Natya Sodh Sansthan, Kolkata

Shakuntala Or The Lost Ring

Mishra,pandit Jwalaprasad · 2005/01/12

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Front matter

SHA KUNTALA
OR
THE LOST RING
A. SANSKRIT DRAMA
OF KALIDAS
TRANSLATED INTO HINDI
PROSE AND VERSE
WITH NOTES
BY
PANDIT JHALAPRASAD
HISIRA
OF
VORADABAD
PUBLISHED BX
KHEMRXX SHRIKRISHNXASS.
Printed at the Shri V. S. Press,
BOMBAY.
1927

GI660656965 ॥ श्रीः ॥ महाकवि श्रीकालिदासकृत- शाकुन्तल नाटक। अनेक ग्रन्थों के निर्माता तथा टीकाकार मुरादाबादस्थ पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्रद्वारा गद्य पद्यमें अनुवादित. 'खेमराज श्रीकृष्णदास' द्वारा बंबई निज "श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम्-प्रेसमें मुद्रित तथा प्रकाशित । संवत् १९८३, शक १८४८. सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटश्वर" यन्त्रालयाध्यक्षने स्वाधीन रक्खा है। are

यह पुस्तक खेमराज श्रीकृष्णदासने बम्बई खेतवाडी ७ वी
गली खम्बाटा लैन, निज "श्रीवेंकटेश्वर'' स्टीम् प्रेसमें अपने लिये
छापकर यहीं प्रकाशित किया ।

A.B... A९७. Re687 Dnto 24.8.95- Item NaD/H-455822.५- 17 भृमिक Don. by जो अपने गुणोंके कारण समस्त संसारमें एकमात्र महाकवि कहाता है उस कविकी सबसे ऊंची फहरानेवाली “शाकुन्तल-नाटक" रूप ध्वजाको कौन नहीं जानता है ? जिस नाटकके अनुवाद देश देशान्तरकी अनेक भाषाओंमें याथातथ्य न होकर भी इस ग्रन्थकी सर्वोत्तमताका परिचय दे रहे हैं, इसमें कोई भी सन्देह नहीं कि "शाकुन्तल-नाटक" के समान सर्व- जनप्रिय दूसरा नाटक इस भूमण्डलमें नहीं है, इसमें जो स्थान जो भाव रस- निरूपण नाटकके अलंकारादि और पात्र लिखे गये हैं, वे ऐसे हैं कि मन लगाकर पाठ करते ही नेत्रोंके सामने नृत्य करतेते दिखायी देने लगते हैं, इसके विषयमें विशेष लिखना पिष्टपेषणमात्र है, कारण कि, सभी ज्ञाता- ओंने इसके विषयमें थोड़ा बहुत कथन किया ही है और अब भी इसके विषयमें छोटे बड़े प्रबन्ध निकलते ही रहते हैं, इस कारण इसके समालोचक-विभागको छोड़कर इसमें इतना ही कहना बहुत समझते हैं कि, महाकविने इसमें वह भाव रखे हैं, जो प्रेमीजनों के हृदयमें घनिष्ट प्रेमकी स्थिति होनेपर हुआ करते हैं और उसके भावोंको हृदयसे मिलाकर पाठ करनेसे रसज्ञ सजनोंको इसका परिचय भलीभाँतिसे होसकता है। इसका यथार्थ रस तो संस्कृतग्रंथके अवलोकनसे ही हो सकता है परन्तु जो संस्कृतसे अनभिज्ञ हैं उनको अपनी देशभाषाके अनुवाद के सिवाय इसके जान- नेका और उपाय ही क्या है ? इसमें कुछ सन्देह नहीं कि, अपने देशकी हिन्दी- भाषाको छोड़कर अन्यदेशकी भाषाओंमें संस्कृतका अनुवाद वैसा उत्तम नहीं होता, कारण कि यह भाषा संस्कृतसे ही बिगड़कर बनी है. इस कारण इसमें उन शब्दोंकी सामग्री विद्यमान है, दूसरी भाषाओंमें नहीं है, इसीसे हिन्दी अनुवाद ही और अनुवादोंसे उत्तम हो सकता है. जिस भारतवर्ष में अच्छेसे अच्छे विज्ञ प्रगट होते रहते हैं और हैं तथा होंगे; वहां "शाकुन्तल" हिन्दी .

(६) शाकुन्तल नाटक। अनुवाद हुए विना कैसे रह सकता है, कई महानुभावोंके लिये अनुवाद हिन्दीके भंडारकी शोभा बढ़ा रहे हैं और प्रशंसनीय हैं, फिर दूसरे अनु- बादकी आवश्यकता क्या है ? परन्तु ऐसा कौन है कि इस महाकवि कालिदा- सके प्रेमसरोवरमें स्नान करके शुष्कशरीरसे बाहर निकल आवे और उसके वस्त्र तथा सर्वांगसे-नेह नीर न चुचावै, “सब जानत प्रभु प्रभुता सोई । तदपि कहे विन रहा न कोई," इसको पढकर कई बार मनमें आया कि एक इसका हिन्दी अनुवाद ऐसा भी किया जाय कि, जो नाटकके खेलके भी उपयोगी हो और संस्कृत भाषावालोंके भी उपयोगी हो, जिसे देखकर असली ग्रंथका मिलान भी हो जाय, परन्तु फिर भी मनमें संकोच होता था, यद्यपि इस विषयमें कितने एक मित्रोंकी प्रेरणा भी हुई पर तो भी इस कार्यका दृढसंकल्प न हुआ। उसी अवसरमें हमारे परममान्य जगद्विख्यात हिन्दीभाषाके परमसहायक "श्रीवेङ्कटेश्वर" ( स्टीम् ) यंत्रालयाध्यक्ष सेठजी श्रीयुत खेमराज श्रीकृष्णदासजी महोदयने बहुत अनुरोध किया कि, अपने यंत्रालयके निमित्त "शाकुन्तल नाटक" का गद्यपद्य हिन्दी अनुवाद करना चाहिये. इस अनुरोधको सर्वथा अनिवार्य जानकर मैंने इस ग्रंथको भाषामें अनुवादरूपसे लिखना प्रारंभ किया और जो स्थल पद्यके हैं उनको पद्यमें और जो मूलमें गद्य हैं वहां भाषा गद्य ही रखी है और जहां कहीं ऐसा * फूल बना हुआ हो तो उस वाक्यको मूलका अनुवाद न जानना, वह अधिक जानना, पर ऐसा कहीं ही हुआ है। पद्यका अनुवाद पद्यमें करना और उसका सम्पूर्ण भाव उसमें प्राप्त करना कोई सहज बात नहीं है, इसीसे थोडे अक्षरों में वह भाव भरना कठि- नाईका कारण हो जाता है. यद्यपि इसमें सर्वथा कृतकार्य होना कठिन है तथापि यथासंभव किसी श्लोकका: भाव नहीं जाने दिया है और निज रचनाके शब्दोंको बहुत न्यून अवकाश दिया है। शेष गद्य रचना सर्वत्र ही मूलका अक्षरार्थ है। इसके पाठसे भाषा और संस्कृत दोनों प्रकारके ज्ञाताओंको लाभ हो सकता है और यदि इसका दृश्य दिखलाया जाय तो यह उसके भी उपयोगी हो सकता है, इसी कारण इसमें भिन्न २ भाँतिके भूमिका। (.७) . . राग गानेयोग्य सयुक्त किये हैं और मनुष्योंकी रुचिके अनुसार व्रजभाषा पूर्वी और इस देशकी भाषामें भी पद्यरचना की है और वह प्रायः ऐसी शैलीपर लिखे है जिनका इस समय प्रचार है। इसके अनुवादमें कलकत्ता, बंबई आदि स्थानोंकी मुद्रित तथा एक दो हस्तलिखित पुस्तकोंको भी मिलाया, परन्तु सबमें बम्बईकी छपी पुस्तकका ही पाट अधिक शुद्ध और उपयोगी विदित हुआ, इससे उसीके अनुसार यह भाषामें लिखा गया है। इसकी भाषासे हिन्दी- रसिक बहुत प्रसन्न होंगे, यह कहना तो अत्यन्त ही अनुचित है, पर हां, सजनोंको यह अरुचिकारक भी न होगी, कारण कि, वे दूसरेके गुणों के ही ग्रहण करनेवाले होते हैं, शेषमें तो “जे परभणित सुनत हरषाहीं, ते वर पुरुष बहुत जग नाहीं" इसमें इतना ही कहना बहुत है कि, भला है या बुरा है जैसा है, प्यारे ! तुम्हारा है। हिन्दीके प्रेमी उत्साहवर्द्धक "भारतमित्र " के एडीटर बाबू बालमु- कुन्द गुप्त कलकत्ता, बाबू उदितनारायणलाल वकील गाजीपुर तथा अन्य महाशय और हमारे नगरके कुमर बनारसीदासजी एम, ए., पण्डित बलदेव- प्रसाद मिश्र, कन्हैयालाल मिश्र, कन्हैयालाल तंत्रवैद्य, सेठ कुन्दनलाल, पंडित बाबूराम, बाबू बुद्धासिंहजी आदि भी धन्यवादके योग्य हैं, जो हिन्दी अनुवादके ग्रन्थों के प्रचारार्थ अनेक प्रकारसे यत्न करते रहते हैं। पाठक महाशयोंसे प्रार्थना है कि, यदि इस ग्रंथमें कहीं अशुद्धि पावें तो अपनी उदारतासे क्षमा करें, कारण कि मनुष्यके स्वभावमें विशेषकर भूल है । दोहा--"रसिकनके हित ग्रंथ यह, मैं कीन्हो अनुवाद। पढ़िये सुनिये प्रेमसे, पइये नित अहलाद ॥" सज्जनोंका अनुगृहीत-ज्वालाप्रसाद मिश्र, (दीनदारपुरा)-मुरादाबाद. , शकुन्तलाकी संक्षेप कथा। १ अंक-हस्तिनापुरका राजा दुष्यन्त आखेट करता हुआ कग्वऋषिके तयो- बनमें पहुँचा. यह आश्रम मालिनीनदीके तटपर था, वहां मेनकागर्भसम्भूत शकुन्तला को देखकर मोहित हो गया और सखियोंके मुखसे उसे विश्वामित्रके वीर्यसे उत्पन्न हुई क्षत्रिया जान बड़ा प्रसन्न हुआ और वहीं परस्पर दोनों के मनमें प्रीति उत्पन्न हुई. पीछे सेनाके लोगों को देख वनके हाथोके बिगड़नेसे शकुन्तला अपनी सखियों सहित कुटीमें चली गयी. राजाने भी आश्रमके निकट ही डेरा किया। २ अंक-अपने डेरेपर राजाने अपने मित्र माढव्यसे शकुन्तलाका सम्पूर्ण वृत्तान्त कहा और फिर आश्रममें जानेका मिस पूछा कि इसी समय कुछ तपस्वियोंने आकर कहा महाराज ! आप यहां कुछ दिन रहकर आश्रमकी रक्षा कीजिये, कारण कि, जब हम यज्ञ करते हैं तो राक्षस आकर विन डालते हैं। राजाने इस बातको सहर्ष स्वीकार किया, कारण कि उसको शकुन्तलाके समीप जानेका मिस मिल गया। ३ अंक-शकुन्तलाके निमित्त व्याकुल हो राजा उसे वृक्षोंमें खोजने लगा, तब उसको एक चट्टानपर लेटी हुई विरहतापसे तापित शकुन्तला दिखायी दी, दोनों सखियें उससे दुःख पूछ रही थीं, राजा पेडको आडसे सब सुनने लगा, सखियोंने शकुन्तलासे एक प्रेमपत्र लिखवाया, जब वह पत्र शकुन्तला बांचने लगी तभी राजाने प्रगट हो अपना वृत्तान्त कहा और वहीं दोनोंका गांधर्वविवाह हुआ, सखी बहाना कर वहांसे चली गयीं, पीछे मौतमो शकुन्तलाको देखने आयी। राजा पेड़ोंको आडमें छिप गये और शकुन्तला गौतमीके साथ अपनी कुटीको गयी, चलते समय राजा अपनी अँगूठी देकर हस्तिनापुरको सिधारे और कह दिया कि, आजसे तीसरे दिन कोई तुमको लिवाने आवेगा। ४ अंकका--(विष्कम्भक ) राजाके वियोगमें शकुन्तला बडी व्याकुल थी, उसी समय महर्षि दुर्वासा आ गये और शकुन्तलासे आदर न पाकर बोले कि जिसके ध्यान में तूऐसी मग्न है, वह तुझे भूल जायगा, पीछे शकुन्तलाकी सावीके मनानसे कहा कि अपनी अँगूठी देखकर उसे स्मरण हो जायगा।

शकुन्तलाकी संक्षेप कथा । (९) ४ अंक-सोमतीर्थसे लौटकर कण्वऋषिने शकुन्तलाको मर्भवती देखकर सब वृत्तान्त जान अच्छी शिक्षा देकर गौतमी और दो मिश्रोंके सहित उसको राजाके यहां भेज दिया, चलते समय सखियोंने कह दिया कि, यदि राजा तुझे तुरन्त न पहँचान ले तो उसे यह अंगूठी दिखा देना । ५ अंक-जिस समय शकुन्तला राजाके पास पहुंची और तपस्वियोंने उसे राजाकी विवाहिता बताया तब राजा शापवश उसको न पहँचान सका, उप समय राजाको सुधि दिलानेको शकुन्तला अँगूठी दिखाने लगी (जो आचमन करते समय शक्रतालमें गिर पड़ी थी) पर हाथमें न देख लजित हुई और जब राजाने उसे स्वीकार न किया तब पुरोहितने कहा जबतक इसके बालक हो तबतक मेरे यहां रहे, यदि उस बालकके लक्षण चक्रवर्तियोंकेसे हों तो आपके रनवासमें रहेगी अन्यथा अपने पिताके घर जायगी. कण्यके चले अपने आश्रमको गये और शकुन्तला पुरोहितके पीछे २ चली, कुछ दूर जानेपर ही एक अप्सरा उसको उड़ाकर ले गयी। ६ अंकका-( प्रवेशक ) जहां शकुन्तलाके हाथते अंगूठी गिरी थी वहां एक धीमरने मछली पकडी और उसका पेट चीरा तो उसमें से वह अंगूठी निकली, उसपर राजाका नाप खुदा था, वह उत्ते बेचने हस्तिनापुर गया कि कुतवालने राजाकी अंगूठी देख उसे चोर जानकर पकड़ा और मुंदरीको राजाके पास ले गया, उसे देखते ही दुर्वासाका शाप मिटा और राजाको शकुन्तलाकी सुध आ गयी, धीमरको पुरस्कार देकर छोड़ दिया । ६अंक-शकुन्तलाकी सुव आते ही राजा बड़े पछतावेमें पड़ा और बसन्तोत्सवको वर्जकर मंत्रीपर राजकाज सौंप उपवनमें निवास करने लगा। सानुप्रती अप्सर ने यह सब वृत्तान्त देखकर शकुन्तलासे कहा, एक दिन इन्द्रका सारथी मातलि रथ लेकर आया और राजासे कहा, दानवोंसे युद्ध करनेको इन्द्रने तुम्हें बुलाया है, राजा उस रअपर चढ़ दानवोंते युद्ध करने गया । .

(१०) शाकुन्तल नाटका ७ अंक-जब दानवोंको जीत इन्द्रसे विदा हो राजा अपने नगरको चला तब मार्गमें कश्यपऋषिके आश्रममें राजा दर्शनके निमित्त ठहरा. वहीं शकुन्तला और अपने पुत्रसे मिला. उन्हें लेकर महर्षि कश्यप और अदितिसे आशीर्वाद पाकर स्त्री पुत्र सहित राजा अपनी राजधानीमें आया. शकुन्तलाका दुःखे जान- कर मेनकाने एक अप्सराद्वारा कश्यपजीके आश्रममें उसे उड़ा मँगाया, यहीं शकुन्तलाके पुत्र हुआ. तपस्वियोंने उसका नाम सर्वदमन रक्खा और पीछे यही सम्राट् होकर भरत नामसे विख्यात हुआ । शकुन्तलाकी रचना विशेषकर "पद्मपुराण" के आधारपर है। 112424 नाटकपात्र। (पुरुष) सूत्रधार-नाटकका प्रबन्धको। दुष्यन्त-हस्तिनापुरका पुरुवंशी र ज । माढव्य-दुष्यन्तका मित्र और विदूषक। सर्वदमन--शकुन्तलासे उत्पन्न दुष्यन्तका पुत्र ! सोमरात--राजाका पुरोहित । करभक-दूत । मित्रावसु-दुष्यन्तका साला नगरका कोतवाल । वातायन-रनिवासका रक्षक । जानुक--सिपाही। सूचक-सिपाही। कुम्भीलक-शक्रावतार तीर्थका धीमर । रैवतक-द्वारपाल। सारथी-रथ चलानेवाला। कण्व-तपोवनके अधिष्ठाता शकुन्तलाके पालक पिता महा कश्यप-मरीचिके पुत्र ब्रह्माके पोते । शाङ्गरव-) कण्वके शिष्य । शारद्वत- गालव-कश्यपका शिष्य । माताल-इन्द्रका सारथी। (स्त्रो) नटी-सूत्रधारकी स्त्री। शकुन्तला-दुष्यन्तकी प्रिया, विश्वामित्रसे मेनकामें उत्पन्न : प्रियंवदा- शकुन्तलाकी सखी अनसूया- मौतमी-कण्वकी बहन एक तपस्विनी । वसुमती-दुष्यन्तकी एक रानी।

(१२) शाकुन्तल नाटक। सानुमती-मेनकाकी सखी एक अप्सरा । तरलिका-रानी वसुमतीकी दासी । वेत्रवती- रनिवासकी द्वारपालिका । प्रतीहारी- परभृतिका-- उपवनकी रखानेवाली दो युवा स्त्री। मधुरिका- सुव्रता-सर्वदमनको सिखानेवाली। अदिति-कश्यपमुनिकी स्त्री यवनी-राजसेवकिनी आदि । संकेत। १---नाटकके प्रारम्भमें जो एक ब्राह्मग रंगभूमिमें आकर सभाको आशीर्वाद देता है, उसको नान्दी कहते हैं और नान्दीके पीछे सूत्रधार आकर जो बातचीत करता है और नाटकका विषय वर्णन करता हुआ कुछ आप गान करता और दूसरे पात्रों से गवाता है इस वार्तालापको प्रस्तावना कहते हैं, नाटक खलनेवालों के मुखियाको सूत्रधार कहते हैं । २ .---दूसरे ग्रन्थों में जैसे अध्याय आदि होते हैं वैसे नाटकोंमें विभाग करने- वाले अंक होते हैं। यदि किली अंकके प्रारम्भमें कोई अधिक प्रसंग आता है उसको जंब लिखते हैं तो वह विष्कम्भक, प्रवेशक वा गर्भाङ्क कहाता है। ३-जहां नाटक खेला जाता है उसको रंगभूमि कहते हैं और परदेके पीछे जहां नाटकपात्र वेष बदलते हैं अथवा खेलकर चले जाते हैं उसे नेपथ्य कहते हैं। ४---जो लेख ( ) या [ ] चिह्न के भीतर हो वह नाटकपात्रका वचन नहीं जानना, पढनेवालोंके समझानेके निमित्त नाटकपात्रोंका भाव बताया गया है और जहां (आप ही आप ) लिखा है वह मनमें ही विचारा, ऐसा जानना, इसके पीछे जहां (प्रगट ) लिखा है वह सबको सुननेके निमित्त है। ५--जहां किसीका आना जाना लिखा है इससे जानना कि वह पात्र रंगभूमिमें आया वा नेपथ्यमें गया।

श्रीगणेशाय नमः । शाकुन्तल नाटक. ( स्थान रङ्गभूमि.) ( नान्दी मंगलपाठ करता हुआ आता है.) ( राग कलिंगड़ा) कर्ता आदिम्मृष्टि जेहि जायो। सो जल और जो विधिवत आहुति, लेत अग्नि जाह नाम बतायो । यज्ञ करत जेहि कहत होत्री, कर दोउ जोति समय सधवायो। स्थित सचराचरमें है व्यापक, जहि गुण शब्द अकाश लखायो । सर्व बीजकी करत प्रकृति जेहि, जासे प्राणिवन्त जग पायो । आठमूर्ति जो प्रत्यक्ष शिव, मिश्र तुम्हें रक्षहि मनभायो ॥ १ ॥ ( नान्दीके पीछे सूत्रधार आया) सूत्रधार-(नेपथ्यकी ओर देखकर ) प्यारी ! जो शृंगार कर चुकी हो तो यहां आओ। (प्रवेश करके) नटी-आर्यपुत्र ! मैं यह आयी। सूत्रधार-प्यारी ! यह समा श्री १०८ श्रीमहाराजाधिराज प्रमर वंशातस छत्रपुराधीश्वर श्रीविश्वनाथसिंहदेवजू महोदयकी है। सो आज कालिदासकृत अभिज्ञान-शाकुन्तल-नाटक "कि, जिसको मुरादाबाद निवासी पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्रने भाषा गद्य, पद्यमें रचा है। की लीला करती है सो प्रत्येक पात्रको सावधान होना चाहिये।

(१४) शाकुन्तल नाटक । 'नटी-स्वामिन् ! आपका प्रबन्ध ही ऐसा है कि, कुछ भी न्यूनता न होगी "पर यह तो कहो कि, यह जगत्प्रसिद्ध कविका नाटक भाषामें क्यों खेला जाता है?" सूत्रधार-"प्यारी ! अब वह समय नहीं है कि, सर्व साधारण संस्कृत समझ सकें और संस्कृत समझना तो क्या ! हमारे भारतवासी अपनी भाषा और सर्वगुणआगरी नागरीका भी आदर नहीं करते, हां, श्रीमान् न्यायपरायण सर एन्टोनी मेक डानल महोदय लेफ्टिनेण्ट गवर्नर N.W.P.को धन्यवाद है कि, जिन्होंने हिन्दीको भी न्यायालयों में स्थान दिया, इससे कुछ उन्नतिको सम्भावना है, पर भारतवासी अब भी इस ओर भलीभाँति नहीं झुके हैं, इस कारण उनको रुचि बढानेको हिन्दीभाषामें नाटक करते हैं। मैं तुमसे अपना सिद्धान्त कहता हूं किः-- तबहिं भलो नाटक हम जानैं । जेहि लाख पण्डितजन तुख माने ।। नाहिंत अति शिक्षित मनमाहीं। सुधरनकी दुचितई सदाहीं ॥२॥ नटी-स्वामिन् ! यह सत्य है. अब कार्यके निमित्त आज्ञा दीजिये । सूत्रधार-इल समाके प्रसन्न करनेके सिवाय और क्या आज्ञा है कि, यह उपभोगके योग्य ग्रीष्मऋतु अभी प्रारंभ हुई है, इसते इसी ऋतुके योग्य कुछ गाओ देखोः- ( राग झंझोटी) कैसे नीके लागत हैं ग्रीषमके भावरी ॥ आस्ताई। साँझको समय निहार पावत सुख नरो नार, उपजत सुख बार बार जीको बड़ो चावरी । नदी औ सरोवर जन न्हाये होत शीतल तन, छाया सुख देत विपिन मोदको बढ़ाव री।

शाकुन्तल नाटक। शीतल सुगन्ध सनी जीको सुख देत धनी, पाटलके फूल गन्ध लिये चले बावरी ॥ ३ ॥ नटी--सत्य है. ( गाती है.) (राग वसन्त ) कोमल नव अंकुर युत केशर । ईषत चुम्बत भ्रमर रहसकर, अंकम भरत मोद निज हियभर । देखो नव यौवन वनवासिनि, शिरसफूल आभूषण करकर। धरत श्रवण पावत अतिशोभा , ग्रीषमकी ऋतु है बड़ेि सुन्दर ॥४॥ सूत्रधार-प्यारी ! अच्छा गाया, धन्य है ! इस रागसे सुननेवालोंकी चित्तवृत्ति एकाग्र होकर रंगभूमि सब ओरसे चित्रलिखितके समान हो गयी, अब किस प्रकार से इस सभाके महात्माओंको प्रसन्न करें ? नटी-स्मरण नहीं कि, स्वामीने अभी कहा था कि, अभिज्ञान-शाकुन्तल नामक अपूर्व नाटकका खेल करना होगा । सूत्रधार--अथ ! अच्छी सुरत दिलायी, मैं तो इस समय भूल ही गया था, कारण कि:-- दोहा--मधुरगीत तव मम हियो, बँच्यो इमि बलवन्त । जिमिलायो कर हरण यह,हरिण नृपति दुष्यन्त।।५।। ( दोनों बाहर गये) इति प्रस्तावना।

शाकुन्तल नाटक! ! अंक १. स्थान वन। ( रथपर चढ़ा, धनुष बाण हाथमें ले राजा दुष्यन्त हरिणको देखता सारथी सहित आया.) सारथी-( पहले कुरंगकी ओर फिर राजाकी ओर देखकर ) हे आयुष्मन् । दोहा-लखि कुरंगको अरु तुम्हें, हाथ लिये धनु बान । साक्षात जतु यज्ञमृग, पीछे शिव भगवान ॥६॥ राजा--हे सूत ! यह मृग तो हमें बहुत दूर ले आया है और फिर यह देखो:- कैसे रथको हरिण विलोकत, लखिघहरान अधिकस्यन्दनकी, चलत उतावल ग्रीवा मारत । कबहूँ बाण लगनके भयसे. आगे पिछलो गात सकोरत ।। छिन २ मगमें थाकित मुखसे, दाभ गिराय चला पुनि दौरत । लखो कुलांच भरत अब कैसी, भूतलमाहिं न निजपग जोरत ॥ ७॥ और देखो अब ऐसे वेगसे जाता है कि, सहज दिखायी भी नहीं पड़ता। सार--हे महाराज ! अबतक भूमि ऊँची नीची थी, इससे मैंने रास रोककर रथ धीरे चलाया था, इससे यह मृग दूर निकल गया है, अब धरतो एकसी आयी, अभी ले लेंगे। राजा-तो अब घोडोंकी रास छोडो। सारथी-जो महाराजकी आज्ञा ( रथको भर दौड चलाय उसके वेगका निरूपण करके ) महाराज देखो ! देखो:-- अश्वकी ढीली की जब रास, वेगसे दौर परे तत्काल । अगले त नुको तान कनोती, लीन्ह दबाय विशाल ॥

अंक-१. (१७) है चमर शिखा हालत नाह नेकहु, रज न लगत खुरताल । झपटत मानहु वेग हरिनको, सह न सकत भूपाल ॥८॥ राजा-सत्य है, यह घोड़े इन्द्र और सूर्यके घोड़ोंके वेगको भी जीतकर चलते हैं। ( झंझोटीका जिला) दूर रहेसे वस्तु जौनसी, पहले झीनी परी दिखाई। निकट भयो सो मोटी दीसति, कटीहुई सो जुरी लखाई। टेढ़ी निकट भये जो दीखत, दूर भये सीधी दरशाई । रथके वेग निकट अरु आगे, दूर न अन्तर नेकु रहाई ॥९॥ सारथि ! देखो अब हम इसे गिराते हैं (धनुषपर बाण चढ़ाया) ( नेपथ्यमें ) हे महाराज ! इसे मत मारो । मत मारो। यह आश्रमका मृग सारथी-(शब्द सुनकर देखता हुआ) हे महाराज : बाणके सम्मुख आये हुए. हरिणके बीचमें यह तपस्वो खड़े हैं। राजा-(चकित होकर ) तो घोडोंको रोको। सारथी-जो आज्ञा ( रथ रोकता है) ( एक तपस्वीका दो शिष्यों समेत प्रवेश) तपस्वी-( बाँहें उठाकर ) हे राजन् ! यह आश्रमका मृग है। इसे मत मारो यह मारनेके योग्य नहीं है। दोहा-भलीभाँति संधानकृत, लो उतार यह बान ॥ दुखियन रक्षत शस्त्र तव, लेत नविन अघ प्रान ॥१०॥ राजा-यह मैंने बाण उतार लिया (बाण उतारता है ) तपस्वी-पुरुवंशदीपक ! आपको यही चाहिये । दोहा-जन्म पाय पुरुवंशमैं, तुम्हैं उचित नृप एह ॥ चक्रवात गुणयुत सुवन, होय तुम्हारे गेह ॥ ११ ॥ दोनों तपस्वी-( भुजा उठाकर) अवश्य तुम्हारे चक्रवर्ती पुत्र हो ।

(१८) शाकुन्तल नाटक । दुष्यंत-( प्रणाम करके ) ब्राह्मगोंके वचन शिर माथे लिये। तपस्वी-हे राजन् ! हम तो समिधा लेने जाते हैं और यह कुलपति कण्वका मालिनी नदीके किनारे आश्रम दीखता है, यदि अवसर हो तो वहां चलकर अतिथिसत्कार ग्रहण कीजिये और (राग काफी) मुनियनके आश्रममें जाई । देख हुगे सब काज धर्मके होत विघ्न विन राई । तब जानहुगे ये मेरी भुज धनुगुण चिन्ह तुहाई। कितने सत्पुरुषनकी रक्षा होत जगल लुखदाई ॥ १२ ॥ राजा-महर्षि आश्रममें हैं, कि नहीं ? तपस्वी-अपनी पुत्री शकुन्तलाको अतिथिलत्कारकी आज्ञा देकर उसीकी ग्रहदशा शान्त करने के निमित्त सोमतीथको गये है। राजा-अच्छा ! हम उस कन्याको ही देखेंगे और वह हमारा भक्तिभाव महर्पिसे कहेगी। तप०-तबतक हम भी अपने कार्यको जाते हैं ( शिष्यों समेत गये) राजा--हे सारथि ! रथ चलाओ, इस पवित्र आश्रमके दर्शन कर अपना जन्म सफल करें। सूत-जो श्रीमान्को आज्ञा ( रथको चलाया ) राजा-(चारों ओर देखकर ) हे सूत ! जो कोई न भी बताता तो भी यहां हम जान लेते कि, तपोवन समीप है । सूत-कैसे? राजा-क्या तुम नहीं देखते ? कि यहां--- ( दादरा) देखो ये तपोवनके दीखे हैं चिह्नसारे ॥ आस्ताई ।। तोतोंके कोटरोंसे गिरकर समेके चावर, नीचे परे तरुनके शोभाके भरे भारे ।। हिंगोटं कूटनेकी चिकनी धरी शिला है,

