Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Nizaranno

Satya Prakash · 2011/03

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निजराणो सत्यप्रकास जोसी री कवितावा

राजस्थानी सिरजणधारा-अक
R
संदी

सत्यप्रकास जोसी री कवितावां सम्पादकः चेतन स्वामी

राजस्थानी भासा साहित्य अव सस्क्रति अकादमी, बीकानेर
भोल: साठ लिपिमा
मामानी मा. सा. स. अकादमी स कानी छपी/पलो सस्करण-1990/समटा इधकार : अकादमी रा/
मावरण : अमित भारती/मुक : साधला प्रिष्टसं, मुगन निवास, चन्दन सागर, बीकानेर
NIZARANNO (Poetry) by Satya Prakash Joshi Edred by Chetan Swami
Rs.60.00

प्रकासक कांनी सूं राजस्थानी भासा, साहित्य व संस्कृति अकादमी, बीकानेर रो थरपणा र पर्छ सू ई पोथी प्रकासण रै मत उदासीन रवैयो रयो । अकादमी री धी कार्यकारिणी अर सामान्य सभा इण रवैये माथै गभीरता सू विचार कियो भर चालू रोकड वरस में की पोथ्यां छापण रो निरण लियो है । इणी निरण र तहत राजस्थानी रा चावा-ठावा कवि सत्यप्रकास जोसी री टाळवी कवितावां री आ पोथी 'निजराणो' पाठकां ने निजर कर रैया हो । राजस्थानी समकालीण कविता र छेतर मे श्रीजोसी अक नूवी भाव भूमि त्यार कीवी है जिकी कविता री असल पिछाण रै रूप मापार सांम्है है । जोसी रो भासाई सिल्प तो घणो रळकवां है। राजस्थानी अकादमी थीजोसी रो टाळवी कवितावां रो ओ संग्रह 'राजस्थानी सिरजण धारा' प्रकासणमाळा र पलड़े पुसबर रूप प्रकासित कर रेई है। सिरजण धारा योजना में केई दूजी पोथ्यां ई वैगी ई पाठकां रे हाथों मे होला। पतियारो रासा ओ "निजराणो' पाठकाने दाय आवला छारडी, 90 वेद व्यास अध्यक्ष राजस्थानी मासा, साहित्य व संस्क्रति अकादमी बीकानेर, (राज.)

विगत
• संपादकीय दौठ7
• सत्यप्रकास जोसी री कवितावां
पला पैत 14, बदनामी 18, व्याव 20, विदा 24, जप 25
• दीवा का क्यू
गीतां रो जस 32, सोवन माछळी 36, जागण रो गीत 37, जीवण रा दीपा 38
.बोल भारमली
अपरच 42, रूप 46, सावो 47, सवाग 49, जाळो 52, विराग 56, अडवाणो 57,
प्रीत 59, आप 62, साख राजा मालदेव री 64, सास राणी उमादे 65,
अंताखरी 67
• गांगेय
तलाक री तांत 70, बाप रा व्याव में बेटो विनायक 74,प्रीत रो पराछीत 78,
फूलो मरां तीरां मरां कोनी 82, मां पारी गोद निवाई में 84
.मागत-अणगत
अगवाणी 90, ओळख 91, उतारो 92, मौत 94, जामण नै....98, जामण में 99,
धीयां ने 100, पर 101, कचरा री कांण 102, भूगोल रा बंद 103
• आहूतियां
वन 106, संभावना 107, कल्पना 108, बाळपण 108, भरोसो 109, हरख
110, पाप बोध 111, त्याग 112, प्रेरणा 113, तिरस 114, संकोच 115,
उपज 116, खेम 117, गाढ 118, ईसको 118, बस्ती 119, न्याव 120,
आजादी 121, प्राथना 122
• पुजापो
सनेसो 124, थे ही 125, बोलो 125, मिलण 126, कामण 127, हठ 129,
लोरो 130, माध्यम 130, हरख 131, परस 132, बस्ती 133, कुण 134,
भूलणो 135, पुजापो 136

संपादकीय दीठ फगत हैं ई क्यूं, अक मोटो राजस्थानी पाठक वर्ग है जिको सत्यप्रकास जोसी री कवितावां बांच बांच ने फेर बांच भर जिती वार बाचं निरवाळी अणभव हेमाणी अंवेरै । घणा निजू क्षणा में जोसीजी री कवितावां रा नैना टुकड़ा आपरी खिमता रा नगारा धमकावं । ऊमर रैपरवाण न्यारा अरथ संदभार साग ऊभी होवै- कवितावां। इणनं अक कवि री घणी मोटी अर गीरबजोग हांसल कंवा तो कठे ई असंगत बात नी होवे। जोसीजी कनं कविता रो जिको 'क्लासिक फॉर्म' है वो नी 'आज' सूं जुदा है, नी 'काल' सूं अळगो। कविता में जिकी खास चीज होया कर-मायलो लगाव, उणरी अपड़-पकड़ जोसीजी कनै खूब-खूब । लयकारी रै नतं, आनुप्रासिक वधेज तो वारी हरेक कविता री पंगत- पंगत मे सैचरूड होवे। लोक मानस रा इण कवि कनै आपरी सबदा- वळी है-जिकी जमीन रा लोगां तूं जमीन री वाणी में बोल-बतळावै । 'राधा' सूं 'पुजापो' ताई री काव्य जात्रा में भलाई सिल्पगत बदलाव आपनि निगं आवं पण वार रचनात्मक मूल्या रे 'इन्प्रेशन्स' में कठे ई फोर-बदळ नी दीखे । हा, मौतिकता रै खोड (जंगळ) रो डरावणोपण जोसी रै कवि ने ऊमर र इण पड़ाव पूगतां, ज्यादा 'प्रोडेक्टिव' बणा देव । भौतिकता र प्रसार रा विरोधी नी है जोसी- पण, वै उण विरती रा घोर विरोधी है-जिको मिनख री देह सूं काळजो काढ लेवैवान लाग के विग्यान री वेगवान बिरती लोगां रा काळजा काढ रई है अर वांरी कवितावा रा हथियार लोगों ने काळजा विहूण होवण मू रोक रंया है। बारी इण समस्टि समझने ऊपर-ऊपर सू जोया लाग के वे कोई स्पयादी गौदर्य बोध रा कवि है पण वारी रचना में करें ई व्यक्तिगत 'आणंद अर धाप' जड़ी प्रवृत्ति नी है। वे समाज साग प्रत्ति र जड़-चेतन री गनो (रिम्ती) दरई नी भूल पावै। ई वांरो सोदय बोध है। काव्यकला में मानवीय मूल्या रा हिमायती जोमी, रागन्देश हरा- सोग न काम-क्रोध जंडा मनोविकारां ने मिनरारी संग्या सू जोड र देश अर वार बीचला अन्तविरोधारी पडताल ई 'अहंवादी' होयन ना करें। पाच दसका रं काव्य जीवण में जीमीजी रै कवि ने 'व्यक्तिवाद सू कोई खतरोनी होयो, वारी आम्था अर सौंदर्यबोध दीठ हरमेग नैतिक- सासता जीवण मूल्यो र परा मे रई। सत्यप्रकास जोसी अक लावं असें ताई मच रा चावा कवि ईरया है इण वास्त 'मंच संस्थति' रारातरा सूर्य ई गेईज (अमित) सके हा पण अंडो कुजोग नी मधियो अर व आपर कवि र ऊजळे अर अबोट मिनय री रिछ्या करती । कयो जाये के कला र मानवीयकरण सू मिनखा री भावनावा नै तिरपती मिले। अक कढा-जीवी सारू इण सू मोटो निजराणो कोई होवे, के वो आपर काम सू भावनावां रो विकास कर, जिको हर भांत-समाज र विकास सूं जुडघोडो हो। लग टगे आजादी रे पछ सूं सरू होई जोसीजी री काव्य जात्रा । हिन्दी-राजस्थानी मै छुट-पुट गीतारै साग ई वारो राजस्थानी जगत मांस धमाकेदार परवैस होयो। धमाकेदार इण नत के आजादी रा गीत गावणवाळा कविया प्रयोजण धरमो काव्य माय कविता आपरी पिछाणगत अनुरंजनी चर ने कई लुकायां बैठी ही~'न कान्तमपि- निर्भूषणं विभाती वनिता मुखम् (वाल्ही घण रो मुंडोई बिना सिणगार तो अलूणो) । मंच र खंदोळयां चढनै कविता उण वगत फगन भाव ने भूल विचार न झाता देय रेई हो। या पर्छ की लोग पारंपरिक वीर रस के सिणगार राई रसिया व रैया हा । राजस्थानी कविता जिण भासा अर मुहावर रं दब ढल रई ही उण ने 'समकालीण समझ' अर 'तरास' गेले लावण में जोसीजो रो सिरै हाथ रैयो। मंच जोसीजी रोई की दिनां तांई माध्यम रैयो पण वार खातर कविता फगत मन बिलमाऊ रिगल नौ रैई, 4 इण नै महताऊ क्रियेशन मान्यो अर मंच रो इस्तेमाल ई उण दीठ सूं करयो । स्वर से प्रभाव घणो चिमतकारीनं वसीकरण जड़ो हो । विचारक कॉडवेल रो ओ मानणो वाजब ई है के 'कविता रो सनमन उपेजो करण वाळी मैणत सू ई होवै।' कविता मिनख ने संस्कारित कर अर उणरो वैचारिक नै भौतिक विकास ई करें । मिनख रो मणत सूं रिस्तो नै मंणत रो लय तूं संगोठो अर लय कविता री सिरै जरूत । जोसीजी कवितार इण आदू गणित नै विसरायो नीं। लोक री सांस्कृतिक चेतना ने जगावण सारू जिण ढव अर सिल्प री जरूत होवै वी जरूत नै जोसीजी खास-खास मंसूस कीवी अर लोकगीतां रै सलूण सिल्प नै आपरी कविता रो मुहावरो बणायो। लोक साहित्य री अद्भुत सम्प्रेसणीय सगति नै भोळखी अर उणरा व तत्व जिका समाज ने समाज र आखा कारज बोपारां सूं सैमुडे करे-जाण लवणा किणी साधना सूं कम नी है । लोकगीतां रे सिल्प नै अंगेज लेवणो तो फगत चतराई रो काम होय सके पण वारी 'पूग' (एप्रोच) री बुनियाद लग पूगणो सहज नै सहळो काम नी है । लोकमानस र इण चितर ने लोकगीतां रो पॉवरफुल कन्टेन्ट हर रचना में अखरावणी देवतो रैयो। 'राधा' भारतीय साहित्य री बेजोड काव्य क्रिति है। यू तो राधा किसण री हेजाळू वायेली है पण जद वा आपरै 'कमगर' हाथा सूं मांत- भांत रा घरू काम कर तो मैणत री पूतळी ई लाग अर मैणत ने ई वा पूजा जाण । श्रम र पछै रो सुख, उणर रूं-रूं तूं दुळे । सुस-सौरप सारू राधा अकली धणियाणी वणन रो मतो नी राखे । क्रिसण जे सुख रो लेरको है तो, वा चावं इण लेरके सूं आखो जगत आपरा प्राण सरसावे । राधा आखा जगत ने आपर आवर्ग सांस्कृतिक सरूप साग सरस- सलूणो देखणी चावै । क्रिसण सूं जगत नै विध्वंस सूं बचावण सारू हाथ जोड़-जोड़ न जुध जैडी मुरी विरतियां परिया राखण री र ई इण काव्य रो असली मकसद है । क्रिसण सिरजणकारी सगतियां है ने राधा जीवण रा सांस्कृतिक मोल । जोसीजी रे इण काव्य सं जिको अमर पारस्थितिकी' चेतावणियां प्रगासीजी है, वे आज पल पल किती जरूरी बणती जा रैई है इण ने आपा सहज ई समझ सका। 'दीवा कापै क्यू' रा सगळा ई गीत सत्यप्रकास जोसी री सरूआती पिछाण रा लोवडा थंभ है । कविता री सासताई रा पक्का प्रमाण में गीत मिनखरी उण अबोट घणियाप रा गीत है जिकी निरजीव बीजा में प्राणां रो संचार कर नै जिकी इण रुपाले संसार री धड़कना नै आपरै माय धडकावै । गीतारै जस रा बखाण तो चाव करियां ई जावो क्यू के गोत ई तो होवै जिको रैणादे रे खोळे सोनल भांण जलमा अर अंधार री ओवरियां ग्यांन री पीलजोत जगावै। सर्वद, विचार, भावनावां री भेळप सू कविता रो जलम होवे । हिड्दै अर मगज रो ताळमेल जठ क ई टूट, कविता रो अकांगी होय जावण रोखतरोई बध जावै । सबद छिणी ई पोरवा री आंख सूं मूरत नं घई । भौत जिको अणघड पडयो है, भोत जिको कयो नी गयो है, सबद ई तो उण मून ने भाग, अणघड़ ने तरास । अमूरत नै परगासण वाळो सबद जद हिड्दै अर मगज रा देळी-दरजा डाक ने अवतर तो गीत रै उणियारं आपार सांम्है हो । गीत जिण मे मानखो जीवं जलम, गीत जिण स समाज जागं । इण खातर जोसीजी कंव-आवो रे कविया म्हारे साथ रे, जुग ने नूवं गीतां सू घेरल्या।' 'वोल भारमली है तो मेक इतियास कथा पण इणन खाली इतियास री घटणावों रो बखाण ई नी कय सका। नी ई इण नै सन-सम्वत रे मत सतरवी सदी रे राजस्थान इतियास री ओक घटणा ई कय सका। भारमली जोसी रे कवि री 'नारी' है अर उण सूमिळणवाळा पुरुस ई जोसी रा पुरुस पात्र है। वोल भारमली सिस्टीरोधड़त करणवाळी नारी रा सवाला रो काव्य है। ये सवाल जिका भूतकाळ सू अवार पडू तर री उडीक मे उभा है। नारी अर उणरी मरजाद, पुरुस अर उणरा करतब, इण ₹ ओळे-दोळे इण काव्य री कथा पूरी नी होय जावे। भारमली रा सगळा बैवहार र पछ जिकी भारमलो पाठक रे मन मे जलम वा जोसी री 'राधा' है, 'भारमली' है, 'जयत्री' है, नै कवि री सर्वाग मानवीय स्त्री पात्र है । जोसी रो फगत इण भेक पंगत में नारी रो मानवीकरण होय जावं के~'थे दूजी कुदरत हो विधाता री, पैली कुदरत री खोमियां पूरी करणवाळी ।' 'गागेय' महाभारत र पात्र मोस्म माथै काव्य है, पण 'राधा' अर 'वोल भारमलो ज्यूई नर-नारी सम्वन्धारी पडताल ई इण काव्य रो अभीस्ट है। कवि साहित्यकार समाज विग्यानी ई होया कर है। जन विरोधी सस्क्रति, सडी व्यवस्था रो प्रतिकार ई उपरो लक्ष्य हो । समाज में नर अर नारी दोय सगतिया रे जमू होवे पण नारी र साग लगोतार माड़ो वरताव कियो जावणो क मोटी सगति री अवमानना है~~-जिणरो परिणाम महाभारत रे रूप मांम्है मा । महाभारत में मारतीय समाज विकास अर बदळाव रा सोजई साध। कविता री मनोभूमि ई समाज री मांगली अर बारली सत्ताबा संन्यारी मी होवे-उण में कथ्या जावणवाळा आखा भाव समाज री स्थितिमा नै ई पड़विव करें। नर-नारी र सनमन री कथा महाभारत, विग्यान र इण जुग पूगतां ई कितरी प्रासंगिक है, ओ बतावणो ई मूळ धेय रयो है जोसोजी रोन के महाभारत रा अवांतर प्रसंगा ने फगत रास देवणा। मरती वेळा गांगेय मात सत्ता रो सिवरण कर, ओ सिवरण ई या रोगारीरी घटती मरजाद रो अवोट पिछतावो हो।

तकनीकी जुग अर मिनखां रे सनमन रो काव्य है 'आगत- अणागत'-यांत्रिकतारै खोड़ में मिनख जैडो संवेदणसीळ प्राणी गमतो जाय रयो है । मिनखरी आंतरिक पिछाण, उणरो सौंदर्य बोध, आपोपरी रो लगाव, दीठ-मोठ रो फरक, स्सो की बदळ जावला तो कांई मिनख फगत अडव ज्यू होयन रेय जावला? इणरै चलते समाजू संस्थावा टूटती ई जाला तो उणरो छेकडली परिणति कांई होला ? अंडी ई चितांवा इण काव्य में दीठीगत होवे । मिनख इण भौतिक दौड़ (जिकी जरूरी होवे पण उणरो अणूतो अटावरोपण मिनख ने खंडित ई कर) मे भाजतो उपथग्यो हो अर अमूंश'र विसाई खावण सारू कैवै । छिण अक धरती ने थामो-थामो म्हने उतरणो है।' 'आहूतिया' आपरी तर रो अक निरवाळो काव्य है। राजस्थानी में प्रक्रति, प्रगति, भगति, नीति निरा ई काव्य लिखीज्या पण 'सम्बोधनात्मक' सैली में लिख्योड़ी से कवितावां किणी ई भासा मे अंक अद्भुत प्रयोग है। कवि समतामई संसार सारू प्रक्रति अर समाज सूं आपसी गनो रासणवाळी हरेक चीज, हरेक भावना रो आव्हान करें। कवि री चेतना सूं ओ ई प्रगासीज के सौंदर्य मिनख री चेतना सू अळगो होय जावला तो उणरो अरथ काई रेय जावला? मिनस सूं जुड़या ई भौतिक मौंदर्य-मोला मे वदळे। मिनख रा कारज अर उणरै सौदर्य बोध मे गैरोरिस्तो होवे। इण सातर ई तो कवि चराचर नै आहूत कर अर कंव-आवो, 'इण ब्रह्मांड में सिरजां देव सिमटी रा । जुग!" प्रेम, भगति, आराधण री कवितावां रोई दूजो काव्य है 'पुजापो' । प्रेम में निर्वयक्ति री भावना, भगति में लोकमंगळ री भावना होवे तो कविता 'मतर' री ओपमा पावै । इण आराधण में रिसीरे सैजोड़े ई हो कवि । वैदिक सूत्रां रो रहस ई महज ममझ में आवै । वाणी र इण निराकार साचन कविता, मतर, सम्मोहन चावं ज्यू अभिहित करो, उणरो मूळ लक्ष्य तो कई होपै-लोक कल्याण री भावना । जोसी रोसनेसो इण वात मारू कविणासरीपरविरतियां न फगत प्रेम सूई टायी जा मक-अठ ओ सनेमो घणो समीचीन प्रतीत होवे । संसार अधार जिण स्थितियां सूं रूबरू होय रेयो है ये कितरी घातक है- इणरी कल्पना कवि जडो जुगद्रस्टा नी फरेला तो कुण करेला । सत्यप्रकास जोमी रो मूल्यांकन आपां राजस्थानी ऊजळ भविस रे रूप में कर सका हां। राजस्थानी कविता ₹ इण विराट कवि र स्वास्थ्य रीमंगलकामना करां। चेतन स्वामी

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कोई इण विग्यान रा जमाना में मिनख रो
अंत होयग्यो ? काई विग्यान मिनख री देह
सू उणरो काळजो काढ लियो अर उणरी
मावना रो विणास कर दियो; जिण तूं के
आज मिनख र वास्तै कविता री की दरकार
कोनौ। कोई मिनख ₹ जीवण सूं आज दुस,
दरद, हरख, नेह, उछाव, आणंद, क्लेस,
संताप अर मोह-परीत इत्याद मायनावां लोप
होयगी; जिको आज कविता रो जमानो
कोनी। हर जमाना रो मिनख आपरं सारू
जमाना रे मारफत ई कविता निरमाण किया
करें।
राधा
1960
• पैलापल . यदनामी • ग्याय
.बिदा
. जुध

