Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Ramya Raas
Front matter
-
M
चक्रधर ग्रन्यमाला-बारहवा पुष्प
AN
रम्य रास
है
लेखक
काव्य कानन, मायाचक्र, रनहार, जोशे फरहत
आदि के रचयिता
रायगढ़-नरेश श्रीमान् राजा चक्रधर सिह
प्रकाशक
साहित्य-समिति, रायगढ़
सितम्बर, १९३४
प्रथम चार २०००
{मूल्य साधारण म०१५
सर्स कालीचरण त्रिवेदी ऐण्ड कम्पनी मिण्टर और पब्लिशर
के लिये
गिरिजा प्रसाद श्रीवास्तव ने
हिन्दी साहित्य प्रेस, प्रयाग मे छापा
तथा
साहित्य-समिति, रायगढ ने
प्रकाशित किया ।
प्राक्-कथन सम्पूर्ण पुराणो मे श्रीमद्भागवत पुराण सर्व श्रेष्ठ है क्योंकि वह 'निगम कल्पतरु' का 'गलित फल' समझा जाता है और काव्य तथा कथा रसिक भावुक सज्जनो के लिये मुक्ति पर्यन्त लोकोत्तर आनन्द देने वाला कहा जाता है। भागवत का सार है दशम स्कन्ध, जिसमे आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रजी का चरितामृत भरा है। दृध मे मस्सन के समान उस स्कन्ध मे भी सर्व श्रेष्ठ वस्तु है रास पञ्चाभ्यायो । इन पॉच अध्यायो मे वृन्दावन वल्लभ के रम्य रास का रसपूर्ण वर्णन है । उस वर्णन का सार इस प्रकार है - शरत्पूर्णिमा की रात्रि थी। वृन्दावन मे चारों ओर कुमुदिनीनायक की कोमल किरणे विरपरी हुई थी। भगवान ने यह देसा ओर योग माया का आश्रय लेकर मधुर मुरली का कलवादन किया । अनङ्ग वर्धक उस गीत को सुन कर ब्रज-स्त्रियाँ पापे मे न रही। वे गृहस्थी के काम काज भूल गई । बनाव शृगार भी भूल गई । जो जैसी थी वैसी ही उठ कर श्रीकृष्ण की ओर दौड पड़ी। कुछ लोगो ने उन्हे रोका भी परन्तु वे किसकी सुनने चली थीं । प्रस्थान के लिए जिन्होने अपने को श्रम- मर्थ पाया उन्होंने ध्यानावस्थित होकर एक दम महाप्रस्थान ही कर दिया और इस प्रकार सूक्ष्म शरीर से वहाँ पहुँच गई। भगवान ने उन्हें देखा और बोले, "अहा | आइए म्वागत है। कहिए, ब्रज की कुशल कहिए । अपने आने का कारण कहिए । यह भयङ्कर रात और यह गहन वन जहाँ जगली जानवर भरे पडे हैं । यहाँ आप लोग क्यों आगई ? आपके बन्धु बान्धव आपकी सोज कर रहे हैं। क्या प्राकृतिक शोभा देसनी थी ? अच्छा तो वह देख लिया अब वापस लौट जाइए । कही ऐसा तो नही है कि आप लोग मेरे स्नेह के कारण यहाँ चली आई हैं ? यदि यही बात है तो में बता देना चाहता हूँ कि पियों के लिए निष्कपट भाव से पति-सेवा ही प्रधान धर्म है। कुल-स्त्रियों के लिए प्रोपपत्य से बढ कर और अधर्म नहीं । श्राप लोग यदि मेरी भक्ति ही करना चाहती हैं तो श्रवण, दर्शन, ध्यान और कीर्तन के रास्ते खुले हैं। समीप रहना ही आवश्यक नहीं । इस लिए आप लोग अब कृपा पूर्वक लौट जाइए।" गोपियों ने यह सुना। मानों उन्हे काठ मार गया । वे दुम मे बिलविला उठी । बडे ही करुण स्वर में उन्होने कहा, "भगवन । ऐसा न कहो । हमारे पति पुत्र आदि में तुम्ही तो निवास करते हो। फिर जब सब विषयों को छोड हम तुम्हारे चरणो मे शरण पाने आई हैं तो हमे अब क्यों हटाते हो । वशी बजा कर तुमने जो आग हम लोगो के हृदय में लगाई है उसे अपने ही मधुर अधरामृत से शान्त करो और हमें अपना दास्य दो । हे सुरलोकगोप्ता । हे आर्तवन्धो । हम दासियों के वक्ष स्थल और मिर पर अपना वरद कर-पङ्ज रक्खो। यदि हमें आग्रह पूर्वक हटाओगे ही तो हम यही अपने प्राण छोड देंगी।" भगवान को झुकना पडा । वे मान गए और गोपियों समेत यमुना पुलिन की ओर अग्रमर हुए। वहाँ सम्प्रयोग शृगार का प्रारम्भ हुवा। गोपियों ने मानो सदेह वर्ग छू लिया। उनकी . पार कर गई। ससार म उनके समान और कोन भाग्यशाली था । उनका यह सौभाग्य- भगवान को बिलकुल न रुचा। उनके कल्याण की इच्छा से भगवान एकदम अन्तर्धान पियाँ अधीर हो उठी। वे विक्षिप्त मी हो इधर उधर श्रीकृष्ण को ढूंढने लगी। कहीं ज लताओ ही से पूछना शुरू कर दिया । बट, पीपल, कुरवक, अशोक, तुलसी, मालती, ती, यूयिका इत्यादि सभी मे पूछ डाला परतु कही पता न लगा। इस प्रकार कातर होकर वे कृष्णात्मिका बन गई और फिर उसी भावना मे भर उठने के कारण बला का अनुकरण करने लगी। पूतना चरित, शकट चरित, गोवर्धन चरित, कालीनाग द सभी चरितो का याचरण किया जाने लगा। व इस तरह तन्मयता पुष्ट हुई तब भगवान के पद-चिह्न सामने दिखाई पडने लगे। और पहिचाना। साथ ही उन्होने यह भी देखा कि उन चिह्नों के साथ ही साथ किसी पद-चिह पड़े हुए हैं। वे आगे बढी। पद-चिह्नो के निरीक्षण से उन्हे विदित हुआ पी के साथ भगवान् ने अनेक प्रकार की शृगार कलाये की थी। कुछ देर बाद वह ती बिलखती उन्हे मिल गई। वात यह थी कि विशेष सम्मान पाकर जब उमे आया और उसने बडी शान में कहा, "देखो जी, मैं पैदल नहीं चल सकती। मुझे तो लाद कर ले चला ।" तब भगवान ने कन्धे झुका कर कहा, "आइए, तशरीफ । और तुरत अदृश्य हो गए। बस, अब सव की सब फिर यमुना किनारे पहुँची क्योकि उन्हे अब ध्यान तक न पाता था। वहाँ जाकर उन्होने भगवान् की स्तुति करना प्रारम्भ किया। वे बोली, "भगवन । हम इस प्रकार मार कर तुम्हे क्या मिलेगा ? तुम तो जगन्मङ्गलकारी हो ओर तुम्हीने हमार यह प्रेम भाव उत्पन्न किया है। फिर इस समय हमे यहाँ इस प्रकार छोड जाना क्या ना देता है ? तुम जब गोचारण के लिये जाते हो तब भी हम व्यथा-व्यथित हो जाती जब जब इस प्रकार इस कर्कश अवनी पर भटक रहे हो तब, सोचो, हमारी क्या अवस्था गी। भगवन , क्यो नही इमका ध्यान करते ? क्यो नहीं श्राकर दर्शन दने ?" गोपियों र कह कह कर सूब रोने लगी। भगवान श्रासिर मुस्कुराते हुए प्रकट हुए । सहमा मब मुमर्पु गोपियो में प्राण से चे एकदम उठकर उनमें जा चिपटी। किमी ने हाथ पकडा किसी ने पैर । किसी न अगाश्लप ई दूर ही में ध्यानावस्थित हो गई। सब के ताप दूर हो गए। सभी ने मानो मन चाही न की। भगवान उन सब को लेकर मनोन पुलिन पर पहुंचे। वहाँ गापियों ने अपनी आडियों विधा दी और उन पर भगवान को पधरा कर पछा, "प्रभो । उता ऐम है जे. प्रतिफल मे अनुरक्ति दिखाते हैं, कुछ ऐसे हैं जो विरक्ति के प्रतिफल में अनुरत्ति हैं और कुछ ऐसे हैं जो दोनों के बदल रिक्ति ही दिग्याने । यह क्या बात है ?" भगवान इस रम्य समग गा । फिर भी मगझाते हुए उन्होंन कहा "प्रिय गोपिकाया जा भक्ति ही प- ३ - अनुरक्ति दिसाय वे स्वार्थी है और जो विरक्ति पर भी अनुरक्ति अथवा भक्ति दिसावे वे निस्वार्थ स्नेही माता पिता के समान सच्चे सुहृद हैं। जो भक्ति के प्रतिफल मे भी विरक्ति दिसाते है वे या तो उच्चातिउच्च आत्माराम प्राप्तकाम हैं या नीचातिनीच अकृतज गुरु-द्रोही हैं। मैं जो भक्तो के प्रति विरक्ति सी दिखाया करता हूँ वह केवल उनकी भाव-पुष्टि के लिए । तुम्हारे साथ भी मैंने वही किया है । तुम्हे चिन्न न होना चाहिए क्योंकि वास्तव मे तो मै तुम्हें कभी भूल ही नहीं सकता । जिस माहम के माय तुमन लोक रीति की दुर्जर शृग्वला को तोडा है वह क्या सामान्य बात है ? गोपियाँ यह सुन कर परम सन्तुष्ट होगई। इसके बाद फिर राम-मण्डल सम्प्रवृत्त हुआ। योगेश्वर भगवान ने अनेक रूप धारण कर लिए और इस प्रकार मिथुनी भूत गोपीकृष्ण रम्य रास- क्रीडा मे विभोर होगा वलय,नपुर, किकिणी आदि की मधुर ध्वनि तथा भाँतिभाँति के पदन्यास भुजवि- क्षेप ध्र भङ्ग कटि सचार श्रादि से वह रास और भी अधिक कान्त बन गया। भगवान के स्वर मे स्वर मिला कर गोपियों ने वह सङ्गीत लहरी प्रवाहित की जिससे समग्र ससार भर उठा । आकाश से सपत्नीक देवगण पुष्प वृष्टियाँ करने लगे। देवागनाएँ गोपियों मे डाह सा करने लगी । गोपियों ने इस समय मनमाने आनन्द का उपभोग किया। अङ्ग सञ्चालन से थक कर कोई पार्श्वस्थ कृष्ण के कों पर टिक रही, कोई उनके कर-कम अपने वक्ष स्थल पर लेकर तृप्त होगई, किमी ने उनके मुस के साथ अपना मुस जुटा दिया। स्थल विहार में यक जाने पर जल विहार शुरू हुआ। वहाँ भगवान ने मत्त गजराज के समान सानन्द विहार किया। और इस प्रकार शरत्कालीन सयोग शृगार के जितने अङ्ग उपाङ्ग हैं सब का पूरा पूरा सुरम चनाया। भगवान आत्माराम थे-योगेश्वर ये-प्रात्मरत थे। उन्होंने "आत्मन्यवरुद्व सौरत" होकर ही शृगार प्रदर्शन किया था। इसलिए वह क्रोडा ठीक उसी प्रकार थी जिस प्रकार चालक दर्पणो पर पडे हुए अपने प्रतिबिम्बों के साथ क्रीडा किया करता है । वह रात्रि ब्रह्मा की रात्रि हो गई। निसर्ग आनन्द-मग्न होकर निश्चल हो गया था। फिर रात ढले कैसे ? सैर, जब परमात्मा की इच्छा हुई तब रास समाप्त हुआ ओर गोपियों को अनिच्छा पूर्वक घर जाना पड़ा । वहाँ भगवान की माया से गोप लोग यही देख रहे थे कि उनकी गोपियाँ तो उन्ही के पाम हैं। इसलिए यह रहस्य किसी ने जाना किसी ने जाना ही नहीं । यह वह रहस्य हे जिमे श्रद्धा के साथ कहना सुनना चाहिए। क्योकि ऐसा करने मे वीर मनुष्य शीन ही अपना हृद्रोग दर कर पराभक्ति प्राप्त कर लेता है। कथा तो इतनी ही है परन्तु इमी कया के भीतर शुकदेव स्वामी ने दो जनग्दस्त शकाओं का समाधान भी कर दिया है। पहली शमा तो गोपियो के मम्बन्ध की है और दमरी कृष्ण के सम्बन्ध की । गजा परीक्षित की ओर से ये शकाएँ उठवा कर शुकदेव स्वामी ने इनका उत्तर बडे उत्तम प्रकार मे दिया है। कई गोपियों श्रीकृष्ण को ब्रा भार से न देयकर कान्त भाव ही मे तो देख रही थी और सामान्य औपपत्य की भावना ही से तो उनके पास आई थी फिर उनका भी कल्याण कैसे हो गया। इसके उत्तर मे शुरदेव स्वामी ने कहा है कि वह श्रोपपत्य भी प्रेम भाव के कारण भगतान मे तन्मयता प्राप्ति का सहायक ही हुआ। मोक्ष का माधन हे ईश्वर-तन्मयता और ? साधन वही श्रेष्ठ है जो अपने को रुचे। उसके लिए विधि-निषेध के बन्धन में बँधा पानी नही। जब द्वेप भावना से ही शिशुपाल आदि कृपण-तन्मयता प्राप्त करके मुक्त होग प भावना से कृष्ण तन्मयता प्राप्त करके गोपियाँ क्यों न मुक्त होंगी? यह तो हुआ पहली माधान । दूसरो शका में यह कहा गया कि जब ईश्वर ने धर्म सस्थापन के लिए अवतार स प्रोपपत्य को प्रश्रय ही क्यों दिया ? इस का उत्तर यह है कि ईश्वर के कृत्य सामान्य विवि-निषेध की कसौटी पर नही कसे जा सकते । ईश्वर का विभुत्ल तो यही बताता है गोपियो के पतियो के अन्तरात्मा थे। इस विचार से गोपियाँ उन्ही की स्त्रियाँ हुई। फिर गोपियों का औपपत्य किस प्रकार माना जा सकेगा। इन दोनो शकाओ मे यह तो निश्चित रूप से मान ही लिया गया है कि श्रीकृष्ण जी मात्मा के पूर्ण अवतार थे । इतना मान कर ही ये शवार उठाई गई हैं। आधुनिक समय ही पूछने लगेगे कि हम कृष्ण को भगवान ही कैसे मान ले ? इसके उत्तर में तो कई पृष्ठ वाहिजिसके लिए न तो यहाँ स्थान ही है और न समय। फिर भी मक्षेप मे यह कहा जा कि जो सामान्य शरद्रात्रि को ब्रह्म रात्रि (एक हजार चतुर्युगियों वाला समय ) बना सकते ग माया से गोपियाँ बना कर गोपो के पास रस सकते हैं, जिन की क्रीडा देखने के लिए विमानो पर बैठ कर आसकते हैं और पुष्प बरसा सकते है उन्हें हम ईश्वर अथवा परमात्मा ने ? यदि यह कहा जाय कि ये सब बाते झूठ है तो फिर समझ लीजिए कि सम्पूर्ण गस है क्योकि पासिर जिन ग्रन्थों मे रास का जिक्र है उन्ही में, उसी गस के साथ, इन बातो की । फिर क्या कारण है कि हम एक अश को सत्य और दूसरे को मिथ्या मान ले ? । पैमाने से ईश्वर को नापने का हमे कोई अधिकार नहीं। राम पञ्चाव्यायी कोई इतिहास प्रधान ग्रन्थ नहीं है। वह तो भावुको की सामग्री है। पग्री मे काव्यकला की दृष्टि से भी पर्याप्त महत्व भरा है। पहली बात तो यह है कि गार रस का अच्छा परिपाक हुआ है और शृङ्गार साहित्य के प्राय सभी प्रधान अग मॉति व्यक्त कर दिए गए हैं। दूसरी बात यह है कि इस कथा के बहाने भक्तिरस पूरा पूरा और सुन्दर विवेचन कर दिया गया है। तीसरी बात यह है कि समाधि भाषा त होने के कारण इसके आविभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक आदि सभी तरह के अर्थ हो हैं। पद-लालित्य देखिए, काव्यालङ्कार देखिए, अर्थ-गौरव देखिए, मनोभाव विश्लेषण देग्विार , अङ्ग तो भरपूर हैं । इतना होते हुए भी उसमे रास का वह अनुपम ओर अपूर्व मन्देश है जिसने ज्वाध्यायी को अमर बना दिया है। पश्व में जिधर देखिए राम ही तो हो रहा है । प्राधिभौतिक जगत मे इतिहास प्रमिद्व रास की छोड देने पर भी हम देखते हैं कि सूर्य, चन्द्र, तारे, मंघ, समुद्र आदि सव राम ही कर रहे हैं। का सगीत भाग्यवान ही सुनते हैं-चर्म श्रुतियों से नहीं वरन् भाव श्रुतियों अथवा मानस गो से । जहाँ सुव्यवस्थित स्थिति गति है वहीं रास है। अरियल ब्रह्माण्ड सुव्यवस्था पूर्ण स्थिति मे ओत-प्रोत है। इसलिए समय ससार रासमय है। आधिदैविक जगत मे चैतन्य सत्ता और उसकी .