अंक-१
(१९)
कैसे हिले हिरन हैं टरते हैं नहीं टारे ॥
भीजे बसनकी बूंदें पगवाटमें नदीलो,
पड़करकै बनी रेखा शोभा हैं कैसीधारे ।
अतिवेगसे पवन यह सरिताका जल हिलोरे,
हुइ श्वेत मूल धुलकर जो वृक्ष हैं किनारे॥
नइ कोंपलोंके पत्ते लगकर धुवाँ हवनका,
देखो तो नेक चितधर धुंधरे हुए हैं सारे ॥
उपवनके आगे भूमीकी दाभ जो कटी है,
निश्शंक चर रहे हैं मृगपोत ये दुलारे ॥
दुर्लभ है गृहीजनको ये शोमा तपोवनकी,
पाये जो दरश हमने धनभाग हैं हमारे ॥ १३ ॥
सा०--सब सत्य है, मैंने जान लिया ।
राजा- ( थोड़ी दूर चलकर ) तपोवननिवासियों के कार्यमें विन्न न पड़े, इसते
रथ यहीं खड़ाकर लो, हम उतर लें ।
1-मैंने रास थाम ली । महाराज उतर लें ।
राजा-( उतरकर ) हे सूत ! तपोवनमें विनीत वेवले जाना चाहिये, इस
कारंग यह तुम लिये रहो (धनुष और आभूषण सारथिको दिये ) हे सूत !
जबतक आश्रमवासियों के दर्शन करके मैं यहां लौटि आऊं, तबतक तुम
बोडोंकी पीठ ठण्डी कर लो।
सूत-जो आज्ञा ( गया )
राजा-( लौटकर और देखकर ) यह आश्रमका द्वार है, अब इसमें चलं ।
( प्रवेश कर और शकुन देखकर )
(काफी)
यह तो पुण्यक्षेत्र अतिपावन ।
फरकत बाँह कहा फल करिहै, यह थल शोक नशावन ।
अरू जो होय नाहिं कछु अचरज, भलीवात मनभावन ।
होनहार के द्वार अनेकन, होत चहत जब आवन॥ १४ ॥

(२०) शाकुन्तल नाटक। ( नेपथ्यमें ) सखियो ! इस ओर आओ, इस ओर आओ। राजा-(कान लगाकर ) अहो ! इस फुलवारीके दक्षिण और क्या बोलसा सुनाई देता है ? इधरहीको चर्चा ( चूमकर और देखकर ) अहा ! यह तो तपस्वियोंकी कन्या है, अपने अपने वित्त के अनुसार कोई छोटी कोई बड़ी गगरी लिये वृक्षोंके सींचनेको जाती हैं ( निपुणता निरूपण हारके ) अहो! इनका कैसा मधुर दर्शन है ? आश्रमकी यह तिय बारी है। इनको रूप निहारि मनोहर, तिय रानिवासन छबिधारी तिमि वनलता आपने गुणसे. उपवन वेलि जितनहारी हैं ।। यह सुकुमारी वनकी शोभा, करत रूप गुण उजियारी हैं ॥ १५ ॥ तबतक इस वृक्षकी छाया खडा हो इनकी बाते सुन खडा होकर देखने लगा ] उसीप्रकारसे दो सखियोंके संग शकुन्तला आयी) शकुन्तला-सखियो ! इस ओर आओ । इस ओर आओ। अनसूया-अरी शकुन्तला ! मैं जानती हूं यह आश्रमके वृक्ष पिता कग्यको तुझसे भी अधिक प्यारे हैं,नहीं तो नयी मलिकाके फूलों के समान कोमलांगी तुझको इनके सींचनेकी आज्ञा क्यों दे जाते ? शकुं०- हे सखी ! निरी पिताको ही आज्ञा नहीं, मेरा भी इन वृक्षोंमें सहो- दरकासा स्नेह हो गया है ( पेडको पानी दिया ) राजा--( आप ही आप) क्या कण्यकी बेटी शकुन्तला यही है : महात्मा कण्वका चित्त बडा कठोर है जिन्होंने इसको आश्रमधर्ममें लगाया है। ( जोगिया आसावरी) क्या यही है ऋषीकी दुलारी। जोरही सींच बिरवें कुमारी ॥

अंक-१.
(२१)
इससे ऐसी तपस्या कराना।
जैसे पंकजके दलसे अयाना ॥
छेद नीचा है छौंकरकी डारी ॥ क्या० ॥
उन मुनीने न कुछ भी विचारी।
ऐसी जो रूप गुणकी उजारी ॥
कैसे सौंपू उसे काम भारी ॥ क्या० ॥ १६ ॥
जो भी हो, वृक्षको ओटमें होकर इनको बात चीत करते निःशंक देगा
(एकांतमें बैठ गया )
शकुं०-हे सखि अनसूया ! प्रियंवदाने मेरी वल्कलको कंचुकी बड़ी कसकर
बाँधी है, जिससे अंग बँधसा गया है इसे ढीली कर दे ।
अन०--अच्छा ढीली करती हूँ ( ढीली करने लगी)
प्रियंव०--( हँसकर) मुझे दोष क्यों देती है ? अपने यौवनको दोष दे,
जो तेरे उरोजोंका विस्तार करता है।
दुष्यं०-(आप ही आप ) इसने ठीक कहा, वल्कल वस्त्र इस मोहिनीके
गातको शोभा देता ही है।
एहो मुनिसुताके मात ।
बँधे कंधर वसन वलकन तन उमंग लखात ।
हमें ऐसी विमल शोभा नहिं कहूं दरशात ।
ढके युगल उरोज पूरी धरत शोभा नाहिं।
छिपरह्यो है फूल जैसे पीत पातनमाहिं।
कह्यो मैंने भूलकर नहिं सजत वल्कल याहि ।
लगत नीके बालको सब रूप सागर आहि ।
पंकमें सरसिज सुहावन, शशिहि कारी रेख ।
लगत सुन्दर तिमि तिया यह किये तपसी भेख ।
सत्य है करतार जेहिको देत रूप अपार ।
भलो लागत ताहि सब कुछ लेहि जो तनुधार॥१७॥

(२४) शाकुन्तल नाटक। राजा-प्रगट होनेका यह अवसर तो अच्छा है । मत डरो! मत डरो! (ऐसा आधा कहकर मनमें ) परन्तु इससे तो विदित होजायमा कि, मैं राजा हूँ जो कुछ हो कुछ बातचीत करूंहीगा। शकु०-(थोड़ी दूरपर खड़ी होकर और कटाक्षसे देखकर ) यह तो यहां भी आता है, हाय ! अब कहां जाऊँ ? राजा-( झटपट आगे बढकर ) छंद-मैं पुरुवंश बनो जबलो भूमण्डलको रखवारो। तबलो कौन दुष्ट है जो मुनिसुता सतावनहारो॥ पहुँच्यो आय समीप तिहारे अब मनतें भय टारो। यह निर्विघ्न तपोवन यामें सब शंका निरवारो ॥ २१ ॥ (राजाको देखकर तीनों चकित हो गयीं ) अन०-आर्य ! यहां सतानेवाला तो कोई नहीं है, यह हमारी प्यारी सखी भौंरेके घेरनेसे डर गयी है, ( शकुन्तलाको ओर दृष्टि करती है ) राजा-(शकुन्तलाके समीप जाकर) हे बाले ! तुम्हारा तपोव्रत तो सफल है ? (शकुन्तला लाजसे नीचेको देखती चुप रह गयी) अनल-तुम सरीखे पाहुनेके पधारनेसे तयोत्रत सफल क्यों न होगा ? सखी शकुन्तला ! तू जा और कुटीमेंसे फल फूल और अर्घ्य ला, चरण धोनेको जल यहीं हैं (घटकी ओर देखती है ) राजा-तुम्हारे मीठे वचनोंसे ही हमारा अतिथि सत्कार हो गया । प्रियंव०-तो आओ--इस सप्तपर्णवृक्षकी शीतलछायावाली वेदीमें बैठकर विश्राम लेलो। राजा-तुम भी तो इस कामसे थक गयी होगी, आओ छिनभर बैठ लो। अन-(शकुन्तलासे हौलेसे ) शकुन्तला ! अतिथिके निकट बैठना उचित है। आओ ! यहाँ बैंठ लें ( सब बैठती हैं ) शकुन्तला-( आपही आप) इस पुरुषको देखकर मेरे मनमें ऐसा विकार उपजता, है जो तपोवनके योग्य नहीं है। राजा-(सबको देखकर ) हे सुन्दरियो ! समान अवस्था और समान रूपमें तुम्हारी परस्परकी प्रीति बड़ी अच्छी लगती है। .

अंक-१. (२५) ! ? प्रियंवदा-( हौले अनसूयासे ) अनसूया ! यह अतिथि कौन है ? जिसके रूपमें चतुराईके साथ गंभीरता और वचनोंमें चतुरताके साथ मिठास है? यह लक्षण तो बड़े प्रतापियोंके हैं। अनसू०-(हौले प्रियंवदासे ) सखी ! मैं भी इसी अचम्भेमें हूं, अब इससे पूछती हूं (प्रगट ) हे आर्य ! तुम्हारे मीठे बोलोंके विश्वासमें आकर मेरा जी यह पूछनेको करता है कि आप किस राजवंशके भूषण हो? कौनसे देशको विरहमें व्याकुल छोड आये हो ? किस कारण तुमने अपने सुकुमार शरी- रको इस तपोवनमें आकर पीडित किया है ? शकुन्त०-( आपही आप ) हे मन ! व्याकुल मत हो, तेरे मतेकी बात अनसूया कर रही है। दुष्य०-- ( आपही आप ) क्या मैं अपने आपको बताऊँ । अथवा कैसे अप- नेको छिपाये रहूं? जो हो इससे यह कहूंगा ( प्रकाश ) हे ऋषिकुमार ! पुरुवंशी राजाने मुझे धर्माधिकारमें नियुक्त किया है, सो मैं आश्रम देखने आया हूं कि, तपस्वियों के कार्यों में कुछ विन्न तो नहीं होता ? अनसू०--आपके पधारनेसे अब धर्मचारी सनाथ हुए। ( शकुन्तला शृङ्गारलज्जासे लज्जित हुई ) दोनों--(दोनोंके आकारको देखकर हौले हौले) हे शकुन्तला ! यदि आज पिताजी घर होते ! शकुन्त०--तो क्या होता ? दोनों-तो अपने जीवनसर्वस्वको भी देखकर इस अनोखे पाहुनेको कृतार्थ करते। शकुन्त०-चलो हटो, मनसे गढकर बातें बनाती हो, मैं तुम्हारी न सुनूँगी। ( अलग जा बैठी) राजा-तो मैं भी अब तुम्हारी सखीका वृत्तान्त पूछता हूं । दोनों०-महात्मा ! यह आपका अनुग्रह (२६) शाकुन्तल नाटक। राजा-कण्व तो संदाके ब्रह्मचारी हैं यह बात विख्यात है, फिर यह तुम्हारी सखी उनकी पुत्री कैसे हुई ? अनसू०--सुनिये । कुशिकके वंशमें एक बड़े प्रतापी राजा हुए है। राजा-हां, मैंने सुना है। अनसूया-उन्हींसे हमारी प्यारी सखीकी उत्पत्ति जानो और तात कण्वको यह पडी मिली थी उन्होंने ही इसको पाला पोषा है, इससे वह इसके पिता कहाते हैं। राजा-पडी मिली थी यह सुनकर तो बडा आश्चर्य होता है यह वृत्तान्त तो जड़से सुननेकी इच्छा है। अन०-सुनिये महाराज ! जब उस राजन गौतमोके किनारे बडा किया, तब देवताओंने शंका मानकर उनके तप नियममें विन्न करने के निमित्त मेनका नाम अप्सरा भेजी। राजा-सत्य है, दूसरेकी समाधिसे देवताओंका डरना प्रसिद्ध है । अन०-तब वसन्तके प्रारम्भमें मेनकाकी उन्माद करनेवाली छाये देखते हो ( इतना कह लाजसे शिर झुकाय मौन हो गयी) राजा-आगेकी बात हमने जान ली, यह अप्सराकी बेटी है ? अन०-हां। राजा-सत्य है नहीं तो, दोहा-मनुज तियनमें रूप अस, कैसे संभव होय ॥ वसुधासे निकसत नहीं, विद्युछटाकी जोय ॥ २२ ॥ (शकुन्तलाने शिर झुका लिया) राजा-(आपही आप) तो अब मनोरथ पूरे होनेका समय दिखायी दिया परंतु सखीने जो वर मिलनेकी बात हँसीमें कहीं थी, इसको सुनकर मेरे मनमें दुबिधासे अधीरता होती है । प्रिय०- ( मुसकाकर पहले शकुन्तला और फिर राजाकी ओर देखकर ) क्या आपको कुछ और भी पूछना है ?

. अंक-१. (२७) (शकुन्तला सखीको अंगुलीसे बजती है.) राजा-तुमने मेरे मनकी ठीक जान ली, मुझे इस अनूठे चरित्रके सुननेकी अभी और लालसा है। प्रियवंदा-तो विचारकी क्या बात है, तपस्वियोंसे कुछ पूछनेमें रोक- टोक नहीं है। राजा-मैं तुम्हारी सखीके विषयमें यह पूछना चाहता हूं कि, (गीतिका छन्द) रातिराज काज बिगार कारन होत व्रत वन वासुको। व्याहलो ही पालि है तुम्हरी सखी कह तासुको । खेलि है अथवा सदा निज नैन सम हरिनीनमें । करहिं अवलम्बन महाव्रत रहै मग्न अलीनमें ॥ २३ ॥ प्रियम्व०-हे आर्य ! सखी तो धर्माचरणमें भी परवश है, विवाहकी कौन कहै ? इसके पिताका संकल्प है कि अनुरूप बर मिले तो दें । राजा-(आपही आप ) यह संकल्प पूरा होना तो कुछ कठिन नहीं है। दोहा-रे मन कर अभिलाष अब, दूर भयो सन्देह ॥ जानी अग्नी जाहि सो, रत्न अलंकृत देह ॥ २४ ॥ शकुन्तला-(रिससी होकर ) ले अनसूया ! मैं जाती हूं । ) अनसू०-क्यों ? शकुन्तला०-मैं पूज्य प्रियवादिनी गौतमीसे. जाकर कहूगो, कि यह मुझसे अनकहनी बातें कहती है। अनसू०-सखि ! तुझे यह उचित नहीं है कि, ऐसे अनोखे पाहुनेका विना आदर किये छोडकर चली जाय। ( शकुन्तला विना कुछ कहे चल दी) राजा-(ऐसे उठा मानो रोकेगा फिर रुककर आपही आप ) अहा ! बाहरकी चेष्टाओंसे ही कामियोंके मनकी बात प्रगट हो जाती है। (परज) अनुचित काज कियोहो चाहत ।

(२८) शाकुन्तल नाटक। पाछे चलत तियाके काहे, नहिं निजकुल मर्याद निबाहत । यदपिन उठ्यो तदपियों मानत, कछकर लौट पन्यो मन दाहत। रोकलियो कुलकान आन मोहि, किमि जिय मोह सिंधु अवगाहत॥ २५ ॥ प्रियवं०-(शकुन्तलाको रोककर ) सखि ! तुझे जाना न होगा। शकु०-(भौं चढाकर ) क्यों ? प्रियवंदा-अभी तुझे दो बिरुए और सींचने हैं, सो आ इस ऋणको चुकाकर फिर चली जाना ( बलसे रोकती है राजा-सुन्दरि ! वृक्ष सींचते २ तुम्हारी सखी थकीसी दीखती है कारण कि- (राग देश सोरठ) घट करमें लिये सुकुमार बाल, तरु सिंचत हथेली भई लाल,दोऊ उठत उरोज उसास चाल आस्ताई। भयो आज सखीको श्रम अटूटि, रहिं स्वेद कपोलनि बूंद छूटि, रहे चिपक करन भूषण विशाल ॥ १॥ सब अलक गई विथराय आज, कर धारिरही तेहि सहित लाज, जतु प्रेमफन्द डारनकिमाल ॥२६॥ सो मैं यह ऋण यों चुकाता हूं ( अंगूठी देनेकी इच्छा करता है) (दुभ्य- न्तका नाम अँगूठीपर बांचकर दोनों एक दूसरेकी ओर निहारती हैं) राजा-इसके लेनेसे तुम यह संकोच मत करो कि, यह राजाकी वस्तु है, कारण कि मैं भी तो राजपुरुष हूँ, मुझे यह राजाके यहाँसे मिली है। प्रियवं०-तो यह आपकी अंगुलीसे विरक्त होनेके योग्य नहीं है, आपके वचनसे ही ऋण चुकगया ( कुछ हँसकर ) सखी शकुन्तला ! इन महानु भावने वा महाराजने दया करके तुझे ऋगसे चुका दिया, अब चाहे तो तू चली जा।

अंक-१. (२९) शकुन्तला-(आपही आप) जो अपनेको वशमें रख सकी तो ( प्रगट) जानेको आज्ञा देनेवाली अथवा रोकनेवाली तुम कौन हो ? (दादरा) पियके वचन भूलि नहिं जैहौं । हियरेके अन्तर नित राखौं, जो अपने वशमें हो रहौं । प्रथम मिलाप न देख सकत है, मेरो श्रम केहिभाँति भुलैहौं। दयानेह उपकार सुबोलनि, मुएहू मन” नाहि मिटहौं । ममहित धरत कमलकर गगरी, याके पलटे मैं कह देहाँ ? मिश्र प्राण सर्वस्व हमारे, तन मन वार नेह इन लैहौं ॥२७॥ राजा-(शकुन्तलाको देखकर आप ही आप) जैसा मेरा मन इससे लगा है वैसा ही इसका भी मुझसे उलझा दिखाई देता है, अथवा मेरे मनोरथ पूरे होनेके लक्षण तो दीखते हैं। (दाउरा) मनकी लगन ये छिपाए छिपै ना, यदपि न बातन बात मिलावत, तदपि सुनत हितकर मम वैना। सन्मुख आय होत नहिं ठाड़ी, कियेहि रहत इतको दोउ नैना। यह सकुचनि यह नेह दुहुन दिशि, लखि लखि जिय अब धीर धरै ना ॥ २८॥ (नेपथ्यमें) हे हे तपस्वियो ! आओ, मिलकर तपोवनके जीवोंकी रक्षा करो, मृगया खेलता हुआ राजा दुष्यन्त समीप आ पहुंचा है, देखोः यह देखो कैसी धूर उड़ी सब वनमें छाई है ।आस्ताई।। घोड़ोंके पगोंसे उड़कर, पड़ती वसनों आकर । जो सूख रहे हैं वृक्षोपर, धूसरता पाई है। सन्ध्याकी अरुणता माहीं, टीड़ादल ज्यों दरशाहीं।

(३०) शाकुन्तल नाटक। . तैसे घेरो आकाश विपत्ति वनपर आई है। देखो यह वनका करिवर, राजाके रथसे डरकर । हरनोंको व्याकुल करता तरु तोरै दुखदाई है। पैरोंमें लताका लंगर, डाले घूमें है बेडर। लगते हैं दाँत कंधेसे पीछे दृष्टि लगाई है। अब चलो यहांसे धाई, कुटियोंमें रहो छिपाई । यह जप तपमें विघ्नरूप अब कौन उपाई है ॥ २९ ॥ ३०॥ ( ऋषिकुमारियोंने कान लगाकर सुना और चौंक पडी ) राजा--( आपही आप ) हा विक् इन पुरवासियोंने मुझे ढूंढते २ यहां आकर तपोवनमें विन डाला, अच्छा अब इनके पास जाना पड़ा। दोनों-हे महात्मा ! हम इस वनके वृत्तान्तले व्याकुल होती हैं हमें अब कुटीमें जानेकी आज्ञा दीजिये। राजा--(संभ्रम से) अच्छा ! जाओ मैं वह उपाय करूंगा जिससे तपोवनमें कोई विघ्न न होने पावेगा। (सब उठती हैं) दोनों--हे श्रेष्ठ ! जैसा अतिथिसत्कार होना चाहिये वैसा हमसे नहीं बना इससे फिर दर्शन देनेको कहते हुए लजाती है । राजा-ऐसा मत कहो, तुम्हारे दर्शनसे ही हमारा सत्कार हो गया। (शकुन्तला राजाको देखती हुई और बहानेसे ठिटकती हुई सखि- योंके संग गयी) राजा--( आपही आप) अब नगरकी ओर जानेको तो इच्छा नहीं करती तो अब संगवालोंसे मिलकर तपोवनके समीप ही डेरा करूंना, शकुन्तलाके हावभावोंसे मैं अपने मनको उससे नहीं हटा सकता । दोहा-व्याकुल मन पीछे चलै, आगे चले शरीर ।। फहरावत पीछे ध्वजा, सन्मुख चलत समीर ॥ ३१ ॥ ( सब गये) पहला अंक समाप्त हुआ।

अंक-२. स्थान-बमके निकट राजाके डेरे। (दुःखी हुआ विदूषक आया) माढव्य-( श्वास लेकर ) देख लिया, इस मृगयाविहारी राजाकी मित्रतासे हम बड़े दुःखी हैं । यह मृग है, यह वराह है, यह शार्दूल है, दुपहरीमें भी यही कहते इस बनसे उस वनमें उससे इसमें दौड़ना पड़ता है, गर्मी में कहीं इतनी भी छाया नहीं मिलती जहां कुछ विश्राम लिया जाय, वृक्षोंके पत्ते गिरनेसे कसैला हुआ पहाड़ी नदीका जल पीनेको मिलता है, शूलपर भुना आमिष कुसमय खानेको मिलता है, घोड़ोंके संग दौडते २ शरीर ऐसा ढीला पडजाता है कि, रातको अच्छी तरह नींद नहीं आती और फिर बड़े सबरे ही दासीपुत्र चलो वनकोरइसप्रकार चिल्ला चिल्लाकर जगादेते हैं परन्तु इतनेपर भी पीडा नही गयी, इतने दुःखपर एक नया घाव और लगा, कि कलदिन हमसे बिछुडकर राजा पृगके पीछे धावमान होता हुआ तप- स्त्रियोंके आश्रममें जा पहुँचा, वहां मेरे अभाग्यसे उसकी दृष्टि तपस्वीकी कन्या शकुन्तलापर पडी। अब वह नगर जानेको मन भी नहीं करता,अब भी इन्हीं बातों के शोच विचारमें सब रात उनकी आंख नहीं लगी, जबतक राजाको नित्यकर्म करता हुआ न देख लूंगा न जानें तबतक मेरी क्या गति होगी ? (घूमकर और देखकर ) अहा ! यह वनके फूलोंकी माला पहरेहुए धनुषधारिणी यवनियों के साथ मेरा प्रियसखा इधरहीको आता है, तो अब मैं भी अंगभंग करके विकलके समान खडा हो जाऊं ( लकडी टेककर खडा हुआ) चलो यों ही विश्राम सही । , (३२) शाकुन्तल नाटक। (ऊपर कहे हुए वेषसे दुष्यन्तका प्रवेश) (दादरा) दीखत मोहिं तिय मिलन कठिन है। पर जब भाव विलोकत ताके, मिलि है अवशि कहत यह मन है, यदपि कामको भयो न कारज तदपि दोऊ दिशि चाह मिलन है । प्रीतिरीतिको रंग निरालो, पार लहै जग को अस जन है ॥ ३२ ॥ (हँसकर ) जब किसीको किसीसे लगती है तब वह अपने मनकी अभि- लापासे उसके मनका प्रेम अनुमान कर वंचित होता है। (ईमन कल्याण) मनकी गति आति अगम अपार । वह चाहै कहुँ अनत दृष्टिकर अनतें रही निहार। है यह नेहदृष्टि मोहिं ऊपर मैं जानी निरधार । चली मन्दगति होय पियारी चहुँ नितम्बके भार । मैं जानो यह मोहिं दिखावत निज विलास विस्तार रोक्यो सखी भई हो सांची रिस चाहै सुकुमार । मैं जानो एहू कटाक्ष कछु मोहूपर बलिहार । सत्य कहत कवि कामीजनकी दृष्टि अनीकी धार । होत आपने ही स्वारथमें जानत सब संसार ॥ ३३ ॥ माढव्य-(वैसे ही खडा रहा ) हे मित्र ! हाथ पांव नहीं चलते इससे वाणी- मात्रसे ही आशीर्वाद देता हूँ कि आपकी जय रहे। राजा-यह तुम्हारा अंगभंग क्यों हुआ ? विदूषक-अपनी अँगुलीसे आंख चुभाकर, पूछते ही आंसू क्यों आये ? राजा- हम तुम्हारी बात नहीं समझ ।

अंक-२
(३३)
विदूषक-भो मित्र ! देखो यह बेत जो कुबड़ोंकी होड़ करता है, यह
अपने आप टेढा हुआ है, या नदीके वेगसे :
राजा-नदीके बेगते ही झुका होगा।
माढव्य-इसी प्रकार मेरे अंगभंगके भी आप ही कारण हैं ।
राजा-कैसे ?
,
माढवन-भला यह बात तुमको उचित है कि, राजकाज छोड़कर बनने
अहरियों के कार्य करो ? यह मैं सत्य कहता हूँ कि प्रतिदिन वनके जीवोंके
पीछे दौड़ते दौड़ते मेरा अंग अंग टूट गया है, इससे प्रार्थना करता हूँ कि,
अव कृपा करके मुझे एक दिन तो विश्राम लेनेको छोड जाओ।
राजा-( आप ही आप) इधर तो यह कहता है और मेरा मन भी ऋषिकु-
मारीकी सुधमें भृगयासे निरुत्साह हो गया है, कारण कि-
(कल्याण)
मृगनपर कैसे चलि है बान ।
सिखराई जिन तियको भोरी, चितवन अति सुखदान ।
तिनपै धनु उठ सकत न करतै, दया उठत मन आन ।
अब यह काज बनै नहिं मोते, अकुलावत हैं प्रान ।
माढव्य-(राजाके मुखको देखकर )श्रीमान् न जाने मनमें क्या शोच रहे हैं ?
मेरी बात तो बनमें रोनेके समान हो गयी।
राजा-( मुसकाकर ) और क्या यही कि, मित्रकी बात अवश्य मानूँ !
विदूषक-आप चिरञ्जीव रहें ( उठकर जाना चाहता है)
राजा-मित्र ! ठहरो तो अभी कुछ और कहना है ।
माढव्य-आज्ञा दीजिये।
राजा-जब तुम विश्राम ले चुकोगे तब हम ऐसे काममें सहायता लेंगे, जिसमें
कुछ परिश्रम न करना पड़ेगा ।
माढव्य-क्या खांडके लड्डू खिलाओगे? तो तो यही अच्छा समय है ।
राजा-अभी कहता हूँ कोई है ?
३

(३४)
शाकुन्तल नाटक।
?
( द्वारपालका प्रवेश)
द्वारपाल-(प्रणाम करके ) स्वामीकी क्या आज्ञा है ?
राजा- रैवतक ! सेनापतिको बुलाओ ।
द्वारपाल-जो आज्ञा ( बाहर जाकर सेनापतिके साथ फिर आया )
आओ यह महाराज कुछ आज्ञा देने के लिये तुम्हारी बाट देखते हैं।
सेनापति-( राजाको देखकर ) यद्यपि मृगयामें दोष है, पर हमारे
स्त्रामीको तो गुणदायक हुई है, देखो तो ।
( सोरठ)
महाराजका शरीर, कैला बना धीर ।
खें हैं बारबार, धतुषको चढ़ाके तीर ।
ऐसी गढ़न भरी, पर्वतका ज्यौ करी ।
श्रमसे न व्यापे घाम, न पावै कलेश वीर ।
आवै न तनपै स्वेद, नहीं दौड़ धूप खेद ।
दुबराई है शरीरमें, दीखै न कोई पीर ।
समीर जाकर ) स्वामीकी जय हो महाराज ! वनमें श्वापद पशुओंके
खोज देखे गये हैं, श्रीमान् कैसे निचिन्त बैठे हैं ?
राजा-इस माढव्यने मृगयाकी निन्दा करके मेरा उत्साह मन्द कर
दिया है।
सेनापति-(हौले माढव्यसे) तुम अपनी बातपर बने रहो मैं स्वामीके
मन-मुहाती कहूँगा ( प्रगट ) महाराज ! इस रांडकेको बकने दीजिये
आप ही विचारिये कि, इसमें कितने गुण हैं ?
(सोरट)
देखो तो मन विचार, मृगयाके गुन हजार।
देती है मोद छांट सभी, उदरको सम्हार ।
करती है सह शरीर, चलनेके योग्य वीर ।
पशुओंकी चित्तवृत्तिसे, करती है जानकार।
चलता हुआ हरिन, जो मारते हैं जान ।

अंक-२.
उसको यही सिखाय, करै मोद मन अपार ।
ऐसी विनोदरूप मृगया है राजभूप,
देते इसे जो दोष, तो जानौ उन्हें गवाँर ।
माढव्य-(रिसो) अरे ! महाराज तो अपनी प्रकृतिमें प्राप्त हैं और तू इस
बनसे उस बनमें बहुत दौडता है, कहीं किसी दिन मनुष्यकी नाकके
लोभी बूढे रीछके मुखमें न पड़ जाय ।
राजा-भद्र सेनापति ! यह आश्रमका निकट है, इस कारण मृगयाकी बड़ाई
करनेमें हम तुम्हारा पक्ष नहीं ले सकते, आज तो
( झंझोटीका जिला)
आज करहु आनन्द महिषगणसरन माहिं निजशृंग हिलाई ।
तरुअन घनी छाँहमें हरिनी बैठी रोंथ करें सुख पाई।
शूकर निज अधखुले मुखनसे मोथन मूल खोदकर खाई ।
मम धतुकी प्रत्यंचा शिथिलित भई आज विश्राम कराई।
सेनापति महाराजकी जो इच्छा।
दुष्यन्त-आगे जो कमनैत बढ गये हैं उनको लौटा लो और सेनावालोंको
समझा दो कि तोवनमें कुछ विन्न न करें, कारण कि--
( सोरट)
दीजिय अभी बुझाय, सेनाके लोग जाय ।
देखो किसी तपस्वीसे, बोलें न वे रिसाय ।।
रहते हैं यदपि शान्त, ज्यों मणी सुर्यकांत ।
शीतल है जल उठेगी, सूर्यतेजको दिखाय ।
नैसे ऋषी सुजान, हैं गुप्त तेजमान ।
पातेहि तिरस्कार, तेज प्रगटहो लखाय ।
सेनापति--स्वामीको जैसी आज्ञा ।
विदूषक--जा, तेरा उत्साह दिलाना निरर्थक हुआ ।
(सेनापति गया)
राजा--( दासियों की ओर देखकर ) तुम भी अपना यह मृगयाका वेष उतार

