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Krishna - Vakya

Sharma, Damodar Prasad · 2009/10

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* ओ३म्-खम्ब्रह्म निवेदन। हे.मेरे प्रिय पाठको! मैं आज इस छोटे से लेख को आप की सेवा में इसलिये भेट करता हूं कि आप लोगों को यह भली भांति विदित हो जावे कि बाजार का भोजन धर्मशास्त्रानुसार तथा युक्त युक्ति से महा अपवित्र होता है और अपचित्र भो- जन खाने से बुद्धि मन्द और सन्तान बुरी उत्पन्न होती है और धर्म नष्ट होता है। मिय भ्राताओ ! तनक विचारो तो सही, यदि धर्म ही नष्ट हो गया तो फिर परलोक में संग जाने वाली कौनसी वस्तु रह गई ? क्योंकि धर्म ही एक ऐसा है जो परलोक में भी साथ जाकर सहायता करता है और नहीं तो पिता, माता, पुत्र, स्त्री और जाति इन में से एक भी साथ नहीं जाता सब यहां के यहीं रह जाते हैं । यथा- नामुन्नहि सहायार्थ पिता माता च तिष्ठतः । ने पुत्र दारं न ज्ञातिधर्मस्तिष्ठति केवलः ॥ और भी धनानिभूमौ पशवश्चगोष्ठे, नारी गृहद्वारि जनाः श्मशाने । दहश्चितायां परलोकमार्ग, धर्मानुगो गच्छति जीव एकः ।। ॥ अर्थ-भजन ॥ न प्रिय कोउ करहु धर्म मन मोर ॥ टेके । धन है साथी उमी भूमिलों नहां गड़ा है तोर । पशू उसी घर तक के साथी नारिद्वारली सोर ॥ १ ॥ प्रियवन्धू समसानादि जानें भागे दें सब छोर । यह प्रिय कार्या संग चितालों आगे धर्महि डोर |॥ २॥ इसीलिए किसी कवि ने कहा है- क्यों अठिलात चलै मग में शठ द्वै दिन के हित कीन्ह घमण्ड है। साथ न जाय है यौवन औ वल नाहक व्यर्थ वन वलबण्ड है । त्यागि दे तू जग जालन को भजु जो जग व्यापक ब्रह्म अखण्ड है। राम स्वरूप लखै करि ध्यान खड़ो शिर ऊपर काल प्रचण्ड है । निवेदक- दामोदर-प्रसाद-शर्मा-दान-त्यागी, कृष्णपुरी-निवासी ॥ स्थान मथुरा, मिती १५ मार्च सन् १९०७ ई० ओश्म-सम्द्रल कृष्ण वाक्य यातयानं गतरसं पूति पर्युपितं च यत् । उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजन तामस प्रियम् ॥१॥ भारार्थः पासी विरल बुला तथा, पुरे गन्ध रस जासु । जूला सशदि तथा कडे, भोजन तामस तातु ॥२॥ * दान-त्यागी-का-पञ्चम-विज्ञापन * अर्थात् --- - अपवित्र-भोजन-का-परित्याग मैं ( दामोदर प्रसाद शर्मा) आग सम्बत् १६६४ विक्रमी के प्रथम. दिवस से बाजार के भोनन का, निस में कि पवित्रता नहीं पाई जाती। परित्याग करता हूँ। . क्योंकि मनुष्य का मन पवित्रता से प्रसन्न और अपवित्रता. से दुःखी होता है एनौटिए धर्मशास्त्रकारों ने कहा कि पवित्रता-शुद्धता ही धर्म का मूल है। जैसे- धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः। धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ॥ ३ ॥ मनु० अ०६ । ९२॥

14 ti ( २ ) हिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः । मतु० मा १०॥६३ ।। सत्यमस्तेयमक्रोधो ही शौचं धीतिर्दमः । संयतेन्द्रियता विद्या धर्मः सर्व उदाहृतः ॥५॥ इन सब श्लोकों में "शौच" शब्द याज्ञवल्क्य अ० ११ १२२ माया है। इसी प्रकार दक्ष जी महाराज कहते हैं कि बुद्धिमानों ने कहा है कि शौच को करना और अशौच को त्यागना चाहिये । यया- उक्तं शौचमशीचं च कार्य त्याज्यं मनीषिभिः॥६॥ दक्ष अ०५।१ और शौच ( पवित्रता ) में सदैव यत्न करना चाहिये क्योंफि दिनपने फा कारण शौच ( शुद्धता ) ही कहा है । शौच (निर्मलता) के आचरण से जो हीन है उस के सब कर्म निष्फल हैं । यथा- शौचे यत्नः सदा कार्यः शौच मूलो दिजः स्मृतः। शौचाचारविहीनस्य समस्ता निष्फलाः क्रियाः॥७॥ दक्ष अ०५।२ दक्ष जी महाराज कहते हैं कि शौच दो प्रकार का है एक बाहर का और दूसरा भीतर का, बाहरी मट्टी और जल से और भीतरी (अन्तः) शौच मन की शुद्धि से होता है। यथा-- शौचं च विविध प्रोक्तं वाखमाभ्यन्तरं तथा। मृजलाभ्यां स्मृतं वायं भाव शुद्धि रथांतरं ॥८॥ दक्ष अ०५।३ इसी प्रकार एक और महात्मा ने कहा है कि पवित्रता दो प्रकार की होती है। (१) वाह्य अर्थाद शरीर को शुद्ध रखना । खच्छ जल से स्नान करना। - शुख स्थान में रहना । उज्जल वस्त्र धारण करना । निर्मल जल पीना और पवित्र भोजन करना नादि और (२) भाभ्यन्तरिक जो विद्याध्ययन और ईश्वराराधन करने और विषयवासना और कामादि दोषों के त्याग से होती है। यह विज्ञापन अपवित्र भोजन त्याग के लिए है इस कारण मैं यहां पर केवळ पवित्रापवित्र भोजन विचार पर ही कुछ लिखता हूं। देखिए ! मनु महारान कहते हैं कि नष्ट किया हुँना धर्म नाश करता है और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षा करता है । जैसे- धर्म एव इतो हन्ति धर्मो रक्षति रचिता ॥९॥ मनु अ०८।१५ (१०) धर्म पहचान के कौन लक्षण हैं। (उसर) वेद और स्मृति में लिखा हुआ, सत्पुरुषों का आचार और अपना सन्तोप अर्थात् अपने मामा के भविरुद्ध प्रियाचरण ये चार लक्षण. धर्म जाननें के हैं। यथा- वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च मियमात्मनः । एतचतुर्विध प्राहुः साक्षाधर्मस्य लक्षणम् ॥१०॥ :: - .. मनु० अ०२।१२ यस धर्म के इन्ही चारों लक्षणों को स्मरण कर के मैंने अपवित्र भोजन का परिणाग किया है। देखिए । वेदानुयायी मनुस्मृति में लिखा है कि न किसी को अपना जूठा पदार्थ दें, म किसी के भोजन के बीच आप सावे भर्याद किसी का जूदा न खावे, न अधिक भोजन करे और न भोजन किये पश्चाद हाथ मुख धोए विना कहीं इधर उधर नावे । यथा-. नोच्छिष्ट कस्यविद्यानाथाचैव तथान्तरा। न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः कचिदू ब्रजेत् ॥ ११.३... मनु अ०२।५६ । . . आगे और भी मुनिए ! उन्मत्त, क्रोधी, रोमी इन , बाल वा कीड़ा पड़ा ", नान कर पैर से छुबा हुआ, भ्रूण हत्यारे का देखा हुआ, रजस्वला का छूआ हुआ, कौवा आदि पक्षियों को चोंच लगा हुआ, कुत्ता का छुवा हुआ, गा , आदि पशुओं का सुंघा,हुआ, ऐसे पके बनाये हुए अन्न का भोजन कदापि न कर। यथा- मत्तंकुद्धा तुराणां च न भुजीत कदाचन । केशकीटावपन्नं च पदास्पृष्टं च कामतः ॥ १२ ॥ भूषनादेक्षितचैव संस्पृष्टं चाप्युदक्यया । पत्तत्रिशावली व शुना संस्ष्टमेव च ॥ १३ ॥ गवा चान्नमुपाघ्रात घुष्टानं च विशेषतः ॥१४॥ 'मनु० अ०४ । २०७-२०१ इसी प्रकार गौतम मुनि ने भी अपवित्र भोजन न करने की आज्ञा दी है। देखो गौतमस्मृति अ० १७ ॥ इसी भांति पाराशरली महारान कहते हैं कि नो भोजनं मन को न भावे १.अच्छाःन लगे.), उच्छिष्ट हो. और मिस में कीड़े पड़े हों. उसे न खाये । जैसे- भाव दुष्टं न वजीत नोच्छिष्ठं कृभि दूषितम् ॥ १५ ॥ पाराशर अ०६। ३८ : हौकिक में भी एक कहावत प्रचलित है । कि... रुचे सो पचे ॥१६॥ अर्थात् जो भोजन मन को भाता है वही पचता है अन्यथा नहीं ॥ श्री कृष्णदेव जी महाराज ने भी गीता अ० १७ श्लोक १० में अपवित्र भों- 'नन खाना खाने का निषेध लिया है । देखो इसी विज्ञापन का शीर्ष श्लोक इसी प्रकार और सब शास्त्र भी अपवित्र भोजन करने का वर्गव करते हैं। * पहुंधा बाज़ारूं भोजन ही महा अपवित्रं होते हैं * अब आप मथम बाज़ार में हलवाइयों की हाटों पर पूरी, कंचौरी, सांग, दही, दूध और पंपान्नादि खाद्य वस्तुओं की दशा को दोष दृष्टि से देखिए कि उन की कैसी दुर्दशा अथाव अपवित्रता होती है। उन बाजारू भोज्य पदार्थों में मनु भग- पनि, कृष्णदेव और पासशर आदि प्रापियों के कहे हुए सब चरन अधिक विशेष दोष पाए जाते हैं।

। - देखिये! मायः पाककारी पाक बनातेर पाफ खाते रहते हैं। बहुधा विल्लिये दही दूध खाती पोती रहती हैं। कुत्ते कड़ाही चा करते हैं । और समय पाकर थाळ में भी मुंह डालते रहते हैं । बन्दर और लंगूर लूटते रहते हैं। कौवा चोर चुभाया फरते हैं । चील झपट्टा मारा करते हैं। कोढ़ी कङ्गाल दृष्टि डाला करते हैं। और कभी २ यह चीलें और लंगूर और वन्दर ऐसा झपट्टा मारते हैं कि सारा योमचा ( पाक से भरा हुवा था ) राजमार्ग-शाहराह में ऐसे कुठौर पर गिर पड़ता है कि जहां पर मल, मूत्र, थूक, खखार, कूड़ा, कर्कट और की- चड़ आदि अशुद्ध पदार्थ पड़े रहते हैं, परन्तु बेचने वाले इस अशुद्धता (ना- पाकी ) से कुछ भी ग्लानि नहीं करते, और चट से गिरे-बिखरे और उक्त धुरी वस्तुओं से लिथरे और सने हुए पकवान को वटोर-वटार, पोंछ-पांछ, साड़-शू खोमचे (थाल ) में घर-भर वेचने लग पड़ते हैं । जब लड्डू आदि पदार्थ सड़कों पर घर फर बांध जाते हैं तो बहुधा गौ आदि पशु भी मुंपा ही करते हैं । प्रायः हलवाई लोग लोभ के वशीभूत होकर वासे-कूसे, बुसे-चुसाये, साग को पुनः गरम फरफे और गरमियों में सूके-साके दौर ची- मासों में फदे-फफांद, दुर्गन्धित और कृमि पड़े हुए लड्डू-पेड़ों को तोड़-ताड़, फोड़ फाड़, मीन-मानं नई चासनी में मिला-मिलू या गरम पानी के छोटे दे फिर बांध लेते हैं। और पुन: नाने, टटके, हाल कह कर वेचते हैं । बहुधा हलवा- इयों के यज्ञ ठोके दुकानों में बाहर भीतर आने जाने के कारण खाद्य पदार्थ दुकानदारों के पैरों से छूर जाते हैं । ठुकराए जाते हैं । और टांगों से लांघे जाते हैं । मांसाहारी और रजस्वला स्त्रियों से भी छुए जाते हैं। क्योंकि वह भी तो ग्राहक होते हैं । बाज़ार के पदार्थों पर भूण हत्यारे. महापातकियों की भी दृष्टि पड़ती है। क्योंकि खुले मैदान में बिकते हैं ।। (प्रश्न) हा भाई! हम समझ गये, तेरा कहना सत्य है। धर्मशास्त्रानुसार बाज़ार का भोजन करना योग्य नहीं । परन्तु अब सत्पुरुषों के आचार के कुछ दृष्टान्त और सुनादे। पहिले कान फोन नहीं खाते थे और अब कौन कौन नहीं खाते हैं ? (उत्तर) महाराज! पहिले समय में तो बाज़ार में पकाए हुए पदार्थ जैसे कि रोटी-दाल, पूरी-साग, लड्ड-पड़े आदि विफते ही न थे। पर हाजर यवनों में इस देश पर अधिकार किया। आर्यों को काफिर (हिन्दू नाम से पुकारा । आर्यों का धर्म - 1 ध्वंस किया । आर्यों से देष और घृणा की । आर्यों के पुस्तकालयों को जलाया। हिन्दुओं के मन्दिरों और मूर्तियों को तोड़ा । हिन्दुओं के तीर्थ स्थानों को विगाड़ा हिन्दुओं को तिलक तक न लगाने दिया । और फिर हिन्दुओं को यवन बनाना चाहा तो बल पूर्वक बाजारों में दाल, चामर, कढ़ी, रोटी आदि बनाए हुए पदार्थों की दुकानें खुळवादी । तो उसी समय से कुछ एक मनुष्यों ने भयभीत होकर और कुछ मनुष्यों ने आलस्य के फैन्दे में फंस कर बाज़ारी भोजन करना (खाना) आरम्भ कर दिया । परन्तु जो मनुष्य यह समझते थे। कि- तन धन धरती धाम सुत, मात पिता और प्रान । :. एक धरम के साम्हने, हैं सब तुच्छ समान ॥ १७ ॥ उन लोगों ने बाज़ार के अपवित्र भोजन को ग्रहण नहीं किया अर्थात् नहीं खाया और यही कारण है कि उन धर्म हठीलों में से कान्यकुब्न, महाराष्ट्र और नागर आदि ब्राह्मण और कुछ चौवै भी वाज़ार के अपवित्र भोजनों से अब तक मुख मोड़े रहते हैं। (प्रश्न) क्या चौबै लोग बाज़ारू अपवित्र भोजन नहीं करते ? हम तो रात दिन देखते हैं कि यमुना पुत्र सदैव विश्रामघाट पर हलवाइयों की हारों से ही लिया करते हैं। चाहें अपने पास से लें चाहें यात्री से मांगकर लें। उ०-महारान ! आपका कहना सत्य है किन्तु अव भी ऐसे बहुत से चौबै हैं जो कि अपवित्र भोजन से घृणा करते हैं। लीजिये ! आपको उन में से केवल दो-चार सज्जनों का नाम सुनाये देताहूं । क्योंकि सर्व सज्जनों की नामावली लिखने के लिये तो यहां स्थानाभाव है ।। १-चार सहस्र चतुर्वेदियों को धर्मोपदेश देने वाले और काम,क्रोध,लोभ,मोह, भय, और देषादि शत्रुओं को जीतने वाले श्री १०८ योगीरान रन्जूनी महाराज चतुर्वेदाचार्य ॥ २-अष्टादश पुराणों को जानने और मानने वाले परन्तु- यद्यपि शुद्धम् लोक बिरुद्धम् । ना करणीयम् ना करणीयम् ॥१८॥ ।

" " ८- " ( ७ .) की प्रथा पर चलने वाले, वैदिक धर्माविलम्बियों से घृणा करने वाले,आर्य समाजियों से चिड़ने वाले, श्रीमद्भागवतादि पुराणों की कथा कथन कर हिन्दू धुर्मोपदेश देने वाले, चतुर्वेदी कहलाने वाले श्री मान्यवर पण्डित वामनाचार्य जी महाराज हाथरस वाले। व उन्हीं के सरश उनके भ्राता- ३-श्री मान्यवर चतुर्वेदी पण्डित बार कृष्णभी महाराग । ४-श्रीमान चौवै गुलवाजी पाठक , दाऊनी पाठक ६- प्रहलादनी पाठक ॥ दामोदरजी दक्षगोत्री " बाबूलालनी दक्षगोत्री नारायणदत्तजी पाठक १०- टैनचीनी बुदौआ ११- फैलीनी मटकाजीकेभ्राता १२- गजघण्टनी गूजरमलबारे १३- कृष्णाजी काही १४- सौकेजी बतोलानीकेपुत्र मेरीधर्मिष्ठ बड़ बूआ (फूफी ) नाम मय्यादीजी वाज़ार के अपवित्र भोजन का त्याग किये हुए हैं। मेरी माताजी के गुरु श्री१०८रामचन्दनी महाराज । मेरे पिताजी के गुरु श्री१०८नन्दननी महारान । यह दोनों चतुर्वेदाचार्य और इन के शतशः शिष्य अपवित्र भोजनों को अपने पास तक नहीं आने देते थे। अब वीचमें इस अन्य प्रकरण को भी पढ़लीनिये ।। (प्र०) अरे वेटा ! रज्जूनी ने अभीतक क्रोध तो नाय छोड़ो । (उ० ) अजी महाराज ! आप अपने श्रीमुख से ऐसे असह्य और असभ्य वाक्य का प्रयोग न फीनिये, रज्जूंजी महाराज ने वास्तव में क्रोध.को जीत लिया है किन्तु आप नहीं समझते ।। - " .. ....

