Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Kshan Ki Dulhan
Front matter
No text on this page.
क्षण भर की दुल्हन,
यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र
नवरत्न प्रकाशन
बीकानेर
यादवद्रगम
सस्वरण
अक्टूबर १९६७
मूय
रुपये ३५० पसे
भावरण
पातिद
नवरत्न प्रकाशन
बीरानेर
म
सहारा सम्मानिग एमी द्वारा
पुमार ग्राम प्रिटिंग प्रेस
नवीन शाहारा ल्लिी।
प्रकाशकीय
नवरल प्रकाशन के आधार-स्तम्भ हैं श्री यादवेद्र शमा
'चद्र' के प्रात्मीय, मित्र और सहयोगी। राजस्थानी
और अय प्रान्तीय वधु
यह निर्विवाद है कि श्री चद्र जी ने अपनी निरन्तर
साहित्य साधना से अपिल भारतीय ख्याति अजित
करके न केवल राजस्थान का मान बढाया है, अपितु
उनकी प्रातीय भाषामा मे अनूदित कृतियो ने
राष्ट्रभाषा का मस्तक गौरवावित किया है।
मैं व्यक्तिगत रूप से नवरत्न प्रकाशन के उन सह
योगियो का आभार मानती हूँ, जिहोंने परोक्ष अपरोक्ष
रूप से उसे बल दिया है। भविष्य में भी उनके
हार्दिक सहयोग की अपेक्षा है ।
भाई थी अमरनाथ शुक्ल की आभारी हूँ ही जिनके
प्रयत्ना के बिना इसका शीघ्र प्रकाशन सम्भव नहीं
होता।
शाति भट्टाचाय
प्रवाधिका
मै इतना ही कहूँगा
य मरी ऐतिहासिक कहानियों है। इस पूष इतिहास
को लेकर मेरे दो उपसास बसरिया पगडी मोर
खून का टीका' प्रकाशित हो चुके है।
कहानिया प्राय राजस्थान र इतिहास से सम्बन्धित
हैं, जो विभिन्न श्रेष्ठ पत्रिकामा म छप पर पाठा
द्वारा प्रशमित हो चुकी हैं।
समीकी राय स्वागत योग्य
यादवद्रमा चद्र'
साल की होली
बारानेर
अनुक्रम
.
गोर-गाडी के यात्री
.
महारावल
०
२७
मैं बूदी नहीं दूगा
.
प्रीत
३७
.
एक और नूरजहाँ
.
चौहान और पठान
७२
.
मुक्ति
८४
.
एक नयी रावणा
नाहजहाँ का सदेह
.
क्षण भर की दुल्ह्न
१०२
No text on this page.
गोरू-गाडी के यात्री
रात का अंधियारा वोकानेर के मजबूत पथरीले बुजों,
नगर की मजबूत चहारदीवारी और कच्चे पक्के मकानों एव
हवेलियों से होता हुआ रामजी लुहार के गोरू-गाडी घर पर
पाकर ठहर गया । रामजी को माज रह रहकर अपने वे
पूवज याद मा रहे थे जिनके त्याग और बलिदान ने एक
बार मेवाड के धूम धूसरित होते हुए गौरव को पुन जागृत
कर दिया था। उनकी इस घोषणा ने सुषुप्त सूयवशियों म
एक नया जोश और स्फूर्ति भर दी थी कि जब तक हम
चिसोड नहीं जीत लेंगे तब तक चित्तौड़ की धरती पर
अपना कदम नही रखेंगे। राणाजी की सौग घ हमारी सौगधे
होगी और इस महती घोषणा के पश्चात ये वीर सुहार अपने
घर-परिवार को गोरुगाडी में लादकर चल पडे। मनेक
१.
कष्टो मापदामो पौर प्रमावो को झेलते हुए ये गाडिया लुहार जहाँ तही
विसर गये।
उसी दलित बग की गौली सन्तान रामजी माज अपनी गाडी के
नीचे सम्पूर्ण परिवार के माय निर्जीव-मा बैठा था। पाम म एक दीया
जल रहा था-धीमा धीमा, हलका हलका ।
उसकी पत्नी अपने नन्ह नन्हे बन्यो को मुला चुकी थी। उसकी बड़ी
लड़की अपने भाई के साथ लोहे की छुरी बनान म निमग्न थी। घोकनी
की हवा से प्रगारे तीव्र गति से जल रह थे
रामजी की पली जेठा लाल रंग की छोट का मोड़ना और लहगा
पहने हुए पी । उसका लहगा १६ गज का था और उसके पापों में दो
दोसर की चोरी की वडियो और मौवले नामर गहन पर हुए थे।
काना मे चाँटी की बागिय पी जिनमे पत्तियां लटक रही थी। नाम
चांदी का नाम था : थोडा सा पूघट उसने निकर रखा था। वह भूपट
के भीतर से ही मदिम स्वर म बोली
हम तरह मन मारकर बेठने से
का होगा आपने मुबह भी माना नही सापा है।
'क्या कर चयू यो मां ? और गल पे नाच स जरता ही नही।
चौगानेर पर गण की राना चा पायी है । वीर-यांवरे राठोड और सामत
पपनी द्वारा को भ्याता म मुनावर बमूम्यै के नाम पडे हैं । महाराज
बागाह की सवा म दमिण को मार गय हुए हैं । एमी यिनि म मुभमे
बीकानेर पर जोधपुर वाला प्रत्याचार नही देम जाते।
उमसी पनी जान मारी भयम बाना बाना समझ पायी।
सकर पनप ममपन पनि उम मुह को दसती रही।
परिधनीवाला दड़ा भोर म दिन मवरा थी। राधा रोखा
परत - वार HTTP-मूगे यापमाने म मागी और मोगलबी
गें पूर tel
मम्मार शनि पााउमनियाभग पर रही पी पोरनी की
परामवार
-
रामजी अपने आप में खोया हुआ था। उसका सबसे छोटा बच्चा गोरू गाडी के ऊपर सोया था। वह अप्रत्याशित रूप से रो पडा ! क्षण भर के लिए उसका ध्यान भग हो गया और जेठा गाडी के नीचे से निकलकर अपने बच्चे को गोद में लेकर रमाने लगी। तभी शेरू न पाकर खबर दी कि जोधपुर की सेना ने आज दो निर्दोष ग्रामीणा को मौत के घाट उतार दिया है। उनकी फौजें बडा अत्याचार कर रही हैं। रामजी की नसें तन गयीं। उसके नेत्र रक्तिम हो उठे। वाजू फडक उठे । वह व्यथा से पीडित सा होकर बोला "कारा माज महाराज होते । उनके होते हुए जोधपुर नरम बीकानेर की ओर भाख नहीं उठा सक्ते थे। इस तरह की कायरता बीकानेर का सवना कर देगी।" वह अवश हो उठा । अपनी गाडी की मोर देखकर वह सोचने लगा. इसी गाडी को अपना घर ससार समझकर वह चित्तोड से चलता फिरता भटक्ता यहाँ पाया था। यहाँ पान के बाद रामजी पहने बीकानर नरेश की सेना मे रहा पौर बाद में हथियारो वे कारखाने म काय करने लगा। वप पर वप वीत गये। रामजी ने वीसरानेर नरेग वे नमक-पानी से अपने परिवार का पालन पोषण किया । आज उसके होते हुए जोधपुर की सेना बीकानेर की पगडी उछाल रही थी । उनक गौरव एव मयादा को रौंद रही थी। उसने सोचा कि इमस तो मर जाना अच्छा है। एक विभीषण ने रावण-जैसे महावली मयोगी पौर महापण्डिन की सोने की लका को मिटा दिया था और बीकानर म प्राज कई विभीषण उत्पन्न हो गए थे । लाडणू म जोधपुर नरेश अनीतमिह जी ने बीदावत ठाकुर तेजसिंहात एव म य मरटारो को अपने पक्ष मे प्रलोमन देकर मिला लिया था । गोरालपुरा के कमसेन तथा वीगासर के विहारीदास अजीत सिंह जी के प्रलोभन म नहीं माये, फलस्वरूप उन्हें उसी क्षण पद पर लिया गया।
M " बिहारीदास न तेजसिंहात से पडती हुई मावाज म रहा था गदार व राजपूत नहीं है। अपनी मातृ भूमि स दगा तेरी रजपूताई पर | जरूर तूने क्सिी गाली (गुलाम) का दूध पिया है इस बीच कमसेन ने अपने विश्वस्त गुप्तचर के साय यद खबर बीका मेर भिजवा दी थी किंतु राज्यलिप्मा मे अधे अजीतसिंह ने रघुनाथ भण्डारी को बड़ी सेना देकर तुरत बीकानेर रवाना कर दिया । इम पप्रत्याति प्रारमण ने बीकानर की हिम्मत पस्त कर दी पोर जाधपुरी सेना ने बीकानर को घेरकर उत्पात मचाना शुरू कर दिया । बीकानेर पर प्रात हा गया । राजकुमार जोरावरसिंह भी उन शिना बीकानर म उपस्थित नहीं थे। ऐसी स्थिति म यहाँ सलबली मन गयी। ठाकुर मा। रामजी सुतार को यह दुपद स्थिति सहन नहीं हुई। उसे मालम पा स्लिागार में हथियारा की कमी नहीं है । एमी स्थिति म यदि बीका नर के समान सामन्त और राजपूत युद्ध भूमि में मा डट ता जोधपुरी सना का सामना अच्छी तरह से किया जा सकता है। रामजी चिन्तातुर हा उटा । उसने एक स्टार बगल म दिपायी मोर निर। वापानर गढ़ व रक्षर प सांघता राजपूत । गलतसिंह उनका सर- दार था। रामजान उमा समा जाार निवान किया महाराज का मरहानरी म बीकानर के गोय का इस तरह न मिग्ने लिया गाय । पार पाने माई-ब घुमा का पालान करें। यह युद्ध में लिए नपार करें । हम मर मिनार भारदारणा करेंगे। दोरनहिने अममयता प्रकट का यह मम्भव नहीं है । जायपुरी मना का सामना मन नरी पिया ना मरता । पद उमरमर र उयमिह व पास गया । प्रायनापो पर पार्द मर नहीं हुमासमी बह सरार या ता गुप्त प स जोधपुर थाना रन पर पा वे एमी रिम स्थिति म पुट परना ही नहा पाहता पराजय सम्मुख सही थी। रामजी हताश होकर वापिस अपने गाडी घर पर लौट आया। उसकी पत्नी जेठा प्रभी भी उमकी प्रतीक्षा म बठी थी। सनाटा और गहरा हो गया था । सभी बच्चे सो गये थे। उसकी पत्नी ने पूछा "प्रब क्या होगा? क्ल जोधपुर वाले नगर पर जोरदार हमला करेंग।' रामजी ने कहा 'वीरा को सांप सूघ गया है । ये राजपूत हमेशा आपस म लडवर अपने आपको कमजोर करते पाए हैं लेकिन मैं मेवाडी हूँ। मेरे पूर्वजा ने कभी भपनी मां के दूध का नही लजाया है । मैं एक बार फिर अपना बलिदान वहँगा । मैं अकेला ही युद्ध करूगा । जेठा हतप्रभ रह गयी। दीय को जलाकर उमने अपने पनि को देखा। उसने नेत्रो में खून उतर पाया था। मैं जाते जी जोधपुर वालो को बीकानेर की पोर नहीं माने दूगा।" आप पागल हो गए हैं ? अवेला चना भाड नहीं भूजता ।' 'तो क्या रामजी जीते जी अपनी मां-बहिनो की लाज जाते देखेगा' नही नही मैं बढती हुई जोधपुरी सेना को रोकूगा और अकेला बुझे हुए रोगा।" रामजी उमी ममय एक बूढे ठाकुर रामसिंह जी के डेरे पर गया। बूते ठाकुर का चेहरा तेजस्वी पा। रामजी को वह पहचानते थे । जब रामजी न अपना मतप उनरे समक्ष प्राट पिया तव उहोने उसे अपना प्रश्व तलवार भाना, कवच, बदूक और ढाल देते हुए कहा, 'तुम्हारा बलिदार नाय इन क्षत्रिया दे रक्त में उबाल ला 1 एक बार भगवान राम ने मर्यादा की रक्षा की थी, माज तुम इस धरा वी मर्यादा की रक्षा करना । चाहो तो मैं युद्ध भूमि म चल सकता हूँ रामजी पी भुजायें इम सम्मान से फ्रयने लगी। उसने जोर से भरणी माता की जयगर वी और वहां से लौट पाया।
१२ बिहारीदास ने तेजसिंहान में कहरती हुई मावान म कहा था- "गद्दार । तू राजपूत नहीं है। अपना मात भूमि म दण तेरी रजपूताई पर । जरूर तूने रिमी गोनी (गुगाम) का दूध पिया है।' इम वीच कमसन ने अपने विश्वम्न गुप्तचर व साय यह मदर वारा नेर मिजवा दी थी, किन्तु राज्यतिमा म मधे अजीतसिंह ने रघुनाय भारी को बढी सेना देकर तुरन बीशनर रवाना कर लिया। इस अप्रत्याशित प्रारमण ने बीकानेर का हिम्मत पम्न र दी पोर जाधपुरी सेना ने बीकानेर को घेरकर उत्पात मचाना शुरू कर दिया । बीकानेर पर माता छा गया। रानरमार जोरावरसिंह भी उन दिना बीकानर म उपस्थित नहीं थे। एमी स्थिति म वहाँ सलबली मच गयी। रामजी लुहार को यह दुम्बद स्थिति सहन नहीं हुई। उमे मालूम या कि शस्त्रागार म हयियारो की कमी नहा है । एसी स्थिति म यति बीका नेर के समस्त सामन्न और राजपूत युद्ध भूमि में मा डट ना जोधपुरा सेना का सामना अच्छी तरह से किया जा सकता है । रामजी चिन्तातुर हो उठा । उमने एक कटार बगल म छिपायी और निकन पता। ठाकुर सा। वीवानर गढ के रक्षक ये सांपला राजपूत । दौलतसिंह उनका सर- दार था। रामजी ने उसके समक्ष जार निवन्न पिया महाराज की गरहाजरी म बीकानेर गौय को इस तरह न मिटने रिया जाय । पाप अपने भाई-ब घुमा का माह्वान करें। उह युद्ध लिए तयार करें। हम सब मिलकर मपन देश की रक्षा करेंगे । दौरतसिंह ने असमयता प्रकट की "यह सम्भव नहा है । जापपुरी सेना का सामना भय नहीं किया जा सकता। यह जमनमर क उपयसिंह क पास गया। प्रायना की पर कोई भमर नहीं हुमा । समी बढे सरतार या ता गुप्त रूप स जोधपुर वाला से मिल गये ५ या व ऐमी दिपम स्पिति म युद्ध करना ही नही चाहते थे।
१३ पराजय सम्मुख खडी थी। रामजी हतार होकर वापिम भपने गाडी घर पर लौट पाया । उसकी पली जेठा अभी भी उसकी प्रतीक्षा म बैठी थी। सनाटा मोर गहरा हो गया या । मभी बच्चे सो गय थे। उसकी पत्नी ने पूछा "अब क्या होगा? पल जोधपुर वाले नगर पर जोरदार हमला करेंग। रामजी ने पहा "चोराको माप सूप गया है । ये राजपूत हमेशा आपस म लडवर अपने आप कमजार करते पाए हैं, लेकिन मैं मेवाडी हूँ। मेरे पूर्वजा न कभी अपनी मां के दूध को नही लजाया है । मैं एक बार फिर अपना बलिदान करूंगा । मैं अकेला ही युद्ध क्रू गा!" जेठा हतप्रभ रह गयी। बुझे हुए दीय को जलार उमने अपने पति को देखा। उसने नेत्रा में खून उतर भाया था। "में जीते जी जोधपुर बालो को बीकानेर की मोर नहीं माने दूंगा।" माप पागल हो गए हैं ? प्रक्ला चना भाड नहीं भूजता।" तो क्या रामजी जीते जी अपनी मां-वहिनो को लाज जाते देखेगा। नही नही मैं बढती हुई जोधपुरी सेना वो रोकूगा और प्रोला रोगा।" रामजी उमो समय एक बूढे ठावर रामसिंह जी के डेरे पर गया। बूढे ठाकुर का चेहरा तेजस्वी या । रामजी को वह पहचानते थे। जय रामजी ने अपना मन्त प उनक समक्ष प्रवट पिया तब उन्होंने उसे अपना अश्व तलवार, माला, कवच, बदूक पार ढाल देते हुए कहा, "तुम्हारा बलिया शायद इन क्षत्रिया के रक्त में उबाल ला दे। एक बार भगवान राम ने मर्यादा की रक्षा की थी, माज तुम इस धरा को मर्यादा की रक्षा परना । पाहो तो मैं युद्ध भूमि में चल सकता हूं।" रामजी पी भुजायें इस सम्मान से फ्डरने लगी। उसने जोर से वरणी माता की जयकार की और वहाँ से लौट पाया। ।
. नगर के दरवाजे बंद हो चुके थे। रामसिंह जी ने ठाकुर जैतसी पहिहार के यहाँ सन्देगा पहुंचाया। छहोंने कहलाया, "माज एक मेवाडी लुहार राठोडा की पगडी को पद दलित करेगा । धिक्कार है सिंहों की सन्नान को" विन्तु प्रमात तब कोई भी सामत सरदार युद्ध के लिए तत्पर दिखाई नही पहा रामजी ने सबप्रयम सूय की मचना की। उसकी पत्नी जेठा ने उसे पधु भरी विदाई दी। उसके छोटे-छोटे बच्चे अपने बाप को एक सेनानी के भेष मे देसर हप से मचल रहे थे। उसकी बडी लडकी सवती ने पाकर पूछा, "बापू लगई म प्रापरे साथ कौन होगा ?" राजमक्त रामजी ने कहा 'बेटी, वीर के साथ दो ही चीज रहती है-अपनी तलवार भोर भपने स्वामी की भान पर मिटने की साथ माप कब वापस भायेंगे? जेठा का तो जसे क्लेशा ही फट पडा । उसकी सिसकियाँ मुनकर सभी बच्चे सहम गये रामजी जेठा के समीप गया । भर्रायो मावाज म बोला 'सेवती की मो युद्ध मे जाते हुए वीर को सिसकियां मन सुनापो । मैं जिदा रहा तो लोट पाऊँगा । यदि मर जाऊं तो समझना कि तरे पति ने जिसका नमन उसके नमक के हत को सचाई के साथ मना कर दिया।' उसका तीन वर्षीय बेटा भागा भागा माया मेरे लिए क्या लाभोगे?' 'शत्रुमो के सिर ।" वह खुशी से तालियां बजाने लगा। रामजी ने घोड़े पर सवार होने के पहले एक बार अपनी गोरू-गाडी के घर को देखा । फूल सहन है बच्चो को देखा। घूघट में लिपटी पत्नी को देवा । फिर फुरती से 'जय एकलिंग , 'जय माता जी के नारे लगाते हुए प्रस्थान कर गया। जस ही क्लेि ये माग से गुजरा बसे हो चन्द सनिको ने उससे पूछा साया "कहां जा रहे हो भाई " वह कठोर स्वर में चोला, "बीकानेर के क्षत्रिय अपनी मां धरती की इज्जत नही रख पा रहे हैं, इसलिए एक सुहार उसकी रक्षा के लिए मला ही लडने जा रहा है ?" उसने एक मिरासी को बुलाया, उसे नगाडा बजाने को कहा । मिरासी नगाडा बजाता हुमा उसके आगे मागे घलने लगा। वह हर व्यक्ति से उपयुक्त शब्द कहता हुमा चल रहा था। वह जान हथेली पर रखे चल रहा था। जालीदार खिडकी मे सही मुकरका के ठाकर पृथ्वीराज की पली ने रामजी की घोषणा सुनी। उसकी नसों का खून उबल पड़ा । वह अपने पति के सामने गयी। मफीम के नशे में धूर अपने पति को सलकारा और फटकार सुनाई । मलसीसर के ठाकुर हिदसिंह की शक्ति को ताने दिए गए पर वे भी मरणासन्न से पडे रहे। नगर का द्वार बद था। वहां पद सैनिक तैनात थे। उनकी दृष्टि उन धूल भरे बादलों पर लगी हुई थी जो जोधपुरी सेना के माने की सूचना दे रहे थे। सैनिको के पास कुछ बदू थी। रामजी ने अपनी बदूक समाली। उसने द्वारपाल से निवेदन किया, "दरवाजा खोल दो। मैं मुख भूमि में जाना चाहता हूँ।" "मले. 'क्यों?" "क्योकि राठौरों ने चूड़ियाँ पहन ली हैं। उनके रक्त में गरत नहीं, गद्दारी पुन गयी है । वे लालच में पडकर उस मिट्टी को बेचने के लिए तपार हैं जिस मिट्टी ने उह पदा किया है।" "क्या बक्ते एक सनिक भल्लाया। "ठीक कह रहा हूँ, वरना भाज बीकानेर को मोर शत्रु मेना इस तरह बढ़ती चली माती ? माज सब सपा से मिल गप हैं। महाराज यहाँ नही हैं । महाराज अवर भी बाहर गए हुए हैं। एमी स्थिति में हमारा क्या क्तव्य हो सकता है। प्रपने देश पर हमत हसन बलियन हो जाना और प्राप पहरेदार चोखा-'हम गद्दार नहीं हैं।' 'पिर रणभेरी बजानो, तुरही की गूंज स माग हिला दो। मैं प्रवेला इस क्लेि की रक्षा करेगा। में जीते जी इस पहार दीवारी में गशुपा को घुसने नहीं दूगा । माप मरा विश्वास करें। पहरेदार ने जोशम दरवाजा सोल दिया। दरवाजे वे रसाय सनिको ने रणभेरी के नाद से दिग दिगत को गुजा लिया । "एक लुहार जोधपुरी फौज से मरेला लडेगा। सामत ठाकुरा, सरदारो के लिए डूब मरने की बात है।" बस यही पर्धा, यही बात । ठकुरानियो ने चूडियां और लहंगे ला लाकर अपने पतियो वे मागे रख दिए । राजपूती रक्त खौल उठा । भुकरमा के ठाकुर पृथ्वीराज भोर मल सीसर के हिनसिंह ने वागडोर संभाली । वे वीरो को एकत्रित करने लगे। तब तक जोधपुरी सेना चहारदीवारी के नजदीक मा गई थी। रामजी पर तो जसे उमाद छा गया। जब रघुनाथ भडारी ने अपनी सज्जित सेना को रोक कर दरवाजे की मोर देखा तो वह विस्मित रह गया । एक अकेला सिपाही खडा था। भडारी ने सावधान होकर अपनी सेना से कहा, कोई भागे न बढ़े। वार करने के पहले मेरी माना की प्रतीक्षा करें।' और उसने रामजी को ललकारा-"खर चाहते हो तो अपने माप को हमारे हवाल करदो। हम तुम्ह क्षमा कर देंगे।' रामजी ने ललकार कर कहा, 'बेहतर यही होगा रिमाप जिस पांव पाये हैं उसी पाव लोट जायें वरना माग पोई जीवित नहीं बचेगा।" भडारी ने पुन रहा क्यो अकेले अपनी जान गवा रहे हो' रामजी गरजकर बोला 'कौन भरेना है? मेरे पीछे हजारो लोग हैं।
भडारी ने अपने सैनिको को आगे बढने के लिए कहा । रामजी के सिद्धहस्त हाया ने व दूव सभाली और फायर करने शुरू किए । उसने एक बडी गिला के पीछे अपना मोर्चा लगाया। पर जोधपुरी सेना ने उसे थोड़ी देर मे घेर लिया। उसकी बदून शत्रु की गोली से टूट गयी । तब वह अपनी तलवार लेकर उन पर टूट पना । उमने क्इ शत्रु को पाहत व धराशायी किया। प्रत म वह निदयतापूवक कत्ल कर दिया गया । उसका सिर धड़ से अलग एक कोने मे लुढक गया। एक साथ इतनी तलवारें पड़ी कि गरीर के टुकडे टुकडे हो गए। द्वार रक्षका का सून खोल उठा । वे मोचा लगा पर डट गए । दो वफादार पडिहार सैनिका ने पृथ्वीराज एव हितसिंह को जाकर यह किस्सा सुनाया । सोये सिंह लुहार के वरिटान से जाग उठे जैन उस लुहार की मौत ने उनके मुह पर तमाचा जड दिया हो। घर पर अकेले लुहार के बलिदान की गाथा के गीत गूज उठे। राजपून घरा के बाहर निक्ल आए । साँझ का युद्ध बद रहा ! सुबह की पहली किरण के साथ ही बीका- नेर की फौज ने पथ्वाराज एव लिसिंह क सेनापतित्व म जोधपुर की सेना पर हमला बोल दिया। जोधपुर की सना म खलबली मच गयी। बीकानेर के लोग भयर म्प से लड । लग रहा था, हर अवेला राजपूत रामजी लुहार है। जोधपुरी सना के पांव उवहन लगे। पराजय के भय से भडारी बीकानेर वालो से सधि कर लौट पड़ा। रण क्षेत्र म ढेरो सिर एव घड पडे थे। लोग अपो अपने सम्वधियों की लाशें खोज रह थे । एकायर चपू और शेरू नजर पाए । दोनो नगे पांव रामजी की लाश टूढ रहे थे । क्षत विक्षत लाशो को देखकर चपू काप रहा था। कभी कभी चीख उठता या। शेर उसे साहस बंधाता था। एकाएक चपू ने कहा, "वह रहा बापू का सिर ।" फिर दोनो ने सिर को एक कपडे मे बाधा पोर पर चले पाए ।