पैलापल
पून पालकी में बैठया
मुरली रा झीणा सुर
म्हारा नांव ने
कूट-कूट में गावै
कण-कण रा कानां में गुजावै,
जमना री लैरा म्हारा नाव नै कळकळावे,
ठेट समदर री छोळांलग पुगाव,
रूंखां रै पानडां रा होठ
म्हारा नांव नै गुणगुणावे
कोयल नै सुणाव
पण पैलापैल
सुगणी जसोदा रा जाया!
यूं म्हारो नांव पूछियो;
लजवंती लाज
म्हनें दुलेवडी कर न्हाखी
दो आखरां रो भोळो-ढाळो नाव
म्हारै मूखते कंठा
पोयण में भंवरां ज्यूं अटकग्यो,
म्हारे होठां री लिछमण-रेखा में
वैण जानकी दाझण लागी
थू म्हनै घणी-पणी यातां पूछी
पण मुगणी जसोदा रा जाया !
म्हारे मुरंग गाला रं कमूमल म्हैला सू
रजयंती राणी
नी उतरी मोनी उत्तरी
गायराम जोगीरीशवितावा

आज अणचितारयां अणवुलाई, अणचीती सी अलेखू बार दौड-दौड आऊ थारै दुवार तो ई नी अछही आस पूरै नी सवाई साध पूरै रे म्हारा कान्ह कामणगारा ! पण पैलापल अचपळा कांन्ह कंवर ! थू म्हारो अवोट पुणचो पकड मुरंगी जमनां रै कांठ उण कदंब रूख र पसवाई म्हार नैणां में टुग-टुग जोवण लागो, थारै कोडीले हाथ रो निवायो परस म्हारै रं-रुं में झणकारां रा झाला मारण लागो रगत नाडियां में जाण पाळो जमग्यो; आख पंथ, आख मारग, पगां में भाखर रो भार लियां घणी दोरी चाली आज थार-म्हारै परसेवा में कोई भेद कोनी, माठ कोनी, थनं म्हारी पलकां सू वाव दुळाऊं तो म्हारो पसीनो तो आप ई मूम जावै पण पैलापल हेम रै उनमान धारा ठाडा दरस सूं निजराणो म्हारा पसीना में जांणे आदण लाग्यो यूं पीतांवर सू म्हनै बाव करतो ई गियो अर म्हारो पसीनो नणां-नणां, पलकां-पलका अर रुं-हं सू उफणतो ई गियो आज जमना सगळे कांकड डाडीमार्थ मुळकती मिमजरियां जांणै म्हारी मांग रो चितराम पण पैलापैल म्हारी मांग सजावण ने अमर सुहाग रै खातर थू मिमजरियां रा मोती लायो, तद म्है छळगारी लाज रे फरमाण, माथो ऊंचो कर लीनो; डांडी-डांडी मिमजरियां रळगी, कांकड़-कांकड़ मोती रळग्या आज अंबर रा लिलाड माथै चळापळ तारां री अणगिण दीकियां पळपळावे, चमचमात्र, मुळके पण पैलापल जद यूं म्हारै आंटोले भंवारा बीच रतनाळे हीगळू री टीकी देवण लाग्यो तो म्हैं छळगारो लाज रै फरमाण भायो नोचो कर लीनो म्हारी मुरंगी मेंहदी रै उणियार 16 सत्यप्रकाम जोसीरी कवितावां

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बदनामी
छान क्यू मिळू
म्हारा कान्ह छांनै क्यू मिळू ?
थारी मुरली
म्हारा ई तो नांव ने
धरती आभ में सरसावै;
वरस जुगां री छली माठ लग पुगावै;
कुण नो मान ?
कुण नी जांण?
तो छान क्यूं मिळू
म्हारा कान्ह छांनै क्यूं मिळू ?
नगरी-नगरी, हाट-हाट, गळी-गळी
लोग म्हने जाण,
थारी-म्हारी सूरत पिछाणे
अकजीव रा ओ दो इदका रूप
कुण राधा, कुण गोपाळ !
ओ जमना रो नीर अथाग
थारा नै म्हारा भेळा भाग
रुंसा रा सगळा पनि थन जाणे,
म्हन हर फूल हर कळी पिछांणं,
तो छांने क्यूं मिळू
म्हारा कान्ह छांने क्यूं मिळू ?
यो आभो घरती ने चूमं
वे जगनां री लेरां सागर सू सूम
18
गायत्रकामचोसो रो कवितावां

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ब्याव
नी कान्ह ! नी
थारो-म्हारो ब्याव कोनी हो सके !
म्है विरज री अक गूजरी
थारी जान री किण विध खातरी कर सूं
दायजो कठा सू ला सू !
जणा-जणा रो मन किण विध राख लूँ !
सासरा ने कियां केवट स !
नो कांन्ह नी
थारो-म्हारो ब्याव कोनी हो सके !
दूर देस रा राजम्हैलां में
कोई राजकंवरी
सपनां रो संसार सजाती
थारी माग उडीकती होसी
थारा चितराम कोर-कोर
दूतियां न दिखाती होसी;
कामण करती होसी
थारा राज सूं
मोटा सिरदारां री जान
आगलै गढां पूगसी,
साम्हेळो जुड़सी
डेरा लागसी
नगर री ऊंची हवेलियां रै
झरोखां सूं
कामणियां फूल गेरसी
सत्यप्रकाम जोसी री कवितावां
20
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मनागम
मामanti
पुरमा
मिमी.
rem Kr-gar
गूसरा नाममा भाग
Briti iraगी।
नीना!नी
पागमा मापानी गां!
गारंटसागविवारी
पटापट भरोगमा
सान में गिपटमाटी,
हिरी-गी राही,
मोबदमागण
पार हाया हरण पारया रो
सामना करती होगी
आपीर पंग
यदिपार मंचर में
यूं उणनं उमा लामो
परणवा रा फोडीला दूगा पतगा.
आपरी मांग गुगवा देग,
रोरा अर अपमान रीताको सवदता,
निजराणी 21

थार लार अजेज वार चढसी, पण य आपर आपारे पाण पूनगत रथ माथै हाकां-धाकां उण कंवारीने थार रंग म्हैला ला विठासी नी कान्ह ! नी थारो म्हारो व्याव कोनी हो सके ! वीनणी तो जीतणी पड़े गऊ-सी किणी किन्या ने जीतवा सारू केई राजा भेळा होया होसी से आप आपरै भुजदंडां रो वळ आंकसी कोई धनख तोड़णो पड़सी, के कोई निसाण साघणो पड़सी, के वळे कोई अणहोणी करणी होसी थारी भुजावां रो वळ कंवारी किन्या रे घरवाळा रो प्रण पूरो करसी; अणजाण किन्या अणजांण सूरवीर र गळा में वरमाळा पूरसो; पुरोहित मंत्र उचारसी, कड़वो मंगळ गावसी, मावड़-बावल हरख रा गीत गवासी, खुसियां रा ढोल बजासी; छेला मौरत तांई हारघोड़ा मनहीणा राजा घमसाण मचावसी वाने भरपूर हरायां सत्यप्रकास जोसी री कवितायां 22

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थन म्हारो अंस बणायो,
थारा दुख में दुख जांण्यो,
थारा सुख नै सुख मान्यो;
थारी रीस आदरी,
थार मनावण रूसणा करया;
घणी रीझी, घणी खीजी;
थारै जीवण री
थार वधण री
कामना करी।
थने रेकारो देती-देती
अवै 'नाथ' कियां पुकारूं?
नी कान्ह ! नी
थारो-म्हारो व्याव कोनी हो सके !
ओ तो थारो थारा सू
नै म्हारो म्हारा सू ब्याव हो जासी ।
विदा
आज यूँ मथरा जावै
भलाई जा,
म्है कद रोकू।
थार मंगळ पंथ रो अपसुगन करूं कोनी,
थारा दुपटा नै खैच खेंच फाड़ कोनो,
निस्च जांण,
हाथां रै लूम-लूम थारो चन्नण उतारूं कोनी
सनेसो भेजण री उतावळ करूं कोनी
आज थू मथरा जावै
अकर कुंज में चाल,
24
सत्यप्रकास जोसी रोकहिताना

मनोग
मामन निमा
पादा
CR गमियान
पार REMus
मनाना
परमगन मना
संगो गणमिती पा
पग पग मागमा
मुरलीग मार
सुपर मोती शाम
पाकिनियो गोगम
टे-माग गनिमान
जोर्गनगार पानपराग,
अंचमी पनि यानी कर
गोगर या माग
मारी माय
ज-जपान हापा गनिमांग है
-टेगर गमनमाय मू
एमपरा गिनी
सो पागधीरानं
गाजी मापन यणा राग ।
जुष
मन ग मौत मांदारे-
पर-घर गू भाजी आई गोपियां
निगराणो 25

जमना र काठ रमल्यां राम, नटवर नागर, अकर बजादै थारी यांसरी मन रा मीत कांन्हा रे- पिचरंग घाघरिया घेर घुमेर, ओढण ताराळी बोरंग चूनड़ी वांया मे वाजूवंद री लूम, पगल्यां में वाध्या विछिया वाजणा आभा मे पूनम केरो चाद, आकळ उडीक थारी गोपियां मन र मीत कांन्हा रे- मिमरियां भरद वांरी मांग, हाथां रचादै मेंहदी राचणी, मुळझादै उळझ्या कंवळा केस फूलां सजादै वेणी नागणी, अतस में भरद गरो हेत, नैणां मे भरदै सुरता सांवळी मन रा मीत कान्हा रे- गोयर सूं काळी धेन उठेर, गोहै उडीकै साथी गवाळिया मटकी भर माखण लीजै चोर, मावड़ ने देस्यां मीठा ओळमा पिणघट-पिणघट गागर दीजै फोड़, रस में भीजला कोई गोरड़ी लुक जास्यां कंवळां केरी आड़, थारै मनावण करस्यां रूसणा आवली सावणियां री तीज झूला घलादयां वेगो आवजे मन रा मीत कान्हा रे---- नवी मुणी रे म्है आ वात, सत्यप्रकास जोसी री कवितावा 26 यसो गामी पाप ini Ti मग मुनीमजा मरना गोपामा पागा-गा THE in मी गानाar. पापनमा मोगirl गर्ममार पानीपम: मनगीनामा.... अजपागोगा, गमा मोवन पर यामी! पाज पर रन्मिाना, पारगोना। मीनमाणमा मी पगारागार माग ग! गुगली पनरो रिमोगमा भागीया पगे। ཀ vi in Tis iབག जग में मंत्री गगासनो भाई पर भामरगी बार आपग में गरमी मगनी, गानगी मटमा फोटंना गाळा आहे, अगर गुगण पारी गोपिया पाणिया विामी योग पगार, पुणतो उगी धनां दागी पिपी प्रणा ग होगी होणा- टावर महागी विना वापरा गुण करगी पीढ़ियो गे न्याय, कुण तो मरवी पारी पाळगी ! निगराणो 27 अणगिण मावड़ियां देसी हाय, मुडजा, फौजां ने पाछी मोइल मन रा मीत कांन्हा रे- जग मे जे मंडग्यो घमसांण, तो कुण तो वणासी सतखड म्हेल, कुण तो चिणासी मंडी-माळिया ! कुण तो उगेरै मीठा गीत, कुण तो वाचला पोथी पानड़ा ! कुण करसी गोखडिया मे जोत, कुण तो माडला आगण माडणा! कुण तो मनावै चार-तिवार, कुण तो तुळछा गवरां ने पूजसी ! अणपूज्या सात्य सिंझचा देव, कुण तो करसी रे मिंदर आरती ! मिटता जीवण री थने आंण, मुडजा, फौजा नै पाछी मोडल ---- मन रा मीत कान्हा रे-- जग में जे मंडग्यो घमसांण, तो कोयल कुरळासी वागां मांय, नाचता थमसी वन में मोरिया चीलां मडरासी हरिय खेत, गीधण भंवैला सगळे देस पर डाकणियां रमसी रात्यूं रास, चौसठ जोगणियां खप्पर पूरसी धरती माता रो लाग साप, मुड़जा, फौजां ने पाछी मोडल मन रा मीत कांन्हा रे- जग में जे मडग्यो घमसांण, तो भातो ले भंवसी रे भतवार, हाळी जद लड़वा जासी खेत में हळ री हळवाणी वणसी सैल, 28 सत्यप्रकाम जोसी री कवितावा पीaratri गुरसागयोगा गजान गुनासो मी भागामा- जमना गीगार, माटोवामीनामांदिया मायामामी अनमामो माग रिमोटा मामे मागे नाम मरना, मनानं नामोर गनगमीमामा.. आना या न्याय, मना, पोनापासीमांरम गोग्ग- माग गठ, गुजा. जापानी मांग भागागागभयाप, मुन्ना, फोगांपाठी मार সাবিনা বা যা, गुम्जा, पोजा पानी पीने भाना रे भोग ग्माया गग, मुटना. मुगा फोगांन गोटम निजराणो 29 མཆ-

दीवा कांप क्यूं
1902
गोजम • सोयम मारो.जागण रोगीत
•जीवराया

गीतां रो जस
थाळी तो बाजी ऊंचे डागळे
रैणादे जायो सोनल भाण रे
कोई मा टसकै ऊंडी ओवरी
आखै कड़ बै हरख वधावणा
कुण तो गावै मावड़ री पीड़ रे
सिरजण रे सुख रा कुण दै गीतड़ा
अजमो रंधावै रतन रसोवड़े
पौळां रे बांध बांदरवाळ रे
सासूजी सात्या देव वारण
हांचळ तो खोळे नणदां लाडली
जेठांणी देवै पाटो ढाळ रे
पड़दा बंधावै गवरू सायवा
जोसीजी वांचे टेवो टीपणो
आई वेमाता मांडण लेख रे
मीठी गीतेरण का चूंघटा
मावडरै नैणां कविता जीवती
जायोड़ा जुग पुरसा रे जोग रे
कुण तो लिखमी जलमां रा गीतड़ा
यागां तो आई भोळी वायली
मिळवा ने छांने मन रमीत रे
गीतां बिन कियां जोवे बाटड़ी
32
मदयाराम जोमी री पयितावो
.

मागोपनीप्रीत
मागा
मानानटी
गुगसो रापुर गं माग
रोnि in
मग कागार मार
wala fuी गाड़िया
मा माग मिमान गरे
मामांना गमा
पानांना मनामना
सामना गरगुजान।
गीता किन पानी मुखर रामनी
मांग मिजमार गोत गनिया
माती सपा मोटा गोरे
गीता दिन मनीम: मारना
गीना नि या पोपत्री
गाय पनही बनती गरोदर
पोटी गावं मो गीतढ़ा
गरजनो यानी गायर माकळी
बनी गुपरिदकात्यारे
ल
१
शागण पोट सो पाळं गोता
पंन फर पमगो मादली
गुण गम पिडसा रा गिलोरर
पंवरी रावाना गाना गीतक्षा
गोटरी कोपनही चानी गागरे
आंगू रो गोतां गाय मेळ रे
फरद बिदाई गीला गीतमा
निजराणो 33

फूलां री सेजां सिंवटी घूघटै
संकाळू उरती नवं सुहाग रे
धनड़ा सूं संधी हो चीनणी
धीरज बंधाको बाई सासर
कोई तो भायो अमर सुहाग रे
गीतां बधायो वांरी प्रीतड़ी
कुण तो छिपावै साधां अरगणी
छान ओले रोज्यार पेट रे
गीतां में गाव बंस वधावणो
कान्हूड़ो झूलै सोवन पालणे
मावड़ क्यू बैठे मुडो भीच रे
हिवड़ा सू छळकै भोळी लोरियां
प्रीत तो लगाई, वाई पीपळी
चाल्या कमाऊ जद परदेस रे
ऊंची चढ जोवै विरहण बाटड़ी
नेणा रा आसू पूछे गीतड़ा
गीतां सू घटसी काळी रैण रे
गीतां सू ओछा दिवस विछोह रा
गीतां रा भेजो कोई वादळा
ढाढ़ी सुणावै धण रा गीत रे
गीता री कुरजां हाथ सनेसड़ा
गोतां रै समचे चालै सासवा
भाई बैनां रा गाढ़ा हेत रे
गीतां में देवर नणदो लाडली
कुण तो व्यायण नै देवै सोठणा
कियां जंवाई जीभ थाळ रे
गोतां विन कुण तो सगफ्ण सांच
सत्यप्रकास जोसीरीकवितावा
34

बिखरण तो लागी बंधी बुहारियां
गीतां सूं रोपो कुळ री काण रे
गीतां बिन कुटुम कबीला तूटसी
सूनो वळे रे दीयो आंगणे
गीतां विन तूठे कोनी देव रे
गीतां नै उडीकै मिंदर आरती
गीतां में तुळछां गवरां पूजणी
तीरथ बरता रा साचा नेम रे
नूंवै गीता बिन टळिया जावसी
भगवां तो धारचा साधू मातमा
गीतां बिन कोठे आतम ग्यांन रे
वै धरमां रा नूंवा गीतड़ा
मिट ज्यासी इतियासां रा पानड़ा
वीरत कीरत रै जस री देह रे
गीतां में जुग-जुग ताई जीवसी
गीतां बुलाई आई वादळी
आसूदी धरती रो अळसोट रे
गीतां विन कियां होवै हळसोतियो
गीतां रा काढ़ो खेतां ऊमरा
गावो तेजा री तीखी ढाळ रे
गीतां सूं भर लेवो बीजोळियो
गीतां बिन धूज कूवै कीलियो
पांणतियो धज धोरां नीर रे
गीतां बिन दोरी रात रूखाळणी
नूंवी तो भणतां गावै वायला
गीतां बिन कोनी होवै ल्हास रे
गीतां तूं ऊंची आवै पूंजळी

गीता विन मीयाळा ने काटणो
गीतां विन केहड़ा कंथ वसंत रे
गीता विन कहड़ो सावण भादवो
गीतड़ला गावै झीणो वायरो
गीता सूं ऊगै सूरज-चांद रे
गीता विन रितुवा फिरणो छोडसी
गीता विन कोनी नदिया खळखळे
गीतां विन कोनी ऊगे फूल रे
गीतां विन कोनी दीवा जगमगे
गीता विना प्रीतां तो रुळियारगी
गीतां विना जाया पूत कपूत रे
गीता विन परणी घाटा लांघसी
गीता मे जलमै जीवे मानखा
गीतां मे जागै सवळ समाज रे
गीतां में आखा जुग नै जीवणो
पग-पग तो जीवण माग गीतड़ा
आवो रे कवियां म्हारे साथ रे
जुग नै नूवै गीतां सू घेरल्या ।
सोवन माछळी
सांझ तो पड़ी नै वडग्यो नीर में बैरी
आ थारी मछवा बाण कुवांण
छोळां सूं टाळे गिण गिण माछळी
क्यूं , हिवोळे ऊडा समंद ने रे मछवा
क्यूं थू पसार झीणा जाळ
खारा समंदां री खारी माछळी
36
सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

पाछो तो वावड़ थारी झूपड़ी रे मछवा
थारी थाळी मे चांनण चौक
तड़फा तोड़े रे सोवन माछळी
सात्यू समंदा नै राखै नैणा मायने रे मछवा
होठा विच साचा मोती सात
मीठा पाणी री सोवन माछळी
कैव तो चीर कवळो काळजो रे मछवा
माथै भुरकाऊ तीखो लूण
काटां विना री सोवन माछळी
तेल में तळू रे थारै राम रसोई मछवा
नीचे सिळगाऊ मधरी आच
छिण छिण सीझरे सोवन माछली
धोया-धोया थाळां पुरसू आधी रै अमलां मछवा
अलंघ झरोखै जोवू वाट
अंग तो मरोड़े सोवन माछळी
मुंडो ॲठण ढळती रा काई आवै रे मछवा
पैला ई क्यूं नी लेव चाख
जतनां सू राधी सोवन माछळी
कैवै तो बेचा सोवन माछळी रे मछवा
वेचन चिणावां ऊंचा म्हैल
छोडा समंदा में पाछी माछळी ।
जागण रो गीत
मीच आखड़ियां, कर अधारो
मत अंधारो सहो
निजराणो 37