. (८) ( म०) तौ का हन मूरख हैं ? जो नाय समझें ।। (उ०) नहीं महाराज कृपानिधे ! आप मूर्ख तो नहीं हो, परन्तु मैं आपको विद्वान् भी न कहूंगा, क्योंकि आपने कुछ विद्याध्ययन नहीं किया आपतो केवल सदैव गपोछे गढ़ा करते हो, और अहमता कर अहङ्कार करते रहते हो । देखिये श्रीमद्भागवत स्कन्ध ११ अध्याय १८श्लोक ४२ में श्रीकृष्णदेवनी उद्धननी से कहते है कि जिसके देहादिक में अहंकार है सो मूर्ख है । यथा-- सूर्यो देहाघहंयुद्धिः ॥ १६ ॥ इसी प्रकार श्रीकृष्ण भगवान ने गीता अध्याय३ श्लोक २७ में अर्जुन से कहा है कि मूर्ख वह है जो अपने में अहम्ता मानता है । यथा- अहंकार बिलूढात्मा काहमिति मन्यते ॥ २० ॥ अर्थ-दोहा अपने को कर्त्ता कहै लूद पुद्धि नर जोय ॥ २१ ॥ महाराज ! भृकुटी न चढ़ाइये । नेत्र लाल न कीजिये । नासिका न सिमोड़िये। दन्त न पोसिये । ओष्ठ न फरफाइये । मुख तिरछा न कीजिये । हस्त न मलिये। जिह्वा को सम्भालिये । कुवाक्य न कहिये । लकुट को न उद्याइये । शरीर को न कं- पाइये । मुख से झाग न छोड़िये । कुदृष्टि से न देखिये । क्रोधित न हूनिये । आ- त्मा को क्लेशित न कीजिये । किन्तु शान्त इजिये और कृपा करके क्योंकि आप वीरभद्र रुद्र का रूप शीघ्र (बात करते करते ) धारण कर लेते हो, मेरे सविनय निवेदन को, जिस को कि मैं दोनों कर जोड़कर फरता हूं, धीरज के संग प्रवण करलीजिये । हे महाराज कृपासिन्धो ! रज्जूनी कोधी नहीं हैं, किन्तु वह सत्याचा- ,री, सत्यव्यवहारी, सत्यवादी और सत्यके प्रेमी हैं, इसी लिये यदि कोई मनुष्य उन के सत्यवधन के विरुद्ध कुछ मिथ्या कह बैठता है । तो वह रज्जूनी महारान इसकी असत्यता को दबाने के लिये सिंहनाद कर उठते हैं। अर्थात् सिंह समान धाड़ते हैं। और यह उनके ब्रह्मचर्य का मताप है । वस जब रज्जू जी महाराज नैक भी बल पूर्वक बोलते हैं। तो अज्ञानी और मिथ्याभि- -

माना लोग कह देते हैं । कि वह क्रोध करते हैं। परन्तु वास्तव में वह को नहीं
करते । उन्हों ने क्रोध को भली भांति जीत लिया है । मैं तो यही कहूंगा कि यदि
धौवे लोग श्री १०८ रजी महाराज योगीरान को धर्म सम्बन्धी आज्ञा का पा-
छन करें तो बहुत शीघ्र ही उन्नति के शिखर पर पहुंच जावें । क्यों कि बिना धर्म
के कोई भी आर्य फार्थपूर्ण नहीं होता । मैं बड़े साहस से कहता हूं कि श्री १०८
रज्जू नी महारान योगीराज हिन्दूधर्मशास्त्र के पूर्ण ज्ञाता हैं ।।
(प्रश्न) तेरी समझ में शूद्र का अब साना उचित है या नहीं ? क्योंकि
बहुधा देखने में माता है कि पौराणिक पण्डित खाने कमाने के कारण मन्दिर (पा.
पाण मूरताय) बनवालेते हैं और फिर काष्ठे, पापाण और पतिलादि धातुओं की
मूर्तियों का चरणामृत पिलाकर, प्रसाद खिलाकर, तुलसीदल देकर, कण्ठी बांधकर,
दुपट्टा उढ़ाकर शुद्रों को शिष्य बना लेते हैं और फिर उनके अन्न से अपनी उदर-
दरी को सदैन भरते रहते हैं।
(उत्तर) श्री महाराज कृपानिधे ! मैं तो इस विषय में कुछ भी नहीं समझता
पर हां, जो कुछ मैंने शासों में सुना है वह आप के कर्णगोचर करें देताहूं।सुनिये ।
शूद्रानान्नरकं ब्रजेत् ॥ २३ ॥
भर्थ-शूद्र का अन्न खाने से नरक होता है ।।
मृत मृतक पुष्टाङ्गे द्विजे शूद्रान्न भोजने ।
अहमवं न जानामि कां योनि स गमिष्यति ॥ ३३॥
अर्थ-नो ब्राह्मण जन्मऔर मृतक के सूतक में खाता है या शूदको अन्न खाता
है (व्यास जी कहते हैं कि) मैं नहीं नानता उसकी क्या क्या (बुरी) गति होगी।
शूद्राने नोदरस्थेन यदि कश्चिन्ध्रियत यः।
स भवेत् शूकरो नूनं तस्य वा जायते कुलें ॥४॥
अर्थ-व्यदि मरते समय में शूद्र का अंग बाह्मण के पेट में हो तब वह मर
कर निश्चय करके शूकर होगा या जिस शूद्र का अन्न था उस के कुल में होगा *
यश्च भुक्तंत्र शुद्रानं मासमेकं निरन्तरम् ।
इह जन्मनि शुद्धत्वं मृता वाचैव जायते ॥२८॥

(१०) अर्थ-नो ब्राह्मण-शूद्र का अन्न निरन्तर एक महीने तक खाले तब वह इसी मन्म में शूद्र है और मर कर कुत्ता होगा । गृध्रो द्वादश जन्मानि सप्त जन्मानि शूकरः। श्वा च वै सप्त जन्मानि इत्येवं मनुरनचीत् ॥२६॥ अर्थ मनुनी तो यह कहते हैं कि वह ब्राह्मण निसके पेट में मरते समय शूद्र का अन्न रह गया हो मर कर बारह जन्म तक गीध और सात जन्म तक शूकर और सात जन्म तक कुत्ता होगा। (प्रश्न ) अरे भाई ! यह श्लोक कहां के हैं ? हमने तो आज तक कभी सुने ही नहीं ॥ ( उत्तर ) श्री महाराज सत्यप्रेमी जी ! आप सुनते कैसे ? जब कि स्वार्थी कथकई लोग ऐसे श्लोक निन हानि होने के भय से श्रोताओं को सुनाते ही नहीं। महाराज ! यह श्लोक श्री वेदव्यास जी महाराज के कहे हुए हैं जिनको आप- अष्टादश पुराणानां कर्त्ता सत्यवती सुतः ॥ २७ ॥ कहा करते हो । देखो व्या पुस्मृति । अ० ४१ श्लो०६३ से ६७ तक । (प्रश्न) क्यों भाई ! तेरी समझ में मन्दिर का बनाना कैसा है ?अच्छा या बुरा॥ (उत्तर) महाराज सत्य विचारी जी ! सुनिये ! यदि मनुष्य मन्दिरको पुण्यार्थ बनवा कर उसके व्ययार्थ कुछ भाजीविका का प्रबन्ध करदे तो तो हिन्दू धर्मानु- सार मन्दिर का बनाना अच्छा है। और यदि कोई ब्राह्मण ( चाहे एक नड़ा भारी विद्वान् ही क्यों न हो ) अपने व्यय के लिये धनोपार्जनार्थ मन्दिर को बनाये तो हिन्दूधर्मशास्त्रानुसार मन्दिर का बनाना बहुत ही बहुत बुरा है। क्योंकि देवालय (मन्दिर) की आय अर्थात् देवता की भेट ( मूर्ति पर की पढ़त) को जो ब्राह्मण खाता है या यों कहिये कि जो ब्राह्मण मन्दिर की आय ( आमदनी ) से रोटियों का काम चलाता हुआ अपना वैभव बढ़ाता है और औरों के सम्मुख अपने को प्रतिष्ठित ( इन्जतदार ) जनाता है वह धर्माज्ञानुसार ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं रहता और अधम-नीच शूद्र होजाता है । यथा--- असि जीवी मसि जीची देवलो ग्राम याचकः । धावकः पाचश्चैव षडेते ब्रांसमाधमः ॥२८॥ - --- अर्थ-बामणों में यह यः कर्म करने वाले शूद से भी नीच गिने जाते हैं, तलवार से रोटी पैदा करने वाला १, पोथी पत्र लिखकर रोटी कमानेवाला २, ग्राम का भिसारी ३, हलकारा ४, रसोइया ५, और देवल की चढ़त लेने वाला, पुनापा साने वाला मठधारी ६ ॥ देखो हिन्दूधर्मशास्त्र०॥ अब आप पुनः अपने प्रकरण पर आनाइये ।। (प्रश्न ) अरे भाई ! तूने अपवित्र भोनन के लिये सत्पुरुषों के सदाचार का भी प्रमाण देदिया। परन्तु न अब हमें यह और बतलादे कि तेरी आत्मा का क्या विचार है ? { उत्तर) महारान ! मेरा आत्मा राज़ारी भोजन अर्थात वाज़ार में दूकानों पर पकाये हुए ( बनाये हुर ) खाद्य पदार्थों को ग्रहण करना नहीं चाहता। क्यों. कि वह निम्न लिखित कारणों करके महा अशुद्ध होते हैं । सुनिये ! यह दुकानदार लोग बहुधा बड़े तड़के सोतेसे उठते ही भट्टी को सु- रगाकर पाक बनाने लग पड़ते हैं। न हाथ पांव धोते । न. दांतन कुल्ला करते है. न झाडू चौका देते । न पड़ाही आदि वरतन मलते । न स्नान करते । पाठ पूजा. का तो यह विचारे नाम ही नहीं जानते । पर हां दम दम में चिलम की दम अवश्य- जगाते हुए कहते रहते हैं। कि- लगे दम | मिटे ग़म ॥ २० ॥ जो पीवेगा चरस । तो पावेगा दरस ॥ ३०॥ कभी कभी कोई कोई आलसी टट पूरे निखटू जूठन-कूठन, झाड़न-झूडन, धोधन-धान भी भट्टी ही में झोंक देते हैं। और जाड़े के दिनों में रात्रि समय कोई कोई अफीमची, चिलमची, भंगेड़ी, गंजेड़ी और चरसी यार भट्टी ही में थूक-.. संसार करने के सिवाय लघुशंका भी कर लेते हैं। दूकानों के नीचे बाज़ार में सड़क पर नहीं कि प्रत्येक प्रकार की मलीन, घिनौनी वस्तुएं पड़ी रहती हैं । थाल, परात और कड़ाह आदि बासन धर कर लड्डू आदि पकवान बनाते हैं। इधर यह लोग लड्डू पेड़े बांधते हैं। उधर भंगी झाडू देते हैं। नो सारी धूर ( गर्द रखाक) उड़कर उन खाद्य पदार्थों में मिल जाती है । जिस से वह पदार्थ अपवित्र होने के अतिरिक्त बहुधा किस किसे-किरकिरे भी होनाते हैं। कभी कभी चील कौआ (१२) आदि पक्षीगण उड़ते उड़ते लड्डूओं की निकती (बून्दी) से भरे हुए कड़ाह में वीट फरमाने हैं। और हलवाई लेग उसी समय उस में कोंचा मार देते हैं । बहुधा हलवाई लोग पाक बनाने के समय चिलम पीते-रागें खुनाते-मूत्रेन्द्रिय को सहराते-धोती सम्भालते-चूतर मलते-नाक छिनकते-बांस के कींचर पोंछते. कान से मैल निकालते-पेशाब करते-बात करनेसे थूक उछालते-नेत्र मलते-और आंख बचाकर उसी में से खाते रहते हैं। यदि पाक बनाते बनाते कुछ पाक पृथ्वी पर गिर परे तो उसे चट से उठाकर थाल या कड़ाह के में मिला देते हैं । और लड्डू पेड़े ऐसी असावधानी से बांधते हैं कि मक्खी, मच्छर, आदि जन्तुओं. तक को भी मिलालेते हैं । और यही कारण है कि बहुधा मिठाई के भीतर से बर-ततैया-माछी-मच्छर और पतंगादि जन्तु और चीटा-चींटी आदि कीट (कभी कभी वह पूर्ण रूप से और कभी कभी उन के केवल अवयव ही) निकलते हैं। मिन को किसमिस-कालीमिरच-लोंग और इलाइची के धोखे में खाकर बहुधा मनुष्यं रोगी हो जाते हैं । श्लेष्मा ( जुकाम ) होने के समय पाककर्ताओं की नाक भी-कभी कभी खाने की वस्तुओं में टपक पड़ती है। और हाथ से तो वह ( पाक बनाने और बेचने वाले ) प्रतिक्षण नांक को पोंछा ही करते हैं । जब इन लोगों को खांसी होती है और खों खों करते हैं तो सारा थूक भोज्य पदार्थों पर जा पड़ता है । जब यह लोग आपस में या किसी ग्राहक से लड़ते निड़ते हैं तो उस काल भी इन का थूक खाद्य वस्तुओं पर पड़ता है। हलवाई लोग निज वस्त्रधुलाने और वाल क्नवाने में भी बहुधा बहुत अवेर करते हैं । इसी कारण यह लोग प्रति समय शिर और शरीर को खुनलाया करते हैं। जिससे कि हाथ अशुद्ध रहते हैं। रात दिन देखने में भाता है कि बहुधा हवाई लोग कूचड़ियों से काने-कुतरे-बचे-खुचे-गले-सड़े सस्ते साग चुकालाया करते हैं। और विन बीने-चूने-धोए-धाएं चटपट काट- कूर-तोड्-ताड़-मरोड़-मराड़ उसी. डटेली-जली-बली-काली-फलोटी कड़ाही में सिजने को पटक देते हैं। और उप मिने-अधसिने साग में थोड़ा बहुत्त नौन हल्दी और मिरचा मिला मिल देते हैं। और फिर उसे अनधुए. माटी के कूड़े या हांड़ी में निकाल धरते हैं। और फिर सुधि, नहीं लेते चाहे उस में, कङ्कड़-मच्छड़ आदि जन्तुं ही क्यों न गिर पड़ें । विन देख भाले. सगौरा में से साग- निकाल निकाल कर ग्राहकों को देते चले जाते हैं. जब तक कि उस सगौय के पैंदे से हाथ न ना अटके या खटके।

