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प्रातः स्मरण माला
उत्तिष्ठत जाग्रत
प्राप्य वरान् निबोधत ।
(कठ. उ. १-३-१४)
LAL.LA..
[उठिये, जागिये और प्रवीण श्रेष्ठों से ज्ञान सम्पादन कीजिये]
लेखक
म. दा. गाडगील
सेवा-निवृत्त इंजीनियर हैदराबाद (दक्षिण)
दि.२५-९-१९५५
मूल्य बारह आने
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प्रातः स्मरण माला
उत्तिष्ठत जाग्रत
प्राप्य वरान् निबोधत ।
(कठ. उ. १-३-१४)
[उठिये, जागिये और प्रवीण श्रेष्ठों से ज्ञान सम्पादन कीजिये]
लेखक
म. दा. गाडगील
बी. ए. एल. सी. ई. एम. आय. ई.
सेवा निवृत्त इंजीनियर हैदराबाद (दक्षिण)
दि.२५-९-१९५५
मूल्य बारह आने
लेखक तथा प्रकाशक
म. दा. गाडगील, इंजीनियर
आनन्द विलास, काचीगुडा
हैदराबाद (दक्षिण)
सर्वाधिकार प्रकाशक के स्वाधीन
यह पुस्तक उपर्युक्त प्रकाशक से प्राप्त की जा सकती है
मुद्रक
हिन्दी प्रेस
हिन्दी प्रचार सभा
हिन्दी मार्ग, हिन्दी भवन
भामपल्ली स्टेशन रोड हैदराबाद-द.
विषय सूची -.com क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ १ समर्पण १ २ परमात्मा को नमन २८ २ ३ (आ) ज्ञान और ज्ञानी के विषय में (इ) पौरुष, दैव तथा प्रज्ञा के विषय में ३ लेखक का निवेदन ४ प्रातः स्मरण १३ श्री शंकराचार्य कृत स्तोत्र साधारण श्लोक ९ ३१ ३२ श्रीगुरु नमन ईश स्मरण मानसिक स्नान मनीषा पञ्चकम् निर्वाण षट्कम् हस्तामलक स्तोत्रम् दक्षिणामूर्त्यकम् ललीता पञ्चरत्नम् १४ भारत सावित्री १६ २० ५ वैदिक राष्ट्र-गीत ६ नासदीय सूक्त ७ शुभ संकल्प के लिए प्रार्थना ८ मानस मंदिर में आओ ९ श्रीरामदास कृत भूपाली १० श्रीतुलसीदास कृत भूपाली १५ श्री शिवराम स्वामी कृत भूपाली पंचक १२ बृहद्योगवासिष्ठ के कुछ उद्धरण (अ) मन चित्त आदि के विषय में ३८ षट्पदी स्तोत्रम् १४ स्वराज्य-प्रबोध माला १५ श्रीमधुसूदन सरस्वती कृत श्लोक ६८ १६ और भी कुछ सुभाषित १७ श्रीसमर्थ रामदास कृत मन को बोध १८ राष्ट्रीय गीत करना है निर्माण अभियान गीत २३ वन्दे मातरम् ७९ ६ भारत भाग्य विधाता
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KERAREE
समर्पण
भारतवर्ष की स्वतंत्रता के लिए जिन महानुभावों
ने अविरत परिश्रम के साथ आत्मसमर्पण
किया है और अनेक जो आज भी भारतमाता
की सुरक्षा तथा समृद्धि के लिए प्रयत्नशील
है, उनकी सेवा में सादर सस्नेह भेंट ।
FARMEREKAREE*
म. दा. गाडगील
M
२
परमात्मा को नमन
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतांतरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः
साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ।।
(श्वेताश्वतर उप. ६-११)
योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्ताम्
संजीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाना।
अन्यांश्वहस्तचरणश्रवणत्वगादीन्
प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ॥
(भागवत स्कं. ४ अ. ९ श्लो. ६)
नमस्ते सते ते जगत्कारणाय नमस्ते चिते सर्वलोकाश्रयाय ।
नमः सौख्यकन्दाय मुक्तिप्रदाय नमो ब्रह्मणे व्यापिने शाश्वताय ॥ १ ॥
त्वमेकः शरण्यस्त्वमेको वरेण्यस्त्वमेको जगत्पालकः स्वप्रकाशः ।
त्वमेको जगल्लीलया निर्मिमीषे त्वमेको जगत्सुव्यवस्थं करोषि ॥ २ ॥
भयानां भयं भीषणो भीषणानां गतिःप्राणिनां पावनः पावनानाम् ।
महोच्चैः पदानां नियन्ता त्वमेकः परेषां परो रक्षको रक्षकाणाम् ॥ ३ ॥
वयं त्वां स्मरामो वयं त्वां भजामो वयं त्वां जगत्साक्षिरूप नमामः ।
सदेकं निधानं निरालम्बमीशं भवाम्भोधिपोतं शरण्यं व्रजामः ॥ ४॥
३ प्रातः स्मरण माला लेखक का निवेदन हमारे प्रिय भारत में प्रातः स्मरण तथा अभिवादन मंगला- चरणादि पाठों की प्रथा, स्मरणातीत काल से चली आई है। एतत्सम्बंधीय स्तोत्रों तथा प्रार्थनाओं से हमारे प्रत्येक दिवस का श्रीगणेश अतीत काल में हुआ करता था और आज भी कुछ-कुछ स्थानों में हुआ करता है । यह प्रथा हमारी सनातन संस्कृति की एक अंगभूता आवश्यक वस्तु है, जिसकी प्रभावोत्पादकता और उपयोगिता अमान्य नहीं की जा सकती । उदाहरणार्थ, कहा जा सकता है, कि प्रातः स्मरण एक सुन्दर इजेक्शन है जिसके प्रभाव से दुर्भावनाओं के कीटाणु मर जाते हैं, और सद्भावनाओं का अनु- प्राणन तथा संजीवन हुआ करता है। पर भेद इतना है कि इजेक्शन प्रायः विषैली औषधि का हुआ करता है और उसमें यदि ज़रा भी असावधानी हो तो वह बिना हानि किये नहीं रहता । इसके विरुद्ध प्रातः स्मरणों में अमृत ही अमृत भरा हुआ रहता है जिससे हानि की कोई सम्भावना ही नहीं होती। दुर्भाग्य की बात है कि यह प्रथा वर्तमान् काल में बहुत स्थानों पर लोप होती जा रही है जो किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं । आशा है कि हमारे धुरंधर नेताओं का ध्यान इस अभाव की ओर आकर्षित होगा और वे हमारी शिक्षण प्रणाली में ही कुछ सुन्दर आयोजन शीघ्र ही कर पाएंगे। प्रातः स्मरण का उद्देश्य जनता में सद्भावनाओं को जगा देने, भक्ति-प्रेम को उत्पन्न करने और उत्साह तथा पौरुष को उत्तेजना देने का है, और यही होना भी चाहिये । परन्तु देखा गया है कि इसके लिए हमारी प्रातः स्मरण की पोथियों की रचना जैसी होनी चाहिए थी वैसी हो नहीं पाई है। इनमें भाक्ति-प्रेम की चर्चा है, पर वह निर्बलता तथा दैन्य दुःखों से भरी पड़ी है । यत्र तत्र निविर्णता अर्कमण्या तथा प्रेरणाओं की उपेक्षा ही छाई दिखाई देती है ! इसका कारण यही है कि हमारा अतीत अनेक शता- ब्दियों का इतिहास, परकीयों के घोर आक्रमण और अत्याचारों से भरा पड़ा हुआ है । अतः हमारे कवियों तथा साधु पुरुषों के सामने दुःख, दारिद्रय, दैन्य और हत्याकांड के दृश्य ही घूर्णायमान रहे, इसलिए उनके लेखों में निराशा और निरुत्साह को ही (मानो एक गहरे Inferiority complex को ही) बड़ा भारी स्थान मिलता है। किसी भी दृष्टि से यह हमारी वैदिक संस्कृति का आदर्श नहीं हो सकता । इस मध्यकालीन दुरावस्था के कारण, हम जीवन की महती प्रेरणाओं से दूर हो गये हैं । जीवन पर नियंत्रण, आत्मबल का सम्पादन, मृत्यु पर विजय और लोक कल्याण के आदर्श की प्रतिष्ठा, यही हमारी संस्कृति है । पहले अपने को निर्मल करो, और फिर धर्म साधनाओं से अभ्युदय तथा निःश्रेयस अर्थात् विश्वशांति की प्रातष्ठा करने वाले अध्यात्म ज्ञान का प्रकाशन करो, यही हमारी संस्कृति की अमर वाणी है न मोक्षो नभसः पृष्ठे न पाताले न भूतले । मोक्षो हि चेतो विमलं सम्यग्ज्ञानविबोधितम् ॥ ( योगवासिष्ठ ५-७३-३५) 'अत्र ब्रह्म समश्नुते' (बृहदारण्यक उप० ३-८) यह हमारी अध्यात्म विद्या का सिद्धान्त है । मुक्ति मरने के अनन्तर मिलने वाली वस्तु नहीं है। वह तो जगत् में सुग्व और शांति पैदा करा देने वाली ज्ञानी पुरुष की जीती जागती, यहाँ वाली अवस्था है। अब पराधीनता की अन्धकारमयी रजनी का अवसान हो गया है और स्वाधीनता की नवप्रभात में प्राची दिशा उद्भासित हो उठी है। हमारी प्रिय संस्कृति का आदर्श विश्वकल्याण है और यही हमारे प्रवीण नेताओं की भी आन्तरिक प्रेरणा है। इसके लिए हमको चाहिए कि हम भी तपस्या द्वारा कटिबद्ध हो जाएँ । हमारे नवयुवकों को नवचैतन्य से प्रेरित करने के लिए उत्तेजनापूर्ण सद्भावनाएँ एवं पौरुष (पराक्रम) उत्पन्न कराने वाले उपदेशों की अत्यन्त आवश्यकता है । इसके लिए सर्वप्रथम (१) हमारे नेतागण के चरित्र ही उदार विचार तथा आचारों से भरे हुए हों, दूसरे (२) हमारी शिक्षण प्रणाली सम्बन्ध में सुयोग्य योजनाएँ बनाई जाएँ और तीसरे (३) हमारा गृह शिक्षण भी भली भांति सुधरा सवरा हो । स्पष्ट है कि आदर्श जीवन बिना ६ भरसक प्रयत्नों के नहीं बन सकता । गृह शिक्षण में प्रातः स्मरण का अन्तर्भाव होता है, और उसकी कितनी महती उपयोगिता है, पहले ही बताया जा चुका है । इसी दृष्टि से उद्बोधक विचारों तथा देश सेवा के लिए शक्ति प्रदान में सहायक विचारों को इस छोटी पुस्तक में एकत्रित करने का प्रयत्न किया गया है। संसार के सब देशों में भारतवर्ष एक अत्यन्त प्राचीन देश है, और धर्म, तत्वज्ञान, समाजशास्त्र और राजनैतिक क्षेत्रों में प्राचीन काल में भारत वासियों ने जितनी प्रगति की है उतनी दूसरे देश वासियों ने नहीं की। यदि कहा जाए कि संसार के सभी धर्म- प्रवर्तकों ने अपने मौलिक विचारों की स्फूर्ति, इसी देश के महर्षियों से ली है, तो अत्युक्ति न होगी । परन्तु यह भी सत्य है कि प्राचीन तथा सम्पन्न होने के कारण इस देश में इन सब क्षेत्रों में जितने झगड़े, पचड़े, आन्दोलन, उलझनें और मतमतान्तर उत्पन्न हुए हैं, उतने दूसरे किसी देश में नहीं हुए । फलस्वरूप, आज हमारे देश में उपर्युक्त क्षेत्रों में कुकल्पनाएँ और कुप्रथाएँ दिवाई देती हैं। हर्ष का स्थान है कि इस दृष्टि से हमारा संविधान और हमारे प्रवीण धुरंधर नेतागण इन भ्रान्त मतों को और रीतियों को हटाने और मिटाने में प्रयत्नशील हैं और उनको अब तक पर्याप्त मात्रा में यश भी मिला है, जिसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं। आशा है कि उनके सभी प्रयत्न, शघ्रि ही सफलता पाएँगे । इस दृष्टि से लेखक ने भी एक वैचारिक प्रयत्न अपने 'स्वराज्य- प्रबोधमाला' नामक स्तोत्र में किया है, और मत परिवर्तन की दृष्टि से आशा है कि उसका भी कुछ उपयोग होगा। किसी भी समाज की प्रगति, उसके धुरंधर नेताओं तथा अनेक सामाजिक पुरुषों के चरित्र और व्यवहार पर निर्भर करती है। समाज में जितनी अधिक मात्रा में ऊँचे-ऊँचे नैतिक प्रकाशमय प्रभावोत्पादक और कर्त्तव्यपरायण विचारों का प्रचार और तदनुरूप आचरण हो, उतनी ही उस समाज की प्रतिष्ठा संसार में अधिक होनी अवश्यंभावी है । अतः सर्वप्रथम सद्विचारों का प्रणयन, मनन और चिन्तन होना आवश्यक है और साथ ही, उनको आचरण में लाना तो अत्यावश्यक है । इस दृष्टि से सुप्रभात के शांत और पवित्र वेला में सर्व प्रथम परमात्मा का चिन्तन तथा उदात्त और स्फूर्तिदायक विचारों का मनन निदिध्यासन और उनको प्रयोग में लाने का कार्य, प्रातः स्मरण के विधान से बहुत सुकर होने में कोई सन्देह नहीं है। इस छोटी-सी पुस्तक में जो अनेक मौलिक मार्गदर्शक तथा मार्मिक विचारों का संग्रह किया गया है, उसमें प्रत्येक विचार एक स्वतंत्र उपन्यास की योग्यता रखता है । उदाहरणार्थ, महर्षि वसिष्ठ जी के निम्नांकित दो श्लोक लीजिये: शुभाशुभ्यामार्गाभ्यां वहन्ती वासनासरित् । पौरुषेण प्रयत्नेन योजनीया शुभे पथि ।। सर्वमेवेह हि सदा संसारे रघुनन्दन । सम्यक्प्रयुक्तात्सर्वेण पौरुषासमवाप्यते ॥
क्या इनमें अनेक कथानकों तथा पराक्रमी पुरुषों के चरित्रों
का रहस्य नहीं दिखाई देता ? किसी देश की सुशिक्षा प्रणाली में
ऐसे उदार और महनीय चरित्रों का पठन तो अत्यावश्यक है ही,