जागता रहो
ताकता रहो
जागता रहो
सपनों रो राजा चंदरमा, इमरतपी मर जासी
सोनारी जागीरा खोकर तारा घर जासी
छिण मे उठसी रैणादे रा काळा पड़दा
चन्नाणा री किरणां सू ठगणी छियां डर जासी
नवी जोत में राख भरोसो
नवी कहाणियां कहो
जागता रहो
सीटी रो सरणाटो वाजे, मील मजूरी चालां
खेतों में पंछोड़ा बोले, हळ रा ठाट संभाळां
हाट हटड़ियां खोलां, दिन री बाळद आई
मैंणत भूखी रहै न कालै, इसो जमानो पाळां
ऊगे है सोना रो सूरज
मत आळस में वहो
जागता रहो।
जीवण रा दीया
मारग रा दीया रे
थोथी थलियां रा ऊजड़ पंथ
चांदो तो छिपग्यो, किरत्यां ढळ रही
डरतो उगेर तीखो गीत
चाले थकाळू डांडी अकलो
सिंझ्या रा जाया! थारो हेत
बामो तो छोडधो सगळी रात रो
झिलमिलतो दोस रे उजाम
जोत ने मिळाजे पीळा भोर सू
गत्याग जोगीरी पापितावां
38

मेड़ी रा दीया रे
कोई संचायो तेल चंपेल
वाटां वटाई पीळ चीर री
सजिया रे सिझ्या रा सिणगार
गोखै संजोयो थारो चानणो
काळी रे काळिया री रेख
थार सरीसी गोरी देहड़ी
बळजरे जद लग जोवै वाट
वधजे जद पीया आवै सेज में
मिंदर रा दीया रे
गूंगी पड़ी रे झाझ मंजीर
सूनी परकमा, सूनो आंगणो
देवां री पूजा थारै हाथ
रातीजोगारी थारी वोलवा
भगतां नै मिळियोड़ा वरदान
थू ई भर लीजै थारी खोळ में
कर लीजै आगोतर रीवात
भाटां रो भरोसो कालै कुण कर
माटी रा दीया रे
सूरज सू ऊंचो थारो बंस
मावस रै मोडै थू ई जूझियो
लेखा तो वाचै थारी छांव
जोगण, विजोगण,देवी देवता
मांझल र जीवण रा सैनाण
सोई धरती री सांसां कुण गिणै
बळियां ई जाग्या रेसी प्रांण
बुझियां तो जीवण जासी जीव
सू
निजराणो 39

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'साहित्य जिका सांच सूं बाधेड़ो करें, वो
इतिहास ज्यू, काळ सापेख कोनी होवें। इण
कारण जद कोई काळ रो इतियास, साहित्य
मे ऊतर तो वो अणत-मोला रा पख में हो,
इण के उण पात्र रा हक में कोनी होवें।
साहित्य घड़ी-घड़ी इतियास ने आपरी कसोटी
माथे जांच-परखें। इतियास नी आपरो
नजरियो बदळे-नी कंयोड़ी बात सूं ज्यादा
बता सके जद के साहित्य सारू अंडी कोई सीय
नी हो।
बोल भारमली
1974
• अपरंच .रूप.सावी .सबाग .जाळो
•विराग • अडवाणो .प्रीत . आप
• साख राजा मालदेव री . साख राणी उमादेरी .अंताखरी

अपरंच
म्है कुण हूं?
प्रीत रा पुस्करजी रै पावन पगोतिय
फागणिया हथेळियां ऊग्योड़ा
लीला जवारा वोळावती गिणगोर ?
के चांद री इमरत डोळियां रै ऊपरवाड़ी
वरसता मेघां ज्यूं ढळती
माटी री तीतर-पांखी सोरभ झिकोर ?
म्हैं कुण हूं?
इतियास री खड़ग-लेखणी सूं
रगत-मसी में सीवा वदळता भूगोल रा
अडोळा चितराम री खांडी कोर ?
के रंगसाळ में चितारियोड़ी
ऊभी आंगळियां सांनी करती
कुळ वहुवां रै डावर नेणा झरती
भाटा री नागी पूतळी रा लेवड़ा री लोर ?
म्हे कुण हूं?
तोड ज्यू उछेरी म्हनें घोरा जैसलमेर
झेकाई वाळू रेत
बड़ री सास वाधी
सिणगारी सोनलिय गिरवांण
गोरबंध कवडाळां;
नोरी नागरवेल,
तो ई वाजती नळियां
विछटगी झोक मू
कतारियां रे देगतांन्देयता !
गम्याग जोगी गैरपिताया

पाळिया वासक म्है मनड़ा रै रोहिणी द्रुमा रचन-कचोळां ईसका पय पायो डाढां डसायो कंवलो काळजो विस री गहन वितायो रांमतिया-रमतो वाळापण सूघती चंपा री चौथी पांखड़ी पूगी वागां मडोवर रे चरती आफूनी रा फूल हिरणी ज्यू सोई मेहूड़ा री छांव गुळक्यारां फाळ सांध्या इमरत कर पीवी म्हें रविजळ री छळ-छोळां ! वदळो चुकायो यूं अणजाण्या मावीतां रै पाप रो, धुतकारां, ओझाड़ा, संताप रो, अणसमता हाचळ चूंध्या दूध, फाट गावांरी गाठ घुली निरधनता, हटक रै होड़ा दिय जोबन रो, रोक-टोक रमता रूप रो, वचपण रो, मेहणा री बोली रो, नारी निवळी रो गोली रो जोवन रै कामरूप वादळां री रीझ टाकी जोधांणे टेकरियां लाल सिंहरां, भोर ज्यूं पांखां रा छतर तांण ! पण देख पगां साम्ही ढळकाया आंसूड़ा कोट-कोट, कांगरे-कांगरे निजराणो 43 तनवन राज कियो जोवन सादूळां सरवर री पाळ मदगहळी गजगांमण सू करी चूक कुभ ने विदार गजमोती लिया काढ मान कियो धणियाणी, मांणी तो राज-सेज मोजां वस म्ह मांणी हिंगळू ढोलिया रे वादळ पथरण जठे-जट म्हें फेरिया पसवाड़ा उठ-उठ विगसिया फूल रातराणी, चपा, गुलाव रा अर सपना र ममदर-तकिये जठे-जठ ओसरिया मोती नीरद-नणां उठ-उठे भरग्या पीछोला, वाळसमंद, आनासागर ! तरणाप अंतेवर अकमाळा भीमळ-नयण मारग नीहाळती प्रीत री पुरवाई रा सदेस री कुरळाई रत-पखी कुरझड़ ज्यू 'तिरसी हू, तिरसी हूँ सेवट उडगी सरवर रै ईरां-तीरा जोड़ी सू जुड़ण मनड़ा रै कोटड़े गोली वण भावन रची भाटिया री राणी वण रंग दियो राठौड़ झोरावा गाया कोटड़िया रा संपूरण नारी ज्यूं म्है कुण हूं? जिणरै कू-कू पगल्यां री खोज 'खोज गई' गाळ खाय ओठ-ओठ हालती कुळवहुवां सतियां के राणियां! -- 44 सत्यप्रकाम जोमीरी कवितावा प्रीत री कामधेण म्है तो समाज र मीट-मारग (मुईदार ज्यू) टणमण टोकरा बजावती आगे निकळगी छांगरे टळगी म्है टोळी सूं म्हनै टोळण आया 'आसाजी' दूवा सोरठा गीतां कवितां रै टिचकार पण म्है वधतीगी खेतां-खेता, सरवरां-पोखरां, बागां-वगीचां, चरणोयां थळां-मस्थळां म्हैं कुण हूँ? बाधाजी रो जस-अपजस हिवाळां ऊंचो, ऊंडो महराणां ? कविता कोटड़िया री अरथां, संकेतां, सबदा परबारी ? परोकी प्रीत ? नेह गाढा मारु रो? बिना हाथ हथळेवो? गांठ बिना गंठजोड़ो? बिन सावा परण्योड़ी? जलमी कठे, पाळी कुण किणरो म्है घर मांड्यो सती हुई किण साथ आडी ज्यूं समाज री म्हैं कुण हूं? सरीरां असरीरी? नाम जात कुळ बिहूणी क्रौंच पांखी आद कवि री? निजराणो 45 चंडाळी? खंडाळो स्परी वणजारण वडारण जोवन री? आदण ईसका रो रेख के हथाळी री लोक सू टळियोड़ी उछाको दवियोड़ी माटी रो? ध्याव सुरसत ने, सिमर गणपत जद मांडोला छंदा-अछंदां सवदा में बाधोना प्रीत री कथा कोई वरणोला नारी ने थे ई वतावोला पोढियां ने 'कुण हूं म्हं, भासा रा भावी कविसरां ! रूप जद रतन तळाई आडा टेढा पड़दा बंधाय, झोलण जावती राजकंवरी सहल्यां रै झूलर म्है उतारती निवसण सगळा सूं पैला अर पाणी रा दरपण में निहाळती म्हारो रूप मला गाभा तूं मुगत म्है अक देही जात जद ढोळती म्हारै अपधन रो रूप कूपळो निरमळ नीर घुळ जावती म्हारी कू कू पगळियां जळ मे, 46 सत्यप्रकास जोसीरीकवितावां re

ससहर ज्यू पळकती
म्हारे मुखड़ा रो पड़छाया
अर तिरती छोळां माथै
म्हारी मुळक हंस री पांख ज्यूं !
पण ओझाड़ा खाय
निकळणो पड़तो नाडी रै वार
अर धूजते डीलां पैरणी पड़ती
कंवरी री उतरयोड़ी पोसाकां!
उमगतै अंगां काटती खड़पां
कांचळी फाट्योड़ा टूकिया
विना अंतरसेवै कळियां रो घाघरो
अर बदरंग लूघड़ी!
अणसमझ म्है बूझती रोजीना
धू म्हारै डील क्यू आयो
हे कामणगारा रूप !
थारै ओपतो सिणगार कठा सूं लाऊं
च्यार दिनां रा पावणा !
सावो
जद सूं नारेळ झेलियो
मालदेवजी
राजकंवरी रो सुभाव की बदळतो लागे
आजकाल ना भर सेजां भेळी
ना करावं म्हने मरदानो भेख
अणमणी रैवं आखो दिन!
गुमेज री की बात?
राठौड़ा नै भाटियां री डीकरियां रो
सदा सूं ई चाव!
निजराणो 47

पछ जोधाण रोधणी पग पसार अजमेर तांई चोखो बचायो जैसलमेर गीध री अणियाळी मीट सूं गढ सू परणीजतो गढ़ ! राज सू फेरा राज रा! धसमस धोया जैसांणगढ रा पीळा जाळी झरोखा, सिणगारचा कोट कांगरा! ठाकरां उमरावा रो यट्ट गरणावै बुरजां, म्हैलां, माळियां! घुरीजती नौवत अर सरणाई र सुरां समच टाळी म्हन दायज देवण डावड़ी ज्यूं हाथी, घोड़ा, करहला, वळदां, सोना-रूपा, हीरा-पन्ना, गाभां-पोसाका रथ अर पालकी साथ दूह दड़ादड़ ! दूह दड़ादड़ ! सुणीजै नगारां री धोक राठौड़ा री चढती जान री कळहळ रो सरणाटो गढ रा चौक में ब्याव र उमा राग रंग में रीझतो रजवाड़ो बुरजां में बतळावै सूरमा सैणां सूं जनानी डोढ़ी गीतां रै बायर सिणगार बाजोट विराजी बीनणी ने सौरभ सूं गरणाय आंगणे केसरिया कसूमल रै दळ वादळ सोधे भारमली अक उणियारो जिको उबारी उणने अक रात 48 सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

समद म्हैल में
अर अकई निजर में
करदी अनुरागण पौरूस री !
पखार लेवती अक वार
उण अणजाण्या पौरूस रा कू कू चरण
समरपण रा पुसब भर आंचळ
उतार लेवती आरती देवतारी
अर नैणां में सावळ झांक
घर देवती उण मन में
हार हीया री हेमांणी
विदा होवण सू पैलां!
सवाग
अजमेर आयां कित्ता दिन होयग्या
अक वार ई कोनी दिख्यो परणेत
दीख्यो ई होवे कुण जाणे
नाम नाम सुण्यो है कानां
अक-दूजा ने ओळखां कोनी !
तो ई सुख है परणीज्योड़ी वाजण में
कोई री होवण में
तीज पौर आयग्यो वोड़ो अनदाता रो
पानां री छाव
पोसाकां, गणां, अंतरदान
केसर कस्तूरी
मिठाई री छावां
निजराणो 49

म्है खुद डोढी सूं लाई वीडो अर राणी उमादे भटियाणी रो सवाग विड़दावती थाळ में घलाई पच्चीस मोहरा । राणी जी ने अंगोळी कराई सौरभ री दपटां दीवा जुपाया गोखै-गोख आळे-आळे चढाया पूजा रा पुसव नख सिख सिणगारण लागी चतर डावड़ियां ! हाल मोत्यां री लड़ाई कोनी गूंथी ही चोटी रै के पधारग्या पिण्डा म्हैला में ! धूजगी कंवरी रे हाथ री आरसी हळफळायगी अवरी डावड़ियां आंच-आंचे सारण लागी काजळ अर विगाड़ण लागी रळियामणो सिणगार! म्है पूगी रंगम्हैलां आधो घूघटो खेंच सेजां रा सिणगार अनदाता नै मुजरो अरज करती घड़ी-अधघड़ी विलमायां राखण । म्हारे बिछिया र घूधरां रै खणका री अगवाणी लड़थड़ता अनदाता भरली म्हनै भुजावां में। अर म्हार वोल्यां पैली ढंक दी म्हारी अधरज आपर होठां सूं 50 सत्यप्रकास जोसी री कवितावा

समझी कोनी
उतरते सोळवें सईका रे चेत री चवदस
अकाओक वणता इतियास नै
डरगी
इण अचीत्या अणाहूत सू
आहेड़ी सांम्है हिरणी ज्यू ।
प्रथीनाथ,
जिकां री दुधार लचके
सूरां री खेटक।
धूजै मारवाड़, नागौर, सोजत
अर अजमेर री गिरद,
भीचे बरजोरी
कादम्बरी री गहळ
दायजे आई अक डावड़ी ने !
भारमली नट कोनीसकी
झूठ मत बोल भारमली!
जद सैलां रो सांवत,
नरपत,
पड़वै रा आरण में चढ़ाय लिया
पंचसायक कंदरप ज्यूं म्हारै सांम्ही
मोह भूरछा रै पांण
म्है ई बणगी छळगारी
समोवड़ करण ने !
धुपता लाग्या म्हन
म्हारा सम्बोधन, विसेसण
बदळतो करता, बदळती क्रियावां !
मांग में घाल जिणरो सिंदूर !
बदळा री रात दूजी वार कोनी आवे !
म्है राणी क्यूं कोनी वण सक्?
निजराणो 51

वस, म्है ई चाख लियो दुवारो
अर नटती नटती, माथो हिलावती
पलकां ने तिरछी तणाय
लूमगी नरनाह रे
संपूरण अंगां, संपूरण संगां
अंगरळी रे पैले सवाद में !
कुण जाणं कद आई उमादे
अर ठोकर सूं गुड़ायगी पीळजोतां!
लाल किंवाड़ी रो खुड़को ई कोनी सुणीज्यो
दिन ऊगां फगत लाध्या
धरती पड़ी म्हारी कांचळी रे लाग्योड़ा
भटियाणी जीरे काजळ टीकी रा
पूंछ्योड़ा अहनाण!
कुडाळी वण आंगण ढळक्योड़ा
म्हारा घाघरा माथे
ठोकर रा सळ ।
भीतां माथै चिपियोड़ी गाळियां ।
मोड़े ढळक्योड़ा आंसू
अर चौबार बिखरयोड़ी
चूड़ियां, बीटियां, रिमझोळां,
करणफूल, वोर अर वाजूबंद ।
म्है दूजै दिन जागी।
जाळो
सुणियो अक दिन
कवराजा ईसरदासजी सूं बंतळ करता
अनदाता नै हर आयगी
राणी उमादे भटियाणी री।
52
सत्यप्रकास जोसी कवितावां

'कविराजा, देखू थारी सुरसत रो परताप
मनाय लावो राणी
रूसणो भंगावो।'
पलीवार चेती म्है
धारणा री मोह-धरती सू~-
कोई खामी है इण राजा रै मरद रूप में ।
इचरज होयो म्हनें
परण्योड़ी लुगाई रूठगी इण आदमीरी ?
हथलेवा रो दाग ई दाग लाग्यो
इण वींद रै?
वीनणी भीटीजी ई कोनी इणरा अंगां सूं ?
घरवासो कोनी होयो इण निरभाग्या रो?
अर ओ मरद भेजे
अक कवि नै, आपरी परण्योड़ी मनावण ?
दो प्रेमियों रे विचाळे
हेत रो मून ई जद रचदै
सौ सौ त्रिकूटबंध,
अर अॅक-अक सबद रो उच्चारण
वण जावं सुपंखड़ो, सावझड़ो, मंदाक्राता,
पछ हेत रे सिवाय किसी कविता
मांग रूसणो अक मानेतण रो।
म्हारी जांण में
प्रेमी ई होया कर कवि कालीदास
सुण्यो कदैई कोई ढोलो
अक तीजा पुरुस नै भेजें
आपरी मरवण मनावण नै ?
क्यूं कोनी ओ पुरुस
झाल आपरी प्राणप्यारी रा रेसमिया कुतळ
कर दे अवोट चंदरमुख आभा सांम्ही
निजराणों 53

अर उणरा दरपण-नैणा मे नण घाल कर दै नेह रोवो संकेत जिकां सू दामणी सी चमक जावे नारी री रूंआळी रूआळी अर मुग्ध होयोड़ी वा नट जावं, नटिया जावे, नटती ईजावै । धरती रो भार धारण वाळी अ भुजावां क्यूं कोनी वांध सके आपरी तिरिया री पुसब काया ? कोई खामी है इण राजा रै नरापण में । अर आखा नारी लोक में म्है भारमली ही लाधी भागहीण, जिकी सोयगी इण अणवर साथै ? जिका मरद नै नड़ो कोनी आवण दियो कोई लुगाई आपरा रूप मंडळ रे उणने जीत. अंजस भारमल ? इत्तो पत्तन म्हारो? समझतां ई परसेवो फूटग्यो म्हारै अंगां अपूठी होय पूछ लिया म्है अडवड़ता आंसू भागी म्हैला मैं दरपण रै रूबरू, काळी छियां-सी पसरगी नैणां रै हेठे। अवरोही जोबन रै पिणघट ढळग्या कुच-कळस चामड़ी लटकती-सी लागी भुजावां री सुण्यो ईसरदासजी भंगाय दियो रूसणो मांन छोड़ अठवाळी विराजगी राणी जोधपुर आवण ने। 54 सत्यप्रकास जोसी री कवितावा

म्है वधारया नाळेर देवी रे।
नाचण लागी अणूता मोदी में ।
गुभेज है म्हने
अक आंटीलो, लोही तिरसो,
नारी मन री साधा सू अणजाण मरद
म्हारै कारण रळी तो करी दूजी नारी रो।
पलकां सूं बुहारयोड़ी सेज री
अनग-रज में लुटयोड़ी काया
अक अणधड़ नर री
फुरण तो लागी नेह रै नगारां।
म्है खाद ज्यं तो रळी
अक पुसब रै विगसाव में।
अकारथ कोनी होई म्हारी गीत संगीत वारणी
अंग मरोड़णो कांचळियां उतारणो।
म्हे जाणू, म्हैं कोनी लियो जलम
कोई राजा रै घरै।
कोनी जलमी कोई राणी री कूख ।
पाछो म्हारी कूख जलम्यो
कोनी बणेला राजा।
पण पछतावो कोनी म्हारा नाम जात
कुळ विहूणा जलम माथै
मत वणो भलाई राज कंवरारी मां
म्है अक सम्पूरण नारी तो वणगी।
के आया समाचार कोसाना सूं
पाछी फिरगी राणी री पालकी।
आसाजी वारहरु कैयो बताव हो
मांन अर पीव दो दो गयन्दा रै
ओके कंवूठाण बंधण रो।
निजराणो
55

