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Samrat Ki Aankhen
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सम्राट् की आँखें
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सम्राट की आंखें
(सम्राट् पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर आधारित
वारवी सदी का एक ऐतिहासिक उपन्याम)
कमल शुक्ल
संजीव प्रकाशन, नई दिल्ली-२
।
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:सीम रपये । संस्करण सन् १९६१
प्रसार : गंजीव प्रागन, ३६१३, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२।
मुर :नवीन आर्ट प्रिंटग द्वारा मदिना प्रिटन नवीन शाहदरा, दिल्ली-३२
Samrat ki Aankben
:
Kamal Shukla
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Rs.35.00
1 चौहान की विजय रंगमहल के आंगन में शहनाई के बोल बुलन्द हो रहे थे। दासियां सुशी मे फूली नहीं समाती। वे आनन्दातिरेक से झूम-झूम उठती। परि- चारक भी अपने में पूरी तरह मगन थे। रानी अगमा के सामने चन्दन की चौकी पर चांदी का थाल रखा था । उसमे सात बातियों वाला घी का दीपक जल रहा था। उसके निकट ही एक छोटी-सी सोने की थाली रखी थी। उसमें तिलक के लिये कुमकुम (वेगर) पुष्प तथा अक्षत थे । महल के फाटक पर नौवत के नगाड़े बज रहे थे। राजपथ के दोनों ओर प्रजा खड़ी थी। वह अपने विजयी सम्राट् के लौटने की प्रतीक्षा में रत थी। क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या जवान सभी के हाषों में फूल थे, जो वे श्रद्धापूर्वक अपने सम्राट् के आगमन पर उनपर बरसाने के लिये आतुर ही रहे थे। शुभ समाचार पहले ही आ चुका था कि तराइन के मैदान में सम्राट पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी को पराजित कर दिया। गौरी बन्दी बना लिया गया है । सम्राट् उस कैदी गजनी के बादशाह को देहली ला रहे हैं। सात लास फौज लेकर सम्राट् ने मुहम्मद गौरी का सामना किया । यवन मम्राट् हार गया। वह भारत विजय करके उसपर अपना आधिपत्य जमाने आया था। मुहम्मद गौरी के साथ उसका सास गुलाम कुतुबुद्दीन ऐवक भी वन्दी बना था। इसके लिये कहा जाता था कि यह गौरी का दाहिना हाप है, उमदा मुम्प मेनापनि है और उसका सबमे बडा विश्वासपात्र । सोगरे पहर पा समय था। राजपथ को गुलावजल से सीचा गया। कदली-पल्लवों तथा आम्र-पल्लवों के तोरण बनाये गये। उनपर मंगल- कलरा शोभा पा रहे थे।
६ सहमा दूरी पर तोप का एक गोला छुटा। भीड़ मे शोर मच गया कि सम्राट् की सवारी आ रही है। आगे-आगे बाजे बज रहे थे। चौहान की लाल पताका फहरा रही थी। सम्राट् चौहान हाथी के हौदे पर बैठे थे। उनकी दाहिनी ओर घोड़े पर मवार चन्द्र कवि थे. जिन्हें चन्द्रभाट तथा चन्द वरदाई भी कहा जाता। मम्राट् के बाई ओर उनके प्रधान सेनापति चामुण्डराय थे। वे भी घोडे पर आसीन थे। पीछे पैदल सेना थी। उसके बाद हाथी, फिर घुड़- सवार। जैसे ही सनाट् का हाथी राजपथ पर आया, ठीक तभी जनता- जनार्दन उनकी जय-जयकार करने लगी। उच्च स्वरो मे नारे वुलन्द हो रहे थे-"सम्राट् चौहान की जय । पृथ्वीराज चौहान की जय । दिल्ली नरेश की जय । भारत सम्राट की जय।" सम्राट् पर प्रजा ने फूली की वर्षा ऐसी कि सारे का सारा राज- पथ फूलों मे विछ गया। रंगमहल के फाटक पर पहुंचते ही सम्राट् का हाथी रुक गया । होदे पर मीढी लगा दी गई। सम्राट् नीचे उतर आये । दासियो मंगल गीत गाने लगी। । रानी अगमा ने पति के तिलक लगाया। फिर आरती कर, सम्मान- पूर्वक उन्हें महल में लिवा लाई। पटरानी अगमा ने सम्राट को चांदी की कुर्मी पर बैठाया। दो दामिया पीछे गड़ी होकर मप्राट् पर चंवर टुलाने लगी। "आज में बहुत प्रमन्न हूँ, आर्यपुत्र ।" रानी अगमा के मुंह में जमे ही निाला, ठीक तभी सम्राट् मुस्करामे और कहने लगे--"मुगी की बात ही है, महारानी। मुहम्मद गौरी को मैं यनी यनारर नाया है।" "मय दरा मैनान को बन्धन मुरा मन परना, प्रापनाय ! यह हमारे देश को गुलाम बनाने भाया था।"
७ "दरवार लगने पर उसका निर्णय होगा। "आज विश्राम कीजिये राजन्, दरवार कसं सगाना-".- "तुम मेरा कितना ध्यान रसती हो, रानी" "पति पत्नी के लिए परमेश्वर होता है प्रापनाया" अभी रानी अगमा इतना ही कह पाई थी कि सन्नाट चौहान योग में हैसकर बोल उठे--"महारानी, इन बातों को छोडो और यह यतसाओ कि तुम्हें कोई कष्ट तो नही हुआ?" "मैं भारत की सामाशी हूँ, आर्य. पुत्र । देश की महारानी को कप्ट कैसा? बस जब से तुम गये, भगवान् से यही मांगनी रही कि मेरे सौभाग्य का सूरज अम्त न हो। हमारा देश गुलाम न हो। इस पवित्र भारत-भूमि पर ययन न आएँ।" "महारानी, भगवान् ने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली । अन्धा अब मैं आराम करूंगा। अनुराधा को भेज दो। यह आकर वीणा पर कोई राग गाए।" रानी अगमा ने ताली बजाई। एक परिचारिका सरक्षण ही सागने आ गई। उमे आदेग मिला फि यह जाकर अनुराधा दासी को युरा। लाये। । अनुराधा आ गई थी। यह नीचे आरान पर बैठ गई। उसकी उंगलिया वीणा के तारों पर थिरकने लगी। मम्राट् अव विस्तर पर लेट गये थे। रानी जगमा उनके पैर दराने लगी । वे मौन थे । यीणा की सफार यातायरण को गुमरिण मार रही थी। अनुराधा का स्यर भी गूंज उठा। यह गा रही थी-गपुर-गपुर वोल, वीणा मधुर-मधुर बोल ." सम्राट् देर तक अनुराधा फा गंगीय सुनते रहे। ये उठार ये गये और अपने गले गे मोगियों पाहार उमारणार अनुराधा मी और करो हुए यौन--"बहुत अच्छा गानी हो, दामी। गरगुग तुम पोफिल-मण्टी हो । यह लो अपना नाम । तुम्हारी योणा तभी यन्द होगी, अनुराधा, जय मैं नीद के लोक में पहुंच जाऊंगा।" अनुराधा ने जन्मी गे हार उठापार अपने गरी में जान लिया। गये मह में प्रगन्नता भरे स्वर में निकम गपा-"भारत गनाट् पृथ्वी
।
चौहान की जय हो । जब तक गंगा-जमुना में पानी है, हमारी महारानी
का सुहाग अमर रहे । हमारे सम्राट् दीर्घजीवी हो।"
वस वीणा फिर वजने लगी। सम्राट् की पलकें बन्द हो गई । रानी
अगमा के होंठो पर मन्द स्थिति थी। अनुराधा गा रही थी। वीणा के
स्वर गूंज रहे थे । वातावरण मुखर-मुखर उठता।
अब सम्राट को नीद आने लगी थी, लेकिन ये जानते थे। उन्हें
राजनीति का बहुत अच्छा ज्ञान था ।
राजा को दिन में कभी नहीं सोना चाहिए। यह सांझ को येला थी।
वे विश्राम कर रहे थे और सगीत का रस ले रहे थे ।
भारत सम्राद कादरवार दोपहर की बेला वीत चुकी थी। तीसरा पहर होते ही सम्राट चौहान का दरवार लग गया। सभी दरवारी यया स्थान बैठे थे। जैसे ही सम्राट् दरबार में आये, उनकी जय-जयकार होने लगी। वे आकर सिंहासन पर आसीन हो गये। उनके सम्मान मे सभी दरवारी खड़े हो गये थे। वे भी बैठ गये । सम्राट् पृथ्वीराज ने अपने महामन्त्री की ओर देखा। वे बोले-महामत्री, दरवार की कार्यवाही आरम्भ कर दो।" "जो आज्ञा, महाराज।" सम्राट् के पास ही उनके प्रधान नेनापति चामुण्डराय वैठे थे। दूसरी ओर थे उनके प्रिय मित्र चन्द्र कवि । महामत्री ने सम्राट् से कहा-"राजन् । बन्दी मुहम्मद गौरी को दरवार ने बुलाया जाये । आज उसी का निर्णय होगा । वह देश का दुश्मन है। हमारी आजादी छीनने आया था। खुद ही बन्दी बन गया।" अभी मत्री की बात पूरी हुई थी कि चामुण्डराय उठकर सडा हो गया। उसने विनम्रता के साथ सम्राट् से कहा-"मुहम्मद गौरी को क्या दण्ड देंगे,श्रीमान?" "दण्ड ? "हाँ दण्ड, राजन् !" "चामुण्डराय, दण्ड से वही क्षमा है । मैं मुहम्मद गौरी को क्षमा कर दूंगा। वह विदेशी है । वह हार गया । वह मेरी कैद मे है "राजन् ! आपकी यह सबसे बड़ी भूल होगी। जो दुश्मन आपको गुलाम बनाने आया था, आपका देश जीतने आया था, उसके साथ दया। यह कहाँ का निर्णय है ?" "तुम समझते नही हो, सेनापति ! क्षत्रियों की शोभा क्षमा में ही है । मैं मुहम्मद गौरी को अवश्य क्षमा कर दूंगा।" अब चन्द्र कवि से नहीं रहा गया। वह एक झटके के साथ उठकर १० । । " खडा हो गया और आवेश में आ, पृथ्वीराज से कहने लगा--"भारत सम्राट् होकर बच्चों जैसी बातें करते हो, पृथ्वीराज ! मैं कहता हूं कि साँप के दांत तोड़ दी । उसको कुचल दो। दुष्ट पर दया करने का परिणाम कुछ अच्छा नहीं होता है ।" "हाँ, यही होना चाहिए, चन्द्रभाट, मेरा भी सम्राट से यही कहना है ।" यह कहकर महामंत्री ने चन्द्र कवि का समर्थन किया पृथ्वीराज को हंसी आ गई। वे धीरे मे बोले-"तो तुम्हारी सबकी राय क्या है "मुहम्मद गौरी को मौत का दण्ड दिया जाए। वह लुटेरा है, हमलावर है और है हमारे देश का शत्रु।" "अच्छा महामत्री। मुहम्मद गौरी को दरवार में उपस्थित क्रिया जाए। मैं उससे भी पूछूगा कि वह अपने लिए क्या सजा चाहता है ।" "जो आज्ञा महाराज।" महामत्री के आदेश पर बन्दी मुहम्मद गौरी को दरवार में लाया गया । उसके गले मे लोहे का तौक पड़ा था। यह नीचे से लेकर ऊपर तक लोहे की जंजीरो से जकड़ा था। उसके पीछे ही खड़ा था। उसका खरीदा हुआ गुलाम जिसे कुतुबुद्दीन ऐबक कहते थे। वह भी जजीरों से जकडा था। उसकी भी गरदन नीचे झुक रही थी। सम्राट ने गौरी की ओर देखा । वे बोले-"गजनी के सुलतान मुहम्मद गौरी, मेरी तरफ देवो । मैं तुममे कुछ पूछना चाहता हूँ।" गौरी की निगाह ऊपर उठी। उसने मन्त्राट् को देखा। तभी सम्राट ने प्रश्न कर दिया--"गौरी, तुम जिस इरादे को लेकर हमारे देश मे आये थे, तुम्हारा वह सपना पूरा नहीं हुआ। तुम कैदी वन गये। बोलो, अब क्या चाहते हो?" "मैं कुछ भी नहीं बोलूंगा । मैं हार गया। मेरी किस्मन का सितारा डूब गया। अब तो मैं आपका कंदी है। आपको क्या बतलाऊँ कि मैं क्या चाहता हूँ?" "मुझे अपने मन की बात बतलाओ, गौरी, और यह भी माफ-माफ वहीं कि मैं तुम्हारे माथ कैमा व्यवहार करें।" "मेरे साय वही मलूक कीजिए, चौहान, जो एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है । मैं दाहंशाह गजनी का हूँ और आप हिन्दुस्तान के मालिक हैं।" "बहुत ठीक, बहुत ठीक, लेकिन एक बात है, गौरी।" "क्या, चौहान ?" "तुम हमारे दात्रु हो और दुश्मन को कभी माफ नही किया जाता। इन्माफ यही कहता है।" 'मैं माफी का तलबगार हूँ, चौहान । मैं अपने गुनाह की माफी चाहता हूं। मुझे आजाद कर दो। म जिन्दगी भर आपका शुक्रिया अदा सम्राट् पृथ्वीराज मुहम्मद गौरी को कुछ जवाव दें, उससे पहले ही दरबार में शोर मच गया। सभी दरवारी अपनी-अपनी कह रहे थे । कोई कहता कि इस दुश्मन का सिर धड से अलग कर दी। कोई कहता कि इसे जमीन में गाड़ दो। किसी का कहना था कि मुहम्मद गौरी को मौत की सजा दी जाए। "शान्त... शान्त !" सम्राट् जोर से चिल्लाये । दरवार मे सन्नाटा छाकर रह गया । वे गौरी की ओर उन्मुख हुए और जल्दी-जल्दी व्यस्त स्वर में कहने लगे- "अव तुम्हारा इरादा क्या है, गौरी?" "कैमा इरादा?" "तुम हिन्दुस्तान जीतने आये थे। फिर आ सकते हो। आखिर मुझे यकीन कैसे हो?" "मैं वादा करता हूँ, चौहान । युदा की कमम खाता हूँ कि अब हिन्दुस्तान की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखूगा।" "मैं तुम्हारे मुंह से यही सुनना चाहता था, गौरी । तुम देख रहे हो । तुम सुन रहे हो । मारा दरबार तुम्हारे खिलाफ है।" "मेरा गवाह अल्लाह ताला है, रमूल है। मैं इस्लाम की कसम खाता है कि मैं हिन्दुस्तान जीतने कभी नहीं आऊँगा। मुझपर रहम करो, चौहान, और मुझे आजाद कर दो।" "नहीं, यह कभी नहीं होगा। मैं अपने हाथ से मुहम्मद गौरी का मिर काटूंगा।"
१२ यह कहते हुए युवराज ताहर ने दरवार में प्रवेग किया। उसके हाय में नगी तलवार थी। वह गौरी पर वार करना ही चाहता था। तब तक सम्राट् जोर से चिल्लाये - "युवराज, बन्दी की हत्या करने में कोई शोभा नहीं है । दूर हट जाओ। यह मेरा आदेश है।" युवराज ताहर पीछे हट गया। सम्राट ने गौरी से कहा--"जो तुमने भरे दरवार में वादा किया है, उसे कभी मुलोगे तो नहीं गौरी?" “मैं वादा करता हूं, कुरान की कसम खाता हूँ कि अब हिन्दुस्तान कभी नहीं आऊँगा।" "तो फिर हम लोग आज से दोस्त है । हमारी दुश्मनी हमेगा-हमेशा के लिए खत्म हो गई । सेनापति, मुहम्मद गौरी को आजाद कर दो।" गेनापति ने मुहम्मद गौरी के बन्धन खोल दिये । कुतुबुद्दीन ऐबया को भी स्वतन्त्र कर दिया गया। दोनो ने झुककर सम्राट् को अभिवादन किया। वे वहां से चल दिये। दरवार मे देर तक मुहम्मद गौरी की ही चर्चा चलती रही । चन्द्र कवि सम्राट् पर नाराज था। उसका कहना था कि चौहान ने यह मय में बडो मूल की है, जो हाथ आये शिकार को छोड़ दिया । देख लेना, गौरी एक दिन घोखा जरूर देगा । इसमें कोई सन्देह नही। चामुण्डराय भी मन्तुष्ट नहीं था। सम्राट् ने उसका कहना नहीं माना । उमे इममा महान दु.ग्य था । युवराज नाहर वाप के सामने बड- वड़ा रहा था। उसका क्यन था कि सांप को ऐसे ही छोड़ दिया गया। यह अच्छा नहीं हुआ। मम्राट् मौन थे। वे सबकी बातें सुन रहे थे। उन्हे लग रहा था कि उन्होंने एक महान उपकार किया है। उन्हे यही करना चाहिए था। क्षत्रियों की यही शोभा है। कुछ देर बाद सम्राट् उठकर खडे हो गये और अन्त.पुर की और चल दिये। वै प्रमन्न थे। उनके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव थे। .