परन्तु प्रातः स्मरण जैसी तुरन्त तात्पर्य और निष्कर्ष बताने वाली
पुस्तकों का पठन पाठन भी कम महत्व वाला नहीं समझा
जा सकता।
इस पुस्तक में अनेक प्राचीन ग्रन्थों से उद्धरण लिये गये हैं
जिसके लिये लेखक उनका अत्यन्त ऋणी है। केवल एक ही
स्तोत्र-उपर्युक्त "स्वराज्य-प्रबोध माला' उसकी बनाई हुई है, जिसके
भी सारे उदात्त विचार महात्माओं के हैं, रचना मात्र उसकी है।
अस्तु
आनन्दाय सताम्भूयात्
एषाऽल्प रचना
म. दा. गाडगील
प्रातः स्मरण माला
६
प्रातः स्मरण:
ब्राह्म मुहूर्ते लम्बुध्य चिन्तयेदात्मनो हितम्
कायक्लेशांश्च तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च ।
वेदतत्त्वार्थः परमात्मा ।
(आचारमयूख)
प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं
रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनूर्यजूंषि ।
सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं
ब्रह्माहरात्मकमलाक्षमचिन्त्यरूपम् ॥१॥
प्रातर्नमामि तरणिं तनुवाड्मनोमि-
ब्रह्मेन्द्रपूर्वकसुरैर्नुतमर्चितं च ।
वृष्टिप्रमोचनविनिग्रहहेतुभूतं
त्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च ॥२॥
प्रातर्भजामि सवितारमनन्तशक्ति
पापौघशत्रुभयरोगहरं परं च ।
तं सर्वलोककलनात्मककालमूर्ति
गोकण्ठबन्धनविमोचनमादिदेवम् ॥३॥
श्लोकत्रयमिदं भानोः प्रातः प्रातः पठेद्विजः। द
सर्वव्याधिविनिर्मुक्तः परमं सुखमाप्नुयात् ॥४॥
प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवेति नित्य
तब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघः ॥१॥
१०
प्रातः स्मरण माला
प्रातर्भजामि मनसो वचसामगम्यम्
वाचो विभान्ति सकलं यदनुग्रहेण ।
यन्नेति नेति निगमानिगमैरजग्मु-
स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरध्यम्
॥२॥
प्रातर्नमामि तमसः परमर्कवर्ण
सन्मात्रपूर्णमखिलं पुरषोत्तमाख्यम् ।
यस्मिन्निदं जगदोषविशेषमूर्ती
रज्ज्वां भुजंगम इव प्रविभासितं वै ॥३॥
श्लोकायमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम् ।
प्रातःकाले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम् ॥४॥
॥२॥
प्रातः स्मरामि परिपूर्णमनन्तमेकं
सच्चित्सुखाकृतिनिजानुभवैकवेद्यम् ।
आरन्धविश्वजननस्थितिभङ्गलीलं
ब्रह्माद्वयं तदखिलश्रुतिमौलिगम्यम्
प्रभिजामि तमहं निजमाययेद
सृष्टवा जगत्तदनुविश्य विचित्रशक्तिः।
जीवात्मनेन्द्रियमनोगुणबुद्धिसाक्षी
यो लीलया विहरते सततं महेशः
प्रातर्नमामि
दहरात्मतया स्फुरन्तं
प्रत्यक्तया पृथु तटस्थतया स्फुरन्तम् ।
अन्तर्नियामकतया स्थितमङ्गभाजा-
माधारकारणविवर्ततया स्फुरन्तम्
प्रातःश्रये तमिह जाग्रति विश्वसं
स्वप्नोदये तदुररीकृततैजसाख्यम् ।
प्राशं सुषुप्तिसमये च शिवं तुरीये
तत्त्वेन चिन्तयतमाघमनन्तवस्तु
॥४॥
प्रातः स्मरण माला
११
प्रातर्नमामि गुरुशास्त्रविचारलब्ध
तत्त्वंपदार्थसहजैक्यतया दृशोच्चैः ।
मोहान्धकारमवधूततया स्फुरन्तं
स्वात्मानमेव सुदृढं निजबोधरूपम् ॥५॥
प्रातः स्मरामि परिपूर्णमनन्तमेक-
मेकं परं परमसूक्ष्ममुपाधिशून्यम् ।
सत्यस्वरूपममलं व विशुद्धतत्वं
ब्रह्मैव सत्यमिति निर्गुणमद्वितीयम् ॥६॥
प्रातर्भजामि शिवतत्वमज पुराण--
माद्यन्तशून्यमभयं स्वपरप्रकाशम् ।
सर्वात्मकं सदसतोः परमार्थतत्त्वम्
ब्रह्मैव सत्यमिति निर्गुणमद्वितीयम् ॥७॥
प्रातर्नमामि गिरिश गिरिजार्धदेह
सर्गस्थितिप्रलयकारणमादिदेवम् ।
विश्वेश्वरं विजितविश्वमनोभिरामं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्
प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं
गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् ।
खट्वाङ्गशूलवरदाभयहस्तमीशं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्
प्रातर्भजामि शिवमेकमनन्तमाद्य
वेदान्तवेद्यमनघं पुरुषं महान्तम् ।
नामादिभेदरहितं षडभावशून्य
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्
॥२॥
॥३॥
१२ प्रातः स्मरण माला ॥२॥ प्रातः समुत्थाय शिवं विचिन्त्य श्लोकत्रयं येऽनुदिनं पठन्ति ते दुःखजातं बहुजन्मसंचितं हित्वा पदं यान्ति तदेव शंभोः ॥४॥ प्रातः स्मरामि भवभीतिमहार्तिशान्त्यै नारायणं गरुडवाहनमब्जनाभम् ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतु चक्रायुधं तरुणवारिजपत्रनेत्रम् ॥१॥ प्रातर्नमामि मनसा वचसा च मूर्ना पादारविन्दयुगलं परमस्य पुंसः। नारायणस्य नरकार्णवतारणस्य पारायणप्रवणविप्रपरायणस्य प्रातर्भजामि भजतामभयंकरं तं प्राक्सर्वजन्मकृतपापभयापहत्यै । यो प्राहवक्त्रपतिता िगजेन्द्रघोर- शोकप्रणाशमकरोद्धृतशंखचक्रः श्लोकत्रयमिदं पुण्यं प्रातः प्रातः पठेद्विजः। लोकत्रयगुरुस्तस्मै दद्यादात्मपदं हरिः ॥४॥ प्रातः स्मरामि रघुनाथमुखारविन्दं मन्दस्मितं मधुरभाषि विशालभालम् । कर्णावलम्बिचलकुण्डलशोभिगण्डं कर्णान्तदीर्घनयन नयनाभिरामम् प्रातर्भजासि रघुनाथकरारविन्द रक्षोगणाय भयदं वरदं निजेभ्यः । यद्राजसंसदि विभज्य महेशचाप सीताकरग्रहणमङ्गलमाप सद्य:
प्रातः स्मरण माला प्रातर्नमामि रघुनाथपदारविन्द पद्मांकुशादिशुभरेखिशुभावहं मे । योगीन्द्रमानस मधुव्रतसेव्यमानं शापापहं सपदि गौतमधर्मपत्न्याः प्रातर्वदामि ववसा रघुनाथनाम वाग्दोषहारि कलुषं सकलं निहन्ति । यत्पार्वती स्वपतिना सह भोक्तुकामा प्रीत्या सहस्रहरिनामसम जजाप ॥४॥ प्रातः श्रये श्रुतिनुतां रघुनाथमूर्ति नीलाम्बुदोत्पलसितेतररत्ननीलाम् । आमुक्तमौक्तिकविशेषविभूषणाढ्यां ध्येयां समस्तमुनिभिर्जनिमृत्युहन्त्रीम् ॥५॥ यः श्लोकपञ्चकमिदं प्रयतः पठेत नित्यं प्रभातसमये पुरुषः प्रबुद्धः। श्रीरामाकिंकरजनेषु स एव मुख्यो भूत्वा प्रयाति हरिलोकमनन्यलभ्यम् प्रातः स्मरामिशरदिन्दुकरोज्ज्वलाभां सद्रत्नवन्मकरकुण्डलहारभूषाम् । दिव्यायुधोर्जितसुनीलसहस्त्रहस्तां रकोत्पलामचरणां भवतीं परेशाम् ॥१॥ प्रातर्नमामि महिषासुरचण्डमुण्ड- शुम्भासुरप्रमुखदैत्यविनाशदक्षाम् । ब्रह्मेन्द्ररुद्रमणिमोहनशीललीला चण्डी समस्तसुरमूर्तिमनेकरूपाम् ॥२॥ प्रातर्भजामि भजतामखिलार्तिहन्त्री धात्री समस्तजगतां दुरितापहन्त्रीम् ।
प्रातः स्मरगा माला
संसारबन्धनविमोचनहेतुभूतां
मायां परां समधिगम्य परस्य विष्णोः ॥३॥
श्लोकत्रयमिंद देव्याश्चण्डिकायाः पठन्नरः।
सर्वान्कामानवाप्नोति विष्णुलोके महीयते
श्रीगुरु नमन :
नारायणं पद्मभुवं वसिष्ठ
शक्किं च तत्पुत्रपराशरं च ।
व्यासं शुकं गौड़पदं महान्त
गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य शिष्यम् ॥१॥
श्रीशंकराचार्यमथास्य पद्म-
पादं च हस्तामलकं च शिष्यम् ।
तं त्रोटकं वार्तिककारमन्यान्-
अस्मद्गुरून संततमानतोऽस्मि
॥२॥
ईश स्मरण :
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषासिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः
सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् ।
येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः ॥२॥
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजयाते
॥३॥
मानसिक स्नान :
खस्थितं पुण्डरीकाक्षं मंत्रमूर्ति विभुं स्मरन् ।
अनन्तादित्यसंकाशं वासुदेषं चतुर्भुजम् ॥१॥
प्रातः स्मरण माला । शंखचक्र गदापद्मपीताम्बरधरं हरिम् । श्यामलं शान्ति निलयं प्रसन्नमुखपङ्कजम् ॥२॥ दिव्यचन्दनलिप्तांगं चारुहास शुभेक्षणम् । केयूरहारिणं दिव्यं सुवर्णमुखपंकजम् ॥ ३॥ वनमालापरिवृतं नारदादिभिरर्चितम् । अनेकरत्नसंछन्नस्फुरन्मर कुंडलम् ॥४॥ ध्वजवज्रांकुशाब्जादिपादपद्मविराजितम् । तत्पादोदकजां गंगां निपतती स्वमूर्धनि ॥५॥ चिन्तयेब्रह्मरंध्रेण प्रविशंती स्विकां तनूम् । तया संक्षालयेत्सर्वमंतदेहगतं मलम् ॥६॥ तत्क्षणाद्विरजोमयों भवत्येव न संशयः । इदं मानसिक स्नानं प्रोक्तं हरिहरादिभिः ॥७॥ नमः शिवायै गंगायै शिवदायै नमोनमः। नमस्त्रिपथगामिन्यै विश्वमूत्यै नमोनमः ॥८॥ इडा भागीरथी गंगा पिंगला यमुना नदी । तयोर्मध्यगता नाडी सुषुम्नाख्या सरस्वती ।। शानहदे ध्यानजले रागद्वेषमलापहे। यःनाति मानसे तीर्थं स याति परमांगतिम् ॥९॥ अतिनीलधनश्याम नलिनायतलोचनम् । स्मरामि पुंडरीकाक्षं येन स्मातोभवाम्यहम् ॥१०॥ देहो देवालयःप्रोक्तःजीवो देवासदाशिवः । त्यजेदशाननिर्माल्यं सोऽहंभावेन पूजयेत् ॥११।। यहाँ 'जीव' शब्द का अर्थ पारमार्थिक जीव अर्थात् प्रत्यगात्मा, हृदयस्थ नारायण है, संसारी जीव नहीं ।
प्रातः स्मरण माला महर्षि व्यास की भारत सावित्री : महर्षिर्भगवान्व्यासः कृत्वेमा संहितां पुरा श्लोकैश्चतुर्भिर्धर्मात्मा पुत्रमध्यापयच्छुकम् ॥ मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च। संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे ॥१॥ हर्षस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥२॥ ऊर्ध्वबाहुर्विरोम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे। धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ॥३॥ न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्म त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः। धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः॥४॥ इमां भारतसावित्री प्रातरुत्थाय यः पठेत् । स भारतफलं प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति ॥५॥ वैदिक राष्ट्र-गीत . आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् । आ राष्ट्र राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्। दोग्ध्री धेनुर्वोढानद्वानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः समेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् । निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्ताम् । योगक्षेमो कल्पताम् ॥ (यजु. सं. २२।२२) ग्रातः स्मरण माला (भाषान्तर कर्ता 'राम', 'कल्याण' मासिक के 'हिन्दू संस्कृति' अंक से ) भारतवर्ष हमारा प्यारा, अखिल विश्व से न्यारा; मब साधन से रहे समुन्नत, भगवन् ! देश हमारा । हो ब्राह्मण विद्वान् राष्ट्र में ब्रह्मतेज-व्रत-धारी, महारथी हों शूर धनुधर क्षत्रिय लक्ष्य-प्रहारी । गौएँ भी प्रति मधुर दुग्ध की रहें बहाती धारा ॥ सब... ॥१॥ भारत में बलवान वृषभ हो, बोझ उठायें भारी; अश्व अाशुगामी हो, दुर्गम पथ में विचरणकारी । जिनकी गति अवलोक लजाकर हो समीर भी हारा॥ सब... || २॥ महिलाएँ हो सती सुन्दरी सद्गुणवती सयानी, रथारूढ़ भारत-वीरों की करें विजय-अगवानी । जिनकी गुण-गाथा से गुंजित दिग्-दिगन्त हो सारा ।। सब" ॥३॥ यज्ञ-निरत भारत के सुत हों, शूर सुकृत-अवतारी, युवक यहाँ के सभ्य सुशिक्षित सौम्य सरल सुविचारी । जो होंगे इस धन्य राष्ट्र का भावी सुदृढ़ सहारा ।। सब ॥४॥ समय-समय पर अावश्यकतावश रस धन बरसाये, अन्नौषध में लगे प्रचुर फल और स्वयं पक जायें । योग हमारा, क्षेम हमारा स्वतः सिद्ध हो सारा ।। सब... ॥५॥ 'राम' .