-- २० परम्परा को उसी माल मर्यान से निभा रहा था। ययन हताश हो गए थे । भाटी रा पूना यो विजय वरना पर उनरे या या रोग नहा रहा, पर विलनी ता बाहरी था और उगा इराने मणि थ । वह बार-बार परमात भेजता पा-पिलजा ने निरस्त सागर लौटना नहा सीसा । उसके हुक्म पी तामील होनी ही चाहिए । अपने पाप यो वर्वा रो या दुश्मनो का नस्तनाबूद उसको इम माना का पालन करने के लिए महबूब सा मली सो फराद सा और काफूर वर्षों से जसलमर म डटे हुए थे । वाफूर प्रत्य त वीर और युगल राजनीतिज्ञ था, पर साप ही धम परायण और सच्चा भी। उसम नैतिस्ता थी और नतिकता के साथ वचनो कपालन को क्षमता। जब महारावल मूतराज के भाई रतनसिंह जी ने एक बार मप्रत्या गित प्राश्रमण पिया प्रौर काफूर के प्राणो पर आ वनी, तब काफूर ने उनसे अभयदान मांगा । रतनसिंह जी । विवा काफूर को प्राणदान देने हुए कहा-'हम क्षत्रिय विवा त्रु पर वार नहीं करते ।सेनापतिजी माप सुगी से अपने हेरे पर जा सकते हैं । काफूर इस अभयदान पर पिघल गया। रतनसिंह जी को प्रगाढ प्रालिंगन म आबद्ध करता हुअा, विगलित स्वर म वह बोला-"इस अहसान का वा जिगी म नहीं चुका सकता, फिर भी मापसे वायता करता हूँ मि फ्ज के अलावा प्राप व कभी इस नाचीज से बुछ भी मागेंग वह सुगी सुशी देगा । मौका पड़ने पर अपनी जान तक कुबान कर देगा इस घटना के बाद काफूर और रतनसिंह जी म गहरी दोस्ती हो गई । जब जब युद्ध व - होता तव-तव रतनसिंह जी दिल की दीवार की दुनिया में ररसी की सीढी लटका वर मा जाते और दोनो मित्र घटा वार्ताताप करत। माज भी एसाही हुआ । अधवार बढते-बढते रतनसिंह जी काफ के शिविर म मा गए । मशालोकी रोशनी में शराब के जाम उहने लगे। रतनसिंह जी शराव की जगह वसूम्बा पीते थे। उनके लिए अफीम को घोलकर कसूम्बा बनाया जाता था। दोनो दोस्त चौपड और शतरज के खेल में निमग्न हो जाते । राज नीति की कोई चर्चा नहीं होती। चर्चा करने पर जसे एक तरह का प्रतिबघ ही था । घर बार, गहस्य और निता त व्यक्तिगत चर्चाएं ही उनके बीच होती थी। परन्तु फरीद खा दुष्ट प्रकृति का था। दोनो के बीच पाकर विपाक्त वातावरण की सजना किए बिना नहीं रहता था । अपनी चगेज मूछा पर हाथ फेरता हुआ, वह शिविर में प्राता। उसके काले भद्दे होठो पर कुटिल मुमकान रहती। आकर वह पूछता-"कौन क्सिको मात दे काफूर दातरज की मोहरो पर अपनी नजर जमाए हुए कहा- "अभी तक तो छोटे रावल ही मात दे रह है। "इतने सालो से इनसे मात खाना ठाक नहीं है मियाँ । बात का तात्पय समभर रतनसिंह जी तुरत अपनी मूछ। पर ताव देकर कहत- 'पाच दिन पहले तो पापका सजाना लूट लिया गया था। अपने पालीजहा को लिस दीजिएगा कि जमलमेर का क्लिा न प्राज फतह होगा न क्ल । भाटी राजपूतो के गौरव की गरिमा को आसानी से नहीं मिटाया जा सकता।" फरीद खां स्त प रह जाता। इतनी रसर ये लोग वहां से लाते हैं क्या इतने प्रखड भडार दिल में हैं और समय गुजरता माता। फिर प्रारमण होते। यवन अपनी समस्त पावित, रण-कौशल और साहस के साप माक्रमण वरते, पर प्रतिरोध में भाटी वीर उहें ऐसा मुह-तोड जवाब देते कि उनको लेने के देने पड जाते । अजेय दुग अजेय ही बना रहता। फिर कुछ दिनो के के पश्चात विराम। पूर्ण J शानि।
इस तरह पूर बारह वप बीत गए। भाटी राजपूत 'दूना' यवनों की क्लेि के बाहर छिपे रूप से रमद लूटता रहता। यवन सेना के समय अब रसद की समस्या सही होने लगी। महबूब सा विचलित हो गया। उसने काफी सोच विचार कर सौटना ही बहतर समझा। शिविर म गुप्त मत्रणा हुई। सारे सेनापति एकत्र हुए। महबूब खां ने निरागा से कहा-"अब मुमकिन नहीं कि हम महा रावल का शिकस्त दे सकें। अब हमारा लौटना ही बेहतर रहेगा।" काफूर ने उसकी बात का समपन किया-"एक छोटी-सी बात को लेकर फौज वो इस तरह तबाही कराना ज्यादा ठीन नही है। मालम पनाह जिद्दी हैं । जो बात पक्ड लेते हैं उसे छोडते ही नहीं। इधर जसलमेर और उधर चित्तौड।' फरीद खां ने व्यग्य मिश्रित स्वर में कहा- आप बादशाह सलामत को जिद्दी से नही कहेंगे ? महारावल मूलराज के छोटे भाई रतनसिंह आप के दोस्त जो ठहरे पर आप सब मेरी एक वात का जवाब देंगे? क्या इतने साला के बाद कोई पसला किए बिना लौटना हम सब के लिए डूब मरन की बात नहीं ? क्या मुह लकर हम मालमपनाह के सामने जाएगे ? अली सा बदी ही गम्भीर प्रकृति का था। उसने भी फरीद खाँ की इस यात का समर्थन दिया। वह बोला- इस क्लि की हिफाजत ऐसे बहादुर कर रहे हैं जो मौत को मनाक समझते हैं। पर हम किले का रान जाने बिना उसे कदापि फतह नहीं कर सकत । फरीद लोन उत्साह स कहा--- खां साहब फरीद ने यह इन्तजाम भी कर लिया है। मैंने नीमसिंह भाटी सरदार को अपने म मिला लिया है । वह बस तक मुमकिन है बिल का सारा राज लेकर मा जाएगा।' वापूर व मस्तिर पर जसे किसी ने हथोडा मार लिया हो । वह प्रश्नवाचक दृषि सफरीद खा को देखने लगा। फरीद सा ने भौहें टेढ़ी करके कहा-'काफूर भाईजान यह राज राज ही रहे । नमकहरामी २३ वफादार लाग नहीं करते।" "माप बेफिक रहे । यह राज राज ही रहेगा। और रात को जब रतनसिंह जी उससे मिलने के लिए पाए तब वह अपने साथ अपन दोनो बेटो को भी लाए। घडसी और कान्हड को सम्बोधन करके रावल ने कहा-"अपने चाचा को प्रणाम करो। दोनो बेटो ने काफूर को प्रणाम क्यिा । काफूर ने उहे अपने गले से लगाते हुए कहा- पामो वेटो, तुम लोगो की क्या खातिर-तवज्जो करू?" "इनकी हिफाजत अब प्रापका करनी है। काफूर भैया, इहे मैं पापके हवाले करके जा रहा हूँ क्योकि भीमसिंह भाटी आपके सिपा- हियो को क्लेि का भेद देने लिए आ पहुचा है । हम चाहे बचे न बचें, पर प्रापको इन बच्चों को देख भाल करनी होगी। दोस्त । ये मेरी अमानत है । इनकी रक्षा करना प्रापका धम है।" काफूर ने उन गानो को अपने वश मे समेट लिया। दढता वह बोला- मैं अपने ही बच्चा की तरह इन दोनों को रखूगा । मेरे जीते जी इनका कोई गल भी बांका नहीं कर सकता।" 'मुझे ऐसी ही उम्मीद है। अच्छा अब मैं चला। अब हमारी मुलावान युद्ध भूमि में ही होगी। दोना ने अश्रु भरी विनाई ली। फरीद खा शिविर में पाया तो उसने उन लडको को देखा। वह काफूर से योगा-'न काफिरो को तुम दूध पिलावर बडा करोगे? पौन काफिर है ? य बेगुनाह लडब ? फरीद खां । फज के मैं नहीं गुजरेगा, पर इसाीियत स भी नहीं गिरगा। जानते हो, रावल मेरा दास्न है एर बार उसने मुझे पान बरती थी, उसके बदले का परत पास ही पाया है । समझे !" वह दोनो लडका को भीतर ले गया । रात जसे सर पर गुजर रही थी। जसलमेर के वीर जान गए थे रि भीमसिंह भाटी, जो गत तीन दिन . । 1 । इनाम | जलील कुत्ते देरा इस माग को। इस माग म तेरी बीवी भी होगी सरा बच्चा भी होगा । तू हवस का गुलाम है। तूने कभी यह नहीं सोचा कि इतनी पर्याी ये वार क्या बचेगा' मुझे नफरत है ऐसे इन्सानों से । बहादुर हैं ये लोग, जो अपने मादरेवतन पर हंसते हसते मिट जाते हैं। सिपाहियो । इस जलील इन्सान को इस भाग में झोंक दो। जो अपनी मां का नहीं हुमा, यह पराया का कसे होगा?" भीमसिंह चीसता चिल्लाता प्रभय मांगता रहा पर नापूर ने उसे प्राग म झोक दिया। फिर वह चुपचाप टूट कर बैठ गया । उस मूने भौर निजन किले को देखता रहा मौर फिर सिसक पड़ा। मन-ही मन तिज्ञा करता हुमा बोला--"दोस्त रतन I में फज मबंधा पा फिर भी मापके दोनो लडकों को हिफाजत स रतूंगा। वे दोना अब मेरी ममानत हैं और एक दिन उहे इसी क्लेि का स्वामी बनाऊंगा।" पौर समय पाने पर घडसी जसलमेर का महारावल बना -
मैं बूंदी नहीं दूंगा
में वूदी नहीं दूगा । कुम्भा वैरसी ने भीम-गजना की,
'चाहे बूदी मसली हो या नक्ली। चूदी नाम की रक्षा करना
मेरा घम और वशीय गौरव है।"
रात्रि का तिमिराचल ससृति पर छा गया था। माकाश
तारो से जगमगाने लगा था । कुम्भा वैरसी अपने शयनकक्ष
मे व्यप्रता से चहल-कदमी कर रहा था ! रजत दीवट पर इत्र
का दीया जल रहा था। उसकी सुवास से वक्ष सुगघित था।
गवाक्षो के रेलामो पर्दो पर जड़े हुए सलमे सितारे कापते
प्रका" से मलमला रहे थे।
उसकी पत्नी इम गजना से महम गयी। वह निस्पन्द-सी
हो गयी। उसके मदरीले नयनो मे प्रश्न नाच उठा। कुछ
बोलना चाहती थी, पर बोल नहीं पायी।
- 'माप ठकुराणी सा, इस तरह स्तब्ध सही हैं। इसे मैं समझ रहा है। किन्तु मैं भापको भी स्पष्ट रूप से बता दना चाहता हूँ मैं बूती नहीं दूगा पदापि नही दूगा।' ठकुराणी उसके थोडे निकट भायो । उसके पांवो की पैजनियां धीर धीरे बजकर शात हो गयी। अपने कांपते हुए स्वामी की भुजा का मदुल स्पश करके वह मद स्वर मे बोली, भाप यथ उत्तेजित मत होइये । बूदी का कौन ल सकता है ? माज स दो दिन पूर्व सिसोदिया वोर हाडा सरदारी से पराजित होर पाये हैं । बूदी नरेश वीरसिंह ने स्वय राणा लाखा जी की भग भवानी को खडित किया है। हाडा वीर कुम्भा वैरसी शय्या के पास गये । पल भर के लिए उनकी दृष्टि गय्या पर बिधे मलमली गद्दी पर गयी। पलग के चांदी व पाये धमक रह थे। पार्यों का निवला हिस्सा सिंह की शक्ल का था। वे धम से उस पर बठ गये । गहरी सास ली। अपनी बोक्डली मूछा पर ताव दिया । पूववत स्वर मे सिंचित मन्द स्वर मे होने यही पश्चाताप राणा जी और उनके सामन्त योद्धामो को सता रहा है। अपनी पराजय व भप मान की माग वे मेरे रक्त-गव और वणीय गौरव को मिटाकर ठडा करना चाहते हैं यह मैं वदापि नहीं होने दूगा । मै भी हाडा राजपूत हूँ मेरे शोणित में भी क्षत्रिय रक्त दौड रहा है । लेक्नि में आपकी बात का तात्पय नहीं समझी। पुराणी उनके समीप बठ गयी। श्वेत मलमल की बगलवन्दी पसीने से भीग गयी थी। उसने दासी को आवाज दी । दासी तुरत नतमस्तक होकर उपस्थित हुई। ठाकुर सा पो पखा मलो।' भाशा दी ठदुराणी ने। दासी पल भर मे मोर के पखो का बना पखा ले मायी जिससी मूठ चांदी की थी। वह तीव्र गति से पसा करने लगी। यक्ष म इस बीच गहरी निस्तब्धता छायो हुई थी। वाई भी नही बोल रहा था। ठ राणी उठी। सहानुभूति पूर्ण स्वर मे बोनी 'बिना बात वे प्राप इतने व्यग्र मौर मादेशममा जाते हैं। उसने अपने मांचल से कुम्मा २६ वैरसी के मुख पर उभरे श्वेद-कणो को पोछा । पत्नी वे इतने अनुराग मदुल स्पश से कुम्भा को एक अलौकिक सन्तोप मिला। अपनी प्रान्तरिक विकलता को दीघ नि श्वास द्वारा निकालकर व बोले, 'ठवुराणी सा । माप यह भली भाति जानती हैं कि परसो के युद्ध मे मेवाड बूदी से परा- जित हो गया है । बूदी के निकट गांव निम्बेड में दोनों सेनामा के बीच घमासान युद्ध हुआ । सहन्न मूयवशी युद्ध पिपासुओं के समक्ष मुटठी भर हाडा सरदारो ने केसरिया पहनकर सामना किया। सभी कहते हैं कि विजय सत्य की होती है । असत्य पर लडा युद्ध उचित नहीं। हालाकि राणा लाखा जी के पास बूंदी से लड़ने का कोई ठोस प्राधार नहीं था, फिर भी उहोने अपनी विस्तारवादी नीति का पोषण करने के लिए हाडाराव वीरसिंह जी को एक दिन पत्र लिखकर यह मांग की कि उहे चित्तोड की पराधीनता स्वीकार कर लनी चाहिए । उनका तक और मांग है कि उहोने जिन ग्रामो पर अधिकार किया है वे चित्तौड के हैं।" "क्या यह सच है ' ठकुराणी ने प्रश्न किया । "नही। जो गाँव माज बूदी का गौरव बढ़ा हैं, उन्हें हाडा वीरो ने तलवार के जोर से मीणा से जीता है । उहें इस तरह की धौंस पर कसे दिया जा सकता है । मीणो से युद्ध करना कोई बच्चो का खेल नहीं। सो हाडा नरेश वीर सिंह ने उन ग्रामो को देने से सवथा अस्वी कार कर दिया । परिणाम स्वरूप राणा लाखा ने बूदी के विरुद्ध युद्ध की पापणा कर दी। विजय सत्य की होती है। हाहामो ने अपने मुटठी भर योद्धामो के साथ राणा के छको छुग दिये। स्वय वीरसिंह ने राणा लासा को युद्ध भूमि म ललकारा । सुनते हैं, बिजलियो की भांति चमाती दोनो की तलवारेंटकरायी। रितु हाडो के उस अप्रत्याशित माक्रमण को मेवाडी नही रोज सके । वे भाग सड़े हुए। इस लग्जाजनक पराजय मोर अपमान को राणा जी नहीं सह मके । उन्हाने चित्तोड पहुंचते-पहुंचते एक भयानक प्रतिज्ञा पर ली। कुम्मा वरसी गात हो गये। उनके नेत्रो के स्फूलिग कुछ क्षणो के । ।
लिए बुभ गये। उन्होंने पल मूद लीं । राणी वी उत्सुक्ता बढती गयो । उसने चादी की भारी से सोन के गिलास में पानी भरा। कुम्मा वरसी को विनीत स्वर मे ठमुराणो ने कहा "ठाकुर सा | जल परोगिये।" ठाकुर ने जल पिया । गिलाम वो वापस लेते हुए ठकुराणी ने फिर पूछा "राणा जी ने पौन सो प्रतिना की है।' 'उहोने प्रतिज्ञा की है कि जब तक मैं बूदी को नहीं ल लूगा तब तक मन्न जल ग्रहण नहीं करेगा। ठकुराणा पाश्वय-वरित सी कुम्मा वरमी की पोर देखने लगी। सहमती-सी बोली 'इतनी कठोर प्रतिना?' 'हा ठकुराणी, इतनी कठोर प्रतिज्ञा की है हमारे राणा जी ने । और जानती हैं माप यह प्रतिज्ञा पूण हाते होत महीना लग जायेंगे पौर राणा जी भूख और प्यास से तडप-तडप कर अपना दम तोड़ देंगे। 'हे राम । हठात ठराणी के मुख म य र उच्चारित हुए मोर वह गम्भीर हो गयी। कुम्भा वैरसी के समक्ष को दीवार पर एव ढाल वे दाना पोर तल बारें लटर रही थी । दायी ओर की दीवार पर कई सिंहो व भानुप्रो वो सालें थी। कुम्मा वरसी गिवार ये बहुत ही शौकीन थे और सिंह को मारने म सिद्धहस्त गिने जाते थे। वे उठ एक सिंह क मुग्व पर हाय रखकर वे बोते "यह प्रतिया हाडाराव व उनके स्वामिभात सरदार चीत जो सहजता व गीघ्रता से पूरी नहीं होने देंगे। ---वराणी सा हाडो ने स्थान-स्थाा पर अपनी रिलेवनी को बहुत ही सुव्यवस्थित मोर मजबूत बना लिया है। उनके मास्वी व नीतिज्ञ सेनापतियो ने ऐमी स्थिति उत्पन कर दी है कि वे टी प्रान राने की मोचें तो महीना बीत जायेंगे। फिर राणा सूपवगियो की प्रतिमा बच्चा का सेल बन गयो है । किन दु राणीसा। यह बच्चो का खेत उह बहुत महंगा पडगा ।
कुम्भा वैग्सी न फिर धीरे धीरे बताया, "ठकुराणी सा | राणा जी ने अपनी पराजय को विजय मे बदलने के लिए यह निश्चय किया है कि एक कृत्रिम वूदी का निर्माण हो । चित्तोड के नीचे एक मिट्टी की बूदी बन रही है । वैसा ही किला बन रहा है। गणा जी उस बूदी को ध्वस करके अपनी प्रतिना पूरी करेंगे तथा उसकी रक्षा का भार हमै सौंपा जायेगा। और ठकुराणी मा, हमारी ग्गो में हाहा वश का गौरवशाली रक्त है, हम सिसोनिया राजपूतो का अपने समक्ष बूंदी का विना करते नहीं देख सकते चाहे वह बूदी कृत्रिम ही क्यो न हो कुम्भा वरसी गत कई वर्षों से राणा जी को हाडा राजपूत सना वे सरदार थे। अपनी वीरता और शूरता के लिए वह दूर दूर तक प्रसिद्ध थे। किमी कारण हाडामो से रुष्ट होकर वे गणा जी की सेवा में पाए थे। किन्तु राणा जी की सेवा में पाने के पूर्व उहोंने स्पष्ट रूप से कह दिया था, जहाँ प्रापका पसीना बहेगा वहां हम अपना रक्न बहायेंगे। हम मापके एक सोत पर अपना सवस्व विमजन कर देंगे, किंतु हम कभी भी अपनी तलवार वो हाडों के विरुद्ध नहीं उठायेंगे । हम कभी भी उन युद्धो में सम्मिलित नहीं होंगे जो हाहा वश व उनकी मातभूमि से सर्वा घत होंगे हम कभी भी अपनी प्रांखो के समय किसी हाडा राजपूत का अपमान होते नही देखेंगे। किन्तु प्राज जब कुम्भा वरसी शिकार करक लौटे तब उनके समस एकलिग दीवाण राणा लामा का सारा पहुचा । कुम्भा वरसी एव सिंह को मारस र लाये थे। बहुत ही पक चुके थे। बडे जार की प्यास लगी हुई थी। उनकी इच्छा थी कि तन और मन की पकान मिटाने के लिए एक प्याली क्मूम्बा की पी जाय । अपने प्रश्व से उतरत ही हयोढीदार ने राणा जी का सन्देश पमा दिया। वे उसी पांव पुन प्रश्वारूढ होकर राणा जी ने दरवार में पहुंचे। वहे-बडे सामत, उमराव सरदार मौर दीवान जी बैठे थे। कुम्भा वैरसी का सबने खडे होकर अभिनन क्यिा । राणा जी से मुजरा करने वे भपने पदानुसार प्रदत्त सिंहासन पर बठ गये। दीवाण जी ने एकलिंग की प्रभ्यपना करके बहा, “सरदारो । राणा जी ने जो प्रतिज्ञा की है उसको सभी जानते ही हैं। प्रतिज्ञा इतनी कठोर है जिससे मेवाह भयानक परिणाम से टकरा सकता है । तात्पप स्पष्ट है कि जब तक बूदी का क्लिा विजयो नही होगा तब तक राणा जी पन्न बल ग्रहण नहीं करेंगे भौर यह सहन सम्भव नहीं है । अत यह निश्चय किया गया है कि एक मिट्टी की बूंदी बनायी जाय और उसे सिमोरिया दारा विध्वम कराया जाय । इस तरह प्रतिना पूर्ण करके किसी भी तरह वतमान सक्ट को टाला जाय । प्रतएव हम सबने देश मौर राणा जी के हित को सोचकर यह निश्चय किया है कि इस कृत्रिम धूनी दुग की रक्षा का भार हाडा वीर युम्भा वैरसी को सौंपा जाय। सीसोदियो के भाक्रमण पर वे हट जायेंगे और कृत्रिम बूदी को विनष्ट कर दिया जायेगा। इस तरह यह सकट टल जायगा ।' कुम्भा परसो एकदम खडे हो गये। उनका हाथ अपनी तलवार पर चला गया किन्तु दरबार की मर्यादा का ध्यान रखकर वे पुन बैठ गये। सेनापति ने कुम्भा वरसी के रौद्र रूप को देखा। शक्ति हो उठा । फिर वह दीवाण जी को वठने का समेत करके बोला हम जानत हैं कि इस बात से कुम्भा जी के प्रात्माभिमान पर ठेस पहुचेगी पर राणा जी के जीवन और अपनी स्वामिभक्ति की रक्षा के लिए व इस माना का सहप पालन करेंगे। उन्हें विश्वास होना चाहिए कि यह सब विवशता के कारण हो रहा है। कुम्मा बरसी अधिक नहीं रके। वे दरबार में सिर झुका कर सर हए मोर राणा जी के समय बोले, हम भापकी भाशा रा पालन करेंगे।" अपने डेरे लौटते ही उहाँने वरम्बे की प्यालो पी पर उनके मन की वाचलता और व्यर बढ़ती गयी। सीसोगिया उनके गौय को लल कार रहे हैं । उन्होंने ना किया 'मैं वूदी नहीं दूगा कदापि नही दूगा । गति का मौन मव उनके डरे की दीवारो कनरो व बुजों पर पावर .
