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Kahani Anubhav Aur Shilap

Kumar,jainendar · 2010/12

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कहानी : अनुभव और शिल्प

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कहानी : अनुभव और शिल्प
लेखक
जनेद्र कुमार
भूमिका
विजयेद्र स्नातक
प्रकाशक
पूर्वोदय प्रकाशन, दिल्ली

जैनेन्द्र ट्रस्ट
प्रकाशन पूर्वोदय प्रकाशन
सवाधिकारी
पूर्वोदय प्रा. लि.
८ नेताजी सुभाष माग
दिल्ली-६
प्रथम सस्करण माच, १९६७
मूल्य
मुद्रक उद्योगशाला प्रस,
किंग्सव, दिएली-
छ रपये

लेखकीय
मुनता हूँ कि कहानी लिखना एक गिल्प है और क्ला
है। कहानियां मैंने लिखी जरूर हैं और अब भी लिख लेता
हूं लकिन कता वगैरह का मुझे कुछ पता नही है । शायद
मान लिया जाता होगा कि लिखी है तो कहानी को मैं
जानता जरूर होऊँगा । इसी से नव-तब कहानी को लेकर
भेंट वार्ता म मुझे जिरह के नीचे आना पडा है । गाप्ठिया,
परिसम्मान मे आक्षेपा के बीच राडा हाना और वोलना-
भुगतना पड़ा है । यह सालन कुछ उसी तरह की बाता को
लेकर प्रसारित किया जा रहा है। लिखने के पहले दिन से
आ7 तक मैं कहता आ रहा हूँ कि मैं नहीं जानता हूँ।
यहाँ तक भी कि जानना चाहता भी नहीं हूँ । वारण
और दुध नही, सिफ यह कि होने से ही मुझे छुट्टी नही
है। इस हाने और होते जान मे जो करना समाया है उसी
म मुझ से कहानियां लिख गई है । उससे भाग और
विश्वमनीय मैं कुछ नहीं कह सकता है।
पुस्तक सबके समक्ष है और कहानी को लेकर जो कुछ
इसमे कहा मुना गया है आगा है उसको लेकर मनोविनाद
गाय हा जाय विरोप तत्वचर्चा न होगी।
११ माच '६७
-जने द्रकमार

प्रकाशकीय
यह सबलन अनेक बधुओ के कृतित्व के योग से बनने
मे आया है । 'कहानी म अपेक्षणीय और उपेक्षणीय तथा
'कहानी प्रेरणा, प्रभाव और गिल्प लेखा के प्रश्नकर्ता
श्री जगी। गोयल है । सव श्री प्रदीप पत महेन्द्र त्यागी
धर्मेद्र गुप्त की भेंट वाताओ को सयुक्त करके स्वातत्र्योत्तर
हिन्दी कहानी एक विशलेषण को स्वरूप मिला है। हिदी
कहानी नील निरूपण वे प्रश्नकर्ता श्री ओम प्रकाश दीपक
हैं । सम्पादन म उपयुक्त लेखो का उपयुक्त शोषक आदि
देने की आवश्यक्ता हुई है । विश्वास है वर्ता व घुआ
वे अनुकूल प्रतीत होगे।
नीलम देश की राजक्या ग्रामोफोन वा रिकाड
और पत्नी कहानी पर लखर के वक्तव्य सक्लन में सम्मि
रित है । उनकी विज्ञान और अविमान कहानियाँ
पर्याप्त चर्चाम्पर रही थी। उस प्रकरण मे घमयुग में
प्रकाशित श्री रमेन चक्षी और लेबर के पत्र भी उपयोगी
जानवर यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे है ।
बलवत्ता क्या ममारोह म जनेद्रजी के वक्तव्य और
तत्प्रेरित व्यवन एवम अ यवत प्रनिनियाा को ध्यान में
रसार उनकी अपनी कपिपत दी जा रही है ।
दिल्ली विश्वविद्यालय पे श्री डा. विजयेद्र सातव ने
पारायणव पुस्तक का भूमिका तयार की है तो हिदी
कहानी र नये आयामो का निशान कराती है।
इन सभी वधुओं के सहयोग के लिए हम उनके प्रति
हृदय सभामारी है।

अनुक्रम
लेखकीय ५
प्रकाशकीय ६
/भूमिका ६
अपनी कैफियत २६
निवेदन और जिज्ञासा ४३
मेरी रचना प्रक्रिया ४८
V कहानी म अपेक्षणीय और उपेषणीय ५६
- कहानी प्रेरणा, प्रभाव और शिल्प ६७
स्वात न्योतर हिदी कहानी एक विवेचन ७६
हिंदी कहानी शील निरूपण ६७
कहानी, नई कहानी अ-कहानी कुछ प्रश्न १११
किता नया, क्तिना पुराना ११८
विहानी लेखन और न जानना १२४
-/हिदी कहानी मे ययाथवाद का विरोध १३०
वक्तव्य १४१
पत्नी के बारे में १४८
विवाद प्रतिवाद १५२

प्रकाशकीय
यह सक्लन अनेक व घुओ के कृतित्व के योग से बनने
मे आया है। कहानी में अपेक्षणीय और उपेक्षणीय तथा
कहानी प्रेरणा, प्रभाव और शिल्प' लेखो के प्रश्नकर्ता
श्री जगदीश गोयल है । सवश्री प्रदीप पत महेद्र त्यागी,
धर्मेद्र गुप्त को भेंट वार्ताओ को सयुक्त करके स्वातत्र्योत्तर
हिदी कहानी एक विलेपण को स्वरूप मिला है। हिन्दी
कहानी शोल निरूपण के प्रश्नकर्ता श्री ओम प्रकाश दीपक
हैं । सम्पादन म उपयुक्त लेखो को उपयुक्त शोषक आदि
देने की आवश्यक्ता हुई है । विश्वास है पर्ता बघुआ
को
वे अनुकूल प्रतीत होगे।
नीलम देश की राजदया ग्रामोफोन का रिकाड
मोर परनी कहानी पर लखक के वक्त य सकलन मे सम्मि-
रित हैं । उनकी विज्ञान और अविनान कहानियाँ
पर्याप्त चर्चास्पद रही थी। उस प्रकरण मे घमयुग म
प्रकाशित श्री रमेश बक्षी और लखन पत्र भी उपयोगी
जानकर यहाँ प्रस्तुत किय जा रहे है ।
क्लक्त्ता क्यान्समारोह म जने द्रजी के ववनय और
तत्प्रेरित व्यक्त एवम अव्यक्त प्रतिक्रियामा को ध्यान मे
रखरर उनकी अपनी कैफियत दी जा रही है ।
दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री डा. विजये द्र स्नान ने
पारायणपूवा पुस्ता की भूमिका तयार की है जो हिदी
पहानी के नय मायामो का निपटान कराती है।
इन सभी वधुओ के सहयोग के लिए हम उनके प्रति
हृदय से आभारी है।

अनुक्रम
V
लेखकीय ५
प्रकाशकीय ६
भूमिका
अपनी कफियत २६
निवेदन और जिनासा ४३
मेरी रचना प्रक्रिया ४८
V कहानी म अपेक्षणीय और उपेक्षणीय ५६
कहानी प्ररणा, प्रभाव और शिल्प ६७
स्वातत्र्योतर हिन्दी कहानी एक विवेचन ७६
हिटी-कहानी गोल निरपण ९७
कहानी, नई कहानी बन्नहानी दुध प्रश्न १११
कितना नया क्तिना पुराना ११८
बिहानी लेखन और न जानना १२४
/हिदी-कहानी म यथाथवाट का विरोध १३०
वक्त य १४१
पत्नी के बारे म १४८
विवाद प्रतिवाद १५२

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भूमिका डा. विजयेन्द्र स्नातक हिंदी क्था माहित्य के इतिहास म प्रेमच * के बाद जन द्रकुमार का उन्य एक ऐतिहासिक घटना है । जैनेन्द्रकुमार कथा साहित्य म जिस रूप म प्रविष्ट हुए यह भी कम विस्मयजनक नही है। प्रारम्भ मे जनेन्द्र विचारक रहे होगे विचार और चितन के क्षेत्र की इयत्ता नही है । चितन मनन म लीन होने पर प्रत्येक व्यक्ति लोक परलाक सबम विचरण करने का अधिकार प्राप्त कर लेता है। में नहीं जानता कि जने द्र ने यह अधिकार किस आयु मे पा लिया था। मैंने उनके बारे मे जो कुछ पढा है उसमें भी इसका कोई व्योरा नहीं है। जितु जनेद्र क कथा क्षेत्र में प्रवेश करने की बात विचित्र हाने पर भी जने द्र- साहित्य के पाठर को भलीभाति विदित है। जनेद्र ने एक युवक की बात, बिना किसी सयोजना के सरसरी तौर पर, लेकिन पूरी सहजता के साथ परख म लिखी थी। 'परख लिखते समय जनेद्र को उप यास की रचना- प्रक्रिया का चोप नही था शास्त्रीय समीक्षा म उप यास के क्या तत्त्व होते हैं यह भी जानने की जन द्रन चिता नही की थी। लकिन हो जने द न सत्य- धन को जीते देखा था, पट्टी को भीतर ही भीतर वसमसाते देखा था, और उस सामाजिक परिवेश का भी दावा पा जो इन दोना पात्रो के चारो मोर फला होने पर भी इहें वाध रहा था । यस, जनेद्र ने उमे लिपिबद्ध कर डाला और प्रेमचद ने कहा कि यह यथाथ-दृष्टि का उमेप करने वाली सफल कृति है- यह नया उपायास है । मैं इसीलिए कहता हूँ कि जनेन्द्र का क्या क्षेत्र म उद्भव एक बारस्मि रितु अदभुत एतिहासिक घटना है । । - १० कहानी अनुभव और शिल्पा पत्र तो अपने जनेद्र को हिदा-कथा क्षेत्र म आये आज छत्तीस वप व्यतीत हो गये। चीसवी शताब्दी की एक तिहाई और वह भी शताब्दी के ठीक मध्य की छत्तीसी जनेद की रचना अवधि है । इस अवधि के पूर्वाद्ध को हिंदी साहित्य के इति- हारा लखक 'प्रेमच दोत्तर हि दी कथा साहित्य के नाम से यवहृत करते हैं और उत्तराद्ध को स्वातत्र्योत्तर क्था साहित्य के नाम से स्वाधीनता प्राप्ति के परि- प्रय म रखकर नय मानदण्डो और मूल्या द्वारा उसका आक्लन अध्ययन करते हैं। इन दोनो विभाजना म स प्रथम विभाजन में जनेद्र प्रमुख कथाकार हैं । जनेद्र के उसमे प्रमुख होने का भी कोई दावा नही किया वि तु कहानी को नया मोड़ दो और पात्रो के अतद्व द को चित्रित करने की नयी शैली के कारण यह स्थान जोद्र को अनायास उपलध हो गया है। परख के चार जनेद्र ने कहानी और उप यास दोना क्षेत्रो म विपुल मृजन किया। उप यासो मे सुनीता और त्याग- युग को श्रेष्ठतम कृति रूप म समाहत हुए । इसी समय उनकी अत्यन्त विख्यात कहानियां भी प्रकाश म आई। पहानी म जिस सवेदन और बाध को आज बडे आयास पून लाया जा रहा है वह आज से तीस वप पूक निखी जने द्र की कहानिया में इतनी प्रचुर मात्रा मे था कि उमक विना वहानी का विश्लेषण हो ही नही सरता। कुछ समीक्षकों ने इसी सवेदन और जीवन बोध को पाकर जनद्र की कहानियो को विचारात्मक कहानी में निवधात्मक कहानी तक पहचाने का प्रयत्न किया था। वितु कहानी, यदि वह क्सिी पथ्य को घटनात्मक रूप से प्रस्तुत करती है तभी कहानी है अन्यथा नही-यह पात जनेद्र की समझ में कभी नहीं आई। उह घटनामा की सयोजना का आग्रह कभी नहीं रहा । घटनाए तो केवल आवरण मान हैं और कहानी फेवल आवरण नहीं है। कोई व्यक्ति खोल को लेकर जीवित चेतना की प्राप्ति का दभ नहीं करेगा । इसलिए जने द्र की कहानिया म जिन पात्रो को सृष्टि हुई वे देवन आपबीती यो दुहराने वाल न होकर बापवीती के कारण काय सवधा म उनमो वाल, उन गुत्थिया म स्वयं उलझ कर उहें सुलझाने का प्रयल करने वाले हैं । कौन कह सकता है कि उलझनो को सुलझाने की हरेक कोगिर सम सलान ही म सरम होती है-अनेक बार मन की गुत्थिया क फेर मे पढ़ पर जनेद्र पात्र यशस्वय दिग्भ्रमित हो गये हा तो इसम आश्चय की क्या भूमिका चात है। जनेन्द्र के मनका सशय और सदेह जीवन को अधिक गहराई से जानने समझने का साधन मात्र है । यह उनको जीवन यात्रा की प्रारम्भिव सोपान मात्र है, यात्रा का अतिम गतव्य नहीं । जनेद्र जव कथा क्षेत्र म अवतरित हुए थे तब योरोप मे मनोविश्लेषण का सिद्धा त चिकित्सा विज्ञान से हाना हुआ ललित साहित्य में पूरी तरह पंट चुका था। फाइड आदि मनोविश्लेषण शास्त्रिया की स्थापनाएं काय, नाटक और कथा साहित्य को समीक्षा म चरिताम हो रही थी और रचनाशर भी उनसे पूरी तरह अवगत था। हिदी मे मनाविश्लेषण शास्त्र का, समीक्षा क्षेत्र में प्रयोग, छायावाद युग से प्रारम्भ हुमा और छायावादोत्तर लेखक अर्थात सन् १९३० के बाद के रचनाकार के भीतर इस शास्त्र की गध धीरे धीरे वमने लगी थी। जैनेन्द्र उसी युग में आये और मैं नहीं जानता कि वे इस शास्त्र गघ से वासित पे या नहीं कि तु गघ तो जैसे वातावरण म सहन हो फल जाती है वसे ही वह जनेद्र के साहित्य में चुपचाप आ गई हो तो कुछ आश्चय नही है । लेकिन शायद जनेद्र इस गध को काम्य न मानते हो और इसी कारण गायद अपने साहित्य से इसे दूर रखने की इच्छा भी व्यक्त करें किन्तु मरी अपनी दृष्टि स वे मनोविश्लेषण के फेर से बच नहीं सकते, भले ही उस विश्लेषण का वे स्वत स्पूत कहार फाइड आदि मनोविज्ञान वेत्ता विक्सिको से दूर रखकर देखें । मैं इस तथ्य का सकेन इसलिए कर रहा है कि वाद के साहित्य म मनोविमान या मनोविश्लेषण शास्त्र को एक उपयोगी तत्व समझ कर स्वीकृत दिया गया और उसन प्रयोगात्मक पपी स्वीकृत से क्या में पात्रा के अत- द ही नहीं घटनाओ का विकास एव फलिनाथ भी प्रस्तुत किये गये। कुछ समीक्षका ने तो क्या लेखको के वग बनाते हुए जनेद्र को भी इमी वग मे रखने का आग्रह किया। मैं नहीं समझता कि जनेद्र ने अपने को कभी किसी वग म बाधा जाना पसद दिया हो, लेकिन जनेद्र को पसद की परवाह कौन करता है । जब समीक्षा वग विभाजन से ही चलती है तो कोई भी लेखक अपने बधन यो, अनिच्छा से ही सही मानने से इकार नहीं कर सकगा। फलत पपा १२ कहानी अनुभव और शिल साहित्य मे मनाविनान का पूरी तरह सूत्रपात करन का दायित्व जनेद्र और इताचद्र जोगी पर ला दिया गया। मैं यह बात प्रेमच तर क्थासाहित्य के इतिहास के साक्ष्य पर बह रहा हू । स्वात त्र्योत्तर काल मै इस दायित्व वो जनद्रस छीनन या प्रयत्न हुमा और जनेद्र की श्रेष्ठ कहानिया में मन के सघप और दुद को अ यया ठहरा कर जने द का काम कलि के कुत्सित वणन तक ही सीमित रख कर देखने की बात नय क्यानारा द्वारा कही गई। कैसी विचित्र विडम्बना है कि जनेद्र की सर्वश्रेष्ठ कहानिया वा अत्तरद स्वातन्योत्तर काल म, यौन कुठाआ से लिपटा जुगुप्सा पूर्ण करार दे दिया गया । समीक्षा की ऐमी दयनीय स्थिति भी होती है इसकी कल्पना तो की जा मरती है पितु इसे घटित हाते देवना समीक्षा के मानदण्डो का दूर ही से प्रणाम करना है । पूर्वाग्रह से दुष्ट पधरना की यही परिणति ममझनी चाहिए। जने द्र ने अपन उपन्यासो मे कुछ एम पात्र अवतरित किये है जो साधारण से भिन्न होते हुए भी उन सिद्धाता के परीक्षण मे लगे हुए हैं जो पायद साधारण 'यक्ति द्वारा क्रियावित होते नहीं देखे जाते। सिद्धाता दी स्वीकृति और किया वयन दो मिन तध्य हैं । मिदात की स्वीकृति तथ्य मात्र है। पितु सिद्धात का प्रिया वयन सत्य की स्थापना है । सिद्धान्त कोई भी षया न हो अपने पुस्तकीय रूप में वह ग्रह्य या अग्राह्य नहीं होता । अहिंसा या सत्य जीवन बाध के निक्प पर ही सिद्धात बनते हैं वैसे तो ये दोना शब्द धम. प्रपोशोभा बढाने के लिए है। जनेद्र ने वहानियो म जिन पात्रो को अवतरित किया या वे पात्र जनेद्र ने अपने इद गिद देखे होंगे। न भी देखे हो तो जनेद्र के भीतर से भी दे पात्र आ सकते हैं । किमी भी पात्र घटना या चित्रण को नाम और स्थान पूवक नको म होना ही चाहिए यह कोई अनिवाय शत नहीं है। भीतर भी पात्र होता है भीतर भी घटनाए पटती हैं भीतर भी दर से चित्रण की रेखाएं खिचती है । अनुभूति बाहर से भीतर जगती है और भीतर से बाहर आवर रूपापित होती है । इस प्रक्रिया को कोई भी क्याकार सहज ही में जान सक्ता है। बनेन्द्र ने अपनी प्रारम्भिक कहानियों के बारे में कहा है कि वे पहानियाँ भूमिका १३ कल्पना ये भीतर से नहीं बनी । उह जनेद्र ने बनाया नहीं जो देखा उसे कहने को बाध्यता मे स बहानी ने स्वय रूप ग्रहण कर लिया। यह जन के यथाथवादी रचनाकार का एक पहलू माना जा सकता है। इस पर अभी तक बालोचक का ध्यान नहीं गया है। मैं इस सदभ म जनेद्र के अपने शब्दों को हो उद्धत मरना चाहूँगा। जनेन्द्रन अपन क्या माहित्य की रचना प्रक्रिया उत्स पर विचार करते हुए निखा है ' शुरू मे जो कमिया लिखो गई ये मेरे उस समय जीवन से जुही दी जा सकती हैं। उनकी प्रेरणा अमुक रचना से नही आई हागो, क्योकि वह बिल्कुल जुड़ी हुई थी मरे तात्कालिक जीवन से निमित्त कुछ बन गया हो, यह बात जुना है। अपनी स्पर्धा गीपक बहानी 43- सव के बारे में जने द ने पूरा विज्ञान पलार जा बात कही है वह भी मर इस कथन की पुष्टि करती है कि जन द वे अपन परिवश व भीतर स कहानी पूरती रही है। एक सम्पादक कहानी दन का वाया र अनद्रइस चिता मलिन दूब गये विपल पहानी दनी है लकिन कहानी है कहा। कस लिय और क्या नि' वल कहानी दन की किम' और मैं कार तारे देस रहा था। नगारिए तारा बहुत बध है और बहुत दूर । और मैं बुध नहा । और मैं तारा नही हो सकता । सो लही म सूय मन म भट कर सकरागादि यदि में अपनी चाह को तार म बिठा दू तो कुछ हाथ नही आएगा । अर्थात आग्रही आदा वान था है । महलामाक्षा स अगर चलें और एक बाहर म कही राप्रति प्टिन कर 7 मा मत व्यथना महागा पूणता हाथ नही लग सकती । बस एमा पथ मूब गा था, उग समय मन म घटनात्मय कुछ नही था । इम मन्त्र को- मून करने के लिए बनायाम दा चरित अवतार पाते है। बम उन दो प्रतीक पानी का बन नवा में स्पर्धा हानी वनती चली गई। ता अधिकार रचनाए अमृत मिहान को अपने निकट मूत्त करनी प्रणा ग बनी है। मेरी अधि- कार रचना साचता हूँ कि सार प्रतिगत एगो होगी।" जी नयी यानी घाममो स इस सिद्धारमून मे बगनी रचना म विश्वास नहीं करता । जिम मूष को वह पहानी ५ लिए आरश्य सममता है वह है कहानी अनुभव और शिल्प भोगा हुआ जीवन, मही हुई पीडा, अनुभूत क्यिा हुआ सत्य, देखा हुआ हप विपाद । लेक्नि क्या सब कुछ आत्मानुभूत ही साहित्य है ? क्या समस्त लेखन स्वकेद्रित सत्य का अनुभूत प्रयोग मात्र है ? क्या आज का कहानी लेखक मा यताओ + विघटन और आस्थाओ को टूटन का सारा दुख स्वय भेलने का दावा कर सकता है ? भेलने और भोगने की सीमाए हैं-भोगना सही है कि तु लेखन का वही मेरुतण्ड वने ऐसी अनिवायता को लाद लेना एक सीमा तक नारोपित दण्ड है । इसे भी स्वीकार करो कितु इम ही अतिम सत्य न माना । मैं जनद्र मिद्धा त सूत्रो म जीवन दृष्टि को पा लने की बात समझ पाता हूं और मीलिए केवल भोग हा क्षण तर साहित्य सृष्टि वो सीमित नहीं करता। अव प्रश्न यह उठता है कि क्या जने द्र ने जिन सिद्धात मूत्रों की वित्ति के लिए कहानिया लिखी व मिद्धात जन'द्र रशन के है या तत्त्व दशन + । तात्विक दृष्टि को सशय दृष्टि नहीं बनने दना चाहिए । जनेद्र की पि में सायो वा घटाटोप होने में साथ एक विचित्र उलझन मिलती है। यदि समय जीवन व्यापी है तो उसका होना जनेद्र मे से क्यो बहिष्कृत हो, लेकिन उल मन म पाठर को छाह देना भी क्या लेपन का काम्य हो सकता है । मैं इस प्रश्न को जनेद्र क पा से ही समाधान तक पहुचाने का प्रयत्न करूंगा। जन द ने स्वयं कहा है कि वहानी लिखना तो OF भूव है जो निर तर समा... पान पाने की कोशिश करती रहती है । हमारे अपने सवाल होते है, शवाए होती है चिताए होती है और हमी उनका उत्तर समाधान योजने का, पाने का सतत प्रयत्न करते रहत हैं। हमार प्रयोग होत हैं । उनाहरणों और मिसाला की सोश होती रहती है । कहानी उस मोज के प्रयास का एर उदाहरण है। वह 7 निश्चित उत्तर नहीं दे पाती पर यह मलबत्ता कहती है कि शायद उत्तर इस रास्ते म मिल । वह मूचा होती है पुच सुथाव देती है और पाठक अपनी पिया क सहार उम सूझ को ल लेते हैं। जनेद ने वहानी में प्रश्नों के उत्तर पाने की सम्भवना ही मानी है। अतिम उत्तर वे पहानी म नही मानते । इसीलिए समय को भूमि उनकी कहानी +- भूमिका मे जितनी स्पष्ट होती है उतनी समाधान या उत्तर की भूमि नहीं मिलती। पाठक की उलयन बढती है सशय सघन होता है और वह भ्रमित सा होकर उन पात्रो से बार बार पूछता है कि यह तुमने क्या किया ? क्या तुमने आग्रह के आगै समपण किया ? यो तुमने अनीति को स्वीकारा ? क्यो तुमने नग्नता म अहिंसा का उत्वप देखा ? कैसी है तुम्हारी यह निस्सगता और तटस्थता जो हिंसा को पनपने दे रही है ? और पाठक जिनासाओ के घूमायित चक्रवाल में भ्रमित हो माथा पकडकर बैठ जाता है । क्या कहानी के माध्यम से सातिर ऊहापोह की यह गली उपादेय हो सकती है ? क्या कहानी की सफलता पाठक को सिद्धाता के विचार जगत मे पहूंचाने मे ही है ? लीजिए मैं एक कहानी के माध्यम से यह प्रश्न उठाता हूँ। कहानी का शीपक है 'नीलम द्वीप की राजक या । कहानी बहुचचित रही है । इस सशय की दद्वात्मक स्यादवादी कहानी ठहराया गया है । अर्थात है भी और नही भी है शायद नहीं ही है, और गायद है भी, यदि नहीं है तो उमका प्रतिपादन नहीं हो सकता और यदि है भी तो भी वह अनिवचनीय है।' इस प्रकार जो अतिम सत्य है उमे पा लेना मानी असम्भव है। एक समीक्षक वे श में "यह कहानी जने द्र की कल्पना का वही नगर है जिसप चलकर वह सशय के सत्य तक पहुंच सकते हैं । यह दूसरी बात है कि हवा म अगुलियो से बनाया गया उनका यह नगर कोई नगर न हो कर, नगर की कल्पना मात्र हो, उमकी रेखाएं धुएं को हा, और हाय लगते ही पिघलकर मिट जाती हो, लेकिन वह है कल्पना का नगर और रहेगा कल्पना का । ऐमा नही कि नगर धस्तु जगत का यह काल्पनिक निर्माण ही इन कहानिया का दोप है वरन हिदी कहानी के विकास का दया जाए तो जनेद्र पहले लखक होगे, जिहोने अपनी मा यताआ के लिए पलना को एक नई दुनियां खडी की और उसमे रक्त मांसहीन पात्रा को पर- छाइया दिखावर कथानक का घोखा सहा दिया गया और उसके भीतर से उभारने की चेष्टा की। विचारदी जनेद्र को जीवन के प्रति भारी साय है । इसलिए जब व परलप्रमा' जसी बहानिया म एक नारी की कल्पना करते हैं तो लगता है कि वह मोम की गुडिया है । कुल मिलाकर हमे इतना ही कहानी थनुभव और शिल्प मिलता है कि उसके पास मोटर है, सोफा है, महल और रुपये हैं यह जमुना जाती है और आती है और एक स्तिाव वेचने वाले के प्रति सदय हो जाती है । पमाल तब है जब वह उसे हटरो स पिटवाती है। जनेन्द्र को रत्तप्रभा ऐसा ही अवास्तविक और नकली है जो अपने रचनाकार को एक तरुण शिवास्वप्नदी बालक को बगल म ला विठाती है । मैंने तो सवाल उठाया था उसका व्यापक विस्तार ऊपर के उरण म दराजा रावता है । वितु जने द्र की पाय सटि को इसी तक के द्वारा डिसमिस नहीं किया जा सकता कि ये कल्पना द्वारा निर्मित होते हैं तथा उनको सष्टि म केवल मिद्धात मा अयक्न आग्रह होता है। मैं समझता हूँ कि प्रत्येक लसर कल्पना ये योग स सानित्य सृष्टि करता है । कल्पना का अथ आरोपित मिथ्यात्व न होकर मभाय मत्य हो । जाद्र की रचना वा उत्स विचार मे होता है। विचार और अनुभव के बीच की खाई ज1द्र जिम रूप म पाटते है वह साधारण लेखक स भिन काटियो पद्धति है। जन द्र का विचार का इतना प्रवल है कि वे अनुभव की कसौटी की उपेक्षा करते हुए अपन तक जाल को फलात चलत हैं । इस प्रकार उनकी सप्टि मे विचार या तानाशाही लगित होता है अनुमति के लिए गुजादश कम ही रह जाती है । हो माना है जन द मैर इस वयन का एक्दम अस्माकार कर दें और अपनी अनुभूतिया का रचना स रायुक्त बरने का दाना करें। कि तु में उनके दावे को मानने को विवशता में नहीं पहना चाहूगा । न यह उठता है कि जिस विचार का मैंने उनकी राना पा मून प्ररव माना है क्या वह जन द वो अपने निजी जीवन से सम्पृक्त होता है । और क्या जनेद्र अपने विचारात्म धरातल पर जीवन जीना उपम करते हैं परि एमा है तो निश्चय ही उनकी निया में प्रामाणिस्ता वो स्थापना हो जाएगा और फिर विरोध लिा अवोरगा । रितु विचार और अनुभूनिया सम्ब घ गायः जनः स्थापिन नहीं कर पाते । गका वारण उतरा अपना व्यक्तित्व ही है। मन्द्र अपन व्यक्तित्व मजु नही हैं । समम न तो विचार की सरलता है और 7 व्यार की। व गांधीवाती महिमा के समय होने पर 7 भूमिका भी अहिंसक वा आचरण शायद निभा नहीं पाते । इसीलिए अपने पात्रो को अहिंसा के उस स्तर पर पहुचा देते हैं जहाँ पाठक नहीं पहुंच पाता। उनक पात्री की पीडा को समझ पाना सरल नहीं है। क्योकि वह पीडा जैने द वे विचार से सम्भून है जनेद्र का प्रताडित अहवार उस पीडा मे समाया हुआ है जिसे हम अहकार का विगलन कहते हैं वह जनेद्र को काम्य तो है कि तु जनेद्र ने उस काम्य को अभी तक उपलब्ध नही किया है । कारण स्पष्ट है कि जनेद्र सहकार म इतने गहरे उतरे हुए कि अभी उससे मुफ्त होन का क्षण व पा नहीं सके है । जब इनका बौद्धिक विमश श्रद्धा, भक्ति और प्रेम से द्रवित होकर अह के पिंजड सब हर निनलगा तभी जन अपनी रचनाओ म जुता क साथ पात्रा को उतार सक्गे । जो आलोच उनक उलझ चितन पर आक्षेप करते हैं ये जने द्र के व्यक्तित्व में ओतप्रोत इम मह को ठीक प्रकार समझे नहीं हैं। जनेद्र की हिंसा भावना म भी यही अह छिपा बठा है जो जन द वो सरलता स यक्त नही होने दत्ता। मरी यह बात जनद्र का रचिकर नहीं लगेगी कि तु मैं जैसा आभव करता वसा लिग्मने व लिए बाध्य हूँ । बुद्धिवल से पात्रो का 7 तो शुद्ध अहिंसक बनाया जा सकता है और नपुण प्राध्यात्मिक सिनको पहानिया से मन में तीन कचोट और मथन उत्पन होता है, उत्तेजना और आवग उमडता है, सात्विाता योर सिग्धना नही उपजती । गति स्निग्ध प्रभाव के लिए जिम वातावरण की अपक्षा होती है वह भी जन २ की कहानिया में विरत है । आत्मपीडन से ग्रस्त उनके पात्र पाठक का आश्वस्त पर भी कस सक्त है । कि तु यह नव ग्रामो ददान पीरन और उत्तेजन ही जनेद्र यथा साहित्य की गति है । इस गक्ति यो मालोचका न पहले स्वीकार किया पारितु सन १९६० के चा? क्या साहित्य म जो परिवतन आय हैं उनम जन द वो मया, यिन सामथ्य और गली या अस्वीकृत करन वा 47 चा है। जो जनेद्र बो नही ममत उनम मुछ कहना व्यथ है कि तु जो जने के क्या सात्य को गक्ति से पूरी तरह परिचित हैं उनस मरा यही निवन्न है वि व जनेद्र के प्रदय को उसी रेप मे स्वीकार करें जिस रूप मप्रेमचद ने स्वीकार किया था। मधन क्दानी अनुभव और शिल्प इधर पिछले तीन-चार वर्षों म जैने द्र ने एक उप यास 'मुक्ति बोध' और १० १२ कहानियां लिखी हैं । इन कहानियो के सदभ में उठी चर्चाओ की बात मैं यहा करना चाहता हू । पहली बात तो यह कि नयी कहानी के नामकरण वे साथ एक दलबद्ध योजना भी 'अनजाने तैयार हो गई है। अनजाने श द को चहुत से पाठक गलत कह सकते हैं क्योकि उनके विचार म नयी कहानी के साथ योजनाबद्ध दल सगठन हुआ है । जिस तरह कुछ विशेष नामो को लेकर वर्गीकरण होने लगा है वह भी दलीय दृष्टि से ही हो रहा है। रचनाकार की खानेबदी 'पहले वादो के सहारे होती थी और नये पुराने के आधार पर होने लगी है । जैनेन्द्र की विनान' और य विज्ञान गीपक कहानियो पर जो चर्चा हुई वह जने द्र पो न समझने के कारण नही वरन् जानबूझ कर जनेद्र को समझने स इकार करने के कारण ही अधिक हुई है। जनेद्र को स्वीकृति से इकार करना नये पुराने की सानेव दी का एक पहलू है दूसरा पैचारिक पहलू भी हो सकता है जिसमे सवेदन का ययाय आत्मानुभूति का चित्रण आधुनिकता का ग्रहण मानव की स्वीकृति और मध्य को प्रमाणिक्ता आदि शामिल है । मैं इन पहलुमा पर बाद मे विचार करूगा पहले जन द्र की नयी कहानी के सदभ में अस्वीकृति पर कुछ चर्चा करना चाहता हू । पहा जाता है कि स्वतत्रता प्राप्ति के बाद देश म वचारिक दृष्टि से भी नवीन युगबोध आया है । गणतत्रात्मक शासन की स्थापना के द्वारा चयक्तिक राता फिर से उद्भूत हुई है और पुरातन परम्परावाली जडता से व्यक्नि ने अपने को छुडाने का स्वप्न ही नहीं देखा उपक्रम भी दिया है । इस परिवतन का परि णाम यह हुआ कि विचार के सभी घरातों पर पुनमूल्याकन प्रारम्भ हुआ और हमने उस प्रामाणिन माना जो हमारे मन मे विगह या सघष पदा करने वाला था । जो जहता से गृहीत होता आ रहा था वह स्वयं छूटता सा दीखने लगा। जिनवी लखनी ने इन यथाथवानी तत्वो को उनकी समग्रता मे प्रण पिया व अपने लेखन मे प्रामाणिक और परे माने गये, आप पुराने लेखकों को मोपरीधारवान हपियार की तरह निकम्मा ठहरा दिया गया । वह निणय भी नये - हानिकारा ने स्वय ही कर लियादि कौन आधुनिकता बाघ से सयुक्त यषाय भूमिका वादी प्रामाणिक लेखक हैं और फोन मौयरीधार वाला व्यक्तिगत कुठाओं एव विमतिया से पीडित दथित लेखक हैं। इन लेखकोपर यह आरोप भी लगाया गया कि य अपने समय और ययाथ म डूबे न होने के कारण नितात पसनल, व्यक्तिगत स्वर से आपूण थे । इस काल के लेखको की रचनाआ को कविता के इतिहास के सदृश कहानीका रीतिकाल कहा गया। "लेखक को अपना दमित वासनाआ और युगा से ग्रस्त उपजीवी पात्र (इस रीतिकालीन कहानी में) अवतरित होने लगते हैं । प्रम से उद्भून अपने परिवेश म सास लेता सामाजिक जहा वाला मनुष्य वही रुका रह जाता है और दीदी तथा भाभी या वहिन जी के रिश्त चाल व्यक्तिया में कामुक्ता समसाने लगती हैं । भाभीवाद और दीदीवाद का यह युग बीते अभी बहुत दिन नहीं हुए।' स्पष्ट है कि ऊपर का यह उद्धरण जने द्रव क्यासाहित्य से चस्पा कर दिया जाता है और जन'द्र नये वहानीकारावी दृष्टि म रीतिकालीन सवेदना वाले लेखक ठहरत हैं । मैं रीतिमाल श से जो समझ पाया हूँ वह काम वासना या शृगार भावना की अभियक्ति के साथ नारियो के प्रति ललक का द्योतक है। नारिया पी सष्टि म यौन सम्बधा का उद्याम वग भी रीतिकाल जसा ही इन कहानिया म होना चाहिए । वहा जाता है कि जने द्र के नारी पात्राम यह दमित अतृप्ति, कामवासना वो समसाहट है उनक त्याग या समपण में कोइ उदात्त भाव नहीं है । मैं गा की वहम म न पडक्र रेवल इतना रहना चाहता हूँ कि जनेद्र विचार दशन को न समझ कर उनक नारी पात्रो म केवल कामुकता देखपाना एकागी दृष्टि या पक्षारीय दृष्टि का फन है । जने द्र नारी पायो का देह-समपण भी एक विशिष्ट भूमि पर हुआ है जोर वह पीटा के दश को उभारने के साथ चुनौती भी लेकर आया है । यदि रीतिकालीन शृगार भावना जने द्र को अभीष्ट होती तो वे प्रेमच द स पहले के कथा साहित्य मे जीवित रहते द्विवेदी युग से भी पहले के लेखक में फेंदिय जाते प्रेमच दोतर कथा सटि अग्रदूत न बन पाते। रोमानी अनुभूतियो का चित्रण क्या साहित्य वा वष्य विषय रहा है । आज वे नये कहानीकार भी इसे बचा नहीं पाय हैं। मैं समझता हूं कि इमे kathiya कहाना अनुभव और शिल्प ! रा सचार होता है । यदि इसी भावबोध को आधुनिकता के लिए ग्रहण किया जाए तो जनेद्र भी आधुनिकता से दूर नहीं ठहरते । उहाने समाज के भीतर से व्यक्ति को प्रवडा है। व्यक्ति है तो समाज का सगठन भी बनता है । निया- क्तिक समाज सगटन की बात जने द्र ने कही नही कही। फलत जनेद्र उस बोध से अवगत रहते हुए कहानी लिखते रहे हैं जो यक्ति को उद्वलित करता है और समाज को व्यक्ति माध्यम से भादोलित । कभी कभी ऐसा भी होता है कि कहानीकार का अपना परिवेश उमसे दूर जाता है और वह किसी कलित परिवेग को अक्ति करने मे लीन हो जाता है । रोमास और भावुक्ता पूण कहानियो की चरम परिणति एसे अयथाथ बाध में होती है जो केवल कल्पना की सासो वे ताने बाने पर निभर घरता है । कल्पना की यह रंगीन दुनिया प्राय सभी लेखको व पाम होती है किन्तु केवल रगीनी ही कहानी नहीं हो सकती । जने द्र ने अपनी प्रारम्भिक कहानियो म कुछ रोमानी रगोनियां समेटी थी रितु उनका विचार पक्ष उन रगोनियो म दूब करसोया नहीं था। जने द्रको दृष्टि भले ही आधुनिकता के तथा कथित मूल्य पर न रही हो मितु सहज स्वाभाविक रूप से वे जो लिखते रहे थे वह विचारो को म्होपोह से ओतप्रोत था और एक सीमा तक वह विचार आधुनिक कहा जा सकता है। जिस सामानिक चेतना को अत्यधिक स्पष्ट और उजागर करन का आग्रह बाज का नया कहानीकार कर रहा है वह एक अथ में नयी अभिव्यक्ति है । मानव मानव के बीच उभरते आकार धारण करते या टूटते सम्ब पा को उनके सभी सभा य सभी मे अक्ति करना बहानीकार के लिए आवश्यक हो गया है । सामाजिक चेतना को नये भाववोघ का आकार बनात ही रूढिया बरनाओं अपविश्वासा जडमा यताया और मिथ्याचार राहितामा काखाखला- पन उदघाटित करना आज रचनाकार के लेखन इम मे समाविष्ट हो जाता है। जनेद्र का स्वातत्र्य पूर्व कहानियो मे इस प्रकार की अन चुनौतियां हैं जो रूद और गह का सडसड कर समाज के परम्परामुक्न माग को बदलने पा सकेत देती हैं । जनद्र ने यह चुनौनी न तो किसी पूर्व निश्चित योजना के भूमिका रूप में प्रस्तुत की है और न उनका ध्येय यह रहा है कि सामाजिक चेतना की स्थापना के लिए कहानी लिखी जाए। कहानी लिखी गई और जा कुछ कहा गया उसम से यदि कोई चुनौती, प्रहार या आक्रोश निकल सका है तो वही स्वामाविक है, कहानी की यही सहज परिणति है। जनेद्र को कुछ कहानियो में कतिपय सैद्धान्तिक तत्व भी टूढे जा सक्त हैं। कोई उनकी कहानी को पढकर शायद उहें सत्याग्रही ठहरा दें, काई उनको अहिंसक वत्ति का सधान करे, कोई कह सकता है कि जने द नतिक मूल्यो को परीक्षा का उपक्रम करते है ! काई कहगा कि जनद्र गाधीवाद की स्थापना में लिए चरमहिमा की कल्पित कल्पना करते हैं। किसी का मत होगा कि जैनेन्द्र ने अपनी पचारिक सम्पदा को उलझे हुए रूप में कथा में ढाला है जो पाठक के लिये बम और स्वय लेबर के लिए अधिक है। इसी प्रकार के और भी अनक आरोप अभियाग जनद्र की नयी पुरानी कहानिमा पर पाप जा सक्त हैं। बनद्र इन आरोपों का उत्तर प्रतिवादी बनार नदी वरन केवल ए और कहानी लिम्ब कर चुपके से प्रस्तुत कर देते है । 'विज्ञान और अविज्ञान' शीपक कहानियां उनक भीतर के मथन पर प्रतिफलन ता है ही कितु 4 आग " नैतिक मूल्य एव आधुनिक बोध को भी स्पष्ट करती हैं। विज्ञान केवल देह को माप पर टिकी है माग की माप विनान को न तो अभीष्ट है और न शायद उसके लिए सभव हो । जो कुछ मापा जा रहा है वह विज्ञान की अपूण दृष्टि का प्रतिफलन है। पार्थिव दृष्टि को इस कहानी म लेखक ने नयो जिन्दगी के परिप्रेक्ष्य म रख पर आका है । इस कहानी के द्वारा भी जनेद्र न एक सत्य का इगित रिया है, सत्य का प्रतिपादन न तो है अभीष्ट और शायद पाटर को ही अभिप्रेत हा ! चुटीला समेत प्रतिपादन से वही बढकर है। माज के कहानीकार यथाथ चित्रण पर अधिक बल दे रहे है। उनका कहना है कि हमारी पहानी प्रामाणिक्ता पर आधित है। कल्पना के मोहर चित्र, जिहे मिध्या चित्र कहना अधिक सगत होगा, आज की कहानी म नहीं है। जनेद्र ने इस सम्बध में विसी अतिवादी स्थिति को स्वीकार नहीं दिया। पपाथ चित्रण लिए जनेद्र ने किसी भी आरोपित मर्यादाअर्थात् प्रामाणिक्ता २४ कहानी अनुभव और शिर आदि का दम नही दिया । जने द्र का कहना है हा रहा है या और जा हम चाहत हैं इन दोनो के मध्य मदा यवधान रहता है। लखन का सारा व्यापार "म व्यवधान में चलता है । इच्छा भावना और क्सना, रचना के अनिवाय तत्त्व हैं। जो है और होना चाहिए इनके द्वद्ध मे से ही लेपन की प्रेरणा उद्भत होती है । यह कैसे हो सकता है कि यथाथ म में सो फीसदी सिद्ध अनुमव वरू । कारण, मैं चाहता अवश्य उसस अधिक जो जिसे सो फीसदी यथाथ वहा जाता वहाँ कामना और घटना के बीच अतर नही रह जाना चाहिये। लेकिन क्या ऐसी स्थिति बन पाती है ? यदि बनती मान ली जाए तो वहाँ समय समाप्त हो कर रह जायेगा। दूसरे शब्दो म पुरुष का अथ पुरुषाथ मृत हो जायगा। कुछ है जो यथार्थ चित्रण से परे है उसका सकेत साहित्य म अनियाय है । जो सर्वागत यथाथ चित्रण का दावा करते है वे जानत नीं विशायद वे दम कर रहे है । प्रत्येक ययाथ के धारण म लेखक स्वय भी रहता है । अन वह ययाप को अपने पन मे से गुजार पर ही प्रस्तुत कर पाता है । यदि मेरे पन से किंचित रचकर ययाथ आया तो वह सवथा निरपेक्ष यथाथ बैंस हुआ । यपाथ के भेद प्रभेद इसी तष्य का समेत करते हैं। कोई लेखक चरल वाह यथाथ के आधार पर नहीं लिख सकता। ऐसा हो तो उसमें सयरन की ययावश्या मात्रा न मा पायगी । लेखन क लिए अनुभूति की अनि- वायता सा बनी रहेगी और वह नितात निस्सग यथार्थ चित्रण के लिए चुनौती होगी। परम सत अनुपलम्य अर्थात थादा माना गया है। उस क्ष्य में यही 1 आज की नयी कहानी म अबहानी या एटोस्टोरी जसो विधा की चर्चा भी मुनी जाती है। शायद इसके मूल में यही है कि मानी दाटी की भुलावे की या रोमानी तज को वहानी को विचार प्रधान कहानी ने मच स हटाया था । अब विचार वा ततु इतना क्षीण हा गया कि घटना की विसी योजना की भी उमे आवश्यकता नहीं रह गई है। कहानी के अनादि इतिहास म यह एटीस्टोरी वही फिट ठगी इस पर अभी तात्विक दृष्टि से विचार नहीं हुआ है। फिर भी अहानी या ऐटी स्टोरी की चर्चा आज होनी रहती है ।