१
प्रातःस्मरण माला
नासदीय सूक्त
(ऋग्वेद १० । १२९ । १-७)
(भाषान्तर कर्ता-पाण्डेय पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री 'राम',
'कल्याण' मासिक के 'हिन्दू संस्कृति' अंक से)
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं
नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः
किमासीद् गहनं गभीरम् ।। १॥
"
'असत्' नहीं उस प्रलयकाल में, 'सत्' भी नहीं रहा कारण;
हुअा भूमि-पाताल प्रभृति भुवनों की सत्ता का वारण ।
अन्तरिक्ष भी नहीं, नहीं वे स्वर्ग आदि रह गये प्रदेश;
क्या आवरण, कहाँ, किसके हित, गहन गभीर नीर था शेष ॥१॥,
मृत्युरासीदमृतं न तर्हि
न रात्र्या अह्न आसीत् प्रकेतः।
आनीदवातं स्वधया तदे
तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास ॥२॥
मृत्यु नहीं थी, नहीं अमरता, रात-दिवस का ज्ञान नहीं;
था चेतन, बस, एक ब्रह्म ही, हैं जिसके मन-प्रान नहीं ।
था माया के साथ विराजित ब्रह्ममात्र ही सत्तावान्
विद्यमान थी वस्तु यहाँ पर उससे भिन्न न कोई आन ॥२॥
तम आसीत्तमसा गूळहमने-
ऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् ।
तुच्छयेनाभ्वपिहितं यदासीत्
तपसस्तान्महिनाजायतैकम् ॥३॥
प्रातः स्मरण माला
२६
श्रावृत हो अज्ञान-तिमिर से पहले यह सत्र था तमरूप,
दुग्धराशि में मिलित सलिल-सा अखिल विश्व अज्ञात अरूप ।
तुच्छ अविद्या से छादित जो तम से एकीभूत हुआ,
वही विश्व विभुके तप की महिमा से फिर उद्भूत हुअा ॥३॥
कामस्तदने समवर्तताधि
मनलो रेतः प्रथमं यदासीत् ।
सतो बन्धुमसति
बन्धुमसति निरविन्दन
हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥
हुअा सृष्टि-रचना के पहले ईश्वर के मनमें संकल्प,
क्योंकि पुरातन कर्मराशि थी बीजारूप में उदित अनल्प ।
ज्ञानी पुरुषों ने मेधा से निज उर में जब किया विचार,
'सत्' के साधनभूत कर्म का हुअा 'असत्' में साक्षात्कार ॥४॥
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषा-
मधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत् ।
रेतोधा आसन् महिमान आसन्
स्वधा अवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ॥५॥
तना सृष्टि का सूर्यरश्मि-सा सहसा ही सब अोर वितान,
पहले मध्यलोक में, ऊपर या नीचे-कुछ हुआ न भान ।
कर्मों के कर्ता-भोक्ता थे अगणित जीव हुए उत्पन्न,
भोग्य-स्थान महान् भूत भी, भोक्ता उच्च, अधम है अन्न ॥५॥
को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्
कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेनाऽथा
को वेद
आबभूव ॥६॥
२०
प्रतः स्मरण माला
-
किस निमित्त, किस उपादान से हुई प्रकट नानाविध सृष्टि
कौन जानता, कौन बताये, किसकी वहाँ पहुँचती दृष्टि ।
पैदा हुए देवगण भी तो भूत-सर्ग के ही पश्चात् ;
फिर किससे सब सृष्टि हुई है, यह रहस्य किसको है ज्ञात ॥६॥
इयं विसृष्टियत आबभूव
यदि वा दधे यदि वा न।
यो अस्थाध्यक्षः परमे व्योमन् त्सो
अङ्ग वेद यदि वा क वेद ॥७॥
जिस विभु से इस विविध सृष्टि का हुआ प्रकट अतिशय विस्तार,
वही इसे धारण करता है, रखता या कि बिना अाधार ।
जो इस जग का परम अधीश्वर रहता परम व्योममय देश,
वही जानता या न जानता; नहीं अन्य का यहाँ प्रवेश ||७||
शुभ संकल्प के लिये प्रार्थना
(ऋग्वेद खिलकाण्ड ४-१२)
येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्
येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥१॥
अमृत भरे जिन ज्योति रूप ने त्रिलोक सारा व्याप्त किया
भूतभविष्यद्वर्तमान भी निजमहिमासे घेर लिया
सप्तहवन के चलते जिनकी आज्ञा से सब यज्ञ विधान
उन विभुके शुभ संकल्पों से हो मन मेरा नित बलवान् ॥१॥
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वंति विदथेषु धीराः
यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥२॥
प्रातः स्मरण माला २१ यज्ञ याग में कर्मवीरगण निपुण मनस्वी धर्मनिधि जनगण की हितवाञ्छा से करते हैं सब कर्मविधि फलदाता हैं सब की के पूजनीय हैं जो भगवान् उन विभुके शुभ संकल्पों से हो मन मेरा नित बलवान् ॥२॥ * यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्योतिरंतः अमृतं प्रजासु यस्मान्न ऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥३॥ जिसमें धैर्य-शक्ति चिन्तन भी तथा ज्ञान रहता भरपूर प्राणिमात्र में अमृतमय है या प्रकाश का बहता पूर जिसके बिना नहीं चलता है निश्चय कोई कार्य विधान श्री विभुके शुभ संकल्पों से वह मन मेरा हो बलवान् ॥३॥ यजाग्रतो दूरमुदति दैवं तदु दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥४॥ प्रभो जागते हुए सदा जो दूर-दूर तक जाता है सात में भी दिव्य शक्तिमय कोसों दौड़ लगाता दूर दूर वह जाने वाला तेजों का भी ज्योति-निधान श्री प्रभुके शुभ संकल्पों से वह मन मेरा हो बलवान् ॥४॥ सुप्तस्य तथैवैति मानस मंदिर में आयो मानस मंदिर में 'आओ। रोम रोम में अस्थिर तन के, अंतस्तल में औ मानस के, निज आभा पल पल झलकाओ। *ऋचाएँ ३ और ४ तथा 'मानस मंदिर में श्राश्रो' यह कवन श्रीमती कृष्णा कुमारी की प्रार्थना' पुस्तक से लिए गए हैं ।
२२ प्रातः स्मरण माला नाविक हो जीवन नौका के, स्वामी हो तुम मेरे मन के, वाणी में अमृत बरसाओ। मृदु भावों में शक्ति जगाओ, चित्रण में नवजीवन लाओ, जग को मंगलमय सरसाओ। श्रीरामदास कृत भूपाली उठोनियां प्रातःकाळीं । जपा गमनामावळी । स्वयें ध्यातो चंद्रमौळी' । शैलबाळीसमवेत ॥ध्रु०॥ राम योग्यांचे मंडण । राम भक्तांचे भूषण । धर्माचे रक्षण । संरक्षण दासाचें ॥१॥ रामें ताटका मारिली । रामें शिळा उद्धरिली। रामें जानकी पर्णिली । गणिका केली ते मुक्त ॥२॥ रामें पाषाण तारिले । रामें दैत्य संहारिले । रामें बंदी सोडविले । मुक्त केले सुरवर ॥३॥ रामें रक्षिले भक्तांसी । रामें सोडविले देवांसी। राम दासाचे मानसीं । रामदासी आनंद ॥४॥ राम श्री तुलसीदास कृत भूपाली जागिये रघुनाथकुंवर । पंछी बोले ॥टेक॥ चंद्रकिरण शीतल मई । चकई पिय मिलन गई । त्रिविध मंद चलत पवन । पल्लव द्रुम डोले ॥१॥ १ शंकर २ पार्वती के साथ ३ चक्रवाकी ग्रातः स्मरण माला २३ २ प्रातभानु प्रकट भयो । रजनीको तिमिर गयो। भृङ्ग करत गुंजगान । कमलन दल खोले ॥२॥ ब्रह्मादिक धरत ध्यान । सुरनरमुनि करत गान । जागन की बेर भई। नयन पलक खोले ॥३॥ तुलसिदास अति अनंद । निरखिके मुखारविंद । दीननको देत दान । भूषण अनमोले ॥४॥ श्री शिवराम स्वामी कृत भूपालीपंचक इस भूपाली में अद्वैत विज्ञान के सिद्धान्तो को हृदयहारी रीति से स्वल्पशब्दों में प्रदर्शित किया गया है । प्रथम पद्य में निर्मल आत्मतत्व, स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण तथा विराट हिरण्यगर्भ और महत्तत्त्व इन उपाधियों में अलग बताया गया है । दूसरे पद्य में वह देह, प्राण तथा मन के धर्मों से अलिप्त रहते हुए, सभी पदार्थों में 'अनुस्यूत' है, बताया गया है । तीसरे पद्य में विरक्ति भक्ति तथा ज्ञान के लक्षण कह कर इस 'त्रिवेणी' में अवगाहन करने वाला, वर्णाश्रम बन्धनों के पार किस प्रकार जा सकता है, बताया गया है। चौथे में वृत्तियों को, अलिप्तता से 'साक्षी' अर्थात् देखते रहने वाला पुरुष किस प्रकार 'सहज समाधि' की अवस्था का अनुभव करता है, दिखा कर, पाँचवें पद्य में 'विसर' अर्थात् अज्ञान को त्याग तथा 'अाठव' एवं स्मरण को मिटा कर, साधक किस प्रकार जीवन्मुक्त एवं ब्रह्मरूप हो सकता है, दर्शाया गया है। रामकृष्ण हरि गोविंदा, राजीवनयना रे । बापा राजारामा रे ॥ अनाथबंधो पतितपावना करुणावतारे ॥ध्रु०॥
प्रातःस्मरण माला गुरुकरुणोदयकाळी, शिवगुरुवर गितिं गावा । स्वहितकारणे आपुला आपण विचार करावा ।।१॥ इंद्रयांसकट स्थूल नव्हें भी, जाणता याचा । याचिकारणे विराट नोहे, देखणा त्याचा ॥२॥ मनवुद्धयादी वृत्तिसि जाणे. अंतःकरणाच्या कारण हिरण्यगर्भ तयाचा साक्षी मी साचा ।।३।। स्वरूपि जे कां विस्मृती तें, मायेचे रूप जाणा । तेंचि येथे कारण मीच. जाणे तनुत्रयाचां साक्षी तो मी, महाकारण। तेथिल चौथे महामायेसी, मीत्र वोळखण ॥२॥ शबलद्वय-उपाधि निरसितां, जीवशीव हारपले। शुद्ध पूर्णानंदी रिघतां शिवरामचि झालें ।।६।। आपणा ॥४॥ २ वृद्ध-तरुण' नेणे ॥१॥ मी देह नव्हेसा झालों तेव्हां, 'उपजणे-निमणे । रोड-मोठा हे कांहींच यापरि विचार करितां मनुजा, सुमनें साक्षेपें । चैतन्य आत्मा मी हे कळतां, विचारही लोपे ॥२॥ मनसह अंतःकरणाचा मी, देखणाचि वेगळा । वर्णाश्रमसुखदुःखें येउनि, बाधिति कवणाला ? ॥३॥ क्षुधातृषादि प्राणधर्म हे, मजला दिसताती। मज मी फिरोनि पाहतां मग हे, कवणा बाधीती ॥४॥ १ उस विराट का मैं द्रष्टा हूँ २ स्वरूप का विस्मरण ही माया का कार्य है ।
तः स्मरण माला
२५
हे जड ऐसें जाणुनि निराळा, होउनि मग पाहतां ।
'व्यतिरेके' ही चिदचिद्ग्रंथी, सूटे तत्त्वतां ॥२॥
सकळ सच्चिदानंदू हा हो, 'अन्वय'- बोधु ।
तो
शिवरामाचा परिपूर्णानंदु ॥३॥
जाणावा
३
नित्य
॥२॥
विषय इंद्रियें जड ओळखणे तेची "विरक्ती'।
चैतन्याकडे वृत्ति फिरविणे, या नांवे "भक्ती' ॥२॥
मी चिद्धन वस्तुची प्रीतीती, शुद्ध ते 'शान' ।
यापरी त्रिवेणीचे
करावे लान
वर्णाश्रमसह
युक्ताचार.