(१३) कभी कभी हन्टवाई लोग घुने घुनाए अमचूर को नौन मिरचा के साथ पुराने गुड़ में सड़ा देते हैं और फिर उस सड़े, गले; कीड़े पड़े हुए पदार्थ को मीठी चटनी के नाम से ग्राहकों को महीनों तक देते रहते हैं। बहुधा हलवाइयों के यहां गड़रियों और कसाइयों ·(सिकों ) का दूध भाता है। निस में बह लोग ( गडरिये और अधिक ) अपना महा अपवित्र पानी भी मिलालाते हैं। मेले तमाशों में हलवाई लोग भोज्य पदार्थो को तेली-तमोली- फोली-म्हार-चमार-आदि नीच जाति के मनुष्यों के सिर पर और सीतलावाहन (गभसेन) की पीठ पर लाद कर लेजाने हैं। बहुधा देखने में आता है कि हलवाई लोग यवनों के लोटे-कटोरे और प्याले अपने हाथ में लेते हैं। और कड़ाही-थाल और कूड़े में से दूध-रवड़ी और दही भर कर उन को लौटा देते हैं । कसाइयों के दूध के बरतन तो हटवाइयों की दूकानों पर रहे ही आते हैं। जब साहब लोगों के सेवक जैसे खानसामा-बहरा-मिश्ती-मिहतर और ग्रासकट आदि अच्छे अच्छे सफेद साफ कपड़े पहन कर सौदा खरीद ने आते हैं। तो सौदा लेने और दाम देने में बहुधा हलवाइयों को लेते हैं। और जब कभी सौदा लेने में तकरार हो जाती... है। तो सौदा को वापिस देकर चले जाते हैं । और बहुधा दरपोक और लोभी हलवाई लोग उस वापिसी सौदा को अपने असलमाल में मिला लेते हैं । रेलवे स्टेशनों पर तोदन-रोटी और पूड़ी-साग वाले पास पास ही बैठकर वेचा करते । शुद्धता में तो रेल की गाड़ियों ने उड़ीसा वा श्री जगन्नाथनी के मन्दिर को भी मान कर दिया क्योंकि मन्दिर में तो घेवल हिन्दुओं ही की सात जात मिल--- कर निरामिष प्रसाद साती हैं । परन्तु रेलगाड़ियों में तो पृथ्वी भर के लोग क्या कारे क्या गोरे सब ही मिलकर भामिषाहार करते हैं । पानार में जब बहुत . भीड़ भाड़ होती है। तो भंगी, चूहड़, चमार, धोबी, धानुक, भी हलवाइयों की हटों को छूने हुए चले जाते हैं । और हलवाई लोग लोभ के फन्दे में फसकर इस कौतुक को देखते हुए भी दोनों आंख मीच लेते हैं। और अपने दोनों होठों का सम्पुट बनालेते हैं। या यों कहिये कि दोनों आखों पर : ठीकरी पर मौन धारण कर लेते हैं। बहुधा हलवाई लोग कुछ मिठाइयों को जैसे साबौनी, बतासे, पट्टी, गजक, रेवड़ी और खांड के खिलौने आदि यवनों से भी बनवाया करते हैं । अब यहाँ ठहर कर कुछ अन्य वाक्य भी पढ़लीजिये। ": 4- (१४) “ (प्र.) यवन किसे कहते हैं ?। (76) कोश में तो यवन के अर्थ म्लेच्छ के हैं अर्थात् जो लोग वेद और शास्त्र से विपरोत चलते हैं किन्तु मुनिवर श्री चाणक्य जी महाराज इस प्रकार कहते हैं कि तत्वदर्शियों ने कहा है कि सहस्र चांडालों के तुल्य एक यवन होता है और यवन से नीच दूसरा कोई नहीं है । यथा- चांडालानां सहनैश्च सूरिभिस्तत्वदर्शिभिः । एकोहि यवनः प्रोक्तो न नीचोयधनात्परः॥३१॥ चाणक्यनीति अ० ८।५॥ इसी प्रकार आपस्तम्ब स्मृति अ० २ श्लोक. ९ में लिखा है। कि मूत्र विष्टा इन के पड़ने से और यवन के जल भरने से कूप भी दूषित ( अशुद्ध) हो जाता है। यथा- कूपो भूत्रपुरीषेण यवनेनापि दूपितः ॥ ३२ ॥ एक धर्ममा ने तो यावनी बोली-बोलने का भी निपेध किया है। यया- नवदेद्यावनी भाषां प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥ ३३ ॥ अर्थ- चाहे कितना ही दुःख प्राप्त हो और प्राण कण्ठगत अर्थात् मृत्यु का समर भी क्यों न आया हो तो भी यावनी अर्थात् म्लेच्छ भाषा सुख से न बोलनी । चाहिये ॥ भरतपुर के प्रबल प्रतापी महाराजा सूर्यमल्ल जी ने अपनी सभा में आज्ञा दे रक्सी.थी कि “जो कोई यावनी बोली का बोल बोलेगा वह सभा से उठा दिया जायगा ॥ सन् १९८१ ई० की १९ वी अगस्त को रियासत रायपुर-राजपूताना के ठाकुर हरीसिंह साहब से महर्षि दयानन्द जी महारान ने तो यहां तक कहा था । कि "आर्य पुरुषों को उचित है कि यवनों को अपना रान मन्त्री न बनाए । देखो धर्म बीर पं० लेखराम कृत महर्षि जीवनचरित्र पेण ५४७ लाईन १८ ॥ हाय, हाय, कसे आश्चर्य की बात है कि जो लोग यावनी भाषा के उच्चारण में भी दोष समझते थे उन्हीं के सन्तान आम के दिन यवनों के हाथ की बनीं हुई मिठाइयों को प्रसन्नता पूर्वक खाते हैं (प्र.)-मुनिवर चाणक्य कौन थे ?

(१५) (उ०) यूनानी बाबिल देश के यवन बादशाह सिल्यूकस की बेटी से वि- वाह करने वाले बौद्धाविलम्बी मगध देश के महाराजाधिरान चन्द्रगुप्त के प्रधान मन्त्री थे। (प्र०) महाराज चन्द्रगुप्त किन के पुत्र थे? (उ०) मगध देश के नागवंशी महावली महाप्रतापी महाराजाधिराज महा- नन्द जी के पुत्र थे । इन्हीं महाराजाधिरान महानन्द जी के पास छः लाख कि- यादे, बीस हज़ार सवार. और नौ हज़ार हाथी थे । इन्हीं के डर से यूनान का बड़ा बादशाह सिकन्दर, निस ने यूरोप और पशिया में बड़े २ देशों को जीत लिया था, भारतवर्ष से भाग गया था। हलवाई लोगों की नाति पांति का भी ठिकाना नहीं लगता । बहुधा चारों ही वर्ण के होते हैं। इसीलिये शास्त्रकारों ने आज्ञा की हुई है, कि पाक बनाने वाले को मति दिन शरीर-शिर और डाढ़ी के वाल व नख कटवाने चाहिये तथा कपड़ों साहित स्नान करना चाहिये और भोजन की ओर मुख कर के न बोलना न खां- सना न थूकना चाहिए वरन ढाटा बांधे रहना चाहिये । यथा- अधिक महरदः केश श्मश्रु लोम नख वापनम् ॥ ३४ ॥ उदकोपस्पर्शनं च स हवाससा ॥ ३५ ॥ देखोआपस्तम्भ सूत्र,॥ देखने में आता है कि चतुर्वेदियों के पैर पूजने वालों में से एक बल्लभाचार्य के कुल में अब तक इन नियमों की थोड़ी-बहुत चाल चली जाती है । (प्र.) ओ ! हो ! क्या वल्लभाचार्य जी चतुर्वेदियों के चरण पूजक थे ? (30) हां हां । वल्लभाचार्य जी. चौधों के पग पूजक थे । इस का पूरा २ पता तो सौ के आधे पचास और दो बावन राजा और चार सम्पदायों के तीर्थपुरो- हितों से, जो कि आजकल बड़े. चौबैजू के नाम से विख्यात हैं, मिलेगा । परन्तु इतना तो मैं ने भी निज नेत्रों से देखा है कि वल्लभवंशी विश्राम घाट पर बड़े चौबैजू के पैर धोते हैं । और वन यात्रा जाने के समय उन्हीं से नियम लेते हैं। (प्र०) क्या बल्लभकुछ के चेले नहीं होते ? (७०) नहीं, मुझे तो पूर्ण निश्चय है कि-चौबे लोग वल्लभ- कुछियों के .

(१६) चल नहीं होते । और होते ही क्यों । जव कि उन के यहां ही दो गुरु गद्दी वर्त- मान में भी विद्यमान हैं॥ १-श्री १०८ नन्दन जी महाराज की । २-श्री १०८ शीलचन्द्र जी महाराज की। (प्र.) अरे भाई ! तू क्या जाने, वीसियों चौवे वल्लभकुलियों के चेले हैं। और कुछ एक ऐसे भी प्रेमी हैं जो उन के बनाये हुए दूध-भात, दाल-चामर, कढ़ी रोटी को भी खा लेते हैं। (उ०) महारान ! यदि ऐसा है ? तो मैं उन से यही हूंगा। कि- अली करीरे मित्रो निज गुरु के मारे मान । घर की गङ्गा छोड़िकें गये तलैया न्हान ॥३६॥ ओहो ! यदि यह बात सत्य है ? तो महाराज ! आप ऐसा समझिए । कि गङ्गा हरिद्वार को उलटी बह गई ॥ ३७॥ बांस बरेली को उलटे लद गये ॥ ३८॥ मैं नहीं जानता कि चौवे लोग जव यज्ञोपवीत के समय भाचार्य से गायत्री मन्त्र का उपदेश लेते हैं तो फिर क्यों बल्लभकुलियों से श्री कृष्णः शरणं मम ।। ३ । क्लीं कृष्णाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ॥ ४० ॥ इत्यादि मन्त्रों का उपदेश लेते हैं ? क्या वल्लभकुलियों के कृत्रिम रंचित मन्त्र गायत्री मन्त्र से बढ़ कर हैं ? जो कि चारों वेदों की माता कहलाती है। यदि आप यह कहें कि लौकिक व्यवहारानुसार गायत्री मन्त्रोपदेश लेने के भी पश्चांद किसी मनुष्य को अवश्य गुरु करना चाहिए तो फिर आप श्री १०८ योगीराज रज्जू जी महाराज ॥ अथवा श्री२०८ पूज्यपाद वासुदेव जी महाराज ॥ को गुरू क्यों नहीं बनाते ?

( १७.) (प्र. ) अरे भाई ! तु कुछ समझता नहीं है । केवळ अपनी टांय टीय क- रता है। देख ! अब हम तुझे समझाते हैं । इन दोनों चतुर्वेदाचार्यों को गुरू ब- नाने में कुछ भी लाभ नहीं होता । और वल्लभकुलियों को गुरू करने से अच्छे अच्छे वन और स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ प्रसाद के नाम से सदेव मिलते रहते हैं। भला भय त यह तो यतलाई कि इन दोनों कुओं में से श्रेष्ठ कुल कौनसा है ? (उ०) महारान कृपानिधे ! मैं क्या बतलाऊं ? आप ही इन दोनों के इति- हासों को पढ़कर छान-चीन फरलीनिये ।। (प्र०) इन दोनों के इतिहास फहां मिलेंगे ? ( उ०) चतुर्वेदियों नाथुरों का इतिहास तो वाराह पुराण के मथुरा महा- स्य नाम खण्ड में मिलेगा और वल्लभ कुलियों का इतिहास महर्षि दयानन्द कृत सत्यार्य प्रताश के ३६१ से ३६८ तक के पत्रों में पावेगा। यदि आप इस से भी विशेष देखना चाहें तो मिष्टर टायट साहब रचित "वल्लभकुल इतिहास नाटक" और "नल्लभकुल चरित्र दर्पण" नाम की पुस्तकों को अवलोकन कीजिए । (प्र०) क्यारे ! तेरी समझ में राज्य-धन खाना कैसा है ? (10) महाराज कृपासिन्धु ! मनुष्य यदि परिश्रम फर के राजा का धन, अकंला धन ही क्या, बरन धन-धान-धना-धरती ले तो सुख पाता है । और यदि बिना श्रन=मिहनत किए प्रतिग्रह के समान लेता है तो कष्ट सहता है और धर्म से भ्रष्ट-धन से नट-काया से निकृष्ट हो जाता है । जैसा कि मनु महाराज ने M . न राज्ञः प्रतिगृहीयादराजन्य प्रसूतितः ॥ ४ ॥ मनु० अ० ४।८४ ॥ अर्थक्षत्रियपन के वेदोक्त धर्म कर्म से जो युक्त न हो ऐसे नाम मात्र के नि. कृष्ट राजपुत्र से- ब्राह्मण प्रतिग्रह-धनादि का दान कभी न लेवे । क्योंकि शास्त्र से विरुद्ध चल के अधर्म करने वाले लोभी स्वार्थी राना का दान जो ब्राह्मण लेता है वह इनें आगे ३ (१८.) कहे हुए इक्कीश प्रकार के नरकों नाम दुःख के साधनों को कम से प्राप्त होता है। यथा- यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्र वर्तिनः । सपर्यायेण याती मान्नरकानेकविंशतिम् ॥ ४२ ॥ मनु० अ०४। ८७॥ आगे चलकर मनु भगवान फिर कहते हैं कि यह प्रतिग्रह नाना प्रकार के नरकों दुःखों का हेतु है, ऐसे जाननेवाले विद्वान वेद के जानने वाले और परलोक में फल्याण की इच्छा करने वाले ब्रह्मवादी बाह्मण राना का प्रतिग्रह नहीं लेते। यथा- एसब्दिन्तो विद्वांसो ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः । न राज्ञः प्रतिगृह्णन्ति प्रेत्य श्रेयोऽभिकाक्षिणः ॥ ४३ ॥ मनु० अ०.४१ ६१ ॥ एक स्थान पर मनु नी ने यह भी कहा है कि राजा का अन तेज को और शूद्र का अन्न ग्रन सम्बन्धी तेन को नाश करता है । यथा- राजानं तेज आदत्ते शूद्राने ब्रह्मवर्चसम् ॥ ४४ ॥ मनु० अ०४। २१८॥ इसी का आशय लेते हुए महारान अत्रि जी और अङ्गिराजी, कहते हैं ।.. कि राजा का अन्न तेन को और शूद्र का अन्न ब्रह्म तेल को हरता है । यथा- राजानं हरते तेजः शूद्रानं ब्रह्मवर्चसम् ॥ ४५ ॥ भत्रिस्मृति श्लोक ३०० और अङ्गिरास्मृति श्लोक ७१॥ इसी प्रकार आपस्तम्ब स्मृति अध्याय ९ श्लोक २७ में लिखा है। किराना का अन्न बलं को और शुद्ध का भन्न ब्रह्म तेज को नष्ट करता है । यथा- राजाममोज पादत्ते शूद्रान ब्रह्मवर्चसम् ॥ ४६.॥ तात्पर्य यह है सत्र शास्त्रवेत्ताओं ने राना.और शुद्र के अन्न को (प्रतिग्रह को) लेने का निषेध किया है ।।