जयचन्द का दरबार राठौर वंश के कुलदीपक राजा जयचद का दरवार लग रहा था। सेनापति सूर्यसिंह उठकर खड़ा हो गया और महाराज को अभिवादन करके कहने लगा -"पृथ्वीराज चौहान ने गजनी के वादगाह मुहम्मद गौरी को छोड़ दिया।" "!" "हाँ, महाराज! वह अपने सिपहसालार कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ गजनी चला गया। उसने पृथ्वीराज से माफी मांग ली।" "यह बहुत अच्छा हुआ, सूर्यसिंह । मैं यही चाहता था।" "यही मौका है, महाराज ! हारा हुआ मुहम्मद गौरी गजनी पहुंचे, तभी आपका दूत भी वहां पहुंच जाना चाहिए। आप पत्र मे यह लित्रिए कि गौरी युद्ध की तैयारी करे। वह पृथ्वीराज पर चढाई कर दे। आप अपनी पूरी फौज लेकर युद्ध मे उसका साथ देंगे।" "सूर्यसिंह, तुमने बहुत अच्छा मोचा । मैं यही करूँगा। मैं पृथ्वीराज का सर्वनाश देखना चाहता हूँ। मेरे कलेजे में वदो की आग जरा रही है। - अभी जयचन्द इतना ही कह पाये थे कि उनका महामंत्री उठकर खडा हो गया। उसने साहस बटोरकर जयचन्द से कहा- “महाराज, यदि आज्ञा हो, तो मै कुछ कहूँ?" "हाँ, कहो, महामंत्री, तुम क्या वहना चाहते हो?" "महाराज, अभी हमारे देश भारतवर्ष मे हिन्दू राज्य है। सदियों पहले महमूद गजनवी आता था । वह हमारे देश को लूटकर ले जाता था। उसने भतरह वार मला किया। यह लुटेरा था, लुटेरा।" "आखिर तुम बहना क्या चाहते हो, महामनी ?" "मेरा कहना यह है कि घर की फूट से बाहर वाला हमेशा फायदा १४ उठाता है। गौरी का इरादा भारत को गुलाम बनाना है । यहाँ वह इस्लाम लायेगा और उस धर्म का प्रचार करेगा। हम गुलाम हो जायेंगे। हमारी आजादी छिन जायेगी।" "तुम्हारा मतलब क्या है, महामत्री ?" इसपर महामंत्री तो बोलते-बोलते ही रह गया। एक वृद्ध दरवारी उठकर खडा हो गया। उसके मुंह से निकला-"विदेशी को देश मे आने का निमन्त्रण मन दो, महाराज । मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ ! मैं-" "मैं कुछ भी सुनना नही चाहता हूँ। मैं पृथ्वीराज से अपने अपमान का बदला लूंगा। मेरा हक पृथ्वीराज को दिया गया। यह कहाँ का निर्णय है कि छोटा भाई युवगज पद पर बैठे और बडा अपने अधिकार में वंचित हो जाए।" अब महामंत्री से चुप नहीं रहा गया । वह हिम्मत करके फिर बोल उठा--"यह शिकायत आपको अपने नाना अनंगपाल से करनी चाहिए पी, महाराज । उन्होंने अजमेर और देहली का राज्य पृथ्वीराज चौहान को दिया। आपको कन्नौज का मालिक बनाया। आप दोनो मौसेरे भाई हैं । आप बड़े हैं और पृथ्वीराज छोटे । आपको चाहिए कि आप पृथ्वीराज को क्षमा कर दें।" "कसी बातें करते हो, महमत्री। क्या तुम्हे मालूम नहीं कि पाटन राज्य मे हर साल मुझे गत्तर लाख मोहरे मिलती थी। पृथ्वीराज ने उम राज्य को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। मेरी आमदनी बन्द हो गई। मैं पृथ्वीराज को कभी क्षमा नहीं करूंगा।" महामंत्री उदास हो गया। उसके और आ गये । वह बच्चों की तरह रोता हुआ बोला-"महाराज, मेरी प्रार्थना यही है कि देश को गुलाम मत होने दीजिए। भारत में हिन्दू राज्य रहे, इसके लिए हमको जान की बाजी लगा देनी चाहिए।" "महामंत्री, पर राजनीति है। पृथ्वीराज ने मेरा यहप्पन कभी नहीं माना । यह आज भी मुझे पुणा बी दृष्टि मे देखता है। मैं उमे नंग में नहीं बैठने दंगा। मेरे मन में प्रतिशोध की आग जल रही है ।" मंगी मौन हो गया। गेनापति मूर्यगिह को मौरा मिला। यह मुस्कराया और धीरे से अपनी बात कहने लगा-'महाराज, मेरे मन में भी बदले की आग जल रही है। आपको मालूम है कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने मेरे पिता को अपने दरबार में बुलाया और वहां उनकी हत्या कर दी गई। उनपर राजद्रोह का झूठा अपराध लगाया गया था।" "मालूम है, सूर्यसिंह, मैं इसे कभी नहीं भूल सकता। तुम मेरे सेना- पति ही नहीं, किसी राजा के राजकुमार हो, जिसे युवराज पद पर बैठना चाहिए था। आज वह सेनापति है। इसका कारण पृथ्वी है, पृथ्वी।" "महाराज, अगर आप मुझे शरण न देते, तो मै कहाँ जाता ?" "सूर्यसिंह, आदमी ही आदमी के काम आता है । यही इन्सानियत है। तुम्हारे पिता जालन्धर राज्य के स्वामी थे। वे बहुत ही सीधे और साधु पुरुष थे । उनका वध कर दिया गया। उनका राज्य हड़प लिया गया। चुप मत बैठो, सूर्यसिंह, बदला लो, बदला।" मूर्यमिह और जयचन्द में देर तक इसी तरह वात होती रहीं। अन्त में यही निश्चय हुआ कि शीघ्र ही कन्लीज का दूत गजनी जायेगा। मुहम्मद गौरी को हिन्दुस्तान आने का निमन्त्रण दिया जायेगा। जयचन्द उसे पूरी-पूरी सैनिक महायता देगा ।
संयोगिता राजकुमारी सयोगिता अपने कक्ष में बैठी गुनगुना रही थी। उसके बोनो हाथो मे मम्राट पृथ्वीराज चौहान का चित्र था। वह कहती-- "तुम दिल्ली नरेश हो। तुग सम्राट् चौहान हो। तुम शब्दवेधी वाण चलाते हो। तुम इस कलियुग मे अयोध्या के राजा दशरथ हो । मैं वारी जाऊँ। वोलो नाथ, कुछ तो बोलो । दासी तुम्ह खुला रही है ।" चित्र मौन था । संयोगिता अकुला उठी। उसने उस तस्वीर को वक्ष से लगा लिया। उसके मुंह से निकला। "तुम्हारी भुजाएँ फौलाद को बनी है, चौहान । तुमने गौरी को पराजित कर दिया। वह कौन-सा सोने का दिन होगा, जब इस दासी को तुम्हारे चरणों की रण मिलेगी? तुम..." अभी मयोगिता इतना ही कह पाई थी कि पीछे से आकर उसे किसी ने टोक दिया। वह कह रहा था-"क्या सोच रही हो, बहन सयोगिता ? किससे बातें कर रही हो?" सयोगिता चौककर रह गई। स्वय जाना-पहचाना था। उसने पीछे घूमकर देखा तो जोधमल खडा मुस्करा रहा था। यह मयोगिता की धाय का पुत्र था और था कन्नौज शहर का कोतवाल। यह सयोगिता से बडा था। उसे छोटी बहन की तरह प्यार करता था । उसपर उसका स्नेह अटूट था : सयोगिता उठकर खड़ी हो गई । उसने पृथ्वीराज वा चित्त जोधमल के मे दे दिया। फिर उसके वक्ष से लग गई और हँसती हुई धीरे से कहने लगी-"भैग में इनमे बातें कर रही थी। यह चित्र तुम्ही तो लाए थे। तुम्ही ने मुझे दिया था। पता नहीं, इनके दर्शन कव होगे?" इमपर जोधमल ने एक लम्बी मांग ली। यह ऊपर आवाश की और देखने लगा। उसके मुंह से दर्द भरा स्वर निाला--"बहन मंयोगिता, जो तुग मुन नहीं मरोगी, मैं तुम्हे वही सुनाने लाया हूँ। हाथ १७ - मैंने तो कलेजे पर पत्थर रख लिया है। मगर सोचता हूँ कि तुम्हारा हात क्या होगा?" "क्या हुआ, भइया?" "सम्राट चौहान ने गजनो के यवन को दुरी तरह हराया। फिर . उसे क्षमा कर दिया। गौरी वापस लौट गया। किन..." "लेकिन क्या, भइया?" "तुम्हारे पिता गौरी के पास निमंत्रण भेज रहे हैं। ये युद्ध के मैदान मे पृथ्वीराज के खिलाफ गौरी को सैनिक सहायता देंगे। तुम्हें यही सुनाने आया था।" "मैं ऐमा कभी नहीं होने दूंगी। पिताजी को रोकिये । यह अनर्थ है, महा अनर्थ ।" "उन्हें कोई भी रोक नहीं सकता, संयोगिता। उनपर बदसे की भावना का भूत सवार है।" "क्या दूत गजनी जा चुका है ?" "इस विषय मे मुझे कोई भी जानकारी नहीं है।" "क्यों?" "सेनापति सूर्यसिह और महाराज की राय एक है । महामन्त्री ने उनके इस प्रस्ताव का खूब खुलकर विरोध किया। मगर नतीजा कुछ भी नही निकला। योजना और उसके कार्य सभी गुप्त रखे गए हैं। फिर भी मैं पत्ता लगाऊँगा कि अभी दूत गजनी गया है या नहीं।" जोधमल और संयोगिता में इसी प्रसंग को लेकर देर तक बातें होती रही। कुछ देर बाद वहां रानी तिलका आ गई। आते ही वे संयोगिता की बलायें लेने लगों और जोधमल से बोली--"भाई-बह्न मे क्या बातें हो रही हैं ?' दोनों हंस दिये । दोनो ने ही मन की बात नही बतलाई। जोधमल बोला-"महारानीजी, संफोगिना कह रही थी कि मेरे लिए आसमान के तारे तोड़ लाओ, भइया । यह मुझे ऐसे ही काम बतलाती है। बहुत नटसर हो गई है।" अब संयोगिता रानी तिनका से लिपट गई। वह कह रही थी- -- १८ "बड़ी, मां भइया झूठ कहते हैं। मैंने इनसे कुछ भी नही कहा । यह मुझे चिढा रहे थे कि मैं दासी की पुत्री हूं और महलों में राजकुमारी की तरह पाती जा रही हूँ।" रानी तिलका को हंसी आ गई। उसने संयोगिता के कपोल पर एक हल्की-सी चपत जड़ी और प्रसन्नता के तीव्र आवेग से आलोक्ति होकर बोल उठी-"तुम दोनों बहुत ढीठ हो गये हो । जब देखो, तब लड़ते ही रहते हो। मैं पूछती हूँ-आखिर तम्हारा यह बचपना कब जायेगा ?" अब जोधमल चौती पर बैठ गया। रानी तिलका भी चांदी की कुरसी पर आसीन हो गई थी। संयोगिता महारानी के अंक में बैठी थी। वे उसके सिर पर स्नेह- पूर्वक हाथ फेरती हुई कह रही थी... कन्नौज के राजा को भगवान ने औलाद नही दी। हम दोनों सन्तान न होने से दुःखी थे । दासी कम्मो मर गई। वह महाराजा की बहुत ही प्रिय थी। उसी से तेरा जन्म हुआ, बेटी। कहने को यह सत्य है कि तुम दासी-पुत्री हो परन्तु वास्तव मे तुम मेरी आँखों की पुतली हो।" रानी तिलका इस तरह बात कर रही थी, जोधमल और संयोगिता सुन रहे थे। आगे तितका ने कहा-"मेरे देवर थे रतिभान । वे महाराज के सगे भाई नही थे। उनका भी निधन हो गया। वे अपने पीछे अपना पुत्र साखन छोड़ गये। आज वही मेरा बेटा है। भाज वही पन्नोन का राजकुमार है । मुझे उम दिन महान हपं होगा, जब मेरी बेटी का स्वयंवर होगा, जब घर मे लाखन की बहू आयेगी और मेरे आंगन में पायलों की झंकार होगी।" रानी तिलका प्रमन्नता के प्रवाह में वही चली जा रही थी। उसे बोष ही नही हो पाया कि उसके सामने क्व महाराज जयचन्द आवर सई हो गये हैं। जव दम्पत्ति की अघि चार हार, सो जयचन्द मुस्कराये और इंसबर -"आज महारानी को क्या हो गया है, जो बीती बात याद - पहने लगे-
१६
है
कर रही हैं ?"
"आज मैं बहुत खुश हूँ, नाय । भाग्य ने मुझे वेटा दिया, बेटी दी।
बस मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"
जयचन्द दूसरी कुर्सी पर बैठ गये। संयोगिता और जोधमल दोनों
वहां से चल दिये।
स्वयंवर की योजना राजा जयचन्द को गुप्त सूत्रो से इस बात का पता चल चुका था कि राजकुमारी सयोगिता सम्राट पृथ्वीराज चौहान से प्रेम करती है। उन्हे यह भी मालूम था कि उसके पास पृथ्वीराज का चित्र है। जब से जयचन्द ने यह सुना, तभी से वे अपना धीरज खो बैठे थे। आखिर उनसे नही रहा गया। एक शाम को वे संयोगिता के महल मे आये और उसकी गतिविधि का निरीक्षण करने लगे। जयचन्द बिस्तर पर आकर बैठ गये और संयोगिता से पूछने लगे- "बेटी, मैंने सुना है कि तुम्हारे पास पृथ्वीराज का चित्र है और तुम चौहान के साथ ब्याह करना चाहती हो। यह यहाँ तक सत्य है। संयोगिता? मुझे बताओ।" संयोगिता तनिक भी विचलित नहीं हुई। जैसे वह उत्तर देने के लिए तैयार बैठी हो । तत्क्षण ही कहने लगी-"आपने ठीक सुना है पिताजी । मैं आपसे झूठ नहीं बोलूंगी।" "क्या तुम्हें मालूम नहीं कि पृथ्वीराज मेरा दुश्मन है ?" "यह शत्रुता आपने पाली है । मैं इसे अच्छा नही समझती। आपस की फूट और आपस की लडाई घर को बर्बाद कर देती है।" "मैं तुम्हारा ब्याह पृथ्वीराज के साथ कभी नहीं करूंगा।" "मत कीजिए। आप पिता है । आपका मुझपर पूर्ण अधिकार है। मगर एक बात मेरी भी सुन लीजिए।" "क्या?" "यदि चौहान के साथ मेरा पाणिग्रहण न हुआ, तो मैं अपने प्राणों पर खेल जाऊँगी । मेरा यह दृढ निश्चय है।" / "तुम्हारी इस धमकी से मैं भयभीत होने वाला नहीं हूं, संयोगिता । मैं जो उचित समझूगा, वही करूंगा।" ।
"तो फिर एक काम कीजिए पिताजी।"
"क्या?"
"मुझसे यह कटार लीजिए और मेरे सीने में भोंक दीजिए । बस फिर
न रहेगा वास और न बजेगी बांसुरी।"
"तुम पागल हो गई हो, बेटी। तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है ।
तुम्हें कैसे समझाऊँ ?"
यह कहते हुए जयचन्द वहाँ से चल दिये । वे बड़वड़ा रहे थे । उनका
को सीमा को पार कर रहा था । इसीलिए अधीर थे।
रानी तिलका तुलसी की पूजा कर रही थी। जयचन्द उसके पीछे
जाकर खड़े हो गये। जब पूजन समाप्त हो गया, तो तिलका का ध्यान
अपनी ओर आकृष्ट करते हुए क्रोध-भरे स्वर में बोले-"महारानी
तुम्हारे महल में क्या हो रहा है। तुम्हे इसकी कोई भी खबर नहीं।"
"क्या हुआ, आर्यपुष ? तुम गुस्सा क्यों हो रहे हो ?"
जयचन्द ने एक सास में तिलका को सारा हाल बतलाया। वह भी
अवाक रह गई।
दम्पनि कक्ष में आकर बैठ गये और उनमें परस्पर वार्ता चलने
लगी।
रानी तिलका का कहना था कि मैं संयोगिता से बात करूँगी। किन्तु
जयचन्द ने इसके लिए मना कर दिया।
जयचन्द का कयन इस तरह था कि मंयोगिता को समझाना अपने
हाय दीवार पर पटरना है। वह कभी नहीं मानेगी। वह जान देने के लिए
तैयार है।
दुछ देर बाद जयचन्द के मुंह से निकला--"मैंने एक बहुत ही
वलिया उपाय मोना है, महारानी!"
"क्या?"
"मयोगिता का म्यपवर ध। गके लिए देश के मभी राजाओं को
निमन।"
"गह प्राणनाय ! नी और पूछ-पूछ। यहीं परो । यही मवमे उनम ।
मार्ग है।"
१२
"एक बात और पूछना चाहती हूँ।"
"क्या ?"
"क्या पृथ्वीराज को भी निगन्त्रण भेजा जायेगा ?"
"हाँ, अवश्य।"
"किन्तु पृथ्वीराज तो तुम्हारा शत्रु है।"
“वह शत्रु है, यह सत्य है। मगर यह राजमों का राजा और
भारतवर्ष का सम्राट् है। उसे निमंत्रण देना होगा। यह बहुत आवश्यक
"मेरी राय यह है कि पृथ्वीराज को स्वयंवर का निमंत्रण न दिया
जाए।"
"क्यों?'
"इसलिए कहती हूँ कि जब पृथ्वीराज स्वयंवर में नही आयेंगे, तो
संयोगिता विवश होकर किसी अन्य राजा को जयमाला पहनायेगी।"
"तुम अभी समझी नही, महारानी कि में पृथ्वीराज को निमंत्रण क्यों
देना चाहता हूँ ?"
"मैं नहीं समझी, आर्यपुत्र ।"
"तो अब समझ लो।"
"क्या ?"
"मैं पृथ्वीराज को निमंत्रण भेजूंगा। उसके साथ मेरा पत्र होगा।
उस पत्र में यह लिखा जायेगा कि मैंने स्वयंवर के समारोह में सम्राट
पृथ्वीराज चौहान को द्वारपाल का पद दिया है । वे इस पद को स्वीकार
कर लें और स्वयंवर में आएँ।"
"ऐसा मत कीजिए, नाथ, ऐसा मत कीजिए।"
"क्यों, महारानी ?"
"ऐसा करने से दबी हुई चिनगारी भड़क उठेगी । वह चिनगारी शोला
बनेगी। पृथ्वीराज को निमत्रण मत दीजिए, मत दीजिए।"
"इसके लिए मुझे कोई भी मना नहीं कर सकता है, महारानी । मैंने
स्वयंवर मे पृथ्वीराज को नोचा न दिखलाया, तो मेरा नाम जयचन्द नहीं
-1
२३ "ईश्वर, रक्षा करो। आर्यपुत्र को सुबुद्धि दो। यह जो अनर्थ होने जा रहा है, इसे रोक लो, भगवान् ।" तिलका ने माये पर दोनों हाथ रख लिये। वे गहरी चिन्ता डूब गई । जयचन्द वहां से चले गए। उसे बोध भी नहीं हो पाया। जब देर बाद रानी तिलका का चित्त कुछ स्थिर हुआ, तो उसने दासी को भेजकर युवराज लाखन को बुलवाया। तिलका ने लाखन को सारी परिस्थिति भली भांति समझा दी। फिर जोर देकर बोली-"राठौर नरेश का मस्तिष्क बदले की भावना से विकृत हो गया है, उन्हें अनर्थ करने से रोको, बेटा। यह तो वही बात हुई। जैसी मिसाल कही जाती है कि आ बैल, मुझे मार।" लाखन ने अपनी धर्म-माता को पूर्ण आश्वासन दिया। वह चला गया। तिलका फिर चिन्तन मे खो गई। आखिर उससे अपने कक्ष मे बैठा नही रहा गया। वह उठकर खड़ी हो गई और उसके पर अपने आप ही संयोगिता के कक्ष की ओर उटने लगे।
- निमन्त्रण रानी तिलका ने संयोगिता को बहुत समझाया, किन्तु राजकुमारी नहीं मानी । वह अपनी हठ पर अडी रही। लाखन ने भी धर्म-बहन के नाते संयोगिता को सब कुछ समझाया। अन्धकारमय भविष्य की ओर भी संकेत किया। लेकिन संयोगिता पर कोई भी प्रभाव नहीं पडा । वह अपनी ही कहती रही। राजा जयचन्द ने दरवार में सभी सभासदों के सामने स्वयंवर वाली योजना रखी। सभी ने उम योजना को स्वीकार किया। सभी ने उसका स्वागत किया। एक बूढे सभासद ने इस योजना का विरोध किया। उसका कहना था कि आप स्वयवर शौक मे कीजिए, लेकिन पृथ्वीराज का अपमान करना यह कहां का इन्साफ है । वैटी हुई । उकसाओगे ? पृथ्वीराज यन्नौज को इंट मे ईंट बजा देगा। यह सम्राट् है और तुम राजा, यह कभी मत भूलो। यह बूढा मभासद रायमल था। राजा जयचन्द का यह सगा चाचा था, किन्तु उमर में कुछ ही बडा । जयचन्द ने रायमल की ओर देखा। वे उदास हो गये और सीकर पहने लगे-"यह आप क्या कह रहे है, चाचाजी ?" बेटा जेयपद, राजा. को राजनीति मे काम लेना चाहिए । विश्व की यही परम्परा है। तुम इसका पालन करो। अगर निमन्त्रण भेजना चाहते ही हो, तो पृथ्वीराज को भेज दो। "मैं निमन्त्रण अवश्य भेनूंगा।" "पर वह निमन्त्रण भी उमी तरह का होगा, जैसा गभी राजाओं को जायेगा । जानते हो, जयचन्द, पृथ्वीराज स्वयवर में कभी नहीं आयेगा। तुम्हारा पतंय्य भी पूरा हो जायेगा । इस तरह न तो लाठी टूटेगी और : भी haryana न साप मरेगा । निर्विघ्न स्वयंवर हो जायेगा और आपसी झगडा भी नहीं होगा।" "आपकी बातों पर विचार करूंगा, चाचाजी। अभी मुझे सोचनें का मौका दीजिए।" रायमल की समझ में अच्छी तरह आ गया कि जयचन्द पर उनकी बातों का कोई भी असर नहीं पड़ा। वे मौन हो गये। दूसरे दिन निमन्त्रण भेजे जाने लगे। हर राज्य के राजा को यह न्योता दिया गया। एक विशेष दूत को देहली भेजने के लिए बुलाया गया। जयवन्द ने अपने हाथों से इस दूत को पत्र और निमन्त्रण दिया। वे बोले--"इस पत्र का तुम्हे उत्तर लाना है, दूत।" यदि पृथ्वीराज टालम- टोल करे, तो यही कहना कि मुझे पन का उत्तर चाहिए । मैं जवाब लेकर ही वापस जाऊंगा।" राजधानी में इस बात की चर्चा जोर पकड गई कि राजा जयनन्द अपनी वेटी सयोगिता का स्वयंवर कर रहे हैं। इसमें देश के सभी राजा आयेंगे। इसीलिए स्वयंवर के लिए बहुत बड़ी रंगभूमि बनाई जा रही प्रजा मे उमग आ गई। लोगों में उत्साह हिलोरे लेने लगा। देहली जाने वाला दूत अरवी घोड़े पर सवार था। उसे यह विशेष “घोडा इसलिए दिया गया था कि कन्नौज से देहली तक का मार्ग जल्दी ही तय हो जाए। दूत सोचता जा रहा था कि मैं शेर की मांद में जा रहा हूँ। उसके दरवाजे पर जाकर यह कहूँगा कि मैं तुम्हारे दांत तोड़ने के लिए आया हूँ। शेर गुर्रायेगा। उमे गुम्सा आयेगा। ऐसा भी हो सकता है, सम्राट 'पृथ्वीराज मेरा सिर धड से अलग कर दे।" दूत को अब देहली को गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ दिखलाई पड़ने लगी थी। उसके हृदय की धड़कन तीत हो गई। दोपहर बीत चुकी थी। तीसरे पहर दून ने देहली नगर में प्रवेश किया। वह नौबतखाने में पहुंचा। वहां सूचना दी कि वह कन्नौज में आया है और राजा जयपन्द का निमन्त्रण साया है। सम्राट् को समाचार मिला । उन्हें आश्चर्य हुआ। उनका अन्त:करण कहने लगा कि जयचन्द तो मुझे अपना शत्रु समझता है फिर उसने निमंत्रण क्यो भेजा? सम्राट का मन कह रहा था कि इसमे अवश्य कोई राज है। वे मन्द- मन्द मुस्कराये और धीरे से द्वारपाल से बोले- कन्नौज के दूत को सम्मान के साथ दरबार मे ले आओ।" "जो आज्ञा, महाराज !" द्वारपाल चला गया । पृथ्वीराज ने चन्द्र कवि की ओर देखा। उनकी खामोश निगाहें अपने मित्र से पूछ रही थी कि राजा जयचन्द ने मुझे निमन्त्रण क्यों भेजा है ? चन्द्र कवि भी हैरान था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या है और भविष्य में क्मा होने वाला है।
। वत्र परपत्र कन्नौज के दूत ने चौहान के दरबार में प्रवेश करते ही झुककर सम्राट को अभिवादन किया। सम्राट ने धीरे से पूछा-कही दूत, क्या समाचार सारे हो?" "महाराज की जय हो। हमारे राजा जयचन्द ने आपको निमन्त्रण भेजा है।" "कैसा निमन्त्रण, दूत?" "राजकुमारी संयोगिता का स्वयंवर है। उसमें आपकी उपस्थिति अनिवार्य है।" यह कहने के साथ दूत ने पत्र और निमन्त्रण सम्राट में आगे यदा दिया । पृथ्वीराज से चन्द्र कवि ने कहा-मित्र चन्द्रवरदाई। पढ़ो, देसी, इस पत्र में क्या लिखा है?' 'चन्द्र कवि ने जयचन्द का पज अपने हाथ में लिया। सभी सभासद सजग हो गये। सभी के कान सहे थे। दरवारियों को आश्चर्म हो रहा था कि राजा जयचन्द पृथ्वीराज के दुश्मन है, फिर उन्होंने अपनी बेटी के स्वयंवर का निमन्त्रण महो त्यो भेगा?" चन्द्र कवि ने पत्र पढना आरम्भ किया। उसमें लिसा था-सम्राट पृषीराज चौहान को भी अपनी बेटी संयोगिता के स्वयंवर का निमन्त्रंग भेज रहा हूं। मैंने आपको इस समारोह में द्वारपाल के पद पर नियुक्त किया है। मुझे आशा है कि आप इस सेवा को अवश्य स्वीकार करेंगे और यहाँ आकर रंगभूमि की शोभा बढ़ायेंगे।" "यह पत्र नहीं, जहर का बुझा हुया तीर है नन्द्रकवि । मह निमन्त्रण नही, मेरे ऊपर सरासर कीचड़ उछाला गया है।" पप्वीराज ने यह कहकर दूत को ओर देखा।वै उसमे वील-दून, तुम जाओ। विथाम करो। कल तुम्हें इस पत्र का उत्तर दे दिया जायेगा।
२८ - द्वारपाल कन्नौज के दूत को मसम्मान ले जाओ।" जब दूत चला गया तो पृथ्वीराज ने चामुण्डराय की ओर देखा। उनके मुंह से निकला "जयचन्द को इंट का जवाब पत्थर से दिया जायेगा सेनापति । इस पत्र को चन्द्र कवि फाडकर फेंक दो। अब दूत को क्या जवाव दिया जायेगा, उसका निर्णम होना है।" सम्राट की यह बात सुनते ही उनके वहनोई चित्तौड़ के राजा समर मिह बोल उठे-"चौहान, यह ममय श्रोध करने का नहीं है तुम्हें समझ से काम लेना चाहिए। तुम्हें शक्ति-सचय करना है मुझे गौरी पर तनिक भी भरोसा नही । वह भारत पर फिर हमला कर सकता है। इसलिए उलझो मत । युक्ति से काम लो।" "कैसी युक्ति, जीजाजी ?" "दूत को जवाब दे दो कि तुम कन्नौज आने में असमर्थ हो । गजनी का मुहम्मद गौरी हिन्दुस्तान पर फिर हमला करने वाला है। तुम नेना के मगठन मे लगे हो। तुम्हे अवकाश नहीं है।" "यह उत्तर दिया जायेगा।" "हां, यह उत्तर उचित है।" यह कहकर चन्द्र कवि ने राजा समरसिंह का समर्थन किया। पृथ्वीराज देर तक मौन रहे। फिर वे चन्द्र कवि से कहने लगे-- "मित्र चन्द्रवरदाई, यह काम तुम्हें ही करना होगा । मैं लिखित उत्तर देने के पक्ष में नहीं हूँ। तुम जाकर दूत को समझा दो।" "जो आज्ञा, मम्राट् ।" पृथ्वीराज का मन खराब हो गया था। फिर वे दरबार मे नहीं बैठे। वहाँ मे उठकर रंगमहल की ओर चल दिये । रास्ते में में सोचते जा रहे थे कि राजा जयचन्द उनकी जिन्दगी के लिए एक नासूर बन गया है X सवेरा होते ही चन्द्र कवि ने कन्नौज के दूत को उत्तर दे दिया। यह जबाव पाकर पन्नाज के लिए रवाना हो गया। दूसरे दिन चौहान का दरवार फिर लगा। उममे यही चर्चा चलती रही नि जयवन्द मे इस अपमान का बदला किम तरह लिया जाए। वह tara चोटी है, चीटी और उसने हाथी से टक्कर लेने की सोची है। कोई कुछ कहता और कोई और कोई कुछ लेकिनारामा समरसिंह का निरन्तर यही कहना था कि आपस के झगड़े से बचो। इसमें अस्ति का नाश होगा। विदेशी यवन फिर आक्रमण कर सकता है। उसके लिए तैयार रहो। किन्तु पृथ्वीराज अभी तक कुछ भी निश्चय नही कर पाये थे कि उन्हें क्या करना चाहिए। दिन पर दिन बीतने लगे। स्वयवर की तिथि निकट आती जा रही थी। एक दोपहर को दरवार लगा था तभी सम्राट् को सूचना मिली कि कन्नौज मे जोधमल आये हैं। वे सम्राट् से मिलना चाहते है। वे राज- कुमारी संयोगिता का पत्र लाये हैं। और उसे सम्राट् के हाथों में देना चाहते हैं। पृथ्वीराज ने यह सुना तो उनकी खुशी का ठिकाना नही रहा । उनका अन्तःकरण कहने लगा कि राजकुमारी संयोगिता ने शायद अपने लिए उनसे सहयोग की मांग की है। सम्राट ने आज्ञा दी। वे बोले-"दून को आदर के साथ दरबार मे ले आओ। मैं जानना चाहता हूँ कि ये जोधमल कौन हैं और यहाँ क्यों आये कुछ ही देर मे जोधमल मम्राट के सामने आ गया। उसने सम्मान के साथ भारत मम्राट् को प्रणाम किया। सम्राट नै पूछा-कहो, भाई जोधमल, यहां कैसे आये ?" "मैं कन्नौज की राजकुमारी सयोगिता का पत्र श्रीमान जी की सेवा में लाया हूँ।" "लाओ, कहाँ है पत्र ?" "यह रहा महाराज।" जोधमल ने सयोगिता का पत्र पृथ्वीराज के हाथ में दे दिया। वह सिर झुकाये खडा था। उसकी मुद्रा इस बात की प्रतीक थी कि वह प्रसन्न है और उसे यहां आने की खुशी है।
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भाग में घी दूसरे दिन दरवार लगने पर राजकुमारी संयोगिता का पत्र पढ़ा गया। उसमे लिखा था-"भारत सम्राट् की जय हो । यह दासी आपको प्रणाम करती है। आपको मालूम होना चाहिए कि मेरे पिता ने मेरा स्वयंवर रचाया है। यदि आप स्वयंवर मे न आये, तो मैं जीवित नही रहूंगी। मैंने मन, कर्म और वचन से आपको अपना पति स्वीकार कर लिया है । मेरी रक्षा कीजिए। मैं स्वयंवर की जयमाल आपके गले में ही डालूंगी।" पत्र सुनकर पृथ्वीराज मौन हो गये। दरवार में भी सन्नाटा छाकर रह गया था। अभी सम्राट् विचारमग्न ही थे कि तब तक जोधमल ने दरबार में प्रवेश किया। मम्राट ने जोधमल से पूछा-"कन्नौज का क्या समाचार है, जोधमल ?" "महाराज, कुछ न पूछिये । क्या बतलाऊँ ? हमारे राजा जयचन्द की बुद्धि पर पत्थर पड़ गये हैं। उन्होने आपकी सोने की एक बही-सी प्रतिमा वनवाई है । यह मूर्ति रंगभूमि द्वार पर रखी गई है। आप को द्वारपाल बनाया गया है।" "राजा जयचन्द का यह साहस ? मैं उसके अभिमान को मिट्टी में मिला दूंगा, जोधमल । राजकुमारी से कहना कि वे निश्चिन्त रहें। उनकी रक्षा होगी। जिस तरह उन्होंने मुझे अपना पति स्वीकार किया है, वैसे ही मैं भी उन्हें पत्नी-रूप मे स्वीकार करता हूँ। उनकी रक्षा होगी और यह कार्य में स्वयं करूंगा।" जोघमल दरवार से रवाना हो गया। पृथ्वीराज ने समरसिंह की ओर देसा और क्रोध-भरे स्वर में कहने लगे-"जीजाजी, राजा जयचन्द मेरा अपमान पर अपमान करते चले जा रहे है। पहले जहर-भरा पत्र भेजा। आज सुनने को मिला कि द्वारपाल के पद पर मेरी मूर्ति खड़ी की .