- भूमिका २५ जनेद्र इस शद को स्वीकार करने के पक्ष मे नहीं है । उनको मा यता है कि कहानी अपनी विधा मे परिवतन करती रही है। किसी एक लीक पर कहानी चले, ऐसी विवशता उसकी नहीं है । किंतु वह एटी होकर स्टोरी, या कुछ भी, साथस्ता प्राप्त करे, यह भी सभव नहीं है। हा अबहानी शब्द से सार अप निकल सकता है वह यह कि घटना में हठ पूवक सयोजन न हो, यही शायद एटी स्टोरी का आशय हो । आग्रह पूवक घटनामा को जुटाने और उनमे फिर तुक डालने के भी मैं विरुद्ध हूँ। सयोजना तो ठीक है, कि तु हठपूवक्ता से किया गया सयोजन कहानी के स्वरूप दबोचने वाला होता है।" इस सदभ मे जनेद्र अपनी एस कहानी को उदाह्त करते हैं । उनको 'इक्के में शोएक कहानी सयोजनविहीन कहानी है। कथा का चौखटा कस कर किसी सयोजन को यत्नपूर्वक उसमे नही रखा गया है । लेकिन सयोजन के बाद कहानी या वहाँ अभाव है ऐसा जनेद्र नहीं मानने । उनका कहना है कि मुक्त मान- सिक्ता + आगे यह कहानी एक प्रश्नचिह्न छोड जाती है । अर्थात आशय का अभाव वहा प्रतीत नहीं होता और सयोजन ही कहानी को साथकता प्रदान बरता है। कहानी मे गति और पदन की उपस्थिति वस्तुनिभर नहीं होती। भाव वस्तु नहीं है । ऐसी अनेक कहानियाँ जनेद्र ने लिखी हैं जिनमे भाव ने ही वस्तु का रूप ग्रहण कर लिया है । भूतवाली उनकी प्रसिद्ध कहानी म वस्तु का व्यक्त ढाँचा नहीं है। किन्तु वह कहानी गतिशीलता से स्फूत है, अत घटना के अभाव में भी वह कहानी है । अहानी उमे नहीं कहा जाएगा जिस कहानी म घटना निमरता न हो, क्या वह कहानी नहीं होगी। अगूर का छिलका पतला होता है, लेक्नि छिलया होता है । कहानी की घटना भी छिलके के सदृश ही है जितना सूक्ष्म बह छिलका होगा अगूर उतना ही अच्छा होगा। जैने द्रको मायता है कि पहानी वस्तुत गनाथ का माध्यम नही लेती उसबा तो माध्यम शब्द चित्र है। मन में चित्र अकित हो जाता है और कहानी स्प धारण करती जाती है।गद के अभियाय के माध्यम से विस्तार करना लख पा निवध लिम्बना है । इसलिए अबहानी में पर विस्तार यून और चित्राक्न अधिक हो तो ठी मे कहानी अनुभव और शिल्प ही है, किंतु उसे अकहानी यह कर रेखाबद्ध वरना जनेद्र का प्रिय नहीं है । कहानी के शिल्प के सम्दप में जनेद्र पे विषय में प्रारम्भ से ही विचित्र धारणाएं बनती बिगडती रही है । कुछ समीक्षको का मत रहा है कि जनेद्र गिल्पराहमुख हैं। दूसरे कहते हैं वि जनेद की चेतना गिल्प को अपनी पद्धति से नया रूप देती रही है, वे एक सफल एवं सचेत शिल्पी हैं। आज की कहानी में रूपहीनता को अधिकाधिक प्रश्रय मिल रहा है। उसका शिल्प वस्तु के साव सश्लिष्ट होकर शिल्पहीनता का रूप धारण करने लगा है । जनेद्र इस रूप- हीनता को स्वीकार नहीं करते । कहानी या रूप, आधार ही उसका लेकर घा, शिल्प है। यणमाला के अक्षरो मे जिस प्रकार नया कहानीवार परिवतन नही करता उसी प्रकार वह रूप की भी उपेक्षा नहीं कर सकता । मौलिक लपा वस्तु और शिल्प की अभिनता ता अनिवार है और वह सहज भावस अपना स्थान बना लेती हैं। वस्तु और शिल्प दोनो रचनाकार मे सश्लिष्ट धनु गृति से जुड़ जाते हैं अत इहे अनायास सिद्ध मानना चाहिए। अमौलिक लेगा रपशिल्प को लेकर नाना प्रयोग करते है कि तु उपलब्धि नहीं पाते । मेखन म फाम प्रतीत होने को रह न जाय यह चेप्टा आग्रही और आरद चेतना वी परिचायक है । फाम के प्रति निश्चितता निश्शक्ता मुक्त चेतना का धम है। रचनाकार के भीतर जो उपलभ्य है उसको प्राप्त करने और प्रेषणीय बनाने में को बायास हैं यही पाली और गिल्प का स्रष्टा है वि यास इसी म से निर्माण पाना है । अत उसे त्याज्य क्यों समझा जाए । जनेद्र इसी सहज और अनिवणीय पाम को मानते हैं, इमस अधिक शली शिल्प का कोई साचा होता है तो जनेद्र उसकी चिन्ता नहीं करते और उसे जानने का प्रयान भी नहीं करते। में इस पुस्ता म जनेद्र को विचार धारा को पूर्णता के साथ प्रस्तुन करने का दावा नहीं करता । जनेद्र काविचारक स्प दान को सीमामो तक फ्ला है निगे जने छ भने ही अगोकार न करें वितु हिंदी या पाठक उसे जानता है । मैंने तोवल बहाती ये सदन में कुछ बातें कार की पक्तियों में लिप्सने पी चेष्टा की है। हो सकता है कि मेरे चितन को जनेद्र एक मटरे के साप अस्वीकार कर दशि मैं तुम्हारी मा यतामा का अनुमोदन नहीं करता-मैं वह है और वह भमिका नहीं हूँ जो तुम समझते हो।" ऐसी स्थिति में दयनीय तो मैं हो ही जागा और शायद पाठक की दृष्टि मे एक सीमा तक हतप्रभ भी माना जाल । लेकिन भूमिका लिखने का अधिकार पाकर में वह सब कहना अपना क्त्तव्य सममता हू जो ईमानदारी के साथ अनुभव करता हूँ। मैंने जैने द्र की कहानी-क्ला पर यह भूमिका नहीं लिखी है-मेरी प्टि तो आज की कहानी के सदभ म जने द्र की कहानी पर रही है। इसलिए इस भूमिका का क्षेत्र अत्यत सीमित और सलक्ष्य रहा है। कहानी के परिवर्तित होते रूप प्रतिपाय, शिल्प शैली आदि पर अनेक समीक्षको के लेख प्रकाशित हुए हैं । जनेद्र से भी अनेक आलोचना और पाठको न प्रश्न पूछे हैं जो इस पुस्तक में सकलित हैं । मैं समझता हूं उन प्रश्नोतरों मे पाठक को बहुत कुछ मिलेगा जो मेरी भूमिका में नहीं है । जनाद्र से सीधे बात करने और उनके मतव्य को जानने के लिए मैं पाठर से अनुरोध परूगा कि वह मैनेद्र के उत्तरो मे प्रवेश करें। जनेद्र को पा लेना दुष्कर है ऐसा बहुत लोग मानने हैं-मैं स धूवग्रह से मुक्त हो कर पाठक से अनुरोध करता हूँ किवे इस पुस्तक का अनुगोलन करें। समग्र जीवन प्टिस अनुस्यूत जैने दवे ये उत्तर पाठक को कहानी के माध्यम से बहुत कुछ गातव्य दे सकेंगे । इस पुस्तक ममिन भिन्न समय के प्रश्नोत्तर सकलित किये गय हैं अत कही यही पुनरारतिमा थाभास मिलगा वि तु बहुत वहा भेद कही नहीं है । अनेने बीस वर्ष पहल जो मौलिक प्रेस के रूप म स्वीकारा था आज बीस वप वाद उसे नकारा नहीं है। जैनेन्द्र के चितन म ज्यो ज्या गराई आई है त्यों-यो नै तत्व के समीप ही पहुंचे है यही कारण है कि वाह्य विधान या शिल्प शली पर उनका आग्रह नहीं रहा। वे विज्ञान या पापिवता से अभिभूत नही हए -सहज रूप से विमान को स्वीकार सरने पर भी उनके भीतर पाय से कार देखने का आग्रह निरन्तर बना रहा है मही उनक चितन को समृद्धि का द्योतक है। जनद्र अस्तित्ववादी नहीं, अस्ति को पहन वाल आस्तिक हैं । अत उनकी करानी का वोर आधुनिकता पेरिमी सीमित आयाम मे न बघार भ्यापर आम्निवता रे वीघ से जुना रहता है।म समझ लेने पर जनेद्र कहानी विषय विचार विमी भी निकप पर

कहानी अनुभव और शिल्प
से जा सकते है । इस पुस्तक में सालित प्रश्नात्तरी में भी जनेद्र की कहानी
रचना प्रक्रिया का स्वरूप समझा जा सकता है । यही इस पुस्तक की सार्थकता
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अपनी कैफियत मेरा कहानी लिखना कैसे शुरू हुआ, यह याद करता हूँ तो विस्मय होता है । विस्मय शायद इसलिए कि औरों की बात मैं नहीं जानता । मेरा बारम्भ क्सिी तयारी साथ नहीं हुआ। जब तक चाहता रहा कि कहानी लिखू तब तक सोचता रह गया-~ -से रिखू ?' और जब लिखी गई, वब पता भी न था कि वह कहानी है। बात यो हुई। वक्त खाली था और मैं नहीं जानता पा कि अपना क्या बना । दुनिया में एक मां की माफ्त मेरा नाता था। शेप में दुनिया अलग पो और मैं अपने मे बद अलग था। एक बूद अलग हो कर सूग्व ही सस्ती है, मैं भी सूख ही रहा था। पर शिदगी एक अकेले तो चल ही नहीं सस्ती निवाह को कुछ वो पाहिए | उसके लिए कमाई चाहिए । तेईस चौबीस बरस को उमर हो जाय तो आदमी को कुछ करने की सुध लनी चाहिए । सुप तोलता यापर जुगत कुछ नमिलती थी। नतीजा यह कि दिन के कुछ घण्टे तो लाइमेरी के सहारे काटता पा, माको बुध खामग्वयाली और मटरगश्ती मे। इस हालत में पहली जो कहानी हुई वह यो एक पुराने साथी थे, जिनका म्याह हुआ। भाभी पढ़ी लिखी थीं। पत्रिका पढ़ती थीं और चाहती थी कि कुछ लिखें जिससे उनका लिखा छपे और साप तस्वीर भी छपे। हम भी मन ही मन यह चाहते थे। दोनों ने सोचा लिकुछ निवना पाहिए । तय हुआ कि अगले शनिवार वा दोनों को अपना लिखा हुआ एक-दूसरे के पहानी अनुमर और शिल्प सामने पेश करना होगा । शनिवार माया और देखा कि उनकी कहानी तयार पी। हमे कुछ बात पकड न बा सकी थी कि लिखा जाता। ऐसे एक हफ्ता दो हफ्ता निकल गये । भाभी तो भी कुछ न कुछ लिख जाती थी यहाँ दिमाग दुनिया भर मे घूमकर कोरा का कोरा रहता था । हम अपनी इस हार को लवर मन ही मन आछे पडे जा रहे थे । होते होते हम जड हो गये, सोच लिया कि कुछ अपने से होने हानेवाला नहीं है । यह अपना निकम्मापन इस तरह तय हो चुका था कि एक दिन घटी एक दिलचस्प घटना को हमने ज्या का स्यों कागज पर उतार डाला । जाकर भाभी को सुनाया। घटना भाई साहब थोर भाभी को लेकर थी। भाभी लाइ मगर खुश भी हुइ । मैं मानता हू कि वह पहनी कहानी थी जो फिर जाने क्या हुई । दूसरी तीसरी और चौथी-पांचवी पहानियो या बानय यो बना कि एक मित्र सन २० २१ की गर्मा गम देश सेना के बार सन् २६ २७ होते होते खाली हाथ हो गये । अब क्या करें? जमने की जगह हा तो नेतागिरी के पाम की भी सुविधा हो जाए। यो आँधी के वक्त की बात दूसरी है, ठडे यक्त की दूसरी । सो मित्र-बडे विलक्षण बडे योग्य-अत मे शायद पच्चीस रुपये पर एक पाठगाना म मुख्य अध्यापक हुए। पाठशाला छोटी थी पर उनक स्याल बहे थे। महाशय ने तीसरी चौथी क्लास के विद्यापियाको लेर यहाँ एक हाथ निखी पत्रिका निकालनी शुरू की । मुझे लिखा कि उसमे सुम भी लिखो। यही पता होता कि यह तो लेखक बनने का रास्ता बन रहा है तो मरा जी डूब जाता । सच कहता हूँ मैं ऐसो दुस्सम्भावना का बोझ तव नहीं उठा सपना था । सो मित्र का सत आता और मैं जवाब लिख भेजता । जवाब जरा सम्बा भी हो जाता और सूझ मे गो उलझता, ओंक देता । इस तरह पायद छ महीने हुए हागे कि मित्र वा वहाँ से पत्ता कट गया । मिवल सो साप अपनी हाप लिखी पत्रिका के अक भी उठाते लाये। उन दिनों एक हितपी बुजुग कभी-यभी पर पधाग करते थे। ठाली उत्सुकता मे पत्रिका मार होने देसे और कहीं जा रहे पे तो साय ते गये।

अपनी कैफियत एलो छुट्टी हुई। लेकिन दो एक महीने वार लाइब्रेरी में बैठा हुआ देखता पया हूँ कि 'विशाल भारत में 'श्री जिनेन्द्र की कहानी छपी है 'खेल' । यह खेल' तो जरूर मेरा है तो क्या 'विशाल भारत' में छपनेवाला 'यो जिनेद्र मैं ही हूँ। दिल उठता था और गिरता था। जाने किस पडी यह कहानी लिखी गई थी, खेल कि अब कई जगह पपी देखना हूँ कि वह "एक चीज है। क्यो न हो, लोग कहते हैं तो शहर होगी वह 'चोश'। पर सच मानिये, यदि उसके भी चीरा होने का जरा भी गुमान होता तो 'खेल' का वह खेल जैनेन्द्र में न हो पाता। पहानी का लिखना तो ऐमे गुरू हुआ, पर उसके कुछ काल जारी रहने का भेद दूसरा है। वह रहस्य यह कि शायर सेल' के ही पारिश्रमिक स्वरूप 'विशाल भारत' से चार रुपये का मनीाहर चला आया। मनोआडर या आया मेरे आगे तो तिलिस्म खुल गया । इन तेईस चोवीस बरसो को दुनिया मे पिता पर भी मैं क्या तनिक उम द्वार को टोह पा साा या नि जिमम से रुपये का आगमन होता है । या मेरे आगे फरिश्ते के मानिद था, जिसका जम जान विस लोव का है । अवश्य वह इस लो का तो है नहीं। वह तिथि की मांति मेरे 'खेल के परिणामस्वरूप मेरे, घर आ पधारा, तो एकाएक मैं अभिभूत हो रहा । मेरी मां को भी कम विस्मय नहीं हुआ। तो बेटे के निकम्मेपन की भी कुछ कीमत है। मां से ज्यान देटा अपने निकम्मेपन को जानता था। पर विशाल भारत' के मनीमाडर से मालूम हा कि आदमी अपन का नहीं जान माना । दुनिया भनि विचित्र है और जाने यहाँ विसका क्या मोल लग जाय । मोल भाव यही असली है नहीं इस लिए उनकी तोल भी मनमानी है। खर, फिर तो कुछ और भी लिखा। उसी जमाने की एक बात याद यानी है। पाठशाला वाले मित्र के पहले खत के जवाब में मैंने कुछ लिखना शुरू किया । उस क्या मे एक पलिक लीडर मच पर आते हैं जो भारत माता की याद अप्रेजी में ही पर पाते हैं। कहानी पूरी हुई तो मालूम हुआ किमपनी भारतमाता की भक्ति तो खामी ऊंची अग्रेजी में यह महोदय पर कहानी अनुभव और शिल्प गये हैं-तीसरी चौथी क्लास के बच्चो की समझ तक वह कसे उतरेगी? इससे उस रचना को मैंने अपने पास रोक रखा दूसरा कुछ और लिख भेजा। पहली रचना को शीपक लिया गया था 'देशप्रेम' । वह मेरा 'देशप्रेम एक दिन दिल्ली के एक मासिक पत्र के कार्यालय मे मेरे हाथों से छिन गया। पर तीन- चार महीने हो गये उसकी सूरत उस पत्रिका म देखने में नही आई। मैं डरते-डरते कार्यालय में पहुंचा । सपादक, जो मालिक भी थे, बोले मिलापका लिखा हुआ साफ नहीं था और अशुद्ध भी था। अत हमारे सहा- यक गये तो उसे साथ ले गये थे। देखिये सभी इस डाक से उसकी शुद्ध प्रति- लिपि भेजी है । अब अगले अक मे वह जा रहा है। मैंने रचना देखनी चाही तो सपादक ने मेरे हाथो मे दे दी। मैंने खडे-बडे उमे उलटा पुलटा कि मस्तक हाथ म लेकर वापस कुर्सी मे भा रहा । देखता हूँ कि सचमुच ही रचना को एकत्म शुद्ध बना दिया गया मैंने सपाय से कहा कि यह रचना मुझे ले जाने दीजिये कारण नि- सदेह यह गुद तो है पर वह मेरी नहीं रही है । अपने से अधिक शुद्धता मेरा नाम कसे उठा सकेगी। सपारक हंसकर बोले, जसी आपकी इच्छा !ल जाइये । लेकिन आपकी एप पहानी तो हमारी हो चुकी है यह ले जा सकते हैं । लेकिन दूसरी देनी होगी, और फल पाम तक मिल जानी चाहिए। मैंने कहा कि यह बम सभव है ? बोले तो रहने दीजिए यही छप जायगी। पहा कि इतनी शुद्ध होकर यह मेरे नाम से पसे छप सकती है, क्योकि मैं वहाँ उतना सुद हूँ? बोल, तो कल दफ्तर के समय तक दूसरी रचना देने का वाया कीजिये। माप पहेंगे कि क्या वह रचना खरीद ली गई थी? नहीं, पर पैसे के अधिकार से वहा प्रेम या अधिकार होता है। सपा वजी का, जो पि मालिक भी थे, मेरी उस रचना पर वही अधिकार था । ।

393c अपनी कैफियत . मैंने कहा कि अच्छा, कोशिश करूगा । दोले, कोशिश नही, वायता कीजिये । क्ल चार बजे तक पहुंचा देने का घायदा करे तो यह ले जा सकते हैं। मेरी हालत दयनीय थी । लेखक को दयनीय होना भी चाहिए । उसका अधिकार केवल क्त्तव्य है । लेकिन मैं अतिपरिशुद्ध अपना वह देगप्रेम' वहीं से छोड सकता था? उस 'देगप्रेम' को अच्छी तरह काटा छोला गया था। मुझे. तो ऐसा लगा कि मरम्मत से जगह जगह उस बेचारे देश प्रेम मे लहू को लाली उमर आई है। सपादक जी बोले कहिये पायदा करते है अपने देश की बेहद छिली और रंदी दशा का देखते हुए नीची माखो से मैंने कहा, अच्छा ! सपादक जी बोले, तो खुशी से ले जाइए। यह सुनते ही उस देश प्रेम को मोड माडकर जेब मे डाल में तत्काल कार्यालय से बाहर आ गया। यह लगभग नाम पा समप पा । गर्मियो के दिन थे। घर माया, खाना खाया कोठरी से निकाल कर खटोली खुले खंडहर पर बाहर डाली और सोचने लगा कि कल क्या करूगा । मन एक बोझ से दबा हुआ था और कल्पना उड न पाती थी। रात हुई और उसी खडहर पर खटिया डाले ऊपर देखता में पड़ा रहा । मेरे और तारों के बीच केवल मूल्य था। ऐसे समय मुझे नेपोलियन का नाम याद आया । क्या वह सफल हुआ उसका जीवन साथ हुआ वह तप्ति लेकर गया ? क्या उसम या विसी में अपने आश को बिठाया जा सकता है ? क्या मादा को अपने से बाहर रख कर देखना होगा? आदश को अपने से दूर, अलग, किसी दूसरे म आरोपित करने से चलेगा नहीं ऐसे खयाल पर सपाल आते रहे । ही दे बहाव मे मन मे उठा कि अच्छी बात है, एक पात्र उठाया जाय जो नेपोलियन मे अपना आदश डालकर चले । दूसरा उसरे मुकाबले का पात्र हो जो अपने आदश के बारे में मुखर न 2 क्या कहानी अनुभव और शिल्प हो । ये दोनो फिर आपस मे दूर न हो, बल्कि घनिष्ठ हा पर ये सव विचार आपस में ऐसे धुले मिले धूमिल थे कि वे थे ही, यह भी कहना कठिन है। सब कुछ वाय य ही था। इसी हालत मे शन शन नीद मा गई । सवेरे उठकर निवृत होना था "वि याद आया, चार बजे तक कहानी पहुंचानी है। मन को झुझलाहट हुई । उसने विद्रोह करना चाहा । पर अपने से कोई बचाव न था, कारण मुभमे असली शक्ति ही न थी। इसलिए वचनबद्धता को जकड मुझसे टूट न सकती थी। मत लिखने बठना पड़ा। उस समय रात की उठी हुई अस्पष्ट सी घुमडन सूझ आई । बस उसका सहारा थाम मैं लिख चला । अत मे पाया कि स्पर्धा पहानी बन गई है। वह कहानी सन शन से बनती गई और उसके उपकरण कसे-कसे लिखने के साथ साथ मन में और मस्तिष्क में जुटते चले गये--उस विषय को यहाँ छोडे देता हू यद्यपि कहानी के अतरग निर्माण को स्वय समझने की दृष्टि से विपय काफी सगत है। खर, कहानी हुई और उसे गुढी मुढी कर मैंने जेब मे डाला । पहानी जसी जो स्लिप भाई-लम्बी, कम लम्बी छोटी--उसी पर निग्वी गई थी। इसरो यह लपटी ही जा सकती यो उसकी तह नहीं की जा सकती थी। उस रोज ठीक याद नहीं पड़ता कि क्यो, पर पांच रुपये की मुझे बेहद जरूरत थी। मा से मांग नहीं सकता था। वे पांच रुपये अपने लिए नहीं विसी और ही जरूरी आवश्यकता के लिए चाहिए थे। खर तीसरे पहर का रामय और में बता पदल । फतेहपुरी पर मुझे भाई कृपभवरण मिले । बोले, कहाँ ! कहा जा रहे हो ?-मो, यह जेब आज कस फूली हुई है । और देखते-देखते जेब से लिखे यागजी पी शैल रहोंन निकाल ली। ओषफोह, कहानी है ! तो कहानी लिखी है ! यहाँ ले जा रहे हो ? मैंने बताया कि अमुक कार्यालय म ले जा रहा हूं और ५ ३० की जरूरत 1 अपनी कैनियत है। सोचता हूँ कि कहूंगा कि उधार ही सही, इस पहानी पर पांच रुपये हो दे दें तो एहसान हो। ऋपम माई की सलाह यो कि मैं ऐसा न करूं, क्योंकि उससे कोई फायदा न होगा। खर पहुंच कर कहानी की रील सम्पादकजी को दिखलाई और ५)रु. को अपनी गरज भी जतला दी। सपा-कजी लेखकों को पारिश्रमिक अवश्य और काफी परिमाण म दे देना चाहते थे। बम, प्रतीक्षा यह थी कि पत्रिका नफा देने लगे। तब तक मन पर पत्थर रखकर उहें अपनी असमयता प्रकट करनी ही पडेगी। मैं नहीं जानता कि तब ऐमी मटर मुझे क्या मा गई थी। मैंने कहा कि मैं तो उधार चाहता है। पर सपादाजी अममय ही थे । उहोंने कहा कि आप चाहें तो कहानी ले जाइये यद्यपि देखा जाय तो पहानी हमारी हो चुका है। पर क्या कहूँ, कहानी पर पसा दने की स्थिति तो बिल्कुल नहीं है। लौट आया और यह कहानी फिर गायद एकाघ महीने भेरे पास ही पढी रही । फिर एक दिन कमर म साहस वाधकर मैंने क्या किया कि अपनी उस स्पर्धा' को प्रमचरजी के पते पर रवाना कर दिया। साथ ही एक पत्र लिखा कि 'माधुरी' सपादन नहीं कहानी-सम्राट प्रेमचंद को यह भेज रहा हूँ और पाने के लिए नही वस कुछ जानने भर के लिए वह साम बन पड रहा है । हाक में डालकर घडरते मन से जवाब का इताशर वरने लगा। छ सात दिन म छपा काह गया, जिसमे लिखा पा कि कहानी सघयवाद वापस पी जा रही है । कहानी का वापसी पर चाहे मन से खिन ही होना चाहा, पर उसके सपयवा ने उस पानी-मानी कर रखा। पत्र पर प्रमपदजी के दस्तखत न थे। चलो, बखेडा बरा । जिन्दगी की मुक्ति मौत में है और याशा की सफनता निरागा मे । पर हाय राम, कागजा को सबसे पिछली स्लिपि की पीठ पर फोकी स्याही म अग्रेजी में यह मैं क्या लिखा देखता हो न हो, ये प्रेम पट अक्षर है। लिखा है-Please ask if this is a translation कहानी अनुभव और शिल्प पहना चाहिये कि प्रेमच दजी के परिचय का द्वार उस राह से मेरे लिए खुला। मैंने उस पर उन्ह कुछ नही लिखा। सिफ कुछ दिन बाद एक दूसरी वहानी भेज दी। 'स्पर्द्धा कहानी के पात्र विदेगी थे और ढग विदेशी था। उसकी एक लाचारी हो गई थी। दूसरी कहानी मास पास को लेकर थी। बस, उस अधे के भेद स चिट्ठी पत्री शुरू हो गई। यहाँ शायद आप प्रमच दजी की कहानी कला पर कुछ कहने की मुझसे अपेक्षा रखते हो । सचमुच मैं अधिक नहीं कह सकता । मैंने पहले ही निवेदन कर दिया था। अपनी कफियत देने के सिलसिले म कुछ आ जाय तो आ सस्ता है। प्रेमच द जी को मैं कहानी की क्ला के विषय म बात करने तक कभी न ला सका। यों तो कोशिश भी विशेष न की पर जब उस तरह की बात आयी वह टाल ही गये । कहानी उनके लिए निर्जीव तत्त्व न थी । इसस उसकी टेकनीक पर रस के साथ वह चर्चा भी क्या कर सकते थे ! कहानी मे मानव चरित्र और मानव हुत्य उनके लिए प्रधान था। लेखन सम्बधी दूसरी फ्ला- गिल्प की बातें एकदम गौण था। एष पार प्रेमचद ने कहा, जने द्र उप यास लिखो । मैंने कहा कसे ससे बोले अरे घर में नाते रिश्तेदार जो हा, बस, उही को लेकर सिख दो। यह बात बाज भी मुझे याद है । मैं नातदारों को लकर नही निम्न समा न ही लिप पाता हूं यह बात बिल्कुल अलग है । लेकिन प्रेमव दजी नौ सलाह पक्की है और सच्ची है । यानी प्रमचर को वह सही-सही व्यक्त परती है । प्रेमच दजी वी क्ला का मूल उनको उस सीख मे बसा है । दूर कहाँ पाना है । आस पाम के जीवन मे ही जो जीते जागते व्यक्ति तरह नरह के स्वभाव लेकर तरह तरह के कम करते हुए निम रहे हैं उनमे हो तुम क्या नहीं पा सकते हो ? किसी परिवार को रे लो। तीन पीढ़ियां तो मिल ही जाती । उनके जीवन-म्यापार पर अक्ति है ठा तीनों पीढ़ियों का इतिहास ।

चपनी कैफियत जीवन की गति के विकास का भी उसमे से शोधा जा सकता है । उही के मनिट जीवन चित्र मे से नीति और दगन के निचोड को भी पाया जा सकता है। मेरा अनुमान है कि उनकी कहानिया के चौखटे आस-पास के यथाथ पर से उठाकर किये गये हैं। उनकी कहानियों का प्राण व्यवहार धम है। उनके पात्र सामाजिक हैं । उनके चरित्र महान् इसलिए नहीं है कि प्रेमचदजी ने उन्हें महान् बनने देना नहीं चाहा है । सबके सभी गुण-दोपो के पुज हैं । किसी मा दोप विराट अथवा कि इतनी सघनता से वाला नहीं बन पाता कि उसी में चमक मा जाय, न किसी का गुण हिमालय की भांति शुभ और मनोविक काति देने वाला बन पाता है। सोमत आत्मी की समावनाओं से परे उनके पात्र नहीं जाते । कल्पना की प्रेमव उठने देने हैं, पर रोमास नव नहीं उठने देते। जैसे उहोंने अपने को एक क्त्तव्य मे बांध लिया है और वह क्त्तव्य उनका वतमान के प्रति है। मोष से और मानव की भवित-पताओं की अमित सभावनाआ में उनका इतना सम्बध नहीं है जितना कि मनुष्य-ममाज और उसको आज की समस्याओं से है । वह समाज हित पिता से छूट नहीं सकते। यह उनको शक्ति और यही उनकी सीमा है । एक राज बाल, जैन मुझ में प्रतिभा नहीं है। मैं तो 'प्लाड करता । महीने में दो कहानी पूरी कर दू तो सममू, बहुत हुआ । मुभम वह वेग नहीं है जिस प्रतिभा का लक्षण माना जाय । इम वक्तव्य को भी मैं उनक व्यक्तित्व की दृष्टि से बहुत लामणिक वह सकता हूं। वह साधनापूर्वक साहित्यकार थे। साहित्य उनके लिए विनोद या विलास रूप न था। वह कहानी गरते थे, तयार करते थे उसे निकाल मसें फेंकते थे। मैंने उहें उपयास लिखते हुए देखा है । घाटी कहानी के बारे में तो नहीं कह साता । गापद हो कि कहानी भी एक से अधिक बैठका म वह विपते हों। पायद उनके उपयास लिखने की पति से दहानी के ढग पर कहानी अनुभव और शिरुप । भी प्रकाश पडता हो। उनको रफ पाण्डुलिपियो के शुरू में अक्सर उपयारा के कुछ परिच्छता का सिनोप्सिस मैंने देखा है । पात्रो के नामो की फहरिस्त कही-कही अलग लिखी मिली है । फिर उन पात्रो के अलग अलग चरित्रो की पल्पना को पल्लवित किया गया है । जसे दमय ती-साधारण सुदर । शील का गव रखती है। कम, पर तेज बोलने वाली। वात्सल्यमयी, पर ईर्ष्यालु इत्यादि। इस प्रकार परिस्थिति से पृथक और पूर्व पात्र की रूप रेखा को निर्दिष्ट करके चलने में शायद प्रेमच द सुविधा देखते थे। उसी भाति प्लाट का भी एक खाका बना लते थे । पानी, पूर्व परिस्थितियो मे से ही परवर्ती स्थिति पैदा होने दी जाय यह नहीं, बल्कि पूर्व मोर अपर ये दोनो स्थितियों पहल स निश्चित करली जाती थी। इसीलिए उनकी रचनाआ मे वसी सरलता नहीं है कि पान हाथ न आते हो बच-बच जाते हा, उनकी रेखाएं काफी उभारदार हैं। लेक्नि जसा कि पहले कहा प्रमचद म एर यही विशेषता थी । वह पह कि वह क्या रचना का अपने पास सांचा कोई नही रखते थे, न साँचे में होने में विश्वास रखते थे। इसलिए यदि कभी मैंने नौसिखिये की भांति चाहा भी वि हाथ पकड कर वह मुझे कहानी लिख चलना बताए तो उस दुरागा म उहोने कभी मरी सहायता नहीं की। और मैं मानता है कि इस मामल म मुझे अपने ऊपर रहने देना, किसी तरह का माराप मुझ पर न आने देश ही उनकी बड़ी सहायता थी। अब मैं नहीं जानता कि मुझस अपने लिखने के बारे में पूछा जा सकता है या क्या। पूछा हो जाय तो मैं उसका एक और चौवद उत्तर नही है साता । कुछ कहानियों बाहर स लकर भी निखी हैं । जस वि एक अभा भिखारी गली में आ जाया करता था। मेरी भानजी, जो अब आकर तमीमठ मे मुमसे भी युजुग बन गई है धोलो मामा, इस अधे पर बहानी तिखो। मैने कहा, अच्छा!

अपनी कैतियत कहानी शुरू होने में तो दिक्कत न थी। यानी कि मेरी जिदगी चल रही है उसके अपने दायरे और अपनी व्यस्तताएं हैं उन दायरो को आ टूता है एक अधा भिखारी ! चलो, यहाँ तक तो जो घटा वही लिख दिया गया। आगे क्या किया जाय ? आगे जो भी हो, कल्पना के बल पर ही किया जा सकता था। इसलिए कुछ तो कल्पना को उस अधे के अतीत की ओर बढ़ने दिया, और तनिक भविष्य की ओर कल्पना को आँखा से मैंने देखा कि उसके दो बच्चे हैं और पत्नी भी है । एक छोटी सी कोठरी मे रहता है. जैस.. तसे बच्चो का पेट पालता है। स्त्री ? नहीं, वह साथ नहीं है कैसे हो? वञ्चो के लिए भीख को रोटो काफी कहाँ होती है । पेट के लिए हो भी जाय,. पढ़ाई के लिए? इससे स्त्री को भी कुछ कमाई करनी चाहिए। और वह मां बाप बेटे के लिए पेशा करती है। और हाँ, उसीने पति की आंखें फोडी हैं इसस वेश्या बन कर अपने को नरक मे डाले, यही उसने अपने लिए दड. चुन लिया है । इत्यादि इत्यादि । बस, इस नरह वत्तमान पर जो वह अधा आया था, उसको तनिक अतीत और अनागत की ओर फला कर देखा कि कहानी हाथ आ गई । कहानी जीवन का इतिवृत्त ही तो है । यानी उसम स्थिति से स्थित्यतर इस प्रकार पटित होना चाहिए कि जीवन का अमाप तक उभरे । काल का कुछ स्पदन, कुछ तनाव अनुभव हो । वही तो कहानी का रस है । यह पटित के द्वारा अनुभव कराया जाय, या चाहे तो बिना घटना ने ही मम म उतार दिया जाय । अतएव ऐसी भी सफल कहानियां है जिनमे खोजो तो घटना तो है नही, फिर भी रस भरा और पूरा है । ऊपर 'अधे का भेद' कहानी के उदाहरण में वास्तव घटना या यथाथ पात्र मे कहानी आरम्भ हुई। पर मेरे साथ अधिकाश ऐसा नही भी होता है । जसे कि पहले स्पर्दा का जिक आ चुका है। वह एक्दम विचार मे से बना ली गई रचना है । समूची कहानी जसे इस प्रतिपाद्य के प्रतिदान के लिए है कि पाश को अमुक मूत व्यक्ति या प्रतिमा म डालकर और फिर उसके प्रति अपना रूमानी सम्बध बनाकर चलना सफल नहीं होगा। वरच आदश की तो मौन एव तत्पर आराधना ही फलदायक हो पायगी । इस धारणा मे । 1 । कहानी अनुभव और शिवर से ही पात्र वन खडे हुए और उनके घात प्रतिघात से कुछ घटना क्रम भी बन गया । मेरे मत से उसमे चरित्र प्रधान नहीं बलि परिणाम और भाव प्रधान है। मैं नहीं कह सकता कि इस प्रकार लिखी गई कहानियों को सोद्दश्य कहना गलत होगा, या वि सहो । निरुद्दश्य यहाँ कुछ है यह कहना भी कम जाखिम भरा नहीं है। मुक कहानियां हैं जो मानो कि न प्रमेय पर और न प्राप्त पर ही लिखी गई हैं। एक बार का स्मरण है कि सध्यानन्तर अकेले एक मान म से जाते हुए मुझे अपनी चेतता पर एक अजब तरह का दबाव अनुभव हुआ। था कही कुछ नहीं तो भी एक डर लगा। बाहर का न-कुछ ही जसे जाने क्या कुछ मेरे लिए हो गया था और उसकी सीधी प्रतिक्रिया मेरे अतश्चेतन पर होती थी। मैं तेज 'चलने लगा था और सांस फूल आई थी। छाती धक धक कर रही थी। वह कुछ एक ऐसा अनुभव पा कि कुछ देर टिकता और अधिक तीव्र होता तो उसके नीचे जान हो सुन पड जा सकती थी। कोरे हर से जाने क्तिने मर गये हैं। यह डर, जिमे कोरा कहते हैं क्या है ? यह कुछ है अवश्य । और मानो उसी का सचेतन भाव से पुन स्पा पाने के लिए मैंने एक कहानी लिख दी। उसमें तो पात्र भी नहीं है घटना भी नहीं है, केवल मान वातावरण है। उसमे प्राणी तो प्रेत के मानिंद, जिनम देह ही नही और वे निरे सभ्रम के बने हैं। ऐसी कहानियों मे सोते पेड विछी पास, बहता पानी सूना विस्तार, रुकी वायु, टिका आमगार, मटमला अंधियारा ये ही जसे व्यक्तिगत सना धारण कर लेते हैं । ऐस धरती आसमान से बातें करने लगती है और जो बचर है वह भी मनुष्य की वाणी बोलने लगता है । पया मुझे मानना होगा कि जहां पेड, पौधे और विडियो भादमी की योली म बोलते हैं यह कहानी अययाय है ? क्या वह एक्टम अवास्तव है इस लए निरी व्यय वस्तु है ? समव है वह हो अवास्तव और अयपाप और किसी के लिए एक म व्यप भी हो सकती है। पर हर भी तो अयपाय ही है । पर जो अपनी कैफियत डर के मारे मर तक गया है, उमको मत्यु ही क्या उसके निक्ट उस डर के अत्यत यथाथ होने का प्रमाण नहीं है ? इसलिए मैं मानता हूँ कि वातावरण प्रधान कहानियाँ मनिप्ट और अनु- पयागी नही हैं। वल्कि चूकि उनमे अस्थि मास की देह नहीं है, इमलिए हो सकता है कि उनम स्थायित्व कदाचित अधिक ही हो । देह मत्य है, अमर आत्मा है। इससे जिसम दैहिकता स्वल्प और भावात्मकता हो उत्क्ट है, उन कहा- निया म चिरजीविता भी अधिक है ऐसा मानने को मेरा जी करता है। नभी तो जो असम्भव की रेखा को द्रुती है और जो स्थूल भौतिक जगत् वो सभवना की सीमा मे पराजित नही है, वह क्या जाने काल के कितने स्यूल पटना को भेदती हुई गतान्न्यिा से अबतक जीवित बनी हुई है। पुराणा की देवता और राक्षसवाली कहानिया, जातक को क्याएँ और ईसप की पशु पक्षिया की वार्ताएं फैन कर हमारे नित्य प्रति के जीवन मे घुल मिल गयी हैं। अत यथाथता का आवधन और अवलेप जिस पर जितना कम है वह कहानी समय की छननी म छनती हुई उतनी ही येष्ठ भी ठहरे, तो मुझे अचरज न होगा। अपनी कैफियत काफी अरसे पहले यह अपनी कैफियत दी गई थी। आज दस बरस स ऊपर हो गया । उसमे कुछ अधिक जोड़ने की इस समय रुचि नहीं है। अपना ही विश्नपण आप मुभमे न चाह । बाहर की घटनाआ या व्यविनया का प्रभाव मुझ पर क्या पड़ा यह मैं छाँट बीनकर वता नही सकता है। जो हू, उन मद प्रमावा के परिणाम में ही हूँ। अलग अलग करक उह दे सकू, तो मायर मैं स्पय कुछ भी न रह जाऊ । लमदेश को गज या कहानी का मै अपनी सवप्रिय सवश्रेष्ठ कृति समझता हूँ, एसान मान लीजिय । न प्रियता जहचीज़ है न श्रेष्ठना। दोना गुण सापेग भाव रो जहाँ तहाँ यूनाधिक परिमाण मे वटे रहते हैं। इस दृष्टि से अपनी रचनाआम चुनाव करना मेरे लिए कभी सभव नहीं हुआ । चुनौती के ।

૨૨ कहानी अनुभर और शिल्प जवाब मे भी वह मै कर नहीं पाया। इस नीलम देश की कहानी की चर्चा शायर कम ही हुई है। वह किसी बाहरी स्थिति या बोध या मत के लिए नही बनी है । वास्तव उसम कुछ है ही नहीं। देश है तो नीलम का, क्या है तो उसके माता पिता का आभास नहीं है सहस्रा वष स ऊपर उसे आयु मिली है । इस तरह कुछ भी वास्तविक्ता वहाँ नहा है । उम कथा का सारा क्लेवर मेरे अपने अतरग के भाव सूत्रो स बुना और बना है। इसलिए किसी एक कहानी का नाम जव मुझे आपको बता देना ही पड़ा ता मैंन सहज भाव से वह म ले दिया । मैं श्रद्धा का कायल हूँ। बुद्धि "यापार सत्य की उपलब्धि म अत मे तगडा ही ठहरता है। बुद्धि की इस सीमित साथक्ता और उसके आगे उसको यथता का जतलाने के लिए कहानी लिखी गई व्यथ प्रयत्न । उसी की जोड म लग भग साथ ही यह कहानी वनी, नीलमदे।। जसे वह उत्तरपम है पहली म नकार है तो इसमे स्वीकार । मैं इस रचना को अपनी मूलभूत वृत्ति की परि चायिका यह सरता हूँ। ००० निवेदन और जिज्ञासा - मई महीने के बाद चाद' के एक लेख म मेरी कहानी 'प्रामाफान के रिकार्ड को याद किया गया है। लव पर लेख का असली नाम नहीं है । मैं हठात मान लेता हूँ जि लस स्त्री नहीं है यद्यपि उपयुक्त (और सम्भव) है कि वह स्त्री हो । उनका पता मुझे हो तो सीधे उह लिखकर मैं उनस माग दान चाह लू । जहाँ वह लखर निश्चित और निशक है वहीं में स्वीकार कर लू दि मैं नही हूँ । मैं अभी राह बूझ ही रहा हूँ। प्रार्थी हूँ कि राह पा जाऊँ। इसस यहाँ मैं अपनी स्थिति लवक और पाठक के सामन रखने की इजाजत चाहता हूँ। कहानी तो कहानी है । इसके बारे में कुछ कहना क्या है। उसकी सफाई मुझपे न चाही जाय । सफाई ने लगने से या भी गुलतफहमी दूर होते कम देखी जाती है। मैं मानता ह कि उन पाठक लेखक को गलतफहमी हुई है। गाय: उ हाने मेरी और कम चीजें पढी हैं। तो भी वह इमी कहानी को दुबारा पढ़ सकते हैं तिवारा पढ सकते है । मैंने उस फिर फिर पढ़ा है। मैंने यह नहीं पाया उसके भीतर वि दुराद को पोषण मिला है। वहा भी मुझे मानय हृदय के वनानिक अनुमपान की अपनी लगन मिली है । उमसे पहले भी मुझे बताया गया पालि मेरी उपयुक्त कहानी में से कि ही वो बुराई पूरती दोख पहनी है । पढकर मैंने अपने से पूछा था कि क्या उस वहानी को 'विजया को मैं सानी सो वहिन मानने के लिए तैयार हू म प्रश्न के जवाब में मेरा मन यौपानहीं था। मैंने उत्तर पाया था कि हो क्या नही, तयार हूँ। उम लख के या भी मैने वह कहानी फिर पढ़ो और फिर अपने से वही पूछा । मन ने रहा ४४ कहानी अनुभन और शिल्प कि वेशक विजया तेरी बहिन ही तो है। इस सवाल पर मेरा मन कॉप जाता तो मैं प्राथना करता कि परमात्मा गस्ति दे कि मैं हि टी ससार से अपनी उस काली कहानी को वापस खीच लू । पर अब जर बात वसी नहीं है मैं लावा और पाठक से पूछता हूक कृपया बतावें मैं क्या करू? क्या पाठक के समक्ष कहानी वे प्रति अपनी स्वीति और अपना पूरा दायित्व ही नहीं स्वीकार पर लू? समस्याएं इसी स्थल पर खडी होती है। क्या सभी कुछ लिखा जा सकता है ? क्या निपिन कुछ है ही नहीं ? जो भरमाये फुसलाय जो बनाये और नगारी पशुता को जगाये क्या वह भी शिया ही जाय ? एक ही वस्तु म म किसी को विराग प्राप्त होता है । दूसरे म उमी व सहारे उत्तर वासना फनफना उठनी है। तो उम वस्तु के बार मे क्या शिणय किया जाय? निषेध की रेया यदि है और आवश्यक है तो उसे वहाँ खोजा और कहाँ खीचा जाय ? अनिष्ट और इप्ट साहित्य म क्या अतर है ? क्या कुछ अतर है ही नही? ये और एसे और सवाल पडे होते हैं। वे अपना हल मांगते है । मैं चाहता हूँ कि रामी फ तोग इन धाता का समाधान करने दें। मुझे लेख पढ़ार ऐगा नहीं मालूम हुआ कि उसा लम्पर ने इन प्रश्नो की गुरुना पर पूरा ध्यान गिया है । या फिर यह हो सपना है कि उनकी बात पूरी तरह में ही नहीं समझ पाया है। नेपा का काम जोखिम म भरा है । जो उसने अपने विश्वास है, मानो उस बारे में भी गनिमम हाना पड़ता है। उमम सनत जिनासा है, निर- तर प्रश्न है। अपनी मायना अपना अभिमत अपनी धारणा अपना अनुसार, का सयम उरा गिनारा लना होता है । उनमें प्रति भी वह निर तर सप्रश्न है। प्राचिना मिसासु मातरम्य हुए रिना ट्रष्य व सा' तखन के लिए ममता पा रही प्रयास नहीं रहता । राव उमा हैं फिर भी कौन सा है ?