शाकुन्तल नाटक।
डालो, हे रैवतक ! तुम अपना कार्य सावधान हो करो।
सब सेवक--महाराजकी जो आज्ञा ( सब गये )
विदूषक- आपने इस स्थानको मक्खियोंसे रहित किया, अब इस शिलापर
जो सुन्दर वृक्षकी छायामें है बैठिये, तबतक मैं भी आनन्दसे बैंहूँ ।
राजा--तुम आगे चलो।
विदूषक-आप आइये।
(इस प्रकार दोनों जाकर बैठे )
राजा-माढव्य ! अभी तुझे नेत्रोंका फल नहीं मिला है, कारण कि तैंने देखने
योग्य वस्तुको नहीं देखा है।
विदू० कारण कि मुझे महाराजका नित्य दर्शन होता है।
राजा-अपनेको तो सभी अच्छा जानते हैं, परन्तु मैं तुझसे इस आश्रमकी
शोभा शकुन्तलाके विषयमें कहता हूं।
माढव्य-(आप ही आप) पर मैं इस कहनेका इनको अवसर न दूंगा
(प्रगट) हे मित्र ! जान पड़ता है कि आप तपस्वीकी कन्याकी अभि-
लाषा करते हो वह तो तुम्हारे व्याहने योग्य नहीं।
राजा--मित्र! पुरुवंशियोंका मन अलीन वस्तुपर कभी नहीं जाता ।
(जैजैवन्ती)
नाममात्रको प्रिया हमारी मुनिकन्या मनमान ।
जन्मतही तज गई अप्सरा वनमें उसे सुजान।
दैवयोगसे कण्व महामुनि आ निकले तेहि ओर ।
पड़ी देखकर दया गोदले आये निज अस्थान ॥
निज पुत्रीसम हितकर पाली बहुविधिलाड़ लड़ाय।
ऐसी विधि मुनिसुता कहावै रूपराशि गुणखान ।।
माहव्य-(हँसकर ) जैसे किसीकी रुचि पिण्डखजरसे हटकर इमलीपर
लगे इसी प्रकार तुम रनिवासकी स्त्रीरत्नोंको छोड़ उस तापसीके अमि-
लाषी हुए हो।

अंक-२
राजा-जबतक तू उसे नहीं देखता तभीतक ऐसे कहता है।
माढव्य-जब वह आपको विस्मित करती है तो अवश्य मनोहर होगी।
राजा-(मुसकाकर ) बहुत कहांतक कहूँ?
(राग बिभास)
कहा कहूं वाकी छबि भारी ।
प्रथम चित्र जनु लिखो विधाता मूरति फेर सवारी।
अथवा सकल रूपबतियोंको कियो ध्यान इकबारी।
मूरति चित्रमाहिं जिय डारो इहि विधि बनी पियारी।
मेरे जान लक्षमी दूजी आश्रम-माहिं पधारी ।
देखत ही अपनो सब कीन्हों तन मन धन बलिहारी।
माढव्य-जो ऐसा है, तो उसके आगे सब रूपवती तुच्छ हैं ?
राजा-मेरे मनमें तो ऐसी ही है-
(राग बिभास)
सकल दोष बिनु रूप उजेरी।
सकल विश्व शोभा मथि डारी नहिं ऐसी कहुँ हेरी।
विन सूंघे जिमि पुष्प मनोहर रत्न वेध बितु जैसे ।
वितु टूटी नवीन तरुकोपल विना स्वदित मधु तैसे।
अथवा यह अखण्ड पुण्यनको फल जगमें अतिभारी।
केहि बड़भागी देइ विधाता को कहिसके विचारी।
माढव्य--तो तुम उससे शीघ्र विवाह कर लो,नहीं तो हिंगोटके तेलसे चिकने
शिरवाले किसी तपस्वीके हाथ यह अखण्ड पुण्यका फल लग जायगा ।
राजा-बह परवश है और उसके पिता घर नहीं।
माढव्य-भला तुमपर उसका प्रेम कैसा है ?
जा--तपस्वीकन्या स्वभावसे ही सकुचीली होती हैं, तो भी-
( काफी)
ऋषिकन्या स्वभाव सकुचाली।
सन्मुख होय छिपावन चाही फिरी सुदृष्टि रसीली।

शाकुन्तल नाटक।
सो न छिपाय सकी मुसकाई रंग अनंग रँगीली ।।
लाजहेत नहिं सकी प्रकटकर प्रेमभाव गुण शीली।
तौहू मदनदेवकी बाधा रही न गुप्त गहीली ॥
माढव्य-तो क्या देखते ही तुम्हारी गोदीमें आ जाती ?
राजा-फिर जब चलने लगी तो लजामें भी उसका प्रेमभाव दिखायी दिया,
कारण कि-
( राग खम्माच)
प्रीतिभाव कहा ताहि बताऊं।
चलनलगी जब सखिन संग निज ओठहरनिजपाउं.।
बोली चुभी दाभकी एनी ठहरो नेक हटांऊं ॥
उरझ्यो बलकल वसन तरुनमें नेक याहि सुरझाऊं।
यदपिनदाभ वसन नहिं उरझो मिस ताको समझाऊं।
ठिठकिठिठकि इमिबार बारतिय चितयरही मोघाऊं।
माढव्य--तो अब यहां पथिकाईकी सामग्री संग्रह कर लो, मैं देखता हूँ कि
आपने इस तपोवनको उपवन कर दिया।
राजा हे मित्र! किसी किसी तपस्वीने मुझे पहँचान भी लिया है, विचार करो
कि अब किस बहानेसे फिर आश्रममें जाऊं?
माढव्य-आप राजा हो, तुम्हें बहाना कैसा ? कहो कि, हमको नीवार अन्नका
छठा भाग दो।
राजा-मूर्ख ! ये तो हमको और ही भाग देते हैं, जिससे हमारी रक्षा होती है
जिसके आगे रत्नोंके ढेर तुच्छ हैं. देखो..
दोहा-अन्य वर्णसे लेत कर, जो नृप सो क्षय होय ।
तपसी तपका भाग षट, देते अक्षय सोय ॥
( नेपथ्यमें)
(अब हमारा मनोरथ सिद्ध हुआ)
राजा-( कान लगाकर) अहो ! इस धीर और शान्त बोलसे तो ये
तपस्वी होंगे।
.

अंक-२.
(३९)
(द्वारपाल :आया)
द्वारपाल-स्वामीकी जय हो ! ये दो ऋषिकुमार द्वारपर आये हैं।
राजा--अभी लाओ, देर मत करो।
द्वारपाल-यह लाया ( बाहर जाकर ऋषिकुमारोंके साथ आया ) इधर
आइये, इधर आइये।
(दोनों राजाको देखते हैं)
पहला ऋ० कु०-अहो ! दीप्तिमान् होकर भी इनके शरीरमें कैसी विश्वांसता
प्रतीत होती है, अथवा यह उचित ही है, कारण कि यह राजा ऋषियोंसे
भिन्न नहीं हैं।
( राग देस)
बड़ा जो तेज धारे हैं, यही राजा हमारे हैं।
नहीं मुनियोंसे ये कुछ कम, बसैं वन मनको कर संयम ।
प्रजाके पालनेवारे, यही हैं इनके तपभारे ।
इन्हींकी स्वर्ग में चारन, करें हैं कीरती गायन ।
इन्हैं ऋषिराजका पद है, इन्हींसे इन्द्रको मद है।
नहीं इनके सदृश कोई, नहीं है और नहिं होई।
दूसरा-हे गौतम ! क्या इन्द्रका सखा दुष्यन्त यही है ?
पहला-हां, यही है।
दूसरा-इसीसे तो।
दोहा-श्यामोदधियुत भू सकल, भोगत इक नृपवर्य।
नगरद्वार अर्गल सदृश, नहिं यामें आश्चर्य ।
यहि बाहूबल धनुषबल, इन्द्रवज्रबल पाय।
सुरतिय अरिकुलविजयकी,आश करत सुखपाय १५
दोनों-(राजाके समीप जाकर ) महाराजाकी जय हो !
राजा-( आसनसे उठकर ) दोनोंको प्रणाम करता हूँ।
दोनों आपके कल्याण हो. ( फल भेंट करते हैं)

(४०) शाकुन्तल नाटक। राजा-(प्रणामपूर्वक ग्रहण करके) तुम्हारी आज्ञा सुननेकी इच्छा है। दोनों-यह जानकर कि, आप यहां ठहरे हो, आश्रमवासी कुछ प्रार्थना करते हैं। राजा-क्या आज्ञा की है ? दोनों हमारे गुरू कण्वऋषिके यहां न होनेसे राक्षस आकर यज्ञमें विघ्न करते हैं, इससे सारथिसहित कुछ दिनोंतक आप इस आश्रमकी रक्षा करो। राजा- यह तो बडी कृपा की है। विदूषक-(सैन देकर ) यह प्रार्थना तो आपके मनमानी हुई । राजा--( हँसकर ) रैवतक ! हमारी ओरसे जाकर सारथिसे कहो कि धनुष- बाणके सहित हमारा रथ लावै । द्वार०-जो आज्ञा ( बाहर गया ) दोनों--(प्रसन्न होकर ) (राग आसावरी) पुरुषनकी पालत सब रीती। उनहींकेसे काज करत हो आश्रमधर्म रखतं कर नीती। शरणागत दुख दूर करनको दीक्षित है पुरुवंश सप्रीती। को नहिं जाने महिमा तुम्हरी छायरही जगपावन क्रीती। राजा-(प्रणाम करके ) आप आगे चलो मैं भी आता हूँ। दोनों--सदा जय रहै ( गये )। राजा-माढव्य ! क्या तेरे मनमें शकुन्तलाके देखनेकी इच्छा है ? माढव्य--पहले तो बड़ी चाह थी पर अब यक्षसके नामसे तो बूंदमात्र मी न रही। राजा--डरनेकी क्या बात है ? हमारे निकट रहना । माढव्य-यहीं मैं राक्षसोंसे रक्षित हूँ। ( द्वारपाल आया) द्वारपाल महाराज ! रथ सजकर आ गया है, आपके विजय प्रस्थानका संदेह स्वर्गको चला जाऊं. उन्होंने कहा ऐसा यज्ञ नहीं हो सकती बाट जोहता है और माताजीका भेजा हुआ करभक दूत: नगरसे कुछ संदेशा लेकर आया है। राजा-(आदरसे) क्या माजीका पठाया आया है ? द्वार०-हां, महाराज! राजा-तो उसे लाओ। द्वार-जो आज्ञा ( बाहर जाकर करभकके सङ्ग आया) ये महाराज हैं, सन्मुख जा। करभक--स्वामीकी जय हो!माताने आज्ञा दी है कि, आजसे चौथे दिन तुम्हारी वर्षगांठके कारण मेरा व्रत होगा, इससे उस समय तुम चिर- जीवीको भी अवश्य आना उचित है। राजा-इधर तपस्वियोंका कार्य, उधर माताकी आज्ञा, दोनोंका ही उलंघन करना उचित नहीं, अब क्या करना उचित है ? विद्०--अब तो त्रिशंकु बनकर मध्यमें ही ठहरे रहो । राजा--इस समय मेरे मनमें बड़ी दुविधा है । ०-दूर दूरप कारज दोई । परे आय मन व्याकुल होई ।। लांघन योग एक हू नाहीं। शोच होत यातें मनमाहीं।। जैसे रुकत शिला पैजाई। नदीधार दुइविध बट जाई ।। तैसे भइ गति मोरे मनकी। क्या उपाय अब शंकमिटनकी॥ १७॥ १ यह त्रिशंकु अयोध्याका राजा वसिष्ठसे कहने लगा कि, मुझे ऐसा यज्ञ कराओ जो गया और यही कहा, वे बोले तू गुरुवचनोंमें विश्वास नहीं करता इससे चाण्डाल हो जा, तब विश्वामित्रने प्रसन्न हो उसे अपने तपोबलसे स्वर्गमें भेजा. वहां देवताओको अपना फल सुनानेसे फिर नीचे गिरा, विश्वामित्रने बीचमें ही रक्खा वह अबतक भूमि और स्वर्गके मध्य में है उसकी छाया मगधदेशमें पडती है। चौ०-दूर समय (४२) शाकुन्तल नाटक। हे मित्र ! तुझे भी तो माता पुत्र कहकर बोली है, सो तू नगस्को जाकर मेरी ओरसे माताजीसे निवेदन कर देना कि मैं इस तपस्वियोंके कार्य में लगा हूँ और तू उनके पुत्रकार्यका अनुष्ठान करना। विदूषक-यह तो सब होगा, पर आप मुझे राक्षसोंस डरा हुआ तो नहीं समझ गये ? राजा-( हँसकर ) मला तुझमें भय कैसे हो सकता है ? विदूषक-तो अब जैसे राजाके छोटे भाई जाते हैं वैसे ही मुझे जाना चाहिये। राजा-तपोवनका घेरा न होना चाहिये, इस कारण यह सब भीड़ भी तेरे साथ भेजता हूँ। विदू०-तब तो मैं अब युवराज हो गया । राजा--(मनमें) यह ब्राह्मण बड़ा चपल है, कहीं रनिवासमें जाकर हमारा भेद न कह दे, सो अब इससे यों कहूँ (विदूषकका हाथ पक- डकर, प्रगट) हे मित्र ! केवल ऋषियोंका गौरव रखनेके लिये आश्र- ममें जाता हूँ. मैं सत्य कहता हूँ कि, तपस्वी कन्याकी मुझे चाहना नहीं है। देख-- ( कलिंगड़ा) कहँ तो हम अरु कहाँ बाल वह जन्मी कानन आई। बड़ी भई हरनिनके सँगमें मैनभेद किमि पाई॥ मन बहलानेके हित हमने तुमसे कथा सुनाई । सो तुम सत्यरूप मति जानो अपने मन द्विजराई ॥ माढव्य-सत्य है ( सब बाहर गये.) दूसरा अंक समाप्त हुआ।

अक-३. (४३) (घूमकर तीसरे अंकका विष्कम्भक । (स्थान तपोवन) ( ऋत्विज ब्राह्मणका एक चेला हाथमें कुशा लिये आया ।) चेला--अहा ! राजा दुष्यंतका कैसा प्रताप है कि, श्रीमान्के आश्रममें प्रवेश करते ही हमारे सब कर्म निर्विघ्न होने लगे। दोहा-शरधारणकी क्या कथा, केवल ज्याटंकार ॥ हरत दूरते विघ्न सब, तेहि धनुको हुंकार॥२॥ अब चलूँ, ऋत्विग ब्राह्मणोंको वेदीपर बिछानेके लिये यह कुशा देते और आकाशकी ओर देखकर ) हे प्रियंवदा ! यह खसका लेप और नालसहित कमलके पत्ते किसके निमित्त लिये जाती हैं ? सुनकर क्या कहा ? कि, धूप लगनेसे शकुन्तला मुरझा गयी है उसकी शांतिके निमित्त ठंढाइ लिये जाती हूं, तो शीघ्र जा, सखि ! वह कन्या भगवान् कुलपति कण्वकी प्राण है । मैं भी यज्ञ मन्त्रका शांति करनेवाला जल गौतमीके हाथ भेजूंगा । ( गया) इति विष्कंभक। अंक-३ ( कामियोंकेसी दशा बनाये दुष्यन्त आया) राजा-(श्वास लेकर) ( कान्हरा वागेश्वरी) आरे मन ! व्याकुल है क्यों परवश है बह बाल । जानत हूं तपकी प्रभुताई फिर न कसत जिय हाल । "भूमि निमानी जाय वारि ज्यों पीछे करत न चाल। सो गति भई मिश्रमोमनकी कह उपाय बिन भाल"॥ (कामकी बाधा निरूषण करता हुआ) हे काम ! तुम और चन्द्र हम कामीजनों के विश्वासघाती हो, कारण कि- - (४४) शाकुन्तल नाटक। कुसुमायुधके ( सोरठका जिला) तेहि कहत हिमांशू चन्द्र धीर । फूलनके तीर ॥ हमें लगत असत तन देत पीर ।। १॥ शीतल किरणों में भरी है अगन । फुल बान कठिन जिमिवज लगन ॥ तोहि दया न लगत कन्दर्प वीर ॥२॥ "तब फूलनकी पैनी है अनी। शिव कोप अगिनि अजहॅलोंबनी ॥ वड़वा जिमि दहकत सिंधु नीर ॥३॥ जो सत्य न होती. बात मदन । किमि करत ताप इहिभाँति वदन ॥ मकरध्वज बाधत सब शरीर ॥ ४॥ तुम कल न देत एक घरी मार । तो भी ये बड़ो उपकार कार ।। मदलोचनि हित नित होय पीर ॥ ५ ॥ करिनियमकियो तोहिं बलनिधान । रातराज कियो सब बिफल मान । कीन्हों फर फरतन शर करीर" ॥ ६॥ ( व्याकुलसा होकर इधर उधर फिरता है ) हाय ! जब यज्ञ पूर्ण हो जायगा तब मैं ऋषियों से विदा होकर अपने दुःखी जीवको कहां बहलाऊँगा ( लम्बी श्वास लेकर ) प्रियाके दर्शन बिना कोई धीरधरैया नहीं है, अब उसीको खोजें । ( सूर्यकी ओर देखकर ) इस कडी दुपहरीको प्यारी शकुन्तला सखियों के संग कही मालिनीके किनारकी लता- कुञ्जोंमें विचरती होगी, अब वहीं चलू ( फिरकर और स्पर्शका निरूपण कर) अहो ! यह स्थान पवनसे कैसा सुहावना है "इन नई लताओंमें होकर प्रिया गयी है, कारण कि, जिन डालियोंसे फूल तोडे हैं उनका दूध अभी नहीं सूखा और कौद भी नहीं भरा है, यह स्थान कैसा मनोहर है ?? !

अंक-३ (४५) दोहा-गन्धित सरसिज गन्धते, शित मालिनीतरंग। लगत सुखद भल बात यह, दाही देह अनंग ।। फिरकर और नीचेको देखकर ) इन्हीं बेतोंके लतामण्डपमें कहीं प्यारी होगी, कारण कि- दोहा-यहि निकुंजके द्वारपद, चिह्नित पांडूरेत । भरनितम्ब एड़ी धसकि, आगिल उठे सहेत ॥ अच्छा ! इन वृक्षोंमें देखू ( फिरकर और देखकर प्रसन्नतासे ) अहा ! अब मेरे नयन सफल हुए, उस पटियापर फूल बिछाये मनभावनी पौढी है, दोनों सखी सेवामें उपस्थित हैं, अब जो हो, इनके एकान्तकी बातें सुनंगा (खड़ा होकर देखने लगा ) ( दोनों सखियोंसहित शकुन्तला दिखायी दी.) दोनों सखी-(प्रेमसे पंखा झुलाती हुई ) हे सखि शकुन्तला ! यह कमलके पत्तोंकी हवासे तुझे सुख होता है कि, नहीं ? शकुन्तला--सखियो ! तुम मेरे पंखा क्यों करती हो : ( दोनों सखी दुःखसे परस्पर देखती हैं ) राजा-शकुन्तलाका शरीर बहुत अस्वस्थ दीखता है (विचारकर ) तो क्या ? इसको धूपने सताया है ? अथवा जो मेरी दशा है सो इसकी है ( अभिलाष करके) अथवा अब सन्देहसे क्या है? (कालिंगडा) हियपर लेप उसीर लगाये । एक हाथमें कमलनालके, शिथिलित कंगन शोभा पाये। जिय कछु दुखित तदपि तन मनहर, अषिम मदनताप सम पाये। पर ग्रीषमको ताप पाय इमि, नवतिय अँगनहिं लगत सुहायो । निश्चय होत मदनने बलकर, प्यारीके सब अंग तपाये॥

-- . (४६) शाकुन्तल नाटक। प्रियवंदा-हौले अनसूयासे ) हे अनसूया ! जब उस राजर्षिपर शकु- न्तलाकी दृष्टि पडी है तबसे उत्कंठितसी हो गयी है, सो उसीके कारण तो इसको यह बाधा नहीं हुई ?. अनसूया--( हौले प्रियवंदासे ) सखी ! मेरे मनमें भी यही सन्देह है, जो हो, इससे पूछना तो चाहिये ( प्रगट ) हे सखी ! तुझसे कुछ पूछना चाहती हूं, कारण कि, तेरा संताप बढता जाता है । शकुन्तला-( शयनसे अधीर उठकर ) भला ! क्या पूछना चाहती हो ? अनसूया-हे सखि शकुन्तला ! हम कामके कारण प्राप्त हुए व्यवहारोंको तो नहीं जानतीं परन्तु कथाओंमें जैसी लगन लगे मनुष्योंकी दशा सुनी है वैसी तेरी दिखायी देता है, सो बता तुझे यह रोग किस कारण हुआ है ? कारण कि मर्मके जाने विना कोई औषध भी नहीं कर सकता । राजा- -जैसी मुझे आशंका है वैसे ही अनसूयाको है, मेरे अभिप्रायके अनु- सार ही ज्ञान नहीं। शकुन्तला-( आप ही आप ) मेरी व्यथा तो भारी है, इस समय भी इनसे नहीं कह सकूँगी । प्रियवंदा-हे शकुन्तला ! अनसूया भली कहती है, तू अपने रोगकी क्यों उपेक्षा करती है ? दिनपर दिन तेरे अंग दुबले होते जाते हैं अब केवल स्वरूपकी छायामात्र रह गयी है। राजा-प्रियंवदाने सत्य कहा (ठुमरी) प्रियवंदाने प्यारीसे यह, सच्ची बात सुनाई है । आनन छीन कपाल भये मुख, परछाई पियरायी है। उरन उरोज कठोर रह्यो, दुबरी कटि अति दुबराई है । कंधे दोउ झुकि आये हैं, रतिपतिने आधिक सताई है। करुणाके योग्य तन प्यारीको,दुबरीभइनरम कलाई है जमि लू व्यतिथि चमेली बेली, पत्र सहित मुरझाई है है

अंक-३.
(४७)
शकुन्तला-हे सखि ! यदि तुमसे न कहूँगी तो किससे कहूँगी ? तुम दोनोंको
ही कष्ट दूंगी।
दोनों-इसीसे तो हम हठकर पूछे हैं, सुन प्यारी ! यह बात हितूजनों के
सम्मुख कहनेसे ही कुछ दुःख बँट जाता है।
(जंगला)
राजा-अब बात कहेगी प्यारी,
दुख सुख साथी सखी सयानी।
अब सब छूटै आनाकानी
पूछत देह व्यथा दुख मानी ।
संशय मिटै हमारी ॥ १ ॥
बार बार इन चाव दिखायो,
प्रेम सहित लख मोहि जनायो ।
तो हू मन नहिं धीरज पायो,
पायो कहा कहै उच्चारी ॥२॥
(राग सहाना)
शकुन्तला-जियकी गति कहा कहूं अलीरी।
जबते तपवनको रखवारो,
लखो भूल गई धाम गलीरी।
मन तहँ गयो दशा लै वोरी,
जिय न लखत कछु बुरी भली री।
राजा-(प्रसन्न होकर) सुननेके योग्य ही सुना।
(जिला)
राजा-वचन मनचीतो सुन पायो।
जेहि मनसिज मो मन बिकलायो,
वैसहि प्यारीको भरमायो ।
मनकि लगन नहिं वृथा होत है,
निश्चय अव आयो॥१॥

(५०) शाकुन्तल नाटक। शकुन्तला-(मुस्कराकर) अच्छा मैं तुम्हारा कहना करती हूँ(सोचने लगी) राजा-( आप ही आप) इस समय प्यारीको पलक बिसार कर देखनेका यह अवसर भला है। ( राग सहाना ) छन्द रचत कस लगत सुहाई। फरकत होठ रोम भये ठाड़े, बंक भुकुटि इक लीन्ह चढ़ाई। गद्गद भये कपोल और मन, ममहित प्राति रही झलकाई ।। शकुन्तला-सखियो ! छन्दका विषय तो सोच लिया, पर लिखनेकी सामग्री नहीं है। प्रियंवदा--अपने नाखूनोंसे तोतेके उदरके समान कोमल कमलके पत्ते पर लिख दे? शकुन्तला( यथोक्त सामग्री लेकर ) सुनो सखियो ! इस छन्दमें अर्थ बना कि नहीं? दोनों--हम सावधान हैं, सुना । शकुन्तला-बांचती है । ( झंझोटीका जिला) निर्दय तव मनकी नहिं जानत । रैन दिवस मोहि मैन तपावत, मन अभिलाष मिलनकी ठानत । यह तन काम तपाय सुखायो, तुम नेकहु मनमें नहिं आनत ॥ १३ ॥ राजा-( झटपट आगे बढ़कर ) केवल तोहि तपावत रतिपति, पर प्यारी मम देह जरावत ॥

अंक-३. (५१) दिन न बिगारत कान्ति कुमोदिनि, शशिकी सबही कान्ति नशावत ॥ १४ ॥ दोनों-(प्रसन्न होकर ) बड़ी प्रसन्नता है कि, अपना मनोरथ शीघ्र सिद्ध हो गया। [ शकुन्तला आदरके निमित्त उठनेकी इच्छा करती राजा-रहने दो इतना परिश्रम मत करो। ( राग टोड़ी) हैं अति कोमल गात तुम्हारे । ताप तपायो प्यारी तव तन, पुष्पसेजके रह्यो सहारे । सरसिजकी पखुरिनकी गंधी, छाय रही तेरे तनु सारे । कष्ट सहनके योग्य देह नहिं. पौढ़ी रहो धीर उर धारे ॥ १५ ॥ उनसू०-महाराज! शकुन्तलाके समीप इसी चहानपर वियजिये । ( राजाके बैठने पर शकुन्तला लजाती है) प्रेयंवदा-तुम दोनों युवाओंका परस्पर अनुराग तो प्रत्यक्ष है, पर सखीका स्नेह मुझसे फिर कुछ कहलाया चाहता है । जा-भद्रे ! जो इच्छा हो सो कहो. कारण कि, जो कहनेको मन चाहे और कहा न जाय, वह मनमें ताप उत्पन्न करता है। प्रयंवदा-आपका यह धर्म कहा है कि, यदि प्रजामें किसीपर विपत्ति हो, तो राजा उसे दूर करे । जा-इससे अधिक राजाका कोई धर्म नहीं । नयंवदा-तो इस हमारी प्रियसखीको बली कामने इस दशापर पहुँचा रक्खा है,सो आप ही इसके अवलम्ब हो कि,दया करके इसके प्राण बचाओ।

करत, तो (५२) शाकुन्तल नाटक। राजा-भद्रे ! यह प्रणय तो दोनों ओर तुल्य है, परन्तु सब प्रकार सुझही पर अनुग्रह है। शकुन्तला-(प्रियंवदाको देखकर ) सखी ! रनिवासके विरहमें उत्सुक राजर्षिको यहां क्यों बिलमाती हो ? राजा-प्यारी! दोहा-मेरो मन तव वश भयो, बशन औरके मान : यापर जो शंका सुन जीवनप्रान॥ मन्मथ बाणन विधित तन,पुनि वेधत तू याय । और नहीं तन रोम प्रति, तूही रही समाय ॥ अनसूया-महाराज ! हमने सुना है कि राजा बहुत रानियों के प्यारे होते हैं जिससे सखीके बन्धुजनोंको शोक न करना पड़े ऐसा आप निबाह करना ।, राजा-हे भद्रे ! बहुत कहनेसे क्या है ? ( कलिंगड़ा) बात न ऐसी कहो कुमारी अधिक बड़े रनिवासमाहिमें, दो कुलभूषण नारि विचारी। एक वसुमती अरु यह बाला, जीवनदाता सखी तुम्हारी ।। दोनों-तो अब हमारी चिन्ता:गयी । प्रियंवदा-(अनसूयाको देखकर ) हे अनसूये ! यह हिरनका बच्चा इधरको देखता हुआ कैसा अपनी माके ढूंढनेमें उत्सुक है ! चलो उसे मिला दें। ( दोनों चलती हैं) शकुन्तला--आली ! मैं इकेली हूँ, दोनोंमेंसे एक तो मेरे पास रहो। दोनों-इकली कैसे है ? सब भूमिका रखवाला तो तेरे सप्पीप हैं ( गयी) शकुन्तला--क्या दोनों ही गयीं ? १ अर्थात् जो तुम इसके प्राण रखनेको मुझसे कहती हो तो,मेरे प्राण रखनेको शक न्तलासे भी कहो।

अंक-३.
(५३)
राजा-प्यारी ! व्याकुल मत हो, यह जन तुम्हारी सेवा करनेको उपस्थित है।
(झंझोटी ).
अब जनि शोच करहु मन प्यारी ।
कोमल सरसिजको पंखाकर, कहु तो करूं बयार तुम्हारी।
सियरी पवन लंगेते श्रमकण, सूखदिंगे सुख पैहो भारी ।
जावक लगे चरण अंकमधर, कहु तो दाबू हरु सुकुमारी ।
सेवक जान वचन कछु बोलो, हे करिकरसम जंघावारी ॥
शकुन्तला-मैं बड़ोंका अनादर कर अपनेको अपराधिनी न करूंगी।
( उठकर चलनेको होती है)
राजा-प्यारी ! अभी दुपहरी बड़ी कठिन है और तुम्हारे शरीरकी यह दशा
हो रही है।
( जिला)
प्यारी ! असमय काहे जात ।
कठिन दुपहरी परत सुन्दरी, के हैं तापित गात ।
कुसुमसेज तजिं जात धूपमें, उचित नहीं यह बात ।
यह कमलनके पात धरे उर, कहां जात अलसात ॥
( हाथ पकड़कर बैठाया )
शकु०--हे पुरुवंशी ! नीतिका पालन करो, कामकी सताई हुई भी मैं स्वतन्त्र
नहीं हो सकती।
राजा-हे भीरु ! गुरुजनोंका डर मत करो, महर्षि कण्व धर्मको जानते हैं,
वे कुलपति इसमें तुमको कुछ दोष न देंगे।
(कलिंगडा)
मनमें भय जान करहु पियारी ।
यहि गन्धर्व रीतिसों बहुतिक, ब्याहि गई ऋषिराजकुमारी।
मात पिता मन हर्ष बढ़ायो, कीनों तिनको आदर भारी ॥
शकु०-अच्छा ! मुझे छोड़ो तो मैं फिर अपनी सखियोंसे कुछ कह आऊ ।
दुष्यन्त-अच्छा ! छोड़ दूंगा ।
शकुन्तला कब?