घणी रीस आई वारहठजी माथ
पाणी फेर दियो वै म्हारी साधना रे
म्हनै उबारण री हूंस में।
सांचाणी गेला होवै दो-कवि अर प्रेमी ।
विराग
आरण सूं बावड़ता जोधारां रो
जद उतारूं आरतो,
झटकू पोसाकां चढी खंख,
अर घोवू चाठा लाग्योड़ा कड़ियाळ ।
यू लागै जांण म्है पूंछु
न्हारा, बघेरां रीछां री
लप-लप करती जीभां।
सूरां रै कपाळ प्रहार करता सुभट
काई सांचांणी भूल जावै
म्हारो फूलां गूथ्यो सीस,
आपरै खांध टिकियोड़ो
सिझा रा सिंदूरी पळका में ?
भड़ां रै उरांट सैलां रा घमोड़ा मारता
काईं वै पांतर जावे
आपरं भुजअंतर भिड़ता
म्हारा पयोधरांन?
संघार कियोड़ा वीरां रै पेट सूं
जद निकळे अंत्रावळियां
कांई वान कोनी रळी आवै
म्हारी नाभी कनै ऊगी रोमलता री?
सागां सूं न्हावणिया म्हारा राज,
कदेई तो कोनी करी मनसा
56
मत्यप्रकास जोसी री कवितावा

म्हनें छाती सूं लगाय
बरसता मेह में भीजण री।
अर जद जद म्हारा इमरत परस सूं
बोली में मद घोळ
अरज करूं जंक लेवण री
व म्हनै निवसण कर देव
डावड़ियां रै देखतां देखतां
अर जिनावर ज्यू मिटाय लेवे
आपरी भूख रीसां वळता।
मरण कोडियाळ, कद समझे
सूछम भोग रो सुरगाळो मरम।
अडवाणो
तिरस रा अंक पड़ाव सूं
दूजै पड़ाव।
जैसलमेर आयगी हूं म्हारै पीवर
कोई ठपको कोनी दियो
वाइसा साथै चूक करण रो।
मालदेवजी री अंक सोवणी सूं ई
धूजता लागे केई गढ कोट।
वैजयंती ज्यू फरकू म्हैं
देसां रै व्योमाळ
मनां रे देवळ।
कोई सांम्ही मीट कोनी कर
आपरै अंकां कोनी उठाई
मालदेवजी म्हनें ऊमा रै भरम ।
निजराणो
57

मांन दियो वै अक अणखी रूप नै । छांन कोनी राखी आपरी प्रीत अर छळ कोनी कियो भोग सूं। ओछो तुलग्यो वो म्हारी ताकड़ी भोग रा संपूरण अरथां कोनी भोग सकियो नित नई जीत्योड़ी-धरती कोनी रिझाय सकियो भारमली सिवाय कोई अवर नारी। अधूरो वीर, अधूरो भूपत। आधो पुरुस, आधो भंवरो॥ दूजी कांनी म्हैं भारमली। जठीनै मोड दियो आपरो अंग वाहण जठीन संधाण कियो जोवन रो पुहप धनख, जठीनै वाही रूप री खागां वाजतै ढोलां जीत लिया मनां रा गढ़ घराधार करदी जूझारां री अखोणियां। संपूरण भोग सू ओछो न लियो, न दियो। ----- अर ओ अलबेलो राजकंवर ? अेक कापुरुस। रगत री झूठी सौरभ रै कळंक रा मसाणिया हेला रो चाठो कठे आयगी म्है ? जांण पावासर रो हंस मोती चुगण उतरग्यो ओछै ना. जांण मरू में भटक्योड़ो किस्तूरी-मिरग पूगग्यो करदम सरोवर। हाल क्यारा कोनी पूग्यो नीर रळक्यो कोनी धोरां लागे अडवाणो कियो है पांणतियो। 58 रात्पराम जोगी री कवितावा प्रीत रूप री अक पीड़ है रसैला घावां तूं ऊंडी राग रा सुरां सूं तीखी अकथ अर अरूपी! रोझणहार री मीट में होवै उणरो जलम अर रसिया री निजर सूं हेठे पड़ता ई अकाळ मर जावै वो! रूप री ऊमर कोनी आवै! नीतर जिकी डावड़ी रो रैण-सिणगार करतां म्है देख्या वाघाजी नै- गाल रै तिल लगावतां, वेणी में फूलां रो चोसरो टांकतां, टीकी में चदरमा कोरतां पगा में मेहदी रचतां नखां रै धार देवतां अर सोरभ में भिजोय भिजोय उणने अंग लगावतां वा मुळगै ई सुन्दर कोनी ही। अठीने म्है, जिकी अक निजर में उछेर दूं हजारां करहलां री झोकां चिटूड़ी रै अधर संकेतां डुवाय दूं आडां ज्यू समदर तिरती अलेखां खेवणियां, अक मुळक मे छुडाय दूं भूपाळा रा मुगट-सिंघासण लारला कित्ता दिनां सूं घेर-धुमेर घाघरा रा फटकारा देवती निजराणो 59 फिरूं बाधाजी रे पड़वे पण कोनी मिले रीझ रो आऊकार! जित्ती वार अकायत में अकला मिलण री चेस्टा करी म्हें म्हने लाधा वै जुगल रूप में अर टळता गया म्हार मिलण रा मौहरत ! कद देऊ इण अरजण-पुरुस रा सीम ने छाती रा भूघरां बीच विसांई ? आखा ससहर आनन माथै झेलू अधर पारळ रा दाझता घाव ? अर अंकां में कसती-कसीजती हो जाऊं इण लोक सू अंतरघांण ? वाधाजी रा आऊकार विना मरगी राम जाण संसार री कित्ती भामणियां तिरसी, झुरती, अण बोली ! अंजस भारमली रो लुगाई पणो म्हनै टाळो वै टोळी सूं! म्हैं ई अनग रै भरोसै ठगीजी कित्ता अंगां सूं! लोगां जांण्यो भारमली माल्है जोधपुर, अजमेर, जैसलमेर रै राजम्हेला अर म्है, महादेव रै चढावण जोगा आकडोडियां सू पूज्यां गई सतमासिया मरद, अधूरा प्रेमी चोर अर लतिया! वाघाजी सोधली आपरी कल्पना टूहूकती मगरां मगरां अर अक भटकतो अरध मंडळ भिळग्यो दूजा अरध मंडळ सू संपूरण मंडळ रो आकार धारण करण नै ! 60 मत्यप्रकास जोमीरीकवितावा

वाघो म्हारो भव भव रो भरतार !
उतारी कोनी आवरू ॲठवाड़ी जांण
समझ लियो मरम पोळ पोळ चढण रो
पिणघट पिणघट नीर भरण रो,
गळी-गळी रास रमण रो
विना बतायां
वाघो म्हारो भव-भव रो भरतार !
जिकां री रूठ कोनी परणेत
जिकां रो खोस कोनी कोई धरती
जिकांरी अणत भोग्याहू म्हें, न पैली न छेली!
वाघो म्हारो भव-भव रो भरतार !
जिकां री आसुरी भुजावां में
कसण दूं म्हारी वीजळ-काया !
उघाडू घडी घड़ी ढंकण नै,
मूंछां रै लगायां राखू होठां री पांसड़ी
अर रगत रा उछाळा ढाळचां जाऊं
झव-झव करता अंक में !
वाघो म्हारो भव-भव रो भरतार
जिको अरथ दियो म्हारा जीवण ने,
रगत नै रंग देय
रूप नै सिखायो संगीत
अर कविता दी अरूप प्राणां ने !
वाघो म्हारो भव-भव रो भरतार !
भोग नै बदळ दियो भगती में
ध्यान घर अरचना करी
देवां री आरती ज्यू
जोत जगाई देह रे देवर!
वाघो म्हारो भव-भव रो भरतार !
निजराणो
61

आप
म्हारी बात करती करती म्है
क्यू करण लागगी आपरी वात ?
सुर क्यू बदळग्या म्हारी कथणी रा?
आप सू सनमन होयां
दीठ वदळगी है म्हारी!
मरू रै कण कण म्हने नाचती दीस निरजरियां
कांमलतावां लूमी है कलपद्रुमां रै;
रंग-झड़ लागी है, रजरमता अणगिणत फूलां में
मीठी लाग आपरी दियोड़ी पीड़
होठां माथै हरिया घाव दांतां रा
नखां छिदियोड़ा उरंग
अर केवड़ा रो चुभियोड़ो कांटो
अपधन रै रेसमिया पाट-पल्ल !
लावो आपरो सीस
म्हारी छाती माथै टिकाय
गीतां तूं थेपड़ दूं पलकां!
लावो होठां तूं होठ उळझाय
आपां फूंकदां प्राण, पिंजरां में !
हां, कसलो
कसलो आपरी वळी भुजावां में
म्हारो इकलेवड़ो बीजळ गात !
मालदेवजी रा भेज्या
आया आसाजी वारहठ म्हनै पाछी ले जावण
आयगी होवैला ओळू राजा ने
अर आपरी कुबांण रै पांण
वहीर कर दिया होवैला कवीसर
62
सत्यप्रकास जोसी री कवितावां
..

छंद ने भांग कविता रो अंक चरण पाछोलायण न ! जाणू छायालोक में सपना रोसंसार रचावणिया कवीसरां री सिद्धवाचा रो परताप ! अर जाणू हूं कवि सू ऊडी समझ कोनी होचे कोई में कविता री; देहो रे डाळां, काम र तिणकलां सूं अक बसेरा रो सिरजण म्हारो जीवण-काव्य ! गुणो, कवीसर! गुणो! काठी चिपगी म्है वाघाजी रै गळा में पाल हाथ अरघ चंद्राकार लूमगी भुज अंतर टिकाय म्हारोसीस सुरसरी ज्यू वणगी तरळ नेण मूंद अंगेज लिया देवाधिदेव नै ! आसाजी रै च्यामेर घूमण लाग्यो ब्रह्माण्ड राधा अर स्याम री जुगत छिय झव झव करण लागी नैणां में! अर कल्पना सिरजण लागी रूप- भूल सगळा मनोरथ, आसाजी करली डंडोत इण विराट दरसण ने आसण री आसका चढायली माथै अर नीझर ज्यूं खळकण लाग्या वांणीरा वरदान- नमो सळ कळास सिखरा, महेसर नमो अरध-अंगी, सती-गोरजा वर निजराणो 63

नमो जोग जोगांण, करतळ गरळ धर
नमो मार मारण सुरसरी सीस, ईसर
नमो अकलिंगी, भूतेस-कायः
नमो सिवायः नमो सिवायः
नमो मोहिनी रै भुवन रूप रोंझळ
नमो भुजउंचायां सती देह निहचळ
नमो जळमअंतर उमा रा वरणवर
नमो उरलिंगी, जटाधर सुधाकर
नमो परमगुर, अणत, विस्वनायः
नमो सिवायः नमो सिवायः
साख राजा मालदेव री
म्है भांगिया नित नया खितिज
नित नया भुरजाळ।
जठे जठे बजाई रूक
रणमल्लां रा मुडां सू पाट दी मेदनी;
अर अजेय म्हारी कटक
लारला दस वरसां में जीत लिया तेतीस मुलक
रण रो रसियो म्है
म्हारै पराक्रम, विपख जोवै
आपर पराभव री वाट!
साधारण समझ ने पांतरग्यो
'सेजां रै समर कोई पख हारै कोनी'
खड़ग सू कोनी मरै अनंग
सैलां सूं विधै कोनी!
कळा है कांमण ने जीतणो!
64
सत्यप्रकास जोसी री कवितावा
प
+

सोधतो कोनी म्हैं, गमियां थने !
मरियां, कोनी करतो पछतावो
पण y म्हारा पुरसारथरी उतार पांण
वर लियो अक कवि ने ।
तीखड़ी बोर जड़ा कोटड़ा रा
धाड़ायत बाघा नै?
भारमली हरायदी म्हन
मेहणो लगाय दियो म्हारा पुरसारथ रै
अव्रणां री औखद कठे ?
अब तो राणी ई कोनी चढला
म्हारी पोळ
धरती ढबैला कोनी म्हारा सूं
अर कळंक लागला म्हारा जस रै
विगतां में !
गुण गरभा भारमली!
यूं भर देवती म्हारी अपूरणता रा आळा
म्हने बणावती अक पूरण नारी रो
पूरण पुरूस !
म्हनें बगसती थारै इमी कूपळा री
अगोचर बूदां !
म्है राजा सू वण जावतो रंक
भसमी रमाय लेवता !
साख राणी उमादेरी
भरोसो हो म्हने भारमली माथै !
अक वार तो हुई पीड़
নিসগী

उणन म्हारी सेज, म्हारा ई धणी सूं रळो रमतां देख! पण जाणती म्है, भारमली सेवट सोधला आपरो भरतार ! म्है लुगायां, सूप दे, जिकां रा माइत, अक अणजांण पुरुस ने वांधदै गठजोड़ा कांपती हथेळी धर दै नर रा हाथ में, गाजां वाजां हजारां गीतां बीच अगन री साखी, समाज र सांम्है सीख लेवां दोरी-सोरी पुरूस सू करती प्रीत ! तरसा छीके पड़ी भोग री हांडी नै ! चळू चळू पीवां अर परसाद ज्यू चढावां माया रै ! भारमली पोल खोल दी मोटे मरदां री ! फेरा खायोड़ी परणेतां पूजती परमेसर ज्यू जिकां नै पण कोनी दे सकती संपूरण देही रो भोग ! म्है ई करली अक भूल ! लोकां चावी होयगी रूठी राणी रा रूप में, ओळखीजे म्हारो म्हैल रूठी राणी रा म्हैल रै नांव सूं वदळ कोनी सकू जस-देह सू निकळ नारी देह में ! महाभारत रा गांगेय ज्यू म्हनै ई जीवणी पड़ी विरमचारणी री जूण अक अविचारी निस्चै रो ढोल बजावण रै कारण ! 66 सत्यप्रकास जोसी री कवितावा

बरस री अक अक रात
करियां गई कल्पना
भारमली री रळियां री
म्हारा धणी साथै !
अर उणरा पिंड री मारफत
भोग्यां गई भोग मन ई मन !
म्है छांट राखी मरद रा परसेवा सू
अर भारमली भोग भोग छितराय मरदां ने
दोनूं पूगा अक ई सम माथे
अक राग सूं, अक विराग सूं,
'नारी बणावे सोनर'
अंताखरी
अंगां रो मेळो भरयो पैली आयगी
म्है भारमली इण भुवन में !
कुंकू पगल्यां वसंत रो अगवाणी
फूलां री जाजम विछावण
चंवर ढोळण मनसिजारी पालकी रै।
म्हारै सांम्ही पसरयो है
भावी रो काळ हीण अंतरिच्छ !
तिरता दीस म्हनें प्रभंजण में
अणगिणत नीळज अंगनावां रा आकार
निरबंध, अणावरत
कांमासणा लीण,
ममता बिहूणा, अगरभा;
सांवळा री गाळ, रागां रीझ्योड़ा !
पण कुण समझतो
नारी काया री कमेड़ी रो नखराळो मरम
मरदां रचियोड़ा जुग मे !
निजराणो 67

कुण समझतो संकेत
गढ-कोटां-रावळां री
बीजळसार पोळा लार जलमता उछाला रो
कुण जाणतो
मिनखा जूण री वेदी रै ओळं दोळू
गोतर फेराखावता भोग ने
म्है देह धारण कोनी करती तो !
ससार रा सगळा धन सूं इदको मोल है
थांरी देही रो, लुगायां !
'थे दुवार हो सगळी देहां रो!
थांरी देही बिना कोनी आवं
कोई आतमा, ई रळियामणा संसार में !
थे धारण करो गरभ में वेटा
अर यू ई विना भेदभाव
धारण करो गरभ में बेटियां !
थे गरभ पूरणी मां हो अलेखा मावड़ियां री
थे जलम देवो डीकरा नै
जिका जोड़ायत बण जांमणिया रा।'
थे दूजी कुदरत हो विधाता री
पैली कुदरत री खामिया पूरी करणवाळी
थारी देही में विलग
छोटा अर मोटा-सगळा !
मां ज्यूं सुवाणो जिकां ने छाती मार्थ
ढांको आंचळ सूं होठां में हांचळ देवती
4 जवान होयां उणी भांत मांग बिसांई
वल्लभा री छाती मार्थ
आंचळ री छीयां!
न्यारान्यारा रूपां में जीवो।
68
सत्यप्रकास जोसी री कवितावा

'नर अर नारी रा संबंध, आद्काळ सूं दो
आधार माथे जुड़या करता। कुदरती पर
सामाजिक । नर-नारी रा संबंध अबै ई
सीमावा में सावळ बंग्या हो वा वात ई
कोनी । वेद अर पुराणां रो सैकड़ो कथावां
इणरा संकड़ी रूप बखाण तो आज दिन ई
इण रा अलेखा रूप देखण मे आवै ।
गांगेय
1985
• तलाक रीतांत . बाप रा ध्याव में बेटो बिनायक
• प्रोत रो पराछोत • फूलो मरा तोरां मरां कोनी
• मां पारी गोद निवाई
+mami

तलाक री तांत
सात पूता नै समरपित धार में कर
आठवां ने जद उठा चाली
तरगाळी, अपाटा, हसहाळी;
रोक कोनी सक्यो राजा मन कुतूहळ
बूझ बैठ्यो-
ऊजळे चरितां अख्याती ! देव बाळा !
कठे म्हारै रगत री आ बेल,
ओ अवतस थू ओढाळ,
कर निरवंस थारा परम हेताळू,
सनेही सांतनू नै
क्यू कठ कांई करै है
पापनासी, अमर, अविनासी,
तरण-तारण, तरुण गंगे !
प्रिया हे
देव गंगे, वल्लभा हे !
रीझ म्हारी नै दियो यूं वेग, आऊकार,
म्हारी सेज चढगी
म्हनें थारै अचपळे अंगां डुवायो
घेर म्हारी वासना सैपूर देही
पारदरसी नेह थारै !
हाल चितवण उरमियां थार नयण री
पीवतो ई जा रयो हूं
अर ज्यूं-ज्यूं डूब डूबू स्याम रंगां
ऊजळो तर ऊजळो बण, घाट औघट आ रह्यो हूं!
यूं म्हनें ओ भेद भोगां रो वतायो-
काम री झाळां दझ्योड़ा मरद ने
70
सत्यप्रकास जोसी री कवितावा

जे कामणी गंगा सरीखी मिल सके निस्पाप तो तन, प्रांण, मन होवे अमर वैता नीर ज्यूं नित निरमळा रे निरमळा! हे पवीतां में परम पावन ! अमीणी पीढियां रो यूं कठे करदै विसरजण ? म्है करूंहूं जीव वरधापो, नमन थारो करूं, कर जोड़, म्हारा रगत रज सिरज्या महोबी वाळका नै बगस, म्हारा प्राण लेले अक सैनांणी फगत आधा-अधूरा इण पुरूस री बाळ म्हारो, पूत म्हारो छोड़ दे जे माफ कर दे, म्हनें दे दै! म्है थन दीव चढाऊं फूल चरणों में धरूं, पूजूं, करू हूं याचना! घणो राजा गिड़गिड़ायो नेह भीमळ घणी करली अरचना आंसू भर्या द्विग लोटग्यो धरती, विसारी कांण-मरजादा पुरुस री इमी-घट-मुख सूं कैयो गंगा छळकती- भूलग्यो भूपत ! दियोड़ा नेह वाचा? विगत रो संधांण करणो अंक दूजा रो मना है जद खिचै दो पिण्ड, ग्रह, नखतां-नखत आकरसण नियम सूं नांम तांई जांणणो विरथा परिच न सामाजिक लगावां रो अरथ राख मिनल रे भोग में देस जात समाज धरमां रा अदीठ बंधणा सूं घणी ऊंची ऊरजा होवै काम राकांमण अनळ री। म्ह करूं कांई छिटक सेजां, फिसळ भुजपास सूं: क्रोड़ सूं कर सीस आगो, - नेह भरिया अंगदानां सू विमुख हो कांम म्ह कांई करूं? असवाला रापडूतर कुण होवे यूं मूढ बूझणहार, जाणंणहार ! म्है थन वरज्यो, लिया वाचा, मिलण र, नेह रे पले दिनां! अब असभव है जुड़ावो साथ थारं म्है बदळ मारग, खळक जाऊं विपिन-कानन ! छुद्र धरती जोग है ) छुद्र है धणियाप थारो नारियां माथे, सकळ जळ, काळ माथे अर भविस्यत रा अगम विकराळ माथै त्यागती राजा थन म्है पूत राखूला निसाणी रूप में म्हारे कनै पाळूला मिनख रो वीज ! फाटो देह देतां जलम, झेली पीड म्हारा अंस ने म्है ई उछेउंला! - तरुण बधतो गयो ज्यूं फूटी रूंआळी मूछ, डाढ़ी, गाल, होठां अर छाती अंग में चढगी परत सम सीकरां री लूणिया ही आव, लाली नैण डोरां गठीले आकार भुज, मजबूत पुणचा सीस माथे केस लट वांकी घणी बांकी नरां री चाल अचपळ ! सात, भंवतो नदी रै तीर हद बेचैन जाण सोधतो खोई जवांनी नित रळकता नीर मे ! मरम विधियोड़ो, घणो ई छीजतो, निरमद होया गजराज ज्यू 72 सत्यप्रकास जोसी री कवितावां हालता अणचेत सपनां में चरण ज्यूं वो बिजोगी दरद गंगा रो उठायां । देख सर संधाण करता देव जोध जवान ने अर करतां परस गंगा रै अनंगां होठ, छाती, गाल, केसां, पेट, कड़ियां पिंडलियां, चरणां, नखां रो समझग्यो ओ वीर म्हारै बंस रो है कुण करै दूजो परस इण हेत तूं म्हारी प्रिया रो! कैयो गंगा नै विनत लोचण तज्योड़ो, हारियोड़ो सांतनू जा रूबरू माफ कर देवी ढिठाई, माफ कर भूलां म्हनें थारी दया रो दे भरोसो हेत रो जाचक थन लेवण होयो हाजर खमा कर चाल म्हारे साथ थारै सासर ! की नहीं तो अवजी में सूप म्हारो पूत म्हारी संपदा रो असल भोगणहार, म्हारै बंस रो अवतस जुग नियमांप्रमाणे ! घणो निवळो बापड़ो है मरद रुच रुच कर रंजण भोग भोग अर संभोग कर, जद फेर पसवाड़ो विसर दुनिया, अजाण्यो ऊंघ जावे, मां गरभ में बीज पाळे तीन सौ दिन सींच लोही सूं घड़े आकार खुद रो मांस देव पीड़ भोग निजराणो 73

