देखकर हक्का-बक्का हो गया। कुछ देर बाद उसने केवल तीन शब्दों का एक छोटा-सा वाक्य कहा, 'मैं जीत गया ?' - इसमें शक नहीं कि गिनेस के प्रति मेरे मन मे जो-जो शंकाएं थी घर- परिवार के रवैये ने विद्रोह के स्तर पर हटा दी। अगर घरवाले मुझे विश्वास और आत्मीयता देते, मै कुछ तटस्थ होकर विचार कर सकती थी । यों भी मैं तैश में काम करनेवाली लड़की नहीं थी। मैं मारे रास्ते यही सोचती गई थी कि सब तरह से इस संभावना पर विचार करूंगी, उन्हीके सामने खुल्लमखुल्ला । किन्तु उनका आक्रामक और आतंकवादी रवैया मुझे उनसे इतनी दूर ले गया, जहा अपने अजनवी, और अजनवी अपने हो जाते है । जैसे गेंद गच्चा खाकर बहुत ऊपर उछलती है, कुछ ऐसे प्यार एक बुखार-मा, मेरे तन-मन को तान गया। इतने बड़े शहर में अब मुझे न सडक दिखती, न इमारतें, न लोग, न दुकानें, केवल अपने सपनों का सिंहद्वार नजर आता । बल्कि गिनेस से घुल-मिलकर मैं अपने आपको बाकायदा डाक्टरनी मानने लगी थी। होस्टल में कोई बीमार होता तो मैं चट सलाह देने पहुंच जाती। मुझे लगता गिनेस के माथ मेरा वाकी जीवन एक महान उद्देश्य को समर्पित होगा। गिनेस ने मेरी सब जिद मान ली। यहां तक कि यह भी कि हम पहले शादी करें, बाद में मारिशस जाएं। मैरिज-रजिस्ट्रार के दफ्तर से जव हमें तमाम तामझाम और विलम्ब के बाद विवाह-प्रमाण-पत्र हासिल प्रेम कहानी/45 हुआ, तब वही कागज मुझे थमा गिनेस ने वाहों में भर लिया, 'लो तुम इसके लिए आतुर थीं और मैं, तुम्हारे लिए !' वात की बात में दिल्ली मारिशम बन गई और मारिशम दिल्ली। होस्टल छोड मैं अस्पताल के अहाते में आ गई, जहां गिनेस को एक कमरे का छोटा-सा क्वार्टर मिला हुआ था । सिर्फ होस्टल छोडा, पढ़ाई नहीं। गिनेस कहता, 'सच जया, अपनी पढाई के दौरान मैंने यही सोचा था कि डाक्टर और योगो मे कोई फर्क नहीं रहता। शरीर के सारे भेद जानने के बाद कोई तभी उत्तेजित हो सकता है जब उसकी जिन्दगी मे तुम-जमा करिश्मा आ जाए।' मैं ईश्वर को नहीं मानती थी। लेकिन ऐसे लमहों में मैं ईश्वर को मानने लगती और मनाती कि हमारी यह तन्मयता कभी न टूटे । गिनेम के प्यार ने मेरा संसार बदल डाला था। आसिर छुट्टियों में घर जाने की घडी भी आ पहुंची । मेरा मन डर और संगय से कच्चा-कच्चा हो रहा था, गिनेस के घरवाले मुझे पसन्द करेंगे, वहा जाकर वह बदल तो न जाएगा, मैंने क्या यह सब ठीक किया है ? लेकिन मामान वध चुका था, टिकटें आ गई थी, आरक्षण मिल चुका था और मैं अपनी सब दुविधाएं, असमंजस और शंकाएं मन के एक कोने में पंक कर गिनेम के माथ दिल्ली से बम्बई फ्लाइट पकड़ने जा रही थी। गिनेस ने कहा, 'तुम सामख्वाह डर रही हो । तुम एक ऐमा पौधा हो, जिगे कही भी लगाया जा सकता है।' 'मैं पौधा नहीं, इन्मान हूं।' 'वै भी इन्मान ही हैं, जिनके पाम तुम जा रही हो। जानती हो चलते वक्त हर छुट्टी के बाद जब मैं ममा में पूटता 'ममा भारतवर्ष से तुम्हारे निए क्या लाऊं ?' वह कहती धी, 'वम एक अच्छी-मी दुन्हन ला दे। उन्हें मारिगस को आधुनिक सहकिया अच्छी लगती हैं, पर बहू बनाने नायक नही । दरअसल हमारा परिवार अभी भी बहुत ज्यादा हिन्दुस्तानी 46/प्रेम कहानी है । वर्षों वहां रहकर भी, लिवास के सिवा हमारा कुछ भी नहीं बदला है। वहां देखना मेरी बहनें तुम्हें एयरपोर्ट पर ही पटा लेंगी । मेरी मां तुम्हें प्यार और प्रेजेण्ट्स से ढाप देंगी।' मुझे विश्वास होते हुए भी आश्वस्ति नहीं हो रही थी। उद्विग्नता में नास्ता नहीं भाया। एयरहोस्टेस ने मेरे चेहरे का रंग देखकर कहा, 'इन द फैमिली वे, आर यू?' 'हैविन्स नो, गाड फारविड,' मैंने कहा। "हाय बिंग इन गाड, वी फारविड,' गिनेस हंसा । वह बहुत खुश था । यह चाहता था मैं भी खुग लगू । घबराहट मेरी खुशी पर हावी थी। गिनेस मुझसे मुखातिब हुआ, 'तुम तो ऐसे डर रही हो, जैसे तुम्हारा इम्तहान होना है।' 'इम्तहानो से तो मैं कभी नहीं डरी, लेकिन बार-बार कानो में तुम्हारे उस दिन के शब्द गूज जाते हैं, जब तुमने कहा था मैं कुछ दिन के लिए तुम्हारे माथ चलकर तुम्हारे परिवार का रहन-सहन, तुम्हारी जिन्दगी का तापमान पहचान लू ।' 'मेरा तापमान तुम अव भी नही पहचानती !' गिनेस ने शरारत से मुस्कराकर मेरा तापमान बढा दिया। पांच घण्टे बीतते न बीतते हवाईजहाज कुछ नीचे को झुककर उडने लगा। गिनेस ने कहा, 'वह देखो मेरा देश ।' मैने खिड़की से देखा। नीचे वादल ही बादल थे । धुन्ध-सी नजर आ रही थी। कहीं-कही धुन्ध फटी हुई थी, वहां नीला सागर झलक मार रहा था। तभी जहाज फिर मुड गया। नीचे की खुली झलक मिली। लेकिन एकाएक कुछ समझ न आया। एक बार लगा मानो नीले पानी के बीचोबीच एक हरा धब्बा है, नही हरी छतरी । फिर लगा जैसे नौली प्रेम कहानी / 47 रेत पर रंग-बिरंगा पहाड़ पड़ा है। कुछ-कुछ फिल्मी स्य था। तभी उद्घोषक की सूचनात्मक आवाज आई, 'कुछ ही मिनटों में हम प्लेजांस हवाई अड्डे पर उतरने वाले हैं।' मैंने भरसक अपने को सम्भाला, पर फांपते हाथो से पेटी नही बंधी । गिनेस ने मेरी बेल्ट वांधी और उत्सुकता मे पाम सरकता हवाई अड्डा देयने लगा। मैं अभी उतर ही रही थी कि गिनेस लपककर सीढ़िया उतर गया। उसका पूरा परिवार आया था। सबके हाथों में फूल थे। गिनेस को संक्षिप्त-मा गले लगाकर सब मेरे स्वागत में बढ़ आए । एक-मे-एक सुन्दर उसकी बहनों ने मुझे फूलो से ढंक दिया। मां ने मुझे चूमा और पिता ने आशीर्वाद दिया। मैं चकित थी। यह विदेश था या स्वदेश, समझ नहीं पा रही थी। मेरे आसपास सब चेहरे नितान्त भारतीय थे। कार में बैठने से पहले हमे वाकायदा लड्डू खिलाया गया। रास्ते भर दोनों बहनें गाती आई। जिस बाजार से हम गुजर रहे थे वह बम्बई की याद दिला रहा था, दिल्ली की नही । वही कारो की लम्बी कतार, लाल-हरी बत्तियां, व्यस्तता और भाग-दौड़। बाकोआ में गिनेस के पिता का छोटा-सा बंगला था हरियाली से घिरा । अन्दर-बाहर से इतना सुथरा कि लगता था अभी बनकर तैयार हुआ है । घर पहुंचकर एक बार फिर चरण-स्पर्श की रस्म हुई। सबका हिन्दी-उच्चारण इतना साफ व स्वाभाविक था कि मुझे हैरानी हो रही थी। कहां तो कितने ही हिन्दुस्तानी हफ्ते भर विदेश में रहकर ही अपना उच्चारण फैशन के तौर पर तबाह कर डालते थे, कहां पीढियो से यह परिवार यहा रचा-बसा, भिन्न-भिन्न संस्कृतियो से सरोकार रखते हुए भी कितना मौलिक था । मा अन्दर से लाल रंग की एक जामदानी साड़ी 'निकालकर लाई, 'यह तीन पुश्तों की अमानत तुम्हे देती हूं, जया ! बडी 48/प्रेम कहानी अम्मा आज होती तो ऐमे तुम्हें घर में थोड़े ही आने देती, बाकायदा अग्नि के सामने विवाह की रस्म होती" 'अनिता, चलो भाभी को बढिया चाय तो पिलाओ,' गिनेस के पिता बोले। उस घर में चखी चाय का स्वाद अब तक पी गई ममस्त चाय से नितान्त भिन्न, सुगन्धित और ताजा था। पता चला यह हमारे ही चाय- यागान की चाय है। गिनेस ने पिछवाड़े की बालकनी से दिखाया, मीलों-मील फैले चाय- बागान और गन्ने के खेत दिखाए, दाएं-बाएं । वाकोआ पेड़ भी दिखे, पर उनसे अधिक ये नारियल व ताड़-लम्बे, ठिगने, चौड़े, सतर, झुके हुए, फैले हुए-~-किस्म-किस्म के नारियल और ताड। अगले दिन सब बड़ी झील गए। वहां खासी भीड थी। माथे पर तिलक लगाए भक्त आचमन कर रहे थे, दण्डवत कर रहे थे, परिक्रमा लगा रहे थे, हनुमानजी के मन्दिर प्रसाद चढा रहे थे। मैं बिल्कुल भूल गई कि मैं अपने देश में नहीं हूं। यह मेरी जमीन थी, मेरी मिट्टी । यह तो बिल्कुल मथुरा के भिवताल वाला दृश्य था, बस उससे ज्यादा स्वच्छ व कोलाहलपूर्ण । कुछ-कुछ बिड़ला-मन्दिर को याद आ रही थी, क्योकि हर तरफ पक्की जमीन थी। शिवजी का मन्दिर भी वही था। पता चला सबसे ज्यादा माहात्म्य यहां शिव का ही है । स्त्रियां बाकायदा सिर पर आंचल ढंके शिवलिंग पर जल, पुष्प-पत्र चढा रही थी। हमने भी वहां जाकर माथा टेका, पुजारीजी मे आशीर्वाद पाया । मन्दिर में हमने साथ-साथ घण्टा बजाया तो मैं अन्दर तक हिल उठी । मुझे लगा हम एक विराट शुभचिह्न बन गए हैं. यह धूप-गन्ध दिशाओ से नहीं, हमारे अन्त- मन से ही उठी है। हमारे पास बहुत कम वन्त था। गिनेस के पास केवल दो हफ्ते की छुट्टी थी। वापस पहुंच उमे एम. डी. ज्वायन करना था । इसलिए बुधवार को चाय-बागान की सैर का प्रोग्राम वना। समुद्र-तट से करीब-करीब प्रेम कहानी / 49 पन्द्रह सौ फुट ऊंचा चाय का हरा बिस्तर 'पितों द मिलिए' पर फैला था। बम्बई के कमला नेहरू पार्क जैसा सुरम्य लेकिन उमसे ऊंचा यह शिखर चारो तरफ फूलों से लदा खड़ा था। दिल्ली के धूल-धक्कड़ में प्रकृति का सौन्दर्य मै तो भूल ही चली थी। दिल्ली विकास प्राधिकरण ने शहर में जहां-तहा प्राकृतिक सौन्दर्य देने की चेष्टा भी की थी, वह इतनी कृत्रिम और दिखाऊ थी कि उससे कोई सौन्दर्य-बोध नहीं होता था, महज समृद्धि- बोध होता था। यहां खड़े होकर लगा, प्रकृति वाकई दृश्य नहीं, संवेदना वापसी मे जिस रास्ते से हम लौटे वह गन्ने की फसलों मे पटा पड़ा था । दूर से देखने पर लगता, गन्ने की लम्बी पत्तिया अभी खिड़की की राह कार मे घुस जाएंगी, पर पास जाने पर सड़क उतनी ही चौड़ी मिलती, जितनी कि पीछे थी । 'क्या हम गन्ने भी वोते हैं ?' मैंने गिनेस की वहन अनिता से पूछा। 'नही' नवर, "वह कुछ उदास हो गई। 'क्यो ?' मैंने पूछा। 'मैं बताता हूं,' गिनेस के पिता ने झटके से गियर बदलकर कार पीछे की और एक साइड-वाक पर चल पड़े । कुछ देर बाद उन्होंने एक चबूतरे के पास कार रोकी । सभी उतरे। सवने जूते उतार, घुटने टेक, उस चवूनरे के प्रति प्रणाम किया। मैंने भी ऐसा करते समय चबूतरे पर खुदे शब्द पढ लिए। उसपर लिखा था 'स्वाधीनता संग्राम मे अपने प्राणों की आहुति देनेवाले महान मजदूर विशेशर सिन्हा की स्मृति मे मारिशसवासियों की श्रद्धां- जलि'। यह गिनेस के दादा का समाधि-स्थल था । पिताजी ने कहा, 'जया आज पहली बार यहा आई है, उसे बताना होगा हमारे पूर्वजो ने किम कीमत पर हमे आजादी दिलाई।' 'वेटे, यह वह जगह है जहा तुम्हारे बाबा गन्ने के खेतों में रात-दिन 50/प्रेम कहानी खून पसीना बहा कर अपने मालिकों के लिए पैसा पैदा करते थे। मात मौ मजदूरों के साथ वह भी पटना से आकर यहां फंस गए थे । बल्कि फंसाए गए थे । उन्हें भी गोरों के दलालों ने सब्जबाग दिखाए थे खुग- हाली के, पैसे के, तरक्की के । उन्होंने सोचा था वह अपनी मेहनत के बूते पर यहा स्वर्ग बसा लेंगे। मेहनत और खुदा के अलावा तीसरी किसी चीज़ का उन्हें इत्म न था। बीन के आगे गिनना भी ठीक से न जानते थे। अलबत्ता पढ़ लेते थे, अक्षर जोड-जोड कर। एक वीसी रुपया देकर उन्हें बंधुआ मजदूर बना दिया गया। बड़ी अम्मा मुझे नन्हा-मा गोद में लेकर यहां आई थी। उन्हें तो और भी कम, महज बारह रुपये मे बंधुआ रखा था। 'सभी मजदूर दिन-रात मेहनत करते, फिर भी मालिक खुश न होते। रोज डांट-फटकार चलती । बल्कि होता यह कि किसी और मजूर को भी अगर बेवजह डांट-फटकार, मार पड़ती तो वावा बौखला जाते । वह आवाज उठाते तो उनको भी भार पडती। बड़ी अम्मा उन्हें चुप रहने की सलाह देती तो उन्हीपर बरम पडते, 'यह जोर-जवरदस्ती, तुम चाहती हो, मैं चुपचाप देखता रहू ।' मालिक इमलिए उनसे बहुत चिढते थे । 'बाबा शाम के समय वैठका में जाते थे। पहले-पहल बैटका में कुछ मजूर किसान मिलकर केवल भजन-कीर्तन किया करते थे। फिर बाबा के जाने से वहा सुख-दुख को चर्चा भी शुरू हो गई। वावा मजूरों को समझाते, "भैया मेरी मानो तो मिल-जुलकर रात स्कूल शुरू करें। हमी सब पढे- लिखे होते तो कौन हाथ उठा सकता था हम पर ।' देवकीलाल का जवान बेटा अंग्रेजी जानता था। उसीके सहारे बाबा रात स्कूल की वात किया करते थे । अंग्रेजी न आने के कारण हिन्दुस्तानी मजदूर यह तक नहीं पड़ पाते थे कि उनके परमिट पर क्या लिखा है, वे किन शर्तों पर रखे गए हैं और कब तक उन्हें काम करना है, मजदूरी की दर वगैरह-वगैरह । पर दिन भर दम-तोड़ परिश्रम के बाद मजूरों में जोश पैदा करना मुश्किल हो जाता । कुछेक मजूर दो-एक दिन शाला में आते, फिर घर बैठ जाते। ज्यादातर मे हिम्मत की कमी थी। उन्हें डर लगता कि उन्हे काम से निकाल दिया जाएगा । आपस में मजूर चुगली भी बहुत किया करते। । प्रेम कहानी/51 मालिको की छोटी-छोटी मेहरबानियां पाने के लिए एक-दसरे से लह मरते । वावा ने उन्हें कई बार समझाया, मिल-जुलकर रहो, फिर किस गोरे की हिम्मत कि तुम पर हाथ उठाए पर कुछ चुगलसोर यह बात भी मालिको तक पहुंचा देते। 'धीरे-धीरे वावा के खिलाफ मालिकों के मन में एक मोर्चा तयार हो रहा था। उन्होंने उन्हें मजदूरी के लिए रखा था, न कि नेतागीरी के । उन्हें जान-बूझकर लोगो के मामने जलील किया जाता। मित्र-मण्डली के जोर डालने पर बावा एक बार चुनाव में भी खड़े हुए। उनके ममर्थकों को पूरी उम्मीद थी कि बाबा जीत जाएंगे, बहुमत उनके साथ था, पर उस जमाने मे चुनाव का नतीजा बहुमत से नही अल्पमत में निर्धारित होता था । अतः वावा हार गए। "फिर भी उनका मन नहीं हारा । सन् 1936 में जव लेबर पार्टी का गठन हुआ, तब वावा दुगने जोश से मजूरो को संगठित करने लगे। उन्होंने जगह-जगह टोलियां बनाकर भाषण दिए।' 'इन्ही सरगर्मियो के बीच शिवरात्रि आ पहुंची। वावा शिव के अनन्य भक्त थे। उन्होंने उपवास रखा था। कायदे से उस दिन छुट्टी रहनी चाहिए थी, लेकिन मालिक ने ऐन वक्त पर मजूरों की छुट्टी रद्द कर दी। बामा ने सबेरे-सबेरे स्नान कर घुली हुई झकाझक सफेद कमीज पहल ली। माथे पर तिलक लगाए, वह काम पर पहुंचे ही थे कि मालिक ने कड़क कर कहा, 'विशेगर तुम आज फिर देर में आए !' 'कहा मालिक रोज यही म आते हैं हम ।' 'टम के बच्चे, तुम क्या दावत में आए हो। ऊंचा लोग माफिक कपडे पह्नकर मजूरी करता कि हजूरी करता!' 'सरकार आज साल भर का त्योहार रहा हमार, वावा ने कहा । 'मालिक भड़क गए, एक न सुनी । उठा हण्टर मारना शुरू कर दिया। सारे मजदूर सास खीच, परे हो गए। मालिक उन्हें मारता गया, मारता गया। मार उनकी पसलियो पर असर कर गई। चीनी से निकती दिप- चिपी गन्दगी उनके कपड़ों पर छिड़क उन्हें मिल के बाहर सेतो में घसीटा गया । इम जगह वह सामते-खांसते ढेर हो गए। लेकिन उम हिन्दुस्तानी 52/प्रेम कहानी

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परवानों का न पापि हाउग-गर्जनशिप में याद गिनेन को यही गना गाभिए । पिताजी के दिमाग में, अपने पाय-बागान के मजदूरों ग लिए एक अम्पनाल गोलने की योजना थी। मैमिन मिस नहीं माना । हम दिल्ली मा गए। पर मग गे कम म. डी. कर सेना पाहा पा। यह प्रोफैगर गुप्ता के प्रतिभाशाली छात्री में गिना जाता था। उन्होंने उभे रेजिडेण्ट रायटर की हैगिया से बी. एम. अस्पताल में रख लिया। यह बाल-रोगों पर विशेप अध्ययन करना पाहता था। उगे बच्चे बहुत आकर्षित करते थे, हंगते, शिलसिलाते, गोरे-गुदमारे बच्चे नहीं, वरन रोते-कराहते, काले-काटे, कृशकाय शिशु। यह महक के दाएं-बाएं भुग्गियो में विमुरते, बिलबिलारी बच्चे देसता और प्रस्त हो जाता, 2 बच्चे देश का भायो इनिहारा फैसे विरोंगे, भूग, युपोषण, गन्दगी, गरीबी से लडते-लड़ते ही दम तोड़ देंगे !' कई बार अस्पताल में, बचे हुए संम्पल लाकर वह पिछवाडे वसी झुग्गी-कालोनी में वाट आया था। यह उन्हें अस्पताल आने की सलाह देना । इनमें अधिकार मजदूरिने थी, लुहार-चमार, और धोबी । इलाज के लालच मे इनमें कई अस्पताल पहुंच गए । एकाध बार बीच में पड गिनेम ने उनकी जांच करवा दी, पर जब वे मरीज फिर अस्पताल आए. उन्हे घुडककर भगा दिया गया। वाल-रोग-विभाग के अध्यक्ष व अस्पताल के सुपरिन्टेण्डेण्ड प्रोफेसर गुप्ता ने कहा, 'तुम समझते नहीं हो गिनेस, अगर सारे शहर के भिखमगे यहा भीड़ लगा लेंगे तो अस्पताल का काम क्या खाक होगा! हमारी एकाग्रता मे कितनी वाधा पड़ती है, इस तरह ! यह अस्पताल है या खेरातखाना !' प्रोफेसर गुप्ता अस्पताल के अहाते में बने एक बड़े बंगले में रहते थे। उन्होने न केवल देश में वरन विदेश में अपनी मौलिक पुस्तकों पर स्याति अजित की थी। 'शिशु-रोगों की रोक-थाम' पुस्तक पर उन्हे अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका था। शहर मे डा० गुप्ता को बच्चों का जादूगर कहा जाता था । सुबह वह अस्पताल व मैडिकल कालेज में व्यस्त रहते । शाम को उनके बंगले का अहाता शिशु-मरीजो से ठसाठस भर जाता । उनके घर फोन सुनने के लिए 54/प्रेम कहानी ही अलग से एक चपरासी रहता। कहने को वे केवल दो घण्टे मरीज देखते, लेकिन वह कभी साढ़े दस से पहले खाली न होते थे। चार-साढ़े चार घण्टे अनवरत उनके क्लिनिक मे लोग आते, लोग जाते । वच्चे बुखार में तपते, कराहते, रोते, मचलते अपने मां-बाप की गोद मे आते, रिक्शों पर, स्कूटरों पर, पैदल, कारों मे। हर मेल का बच्चा वहां देखा जा सकता था, छोटा-बडा, काला-गोरा, दुबला-पदबदा । डा. गुप्ता केवल जांच करते नुस्खा लिखते, दवाएं कैमिस्ट से खरीदनी पढ़ती। घर के ही बाहरी कमरे में उनका क्लिनिक था। पोर्च और बरामदा मरीजों से ठसाठस भरा रहता । वहुधा ऐसा होता कि रात दस बजे वे आखिरी मरीज देखकर जब अन्दर चले जाते तव भी कोई-न-कोई मरीज़ आ टपकता । नौकर लाख कहता कि डाक्टर साहब अब नहीं देखेंगे, पर बीमार बच्चे के मां-बाप टलते नहीं। कई तो वहा पोर्च में पसर जाते, सुबह के इन्तजार मे। मिन्नत-खुशामद से काम न चलता देख, कई बार लोग नौकर की मुट्ठी गर्म करते कि किसी तरह डाक्टर साहब उनके बच्चे को देख लें। एक बार ऐसे ही किसी जरूरतमन्द के रात डेढ बजे आने पर डा० गुप्ता ने बैडरूम की खिड़की से कह दिया था, 'पूरे पचास रुपये तगेंगे इस वक्त' । तब से चार-छह मरीज रात डेढ़ बजे के बाद भी आ जाया करते । इनमें अक्सर वे नौसिखिए मां-बाप होते, जो अपने नवजात शिशु हर एक हरकत पर व्यग्र व चिन्तित होते, या वे, जिनके पास फेंकने को पैसा होता । डा० गुप्ता बिना चेहरे पर शिकन डाले चुपचाप मरीज़ देख लेते । उनका पर्स बार-बार नोटो से भर जाता। उनकी आलमारियों में एक की बजाय दो-दो सेफ थी । अस्पताल में वह जितने गुस्सल और चिड़चिड़े नजर आते, घर मे उतने ही शान्त व प्रस्तुत । वैसे घर पर मरीज देखने की उनकी फीस थी, सिर्फ बीस रुपये। लेकिन विजिट पर जाने पर वह मनमाना चार्ज कर लेते। शहर के हर इलाके में वह जाते भी नहीं थे। हालांकि उनका कदीमी घर पुरानी दिल्ली मे था, वह पुरानी दिल्ली में मरीज देखने कभी नहीं जाते थे । बहा के धीमे ट्रैफिक मे उनका बेशकीमती समय जाया होता । बल्कि जबसे इधर' घनघर और गिनेस ने शाम को उन्हें मदद करनी शुरू कर दी, वह यह प्रेम कहानी/55 .