(५४)
शाकुन्तल नाटक ।
( जैजैवन्ती)
राजा-छांड देहु इतनी मन करकै ।
जिमि कोमल सद पुष्प पायकर,
मधुकर अधिक प्रेममें भरकै।
मन्द मन्द मधु लेत बुझावत,
तनकी तपन पियारी अरके।
तैसे हि अधर अछूत तुम्हारे,
मैं जब करिहौं पान सुधरकै ।
यह सुख पाय प्रिया तोहि छोडूं,
जात कहां मम जिय मन हरकै ।
(शकुन्तलाका मुख उठाता है और वह बरजती है)
(जैजैवन्ती)
शकुन्तला-जान देहु मैं निपट अकेली।
बार बार विनवत पिय तुमसे,
पास नहीं कोउ सखी सहेली।
(चलकर और फिर लौटकर )
यदपि रही प्रिय मनकी मनमें,
बात करी दोइ पल मनमेली।
परवश जान छमा त करियो,
जात न निजवश सत्य कहेली!
प्यारे मुहि न बिसारहु मनते,
लाज राखियो बांह गहेली ॥
( चलदी)
(दादरा)
राजा-कैसेहु बिसरन योग पियारी।
दूरि भई हो भयो कहा है, मो मन तो तुम संगति धारी ।
कितहू गुड़ी उड़ी रहै चाहो, डोर उड़ावनकर रहै सारी॥
१ यहांसे बलिहारी पदतक संस्कृतनाटकका विषय नहीं है।

अंक-३. शकु०-(आप ही आप) राजार्षिकी बातें ऐसी हैं कि, जिनको सुनकर एक पग भी आगे नहीं चला, जाता, तो इनके पाससे निठुर बनके कैसे चली जाऊं ? अच्छा! इस पेड़की ओटमें छिपकर देखू यह मुझे कैसा चाहते हैं ? ( काफी) राजा-प्रियको कौन भाँति समझाऊ। प्रिया विना यह फूलवाटिका, कंटक तुल्य ताप तन पाऊँ। बांह छुड़ाय गयी निर्मोही, अनघेरी सम अब कहँ जाऊं।। जिन प्रभु अस कोमल निर्मायी, किमि हिय वन समान लखाऊँ। शकुन्तला-( आप ही आप ) दोहा-प्रीतिमान अस पीयको, ताजिक कैसे जाउँ । सुनि सुनि बात प्रेमकी, आगे परत न पाउँ॥ राजा-(आप ही आप ) अब यहां रहकर क्या करूं? (चलता हुआ नीचे देखकर) अहा ! अब तो ठहरूंगा, यह प्राणप्यारीके हाथसे गिरा हुआ कम- लका कंकन मेरे निमित्त प्रेमका बन्धनरूप प्राप्त हुआ है, ( उठाकर ) अहा ! इसमें कैसी उसीरकी गन्ध आती है, इसके छूनेसे मन शीतल होता है, क्यों न हो ? प्यारीके हाथका ही तो है। शकु०-(आप ही आप ) हाय ! इस लगनसे देह ऐसी दुबली हो गयी है कि, हाथसे गिरा कंकग भी नहीं जाना ! चलू, अब इसी मिससे फिर दिखायी हूँ । राजा-(देखकर ) अहा ! (झंझोटी) नैननको भाग बड़ोइ । जिमि सुरंक ढिग कमला आवत, तिमि आवत मम ढिग प्रिय सोई । इन नैननको

(५६)
शाकुन्तल नाटक।
दरश पाय शीतल भइ छाती,
जिमि चातक स्वातिहि सुख होई।
जेहिको सत्य
सनेह जासुपर,
सो पावत यह सत्य कहोई ॥
शकुन्तला-गिरा पहुँचेसे है कंकन, जु पाया हो तो देदो जी।
करूं बिन्ती तुम्हारी मैं, पसारूं अंचरा हो जी ।
तुम्हारे कामका नहिं कुछ,भेरी बहियां लगै सूनी।
हँसी होगीचयों में, विचारो अपने मन सोंजी ।
(जिला)
राजा-कंकण तब देहों मेरी प्राण अधार ।
अपन करन जब दो पहरावन, बाँह गहाँ सुकुमार ।
विनवत मिश्र जोरिकर दोऊ. मानों वचन हमार ।
शकुन ०-टार सकत नहिं वचन तिहारे, पहरावहु भरतार ।
राजा-आओ ! विराजोशुनगशिलापर,तनमन डारौं वार ।
शकु०-( बैठकर ) बेगि पहराओ प्रिय मोहि,
डरलागे लखै न कोउ सगवार ।
राजा-(प्रसन्न होकर आप ही आप ) अहा ! अब मनोरथ पूरा हुआ, जो
प्यारीके मुखले चिया शब्द सुना, धन्य कुसुमायुव ! (पहनाता हुआ) अहा !
दोहा-हरित भई फिर वेलती, कोमल प्यारी बाहिं।
जिमि शिवक्रोध मदन मुयो,जियो अशीशहि माहिं।
( प्रगट ) प्यारी ! यह कंकग ठीक नहीं आता, कहो तो फिरसे
बनाके पहरा दूं?
शकु०-जैसा जी चाहै वैसा बनाकर पहरा दो।
राजा-( बनाता हुआ)
दोहा-प्यारी यह कंकण नहीं, याहि अधशारी जान ।
तेरी सुन्दर भुजनपर, बलिहारी कर प्रान ॥

अंक-३.
(५७)
(दादरा)
शकुन्तला-हमैतो पिया चन्द न.परत लखाई ।
करकमलनकी उड़त महारज दृष्टि रही धुंधराई ।
राजा--आज्ञा होय पवन निज मुखसे, सब रज देहुं उड़ाई ।
श०(मुस्काकर ) दयाकरहु परतीततुम्हारीहोतनमोहिपुरुराई।
राजा-कहुं नवीन सेवककी तुमने प्यारी लखी ढिठाई।
शकुन्त०-बातनमें को जीति सके तुम्हें, कीजे जस मनभाई।
राजा-(धीरेसे फूंक मारी )
शकुन्त०-बस महाराज ! अब मेरी दृष्टि निर्मल हो गयी दीखनेलगा।
(पीलूका जिला)
पिया विनय केहिभाँति सुनाऊं ।
एको गुण निजमें नहि देखत, जेहि तुम्हरे मन भाऊं।
तुम्हरी सहज दया अति लखिकै, मैं मनमाहिं लजाऊं।
निजमुख दासी भई तुम्हारी, कहि अस तुम्हें हँसाऊं।
( कालिंगड़ा)
राजा-रहिते अधिक और कहा प्यारी ।
कीन्हीं अधरसुधा सौरभसों,
सबविधि पूरण साध हमारी।
प्राणप्रिया मुखचन्द तिहारो,
निरखत रहूं नित्य सुकुमारी ।
यहिते अधिक न हमैं चाहिये,
तन मन बलिहारी बलिहारी।
( नेपथ्यमें)
(हे चकई ! अब चकवेसे न्यारी हो रात आयी)
शकुतन्ला--( कान लगाकर और सटपटाकर )
हे पुरुराज ! मेरे शरीरका वृत्तान्त जानने के निमित्त भगवती गौतमी इस
ओर ही आती हैं, तुम तनक वृक्षकी आड़में होजाओ।
राजा--अच्छा ( वृक्षकी ओटमें हो जाता है)

(५८)
शाकुन्तल नाटक।
( हाथमें कमंडल लिये गौतमी दोनों सखियों समेत आयीं)
दोनों सखी-आर्या गौतमी ! इधर चलो इधर चलो।
गौतमी-(शकुन्तलाके समीप जाकर ) पुत्री ! तेरे शरीरका ताप कुछ
घटा कि, नहीं?
शकुन्तला-हां, कुछ घटा है।
गौतमी -इस कुशके जलले तेरा शरीर बाधारहित हो जायगा - शिरपर
कुशका जल छिड़कती है) पुत्रि ! अब दिन छिपनेको है आ कुटीको
चलैं । ( चलती हैं)
शकुन्तला-(आपही आप ) हे मन ! जब तेरे सम्मुख मनोरथ पूरे होनेका
अवसर आया, तब तो तैने कातरता न छोड़ी, अब प्रिय वियोगमें उस
सन्तापसे तेरी क्या गति होगी ? ( कुछ चलकर बोली ) हे सन्ताप
हरनेवाली लताकुंज ! मैं तुझसे बिदा होती हूँ, फिर भी सुखभोगके निमित्त
तुझे देखूगी।
( गौतमी और सखियों के साथ शकुन्तला दुःखी होकर गयी)
दुष्यन्त( पूर्वस्थानमें आकर औ श्वास लेकर ) अहो ! मनोरथ सिद्ध होने में
अनेक विन्न होते हैं।
(गौरी)
मन अब कहा वृथा पछताये।
बार बार जब निज अँगुरिनते,
प्यारीने दोउ होठ दुराये ।
मीठे वचन नहीं नहिं हितसों,
बोली अपनो मुख मुरकाये।
ताही समय कुरंगलोचनी,
मुख उचकायलियो सुख पाये।
पै अधरामृत पान करनको,
समरथ भयो न वैन सुनाये ॥
तो अब मैं कहां जाऊं अथवा प्यारीके भोगेहुए इसी लताकुंजमें एक मुहूर्तको
बैठू ( चारों ओर देखकर )

अंक-३
(५९)
( दादरा)
विन प्यारी मन थिर न रहाई।
फूलबिछी यह शिला सेज वहि,
अरु यह सरसिज पत्र लखाई।
जेहि पर मदन व्यथा प्यारीने,
नखसे लिख निज सखिन सुनाई।
यह मृणालको कंकण सोई,
करते गिरत जान नहिं पाई।
सूनी बेतकुंज लख अस यह,
हमसे तो अब त्यागि न जाई ।।
( नेपथ्यमें)
( काफी)
राजन-सन्ध्यासमय आय नियराई।
सवनकर्म आरंभ करत हित,
वेदी प्रज्वलित कीन सुहाई।
चहूँ ओरसे राक्षसगनकी,
छाया तेहिपर परत दिखाई।
सन्ध्यामेघ समान श्याम अरु,
पीत वरनकी है भयदाई।
त्रासदेत तपसिनको
अतिही,
आय धनुर्धर करहु सहाई ।।
दुष्य०-हे तपस्वियो ! मत डरो यह मैं आया ( गया)
(तीसरा अंक पूर्ण हुआ)

(६०)
शाकुन्तल नाटक!
चौथे अंकका विष्कम्भक ।
(स्थान तपोवन)
(दोनों सखी फूल बीनती आयीं)
अनसूया-हे सखि प्रियंवदा ! यद्यपि गन्धर्वविधिसे शकुन्तलाका
विवाह हुआ और पति भी तुल्य ही मिला, इसते तो मन प्रसन्न
हुआ तथापि चिन्ता न मिटी।
प्रियंवदा--कैसे ?
अनसूया--इससे कि आज वह राजर्षि तपस्वियोंका यज्ञ पूर्ण कराय ऋषि-
योंसे बिदा हो अपने नगरको गया है, वहां अन्तःपुरमें पहुँचकर जाने उसे
यहांकी बात स्मरण रहै कि नहीं ?
प्रियंवदा--विश्वास रक्खो, ऐसे महात्मा पुरुष विरुद्धस्वभावके नहीं होते, पर
चिन्ता तो यह है कि, पिता कण्व इस वृत्तान्तको सुनकर जानें क्या कहेंगे ?
अनसूया-जहांतक मैं देखती हूँ इससे सुखी होंगे।
प्रियंवदा--क्यों ?
अनसूया--उनका संकल्प था कि, यह कन्या हम गुणवान्को देंगे जो दैव
वश स्वयं ऐसा वर मिला है, तो गुरुजन विना प्रयास ही कृतार्थ
प्रियंवदा-( फूलोंकी टोकरीको देखकर ) सखी ! पूजाके योग्य फूल तो
हुए।
मैं बीनचुकी।
अनसूया-(शकुन्तलासे) सुहाग देवीकी पूजा भी तो करानी है, थोडे और बीनलें।
प्रियंवदा-अच्छा ( दोनों फूल बीनती हैं)।
( नेपथ्यमें)
हे ! यह मैं हूँ।
अनसूया-( कान देकर ) हे सखी ! यह किसी अतिथिकासा बोल है।
प्रियंवदा--क्या है ? शकुन्तला तो कुटीपर है ही ( आप ही आप ) है तो
परन्तु इस समय उसका चित्त ठिकाने नहीं है

अंक-४
(६१)
अनसुया-चलो-इतने ही फूल बहुत हैं ।
( दोनों जाती हैं)
(नेपथ्यमें)
हे अतिथिका निरादर करनेवाली !
( चौपाई)
तपोधनी मोहिं सकल बखानत,
सन्मुख आत न तू मोहिं जानत ।
जहि अनन्यमन चिन्ता करई,
मन वच कर्म जाहि चित धरई।
सो जन नारि भूल तोहिं जाई,
समझाये सुधि करै न राई ।
जिमि मदमत्त प्रथम की बानी,
करत स्मर्ण न जान सयानो।
प्रियंवदा-हा धिक ! बुरा हुआ, किसी पूजनीयका अपराध बेसुधीमें शकु-
न्तलाते बनगया ( आगे देखकर ) यह तो कोई ऐसे वैसे नहीं, यह महा
क्रोधी दुर्वासऋषि हैं । इस प्रकार शाप देकर रिसभरे डिगमिगते पैरोंसे
शीघ्र शीघ्र लौटे जाते हैं, इनको छोड़ अग्निके सिवाय और किसमें भस्म
करनेकी सामर्थ्य है ?
अनसूया-तू जा पावोंमें पड़कर जैसे बने ममाकर लौटा ला, तबतक मैं
इनके निमित अर्घ्य संजोती हूं।
प्रियंव०-अच्छा ( चलीं)
अनसूया-( कुछ दूर चलकर गिरी ) अहो ! जलदी चलकर मैंने फूलों की
टोकरी भी हाथसे गिरा दी ( फूल बीनने लगी)
(प्रियंवदा फिर आयी)
प्रियंव० हे सखि ! यह तो स्वभावसे ही टेढ़े हैं, सो किससे मान सकते
पर तथापि मैंने कुछ सीधा कर लिया है।
hos

(६२) शाकुन्तल नाटक। अनसूया-इनका थोड़ा मानना भी बहुत है, कह तो कैसे माने ? प्रियंवदा-जब फिरनेकी इच्छा नहीं की तब मैंने प्रार्थना की, भगवन् ! आपके तप प्रभावको न जाननेवाली इस कन्याका यह प्रथम अपराध है, इसको पुत्री विचारकर क्षमा करो। अनसूया-तब फिर। प्रियंवदा-तब कहने लगे कि, मेरी वागी झूठी नहीं होती, परन्तु जब राजा अपनी सुध दिवानेवाली अंगूठी को देखेगा, तब शाप मिट जायगा. यह कहकर अन्तर्धान हो गये । अनसूया-तो अभी आश्वासनकी आशा है, कारण कि. जब वह राजर्षि चलने लगा,तो अपनी नामखुदी अंगूठी उतारकर सुध दिवानेके निमित्त शकुन्तलाको पहना दी थी, इसले शापनिवृत्तिका सहज उपाय शकुन्त- लापर है। प्रियंवदा-चलो सखि ! अब देवकार्यसे निवृत्त हों ( इधर उधर फिर कर और देखकर) प्रियंवदा-अनसूया ! देख तो बायें हाथपर कपोलघरे चित्रके समान प्यारी सखी बन रही है। स्वामीकी चिन्तासे यह तो अपनेको भी नहीं जानती, दूसरे आगन्तुककी तो बात ही क्या है ? अनसूया-हे सखी ! यह शापका वृत्तान्त हम तुमतक ही रहे, स्वभावसे कोमल सखीकी इससे रक्षा करनी चाहिये । प्रियंवदा-ऐसा कौन होगा जो गरम जलसे नई मल्लिकाकी रहलही लताको सींचेग ? ( दोनों गयीं) इति विष्कम्भक।

अंक ४.
2
(आश्रमका समीप )
वेला--महात्मा कण्व अभी परदेशते आये हैं, मुझे समय देखनेके निमित्त
आज्ञा दी है कि, रात कितनी शेष है ? सो मैं बाहर देखनेको जाता हूं कि,
रात कितनी हैं ( इधर उधर फिरकर और आकाशकी ओर देखकर)
अहा ! यह तो सबेरा हो गया।
(कलिंगडा)
प्रात कि कैसी प्रभा दरशाई ।
औषधिपतितो एक ओरको अस्ताचल शिखरनको जाई ।
दूजी ओर सरोजाधिप रवि उदय होत कस तेज लखाई ।।
दोउ तेजधारिनकी युगपत सम्पत विपत सुरीत सिखाई।
कैसेहु सुख दुख परे तदपि नर धीरज धार सहे कठिनाई।
अस्ताचल शशि गयो कुमुदिनीध्यानमात्र शोभारहिछाई ।
देत न सब आनन्द दृष्टिको जिमि विदेशपतिका बिलखाई।
दुस्सह होत वियोग दुःख तेहि कैसे शोकहि प्रगट लिखाई ।।
(अहा !)
"जो निशिंपति धरि पाँव मेरुपै,
सब निशि विचरे हिय हरपाई।
तम समूहको नाश किरण निज,
श्रीहरि धरम समीप लगाई ।।
तेज गवाँय गिरे
नभते सोउ,
भोर समय रवि दियो दबाई ।
या जग माहि बड़ेहु बड़ेनकी,
थिर सम्पति नहिं देत दिखाई ॥"
( अनसूया पटको उठाकर आती है)
अनसूया-( आप ही आप ) यद्यपि मैं संसारी बातोंको नहीं जानती

(६४) शाकुन्तल नाटक। इस तो भी इतना तो मानती ही हूँ कि, उस राजाने शकुन्तलाके साभ अन्याय किया है। शिष्य--तो अब गुरुजीसे चलकर कहना चाहिये होमका समय हुआ । (गया) अनसूया-मैं उठी भी तो क्या हुआ, करने योग्य भी निज कार्योंमें मेरे हाथ पैर नहीं चलते, अब तो निर्दयी कामकी अभिलाषा पूरी हुई, जिसने असत्यवादी शून्यहृदय राजाके वशमें हमारी सखीको डालकर दशाको प्राप्त किया, अथवा यह दुर्वासाके कोपका विकार है, नहीं तो वह राजर्षि क्यों ऐसे वचन देकर फिर सन्देशपत्र भी न पठाता, अच्छा यहांसे ( अभिज्ञान ) सुध दिवानेवाली अंगूठी उसके पास भेजनी पडेगी परन्तु इन दुःखशील तपस्वीजनोंमें किससे कहूँ, जो मैं यह जानती कि शकुन्तलाका दोष है तो अभी तीर्थसे लौटे हुए पिता कण्वसे न कह सकती कि राजा दुष्यन्तसे शकुन्तलाका व्याह हो गया और वह गर्भवती भी है तो अब इसमें क्या करना चाहिये। (प्रियंवदा हँसती हुई आयी) प्रियंवदा-सखी ! जल्दी चलो शकुन्तलाकी विदाका कार्य करें। अनसूया--तू क्या कहती है ? प्रियंवदा-सुन जब मैं शकुन्तलाके समीप सुशयन ( रातमें सुखसे सोयी) पूछने गयी कि, इसी समय लाजसे नीचा शिर किये बैठीके समीप पिता कण्व आये और हृदयसे लगाकर बोले पुत्रि ! भाग्यकी बात है कि, धूमसे व्याकुल दृष्टिवाले भी यजमानकी आहुति अग्निमें ही गिरी । हे पुत्रि ! योग्य शिष्यको विद्या देनेके समान तुम अशोचनीय हो सो आज ही ऋषियोंके संग तुमको पतिके समीण भेज दूंग । अनसूया--सखि ! यह बात महात्मा कण्वसे किसने कह दी ? प्रियंवदा-अग्निहोत्रस्थानके निकट ही छन्दोमपी अशरीरी वाणीने उनसे कहा। दोहा--प्रगट होत शभिगर्भसे, जिमि पावक भगवन्त प्रजाहेत तिमि तव सुता, धरत तेज दुष्यन्त ।

अक-४. (६५) अनसूया-(प्रियंवदाको आलिंगन करके ) सखि ! यह बात सुनकर तो मुझे बड़ा सुख हुआ, परन्तु शकुन्तलाका आज ही विदा होना विचार कर दुःख सुख समान हो रहा है, साधारण सन्तोष है। प्रेयंवदा-सखि ! हमारी चिन्ता सुखरूप हो जायगी, यदि हमारी सखीको सुख मिले। अनसूया -इसीसे मैंने इस आमकी शाखापर लटकते हुए इस नारियलमें नित नयी नागकेशरकी माला रक्खी थी, तू उसे उतार ले, तबतक मैं भी उसके निमित्त मृगरोचना, तीर्थकी मृत्तिका, दूर्वा, किसलय मंगलके निमित्त ले आऊँ। प्रियंवदा-यही कर। ( अनसूया गयी और प्रियंवदाने माला उतारी ) ( नेपथ्यमें ) हे गौतमी ! शाङ्गरवमित्रोंसे कहो कि शकुन्तलाको लेकर जाना होगा। प्रियंवदा-( कान लगाकर ) अनसूया ! शीघ्रता कर यह हस्तिनापुर जानेवाले ऋषि बुलाये जाते हैं । (हाथमें सामग्री लिये अनसूयाका प्रवेश) अनसुया-आओ सखि ! चलैं । ( इधर उधर फिरने लगीं) प्रियंवदा--( देखकर) यह देखो, सूर्य उदय होते ही शिरसे स्नान किये शकुन्तला बैठी है, नीवार हाथमें लिये स्वस्तिवाचन करनेवाली प्रतिष्ठित तपस्विनियाँ आशीश दे रही हैं, हम भी इसीके समीप चलें। ( गयी) ( ऊपर लिखी भाँति शकुन्तला आसनपर बैठी दीखती है) एक तपस्विनी--( शकुन्तलाकी ओर देखकर ) हे पुत्रि! तू स्वामीसे बहुत मान पाकर महारानीपदको प्राप्त हो । दूसरी-वत्से ! तू वीरकी माता हो । तीसरी-पुत्रि ! तू पतिको बहुत प्यारी हो । ५ (६६) शाकुन्तल नाटक। ( इस प्रकार आशीर्वाद दे गौतमीके सिवाय सब गयीं) नों सखी-( समीप जाकर ) हे सखि ! अच्छे स्वान हुए। कुन्तला--सखियो ! भले आयीं, यहां बैठो। रोनों-( मंगलपात्र हाथमें लिये बैठकर ) अच्छा सखि ! सज्जित हो. जबतक हम मङ्गलउपचारका उबटन कर दें। शकुन्तला-यह भी बहुत है, कारण कि, अब तुम्हारा शृङ्गार मुझे दुर्लभ हो जायगा । ( आंसू डाल दिये) दोनों-सखि ! ऐसे मंगलकार्यमें तुझको रोना उचित नहीं है ( आंसू पोंछकर वस्त्र पहराती है) प्रेयंवदा-सखि ! तेरा सुन्दर रूप तो अच्छे २ आभरणोंके योग्य है, परन्तु जो आश्रममें वल्कलादि मिल सकते हैं, उन्हींसे शृङ्गार करती हूँ, पर इनसे रूप बिगड़ता है। (दो ऋषिकुमार हाथमें वस्त्राभूषण लिये आते हैं) दोनों ऋषिकुमार-पह भूषण वस्त्र हैं भगवतीजीको पहराओ। (सब देखकर चकित होती हैं ) गौतमी-बेटा नारद ! यह सब कहांसे आये ? पहला-पिता कण्वके प्रभावसे । गौतमी-क्या मानसी सिद्धिसे प्राप्त हुए ? दूसरा-नहीं सुनो, जब भगवान् कण्यने हमको यह आज्ञा दी कि, शकुन्त- लाके निमित्त वनस्पतियोंसे फूल ले आओ, तब तुरन्त ही- (विभास) अस प्रभाव मुनिवरको मारी। माङ्गलीक शशिसम अति निर्मल,काहृतरुवर दीन्ह सुसारी, चरण शृंगार हेत केहु तरुवर, दियो महावर मंगलकारी। वनदेवन और बहुतेर, भूषन वसन दिये सुखकारी।

अंक-४.
(६७)
पहुँचे तक तिनकर अस दीखे,
जिमि नवशाखा तरुसुकुमारी॥
प्रियंवदा-(शकुन्तलाको देखकर ) वनदेवियोंसे वस्त्राभरण मिलनेके शकु-
नसे यह सूचित होता है कि तू स्वामीकेघर राजलक्ष्मी मोनेगी।
(शकुन्तला लाज गयी)
पहला ऋषिकु०-गौतम ! आओ आओ, स्नानकर आये हुए मुनिवरसे यह
वनदेवियों के सत्कारका वृत्तान्त वर्णन करें।
( दोनों गये )
दोनों सखि-हे अली ! हम भूषण वस्त्रोंको क्या जानें, पर चित्रविद्याके
बलसे तेरे अंगोंमें पहनाती हैं।
शकुन्त०-तुम्हारी चतुरता मैं जानती हू ( दोनों शृङ्गार करने लगी)
(स्नान किये कण्क्का प्रवेश )
कण्व-प्यारी बेटी आज जाय प्रीतमके भवन ।
चित्त है उदास आज कंठ रुकै बार बार,
धीरजके राखबेको कौन है जतन ।
नयनोंमें नीर भरै चित्त नहीं चैन लहै,
धुंधली दृष्टि भई पुत्रिका गमन ।
हमसे वनवासी जब प्रेमसे अधीर होत,
बेटीकी बिदाको दुख कैसे फिर गृहीके तन ।
लाडहू लड़ाय पालपोसके बढ़ायो जाय,
आज एक साथ हाय ! परी है तजन ॥
( मन बहलानेके निमित्त इधर उधर टहलने लगे)
दोनो स-प्यारी ! हम शृङ्गार कर चुकीं अब यह क्षौमवस्त्रका जोडा पहरो।
(शकुन्तला पहरती है)
गौतमी-बेटी ! यह नेत्रोंमें आनन्दके आंसू भरे तेरे पिता तुझे देखने आते हैं
सो तू इन्हें आदरसे ले।

(६८) शाकुन्तल नाटक।
शकुन्तला-(लज्जापूर्वक ) पिता ! प्रणाम करती हूँ।
कण्व-पुत्रि!
दोहा-नृप ययातिकी जिमि भई, शर्मिष्ठा प्रिंय नारिं।
पतिव्रता तिमि होय तू, पतिको प्राण अधारि ।।
जिमि तिन पायो पुरुषवन, चक्रवर्ति गुणमूल ।
तिमि उपजहि तेरो सुवन, हरन सकल जगशूल ॥
गौतमी०-भगवन् ! यह तो वर है अशीश नहीं ।
कण्व-पुत्रि! आओ, तत्काल आहुति दीहुई अग्नियोंकी प्रदक्षिणा कर लो।
(सब परिक्रमा करती हैं)
कण्व- ऋक् छन्दसे अशीश देते हैं)
(देश)
यह जग पावनि अगिनि सुहाई।
वेदकि चहुँ ओर विराजित, तटपर दर्भ बिछाइ ।
समिध पाय प्रज्वलित भइ भारी, हविष गन्ध सरसाई।
नाशत अघ सबके सो तुमको, शुद्ध करै सुखदाई।।
सो अब तू शुभ घड़ीमें बिदा हो ( चारों ओर देखकर) जो संगमें जायँगे
बह मिश्र कहां हैं?
शिष्य-(आकर ) मुनिजी ! हम यहां हैं ।
कण्व-अपनी बहनको मार्ग बताओ।
शारव-इधर आओ भगवती ! इधर आओ।
सब चलते हैं)
(बिहाग)
हे हे आश्रमके सब तरुवर !
आज शकुन्तला पतिपुर जाई।

(६९) अंक-४. जहिने सींचे विना तुम्हारे, कहुँ जल पान कियो नहिं राई। अभरणकी रुचि तदपि तुम्हारे, फूलन लिये प्रीति अधिकाई । फूलत फलत निहारि तुम्हैं जिन, सुवन समान मोद मन पाई। आयसु देहु जात पतिके घर, तुमसे चाहत होन बिदाई॥ ( कोकिलाका बोल बताकर ) यह देखो- दोहा-वनवासिनके बन्धु यह, तरुवर पुत्री हेत । कोकिलशब्द सुनायकर, गमनहु आज्ञा देत ॥ ९॥ (नेपथ्यमें--राग काफी) याको मार्ग होहि सुखकारी । हरित कमलिनी छाये सरवर ठौर ठौर पावै सुकुमारी । सरसनदी अरु मघन वृक्ष सब मिलें मार्गमें तनश्रमहारी । कमलपुष्परज सदृश मृदुल अति भूमी मिले तुम्हें मगसारी। शान्तऔर अनुकूल सबंहिविधिगन्ध बहाहो अभिमतचारी। (सब विस्मय होकर सुनते हैं) गौतमी-हे बेटी ! जातिजनोंके समान हित करनेवाली तपवनकी देवियें तुझे अशीश देती हैं, इन्हें प्रणाम कर । शकु०-(प्रणाम करके हौले प्रियंवदासे) (आसावरी) सखिरी मेरो आगे परत न पाउँ । आर्यपुत्रसे यदपि मिलनको है मनमें अतिचाउ । तदपि बड़ी भई एती जेहिवन तेहि तज कैसे जाउँ ॥ प्रिय०-आली नहीं अकेलो दुख तोहिं हैयह लखि पछताउँ। ज्योज्यों समय वियोग निकट चलि आवत मन अकुलाउँ।।