सम्राट् ने जोधमल से उसका परिचय प्राप्त किया। उसने स्पष्ट बतला दिया कि वह राजकुमारी सयोगिता की धाय का पुत्र है । वह उसका दूध. भाई है। उसकी आज्ञा से पत्र लेकर यहाँ आया है। राजकुमारी ने उसे चोरी-चोरी देहली भेजा है। सम्राट् ने जोधमल को अतिथि-गृह मे भेज दिया । उनका कहना था कि आज तुम आराम करो, जोधमल । कल पत्र का उत्तर लेकर चले "जाना।
आग में चो दूसरे दिन दरवार लगने पर राजकुमारी संयोगिता का पत्र पढा गया। उसमे लिखा था-"भारत सम्राट् की जय हो । यह दासी आपको प्रणाम करती है। आपको मालूम होना चाहिए कि मेरे पिता ने मेरा स्वयंवर रचाया है। यदि आप स्वयंवर मे न आये, तो मैं जीवित नही रहूंगी। मैंने मन, कर्म और वचन से आपको अपना पति स्वीकार कर लिया है। मेरी रक्षा कीजिए। मैं स्वयंवर की जयमाल आपके गले मे ही डालूंगी।" पत्र सुनकर पृथ्वीराज मौन हो गये। दरवार में भी सन्नाटा छाकर रह गया था। अभी सम्राट विचारमग्न ही थे कि तब तक जोधमल ने दरबार में प्रवेश किया। सम्राट् ने जोधमल से पूछा-"कन्नौज का क्या समाचार है, जोधमल ?" "महाराज, कुछ न पूछिये । क्या बतलाऊँ ? हमारे राजा जयचन्द की युद्धि पर पत्थर पड़ गये है । उन्होंने आपकी सोने की एक बड़ी-सी प्रतिमा वनवाई है । यह मूर्ति रंगभूमि द्वार पर रखी गई है । आप को द्वारपाल बनाया गया है।" "राजा जयचन्द का यह साहस ? मैं उसके अभिमान को मिट्टी मे मिला दूंगा, जोधमल । राजकुमारी से कहना कि वे निश्चिन्त रहें। उनकी रक्षा होगी। जिस तरह उन्होने मुझे अपना पति स्वीकार किया है, वैसे ही मैं भी उन्हें पत्नी-रूप मे स्वीकार करता है। उनकी रक्षा होगी और यह कार्य में स्वयं करूंगा।" जोधमल दरबार से रवाना हो गया। पृथ्वीराज ने समरसिंह की ओर देखा और क्रोध-भरे स्वर में कहने लगे--"जीजाजी, राजा जयचन्द मेरा अपमान पर अपमान करते चले जा रहे है। पहले जहर-भरा पत्र भेजा। आज सुनने को मिला कि द्वारपाल के पद पर मेरी मूर्ति खटी की ।
३२ गई है। आखिर क्या करूं?" "धीरज से काम लो, सम्राट् । सयोगिता की रक्षा करना आवश्यक है। इसके लिए एक अकेले तुम्हें ही नहीं, हम लोगों को भी साथ चलना होगा । यह निश्चित है कि संयोगिता जयमाल मूर्ति को ही पहनायेगी। ठीक उसी समय उसका अपहरण कर लिया जायेगा । जयचन्द चौंककर रह जायेंगे। उनके पैरों के नीचे से जमीन निकल जायेगी।" "आपने यह ठीक सोचा। मुझे तसल्ली हो गई। मेरी आधी चिन्ता दूर हो गई" "और सुनो, सम्राट् !' "क्या?" "जयचन्द के लिए सबसे बडा दण्ड यही है कि तुम उसकी बेटी का हरण कर लाओगे, उसे अपनी राजरानी बनाओगे।" सेनापति चामुण्डराय दोनों की बातें सुन रहा था। उसने भी अपना मत प्रकट किया। वह कहने लगा-"मैं, चन्द्रकवि और समरसिंह तीनों सम्राट के साथ छाया की तरह रहेगे। हम अंगरक्षक के रूप में होगे, ताकि सम्राट का कुछ भी अनिष्ट न हो। इसके अलावा हमारे वेश बदल जायेंगे । अन्त तक कन्नौज में हमे कोई भी नहीं पहचान पायेगा।" "बहुत खूब, बहुत खूब, सेनापतिजी। तुमने मेरी तबीयत खुश कर दी।" सम्राट ने यह कहकर अपने सेनापति की भूरि-भूरि प्रशंसा की। तभी राजा समरसिंह फिर बोल उठे-'मेरी राय है कि सेनापति चामुण्डराय अपने साथ पन्धीस हजार सैनिक लेपर कन्नौज के लिए रवाना हो जायें । उस सेना में एक सिपाही भी पंदल नही होगा। सब-के-सब घुड़- सवार होंगे। यह सेना नगर से दूर पड़ाव करेगी। इसका आभास भी जयचन्द को न होने दिया जायेगा।" समरसिंह की बातें सबके कानो मे ऐसी उतर रही थी कि जैसे ताल का बहता हुआ पानी। मम्राट को प्रसन्नता का ठिकाना नही था। वे खुशी से फूले नहीं हथे।
३३ । अब चामुण्डराय ने भी अपनी बात कहनी आरम्भ कर दी। वह बोला--"जैसे ही राजकुमारी आपके गले मे जयमाल डाले, सम्राट्, ठीक तभी आप उसे उठाकर घोडे पर बैठ जायें। आपका घोड़ा हवा से बातें करेगा। आप पीछे घूमकर भी नही देखोगे। आपके साथ चन्द्रकवि रहेगे । और पीछे-पीछे अश्वारोही के रूप में मैं तथा राजा समरसिंह ।" "वाह चामुण्डराय, वाह !" सम्राट ने यह कहकर अपने सेनापति की तारीफ की। ऐसे मे ही राजा समरसिंह के मुंह से भी निकल गया-"आखिर चामुण्डराय सेनापति किसके हैं । जैसा सम्राट्, वैमा सेनापति ।" योजना पूर्ण रूप से बना ली गई थी। यह भी निश्चित हो गया कि दो दिन बाद ही चौहान के सेनापति पच्चीस हजार सैनिक लेकर कन्नौज के लिए रवाना हो जायेंगे।
रंगभूमि देखते ही स्वयंवर कन्नौज नगर खूब सजाया गया था। स्वयंवर बनती थी। राजाओं के बैठने के लिये अलग-अलग पीठिकाएं बनी थी। उनके विश्राम के लिये मुखद तथा रमणीक आवास बनाये गये थे। रंगभूमि के द्वार पर सम्राट् पृथ्वीराज चौहान की स्वर्ण-प्रतिमा स्थापित की गई थी। उन्हे द्वारपाल का पद मिला था । देश के प्रत्येक भूभाग से नरेश आने लगे । उनका स्वागत किया जाता, उनके सुख और सुविधाओं की पूर्ण व्यवस्था थी। संयोगिता को भी जोधमल ने आश्वासन दे दिया था कि सम्राट स्वयंवर में आयेंगे। वे उसकी रक्षा करेंगे। किन्तु फिर भी वह चिन्तित थी और सोच रही थी कि भविष्य में ऊँट न जाने किस करवट बैठेगा। स्वयंवर की तिथि निकट आ गई थी। अब केवल दो ही दिन शेप रह गये थे। लगभग सभी निमत्रित राजा आ चुके थे। वह दिन भी आ गया, जब संयोगिता को किसी के गले में अपनी जयमाल डालनी थी। प्रभात में सूर्य की प्रथम किरण फूटते ही रंगशाला मे नौवत वजने लगी । सभी राजा आ-आकर अपनी पीठिकाओं पर बैठने लगे। जब सभी नरेश आ गये, तो जयचन्द ने अपने सेनापति सूर्यसिंह को आज्ञा दी कि राजकुमारी सयोगिता को रंगभूमि में लाया जाए। कुछ ही देर में संयोगिता मखियो के साथ स्वयवर भूमि में आ गई। सहेलियां मंगल गीत गा रही थी। जयचन्द ने आगे बढ़कर अपना वरद् हस्त पुत्री के सिर पर रख दिया। वे बोले-"बेटी ! आज तुम्हारा स्वयंवर है । देश के सभी दुष आये हैं । तुम्हारी जिसे इच्छा हो, उसके गले में जयमाला पहना दो।" यह बहने के साय जयचन्द ने फूलों की बड़ी-मी जयमाल संयोगिता - के हाथ में दे दी। संयोगिता आगे बढ़ी । भाट लोग उसके आगे-आगे चल रह गवर राजाओं का नाम लेते तथा उनके वंश का परिचय देते। संयोगिता के हाथों में जयमाल कांप रही थी। उसकी आँखों में सम्राट पृथ्वीराज चौहान की प्रतीक्षा थी। उसका अन्तःकरण कहता कि अगर पृथ्वीराज न आये, तो वह अपने प्राणो का अन्त कर देगी। सवेरे से दोपहर हो गई, किन्तु सयोगिता ने किसी को भी जयमाल नहीं पहनाई। राजा जयचन्द की घबराहट बढने लगी। वे उसके पास आये और अधीर होकर व्यस्त स्वर में कहने लगे- वेटी किसी को भी जयमाल पहना दो, जिमे तुम्हारा मन हो।' ।" संयोगिता निराश हो चुकी थी। उसका मन कहने लगा कि शायद अब सम्राट् चौहान नही आयेंगे। इसीलिये वह रंगभूमि के द्वार की ओर चल दी। जयचन्द पुत्री के पीछे-पीछे चल रहे थे। संयोगिता ने पृथ्वीराज को स्वर्ण-प्रतिमा को नमस्कार किया और दोनों हाथों से जयमाल मूर्ति के गले में डाल दी। राजा समरसिंह, पृथ्वीराज और चामुण्डराय फाटक पर भेष बदले हुए टहल रहे थे। वे संयोगिता और जयचन्द की गतिविधि देख रहे थे । जयचन्द जोर से चिल्लाये-“तूने यह क्या किया, मुर्ख तड़की ? द्वारपाल को जयमाल पहना दी !" "पिताजी ! स्वय वर मे जयमाल पहनाने का अधिकार मुझे है । मैं..." अभी संयोगिता इतना ही वह पाई थी कि जयचन्द ने दांत पीसे। ये कठोर स्वर मे कहने लगे- "यह जयमाल द्वारपाल के गले से उतार सो, संयोगिता । किसी अन्य राजा को पहना दो।" "मुझसे यह नहीं होगा, पिताजी।" "मेरी अवज्ञा करती है, नादान?" "मैं विवश हूँ, पिताजी" "मेरी आँखों में खून उतर आया है, सयोगिता । यदि तूने मेरा कहना न माना, तो इसी रंगभूमि मे तेरी हत्या कर दूंगा।"
"मुझे प्राणो का मोह नहीं है, पिताजी।" "मुझसे जवान लड़ाती है। मैं बहता हूं कि जयमाल उतारो, सयोगिता।" "यह कभी नहीं होगा, पिताजी।" "तो फिर मौत के लिये तैयार हो जा।" "मैं तैयार हूँ।" "तेरा यह साहम?' कहकर जयचन्द ने म्यान से तलवार बाहर निकाल ली। वे संयोगिता पर वार करना ही चाहते थे, तब तक पृथ्वीराज उनके सामने आ गये! वे धिक्कारते हुए कटु स्वर में जयचन्द से वोले-"क्या यही क्षत्रिय-धर्म है कि लड़की पर हाथ उठाओ। खवरदार ! जो संयोगिता पर तलवार चलाई । अब वह मेरी धर्मपत्नी है।" . जयचन्द ने भेष बदले हुये पृथ्वीराज को देखा, तो उनके तन-बदन में आग लग गई। वे ललकारकर बोले-"खबरदार, दुश्मन ! सावधान हो जा। मेरी तलवार तेरा ही खून पीने की राह देख रही थी।" यह कहने के साथ जयचन्द ने जैसे ही पृथ्वीराज पर तलवार का वार किया,ठीक तभी पृथ्वीराज ने पंतरा वदला और संयोगिता को दोनों बांहों पर उठाकर अलग हट गये । अव समरसिंह और चामुण्डराय ने जयचन्द को घेर लिया। छिपे हुये पृथ्वीराज के सभी मैनिक प्रगट हो गये । सभी के हाथों में नंगी तलवारें थी। जयचन्द चारो ओर से घिर गये थे। वे गला फाड़कर बुरी तरह चिल्लाये-"पकड लो इस बदमाश चौहान को। इसका वध कर दो। यह मेरी इज्जत से खेलने आया है।" लेकिन तब तक पृथ्वीराज सयोगिता को लेकर आगे बढ़ गये । स्वयं- वर भूमि से कुछ दूरी पर चन्द्रकवि दो घोडे लिये तैयार खड़े थे। एक पर पृथ्वीराज संयोगिता के साथ बैठ गये और दूसरे पर चन्द्र कवि सवार हो बात की बात मै दोनो घोडे हवा से बात करते हुए सभी को दृष्टि से गये। - JAN- ओझल हो गये। चामुण्डराय तथा समरसिंह सेनापति थे। चौहान को सना युद्ध कर रही थी। स्वयंवर की रंगभूमि रणभूमि बन गई। तीर चलते, तलवार छप:- छप करतीं । सून की नदी बह चली । लाशो पर लाशें पटने लगी चौहान के सैनिको ने कन्नौज की सेना को इतना अवसर नहीं दिया कि वे पृथ्वीराज का पीछा करते। देर तक युद्ध रहा। जव देहली के सैनिकों ने देखा कि उसके सम्राट काफी दूर निकल गये हैं तो वे भी घोड़ो पर सवार हुए और राजधानी देहली की राह ली। जयचन्द ठगे से रह गये। वे होठ चवाते, दांत पीसते, मगर अब हो ही नया सकता था? वे बाजी हार चुके थे। जयचन्द अपने महल मे आ गये । वे पृथ्वीराज से इस अपमान का बदला लेने की मोचने लगे। स्वयवर में जितने भी राजा आये थे वे सब उठ-उठकर चल दिये। कन्नौज नगर में जो खुशी की लहर दौड़ रही थी वह विपाद में बदल गई। राजमहल मे उदासी छाकर रह गई थी। रानी तिलका को भी महान दुःस था।
अगमा और संयोगिता सम्राट् पृथ्वीराज चौहान संयोगिता को लेकर चन्द्र कवि के साथ सकुशल देहली पहुंच गये। राजरानी अगमा ने पति का भव्य स्वागत किया। सयोगिता को रानी अगमा ने अपने हाथों लहरपटोर पहनाई । उसने हँसकर उसके गले में नौलखा हार डाल दिया। दोनो एक-दूसरी को पाकर बहुत प्रसन्न थी। अगमा के मुंह से निक्ला--"तुम्हारा सपना साकार हो गया, संयोगिता । मुझे इसका महान हर्ष है।" "हां, बड़ी रानी! मैं भी इसे अपना सौभाग्य समझती हूं।" 'तुम्हारे पिता को सम्राट् चौहान का ऐसा अपमान नहीं करना चाहिये था । तुम्ही बताओ कि जो भारत-सम्राट् हो, उसे द्वारपाल का पद दिया जाये, यह सरासर अपमान नही तो, और क्या है ?" "इसके लिये मैं बहुत शर्मिन्दा हूँ, वडी रानी।" "इसमे तुम्हारा कोई दोष नहीं है, संयोगिता । विनाश का भूत राजा जयचन्द पर सवार है। वही सब करवा रहा है । मुझे फिर कहना पड़ता है कि घर की फूट अच्छी नही होती। इसका परिणाम किसी के भी हक मे अच्छा नहीं होगा। मैं...!" अभी रानी अगमा इतना ही कह पाई थी कि संयोगिता अधीर होकर बोल उठी-मैं पिताजी के लिए क्या कहूँ ? वे भविष्य के लिए नही सोचते । बदले की आग मे जले जा रहे है । इममे भी एक राज है, बड़ी रानी।" "क्या ?" "मेरे पिना का प्रधान भेनापति मूर्पमिह है । वह बहुत ही दुष्ट म्वभाव का है। वहीं उनके कान भरता है । वही उनके भविष्य के पथ पर :विद्या रहा है।"
३६ "सूर्यसिंह को मैं अच्छी तरह जानती हूँ, संयोगिता।" "कसे, बड़ी रानी ?" "वह जालघर के राजा का बेटा है । उसका बाप केन्द्र को कभी कर नहीं देता था। उसकी भावनाएं विद्रोही थी। वह भारत मम्राट् की निन्दा करता और उनके विरुद्ध कुचक्र रचता था। इसीलिए उस राज्य पर चढाई की गई और उसका पतन हो गया।" "हां, महारानी । सूर्यसिंह सम्राट् को अपना शत्रु समझता है।" "युद्ध में उसके पिता ने वीरगति पाई। उसका वध सम्राट् ने स्वयं अपने हाथों से किया था। वे चाहते थे कि सूर्यसिंह को युवराज पद दें। वह उन्हें हमेशा कर दिया करें । मगर अफसोप है कि..." "हाँ, कहो न, बड़ी रानी ! तुम कहते-कहते रुक क्यों गई ?" "लेकिन सूर्यसिंह ने चौहान को धोखा दिया। उनके साथ विश्वास- घात किया। वह कन्नौज चला गया। उसने तुम्हारे पिता के दरबार मे जाकर शरण ली। तभी उसका राज्य केन्द्र राज्य में सम्मिलित कर दिया गया।" "महारानी, तुम्हें सूर्यसिंह की काली करतूनों का पता नही है। वह आस्तीन का सांप है। घर का भेदी है। वह कन्नौज राज्य का भी हित नहीं चाहता। उसके मन मे मैल है !" "हाँ, महारानी। वह मुझपर आमक्त था । मुझपर डोरे डाल रहा था। मेरे पिता को धोखा देकर मुझसे ब्याह रचाना चाहता था। वह मेरी रोज झूठी शिकायतें पिताजी से करता। उसी ने उन्हे बतलाया था कि मेरे पास सम्राट चौहान का चित्र है।" "तव तो संयोगिता, सूर्यमिह बहुत ही खतरनाक है।"- "क्या कहूं, बड़ी रानी। यदि उसे सेनापति के पद से हटाया नही गया, तो वह कन्नौज नरेश बनने के लिए षड्यन्त्र रचेगा।" "यह तुम्हारे पिता जाने और उनका काम। मैं तो एक बात जानती हूँ कि आदमी को सर्वकी बातें सुननी चाहिए, मगर करना वही उचित होता है । जो उसकी अपनी समझ में आये।"
४० . . "मेरे चाचा रायमल ने पिताजी को मना किया था कि सम्राट् चौहान से शत्रुता मोल मत लो। मगर मूर्यसिंह ने भड़काया। इसीलिए मेरे प्राणेश्वर की सोने की प्रतिमा बनवाई गई और उन्हें द्वारपाल का पद दिया गया।" "तुम्हारे पिता ने जैसा किया, वैसा फल पाया। तभी तो कहा जाता है कि जैसे को तैसा । वे मेरे मौसेरे जेठ हैं । सम्राट् उनके मौसेर भाई हैं। उन्हें सन्तोप करना चाहिए। मगर वे प्रतिशोध की आग में जल रहे हैं। यह बहुत बुरा है।" "महारानी, अब यह घर मेरा है । सम्राट् मेरे सौभाग्य के प्रतीक हैं । इसीलिए तुमसे कुछ भी नहीं छिपाऊँगी। सूर्यसिंह पिताजी से कहता था कि...?" "क्या कहा था ?" "जब तराइन के मैदान में मुहम्मद गौरी बुरी तरह पराजित हुआ और सम्राट ने उसे क्षमा करके छोड़ दिया, तब सूर्य सिह कहता था कि मैं गजनी जाऊँगा और हारे हुए मुहम्मद गौरो को युद्ध के लिए फिर तयार फरूंगा। उसे आश्वासन दूंगा कि भारत आने पर कन्नौज से उसे सैनिक सहयोग मिलेगा।" "इतने नीच विचार! "हाँ, रानी। चाचा रायमल ने इसका भी खूब खुलकर विरोध किया। बात दब गई । अब आगे देखो, क्या होता है ?" "यहां पर सम्राट् की भी भूल है, सयोगिता।" "कैसे?" "दुश्मन को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए। और उसपर दया करने का परिणाम अच्छा नहीं होता। सांप को यदि मारो नही, तो उसके दांत तोड दो। बन्दी मुहम्मद गौरी को छोड़कर सम्राट् ने अपने जीवन में यह सबसे बड़ी भूल की है ?" "सुना है कि इसके लिए चन्द्र कवि ने मम्राट् को बहुत मना किया या?" "हाँ, यह सच है, संयोगिता । सेनापति चामुण्डराय ने भी समझाया ४१ . था। मैंने भी कहा था, मगर मेरे पतिदेव का कहना था कि दण्ड से बड़ी क्षमा है। उन्होंने इस तरह अपने क्षत्रिय धर्म का पालन किया है और उस की शोभा बढ़ाई है।" "यह बहुत संभव है, महारानी कि यवन फिर हमला करे उसका कोई भरोसा नहीं।" "संयोगिता, कोई नहीं जानता कि भविष्य की गोद में कांटे होगे अथवा फूल । छोड़ो यह राजनीति का प्रसंग है। तुम्हारे आ जाने से मैं निश्चित हो गई। अब मैं सम्राट् चौहान को तुम्हारे हाथो में छोड़ती हूँ। यह दीपक निरन्तर जलता रहे, संयोगिता, संसार के मालिक से मेरी यही प्रार्थना है।" यह कहते-कहते रानी अगमा की आँखों में आंसू आ गये। वे संयोगिता के प्रति अटूट स्नेह से भर गई। इसीलिए उसे गले से लगा लिया और उसकी वलायें लेने लगी।