- करते कि अगर चावडी बाजार, फतेहपुरी, घण्टाघर का कोई केस आता तो उससे पूरी फीस एडवान्म वमूल कर गिनेस या चक्रधर को रवाना कर देते। पढ़ाई और नम्बरों की सातिर यह दोनों बेगार ढोते और डा० गुप्ता के लालच को कोमते । चक्रधर कम, गिनेस ज्यादा। कभी-कभी शीतल बंडी भी डा० गुप्ता के घगुल मे प्रा फंमता, लेकिन कम, क्योकि उमका सीधा सरोकार डा. मेंहदीरत्ता से था। सभी विभागों के अध्यक्ष अपने- अपने किस्म के गहनशाह थे, इसलिए नहीं कि उनकी प्रेक्टिम नबसे ज्यादा चलती थी अथवा इसलिए कि यह सबसे योग्य थे, बल्कि इसलिए कि वह दंद-फंद व गुटवाजी द्वारा अन्य सभीको गिराने की काबिलियत रखते थे। यहां तक कि वे रीडर्ज का भी नम्बर न आने देते। एक खास घेरे के अन्दर ही केसेज देखे-यांटे जाते। मरीज इम भेडियापसान को न समझकर यही मानते कि जिमकी फीस और नसरें जितने तगड़े, वह उतना ही आला डाक्टर है। नये विचारो, आदों से उत्तेजित नये-नये युवा डाक्टर अध्यक्षों को इस पद-लोलुपता और धन-लोलुपता पर सिर धुनते । वंडी कहता, डा. गुप्ता, डा० मेहदरित्ता इतने पैसों का करेंगे क्या ? आखिर माय तो न जाएंगे !' गिनेस कहता, 'हवस के मारे बौरा गए हैं। यह भी नही देखते कि उनकी बीवियो के मुंह पर कितनी मुर्दनी छाई रहती है, बावजूद मेकअप के डा० वंसल व कुमार की पत्निया भी डाक्टर थीं । अन्य तीन अध्यक्ष, जो अहाते में रहते थे, उनकी पलिया डाक्टर नहीं थी । इनमें मिसेज मेहदरित्ता मवसे नई व कमउम्र थी। चक्रधर को वस एक आश्चर्य होता कि इतना पैसा यह डाक्टर रखते कहां है । बैंक में तो रखने से रहे । बोला, 'वह जरूर रुपयो के गद्दे भरवाते होगे।' 'फिर तो एक दिन इनका घर केवल गद्दो से भर जाएगा।' गिनेस कहता। . 56/प्रेम कहानी कई वार गिनेस बहुत खिन्न हो जाता, 'जया, सच उस दिन मैं नई मड़क गया था न केरा देखने, मुझे भयानक तजुर्बा हुआ। उस दिन शाम छह बजे से ही वह आदमी डाक्टर साहब के दरवाजे पर खडा मिन्नतें कर रहा था कि डाक्टर साहब उसके बच्चे को चलकर देख लें । डा० गुप्ता ने पहले तो उसकी गुहार पर कोई ध्यान नहीं दिया, बाकी केसज निपटाते रहे। अन्त मे नौ बजे मुझमे बोले, 'गिनेस, वाय डोन्ट यू गो एण्ड सी हिज पेशेन्ट ?' फिर उस आदमी से कडककर बोले, 'फीस निकालो।' कापते हाथों से आदमी ने अपनी अंटी से गुडीमुडी किया हुआ एक बीस का नोट निकाला और प्रोफेसर गुप्ता के हाथ पर रख दिया। प्रोफेसर गुप्ता ने कहा, 'जाओ, डाक्टर माहब के लिए टैक्सी लाओ।' उस आदमी की शक्ल रूंआसी हो आई । मैंने तुरन्त कहा, 'नही प्रोफेसर साहब मैं बस मे चला जाऊंगा।' डाक्टर साहव का ड्राइवर उनके कुत्तों को घुमाने ले जा रहा था। उनकी दोनों गाड़िया पोर्च में सड़ी थी। । - उस आदमी के ग्यारह महीने के बच्चे को गर्दन-तोड़ बुखार हो रहा था । उसके मौकसलाई से हाथ-पांव, बडा-सा पेट और लटकी गर्दन देख ताज्जुब होता कि यह जीवित कैसे है। बच्चे की मां फिर से मां बनने वाली थी। और उसका घर ओफ ! लगता नही था, चूल्हा भी जला है। मैंने नुस्खा लिखा तो उसने कहा, 'डाक्टर साहब यह दवा कितने की आएगी?' कीमत मुनकर वह पस्त हो गया। उनकी पत्नी बोली, 'हंसुली वेचकर पच्चीस लाए थे, वीर तो डाक्टर की भेंट चढ़ गए, अब दवा कहां से आएगी? कोई सस्ती दवाई लिख दीजिए, डाक्टर साहब ।' , ऐमी लाचारी, मायूसी और मुसीबत से गिनेम का रोज का साक्षात्कार था । अस्पताल से लौटकर वह मुझे यह सब बताता, मैं दहल जाती। प्रेम कहानी/57 हमारे खर्च बहुत मीमित थे, इसलिए हमे कोई आधिक कठिनाई नहीं थी, गिनेस के वेतन में वसूची गुजारा चल जाता! फिर भी मुझे बड़ी घबराहट होती। यह एक नितान्त अपरिचित दुनिया थी। इस माहौल में एक तरफ इन्सान अस्तित्व के लिए संघर्ष करता दिसाई देतातो दूसरी तरफ अस्तित्व के लिए मजबूर । नयॊ मे कई मेरी सहेलियां बन गई थी। वह बताती कितने मरीज किन स्थितियों में दम तोड देते है । कोई घटना सुनकर लगता कि मनुष्य मे वाकई जिन्दा रहने की जांबाज तैयारी है, फिर किमी घटना से लगता कि मनुष्य भरने के लिए अभिशप्त है। मेरे आमपास अस्पताल के अहाते में ऐनिस्थीसिया की नीली गन्ध और दवाओ की पोती गन्ध थी । उस जगह के वायुमण्डल में ये गन्धे बिंध गई थी । सामने के गोलचक्र मे तरह-तरह के फूल खिले थे, लेकिन उनका सौन्दर्य-मुगन्धि महसूस नहीं होती थी, लगता था फूल भी स्टरिलाइज़ कर डाले गए थे। हमारे अपने घर मे फिनायल और हेटाल की गन्धे प्रमुस थी। गिनेस जितनी बार बाथरूम में हाथ धोता, थोड़ी-मी फिनायल गिरा देता । मैं एतराज करती तो कहता, 'तुम्हे नहीं पता, अस्पताल के करीब होने से यहां की हवा में इतने कीटाणु हैं कि फिनायल का इस्तेमाल बेहद जरूरी है।' 'अस्पताल के बाहर ज्यादा है, मैं कहती। 'शहर मे एक नगरपालिका है, नगरपालिका में एक जन-स्वास्थ्य विभाग है । यह उस विभाग का सिरदर्द है।' गिनेस के अनुसार हमारे मुल्क में स्वच्छता का सबसे विचित्र व गन्दगी का सबसे घिनौना रूप, दोनो उपलब्ध थे। उसे लगातार अचम्भा होता । मैं उसका आश्चर्य समझ सकती थी। क्योंकि मारिशस मे कहीं भी गन्दगी का यह विकट स्वरूप मुझे देखने को नहीं मिला था । वहा के एकदम साफ और सुन्दर लगते थे। दो-एक वार गिनेस ने जमुनापार की बस्तियो का दौरा किया। उसका कहना था कि उन बस्तियो का मुख्य आहार जीवाणु और कीटाणु था। मैंने भी मथुरा की गलियों में देखा था । कृष्ण के कट्टर भक्त नहीं धोकर नंगे पाव घर से निकलते, पूजा के लिए पीतल की टोकरी और ताने की लुटिया हाथ में थामे मन्दिर जाते । अगल-बगल राहगीरों का स्पर्श 58/प्रेम कहानी गाव भी बचाते, वह कभी यह न सोचते कि इस तरह कितनी गन्दगी वे पैरों में लपेट मन्दिर में छोड़ आते हैं और कितनी मन्दिर से घर में ले आते है । वहां धर्मनिष्ठ औरतें मंगिन के छू जाने पर उनसे घमासान युद्ध छेड देती, बिना यह देथे कि उनके दांतो मे कितने कीड़े लग गए हैं या उन्हे जगह- बेजगह सुजली की बीमारी कब मे है । अपनी पढ़ाई के सिलसिले में गिनेस ने कई गर्भवती स्त्रियो का इन्टरव्यू लिया। उसने पाया उनमे से अधिकांश भयंकर रूप से धर्मान्ध थी। अजीब-अजीव सयाल थे उनके। एक औरत ने कहा वह रोज सुबह उठकर अपनी बेटियों को ओर पीठ कर किमी नर-पक्षी का दर्शन करती है, इससे शर्तिया लडका पैदा होता है । एक ने बताया कि ग्रहण के समय उमने द्वार की साकल उचककर खोली थी इसलिए उसका पेट का बच्चा लंगडा पैदा हुआ । एक औरत ने कहा वह गर्भावस्था के दिनों मे साबुन से नहीं नहा पाती, इससे बच्चे काले हो जाते हैं। गिनेस जब इन ऊलजलूल खपालो को तर्कहीनता समझाता, औरतें सिर हिलाती और आपस मे खुसर-पुमर कर सहमति प्रकट करती, पर फिर अपनी बड़ी-बूढियों का हवाला दे, वापस उसी अन्धचक्र मे पहुच जाती । यहा तक कि शिक्षित महिलाओ मे भी विचित्र प्रकार के अन्ध- विश्वास थे । गिनेस ने शहर की कुछ गृहणियो व कामकाजी स्त्रियों से साक्षात्कार किया। उसने पाया ये स्त्रियां अपनी गर्भावस्था का समय एक विशेष तनाव मे विताती है । तनाव का सर्वप्रमुख कारण कि कही लडकी न हो जाए । यहां तक कि निम औरत के तीन बेटे थे, वह भी चौया बेटा ही चाहती थी, बेटी नहीं। जिसके पहला शिशु होना था, उसकी वेटे की थी । झुग्गी-झोपडी से लेकर कोठी-बंगले तक गिनेस को पुत्र के प्रति यह आग्रह देखने को मिला। अपनी डिज़र्टेशन के सिलसिले मे उसे 'माताओं और शिशुओ मे रोगों की रोकथाम' पर काम करना था। कभी-कभी वह मुझसे कहता, 'मैं तो यही कामना करता हूं जया, हमारे प्यारी-प्यारी बच्चियां हो, वे भी जुड़वां ।' चाह भी प्रेम कहानी/59 हमारे गचं बहन मीमित पे, इमलिए हमें कोई आधिक कठिनाई नहीं थी, गिनेस के वेतन मे यसूची गुजारा चल जाता। फिर भी मुझे कसरी घबराहट होती। यह एक नितान्त अपरिचित दुनिया थी। इस माहौल में एक तरफ इन्सान अस्तित्व के लिए संघर्ष करता दिसाई देतातोमरी तरफ अन्तित्व के लिए मजबूर । नर्मों में कई मैरी सहेलियां बन गई थी। वह बताती कितने मरीज़ किन स्थितियों में दम तोड़ देते हैं । कोई पटना मुनार सगता कि मनुष्य में याकई जिन्दा रहने की जावाज तयारी है, फिर किमी घटना से लगता कि मनुष्य मरने के लिए अभिशप्त है। मेरे आमपास अस्पताल के अहाते में ऐनिस्थीसिया की नीली गन्ध और दवाओ यो पीलो गन्ध थी । उग जगह के वायुमण्डल में ये गन्धे चिंध गई थी । सामने के गोलचक्र में तरह-तरह के फूल सिले थे, लेकिन उनका सौन्दर्य-मुगन्धि महसूस नहीं होती थी, लगता था फल भी स्टरिलाइज कर डाले गए थे। हमारे अपने घर में फिनायल और हेटाल को गन्धे प्रमुख थी। गिनेस जितनी वार बाथरूम मे हाथ घोता, थोडी-मी फिनायल गिरा देता । मैं एतराज करती तो कहता, 'तुम्हे नहीं पता, अस्पताल के करीब होने से यहा की हवा में इतने कीटाणु हैं कि फिनायल का इस्तेमाल बेहद जरूरी है।' 'अस्पताल के बाहर ज्यादा हैं, मैं कहती। 'शहर मे एक नगरपालिका है, नगरपालिका में एक जन-स्वास्थ्य विभाग है । यह उस विभाग का सिरदर्द है।' गिनेस के अनुसार हमारे मुल्क में स्वच्छता का सबसे विचित्र म गन्दगी का सबसे घिनौना रूप, दोनों उपलब्ध थे। उमे लगातार अचम्भा होता । मैं उसका आश्चर्य समझ सकती थी। क्योकि मारिशस मे कही भी गन्दगी का यह विकट स्वरूप मुझे देखने को नहीं मिला था । वहा गाव भी एकदम साफ और सुन्दर लगते थे। दो-एक बार गिनेम ने जमुनापार को बस्तियो का दौरा किया। उसका कहना था कि उन बस्तियों का मुख्य आहार जीवाणु और कीटाणु था। मैंने भी मथुरा की गलियो मे देखा था। कृष्ण के कट्टर भक्त नहीं धोकर नंगे पाव घर से निकलते, पूजा के लिए पीतल की टोकरी और तावे की लुटिया हाथ मे थामे मन्दिर जाते । अगल-बगल राहगीरों का स्पर्श । के 58/प्रेम कहानी बचाते, वह कभी यह न सोचते कि इस तरह कितनी गन्दगी वे परों में लपेट मन्दिर में छोड आते हैं और कितनी मन्दिर से घर में ले आते हैं । वहां धर्मनिष्ठ औरतें मंगिन के छू जाने पर उनसे घमासान युद्ध छेड़ देती, बिना यह देखे कि उनके दांतों में कितने कीड़े लग गए हैं या उन्हे जगह- वेजगह खुजली की बीमारी कब से है। अपनी पढ़ाई के सिलमिले में गिनेस ने कई गर्भवती स्त्रियों का इन्टरव्यू लिया। उसने पाया उनमें से अधिकांश भयंकर रूप से धर्मान्ध थो । अजीब-अजीव खयाल थे उनके। एक औरत ने कहा वह रोज सुबह उठकर अपनी बेटियों की ओर पीठ कर किसी नर-पक्षी का दर्शन करती है, इससे शर्तिया लड़का पैदा होता है। एक ने बताया कि ग्रहण के समय उमने द्वार की सांकल उचककर खोली थी इसलिए उसका पेट का बच्चा लंगड़ा पैदा हुआ । एक औरत ने कहा वह गर्भावस्था के दिनो मे साबुन से नही नहा पाती, इससे बच्चे काले हो जाते है। गिनेस जव इन ऊलजलूल खयालों की तर्कहीनता समझाता, औरतें सिर हिलाती और आपस मे खुसर-पुसर कर सहमति प्रकट करती, पर फिर अपनी बडी-बूढियों का हवाला दे, वापस उसी अन्धचक्र मे पहुंच जाती। यहां तक कि शिक्षित महिलाओं में भी विचित्र प्रकार के अन्ध- विश्वास थे । गिनेस ने शहर की कुछ गृहणियो व कामकाजी स्त्रियों से साक्षात्कार किया। उसने पाया ये स्त्रिया अपनी गर्भावस्था का समय एक विशेष तनाव में बिताती है । तनाव का सर्वप्रमुख कारण कि कही लडकी न हो जाए । यहां तक कि निम औरत के तीन बेटे थे, वह भी चौथा बेटा ही चाहती थी, वेटी नही। जिसके पहला शिशु होना था, उसकी चाह भी बेटे की थी । झुग्गी-झोंपड़ी से लेकर कोठी-बंगले तक गिनेम को पुत्र के प्रति यह आग्रह देखने को मिला। अपनी डिटेंशन के सिलसिले मे उसे 'माताओ और शिशुओं मे रोगों की रोकथाम' पर काम करना था। कभी-कभी वह मुझसे कहता, 'मैं तो यही कामना करता हूं जया, हमारे प्यारी-प्यारी बच्चियां हों, वे भी जुड़वां ।' . प्रेम कहानी /59 मै हंस देती। 'सच एक या दो नन्ही जया ! मैंने तुम्हारा बचपन नही देखा, उसके जरिए वह भी देख लूगा।' 'लेकिन, मैं तो एक नन्हा गिनेस चाहती हूं, मैंने भी तुम्हारा बचपन कहां देखा?' 'रही न तुम भी वही की वही,' वह रूठने लगता। मैं उसे मनाने लगती। चादनी हमारे नन्हे घर की खिड़की से छनकर सीधी पलंग पर आती थी। लेटे-लेटे गिनेस मेरा हाथ थाम लेता, 'लाओ, तुम्हारा भाग्य पढ़ दू । अरेरे यह कैसा हाथ है, भाग्य-रेखा तो इसमे है ही नहीं।' 'हटो', मैं हाथ खीच लेती, 'मेरे हाथ में तो पूरी छह फुट लम्बी भाग्य रेखा है, तुम्हे नही दिखी। हम चांदनी की भीठी जकड़बन्दी में सांसो को जुगलबन्दी सुनते-सुनते सो जाते। मैं चक्रधर होस्टल में रहता था। कई बार वह दोपहर का खाना हम लोगो के साथ ही खा लेता। पिछले पूरे माह उसे डा० गुप्ता ने शाम के समय जोते रखा । विद्याथियो से काम लेने के लिए डा० गुप्ता कुख्यात थे। जो उनके काम न आता उसका भविष्य पहले ही धुंधला पड़ जाता। उम दिन फुर्सत मे चक्रधर आया। कॉफी पीते-पीते बोला, 'पिछले हफ्ते डाक्टर माहब ने कई कलाबाजिया दिखाई। एक रात ग्यारह बजे जब आखिरी मरीज विदा हुआ तभी स्कूटर पर एक दम्पति नन्हा-सा बच्चा लिए पहुचे । स्त्री विल्कुल स्बासी हो रही थी, वोली, 'डाक्टर साहब, तीन घण्टे से कोगिग कर रही हू, वैबी सोता ही नही। बम रोए जा रहा है।' यच्चे के नौजवान बाप ने कहा, 'डाक्टर साहब, यह इतनी देर से चिल्ला रहा है, कहीं इसके फेफडेन डेमेज हो जाएं।' तुम्हें पता है गिम, डा० गुप्ता की वह शरारती मुस्कान जो ऐसे पढे-लिगे बेवकूफों को देखकर उनके चेहरे पर अनायास आ जाती है। बच्चे के मां-बार तो इतने घबराए हुए थे कि उन्हें खुद रलाई आ रही 60/प्रेम कहानी . थी। डा० गुप्ता ने मुझे इशारा किया। डाक्टर साहब ने बच्चे का पेट, छाती, गला, आख सब जांचा, सब दुरस्त था। मैंने अन्दर में लाकर माधी चम्मच दाइक्लोरियल सिरप बच्चे के मुह मे डाल दिया। बच्चे ने रोना अन्दर आकर ही बन्द कर दिया था। मेरा तो मन हो रहा था कि एक-एक चम्मच सिरप उसके मा-बाप को भी पिला दू । डाक्टर साहब ने कहा, 'अव बच्चा पापको तंग नहीं करेगा, जाइए, आप लोग भी सो जाइए।' वे नौसिखिए मा-बाप इतने प्रसन्न हुए कि बीस की जगह चालीस रुपए दे गए। उनके जाने पर डाक्टर साहब ठठा कर हंस पड़े, 'देखा चक्र- घर, यह है हमारे धन्धे का अन्धा जादू । सीख लो, सीख लो, काम आएगा! कम बोलो, ध्यान से सुनो, जाचौं, मरीज के अटडेण्ट को कभी समझाने की कोशिश न करो, बम पर्चा लिखो, पकड़ा दो। ज्यादा से ज्यादा हूं-हां से काम चलाओ।' उस दिन डाक्टर साहब ने मुझे पहली बार दस का एक नोट दिया, इनाम । नही तो तुम्हे पता है चाहे ग्यारह बन जाएं चाहे बारह, डाक्टर माहब कभी कॉफी को भी नहा पूछते ।' 'कायदे से उन्हें कुछ हिस्मा सहयोगियों का भी रखना चाहिए,' मैने कहा। गिनेस ने कहा, 'कायदे से उन्हें फीस लेनी ही नहीं चाहिए। उन्हें सरकार से वेतन मिलता है। किताबो से रायल्टी भी आती है।' 