निवन्न और जिज्ञासा ४५ वह थद्वापान है फिर भी (अथवा तभी) शकाशीत है। स्नेही है इसी से निसम्व है । इस भाति परमात्मा भी उमरे निकर आलोभ्य बनता है। वह जितना ही निस्सग हो तिमम हा उनना ही कम है । यह निममता असलग्नता, उसी अनुपात में व्यक्ति को प्राप्त होता है कि जितना गम्भीर और कठिन उसका जत स्थ प्रेम होता है । लेसर द्वप इसीलिए किसी से नहीं कर सकता, क्याकि राग नहीं कर सकता । द्वेष भी राग है । दोनो मोह ज य है । इसी से लेखक के निस्ट जर देवता भी जलोचनीय होता है तब वश्या भी विवचनीय बनती है। क्या यह ठीव नहीं है कि तेवर जज नही है ? हमारे सब विशेषण जा जनक्य की स्पर्धा म से बने हैं, जो पिनल कोर व जसे मालूम होते हैं वे लखक के लिए नहीं है। समझो कि वे उमको पहुँच स बाहर है । पापी, भारयीय घृण्य अस्पृश्य नीच शत्रु, पामर-ये ग तखक के काम के लिहाज से मोथर, ओघ निरे स्थूल पडते हैं । इनम स किसी दुविरोपण से पुकारा जाने वाला व्यक्ति लेखक के लिए वजनीय कैसे हो सकता है ? इस दुनिया स बाहर का सत्य उसके लिए अप्रतिष्ठित है । उसे दुनिया क दीना मे पतितो दलितो और पीडिता म पापिष्ठ और पापिष्ठाआ म भी उसी आत्मा को देखना है जो सत्य है जो कि एकमात्र सत्य है। जिसको समाज का यायाधीश जेल और कासी की मजा दगा, लवक को उसे भी छाती से लगाने को तयार रहना होगा । लग ज नहीं हो सकता। जज बडा आरमी हो लेखक को अपने से तुम्दातितुच्छ से भी बड़ा नही गिनना होगा । लेखा यू य है इसी सबक प्रति वह सम्मान तील होगा। विजया यदि पतिता है ता हो, लेखक उसे अपनी यहिन क्या न मान मवे ? लवक को उसके पतन मे सुख नहीं है । वन उसके दुख म दुखी है । उस पतिता को लाछना देकर, उपहास देकर लेखक पाचन नही है। उसकी दयनीयता मे स लखक को रस नही लेना है। क्यो वह उसे उतारने के लिए अपने को विसजन करने की क्षमता भी नहीं चाहता चाहता है और ठीक इसीलिए वह उस 'पतन को आर मास नही मीच सक्ता । क्योकि क्या असम्भव है कि उसरे निमित्त उमे खपना भी पई ? 7 कहानी अनुभव और शिल्प जब मैं ऊपर की बात कहता हूँ तब मुझे लगता है कि जगत् के कम क्लाप के बीच वही गहरी कोई ऐसी रेखा खीची हुई नहीं है जिसके उस पार पुण्य हो और इस पार पाप हो । पुण्य प्रम है और पाप अप्रेम के अतिरिक्त और क्या है ? अपन जी से बाहर पुण्य और पाप का यस्तित्व मुझे नहीं दीख पाया । इसलिए मैं जानता हूँ कि आलेत्य और विवेच्य वस्तु क सबध मे विधेयता और निपिद्धता को समझना हागा तो अधिकार भेद और अधिकारी भेद की अपेक्षा फे विना मात्र वस्तु गत मे उस नही सममा या सदगा। क्या वल य पाप नहीं है । क्या निर्वीयता निश्चेतनता और जडना पाप नही है ? हम निर्वीयता वो पवित्रता की परिभाषा गाढा दें तो इसस क्या वह कम पाप हो जाती है ? जिम तरह कायर और भीरु की अहिंसा अधम है, वैसे ही निस्ते रोगी का समाचार स्पृटणीय नहीं है। रोगी का रोग समझना होगा और उसक साचार के गव वो सडित हो जान देना होगा। लख म भारतीय नारी की बात कही गई है। वह ठीक है । लपिन नारीत्व भारत म समाप्त नहीं है। नारी यनि यारणीय है ता इस त के ही साथ नही कि वह भारतीय हो। यदि नारी भारतीय रा स्तर है तो इस कारण वह कम सम्माननीय और अधिक थालोच्य नही बन जाती । जान पडता है कि भारतीय होरर नारी लसर के निकट मिचित कम आर पी पात्र रह जाती है। मैं इस दम्भ के विरुद्ध हू भले वह राष्ट्रीय हो। भारतीय संस्कृति में समथक हान का यह अथ मैं अपन लिए नहा लगाता कि इतर सस्कृति अथवा भिन जीवन के लिए भरे मन म आर गेप न रहे । भारतीय नारी यति चिर सन नारी की प्रतिनिधि है तो यूरोपीय रमणी भी क्या नहीं है ? मैं नारी को भारतीयता को अपनी सहानुभूति और दृष्टि यो परिघि नर्ग बना लेना चाहना । मैं मानता हूँ कि सजीव भारतीय तस्वीरी भारतीय ही प्रतिक्षा विरासगील है। अरिवतनीयता अचान पाय पा लगण है । जिगी जरुरत है वह है यहाँ प्राणता । माहित्य में उमत्री जरूरत है और जीवन म उसकी जररत है। छोटी-छोटी ममताना सकेंना उरना होगा।

निवेदन और निशामा तग दायर नही वाम दगे । घम, सिद्धात मत मा यता, प्रकृति-सस्कृति, पथ सम्प्रदाय ऐस की ओट लार सकीर्ण ममताएं और सीमित स्वाथ आज पाल और पोसे जा रहे हैं। उनस विपटकर मानव और मानव समुदाय अपने को निवल रख रह हैं। अपनी ही निवलता उन्हें प्यारी है व मोह मे मुग्ध है। लेकिन नहीं जग विकसित होगा और मानव देवता होगा। हम क्षुद्र कैस रह सकेंगे । विगट का आह्वान या प्रतिषण हमको नहीं प्राप्त हो रहा है ? तप क्षुद्र बने रहने का अवसा हम क्षुद्रो का भी नहीं मिलगा। हम चीग्वत रह सकते है कि हमारा धग गया हमारी संस्कृति डूबी हमारा बादश मिटा' लेकिन जो कल्याणकर है वह सम्पन ही होगा। हमारा रोना वह सुने तो हमारा ही मगल सापन कैसे हो? मैं मानता हूं कि सत्य गहन है । मैं जानता हूं कि सत्य जितना व्यापक हैं उमा नाम पर उतना ही पाखड के फलने की गुजाया है। जो वहिरियाली उपजाती है वह गदगी भी बढ़ाती है, लगिन रसक लिए वर्षा को रोकने का यत नही करना होगा। हमको अपने भीतर परस जगानी होगी। पीतल भी पीला होता है इससे सब होकर स्वण का बहिष्कार करना बुद्धिमत्ता नहीं है। समवण और सस्ते होने की विशेषता से लाभ उठाकर पीतल बाजार का पाद द मक्ता है तो भी सोना इस पोतरा के सौभाग्य की स्पर्दा नहीं कर सकता। वह अपने को दुर्भागी मानकर अपनी स्वणता तज दन का अहकार विस मांति ठाने ? वह विनीत हो, पर अपनी स्वणता पर लज्जित उम नहीं होना होगा। हो उसे चाहो तो तिरस्कृत किया जा सकता है। मुझे माना है कि समोक्ष लाग पर उठाये गये प्रश्नाको हमारे निकट सुभान की कृपा करगे।

मेरी रचना-प्रक्रिया कहानी या उपायास लिखने की प्रेरणा आपको अधिकाशत जीवन और जगत् से सीधे मिलती है या उनक प्रति बन चुक अपने किसी दृष्टिकोण मे ? -बन चु दृष्टिकोण को फिर फिरपर सवारते रहना होता है। अर्थात दृष्टिकोण कितना भी स्थिर हो नय आते हुए अनुभवा से सस्कार प्राप्त करता ही है। जीवन और जगत से आने वाला प्रभाव सवेरनो का मिलता है । वही से स्वय जिस दष्टिकोण कहा उसम रच रम जाता है । कहानी उपयास मेरे लिए केवल भावोद्गार नही है । उसमे हिंगा होती है और वह विचार से आती है । विचार मनोदृष्टि या दृष्टिकोण स स्वतन्य नहीं हुआ करता। जानता हूँ कि यति उमरे पीछे दृष्टि या विचार न को तो रचना में बहुत कुछ भावात्मकता हावर भी अथ की उतनी गरिमा नही हो गक्ती । प्रभाव को इसे अविति कहते हैं या एकाग्रता और एक पता कह सकते हैं। वह उस विचार म से आती है तो पहले से हो उपस्थित रहता है योर स्वय घटना और रचना म स अपना समयन-प्रकाशन चाहता है। घटना में जीवन और जगत् को आर स आने वाले प्रभावोपलक्ष को कहता हूँ। जिम आपन मनोदृष्टि कहा है साहित्यिक कृति के मा यम स आप प्राय नसको पुष्टि करने की चेष्ण परत हैं या उसकी जांच की ओर भी अग्रसर -~-प्राय पुष्टि करता हूँ। जाच करने का साधन अधिकारी इडिया से प्राप्त होन याला सोपा जगत्-चोप होता ही नही है। जांच का साधन यदि हो मेरी रचना प्रक्रिया ४६ तो स्वय अतरगता के पास है, वाह्य विवरण और विगत के पास नहीं है। यह सच है कि मैं श्रद्धा से चलता है। श्रद्धा के पास मानो कुछ ग्रहीत मा यता रहती ही है । बाह्य सामग्री इद्रियो के द्वारा जितनी भी बुद्धि के पास पहुचती है उस सवम मानो युद्धि चुनाव और दटाव करती है । यह सब बुद्धि का धधा श्रद्धा से स्वतत्र नहीं हुआ करता । वल्कि श्रद्धा के अनुसार ही होता है । लेकिन श्रद्धा मत कट्टरता से सवथा भिन वस्तु है । मत की जडता प्रश्न का स्वागत नहीं करती। श्रद्धा के लिए प्रश्न भोजन है । इस सरह बुद्धि श्रद्धा को काटती ही न उमे सस्कार परिष्कार देती हुइ वही जा सकती है । वह तो श्रद्धानुमारिणी ही होती है । वि तु सजीव श्रद्धा मानो नित्यप्रति अपने को आत्म सस्कार दिया करती है। और इसम व्यक्तित्व या वह अश सहकारी होता है। जो तक बुद्धि स गहरे न्यथा के स्तर पर काम किया करता है । श्रद्धा आत्मव्यथा म से स्नान कर नित नूतनता प्राप्त करती है। बाहरी घटनाएं इस श्रद्धावित व्यक्तित्व स्तर मे मे स्वय नम पाती और अपना रस देकर उस और पुष्ट कर जाती हैं । इससे अधिक गायद वे नही पर सक्ती। * जिस श्रद्धा को लेकर आप साहित्य सजन में प्रवृत्त होते हैं जब उसम मत की पटटरता या मताग्रह का लेग भी नहीं है तो आपके जाने या अजाने मनोदष्टि की जाच की गुजायश तो रह ही जाती है । अपनी किमी कृति को लिखते समय या पूरा करक क्या आपने कभी एसा भी महसूस किया कि जिम मनो- प्टि को लेकर वह चली थी उसम हेर फेर की अपेक्षा है ? -हो कोई रचना ऐसी नहीं है कि जो मेरे हाय आकर बदली न जाय । बार बार आये तो बार बार बदलने की इच्छा होती है। इसीलिए मैं कोगित बरता हूँ कि होने पर रचना फिर मरे सामने आयेगी ही नी। यह फेर पार करने की इच्छा पया होती है ? आपिर सीलिए हो सकती है कि व्यक्तित्व और जीवन एक क्षण के लिए भी गतिहीन नही होता है।

कहानी अनुभन और शिल हो सजन म आलोचन गभित हुया चलता है । इसलिए सृजन कोइ सहज प्रक्रिया नहीं है । बडा क्प्टनाया अनुष्ठाा है । कष्ट मुस्यता से इसी दांतेदार आलोचना स होता है जो बार की तरह से तुमको बराबर काटती रहती है । जो बात ध्या। दन की है और जिसे मैं वदे महत्व को मानता हूं वह यह कि आचना वह अतमन और अत विवक से आती है। बाहर से थाई हुई वुछ भी प्रतीति उसके लिए सहायक नहीं हो पाती। उपरे ग आदेश अथवा मान चिनान की आमा अनुना सहायक नहीं होती बल्कि ऊपर से आई सीख एक्रम असगत जा7 पटती है । और उपटेग की अधिकाश अवना होती है। वह इसी वारण वि चतय का परिकार वस्तु की मार से नहीं आ सकता उसे यात्म की ओर से ही आना होता है । आत्माभि-यक्ति म आत्मालोचन गभित रुप से और अनिवाय, होता ही है। इमलिए वह श्रद्धा जिसम मत को पटटरता का विशिष्ट रह गया है, माहित्यिस मृजन म स माना स्वय अपनी जडता का परिहार प्राप्त करती है। साहित्यिक कृति का प्रभाव और उतना ही होगा जितना सहानुभूति का प्रवाह सुना रह सका है और कटटरता अवरोध नहीं बन सकती है। अवरोध यति यही बनी हो तो साहित्यकार और साहित्य रमिर तमाल भाभव परेगा और इस प्रकार स्वय उस साहित्य की कृति स पटटरता से मुक्ति का उपाय हो चलगा। अभी-अभी जापने बडे मा यो बान रही है- श्रद्धा जात्म-व्यथा म स स्नाा कर नित नूतनता प्राप्त करती है। परतु मुनीता सुपटा विवत और व्यतीत की नायिधामा काममा तर खिास और उग याम समाप्त होते ते उना एक ही रूम का उमरयर सामने याना क्या इस बात का घोतर महा है दि इन उप यामो वा यत एक ही निवप म हुआ है ? दा व्यक्ति मृष्टि में कभी पूर एक समान नहीं होते । न रचना दो पात्र बिला एक हा मक्त हैं । गमान-जसे दाखते हा पर होते ही हैं। जिा उपयागा वा आपो नाम लिया, उनकी गायिका म आप चाह तो बार मेरी रचना प्रक्रिया देख सकेंगे । मेरे उपयासा म अतिम परिणति यदि कुछ एको मुखी दीसती हो तो हा, वह हो सकती है । मेरे लिए अत मे सब बातें एव बडे प्रश्न और बडे घम में समाई हैं । वह यह है मित म अह को अखिल मे जपित और लीन हो रहना है । समस्या मूल म यही है कि यक्ति है। व्यक्ति की समस्या जसी मालूम होती है लेकिन वह मृष्टि की समस्या है इसलिए जो निदान समस्या को बाहर देखता है, देश और काल मे रखता है वह रोग के लक्षणो को पकडता है, मूल तक नहीं जा पाता । राजनीति और दूसरी कार्मिक प्रवृत्ति उसी तरह चलती है। मुझे वहा समाधान नहीं जान पडता । इसलिए शायद मरी सब कहानियां अत म जैसे कुछ एक ही रहस्य में आकर समाप्त होती है। उसके अतिरिक्त गायद उन रचनाओ मे समारता न भी देखी जा सके, पर वह विचारणीय नहीं है । अब तक जाप अपना अधिकागत जीवन दशन या आपके ही गा मै मनोदृष्टि साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त करते जाय हैं । पया कभी आपको एमा भी लगा मि यदि यह साहित्य की ओट छोड में अपने वास्तविक स्प मे सीधा पाठक। के सामने लाया हाता तो बेहतर होता ? ननी अपगी ओर से तो नहीं लगा । तेक्नि कहानी उप यास पढे जात और पढाये भी जाते हैं, तब प्रश्न होता है और मुझसे किया जाता है कि वाक्य मा यय क्या है या उस प्रसग का भाव क्या है ? तब मालूम होता है वि जीवन का प्रश्न जानकारी का बन गया है और जा पनने और सहने के लिए था वह समभने ममझान वा बना जा रहा है। मैं मानता हूँ कि जीने के सवाल को जानने का बनाना जीने स वचना है । शायद जो कठिन है उम हठात आमान मा लना है । फिर भी यह करना पहता है। लकिन इस वाम का मूल्य दोयम है। प्रथम जीत जागत परिम-- प्रतीया की सप्टि है । तत्त्व मिदात का उत्पादन उतना बडा काम नहीं है । फिर भी मुझ कथा-लेखक को छोडकर मुझ विचारक को अपनान बाले लोग भी मिल जाते हैं । ऐगे लोग प्रतिष्ठा प्राप्त और गम्भीर होने हैं । अनेक पहाना अनुभव और शिल्प हैं जिहाने वहानी मरी एस भी नहीं पली है न पढेंगे 1 निवच परने है और उसी को पढन योग्य मानते हैं । बहुत है जो ताजा हालत म फत पस द नहीं बरते सूसा हालत म सिफ मवा क कायल होत है । मानना होगा कि फल जल्दी रस छाड रहता है । सूखी मवा को बनाये रखा जा सकता है । जिसमे स जान चली गयी है उस आगे फिर मरना शेष कहाँ रह जाता है ? एमे नान अधिक जी नाता है । क्योकि बेजान हाने से उसके जीवन का आरम्भ होता है । मैं उस काम म पहा हू क्यालि युग बुद्धिवानी है और मैं उस युग रोग स वचा हुआ नही हू । अपेभात यह काम आमान भी होता है। कहानी म अपन में ज्याना लडना झगडना पउता है और वह चीज हवी दीवने पर भी मुश्किल हाती है। मम का रस मुझे उसी म मिलता है । और रायम बडो मुविधा यह है कि पहानी की व्यास्या आवश्यक नहीं हुआ करती है । फिर भी पाने लिपन यार ताग याख्यामा पर चलते और चनात हैं। दमम उमकी भी उपयो गिता है। म बीच आपक विभिन समस्याओ पर बहुत सार चिंतनात्मर लग्य पढ़ने को मिते हैं। तो आप जब विचार करते है तो किसी न रिसी एक तिकप मिदु पर तो साधारणत पहुचा ही करते होगे। ता मूत्ररूप में आप प्रमुखता से क्या परना चाहत है ? - मुश्विल मरी गुरूस रहा है और अभी तक भी कती नही है। यह पर कि मुझे अपने को मानना पडता है। मा बिना काम ही न. चनना है पानी पाने मे मान सू दि मैं हू । लेकिन मैं अपने का पूरी तौर पर मान भी नी सकता हूँ! यानि इतना अनत यह जा कुछ बाहर है वह भी है। ता मरा यापी इस सार प्रहार मे ममा से जगत् मे देश रा, सानिया ग, मूरज से चौरस गप से यया मवय है यह बहा प्रश्न बन आना है । सबध न रह जाए मैं अपन मे ही मुह गाड लू तो उसम समाधान मुझे दीखता नही है । और सर पति या मध्यात्म यही बताना जान पड़ता है। में अपने को सार कर, मेरी रचना प्रक्रिया और शेष काल इतिहास मे नकार वत ठहरा दू तो भी ऐसा मालूम हाता है कि 'मैं' नाम की चीज समाप्त नही होती है । यह जो यमवाद है भौतिकवाद जिसको शान दिया जाता है उसके जोर से भी मैं' खत्म नहीं हो पाता है। बल्कि बढ़ जाता, पून आता देखा गया है । तो आखिर म मुझे लगता है कि मै और बाकी जो कुछ है उसक वीच म सतत आदान प्रदान का सवध ही सच है । मै वाहर से जा कुछ मेरी इद्रिया लाकर मुझे देती हैं उसका स्वीकार करूं, यह कह कर तिरस्कार न करू कि यह मिथ्या माया है। फिर इस ओर से भी अपनी चेतना- भावना अपन म न रखू दूमरे को दू । इस प्रकार अगर पूरा वृत्त हो जाय वहाँ से लू और अपन को दू तो मैं समझता हूँ कि जीवन म चित विद्युत् रेखा प्रवा हित हो जाती है। नहीं तो विद्युत प्रवाह चलता नहीं है । तो अब इस सवध को मैं प्रेम का सबध कहता हूँ जहा अभि नता पाने की कोशिश है और भि नता को अनुभूति है। तथ्यानुभूति भि नता की है, श्रद्धा धारणा अभि नता की है । देह म विछोह, आत्मा मे सयाग । विग्ह रेटना और सयोगानद । तो यही एक मेरी मुख्य ची7 है कि य दो जो हैं, धम और कम, अध्यात्म और वस्तु मैं और समष्टि व्यक्ति और समाज, इत्यादि इत्यादि दो किनारे बना रखे हैं, इन दो में एकता हो। दो मे नाश विसी एक का भी न हो, पर दोनो के बीच मे प्रीति हा। इसमा में आदश मानता हूँ, इसको साध्य मानता हूँ। इसी की उनमन में मेरा जा कुच लिगना होता है होता रहा है । * प्रेम के सामाजिा स्वरूप पर जाप विप जार देते हैं ? -मैं ममझता हूं कि अप्रेम असामाजिव है प्रेम सदा ही सामाजिश है। * यही व्यक्ति प्रधान हो जाय और यही उसमें उसका जो दूसरा सामाजिक स्वप --17 मैं सममता हूँ कि व्यक्ति प्रधान होता है। प्रेम तय अप्रेम + मिश्रा म पारण हाता है । प्रेम अपन जाप भ अभय प्रधान है । उसम 'स्व' और पर दोना की सगा रक्षा है और मैं समझता हूँ कि क्याकि वह अभिनता का प्रयास है इसीलिा प्रेम कभी भी मामायि हो सकता नहीं है। और जो घसामाजिा होता है वह अप्रेम के मेत्र में वारण होता है। इसलिए प्रेम मरे - क्दानी अनुभव और शिल्प -- ‘लिए, मरी कहानियो म और तरह में भी, अतिम मूल्य है । उस मूल्य की परस के लिए कोई दूसरा मूल्य नही रहता । वही है जो कि स्वप्रतिष्ठ और प्राथमिक और इस मूल्य की कसौटी पर दूसरी चीजें वसी जा सकती हैं। प्रेम का कसने के लिए उपयोगिता कसोटी नहीं है । प्रम तो सवथा शुद्ध है पवित्र है। यह मरा मत है। * आप इस विचार के साथ ही एक और दूसरा प्रश्न मरे मन में उठ जाया है वि कथा साहित्य में सजन के समय भापके विचार कथा स आगे आ7 चलते है या कथा विचारा स आगे रहती है ? -इस प्रश्न को मैं कुछ अपनी भाषा म पहूँ तो मुझे लगता है रि मेरा निमाग कागज पर लिखे जाते हैं-उसस आग नही चलता। दाना साथ साथ चलते हैं। याने दिमाग म लिखे जाने के साथ साथ ही कागजवा तेव भी लिया जाता है। अगर दिमाग म कहानी कागज स स्वतत्र होकर बन जाती है तो लिखने म कभी नही आती। आप दसम से क्या निकालियेगा ? मैं समझता गायर सार यह निाले पि दोनो प्रनिया साथ साथ चलती हैं। एसा मरे साय हुआ है। यानी कि क्या वा आत्म निर्माण अर्थात आतरिक भावबोध और वथा पा क्तेवर बाह्य य दाना युगपत् साथ चलते हैं । इमम आगे पीछे होने में उरागन हो जाती है। ये बात ता मैं स्वीकार करता हू । लकिन इस बात, इस प्रश्न की प्ररणा इसलिए भी मिली थी कि आपका व्यक्तित्व जब भी सामन आता है एक नितन या विचारप “यक्ति जसा सामने आता है। माप विचारक पावार हैं। इस लिए बापका विचार प्रमुप हो जाता है या क्यापार प्रमुख हो जाता है? प्रश्न के मूल में मैं यह जिनासा आपरे समक्ष रखना चाहता था। ---आप सच मानिय किए चीज जिसस मैं बेहर ज्यादा पवराना हू हरता ए वह विचारता है । मैं किसी विचार यो कभी भी अपने पास फरकने नहीं देना चाहता । कति रहती है कि मैं सारे विचार के प्रति अपन दिमाग को या र । क्यापि मुझको यह लगता है कि जब तक दुष भीतर नहीं है, उनमन - मेरी रचना प्रक्रिया सामन नहीं है तव ता जो भी विचार है सा खामख्याली है, वुसार है, वह विचार नहीं है । इसलिए मैं विचारक कुछ भी नहीं है, भाई और मैं समझता हूँ कि विचारक और क्थावार इस दोनो के बीच झगडा अनिवाय हो तो वसा झगडा हाता हुआ मैंने तो अपने अनर बनुभव क्यिा नहीं है । बाहर सुनता हूं कि कोई दाशनिक हुआ करता है जो क्लावार नहीं होता है इत्यादि इत्यादि । वह सब तो वे ताग जानें, जो कहते हैं । इस तरह का झगडा मैंन अनुभव नहीं किया है । कब कथाकार ऊपर आ जाता है, या वि दाशनिक कार आ जाता है । मैं समझता हूँ पडिता के बीच म बात करनी होगी तो कलाकार को मौका ही नती है तब ऊपर नीचे क्या, दाशनिक ही दाशनिक सामने आयगा । और जन मागा य के बीच मे बात करनी होगी, जहां पर कि दाशनिक गुत्थी नी है व चारिक गुत्थी नहीं है ता वहा क्या का स्म आ जायगा उदाहरण - काहप। और एक विनम्र पाठक के रूप म आपक उप यास पढते हुए कई बार मुझे कुछ पाना के प्रति श्रोध हो आता रहा है खासकर इसलिए कि वे झटके के साथ सब कुछ को तोडकर अपना मनचाहा क्या नहीं कर लेते है । मैं आपसे बडी विनमता के साथ यही पूछना चाहता था कि ऐसा ही कुछ कभी कभी आपन स्वयं भी अनुभव नहीं किया है ? -मुझे इससे बहुत खुशी है कि मेरे पात्रा के प्रति किसी म क्रोध पैदा होता है । सुगी इसलिए है कि उसम प्रगट जाता है कि वह पात्र जीता जागता है। उसके सामने प्रत्यार हो जाता हो तभी तो शेष हा सकता है । तो ये भावनात्मक सबध रागारमा सयध यति पात्रों प्रतिपदा हो जाये तो तो मैं समझना हूँ कि कहानी की सायक्ता इसी में है । अब वह गलत पान है या सही पात्र है यह प्र न गेप नहीं रहता। विवTता को तोह पोह या नहीं डालता है पात्र, मिसमिसार क्या रह जाता है ? यह परिस्थितिया का जो एक उस कार आवेष्टन है उसको तोडकर क्या नहीं तीर की तरह से निकल जाता है उलझा हुआ क्यों रह जाता है ? यह प्रश्न है और सगत है।

कहानी अनुभव और शिल्प तो मैं यह मानता हूँ कि परिस्थितियो को तोड़ने म जो एक मुक्ति समझी जाती है, कि जिमका विद्रोह विप्लव कहते है क्राति इत्यादि कहते हैं वह मुफ्ति है ही नही । उसको मैं मुक्ति नहीं मानता है। जहां वह विवाह अधिक है मैं समझता है वहा फाफडाहट ता है लेकिन उसका फन मुक्ति नहीं है। इमलिए परिस्थिति और “यवित इन दोना म सवध वह बना डानना जहाँ पर दि हम समझे कि ताडना ही एक मिद्धि है वहाँ भमरे । तो अत म यह प्रगर होगा कि परिस्थिति वह चीज है जिमक साथ सधि की जा मके तो-आदमी का विकास आरम्भ होता है । इसलिए मेरा पात्र परिस्थिति को धक्का देकर तोडन में उनना उद्यन नही मालूम होता । परिस्थिति म मिस मिमाता दीसता है लदता भगना है तो ऐसा मालूम होता है कि अपने साय ज्यादा लडता- झगडता है और अपनी रुचि अरुचि अपनी अतहतिया के साथ बाहर के साथ कम लहता है । यह मरे पात्र मे सलिए दिखाई देता है कि मैं यह मानता हूँ कि चेतना परिस्थितिया का उपयोग करके अपने को विकसित कर सकती है । परिस्थिति को टक्कर देवर उमम कोई छेट या दरार पटा परवे चेतना विकारा पानी है, ऐसा मैं नहीं मानता। लेकिन वह परिवतन तो कर सकता है उस परिस्थिति का ? -होता ही है। प्रत्येक ऊ वगामी चतना परिस्थिति का परिपतन पिए विना र नही गवती बगलें कि परिस्थिति के प्रति अभाहट ही हो उस चतना म । स्वीकारता चाहिए परिस्थिति के प्रति । मेरे ख्याल म यह जो मेरे पात्रा की नामी है, और चित्तनगीलता है उलमन म रह जाना है, और वीर पराममी पुरष की भांति तोडते हुए आगे निकल जाना मगर नीं है तो वह इमी परी मागता के कारण ही है कि पराम के नाम पर जो मोह हम आवरला है वह सचा पराक्रम नगे है वह प्रतिक्रिया है । एर अगता प्रमा आपरा पूर कि आपने अधिकार पानाएँ पत्नी के साथ ही अमिका भी हैं या उन प्रेमिका का या एप “यतीत उनक साथ जुल हुआ है । कृपया यनताइये नियारे लपर को महाभूति नारी विरा रूप साथ है 7 मेरो रचा प्रक्रिया ५७ * अब यह जो आपका शब्द है व्यतीत इससे दुविधा झलकती है। आप निरसकोच रह । क्याकि सत्य का हम सामना करना है। अतीत का ही प्रश्न नही है वतमान और भविष्य में भी प्रेम को रहना ही है। विवाह जितनी ही आयु उसकी नहीं होती। मुझे लगता है आप माफ करें कि विवाह हो जाने के कारण और स्निया म मैं सौत्य दख सकू तो समझता हूँ यह अथ कराा विवाह का अपमान है । * सौ दय गन का मतलब किन हम प्रेम से कैसे ले लेंगे ? -सौ दय की अनुभूति जहा है वा प्रेम नहीं है यह सिद्ध किया जा सकता है । रूपज है प्रेम । लकिन वह प्रेम जो हर सामनवाली आनवाली नारी- हा सब नारिया के प्रति समक्षता चाहिए । पीठ को तरह कोई होनी ही नहीं चाहिए । सबब प्रति सम्मुखता ही धम है। पीठ देना कायरता है, पला यन है । प्रेम जो निखिल के प्रति है वह विवाह से टकरायेगा नहीं । पत्नी एव' व्यक्ति है-इसी तरह से प्रेम इस के द्र के बजाय पत्नी के कद्र के बजाय किसी अमुक व्यक्तिगत केद्र मे जायगा, तो शायद उनमे टकराहट हो सकती है तभी प्रश्न भी पता हो सकता है । --पर पत्नी स्वय एमा करती है तो क्या वह अपने समाज के प्रति या अपने पत्नी स्पक प्रति भी याय करती * मैं समझता हूँ कि अपनी आत्मा के प्रति और इस तरह से गृहस्य के प्रति और इसके भाग जाकर समाज और समति के प्रति भी याय तभी हो सकता है जबधि आदमी, स्त्री हो या पुरुप हो अपने प्रेम को घेरा ब द करके गृहस्थी में नहीं घेर लेता है। तभी ‘याय कर सकता है अपने प्रति और गृहस्थ के प्रति । इसलिए प्रेम विवाह का पूरक ही है पत्नी के लिए भी और पनि के लिए भी। पत्नीव्रत अथवा कि पतिव्रत शद को प्रम के निषध के रूप म लेन में मैं समझता हूँ विवाह-सम्था ही गिर जायगी। एर यात और मैं आपस पूछना चाहता था कि आज की हिंदी में जो यह नास्त्रीय तत्त्वा से मुक्त होकर, जो य प्रभारवादी कहानिया लिखी जा - कहानी अनुभव और शिल्प रही है उनमें आपको हिदी साहित्य की कौन-सी सभावनाएँ दृष्टिगत होती हैं। —मैं समझता हूँ कि शास्त्रीय तत्त्व के प्रति कुछ बहुत याग्रह नही है । तो यह क्या सष्टि के लिए इष्ट ही है। सजन कम के लिए शास्त्रीय वाध को जो निभरता है, अच्छी नहीं है सहायक नहीं है । आज की कहानी में उक्त निभरता उत्तरोत्तर कम होती जा रही है यह मुझे अच्छा ही मालूम हाता है । सभाव नाना क चिह्न हैं, यह मेरे लिए तनिक भी चिंता का विषय नहीं हैं। लकिन इसम शिल्प के प्रति एक विप सजगता जो आ गई है उसके प्रति आपके क्या विचार है ? ---मैं ममझता हूँ शिल्प के प्रति सचेत सजगता भी एक प्रकार की शास्त्री- यता ही है वह भी इष्ट नहीं है।

कहानी मे अपेक्षणीय और उपेक्षणीय 7 * नई कहानी की इन दिना बडी चर्चा है लक्नि जनेद्र जी, कहानी म नया क्या और पुराना क्या - मुझे चचा का पूग पता नहीं है । कहानी मरे विचार म नई ही हो सकती है। कारण घटना जा जगत म घटनी है वही समय से बंधी होती और पुगनी पडा करती है। कहानी की घटना जागतिक और सामयिक न हाकर मानसिक हाती है इसलिए वह सनातन बन जाती है । पाठर के मानस पर पढने के साथ साथ घटित होत जाने कारण वह नित-नूतन प्रतीत हो मकती है। मैं अपने को कहानी-लेखक नहीं मानता हूँ यानी वह लेखक, जिसे साथ ही कहानी के विधि विधान का जानना भी आवश्यक होता है । मैं कहानी 4 शिल्प अथवा कि ये पुगन गिल्प के बार मे देखवर हूँ और रहना चाहता हूँ। नाता होने से मुझे लेखक हान म वापा पढने का भी डर है । नान सृजन के काम में अक्मर वाधक हुआ करता है । इसकता वह है इसलिए कहानी के मामल मे अनता का में अधिक कायर हूँ और विनता से सदा भयभीत रहता हूँ। यह मेरी अपनी बात है । उससे आप देखेंग कि नई पुरानी की चर्चा या पटानी-मम्वधी वाई भी चर्चा मुम से अलग किनारे ही हट जाती है, मरे थाम से बहुत सगत नहीं हो पाती। जो नई के पीछे रहते हैं या पुरानो व आगे रहना चाहते हैं ऐस सब लोग कहानी के बाजार में और उसके मोन ताल में भटा जा सरत हैं।

६० कहानी अनुभव और शिल्प पहानी की सप्टि बाजार में नही उस निमत गुहा म है जहाँ पीडा अपन लिए स्थान पाकर दबीन्दुबकी रहती है। * जनेद्र जी एक ओर आपन वहा कि कहानी नइ ही हो सकती है दूमरी ओर यह भी कि वह सनातन है। इससे क्या विराघामास नहीं है ? -विरोध का आभास ही है विरोव नहीं। - सा यस ' इससे मरी जिनासा शा त नही हुई। -क्षण सदा ताजा होता है । लेकिन उतर पर वह पीडा या बनता है-- वह गल पीडा जहाँ दुख और सुख व्यथा और आन- एमएर हो जान है तो वही क्षण सनातन हो जाता है । वह कभी नहीं बीतता और पारसत बना रहता है । इमी से कहता हूँ कि नाश्वत का अस्तित्व नहीं है । है तो क्षण ही शाश्वत है । यानी एक साथ जो पुरातन और नितनूतन हो वही सनातन है। कटानी म सनातनता का प्राण चाहिए । वाकी सब जारी है अदल बदत सकता है फान है, साज सज्जा है, पहरावा और प्रेजेण्टगन है । इससे मरी सका दूर हुई । आपका आशय यही है न कि सनातन और पाश्वत ही कहानी का प्राण है । जिस नया कहा जा सकता है और एसा नया पन आने वाले पल के साम मे पुराना पड जायगा । है न -यही तो मुश्किल है कि यहते-वहत क्षण बीत चुनता है और नया हो पुराना बन जाता है । ये के नारे पर पशन की दुकानें चना करती हैं। क्या न उन निपुणा का भी कारवार चलता रहे जा बरतत फगना पर पलते हैं चलते कानों को पूंजी से चलते हैं । इस निमित यह उचित हो सकता है कि उग चर्चा म योहा समय हम उसी तरह दे दें जस क्लव म दरिया मरते हैं। अधिक यहां मत्व और मार मान लिया जाएगा तो प्रशन बढगा दान वम होगा। यह लाम की बात नहीं होगी। - मूल यात ता यह है कि वहानी का जन्म पहानीकार को पीडाम है और पाठा के लिए उसकी मायबना इसम है रि बहानापार को पीटा वहानी द्वारा सम्प्रतित हो उसव जाने मुख टन से जुटती है। क्या यही पहानी में यारपण का रहस्य नहीं है ? 7 ।

यदाना में अपक्षणीय और उपेक्षणीय ६१ -~-हा पहानी द्वारा लेसर को ममता अने पाठनो मे जुडती है, यही उसकी सच्ची सायकता है । अर्यात एक अनेक मे घटता व्याप्त होता है। र जैने द जी, आपन बहा दिपान कहानी माग म बाघर है । बहानी छलकने म मे निकलती है । आपका दाशनिक क्या आपके बहानीकार के माग म वापर नहीं है? ~~~हुन वाधव है लेकिा दानिक मैं २ मैं अपन को निपट जिनामु मानता हूँ। अक्सर अपने ऊपर परोही और व्यग्य जहां तहाँ त्यताह । मुख्य बात उसम यही रहती है कि जने द्र यह भी है वह भी है उसकी हर बात यह भी है वह भी है । दाशनिक का यह लक्षण तो ही होना चाहिए । पर मेरी गति सचमुच एमो हो है निश्चिति मुझे प्राप्त नहीं है । बलि जो विपना है, उसम स हर मोर आप्रह और आदा उपदेश निकल आते है और स्नेह प्रम सुचल जाते है । मुझे उन परोडिया और वटामा म मदा ही बड़ा रस मिला है और मैं उनस पूरी तरह सहमत हूँ। मेरी सी गति भगवान किसी को - पान की जह यह मे है। प्रेम अह के विसजन का नाम है । इमलिए नान और प्रेम म मना सनाई चलती है । मैं प्रेम का विन बिना गुलाम हूँ 1 द्रोह वर मान की पनि म मे वैर साता हूँ यीका में प्रेम तत्त्व म जुडा रेग्नना चाहता हूँ। विच्छेन जहाँ दीपता है जो जानकारी और जवाबदारी नह की इस सहानुभूति का दवा डालती है वहाँ हो मुझे अचि और अतृप्ति सता बनी रहती है । जनद्र जी आपन दहानीकार हाने से इ पार किया। वितु आपके अतिरिक्त आपके बहानीकार होने से कौन इनार कर सकता है १ दानिक होने से आप इवार का भी इसी रूप म लना होगा। अब मैं आपम कहानी 4 उपयागिता-पर पर उस दा सम्बधी दायित्य पर राष्टीययित्व पर प्रा डालो वा गनुरोध करता है।