1 . , शक्तियाँ अपनी सुव्यवस्थित स्थिति गति कर रही है। मक्रम और प्रतिसक्रम को अथवा विकास और हास को हम भगवान का रास तथा उनका प्रादुर्भाव और तिरोभाव न कहे तो क्या कहे ? आध्यात्मिक जगत् मे सहस्रदल कमल वृन्दावन है जहाँ भगवान स्थित है । कुण्डलिनी को हम रावा कह सकते हैं अन्य नाडियाँ ब्रजनारियाँ हैं। अथवा यों कहिए कि जीवात्मा राधा है और परमात्मा कृष्ण । इन दोनो की शेष सब शक्तियाँ अन्य गोपियाँ हैं । ऐसे अद्भुत रास का रहस्य सोलना रास पञ्चाध्यायी का ही काम है । इसीलिए वह अमर काव्य है और उसका वर्ण्य विषय एक अमर सन्देश है । भगवान सच्चिदानन्द हैं- सत्य, शिव, सुन्दर हैं। उनका सचिद्भाव अथवा सत्यत्व और शिवत्व तो अनेक प्रकार से वर्णित हुआ है परतु आनन्द भाव अथवा सुन्दरत्व यदि कही भली भाँति व्यक्त किया जा सका है तो वह इसी रास मे। शायद इसीलिए इसी रास के कारण भगवान श्रीकृष्ण अशावतार न कहे जाकर पूर्णावतार माने जाते हैं। भागवत की इस कथा के अनुकरण पर अन्य ग्रन्था में भी रास का उल्लस हुया है। देवी भागवत, ब्रह्मवैवर्त पुराण, गर्गसहिता, विष्णु पुराण, वासुदेव रहस्य आदि ग्रन्थों में भी इसका जिक्र है । भाषा मे सूरदास, नन्ददाम, ब्रजवासीदास श्रादि मज्जनो ने रास पर अपनी कलम उठाई है और बहुत कुछ लिसा है। कई अन्या मे तो रास का वर्णन रास पञ्चाध्यायी से भी बहुत अधिक विस्तृत रूप में किया गया है। परंतु इतना होते हुए भी पञ्चाध्यायी अव तक अनूठी है और कोई काव्य अव तक उमका मुकाबिला नहीं कर सका है। दूसरे काव्यों की श्रोर इसीलिए ध्यान न देकर मैने राम पञ्चाध्यायी ही को अपना आदर्श चुना है। मैने देखा कि हिन्दी के अनेक कवियो ने रास को बहुत विकृत रूप द रक्सा है और उसे केवल पार्थिव शृगार का एक उच्छ्वास मात्र बताया है। संस्कृत के प्राचार्य लोग रास पञ्चा- ध्यायी का असली रहस्य प्रकट करने में कुछ उदामीन से दिसे। इसलिए यह प्रावश्यक जान पड़ा कि में अपनी अत्प मति के अनुसार इस महत्वपूर्ण विषय का वास्तविक रूप हिन्दी प्रेमियों के सम्मुस रखने की चेष्टा करूं । इमी प्रेरणा के परिणाम स्वरूप ये छन्द पाठकों की भेट किण जा रहे हैं । यदि पाठको को इन छन्दों में कुछ काव्यत्व मिला तो ठीक ही है अन्यथा में मममँगा कि इसी बहाने भगत चर्चा हो गई। "रम्य रास" पञ्चाध्यायी का शाब्दिक अनुवाद नहीं है । यह उमका म्वनन अनुवार भी नही है। उसे पढकर मन में जो भावना आई सो इन छन्दो मे क्रमबद्ध कर दी गई है। इसीलिए कई स्थला में शब्दानुवाद और भावानुवाद विमान रहते हुए भी 'प्रनेर स्थल में मिलेंगे जा पञ्चाध्यायी से सर्वथा विभिन्न भी होंगे। कथा प्रमग में परिवर्तन-प्राप्त मुग्य स्थल ये हैं ---(१) गम म केवल येगी गोपियाँ पाई जो कात्यायनी व्रत में श्रीकृष्ण को पतिभाव से वर चुकी थी ओर जिनरे टमी भाव रा पुष्ट करने के लिए भगवान ने चीर हरण लीला की थी। न इन्हें किसी ने गेका 'गोर नई हताश मरी ही। (२) श्री राधिका जी का दाम्पत्य विलास जग अधिक स्पष्ट रूप में, चिहानुग गोपियों । , तन्मयता का साधन वही श्रेष्ठ है जो अपने को रुचे। उसके लिए विधि-निषेध के पन्धन में बँधा रहना बुद्धिमानी नहीं । जव द्वेष भावना से ही शिशुपाल आदि कृष्ण तन्मयता प्राप्त करके मुक्त होगए तन औपपत्य भावना से कृष्ण तन्मयता प्राप्त करके गोपियाँ क्यों न मुक्त होंगी? यह तो हुआ पहली शका का समाधान । दूसरी शका में यह कहा गया कि जब ईश्वर ने धर्म सस्थापन के लिए अवतार लिया तो इस औपपत्य को प्रश्रय ही क्यों दिया? इम का उत्तर यह है कि ईश्वर के कृत्य सामान्य मनुग्यो की विधि निषेध की कसौटी पर नही कसे जा सकते । ईश्वर का विभुत्व तो यही बताता है कि वे ही गोपियो के पतियों के अन्तरात्मा थे। इस विचार से गोपियाँ उन्ही की स्त्रियाँ हुई। फिर उनके साथ गोपियों का औपपत्य किस प्रकार माना जा सकेगा ? इन दानो शकाओं में यह तो निश्चित रूप में मान ही लिया गया है कि श्रीकृष्ण जी परब्रह्म परमात्मा के पूर्ण अवतार थे। इतना मान कर ही ये शङ्का उठाई गई हैं। आधुनिक समय मे लोग यही पृछने लगेगे कि हम कृष्ण को भगवान ही कैसे मान ले ? इसके उत्तर में तो कई पृष्ठ रगे जाने चाहिएं जिसके लिए न तो यहाँ स्थान ही है और न ममय। फिर भी सक्षेप मे यह कहा जा सकता है कि जो मामान्य शरद्रात्रि का ब्रह्म रात्रि (एक हजार चतुर्युगिया वाला समय) वना मकते हैं, जो योग माया से गोपियाँ बना कर गोपो के पास रस सकते हैं, जिन की क्रीडा देखने के लिए देव गण विमानो पर बैठ कर प्रासकते हैं और पुष्प वरमा सकते हैं उन्हे हम ईश्वर अथवा परमात्मा म्यो न माने ? यदि यह कहा जाय कि ये सब बाते झूठ है तो फिर समझ लीजिए कि सम्पूर्ण रास ही झूठ है क्योंकि पाविर जिन ग्रन्थों में रास का जिक्र है उन्ही में, उसी गम के साथ, इन बातो की भी चर्चा है । फिर क्या कारण है कि हम एक अंश को सत्य और दूसरे को मिया मान ले ? मनुष्य के पैमाने से ईश्वर का नापने का हमे कोई अधिकार नहीं। रास पञ्चाध्यायी कोई इतिहास प्रधान अन्य नहीं है। वह तो भावुकों की सामग्री है । इस सामग्री मे काव्यकला की दृष्टि से भी पर्याप्त महत्व भरा है। पहली बात तो यह है कि इसमें शृगार रस का अच्छा परिपाक हुआ है और शृङ्गार साहित्य के प्राय सभी प्रधान अग भली भाँति व्यक्त कर दिए गए हैं। दूसरी बात यह है कि इस कथा के बहाने भक्तिरस का भी पृग पुरा ओर सुन्दर विवेचन कर दिया गया है। तीसरी बात यह है कि समाधि भाषा मे रचित होने के कारण इसके प्राधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक श्रादि सभी तरह के अर्थ हो मकते हैं । पद-लालित्य देग्गिए, काव्यालवार देखिए, अर्थ गौरव देखिए, मनाभाव विश्लेपण देखिए, सभी अग तो भरपूर हैं। इतना होते हुए भी उममे राम का वह अनुपम ओर अपूर्व मन्देश है जिमने राम पञ्चाध्यायी को अमर बना दिया है। विश्व मे जिधर देग्मिा गस ही तो हो रहा है। आधिभौतिक जगत में इतिहास प्रसिद्ध रास की बात छोड देने पर भी हम देखते हैं कि सूर्य, चन्द्र, तारे, मेघ, समुद्र प्रादि सब रास ही कर रहे हैं। नक्षत्रों का संगीत भाग्यवान ही सुनते हैं-चर्म अतियों में नहीं वग्न भाव श्रुतियो अथवा मानस श्रुतियों से । जहाँ सुव्यवस्थित स्थिति गति है वहीं राम है। प्रसिल ब्रह्माण्ड सुव्यवस्था पूर्ण स्थिति गति मे श्रोत-प्रोत है । इसलिए समप्र समार राममय है। आधिदैविक जगत में चैतन्य सत्ता और उसकी शक्तियाँ अपनी सुव्यवस्थित स्थिति गति कर रही हैं । सक्रम और प्रतिसक्रम को अथवा विकास और हास को हम भगवान का रास तथा उनका प्रादुर्भाव और तिरोभाव न कहें तो क्या कहे ? आध्यात्मिक जगत् मे सहस्रदल कमल वृन्दावन हे जहाँ भगवान स्थित हैं । कुण्डलिनी को हम राबा कह सकते हैं । अन्य नाडियाँ ब्रजनारियाँ हैं। अथवा यो कहिए कि जीवात्मा राधा हे और परमात्मा कृष्ण । इन दोनों की शेप मा शक्तियाँ अन्य गोपियाँ हैं । ऐमे अद्भुत रास का रहस्य सोलना रास पञ्चाध्यायी का ही काम है। इसीलिए वह अमर काव्य है और उसका वर्ण्य विषय एक अमर मन्देश है। भगवान् सञ्चिदानन्द हैं-सत्य, शिन, सुन्दर हैं। उनका मगिद्भाव अथवा सत्यत्व और शिवत्व तो अनेक प्रकार में वर्णित हुआ है परतु आनन्द भाव अथवा सुन्दगल यदि कही भली भाँति व्यक्त किया जा सका है तो वह इमी रास मे। शायद इमीलिए इसी रास के कारण भगवान श्रीकृष्ण अशावतार न कहे जाकर पूर्णवतार माने जाते हैं। भागवत की इस कथा के अनुकरण पर अन्य प्रन्या में भी रास का उल्लेस हुआ है । देवी भागवत, ब्रह्मवैवर्त पुराण, गर्गसहिता, विष्णु पुराण, वासुदव रहस्य आदि ग्रन्थों में भी इसका जिक्र है । भाषा में सूरदास, नन्ददास, ब्रजवासीदास आदि सज्जनों ने रास पर अपनी कलम उठाई है और बहुत कुछ लिसा है। कई अन्यों मे तो रास का वर्णन रास पञ्चाध्यायी से भी बहुत अधिक विस्तृत रूप में किया गया है। परतु इतना होते हुए भी पञ्चाध्यायी अब तक अनूठी है ओर कोई काव्य अव ता उमका मुकाविला नहीं कर है। दूसरे काव्यों की ओर इसीलिए ध्यान न देकर मैने रास पञ्चाध्यारी ही को अपना आदर्श चुना है। मैने देखा कि हिन्दी के अनेक कविया ने रास का बहुत विरत रूप उसे केवल पार्थिव शृगार का एक उच्छ्वास मान बताया है। संस्कृत के प्राचार्य लोग राम पञ्चा ध्यायी का अमली रहस्य प्रकट करने में कुछ उदामीन से दिये। इसलिए यह आवश्यक जान पडा कि अपनी अत्प मति के अनुमार इस महत्वपूर्ण विषय का वास्तविक रूप हिन्दी प्रेमियों के सम्मुख रसने सी चोटा करू । इसी प्रेरणा के परिणाम स्वरूप ये छन् पाठको की भेट किए जा रहे हैं। यदि पाठको को इन छन्दो मे कुछ काव्यत्व मिला तो ठीक ही है अन्यथा म मममगा कि इसी यहाो भगवत चर्चा हो गई। "रभ्य राम" पञ्चाध्यायी का शाब्दिर अनुवाद नहीं है । यह उसरा म्वतंत्र अनुवाद भी नहीं है । उम पढकर मन में जो भावनाएँ आई सो इा छन्दो में क्रमबद्ध कर दी गई हैं। इसीलिए कई स्थला मे शब्दानुवाद ओर भावानुवाद नियमान रहते हुए भी 'अनेक स्थल मे मिलेंगे जा पञ्चाध्यायी से मर्वथा विभिन्न भी होंगे। क्था प्रसङ्ग में परिवर्तन प्राप्त मुग्व्य स्थल ये ई -(१) राम मे केवल वही गोपियाँ आई जो कात्यायनी व्रत में श्रीकृष्ण को पतिभाव से वर चुकी थीं और जिनके इमी भाव