.. ( १९) महाभारत के देखने से प्रतीति होता है कि पिछले समय में सप्त ऋषियों ने और विश्वामित्र ने क्षुधा से अपने प्राणान्त होते हुए मान कर भी राजांन को बुरा समझ फर ग्रहण नहीं किया था। परन्तु न मालूम आजकल के ब्राह्मण देवों (जोकि फेवल नाम मात्र के हैं क्योंकि न सन्ध्या समझते न गायत्री जानते ) की क्या कुगति होगी ? जो निर्भयता से राजा का अन्न (प्रतिग्रह ) लेकर अपनी उदरदरी में इसते चले जाते हैं। कहीं फह से फट न जावे। या चह से चटकन जावे। चार हजार चौवों में विख्यात ( एक ही ) कविराज श्री मान्यवर च- तुर चतुर्वेदी पण्डित नवनीति लालनी महाराज कहते हैं कि. दो सौ वर्ष पूर्व चौवे लोग भी अपवित्र भोजन नहीं करते थे । परन्तु जब अपने भाई भतीनों और नाती (वेटी के बेटे) को मरवाने वाले, बाप को कारागार में विश्राम करा के राज सिंहासनारूढ़ होने वाले, हिन्दुओं से डाह करने वाले, हिन्दुओं पर निज़या जारी करने वाले, अर्थात मत सम्बन्धी. कर लगाने वाले, हिन्दुओं के धर्म के मेलों को बन्द करने वाले, मथुरा में केशवदेव, वृन्दावन में गोविन्ददेव और काशी में विश्वेश्वर और विन्दुमाधव के प्रख्यात. मन्दिरों को तोड़ने वाले अपने दामाद महाराजा यत्रपति शिवानी से भय खाने वाले- औरङ्ग यो पछिताय मन, करतो जतन अनेक । शिवा लेघगो दुरग सय, को जाने निशि एक ॥ ४७ ॥ मुगल तैमूरवंशी यवन दिल्लीश्वर नाम. औरङ्गमेव वादशाह ने इन को आज्ञा भेजी तो इन चौयों ने भी शास्त्रानुसार उस राजाज्ञा को स्वीकार किया क्योंकि यह लोग राजा और बादशाहों में ईश्वर का अंश समझा करते हैं । यथा- नराणां च नराधिपं ॥४८॥ गीता अ० १० ॥२७॥ और मनु महाराज की भी आज्ञा है कि जब राजा कोई आज्ञा किसी के लाभ वा किसी के हानि के निमित्त. देवे. तो चाहिये कि कोई. मनुष्य इस माज्ञा को उलंघन न करे । यथा- ( २० ) तस्माद्धर्म यमिष्टेषु स व्यवसेन्नराधिपः । अनिष्टं चाप्यनिष्टेषु तं धर्म न विचालयेत् ॥ ४० ॥ मनु० अ०७॥१३॥ और इसीलिये उस राज्याज्ञानुसार बाज़ार में विश्रामघाट पर दो चार वा- झणों से दाल रोटी के स्थान कचौड़ी आदि पकवान की दूकानें खुलवादी। बस उसी दिन से कुछ थोड़े से आलसी चौवों में अपवित्र भोजन करने की प्रथा पड़ गई। (प्र.) शिवाजी कौन थे। 1 (उ०) छत्रपति महाराजा शिवानी भोंसला हिन्दुओं के ( यहां गाय्यों से मत- लब है ) धर्म विरोधी दिल्ली के बादशाह यवन औरङ्गजेव (जिसे नौरङ्गनेव भी कहते थे). को दबाने वाले और आग्यो (हिन्दुओं) के धर्म की रक्षा करने वाले थे । देखिए ! महाराजा के सत्य वीरत्व में कविगन भूषणनी ने निम्नलिखित कैसी अच्छी सच्ची कविता की है। दोहा। काल करत फलिकाल में, नहिं तुरकन को फाल । काल करत तुरकान को, सिवसरजा करवाल ॥ ५० ॥ सिव औरंगहि जीति सकै, और न राजा राज। हथ्यि मथ्य पर सिंह बिनु, और न घालै घाउ ॥ ५१ ॥ सवैया। दच्छिन जीति लियो दल के बल पच्छिम जीति के चामर चाख्यो । रूप गुमान गल्यो गुजरात को सूरत को रस चूसकै चाख्यो ॥ पञ्जन पेलि मलेच्छ मले यचे भूषन सोई जो दीन है भाख्यो । सौरङ्ग है शिवराज बली जिन नौरङ्ग मै रंग एफ न राख्यो ॥५२॥ ॥ कवित्त ॥ इन्द्र जिमि जंभपर बाड़व सु अंभ पर, रावण सुदंभ पर रघुकुल राज है।

. ( २१ ) पीन बारियाह पर शंसु रतिमाह पर, ज्यों महा बांह पर राम द्विजराज है ।। दावा द्रुमदुंड पर चीत्ता मृगझुडंड पर, पण वितुंड पर जैसे मृगराज है । तेज तिमिरंस पर कान्ह जिमि कंस पर, त्या म्लेच्छ बंस पर सर सिवराज है ॥ ५३ ॥ चंद राख्यो विदित पुरान राख्यो सारसुत, राम नाम राख्यो अति रसना सुधर में। हिन्दुन की चोटी रोटी राखी है सिपाहिन की, फांध में जनेऊराख्यो माला राखी गल में ॥ मीड़ राखे मुगल मरोड़ राखे बादशाह, धैरी पीस राखे यरदान राख्यो कर में। • राजन की हद रावी तेगवल शिवराज, देव राख्यो देवल स्वधर्म राख्यो धार में ॥ ५४ ॥ दामन देयन हिरनाकुम बिदारवे कों, भयो नरसिंहरूप तेजु विकरार है। प्रवपन भनत त्याही रापन के मारिनेको, रामचन्द्र भयो रघुकुल सिरदार है || फंस के कुटिल बल वंसनि निदरिवे कों, भयो जदुराय वसुदेव को कुमार है। पृथ्वी पुरुहूत साहि के सपूत सिवराज, म्लेच्छनि के मारिव को तेरो अवतार है ॥ ५५ ॥ दोहा सिव सरजा के बैरु.को। यह फल आलमगीर । छूटे तेरे गढ़ सबै । कूटे गये उजीर ॥ १६ ॥ प ( २२ ) ॥ कवित्त ॥ मारकर बादशाही खाक शाही कीन्ही जिना जर कीन्ही जोर सो लै हद सब मारे की। ख्रिस गई सेखी फिसगई सूरताई सय, हिसगई हिम्मत हजारौ लोग प्यारे की। पाजत दमामे लाखौं धौंसा आगे धुरजात, गरजत मेघ ज्यों घरात पढ़े भारे की। दूल्हो शिवराज भयो दच्छनी दमाले वाले, दिल्ली दुलहिन भई शहर सितारे की ॥ ५७ ॥ अव आप फिर अपने पूर्व प्रकरण पर आनाइये ।। बहुधा देखने में आता है कि हलवाई लोग शीघ्रता में कचौड़ियों और इमर- तियों के लिये उड़द की दाल को भिगोने के स्थान आग पर उबाल लिया करते हैं। और नलदी में मालपूआ और जलेबी के घोल को गरम पानी से घोल दिया करते हैं । खस्ता कचौड़ी और मठड़ी में तिली के तेल का पुट लगाया करते हैं। साग में सरसों के तेल का छौंक दिया करते हैं। प्रायः पेड़े वर्फियों में मावा- खोआ के स्थान मैदा मिला दिया करते हैं ।। ४ . बहुधा वालभकुली मन्दिरों में मुखिया, भीतरिया, बाहरिया, जलघड़िया, रसोइया, सारंगिया, गवैया, बजैया, नचैया, कुदैया, झापटिया, झंझकुटिया, मृदंगची, तवलची और पूजारि आदि सेवकों को वेतन के बदले ठाकुर के प्रसाद (जूठन ) की पत्नले मिला करती हैं। जिन में निखरी और ससरी सब ही प्रकार की खाद्य वस्तुएं होती हैं । सेवक लोग इन प्रसादी पत्तलों को आप नहीं खाते बरन कुछ दाम दमड़े लेकर दूकानदारों को सौंप दिया करते हैं । और यह दूकानदार लोग प्रथम प्रत्येक निखरे सखरे पदार्थ को पृथक पृथक करते हैं। और फिर धीरे धीरे ग्राहकों को बेचा करते हैं। जिन में खीर भी खुले मैदान रक्सी रहती है। बहुरा हलवाई लोग दूकानों की भट्टियों पर ही अपने खाने के लिये दाल, ।

(२३ ) भात. सिचड़ी, नदी, गेरी आदि सखरी चीजें बनाते हैं । और कभी कभी नल- चरम-मरियां भी गन टने ॥ या हलवाई लोग दुधपाग के नाम से बाजारों में अपनी दूकानों पर चामर की तार भी बनाफर ना परते हैं। और उन्हीं दुकानों से अच्छे अच्छे ब्राह्मण परी पगवान माल लेकर खाते हैं। यह खीर एक नई रीति से बनाई जाती है। प्रथम एलयाई नामरों का भान करके रखते हैं फिर ग्राहक के कहने पर उस को मानुसार तोल में जितना न मांगे उसी तोलानुसार दूध, भात और बूरा मिसकर ओंटा लेते हैं । और दूधपान के नाम से ग्राहक को देदेते हैं । पर न जाने निसरी-मसरी-सागारी-फलाहारी का झगड़ा करने वाले. वैष्णव गण और एकादश्यामन्न पापानि पसन्ति ॥ ५८ ॥ देखो एकादशी महात्म्य ॥ एकादशी के दिन भन्न में पाप समझने वाले व्रती लोग इस ओर ध्यान क्यों नहीं देने ? मैंने निग नेत्रों से देखा है कि फिन्ही हलवाइयों की हटों पर दूध भरी कड़ाही में शामियों मक्खियां गिली मरी पड़ी सहा करती हैं। और वह लोग कुछ भी विचार ( परराइ) नहीं करते। हां जब किसी ग्राहक को देते हैं तो उन्हें भी निफाल बाहर फेंक देते हैं। चौमासों में गवि समय मन हबनाई लोग दृध औंटाते- तो दूध की कड़ाही में सैकड़ों छोटे छोटे जन्तु ना पढ़ते हैं । और वह दूध ही में मिल जाते हैं। A बहुधा हलवाई लोग दूफानों और खोमचों के दीपक ( चिराग ) और लैम्पों को सम्भालने के पश्चाद भी हाथ नहीं धोते और उन्हीं अशुद्ध और दुर्गन्ध युक हाथों : को भोज्य पदाथों में लगादेत हैं। बहुधा हलवाई लोग प्रत्येक नावि से ज्योनारों की बची हुई सामग्री को भी मोल.. लेकर बेचा करते हैं। जोकि प्रत्येक प्रकार से अशुद्ध होती है ।..