१० वदानी अनुभर और शिल्प --इ कार कहानीविद होने से किया है, कहाती सग्रहो के भाग पर भाग निक्लो पर कहानीकार होने से इकार मेरा बस चलेगा ? ज्ञान से इकार है, कम का स्वीकार है। देश को मैने नफ्शे मे देखा है । उससे बाहर तो आदमी ही आदमो दीखते है नवगे की तरफ यदि अपना दायित्व मैं मान लू तो काम बहुत आसान हो जाएगा । मैं वह आसानी ही चाहता । नकणा गणित कथको में और ड्राइम पी रेसाओ के काबू म आ जाता है और तत्सम्बधी बढिया से बढिया योजना बिना प्रेम के योग के परिपूण बनाई जा सकती है । मेरी हालत यह मैं उम कम्यस्त से परेशान है जिस प्रेम कहते है । दूसरे सबको भा उसी से परेशान पाता हूँ । रेखागणित या अगणित म से मिलो वा सा त्वना राजनीतिक पो प्रम न करली है वर उससे स्वास्थ्य और बल पाता है । मुझ मे रोग गहरा है और उसका उपचार साहित्य म स भी पर्याप्त मिल नही पाता। कभी धम बी भी आवश्यक्ता जान पडती है। मानव पवित सामने है मानव जाति का वनी यक्त मूत पक्ष है। व्यक्ति की एना में जाति की एक्ता सम्प न एवं तिप्पन होने ही वाली है। बाकी एक्ताआ पी मुझे चिना नही है । मैं समझना हू कहानी को भी उस चिना पी आवश्यकता नही है। यह जो धारणात्मक है जिराको अह ने दृढ और पुष्ट यरवे मानो कल गच बिना लिया है यह सब सापेटा है। जो चाहिए वह मानव व्यक्ति की निरपक्षा स्वीकृति है। पिचार यदि प्रथम और यस्नि द्वितीय होगा तो दृश्य उपस्थित हो सकता है कि अमुक एम विचार मन विचार या दन विचार लिए हजारालापा की परवलि दी जा रही हो, और निशा निर्वे भाव सनी जा रही हो । माहित्य मे और साहित्य के अतगत बया-बहानी से अपेमा छि यह व्यवस्था बजार व्यक्ति की प्रतिष्ठा परे और सरकार के विवागे के सीप पर मानव को मत्य प म अध्ययनीय बनाए । साहित्य का दायित्व है तो यह है । यह दायित्व हर वचारित मायना या जातीयता अयया राष्ट्रीयता कहानी में अपेनणीय और उपेनणीय ३ से उत्तीण ठहरता है । सच पूछिए तो दृप्त और तप्त राष्ट्रवाद ही आज का सक्ट है और युद्ध के मूल म भी वही है । - तात्पय यह है कि वहानी जातीय राष्ट्रीय आदि आरोपित प्रयोजना से भूप होनी चाहिए यानी जीवन को हो तरागी हुइ पार होनी चाहिए? -~-गूय की जगह मुवन कहिए । अर्थात कहानी अदर से रिक्त नहीं हो सक्ती । जीवन विसी ऐसी अतिमता का नाम नहीं है जहाँ राष्ट्रीय अथवा जातीय सब प्रयाजन समाप्त हो जाए । अर्थात जीवन का हर चित्र और साहित्य की हर कहानी उस प्रकार के नाना प्रयोजना से अछूती नही हो सक्ती हर कोई मोमितता म रहना और जीता है । जीवन का अथ सीमा का अस्वीकार नही है। सारे प्रयाजन मीमा के साथ हैं लेकिन आस्था अमीम की ओर चलती है और दही मूल पूजी है । उस आस्था स सब प्रकार के सब प्रयोजन पृष्ट होते है नष्ट तनिक भी नहीं होते । किन्तु जब हम प्रयाजन को ही अपने आप म पोमना और पालना चाहते है तो यह दूसरे के प्रयाजन से टवार म आ जाता है इस तरह स्वग राग विदेश द्वेप पर पलन लग जाता है। प्रयोजनीयता के तल पर साहित्य को उतारन म यही खतरा है । माज यावश्यकता के दबाव में आकर हम राष्ट्रीय रचना मांग सक्ते और उसकी अभ्यथना कर सकते हैं, लेकिन वाम निक्लन पर कल को वह हमारे लिए भून जान लायक पाय वन मना है। जिसका यह भाग्य हाना हा उसे साहित्य नहीं कहत । जैन द्रजी 'उमने कहा था स लवर नई कहानी तक हिंदी कहानी की प्रगति के वार में आप क्या विचार है? -विचार खराब नहीं हैं इतना जानता हूँ क्या है यह बताने सापक मी सही उन्हें नहीं जानता। कहानी को मैं धारा नहीं मानता कि जसे गगात्री मे निकलवर हि महासागर म पडन वाली गगा है। हर कहानी या माना व्यक्तित्व होता है और सब वानियां मिलकर रोई एक धाग बना देती है जो बानापुरम स बढती है, यह धारणा मरो नहीं है। बुद्धिवादियो द्वारा कहानी अनुभर और शिल्प पश्चिम से लार हुई परिपाटी यह चल पडी है जो इतिहास की भाषा में ही जीवन और जगत का समभना चाहती है । मेर पाम बाई बहाना यह मानन का नहीं है कि अगर दो हमार बप पहले महाभारन लिया गया तो गुण में भाज सवरे लिखी गई मरी कहानी उमसे ठाक दो हजार वष जागे है । समय के अथ यो इस रूप में समझना क्वल स्वाथ स लगना और परमाथ से दूर होगा है। हर नया लेखक आगे है और उसन कहा था नाम की कहानी मील के पत्थर की तरह बस अपनी जगह गडी रह गई है ऐसा मैं नहीं मानता। उस प्रकार स माचन की मरे लिए कभी आवश्यकता नही हुइ। एनिहामिक भाषा से अलग नतिक भाषा मे साहित्य विचार हो तो म समझना हू यह अधिर साथक और मारगम होगा। तब ममय का प्रवाह हम को नही यहायगा और हम विस्थिर मूल्या को पहचान और पकड मकेंगे। माहित्य यो अथवा वहानी को एनिहामिद भाषा में नापने पर मरा आग्रह मी है। मितु क्या आप यह नहीं मानेंगे कि उसन कहा था की स्थिति से बढवर कहानी जिसमे हि दी वहानी ही नही अन्य भारतीय भाषामा को महानी भी सम्मिलित है थाज हमारे माहिय की वह विधा बन गई है जिसमें यह विश्व-सारिप की ममता कर सकती है ? ता गया मैं यह मानू वि 'उसने कहा था दिग्व मानित्य की समता नगेकर समती, और वह वेवल हिली सारित्य अथया पुरातन साहित्य है ? जीनी मैं उम तरह नहीं सोचना ।हर बूर अगर वह अपनी जगह निमल है तो विश्व ही नहीं ब्रह्मा को निमराता म पाग दन वाली है। विश्व की भौगोलिय एकता और अपनी भौगालिक विम्तति यी ओर अधिक सम्भ्रम से देखन वी माय यवना नहीं है। म्वय हार बाचलिक हार प्रादपिक होर रचना सहा भाव स सावभौम हा सस्ता है। प्रल प्रेम का स्वन्दता एप अविरता पा है। आज स्थाबार करना चालिए हमारी मांग मूक्ष्म की ओर घर रही है। पहन म्यूत म चला जाता था। प्रयोजनाश्रित रचनाए मन को भा जाती थीं। 1 बहानी में अपेतर्ण य और उपेक्षणीय एक तम्ब असे तर समाज वा मुधार और कुरोति का निवारण मानो कहानी- लेवन के प्ररणा-सूप बने रह । 'नई कहानी' अवगाहन म जाता है । यह उसकी प्रगति गुभ है । लेकिन यह ता समय काल की ही गति है और जीवन विास स्थूल स सूक्ष्म को आर चलना ही है । आज मूक्ष्म सवेदनाया आनन का प्रयास अधिक नीखता है घटना ६ घटाटोप का आग्रह कम है और यह गुम लक्षण है। * वूद के महत्व को घटाना मेरा उद्देश्य रही। मैं तो देवल यह कर रहा था कि गत वप म प्रमचट, जैने'द्र यापान, अनय च द्रगुप्त विद्यानमार और मोहन राक्ग जाति कहानीकारा 7 समग्र प म कहानी का इतना मुछ दिया है कि वह स्तुत्य और प्रासनीय है। --जनद्र का गिनती म बाहर कर दीजिए। यह जहरन म ज्यादा मनमाना है।न भाषा को संवारता है और न शिल्प का। एम अहनिप्ठ का विचार की समा म मे बहिष्कृत ग्पना चाहिए। यह में गिमी निजता के प्रभाव म नही पह गह, वस्तुनिष्ठ विचार को दष्टि स ही बन्न को छुट स रहा हूँ। अन्य रचनाकारा म प्रेमचद योर यशपाल मुझ व प्रतीत होत है जिनके पास क्थ्य है और तत्सम्बधी पुष्टता और निष्ठा है । गिल्प और पला इन दाना व निए साय नहीं है योग्य प्रय की बात है। अनेय गहर जात हैं हम्मान दिया चाहत है लकिन क्ला मानो उनर निक्ट गाध्य हा जाता है और क्थ्य क्यन को मीनाकारी म गौण और मीना पहन लगता है । चन्द्रगुप्त जो बडे स्वस्य लखा है इनन दि इसी कारण ने उनसे ईर्ष्या होती है न उत्तेजन मिलता है । मुझे लगता है लेग्नक को अवश्य विचित हीन और असामासि होना चाहिए ! चाहिए स मत हानहार ही यह हाता है। चद्रगुप्त जी या नही गे माने । मान राम की कहानिया मुझे सदा भिगाना धौर ती रही और यह मुझे अच्छा रगता है कि जाटार बवाय का वह बचाते है और रग तास नहीं देत । मैं व चार से दूमरे लगना की भो कहानियो, जब हाथ आती हैं पर जाता हूँ और कुन मिनाकर मैं देख रहा - गौर सूश्मता 1 कहानी अनुभव और शिल्प हूँ कि हमारा सवेदन चौर सवद्य सूक्ष्मतर होता जाता है और वातावरण की प्रतिष्ठा बढ रही है । सुधार या उद्धार के आग्रह म वातावरण पर बलालार होने लग जाता था और प्रेमचन्द जी म यदि इसका अवकाश था तो यशपाल जी म और अधिक है। मतय अधिकाश तो इनकी कहानी म रमा रहता है, पर कभी उसक ऊपर भी बैठा हुआ दीखने लग जाता है। माना होगा कि आज के दिन कहानी सबमे सात माध्यम है । यो तो उप यास बडी उपलब्धि है और प्रभाव भी उसका धना होता है । लकिन समय की गति में द्रुतता आ रही है और उप यास का क्लेवर उस पर बामिल पड सकता है। कहानी प्रवाही है और वृहत्काय नही हा सवती । यह अधिक समयानुनून है और कहानी पर एक तरह अधिय दायित्व ल आती है। माजकन जाह-तहाँ दीपन वाली कहानिया के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ पि हिदी के लेयर उतन ही प्रबुद्ध और जाग्रत हैं स्थिति में प्रति उनन ही तत्पर हैं, जितने दे। यो अथवा विदेश की दूसरी भाषाओ के मा य लेपर समझे जा सकते हैं । डर यही है कि क्ला और गिल्प यति अपन आप म साध्य बनेंगे तो अनायगी ऊपर आ जाएगी आत्मदान अनुण्टिन हा नही पारगा पता की जडावट मनावट वा उसी घिम माज का कही कुछ आधिक्य और अनिरक तो नही हो रहा है, एसी का होती है । लेकिन प्राणवेग इम कौगरा की अति यता व लिए अपवार नहीं छोडन वाला है और आज विश्व का या हर कहीं का आधुलित एव विलित जीवन स्वय इरा अतिरक का उपचार करताना जा मरता है।

कहानी: प्रेरणा, प्रभाव और शिल्प - जाद्र जी, हमारी भेंट का आपको स्मरण होगा। उसमे आप महष्टि जाद्र' को विचार की सभा मे वहिष्कृत रखने को कहा था । आज हग उगी गिनती से वाहर व्यक्ति पर अलग से चर्चा करेंगे । कहिये, इसम मापयो गा६ आपत्ति तो नहीं? --आपत्ति हो तो भी क्या आप टलने वाले है ? * नहीं लेकिन इस प्रकार स्वच्छा से बहिष्कार का माग अपनावर पया आपने अपने को विशिष्टता प्रदान नही कर दी? -- सोलिए बहता था कि जापत्ति से क्या फायदा है ? अय बाण आपकी तरफ म शायद पीछे आयेंगे, पहले इसी प्रतिष्ठा वाले का झेल लिया जाए। हां, आपकी बात सही भी हो सकती है। प्रतिष्ठा अपनाने का भी वह वहाना हा सरता है। लेकिन क्या प्रतिष्ठा ऐसी बुरी चीज है कि उसे अपनाने से डर हो क्या अच्छा यह न होगा पि प्रतिष्ठा अप्रतिष्ठा को अलग करके बात आगे क्यावि वमे हमारे बीच साय आ जाएगा और हेतु परस्पर-निरुद्ध पड जाएंगे। उस तरह चर्चा बेकार हो जाएगी। ४. ठापनी उस दिन वी भेंट को मैं अपूण मानता था। जने द्र का व्यक्ति और शिल्प विगिप्ट है यह स्वीकार करना होगा । इमलिए उस पर विस्तार से विधार की आवश्यकता हुई । ? चलाई जाए, पहानी अनुभव और शिल्प -अच्छा बाप कहते हैं ता स्वीकर दिया। फिर? फिर हम आरम्भ म चलगे-और म बापस कहानी लिपना जारम्भ करने की मून धरणा पर प्रभाग डारने को कहूगा । -मुझे मूल या ठीक पता नही है । एक व घु जाति और उसी तरह के कामा म उपद कर वेकार होगा और बेगारी मे काम खोजते हुए दिल्ली आए । बहा वागिश स उनसे प्रायमरी स्कूल मे मुदरिमो मिली। बातमी ऊचे विचार के थे और गाभिमग । चोय जे तक का स्कूल और उगेन वहीं नाय लिम्वी परिका जारी को। बडी सज धज और उद्यम म उसे गंवारते थ । जमी व निरा पहनी ट्रमग तोमरी बहानी त्रिपा गई होगी। लिनत वक्त बतानी है यह भी मानूम हाता था। चिटठी आती थी और जा मन माया लिन भजना था। परनी वगनी मशायर यग्य के साथ उपरे दन को मैंने ठानी होगी। नाक पराग्राफ बाद एक नता उमम अनजी में बाल पत थे। उग अग्रजा की वक्तृना + दा चार वाक्य निग्मन पर पता चला कि जहां चीज जाने वानी है वहाँ चटमास के बच्च हागे अपनी यौन समझेगा? गतिए उम राप लिया गया और वह पीचे प्रम नाम में छपी। उसकी जगह लगे हाथ व पटना जिय भजी जा चुद गा पहल पर साथ घरी था। उगर आगे भी कल्पना से कुछ जोइ-जान लिया और वह काग्राफा बन गई। उमी हस्तलिखित पत्रिका ज्योति +fTए मेन और चारी बगी। य तीनो कर नियां पोछ दूसरी पत्रियामा म पी। लगिन य ग निमत वक्त प्ररणा का प्रश्न नी न हुआ था। वधु थ चिठगे वा उत्तर जरो गता था और मैं मनमाना मि भजना था। पता था कि य रपनाए यानी यमायगा और मुभम एक नि जवार तक तलब होगा। मूत्र प्रणा का कर वनाप्य अर मैं पहा क्या यह जने द्रजी यापन कहा कि अपा। पहती दूमगे तोमरी कानिया मिने वस्त आप। यह भी नी मारम Pाता था रिहाणी हैं । लगभग एगा ही आपका वह वाग्य है जो मुके स्मरण पह रहा है कि कहानी में क्षेत्र में क्या . - कहानी प्रेरणा, प्रभार और शिल्प जनेद्र का प्रया राजमाग से नहीं हुआ, कि तु क्या आप यह नहीं मानते कि मूल में आपके अतरतम का वह भाव वेग था जो व्यक्त होने को निर तर यस था और आपको अपने आपको उटेन देने क लिय विग विय डालता था? -अदर कुछ भाव या यह मानन म उज क्या हो सकता है । लेकिन वह वधु मुरिम न बने होते और उन्हाने पनियरा न निकाली होती, तो अधिक सम्भव था कि मरा लिखना ही न हो पाता। यानी लिवन की कोई विधाता मैं अपन जीवन में नहीं देखता । बरसों बरस गुजर गए हैं और मैंने एक हरफ नहीं लिया है। जात प्ररणा को काइ दिवशता हाती ता यह हरामगीरी मुझ से नही हो सकती थी। अभी दसिय कि लिसन के सिवाय कोई मन वाम का काम नहीं किया है, सविन जित्ता लिखा है उत्ता तो कोई प्रामाणिक पाय कर्ता तीन साल मे लिख फॅन सकता था। नहीं वसी कोई भीतरी वेबमी मुभ म नही थी। मुझ म न कुछ वक्तव्य है न सदा है । जम बोल लता हू वैस ही लिख भी जाता हू । बहुत अधिक आयास प्रयास की मुझे आदत नहीं है । न एसा कुछ मेरे पास मालूम होता है कि जिस पर आयास यच किया जाए । पाठको और आलोचका की ओर से जो कभी मुन पडता है उसको अगर भुता दिया जाय ता में अपन बार म निमी भूल म नहीं हूँ। अर्यात म जानता हूँ कि मैं नी जानता । • आप वहत हमि निपन क मिवाय कोई मन काम का काम नी क्यिा । क्या लिग्वना अपने आप म सय पामा म वढार वाम नहीं है ? महमूद गजनवी के भारत पर यायमणा या उमा सामान्य वा आज कौन याद रखना है पर उसी क दरवार के फिरदौमी या नानामा आज भी एव जावित सात है। शासन और सत्ताधारी जो राया और साम्राज्यों वा निर्माण करत हैं व इतिहाम मे स्मारर स्तम्भ की भांति जहाँ के तहाँ गडे र ात हैं। पर लेखक विचार वे प्राण वग ये मचारण के कारण गतारिया के आर-पार जीवित रहता है। फिर लम्बर ६ काम या हम छोटा पम मान सरत: -नही नही लिबन की तारीफ आप मुझस 1 कीजिये । उससे महबार 7 7 ७. कहानी अनुभव और शिल्प उद्दीप्त हो सकता है और वह घाटे की बात है । आप कहते हैं लिखना बढे काम का काम है । वाम का नही यह तो मने भी नहीं कहा । कैम कह सकता हू ? उसी की खा रहा हू नही तो नोकरी ढूढने गया तो क्या वीस पच्चीरा म्पए की नौकरी भी मुझे मिल सकी थी? एक्दम नहीं मिल सकी थी। अब यह मौका है कि आप तक से बात हो रही है। यह अवसर जिसकी बदौलत भाया है वह लिखना सचमुच बकाम नहीं कहा जा सकता। लेकिन इससे आगे आप मुझे छन मे नही डाल सक्ते । जसे और काम हैं ठार वम ही यह सिपने का काम हो सकता है, उनस कम या अधिक मूल्य का म उसे नही मान समता। मह्नती से और किसान से म अपने का किसी बूते भी कोई खास नहीं समझ सकता है। सच यह है वि लिमना कोई काम ही नहीं है। वाम होता तो पनीर जुताह क्यो बने रहते और तुलसी ने भी कभी अपने का रायल्टी याना पदि क्या न माना होता अत तक भिक पया माना होता? यह सब इसलिए कि लिखना वाम नही होता है। यह तो पश्चिम ने उस घ घा बना लिया है और कम्यूनिस्म न तो सबस ही ठाठ का घधा बना दिया है । समाज और राज की महिमा ही कहिये कि जो चाहे बना दे । सच मगहर जायें तो जान पडेगा फि लिनन को काम मानना और पाधा बनाना गुग नहीं है। फिर भी यगर उसको दुहाई दी जाती है ता म उन दुहाई देने वालो को धयवार भी दे सकता हूँ क्यादि अत म उससे मेरा स्वाथ ही सिद्ध होता है। वितु जनेन्द्र जी जूनाह और भिगुक पया सम्यातीत नहीं अपनी वृत्ति रो अतिरिपन वारण स ही पीर और तुलसी हमारे शिण अविस्मरणीय है, वसे यह ठीक है कि ममाज के विधी व्यक्ति का पेट दूसरो यो ठठरिया के पसीने पर न पनपे । लमा और मनासार अरने को मोतिय अथवा शारीरिक श्रम से सम्पृक्त करने का दप्टिकोण वपनायें और अपन का जन-जीवन के समीप रखें इसरा मशिन शुभ एव अयार और क्या हो सकता है ? अव जन द्र जी, आप यह बतायें प्रिम दमी म सम्पक म आप क्व आये और उनस पिस रूप में प्रभावित हुए १ ७१ कहानी प्रेरणा, प्रभार और शिल्प -मैं चिटठी से उनम पहले पहल सन २७ म मिला हूगा । स्वरू सन् २८ के अत मे। -सब स ज्यादा उनको वेवाकी और वेगानगी का मुझ पर असर पड़ा । मैं नामी आमी के पास गया लेकिन मिनने पर मालूम हुआ कि जसे उह मालूम हो नहीं है कि वह नामवर हैं। यों तो अनजान कहना उ ह मुश्किल है लेकिन यह नान उनके भीतर तक नही उतर सका था और उनकी साधारणता को उनम नहीं छीन मका था । इसकी झलक उनक लिखन म भी है। मानो लिखने वाला लिखे गए चरित्रा से अलग और अन्य कुछ है ही नही कुछ रहना ही नहीं चाहता । यह निगामी आदमी के लिए कम सम्भव हाता है। वह मानो ऊपर स लिखता है और चरित्रा को अपनी अधीनता म रखता है, उह स्वत श्र नहीं होने दता। एम उनका व्यक्तित्व अव्वल तो वनता नहीं या बनता है तो वह बनता है जो स्वप्रतिष्ठ नही होता लखक वे (अधिमाश मतवादी) प्रयोजन का उपवरण मात्र हाता है। प्रेमच ६ का यह निरीह स्वभाव मुझे ऐसा ह गया कि उसके लिए में अब तक उहें याद करता हूँ। पहली बार आय तो क्या दखता हूँ कि गली म स कम्वल कधै पर डाल और हाथ म भोला लटकाये चले था रहे है, तार न खत, बस, वखबर चले आ रहे हैं । बोले--तार म फिजूल आने डालने से पया फायदा था ? आखिर घर तो या पहुंचा न यह चीज़ अव बहुत सोजता हूं, लेकिन बहुत ही कम मिलती है । बाकी प्रतिभा वगैरह तो सब ठीक है, लेकिन यह चीज जैस जड की है । जसे जह ही न हो तो ऊपर, सोनिये, सिलेगा क्या? जनेद्र जी आपके कहानीकार वे निर्माण म मात्र सांग प्रेमच के सम्पा के अतिरिक्त जिन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों -का प्रभाव रहा हो, उन पर प्रकाश डालिये। --मुस्किल है और मेरे पास इस बार मै कुछ प्रकाश नहीं है । इतना जानता हूँ कि जय मरा लिखना हठात् गुरू हुआ तब मैं बहुत बेहाल और वाहाल था। यहाँ तर विमरने की बात साया करता था। ऐसे म कोरा तत्व सिदात । बारह ७२ कहानी अनुभर और शिल्प काम नहीं दे सस्ता, न प्रिय हो सकता है । हर तत्त्ववान वो मानो सवान को कसोटी पर उतरना और अपने को खरा साबित करना होता है। मबस प्रयम तय्य और मूल तत्त्व है दुग्दइरा वौद्ध क्थन का भी शायद यह सार है । इमी अनिवायता मै रा विचार को मानो पहानी बनना पट गया ! इसस अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता। इधर उधर की जो किताब हाथ आती मैं पढता तो रहता ही था । लकिन उस परने म स लिखना जामा या कभी आ सकता था यह म नही कह सकता। लिखा शायत बाहरी सयोग के याग म ही हुआ। यहाँ दिल्ली में एक हिटी मभा बनी थी। मरा सन २१ म माखनलाल जी से परिचय हुआ था जिसम साहित्य का सदभ तनिय 7 था। लेकिन यह एक बार दिल्ली थाए तो चतुररान जी घे यहाँ ठहरे । ऐम चतुरमन जी की कृपा और उतारता से हिंदी सभा म उपस्थित होना मिल गया। पहली कहानी वही पढी गई होगी मुझे एक घटना की याद आती है । एक बडे मानी विद्वान् थ । थे पया अभी हैं । वही आग से उह कहानी सुनाई बडे धय म उ ने सुनी । अत म यदि कुछ बात उनम मालूम हुई तो यह कि भापण दिया नही जाता किया जाता । पहानी के लिए यानी उस पर प्रकाग लिए मैं उनकी ओर देखता रह गया । पर जो वहाँ था या वही स आ सरता था वह उस मा यह लिया और प्रिया का फर था । ऐमा मालूम हुआ था तब Fि Tी इत्यादि सर वृथा + दिया किया सम्ब घी ज्ञान हो साया है। आप गाच सात है कि इस शिक्षा नीषा के अधीन में कहानी को महत्व ही कम दे मरता था। उन परम विद्वान या लोचना का या लांचा या मैं आद मानू या नहीं, यह म निश्चय नहा बर साहूँ। लग्नि ऐमा अवश्य मानूम होता है कि भाषाविद जिम ला म रहना है कहानी मा की दुनिया उममे पारी ही होती है। दरजी मन है दुम की बात जानन को जरत म पिपुरा नही है उसका पन्न की नाप गोप बस है । यवगाय का सचमुन यही गुर है। जमिन दरजीपना भूलकर वह यदि आमी और किसी का भाई बेग या पनि वगरह हा जाता है तय वात अयश्य दूगरी हा जाती है। यानी कहानी (मरे लिए) गिल नही कहानी प्रेरणा, प्रभाव और शिल्प है। वह सवेतन और सवेद्य है । उम प्रकार उसमें सीखने जानने को बहुत कम रह जाता है। या बढेि कि जो सीखा जाना जाता है वह सब वहाँ उपकरण भर रह जाता है अर्थात इष्ट नही आनुपगिक होता है । मतलब यह नहीं कि जिह मैन पढ़ा है और जिनस रम प्राप्त किया है उनके प्रभाव का मै ऋण नहीं मानता हूं। लेकिन आशा है कि मुझे उनमे से किसी को याद मे या नक्ल मे लेन की आवश्यकता नही हुई है । उनका उपकार इतना हार्दिक है कि मुझ एक क्षण के लिए भी उपकृत वनन की याद नही आती । सच यह है कि दुनिया की और जिदगी की जो खुला पुस्तक सामने है उसको उहोने मरे लिए कुछ अधिक खुलो बनाने म ही मदत की है । उस क्तिाब के और मेरे बीच में आने को किसी ने काशिग नहीं की। - जन द्र जी मैंने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितिया वे प्रभाव के विषय म जिनासा की थी। -सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक परिस्थिति की बात मैं क्या कहूँ? अठारह वप को अवस्था म में यालिग हुआ होऊगा। उस सन २३ से अर सन ६३ तक इन तीना प्रकार की या अय प्रकार को, जो परिस्थितियां यहा रही है वे उजागर है नही तो रिपोटों से उह जाना जा सकता है। जीवन में बाहरी जा घटनाए घटी उनका मल भी कुछ उनस बिठा कर देखा जा सकता है । लकिन परिस्थिति मेरे लिए कोई मन स्थिति से स्वतत्र अस्तित्व रखन- वाली चीज नहीं है। उम दृष्टि से परिस्थिति की बात करूं तो मर जीवन का कच्चा चिटठा ही खुल निकलेगा । उस खालना मुझे मजूर नहीं है । न खुल इसीलिए तो क्था कहानी और उपयास हैं । जी नही, कच्ची चीजें आप मुमम नहीं पा सकेंगे। जनद्र जी, आपका रचनाकाल गाधी-युग रहा जिमम एक महान हस्ती ने जन जीवन को भीतर तक मनमना कर जागत कर निया। उस हस्ती का प्रभाव याप और बापद युग के साहित्य पर कहाँ तक पडा ? -उस तक को मैं तय नहीं कर सकता। मेरे मन मे समग्रता और कहानी अनुभव और शिल्प जो वह इसी सयुक्तता की चाह रहती है । मुझे लगता है कि मुक्त पुरुप पूणभाव से युक्त भी हाता होगा । गाधी को म उसी चरम योग के सभ म देखता हूँ । इतिहास के दूसरे महापुरुप उस तरह युक्त और मुक्त नही दिखाई पडत माना दत के दो सिरे उनम परस्पर टकराते है ममवित नहीं होते । इसी से गाधी र प्रति मेरा गहरा आक्पण है । घटनात्मा जो हुआ यानी मने कालज छाडा जल गया वह सब ऊपरी बात है । शायद उसका निदशन मरी रचनाजा मे जहाँ सहाँ मिल भी जाता हो । लेकिन जिससे गाधीवाट कहत हैं उसका राइ रत्ती भी बोध मने अपने दिमाग पर अनुभव नहीं किया है । वे याय नहीं करते हैं जो अपना याम गाधी क मृत्यु म से मुक्त हो जान पर भी उही पर टिकाये रखना चाहते हैं । जो क्यिा उसम स म गाधी वो नही देवता हुए उसी को सीधे देख लेना चाहता हू । स तरह गाधी मरी अपनी मुरित म सहायर ही हो सपने है मुझे वोध नही सरते । पुग र अन्य महापुम्प रवीद्रनाप को आप मुवतात्मा मानते हैं या नहीं? यदि हाँ तो पयो और नही तो क्या ननी? -मुक्त को शायद निगु ण होना चाहिए । यानी कोई विरोपण उम पर सही सही वट म सवे । गाधी महात्मा थे और गाटग के लिए दुगत्मा थे । गाई ऐसा नहीं है कि उसका प्रतिरोधी विरोपण भी उसी तरह गाघी पर लगाया न जा रावे । पर रवि ठाकुर को बट निश्चय स म कवि कह सकते हैं, और शायद अववि काई नहीं यह सकता । रवीर की विभूति सगुण है । गाधी को उस प्रकार रूप वण ऐश्वप में म रेम्वना मुश्किल होता है। जनेद्र जी आपन बहा विरहानी के गिल म आप विश्वास नहीं करते फिर भी क्या कहानी शिम्पहीन हा साता है ? - नहीं हो सस्तो। पर क्या कोई गितु ऐसा हो सकता है जिसके भीतर यह जटिल यत्र न हो जिसे मानव यष्टि पड़ते हैं ' लक्नि एप अवोधा भी माता बन जाती है और उसे उस जरिला वा कुछ पता नहीं होता जिसका निप्पन स्प जसपा ति है -- कहानी प्रेरणा, प्रभार और शिल्प कथा का शिल्प हो सकता है और उसको जानने की भी आवश्यक्ता हो सकती है। किंतु शरीर यत्र का कितना भी नान हो, क्या केवल उस भरोस किसी वैनानिक ने अपन में से शिशु की सृष्टि की है ? शायद नान अपनी खातिर सृष्टि मम से सगत ही नहीं है । तात्पय यह कि आप अपने कहानी शिल्प के विषय में विशेष जानकारी का दावा नहीं करते । यही न ? -हाँ बिलकुल यही। लेकिन, आप लोगा की इस धारणा के विषय मे क्या कहेंगे कि आपकी कहानियां प्रश्नात होती है ? साथ ही आप हमारी परस्पर की चर्चा मे कभी कभी व्यक्त किए गए अपने इस वक्त य के विषय मे क्या कहेंगे कि आपकी यहानिया थियारम म से निकलती है? --दोनो बातें ठीक हैं। प्रश्ना त होती हैं मेरी कहानिया क्योकि प्रश्न मुझ म है और ा त नहीं है । फिर यह कि कहानी थियोरम म से निकलती है, मानो अपने पार अनिवाय हो आता है। मै श्रद्धा का विश्वासी हू लक्नि प्रश्न का अधिवासी हैं। इसलिए प्रश्न मेरी कहानी में नोचता वाटता सा नहीं आता, बल्कि समाधान खोजता पूछता मा आता होगा । ससार प्रश्न है ईश्वर समाधान है । लेकिन मेरा इश्वर ससार के प्रश्न को व द नहीं करता है प्रत्युत अन त कार तक मानो उस खुला रखने का तयार है । अर्थात श्रद्धा म मैं अनात प्रश्न का समावेश सम्भव देव मक्ता और बना सकता हू । बलि मुझे लगता है कि आस्तिक होकर ही प्रखर नास्तिक हुआ जा सकता है । अन्यथा नास्ति- पता म भी प्रसरता नहीं आयेगा, जडता बनी रह जायगी। प्रश्न के लिए आवश्यक है कि वह जिमासा रहे, आलोचना न बने । यह सम्भव श्रदा योग से ही हो सकता है और मैं आशा करना चाहता हूँ कि मरी कहानी ये गर्भित प्रश्न म महवान का दप नहीं रह जाता, आवाद और रिपागा भले रहती हो। x अच्छा, जनेद्री, माजवल पहानी के लिए आवश्यक समझे जाने वाले कहानी अनुभव और शिल्प बोधा-युग बाध तत्त्व बोध रस वाघ, भाव बोध, सूक्ष्म बोध और दल बोष तथा अन्य अनेक वोघो को, आप कथा की आत्मा अथवा क्या गिल्प के लिए यहां नव सगत और साथक मानते हैं ? --मैं भी उन बोध-व्यूहा की चर्चा छपी देग्यता और कभी पढ़ता भी हू । पढ़ भई चौकडी भूल जाता है। बर्ड तोगा की भीड के बीच कोई अनाडी पड़ जाए, तो उसका जो हाल हो यही मेरा होने लगता है। कहानी व मामले मे बोध वाला माल मुझे जरूरत से भारी मालूम होता है । गायत दहश कहानी म कही कार अधर में विराजा हुआ रहता है या कहो वह अचन श- है पहानी के मम तर जाने का उपाय उसके पास नहीं है । बोध मानो कुछ स्थित तत्व है, वहानी की जान गति है। इसलिए वोए ही है जो कहानी को जड और नि स्पद बना दे सकता है। हमारे नय बघु जितन हि टी कहानी के क्षेत्र म आ रहे हैं सब खूब पढ़े लिखे होते हैं। इसलिए वोध के चक्कर मे वे पढ़ें तो वे इसके अधिकारी मान जा सकते हैं । मैं अपने अभागे भाग्य का पृतन हूँ कि उस अधिकार से वचित हू । जीने से इतना घिरा ह कि अतिरिका जानने से मासानी से किनारे टूटा रह जाता हूँ। ऐसा लगता है कि वहद अक्षर-पाठी लोगा को पुछ निरक्षर पाठा की आवश्यकता है नहीं तो उनकी कहानी उन साथ इतनी विदान बन जा सकती है कि सही राही जी न पाए । पहानी के लिए एक अकेला प्यार बहुत वाफी है, फिर सार दूमरे वोध मष्ट भी हा जाता कोई हानि नहीं। ममझ म नहीं आता कि मान से पर य जवान लोग प्यार को क्यो उहा बनाना जरूरी समझते हैं। जान से पहले ४डा बना लेंगे फिर दो १ जार स उस गरमाना चाहगे । यह सब पार जरूरी नहीं होना चाहिए और विन म योडा यज्ञ बनन की तयारी पाहिए। कहानी पर यातें व अवश्य करें जिना वा यात मे है बानी मे नहीं है । बातों या क्षेत्र ही अलग है। पहानी म जिनकी कामना है उनको पहानी लिसनी पढ़नी चाहिए। भाई यशपाल ने एक जगह टोय लिया है कि अपना माल बचने का सवात फूम फर पहानो प्रेरणा, प्रभार और शिल्प भी आता है और वहां दम तरह की बातें बनानी होती है। उस हुनरमदी का मामला हो तो सचमुच इस बारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है । पर आगिर स्वाद की परप चखो मे हो होतो है बात कहने मुनने से सही परख नहीं होती। आप कहते हैं कि कहानी के लिए क्या अकेला प्यार काफी नहीं है । इसकी जरा और व्याख्या शीजिये। -~-प्यार में व्यक्ति अनायास नि म्स बनना है अर्थात स्वत्व को निहावर क्य डालना चाहता है । प्यार के अतिरिक्त जब हम अपने पास फुच राब रग्बन है ता असल में उस बहाने अपन सत्व को ही अपन पाम सचित और सुरक्षित बनाय रचना चाहते हैं। इसम हम समीक्षा और थालोचक न जात है और दोय सब हमार निष्ट हमारी अपक्षा दोयम बन जाते हैं। हम नाता, वे नय । यह रिमाग को स्वत्ववानी (Approprnative) वृत्ति है और इसम से न जागतिक सत्य हाय आ सकता है न आत्मिा । यह एक प्रकार की स्वरति का ही रूप है। इसी से परम अनुभविया ने चेतावनी दी है कि विद्या अविद्या भी है पान अनान भी है । बोध की दुहाई से इमोनिए मुझे हर लगता है कि उसम अनत मह का अजन और अचन या जाता है और विसजन बच रहता है। x क्या घणा भी थाप उक्त प्यार के अतगत आती है ? ~~~णा के अस्यताभाव म स ही प्यार उत्पन होता है । धणा को समझे तो वह मूत्र म अपन प्रति प्यार का ही उत्स्ट रूप निक्लगा। स्वरत व्यक्ति चारा बोर घणा का अधिकार पा जाता है। जब यह घणा असह्य होती है और अपने प्रति हा चलती है ठीक उसी क्षण प्यार जग उटता है। प्यार व तत्त्वशन मे जान को पिस्तुल जरूरत नहीं है। रोजमर्रा के उपल-मे उपले प्यार में भी याप एक पान पाइयेगा । आदमी जिसमे प्यार करता है पहले उमत्री निगाह सा मे बचना चाहता है। यानी अपने मउघ म ए होनभाव वो अनुभूति से प्यार आरम्भ होता है। उसमे प्रेमी आम और पास एक साथ पाना है । यह पृणा अपने से ही जो होने लगती है, अपने निज की रति से उरटे निज स कहानो अनुभर और शिल्प सोश और ऊव हो आती है तब मानो पूजा अपने से बाहर की ओर जाती है । इसी को तो प्यार का अनुभव माना जाता है । इस तरह प्यार मे से ही मैं मानता हूँ वह सच्ची घणा की अनिवाय और अमोघ शक्ति प्राप्त होगी जिससे हमार परस्पर सबधो म आई घणा अनावश्यक और "यथ हो जाए । तब वह घणा निर्वयक्तिक होगी व्यक्ति के सदभ से वह मुक्त हो जाएगी। अर्थात पाप स ही होगी और पापी के लिए प्रेम को मुक्त करने वाली होगी ।

स्वातन्त्र्योतर हिन्दी-कहानीः एक विवेचन * अाज हमे विशपकर स्वातथ्यात्तर हिदी कहानी के धार म बातचीत करनी है। इस सम्बध मे पिछले दिना पापक वक्तव्यो से लगा है कि इस अवधि म कहानी ने प्रगति नहीं की है । क्या आप सचमुच मानते हैं कि पिछले वर्षों मे हिदी कहानी न प्रगति नहीं की। -कहानी ने प्रगति की है अथवा नहीं की है, मैं समझता हूं यह गब्दावली ही सगत नही है । कहानी की प्रगति को क्लक्व्लिी यानी सामूहिक रूप से आंका जा सकता है एसा मैं नहीं मानता। होता यह है कि कुछ लेखक अच्छा लिखते हैं, कुछ वसा नहीं लिखते । दाना तरफ के लेगक हर कान मे हाते हैं । मैं कहानी का सम्बध समय से नहीं, रचनाकार व्यक्ति से जुड़ा मानना हूँ। * इसमें विरोप अतर नही जाता । अव मेरा प्रश्न है--स्वतत्रता के बाद के कहानीकार ने पूर्ववर्ती कहानी को अपेक्षा कहानी का आगे बढ़ाया है अथवा नहीं? -इस अवधि म बोधात्मक नान का मान मिला है भावोत्क्प का नहीं। विश्लपण का आग्रह वढा है । प्रादश आमल हो गया है । यथाथ की कुरेद- बीन करने में प्रयत्न अधिन सीमित हो गया है। प्राज के कहानीकार का आग्रह है कि उसने समप और समष्टि के प्रति अपने दायित्व का ज्यादा शिक्षित और श्यादा जिम्मदारी के साथ अनुभव किया है। इस बार म आपका क्या मत है -समाज के प्रति सचेत भाव स दायित्व अनुभव वरना उपयोगी नही 7 50 कहानी अनुभर और शिल्प है। रचनाकार अपने को समाज से अनग मानकर हो वसा नायित्व ओढ सबता है । नय कथावार की सवेदना व्यक्तिया के दुसा के प्रति न होकर समाज नामक संस्था के प्रति हो तो उसका विशप अथ नहीं बनता है । इसस अहम्म यता बढती है । मैं इसीलिए समाजवाद का कायल हू। समाजवादी सहज अहवादी हो सकता है। र स्वातत्र्योत्तर कथा साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तिया म प्राचलिक्ता भी एक है । क्या आप समझते है कि यह प्रवृत्ति सान्त्यि के लिए श्रेयस्कर सिद्ध हो सकी है? -प्राचलिक्ता शब्द तो अचल स बघा है। लेकिन हां स्थानीयता जिसे लाल कलर कहें उस पर विशेष ध्यान है । परिस्थिति को बारीकी म चित्रित करने वा माग्रह बढा है । यही प्राग्रह प्राचलिकता तर भी गया है । प्रति ग़लत तो नहीं थी पर गायद अति हो गयी। परिस्थिति य बीच मानद भावना की स्थिति क्षीण बना दी गयो । परिस्थिति अपने पाप म साहित्यकार के निक्ट पट ही तो है। उस पर मानव चित्त की क्या और क्तिनी गहनता अक्ति हुई है, साहित्य को सफ्नता का मुख्य मान यही है । nाज के लेखक का यह भी प्रापह है कि उसने फ्था को अपन पूर्ववतियों ये रामेण्टिसिज्म मे मुक्ति दिलायी है और उस ययाय की भूमि दी है । प्राप इस वपन से यहाँ त सहमत हैं ? -विनकुल सहमत नहीं हूँ। म रामास विना माहित्य को पल्पना ही नही कर सवना । अाज वि लपण इतना बढ़ रहा है कि रोमास वा पाय जा रहा है । बौद्धिकता ने हारियता को ग्रम लिया है। यह ता रही वष्य की बात, अब मैं जानना चाहूगा कि पाप की राय में पिछन वर्षों म गिल्प की दृष्टि से विकाम हुमा है प्रयवा नहीं ? -शिल्प की दृष्टि से अवस्य विकास हुमा लगता है । सूचस्ता भोर सांगनिवता या प्राग्रह पढ़ा है । लेग्नि बाहर की साज-सज्जा पया कुछ साम दगी मगर भोतर का स्वास्थ्य क्षीण हो ? क्या दपने म यही नहीं माना fr स्वास्थ्य स्वय सोन्दय है ? ऊपर को सौन्दप सज्जा स्वास्थ्य के प्रभाव में भारी मातन्योत्तर हिन्दी कहानी एक रिवचन ८१ तक लग सकती है । मुझे कई बार ऐसा लगा है कि शिल्प चातुय ने अमुक कहानी को बनाया या सवारा नहीं बल्कि दवा दिया है । यदि वस्त्र की बनावट और सजावट व्यक्ति को ढककर ऊपर उभर आती है तो अरुचि ही पैदा करती है। अभी प्रापन कहा कि शिल्प की दृष्टि से अवश्य विकास हुआ है । आज के विन कथागारा की रचनामा म वह शिल्प वैशिष्टय है जो आपके इस कथन की प्राधार भूमि बनता है ? —यानी नाम चाह्त हो। प्रापका अमुविधा होता मैं प्रासानी मे प्रश्न वापस लेकर आगे बढ सकता हूँ। ---मुझे निमल वर्मा म शिल्ल को सूट मना और साकेतिकता मिली है। साथ ही वन लेखन शिल्प की अधिकता और अतिशयता से वरी है। गित्प के आधिक्य की दृष्टि से मुझे गजेद्र याच का नाम याद आ जाता है । वहाँ कौगल के नीचे सत्त्व दव सा जाता है। और भी रचनाआ म अदायगी और तज़ पर ज्यादा जार है । एक और भी वात है-लेखक प्राजक्त सभी पढ़े लि वे होते है । एम० ए० से कम शायद कोई ही हो । उह अपनी विनता का पता रहता है । कहानी की क्ला के लिए मुझे अनता बहुत आवश्यक मानूम होती है यानी कि लेखक सुन कुछ जानना चाहता हो । लेखक जब हाथ म निणय लेकर लिखता है तो मात की उत्सुकता उमरे लेपन म नहीं रह पाती । नाज की पीढा के लोग अधिकार बहुत कुछ जानते है । यह तक जानते हैं नि पुरानी पीढी के कुछ नहीं जानते थ । * आप उनके इस क्यन से वहां तक सहमत हो पाते हैं ? -वात ता सच है । वेगर आज बेटे के मुकाबले वाप बहुत ही कम जानता है । लकिन यह बहुत और अतिम और निर्णीत मान रखने की क्षमता कहानी- लेखन की क्षमता नही बनता । यह विवाह प्रादि के मामले में ज्यादा काम की सावित हो सकती है जहां सघष लना जीना मौर जीतना पड़ता है । कहानी वे लिए तो महानुभूति को अधिक अपेक्षा है । वह अपन को वम मान मकन की तपारी म रा सृष्ट होती है। पर क्या दिया जाय, जानरार युवक अपन को अन्न २ कहानी थनुभव और शिरप कसे माने। आपसी याता से लगता है कि पुरानी नयी पीढी म कसाव-तनाव की स्थिति -वह ता है। * ता पया यह स्थिति साहित्य के लिए श्रयस्कर भी है ? श्रेयस्कर न हा लेकिन फल माने से पहले वृक्ष यदि नही झुव पाता तो दोप उसे कसे दिया जाये विद्रोह की गवस्था हर जीवन में पाती है । उस अवस्था म यक्ति अपने को अपरिपक्व मान ही नहीं सकता । उचित यही है कि उन अपरिपक्व न कहा जाय । असम्मान म से विनय या नम्रता वो नहीं उपजाया जा मकता । मागे पोछे तो स्वभाव म वह आजव आयेगा ही। किंतु जव 'एडोलोसेंस (अल्हडपन) की यह अवस्था हा तब सामने न पढना ही इष्ट है । वल्कि ऐसी अवस्था में कुछ और प्रशसा देते रहना भी हितकर हो सकता ४ वह विम एष्टि से? -दपि यह कि मह उसमे कही दवा हुमा है । वह अपने को माजाद और सबसमय ममझना चाहता है । यह योयी तृष्णा है । बढावा देने से वह दमित भाव दूर हो सरता है और ग्रह अपन प्रकाशन का माग पापर स्वास्थ्य का लाभ कर सकता है। मापने नया पीली पर अपरिपक्वता का आरोप लगाया है । इसके विपरीत नगा पीला का पाराप है कि पुरानी पाश अधिकारी लाग अति पश्य यानी आयर राइप हा गय हैं । इस सम्बध म माप क्या कहगे ? -प्रायु से गाय एक ममय जरा थातो हो है और फिर मृत्यु मा जाती है। यह क्रम तो स्वत सिद्ध है । अपना ओर से मिमी का धक्का देवर जरा और मत्यु म धरलन का माव याना तुमब हानी है तो यह कुछ अपनी ही महिलागुता के कारण । राज परम्परा में अक्सर देया गया है जि बेग याप के गरन तर ठहरा नहीं है उसस पहल ही उसने माग प्रारर वाप के सिर को बाट हाना है। कारण इसम राजसिंहासन बना करता है। ऐसा कोई सिंहासा स्वात-योत्तर हिन्दी कहानी एक विवेचन साहित्यकार के पास नहीं है । पर दात पारे में काम करत पान दाना दे कोद-न-कोई प्रासन ता बन हो गया है । यनित्व क युद्ध में दरबकों सहा जाय ? जीवन-मपप का यह भी एक है। पर, गच वम 'नना भी कि इमम साहित्य अथवा मम्वृति का वा मम्ब र नर्ग है । यति मुन वा बिजरा-नीणता को पार बग्न जान वान व्यक्ति का अतिरिक्त मम्मान दना कुछ वठिन नहीं हाना चाहिए। सच पूटिरता यर यार-मा- 33 विधाम की मार भगता है। अपमान ता उल्टे जीवनलायी तत्त्व । निरम्बार का भाव देंगे तो पुरानी पोटी में जीन और अपनी मता रखने का भाव अगा । नयी पीता को यह अनुभव नगें है और इमोनिए पुरानी पीढी को टलटे जमाय और जगाय रखन का काम टमम हा रहा है। * फिर ता मैं मममता हूं नया पाढा की यह अनुभवहीनता और दाना पीडिया के बीच तनाव का स्थिति उत्पादक ही है। --मघष और तनाव कायम रखा जाता है ता मम आगमी का दिनना भी नुकसान होता ही साहित्य का भला ही होता है। * मागमा का नुक्सान भी वहात नुवमान है । और आपर हिमाव से ता अतन व्यक्ति ही महत्त्वपूर्ण है तो क्या इस तनाव की स्थिति वा बाई निरा-- करण नहीं है। --तनाव का स्थिति का निराकरण चाहा हो क्या जाता है ? उममे कष्ट होता है उसन गम्भीर प्रेरणा किती है मनों में विकार पाता है वह सर तो है । लकिन दूसरी पार उत्साह भी जागता है कम म प्रसरता आती जीवन म वग बना है। ननाव न अवश्य ही दो पर होते हैं। क्या यह इप्ट है कि एक पण दूसरे के मुरादल मुव या मन्द पड जाय ' जिमका भुपना (ममिशन) क्त हैं उगम लगता तो है कि तनाव मिट गया लक्नि उम पद्धति से जीवन में क्षति पाता है। इसलिए निराकरण का माग भुा जाना नहा है । बलि तनाव स्वय मे हान समाधान का भार बढ़ता है। विकाम को इस द्वात्मक प्रक्रिया का माधम ने अच्छा निरूपण किया है । पोमिस एण्टी योसिस का जमाता 1 कहानी अनुभव और शिल्प उसम आपका मन उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त होता है या नहीं? -नई यहानी वही न जो पत्र पत्रिकाओ में नय अका में छपी देसी जाती है तो क्या यह वहानी एक ढग की है ? अखबार बहुत स हैं और रोज रोज सब नय अब था रह हैं। बहुतायत और वहाव म ठीक कौन नमूना नई कहानी का है यह मैं जानता नहीं है। लिसने वाल के साथ क्तानी का स्प डा है और सभी तरह के लिसने वाले ह । हल्के है भारी हैं धोती वाल है टाई वाल हैं । एक साचे म देखना मुभमे हो नही पाता है। नया ग सदा फरान का है । फशन का भविष्य नही हाता, कवल वतमान हाता है। * पापन हिती क्या माहित्य म ययों का प्रवाह देखा है। क्या रतमान की कहानियां विगत की तुलना में प्रापको आधिक सामथ्य वाली लगती है ? --नहीं। न कम न अविर | सामथ्य समय में मनही यक्तित्व में मे पाता है। नया १९६१ का साल गत वपो से समथ हो तो असमर्थों के लिए वन हुए याजनालय भाजनालय और औषधालय सव खतम हो जाय और लोग कुछ न परें मिफ समय का मासरा दसा करें ! सामथ्य श्रद्धा म से प्राता है । श्रद्धा का जमाना यह नहीं समझा जाता इसलिए सामथ्य या भी जमाना शायद य नहीं है । दुध गिरा विसरा है। मानस का गठाव मोर जुटाव उतना उपयोगी नहीं समझा जाता जितना विवराय सामध्य मे उल्टी चीज है पिग्म म मे विवरा दी गई यह रगीनी और पता- चीनी । पहानिया म ऐसा मसाा मैं मारा प्यादा देखना । हिनी की नई कहानी म प्रयोगाथा ॥ एक प्रम या नये ढग से यात बहन या जा प्रयत्न दृष्टिगत है व पापो नया पौध क पतन पूनन वा मनोप दे पाता है? --प्रयोग या प्रयत्न मेरी समझ मे नही पाना । हर सहि प्रयोग है। हर नई पहानी प्रयोग में से माती है । क्या पहल क्या प्रव । यह प्रयोगशीलता गमित है जीवन म और पुरुषाय का नाम है । लेकिन प्रपनपूपा हान वाला प्रयोग जीवनमय नों होता है। इमलिए रूपतिर साय हा अधिकारी हुमा करता है जो व्ययता है ।