पण कर परिणाम रो धणियाप सगळा मरद
पळे भरम, बेटा सू वधैला वंस
झगड़ो अंस रोअर वंस रो है !
क्यूक मरदां रै रच्योड़ो अक निवळ समाज
धन, परिवार, सत्ता राज री
है छळ इसो ई!
मां दियो है छोड़ इणरा वाप ने पण
जनम तो गंगा दियो, गंगा चुंधायो
पाळियो गंगा जतन सू
याद राखो
पूत गंगा रो सदा गांगेय रै ई नाम सूं
रथ धज ऊचायां,
ओळखीला पुजीला जगत में
बाप रा व्याव में बेटो विनायक
भेद री आ वात म्है थांन बताऊं-
अक सौरम चांद में मझरात आवै,
अर उण सूं घणी तीखी
अक सौरम सात किरणां में लियां सूरज तपै!
बीजळी तो पूंजळी होवै सौरम री !
अक सौरम होवै जवानी में चढ्या चंदण वनां री
फूल री छिण च्यार सौरम
घणी न्यारी होवै नदी, जळपांत री
सौरम समद सू!
वस इणी गत
जिकी सौरम होवे कंवारी देह री
ओळख,परखे संध्योडा प्रांण
कांमी लोक में तो गंध ई आकार घर ले!
74
सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

सांतनू चकरायग्यो इण गंध रा आवेग सूं चेतना घिरगी असूंधी अंक सौरम रै समद ! विना होड़े, बिना आगळ, वो खिचोडयो ई खिचोड्यो मझ्झ पोंदै पूगियां दरसण किया जद अक सोनल देह रा गंगा किनारै ज्यूं रमण मुक्ताहळां- जळपरी कोई बिछड़गी होवै झूलरा सू! कुण खडी परतख धरा र केन्द्र में » मानवी है, दानवी लीला के कोई देव कन्या भूतणी है संखणी है ? सांच है के फगत सपनो? भूतणी ना संखणी ना देवकन्या, दानवी लीला न म्है सपनो अधूरी कामना रो धीवड़ी म्है झूपड़ी रा नाथ धीवर री नाम म्हारो सतवती है संख सीपी और सफरां रो सरळ संसार म्हारो! नैण में प्रस्ताव ले पूगो धणी उण झूपड़ा में, काढ़ ओळख, हाथ माग्यो सतवती रो कांम रो आंधी चढ्योड़ो ! कीर बोल्यो- वापजी बेटी अब्याही घरां तो राजेसरां रे ई न सोभै! भाग म्हारा, खुद धणी इण राज रा, जे मांग करली सतवती री ले पधारो! पण सुणी म्हे अक है युवराज पैली भामणी तूं। आपरै सुरगां गया पायां बंधेला सोस उणरे, निजराणो 75 राज ई वो ई करला, अर जाया सतवती रा जाळ नदिया में बिछा सफरा उडीकत मारता झख समद में सीयां मरला! राज राजे धणी वांने आप मानो बंस रो दो गरव अर स्वामी वणावो संपदा रो तो अरथ है भोग रो इण बाळका सूं न्याव होवै संतान रो परणेत रो होवै धरम पावन ! वात अखरी पण खरी ही आय ऊभो फेर फेर सवाल वो ई म्है लियायो देवव्रत गांगोत नै इण राज सारू, भोग संपद रो करण ने वंस रो अधिकार दे म्हें खोस लायो अंस मां रो दिखा पौरुस सूप चुकियो वेल, रीत परंपरा री! आज नट कोनी सकू हक पूत रो म्हैं हर नूवी परणी जलम देव सपूतां ने अगर मांगे धरा, घन, राज रोधणियाप आखो जलम रै इतियास रो मुख मोड़ दे कुण पूत जेठो तो सदा जेठो रैवेला नयण नीचा कर, झुका माथो थक्या पग म्हैल राजा वावड़यो! अन्न खावं ई नी, भाव नीं। आंख लागी हाय कड़ी- रात भर आ आंख लाग ई नीं मन ओपरो, तन छीज कांटा सो होयो युवराज वूझी दसा, वो कारण कढायो- 76 मत्यप्रनाम जोमी री कवितायां

अर खुद पूछ्यां बिना ई वाप ने
सतवती रै झुपड़े जा चरण परस्या
प्रगट बोल्यो-
मां, मना संकोच छोडो
पूत थारा ई करेला राज, म्हैं दू वचन सांचा
क्यू के म्है जांमण विहूणो हूं अधूरो
संपदा रो खेल खेल वाप
पण मायड़ विना
आ आहुती कोनी म्हने लागे
अरे ओ ग्रास ई म्हारो नी है
फेर ई धीजो नी होवै
सोचता होवो पूत म्हारा राड़ करसी
तो उठा ओ भुज करूं म्है आ प्रतिग्या
सुणो देवी देवता इण वस रा
घरती, अगन, जळ, चांद, सूरज
म्है जलम भर
हां जलम भर, बस कंवारो ई रहूंला
मुगध माई मां निहाळयो वाळका नै
● सभाग्यो है घणो गांगेय
थार दोय मांवां!
दोय नैणां वीच में थू तिलक जैड़ो
यूं अजेय
अछेह होवला जीव थारो
यूं जिको छोड्यो सकळ अधिकार कुळ रो
अकलो यूं ई बचाव बंस
कुळ रिच्छा करैला!
देवता फूला बधायो
सांतनू सरमावतो सो पूत सूं टीको कढायो
पण अणूतो अक वणाव वणतो रुक न पायो-
निजराणो 77

आ प्रतिग्या घणी भीखम त्याग रो उन्माद है ओ भीस्म पड़ग्यो नाम इणरै कारण पण केस होयग्या सेत्त अणछक सीस रा धुंवा ज्यूं उडगी जवानी होयग्या गांगेय बूढा वाप करता घणा बूढा अर बूढ़ा ई रैया जोया जठा लग ! प्रीत रो पराछीत सतवती रे सांतनूं सूं दोय जाया पूत पण वधियां विना ई अक- चितरांगद कठे ई काम आयो राड़ में गधख अरि सू दूसरो हो विचित वीरज- व्याव री चिंता हुई डीलां लियां, जिणरी बड़ा भाई वहादुर, राजकरता, गंगसुत नै सुणियो कठं ई राज कासीराज रचियो है स्वयंवर अपछरा सी आपरी तीनूं कंवारी धीवड़यां रो नाम अंबा, अंबिका, अंबालिका हा पूगग्या गांगेय ई उण रूप-रण में सांतनूं रा भंवर सारू वीनणी ने जीत उण सजिया स्वयंवर में दिखावण कळा सर-संधाण री घेर तीनूं राज कन्यावां उठा, रथ घाल, चाल्या हस्तिनापुर जीत रण गागेय, पौरूस री अथक जैकार सुणता! 78 सत्यप्रकाम जोसी री कवितावा अक राजा, नाम हो सौवाळगढ रो साल्व फिर्यो आडो, अरज की- म्है करूं हूं प्रीत इण अंवा कुमारी सू म्हने आ सूप दो वावा भला ई पूछलो आ ई कर है प्रीत म्हासू जे स्वयंवर होवतो निरविधन आ करती वरण म्हारो म्हारा हेत रो तो मांन राखो रीस में अंगार ज्यू वळता विजय मद गहळ मे गांगेय करदी अणसुणी आ अरज उणनै कूट, मरदन मांन रो कर लेय आया हस्तिनापुर रायकवरी ब्यावरा फेरा फिरण लागा करी पाछी अरज अंवा करूं म्हैं प्रीत म्हारा साल्व सूं पूरै मनां-ग्यांना म्हनें परणाय दूजा नै करो हो पाप; के है पुग्न ओ नियमांप्रमाणे ? थे पुजीजो हो जगत में नेम रा निरमाण करतां थे घडो परिवार, वंस, समाज, रचना थे कबीलां री करो नारी नै वरत मरजी मुताविक थे वतावो- प्रीत माथै यस किणी रो? प्रीत करणो अक मन रो हक नी क्यूं? पाप क्यूं है प्रीत करणो? म्है करूं हूं प्रीत विसवा बीस जिणरो संग सोधू, परस फूलू निजराणो 79 दरसणां रीझू, मुगध मन वीजळी जड़ो संचांनण होवे सदा ओळू, उडीका ! थे म्हने उण तूं छुडा क्यू बाध दो हो अक अणजाण्या मरद सूं? खातरी कीकर होवै थांने के म्है सेजां रमूला खुलै प्राणां हर करूंला अंगदानां में नी म्हार प्रण री? याद कोनी करूंला म्हैं अवस म्हारा मीत प्रेमी री? बात जंचगी की मगज में देवव्रत रे खोल कांमण डोरडा, गठ जोड़णी अर बरी, मोळी भेज दी वो साल्व राजा रै कनै अंबा कंवारी झूरती नै ढोल वाजा, मान आदर सूं, सजा रथ-पालकी साल्व नटग्यो- माजनो म्हारो गंवा, म्हैं होयो हतवीरज जिकी रै कारण, उणन वरूं? हाथ पकड्यो हरण करग्यो, अक वो ई वर, कंवारी रो हो माफ कर अबा म्हने तो माफ कर ! वावड़ी पूठी न वै वौहार सूं आहत समरपित फेर होवण नै हरणकरता कनै पण विचितवीरज न थांमी कह्यो थारो मन कठे ई और है थू और री है-जा अठा सं! वाप रो घर छूट्यो प्रेमी न राखी परणतां वर वीद नै पली नटी वा 80 मत्यप्रकाम जोमी री कवितावा फेर वो नटग्यो हरणकरता खण लियोड़ो विरमचारी रो! घणी आहत, घणी ही अकली अवा घणा अपमान री दाझी ! रूळयोड़ी अक पाळा सूं खिलाड़ी रे पगां ठुकरीजियोड़ी दूसरे पाळे कोई फूलां दड़ी ज्यू ! रीस अबा री नियोजित ही फगत गांगेय मार्थ फूक तूं ज्यूं नाळ में दे झाळ सोनार गळावै लाल गेरू चुपड़ियोड़ा स्वरण नै ! निकळगी अंवा मुलक में राजवंसां ने घणी उकसावती अन्याव री देती दुहाई रीस में खुद होम री ज्यू झाळ परझळती ! कर कुण जुध पण गांगेय जैड़ा अनड़ सुभटा सू गमावै राज कुण इण अक छोरी रा पखा में ऊभ खुद री कुण गमावै लाज डरतो भीस्म सू आखो भुजावळ जीवतो समुदाय औघड़ ! अक दिन चढगी हिवाळा तप करण नै रीस रै फण री विखम फुणकार रा विस सूं डस्योड़ी बैर सूं निवळी कठण तप री हुतासण में पिघळती ! साधना सूं रीझग्या संकर महेसर कह्यो-कन्या! यूं अवस पूरो करेला बैर पण इण जलम में नी जलम तो दूजो थन लेणो पड़ेला ! निजराणो 81

सुण विधाता र लिख्योड़ा लेख
वा क्यू देर करती
बैठगी काठां, मनोवळ सूं जगा अगनी
उणी छिण भसम होयगी
प्रीत रो इण भात वा करती पराछीत
उण पुराणा फिनिख पाखी ज्यू
जलम लेवण दुवारा, राख वणगी।
फूलो मरा तोरा मरां कोनी
तो सुणो अरजण, जुधिस्ठर
क्रिस्ण अर सगळा समरथां !
जीवत्ता म्हार, जठा लग म्है न हारूं
जीत कोई जुध ई कोनी सकियो
कोनी सकला!
म्है अगर हथियार धर दूं काले रण में
थे करो आहत भलाई मार न्हाखो
जुध थारै पख मुड़े
थे विजय रा भागी वणोला !
सस्त्र म्है कोनी उठाऊं
सामने जे जुध मे आवै सिखंडी
ओ सिखंडी पुरुस कोनी
अक नारी है अभागी
इण जलम री, गत जलम री
अर पूरव जलम री, फगत नारी!
हेत है म्हारो हिया में नारियां सूं
म्है न आकरसण नियम सू छिटकियोड़ो
परस करतां पिंड कंवळा
रोम म्हारो झवझवावं
नाड़ियां तणती म्हन परवस वणावै !
82
सत्यप्रकास जोसी री कवितावा

म्है अधूरो मां विना
तो हूं अपूरण अरध-जोड़ायत विना
बेटी विना, बैनां विना
अर प्रीत करती प्रेमिका रै मन विना
म्हैं टूटियोड़ो हूं
किणी खंडत होयोड़ी देव प्रतिमा ज्यू
अपूज्या देवरा में!
हेत हो म्हारो सिखंडी सूं जलम रा आंतरां में
आ, म्हने छिटकाय
दूजां री वणी सहभागिणी
जद अक गण रा लोग म्हांनै घेर
लेग्या अगन, गायां
अर धारण गरभ करणारी लुगाया !
म्हैं हरण पाछो कियो
जद आ वणी अंबा
जलम ले राज कासीराज कन्या !
यू वदळो चुकायो
हाथ पकड़यो म्हैं हरण करतो
निभातो हाथ रो म्है हेत
पण करली प्रतिग्या घणी पलां
म्है कंवारो जलम भर जीवण जिवण री !
आ घणी है मानवाळी, परम मानेतण,
मरद सू रुसियोड़ी,
वैर काढण तप कियो
अर जद मिल्यो वरदान
दूजा जलम में संहार करसी बेरियां रो
आ चिता चढ भसम बणगी !
निजराणो 83

मां थारी गोद निवाई मे मा । गरभ थारै कुडाळी मार सोवै ज्यू निवाया पथरणा में ! गोद थारी होवै निवाई जठे अचपळ हाथ पग हात मुळकता ! देख, मरती वगत कैड़ी वापर ठारी, मरण री तळखणा पूग्यो मिनख चित पड़े, सीधो! आंख में सून्याड़ असमांनी निजर असमान ई असमान उणनै लील जावे! जलम सू इधको अवस होवै मरण में हर जीव वो मारग न जांण, भूल जावै ! भीस्म ई चित आयग्या है अणगिणत तीरां ! छिदयोड़ी देह में ताजा हरचा धावां खिलै है पीड़ रा रज पुसव, धारण कर भूवा आकार मार ठोकरां! आज गुणसठ दिन हाया रणखेत पड़ियां आंखियां मिचगी पलक भारी होई मण-मण भवा नीचे लटकगी! बोलणो ई बंद होयग्यो ! चेतना फिर फिर घिरै पण धणकरो संसार अंधारो लखावै ! छीजता तन मे सळायां ज्यू पुराणा हाडका अब निजर आव! सांस री गत घणी आंची देह में मावं नी, वस घूम आवै ! 84 सत्यप्रकास जोसी री कवितावा भीस्म खोली आंख अर संकेत सू बूझ्यो-कठ हूं! लोग वार दरसणा आया कह्यो ऊंचे सुरां वै आयग्या सूरज मकर में उत्तरायण हे महाभागी हुकम दो! भीस्म काढी जीभ धीरे-सी सबद 'पाणी' उचारयो फेर अरजण कर पराक्रम तीर धरती में पिरोयो नीर गंगा रो परम निरमळ उछळ आवेग सूं ऊंचो अखूटी धार रा टोपा वण्यो गागेय रो मुंडो भिजोयो! भीस्म नै लाग्यो के उणरी वच्छळा मा घण कोडां संख-छाती सू टपकतो देव चरणाम्रत सरीखो दूध पायो ! मां! जगत में हेत थारो पारदरसी पीड़ थारी अकथ, थारो हरख ई अणछेह थारै गरभ में धारण करै सै देह सुगनी थनै पी पी पळे चिंता टावरां री कर घणी थू हार जावै रोग अर भय-भव मिटावण टोटका थारा परम विग्यांन गोरे गाल यूं काजळ लगावै ! टावरां रो रमण ई थारी रमत यूं पकड़ पुणचो प्रथम पग ऊभो करै भासा सिखावै! निजराणो 85 प्रीत सू संची जुगां तूं, पीढियां सूं राळ देव है भविस्यत र अलख प्राणां गुणां रा वीज देव ! यूं सदा रखवाळती थाती वर्ण अपरूप दुरगा, चंडिका अर भगवत्ती, वाळका विलस, पळे से गोद में थारै निवाई ! यू कियो गांगेय सिमरण मात सत्ता रो प्रभा वधगी उजाळो देह सू निसरै कर जैकार बचियोड़ो जगत वंधियो धरा सूं जोत अविकारी प्रखर रवि ओप सूं छिण अंक में जा जोत मिलगी! फूल बरस्या, सख वाज्या ढोल र ढळतं धमक प्राण रै प्रस्थान रो उच्छव मनायो! जद चित्ता नै देह रो सिणगार सूंप्यो अक जणा रा प्राण रो कुरळाट फूट्यो मोड़ मुडो जद सिखंडी आंख पूंछी रोक सिसकी, हाथ में ले मूठियो कोई सवागण तोड़ न्हाक्यो अर माथो निवा ले नारेळ हाथां चालतो वो हसगत पळती चिता में सत करण नै, लीण होयग्यो ! के अचांणक दीखियो बधतो दिगंतां ओक मानव रूप अणघड़, चाल खाथो भुज उठायां रोकतो अर नाद करतो आ रेयो हो साथ आंधो उमड़ती 86 सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

अर साव लारं सळळ सळ कर भगवती गंगा
उठावण गोद में छावो
रळकती आ रई है !
धधकती धू धू चिता रै मार छांटो
मंद कर दी
इण कुटम रो जनक वेदव्यास हो वो !
अर गंगा, मात गंगा, मावड़ी गगा
पतित पावन, तमस हरणी
विमोचन पाप अर भव-ताप करणी,
आपरा जाया अमर गांगेय ने
खांदोळिये पुचकार,
थेपड़ती, करा पंपोळती
टुरगी उठा तूं, नीर गति सू
करण ने बेटो विसरजित महोदध में।
निजराणो

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'इण तकनीकी सभ्यता राजिका नतीजा
निफळ उणमें मिनस रो चित्या मुख्य है।
पारले जीवण रा दवावरिंकारण अर वेगवान
जीवण केई बेमारिया ने जलम देव। लोग
निररण फोती कर सकं अर पसोपेस में पड़या
रखें। इण तकनीकी समाज में व्यक्तित्व रो
नुकसाण होवे। छवट मसोना रो असर इतो
बच जावं केमिनस रोकोई कीमत कोनी
रखें। मिनस, समाज सूं छिट्ययोड़ो अर
अलायदो रखें।
आगत-अणागत
1986
•अगवाणी .ओळख .उतारो .मौत .जामण नै....
•जामण ने .घीय ने .घर .कचरा रीकांण
• भूगोल रा बंद