बैठ गया । रात उनकी अखिो मे गुजरने लगी। उह लगा कि यह रात कितनी विकत और मधीर है ' हर क्षण उमत्त और ठहरा हुआ । कुभा जी ने अपनी रानी से अनेक मुख और दुख की बातें की। उनका पुत्र पालने म झूल रहा था । कुम्भा जो उमे स्नेह भरी विगलित दष्टि से देखते रहे। ठकुराणी न प्रापना की 'माप थोडी देर विश्राम कर लीजिए प्रभात होते ही पापको युद्ध भूमि में जाना है। "ठकुराणी।" स्नेहिल स्वर मे बोल कुम्भा जी, 'मुझे लगता है हमारे. जीवन की यह सवश्रेष्ठ पौर महान रात है । अब दूसरी रात हमारे जावन में नहीं मायेगी। "नही नहीं, एस प्रशुभ अणूत घोल मत बोलिये । मेरा सि दूर सुहाग इतना फोका नहीं है। कुम्भा वरसी धीरे स मुसकराय । बोल, राणी सा । क्षत्राणी या सिंदूर केवल सिदूर नहीं होता वह रक्त सिदूर होता है। हर वीर- त्यागी क्षत्राणी ने अपनी मन्तिम मांग शोणित से भरी है। मैं निश्चित रूप से रह रहा है कि मैं जीते जी बूदी नहीं दूगा। डा राजपूत यह अपमान नही सह सकेगा। मौर इम अपमान को रोक्न के लिए उसे उत्सग होना ही पड़ेगा। कुम्मा जी शय्या पर प्रधशापिन हो गये। उन काना म पहने हुए मोती पमर रहे थे। ठकुराणी थोडी देर तक उह देखती रही । बार मरणो यो धीरे धीरे दवाती हुई बोली "मुझे तनिक भी दुख नही है। साणी के लिए श्रेष्ठ महान पर्व ही उम दिन होता है जब उसका पनि पुर को जाता है। किन्तु ।' जितु क्या 'देखिए अपने कुवर को। क्ल माप नहीं होंगे और मुझे यह पूछेगा कि मेरे पिता जी कहां हैं तब मैं क्या उत्तर दूगी?" "उमे मरो ढाल, सलवार और पगडी दिखावर कहिएगा, तुम्हारे पिता . " जी न इस पगडी की रक्षा के लिए ग्न दो गस्त्रो से सज्जित होकर प्राण त्याग दिए। ठकुराणी सिसा पड़ी। अपने पति का निश्चित मत्यु का जानकर उसरा हृदय विदीण होन लगा। उसका ध्यान सहमा अपना हाया की चूडिया पर चला गया। वह उह देखती रही। उसकी आँसों से भथुमा की पविरल धारा प्रवाहित होता रही। अपनी पत्नी को अपन वक्ष म छिपात हुए कुम्मा जी न विगलित स्वर में वहा मत्यु वीरा व लिए त्योहार होता है ठराणी सा । जो क्षण मत्यु के लिए निश्चित है वह भायगा ही। हमे यह मानकर धंय रखना चाहि कि क्ल विधि न हमारा मत्यु दिवस निश्चित किया है लेकिन हमारी मत्यु आप विचलित मत होएगा। यह फूल सा कुवर क्ल पडा होगा म भी यही स्मरण निजाती रहियगा कि अपनी मातभूमि की रक्षा करना भोर अपने देश उमकी मिट्टी और उसकी मान गान की रक्षा करना । विनी मूल्य और प्रलानन म अपने गौरव का मौना न करना। ठकुराणी मिसक्ता रही । कुम्मा जी उमे महलात रहे । क्व रात अपनी तारो भरी चनडी ममेटकर चली गयी यह उन दोना ने तमो जाना जद मदिर की पवित्र घटा घनियों ने उदयोधन की झवार की। X X कुम्भा वरमा न अपने प्राधान समस्त हारा सरदारो को एकत्रित किया । उह सारा स्थिति अवगत कराया। सारे हाहा मरदार इम तरह के अपमान क विन्द लड़ने को तत्पर हो गय । उहनि उसी क्षण प्रतिमा की हम कुम्भा जी की भांति जोत जी इस मिट्टी की चूदी को नहीं दग। म्भा जाने पहा यह बात प्रभा प्रस्ट नहा होनी चाहिए।
हेरे के बाहर एक प्रश्व प्राकर रुका। अश्व राणा जी या था। उसने राणा जी का सरेश लाकर दिया । सदा पढकर कुम्भा जी ने अपने संगमग पचास साथिया को चलने का प्राह वान किया। हाडा वीर चल कुम्भा जी ने अपनी पत्नी स प्रतिम विदाई ली। वह पूजा का थाल सावर लापी मारती उतारी । अन्तिम बार अपने तेजस्वी और वीर पति के दशन क्यि । मन में कोई वोल उठा, 'पर ल जी भरवर दशन कर ले।" वह फिर रो पड़ी। कुम्भा जी ने प्रस्थान क्यिा । द्वार पर उनका पुत्र पड़ा मिन गया । वह तोतली बोली मे बोना पिणा जी प्राप व लौटेंग? कुम्भा जी ने उसे अपने सीने में चिपका लिया। वे भर भर पाय । बौदी ने पाकर उसे अपनी गोद में ले लिया । मिटटी की बनी बूदी के चारा भार हाडा राजपूत रक्षा हेतु गडे हो गये । अश्व पर प्रारूढ होरर कुम्भा जो मोसोदिया के पास गय । उनसे गले से मिले और गजार कहा हम बूदी लडकर प्रापको दगे। बूदी नाम की रक्षा करना हाडा का घम है, प्रत पाप हम पर वास्तविक माक्रमण करें। सीसोदिया में हलचल मच गयी। अस्वस्थ राणा जी न जब यह मुना तब वे रोप मै भर पाये । उहोने प्रागा दी "हाडा को गेंद दिया जाय ।" मिटी की वूदी के दुग के द्वार पर कुम्मा वरसी अपने मांड को लिए पहरा दे रहा था। रणभेरी बजी। मारु ने नाद किया। हर हर महादेव पौर एवलिंग दीवाण की जय के साथ सीसीटिया ने प्रानमण बाल दिया। चन्द हाली में सीमोरियो का बडी वारता से सामना दिया। भयकर पुर के पश्चात मिटटी की बूदी को फतह कर लिया गया। कोई हाग पौर जीवित नहीं बचा।
कदापि नहीं दूगा राणा जी ने कुम्भा वरमी को ढूंढा । उसके रोम रोम मानो पाय हो गये थे । राणा जी ने उन्हें वांहो मे उठाया । अन्तिम सांस लेते हुए भी कुम्भा जो कह रहे थे 'मै चूदी नहीं दूगा, और राणा जी को वाहा म ही कुम्मा वरसी ने दम तोड लिया । राणा जी ने व्यथित स्वर में कहा, 'हम अापके समानत मस्तक हैं। जिस धरती पर माप जसे भावना वाले वीर हागे, उस घरती को कोई भी पराजित व अपमानित नहीं कर सकता । दीवान जी, हाडा जी की गव-यात्रा राजकीय सम्मान के साथ निकाली जाय।' राणा जी टूटे टूटे शव को रसकर चले। एक बार फिर मिट्टी को यूदी को देखा । वह उनके गौरव पर खिलखिला रही थी विश्वना से ।
प्रीत
पंशुमाली की रश्मियां कोहरे से सघष करने लगी।
कोहरा-अटूट और अभेद्य कोहरा । शीत लहरो मे बंधा
मौर कोहरे की चादर मे लिपटा मागरा शहर । मौन
पौर नितान्त निश्चल ।
भयकर शीन से भयभीत यमुना का स्थिर और सोया
हुमा जल । शात और निस्पन्द ।
अपने शयनकक्ष में मयूराक्षी शय्या पर निद्रा मे निमग्न
हैं अप्रतिम योदा महान विलासी महाराजा गसिंह राठौड ।
जोधणे (जोधपुर) के यशस्वी और अपराजेय राजाधिराज ।
समीप ही रजत-दीवट पर इत्र से सुवासित दीपक जल रहा
पा। उसकी ज्योति महाय्या पर विछ मखमली जरीदार
गद्दे चमक रहे थे । महाराज पालस्य में थे। चाकर कई बार
पाकर उहे देख चुका था ! मान महारान समय पर क्यो नहीं उठ रहे हैं ? वह सोच सोचकर उद्विग्न और चितित हा रहा था। और महाराा। महाराज जगवर भी जगना नही चाहत थे। भव भी गति का सुमार उनको दडी बडी पाखा की पलको को वोझिल बना रहा था और वे सपनीली मारकता म अपन मापको विस्मन किये हुए थे। - नाहजहाँ के विशेष कृपापात्र नवाव फजल के घर का कल रात उन्हें पाम त्रण मिला था। वे गये थे-मपना सम्पूर्ण पोशाक में । रेसमी जरीदार प्रचक्न, श्वत रेशमी चूडीदार पाजामा, कमरबन्- जिसकी विनारी स्वर्णिम जरी को पो । गल मे अमूल्य हीरा का हार कानो म मुस्ता-लौंग। हाथो में सोने के पडे । य जस ही नवाब की महफ्लिम पहुचे वसे ही नवाब ने उठकर उनका स्वागत किया । कुछ प्रय भी उमराव सरदार और मनसबगर पठे थे । सभी को शराब की मनवार की गयी । सुरा के साथ एक ईरानी नतकी ने मत्य और स्वर लहरियो से समा बांध दिया। मांखो जाम छलकने लगे नतकी के और न जाने कितने प्याले पी गये माये हुए मेह मान । 11 महफिल की Tमा वुझो तब लोग बेहो। मदहोश से अपने अपने रथो पर पारूढ होकर चल पडे । नवाब ने गजसिंहजी से रुखसत लेनी चाही। गजसिंह जी मादकता मे बहन रहे थे। वे उठे । सलाम किया और विटा ली, पर वे पुन वही बठ गए । उहें तनिक भी हो। नहीं था। नवाब वही गाव सक्यि का सम्बल लकर लुढक गया। महाराज गजसिंह के खास हाजरिए कृपालसिंह ने उह उठाया और सावधान करते हुए प्रापना की भन्नताता | होश मे माइए हम अपने रे चलना है। 'हम डेरे नहीं चल सकते। वह ईरानी नतको पहा है । हम इनाम देंगे।
"अनदाता, वह चली गयी है । अब हम भी चलना चाहिए। रात बहुत जा चुकी है। गजसिंह उठे । रोगनी वे वत में उनका कान्तिमय मुव भोर म्वणिम हो गया था। मानो गुलाब खिल उठा हो या फूल पा किसी ने लाल रग म भिगो दिया हो। हाजरिए के साथ चलने लगे। चलते चलते रुके और पश्चात्ताप भरे स्वर में बोर 'जिमकीनतकी इतनी रपवती होती है उसकी बेगम प्रनारा कितनी रूपवता होगी। बहुत चर्चा सुनी है उससे । हम कोई उगवानदार करा दे तो हम उसे मालामाल कर दें। यह वाक्य उस जगह से कहा गया था जहाँ मे उनको प्रावाज सहजता से जनाने झरोने तक जा सकती थी। थे ईराणी नतमी की मधुर स्मति मे खाय रहे । मन्त म मदिर या जब पावक शम्ब बजा तब महाराज हडबडा वर उठे। जल्दी ही स्नानादि से निवत्त होकर वे मदिर म प्रचन-बदन बरन चल गये। माज व दरवार में हाजिर नही हो सकेंगे ऐसा उहोंने भोजन से निवत्त होते ही प्रालीजहाँ को बहला दिया और प्राप धूप लने के लिए अपने डेरे की ऊपरी मजिल पर आ गये। धूप बहुत ही मुहावनी लग रही थी। वही वही प्राखें इसीलिए बार- बार पद हो जाती थी कि अब वे उस महफिल की ईरानी नतको को करने की चेष्टा कर रही थी। दास ने पार सिर झुकापर पहा "मनदाता | नवाय साहब की दासी प्रापसे मिलना चाहती है। "नवाव माहब की दामी भान दीजिए।" घद ही मिनटों में एक चालीस वर्षीया औरत महाराज के समक्ष हाजिर हुई । उसने तीन बार कोनिश की पौर चुपचाप खड़ी हो गयी। "नवाच माहब का कोई परवाना लायी हो" महाराज ने हुक्के की नली को मुह मे बाहर निकालकर पूछा । पौरत का रंग गोरा था मौर ४० - यह एक्दम मुमतमानी वेश म यो । उमन पान खा रखा था। उसन फिर बानित की और बोली, 'गुम्ताखी माफ हो, मैं तनहाई में कुछ प्रम करना चाहती हूँ।" जो अगरक्षा खडा था, वह सिर भुवाकर चला गया। दासी ने अत्यन्त कीमत और नम्बरे स कहा "लोंडो को जहीन क नाम से पुकारते हैं । मैं एव' खास मक्मद स आपरे हुजूर म पेत हुई है। जान की मुमाफी चाहूंगी।' 'हम तुम्हें सात गुनाह माप करते हैं। "हुजूर कल जन मापने ईरानी नतो की तारीफ करते करते बगर का जिक्र किया तब मैं झरोख में खड़ी थी। मापसे हुस्न का इस तरह मागिक देखकर मरा दिन पमीज गया और "पौर क्या ?" महाराज बेसब्री से बोले । देखिए गरीय परवर, घर पा गज खोल रही हूँ । कुछ अरे, तुम बेफिक्र रहो । हम तुम्ह मुहं मांगा इनाम देंगे। तुम्हारी मोली सच्चे मोतियो से भर देंगे।' "बात यह है. अन्नदाता। दासी घुटना के मल बठकर बहुत ही घीम गेम बोली हमारी सबसे छोगे धेगम माहिबा अनारा मौर नवाब साहब मे नहीं बनती है । बेगम साहिबा के नासून की भी वरावरी वह रक्कासा नहीं वर साती। माप चाहे तो ।' वासना में लिप्त और प्रत्यास विलासा स्तुि महान योद्धा के समस्त पारीर मे एक झुरमुरी-सी छूट गयो । उनको इच्छा हुई कि वे अपनी हथेलिया को इस समाचार वे मिलने की प्रगनता में रगड, विन उहनि वेसनी पर काबू दिया । गम्भीरता से प्राशा को मोर देखकर बोले नहीन | इस बात को मत भूलो मि तुम एक ऐसे इनसान के सामने मड़ी हो जो तुम्ह जिंदा जमीन में गडवा सकता है, जो मुगलिया सल्तनत की नींव हिला सकता है। उससे किसी तरह का खेल खेलने की मोगा मत करना।'
पुन कश
दासी कोपने लगो । उसने हाथ जोड दिये। उससे कुछ भी बोला
नहीं गया। घर घर धूजती रही।
'जानती हो उस वक्त हम नशे मे थे।" महाराज ने
कठोर आवाज मे कहा "हमारी कमजोरी का नाजायज फायदा।"
"तोबा करती हूँ, गरीव परवर । हम गरीव गुलाम ऐसा सोच भी
नही मकते। कुछ लालच
"हम तुम्हें खूब इनाम देंगे। सहसा महाराज ने स्वर बदलकर कहा,
"पहले हम बेगम का दीदार करायो।
"जम्बर करा दूगी। तब आपको मेरा यकीन पायगा कि हमारी
मालकिन हकीकत में हुस्न और रल्म को मात्रिका हैं ।"
महाराज ने दासी को एक अंगूठी उसी वक्त दे दी।
x
X
वादशाह के दरबार में गजसिंहजी का बहुत ही मान-मम्मान था।
शाहजहाँ उहें 'मामू' कहार पुकारते थे। उनकी इज्जत और मानवान
का विशेष स्याल रखने थे। मन ही मन वादशाह गजसिंह जी की रुसवाई
से डरते भी थे।
फिर दामी की वे सदा प्रतीक्षा करते थे और नवाव साहब स उहाँने
खूब दोस्ती गाठ ली थी। कभी उनके यहां जाना और कभी अपने यहाँ
बुलाना।
और एक दिन वह दासी पायी। बहुत खुश जसे चांद उसके चेहरे
पर प्रा रिका हो। पावर महाराज से एकान्त मे वोली, "अाज दोपहर को
वगम साहिदा प्रापका दीदार करना चाहती हैं।"
.
मगर कहाँ ?"
जमना केसी
४२ बेगम साहिवा ने इल्तिजा की है कि वान को प्राम-पास के पेड भी न सुनें।" गजसिंहजी ने अपनी अपार प्रातरिक प्रसनता पर अधिकार करते हुए कहा "उहें हगारी मोर से पूरा यकीन दिला देना ।" और गजसिंहजी अपने विश्वस्त अगरसको के साथ यमुना के उस पार पहुच गये। चिलचिलाती धूप रात भर के ठिठुराये पेडो को पूर्ण राहत दे रही थी । जल-वीचियां धीरे धीरे तट को स्पा कर रही थी मानो वे तट को स्नान करा रही हो। गसिंहजी ने एक घने झुरमुट मेमपने सभी विश्वस्त अगरक्षको को सावधान किया, 'हालांकि इसमें किसी भी पडयत्र की गघ नही आती है, फिर भी तुम लोगो को नितात सजग प्रहरी की भाति खडा होना पडेगा । सच्चा और स्वामिभक्त सनिक वही होता है जो स्वामी के सकेत पर एक क्षण भी असावधानी न बरते।" मोर उन्होंने मपनी विप दासी देवली को एकात म पाने का सरेत किया। वह जब एकात में मा गई तब उहोंने उससे मादेश भरे स्वर म कहा तुम वेगम की नाव के पास चला जाना । अत्यात चतुराई से इस बात का पता लगाना कि उसके साथ कोई सदिग्ध व्यक्ति तो नहीं है।' हुक्म, अन्नदाता । आप निश्चित रहिए।' देवली सिर झुरा फर चला गई। धूप से स्नान करत हुए जल में एक नाय मयर गति से पा रही थी। नाव पर सिफ दो मल्लाह पे। नाव भी कोई बहुत बड़ी नही थी। एक- दम साधारणा गमिहजी सजग हो गए। एक बडे वक्ष के तने की मोट म खडे होकर वे भाती हुई नाव को अपलक दसने लगे। देखते देखते वह नाव किनार से प्रा लगी। उसम स जहीन उतरी। जहीन के साथ बुरखे में एक भय नारी पी। नारी के दो गोरे-गोरे हाय उस काले बुरखे म दिखाई पड रहे थे।
४३ जहीन ने इधर उधर देखा। तभी देवली उसके पास हवा की तरह भापी । जहीन की भांखाम प्रश्न नाच उठा। देवली से उसवर मीधा, प्रत्यय सम्बध नहीं था। देवली ने मुस्करा कर कहा "मैं गजसिंहजी की खास बांदी हूँ। पाइए, मैर साथ चलिम ।" बेगम ने वीणा के तारा भकृत हान जैसे स्वर में कहा, "नही जहीन, हम इहे नही जानत।' देवली और कुछ कहै, इससे पहले ही महाराज त्यय वर्ष की भोट से निकल आए। उहोंने अनुगमपूर्ण स्वर म कहा, "जहीना हम " जहीन में एक बार इधर उधर देवा । फिर वह एक पने झुरमुट म बेगम साहिरा को लेकर घुम गई। यह झुरमुट सचमुच का अभिसार स्थल पा । चारो ओर पनी भाडिया और भरडियो को और गहरा करन के लिए उन पर चलें लिपट गई थी। बेला म छाट छोटे लाल, पीले और सफेद गपहीन फूत सिले हुए थे। जहीन न मादाय बजाकर कहा, महाराज, मरा इनाम महा राज ने तुरत अपने गले के एस्लड हार को सोलार उसे दे दिया और वचन दिया कि वे उसे नवाब साहब से मांगकर ले जायेंगे। जहान ती गई । प्रस्तर प्रतिमा की तरह खड़ी रही अद्वितीय सुटरी और कोमलगी भनारा बेगम । महाराज उसके समीप गये । मधुर स्वर म बाल "इस परदे को दूर कोजिए वेगम साहिवा हम नहीं जानते नि मह प्यार निस विस्मा है पर इतना जरूर जानते हैं कि हम पाप से मिलन के लिए तडप रहे पे रात दिन येचनी में सांस ल रहे थे । शायद इसलिए प्रम करने वालों के बारे में लोगा ने कहा है कि वे जम जमावर से प्रेम करते पाते हैं।' महाराज भावावश मे थ । क्या कह रहे थे, यह स्वयं उह मातूर - नहीं था।
४४ रोक्कर, निस्तघ। महाराज उसके समीप गये । अपने हाय से बुरखे को उलटा दिया। हठात महाराज के मुंह से प्राश्चय म डूबी प्रोह' निकन गयो, जस काली, काजल-सी घटाग्रा के बीच चांद नही मूरज तेजस्वी महारान अप्रभित से खडे रहे । पपरापो दप्टि से, देखते रहे अपने स्वप्ना की रानी अनारा वेगम को और अनारा की नाजुर सी पलकें पत भर के लिए खुलकर झुक गई । उसने लरजने होठो पर पागव T? थरथराकर रह गया। हाथ थोडा सा उठा तो उठा ही रह गया। "वेगम । जहीन सच कहती थी कि हमारी वेगम साहिरा चांद का टुक्डा हैं । वह आपके बारे में इस तरह बताती थी, मानो वह नही, पाप खुद हमसे बातचीत कर रही हो। इस पहली मुलासरात म हम कुछ नहीं पहते सिफ इतना ही वायदा करते हैं हम आपके लिए सब कुछ निछा वर कर सकते हैं। भनारा बेगम ने अपनी पखुडियो सी पलका को धीरे धीरे सोला। बहुत ही मद्धिम स्वर मे बोली मापने वारे म मैं बहुन सुन चुकी हूँ। हम भी वफा नहीं छोड़ेंगे। पाप यतीन रखें।' महाराज का विपुल विलास म लिपटा मन दहा उठा । उहोने मागे बनकर बेगम के हाथ थाम लिए और उह चूमकर कहा 'विता।' बेगम ने सिफ मौन सलाम दिया । X x x फिर दिन प्रतिदिन उनरा प्यार बना गया। महाराज अपना मारा सोय कौटुम्बिक परम्परा गौरव मान-मर्यात और मानवान को विस्मन परके भनारा की पागो मे सो गए और अनारा बेगम ने भी किसी परवा न करके गजसिंहजी को अपना सवस्व समर्पित कर दिया । वे हमेशा मिलने लगे। खुलेमाम मिलने लगे। उनके चरचे भी शुरू ए । मुसलमान सरदारा को यह अनुचित लगा। उन्होंने नवाब से इसकी शवरायत की। पहले तो नवाब को विश्वास नहीं आया, पर बाद में सारी स्थति का नाम हुमा, तो वे सजग हो गय। उहाने तुरन्त अनारा पर तिबध लगा लिया पर अनारा कही जा पा नहीं सक्ती थी। ड्योढ़ी र भी सख्त पहरा ठिा दिया गया था दमना मस्त को कोई भी विना वजह बाहर नहीं जा सकता था। किन जहीन ने देवली को अपने यहां बुलाया । बेगम ने देद भरे स्वर में कहा, "मैं महाराज के पास जाऊँगी। मैं उनके बिना नही रह सकती देवली । उहे मेरी भोर से हाथ जोडकर कहना कि वे मुझे आजाद करा दें।" देवली ने बगम को पाश्वस्त करते हुए विनम शदी में उत्तर दिया, 'महारान स्वय ताप रहे हैं । उहोने कहा है कि वह मुझे एक बार मिल ले, सिफ एक बार । क्या माप उनसे मिल नही सक्ती ? "क्स मिल सकती हूँ, देवली। नवाव पुद बादशाह सलामत के खास आदमी हैं। मुझे हर इस बात का है कि कहीं मेरी वजह से कोई बड़ा सून-खराबा न हा जाम।" "मैं इसका क्या जवार दू' आप किसी भी तरह उनगे मिल जोगिये। कुछ क्षणा तर मनाला छाया रहा । बेगम सापती रही। सहसा चहरे पर प्रसलता की रेखा नाची । वह बोली "महाराज पश्चिमी महल के झरोखे म मा सकते हैं क्या ? उन्हें पहना कि मैं वहां उनका इन्तजार देवनी ने भावर महाराज से सारी बातें बतायी । महाराज मोर पिरल हो रठे। उह लगा कि वैगम के चिना यह जीवन, यह भोग- विलास यह शोष और यह शानोगौरत, सब व्यय है।
'मैं जाऊगा देवली, तू वेगम को जरूर कह दे कि वह झरोस में
रस्सी की सीढियो बनाकर डाल दे। मैं उसके द्वारा झरोखे म पहु=
जाऊंगा।'
देवली चली गई।
X
X
।
माप कुछ
निशीथ का समय । महाराज मपने व्यक्तित्व की महत्ता को भूलकर
साधारण नायक की तरह चल पडे । वे हाथी पर थे। जसे ही हार्य
झरोखे के नीचे पहुचा वसे ही वेगम ने रस्सी की सीढियां लटया दी
महाराज पलक भपरत चढ गये।
वह पनारा का अपना वक्ष था। प्रनारा महाराज स लिपटकर
सिसक पडी । महाराज भी विह वल हो गए।
'बेगम ।'
महाराज
भी कहिय पर यह सच है कि हम मुदत
की राह म बहुत आगे बढ चुके हैं । यहाँ स लोटवर में जिन्दा नहीं रह
सकूगी। पता नही पाप क्या सोचते हैं ?