स्थात योत्तर हिन्दी-दहानी एक विपचन कगनी के बारे में आपका निजी मत क्या है ? अाप कौन सी दिशा को नये लेखका के लिए थेयम्बर मानेंग? ~ निजी मत कुछ नहीं है। कारण, मैं कहानी-लेम्वर रहा हूँ अब भी हो सकता हूं। मत अलेयर के लिए जरूरी होता है। दिया मुझे वह चाहिए जो क्मिी भी दूसरी निशा से अलग या उल्टी हाने को मजबूरा स बची रहे। दिशाएँ सब स्पस में चतता है । म गइम की दिशा पमाद वगा जो स्पैम की किमी दिशा को नहीं काटती और सवका भरपूर बनानी है । टाइम की दिशा को आत्मिय कहना चाहिए । आजटिक्य से स्वतन सजेक्टिव । * अपने का आज का कहानीकार मानने के नाते, वतमान यत्रणामय परि स्थिनिया-वास तौर से राजनीतिक और आर्थिक गोपण की यरामय परिस्थितियों के प्रति कहानी लेपन के स्तर पर सनिय पात हैं या इन स्थितिया के माय अपने को सिफ सनग्न ही पाते हैं और कहानी-लेखन क समय इह ग्रहण कर सक्न अथवा ग्रहण करने के बावजूट व्यक्त कर सक्ने म असमथता मह मूम वरत हैं? -~-परिस्थिति की क्या मला सता है ? मन स्थिति के साथ उसकी सम्बद्धना वे स्वरप पर मैं सर निभर मानता हूँ । लेखा परिस्थिति व्यक्त नही करता उनकी अपेक्षा में अपने का व्यक्त करता है । वह अपनी ओर मे निनान वाजता और मुमाता है । अपने बारे म मैं अनजान हूँ । पाप मानते है कि परिस्थिति और मन स्थिति परस्पर सम्बद्ध होती हैं। इम हम भी मानते हैं, किंतु आपने यह स्पष्ट नहीं किया कि परिस्थिति का अपना मोर स निदान आपकी रचनामा म वहां पर या कहा तर खोजा या सुभाया गया है? ~हो यह स्पष्ट नहीं है । शायद मुममे अधिक स्पष्ट हो भी नहीं सकता। मन स्थिति क मैं माय हूँ तद्गत हूँ, इससे उसका तटस्य माता होने का मेरा वा नहीं है। परिस्थिति का ज्यो का त्या स्वोकरण या समथन लेखक में नहीं हो

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स्वात योत्तर हिन्दा कहानी एक विवचन --म काल की दानी के निणय को अपनी मुटठी म नगे लेना चाहता। अपनी रचि म मै अावद्ध हूँ और दिवा हूँ। क्या पता कि यह इतिहास की प्रतिनिधि रुचि हो ही नहीं। अधिक स अधिक मैं इतना ही कह सकता हूँ कि मुझे अमुर बहाना या पुस्ता अच्छी लगी लेकिन उस निणय को कालम पर थाप ता म नही मक्ता । xxफिरना। -~-जम प्रमा निमल वर्मा की एक कहानी पढ़ी थी और उमरा असर गहरा दृप्रा । सारिसा मे प्रमागित कहानी स प्राशय है । ---हां पर कान दा का निणय उमचे पक्ष म होगा कि नहा कौन जान । इमोलिए जब ता कभी मने निणय का काम अपने ता नहीं प्रान दिया है । विद्वान पति यह काम करते आए हैं और अपन व्यवसाय का वे ही अधिक अच्छी तरह जान सात हैं। क्षमा परें, वहीं एमा ता नहीं कि प्रश्नावे सही उत्तरा म माप इस्तेप करना चाह्न हैं ? -~~इमप करन स मुझे भय हो एमी बात नहीं । परिवतन की दृष्टि से पूरा सन साठ के पहले की और मन् माठ के वार की कहानी में क्या प्रापका कोई दिगप अतर नजर आता है --चौसि मात्रा निरतर बढ़ रही दीखती है। व्यक्ति म स्वरमा मरता के भार गरे हात जान का यह प्रमाण है । प्रयात मभ्यता की रणता का प्रमाण र नामवरसिंह व इम क्यन के बार म प्रापका क्या विचार है कि हिन्दी- बहाना म १६५६६० मे प्राम-पास कहानीरारा की जा नई पीढी उमर कर सामने आई है वह प्रानो गुरुग्रात वा नाता निमल वमा को एक गुरुमात' स जाडना पसद करती है। राग यादव कमलेश्वर द्वारा विमापित नई यहाना द विन्द इम पोटी के मन में स्तिना अधिक विदाह है, यह इमी से स्पष्ट है दिइहाने बहानी मात्र को अस्वीकार नरक हिती म मरहानी योमावाज उठा दो। 7 - कहानी अनुभव और शिल्प -~बहुत कुछ से सहमत हूँ। पर सही जवाब उसी पीढी से लेना चाहिए । sx सही जवाब तो वस्तुत आपसे मिलना चाहिए, जो कि पहले की पोढी के हैं । और केवल है ही नहीं बल्कि उस पीढी के प्रतिनिधियो यानी विशिष्ट व्यक्तिया में से भी हैं। -मेरी कठिनाई–जनेद्र ने इस बार फिर सीधे धागे म गोठे बांधना चाही-भई यह है कि व्यक्तित्व को मं पीढी म देख ही नहीं पाता, घेवल व्यक्ति में देख सकता हूं। इसलिए कहना पडता है कि पीढी के बारे में सही जानकारी प्रगर चाहिए तो उस पीढी से ही लेनी चाहिए । मुझे डर अवश्य है कि आप पीढी स लेने चलेंगे तो जवाब इतने विविध हो जायेंग कि कौन सा उनमे पीढी का है यही तय करना मुश्किल होगा। इसलिए मेरी सलाह तो माप को भी यह है कि पीढी के चक्कर से बचिय पोर व्यक्तिया को रचनामा को ध्यक्तिश लीजिये। अभी मापने जानकारी पन का प्रयोग किया है कि तु यदि मूल प्रश्न को देखें तो उसम मापसे जानकारी नही विचार मांग गये थे ।' -विचार पहले ही इस बात पर अटकता है कि पाढ़ी का पोई वस्तुगत मस्तित्व भी है । असल म यह सना धारणात्मक है । धारणा के बाहर वस्तुरव व भय म उसवा मस्तित्व हा नहीं है । इसलिए उसके बारे म विचार बनाने भी सगू तो विस प्राधार पर ? सक्षेप म पोढी के बार म मेरे पास कोई माय- विचार नहीं। बहुत सुनता हूँ (साहित्य नही चरित्र के क्षेत्र म) कि पीढी विगड रहा है । मुझे वसा कुछ भी नहीं दीखता और एसे कथन उन लोगा के मुह मे ही गोभा या सायक्ता पा सरते हैं जो सममना नही सिफ़ बताते रहना चाहते हैं। विचार का सम्बध समझने से अधिक है बनलाने से कम और इसलिए देता है कि समझने की चेष्टा मपीढ़ी जसे समुदाय वाचा गर अपनी इयत्ता यो रेसाएँ तो बठन हैं और अवास्तव हो जाते हैं । विचार को उन पर रसने की फिर मावश्याता गप नहा रहती । पया इस्वेप-मरधी अपने प्रश्न यो मन मला सरना है। -भाप स्वतन है पर 'इस्वेप से मुझे भय हो ऐसी बात नहीं। मगाना वितार स्वातन्योत्तर हिंदी कहानी एक विवेचन सीग वढाय सामने आ जाए तो क्या आप समान हैं में वचने और भागने मे देर लगाऊंगा? जी नहीं इतना नासमझ में नही हूँ। इसलिए पलायन की पावश्यक्ता को म मान लता हूँ। 7 - नई कहानिया आदोलन को आप किस सदभ म लते हैं ? -मुझे उसम साहित्यिक सदभ तो मिल नहीं पाता । प्रथात् उस स्तर पर मुझे उस पान्दालन को पालतू मानना होता है । सदभ कुछ यदि मिल पाता है तो प्रादिम प्रेरणाया मे । उनको जीवनपरम या एक्जिस्टेंगल प्रेरणाएं कहिये । वे प्रेरणाएं जोवन का कम आवश्यक भाग नहीं हैं । लेकिन उनमे विग्रह फलित होता है और वह अपनी बातचीत के क्षेत्र से बाहर की बात होनी चाहिए। x नय परिवतन ता उस साहित्य म निरन्तर प्रान ही रहत हैं फिर उहें स्वीकार करन म भित्र क्या है -परिवतना को अस्वीकार करने को भूल कौन करेगा? पर, पानी वह नही है क्षण-क्षण बदल रहा है, तो क्या गया भी मिट रही है । साहित्य को रूपा- कार म ही बंधा देखेंगे ता उमरी अमरता न हा जाएगी। र व्यक्ति पल पल बदलता है जो अभी था अभी नहीं है । कला मे भी परि वतन अव यभावी है। उसी तरह यति साहित्य की विधा भी बदले तो इसम यस्वीकार क्या प्रेमपद सत्रीजी की तिलिस्मी कहानिया स उभर कर एक नय ययायवाटी घरानल पर पाये, वैसे हा उससे अगले परिवतन जैनन्द्र प्रय माटि द्वारा हुए 1 उसी तरह अब जा नये परिवतन हागे जो अवश्य भावी हैं, उनको अस्वीकार करना क्या ययाय वा अस्वीकार करना नहीं है ? -जनद्र का मैं जानता हूँ। उसने काई परिवतन नहीं दिया। उमन बस वह कहानी लिखी जा लिम्ब सकना या । यानी अपनी कहानी लिखी। परिवतन परन के लिए नहीं भपने को साधन के लिए। गृहस्यो को कहानियाँ प्रेमचन्द ये या मागे भी लिखी गई मोर लिसी जायेंगी। वे पड़ी भी जायेंगी । कहानी लिगने वाले के साप है, समय के साथ उतनी नहीं है। समय से लगी भाषा हो कहानी अनुमर और शिल्प सकती है मैली हो सकती है या इस तरह की और ऊपरी बात हा सस्ता हैं। उनका लकर आदोलन और विनापन होते रह है सडे भी किये जा सकते हैं। पर साहित्य की प्रारमा मे उनका कोई वास्ता नहीं होता । परिवतन खून हो, फैगन चाहे पल पल बदलें तो कुछ भी बुरी बात कही है। परमिक लिए वे वस्त्र होते हैं न वह मनुष्य का शरीर ऐस जी बनता है न स्वभाव फिर प्रात्मा की बात ता कहिये क्या । * एस न भी बाल लकिन यह ता मानना हो होगा कि वह सब परिवतन शील है । जहा तर प्रश्न है विज्ञापन का या विज्ञापन को मनात्ति का वह बुरा कहा जा सकता है लकिन केवल उसी वृत्ति के लिए सम्पूण साहित्यिक धारा परिवतन को नकारा जाय,पौरउरी पुरानी लकीरा पर पता जाय, ता क्या वह विवाग है ? अापने अभी पहा जा सालित्य वहानी लिग्मन वाल के साथ है समय के साथ नहीं है क्या समय, निपने वाला पहाना ये सब रिलेटेड नहीं हैं ? एक धोनी मी पमजोरी के लिए सम्पूण अस्तित्व को अस्वीकार करना प्रगनिगीलता नहीं मानी जा सकती। -नय-गुरान शो का वीच म डालकर मानो वारा मातत्य काम भाना और सरना नहीं चाहते हैं। इस प्रकार मातन और गत्य स अपन का वचित वग्ना विसा ये हित में नहीं हो रास्ता । पुराने के विरोध में किसी नये या सडा बरवे दखन की पद्धति सटा प्रारमगमथनात्मा हाला है और हान भाव में से आता है। लिखने वाला मर जाता है उमवा लिसा फ्रि मा जिता रहता है तो क्या? ण्यत इसी वारण शि परिवतनीय म जितना उग लिनने और 7 वाले म अपरिवननीय का 'वाग रहा उननानी चिरतन अमर बनकर यहाँ गप रह गया परिवानीय तो उपर पावर के साथ मर सप गया। सचमुच क्या बाप उम यसवर यापार हा साहित्य के मूल्या का पहचान करना चाहत हैं ? साहित्य मे मूल्या की परम ययाय सोती है। यह फगे स्वाधार किया जा सकता है कि नया सारित्य गाता मोर सत्य स वषित है? जिता गराई पौर निपटना रा जीयन एव गायी ममस्यामा यो देपन या प्रयत्न प्रयतया स्वात योत्तर हिन्दी कहानी एक विवेचन जा रहा है उतना शायद पहले कभी भी हिदी साहित्य मे नही किया गया । नय पुराने के भद को बंधत रहगे, लेकिन साहित्य आगे नहीं बढता और सब कुछ यह प्रचारात्मक ही है यह कसे हो सकता है ? यथाथ क्या है मैं अव तक जान नहीं पाया। प्रयत्न सच्चा होगा यहां दावा नहीं होगा । दावा है, इसी से सराय होना चाहिए कि क्या प्रयत्न भी है ? और क्या वह सच्चा है ? नये पुराने के भेट पडेंगे, डाले जायेंगे, उठेंगे उठाये जायेंगे । पर जो उसमें रमेगा और भूलेगा, वह ग्योयगा ही, पायेगा कुछ नहीं । आज मेरी उम्र अट्ठावन है कभी अटठाइस भी रही होगी। आलोचको की और आपकी बात मानू तो शायद मुझम कुछ वैसा प्रयत्न रहा हो, पर उस ज़माने में भी, किसी नयेपन के दावे की बात मुझे सूझी तक हो ऐसा याद नहीं पद्धता । क्या बिना हो-हल्ले क निर्माण हो नहीं सकता? * गोरगुल की प्रवृत्ति स्वस्थ न हो, लेकिन इससे वास्तविक्ता म क्या अतर पडता है ? गगा बहती है और प्रतिपत्र बहती रहती है यदि हम उस न दखें या न स्थाकार गौर या उसस तटस्थ बने रह तो वस्तुत कोई विशेष अतर नहीं आता है । शारगुल की प्रवत्ति शायद समय की देन हो, क्योकि यह हिदी तक ही सीमित न रहर विश्व के सभी साहित्य म विद्यमान है । अल्मेयर मामू सात्र हैमिग्य विलयन पारनेर यदि मूख ही हाते तो विश्व के साहित्यकारा की श्रेणी म नहीं पहुंचते और दुनिया का सव भापाआ म उनका रूपातर नहीं होना और करोडा पाठक पहनती पढते । -मुझे नहीं मालूम कि आपवे गिनाय नाम + लोगा न दूसरो को स्तिन्य जीण और भूख बतान को वागिश की थी। यदि वे माय हुए भौर रहगे तो निश्चय ही इग वारण कि उहांने अपन प्रति ईमानदारी अवश्य अपनाई होगी, लेपिन पूजा व प्रति उद्दण्डता नहीं। अन्तर जो उस तरह पाता से पडता है वह यह है कि समभा जाने लगता है कि वापबेटे की प्रौढ किशोर की उनति नहीं चाहता है। याद कीजिये कि माता- पिता विस वृताथ भाव से पुत्र वा प्राप्त करत और उमका पोपणपरते हैं । लेकिन कहानी अनुभव और शिल्प राजनीति मे अधारता को परम्परा रही है कि युवराज राजा को खत्म करके पहले गद्दी छीन लेना चाहता है । गद्दी के कारण बात समझम पाती है पोर पाज के कानून ने सचमुच साहित्य को सम्पत्ति बना दिया है । इसलिए उस मे भीक्षेत्र इस तरह की बता बदी माये तो कोई विस्मय की बात नहीं है। लेकिन साहित्य चिन्तना उस अनिवायता से डिगे तो सचमुच शोचनीय बात होगी । * नई कहानी के नाम पर हिंदी में जितना कुछ लिसा जा रहा है, क्या आपको सब वैसा ही भावगूय और उथला नजर आता है ? और उसमें कही भी सार और टिकाऊपन नहीं नजर आता ? ~~हां नई कहानी के सम्बध मे और उस पर जो लिखा जा रहा है अधि पाश तो मुझे प्रथहीन पोर अनभीष्ट प्रतीत हुआ है । कहानियां सचमुच ऐमी अनेक सामने भाई हैं जिह पढ़वर चित्त को मानत प्राप्त हुआ है । नयेपन के शोर मे अक्सर देखता रवि अच्छा अनपूछा रह जाता है और बनावटी उभार मे ल पाया जाता है । इस चर्चा स सबस वही हानि यह हो रही है कि लेखन हार रहा है गुटय दी जीत रही है। लेकिन लोग सो यह दावा भरते हैं कि उहाने सचमुच साहित्य को नौता दलाल से निकाल कर पार लगानी है। यदि ऐसा न होता तो वे कसे इतना विश्ते छपते और पाडे ही समय म इतना यश प्रजित कर लते ? -~-दावा व भरते हैं क्योकि उनमे इसकी स्पर्धा है इतना गुमान है । इस धामना के लिए उनके प्रति सराहना का भाव हो सकता है । माखिर इतनी हिम्मत हर रिसी में कहाँ हो पाती है ? पार हाया हाय इसका इनाम भी मिलता है कि नाम की चर्चा होती है और कितावों को वित्री होती है। लेकिन इस सबक वावजूद उनके प्रति सबसे बढ़कर मुझमें सहानुभूति का उदय होता है । क्योकि यह निश्चित है कि अहकार अथवा भाग्रह मे स नहीं बल्कि उसके मपण म से श्रेष्ठता पो सष्टि होगी। बाजार में ऊंच नाच पर याद न जाइये, पाल निरवधि है और धरती भी विपुला है हम माप से सीमित नहीं है। और वहां महम नहीं टिकेगा, प्रेम ही टिक पायगा।

हिन्दी-कहानी : शील-निरूपण 1 ॥ अभी 'धमयुग में आपका जो लेख आया है उसम कुछ इस प्रकार की ध्वनि निकलती है, जैसे आपका लेखन विरोपत उपयास और कहानी को विधा को अपनाना कुछ अपने आप हुआ है । लेकिन, में समझता हू वि उप यास और कहानी को अपनी विधा के रूप में अपनाने के पाछे कोई वैचारिक पृष्ठभूमि जरूर रही होगी । यू उप यास और कहानी विशेष रूप म आधुनिक पश्चिमी सभ्यता की विधाएँ हैं । अपन बारे म पसला करते वक्त क्या पश्चिम की किसी खास विचारधारा के लेखक या किसी खास पीढी के लेखक आपक सामने थे ? --मैं निणय म से तो लेखक बना नहीं । यह घटनात्मक तथ्य है । मैं अपने सम्बध म इतनी स्वस्य अवस्था में ही न था । ऐसी हीन भावना मे दवा था कि निणय वहा से नहीं बन सकता था। कहानी और उप यास लेखक बनने का निणय तो और भी वश का न था । मैं समझता हूँ कि हर प्रादमा के साथ क्षमा करेंगे मेरे प्रश्न का सम्बध वनने से नहीं करने से है । इसलिए मैंने किसी न किसी स्तर पर निणय की बात कही थी -~-मैं जो कहन जा रहा था, अापका प्रश्न उससे सम्बद्ध दीखेगा। हर आदमी दो चीजो के बीच से चलता है और वे दोना सामा यतया मेल नहीं खाती। एक तो, जो सपना-सा लगता है, जिसके प्रति प्राकाक्षा होती है । दूमरे वह जो अपने साय ययाष और वास्तव होता है। इन दोना के बीच काफी पासला है और प्रत्येक व्यक्ति चुनौती अनुभव करता है कि कस इन दोनो फासला के बीच मरिक्तता न रहे बल्कि एक सम्बद्धता हो । तो इस प्रयत्न में, मैं मानता हूँ कि कहानी उपयास आदि की मुष्टि सहन और अनिवाय हो भाएगी । पश्चिमी साहित्य पढ़ता में उरूर रहा हूं, लेकिन किसी लेखक या अमुक रचना के कारण - कहानी अनुभर और शिरप मै कहानी पर पाया ऐसा मुझे याद नहीं आता । गुरू म जो कहानियां लिखी गइ ५ मर उस समय के जीवन से जुडी सो देखी जा सकती है। उनकी प्ररणा अमुर लेप या यमुक रचना म से नही पाई होगी क्यापि वह बिलकुन जुडी हुई थी मरे ताशालिक जीवन से । निमित्त कुछ बन गया हो वह बात जुदा 7 जहाँ तक आपके यहानीकार के आएको निजी जिदगी स पुढे हो की बात है वे पाराभाए और यथाय कौन से थ जिह जोडने की चुनौती आपके सामने पाई? --मरे साथ घटना ही हुई कि मुझे नौररी मिना । यह दूसरी बात है कि मिलते ही वह नौकरी गम भी हो गई। ता मेरे मन,म उथल पुथल हुई । मैंने उसी वाप-योता पर पुछ लिसा और वही द दिया। फिर दूसरी रचना की वात । आश्यामन मिला था कि वह छपेगी । पांच महीना तय नही छपा तो मैं दफ्तर पहुंचा। मालिक न कहा कि वह अभी डाप स वापम माइ है सम्पादक वाहर गय थ उहान ठीक करके भेजी है । देषी तो वह बहुत शुद्ध हा गई थी। इतनी गुद वि वह मरी रचना ही नहीं रही। अब वह रचना मैं कम छपने दू पयावि उमरा सब इतना दुरस्त था कि मैं ता वसा न था। कहने लगे कि नहीं रचना हमारी हो गई है अगर आप ल न ये तो इस गत पर मि का तीसरे पहर तक एनज यी दूसरी कहानी दे जाऐंगे । खर मैं वादा यर भाया । म जहाँ रता था वर्ग सामन उजाट ऊबड़ खाबड जगह पडो थी वहीं पटाना हाल में सोया करता था। न वानी दने की पिक और मैं ऊपर तारे दग रहा था। लगा कि एक एक तारा बहुा बड़ा है और बहुत दूर भोर में कुछ नहा हूँ और मैं तारा नहीं हो सका। इसी लडो म एक मूत्र मा म प्रापर टप राया ति यदि में अपनी चार वा तार में बिठा हूँता कुछ हाथ नहीं पायेगा। अर्यात भाग्रही भादावार व्या है । महत्त्वारा रा रा अगर चलें और बारम यही एक प्रादायाप्रतिष्ठित कर लें तो प्रव पथताम होगा पूर्णताहाधनही लग सकती। यम ऐमा एक मूत्र साया उस समय मन में घग्नात्मय कुछ नहीं था। इस हिन्दी कहानी शोल निरूपण सूत्र का भूत परन के लिए अनायास दो चरिम अवतार पा उठे। बस, उन दो प्रतीक पात्रो की बन अनवन से स्पर्दा वहानी बनती चली गई। तो अधिकाश रचनाएँ अमूत सिद्धात को अपने निकट मूत्त करने की प्ररणा स बनी है । मरी अधिकाश रचनाएं सोचता हूँ कि साठ प्रतिशत ऐसी ही होगी । तो क्या मोटे तौर पर आप इस विचारधारा से सहमत ह कि साहित्य का मुख्य उद्देश्य विपी सिद्धान का निरूपण वरना होता है ? --नहा, म सोचता है कि निरूपण करने के माना होगे कि सिद्धात प्राप्त है और पाप म बाद है । लेकिन हाँ, सिद्धा त यदि अापकी अभीप्सा और साज का विषय हो तो आप उसका प्रयोग और परख म ला सकते है अपने निकट मूत्त करने के लिए। अपने तइ उसको घटनात्मक स्तर पर उतार कर दखना चाहते हैं कि सिद्धान्त सहा ढलता है या नही । इसम निरूपए नहीं होगा । साहित्य सिद्धात को परखने का ढग अवश्य हो समता है। K. क्या इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि यह प्रनिया दुनिया के हर यक्ति के लिए अलग-अलग होगी? -निगलना चाह तो निकाल, लेकिन मैं साचता हूँ कि जगर मरे लिए पप्रिया यह सगत है, तो दूसर के रिए भी सगत हानी चाहिए । मानव य प वेम्प म क्या में कोई प्रौरा से अलग ह Tव हम यह मार लेते है कि साहित्य के सदभ म बाई प्राप्त सिद्धा त नही हैं जिनका निरूपित करना है बल्कि घटना स सिद्धात की तरफ जाने और फिर उस सिद्धात को परखो को प्रक्रिया को प्रसनाने है तो निश्चय ही यह प्रक्रिया हर व्यक्ति के लिए अलग हो जाती है। हर व्यक्ति का यह रास्ता अपने पाप तय करना होगा? -मुझे इमम कोई आपत्ति नही है । वसे में यक्ति प म यह नहीं मान पाता कि दूसरा से सवथा अनमिल और जो यात्रिय प्रत प्रक्रिया मुभम चलती है वह दूसरा म नही होगी । म मरे मवाल का मतलब है कि मेरे पिसी प्राधार वालर यानी जो मैने प्राप्त विया है उसको आधार बनापर दूसरा आरमी रास्ता नही बना सस्ता?

कहानी अनुभर और शिल्प -मेरा स्वप्न केवल मेरा ही है दूसरे का नहीं। इसी तरह माग भी किहीं दो का एक नहीं हो सकता । कारण हर दो मे स्थिति भेद है । लेकिन प्रत्येक व्यक्ति अपने प्राकाक्ष्य और अपने ही यथाय के अतर की चुनौती से बच कसे सकता है मैं जानता नहीं । इसलिए मैं तो यही कहता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति अपने घटित और आकाक्षित- इन दोना तटो को छुना हुआ चलता है । उसको परिभाषा दू कि जहाँ मे चुनौती है ? नहीं वह न होगा। परिभाषा दी जा सके तो चुनौती खत्म हो जाती है । चुनौती नात म से नहीं पाती, हमेगा प्रगत अनय म से माती है । जो घटित है वह यथाथ का चित्र है । जहाँ से चुनौती आती है पाती रहेगी कभी खत्म नहीं होगो वह उस भाषा म प्रय थाथ है-निता त मौर नित्य अ-ययाथ ! उस सवथा अवास्तव का नाम मरे निकट भगवान है । सत् कुछ हो तो वही हो सकता है । उसे असत् तक कहना चाहो तो पहो । बहुतेरे कहते ही हैं । पर मतिम और परम चुनौती का वह ऐसा स्रोत है कि कभी समाप्त होने वाला नहीं है । इसलिए मैं जो भी परि 'भापा हूँ वह अत मे ईश्वर में सोने के लिए होगी। - इसस प्रगलो बात क्या यह कही जा सकती है वि भापकी राय में घटना या और पावसानो की चुनौती का भी कोई सामूहिक रूप नहीं होता -बात कहीं भारी तो नहीं हो रही? मैं समझता हूँ क्षण समय का अग है । क्षण न हो तो समय समाप्त हो जाता है । यद्यपि क्षण स्वय को समय मे समाप्त कर साथक बनता है । यही बात व्यक्ति और समूह समाग या देश की सबद्धता के बारे मे सही मानना चाहिए । अर्थात् व्यक्ति घटव है, इसी से समूह समाज है । व्यक्तित्व के नाम सामाजिक्ता फलित नहीं हो सकता । इस तरह मा और समग्र दोना जहाँ परस्पर म सुरक्षित रहते और परस्पर को सुरक्षित रखते हैं वही सफल साहित्य है । समाज प्रधान बनता है और व्यक्ति मस्वीकृत होता है अगर ऐसा कोई साहित्य है तो वह सफल नहीं है। और व्यक्ति का अहम् इतना प्रतिष्टित हा जहाँ सिप अनाहत हो जाता हो तो वह भी साहित्य प्रम्यपनीय नहीं है। 7 हिदी-कहानी शील निरूपण o आपने अभी जो कहा, यह क्या किसी हद तक चुनौती की परिभाषा -अगर है, तो होगी। * दानो बाता को अगर मान लेते हैं, तो पहली बात अधूरी हो जाती है । -अधूरी तो होगी ही। और जब तक तीसरी बात निकलने वाली हो तो दूसरी बात अधूरी हो जायगी । - एक छोटा-सा निजी प्रदा पूछना चाहता हूं। कई लोगा ने कहा है कि आप का लेखन हिटी के क्या साहित्य म एक नई दिशा में किया गया प्रयाम था। षया प्रापन म्युट भी यह अनुभव किया कि जा दिशा उस समय थी, हिन्दी के कथा साहित्य में उससे ग्राप कुछ भिन दिशा में जा रहे है ? -~नही, विल्कुल अनुभव नहीं किया। x अभी पश्चिम में एक प्रवृत्ति एसी है जहाँ यह मान लिया गया है कि जिसे अभी आपने चुनौती कहा है उस चुनौती का कोई उत्तर दिया नहीं जा सकता। इमलिए भविष्य को काई कल्पना नहीं कर सकता । -फिर भी कल्पना भविष्य की ओर चलने का वाध्य है। निरथक मा लो, लेकिन कल्पना वैचारी जाय और विघर ? वतमान के प्रति हमारा सम्बध बुद्धि का है। उधर क्रपना जाय तो कसे ? क्या अपनी मीठ की तरफ जाया जा सकता है। अर्थात चुनौती का उत्तर चाहे न बने पर प्रेरणा वही में बनती है। समय वा प्राप्त पहलू क्षण ही है अर्यान् क्षण के साथ वही “याय कर सकना है जो ममप के प्रति जोता है। क्षण में जीना समय की धारा से विच्छिन होना है। जो समय को सनातनता के साथ तत्सम होता है वही क्षण के साथ “याय कर पाता है। समय से तरसम होने को तरकोव समय के प्रति निश्श होकर चलना है। अर्यात समय के प्रति उचन और निरपर ] आज युग घम क्या है, यह प्रश्न पता परये हम समय से युग का विन्दिन करते हैं । इसलिए आ-मी अपनी चेतना से अपि तत्सम हावर घने तो उसम ही समय में माय धीममिलतामा जायेगी।

कहानी अनुभर और शिरूप x लेकिन ग्रााकी यह वात तो आपको उस चुनौती के प्राधार को ही नष्ट कर देगी। 7 --मेरा दुध पहल कहा हुआ दसम नष्ट हो जाता है तो उसकी आप चिता मत कीजिय । यह मुभ पर छोडिय । मैं आगे चल रहा हूँ ता अनिवाय अपनी भूमिका का बनत हुए भी चलता हू । इसनिए मुझे भय नहीं है यदि मरी एक चात दूसरी बात का काटती लगनी हो । xजा निरपक्ष रहता है उसी के प्रति तत्सम हा का गिवायत नही होती ? --सीलिए मैं कहता है कि युग बोध कोमात्म बाब स अलग समभन की प्राय यरता ही नहीं। * कठिनाई दुनिया की तरफ से नहीं है अपने प्रदर स है । स्वस्थ हा तो दुनिया प्रसनता देता दिगाई देती है और खुट भगर रग्ण हा ता दुनिया म कही प्रसता मला देय सपने। - यह पहना ठीक है पर प्रापने अनुमार आत्मबोध और युगपोष दा एकाइयाँ नहीं हैं -यदि जनेद्र अपने लिए वर घेरा बा लता है तो यह नष्ट ही होगा। ध्यान रखना गा वि वोध बुद्धि ग प्रतग नहीं होता । चाहे फिर उरा बाध का रिमी सपा व माय हो --- दा युग पाल या बुद-मसा वह धारणा मे लेने वाली बुद्धि के भनुमार होगा सीलिए समन व सभ को सदा साथ रमने की यात मैं कहता हूँ। मापसी बात से दा नतीजे निरलते ह एक नतीजा ता यह निकलता है कि याज या चुद्धिनारी विपत पश्चिम का निरतरता वो पा पात्मबोध और मग-बोध के सामजस्य का उपनप नहीं कर पा रहा। दूसरे रिकात उराको यह है कि उस जगह पर पहुंच नदी पा रग है जहाँ उसका यह ममूम हो कि वह समय के साथ तस्मम हा गया है इसलिए वह मागे बढ़ सकता है । -मैं राममना निमूमत मस्तित्व बोध दुख क बाघ के सिवा दूसरा बुध हो नही साना । आपकी बात को मानता हूँ कि "स मैं हूँ को अनुभूति दुख और पीटा कप म हो मिलती है। क्यापि महू म हो यह है कि 'मैं सब नहीं हूँ। M हिदी-दहानी शील निरपण १०३ इसलिए आज के साहित्य मे जा एक अकेलेपन का अहसास है, व्यया की अनुभूति है, वह अनिकाय है । और अशुभ नहीं है । आदमी आज नाम और शद वाले परमेश्वर को भूलकर वल्कि तोडकर, जा सचाई को खोजना चाहता है, सो भी अनुचित नहीं है । मग अपना खयाल है कि समय के साथ तत्सम रहे, इसकी भी अलग से चिता करन की जरूरत नहीं हैं। वेचनी शुभ लक्षण है, इससे बुद्धि की कुरेद चेतना की गहरी पर्तो का उदघाटन करती और समय व साथ सत्समता लाने में सहायक होती है । अतिम विश्लेषण म सदबोच दुस बोध म से ही मिलेगा। * बातचीत के दौरान नापने तीन स्तरो पर चेतना की बात कही है । एक कप बोध की एव युग-वोध थी और एक प्रात्म बोध को । आत्म बोध और युग बोध की चेतना परस्पर सम्बद्ध है। इस वचारिक सदभ म नवलेसन के सम्बध मे जा स्थापनाएं हैं, नवलखन के प्रवक्ताया की उनके बारे में और विशपम्प से नई कहानी के बारे में आपकी राय क्या है ? -शब्ना की बारीक्यिा म कही हम भटव न जाए। दुख वाघ से हमारा प्रारम्भ है । उसका बाहर की चार प्रक्षेपण होता है तो वह आत्म बोध के रूप म परिणत होता है । अर्थात उसका पलित हाता है-सह अनुभूति । जब हम दुसरे अथवा अह के बोध को सहानुभूति में परिणत नहीं करते, अाग्रह पर स जात है तो उसरा जच्छे-अच्छे गो का दाना पहनाना यावश्यक हो जाता है । तव उसका युग पर दा पर या इस प्रकार के अय अतिरिक्त लटका पर सटका दते है। नवलखन ऐसी सजा है जिसम जितना नया लिया जा रहा है भौर जितन नय लिखन वाले हैं सब । सव समा जाते हैं । लकिन उन लेखका मे लखन म अपनी अपनी निजता एव विविधता है। इसलिए नवलखन' के वारे मे वाई निणय द साना मेरे लिए सम्भव नहीं है । क्याकि यह सना समुच्च्म बोधर है और अपन माप म कुछ आविदेरी है । कुल मिलाकर मुझे लगता है वि परस्पर को सवेरनारमन सम्बद्धता पर उतना पाग्रह नहीं है जितना होना चाहिए और निजस्व की प्रतीति पर कुछ ज्यादा निभरता है।

१०४ कहानी अनुभर और शिल्प । - मैं एक मिसाल देना चाहता हू, जसे राजकुमार । राजकुमार की जितनी कहानियां पिछले दिना पाई हैं मुझे लगता है कि उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके जितन भी पात्र हैं वे सब किसी स्तर पर आकर यह महसूस करते हैं कि उनके अदर सवेदना को शक्ति नष्ट हो गई है । लेकिन कहानियां इसका मकेत नहीं करती कि लेखक की सवेदना-शक्ति भी नष्ट हो गई है, तो यह नतीजा निकाला जा सकता है कि लेखक के सामने जो वस्तु स्थिति है जो जीवन की घटना है उसम सवेटना नट हो गई है, या बहुत कम हो गई है । और उसके परिणामस्वरूप लखक की सवेदना ने यह रूप ले लिया है। -जसा कि मैंने कहा है निजत्व का बाघ पोडात्मक होता है । अव पीडा की तीव्रता प्रेरित करती है कि उसका निवारण हो । इस चष्टा म समूह-सत्ता और परस्परता की सष्टि होती है । रामकुमारी की मिसाल मरे लिए बहुत मददगार नहीं हो पाती। उनकी रचनाएं कुछ पढी तो हैं लेकिन अलग स उनकी याद में नहीं कर पाता । पर यह मैं समझता हूं कि कहानी के पात्रा में उसके चित्रण पे निजत्व हो स्वय क्यार म उसका मोह न हो। बल्कि पात्रा चरित्रा के निजगत गिध का चित्रण सफलतापूर्वक हो पाता है तो यह तभी हो सकता कि जब लेखक स्वय निज के महवाद का गिरार न हो। लग्नि पाज निजत्व वे चित्रण स अधिक उसकी लिपटन प्रर्यात स्वरति जसी जो चीज मिलता है, उसरा मा सताप नही पा सवना। आजकल समाजवाद का समूहबाद या जो जोर है उसकी प्रतिनिया म निजत्व और व्यक्तित्व पर बल मा पहा है। किंतु राजनानि की एकागिता का उत्तर साहित्य की एकागिता स नहीं दिया जा सकता। मुझे लगता है कि नवलेपन म जस वह उत्तर उलटी एकागिता से देने का प्रयास भी कुछ कुछ है । , अगर म कह दिनयनपन की समस्या हिंदुस्तान म इस वक्त य है कि आप जिम प्रात्मबोध की प्रक्रिया कहत हैं उसका कोई रास्ता उसको नजर नहीं आता तथा जा सिद्धात हमार बुजुर्गों लिए पर्याप्त रहे हैं वे उसको पर्याप्त नही लगत, और इस कारण जिसके पास पर्याप्त सिद्धात हैं उसका ऐसा सगता है कि उसम संवेगा नहीं है तो पया यह गलत होगा हिदा-कहानी शील निरूपण १०५ ~प्राप सही कहते हैं। सबदन का ही धम मान लेंगे, तो जीवनमराक्रम का आधार परम हो जायेगा सिप दबना रह जायेगा । भावुक विशेष कुछ कर नहीं पाता । सवेदन म इसलिए जो बिल्गुन गीला है, बेहद भाद्र है तो समझना चाहिए कि भीतर का अस्थि-सस्थान उसम शीण है। अस्थितन मजबूत न हो तो शरीर का रूप लावण्य भी नहीं रह सकता। भाव का भोगापन अधिक है, ता अवश्य घबराना चाहिए । लपिन निज वोध अपने आप में कष्टकर ही है। निज का पर से सम्बघ जब तक नहीं होता तव ना स्वत्ववाघ में भी रस- सामन्य नहीं आता । तो स्वत्वबोध का मैं बहुत उपयोगी मानता हूं, बशर्त दि उसको पीडा म रमार रुष न जाया जाय वल्कि उससे मुक्ति पान मे उठा जाये । पाटाको यदि झेलत नहीं, उससे जूमत नहीं है, तो एक रोमाटिक साहित्य पदाता है । वह स्व (रनि) मूरक हाता है। पोडा को मानना है पर रमणीय नहीं मानना है। इस बारे में मैं निजी तौर पर आपम पूरी तरह सहमत हू कि पीहा म रस सेना तुम नही है । लेकिन दो दिक्कतें आती हैं एक दिक्कत यह आती है कि जिस समूहबाद या समाजवाद कह सकता है, केवल वही नही बल्कि जो व्यक्ति- वाली या उदारवादी सिद्धान्त कहे जाते है व भी आज निष्फल लग रहे हैं। ममस्या नय लेखक मैं सामन समूग्वाद के प्रतिकार की नहीं है कुछ लागा के लिए यह बात हो सातो है लेकिन सम्पूर जो प्रक्रिया है उसके लिए सत्य नही है । साम के लिए भी सब नहीं थी। हाल ही म सा उहोने कहा है कि १६ सदी का प्रतिनिधि उप यास 'युद्ध और शान्ति है और यदि बीसया सदी का कोई प्रतिनिधि उपयास होगा तो वह समाजवाद- विषयम' होगा । और सार की निजी जि-गो भी गवाह है विरहोंने अपन मापको सामूहिक' मा दोलना स बाटन का कापित नही की।पक यहाँ पर गया है जहां तर मैं समझता हूँ, निमुछ मूल भाम्याएं मौजूद हैं जस कि चीसदी सोने सदभ म जातिमेत मी ममाप्ति उपनिवेशवाद वो ममाप्ति, या स्त्री- पुरुष के सम्द बोम समानता व्यक्ति को स्वतत्रता, राज्य द्वारा निजी जीवन म हस्तक्षेप की समाप्ति, इस तरह की कुछ मूल आस्थाएँ मौजूद हैं । लेकिन ।