(७०)
शाकुन्तल नाटक।
सकल तपोवन छई उदासी देख तोहि दिखराउँ ।
मृगी न लेत कवल मुखमाहीं अब वन नचत न मोर ।
पीरेपात गिरत अँसुअनसे करत न कोकिल शोर ।।
शकुन्त०-(सुध करके ) पिता ! मैं इस वनज्योत्स्नासे भी भेंट लूं इसमें
मेरा बहनकासा प्रेम है।
कण्व-इसमें मैं तुम्हारे सहोदरकेसे प्रेमको जानता हूं, यह माधकीलता
दाहिनी ओर है।
शकुन्त०-(लताके समीप जाकर )।
( राग काफी)
हे वनकी छबिदाता बेली।
यदपि माधवी आमवृक्षसे लिपटिरही मम तदपि सहेली ।
शाखारूप पसारभुजा निज मिलले अति सुखदान नवेली॥
फिर संगम दुर्लभ मनमानत दूरजाय हौं पडूं अकेली ।
( बिहाग)
कण्व-बेटी!जैसा पति तेरे हित मैं संकल्प कियो मनमाहीं।
तैसोइ ते पायो प्रियभर्ता अपने पुण्य प्रताप लखाहीं ।।
अस यह नवमल्लिका आम सँग लिपटरही मनदेगलबाँहीं
मैं निचन्त अब भयों लाइली तुम दोऊ इकसंग विवाहीं ।
पुत्री ! देर मत कर, अब विदा हो।
शकुन्तला-( दोनों सखियोंसे ) हे सखियो! इसे मैं तुम्हारे हाथ सौंपती हूं।
दोनों--और हमैं किसको सौंपे जाती है ? ( आंसुओंसे रोती हैं)
कण्व-अनसूये ! इस समय रोना उचित नहीं है, इस समय तो शकुन्तलाको
धीरज बँधाना चाहिये।
(सब चलते हैं)
(राग बिहाग)
शकुन्तला-पिता कुटीके निकट चरति जो,
हरिनी गर्भभार अलसाई ।

अंक-४.
(७१)
क्षेमकुशलसे जन जब तुम,
समाचार मोहि देहु पठाई ।
भूल न जैयो विनय करत हूं,
एहिमें नेह मेरो अधिकाई॥
कण्व-बेटी!तुम्हैं हरिनि जब व्यावै समाचार देहों पहुँचाइ ।
शकुन्तला-( कुछ चलकर और देखकर) यह कौन है ? जो मेरा अंचल
नहीं छोड़ता।
( कलिंगड़ा)
कण्व-अहै वही मृगछौना तेरो ॥
जब जब चिरो दाभते यहि मुख,
व्रणित भयो पुत्री तैं हेरो ।
तब तब तेल हिंगोट लगायो,
लाड़ लड़ाय लड़ाय घनेरो ।
ससा खवाय खवाय पुत्र सम,
पालनकर सब कष्ट निबरो।
सो अब किमि तज सकत सुता तोहि,
भयो तेरो चरणनको चेरो ॥
शकुन्तला-धीरजधर मनमें मृग जाये।
अनतजात मैं संग छोड़ अब,
पाछे क्यों आवत अकुलाये ।
तव जननी जनमत तज तोही,
मरी पाल म लाड़ लड़ाये।
मो पाछे अब पिता हमारे,
तोहिं पालि हैं नेह बढ़ाये ।
पाछे लोट जाहु मृगछौना,
मानत नहिं काहे समुझाये ॥

(७२) शाकुन्तल नाटक। . (आंसू गिराती चलती है) (चौपाई ) कण्व-धीरज बांध हिये सुकुमारी।परवशरोकविलोचन वारी। उन्नत वरुनी दृगसे आई । लखनहोहि नहिं पंथ सुहाई। ऊची नीची भूमि लखाई। ठोकर खा न गिरो कहुँ जाई। शारिव-भगवन् ! सुना जाता है कि, जहांतक जलाशय न मिलैं वहीं तक प्रियजनों को पहुँचाना चाहिये । अब यह सरोवरका तट है, यहां संदेशा देकर आप लौट जॉय । कण्व-तो आओ, थोडी देर इस वटकी छायामें विश्राम लें। ( सव वृक्षके नीचे बैठते हैं) कण्व-( आप ही आप ) श्रीमान् राजा दुष्यन्तके योग्य क्या संदेशा भेजना चाहिये ( विचारनेलगे) शकुन्तला-(सखियोंसे-हौले हौले ) हे सखि ! देख कमलिनीपत्रमें छिप जानेपर ही प्रिय चकवेके निहारे बिना व्याकुल हुई यह चकवी विलाप करती है, मैंने बडा कठिन कार्य किया है। अनसूया-सखि ! ऐसा मत कह । दोहा-यह वियोगकी बड़ेि निशा, काटत विन प्रियसंग। मेटत कछु दुख विरहको, पुनि फिर मिलन उमंग॥१५॥ कण्व-हे शाङ्गरव ! शकुन्तलाको आगे करके हमारी ओरसे राजा दुष्य- तसे यों कहना। शाङ्ग-जो आज्ञा । (राग जैजैवन्ती) कण्व-जानि हमे तपधनी नृपति भारी, अपनोहू कुल उच्च विचारी। हुई प्रीति जो स्वयं दैववश, इस कन्याकी ओर तुम्हारी ।

अक-४. (७३) ताहि सोचकर सब रानिन सम, राखो बेटी यहू हमारी॥ बस कहनो यह अधिक बात यहि, हैहै भाग्य अधीन सुखारी। सो न उचित हम वधू बन्धुजन, ताको मुखसे कहै उचारी ॥ शाङ्ग--आपका संदेशा मैंने भलीभाँति ग्रहण कर लिया । कण्व-बेटी ! अब तुझे भी कुछ शिक्षा दूंगा, यद्यपि हम वनवासी हैं तथापि लोकवृत्तान्त भलीभाँति जानते हैं। शाई-बुद्धिमानोंसे क्या छिपा है ? कण्व-बेटी ! जब तू यहांसे जाकर एतिकुलमें प्राप्त हो तब-. (अरल) गुरुजनकी सबभाँति करो सेवा मनलाई । सौतनसे तजि द्वेष सखीसम प्रीति बढ़ाई। भर्ताके अपमान किये ते रोष न कीजो। कटुकवचनको त्याग नित्य आदरतेहि दीजो ॥ परिजनके प्रति सदा मिष्टवाणी उच्चारो। मैं महारानी भई गर्व यह मन मतिधारो॥ "पतिको देवसमान सदा मनमाहिं विचारो। सबविधि सेवहु ताहि दोउकुल मुमति उधारो॥ पीछे सोवहु नित सबहीसे पहले जागो। करि सबविधि सम्मान पती चरणन अनुरागो।" वर्तत इमि कुलवधू श्रेष्ठ गृहिणी कहवा । चलें जो उलटी चाल दुहूंकुल दोष बढ़ावै ।। कहो गौतमी पुत्री हित यह शिक्षा कैसी। त०--कुलवधुओंके निमित कही चाहिये कहि तैसी॥ पुत्री इसको सदा ध्यान राखो मनकर ।

(७४)
शाकुन्तल नाटक।
कण्व-बेटी-आ मुझसे अरु निज सखियोंसे भेंट अंकभर ॥
शकुन्तला-हे तात ! क्या यहींसे प्रियंवदा और अनसूया मेरी सखी
लौट जायेंगी?
कण्व-बेटी! यह दोनों अभी कारी हैं इसते इनका वहां जाना उचित
नहीं, गौतमी तेरे सङ्ग जायगी ।
शकुन्तला-( पितासे मिलकर ) अब मैं पिताकी गोदीसे न्यारी होकर
मलयपर्वतसे उखाडी हुई चन्दनलताके समान देशान्तरमें कैसे प्राण
धारण करूँगी ?
( राग काफी)
"पितुकी गोद बहुरि कब पैहौं।
जिन पाली पोषी अति हितसौं,
तिनको त्याग कौन विधि जैहौं।
पितुगृह परिजन, प्रियजन साखजन,
छुटत सबै यह दुख केहि केहौं ।
तजत अकेली हाय ! पिता मोहि,
इकली केहिविधि धीर धरैहों"
कण्व-बेटी ! ऐसी व्याकुल क्यों होती है ?
बेटी धीर मनमें धारि ।
जाय घर यशवन्त पतिके होइ है प्रियनारि ।
मिलै नहिं अवकाश जब गृहकाजसों सुकुमारि।.
दिशा पूरव जनत जिमि रविसुवन मंगलकारि ।
जनहिंगी जब पुत्र ऐसो जगतको उजियारि ॥
तब विरहकी व्यथा हमरे भूलि जैहै सारि ।
लहत सबही नारि यह दुख नेक मनहिं विचारि॥
( शकुन्तला पिताके पैरोंमें गिरती है)
कण्व-मेरे आशीर्वादसे तेरे मनोरथ पूरे होंगे।
शकुन्त०-( दोनों सखियोंके पास जाकर ) आओ सखियो ! दोनों
संग ही मुझसे मिल लो।

अंक-४. (७५) नों-(भेंटकर) हे सखि ! यदि राजा तुझे न पहचाने, तो यह मुंदरी जिसपर उसका नाम खुदा है दिखा देना । कुन्त०--तुम्हारे इस सन्देहने तो मुझे कम्पित कर दिया। पोनों--डरनेकी बात नहीं, अधिक स्नेहमें अनिष्टका सन्देह होता है । मा० 0--अब दिन पहरसे अधिक चढ़ गया, चलनेमें शीघ्रता करो। शकुन्तला--( आश्रमकी ओर मुखकर खड़ी होती है ) हे पिता! अब तपो- वनका दर्शन फिर कब कराओगे ? कण्व-बेटी सुन जब फिर आश्रम तू आवैगी। सागरपर्यंतभूमि सौत मानि पीयनेह, सबावधि समरथ पुत्र धीर वीर पावैगी। रथको नहिं वेग रुकै जाकर जगमाहिं कहूँ, ताको कर व्याह वधू देख चित चावैगी। राजकाज सौंप ताहि पालन कुटुम्बभार, शान्त हो पतीको फिर आश्रममें लावैगी ॥ मोतमी--बेटी! चलनेकी घरी बीती जाती है पिताको लौट जाने दे,मुनिराज ! अब लौटो यह तो बार बार ऐसे ही कहती रहेगी। कण्व-बेटी ! मेरे तपोऽनुष्ठानमें विन्न पड़ता है। शकुन्त०-(फिर मिलकर ) पिताजी ! तुम्हारा शरीर तपस्यासे पीडित है सो मेरे निमित्त बहुत उत्कंठित न होना । कण्व-(श्वास लेकर) (खम्माच ) मम दुख यह केहि भाँति नसैहै। पूजाहेतु कुटीके द्वारे, बुए धान्य दृष्टिं जब जैहै। तब नीवारबली अवलोकत, जियवियोग दुख अति अधिकैहै। तब बिछरनकी व्यथा बढे नित, पुत्री हित पितु मुख कब पैहै ॥

(७६)
शाकुन्तल नाटक।
लीनो वृक्ष
अब जा तेरा मार्ग मंगलकारी हो।
(शकुन्तला साथियों समेत चलती है)
दोनों सखी( शकुन्तलाकी ओर देखकर )-(विहाग)
भई अब नैननिसों सखि दूरि ।
दुराय सखीको,
नहिं दीसत पगधूरि।
कण्व-(श्वास लेकर) अनसूये गइ सखी तुम्हारी,
मेरी जीवनमूरि।
शोक त्याग मम पाछ पीछे,
आओ मनकरि कार॥
दोनों-पिता सखीके विना तपोवन,
रह्यो विरह भरिपूरि।
सूनो लगत चलें हम कैसे,
चर अचर रहे विसूरि॥
कण्व-सत्य है प्रीतिमें ऐसा ही दीखता है (ध्यानकर चलते हुए) आज शकुं
तलाको पतिके घर भेजकर मैं निश्चिन्त हुआ।
(चौपाई)
बेटी होत पराये घरकी।
चिन्ता लगी रही सम वरकी।
सो अब तेहि पतिगेह पठाई।
मनमें इमि पाई निचिताई।
जिमि काहूकी देइ धरोहर ।
होय विमल मन सब विधि सुखकर ॥
(सब बाहर गये)
चौथा अंक समाप्त हुआ

अंक-५. (स्थान राजभवन) (दुष्यन्त राजा आसनपर स्थित है विदूषक सामने खड़ा है) घदूषक-कान लगाकर) हे मित्र ! संगीतशालाकी ओर कान लगाओ, कैसा मनोहर स्वरोंसे गीत सुनाई देता है, मैं जानता हूं श्रीमती हंस- पदिका रानी गानेका अभ्यास कर ररही हैं। जा-चुप रहो सुनने तो दो। ( नेपथ्यमें ) ( सहाना) भ्रमर तुम अभिनव मधुके मीत । रस आमकी मृदुल मंजरी, तासों राखी रीत । नित चुम्बन हित आवत तोहि ढिग, अधिक बढ़ाई प्रीत । ब सरोजवश ताहि भुलायो, बहु दिन गये व्यतीत । भश्र तिहारी दशा देख यह, होत न जिय परतीत ॥ जा-अहा ! कैसा प्रीति उपजानेवाला राग है। पदू०-आप इन गीतोंका अर्थ भी समझे ? जा-(मुसकाकर) हां समझा, रानी हंसपदिका. पर मैं पहले आसक्त था, अब वसुमतीमें प्रेम है, इस कारण रानी मुझे उलाहना देरही है। मित्र माढव्य ! हमारे वचनसे रानी. हंसपदिकासे कहो कि, हम तुम्हारी चेता- वनीको जानगये। ढ०- जो श्रीमान् आज्ञा देते हैं ( उठता है ) हे मित्र ! जिस प्रकार अप्सराके हाथसे तपस्वीका छुटकारा कठिन होता है ऐसे ही मेरी दशा होगी, वह सखियोंसे चोटी पकड़वाकर मुझे पिटवावेगी । जा-जा-चतुराईसे उसे समझा देना। ढिव्य--जाने मेरी क्या गति होगी ? ( गया)

(७८)
शाकुन्तल नाटक।
दुष्यन्त-( आपही आप ) यद्यपि मुझे किसी प्रेमीका वियोग नहीं है, ते
भी गीतके सुनते ही अकस्मात् चित्तमें उत्कंठा हो आयी इसका क्य
कारण है ? अथवा ।
( झंझोटी)
जियमें यह जान परत हमको सब कारन ।
भली वस्तु देख कोइ अथवा सुन राग सरस,
मुखियन मन एक संग उत्कंठाकर धारन ।
पूर्वजन्मके स्नेह बन्धुनको संस्कार,
देत सुध दिवाय सवै प्रेमके पगारन ।।
(व्याकुलतासे बैठता है)
(कंचुकी आता है)
कंचुकी-अहा ! इस समयमें किस दशाको पहुंचा हूं ?
(राग ईमन)
यह लाठी जो द्वारपालके,
काम काज हितकी धारन ।
रनवासीको काम निकारे,
अब सब बीतचले कारन ।
डगमग बूढ़े चरनोंको अब,
बनी सहारा सोई है।
हाय बुढ़ापेने अब आकर,
अक्किल सारी खोई है ॥
"कहन चहत जो कहत बनै नहिं,
भूलिजात है कहत कहत ।
छिनभर रहत न वृत्ति एकसी,
तनको मन नहिं धीर रहत।"
यह तो सांची महाराजके,
धमकाज सब करन परत।

अंक-५.
(७९
अथवा
पर' धर्मासनसे वह उठकर,
अभी गये विश्राम करत ।
तासे उचित नहीं अस कहिबो,
कण्वके चेला आये हैं ।
विघ्न पड़े विश्राम स्वामिके,
अबही तो पौढ़ाये हैं ।
प्रजापालको बोझा,
जिन अपने शिरधारो है।
तिनको फिर विश्राम कहां यह,
मुनियन सत्य उचारो है।
एकहि बार जुते रविके रथ,
घोड़े नितप्रति चलते हैं।
करत नहीं विश्राम एक छिन,
पवन सदा गति करते
शेषनाग नित धरत भूमिको,
कबहूं करत नहीं विश्राम ।
तिही भाँति राजनकी शोभा,
येही नित्यप्रति जनकाम ॥
अब मैं इस संदेशेको भुगताता हूं ( इधर उधर देखकर )
हाराज
वे बैठे हैं।
पुत्रसमान पाल परजाको,
जब राजा थकजाते हैं,
तब एकान्त स्वस्थके कारण,
इच्छा प्रकट जनाते हैं।
जिमि सब यूथ सघन वनमाहीं,
जब गजराज देत पहुँचाय ।

(८०) शाकुन्तल नाटक। रविके धूप तपनके कारण, ढूँढत आप ठंढ कहुं जाय ॥ ( समीप जाकर) महाराजकी जय हो । यह हिमालय पर्वतकी तराईके रहनेवाले कुछ तपस्वी कण्वमुनिका संदेशा लेकर स्त्रियोंसहित आये हैं, उनके निमित्त जो आज्ञा हो ? राजा-( आदरसे) क्या कण्वका संदेशा लाये हैं ? कंचु०--हां, महाराज ! राजा-तो हमारे वचनसे जाकर उपाध्याय सोमरातसे कहो कि, इन आश्र- मवासियोंका वेदविधिसे सत्कार करके स्वयं प्रवेश करावे और मैंभी तब तक तपस्वियोंसे मिलने योग्य स्थानमें बैठता हूं। कंचुकी-जो आज्ञा महाराजकी-- (गया) राजा-( उठकर) वेत्रवति ! अग्निस्थानकी गैल बताओ। प्रतिहारी-महाराज ! यह मार्ग है । राजा--( इधर उधर फिरकर अधिकारका खेद निरूपण करके ) सबही अपनी मनोकामना पाकर प्रसन्न हो जाते हैं, पर राजाकी कृतार्थता दुःखभरी होती है। (राग ललित) राज पाय मनकी अभिलाषा, पूरी तो हो जाती है। पाय पालन दुखदाई, नित मनमें यह आती है। हाथ हमारे रहै कौन विधि, यह चिन्ता मनमें नित जागै । श्रमहित शयन न होत खेदसे, कबहूं नैन नींद नहिं लागे.। जिमि छत्रीको दण्ड. लियेकर, देत भार अरु धाम बचाई।

अंक-५. (८१) तिमि यह राज्यभार प्रदहू अरु, दीसत है जनको सुखदाई ।। ( नेपथ्यमें) दो वैतालिक-स्वामीकी जय हो-(ध्रुपद ईमन कल्यान ) चिरञ्जीवि महाराज, प्रजापाल करत काज, आपको सुन्याव देख सबही सुख पावै । लोकहेत सहत दुःख, धम यह तुम्हारा नित्य, अपने सुख हेत आप इच्छा बिसरावै । जैसे तरु और हेत, छाया सुख सकल देत, अपने शिर धूप शीत लत दुख नशावें । दसरा-दुष्टनके वश्य हेत, धारत निज हाथ दण्ड, नाशत सब जनविवाद नाम तव सुनावैं । रक्षा नित करत भूरि, क्लेश दुःख करत दूरि, जेहि हित नृप जन्म धर्म सकलह लखावें । औरहू केतिक नरेश, वैभवयुत हैं विशेष, प्रजाहेत पाल धर्भ तुम सर नहिं आवै ।। राजा--इनके वचनोंने तो मेरे थके मनको फिर हरा कर दिया, ( इधर उधर फिरता है. .) प्रतिहा०-हे महाराज ! अग्निशालाके बहिद्वारका कोठा भली प्रकारसे समार्जित किया हुआ सुशोभित है, वहींपर श्रीमहाराज चलें। राजा-(सेवकोंके कंधोंपर सहारा देता हुआ राजा आरोहण करता है। प्रति. हारि ! किस निमित्त महर्षि कण्वने हमारे पास ऋषि भेजे हैं ? (जैजैवन्ती) कोहि कारण ऋषि शिष्य पठाये। तपसिन केहि धौं काजमाहिकोइ, विघ्न भयो तासों अकुलाये। वा केहि दुष्ट आश्रम जन्तुन, ६

(२)
शाकुन्तल नाटक।
कष्ट दियो कहने सोइ आये।
अथवा मेरे अघके कारण,
आश्रम लता पुष्प मुरझाये ।
यह शंका व्यापत मेरे मन,
थिर न रहत बहु धीर बँधाये ।।
प्रति०-मैं तो यह विचारती हूँ कि यह तपस्वी आपके सुकर्मोंसे प्रसन्न हो
अभिनन्दन करने आये हैं।
( मुनिजन शकुन्तलाको साथ लिये गौतमीसहित आते हैं और पुरोहित
कचुकी आगे होते हैं.)
कंचु०-महात्माओ ! इस ओर आओ !
शाईरव-हे शारद्वत !
( चौपाई)
महाभाग यह नृपति सुहायो।
जासु प्रताप दशहु दिशि छायो॥
निजमर्याद कबहुं नहिं त्यागत ।
नीचहु वर्ण कुमार्ग न लागत ।।
पे मैं नित एकान्त निवासी ।
सदा इकेल रहन अभ्यासी ॥
जनाकीर्ण यह है नृपस्थाना ।
अग्निदीप्तगृह सम मनमाना ॥
शारद्व० --मैं भी ऐसा ही जानता हूँ मेरी भी पुरमें प्रवेश करनेके समयसे ऐसी
ही दशा हो रही है।
(दोहा)
सुखसंगी इन जननको, मैं देखत इहि भांति ।
न्हायो तेल लगात जिमि, जिमि शुचि अशुचि मिलात।
जिमि जागत सोवत लखहि, बँधुवन जिमि निबंध।
तैसे मैं इनको लखहुँ, पड़े जगतके धंध ॥

अंक-५.
(८३)
कुन्तला-(निमित्त देखकर ) हा ! मेरी दाहिनी आंख क्यों फड़कती है ?
तमी-पुत्रि ! दैव कुशल करेंगे, तेरे स्वामीके कुलदेवता अशकुनोंको मेट
तुझे सुख देंगे ( चलती है)
रोहित-( राजाको बताकर) हे हे तपस्वियो ! यह वर्णाश्रमोंके रक्षक राजा-
विराज पहले ही आसनसे उठकर तुम्हारी बाट देखते हैं, इन्हें देखो ।
रिकहे महाब्राह्मण ! यह तो बड़ाईके योग्य ही हैं, परन्तु हम तो इसमें
निस्पृह हैं कारण कि-
हा- तरुवर फल लागे झुकत, जलयुत मेव झुकाय ।
सजन पाय समृद्धिको, झुकत मान बिसराय ।
परोपकारिजनको सदा, यहै स्वभाव लखाय।
यहिमें अचरज कौन अति, धर्मधुरन्धर राय ॥
तिहारी-स्वामिन् ! यह तपस्वी प्रसन्नमुख दीखते हैं, इससे जाना जाता है
कि, इनका कोई शांतिवाला कार्य है।
जा( शकुन्तलाको देखकर-इनमें यह कोई स्त्री है)
हा-अश्चलसे मुख ढांकि यह, को इनके सँग बाल ।
पूरी सुघराई यदपि, लख न परत इहि काल ॥
तदपि तपस्विनसे घिरी, यह लखाति अल तोय ।
जीरन पातन मध्य जिमि, नव कोंपल कमनीय ।।
तेहारी-महाराज ! इनका वृत्तान्त जाननेकी तो मेरे मनमें भी है पर
मेरी तर्कना काम नहीं करती, पर हां, यह स्त्री बहुत ही सुन्दर और
देखने योग्य है।
जा-रहने दे, दूसरेकी स्त्रीको देखना न चाहिये ।
कुन्तला-( अपने हृदयपर हाथ रखकर आप ही आप )
(विहाग)
अहो! मन धीरज नेक धरो ।
कत धरकत कारण विन आत ही चाहत भाग भरो

(८४)
शाकुन्तल नाटका
सुधिकर आर्यपुत्रकी वह दिन जैसो प्रेम करो।
कंप त्याग सोई हम प्रतिम चाहत दुःख टरो।
पुरोहित--( समीप जाकर ) महाराज ! इन तपस्वियोंका विधिपूर्वक आदर
सत्कार हो चुका, अपने गुरुका जो यह संदेशा लाये हैं सो अब सुन लीजिये।
राजा-( आदरसे ) मैं सुननेको सावधान हूं।
ऋषि-( हाथ उठाकर ) महाराजकी जय हो।
राजा-तुम सबको प्रणाम करता हूं।
ऋषि-तुम्हारी मनइच्छा सिद्ध हो ।
राजा-मुनियोंके तपमें तो कोई विन्न नहीं है ?
शार्ङ्गरव-( जैजैबन्ती)
जिनके रक्षक तुम राजा, तहां विघ्नदुःख केहि काजा।
जहां भानुतेज प्रकाशै, तहां अन्धकार सब नाशै।
राजा-तौ राजशब्द यह ज्ञानी, हम लियो यथारथ मानी।
अब कहो लोक हितकारी, हैं मुनि प्रसन्न दुखहारी।
शारिव-स्वाधीन कुशल ऋषिराई, रहते हैं सिद्धसहाई।
उन पूछि अनामय राजा, यह कह्यो आपसे काजा ।
राजा-क्या आज्ञा हमें सुनाई, सो दीजे आप बताई।
शारिव-यह कन्या शील तुहाई-गंर्धवरीति तुम पाई।
हम प्रीतिभावसों जानो, अब बात यहै मनमानो।
दुहिताकी और तुम्हारी, यह जोड़ीभली विचारी।
गुण रूप माहिं तुम दोऊ, हो तुल्य कहत सब कोऊ।
तुम पूजनीय सज्जनमें, यह मानत है हम मनमें ।
बेटी सक्रिया हमारी, कै मूर्तिमती सुविचारी ।
नहिं तुल्य मिलावत जोरी, विधिकेशिर है यह खोरी।
सोतुमदोउ योग्य मिलाई निन्दा निज सकल मिटाई
एहि गर्भवतको राजन, ले धर्म करहु सब साधन ।

अंक-५. (८५) गौतमी- आर्य ! मैं भी कुछ कहनेकी इच्छा करती हूँ, पर मुझे अभी कह- नेका अवसर नहीं मिला। इन पूछे नहिं गुरुजन, निज विवाहके माहिं। तुम पूछे .नहिं बंधु जन, मिल बैठे इकठाहिं। "करो परस्पर बात अब,सुख भोगो सबभांति । प्राति परस्पर दोउनकी, मोहिं सबभांति लखाति" शकुन्तला-( आप ही आप ) देखू , अब स्वामी क्या कहते हैं। राजा-यह क्या स्वांग है ? शकुन्त०-( आप ही आप ) यह राजाका वचन तो अग्निरूप है। शाङ्ग०-यह क्या आप तो भली प्रकार लोकाचार जाननेमें कुशल हैं। दोहा-रहत सुहागिनि जाय जो, अपने पितुके गेह । कैसिउ होय पतिव्रता, करत लोग सन्देह । होय पियारी वा नहीं, रहै पियाके पास । यह चाहत हैं बन्धुजन, यहिमें सकल सुपास। राजा-क्या इस देवीसे मेरा पहले ब्याह हुआ है ? शकुन्तला-(दुःखी होकर आप ही आप ) हृदय ! जो तुझे डर था सो आगे आया। शारव-क्या अपने किये कार्यमें अरुचि होनेसे राजाको धर्मको त्यागना उचित है ? राजा-आप यह असत्कल्पनाका प्रश्न कैसे करते हो? शारव-ऐश्वर्यके मदवालों में यह विकार हुआ करते हैं कि, चित्त स्थिर नहीं रहता। जा-इस वचनसे तुमने मुझपर बड़ा आक्षेप किया है। गौतमी-पुत्री ! अब एक मुहूर्तको लज्जा मत करे, ला मैं तेरा यूँघट खोल दूँ जिससे तेरा स्वामी तुझे पहचान ले । ( घूघट खोलती है ) राजा--(शकुन्तलाको देखकर आप ही आप) (८६) शाकुन्तल नाटक। (झझोटी) बारबार दुविधा यहि मनमें । ब्याह भयो की नहीं हमारो, या बालासँग बनमें । ले न सकत नहिं सकत त्याग यहि, लखत न कोइ जतनमें। भोर ओसयुत कुन्द फूलको, जिमि अलि लखत सुमनमें। त्याग न सकत न लेन सकत रस, दशा भई इमि जनमें ( विचारता हुआ स्थित होता है) प्रतिहा०--अहो ! महाराजको धर्मपालकता ! नहीं तो ऐसी स्त्रीरत्नको देख- कर कौन सोच विचार करता ? शार्ङ्गरव--महाराज ! मौन क्यों साध रहे हो ? राजा-हे तपस्वियो ! मैं बारम्बार स्मरण करता हूँ पर सुध नहीं आती कि इस भगवतीसे कब मेरा विवाह हुआ है ? फिर क्षेत्री कहानेसे भय करने- वाला में इस गर्भवतीको किस प्रकार स्वीकार करूँ ? शकुन्तला-( दुःखसे) हाय ! जो मेरे सँग ब्याहमें ही शंका है तो अब मेरी बहुत दिनकी आशा टूटी । ( कलिंगड़ा) "विपत्ति यह कैसी आय छई । बहुत दिननकी आशा मेरी सो सब टूट गई। वज्रसमान दुःख यह गाजो किमि हो शान्त दई । जेहि मुख अमि समान नित वाणी तेहिते अनल जई। यह विपरीत लखत मैं जानो खोटो भाग हुई। ङ्गिरव-ऐसा मत कहो। ( राग ललित) कहो न ऐसी बात नृपति तुम, नेक विचार करो मनलाई (टेक) १ जिस मनुष्य की श्री दूसरेसे गर्भवती है उसे क्षेत्री कहते हैं।

अंक-५. (८७) , जिहि मुनिकन्याको तुम छलकर, दूषित कियो धर्म बिसराई । जोह मुनि बुरो न मान तुम्हारी , मानी सबही भांति भलाई । चोरीवस्तु चोरको जिमि को, सौंपत तिमि निजसुता मठाई । साह बनायो तुम्हे तासुको, मत अपमान करो नृपराई ।। शारद्ध०--शार्ङ्गव ! अब तुम ठहरो, हे शकुन्तला ! हमको जो कुछ कहना था कह चुके और महाराजने जो कुछ कहा वह भी मुन लिया, अब तू ही कुछ प्रतीति करा जिससे महाराजको सुध आवे । शकुन्तला--(दुःखसे मनमें ) जो अब वह प्रेम हो न रहा तो सुध दिलानेसे क्या है ? अब मैं लोकापवादसे कैसे बचूं यह चिन्ता है ( प्रनट) आर्य- पुत्र ! (आधा कहकर रुक जाती है ) जो ब्याहमें ही सन्देह हो तो यह . शब्द अनुचित है। (नट) तुहि न उचित यह पुरुकुलराई। सरलस्वभाव तपोवन में मोहिं, कहि कहि मीठे वचन भुलाई। प्रीत बढ़ाय करी परतिज्ञा, अब काहे धारत निठुराई। "कहि कहि प्यारी निपट लडेती, दोउ भुज भरिभरि कंठ लगाई। वाही मुखते लोककान तजि, भाषत हो मोहि नारि पराई॥" राजा-(कानोंपर हाथ धरकर ) !