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हुआ है। हमारा सहयोग पाकर प्रसन्ना ही नहीं, हमले. व लिए राजी' हो जायेगा। हम उसे सहयोग देंगे और अपनी आँखो में पृथ्वीराज का. सर्वनाश देखेंगे।" "जो भी करना है, जल्दी करो, सूर्य सिंह । मेरो कलेजा. तभी पड़ा- होगा, जब पृथ्वीराज की मौत यवन के हाथों होगी। चाहता तो यह हूँ कि वह बन्दी बनाकर मेरे सामने लाया जाये और मैं अपनी तलवार से उसका सिर, धड़ से अलग कर दूं। मैं..." अभी जयचन्द की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि रायमल को बोलना पड़ा। वे कन्नौज नरेश को धिक्कारते हुये श्रोध-भरे स्वर में वोले- "तुम कितने नीच हो, नाचन्द ! आपसी फूट के चक्कर में एक विदेगी यवन का महयोग ले रहे हो। तुम देश को परतन्त्रता की वेडियो से जकड देना चाहते हो। तुम देशद्रोही हो । समाई करो, जयचन्द । तुम्हारी बेटी भारत की साम्राजी बन गई।" "ममाई कैसे कर लूं, चाचाजी?" "मेरा कहना यही है कि सूर्यसिंह को गजनी मत भेजो। तुम नहीं रहोगे, गौरी भी एक दिन समाप्त हो जायेगा, लेकिन इतिहास के काले पन्नो में तुम्हारा नाम हमेगा अमर रहेगा।" "मैं इतिहास के काले पन्नो से बिल्कुल नही डरता हूं, चाचाजी। मरने के बाद कौन देखने आता है कि उसके लिए क्या हो रहा है ?" "कितने शर्म की बात है ! जहाँ पृथ्वीराज का नाम स्वर्णाक्षरो मे लिसा जायेगा, वही तुम्हे देशद्रोही, देश का कलक कहकर पुकारा जायेगा। इम कलंक से वचो, जयचन्द, मेरा कहना मानो।" "चाचाजी, दुनिया की कोई भी शक्ति मुझे इसके लिए मना नहीं कर मकती । मैं पृथ्वीराज से बदला अवश्य लूंगा।" "रायमल ने जयचन्द को बहुत समझाया, किन्तु कोई लाभ नहीं वे निराश होकर अपने आसन पर बैठ गये और दरवार की कार्यवाही चलती रही। कन्नौज नगर का कोतवाल जोधमल रायमल की बातें सुन रहा था। उममे चुप नहीं रहा गया। वह उठकर गडा हो गया। उसने धीरे से । मन्त्रणा राजा जयचन्द ने कई दिन तक दरवार नही लगाया। उसके चेहरे पर उदासी के बादल छाये रहे। प्रतिहिंसा की आग उनके कलेजे को खाक कर रही थी। प्रतिशोध की भावना उन्हे व्याकुल बना रही थी। वे अब रुककर सांसें लेते और छोटी से छोटी बात पर भी उन्हे क्रोध आ जाता। कई दिन बाद दरवार लगा। राजा जयचन्द ने सभी सभासदो से कुण्ठित होकर कहा-"यह मेरी कितनी वडी तौहीन है कि मेरा दुश्मन आया और मेरे सामने ही मेरे घर में मेरी इज्जत पर डाका डालकर चला गया। तुम लोग कुछ भी नहीं कर पाये । रोनापति सूर्यसिंह, तुम्हे धिक्कार है।" "मैं बहुत सज्जित हूँ, स्वामी । मुझे क्षमा कर दीजिए, राजन् । तिनका था, तिनका । इसीलिए तूफान से टक्कर नही ली । धीरज रखिये । वह दिन भी आयेगा, जब सम्राट् चौहान का अन्त हो जायगा, विनाश हो जायेगा।" "मूसिंह, कैसी बातें करते हो? शत्रु रंग में भंग कर गया । उसने स्वयवर की रंगभूमि को रणभूमि बना दिया। तुम सब देखते रहे, तुम्हारा कोई कौशल नही चला और दुश्मन बाजी मार ले मैं - गमा ।" "महाराज ! हम सब लोग पृथ्वीराज के सैनिकों से बुरी तरह घिर गमे थे फिर गिवारी शिकार लेकर भाग चुका था। उमका पीछा करने से कोई फायदा नहीं था। उसके साथ पच्चीस हजार फौज थी।" मूमिह कह रहा था। एक अफैले जयचन्द ही नही, गारे दरवारी उनकी बातें गुन रहे थे। गूमिह ने आगे फिर कहा--"अब तो एक ही रास्ता है, राजन ।" "क्या?" "मुहम्मद गौरी को भारत आने का निमन्त्रण दिया जाए। यह हारा 1 - हुआ है। हमारा सहयोग पाकर प्रसन्ना ही नहीं, हमने के लिए राजी हो जायेगा। हम उसे सहयोग देंगे और अपनी आँखों में पृथ्वीराज का। सर्वनाश देखेंगे।" "जो भी करना है, जल्दी करो, मूर्यसिंह । मेरा कलेजा तभी पड़ होगा, जब पृथ्वीराज की मौत यवन के हाथों होगी। चाहता तो यह हूँ कि वह बन्दी बनाकर मेरे सामने लाया जाये और मैं अपनी तलवार से उसका सिर, धड़ से अलग कर दूं। मैं..." अभी जयचन्द की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि रायमल को बोलना पड़ा। वे कन्नौज नरेश को धिक्कारते हुये क्रोध-भरे स्वर मे वोले. "तुम कितने नीच हो, जाचन्द ! आपसी फूट के चक्कर में एक विदेशी यवन का सहयोग ले रहे हो। तुम देश को परतन्त्रता की वेडियो से जकड़ देना चाहते हो। तुम देशद्रोही हो । समाई करो, जयचन्द । तुम्हारी बेटी भारत की साम्राज्ञी बन गई।" "समाई कैसे कर लू, चाचाजी?" "मेरा कहना यही है कि सूर्यसिंह को गजनी मत भेजो। तुम नहीं रहोगे, गौरी भी एक दिन समाप्त हो जायेगा, लेकिन इतिहास के काले पन्नो मे तुम्हारा नाम हमेशा अमर रहेगा।" "मैं इतिहास के काले पन्नो से बिल्कुल नही डरता हूं, चाचाजी। मरने के बाद कौन देखने आता है कि उसके लिए क्या हो रहा है ?" "कितने शर्म की बात है ! जहाँ पृथ्वीराज का नाम स्वर्णाक्षरो में लिखा जायेगा, वही तुम्हें देशद्रोही, देश का कलक कहकर पुकारा जायेगा। इस कलंक से बचो, जयचन्द, मेरा कहना मानो।" "चाचाजी, दुनिया की कोई भी शक्ति मुझे इसके लिए मना नही कर सकती। मैं पृथ्वीराज मे बदला अवश्य लूंगा।" "रायमल ने जपचन्द को बहुत समझाया, किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। वे निराश होकर अपने आसन पर बैठ गये और दरवार की कार्यवाही चलती रही। कन्नौज नगर का कोतवाल जोधमल रायमल की बातें सुन रहा था। उममे चुप नहीं रहा गया । वह उठकर डा हो गया। उसने धीरे में जयचन्द से कहा-"रायमलजी ठीक कहते हैं, राजन् । हम आपस में लड़ें, एक-दूसरे को जान से मार डाले, लेकिन यह कभी नही होना चाहिए कि एक विदेशी यवन को अपने देश में आने का निमन्त्रण दें। यह आपकी भूल है । इसके लिए आप वाद मे जीवन-भर पछतायेंगे।" "नालायक ! नमकहराम ! मेरा नमक खाता है और मुझे ही तमीज सिखलाता है। तू चुप रह । तुझे बीच में बोलने का कोई अधिकार नहीं है।" "मैं चुप नही रहूंगा। मेरी जबान खुल गई है। मैं आपका विरोध कहेंगा कि आप विदेशी यवन को भारत मे न बुलायें।" सूर्यसिंह को मौका मिल गया। वह जोधमल से न जाने कब से जलता था। इसीलिए उठकर खड़ा हो गया और तत्क्षण ही व्यस्त स्वर से कहने लगा--"महाराज, यह घर का भेदी है । मुझे इमपर सन्देह है । गुप्त सूत्रो से पता लग गया कि संयोगिता का पत्र लेकर यही देहली गया था। इसी की प्रेरणा से पृथ्वीराज यहाँ आये और रंग में भंग करके चले गये।" "एँ ! यह वात है ?" "हां, महाराज ।" 'जोधमल, तुमपर जो आरोप लगाया गया है, उसका उत्तर तुम्हारे पास क्या है ?" जोधमल निर्भीक था। उसने सत्य पर आवरण नही डाला। उसे स्पष्ट कर दिया। वह बोला-"संयोगिता मेरी दूध-बहन है। मैं उसका बड़ा भाई हूँ। एक बड़े भाई का छोटी बहन के प्रति जगे कर्तव्य होता है, मैंने उस कर्तव्य का पालन किया। मैं दोषी नही हूँ। मैं"।" "जोधमल!" जयचन्द जोर से चिल्लाये। वे क्रोध से कांपने लगे थे। उनकी आंखें लाल हो गई। वे तेज गले में बोले- "इमी वक्त "डमी समय दरवार से चले जाओ, जोधमल, और फिर कभी जिन्दगी में अपनी सूरत मुझे मत दिखलाना।" "आप कहते हैं, तो मैं चला जाऊँगा : मैं भी ऐमी जगह रहना नहीं ४५ चाहता, जहाँ अन्याय और अनीति चल रही हो।" यह कहने के साथ जोधमल ने जयचन्द को अभिवादन किया । वह वहाँ से जाने लगा। तभी सूर्यसिंह ने व्यस्त स्वर मे जयचन्द से कहा- "महाराज, जोधमल को ऐसे मत जाने दीजिए। यह हमारा शत्रु है। यह जाकर दुश्मन से मिल जायेगा और हमारे भेद दे देगा । इसे कैद कर लो। इसे कारागार में डाल दो। यह कभी मुक्त नहीं किया जायेगा।" इसपर जयचन्द तो बोलते-बोलते ही रह गये। रायमल को क्रोध आ गया । वे सूर्यसिंह को बुरा-भला कहने लगे। वे बोले-"सूर्यसिंह. तुम्हें जोधमल के लिए कुछ भी कहने का अधिकार नही है । तुम सेनापति हो, जयचन्द के महामंत्री नही।" मूर्यसिंह मौन हो गया। उसने रायमल को कुछ भी जवाव इसलिए नहीं दिया कि वे उसपर बरस पड़ेंगे। जयचन्द रायमल का मुंह देखने लगे । जोधमल जा रहा था। उसकी पीठ दिखलाई पड रही थी। जब जोधमल चला गया, तो रायमल ने एक लम्बी सांस ली। वे दुखी होकर कहने लगे-"यह बहुत बुरा हुआ । इसका परिणाम कन्नौज के हक मे अच्छा नहीं होगा।" जयचन्द ने अपने चाचा की और देखा । वे भी चुप नहीं रहे। उनके मुंह से निकल गया- "होनहार बलवान होता है, चाचा जी। उसे किसी तरह रोका नहीं जा सकता। जोधमल आस्तीन का सांप था। इसीलिए उसे अपने राज्य से निकाल दिया।" सभी दरवारी जोधमल के जाने मे दुःखी थे। कोई भी ऐमा नहीं पा, जिगे जोधमत प्यारा नहीं था। सभी का अन्त मरण यह रहा था कि राजा जयचन्द ने अपने जीवन में यह मयमे बड़ी भूल की है। ।
देशद्रोहिला
जोधमल कन्नौज से चला गया। इसका सभी को महान दु.ग्य था ।
'रानी तिलका जयचन्द पर बहुत नाराज हुई। वे कई दिन तक रोती रही।
रायमल भी इस घटना से अप्रतिम हो गये थे। उन्हें लग रहा था
कि अगर जयचन्द सूर्यसिंह के कहने पर चलते रहे, तो एक दिन कन्नौज
राज्य के सौभाग्य का सूरज हमेशा-हमेशा के लिये अस्त हो जायेगा।
कुछ दिन बाद रायमल को यह पता भी हो गया कि राजा जयचन्द
ने अपने प्रधान सेनापति सूर्यसिंह को गजनी भेजा है। यह गौरी में पाम
इमलिये गया है कि सरन भारत पर पुन. आक्रमण करे । उसे पन्नोज
राज्य मे पूरा-पूरा सैनिक सहयोग दिया जायेगा।
इमपर रायमर को बहुत क्रोध आया। उन्होंने अपने भतीजे जयचन्द
को पूर्व युरा-भला कहा।
रायमल को समझ में अच्छी तरह आ गया था कि अब कन्नीन
में उनका रहना उचित नहीं है। मीलिये एक दिन वे चुपचाप वहाँ से
चल दिये।
कोई भी नहीं जान पाया, किमो को भी पता नहीं चला कि ये कहाँ
रे और उनका क्या हुआ।
जय याद गे गयल मोमोज में मंनिक भेजे। गे ही उनके गुप्तचर
महापना ममा रहे थे रिभागिर जोधमस यहाँ गया।
पर यह परियिनि पी और उपर सूर्यमिह गजनी पहप गया था।
उममा यहा परवागारा।
मुहामा गौरी ने मार पहा -"पलोर के गिपगासार. मुम्हारे
बाने में माना। मेरे पाग दो माग पोरयार और भी
frगान पर पE1"
"
मलीगत परमानो हम योग प्रार
! " "बहुत खूब, बहुत खूब "हमारे राजा जयचन्द का कहना है कि जव आपकी फौज देहली के करीब पहुंच जायेगी, तो कन्नौज से सेना भी आ जायेगी।" "हम इसके लिये तुम्हारे शुक्रगुजार हैं।" "हमारे राजा आपको सहयोग देने के बदले मे देहली का राज्य वाहते हैं।" "उन्हे देहली का तहत मिलेगा। यह मेरा वादा है।" "और मैं भी..." "हाँ, कहो न मिपहतालार! तुम कहते-कहते रुक क्यों गये ?" इसपर सूर्यसिंह ने मुहम्मद गौरी को अपनी कहानी आदि से लेकर अन्त तक सुना दी। फिर कहने लगा-"मैं अपने लिये चित्तौड़ा राज्य चाहता हूं।" "तुम्होरी भी यह ख्वाहिग पूरी होगी, सिपहसालार।" "आपको बहुत-बहुत धन्यवाद ।" “बोलो, और क्या चाहते हो, सिपहसालार?" "वम और कुछ नहीं । अव मुझे आज्ञा दीजिए और आप हिन्दुस्तान के लिये फौज लेकर कूच कर दीजिये।" "यही होगा सिपहसालार । जाओ खुदा हाफिज ।" सूर्यगिह ने झुककर गजनी सम्राट् मुहम्मद गौरी को कोनिश वी और वहाँ से चल दिया। उसके जाते ही मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक मै वार्ते होने "यह निहायत, अच्छा हुआ मुलतान । अब पृथ्वीराज की खैर नहीं । उसके नाश के दिन करीव आ गये है।" "जयचन्द ने अपनी फौज जंग के मैदान में भेजने का वादा किया है। बदले मे वह देहली का तरत चाहता है।" "हंगाह, जो अपनी कौम का दुश्मन है, वह भला फिर आपरा कैसे हो सकता है ? आप पहले अपना काम बनाइये । जयचन्द के लिये वाद में लगों। मोन लिया जायेगा।"
"ठोर कहते हो, सिपहसालार । हमें आपस की फूट से फायदा उठाना चाहिये । समझदारी यही कहती है।" "जहाँपनाह ! ये हिन्दुस्तानी राजा कितने नासमझ हैं, जो आपस मे ही लड़ते रहते है। कोई भी एक-दूसरे का भला नहीं चाहता । हमे जल्दी. से-जल्दी कूच कर देना चाहिए।" "वेशक!" "एक बात और है, आलमपनाह ।" "क्या?" "यह "पृथ्वीराज को मात देने के बाद हमे हिन्दुस्तान मे अपनी हुकूमत कायम करनी है।" "यही पाक इरादा मेरा भी है सिपहसालार।" "जयचन्द को भी सबक देना है कि अपनी कौम की खिलाफत करने का नतीजा क्या होता है।" "सिपहसालार ! ये सारी बातें बाद मे सोची जायेंगी। पहले हिन्दुस्तान पहुंचो और देखो कि वहां क्या होता है।" "आलीजाह ! हमारी फौज विल्कुल तैयार है। बम उसे हुक्म देने भर की देर है।" मैं जानता हूँ, लेकिन"" "लेकिन क्या, सरकार?" "हमे किमी पर भी यकीन नहीं करना चाहिये।" "क्यों ?" "जब हिन्दुस्तान की यह हिन्दू कौम अपनी जाति की ही साथी और हमदर्द नहीं है, तो फिर दूसरे के काम कैसे आ सकत । इसलिये यह जरूरी है कि हमे खुद अपनी बांही पर भरोसा । मान, लो जयचन्द ने इमदाद न दी, दो?" "जयचन्द फौजी इमदाद जहर देगा।" "हाथ कंगन को आरमी क्या? वक्त आने "नहीं, आलमपनाह ! जयचन्द को देहती बह आपकी मदद जर ।" .
४६
"ठीक है । फिर भी हमें होशियार रहना चाहिये।"
"पालीजाह ! इस बार फतह जरूर होगी। इसमें कोई शक नहीं।"
"मैं यकीन तब करता हूँ, जब मौका मेरा साथ देता है ।"
वजीर दोनों की बातें बड़ी देर से सुन रहा था। उसने भी बीच में
दसन दिया और अपनी बात करने लगा--"इजूर का इकबाल बुलन्द
रहे। मैं दावे के साथ कहता हूँ कि हिन्दुस्तान की जंग में कामयाबी
थापकी कदमदोषी करेगी।"
"वल्लाह ! वजीरेआजम, क्या बात कही है ! तुम्हारे मुंह में घी-
शककर।"
"जहाँपनाह ! हिन्दुस्तान पर आपकी हुकूमत हो जाये। फिर मैं भी
उस सोने की चिड़िया को देखूगा । सुना है कि उस मुल्क में मोना ही
खोना है।"
"यह सच है। हिन्दुस्तान में वेशुमार दौलत है।"
अन्य दरवारी भी अपनी-अपनी कहने लगे। मुहम्मद गौरी खुशी से
फूला नहीं समा रहा था।
ऐसे ही कुतुबुद्दीन ऐवक के हर्ष का पारावार न था। यह भी भविष्य
के स्वर्णिम सपने देख रहा था ।
हिन्दुस्तान
पजनी में घर-घर मे यह चर्चा जोर पकड़ रही थी कि जल्दी ही
पर उसके सुलतान मुहम्मद गौरी का हमला होने वाला है।
इसबार कयामत की जंग होगी और कामयावी गौरी को मिलेगी। वह
हिन्दुस्तान का भी बादशाह बनेगा।
आश्चर्य आश्चर्य
सम्राट् पृथ्वीराज चौहान का दरबार लग रहा था। एक दूत
आकर समाचार दिया कि कन्नौज मे जोधमल आये हैं।
कहकर सम्राट् कुछ चौके। फिर सन्देशवाहक दूत से कहने लगे-
"जाओ । जोधमल को सम्मान के साथ ले आओ।"
"जो आज्ञा, महाराज !"