१०६ कहानी अनुभर चौर शिल्प चाहे वह व्यक्तिवार हो चाहे समाजवाद हो, चाहे समूहवाद हो, जो भी राज नीतिक दशन या सिद्धात उसके सामने आन हैं वे सब उसको अप्रासगिक लगते हैं ! इसलिए वह इन मारे सिद्धाता से नोतात्वारिक साहित्य में किसी हर तक निहित होते हैं अपने प्रापका काट लेता है । राजनीतिक सगठन रा काट लेता है, लेक्नि उद्देश्यो स नहीं काटता । इसको हिदुस्तान म दे तो भी बात वही पाती है । लेकिन बने बनाये सिद्धान उसको अपयाप्त लगते है। आपका क्या विचार है ? -साथ सामूहिक प्रादोलनो मे गरीव हो सक्त हैं लविन अस्तित्ववाद निश्चय ही समाजवाद रही है । वलि दोना में मामा र भूमि भी लगभग नहीं है । सात्र के लिए अथवा हर किसा ये लिए जरूरी होता है कि वह समूह स ममान म न टूटे साथ ही समय से भी जुडा रहे । इस तरह हर काईदो प्रतिरोधी प्रवृत्तिया के बीच जीने के लिए रह जाना है। बल्कि साहित्य म जैसे मुझे लगता है वह इतना नही माता जो व्यक्ति स्वय है बल्लि अधिक वह पाता है जो वह नहीं है सिफ होना चाहता है । सान के घटित अथवा वास्तविक जीवन में यति झुकाव इस प्रकार सामूहिक आन्दोलना के प्रति दीखता है तो शायर इस कारण और भी अनिवाय है वि लेखक म उसवा भुकाव उलटा रहा हो। प्रापकी यह बात सही है कि प्राज इति निश्चिति या भाव टिक नहीं सकता है । सिक्षात कोई नहीं है । सिद्धात सर सहारे का काम दते हैं। महार तर के लिए उहें रखा जा सकता है। समय यह भी पा सकता है कि वे धाम न दें। और तब उह छोडना ही क्त्तव्य हो जाता है । आप स्त्री पुरुप सम्पच को परि पनिन मोर नई धारणा की बात बरत हैं उसे ही लीजिये । मुझे नहीं मानूम गि यह नई धारणा क्या है । स्त्री का अपना भी निजत्व है इसका क्या नई धारणा पहा जाएगा? मैं स्था-पुरुष के बीच के बावपण या पवित्र मानता हूँ । इससे पाम कहते हैं और काम मेरे लिए अश्विरीय शविन नहीं है । पितु ग सम मता हूँ कि काम की उत्कृष्टता एक विगप प्रयार थे निग्रह पोर सयम पाजाम दे साती है । प्रेम में काम की पूर्णता है और ब्रह्माय मे प्रेम की पूणना है । भपातु ऐसे पौरुप को मं पलना ही नहीं, बल्यि दशा भी कर सकता कि जो हिन्दीबहानी शाल निरूपण रूढ अथ म बापुरुपता-जसा लगे । अहिंसा मरे लिए परम पराक्रम है इसी तरह ब्रह्माय परम पौरप ! मैं नहीं मानता हूँ कि यह दृष्टि पुरातन अथवा नूतन को पाने के लिए है। किंचित दुलन मावश्य है। मुझे लगता है कि नव म भी जो न य है, ऐमा लेखन अनिवायत इस दशन की ओर बढेगा। और तर श्वल काम या सरम को इलाधा न मितगी न समथन । अाज तो अवश्य सा नहीं दीरता। & कमलेश्वरजी की एक कहानी है-~-'एक अश्लील कहानी ।' उसम निरपरा है इस समय की स्थिति का, कि ब्रह्मचय भी नहीं है और नाम भी नहीं है, बल्कि एर तरफ दुगव छिपाव है दूसरी तरफ मन म बढती हुई कुण्ठाएँ । या मोहन राकेश की कुछ कहानियां जो मानत्व को लारसा और आधुनिक जीवन की कठिनाइया वे टकराव कोयन करती है। या एक और व्यापक समस्या अक्सर पाती है। खास तौर स म यम वग लडने लडवी, सचमुच रिसी अथ मरान नहीं हात । या तो बच्चे रहते है या मोबाप या जात हैं । इन सब चाजा को लेकर जसा नापने भी कहा है एक व्यापर स्थिति है, जिसको प्रतिक्रिया नवलसन मे मिलती है। विशिष्ट रूप से, क्या आप इस स्थिति पर कोई राय देना चाहगे ? इधर विही लखका म क्या आपको ऐसा लगता है कि नितत्व को पार कर पा रहे है। ~~~-घर की बहुत सी कहानिया म जावन व घुरे और ढक पर भी प्रय मैं लाये जा रहे हैं । यह व्यक्तिगत भौर सामाजिक स्वास्थ्य के लिए हितकर होगा। पहले राचमुच ऐसे मुक्त भाव के माग म कुछ मर्यानए घी मिकी पार करना मुश्किल हुआ करता था । आज भी परिस्थिति कुछ ऐसा सकुलित है कि मर्यागमा की सस्ती रह नहीं गई है और बुद्धि की विश्लपण गक्ति सुल गइ है। कुल मिलाकर यह अच्छा ही है। किन्तु बुद्धि अपनी सीमा से प्राग काम नहीं कर सक्ती प्रयात् प्रकाश नहीं दे सक्ती । जिसके पास मास्था नही है दूसरे शब्दा म दिना नहीं है उस बुद्धि द्वारा जो रचना होगी, उसम व्यग सोसा हो सस्ता है आलोचना पनी कटाक्ष रोमाच का लेकिन उस रचना था दान, उसमा माय, स्थायी वापद न हो पाय । गृजनात्मक रचना मे सहन, १०८ कहानी अनुभव और शिला व्यग, मटाभ उपयुक्त नहीं होगा ऐसा नहीं विन्तु मूल प्रेरणा आलोचनात्मक नही होगी । चारण बुद्धि नितात विश्लेषणात्मक है और उसको सिफ अपना शोर पूरा करने की छूट नही दी जा सकती। बल्कि उमरे निर्माण म लभ्य रहना चाहिए। इन दोना प्रकार की रचनामा अर्थान मृानात्मक प्रोर समी क्षात्मक में एकाएक पहचान कर पाना आसान नहीं ! लेकिन विवरण और विश्लेपण जहाँ स्वय म प्रधान और चमत्वारा बन जाए यहाँ अधिकाम मरे मन म साय हो पाता है। दिल तो हर आमी के भीतर इतनी सुरक्षा में रखा गया है कि वह हाथ आ नहीं सकता। जो दोग्यता है वह गरीरावयव हैं। इसलिए जहाँ हृदय के व्यापारों का जयन्न सुनिश्चित विवरण या विश्ते- पण है वही मुझे मतवाहिता की आशा होने लगती है। सही दृष्टि घटना- त्मक ये प्रति उदासीन नहीं हो सकती। इसलिए वहानी चाह्य घटनात्मक या स्थूल रह तो यह उपित ही है । जो मातरिक है, उसरे प्रति ता पढने पाले मे उ मुखता जगती जानी चाहिए। अर्थात रचना में उसनरी सूचना हो सकती है प्रतिपादन या निर्देशन नहीं हो सकता । घटना म सत्य निभृत एव गूढ होता है। कि तु घटना ही सत्य की वाणी भी है । अर्थात घटना दोपती है। राज्य को उसम से दूरना पडता है। कहानी म भी व्यक्त अयक्त पा पुछ यही समय समीचीन होगा। मापन पुत्र नाम सामने दिये हैं । नामों के बीच स मुझे राह ददना मुशिल होता है । जमे श्री राके। ये गाय थी राजेन्द्र यादव को लिया गया हो, तो इन दोना म मुझे बहुत कम मामा य मिलता है। लगभग अलग ही नहीं, यपि परस्पर विराधी-जसा लखन भी लगता है। सूचना जा राव मे है राजेद्रममावर जम उसी परत पर परत ग्योल कर देखो व पिल्ल म परिणन हा माती है। यह दूमगे पदनि मुझे बीच नहीं पाती । पयापि मेरे लिए मेरी मल्लात्मरता म लिए यह उतना अवसा नही छोडती । वमनश्वरराम घटनात्मक वा प्रभाव नहीं है। किन्नु घटवारमरता यहाँ पेयल उपादान नहीं है, रिचित म्यय म सायर तक है। म स्वय पटना वा सस्प ने संबैन में रूप मही महत्त्व दे पाता हूँ।नेप म ता वह पस्न है, जो व्यक्तित्व या अपन हिदी कहानी शोल निरपण मे प्रगट भी कर सकता है टंक भी सकता है । वस्त्र के विवरण की सार्थकता इम है कि उस पर ध्यान त जाय, ध्यान सोया उसके द्वारा व्यक्तित्व पर जाये। ? x इस समय जो अपातया नई पीढी है उसम सर्वाधिक मतोषप्रद रचनाएँ आपको किन वहानीकारा की लगती है -यह ता आप मुझे घसीटते हैं । मैं निणय नहीं देता है । न मवका पूरा पढ़ा हो है । उल्लेख के लिए नामा की आपने ही कुछ सहायता कर दी है। मोहन राशि के लेखन न मुझे पकडा । छिटपुट रचनाएं ही दमी थी, फिर सग्रह भंगारूर पढ गया। इसम पहले निमन वर्मा की आर मैं नहीं जा पाया था। लेविन नये सग्रह जा मेंन प्रयत्नपूर्वक प्राप्त किये और पढे, उनम मुझे निमल भ सूचक्ता विरोप मालूम हुई । सूक्ष्मता और तात्कानिकता की दृष्टि से मोहन राग अलग हैं और स्वय ह । इधर जो नाम आत है उनम कमलेश्वर की रचना म सत्व है। वे इतनी महीन नहीं हैं कि हाय त सा जाएं। राजेन्द्र को कुछ रचनाएँ अच्छी लगी पर भी मुझे पढन पढ़ते एक ऐसे दाग स्म की पाद आ जाती है जिसम बढिया बढिया सामान इतना था कि जगह ही शेष नहीं रह नाती पो जिस म कहो । उस ड्राइंग गम में पहुच कर विस्मय ता हुआ पर जो बुछ घुट गया। वाज-बार कहानियां ऐसी नजर म पाई है कि वहां टिक गई हैं। उनके सेराका नाम सहसा माद म प्रस्तुन नहीं हो रहे । उपा प्रियम्वदा की कुछ कहानियां पढने पर दर ता मुझ म भूमती रह गई थी । लक्नि लिपने वाला या मसा माग व्यक्तित्व है । और पितान में पिसी का नाम उल्लग्न से बचा रह सकता है पर व्यक्तित्व अपना स्थान रखते हैं । चपी का वितान लम्वा है लपिन लक्ष्य को एकाग्रता उतना नहा लगी । शला को व्यापर सहानुभूति है और चरित्र माल और विश्वसनीय हाते हैं । राजकमल चौधरी की सूम प्यारी पोर पनी है। सर्वेश्वर, रघुवार के पास मन्तव्य है और व भूम हैं, रिपना इतनी पास्तविव और गारीरिक नहीं रह जाती।

कहानी अनुभर और शिरप भोम का लेसन स्वतत्र और पुष्ट है और अप्राप्य दुष्प्राप्य को पाने पक्रने के पीछ नही है । कृष्णा सोबती की इधर एक कहानी मित्रो मरजाना अत्यन्त साफ्त कहानिया मे स है । मुझ उसकी निमम तटस्थता विस्मित कर गई है। दूसर अनक बधु हैं जो अपने ढग से कीमती काम कर रहे हैं और नय जायामा की पार वरने के प्रयासी हैं। हो पीरियो | सवाल न इधर कुछ दिक्कत पता कर दी मानूम हाती है । तीस से चालीस तव की पीढी यदि अपने का नया कहती है तो वास या याइस से बत्तीस तक पी पीढी अपने को क्या कहना चाहेगी इमलिए समय बोधक सद से कहानिया ममतर डालन या देखने को पद्धति साहित्य वी दष्टि से यहुत विश्वसनीय नहा हो सकेगी। इस काम के लिए विसा गुणात्मक विशेपरण को लिया जाए तो ज्यादा अच्छा हो । जनेद्र प्रगर सोच समझकर नई कहानी लिखता है एसी या वसी बहानी लिगता है, तो इस शत पर लिख सकता है कि उसकी वह हानी जन द्राय 7 रह जाय । अर्थात हरेक यदि वह राजनगील लसर है अपनी ही कहानी लिस मक्ता है । पिसी भी नाम-नमून वाली पहाना वह नहीं सिख सकता। 7 कहानी, नई कहानी, अ-कहानी : कुछ प्रश्न * कहानी विधा में परिवर्तित शिल्प और क्थागत मूल्या को उनकी परिवर्तित होती स्थिति को, आपने किस रूप मे ग्रहण किया ? -शिल्प और वियास का मुझे कभी पता ही नही रहा । कभी न मैं उन पर अटका न रुका । क्थ्य भी मेरे पास बाहर से पाया यह मैं नहीं कह सकता । इसलिए बाहर होते हुए क्सिी परिवतन की चिता ने मुझे विशेष नहीं सताया। परिवतन हठात अादर भी होता ही रहता है। नहीं तो जीवन चेतन नहीं वहनायगा । उन परिणतियो को मैं और मेरा लेखन स्वीकार करता चला गया इतना ही मेरे लिए काफी है । कहानी के बनाव के बार में जो मैं निश्चित रहा, सो उसका लाभ ही मुझे यह मिलता रहा कि एक कहानी दूमरी जसो नहीं बनी । मर अपन पाप म स्वतत्र और भिन्न बनती चली ग । जानता हूँ कि कहानी वि यास के बारे में बहुत चर्चा बनता है, लेकिन कहाना जिसे लिखती हो वह उनसे अप्रभावित बना रहे ता इसी म मुझे खरियत मालूम हाती है। x क्या प्रकहानी वा परम्परा सहकर कोई अपना स्वतत्र दशन हो सकता है ? या महज भाषा और कथ्य के नगण्य के कारण हो वह अपने का अलग साबित करना चाहती है -वहाँ 'अरहानी' द मै कहानी के इन्वार की जो ध्वनि है वह क्यो। यस, उमा से वहाँ अहवार का आभास होता है । कहानी कोई मीमित विधा तो मर रह नहीं गई है। उमम सभी तरीके को रचनामो का समावेश हो सकता --- १२ कहानो थनुभर और शिल्प है । शत केवल यह है कि वहाँ गन् मभिधा में नती, बल्कि व्यजना से अपनी बात कहे । 'कहानी समा में इतना कुछ अवकाश होत हुए फिर 'प्रबहानी' शब्त का निर्माण यदि करना पड़ता है तो मावूम होता है पि वह अनायास नही, एक सप्रयास प्रक्रिया है। इसलिए मुझे कहानी कहानी की चर्चा कृत्रिम मालूम होती है। अगर इस बात को आप मानते हैं तो यह बात काफी पहले तथाकथित नई यहानी ने भी क्या कुछ प्रशा म न की थी? -वैसा ही कुछ मनोभाव नई कहानी' शद के निर्माण और विमापन वे पीछे मालूम हाना है । उसम काई साहित्यिक सत्त्व नही है। किसी भी एक समय म लिखी जानी हुई कहानियो के वविध्य म हम उतरें तो दीख पडेगा कि व तत्त्व बीज रूप में वही भी विद्यमान थे जिन पर नई कहानी या प्रकहानी के निरूपर जोर देते दर जात हैं । इसलिए मरी सलाह होगी कि नित नये उठने वाले इन नारो से चाप उद्विग्न न बनें, कहानी को जहाँ तक हो सक जीवन से तदगत माने रहें और साहित्यिर वादो और मानहा से अपन को मुक्त एव निर्विवाद बने रहन दें। x नई वस्तु अपन नयेपन के वारण कुछ काल तक नई रहती है । क्या नई वहानी अब नई पन्लाने योग्य रह गयी है ? -~हर पल नित नया कुछ सिलता ही रहता है । तडवे मधेरे ही गया सवेरा फूट पाया था । दया पौध म नयी कला उभा आयी है । रिन सिलते दोपहर तर वह पूल बन पायी । यह सब अनिवाय और अनायास पटित होता है। कोई इराम बाजे नहीं बजत न गार होता है। इसलिए जोर और गोर के साथ भगर मुछ नयापन लाया जाता या फिर जनावर उभारा जाता है तो निश्चय ही यह पुछ बना हुआ मामला है । इम ढग का नया मार्ग हुआ करता है जिसरा टप्पा चलाने के लिए अमु माल पर लगाया जाता है । इममे मोर जीवन की नित नवीन परिणतिया में कोई सम्दप नही होता । बल्कि यह माग विज्ञापनवाद नूतनता क नयाविवार म प्रयराप और बाधा ही अधिक बना मरता है । पारण, जिन्दगी लेविल क तहन लिसने वाना चाज नहीं है।

कहानी, नई कहानी, श्र कहानी कुछ प्रश्न 1१३ बल्कि बमे ता वह और मुरझा जा सकती है । लेविल के अधिकतर समूहगत मत-स्वाय पर चिपकने की आवश्यक्ता होती है । समूह माहित्यिक क्षेत्र म सन्दिाघ वस्तु है । कहानी पर लेखक का नाम होता ही है वस, उसी व्यक्तिगत रुग्व, रुचि या वत्ति के लिए सालित्य म अवकाश है । अधिक होने पर मानो राजनीति का क्षेत्र प्रा जाता है जहां स्वाथ अमुक प्रयाजन मोढ लेता है और दलगत बन जाता है। हर व्यक्ति को साहित्य के क्षेत्र मे हिम्मत होनी चाहिए कि वह अपने कलम के साथ अकेला खडा हो और गोल या भुण्ड वाच कर जीने को आदिम आदत को चुनौती देता रहे । अनेक आधुनिक मतवादा के नाम पर यूथवद्ध होकर चलने में इन प्रादिम सस्वारा से मानव व्यक्तित्व को ऊँचे उटना चाहिए और साहित्य टमी की दीक्षा देता है। उसे अन्न करण के साथ और सत्य के साथ जीना आना चाहिए । उसे माहित्य के क्षेत्र में भी यदि घडवली चल निकलेगी तो पाया फिर किससे की जा सकती है? - पहानी गत प्रतियो के इन नामकरणा का आपके वक्त की या या रहिम आपके द्वारा लिसी जाने वाली कहानिया की सापेक्षता म क्या महत्त्व -मरी जानकारी में तो कोई महत्व नहीं है । कहानी हरेक को उसके व्यक्तित्व म अभिन होगी। बाहर पदा किये जाने वाले नाम और विशेषण उस अभिनता म अतराय ही डाल सकते हैं । इसलिए वे किसी के लिए इप नहीं हो सकन, यानी इप्ट साहित्य सजना मे किमी दूसर प्रकार का प्रयोजन अभीष्ट हो तो वह अलग बात है। पाप अपना या अपने समकालीन सीनियर क्या लेखका का एग्जीस्टेण्ट पिन जूनियर लेवका म हुप्रा मानते हैं । अर्थात जनेद्र अनेय किन लोगों म माज जी रहे हैं ? --यह मैं कुछ नहीं कह सकता। हर लेसर को स्वप होना पड़ता है फिर प्रभाव वह जहाँ से चाहे ले। बल्लि उस प्रकार के प्रमावा के बीच वह जनमता जीना ही है । ये पचाय गये प्रमाव फिर उसरे निजी और सश्लिष्ट वन कर व्यक्त होते सासाहित्य रख जाता है। जहाँ दावा हा कि वह मौगिक है बढ़कर है।

कहानी अनुभव और शिल्प ऐसा है, वसा है वही मान लेना चाहिए कि पात्म निमिति और प्रात्म स्वीकृति म कुछ त्रुटि रह गई है । इलक्ना अधभर होन वे वारण हुआ करता है। दूमरे का इनार उसी अनक्ष्य प्रभाव को जतलाता है । कृतन स्वीकार स्वस्थ व्यक्तित्व का लक्षण होता है । जहा दूसरा का इन्कार देखें नये पन का मौलिकता का दावा सुनें वहाँ ही हम सहानुभूति देने को तयार रहना चाहिए । कारण वहाँ स्वास्थ्य का अभाव और विचित हीनता का प्रभाव है। क्या पाप इस दृष्टि से प्रेमचन्द को मृत मानते हैं ? अगर नहीं तो वे कौन लेखक हैं जिनम प्रमच द की परम्परा विवसित हुई है ? -रान १६३६ म प्रेमच द जी क्या सचमुच गत नही हो गय? लेकिन साहित्य उनका जीता है और जियगा । दूर क्या जाऊ स्वय मैं अपन को उनसे उऋण नही मानता हूँ। लेकिन हां मेरे प्रश्न उनका रूप दूसरा है कि जिनस मुझ जूझना निपटना पडता है । मैं वादी शत्ति इसलिए नहीं अपना सक्ता कि मैं अपने का बुट सुधरा हुमा नहीं पाता है । यह मरी प्रतत्ति की बात है। लेक्नि निश्चय ही नया म भी ऐम ताग हैं जो सुधारप मनोभाव रखते हैं। कहने तिग्वन के तौर तरी म फिर क्तिना भी विभद हो वे उसी परम्परा को तिवाहने वाले माने जायेंगे । एक लपन बताने वाला है दूसरा योजा वाला मानना होगा यि पाज वइ नगक इतन जानकार हैं कि वे मासाना से पाटा के नजीर बनाने सिसाने वाल वन रहत हैं। प्रेमचन्द के जमाने म लेखन एम० ए० वगैरा यम हुप्रा करते थे। पर उमसे कम तो गायट होते ही नहीं, आगे सापटर इत्यादि भी हो तो अलग बात है । इरा अतिविपता ये पारण मुझे सदेह है कि साहित्य उतना पुष्ट और स्थायी कटाचित कम आ रहा है। नामवरणों तथा गाप्ठिया और इधर जा क्या समारोहा या सिलमिता शुभ हुमा क्या आप उसे वहानो वं क्षेत्र म माय गतिरोध की प्रतिक्रिया माना हैं या माउ कुछ लोगा के प्रचार के निमित्त एक मायोजित सिलसिला है? -गतिरोध मे गे यह चर्चामा और परितम्याटो वा मतिरेर निरला या उस अतिरेव से गतिरोध निक्ला पहना कठिन है। लेकिन दोनो म नाता अवश्य है । माप अपने साय या मोर सम्वाद में मुक्त हो सकते हैं तो लेखन निकलता है।

कहानी, नइ कहानी, अ-कहानी कुछ प्रश्न ११५ वाद और विवाद को उलटा म यदि रहते है, तो भापण और समीक्षण निकलता है। यह भी हा सकता है कि भाषण-समीषण को ही लेखन म उतार दिया जाय । लक्नि तर वह माहित्य नहीं होता। हाँ पत्रकारिता का नाम सवा दे जाता है। * यापन कलकत्ता में हुए समारोह म भाग लिया था~-उस क्लबत्ता-ममारोह मे,जिसम म मयनाथ गुप्त, विष्णु प्रभाकर मुद्राराक्षस श्याम परमार कुलभूषण, बमल जोशी, नरेश महेता रघुवीर सहाय अमृतराय, देव द्र इन्सर राजस्मल चौधरी मधुकर गगाधर पानद प्रकाश जन आदि का प्रामत्रित नहीं किया गया। रितु याप उमम फिर भी पहुच । क्या इसका मतलब निकाला जाप कि भाभा विमो तरह के प्रचार की मात्रामा रखते हैं या अाप अपन को इतना अक्ला महसूस करने हैं कि पाप कुछ लागो के माथ पा जाने के लिए मजबूर हुए हैं -पाकासाहीन ता मै नही हूँ लेकिन कौन पा रहे हैं और कौन नहीं जा रह हैं उनकी पूरी पबर रपन म जितना कुगल भी मैं नहीं हू । माचता अवश्य हूँ कि मुझे उमम अधिक व्यवहारत और नीतिन होना चाहिए। पर मैं अपन सम्बन्ध म स्वय को लेकर निणय कर ले जाया करता हूँ। टीम के साथ चलना पायत अधिक सकुन होता हा, पर वह मुझे अब तब आया नहीं है । माधारण तया में क्लात्ता जा नहीं रहा था। २२ ता० तब यही जानता था कि नरी जाना है। फिर जो पहुंचा तो वह बहुत बुध इम कारण कि अपने प्रात्मीय वघुमा अनुराध की अवना अगिप्टता समझ लो जाती । बुध आरपण यह भी यादि मुझे अनुमान था कि वहां अभियुक्त के रुप मे पा होना होगा । मैं अहिंसा का विश्वासी हैं। नाम रहता है कि ऐमा परीषाआ म पड़, जहा प्रहार हो और देपू वि में अपनी ममता तो नहीं योना । उमक साथ अपनी बात पर भी बना रहता हूँ न । इन मय कमज्ञारियों के कारण मैं कलकत्ता गया और यपि बहन म आवश्या नाम अनामप्रित रहे तो भी वहां पहुंच जााम अपनी पोर से उनरे प्रति कोई अस्निय नहीं देवता । न, जान के लिए पछताता हो हूँ। बल्लि अच्छा हुमा दि मुझे परीा में पडना पड़ा। यहां की रिपाट बहारी यहानी अनुगर और शिल्प निकली हैं । अधिकतर मुझ पर क्षोभ उतारा गया है। मुझे याद नही परता कि मने एक भी वाक्य रिगड कर कहा । उघडे यदि कुछ शब भा गये ता उनकी चोट का मुह सुर मेरी ही तरफ था । दाढी म तिनक को बात अलग है वसे मैने विग्रह की ध्वनि म कुछ नहीं कहा, न समझौते की ठकुर-सुहाती मे ही कुछ कह सका। इस तरह सत्य और अहिंसा इन दोनो दष्टियो से मैं उस परीक्षा में पास हुआ यह मैं नहीं कह सकता। शिष्टाचार ऐमा भी हो सकता है जो सत्य की दाता को खा जाये, वह अपनाना उतना कठिन नहीं होता। साधारण सभा सौजन्य का निर्वाह सहज और ऊपरी व्यवहार है। वह आत्मीयो की गोष्ठी था और तकल्लुफ का प्रश्न नही था सचाई का प्रश्न या । उस सम्बध मान के दिन आवश्यक है हर कोई स्पष्ट और दृट हा । मत भेट के यीच जा सौगय पलित हो सकता है वही मूल्यवान है । कलकत्त से वह पा होगा और बढगा ऐसा मरा प्राशा थी। म जो अखबारो म छपा उससे आग पूरी नहीं हुई और प्रागे क लिए म अवश्य सोचता हूँ कि ऐमी गाप्ठिया में जान के बारे में अधिक सयमी मोर सावधान रहू । x कथा समारोह के सम्ब ब म आपको क्या प्रतिक्रिया है ? -~-वह कथा समागेह एक ऐतिहासिक घटना मानी । सकती है। इतने विविध पौर विमुम लाग एक साथ प्रामानी से जमा नहीं होने । मागे भी शायद यह कठिन हो पर निप्पत्ति जा हो सकती थी की हुई । लोगा के भीतर व नकार निषेध मधिय बाहर मारर व्यक्त होते रहे और वातावरण म सम्बादिता उत्पन्न नही हो पाई विवादो स्वर मुसर रहा । सयाजन ये समय कोई स्वस्थ मोर रामन दप्टि पीछे काम नहीं कर रहा थी। मायाजन कनाचित एकागा वृत्ति के हाथ म अधिकारी बना रह गया । उतने सच मे वही अधिक उपयि हो मरनी थी। फिर भी यह नि एक अवसर प्राप्त हुमा नहाँ माहित्यिक लोग अपन मन था विग्रह पोर वार की विद्वत्ता एक दूसरे पर निकाल फ्रें। इस दष्टि स ममायो- जन को उपयोगी और महत्वपूर्ण माना जा साता है । - इयर आपा पत्र पत्रिकामा म उसको रिपोटिंग पढी होगी। माप उगम सहमत है।

। कहा, नइ कहानी श्र कहानी कुछ प्रश्न --सहमति का प्रश्न कहाँ है । अपनी अपनी मनचीती लोगो ने लिखी और इसके सिवा दूसरा हो क्या सकता है । एक रिपोट मे उलटकामा के भीतर मेरे नाम पर कुछ उदाहरण दिये गये हैं, न वे शब्द मेरे थे न भाव मेरे आ पाये। उलटकामा वे भीतर उह न रसा जाता तो पाठक समझ लेता कि वे लेखक की याद के शब्द हैं जनेद्र के कथन से चाहे न भी हो। तब उतना भ्रम न होता। आगे अगर ऐसी सावधानी रखी जाय तो अच्छा है। मुनासिव तो यह हो कि काट के भीतर के शब्द वक्ता द्वारा पहले प्रमाणित करा लिये जायें। मैंन उकी सफाई देना जरूरी नहीं समभा। कारण मिथ्या पाव नहीं होते । हर जगह उसकी काट करने दौडना उसको महत्व देना है। हमने सुना है कि आपको क्लबत्ता-समारोह के बीच कुछ व्यक्तियो ने पाग्रेस पार कल्चरल प्रोडम का एजेण्ट घोपिन किया। क्या इस सम्बध मे माप कुछ कहना चाहगे? नहीं। क्योकि जिहोंने ऐसा कहा, प्रश्न उनसे होना चाहिए कि मिस हेतु स कहा वह सस्था निपिद्ध तो है नहीं, अनिष्ट भी नही है। और यह मेरे लिए ई कृताथता की बात नहीं है कि मैं उस सस्था से वास्ता नहीं रखता हूँ कर भी कहने वाले को क्या वसे प्रचार की आवश्यक्ता हुई वही जाने । मालूम होत ही मैने वह सूचना तत्काल वही अपने से निकाल बाहर कर दी थी। इतना मैं यथेष्ट मानता हूँ। - आज आप कथाकार और हिंदी कहानी की नियति क्या मानते है -मैं तो मानता हूं कि कुल मिलाकर वतमान भविष्य की पोर बढ रहा है और भविष्य उज्ज्वल है। कुछ प्रहवादी शक्तियां उस आगाप्रद भविष्य को प्रपन हापा म या अधिकार मदद मानती हो तो, उनको भले निराणा प्रप्त हो सकती है किंतु उनके नाते भविष्य ठिठक्ने वाला नही है । कई हैं जो क्लह कोताल से दूर हैं और कहानी के क्षेत्र मे सही दिशा में कीमती काम घर रहे हैं। वहा रचनात्मर काय टिकेगा और भावी को उजला करने वाला सिद्ध होगा।गार शरावा नही जावस बैठ जाने के लिए कभी-कभी उपन पाया करता है। याल गति से उसका सम्मघ नहीं है, चाहे उस शार या युग-योध बसे दानों द्वारा ही क्यो न ऊपर उठाया जाता हो। 7 कितनानया, कितना पुराना आपके नागे पाय आपके साहित्य को गरम वडी देन है लेकिन जिम नारं या विलक्षण चित्रण आपने कभी किया या पया आप समझते हैं कि मोद्यागी बरण वे इस युग म उसम परिवतन नहीं पाये हैं ? - प्रापये प्रश्न का गण्डन नहीं करता । नारी जो मेरे साहित्य म प्रस्तुन हुई है क्तिनो साम्प्रतिक है क्तिनी आधुनिक है क्तिनी परम्परागत है यह में नहीं जानता। गरे सिए प्रश्न वह परागत है। सच यह है कि मैं उसके सामाजिक या सामयिक स्प पर नहीं अटका हूँ। मेरे लिए धम पा, नारो घम या प्रश्न रहा है । इम प्रन वीष्टि से नारा के रूप मे धरित हुग्रा काल-या-दागत विवरण विप रागत नहीं रहता । जीवन का घम उस्मग और विसजन है यह धम नारा वीवा म अनायास प्रतिष्ठित दसा जाता है । गाधी को अहिंसा पा स्ना परतूरवा से मिना । जा पुरुष के लिए साधना का नितिभा और मध्यवसाय या विषय है मालूम होता है वह नारी प्रकृति के लिए मुनम और पौर सहज बन जाता है। मरीपत्नीसवेरस उठार दिन दोबजे तानिरतर थम मलगी रहती है उस पाा तर यह गिरायत नहीं हुई कि उस सारे समय म मैं पाराम ही आराम ता नहीं करता हूँ। इमजो चितर और विवेचा नारी को दासता रहते हैं वे अपनी जानें । मैं तो इस उसरा गरिमा और महिला मारता हूँ। दामा पीजियेगा, क्या यह पुरुष का दृष्टिकोण नहीं है ?

कितना नया स्तिना पुराना -~-निश्चय पुरुप का दृष्टिकोण है। इसे निरा स्वाथ माना जा सकता है कि माराम को वह अपना हा वना ले और गरिमा महिमा के नाम पर चाकरी स्त्री के पल्ले डाल दे। पर पुरुप ने ही अपने चितन के अभियान मे स्नी में भी माधु- निक चितन डाल दिया है । स्त्री भी यह मानकर कि पुष्प उससे कुछ बुद्धिमान है पुरुप की इम बनी हुई निप्पलता को अपने पक्ष मे स्वीकार कर लेती और भूत की राह चल पडनी है। उम दिन ही मुझे सुनने का मिना कि 'मुखदा में जनद्र ने नारी के लिए घोर प्रतिक्रियावाटी आदा प्रस्तुत किया है। लेकिन यूरोप में जन-जव गया, मुझे वहाँ को नारी की स्थिति अधिर करुण और दयनीय प्रतीत दुइ। जार्थिक म्वतत्रता तौर स्वनिमरता के नाम पर वहाँ स्त्री को रीनतम स्थिति म डाल दिया गया है। यहा ता दि पैस के लिए अपने को बेचने का वह अपना प्राकृतिक हक मानती है। प्रगति और उनति की इस धारणा से भला और हो ही क्या सकता है । आज भी भारत म यह भूठ नहीं है कि आदमी कमाने का मालिर है, लविन सचने की मालकिन स्त्री ही है। म सुर अपने घर म पमे के खच के मामले म उतना स्वतन नहीं हू जितनी स्वतत्र मेरी पली है। इस स्थिति का म अपने लिए घायता की स्थिति मानता हूँ। मेरा यह पार्थिव पारतम्य मुझे सयम म रसता है आप चाह न चाह, प्रौद्योगीकरण के युग म स्त्रियां बाहर आयेंगो पा -स्त्री कमाती हो तो पति हार पुरुप उम कमाई का नाम नहीं लेना चाहेगा । यह सयाल उममे यह भाव जगा सस्ता और सामजस्य म पाठे पा सरता है । उससे फिर समाज-परिवार के मूत्र क्षाण और दिन्न भिन होने की मोर बढेंगे। - इधर प्रापन अपनी कुछ कहानियों में स्त्री पुरुप वे सवधा की अस्थिरता या विवेचन दिया है। क्या यह कहना सहा होगा कि स्त्री पुरुप सम्बघा को पाप गमाज ये वचनों स परे--उनके उ मुक्त अस्तित्व को स्वीकार करते हैं कहानी अनुभव और शिप ---समाज यदि आपसी सवधा के विकास को रोकने के लिए घेरा बन जाता है तो उसम समाज काही महित है। प्रेम जड तत्त्व नहीं है। वह चिमय है हम लिए विकासगील भी है । जिसको अस्थिरता मापने वहा उमको में विक्सन- शीलता कहूगा । पली को पावर पुरुष का प्रेम व नही साता, न पति वा प्रेम जकबर होकर रह सकता है। ऐसा हो तो यह प्रम का अपलाप होगा। अर्थात ईश्वर के प्रति अपराध हो जायगा । पातिव्रत और सतीत्य अथवा पतित्व के पाश को उस स्थिर और जहप म मानन वे मैं शुरू से ही खिलाफ हूँ। शायद अमुक मोर मे घिरकर रह जाने को धम मान लिया गया था। मैं उनकोसुन पर अधम मानता हू । यही आप और दूसरे व घुआ मुझस गिरायन होने लगती है। . हाल ही म कमलेश्वर ने मापको भाभीवार का कहानीकार यहा है। भापका इस सवध म क्या कहना है ? -मेरी समझ म नहीं आया कि वह क्या कहना चाहत हैं । वैसे म स्त्री पुरुष सवधा म उस विशिष्ट कल्पना और धारणा को भारतीय संस्कृति का एक अनुपम उपहार मानता हूँ । * सन ६० के याद की कहानी के बार म प्रापर क्या विचार है ? - काल को विमस्त वरखे पक्डन के खिलाफ हूँ ! जा लाग सा करते हैं वे सत्य पा सहित परत हैं । काल तो प्रवाही है। काल ये पट पर मत्य अभिव्यक्न हाता रहता है इसलिए काल पी अमुक अवधि में माहित्य यी सत्यता का विमान नहीं दिया जा सकता । अध्ययन में निमित्त विभाजन हा तो हो। आप इतिहाग देग्मिय मावस ने भा पाप मावरा में बहुत प्रभावित जान पाते हैं । --में माम म प्रभारित हूँ इस अथ मलि माक्मगदी नहीं है। माप मानते हैं कि घर क द म कहानी बाली है -परिवतन ता क्षण-गण हो रहा है। पल भा था आजहीं है-माज जो है, कल नहीं होगा। 3 १२१ बत नया फितना पुराना ? - मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव न, आप समझते हैं कहानी को नया दिशा दी है -~4हा न कि परिवतन तो होते रहते हैं। हां इतना जरूर है कि जनेन्द्र और निमल वर्मा मे कम पर है। कमलेश्वर और जनेद्र मे अधिक फ्क है। यानी निमल और कमलेश्वर म, दोना का समय एक होने पर भी वेद फक है । सा क्या ? अतर समय से नहीं पृथक् निजत्व के कारण से होता है । - पाप नये लेखया को क्या सदेश देना चाहेंग? -~-वे भून जायें कि वे एक दूसरे से क्तिने नय है । - साहित्य की नवीनतम प्रवृत्तिया~भीड मे अकेलापन और अधेरे की वाज के बारे में आप के विचार ? -प्राज जो आर्थिक विकास है, पस की बहुतायत है उसम व्यक्ति के मह पर जोर पड़ रहा है। इस तरह बुद्धिवाद टेला जाकर अध्यात्मवाद की पार बढता जा रहा है। जस अध्यात्मवाद म कहा गया है कि इसान अकेला दुनिया म पाता है अकेला जाता है । वही वात प्राज दाहरायी जा रही है- साहित्य चेतना का वह सूत्र मूलाधार बन रहा है। व्यक्ति को अस्तित्व के विराध म अस्मित्व की चिता अधिक है। निन को निखित के बनाम पान और टिकान की चेप्टा उसके लिए आवश्यक वन पाई है। आपनो जीवन म जो कुछ पहना था, वह कह चुके या अभी कुछ कहना वाती है ? -प्ररे, प्रभी तो म जिंदा है । जिसके लिए इस दुनिया म याया हूँ वह प्रयोजन हो गया हा और फिर भी मैं यहां रहने दिया जाऊँ, तो यह ईश्चर के दरवार को भून हागी, जा हुआ नहीं करती। मानक्ल आप क्या लिख रहे हैं ? -कुछ नहीं। - क्या माप सममने हैं कि प्रात्मतुष्टि के लिए लिखा जाता है - या यह बात ४६ प्रतिशत सही है कि प्रस्तुप्टि क लिए लिखा जाता है ।यह यात ५१ प्रतिशत मही है कि मह से मुक्ति के लिए लिखा जाता है .

बहानी थनुभव और शिल्प - ? - वगाल की भूखी पीढी के बारे में आपका पया ख्याल है -मैं समझता हूँ उनम भूख कम है या नकली है या है ही नहीं । साने पीर की चीजा स बाजार भरे पडे ह उन पर व टूट क्या नही परे ? लगता है, उनकी भूख पेट की भूख नहीं है । xx पया आप यह नहीं समझते कि यह भूख पट की नहीं है । कुछ और ही भूख है जा पविता मे निकल रहा है । -यानी वह भूख सिफ कविता वानी है। मुझे यह लगने लगा है कि से मुक्ति नहीं है इसलिए मर के द्वारा जा अभि यजना है उसी ओर ध्यान कभी मेरा नहीं गया था—अब ता उमस भी कम हो गया है। प्राज के युवकों के विद्रोह के बारे म अापका क्या कहना है ? उनले बटर जो गालो है उसके लिए कौन दोपी है -पहल ता गाली उनके अदर पदा हा यही गलती है । यगर वह पता हा भी गयी है और वह मुझ जसो के ऊपर निकल कर खतम हो जाती है तो यह हमारा सही उपयाग होगा। a लविन गाली पदा ही क्या हो ? -'सलिए कि मन स्थिति और परिस्थिति म सही सम्बध स्थापिन वे नह। पर पाय । परिस्थिति ता सदा थामने वाली होती है । यदि हम उसे स्वाकार पर लें तो क्षोभ को जगह श्रम का आरभ हो सस्ता है वैसे मैं क्षोभ, श्रोध विद्रोह मादि यो गृजनात्मक प्रेरणा वी त्रुटि मानता हूँ। दिसे दोष रिया जाय? प दिया जान को नही होता हाँ दोप लिया जा सकता है । माज वे विद्यार्थियों का जनः दोप नहीं देगा। इसम दोष वह अपना भी मानता है। आपके विचार म भारतीयता क्या है ? -कुछ तो वह जो प्रस्ट है । जसे सामाजिक रीति-नीति रहन सहन इस्पा के रूप पोर साँच 1 और कुछ है जो अव्यक्त है । उसका सम्बध भारमा रा है। यह प्रान्तरिय हुई। उसी पर मरा ध्यान है। उसम लेने से 1 ।

स्तिना नया कितना पुराना
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अपने को देना प्रमुख है । यह भारतीय सस्थति और भारतीयता का मूल तत्व
माना जा सकता है।
क्षमा कीजिये हमारा फाटाग्राफर नहीं आ सका।
-~याइ वात नहीं पुराना ही चित्र थाप दीजिये । उसमे मैं जवान लगूगा ।
अच्छा ही है।

कहानी-लेखन और न जानना यह कथा ममारोह तनिक विशिष्ट है कि सभी तरह के क्याकार यही है। पुरसी उछालना मन भारत मे नहीं देखा है। हाँ लका म देखा है जोर जिसने पास उधालने के लिए ट हैं वह कुरसी क्या उडालगा जितना जो लामी- पद्रजाने कहा पहले तो उसमे मन म प्रातक छा गया। उसके बाद फिर अपक्षा बसानी जो उहान रपी हैं हम सबमे उममे कुछ घबराहट चढ गयी । मैंने जिगी म केवल एक इम्तहान लिया है वह काफी है। पारपार इम्तहान म पर्ड इसी डर स मैं आता नही था । वहानो लिखत तो मैं निब जाता हू पर कहानी के बारे में पूछ ताछ होगा और परीक्षा होगी अगर बात से मुझे ऐसा पता लग जाये तो शायद पव स लिखना व द पर दू क्यापि मरा अपना अनुभव यह है वि जानना जय वाफी नहीं होता है उसम मन नहीं भरता है तब बहानी शुभ होता है मौर कहानी का मापा जीने की भाषा है जानने की भाषा नहीं । जानने की भाषा गोषहाना पर लाते हैं और अपना करते हैं कि यहानीकार से पुछ जानकारी भी हामिल कर कहानी के सम्बयम वे शायद पयादती करते हैं। मैंन कहानी लिखी, विस जीवन दपि स लिम्पो जो वन-टिश बुध ऐसा लम्बा भारा भरकम गर है कि जीवन-ष्टि T* उस समय मेर पान पर पा जाता ता गायद कहानी लिपो ही जा सस्ती यो । पहाना निम गय, लेकिन जीवन दृष्टि का, वक्तव्य का पता नहा है वह अब तर निर्मित नही हुई क्यापि जय भी दष्टि कोई यनती है, जीवन में ऐसी कुछ घटनाएं दसन म मा जाती हैं नि वह दहि पिर निप पुतकर माफ्हा जाती है । ए मायूम होता है मि दृष्टि न बन पाये, तभी बहानी- .