को पुष्ट परो के लिए भगवान ने चीर हरण लीला की थी। न इन्हें किसी ने रोका और न कोई हताश हो मरीही। (०) श्री राधिता जी का दाम्पत्य विलास जरा अधिक स्पष्ट रूप में, विरहातुरा गोपियो सका रस्सा है और w r के वर्णन के माय ही, लिप दिया गया है। उस वर्णन में मम्भर है "नीवि मोन" जैसे शब्द पढकर पाठक चौंक पडे और 'श्रश्लील । अश्लील " पुकार उठे । उन से निवेदन है कि शृगार पक्ष में 7 अगरुक बने हुए जगदगुरु शकराचार्य के "मदकल-मदिराक्षी नीवि मोती हि मोक्ष मश पद तथा भक्ति पक्ष में माधु स्वामी गमतीर्थ के "हो जा नगी बुर का जामा और बन्न तक दे उतार | देस ले फिर एक दम में किस तरह मिलता है यार ।” महश शेर स्मरण कर ले। यति भाव उन्च हैं तो केवल एमे शन अश्लीलता गोतक कदापि नहीं हो सकते । (३) ब्रजेश सन्तुति अथवा गोपी गीत मे मौकुमार्य ओर माधुर्य के बदले नैन्य भार ही की विशेष अभिव्यक्ति हुई है । (४) गोपगणो ने गोपियों को अपने ही पाम देसा अथवा नही इस पर वाणी मौन है । क्योंकि यदि गोपों ने उन्हें रोका ही नहीं तो उन्हें गोपिया को अपने पाम देसने की थावश्यकता भी न थी। (५) अन्त में श्रद्धा और माहात्म्य सूचक वाक्य के बनते प्रश्न सूचक "कहाँ ? कहकर ऐतिहासिक स्थूल राम के प्रभाव और दिव्य सूक्ष्म रास के मर्वतोभार की ओर काव्यमय ढङ्ग से सात किया गया ये परिवर्तन अन्छे हा है या बुरे इसका निर्णय तो मैं पाठको पर ही छोडता है। परतु यहाँ इतना अवश्य लिग्न देना चाहता हूँ कि मैंने जान बूझ कर ये परिवर्तन नहीं किये । भावो की उमङ्ग में ये श्रापही श्राप हो गए। यदि श्रन्छे बन पडे हो तो भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा है। यदि चुरे हुए हो तो मेरा दोष । गम पञ्चाध्यायी मे राधा का स्पष्ट नामोल्लेख नही हुआ है। कई लोग इमका कारण यह समझते हैं कि शुकदेव स्वामी भक्तिपक्ष में श्रीराधिकारानी को अपना गुरु मानते थे और गुरु का नाम रोना शिप्यो के लिए अनुचित है। इसीलिए उन्होने उस विशिष्ट गोपी के लिए, जो श्रीकृष्ण के माथ अन्तर्धान हुई थी, "अनयारावितोनून भगवान् हरिरीश्वर" कह कर इशारे में बता दिया है कि ये ही गधा थी। जो कुछ भी हो । परन्तु दूसरे अन्यों के देखने मे यह स्पष्ट हो जाता है कि वे ही राया थी। वे दूसरी गोपियों से श्रेष्ठ तो थी ही परन्तु साथ ही देवी-भागवत, ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि मे उन्हे सवश्रेष्ठ शक्ति, परमात्मा का वाम भाग, उमा, रमा, ब्रह्माणी में भी उत्तम बताया गया है । वे ही राम मण्डल की अधीश्वरी कही गई हैं। इसलिए उनका स्पष्ट नामोल्लेग्य करके उनके सम्प्रयोग गार को जरा विस्तार के साथ लिस ना किसी प्रकार अनुचित नही हुआ ऐसा कहा जा सकता है। यद्यपि गस की प्राय सव गोपियों ने श्रीकृष्ण की कान्तभावना से उपामना की थी परन्तु फिर भी धर्म सस्थापफ भगवान श्रीकृष्ण ने केवल राधाजी ही के साथ वास्तविक दाम्पत्य दिग्वाया है। ये राधा स्वसीया थी कि परकीया इम विषय पर भी बहुत याद विवाद चला है। कुछ लोगो का कहना है कि राधाजी अतिमन्युक नामक किसी नपुमक गोप की पत्नी थी और श्रीकृष्ण की भोर वे परकीया का सा प्रेम रसती थी । परन्तु ब्रहावर्त पुराण और गर्गमहिता आदि मे श्रीकृष्ण के साथ उनके माङ्गोपाङ्ग विवाह का वर्णन है । इसलिए वे निस्सन्देह स्वकीया ही कही जा सकती है। जो लोग इन्हे परकीया मानते हैं वे केवल कल्पना के माधुर्य के लिए । बात यह है कि स्वकीया की अपेक्षा प्रसर परकीया मे प्रेमामक्ति प्रवल रहती है। क्योंकि इमी प्रेमामक्ति के - - - -- पर- कारण तो वह लोफमर्यादा श्रोर धर्मवन्धन को काट फेंकने की हिम्मत कर जाती है। जो इस प्रकार लोकनाट होकर प्रेमामक्ति दिया वह उम अश में अवश्य अनुकरणीय है। राधाजी को परफीया मानने का एक और भी कारण है। जग कृष्ण, रुक्मिणी और राधा के नामों पर यान दीजिए । कृष्ण का अर्थ है श्राकर्षणकारी । रुक्मिणी का अर्थ है सुवर्णमयी- लक्ष्मी सपत्ति । गया अर्थ है आराधना---भक्ति । परमात्मा परम आम्र्पणकारी है क्योकि ससार उनकी और मिंचता है। परन्तु उन्ही की सुवर्णमयी माया अपनी मनोमानी रोचकता के कारण शिशुपाल मरीये प्रगल धीरा का भी मन अपनी ही पार गींच रसती है। इतना होते हुए भी उस माया पर किसी का बामित्व नहीं होने पाता । हठात् भगवान उसका अपहरण कर लिया करते हैं। इधर रामा अथवा भक्ति तो भक्तो ही की वस्तु ठहरी-- उन्हीं के हृदयों म मन वाली चीज ठहरी। फिर भी वह अपना तानगम्य भगनान ही स चाहती है न कि मानन हदयो मे । भगवाल को भी माया की अपना भक्ति निश्चय अधिक प्यारी है। इमी लिए स्वकीया रुक्मिणी के पति हात हुए भी ये कोया रामा के साथ अपना नाम जुडा रसना पसन्द करने है । रुक्मिणीकृष्ण न कहलाकर गधाकृष्ण कहलाने का यही रहम्य है। भगवान के माय भक्ति का ( राम का ) जिस प्रकार अभिन्न नादात्म्य हो मरुना है उम प्रसार माया अथवा लक्ष्मी का (रुम्मिणी का) कदापि नही । अन्य गोपियों को यदि हम चाहें तो मानन हृदय की अन्य भारनार-दया, नमा, उदारता श्रादि मान सकते हैं । समग्र राम मण्डल इस प्रकार हदयस्थ अन्तर्यामी के प्रति बढी हुई समग्र भावनाओं का लीलाक्षेत्र बन जाता है । यदि हम चाहे तो राममण्डल को मोक्ष माम मान कर गोपिया को मुमुनु के रूप में दस मकने हैं। ईश्वरीय प्रेरणा मे वे मोक्षधाम के लिए अग्रसर होती हैं और स्वय भगवान की मायामयी गातो चक्कर में भी न पाकर अभीष्टसिद्धि प्राप्त कर ही लेती है । जन पूर्व वासनाओं के कारण असार-सकीर्ण व्यक्तित्व--- की भावना मे पड कर रे सब कुछ यो देती हैं तर वियाग नाला म रम को ओर भी पुष्ट करके व अपना वह अहकार जड ही से नाट कर देती हैं । इस प्रकार चित्त शुद्ध होने पर नत्र भगवत्प्राप्ति होती है तन प्रणिपात, परिप्रश ओर सेना से वह तत्वयो र होता हे जियो फल में उन्हें 'प्रचण्ड मान धाम मदा के लिए प्राप्त हो जाता है। बारीकी से विचार किया जाय तो प्रत्येक छन् पोर पर का अर्थ इन मा रष्टिया मे लगाया जा माना है । उदाहरणार्थ, "कही लगा अञ्जन एक गाँस में, कहीं लगी लाग्न पडी न पंजनी", कह कर ययपि प्रस्थान तत्पर गोपियो की पिशेप उत्सुकता ही प्रकट की गई है, तथापि यदि भातुक लोग चाह तो यहाँ यह कह साते हैं कि अक्षा का अर्थ है गुरुपरज या फिर मायामयी कालिमा, लाग्न का अर्थ है गग अथवा अनुगग क्याकि उसका भी ग्ग लाल माना गया है। थोर पजनी का अर्थ हे मुग्दरता या अहकार । इस तरह एक औस का अञ्जन यह सूचित करता है कि दिन्य इप्टि कुन कुल गुल चुकी थी। यह यह भी सूचित कर रहा है कि माया या परदा केवल एकागी ही रह गया था। पैंजनीविहीन पेंगें की लास यह बताती है कि गोपियाँ ऋणानुराग मे विची चली जा रही थी परन्तु उनकी इस क्रिया मे मुखरता अथवा भक्ति की गई गरिमा न थी। दूसरी -ष्टि मे वह यह भी बताती है कि यपि गोपियो मे पार्थिव सुनी पर अनुरक्ति बनी हुई थी (क्योकि लाग्य युक्त पैर पृत्वी पर ही थे ) परन्तु उनके प्रति पर अहभावना-प्रपल ग्रासक्ति नहीं रह गई थी। ये अर्थ भावुको के हृदय में पाप ही आप उरभूत हो जाते हैं। न इन्हें हँढने ही का प्रयास होना चाहिए न इनके लिसने ही का। काव्य के मामान्य अर्थ का अनुभव कराना ही मुझे अभीप्ट जान पड़ा और इसी लिए पुस्तक के अन्त में जो टिप्पणियाँ दी गई हैं उनमे इन विचित्र अर्थों की योर ध्यान ही नहीं लिया गया है। इस रचना मे आदि में अन्त तक वंशस्थ वृत्त रखा गया है। वशिका वादन से बँधा हुआ यह विषय भी मुवशस्थ ही है। भापा सडी बोली है क्योंकि पड़ी बोली मे तो इस विषय के कुछ प्रथ है भी, सड़ी बोली में कोई नहीं। इस गडी बोली में भी सस्कृत का पूरा प्राधान्य है क्योंकि एक तो मूल विषय सस्कृत का है नमरे छद भी सस्कृत ही का है और तीसरे सस्कृत के उन शब्दां ओर उन पद समूहों में जितनी भार व्यजकता है उतनी अभी तदर्थक ठठ हिन्दी शन्नो में श्रा ही नहीं पाई है। पाठको की सुविधा के लिए टिप्पणी में क्लिप्ट शब्दो के अर्थ भी दे दिये गये हैं। व्याकरण में अलवत्ता मैने संस्कृत का अन्वानुमरण नहीं किया है । इमीलिए सम्बोधन कारक में "हरि ।" और "हरे " के प्रयोग तथा विशेग्य विशेपण में "अधीर गोपियों ओर "अधीरा गोपियाँ" सरीने अनेक प्रयोग इस रचना मे मिलेंगे। कही कही कति रमातन्त्र्य से काम लेकर हिन्दी व्याकरण के भी उन्धन ढीले कर दिए गए हैं। क्योकि अमल उद्द श तो था रस-विस्तार न कि व्याकरण विस्तार । हिन्दी और मस्कृत के दिग्गज कवियो तक ने जन ऐसी ढिलाई दिग्पाई है तो फिर मेरे जैसे मामान्य लेखक के लिए तो यह कोई बात ही नहीं है । हाँ, एक विषय अश्य ऐसा है जो उल्लेख योग्य है । सस्कृत में मयुक्ताक्षर के श्रादि का हस्व दीर्घ पढा जाता है । र, धृ श्रादि सयुक्त अक्षर नही माने जाते क्योंकि ऋ व्यञ्जन न होकर मर है । इसलिए उनके पहले का प्रक्षर दीर्घ न होगा। इस नियम का निर्माह इम ग्रथ में बहुत विशेष रूप से हो गया है। सभव है इसीलिये केवल हिन्दी पाठकों को इसके छन्दों का पाठ कहीं कहीं कुल अटपट मा लगे। वे मज्जन यदि ' रस प्रवाह" मरीसे शब्दों को "रसप प्रवाह' मान कर पढ़ेंगे तो श्राशा है कि वे इस नियम का अच्छा आनन्द उठावेगे ।