है
(८८)
शाकुन्तल नाटक।
पापसे भगवान् बचावे ।
मम कुल और मोहि तू देवी, काहे चहत कलंक लगाई।
जो सरिता मर्याद त्यागनिज,तट अरु तरुवर देत गिराई ।।
वह अपनो ही जल मलीन कर, अपनी शोभा देत बहाई ।।
शकु०-अच्छा, यदि यथार्थमें तुम मुझे पर नारी समझते हो तो जिसपर
तुम्हारा नाम खुदा है पतेके निमित्त वह तुम्हारे ही हाथकी मुंदरी देती हूं
इससे तुम्हारी शका मिट जायगी।
राजा--यह सबसे अच्छी बात
शकुन्तला-(अंगुली देखकर ) हा ! विक् ! मेरे हाथ से अँगूठी कहां गयी ?
(जैजैवन्ती )
अब भलिभांति विधाता रूठो ।
हँसी भई सबभांति हाय हा!
आर्यपुत्र जानों मोहिं झूठो ।
अब कित जाउँ करूं का मैया!
भई यथा भोजन हो जूठो।
( बड़ी व्याकुलतासे गौतमीकी ओर देखती है.')
गौतमी-बेटी ! तैंने शंकावतारके समीप शचीतीर्थमें जल आचमन किया
था, निश्चय ही अगूठी वहां गिरी होगी।
राजा-(हँसकर ) स्त्रियोंकी तात्कालिक बुद्धि यही कहाती है ।
शकुन्तला-यह तो विधाताने अपनी प्रभुता दिखायी पर अभी और भी
पता दूंगी।
राजा-उसे भी सुनूंगा, जो कहोगी।
१ मालनी एक छोटीसी नदी बिजनौरके जिलेमें गंगाजीसे थोड़ी दूर पूरबका
चहांसे दक्षिण ओर हस्तिनापूर १६ कोशके लगभग है, बीचमें गंगाजीके दाहिनी
शक्तावतार तीर्थ है जिसे अब शुक्रताल कहते हैं ।

अंक-५.
(श्रीपट)
शकुन्त०-पिय कछु करहु मनमें चेत ।
एक दिन जब माधवीके लतामण्डप हेत ।
बैठकर तुम नलिनीदलमें पानको जल लेत॥
जा--तब क्या हुआ?
शकुन्तला-ता समय पालित हमारो बालमृग सुखदाय ।
नाम दीर्घ अपांग प्यारे निकट आयो धाय ।।
कही तुम अतिप्यारसे यह तुही जल कर पान ।
पियो नहिं तुमसे महाप्रभु देशको नहिं जान ॥
जब पियायो मैं पियो तब कही तुम अस बात ।
सब कोई निजसंगिजनसे हे प्रिया! पतियात ॥
एक वनके दोउ निवासी दोऊ जन सुखदान ।
भयो हमसों नहीं आगे मृगशिशू पहँचान ॥
राजा इसी प्रकार निज प्रयोजन सिद्ध करनेवाली स्त्रियोंकी बनावटी बातोंसे
कामियोंके मन खिंचजाते हैं।
गौतमी--हे महाभाग ! ऐसी बातें मत कहो । यह तपोवनमें पालीहुई कन्या
छल छिद्र क्या जाने ?
राजा--हे वृद्धतापसी ! सुनो ।
सहज स्वभाव नारि चतुराई ।
सवगुण आकर्षनके
जानत, यद्यपि काहू नाहिं सिखाई ।
पशुपक्षिनकीनारिगुणवती, फिर मनुजनकी कौन चलाई।
दखो कोयल अपने बालक, कागनसे पलवावत जाई ।
पालित होय मिलैं अपने कुल, यह देखी हम रीति सदाई।
शकुन्तला-(क्रोधसे)
(ललित)
हे अनार्य! तुम निजसम सबही, कुटिल हृदय कर जानो।
तृणसे ढके कूप
सम ऊपर, धर्मवेष तुम ठानो ॥

(९०)
शाकुन्तल नाटक.।
तुमसों छलिया कौन होय जग, सत्यवचन नहिं मानो।
अपनायी पुनि दोष लगायी, अब कहँ मोर ठिकानो ॥
राजा-( आप ही आप )
तियको कोप बनावटको नहि, यह मेरे मन आवै ।
यहिते मन सन्देह रह्यो भर, कहुँ चित थिर नहिं पावै ॥
जब मैं कहत ब्याह होनेकी, सुधि मोहिं नेक न आवै ॥
कबहुं इकान्त प्रीतिकी बातें, भई न क्यों भरमावै।
यह सुन भौंह चाय क्रोध कर, लाल नैन कर लीन्हे ।
भौं मरोर इमि मनहुँ काम, धनुके युग खण्ड सु कीन्हे ।
(प्रगट) हे भद्रे ! दुष्यन्तके चरित्र तो प्रसिद्ध हैं तो भी ब्याह विदित
नहीं है।
शकुन्त०-होंगे ! मैं तो स्वच्छन्दचारिणी कहलायी, जो मैंने मुखके मीठे पेटमें
विषभरे इस पुरुवशी राजाकी प्रीतिमें पड़कर अपना हाथ गहाया ( अचलसे
मुख ढाककर रोने लगी)
शार्ङ्गरव-विना विचारे कामकी शीघ्रता इसी प्रकार जलाती है,कहा है किः-
(तिताला-टुमरी)
बिन परखे करिये ब्याह नहीं, यामें भलि बात लखात नहीं।
अनजाने प्रीति जुरात जहां, है वैर सुप्रेम रहात नहीं ।
राजा-क्या तुम इसकी परतीति मान,
यह मुझपर दोष लगाते हों।
शार्ङ्गर-(अवज्ञासे) क्या तुम न सुनी यह उलटी रीत।
जो सज्जनसँग सरसात नहीं ।
छलको जिन नाम न जन्म लियो,
तेहि बात न मानो सत्य कभी।
जिन निजविद्या छल सीखी,
वे झूठे कबहुँ कहात नहीं।
-

अंक-५. (९१) , दुष्यन्त-हे सत्यवादी ! यह तो हमने जाना कि हमारी विद्या ऐसी है, पर यह तो कहो इससे छल करनेसे मुझे क्या मिलेगा। शार्ङ्गरव-घोर विपत्ति । राजा-पुरुबशी विपत्ति चाहते हैं इस बातकी किसीको श्रद्धा नहीं हो सकती है। शारद्व०-हे शाङ्गरव, इस उत्तर प्रत्युत्तरसे क्या है ? गुरुका जो संदेशा था सो सुना दिया, चलो अब लौट चलो ( राजासे )। दोहा-यहै तुम्हारी कान्ता, तुम इसके भर्तार । वशतिनि चाहै तजो, चह कर अंगीकार ॥ आओ गौतमी ! आगे चलो। ( दोनों मिश्र और गौतमी जाते हैं )। शकु०- इन छलीने तो छोड़ दिया क्या तुम भी मुझे छोड़ जाओगे ? ( उनके पीछे चलती हैं) गौतमी--(खड़ी होकर ) पुत्र शारिव यह देखो ! करुणापूर्वक विलाप करती हुई शकुन्तला पीछे पीछे आती है। अब निरमोही पतिके छोड़ने पर मेरी अभागी पुत्री क्या करे ? शाङ्गरव-( क्रोधपूर्वक शकुन्तलाले ) हे भाग्यहीने ! क्या तू स्वच्छन्द- चारिणी होना चाहती है ? ( शकुन्तला भयसे काँपने लगी) शार्ङ्गरव-हे शकुन्तला ! ( चौपाई ) यदि तू है यथार्थमें ऐसी, महाराज भाषत हैं जैसी ॥ तो दूषित पितुघर कह कामा, यदि तू सत्यवादिनी वामा। तो पतिकी बनकर रह दासी, यहां रहन भल त्यागउदासी। पतिके गेह भली सेवकाई, यह सब लोकाचार भलाई ॥ अब तू यहीं ठहर, हम आश्रमको जाते हैं। राजा हे तपस्वियो ! अब इस भगवतीको क्यों वंचित करते हो ? दोहा-चन्द खिलावत कुम्दनी, रविकर कमल प्रकाश । वशी पुरुष परनारिसे, करत न प्रेमविकाश ॥

(९२) शाकुन्तल नाटक। शाङ्गरव-जब कि, आप दूसरेका संग पाकर अपनी पहली वृत्तिको भूल गये तब अधर्मसे भय करनेकी क्या बात है ? राजा-(पुरोहितसे ) मैं तुमसे इस विषयकी भलाई बुरायी पूछता हूँ। दोहा-भयो मूढ मैं वा यही, मिथ्या कहत बनाय । कहो आप भलिभाँतिसे, जहि विधि संशय जाय। तिय त्यागेकर होय अघ, यदि सांची यह नार। नहिं परनारी परसको, पातक लगै अपार । पुरोहित-( विचार कर ) अब तो यह कीजिये। राजा-कृपा कर आप कर्तव्य कहो। पुरोहित-जबतक इसके सन्तान न हो तबतक यह हमारे घरमें रहे, इसके कहनेका कारण यह है कि, बडे २ ज्योतिषी महात्माओंने कह रक्खा कि, आपके चक्रवर्ती पुत्र होगा, यदि वह इस मुनिकन्याके चक्रवर्ती लक्षणवाला जन्मे तो आदरके साथ इसको रनिवासमें लेना, यदि ऐसा न हो तो इसका पिताके समीप जाना निश्चित ही है। राजा--जो गुरुजनोंको भला लगे सो करो। पुरोहित -(शकुन्तलासे ) बेटी ! आ, मेरे पीछे चली आ । शकुन्तला-हे भगवती वसुधे ! मुझें स्थान दे तो मैं समा जाऊं। ( रुदन करती हुई पुरोहितके पीछे पीछे तपस्वियों सहित जाती है, राजा शापवश भूला हुआ शकुन्तलाका ही ध्यान करता है,) ( नेपथ्यमें) बड़ा आश्चर्य हुआ ! राजा-(सुनकर) क्या हुआ ? पुरोहित-(आकर विस्मय पूर्वक ) देव ! बडी अद्भुत बात हुई। रजा- क्या? पुरोहित-देव ! (जैजैवन्ती) कण्वशिष्य जब गेह सिधाये।

अंक-५
(९३
तब वह बालभागनिज निन्दत,
चली रुदन कर बांह उठाये ।
राजा-तब क्या हुआ ?
पुरोहित-तब अप्सरातीर्थके तट इक,
ज्योति लखी तियरूप सुहाये ।
ताहि उठाय गयी उड़ कित जतु,
जान न परी मोहभ्रम पाये ॥
(सब आश्चर्य करते हैं)
दुष्यन्त-भगवन् ! पहले ही हमको यह बात भास गयी थी, अब इसमें तर्क
खोज वृथा है, जाओ घर विश्राम करो।
पुरोहित-(देखकर ) महाराजकी जय रहे ( गया )
राजा-हे वेत्रवती ! इस समय में व्याकुल हो रहा हूँ,विश्रामस्थानका मार्ग बता!
प्रतीहारी--महाराज ! इधर आवें इधर आवें ।
(चलती है)
राजा-( सोचता हुआ)
दोहा-सुधि न व्याहसे निदरितिय, कहिकहि वचन कराल ।
अतिपीडित हो हिय कहत, है वह सांची बाल ॥
( सब बाहर गये )
इति पांचवां अंक पूर्ण हुआ।

(९४)
शाकुन्तल नाटक।
छठे अकका प्रवेशक ।
(स्थान एक गली)
( दो प्यादे और राजाका साला कोतवाल एक बँधुरको लाते हैं।)
प्र०-सिपाही-(बँधुएको पीटता हुआ)
( अंग्रेजी धुन)
बतला तू सच गंवार, मत बात कर हजार ।
कहांसे मिली अंगूठी, ये राजाकी नामदार ॥
कुम्भिलक-( कांपता हुआ)
मुझपर करो दया, अपराध नहीं किया ।
ऐसा नहीं हूं करते हो,मुझको जो मार मार।
प्र० प्यादा-क्या विप्र तू सुजान, राजासे पाय दान ।
मुंदरीकी बात कह नहीं करता हूं तीन चार ।
कुम्भिलक-तुन लो तो पहले बात,धीमर है मेरी जात ।
धोरेही शक्रतीर्थके, जानोजी घर हमार ।
दूसरा प्या०--मुंदरीकी बात बोल, बकता क्यों गोलमोल।
क्या जात पात पूछते हैं, तेरी चोर जार ।
कोतवाल-कहने दो बात सब, रोको न इसको अब ।
दोनों-कहते हैं कोतवाल जो, तू करबे उस प्रकार ।
कुम्भि०-तहँ जाल डार डार, मछरिनको मार मार ।
उनहींको बेंचबाँचके, पालूं मैं घर दुआर ।
कोतवाल-है जीविका भली।
कुम्भिल०-कहिये न ये अजी।
जिसका जो धर्म कुलका, नहिं इसमें कुछ विचार ।
वह योग्य हो अयोग, निन्दाके नहीं जोग ।
पशुवधको सब बखाने, बड़े निर्दयीको कार ।

अंक-६.
(९५)
पै यज्ञमें अनेक, मारे हैं बलके हेत।
क्या विप्रवर्ग बीच. नहीं दयाका प्रचार ॥
कोतवाल-आगेका बोल हाल ।
धीमर-हे दीनके दयाल !
एक रोहू मछली एक दिन, देखी थी पेट फार ।
उसहीके पेट मांह, मुन्दरी मिली ये नाह।
तुम गह्यो बीचसे आय, बात दी बताय ।
उसहीको बेचनेको मैं, आया था इस बजार ।
अब मारो चाहै छोड़ो, जो हो धर्ममें तुम्हार ।
इहि बीच धरो आय, दी बात सब बताय ।
खाता है गोह मांस, आती है इसके वास ।
कुछ पूछ पाछ और भी, जानुक करो सुधार ।
राजाके पास जाय, सब भेद दे सुनाय ।
दोनों-(बहुत अच्छा ) चल बेखटके अब है कहां उबार ।
( सब चलते हैं)
कोतवाल-सूचक नगरके द्वार, तुम ठहरो खबरदार ।
मुंदरीका ब्योरा जबतलक, कह आऊं मैं पुकार ॥
दोनों-अच्छा, जाओ स्वामीको प्रसन्न करो।
( कोतवाल गया)
प्र.-प्यादा-हे जानुक ! कोतवालजीको बडी देर हुई ।
द्वि०--प्यादा-राजाओंके निकट समय से ही जाना होता है।
प्र०-प्यादा--(धीमरको देखकर ) हे जानुक ! इस अपराधीके शिरपर माला
रखनेको मेरे हाथोंमें खुजली होती है ।
धीमर-विना अपराध मेरे प्राण लेनेकी क्यों इच्छा करते हो ?
दूसरा-( देखकर ) यह देखो हमारे स्वामी हाथमें राजशासनका पर
लिये आते हैं, हे धीमर ! अब • या तो तुझे गृध्र खायेंगे चा कुत्तोंका मुख
देखेगा।

(९६) शाकुन्तल नाटक। कोतवाल-हे सूचक ! इस धीमरको छोड दो। अंगूठीका भेद खुल गया । सूचक-जो आज्ञा । दूसरा प्यादा-यह तो यमराजके घरसे लौट आया (बंधन खोलता है ) कुम्भिलक-(कोतवालको प्रणाम कर ) स्वामी ! कहिये; मेरी आजीविका कैसी है ? कोतवाल-अरे ! महाराजने इस अमूठीका मोल और कुछ पुरस्कार भी दिया है ( द्रव्य देता है) कुम्भि०-( हाथ जोडकर और द्रव्य लेकर ) स्वामीने मुझपर बडी कृपा की। सूचक-यह दया नहीं तो और क्या है ? जो तुझे शूलीसे उतारकर हाथीके ऊपर बैठा दिया। जानुक--स्वामी ! पारितोषिकसे जाना जाता है कि वह अंगूठी बड़े मोलकी होगी। कोतवाल--मेरे जान स्वामीने अंगूठीका रत्न तो बड़े मोलका नहीं माना पर उसके दर्शनमात्रसे ही राजाको किसी अपने बड़े प्रिय प्रीतमकी सुध आ गयी । गम्भीरस्वभाव होनेपर भी अंगूठीके देखते ही कुछ देरतक:उदास रहे। सूचक-तो तो तुमने स्वामीकी बड़ी सेवा की। जातुकन्यों कहो कि इस धीमरका बड़ा काम किया । (धीमरकी ओर ईपाकी दृष्टि से देखा) धीमर--क्रोध मत करो, फूलमालाके बदले अंगूठीका आधा मोल तुम्हें भी दूंगा जानुक--तुझे ऐसा ही उचित है। कोतवाल- अरे कुंभिलक ! 'अब तो तू हमारा बडा प्रियमित्र हुआ' तो पहली प्रोतिका साक्षी मदिराको बनाना चाहिये, चलो कलारकी हाटमें चले ( सब गये) ( इति प्रवेशकः) १ प्राणदण्ड देनेके समय अपराधीके गलेमें फूलमाला पहरायी जाती है।

अंक-६.
(राजभवनकी फुलवाड़ी)
(विमानमें बैठी हुई सानुमतीअप्सरा आकाशसे आती है.)
( रोला छन्द)
सानु०-अप्सरतीर्थ माहिं जबतक है स्नानसमय सज्जनको।
तबतक बारी बारी जानो पडै अप्सरागनको॥
सो इसकाजमाहिं तो मैने अब निचिताई पाई।
अब वृत्तान्त राजऋषिको मैं चलकर देखू जाई ।।
अहै मैनका मेरी आली सबविधिसे गुणवारी।
उसके ही सम्बन्ध शकुन्तल मुझे प्राणते प्यारी ।
मुझे मेनका बेटीके हित नृपके नगर पठायो।
( चारों ओर देखकर )
यह वसन्तउत्सवके दिन क्यों नगर उदास लखायो ।
यद्यपि पूछे विना जान लूं गुप्त हेन परकासी।
आज्ञा मान सखीकी पर मैं लखिहौं भेद उदासी ।
इन उद्यान रखानेवालीके समीप अब
जाई।
भेदहेतु मायाके बलसे बैटूं गात छिपाई ।।
( विमानसे उतरकर बैठती है)
(आमकी मंजरीको देखती हुई एक चेरी आती है और दूसरी उसके पीछे)
(चौपाई )
प्र०चेरी-आममंजरी सरस सुहाय ।
हरित पीत कहुँ लाल लखाय ।
है तुहि जीवनमूल वसन्त । है तुहि शोभा सकल कहन्त ।
तेरा प्रथम दरश मैं पाय । विनवतहूं अति प्रेम बढ़ाय ।
ऋतुको हूजे मंगलकारि । रतिपतिकी तू प्राण पियारि ॥

(९८) शाकुन्तल नाटक। द्वि०चेरी-हे कोकिले ! तू आप ही इकली क्या कह रही है ? प्र०चेरी-हे मधुरिके ! आमकी कलीको देखकर कोकिला मत्त होती ही है। द्वि०चेरी-(प्रसन्नतासे समीप जाकर ) क्या वसन्तऋतु आ गयी । प्र०चेरी-हे मधुरिके ! तेरा यह मदविभ्रमवाले मीत गानेका समय है। द्वि०चेरी-हे सखि ! तू मुझे सहारा देकर उचका दे तो मैं पायके अग्र- भागसे खड़ी होकर एक आमकी मंजरी ले लू, इससे भगवान् कामदेवकी पूजा करूँगी। प्रबेरी-जो मुझे पूजाके फलसे आधा दे तो सहारा दूंगी। दूसरी-हे अली ! जो तू यह न कहती तो क्या आधा फल न देती ? कारण कि मेरा तेरा तो एक प्राण दो देह हैं ( सहेलीका सहारा लेकर मंजरी तोड़ती है ) यद्यपि यह आमकी कली अभी खिली नहीं है, तो मी टूट- नेके स्थानसे कैसी सुहावनी महक आ रही है ( अंजली बनाय मंजरी भेटको लेकर) ( वसन्त) हे आममंजरी रसनिधान, रतिपतिको अरपति तोहिं निदान । जेहि अबहिं लियो कर धनुष बान, तेहि पंचवानमें अधिक पथिकन तियके जिय वेध हेतु, तू अधिक बान बन मीनकेतु ॥ (मंजरी अर्पण कर दी) (कंचुकी आता है.) कंचुकी-(रिस होकर )अरी बावलियो! यह क्या करती हो ? महाराजने तो अबके वर्ष वसन्त-उत्सवका होना निषेध कर दिया है फिर तुम क्यों आमकी मंजरी तोड़ती हो ? दोनों-(डरकर ) प्रसन्न हो, हमने यह काम जानकर नहीं किया । मान।

अंक-६.
कंचुकी-तुमने नहीं जाना कि वसन्तके तरुवरोंने तथा उनके आश्रित
पक्षियोंने भी तो महाराजकी आज्ञा मानी है। देखो तो!
(राग बहार)
तुम देखत हो नहीं काहे अरी,
बहुदिनकी लगी कली आमनकी।
नहिं देत परागरही निकरी ॥
कूरेको तरु कलियाय रहो,
विकसी नहिं तनहू मौलसिरी ॥
गइ बीत शिशिर कबकी बगरी,
नहीं अजहूं कोकिल कूक भरी ॥
शंका भोहि आधा बान काढ़ पुनि,
धरत निषंग मनोज डरी ॥
दोनों-इसमें क्या सन्देह है ! यह राजर्षि ऐसा ही प्रतापवान् है ।
प्र०चरी-हे महानुभाव ! कुछ दिनोंसे हम महाराजके साले, मित्रावसुकी भेजी
महारानीके चरणों में आयी हैं, हमें इस कुमुदवनके पालनका कर्म मिला है
इस कारण विदेशी होनेसे हमने यह वृत्तान्त नहीं सुना ।
कंचुकी-अब हुआ सो हुआ फिर ऐसा न करना ।
दोनों-हे श्रेष्ठ ! हमें इस बातके जाननेकी इच्छा है,जो यह हमारे जानने योग्य
हो तो कहो,महाराजने वसन्तोत्सव क्यों वर्ज दिया है ?
सानु०--(आप ही आप ) मनुष्यों को तो सदा उत्सव भला लगता है, इसमें
कोई बड़ा कारण होगा जो ऐसी आज्ञा दी गयी है।
कंचुकी-यह तो सब जान चुके हैं फिर इसको कहनेमें क्या है, क्या
शकुन्तलाके त्यागकी बात तुम्हारे कानों तक नहीं आयी ?
दोनों-हां, राजाके साले के मुख से अंगूठी मिलनेतकको बात हमने सुन ली है ।
कंचु०-तो थोड़ा ही कहना पड़ेगा, सुनो, जब ही महाराजने अंगूठी देखी

(१००)
शाकुन्तल नाटक।
तत्काल कह दिया मुझे सुध आगयी, शकुन्तलाका ब्याह मुझसे एकान्तमें हुआ
मोहसे मैंने उसको त्यागा है, उसी दिनसे महाराज पछतावेमें पड़े हैं.
( बहार)
सुखद वस्तु नहिं कोई सुहावै, मंत्रीवर्ग निकट नहि जावै।
परे रहत सेजनकी पाटी, रातो रात नींद नहिं आवै ।
जब रनवास जाय बतरावत, यदपि चतुरता करि गुहरराव ।
नाम भूलकर कहै शकुन्तला, फेर लजाय शीश महि नावै।
जब जब रहतइकन्त नृपतिमाणि,तब तब नैन नीरभरिलावै।
कहैं कहा नृपको पछितावो,विरहबिथा आत ही तनु तावै॥
सानु०-(आपही आप) यह बात तो मुझे प्यारी लगी।
कंचुकी-इसी दुःखसे महाराजने वसन्तोत्सव वर्ज दिया है ।
दोनों-यह तो उचित ही था।
( नेपथ्यमें)
इधर आइये इधर आइये महाराज !
कंचु०-( कान लगाकर ) अरी ! महाराज इधर ही आते हैं, जाओ तुम
अपना काम करो।
दोनों-अच्छा ( गयीं) ( दुःखियोंकासा वेष किये प्रतिहारी और माढव्यके
साथ दुष्यन्त आता है)
कंचुकी-(देखकर) यह सत्य है, तेजस्वी पुरुष सभी दशामें मनोहर लगते हैं,
यद्यपि हमारे महाराज उदासीमें हैं तो भी इनका दर्शन कैसा मनोहर है ?
(खम्माच)
यद्यपि वाम हाथमें कंकन पहरे एक दुखारे हैं।
शोभित हैं तथापि औरौ सब भूषण राउ उतारे हैं।
तत्ती; श्वासेंसे होठोंकी सूख गयी सब लाली हैं।
नींद नहीं आवे सारी निशि नैन भये अरुणारे हैं।
राजसाज सब दूर किये हैं विरहबिथासे दुबले हैं

अंक-६.
(१०१)
तदपि तेजके कारण देवो शोभा तनपर धारे हैं।
जैसे चढ़ा शानपर हीरा शोभायमान लखाता है।
तैसे तेजमान राजाजी लागत सबै पियारे हैं।
सानुमती-( राजाको देखकर ) अनादर पानेसे भी शकुन्तला इसके वियोगमें
व्यथित हो रही है, सो क्यों न हो, यह इसी योग्य है ।
राजा-(ध्यानमें इधर उधर फिरकर )
(केदारा)
जब ढिग आयी प्राणपियारी
चेतायो चेतो नहिं तूं मन दीन्ही सब विधि तुरत बिसारी।
अब चेत्यो सन्ताप सहन हित, मृगननीके ध्यान मझारी ।
सानुमती-(आप ही) इसीसे उस तपस्विनीके बड़े भाग हैं ।
माढव्प-( आप ही आप ) इनपर शकुन्तलारूपी व्याधि फिर आ गयी, न
जानिये अब इसका उपाय क्या होगा ?
कंचुकी--( राजाके समीप जाकर ) महाराजकी जय रहे, मैं भले प्रकार
प्रमदवनको देख आया, आप अपनी इच्छानुसार उसके विनोद स्थानोंमें
विश्राम करें।
राजा-हे प्रतिहारी ! तुम हमारे वचनले जाकर मंत्रिश्रेष्ठ पिशुनसे कहो कि
कि बहुत काल के जागनेसे हमें धर्म आसनपर बैठनेकी सामर्थ्य नहीं
रही, इसते प्रजासम्बन्धी जो कार्य हो उसे पत्रपर लिखकर हमारे
पास भेज दिया करें।
प्रतीहारी-जो आज्ञा ( गया )
दुष्यत-वातायन ! तुम भी अपने कामपर लगो।
कचुंकी-देवकी जो आज्ञा ( गया )
विदूषक--यह स्थान तो आपने निर्मक्षिक कर दिया, अब शीत और गरमी
का निवारण करनेवाली मनोहर इस प्रमदाकुंजमें बैठकर जी बहलाओ ।
राजा-हे मित्र !आपत्ति छिद्र देखती रहती है, यह कहावत सत्य है कारण कि--
११ अर्थात् यहां मक्खी भी नहीं रही-एकान्त ।

(१०२)
शाकुन्तल नाटक!
(दरबारी कान्हरा)
कहाँ कहा कही न हमसे जाय ।
मुनिदुहिता सँग ब्याह भयो मन मन सुधि दी बिसराय ।
अब सुधि करकर उन बातनकी जिया रह्यो अकुलाय ॥
मिटन न पायो सो भ्रम जबतक मदन पहूंचो आय ।
धनुपर बाण मंजरीको
धर ताकन
लगो कुभाय ॥
मा०-ठहरो तनक कामको सबभय दैहौं अबाहि मिटाय ।
मनसिजके बाणोंको लाठीसे मैं देहुँ गिराय ॥
(लाठी उठाकर आमकी मंजरी तोड़नेको खड़ा होता है)
राजा-( हँसकर ) हां, मैंने तेरा ब्रह्मतेज देख लिया, बता तो मित्र ! अव
कहां बैठकर प्यारीकी उनहारवाली लताओंको देखकर नेत्र शीतल करूं।
माढव्य-क्या स्वामीने चतुरिकाको आज्ञा नहीं दी है, कि हम यह समय
माधवीमण्डपमें बितावेंगे, वहीं मेरे हाथकी लिखी हुई भगवती शकुन्तलाको
चित्रपटी लाना।
राजा--जो वह ऐसा मनोहर स्थान है तो उसीका मार्ग बता ।
माढव्य-महाराज ! इस ओरसे आइये ।
(दोनों चलते हैं, सानुमती पीछे २ जाती है)
माढव्य--जहां मणियोंसे जटित शिलाकी चौकी बिछी है, यही माधवी-
कुंज है, यह ऐसी दीखती है मानो आदरके निमित्त फूलोंका उपहार
देती है, चलो वहीं चलकर बैठिये ।
( दोनों चलकर बैठ गये)
सानुम०-(आपही आप ) मैं भी प्यारी सखीका चित्र इस लतामण्डपकी
ओटमें बैठकर देखूगी और फिर इसके प्रेमकी अधिकाई उससे
जाकर कहूँगी।

अंक-६.
(१०३)
(लताकीओटमें बैठ गयी)
राजा हे मित्र! मुझे अब शकुन्तलाके मिलनेके पूर्व वृत्तान्तकी सब सुधि आ गयी
और मैंने तुझसे भी तो कहा था, परन्तु उसके अनादरके समय तू मेरे
निकट न था और न कभी तैंने उसका नाम लिया सो क्या तू भी उत्ते
मेरी ही भांति भूल गया था ।
माढव्य-नहीं मैं नहीं भूला हूँ, परन्तु सब बात कहनेके पीछे आपने यह भी
तो कहा था कि यह बात हमने निरी जी बहलानेको ही कही थी, यथार्थमें
नहीं, मैंने भी अपनी मूढ बुद्धिसे वैसा ही मान लिया था होनहार प्रबल होता है।
सानु०-( आपही आप ) यह ऐसे ही हैं
राजा-( शोकसे ) मित्र ! मुझे दुःखप्ते छुटाओ।
माढ० महाराज ! यह आप क्या कहते हैं, आपमें यह शोभा नहीं देता,
सत्पुरुष कभी शोकसे कातर नहीं होते, देखो वायुके प्रबल वेगसे भी पर्वत
कम्पित नहीं होते।
राजा-( पहाडी धुन)
वह सुधि कर कर जिय अकुलाय ।
जब प्यारीको त्याग दियो मैं दशा कहूं क्या हाय ।
मैं नहिं तोहिं रख सकत गेह निज तब प्यारी बिलखाय।
चलनेलगी साथियनके सँग तब वे उठे रिसाय ।
ऋषिकुमार गुरुसम जहि मानत बोले क्रोध बढ़ाय ।
चलन अभागी साथ हमारे वही
ठहर मतिआय ।
तेहिछिन आंसू भरि मोहिं देखत खड़ी रही दुख पाय ।
मम कठोर हियमें विष शर सम अब कसकत सो आय ।
वे जलभरे नैन दोउ रोते जियमें रहे समाय ।
फल न मिलो प्यारी पछिताई मोसे नेह लगाय ॥
सानु०-( आप ही आप ) अपना स्वार्थ ऐसा प्रबल होता है, कि इसका दुःख
भी मुझे अच्छा लगता है।

(१०४)
शाकुन्तल नाटक।
माढव्य-मेरे विचारमें तो यह आता है कि उसे कोई आकाशचारी देवता
उठाकर ले गया।
दुष्य--ऐसी पतिव्रताके स्पर्श करनेकी किसे सामर्थ्य है ? मैंने सुना है कि
मेनकासे उसका जन्म है सो मेरे मनमें तो ऐसी भासती है कि उसीकी
सखिये उसे उठा ले गयीं।
सानु --सुधिका भूलना अचम्भेकी बात है न कि सुधिका आना ।
माढव्य--हे मित्र ! जो ऐसा है तो वह शीघ्र मिलेगी।
राजा--तुमने यह कैसे जाना ?
माढव्य-यह कि माता पिता अपनी पुत्रीको बहुत कालतक पतिके वियो-
गमें दुःखी नहीं रहने देते।
राजा-(आलावरी राग)
मित्र कहां मम प्राण प्रियारी ।
जब संयोग भयो प्यारी सँग,
सुपनी ही वा माया भारी ।
अथवा फल मेरे पुण्यनको,
प्रगट मिटो पुनि कियो दुखारी।
अब वह सुख फिर मिलत न दीखत,
इच्छा पड़ी अथाह हमारी ।
तेहि विन अब जीवन धिक मानत,
चहुँदिशि दीख परै अँधियारी ॥
माढव्य-ऐसा मत कहो, देखो अंगूठीही इसका दृष्टान्त है कि खोई हुई वस्तु
फिर मिल सकती है, प्रारब्धले अचिन्त्य समागम भी हो जाता है, दैव-इच्छा
सदा बलवान् है।
राजा-(मुंदरीको देखकर ) यह मुंदरी ऐसे स्थानसे गिरी है जहां फिर
पहुँचना कठिन है इस कारण यह शोच करनेके योग्य है ।

अंक-६.
(१०५)
(पहाडी धुन)
शोचयोग अति यह मुंदरी है।
जहँसे छुटे कठिन ढिग पहुँचत, ऐसे करसे छूट परी है।
अथवा जानपरत इस फलसे, मम समतुच्छ पुण्यनिदरी है ।
अति मनहर नख अरुण उंगरी,पाकर गिरी अभाग भरी है।
सानु-( आपही आप ) जो यह किसी औरके हाथ पड़ती तो अवश्य
इसका खोटा भाग गिना जाता।
माढव्य--मित्र ! यह तो कहो यह मुंदरी किस प्रकार उसकी अंगुली-
तक पहुँची।
सानु०--(आपही आप ) मेरे मनमें भी यही सुननेकी इच्छा थी।
दुष्य-सुनो, जब मैं तपोवनसे अपने नगरको आने लगा तब प्यारी नेत्रोंमें
आंसू भरकर बोली आर्यपुत्र ! अब कब सुध लोगे ?
विदूषक-तब फिर ।
( काफी)
राजा-तब मुंदरी तेहि कर पहराई ।
बहुत भाँति समुझाय बुझायो,
चलत समय यह बात सुनाई।
नितप्रति गिनियो अक्षर याके,
अन्तिम अक्षर जादिन आई।
तब निश्चय मनमें पह करियो,
लै जैहै कोइ आज बुलाई।
हाय ! भयो निर्दयी अधिक मैं,
वह सुधबुध ही सकल भुलाई ।।
सानु०( आप ही आप) मिलनेकी अवधि तो अच्छी रक्खी थी, पर दैवने
बिगाड़ दी।
माढव्य--फिर यह धीवरसे काटी हुई रोहूके पेटमें कैसे पहुँची ?