कुछ ही क्षण बाद जोधमल सम्राट के सामने आ गया। उसने थदा-
विभोर होकर सम्राट् को अभिवादन किया।
"कहो, जोधमल, कुशल तो है ?"
सम्राट् के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए जोधमल निराशा-भरे स्वर में
कहने लगा-
-"कुछ न पूछिये, सम्राट् । हमारे देश भारतवर्ष के अब बुरे
दिन आ गये हैं।"
यह कहकर जोधमल ने पन्नौज का सारा हाल बतलाया। सुनकर
समाट पृथ्वीराज चौहान सन्नाटे में आ गये। उनके मुंह से कुछ देर बाद
निम्ला-आपस की फूट देश का अनिष्ट करेगी। इसमें कोई सन्देह नहीं।
जोधमल तुम सिर-आँखों पर हो। मेरे महल में रहो, और कन्नौज को
हमेशा-हमेशा के लिये भूल जाओ।"
शेनापति चामुण्डराय तथा चन्द्र कवि भी धन्नौज वा हाल सुनार
विचलित हो उठे। सभी लोग चिन्ता करने लगे कि जयचन्द ने यह गलत
कदम उठाया है। इसका दुपरिणाम सभी को भोगना पड़ेगा।
जोधमल रंगमहा में गया । वह संयोगिता से मिता। संयोगिता ने
अपने पिता को पाली परतूत यी यहानी सुनी, तो उसे भोप आ गया।
यह आवेश में भरकर बोली-"पिताजी को मैं मना करूंगी कि यवन
मुहम्मद गोरी को सैनिक सहायता न दें।"
"यह सब व्यर्थ है, बहन ।" "मैं कन्नौज जाऊँगी और"" "नहीं, बह्न, नहीं। तुम्हारा कन्नौज जाना उचित नहीं है । हमें यवन से टक्कर लेने के लिए तैयार रहना चाहिये ।" "मैं ऐसे बाप की हत्या कर दूंगी, जो देशद्रोही हो।" "शान्त हो, राजकुमारी! यह समय क्रोध करने का नहीं है । देश पर विपत्ति के बादल छा रहे हैं। हम सवका कर्तव्य हो जाता है कि शत्रु से अपनी जन्मभूमि की रक्षा करें।" इस तरह जोधमल ने संयोगिता को बहुत समझाया। मगर वह आपे से बाहर हो रही थी। रानी अगमा तथा सम्राट ने भी संयोगिता को समझाया। किन्तु वह उबलती ही रही । उसका क्रोध किसी तरह शान्त नहीं हुआ। x x दूसरे दिन सम्राट का दरवार लगा। उसमे यह चिन्ता व्यक्त की जा रही थी कि मुहम्मद गौरी को भारत आने के लिये जयचन्द ने निमन्त्रण भेजा है। उसे सैनिक सहयोग देने का भीवचन दिया है । इसीलिये गौरी पुनः आयेगा । वह देश पर फिर चढाई करेगा। चन्द्र कवि ने अपना मत प्रगट करते हुए कहा-"गौरी को इस बार ऐसी चोट दी जायेगी कि वह जिन्दगी भर याद करेगा। देश के सभी राजाओ को पत्र भेज दो, सम्राट् कि ये अपनी सेना को लेकर गौरी के भुकावले के लिये राजधानी आ जायें।" "हो, महानन्त्रीगी, चन्द्र कवि ठीक कहते हैं । सभी नरेशों को पत्र x लिख दो।" "जो भाज्ञा, महाराज" 117 चामुण्डरार का कहना था कि गौरी के हिन्दुस्तान आने से पहले ही जयचन्द को कुकरा दिया जाये। यदि सझाट आज्ञा दें, तो मैं फौज लेकर दन्नौज के लिये रवाना हो जाऊँ। उस नीच देशद्रोही राजा के लिये में ही काफी हूँ। ... . किन्तु समरसिंह ने इसके तिये चामुण्डराय को मना कर दिया।
आश्चर्य पर आश्चर्य
सम्राट् पृथ्वीराज चौहान का दरबार लग रहा था। एक दूत
आकर समाचार दिया कि कन्नौज रो जोधमल आये हैं।
ने
कहकर सम्राट कुछ चौके । फिर सन्देशवाहक दूत से कहने लगे-
"जाओ। जोधमल को सम्मान के साथ ले आओ।"
"जो आज्ञा, महाराज
कुछ ही क्षण बाद जोधमल सम्राट के सामने आ गया। उसने श्रद्धा-
विभोर होकर सम्राट को अभिवादन किया।
"कहो, जोधमल, कुशल तो है ?"
सम्राट् के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए जोधमल निराशा-भरे स्वर में
कहने लगा-"कुछ न पूछिये, सम्राट् । हमारे देश भारतवर्ष के अब बुरे
दिन आ गये हैं।"
यह कहकर जोधमल ने कन्नौज का सारा हाल बतलाया। सुनकर.
समाट पृथ्वीराज चौहान सन्नाटे में आ गये। उनके मुंह से दर
निकला--"आपस की फूट देश का अनिष्ट करेगी। इस
जोधमल तुम सिर-आँखों पर हो। मेरे महल
में
हमेशा-हमेशा के लिये भूल जाओ।"
1.
'विभीषण था, पृथ्वी, वैसे ही भारत में जयचन्द ने जन्म लिया है । अगर विभीषण लंका का भेदो न होता, तो रावण की इतनी बुरी हार कभी न होती।" "चाचाजी, अफसोस मत कीजिए। आने वाला समय अपने आप ही बतला देगा कि देशद्रोहिता का परिणाम क्या होता है । पहले मैं गौरी से निपट लूं। उसके बाद जयचन्द का भी सिर कुचल दूंगा।" पृथ्वीराज ने समरसिंह से कहा-"चाचाजी को विश्रामगृह में ले जाओ। इन्हें कोई कष्ट न हो, इसका ध्यान रखना।" संयोगिता को जब मालूम हुआ कि कन्नौज से रायमल भी आये है, तो वह दासियों के साथ अतिथि-गृह मे पहुंची। रायमल ने सयोगिता को देखते ही वक्ष से लगा लिया। उनकी आँखों में ममता के आंसू आ गये । वे स्नेह-भरे स्वर में बोले-"कैसी हो, बेटी संयोगिता?" "दादाजी, आपके आशीर्वाद से मुझे कोई कष्ट नहीं है। मैं बहुत सुखी । चिन्ता दोनों को थी। "बस, सुखी रहो, बेटी, और तुम्हारे सौभाग्य का सूरज कभी-अस्त न हो। मुझ बूढे का यही आशीर्वाद है।" सयोगिता और रायमल मे देर तक जयचन्द के विषय में ही बातें होती रहीं। दोनों एक-दूसरे को पाकर बहुत प्रसन्न थे, किन्तु भविष्य की संयोगिता का कहना था कि यदि आवश्यकला पड़ी, तो पति के साथ वह भी युद्ध के मैदान में जायेगी। सम्राट् गौरी का वध करेंगे और वह अपने हायों अपने पिता का सिर काट लेगी। इस तरह राजधानी देहली में घर-घर मे यह समाचार फैल गया कि गजनी का सुलतान मुहम्मद गौरी भारत पर फिर हमला करने आ रहा है। इस बार वह पूरी तैयारी के साथ आयेगा। इसके साथ बहुत बड़ी " फौज होगी।
५२ उनका कथन था कि इस तरह हमारी सेना कम हो जायेगी। इस समय आवश्यकता इस बात की है कि अपनी सेना का खूब अच्छी तरह संगठन किया जाये। इसके अतिरिक्त उसमे नये सैनिकों की भर्ती की जाये। यह राय सम्राट् को भी पसन्द आई। उन्होने चामुण्डराय को आदेश दिया। वे बोले-"सेना में नई भर्ती कल से प्रारम्भ कर दो।" "जो आज्ञा, सम्राट् ।" अव सम्राट् पृथ्वीराज सजग हो गये थे। उन्हे जयचन्द पर बहुत क्रोध था। मगर उन्होने उलझना ठीक नहीं समझा। इसीलिए वन्नौज पर चढ़ाई नहीं की। महामन्त्री ने देश के सभी राजाओं को इस आशय के पत्र लिख दिये थे कि मुहम्मद गौरी का हमला भारत पर फिर होने वाला है। वे सब अपनी-अपनी सेनायें लेकर राजधानी आ जायें। चामुण्डराय ने सेना में भर्ती शुरू कर दी थी। युवक बड़े उत्साह से आते और चौहान की सेना में भर्ती होते । सभी का यह कहना था कि हम देश को परतन्त्र नहीं होने देंगे। यवन गौरी के दांत खट्टे कर दिये जायेंगे, अगर वह फिर भारत आया। अभी जोधमन को आये थोड़े ही दिन हुए थे कि दरवार में सम्राट को सूचना मिली कि कन्नौज से रायमल आये हैं । सम्राट् ने रायमल को दरबार मे बुनाया। उन्हें बैठने के लिये ऊँचा सिंहासन दिया गया। फिर पृथ्वीराज ने पूछा- "कहो, कैसे आये चाचाजी? आपके दर्शन पाकर मैं धन्य हो गया। मेरे योग्य जो सेवा हो, बतलाइये?" रायमल बच्चों की तरह रोने लगे और रोते-रोते पृथ्वीराज से बोले-"बेटा पृथ्वी, जयचन्द के सिर पर विनाश का भूत सवार है । मैंने इसीलिए कन्नौज छोड़ दिया है और यहां चला आया हूँ।" सभी दरवारी सन्नाटे मे मा गये । सबकी निगाहें रायमल पर टिकी थी। और रायमल रो-रोकर कन्नौज का सारा हाल सम्राट् को सुना थे। उनके मुंह मे पीड़ा-भरा करूण स्वर निकला-"असे लंका का .
'विभीषण था, पृथ्वी, वैसे ही भारत में जयचन्द ने जन्म लिया है । अगर विभीषण लंका का भेदो न होता, तो रावण की इतनी बुरी हार कभी न होती।" "चाचाजी, अफसोस मत कीजिए । आने वाला समय अपने आप ही बतला देगा कि देशद्रोहिता का परिणाम क्या होता है । पहले मैं गौरी से निपट लूं। उसके बाद जयचन्द का भी सिर कुचल दूंगा।" पृथ्वीराज ने समरसिंह से कहा--"चाचाजी को विधामगृह में ले जाओ। इन्हें कोई कष्ट न हो, इसका ध्यान रखना।" संयोगिता को जब मालूम हुआ कि कन्नौज से राममल आये हैं, तो वह दासियों के साथ अतिथि-गृह मे पहुंची। रायमल ने संयोगिता को देखते ही वक्ष से लगा लिया। उनकी आँखों में ममता के आंसू आ गये। वे स्नेह-भरे स्वर मे बोले-"कैसी हो, बेटी संयोगिता?" "दादाजी, आपके आशीर्वाद से मुझे कोई कष्ट नहीं है। मैं बहुत सुखी । । "वस, सुखी रहो, बेटी, और तुम्हारे सौभाग्य का सूरज कभी-अस्त न हो । मुझ बूढे का यही आशीर्वाद है।" संयोगिता और रायमल मे देर तक जयचन्द के विपय में ही बात होती रही। दोनों एक-दूसरे को पाकर बहुत प्रसन्न थे, किन्तु भविष्य की चिन्ता दोनों को थी। संयोगिता का कहना था कि यदि आवश्यकला पड़ी, तो पति के साथ युद्ध के मैदान मे जायेगी। सम्राट् गौरी का वध करेंगे और वह अपने हाथों अपने पिता का सिर काट लेगी। इस तरह राजधानी देहली में घर-घर मे यह समाचार फैल गया कि गजनी का सुलतान मुहम्मद गौरी भारत पर फिर हमला करने आ रहा है। इस बार वह पूरी तैयारी में साय आयेगा। इसके साथ बहुत बड़ी फौज होगी। वह भी गौरी का आगमन राजा जयचन्द को इस बात का पता लग गया था कि जोधमल देहली गया है और पृथ्वीराज के महलों में रह रहा है। कुछ ही दिन बाद जयचन्द को यह खबर मिली कि उसके चाचा रायमल भी देहली पहुंच गये हैं । जव गौरी का आक्रमण होगा, तो चौहान के साथ वे भी रणभूमि में जायेंगे । इससे जयचन्द को चिन्ता बढ़ी। इसके बाद समय कुछ वीता। जयचन्द के कानों में ऐशी सवरें भी आने लगी कि देश के सभी राजा पृथ्वीराज को सहयोग देने जा रहे हैं । जयचन्द को अपने सेनापति सूर्यसिंह पर पूरा भरोसा था । वे सूर्यसिंह से बोले-"तुमने गुप्तचरों की बातें सुनी, सूर्यसिंह, वे देहली से क्या समाचार लाये हैं ?" "सब कुछ सुना है, महाराज। आप निश्चिन्त रहिये। जैसे ही मुहम्मद गोरी की सेना पंजाव की सरहद पर आ जायेगी, हमारी फौज कन्नौज से रवाना हो जायेगी। जीत गौरी की होगी। आप भारत सम्राट बनेंगे। आपको देहली का सिंहासन मिलेगा। पृथ्वीराज का दिनाश हो जायेगा । अब वह दिन बहुत ही निकट आ गया है।" "सूर्यसिंह, परिस्थिति बहुत ही विगड़ गई है। भविष्य में क्या होगा, कुछ समझ में नहीं आता।" "कुछ भी हो, महाराज । हमें मुहम्मद गौरी को विजयी बनाना है । वह लुटेरा है, लूट का माल लेकर गजनी वापस लौट जायेगा।" "यह कुछ भी नहीं कहा जा सकता है, सूर्यमिह ।" दोनों में देर तक इसी विषय पर बातें होती रही। जयचन्द की वराहट बढ़ती जा रही थी। वे सोच रहे थे कि अगर वही मुहम्मद in की हार हो गई, तो पृथ्वीराज वन्नौज पर चढ़ आयेगा। वह ५५ यहाँ की इंट से ईंट बजा देगा । उसके पास सात लाख फौज है। कन्नौज की यह परिस्थिति थी और देहली में सम्राट पृथ्वीराज चौहान संयोगिता के महत में बैठे थे। दोनों चौपड़ सेल रहे थे। उनमें हंस-हंसकर बातें हो रही थी। द्वारपाल दासी ने आकर सूचना दी कि महाराज से मिलने चन्द्र कवि आये हैं। सम्राट ने चन्द्र कवि की उपेक्षा कर दी। वे दासी से बोले-"जाओ, राजकवि से कह दो कि मुझे अभी अवकाश नही है।" उत्तर पाकर चन्द्र कवि चला गया। उसका अन्त:करण कहने लगा कि सम्राट् राग-रंग में खो रहे हैं। उनके पास इतना भी समय नही कि वे मुझमे मिलें। लगभग एक सप्ताह हो गया और सम्राट ने अपना दरबार नहीं लगाया। जब देतो, तब वे संयोगिता के महल मे ही बने रहते। एक दिन चन्द्र कवि साहस करके फिर गया। वह यह पहने आया था कि सम्राट् दरवार क्यों नहीं लगाते, राजकाज क्यों नही देखते ? किन्तु उम दिन भी चन्द्र फयि को यह उत्तर मिला कि सम्राट् छोटी रानी संयोगिता के साथ बैठे चित्र बना रहे हैं। उन्हें समय कहाँ है। वे राजकयि फिर मिलेंगे। चन्द्रकवि निराशा से भर गया । वह महामन्त्री और चामुण्डराय से कहने लगा कि अगर सम्राट् का यही ढंग रहा, तो वह राजकाज एकदम भूल जायेंगे। सम्राट् सयोगिता के साथ बैठे चित्र बना रहे थे। उनकी तूलिका पल रही थी। संयोगिता ने उनके हाथ से तूलिका ले ली। वह कहने लगी, "अव दस अपरे चित्र को मैं पूरा फरूँगी, आर्यपुत्र ।" मप्राट् ने हंसकर तूलिका संयोगिता को दे दी। तभी द्वारपाल दासी ने आकर बतलाया कि पंजाव की सरहद से एक दूत थापा है और इसी समय सम्राट मे मिलना चाहता है। मम्राट् की आशा पर दूत को बुलाया गया। यह बहुत ही धवराया हुआ था हांफते स्वर में कहने लगा--"महाराज, गजब हो गया। मुहम्मद .
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५७
-युद्ध की तैयारी करने लगे।
राजधानी में हलचल मच गई। जिसे देखो, वही कह रहा थाकि
मुहम्मद गौरी ने देश पर आक्रमण कर दिया है। इस बार उस यवन को
कन्नौज के राजा जयचन्द ने बुलाया है ।
गौरी ने भारत पर चढाई फिर कर दी। उसकी विशाल सेना पंजाब की सरहद तक आ गयी है।" सम्राट के हाथों के तोते उड़ गये । संयोगिता के हाथ से तूलिका गिर पडी । दम्पति भौंचक्के से होकर दूत का मुंह देखने लगे। दूत चला गया। सम्राट् उठकर खड़े हो गये। वे सयोगिता से बोले- "मैं अभी जाकर दरवार लगाता हूँ । नीच गोरी तुझे ऐसा पाठ पढ़ाऊँगा कि तू जिन्दगी भर याद करेगा। तूने मुझसे वादा किया था कि अब हिन्दुस्तान कभी नहीं आऊँगा । तूने विश्वसघात किया। इसका दण्ड तुझे दूंगा।" सम्राट ने उसी समय जाकर दरबार लगाया। उसमें यह मन्त्रणा होने लगी कि गौरी को आगे बढ़ने न दिया जाये। उसे रास्ते में ही रोककर टक्कर ली जाये। ठीक तभी एक गुप्तचर ने यह बतलाया कि राजा जयचन्द ने मुहम्मद गौरी को धुलाया है । उन्हीं के निमन्त्रण पर सुलतान गजनी से यहाँ आया है। अभी वह गुप्तचर जा भी नही पाया था कि एक और जासूस या गया। वह बतलाने लगा कि राजा जयचन्द की पचास हजार सेना गौरी की सहायता के लिए तैयार है। वह कन्नौज से चल चुकी है और पंजाब की ओर बढ़ रही है। अब पृथ्वीराज गुस्से से पागल हो उठे। वे अपने बहनोई राणा समरसिंह से बोले-"जीजाजी, आप एक लाख फौज लेकर जाइये । फन्नौज की सेना को आगे मत बढ़ने दीजिए। उसका रास्ते में ही सफाया कर दीजिए।" इसके बाद पृथ्वीराज ने चामुण्डराय से कहा-"तुम तीन लाख फौज लेकर पंजाब की ओर बढ़ो, चामुण्डराय । मैं भी तुम्हारे पीछे आता हूँ। कुछ राजाओ की सेनायें हमारी महायता के लिए आ गई हैं।" चन्द्र कवि सम्राट के साथ था । वह हमेशा साथ ही देना । छाया की तरह सम्राट का साप कभी नही छोड़ता। रायमल और जोधमल भी
५७
युद्ध की तैयारी करने लगे।
राजधानी में हलचल मच गई। जिसे देखो, वही कह रहा थाकि
'मुहम्मद गौरी ने देश पर आक्रमण कर दिया है। इस बार उस यवन को
“कन्नौज के राजा जयचन्द ने बुलाया है।
घर का भेदी
"सूर्यसिंह !"
"जी, महाराज
।"
"गौरी की सेना पंजाव के निकट आ गई है।"
"हां, राजन, दूत द्वारा यही समाचार मिला है।"
"तुम्हे गौरी के पास जाना होगा।"
"क्यों ?"
"गौरी से जाकर कही कि कन्लीज से पचास हजार सिपाही लेकर मैं
स्वयं आ रहा हूँ।"
"जी।"
"और सुनो।"
"क्या?"
"तुम गौरी से मिलकर सीवे अपनी मेना मे मेरे पास आ जाना।"
"यही करूंगा, महाराज ।"
"जत्दी आना, सूर्यसिंह । मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा।"
"जो आज्ञा, महाराज ।"
कहकर सूर्यसिंह जाने की तैयारी करने लगा।
सूर्यसिंह के जाने के बाद राजा जयचन्द स्वयं सेना का संगठन करने
लगे । उन्होने कन्नौज से कुंच कर दिया।
इधर जयचन्द की सेना गौरी के सहयोग के लिये जागे वद रही थी
और उधर सूर्यसिंह मुहम्मद गौरी के खेमे में पहुँच गया।
सिंधु नदी के उस पार गौरी की सेना ने पड़ाव डाला था। यवन
सम्राट् अपने शिविर में बैठा था । उसने सूर्यसिंह को देखा, तो प्रसन्नता से
खिल उठा और मगन होकर व्यस्त स्वर मे कहने लगा--"
-"कहो, कैसे आये
कन्नौज फेसिपहसालार ?"
हूँ, सकार -
"आपकी ही सेवा में हाजिर हुला
"कहो।"
"हमारे राजा जयचन्द खुद पचास हमार की बोली
पड़े हैं। वे जल्दी ही आपके पास आ जायेंगे।"
"इस खुशखबरी के लिए तुम्हें मुबारकबाद देता हूँ, सिपहसालार।"
"वम में आपको यही बतलाने आया था।"
"ठीक है, सिपहसालार ! और कहो दुश्मन का क्या हाल है ?"
"एका लाख फौज सिंधु नदी के उस पार आपकी सेना से दफार लेने
के लिये पड़ी है।"
"कोई परवाह नहीं है । मैं जंग के लिये पूरी तरह तैयार हूँ . अब तुम
कन्नौज जाओगे, मिपहसालार?"
"नहीं।"
"फिर?"
"हमारे राजा जय वन्द फौज लेकर आ रहे है। मैं उन्ही के पास
जाऊँगा।"
"वहुत ठीक।"
गौरी ने इत्मीनान के साथ यह कहा और सूर्यसिंह वहाँ से चल दिया।
अभी सूर्यसिंह मुहम्मद गौरी के खेमे से बाहर निकला ही था कि
पीछे से किसी ने धक्का देकर उसे गिरा दिया ।
वह भरभराकर गिर पड़ा और आततायी की ओर घूमकर देखने
लगा। जोधमल सूर्यसिंह को बन्दी बनाने का उपक्रम कर रहा था।
"जोधमल, तुम ?"