( २४ ) बहुधा हलवाई लोग मिठाइयों में शोभा के लिये महा अशुद्ध विलायती रङ्ग जैसें लाल, गुलाबी, पीला और हरादि मिला दिया करते हैं। कभी २ यह हलवाई लोग धोखा देकर भोले भाले लोगों का धर्म भी बिगाड़ते हैं। जैसे बूंदी (निकती ) में मिलाते तो हैं हरा रङ्ग, पर बेचते हैं बूट कीबूंदी कह कर । बूट के अर्थ हराचना ।। बहुधा हलवाई लोग विदेशी चीनी-खांड़ से मिठाई बनाया करते हैं। और यह विदेशी चीनी गाय और सूअर की हड्डी, मनुप्य के थूक, खून और मूत्र और मरे हुए कोढ़ियों के मांस के मेल से बनती है । देखो हीरालाल गुप्त रुहकी निवासी कृत पुस्तकें जो कि इस विषय पर लिखी गई हैं । बहुधा हलवाई लोग अपनी दूकानों में मत्येक जात के मनुष्यों को प्रत्येक जाति के मनुष्य की जूंढ में बिठला कर खिलाया करते हैं और चौका का कभी नाम ही नहीं लेते। और उन सव-खाने वालों को एक ही लोटे से पानी पिलाया करते हैं किन्तु उस लोटे के मानने की कभी वारी ही नहीं आती ॥ बहुधा हलवाई लोग बड़ी बड़ी ज्योनारों में भाड़े के बड़े बड़े कडाह लाया करते । यह कड़ाह ऐरो अपवित्र होते हैं कि जिन की अपवित्रता ने सातों बातों को एक कूड़ा-पन्थी बनादिया है। देखिये एक कड़ाह में एक दिन एक कसाई मांस बनाता है। दूसरे दिन एक बनिया उसी में खांड़ गलाता है | तीसरे दिन उसी में एक चमार चामर सिजाता है। चौथे दिन एक ब्राह्मण उसी में दूध औंटाता है । पांचवे दिन एक कोली उसी में दाल रांधता है । छटे दिन एक कुंजड़ा उसी में गोश्त पकाता है। सातवे दिन एक माली उसी में खिचड़ी करता है। आठवे दिन एक चौवा उसी में खीर घोटता है । तात्पर्य यह है कि सातों जात के मनुष्य चौब से लेकर चमार तक एक ही कड़ाह में अपना भोजन तय्यार कर लेते हैं । वाहर की ओर से तो इन को कोई मांजता ही नहीं क्योंकि काले २ पपटा ऐसे जमे रहते हैं कि जिन का छुड़ाना एक बड़ा कठिन काम है और ऐसे कठिन कार्य को र के कोई कष्ट उठाना भी नहीं चाहता। इसीलिए कह दिया करते हैं कि कड़ाह रात दिन आंच पर चढ़ा करते हैं इस से ये सदैव शुद्ध होते हैं ऐसे बूड़े यज्ञों में ऐसी छोटीसी अशुद्धता का विचार नहीं किया करते की अलङ्ग से इन कड़ाहों के मानने की कोई आवश्यकता ही नहीं (२५) पड़ती क्योंकि भैरव नी के वाहन पहिले ही से चाट चुटकलेगा कर देते हैं यदि 'उनकी की हुई सफाई पर कोई शक पैदा हुआ तो मज़दूर से, जोकि कड़ाह को उठाकर लाता है, एक हाथ दिवा दिया करते हैं। न मालूम मेरे प्यारे वैष्णव भाई, लकड़ियों को धोकर जलाने वाले, पेड़ों को छील कर खाने वाले, आकाश में धोती सुखाने वाले, एड़ी उचका कर और धोती. दुपट्टा समेट कर मार्ग में चाल चलने वाले और चलने में कमर तिरछी फरके दूसरों से बचने वाले इन महा अ- पवित्र कड़ाहों की ओर ध्यान क्यों नहीं धरते ? अपनी बात के लिये एक २ आने का चन्दा करके २५०) ढाई सौ रुपये इकडा कर कुछ थोड़े से कड़ाह क्यों नहीं बनवा लेते ? जिस से एक तो अपनी जाति का धर्म वचा रहे और दूसरे अपने लो- गों का गौरव बढ़े॥ प्यारे भाइयो ! धन के लोभ से धर्म कोन त्यागो । स्मरण रक्खो, यदि आप धर्म को ग्रहण कर लोगे तो अर्थ और काम आप से आप आप के पास आ खड़े होवेंगे। किसी कवि ने सत्य कहा है- धर्म तत्व कहं समुझिं मनुज जे, साधत कहुं न थकाहीं।। अर्थ काम नहिं तिनहिं त्यागि सक, ज्यों तन कह परछाहीं ॥ जहां धर्म तहं अर्थ कामहू, बसत आय अति नेरे। ज्यों सुगन्ध मकरन्द सुमन कहं, रहत सदा ही घेरे ॥ १९ ॥.. बहुधा किन्हीं किन्हीं मनुष्यों की समझ है कि विमा धन के धर्म नहीं होता। यथा- -- बिना अर्थ त्यो धर्म सधै नहि-कौनहु बने में कौमा। भोजन के पिन पुंषन जैसे-जीव दें अंभिरमा ६०॥ 'किन्तु आप इस को भली भांति निश्चय करके समझना कि न की जड़ भी धर्म ही है अर्थात् धर्म के बिना धन कदापि नहीं ठहर सक्ता । यथा -- अर्थ बहुलता निश्चय ही है-धर्म काम को पैविन सधि धम्म काम के-चलि नसे -1 - ( २१.) बहुधा हलचाई लोग हिन्दू धर्मानुसार सूतक पातक की भी कुछ विचार नहीं करते । देखने में आता है कि हलवाई लोग मृत्यु दिवस से तीसरे दिन "उठावनी" कर के दूकान खोल लेते हैं । और पूरी, कचौड़ी, दूध, दही, साग आदि पकवान बना कर बेचने लग जाते हैं। ये लोग केवल दो रात का सूतक मानते हैं परन्तु हिन्दू धर्मशास्त्रानुसार मनुष्य १० रात्रि व्यतीत होने पर शुद्ध होता है । यथा- प्रेतहारैः समं तत्र दश रात्रेण शुद्धयति ॥ ६२ ॥ मनु० अ०५।६५.॥ न जाने रात दिन हिन्दू धर्म शास्त्रों को सुनने और सुनाने वाले, भगतनी और पण्डित गुरूजी कहलाने वाले इन सूतकी हलवाइयों के हाथ का भोगन क्यों किया करते हैं ? हिन्दू ही जो ठहरे, गुड़ खांय गुलगुलों की आन करें । बहुधा हलवाई लोग साग भानियों में हल्दी गेरा करते हैं जिस से वह स- खरी हो जाती हैं। (10) सखरी हो जाती हैं तो हो जाने दे। तुझे क्या ! चौब लोग तो हल्दी को सखरी नहीं मानते ।। (उ०) अनी महाराज दीनबन्धु ! चौवे लोग सखरी नहीं मानते तो क्या? फुलीन लोंग तो हल्दी को सखरी मानते हैं । (प्र०) क्या चौर और कुलीन एक नहीं हैं ? क्या वह अलग २ हैं ?. (१०) इस का तो उत्तर मैं अभी देना नहीं चाहता । परन्तु इतना मैं अ- वश्य कहना चाहता हूं कि यमुना पुों और कुलीनों के चाल-चलन,आहार-व्यव- हार, और रोजगार में रात दिन का फर्क है । जिस को दोनों समुदाय में से प्रत्येक जन अपने मन में भली भांति जानता है । निश्चय है कि अध्यदश पुराणों की कथाओं की महिमा कहने वाले और भक्कल के बकल से वीलं की खाल निकाल गरुड़ पुराण कीनाथा-गाने वाले श्रीमान् चतुर्वेदी पण्डित गयादत्तनी शर्मा काव्य- तीर्थ इन दोनों थोकों की पृथकता को भिन्न भिन्न कर के समझा देवेंगे । 1 (२७) (.) अरे भाई ! काव्यतीर्थ नी तो जब कहेंगे तब कहेंगे देखा जायगा।पर अब तो तू इस समय इन का कुछ थोड़ा ही. सा भेद-( अन्तर-फ़र्क ) वतलादे ॥ (उ..) अच्छा महाराज ! इस काल में कुछ कहना तो नहीं चाहता था किन्तु अब आप के कहने से कुछ कहें देता हूं। सुनिषे ! इन दोनों थोकों के वि- वाह संस्कारों में ही रात दिवस और पृथ्वी आकाश का सा भेद है । यमुना पुत्रों में पुत्री ऐसे बड़े. वा से व्याही जाती है कि जिस. को देख कर एक विद्वान् ने कहा है कि “वाह भाई वाह ! देखो, इतने बड़े ऊंट की पूंछ से कैसी छोटी सी एक गिलहरी बांधी गई है" ।। कुलीनों में लड़की ऐसे छोटे वर से विधाही. नाती है कि निसं के लिये एक विद्वान् प्रार्थना करता है नंजौ कुढङ्गी चाल वाल व्याहन ते रोको। शिशु कुरङ्ग को घांधि सिहिनी पैं नहीं. कोको ॥६३ ॥ याल ब्याह अनरीति. ताहि लजि रीति सुंधारो। मृगछौने को हाय ! सिंहिनी गोद न डारो ॥ ४ ॥ साथ ही साथ मैं आप को इस विषय पर दो इतिहास भी और सुनाये देता हूं.॥ १-बहुत दिनों की बात है एक वेर, अनुमान . ६० : वर्ष की आयु के एक यमुना पुत्र जी एक छोटी सी छोरी को, जो कि लगभग : तीन वर्ष के थी; निज़. कन्धे पर बिठला कर रामलीला दिखाने को ले गये। क्योंकि चौबै जी. उस समय में अपने वंश में आप ही एक अकेले रह गये थे । और और कोई समीपी सम्बन्धी न था। सत्रण फुकने के समय लड़की रोने लगी। लड़की को रोते हुए देख कर एक भले मनुष्य ने कहा कि बौवै. जी महारान ! अपनी पुत्री को पुचकार लो और कन्धे से उतार कर गोद में लेलो.। विचारी आतिशबाजी को आवाज से सौफ खाती है । यह सुनते ही चौबै जी कोधान्ध होकर लाल लाल आंखें दिखा कर बोले "क्योरे सुसरी राड़ फे! तू कैसें बोले है ? का तोय. कळू दीखे नायने ? अरे सुसरे ! ला को तू हमारी छोरी बतावे है। अरे विडचोद !ज हमारी पुत्री बेटी (२८) नायने ।।अरे ! जतोहमारे ससुर की बेटी है । अवे! हम तो जा के खसम हैं।" भला मनुष्य बोला; महाराज चौवैजी ! कसुर माफ़ करियेगा, मैंने तो आप को इस लड़की का बाबा या नाना जाना था। यह सुनते ही सब तमाशे पाले खिल खिला कर हंस पड़े और कहने लगे' "ओ! पुत्री के वावा"। "ओ! छोरी के नाना" "अरे बेटी के बाप" इत्यादि अन्त को चौबै जी भी हंस कर वहां से खिसक दिये और घर को चल पड़े और फिर रास्ते में कहीं न अड़े और किसी से न रहें। २=जयपुर में एक समय संक्रांति के ऊपर एक कुलीन के लड़के ने एक मुसलमान के लड़के की पतङ्ग तोड़ली मुमुलमान का लड़का कुलीन के घर पर आया और सामने एक लम्बी मोटी पचहत्यी औरत को खड़ी हुई देखे करें उलाहना देने लगा कि "भनी मा नी ? थां को छोरो म्हां को कनखो ले लियो छै, सो म्हां को देदेउ" मुसलमान के लड़के के उक्त वचनों को सुन कर घर पर के सब लोग हँस उठे । क्यों हँसे ? इस लिये कि मुसलमान के लड़के ने मिस स्त्री को कुछी- न के लड़के की माता जाना था। वह उस लड़के की माता नहीं थी। किन्तु उस की वह अर्थात लुगाई थी। जैसे सब लोग हँसे थे वैसे ही वह बहू विचारी रोई थी। क्यों रोई थी ? इन कुलीनों की कुरीतियों को देख कर और यमुना पुत्रों की कुप्र- थाओं को सुन क्या मथुरा वाले चार हजार माथुर्ग की माथुर सभा के महामन्त्री श्री मान्य- वर चतुर्वेदी पण्डित श्री नटवर लाल जी महागन मिहारी सर्दार, आर्यभिषक्, गोभक्त, स्वदेश हितकारी; निन नात्योन्नतिकारी, सुप्रबन्धकारक, कुमथानाशक, इन कुरीतियों का कुछ प्रबन्ध न करेंगे ? अर्ना महामन्त्री जी महाराज ! स्मरण रखनी, यदि आप लोगों ने इन कुर्स नस्कारों को कुछ संशोधन न किया तो एक दिवस ऐसा आवेगा कि नई यह पवित्र और श्रेष्ठ जात किसी गहरे गड़हे में गड़ी पड़ी दृष्टि पड़ेंगी। यह वही उतमीम जात हैं नों कि एक दिन हिमालय पर्वतं की उच्च से उच्च चोटी पर चढ़ी हुई थी और खिसे- फेते खिसकते आज उसी पर्वत के पदों पर ऑपड़ी हुई हैं और अब यहाँ (पदापर) भी उस के ठहरने की कोई लक्षणे दिखलाई नहीं देता। वीज़ारू भोजन की अपवित्रता के विषय में मैंने भाचीन मनुष्यों से बहुत से इतिहास सुनें हैं । निन में से एक-दो औप को भी सुनायें देती है। कर॥ 1 3 ( २९ ) १ इतिहास । एक दिन एक पण्डित नमुना स्नान के लिये विश्राम घाट पर जा रहे थे। जब आप बाज़ार की सीढ़ियों पर पहुंचे तो देखते हैं कि एक हलवाई की दूसरी दूकान पर दूध से भरा हुआ एक टोकना (पीतल का बर्तन )घरा हुभा है । और उस में भैरव-वाहन जी टॉग उठा कर अपने पेट का पानी गिरो रहे हैं। और टोकना के पय जी उस पेट के पानी को, जो कि पहिले पवित्र जमना जले था, प्रेम पूर्वक अपने रूप, रस और गुण में शीघ्रता से मिला रहे हैं निस से कोई उन के परम भैमी मित्र को पहचान न लें।पय और पानी की प्रीति सारे संसार में संख्या- त हैं। यह कौतुक देख कर उक्त पंण्डित जी ने हलवाई से कहा " बनिये के ! तो को कंछू दूध के टोकना की हूँ खबर है ? देख ! ना सुसरे कोरे कुत्ता नै जी दूध में मून दिया है। हलवाई बोला "अच्छा महाराज ! को डर है जो दूधे मैं फेंक दोगो” यह कहते हुये हवाई दूध को भीतर ले गयो । पण्डित जी चतुर-थे समझें गये कि हलबाई दूध न फेंकेंगी। बस उसी समय से पण्डित जी ने बाज़ार की भोजन छोड़ दिया। धन्य है ऐसे धर्मामी पुरुष को । ऐसों से ही धमौनति होती हैं। २ इतिहास । एक समय दिल्ली में एक साहूकार के भंगी को बहुत जूठन मिली। उसने एकं हलवाई को बेच दी। इलवाई ने खोमचे वालों को मोळं दे दी। खोमचे चालों ने शहर में बेची। एक खोमचे वाले की एक भंगी से तकरार हो गई। भंगी ने हल्ला मचा दिया । "अरे इस ने भंगी की जूठ बेचकर सब हिन्दू मुसलमानों का धर्म विगाई दिया। सारे शहर में शोर मच गया, और एक बड़ी भारी पञ्चायत हुई ॥ स इन्ही रातों को सोचते विचारते मेरा जी बाजार के अपवित्र भोजनों में हर मया है। और इसीलिये मैंने. अशुद्ध भोजन को उच्छिष्ट-जूठन में बैठ कर न (नहीं ) खाने का प्रतधारण कर लिया है । और ईश्वर पर पूरा भरोसा रख लिया है । कि वही जगदाधार मेरे प्रण को पूर्ण करने वाला है ।। ईशभरोसा भारी ॥.६.५॥ (4) रै भाई ! हमने सुना है कि आर्य समान में खान पाने को कुछ भी विचार नहीं किया जाती - " । ( ३० ) (उ० ) महारान ! आप से किसी जूंठ खाने वाले और झूठ बोटने वाले झूठे ने झूठ कह दिया होगा । देखिये ! १= श्रीमान् पं० भगवानदीन जी प्रधान आर्यप्रतिनिधि सभा संयुक्तमदेश । " कृष्णलाल , " आर्यसमाज मयुरा । ३६ बाबूगम " आचार्य मुड़सान निवासी। " नन्दकिशोर " देवशमा कान्यकुब्ज } यह दोनों आर्य प्रयागदत्त धर्मोपदेशक हैं । यह सब लोग और इन के अतिरिक्त और भीअनक भद्र पुरुष हैं हो बाज़ारी अपवित्र भोनन नहीं करते । (प्र०) अरे भाई ! तूने इन भले लोगों का ता नाम बतादिया और निश्चय है कि और भी सहस्रों मनुष्यों का नाम बत- ला देग। किन्तु हमारे कथन का मथन तो कुछ और ही है। (उ० ) अच्छा महाराज, ! तो अब आप अपना वह प्रयोमन भी कहियेगा । (प्र.) अरे भाई ! दयानन्द ने तो खान-पान का कुछ भी विचार नहीं माना । ( उ०) महारान ! आपने अब तफ महर्षि दयानन्द जी के विचारों को नहीं सुना । यदि सुनते तो ऐसा न कहते । अच्छा अब आप ध्यान दे कर मुनिये। महर्षि दयानन्द जी खान-पान की शुद्धता के विषय में कहते हैं । कि- १%=( मनुष्य ) नित्य स्नान, वस्त्र, अत्र, पान, स्थान, सवशुद्ध रकरवे क्योंकि इन के शुद्ध होने में चित्त की शुद्धि और आरोग्यता प्राप्त होकर पुरुषार्थ बढ़ता है ।। देखो सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ संस्करण पृष्ठ २६२ पंक्ति २७ ॥' :२=जहां भोजन करें उस स्थान को धोने, लेपन करने, झाडू लगाने, कूग कट दूर करने में प्रपन्न अवश्य करना चाहिये । देखो स० प्र० पृ० २६५ पं० २६॥ :.३ (चौका को) प्रतिदिन गोवर मिट्टी झाडू से सर्वथा शुद्ध रखना और जो पक्का मकान हो तो जल से धोकर शुद्ध रखना चाहिये । देखो सत्यार्थ प्रकाश पृष्ठ २७० पं० २१॥ ४=नितने पदार्थ अपनी प्रकृति से विरुद्ध विकार करने वाले हैं उन उन का सर्वथा त्याग करना ॥ देखो स. भ. पृ० २६९ पं०३॥ ५-बुदि लुम्पत्ति यदु,द्रव्यं मदकारि तदुच्यते ॥ ६६ ॥ शारजापर.। अ०४ । २१॥ 1 .. जो २ बुद्धि का नाश करने वाले पदार्थ हैं. सन का सेवन कभी न करें और नितने अन्न सड़े, बिगड़े, दुर्गन्धादि से दूषित, अच्छे मकार न बने हुए और मद्य मांसाहारी म्लेच्छ कि निन का शरीर मद्यमांस के परमाणुओं ही से पूरिन है उन के हाथ का न सावे ।। देखो स० प्र० पृ. २६७ पं० २० ॥ ६-(एक साथ खाने में ) दोष है, क्योंकि एक के साथ दूसरे का स्वभाव और प्रकृति नहीं मिलती जैसे कुष्ठी आदि के साथ खाने से अच्छे मनुष्य का भी रुधिर बिगड़ नाता है वैसे दूसरे के साथ खाने में भी कुछ विगाड़ ही होता है सुधार नहीं। देखो सत्यार्थप्रकाश पृ. २६६ पं०.६॥. ७-इसलिये मनुष्यमान को उचित है कि किसी का उच्छिष्ट अर्थात् झूठा न खाय । देखो सत्यार्थप्रकाश पृ० २६९ पं० २८॥ ८-नहीं ( स्त्री पुरुष को भी परस्पर उच्छिष्ट न खाना चाहिये ) क्योंकि उन के भी शरीरों कास्वभाव भिन्न भिन्न है ॥ देखो स० प्र० पृ.० २६९ १० १२६ । इसी प्रकार मनु महारान ने भी कहा है कि पुरुष अपनी स्त्री के साथ एक पात्र में भोजन न करें। यया-- नारनीयाद् भार्या साई ।। ६७ ॥ मनु० अ४। ४३ ॥ एक मनुष्य ने कहा कि गुरू की जूठन तो अवश्य खाना चाहिये । यथा. गुरोरुच्छिष्ट भोजनम् ॥ ६८ ॥ महर्षि ने उत्तर दिया.-: इस का यह अर्थ है कि गुरू के भोजन किये पश्चात् जो पृथक् अन्न शुद्ध स्थित है उस का भोजन करना अर्थाद गुरू को प्रथन भोजन करा के पश्चात शिष्य को भोजन करना चाहिये ( नकि गुरू की जूठन रवाना चाहिये ) | देखो सत्यार्थप- 'काश-पृ० २६५ पं०.१५॥ फिर एॐ ने प्रश्न किया कि जो उच्छिष्ट मात्र का निषेध है तो बरड़े का च्छिष्ट दूध भी न पीना चाहिये। इस पर महर्षि ने कहा कि- १.०बड़ा अपनी मा के बाहिर का दूध पीता है भीतर के दूध को नहीं