कहानी लेपन और पानना १२१ कार के लिए सरियत है । जहा जम गरी दृष्टि, फिर आप कुछ तत्ववाद निसिये, कुछ पौर लिखिये, कुछ उपदेश दीजिये और बहुत से काम हैं जिसके पास जीवनदष्टि प्राप्त हा गयी वह तो सिद्ध हा गया। फिर उसका कहानी लिखन की आवश्यक्ता का खयाल रहना ही नहीं चाहिए। मैंने तो कम से कम कहानी नप्टि प्राप्त करने के लिए लिखी, दष्टिदान के लिए नही । मुझे लगता है कि जीवन क्तिना गूट अन त, विलक्षण और रहस्यमय तत्व है कि नहीं लगता काई दष्टि ऐसी हा सकती है जा यहाँ से वहा तक घेरे मे उस बांध ले । होते हाग काई सिद्ध लोग पहुच हुए लोग जा घर लेत होग जीयन को लेक्नि मालूम नहीं कि वे अपन का कितना घेर लत हैं । गायन जीवन क नाम पर वे अपने को घेर लत हाग । जीवन ता क्या घिरता हागा क्यावि जीवन तो अनत है । अनन्त काल है लकिन मन त काल भी जीवन का प्रातता को समाप्त नहीं करता है चुकाता नहीं है । दिमाग है हरएक के पास है और करीब करीब हर आदमी यह साचता है कि जो उसर पास है और जितना है वह दूसरके पास नहीं है, एक उस पास है और प्राधे म सारी दुनिया है । अक्ल चीज ही ऐमा है। दूसरे का धन वहा लग सकता है लकिन दूसरे को अक्ल कभी वही नहीं लग सकती है। ता मेर मन म गुरू स इस प्रक्ल नाम की चीज का अविश्वास रहा। और मैंने जब लिसना गुरू किया ता मुझे एसा लगा कि प्रश्न प्रौ सय गुरु से ही प्रा गया है । लिखन सगा ता लगा साय हुमा कि क्या यही ठोप है इतना ही ठीक है ? यतिन भी हमारे मत हैं मा यताए हैं कि हम जमकर वठ जात हैं जिसके लिए अक्ल का हम मौना दते हैं कि वह पमला करे, मुमिप वन । यदि दुनिया को खपिरत कर दें वर्गों मे वाट दें तो यह अपनपन के माह मे होता होगा । इसका मूल्य दिग्ध है । यह काम बडे लोगा के लिए ही घाह दना चाहिए । मरे लिए ता निमासा ही काफी है । नानो वनन की अभिलापा का मरे बस की है नहीं। मरे लिसने का कारण जिनासुता भौर सप्रनता है। जिसको कहानी विपना है उसका विनता से चपराना चाहिए और अज्ञता को कभी घोडना नही चाहिए । जो नान सत्य है, टिक्नवाला है उसका स्म सत्य का है मतवारिता का नहीं है । नान यह है जा नावन को समथ कर मरना है । जानन ।

१२६ कहानी अनुमर और शिल्प । को इच्छा हो बुद्धिमत्ता का लक्षण है-जा जान गया कि वह जानता है, जान चुका है वही है जो नहा जानता है । और जो यह जानता है वह इच्छुक रहता है । अगर कोई विचार है तो उसे प्राचार म परिणत करें । दूसरा से टकराने के लिए वह उसे नहीं फेंकता । व लोग जीवन मे परास्त हो गये हैं टूट गये है लिएर गये हैं जिहाने जीवन मे क्वन जाना ही जाना है। दो के बाद जिन्होंने तीन चार एम०ए० क्येि हैं उनकी गति प्राप देख लीनिये कि क्या हो गयी है । जीवन म स जो उपलब्ध होता जाता है और फिर जीवन पर घटित होता जाता है वह ता नान है। मैं तो इसी म खग्यित देवना हूँ कि किनारे रा निकल ताऊ । हमारी कहानी लेसक बिरादरी म से कोई इसका जवाब देगा। इस समारोह की निष्पत्ति क्या होगो मैं कह नही सकता। क्या को गति में वेग आयगा भाये तो बहुत अच्छा है । लेकिन अधिक सम्भव यह भी है वि अवरोध आयेगा। ययापि कहानी लिखा जान और पढी गाने से चर्ची जाने की चीज हा जाय तोसमझ लीजिये पि वगनायगा वि अवरोध ? कहानी एक ऐमी चीज़ है कि पियन वाल और परन बाल वे पाच पिसा विचौलिय को आवश्यक्ता नही होती ईश्वर और मनुष्य र बीच पुजारी इत्यादि इतन लोग होत हैं कि इश्वर गूढ होता चला जा रहा है । मैं मानता हूँ रि कहानी भी एसी ही सीधी-सादी चीज़ है कि उगम एष हमारा विचौलिया हो जो लेसर और पाठन के बीच पहानी की व्याख्याएँ मरता मैं मानता हु कि कहानी जब व पाठय और लेराव के बीच पत्री माता है, समझी नहीं जाती। यह सम्भव है नि इम व्यवधान 4 कारण पाटय भी प्रभाविन हो कि कितनी ऊची चाल है जो हमारी समझम नही आयो । पौर लेखप भी समझे विपन्नवाल चमात रह जाते है-इसम बडी चाज क्या है ? माम तौर पर तो चोर समझ ली जाती है उसमा मूल्य क्या है यह ता बहुत सस्ती चान है। एसी चीज होना चाहिए तिमे समभन म दिमाग पर तार पढ । इस व्यवधान स मालाचा प्राध्यापक ममीक्षक वथा पानी पानि बा समावेश हो जाता है तो मैं मानता है कि बहाना की प्रतिष्ठा उराम घरता ही है। और पीज है निमर बारम च चलता रहती है कि यह जा समय है युग है समाा है यतमान है इनके साथ वहाती और साहित्य का सम्वय क्या है ? - - ०७ कहानी लखन और न जानना कहते हैं कि साहित्य दपण है समय का, युग कादपण ही हो तो साहित्यसे जो अपे क्षाएँ हैं वे पूरी नहीं हो सकेंगी। अगर केवल मात्र प्रतिविम्ब न होतो वह काम पूरा हो नहीं सकेगा । इसलिए मुझे लगता है कि जो वस्तुगत तथ्य है जो समयपर प्रतिफलित दीसता है उसको ज्या का त्या हम कहानी म वारीवी के साथ चित्रण कर देते हैं तो मेरे खयाल मे इतने मात्र से कहानी सफल नहीं हो जाती। वह सदा साहित्य नही बन जाती है । मुझे तो ऐसा लग रहा है कि यह जो पैसा बढ रहा है इससे हमारी बुद्धि पनी और प्रखर हो गयी है । इससे जो कुछ भी हम देखते हैं, उसको खण्ड खण्ड, अणु-अणु छितराकर देख लेना चाहते हैं, विश्लेपन बुद्धि से । वह इतना विश्लेपण परती है इतना विश्पण करती है कि सश्लिष्ट तत्व लगभग रह नहीं जाता। जिसे रम कहते हैं प्रेरणा कहते हैं वह सश्लिष्ट प्रभाव है । विश्लपक बुद्धि केवल बारीकी मे उतर सकती है । कि तु रस और प्रभाव की विति उसमे कम हो जायगी। जीवन के साथ कहानी का क्या सम्बन्ध है इस पर जब विचार करता, नोमालूम होता है कि वज्ञानिक सम्ब ध नहीं है। कहानी का सम्बन्ध अवश्पणीवन साथ रोमेण्टिा सम्बध है चौर रामेण्टिक सम्व घ के माने ये कि हम प्रयत्नपूरक नन्तर रखते हैं । अन्तर नहीं रगते हैं तो आदर समाप्त हो जाता है मूल्य समाप्त हो जाता है मयाठा समाप्त हो जाती है । अतर रखते हैं तो भावना का प्रयास रहता है। मगर विनान वह है जो सेंटीमट के लिए अवकाश नहीं छोड़ता है ता वह विनान एटम बम बनायेगा और एटम बम को सिप रखे रहन से गतुष्ट नहीं हो जायेगा, आगे भी चलेगा। कोई चीज़ है कि निमक कारण विशान अपनी मर्यादा म रस्ता है। जीवन के बारम मेरा दृष्टिकोण बना है कि भार मावश्यकता है- जीवनमान का जसा श्वाइजर कहत थे । पाटर रय माना जोवन ये लिए सामान काम नहीं होता । क्यापि हर चीज म अपूणता दिखाई देता है और प्रादर तिराहित हो जाता है । हर काई अपने को मानता है और विगी या नहीं मानता है । इस प्रसार समाज चलता नहीं चन सक्ला नहीं, सेरिन म अपन में दूसरे को मानू' और प्रपो से अधिक मानू यदि ऐसा हो सके तो मैं समझता है कि हमारे जीवन म ग विष समाप्त हो जायगा और अमत पता होगा। जीवन उस विमान को पादे जो ब्रह्माण्ड तक व्याप्त है और किस मैंने यहानी अनुभव और शिल्प - रोमास कहा । विराट के प्रति जो विस्मय का भाव है वह विनान है । साहित्य की यदि कोई उपलब्धि है या उपादयता है तो वह यादमी और आदमी के बीच ममहता के सम्बध को शिवाय नहीं ममता बल्कि टूमरे प्रकार का मम्बप मानता है- सहानुभूति का । इससे आगे प्रेम वा सम्द घ है । जब म किसी के निकट भुक्ता है उसके प्रति कृताथता अनुभव करता है उसे प्रथम और अपने को दोयम मानता हूँ ता वह प्रेम है । इसी का बढ़ा हुआ रूप भक्ति है । साहित्य म जव भक्ति का तत्त्व रहता है तो वह घरमात्वप पर रस्ता है। और जितना उसम तियन, अहता का भाव रहता है वह प्रपन प्रयोजन रो च्युत हाता है । कहानी के बारे में मुझे लगता है कि साहित्य मे कोई विधा नहीं है जो कहानी के अभाव में टिक सक । कहानी ही थी, उसका स्प बनावट, पहनावा रविता का था । व हमारे पुराण हैं जिहोने हमारी संस्कृति की एकता को कायम रखा । उसके मध्य मे वहानी जरूर रही है । जो कविता हम प्रभावित करती है उरावे मध्य म कहानी पी सिचुएशन जरूर रहती है । तो भी कुछ मुक्तक हैं जिनम क्या का सदभ नहीं है । कथा की इतनी प्रधानता येवल इसलिए है कि जीवन के सम्म घम हमागे मा यता स्थिर और वधकर रह जाये, दिमाग उस वक्त चला करता है । पहानी सस्कार देती है । उसका सशोधन करती है। चलता हुआ जो जीवन व्यवहार है उराम द्वारा सत्य की झांकी कहानी देती है और वह टिक जाता है। प में, मूत्र म, बंध गया यह तो स्टेटम-का का समधन करनेवाला होता है। जीवन यो पागे नहीं बढाता है । उपनिषद का जव परम गुह्य बात कहनी हुई तो उमरे पास कथा के अलावा कोई सहारा नहीं था । क्या माहित्य का वही गाफ्ल्प है महानोस यह वात यदि हम मालूम हाजाय जिसे मानूम होना चाहिए, कि जितन भी वाद हैं जितनी मान्यताएं हैं उनम मापेक्ष्य मूय है । मनुष्य उस मध्य में है जो निरपेक्ष मानव से व्यवहार मग जागर मानर-व्यवगर से प्रसग जावर, कोई मतव्य कोई गुत्र प्रपा मा म मत्य हा नही सस्ता है ।मानव-व्यव- हार की कमौटी पर जो टिक्ना है यह सही है तो मैं मानता है कि एसा हमारा मनोभाव बन जाय तो साहित्य मे, पया माहित्य म, अपना काम यहुत दुध पूरा रिया । मने पहानिया लिखी है पोर जव एपाय कहानियाँ छा गया थी, तो कहानी लेसन और न जानना १२६ मैं बहुत उत्सुक रहा कि मैं यह जानू कि कहानी क्या चीज | इधर उधर जाता था कि कहानी क्या होती है, मुझे बताइये । एकाएक जव कुछ कहानिया छपी तो किसी ने यहा~छपा हुआ मिल गया पढन को, जब मै धूमता फिरता था दिल्ली में और आदत यह थी, दि जीवन से परास्त हो चुका था, यहा क्ल बत्त मे पाया था, इस प्राशा से वि दस प द्रह रुपये की नहीं नौकरी मिल जाये ता रह जाऊँगा। मां का सामना नही होता था । यह मेरी हालत थी और मैं जानना चाहता था कि कहानी क्या हाती है तो उसी समय पटनेको छपा हुआ मिल गया कि कहानी का जानकार जनद्र है। तब से कहानी का लिखना मेरा चलता रहा है उसम कोई खाम निवकत नही हुई है, लकिन यह चात मेरे मन म बध गयी है कि कहानी का जानना कुछ होता नहीं है । जा कहानी के चारे म इनना जानकार था और वह जगह जगह जाकर पूछता था कि कहानी क्या हाती है बतायो । और उसो ये सम्बध म यह उपा मिल जाता है कि उसके समान जानकार काई नहीं है, तो सिवा इसके क्या सावित होता है कि पहानी जानने की कोई चीज नहीं है । और उसको भाषा जव जानकारी की भापा बनायी जाती है और लिखी जाती है तो मैं मानता हूँ कि कहानी पर कुछ अवलेप पा जाता है । और जब कहानी जानकारी को भाषा से मुक्त होकर जीने की भाषा अपनाकर चलती है तो मरल हो जाती है सके लिए सुगम हो जाती है। पपिसके लिए इसी कारण यह शायद गूड हा जाती है। मैं मानता है कि यहानी ये सम्बध म परिचर्चा या जो बाडा मापने उठाया है वह माहस का वाम अरूर है, लेकिन मेरी प्राथना और भावना यह है कि कहानी-लखन की दष्टि से भी यह समारोह उपयोगी और लाभकारी हुआ तो में अपने का आप सर को और गमागह को सपन समझगा-जिसकी कि सम्भारना मुझे कम दिखती है ।

हिन्दी कहानी मे यथार्थवाद का विरोध पापये कलकत्ता क्या समारोह में दिये गये भापण पर हुई प्रतिनियात्रा से एसा प्राभास होता है जैस आपने यथाथवाट का विरोध किया है । क्या आप इस साहित्य के लिए इष्ट नही मानते ? -- बाद को साहित्य म मैं ठीक नहीं मानता हूँ । वाद स्थित मत का प्रतीक है। साहित्य म स्थिति स पागे गनि की प्रतिष्ठा है । इसलिए किसी भा मनवाट ६ प्रतिपाद्य के लिए मै साहित्य म अवकाश नहीं दग्यता हूँ। फिर यथायवाद की सना तो मुझ और भी सीमित जान पडता है। वहा जाता है कि माहित्य समारा जीवन का दपण है। साहित्य क लिए यह स्थिति रि यह बरा बाह्य गावन का प्रतिविम्य है मुझे ग्राहा नहीं। मावश्या मालूम होता है कि वह उस तीन गा प्ररित भी करे। इसलिए मैं मानना चाहता हूँ मि ययावस्थित ययावतानो मे अधिव साहित्य म राभावनामा और यल्पनामा का प्रतिपनन मिलता है। इसी तत्त्वाचे कारण साहित्य जीवन में निए प्रेरक भी हो पाता है। ऐसा मा यता रयकर भरे लिए अपने भारभिन मापरण म यह बहना भाव यर हो गया कि वा घि नेपणपूरा बुद्धि से जो रसना होगी यह पयाय को पाडन की कापि म पत पर पत यानते हुए मत म मास्ति पर पहुंच जायेगी और उगम सर्मा वत प्रभाय प्रयोजन यी कमी होन लग जायगी। प्राव यवता साहित्य गृजन मा नष्ट आस्या को भी है जो वस्तु को अश्विन भोर सडित घरस हा 7 दम, ल्लि उमरा भराड व सभ म सौग्य से मंडित हिन्दी कहानी मे यथार्थवाद का शिरोध करके भी देख सके । इसको ययाय प्राग्रही से अधिक सत्य-आग्रही दृष्टि कह सक्त हैं। यथाथ के अाग्रह में सौंदय छिन्न भिन हो जाता है । वस्तु की अनेकता वेद उभर पडती है । जसे मानो सब कुछ परस्पर को व्यथ परता हा सिफ क्टा फटा हो । साहित्य वस्तु को अनेस्ता मे से अपनाकृत दृश्य एब दान का एक्ता सष्ट करता है। इसम द्रप्टा जोर दश्य के बीच मानो इतना प्रतर रहने दिया जाता है कि दुरि काम कर सके और वहा मौन्य का पाविष्कार कर सके । चित्र स आस सटाकर रखेंगे तो उसका सौदय समाप्त हो जायगा। वली रग के धब्ये भर रह जायग । भाव और अथ वहाँ से तमाम लुप्त हो चुका होगा। आज वैनानिक एवं प्रौद्योगिय युग के प्रभाव म कुछ ऐसी ही घटना घटती दिखाई दे रही है । अनि बौद्धिकता का जोर है वस्तु और व्यक्ति के बीच का अन्तर यथायवादी आग्रह के कारण विलीन सा हुया जा रहा है । मुझ कहना हुआ था कि इस युग म काव्य की जो माग घट रही है, पाटण का स्थान अवगणनीय वन रहा है सा श्लाघनीय नहीं है । मुझे प्रावश्यक मानूम होता है कि वस्तु से वास्तव का अतर देखा जाय और रोमाटिक यत्ति को तनिक फिर से अपनाया जाय । वसी तटस्थता और निरपेक्षता में विना वस्तु जगत का आशय पकड म नहीं आयेगा। वल्लि वह वस्तु-जगत ही हमका पक्ड लगा और इस प्रकार माहित्य वस्तु म्यिति को समाले रखने वागी रा नानि या अनुक्ता मात्र रह जायगा उसका मागदार एव दिग्दराक नहीं हो सकेगा। पान वगानिर बुद्धि के वावर्ती होवर हम गणना म फ्म गय हैं । वह गणन-वत्ति हरेर यो एक दूसरे मे अलग घर देती है। प्रत्यव पथर और घटर हो जाता है किन्तु सब अलग अनग होन के लिए ही नरी हैं। उनके बीच म व्याप्त एकता वा मूत्र है जो अमोघ है । माहित्य उसी प्रमाघ अनिवाय यद्यपि अप्रत्य । तत्व की प्रास्था रसना योर उसको प्रतिष्ठा करता है । अनर के बीच वह ऐक्य वा उद्घाटन करता है। यही ऐश्य है यह पप्ट सत्य जा ययाय को सच्ची यथायता देता है । नहीं ता यथाय स्पडा प्रतिस्पद्धा से भरा ए उलमाप मात्र र जाता है चोर उसम हर स्वय इतना प्रधान बन जाता है कि वह सब- कहानी अनुमर और शिला स्व को मा डालना चाहता है । इमो वृत्ति का परिणाम है कि सघप सब यही दीरता है और सौमनस्य का अभाव सा हुअा जा रहा है । इसलिए प्रारम्भ म हा मैन यथाथवाद के प्रति अपनी दर अमा यता प्रगट की थी और आस्था को आवश्यक्ता का समर्थन किया था । यह प्राज की सभ्यता और विश्व को मानसिकता के प्रचार को देखते हुए मैंने कहा था । मुझे डर है कि हि दी Tथा क्षेत्र में नय पुराने ग को लवर जो चथा विवाद की स्थिति पदा कर डाली गइ है, उमके सम्म म उन वाक्यो पात पिया गया और फिर गायर उसके प्रति दुलक्ष हा हो गया । मरे मन में उन नयी पुगनी सनापा के लिए स्थान कभी नहीं रहा नअर है । म मानता हूँ कि उनके सहारे चतर माहित्य के मूल्य निणय सबघ म कोर प्रकाश मिलने वाला नहीं है। xx मापने को सनिष्ट मि की बात कही वह ता ठीक है किन्तु विज्ञान र इस युग में गणक हुए विना लिखा गया सागिय पाठन वो विभ्रमित ही न । परगा ? -वि लेप और विवेक बुद्धि को ताक पर रखकर साहित्य निपाता सनेगा यह मैं कस कह सकता है । लेकिन हां विनान और अनुमान से इतर यदि राजा में उसका उपयोग होगा ता उम बुद्धि को भावना की प्राव यकता होगा । एक 'T' प्रतिवद्धता आज पल चना करता है। प्रास्था के अभाव म प्रतिबद्धता सभव नहीं है । यति यह प्रतिवद्धता यात्मगन विल्कुल न हो मवथा वस्तुगत हो जाय ता साहिय समाप्त हो जाता है सिप राज वार हाय म रह जाता है । तब बढ़ा वदी और पापाधापी यानि वा प्रवेश माहित्य को घर ता है। हरव के लिए यति अपना अपना म्ब और स्वाथ ही यथाथ हो जाता है तो फिर याच म से उनके प्रम तिराहिल हो जाता है। साहित्य पा सवाय उन सबवे याच का प्रेम ही है वहा उसमा पथाय भी है । मयका अपना बिमा और विरुद्ध स्व और स्वर गाहित्य पनि मिथ्याप वन रहता है। साहित्य गोर राग्नीति म यही प्रतर है । इसलिए वह दहिजो स्वरब को और स्वाय पानिमा एप परमाय म मिला-जुला अभिन्न दसती है, इस दुनिया म रिचित रोमाटिक टि समझ ली जाता है । पद लिया जाय उस रोमाटिक हिदी कहानी स यथार्थवाद का विरोध लेकिन त म स्तष्टि भी वह ही है । इस दृधियो अपनान मे बुद्धि के लिए भरपूर पुरुपाय का अवकाश रहता है । सच पूछिय तो उस बुद्धि के साथ सही सही याय तभी हो पाता है जब वह उस प्रास्या से अपना समाजस्य बिठाने का निरतर प्रयास करती रहरी है । अयथा आस्थाहीन बुद्धि तो निरी प्रहकृत हो जाती है और निंदा आलोचना का या काटने कुतरने का ही उसका एक पाम रह जाता है । वह रचना निर्माण मे फिर समथ नहीं हो पाती है। * इसका अर्थ यह हुआ कि धाप साहित्य में जो यथाथवाद आज चल निबला है, उसेस्मस्थाहीन बुद्धिन य मानते हैं और यह भी कि वह घटिया है। यहा साहित्य की परिभाषा का प्रश्न उभरता है जिस पर क्लत्ता कथा समारोह म वहीं हुई थी। क्या साहित्य की परिभापा भी समय समय पर बदलती रहनी चाहिए। क्लात्ता क्यासमारोह की इस दिशा मे क्या उपलब्धि रही? ही यथाथवाद जो कहा जाता है प्रकृतवाद ता पहुंच गया सो शायद इमा प्रास्था च्युत बुद्धि प्रयोग के कारण। मैं क्याथ गब्द को सत्य मे मिलाकर खो देना चाहता हूँ । ऐस यथाथ वस्तुता और बाह्यता म मुक्त होकर प्रतरगता और प्रात्मता से अपनी सधि स्थापित कर लेता है। ऐसे घाजक्टिव औरम जक्टिव मे अभेद स्थापित हो पाता है एक गमवित सयुक्त इटिग्रल वास्तविक्ता अथवा सत्ता के प्रति उ मुग्यता प्राप्त होती है । यथाय प्रपा आप मे प्रास्मता से जो अपना रह जाता है मो उसी मात्रा म अवास्तविक भी बन जाता है । इसी से स्थिति अनिवायनया यह बनी और भागे भी बन सकती है, कि यथाय के वाद मे से प्रक्तवाद या प्रश्नोलवाट जमले निक्ले । नही, विचार ये उस स्तर पर क्लात्ताये क्या-समारोह मे कोई उपलधि नहीं हुई । एा बहुत मवरे दायरे मे बातें चलती रही और वहाँ जो कुछ हुमा उराम पाफी तो मेरे लिए अगम बना रह गया। कुछ व्यक्तिगत चर्चाएं भी रहा जिनना सावजनिक महत्त्व नहीं बनना या मानना चाहिए । कलरत्ते का यह फ्था ममारोह सस्कृति-ससद को ओर हुया था। उनका प्रयत्न सचाइ ने साय उप क्या समारोह को पूरी तरह सफल और समग्र मौर । कहानी शुभव धीर शिल्प प्रतिनिध्यात्मव बनाने का था। यदि वह वसा नहीं हो सका बुध एकागी बन गया तो कारण कुछ नय अथवा अन्यत्र रहे हागे। लेकिन इन नपथ्य की बाता कान मुझे परिचिति है न चिंता है। इन और एम समारोहोम साहित्यतर वातावरण बन ही जाया करता है । मेरी वहा जानेको रुचिअथवा वृत्ति नरी थी। दास तारीख तक मैं निश्चित जानता था कि में नहीं जा रहा है । वीच के हैढ दिन म मै कुछ मा घिर गया कि प्रत में मैंने अपने को क्लत्ते म पाया । यह निस्सह बडा सफ्नता है कि रतने हि टी-क्या में सबध रखने वाल लाग वहां उपस्थित हो सर्वे । सभी वया धारामा वियाग्रा ये वधु थे । उससे वातावरण किमी निश्चित स्तर का नहीं बन सका । मालूम होता है ऐसे सयोजना म विस्तार क लोग सवरण अधिक उपयागी होगा। यह मैं नहीं मानता वि सुनकर बातें हो सके तो उसस मनिष्ट होता है । यह भी दिन वहां प्रापस का मोमालिय था न पदा हुमा । कुछेर अप्रियताआ की छानबर मतभद व मानसिक मौर वचारिख था जा स्वाभाविक और उचित है। पथा लेखा सेवथा मीमासा ये अवसर पर अपेक्षा रखी जा सकती है विवे किताबी भाषा में बात यम करेंगे जिसम भारी भरषम र वेहत आ जाते हैं । यान कुछ निजी और घरेलू भाषा में का जायगी जिसम रा परस्परोपरधि हो मरे । शास्त्रीय गन्दा म की आनेवाली पर्चा पिचित परोक्ष और सुरा- स्मर या जाती है । उसपर से रिपाट तो अच्छी बनती है निप्पत्ति वम हाती है । समझम नहीं आता कि कहानी लेसक स्तिावी भाषा या विवाता म क्या पड़ता है । यहाँ वहुत-कुछ ऐमा मुनन को मिला जो वक्तृत्व का कोटि TT उठा हुआ था और प्रापसीपा से अटूता था। मरे लिए य’ प्रगम बना रह गया मोर विचारणीय नहीं हो सना। प्रतिक्रियाएं यहां की क्या हुइ मुझे पूरा पता नहीं है । एकाध जगह पुछ उस बारे म छा अवश्य पढ़ा है । यह सही है कि हवा उससे साफ नहीं बनी। पध बुध अधिक बढ़ गया । जो न विचार को सुलझाने में बजाय उलमा रहे ये उनपर ध्यान उलटे बड़ा मोर उभरा । नये पर गार रहा, जो अपने पाप पुरान पर भी पडना घसा गया। मुझे अपन वारे म सुनन को मिला नि । हिदी कहानी में यथार्थवाद का विरोध प्रेमचद वे समय के वहानी के साथ दो मन तोडा था। यह निरा अपवाद है। मैंने सिवा अपने जसा लिसने के कुछ और नहीं किया। प्रेमचद को तनिक भी कभी मैन अस्वीकार नहीं दिया। अपने का स्वीकार करने में किसी का अस्वीकार मेरे लिए आवश्यक या उचित नहीं बना ! बल्कि उलटे मैन यह अनुभव किया है कि अपन सहज स्वीकार अथात अपनी मयादाला के स्वीकार मे शेष सवका सत्कार अपन आप आ जाता है । पिसा व्यक्ति या पीढी का अम्वीकार जव भी मन मे उठ तो मान लेना चाहिए कि हममे निश्छल प्रात्म- स्वीकारता की प्रक्रिया अभी अपूण रह गयी है । हमारे मना मे अमुक अथिया काम करन लग जाती है । ग्रथि बनने का कारण केवन अपनी निश्चल स्वीकृति का अभाव ही होता है 1 अमुर अभिनिवेश या प्राग्रह या आक्रमण उसो म से फलित होते हैं । यदि ऐसा होता हुआ वही तीस पटे तो उसको मुनना और सहन कर लेना चाहिए और कभी उसको महत्व नहीं देना चाहिए। वसी मन - स्थिति म से निकले सब उदगार व्यक्ति को प्रगट करते है साहित्यिक मूल्य विचार से वे निरपेक्ष हुआ करते हैं । ऐमी लहरें तात्कालिक स्तर पर हमेशा चलती आयी है । तत्काल से आगे उनकी कोई सगति नहीं रह जाती है । लेकिन इस सबघ म अधिक चितित होने की प्रावश्यक्ता नहीं है। प्रत्यक द्वारा सृष्ट साहित्य हो पोछे रह जायगा वादानुवादपूचा नही जायगा। कलकत्ता कथा समारोह का बहुत कुछ है जो टिकेगा नही भूल जायगा और खोजायगा । इतना भर रह जायगा कि सब लोग मिल और अपने अपने मन का प्रवासन दिया पौर प्रन म इस मात्रा म सौमनस्य वढा और मै मानताहूँ कि मुझे निजी तौर पर इम अथ मे काफी लाभ हुआ। मेरे निक्ट माविणार हुआ कि भाई परसाई और श्रीकात वर्मा इतनी साफ सीधी खिलती और चुभती भापा म अपनी बात कह सकते हैं । डाफ्टर शिवप्रसाद और डा. लक्ष्मी नारायण लाल की बातें भी मुझ हार्दिव और स्पष्ट लगी । भीष्म साहनी लगभग नहीं बोले किन्तु जितने शब्द पाय मिठास म से पाये । वृन्दावनलाल जी, भगवतीवायू पोर अमृतलाल नागर से तो अधिकार ही था कि हम अनुभत्र सिद्ध वाणी व यतिरिक्त कुछ न मुन सर्वे । शेप मेरे मनमे अपक्षा बनी रह गयो दि वात यदि हृदय की भाषा 1 कहाना अनुभव भार शिल्प समझ लेना चाहा है । समझकर क्या वे पा सके, या दे सके हैं, पता नहीं। लेकिन मैं उस लालसा मे कोई समुपलधि की समावना नहीं दखता। मुझे नहीं मालूम, इस सबध म अखबारा म क्या छपा है । लेकिन जो बात मेरो पार से कही गई थी, वह सोधे सादे ग म ऊपर मा जाती है। * क्या उक्न प्रश्न पर समारोह में मीमासा हुई ? मोहन राकेश और कमले- श्वर के वक्तव्या पर आपका क्या मत है ? सायद उन वाक्यो को व्यक्तिगत आक्रोश और आक्षेप के रूप म समझकर टाल दिया गया । मेरे मन मे यक्ति थे ही नहीं । मेरे मन मे कवल मूलभूत प्रश्न था । पसल मे यह चर्चा प्रमगवश ही उठ आई थी। दो एक वक्त म कह दिया गया था कि हिन्दी कहानी म माधुनिकता जनेद्र से भी कि जनेद्र लेखक आधुनिक है । इसी पर हठात् उठकर मुझे कहना पड़ा विम इस अभियोग को अस्वीकार घरता हू (आई प्लीड नोट गिल्टी)। नद्र किसी हालत मे माधुनिर लेखर नहीं हो सकता है, म उन माधुनिर होना मजूर है । प्राधुनिक जीवन का बहुत बडा क्षेत्र ऐसा है जिसक अनुभव स वह वचित है । इस अनुभव की पूंजी की कमी पर यदि कोई चिंतित नहीं है तो वह याधुनिन कस मान लिया जा सकता है ? इसी बचाव में मैंने अपने प्रतिम वाक्य म कहा था कि साठ बरस आयु वे हा गुको पर भी अगर जनेद्र आधुनिक लगा करता है तो क्या बीसी- तीसी ये उमर के लेयर पाप मानते हैं झप ही मारते हैं । इसका भागय था पियाधुनिक और उसी गोड म प्राचीनता यादि गदा के सहारे जनद्र का याम नहीं चला है । पामर माधुनिव मतवार को पसौटी से रि जिरावा चलन है, यह एक्दम उतरा हुमा है । उसको वहानियाँ वस्तुगत अनुभव वी राष्टि रा सच्ची नहीं हैं उनकी सचाई यदि है तो निष्ठागन है। स्पष्ट ही वे गहन हैं। उपत मेरे मतव्य को व्यक्तिगत भूमिका देकर उग पावारण वन जाने दिया गया विचार विवचन ये स्तरस उग पग पग रह जाने दिया गया, इस पर मुझे रो रहा और अब भी सर है। हमारे एक नना वधु जो या दिगण है उगो मारे आगप में पाते वो रह गये और भय तक पहे ।

हिदी कहानी यथार्थवाद का विरोध इसी से समारोह के उत्तप्त वातावरण की कल्पना की जा सकती है। श्री माहन राकेश और श्री कमलेश्वर के वक्तव्य सभ्रमयुस्त पौर विद्वज्जनोचित थे। मुझे स्वीकार करना चाहिए कि वे मेरी कक्षा से उचे थे। मुझे अनुभव हुआ कि मैं उतना पढा लिखा नहीं हूँ। पाज के कहानी लेखन मे आप क्या सभावनाएं पाते हैं ? -~सभावनाएँ । सभावनाएं तो बडी उज्ज्वल मालूम होती हैं । डर यही है कहिदी का क्षेत्र बढ रहा है और बाजार भी बढ रहा है । इसलिए उस घूम- पाम और कोलाहन मे गुण अनपहचाना और पिछडा रह जा सकता है। लेकिन हर सचाई को इम परीक्षा मे से तो गुजरना ही होता है । इसलिए व्यग्र अथवा निरत्साहित होने की आवश्यकता नहीं है। कहानी के क्षेत्र में बहुत तेजी से और बहुत दिशाओ मे काम हो रहा है। उस सवका लेखा-जोखा तो म नहीं दे सकता है। तो भी काफी कुछ निगाहा से गुजरता है और अपने को अत्याधुनिक से अवगत रखन की भी काशिश करता हूं। इस प्रयाम म तीन नाम सहमा मन पर प्रक्ति होर उभर आये निमल वर्मा की कहानिया को पक्ड से म वच नही सका हूँ। उपा प्रिय दा की रचनाएं ममहीन कभी मने नही पाई। उनमे सगोपन और साकेतिक्ता भरपूर मिलती है। इधर मनहर चौहान का एक साह देखने को मिला । क्या वर्षों की सहजता, साथ ही सवेदन को समता और सूक्ष्मता मुझे बहुत प्रभावो स्पारक रागो। याद पहता है, मोहन राकेश की रचनामा की छाप मुझ पर गहरी पड़ी थी। इधर वह अपेक्षया अवश्य कुछ भूखी-सी रह जाती है । अतीव नया मकाई नाम उतना अभी पवा तो नहीं बन सका है लग्नि एक ताजगी अमर देखन मे थाती है । कुन मिलाएर बहन कीमती काम हो रहा है पौर हिन्दी म निचय हा पहानी के स्तर की तुलना विगो भी भारतीय भाषा बल्कि अनेर विदेशी भाषाआ की तुलना म हली नही चटनी। भारतवप म नई से नई रहर का सा भी मिलता है और प्राचीन परपरा पीजह भी यहाँ मे अभी उन्हो नहीं है । इस तरह अत्यत गहा और सपन भाव मयन की मामग्री भारतीय जीवन म प्रान उपस्थिा है। स्वदेश वा वह माता जय यह एक १४० कहानी अनुभव और शिल्प साथ तुगनेव, टाल्स्टाय, दास्तोविस्की और गोळ-जैसे दिग्गज उदय म आये, मानो सप्रति भारत भोग रहा है। यहां की राजनीति शिथिल और स्थितिगील जो बनती जा रही है सो आशा है कि उसकी क्षतिपूर्ति साहित्य द्वारा होगी। ऐसा ही होता है और सचमुच उसकी चिनगारी जहां-तहाँ वही कही दीख जाया करती है।

वक्तव्य अभी एक पवित्रा में कुछ प्रतिक्रियाएं परने का मिली । पलकत्ते म कथा- समारोह हुआ था और उसी के परिणाम मे वे उपजी हैं । उसने मुझे चिंता में डाल लिया है । मैं अपने को अहिंसा का विश्वासी मानता हू । मानता हूँ कि यहाँ हर प्रकार के जीवन को खितने खुलने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन उस पवियाम मागम होता है कि काफी कुछ मनिष्ट भाव मुझरो और मेरे वक्तव्या को लपर जमे और मम जीवन क सौमनस्य को वे नष्ट भ्रष्ट कर रहे हैं । इससे लिसे श को अपेक्षा म बोले गए शब्त को उपयोगिता अनुपयागिता के बार म मपन चल निक्ला है। लिया गया दाब्द समूह के भीह के, पास नहीं जाता । वह एक एक पढन वाल के पास पहुंचता है और हठात् नहीं पहुचता, या वह उसके अस्तित्व को टक्कर नहीं देता। पढन वाले में मांग होती है, ग्रहगोलता होती है और तब लिखे हुए T के द्वारा लेखक की बात उम तक पहुंचती है। दोनों में विचित परस्परो मुमता बन चुपी होती है। हो सकता है कि लेखक का पद और भाव पाठन के मन में और मत के अनुकूल न हो। चाहे तो वह प्रतिकूल ही पड़ जाता हा । तो भी पाठक वे भस्तित्व का पालखर के पद से यदि कुछ चुनौती मिलती भी है, तो यह उमको मानसियता को मिलती है। इस पद्धति से साहित्य ये साठ का प्रभार एक एप की मानसिवना का जगाता, चौकाता या टेलना हुप्रा व्यापक घरता जाता है । उगका परिणाम चनय उद्ोधन की दृष्टि से इमलिए मनभीर नी हाता । साहित्य के गर ने काफी हलवन पोर उपन-युयल मी - १४२ कहानी अनुभव और शिल्प मचा दी है लेकिन यह पालोडन मानसिकता के स्तर पर होने के कारण अन्तत जीवन साधक ही होता है। वह मथन जीवन के नवनीत को ऊपर लाता है और कुल मिला कर चत य को प्रक्प और उत्रूप देने वाला बन जाता है। लिखा हुआ शब्द किसी के सिर पर जाकर नहीं पडता । पाप नहीं पढना चाहते है तो नही पढते हैं । पढते पढते अरुचि से अब जात है तो छोड दते है। यह सुविधा मच से बोले हुए श म नहीं रहती। वह हठात आप पर पडता है और मापसे टकराता है । आपम उसकी मांग नहीं । पर अगर बठे हैं तो उससे बचने का उपाय भी आपके पास नहीं है । मच से बोला गया पर प्राप पर पडता है। आपसे बात नहीं की जा रही है प्राप पर वह गली जा रही है और इस तरह उराम खतरा पदा हो जाता है कि आपके अस्तित्व और व्यक्तित्व को वह छेड पड जवकि आपकी मानसिकता सवथा उससे अछूती ही बनी रह जाती है । उसी घाट प्रहता को लगे मोर वे शब्द ही लेखक, पाठक के सयप से विरुद्ध वक्ता धोता में एक प्रकार की अनारमीयता पैदा करने वाले बन जाय । वेशन ऐसी लहरें उठायें जिनसे विग्रह बटे और मावेश उत्पन्न हो । मच रो यान गए शहर व्यक्ति के प्रति नही जाते समूह मौर भीड से कहे जाते हैं। इसलिए उनके मथ भी अलग भग तरह से लिये जाते हैं। तात्कालिक मनोभावा का हो उन पर्थों या भनों पर असर पष्ट सकता है। इस तरह मच पर से गेना गया शल व्यक्तिगत मनुवध स निरपेक्ष हो जाता है और वह घतय या उपवरण नहीं रहता बलि समूह में भावेशो प्रमिनियेगा काम आन लगता है। उसग इस कारण सास्कृतिक प्रयोजन सिद्ध नहीं होना अधिकारी राज नोतिष परिणाम निकाला जाता है । सामुदायिक भावे और अभिनिवेा राज- नोति म गर्मी लाते हैं और हम इस पद्धति में उसे उभारते हैं । राजनीति मे व्यक्ति गौण हो जाता है गुट गणनाय बनते हैं । इसलिए राजनीति का मेल अम्नश्चत य को उदबुट परनेवासा नहीं हुमा करता है अधिकांश मोहाविष्ट मरता है और व्यक्ति की आरम निभरता को वह कम परता है । वह सगठन पा मायम बनता है और उद्बोधन दे माग म मरमर एकावट बन जाना है।

१११ वक्तव्य सासार वह मच, बहां वक्ता-श्रोता के बीच देवल ग्रहणशीलता का सबध न हो, बल्कि वह मच वाद विवाद का हो । मैं इस बार मेयवतक असावधान रहता आया हूं। मचा पर जाने और समूह के प्रति वोलने म झिमका नहीं हूँ। अब मालूम होता है, मिझाने की आवश्यकता है । आवश्यक्ता इमलिए है कि रिसे हुए गब्द का भी उपयोग में करता हूँ। लिखा शब्द समूहको स्वाकार नहीं करता, व्यक्ति से बहव्यक्ति को जाता है और जिसके लिए समय व्यक्ति हो उस जमाव के प्रति बोलने में कठिनाई होनी चाहिए । छोटो मोटो गोष्ठी तो भी चल सकता है । कारण, उस गोष्ठी म मानो एक व्यक्तित्व का निमाण हा माना है। खुले दमाव में यह शक्यता नहीं रहती, इसलिए वहाँ वा शह स्थिति निरपक्ष और व्यक्ति निरपण हा चलता है और अप का अनप पैदा कर देता है। गहर सोच में इसलिए मुझे यव पड जाना पड़ा है । सुनता था कि लेखक अच्छ वक्ता नहीं हात । अबतक इसका सगति मुझे समझ नही मानी । अब मालूम होता है कि लेखक को वक्ता हाना भी नहीं चाहिए। यदि वक्ता वह सपन हो तो शायद नसकी पर उसका दुष्प्रभाव पडे बिना नहीं रहेगा। वालने म तात्कालिक प्रभाव की प्रपेशा भी जुट जाती है । लिसने से भी उसका योग हो जाता है तो उसमें कृत्रिमता थाने को समावना है। लेखन प्रात्माभिव्यक्ति है। जितनी वह अपने प्रति सच्ची होगी उतना दूसरे के प्रतरग का छुएगी। अगर बाह्य प्रभाव की प्रासक्ति उसम प्रा मिलती है तो उसकी पतरगता रिचित बहता से कनुपित होती है। वह फिर सच्ची नहीं रह जाती है । लेखक वा इसकी योडी सुविधा भी इस कारण रहती है कि वह मकेला होकर सिप्तता है, बाई श्रोता-वग उस समय नहीं रहता। उसे अपने से जूझना पडता और लिसने पे द्वारा मानो बह पावत अपने से ही सामजस्य साधना चाहता है । फना प्राता-वग नसके सामने हो तो उमर मनामाव विचलित हो सकते हैं पोर मपनी ही मम भूमिका स च्युत होकर वह तात्कातिर भोर लौकिक प्रपोजना म वह जा सकता है। मारमो अपनी ही भावना में अब उतरता है तोमा मशुद्धिको मोर बढता है। - कहानी अनुभव और शिल्प मचा दी है लेकिन यह आलोडन मानसिक्ता के स्तर पर होन के कारण अन्तत जीवन साधक ही होता है। यह मथन जीवन के भवनीत को ऊपर लाता है और कुल मिला कर चतय को प्रक्ष और उरूप देने वाला वन जाता है। लिखा हुआ गर किसी के सिर पर जाकर नहीं पडता । पाप नही पढना चाहते है तो नहीं पढते हैं ! पढते पढते अरुचि स ऊब जाते है तो छोड देत हैं । यह सुविधा मच से बाले हुए ग म नहीं रहती। वह हहात पाप पर पता है और मापसे टकराता है । आपम उसकी माग नहीं है। पर अगर वठ हैं तो उससे बचने का उपाय भी आपके पास नहीं है। मच से बोला गया दाट श्राप पर पड़ता है। मापसे बात नहीं की जा रही है माप पर वह हाली जा रही है और इस तरह उसम खतरा पैदा हो जाता है कि आपके अस्तित्व और व्यक्तित्व यो वह छेड पडे जवकि आपकी मानसिकता सवया उससे अमृती हो यनी रह जाती है। उसकी पाट महता को लगे मोर वे शट ही लखन पाठय ५ सवय से विरुद्ध वक्ता थोता मे एक प्रकार की मनारमायता पैदा करने वाले बन जाय। वेदाम ऐमी लहरें उठायें जिनसे विग्रह वढे और प्रादेग उत्पन्न हो । मच ग बोल गए पर व्यक्ति के प्रति नहीं जाते समूह मौर भीड रा कहे जाते हैं। इसलिए उनके अप भी अलग अलग तरह से लिये जाते हैं। तालातिर मनोमावा का ही उन पर्यो या अनपों पर असर पड़ सपना है। इस तरह मच पर स चोला गया शक व्यक्तिगत मारप से निरपेक्ष हो जाता है और वह चाय या उपकरण नहीं रहता बलि समूह के प्रावणा अभिनिवेगाव बाम आ लगता है। उसने इस कारण सांस्कृतिक प्रयोगन सिद्ध नहीं होना अधिरा राज. नीतिष परिणाम निकाला जाता है । सामुगापिर मावेश और अभिनिया राज नौति में गर्मी साते हैं और हम इस पद्धति से उसे उभारले हैं । राजनीति म व्यक्ति गौण हो जाता है, गुट गणनीय बनते हैं । इमलिए राजनीति का गल असश्चत यो उदयुट करनेवासा नहीं हुमा करता है अपित मोहाविष्ट परता है और व्यक्ति की आरम निमरता को वहम मरता है । यह समठन पा माण्यम यनना है और उद्योधन दे माग म अमर सावट बन जाता है।