(१०६) शाकुन्तल नाटक। राजा-जब प्रियाने शचीतीर्थसे आचमनको जल लिया तब हाथसे गंगामें गिर पड़ी। माढव्य-सत्य है। सानुमती-(आप ही आप ) इसीसे तपस्विनी शकुन्तलाके साथ ब्याह- होनेमें अधर्मसे डरकर राजर्षिने सन्देह किया था, परन्तु मुंदरीके देखनेसे इतना अनुराग क्यों हुआ, यह आश्चर्य है। राजा-इसीसे मैं इस मुंदरीको बुरा कहता हूँ। माढव्य-( आप ही आप ) इन्होंने तो उन्मत्तोंका मार्ग ग्रहण किया है । ( देवगिरी) राजा-कोमल अंगुरिनपर तू पहुँची, हे मुंदरी जब सुखसे जाय । तिन्हें त्याग जलमें क्यों पैठी, कैसे काज बन्यो यह हाय । अथवा तू अचेत है तुझको, भल बुरेका क्या है ज्ञान । मैंने चेतन होकर कैसे, प्यारीको कीनो अपमान ॥ माढव्य-(आपही आप ) यह तो पड़े मुंदरीके ध्यान । मैं क्यों देऊँ मँखसे प्रान । राजा-प्यारी तुहि निष्कारण त्यागो, दया करो दरशन दो आन ॥ स्त्री चित्र हाथमें लिये आयी) चतुरिका--महाराज ! यह महारानीका चित्र देखिये ( चित्र दिखाती है ) माढव्य-- मित्र ! यह चित्र बहुत विचित्र बना है, जो भाव जहां चाहिये वैसे बने हैं, इसके नीचें ऊंचे स्थानोंका मेरी दृष्टिको भ्रम होता है।

अंक-६.
(१०७)
सानुमती-अहो इस राजर्षिकी चतुराई ! मुझे सखी चित्रमें ऐसी
दीखती है जानो सामने ही खड़ी है ।
( खम्माच)
राजा-रीति चिनेरोंकी है जो जो वस्तु चित्रके माहीं ।
आय यथारथ सके नहीं तेहि आन भाँति दरशाहीं ॥
याही भाँति चित्रमें मैंने लिखी प्रिया मनभाई।
तदपि रूपकी छबि कुछ कुछ इन रेखोंमें झलकाई ॥
सानु०-(आपही आप ) यह प्रेमके भरे वचन पछतावेके योग्य ही हैं तथा
निरभिमानके भी योग्य हैं।
माढव्य-मित्र ! इसमें तो तीन भगवती दीखती हैं,तीनों ही दर्शन योग्य हैं,
इनमें श्रीमती शकुन्तला कौनसी है ?
सानु०-इसने उस भगवतीको नहीं देखा इस कारण इसके नेत्र निष्फल हैं।
राजा-अच्छा, कहो तो मित्र ! तुम इनमें किसे शकुन्तला जानते हो ?
माढव्य-मैं जानता हूं कि यही शकुन्तला होगी जिसकी वेनी ढीली होकर
बालोंसे फूल गिरते हैं, पसीनेकी बूंदें कपोलोंपर ढलक रही हैं, शरीर कुछ
थकासा है, निराली भांति भुजा फैलाये इस सींचेहुए नयी कोंपलोंवाले
आमके निकट खडी है, इधर उधरकी दोनों सखी होंगी।
राजा-तू बड़ा चतुर है,इस चित्रमें यह मेरे सात्त्विक भावका चिह्न देखो।
दोहा-लगी पसीजी आंगुरी, रेख मलीन दिखाय।
आंसनफीको रँग कियो, गिरे कपालन आय ॥
हे चतुरिके ! अभी इस विनोदस्थानका चित्र पूरा नहीं लिखा गया है,इससे
जा चित्रनिर्माणको सामग्री ले आ ।
चतुरि०-आर्य माढव्य ! जबतक मैं आऊ तुम चित्रपटी लिये रहो ।
राजा-मैं ही तबतक लिये रहूँगा ( चित्र ले लिया )
(चतुरिका गयी)
(राग आसावरी)
राजा-हा प्यारी जब सन्मुख आई।

मृगतृष्णाको
.
(१०८) शाकुन्तल नाटक।
तब कठोरता कीन्ह हिये अस,
सन्मुख सो नहिं बैठन पाई।
चित्रमाहि लखि २ अब प्यारी ।
आदर दे दे थकत न राई।
नदी प्रवाह उतरनेपर जिमि ।
दौरत
जाई ।
सो गति आन भई यह मेरी ।
अब कहा हाथरहे पछताई ॥
माढव्य-( आप ही आप ) महाराज तो नदी उतर मृगतृष्णामें पड़े हैं,
(प्रगट ) मित्र ! अब इसमें क्या लिखना शेष है।
सानु०-( आपही आप ) मेरे जान तो राजा उन स्थानोंको भी लिखेंगे जो
मेरी सखीको प्रिय थे।
राजा--सुनो।
(सुहाग)
अबाहिं यह लिखनको है मीत ।
नवी मालिनि वहै इहि थल सकल भाँति पुनीत ॥
होय बैठे हंस जोड़े तासु रेती तीर ।
हिमालय दुहुँओर शोभित खग मृगनकी भोर ।
तहाँ बैठे हरिन सुखसों करत होहिं जुगाल ।
और चाहत मित्र लिखनो एक वृक्ष विशाल ॥
सूखते हों जासु शाखा मुनिजननके चीर ।
तहां हरिनी लिखू बैठी कृष्णमृगके तीर ।
सींगसे तेहिके रही हो वामनैन खुजाय ।
चित्र में यह सकल बातें लिखों देहुँ बनाय ॥
माढव्य-( आप ही आप ) मैं तो यह चाहता हूं कि इस चित्रपटीको यह
लम्बी दाढ़ीवाले तपस्वियोंसे पूर्ण करदे ।

अंक-६. ( १०९) राजा-मित्र ! शकुन्तलाका एक भूषण लिखनेकी इच्छा थी सो तो रहे ही गया। माढव्य कैसा ? सानुमती-(आपही आप ) जो वनवासी युवतियोंके शेखरके योग्य हो । (आसावरी) राजा-कर्णाभूषण शेष रह्यो है। शिरसफूलको बनो मनोहर, शशिकर सरिस नयो है। केशर जासु कपोलन ऊपर, लटकत आय सुराज लह्यो है। कमल नालकी उरपै माला, लिखनी रही विचार कह्यो है। शरद चन्द्रकी कर सम कोमल, सुन्दर रस जनहित निचयो है। माढव्य हे मित्र ! यह भगवती लाल कमलकी पंखरीके समान हाथसे अपने मुखको छिपाये चकितसी क्यों हो रही है ( विचारपूर्वक देखकर ) आहा ! यह दासीपुत्र फूलोंके रसका चोर भौंरा भगवतीके मुखपर घूमता है । राजा-इस ढीठ भौंरको दूर माढव्य-तुम्हें ही ढीठोंको दण्ड देनेका सामर्थ्य है, तुम्हीं इसे निवारण कर सकोगे। राजा-सत्य कहते हो, अरे फूलवाली लताके प्यारे पाहुने! तू यहां खेद उठा कर क्यों आया है ? दोहा-भौंरी बैठी फूलपै, ताको रही निहारि । मुंखी प्यासी तो बिना, ले न सकत रसवारि ॥ सानु०- यह वर्जन तो बडी उत्तम रीतिका है। माढव्य-यह जात बड़ी ढीठ होती है, समझायेसे नहीं मानती। करो।

(११०)
शाकुन्तल नाटक।
राजा-अरे ! मेरी आज्ञा नहीं मानता ? सुन,
दोहा--नवपल्लव कोंपल सरिस, प्रियके अधर रसाल।
तेहिते रस धीरे लियो, मैं संगमके काल॥
तनकोहू जो तू छुए, अधर अरे अज्ञान !!
कमलनालके उदर तोहिं, बन्द करहुँ इस आन ।
माढव्य--ऐसे कठिन दण्डसे क्यों न डरेगा ! ( हँसकर आपही आप ) यह
तो उन्मत्त होगये हैं,मैं भी इनके संगसे ऐसी ही बातें कहने लगा।( प्रकट)
हे सखा ! यह चित्र है।
राजा-कैसा चित्र?
सानु०--इस समय तो मुझे भी सुध न रही कि, यह चित्र है, फिर राजाको
क्या चेत रहेगा।
राजा--मित्र ! तैंने बुरा किया ।
(पीलूका जिला)
मित्र ! तुम क्यों सुध मोहिं दिवाई।
मैं दरशनको लेत रह्यो सुख इकटक चित्त लगाई।
साक्षात् ठाढ़ी हैं मानों मेरे सन्मुख आई ॥
अब रह गई चित्रकी प्यारी कीजै कौन उपाई।
(आंसू गिरा दिये )
सानु०-( आपही आप ) पूर्वापरका विरोधी विरहका मार्ग निराला है,
इसे सब ओर दुःख ही दीखता है ।
राजा--मित्र ! अब यह पलपलका दुःस्व कैसे सहूं ?
दोहा-नितप्रति कीन्हें जागरन, छूटो स्वप्न मिलाप ।
देखन देत न चित्रको, आंस आंखन ढाप ।
सानु०-- ( आपही आप ) शकुन्तलाके तिरस्कारका दुःख तैंने सर्वथा
धो दिया। (चतुरिका आयी)
.

अंक-६.
(१११)
चतुरिका-(आकर ) महाराजकी जय हो, मैं रंगोंका डिब्बा लिये इधर
आ रही थी।
राजा-तब क्या हुआ ?
जैजैवन्ती)
चतुरि०-मिलीं मारगमें रानी वसुमतीजी,
वो डिबिया रंगकी सब बस्तु छीनी ।
ये बोली मैं हीं दूंगी इसको जाकर ।
माढव्य-तू बचआई मला कैसे यहां पर ।
चतुरि०-महारानीका तबतक सुघर अंचल,
कॅटीले वृक्षमें
उरझा सुकोमल ।
तरलिका हां लगी उसको छुड़ाने,
मैं चटपट आगयी तुमको छुड़ाने ।
राजा-सखा ! मानमें गर्बीली रानी वसुमती आती है, तू इस चित्रको
छिपा रख ।
माढव्य-यही कहो कि मुझे छिपाले ( यह कह चित्रको लेकर उठा ) जब
श्रीमान् रनिवासरूप कालकूटसे छूटें तो मुझे मेघप्रतिच्छन्न भवनसे बुला ले।
(बड़े वेगसे गया)
सानुमती-( आपही आप ) दूसरीमें आसक्तहृदय होकर भी राजा पहली
प्रीतिका निर्वाह करता है, परन्तु विदित होता है कि, पहलेकी अपेक्षा
अब इस रानीमें राजाका थोड़ा अनुराग है ।
( हाथमें पत्र लिये प्रतिहारीका प्रवेश)
प्रतिहा०-महाराजकी जय हो ।
राजा-प्रतिहारी ! तैंने मार्गमें महारानी वसुमतोको तो नहीं देखा ?
प्रति०-हाँ स्वामिन् ! मिली तो थी, पर मेरे हाथमें पत्र देखकर पीछे
लौट गयी।
राजा-रानी समयको जानती है, मेरे काममें विघ्न करनेकी इच्छा नहीं करती।

है
.
(११२) शाकुन्तल नाटक।
प्रतिहारी-महाराज ! मंत्रीने यह विनय की है कि आज भंडारमें बहुत
द्रव्य आनेके कारण उसकी गणनासे अवकाश न मिला, इस कारण नगरका
केवल एक ही कार्य हुआ है, सो इस पत्रमें लिखा है,श्रीमान् देख लें।
राजा-ला, पत्रिका दिखा (प्रतिहारीने चिही दी)
राजा--( बाँचता है) समुद्रमें नाव लेजाकर व्यवहार करनेवाला धनमित्र नाम
सेठ नौका डूबनेसे मृतक हो गया, उसके कोई सन्तान नहीं है, क्या उसका
धन राजकोषमें लिया जाय ? (शोकसे) हाय ! अपुत्र होना बडे दुःखकी
बात है परन्तु जिसके इतना धन था उसके स्त्री भी बहुत होंगी, इससे
पहले यह जानना चाहिये कि, उन नारियोंमें कोई गर्भवती है कि, नहीं ?
प्रति०--हे देव । सुना है कि अयोध्याके सेठकी बेटी जो उसकी स्त्री
उसके इन दिनों पुंसवनसंस्कार हुआ था।
राजा-जाओ, मंत्रीसे कह दो, गर्भका बालक पिताके धनका अधिकारी है ।
प्रतिहा-जो आज्ञा ( जाता है)
राजा-ठहरो तो।
प्रतिहा०-(फिर लौटकर आया)
राजा-इससे क्या ? उसके सन्तान हो या न हो।
( राग प्रभाती)
नगर ढंढोरा मेरे वचनसे जाकर दीजे अबहिं फिराई।
पापीजनके बिना हमारी प्रजाके जो कुल समुदाई।
विधिवश होय वियोग बन्धुके वे अपने सब दुःख मिटाई।
उनकी ठौर मोहिं ते जानें कहदीजो सब भांति सुनाई॥
प्रतिहारी जो आज्ञा यही ढंढोरा होजायगा ।
(बाहर जाकर फिर आया )
प्रतिहारी-योग्य समयकी बरसाके सपान महाराजकी आज्ञाने नगरमें
आनन्द कर दिया है।
दुष्यन्त-( महरी श्वास हे कर ) हा ! जिस कुलमें आगेको सन्तान

अंक-६.
(११३)
नहीं होती, मूलपुरुषके मृतक होते ही योही उसकी सम्पत्ति पराये धर
चली जाती है, इसी प्रकार मेरे पीछे भी पुरुवंशकी राजलक्ष्मी अकालमें
बोयी भमिके समान रह जायगी।
प्रतिहारी-ऐसा अमंगल कभी न हो।
राजा--धिकार है मुझे जो मैंने उपस्थित हुए सुखका तिरस्कार किया।
सानुमः--( आप ही आप ) सखोको हृदयमें करके ही इसने यह अपनी
निन्दा की है, इसमें कुछ सन्देह नहीं ।
(देश)
राजा-मैंने प्यारी
पत्नी त्यागी विना विचार ।
निजकुलकी कल्याणवर्द्धिनी, गर्भवती सुकुमार ।
जैसे फलके समय कृषक कोउ, खेती तजत उदार ॥
सानुम०-( आपही आप )
रहि है वंश अटूट तुम्हारो, सबविधि मंगलकार ।।
चतुरिका-(प्रतिहारीसे)
हाय! सेठकी दुःखकथाने, दीनो कष्ट अपार ॥
महाराजके चितविनोदहित,
करों शीघ्र उपचार ॥
धन प्रतिछन्न भवनले जाकर,
माढव लाउ पुकार ॥
प्रतिहा०-सत्य कही अब मैं जाती हूं,
लाऊं अभी गुहार । ( बाहर गयी)
राजा-हा ! मेरे संशयमें निशिदिन, होंगे पितर दुखार ॥
नृपपीछे विधिसहित पिण्ड तिल कौन देइहै वार ।
निशि दिन अपने मन में राखत, होंगे यही निर्धार ॥
अब तो निज आंसूं धोनेसे शेष रहे जल जोय ।
सुतविहीनके तर्पणजलके पियत होयँगे सोय ॥

(११४)
शाकुन्तल नाटक।
( शोकसे मूञ्छित हो नया)
चतुरि० ( आश्चर्यसे देखकर ) महाराज ! सावधान हो ।
सानुमती--( आप ही आप )
(राग खट)
हा धिक् ! हा धिकू ! महाराजकी,
शोचनीय है दशा अपारी।
जिमि दीपक सन्मुख पट कीन्हें,
दीखन लागत है अँधियारी।
मनम आवत है यह अबहीं,
मेट देहुँ नृपके दुख भारी ।
पर मैं सुनी इन्द्रमाताकी,
कही सखीसे बात उचारी ।
यज्ञभाग अभिलाषी सुरगण,
बेटी ऐसा करहिं सवारी।
थोड़े समय माहिं निजपतिकी,
है है सबविधि नारि पियारी ।
यहि कारण उस शुभ अवसरकी,
चहिये परखन घड़ी सुखारी।
इतना करौं जाय
निज सखिसे,
कहि सब धीरज देहुँ विचारी ।
( उड़ गयी)
(नेपथ्यमें)
(लच्छासाखकी तीसरी चाल.)
कोई मुझे बचाओ बड़ी आपदा मुझपर आयी है।
राजा-(चेत होकर और कान लगाकर )
माढव्यसा ये चिल्लाना, है कोई ह्यां जलदी आना।
प्रतिहारी-( आकर संभ्रमसे

अंक-६.
(११५)
रक्षा कीजे माढवकी स्वामी दुख अधिकाई है।
राजा-किसने अपमान किया है ?
प्रतिहारी-एक प्रेतने पकड़ लिया है ।
घनछन्नभवनके ऊपर रख देता न दिखाई है।
राजा-ऐसा मत हो क्या मेरे भी घर भीतर,
रहते हैं भूतगण आकर ।
अथवा प्रमादवश अपने जिन गति कर्म भुलाई है ।।
फिर वह क्यों जानै ऐसे, प्रजामें कौन है कैसे ॥
( नेपथ्यमें)
हे भित्र ! दौड़ियो चलियो, काहे देर लगाई है ॥
राजा-(सुनता हुआ और वेगगतिसे चलता हुआ)
(नेपथ्यमें)
डरना मत मित्र सयाने, क्यों नहिं इससे भय माने ।
घरकंठ देहको ऐंठत, जैसे ईख पिराई है।
राजा--( चारों ओर देखकर )
कोई धनुष हमारा लाओ,
मत इसमें बार लगावो ।
लिये आती है)
महाराज धनुष यह हंस्तवारयुत धरो दुहाई है।
( राजाने धनुष बाण लिया)
( नेपथ्यमें )
पकड़ा है तुझे अब ऐसे, धरता है सिंह मृग जैसे।
कंठरुधिरकी तेरे प्यास, मुझको अधिकाई है ।।
अब कहां राजा दुष्यन्त, कर्ता है विपतका अन्त ।
वह धनुष बाण धर तुझको, क्यों लेता न बचाई है।
५ जो धनुषकी प्रत्यच्चाकी फटकारसे भुजाको बचानेको पहुँचेपर धारण किया जाता
है उस अत्रको हस्तवार कहते हैं।
यवनी--धनुष

२११६)
शाकुन्तल नाटक।
राजा-(क्रोधसे )रे शवभक्षी अन्यायी!क्या मुझे चिनोती लाई
रह खड़ा मृत्यु तेरी अब पापी धोरे आई है।
(धनुष चढ़ाकर)
राजा-हे वेत्रवती ! सीढ़ियोंका मार्ग दिखलाओ ।
प्रति०-महाराज ! यह मार्ग है ( सब शीघ्रतासे जाते हैं )
( ऊपर जाकर )
राजा-(चारो ओर देखकर ) यहां तो कोई भी नहीं है।
(नेपथ्यमें )
बचाओ महाराज ! बचाओ,मैं तो तुम्हें देखता हूँ तुम मुझे नहीं देखते,
मैं तो बिलावसे पकड़े चूहेके समान अपने जीवनसे निराश हूं।
राजा-हे तिरस्करिणी विद्याके अभिमानवाले ! मेरा अस्त्र तुमको देख लेगा,
देख, अब मैं बाण चढाता हूं।
तुझ पापीको मार जो, द्विजको लेहि उबारि ॥
जैसा हंसा दूधको, जलते लेत निकारि॥
(धनुषपर अस्त्र चढ़ाया )
( माडव्यको छोड़कर मातलि आया )
(आसावरी)
माताल महाराज इन्द्रने इन बागोंको असुर बताये हैं।
उनपर यह छोड़ो बाण वचन सुरराज सुनाये हैं।
मित्रोंके ऊपर नित ही सज्जन दया दिखावै हैं।
अपने हितकारीको सब विध हितकर अपनावै हैं।
राजा-अस्त्र उतारता हुआ ) हे महेन्द्रसारथि मातलि ! तुम भले आये।
माढव्य-( आकर ) हैं, जो मुझे बलिपशुके समान मारता था यह
उसका सत्कार करते हैं।
माताले--( हँसकर) महाराज ! सुनिये जिस कारण इन्द्रने मुझे तुम्हारे
समीप भेजा है।
राजा--कहिये, मैं सुनता हूं।
मातलि--कालनेमिके वंशमें एक दानवोंका समूह बड़ा दुर्जय हो रहा है

अंक-६
(११७)
.
राजा--सत्य है ! यह मैंने पहले ही नारदजीसे सुन लिया है ।
मातलि-
(पूरियाछंद)
तव सखा इन्द्रके पाहीं, नहिं दानव जीते जाहीं।।
तिन मारनहित महाराजा, हो अग्र करो सुरकाजा॥
जेहि सूर्य मकत नहिं टारी, शशि मेटत रात अँध्यारी॥
अब अस्त्र शस्त्र प्रभु बांधो, रथ चढ़ जयकारज साधो ॥
दुष्यन्त-देवेन्द्रने सत्कार देकर मुझपर बड़ा अनुग्रह किया, पर यह तो
कहो, तुमने माढव्यपर ऐसा अत्याचार क्यों किया ?
मातलि--यह भी कहता हूँ, मैंने किसी निमित्तसे आपके मनमें अधिक सन्ता-
पके कारण उदासी देखी इससे क्रोध दिलवानेके निमित्त यह कार्य किया ।
जौलों नहिं काठ हिलाई, तौलों न अगिन धुधकाई ।।
जबतक न सर्प खिझियावै, तबतक नहिं फना उठावै ।।
तैसेहि क्षोभ बिन आये, जन निजमहिमा नहिं पाये।
इहिकारण मित्र सतायो, तुम्हरे मन रोष बढ़ायो ।
राजा-( हौले माढव्यसे ) हे मित्र ! सुरराजकी आज्ञा उलंघन करनेके योग्य
नहीं है इससे यह बात समझाकर हमारी ओरसे पिशुन मंत्रीसे कहो।
दोहा-तबलों निजमतिस करहु, सकल प्रजा प्रतिपाल ।
और काज मेरो लगो, जबलौं चाप विशाल ।
माढव्य-जो आज्ञा ( गया )
मातलि-महाराज ! रथपर चढ़ो।
( दुष्यन्त रथपर चढता है)
सब बाहर गये)
छठा अक समाप्त हुआ।

(११८)
शाकुन्तल नाटक।
अंक-७
(राजा दुष्यन्त और मातलि रथपर बैठे आकाशसे उतरते हैं )
दुष्यन्त-हे मातले ! इन्द्रकी आज्ञा पालन करके भी मैं अपनेको इतने बड़े
सत्कारके योग्य नहीं समझता हूँ, जितना देवराजने मेरा सत्कार
किया है।
माताल--(हँसकर) महाराज ! दोनोंको ही यह सकोच मानता हूं।
दोहा-हे नृप तुमने इन्द्रको, कियो बड़ो उपकार ।
मानत हो तेहिं तुच्छकर, देख इन्द्र--सत्कार ॥
लाख तुम्हरी सो वीरता, सोउ चकित हियमाहिं।
यदपि कियो सम्मान बहु,तदपि गिन्यो कछु नाहिं।
राजा-ऐसा मत कहो, इन्द्रने बिदा करते समय मेरा ऐसा आदर किया कि
जितनेकी मुझे आशा न थी, देवताओंके देखते २ मुझे अपने आसनपर
बैठनेको आधा स्थान दिया ।
( चौपाई)
जाकी आश जयन्त लगाये । ठाढ़ोरह्यो पास सकुचाये ॥
हरिचन्दनसे चर्चित जोई । पारिजातकी माला सोई ॥
सुअन ओर लखि हार मुसकाईहिये उतार मोहिं पहिराई।
यहितें अधिक कौन सत्कारा । देवराज जो कीन्ह हमारा॥
मातलि--महाराज ! देवताओंसे आप किस किस सत्कारके योग्य नहीं हो ।
दोहा-सुरपुरके द्रोही किये, कण्टक दूर नृपाल ।
अब तुम्हरे शर पूर्वमें,नरहरिनखन कराल॥
राजा--मुझे इस यशकी प्राप्ति देवराजके प्रभावसे ही हुई है।
दोहा-आज्ञाकारिन हाथसों, बनत बड़ो जब काज।
तो माहिमा सो स्वामिकी, समुझि परत सब साज ॥

अंक-७
(११९)
अरुण सकत नहिं दूरिकर, रजनीको आँधियार ।
यदि न देत निजसामुहे, आसन सूर्य उदार ॥
मातलि-सत्य है ( कुछ दूर चलकर ) हे महाराज ! इस ओर तनक दृष्टि
कर स्वर्गतक पहुँची हुई अपने यशकी महिमाको देखो ।
दोहा-अंगराग सुरतियनतें, रंग बच्यो कछु जोय।
तासों सुरगण लिखत हैं, प्रभुचरित्र तव सोय ॥
पत्तनपर सुरवृक्षके, : मधुरे छन्द बनाय ।
लिख लिख राखत प्रेमसौं,लखहु नरेश सुभाय॥
राजा हे मातलि ! दानवोंके मारनेके उत्साहमें प्रथम दिन इस ओरसे गमन
करते हुए हमने स्वर्गमार्ग भलीभांतिसे नहीं देखा था, कहो तो इस समय
हम वायुके किस मार्गमें चलते हैं।
जैजैवन्ती)
मातलि-महाराज यह मार्ग वही है।
बहत जहां नभगंग सुहावन,
ऋषिमंडल गति वर्त्त रही है।
परिवह पवन पंथ यह पावन,
शाक्तयुक्त जहि ज्योति गही है।
विक्रमरूप ईशके दूजे,
पगसे पावन ख्याति लही है ।
निज रश्मिनसे सबहि घुमावत,
ज्योतिर्गणको बात सही है ॥
१ पुराणोंके मतसे आकाशके विभागमें सात पवन चलते हैं । भूलोकका विस्तार सूर्य
तक है। इसमें आवह पवन चलता है। वही अन्तरिक्षमें बहकर मेघ, बिजली और उल्कापा-
तको प्रकट कर चलता है।शेष छः मार्गमें हैं। पहले स्वर्ग में प्रवह सूर्यको चलाता है, संवह
चन्द्रमाको धुमाता है, उद्वह नक्षत्रोको धुमाता है,सुवह सातों ग्रहोंको चलाता, विवह सप्तर्षि
और स्त्रगंगाको धारणकर चलाता है और परिवह ध्रुवको धारण किये है।