'लेकिन खर्च भी तगड़ा होगा उनका, आखिर दो-दो वच्चे शिमला में पढ़ते हैं, मैंने कहा, 'मिसेज़ गुप्ता की माडिया दैसी है, मार्केटिंग करने भी जाती है तो तीन सौ से कम की साड़ी नही पहनती।' गिनेम चिढ़ा, 'जाने किस-किसकी व्याधि से कलंकित, किस-किसकी मजदूरी से मुडे-तुड़े नोटों से ऐश करते है ये लोग ?' यह क्या कि जो फीस दे सकता है वह छीक का इलाज भी वी० आई० पी० ढंग से करा ले और जो नहीं दे सकता वह दमा, लकवा, तपेदिक को भी किस्मत का हिस्सा मान कर सब कर ले।' चक्रधर असहमत हो गया, 'तुम तो खामखाह भावुक हो रहे हो, दोस्त ! आखिर डाक्टर गुप्ता डाक्टर है, ठग तो नही । इलाज करते है, फीस लेते है । अपनी अक्ल के बूते पर कमाना कोई बुरी बात नहीं।' प्रेम कहानी/61 'तुम्हारे लिए नहीं होगी, मेरे लिए तो है। मेरी नज़र में अपनी अक्ल का पेक्षा करना उतना ही नीच है जितना अपनी शक्ल का पेशा करना।' गिनेम के लिए डाक्टरी की पढाई एक आदर्श थी। वह सोचता था कि चिकित्सा भी राष्ट्रीय सेवा का एक अंग होनी चाहिए, जिसके अन्त- र्गत जाति-वर्ग, वर्ण से परे हर किमीको हर किस्म का उपचार सुलभ हो। चक्रधर की आंखों में ऐमा कोई सपना नही था । अक्मर वह डा० गुप्ता के नुस्खे रट लेता, दवा-कम्पनियों के नाम समेत । इसीलिए डाक्टर गुप्ता के घर इस सायंकालीन सेवा को वह इन्वेस्टमेट कहता था। वह एक महत्त्वाकाक्षी व्यक्ति था। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि स्नातकोत्तर शिक्षण के बाद डा० गुप्ता उसे इसी शहर में इसी कालेज मे लेक्चरर नियुक्त कर लें। इसके विपरीत गिनेस डा० गुप्ता से भिड जाता। दो-एक वार मरीज के जाने के बाद गिनेस की डाक्टर साहब से वहस हो गई : 'आपने अमुक कम्पनी की दवा क्यो लिखी? आपको पता है उस दूसरी कम्पनी की वही दवा उससे सस्ती और ज्यादा कारगर है, हम परीक्षण द्वारा यह सिद्ध कर चुके है।' 'गिनेस तुम मेरे प्रेस्क्रिपशन मे दखल न दिया करो,' डाक्टर गुप्ता ने भरसक ठण्डे स्वर मे कहा। 'उस छह माह के शिशु को आपने वह तेज असर वाली दवाई प्रिस- क्राइब की है । वह ठीक तो तुरन्त हो जाएगा. लेकिन उमकी भूख हवा हो जाएगी, पाचन-क्रिया चौपट हो जाएगी, उसका ब्लड-काउण्ट भी लो हो सकता है। 'तो फिर उसके माता-पिता पाचन-क्रिया और ब्लड-काउण्ट का इलाज करवा लेंगे।' 'और उनका भी माइड-इफेक्ट होगा।' 'हा होगा! हर एक दवा का इफेक्ट और साइड-इफेक्ट होता है, 62/प्रेम कहानी इसमे ताज्जुब क्या है । और आइन्दा मुझसे ऐसे बेहूदा सवाल-जवाब न करना । यू मस्ट नो योर लिमिट्स ।' 'सर, मैं आपसे एक गुस्ताखी कर सकता हूं ! अगर आपका बच्चा बीमार हो जाए तो क्या आप उसको यही दवा देंगे' 'तुम अपनी हद वाकई लाघते जा रहे हो, गिनेस । तुम्हें पता नहीं, हो सकता है इन हरकतों से तुम्हें बगैर पढाई पूरी किए वापस लौटना पड़ जाए।' 'क्या इसका यह अर्थ निकलता है कि मैं आपसे स्पष्ट बात नहीं कर सकता?' 'कर सकते हो, तमीज के साथ, याद रहे ।' डाक्टर गुप्ता फिर मरीजों में लग गए। लेकिन गिनेस पर आकर किचकिचाता रहा, 'उस दवा कम्पनी का प्रतिनिधि इनके पास न जाने क्या-क्या भेंट छोड़ जाता है ! तभी इन्हे वह दवा कम्पनी इतनी प्यारी है।' 'पर तुम इस चीज को कैसे रोक सकते हो, आखिर मरीज़ उनके मरीज हैं, उनसे इलाज करवाते हैं, उनमे विश्वास रखते हैं, तभी आते हैं !' मैंने उसे शान्त करने का प्रयत्न किया। 'मरीज उनके हैं या मेरे, यह जरूरी बात नहीं है, जया, पर वे जिन्दा इन्सान है । जिन्दा जानो से निर्मम मुनाफा कमाना उफ, कितना धृणित है यह ! तब तो और भी ज्यादा जब वे इन्तान इतनी श्रद्धा और विश्वास से उनके पाम आते हैं, उन्हे साक्षात भगवान समझ !' 'फीस लेना तुम मुनाफा क्यो मानते हो। वे कोई दवा तो वेचते नहीं, जो मुनाफा कमाएं ?' 'तुम नहीं जानती यह एक जाल है, जो पूरे कालेज और अस्पताल मैं फैलाया हुआ है। जो लोग इस जाल को फैलाने में उनकी मदद करते हैं, उनकी ये भी मदद करते हैं। जैसे वेज़रूरत मरीज़ का फलां डाक्टर से एक्सरे करवाना । अगर वह कहीं और से करवा लाया है तो उम प्रेम कहानी/63 रिपोर्ट को आथेण्टिक न मानना। जनरल वार्ड में विस्तर होते हुए भी जवरदस्ती प्राइवेट वार्ड में मरीज दासिल करना, जव तक मरीज मरणा- सन्न न हो जाए लापरवाही बरतना, जो मरीज प्राइवेट उपचार कराएं उनपर ज्यादा ध्यान देना, जो अस्पताल में इलाज करवाएं उनपर कम। ये सब बातें मुनाफे के अन्तर्गत आती है।' 'जाच कर वे दवा ही देते है न, जहर तो नहीं देते, तुम यों ही गरम हो रहे हो।' 'पर जब उससे कम तेज दवा से काम चल सकता है तब उन्हें वह देनी चाहिए। बच्चों का सारा सिस्टम हमेशा के लिए नामाकूल हो जाता है। 'वे भी क्या करें ? मरीज़ भी तो डाक्टर को जादूगर समझ कर आते है।' 'तो डाक्टरो को चाहिए डाक्टरी छोड बाजीगरी शुरू कर दें।' 'मुझे लगता है गिनेस, विद्यार्थी-जीवन सपनों का सिलगिला होता है, तुम ऐमे ही सपनो मे जीते हो। जरा आख खोलकर देखो। क्या दुनिया सपनो से चल सकती है ? इसमें नोन, तेल, लकड़ी की सरत जरूरत होती है, जनाव ।' 'डाक्टर साहब के मामने उनमे से एक भी समस्या नहीं है जया, समस्या है तो उनकी हवम 'जब तुम प्रेक्टिस शुरू करोगे, तब देखेगे।' 'देख लेना ! मुझे प्रेक्टिस छोडना मंजूर होगा, लेकिन मिद्धान्त नहीं।' 'हर असफल आदमी आदर्शवादी होता है, हर सफल इन्सान यथार्थवादी।' गिनेस मेरी बात से आहत हो गया: 'क्या तुम्हारी निगाह मे भी सफलता वही है जो नोटों मे नापी जाए। चया तुम भी इन्तजार कर रही हो कि कब मैं पढाई खत्म कर पैसा कमाने की मशीन में ढल जाऊं!' मेरा यह मतलव बिल्कुल नहीं था। मेरी मुश्किल यह थी कि मैं उमे असम्भव आदशों की कच्ची राह से वास्तविक तथ्यों की पक्की राह पर 64/प्रेम कहानी लाना चाहती थी। मैं नहीं चाहती थी कि दुनिया के आगे वह फिसड्डी सावित हो। पर गिनेस की आंखें आदर्श से आलोकित थी। वह बोला, अव्वल तो मुझे यहां प्रेक्टिस करनी ही नही है । अस्पताल की जानलेवा राजनीति में यहां डाक्टर खुद रोगी हो जाता है । वह नए डाक्टर आए है न, डाक्टर उस्मान, सर्जरी के लेक्चरर ! उन्हें लेकर विभाग मे जबरदस्त विरोध है । डाक्टर गुप्ता उनसे बेहद चिढ़ते हैं। उन्होने पूरे विभाग मे यह प्रदूषण फैला दिया है । परसों डा० उस्मान को बड़ा जरूरी एमरजेन्सी आपरेशन करना था, थिएटर खाली नहीं मिल रहा था । उनका मरीज दो बजे तक कारीडोर में पड़ा रहा और जब आपरेशन-थिएटर उन्हे मिला तब आपरेशन के दौरान विजली गुल हो गई। आपसी बैर-भाव मे दूसरों की जान से खिलवाड़ करना जैसे आम बात है 'तुम्हें इन सब बातों में नहीं पडना चाहिए गिनेस,' मैंने खाने की प्लेट हटाते हुए कहा। गिनेस का गुस्सा बढ़ गया, 'तुम भी डा० गुप्ता की तरह बोल रही हो । छात्रो से कहा जाता है इन सब बातो में न पडी । इसीलिए उपद्रव होते हैं, इसीलिए तोड-फोड़। किसी भी औसत बुद्धिवाले इन्सान को ये चातें कचोटती हैं, इनमे कैसे आंखें बन्द की जा सकती हैं । अगर पढाई के दौरान आख, कान, मुंह बन्द रखना जरूरी है तो पढाई के बाद दिमाग कसे खुलेगा ! क्या अर्थ है इस पढाई का ?' गिनेस इमी तरह हमेशा मवालो से भरा रहता था। वह केवल अपने विषय पर सीमित न रहकर, ममूचे अस्पताल, समूचे शहर, समूची व्यवस्था को लेकर आन्दोलित रहता। शहर में आए दिन कोई न कोई रोग महामारी की तरफ फैला रहता। कभी पानी तो कभी हवा, कभी मक्यी तो कभी मच्छर पर गवारी करता रोग आता और घर-घर घुम जाता। हफ्ते मे दो दिन सुबह आठ से एक नहानी165

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छोडो ये तो जमदूत को भी चकमा देकर अस्पताल आ जाएं बिस्तर तोड़ने !' बंडी ने उसे घुड़ककर चुप कर दिया। 'हजारों टेबलट्स आई थी, इतनी जल्द कैसे खत्म हो गई ?' गिनेस ने कहा। डाक्टर गुप्ता कुछ नहीं बोले । उन्होंने एक ठण्डी, टेढी और बद- मिजाज नजर उसपर डाली। कम्पाउण्डर किसीसे दवता नहीं था, बोला, 'लोग भी वस शोर मचाना जानते हैं । अरे बार-बारह पैसे में बाजार से टिकिया मिलती है, ले क्यों नहीं लेते ! चले आते हैं सुबह-सुबह दिमाग चाटने ।' बंडी ने कहा, 'इनमें से ज्यादातर ऐसे लोग हैं जिनकी जेब में बारह पैसे भी होने मुश्किल है।' डाक्टर गुप्ता चिढ गए, 'जितना स्टाक था, बांट दिया गया। अस्पताल ने क्या सारे शहर का ठेका ले रखा है ? ये गलीज लोग क्या कभी ठीक हो सकते है ! आज इन्हे मलेरिया से बचाओ, कल इन्हे फ्लू हो जाएगा, फ्लू ठीक करो, टायफायड हो जाएगा। दवाई खिलाने से पहले इन्हे सफाई मिखाने की जरूरत है । गन्दगी इनका भोजन है और मच्छर इनका हमसाया!' गिनेस वोला, 'नही सर गरीवी इनका हमसाया है, मुखमरी इनका भोजन।' डाक्टर गुप्ता बोले, 'तो इसका इलाज हम कहा से करें । जाएं गाधी टोपी वाले नेताओं के पास उनसे इलाज मांगें। उनसे क्यो नही कुछ कहते, जिन्हें ये चुपचाप जाकर वोट पकड़ा आते है !' बंडी ने गर्दन हिलाई, 'ठीक कहते हैं सर, इनका इलाज डाक्टर के नही, लीडर के पास है !' 'कारा ! गरीबी दूर करने की भी कोई टिकिया आती!' गिनेम ने कहा। प्रेम कहानी/67 । गिनेस की ड्यूटी बाह्य-विभाग में लगती। इस माह डाक्टर गोकर्ण के साथ शीतल बंड़ी और गिनेस की ड्यूटी थी। इन दिनों शहर में मलेरिया भयंकर रूप से फैला हुआ था । अस्पताल में उसके इलाज के लिए भारी तादाद मे एक अच्छी कम्पनी की माकुल गोलिया मगा ली गई थी। कापते, थरथराते, बुखार मे तपते लोग सुबह से अस्पताल पहुंच जाते। घण्टो लाइन में खड़े होकर वे पर्ची बनवाते, फिर एक-एक कर डाक्टर से जांच करवाते । अन्त में उन्हें दवा के लिए लाइन लगानी पडती । इस सबमे रोगी का खासा कचूमर निकल जाता, लेकिन और कोई चारा भी नहीं था। इतनी परेशानियों के बावजूद अरपताल मे आजकल खिड़की-तोड़ भीड थी। बुधवार को एकाएक बारह बजे अस्पताल के दवाखाने की खिड़की बन्द कर दी गई। अभी दवा लेनेवालों की एक लम्बी कतार वांकी थी। लोग शोर मचाने लगे। चपरासी ने बाहर आकर कहा, 'दवा खत्म हो गई है।' मरीज़ो के चेहरे उतर गए। कई असन्तोप में बहस करने लगे। कम्पाउण्डर ने बहस नही की। वह सीधे सुपरिन्टेण्डेण्ट की केविन मे घुस गया। शीतल बंडी और गिनेस जो इतनी देर से रोगियों की जाच में सिर खपा रहे थे, इस खबर से हक्का-बक्का रह गए कि गोलियो का स्टाक खत्म है । बीमारी पूरे जोर पर थी। बच्चे-बूढे सब चपेट मे थे। ऐसे समय अस्पताल का फर्ज हो जाता था कि दवा मुहैया करे । वे दोनों भी सुपरिन्टेण्डेण्ट के केबिन में पहुंचे, 'डा० गुप्ता, बाहर मरीज त्राहि-त्राहि कर रहे है, आप दवा का तत्काल प्रबन्ध करवा दें।' 'भई इतनी जल्द कैसे होगा। आखिर सौ पचास गोलियों का सवाल तो है नही, हजारो की तादाद मे चाहिएं, उसके साथ उतनी ही विटामिन की टिकिया। देर तो लगेगी।' 'तो मैं रोगियों से कह दू, कल आकर ले जाएं,' गिनेस बोला। 'कल तक कैसे होगा इन्तजाम । उनसे कहो, अगले हफ्ते आएं !' 'सर, अगले हफ्ते तक जिन्दा रहे तभी आ पाएंगे ये !' कम्पाउण्डर बोला, 'अरे ये नहीं मरने वाले मलेरिया, फ्लू - की बात 66/प्रेम कहानी छोड़ो ये तो जमदूत को भी चकमा देकर अस्पताल आ जाएं विस्तर तोड़ने !' वंडी ने उसे घुड़ककर चुप कर दिया। 'हजारो टेबलट्स आई थी, इतनी जल्द कैसे खत्म हो गई ?' गिनेस ने कहा। डाक्टर गुप्ता कुछ नहीं बोले । उन्होने एक ठण्डी, टेढी और वद- मिजाज नजर उसपर डाली। कम्पाउण्डर किसीसे दवता नहीं था, वोला, 'लोग भी वस गोर मचाना जानते हैं । अरे बारह-वारह पैसे मे बाजार से टिकिया मिलती है, ले क्यो नही लेते ! चले आते हैं सुबह-सुबह दिमाग चाटने !' बंडी ने कहा, 'इनमे में ज्यादातर ऐसे लोग है जिनकी जेब में बारह पैसे भी होने मुश्किल है।' डाक्टर गुप्ता चिढ गए, 'जितनास्टाक था, बाट दिया गया। स्पताल ने क्या सारे शहर का ठेका ले रखा है ? ये गलीज लोग क्या कभी ठीक हो सकते है ! आज इन्हें मलेरिया से बचाओ, कल इन्हे फ्लू हो जाएगा, फ्लू ठीक करो, टायफायड हो जाएगा। दवाई खिलाने से पहले इन्हें सफाई मिखाने की जरूरत है। गन्दगी इनका भोजन है और मच्छर इनका हमसाया !' गिनेस बोला, 'नही सर गरीबी इनका हमसाया है, भुखमरी इनका भोजन।' डाक्टर गुप्ता बोले, 'तो इसका इलाज हम कहा से करें। जाएं ये गाधी टोपी वाले नेताओं के पास उनसे इलाज मागें । उनसे क्यो नहीं कुछ कहते, जिन्हें ये चुपचाप जाकर वोट पकड़ा आते है !' बंडी ने गर्दन हिलाई, 'ठीक कहते है सर, इनका इलाज डाक्टर के नही, लीडर के पास है !' 'काश! गरीबी दूर करने की भी कोई टिकिया आती!' गिनेस ने कहा। प्रेम कहानी/67 अस्पताल में इसी तरह दवाओं का स्टाफ अकस्मात् खत्म हो जाता। कभी टैटबैंक उपलब्ध न होता, कभी पोलियो डोज खलाम हो जाती । कभी विटामिन बी० के कंप्मूल गायब हो जाते तो कभी ए० पी० मी. नदारद । अस्पताल के बाहर कैमिस्टों की चांदी बन आती। मरीज निराश होकर वहीं जाते। उन दिनो डा० गुप्ता, डा० मेहदरित्ता, डा० प्रधान, डा. गोकर्ण वगैरह के घरो में भी शाम को अतिरिक्त भीड होती। कई मरीज अस्पताल की भीड और लम्वे इन्तजार से घबराकर, किसी तरह फीस का प्रबन्ध कर शाम को डाक्टर माहय के घर पर दिखते। हर वस्तु का मौसम साल मे एक बार आता, कितावों का, कपड़ों का, फलों का, फूलों का, लेकिन बीमारी हर मौसम के माय चिपकी रहती । सुबह होते ही अस्पताल का अहाता खांमते-खांसते लोगों से भर जाता, औरतें, बच्चे और मर्द । कइयों की दगा ऐमी होती कि उन्हें अस्पताल में दाखिल करना जरूरी होता, लेकिन अस्पताल ठसाठस भरा रहता। जितने विस्तर उसमे तिगुने मरीज, मरीज विस्तरों के ऊपर, नीचे और अगत-बगल । इस आपाधापी में सबसे ज्यादा अगर किसी पर जोर पड़ता तो नसों और हाउस-सर्जनो पर। उनकी ड्यूटी यकायक बढा दी जाती, कभी आफ- डे कैन्सिल कर दिया जाता, कभी कैजुएल । केस विगड़ने पर सबसे ज्यादा लताड भी उन्हे ही पड़ती। कभी-कभार दाखिल हुए मरीज़ बड़े डाक्टर से शिकायत कर देते । अगर शिकायत करने वाला कोई महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हुआ तो बस कयामत आ जाती। दरअसल अस्पताल का प्राइवेट-वार्ड ही ऐसी सब मुसीवतो की जड था । किसी-किसी मरीज के सेवक वहा आकर ऐसे व्यवहार करते, जैसे वे किमी होटल में रह रहे हैं और जैसे उन्हें पैसे के बल पर सब सुविधाएं प्राप्त करने का हक है । थोडी-थोडी देर में वे नर्स को बुला लाते, अपने मरीज का हाल बढ़ा-चढाकर बयान करते और रात-विरात डाक्टरों को तंग करते । नतीजा यह होता कि अस्पताल का स्टाफ इतना झल्लाया रहता कि कभी-कभी वास्तव मे गम्भीर मरीज़ की भी अवहेलना हो जाती। प्र-4 68/प्रेम कहानी एक दिन हम धूमते-घूमते वगाली मार्केट चले गए। मुझे चाट वहुत पसन्द थी, पर गिनेस का खयाल था यह बीमारी की जड़ है। मेरे बहुत जिद करने पर भी उसने चाट नहीं खाई, न खाने दी। वह कनाट प्लेस जाकर आइसक्रीम खाना चाहता था । तभी मैंने एक दुकान की भीड मे एक नितान्त परिचित पिछवाडा देखा । नहीं, मैं भूल नही कर सकती थी। यह यशा थी, मेरी सबसे प्यारी सहेली। मैंने पास जाकर शक्ल देखकर इतमीनान किया और पुकारा, 'यशा !' हम लिपट गए फिर सहसा अलग हो गए । यशा ने कहा, 'तूने खवर भी न ली इतने दिन, कि यशा जीती है या मर गई !' 