इंद्रियां घडे।
विरक्ति-भक्ति-ज्ञान हातां, आपें आप चढे ॥३॥
विचार मुळिंचा हरपे हर्षामर्ष अग कैंचे।
शिवराम
संतत, पूर्णानंदाचे ॥४॥
पाय
आपण चैतन्य
वृत्ती जिकडे धांवे तिकडे, न जावें तीपाठी।
साक्षि तियेचा होउनि पाहतां स्वरूपि होय भेटी ॥६॥
वृत्तिकडे पाहतां वृत्ती, आपणांतचि विरे।
मात्र केवळ, परिपूर्ण ऊरे ॥१॥
ऐके देखे स्पर्श हुँगे, जो जो रस चाखे।
बोले चाले वेव्हारीतां. आप आपणां देखे ॥३॥
सहजसमाधी सहजचि भोगी, पूर्णानंदू रे ।
शिवराम निरावरण होउनी आनंदे · वावरे ॥४॥
२६ प्रातः स्मरण माला अरुणोदयकाळी म्हणतां, पढ़े पांच हीं। अर्थ विवरुनी पाहतां होई, देही विदेही ॥१॥ सद्गुरु-आज्ञावचन पाळणे, ‘परमार्थ' या नांवें । वेव्हारितां आपण आपणा, विसरूं न द्यावे ॥२॥ विसरा विसरुनि आठवा प्रामुनि आत्मा स्वये होणें । होणे न होणे वृत्तिविणे त्या, अंगी अनुभविणे ॥३॥ जगी आपण भरला आपणा माजी जग पाहे। तो जाणावा शिवरामाचा पूर्णानंदू आहे ॥४॥ बृहद्योगवासिष्ठ के कुछ उद्धरण (अ) मन, चित्त, कलना, तृष्णा, वुद्धि, तथा जीव, के विषय में - १ क्षणमायाति पातालं क्षणं याति नभस्तलम् क्षणं भ्रमति दिक्कुले तृष्णा हृत्पद्मषट्पदी ।।१-२७-३१ २ क्षणमालोकविमला सांधकारलवा क्षणम् व्योमवीथ्युपमातृष्णा नीहारगहना क्षणम् ।१-१७-४० ३ अहो बत महच्चित्रं तृष्णामपि महाधियः दुच्छेदामपि कृतंति विवेकेनामलासिना ।३-१७-४७ पाये अांकड़े बृहद्योगवासिष्ठ के प्रकरण, अध्याय तथा श्लोकों को बताते हैं ।
तिः स्मरण माला
४ क्षणमानंदितामेति क्षणमेति विषादिताम्
क्षण सौम्यत्वमायाति सस्मिन्नटवन्मनः ॥१-२८-३८
५ चित्स्वभावपरामृष्टा
स्पन्दशक्तिरसन्मयी
कल्पना चिनमित्युच्या कथ्यते शास्त्रदृष्टिभिः १५-१३-५१
६ यश्चित्तफणिफूत्कारः सैवेय कलनोच्यते
चिदेवाहमिति ज्ञात्वा सा चित्तामेव गच्छति १५-१३-५२
७ कलना सर्व जन्तूनां विज्ञानेन शमेन च
प्रबुद्धा ब्रह्मतामेति भ्रमरीतरथा जगत् ।५-१३-५९
८ अयं सोऽहमिदं तन्म इति या कलनाविला
प्राणात्मतत्वयो स्तस्याः संज्ञा जीवेति कथ्यते ।५-१३-७३
९ धीश्चित्त जीव इत्येताः संकल्पस्यासतो मताः
संज्ञाः संकल्पितास्तन राम परमार्थनः १५-२३-७४
१० मनो नो न मति पि धीरेषा न शरीरकम्
अस्तीह परमार्थेन स्वात्मैवेहास्ति सर्वदा ।५-१३-७५
११ चित्ततैषा चितो मिथ्या कल्पिता बालयक्षपत्
अखण्डमण्डलाकारस्पन्दरूश चिदेव यत् ।५-१३-९२
१२ जडत्वान्निस्वरूपत्वात् सर्वदैव मृतं मनः
मृतेन मार्यते लोकश्चित्रेय मौर्यचक्रिका ।५-१३-१००
१३ यस्य नात्मा न देहोऽस्ति नाधारोनापिचाकृतिः
तेनेदं भक्ष्यते सर्व चित्रेयं मौयंचागुरा ।५-१३-१०१
२८
प्रातः स्मरण माला
१४ सर्वसामग्रयहीनेन हन्यते मनसापि यः
नीलोत्पलदलाघातर्मन्ये दलितमस्तकम् ।५-१३-१०२
१५ अहो नु खलु चित्रेयं माया मयविधायिनी
चेतसाप्यतिलोलेन लोकोऽयमभिभूयते ।५-१३-१०६
१६ मूर्ख लोकमयी सृष्टिः मन एवास दुत्थितम्
यः शक्तो न वशीकर्तुं नासौ रामोपदिश्यते ।५-१३-११३
१७ अहो मोहस्य माहात्म्यम् यदयं सर्वदुःखहा
चिंतामणिविचाराख्यो हृत्स्थोऽपित्यज्यते जनैः।७-१-१२
(आ) ज्ञान तथा ज्ञानी के विषय में
१ सम्यक्पश्यति यस्तज्ज्ञः ज्ञातयःस पण्डितः
न स्वदन्ते बलादेव तस्मै भोगा महात्मने ।२-२-७
२ हृद्याकागे विवेकार्के शमालोकिनि निर्मले
अनर्थसार्थकारो नोद्यति किल केतवः ॥२-१८-२१
३ संसाराम्बुनिधावस्मिन् वासनाम्बुपरिप्लुते
ये प्रज्ञानावमारूढास्ते .तीर्णा बुडिताः परे ।४-४६-२२
४ राज्यं कुर्वन्विदेहानां जनको जनजीवितम्
नैव हर्षविषादाभ्यां सोऽवशः परितप्यते ।५-१२-१०
५ भविष्य नानुसंधत्ते नातीतं चिंतयत्यसौ
वर्तमाननिमेषं
हसन्नेवानुवर्तते ।५-१२-१४
६ सुन्दर्या निजया बुद्धया प्रज्ञयेव वयस्यया
पदमासाद्यते राम न नाम क्रिययान्यया ।५-१२-१८
तिः स्मरण माला
२६
७ यस्योज्ज्वलति तीक्ष्णामा पूर्वापरविचारिणी
प्रज्ञा दीपशिखा जातु जाड्यांध्य तं न बाधते ।५-१२-१९
८ प्रज्ञावानसहायोऽपि विशास्त्रोऽप्यरिमर्दन
उत्तरत्येव संसारसागराद्राम
पेलवात् ।५-१२-२२
९ चिंतामणिरिय प्रज्ञा हृत्कोशस्था विवे किन:
फल कल्पलतेचैषा चिंतित संप्रयच्छति ।५-१२-३४
१० प्रशयेह जगत्म सम्यगेवांग दृश्यते
सम्यग्दर्शनमायांति नापदो न च संपदः ।५-१२-३८
११ हृद्गुहावासि चितवं मुख्य सानातन वयुः
शंखचक्रगदाहस्तो गौण आकार आत्मनः ।५-४३-२७
१२ ज्ञानवानेव
सुखवान्शानवानेव
जीवति
ज्ञानवानेव बलवांस्तस्माज्ज्ञानमयो भव ॥५-९२-४२
१३ ज्ञानाद्विषयवैरस्य स समाधिहि नेतरः ७-४६-१५
(इ) पौरुष, दैव तथा प्रज्ञा के सम्बन्ध में
१ सर्वमेवेह हि सदा संसारे रघुनन्दन
सम्यक्प्रयुक्तात्सर्वेण पौरुषात्समवाप्यते ॥२-४-८
२ यत्नवद्भिर्हढाभ्यासैः प्रशोत्साहसमन्वितैः
मेरवोऽपि निगीर्यते कैव प्रापौरुषे कथा ।२-४-१८
३ परं पौरुषमाश्रित्य दन्तैर्दन्तान्विचूर्णयन्
शुभेनाशुभमुद्युक्तं प्राक्तनं पौरुषं जयेत् ।२-५-९
my
३०
प्रातः स्मरण माला
४ प्राक्तनः पुरुषार्थोऽसौ मां नियोजयतीति धीः
बलादधस्पदीकार्या प्रत्यक्षादधिका न सा २.५-१०
५ दैवं प्रेरयति माम् इति दग्धधियां मुखम्
अदृश्रेष्ठदृष्टीनां दृष्टवा
लक्ष्मीनिवर्तते ।२-५-२०
६ दैन्यदारिद्रय दुःखार्ता अप्यन्ये पुरुषोत्तमाः
पौरुषेणैव यत्नेन याता देवेन्द्र तुल्यताम् ॥२-५-२७
७ तस्मात्प्रापौरुषाव नान्यत्तत्प्रोज्झ्य दूरतः
साधुसंगमसच्छास्त्रैर्जीवमुत्तारयेद् बलात् ।२६-१
८ ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्ग नरकमेव वा
स सदैव पराधीनः पशुरेव न संशयः।२-६-२७
९ यस्तूदारचमत्कारः सदाचारविहारवान्
स निर्याति जगन्मोहान्मृगेंद्रो पञ्जरादिव ।२-६-२८
१० स्वार्थप्रापककार्यकप्रयत्न परता बुधैः
प्रोक्ता पौरुषशब्देन सा सिध्यै शास्त्रयंत्रिता ।२-६-३२
११ करामलकवत् दृष्टं पौरुषादेव तत्फलम्
मूढः प्रत्यक्षमुसृज्य दैवमोहे निमज्जति ।२-६-३८
१२ मूढः प्रकल्पितं देवं तत्परास्ते क्षयं गताः
प्राशास्तु पौरुषार्थेन पदमुत्तमतां गताः ॥२-८-१६
प्रातः स्मरण माला
३१
१३ ये शूरा ये च विक्रांता ये प्राज्ञा ये च पंडिताः
तैस्तैः किमिव लोकेस्मिन्वद दैवं प्रचक्षते ॥२-८-१७
१४ शुभाशुभाभ्यां मार्गाभ्यां वहन्ती वालनासरित्
पौरुषेण प्रयत्नेन योजनीया शुभे पथि ।२-९-३०
१५ मोक्षद्वारे द्वारपालाश्चत्वारः परिकीर्तिताः
शमो विचारः संतोषश्चतुर्थः साधुसंगमः २-११-५९
१६ एते सेव्याः प्रयत्नेन चत्वारो द्वौ त्रयोऽथवा
द्वारमुद्घाटयंत्येते मोक्षराजगृहे तथा ।२-११-६०
१७ पूर्वापर विचारार्थचारुचातुर्यशालिनी
सविकासा मतिर्यस्य स पुमानिह कथ्यते ॥२-११-७२
१८ न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषुवा क्वचित्
पौरुषेण प्रयत्नेन यन्नाप्नोति गुणान्वितः।४-६२-१९
श्री शंकराचार्य कृत स्तोत्र
या
मनीषापञ्चकम्
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटतरा संविदुज्जृम्भते
या ब्रह्मादिपिपीलिकान्ततनुषु प्रोता जगत्साक्षिणी ।
सैवाहं न च दृश्यवस्त्विति दृढप्रज्ञापि यस्यास्ति चे-
च्चाण्डालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥१॥
३२
प्रातः स्मरण माला
ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं चिन्मात्रविस्तारितं
सर्वे चैतदविद्यया त्रिगुणया शेष मया कल्पितम् ।
इत्थं यस्य दृढा मतिः सुखतरे नित्ये परे निर्मले
चाण्डालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥२॥
शश्रन्नश्वर मेव विश्वमखिलं निश्चित्य वाचा गुरो-
नित्यं ब्रह्म निरन्तरं विमृशता निर्व्याजशान्तात्मना।
भूतं भावि च दुष्कृतं प्रदहता संविन्मये पावक
प्रारब्धाय समर्पितं स्ववपुरित्येषा मनीषा मम ||२||
या तिर्यङ्नर देवताभिरहमित्यन्तःस्फुटा गृह्यते
यद्भासा हृदयाक्षदेहविषया भान्ति स्वतोऽचेतनाः ।
तां भास्यैः पिहितार्कमण्डलनिभा स्फूर्ति सदा भावय-
न्योगी निर्वतमानसो हि गुरुरित्येषा मनीषा मम ||४||
यत्सौख्याम्बुधिलेशलेशत इमे शक्रादयो निर्वृता
यच्चिले नितरां प्रशान्तकलने लब्ध्वा मुनिर्निर्वृतः।
यस्मिन्नित्यमुखाम्बुधौ गलितधीब्रह्मव न ब्रह्मवि-
द्यः कश्चित्स सुरेन्द्रवन्दितपदो नूनं मनीषा मम ॥५॥
निर्वाणषटकम्
मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाह
न कर्ण न जिह्वा न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योम भूमिन तेजो न वायु-
श्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ १ ॥
प्रातः स्मरण माला ३ न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायु- न वा सप्तधातुन वा पञ्चकोशः । न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।। २ ॥ न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहो मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः। न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष- श्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ ३ ॥ न पुण्य न पापं न सौख्य न दुःखं न मन्त्रो न तीर्थ न वेदा न यज्ञाः । अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ ४ ॥ न मृत्युन शंका न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता च जन्म | न बन्धुन मित्र गुरु व शिष्य- श्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ ५॥ अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् । न चासंगतं नैव मुक्तिर्न बन्ध- श्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ ६॥ हस्तामलक स्तोत्रम् निमित्त मनश्चक्षुरादिप्रवृत्ती निरस्ताखिलोपाधिराकाशकल्पः ।
प्रातः स्मरण माला
रविलॊकचेष्टानिमित्तं यथा यः
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ १ ॥
यमग्न्युष्णवन्नित्यबोधस्वरूपं
मनश्चक्षुरादीन्यबोधात्मकानि ।
प्रवर्तन्त आश्रित्य निष्कम्पमेकं
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ २ ॥
मुखाभासको दर्पणे दृश्यमानो
मुखत्वात्पृथक्त्वेन नैवास्ति वस्तु ।
चिदाभासको धीषु जीवोऽपि तद्व-
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ ३ ॥
यथा दर्पणाभाव आभासहानौ
मुख विद्यते कल्पनाहीनमेकम् ।
तथा धीवियोगे निराभासको यः
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ ४ ॥
मनश्चक्षुरादेवियुक्तः स्वयं यो
मनश्चक्षुरादेमनश्चक्षुरादिः।
मनश्चक्षुरादेरगम्यस्वरूपः
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ ५ ॥
य एको विभाति स्वतः शुद्धचेताः
प्रकाशस्वरूपोऽपि नानेव धीषु ।
शरावोदकस्थो यथा भानुरेका
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ ६ ॥
प्रातः स्मरण माला
३५
३
यथानेकचक्षुःप्रकाशो रविन
क्रमेण प्रकाशीकरोति प्रकाश्यम् ।
अनेका धियो यस्तथैकप्रबोधः
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ ७ ॥
विवस्वत्प्रभातं यथारूपमक्षं
प्रगृह्णाति नाभातमेवं विवस्वान् ।
यदाभात आभासयत्यक्षमेकः
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ ८ ॥
यथा सूर्य एकोऽप्स्वने कश्चलासु
स्थिरास्वप्यनन्वग्विभाव्यस्वरूपः ।
चलासु प्रभिन्नासु धीष्वेवमेकः
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ ९ ॥
घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्क
यथा निष्प्रभ मन्यते चातिमूढः।
तथा बद्धवद्भाति यो मूढदृष्टेः
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ १० ॥
समस्तेषु वस्तुष्वनुस्यूतमेक
समस्तानि वस्तूनि यं न स्पृशन्ति ।
वियद्वत्सदा शुद्धमच्छस्वरूपः
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ ११ ॥
उपाधौ यथा भेदता सन्मणीनां
तथा भेदता बुद्धिभेदेषु तेऽपि ।
यथा चन्द्रिकाणां जले चञ्चलत्वं
तथा चञ्चलत्वं तवापीह विष्णो॥ १२ ॥
प्रातः स्मरण माला
दक्षिणामूर्त्यष्टकम्
विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ १ ॥
बीजस्यान्तरिवांकुरो जगदिदं प्रानिर्विकल्पं पुन-
मायाकल्पितदेशकालकलनावैचित्र्यचित्रीकृतम् ।
मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥२॥
यस्यैव स्फुरण सदात्मकमसत्कल्पार्थगं भासते
साक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् ।
यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिभवाम्भोनिधी
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ३ ॥
नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरं
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते ।
जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत्समस्तं जग-
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥४॥
देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चला बुद्धिं च शून्यं विदुः
स्त्रीबालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृश वादिनः।
मायाशक्तिविलासकल्पितमहाव्यामोहसंहारिणे
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥५॥
प्रातः स्मरण माला
३
राहुग्रस्त दिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादना-
सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् ।
प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ६ ॥
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा।
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ७ ॥
विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसंबन्धतः
शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः।
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामित-
स्तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ८ ॥
भूरम्भांस्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशुः पुमा-
नित्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् ।
नान्यत्किंचन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभो-
स्तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥९॥
सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिस्तवे
तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्धयानाच्च संकीर्तनात् ।
सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः
सिध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम् ॥ १० ॥
३
प्रातः स्मरण माला
ललितापञ्चरत्नम्
प्रातः स्मरामि ललितावदनारविन्द
बिम्बाधरं पृथुलमौक्तिकशोभि नासम् ।
आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलाढ्यं
मन्दस्मितं मृगमदोज्ज्वलफालदेशम् ॥ १॥
प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पपल्ली
रक्ताङ्गुलीयलसदगुलिपल्लवाढ्याम् ।
माणिक्यहेमवलयाङ्गदशोभमानां
पुण्ड्रेक्षुचापकुसुमेषु सृणीर्दधानाम् ॥ २ ॥
प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्द
भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम् ।
पद्मासनादिसुरनायकपूजनीयं
पद्माङ्कुशध्वजसुदर्शनलाञ्छनाढ्यम् ॥ ३॥
प्रातः स्तुवे परशिवां ललितां भवानी
त्रय्यन्तवेद्यविभवां करुणानवद्याम् ।
विश्वस्य सृष्टिविलयस्थितिहेतुभूतां
विद्यश्वरी निगमवाङ्मनसातिदूराम् ॥ ४॥
प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम
कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरी ति।
श्रीशाम्भवीति जगतां जननी परेति
वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति ॥ ५ ॥
प्रातः स्मरए माला
३६.