अगवाणी
आगा हो जावो वा'सा
अणसम मारग में क्यूं बैठा हो !
दीस कोनी, सूरज रो आवै है रथ अठीने !
चिगदीज जावोला;
कित्ता वेग सू आव है, देखो देखो,
इण रा आवेगा सू आगती पाखती ऊठणवाळी
आंधी अर बथूळिया में उड़ग्या तो
थै थारी जांणो;
थोड़ी वळा फेर टिकणो-होवं
तो उण धुड़ता ढूढा री भीतां लार
छौंया में बैठ जावो वा'सा,
सूरज रो वेगवान रथ अठीनै इज आवै है।
वो देखो इंगरेजी बोलतो थारो पड़पोतो
रीस आवै जद हंसण लाग जावे;
वारं बैठा उडीकतां, उणने सरम कोनी आवै,
जद ना केवणो होवै, वो हां बोल जावै ।
अर कैडो तो बदळाव आयो-
के टावर टावर कोनी रह्या;
टावरां ज्यूं रमै है मोट्यार;
गरीव गुरवा ज्यूं कारी लाग्योड़ा गाभा पर रईस,
धरम गुरु घड़ी घड़ी परणीज,
अर जणा जणा कन सोवती धीवड़ियां गरभीज कोनी !
तो अकांनी-सिरक जावो सचवोला वासा,
चोरी कुण कोनी कर?
कुण कोनी-छिपावै आपरा करम ?
मत्यप्रकाम जोमी री ववितावा
90

छल कपट रोई है ओ महाभारत
थांन यूं ई कोनी दीस या'सा
मिनख रा बदळता मन री कालायां
थांन कोकर सूई!
वो आवै है सूरज रो सतरंगो रथ,
नया नया औजार अर हथियार
उठा लिया है मिनस!
नया नया नसा-पता,
नागा रैवण ने परियोड़ा नया नया गाभा ।
वगत री तो मिटगो सगळी ओळखांण
रात होयग्या दिन,
अर दिन होयगी रातां;
यांन उठाय अक कांनी धरण नै
कोनी रकेला मिनसां रा पवनवेगी यान !
हां यदळग्या'से की बदळग्या
बगत, अकास, अरथ, घरम, प्रीत, काम,
ओ धमीडो थे कोनी से सकोला वा'सा
आगा हो जावो;
सिरक जावो अक कानी,
उठी छीयां में जावो परा,
आव है हित्यारा सूरज रो निपग्गो रथ !
आवै है !
ओळख
अंक जमानो हो,
जद लोगां ने लखावतो के वै मिनख है
अवै की लखावै कोनी !
निजराणो 914

अवै फूटरा कोनी लागे फूटरा, विडरूप झिरोखां सूं झांकण लागग्यो रूप-सरुप, अब तो पोड़ ई कोनी लखावै, दोरो ई सोरो लागे आग लागतो, आपां जिनस कोनी हाँ; कोनी हां जिनावर सींग-पूंछ वाळा, आपां मिनस हां! जमानो केई सबक सिखायग्यो लुगायां न लेवता बेचता- अर किराया माथै उठावता लोग, ना खुद लागै मिनख, ना वै लुगायां लागै नारी-रतन ! गुलाम अर गरीव कमतरिया ई, जुड़ाव सू छिटक्योड़ा लागे जिनस जैड़ा, अर रोजीना रो इकसार जीवण जीवता नींद, जीमण अर भोग-भजन करता आपां सगळा ई होयग्या हां जिनावर- आदम जिनावर! अवै ना आपणं कनै हरख-पीड़ है, नाभासा, आपां नै लखाव ई कोनी के आपां हां ! उतारो छिण अक धरती ने थामो- थामो म्हनें उतरणो है सूरज रा सात्यूं घुड़ला तो लार रेयग्या, हांफण लागगी पूंन अकासां लड़थड़ती, - 92 मत्याग जोगी री कवितावां

वेग रूपायत होयग्यो;
अर गंध जमगी है वादळां ज्यूं
म्हें जिको फूल मूघतो
वो तो सौ जोजन लार यग्यो!
हांफ है सगळा ग्रह नयत, मंगळ, बुध, गुरु,
म्हने अठ कांई करणो है !
छिण अक धामो धरती नं, म्हन उतरणो है।
सूरज री अक किरण ने अठं आवतां
जिता किरोड़ वरस लागे,
मयद नै उण अगन रा गोळा सू चटक
म्हार कांनां लग आवतां
लागे उण सूं बेसी वरस !
पदै थारी इण धरती ने-
अक पूरी परकमा करता
वयू कोनी लागे वगत रो चांण !
देखो, म्हार लिलाड़ पसीनो पळक रह्यो है,
देखो, फूलगी है सांस म्हारी;
कांई म्हने वगत री चालणी सूं छणणो है !
छिण अक थांमो धरती नै, म्हने उतरणो है !
ओक पल तो सावण दो पिसाई,
सोवण दो म्हने मोड़ो दिन ऊगां तांई,
बांइटा काढण दो म्हार पगां रा;
लारली-आगली सोई तो लेवण दो,
आंम्है-सांम्है होवण दो म्हनै म्हार,
वस ओ ई जीवणो है कांई ?
ओ तो मरणो है !
छिण अक थांमो धरती ने म्हनें उतरणो है।
निजराणो 93

मौत
बैठो हूं म्है बीसवां सईका रै उतराध
(फगत पनरै बरस बाकी है)
जलम लेवता अणगिण जीवां रै मज्झ
म्हने ई अपरोखी लागै चिंतणा मौत री !
पण झिझक आकार धारण करें
म्हारै अवचेतन में रगत री अक नाडी
जिणमे तिरता अलेखां मरण-कोडियाळ
उण इकथंभिया म्हैल रै कंगूरां कांनी
जिण माथै टंगियोड़ो अक लोही झरतो नरमुंड
जिणरा डोढ़ा झिरोखां सू छणती
खळखळ हंसी;
अर गोखड़ा में तीरां री सेजां ओझक
सैलां सू विधियोड़ा
पळकती करवाळां रै झटकै पड़िया कबंध
क्रूस माथै लटकता,
अरोगता केसर रा प्याला
अॅठता बदन मुगत होवण री पीड़ सू !
कविता रो छांटो पडताई
पाछो बैठतो रगत रो उफाण,
अर गरभ में भेळो होयोड़ो भ्रूण
रूप धारण करतो कुंडळाकार!
वसंतायोडा उद्दीपन वन में
फूलां सूं लड़ाझूम वेलडियां वीच
पांच सपूतां रो वाप
काम रा मरण विंदुरी चेतना में
अकाकार
जीवण सिरजण री साधना में
अणावरत माद्री रा भूधर कुचां ने
मत्यप्रकाम जोसी री कवितावा

आपरी मूठी में भींच, उणरा निवाया होठां मे गडाया गयो दांत अर धोवतो आपरी तणियोडी नाड़ी सूं किरोड़ो जीवाणु स्वागत करता गरभ में अकाओक पड़ग्यो निस्पंद! निस्पंद होयग्यो हिरणी रो सराप ! रगत री नाडी मे कामासणां लीण लाख लाख जुगल छिटक छिटक ढंक लिया भोजपत्तर सूं आपरा झव झव करता अंग गिनोरिया अर सिफलिस री छूत सू डरियोडा मरण रा डर सूं घायल मरियोड़ा अणभोग्या अनुभव री मायावी पीड़ अक मौत! केंसर वार्ड में सूरज भगवान रै उतरायण पूगण नै उडीकतो पीड़ तूं छीजतो अक भरपूर जोधार, विधियोड़ो तीरां सू। अंबा नै अंक वार, फगत अक वार निजर रा फोटू-प्लेट माथै उतार अंधारा में विलम जावण ने उतावळो, सांम्है ऊभा सिखंडी सू ई संतोस धार जिणरो धीळो माथो लटकग्यो जीवता महारथियां रै स्वरू! अक बेकाबू रोग अक्यूपंचर, अपरेसन, रीसर्च, रीसर्च ! . अनरजी वरावर मास गुणा वेलोसिटी वरग! अणु रा गरभ में जलमें वा रसायनिक ऊरजा जिकां में विसरजण होवै सगळा जीवण ! निजराणो 95 हिरोसिमा अर नागासाकी रा नगर धू धू वळे इण ताप सू अर दाझै लाखां पिंड चीसां मारता! अक धुवा रा वादळ अर धमाका समचै अलोप होवता हज्जारां अबोध, निरदोस, जनपद चेतनावां निस्पाप ! माथो पकड़ बैठग्या चित्रगुप्त जी लाख लाख जीवां रो लेखो पाप पन्न री सतावणी मिजमांनी लाख लाख पावणां री पाछा सिरजण री चिता! नोबल प्राइज अनरजी बराबर मास गुणा वेलोसिटी वरग! तणाव रा आखर घोखतो दफ्तर तूं घरां बावड़तो अक अलकार भिड़ग्यो समान लदिया ट्रक सूं ! निकल आई पेट वार धौळी गुलाबी आतड़िया ओक धमाका साथै वार आयग्या माथा रा कपासिया थरथरायो अक हाड मांस रो बदन पाणी, पाणी, पांणी! सोना री ॲठवाड़ी बतीसी धोय दान करण ने धोखतो ब्रम्हास्त्र चलावण री कळा परसरामजी र सराप! धकरिया रे ऊपर घूमती माछळी री आस रोसंधाण नीचे तेल रा कढाव में पडछाया देख ! 96 मत्यप्रशाम जोमीरी कवितावां कंवारी कन्या सूं जायोड़ो मां, म्हनै अंक बाप तो दियो होवतो बाप बिना बहू कठे ? रिच्छा रा कवच-कुडळ काल ई उतरग्या ! मुडा माथै मारली अक डगळ री सोना री बत्तीसी धोवण ने पाणी, पांणी ! तीन वरस होयग्या बादळां ने अठीने गाज्या सूखगी-धरती रै नीचे री अंतरधारा दो मील पूरब कांनी बधै रेगिस्तान सालो साल! आंधी, वळिया अर रेत रा दरियाव भरयां जावै सामरथ सतावांन रासन में चळू चळू पाणी पीवो, धोवो, न्हावो, करो कुरला ! तड़ाछ खाय पड़ग्यो टोगड़ो तणगी च्यारू टांगां बार लटकती जीभ माथै वेकळू ! दिमाग सब सूं पैली मरया करै पछै मरे दिल अर आंख्यां खासी ताळ मरयां पछै ई जीवं ट्रांसप्लांट दिल रो आंख रो दान संभव है इणी कारण ! हाल थूक में तरळाई है चालो माळव! माळवं किसा मिनख कोनी मरै ! आटा-पाटां बैवती अक नदी में रूंखां माथ टिरियोड़ा लोग देखता रह्या आंख्यां सांम्हीं धार में गुड़कता आपरा कुटम नै निजराणो 97

डूबता, उतरावता, बदन
नागा, फूल्योड़ा, विडरूप !
कठा सू आवे रेळो अचाणचक
मरण रो,
वोळाय जावं अंवेरियोड़ी संपद,
झूपड़ा!
अर बिखेर जावै घरकोल्या!
वो उड़तो अक विमाण पड़ग्यो संमदर में
तीन सौ पचास अमीर उमरावां
अर परियां जैड़ी फूटरी
परिचारिकावां ने आपरा गरभ में लिया।
हाल सोध है लोग
उण विमाण रो कचरो
जातरिया रो सामान ?
जामण नै ....
छोरी सू लुगाई वणती वगत रो बदळाव
घणी पीड़ उपजावै मां
अर थू म्हारी कोई मदद कोनी करें ?
केई तो मिथक, केई तो रहस्य
जुड़योड़ा होवे इण वदळाव सूं ?
सहेल्यां ई सांच कोनी बोले
अक वरजणा रो पसराव होवै म्हारै च्यारुमेर
अक गुब्बो, अक अनुमान में जीवां
म्है सगळी धीवड़ियां?
देही रा आपे आप होवता करम
जिकां माथै जोर कोनी म्हारो
98
सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

क्यू देव म्हांनै अणूंती सरम,
क्यू करै म्हारो दरपदमण, अपमान ?
क्यूं म्हांनै अपरस बणावे लोग
क्यू म्हांनै सूग आवै खुद माथै
क्यूं म्हांनै पाप रो बोध करावं
ओ देही रो धरम
क्यू ठराव म्हांनै कसूरवार
क्यूं म्हांनै चुप रैवणो पड़े?
यूं खुद भोगियोड़ी, म्हारी मदद कोनी कर मां?
जांमण नै
थारा सू बिछड़ण रो भी
म्हन थारा सूं जोड़ दी मां ?
भाई तो जलम तूं ई आपरै पगां होवै
मोटा होयां लाग जावै आपरै बाप रा वौपार विणज में
संसार बसावे बड़ेरा ज्यू
अर सुख दुख झेलता गुजर जावै इण मेळा सू
?
पण घणी डरती म्है
लार आंचळ रो छाव छोड़ती,
घणी अचपळ होय जावतो
जद थनै कोनी-देखती म्हारै कन।
थनै म्हारा डील में उतारण न ई तो
म्है रमती इलियां सू
थेपड़ती, खवाड़ती, सिणगारती, लाड करती।
थारी जूण जीवण ने ई तो
म्है रसोई करती, घर वणावती, टावर राखती !
म्हनें घणो डर लागतो थारा सू विछड़तां!
निजराणो 99

सासर गयां ई ओ संको कोनी छोड़े म्हारो पल्लो
घिरियोड़ी नर रा भुजपास
में
आंख मूंद इणी अभरोसा मे चिमक चिमक जाऊ
कठे ई म्हनै विछड़णो तो कोनी पला ।
कठे ई म्हैं विलग तो कोनी हो जाऊं।
धीयांन....
हर बार म्है ई म्हैं हारूं बेटी, म्हैं ई म्है हारुं ।
थन जाई जद सुणिया मोसा म्है
जाण थारो वेटी होवणो म्हारो कसूर है ।
थनै बेटा साथै उछेरी
तो जणो जणो टोकी म्हने
म्हारै पिड रा ई दो खंड,
सोचो तो कुण बत्तो कुण ओछो।
तो ई धोवा धोबा ओळमा घालीज्या म्हारे पल्ले ।
थने टोकी, बरजी समाज संकेतां
पण मेहणा सुण्या म्है ।
आगण में थारी बिगसती काया सूं डरती,
थू वारै जावती तो अपलक उडीकती म्है
अर छपर-पिलंग माथै थारै पौढ़ियां
रात्यूं चमक चमक पौरा दिया म्है ।
व्यावणसार होई
तो लोगां आरपार करदो आगळी म्हारै
नीद उड़गी म्हारी।
परायं घर विदा कर
100
सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

अवै म्है सुणूं थारै सासरा री सिकायतां
अर अवखायां थारै मन री।
थार कारण हारी समाज सूं
अर अवै हारगी थारा सूं
हर वार, म्है ई म्है हारूं बेटी, म्है ई म्है।
घर
धरती सूं १४५४ हाथ ऊंचो ऊभो हूं म्है
सिकागो नगर में सीयर टावर री
११० वी मजल माथै,
जठे इंतजाम है म्हारै रातवासा रो !
फगत वदळग्यो है अकास
अर म्हारी दीठ में उफांण लेवै
सात समंदर पार म्हारो घर
मकराणा मोहल्ला, जोधपुर में
खीर समद में संपिणी ज्यूं अकेटा खावतो !
[म्हां च्यारू भायां नै वेचणो है ओ ढूढो,
लाख लाख रिपिया कोई ओछी रकम कोनी होवै]
अकाओक धारण कर लेवै
मानवी उणियारो, म्हारो घर,
चूना सू पुतियोड़ो, परेवा जड़ो ऊजळो !
वाघतो म्हनै आपरी हेताळू भुजावां में
अर बंधतो म्हारी अणसीमा वावा में,
डुसका भरतो,
टप टप चवता आंसुवां में
पाछो लाघ्यां गमियोड़ा टावर ज्यू !
निजराणो 101

भाईसा! ओ कोरो घर ई कोना
ओ म्हारी रातादेई मां है-मां!
जिणरी कुंख मे जलम लियो म्हे
अक अंधारा ओरा री टसकती मचली में,
(सूंठ अर अजवांण री सौरम
हाल भर जावं म्हारी सांस में)
जठे चौक में चित पड़ियो
म्है टुग टुग भाळयो असमांन !
नया घर में इण घर रो सामान !
भूगोल सूं बंधियोड़ी कोनी आ सभ्यता
मोह, कोनी कोई चीज सूं
अक बार वापरियां
अकूरड़ी माथै फेक दै आपरी चीज वस्त
औ कोनी माने सरग नरक
आतमा परमातमा
अणत काळ अर विपुला प्रिथमी।
कचरा री कांण
और फेको अमीर उमरावां
पैक करण रा कागद
आज तो थांरो तिवार है
रंग-बिरंगा, फूल-फांटा छपियोड़ा
चोकणा कागदां सूं बांध बांध
लावोला अलेखां भेंटां
अर दिनूगां क्रिसमस रा रुख हेठे बैठ
सांता क्लॉज रा थैला सू काढोला
अक दूजा रा उपहार
पछै फाड़ फाड़ फैकोला पारसलां रा कागद
102
सत्यप्रकास जोसी री कवितावा
-

संसार रा साधनहीण देसां रा
लाखां किरोड़ा टावर रैयग्या अणपढ़
कागद कठे
अर है तो मूघा कित्ता?
कितावां कठे? कागद कठे?
फैको इणी भांत गाभा
दातण करण रा बुरस
हजामत रा पाछणा
मोटरां, घर वार,
फगत अक बार काम में लियोड़ा सामान
म्हारी दुनिया नै दरकार है अ सगळी चीजां री
दवायां थोक वंध, भला ई नुकसाण करती होवै
दवायां तो दवायां होवै
अर वै ई परदेसी।
तो फैको अमीर उमरावां
थारी सभ्यता नै अहनाण रा की छांटा
फैको फेंको।
भूगोल रा बंद
अक जूनी सभ्यता रा वारिस आपां
इण नतीजा माथै पूग्या
के संसार असार है। ओक सराय है
अठ आपरो की कोनी
साथै की कोनी चाल
कांकरा कांकरा भेळा कर म्हेल चुणाया---
अर मूरख इणनै आपरो घर के
ओ तो रैण बसेरो है-रेण वसेरो
निजराणो 103

पण जद ई मामूली सो दवाव आयो
आपां नटग्या आपणी जमीन देवण सूं
टावरां ने पालण में पढ़ायो-
इला न देणी आपणी...
घर रा ढूंढा सारू कोट कचेड़ी चढ़िया
अर अक टोडो के चातरी ई कोनी दी
भायां ने
पण अवै जलम ले चुकी है
अक नूवी सभ्यता
जिकी ईधरती नै आपरी कोनी मांन
कोनी मांनै देस आपरा
सर, गांव, सगळा बदळता चाल
सीवां स आग वधता चाल
आ सभ्यता बदळे मोटर हर दूजे बरस
हर तीज वरस घर
अर आपरो गांव हर पांचवै वरस
घर बदळती वगत कोनी ले जावै।
आपरै साथ।
U
--
104
सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

'म्है तो म्हारी गरज तूं आह्वान किया
है - समता नै सुख-दुख बाटण सारू, काम ने
संतान सारू, वेदना ने जागरण खातर,
संभावना ने गाढ सारू, रीस ने अन्याय रे
सांम्ह लड़ण सारू, लाज नै हेत सारू, पाप ने
शुद्धि सारू....! म्है आं सगळां ने बुलाया
है, अभ्यरथना करी है, काम मोळाया है अर
कदेई-कदेई नतीजा सूं ओळखाण ई कराई है।'
आहूतियां
1986
• वन • संभावना • कल्पना • माळपण • भरोसो • हरस
• पाप-बोध. स्याग. प्रेरणा . तिरस . संकोच . उपज
• रोम • गाड़ . ईसको • यस्ती • न्याय • आजादी
• प्रार्थना