महाराज ने उसके नाजुक हाथ को अपने हाथ में लेकर पहा
'बेगम । मैं बहुत ही ऐय्याश रहा हूँ। लकिन तुमसे प्यार होने के मा
मेरा दिल बदल गया है मैं भी स्वय बदरा गया है। मुझे लगता है कि
पह गासिंह जो औरत को सेल और रूप की वस्तु समझता था, मर गया
है । तुम्हारे प्रेम की छाया म एक नये गजसिंह ने जन्म लिया है। मैं
भी तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकता।'
प्रमाण धीमा था । रगम उनक पारा गयी। रघे स्वर म बोली, कुछ
पीजिए मुझमे अब अलगव नहीं सहा जाता । मैं पर तर मुरवत का
भूटी बातो स नवाब को भरमाय रखूगी। शराब के नाम पिलाये
रखगी। सच, मैं आपके इक के साये मदम लेना भौर दम तोडन:
1
४७ चाहती हूँ। मैं नवाव रे साथ हरगिज नही रह सकती।" गजसिंहजी बाहर फले मधेरै पो देखते रहे। बेगम की खिडकी के चौखटे पर सिर रखकर लम्बी सांसें ले रही थी। गाँसंहजो ने गम्भीर स्वर में वहा. "अपने भगवान री सौगध साकर रहता हूँ कि मैं तुम्हारे लिए ससार को सारा खुशियां छोड़ सकता हूँ। मारवाड का सिंहासन मोर मुगलिया सल्लनत का मान-सम्मान छोड सकता है। बाम मैं तुम्ह वचन देता है कि प्राण रहते तुम्हें नहीं छोड़ गा। मैं राजपूताना का वीर हूँ। क्षत्रिय है. क्षत्रिपो म राठोड हूँ। हम अपनी प्रतिमा को पूर्ण करने के लिए सिर करने के बाद भी धराशायी नहीं होते। भोर मापको अपनी तलवार पर हाथ रखकर मरोसा देता हूँ कि मापका यही पोहदा होगा गो हमारे महतो म पटरानी का होता है।' "फिर पाप मुझे अपने यहां से बलिए।" "मैं पापको इसो समय ल चल सकता हूँ। "फिर ले चलिए।" भौर रात में अंधरे में दोनों जने झरोखे मे उतरकर पले माए। मामोश रात और उन दोनो के सामोश इरादे । किसी को दुछ पता न पला, सिफ जहान जानती थी कि बेगम कहाँ है । दूसरे दिन सार नगर में तूफान मच गया। भागरा के हर प्रतिष्ठित पतित में यहाँ इची चर्चा का बाजार गरम या । लोग पता नहीं लगा पा रहे पेलि मासिर बेगम गयो वहाँ हाँ, यह निर्विवाद रूप से कहा जा रहा था कि वेगम बी उम्र नवाब साहब से बहुत कम पी। पोर नवाब साहर जो स्वय शाहजहाँ के कृपापात्र थे, जहाँपनाह के में हुजूर म हाजिर हुए। "मया बात है नवाब साहद " नवाब साहब ने सारी बातें दद मर म्वर मे सुना दी। शाहजहाँ ने अनुमान लगाया । क्त ही उन प्रमुख गुप्तचर ने बताया था कि गसिंह जी का अनारा बेगम से उहोंने गम्मीर स्वर में नवाव से कहा, "माप " फिक्र न करें, हमारी प्रोर से पूरी कोशिश की जायेगी।" शाहाहाँ ने तुरन्त गजसिंहजी को तलब किया । गजसिंहजी भी तुरत हाजिर हुए । प्रौपचारिकताएं पूरी करते ही वादगाह ने तनिक मादेश- भरे स्वर में कहा, "अनारा बेगम कहाँ है बादशाह की नजरें दीवार पर बने एक तलचित्र पर थी। 'मुझे नही मालूम प्रालीजाह मोर प्रापने मुझसे ऐसा सवाल क्यिा ही क्यो ? मैं मुगलिया सल्तनत को देखमाल करता उसके मन सबदारो ताजमी सरदारो की बीवियो को नही ।' गसिंहजी का स्वर मठोर हो गया। शाहजहाँ ने प्रश्न मरी दष्टि उन पर फेंकी। ईरानी कालीन पर थोडी चहल-कदमी करके कहा, "मुगलिया सल्तनत पर आपके बहुत मह सान हैं । यह भी सही है कि मापने अपनी बहादुरी भोर जवामरदी से हमारे तख्तेताऊस की कई बार हिफाजत की है लेकिन हम यह भी जानते हैं वि औरत प्रापको कमजोरी है। ऐसे हालात मे भाप हमारे किसी खररवाह को नाराज करके हमारे बीच झगडा भी करा सकते हैं। जरा हमारी बात पर गौर कीजिए कि इससे हिंदू और मुसलमानो मे फसाद हो सकता है।" गजसिंहजी की भकुटियां तन गयो । बुछ रुष्ट होते हुए बोले, 'एक मदना मनसबदार महाराज गजसिंहजी पर बै-बुनियाद दोष लगयेगा पालमपनाह' राठोड का रक्त इतना ठण्डा नही हुमा कि मुगल जब चाहें उहें ललकार दें। यदि मुझ पर झूठा दोष लगाने का साहस किया गया तो नवाब को बहुत बुरे भजाम से टकराना पडेगा। मव नाहजहाँ ने अपना रुस बदला । वे समझ गये कि महाराज इस तरह की डॉट इपट और धमकी में नही पा सक्त । तुरन्त मधुर स्वर में बोले, "प्राप मेरी बात का मतलब नहीं समझ पाप मुझ पर यकीन क्यों नहीं करते ? मुभम भी प्रापका सून है । मैं पापत्रो तहेदिल से मामू कहता हूँ। माप मुझे पपना समझकर सब कुछ सच-सच बयान कीजिए।
मैं मापसे एक शहशाह ही नहीं, जाती तौर पर मन कर रहा हूँ कि मामू, मैं भापके हक में ही फसला करूंगा। "वायटा करते हैं।" "वायदा करता हूँ. मामू शाहजहां ने विनीत स्वर म कहा, "मैं नहीं चाहता कि ऐसी मामूली बातें खौफ्नाद अन्जाम मे बदल जायें।" गमिहनी ने सारी बातें बताकर कहा 'बगम हमारे पास है । हम उमम मना नहीं रह सकत । हम उसके लिए सब कुछ छोड़ने के लिए तयार है । प्रापको नगरे इनायत और ओहदा भी। यह भी सच है कि हम उसके लिए दुनिया को बड़ी से बड़ी तारत से टकरा सकते हैं।' "हममे मी? "गुस्तासी माफ हो, वात पाया तो मुगल सल्तनत से भी।' गज- सिंहजी की प्रासं झुरे गयी। बादशाह ने बात बलते हुए कहा, 'और भापक राठोड वश में रासका क्या पोहा रहेगा ?' "हम उसे वही इज्जत देंगे जो अपनी महारानी को दे रहे हैं । जहाँ पनाह, हम उसे बहुत प्यार करते है। हम उसके साथ पूरी वफा मौर सच्चाई से रहो।" शाहजहां ने कहा, हम प्रापपो गर तौर पर वेगम बस्शते है । भाप उसे जोधपुर भेज दीजिए । पीछे से भाप चले जाइए, लेकिन बहुत ही खुफिया तौर पर । हम नवाद को दक्षिण में भेज देंगे। खुा हूँ प्राप?" "हम मापने इस महसान को कभी नहीं भूल सकेंगे। महाराजा ने तिर झवा दिया था। पोर महाराजा गज सिंह ने प्रनारा बेगम १ अपनी मौत तक एक हिन्दू रानी स कम मत से नहीं राणा । प्राज भो जोधपुर में उस प्रेम- दीवानी की याद म भनारा की यादी बनी हुई है। -
एक और नूरजहा
रसरपूर को निजी वठव म उसकी हसी गुजित हो
गयी। पति गिवनारायण मिश्र उसकी इस हसी का मम
नही समझ सके । वह अप्रतिम सा रसापूर को दग्वते रह
गये । रसकपूर अपनी रेशमी गुलाबी प्रोत्नी को जरा मिय
की ओर भुका कर बोली पडितजी आपने मुझे बहुत
लाड-प्यार पिया है। मैंने अपने जीवन में किसी को यति
अपन सिर पर सच्च प्यार का हाथ रसते हुए पाया है, तो
मापको। मैं प्रापको यकीन दिलाती हूँ नि जयपुर के दीवान
प्राप ही हागे।
सांझ वार्तालाप म वही सरकार पवत पाटियो मे टिप
गयी थी।
योनी ने पावर इन का दीपक जला लिया था जिससे
चटक म सुवासित मालोर फल गया। समीर मद मद चल
रहा था कापती लौ म मिश्र का चेहरा और गम्भीर लग रहा था। रमपूर के प्राचल के एक पल्लू को स्नेह से चूमन हुए उसने कहा, "वेटी, मुझे तुम्हारा ही भरोसा है। सारे साम त, सरदार और उमराव तुम्हार विरुद्ध पइयत्र रच रहे हैं । व तुम्हें दीघ्र से पीघ्र जलील करके अपने अपमान का बदला लेना चाहते हैं।" रसापूर ने घणा स एष हुकार भरी और कहा, "महाराजा जगतसिंह मेरी मुटठी में हैं । पडितजी, व मर बिना जिंदा नहीं रह सक्न । व मुझे बहुत प्यार करते है। फिर मैंने अपने विरोधियो को या तो परच्युत परा दिया है या मरवा दिया है।" घडारन नरबदा न उसकी बठक मप्रकश किया । वडारन ने काली छोट बा घाघरा और वाचली पहन रखी थी। सिर पर माना मोदना मोद रखा था। उसके गले में चांदी का पाठलिया और सरल थी। कमर में चांदी का कोडा झूल रहा था। उसने रसपूर को शिर मुका- कर मुजरा किया। विनीत स्वर म बोत्री "अन्नदाना ने प्रापका पद परमाया है। "मैं अभी हाजिर होती है।' रसापूर ने नरबदा म वहा और उठता हुई पहिनजी से बोली, "आप निश्चित रहिए । भाप जयपुर में दीवान बनेंगे ही। पडितजी ने उसे प्रागीर्वाद दिया और प्रसनता में हुची हुई वह चली गयी। माम मोर गहरी हो गयी था। महत में मदिरा दी दावध्वनि मोर घण्ट बज उठे। रमरपूर ने अपनी बौदियो से स्नानादिका प्रवध ररने व लिए कहा । जब वह नहाकर बाहर निती तब उममा अद्वितीय मौदय वणवण में व्याप्त हो गया। उन बारियां वस्त्र पहनाने लगी। रेशमी भीने वस्न । उसरा गोरा रंग, सरिया सहगा, कौचला और घोढने में एक मात हा रहा या कानाम हारर फूल और गले महीकि नर ।
भलमल भनमल। पांवो म वह बजती हुई पायल जस्र पहनती थी। वह सज धजकर महाराजा के गयनरक्ष म पहुंची। जयपुर के महाविलासी और चरित्रहीन राजा जगतसिंह रसकपूर के लिए उमत्त हो गये थे। रसपूर एक वेश्या, एक मुसलमान वश्या, जिसने जयपुर वे राजघराने में तूफान मचा दिया था। राजा जगतसिंह कौटुम्बिन गौरव की प्रतीक अपनी समस्त रानियां जोधी, जप्ती और भरि याणी को छोकडर उसक वासनालिप्त प्यार म त मय हो गये थे । सभी सामत सरदारो ने इसका घोर विरोध दिया। यह वेश्या उनके घम को पददलित करखे छोडेगी।' इस तरह की चचाएं फलने लगी थी पर रसकपूर ने किसी को परवाह नहीं की। वह अपनी मनमानी करती थी, क्याकि स्वय महाराजा उसके हाथ की कठपुतली थे। उसने एक तरह से गासन की बागडोर अपने हाथ म ले ली थी। पायल की झकार जसे ही जगतसिंहजी के कण-युहरा म पडी वसे ही उ हाने अपनी बाँदी से कहा "लगता है रसरपूर पा रही है । इत्र का छिडकाव कर दो और दीप जलायो। मुझे और क्सूम्बा पिलामो।' कमुम्ब म मतवाते बने जगतसिंहजी से रसकपूर कहती 'मुझे सता डर लगता है राजाजी वही आप अपने दुष्ट सरदारो की बातो मे माकर मुझे देश निकाला न दे दें? प्रापका वह बनिया दीवान प्राज ही एक भादमी का एसा कह रहा था। मुझे उसको वफादारी पर शक है । उसे अपने पर से हटा दिया जाय । तब रसपूर की बांह महाराजा के गले चारो पोर लिपटों लगती। वह अपने मिर को महाराजा की छाती पर रस देती । महाराजा के चारो और वासना व सागर ठाठे मारने लगते । महाराजा कहते, "हम उस दीवान को कम ही पदच्युत कर देंगे । हम तुम्हारे एक गारे पर सारे राय वा गासन बदल सरते हैं।' मोर दूसरे दिन पडित दीवान हो गया। सारे कछवाह राजपूत जल 7 उठ। इस वेश्या ने महाराज पर न जाने क्या जादू कर दिया है ? किसी का भी नहीं सुनत । क्या दिया जाय, रमरपूर का पतन हो पर रसकपूर ने और चतुराट से कदम उठाना गुर दिया । उसने कुछ विश्वस्त लोगो व बोरिया का गुप्तचरी ररन के लिए छाड रिया । मामता का वह भीतर ही मातर कमजोर बग्न लगी। उह मापस में मिगने लगी। दीवान मिश्र उस प्रत्यन ही बनवान बना रहा था। वह करनागिन और दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति अपनी पत्र की रमा के लिए रम रपूर वे चारो प्रोर साए की तरह निपटा रहता था। मूथ तप रहा था । जयपुर कपात पापीमा लग रहा पाक्लिन साफ और सूना। उदास दापहर सर जगह सोयी पहा थी। रमापूर अपने भवन में वठी थी। दो पालियों पसे मल रही थी। दीवान समीप बैठ गम्भीर चर्चा कर रहा था। दीवान फरमा रहा था, 'टाकुर निसिंह तुम्हारा सुरलमसुल्ला विराध दर रहा है। उसरे पछि मह ब४ सामनों का हाथ है । मुम सतरा लग रहा है । 'मापको सनरा हर वक्त लगता ही रहता है पडितजी पर रस कपूर ने कच्ची गालियां नहीं ली हैं। मैन गजाजी से अपने नाम का fam चनान की प्रारा स तो है । मैंने उनम वचन भी लिया है कि मरा सम्मान जोधाणी, जैसाणी और भरियाणा रानियो का तरह हो। मेरा स्तवा उनके बराबर हो । दरबार म मरा यही सम्मान हो जा एक "फिर उन्हान क्या कहा 'उहाँने फरमाया कि तुम्हारा वही सम्मान और वहा प्रज्जत होगी। सरपूरक सारे पर सारा शमन वाला जर मक्ता | राजाजी मरे लिए अपना सबम्ब मारा सक्त है।' मरे बारे म कोई चचा हुई?" धौरस प्रश्न किया गवार ने । 'हुई वापर बहुत खुश और सन्तुष्ट है ।" रानी का होता है। "फिरकर दरवार म मिलेंग।"
रसापूर दीवान के जान के बाद दपण म अपने-मापको निहारत रही, फिर दम्भ म हस पडी । उमने अपने चारों ओर देखा, अतुल वम विसरा पड़ा है । जयपुर के राजपूती गौरव को उस नतकी ने मानो पर दलित वर दिया हो। X X x . दरबार। महाराजा जगतसिंह ने दरवार म प्रा किया । रसरपूर उतरे सा थी। पकी ज्योतित शिसा की मांति उसरा सौग्य ज्वाजल्यमान है रहा था । कुछ सरदार जल रहे थे। क्तिना अनुपम क्तिना अलौकिक स्वत ही साम त सरदार गरदन झुकाकर मुजरा कर रहे थे । रिक दूना के सामत चामिह ने अपनी गरदन नही झुकायी । वह तना मडा रहा। महाराजा के पांव कालीन स चिपक गये । दरबार का सारी दीवा जैसे काप उठी । महाराज क्रोध म जल उठे। अपने हाठ को मजाब तर से हिलार व धोते 'मपुर सा | दरवार के काम-कायदे भी नहीं रह जाते ? हम मुजरा पीजिए। 'मैं प्रापका मुजरा कर सकता हूँ पर इस वग्या या नहीं। जिसर्व इज्जत और मान हाट की वस्तु है उसके समक्ष राजपूत का मिर नहीं मा सकता। ठाकुर सा' चीस पडे महाराज । उनकी प्राखें बहुत ही भयावह हो गयी । मूछे कोष म फुरक्ने लगी। उनसे ताण एव पद भी बोल नहीं गया। सारे दरवारी स्तष हो गय । दीवान मिश्र अपनी तलवार पर हा रखकर खड़ा था । मबसो मनय होने की माया हो गयी। महाराग ? अत्यत कठिनता से बोल पाय इस गुस्ताखी की सजा जानत हो ? हम आपको कोल्हू म पिमवा देंगे। ठाकुर के काना म चमक्त हीरे वे लौंग हिल उठे। अपने कानों पो सश करती मूछो पर ताव देकर व वो। और पाप कर ही क्या सकते हैं ? हिंदुआ का विना या तो उसको धार्मिक अधता न किया या भोग- विलास न । बछवाहा का रक्त प्राज आज एक वश्या के लिए इस तरह तडपेगा, यह हमन सपन म भी नहीं सोचा था । मैं इम रटो को न प्राज मुजरा कम न क्ल। और जिस प्रायोजन म यह भाग लगी, उसम मैं पदम नहीं रखूगा । रसकपूर अब भी तटस्य सो खनन थी । अपनी जलती आँखा स वह चालसिंह को देख रही थी और समझ रही थी अय मामता को भी । वह सबके चहरा को पढ़ रही थी कि सारे मामत महाराजा क निन्द्ध हैं। विरोध की प्रामा म धणा को आग वनकर चमर रहा है । रहा कुछ अधिक ब हो गयी तो महाराज की हत्या तक हो सस्ती है । इसलिए उसने । स चलना श्रयस्पर समझा । उसन नाराजगी के स्वर में कहा, "मैं ती हूँ, राजाजी । मैं आपकी यह बेइज्जती नहीं देख सरुनी।" रमापूर हवा की तरह चली गयी । महाराजा उस रोकना चाहते थे, र उनका जबान तानू स चिपर गयी। दरबारम सन्नाटा छा गया। चौतमिह न थक्ते हुए पुन पहा 'क्छवाहा की पवित्र और गौरव मयी वसु धरा पर एक वश्या का सिक्का चलगा। क्या सब रानियां मर गयी है, अनदाता वासना में इतने लिप्त मन होइए । क्छवाहो * भान गान को कक्ति मत कीजिए । उनकी मर्यादा का धूल धमरित महाराजा ने अपने भीतर का सारा जोर लगाकर कहा, 'खामोश हम कहते हैं कि आप चुप हो जाइए वरना हम आपको दरवार में करल करा देंग।"
चालसिंह दरवार से निकल गया । वातावरण बहुत बोझिल हो गया था। दरवार वर्षास्त कर दिय गया। X X X । राजाजी की सवारी निक्ली थी। हाथी के हौदे के स्वण सिंहासन पर महाराजा के माय रसवपूर बढ़ थी। लोग जय जयकार कर रहे थे । दीवान मिथ सारे सामतो की देख भास कर रहा था । चादसिंहजी नही पाय थ । वह ना सिंह पर क्रोधित हो रहा था और साय ही उमरे विरुद्ध पडयन भी रच रहा था। रसकपूर क गुरगे अपने दोनो हाथो स वे ही सिबवे लुटा रह य जे महाराजा ने रसम्पूर के नाम से चलवाये थे। ब्राह्मण दीवान न मपने प्रादमियो को सिखा पढा गिया था कि व महाराजा वे जयघोप वे साप महारानी रसकपूर की भी जय बोनें । उमको जयकार के साथ राजपूतो को लगता था कि किसी ने उनो जिस्म पर जलती लारा चिपका दी हो पर मभी खामोश । जलूम हर म घूमार महत में पहुचा । महत के बार महाराजा के निजी भवन म । रसवपूर उनके साथ थी। एकात होत ही रसकपूर अपनी रेमो वाह महाराजा के गल म हाल पर बोली "यह इज्जत पाप ही मुझे द सकते हैं। राजाजी, आपने म नाचीज को पितना प्रादर यम्मा है । पर यापसे एक ही मज है कि मुझ सदा अपने घरणो में पड़े रहने दीजिएगा । यही इज्जत यही मान यही मधिरार हो मेरे ।' "हम तुम्ह वचन दते हैं कि तुम्ह इतना ही मान मिलगा। फिर वही वासना का समर। भाग की दुवलता। जगतसिंहजी क्षण दाण म विचलित हो गते टूटने लगते दान हो जाते और रसकपूर मांगती, 'फला बादी को हटा दिया जाय। फला सामत के अधिकार छीन लिये जायें। फला को फला पद का अधिकारी बना दिया जाय । मुझे इतना रुपया चाहिए। और महाराजा हाँ हाँ करते रहते और प्रत में मुझलाकर कहते, "मेरा सभी कुछ तुम्हारा है। यह धन, महल मोर सासन।" भोर आज उसने दीवान को उसी समय बुलाकर प्राज्ञा दी, ठाकुर पादसिंहजी न राजाजी का अपमान और दरबार की मर्यादा तोडी है। इसलिए उन पर दो लाख रुपया जुरमाना किया जाता है। जुरमाने की पदापगी भार ने हो सो उनको जागीर जल हो जाय । रसकपूर ने इस फरमान पर महाराजा के उसी पल हस्ताक्षर कराए। मोहर भी लगवायो और दीवान को दे दिया। चांदसिंह सभी सामतो के पास गया । सामत क्रोधित हो उठे। पर दीदाण मिथ ने बहुत ही अच्छी नाकेव दी कर रखी थी। चांदसिंह परे- शान रहने लगा। . x x X बहारन नरवदा राज्य की वफादार बांदी पी । वर्षों से नमकहलाली का हक पटा करती मायो थी। जोधाणी रानी के साप वह दहेज मे पायी 'गोलो' थी। परनीघ्र ही अपनी चतुराई और वफादारी के बल पर रावले पी वडारन बन गयी। वह इन सब तमाशो को देख रही थी।जोधाणी का अपमान, उपेक्षा मोर उसकी पीडा । रानी पति वियोग मे कभी बावली- सी हो जाती थी। नरवदाको कहती थी, इस रसकपूर की हत्या कर दो। नरबदा जानती थी अपने पद को मर्यादा जिम्मेदारी भोर उलमन। यह राणी-सा को पहती 'माप धीरज रखिए । कमी वह खेल खेलूगो कि पासा ही पलट जायगा।' 1 १८ । पौर एक दिन उमने सडक पर एक सेठ की बेटी को देखा । देसा तो देखती रह गयो । रसकपूर से भी अधिक रूपवती। उसने तुरन्त उसका पता-पता लिया फिर कुटनियों को छोडा । वह महाराजा के चरित्र को दुपलता को तो समझी हुई ही थी। रसपूर के पतन का एक ही इलाज है-एक दूमरी रसक्यूर । मौरा मिलते ही उसने उस लड़की को महाराजा के समक्षा पेप दिया । राजा चरित रह गये । लगिरा वे रसकपूर को अपने मन की इस कमजोरी भौर उस लड़की की जानकारी से मनभिज्ञ रस रहे पे। नर- पदा कहती, "रसवपूर कभी भी उसकी हत्या करा सकती है, पन्न पाता। यह बहुत ही निदयी है। और यह दीवानजी इन सारे सामन्तो को अधिक खिलाफ करके आपको पाक्तिहीन बनाना चाहते हैं । ठाकुर चादसिंह विद्रोह करने पर उतारू हैं । पौर इसी तरह नरबदा महाराजा को उकसाती रही । एक दिन जब महाराजा ने उस लड़की के बारे में पूछा ' वह हमारे पास क्यो नहीं पाती नरबदा? हम उसे और उसके बाप को निहाल कर देंगे। हम तुम्हें मुहमांगा इनाम देंगे। तुम देर मत करो। पर यह रसकपूर मनदाता वह मुझे जिंदा जला डालेगी।' "रसक्पूर को मालूम ही नही पडेगा।" 'ऐसा माप मत सोचिए अनदाता । उसके अपने लोग भी महल में पदव हैं । पाप उसे अपने रास्ते से हटा क्यो नहीं देते?" यह सम्भव नही । हम उसे चाहते हैं प्यार करते हैं । हमने उसको पई वचन दिए है नरवदा । इस मामले के बीच रसपूर को मत सामो । कोई मौर उपाय ढूढो। पौर सारे सामतो तथा रानियो को दष्टियां नरवा पर नगी हुई थी। बस अब नरबदा कोई नया घमारा परे । नरबदा ने उस लड़की के बाप को एक कचा मोहदा दिला दिया। उस दिन महाराजा ने फिर उस लडकी को देखा। वे वाचाल हो गये। ।
५६
नरवदा को एका 1 में ले जाकर बोले, "मैं तुम्हें मुंहमांगा इनाम दूंगा।
मरवदा, मेरी इस इच्छा
"माप इस रसकपूर बाईजी को ।'
फिर तुम इसको बीच मे लाती हो।" महाराजा रुष्ट हो गये।
कठोर हो गए।
अन्नदाता सूर माफी हो । माप जिस रसवपूर पर इतना अभि
पान कर रहे हैं, वह भापके प्रति वफादार नहीं है । माप त्रिया चरित्र
को नही जानते "
"क्या बकती हो
महाराजा उत्तेजना म खडे हो गये।
ठीक कहती हूँ । वह प्रापके साथ-साप विसी पौर वो भन्नदाता
वह कुलटा है।'
"नरबना हम तुम्हारी जबान खीव लेंगे।"
"हाथ कगन को पारसी क्या ? प्राज दोपहर को मेरे माप माप
घलिए।"
"
x
X
X
दोपहर।
नरवदा महाराजा को अपने साथ रसकपूर के निजी कक्ष में ले
गयो । रमापूर के साथ कोई खूबसूरत जवान सोया हुआ था। महाराजा
में तलवार निकाली। नरबदा ने उसे रोक लिया। मज करने लगी,
"इसकी यह सजा नहीं है, अन्नदाता | इस वेश्या को कठोर से कठोर
रण्ड मिलना चाहिए । इसकी वजह से सारे जयपुर में प्रशाति और
विद्रोह के वीज पडे है।"
महाराजा उद्विग्न से वापस पाये।
मरबदा ने रसकपूर के समीप सोये युवक को सौ मोहर दी
घस्तुत वह रसपूर की एक विश्वसनीय बादी थी जो पौडी देर में
लिए पुरुष बनी थी, स्पयो के लालच म । नरवदा ने उसे यह भी धमकी
दी 'यदि तूने कभी राजफाश किया, तो पनदाता सबसे पहले तुझे ही
सूली पर चढ़ा देंगे, समझी।"
X
'दावानजी को पद से अलग कर पिया गया है ।" रसापूर की एक
दासी ने घबराते हुये कहा।
"वयो"
रसकपूर चौकी।
.