'तूने भी तो नहीं ली यशा ! तू अकेली आई है ?' 'नहीं, 'जी' साथ मे है, उसने कहा और तभी पास आई एक वृद्धा से मुखातिब हो गई। मैंने पाया वह औरत बड़े ध्यान से मेरी ओर देख रही थी। 'जी, यह मेरी कालेज की सहेली है, जया । हमारे घर अगल-बगल जी ने आशीर्वाद दिया। फिर यशा से बोली, 'जल्दी कर ले, देर हो । यशा ने बताया वह चांदनी चौक मे रहती है। पति लोहे के व्यापारी है । यह उसकी सास हैं, जी।' मेरे दिमाग मे तडफड मची थी। शादी के साथ-साथ मैके से सम्पर्क टूट गया था। मुझे अपने माता-पिता की कोई खबर नहीं थी। यशा के बारे में फिर कैसे कुछ पता होता। मैंने कल्पना की थी जैसे मैंने अपने प्यार में कामयाबी पाई, वैसे ही यशा ने पाई होगी। वह शिकागो उड गई होगी या मुहम्मद हिन्दुस्तान आकर बस गया होगा । मुझे क्या पता था यशा यहीं है इसी शहर मे। मैंने उसे गिनेस से मिलाया। गिनेस की आदत थी वह एक ही नजर म बहुत-कुछ ताड़ लेता था । कुछ-कुछ तो मैं भी ताड़ गई थी। बावजूद अपनी कीमती साड़ी और वढिया मेकअप के यशा के चेहरे पर रोनक नहीं प्रेम कहानी | 69 । थी । मैंने जी से बचाकर इशारे से पूछा, 'क्यो मुहम्मद वाला प्लेन छूट गया था क्या? यशा पीली पड गई। डरकर उसने जी की तरफ देखा और वोली, 'फिर बातें करेंगे। अपना पता दे दे, मैं आऊंगी।' वह जल्दी से जी के साथ वहां से चली गई। गिनेस ने कहा, 'यही वह लडकी है, जिसके बारे मे तुमने बताया था !' 'शी सीम्स टु बी बार्न फार ट्रैजिडी।' वाकई यशा वेहद उदास लगी थी। उसने अपना पता भी नहीं बताया था। मुझे बड़ी बेचैनी होने लगी। मैं तो गिनेस को पाकर घर-बार, सखी-सहेली सब भूल गई थी। अपने दिन और रात, दोनो उसके हवाले कर मैं वेहद मगन थी। मुझे अचम्भा होता था कि हमारे विवाह के ग्यारह महीने, ग्यारह मिनट की तरह गुजर गए थे। नहीं, मैं उस अर्थ मे, विवाहित नही दिखती थी, जिस अर्थ में आम तौर पर लडकिया दिखती हैं । न मांग मे सिन्दूर, न माथे पर बिन्दी, कलाई मे न चूडा, न चूडी, सादी सूती कलफ लगी साड़ियों में मैं उसकी पली की अपेक्षा दोस्त नजर आती । उसे मेरी यही तस्वीर पसन्द थी। मेरी आभूपणहीन, दुर्बल देह की इच-इच को उसने अपने प्यार से इतना मजा दिया था कि मैं अपने को किसी रानी-महारानी से कम नहीं मानती। पर इसका मतलब यह नही था कि हमे परेशानिया नहीं थी। उद्विग्न होने के लिए कोई-न-कोई कारण निकल ही आता था। अस्पताल के अन्दर- बाहर का हाहाकार, गिनेस की दैनिक व्यस्तता, अपने आस-पास के सवाली से रोज का टकराव, हमें कभी भी पूरी तरह सन्तुष्ट और सुखी होने की छूट नही देता था। आए दिन में दिल्ली की सडको पर नव-विवाहित जोड़ी को देखती-भारी साड़िया और नये मूट पहने, एक-दूसरे के हाथ में हाथ डाले घूमते, हसते, चहचहाते। हमारा एक भी दिन इतना निश्चिन्न नहीं गुजरा था । गिनेम का अनिश्चित ड्यूटी-क्रम, अध्ययन और चिन्तन इम मय की इजाजत नहीं देता था। कभी मैं कहती, 'प्रेम भी कर लिया, शादी भी कर ली, पर एक भी 70/प्रेम कहानी । .

बार न ताजमहल गए, न कश्मीर । न कोई फोटो खिंचवाई, न जेवर बनवाए । इसका मतलब चालू अर्थो में या तो हम औसत नहीं है, या हम प्रेमी नहीं हैं, या हम दोनों नहीं है।' गिनेस कहता, 'प्रेम और प्रेमी इतने पिटे हुए शब्द हैं कि इनका कोई अर्थ नहीं बचा है। हम एक-दूसरे के लिए जरूरी है, क्या यह काफी नहीं है ! तुम मेरी जिन्दगी में वैसे ही जरूरी हो, जैसे सुबह का अखवार ।' 'अखवार न आए, तो भी जिन्दगी तो चलती रहती है, मैं रूठती। 'हां, जिन्दगी तो एक बायलाजिकल प्रक्रिया है, चलती रहती है, किन्तु वह एक छिलका जिन्दगी होती है । जिस दिन सुबह का अखबार न मिले, वह दिन कितना अधूरा, मनहूस और वेस्वाद होता है !' मैं कहती, 'तुम मेरे लिए उतने जरूरी हो जितना जिन्दा रहने के लिए मिट्टी-पानी और आकाश । मेरे लिए सास लेने का पर्याय हो तुम !' गिनेस हंस पड़ता, 'दरअसल हम दोनों एक-दूसरे के लिए आक्सीजन का काम करते हैं, है न । जय, मैं कवि नही हूं, मैं तो बडी वेसिक बातें समझता हू कि अब तुम्हारे बिना जिन्दगी की कोई शक्ल मेरे जेहन में नहीं बनती।' ऐसे समय मै गर्व से कुछ और ऊंची उठ जाती। बहुत नाज़ था मुझे गिनेस पर! इसीलिए इसका नन्हा संसार सम्भालते मुझे कभी ऊब नहीं होती । अन्य सीनियर्ज की पत्निया हर वक्त इतनी मनहूस शक्ल बनाए बुनाई करती रहती, शापिंग करती या किमी पार्टी को अटैण्ड करती। मैं अपने छोटे से, नर्म, खुशनुमा घोसले मे तिनका-तिनका संवारती । शीतल चंडी की अभी शादी नहीं हुई थी । लेकिन चक्रधर अग्रवाल विवाहित था। वह अपने निजी जीवन के बारे में कभी सुलता नहीं था। उसके जीवन का आदर्श थे डाक्टर गुप्ता । इस व्यवसाय में वह उनका वारिस बनना चाहता था। वह तो हमे बहुत बाद में पता चला कि वह एक बच्चे का बाप भी था। उसकी पत्नी मुरादाबाद में अपने माता-पिता के माथ रहती थी। कभी-कभी चक्रधर छुट्टी लेकर ससुराल जाता था। प्रेम कहानी /71 लेकिन लौटकर वह अपने विभाग की नसों के साथ फिर वही छेडछाड़ शुरू कर देता, जिसके लिए यह खासा बदनाम या। जब भी कोई नर्स ट्रेनिंग करके नियुक्त होती, चक्रधर बडी हेकडी से उसे अपने कब्जे में ले लेता। गिनेस ने कई बार उसे इस लम्पटयने के लिए डाटा, लेकिन वह वेहयाई से हस देता, 'जब वीवी मायके रहती है तव हम क्या भगवद्गीता के सहारे ज़िन्दगी काटेंगे !' चक्रधर सम्बन्धों को जिस पशु-स्तर पर ला पटकता था, उससे मुझे और गिनेस को बड़ी वितृष्णा होती । भोली-भाली लडकिया उसके व्यक्तित्व से आकृष्ट हो, फंस जाती। अचरज इस बात का कि यह आदमी जीवन की समस्त नैतिकताओ से परे था। वह लड़कियों के बारे में दोस्तों में बैठ अपनी विस्तृत जानकारी बताता । वह लड़कियों के बारे में ऐसे बोलता, जैसे वे लड़की न होकर बिजली का सामान हो, 'यह देर में गर्म होती है, 'यह जल्दी ठण्डी पडती है...' मैंने गिनेस को सस्त मनाही कर दी कि चक्रधर को घर न लाया करें। गिनेस को भी मित्र के रूप में वह पसन्द नहीं था। चक्रधर का जीवन के बारे मे मुहावरा ही अलग था । खासा हिसावी आदमी था। अगर कभी चाय पिलाता तो शाम तक वापस चाय वसूल लेता । वात-वात में झूठ बोलता। यह सब छोटी बातों तक ही सीमित रहता तो इतना बुरा न लगता, लेकिन कभी-कभी वह बडे भूठ बोलने में भी न कतराता। एक वार उसने डाक्टर गुप्ता से कह दिया कि गिनेस आपके मरीजो को भडकाता है। उन्हे ओ० पी० डो० मे ही वे दवाएं लिखकर दे देता है, जो आप शाम को घर पर बताते हैं । डाक्टर गुप्ता इस बात से बहुत भडक गए। अपने नुकसान की आशंका भी उन्हें असह्य थी । वह तो सुबह से शाम का इन्तजार किया करते, जब वह नोट गिनें । उन्होंने गिनेस की ड्यूटी ओ० पी० डी० से बदल दी। गिनेस जानता था कि अस्पतालो में रेजिडेण्ट एक तरह की स्टेपनी होता है, उसे कही भी, कभी भी इस्तेमाल किया जा सकता है। ओ० पी० डी० मे चक्रधर छोटे-मोटे रोगो वाले रोगियो को देख कर उपचार कर देता, लेकिन जरा भी तगडा आदमी नजर आते ही 72/प्रेम कहानी - बडी वेह्याई से उससे कहता, 'शाम को डाक्टर साहब के बंगले पर आइए।' उसके इस देशर्म प्रचार से डा० साहब कई बार विचित्र स्थिति में पड़े थे। एक बार तो उसने अस्पताल में दाखिल एक मरीज को जबरन बंगले पर जांच के लिए भेज दिया। बुधवार को डाक्टर साहब रोटरी क्लब की मीटिंग में जाया करते, अतः बुधवार शाम घर पर मरीज देखने के समय में थोडा अन्तर हो जाता। ऐसे मौकों पर चक्रधर डा० साहब की कुर्सी का दुरुपयोग कर आधे पैसों में मरीजो की जांच कर अपनी जेब गर्म कर लेता। पर वह भूल जाता था कि मिसेज गुप्ता की जासूमी उसको चालाकी से बढकर थी। इस बात की पुष्टि होते ही उन्होने उसे टोक दिया और डाक्टर गुप्ता मे शिकायत भी की। तब कुछ दिन के लिए चक्रधर का शाम को क्लिनिक आने का सिलसिला बन्द रहा। मिसेज गुप्ता गिनेस और शीतल बंडी को ज्यादा पसन्द करती थी, जो अनावश्यक रूप से महत्त्वाकाक्षी नही थे, इसलिए जल्दबाज़ भी नहीं। लेकिन शीतल बंडी इस बैगार की अपेक्षा अपनी शाम टेनिस कोर्ट में बिताना पसन्द करता। वह तीन साल से टैनिस का चम्पियन था। गिनेस चाहता था किसी तरह जल्द से जल्द एम० डी० कर हम अपने देश लौट जाएं। इसलिए वह फंस जाता। उन्होंने हमे रहने के लिए यह छोटा-सा क्वार्टर भी दे रखा था। इसलिए जब मिसेज गुप्ता उससे आत्मीयता से बोलती, वह सख्त न रह पाता। वह कभी अपने बच्चों की फोटो दिखाती, कभी चिट्ठिया सुनातीं। वह बड़ी वैतावो से सदियो का इन्तजार करती, क्योकि बच्चे धर मदियों में ही आते । तब उनके स्कूल बन्द रहते। तब वह सारा दिन व्यस्त रहती। कभी बच्चों को मानिंग-शो दिखा लाती, कभी साफ्टी खिलाती, कभी उन्हें लेकर शापिंग पर चल देती। कभी-कभी वह बच्चों को गिनेस के माथ कर देती । उनके बच्चे वेहद प्यारे थे, गोलमटोल, गुदकारे । इतनी जल्द हिलमिल जाते। हमारे घर आकर ढेरों बातें करते, अपने स्कूल के मास्टरों की नकल निकालते, साथियों की शैतानी बता-बताकर हंसते और कभी हम सब मिलकर खूब हो-हल्ला कर गाना गाते। सुन्दर नाम प्रेम कहानी/73 थे उनके, आकार और आधार । उन्हें घर आना अच्छा लगता, क्योकि उन दिनों पटना नहीं पड़ता था। नहीं तो घण्टी लगी--किताव सोलो, घण्टी लगी-खाना साओ। पर कभी-कभी ये मवाल करने लगते, 'अंकल जब आप छोटे थे, आपके हो आपसे बोलते । गिनेस डैडी को याद करने लगता, 'डडी हरदम हमारे माय रहते थे। मेरे लिए स्कूल-बम लगा रखी थी, फिर भी छुट्टी होने पर मुझे स्कूल के फाटक पर इन्तजार करते मिलते। कितावो में दिए सन मुझे वाद में याद होते, डैडी को पहले । सच पूछो तो डंडी मेरे बेस्ट फ्रेण्ड थे।' आकार बिगड जाता, 'और एक हैं हमारे पापा! जब देखो अस्पताल, क्लिनिक, विजिट, फोन । हमें स्टेशन से लाने और स्टेशन छोड आने के अनाया जैसे उनका हममे कोई मतलब नहीं।' 'पर मेरे डैडी इतने पैसे नहीं कमाते थे, गिनेस बताता, 'हम चार भाई-बहन थे, चारो पढते थे। डंडी ने कह रखा था, देखो, तुम्हे पडाने और खाना खाने के अलावा फिलहाल हम कुछ अफोर्ड नहीं कर भक्ते । हाई स्कूल के बाद हम सब अपनी-अपनी हिम्मत पर पढे, किसीको म्कालरशिप मिल गई, किसीको पार्टटाइम नौकरी। हमने दो जीन्ज पर वर्षों काटे हैं।' आधार बड़ा था, 'पापा हमे रायल एजुकेशन दे रहे है । अगर कमाएं न तो कहा मे दें।' आकार कहता, 'फिर भी अंकल आप इतने बड़े डाक्टर कभी न बनना कि डेंडी बन ही न पाएं।' मैं कहती, 'वेटे एक अच्छी जिन्दगी के लिए अच्छे पैसो की भी जरूरत रहती है। आकार की समझ मे न आती ये बातें, 'क्या फायदा पैसो का। रात ग्यारह बजे जब पापा क्लिनिक से उठते है, सारे सिनेमा-हाउस, रेस्तरा, बाजार बन्द हो जाते है । उस समय वह इतने थके होते है कि न ठीक से खाना खाते है, न बात करते है, बस सो जाते हैं। उनसे उस वक्त कहा भी नहीं जा सकता कि कही चलो। रात ग्यारह बजे किमीके घर नहीं जा सकते जब तक कि कोई फीस देकर ही न बुलाए।' - 74/प्रेम कहानी - ये सब बाते ऐमी थीं, जिनमें से कुछ बच्चे आप महमूम करते थे, कुछ उन्होंने ममी मे सुनी थी। ये इन असुविधाओ को महसूस करती, फिर भूल जाती क्योंकि इन्ही अमुविधाओं से मुविधाएं भी जन्म लेती थी। रोज रात पति की जयें, पर्म माली करते हुए वह अपने सारे शिकवे-शिकायतें भूल जाती। फिर उन्हें सिर्फ वह शॉपिंग-लिस्ट याद रहती, जो कभी खत्म नहीं होती थी। उन्हे अपने कपड़ी पर वडा नाज था । एक बार उन्होंने किसी पत्रिका में पड़ा कि हेमा मालिनी रोज नई साडी पहनती हैं तो मुंह विधका दिया । उस दिन उन्होने मिमेज मेंहदरिता को यह बात बताते हुए कहा, इसमें कौन बडी बात है । हम तो विना हड्डिया तुडवाए रोज नई साड़ी पहन लेते है।' मुझे वह कई बार अपने साथ शॉपिंग पर घसीट ले जातीं। मुझे तो खरीददारी को कोई भव नहीं थी, मात्र दर्शक बनी उनका वैभव देखती। आश्चर्य की बात यह थी कि वर्षों से शॉपिंग करनेवाली इस महिला को अभी तक इतना भी नहीं पता था कि उसे कौन-से रंग फबते है । शोख रग को बड़े-बड़े छापे वाती कीमती साडिया उन्हे विशेप प्रिय थी। मेरा गुजारा तो चार मैक्सीज मे बखूबी से चल जाता था। इससे ज्यादा कपडे मुझे काटते थे। किन्तु रोज उन्हें नई साडी पहन कार में लदे-फदे देख मुझे यह ज़रूर लगता था कि लो आज इन्होंने फ्लू पहन रखा है, कल मलेरिया बाधी थी। वह नीली वाली गतिया न्यूमोनिया है और पीली वाली पीलिया । वह मदुराई 'सिरक जरूर मीजिल्ज की सौगात है और वह हैदरावादी, हैजे की। वह अपने पति की पूंजी इतनी अश्लीलता से खर्च करती थी कि कई बार अपनी ही सहेलियो में उपहास का विषय बन । जाती। 11. डा० गुप्ता का हाल बदतर था। वह आदमी अपने क्षेत्र का इतना मर्मज्ञ होकर भी जीवन को मामिकता से नितान्त अछूता था। बीमारिया उस चिन्तित नहीं, आकर्षित करती थी, क्योकि वे उसकी प्रसिद्धि में चार चाद लगाती थी। मरीज़ उसके लिए इन्सान नहीं, केस थे। अस्पताल के प्रेम कहानी /75 मुपरिन्टेण्डेण्ट की हैसियत से डा० गुप्ता बहुत कुछ कर सकते थे-वे कई अस्थायी कर्मचारियो को स्थायी करने का प्रयत्न कर सकते थे, असमर्थ मरीजों को बिस्तर मुहैया करा सकते थे, जमादारो को महंगाई भत्ता मंजूर करा सकते थे लेकिन वे केवल अपनी निजी प्रेक्टिस को लेकर मशगूल रहते । अस्पताल से आकर वह थोडी देर आराम करते, खाना खाते, फिर किसी न किमी मीटिंग में चले जाते । शाम की चाय खत्म होते न होते वरामदे से बुलावे आने लगते । मौसम आते और चले जाते, उन्हें कोई खबर न होती। न वसन्त की उत्कण्ठा, न पतझड की उदासी। आए दिन कीमतें बढ़तीं, लोग आन्दोलन करते, चुप किए जाने, लोग तकलीफ पाते, तिलमिलाते, लेकिन डाक्टर गुप्ता शान्त रहे आते। उनके मकान की वाई तरफ जगमगाती रहती, क्लिनिक आबाद रहता। दाई तरफ खाली रहती, क्योकि मिसेज गुप्ता अक्सर शाम को सज-धजकर अपनी सहेलियों के यहा पापलू खेलने जा चुकी होती । जिन दिनो आकार, आधार घर आते उन दिनों अलबत्ता वह बच्चो के साथ शाम बितातीं। महीनो बाद अचानक एक दिन यशा घर आ गई। उसके साथ एक चच्चा भी था । मैंने कहा, 'इतनी जल्दी यह भी तैयार कर लिया।' 'मही, भाभीजी का मुन्ना है।' 'यह क्या रक्षा के लिए भेजा गया है ?' 'नहीं, जासूसी के लिए।' उसने कहा और कहकर एकदम सतर्क हो गई। मैं समझ गई। मैंने सिस्टर एल्सी के गुड्डू को आवाज सगाई और बच्चे को उसके साथ खेल में लगा दिया। मेरे पूछने के पहले यशा आप फूट पडी, 'मैंने बडी गलती को जय, जो तेरे नक्शे-कदम नही चली। मां ने भूख-हड़ताल कर दी, लिप्पी-मा मुंह निकालकर दादी आगे आ गई। बाबूजी ने जल्दी-जल्दी रिम्ना तय कर चटपट व्याह कर दिया कि वही मैं मुसलमान न हो जाऊं, बनिया जाति का पतन न हो जाए। 