मङ्गलाचरण विशाला माला से हृदय अति ही शोभन बना वनश्री ही मानों हृदय-पन से है मिल रही। स्मितामा फैली है मधुर अपरों में मनहरी मनोज्ञा वशी की ध्वनि कर रही स्नेह जिससे ॥१॥ नयी नीली कन ध्रुति हर रही कान्ति वपु की प्रभातश्री सी है पिलसित छटा पीत पट में। सुकेशों पं वॉका मुकुट घन में इन्द्रधनु सा करों में वशी है मनसिज मखी मूर्ति रति की ॥२॥ 4 मुकगा JBURTHIRDA.OSH SITE JAIN LIBRARI. PUKAMEAL NAIPUTR" गगग धागजा का मङ्गलाचरण विशाला माला से हृदय अति ही शोभन बना वनश्री ही मानों हृदय-पन से मिल रही । स्मिताभा फैली हे मधुर अधरों में मनहरी मनोज्ञा वशी की ध्वनि कर रही स्नेह जिससे ॥१॥ नयी नीली कज द्युति हर रही कान्ति वपु की प्रभातश्री सी है विलसित छटा पीत पट में । सुकेशों पे डॉका मुकुट घन में इन्द्रधनु मा करों में चशी है मनसिज सखी मूर्ति गति की ॥२॥ कन Bue स
त्रिभगी झाँकी है त्रिविध सुखदा तापशमनी
सुधा सी छाती है विमलतर ऑखें छविभरी ।
सुगोपी, गो, गोप प्रभृति जिसमें तन्मय बने
मुलाते है भूले भ्रमर-सम ही भान अपना ॥३॥
सदा श्रीमद खन्दावन विपिन में यों विहरते
दिखाते लीलाएँ दिनमणि सुता-तीर सुख से ।
वही श्यामाकान्त प्रथित
रस रास मणयिता
प्रसादाम्भोजश्री सहित कर दें श्याम सबको ॥४॥
प्रसाद कामना
रचाया जो रास ग्रथित कर आभास उसका
सम' आनन्द प्रद पद भरे हार हरि को।
मुझे दें वाणी का वह वर जगन्नाथ जिससे
सुवशस्था गाया श्रुतिमधुर लावे शिखरिणी ॥५॥
-
शरद निशा
मुखेन्दु की स्निग्ध-सुधा समेत थी
खिली हुई विश्व-विभूति सी लिये ।
शरन्निशा सुन्दर सुन्दरी समा
अभिन्न सयोग वियोग योगिनी ॥शा
शरद् चन्द्र
विशुद्ध कान्ति-स्फुट थी प्रभामयी
बढ़ा हुश्रा ऊर्ध्व नभ-प्रदेश में ।
मृगाङ्क रेखा वपु में
प्रसार के
द्विजेश था कानन सा नरेश सा ॥२॥
पायन प्रति दिगन्त दुग्धाम्बुधि सा रसाल था शिला सुहाई रजताद्रि श्रृंग सी । निकुञ्ज में स्वर्ग ललामता खिली प्रशान्ति थी ब्रह्म निवास सी बनी ||३|| वृन्दावन तपोवनी, माघवनी वनी समा, वसुन्धरा भाल कनी रसाल मी। अमन्द - वृन्दारक सुरम्य वृन्दावन की वनी बनी ॥४॥ - वृन्द - सेविता पिमुकजी ta यमुना त्रिशक्तियों की छवि से त्रिकाल में गिलोक आलोक लता ललाम सी । त्रिताप हारी जल राशि साथ ले तरगिता थीं तनया तमारि की ॥५॥ वशीट विचित्र वायुत चित्त चित्र सा चरित्र साक्षी शुचिता समृद्धि से । सुरत्न-सौंदर्य-समुद्र-सार सा विशाल वशी वट था विराजता ॥६॥ पि मुकर्जी प्रज माधुरी सुधाशु की रश्मि सुधा सुधार सी सुधारने को रस की रसालता । शरत्प्रभा से अति ही प्रफुल्ल थी ब्रज स्त्रियों सी ब्रजमाधुरी लसी ॥७॥ कृष्ण आविर्भाव निसर्ग आह्वान सुना नटेश ने वहीं पधारे वर वेणु हाथ ले । मिले जगन्नाथ रसा रसालको शरीर को प्राण समान प्रामिले । पि.मुक
श्याम छटा
शशाङ्क सा आनन कान्त शान्त था
निरभ्र आकाश समान देह थी ।
शरन्निशा में लसते ब्रजेश थे
शरच्छटा के वर मूर्त रूप से ॥६॥
सजे हुये थे शिखि-पख केश में
तडिप्रत्भा सा पट पीत था लसा ।
गले लगी थी बन माल सोहती
ब्रजेश वर्पा छवि-धाम थे बने ॥१॥
प्रसून से सुन्दर अंग थे खिले, शरीर का सौरभ अद्वितीय था। पिकी समाना मुरली लिये हुए नटेश वे कामद थे बसन्त से ॥११॥ विशाल नेत्राम्बुज में प्रसाद था सहास श्रोष्ठ-द्वय थे प्रवाल से । विराजते प्रेम समस्त सौंदर्य समुद्र सार से ॥१२॥ रसावतार वे Sola समस्त ससार कटाक्ष मात्र से विमुग्ध होता जब एक बार ही । कहो कहें क्या कितनी अनूप थी ललामता मजुलता रसालता ।।१३।। आकर्षण निकुंज कूजे, हॅसने लगी धरा समागमेहामय भानुजा हुई। अनन्त श्राकर्षण-धाम क्यों न हों कहे गये कर्पण से सुकृष्ण जो ॥१४॥ मुकजा मुरली-वादन WALL समस्त ससार कटाक्ष मात्र से विमुग्ध होता जब एक बार ही । कहो कहें क्या कितनी अनूप थी ललामता मजुलता रसालता ॥१३॥ आकर्षण निकुज कूजे, हॅसने लगी धरा समागमेहामय भानुजा अनन्त श्राकर्षण-धाम क्यों न हों कहे गये कर्पण से सुकृष्ण जो ॥१४॥ MAR
वशीवादन
हुई समुद्भूत
जगन्निवास के
सुचित्त में बात सुचित्त मोहिनी ।
अतः चिताई यमुनोपकूल में
मनोहरी कामभरी सुबॉसुरी ॥१५||
सुपक्व बिम्बाधर
पै विराजती
सुवश जाता रुचिरा सुवंशिका ।
करागुली थी जिसके सुछिद्र पै
नचा रहीं सुस्वर नाच नाच के ||१६||
Lavandanition
सजीव सी होकर सौम्य बाँसुरी सुना रही थी सुर यों सुधासना । विभोर होके जिसमें निसर्ग भी रसाल था मजुल ताल दे रहा ॥१७॥ सुवशजा थी मधुरा सुवश सी सुवश रूपा प्रथिता सुवश में । सुवश सभ्रान्तिहरी सुवश की सुवंश विस्तार करी सुवशरी ॥१८|| अधीर गोपियाँ सुना, वनीं श्राशु अधीर गोपियों जगत्पिता में जग लीन हो गया । तुरन्त ही मोहन के समीप वे सभी खिंची-सी चल चित्त-सी चलीं।।१६।। कहीं लगा अजन एक आँख में कहीं लगी लाख पडी न पैंजनी । गिरे अलंकार अनेक के तथा अनेक के सस्त दुकूल भी हुए ॥ २० ॥ म:मुकजी न एक की भी सुध एक को रही सखा सखी भूल समस्त ही गई। चली त्वरायुक्त सरित्प्रवाह सी बढ़ी वहीं मार्गजिसे जहाँ मिला ॥ २१ ॥ - विहाय भर्ता तज पुत्र लाडिले हटा सभी सत्कुल-रूदि-शृङ्गला। व्रजेश के पास कुलाङ्गना चली अलक्ष्य ही था क्रम सर्व भावसे ॥ २२ ॥ पि मुवी कहाँ रखा दूध दही कहाँ धरा किसे भला था उस काल ज्ञान यों। सुलोचनो में बस नन्द-नन्द की छटा रमी थी छवि से भरी हुई ।। २३ ।। असीम सौन्दर्यवती समग्र थी मनोज भी देख जिन्हें अंपा सदा । वही समाराध्य किशोरियों चली पुनः ममाराधन हेतु कृष्ण के ॥ २४ ॥ पःमुकल का, कुलीनता-सभ्रम, गर्व सदात्म-विश्वास सभी उड़े अहो । सुवंशिका की बस एक फूंक में, बनी बिना मूल्य नटेश-किकरी ॥ २५ ॥ ब्रजेश्वरी राधिका परास्त सी थीं प्रतिभा-प्रभामयी त्रिशक्तियों भी जिस रूप-शक्तिसे । व्रजेश्वरी आज वही सुराधिका नटेश्वर-प्रेमभिखारिणी बनीं ॥ २६ ॥ सुजा कृष्णान्वेपण रूप का, कुलीनता-संभ्रम, गर्व सदात्म-विश्वास सभी उड़े हो ! सुवंशिका की बस एक फूंक में, बनीं बिना मूल्य नटेश-किकरी ॥ २५ ॥ व्रजेश्वरी राधिका परास्त सी थीं प्रतिभा-प्रभामयी त्रिशक्तियाँ भी जिस रूप-शक्तिसे । व्रजेश्वरी आज वही सुराधिका नटेश्वर-प्रेमभिखारिणी बनीं ॥ २६ ॥ M व्रतसाफल्य आज उपासना सार्थक थी हुई हुई मनोज्ञा सफला व्रत किया । दिया उन्हें जो वर चीर को चुरा उसे किया पूर्ण जगन्निवास ने ॥ २७ ॥ सभापण उन्हें विलोका ' हरिने प्रसन्न हो कहा "हा स्वागत | धन्य भाग्य है। कहाँ निशा में अभिसार यों हुआ पुनीत कैसे वन की धरा हुई ? २८ ।।
अगम्य थी श्वापद-सकुला बनी;
डरीं न कोई इस भाति श्रागई।
असीम दुःसाहस क्यों किया अरे ।
कहा गई मंजुल भावभीरुता ॥ २६ ॥
प्रसन्न तो है कुल के बड़े सभी
सुखी सलोने शिशु तो समग्र हैं ?
न साथ हैं गोप, अधीर सी बनीं
कहा चली हो ब्रजसुन्दरी। कहो ॥ ३० ॥
विलास वाली यह शारदी निशा
बना रही क्या तुमको विमुग्धसा !
इसीलिये हो इस ओर आगईं
निसर्ग-शोभा सुखधाम देखने ? ३१ ।।
विलोक ली है वसुधा । सुधा-सनी
शशाङ्क-शोभी नभकी छटा लखी ।
खिली बनधी-सुषमा समेट ली
विलम्ब क्यों है अब होरहा यहाँ १३२।।
न बोलती हो, स्थिर हो, अरे कहीं
सुरूप से मोहित तो नहीं हुई
सुरूपत्रासक्ति नितान्त हेय
तुम्हीं कहो सार कहाँ सुरूप में ॥ ३३ ॥
ther
घन-प्रभा है, छल है, मरीचिका
समान ही रूप-सुखाभिलाप है।
सुरूप-माया-वश हो नितान्त ही
अयोग्य है त्याग सुवंश-रीति का ॥३४॥
अनर्थकारी, अघ से भरा हुश्री, सदा घृणा-धाम विनिन्दनीय है। न भलके भी इस ओर ध्यान दो जघन्य है, गर्हित औपपत्य है ॥ ३५ ॥ भरी हुई हो अथवा सुभक्ति से इसीलिये आशु समीप श्रा गयीं। : परन्तु क्या भक्तिन हो सकी कभी स्वसद्म में ही कुल-रीति-नीति से ।।३६।।
कुटुम्ब-सेवा हित जन्म है हुआ |
स्वजाति का त्याग न इष्ट
कभी।
वही कहाता प्रभु-भक्त सत्यतः
सदैव है सेवक जो समाज का ।। ३७ ॥
फिरो फिरो शीघ्र हटो हटो सभी
रुके न कोई इस भूमि-भाग में ।
पुनः न श्रावृत्ति कदापि हो यहाँ
प्रमाद उच्छृखलता अनिष्ट की ॥३८॥"
विहल गोपियाँ
सुनी सभी ने यह
मर्म-भेदिनी
ब्रजेश की वज्र-निनादिनी गिरा।
बनीं जडीभूत धरा विलोकती
तुपार-दग्धा लतिका समान वे ।। ३६ ॥
STA
भरा गला, नेत्र भरे जलार्द्र हो,
भरे सुवस्त्रादिक अधुमाल से ।
कहा उन्होंने “प्रभु ! यों न बोलिये
टटोलिये ब्रह्म !न धैर्य जीव का ।। ४० ॥
प.गाव
किया
समाकर्पण वेणु-नाद
से
प्रभो। किया क्यों अब दूर चाहते ।
कमान से बाण समान खींच के
हमें गिराना प्रभु-धर्म है यही ? ४१ ॥
लगा चुके भाग सुचित्त में हरे ।
सुवंशिका को इस भॉति पूँकके ।
व्रजातिहारिन् । अब अाज क्या प्रभो !
न पूर्ण होगी अधरामृत-स्पृहा ? ४२ ॥
रखो विभो ! मस्तक पै अभीति का
रमा-समाह्लादक हाथ, साथ दो ।
हमें तजा तो हम प्राण छोड के
पडी रहेंगी चरणों लगी हुई ।। ४३ ।।
सभापण
नाथ
साथ दें
अभीष्ट है केवल
हमें नहीं वंश-विलास चाहिये ।
सुवंश तो था प्रतिरूप आपका
सुवंशिका तो अब है सुवशिका || ४||
-
TA
1
है
युगल मानी
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तुम्हें भजेगी तुम श्रादि-नाथ हो
तुम्ही हरे | ध्येय
कुटुम्ब रीति के ।
न वश-माया अब देव ! और दो
हमें सुना दो सुखदा सुवशिका ।। ४५ ॥
प्रभो । त्वदायत्त जगत्प्रवृत्ति है
कहाँ यहाँ गर्हित श्रोपपत्य है।
विलोकती हैं पति में भरी हुई
जगत्पते । मञ्जुल श्रापकी प्रभा ॥४६॥"
प्रार्थना स्वीकृति
“यही सही” माधव ने कहा, अहा !