३
यः श्लोकपञ्चकमिदं ललिताम्बिकायाः
सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते ।
तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना
विद्यां श्रियं विमलसौख्यमनन्तकीर्तिम् ॥ ६ ॥
षट्पदी स्तोत्रम्
अविनयमपनय विष्णो
दमय मनः शमय विषयमृगतृष्णाम् ।
भूतदयां विस्तारय
तारय संसारसागरतः॥१॥
दिव्यधुनीमकरन्दे
परिमलपरिभोगसच्चिदानन्दे ।
श्रीपतिपदारविन्दे
भवभयखेदच्छिदे वन्दे ॥२॥
सत्यपि भेदापगमे
नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् ।
सामुद्रो हि तरङ्गः
कचन समुद्रो न तारङ्गः ॥ ३
उद्धृतनग नगभिदनुज
दनुजकुलामित्र मित्रशशिदृष्टे ।
दृष्टे भवति प्रभवति
नभवति किं भवतिरस्कारः॥४॥
प्रातः स्मरण माला मत्स्यादिभिरवतारै- स्वतारवतावता सदा वसुधाम् । परमेश्वर परिपाल्यो भवता भवतापभीतोऽहम् ॥ ५ ॥ दामोदर गुणमन्दिर सुन्दरवदनारविन्द गोविन्द । भवजलधिमथनमन्दर परमं दरमपनय त्वं मे ॥६॥ नारायण करुणामय शरणं करवाणि तावको चरणौ। इति षट्पदी मदीये वदनसरोजे सदा वसतु ॥७॥ स्वराज्य-प्रबोध माला स्वस्ति श्रीर्दिशतादशेषजगतां तज्ज्योतिराचं महत् सर्वासूपनिषत्सु यन्निग दितं सच्चित्स्वरूपं शिवम् यच्चावाङ्मनसावगाहममृतं वेदांतवेद्यं परम् भावैरात्मगतैरुदारमधुरैः स्वीये महिग्नि स्थिरम् ॥ १ ॥ १ दिशतात् आदेश दें, जगत् में स्वास्थ तथा सुख के लिए पर- मात्मा ही हमें आदेश दें। २ अवाङ्मनसावगाह्य-मनवाणी से जिनका साक्षात् नहीं हो सकता, यहाँ 'वाणी' शब्द से सभी ज्ञानेंद्रियाँ ध्वनित होती हैं । परन्तु परमात्मा का ज्ञान सूक्ष्म बुद्धि को अगम्य है, यह अर्थ नहीं है।
प्रातः स्मरण माला ४१ ज्ञानानन्दमयं परात्परतरं दिग्वस्तुकालातिगम् वन्दे देवम विलक्षणगुणं श्रीशं परं पावनम् । यस्यैकांतिकशासितेऽपरिमिते ब्रह्माण्डभाण्डोदरे नाजदभास्करमण्डलान्यमितशोभ्राम्यति तत्तद्ग्रहैः॥२॥ भीषाऽस्मादितिवर्णितं श्रुतिगिराऽतयै च यस्याद्भुतम् ऐश्वर्य सहज प्रशासनमिति वारण्यके कीर्तितम् । अस्मिन्नेव महेंद्रजालसदृशी शक्तिः पराधिष्ठिता याऽध्यक्ता मुनिभिः सुदीर्घतपसा स्वान्तेऽपरोक्षीकृता ॥३॥ या सृष्टिस्थितिसंहृतीर्वितनुते स्वानंदरूपाऽमला तस्या एवं विलास एष भवितुंमहत्यशेषो महान् । प्रा विश्वांतःस्थितया कयापि सुशकं शक्त्या न संपादितुम् एतत्सर्वमृते प्रभोःपरिवढाच्चानुग्रहात्सर्वशः ॥४॥ दिक्कालाद्यवधिन यामभिभवेद्या सत्स्वरूपा स्वयम् चिद्पा लहरीव या विलसते त्रैलोक्यविद्योतिनी । या बीजप्रकृतिर्विकासकुशला या प्राणिनां पोषिणी कर्माकर्मविपाकसूक्ष्मफलदा प्रोल्लासिनी शासिनी ॥५॥ १ दिग्वस्तुकालातिगम्-जिनका स्वरूप देश काल या किसी वस्तु से मर्यादित नहीं है । २ भीषाऽस्मात् (तैत्तिरीय उपनिषत् २-८) ३ आरण्यक, (बृहदारण्यक उपनिषत् ३-८) ४ अव्यक्ता यह शक्ति स्वयं कहीं बाहर नहीं दीखती है, सदा गुप्त रहती है, केवल उसका प्रभाव या कार्य ही बाहर दिखाई देता है । ५ संहृति-विनाश या उपसंहार ६ परिवृह-प्रभावी। ७ जिसे देश कालादि की मर्यादा नहीं है। जीव जगत् तथा परमात्मा,, इनके विषय में यथार्थ परिज्ञान को ही तत्त्वज्ञान कहते हैं । संसार के प्रायः सभी तत्त्रज्ञानों में इनके सम्बंध में चर्चा रहती है।
४२ प्रातः स्मरण माला काम तां प्रकृति वदंत्वथ सतः सत्ता स्वभावं तथा मायां वा बलवत्प्रशासनमिदं श्रुत्योदितं विश्वभृत् । एतास्ताः प्रतिबोधका हि विविधाः संज्ञाः स्वरुपेऽर्पिताः शानानंदपरे सदाऽद्वयशिवेऽद्रव्ये न भेदो मनाक् ॥६॥ विशेषतः जगत् की उत्पत्ति किस प्रकार हुई, यह बड़ी जटिल समस्या मानी गई है । कोई कहते हैं कि जगत् स्वयं सिद्ध है, उसको किसी ने बनाया ही नहीं । कोई कहते हैं कि जड़ 'अज्ञान' ने जगत् को बनाया है । कोई कहते हैं कि सारा विश्व अनंत परमाणुओं का ही बनाया हुआ है, और कोई कहते हैं कि जगतू हुआ ही नहीं और है ही नहीं !! यह तो सबसे विचित्र बात है ! 'अद्वैत विज्ञान की दृष्टि से इस विराट् विश्व को सच्चिदानन्द स्वरूप, निगुण निराकार आत्मतत्त्व ने अपनी अद्भुत अचिन्त्य शक्ति से (मानों Thought power द्वारा) बनाया है । थोड़े से विमर्श से यह बात समझ में आ सकती है कि त्रिलोकों को उप्तन्न करा देने वाली शक्ति, त्रिलोकातीत अर्थात् देश- कालातीत और सबसे अलग ही होनी चाहिये । देश काल अपने को तो नहीं उप्तन्न कर सकते ! यही विधि-गति अज्ञान या जड़ः पदार्थों की है। फिर एकमेवाद्वितीय चैतन्य, अपने को ही कैसे उप्तन्न करें ? अर्थात् वह ही 'जड़' पदार्थों को उत्पन्न करता है, यह बात अनिवार्यता से प्राप्त होती है । थोड़ लोगों का कहना है कि 'जड़ ही चैतन्य की शक्ति को लेकर विविध पदार्थों की सृष्टि क ता है । ठीक है, परन्तु इस 'जड़' की उत्पत्ति किसने की ? वह स्वयं सिद्ध है कहे तो फिर 'द्वैत' सिद्धान्त स्वीकारना पड़ेगा ! इसलिए अद्वैत सिद्धान्त में माया को परमात्मा का सामर्थ्य, ['इन्द्रोमायाभिः पुरुरूप ईयते' ऋग्वेद ६-४७-१८] माना गया है। शंकराचार्य ने इसको अपने मस्तिष्क में से नहीं निकाला है । माया (अर्थात् मूलमाया) परमात्मा की शक्ति है, कोई नष्ट होने वाली भ्रांत वस्तु नहीं । हाँ, कार्य रूप प्रपंच को भी माया अर्थात् 'तूल माया कहते हैं, जो परिणामी और नष्ट होने वाली है । छान्दोग्य प्रातः स्मरण माला ४३ विश्वेशः सृजति स्वकीय महेसा विश्वं विरिष्यन्वितम् संकल्पप्रभवैराचंत्यरभसैविद्युद्विवतः कणैः । . उपनिषत् (६-२-१) 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत् एकमेवाद्वितीयम्' के भाष्य में शंकराचार्य लिखते हैं 'सद्व्यतिरेकेण सतः सहकारि कारणं द्वितीयं वस्त्वंतरं प्रतिपिद्धयते अद्वितीय मिति' । इसी को 'ब्रह्मकारणता' या 'चैतन्यकारणता' का सिद्धान्त कहते हैं । परन्तु इसके सम्बन्ध में हमारे पण्डितों को ही मजेकी अाशंकाएँ उत्पन्न होती है, जिनकी समालोचना करने का यह स्थान नहीं है । तथापि इतना कहना युक्त होगा कि वर्तमान युग के प्रवीण वैज्ञानिक, इसी सिद्धान्त की अोर (अर्थात् The monistic unitary view of the Universe की ओर) आकर्षित हो रहे हैं । देखिये Man in the modern world by Julian Huxley, Chapter X 'Philosophy in a World at war'. यहाँ ग्रंथकार लिखते हैं कि यह विश्व Dualistic (द्वैत रूप। नहीं है Monistic (ऐक्य-रूप) है । यहाँ के अखिल पदार्थ एक ही शक्ति के Wavicles अर्थात् 'विवर्त' हैं । परन्तु इससे आगे जाकर किसी सृष्टिकर्ता परमात्मा को मानने या न मानने के सम्बन्ध में अभी इन लोगों में दुविधा है । जो भी हो, हमारी दृष्टि से इन विद्युन्मय Wavicles, विवों के उत्पादक, बिना परमात्मसंकल्पों के कोई हो नहीं सकता । और संकल्पों के उत्पन्नकर्ता परमात्मा, अपनी निर्गुणता से कदापि भ्रष्ट होते ही नहीं । सगुण निर्गुण में 'द्वैत' नहीं है, वे एक ही हैं । १ महस-तेज एवं प्रभाविता, स्वकीय महसा, अर्थात् अपनी प्रभाविता से। २ विरिञ्चि-सृष्टिकर्ता ब्रह्मदेव यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम् श्वे. उ. ६-१८] ३ वर्तमान युग के प्रवीण शास्त्रज्ञ स्वर्गवासी झाल्बर्ट आइन्स्टाइन के सिद्धान्तानुसार, यह विराट् विश्व (A vast unified electro-magnetic field) एक अथाइ एकतन्त्र विद्युच्चुम्बकीय क्षेत्र है, जिसमें विद्युद्विवर्त विद्युत्कण और प्रचण्ड विद्युत् आकर्षणों तथा विकर्षणों का एक घमासान प्रातः स्मरण माला दिक्कालाप्रमितप्रकर्षनिभृतैः शम्पासमुज्जृम्भणैः तज्जन्यैरनिलाविभूतनिकराप्यस्थितै रोदसी ॥७॥ ज्योतीरूपमयैरसीमगणनाकारप्रभाभास्वरैः स्फारेऽत्यंतदविष्ठदिव्यनभसि भ्राम्यद्भ-मेधै-गणैः । सर्वाश्चर्यमयैरतीवविविधैर्जीवैश्च जीवाणुभिः नानाकारविचित्रदेहकरणस्थूलादिकोशैवृतैः ॥८॥ स्वातंत्र्ये लवमात्रशक्त्यधिकृतैस्तृष्णादि दोषान्वितैः धावद्भिः प्रदिशं सुखार्थमनिश संख्यातिजैतुभिः । अत्यल्पैश्च युतं सुबुद्धिसहितैश्चिन्नाट्यपूर्ण जगत् संकल्पप्रमितं विलापयति तत् लीला परां संहरनू ॥९॥ अत्यंत चपलं विचित्रमतुलं यंत्रं 'मनो' नामकम जन्तूनां हृदये निवेशितमहो विश्वात्मना लीलया । सामर्थ्य प्रबलं समस्ति निहितं तस्मिश्चमत्कारि यत् शक्तिश्चापि तथाऽस्य संयमपरा दत्तास्ति जीवात्मनाम् ॥१०॥ नाट्य चल रहा है । भौतिक वाद की दृष्टि से तो यह बात ठीक है, परन्तु आस्तिकता की दृष्टि से (और उपर्युक्त पण्डित भी स्वयं बड़े आस्तिक थे) इस विराट नाट्य के सूत्रधार परमात्मा हैं, जो अपनी अद्भुत संकल्प शक्ति से विश्व प्रपंच की लीला दिखा रहे हैं । देखिए पृष्ठ ४१ की ७ वी टिप्पणी । Time and Space Continuum २ शस्पासमुज्जृम्भण=विद्युत् की हलचल । २ जो ज्वलन्त रूप हैं । ३ भ- मेघैः Nebula, नीहारिका के सदृश तारक समूह । ४ यह स्वातंत्र्य, देखा जाए तो लवमात्र ही है, परन्तु ज्ञानी पुरुषों की दृष्टि से इसमें कहीं अधिक कल्याण कारी गुण भरे पड़े हैं, जिनके द्वारा मानव अपनी असीम उन्नति कर पाता है । ५ देखिए पृष्ठ २१ ऋचाएँ ३ और ४ य प्रातः स्मरण माला तस्मात्संयमवान्भवेनिजमनोयंत्रप्रयोगे सदा स्वच्छान्तःकरणो विवेककुशलः कर्तव्यनिष्ठःपुमान् । शास्त्रज्ञानपरः विचार्य सकलं कुर्यादिम निश्चयम् प्राप्स्ये स्वीयसदुद्यमैः प्रभुकृपां स्वान्तःसुख निर्मलम् ॥११॥ अत्याश्चर्यमयी मता क्षितितले सृष्टिः पुनर्मानवी स्वायत्तबहुसाधनैः परिवृढा स्वोत्कर्षसिध्यै क्षमा। नैतत्कि प्रबल समर्पकमहो प्रत्यायकं श्रीप्रभोः अस्तित्वस्य च शासनस्य सुतरां निश्चायकं ज्ञापकम् ? ॥१२॥ अज्ञानां बहु दुःखदं जगदिदम् सत्सौख्यद ज्ञानिनाम् एवं ज्ञानपरो भवेत्सुमतिमान् स्वानन्दनः सर्वदा। सर्वेषां हितमाचरेत्प्रभुपरः सद्धर्मचारित्र्यवान् स्वानंदाम्बुनिधौ प्रमार्जितधियां शोकस्य कासम्भवः १ ॥१३॥ पाश्चात्यैर्जगतः सतत्त्वमधुना विद्युन्मय निश्चितम् ज्ञेयं तत्खलु बाह्यमेव जगतो रुपं हि प्रांतीतिकम् । कार्यो १ 'न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः' ऋग्वेद (४-३३-११) बिना परि- श्रम के परमात्मा की कृपा नहीं होती । २ एक अमेरिकन विद्वान् Dantzig, Tobias अपनी पुस्तक 'Number, the lauguge of science' के gg & a Praia Man is the measure of all things, मानव स्वयं, परमात्मा के अस्तित्व का जीता जागता प्रमाण है । परन्तु श्राश्चर्य की बात है कि बहुत से पण्डित इस पर विश्वास नहीं करते हैं । ३ प्रातीतिकम् दैनंदिन अनुभव में आने वाला, केवल भ्रम रूप नहीं (Empirical) ४६ प्रातः स्मरण माला प्राचीनमुनिभिः सुनिश्चितमिदं चिन्मात्रविस्तारितम् नानाकारविकारवर्णरुचिरं श्रीशेन संकल्पितम् ॥१४॥ विश्वेशः सृजति प्रशास्ति सततं ब्रह्माण्डमेतद्धृवम् तस्मात्स प्रभुरेव पुण्यमथवा पापं करोति स्वयम् । किंवाऽन्यैः प्रभुरेव कारयति तत्सर्व शुभं वाऽशुभम् इत्थं यो मनुते प्रवक्ति च परान् संभ्रान्तचित्तो हि सः॥१५॥ चोरेभ्यः किमु देव एव कुमति पापात्मिकां घातिनीम् दत्ते ? तर्हि स एव पापफलभाग्दण्डयः खलो वञ्चकः । एतत्सर्वमनर्गलप्रलपित भ्रान्तात्मनां प्राणिनाम् ज्ञातव्या खलु तत्वनिर्णयधिया या हि स्थितिर्वास्तवी ॥१६॥ त्रैलोक्याधिपतेः स्वरूपममलं दिव्यै रहस्यैयुतम् न ज्ञातुं सुशकं विवेकरहितः संभ्रांतचित्तर्जनः । किन्त्वेतत्सुशकं विशुद्धधिषणैर्शातुं प्रवेष्टुं तथा ज्ञानाभ्यासवशीकृतैः सुहृदयैः सद्भक्तिपूतात्मभिः ॥१७॥ इत्येतत्प्रतिपादितं भगवता गीतासु निःसंशयम् श्रद्धापूर्वमतस्तदर्थमनिशं कार्यः प्रयत्नो महान् । कल्याणे प्रभुशासने प्रणिहितस्वान्तैनरैः पौरुषम् प्रारब्धस् भृशमश्नुते सफलतांसौख्यान्वितां शांतिदाम् ॥१८॥ १ 'पौरुष' की व्याख्या के लिए देखिए पृष्ठ. ३० श्लोक. १० प्रातः स्मरण माला विश्वेशो न हि तोषमेति बहुभिः शुष्कः स्तवैरर्चनैः नैवाभ्यर्थनमन्त्रतन्त्रकृतिभिश्चाक्रंदनैर्भूरिभिः । सर्वप्राणिदयान्वितैः सुचरितैर्दीधैस्तपस्साधनः भूतानां हितकारिकर्मनिचयैरीशो ध्रुवं तुष्यति ॥१९॥ स्वार्थाय स्वमुखं न जातु पुरतः कस्यापि विस्तार्यताम् श्रीशानः पुरुषो न चापि बहुभिः स्वाभ्यर्थनैः पीड्यताम् । सर्वज्ञ हृदयस्थिते स्वपददे किम्प्रार्थनाभिस्तवैः आत्मोद्धारविधौ प्रलन्नमनसा यत्नः समाधीयताम् ॥२०॥ १ "शिवानन्द लहरी' नामक एक स्तोत्र श्री शंकर भगवान के नाम से प्रसिद्ध है । उसमें एक श्लोक इस प्रकार है : . नतिभिर्नुतिभिस्त्वमीश पूजाविधिभियानसमाधिभिर्न तुष्टः । धनुषा मुसलेन चाश्मभिर्वा वद ते प्रियकर तथा करोमि ॥६॥ मानों बेजार होकर कवि पूछ रहे हैं कि जब वैधानिक पूजा अर्चादिमार्ग स कुछ नहीं बन रहा है, तो क्या परत्मामा, जगत्कल्याण के ठोस श्रमिक कार्यों से संन्तुष्ट होने वाले हैं ? उत्प्रेक्षा तो ठीक ही दिखाई देती है। २ श्रीमद्भगवतगीता में (१) परित्राणाय साधूनाम् (गी. ४.८) और (२) ददामिबुद्धियोगम् (गी १०-१०) ऐसी दो बातों के लिये परमात्मा ने स्वयं अभिवचन दे रखा है। अतः इनके लिए हमको परमात्मा से प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं है । ये तो वे स्वयं ही करनेवाले हैं । हमारा कर्तव्य हमारी सदभिलाषा की पूर्ति के लिए धर्म मार्ग से प्रयत्नशील रहना ही है; प्रयत्नों की सफलता में कोई सन्देह नहीं हो सकता। इच्छा भावना और प्रार्थनाओं से कुछ नहीं बनता । ये केवल दिग्भ्रांति करा देने वाली बातें हैं । विमर्श के साथ 'प्रयत्न' यही प्रधान है । परमात्मा के विधि प्रातः स्मरणमाला श्रीशः कस्य कदापि किंचिदपि वा पुण्यं शुभं वाऽशुभम नादत्ते न ददाति यन्निगदितं सत्यं हि तन्नान्यथा । , विधान ही ऐसे अकाट्य बने बनाएँ हैं, कि ऐसे प्रयत्नों को सफलता लाभ होना अनिवार्य है । जिन इच्छाओं और भावनाओं में प्रयत्न ही नहीं है वे वेकार हैं, स्वप्नतुल्य हैं । हाँ प्रार्थनाओं का एक उपयोग है; वह यह कि उनसे एक दृष्टि से उत्साह को बढ़ावा मिलता है कि परमात्मा हमारे पीछे हैं और हमारे प्रयत्नों को देख रहे हैं। यह तो बात सत्य है, और इससे हमारी प्रयत्न- शीलता बढ़ती है और फल लाभ हो जाता है । फिर भी प्रश्न होता है कि यदि परमात्मा की पूजा आराधना तथा प्रार्थनाओं से हमारा कुछ भी बनता या बिगड़ता नहीं है, और यदि वे न तो हमको कुछ देते हैं और न हमसे कुछ लेते या चाहते भी हैं, तो फिर वे हमारे व्यवहारों की दृष्टि से, नहीं के समान ही होते हैं ! ऐसी अवस्था में उनको मानने की ही क्या आवश्यकता है ? प्रश्न तो ठीक है, और उसका उत्तर भी है, कि कोई आवश्यकता नहीं है, यदि आप न्याय नीति तथा सदा- चार को माननेवाले हों। क्योंकि ये भी तो परमात्मा के मानों रूप भूत हैं जो व्यवहार के लिए पर्याप्त हैं। उदाहरणार्थ यदि कोई कहे कि आकाश में जो बृहस्पति नामक ग्रह है, उसको ग्यारह चाँद हैं, मानने की आवश्यकता ही क्या है ? हम तो अब तक एक भी चाँद नहीं है, ऐसा ही मानते आए हैं, और इससे हमारा कुछ भी बिगड़ा नहीं है । ठीक यही बात परमात्मा के विषय में, एक दृष्टि से चरितार्थ होती है । परन्तु सत्य की दृष्टि से हमको जानकारी होना भी अत्यावश्यक है। यदि आप बुद्धि प्रामाण्यवादी हैं और तर्ककुशल हैं, तो फिर आपको परमात्मा को मानना ही पड़ेगा; जिसके फलस्वरूप आप अपनी आत्मा में अखण्ड शांति और समाधान का अनुभव कर सकेंगे। और यूँ देखा जाए तो परमात्मा की सिद्धि के लिए हमको इतनी गहराई में जाने की भी कोई ज़रुरत नहीं है । आप किसी डॉक्टर से पूछिए तो ।
प्रातः स्मरण माला ४६ किन्त्वेषोऽद्भुतभावनोऽस्य महिमा जागर्ति कल्याणकृत् जन्तुर्येन शुभाशुभं वितनुते तत्तत्फलं विन्दते ॥२१॥ स्वाभिप्रायसिमं भृशं प्रकटयन् गीतासु चाह प्रभुः नैवाहं प्रददामि पायमथवा कस्मै च पुण्यं शुभम् । कर्तृत्वं विदधामि कर्मणि तथा धर्मेऽपि नो कस्यचित् स्वे स्वे कर्मणि यो रतःशुभकृती दक्षः म मेऽतिप्रियः ॥२२॥ मालूम होगा कि आपके शरीर के भीतर कैसे कैसे विचित्र यन्त्र और योज- नाएँ बनी बनाई हैं । वे इतनी आश्चर्यकारी हैं कि उनकी पूरी जानकारी का पता अभी तक बड़े बड़े डॉक्टरों को भी नहीं लगा है। क्या ये सब यन्त्र किसी मानवी कारीगर ने बनाएँ हैं ? इनके ऊपर तो हमारा कुछ भी वश नहीं चलता, प्रत्युत उन्हीं के वश में हमको सर्वदा रहना पड़ता है। यदि ये योजनाएँ किसी बुद्धि शील अति सूक्ष्मदर्शी निसर्ग की रची हुई हैं, तो यही हमारे परमात्मा हैं नाम कुछ ही रहे ! श्रीभगवद्गीता में भी नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र ने 'अहं वैश्वानरो' (गी. १५-३४) इत्यादि कहते हुए इसी बात का प्रत्यय दिलाया है । बृहदा- रण्यक उपनिषत् (३-४) 'उषस्त याज्ञवल्क्य' संवाद में भी इसी प्रकार का वर्णन और विवरण आ गया है । तात्पर्य जिनके अद्भुत 'प्रशासन' में सारे विश्व के व्यवहार अखण्ड और सुनियन्त्रित चल रहे हैं वही हमारे परमात्मा हैं । केवल वे हमारा कुछ उपयोग नहीं करते इस लिए उनको नहीं मानना यह स्वार्थी असमञ्जस की दृष्टि है । देखिए, निःस्वार्थ बुद्धि से खोज लगाने पर ही पाश्चात्य शास्त्रज्ञों को बृहस्पति के ग्यारह चन्द्रमात्रों का पता लगा। ठीक इसी प्रकार यदि हम निष्काम बुद्धि से अनुशोधन करेंगे तो हमको भी तत्त्वदर्शन' होने में कोई सन्देह नहीं है।
प्रातः स्मरण माला दिव्यं मे शुभजन्मकर्मचरितं भव्यार्थ बोधप्रदम यै तिं भुवि दिव्यकर्मणि रता वानुगास्ते मम । तेभ्योऽहं स्थिरबुद्धियोगमतुलं यच्छामि मत्प्राप्तये तद्योगान्वितदिव्यकर्मकृतिनस्ते नित्यसंन्यासिनः ॥२३॥ धर्म न्यायविरोधिनः स्मरंगणा ख्याता हिते शत्रवः त्याज्यास्ते बहुदूरतः सुधिषणैः क्षुद्राश्च या वृत्तयः । दिव्ये कर्मणि या त्वकर्मधिषणा सा शर्मदा मोक्षदा सा शक्या खलु दिव्यकर्मणि सतां सा विश्वशान्त्यै भवेत् ॥२४॥ या पूजा ह्यपचारषोडशयुता लोके प्रसिद्धिं गता साऽदिष्टा लघुमार्ग बोधनधिया सांकेतिकी शोमना । या हृद्या विहिता प्रभोरभिमता कर्तव्यरूपा परा तत्त्वजनकादिभिः सुकुशलैः सांऽगीकृता सूरिभिः ॥२५॥ १ वर्मानुगाः अनुचर, भक्त। २ कामक्रोधादि विकार । ३ जितने उदार एवं लोककल्याणकारी कर्म हैं, उनको वेदान्तशास्त्र की परिभाषा से 'अकर्म' कहते हैं, क्योंकि वे त्वार्थवाले नहीं होने से बन्धक नहीं होते । इसी दृष्टि से ऐसे कर्म करनेवाले पुरुष को 'अकर्ता' कहते हैं । अतः स्पष्ट है कि इन पारिभाषिक शब्दों से कर्मों का सुतरां अभाव नहीं बतलाया जाता, प्रत्युत 'दिव्य कर्मण्यता' प्रदर्शित की जाती है । अात्मा, परमात्मा 'अकर्ता हैं' इसका अर्थ वे कोई कर्म ही नहीं करते ऐसा नहीं, प्रत्युत उनके कर्म दिव्य होते हैं ऐसा है। इसी को परिभाषा से 'नैष्कर्म्य' भी कहते हैं । अर्थात् यह अकर्मण्यता नहीं है । 'अकर्म' शब्द से वेदान्त शास्त्र, अकर्मण्यता या निरुद्यमता का उपदेश नहीं करता है। ४ पूजा आराधनादि विधानों से भक्ति प्रेम के संस्कारों को बढ़ावा मिलता है, यह तो ठीक है परन्तु इनके साथ यदि सत्कर्मण्यता न हो तो वे बेकार हैं; परमात्मा को खुशामद प्रिय नहीं है ।