76/प्रेम कहानी "उन्हें तेरी प्रेम कहानी की भनक कैसे मिली ?' 'तुझे पता है न, उस साल डान-आन्दोलन के कारण सभी कालेज महीनों बन्द पड़े रहे । उन दिनों मुहम्मद मुझे घर के पते पर पत्र लिखता था। लिफाफे के ऊपर फरीदा के नाम से दस्तखत कर देता था । एक धार लिफाफा कुछ भारी लगने पर बाबूजी को शक हो गया। उन्होंने चिट्टी खोल ली। बस फिर क्या था। घर में ऐसा कोहराम मचा, वह मेरी लानत-मलामत हुई कि मैं जीते-जी मर गई।' 'और तेरा मुहम्मद, कुछ भी न किया उसने ?' 'उसी खत में उसने यह लिखा था कि वह मेरा टिकट भेजने वाला है। उसने लिखा था पासपोर्ट के लिए क्या करना होगा, वीजा कैसे मिलेगा। वहीं चिट्ठी खलनायकों के हाथ लग गई । मुझे क्या कुछ न कहा उन्होंने ? अपनी ही औलाद को कम्बस्त, कुलच्छनी, कलकिनी कहते उन्हें कुछ भी न लगा। धर्म की वेदी पर न चढाया बकरा, चढा दी बेटी।' 'पर तू तो ऐसी बकरी कभी भी न थी, यशा !' 'इम वक्त सब कुछ समझ आ रहा है जय, उस वक्त मेरे सामने अंधेरे और अनिश्चय के सिवा और था भी क्या? फिर स्टेट्स में पोस्टल स्ट्राइक हो गया । मुहम्मद से सम्पर्क टूट गया। घरवालो ने अपने आंसुओं में मेरे सारे अरमान डुबो दिए । मेरा मजनूं तेरे रांझा की तरह दिल्ली में बैठा होता तो मैं भी छलांग मारकर पहुंच जाती। वह बहुत दूर था, अपनी मुहब्बत की पैरवी करने भी नहीं पहुंच सका।' 'लेकिन यशा, मुझे यकीन नहीं होता कि इतनी पढ़ी-लिखी होने पर 'भी तू गाय-भैस की तरह हाक दी गई। तेरी मर्जी-नामर्जी कुछ नहीं 'चली ?' 'तू क्या सोचती है, पढ़ना-लिखना लड़कियों के पैर लगा देता है या पर? हम लाख एम० ए० हो जाएं, पी० एच० डी० हो जाएं, परम्पराएं जब मां-बाप, ताई-चाची की शक्ल में सामने आती हैं, तब सब भूल जाता है। फिर मेरे घर का माहोल तूने देखा तो था। मरखनी मां और कटखनी दादी, मुझे जीते-जी खा गई।' बड़ी देर हम बोझ तले दब गए। मेरी समझ में नहीं आ रहा था प्रेम कहानी/77 1 'खुश होगे।' कमे उसे सात्वना दू, क्या कहूं कि वह पहले जैसी अलमस्त यशा हो जाए। तभी मैं जागी, 'मेरे ममी-पापा मिलते हैं, कैसे हैं ?' 'हां मिले थे, अभी पिछले महीने ! ठीक हैं । तुझे बहुत याद करते है । उन्होने तो तुझे कब का माफ कर दिया । तू लिखती क्यो नही उन्हें । वह बडे एकाएक मन में चिलक-मी उठी। इस वक्त ममी क्या कर रही होगी, मूढे पर बैठी स्वेटर बुन रही होगी। पापा क्या कर रहे होगे, चाय पी रहे होगे । घर मैं वैसे ही सुबह होती होगी, रेडियो और असवार के माथ-साथ वैसे ही रात होती होगी, दूध की बोतलो के कूपन और बन्द दरवाजों के साथ-साथ । जिन्दगी वही होगी, केवल दीवारो पर कैलेण्डर बदल गए होगे। मन फड-फड करने लगा, मेरे बिना उन्होने जीना कब और कमे मीख लिया, क्यो नही डाला एक भी खत, क्यों कभी खोज- खबर न ली? जव गिनेस अस्पताल से लौटकर आया, तब हम दोनों को एक विचित्र भारीपन मे डूवे पाया—एक सागर-पार प्यार की वहशियाना तलाग में गमगीन, दूसरी मा और बाप की हुडक से हिली हुई। गिनेस हर स्थिति बहुत आसानी से और जल्द भाप लेता था। वह चुपचाप साथ बैठ गया। 'आपके पति क्या करते हैं ?' गिनेस के सवाल ने हम दोनो को वर्तमान मे लौटा लिया। 'लोहे का कारवार । फरीदाबाद मे फैक्टरी है, कनॉट प्लेस मे गो-रूम ।' उसके पति के उद्योग-सस्थान का नाम था, 'खण्डेलवाल शटर्ज'। उनके यहा के न केवल गटर्ज, वरन आलमारिया, आफिम-कैविनेट, तिजोरिया आदि पूरे भारत मे प्रसिद्ध थे। वह तीन भाई थे, तीनो सान- दानी कारवार मे लगे हुए थे। 'इसका मतलब तू तो बहुत बड़े घर पहुंच गई है। मैंने कहा। 78/प्रेम कहानी 'हां, वाकई बड़े घर पहुंच गई हू,' वह हसी-एक खरांच खाई हंसी, जिसमें अन्तर के आसू डबडबा रहे थे। 'ऐसा है, यशा, जीवन में समझौता भी करना पड़ता है कई वार । अगर साथी अच्छा हो तो समझौते आसान हो जाते है ।' 'हा, तुम्हे अपना साथी मिल गया, अब समझोते मुझे ही मिवाओगी। अपनी अण्टी गर्म हो तो त्याग की बातें बडी सुहाती है।' 'पर तुम कर भी क्या सकती हो।' तभी यशा का ड्राइवर अन्दर आया, 'बहुजी, दोनो बच्चे बार-बार वानेट पर चढ़ रहे है।' गिनेस ने हमारे बैठे-बैठे ही कॉफी तैयार कर ली थी। पहला प्याला ड्राइवर को पकडाकर बोला, 'चढ रहे हैं तो उतार दो। तुम्हारी बहूजी वरसों बाद अपनी सहेली मे मिती है । लो कॉफी पियो।' ड्राइवर चला गया। पर कुछ ही देर में खाली प्याला ले वापस आ गया, 'वहूजी, बाबूजी ने तीन बजे गाडी मंगवाई थी।' यया उठ दी। । डा० गुप्ता पिता को अचानक दिल का दौरा पडा । वह हिण्डौन के पास गांव में रहते थे। सबर लगने पर डाक्टर गुप्ता गाव चले गए। उन्होंने पत्नी में परामर्श कर तय किया कि पिताजी को जल्द से जल्द यही ले आया जाए ताकि ठीक से इलाज भी हो जाए और उनके काम में भी खलल न पड़े। मिसेज गुप्ता को सन्देह था कि पिताजी दिल्ली आना पसन्द करेंगे। एक बार पहले उन्हे दिल्ली लाया गया था, पर वह यहा इतने . खिन्न हुए थे कि सप्ताह भर मे वापस चले गए। जिस दिन डाक्टर गुप्ता रवाना हुए थे, उसी दिन मिसेज गुप्ता ने मेरी ड्यूटी अपने घर पर लगा दी। करना कुछ नहीं था, रात उनके यहा मोना था ताकि उन्हे एकान्त न अखरे । उन जैसी औरत को एकान्त का कोई अहसास भी होगा, यह एक शोध का विषम था। पर वह अपने हक का इस्तेमाल तो करना जानती ही थी, और हम सब इस हद में आत थे। प्रेम कहानी / 79 मैंने बताया तो गिनेस किचकिचाने लगा, 'यह तो सरासर अन्याय है, तुम उनके पास सोने क्यों जाओगी? उन्हें किस बात का पतरा हो सकता है, खतरे का वक्त तो कब का गुजर चुका है, उन्हें नहीं मालूम । उनका डील- होल देखकर तोहकेत भी डर जाएं। बस, रोय गालिब करने की आदत पड़ी है।' खर जाना तो था ही । मैं रात दस बजे उनके बंगले पर चली गई। गमियो के दिन ये, बच्चे शिमला में पे । डाक्टर साहब के यहा निजी नौकर एक भी न था। अस्पताल के ही चपरासी, वाई-बॉय और आया कान कर दिया करते। रात मे सब अपने-अपने क्वार्टर में चले जाते। मिसेज गुप्ता कुछ देर बैठी बातें करती रहीं। उनका प्रिय विषय था, जिन डाक्टरों की बीविया डाक्टर हैं, उनके घर कितने वेढंगे हैं। वह डा० प्रधान की सामिया बताने लगी। उनके अनुसार उनकी पत्नी सारे शहर के बच्चे पैदा करने में इतनी व्यस्त थी कि उन्हें अपना वच्चा पैदा करने की फुरमत ही नहीं मिल रही थी। उन्हें मुखर्जी डाक्टर-दम्पति भी नापसन्द थे, क्योकि उन्होंने पिछले साल नौकरी छोड निजी क्लिनिक शुरू कर लिया था। वह कह रही थी कि निजी नसिंग होम, नाजायज बच्चे पैदा करवाने के अलावा और करते ही क्या हैं । अपने पति के कार्य-क्षेत्र मे ही उन्होंने अपने आदर्श ढढ निकाल रखे थे। उनका कहना था कि डाक्टर गुप्ता के कारण ही यह चालीस विस्तर वाला अस्पताल आज चार सौ विस्तर वाला बन सका है । तत्पश्चात् मिसेज गुप्ता ने नर्मो की अनैतिकता पर एक संक्षिप्त प्रवचन दिया। उठते-उठते वह बोली, 'अब तो नसें भी प्राइवेट प्रेक्टिस करने लगी हैं, ड्यूटी से छुट्टी लेकर परों में जचगी करा देती है, बताओ, इनका कोई ईमान है।' फिर वह कमर पर चाभियों का गुच्छा हिलाती, सारे दरवाजे बन्द करती हुई अपने कमरे में चली गई। मुझे उन्होने स्टडी में दीवान दे दिया था। नीद बिल्कुल नहीं आ रही थी, बल्कि चाय पीने की इच्छा हो रही थी। पर मैंने मिसेज गुप्ता को रसोई मे ताला लगाते देखा था। इतने ताले वह क्यो लगाती है, मैंने सोचा, जबकि फाटक पर हर वक्त चौकीदार तैनात रहता है। 80/प्रेम कहानी । मेज़ पर बहुत-सी नई पुरानी पत्रिकाएं बिखरी थी। कई मैडिकल जरनल भी थे । मैं पत्रिकाएं देखने लगी। बीच में कुछ डाक व फुटकर कागज भी शामिल थे। लगता था आज की डाक अभी छांटी नही गई थी। टेलिफोन विल था चार सौ पचहत्तर रुपए का । पत्रिकाएं पढ़ते-पढते आंख लग गई। सुबह उठने पर पाया मिसेज़ गुप्ता पहले से ही उठी हुई थी। छूटते ही बोली, 'जया, रात तुम विजली बन्द करना भूल गई थी !' बात सच थी, लेकिन अच्छी नही लगी। मैंने जाने की अनुमति मागी। 'चाय पी लो तव जाना।' मैं जल्द से जल्द घर जाकर गिनेस के साथ चाय पीना चाहती थी। पर यह बात उनसे कही नहीं जा सकती थी। दुविधा मे फसी मैं वहा बैठ गई। मिसेज़ गुप्ता ने स्वयं चाय बनाई । पत्ती, चीनी, दूध मिलाकर । चाय पीते हुए वह लगातार मुनमुनाती रही, 'डाक्टर साहव को देखो, वहां जाकर बैठ गए हैं । उन्हें जरा ख्याल नहीं, यहा कितना हर्ज हो रहा है, मैकडों मरीज लौट रहे है । अब पिताजी की उम्र ही है बीमार रहने की। वह चाहे उनका बेटा उन्हें फिर से जवान बना दे, यह तो हो नही सकता। उन्हे परहेज से रहना चाहिए।खा लिया होगा कुछ अनाप-शनाप, गुरू के चटोरे है। फिर गाव का रहन-सहन एकदम बेसलीका । बीमार न होगे तो क्या होगे? मुझे अपने सामने बैठी इस मुटल्ली ममत्वहीन महिला से विरक्ति हो रही थी, जो मेरे पति के वॉस की बीवी थी। 'डाक्टर साहब कोई बच्चे नहीं है, जानते है सात सौ रुपये रोज का नुकसान हो रहा है, फिर भी न तार दिया, न फोन किया कि कब आ रुपया, रुपया, रुपया, इस औरत के अन्दर दिल की जगह सिल रखी थी शायद । इसे और कुछ सूझता नही था, नफे-नुक्सान के सिवा । सारे सम्बन्ध इसे बन्धन लगने लगे थे। मिसेज़ गुप्ता का बस चलता तो स्वयं रोगियो को देख डालती। प्रेम कहानी / 81 उनकी बडबडाहट का ममं यह था कि उन्हें शिमला जाने के लिए गाडी की टंकी पेट्रोल में फुल करवानी थी, टेलिफोन का बिल अदा करना घा, बच्चों के लिए मेवे और गर्म कपड़े सरीदने थे, दर्जी का बिल पे करना था। क्या डाक्टर साहब समझते हैं इस सबके लिए बैंक साली कर दिया जाए! कमी भव्य गरीबी थी उनकी, कैसी शानदार झुंझलाहट ! मैं जैसे-तैसे उनसे छुट्टी पाकर घर आई । अपने घर को रोशनी और हवा में पहुंच तीन-चार गहरी मास ली। गिनेम अस्पताल जाने के लिए तैयार हो रहा था। मैं उससे ऐसे कसकर लिपट गई मानो यरसों की बिछड़ी हूं। । गिनेस आजकल चिल्ड्रेन-वार्ड में छत्तीम बिस्तरो का इन्चार्ज था। मभी विस्तर भरे थे। तरह-तरह के रोगो से ग्रस्त बच्चे भरती थे, जिनमे ने दो की हालत चिन्ताजनक थी। एक बच्चे के मूत्र मे रक्त आ रहा था। उसके एक्सरे मे पथरी का पता चला था । ऑपरेशन होना अनिवार्य था। मुश्किल यह थी कि इतने छोटे बच्चे मे इतने बडे ऑपरेशन से मृत्यु की आशका बहुत बढ जाती थी। एक इन्जेक्शन इस आशंका को चालीस प्रतिशत कम कर सकता था, किन्तु वह शहर मे उपलब्ध नही था । बच्चे के मा-बाप दौड-धूप कर रहे थे, लेकिन घबराहट के सिवा कुछ हाथ नहीं लग रहा था। बच्चे को दवाओ के भरोसे टिका रखा था। डाक्टर गुप्ता ने बम्बई के सरकारी अस्पतालों से भी सम्पर्क स्थापित किया था कि यदि यहा यह प्राणदायी इन्जेक्शन उपलब्ध हो तो तत्काल भिजवाया जाए। बारह नम्बर बेड का रोगी, वावजूद सारे उपचार के, सुवह दम तोड़ गया। सडक-दुर्घटना मे उसके सिर में चोट आई थी। रक्तस्राव कही नहीं हुआ, लेकिन बच्चा बच नहीं पाया। वह बेहोशी की हालत में अस्पताल लाया गया और बेहोशी की हालत मे ही चल बसा । कुछ बालको के परीक्षण चल रहे थे । इक्कीस नम्बर बेड पर छह माल का कृशकाय बालक राजू था, जो पेट-दर्द से रह-रहकर बिलबिला उठता । उसका दाखिला अभी रात मे ही हुआ था। उसके माता-पिता 82/प्रेम कहानी प्राइवेट वार्ड चाहते थे, लेकिन प्राइवेट वार्ड में कोई कमरा खाली न था ! उन्हें समझाया गया कि जनरल वार्ड मे बालक को भरती कर देने से कोई अन्तर नही पड़ेगा। वही डाक्टर वहा उपचार करते हैं, जो प्राइवेट वार्ड मे करते है। थोडी नाक-भौं सिकोडकर वालक के माता-पिता इस आश्वासन पर तैयार हो गए कि जैसे ही प्राइवेट वार्ड में जगह खाली होगी, उनका बच्चा वहा गिफ्ट कर दिया जाएगा। वच्चा पेट-दर्द से व्याकुल था । पेट-दर्द एकाएक उठता और उसका समूचा शरीर ऐंठ जाता। नाभि के आसपास कड़ापन था । भरती करने के बाद बच्चे के प्रारम्भिक परीक्षण शुरू किए गए। मल की जांच में कोई गडबडी नही निकली। अपेण्डिसाइट्स का अन्देशा होने से बेरियम मील एक्सरे भी किए गए । पर उसकी प्लेट्स देखकर कुछ क्षण को डाक्टर भी चक्कर में पड़ गए। आमतौर पर सूजा हुआ अपेण्डिक्स अलग से नजर आ जाता है। किन्तु यहा तो बच्चे की पूरी की पूरी आत ही एक मोटे रस्मे की तरह मूजी हुई थी। डाक्टरो ने संयुक्त रूप से सलाह की कि बगैर बेरियम के भी एक्सरे लेकर देखा जाए, तभी किसी फैसले पर पहुंचा जा सकता है। बच्चे को जब-तब पेट-दर्द कम करने की दवाएं दी जा रही थी। लेकिन उसके मा-बाप असन्तुष्ट थे। उनके अनुसार इलाज बहुत धीमे हो रहा था। 'पूरे दिन में दो-चार गोलिया खिला देते है, बुखार देख लेते हैं, वस।' वे शिकायत करते । जब भी बड़े डाक्टर राउण्ड पर आते वे बताते कि जनरल वार्ड में बच्चे को कितना कष्ट है और उन्हें प्राइवेट कमरा *मिलना कितना जरूरी है। गिनेम अपने मरीजों से भरमक प्यार और सहानुभूति से बातचीत करता, पर मरीज़ के सेवकों के चोचलो से उमका अच्छा-भला मूड बराब हो जाता । इक्कीम नम्बर बच्चे के माता-पिता के कपड़े अन्य मरीजों के अभिभावको की तुलना में ज्यादा साफ थे, इसी हौसले पर वे डाक्टर के निकटनम आने की कोशिश करते, सवाल पर भवाल करते। यहां तक कि राउण्ड लगा चुकने के बाद जब गिनेस अपना अन्य आवश्यक दैनिक कार्य प्रेम कहानी /83 गुरू करता, बच्चे की मा कोई निहायत मामूली बात पूछने टपक पड़ती। 'डाक्टर साहब, राजू को साने को क्या दे सकते हैं ?' 'सब दे सकते है।' 'घर पर खिचडी खिला रहे थे, खिचडी खिला सकते हैं ?' 'खिला सकते हैं। 'डाक्टर साहब, मुसम्मी का रस नुकसान तो नहीं करेगा?' 'नुकसान नहीं करेगा।' 'दे सकते हैं ?' 'हा, दे सकते हैं।' 'डाक्टर साहब, उसमे चीनी डालें या ग्लूकोज़ ?' 'कुछ भी डाल सकते है। 'डाक्टर साहब, ग्लूकोज कितना डालें ?' गिनेस भडक जाता, 'आपको इतना भी नहीं पता तो चाय में चीनी और दाल में नमक कैसे डालती हैं ?' पिता अलग शिकायतो का रजिस्टर था। 'डाक्टर साहब यहां सफाई की बड़ी कमी है।' 'क्या करें, भीड देख रहे हैं।' 'नही डाक्टर साहब, स्टाफ कामचोर है। सुबह से वार्ड मे सिर्फ एक वार झाडू लगी है।' 'स्टाफ पर काम ज्यादा है।' 'सरकारी कर्मचारी काम तो करना जानते ही नहीं।' इम प्रकार का उच्चता-प्रदर्शन बहुत बुरा महसूस होता । अपने को अपने वर्ग से ऊचा समझकर सबको हेय दृष्टि से देखना मरीज के अभि- भावको में बहुधा झलकता। जबकि वार्ड मे फिनायल की गन्ध के अलावा प्रायः अन्य कोई गन्ध न थी, इनकोस नम्बर मरीज की मां अक्मर नाक पर रुमाल रखे बैठी मिलती। माता-पिता के बावजूद बच्चा अच्छा, खुश और को-ऑपरेटिव था । वातावरण की नवीनता के कारण उत्फुल्ल भी रहता । आस-पास के बच्चों को देखते-देखते उसका समय बसूवी निकल रहा था। कई एक्सरे लेने पर यह तय हो ही गया कि उसके पेट में कुछ 84/प्रेम कहानी प्रे. .