(१२०) शाकुन्तल नाटक । राजा--हे मातलि ! इसीसे मेरा आत्मा भीतर बाहरकी इंद्रियों सहित प्रसन्न- ताको प्राप्त हुआ है ( पहियोंको देखकर ) अब हम स्वर्नमें मेवोंके मार्गमें उतर आये। मातलि-यह महाराजने कैसे जाना ? ( राग झंझोटी) राजा-देखो यह प्रत्यक्ष लखायी। अरनमार्गसे निकासिनिकसि यह, चातक पक्षी रहे उड़ायी । चमकत अंग इन्द्र घोड़नके, विद्युतसे देखहु मन लायी। भीजरहे सब रथके पहिये, कहेदेत जनु हमें बुझायी जलसे भरे मेघ पथमाहीं, चलो जात यह रथ सुखदायो । मातलि-अभी महाराज क्षणभरमें अपने राज्यकी भूमिमें पहुँचते हैं । राजा-( नीचेको देखकर ) वेगसे उतरनेमें मनुष्यलोक आचर्य सा दीखता है । (जैजैवन्ती-प्रभाती ) यह शोभित नरलोक मनोहर ऊपरसे इमि देत दिखायी । शैलशिखर यह लगत उठतसे नीचे भूमिहि खसत लखायो । पातड़केसे रहे रूखजे तिनके कंध लगत निकसायी । रेखामात्र लखात नदी जेते अब दीखत ह अधिकायी । बूमण्डल इमि निकट हमारे आय रह्यो देखहु मन लायी। मानो केहु वीरको फेको आवत है हमरे समुहायी । मातलि-आफ्ने मला देखा ( भूमिकी ओर देखकर ) अहो ! भूमि कैसी मनोहर दीखती है।

अंक-७. (१२१ राजा--हे मातलि ! कहो तो पूर्व और पश्चिम सागरके बीच यह कौनसा पर्वत है जिसमें संध्याके मेघसे अनलाके समान सुनहरी धारा निक- लती दीखती है। मातलि-यह किन्नरोंका हेमकूट नाम पर्वत तपस्याका सिद्धक्षेत्र है। दोहा-ब्रह्मा पौत्र मरीचितुत, सुरासुरनके तात ॥ पत्नीसहित प्रजापती, तपत यहां सुख पात ॥ राजा--तो कल्याण प्राप्त करनेके निमित्त यह समय न चूकना चाहिये, ऋषिराजको प्रदक्षिणा करके चलना चाहिये । मातलि-यह विचार बहुत श्रेष्ठ है ( दोनों उतरते हैं) राजा--(आश्चर्यसे) ( चौपाई ) पहियन शब्द न परयो सुनायी।उठीधूरि नहिं परी लखायो। उतरन रथ नेकहु नहिं जानो । अद्भुत रथप्रभाव हम मानो ॥ मातलि-महाराज ! आपके और इन्द्रके रथमें इतना ही अन्तर है । राजा--हे मातलि ! कश्यपजीका आश्रम कहां है ? मातलि-(हाथसे दिखाकर ) ( राग खट) जह वह अचल ढूँठ सम मुनिइक,रविसम्मुख लौरहो लगायी। चढ़ि आई आधेतन बांबी, सर्पकेंचुली हिय लपटायी ॥ सूखी लतापरी गलमाहीं, पीडा करत मन अधिकायी। शीशजटामें वनपक्षिनने, अपने लीन्हें नीड बनायी ॥ वही आश्रम कश्यपजीको, जो सुर नर मुनिके मुखदायी ॥ राजा--ऐसे कठिन तप करनेवालेको प्रणाम है। मातलि-( घोडोंकी रास खींचकर )हे: महाराज ! अब हम अदितिके सींचे हुए मन्दार वृक्षोंसे शोभित प्रजापतिके आश्रममें आ गये हैं।

(१२२) शाकुन्तल नाटक। राजा-यह स्थान तो स्वर्गसे भी अधिक शांतिदायक है, इस समय तो मैं भी मानो अमृतकुण्डमें स्नान कर रहा हूं। मातलि-( रथको रोककर) महाराज ! अब उतरें। राजा-( उतरकर ) हे मातलि ! तुम रथको छोड़कर कैसे चलोगे ? मातलि-इसका मैंने यत्न कर दिया है, यह यहीं खड़ा रहेगा, मैं भी उतरता हूं (उतरकर) महाराज ! इस ओरसे आइये ( घूमकर ) यह महर्षियोंकी तपोवनभूमियें हैं, महाराज इनका दर्शन करें। राजा-मैं आश्चर्यसे देखता हूँ। ( दोहा) करत और मुनितप अधिक, जेहिं थल पावन आस ।' इन्द्रियसुख तज जपत तहँ, यह ऋषि मुनिकर वास ॥ कल्पवृक्षवनकी पवन, पीकर राखत प्रान ॥ अवसर भलो मुनीनको, सब विधि मन सुखदान ॥ कनक कमल रजसे सुभग, पीत सलिल सुखदाय। धर्मक्रिया अभिषेक हित, अँह नित मिलत सुहाय ।। रत्नशिलापर बैठकर, साधत मुनि जन ध्यान ॥ यहां अप्सरन निकट हू, इन्द्रियवशी महान ।। तहां तपत ह्यां मुनि सकल, हरिसे ध्यान लगाय ।। अहो ! धन्य में धन्य अति, इनके दर्शन पाय ॥ मातलि-सत्पुरुषोंकी अभिलाषा सदा उन्नत रहती है ( इधर उधर घूमकर आकाशकी ओर ) हे वृद्धशाकल्य ! कहो भगवान् कश्यपजी इस समय क्या कर रहे हैं ?-क्या कहते हो, कि दक्षसुताने जो पतिव्रतधर्म पूछा था वह उनको और ऋषिपत्नियोंको सुना रहे हैं। राजा-( कान लगाकर) मुनियोंके समीप अबसरसे जाना उचित है। माताल-( राजाकी ओर देखकर ) महाराज ! तबतक इस अशोक वृक्षकी छायामें ठहरें, जबतक मैं समय देखकर इन्द्रके पितासे तुम्हारे आनेका संदेशा कहूँ।

अंक-9.
(१२३)
राजा-जैसा तुम्हें भला लगे ।
मातलि-महाराज! मैं जाकर कार्य करता हूँ।
राजा-(शकुन देखकर)
(परज)
काहे फरकत बाँह वृथाहीं ।
प्यारीरूप मनोरथ मेरो, ताकी आश रही कछ नाहीं॥
जब सम्मुख आये कोइ सुखको,करै निरादर दुख इमिपाहीं॥
(नेपथ्यमें )
अरे ! चपलता मत करें, क्यों अपनो बान नहीं छोड़ता ?
राजा-( कानपर लगाकर ) यह स्थान तो विनयका है, यहां चपलता
करनेका किसको निषेध हो रहा है (शब्दकी ओर देखकर आश्चर्यसे) अहा !
यह बड़ा पराक्रमी किसका बालक है जिसे दो तपस्विनी रोक रही हैं।
(चौपाई)
आधो पियो मात थन जाने,सिंहनिसुतको मनहिं न माने।
गहि कर केश घसीटत ताही,क्रीडाहित को बालक आहो।
(सिंहके बच्चको घसीटता एक बालक आया और दो तपस्विनी उसे बरजती
हुई आयीं)
बालक-अरे सिंह ! तू अपना मुख खोल, मैं तेरे दांत गिगा।
पहली.तपस्विनी-
( अंग्रेजी बालशकी धुन)
कही मान मेरी हे लाल, तज यह चंचलताकी चाल ।
पशू सतावत क्यों अविनीत, हम बालकसी राखें प्रीत ।
हाय बदै साहस नित तेरा, बड़ी डिठाईने तोहिं घेरा ।
इसीसे तो ह्यांके मुनि जन, तुझे कहैं हैं सर्वदमन ।
मत इसके मुखमें कर डाल, तज यह चंचलताकी चाल॥
राजा-(आपही आप)
इस बालककै लख शुभ गात,
औरससुत सम नेह लखात ।

शरीर,
(१२४)
शाकुन्तल नाटक
सो कछ कारण परत न जान,
अथवा मैं हूं विन सन्तान ।
तासों उपजत नेह
द्वि० तपस्वी तजै न जो मृगशिशुको वीर ।
दौड़ेगी सिंहिन तत्काल । तज यह०॥
बालक-( मुसकाकर ) सत्य कहो हो वचन सुघर,
मुझे सिंहिनीका क्या डर।
(मुंह चिढ़ाता है)
राजा-यह तेजस्वीकी सन्तान,
दीखत बालक वीर महान ।
ठाढ़ो ऐसे परत लखाय,
जलती अगिनि काठ जिमि चाय ।
हरि हर इसपर रहै कृपालु । तज यह ॥
प्र० तपस्वि०-प्यारे छोड़ सिंहशिशु नेक,
तुझे खिलौना दूंगी एक ।
बालक-अच्छा लाओ खिलोना अब-( हाथ फैलाता है
राजा-इस बालकके लक्षण सब ।
चक्रवर्तिस परतलखाय,अद्भुतता कछु कही न जाय।
है अपूर्व रेखनको जाल । तज यह० ॥
जबहिं पसारयो यानै हाथ, जालगुथी अँगुरी इक साथ ।
खिले कमलसम परीदिखाय,प्रातअरुणकछुदियो खिलाय ।
पृथक भई नहिं घडेरी जाल, ऐसी शोना करत प्रकाश !
दोऊ बांह बनी बिशाल । तज यह० ॥
दूसरी-हे सुत्रता! यह बालक बातोंसे न मानेगा,जाओ, मेरी कुटीसे ऋषि-
कुमार मार्कण्डेयके खेलनेका एक मृत्तिकाका चित्रित मोर धरा है उसे
ले आओ।
प्र० तप०मैं अभी लिये आती हूँ, (गयी)

अंक-७.
(१२५)
बालक-तबतक मैं इसी सिंहके बच्चेसे खेल करूँगा।
(यह कहकर तापसीकी ओर देखकर हँसता है)
राजा-(आपही आप ) इसके खिलानेको मेरा जी कैसा करता है ?
(राग कलिंगड़ा )
मोद देत बालनके खेलन,
खिलखिलात जब कुन्दकली सम,
विकसत दन्तपंक्ति अतिपावन ।
विना बात हँस वचन तोतरे,
बोलत डोलत इत उत छिन छिन ।
धाय धाय कर परत गोदमें,
प्यारी बातें लगत सबहि मन ।
अहो धन्य ! वे मात पिता अति,
जो इस बालकको करें लालन ।
गोद उठाय बालके तनुकी,
धूरिनसे मलीन कर निजतन ।
द्वि० तपस्वि० --अच्छा, यह मेरी बातपर तो कान नहीं धरता ( इधर
उधर देखकर) ऋषिकुमारोंमेंसे यहां कोई है ? (गजाको देखकर ) हे
महानुभाव ! तुमहीं यहां आओ, इस बली बालकके हाथसे कृपा कर सिंहके
बच्चेको छुड़ाओ, यह ऐसा इसमें मग्न हो रहा है कि इस बालमृगेन्द्रका
छुड़ाना कठिन हो रहा है।
राजा-(निकट जाकर और हँसकर ) हे महर्षिपुत्र !
(राग खट)
आश्रमके विरुद्ध यह तुमने क्यों सीखे आचरण दुलारे।
पशुरक्षा है धर्म तपस्विन काहे पुरुषर वचन बिसारे ।
जैसे बालसर्प चन्दन तरु दूषित करत न ज्ञान सम्हारे ।
तैसे तुमने कियो तपोवन त्यागो यह अनरीति पियारे॥
द्वि तपस्वि०- हे महाभाग ! यह ऋषिकुमार नहीं है ।

(१२६) शाकुन्तल नाटक। राजा-सत्य है, यह तो इसका आकार और चेष्टा ही कह देती है । परन्तु तपोवनमें रहनेके कारण मैंने इसको ऋषिकुमार जाना था, (मनकी लालसाके अनुसार बालकका हाथ हाथमें लेकर आपही आप) (राग देश) अहा ! जनु कोह कुल अकुर यह बालक । जाके छुए मोहिं सुख ऐसो, तेहि सुख कैलो जो एहि बालक । निश्चय मात पिता बड़भागी, जिनके अंग भयो खलशालक ॥ तपस्वि०-( दोनोंकी ओर देखकर ) बड़े आश्चर्यकी बात है। राजा--तुमको क्या आश्चर्य हुआ ? तपस्वि०--इस बालककी और तुम्हारी उनहार बहुत मिलती है, इससे मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ है कि तुम्हें बिना जाने भी इसने तुम्हारी बात मान ली। राजा-(बालकको खिलाता हुआ) यदि यह ऋषिकुमार नहीं तो किसके वंशका है ? तापसी--यह पुरुवंशी है। राजा--( आपही आप ) यह हमारे वंशका किस प्रकार है और इस भग-- वतीने इसीसे मेरी इसकी उनहार मिलती बतायी है। हां, पुरुबशियोंमें यह रीति तो अवश्य है कि-- ( चौपाई ) प्रथम भूमिपालनके कारन, करत गृहस्थआश्रम धारन । तहँ सबविधि कर भोगविलासा,पाछे वनतरुतरकर वासा। तहँ इन्द्रियसंयम कर भारी, जपहिं निरन्तर ब्रह्म विचारी। (प्रगट ) पर यह थल ऐसो है नाहीं, बलसे नर आसकत न ह्यांहीं। दूसरी त०--यह तुमने सत्य कहा, एक अपतराकी पुत्री होनेके कारण इसकी माताने देवताओंके गुरुके तपोवनमें इस बालकको जन्मा है।

अंक-७. (१२७) राजा-(आपही आप ) अहो ! यह दूसरी बात आशाकी प्रगट करनेवाली हुई (प्रगट ) तो वह भाग्यवान् इसकी माता किस राजर्षिकी स्त्री है ? द्वि० ० तप०-जिसने अपनी धर्मपत्नीको विना अपराध त्याग दिया है उसका नाम कौन लेगा? राजा--(आपही आप) यह कथा तो मुझीपर लगती हैं, अच्छा इस बालककी माताका नाम तो पूछू ( सोचकर ) अथवा परायी स्त्रीका वृत्तान्त पूछना अनरीति है। ( तपस्विनी मिट्टीका मोर लिये हुए आयी ) प्रतपस्वि०- हे सर्वदमन ! यह शकुन्तलावण्य देख । बालक-( बड़ी लालसासे देखकर ) मेरी माता शकुन्तला कहां हैं ? दोनों त०- यह माताका प्रिय नामकी समानतासे वंचित हो गया। दूसरी त०-वत्स ! मैंने तो यह कहा था कि इस मट्टीके मोरकी सुन्द- रता देख । राजा-(आपही आप ) क्या इसकी माता शकुन्तला है, अथवा एक नामकी अनेक होती हैं, अथवा मृगतृष्णाके समान मुझे दुःख देनेको वह नाम उच्चारण किया हो ? बालक-(खिलौनेको लेकर )यह मोर मुझे बहुत अच्छा लगता है। प्र०तपस्वि०-(देखकर व्याकुलतासे ) हाय ! हाय ! इस बालककी बांहसे रक्षाबंधन कहां गया ? राजा-व्याकुल मत हो, जब यह सिंहके बच्चेसे खेल रहा था तब इसके हाथसे गंडा गिर गया सो यह पड़ा है ( गंडा उठानेको हाथ बढ़ाया) दोनों त०-हैं हैं इस गण्डेको छूना मत, अहो ! इसने तो उठा ही लिया । ( दोनों अचंभेसे हृदयपर हाथ धर परस्पर देखती हैं) राजा-तुमने मुझे इसके उठानेका निषेध क्यों किया ? द्वि०तपस्वि--सुनिये महाराज ! यह अपराजिता नाम महौषधि इस बाल- कके जातकर्मके समय महात्मौ मरीचिके पुत्र कश्यपजीने दी थी, इसको यह बालक और इसके माता पिताको छोड़कर कोई नहीं उठा सकता।

(१२८) शाकुन्तल नाटक) ? हैं, राजा-और जो कोई उठा ले ? प्रत-तो यह सर्प बनकर उसे डसे। राजा-कभी तुमने इसका प्रभाव देखा दोनों-अनेक वार। राजा-(प्रसन्न होकर आपही आप ) अब मनोरथ पूर्ण होनेसे मैं क्यों न आनन्द मनाऊं (बालकको आलिंगन करता है) दूसरी त०-आओ सुव्रता ! यह सुखसमाचार शकुन्तलाको सुनावें, वह बहुत कालसे वियोगके कठिन नियम कर रही है । (दोनों गयीं) बालक-मुझे छोडो मैं अपनी माके पास जाऊँगा । राजा--हे पुत्र ! तू मेरे संग चलकर अपनी माताको सुखी कर । बालक-मेरे पिता तो दुष्यन्त तुम नहीं हो । राजा- (मुसकाकर) यह विवाद भी मुझे विश्वास कराता है। (एक वेणी धारण किये शकुन्तला आयी) शकुन्तला--(आप ही आप) विकारके अवसरमें भी सर्वदमनके गंडेने रूप न पलटा यह सुनकर मुझे अपने भाग्यमें आशा नहीं है, अथवा यदि सानु- मतीका कथन सत्य हो तो यह संभव है। राजा--(शकुन्तलाको देखकर) अहा ! यही प्यारी भगवती शकुन्तला है । ( सोहिनी) अहा! यही मम प्राणपियारी। नियम करत बीते बहुतै दिन, दूबर अंग भई मुकुमारी। मलिन वसन तनपर तिय पहरे, शीश जटा इक बेनी धारी। अपने शील स्वभाव सतीव्रत, कर कर सहत विरहदुख भारी। मुझ निर्दयी कठोर हिये हित, रोगिन जोगिन बनी विचारी। ।

अक-७.
(१२९)
शकुन्तला-(पछतावेसे विवर्णमुख राजाको देखकर ) यह तो आर्यपुत्रसे
नहीं हैं और नहीं तो कौन हैं, जिसने रक्षाबन्धन पहरे हुए मेरे बालकको
अङ्ग लगाकर क्षित किया ?
बालक-(दौड़ता हुआ माताके समीप जाकर ) मैया ! यह कौन पुरुष है. जो
मुझे पुत्र कहकर गोदमें लेता है ?
राजा-प्यारी ! मैंने तुम्हारे सङ्ग निष्ठुरता तो की परन्तु इसका फल अच्छा
हुआ जिससे मैं देखता हूँ कि तैंने मुझे पहचान लिया ।
शकुन्त-( आपही आप ) हे मन ! धीरज धर, धीरज धर, अब मुझे
विश्वास हुआ कि दैवने ईर्षा त्यागकर मुझपै दया की, यह निश्चय मेरे ही
स्वामी हैं।
राजा-हे प्यारी !
(सोहनी)
सुधि आई मिट गयो सकल भ्रम मेरो भारी।
सफल भये मम काज धन्य यह घड़ी पियारी ।
सन्मुख भेंटी आज प्रिया जीवनधन मेरी ।
ग्रहण होत जब दूर मिटत तेहि सकल अँधेरी ।
तबहिं चन्द्र टिग आयके करत रोहिनी योग ।
तैसेहि पाई में प्रिया मिटे सकल दुखयोग ।
(धन्य दिन आजको)
शकुन्तला--महाराजकी ( इतना कहकर गद्गद्वाणी होती है, आंसू
गिरते हैं)
राजा-प्यारी लीन्हों जान शब्द तुम जय उच्चारी।
रुकी कण्ठमें आय प्रेमवश नैन तिहारी ।
पर अब शंका नाहिं सबहि विधि मैं जय पाई।
सुमुखि ! तुम्हारे दरश भयो अतिसरस सुहाई।
अंगरागसे रहित यह अधर तिहारे लाल ।
दर्शन कर मनमें भयो मेरे मोद विशाल ।

(१३०)
शाकुन्तल नाटका
(धन्य दिन आजको)
बालक-हे माता ! यह कौन पुरुष है कहो विचारी।
शान्त बेटा अपने पूछ भाग्यसे कथा हमारी (आंसू भर लिये)
राजा-(शकुन्तलाके पैरों में गिरता है)
मनते प्यारी दूर करो अपमान हमारो ।
वा छिन मेरे हिये रह्यो अज्ञान अपारो।
बहुतनकी यह होत गति तामसवश सुखवार ।
फेंक देत अहिजान जिमि अन्धदिये गलहार ।
(क्षमा कर दीजिये)
शकुन्त०-उठो प्राणपति! उठो न कुछ अपराध तिहारे।
पूर्वजन्मके पाप उये तिन दिनन हमारे ।
शुभकर्मन फल भेंट तुम्हें निर्दयी बनायो ।
तुम्हरे मनसे दया दूर कर अहित करायो।
( राजा उठता है)
मुझ दुखियाकी सुधि तुम्हें फिरि किमि भई नरेश।
कहो मुझे समझाय सब, मेटहु कठिन कलेश ।
( नराखो गोयकर)
राजा-जब हियरेसे सकल विरहदुख जाय पराई ।
तब सब कहिहाँ प्रिया तोहि मैं कथा बुझाई ।
तेरे अँसुअन बूंद परी जो अधरन आई ।
लखि अनदेखी करी हिये अतिशय भ्रम पाई।
सो पछितायो आज मैं प्यारी लेहुँ मिटाय ।
पोडूं इन अँनुआन जो रहे पलकलौं छाय।
( आंसू पोछता है, निकट
मुख
कीजिये)
शकुन्त०-- राजाकी अंगुली में मुंदरी देखकर )
क्या यह भुंदरी वही विपति जेहि मोहिं दिखाई।

अंक--.
राजा-हां प्यारी यहि लखल मोहिं तेरी सुधि आई।
शकुन्त--स्वामीको परतीत करन हित जब मन आनी।
तब यह दुर्लभ हुई करी अतिशय हित हानी।
राजा हे प्यारी अब फिरि इसे करमें लीजे धार ।
जैसे ऋतु आगमनमें लता फूल गुणवार ।
( तुम्हें लागत भली)
शकुन्तला-मुझे इसका विश्वास नहीं रहा, तुमहीं पहने रहो।
( मातलि आया )
मातलि--आज बड़े भाग्यका समय है, कि आपने अपनी धर्मपत्नीको पाया
और पुत्रका मुख अवलोकन किया ।
राजा-हां, आज मेरा अनिर्वचनीय मनोरथ सफल हुआ, हे मातलि ! यह
तो कहो कि यह वृत्तान्त इन्द्रको विदित था कि नहीं ?
माताल-( मुसकाकर ) देवताओंसे क्या छिपा है ? अब आए आइये, महा-
नुभाव कश्यपजी आपको दर्शन देंगे।
राजा--प्यारी शकुन्तला पुत्रका हाथ पकड लो, तुमको आगे करके महर्षिके
दर्शनकी इच्छा करता हूं।
शकुन्तला-महाराजके संग गुरुजनोंके समीप जाते मुझे लाज लगती है।
राजा-ऐसे शुभकालमें यह करना उचित ही है।
( संग चलते हैं)
( आसनपर बैठे कश्यप और अदिति दिखायी दिये)
कश्यप-(राजाको देखकर ) हे दक्षसुता !
(चौपाई)
अग्रगामि तब सुवनसेनको, सुरगणके अवलम्ब देनको ॥
भूपति नृप दुष्यन्त यही है, एहि धनुको परताप सही है।
जाको प्रबल चाप शर पाई, नाममात्र हरि वज्र रहाई॥
अदिति इमि महिमा नृपके अनुरूपा,
कहत स्वामि जेहि सुरगण भूपा ॥

(१३४)
शाकुन्तल नाटक।
मुद्री लखत चेत मन आयो ।
तव कुलको अपराध कियो मैं,
सो कैसे अब जात मिटायो।
कश्यप-हे पुत्र ! तुम इसमें अपने अपराधी होनेकी शंका मत करो । तुममें
स्वाभाविक मोह नहीं हुआ था, सुनो।
राजा-मैं सावधान होकर सुनता हूँ।
कश्यप--अब मेनकाने अप्सरातीर्थपर जाकर शकुन्तलाको बहुत व्याकुल
देखा तो उसको लेकर अदितिके निकट आयी, उसी समय मैंने ध्यानसे
जान लिया था कि, निःसन्देह दुर्वासाके शापके कारणसे ही राजाने अपनी
तपस्विनी सहधर्मिणीको त्यागा है, और उस शापकी अवधि मुद्रीके
देखने ही तक थी।
राजा-(वेगसे ) मैं धर्मपत्नीत्यागके अपवादसे छूट गया ।
शकुन्तला-( आपही आप ) भाग्यकी बात है कि, पतिने मुझे जानबूझकर
नहीं त्यागा.परन्तु मुझे यह सुधि नहीं कि, शाप कब हुआ ? अथवा विरहसे
शून्यहृदय होनेके कारण वह शाप मैंने न जाना, इसीसे मेरी सखियोंने
मुझे जता दिया था कि अपने स्वामीको अंगूठी दिखा देना ।
कश्यप-बेटी ! अब कृतार्थ हुई अपने स्वामीका अपराध न समझना ।
(राग कान्हडा)
तेरे पतिने होय शापवश तोहिं न जानकर त्यागी।
सो सब मिटो महाभ्रम भामिनि अब तू भई सभागी।
जिमि मलीन दर्पणके कारण परत न बिम्ब दिखाई।
पुनि तेहि स्वच्छकिये सब दीखत तिमि तूभई सुहाई।
राजा-जो आपने कहा सो सत्य है।
कश्यप-बेटा ! जिसके हमने विधिपूर्वक जातकर्मादि संस्कार किये हैं उस
शकुन्तलाके उदरसम्भूत इस अपने पुत्रका तुमने अभिनन्दन किया ।
राजा-भगवन् ! इससे तो मेरे वंशकी प्रतिष्ठा है।
कश्यप-तुम निश्चय जानो कि, यह बालक चक्रवर्ती होगा ।

अक-७.
(१३५)
कहूं सकै गति नहीं जासुकी चढ़ ऐसे रथमाहीं।
वीरपुत्र तव सात दीप जे सागर पार कहाहीं।
तिनको जीत प्रयास बिना ही अपने वश कार लावै।
सर्वदमन जिमि यहां दुष्टपशु दमनहेतु कल लावै ।
तैसेहि प्रजा भरण पोषण कर भरत नाम यह पावै ।
युग युग कीरति चले पावनी आगमहू गुण गावै ॥
राजा-जिसके आपने संस्कार किये हैं उससे सब प्रकारकी मुझे आशा है।
अदिति-हे भगवन् ! आज इस बेटीके मनोरथ सिद्ध हुए, इससे इसके पिता
कण्वको भी यह समाचार पहुँचाना उचित है और पुत्रीको प्यार करने-
वाली इसकी मा मेनका तो मेरे ही निकट है वह सब जानती भी है।
शकुन्तला-(आपही आप ) भगवतीने तो मेरे मनबीती बात कही।
कश्यप-तपके बलसे महर्षि कण्व सब वृत्तान्त जानते हैं।
राजा--इसीसे मुनिने मुझपर क्रोध न किया ।
कश्यप-तथापि हमें यह प्रिय समाचार उनके निकट भेजना चाहिये, कोई
यहां है?
( एक चेला आया)
शिष्य-भगवन् ! क्या आज्ञा है ?
कश्यप- गालव ! अभी तुम आकाशमार्गसे जाकर मेरी ओरसे महर्षि कण्वस
यह प्रियसंवाद कहना कि, शाप निवृत्त होनेसे दुष्यन्तने पुत्रवतो शकु.
न्तलाको पहँचानकर अंगीकार कर लिया।
शिष्य-जो आज्ञा (गया)
कश्यप--हे पुत्र ! तुम भी अब अपनी स्त्री और पुत्रके सहित अपने मित्र इन्द्रके
रथपर बैठकर अपनी राजधानीको पधारो ।
राजा-जो आज्ञा ।
कश्यप--और हम तुम्हारा क्या प्रिय करै ?
"तुम्हरे सब राज्य माहि, प्रजा सुख पावै॥
बरसे नित इन्द्र मेह, ठानै मख विप्र नेह ।

(१३६) शाकुन्तल नाटक।
मंगल सब गेह गेह, मुर मुनि मनभावें ॥
साधै इहि विधि सुकाज, सुरनर मिल तव सुराज ।
सो जुग तुहि महाराज, पद लखि गुणगावै॥
राजा-अपनी सामर्थ पाय, करिहौं सब हेतु पाय ।
हमपर नित प्रेम भाय, राखो शिर नावै ॥
मनकी अभिलाष पूरि, पाई तब कृपाभूरि।
होगये दुखद्वन्द्व दूरि, नित तव पद ध्यावें ॥
कश्यप-अब और क्या आशीर्वाद दें"
दुष्यन्त--इससे अधिक और क्या प्रिय होगा ? और जो आप पूछते ही हैं तो
भरतका यह वाक्य पूरा हो।
(छप्पै)
राजा अपनी प्रजाहेत नित करहिं सुकाजै ।
वेदनिरत द्विज नित्त सरस्वती पूजन साजै ॥
पार्वतीपति शंभु नीललोहित सुखदाई ।
जन्म मरणसे मोहिं छुटावें करें सहाई ॥
धर्म प्रेममय वरध्वजा भारतमें फहरत रहै।
ज्वालाप्रसादकी कृती यह सज्जन जिय आदर लहै।
कश्यप-तथास्तु ।
( सब बाहर जाते हैं)
इति सप्तमा समाप्त हुआ ।
पण्डित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत अभिज्ञानशाकुन्तलनाम नाटकका
गद्यपद्यात्मक अनुवाद पूर्ण हुआ ।
पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास, गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेङ्कटेश्वर' स्टीम् प्रेस, 'लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर' प्रेस,
बम्बई.
कल्याण-बम्बई

Shakuntala Or The Lost Ring

Author
Mishra,pandit Jwalaprasad
Title
Shakuntala Or The Lost Ring
File name
Shakuntala Or The Lost Ring
Text
OCR done
Citation
1927
Published
2005/01/12
Publisher
Khemraj Shrikrishnadass, Bombay
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Natya Sodh Sansthan, Kolkata
Classification
Drama. Plays
Keywords
Drama
DLI number
292704
Barcode
4990010202591.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
In Public Domain
VMLT id
5OkogIQszRv
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Shakuntala Or The Lost Ring