"हाँ, गहार, मैं । ठहर, तुझे अभी बांधकर सम्राट चौहान के सामने
ले चलता हूँ। तू देश का दुश्मन है।"
सूर्यसिंह जल्दी से उठकर खड़ा हो गया। उसके मुंह से निकता-
"आस्तीन के सांप, तू दुश्मन से जाकर मिल गया। इसका मजा तुझे अभी
चखाता हूँ। ले, संभाल मेरा वार ।"
यह कहने के साथ सूर्यसिंह ने जैसे ही अपनी तलवार म्यान से बाहर
निकाली, ठीक तभी रायमल ने उसपर अपना प्रहार कर दिया। वे दांत
"
घर का भेदी
"सूर्यसिंह !
"जी, महाराज।"
"गोरी की सेना पंजाव के निकट आ गई है।"
"हाँ, राजन, दूत द्वारा यही समाचार मिला है।"
"तुम्हें गौरी के पास जाना होगा।"
"क्यों ?"
"गौरी से जाकर कही कि कन्नौज से पचास हगार सिपाही लेकर मैं
स्वय आ रहा हूँ।"
जी।"
"और सुनो।"
"क्या?"
"तुम गौरी से मिलकर सीधे अपनी सेना में मेरे पास आ जाना।"
"यही करूँगा, महाराज ।"
"जल्दी आना, सूर्यसिंह । मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा।"
"जो आज्ञा, महाराज ।"
कहकर सूर्य सिंह जाने की तैयारी करने लगा।
सूर्यसिंह के जाने के बाद राजा जयचन्द स्वयं सेना का संगठन करने
लगे। उन्होने कन्नौज से कंच कर दिया।
इधर जयचन्द की सेना गौरी के सहयोग के लिये मागे वढ रही थी
और उधर सूर्यसिंह मुहम्मद गौरी के पेमे मे पहुँच गया।
सिंधु नदी के उस पार गौरी की मेना ने पडाय डाला था। यवन
सम्राट अपने शिविर मे बैठा था। उसने सूर्यसिंह को देखा, तो प्रसन्नता से
खिल उठा और मगन होकर व्यस्त स्वर मे कहने लगा--
कन्नौज फेसिपहमालार?"
--"कहो, कैसे आये
"आपकी ही सेवा में हाजिर हुना हूँ, सखारा
--
"हमारे राजा जयचन्द खुद पचास हेपर
पड़े हैं। वे जल्दी ही आपके पास आ जायेंगे।"
"इस खुशखबरी के लिए तुम्हें मुबारकयाद देता हूँ, सिपहसालार।
"वम में आपको यही बतलाने आया था।"
"ठीक है, सिपहसालार ! और कहो दुश्मन का क्या हाल है ?"
"एक लाख फौज सिंधु नदी के उस पार आपकी सेना से टक्कर लेने
के लिये पड़ी है।"
"कोई परवाह नहीं है। मैं जंग के लिये पूरी तरह तैयार हूँ • अब तुम
कन्नौज जाओग, भिपहसालार?"
"नहीं।"
"फिर?"
"हमारे राजा जयचन्द फौज लेकर पा रहे हैं। मैं उन्ही के पास
जाऊँगा।"
"वहुत टोक।"
गौरी ने इत्मीनान के साथ यह कहा और सूर्यसिंह वहाँ गे चल दिया।
अभी सूर्यसिंह मुहम्मद गौरी के खेमे
वाहर निकला ही था कि
पीछे से किसी ने धक्का देकर उसे गिरा दिया।
वह भरभराकर गिर पड़ा और आततायी की और धूमकर देखने
लगा। जोधमल सूर्यसिंह को बन्दी बनाने का उपक्रम कर रहा था।
"जोधमल, तुम?"
"हाँ, गद्दार, मैं। ठहर, तुझे अभी बांधकर सम्राट चौहान के सामने
ले चलता हूँ। तू देश का दुश्मन है।"
सूर्यसिंह जल्दी से उठकर खड़ा हो गया। उसके मुंह से निकता-
"आस्तीन के साँप, तू दुश्मन से जाकर मिल गया। इसका मजा तुझे अभी
चखाता हूँ। ले, संभाल मेरा वार ।"
यह कहने के साथ सूर्यसिंह ने जैसे ही अपनी तलवार म्यान से बाहर
निकाली, ठीक सभी रायमल ने उसपर अपना प्रहार कर दिया | देत
पीसकर चिल्लाये-"तू घर का भेदी है, मूसिंह । मैं तुझे जिन्दा नही छोडूंगा।" सूर्यसिंह आहत होकर गिर पड़ा। वह अभी संभल भी नही पाया था कि जोधमल उसकी छाती पर चढ बैठा । उसने उमकी मुश्क बाँध ली समय आधी रात से अधिक हो चुका था । गौरी के पहरेदारों ने दोनो का सामना किया, लेकिन जोधमल तथा रायमल ने सबको मौत के घाट उतार दिया। वे बन्दी सूर्यसिंह को घोड़े पर डालकर सम्राट के पास ले । चले। मम्राट् पृथ्वीराज चौहान भी देहली से पंजाब के लिये फौज लेकर रवाना हो चुके थे। रायमल और जोधमल उधर ही भागे चले जा रहे थे। रास्ते में सम्राट् ने रात को पडाव किया । वही दोनो जाकर उनसे मिल गये । सम्राट् ने जब अपने सामने बन्दी सूर्यमिह को देखा और उसकी काली करतूतों का सब हाल सुना, तो आवेश से कांपने लगे । शिविर में मशाल की रोशनी हो रही थी। वे सूर्यसिंह की ओर देखकर बोले- "मूर्यसिंह ! मैं तुम्हें कभी क्षमा नहीं करूंगा । तुमने मेरे साथ ही नहीं, देश के साथ गद्दारी की है । वोलो, तुम्हे क्या दंड दूं?" "मृत्यु का दंड मुझे दीजिये, सम्राट्।" "हाँ ! तुम्हारे जैसे देशद्रोही का यही दण्ड है।" यह कहकर सम्नाट ने जोधमल की ओर देखा । वे क्रोध-भरे स्वर में बोले-"ले जाओ इस पापी को । इसे आधा जमीन में गाड दो। फिर कुत्ते छोड दो। वे इमै नोच-नोंचकर खायेंगे।" जोधमल सूर्यसिंह को खीचकर ले जाने लगा। तभी सूर्यसिंह जोर से चिल्लाया-"दया करो, सम्राट, ऐसी मौत मत दो।" "ले जाओ, जोधमल । इसे पकने दो।" जोधमल मिपाहियों के साथ मूर्यगिह को लेकर चला गया। रायमल सम्राट के पास बैठ गये। उनका कहना था कि सर्वरा होते ही मुहम्मद गौरी की सेना सिंधु नदी को पार करेगी। ठीक तभी हमारे उर.पर टूट पड़ेंगे। राजा समरसिंह पूरी तरह सजग हैं और वे मौके की प्रतीक्षा कर रहे है। पृथ्वीराज ने एक दीर्घ-उच्छवास ली। वे रायमल से कहने लगे- "कुछ राजाओं की सेना हमारी सहायता के लिए आ चुकी है। बाकी राजधानी में यह प्रबन्ध करके आया हूँ कि जो भी सेनाएँ आये। उन्हें इधर ही भेज दिया जाये।" "सवेरे हमें भी आगे बढ़ना है, चौहान । सिन्यु नदी पार करते ही युद्ध आरम्भ हो जायेगा । दुश्मन को आगे बढ़ने का मौका न दिया जाये । मेरी यही कोशिश है।" रायमल और पृथ्वीराज में देर तक बातें होती रही । कोई भी नही सोया । सभी की आँखो से नीद भाग गई थी।
युद्ध जैसे ही गौरी की सेना सिन्यु नदी को पार करने लगी, राजपूत सैनिक तलवारें वजाने लगे। दोनों पक्षों में खूब घमासान युद्ध होने लगा। गौरी की सेना दो लाख थी और राजा समरसिंह के साथ केवल एक लाख ही सैनिक थे। भारतीय सिपाही अपनी जान हथेली पर रखकर लड़ रहे थे, फिर भी गौरी पी मेना आगे वढी और बढती ही चली गई। अभी सम्राट सीमेना दूर थी। तराइन के मैदान में जहां पहने युद्ध हुआ था, वही दोनों सेनाएँ आमने सामने आकर डट गई। भय सम्राट भी आ गये थे। दोनो पक्षों में तलवार वज रही थी। तीर छूटते; और भाले चलते। तो आप उगल रही थी। सम्राट पृथ्वीराज पा सामना अचानक जयचन्द से हो गया । वे उन्हें ललकार कर बोले-जामो जयचन्द, मैं पहते तुम्हें ही त के घाट उतार दूं। तुम कितने नीच हो। तुमने देश में यवन को बुलाया है। तुम्हें शर्म नहीं आती?" "यमंतुझे लानी चाहिए, नीय चौहान ! मेरी बेटी का अपहरण कर ले गया। मेरा हक छीनार भारत राम्राट् बन बैठा । आज तुषे रण-क्षेत्र में ने मुलाया, तो मेरा नाम जयचन्द नहीं ।" दोनों हाथी पर थे । पृथ्वीराग ने होने से तीर चलाया। वह जयचन्द की जनपटी यो छूता हुआ निकल गया । जयचन्द ने तीर का जवाब तलवार से दिया । राने नौहान पर दाणही वार कर दिया। पृथ्वीराज ने जयचन्द का दार रोका । उन्होंने अपनी दाल अड़ा दी। जयनन्द की वार टूट गई। अय पृथ्वीराज ने हाथी को लोहे पी जंगीर पकड़ा दी कि यह उसे घुमाये और जयचन्द को उसमें लपेटकर हौदे से नीचे गिरा दे। जयचन्द ने यह देखा तो वह जल्दी से नीचे उतरा और रण-क्षेत्र से भाग गया। मुहम्द गौरी घोड़े पर सवार था। वह ओजपूर्ण भापण देकर अपने सिपाहियों में जोश भर रहा था । उसका कहना था कि काफिरों को जान से मार दो। हिन्दू काफिर हैं। जिसने भी जंग में अपनी पीठ दिखलाई, उसका सिर कलम कर लिया आयेगा। यवन सैनिकों में उत्साह आ गया। पूरे जोरा के साथ लड़ने लगे। गौरी अब भी चिल्ला रहा था—यह तड़ाई दो देशों की नहीं, दो मजहबों की है । इस्लाम को जिन्दा रखो । काफिर हिन्दुओ को कुचल दो। अब हिन्दुस्तान में मेरी वादशाहत होगी।" ठीक इसी तरह गौरी का प्रधान सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक भी सैनिको में जोश भर रहा था। उसका कहना था कि जब यह जग जीत लोगे तो तुम्हारी तलव दुगनी कर दी जायेगी। तुम हिन्दुस्तान फतह परने आये हो । तुम्हें पीछे कदम नहीं हटाना है । युद्ध पूरे पैमाने के साथ हो रहा था। दोनों ओर के मारू बाजे बजते । तोपों के गोले घाय-पाय करके छुटते । तीर सनसनाते । भाते नल रहे थे । तलवारें रक्त-स्नान कर रही थी। तराइन का मैदान सून से लाल हो गया। लामों पर लारों विधी थीं। पायल चिल्लाते। ये पीडा ने कराहते। ये पानी मांगते । मगर कोई किसी को नहीं मुनता। लड़ाई पूव बनानान हो रही थी। राजपूत भैनिकों ने नुहम्मद गौरी वीमेना गाजर-मूली की तरह पाट दी। वह एर-तिहाई साफ हो चुकी थी। मीनिए गोरी की चिन्ता बड़ी। पृथ्वीराज का होमला बढ़ गया। उनकी माता के लिए दुध देगी राजाओं की सेनाएं और आ गई थी। मम्राट ने भी अपना हाथी रणभूमि में घुमाया। ये रह रहे थे-- "सैनिकों, यह युद्ध आत्मरक्षा का नहीं, देश-रक्षा का है। देश को गुलाम होने से बचाओ, इस पवित्र भूमि से यवनों को भगा दो। जो इस लड़ाई में विजय प्राप्त करेगा, उसका वेतन चौगुना बढ़ा दिया जायेगा।" राजपूत सिपाही जान हथेली पर लेकर युद्ध कर रहे थे। सांझ होने लगी। सूर्य अस्ताचल की ओर चला गया। युद्ध ने विधाम लिया। दोनों सेनाएँ अपने-अपने शिविर मे लौट गई।
महायुद्ध दूसरे दिन सवेरा होते ही युद्ध फिर आरम्भ हो गया। पृथ्वीराज ने अपने सैनिको से कहा-"आज भारतवर्ष के भाग्य का फैसला होना है। अभी तक यहाँ पर हिन्दू राज्य रहा। इस भूमि पर मुमलमान शासन करें, यवन यहाँ का सम्राट् बने, ऐसा नहीं होगा, कभी नहीं होगा।" आज दोनो सेनाएं जी-जान से लड़ रही थी। पृथ्वीराज सेना के बीच मे थे। सहमा उनके पास एक सैनिक भागता हुआ आया। वह कह रहा "गजब हो गया, सम्राट्, बहुत बड़ा गजब हो गया।" "क्या?" "सरकार, जोधमलजी मार दिये गमे।" "हाँ, महाराज । कुतुबुद्दीन ऐबक ने धोखे से पीछे जोधमल की पीठ में तलवार घुसेड़ दी।" "यह बहुत बुरा हुआ, सैनिक।" यह कहकर पृथ्वीराज दोनों हाथों से युद्ध करने लगे। ऐसे में ही एक सैनिक भागता हुआ सम्राट के पास आया । वह जोर से चिल्लाया-'सम्राट, कन्नौज के रायमल भी मारे गये।" "ऐ! बालाजी की हत्या किसने की?" "महाराज मुहम्मद गौरी ने रायमल को मार डाला।" "ओह ! यह मैं क्या सुन रहा हूँ ! मेरे दो सेनापति मारे गये !" अब पृथ्वीराज चौहान की आँखों मे खून उतर पाया । युद्ध पूरी गते के माय हो रहा था। सवेरे से दोपहर हो गई किसी भी पक्ष ने हार नहीं मानी। सम्राट का प्रधान सेनापति चामुण्डराय बिलखता हुआ अपने महाराज के सामने आया। उसके मुंह से निकल गमा-मन ही नहीं, .
महा अनर्थ हो गया, महाराज ! राजा समरसिंह भी मारे गये।" "ऐ ! जीजाजी भी वीरगति को प्राप्त हो गये ! उन्हें किसने मारा, चामुण्डराय ? मुझे उसका नाम बतलाओ?" "महाराज। समरसिंह को कई यवन सैनिकों ने धोखा देकर घर लिया। सबने मिलकर उनकी हत्या कर दी। यह न्याय का युद्ध नही, अनीति का संग्राम हो रहा है।" अब पृथ्वीराज अधाधुंध युद्ध करने लगे। उनके सामने मुहम्मद गौरी आया। उसने आते ही सम्राट् पर वाण चला दिया। चामुण्डराय ने यह देखा, तो वह गौरी पर शेर की तरह टूट पड़ा। उसके मुंह से निकला--"नीच यवन, अधर्म का युद्ध कर रहा है । न्याय से लड । तू वेईमान है । तेरी नीयत खराब है।" "और तू ईमानदार है, काफिर ?" यह कहने के साथ मुहम्मद गौरी ने एक तीर छोड़ा। वह सीधा आकर चामुण्डराय के सीने पर लगा। चामुण्डराय घोड़े से नीचे गिर पड़ा। गिरते ही उसकी मृत्यु हो गई। पृथ्वीराज ने अब अच्छी तरह समझ लिया कि वे बिलकुल अकेले रह गये हैं। उनके चारों सेनापति मारे गये। उनकी सेना बुरी तरह कट रही थी। जंग पूरी रफ्तार से हो रही थी। वे मुहम्मद गौरी की और बढ़े और उमे ललकारकर बोले-"अब पता चला, गौरी, कि तुम कितने झूठे और दगाबाज हो। धोखा देना, अपना मतलब हासिल करना--यह इन्मानियत नहीं, शराफत नहीं, बहुत ही नीच काम है।" "पृथ्वीराज, अब मौत के लिए तैयार हो जाओ। मैं मुहम्मद गोरी नही, तुम्हारी मौत हूँ।" यह पहने के साथ गौरी ने सम्राट पर तीर छोड़ दिया। वे उस वार को बचा ले गये। उन्होने भी अपना बाण धनुष पर पढ़ाया, लेकिन दुर्भाग्य ! धनुष टूट गया। उसके दो टुकड़े हो गये" गौरी खूब जोर से हंसा । ऐसे में ही सम्राट ने अपनी मलवार निकार.
६७ ली। वे गौरी पर वार करना ही चाहते ही थे कि तब तक कुतुनुद्दीन ऐबक के इशारे पर चालीस यवन सैनिकों ने सम्राट को घेर लिया। सबने मिलकर उन्हे हाथी से नीचे गिरा दिया। सम्राट् चिल्लाये-"यह क्या वेइन्साफी है, गौरी? यह अपर्म है । यह अन्याय है।" "कुछ भी कहो, चौहान। अब तुम हमारे कंदी हो और हिन्दुस्तान हमारा है। सिपाहियों, पृथ्वीराज चौहान को मुश्क बांध लो। इस कैदी को मेरे खेमे में भेज दो। ऐलान कर दो कि अब जंग बन्द कर दी जाए। पृथ्वीरार कैद हो गये । उनकी हार हो गई।" हिन्दू सैनिक जो बचे थे, वे हथियार डाल-डालकर चल दिये। राज- धानी में शोक की लहर दौड़ गई। घर-घर में आर्तवाद होने लगा। लोग कह रहे थे कि यह देश का दुर्भाग्य है । आज से भारत का हिन्दू राज्य समाप्त हो गया। विदेशी यवन आ गया। यह धर्म का दुश्मन है । यह भारत में इस्लाम फैलायेगा। यह लोगों को जवरदस्ती मुसलमान बनायेगा। रानी अगमा ने कटार मारकर आत्महत्या कर ली। संयोगिता खड़े से गिर पड़ी। फिर वह उठकर सड़ी नहीं हो पाई । उसकी हृदय गति रुक गई थी। इस तरह सम्राट पृथ्वीराज चौहान का सर्वनाश हो गया। वे लोहे की जंजीरों से जकड़े थे और दुश्मन के खेमे मे बन्दी बने बैठे थे। उनका अन्त: करण कह रहा था कि किमी तरह मौत आ जाती, तो उन्हें इस बन्धन से छुटकारा मिल जाता। किन्तु भाग्यहीनों को मांगने से मौत कभी नहीं मिलती। वह दूर खड़ी मुस्करा रही थी और सम्राट् दुःखी थे।
भारत में इस्लाम मुहम्मद गौरी ने सबसे पहला काम यह किया कि उसने बन्दी सम्राट पृथ्वीराज चौहान को अपने विश्वासपात्र सैनिकों के साथ गजनी भेज दिण। उसकी सख्त हिदायत थी कि रास्ते में चौहान पर पहरा बहुत कड़ा रखा जाये । इसलिए पांच हजार सैनिक साथ भेजे गये। पृथ्वीराज के लिए मुहम्मद गौरी ने यह आदेश दिया था कि चौहान को जाते ही कंदखाने में डाल दिया जाये। फिर जब वह गजनी आपेगा, तो उसकी किस्मत का फैसला करेगा। अव मुहम्मद गौरी निश्चिन्त हो गया था । वह तराइन के मैदान से देहली की ओर चल दिया। उसने आते ही राजधानी देहली पर अपना पूर्ण अधिकार कर लिया। हिन्दू राज्य के सभी चिह्न मिटाये जाने लगे। मन्दिर टूटे । उनके स्थान पर मस्जिदें बनने लगी। मुहम्मद गौरी लगभग एक महीने तक देहली मे रहा। उसने देहली का तरुत कुतुबुद्दीन ऐवक को सौंप दिया। उसका कहना था कि हिन्दुस्तान एक बड़ा मुल्क है । इस्लाम फैलाओ। मूर्ति पूजा बन्द करवाओ। काफिर हिन्दुओ को मुसलमान बनाओ। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने स्वामी की आज्ञा का पालन किया। उसने गुलाम वंश की नीव डाली और उसका पहला वादशाह बना। मुहम्मद गौरी ने चलते ममय कुतुबुद्दीन ऐबक को यह समझाया था कि वह अपने राज्य का विस्तार करे। हिन्दुस्तान में उसे अपनी ताकत खूब वढा लेनी चाहिए। गौरी के जाने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने राज्य-विस्तार की योजना बनाई उमने पडोसी छोटे-छोटे राज्यों को हडपना शुरू कर दिया। पृथ्वीराज की पुत्री वेला का सतखण्डा पूरे देश में मशहूर था। उसके 7 लिए कहा जाता कि राजकुमारी वेला रोज रात को सतखण्डे पर चढती। वहाँ से वह महोवे का जल रहा दीपक देखती। महोवे में उसकी ससुराल थी। कुतुबुद्दीन ऐबक ने वेला के सतखण्डे को अपने अधिकार में ले लिया। उसने उमपर अरबी भाषा में कुरान की आयतें लिखवाई। उसका नाम कुतुबमीनार रखा। यह वही कुतुब मीनार है जिसके लिए कहा जाता है कि इसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था। इस कुतुब मीनार को देखने देश के कोने-कोने से लोग आते। विदेशी भी कुतुब मीनार पहुंचते और उसका चित्र लेते। इस तरह पृथ्वीराज के वंश का पूरी तरह अन्त हो गया था। भारत मे इस्लाम आ गया। ये इस्लामी मूर्ति पूजा के विरोधी थे। यह जयचन्द की देन थी। अगर वह देशद्रोही भारत में पैदा न हुआ होता, तो हमारा देश कभी गुलाम नहीं होता। मुहम्मद गौरी खुशी-खुशी गजनी वापस जा रहा था। देहली के राजकोप में उमे बहुत बड़ा खजाना मिला था। उसने आधे से ज्यादा खजाना ऊँटों पर लदवाया। उसे गजनी ले जा रहा था। गौरी ने कुतुबुद्दीन को यह भी समझाया था कि हिन्दुओं पर जजिया रागा दो। मभी पर कर बढ़ा दो। इससे राज्य की आमदनी बहुत अच्छी होने लगेगी। इधर गौरी जा रहा था और उधर कुतुबुद्दीन ऐबक भारत में अपना ताण्डव नृत्य कर रहा था। उसके पास ताकत थी। उसकी फौज बहुत बड़ी थी। उमने ऐलान कर रखा था कि जो भी हिन्दू मेरे खिलाफ सिर उठाये, उसका सिर कुचलो ही नहीं, घड से अलग कर दो। जो कर देने में आनाकानी करे, उसे जिन्दा जमीन मे गाड दो। देश में प्राहि-त्राहि मच गई । जनता पृथ्वीराज को याद करके आँखों में आंसू भर लाती । वह जयचन्द को बुरा-भला कहने लगती। देश के सभी राज्य कुतुबुद्दीन ऐवक से पूरी तरह अमन्तुष्ट थे।, ७० इस्लाम किसी को भी प्यारा नहीं था। सभी उसका विरोध कर रहे थे। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आयेगा. जर भारतवर्ष परतन्त्र हो जायेगा। वहां यवन आयेंगे। वे इस पवित्र देश को गुलामी की जंजीरो से जकड देंगे। यह देश का बहुत बड़ा दुमाम्यि था।
पृथ्वीराज की आँखें
मुहम्मद गौरी गजनी आ गया। वहां खूब खुशियां मनाई गई।
कई दिन तक गजनी शहर मे रात को रोगनी होती रही। जशन मनाया
गया। खैरात बंटी। गौरी के लिए यह बड़े गर्व की बात थी, जो छोटे से
गजनी राज्य का स्वामी होने पर आज वह एक बहुत बड़े देश का स्वामी
था। भारतवर्ष उसका गुलाम था ।
तीन दिन बाद गौरी ने अपना दरवार लगाया। उसमे बन्दी
पृथ्वीराज को पेश किया गया ।
गौरी ने पृथ्वीराज की ओर देखा। वह मुस्कराया। उसके मुंह से
निकला--"कहो, चौहान, क्या हाल है ?"