१७३ खासकर वह मच, जहां वक्ता-श्रोता के बीच वेवल ग्रहणशीलता का सबध न हो, बल्कि वह मच वाद-विवाद का हो । मैं इस बारे में अब तक मसावधान रहता आया हूं। मचो परनाने और समूह के प्रति बोलने मे झिम्बा नहीं हूँ। अब मालूम होता है मिमरने की आवश्यक्ता है । आवश्यक्ता इसलिए है वि लिखे हुए शब्द का भी उपयोग में करता हूँ। लिसा सन्द समूह को स्वीकार नहीं करता, व्यक्ति से वह व्यक्ति को जाता है और जिमके लिए समप्य व्यक्ति हो उसे जमाव के प्रति बोलने मे पठिनाई होनी चाहिए। छोटी मोटी गाष्ठी तो भी चल सकता है । कारण, उम गोष्ठी मे मानो एक व्यक्तित्व का निर्माण हो आता है। खुले जमाव में वह शक्यता नहीं रहती, इसलिए वहा का शब्द स्थिति निरपक्ष और व्यक्ति निरपेश हा चलता है और प्रय का प्रनय पैदा कर देता है । गहरे मोर में इसलिए मुझे अव पड जाना पड़ा है । सुनता पाकि लेयर अच्छे देवता नही होत । अवता इसको संगति मुझे समझ नहीं पानी । अब मालूम होता है हि लेया को वक्ता होना भी नहीं चाहिए। यदि वक्ता वह सफन हो तो गाम लेखकी पर उसका दुष्प्रभाव पड़े विना नहीं रहेगा। बोलने म तात्कालिक प्रभाव की अपेक्षा भी जुट जाती है । लिखने से भी उसका योग हो जाता है तो उसमे वृत्रिमता आने की समावा है । लेखन प्रात्माभियक्ति है। जिसनी यह प्रपन प्रति सच्ची होगी उतना दूसरे दे पतरग को छुएगी। अगर वाह प्रभाव की मामपित इसम मा मिलती है, तो उसकी प्रतरगता मिचित अता से व लुपिन होता है। वह फिर सच्ची नहीं रह जाती है । लेखप का इसयो योडो मुविधा भी इस कारण रहती है कि वह मरेता होकर सिसत्ता है कोई श्रोता वग उसरे समक्ष नहीं रहता । उसे अपने स जूमता पडता है । और लिसने के द्वारा मानो वह सतत अपने से हो सामजस्य साधना चाहता है। फंसा घोता-बग उस सामने हो तो उसके मनोभाव विचलित हो सकते हैं पौर मपनी ही मम भूमिका से व्युत होकर वह तात्कातिर पोर सोषिक प्रयाजना म घर जा सकता है। मादमी मपनी ही भावना में जब उतरता है तोमात्मशुद्धिको मोर रदवा है। 14 १४४ । कहानी अनुभव और शिल्प लेखन इसम सहायक होता है और कोई ऐसा नहीं है जो सवथा शुद्ध पौर निमल हो । इसलिए बाहर आकर व लोग अधिक सफल होते है जो हार्दिक से अधिक कुशल होते हैं । हार्दिक जसा का तसा प्रगट हो सकता है । कुगल वह है जो अपने ही अनभीए को पीछे रोक रख सकता है और केवल अभी का ही सामने लाता है । कि तु कुगल यक्ति अपने अनभीष्ट को पीछे रखकर चलने की क्षमता के आधार पर इसलिए घाट में रह जाता है कि वह उस अनिष्ट तत्व से मुक्त होने की चिंता से बच जाता । ऐस दुमुही यक्ति बनो की सभावना रहती है। दा खाने बन सक्त हैं जिनम हम अपन भातर बटे है। शिप्ट मामने आने के लिए और गेप पीधे बचे रह जान क लिए । लेखक होकर किसी के लिए यह सभव नहीं रह जाता है और नहीं रह जाना चाहिए कि वह दो यो में वटा हुआ जीये चला जाय । उरो अविभक्तता चाहिए कि फिर लौविक सफलता चाहे उसस हटती ही क्या न चली जाय । इस तरह प्रक्मर देखा गया है कि लेसर जो कामलतम भावो वी अभियक्ति अपने लेखन म घर पाता है प्रत्यक्ष जीयन म वही अनगढ पोर पूरह दीखता है । उदात्त अनुदार दोसन म माता है और मादर्शोपम कृपण वन माता है । यह वेवल इसलिए कि अपन अनिष्ट भाय को वेवल पिछवाडे रसार ही जीने की एना उग नही पाती है । भाव म उतरकर जर यह लेखन-काय करता है तब अवश्य व अनिष्ट वहाँ उपस्थित होने के लिए नहीं मा पाता । इस तरह उसका रचना भव्य स भव्य तर होता चली जाती है और वह अपन बहिरग म उनहर और प्रव्यवगरी बना रहता है। अपने इस अमावधान घटिरग को लेकर उसे बाहर जाना मोर जीना पहता है और पतरण को दुगई नहीं है मक्ता । इसलिए अच्छा है कि वह निये मौर बाहर व्यापन सामुदायिक सपो स वह यच ! पर इम मवरे बार मैं अपने का लेव र नाचता हूं। लसा में बना तो अपा यावजूद । लेवय के सघम के गरे म मै भी सानघाा नहीं रहा । निया तो बहुत कम और जो मन म माया 1 लषय की एक अपा हाता है। उसका अपना एक स्थान और भूमिका होता है । मानूम होता है दि उसपर टिकार रहने का अवसर मरे लिए आया नहीं 1 आयारा था, मावारा बना -- वतय रह गया और साचता हूँ कि अगर बाहरी सम्पकों की कमीटी से वचकर, अपने में रहार कलम चलाये जाता है तो फिर अपने दोप उघडकर उजागर सामने आयेंगे कमे? मानव सम्बधा और सम्पको म व्यक्ति की वास्तविक्ता नगी हा पडती है मानो वह दपण है जहा प्रादमी अपने को देख सकता है। मन मे मैं अपने को जो चाहे मान मरता हू पर जा हूँ वह तो मुझमे अय पर अनायास प्रगट हो पाता है। इसलिए क्या मुझे सचमुच चाहिए कि वहा से टूटकर मैं कोई कृत्रिम एकात बनाकर अपने में सिंच बैटू वि जहाँ पादमी की क्सौटी है और फिर जहाँ ही उसको मुक्ति भी है । आदमी नही है मुफ्त अपने म । न हो ऐसे मुक्त हो सकता है । उसको मुक्ति है अनिबंध प्रेम-सम्वध म। मुक्ति है इसमे दि वह सबके प्रति समर्पित हो और वर विरोध को प्राव- श्यक्ता उसके लिए कही रह न जाय । कुछ न बचे उसे अनारमीय हो। न बुध रह जिससे उसे भय या प्राशका की आवश्यक्ता हो। अपने को लेकर सम्म होने के लिए वह बढ निकले। वही उसे प्रतराय न रह जाय, न कहीं उसके अपनेपन को पद हाना परे । तेसक राफल शायद वह हो सपता है जो भागमा म रहे और इगलिए शुद्धतम और सूक्ष्मतम स्प पकडता जाय । ऐसे वह स्वल्पतम भी हाता जायगा। यह ए बनेगर और एकाकी बनेगा । शायद इसमे वह अमापानिय भी वन जाय । हो। हाते यह विक्षिप्तता के निकट ही पहुंच जाय । वह भावुक होता जाय इतना और इतना कि स्वय सीधा सतर टिक न सके । प्राश्रय उस कृपा का हो और लेसनी ये सिवा अन्यत्र उसकी भावना निरी गुण्ठत बनी रह जाय । यह हो सकता है और इसमे मेरे लेपन का साफ्ल्प भी देग लिया जा सकता है। लेपित भावना म व्यक्ति नहीं जीता । जो में कम भी लगता है। और मोग मे घर पार नही जागक्ता विचकर अपने मसिमटे ता गांठ ये मानिट हो वह याता है मुक्त मोर प्रास्त नहीं बनवा ! पर पनप होकर यह जमा है ता चेता घिरपर रहनवाली नही है। सरपार र उसे थामत्रण है और भुगौती है । पदप पाने को सपा जा यना नहीं सकता। प्रामयण मौर कहानी अनुभव और शिल्प चुनौती के उत्तर म जो रुक्ता है तो जडत्व को ही अपनाता है । यहाँ रुकना नहीं है खुलते जाना है । रुकने पर वाह्य जगत बधन हो रहता है । उसके निमनण और चुनौता पर अपने चतय को खुलते जान देने मे से ही मानो याह्य जगत म से उसकी मुक्ति का माग प्रशस्त होता है। निश्चय ही इसमे टक्कर होगी विग्रह होगा। नाना प्रकार के प्रश्न उत्पन होगे और मासूम होगा कि मुक्ति पथ राज पथ नहीं है । वह बडा ही कटकाकीण है और जीना पुरुषाय है समस्या है । इसमे यात्री क्षत विक्षत होता है। अस्त ध्वस्त होता है । पर यात्रा छोडी कैसे जा साती है ? पदि भूल चतप खा नहीं गया है और प्रेम निष्ठा अकुठित है तो बीच के सारे झगडे-बखेडे सहे जायगे और पार हाते जायेंगे। अति दुगम माग है और ससार नाना महतामो से घिरा रहता है। पग-पग पर अवरोध है क्याकि वहाँ मुझसे दूसरा है। किन्तु दूसरा यहाँ क्या है कौन है और इसलिए चित्तनिष्ठ होकर जो चलता है मानो वह मात्मतायो और आत्मीयताओ 4 वीच स सहज माग पाता जाता है । धूल उहता है धुध भी पता होती है ताने तिश्न बनते पौर मिलते हैं पर यह तो जीवन पा भोग और प्रसाद है अनबन यनती है और अप का मनप रचा जाता है। फिर भी क्या डर है ' प्रत म आगमी को तो रहना ही है। रहना सच को है और सच की राह में फून ही फूल तो मिलनेवाले नहीं हैं मोट से पम सच नहीं होते हैं भोर आयु बीतती है और आदमी का प्रत होता है। शरीर गिर जाता है और क्षय या प्राप्त होता है । जो बचता है वह स्वयं नहीं होता । स्वयं म शेष होकर जो रहता है वही बचा रह जाता है । अनि सष्टि रहेगी और सजन रहेगा और मामा एक-एक बर आता जायेगा करता जायगा मोर जाता जायगा। इमलिए भावना बी पूंजी लेकर हर मामी को परसरता दे विगद होते हुए बम माग पर बरते ही जाना है। कुलित भोर पदम से उस व्यक्त नहीं हाना है और लगता है कि साहित्य की मौन पाणी भवनम्ब सही उमे नही जोना है बल्कि प्रापसापन म काम मानवाला मुखर और मच वाणी से भी उसे पतराना नही है। कारण, मादमी स्तिना ही सयप हो कितना ही भावुक हो वह अपने मे कुल और समाप्त नहीं है। उसे वक्तव्य १४. शेष दिशामो में भी होना है। उसे हर पर मे उतरना है जिससे उसका एकाकी स्वय सावजनीन प्रात्म बन जाय । इस प्रक्रिया में विकास साधने के लिए उसे गन्द प्राप्त हुआ है। लिखा गया मूक शय्द साय ही वोला गया मुसर गर, हर शब्द लहर उठायेगा। उन लहरो ने पेन पैदा हो सकता है गजन-तजन का रव भी उठ पड सकता है, किन्तु लहर उठकर फिर रुकना नही जानेगी और यदि दाद भात्म के तल से पाया होगा तो यह सर्वात्म का प्राप्त होगा वीच म वध नहीं होगा। और मैं सोचता हूँ कि पत्रिका म प्रगट हुइ प्रतिक्रियाएँ यद्यपि घोर हैं कठोर हैं तो भी यदि मुझे मुक्ति चाहिए ता उम सबको पी जाना होगा भोर निष्ठा को अक्षुण्ण रखरर बचने की युक्ति की खोज में पहना नहीं होगा। अच्छा है कि व्यक्तित्व न विचलित हो । उनकी मानसिकता ही हिले । प्रत्येक की श्रद्धा अविचल रह पाग्रह और अभिनिवेश अवश्य क्षुप और प्रातोहित हो भायें । लहरें उभरें जो गरीर को ज्या का त्या पार करती चेतना को भन्नाती और जगाती चलें । शब्द इसी तरह अपना काम करेगा। स्यूल का छोड देगा, सूक्ष्म जाकर अपना प्रभाव छोडेगा। किंतु यदि स्थूल उसम विचतित होता दोसे, स्वार्थों के सूत्र हिलें और छिड बायें और उस कारण विग्रह मे देप भी पैदा हो, तो भी सब कुछ सह जाना होगा और अपनी प्राधना और निष्ठा म भग नहीं माने देना होगा । प्रायनाएं सब प्रशुण्ण रहें मोर सब जहता मौर महता से उठकर जाग और चैतन्य म एक होते चले जायें।

पत्नी के बारे मे पली पहानी मिस सन म लिपी गयो ठीक याद ही । जान परता है प्रेमच द तव जीवित थे । यानी सन् १९३६ रहा होगा। या तो प्रातिारी शर हमेगा ही आपण का केद्र रहा है। पर तब उसम और भी दिप महिमा पड चुकी थी । लेपिन मेरे मन म होता था कि प्टि पर बहुत कुछ निभर है। सच अपने मे निगुण होता है । यह वणना तीत है उसम अपना रूप वण नहीं होना । धूप को तोहो तो ही नाना रग बनते हैं अ यया घूप देवल उजली होती है । यानी नातिकारी को अपनी मनारम अभिनापाओग महित वरखे जा हम देखते हैं सो गाय- ययाय सत्य महीं दबते । उस निरपक्ष परिप्रक्ष्य म दसा जाए ता चित्र सब शायर बदला हुआ दीमे । उतना मोहा भी चाहे यह न हो । चलो प्रमाग वर दे । उन दिनो पातिगरी भगवतीचरण की वगनी उवल वो म उभर पर सामने आयी थी । वह बा गोले माय प्रयोग करते ममप लाहौर म रावी नगे , दिनार पायरा हुए और देहात प्राप्त पर गये । घायन हाने और मरने के बीच काफी समय उनम सास रहा। बताया पता था कि इग अवधि म भी उ हैं अपने वट वा उतना ध्यान न पा जितनी देन और दूगर साथिया ये योग क्षेम की चिंता थी।-आदि आदि वीरता को वातें मुन पर हठात उन पर मन जाता था। मैंने सोचा कि वह ता त्राति का सार जी गए सरिन उनको लार मगो-मवधिया ने क्या पाया ? पहानी उपजी इस विदु म । पति व महान्त लियाप तर पहानी या में ल जाऊगा ऐमा सोचार रचना वा पारम्भ हुमा । म परनी हो पनी के बारे में थाएगी, ऐमा अनुमान न था । आप जानते हैं, मैं स्वय नही लिखता, लिवाना पडता है। लग्बक वधु को बीच में तनिक उटना हुआ। मैंने दम्या यि पांच द गोट होने या गए हैं। कहानी तकाने के जवाब मलिग्वनी गुम की गयी थी। यानी कि मर इयर हो, उघर फट उसे भेज कर छुटटो पाई जाए। पाचक पृष्ट म तो कहानी बन ही जाती है। वहानी क नाम पर उतना बार- प्रकार आमानी मे निभ जायगा । लेखा वघु आये तो मैंन पहा 'छाहा, एकार वाक्य और दोन देता हूँ। वन, दननी ही को भेज दो। ऐसे वह वगनी बनी और नाम पनी दना पहा । पत्नी इसलिए कि वहाँ तब जो रचना की पाति बनी थी, वह पत्नी व पत्नीत्व को ही उभार द पाती थी। पत्नी की अपना म ही पति वहा मानो अपना समयन-असमधन अथवा व्याख्या प्राप्त करत य । मानो उम क्गनी म वह स्वय उतने गीपस्थ नहीं रह जात थे। ऐमे कहानी बनी और मुद्रण द्वारा परोमी जार लोगों के सामने आ गई । सुनने को मिला है कि वह रमणीर रचना है गिप की दृष्टि से अत्यन्त भय है सवया मी है और जाने क्या-क्या नहीं है । यब बताइय नि यदि यह राब है तो इमम मेरा दाप कितना है ? मैं जो वनाने चला था उसके तो अभी तट तक भी नबा पाया था। जो वन गरी, वह वनाना कभी सोचा नहीं था। इमनिए य िम कता की या गिल्प की या याम बियाम की कोई पुगतना निपुणता है तो वह नागानी आ गयी होगी । मुल उसलिए जिम्मे. दार नहीं टहराया जा सकता है। कहानी-लपक की हैसियत से मैं निणय अपन पास नहीं रखता हूँ। हो सरना है कि कहानी में पत्नी चमकी हो और पति फीर रह गय हा एगा कुछ ता वहानी म विविध रगों के उपयश स होना अनिवाय ही है। मेरा उद्देश्य किमी को घर-दद कर दिखाना नहीं है । जो जितना और जसा है, है । विगी को अच्छा दुरा बहन म क्या वाता-जाता है ? दृष्टि योर चितन यदि वैमानिक हो ता इन रुचि निभर विशेषणा से छुकारा मिल जाना चाहिए । ययाय वह हिनिमम अपनी ओर से मना न जाए। निषपदाम दिपण बहुत से बना यह है योर निरा डर भी वा जाता है । ए है मप्रगामी, कहानी अनुमर और शिल्प दूसरा 'प्रतिगामी । कहानी के पति पर पहला और पत्नी पर दूसरा विशेषण चाहे तो चिपका दिया जा सकता है। पर उन विशेपणो से विशेष्य को अपना पाठक में उदभूत हुए भावको व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। विरोपण विवेचन के पटल तक जापाते ह । वही वे बनते टूटते रहते है। किन्तु कहानी याप्रभाव वहीं तक रहने के लिए नही होना चाहिए, उसे सम्वेदन तक उतरना चाहिए । मतवादिता का श्लेप वहाँ तक पहुचने म बाधक हो जाया करता है । वह निविष्ट अर्थात् केवल सम्वेट को जो भूमि है वहाँ सिंचन पहुचना चाहिए । वहाँ से अकुरित हुए को फिर चाहे हम जिस अभिमन की सना दें। पास्म सम्वेदन को स्पन्न प्राप्त हो चुका होता है और घेतना को एक उन्बोधन मिल जाता है तो बम है । फिर यह अलग बात है वि विस उपयोग म हम उसे लाते हैं। पहानी की पत्नी पत्नी इतनी अधिक हो सकती है कि व्यक्ति वह हो ही नही । मानो वह परम्परागा धारणा वा चित्रित करन ये निमित्त बना चरित्र मात्र हो । उमका अपना निजी स्वत्व स्वत हो ही नहीं। ऐसा होता है और यही जीवन पी विडयना है । निजता नियतता म कस पर ममसाती रह जाती है । पर उस सम्ब ध या कोई मतव्य रचना के समय मेरे मन मन था। मेरी ओर से वह एक पण्ड चित्र म अधिक नहीं है जिसस पति विचार म प्ररत है पत्नी सम्बदना म रावत। ये दोना वृत्त परस्पर निरपेक्ष ही है पर दोनो की सापेगता जम जागिर है और इस तरह दूतादत की एक अजीर पहेली सी सागने में आता और झाकी दार निकलती चली जाती है। एक विवाता है सिम मगाभूति की चाप्ति का अनुमय हा सकता गायक्ता या जाती है, अन्यथा यह निरी व्ययता बनी रहती है। फरवरी'६. ...

विवाद-प्रतिवाद इस बीच श्री जनेद्र जी की सूब पदानियाँ या मार चष्ट्रास्ट सदी कहानिया एर दम सामने रख रहा । 'विमान' और 'ध-विलान' दोनों बहानिया याधुनिक हैं, याधुनिर चित्रापार को गेम, शिक्षा परिप्रेक्ष्य स ले लिया गया है । आरित्य और मिस्टर , म ARY हैं, दोनो के सामने धौरत नाम की चीज नगी होकर या टार-बापर, नाण जोवर देख लो इस स्थिति में सामने आती है । जिस काम-पला दौर जिरा प्रेम-पता की वात जनेद्र जी घोर दानित हार किया करते हैं, व, अर भी उनकी कलम पर आती हैं । जनः जीन जमे उलझे हागन को '' और भुनीता' में सामने रखा है उससे वे एक इच भी यागे न साश्यच होता है। १६ मे ६० तक वह को दोगन Amrit है? सारु बात तो यह है कि प्रेम और मैगी or girl

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कहानी अनुभव और शिल्प और भी कुछ इमी तरह की शिकायत हैं । कुछ टैक्नीक की एपरेमेंटेशन की कुछ पोनोग्राफिक स्टफ को, | पिसी को यह अच्छा नही लगा कि विस्टीन कीनर काण्ड को इतनी मजी हुइ कलम क्या मिनी ? आदि । टेक्नीक और प्रयोग शब्द अब तक मरी चतना से अछूते रहे हैं । मुझे उनका पता नहीं रता है। हर कहानी फिर भी अपन म अलग बन जाती है । यह अनिवायता अनिवाय और सहज है। स्टफ या सवाल जहाँ तक है मुझे विही निषेध की रेखा का पता नहीं है। सत्य के अनुसधान म एसो रेवाएं ठहर भी नहीं सकती। बल्वि' अनुसान के लिए अधिकारी सतह के नोच ही जाना होता है यानी वजित क्षेत्र एमे काम के लिए अधिक उपयोगा हो निकलता है। एक भाई ने बहुत पने को बात उठाई है । अनासक्ति को लेरर वे पूछना चाहत है कि कि रच्च द क 'देवटारा का आदश माना जाए मि धमशास्त्र के श्रीक्षण का यह जिनामा मामित्र है वितु उमप विवेचन के लिए अब सर दूगरा बनाना होगा । देवास पावती के द्वार पर जावर मत म मर जाता है यह मनायक्ति का लक्षण नही माना जाएगा। एक अनोसे यापु ने तो पमाल ही पिया है। नि-पान म जो वि यो अलग करके लिखा गया है मा वह करत हैं शिवह अग्रेजी का वी है । और यह प्रयम असर Victory का नहीं है, Vagina का है । यह सागय कहानी यो प्रलमा परते ह और उसम गहरी गूढना देखते हैं । स्वीकार करना चाहिए कि यसी अतहघि मरे पास नहीं है । सय श्री रमे। वनी ! यह स्वय कहानी लेमर हैं। कहानी ही नहीं लिखते नई भी लिखते है। उन्हें अवरज है कि जो मैं शुरू सोलह म था वही अब गाठ वप के पेटे मार से बना रह गया । यही का दर्शन । बगर उनी बात सच है तो मेरे लिए स्वय प्ररा ता का बारण साठ पर गो में गोलह जितना नया हूँ ना क्या यह गौरव की बात नही होनी - विवाद प्रतिवाद चाहि? यानी अगर रमे। वत्तीम बरम के हों, तो मैं उनमे दुगुना नया ठहर सकता हू । उनको साफ है कि प्रेम और सेक्स दो अनग चीजें है । यह सच है कि मर नि रह सफाई अब तक साफ नहीं है । लगता है कि ये दोना चीजें, समाना तर रसाओ जैसी मीधी वेहन सोधी समझ के लिए ही हो मरती । लेकिन आदमी और उसरी समझ लकीर की तरह सीधी हो सकती है इमम पर है। या मेरी उम्र साठ तर आया चाहती हो । मानव जाति की तो लाग्यो- लाप परम हो चुकी है । काम प्रेम की उलान उमकी अब तक कटी नहीं है। क्या करें दम पोटी म जनम कर रमेश बसी उमका पार पा गय है, तो बहुत ही गुम सूचना है लकिन इसका भरोसा होता नहीं है। अभी मैं सलाह दूगा कि चे जीयें और भुगतें। उसके बाद जो कहगे, वह अधिक मुनो लायक होगा। निमाण वो वहा म न पा जाय नि पान उनके लिए मुझ चुकी है । ऐसा होना सो उप और पतवा देने काही काम उनके लिए रह जाता । पतवा भी उनस आने लगा है लेकिन गनीमत है कि कहानी भी बा रही है। वह सुलमन म से नही उलमन म स ही आ मरती है। एर जाह उन्होंने मेरे लिए मारम भाग गट का उपयोग किया है । सदर्भ चाहे मटा हो गर वह बहुत ही सही है । जैनेन्द्र (के साहित्य) का नही, सारे साहित्य का ही इष्ट आरम मोग है। भला मोचिये कि कागज लम स आरम- भोग और माम मुन ही नहीं हो पा इद्रिय भाग और इन्द्रिय मुप भी पाया जा सकता है ? साहिप म यति कोई लपा या पाठा सचमुच कापिर मा यपाय भाग पाने की प्रवाशा रखते हा तो वह प्रत्यागा अत मे विडम्बना ही शिद होने वाली है । यथायवाद कुछ इसी भूत म पहार, गीमा लाधार अति बाद बन गया था। पर अद भी उसके लमण समाप्त नहीं है । यारम भाग की मर्यात ही माहित्य वी एमया है। इस स्वीकृति और मीमा म मे न जनेद्र अट राता है न कोई और। वशी सभी मुभ भापार म मिल ५ । विस्मय हुआ शाम और प्रेम के कहानी अनुभव और शिखर - दो पन का सहारा उनकी समझ ने अब तक थाम रखा है । मैं उह रहता हूं दि इस सहारे उनका नया पन अधिक टिक नहीं पायेगा, कारण वह मून बहुत पुराना और जीण बन चुका है । यह तो पलायनी अध्यात्मवादी सून है, जो मान काम नहीं दे पा रहा है । जीवन को एकत्रित और एकीकृत हाना है। धम पूर्वक काम र पुरुषाथ को मोक्ष म मभिषिक्त होना है बीच म अप व काम को छोड़कर चलने वाना धम मोक्ष तक ता उठा ही नहीं सका उलटे नाना बपना की रचनाए पर सका है। नयता का सहारा लेकर श्या यत्री उसी द्वित्व को बढाना चाहते हैं ? एर यात और पुसक श से वे घबरात मालूम होते है । इसी से उमे मानो गाली मान लेते है । स्त्रीत्व और पुरुषत्व ग पत्तित्व आग होता है यह स्त्रीलिंग अथवा पुलिंग ही होता है । कोई भी मात्रा अथवा मूल्य स्त्रीलिंग घ पुलिंग नहीं होता । महत तत्त्व मव लिंग की उभयता से पार हात हैं। दूसरे दादा म समग्रता या नपुसक्ता का भूमि पर हो व प्रतिप्ट होते हैं । स्वय स्त्री- पुरुषा का सामाजिक सावजनिर व्यवहार व्यक्तिर को भूमिका पर और सिंगहीन हुआ करता है । इस तरह नपुसक्ता म हम यक्तित्व के भाग की स्थापना भी चाहें तो करव दम्प सकते हैं। आज के युवा या अपने पोप बारे म इतना सदिग्य नहीं होना चाहिए कि हर जगह अपा पुरुषत्व वा प्रमा णित करने की हविस हो, अन्यथा भय हो वि की वे नपुमय न मान लिये जाय । विश्वस्त पौरुष या नहीं यार यह निश्चित काय का प्रमाण है । प्रत्या समाहित व्यक्तित्व लिंगानीत और नपुराव होता है और यह स्वच्छिन नपु- सक्ता रा जनता और सम्पा पा लक्षण है । नपुसक र से किसी को पव राने वी आय यकता नहीं है । पास कर उस ता बिल्कुल नहीं जो पारिवारिस और सामाजिर दायित्वा स पररा नहीं चाहता है । स्थीत्व अयया पौरुप पे प्यय प्रगान म से भी व्यक्तित्व वी गरिमा नही हालकी है और न अपनी पहारियों में यह मैं सम्भव बना सका है। इस सवध म म मेरे मा म तनिक भी दोबल्य की शुभूति नहीं है । यलि मानता हूँ कि यनि युवावस्था में इस विसाद प्रतिवाद १५७ सत्त की याद रखी जा सके तो प्रेम अधिक गम्भीर और विधायक होगा। और समस्या में अधिक सफलता की सष्टि कर सकेगा। इन आये पत्रों से एक दूर की बात भी यहा कहना सगत और आवश्यक जान पडता है । वह यह कि में अच्छा होना नी चाहता हूँ । रोग यही है । हम सभी लोग अच्छा होना चाहा वरल है । इमसे होता है यह कि दुरा दक जाता है अच्छा मह जाता है । अच्छाई का लिवास की तरह म्पर से हम मोढ लेत है और धुराई को आट दिये रहते है । मेरी शिवक्त, खाम र नियने म, या है कि मैं अच्छाई को अलग से दख ही नहीं पाता हूँ, अच्छाई मुके सच्चाई मे गभित नोगती है इमलिए अच्छा यी जगह सच्चा होना मुने इष्ट है। गच्चा हार काई चुग मा निकत तो मुझे असह्य न होगा उलट भूटा हर कोई गि सम्य सनात, गत आनि दीये तो मेरी साता टूटने लग जाती है। समाज भले को चाहता है और पूछता है । बुरे से वह इतना आधुलित रहता है भनाई उस मली और बुरी लगती है, सच्चाई से और सच्चे से उस बटवा रहता है। इसलिए मच्चे के माग म बाधाए और विपनाए आनी है । मुझे रागता है कि कठिनाई यहीं से बनती है । नीतिनिष्ठ पुरुषो के प म जिन नागो या महिमा र अपने काम म दुरदुराए गये थे । नई नीति सदा सवदा, तुम गजमोति जसी जाती रही है । यारण, कि मुविधा प्राप्त हो । भारम्भ म उमम अमुविधा प्राप्त होती है। मेरे मन म निचय है कि गुमना अत म सत्यता के हो साथ है । इसलिये सत्य व माग म विनगला कितनी भी आवश्यक हो विचिकित्सा अथवा भय के लिा यहाँ बिलकुन अवमाननी है। १२ फरवरी ६४ जनन्द्रकुमार . थापा ग र म जनेशुमार जी के विचार दो से है। जाहिर है विभपनी जानगर कहानी पर माये बना तब सीलिटी में कहाना अनुभव और शिल्प चाहते तो दाशनिक प िलयां कमने तथा अपने लेखन में अच्छा' और 'सच्चा' टूटा के बजाय उस कहानी पर आयी बातो का उत्तर सीधे से उसके सजन का प्रोसेस बताते हुए दे सक्ते 4 । उहोने किया तो यह कि प्रश्ना का रिमाग की बहक बताकर नव्यता यथाथवाद, या कहानी और रमेश बक्षी तक पहुँच गये हैं । यदि वे मरे वारे म ही नाराज होकर कुछ कह दते ता में यह पत्रही लिपता, सविन रागता यह है कि वे भोक म कुछ कमिट पर गय है और त म सारे नव रवन का चुनौती भी दे गये है । अत नयी पीढी की दृष्टि और समकालीन जीवन पर चर्चा करने के लिए एक माध्यम मिल गया है मुझे । नाप साचिये तो सारे साहित्यका र आत्मभोग है ? इद्रिय स रतना और बाम को जो अजग मानते है क्या व एकीकृत है ? लिंगीन पर और स्वच्छित पुमकता से विधाया प्रम किया ा समता है । विभाजित व्यक्तित्व, बुरा बनाम सच्चा अतियारी भूठा य सब नये लयको की महिमा को उनके द्वारानिये गये विपण है । मैं सोचता हूँ नयी पीती का रास्ता भूलभुलया वाता हो सकता है, उगवा मस्तिर नहीं। बभी जन कुमार जी कहते थ-- प्राणि मात्र व सुप दुघ म तद्रूप होकर ही हम अहाय हा पात १ । यही साय की चरम उपान्यता है। वही आज कह रहे है - सार साहित्य वा इट आत्म भाग है। वान को एक तरतीय देना चाहूगा ठीक ठीक तारीस याद नहीं लेकिन बाई १० वप पटल प्राध्यामजी ने आधुनिर काव्य पर लिसा हुआ अपना छात्रापयोगी लस रिवाया था उसम यह ध्वनित था कि आ। छायावाट क बाट प्रगतिया काही बालना है और प्रगतिया । परिवाए ही निगी जा रही है । मैन उ ह सुझाव दिया कि प्रगनिया था अब नहीं है अब आप प्रयोगमा पर भावर लग समाप्त काजिय । ये मुझ में दो बार प्रयोगवान। काव्य सरसन नकर चल गय । मयाग हुआ कि पाच वप वा याधुनिक काय पर जाकी एक पुस्तिका प्रकाशित हुई । उगम व प्रयोगया- पी जय जयकार करते हा उपमहार पर पहच थ । मैं पिर बाना प्रयागदा- अय कहाँ है ? यह तो आनर का भी गया । अब आप नयी ।

गि प्रतिपाद कविता को समझ लीजिये । सच ही उसने मारी परम्पराओ को तार दिया है और वह रूढियोस बाग है।" फिर कुछ वर्षों के अतराल से उनमे मुलाकात हुई । अब वे नयी कविता की आधुनिकता को अविम सीमा मानने लगे थे । मैंने हंग कर कहा- 'नयो करिता ता अब चुन गयो । मुक्तिबोध जो न कहा विनयी पविता मढिग्रस्त हा गयी है वह दायरे म जबड गयी है। मेरी बात से व एपदम चिढ गये। बोल- तुम मर माय प्ले कर रहे हो। पता नहीं तुम यी पीढी के लोगा को क्या हो गया है कल से तुम लोगहरसुवह एक नया भण्डालकर आआगे मैं समय ही नहीं पाता कि तुम नये लोग इतनी तजी से वैस आगे बढ़ जाते हा मैंने उहयात क्यिा बोर कहा- मुझे भी याश्चय है कि आप पुराने लोग आगे क्या नहीं बढ़ते अपनी ही जगह क्या रेंगने ? यह वा यही सवार मैंने जैनेन्द्रकुमार जी से भी पूछा था कि सोलह से साट तक वह वो वही उलमन कम बनी रह मक्ती है ? नयी पीढी का ही नही हर व्यक्ति हर धाण आो बना रहता है । लावा-साख वर्षों के इस समय पर चढने हुए मारी पीढी यागे बनती है। मार ममाज की एक उम्र हाती है जो वरती रहती है। हर व्यक्ति विकाम रखा पर मागे घटता है । हर नयी पीनी पुरानी पीढी वे विदु में जाग जाती है । उम्र समय-मष्टि समाज और मारिय मै पीछे की तरफ चलना भी होता नहीं है। धरती का गान घूमना घुगे पर ही गोत्र है समय पर नहीं। समय के प्रारम्भ और अत कभी मिलते ही नहीं । हर व्यमिन अपने म हर भण कुछ न कुछ जोडना है। पांच की उम्र म जो बार निभामाएं रहती हैं दम की उम्र मे व वैमानी हो जाती है । दम का मस्तिष्क वीस तक पहुंचते यधिक मूम बन जाता है । वीग की उम्र म जिम प्रेम म व्यक्ति तल्लीन होकर टूवता है तोम पर पहुँनते वह स्वय उमे 'एडो लगेण्ट नानस म ने नगता है। व्यक्ति प्रौद होता रहता है। यह दिशाम और प्रगति को एक प्रक्रिया है जिसम में गभी गुजरते हैं । वरना यह चाहता हूँ वि १६ की उम्र म व्यक्ति जितना अपरिपकर सीमित मान तया अनिश्चिन दिशा वाना होता है, वैसा वह माठ को उग्न म नहीं रहता। मालह और साठ कहानी अनुः दोनो छोरो पर नयापन हो सस्ता है लेकिन प्रश्न उनकी नियां सोलह में भी नये नही थे। कुछ की गति धीमी हो सकती है वे भी चल सकते है, तर प्रश्न यह है कि आज नयी कविता और बीच रत्नाकरजी और कौशिकजी कसे नगेंगे ? आज जब युग का तेजी से घूमते पहियो पर वठा है हम लोग एक दौडती हुई दुनि तो समय के साथ पर मिलाकर चलना नयी पीढी की नियति है।। बात है कि जने द्रजो कह दें-- कौन चला है समय के साथ परमि सोचनातोहमारा अहभाव है। यदि किसी अवमानिक तरीके से कोई के किसी हिस्से पर रोक सक तो वह वसा हा ज म मर लिख और है । रोमाम लिखना शुरू किया तो ज म भर रोमाम लियते फुरलिया + गीन गाना शुरू किया तो आज म वमे ही गीत गाने अपनी दुकानदारी की बात भी है । वसा न करना ग्राहका यो ता किसी गाने वाले को नयी कविता लिखने की सलाह देना उमदेव पा माट छीनना होगा । किसी भी देशवे साहित्य में सयोग से लम्ब नहीं बनती है, लेपिन अपने देश म ऐसा होता है । पिसी समीक्षर दापनिक कह रिया सा उसी सास को माढ़ने लगा। लेकिन आज । लेसर सयोग को धुनौती दने का क्षमता रपता है । मुझे यह पाप वि पट्टो (परम्प याली) पाठत्रा को पस- आयी थी इमलिए ज अपनी बार की रचनानो में रूपा तर से पट्टो को बार बार लाय है ग होना चर्चा का विषय रहा पाठों न उगरे साडी-नाउने उ घटसार लिये इसीलिए नाज भी वे विपान और अविनान' स्पिति ले आय हैं । यह उन लम्बन वा नुस्मा है पुरानी कहानीय का राज है । मुनीता १९३२ म नगी हुई वही १९६४ म लीडरान रूप होरर फिर गरीर अनाश्त पर रही है । अनारत हाने की ध यसी है । पाटना का रिमी स्थिति विशप म चाट का मजा पानः विकाम घर्गा सराय को चाट का ठेला लगा लेना चाहिए? .

नयी कहानी के लेखको को ट्रेजेडी यही है कि वे परिपक्व होते चलते हैं और यही उनका नयापन है। ऐसा अगर नहीं होता और वे नुस्वो पर ही चराते तो हिदी मे दम जने द्रकुमार बीस गानच दर और चालीस परच्चन्द्र पिछले एक दशक मपंदा हो जाते । नयी पीढी के लेपक के साय एक और दिक्कत है कि वह कुछ ओढता नही या कुछ ओढकर चलना पम द नहीं करता। जहाँ दशन की बात आती है यह उसका विश्लेषण कर देता है । जहाँ आध्यात्मिाता की बात आती है वह उमे अयावहारिक ठहरा दता है। जहाँ काम का प्रश्न उठता है वह उममे उसमता नही । जहाँ प्रेम की गुत्थियां पेश की जाती ह वह उसे आउट ऑफ डेट यहार पने दूसरे जरूरी कामा में व्यस्त हो जाता है। काम और प्रेम वो राजता मे वह प्रिया और भाव की सज्ञा दे देता है। उसका विभा जित व्यक्तित्व माश की दृष्टि से गसत हो लेकिन हकीकत है, इसलिए उसे स्वीकार कर लेता है। वह घर म दीपक पहले लाता है उसका घर आज का वास्तव लोप है । वह प्रेम से असम्पृक्त होरर वाम म डूब रास्ता है क्यों५ि काम उमये लिए भूख है । वह काम से असम्पृक्त होकर प्रेम म कुछ समय के लिए वो सकता है क्योकि प्रेग उसी सवेरना है। वह नगल के लिए कुछ नहीं कर मक्ता उसके लिए प्रेम गरीर पर इत्र छिडकने की तरह वैमन तव है । यह काम मे मदा सवदा डूबा नहीं रह सक्ता क्योकि भूख सबरा जारी है लेकिन चौवीमा घण्टे खाना पाते नही रहा जा सरता । उसके पाम एमे दशन म उनभने या भी वक्त नहीं है। वह इद्रिय सचेतना लेकर पंदा हुआ है --~-उरो पाला पाला और मपैट, सफेद दिखायी देता है। उसे सट्टा, बट्टा लगता है और मोठा मीठा लगता है। यदि नयी पीढी के किसी व्यक्ति की आय खराव हो जाये तो वह स्वीकार करेगा कि उसे दिपायी नही दे रहा है , जबकि पुरानी पाढ़ी वा व्यक्ति आय फूट जाने पर भी यह यहगा-~- उमर बढने से दिला पाता हो ऐमा मेरा अनुभव नही है। आंखें गिपिन हो तो काई कारण नही दिखना मा तिथिल पडे।' आगमी ऐमा ब्रह्मस्य प्राप्त पर ले तो क्या वहन फिर तो दुनिया का सत्य मुटठी म होगा।

कहानी अनुभव और शिल्प जा रहे है तो ववल इमलिए कि उनस उत्पन्न होनेवाले भय का अवश्य वडा उपयोग है । उस भय य ाते ही युद्ध रुका हुआ है, अन्यथा अब तक वह कभी का फूट पडता । डेटरेण्ट उपयोग यहा माना जाता है । लोग विज्ञान का सही मान रह हैं दोष सर राजनीति का मानते हैं । अर्थात उस नीति का जो विनान का उपयोग करती है । विनान तो विशुद्ध ज्ञान है और उसमें से बल प्राप्त होता है। उस बल का यनि सहार के लिए उपयोग किया जाता है तो यह दोष वनानि का नहीं है, नेता का है। ऐसा मानकर विज्ञान को अधिकाधिक महिमावित ही किया जा रहा है । मेरा यह मानना है कि पदाथ-वगानिक ही वनानिय नहीं हैं बल्कि राजनेता भी है जो विमार की प्टि रसरर चलने या प्रयत्न करता है। आज का समाजनेता दौर राजनेता श्रद्धा का पुरुष बनन को अपने लिए उतनी आरश्याता नहीं देखता जितना वह ममाज पा वनानिक बनना चाहता है। इस तरह यह समूची सम्यता वनानिर बनने के प्रयास में विभीषिका बन आयी है । अत स्वय विज्ञान के आय अथवा मूल वे विवेचन की आवश्यस्ता हो सकती है। विज्ञान में हम पाता होते हैं वस्तु को नैय के रूप म लत हैं। इस तरह वस्तु की लिप्सा स उसके अनुराग से, हम उत्तीण बन जात हैं। उस निधिकार और वीतराग वृति से तव पूर्वय वस्तु की यथाथता म उनपर मानो वैज्ञानिक सस्य की उपलब्धि परते चल जाते हैं । इसी म रा विमान को उनति हुई है और नय स नये आविपार हो पाये हैं । मनुष्य की समता और विभुता बड़ी है और यह प्रति या आज माना दास नहीं है, बलि स्वामी पन राका मुझे लगता है कि यह तमाम उनति और मिति अपने माप म बढी रामुलिचि रही है । सत्यता एव वास्तविकता के साथ मनुष्य का यह विभुना का सम्दय राया इप्ट ही नहीं है बचिन अनिष्ट भी है। विमान का विवाद प्रतिवाद योगी तो जितने गहरे उतरता है उतना ही अपने आगे के नेय अर्थात् अनात तत्व की अपारता ये ममम विनात और जिनामु बनता है। किंतु वम विरल बाजी को छोडकर उममानित वाजतम लाभ उठानेवाले क्षेप जन उदभ्रान्त और प्रमत्त वनों हैं, भगवान से व प हो जाते हैं और प्रकृति का विस्मय उनके लिए समाप्त हो जाता है। इस तरह मानव स्वभाव भ से उमको ए मम्मा ही लुट जाता है । वास्तिश्ता और ऋजुता नष्टप्राय होने सग जानी है। पदाथ व क्षेत्र मे वनानिक गति की यह त्रुटि एक नजर नहीं आतोतु मैन हात मानव-सम्बया के बीच म इसी नाशिक पति को उतारकर अपनी विमान बहानी म दापना और निवाना चाहा है। परिणाम जो हुदा उमो ने कहानी म रूम म गठन और व्यजन पाया है । परिणाम चौमास और विडम्बनाजनक के अतिरिकर बुध और हा नहीं सकता था। वही बीभत्स घोरता पाठ के पाम यदि पहुंचना है ता क्या का अभीप्स्य हो उममे अनायास पूरा हो जाना है। सचमुच ही उम मोपण सम्भावना का पाठ की चेतना तक में पहुचाना चाहता। जो वैवानियता को मानव सम्बो । योच म ज्यों का. स्यों उतारने के कारण छा जा सकती है। 'विमान वहानी के घी एपम किमी अपनी महान भागवादी विश्व योजना म नारी मामध्य का पूरा गयाग पर लेना चाहते हैं। इस हेतु म गरी तौर पर कोई रोप नहीं देपा जा सकता है । वहानी में वनितान उत्तीण प्रतीत होते है । नारी का नाम गरीर जहाँ नापा-तोता जा रहा है। उपर ये या पेरने को भी तयार नहीं है। उनको प्राट मे उम गरीर म तनिक यापपण नहीं है और वे सबैटरी दाग हो उम न तोर के आधिक व्यापार को पूरा करा सन हैं। उनकी अपनी निगाह यदि है ता उम गरीर को पाता योर मारपणा पर नहीं है बलि दसरे पार उम मरव ये गहरे उपयोग पर है। कारण श्री एक्स मनुष्य ही हैं, बंगानिय है । मामाय मनुष्य यो जो या तो अणि पृणा रो या नाभपूण लालमा मे भर देता १६८ विवाद प्रनियाद हैं वह वसन प्रलाभनीय उनरे लिए अविचारणीय है। उनका विचार ऊँचाई पर है मानो वे किसी आर स्वप्न म अवस्थित है। इसलिए न उह जुगुप्सा है, न घणा है । न लोम है न लिप्सा है। जपो आत्श हेतु के प्रति मानो वे सम्पूर्ण समर्पित हैं निजत्व से मवथा उत्तीण और अभिसिद्ध । उस दृश्य स जो पाठका को जुगुप्साजनक लगा है यदि हम श्री एक्स के यक्तित्व को अलग करके देख सकें तो शायद वह चरित्र महान और उदात्त और जितेन्यि योगी के रूप म दगा जा सकता हो । क्था को अतिम दो तीन पक्तियां यह निखाने लिए हैं कि यह वैनानिक -यपिन यदि इतना उत्तीण और सिद्ध सयत दिग्यायी देता है तो केवल इसलिn fr उगन अपन भीतर के विमी गूर सत्त्व का जरवीकार किया है। मानो अतर्भावना को कुचतार शू यप्राय बना लिया है। उम रात को रोमाम पहिय या कुछ कहिये ! कहानी के द्वारा यहानी म और पानी से पाहर भी मेरा आग्रह है वि विनान क जार से उम स्वप्न सत्य अथवा सत्य को पूना या छोडना नही होगा बलिल उमवा अविकत स्वीकार करना होगा। मायथा मानव विभु य वजाप दस्यु और देवता के रजाय दानव ही बन सकेगा दूसरा कोई परिणाम नही आयगा। दूसरे ग म आम्तिम श्रद्धा अभाव में विमान अश्रेयस्वर परिणाम ही ला सकता है। इसलिए कहानी न जितनी जुगुप्सा और पृणा पता की है उत्ताही एक तरह स मुझे सतोप प्राप्त हुना है। क्योकि उसमे जाने अनजान मर अभिप्राय की गमीष्ट सिद्धि ही हुई है। मुझे दुख है कि कहानी के अपने अतरग मन्तव्य व बारे म मुझे ये वन यहन पडे है । वह सब पाठप को भार स आविष्मरणीय रहने देना चाहिए पा, मेरे द्वारा वह आरापित नही होना चाहिए था। फिर भी पह परना पड़ा है इगो लिए मैं आपना और मापके पाठ की क्षमा का प्रार्थी हूँ । -जन कुमार

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Kahani Anubhav Aur Shilap

Author
Kumar,jainendar
Title
Kahani Anubhav Aur Shilap
File name
Kahani Anubhav Aur Shilap
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2010/12
Publisher
Delhi,purvoday Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
162
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
515033
Barcode
4990010022693.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
5TDKW7EONvs
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