वहदाकार कीड़े आंतो से लिपटे पड़े हैं। उन्हें निकालने की दवाएं दी जा रही थी। अस्पताल के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियो पर काम का बेहद वोझ था। एक तो उनकी सख्या जरूरत के हिसाब से थोडी थी, दूसरे उनमें से कई छुट्टी पर चल रहे थे। फिर उनकी सफाई का अर्थ तव था, जब उनके द्वारा डम्प किया कूडा नगरपालिका का ट्रक समय पर आकर बटोर ले जाए, अन्यथा वह कूडा और अधिक प्रदूषण फैलाता । डाक्टर प्रायः इन स्थितियों को समझते हुए सफाई कर्मचारियों से उलझते नहीं थे। वे देखते थे कि ये लोग हर समय काम में जुटे रहते हैं । तरह-तरह के स्वभाव व आदतों वाले लोगों के बीच सफाई का कोई मानदण्ड निर्धारित करना मुश्किल काम था। जनरल वार्ड में इसलिए सफाई रखनी इतनी आसान न थी। किन्तु प्राइवेट वार्ड में भी सफाई की पूरी जिम्मेदारी केवल कर्मचारियो की समझी जाती। मरीज व उनके अभिभावक कुछ इस अधिकार से कूडा फैलाते, जैसे वे अस्पताल में न होकर धर्मशाला मे हो । सन्तरे खाकर छिलके व बीज कमरे में कही भी डाल देना, कमरे में ही गीले कपड़े सूखने को फैला देना, घर से लाए विस्तरो, तोलियो की भरमार और ट्रान्सिस्टर चला छोडना, बिल्कुल आम बातें थी। ये लोग गन्दगी फैलाना और गन्दगी रखना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते। वक्त-बेवक्त वार्ड में से आया, जमादार, वार्डब्वाय को आवाजें पडती रहती। सफाई कर्मचारियों को इतना वक्त भी न मिलता कि वे चैन से दोपहर की रोटी खा लें। काम के आधिक्य मे उनके स्वभाव मे भी एक ठण्डी उदासीनता घर कर गई थी। वे मानकर चलते कि चाहे वे कितनी मफाई करें, सुनना उन्हें तब भी पड़ेगा। जनरल वार्ड के बाहरी दरवाजे के गलियारे मे लाइन से चार गुसलघर व चार पासाने बने थे। जो रोगी चलने-फिरने की हालत में होते वे उठकर यहां तक चले आते, जो उठने में असमर्थ होते, उन्हें 'बिस्तर पर 'पाट' दिया जाता । लेकिन अस्पताल में महज दाखिल हो जाने प्रेम कहानी/85 पर ही मरीज की सामान्य मानसिकता असमर्थता के अहसास से भर जाती और प्रायः वह अपने को असलियत से ज्यादा रण और अभक्त महमूस करता। फिर प्राइवेट वार्ड में यह और ऐसी कई बातें लोगों ने प्रतिष्ठा प्रश्न बना रखी थी। चलने-फिरने की हालत में होने पर भी मरीज के अभिभावक आया को ही आवाज लगाते। ऐमा ही बावेला उस दिन मचा जब चार बजे शाम यकायक प्राइवेट वार्ड में एक मरीज़ के अभिभावक की आया से लड़ाई हो गई। पैतालीस नम्बर मे आवाज पड़ी, 'आया!' आया नहीं आई। चार बजे ड्यूटी बदलने का समय होता था । नाम की ड्यूदी वाली आया आने ही को थी, लेकिन सुबह वाली आया दुलारी अपने को आफड्यूटी मान हाथ-पैर धो चुकी थी। एक-दो आवाजें और पड़ी। तुरन्त बाद पंतालीस नम्बर से दनदनाता हुआ अभिभावक प्रगट हुआ। वह गलियारे के उस कोने में पहुंचा, जहां आम तौर पर जमादार, जमादारिने अपना झोला, चप्पल वगैरह रखे रहते । उसने पाया कि दुलारी जमादारिन दीवार से टिकी वैठी तम्बाकू, चूना और सुपारी का विधिवत सेवन करने जा रही है। 'आवाज नही सुनती तुम्हे ?' 'साब, हम आफ हो गई हैं, दूसरी जमेदारिन आती होगी।' 'आफ की बच्ची, तुमने जवाब क्यों नहीं दिया? हम कब से गला फाड़-फाडकर बुलाते थे। 'अच्छा-अच्छा, ज्यादा किट-किट मत करो, हम छुट्टी पाय गई हैं, हम न आएंगी।' तुम क्या, तुम्हारे बाप को भी पाना पड़ेगा। कूडे की बालटी में उठाऊंगा। दो पैसे की लौडी जुबान लडाती है ।' अब तक अगल-बगल के कमरो से ऊचे बैठे अभिभावकों को एक छोटी भीड घटनास्थल पर इकट्ठी हो गई थी। दुलारी अब तक तमतमा उठी थी। बाप-दादा का जिक्र उसका खून खोला देता था। 'माय, जुवान संभालकर बोलो। नहीं अच्छा न होगा।' 86/प्रेम कहानी 'देखा इसका दिमाग, हमें धमकी दे रही है। इसे पता नहीं है किससे बात कर रही है। क्लास धन अफसर है, कान पकड़कर बाहर न कर दिया तो"?' दुलारी सामने आ गई, 'पकडो तो कान, हिम्मत है तो?" चटाक अभिभावक ने तमाचा जड़ दिया । वह ग्रोध में काप रहे थे, 'अंग्रेज चले गए, अपनी पोलाद छोड़ गए। दो कौडी की भंगिन ऑफ हो गई है, कडा नहीं फेंक सकती। बाथरूम उसका बाप साफ करेगा। हम पेतोस रुपए रोज देते हैं और यह हमे प्रॉफ और ऑन का मतलब सिखाने चली है।' किसी ने जाकर बाकी जमादारो को खबर कर दी। अभी-अभी छुट्टी पाए जमादार-जमादारिनें वार्ड तक आ पहुचे। मैक दुलारी का भाई लगता था। स्थिति पता चलते ही भड़क गया, 'ऐ साब सारी अफसरी झाड़ से बुहार कर घर नही करेंगे सफाई देखें क्या लोगे ?' जिन जमादारों की ड्यूटी बदली थी वे आ गए थे, लेकिन काम शुरू करने की बजाय मव लड़ाई में शामिल हो गए थे। कई अभिभावक पैतालीस नम्बर की तरफ हो गए। वे तरह-तरह के आरोप लगाने लगे। 'सुबह से हमारे मरीज को मुंह धोने को गर्म पानी नहीं मिला ।' 'हमारे कमरे में शीशी में रखी चीनी कल गायब हो गई।' 'हमारे मरीज को गर्म पानी की बोतल नहीं मिली।' 'क्या बताएं, इतने पैसे प्रादमी अपने पाराम के लिए खर्च करता है। यहाँ तो जमादारों से झिकझिक खत्म नहीं होती, पाराम कैसे नसीब मैकू, पुरुषोत्तम, ठकुरा, बड़का, सब का खून खौल रहा था। प्यारे जाकर डाक्टर को बुला लाया । सोसल वण्डी ड्यूटी पर था। उसके माने पर पैतालीस नम्बर ने अंग्रेजी में बोलना गुरु कर दिया। बण्डी ने ध्यान से सुना, उस मादमी का महकमा, पद और पता पूछा । पंतालीस नम्बर बोला, 'ए० जी० सी० पार० में एकाउण्ट प्राफी- प्रेम कहानी/87 सर हूं, जितनी इस जमादारिन की तनखा होगी उससे ज्यादा मेरे मकान का किराया होगा, माडल टाउन जन-सेवा-समिति का संयुक्त मन्त्री बण्डी ने कहा, "देखिए आप संयुक्त मंत्री है, कल को मंत्री हो जाएंगे, लेकिन यह जमादारिन पन्द्रह साल पहले जब भरती हुई, तब भी जमादारिन थी, आज भी जमादारिन है और इसी पद पर रिटायर हो जाएगी। आप इनसे उतनी कार्यक्षमता की उम्मीद कैसे कर सकते है ?' 'यानी कि आप भी मुझे समझा रहे हैं, अजब जमाना आ गया है, इन्साफ की बात कोई नहीं करता, सब इन्सानियत के पेट-दर्द से मरे जा प्यारे बोला, 'जव भी किट-किट होती है, पराइवेट से ही होती है । ऐसा ही होगा तो कल से पराइवेट का काम न होगा, कहे देते हैं, सरकार।' सब ने हां में हां मिलाई, 'हां कल से काम न होगा।' पैतालीस नम्बर उछल-उछलकर चिलाने लगा, 'मैं तुम्हारी शिकायत सुपरिन्टेण्डेण्ट से कर दूगा, तुम्हे होश आ जाएगा ।' 'कर दो शिकायत, हम किसी से नहीं डरते' पुरुषोत्तम बोला। 'तुम सब ने समझ क्या रखा है, मैं स्वास्थ्यमन्त्री तक पहुंच जाऊंगा, एक-एक को न निकाल दिया तो मेरा नाम श्यामसुन्दर नहीं।' बण्डी ने जमादारों को तितर-बितर किया और बात डाक्टर गुप्ता को बतला दी। डाक्टर गुप्ता सतकं हो गए। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियो का कोई भी अान्दोलन अस्पताल को महंगा पड़ता था। उनकी मौजूदगी का मूल्य जो हो, उनकी गैरमौजूदगी का मूल्य वहुत भारी था। उनकी गैरहाजिरी में अस्पताल में अव्यवस्था हो जाती थी, गन्दगी के मारे वहा सास लेना दूभर हो जाता। अगले दिन सफाई-कर्मचारी काम पर पाए, लेकिन उन्होंने ममस्त प्राइवेट वार्डो का बहिष्कार कर दिया। प्राइवेट वार्ड से लगातार शिकायतें 88/प्रेम कहानी - मिलती रही, मरीजों और उनके सेवकों को । अन्ततः जब उन्होंने देखा कि जमादारों पर रौब नहीं चल रहा है, वे चुपचाप जनरल वार्ड के शौचालय इस्तेमाल करने लगे। फिर भी सफाई के बिना वार्ड एकदम भिनक गए । कमरों तक पेशाब को गन्ध बस गई और विना झाडे-पूंछे फर्श भद्दे लगने लगे। वार्ड की सारी शान मिट्टी में मिल गई। कूड़ा कही भी जमा हो तो दुर्गन्ध फैलाता है, फिर अस्पताल का कूड़ा । सनी हुई रूई, काटे हुए पलस्तर, खून-मवाद से भरी पट्टियां, थूक के पौर बलगम के थक्के, खाली शोशिया, डब्बे और नालिया मिल-जुलकर एक अजब गन्ध की सृष्टि करने लगे । डाक्टरो के लिए राउण्ड लगाना मुहाल हो गया। दूसरे रोज न जाने किस तरह पैतीस नम्बर के शौचालय में कुछ फंस गया। कुछ ही देर बाद पैतीस नम्बर के मुसलघर से सड़ा हुमा पानी बह-बहकर गलियारे में पाने लगा और आस-पास के कमरों में फैल गया । अव घबराहट भी फैलने लगी । गन्दगी पहले ही से फैली हुई थी, हर एक गुसलघर में कूड़े, कपरे और गन्दगी का ढेर था, इस बदबूदार पानी से मिलकर यह सर बिखरने लगा । मरीज हक्का-बक्का रह गए। जो उठने-बैठने में असमर्थ थे, उन्हें तत्काल जनरल वार्ड में भेजा गया । जिनके आपरेशन अभी नहीं हुए थे, उनमें से निरापद मरीजों का मापरेशन स्थगित किया। अस्पताल में बेहद गड़बड़ी मच गई। डाक्टर गुप्ता ने सफाई कर्मचारियों को बुलाकर अपील की कि वे नासमझी से काम न लें। रोगियों का संकट समझ वापस काम पर पाएं। पर कर्मचारियों ने मामला यूनियन के सुपुर्द कर दिया था। ज्यादा कहने- मुनने का नतीजा यह हुमा कि अस्पताल की दीवारों पर खड़िया से लिखा जगह-जगह नजर आने लगा। 'डाक्टर गुप्ता मुरदाबाद', 'डाक्टर गुप्ता हाय-हाय'। डाक्टर गुप्ता को इस तरह के शोर-शराबे से चिद थी। वह शान्त भाव से अस्पताल चलाने के मादी थे। जबकि बात एक एकातिक उदा- हरण से शुरू हुई, अब इसमें ढेर सारे मुद्दे मिला लिए गए थे और इसे ध्यापक हड़ताल का रूप दे दिया गया था। सफाई कर्मचारियों ने जो मोग- प्रेम कहानी/89 पंप डाक्टर गुप्ताको पकडाया, उसमें निम्न वात थीं:(1)मफाई-कर्मचारियों के साथ डाक्टरों, मरीजों, सेवकों का दुव्यवहार बन्द हो। (2) उनके काम के घण्टे निर्धारित हों व उन पर कड़ाई से अमल हो। (3) प्रति. रिक्त कार्य-घण्टो के लिए प्रोवरटाइम की व्यवस्था हो। (4) उनका वेतन-मान रिवाइज किया जाए। (5) उनके पद पर पेन्नान की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, धादि-प्रादि। इन सब मागों की पूर्ति अकेले डाक्टर गुप्ता के बूते की बात नहीं थी। इस पर स्वास्थ्य विभाग का विचार करना जरूरी था। गिनेस और उसके साथियों की सफाई कामगरों से गहरी हमदर्दी थी, लेकिन वे भी इस तरह अस्पताल का काम ठप्प हो जाने से खिन्न थे। हर प्रकार के इन्फेक्शन का खतरा बढता जा रहा था। बहुत-से मरीज्ञ यह अस्पताल छोड़कर अन्य अस्पतालो में दाखिल हो गए थे, कुछ घर चले गए थे, सिर्फ जो बहुत ही मजबूर थे, रह गए थे। एक नही अनेक बार गिनेस सफाई कर्मचारियो से मिला और वात- चीत की। उसका कहना था कि इस प्रकार काम जाम करने से वे एक बडे काम में बाधा बन रहे है, उन्हें हड़ताल के अलावा और कोई उपाय सोचना चाहिए। वह उनकी मांगों से महमत था किन्तु तरीके से असहमत, सभी नौजवान डाक्टरों की राय थी कि सफाई-कर्मचारियो को मरीजों की जानों से खिलवाड़ करने का कोई हक नही । यह एक सैद्धान्तिक मत- भेद था। एक दिन यशा सुबह-सुबह आ गई। गिनेस तभी अस्पताल गया था और मैं पाराम से धूप में बैठी अखबार पढ रही थी। वह डाक्टर की सलाह पर जांच के लिए आई थी। दो-तीन बार प्राइ- वेट सलाह दे देने के बाद डाक्टर ने एक परीक्षण बताया था, जो अस्पताल में ही सम्भव था। उसे दो माह वा गर्भ था, लेकिन साथ ही रखतस्राव शुरू हो गया था। मैंने कहा, 'तुझे तो बिस्तर पर होना चाहिए, तू यहा क्या कर रही है ?' 90/प्रेम कहानी ." 'डाक्टरने खास तौर पर बुलाया था।' 'पर तू अकेली कैसे, तेरा चौकीदार कहा है ?' 'चौकीदार फैक्टरी गया है और चौकीदारिन के अपने घुटनो में वैतरह दर्द है । डाक्टर ने मुझे दाखिल होने को कहा है, पर उफ यहा तो गन्दगी और वू के मारे बुरा हाल है। तू कैसे रह लेती है यहा?' 'जैसे तू अपने घर रह लेती है न, बस वैसे ही मैं अपने घर रह लेती हूं। कही बीमार न पड जाऊ, इम डर से एडवांस में ही गिनेस मेरी इतनी तीमारदारी कर रहे हैं... 'लकी गर्ल!' 'यू टू, अब तो विवाहित सुख का मर्टिफिकेट भी पाने वाली है तू ।' 'सच जया, मुझे अपने पर बेहद ताज्जुब और खीझ पाती है । इतनी अजनबीयत में कैसे मैंने कसीव किया होगा। मेरी समझ से परे है।' 'विशुद्ध शारीरिक प्रक्रिया है मैडम यह, इसका दिल-दिमाग से वैसा साल्लुक नही, जैसा तू मोचती थी। याद है, तू कहती थी तेरा मजनू तुझे प्रांखो ही आखो में प्रेगनेंट कर देगा!' यशा काप गई । मेरे मुह पर हाथ रख दिया, 'वे दिन सुस्वप्न की सरह भूल जा | अब तो मैं वापस लौह-कुज मे पहुच गई हूं। तुझे पता है जिस साल मेरी शादी हुई उस साल हमारी साँस महोदया ने कृष्णजी को भी कारावास में डाल दिया। खरे सोने की प्रतिमा बनवाई गई। संगमरमर के देवालय में विशेष सुरक्षा के लिए भाई साहब ने एक नन्हा- सा स्पेशल शटर वनवा कर लगवा दिया। अब बता, जहा भगवान भी शटर में कैद हों, वहा इंसान को कोई मोहलत कैसे मिल सकती है।" 'घर तो लम्बा-चौडा होगा तेरा?' 'हां है और हर मंजिल के बीच में लोहे का वडा-सा टट्टर लगा है। ऊपर की मंजिल पर जब बच्चे दौडते हैं, तब ऐसी आवाज़ होती है, जैसे सिर पर से रेल गुजर रही है। जिधर नजर डालो, बस लोहा ही लोहा मज़र प्राता है, कही सचल, तो कही अचल।' 'तेरे पति सचल है या अचल ?' 'उनकी न पूछ ! उनके दिमाग मे जाने कितने खाने बने हैं, हर समय प्रेम कहानी /91 भाग दौड, हिसाब-किताब । जब तक एक भी खाने का हिसाव बकाया हो, मजाल है वह आदमी पाराम कर ले। अनुबन्धो से फुरसत मिले तो सबंधों पर ध्यान दें।' 'तेरा दिमाग फिजूल की दिमागी हलचल से भरा रहता है । अब तुझे अच्छे-अच्छे गाने सुनने चाहिए, बच्चों के खुशनुमा चित्र देखने चाहिए, मनपसद कपड़े पहनने चाहिए और सबसे बड़ी वात-हसना चाहिए। यशा जाने को उठी, 'मेरा एक काम कर दे, तुझे तो पता होगा, कोई ऐसी दवाई नही, जिससे मुझे छुटकारा मिल जाए !' 'छि यह सब क्या सोच रही है तू, कोई कही बेवकूफी तो नहीं कर डाली, जो ब्लीडिंग हो रही है तुझे।' 