प्रातः स्मरण माला ५१ ईशस्यार्चन पूजनादि विषये मिथ्या मतिर्याशी लोके दृष्टिमुपैति तच्छतगुणा जप्ये विधी दृश्यते । विष्णोर्नामजपादि शुष्कविधिभिस्तत्स्तोत्रपारायणैः ग्रन्थानां रटनै निरर्थकतया लाभः कथं सम्भवेत् ॥२६॥ एके सत्पुरुषा विलिख्य निभृतं श्रीरामनामाक्षरैः साटोपान्बहुपुस्तकान्दधति तान्कोष्ठेऽथवा मंदिरे। एतत्सर्वमनर्थकं स्फुटनरं साध्यप्रहाणाध्रुवम् रामस्थाचरणं हि साध्यमनिशं रामस्य जाम्नो जपात् ॥२७॥ शब्दोच्चारण मात्रतो यदि भवेल्लाभः क्वचित्कस्यचित् मुक्तिश्चापि भवेच्छुकस्य सहजा रामस्य नाम्नो जणत् । आश्चर्य हि महत्कथं नु विषमा भ्रांति हितापायिनी लोकेषु प्रसृता ह्यनेकशतकै नांद्यावधि क्षीयते ॥२८॥ आयुर्नश्यति निद्रया प्रतिदिनं चालस्य खेलादिभिः तदृष्टया वरणीय उक्तरटनैः कालात्ययोऽयं जपे । इत्येतत्प्रतिपादनं न हितदं मोहप्रदत्वान्नृणाम् मिथ्याभावितभावनो जपविधिस्त्याज्यास्तु दोषाः परे ॥२९॥ तस्मात्काल विहापनं न च कदा कार्य हिनाकांक्षिभिः सारासार विचारयुक्तमतिभिश्चाध्यात्मदृष्ट्यन्वितैः । साध्ये दृष्टिरतीव निर्मलधिया देया प्रमादं विना साध्यं प्रोज्झ्यहि साधनं यदि भवेत्याज्यं हि तत्सर्वथा ॥३०॥ १ प्रभु रामचंद्रजी की दृढ़ सत्यनिष्ठा, उनका पितृवचन के परिपालन का कठोर व्रत, असीम स्वार्थत्याग, अपने भाइयों पर हार्दिक प्रेम, एक पत्निव्रत, सजनों का परित्राण और दुष्टों का तीव्र शासन, इत्यादि गुणों का जिस 'नाम- स्मरण' में अत्यन्त विस्मरण ही विस्मरण भरा पड़ा है, उसमें 'श्रीराम' नहीं हैं, और न वे केवल ऐसी चीख पुकार से आते भी हैं ! जिस जप में उत्कर्ष, सद्विचार तथा सत्कर्मों के लिए महती प्रेरणा नहीं मिलती है, वह 'जप' नहीं है। , ५२ प्रातः स्मरण माला ध्यानाभ्यासविधौ कुशाग्रधिषणा ह्यावश्यकी सर्वदा नानावृत्तियुता तथापि सुतरा लक्ष्यैकसंधायिनी। धारावाहिकरी तिभिः परिणतं बह्वीषु यत्तिषु ऐकायं प्रबलं तदेव हितदं शेयक लक्ष्ये स्थिरम् ॥३१॥ या जप्ये शुभभावना निगदिता सम्पादनार्था हि सा तद्वारा सुकरं भवेत्सुमनसा साध्यस्य सम्पादनम् । यज्ज्ञेयं न तु तद्विनैव यतनैः प्राप्तं भवेत्कर्हिचित् तत्त्वान्वेषण बुद्धियुक्त पुरुषै ध्येयः परात्मा प्रभुः ॥३२॥ १ परमार्थ या अध्यात्मविद्या यह बुद्धि प्रामाण्यवाला शास्त्र है, इसमें भाव- नाओं से कुछ नहीं बन पाता । यद्यपि 'तजपस्तदर्थ भावनम् ' ऐसी 'जप' शब्द की व्याख्या पातञ्जलयोग समाधिपाद सूत्र २८ में दी गई है, तथापि 'भावनम्' का श्राशय मन ही मन किसी मन्तव्य को कल्पनाओं या भावनाओं द्वारा बना लेना और उसकी मानसिक आवृत्ति करते रहना नहीं है, अपि तु 'अर्थ' को सम्पन्न करा लेना है। यहां अर्थ शब्द से सम्पाद्य वस्तु, प्राप्तव्य वस्तु, अर्थात् पुरुषार्थ का बोध होता है । एवं 'जप' शब्द का अर्थ बहुत गम्भीर है, परमात्मा का यथार्थ ज्ञान करा लेना है, केवल नाम का रटना या किसी आकृति का लगातार आवर्तन करते रहना नहीं है, समझ लेना है । , मनः संहरणं शौच मौनं मन्त्रार्थ चिन्तनम् अव्यग्रत्वमनिवेदो जपसम्पत्तिहेतवः । स्पष्ट है कि जप में तत्त्वचिन्तन और मौन, एवं मनन की महती श्राव- श्यकता है जिसके लिए तत्पर वृत्तियों का रहना भी आवश्यक है। इस रीति से जो निश्चय होता है उसी का नाम समाधि है।
प्रातः स्मरण माला ५३ तत्त्वावबोधएवासौ वालनाक्षयपावकः प्रोक्तः समाधिशब्देन न तु तूष्णीमवस्थितिः (महोपनिषत् अ. ४ श्लो. १२) समाधि की साधनावस्था में प्रयत्नशीलता तो रहनी ही चाहिए, अर्थात् अनेक उपकारक वृत्तियों का रहना भी आवश्यक है। इसके बाद 'समाधि' की अवस्था में, एवं चित्त की निश्चयावस्था में प्रयत्नवाली वृत्तियाँ तो स्वयं ही शान्त हो जाती हैं । परन्तु दूसरी वृत्तियाँ अाती ही नहीं सो बात नहीं। क्योंकि ऐसी वृत्तियाँ 'तत्त्वावबोध' को कोई बाधा नहीं कर पाती। और फिर, ज्ञानी पुरुष को दुवृत्तियाँ तो छू भी नहीं सकती । अर्थात् उसकी सारी भावनाएँ शुभकारक ही होती हैं । एवं किसी भी दृष्टि से समाधि का अर्थ चित्त की पाषाण रूपता नहीं है । सारांश 'भावनम्' या 'सम्पादन' का श्राशय 'ज्ञान' या 'तत्त्वावबोध' • को भावनाओं से अपने कल्पना राज्य में गढ़ लेना, या किसी कृत्रिमता से बना लेना नहीं है । तत्त्वावबोध एक स्वयं सिद्ध वस्तु है और वह हमको उपलब्ध न होने से हमें प्राप्त करा लेना तो आवश्यक है । अर्थात् जो कुछ प्रयत्नशीलता है वह इस उच्च तत्त्व की खोज में होनी है, इसको ढकने वाली अविद्या, या जो कुछ प्रतिबन्धक हैं. उनको हटाने के लिए है; वे यदि दूर हों तो तत्त्वावबोध स्वयंसिद्ध है । समाधि के सम्बन्ध में बहुत से लोगों के अन्तःतकरणों में विचित्र-सी धारणाएँ बैठ गई हैं, देख कर अचम्भा होता है । श्री स्वामी मधुसूदन सरस्वती ने अपनी भगवद्गीता की व्याख्या में छठवें अध्याय के श्लोक ६ से २६ तक टीका लिखते हुए जो सुन्दर प्रकाश डाला है देखते बनता है । कहना न होगा कि कभी कभी अनेक बौद्धिक श्रमों के बाद अथवा अन्य कई कारणों से चित्त में कुछ थकावट तथा उदासीनता छा जाती है, ५४ प्रातः स्मरण माला पूजाध्यानसमाधियोगविषये मिथ्या मतिर्याशी लोकेषु प्रसृता ततोऽप्यतितरां तत्त्वावबोधं श्रिता । माहात्म्याद्विषयस्य तद्विवरणं शक्यं न चास्मिस्थले स्वातन्त्र्येण हि तत्प्रमाणसहितं कार्य भवेदादितः ॥३३॥ नानामार्गजुषां पृथग्विधधियां वैचित्र्य कोलाहले गम्भीरेऽपि परार्थनिर्णयविधौ पाश्चात्यशास्त्रं क्षमम् । सूक्ष्मात्सूक्ष्मतराणुदर्शि गहनं श्लक्षणार्थदं सम्भवेत् इत्याभाति पुराणनव्यरचितग्रन्थानुसन्धानतः ॥३४॥ आस्तांतत्पुनरत्र कर्ममहतौ सम्प्रार्थयेऽहं मुदा सत्कृत्यैरिह लभ्यते सुकृतिभिः पुण्यं सुखं सद्यशः। राष्ट्रस्याभ्युदयोऽपि पौरुषयुतैः सत्कर्मभिः प्राप्यते लोकानन्दकरः समस्तसुकलासंतान वातकः ॥३५॥ संसिद्धिर्निजकर्मणा सुनियतेत्यादिष्टवान्यत्प्रभुः तत्किंचित्परिदर्शितं भगवता स्वातन्त्र्यदानेऽधुना । स्वातन्त्र्यार्थमहर्निशं प्रयतितं विध्नेषु घोरेषु यत् यञ्चात्मापि समर्पितः सुकृतिभिस्तेनैव तुष्टः प्रभुः ॥३६॥ जिसको हटाने के लिए निश्चिन्त व शान्त रहना आवश्यक होता है । इस प्रकार विश्रान्ति तो अवश्य ही लेनी चाहिए । परन्तु इससे धारणा ध्यान वाती समाधि अलग वस्तु है । १ यही कारण है कि आत्मविज्ञान या तत्त्वज्ञान के सम्बन्ध में द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, चार्वाक, मीमांसक, सांख्य, वैशेषिक, न्याय, पाशुपत इत्यादि अनेक विभिन्न मत उत्पन्न हुए हैं । २ जैवातृक : सदा के लिए रहने वाला ।
प्रातः स्मरण माला ५५ अस्मदास्य विमुक्तये प्रयसितं यैः कर्मवीरैर्भृशम् तेषां सच्चरितं सदा हृदि जनैर्धार्य लमुत्तेज कम् । तन्मध्ये प्रमुखः स्वभालतिलकः श्रीहिन्ददेव्याः प्रियः स्वातन्त्र्यार्थरणे पुरःसरपदः श्रीलोकमान्यःसुधीः ॥३७॥ आतंत्राणदृढव्रतः प्रियवचा गान्धी महात्मा क्षमी स्वातन्त्र्यप्रंधने शमास्त्रनिपुणोऽहिंसापरः सत्यवाक् । शांतिक्षांतियुगप्रवर्तकगुरुः शत्रोर्मनोमोहनः प्राच्यानां सुहृदग्रणीः प्रभुपरो देशस्य भक्तोत्तमः ॥३८|| धीरो वल्लभ भाइ सिंहसदृशः सावर्करो धैर्यवान् श्रीराजेंद्र महानुभावविभवो राष्ट्राधिपस्तत्त्ववित् । भास्वद्विश्वयशा [दारचरितो मन्त्री प्रधानो मणिः प्रेयान्पण्डितने हरुबहुगुणी श्रीराजगोपः सुधीः ॥३९॥ भूदानश्रमयज्ञशिक्षणगुरुर्भावे विनोबा मुनिः लाला लाजपातेः सरोजसुषमा देवी. सुभाषो विधुः। श्रद्धानन्दयतिः कृती कुलपतिः श्रीमालवीयः शुचिः सर्वे त्यागधनाः पैरेऽपि कृतिनः संगुप्तनामक्रियाः ॥४०॥ अन्ये चापि सहस्रशः समभवन्पूर्वेतिहासे शुभे सर्वेषामभिधानमान करणं नैवात्र शक्यं भवेत् । तस्माद्वर्णनमातनोमि कतिचिद्भव्यात्मनां भक्तितः तेष्वाद्यस्तु समर्थ आइततरः श्रीरामदासो महान् ॥४१॥ १ प्रधन-संग्राम २ इस नामावली में और भी बहुत नाम आ सकते हैं परन्तु लेखक उनको दे नहीं सका, अतः क्षमा प्रार्थी है ।
५६ प्रातः स्मरण माला वीरः श्रीशिवराजछत्रनृपतिर्माता तदीया 'जिजा' तेजोधैर्ययुता तथा सुधिषणाऽहल्या सती होळकरी । झाशीदेशविभूषिणी सुचरिता लक्ष्मीः सुवीराग्रिमा एताभिर्धवलीकृतं त्वतितरां श्रीहिन्दमातुर्यशः ॥४२॥ स्वातन्त्र्यार्थमहर्निशं प्रयतितं राणाप्रतापादिभिः धौरेयैः स्वपराक्रमैकविभवैः पञ्जाबसिंहैस्तथा । धन्यैः श्रीगुरुनानकादिपुरुषैर्धर्मप्रतिष्ठापरैः शौर्य यत्प्रकटीकृतं परिवृढं लोकेषु तद्विश्रुतम् ॥४३॥ माहाराष्ट्रजनैः पराक्रमधनैः स्वाधीनता सिद्धये श्रीबाजीप्रभृति प्रधानपुरुषैः शिंदे तथा होळकरैः । गायक्वाडमहोदयैर्बहुकृतं शार्दूलविक्रीडितम्। पुण्यश्लोसमाः प्रभोः सुभजका राष्ट्रीयसन्ता इमे ॥४४॥ एतेषां स्मरणं कृतज्ञमनसा कार्य प्रभाते जनैः देशस्याभ्युदये तथा स्वविषये कार्याः कृतीः शोभनाः। ज्ञातव्यं खलु कर्म पौरुषयुतं धर्म्य विमर्शान्वितम् श्रीशस्यार्चन पूजनादिविषये न्याय्यं भवेत् साधनम् ॥४५॥ एतच्चाप्यनुशीलयंतु विबुधा देशस्य भक्तोत्तमाः स्वातंत्र्ये तु महद्भय प्रतिदिनं स्वाभाविकं वर्तते । तच्चाप्यंतरवर्ति शत्रुनिचयात् भीमं यथा दारुणम् बाह्यस्थाद्रिपुसंचयान्न हि तथा विक्षोभकं संभवेत् ॥४६|| १ शार्दूल व्याघ्र । जिस वृत्त में यह स्तोत्र रचा गया है उसका नाम भी 'शार्दूलविक्रीडीत' है । यहाँ 'व्याघ्र जैसा पराक्रम' ऐसा अर्थ है ।