रहा सहा चित्त हुश्रा हरा भरा ।
गये नये ताप, मिटी व्यथा-कथा
खिली मिलों हर्पित हो रमा समा ॥ ४७ ॥
प्रस्थान
निसर्गरम्या रजताद्रि-चूर्ण
सी
बिछी हुई थी वर बालुका जहाँ ।
हिमांशु-सम्प्लावित सर्व मंडली
गई प्रहृष्टा यमुनोपकूल को ॥ ४८ ॥
गर्वावर बॅधा समा सुन्दर रम्य रास का मुनृत्य में तत्पर गोपियाँ हुई । महा महा भाग्य सराह आप को विशेपिता जान हुई सुगर्विता ॥४६॥ तिरोभाव प्रवृद्ध गर्वाङ्गुर देख श्याम ने उखाड फेंका क्षण में अदृश्य हो । हुई बिना श्याम समुज्वला निशा भयावहा दु:सह श्यामतामयो ॥५०॥ ।
सुभक्ति में थीं सब से बढ़ी चढ़ी
सुभक्ति ही की वरमूर्ति राधिका ।
विभक्ति सो संग लगी गई श्रतः
अदृश्य होके अविभक्त ईश से ॥५१।।
यहाँ, “कहाँ श्याम?" समग्र गोपियाँ
भयार्त वित्रस्त पुकारने लगी।
"कहाँ कहाँ ?” निष्ठुर कुज ने कहा
“कहाँ कहाँ श्याम ?" कहा दिगन्त ने ॥५२।।
म:मुकजी
युगल झांकी वहाँ, सुझॉकी युगल स्वरूप की प्रमोद मग्ना कमनीयता मयी । विशाल ही विश्व विलोकनीय थी ब्रजेश्वरी संग ब्रजेश की छटा ॥५३॥ नवीन इन्दीवर कान्ति कृष्ण की मनोज्ञ राधा-वपु पीत वर्ण था । हरे भरे लोचन चारु होगये । हरी छटा देख रमानमेश की ॥५॥ मुकर्जी ปี गोपी प्रलाप यहाँ, वियोगानल दग्ध गोपियों हुई बिना श्याम अतीव अातुरा । अधीर होके दुख से व्यथा भरी प्रलाप ऐसा करने लगी सभी ॥५५॥ “कहाँ हमारे अवलम्ब अम्ब । हैं कदम्ब ! जम्बू । अविलम्ब ही कहो। हँसी चुराई जिनकी खिली जुही । तुम्ही बता दो चितचोर वे कहाँ ।।५६|| मुक प्रसन्न हो क्यो प्रिय की प्रिया अरे तुम्हीं मिला दो तुलसी । ब्रजेश से । कहाँ छिपायी छवि यादवेन्दु की निकुञ्ज चीथी | कुछ तो बता हमें ॥५७।। || रसे रसज्ञे ! न सपलिभाव को दिखा, बता नन्दकिशोर हैं कहाँ ? छिपा न यों दर्शन शीघ्र दे हमें न छीन लेंगी तुझसे ब्रजेश को ॥५॥ पि मुलजा सभी प्रिया हों उनकी, सभी रमें समान ही मञ्जुल काति धाम में । निशा, चकोरी, कुमुदालि, चन्द्रिका समान ही क्या रमती न चन्द्र से १५६।। राधा-माधव-दाम्पत्य / ब्रजेश्वरी संग, वहाँ, हरे भरे ललाम उल्लास विलास से लसे । लगे दिखाने ब्रजराज सुदिव्य दाम्पत्य परावरेश का ॥६॥ भाव से कटाक्ष से मोहित जो हुए स्वयं हँसो हसी में बस चित्त ले लिया । दिया समालिङ्गन जो प्रसन्न हो चुरा लिया चुम्बन चारु चाव से ॥६१॥ फिया समुद्दीपन कान्त भाव का मुखेन्दुलमा छवि से रदात की। विलोक शैथित्य रस-प्रवाह में नख क्षतो से क्षति-पूर्ति शीघ की ॥६२।।
अभिन्न संयोग भले प्रकार हो पड़े रहे द्वैत दुकूल क्यों वहाँ । विभेद कारी व्यवधान मेट के दिखा दिया मोक्ष सुनीवि-मोक्ष में १६३।। रहा नहीं केवल देह ऐक्य ही हुआ सदात्मा तक का सदैक्य यो। सुयोगियों की सुरति-किया-समा सुभागियों की सुरत-क्रिया रही ॥६॥ Filmma न काम की थी कुछ कामना, हुई निकाम यों काममयी रतिकिया । प्रसिद्ध योगेश्वर का अपूर्व ही रहस्य था केलि कला कलाप में ॥६५॥ कभी समाराधक राधिका बने बनीं समाराध्य नटेश राधिका । बिहार बॉका, रख के किया वहाँ विमुग्धकारी विपरीत भाव यों ॥६६॥ ०६ E MA ? प्रजेश-संस्तुति v न काम की थी कुछ कामना, हुई निकाम यों काममयी रतिक्रिया । प्रसिद्ध योगेश्वर का अपूर्व अपूर्व ही रहस्य था केलि कला कलाप में ॥६॥ कभी समाराधक राधिका बने बनीं समाराध्य नटेश राधिका । बिहार बॉका, रख के किया वहाँ विमुग्धकारी विपरीत भाव यों ॥६६॥ ५
कभी दिखाया रसिकों समान ही
सुकामियों का वह दैन्य ईश ने ।
गिरे पदों में जब रूठते लखा
ब्रजेश्वरी को प्रणयाभिमान में ॥६७ ।।
न योगियों का मन पा सका जिसे
निरुद्ध हो के सुखदा समाधि में ।
पहा । वही ब्रह्म मिला निकुञ्ज में
सदेह, राधा-पद यों पलोटते ।।६।।
भरी रमा में रमणीयता कहीं
प्रसून माला सुख से सजा सजा ।
कहीं स्वय सज्जित श्राप हो गये
रमा-करों से रुचिर प्रसून ले ॥६९||
जो हुआ
बिहार सीमा तक पूर्ण
रुची पुनः केवलता कृपालु को।
नटेश्वर-प्रेरित सौम्य राधिका
इसीलिये हा । अभिमानिनी बनीं ॥७०॥ -
मुकर्ज
सुना, "चलें क्योंकर कृष्ण ! हैं थकी" कहा कि “कन्धों पर बैठ लो, चलो" बढ़ी समारोहण हेतु राधिका तुरन्त ही श्याम अदृश्य हो गये ॥७॥ htriyar ॥ प्रसंग थे संग भला न क्यों तजें निरीह ईहामय क्या कभी हुए। प्रमाद में ज्ञान-कथा भरी हुई विषाद ही में जिनका प्रसाद था ॥७२॥ प.मुक तन्मय गोपियाँ यहाँ, प्रलापाकुल वे किशोरियों ब्रजेश में श्राप निमम यों हुई। स्व-भाव भुला स्वयमेव को सभी व्रजेश्वर-श्याम निहारने लगीं ॥७३॥ "कहो, कहो, क्यों ललिते । उदास हो यहाँ लखो प्रेमिक कृष्ण मैं खडा । चलो विशाखे ! सुख से विहार हो द्विरेफ गुजारित कुञ्ज पुञ्ज में ॥७॥ --
• । यहाँ । यहाँ । क्यो उस ओर भागती ?
खडा हुआ गोरस-दान मागने ।
तुम्हें नहीं क्या भय कंस भूप का ?
नहीं बचोगी रस-दान के बिना ||७||
रचा व्रत-स्नान
विचित्र
हो
दिगम्बरी रीति दिखा न क्यों चलो ।
यहां टॅगे हैं सब चीर वृक्ष
पै
बढ़ो स्पृहा है यदि इप्ट-लाभ की ॥७६॥
है
बना मुझे गो-कुल
गो-कुल जीव-तुल्य
इसीलिए गोकुल बीच हूँ बसा ।
पुनीत कर्तव्य करो चलो सभी
चलो न गोचारण मे विलम्ब हो ॥७७||
हुई विनष्टा
छत-धाम पूतना
प्रलम्ब-से वत्स चकाघ-से गये ।
सचेत हो जा शठ कस ! देख ले
महा बली काल कराल मैं खडा ॥७८॥
• कहां लगी आनन
में सुमृत्तिका
नया न मृगक्षण दोष है गहा ।
वृथा मुझे है फटकार अम्ब ! तू
विलोक, मेरा मुख तो विलोक ले ||७६||
मरा तृणावर्त, सुवेग वायु का
मिटा, सभी शात बने सुखी बने ।
यहा विलोको वन के बचाव में
दुरन्त दावानल-पान हो चुका ||८||
न इन्द्र की है कुछ भीति, शात हो
कनिष्ठिका पै गिरिराज है खडा ।
हुआ सुधा-सा जल, नाग है नथा
विभीति सारी अब गोप। दूर हो ||१||
चुरा चुके माखन, कुंज कोट में
चलो चलें, हो बलबीर ! जा छिपें ।"
सभी इसी भाति सुभाव में भरी
ब्रजेश-लीला-अनुगामिनी बनीं।।२।।
-
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पद-चिन्द
बना वियोगानल से विदग्ध हो
सुपक्य सत्प्रेम, तभी ब्रजेश ने
उन्हें दिखाये पद-चिन्ह सामने
मिली नई राह अनन्त-लाभ की ॥३॥
लखा उन्होंने, प्रभु के पदाङ्क में
मिला हुआ एक पदाङ्क और था ।
कहा सभी ने “यह क्या! सुगोपिका
अवश्य कोई हरि-संग है गयी ॥४॥
“चुना समाराध्य उपेन्द्र ने जिसे हुई समाराधित सिद्ध साधना । अहो वही धन्य । बनें कृतार्थ जो हमें कहीं दीख पड़े सुसङ्गिनी ।।"८५॥ बढ़ीं इसी भॉति विचारती हुई व्रजाङ्गनायें जब वन्य-मार्ग में । कृपालु ने भाव विलोक चित्त का दिखा दिये चिन्ह अनेक और भी ॥६॥ ।
मिले कहीं पुष्प विकीर्ण जो वहाँ
दिखा रहे थे कुसुम-प्रिय-क्रिया ।
बता रहे मूईज मार्ग में गिरे
यहाँ रचे कुन्तल कान्त कान्त ने ॥७॥
सुगन्धि-युक्ता सुखदा शिला कहीं
बनी रमा राम विराम सूचिका ।
अलक्तकाङ्का अवनी कहीं कहीं
रहस्य थी खोल रही विलास के ॥८॥
राधा-मिलन
बढ़ी विपन्ना जब खिन्न गोपियाँ
अनेक लीला-स्थल देख देख यो ।
तभी मिलीं अश्रु-नदी-निमग्न-सी
धि-युक्त राका रस राशि राधिका ||६||
सुधा-सना-सा मुख सूख था गया
पड़ी हुई काष्ठ समान देह थी ।
व्यथा भरी थी उठती द्याई हो
"हरे । हरे।" की ध्वनि रोम रोम से ॥६॥
सुना, “सखी | हा! छवि-धाम राधिके !" सुनेत्र खोले धर धैर्य चित्त में उठीं, उसी काल परन्तु व्यग्र हो "मिले ! कहाँ ? कृष्ण।"पुकार के गिरी ॥११॥ विलाप वैकल्य विषाद वह्नि की प्रदीप्त जैसी लपटें वहाँ उठी, सखी-गणों में उतने गभीर ही बहे सुधा-स्रोत सहानुभूति के ||९२॥
व्यग्रता मिली सभी किन्तु न सोच वे सकी कहाँ रहे, जायँ कहाँ, किसे कहें । स्वगेह था कानन-सा भयावना बना उन्हें कानन ही स्वगेह या ॥३॥ सत्परामर्श यही हुआ निश्चय अन्त में "चलो करें सभी सस्तुति विश्व-बन्धु की । सुभक्ति से चित्त धुले बिना कहीं कभी न होगी अपराध-मार्जना" ||६||
गई सभी वे यमुनोपकूल को
प्रशान्ति से ध्यान किया परेश का
निरुद्ध बाप्पा करने लगी तथा
ब्रज-स्त्रियों यों स्तुति भावशालिनी ॥६५॥
व्रजेश-सस्तुति
"कहाँ सिधारे कमनीय कान्त हे !