( ३२ )
पीअक्ता इस लिये उच्छिष्ट नहीं परन्तु बछड़े के पाये पश्चाव जल से उसकी मा के
स्तन धोकर शुद्ध पात्र में दोहना चाहिये ।।देखो स० म० पृ० २६९ ० २१ ॥
(अ) मनुष्यमात्र के हाथ की की हुई रसोई के खाने में क्या दोष है ?
इस के उत्तर में महर्षि ने कहा-
११=(मनुष्यमात्र के हाथ की पकी हुई रसोई के खाने में ) द्रोष है, क्योंकि
जिन उत्तम पदार्थों के खाने पीने से ब्राह्मण और ब्राह्मणी के शरीर में दुर्गन्धादि
दोष रहित रज वीर्य उत्पन्न होता है वैसा चांडाले और चांडाली के शरीर में नहीं
क्योंकि चांडाल का शरीर दुर्गंध के परमाणुओं से भरा हुआ होता है वैसा ब्राह्म-
णादि वर्गों का नहीं इसलिये ब्राह्मणादि उत्तम'वर्गों के हाथ का खाना और चांडा-
'छोदि नीच भंगी चमार आदि का न खाना ( चाहिये) देखो स०प्र० ० २७०
पं० २॥ इसी प्रकार महर्षि ने भागलपुर-बंगाल में स्कूल के मास्टर से, जो
कि बवाली ब्रह्मो थे, कहा है । कि-
१२=सव जहान के लोगों के साथ खाना ठीक नहीं । और चारों वरन भी
'एक नहीं। देखो श्रीमान्वर पण्डित लेखराम कृत महर्षि जीवन चरित्र पृ० १९३५०४
श्री महारान ! अब तो आप भली भांति समझ गये. होंगे कि, आर्य समाज
में महर्षि ने कैसी सुन्दर शुद्धता के साथ पवित्र भोजन करने की आज्ञा दी है। मेरी
समझ में तो खान-पान की पवित्रता नैसी आर्य समाज के सिद्धान्तों में पाई जाती
है वैसी और किसी मत (मनहर्व ) में दिखलाई नहीं देती । किरानी और कुरानि-
यों का तो कहना ही क्या है परन्तु पुरानियों में भी खान-पान के विषय में शुद्ध-
ता के स्थान महा अशुद्धता के नियम बने हुए हैं। इसी लिये कहना पड़ता है। कि-
वाहरे 'आर्य धर्म के विरोधी हिन्दू धर्म ! धन्य है तुझ को कि तूने उच्छिष्ट
खाने की उमंग में शुद्धता की कुछ भी 'सुधि न ली और. ऐसी मिथ्या प्रथा-मच-
लित करदी कि जिस का पारावार ही नहीं पाया जाता । और यही कारण है कि
स्त्री को पति की, चेले को गुरु की और भले २. उच्च . घरानों की बहू बेटियों को
शिष्या-चेली बन कर गोसाई जी व बाबानी वीं जूंठन खानी-पीनी पड़ती है ।
चाहे उन्हें रुचै पचै चाहै न रुचै पचै । देखो राधास्वामी मतवालों के "बचन सार"
नामक ग्रंथ में लिखा है-
पीक दान ले.पीक करावे !
सो संघ पीक अपि पाजावे ॥ ६ ॥

(१३) भीत व नेला चेली मिल कर गुरु की पीक पीदें.... रामस्नेहियों की एक शाखा के मनुष्य साधुओं की जूठन खाते हैं । साधुओं के चरण धो के पीते हैं । और नव गुरू से चेला दूर जावे तो गुरू के नख और डाढ़ी के बाल अपने पास रख लेवे और उस का चरणामृत नित्य लेवे । ऐसा नियम है ।। देखो सत्यार्थप्रकाश पृ० ३६०-३६१ (प्र.) वाह बड़े भले आदमियों का नाम लिया, कि जिन के हाथ की छूवा हुभा पानी तक भी कोई हिन्दू नहीं पीता ॥ ( उ० ) क्या तुम कह सक्ते हो ? कि यह लोग हिन्दू नहीं हैं? अस्तु इनको रहने दो । अब आप यह कहो, वल्लभकुली हिन्दू हैं या नहीं ? (१०) हैं ! हैं !! यह क्या कहते हो ? बल्लभवंशी तो हमारे पूज्यमान और हिन्दू धर्म के स्तम्भ हैं ॥ :: ( उ० ) तो महाराज ! वही लोग (बल्लभकुली) अधिकता से अपनी जूंठन खिलाते पिलाते हैं। देखिये ! जब केशरिया स्नान अर्थात् गोसाई जी के शरीर पर न्त्री लोग केसर का पटना कर के फिर एक बड़े पात्र में पट्टा रख के गोसाईनी को स्त्री पुरुष मिल के स्नान कराते हैं परन्तु विशेष स्त्री जन स्नान कराती हैं पुनः नब गोसाई जी पीताम्बर पहिर और खड़ाऊं पर चढ़ बाहर निकल आते हैं और घोती उसी में पटक देते हैं फिर उस जल का आचमन उस के सेवक करते हैं और अच्छे मसाला घर के पान बीड़ी गुसाई जी को देते हैं वह चॉब कर कुछ नि- गल नाते हैं शेष एक चांदी के कटोरे में जिस फो उन का सेवक मुखं के आगे कर देता है उस में पीक उगल देते हैं. उस की भी प्रसादी बटती है जिस को "सा" प्रसादी कहते हैं ॥ देखो स० प्र० पृ० ३६८ पं०५॥ इस की पुष्टि में मिष्टर ब्लाकट साहब ने कहा है। शैर-हैं खिलाते जूट संब को और ये मुंह का डंगोल यांध के दमड़ी की कंठीं छीन लेते हैं ये माल.॥ हैं सफा ऊपर से ये आँ चाल चलते हैं कुचाल । खूब ठगते चलियों को हार कर वातों के जाल | देखो वल्लभकुल चरित्रदर्पण पृ०४२ पं० २० 15 मिष्टर ब्लाकट साहब में इतना कह कर ही मौन धारण नहीं किया है कि- न्तु आगे चल कर इन, की अशुद्धता का और · भी परिचय दिया है। सुनिये ! .कवित-भाड़े है कैबाहिर गुसांई,जी पधारें जबै बेला और चेली सप तहां बैठे आन हैं । हाथन में जल कछू शेष बचजात ताहि किंछ सब ऊपर जो अशुचि महान है.॥ लींच शेष जल को सुवर्णामृत तुल्य अहो धर्म के विरुद्ध करै हियो न सकान है। पू. हम ताको प्रभु उत्तर बताय दीजे इन सब यातन में द को प्रमान है ॥ ७॥ गुरू के शरीर मांहि ऊपर के अडान ते नीचे के असो तो अति शुचिमान है। जूठी ही दतौन की प्रसाद महा भाषत है से- वक लगाय माथे राखत ज्यों प्रान है ॥ याहीतै चेली त ऊपर के 'अंगन को नीचे के अंगन को राखें घर ध्यान है। पूछ हम ताको प्रभु उत्तर बताय दीजे इन सब बातन में वेद को प्रमान है. ॥७२॥ गुप्त स्थान के समूड़ केश घेलन को देत कहैं की जो यन्त्र उत्तम महान है. | सोने सो महाय पहिराय दीजो कंठ मांहि भूत प्रेत भागत न लागत मसान हैं|बाधा भग जायगी भवन की तुम्हारी कहा.पार और परोसिन को सुखद बखान है । पू, हम ताको प्रनु उत्तर बनांप दीजे इनहू.सब बातन में वेद को प्रमान है ॥७॥ देखों वल्लभकुल इतिहात नाटफ: ०७१-७६ कवित्त संख्या ४-५-६ ॥ हिन्दू धर्म ने इतने पर ही सन्तोष नहीं किया, बरन आगे चल कर एक जन- रैल आरडर ( व्यवस्था ) देदिया है कि उड़ीसा वाले जगन्नाथ जी के मन्दिर में ब्राह्मण को भी सात जात की उच्छिष्ट खाने से नकार न करना चाहिये । यदि कोई नकार-इन्कार करेगा तो वह कोढ़ी या अन्धा या काणां या बहरा या गूंगा या नकटा या टोटा या लूला या लंगड़ा: या: लुंजा या और कोई किसी प्रकार से अङ्गहीन हो जायगा । इसीलिये उच्छिष्ट खाने के विषय में वहां की अद्भुत लीला को देख कर एक विद्धान में कैसा अच्छा सच्चा वाक्य कहा है । यथा- H " ( ३० अगलाथ के धाम में, लर्ची अनोखी बात । अति शुद्रन जूठा किया, भखें विप्र गण भात ॥७॥ हिन्दू धर्म ने चंदन के नान भी अलग २ स्स छोड़े हैं. ! यथा- प्रसादी, महा- प्रसादी. खास प्रसादी, उत्तम. प्रसादी, टाकुरजी की प्रसादी, गोसाई जी की प्रसादी, महाप्रभू जी फी प्रसादी, जमना जी की प्रसदिक्ष, अमनिया प्रसादी, समर्पणी प्रसादी, ब्रम सम्बन्धी प्रसादी इत्यादि कहां तक गिनाऊं || हिन्दू धर्म में प्रसाद पाने मुंठन खाने के माहात्म्यं भी बहुत से लिख रकखे हैं मिन को यहां स्थानाभाव से नहीं लिखा ॥. किसी किसी हिन्द पुरोहित ( गुरू.) ने अपनी जूठन देने, अपने पास बैठने, अपने शरीर को छुवाने आदि बातों पर कर टैक्स-महमूल भी बांध रखा है। यधा-- मा भगत जी पुरोहित जी की ज़ियारत । यात्रा दर्शन') करना चाहे तो ५) रु० । हाथ लगाना चाहें तो २०) रु०। पांच धोना चाहें तो ३५). । हिंडोला झुलाना चाहें तो ४०) २० । मालिस करना चाहे तो ४२) रु. । पास बैठना चाहें तो ६०) F० । खास कमरे में नाना चाहें तो ५०) से ६००) रु. तक । साथ नाचना चाहें तो १००) से २००) रु. तक। थूक चाटेना चाहें तो तो १८)क० । मैली धोती के धोवन या निचोड़न को पीना चाहें तो १४) रुपये देवे ॥ देखो-सद्धर्मप्रचारक वर्ष १७ अङ्क २९ पैन ४ कालम ३.६॥ (प्र०) हमने सुना है कि आर्य लोग समझते हैं कि खान पान के एक होने से " . उन्नति और सुधार होता है ।। (७०) नहीं, आर्य लोग ऐसा नहीं समझते, महाराज ! कृपा करके इस विषय पर आप महा के निम्न लिखितः वाक्य को पढ़ लीजिये- १३.-नब तक एक मन, एक हानि लोभ, एक सुख दुःख, परस्पर न माने तब तक उन्नति होना बहुत कठिन है । परन्तु कैवलं खाना पीना ही एक होने से सुधार ..

- नहीं हो सकता किन्तु जब तक बुरी बातें नहीं छोड़ने और अच्छी बातें नहीं करते तब तक बढ़ती के बदले हानि होती है । देखो स०प्र० पृ० २६६ पं० ३१ ॥ (प्र०) हम समझते हैं कि एक साथ अर्थात् एक संगति हो कर एक पंगति में पैठ कर भोजन करने से मित्रता बढ़ती है और शत्रुता घटती है ।। (७०) नहीं महाराज ! आपकी यह समझ ठीक नहीं है । देखिए ! कौरव- पाण्डव और यादव, यह तीनों थोक आपस में एक साथ भोजन किया करते थे। परन्तु फिर भी इन लोगों ने ऐसा घोर संग्राम किया कि जिस के मारे सारा भा. रत गारत हो गया और वह महान् युद्ध महाभारत के नाम से सारे भूमण्डल में अब तक विख्यात हो रहा है । ईसाई लोग एक साथ एक मेज पर बैठ कर खाते हैं परन्तु उन में भी प्रेम नहीं पाया जाता । रोमन कैथलिक और मोटेस्टेंटों ने आपस में एक दूसरे के सहस्रों मनुष्यों को कृतल कर डाला । देखो क्रिश्चियन मत दर्पण । और मरमन और फ्रांस का संग्राम तो अभी, थोड़े दिन हुए, हुआ है । और रूस में भानकल एक दूसरे को वध कर रहा है। एक थाली में खाने वाले मुसलमान भाइयों में सुन्नी और शिया सदैव आपस मैं झगड़ते ही रहते हैं।। आना कल भी लखनऊ में लड़ रहे हैं। देखो आ० मि. ता० १६-४-०७ का पन्ना ३, कोलम ६ । यदि आप को इन मुहम्मदी भाइयों के आपस में बड़े २ युद्धों का वृत्तान्त जानना है तो दिल्ली के बादशाही समय का इतिहास पढ़िये ॥ मधुरा के सब चौवे एक संगति से एक पंगति में भोजन किया करते परन्तु उन में स्नेह, प्यार, प्रेम, पाते, प्रणय, मेल, मिलाप, मैत्री, मित्रता, दोस्ती, मुहब्बत और लब ( मन में भावे जो कहो ) लेशमात्र को भी नहीं पाई जाती। इस के न होने का, यही एक. बड़ा. भारी प्रमाण है कि इ.सी. एक छोटे से मथुग नगर में इन की संख्या चार हज़ार होते हुए भी.इन, में से म्यूनीसिपलेरी (चुड़ी) का एक भी. मेम्बर नहीं है। यह लोग अपनी परम पूज्य माता श्री जमना जी के परमपवित्र स्थान विश्रामघाट का भी प्रबन्ध नहीं कर सकते जो कि एक छोटासा - कार्य है।

(७) पमाय के प्रख्यात नगर अमृतसर में एक समय पादरी क्लार्क · साइव ने महर्षि में कहा कि "हम और आप एक मंग पर खाना खा॥ महर्षि दयानन्द जी ने उत्तर दिया। "इस से. फायदो क्या होगा?" पादरी साहब ने कहा । "इस से दोस्ती बढ़ेगी" महर्षि दयानन्द जी ने कहा- १४-सृत्ती भोर शिगा सन्मान, व हसी व इजलेण्डः वाले एक पर तन में खारने हैं और तुम और रोमन केथोलिक एक मेन पर खाने हो पर दिल से एक दूसरे के दुदमन हो फिर आप को सि मेन पर खाने से हमारी दूसरे धर्म वालों से मि तरह दोती हो सकी है ? यह सुन कर पादरी साहब लागवाव होगये । देखो धर्मवोर पंडित खाराम कृत महर्षि दयानन्द जीवन चरित्र पन्ना ३३२ लाइन ॥ श्रीमान मामा गुन्शीराम भी मुख्याधिष्ठाता गुरुकुल कांगड़ी-हरिद्वार के कलनों में भी सिद्ध होता है कि एक साथ भोजन करने से प्रेम नहीं बढ़ता। महात्मा जी कहते हैं- हिन्दु गुसलमानों के मेल के लिये जहां आनरेचल गोखले से महानुभाव काम कर रहे हैं. वहां यह सुन फर मुझे प्रसन्नता हुई है कि लाहौर में एक मुसलमानी दनी के निमन्त्रण पर सारनी उमराव सिंह मजीठिया तथा श्रीमती हरदेवी जी तथा बहुनसी मुसलमानी शरीफ़ वीवियां इकट्ठी हुई और उन्होंने इकटे:मिल कर भोजन किया। इस से ममझा जाता है कि दोनों समानों में परस्पर प्रेम बढ़ेगा ........"सम्भा है कि :न विधियों से कुछ दिखलावे का मेल होनावे, किन्तु वास्तविक मेल मा.शिघि कुछ अन्य हा है । देखो सद्धर्म प्रचारक भाग १८ संख्या १८ पेन ८ कालम १ । ( दिखलावे का मेल ) अर्थ ( मिथ्या मेलः) ता- तर्य यह है कि एक साथ खाना खाने, सें झूठा मेल भल ही हों नावें पर सच्चा मेलमिलाप नहीं हो सकता ॥ (प्र०) हम से एक आर्य ने कहा था कि "सत्र के हाथ का खाना खाना चा- दिये क्योंकि ऐसा करने से चढ़ती होती है। ॥ - : में ., (०). महाराज ! आप: से आर्य ने तो ऐसा कदापि नहीं कहा होगा पर हाँ किसी अनार्य ने अवश्य कह दिया होगा। देखिये ! सत्यार्थ प्रकाश. पृ० ३७५ एक विषय इसी विषय पर प्रश्नोत्तर में निम्न प्रकार लिखा हुआ है। ब्रह्म समाजी प्रश्न करता है, देखो ! युरोपियन लोग कोंट, बूट, पतलून पहरते होटल में सब के हाथ का खाते हैं इसीलिये अपनी बढ़ती करते जाते हैं। इस के उत्तर में महर्षि कहते हैं- --- १५-यह तुम्हारी भूल है क्योंकि मुसलमान अन्त्यन:लोग सब के हाथ का. खाते हैं पुनः उन की उन्नति क्यों नहीं होती; ?.जो युरोपियनों में बाल्यावस्था में विवाह न करना, लड़का लड़की को विद्याः सुशिक्षा करना कराना, स्वयंम्बर विवाह होना, बुरे २ आदमियों का उपदेश नहीं होना, अपने देश वालों को व्यापार आदि में सहाय देते हैं इत्यादि गुणों और अच्छे २ कर्मों से उनकी उन्नति हैं मुण्डे. जूते (बूट) कोट, पतलून (और सब के हाथ का खाना ) होटल में खाने पीने आदि साधारण और बुरे कामों से नहीं बढ़े हैं। सारांश यह है कि सब के हाथ का खाना खाने से उन्नति नहीं होती। इस से भी स्पष्ट धुनि निकलती है कि मनुष्य को सब के हाथ का भोजन नहीं करना चाहिये । (प्र.) तो क्या अपने ही हाथ का खाना और दूसरे के हाथ का नहीं ? इस का उत्तर महर्षि देते हैं- . ::नो आयो में शुद्ध रीति से बनावे तो बराबर सब आर्यों के साथ खाने में कुछ भी हानि नहीं। देखो स० प्र० पृ० २७१ पं०.२-३ ॥ (प्र.) तो क्या अब तू सब आर्यों के हाथ का खावेगा ? : : ....) नहीं, क्योंकि प्रथम तो महर्षि ही कहते हैं कि यदि आर्य पवित्रता से बना तो उस के हाथ का खाना चाहिये, और जो अपवित्रता से बनाये न, खाना चाहिये । द्वितीय वर्तमान समय में इस का जानना बड़ा कठिन है फि मनुष्य आर्य समानी कहलाने वाला आर्य धर्म या नहीं ? क्योंकि आर्य धर्म पर चलना ऐसा कठिन है जैसे खड्ग की पैनीतीक्षण धार पर और जब मनुष्य आर्य समाजी कहलाने वाला आर्य धमी. अर्थात् आर्यधर्म पर चलने वाला नहीं है तो उस के हाय को भोजन करना भी मैं वैदिक, धर्म और . चलता हैं .