"मुझसे हाल क्या पूछते हो, गौरी ? कैदी का भी कोई हाल होता
"बोलो, तुम अपने लिए क्या फैसला चाहते हो, चौहान ?"
"कैसा फैसला? मैंने कोई अपराध किया है वया?"
"तुम हार गये हो, चौहान । तुम्हारी मौत और तुम्हारी जिन्दगी इस
समय मेरे हाथ मे है।"
"मैंने तुम्हारे साथ जैसा व्यवहार किया था, गौरी, तुम भी मेरे
साथ वही व्यवहार करो। इसमें पूछते क्या हो?"
"तो मैं तुम्हें आजाद कर दूं, चौहान ?"
"हो, होना तो यही चाहिए।"
"नही, चौहान । नही। गौरी इतना वेवकूफ नहीं है कि तुम्हें आजाद
कर दे।"
"तो क्या मैं बेवकूफ था ?"
"हो, चौहान । तुम नासमझ थे 1 हाय आये दुश्मन को छोड़ना बहुत
बड़ी गलती है । तुमने मुझे छोड दिया। उसका नतीजा तुम्हारे सामने है।
मैं ऐसी भूल कभी नहीं कहूँगा । इसीलिए तुम्हें गजनी लाया हूं।"
७२ "तो फिर मेरे लिए क्या सोचा है, गौरी!" "तुम्हारे लिए ?" "हाँ, मेरे लिए।" "चौहान, तुम्हारी आँखें बहुत बड़ी है । मैं इन आँखों को नहीं देख सकता । यह फोड़ी जायेंगी। मेरे दिल को राहत तभी मिलेगी, जब तुम अन्धे हो जाओगे।" "मगर यह इन्साफ नहीं है, गौरी।" "मैं कुछ नहीं जानता। तुम्हारी आँखें अभी फोड़ी जायेंगी। यह मेरा हुक्म है।" यह कहने के साथ मुहम्मद गौरी ने एक जल्लाद को ओर देखा। उसने उसे आदेश दिया--"लोहे की दो सलाखें गरम की जायें। उनसे चौहान की आंखें फोड़ो। यह काम अभी और इसी वक्त होगा।" दरबार मे उस हुक्म के सुनते ही सन्नाटा छाकर रह गया । पृथ्वीराज शान्त खड़े थे। जल्लाद लोहे की सलाखे गरम करने चला गया। थोड़ी देर बाद जल्लाद दो चिमटों मे गरम सलाखें पकडकर ले आया। उसने पृथ्वीराज की दोनों आँखों में गरम सलाखें घुसेड दी। तभी चौहान जोर से चीखे। वे विवश थे। विलविलाकर रह गये। उनकी आंखें फूट गई और उनमें खून की धार बहने लगी। दरबारियों ने यह दृश्य देखा, तो सभी के रोंगटे खड़े हो गये। बहुत ही रोमांचकारी दृश्य था। जब सम्राट् चौहान की आंखें फूट गई, तो गौरी ने सैनिको को आदेश दिया कि वे कैदी चौहान को ले जाकर कारागार में डाल दें। उस दिन दरवार की कार्यवाही फिर इसी जगह पर समाप्त हो गई। गजनी में घर-घर यह चर्चा चलने लगी कि गौरी ने पृथ्वीराज की आखें फोड़ दी हैं । उसने यह अच्छा नहीं किया। इन्सान को इन्सान के साथ इन्सानियत का व्यवहार करना चाहिए । सम्राट पृथ्वीराज चौहान बन्दीगृह में पड़े अपने भाग्य पर मन-ही-मन ‘रो रहे थे। वे मौत को निमन्त्रण देते । जिन्दगी से ऊब गये थे। जो भारत जैसे एक बहुत बड़े भू-भाग का स्वामी था, वह आज अनाथ की तरह अकेला दुश्मन के कैदखाने में पड़ा था। यह था घर की फट का परिणाम । अतीत के चलचित्र सम्राट की आँखो के आगे सजीव होकर चल रहे थे। उन्हें राजा समरसिंह याद आये, जिन्होंने वीरगति पाई थी। नई रानी संयोगिता याद आई, जिसके कारण ही जय चन्द से विरोध बना। सम्राट् सब कुछ भूल जाना चाहते थे। मगर स्मृतियां मानती नहीं थी । वे एक-एक करके उनके आगे आ रही थी। सम्राट् को चन्द्र कवि की याद आई। उन्हे भली-भौति मालूम था कि चन्द्र कवि युद्ध में मारा नहीं गया। उसपर महल की रक्षा का 'भार था । उसका क्या हुआ? इस समय वह कहां है ? पीढ़ा ऐसी अनहनीय थी कि सम्राट को एक क्षण के लिए भी चैन नही पड़ता था। बड़ी मुश्किल से उन्हें नीद आई। सपने में उन्होंने देखा कि राजधानी देहली मे आग लग गई है। उनका महल जल रहा है । मम्राट् ची वें सुनते। पुपर उनके कानों मे गूंजती। ऐमे में ही उन्होने देखा कि चन्द्र पदि आ गया है । वह उन्हें आग से बाहर निकाल रहा है । उसका पहना है कि हम साथ ही जियेंगे और साथ ही मरेंगे। हमारा साथ चोली और दामन का है । हम दोनों जिगरी दोस्त है । सपना चलता रहा। सम्राट् बहुत खुश थे। उन्हें अपने मित्र चन्द्र कवि पर गर्व हो रहा था। सहसा सम्राट् की नीद टूट गई। वहाँ अन्धेरा था। जिन्दगी का अन्धेरा। हमेशा-हमेशा के लिए अन्धेरा। आंखों की पीडा अब भी सही नही जा रही थी। वे धीरे से कराहे और उनके मुंह से निराशा-भरा स्वर निकल गया-~- --"दुनिया के मालिक! अब तू, मुझे उठा ले तो कुछ अच्छा हो।" सवेरा हो रहा था। मस्जिद की अजान चौहान के कानों मे पड़ी। थे बुरी तरह विचलित हो उठे।
।
देशद्रोही का अन्त
राजा जयचन्द अपने दरबार मे बैठे थे। वे बहुत दुखी थे । महामन्त्री
से एक दीर्घ-उच्छवास लेकर कहने लगे-"महामन्त्री ! कोई नहीं
जानता कि किम समय क्या हो जायेगा । सेनापति सूर्यसिंह का कितना
बुरा अन्त हुआ । जोधमल ताव मे यहाँ में चला गया। वह भी युद्ध में
मारा गया। चाचा रायमल की भी रणभूमि में मृत्यु हो गई ।"
"महाराज ! घर की फूट का परिणाम कभी अच्छा नही होता।"
"मुझे इस बात की प्रसन्तना है कि सम्राट् पृथ्वीराज चौहान को
गौरी अपने साथ बन्दी बनाकर
"कुछ भी हो, महाराज, यह कहना पड़ेगा कि देश गुलाम हो गया।
भारत में यवन राज्य आ गया । ऐसा नहीं होना चाहिये था।"
इसपर जयचन्द कुछ उत्तर दें, ठीक तभी एक दूत ने आकर समा-
चार सुनाया कि मुहम्मद गौरी ने सम्राट् पृथ्वीराज की औरों फोड़ दी
गया।"
"यह बहुत अच्छा हुआ।"
कहकर जयचन्द मुस्कराये । वे महामन्त्री की ओर उन्मुख हुए और
उनसे कहने लगे [---"अब मैं गजनी जाऊँगा।"
"क्यो?"
"गौरी ने वचन दिया था कि वह देहली का मिहारान मुझे देगा।"
"महाराज, मह सपना भूल जाइये।"
"यह कैसे हो सकता है, महामन्त्री ?"
"मेरी राप तो यही है कि आप गजनी मन जाइये।"
"मैं अवश्य जाऊंगा।"
"आपकी इच्छा।"
कहकर महामन्त्री ने एक लम्बी सांस ली।
मजिल पर मजिल तय करते हुए जयचन्द..गजन पहुंच
राजा जयचन्द गजनी के लिये सर्वाना हो गये। रास्ते में सोचते
जा रहे थे कि जो सिंहासन मेरे नालों ने मुझे नहीं दियो, अब वह सहजशी
मुझे प्राप्त हो जायेगा। तकदीर झी को कहते हैं और भाग्य' इसी का
नाम है।
अविलम्ब गौरी के दरबार में पहुंचे। उनके मुंह से निकला-"आपको
बधाई है, गौरी। आपने सम्राट पृथ्वीराज चौहान पर विजय पाई ।"
"आपकी हमदर्दी का बहुत-बहुत शुक्रिया है, राजा साहब।"
"आपका इकवाल बुलन्द रहे, गौरी साहब।"
"कहिये, राजा साहब, कन्नौज से यहां तक आने की तकलीफ कैसे
की?"
"आपके पास आया हूं।"
"क्यों ?"
"आपने वचन दिया था कि जीत हासिल होने पर आप देहली का
सिंहासन मुझे देंगे।"
"आपको?
यह वहकर मुहम्मद गौरी खूब जोर से हँसा। वह जयचन्द से कहने
लगा--"आपकी वहादुरी जग के मैदान में मैंने अच्छी तरह देख ली।
बस अब आप जाइये।"
"हाँ ! आपको जाना पड़ेगा।"
"और आपका वादा?"
"कैसा वादा?"
"देहली का तख्त देने का ।"
"वह स्वाव भूल जाइये, राजा साहब ।"
"यह आप क्या कह रहे हैं ?"
"मैं सच वह रहा हूँ। जव तक मेरा तमाम नुकसान और जंग का
खचं पूरा नहीं हो जायेगा, तब तक देहली का तस्त किसी को भी नही
मिल सकता।"
७६
"आपके मुंह से ये बातें शोभा नहीं देती । आपको मालूम होना
चाहिये कि मेरे कारण ही आपकी जीत हुई और आप मुझं ही आँखें दिखा
रहे है।"
इसपर मुहम्मद गौरी कुछ नहीं बोला। वह अपने प्रमुख सेनापति
से कहने लगा-"राजा साहब को समझा दो, सिपहसालार।"
"जी हजूर ।"
कहकर सेनापति जयचन्द की ओर उन्मुख हुआ। वह शर्मिन्दा
करता हुआ जयचन्द से कहने लगा-"आप खुशी से जा सकते हैं, राजा
साहव । देहली का तस्त आपको नहीं मिलेगा।"
"क्या कहा ? तख्त मुझे नहीं मिलेगा।"
"नही, कभी नही।"
"क्यों?"
"आपका ईमान ठीक नहीं है ।"
"मेरा?"
"हां, आपका।"
"कैसे?"
"जब आप अपनी कोम और रिश्तेदार के न हुए, तो हमारे कैसे हो
सकते है ? आप पर यकीन करना खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना
"मेरेसाथ दगाबाजी?"
"जवान पर लगाम रखो, राजा साहब ।"
"मेरी जवान कोई नही बन्द कर सकता ।"
"मैं बन्द करूँगा तेरी जबान।"
यह कहने के साथ मुहम्मद गौरी मिहासन से कूद पड़ा।
वह जयचन्द के सामने आ गया और यांखें तरेरते
"चुपचाप यहाँ मे चले जाओ, राजा साह्न ।"
"मुझे मेरा हक चाहिए।"
•"वह नहीं मिलेगा।"
नदी?"
वोला-
"हां, नही।" "तो ले, नीच !" यह कहने के साथ जयचन्द ने अपनी तलवार निकाल ली। वे गौरी पर वार करना चाहते ही थे कि पीछे से सेनापति ने खंजर उनकी पीठ में भोंक दिया। राजा जयचन्द चीख मारकर गिर पड़े। कुछ देर तक वे छटपटाये; फिर उनकी जीवन-लीला समाप्त हो गई। "इग मुल्क के गहार की लारा को याहर ले जाकर फेंक दो।" मुहम्मद गौरी के इस आदेश का तरक्षण पालन किया गया। उसके बाद गौरी के दरबार मे यह चर्चा चलती रही कि हिन्दुस्तान के राजाओं में आपस मे फूट है। अगर उनमें एका होता, तो पृथ्वीराज पर फतह कभी नहीं मिल सकती थी। गौरी बहुत प्रसन्न था कि उसकी राह का कोटा जयचन्द भी अब इस दुनिया मे नही रहा । अब वह कन्नौज के राज्य को भी अपने राज्य में मिला लेगा। हिन्दुस्तान पर धीरे-धीरे उसका पूरा अधिकार हो जायेगा। इस तरह गोरी के हर्ष का पारावार न था।
चन्द्र कवि युद्ध में जिस समय सम्राट पृथ्वीराज चौहान को छल-बल से बदी बनाया गया, तब चन्द्र कवि दूरी पर युद्ध कर रहा था। उसने अपने दल के मफेद झंडे देखे तथा सैनिको को भागते पाया, तो फौरन ही समझ गया कि उसके सम्राट् की हार हो गई है। वह भागा-भागा वहां पहुंचा, जहां सम्राट का मोर्चा था । यहाँ जाते ही पता चला कि चौहान को गौरी ने वेईमानी से कैद कर लिया और अपने खेमे में भेज दिया है । उम ममय चन्द्र कवि ने गौरी के खेमे मे जाना उचित नहीं समझा। उमे भय था कि सम्राट के साथ उसे भी बन्दी बना लिया जायेगा। चन्द्र कवि ने दूरदर्शिता से काम लिया । उसका सिद्धात था कि जो भी काम करता, सबमे पहले उसका परिणाम सोच लेता । उसने देखा कि यवन की मैना आंधी और तूफान की तरह देहली की ओर वही चली जा रही है। इसीलिये वह भी देहली के लिये रवाना हो गया। चन्द्र कवि गुप्त रास्तों से देहली की ओर जा रहा था। यही कारण था कि उमे पहुँचने मे देर लगी । वहाँ जद यह पहुंचा, तो गौरी की मैना उमसे पहले ही पहुंच चुकी थी। गुप्त मूषों मे चन्द्र मावि को मालूम हुआ कि रानी अगमा ने आत्म- हत्या कर ली है। छोटी रानी संयोगिता ने भी अपने प्राण ६ दिये हैं। पजाने पर यवन का अधिकार हो गया है। रनवाग को गभी नारियाँ जोहर की आग में जल गई है। चन्द्र फपि गूब जोर मे रोया। वह देर तक रोता रहा। जमुना के पिनारे आया। कुछ देर तक वहाँ बैठा रहा। फिर एक और चल दिया। मोच रहा था कि अब उमे क्या परना चाहिए। उसके मित्र के प्राण माट में हैं । गौरी उसे गजनी ले गया है। एक महीने तक मद कवि इधर-उधर भटकता रहा । जब उसे मालूम ने गया कि गौरी गरनी के लिए रवाना हो गया है, तो वह भी पौर पर 1 सवार हुआ और गजनी की ओर चल दिया। जब चन्द्र कवि पजाव तक पहुंच गया, तो अचानक उसकी तबीयत खराब हो गई। उसने अपना परिचय किसी को भी नहीं दिया। एक किसान के घर मेहमान बना पड़ा रहा । वहीं उसने सुना । एक रात को किसान दम्पति आपस मे बातें कर रहे थे। किसान ने कहा -"तुमने कुछ सुना ?" "क्या?" "पृथ्वीराज चौहान को मुहम्मद गौरी ने यहाँ से ले जाकर कैद में डाल दिया।" "ऐं। यह तो बहुत बुरा हुआ। ।" "यही नहीं। उम जालिम ने हमारे वादशाह की ऑखें फोड़ दी। उसे अन्धा कर दिया।" "पृथ्वीराज ने गौरी के साथ नेकी की थी। अगर उसे छोड़ न दिया होता, तो आज यह नौबत क्यो आती ?" "पृथ्वीराज कैद में हैं । इसमे अच्छा तो यह होता कि वह दुष्ट यवन उनकी जान ले लेता।" चन्द्र कवि ने यह बातें सुनी । उसके कलेजे में हुक उठी । वह तिल- मिलाकर रह गया । अब उससे लेटा नहीं रहा गया। वह उठकर बैठ गया और गहरी चिन्ता मे डूबकर सोचने लगा। चन्द्र कवि के अन्त.करण से कहा-"तुम गजनी जाओ, चन्द्र।" "गजनी ?" "हो, गजनी।" "वहाँ जाकर मैं क्या करूँगा?" "तुम जाओ और गौरी से मिलो।" "मुझे देखते ही गौरी बन्दी बना लेगा।" "तुम कूटनीति से काम लो, चन्द्र कवि।" "कसी कूटनीति?" "गौरी से जाकर हंसकर मिलो। उसके आगे दोस्ती का हाथ बढ़ा दो। तुम कवि हो । तुम्हारा वह आदर करेगा।"
Co "लेकिन मुझे भविष्य पर भरोसा नहीं होता।" "तुम जाओ। भविष्य तुम्हारा साथ देगा।" चन्द्र कवि को अन्त करण की बातें बहुत अच्छी लगी। उसने मन-ही- मन निश्चय कर लिया कि सवेरा होते ही वह गजनी के लिए रवाना हो जायेगा। प्रभात की वेला मे जैसे ही सूरज की पहली किरण फूटी, चन्द्र कवि ने किसान दम्पति से विदा ली। उनका बहुन आभार प्रगट किया । फिर वहां से अपनी मंजिल की ओर चल दिया । उसे गजनी पहुँचने की बहुत ही जल्दी हो रही थी। दर्रा खैवर की घाटी से चन्द्र कवि गुजर रहा था । अभी गजनी दूर थी। मगर उसका अन्त करण कहता कि अगर उसके पंख होते, तो वह उड़कर गजनी च जाता। चन्द्र कवि चता जा रहा था। रात्रि मे उसने एक जगह पड़ाव किया। बुरी तरह थक गया था। इसीलिए वहां दो दिन ठहर गया। यह काबुल की सीमा थी । चन्द्र कवि अव अफगानिस्तान आ गया था। वहाँ उसने राहगीरो के मुंह से सुना कि कन्नौज के राजा जयचन्द गजनी गये थे । वे मुहम्मद गौरी से देहली का तख्त मांग रहे थे। उनकी गौरी से झडप हुई। दोनो का झगड़ा हो गया। राजा जयचन्द की हत्या कर दी गई । उनकी लाश दरवार से बाहर फेंक दी गई। चन्द्र कवि को बहुत खुशी हुई। उसके अन्त करण ने कहा--- "जयचन्द को अपने किये का परिणाम भली-भांति मिल गया । वह देश- द्रोही था, इसीलिए उसका बहुत बुरा अन्त हुआ। चन्द्र कवि आगे बढा । वह काबुल से गुजरा । अब गजनी करीब आ गई थी। चन्द्र कवि ने जय गजनी के ऊँचे-ऊँचे महल दूर से देखे, तो दुःखी हो. कर मोचने लगा कि यह वही गजनी है, जहाँ का महमूद गजनवी भारत लूटने आता या । उसको मरे दो सदियो भी नही बीती कि यह गौरी भारत का दुश्मन बनकर आ गया। हाय रे दुर्भाग्य ! सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत आज यवन का गुलाम बन गया है। ।
चन्द्र ऋवि और गौरी
चन्द्र कवि गजनी आ गया । वह गौरी के दरबार में पहुंचा और अपने
आने की सूचना दी।
गौरी ने जब सुना कि सम्राट् पृथ्वीराज चौहान का राजकवि तथा
अभिन्न मित्र चन्द्र कवि आया है, तो उसने फौरन ही हुक्म दिया-
"चन्द्र कवि को आदर के साथ दरवार में ले आओ।"
चन्द्र कवि ने आते ही गौरी को अभिवादन किया।
गौरी मुस्कराया। वह धीरे से बोला-"कहो, हिन्दुस्तान के शायर,
कैसे तकलीफ की?"
"आपकी सेवा में उपस्थिन हुआ हूँ गजनी सम्राट् ।"
"मेरे लाया क्या खिदमत है ?"
"आपकी मेहरवानी के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद । मैं...।"
कहते-कहते चन्द्र कवि रुक गया।
"तुम चुप क्यो हो गये, गायर?"
"कैसे कहूं?"
"जो कहना है, बेफिक्र होकर कहो, शायर । मेरी तरफ से तुम्हे पूरी
"मैं अपने मित्र चौहान से मिलने आया है।".
"लेकिन यह मुमकिन कैसे हो सकता है ?"
"चयों ?"
"पृथ्वीराज कैद मे है और वह अन्धा भी हो गया है।".
"मुना है । मुझे मालूम है।"
"फिर?"
"मैं एक बार अपने मित्र को देखने और उसने दो बातें करना चाहता
८२ "तुम्हारी यह ख्वाहिश जरूर पूरी होगी। मुझे सोचने का मौका दो।" यह कहकर गौरी ने एक दरबारी की और देखा और उससे कहने लगा-"ये हिन्दुस्तान के बहुत बड़े शायर हैं। इन्हें इज्जत के माथ ले जाओ और मेहमानखाने में ठहराओ।" चन्द्र कवि उस दरवारी के साथ चला गया । उसके बाद गौरी ने यह समस्या दरबारियों के सामने रखी कि चन्द्र कवि को पृथ्वीराज से मिलने दिया जाये या नहीं। सभी दरबारी अपना-अपना मत प्रगट करने लगे। किसी ने कुछ पहा और किसी ने कुछ । मगर गौरी की समझ में कुछ भी नहीं आया। वह सोचता ही रह गया और किसी भी नतीजे पर पहुँच नहीं पाया। दूसरे दिन दरवार फिर लगा। उममे चन्द्र कवि को बुलाया गया। उसे बैठने के लिए गौरी ने ऊँचा सिंहासन दिया। फिर बह सम्मान के साथ बोला--"कहिये, शायर साहब, आपको कोई तकलीफ तो नहीं हुई।" "हुजूर का इकबाल बुलन्द रहे। मैं बड़े आराम से रहा। कहिये आपने मेरे लिए क्या सोचा है ?" "मैंने अभी कुछ भी नहीं सोचा । यह जरूर चाहता हूँ कि तुम एक बार चौहान से मिल लो।" "तो अभी मिला दीजिए।" "अभी ?" "हां, अभी।" "शायर साहब, मापकी स्वाहिश पूरी होगी, मैंने सुना है और सारा हिन्दुस्तान जानता है कि तुम्हारा दोस्त चौहान आवाज पर तीर मारता है । मह कंसा कमाल है ! मैं भी इसे देखना चाहता हूं।" "हाय कंगन को आरसी क्या, गौरी साहब ? मेरा मित्र अन्धा हो गया है, उसे दिखाई नहीं पड़ता, लेरिन फिर भी शब्दवेधी वाण चलायेगा। उसका निशाना कभी चूक नहीं गकता। यह मेरी जिम्मेदारी है।" "तुम्हें इतना यकीन है चौहान पर?" "हाँ, मुझे पूरा विश्वास है।"
"तो फिर मैं इसका इन्तजाम करता हूँ । चौहान को अपना कमाल
भरे दरबार में दिखलाना होगा।"
"मैं कुछ कहना चाहता हूँ, गौरी साहब ?"