कृपा करो किंकरिया कृतार्थ हो ।
कठोरता से कलपा हमें भला
कृपालु | कैसे कल पा रहे कहो ॥६६॥
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कृप्या प्रायिभान
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सुदुःखिता है दयनीय है प्रभो ।
दुरन्त-दागनल-दग्ध हो रही
दरिद्र हैं देव । दयालु। दीन हैं
दयाई हो दर्शन-दान दीजिये ।।६७||
मनोज मायामय मत्र-मुग्ध है
मिटाइये मोह-महान्धकार को ।
मही जिसे पा महनीय है वही
मिले हमें मन्जुल मूर्ति मोहिनी ॥६॥
-- चले कहाँ चञ्चल चित्तचोर । यो चलाइये चाल न चञ्चरीक की सुचाह से चक्षु-चकोर चाहते रचे चमत्कार मुखेन्दु-चन्द्रिका ||६|| अहो विहारी ! हम हार हैं थकी हमें निहारो न हताश यो करो । हशीक-हराम हरा भरा रहे ! हरो हमारी हरि । हेय हीनता ॥१०॥ मुकजा प्रभो ! परात्मन् । प्रथित प्रभा धरे । पुरातन प्राणनिधे। प्रियव्रत ! प्रसन्न होवें पुलकाङ्गिनी बनें प्रसार दो पावन पाणि-पद्म यों ॥१०॥ हुई सभी श्रान्त सँभाल लो हमें समस्त सन्ताप समूल मेट के । सुदिव्य सन्दर्शन से सदुक्ति से सुधार दो सौख्य सुधा सु धार दो"|१०२॥ मुकर्जी पुनर्मिलन विनष्ट सारा जब गर्व हो चुका प्रसन्न योगेश्वर श्राप श्रा गये। मिला, मिला, मञ्जुल मोद श्रा मिला मिला, मिला, मंगल मूर्तिमन्त-सा ॥१०३॥ वही सुमन्दस्मित पद्म वक्त्र था वही लसी पीत दुकूल की प्रभा । अखण्ड आखएडल कान्ति खण्डिनी वही स्मर-स्मेर-करी वपुच्छटा ॥१४॥ माप.मुकर्जा - सुगद सयोग बढ़ी स्त्रियों वे सरिता-समान ही गिरी अधीरा रस के समुद्र में । बनी सभी माधव अंग संगिनी तरंगिनी पावन रंग रंगिनी ॥१०॥ असंग के संग अनंग यों मिला अनंग का ढंग अनंग होगया । सुकामना हो जब श्राप्त काम की वहा भला क्या फिर काम काम का ११०६।। मुकंजा
सुसंग का रंग न अंग जो लगा
कुढंग ही है मिलता मनुष्य को ।
कुसंग उत्संग अपंग मीन या
कुरंग मातंग पतंग भृग का ||१०७॥
रहीं लगी पावन पैर से कई
तथा कई ने पकडा सुपाणि को।
लगी रहीं यों कटि से कई स्त्रियाँ
चले न जावें हरि छोड़ के हमें ॥१०॥
कई रसीले दृग देखती रहीं
कई वहीं सुस्मित की तरंग में।
तथा कई श्रीमुख का प्रसाद पा
बनीं प्रसन्ना प्रथिता प्रसाधिता ||१०६।।
रहीं कई दूर न तीर भासकी
ब्रजेश मे ध्यान निमग्न यो हुई।
मुखेन्दु-सौन्दर्य - सुधा -तृपातुरा
सुलोचनो से अविलम्ब पी गयीं ॥१०॥
परिप्रश्न गई सभी ले हृदयेश को जहाँ प्रभाविलासी यमुनोपकूल था । बिछा दिये वस्त्र बिठा ब्रजेश को ब्रजस्त्रिया यों फिर पूछने लगीं ॥११॥ "विरक्त के भी वर भक्त हैं कई विरक्त भी हैं वर भक्त से कई । रहस्य उद्घाटन नाथ | कीजिये 'विचित्र कैसी यह विज्ञ । रीति है" ॥११२॥ CROlimitor समाधान हॅसे जगन्नाथ कहा कि "विश्व में सुभक्त तो है अनुरक्त के सभी । परन्तु हैं धन्य वही हित-त्रती विरक्त के भी बनते सुभक्त जो ॥११॥ सुभक्त की ओर विरक्त जो बने विमूद हैं वे अथवा मुनीश है । न मूढ़ ही हूँ न मुनीश ही वना सना हुआ प्रेम-पुनीत में सदा ॥११४।।
बॅधा पडा हूँ दृढ़ भक्ति-डोर में
सुभक्त मेरे वर भक्त दास मैं ।
जहाँ प्रिया । हो तुम, पास मैं वहीं
अभिन्न हैं भेदक नाम रूप भी ॥११॥
अदृश्य था मैं रस-पुष्टि के लिये
तुम्हें तनँ मैं यह शक्य ही नहीं ।
समूल उन्मूलन लोक-लाज का
अनन्य साधारण कर्म है सदा ॥११॥
प्रसाद सभी हुई शान्त सभी सुखी हुई खिली धरा उज्वल चन्द्र भी हँसा । समीप वशीवट के हुआ पुनः प्रमोद रत्नाकर अमिवान सा ||११७॥ रम्य रास दिशा दिशा में फिर से ब्रजेश की मनोज्ञ वशी-ध्वनि गूज सी गई । पुनः प्रभा-पूरित कान्त भूमि पै हुआ समारम्भ सुरम्य रास का ॥११८॥ चिप मुनी -
अनेक थी गोप-कुमारिका वहाँ
रमे सभी में पर कृष्ण एक थे ।
अनेक गोपीजन सौख्य को हुए
अनेक के एक अनेक एक से ॥११६।।
अनेक आभूषण
अनेक आये कल वाद्य प्रापही
श्राप छागये ।
जहाँ सदिच्छा
नटराज की रहे
अभाव होगा किस बात का वहाँ !!१२०॥
प.मुकार
मृदंग वीणा डफ झॉझ साथ ले प्रसन्न हो गोप कुलागना बढ़ीं । बजे मॅजीरे भनके सितार यों रसाल संगीत मयी रसा बनी ॥१२॥ हुई विगीता समयानुकूल यों प्रभाव-पूर्णा मृदु राग रागिनी । सचेत जो थे जड-मूर्ति से हुए सचेत ही से जड शीघ्र होगये ॥१२२।। .
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मृदंग वीणा डफ झॉम साथ ले प्रसन्न हो गोप कुलांगना बढ़ीं । बजे मॅजीरे झनके सितार यों रसाल संगीत मयी रसा बनी ॥१२॥ हुई विगीता समयानुकूल यों प्रभाव-पूर्णा मृदु राग रागिनी । सचेत जो थे जड-मूर्ति से हुए सचेत ही से जड़ शीघ्र होगये ॥१२२॥ .
बॅधी पदों में घुघरू सुहावनी ललाम लोला लय श्रालया लसी । सुख स्वना कंकण किंकिणी बनी सुवंशिका के स्वर से अभिन्न थीं ॥१२३॥ रचे गये लास्य कई प्रकार के प्रभेद छाये स्वर और ताल के । प्रतीत होता उमॅगी उमग से तरंग सौन्दर्य-सुधा-समुद्र में ॥१२४॥ Su कटाक्ष थे संस्मित थे सुहास थे अपूर्व थी हस्त पदादि की किया । सुभावसन्दर्शन देख देख देख के मनोज भी मूढ बना विलास में ॥१२॥ दिव्य दर्शन घिरी विमानावलि से नभस्थली अनेक पाये सुरवृन्द यो वहाँ । विलोक के रास अनूप ईश का असख्य पुष्पावृत पुण्य भूमि की ॥१२६।।
दिवाङ्गनायें उस दिव्य रास में
हुई विदेहा इस भॉति तन्मया ।
रहा यही खेद, किमी सुकर्म से
बनीं न क्यों वे ब्रजगोपबालिका ॥१२७||
रास-रहस्य
कभी तने उच्च झुके सभी कभी
बढ़े कभी संवृत एक से हुए ।
परेश ने सृष्टि-रहस्य खोल के
दिखा दिया हास-विकास विश्व का ॥१२८॥
कभी छिपे, श्रा प्रकटे स्वयं कभी कभी भ्रमाया वर भक्त को स्वतः । दिखा दिये-भक्ति रहस्य ईशने ब्रज-स्त्रियों को बस खेल खेल में ॥१२६॥ कभी हुए सन्मुख, पीठ फेरली कभी, पुनः सन्मुख आप आगये । अभिन्न सयोग-वियोग-भाव यों दिखा दिया मञ्जुल रास-चक में ॥१३॥ E विश्रान्ति सुनृत्य में जो थक-सी गई स्त्रियाँ खडी रहीं मोहन पै टिकी हुई। उठा लिया चारु अलभ्य लाभ यों अभीष्ट आकर्षक अग संग का ॥१३१॥ पै विशाल कन्धों पर थीं झुकी कई कई लिये थीं कर-कन्ज वक्ष कई मुखो से मुख थीं जुटा चुकी बनी परिश्रान्ति महा फलप्रदा ॥१३२॥ Home चारिलि अनेक ही थे स्थल नृत्य हो चुके भरी उमंगें न तथापि थीं घटीं । सभी मुखों पै श्रम-बिन्दु छागये हुई सदिच्छा तब वारि-केलि की ॥१३३॥ सुगधि साने सुसमीर दूत को पतगजा ने बहु बार भेज के । समागमेच्छा दिखला बुला लिया बजाङ्गना-संयुत गोप-बन्धु को ॥१३४॥ मुकर्जी "लिये हुए थीं शशि-बिम्ब गोद में निछावरें आज करें उमंग से । प्रवेश ज्यों ही हरि ने किया वहाँ लुटा दिये खण्ड समग्र बिम्ब के ॥१३॥ पखार के पॉव अतीव चाव से अपूर्व ही शीतलता प्रदान की। सुगहिनी-सा अति कान्त भाव से ब्रजेश-आतिथ्य किया प्रसन्न हो ॥१३६।। प.मुकर्जा उठीं हिलोरे लहरा उठी हॅसी मनोज्ञ मोती बिखरे अनेकधा । ब्रजेश के वारि विहार में बनीं तमारिजा श्रागतभ का-समा ॥१३७॥ जहाँ जहाँ श्याम बढ़े वहीं वहीं हुई रसीली यमुना प्रसन्न यों। स्वयं तरंगोंयुत भूल भूल के विशाल आकाश झुला झुला चुकीं ।।१३।। मकजाद
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सुदक्ष थे दक्षिणता दिखा दिखा दिया सभी को सुख तैर तैर यों । ब्रजस्त्रियो ने यह ही लखा वहाँ सभी कही थे बस कृष्ण कृष्ण ही ॥१४१॥ ललाम ताम्बूल मिटा, ललामता अनूप श्रोठो पर और भी भरी। हटा दिया कज्जल किन्तु टी पुनः बरोनिया से वर कान्ति नेत्र को ॥१४२॥ संकज
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कभी धरा पै जलराशि में कभी
निकुंज में सैकत पै कभी पुनः ।
विमुग्ध गोपीगण को प्रसन्न हो।
अमन्द श्रानंद दिये कृपालु ने ॥१४५॥
अपूर्व ही था अनुराग कृष्ण में
मिला अतः मजुल मोद रास का ।
इसीलिये तो
अभिनंदनीय हैं
त्रिशक्तियों से बढ़ के सुगोपियाँ ॥१४६॥
--
1
धन्य गोपियाँ
हुई तपस्या सफला सुखी बनी
मुनीन्द्र-वन्द्या व्रज-गोपियों हुई।
हुए महाभाग्य , सुगोपवृन्द भी
कुटुम्बिनी थी जिनकी सुगोपियों ॥१४७॥
। ब्रह्म-निशा
-
अमेय ही था वह रास ईश का
अलभ्य ही था वह नृत्य विश्व को ।
इसीलिये तो शशि नाचता रहा
नभस्थली में बन के विमुग्ध सा ॥१४८॥
न सूर्य ने नाम लिया प्रभात का
स्वकन्यका-केलि न देख वे सके ।
प्रमोदमग्ना
सुयामिनी
इसीलिये ब्रह्म-निशा हुई वहाँ ॥१४६॥
बन के
ललाम गोलोक
स्वशक्तियों से युत हो विशाल जो
सुरास गोपाल नटेश ने रचा ।
सुभावुको को उसने दिखा दिया
ललाम गोलोक इसी प्रदेश में ॥ १५०॥
विम्ब प्रतिविम्व
दिखाव में कृष्ण रहे स्त्रियों रहीं
परन्तु बिम्ब-प्रतिबिम्ब था सभी ।
यथार्थ में तो 'ब्रज-पारसी लसा
बना हुआ बाल विलास रास था ।।१५१||
मोन अनुभूति
अवर्णनीया अति हो अनूप
कथा सुदिव्या उस रम्य रास की।
चखा कभी जान सका वही सदा
सुशर्करा में कितनी मिठास है ॥१५२।।
पर मुकर्जी
Mantra
नभस्थली में उडु-मण्डली जिसे
विमुग्ध अद्यावधि खोज है रही ।
उसी रसास्वादन के लिये अहो !
सभा रही हैं यमुनासमुद्र में ॥१५३॥
अन्तिम प्रश्न
बना धरा पै व्रज श्राज भी वही
कलिन्दजा की ध्वनि है वही वहाँ ।
परन्तु आकर्षक चारु चित्त का
रसाल रासेश्वर रास है कहाँ ॥ १५॥
चला गया क्या वह दिव्य लोक को ?
बसा किसी सत्कवि कंठ में कहीं ?