- ? मैं महर्षि की नाजा के विरुद्ध समझता हूं। क्योकि आर्यसमाना तो आन कछ यदुपा सब ही लोग रन जाने हैं । कल्पना कीनिये कि एक कायस्थ और एक पला दोनों ही अपना नाम आर्यसमान के रजिस्टर में लिखाकर और ३-४ भाने मासिक चन्दा देने का झूठा सन्चा मण करके भार्य समाजी तो चन गये परन्तु मांस खाना और मदिरा पाना नहीं छोड़ा और न अपने कुल की कुरीतियों ही को स्यागा और न मार्य धर्म के सिद्धान्तों को ही ग्रहण किया। अरे बाबा ग्रहण करना तो बहुत दूर रहा, पर यों कहो कि सुनाही नहीं । सुनें कौन ? सुनें तो वह निस को गो पर श्रद्धा हो । यहां तो धन पर स्नेह ही नहीं है। यह भी नहीं जानते कि सत्यार्थ प्रकाश कितना बड़ा पुग्तक है ? और आर्य समाज के नियम क्या है ? यहां तो केवल लेक्चर सुनने का शौक ( रुचि ) है । सो आठ दिन भाने हैं और कनर सुनकर चले जाते हैं। कहो महाराज ! अब को बार्य धी कसे कह और महर्षि दयानन्द जी महाराज की आज्ञा के विपरीत से आर्य समानियों के हाथ का कैमें खालं ? बहुधा देखने में आता है कि बहुत से मनुष्य चित्त प्रसन्न करने के लिये समाग मन्दिर में आठवें दिन. आ बैठते हैं और चार-आठ पैसे देकर सभासदों अपना नाम लिखवा लने है किन्तु आर्य धर्म से कुछ सम्बन्ध नहीं रखते ॥ कुछ एक स्वार्थी मनुप्य ऐसे होते हैं जो अपना स्वार्थ. सिद्ध करने के लिये दो चार आना महीना देकर सभासद बन जाते हैं और फिर अच्छे अच्छे मनुष्यों से चात नीत करने का मौका ( समय ) पा जाते हैं परन्तु - आर्य धर्म से कुछ भी प्रीत नहीं रखते हैं। कोई बोई धनाव्य नाम पाने के लिये धन के बल से आय्यं समान के पदा- धिकारी तो बन जाने हैं किन्तु आर्यधर्मानुयायी नहीं बनते और अपने पुराने • (हिन्दू) धर्म का पालन करते रहते हैं। बहुधा कुछ एक हिन्दू, थोड़ा बहुत लिखे पड़े हुए, धन के लोभं से आर्थ समानों में घुसकर वैदिक धर्म का प्रचार करने लगते हैं। परन्तु खयं भाl धर्म से कुछ प्रेग नहीं रखते हैं। और जब निन आवश्यकतानुसार धनोपान कर चुकते हैं । तव आर्य समान से पृथक होकर वैदिकधर्म की निन्दा करने संगते हैं। . .", TAL -- ) (४६ ) बहुधा चतुर चालाक दुरात्मा (पापी दुष्ट ) अपना नाम प्रगट ( मशहूर) फ़रने के लिये आर्य समानी बनकर लैकचर- देने लग जाते हैं और फिर धीरे धीरे पुराने और दृढ़ आर्य सभासदों को अपनी बनाल्टी मृदु वाणी से मोहित कर:समान के पदाधिकारी बन जाते हैं औरः पुनः दुराचार करते हुए मनमानी घरजानी करते लंग पड़ते हैं इस से समान की बहुत कुछ हानि होती है। परन्तु कुछ एक सभासद ('निर्बलात्मायें ) महर्षि के मिसन का विगाड़ होते हुए देखकर भी. कचरों के लोभ में पापात्मा के दुराचारों पर कुछ भी दृष्टि नहीं देते और यदि कोई पूछे-तो कह देते हैं कि “भाई !' इन सब बातों (त्रुटियों) को जानते तो हम भी हैं पर क्या करें ? दुधारी गाय की दो लात सहनी ही पड़ती हैं। क्योंकि इन को लेकचर चटाटा मसालेदार होता है इसलिये बहुत से मनुष्य आते हैं जिस से समान की रौनक (शोभा ) बढ़ जाती है" ॥ अरे ! वाहरे निर्बात्माओ !! याहरे दुधारू गाय की दो लाते सहने वालो !!! धन्य है तुम्हैं कि लैकचरार से तो इतना प्रेम करते । परन्तु समान की हानि होने का कुछ भी विचार नहीं विचारते॥ सोचने से इस निर्वलता का कारण यही प्रतीत होता है कि लोगों को ईश पर भरोसा नहीं है। इसी प्रकार श्रीमान् महाशय बाबूराम नी सभासद : आर्य समाज मूड बरेली लिखते हैं। कि अगर गौर से देखा जाये तो आर्य समाज का मेम्बर बनना लोगों ने मामू- ली सा.काम समझ रक्खा है जिस वक्त हमारे सामने आर्य समान के पवित्र और पाक असूल: पश किये जाते हैं । तो हम खुश होनाते हैं और झट दो या चार आने की कुरवानी महीने में समझ कर आर्य समाज के मेम्बर: बनने को तयार हो जाते हैं लेकिन असुलों पर अमलदसमदः का सवाल जिस वक्त पेश होता है तो कोनों में दुबकते फिरते हैं । देखो सर्भप्रचारक जिल्द १८ नम्बर २० पेन ११ कालम २ लाइन २६ ।। ..श्रीमान् महाशयःसुन्शीगम जी सम्पादक सद्धर्मप्रचारक जान्धर लिखते हैं। कि- :... लोग आर्य समान में क्यों आते हैं? यदि:सर्व सज्जनः केवल वैदिक धर्म की शरण ग्रहण करने के लिये ही आर्य समाज में सम्मिलित होते तो सांसारिक ..

(४२) कष्टों का सामना होने पर न गिरते । कोई लिहाज़ मुलाहिजे से कोई आजीविका के लालच से और कोई घर बसाने के मोह से आर्य समाजी बनता है । ............... मतवादी तो परलोक में शारीरिक आनन्द का लालच देते हैं, आर्य समानी इस लोक में ही आर्थिक सहायता से धर्म कराना चाहते हैं। क्या धर्म के मर्म को समझ ने का हम लोग कभी प्रयत्न करेंगे ? देखो सद्धर्म प्रचारक भाग १९ संख्या ९ पृष्ठ १७ कालम १ लाइन १४ ॥ आगे चल कर महाशय जी फिर लिखते हैं कि मैं जानता हूं कि जिस प्रकार अन्य सुसाइटियों में भी बहुत लोग विविध उद्देश्य लेकर सम्मिलित होते हैं वैसे ही मार्य समाज में भी सम्मिलित हुए हैं। कोई बड़ी आयु तक कोई अर्धाङ्गिनी न मिलने के कारण केवल इस आशा पर ही आर्य समाज का मेम्बर बना है कि विधवा विवाह कर के वह न केवल अपना घर ही बसा लेगा प्रत्युत संसार में संशोधया ( Reformer ) का उन पद भी ग्रहण कर सकेगा। कोई श्राद्ध और अन्य प्रकार के खर्च के बोझ से तङ्ग आकर आर्य समाज का सभासद् बन जाता है । कोई केवल जन्म के जाति बन्धनों से छूटने के लिये ही आर्य समाज की शरण में आता है इत्यादि । देखो सद्धर्म प्रचारक भाग १९ संख्या ११ पृष्ठ ९ पा. १ राइन १५॥ अब मैं अपने कथन की पुष्टता के लिये यहां पर आप को वह वाक्य भी सु- नाता है जो कि श्री मान्यवर महात्मा मुनशीराम जी मुख्याधिष्ठाता गुरुकुल का- गड़ी दरिद्वार ने अपने साप्ताहिक समाचारपत्र नाम सद्धर्म प्रचारक भाग १८ सं- ख्या ५० पन८ और ९ में प्रकाश किये हैं। संशयात्मा विनश्यति ॥ ७५ ।। अमाङ्गयोग का वर्णन कट्टर से कट्टर मतवादी के सामने करो, उन की सच्चाई का लोहा वह उसी समय मान जायगा । यम नियम की व्याख्या कर के नास्तिक से सम्मति पूछो, वह भी खुले दिल से उन के सार्वभौम वल के आगे शिर झुका देगा। वर्णाश्रम धर्म की व्याख्या वेद द्वारा बड़े भारी पक्षपाती के सामने रक्लो, वह भी उन को मनुष्य समाज के क्लेशों को दूर करने का एक मात्र साधन मा-- नने के लिये तय्यार हो जायगा । किन्तु ऐसी पवित्र शिक्षा के अनुगामी होते हुए ६ (४२) भी क्यूं आर्य समाजस्थ पुरुषों की दशा अव तक शोचनीय है ! इस का उत्तर सूक्ष्म दृष्टि से विचार करते से यह मिलता है कि अविश्वास ही आर्य समाज की सामाजिक अवनति का कारण हो रहा है । मैं पहिले भी कई बार लिख चुका हूं कि वैदिक सत्य के समर्थन के लिये अन्य मतावलम्बियों से वितण्डा करने की कोई भी आवश्यकता नहीं है, किन्तु अविश्वासी हृदयों ने इस का यह उत्तर दिया कि वैदिक धर्म को गालियां देकर अन्य मतावलम्बी आर्य समाज को खानायंगे । यदि तुमारा धर्म पर ऐसा ही विश्वास है तो यह चाल कब तक चलेगा, अन्त को एक दिन भण्डा फूटेगा ही। मनु महारान कहते हैं:- प्राचारः परमोधर्मः ॥ ७६ ॥ किन्तु इस के विरुद्ध न केवल दुराचारी पुरुषों को उन के सांसारिक ऐश्वर्य के कारण आर्य समाजों में मुख्य पद दिये जाते हैं, प्रत्युत दुराचारी पुरुषों को वै- दिक धर्म प्रचार की पवित्र वेदी पर बैठा कर उन से उपदेश सुने और सुनवाये जाते हैं । जब कभो मैंने किसी आर्य समाज के अधिकारियों के ऐसे कर्तव्य का नोटिस लिया तो उत्तर आश्चर्य जनक मिला । "महाशय ! जानते तो हम भी हैं कि श्री-जी बदचलन हैं किन्तु उन की वक्तृत्व शक्ति पर सर्वसाधारण मोहित । वार्षिकोत्सव की शोभा कैसे बढ़े । तुम्हारे सदाचारी उपदेशक को लेकर क्या करें जब उस के व्याख्यान को सुनने के लिये लोग ठहरते ही नहीं" इस प्रवल न्याय का क्या उत्तर दिया जावे । क्या अधर्मी के मुंह धर्म का उपदेश फली भूत हो, सक्ता है ? वेद चाहै इस का कुछ ही उत्तर दे, किन्तु आर्य समाज के कतिपय अधिकारी अपने "तजुर्बे की विना पर" यही कहते जायंगे कि जब उद्देश ठीक है तो बुरे साधनों से भी काम लेना बुरा नहीं, कारण क्या है ? हम लोगों को सत्यधर्म के बल पर विश्वास नहीं । यदि विश्वास हो तो क्या यह समझलें कि सत्य सूर्यवत् स्वयम् प्रकाशित नहीं होसक्ता । जो सत्य वालक मूलशङ्कर को अपने प्रेम की य- न्थि में वान्ध कर बन जङ्गल घुमा ऋषि दयानन्द बना सकता था, क्या उस के सर्व साधारण तक पहुंचने में तुम्हारी सहायता की आवश्यक्ता है ॥ भगवान कृष्ण ने सच कहा है। अविश्वाप्ती का नाश होता है। विश्वासी ही नीता रहता है। यदि आर्य समाज के सभासदों को वेदों पर सच्चा विश्वास होतो क्या उन को उस के फैलाने में दुराचारियों की सहायता की आवश्यका हो और ( ४३ ) ज्या कित भपने मन्तध्य की पुष्टि के लिये उन्हें शन्द जाल का सहारा लेने की भावश्यकता हो । मेरी सम्मति में समय आगया है जब कि मतवादियों के भाक- मगों को परना न करते हुये आर्य समान के विद्वान् उपदेशकों तथा समाचार पाक सम्मान गो बल मैदिक धर्म की सच्चाईयों को मनुष्य मात्र तक पहुंचाने में ही लगना चाहिये, किन्तु इस से भी बढ़कर भाचार शुद्धि की मोर लग जाना चाहिये। राजर्षि मनु भगवान कहते है- याचाराल्लभते वायुराचारादीसिताप्रजाः । आगारासनमनयमाचारों हन्त्य लक्षणम् ॥ ७७॥ दुराचार का नाश करने वाला सदाचार ही है इसलिये समझ लेना चाहिये किचिनः खानाक मनुष्य का ननुप्यत्व कुछ भी नहीं है । आचार शब्द को अगि गन्द Chara tor का पर्याय बाची कह सके हैं, किन्तु भाव उंस से बढ़कर इससे निकलना है। बगर भाचार से बढ़ती है । तब नास्तिक को भी आचार के मांग नमस्कार करना पड़ता है। और उत्तम प्रना भी आचार से ही उत्पन्न होती है। नगर यही, किन्नु माता पिता तथा राजा भी प्रना का आचार के बल से ही पाउन कार बने हैं। सामारिक धन तो एक ओर रहा जिस मुक्ति रूपी अक्षय धन की प्राति के लिये गार्य समाज सी सभाओं का अस्तित्व है उस अक्षय धन को मान कराने वाला भी सदाचार ही है इस लिये दुराचारी पुरुष को अपना भाई और इस की पुनरुवाति के लिये प्रयत्न करते हुए भी उस को उच्चा- धिकार नहीं देना चाहिये। बहुधा मनुष्य बालस्य के वशीभूत होकर प्रत्येक पुरुष के हाथ की (चाहै नह दुराचारी ही क्यों न हो) बनी हुई रसोई (खाना), चाहे वह अपवित्र ही क्यों नहीं, वालिया करते हैं। और उन से कोई प्रश्न करे तो चट से उत्तर देदेते हैं कि स्वामी जी ने पाहा है कि “भोनन बनाना शूद्र का काम है" । परन्तु उन को यह नहीं मानम कि महर्षि ने शुद्र किस को कहा है ? शूद्र के क्या लक्षण बताये हैं ? भोजन बनाने के समय शूद को किन किन नियमों का पालन करना चाहिये। शूद्र को किस प्रकार पवित्र रहना चाहिये ? परन्तु कहने और खाने वालों का क्या दोष है ? क्योंकि उन विचारों ने सत्यार्थप्रकाश के दर्शन तक तो किये ही नहीं हैं समाते हुए (४४), प्यारे भाइयो ! भोजन बनाना भी चौदह विद्याओं में से एक है। इसी लिये चारों वर्गों के मनुष्यों को इस का सीखना उचित है। एक समय महर्षि ने यह नान कर, कि बिज लोग (ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य ) रसोई करना नहीं जानते, बड़ा पश्चात्ताप किया । (प्र०) अरे भाई ! कब किया था ? (उ०) सुनिये ! जब महर्षि दयानन्दजी कानपुर में थे तब एक दिन आपने श्रीमान पंडित हृदय नारायण कौल दत्तात्रेय जी शर्मा वकील से कहा था कि:- १७-तुम्हारे कशमीरियों में भोजन अच्छा बनता है। अफसोस है, और तो दर किनार, लोग पाक ( भोजन ) बनाना भी भूल गये ॥ देखो श्रीमान् धीर वीर पं० लेखराम जी कृत महर्षि जीवन चरित्र पेज११४ लाइन ११ और १२॥ क्या महर्षि के इन शब्दों से स्पष्ट विदित नहीं होता ? कि दिनों (ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य) को भी स्वयं ( अपने हाथ से ) भोजन बनाना चाहिये ।। इसलिये प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि जहां तक हो सके वहां तक शुद्ध- ता से पवित्र भोजन करे क्योंकि पवित्र भोजन करने से सन्तान और बुद्धि उत्तम होती है और अपवित्र भोजन से सन्तति और समझ बुरी उपजती है । इस विषय पर श्री मुनिवर चाणक्य जी कहते हैं:- दीपो भक्षयते ध्वांत कजलं च प्रसूयते । यदन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते ता घशी प्रजा ॥ ७८ ॥ चा० नी० अ०८।३ अर्थ-दोहा जिन वस्तुन आरोगिये । बुद्धिहु तैसी. होय। अंधकार भक्षत प्रदीप । कजल प्रसधै सोय ॥ ७९ ॥ :