'नही, बेवकूफी करने लायक एकान्त भी कहां नसीब होता है । मैं तो आज सेन-नसिंग-होम में दाखिल हो जाऊगी। डाक्टर का कहना है, सब ठीक हो जाएगा। "फिर क्या मुसीबत है 'जया तू इतनी जड़ हो गई है या जानबूझकर सता रही है मुझे ! मेरी ननद या जेठानीन बन, जया बनी रह, नहीं तो कसम से मैं अब कभी नहीं पाऊगी।' " . अपने यहा के रीति-रिवाजो पर बडा क्रोध आया । यह कैसा रिश्ता है, जहान मन मिले हैं न मस्तिष्क, केवल जिस्म के स्तर पर जीवन चलता है। शादी में सिर्फ यह देखा जाता है कि एक साबुत शरीर लड़का एक साबुत शरीर लडकी को प्राप्त कर ले। दोनो की मानसिकता का कोई विचार नही किया जाता। बहुत हुआ तो प्रार्थिक स्थिति टटोल ली जाती है। माता-पिता कन्यादान ऐसे कर देते है, जैसे गऊदान। हमारे मुल्क के मिया और कहा ऐसा मजाक होता होगा कि अच्छे-खासे पढे-लिसे लड़के-लडकी शादी के वक्त अपना समस्त व्यक्तित्व माता-पिता के हवाले कर। मैंने बिल्कुल स्कूली अन्दाज मे अपने वायें हाथ की दो मंगुलियां पास 92/प्रेम कहानी कर ली और अपनी किस्मत को चश्मेबदूर कह लिया। मेरे अन्दर तो शुरू से सहन-शक्ति बेहद सीमित थी । कही यशा की त्रासदी मेरे साथ घटित हुई होती तो मैं सीधे कुतुबमीनार से छलांग ही मार देती। जिसे पाच मिनट बर्दाश्त करना दूभर हो उसे जीवन-भर बर्दाश्त करना मेरी बर्दाश्त के बाहर की बात होती। गिनेस के साथ मेरी कोई शहनगाह जिन्दगी नहीं थी, एक मामूली वेतन में मामूली तरीके से घर चल रहा था, लेकिन उसका गैर-मामूली व्यक्तित्व कभी मेरे जहन में वे अदना और औसत सवाल ही न उठने देता, जिनसे अक्सर औरत जुड़ी रहती हैं। उसके प्यार में मुझे वाकई बाबुल का घर भूल गया। कुछ डाक्टरो के समझाने से और कुछ शासकीय आश्वासनों पर अस्पताल की सफाई कर्मचारियों की हड़ताल टूट गई । हड़ताल टूटने के साथ ही उन्हे तत्काल जी-तोड़ परिश्रम करना पड़ा। इतने दिनो का मलवा उठाना आसान काम नहीं था। जैसे-तैसे अस्पताल अपने ढर्रे पर लौटा। इसमें एक बात खराब हुई। जो कर्मचारी नितांत अस्थायी तौर पर रखे गए थे उनमें से कुछ की छटनी कर दी गई। हड़ताल के दिनों में जो सफाई-कर्मचारी भरती कर लिए गए थे, उन्ही में से कुछ को बहाल कर लिया गया। गिनेस को यह वात बुरी लगी। उसने डाक्टर गुप्ता से इसाफ की अपील की। डाक्टर गुप्ता भडक गए, 'इसाफ तो यह है कि साले सबके सब को निकाल बाहर करूं । इनसबोडिनेशन मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। नौकरी के साथ-साथ क्वार्टर जब छीने जाएगे, तब होश पा जाएगा सवको! 'जब वे कुछ करते हैं, वह इंसाफ की दुहाई बन जाती है, जब मैं कुछ कहता हूं प्रतिशोध ! देखो गिनेस, तुम पीडिएट्रिक-विभाग से सम्बद्ध हो, अपनी दिलचस्पो वही तक रखो। अस्पताल के प्रशासकीय काम मेरे जिम्मे पड़े रहने दो, मैं उन्हे बखूबी निपटाना जानता हूं।' जो लोग निकाले गए थे, उनमें से तीन ने नगरपालिका में दस्तूरी दे- दिलाकर नौकरी हासिल कर ली। जो रह गए, वे अभी अस्पतात के । प्रेम कहानी/93 क्वार्टरो में ही पड़े थे । डाक्टर गुप्ता ने उन्हें कई बार नोटिस दिया, पर हर बार उनके पास यही जवाव था, 'हजूर इतने बड़े शहर में बाल-बच्चे लेकर कौन-सी सड़क पर बैठ जाएं !' उनकी औरतें हो अपने उद्यम से पर चला रही थी। डाक्टर गुप्ता ने आखिरी चेतावनी दे दी कि अगर क्वार्टर दो दिन के अन्दर न खाली किए गए तो बल-प्रयोग किया जाएगा। वे पाच परिवार थे। दुमरे दिन सुबह देखा गया, पाचो कोठरिया खाली पड़ी हैं। कोठरिया इतनी आसानी से खाली हो जाएंगी, यह किसोने नहीं सोचा था। कई अधिकारी डाक्टर गुप्ता को यह सुझाव दे रहे थे कि इनका सामान जबरन निकालकर बाहर फिकवाइए, तभी इन्हे निकाल पाइएगा। उनके अपने-माप निकल जाने से सभी एक क्षण को हतप्रभ-से हो गए। फिर भी किसीको इतनी फुर्मत नही थी कि विस्थापित कर्मचारियो को लेकर ज्यादा माथापच्ची में पहे। रोज के सैकडो केसेज थे, शाम के मरीज थे, अस्पताल की दैनन्दिन समस्याए थी, मेडिकल कालेज की राज- नीति थी। हादसा तब हुआ जब किसीको इसकी उम्मीद न थी। लगभग साल बीतने पर एक दिन शिमला से विशप स्कूल के हेडमास्टर का तार पाया। तार डाक्टर गुप्ता को सम्बोधित था 'इन्फार्म चिल्ड्रेन्स वेयर एबाउट्स इमोडेटली।' गुप्ता-परिवार में सनसनी फैल गई। डा० गुप्ता ने तत्काल अपने वरिष्ठ, कनिष्ठ, समस्त अधिकारियों से तार का अर्थ समझने की कोशिश की । मिसेज गुप्ता ने फौरन शिमला चल पड़ने की तैयारी कर डाली। अभी वे निकले भी न थे कि शिमला से ट्रंक काल पर हेडमास्टर ने बताया कि प्राकार और प्राधार पिछले चौबीस घण्टे से होस्टल से लापता हैं । मिसेज गुप्ता चीख मार-मारकर रोने लगी। डाक्टर गुप्ता के हाथ काप गएं । दोनों बदहवास हो गए । प्रत. शहर से शिमला के लिए तीन कारें चली, डा० प्रधान और मैंहदीरत्ता के साथ-साथ हम भी। सबके मन आशंका से काप रहे थे। कोई. किसी से न बोला। 94/प्रेम कहानी छत्तीस घण्टे पुलिस और सी० आई० डी० के लगातार दौड़-धूप करने के बाद बच्चे बरामद हुए। कहा उनके लिए शिमला और निकट- वर्ती गांवो, कस्बों तक तलाश की गई थी, कहां वे पाए गए स्कूल के ही अन्दर, दोनों साथ-साथ दोनों को साथ लिटा दिया गया था, अगल- बगल, नि:स्पन्द, निश्चेष्ट, निर्जीव । उनका गोरा रग चुने की सफेदी में तब्दील हो चुका था। पूरे शरीर में केवल गर्दन पर घाव था और माथे पर। हक्का-बक्का रह जाना कोई स्थिति नही होती, विपत्ति होती है। है । गुप्ता-दम्पति का निःशब्द चीत्कार, डाक्टरो द्वारा शवों को विस्तृत जांच, पुलिस का हत्या की कोठरी के चारो ओर घेराव और स्कूल के लोगो को पास-पास भीड़ के बावजूद दिमाग कोई भी तथ्य ग्रहण नही कर रहा था । लग रहा था कोई कह दे यह सव झूठ है, नाटक है, आकार अभी चलकर आए और मिसेज गुप्ता की साडी मे लिपट जाए, 'ममी हमे सापटी खानी है।' बच्चों के कपडे देखकर लग रहा था। उन्होंने जान बचाने के लिए बहुत सघर्ष किया होगा। कमीजें पैट से बाहर निकली हुई थी, युनिफार्म नंही थी, शाम के कपड़े थे, पैरों में पहनी स्लीपरों में तीन वहां पड़ी थी, चौथी गायब थी। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था । डाक्टर गुप्ता माथे पर हाथ रखे प्रिंसिपल और वार्डन की आवाजें सुन रहे थे। बुधवार की शाम बच्चे क्लासे खत्म कर अपनी डारमिटरी में पाए थे, हमेशा की तरह कपड़े बदले, जूते उतारे, वरना पटका और सभी बच्चों के साथ लाइन बनाकर मेस में नाश्ते के लिए गए। मौसम कुछ ठंडा था, इसलिए कोई भी बच्चा मैदान में नही खेला। सुबह से ही धुध फैली हुई थी। गेम्सरूम में पडी टेनिस टेबिल पर प्राकार, प्राधार, मुरिन्दर पोर जसपाल कुछ देर सेले । कुछ बच्चे भोढियो के हत्ये पर फिसलने लगे,पह उनका रोज का रोल था, कुछ गलियारे में ही भाग-दौड मार रहे थे। तभी घण्टी बजी और एक-एक कर बच्चे अपनी-अपनी रफ्तार अपनी जगह पर पहुंच गए। गाम मुरुपुका गई थी। भाकार मोर भाधार ने जरसी ढढने प्रेम कहानी/98 की कोशिश में अपनी आलमारी के कपड़े खासे उलट-पलट किए, फिर उन्होने स्कूलवाली नेवी ब्लू जरसियां ही पहन ली। यह बच्चों का पढने का समय था । हरेक को एक-एक मेज-कुर्सी मिली हुई थी, गणित के टीचर मिस्टर होडीवाला दो बार पूरे हाल का चक्कर लगाया करते । उस दिन प्राधार होमवर्क करने बैठा तो पाया वह अपना ज्योमेट्री. बक्स क्लास में ही भूल पाया है । यह कोई इतनी बड़ी बात न थी कि इसके विना होमवर्क हो ही न सके, दूसरे बच्चे से लेकर वह काम कर सकता था, पर बच्चे प्रायः ऐसे बहाने मिल जाने पर, टिककर बैठते नही, ढुढाई शुरू कर देते हैं। फिर आधार को पक्का याद था कि ज्योमेट्री-बक्स और कही नहीं, क्लास में डेस्क के अन्दर होगा। मिस्टर होडीवाला से इजाजत लेकर प्राधार जाने लगा। तो उन्होंने प्राकार को उसके साथ कर दिया और टाचं भी पकड़ा दी। यो अहाते में तो बत्ती रहती थी, पर क्लासो में कभी-कभी बल्व नदारद हो जाते । आस- पास हरियाली होने के कारण दिन-रात सापो की सम्भावना भी बनी रहतो थी। दोनों भाई कूदते-फादते अहाते के पार दूसरी इमारत की ओर चल दिए, जहां कक्षाए लगा करती थी । ठण्ड खासी थी, लेकिन उन्हे मजा आ रहा था। मिस्टर होडीवाला राउण्ड लगाकर चले गए। उनकी ड्यूटी दूसरे राउण्ड के बाद ममाप्त हो जाती थी। वह स्कूल से सट कर बने स्टाफ क्वाटरो में से एक में रहते थे। जाने कितनी देर बाद, खाने के भी, बच्चों को खयाल आया कि प्राकार और प्राधार अभी तक लौटे नही। उन्होंने सोचा जब वार्डन पाएंगे, उन्हें वे बताएगे । वाईन का कमरा नीचे था और ठण्ड की रात में निक- लने का मन किसी का न था। सुबह बच्चों ने वार्डन को बताया। तत्काल बच्चों की तलाश की गई। वे क्लास में नहीं थे, ज्योमेट्रो-बक्स माधार के डेम्क में रसा था । क्लास की सांकल ज्यो-की-त्यो लगी पड़ी थी, बच्चे यहां तक पहुचे ही न थे। पहले तो यह सोचा गया कि बच्चे मस्ती में इधर-उधर विमक गए हैं, उन्हे पूरी इमारत में खोजा गया फिर हेद- 26/प्रेम कहानी । मास्टर ने पुलिस में एफ० आई० पार० दर्ज करा दी । यो तो हेडमास्टर का खयाल था कि बच्चे ज़रूर दिल्ली घर भाग गए है, फिर भी वह अपना रिकार्ड दुरुस्त रखना चाहता था। बच्चो के पावो के निशान भी ज्यादा मदद नहीं दे रहे थे। दुर्घटना के बारह घण्टे बीतने पर भी पुलिस को कोई कामयाबी नही मिली, तब हेडमास्टर ने डाक्टर गुप्ता को तार और ट्रक काल एक साथ किया। उन्होने सोचा था डाक्टर गुप्ता का जवाबी तार पाता होगा कि बच्चे घर आ गए हैं और उनकी गुस्ताखी पर पिता को अफसोस है । विपरीत उत्तर पाकर सब की घबराहट बढ़ गई। खोज-बीन की सरगर्मिया बढ़ती गई। जैसे-जैसे वक्त बीत रहा था बच्चों के जीवित मिलने की सम्भावना कम हो रही थी। यह तो किसी ने सोचा भी न था कि बच्चे स्कूल के पिछवाडे इस कंडम कोठरी मे पाए जाएंगे, जो पिछली बारिशो के बाद से बंद पड़ी थी और जिसके अस्तित्व के भी बारे में स्कूल के लोग भूल-से गए थे। पहले इस कोठरी मे भूगोल- विभाग के नक्शे, चार्ट वगैरह रखे जाते थे। लेकिन पिछली बरसात में यह चूने लगी थी, कुछ नक्शे एकदम गल गए और इसकी दीवारों में महीनों सीलन बसी रही। सामान उठाने के बाद इसमें एक छोटा-सा ताला डाल दिया गया था। वह जंग लगा ताला भी कोठरी के अन्दर बरामद हो गया, बाकायदा ताली लगाकर खोला गया था वह । पुलिस-तहकीकात के दौरान कुछ बातें जो सामने आईं, उनमें से एक थी कि बोडिंगहाउस के कर्मचारियों, नौकरों में से एक पिछले दस दिन से छुट्टी पर था । कैपस पर रहने वाले हर आदमी को पेशी हुई, किसी से कोई सुराग न मिला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद शव हमारे हवाले कर दिए गए। कहां तो उस रास्ते से एक हंसता-खिलखिलाता परिवार पाया करता था, कहा एक रोता-सुबकता काफिला लौटा। मिसेज गुप्ता को बार-बार गग मा रहा था । डाक्टर गुप्ता अलग समाधि-स्थित थे। यह एक ऐसा जानलेवा जलजला था कि हमारे दिलासा देने के हौसले भी पस्त थे। प्रासिर क्या कहकर उन्हें ढांढस बंधाया जा सकता था, क्या यह कि वे अपने प्रेम कहानी/97 बम् भून जाग या यह कि ये समस्त बच्चों को अपने बच्चे सममने मग या मह रि. ये एक या गोद ले लें । उनको विपत्ति के मागे देगर भूमं विकल्प थे, जो उनके गमजदा जिगर को कोई भी सुकून नहीं देगरते पं । जिन मां-बाप ने अपने नन्हें-नन्हें बच्चों का रोना-हंसना, ऐनाना-मपनना, दोहना मागना मपनो पासो से देखा हो, वै क्या कभी उन पन्नों को भूत मरते थे ! बच्चे बीमार होकर गुजर जाते या दुर्घटना में फंन जाते यारही दूर माग जाते, तब भी सत किया जा सकता था, पर ये तो मानन-फानन में ऐसे चले गए, जैसे गंस चली जाती है, जैसे भरे मेने में जैव पट जाती है, जैसे बदली-पानी में सूरज डूब जाता है। उनके पर में एक नहीं, दो-दो मूरज डूब गए थे। मुझे यार-चार तासन्ताय के एक उपन्यास को पंक्तियां याद मा रही पी, मय युपी परिवार एक-से होते हैं, प्रत्येक दुखी परिवार अपने निजी व मला फारणों मे दुपी होता है । गुप्ता-दम्पति का दुख महनशक्ति की सभी सीमामोमो सिल्ली उड़ा रहा था। गिनेस रह-रहार तिलमिला रहा था, पुलिस को निष्क्रियता और अपराधी की मप्रियता पर । भगर पुलिस और सो० माई० डी० ने ढूंढने में इतने पंटे न मगाए होते तो मुमकिन है, बच्चे जोयित मिल जाते। जाने कितने गुंडे रहे होंगे, जाने कैसे लोग रहे होंगे वे, या मारने के पहले उन्हें बहुत तड़पाया गया होगा, बच्चे जरूर चिल्लाए होंगे, 'वचामो, बनामो'. सदं गत में पावाज किसी रजाई के नीचे पहुंच न पाई होगी। डा० प्रधान, मेंहदीरत्ता भोर गिनेस लगातार शिमला-पुलिस से सम्पर्क गे हुए थे कि हत्यारे का पता मिल जाए। लेकिन आ० गुप्ता और उनकी पली इस मोर से उदासीन थे। इसलिए जब ठीक ग्यारह दिन को सोज-बीन, दौड-धूप के बाद अखबारों में बड़े-बड़े अक्षरों में समाचार छपा कि गुप्ता-बालको वा तयापित हत्यारा पकड़ा गया, एक पार फिर रो पड़ने के अलावा गुप्ता-दम्पति और कुछ भी न कह पाए विभिन्न ममाचार-पत्रों से उनके पास उनकी प्रतिरिया जानने को विशेष सम्वाददातामोशा ताता लग गया, टी० बी०पर शेक-संतप्त दम्पति के चित्र, दिवंगत पच्चों की विविध मलरियां दिखाई गई, हरेक अखबार के 98/प्रेम कहानी मुखपृष्ठ पर आकार और आधार के चित्र छपे, लेकिन उनके माता-पिता वैसे ही हाथ मल-मलकर पछताते रह गए, जैसे ग्यारह दिन पहले पछताए थे कि उन्होंने बच्चों को अपने से दूर क्यों जाने दिया, क्यो नहीं उन्हे दिल्ली में ही पढाया? मिर हाथो मे थाम जिन्दगीभर पछताने के सिवा और क्या किया जा सकता था अब । एक रिपोर्टर द्वारा बहुत अधिक पूछे जाने पर कि अपराधी का पता लग जाने से कैसा लग रहा है डाक्टर गुप्ता बुरी तरह चिल्ला पड़े, 'पाप क्या सुनना चाहते है कि मैं बहुत खुश हुआ हूं। मैं क्या करूं? क्या जाकर पुलिस को इनाम बाटू ! या उस हत्यारे को सामने के पेड़ से लटका कर फांसी पर चढ़ा दू, या दात निपो- रते हुए अपनी तस्वीर खिंचवाऊ । भगवान के लिए मुझे अकेला छोड दीजिए । बेशक पुलिस एक की जगह दस हत्यारे लाकर खड़े कर दे मेरे सामने, क्या उनमें से एक का भी सिर मेरे बेटों की गर्दन पर फिट बैठेगा?' यह तो थी बाहरी लोगो के सामने उनकी प्रतिक्रिया। अकेले में उनकी हालत और भी दयनीय थी। बड़ी-बड़ी देर वह एकदम जड़ हो जाते. एकटक, खाली, भावशून्य नज़रो से सीधे सामने ताकते रहते । उन्हें बार-बार यह कचोटता कि उन्होंने सारे संसार के बच्चों को अटेड किया, एक अपने ही बच्चों को न किया। इस पेशे ने उन्हे कभी इतना वक्त ही नहीं दिया कि वह अपने बच्चों के बाप बन पाए। उन्हे क्या पता था बच्चे यों अचानक चले जाएंगे। मिसेज गुप्ता अपना दुख भूलने को पति की ओर देखती तो स्वयं रो पड़ती। वह न अकेली बैठ पाती, न पति के संग । उनकी कोई-न-कोई सहेली उनके पास बनी रहती। तीसरे दिन हथकड़ी, बेड़ियों में पुलिस की विशेष हिरासत में तथा कथित हत्यारे को राजधानी लाया गया। हम सब जब कचहरी पहुंचे, तव उसे देखकर बुरी तरह चौंक पड़े। यह एक पहचाना चेहरा था। सबने स्मृति पर जोर डाला, नही नहीं, यह उन विस्थापित कर्मचारियों में से, नहीं था, यह कोई पागल नही था, हां, याद आया-यह वह आदमी था, जिसने अभी मई में भरी दोपहरी डाक्टर गुप्ता का दरवाजा खटखटाया या और डाक्टर गुप्ता बाहर नहीं निकले थे। प्रादमी के हाथो में एक प्रेम कहानी/99 1 । घायल बच्चा था। स्कूटर का पहिया उसके पेट को रोंदता हुआ निकल गया था, उसे अविलम्ब उपचार की जरूरत थी। लेकिन डाक्टर गुप्ता ने नौकर से कहलवा दिया था, 'पहले थाने में रिपोर्ट लिखाकर प्रायो, तब देखेंगे।' आदमी ने लाख माथा रगड़ा, डाक्टर गुप्ता अपने उसूल से टस-से- मस न हुए। उस आदमी ने अपना घायल बच्चा बरामदे में लिटा दिया और चिल्लाया, 'मैं जानता हूं