छिपा हुआ है अथवा सुभक्त के--
विमुग्धकारी हृदय-प्रदेश में ११५५॥
प.मकला
प्रसादाम्मोज श्री प्रसादरूपी कमल से उत्पन्न होने वाली लक्ष्मा।
टिप्पणी
(मङ्गलाचरण)
-स्मितामा मुस्कराहट की कान्ति ।
२-नोली कजाति इन्दीवर की नीली प्रभा।
प्रभात धी प्रात काल की शोमा।
मनसिज सखी कामोद्दीपन करने वाली प्रतण्व काम को सहचरी।
मूर्ति रति फो १ प्रेम की मूर्ति, २ काम की पत्नी की मूर्ति ।
५--निमगी झाँकी श्रीकृष्ण जी के गड़े रहा के सास टग की झांकी।
वह भदा जिसमें गरदन, कमर और पैर परा टेडे रहते हैं।
विविध सुखदा १ देहिक, दैविक और भौतिक सुयों को देने वाली । २ शारीरिक,मानसिक
और आत्मिक सुखों की देने वाली।
तन्मय भने तन्मय बने हुए।
उस भोरे के समान (अपना मान व्यक्तित्व ज्ञान भुला देते हैं) जो
(भ्रमर का ध्यान करता हुआ अपने कीटत्व को) भूल जाता है (अथवा जो फमल में बँधा हुआ
अपनी काठ काटने की कठोर वृत्ति को भूल जाता है)।
४-दिनमणि-सुवा यमुना ।
श्यामा कात राधारमण ।
प्रथित रस राम प्रणयिता
भूले भ्रमर सम
सुप्रसिद्ध रस रास रचाने वाले।
२- सुपराम्धा गाथा श्रुति मधुर लाये शिसिरिणी १ सुगो गे गधुर गा शिखरिणी छन्द वंशस्थ
वृत्तों में कही गई कथा को प्रगट कर दे। प्रोशिसरों धाली कल्पना सदेशजात श्रुति मधुर
गाथा को प्रगट कर दे।
टिप्पणी 2--विभूति (१) भभूत, (0) ऐश्वर्य। भभिन्न सयोग वियोग योगिनी (१) श्रीकृष्णा और गोपियों के सयोग और वियोग का एक साथ सुयोग लाने वाली । (२) भक्ति की अभिन्न मयोग वियोग वाली उत्कृष्टतम अवस्था का सुअरसर प्रकट करने वाली। नोट- एक तो इस पक्ति में भविष्य कथा का पूर्ण सोत है, दूसरे रियोगिनी संयोगिनी और योगिनी सुन्दरियों के साथ शीशा का भी वर्णन हो गया । २~-मृगाइ रेपा (चन्द्र पन मे ) कल करेगा, ( ब्राह्मण पक्ष में ) यज्ञोपवीत के समान पड़ी हुई कृष्णाजिन रेसा, (कानन पक्ष में ) मृगो के पद चिह्न की रेसा, ( नरेश पक्ष में) मृगया की अङ्क रेवा अथवा मृगमद-कस्तृरी--की अक रेसा । द्विजेश (१) चन्द्र, (२) ब्राहमण । नोट- इस छन्द के भी चार अर्थ है। प्रधान तो शरचन्द्र का ही वर्णन है। ३-दुग्धाधि क्षीर समुद्र । रजतानि मृग चाँदी का पहाड, कैलाम नोट--इसमें ग्रामनिवास, विष्णुनिनास (दुग्धाम्बुधि ), शिवनिवास (रजतादि गृह), और इन्द्र निवास (स्वर्ग) चारों की शोभा ब्रज में दिखा दी गई है। ४--माधरनी मघवा की (इन्द्र की)। वसुन्धरा भाल पनी पृनी के मस्तक की निन्दी वृन्दारक देवना। बनी छोटा जगल । नोट-'वसुन्धरा भाल फनी रसाल मी' का सन्धि विच्छेद करने पर 'सुन्धरा थाभा अलक नीर साल सी' भी पाठ हो सकता है जिमका अर्थ यह है कि उन्दावन नामक स्थल की चनी वसुन्धरा की थाभा (प्रकाश) थी, वसुन्धरा की अलक ( शीर्ष स्थानीय ) थी, वसुन्धरा का नीर (थार, तेज) थी, और पसु. न्धरा का साल (शाल वृक्ष जो अपनी उनति के लिये प्रग्यात है और जिमके विषय में कहा गया है.---'भव बन्धा को भेद गगन में उठने वाले शाल । प्रणाम' ) थी। २-निशत्तियाँ गिरा (सरस्वती), रमा (लक्ष्मी), उमा (काली)। निकाल दिन, रात, सन्ध्या ।
निलोफ पालोक लता तीनो लोकों में स्वर्ग, मृर्त्य, पाताल में-पुण्य प्रकाश की वेल के समान । त्रिताप . दैहिक, नैविक, और भौतिक ताप । तमारि सूर्य। समारितनया यमुना। नोट-यमुना जल में दिन म लक्ष्मी के समान उज्ज्वलता रहती है, माया में सरस्वती के समान रत्तिमा रहती है और रात्रि में पाली के समान श्यामता रहती है। इस तरह प्रज फी केली एक यमुना सीनो महाशक्तिया के बराबर यताई गई है। ६-विचित्र वायुत सात्विक, राजस और तामस वणों के समान रग पिरगे फल पत्तों श्रानि से युक्त। नोट-(१)यहाँ पन्ने के समान हरे पत्ते वाला और माणिक के समान लाल फलों वाला होने के फारण वट वृष मुरत मौन्दय समुद्रमार कहा गया है। (0) अपनी शुचिता और समृद्धि के कारण यह चरित्र साक्षी कहा गया है तथा विचित्र वायुत व्यापकता और साथ ही सार चरित्र साहिता के कारण ही यह चित्त चित्रमा कहा गया है। १० - ७--सुधांशु चन्द्र। रश्मि सुधा सुधार किरण पीयूप की अच्छी धारा। रस की रसालता (१) प्रेम का आनन्, (२) शगार की कान्ति, (३) यात्मा की अनुभूति, (४) प्रकृति काव्य की कमनीयता, (५) भाव का श्रास्वाद । 4-निसर्ग माहान प्रगति की मोन पुकार-शोभायुन वनश्री ने इस प्रकार उनके हदय को प्रारष्ट किया मानो बुला रही हो। रसा प्रथ्वी। है--निरम मिना नादल वाला। -शिगिपंच मोर पंच। तदिन चिजली। १२-प्रपाल मुंगा। १४-मागमेहामय मिलो की इन्चा ग्यो वाली। कहे गये पण म मुहष्ण जो आर्पणकारी होने के कारण ही जिनका नाम पण पड़ा। १५-समुद्भुत उत्पन्न । भागनियम जगन निममे शिवाम परता है वह, अर्थात श्यर ! पात मुधिग मोहिनी भक्त लोगा अधया सम्जाहदर्ग को मोतवाली थान। 'पिताई : पैतन्य की, मजाई। माम भरी कली मंत्र मयुक्त अथरा पारपंणरागेसामा से भगे। -
१६-मुपक्व विग्वाधर : पकी हुई कुँदम्प के समान लाल ओठ ।
मुवशनाता चांस के अच्छे फुल में उत्पन्न । वा नाम का वृक्ष अवश्य धन्य और कुलीन है
जिमसे ऐसी वंशी उत्पन्न हुई।
नचा रहीं सुस्वर नाच नाच के उँगलियाँ नाच नाच कर गग को भी मानो नचा रही थीं।
-सौम्य नेत्ररजक अथवा हृदयरजक ।
विभोर तन्मय।
निसर्ग प्रकृति।
१८-सुवराणा थी मधुरा सुवश सी वशी अन्छे बाँस की बनी हुई थी और (चाँस की बनी हुई
होने पर भी ) गन्ने के समान मधुर यी (इसमे यह विशेषता थी)। वंश का अर्थ घाँस भी है
और एक प्रकार का गन्ना भी।
सुवश रूपा मत्कुल की प्रत्यक्ष भूर्ति। जो भगवान के मुँह लगी, उसके कुल का क्या कहना।
प्रथिता सुवश में सुविज्ञ सज्जनों मे सुविख्यात ।
सुवंश संभ्रान्ति हरी सद्वशजात गोपियों की कुल-कानि छुटाने वाली।
सुवश विस्तारपरी मदन वाणों की वर्षा-सी फरने वाली । वंश का अर्थ है-याण, सुवंश हुआ
'अच्छा पाण अथवा पुष्प वाण ।
१९--जगत् पिता में जग ली हो गया उनके हृदय के सब भाव श्रीकृष्ण की ओर इस प्रकार आकृष्ट
हो गये कि वे कृष्ण-तन्मय हो गया।
२१-स्वरा युक्त शीघ्रता के साथ ।
२४-समाराध्य दूसरे लोग जिनकी आराधना करते हैं। असीम मौन्दर्य के कारण जिनकी गुलामी
करने को भी लोग तैयार हो सकते थे।
सभ्रम मान-मर्यादा।
सदान्म विश्वास अपनी शक्तियों पर भरोसा।
२६---विशक्तियाँ उमा, रमा,
ब्रह्माणी।
सुराधिका (१) राधा जी, (२) देवताओ मे भी अधिक महत्त्व वाली।
२७-भाव यह है कि चीरहरण के प्रसग में जो कात्यायनीत्रत किया गया था वह इसी
अभिप्राय से था कि उन व्रज-कुमारिकाओं को श्रीकृष्ण पतिरूप मे आनन्द दें। रास रच कर
भगवान् ने उसी व्रत को सफल किया था।
-~-पुनीत कैसे पन की धरा हुई ? इस पन प्रान्त को अपने शुभागमन में इस प्रकार पवित्र करने
का क्या अभिप्राय है ? अर्थात् श्राप लोग यहाँ त्यो आई हैं ?
-२-समुदीपन सवर्द्धन। मुखेन्दु लमा यि म रदाद की मुग्म चन्द्र पर पडी हुई दन्त क्षन की छवि से। मत चिन्ह, घाव। सति पूर्ति कमी को पूरा करना । 1" ६३.--ऐत दुफूल मैं जीव है, वे महा महिम परमात्मा है, इम मकीर्णता मय द्वैत-भाव के परद । व्यवधान भेद, विच्छेद, विभाग, परदा । नीतिमोर नाडे के फन्द छुडाना । दिखा दिया मोर सुनीविमान म कपडे घटा देने पर जिम प्रकार शरीरा का अभिन्न मयोग हो जाता है, द्वैत भावना हटा देने पर उमी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा का अभिन्न सयाग अथवा मोन हो जाता है। ६४+र्मुिरति किया सुरति शन्द-योग, योगिया का अभीष्ट जीव-जहा सम्मेलन । सुभोगियों की राधा कृष्ण की। सुरत किया दाम्पत्य सभोग । नोट- १०६. स ६४ तक कान, मन्दहास्य, मालिंगन, चुम्बन, दन्तहत, नपत्तन, नीविमोश और मुरत निया के रूप में प्रणित अष्टाङ्ग भोग यम, नियम, यासन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि वाले भष्टान योग को शोर भी समेत कर रहा है। - ६५-न काम की थी रति क्रिया (यापि ) रति क्रिया निकाम काममयी (सी) हुई (तथापि उसमे) काम की कुछ कामना न थी। कहावत है कि 'विकार हेतो मति विस्यन्ते येपाम् न चतासि त य धीरा । योगश्वरता इसी मे थी कि निकाम काममयी सी रतिक्रिया रहते हुए भी हृदय में काम की कामना अडरित तक न होने पाया । निकाम यथेष्ट । ६६-समाराधक राधिका बने अनुल नायक बन कर जो पहिले समाराधक थे, वे अर राधिका बन करममाराध्यहा गय। धनी समाराध्य नटेश राधिका जो राधिका रूप मे पहते आराध्य बनी हुई थी, वे अन कृष्ण बन कर समागपिका TT गयी। । ६७--प्रणयाभिमान प्रणय कोप। सयोगावस्था को और भी सुखद अनाने के लिये कृत्रिम वियोग के म जो मान किया जाता है-रूठा जाता है-उसे प्रणयाभिमान, प्रेममान, प्रणय कलह आदिमाते हैं छ ६.-निग्न्द्र होके बंध कर। इस सम्बंध में रससान का सुप्रसिद्ध मरैया पाठकों को विदित ही होगा। ६९-रमा राधा 1(कई स्थलों में राधा को भी लदमी का अवतार माना गया है। कुछ मथों में उन्हें भगवान् का वाम अश माना गया है, इस तरह भी हम उन्हें रमा कह सकते हैं। श्रीकरण के लिये राधिका जी परम रम्य थीं इमलिये भी वे ग्मा यही जा सकती हैं।) . सजा सजा सजा सजा कर। ५०-~केवलता। अकेलापन । कृपालु समप्र गोपियों पर कृपा करने वाले। ७१-समारोहण हेतु चढने के लिये। ७२-~ -माद में ज्ञान-कथा भरी हुई : राधिका जी को अकेली छोड श्रीकृष्ण का इस प्रकार अदृश्य हो जाना सामान्य दृष्टि में भले ही प्रमादपूर्ण अथवा अरसिकता पूर्ण जान पड़े परन्तु उसमें सद्- ज्ञान ओत-प्रोत भरा हुआ था, क्योकि इसी तरह तो भगवान अपने भक्त की अहंमन्यता का मिटाते हैं। विपाद ही में जिनका प्रसाद था मामान्य दृष्टि से भले ही यह जान पड़े कि भगवान ने राधिका जी को विपाद पूर्ण कर दिया परन्तु सूक्ष्म रष्टि से विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि इसी विपाद में भगवान का बडा भारी प्रसाद (आशीर्वाद, प्रसन्नता अथवा वरदान) निहित था। ७३-~-स भाव अपना गोपी-भाव । --विरेफ-गुजारित भौरे जिसमे गुजार कर रहे हैं वह । ०५---गोरस दान (१) दूध का टैक्स, (२) वाणी-विलास रूपी दान । रस प्रेम, आनन्द, शृगार-क्रिया, वाग-विलास आदि। नहीं यद्योगी रस-दान के विा (१) तुम्हे रस-दान देना ही पड़ेगा, (२) तुम्हे रस-दान अवश्य मिलेगा। ७६-या व्रत-म्नान विचित्र नम हो त्रियो ने धार्मिक भाव से जो स्लान किया था उममें विचित्र अधार्मिकत्ता यह दिखाई थी कि माड़ियाँ किनारे रख कर यमुना में नम ही स्नान किया था। एक तो इस अधार्मिकता का उन्हें दण्ट देना था इसलिये भगवान ने चोरों को अपर टाँग दिया था। दूसरे जब वे गोपियों श्रीकृष्ण को कान्तमाव से वरण करना चाहती थीं तो फिर उनके सामने नग्न होकर पाने में उन्हें ऐतराज ही क्यों होना चाहिये था ? फिर शारीरिक नग्नता तो विचित्र है ही, अमल दिगम्बरी रीनि तो श्रात्मा की नग्नता में है। ईश्वर के आगे अपनी आत्मा का गुप्त में गुप्त अग भी प्रकट कर दे और इमके लिये लोक-मर्यादा की भी कोई परवाह न करे, यही सन्ची दिगम्धरी रीति है। दिगम्बरी रीति (१) नगो की-मी रीति, (२) निस्सीम त्याग की परिपाटी, (३) पूर्ण तन्मयता की पद्धति, (४) लाक मर्यादा तोड़ने की प्रणाली । स्टहा इच्छा। ७:आये नष्ट हो गये। ७६---नया न मृदक्षण दोष है गहा (१) मैने मिट्टी