(४५) अन्यच दीप भग्वत तम नित्य प्रति । काजल करि उत्पन्न । सी सन्तति ज्ञात है। जो जैसा खा अन्न ॥ ८० ॥ और भी॥ में माइगना पोभाड़ रहिमन पाटी आदि को । सो परिणाम लखाय । ज्यों दीपक तम को भन्ने । कज्जल चमन कराय ।। ८१ ॥ मैं बाजार प. पही, पड़ा, वी, रखोआ आदि पदार्थों को भी पवित्र नहीं रामझवा॥ फ भुने हुए चना और परमल आदि चवेना को महा अशुद्ध जानता है॥ इति नोट- पढ़त थकं नहिं कोय । इमि कारण लिख लेख लघु । पाठक अर्पण सोय । श्राशय लेहु विचार मित ॥ ॥*॥ पाठकों से प्रार्थना ॥*॥ यदि कोई सुजन अपवित्र भोजन न करने की पुष्टता में कुछ लिखकर भेजेंगे लख उन मुनाम सहित दितीय-भाग में सपा दिये जायेंगे । * विशेप-प्रार्थना | समालोचना करने वाले प्रिय पाठकों से विशेष प्रार्थना है कि वह अपनी स- म्मति प्रकाश फरने के पूर्व इस लेख को आद्योपान्त पढ़कर लेखक के भाव को समझते ॥ धन्यवाद । को में निम्नलिखित महाशयों को शतसः धन्यवाद देता हूं। कि जिन्हों ने इस लेख के लिखने में मुझे बहुत सी बातें बताई हैं।

१ ४६ ) १-श्रीमान् पण्डित नटवर लाल जो चतुर्वेदी आर्य्य भिषक् महामन्त्री मायुरं सभा मथुरा। २-श्रीमान् पण्डित धूनीसिंह जी चतुर्वेदी जागीरदार व मुहल्लेदार व मंत्री माथुर सभा मथुरा। ३-श्रीमान् पण्डित दत्तराम जी चतुर्वेदी आयुर्वेदोद्धारि सम्पादक मथुरा। गयादत्त जी " काव्यतीर्थ मथुरा। " नवनीतलालजी" कविवर मथुरा । भूरामल जी " कुलीन मथुरा । ७-श्रीमान् पण्डित शालिग्राम जी शर्मा नागर उपप्रधान ओल्ड आर्य समाज मथुरा ८-श्रीमान् पण्डित बालकराम जी नागर शर्मा मंत्री आर्य विद्यार्थी समाज मथुरा ९-श्रीमान् पण्डित रामलाल जी त्रिवेदी भरतपुर । १०- " त्रिलोकीनाथदास जी दिवेदी अलवर । " हरीशङ्कर जी शर्मा उपदेशक आर्य समाज शिमला । बाबू परमानन्द जी वा मन्त्री ओल्ड आर्य समान १३ वाबू रमनलाल जी गुप्त उपमन्त्री मथुरा। ॥*॥ अधिक-धन्यवाद।*॥ सव से अधिक धन्यवाद के योग्य श्रीमान्यवर चतुर्वेदी पण्डित श्री रामदास जी रायबहादुर के प्रिय पुत्र श्रीमान् चतुर्वेदी पण्डित छोटेलाल जी डिप्टीकलेक्टर मुज़- फ्फरनगर और श्रीमान् चतुर्वेदी पण्डित प्यारेलाल जी वी० ए० एल० एल० वी. मुनसिफ ललितपुर के गुरू जी महाराज श्री केशवदेव जी शर्मा चतुर्वेदी जी हैं, कि निन महाराज ने मेरे ऊपर कृपा करके इस लेख के लिखने में बहुत कुछ सम्मति-सहायता दी है और इस के संशोधन में अपना अमूल्य समय व्यय किया है। ये गुरू जी महाराज एक बड़े साधारण सुभाव के सुयोग्य और परोपकारी पुरुष हैं । आर्य धर्म के पूर्ण प्रेमी हैं। मतिक्षण मत्येक के दुःख में सम्मिलित होते हैं । और सब के साथ कृपा किया करते हैं। खास फरमेरे ऊपर तो बहुत ही बहुत ॥ ११- " १२- " -- (४७) * ओ३म्-खम्बा * ॥अन्तिम-पार्थना ॥ अरे मेरे प्यारे भाइयो ! यदि आप पवित्र, स्वादिष्ट और पुष्टक भोजन करने की रुचि रखते हो तो निम्न लिखित अमूल्य वाक्यों पर ध्यान धरते हुए गो की रक्षा कीजिए क्योंकि गौरक्षा से मनुष्य के दोनों लोक सुधरते हैं । यथा-दोहा- श्री गोपाल प्रसन्न हित, गोपालहु दिन रैन । जय तक जीवहु सुख यहां, मरण हुए हू चैन । ॥ अमूल्य-वाक्य ॥ प्रभाती नं. १ जागियो दद्याल लाल मात है दुखारी ॥ टेक ॥ तुम तो सांये सुख की नीद, तज के हम से प्रेम प्रीति होती हैं लाखों अनीति, कष्ट पड़े भारी ॥ जागियो० ॥ १ ॥ हैं कंज्ञा ह- लघर गुपाल, दशरथ ऋग धरमपाल । कौनतय पञ्चलाल, दधीच से नमधारी । जागियो० ॥ २ ॥ जिन के समय सुग्ध अपार, भोगे हम विपुलवार । अव तो है तुम्हारी वारि, भारत नर नारी। जागियोः ॥ ३ ॥ दुःख प मेरे प्राण वार, कीजिये मातृ उद्धार । चाहे लेहु यश अपार, चाहे महामारी । जागियो० ॥ ४ ॥ प्रभाती नं० २ जागियो बलि जात वीरो जागियो बलि जात ॥टेक ॥ जोड़ पालम देखो प्यारो, दिवस है कै रात | वीरो जा० ॥ १ ॥ तुम्हीं मेरे प्राण रक्षक, तुम्ही हो पितु मात । पाश तुम्हारी कर के प्रायो, शरण दीजो तात ॥ वीरो जा० ॥ २॥ देशवासी दुखित तुम्हरे, अव कहां कुशलात । सुत पिता में प्रेम नाहीं, कौन किस का भात ॥ वीरोजा० ॥ ३ ॥ देश अपना नहीं, अब धन की के- तक बात । यिपत में सब धर्म छुटे, होत गौ अनघात ॥ धीरोजा. ॥ ४ ॥शरकरा. गौरक्त मिश्रित, जान कर क्यों खातदोभला-

(४८),
लच लल्लो चप्पो, हमें अब न सुहात ॥ वीरो जा० ॥५॥ देवता है
गौ तुम्हारी, कहो मुख से मात । पुत्र जीवित शीश कटते, धर्म
की गति जात ॥ वीरो जा० ॥ ६ ॥ म्यूनिसपलेटी के हो मेम्बर,
राजा पूछे बात । कहत में क्या सुख दुखत है, या बिगड़ी जात ॥
वीरोजा० ॥७॥ वीरता भारत की जग में, प्रथम से विख्यात ।
हो के सुत भारत के पीछ, हटत काहे जात ॥ वीरो जा० ॥ ८॥
शरकरा की बात केतक, सोश्रो मत एक रात । सेठ साहूकार
सब मिल जाव, होत प्रभात ॥ वीरोजा ॥ ९॥ बीनती कर जोड़
करता, अवधू सुनियो तात । आज ही है दिवस पछिताओगे, पुनि
है रात ॥ वीरो जा० ॥ १० ॥
प्रभाती नं०३
जागियो श्री वीर धीर भारत बल जाई ॥ टेक ॥
अब हूं चेतो सुजान, भारत के जात प्रान । रयो नाहिं लेश
मान, कैसी नींद आई । जागियो० ॥१॥ सुख और सम्पति गं-
वाय, राज पाट सब विहाय । काला काफिर कहाय, लाज नाहिं
आई ॥ जागियो० ॥२॥ गौअन के शीश कटत, लाखन गो नित्य
घटत । मानो गो वंश मिटत, रक्त नद बहाई ॥ जागियो० ॥ ३ ॥
भारत भारत पुकार, कहत देउ दुःख टार' । अपनो धन प्राण वार,
धर्म लो बचाई । जागियो० ॥ ४ ॥ भारत जननी पुकार, भारत
कहि चार बार । बेटा लीजो उबार, अधिक दुखित माई ॥ जागि
॥५॥ कीजे देशी प्रचार, वस्तु सर्व अन्य टार टार । बाढ़े सुख
धन अपार, फैलि है बड़ाई । जागियो० ॥ ६॥ कठिन नियम मन
विचार, साहस जिन देवहार । देश धर्म लोसम्हार,रक हवहाई ।।
जागियो० ॥७॥ कुंती स्तुत पंच लाल, रावण विक्रम भुसाल ।
तेऊ गये काल गाल, तुम न अमर भाई ॥ जागियो० ॥८॥ कायर
पड़ सेज मरत, शूर समर करणी करत । कीरति जग जिन की
भरत,
अन्त स्वर्ग जाई ॥ जागियो० ॥ १॥ अब नहिं तुम बचत
काल, मन में करलो खयाल । भारत दुख देव टाल, मौत प्लेग आई।
॥ जागियो० ॥१०॥ सेवाजी उदन आल्ह, पूर्वज तुम्हारे भुपाल
जिम को लखि डरत काल, वीरता पराई ॥ जागियो० ॥ ११ ॥

- (४६) तिन के सुन धर्म खोय, अपयश जग वोय चोय। जीवत नित रोय रोय, कुरता कमाई ॥ जागियो० ॥ १२ ॥ अजहूं प्रिय होश लाय, शीश धर्म हित कटाव । दश धर्म जीत जाव, शूरता दिखाई ॥ जागियो० ॥ १३ ॥ अवधू कहै रोय रोय, जीवन की प्राश खोय। भारत में नल होय, बिगरी बन जाई ॥ जागियो० ॥ १४ ॥ भजन नं०४ अब फिर चेतियोरे तुम हो वीर महा मतवारे ॥ टेक ॥ तुम ही कट महा भारत में, शूर वीर रजपून। फिर आल्हा :- दल कहलाये, लाखन भये सपूत ॥ अथ फिर० ॥ १॥ भारत में गो माता कटनी, सुनते नहीं पुकार । आज राज धन धर्म गंवाया, छिन गये सब अधिकार ॥ अथ फिर० ॥२॥ इस भारत में दूध की नदियां, बहती थी पर आन।तहां वह अब रक्त गाय का, उठो करो अस्नान ॥ अथ फिर० ॥ ३ ॥ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य कहावे, हि- न्दू कहैं पुकार । तिन के जिअत फटें गो माता, जीवन कोधिकार॥ अब फिर० ॥४५ लाल लाल मुख देख डरोना,मत साहस को हारो। ऐडवर्ड का सुमिरन कर के, भारत दशा सुधारो ॥ अब फिर ॥५॥ अपने सूर बिराने जानता, सो मत मनहिं विचारो । भारत वासी दुग्वित देखि के, करि हैं सकल सहारो ॥ अव फिर० ॥ ६ ॥ धर्म हित की प्यारे, नहीं अमर हो यार । इक दिन घर के लंग दाव है, क्षण में कर देय छार ॥ अब फिर० ॥ ७॥ धर्म युद्ध को कङ्कन बांधो, कहि अवधेश पुकार | प्राण त्याग जननी हित कीजै, कीरति बढ़े अपार ॥ अब फिर० ॥८॥ होली नं ५ भारत धूलि मिलाय विदिशिया ने कैसी है धूम मचाई ।। टेक ॥ प्रथम छीन कर देश तुम्हारो, धन पर घात लगाई। शस्त्र हीन कर अबला कर दियो, यह विधि नाच नचाई । विदि०॥१॥ब नज कृषी व्यवहार तुम्हारे, सब में टांग अड़ाई। दाव घात कर तु- म्हें पछाडो, छाती छरत कसाई । विदिशिया० ॥२॥ दूषित शकर को अविर उड़ायो, बहु रोगन की माई । भर पिचकारी गौ रक्त देश , - (५०) की, भारत लूमि रंगाई । बिदिशिया०॥ ३ ॥ अवधविहारी जैसी तो होरी, विधि ने हाय दिखाई । कुमति कुम कुमा देश में फैलो, ताफल की प्रभुताई ॥ बिदिर्शिया० ॥ ४॥ . भजनं नं०६ कैसे सोते हैं वे सुध हाय जै गोपाल के कहने वाले ॥ टेक ! उन्हें कैसी यह निद्रा है छाई, हमें पकड़े खड़ा है कसाई। हाय गले में छुरी लगाई, हो या तो कोई बचाले ॥ कैसे० ॥१॥ हे श्री कृष्णचन्द्र भोपाला, कहँ छिपे नन्द के लाला। तेरे भक्त हैं सेठ भुपाला, उन में से कोई खुलाले ॥ कैसे० ॥ २ ॥ वे कहते मुझ से माता, यदि सच्चा हो यह नाता।क्यों पुत्र लखें अपघाता, जननी किस से न्याय कराले ॥ कैसे० ॥ ३ ॥ है माता का दूध ..ह- राम, जवलग होय न ऐसा काम ! चाहे लुटजावे धन अरु धाम, कोई मेरे प्राण को श्रान लिखाले ॥ कैसे० ॥ ४ ॥ भजन नं०७ गौ माता कहना छोड़ दो निर्लजो दूध हरामी ॥ टेक ॥ किस मुख से अब कहते माता, जो नहिं बर्तो सच्चा नाता। देख देख आंखिन से घाता, बनो नर्क के गामी ॥ निर्लज्जो० ॥१॥ लालच सूद व्याज का करके, दो धन हत्यारों को भर के । वुरा कहैं चाहे घर बाहिरं के, बेशर्म सहो बदनामी ॥ निर्लजो० ॥२॥ बहु गुण युत सन्तान हमारी, उपकारी रहे सदा तुम्हारी । अन्न वस्त्र पय की फुलवारी, एक एक से नामी ॥ निर्लजो० ॥३॥ जो चाहो निज देश भलाई, तन मन धन तज करौ उपाई। वंग लेव मम प्राण बचाई, नहिं हुइहौ गड्डामी ॥ निर्लज्जो० ॥ ४ ॥ नोट-यह सातों भजन श्रीमान् अवध विहारी लाल देशसेवक सम्पादक, वैश्य हितैषी वेवर ज़िला मैनपुरी के रचे हुए हैं ॥ देखो आर्य मित्र वर्ष ६ अङ्क इति ॥ पुस्तक मिलने का पता-ठिकाना- बाबू रमन लाल जी गुप्त, छत्ताबाजार-मथुरा। १४

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Krishna - Vakya

Author
Sharma, Damodar Prasad
Title
Krishna - Vakya
File name
Krishna - Vakya
Text
OCR done
Citation
1907
Published
2009/10
Publisher
Jalandhar, Sadharma Yantralay
Language
Sanskrit
Pages
52
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345538
Barcode
99999990233875.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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