वन
म्है लियां वरमाळ ऊभी हूं स्वयंवर
थे पधारो सांवळा वन देवता रक्रियामणा
औ विचारा पांख पंखेरू
कर जिण घर बसेरो-रातबासो
जीव कळझळ करे-
जीवै निपट वळ सूं
सांप, उल्लू, सिंह, हाथी, मिरगला री सरण
थे हरियळ धरा री कूख रा वरदान
आवो सांवळा वन देवता
अचपळी नदियां रमै खोळे,
खळक्क किलकता नीझर,
फळां, फूलां, हरी द्रोबां, रो कियां सिणगार,
गवरु, अखतजोवन,
थे पधारो म्है उडीका बाट थांरी
काट थांरा रुख
काट जे मिनख नै
व्याध है वै
स्राप रिसियां रो जगावां
लोभ सूं हित्या करणियां पापियां ने
जग्य मे म्है बांध लावां
थे जठं होवो मेघ घिर आवै छतर ज्यू,
थे पवन रा दोस पी निरमळ बणावो,
आसरो दो आसरम नै
म्है रसाळां सूं भरां खोळा
106
मत्यप्रकाम जोमी री कवितावां

दमकता जुगनुवां रै, पागियां रै, हाल ओठे भूलता मारग, भटकता रिंदरोही मिनख मांदो है घणो ओ सांवळा थे जड़ी बूटी जगमगाती औखदी संजीवणी ले इण सदी र प्रांण नै पूरण वणावो थे पधारो इण वरण मे देवता वन देवता, वेगा पधारो। संभावना निरासा रा उफणता समद मे पड़ग्यो हूं डूवणो ई अक मारग है अर डूब ई रह्यो हूं दुख रा इण विराट पारावार में फगत थू अवतार ले हाथ में इमीघट लियोड़ी हे अपछरा संभावना आव म्है गुचळक्यां खावतो थनै भाळू हेलो पाडू-पाछो जीव जाऊं इण गत म्हारा सगळा सुखां विलासां में छिप्योड़ी ओ मोहिणी संभावना तिणकला जड़ी, फगत अक सांस रूप जोवन सिणगारां माथै बैठा पीणा सांप यूं म्हने चेतावं भरोसो देव व्यावस देय सुवाण जोड़े भावी री आंवळ नाळ सूं आव म्हारै मन भुवन री लिछमी, संभावना म्हारे साथ रे। निजराणो 107 ---

कल्पना
जाग वनड़ी कल्पना
आपां घड़ा, की सांच रा, की झूठ रा चितरांम
सपना मिनख री पूरण अपूरण वासना रा
घड़ां पाछो अणमणो इतियास
उणनै गासिया देवां अरथ रा, कारणां रा
फेर उणरा काळजा सू काढ लावां
मोतियां जैड़ा नतीजा
सूपदयां रमता भविस्यत र करां में !
अक थारी कूख सूं सिरजण कियोड़ी
सांच होवे रचना, खरी हो
खुद घटी घटना नी सांची होवै सदा ई;
जाग वनड़ी कल्पना
थू जुग जुगां सू फगत जोडायत रही है
सांचरी
थारै बिना जीवे अपूरण साच
थू तो मधुर पख है सांच अणघड़ रो !
अरे मत लाज म्हारी कल्पना
थू जाग वनड़ी जाग।
वाळापण
बरसां री भीड़ में
म्हारी आंगळी पकड़यां पकड़यां चालतां
बाळापण
यूं कठे छूटग्यो लारै!
108
सत्यप्रकाम जोसी री कवितावा

आव बगत री रेत में बणावां घरकोल्या
थार मुंडा री निस्पाप मुळक
ने
दिनूंगां फूलां ज्यू धोवां
तारां झरती ओस सूं
इचरज करां
अर रग विरंगी पीपळयां रै लार भागां
नीद में थनै कांई केय जावै कुदरत
जे यूं मीठो मीठो मुळकण लाग जावै !
आव, म्हनै ई चालणो है थारा परीलोक में
पूछ, म्है थारे मन में ऊठता
लाखां सवालां रो करूं समाधान
थू थू खुद ई जांण जावला अलेखा जवाब
गिळगिचियां सूं रमता
के पांणी में छपछप फुदकतां, भीजतां !
अदभुत ही ओप थारै अंगांरी
तो ई लाध कोनी गमियां पर्छ
इण अंधरीज्योडा वजार में
म्हें थनै हेला पाडू
सायत पिछांण लै यूं म्हारो सुर
आव म्हारी आंगळी पकड्यां चालता बाळापण ।
आव!
भरोसो
थू होवै, तो अचीत्यो अदीठ ई सांचो
अर थू कोनी होवै
तो परतख दीसतो सांच ई कूड़ो
भरोसो अलख कमाई है मिनख री
निजराणो
109

आव भरोसा!
म्हें थार ई भरोसे हूं!
थारी मूंजड़ी पकड़ म्है चढ जावां भाखर
कूद जावां अगन में
उडला अंतरिच्छ में, तिरलां समंद में !
आधा इंच आगलो पहियो
अर आधा इंच लारलो पहियो
जमी माथै टिकायां
साइकिल चलावतो मिनख थार पांण ई आगे वध
आगे वधे सगळो ग्यांन विग्यांन थार पाण
समाज रा संबंध कुण वणावे?
अक दूजा सूं जुड़े लोग थारी रेसमी सांकळ सूं
थार कारण सीता रयगी रावण री मांद में
थन पाछो बुलावण देवणी पड़ी अगन-परीछा।
यूं अकथ ताकत है प्राणां री, भरोसा !
हरख
नींद खुलतां ई म्हनें हरख होवं
जीवता रैवण रो, नूवै दिन रा दरसण करण रो
हरख नीरोग रेवण रो
हरख कमावण-खावण रो
हरख सिंझा ताई थाकण रो, चोखी नीद सोवण रो
हरख लोगां सूं मिलण रो
समाज सूं जुड़ण रो
इण नदी अर महरांण री अक छौळ बणण रो
सगळा मिनखां सूं प्रीत करण रो
110
सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

हरख होवै बिरखा पाणी सूं
रूंखां, बेलां, फूलां, पौदां, हरी हरी घास सूं
तावड़ा सूं, चांदणी तूं,
बायरा सू, आधी-तूफान सू
रात रा अंधारा सूं, दिन रा चन्नाणा सूं
इण विराट सिरजणा री अंतरधारा
जलम, मरण, बिगसाव सू
अर इण नरतन री मूळ सत्ता रा दरसण सूं !
पण लाखां लाख लोग कोनी देख्यो थने
कोनी रमातो थने खोळा में।
अंक वार वैरै प्रांणां में ई आवै
तो जीवण रा वरस दूंणा तिगणा वध जावं !
पाप-बोध
जाग वोध पाप रा!
आतमा नै बोध
जिणतूं पड़े उणमें दाग काळा
रात दिन थू चूंठिया भर चेतना रे
डरै जिण सूं जुलम करतो जीव
झिझकै गुन्हा करतो!
आतमा सोरी घणी है इण जगत में
कुण सजा दे वावळी ने
सजा तो मन, देह झेले न्याव री
अर पोड़ दूजा नै पुगावण रा करम री!
जाग सिग्या पापरी
यूं वेदना दे आतमा नै अर वचाल
आ सिड़ण लागी अबूझी
निजराणो 111

अकई उपचार है उद्धार रो
यूं जाग काळा बोध कोरी चेतना रा
पाप री ओळख करा दे आतमाने ।
त्याग
आव पूरण भोग, तापस त्याग
कर चुक्यां हां भोग छिण रो, अणत रोम्हें
रूप रस रो, गंध रो,
मोहित निजर रो, परस, वांणी रो
रतन, धन, संपदा रो
पुरुस नारी रो
गगन, धरती, अगन रो, पवन रो,
इण उदध भर मेघ जळ रो
घापग्या हां
आव पूरण भोग, तापस त्याग
म्हांनै भोग सू थू ई उवार
क्यू के ज्यूं ज्यू भोग भोग्या
भोग री बधती तिरस रैवारण
थाकी उमर, थाक्यो बदन,
दो नैण दूसण लागग्या
पग बोझ ई कोनी उठावं
भोग तो परसाद रा परमाण जितरो अब न भावे
म्हें समझग्या
भुगतणो ई भोग रो फळ होवै जगत में
त्याग रो आणंद भोगां सू सवायो
त्याग ई है भोग साचो
आव पूरण भोग तापस त्याग ।
112
सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

प्रेरणा
आव म्हारी प्रेरणा परणी-पताई।
छूटतां ई हाथ हथलेवो
घरां आई महकती मेड़ियां में
घणी भोळी अर अबूझी,
जागती,
की सोधती, की समझती
यूं अरथ सू अणजांण,
डरियोड़ी, झिझकती।
म्है निरखतो रूप निरमळ
जगत में वधग्यो सुरग री सीव तांई
आज म्हारा पथरणा में घोर खीचती
अडोळी, धापियोड़ी,
यूं पसरगी खुद, म्हनै अब कुण जगावै ?
कुण मंगावै मांग मुकताहळ समंद सू
कुण तुडावै फुणगियां टंकिया सितारा
कुण म्हनें विड़दाय, म्हारो वळ वधावै
आज पाछी गरज पड़गी है म्हने
ओ प्रेरणा!
थू सेज म्हारी आव
थोड़ी झिझकती, सपना सजाती,
सोधती, भोळी, अबूझी
भर सवागण 'मांग में सिंदूर म्हार
आव म्हारी प्रेरणा परणी-पताई।
.
निजराणो 113

तिरस
जाग अणछक तिरस
थू
भरिया समद सी
नेण, होठां, कंठ में,
तन-पोर में, नख-केस में, मन-प्रांण में
आ बैठ अणछक तिरस यूं भरिया समद सी
थू लगा प्याऊ
कनक झारां अटूटी धार,
म्हारा प्रांण तिरपत हो उठा लग कूढ़ियां जा
दरसणा सूं धापणो अधरम गिणीज,
नैण संजळ होय थारो रूप पीव जुगजुगां सू
होठ थारो मद परस सिकुडया न दाझ्या
कंठ मे ऊग्या न कांटा
रोम में रसभीड़ बोले-
'और कूढ़ो, और पावो
कुण होवै तिरपत चळू भर दरसणां सूं
अॅक चिमटी परस सूं, कण हेत सूं
हाय जीवण है कितो व्यापक
अलेखा रूप रस में
और पल्लो बैत भर रो खोळ भरवा ने
कठे मावै अणत आकास
नेतर दोय, काया पांच छ फुट,
अक कोरो मन भटकतो
पण छक्योड़ा मिनख है अणगिण जगत में
जीवता ई जे मरघोड़ा।
जाग उण में
जाग अणछक तिरस यूं भरिया समद सी!
114
सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

संकोच - आव मन सकोच सब रै। मारतां कोई मिनख अणजांण नै, अर चोरतां धन, दावतां धरती पराई, पेट माथै मार लातां- पटकता परण्या गरभ नै, बैन सूं धंधो करातां अंग रो, अर टावरां नै कूटतां, मारतां बिन वात कोई जीव ने आव मन संकोच सबर मिनख है मूघो घणो वै कैयग्या ग्यांनी के लख चौरासी भटकतां जूंण मिनखां री मिल थू रंग रा कर भेद जातां रा, धरम रा, वरग रा दोयण वणांतो, कर मनां संकोच - कर मनां संकोच धन रै कारण थारा बदळग्या हेत रा व्यौहार यूं छळकपट, चोरी, लाव-लालच में घिरीज्यो मिनख रो दुवै पसीनो सीव धरती री उकेरी, देस म्हारो देस थारो के भिड़ाई फौज लाखां नै मराया फगत थारी मूंछ अर तुरा किलंगी अखत राखण यूं मिनख रो कुण बता दूं देस रो कुण जद कुटम रो ई नहीं है ? अ झुरै बूढ़ा वडेरा निजराणो 115 वै कचेड़ी में लड़े दो बंद-भाई ! थे बणाई बचाई- जद जिनस वणगी लुगाई ? थू धरम काई स्खाळ ? कांम जद विपरीत करतो होय जगत र अर कर विपरीत कुदरत रे ! आव मन सकोच सब रे! उपज आ उपज! सौ सौ गुणी वध । आ, धरा तूं, गिगन सूं, नित कळ मसीना सू, मिनखरै बूकिया रो, मन-मगज रो जोर लै विग्यांन ने इण काम गाड़ी जोत कर दे कनक मूंधी रज आ उपज ! सौ सौ गुणी सज! म्है गिणां संख्या अरव में यस अरव हां पांच पांच मुंडा जीमवा नै, पांच तन, सुख पोखवा ने वस अरव हा पांच पण है हाथ म्हारा दस अड़व दस अड़ब पग है, पंख है, अर ग्यांन रा घर दस अड़व चीज रै लार फिर जद चीज री कीमत आ उपज सो सौ गुणी वध । सत्यप्रकास जोसी री कवितावां 116

खेम
आव म्हारी खेम
पूछण आयग्या मूसळ लियोड़ा, वारणा खड़खावता,
व रात आधी, गाव रा जूना मंसाणा सूं
आव म्हारी खेम
लेली म्हैं दवायां डाक्टरां री
वैद राधासा पिया
ली गोळियां हैं साव राई ज्यूं हकीमां री
आव म्हारी खेम
म्हारै मन तणावां अर अपूरण वासनावां री
जगां खाली
आव म्हारी खेम
म्है वरजिस करू नित ऊठ वेगो
सांस साधूं, योग रा आसण लगाऊं
आव म्हारी खेम
धन, घर मे धरयोड़ो मोकळो
जुद्ध म्हारो देस कोई राज सू कोनी करै
म्है नेम राखां, धरम पाळां.
आव म्हारी खेम
म्है कुदरत जिवाव ज्यूं जिऊं
म्है अक सुर इण रागणी रो
अक तोड़ो ताळ इण नरतन तणो हूं
रूप रो आकार इणरी धूप-छीया रो
ज्यूं निभै बस इण धरा रो नेम
आव म्हारी खेम ।
निजराणो 117

गाढ़ आव गाढ़ बैठ म्हारा हीया रा हिंडोळा में औ वीखा ई बीखा रा जंगळ हरख ई हरख रा सरवर जठीनै देखू, उठीन- अजांण्या असैंघा असमान घणो डरचोड़ो है मिनख रो आपाण आखी ऊमर बीत जावै फळ री उडीक में आव गाढ़ ! थारै कारण ई है पगां में करार! घटना-दुरघटना, सगळी गई परी होणी रे हाथां कुण जाणै कांई होवैला आगलै पल-छिण, टूट है वीजळी, गाज है मेघ, बाजे है बायरा रा गुणचास वाजणा, अंधारा रा इण अमावस महरांण में- थारै पांण ई दीसला काल रो ऊगतो भांण चंचळ प्रांणा रो धड़को थांम थारै पांण ई जागणो है म्हान- करणो है जाप आव गाढ़ ! ईसको आव ईसका! जे की म्हारो है जीवण में, वो गम नही, कोई खोस नी ले जावं, म्ह करूं रखवाळी, थार साथै ईसका 118 सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

कड़ो ई ओपरो
कड़ो ई स्वारथी लागो म्हारो बरताव
म्हारी चिरमियां, म्हारा गड्डा-कंचा,
म्हारो वरतो, म्हारी पाटी,
घणी प्यारी है
थार कारण ई रखाव है, म्हारा ईसका
यूं रसायण है
प्रेम, घ्रिणा, दुख अर डर रो
थार आयां म्है सम्हाळू म्हारी सिरड़
म्हारी रीस, म्हारी वांण कुवांण,
म्हारी चिड़
म्हारी प्रीत कोई क्यू ले जावे
आव ईसका, म्है राखू फगत म्हारै ताई
भगवान रो ई दूजो नाम ईसको
इण कारण वाइवल बतावै-
कोई दूजा देव नै मत धोको,
सगळा धरमां ने छोड़, आ जावो म्हारी अकली सरण में
घणो प्रेय है यूं ईसका
आव ईसका।
बस्ती
आव वस्ती
अकला तो ऊभग्या इण सून रा पसराव में,
आ मून कद तांणी सुहावै !
बात बतळ रोज खुद सूं ई कर कितरी
अवै तो आत्महित्या करण री मन में उमाव!
ला, मिनख, लड़ता, झगड़ता, प्रीत करता,
आव वंतळ वात करता की पडोसी,
निजराणो 119

ईसका में जीवता, मरता, जलमता,
रीझता, नीहाळता, भर भर नयण बै,
लुक छिप्योड़ा आपरा घर डागळां सू-
बारणां सूं-
और कूची रा कियोड़ा काच-काणां सू
जी अमूझण लागग्यो है,
ला पसेवो मिनख रा तन मन बदन रो
अक सौरम!
म्है तिसायां हां, मिनख रो दूध म्हांनै पा,
विण साथै, करा मावो, पियां मदवो,
हरख सू नाच गावां,
पीड़ होवे तो रोयलां साथै
कठा लग वीण, पोथी, छांव लै बैठां
फगत आकास रै हेठे,
लियां रोटी,
पसरता रेत रा मरु में अकेला जीव म्है ?
आव बस्ती !
न्याव
आव न्याव !
जलम्या नै होया फगत छ: दिन
कोई सजा लिखग्यो म्हारी पूठ मार्थ
पढ़ कोनी सकू, फगत मुगत रह्यो हूं
जुग रा जुग बीतग्या
म्हारो गुन्हो तो वताव-आव न्याव !
आखो दिन करूं मजूरी, पूजूं पसीनो
सैठा है मन मगज अर अंग म्हारा
फेर ई घास री रोटी क्यूं ले जावं वनविलाव !
आव न्याव!
120
सत्यप्रकाम जोसो री कवितावां

क्यूं कोनी म्हारा कमीज रै अदीठ जेबां
कांई कारण, कोनी बैवा में बेनामी खातो म्हारो
गुंडा क्यूं कोनी करै म्हारी मदद
कीकर बड़ग्या म्हारा खेल में, हर कोई रा द्राव !
आव न्याव !
औ झूठा, छिछोरा,
नट और नटणिया करैला राज?
औ देस ने कुतर खावणिया तस्कर होला साहूकार?
अ फरजी, हाका करणिया,
कद सूं बणग्या मौजीज?
म्हैं हमेस करूंला काम?
अ हमेस करला टेलीफोन ?
आ व्यवस्था तो पोची है सार
आव न्याव !
आजादी
आव आजादी!
मुगत कर मिनख ने
दूजा मिनख री राजसत्ता दासता सूं !
भुगत कर धन री रगत पीवणी चतराई सू !
मुगत कर भूख सूं, गरीवी सू,
बेकारी निकरमाई सू!
मुगत कर चमड़ी रै रंगां रा दीखता अळगाव सू !
मुगत कर धरम रा, जात रा, देस रा आग्रहां सूं
मुगत कर राग, रोग, मरण रा डर सूं
मुगत कर कुदरत री मेहरबानी सूं
मुगत कर मसीनां सूं
थड़ियां सू, आंछी गत सूं
निजराणो 121

मुगत कर बरसां वासी धारणावां सूं मुगत कर इण भांत- कै म्है खुद नै सोधलां, जीवलां खुद री जीवणी ! अर इत्ती विराट करलां चेतना ने- के म्हार मांय कर जलमै नया ब्रह्मांड; नया धरम, नया ईस्वर ! आव आजादी! प्राथना प्राथना करू देवां, प्राथना करूं! आवो, आप आप रै भोळायोड़ा करो काम, मिनख नै करो सुखी, करो इण जग्य नै सफळ ! टावर ज्यू लड़णो छोड़- मिनख अर कुदरत कर पूरण अक दूजां नै, विग्रह अर तणाव टूट- मिनखां रै सिरज्योड़ा समाज र संबंधां रा, आत्मा होवे नचीती, प्राणां ने मिल फुरसत, इण ब्रह्मांड में सिरजां देवस्रिस्टी रा जुग देही अर चेतना वध आप सगळां रै पधारयां ई ! म्है तो चढांऊ हूं पुजापो सवधं रो, रूपां रो, रंगां रो, सुरां रो, सौरम रो, सवादा रो, सरधा रो, भगती रो, निरमल भावनावां रो, हेत रो! म्हारी अरज सीकारो, आवो देवां ! म्हारै जग्य में आवो ! सत्यप्रकाम जोसी री कवितावां 122