साने का यह नया दोष नहीं ग्रहण किया है। (२) मिट्टी माना जगत को अपने में लीन कग्ना-मेरे लिय कोई नई बात नही है। विलोक (१) देस, (२) तीनो लोक जिससे निकले हैं (ऐसा मुस),(३) जो लास्य से भी बडा है-विशेप है-(ऐमा मुस)। ८०-~-तृणास (१) एक राक्षस का नाम, (२) बवण्डर । दुरन्त जिसका अन्त मिलना कठिन है। ८१-कनिष्ठिका छोटी उँगली । गिरिराज गोवर्द्धन । नाग है नया (१) कालीय नाग नाथ दिया गया है, (२) नाग वास्तव मे न था और न है । वार ता विपोपम जल को सुधा-मधुर बनान के लिये भगवान की एक लीला थी। नोट-इन तीन छन्दों म पिति, जल, नभ, पायक, पान वाले पांचा तत्वों पर भगगन् की विजय दिमान पाली लीनाओं या उल्लेग हुया है। छोटे से मुख के भीतर अस्विन प्रह्माण्ड दिसा पर, यवगढर रूपी मृणारत पर अपना माधिपत्य जमा कर, धधक्सी हुई धन पी भनि पीकर विपमय नल को थमन सार यना कर और फनिटिका गली पर गिरिराज को उठा कर उन्होंने प्रमश नभसम्ब,अनलतरय जनम लौर पृथ्वी सरन पर धपनी विजय दिसला दी है । गोपियों ने इन्हीं और ऐमी दी लीलाधों या परगण किया। ८२--पालयीर घलभद्र भैया। मुमार अन्दे भाय। पजेश लीना अगामिनी पना श्रीला की लीलामाया अनुकरण करन यानी पit | 3-पषिद (१) भूमि पर या दये परण चित, (२) मार-मार्ग य व रायगय संपत निक मारे भारत भगवान अनन्त यामुदेष की प्राप्ति कर सकता है। ८४-पदा पर चिन्द । ८५----तुद समाराधित मिय माधना गधा की ममागधिन माधा मिद । गयी, ग्याशिमगा गध्य उपेन्द्र न चुना। - werden , ७-विकीर्ण बिसरे हुये। कुमुम मिय-निया कुमुम प्रिय भगवान की शृङ्गार-क्रियायें। मूर्द्धन केश। यहाँ रचे कुन्तल कान्त कान्त ने यहाँ श्रीकृष्ण ने राधा क सुन्दर केशों का शृङ्गार पिया है। ८-रमा राम विराम सूचिका राधा-कृष्ण के विश्राम की सूचना देन वाली-क्योंकि उनमे इन इत्यादि की लपटें उठ रही थी। अलक्तकाका महावर के चिन्हों से अकित । -विपना विपत्ति में पडी हुई। घि-युक्त राका (१) राका शब्द के बीच में 'वि' लगा देन से राधिका शन्द बन जाता है । इसलिये श्री राधिका जी 'वि-युक्त राका' हुई। (१) गधिका जी राका-पूर्णिमा की रात्रि--के समान ही उज्वल, निर्मल तो थी ही, साथ ही व कई वातों में राका से अधिक विशेषतायुक्त भी थीं (वि. शब्द विशेषता ओर वुद्वि की ओर भी सकेत कर रहा है।) ११--भाव यह है कि “राधिके 7 सुन कर उन्होंने नेत्र सोले । शायद इस विचार से कि कृष्ण ही पुकार रहे हों। सामने मानवी आकृति देस उन्हें कृष्ण का भ्रम भी हुआ इसीलिये पहिले उलाहने के साथ 'मिले ।' कहा, फिर गोपियों की प्रारुति स्पष्ट होली गयी इसलिये उन्होंने शकासूचक 'कहाँ' शब्द कहा , फिर जब उन्हें निश्चय हो गया कि ये तो कृष्ण नही, गोपियाँ हैं तब "(हा) कृपण " पुकार कर फिर गिर पड़ी। १२-सुधास्रोत सहानुभूति के सहानुभूति रूपी अमृत के झरने। १५-निरन्तु वापा आँसू रोक कर (बाप्प आँसू)। १८-मही जिसे पा महनीय है यह पृथ्वी जिस मूर्ति को पाकर महिमायुक्त बन गयी है । २६--चलाइये चाल न घबरीक की एक फूल से दूमर फूल पर उडते रहने वाले रस लाभी चचल भीर की-सी चाल न चलाइये-न प्रचारित कीजिये। १००-पीक बदाम (१) इन्द्रियों का केन्द्रम्थल () इन्द्रिया और हृदय का धाम । १.१-प्रथित-प्रभा विग्यात दीप्ति । पुरातन पुराण पुरुप, आदि पुरुष, जगत्पिता। प्रिय प्रत जिसको अपना प्रण प्रिय है। पुलकाङ्गिनी पुलकयुक्त अगों वाली, अत्यन्त प्रसन्न । । पाणि पा कर कमल । , - १०२-धान्त थकी हुई। मर्शन मम्या दर्शन, पूरी पूरी झांकी। सदुक्ति उत्तम वागी, गेचक उक्तियाँ । सुधार दो हमे ठीक मार्ग पर ला रो। सु धार दो अन्छी पारा देगे। भाव यह है कि मदुक्ति से तो हमें सुधार दो और सुदिव्य सन्दर्शन में मौग्य सुधा सु धार दो। १०३-योगेश्वर योगिराज श्रीकृष्ण । ०४-पदा वक्त मुप कमल । थास्वगढल इन्द्रा असण्ड अापण्डल कान्ति सण्डिनी इन्द्र की समूची शोभा को भी नीचा दिया देने वाली। स्मेर प्रसन्नता, मुसुगहट । स्मर स्मेरकरी मदन को भी प्रसन्न कर देने वाली-मुग्ध कर देने वाली। वपुच्छटा बदन की कान्ति । १०५ सरङ्गिनी तरगों वाली, आनन्द-कल्लोल वाली । १०६ असग आसक्तिहीन, नि सग ब्रह्म । धनग मन, जिसके कोई अंग नहीं होते। धनंग कामव। अनग शिथिल, अङ्गहीन । भाव यह है कि गोपियो के मन की श्रासक्ति जब आमक्ति हीन ब्रह्म की ओर हो गयी तब फिर काम की भावना निश्चय ही शिथिल हो जाने वाली थी, क्योंकि पूर्ण काम ईश्वर की कामना कामदेव का क्या काम। १०० मुमग का रग कुमग उरमग दुर्व्यमन की गोद मे ( पडे हुय)। अपंग विक्लाङ्ग, सद्गति हीन । मीन या पुरग मातंग पतग भृङ्ग का (कुटग) मछली, मृग, हाथी, पतिङ्गा और भौरे की सी बुरी हालत । मीन स्वाद के लालच में फँमती है, मृग तान सुन कर मुग्ध होता और बहेलिये के हाय लग जाता है। हाथी पालन हथिनी की त्वचा की रगड मे चढता चला जाता और गड्ढे मे गिरता है। पतिद्गा रूप पर जल मरता हे । भोरा मुगन्धि के चक्कर मे श्रापर कमल में बँध जाता है। मनुष्य मे तो ये पांचो इन्द्रियों प्रपल रहती है, इसलिये उदि उसकी ग्रामक्ति लौरिक पदार्थों पर रही, सत्पनार्थ-ब्रह्मा-की ओर न रही तो वह इन पांचो जीवों की मी बुरी हालन को प्राप्त होता है । इस सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत का अन्यत्र कथित निम्नलिखित ग्लाक द्रष्टव्य है सत्सगका रंग।
ट कुरग मातग पतग भृग मीना हता पश्चभिरेव पञ्च । नर प्रमादी म कथ न हन्यते य मेपते पचभिरेव पञ्च ।। 1204-पर, पाणि, कटि ज्ञान, भक्ति, कर्म, प्रणिप्रात, परिप्रश्न, सेना आदि आदि के भी गोतक हैं। १०६--श्रीमुख का प्रसाद (१) मधुर वागी, (२) सौम्य दर्शन, (३) उच्छिष्ट ताम्बूल । प्रथिता प्रसिद्ध। प्रसाधिना शृगार पूर्ण, सज-धज वाली। $ - - ११0-तृपातुरा प्याम में व्याकुल । १11--प्रभागिलासी चन्द्र-प्रभा में जो विलास कर रहा था अथवा जिम पर चन्द्र-प्रभा विलास कर रही थी वह। ११३-हित-व्रती दूमरो का हित करना ही जिनके जीवन का व्रत ११४--इस छन्द का भाव यह है कि जो भक्ति की ओर भी निरक्त बनते हैं वे या तो पुरुपाधम हैं, विमूढ हैं, अकृतज्ञ हैं या पुरुषोत्तम हैं, मुनीश हैं, प्राप्त काम लोग हैं। भगवान न तो विमूढ ही हैं, न मुनीश ही। वे तो हम भक्तन के भक्त हमारे' कहने वाले सन्चे स्नेही हैं। उन्होंने भक्ति के चदले जो विरक्ति सी दिसाई है उसका कारण छंद ११६ में बताया है। ११५-पाम मैं वहीं मैं वहीं समीप में उपस्थित हूँ। अभिन्न है भेदक नाम रूप भी नाम और रूप ही एक वस्तु को दूसरी से विभिन्न किया करते हैं ( वास्तव में तो सन वस्तुये एक ही तत्व से बनी हुई हैं)। इसलिये नाम रूप ही भेदक हुये । परन्तु श्रीकृष्ण और गोपियों के सम्बन्ध मे तो ये भेटक नाम रूप भी अभिन्न हैं। क्योकि 'गधा कृष्ण' और 'गोपीकृष्ण नाम तथा 'युगल झाँकी' और 'रासा के रूप इम अनभिन्नता को सिद्ध कर रहे है। ११६-रस-पुष्टि के लिये गोपियों को भाव-वृद्धि के लिये, वियोग में प्रेम का अच्छा परिपाक हो जाता है, इसलिये। शक्य सम्भव। समूल उन्मूलन जड़ से उसाड़ना । थान्य साधारण कर्म असामान्य कार्य । भाव यह है कि लोकलज्जा सरीसे सुहढ बन्धन को जिस प्रकार कुल-वधू होकर भी तुम लोगो ने जड से उसाड फेका है वैसा हर काई नहीं कर सकता। ११७-अमिवा लहरी वाला।
ठ 118-रमे समी में सब की अन्तरात्मा में रमण करने वाले। १२३-सचेत जो थे जर शीघ्रगये चैतन्य जीव तो आनन्द-मुग्ध होर जड मूर्ति मे धन गये और जड पदार्थ उस राग-लहरी के प्रभाव से चैतन्य के समान हो गये। मालकोश से पत्थर का पिघलना, श्री राग मे सूसे वृक्ष का पूरा हो जाना, दीपक मे दिया का जल उठना, मलार मे मेघो का छा जाना प्रादि प्रसिद्ध ही हैं। १२३-लोला चञ्चल । लय-प्रालया लय का घर, लय का आश्रय-स्थान । सुगम्वना मधुर शब्द वाली। सुषशिका के म्पर से भिस था वशी के स्वर के साथ स्वर मिलाती थीं। १२४ लास्य स्त्रियों के नृत्य । प्रभेद छाये स्वर और ताल के ताल और स्वर के अनेक रूप व्यक्त किये गये। प्रतीत होता यही जान पडता था मानो। १२५--मुभाव सन्दर्शम नृत्य के ममय जो भाव बताये जाते हैं, उनका प्रदर्शन । १२६-यमण्य पुष्पावृत पुण्य भूमि की असभ्य दिव्य फूल यरमा फर उस पुण्य भूमि को ढक दिया। १२७-हुई विदेहा इस भौति तन्मया (१) ऐसी तन्मय हुई कि उन्हें अपनी देह तक की सुध न रही। () स्थूल शरीर-विहीन वे अप्सरायें भी उस रास में तन्मय हो गयीं। १२८–सत एक स हुए सिमट कर एक व्यक्ति के समान बन गये । ससार की उत्क्रान्ति ओर अपक्रान्ति का नियम । १३०–अभिन सयोग वियोग भाव (१) प्रेम की वह उत्कृष्टतम अवस्था जिसमें सयोग और वियोग का भेद नहीं रह जाता, (२) वह अवस्था जिममें मयोग के बाद वियोग और वियोग के याद सयोग इस शीघ्रता मे आता जाता है कि दोनों अभिन्न से जान पड़ते हैं। भक्तो के लिये यह परम वाञ्छित अवस्था है क्योंकि इस अवस्था में वियोग की पुट के कारण सयोग का मज़ा बढ़ता ही जाता है और गर्वाने ही नही पाता। हास विकास - १३२-पनी परिश्रान्ति महा फ्लाप्रदा गोपियों की थकावट भी अनन्त फलदायिनी बन गयी, क्योंकि इसी बहाने उन्हें 'आकर्षक अग सग का' अमीप्ट लाभ मिल गया। ---पतगता यमुना। १३५-छन्द फा भाव यह है कि शान्त यमुना जल में चन्द्र का जो पूर्ण विम्ब पड़ रहा था, वह श्रीकृष्ण के प्रवेश करते ही हिल कर टुकडे टुक्डे हो गया।
१३६-~मुगेहिनी मा मट्गृहस्थ स्त्री के ममान । १३७-तमारिजा यमुना । भागत-पतृ काममा उम नायिका के ममान जिमका पति अभी विदेशा में लोट कर श्राया हुप्रा हो। १३८----विशाल श्राकाश मुना भुला चुकी भाव यह है कि तरंगो के हिलने रहने में प्रतिनिम्बित आकाश भी हिल-हिल उठा। १३६ ----सरस्वती-ये सरस्वती नदी के ममान लाल रंग के। अनुरक्त धीर (१) लाल रंग की साडी, (२) प्रमासक्त चीर (क्योंकि भीगने के कारण यह शरीर से चिपक गया था इसलिये शरीर पर आसक्त-सा जान पडता था)। हुई ग्रिणी रविनन्दिनी यहीं श्याम यमुना मे जर रक्त माडी वाली रेत देह का सयोग हुआ तय प्रत्यक्ष ही त्रिनेणी की छटा था गयी। 'पद्माकर' की एक सवैया भी कुछ कुछ इसी भाव की है। १५०~-सिवार एक प्रकार की काली घास जो पानी मे ही वढती और बहती रहती है। १४१---दक्षिणता कुशलता। १४२--मिटा मिटा कर। यरोनियों पलकों के रोम । Mor - १४३- कपडा नम मसा शृगार रस मे सहायक सहचर । नोट-इस युग्मक का भाव यह है कि जल ने तामूल, कज्जल, पार भडकीली माडी के कृग्निम श गार को भेट कर लाल थोर, कजरारी प्राग्यों और प्रभापूर्ण सुगढ़ अर्गों का स्वाभाविक सौन्दर्य अच्छी तरह प्रकट कर दिया। गोपियाँ श्रीकृष्ण के सामने अपनी स्वाभाविक माधुरी ही प्रक्ट करना चाहती थीं न कि कृत्रिम । इसीलिये जल नर्म मसा के समामुसमय सहायक जान पड़ा। १४१-सेकत तोला किनारा। १४६-अभिान्दनीय चन्दनीय, प्रशमनीय । निशक्तियों से बद के उमा, रमा, नमाणी--मे भी बड कर। १४५-मुनीन्द्र-यन्द्या मुनीशों की भी वन्दनीय । १४E---कन्यका कैलि न देष वे सके श्रीकृष्ण के माय अपनी कन्या यमुना को क्रीडा करते हुए देगना उनक लिये मम्भव न था, इसीलिये सूर्य भगवान उदित ही न हो सके ।
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