'पता नही, वाईजी, अभी-अभी मुझे यह खबर लगी है। वह अब
भी प्राकुल-व्याकुल थी।
ऐसा नहीं हो सकता राजाजी ऐसा नहीं कर सकते । मैं उनने पास
जाती हूँ। पहती हूँ क्या इमोनिए मुझे इतने वचन दिये थे। प्यार किया
था। क्या इसी बून पर मैं शासन बदल सस्ती हूँ नहीं, मैं राजा
जी को ऐसा नहीं करने दूंगी। जरूर किसी ने तुझे झूठी खबर दी है।
वह जम ही कमरे से बाहर निचली कि उम मिपाहिया ने बाहर
निक्लने से गना कर पिया, माप इस कमरे से बाहर नहीं जा राक्तीं।
यह महाराजा की माज्ञा है।
क्या बाते हो? वह चिल्ला पड़ी।
हम सही परमा रहे है बाईजी।'
रमापूर तहप उठी। यह सव यकामा मौर इतना जल्टी क्या हो
रहा है ? वह मार म्या पर पह गयी । क्रोध म वह रियो को पीने
नगी । अपना सिर मममती गहे पर पटरने लगी।
सेनापति पूसिंह जिम कभी रसापूर ने महाराना स बहार नौकरी
निकसा यिा था, अपने हाय म हपाटो लेकर पाया । रसकपूर के
। कमरे मे निधडक्ता से घुसता हुआ वोना, मैं प्रापको गिरफ्तार करने पाया हूँ। आपको सुनकर बडा दुख होगा कि प्रापकी सारी सम्पत्ति को जब्त करने के प्रादश भी दिये जा चुके हैं।" "तुम क्या तुम्हारा माया फिर गया है " "वह जमाना चला गया जब अापके पत्थर तैरते थे। महारानी सा, आपको क्द करने के हुक्म मिल चुके हैं।" 'मैं राजाजी से मिलना चाहती हूँ।" 'पाप उनसे नहीं मिल सकती। आपको नाहरगढ के किन मेले जाया जायगा।' नहीं नहीं, ऐसा न करिए । मुझे एक बार राजाजी से मिलने दीजिए, सेनापतिजी । मुझ पर दया कीजिए । मैं आपकी गाय हूँ।" वह रो पड़ी। घडसिंह ने उसकी काई बात नहीं सुनी। उसके हाया मे जबरदस्ती हपकडी डाली। उसे अपने माय ले चला। मोगियां उतरते ही खिडकी पर महाराजा खडे हुए दीस गए । रस- कपूर कदन कर उठी, "राजाजी यह सब क्या है ? मुझे मेरा कसूर तो बनाइए। रामजी राजाजी, में आपकी गाय है। ये सब लोग मुझे नाहरगढ़ ले जा रहे हैं।" धूसिंह ने उसे धक्का दिया। यह दीवार से जा टकरायी । महाराजा ने एक पल के लिए माख बद कर लो। फिर घृणा से सखारकर थूक प्रिया । रसवपूर का पातनाद बढ़ गया, 'मुझे बचाइए, राजाजी मुझे बचाइए किसी ने आपको क्पट से ठग लिया है, मनदाता महाराज रमरपूर पीली पड गयी। उस तुरन्त परल ही पवत पर स्थित नाहरगढ़ ले म ले जाया गया जिसके तहखाने महामपगधियो के लिए सुरक्षित रहते थे। उसके कोमल पांवो से खून बह रहा था। चेहरा जद हा गया था। उस भयानक
होंठ सूख गये थे।
रापूर रोते रोते थर गयी थी। थोड़ी ही देर पहने जो इस धरती
की साम्राज्ञी थी जिसके हुक्म के बिना पत्ता तक नहीं हिलता था वह
हपकडियो मे जबडी बिलख रही थी, उसके रुदन पर लोग हग रहे थे।
जब उसे नाहरगढ के भयानर अधेरे तहखाने के फाटको के समक्ष
सहा दिया गया तब वह भय से चीख पडी, नहीं । नही । मुझे इसमें
मत डालो में भापके हाथ जोडती हूँ। मैं यहाँ से दूर बहुत दूर चली
जाऊंगी।
ठाकुर चांदसिंह ने जलते स्वर
में
कहा
पातुर । तूने
। तूने जयपुर को
दुखो मे डाल दिया है। यहा वीरों की जगह मडवे भर गये हैं। तुमने
सोचा कि महाराजा सा तुम्हारे अपने रहेंगे। तुम समझती थीं कि तुमसे
सुन्दर इस पृथ्वी पर दूसरी नारी नहीं
होगी। क्या तुमने महाराजा के
के कारनामे नहीं देख कि इहोने लक्षियों के पीछे जिस चाहा शासन
सम्हाल लिया और जिसे चाहा वापस धक्का देकर निकाल दिया । तुम्हारा
भी वरपा गया । सेनापतिजी हयाडी खोलकर इसे तहसान म डार
दो। इसने बहुत से बेगुनाहों को मरवाया है अब इमे मी तहसाने में
ताप पर भूगो-प्यासी मरले दो तादि यह जाने कि मौत रितनी
भयानर व पीडाजना होती है।
नहीं नहीं नहीं । मुझ कोई वचानो चामो ।
भावान तहमानो के न होने पाटका के साप मर गयी।
एर मोर नूरजहां का पतन हो गया।
चौहान और पठान
"महाराज !'
"क्या है ?"
"दिल्ली से माया एक पुडसवार मापकी सेवा में इसी
समय उपस्थित हो चाहता है ।"
"दिल्ली से मापा घुडसवार
1" रणपभोर गढ़ के
शौय, शक्ति और घप को साक्षात मूर्ति महाराज हम्मीर
चौहान चौंक पडे । यह प्रमी सिंहासन पर बैठे हुए थे।
उनके पास उनके सेनापति, दीवान व दूसरे सरदार बैठे थे।
उहाने पल भर के लिए उनकी तरफ देसा, फिर भाने वाले
पहरेदार की प्राति पर मपने माग की तरह चमक्ते लाल
साल नेत्र जमाते हुए पूछा, "वह सवार मौन है?"
"अपने प्रापको एक बदनसीव सिपाही बता रहा है।"
'उसे मादर के साप भीतर ले मामो। जो पहरेदार भाया था वह पुन सलाम करके चला गया। सेनापति दीवान मोर हम्मीर की मटियो तन गयीं, उनकी प्राकृतियां और भी पभीर हो गई। सेनापति ने अपनी कमर मे लटक्ती तलवार की भोर देख कर कहा, महाराज खिलजी की तष्णा दिन प्रति दिन बढ़ रही है। वह सारे राज- पूताने को निर्दयता और निममता से रौंदना चाहता है।' हम्मीर ने अपनी मूछो को ऐंठते हुए कहा, अभी तक चौहानी सलवारी से नही टकराया है जिनके तप तेज, और गौय के सामने कोई माततायो नही ठहर पाया।" तभी सिपाही उनके नामने उपस्थित हुप्रा सिपाही लगभग ४० वष पापा। उप्तका गरीर बलिष्ठ मोर कद काफी लबा था। उसने सिर मुबाकर प्रणाम किया और मत्यत मादरसूचर पदों मे बहा "शहबाहे मजहब भोर ईमान में भरने में कुछ अज करना चाहता है।' हम्मीर ने हाथ ऊचा करके सकेत दिया। सेनापति, दीवान और दूसरे लोग उठ कर चले गए। पाहिए, क्या बना पाहत हैं ?" हम्मीर ने कहा। मैं आपकी रण में भाया हूँ। मेरे जानमाल की रक्षा कीजिए। मैं पानी पदमपोशी परता हूँ।' कह कर भागतुर ने हम्मीर के चरण पानिए। हम्मीर सिंहासन से उठ गए। दीवार पर टगी दाल व तलवार की पोर देनार उन्होंने गमौर स्वर में कहा 'मैं प्रापका मतलब नहीं समझा परा भरती बात को साफ कीजिए फिर वह पो र बोने, 'परे, पार सडे क्यों विरातिए न इस मामन पर तारीफ रसिए।" भागतुक ने टूटे हुए स्वर में बताया, 'मैं पठान जाति का एक रातार सिपाही है। मरा नाम महिमगाह है। मैंने खिलजी नही वा के सापको। उसने मेरी मानों वाला जफानों से 4 - दिया । मुझे और मरे सारे कुनबे को उसने दीन बना दिया । दर दर का भिखारी और दाने दाने का मुहताज बना दिया । मुझे किसी ने शरण नहीं दी। क्योकि विनजी का यह परवाना मेरे पीछे-पीछे रहता है कि इसे जो पनाह देगा वह मेरा दुश्मन ममझा जायगा। लाचार मैं अपने बाल- बच्चो बीवी व बूढ़ी मा को लेकर भूसा प्यासा इस बस दुनियाँ मे जगह जगह भटक रहा हूँ। अगर वफादारी का यही इनाम है तो पाडे ही दिनो मे वफादारी का नाम इस जमीन से उठ जाएगा। मैंने अपनी पूरी ताकत से खिलनी की शोहरत फलाने वे लिए कुरवानिया दी और उसने मुझे सिफ इसलिए अपना जानी दुश्मन समझ लिया कि एव यात पर मैं उससे रजामद नही हुप्रा । चौहान राव, मैं आपके कदमो पर सिर झुका कर पनाह मांगता हूँ। सुना है राजपूत कौम शरण में पाए दुश्मन को भी गले लगा लेती है।' महिमशाह की प्रांखें भर पाई । वह उठा और उसने अपनी भाख पोंछी। अपने गने को साफ करता हुआ नजरें झुकाए हुए बोला में जाति वा पठान हूँ । मरे खून म एक सच्चे और वफादार पठान का खून है मैं खुदा की कसम खा कर बहता हूँ कि पाप स कभी भी दगा नहीं करुंगा । मुझे पनाह दीजिए गरीर परवर, पनाह दीजिए।' हम्मीर पल भर सोचता रहा । उन दिनो अलाउद्दीन की शक्ति पौर शौय का प्रातर चारो ओर फैला हुआ था। प्रत्यन्त ही वपर ढग से यह राजस्थान के गौय को कुचलने के लिए तुला हुआ था । राजपूताने रे वीर भी उस प्राततारी और बिना कारण साधारण प्रजा को अपनी पाक्रमणकारी गतिविधियो से पारित करने वाले के प्रति रोप स भरे हुए थे। एक तरह से वे खिलजी की पूरता को समाप्त करने म सलग्न थे लेकिन ये स्वप एक सूत्र में नही वधे थे। उनमे सगठन नही था, इस लिए खिलना या मत्याचार दिन प्रति दिन बढ़ रहा था । हम्मीर को भी खिलजी की पाक्ति मौर सेना का भान था । फिर भी महिमगाह के करण ऋदन और विवशता ने उहे सचमुच भाभोर दिया। उन्होंने
No text on this page.
बान, हम पनाह दी है तो पाप हमारी हिजाजत भी करें। सिफ हम ही नही, दुनिया के सारे पठान अापके इस रम के अहसानमन होगे। हम्मीर ने खिलजी को जवाब मे कहला दिया हम अपने शरणागत को किसी कीमत पर आपके हवाले नही कर सकते।" और इस उत्तर से खिलजा आग बबूला हो गया । उमने तुरत एक और हरकारा भेजा, जिमके द्वारा खवर दी 'इसका जाम बहुत ही खौफनाक होगा । हम रणथमौर की ईट से ईट बजा देंगे।' उत्तर में हम्मीर ने कहलवाया, "हम चौहान हैं । हम कोई काम प्रजाम के अच्छे बुरे कारण से नहीं करते । हमने सदा शरणागतो की रक्षा की है और आज भी उसकी रक्षा जी जान से करेंगे । माप को जो कुछ परना है वह कर लीजिए।" इस उत्तर के साथ ही हम्मीर युद्ध की तैयारियां वरने लगा। खिलजी भी अपनी विशाल सेना के साथ रणथभौर की तरफ बढा । रास्ते मे घमासान युद्ध हुआ। खिलजी के पाव उखड गए । कुछ दिन के लिए युद्ध मे विराम पा गया। फिर दिल्लीपति की सेनामो ने सम्पूर्ण शक्ति से हम्मीर पर मात्रमण किया । हम्मीर ने भी पूरी शक्ति से सामना किया। पर इस बार वह खिलजी वो नहीं रोक सका और मत में खिलजी ने रणधभौर के दिल को घेर लिया। रणयभौर का किला प्रभेद्य और अटूट था । हम्मीर के इस विले को मेना और विजय करना कठिन ही नहीं असभव-सा था। खिलजी वार बार मात्रमण करता और बार बार मुह को खाता । महिमशाह का शौय भी देखते बनता था। दिन पर दिन गुजरते गए महीन साल म बदल गए हठी और पाततायी पितजी रणयभौर को लेन के लिए तडपता रहा, लेकिन वह महिमशाह को माराम से बैठन का सकेत दिया। फिर स्वप बाहर माए । अपने दीवान और सेनापति के सामने महिमाह की समस्या रखी। सेनापति, दीवान और राव हम्मीर बहुत देर तक वार्तालाप करत रहे । प्रत म सवसम्मति से यह निर्णय लिया गया 'महिमा को पारण दे दी जाय । यह सच है कि इसका परिणाम प्रत्यत भयकर होगा, लेकिन यह पठान हमारी उदारता प्रेम पोर उत्सग हृदयगम करके प्राने वाली पीढी के लिए एक इतिहास तो छोड जाएगा कि एक पठान के लिए एक पूरी रियासत ने, राजपूताना के वीर चौहानों ने अपना सवस्व निछावर घर दिया । हम्मीर ने पाका महिमगाह से कुछ कहना चाहा । महिमाह उदास था। उसका मुख पीला पड़ गया था। उसने हम्मीर राव से बेचनी से पूछा, "महाराज । हम पापको पनाह देंगे। हमारी गरण म आपको पूर्ण सुरक्षा रहेगी। महाराज वह हम्मीर के प्रालिंगन म बघ गया और बोला 'मैं पटान का बेटा हूँ। मापदे लिए सब कुछ कुरवान पर दूंगा। मेरी जान चली जाएगी लेकिन आपकी गान को बट्टा न लगने दूगा । हम्मार न मे अपने प्रालिंगन से अलग करके कहा, 'भव भाप माराम से हमारे मन में रहिए । प्राज से आप हमारे पारणागत ही नहीं भाई भी है। तीन नि बानत योतत भनाउद्दीन खिलजीना दूत सदा लेकर मा गया । मग म बहा गया था कि भार महिमाह को पनाह न दें। उसे हमारे हवार पर हैं मौर उसी दिन महिमगाह की बीवी ने ने राब नौ नग मुलाकात करक परदे पोथे से प्रापना की कि भाई- ६७ । पान, हम पनाह दी है तो आप हमारी हिजाजत भी करें। सिफ हम ही नही दुनियां वे सारे पठान आपके इस रहम के अहसानमद होंगे। हम्मार ने खिलजी को जवाब मे कहना दिया "हम अपन गरणागत को किसी कीमत पर आपके हवाल नहीं कर सकन । और इस उत्तर से खिलजी आग बबूला हो गया । उमने तुरत एक और हरकारा भेजा, जिसके द्वारा खबर दी 'इमका अजाम बहुत ही खोपना होगा । हम रणधमौर की ईट से ईट बजा देंगे।' उत्तर म हम्मीर ने कहलवाया 'हम चौहान हैं। हम कोई काम भजाम के अच्छे-बुरे कारण से नहीं करते । हमन सदा शरणागता की रक्षा की है और आज भी उसकी रक्षा जो जान से करेंगे । माप का जो कुछ परना है वह कर लीजिए। इम उत्तर घे साथ ही हम्मीर युद्ध की तैयारियो वरने लगा खिलजी भी अपनी विशाल सना के साथ रणयभोर की तरफ बढ़ा । रास्ते मे घमासान युद्ध हुआ। खिलजी के पांव उखड गए। कुछ दिन के लिए युद्ध मे विराम पा गया । फिर दिल्लीपति की सनामा ने सम्पूर्ण शक्नि से हम्मीर पर प्रानमण किया । हम्मीर ने भी पूरी शक्ति से सामना किया। पर इस बार वह खिलजी को नहीं रोग सका, और प्रत म खिलजी न रणधभौर के दिल को घेर लिया। रणथमौर था ग्लिा प्रभेद्य और अटूट था । हम्मीर के इस रिले को भेदना और विजय करना कठिन ही नहीं असभव-सा था। खिलजी वार बार मात्रमण करता और बार वार मुह को साता । महिमशाह का गौय भी देखते बनता या। दिन पर दिन गुजरते गए महीन माल में बदल गए, हो और मानतायी खिलजी रणथौर को लेने के लिए तड़पता रहा, मेकिन ६८ सपन नहीं होगा, उसने 1 बार फिर हम्मीर से कहताया कि प्राप हमे महिमाह को मार दें हम अपनी फौजें वापस कर लगे लेशि हम्मोर ने इस प्रस्ताव को एक्दम ारा लिया। हालांकि रणधभौर के विनाश की कल्पना बारे स्वय महिमशाह ने कहा या 'माप एक पठान के लिए पपने इन इन्सान क्यो मरवाते हैं मब मैं पापस हाय जोहार रहता हूँ कि आप मुझ खिलजी के हवाले कर दीजिए।' हम्मीर ने उसे साने स लगाकर कहा दोस्त इतिहास सदा रहेगा कि एक वागाह एक पठान के सून का प्यासा था मौर एक चौहान राव उसकी रक्षा के लिए सून वहाने को तयार था।' खिलजी न फिर प्रारमण क्यिा भोर बहुत जोरदार मारमण किया। लेकिन यह भाषमण भी दूसरे प्रारमणा की भांति प्रसपान रहा। और अन्त म पिलजा हतारा सा हो गया । करे तो क्या करे? तभी उसके सिपहमालार ने उसके सामन एक ऐम भादमी को पेया क्यिा जो फिल का गुप्त माग जानता था। सदा दाहोहियो ने हो देश को तबाह किया है और गाय का क्लक्ति। सिलजी ने उस मामी को (मिका नाम लेखर देशद्रोही रस रहा है) रणपभोर का शामक बनाने का प्रलोमन लिया। दादादी जो एक मामूली सिपाही था शासका मत जान रापन म पागस हा गया । उसा एक रात रिले की मुरग का पता बता पिया। दिनी र मेना युद्ध के नियमों और मनिगमो का उल्लघन करती हुई गड़म प्रवेश कर गई। चौहाना की एष दान पिता की विशाल सेना को गाजर मूली भातरह कारना गुरु पर लिया । मारी मिलनी सेना में नाहि त्राहि मच गई । म पार हम्मार पौर दूमरी मार महिम शाह पठान दोनो इतनी प्रवलना भोर कुशलता सलह रह थ कि खिलजी के सनिा चाह कर भी उन विनापर नहा कर सा जा रण की दष्टि से महत्वपूर्ण थे। रानदीनाई। मिनत्री को मना भाग नहीं बढ़ मी तब समन मयत नित्यता से ।
अपनी सेना को प्रधाधुध मौत के मुह में झारना शुरू कर दिया। उसमें सनिक कीट मबाडी की तरह मरत रहे पर तीसर दिन युद्ध की स्थिति बदल गई। हम्मीर का धग प्रम जस्मी हो गया था। महिमशाह की भी एक हाथ की दो अगुलियां कट गई थीं। दोपहर का भूय चमर रहा था । प्रायाश बहुत ही निमलया। खिलजी की सेना बिन में घुस गइ पो । किल के हर एक काने म भयकर युद्ध हो रहा था। वच्चा बच्चा अपनी मातभूमि के लिए लड़ रहा था। स्त्रियों घायत सनिका का उपचार करवे उसे पुन युद्ध के लिए प्रेरित पर रही थी। व देय रही थी कि किसी भी वीर की पीठ में कोई पाव नहीं है। वे उत्साह से भर जाती थी। गव स उनका मस्तर ऊँचा हो जाता था। खिलजी के चुने हुए यौटा इस लड़ाई में मारे गए। राव हम्मीर अन्न म शत्रुओं से घिर गए । वे परेल य और ग के सिपाही पचास व भी खिलजा क चुने हुए योद्धा । हम्मीर की तलवार विजली की तरह चल रही थी। उसके सानियों की सख्या बगर कम होती जा रही थी। अचान हम्मीर या एक हाप पर गया । उस हाथ म हम्मीर का बडग था। अब हम्मीर निहत्या हो गया था । निहत्था हम्मीर भूखे बाप की तरह झपटा घार उसने एक शन की तलवार छान ला! एक हाथ से लहूलुहान हम्मीर पाम्रो का विनाश करने लगा। इधर महिमशाह को वारता को वीरता स हो उपमा दी जा सकती थी। वह वफादार पठान जान हथेली पर लिय लड़ रहा था। कितना जात शौम और कितना महान उसग । मन म वह धाण पाया जिस क्षण को हर महान त्यागी वीर को प्रतीषा रहती है युद्ध करत-करत वार गति को प्राप्त करना । हम्मीर वीर गति को प्राप्त हो गये। मदिमशाह गिरफ्तार हा गया । रपयभोर का किला खिलजी के हाप लगा, पर वित्तौह भी तरह हो-एक्दम उजाड मोर वीरान ।
७. तिलजी ने देगा frमुविस से पांच-सात सनिब ही जीवित पकडे गा है। स्त्रिया पार बचे न जाने पिस अनजान रास्ते से बाहर चले गये, यह वह नहीं जान सका । क्लेि को गली-गली और ६८६८ सून से रगी थी। घायपो की चीखपुकार युद्ध की भयानकता मोर तानाशाहों की बबरता की बहानी सुना रही थी। कहीं-कही माग श्मसान भूमि की तरह जल रही थी। कितना करुणामय वीभत्स दृश्य या। मानो विवस कण-कण कराह रहा था। खिलजी यह सब देखकर एक बार कांप उठा मोर न जाने क्यों पर उ मादपूर्ण पाटहास करने लगा कि सब पाश्चय से उसे देखते रहे । सब को गका हुई कि क्या जहाँपनाह पागल हो गये हैं। दूसरे दिन सुबह । बिलजी के सम्मुख अपराधी के रूप म महिमगाह को पेश किया गया। पास ही अभिमान में प्राडा देशोही पडा-सडा मू पर ताव राथा । महिमशाह ने उसके पास भाते ही सार कर उमरे मुंह पर यूरा और वहा हरामी कुते तुमसे तो जानवर ही पच्छा ।' गदोही सकपका गया। दिनी ने हपाडियों में बंध महिमगाह स कहा पठान तुम्हारा पनिम मपय नजीक पा गया है । तुम्हारी माखिरी स्वाहिस क्या है। हम तुम्हारी पासिरी स्वाहिश पूरी करता चाहते हैं।' मेरो भाविकी कगाहित यही है मुझे पोड़ी देर के लिए घोड पिया जाए। क्यों तुम आजाद हार क्या करना चाहते हो। मैं तुम्हें मोर प्स गद्दार को मौत के घाट उतारना चाहता है।' हम तुम्हें माफ कर सकते हैं मगर तुम पव भी हमारी गुलामी कबूत कर लो।' "थू है तुम पर, अगर मुझे जिन्दगी रहते कोई भी मौका मिलेगा, ६ तुम्हारी बोटी बोटी काट दूगा । हरिद अमाना इस पठान पर किए गए एक चौहान का एहसान नही भूगा । पठान का बच्चा बच्चा हमेशा इस कुरबानी को याद रखेगा। मोर याद रखेगा तुम्हारी जगमोरी मादतो को। 'मामोश" खिलजी चीन पहा, 'इसे सजाए मौत दे दी जाए।" लेकिन महिमशाह ने अपनी मौत के पहल एक मोर मजर देखा कि देशद्रोही का माघा जमीन में गाड़ दिया गया है । इन के बाद उस पर Prकारी कुत्त छोड दिए गए हैं। भोर वह 'मरा इनाम, मेरा यह इनाम' चिल्ला रहा है और खिलजी वही हँसी हसते हुये कह रहा है जो अपने मालिक का नही हो सका पह हमारा क्या होगा ? गदार की इतनी ही दर्दीली मोत होना चाहिए।" पौर महिमशाह की गद न तलवार के नीचे पाने के लिये गव से तन इस कहानी का सर्वाधिकार सरिता' मासिक के पास है।
मुक्ति
दूर से पूत के बाल उमडते हुए दिखाई पडे । प्रस्ता
सूय रश्मियां उन बादलों को और स्पष्ट कर रही थी।
देखते देसने पिने को मोर एक साडनी (ऊंटनी) माती हुई
दिखाई पडी। साडनी पर एक सवार पा जो क्षत्रिय सनिक
लगता था। देखने मे वह अत्यन्त बलिष्ठ और सूरुवार लग
रहा था।
वह बीकानेर नरेश राव दलपतसिंह के द्वार में
हाजिर हुआ। दरपतसिंह जी अपनी राठौडी मूछों पर ताव
हुए बोले 'क्या बात है, रूपाराम' तुम दिल्ली से
कब माये
सम्मा प्रनगता । देमोरी प्रापरा भाई मूरगिह
बागाह पहांगीर की मार से बीरानेर पर प्रात्रमण करने
मा रहा है । उसके संग जावाखा पचास हजार पोज
।
देसाय है।
७३ दलपतसिंहजी तुरन्त गम्भीर हो गये । अपने गले में पहले उज्जवल मुक्तामा के हार को क्रोध से तोडते हुए वे वोले, "हम इमकी कोई चिंता नहीं। हम अपनी मातृभूमि के लिए हंसते हसत अपने प्राणों को उत्सग कर दगे।' और उहाने उमी पण प्रपन दीवान, सेनापति और प्रय उमराव सरदारा को एक्न पिया और सारी स्थिति समभायी। युद्ध के नाम से राजपूत लोग उत्साह और उमग से भर उठे। शत्रु को कुचनने के लिए जोर शोर से तैयारिया होने लगी। चारणा के नये गीत प्राग उगलने लग । सेनाए कूच करने लगी। दापसिंहजी स्वय सेना वा सचालन कर रहे थे। मुकाम छापर वे सन्निकट दोनो सेनामा के बीच युद्ध हुमा । खून की नदियां बह उठी । राजपूता की रक्त प्यासी तलदाराने मुगला के दात सटटे कर दिये । सारा क्षेत्र लहूलुहान हो गया। जावदीखों को दलपत मिहजी ने प्रेमी पराजय दी कि वह मैदान छोडकर भाग गया । विभीषण ने सोने की लका को ढहाया था। जावटीखा ने तो मैदान छोड दिया लेकिन सूरसिंह ने भागते हुए मनिका को ललकारा । वह फिर मैतान म मा इटा । दत्रपतसिंहजी हाथी पर सवार थे। उनके साथ चुरू वे ठाकुर बैठे थे जो मूरसिंहजी से मिले हुए थे। मौका मिलते ही ठाकुर ने दलपतसिंहजी को पकडवा गिया । अपन खडग स पथ्वी को कंपा देने वाले दलपतिसिंह भामेर के दिने मे रद कर दिये गये। उनके चारा ओर सम्न पहरा था। सौ सिपाही हर घरी चौकस रहते थे। क्लि की बद पत्यर की दीवारा मे उस वीर का अन्तस पखहीन पछी की भांति तडप रहा था। खुले नीले प्राकाश पा पार देखकर उनकी आंखें स्वाधीनता के लिए भर भर पाती थी, लैक्नि यौन जहाँगीर की सत्ता से लोहा लेता? विमम इतनी हिम्मत यो वि पिंजरे म वद शेर को छुड़ा लाना । लेकिन दलपतिसिंहजी मुवत होने के लिए प्राणपण स पटिबद्ध थे। धीरे धीरे उहाने कुछ पहरदारो वो अपन साय मिला लिया था। उनसे अजमर और पूरे राजपूताना की
.