'पण काई इतो सरळ है भावना सूं
जुड़योड़ो, संग्यापण टूटणो? काई रूप, रस,
गंध, गीत तूं कोनी हो सके संग्यापण ? मत
मिलो, मत बोलो, मत देखो अंक दूजा नै, तो
ई अक दजा री खेम कामना, अंक द्जा रा
गुणो अवगुणा रो अहसास, मेक गुजा रे
• होवण रो बोध अर जाणण रो गुमान, काई
अंक दूजा ने भावनालोक में जुड्योड़ा कोनी
राख सके ?'
पुजापो
1987
• सनेसो .थे हो • बोलो · मिलण • कामग • हर
• लोरी • माध्यम • हरख • परस • यस्तो
•कुण • मूलणो • पुजापो

सनेसो
म्हारो सनेसो देवण नै
म्है थार कनै जिण किणी ने भेजूं;
म्है सोचू-
वो खड़खड़ाबला थारी मेड़ी रा किंवाड़,
सवालिया निजरां सू थै उधाड़ोला वारणो,
थारी, बैठक में ले जाय, चांद तारां री जाजम माथे
पूछोला म्हारी खेम-साता,
उणरा हाथां सू सनेसो लेवत
परस करैला उणरा हाथां सू थारी आंगळियां
की तो सरभरा करोला थे उणरी
इण कारण खूव सिणगारूं म्हारी दूती नै,
लगाऊं अतर फुलेल,
अर हिया रो संपूरण हेत उणरै अंग अंग में राळ
उणन भेजू छिलोछिल थारै कनै
उणरै पाछा वावड़ियां
करूं इतो लाड, इतो दुलार,
जित्तो कोई कोनी कियो आपरी प्रिया रो ई आज दिन
पछे भलाई वा दूनी होवै
म्हारा उसांस लियोडी पवन,
प्राणां रा आब री किरण,
झबूकता हिया री आहट
के म्हारी पूजा लियोड़ी आरती
म्हनं पूरो रो पूरो पुगावं थार कन, म्हारो सनेसो।
124
मत्यप्रकास जोमीरी कवितावां

थे हो खीर रो प्यालो भर, रोजीना कोनी पुगावोला, पलंग माथ बैठ म्हारै माथै हाथ कोनी फेरोला, म्हारी सार सम्हाळ कोनी करोला, वातां कोनी पूछोला, कोनी मुळकोला, कोनी निरखोला, कोनी बुलावोला म्हनें मिंदर में, बगीचा में, समदर रै कांठ, कोनी हरखोला म्हारा हरख में, कोनी छीजोला म्हारा कसाला में, कोई वात कोनी, थांरा हीया में म्हारो चेतो है, थे म्हारै नैड़ा हो, थारो परसाद मिलै म्हनै हर जगां, अर थान सिमरतो म्है सोवू, जागू, अर सगळां स वडी वात- म्हनै ओ भान है कै- थे हो ! घणो इत्तो म्हारा आपांण सारू इण वोध रा मोद में- आ जातरा तो पूरी कर ई लेऊला । बोलो थे कांई सोचो थे दूजा लोगा नै दरसण देवोला, तो म्है कोनी देखूला थाने ? थे देवोला वरदांन कोई नै निजराणो 125

तो कांई म्हारै खोळा रो पल्लो, र जावला खाली?
थे मुळकोला कोई साम्है
काई म्ह कोनी रीझूला थारै मन रा उजळास माथै?
अर कांई थारो परसाद,
कोई भगत म्हारी निजर लागां विना,
ले जा सकेला आपरै घर ?
थे आवोला बगीचा मे-
तो काई कोरी घास ई विछला थांरा चरणां हेठे?
थे जागता बैठा होवोला रात रा पिलंग माथे
कांई म्है कोनी होऊंला छिपियोड़ा अंधारा में ?
चांद तारां री जगमगती उजास में
थे जद ऊग समदर रैकांठ
निजरां पसारोला
जळ थळ गिगन रा मिलण-खितिज तांई
कांई म्है कोनी होऊला
उडता पांखी ज्यू ढळता सूरज रै सांम्है ?
थे कांई सोचो!
मिलण
छांनै मिलण रो कोनी उमावो म्हांनै !
लोग देखें, ईसको करै,
म्हने होवै गुमेज,
म्है करूं थारा बखांण, थे लाजो,
रूबरू अर पीठ पिछाड़ी
कोड तो साव चवड़े होवै जद ई
जीवण घट भर रस रा रसायण सूं
126
सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

थारा गीत गावतो फिरूं मैफल मैफल, आंसू रा धारोळा उतर म्हारं गालां माथ हिचकियां आवे म्हनं वेळा कुवेळा थांन चितारतां, पांतर जाऊं म्है इण संसार में म्हार जीवण रो अरथ ! तो लोग जाणं ई म्हारी प्रीत, अर प्रोत रा प्रभू-थान छान मिलण रो कोनी उमावो म्हांने वार तिवार तो मिल जाया करो मोबीड़ा उण दिन तो सगळा ई मिले अंक दूजा सू- राखी नै भाई बैन, सराध में जीवता मरियोड़ा, होळी नै रंगां रै मिस, दिवाळी ने रामां सामां करण ने, मेळा में, जीमण में, खेल में, स्याल में, सभा में भासण में, हाट वजार में, तीरथ में, चवड़े धाड़े कठ ई मिलो भला ई- छान मिलण रो कोनी उमावो म्हांन । कांमण दड़ी नै ऊंची फेंकणी अर पाछी झेपणी, ओ कामण रो छिण होया कर बूढ़ा मास्टर रो मिलणो अर बोलणो- 'हाय कित्तो मोटो होयग्यो यूं ? कैडो म्हारा खोळा में दुबक जावतो जद गाजता मेघ अर पळकती बिजळी यूं तो जवांन होयग्यो रे! निजराणो 127 अर म्हारा टावरां ने बतावणो म्हारो- 'अ म्हारा गुरुजी है ! वाळापण नै उछाळ, पाछो झेपण रो अंडो ई अक कामणगारो छिण हो ! फेर फेर सोधू ओ ई कॉमण रो अलौकिक छिण, जलम, जीवण अर जवांनी रो- जद म्है वताऊं लोगां ने, आ म्हारी मानेतण ही, म्है रह्या करतो इण कन, घर सू धक्का देय काढयां पैला! जीम्या करतो इणर हाथां सूं कचकोळिया रे खणकार! आ करती म्हारा लाड, म्हारा कोड, म्है सिणगार हा अंक दूजा रा सेजां में म्है सराई पोसाकां अक दूजा री उडीक्या अक दूजा नै, अर घुळग्या अक दूजा में- छाछ अर माखण ज्यू, मिसरी ज्यू मुडा में कुण जांण किसी गाज रै गरजण कीकर छिटक पड़या आगा अक दूजा सू नदी रा दो पाटां ज्यूं, के तरसग्या दरसण नै ! वांसरी अर मोर पांख रेयगी फगत म्हारै कन, पूजा करण ने अर म्हारै सुखी जीवण री कामना- उणरा हीया मे ! कांई बताऊं! कोई देस में, कोई काळ में, कोई रूप में, म्है अक ई हा दोनूं ! 128 सत्यप्रकास जोसी री कवितावां अठा सूं कठे ? आ परकमा तो पूरी होयगी लागे मरणांत माथै आयग्यो है मारग जद थे कोनी देवो आऊकार- तो कठे चढ़ाऊं फूलां री अंजळी ! हेढ़ घरदू बासरी? भूल जाऊं गायोड़ा गीत ? फैकू आरती री थाळी समद रै मंझधार ? कै लिखू नया गीत पूजा सजाऊं पाछी पाछी करूं जातरा जलम सू सरू जठा सू पैली करी ही ? थांनै अर थारा मिजाज नै बदळण री तो संभावना कोनी अर ना वदळेला म्हारो ठरको वैरा वै सभाव है दोना रा ! फगत साधन बदळ सकू रीझरी जगां रीस, गीत री जगांगाळियां, फूलां री जगां भाटा ! थांने सागो करणो पड़ेला म्हारो पूरी करणी पड़ेला परकमा म्हारै साथै ! म्है जिकी साधली है साधना, अकारथ कोनी होवण दूं ला- थांरा ओपरा बौवार सूं! जीर्ला म्है अठा रो अठ अठा सूं कठे ? निजराणो 129

लोरी
सोजा, नचीती हो सुयजा !
म्है जगाय दूंला थनै दिन ऊगां
केसा में आंगळियां उळझाय,
हरजस गाय,
गिलगिली कर पगथळी रे
गाल माथ चूमो देय !
अब सोजा!
रात घणी चढगी
यूं आंख में कस ई कोनी घालेला
तो वगत माथै ऊठला कीकर
अर आखो दिन आंख में जागण भर
कांम कीकर करैला?
थाकगी होवेला म्हारी व्हाल !
अब सोजा!
बाट जोवै सिरांण ऊभा सपना
मन री अणमणी वासना वाट जोवै वारै निकळण री !
विछावणा ने ई हर आवै, थारै निवास री,
तकिया नै माथा रा केसां रै सौरम रो,
अर रजाई नै थारै अंग र च्यारूंमेर लिपटण री !
मत तडपा कोई नै
वती वडी कर अर सोजा ।
माध्यम
म्हारा गीत पावड़िया कोनी थार मिंदर रा
जिका चढ़, म्है आऊ थारै अंतरपटां लार !
म्हारा गीत कोनी रेसम री डोर
130
सत्यप्रकार जोसीरी कवितावा

जिकी नै पकड़,
स्यारोलेय चढ़ जाऊं
थारै हियै रा डीगोडा डूगर
म्हारा गीत कोनी तीरथ....जळ
जिका में न्हाय,
म्हैं निरमळ होय जाऊं तन मन सू
जे चुगणो पड़े म्हनै
दोनां माय सू ओक,
तो निस्चै जांण, म्हारी जान
कोनी चुणूं थांन, गीतां रे बदळे
सवाल तो थांन दोनां नै साथै राखण रो है
गीत कोनी है मारफत
सबद म्हारी संपूरण चेतना है,
अर गीत है उण चेतना रो राग, अनुराग, सिणगार
गीत म्है खुद हूं
अर थे हो सेवट पराया
इण सारू गीतां साट कोनी मोलू थाने
म्हारा गीत रमेकड़ा कोनी थाने रमण रा
म्हारा गीत फूल कोनी थार चढ़ावण रा
म्हारा गीत पावड़िया कोनी।
हरख
आज थारो रोम रोम पुळक
कोई हेताळू आयो दोसै मिलण नै
जिकां री उडीक में अणमणा हा थे
आज हरख सूं लेराव थांरो मन
कोई प्रेमी लायो दीस प्रेम रो पुजापो
जिकां री पूजा रो उडीक में बेचैन हा थे
निजराणो 131

आज थारा प्राण झूमै है गहळ में कोई मेळू रातवासो करण नै रुकग्यो लागे थारी मेड़ी मे! जिका नै वधावण ने थे सिणगार सजायो च्यारू भीतारै आज थे पुसव ज्यू विना कारण हस पड़या दिन ऊगां, दिन ऊगां । रात रा कोई अणत कथा कयग्या लाग, चांद तारा थारा कांनां में आज थे देही में कोनी लागो किसी किरणा री चांदी डोर फेंक- थाने बुला लिया दीस चंवरी में कोई, जिका रा अमर सवागरी टेक लियां बैठा हा थे माथा मे अटाळ धालिया आज थे अणमीत फूटरा लागो । परस थारा तो हिया सूं अक गुलावी किरण रो बार निकळणो अर म्हारै प्रांणां रा पोयण रो खिलणो कैड़ा होया जै स्री क्रिस्णा सौरम रो अंक आखो वादळो पसरग्यो सरवर माथै, गैली पवन रमण लागगी म्हारा गावां सू उडीकै हा भंवरा उड़ उड़ झाकण लागग्या म्हारा हिया में मंडरावण लागग्या म्हारा घर र ओळू दोळू 132 सत्यप्रकास जोसी री कवितावां

अर गूंज गूंज मचायो इत्तो कळरव, म्हारा प्रांणां में
कै विसरग्यो म्हनै म्हार विगसण रो उमावो
अर म्हारै ध्यान री अकाग्रता टूट
म्हनें दाझणो पड़यो थारी अलेखां
आकरी किरणां में
थारै दियोडा रूप नै
देख ई कोनी सकी
नीचे मुंडो झुकाय दरपण में
नाच ई कोनी पाई इण लाभ रा मोद में
गा कोनी सकी थार म्हारै सगपण रा सींठणा
इण पैली ऊगग्यो सिंझा रा गिगन रो तारो
अर म्हने बंद करणो पड़यो
म्हार रूप बिगसाव रो आकार
म्हार प्रांण-पराग री मजूस
थारो परस, अपरस ई रह्यो म्हारा जीवण में ।
बस्ती
इण बस्ती में अब कांई रैवणो
आखो दिन थे रैवो बारै
अर आखी रात थांरा वारणा रैवै बंद
इण गळी सूं तो ऊठगी थारी सौरम
अवै इण वस्ती में कांई रैवणो
फगत रैयगी है थांरी निरमळ गति अर आवेग,
झरणा नदियां मे,
जिकी कोनी मावै म्हारै सामरथ री झोळी में
फगत रैयगी है थारै प्रांणां री पुलक,
दिखणी पूंन में,
जिको कोनी बंध म्हारी भुजावां में
निजराणो 133

फगत रेयगो है थारो देहाभ,
अकास र रोसणी आंचळ मे,
जिकी म्है परस कोनी सकू
बस सुणीज थांरी हंसी फूलां में
जिकी कोनी मावे म्हारी थाळी में
थे कोयल रा कंठा में गावो
पण कोनी समझू म्है
सुर या सबद थारी भासा रा
जुड़ाव तो कटग्यो हो आंवळ नाळ कटता ई
थारै कन रवण रो उछाव ई रीतग्यो अब तो
अवै कांई रवणो इण बस्ती में ।
कुण
अक दिन भेळी होई पंचायत
अर म्हारै कनै मांगियो खुलासो
म्हारै सबंधा रो, थार साथै
साचांणी आपा कांई लागां अक दूजा रे ?
काई लागे हाथ पग, पेट, आंख,
मगज, हीयो, रगत, म्हारै ?
काई लागै चेतना म्हारै ?
कांई लागू चेतना रै म्है ?
अ हरख, सोग,
राग, प्रेम, क्रोध, काम,
सगळा मनोविकार कांई लागै कोई रे?
काई लागै कुदरत मिनखरै ?
हरिया रूंख, वैवतो जळ,
हथिणी गत हालती पूंन,
134
सत्यप्रकास जोसी री कवितावा

धरती, अकास, अगन?
कोई अणत, कोई छिण भर ?
कोई विराट, कोई चिरमी गट्टो
समाज मे ई कुण लागै किण रै?
जात, धरम, परिवार,
सगळां री रचना होई आपां रा अनाड़ी हाथां सं ?
औ कद साध कोई नै, औ कद ढाबै कोई नै ?
इण विराट सुदरता नै
म्है कोनी चितारिया पति ज्यू
अकला म्हारा कोनी वणाया
भाई, भायला, ज्यू, अणजांण ज्यू,
मालक ज्यू, ठाकर ज्यू,
राजावां रा राजा ज्यूं
म्हैं समायोड़ो हूं इण अणत में
ज्यूं ओ विसांई खावै म्हारै माय !
म्हारो आकरसण-विकरसण,
निपजे आपरा खुद रा नेमां सू !
म्हैं अक दूजा नै सोधां, लाधां अर समझां,
आप आप रा संस्कारा सूं!
सुदरता में, करुणा मे, प्रेम में
उणनै थेपडू म्है!
तो निस्छळ, निस्कपट अंतर में,
रातवासो कर व ई
घुळियोड़ा अंक दूजा में ?
कांई बखाण करूं म्है म्हार संबंधां रा,
पंचां नै कांईं बताऊं?
भूलणो
ज्यूं भूलग्या थे
सिस्टि री रचना कर, उणरो कारण,
निजराणो 135

अर मत मत बधण दिया सगळां ने परायां नै वस में कर, दूजां नै मार दूजां रो नास कर थे तो भूलग्या होवोला अक दिन दरसण देय, थे म्हार नैणा मे जगाई अंक उडीक, म्हनें वतळाय, थे म्हारै मन में जगाई अक तिरस, म्हनै परस कर, म्हारी देही नै जगाय दी थे अक सवेदन भरी वीणा री झणकार में! क्यू के थांरी आ वांण है सगळा प्रेम प्राथनावां में जमियोड़ा हेता वा साथै रोजीना, इकसार ! पण म्हने याद है हाल वैवीजळ दरसण रा झमका, वै परस रा राग रंग रचिया छिण, जद म्है, बिना आगली पाछली रो विचार कियां धारली मन मे के थान म्हारै वारै कोनी रेवण दूंला अर म्हारी पूजा सूं थारी मानता नै कर दूला इत्ती अलौकिक के थारा गीत गायां ई जाऊंला जलम जलम! जठा लग कोनी होवे अकाकार आपां रा आपा, अर मिट जावै आपांरा न्यारा न्यारा आपाण ! थं तो भूलग्या होस्यो ! पुजापो पुजापो संधाण है आणंद अरण रो; जठे म्हारो वण सके आसरम, सत्यप्रकास जोसी री कवितावां 136 चीड अर देवदार रा रूंखां वीच, हरिया हरिया आसापाला री निरमल ऊंची उठांण में! जठे किस्तूरी मिरगलां साथै भटक सकै म्हारो मन ! जठे घिर घिर आव करुणा रा मेघ ! खिलै फूल होठा में, जठ उणन कोई तोड़े-मसोस कोनी ! जिका में रळकता हेत नीझरां मे म्हें बुझाऊं तिरस अर उमड़ता अंधारा में हरी हरी गीली घास माथै लुट सकूँ ! थारो म्हनें देखणो भरपूर निजरां, मुळकणो चन्नण देही री रूंवाळी रो सिहरणो, म्हनै देयग्यो गंध रो गिगनार ! थारी बोल-बतळावण, गीत-संगीत, परस, म्हनें करग्यो सबद बिहूणो, बीजळ संचांनण ! थांरी मनवारां, हेत-सत्कार, पूछ परख सूं म्है लरीजतो रह्यो सरप ज्यूं; अर गरब करतो रह्यो थारी ओळखांण रो, मिजाज पुरसी रो! अछेही आणंद रो मारग हो ओ इण निरजण अरण में ! आणंद सरोवर रा ओटा माथै म्है खावण वैठग्यो विसांई तो इण थिर जळ रा लाल पोयणां ज्यूं थांरी पीड़ सूं हुई म्हारी चौनिजरी! थनै सुखी करण रा कळाप म्हन बटाऊ ज्यू आगै वधण रो दियो कारण निजराणो 137 म्हैं घणा सपना भाळिया; अर सतदळां रै हेठे अंतरलोक में पूगण रो, पीळा पराग नै खंखेरण रो उमावो, म्हनें देयग्यो आणंद पुरवाई रो परस ! घणो मोद होवे लोगां मे ईसको जगावण में, गहळ रा आणंद है लोगां रा वोल सुणण में कोई आंगळी दिखाव- तो लागे जाणे तारो टूटियो है अकास में अर रेख खिंचगी है कनक ओपरी मुंडो मरोड़, अबोलणा, मान, म्हारा हीया नै पुगाय दियो आणंद री माठ तांई थारो रूखापणो म्हने देयग्यो- माखण जैड़ा सवद, कविता री कुरळाट मे अणत आणंद भोग्यो है म्है थारी उडीक रो ओ हेत, हेत री तड़प, पूजा, आराधण, कल्पना, कामना, अर म्हारो सिखर समरपण म्हारी प्रणति नै पुगाय दी है उण मोहनी, सरव व्यापी, देवी सत्ता तांई जठे आणंदमय है वारली अर मायली जीवण ऊरजा म्है आणंद समाध में हूं इण आणंद अरण में । 138 मत्यप्रकास जोसी री कवितावा

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Nizaranno

Author
Satya Prakash
Title
Nizaranno
File name
Nizaranno
Text
OCR done
Citation
1959
Published
2011/03
Publisher
Rajasthani Bhasha Sahitya Akadami Bikaner
Language
Sanskrit
Pages
142
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551075
Barcode
4990010031852.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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