डाक्टर साहब, आप बाहर क्यों नहीं निकल रहे। में एक निहायत मामूली दुकानदार हूं। मेरे पास इस वक्त चादी की जूती होती तो आपके सिर पर मारता और आप खुशी से खोपड़ी सहलाते हुए मेरा बच्चा बचा लेते। प्राप डाक्टर नहीं, जानवर हैं, पैसे के गुलाम । प्रापसे निपट लूगा डाक्टर साहब, कभी मेरा भी मौका लगेगा।' दरवान ने उसे और उसके मरीज़ को जबरदस्ती बाहर कर दिया, हालांकि बच्चे की दशा देखकर उसका भी दिल हिल गया था। उसे लगा डाक्टर साहब को यो लोगो की दुराशीष नहीं लेना चाहिए, देख लेते तो इनका क्या बिगड़ जाता। उस दिन तो उसका नाम भी न पता चला था, माज पता चला था- मार्तण्ड । इसने अभी महीने भर पहले शिमला-स्कूल में चपरासीगीरी हासिल की थी। उसके पास वह कटार बरामद हुई, जिससे उसने यह नृशंस काण्ड किया था। उसे देखकर एकबारगी मिसेज गुप्ता बेकाबू होकर उसकी तरफ दोड़ी, लेकिन हम लोगों ने उन्हे संभाला। कानून के शब्दो में अभी तो यह भी सिद्ध होना बाकी था कि असली हत्यारा वह है अथवा कोई और । इस वीच शहर के शिशु-मरीजो का बुरा हाल रहा। मरीज़ रोज डाक्टर गुप्ता के बंगले पर पाते और लौट जाते । उन्हें इस वक्त न अपनी निजी प्रैक्टिस का होग था, न अस्पताल के कार्य का । उन्होंने लम्बी छुट्टी ने ली थी। रोगियों को हो रही भयंकर असुविधा के कारण, डाक्टर गुप्ता के मुझाव पर गिनेस ने घर पर मरीज देखने शुरू कर दिए। पहले-पहल पिनेस रोगियों को देखकर दवाई लिख देता था, फीस 100/प्रेम कहानी प्रे-6 नहीं लेता था। लेकिन कैम्पस पर रहने वाले अन्य डाक्टरो ने इसका तीन विरोध किया। उन्होंने कहा, इससे अन्य डाक्टरों को प्रतिष्ठा और प्रैक्टिम की गरिमा भंग हो रही है। यह न उचित है, न व्यावहारिक । फिर बच्चो के अभिभावक भी यह स्थिति पसन्द नहीं कर रहे थे कि वे अपने बच्चे की चिकित्सा निःशुल्क कराएं। अत नि शुल्क चिकित्सा बहुत थोडे दिन ही चल पाई। अब होता यह था कि लोग खुद-ब-खुद मेज पर फीस रख देते । गिनेस को बेहद संकोच होता, यह उसके आदर्शों के प्रति- कूल था, किन्तु उसे इतनी तसल्ली थी कि असमर्थ लोगों के शिशु-रोगी वह अभी भी मुफ्त देखा करता। गिनेस की साख और आमदनी धूप की तरह बढी और चढी । मेडिकल. क्षेत्र में यह पहला उदाहरण था कि इतने युवा डाक्टर मे लोगो का इतना विश्वास हो व रोगो को उसकी शिनाख्त ऐसी हो कि बडे-बडे दिग्गज भी हार मान जाएं। गिनेस उन डाक्टरों में से था, जिनसे वात करके ही मरीज अपने को स्वस्थ महसूस करने लगता है। उसका अपने मरीजो से सहज सम्प्रेषण था । नन्हें मरीज उसके पास पाकर रोते-चिल्लाते नहीं थे. महज खुद को उसके हवाले कर देते। अस्पताल में भी गिनेस को दुगना, तिगुना काम सभालना पड़ता। एक तो डा० गुप्ता छुट्टी पर थे इसलिए, दूसरे. इसलिए कि अधिकांश शिशु-रोगी उसी की सलाह पर वहा भरती होते। यह सब तो सुन्दर था और मुझे गिनेस की सफलता पर प्रतिपल अभिमान था, किन्तु कुछ बातों के अनिवार्यत घटित होते जाने के कारण मैं हतप्रभ भी थी। गिनेस का एक लगा-बंधा दैनिक-क्रम था--सुबह साढे मात तफ नहा-धोकर नाश्ता कर अस्पताल के लिए तैयार होना, फिर मेडिकल कालेज जाना, वहा से फिर अस्पताल का राउण्ड, दोपहर का खाना, अपनी थीसिस के लिए अध्ययन और शाम के राउण्ड और प्रैक्टिस । रात प्रासिरी मरीज़ देख लेने के बाद वह इतना थका होता कि उससे खाना भी न खाया जाता। ऊपर से रात-बिरात फोन । कई बार यह होता कि अलस्सुबह जब मैं नीद से जागती, पाती गिनेस गायब है, सिरहाने बिट पड़ी है, 'सॉरी डालिंग, एमरजेन्सी केस'। कभी गिनेस दोपहर के खाने पर न पाता, मैं दो बजे तक राह देखती, तीन बजे तक देखती और प्रेम कहानी / 101 प्राखिर चार बजे मुझलाते हुए साने की बजाय काफी पीने बैठ जाती। रात उसका इन्तजार करते-करते भूख तो क्या, नीद भी रूठ जाती। अन्य औरतो की तरह मैं पपल खोलकर, शापिंग कर-कर या नोट गिन-गिनकर दिन नही गुजार सकती थी। अब जब गिनेस इतना व्यस्त और गैरहाजिर था, पाश्चर्य के अलावा और करने को बचा क्या था ! ममझते-समझते भी कई बार नासमझी हो जाती थी। आमतौर पर रविवार को गिनेस मरीज नहीं देखता था। उस दिन अस्पताल तो बन्द रहता ही, प्राइवेट मरीजो को भी पता रहता, वे कम ही याते। मेरे मन में शुरू से छुट्टी का दिन बिताने का एक खास कार्यक्रम था, सुबह देर तक अलसाते हुए पडे रहो, पढे रहो, चाय बनवानो, पियो, न पियो, टालते रहो नहाना, अखबार पढना एक तगड़ा बहाना । छुट्टी है तो खाना हमेशा वाहर, शाम को पिक्चर" लेकिन गिनेस को कुछ ऐसा अभ्यास पड़ चुका था कि इतवार को भी वह सुबह साढे सात बजते-न-बजते नहा-धोकर तैयार हो जाता । नाश्ते के फौरन बाद वह मोटी-मोटी किताबो मे उलझ जाता। कभी किसी जर्नल के लिए, कभी किसी अखबार के लिए उसे पेपर्स लिखने होते । ग्यारह बजे एक कप वाफी के सहारे वह फिर दो घण्टे अध्ययन करता रहता। उमे अपनी व्यस्तता और कार्याधिक्य से कोई शिकायत भी न थी। यह तो मेरा ही वावला मन था, जो उसकी दूधिया मधुर बातो के लिए अव भी तरसता था, अब भी शहर की दूरदराज सड़कें उसके मग कदम से कदम मिलाकर वक्त-वेववत नापना चाहता था" किमी अधेरे कोने में एक अकेली दुनिया निर्मित करना चाहता था.' लेकिन गिनेस बाहर पाने के नाम से ही भड़क जाता, 'छि', अाजकल शहर में पीलिया फैला हुआ है, जानबूझकर बीमारी बुलानी है !' 'यह जो इतनी दुनिया बाहर खाती है, वेवकूफ है 'यकीनन।' 'सब तुम-जमे हो जाए तो शहर के सारे रेस्तरा वन्द हो जाएं।' 'हा, तब अस्पतालों में प्राज-जैसी भीड़ न हो । हमारे मुल्क मे समस्त रोगो की जड पेट है। गलत समय पर गलत भोजन, गलत तरीके से पवाया-खाया जाना मौत को जानबूझ कर करीव बुलाना है।' 102/प्रेम कहानी 'मारी दुनिया तो तुम्हारी तरह उबली सन्जिया और सुप लेकर खुश नहीं रह सकती।' 'तुम क्या चाहती हो, मैं करोलबाग में तुम्हारे साथ खड़ा होकर चाट के पत्ते चाटू " एक रविवार बहुत जोर देने पर गिनेस पिक्चर के लिए राजी हो गया । पुरानी फिल्म थी 'खामोशी', लेकिन हमारी देखी हुई न थी। मैंने कहा, 'फिल्म डाक्टरो से सम्बन्धित है।' गिनेस को हिन्दी-फिल्म पसन्द न थी, बोला, "फिल्मो में डाक्टर या तो नर्मो से इश्क लडाते हुए दिखलाए जाते है या देवता का काम करते, दोनों ही बातें बनावटी है।" 'तुम हर चीज को अपने तरीके से क्यो देखना चाहते हो? दूसरो का तरीका भी देखना चाहिए।' 'जो ठीक हो वही देखना चाहिए । मै तो तुम्हारी खातिर जा रहा है, वरना मेरे पास बरबाद करने को तीन घण्टे हैं ही नहीं।' मैं जल्दी से तैयार होकर चल दी। अभी हम गेट से बाहर निकले ही थे कि अस्पताल की तरफ से एक आदमी लगभग भागता आया और कार के रास्ते मे खडा हो गया, 'डाक्टर साहब, मेरा बेटा दम तोड रहा है, अांखें उलटने लगी हैं, जल्दी देख तीजिए।' 'डाक्टर पहाडिया वहा नही है ?' 'डाक्टर साहब सुवह आए थे, तब बच्चा ऐसे नहीं कर रहा था, डाक्टर साहब, मैं लुट जाऊंगा, देख लीजिए।' गिनेस फौरन स्टियरिंग छोडकर उतर गया। तेज, पक्के कदमो मै वह अस्पताल की ओर मुड गया, विना एक भी बार मुझसे बोले या देखे । मेरा मन तिक्त हो गया। कार गेट के अन्दर कर मैं कमरे में विस्तर पर पड गई। यह भी कोई तरीका है, न गिनेस ने सॉरी कहा, न कोई दिलासा, बस उतरा और चल दिया, जैसे कही प्राग लग गई हो। कितनी मुश्किल से महीनो वाद प्राज पिक्चर का प्रोग्राम बना था। मुझे लगा गिनेम मेरे साथ जाना नहीं चाहता था, इसलिए चल दिया, अब भट से फो हो भी गया तो जल्द नही लौटेगा, साढे तीन के बाद ही। अहाते में प्रेम कहानी / 103 और भी डाक्टर हैं, उनके भी मरीज है, लेकिन वे अपनी निजी जिन्दगी यो रेहन नहीं रख देते। गिनेस ने अगर मेरी ओर मुखातिब हो एक बार भी कहा होता, 'क्या करूं जया, मैं अस्पताल जाना तो नहीं चाहता, पर मजवूरी है' तो शायद इतना बुरा न लगता और मैं इस कदर उफनती न पडी होती, लेकिन उसका यो फुरती से चला जाना, मानो वह इस मौके का इन्तज़ार ही कर रहा था ? इस वक्त में इतनी हताश थी कि लग रहा था जैसे गिनेस के जीवन से मेरी प्रासगिकता अब समाप्त होती जा रही है। जैसा सात्विक खाना वह ग्याता था, नौकर बखूबी बनाकर दे सकता था। वैसे भी मैंने कभी भी रसोईदारिन के रूप में प्यार की सार्थकता नहीं चाही थी । गिनेस उन आदमियो में से भी नही था, जो पत्नी मे जगह पर जूते और खूटी पर वनियान को अपेक्षा करते हैं। अक्सर वह नहाकर इतनी फुर्ती से तैयार हो जाता कि मुझे पता भी न लगता वह कब गुसल- खाने में घुसा था। उसके पास कोई खाली समय नहीं था, जब उसे मनो- रजन के लिए एक माथी की जरूरत हो । अक्सर हम थोडी-बहुत जो भी बातें करते थे, रात ग्यारह बजे के बाद ही। वाकी समय मैं केवल उसका इन्तज़ार किया करती । ये पिछले छह माह मैने इन्तजार में ही गुजारे थे। कभी-कभी वह फोन कर दिया करता कि देर में पाएगा या नहीं पाएगा, कभी फोन करने का भी उसे खयाल न रहता । काम से बरी हो जब सिर उठाकर वह देसता, पाता तीन बजे हैं। मुझे लगा मैं खामखाह अपनी उपस्थिति मे उसे डिस्टर्व करती रहती है । इस वक्त जब उसका सारा ध्यान अपने काम, अपने अध्ययन, अपनी प्रक्टिस में लगा है, मैं अपनी घरेलू सामान्यता से लदी-फंदी महज एक गतिरोधक हूं। गिनेस कितना व्यस्त और सफ़ल था । मफल पादमी कितना सम्पूर्ण होता है। उसे अगल- वगल किसी की जरूरत नहीं होती। बिस्तर पर औंधे पडे-पड़े मुझे बडी शिद्दत से अपने नाते-रिश्तेदार माद प्राने लगे, मां-बाप, चाचा-चाची, गाव-मुहल्ला। जब तक मैं खुश थी, कितनी सपूर्ण थी, मुझे कभी कोई याद न प्राया, प्राज जब मन झंभलाहद, रलाइट भोर डवडवाहट मे भरा था, मव मेरी पासो के मागे घूम रहे थे। मुझे महसूस हो रहा था मैंने सब को कैसे इतने दिनो तक छोडे रखा, विना 104/प्रेम कहानी ।

कभी सरियत पूछे। जव गिनेस ने झंझोड़कर जगाया, मैं झटके से उठी। पहले कुछ समझ में न पाया कि सुबह है या शाम । जब गिनेम ने कहा, 'चलो, अगले शो के लिए तैयार हो जामो।' तब खयाल आया यह तो शाम के छह बजे है और 'तीन घण्टे पहले गिनेस मुझसे मुह मोडकर गया था। एक अच्छी नीद के बाद मैं अब इस वक्त गुस्सा नहीं थी, पर इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न वना मैं रूठ गई। मुझे गिनेस से चिढ हुई। मुझे उदास या खुश करना इस प्रादमी के लिए कितना आसान था। वह अभी-अभी नहाया लगता था, उसके शरीर से टूथपेस्ट, डेटाल, टेल्कम पाउडर और साबुन की ताजी गध उठ रही थी। मैं समझ गई उसका पेशेन्ट बच गया होगा। जिस दिन उसका कोई मरीज गुजर जाता, वह इस कदर खराव मूड में हो जाता था कि उससे सम्बाद मुश्किल हो जाता। मैंने उसकी बात का जवाब न देते हुए कहा, 'काश, मैं तुम्हारी मरीज होती, कम से कम दिन में दो बार तो तुम मेरा हाल पूछा करते, मेरी चिन्ता करते! 'मेरे पास इन फिजूल की कल्पनामो के लिए वक्त नहीं है, चलना है या नहीं, वतामो~यस और नो?" 'मैं वार्डवाय नही हू, यस और नो की भाषा मुझे रास नही आती।' 'तो तुम्हारे चक्करदार, दार्शनिक उत्तरों के लिए मेरे पास फुर्सत नहीं। मैं स्टडी में जा रहा हूं।' गिनेस अपने कमरे में बन्द हो गया। मैं जान गई इस वक्त वह पढ भी नहीं पाएगा। खामखाह इतवार की मिट्टी पलीद हो गई। मुझे अपनी वेवकूफी पर अफसोस हुप्रा । क्या मैं चुप नही रह मकती थी। पति की हां-मे-हाँ और ना-में-ना मिलाना आसान ही होता होगा, तभी करोड़ो लोग गादी करते हैं और सुखी रहे पाते हैं, मेरे लिए गदी की यह सीधी- मादी वर्णमाला कितनी मुश्किल पड़ने लगी थी। घर के किसी भी कोने में मन नहीं लग रहा था। मैं स्टडी मे जाना चाहती थी, सुलह के लिए, लेकिन कमरा अन्दर से बन्द था। मैं रात-भर तिलमिलाती रही। प्रेम कहानी / 105 ए का है ? मुबह मास लगी होगी तभी मुझे गिनेम के जाने की सयर न हुई। नीद टूटी पिंकू की सटर-पटर से। पड़ोस के डा० जोगी का नन्हा बेटा अभी स्कूल नहीं जाता था। ममी-पापा दोनों अस्पताल चले जाते तो उसके लिए घर खाली हो जाता। बुढिया प्राया जब उनके पीछे दौडती परेगान हो जाती, उसे हमारे घर ले पाती। कभी वह अपना काला भालू लेकर खुद ही भाग कर या जाता। मन उत्फुल्ल हो तो उममे तुतला-तुतलाकर बातें करना मुझे बहुत पसन्द था। बिल्कुल उसकी उम्र को बन मैं उसके साथ फिट खेलती और स्वयं हार जाती। कभी वह यो ही मेरे पोछे-पीछे घूमता रहता और एक. एक चीज को छूकर पूछता- 'पाण्टी मैं बताती तो वह दोहराता, 'पेन्छिल, तिकाव, इच्छे का करने ?' मैं उसे बताती। वह फिर सवाल करता, में फिर जवाब देती। कई बार खेलते-मेलते वह हमारे ही घर में सो जाता। तव उसकी पाया गोद में उसे ले जाकर अपने घर में लिटा देती। लेकिन आज उसे देखकर भी मेरे चेहरे पर हसी नही पाई। 'पाया ने कहा, 'क्या बात है विटिया, आज देर तक मोती रही। तवियत तो ठीक है न !' ‘पिंकू ने अपने हाथ का दफ्तो का डिब्बा मेरे पलंग पर रखा और वोला, "पिंकू डाक्टर, डाक्टर-सेट से प्राण्टी शीक कर दे।' उसके पास प्राज नन्हा-सा डारदर-सेट था, उसमे नन्हा-मा स्टेथस्कोप, सिरिज, रुई, प्लास्टिक की घडी, थर्मामीटर और गला देखने का औजार भी था। साथ ही पानी की कटोरी । एक कागज़ नुस्खा लिखने को साय' था। काफी सुन्दर सामान था। पिंकू पाया से कह रहा था,'दाई, पानी लामो, प्राण्टी के छुई लगेगी।' पिंकू ने बिल्कुल डाक्टरी अन्दाज मे मेरी वाह पर रुई गीली करके रगडी और सिरिंज संभालने लगा। उससे उसमें पानी भरा नहीं जा रहा 106/प्रेम कहानी

था। मैंने उसकी कोई मदद नहीं की।
वह कुछ हैरान होकर मुझे देखने लगा। फिर चिना पानी भरे उसने
सिरिज मेरी बाह से सटाई और हटा ली, 'प्राण्टी शीक हो गए, शीक हो
गए।'
मैं अब भी शरीक नहीं हो पाई।
पिंकू मेरा मुंह पकड़कर बोला, 'प्राण्टी, शीक हो गए, है न ।'
मैंने उसका गाल थपथपा दिया, विना बोले । उसने मेरे होंठ खोलने
की कोशिश की, 'पाण्टी, बोलो।'
मेरा मन बहुत भारी था।
आया बोली, 'विटिया की तबियत ठीक नहीं लगती, वावा चलो,
चलें।'
'नई, अम नई जाना । पाण्टी हछो, हंछो "नई हंछोगे तो हम दोली
माल देंदे, एक'''दो...'
मैंने एक बार हंसने की वाकई कोशिश की।
मैं फूट-फूट कर रो पड़ी।
.
मुद्रक प्राइरिस प्रिटिंग, शाहदरा, दिल्ली
22180

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Prem Kahani

Author
Mamta Kaliya
Title
Prem Kahani
File name
Prem Kahani
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2011/03
Publisher
Rajpal & Sons Kashmiri Get Dehli
Language
Sanskrit
Pages
112
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551366
Barcode
4990010032114.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
5K4nGlJXBqj
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