हलचल का प्रच्छी तरह ध्यान रखते थे।
एक दिन व उदाम गाम घिरी थी। पल नीरव और निस्पद थे।
सध्या को खताभ किरणे किले की प्राचीरा के पोचे ढन रही थीं।
अप्रत्याशित भोगन का थाल लेकर पाने वाले रसोइये ने अज किया,
'खम्मा अनदाता | मारवाड के हठीसिंह नाम के चम्पावत सरदार
मजमेर पधारे हैं।"
'वे कहां जा रहे हैं
वे अपनी सुसराल जा रहे हैं।
क्या वे नितान्त अकेले हैं"
'नही, अन्नदाता।
'उनके साथ कौन-कौन है ?"
"दो सौ सवार और दो सौ पैदल ।"
दलपतसिंह अत्यत गम्भीर हो गये । बदीगह के जीवन मे रहते
रहते उनके मुख का प्रोज चला-सा गया था। दीप निश्वास छोडते हुए
ये बोले "पाप जाति के ब्राह्मण है। ब्राह्मण न सदा क्षत्रियो की सहा-
मना की है। विप्र या ससग सदा घम के लिए हुआ है ।
एक काम करेंगे?
पन्नाता का हुक्म मिर प्रोखा पर। अगर इस गरीब ब्राह्मण की
चमडी पी जूती बनाकर भी प्राप पहन लेंगे, तो मैं अपना महोभाग्य
समगा।
रितम तिमिर घुम प्राया था। मालची ने प्राार माल जला
दी। उमरे बापते प्रम दलपतसिंहजी ने कहा, 'आप मेरे देवता हैं।
माप हटीसिहजी वा कहिए मि वीरानेर नरेश प्रापसे मुजरा करना
पाहत है।
'मैं मारा सा ममी उनरे पास पहुंचा दूगा।"
'मोर उतर कर देंगे?"
'कत मुरह जब मैं मापके लिए दूप साऊंगा।'
माप मेरा
७५ "मैं जीवित रहा, तो मापको इस उपकार का बहुत बड़ा पुरस्कार दूगा।" ब्राह्मण चला गया । शन शनं दिगत यापी निस्तब्धता मे रात दूब गयो । चिन्तामा से प्रावृत दलपतसिंहजी नहीं सो पाये । कसे भाग्यहीन हैं व कि एक पूरे राज्य के स्वामी होकर यहाँ बदी हैं-नितान्त असहाय प्राणो की भांति। रात प्रौखाम व्यतीत हो गयी। प्रात समोर उनम कुछ ताजगी भर गया । पाठ पूजा से निवत्त होते हा साह्मण दूध लेकर आया। 'चम्पावत सरदार ने क्या कहा विप्रवर?" ग्राह्मण या सिर झुक गया । निराशा से उसका सारा मुख ढंक गया। पापाण प्रतिमा की तरह सडा रहा निश्चल । दूध का गिलास हाय मे ही . "प्राप घुप क्यो हैं ?" "चम्पावत सरदार ने फरमाया है कि मैं ससुराल से लौटते हुए मापसे भेंट करूगा।" दलपतसिंह जी भर भर पाये । विगलित स्वर मे दीवार की भोर पपलक देखते हुए बोते, "सुख के सब साथी होते हैं। जब प्राणी को दुर्भाग्य घेरता है, तब उसकी परछाई भी उससे विलग हो जाती है। सरदार से पाप कहना वि दलपतसिंहजी ने फरमाया है कि मुझ भाग्यहीन से याप क्या मिलने पायेंगे माप स्वतन हैं। स्वतनता म माप सांस नेते हैं। मापसा हर कदम स्वतन है। मौर में एप क्षत्रिय होवर, एप राज्य का स्वामी होकर वदोगह म पराधीनता का जीवन जी रहा हूँ। मुझे मृत्यु के समय यही दुस-सन्ताप होगा नि मुभ-जंसा एक वीर शनिया के पृथ्वी पर होते हुए बन्दीगृह में मर गया।' ब्राह्मण ने बहुत मनुरोध किया पर दलपतसिंहजी ने दूध नहीं पिया । यह य उनकी मांखों की गहराई में दहक रठा, स्पनिंग-सा ।
वे निष्प्राण-रो बठे रहे। रिल को दोदारा को देखते रहे मौर सोचते रहे
'यह राज्यतिप्सा प्राणी को कितना पतित पोर नीच या देती है।
x
X
X
ब्राह्मण ने जाते ही चम्पावन सरदार को दलपतसिहगी या पुन
सटेगा सुनाया।
मेजबान की हवेली बहुत बड़ी थी। हठीसिंह ने अभी समन (मपीम)
साया था। उसमा नशा उनो रोम रोम में उत्साह और जो भर रहा
था । पाार ने पावर निवेदन पिया, "सरदार पी गय! एप ग्राह्मण
मापस भी मिलना चाहो हैं । वे यह रहे हैं लिए पत्यावश्या मन
करनी है सरदारजी से।
'उह सम्मान महित लाया जाय । पहार ये हसा पो लग।
वठासाने म इव को सुग घ पा रही थी। दोपारो पर तलवार मौर
ढालें लटब रहा थी।
मगमली गद्दे पर गाव पिय सहार अधायिन थे हटीसिंह ।
प्रगानुपाहणं प्रास्त यश, गौरा रग मात्र छह पृट सम्बाई, पानो यो
स्पा करन पानी मूछे जिा पर ये ममत ये हलक उमा- मपभोपभी
नीर भा र देत 4 । नीतू उनकी मूछा ये यर पर दिए जाता था और
व मान माविया र गाय एक जार या ठरा लगा ते थे।
ब्राह्मग न प्रारही कड़ा मुारा कबून हा ।
यात ह्या त्वना | काई नया सादे साप है"
'बागान पर उधर गया। हटीसिर ५ गारे सापी राय हो
पद।प्रन उनी मायाम तर पाया।
द्रामा दवता या प्रागन लिया जाय ।" तुरत पर दाग । उह
मान पिा । ब्राह्मा उम पर वह गमे ।
- एक वीर "अज है, अनदाता ।' वे रुक गय । "कहिए, कहिए आप निश्चिन्त होकर वहिए, ये सब अपने ही हैं । गौरवशाली क्षत्रिय कुल मूय ब्राह्मण ने दलपतसिंह की सारी वेदना और व्यथा अपने स्वर में घोलकर हठीसिंह को सुना दी। जमे ही ब्राह्मण न अपना वयान खत्म किया वैसे ही हठीसिंह के तेजस्वी चेहरे पर एक अभुत मालोक दीप्त हो उठा । अपने प्रापसे बोले, 'एक क्षत्रिय की एसी दुगत की ऐसी कायर मौत" "अनदाता | मैं ब्राह्मण हूँ। मैं यह भलीभाति जानता हूँ कि इस तरह का स देशा लाना लेजाना अपराध है लेक्नि एक गूरमा को मैं इस तरह क्लपते विलयते नहीं देख सकता । मत्यु निश्चित है। उसके प्राने का क्षण अमिट है। फिर विसी स्वतत्रता प्रेमी और अपने ही भाइयो द्वारा पडयार मे फंसाये हुए वीर को क्या नहीं मुक्ति दिलायी जाय ? यह श्रेष्ठ काय पाप जसे वीरा का ही धम है।' होमिह वा क्षत्रिय धम जाग उठा। मूछा पर बल देते हुए बोले, बीकानेर नरेश को वह दीशियगा कि हठीसिंह ससुराल बाद में जायेगा, पहते पापको मुक्त परायेगा। ब्राह्मण प्रसन्नता म डूबा हुमा चला गया । हठीसिंह ने एकात की इच्छा प्रकट की। सभी साथी चने गये। घामाने मे घोर एका त व्याप्न हो गया । हठीमिह को लगा कि वैठरवाने की हर वस्तु पर एक विचित्र मी जडना छा गई है। वह जडता होले होते उहे घेरने लगी। वे ससुराल जा रहे थे। उनकी पत्नी यग्रता से उनकी प्रतीक्षा कर रही होगी। उनकी पत्नी नांदनी म म्नान की हुई पाई परी ही समझो । अनुपम ज्योतिन अंग प्रत्यग ! बडे बडे लोचन, जस मादरता के सागर हा । एर मधुर स्मति चित्र उनके मन पर उतर पाया- 'मैं अपने पीहर जा रही हूँ, ठाकुर सा | आप जापा होते ही मुझ ।
। . लने प्रा जाइएगा। अपनी बाहों मे अपनी पत्नी को प्रारद कर ठाकुर हठीमिह बोल हम तो एक पल भी प्रापके बिना नहीं पिता सरते, ठगुराणी सा अाप नही जानती कि ये रातें आपके बिना क्तिनी लम्बा हो जायेंगी हम प्रापका सदे पाते ही आपको लेने के लिए आ जायेंगे।' अप्रत्याशित लाज से ठकुराणी के पोल रक्तिम हो उठे, बडी बरी मांखो मे एक ग्राम त्रण सजीव हो उठा। ठाकुर को महसूम हुमा कि उका तन मोमी तरह पिघल रहा है। थोड़ी देर में वे तरल-पदाथ की तरह वह जायेंगे। भावुकता से बाल 'राणी सा आपा वियोग मेरे लिए असह्य है । जल्टी पाने की चेष्टा कीजिएगा।' ठगुराणी वे अधर मद मुबान में डूब गय । उनकी बांहा से मुक्त होर वह प्रकोष्ट मे पा गयो । पोरे पोछे चने प्राय हठीसिंह। विभावरी भपने पूण योवा पर थी। ऐसा प्रतीत होता या मि पासा गगा पूर्ण वेग स प्रवाहित हो रही है। उन पर अनिमेप दपि जमाती हुई दुराणी योगी "यह सब ई पर के अधीन है । कब बच्चा होगा, मैं क्या जानू पर पाप मेरा सगा पाते ही मुझे रागम्मान लेने आ जाइयेगा। यति धापने पुत्र हुआ तो मैं माप गाही सम्मान से लेने पाऊँगा। दो सौ सवार और दोमो पदला मापरे पीहर वाले भी देखेंगे कि क्या गाही टाकुर है हमारा दामाद ।' प्रक्ड रो गये । दूरागन पोई रात्रि पपेरू बोल रहा था। एक उल्ा पर पडफ्ता हमा प्रकोष्ठ के प्रागे से गुजर गया। रात और गहरी हो गयी । पौर मौन हो गयी । और पामी चाल से कान लगी। दानों ममाधिम्य स सहे प्रति काम प्रापपात लीला को दमन रहे। पौर या सही हुई तो।' 'एमा नही हो सरता । हमारे सहवाही होगा। पुराणा, हमारे 7 ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की है कि हमारे पुत्र होगा।" ठाकुर का वक्ष गव से फूल माया । "फिर आप मुझे जल्दी से जल्दी लेने पाइएगा।" "वचन देता हूं कि स देशा पाते हो पा जाऊगा।" स्मति चित्र सण्डित हो गया। रानी को वचन दिया था पर बोकार नरे से मिला भी प्रति मावश्या है। एव राजपूत के लिए पहला धम होता है पराये दुख को मिटाना, पराई पोर को हरण करना। लेकिन भाग्य ने कोई विकट और मनहोना खेल कर दिया तो? हठीसिंह मन ही मन पाप उठे। उहें या लगा, जैसे उनके आगे के सारे रास्ते टट गये हैं। एक उनाड प्रातर विस्तृत हो गया है। दूर दूर तक सपाटा छाया हुआ है । ऐसी निजनता में एक औरत एक फूल से कोमल बच्चे को गोद म लिये हुए पड़ी है। एक प्रलो मौरत । वह औरत है उनकी अपनी पत्नी अपने नवजात शिशु को लिये हुए। ठाकुर विगलित हो गये । वैमी कठिन परीक्षा है । लेकिन मैं क्षत्रिय हूँ। प्रापद म पसे हुए किसी क्षत्रिय की रक्षा करना ही मेरा पहला धम और क्तव्य है । उहाने अपने मन श्रांगन से अपनी पत्नी के चित्र को मिटा दिया। अपनी गदन वो जोर का झटका देवर दे उठे । बैठावाने मे जमी जडता को अपनी चुटविया से उडाले हुए उहोने एव हुकार भरी और अपने प्राप निणय लिया, 'मुझे चीकानेर नरेश को मदद परनी ही चाहिये। उहोंने प्रपन विश्वसनीय साथियों को तुरत बठकसाने में बुलाया। ममल वी मनवार पिर गुम हो गई। एक एप गोली अमल की घड़ाने रे उपरान्त हटीसिंह ने स्नेह भरे स्वर में बहा "पमे तो मैं प्रापका स्वामी हूँ। मेरी आमा का पालन करना ही भाप राय या धम है विन्तु में, परामा गिना बोई वाम वरना नहीं चाहता।" और उन्होंने ? सिंह जी की सारी स्पिनि विस्तत रूप से अपने साथिया के समक्ष रस दी। अपनी बात को समाप्त करने हठीसिंह ने पहा, "बीकानेर नरेश एक कुशल स य सचालक और अत्यन्त वीर योदा हैं। पडपत्र और मुगलिया सल्लनत की अपार शक्ति ने उन जसे सुरमा का बन्दी बना लिया है । उहोंने हमसे मुक्ति की प्राथना की है । प्रापकी क्या राय है? क्षण भर के लिए वातावरण गम्भीर बन गया । उस गम्भीर मौन को तोडा उनके साथी महावीर सिंह ने । वह बोना "हम सब निया के हायो के सिलौी हैं। कर टूट जायें, यह कोई नहीं जानता। राजपूत को ऐसा पर बहुत ही कठिनता से प्राप्त होता है । एक वीर की मुक्ति एक देश के मुक्ति के बराबर होती है, क्यानि वीर ही पृथ्वी और नि प लोगो कि रक्षा करते हैं। वीर ही जमभूमि को सन्ति होने से बचाते हैं और वीर ही अमानुषिक अत्याचारी और निग्यो मात्रमणो से देश की रक्षा करते हैं । ऐसे वीरो को मुक्ति के लिए समस्त देश को बलिदान हो जाना चाहिए।' मुझे पाप लोगो से यही भागा थी। वल ही हम बीकानेर नरेश को मुक्त करायेंगे।' सब साथी होल्लाम में चले गये। हठीसिंह ने अपनी ठकुरानी को पत्र दिया 'सिंघ श्री प्रजमर गुम सुधाने चिरु कुवर ने लिखी पिता होसिंह को प्रापि पढ़ना । हम सब अजमेर म बहुत ही कुगल हैं । उपरच याम बात यह है कि हम यहाँ नये वचना म बंध गये हैं । यह नये वचन प्रापर वचना से बहुत ही बडे और अधिर महत्वपूर्ण हैं । देवानर नरेश यहाँ बनी का जीवन यापन कर रहे हैं। उहाँने मुझमे मन्त्री मुक्ति की कामना प्रस्ट की है टाराणी सा । मैं क्षत्रिय हूँ। एक छोरा मा ठाकुर । एक पूरे राज्य का स्वामी मुझा परदासना कर रहा है । पता नहीं उनसरी मुक्ति न गाने कितना की मुक्ति वन सस्ती है।म यु एक न एक नि सभी को मायेगी ही, मितु पर हिताय मरना ही क्षत्रिय का प्रपम और श्रेष्ठ धम है। पता नही कल क्या होगा?
'जीविन रहे, तो जरूर मिलेंगे प्रयचा प्रापको मेरो प्राथना है कि प्राप कुवर सा का एव सच्चा वीर और धीर प्राणी बनाना । कुवर पो हजारा भागिप और आपको उसकी सार सम्हात पत्र दूत के हाथ में दे दिया । दूत देखने देखते विना हो गया । ठी सिंह को पासे अश्रुपूरित हो गई। दह दिन और रात होसिंह को पाखो मे ही बीती। हौसिंह- एक इसान अपनी पत्नी और अपन पुत्र से मिलने के लिए तड़पता रहा । समस्त मानवीय दुबलनाएं उसे घेरती रही। पत्नी का असीम प्रेम और पुत्र का प्रथम दान | सचमुच यह बहुत ही भाग्यहीन है । अनेक उतार- चढाव और विचित्र उधेडवुन । x X X और नया मवेरा हुपा। निनात ताजा और स्वस्थ सवेरा। हदी सिंह पा इमान उनकी वीरता के गौरव के नीचे दब गया। 4 उठे। उन्होंने स्नानादि स निवत्त होकर पूजा किया। प्रचन वदना समाप्त परके प्राह्मणा को बुलाया। श्रद्धा में उह नमार परक दान पुण्य किया। - फिर अपने साथिया को बुताकर माह्वान किया, "हम वीर हैं। हमारा जीवन तलवार पी नोर पर रहता है। तलवार की धार पर चलना पोर लोहे के चने पचाना ही हमारा कम है । हम अपने एक योद्धा चोर को पत्र को पारा गे मुक्त घराना है। उसकी मुक्ति हा हमारे गौवन की सफलता और सापकता है। हम एसे योद्धा का कदापि यादी गह म नही मरने देंगे जो गवे दांत पटटे पर रास्ता है।" सभी सापियो ने पडग भवानी को नमस्कार पर प्रतिमा पीकि दम बीकानर नरेग मी मुक्ति के लिए हसत हसते उत्सग हो जाएगे।
८२ और हठीसिंह प्रान दो सौ पदल और दो सो सवार बहादुरा को लेवर अजमर के किले पर टूट पड़ा। इस अप्रत्यागित प्रारमण ने मुगल सिपाहियों को हासा बसा र रिया। उनमे भगदड मच गई। व इस गत का भी अनुमान नहीं लगा सो विमारमणकारी क्तिने हैं ? इस पराकर तितर बितर हो गए। तुरत अजमेर के भूबदार को इस हमले की सूचना दी गई। अजमर वा सूवेदार अपनी चार हजार फौज लेकर पाया तब तब होसिह ने दीवानेर नरेश दलपतसिंहजी को मुक्त करा लिया था। - हठीसिंह से गले मिलते हुए बीकानेर नरेश ने कहा, "हम प्राभारी हैं चम्पावत सरदार मापके । हमारा दा भी कृतन रहगा पापा । बीकानेर मे आपका कोई लगाव नहीं है कोई सम्बन्ध नहीं है फिर भी प्रापने बीकानेर नरेश के लिए जो पाहुति दी और प्रयास किए वह सब बीकानेर केनिहास म स्वण अमरो म निखा जायगा । 'पाप तैमार हो जाइये । 'यहाँ माचा जरर लेगा।' महावीरसिंह ने पावर समाचार रिया, 'हम त्रु ने चारा मोर से घर लिया है। "कोई चिता की बात नहीं। समझ लो कि हमने वेसरिया माना पहन लिया है । जय तब रक्त वो एप बूद भी रहे हम नु से लडते रहा। हर हर महादेव फिर घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया। चार सो राजपूत मुक्ति के लिए चार हजार सना पर टूट पडे । नरमुगवे हर लगने नगे। सून यी नरियां बहने लगी। घोहों की निहिनाहा में सारा नभमपर गूज उठा। राजपूना का शौय देसने बनता पा। गागर मूला की तरह शत्रु की सेगा यो कार रहे ये वे । गमा प्रतात हाता था कि राठोड राजपून एकत्र हो जायें, तो देश में मुगनिया गामन हा मम कर दें। भागह हात-हाते मार राजपूत एव एव पर वीरगति को प्राप्त हो गये। अजमेर सूबेदार के भी चो हुए योसा मारे गए। चार सो ने उनकी सेना के एक हिस्से का ही वाकी रखा था। यह हटीसिंह की वीरता पर गदगद हो गया। वह हजारा नरगुण्डा में बीच खडा था। कटे हुए सिर, हाथ-पर, धडें । क्षण भर के लिए वह युद्ध की विभीपिका से सिहर उठा 'उफ जग क्तिनी खौफनाक मौर हैवानियत से भरी होती है। फिर वह दलपतसिंहनी व हठीसिंह की लाश देखने के लिए बका। शत्रुपा की ला बीच दानों वी सागपाम-पास पड़ी थी। दोना की छुरियों एक दूसरे के सोने के पार पार थी, मानो व दोना वीर पर वे हाथ से नहीं मरना चाहते थे। पूर्वदार का मस्ता न जाने क्या इव गया? वह अपने अथ पोछो लगा।
एक नयी रावणा
रावणा थानम्नान सी पलग पर जा पड़ी। अपने
अतु य सौ दय वा अपनी गोरी गोरी मेंहदी रची हथेलियो
म छुपा कर वह बरत देर तर उ मन और निद पो
रहा।
पपना छोटी मी हाती ये नासागर पत्यरा के
म्नम्मा वाले गान म वह फिर मा । स्तम्भा पर वेत-यूटे
गहुए थे। मामला पंधेरा पसलमर ये हिने पो स्पा
परदा हुपा नगर पर रिम्पत होन लगा था।
उगरा यांनी न प्रागन म तुनमी दे धिरव के पाग
दापर जता पिा पा । घुधना धुधना उगाता हा गया
था।
गवाक्ष म पडी गवणा ने मन ही मन मां तुलसी को नमस्कार क्यिा। फिर उसे उदासी घेरने लगी। यह सोच रही थी कि कब वह इस बेमन की जिदगी को जीना बद करेगी । वह सिफ किसी की पत्नी बनना चाहती है पली । और भाटी सरदारसिंह उमे सदा प्राश्वासन देकर चले जाते हैं। वह घुटन नगी। अंधेरा और गहरा हो गया था। गहरे अंधर वो अपनी दष्टि मे भर पर वह सोचने लगी-'नथिया टीव रहती थी कि गगैरवी मौरत घे सौ ससम होते हैं। मुझे ही देखो न, जात वो दरोगन हूँ, कोई आगे पीछे नहीं है। क्मिी का सहारा प्रारारा नहीं। इसलिए दीवान जी अपनी जोरू समझते हैं जबकि मैं उनसे पतई प्यार नही परती। मेरा उनमे कोर लगाव नही । व हृदयहीन पत्थर की भांति हैं। अपन पद मद मे चूर। गवान मे प्रकार पी एर लवीर फैल गई थी। उसने घूमवर दया, नथिया ने शयन कक्ष म भी दीपर जता दिया है। इन मिति तेल का दीया। दीय के प्रकाश से पलग पायतान नगे दपण चमर उठे। भाद फानूसा मे लटक्नी भालरें जगमगा उठी। वह थोडी दर के लिए बाहर बरामटे ये सगमरमरी पश पर पहल कदमी परती रही पिर पाकर पलग पर बट गयी। वयमपि को उनके पार करते ही उसके मग प्रत्यग म यौवन-कुमुम गप विसरात हुए बिले । तय उस पर दृष्टि पड़ी फूटनीनिम और दीवान सम्पसिंह माहेश्वरी की। वे उमके स्प पर मोहित हो गए। उन्हाने तुरन्त एव सिपाही भेज पर उसे अपनी हवनी की रगाला में बुलाया । तर दम असहाय और सम्बल- होन रावणा का सहारा पी-उसको बुप्रा । लोभी घुमा। वह थोडसी रायणा को साधना वर दीवान तो बी हवेली मा गयो । राणा का गोरा रंग हाये गुतावा परे और मोदन म हा उटा पा। उसी पगरारी बड़ी-बड़ी मीन सी मवि मन यो मोहित कर लेती थीं। उसा जाबर दीवा जी को माजरा रिया। रागी।
M
जी हुके की नला को गुडगुगते हुए बोो, 'दरोगिन ! हम तेरी बेटी
भोत चोखी नगती है।'
अपने प्रौढने के पल्लू को दांता के बीच दवाती हुई बुमा बोली,
'न-~-न-माइ-चाप यह मरी बेटी ही, भतीजी है। बचपन से
अनाथ है । मैंने ही इमे पाल पोग कर इत्ती बडी की है।"
अपने कठोर कालिमा लिए हुए होठो पर जीभ फिराते हुए दीवान
जी बोने हाथ पांव सूव निकाले हैं। क्या नाम है
अनदाता । मैं इस रावणा ही कहती हूँ।' उसने अपनी यकी
पलका को भटा देरर मिमिचाया और तनिक लम्बे स्वर में वह बोली,
वसे इसका नाम पूगलगढ की पद्मिनी रहना चाहिए । पूगल भी
इतनी फूटरी नही होगा। सच कहूँ दीवान जी । ऐसा रूप भोत कठि
नाई से मिलता है।
हम यह पमद है। तुझे कोई एतराज तो नहीं है।'
जीभ तिमाल कर तथा दोना कान एक साय परड कर बोली,
अनदाता | भला एमा मैं कस कह सकती हूँ। आप इस धरती के
धणी हैं। यहां की छोटी-बी सभी चीजों पर मापा अधिकार है।
यापरी चीज का धणियापा मैं कैसे कर सकती हूँ।
रावणा यह सर सुन रही थी । द श को प्रात्मसात करने की
चप्टा कर रही थी। चेप्टा के माय उनके मम को भी समझ रही थी।
उमकी पारमा न जसे सोच लिया था नि उसरा एक वस्तु के रूप में
मोग रिया जा रहा है।
उग यह पर अच्छा नही लग रहा था। सरूपसिंह ये ग प और
बातचान तरीमा म प्रम की गध नहीं थी। सिफ वासना थी
मुष था।
बचपनग उमकी एर इच्छा था कि वह एक अच्छे भाभी पी
एन्दन यन । उसके मरने वच्चे हो । योग सा घर हो।
उरा पर
८७ मे पति का रोप और जोश दोना हो । बच्चा का रोना और मुस्कराना गूजता हो। पर उसके भाग्य और युमा यो प्रभावा में ग्रस्त जिदगी ने साय नही दिया । वह हाट की सी वस्तु बन गई। फिर उसकी बुआ के भाग्य बदल गये । सरूपसिंह जैसलमेर के महारावल मूलराज (द्वितीय) पर सम्पूण रूप से हावी थे । समस्त गासन का एक भी पता उसके सकेत के विना नहीं हिलता था। गढ के एव एक पदम पर उनकी यूटनीति के जाल बिछे हुए थे और वे स्वतत्र रूप से जो चाहत थे, वहीं करते थे । उहाँने तुरन्त रावणा के लिए यह परी हवेलो ले दी। उसम सुख पौर विलास ये सारे प्रसाधन एकत्रित कर दिय। फिर एक दिन दीवान जी ने अचानक अपा पाने की सूचना भिजयायो । उस समय अपराहपा। सूप देवता पश्चिम के प्रांगण की भोर अग्रसर हो रहे थे। सूसे देश की सूखी तपती हवा मी गरीर म एप विचित्र कम्पन उठा रही थी। बुमा प्रसनता म किलकती हुई पाई। अपनी भतीजी रावणा की बलया लती हुई बोली, "तेरा दरिद दूर हुमा मेरी लाडसर । देख, दीवानजी ने कितना मच्छा “यण्ठा" भिजवाया है। परी मुन, भाज रात ये हमारे यहाँ पधारेंगे।' युमा गभीर हो गई। उसको लालची नीली भोसें मपने प्रोसतन मार से बडी हो गई । उसर मुह से अपना मुंह भिडाती हुई वह बोली, 'साडी सा । जरा हुगियारी से यातचीत करना। दीवानजी प्रसन्न हो गए तो जम-जमा तरा ये कष्ट और दरिद्रता दूर हो जाएगी।" रावणा इतने दिन से युमा की गतिविधि को देख रही थी। समझ रही थी कि चुमा नै नितान्त प्रभावपस्त जीवन जिया है। उसरा पनि स्वय एक "गोला" था। जीवन भर रोगियों के वदते रावले में जो हुजूरा परता रहा। पीडा मोर दासता उसने अतिम सारा ता राही। उसकी जुमा भी मारी-मारी सामन्ता, सरदारा, उमरामा और अधिकारिया पी
८८
हवेली म घूमती रही। अपने साधारण रूप से यह किसी को नहीं लुभा
सकी। इसीलिए आज जब उसे थोडी सी सुस सुविधा मिली तो वह
बावती हो गई।
रावणा ने सब कुछ जानत हुए भी पूछा, "दीवानजी क्या भायेंगे?