"क्या?"
"अगर सम्राट चौहान ने आपके कहने के मुताबिक निशाने पर तीर
मार दिया, तो आप उन्हे क्या इनाम देंगे?"
"मैं तुम्हारे दोस्त को जिन्दगी-भर के लिए आजाद कर दूंगा।
यह मेरी शतं है, मगर वह हिन्दुस्तान नहीं जा सकता। इसपर पावन्दी
रहेगी।"
"मुझे इसमे तसल्ती नही हुई गौरी साहव ।"
"तो और क्या चाहते हो, शायर साहब ?"
अभी चन्द्र कवि इतना ही कह पाया था कि गौरी बीच में बोल
उठा---
-"मैं चौहान के लिए अलग महल बनवा दूंगा ! तुम अपने दोस्त
के साथ उसी में रहना, शायर। हमारे खिदमतगार हमेशा तुम लोगो की
खिदमत में रहेगे।"
"आपकी मेहरबानी के लिए धन्यवाद, मगर मैं यह भी नहीं चाहता
"तो फिर तुम्हारा इरादा क्या है ?"
"मैं अपने दोस्त को लेकर गजनी की सरहद से बाहर चला
जाऊँगा। अब हमारा हिन्दुस्तान मे क्या रहा?" वहां के जलते हुए
चिराग बुझ गये हैं। हम कही दूर जंगल मे निकल जायेंगे। वहीं जिन्दगी
के बाकी दिन गुजार देंगे।"
"जो तुम चाहते हो, चन्द्र कवि, वही होगा, मै वही करूँगा । अच्छा,
अब एक बात बतलाओ।"
"क्या?"
"चौहान की निशानेबाजी देखने के लिए गजनी के सभी लोग
आयेंगे। वे मे तौर चलायेंगे? उसके लिए क्या इनजाम करना
होगा ?"
"सरकार मैं बतलाता है।" "आप लोहे के बरे-वरे तवे दरबार में मंगवाइये । उनपर बांस गाड़े जायेंगे। चार बामों की ऊँचाई पर भून्य बनेगा। वह मंन भी चौबीस गज ऊँचा होगा । उमपर आप वैठिये । आपके तख्त के ऊपर भी एक तवा होगा। जय आप आवाज़ लगायेंगे, तभी चौहान का तीर छूटेगा। वह सवमे ऊपर याले तवे में जाकर लगेगा। "कमाल है शायर साहब ! तुम्हारा दोस्त वाकई में एक बहतरीन इन्मान है । मुझे निहायत अफसोस है कि मैंने उसे अन्धा करवा दिया।" "गया वक्त फिर हाथ कभी नहीं आता, गौरी साहव । जो कुछ भी हुआ, उने भूल गाइये-और आगे की देखिये।" "ठीक है । तुम जाओ और संदखाने मे जाकर चौहान से मिलो। उमे अच्छी तरह समझा देना कि अगर उसका निशाना सही लग गया, तो उमे आजाद कर दिण जायेगा।" "आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ।" "तुम कल तक चौहान के साथ ही न्होंगे। कल दरवार लगेगा। उममें चौहान की निगानेबाजी का तमाशा एक में ही नहीं, पूरी गजनी देखेगी।" चन्द्र कवि ने गौरी को अभिवादन किया। वह दो सैनिकों के साथ कैदखाने की ओर चल दिया। वह बहुत प्रसन्न था। खुशी उसमें समा न पार फूटी पड रही थी।
! चन्द्र कवि और वृथ्वीराज सम्राट् चौहान की आंखों के आगे अन्धेरा छा रहा था। यह एक ऐसा अन्धकार था, जो उनकी जिन्दगी के लिए एक अभिशाप बन गया था। वे मन-ही-मन ईश्वर से विनय कर रहे थे कि किसी तरह मौत आ जाती और उन्हें जिन्दगी मे छुटकारा मिल जाता। सहमा कैदखाने का दरवाजा खुला ! सम्राट् समझे कि कोई पहरेदार आया है। उनके मुंह से सहज स्वर मे निकल गया.-"कोन?" "मै हूँ। तुम्हारा मित्र चन्द्र कवि ।" "ओह ! प्यारे चन्द्र ! मेरे दोस्त ! मेरे मिन ! तुम : मैं सपना तो नहीं देख रहा हूँ ?" "यह सपना नही, सम्राट्, सत्य है।" यह कहने के साथ चन्द्र कवि ने मम्राट को अपनी बांहो में समेट लिया। दोनों एक-दूमरे से गले मिले। उनके आंसू आ गये। उनके स्वर गीले हो गये। देर बाद चन्द्र कवि के मुंह से निकला-"यह सब क्या हो गया, सम्राट् ? मैं जीवित हूं। मुझे मौत नही आई। आप अन्धे हो गये । आपका राज्य चला गया। आप" "मित्र चन्द्र । जब भाग्य रूठता है, तो ऐसे ही दिन आते हैं । भाग्य की शिकायत मत करो। तुम आ गये। मुझे मेरी दुनिया मिल गई। विपत्ति मे मित्र ही काम आता है। तुमने इस कहावत को चरितार्थ कर दिया, मेरे दोस्त।" "सम्राट्, मैं कुछ करने आया हूँ। मैंने जो सोचा है, मेरा वह सपना जरूर साकार होगा।" "तुमने क्या सोचा है, मित्र?" चन्द्र कवि इसपर सम्राट के कान के पास मुंह ले गया। उसे भय ८६ था कि वन्दी-गृह के दरवाजे पर गौरी के जासूस खड़े होगे। उन्हें उसकी हिदायत होगी कि वे छिपकर हम दोनों की बातें सुनें। यही कारण था। इसीलिए चन्द्र कवि चौहान के कान मे फुसफुमाने लगा। वह देर तक अपनी योजना सम्राट् को समझाता रहा। पृथ्वीराज ने चन्द्र कवि की बातें सुनी, तो वे बहुत सुश हुए। उनके मुंह से यह स्वर निकल गया--"इतिहास तुम्हें कभी नहीं भूलेगा, मेरे दोस्त । तुमने हिन्दुस्तान की लाज रखी है। तुम भारत मां के लाल हो । यह तुम्हारा ही साहस था, जो अपनी जान हथेली पर रखकर गजनी आये।" दोनों मित्रों मे दिन-भर बातें हुई। वे रात को भी सोये नही । वातो मे ही व्यस्त रहे। पृथ्वीराज ने जब सुना कि रानी अगमा ने आत्महत्या कर ली, तो वे चीख मारकर रह गये। संयोगिता की हृदय-गति रुक गई। अन्तःपुर की स्त्रियो ने जौहर कर लिया। यह सारी बातें सम्राट को ऐमी लग रही थी, मानो कोई उनके घावों पर नमक छिडक रहा हो। सवेरा हो गया। चन्द्र कवि के मुंह से निकला-"तैमार हो जाओ, सम्राट्, सवेरा हो चुका है। आज हम लोगों की तकदीर का फैसला होगा।" - "मैं तैयार हूं, दोस्त । मुझे एक ही दुख है कि मैं युद्ध मे वीरगति को प्राप्त नहीं हुआ। मुझे जन्म-भूमि छोड़नी पड़ी। मैं बन्दी बनाया गया। यह मेरा कितना बड़ा दुर्भाग्य है !" "सम्राट्, अतीत की बातें भूल जाइये। घर की फूट देश की दुश्मन बन गई। संयोगिता के प्रेम ने आपको राज्य-कार्य से विमुख कर दिया । खर, छोड़िये और मैंने जो योजना आपको समझाई है। उसपर ध्यान दीजिये।" पृथ्वीराज को ऐसा लग रहा था कि अब उनके दुर्भाग्य का थोडा ही समय शेष रह गया है । उन्हें मुक्ति मिलेगी। उन्हें शान्ति मिलेगी।
८७ उन्हे सन्तोप होगा। जव तक यह ससार है। उनका और उनके साथ चन्द्र कवि का नाम भी गर्व से लिया जायेगा। चन्द्र कवि प्रतीक्षा कर रहा था कि कब बन्दी-गृह का दरवाजा खुलता है और कब वह अपने मित्र के साथ दरवार मे जायेगा? दोनो मित्र बहुत प्रसन्न थे। उनमे हँस-हंसकर बातें हो रही थीं। सम्राट् इस समय भूल चुके थे कि वे वन्दीगृह में है । उन्हे अपने मित्र चन्द्र कवि पर गर्व हो रहा था। सवेरे का पहला पहर बीत चुका था। अभी तक बन्दीगृह के किवाड नहीं खुले थे। दोनों मित्रो को उसी की प्रतीक्षा थी।
गौरी के दरबार की रौनक .
भवेरा होते ही मुहम्मद गौरी के दरबार में हलचल मच गई।
अभी बादशाह दरवार में नहीं आया था। सभी लोगो की जवान पर एक
ही बात थी कि आज हिन्दुस्तान के बादशाह पृथ्वीराज पौहान तारा
निशाना लगायेंगे। उसी पे लिये दरबार में मंच बनाया जा रहा है।
पूरे गजनी शहर में यह चर्चा जोर पार गई थी कि अगर हिन्दुग्नान
के बादशाह ने तीर सही निशाने पर मार दिया, तो हमारे पाहंगाह उन्हें
आजाद कर देंगे।
कोई पहता कि गुना है, पृथ्वीराज चौहान आवाज पर तीर मारते
है। उन्हें यह अजीब नमात हामिल है।
मिमीरा कहना था कि आज दरवार में गभी के लिये गुली छूट है।
हर आदमी पौहान पारमाल देगेगा।
मुहम्मद गौरी दरगार में आया। यह आते ही मग मा निरीक्षण
करने लगा । यह बहुत प्रसन्न था। उगमा अनारग पह रहा पार
आज उसके दरबार में सोग समाता देगगरि पौहान आयाम पर तीर
मे मारला है।
हरमबी बेगमी ने भी अपनी राशि जाहिरपी किये भी पौहान
पारमाल देगना पाहती है। मीनिये मी पाया भी की जाने
मगी।
गभी येगमे रोगों में भारग। नगारपरने मनीति
चौहान दरबार में माने।
योगहर हो गई थी। गामा मोरी में अपने मत्रीको श्रीदेगा।
यह गार ने गमा-"गडपारी पूरी हो पात्रो माग?"
"नाह।"
"तोपोगनो पुरापागार?"
.
"धुलवाइये, हुजूर ।"
"एक बात बतलाइये, वजीरे आजम?"
"जी सरकार।"
"अगर चौहान ने तीर निशाने पर मार दिया, तो?"
"तो आप उसे आजाद कर देंगे।"
“यही सोच रहा हूँ।"
"आपने शायद चन्द्र से वादा किया है कि सही निशाना लगने पर
आप उसके दोस्त चौहान को रिहा पार देंगे।"
"कैसी बातें करते हो वजीरे आजम ? इतना आसान नहीं है यह कि
चौहान सही निशाना लगा दे।"
'यह ठीक है। लेकिन..."
"लेकिन क्या ?"
"आपने भरे दरवार में जो वादा किया है, उसे हर हालत में निभाना
'पड़ेगा।"
"यह पोई जरूरी नहीं है, वजीरे आजम ।"
"फिर ?"
"जैसा मौका देखूगा, वैसा क्रूँगा। पहले चौहान को दरवार मैं तो
आने दो।"
"तो चौहान को बुलवाया जाये ?"
"बेशक, बेशरु।"
महामंत्री ने सैनिकों को आज्ञा दी कि वे वन्दीगृह में जायें और
हिन्दुस्तान के वादगाह को कड़े पहरे में यहां ले आयें।
इधर सैनिक पृथ्वीराज को लेने के लिए चल दिये थे, उधर मुहम्मद
गौरी दरवार में सब भी सड़ा था। वह चारों ओर निगाह दौड़ा-दौड़ाकर
देख रहा था कि कही कोई कमी तो नही रह गई।
झरोखो में बेग में बैठी थी, मुंह-लगी बांदियां आँखों में जिज्ञासा
"लिये खड़ी थी। उनमें आपस मे फुसफुसाहट हो रही थी कि .
*
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चौहान हिन्दुस्तान का सबसे बडा बहादुर है। अगर इसके साथ उसके मौसेरे भाई राजा जयचन्द ने दगा न की होती तो यह शेर कभी पिंजडे मे बन्द नहीं होता। सभी दरबारी उस समय की प्रतीक्षा कर रहे थे, जब चौहान का तीर छूटेगा और वह निशाने पर जाकर लगेगा। अन्य दिनो की अपेक्षा आज दरबार खूब अच्छी तरह सजाया गया था। झाड़-फानूसो की कमी नही थी। वे रंग-बिरंगी जगह-जगह लटक रहे थे। हीरे-जवाहरात सिंहासन मे जगमगा रहे थे। सुगन्ध ऐमी आ रही थी कि चित्त प्रसन्न हो जाता था। गजनी की जनता आंधी और तूफान की तरह उमड आई थी। लोग एक-दूसरे से महते, आपस मे कानाफूसी करते कि चौहान आने वाले है । यह मौका उन्हे इसलिए दिया गया है कि उनके शायर दोस्त चन्द्र हिन्दुस्तान से आये है। दरवार के बाहर भी अपार जनसमूह उमड आया था। नौवतखाने मे नगाड़े पूरी गति के साथ बज रहे थे। ऐसा लगता था कि आज कोई बहुत वडा जशन है। इतनी खुशी तो उस दिन भी नही मनाई गई थी, जय सुलतान हिन्दुस्तान जीतकर लौटे थे। एक बूढ़ा पागल फकीर बाहर खडा निल्ला रहा था-"है कोई अल्लाह का प्यारा, जो दे खुदा की राह पर?" एक सिपाही ने उसे धक्का दिया। वह डांटकर बेरहमी के साथ बोला- "हट जा, फकीर ! लगता है कि तेरी शामत आई है। रास्ते में खडा है।" फकीर उठकर खड़ा हो गया। उसके मुंह से निकला-"तू इन्मान को मिट्टी कूडा समझता है, नादान। अल्लाह के दरबार मे देर है, लेकिन अन्धेर नहीं।" इसपर सैनिक फकीर के दुबले शरीर पर कोडे वरमाने शुरू कर दिये । उसने उसे फिर गिरा दिया और डॉटकर बोला-"खुदा के वन्दे, खुदा के पास जाना नही है ? तेरा खुदा तुझे बुला रहा है । चल, हट ।" अब फकीर चीखता हुआ कहने लगा था-"जो इन्मान को सताते है, खुदा उनपर कभी रहम नहीं करता। तुझे क्या मालूम नादान । आज की यह खुशी रज और गम में बदल जायेगी। मेरी यही दुआ है।" "इस वदतमीज को यहाँ से दूर कर दो। यह बदुआ देता है।" दूसरे सिपाही ने यह कहा । वह फकीर को घसीटता हुआ एक ओर ले चला। 'तू ही नहीं । तेरा शहशाह भी नेस्तनाबूद हो जायेगा। जिसे गरूर होता है, अल्लाह उसपर आफत के बादल बरसाता है।" फीर बद्दुआ दे रहा था। सिपाही उसे खीचते हुये दूर ले जा रहे थे कुछ लोग इसके लिए कह रहे थे कि शाही नौकर फकीरों के साथ भी रहम नहीं करते। वे इन्सान होकर खुदा रो भी नही डरते । बन्दीगृह के फाटक से लेकर दरबार तक रास्ते पर दोनो ओर लोगो की अच्छी-खासी भीड लग रही थी। सभी उत्सुक खडे थे। सभी की आँखें प्रतीक्षा मे थी कि सम्राट् चौहान कव आते है । वहुत से लोगो ने सम्राट् पृथ्वीराज को देखा नही था। इसीलिए वे अधीर हो रहे थे। वे देखना चाहते थे कि हिन्दुस्तान का वादशाह कैसा है । सुना है कि उसका सीना गज-भर चौड़ा है। उसकी आँखों मे मशाल जलती थी। इसीलिए हमारे शहंशाह मुहम्मद गौरी ने उसकी आँखें फोड दी, अब वह अन्धा हो गया है।
शमवेधी वाण जैसे ही वन्दीगृह के विवाद सुले। सम्राट् चौहान सजग हो गये । वे चन्द्र कवि मे बोले---"चलो, चन्द्र पवि । शायद लोग हमे बुलाने आये चन्द्र रवि को भी प्रसन्नता हुई। दोनों मित्र मैनिकों के साय दरबार की ओर चल दिये। गजनी की जनता दोनो को देख रही थी। लोग ताज्जुब कर रहे थे कि हाथी जैसी देह वाला चौहान गौरी मे हार कैसे गया ? किमी-किसी का अन्तः करण कह रहा श कि हिन्दुस्तान की जंग में हमारे सुलतान ने ईमानदारी से काम नहीं लिया। वे धोखा देकर चौहान को कैद कर लाये। दोनों मित्र चले जा रहे थे । दरबार करीव आ गया। नौवत के नगाड़े की आवाज उनके कानों में स्पष्ट पड़ने लगी। अब चौहान ने दरवार में प्रवेश किया। चन्द्र कवि ने आते ही गौरी को अभिवादन किया। गौरी मुस्कराया और चन्द्र कवि से कहने लगा-"कहिये, शायर साहब, आपको कोई तकलीफ तो नही हुई ?" "कसी बातें करते है, गोरी साहव ? आपके हुजूर मे मुझे तकलीफ हो सकती है ?" "तुम्हारे कहने के मुताबिक मैंने सारा इनाजाम कर लिया है। देखो, इस मंच में कोई कमी तो नही रह गई ?" चन्द्र कवि ने मच देखा। वह वहुत प्रसन्न हुआ। उसके मुंह से निकला-"बहुत ठीक । अव आप एक काम कीजिए।" "क्या?" "आप मंच के सबसे ऊपर निकल जाइये। आपके ऊपर जो तवा है, जब आप मच पर मे आवाज देंगे, तभी चौहान का तीर छूटेगा। -- ६३ वह सीधा जाकर तवे में लगेगा।" "ठीक है, शायर साहव । मैं ऊपर जाता हूँ।" "हाँ, अभी तमाशा देखिये।" गौरी हमने लगा। वह हँसता हुआ सीढ़ियां चढकर मच के ऊपर पहुंच गया। इधर सम्राट् पृथ्वीराज चौहान के हाथ मे धनुप दिया गया। बाण भी उन्हें पकड़ा दिया गया। चन्द्र कवि ने दाहिना पन्या थपथपाया। उसने सबके सामने कहा--- "वस चौहान । इसी तरह तैयार रहो। जैसे ही गौरी साहब आवाज दें, वम तुम्हारा, तीर छूट जाना चाहिए। सारी जनता तुम्हारा कमाल देखने के लिए बैचेन हो रही है।" पृथ्वीराज ने धनुप की प्रत्यंचा पर बाण चढाया। वे प्रतीज्ञा करने लगे कि शब्द होते ही बाण छोउ देंगे। ऊपर मंच पर बैठा गौरी यह सब देख रहा था। वह जोर से चिल्लाया ~ "हाँ चौहान, तुम्हे यही पर तीर मारना है। वम तीर छोड दो। देखें तुम्हारा कमाल कैसा है ?" जो ही गौरी ने आवाज दी । पृथ्वीराज का नीर छुट गया । वह सीधा जाकर मुहम्मद गौरी के सीने पर लगा । गौरी तिलमिलाया। वह अपने को संभाल नहीं पाया । धाम से मच से नीचे आकर । गिग गिरते ही उसकी मृत्यु हो गई। दरबार में तहलका मच गया । सभी लोग चिल्लाये--"चौहान को जान से मार दो। चन्द्र पति की हत्या कर दो। यह दोनो दुश्मन है। इन्होंने छिपकर साजिश की और हमारे मुलतान की जान ले ली।" इसपर मिपाही तलवार से लेकर चन्द्र कवि और चौहान की और मगर देखने वाले दग रह गये। दोनों मित्रों ने ऐमा कमाल दिसताया, जिमके लिए किमी ने सोना भी नहीं था। जैसे ही गौरी के सीने पर तीर लगा । टोय तभी चन्द्र कवि ने अपनी कमर मे दो कटारं निकाली। एक चौहान को पकदादी, इमरी अपने हाथ में रखी । जव सिपाही दोनो के पास पहुंचे तो वे एक-दूसरे के कटार मारकर मर चुके थे। दोनों ने बदला ले लिया। दोनों की विजय हुई। दरवार मे एक ओर मुहम्मद गौरी की लाश पडी थी। दूसरी तरफ दोनो मित्र एक-दूसरे से लिपटे हुए चिर-निंद्रा मे सोये हुए थे। जमीन खून से लाल हो रही थी। वेगमें तौवा-तौबा करके छाती पीटती हुई आंसू बहा रही थी। दरवार के बाहर वही बूढा फकीर आवाज लगा रहा था-"है कोई अल्लाह का प्यारा, जो सुदा की राह पर?" फकीर ने जव यह सुना कि दरवार की खुशी गम में बदल गई है, तो वह खूब जोर से हँसा। उसके मुंह से निकला-अल्लाह । तेरी इवाहत मे बड़ी ताकत है । तू सबकी सुनता है, मुनासिव फैसला करता है।" मुहम्मद गौरी के शव को सफेद चादर ओढा दी गई थी। लोग अफसोस जाहिर करते हुए कह रहे थे कि सुलतान की मौत बहुत बुरी हुई। वे हिन्दुस्तान जीतने न जाते, तो उनका यह हाल कभी नहीं होता। चौहान का मृत चेहरा भी ऐसा लगता था जैसे कि मुस्करा रहा है। चन्द्र कवि के वन्द होठ कह रहे थे-"बस तयार हो जाओ, चौहान, तुम्हे निशाने पर तीर मारना है।" ।
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