उनका रात को यहाँ क्या काम है?
युप्रा के होठो पर एक निलज्जता की हसी तर गयो । उसके गले म
हाथ डालकर उसकी नाक की नय को छुपर वह बोली
वे तुम्हारी
इस नथ को खोलेंगे। नही समझी। फिर समझ जाएगो । दीवान
जो बने दुनियार हैं।"
रावणा को रोमांच हो गया।
x
x
रात धीरे धीरे ढल गई।
रावणा के पयर वक्ष म अब भी दीया जल रहा था । प्रान अप्रत्या-
गित एक पौर पटना घटित हो गई।
रावणा साफ होने से पहले सोलह शृगार वरखे गदा म राडी था।
सनी सग ताम्बल सा रही थी। इसी समय भारी सामत 'सरदारसिंह
घोर पर मार नीचे से गुजरा ।
रावणा माने ध्यान म निमग्न थी। उमो बिना दये ही पीर यूक
दा। पान की हार की च बू भाटी सरदारसिंह की पोशाय पर पड़
गई । मरणारमिह एकम त्रोघ म भर उठा । उसने ऊपर की ओर देखा
माय हासन म्यान से तलवार सीवा।
कुरा है यत्नमौज'' उमन गावर पूछा।
रि उपर का प्रार दवा तो पता हा रह गया। अनुपम सौग्य
माता मा सामन्त नत्राम समाविष्ट हो गया हो
रावमा उम यौवन को दहलीज पर सटे भगानुबाट वारा मुवर
दर
को देखती रह गई। मदम स्वर में बोती, "मुझे खम्मा परिए सरदार,
मुझसे मूल हो गई।"
सरदारसिंह अपला दृष्टि से रावणा को मर्माहत वरखे चला गया।
उमा अलौविक यौवन रावणा के मदिर मलस नयन में समाया
घ द्रज्योत्स्ना स्वर्णिम बालुका प्रदरा पर सोयी हुई थी। मधुर स्मति
में वचन रावणा 'डागल' (छ) पर मा गयो। देखती रही मौन नगर
फो।
सभी दीवानजी ने पावर उमके द्वार को पटखटाया। युमा ने द्वार
सोलकर योनिश को- 'सम्मा पन्नदाता पणी कृपा की। पधारिण,
पधारिए।
दीवानजी ने बुप्रा ये समन कुछ मोहरें पत्री । घुमा इन मोहरो पर
झपट पडी। उनकी प्रांपा म भूख पी, मयानर भूम।
दीवानजी ने पूछा "रावणा कहां है "
"डागले पर।" फिर उसने पुकारा, "रावणा । दीवानजी मा गये
हैं।' वह मोहरा को देखकर सुशो मे पागल-सी हो गयी थी।
सरदारसिंह की स्मृति म विस्मत रावणा चौंक पड़ी। नौचे प्रायी
मनिच्छा रो। प्रापर मुजरा किया।
दीवानजी गाव तकिये के महारे बैठ गये। उनके समीप बठ गयी
रावणा । वीर म मा गयी युमा । बोली 'किसी चीज की जरूरत हो
तो इस दामी वो पुकार लें।
दीवानजी ने कोई प्रत्युत्तर नही दिया। जब बुमा चली गयी तव
दीवानजीने
पहा, 'रावणा। हम जल नही पिलामोगी।"
रावणा ने जल वा गिताम भर कर दीवानजी के हाथ में पमा
लिया। दीवानगी ने गिलारा के साथ उमवा हाय परड लिया। रावणा
को यह सा ऐमा लगा जम कोई सप दान हो। यह तमक पर बोली,
"मह क्या कर रहे हैं माप ?"
दीवानजी ने गटागट पानी पिया। फिर उस अपनी मोर सोचते हुए कहा-'तेरी बुमा से सौदा हो चुका है।" एक अजीब सी बदबू पा रही थी दीवानजी के वान से। घृणा को लहर रावणा के हृदय मागर मे दौड गयी। बोली, "नही मुझे छोड दीजिए। पर दीवानजी ने उस नहीं छोड़ा। जब रावणा ने अधिक विरोध किया तव दीवाजी ने बुआ को बुलाकर कहा, 'मैं तुम दोनाको जिन्दा जलवा दूगा। मुझसे धोखाघडी करती हो । रुपये लेकर अब में लाच मारपर खाया पीया बाहर निकाल लेता हूँ। समझी और बुग्रा ने एका त में ले जाकर रावणा को समझाया "क्यू अपना जीवन नरक बना रही हो। बल ही यह घर बार छिन जायेगा पौर दीवानजी हमे कद में डाल देंगे।" इस तरह कुवारी धरा का आंचल क्लकित हो गया। प्रनिच्छा पौर समपण। । x x सरदारसिंह एर वीर योदा 1 उससे रावणा अपना हृदय लगा बठी पो। पर दीवानजी की नगमता और महारावल पर जिस तरह का भाला था उमरे वारण रावणा दोना का एक साप नही बरान देती थी। हर पल भयभीत व मागविन रहती थी। निमिर गहरा हो गया था। तारे और तेज होकर चमकने लग थे। यह माच रहा थी "जीवन को इतनी मामिपीडा लेकर नही जिया पा माना। यह मूग जीवन है । मैं दीवानजी से घृणा करतो है । उनके जिस्म स मुझे दुग य पाती है। फिर भी यह वतमान “याय और सत्ता का स्वामा मुझे अपनी वासना स माह करता है । भूसा वुत्ता नहीं का।
. वुमा ने पाकर कहा, "दीवानजी आये हैं । देखो, तुम्हारे लिये हीरे की अंगूठी लाये हैं।" उसने कोई उत्साह नहीं दिखाया ! दीवानजी प्राकर बैठ गये । उह थोड़ी ही देर हुई थी कि सरदारसिंह भी पा गया । प्राकर जोर जोर से कुडी खटखटाने लगा। दीवानजी खडे हो गये । कडक्कर बोले, "कौन है रावणा ने धाकुल भरे स्वर म कहा "भाटी सामत सरदारसिंह ।' 'चे यहा क्यो पाये हैं। व भी मेर यहां प्रात हैं। मैं उह प्यार करती हूँ।" दीवानजी ने एक चाटा रावणा के कपोलो पर जमाते हुए कहा, "छिनाल कही की, खाती है मरा और गाती है गीत भाटी जी का। में भाटी जी और तुझे दोना को देख लूगा । दीवान मेहता सरूपसिंह गवरी के गुस्स को अभी तक तुम दोना ने नहीं देखा है। मेरे श्रोध से धरती कांप जाती है।" दीवानजी घड घट करत हुए नीचे उतर गय । दरवाजा खोला । मरदारसिंह ने ग्राश्चय से पूछा, "माप दीवानजी! दीवानजी ने दूसरी मोर मुह धुमावर घणा से थूक दिया। सरदारसिंह भी तजी से ऊपर की भोर चढा। उसने रावणा से पूछा, 'पहाँ दीवानजी क्या बात हैं ? तुम चुप क्या हो रावणा । मैं पागल हो जाऊगा । मुझ बता दो यहाँ दीवानजी क्या माये थे? रावणा ने कोई उत्तर नही दिया। जब सरदारसिंह अघिय व्यग्र हो गये तब वह फफक फ्फ्व कर रो पडी। जब हुण्य का झमा शान्त हो गया तब रावणा ने सारे व्यतीत को अनावत करते हुए कहा, भाप जिसे अपना का पात्र समझते हैं वह एवं पातुर से अधिक नहीं है । दु वर सा । माप इस गदगी को मत छुइण माप मुझे भूल जाइए।" 7 बालती क्या नहीं?
"
दीवानजी ने गटागट पानी पिया । फिर उसे अपनी भोर खीचते हुए
पहा "तेरी बुआ से सौदा हो चुका है।"
एक अजीब सी बदबू पा रही थी दीवानजी के वन से। घणा की
लहर रावणा के हृदय मागर में दौड गयी। बोली, "नही मुझे छोड
दीजिए।
पर दीवानजी ने उस नहीं छोडा । जब रावणा न अधिक
विरोध किया तब दीवाजी ने बुआ को बुलाकर कहा, 'मैं तुम दोनो को
जिला जलवा दूगा। मुझसे घाखाघडी करती हो । रुपये लेकर अब
ना-न । मैं लात मारकर खाया पीया बाहर निकाल लेता हूँ।
समझी
एकान्त में ले जाकर रावणा को समझाया, "क्यू
अपना जीवन नरक बना रही हो। क्ल ही यह घर वार छिन जायेगा
और दीवानजी हमे कद मे डाल देंगे।'
इस तरह कुवारी धरा का प्रांचल क्लक्ति हो गया। अनिच्छा और
पोर बुमा
समपण।
x
x
सरारमिह एर दीर योदा । उससे रावणा अपना हृत्य लगा बैठी
थी। पर दावानजी की नामता और महारावल पर जिस तरह रा
माता पा उमरे कारण रावणा दोना का एक साप नही टररान देती
था।हर पर भयभीत व मागरित रहती थी।
तिमिर गहरा हो गया था। तार और तेज होर चमकने लगे थे।
यह मोच रीपी
सावन को इतनी मार्मिक पीडा लेकर नहीं निया
जा माता । यह झूठा जावन । मैं दीवानजी स घृणा करती है । उनके
निस्म से मुझे दुग य पाती है। फिर भी यह वतमान ‘याय प्रोर सत्ता
सभी मुझे पानी वासना र माहब करता है। भूसा बुता कहीं।
।
बुमा ने प्राकर कहा, "दीवानजी आये हैं । देखो तुम्हारे लिये हीरे
नी प्रगूठी लाये हैं।"
उसने कोई उत्माह नही दिखाया।
दीवानजी मार बैठ गये। उहे थोड़ी ही देर हुई थी कि सरदारसिंह
भी भा गया । पाकर जोर-जोर से कुडी सटखटाने लगा।
दीवानजी बडे हो गये । बडककर बोले, 'कौन है ?"
रावणा ने पाकुल भरे स्वर म कहा, "माटी सामत सरदारसिंह ।'
"चे यहां क्यों आये हैं?'
'वे भी मेरे यहाँ पात हैं। मैं उह प्यार करती हूँ।"
दीवानगी ने एक चोटा रावणा के पोलो पर जमाते हुए कहा,
"छिनाल यही की खाती है मरा और गाती है गीत भाटी जी का। मैं
भाटी जी और तुझे दोनों को देख लूंगा। दीवान मेहता सरूपसिंह टावरी
के गुस्से को अभी तक तुम दोना ने नहीं देखा है। मेरे क्रोध से धरती
कांप जाती है।"
दीवानजी धड धड करते हुए नीचे उतर गये ।
दरवाजा खोला। सरदारसिंह ने पाश्चयम पूछा, "भाप दीवानजी!"
दीवानजी ने दूसरी मोर मुह घुमावर घृणा से यूक दिया।
सरदारसिंह भी तजी से ऊपर की भोर चढा। उसने रावणा से
पूछा, 'यहाँ दीवानजी क्या पाते हैं ? तुम चुप क्या हो? बोलती क्या
रावणा | मैं पागल हो जाजगा । मुझे बता दो यहाँ दीवानजी
यो माये थे?'
रावणा ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब सरदारसिंह माधव प्या हो
गये तब यह फ्फर फफक कर रो पडी।
जब हृदय का झमा शान हो गया तब रावणा ने सारे व्यतीत को
मनावन करत हुए पहा, "माप जिसे प्रचना का पात्र समझते हैं, वह एक
पातुर से अधिक नहीं है । कुयर सा! माप इस गदगो को मत छुइए।
माप मुझे भूल जाइए।"
नही।
सरदारसिह पोडा से कराह उठा, "मैं ऐसा स्वप्न म भो नहा साच सक्ता । रावणा | मैं तुम्हें अपने हृदय की रानी बनाना चाहता था। तुम्हें मदिर की मूर्ति बनाना चाहता पा पर तुम चौराह की धूल हो गयी। रावणा ने यथित विपरित स्वर म वहा, 'रावणा क्षमा नही मागती, वह आपसे सजा चाहती है । मैं पापिन हूँ, पर प्यार मैंने आपको ही किया है। श्राप मरी विवशता नहीं जानते । दीवानजी बडे निदमी हैं। व भापको जिला नहीं छोड़ेंगे । मैं सोग य साती हूँ कु वर सा । तन जरूर अपावन है पर मन, मन पावन है । मैं मन से सदा पापकी जय करती हूँ। इतना सोचिए हम किनन लाचार है। पाप होशियार रहियेगा। दीवानजी अवश्य कोई न कोई चोट करेंग। मरदारसिंह रावणा के प्रथु मरे मुम को देखता रहा। फिर उस अपने प्रातिगन म पाबद्ध करता हुप्रा याला सचमुच तुम पावन हो। रावणा मैं इस दीवान के बच्चे को ।' 'हा वर सा । मुझे इस विनासिता और सम्पनता से दूर ले घनिय । मैं किसी को बहू बनना चाहता हूँ। किमी के बच्चे की मौ । पर यह जीवन और उमरे हातान प्रादमी को क्या स क्या बना देते हैं । वोई न जानता। मुझे माप चाहिए सिप प्राप।" ऐमा ही होगा।' रात मिसतिया म इवती हुई सो गयी। x x इग्नि बार- मगमकानि का त्यौहार था। सरलारमिह मुरह-गुपट ही महारावन मूलराज प बडे पुत्र रापसिंह के पास गया । रायसिंह के जेवखच म दीवानजी ने बड़ी कटौती कर दी पी। वह प्रतिशोध की प्राग मे जल रहा था। वह किसी भी क्षण दीवानजी को पराजित करना चाहता था। जब सरदारसिंह ने उमको भडकाया तब वह उ मादित स्वर में बोला, 'मैं क्या करू? मैं उसको मौत के घाट उतारना चाहता हूँ ।' "माप उहे आज भरे दरबार म मत्यु दीजिए। सारे सामन्त- सरदार इम दुष्ट के कुचक्रा से तग हैं । यह उनकी मान मर्यादा को धूल . म मिलाने के लिए प्रयत्नशील है। पाप भरे दरबार म दीवानजी वो कत्ल कर लिए । मैंने प्रमुख सामन्तो से बातचीत कर ली है।" "सच।" मैं कुलदेवी की सौग घ खाकर कहता हूँ।" युवराज जरा विचार मे पड गये। सरदारसिंह ने पुन रहा, 'अापके हाथ में यदि यह अवसर निक्ल गया तो सारी उम्र हाथ मलते ही रह जायेंगे । इम समय पाप असन्तुष्ट सामता की मनस्थिति का लाभ उठावर महारावन भी बन सकते हैं।' प्रतिहिंसा को आग म दम्प और महारावल बनने के प्रलोमन ने रायसिंह को विचलित कर दिया। वह भौंह टेढी करके बोना, "फिर पाज गढ के प्रमरविलास क्षम प्राप मावधान रहियेगा।' सरदारसिंह वहां से सीधा रावणा के पाम पाया। "आप मा गए कुंवर सा । 'हा रावणा आज मैं तुझे अपने गांव ल जाऊँगा। तेरे पावन मन ये वदावन म प्रेम वा नपा दीया जलाऊगा।" कुवर सा | मुझे अपने चरणों की दामो ही बना लीजिए। पर यहाँ से ले चलिए 1" 'क्षत्री ये बचा हैं ।" फिर उसने सारी स्थिति समभायी। रायणा गदगद होवर योली "मु वर मा ! मैं गा विमी एक की बहू बन पर रहना चाहती थी। मेरी नारी ममता के लिए तरस रही है। पर यह
बुमा यह कुटनी है । इसे धन चाहिए, वेवल धन ।'
सरदारसिंह वहां से लौट भाये ।
X
X
X
युवराज को इस
अमर विलास म दरबार लगा था। महारावल मिहासन पर बठे थे
तभी दीवान जी अपनी मूछा पर ताव देते हुए पाए और बोले, 'यह
पवित्र त्यौहार ऋतु-परिवतन का प्रतीक है ।
अवसर पर हम कोई विशेष अधिकार नहीं दे पायेंगे, लकिन उनके व्यय
म योडी और कटौती करेंग, क्याकि सजाने में स्पया की कमी है मौर
युवराज बहुत ही व्यथ सच करते हैं।' बात समाप्त करत हुए उन्होने
मूछो पर ताव दिया।
युवराज ने चीख कर वहा "दीवान जी!"
दीवान जी के होठो पर बुटिल हसी थी।
फिर युवराज भपट पडे उस पर। देखते रखते उनकी तसवार ने
दीवान जी को मौत के घाट उतार दिया।
महारावन चीखे पर उह भी सामन्ता ने नजरबद पर लिया ।
सरदारसिंह इस पडयत्र का प्रमुख व्यक्ति या । वह वहाँ से सीधा रावणा
के पास भाया।
वह साढणी अपन माय लाया था।
रावणा तपार सहा थी। युमा कही गयो हुई थी। सरदार ने उसे
साहशा पर दिटाया और कहा
प्राज स तुम मरी गवस्व हो। जल्दी ही
यहाँ से दूर भाग घनें हम लोगान लीवान जी का काम तमाम कर
गिया है।
रावा प्रमन्नता म उसन पी। फिर नितात उगम हो गयी।
उसे वहणी दीवान के माय व्यतीत पिए वे पोहित पण याद आ गये।
वह सिसव पडी।
सरदारसिंह ने पूछा "मरे, तुम रोतो क्यों हो "
'मुझे अभी भी भय लग रहा है कुवर सा, कि इस भाग्यहीना की
यात्रा बिना विघ्न पूरी हो जायेगी कि नहीं?"
'अब कोई बाधा नहीं है रावणा । यह नयी यात्रा निष्क्टक
रहेगी।
भौर साडणी चल पडी, रेतीली पगडी पर धीरे धीरे, बहुत धीरे ।
और रावणा, कल्पना लोक म एक नयी रावणा नाम ले रही थी।
नववधू-सी. बच्चो की मा।
एक नयी रावणा, एक नयी भारत ।
मौर साडणी धूल के धोरो म खो गयी।
शाहजहाँ का सन्देह
माज भी इस किले की दीवार नीरवता के मांसू बहाया
करती हैं । मागरे का यह किला जिसमे किसी समय भारत
के एक कला प्रिय शहँगाह के अन्तिम दुदिन बीते थे। वह
शह शाह जिसकी कला भोर प्रेम प्रियता का प्रतिरूप है
यह ताजमहल, तब ताज की कठोर पत्थर की छाती में
छिपी
मुमताज बेगम को प्यार भरी मात्मा अपने पागल
पति की एसी दशा देखकर फट पड़ी थी और उसे ऐसा
अनुभव ने लगा था जसे उसका पति नितात विरल
भोर हताही या होर कह रहा है-हे मेरी मन की
सालमा होर क्रम के इस पवित्र प्रचल पर मेरे ये मासू
पञ्च बन सा यह क्या कहते रहेंगे । एर समय ऐसा
पाया जब प्रेम की पवित्र प्रात्मामो ने एक पिशाच यो पा
क्यिा जिसने हम पद मे दाल पर तडपा तडपा पर मारा।
इन्ही पत्थर की निष्प्राण दीवारो मे दिल्ली का सम्राट शाहजहा अपने मन्तिम दिन बिता रहा था। दोपहर का समय था। चिलचिलाती धूप से समस्त प्रागरा प्राकुल था और प्राकृत भी यमुना को शांत लहर जो ताजमहल के प्रतिविम्ब से अपने अब मे समेटे फूलो से टकराती हुई धीरे धीरे वह रही थी । सम्राट ने निरीह मानव की तरह उन सहगे को मोर देखा और फिर रा पर । भाखा भासू झुरियो युक्त गानो से होते हुए दाडी म उलझ गए। मागुनों के तूफान ने माखो की ज्योति मे धुध पैदा कर दी और जब धुध दूर हुई तो उह अपना ताज याद भाया और ताज के साथ मुमताज और मुमताज के साथ उसर मन्तिम क्षण । जव मुमताने की मासे कह रही पी 'अपन प्रम को याद का एक मालीन स्मारक हा जो हम दोना को अमर ना दे। और इसी अमर स्मारक लिए शाहजहाँ ने मपन मन की शांति तो भी बच दिया था, ममीरा गरीबो मौर मजदूरा पोताज को मीनारा निमरणमदनि चढ़ा दिया था। सम्राट की भशान्ति बढ़ गई। उनके दिल में ऐमा अनुभव हो रहा था, मातो, उन सब बलि लिए गए मजदूरो की दीन स्त्रियां अनाथ बच्चे और लाचा पिता सब क सब उस अभिशाप दे रहे हैं और व अभिशाप माज फलाभूत हार उसे मसान्त कर रहे हैं। तभी गम लू का ता कोमा माया । बादशाह का ध्याा अपन गल की ओर गया जो सूस रहा था। अहोने पक्षक को पुकारा और एक सम्राट की तरह प्रादेश दिया--"हम ठहा पानी दिया जाय मयादि मुराही या पानी गम हो चुरा है। रक्ष न तुरत अस्वीकार परते हुए कहा--"गुस्नाती के लिए माफी, यदि प्राप हिदुस्ता ये शह माह का हम भेगका देन है मापको प्रोर पानी साते हैं वरना हम मजबूर हैं। सम्राट की पारमा भाहत-सी हो गई। मांसो प्रसिद्दाम भौति यरस पई । उह स्मरण माया जिस तरह कर याचे जा दने वाली माता को भी खा जाते हैं उसी तरह यह काला सांप मुमको खा जायगा खा जायगा, अपने प्रवा के बनाये इस हकूमत को खा जायगा, भाइयो को खा जायगा । क्रोध मे उनका चेहरा तमतमा प्राया मुटिठयाँ बंध गई और रोत राते लिसने वठ- गहन्याह हिदोस्तां । आपकी कैद के बली की सुराही का पानी गम हो चुका है इसलिए उमने ना पानी तुम्हारे नौकरी से मांगा पर नौकरों न मापका हुषम चाहा । पाशा करता हू वि पानी से भी गये-गुजरे अपने अवा को हुक्म मिल जायगा। बदनसीव- नाहजहा मुगलिया साम्राज्य का अन्तिम सम्राट औरगजेज अपने पिता द्वारा ऐसा विवाता भरा पत्र लिखा हुआ देखकर एक पर अट्टहास पर उठा। उसकी माखें दम्भ से और भयानक हो गई। पत्र को बार-बार पढकर वह अपनी महानता का मूल्यांकन कर रहा था। सोच रहा था- नाहजहाँ ने खुद इस बात को लिखकर मजूर किया कि इस हकूमत का असली हकदार मैं हूँ में है। महम वी पराकाष्ठा ने उसे पागल कर लिया। अनमन ही लेखनी चला दी। उत्तर म कुछ विशेप नहीं था। देवनदागर थ- 'जिस स्याही से प्रापन मुझे सत किया है उसी स्याही को पीकर अपनी प्यास बुझा लीजिए। उत्तर मिला पर उममें रम्नासर नाय। अपना यह उपशा दसर मम्राट रो उठा। उसी क्षण उहाँने पोरगजेब से मिलने की उत्कठा प्रकट की। उम प्रायना का स्वीकार कर लिया गया। यमुनाक मौम्य त पर पौरगाय या निवास स्थान था। मन पाहा को जन माग स यहाँ तर ल जान वा प्रवध पिया गया। माग म नाविका न थोडा पाहार दिया । पालू भुजियो की नमयीन मुग ध ने शाहजहां को अपना भोर भापित कर लिया । वह बीती बातें स्मरण हो पाई कि एक दिन उहोंने युवावस्था में इसी प्रकार अपने साथिमा पे साथ शिकार मे लौटते समय भालू भुजिए पाये थे। स्मृति ने हृदप पो अमजोर कर दिया। साप चाहने पर भी व अपने मन को न मना सके भोर मत म कह ही उटे-"मदि कोई एतराज न हो तो थोडे से मुजिये बादशाह को इस निवसता पर क मल्लाह रो उठा। शाहजहां की प्रासा मे उमरी पटना को पहयार पर यह अनायाम वह उधा-"युदरत खेल निराले है। यह वह हाय है जिसके सामने सारे मुम्ब का हाथ फैना रहता था माज एक नाचीज मल्लाह व सामने पला है।" उसने तुरन्त पोडे भुतिय ही नहीं सब के सब शाहजहाँ मी मोर बढाए कि विसा ने राका--'प्रहमद । राम्राट औरगजेब वदी पर किए गए एसे रहम की रास्त सजा दले है।" "पर में भी तो हमारे मालिक है "हैं नहीं, ये। भाज ये हमारे नदी । मोर नदी की विमा तरह मदद वरना हमन ना गुनाह समभा जायगा । "तो" तुम मपने सारे भात भुजिए खा लो इह अपने हाल पर छोड दो। सेापति पुन भपने काप म स्पस्त हो गया। सबाट ने अपना पना हाप मल्लाह सामा सहाराका समर फला दिया। दोपहा मौन रहने के पश्चात् ये हसान मोर पहे- "मेरा सदह भूठा है मरा र भूग है। गुरु वाणी मजा लिया था वह रोग था, एक्दम सब, सोलह माने मय । पौर, एकाएक भीत मी एक परना उनकी प्रासा के समर चित्र कीमाति धूम गई। एर पार ये अपने पुछ सापिया साप पजाय एप गुग्गार
-
मोर जा रहे थे।
गुरद्वार मे प्रचना और बनना का अत्यन्त सुहावना पोर मत्रमुग्ध
कारी समा बँधा हुआ था । वाणी के पाठ की ध्वनि से सरल वातावरण
गुजित था। प्राचीरो म लगी प्रकाशमान उल्लामो के प्रकार पुज से
ममस्त गुरुद्वारा उदभासित या।
गन न देवभक्ता और पुगारियो म निस्त धता छा गई । साथ ही
सबनी दष्टि मुख्य द्वार पर जा लगी। मुख्य-द्वार से एक अलौकिक प्रतिभा
प्रवेश कर रही थी। य थे महान त्यागी और शूरवीर नरश्रष्ठ गुरु
गोवि सिंह।
गुरु गोविंदसिंह अपने पूर्व निश्चित प्रासन पर आसीन हुए। उनके
बटने के साय-माय समस्त जन-समूह बैठ गया। पाठी न गुरु वाणी के
ववनो का पाठ प्रारम्भ किया। श्रोतागण त मम होकर सुन रहे थे ।
पाठी ने कुछ उच्च स्वर से एक वचन पढा-
नजर अपठठी जे परे सुलताना पा सपाउदा।
भिर मगे सरन पाउदा।
मर्यान, र भगवान की दृष्टि विपरीत हो जाए तो सुलतानो को
घमियारा बनायर यह उनस घास एन्वाता है और भीख मांगन पर भी
उभाम रहा मिनती।
तभी द्वार पर एर पारिक्ति रितु प्रतिभा सम्पन प्राकृति प्रवेश
मानावरती उल्टे पर लोट पड़ी। वचन वा श्रवण उसन भली
भौति पर दिया था। बाहर भारर वह अपने मायो से गम्भीर स्वर
म arn- गने आज गुरु वाणी का प पचा मुआ, जिराम हमें
हारन की गह भू भातम दृमा सपि हम उल्टे पाव लोट पाए ।
पर माना हो पिया परवर दिगार । एक चापम ने
मसामवा!
उमा मसर की मचाई पर हम पर है । मला कोर मा मनुष्य
होला मागाह र भिगारी बन जान पर भीस नहीं डालेगा।
१०१ - सब डालेंगे गरीब परवर ।' "तभी तो यह शक-यकीन के साथ दिन में घर किए बठा है।" शाहजहा ने दम्म भरी दृष्टि से अपने प्रत्यक सिपाही को देवा। मिपाही सम्राट की चाह को भांप गए । अपने प्रभु का प्रम न करने के लिए सपने एक स्वर में कहा-"आप ठीक कहत है जहाँपनाह । क्याति प्रापका प्रोना भी खुदा से कम नहीं है । गुरु वाणी हिदू जाति की एक धार्मिक पुस्तक है । उसके लिवन वाले साधारण प्रादमी होगे और प्राप खुला के पैगम्बर हैं इसलिए आपकी राय ज्यादा वजनदार है । इस प्रकार की प्रसन्सा मुनकर गाहनहा की प्रांखें गव से चमक उठी । हाठा पर एस मिथ्या विजय का उल्लास मुस्कान बनकर छा गया। मागो उनकी पासें कह रही हैं- 'मर द दश्वर के दो से कम नहीं। प्रत्यक बात लिखने से पहले एक साहित्यिक और पयप्रदशक नेता को जीवन के अनुमवा को अच्छी तरह देख लेना चाहिए, नही तो बात भटक जाती है । सत्र के मब अश्वो पर बटे चल जा रहे थे । सबने हाँ म हाँ मिनायी थी। अतीत का चलचित्र समाप्त हो गया। नाव में ये यहोश हो गए थ अपने ही दद म । इसलिए उहे वापस प्रागरा लाया गया । हनीम उपचार कर रहा था। सम्राट वो चेतना में आते देखकर वह प्रसनता से बिल उठा । पर गम्राट ने चारा घोर देखकर धीरे मे कहा- नजर अपठठी जे करे सुलताना पा खपाउदा भिगे मगे मर न पाउदा । इस बार उनके स्वर म गुरु वाणी के इस वचन के प्रति गहरी पास्या, विश्वास और श्रद्धा थी। सचाई उह एक एक दम मालूम पड़ रही थी। सारे व्यक्ति इग वचन के रहस्य से अनभिन चित्रवत मे राई-पहे समार वे चेहरे के उतार चढ़ाव को दख रहे थे। [लोरथा पर आधारित
क्षण भर को दुल्हन
बांदी प्रमानना 4 आवेग म भागी भागी मायी।
उमवी सांस फूल रही थी। वेसरिया रंग की धूनडी पीछे
मरर गई थी। महती रचे पाँवा म पायल छनक छनर
परती एक लय म बज रही थी।
गजकुमारी कोडमने अपने निजी पथ के गवाक्ष से
पावम ऋतु में धुल रजत ज्योतामय मापाश को देस
रही थी। उमरी गभीर दष्टि म उस परछाइयां तैर रही
थी। दूर-दूर तक मौन मोया हुआ था।
पानी यास बांदा भारली को भागत हुए मात देखकर
उमका पायता भग हुइ । पलया पर जो व्यथा पराग
एकत्रित हो गया था उम उमने अपनी मदुल हयलियों से
दीप निवास के साप पाठशारिर मारली वी भोर उ मुष
दुई और टून स्वर में बोती, क्या है ?'
"बाई सा, प्रभी कुवर वजेद्र जो कह रह थे कि पूगल के भाटी राजकुमार सादुल ने एक साथ दो शेरा को मार डाला। सचमुच एसा योद्धा इस समय भूमि पर नहीं है।" और यह प्रशस्ति उमके प्रात्म लाक् म बई दिना से अकुरित प्रणय बीज पर जल मिंचन पर गई। वह पीतल के मयूरी दीवट पर रखे दीपर के निकट पायी और उसकी बाती को ठीक करते हुए बोली 'सादुल जी नर नाहर हैं । पर मेरे भाग्य म ऐसे शूरवीर पति कहाँ ? राव सा ने मर भाग्य को बचपन म ही मारवाड के च्डोजी राठोड के पुत्र प्ररड कमल के सग बांध दिया है।" काडमदे इतना कहार मखमली गय्या पर भाकर अध शायित हो गयो । उमका मन अपने अतर की दुनिवार पीडा से दहा सा उठा जसे उमे भरड कमल के साथ निश्चित किया हुमा विवाह सम्ब पतई पसन्द नहीं है । उसने अपने नयन क्षण भर वो बंद किये और फिर वह उठकर समीप रखे एक लक्दी के प्रत्यन प्राकपक स दूर क पास आई। उमे खोला और उममें से एक चिय निकाला। चियनिता त तरुण का पा। विशाल नेत्र और प्राजानु बोहे । वभ पर लटका तीन विभिन मोतिया के हार । वह उस चित्रको प्रपलक और मपनत्व स देखती रही। यह धिय सादुल का था। कोडम ने हीरव कणफूल पहन रखे थे। उसको छाया चित्र के वहरे पर पड रही थी। उस हिलाकर वह भारली ग बोली 'तुम मरी बौदी ही नहीं छोटी बहिन भी हो। क्या कोई एसा उपाय नहीं हो उकता जिसम मरा विवाह सादुल जी जस नरसिंह से हो जाय?" "क्या उपाय हा सकता है। 'नि पाय होकर भारली बोली। 'कुछ भी करो। "मैं प्रयास करूगी। भारती ने कोमद का हाय अपने हाय म पहा, "सच बाई सा, एक बार भी वह नर-वेसरी आपके हाथ की मलाई भी देस ले तो भापके परिणय के लिए व्यग्र हो उठे। या रूप -
क्षण भर को दुल्हन
।
बांटी प्रमानता के भाग में भागी भागी मामी।
उसकी सांस फूल रही थी। केसरिया रग की चूनडी पीछे
मर गई थी। गहती रचे पावो म पायल छनक छनर
वरती एक य म बज रही थी।
राजकुमारी वोडमदे अपने निजी पक्ष के गवाक्ष से
पाबम ऋतु धुने रजत ज्योतामय मावाश को देख
रही थी। उमरी गभीर दष्टि म उस परछाइयाँ तर रही
पी। दूर दूर तर मौन मोया हुमा पा।
अपनी खाम बांदा भारती को भागन हुए पाते देखकर
उमा एकाग्रता भग हुर। पलसरो पर जो व्यया पराग
एपषित हा गया था उम उमने अपनी मदुल हनियों से
दाय नि वाम रे माय पोछा तरि मारली की मोर उमुख
हुई और टूरत स्वर में बोली, क्या है
"बाई सा,
अभी कुवर
बजेन्द्र जी वह पद पनि पूगल + भाटा
राजकुमार सादुल 7 एव साय दो घेरा का मार डाला। मचमुच एमा
दा इस समय भूमि पर नहीं है।"
और यह प्रशस्ति उमा प्रारम IIT म कडरिना से प्ररित प्रात्र
वीज पर जल मिंचन कर गइ।
वह पीतल में मयूरी दीवट पर रमे नीपर के निकट पापी और
उसकी बाती को टीव वरत हुए बोगी "माटर जी नर-नाहर है । पर मर
भाग्य म ऐम गूरवीर पति वर्ग? गव मान मर मात्र का वचपन म
ही मारवाड व चूडोत्री राग-१ पुष 'प्रद कमल दे मग वाप किया
है। कामदे इतना कहार मममयी गय्या पर पाकर अथ माणित हा
गयो । उसका मन प्रश्न अन्ना की निदार पीराम इक या या 71
उस परड वमल व माय निधि fear वियर मी
पसत नहीं है । उमने प्रश्न नयन - मम पिया पिर
उठकर समीर रमे एव पाटीर प्रपत्र प्रय
मे गोता और उममें मर मित्र निद्वारा दिन गि
पा। विशाल नत्र और प्रागानु वा । पर -
पोतिया के हार। वह न चित्रा प्रार
यह चित्र सादल रापा।
चाहिए । प्रापरी यह बटी एक भयकर भूल कर बठी है । वह महीना से भाटी सरदार सादुल को अपने मन मदिर का दवता मान रही है । मैं चाहती हूँ कि मरा हाथ ग्राप उही के हाथ म दे दें। यह मेरी हार्दिक माणकराव पर वन टूट गया। हुक्म की नली हाथ की हाथ म रह गई । कुछ क्षण उनसे वोला नहीं गया। प्रग्नवाचक दष्टि से वे कोडमदे को देखते रह । पाप मरे जन्मदाता और भाग्य विधाता हैं । माप यदि मेरी इच्छा के विरद्ध भी मरडकमल को सौंपगे तो भी मुझ जाना ही पडेगा, लेकिन मैं उसे तन स्पा नहा करन दूगी। व मरे व कोही स्पा कर पायेंगे । कोडमद के नयन प्रथुपूरित हो गय । राव को कुछ नहीं सूझ रहा था। देवल स्तष से वठे थ। को मदे उठकर जान लगी तो उ हाने भारी स्वर म कहा, ठहरो' यह अनहोना विचार तुम्हार मन म कसे पाया ? चौहाण वा के राव म तरह अपनी बहू बटिया का सम्बध तोडेंग तो ससार उनकी मान-पान पर यूरगा नहीं? वचनो के पालन के लिए जिन चौहाणो न अपना सवनात कर निया क्या व चौहाण राठौरो के समक्ष क्या-दान की बात के लिए अपना मिर भुकायेंग' कोडमदे | यह वचन भग इस परा वा रक्त रजिन कर देगा। रणवी का सप्पर नर मुण्डा से भर जायगा। साचलो." मैं न परिणाम स नहा हरनी। जिम दिन राजपूतानियां इतनी दूरी बन गयों उम दिन राव सा, उना पनि निगर होरर मुद्धभूमि म नहीं करेंगे । व प्रचमानण्ड का तरह तेजस्वी होकर गथुप्रो को भम्माभूत नहीं करेंग क्योंकि तब व पति की मत्यु के पश्चात पाने वाले उन वाद वार म साव गा जा उह निवल बना देंग। योडमदे वाम्वर जाम भगया। पिन बग 1 १०७ । मैंने अपने हृदय की बात आपके समक्ष रख दी। अब आप स्वय अपना निर्णय ल । मैं इतना जानती हूँ कि महाबली सादुल में जीते जी चौहाणा का कोई भी बाल वाका नही कर सकता।' माणकराव ने कोई उत्तर नहीं दिया। व सुन से बैठ रहे । कोडमदे वहा से उठकर अपने कम मे मा गयो। भारली ने व्यग्रता से पूछा, "क्या कहा रावजी न ।' ' उन्होंने अभी कोई उत्तर नही लिया । मुझे विश्वास है कि शीघ्र ही इस पर कोई नया निर्णय ले लिया जायगा।' उसने चौथे दिन की बात है। कोडमदे अभी भी अलस निद्रा म निमग्न थी। प्रभात के देवता सूय की रश्मियां ससति को पालोकित करने लगी। शीतल समीर क स्पा से कोडमदे की मुख थी पर एक अलक उड कर इस तरह बिखर गयी थी मानो श्वेत सगमरमर पर काली रख सींच दी हो। भारली ने कोडमदे को जगाया। कोडमदे कदाचित मधुर स्वप्न दख रही थी इसलिए मौखें खोलन हुए वह तनिक रोप से बोली, 'निगोडी, जब जगानी है तब मुझे स्वग वे सुख से जगाती है।" 'लेकिन बाई सा मैं प्रापको सपने का स्वग नहीं सत्य का स्वग दो पायी हूँ। इस पथ्वी का जीता-जागता स्वग । त्वरा से वह तवी यौवना वैठ गयी। यग्रता से पूछने लगी 'कौन सा स्वग? जल्दी से वता।' मोठा कराइए।" तू मेरे मन की बात पूरा कर दे तो मैं तरा मुह ही मोठा नही, तेरी झोली मोतियो से भर दूगी।' "फिर सुनिए । छाती पर हाय रखबर सुनिए, माज आपले विवाह वा नारियल पूगल के राजकुमार सादुलजी को जा रहा है। हालांकि मारे चौहाण इमरे कुपरिणाम से परिचित हो गए है बीयता से बोली। . पहले मुह ।
"जो व्यक्ति प्रत के बारे में सोचता है, वह कभी प्रारम्भ ही नही करता।" कोडमदे ने सहज स्वर मे कहा "पहले तेरी झोली मोतियो से भर दू। 'कोडमदे ने सचमुच अपने गल के मोतियो के हार को भारली के लाख मना करने के बावजूद भी उसको दे दिया और गीता से कपडे बदल कर वह रावजी के पास गयी। उनके चरण स्पा करसे बोली, 'ऐसा बाप क्सिी बेटी को नहीं मिलने का। भगवान से प्राथना है कि मेरी प्रायु भी आपको लग जाय । प्रापके गौय का हका सवत्र बजे।' और खुशी के मारे काडमद की प्राखा में अश्रु छलछला पाए । कोडमदे को अपने सीने से लगाकर माणकराव बोले, मेरा तुम्हें आशीर्वा है कि तुम्हारा विवाह बिना विन्न बाधा के हो जाय । x X X गहनाई का मधुर-पीर भरा स्वर गूज पड़ा। पूगल का राजकुमार सादुल, जो प्रनग सा म्पवान था और मजुन सा महाबली, दूल्हा बनकर पा गया। बडे धूमधाम से विवाह हुआ। विवाह म कोई विघ्न नहीं पढी। लक्नि हर क्षण माणकराव को पागा बना रहा कि क्मिी भा समय अनिष्ट हो सकता है । किसी ममय राठोड वा का परचमन अपमान को भाग में जतार विध्वस कर सकता है। एमविए विना व ममय उमने मादुल या एकांत म ल जाकर वहा 'कवर मा | मार मग पद चुने दृा सनिकहा हैं । माप मरी सनात जाइये । मुझे विश्वस्त्र मूत्र म पता चरा है अरहामल को इम विवाह के ममाचार मिन चुर हैं। वर अपना मगतर या इम सहजता से नही ल जानी। वह प्रदायमार पर प्रारमण करेगा। गव काम वात ग मास का पानावी मुम रक्तिम हा उग। दाता मवाना गोर का परीना इस तरह की सहाईम ही होती १०६ . है। मुझे अपनी कुलदेवी का विश्वास है और भरोसा है इन भुजाओं का । आप प्राकुल-व्याकुल मत होइये । यदि परहकमल रणभूमि में उतर माया तो उसे दिन के तारे दिखा दूगा ।" "लेकिन कुवर सा | दो मिटटी के ही दुरे होते हैं। राजनीति और युद्ध केवल बल से ही नहीं, कौशल से भी लडा जाता है। वह कौशल अभी यही कहता है कि आप अपने साथ सेना लेकर जायें।" "मुझे आपका यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं है। मेरी सा ने जब पहली बार मरे हाय मे तलवार दी थी तब कहा था कि मुझे तुम्हें जम देकर कोई प्रसन्नता नहीं हुई है, मुझे सच्ची प्रसन्नता उस दिन होगी जब तू विजयी होकर पायेगा।" माणकराव ने किचित हिचकते हुए शका प्रकट की, "कही परडकमल अपनी विशाल वाहिनी के सग माक्रमण करके कोडमदे को ।" सादुल के नेत्रों से प्रगारे बरसने लगे । वह कडक कर बोला, "जब माकाश फटने लगेगा, जब इस धरा पर धम नही रहेगा, जब रणांगण नर मुण्डो से भर जाएगा और जब सूरज अपना तेज छोड देगा तब सादुल की पत्नी को कोई उससे छीन सकता है। आप निश्चिन्त होकर हम विना पीजिए । पाशकामा व दुराशामों से भयभीत मत होइये।" मन्त मे माणकराव ने अपती क या कोडमदे को सादुल के साथ विदा कर दिया। मारली उसके साप थी। बारात बीकानेर से लगभग १६ मील के पास थी। उसी समय परडक्मल ने अपनी विशाल राठौडी सेना के साप सादुल पर पात्रमण पर दिया। सादुल ने उस भाक्रमण का सामना किया। कोडमदे अपने रप मे बठी हुई सादुल का भोपण पराक्रम देख रही थी। किस तरह सादुल साप्रो का गाजर-मूली की भांति सहार कर रहा है । किस तरह पृथ्वी माता नर-मुण्डो व रक्त धारामो से भपना शृगार कर रही है। रणभेरियो तुमुल नाद से दिगदिगन्त गंज उठे है। प्रश्वों । कोही मागे पुकारा । रण क्षेत्र भर सा गया है। साझ आकाश स उतरी तो युद्ध वद हुआ। पाहत सादुल अपने खेम म पाया । कोडमदे ने उसकी आरती उतारी। चरण धूलि लेकर बोली मैं प्रभु से प्राथना करती रही हूँ कि मुझे आप जसे वीर पनि की परनी बार बार बनाना। मैं कहती हूँ कि ऐसा सुहाग क्षणिक भी हो तो भी अमर मुहाग है।" कोडमदें और भारली ने कसम्बे का प्रबंध किया। सादुल के धावा की मरहम पटटी को । श्रोत सादुल के नेत्रो म नीद घुलने लगी। मारली मेमे के प्रागे पहरा लगा रही थी कि उसने सहसा कोडमदे को काडमदे बाहर पायी। चारा पोर प्रांत नाति छायी हुई थी। पत्रुमा के खेमो म भी मशालें जल रही थी। कभी-कभी कोई सियार बोल जाता या जिससे मौन डरावना हो जाता था। कोडमद ने पूछा 'क्या बात है भारती? बाई सा परडकमलजी कुवर सा से मिलना चाहते हैं। वे हमारी विराम रेखा के उस पार खडे हैं ? को मदे क्षण भर के लिए भीतर गई। वापस पावर उसने कहा उर ससम्मान यहां लाया जाय । थोरी दरम परदकमल मादुल के खेमे में था। उसका स्वागत मतार बा हा मम्मान में किया गया । परममा ने कहा मैं ग्रापसे गांति और धम की बात करने पाया है। यह पाप म्वय जानत हैं कि राजकुमारी पर मरा पहना अधिकार है। पिमा प्रतिष्ठिन व्यक्ति की मगनर को व्याह लाना उमा घोर अपमान करना है। मैं चाहता हूँ कि आप अब भी कोरमदे को हम सौर देंपोर व्यय २ मवनाम बचिए। ग्राका देवन यही वरना या ता फिर मापन व्यय ही कर frnाम पर मरा विवादिता है पत्ला है नास्त्र-ममाज के अनु मार दर पर मर मिया स्मिा को नहा हो सकती। जो मेरी है यह मैं
.
जीते जी रिसी का भी नहीं दे सकता। राठौड़ कुल रूम । मैं मापका
अपमान नहीं चाहता हूँ पर माप रण भूमि म मेरे समक्ष मन पाइएगा।
मरे समक्ष भावर पाप जीवित नहीं लौटेंगे।'
यह तो युद्ध भूमि मे देखगे । अच्छा } ज माता जी की।"
अरहरमल लौट गया। गांति वाता भग हो गई। होनी भी थी
क्योकि कोई विसा से प्रवधानिक रूप से रिसी की वस्तु को छीनना चाह
तोकोन छीनन देगा।'
माज मूय रणवाद्या का घोष करता हुआ ही उगा खनाद मौर
तूयनाद से नर केसरी सादुल का व हिल्लालित हो रहा था। धमनिमा
का रस्त जण होकर युद्ध युद्ध चिल्ला रहा था।
कोडमदे सोलह शृगार करक अपने पति को विनारे रही थी।
भारती उतार र उमने कहा, मैं रथ पर बैठी हुई पापका रण कौशन
देवगी।"
बमल की
सादुल ने गज कर कहा आज मर प्राममण से स्वय रण-देवता
भयभीत हो जाये।
रणभेरी बजी।
प्रश्व पर मास्ट सादुल विपराल दानव की भाति शत्रुमा पर टूट
पहा । सेना नाहि त्राहि करने लगी। उह भ्रम होने लगा कि सादुल
एव है या प्रने परटकमल दे पर उसडने लगे। उसी समय परह
सहायता के लिए एर और मेना मा गई । दबते देखते सादुल
अपि सनित खेत रह गए । उसकी माया दूरन लगी । वह रणक्षेत्र
छोहार मोडमदे पास प्राया। लत्तार पर बहत हुए रक्त को पोछार
बोला, बुवरागी सा प्रब में प्रापसे अन्तिम बिा लेने पाया हूँ।
भगवान न चाहा तो पिर मिलेंग नही तो अगले जन्म म।
मोडमदे ने उत्साह स पहा
माप निता मत कीजिए। वीर की
पली जमजमान्तर सपन पति का साथ नहीं छोडती है। हम यहां नहीं
तो म्वा म अवश्य मिलेंग। माप मपन पतव्य पर इटै रह।"
No text on this page.
No text on this page.