प्रातः स्मरण माला अस्मन्मध्यगता हि ये कुमतयो धर्मस्य विद्वेषिणः कॉम्यूनिस्टकपूयमार्गचरणा हिंसापरा निघृणाः । प्राथम्येन त एव घोररिपवोऽस्माकं विपक्षे स्थिताः तेषां हृत्परिवर्तनं सुकठिनं कार्य प्रयत्नैः परैः ॥४७॥ अस्मदास्यविमोचनार्थममित वीरैः सुधीभिर्यथा विक्रान्तं सुमहत्ततः शतगुणं विक्रान्तितव्यं बुधैः । स्वातंत्र्यस्य सुरक्षणेऽपि सुतरां कृत्वा दृढ़ निश्चयम् एतद्धयेव निज स्वधर्मसदृशं पुण्यं व्रतं जानथ ॥४८॥ अन्यच्चापि महत्तरं शुभकरं कार्य प्रकृष्ट निजम् आपाय सकलैर्मनस्तनुधनै रस्मद्धिताकांक्षिभिः । यच्चास्महुसंख्यबान्धवजनैः सर्वापदामास्पदम् दारिन्छ स्वनुभूयते विषसमं हीना च दीना स्थितिः ॥१९॥ तस्या नाशनमाशु शिक्षण धनैः कार्य नवीनोद्यमैः अस्पृश्यत्व निवारणादि यतनै ाय्यैश्च सत्कर्मभिः। अस्पृश्यत्वमतीव निघृणतरो दोषः स्वदेशे स्थितः योऽस्मदुर्गतिकारण बहुविध दास्यस्य दैन्यस्य च ॥५०॥ तस्यामूलनिबर्हणं समुचित यत्नैस्तथा साधनैः आपाद्य विधिभि विधेयकचयैरन्यरुपायैः शुभैः। अस्मन्मंगलमंदिरादि बहुषु स्थानेषु तीर्थेषु च तेषां स्वाधिकृतोऽस्तु तोषजनकः पूजासपर्याविधिः ॥५१॥ १ कपूय =बुरा, निन्छ । २ चरणा=चलनेवाले । ३ निबर्हण =पूरा नाश ५६ प्रातः स्मरण माला गोविप्रश्वपचादिषु प्रभुरपि प्राह स्वयं स्पष्टतः साम्या दृष्टिरतीव शुद्धमनसा कार्या विवेकान्विता। देवस्यैव निकेतने यदि तदीयाज्ञा न मान्या भवेत् एताभिः कृतिभिर्वदन्तु सुजनास्तुष्टः कथं स्यात्प्रभुः ॥५२॥ सत्यान्नास्ति परं हितं शुभकरं पुण्यं तथा शोधनम् सर्वेषां प्रियदं सुबुद्धिजनकं सत्यं हि धर्मो मतः। दीनानामहितप्रदोऽनयकरः दैन्यार्तितापप्रदः सोऽधर्मः स कदापि नाहति जने सन्मान्यतां पूज्यताम् ॥५३॥ 'बाबा' वाक्यसिति प्रमा न हितदा धिक्कारिता सज्जनः यस्तण समन्वितः स भगवान् प्राह स्वधर्मो मनुः । श्रीविश्वेश्वरमंदिरे यदि भवेद्विश्वप्रजानां गतिः , तāतच्च तदीयनाम शुभदं सार्थ सुबोधं भवेत् ॥५४॥ अन्याय्यो विषमो हि दर्शनविधिश्चाज्ञैर्जनै निर्मितः वात्सल्यं करुणा दया भगवतो ज्ञाता न तै बन्धुभिः । किं गंगाम्बुनि मज्जिते हरिजने गंगेव दुष्टा भवेत् ? श्रीविश्वेश्वर दर्शने हरिजनैः भ्रष्टः कथं विश्वदृक् ? ॥५५॥ विश्वेशो यदि दुष्यतां न च मनाग्याति स्वयं पावनः तस्यार्चाविधिपूजनादिकरणे मनः कथं दोषभाक् ? । साश्वर्याधपरम्परा त्याज्या सा प्रथम दृढेन मनसा प्राप्ते स्वराज्ये शुभे ॥५६॥ नानासंकटकारिभिर्बहुविधैरेतादृशैः कारणैः भ्रान्त्युन्मादयुतैः प्रमादबहुलैः कार्यैश्च दोषान्वितैः । ह्यानुसृता प्रशाविहीनै जनः १ विश्वप्रजानां गतिः सभी लोगों को प्रवेश और दर्शन प्रातः स्मरण माला ५६ साहस्राब्दिकदीर्घकालिकमहोऽस्माभिः परं दारुणम् भुक्तं दास्यमतीव निपुणतरं नः संस्कृतेर्नाशनम् ॥५७।। तस्माज्जागृत जागृत प्रणयिनश्चालम्बयध्वं हृदा गीताप्रोक्तमतीवनिर्मलशुभं दैवं सुवित्त परम् । तदृष्टया चिनुत स्वधर्मममलं सानातनी संस्कृतिम् चित्ते स्थाप्य दृढां, स्वदेशहितदं चैक्यं कुरुध्वं बुधाः ॥५८|| सम्पत्ति धनिका भवत्सु बहुधा देवेन या स्थापिता तस्याः सम्प्रति सद्व्ययस्य समयो वर्वति यूयं ततः । साहाय्यं स्वधनै नवोद्यमकृते लोकस्य संयच्छत यंत्रोद्योगसमुच्चयान रचयत स्वीयोन्नतेः कारणात् ॥५९॥ जीणांस्ताः स्वकलाः कुरुध्वममला नव्याश्च ता उज्ज्वलाः पाश्चात्यांश्च निजान्मुविज्ञपुरुषान्कृत्वा गुरून् कर्मशः। अस्मद्देशभव हि वस्तुनिचय क्रीणतु सर्वे जनाः मैवांगीकुरुतान्यदत्तमपि सद्वस्त्वन्य देशोद्भवम् ॥६॥ किं वाच्यं बहुना स्वराष्ट्रसुगतौ यद्यद्धयनर्थावह तत्तत्याज्यमतीव जागृतधिया देशस्य भक्तोत्तमाः । एवं राष्ट्रमहत्वलाधनविधौ संयोजयध्वं बलम् स्वं राज्यं पुनरुच्छ्रयध्वमखिले भूमण्डले सर्वथा ॥६॥ ज्ञातव्यं खलु सर्व साधकजनैरेतद्रहस्यं प्रियैः * उत्साहो बलवान् विमर्शसहितः संजीवकोद्धारकः * इस सम्बन्ध में श्री वाल्मीकि रामायण के निम्न श्लोकों का स्मरण हुए बिना नहीं रहता:- ६० प्रातः स्मरण माला निर्वेदः सुतरां विनाशकरणो नृणां जराव्याधिदः दौर्बल्य विमनस्कतां विदधते दैन्यं च कष्टान्बहून् ॥६२॥ वृद्धश्चापि वलीयुतो यदि भवेदुत्साहयुक्तः पुनः तारुण्यं समवाप्नुयात्सुखकरं चारोग्ययुक्तं वपुः । वैपर्यात्सुहढो युवा यदि भवेदुत्साहहीनो नर: तूर्ण दुर्बलतां जरां च सरुजां यायात्स चिन्तां वहन् ॥६३।। 'निवेदो' हि रुजा मता भयकरी तस्याश्चिकित्सामिमाम् व्याधिज्ञा प्रतिपादयति कुशला ईशस्य भक्तोत्तमाः । स्वान्तः स्फूर्तिकरं 'विमर्श' गदितं चापीयतामौषधम् सत्कृत्यैः सहलेवितं वितनुते सौहार्दमोजस्करम् ।।६।। अनिर्वेदं च दाक्ष्यं च मनसश्वापराजयम् कार्यसिद्धि कराण्याहुस्तस्मादेतद्रवीम्यहम् । ४-४९-६ अनिर्वेदः श्रियो मूलम् अनिर्वेदः परं सुखम् । ५-१२-१० अनिर्वेद का अर्थ उत्साह है, कहना न होगा कि यह 'दैवी सम्पत्ति' वाला उत्साह है. धर्म और नीति नियमों का विरोध करनेवाला नहीं । १ निर्विएणता या निरुत्साह के लिए यदि कोई सफल दवा है तो वह सारासार सर्वांगीण विवेक और शीघ्रता से किसी अच्छे काम में लग जाना ही है । अपने मित्रों से सलाह लेना भी आवश्यक है । कुछ नहीं तो तुरन्त उठ कहीं दूर भटक आना भी अच्छा है । परिश्रमों के बाद जब नींद पा कर मनुष्य उठता है तो वह हलका होता है । फिर प्रभावोत्पादक विचारों से उसे उत्साह भी श्रा जाता है। देखना चाहिए कि संसार में निरुत्साह के प्रसंगों से कौन बचा है ? वर्तमान युग के प्रवीण शास्त्रज्ञ स्वर्गवासी श्राइन्स्टाईन् ने लिखा है कि उनकी तौ कल्पनात्रों में, निन्यानवे बेकार होती थीं और एकाध ही यथार्थ निकलती थी ! संसार की तो यही घटना है, जान कर अपनी उन्नति के लिए आगे बढ़ना हमारा कर्तव्य है । एक कवि ने कहा प्रातःस्मरण माला जीवानां मनसि प्रधावति महा या वासनानां सरित संयुक्ता बहुभिः शुभाशुभफलैः सद्वृत्तिदुर्वृत्तिजः । तस्याः संयमनं दृढेन मनसा कार्य विचारैः शुभैः निष्कास्याश्च कुवृत्तयः सुनियतं स्थाप्य मनः सत्पथे ॥६५॥ प्राज्ञेनात्महितैषिणा प्रतिदिन ध्यातव्यमेतत्स्फुटम् किं किं वाद्य मया कृतं पशुसमं किंचाप्युदारं शुभम् । कार्यों निश्चय एष यत्सुचरितं तत्त्वेव सम्पादये यच्चान्यत्परिगर्हितं सुकृतिभिस्त्यक्ष्यामि तत्सर्वथा ॥६६॥ यावन्नैव मया किमप्यपकृतं कस्यापि धीपूर्वकम् नैवं चाप्यपभाषितं न च मनाग्दुश्चितितं कस्यचित् । तावत्कारणमेव नास्ति सुतरां दुःखस्य खेदस्य मे इत्येवं परिचिन्तयन्सुमनसा कर्तव्यनिष्ठो भवेत् ॥६॥ स्वं कार्यविशुद्धनिश्चितधिया प्रारम्भयेत्सज्जनः धैर्य नैव परित्यजेत्प्रभुपरः कुर्यादिमं निश्चयम् । श्रीविश्वेशविसृष्टकर्मनियमै हृद्यैः प्रियैर्धार्मिकैः प्राप्स्ये स्वीयमभीष्टमात्मसुखदं निर्जित्य विघ्नान् बहून् ॥६८|| सर्वदा स्वहितमाचरणीयं किं करिष्य ति जनो बहुजल्पः विद्यते न हि कश्चिदुपायः सर्वलोकपरितोषकरो यः ॥१॥ कस्यचिकिमपि नो हरणीय मर्मवाक्यमपिनोच्चरणीयम् । श्रीपतेः युगमरणीय लीलया भवजलं तरणीयम् ॥२॥ २ रुजा= बीमारी । ३ देखिये पृष्ठ ३१ श्लोक १४ ।
६२ प्रातः स्मरण माला अज्ञो जंतुरनीश एव सुतरां स्वीये सुखे वाऽसुखे स्वर्य वा नरकं नियोजित इव प्रेयात् प्रभोराशया। इत्थं यस्य मतिः परिभ्रमयुता शेयः स शुद्धः पशुः इत्यूचे भगवान् प्रशांतहृदयः प्राजो वसिष्ठो मुनिः ॥६९॥ आशीयाः परमं हि दुःखमनिशं नैराश्यमेवातुलम् सौख्यं ये प्रवदंति पण्डितजना नैतत्सुयोग्यं भवेत् । आशा या विहिता स्वधर्मसहिता त्याज्या न सा कर्हिचित् आत्मोद्धारविधौ मता सुबलिनी श्रेयः प्रदा स्फूर्तिदा ॥७०।। नैराश्यं भणितं तथा निरुपम सौख्यं सुतुष्टिप्रदम् 'तत्त्वज्ञान' महो निरुद्यमवतामेतद्दरी दृश्यते । यद्यञ्चास्ति विमर्शधर्मरहितं तद्धयेव दुःखप्रदम् यद्यञ्चास्ति विमर्श धर्म सहितं पुण्यं हितं जानथ ॥७॥ रे दौराश्यं न समावेदहितदं नैराश्यमेवापि नो कामक्रोधमदामनोविकृतयस्त्याज्यास्तु ता दूरतः। याचावृत्तिरतीव खेद करिणी देहीति धिग्जीवितम् दक्षो धर्मपरः सदुधमरतः सौख्यं प्रतिष्ठां व्रजेत् ॥७२।। जन्तूनां निजकर्मधर्मजनितं यस्मात्सुखं वाऽसुखम् तस्मानास्ति हि कारण विमृशतः दुःखस्य खेदस्य वा । धैर्येणैव सहेत यत्परिणतं स्वानुष्ठितात्कर्मणः आगामिन्यतिसावधानमनसा युक्तो भवेत्कर्मणि ॥७३|| १ देखिये पृष्ठ ३० श्लोक ८ । २ 'आशायाः परमं दुःख नैराश्यं परमं सुखम्' यह कहावत 'निरुद्यमता' को ही पुष्ट करनेवाली है । हाँ दुराशा करना ठीक नहीं है, परन्तु 'नैराश्य' को ही परम तत्त्व ठान लेना कदापि ठीक नहीं हो सकता।
प्रातः स्मरण माला मान्यं यच्च कदा कदा क्षितितले तापप्रदं कारणम् दुःखानां प्रभवेद्विचित्रघटनासंजातमा कस्मिकम् । वैचित्र्याजगतो भवेत्सुमहतां घोरः प्रसंगो महान् तस्मान्नैव विचालयेन्निजमनः सम्यग्विचारे स्थितः ।.७४|| एवं नास्ति कदापि कारणमहो दुःखस्य शोकस्य वा यस्यांवापि विवेकधी विपदवस्थायां भवेत्पूरुषः । श्रेयांसि स्वहितानि विघ्नबहुलान्येतन्न चित्रं भवे धीरा ये च कृतोद्यमा न विरमंत्यंगीकृतात्कर्मणः ॥७॥ उद्योगैः खलु लभ्यतेऽत्र सुजनैः स्वेष्टं फलं दुर्लभम् यत्नानां फललम्भनानवनवोत्साहः समुत्पद्यते। यत्नश्चेद्विफलो भवेदपि तदा शोकस्य किं कारणम् ? प्राज्ञानां सुविचारतः स्वहितदो मार्गः समालम्ब्यताम् ॥७६॥ कार्य तस्य विनष्टमेवसुतरां यो विश्वसेन्नात्मनि स्वात्मप्रत्ययपूर्वकोद्यमवतः सिद्धिः सदा निश्चिता। सौख्यं चापि तदीयमेति विलयं योऽन्यावलम्बी भवेत् स्वायत्तं हि सुखं सदा प्रियकर नान्यद्वशं कस्यचित् ॥७७॥ १ समर्थ श्री रामदास की उक्ति है:- जो दुसरान्यावरी विश्वासला । त्याचा कार्य भाग बुडाला जो आपणचि कष्टत गेला । तोचि भला (दासबोध १६-६-१६) यह कितनी उत्तेजनापूर्ण तथा मर्मवाली चेतावनी है ? ठीक यही बात सुख विद्या ज्ञान धन इत्यादि के लिए भी उपपन्न होती है, जो श्लोक ७७, ७८, तथा ७६ में ध्वनित की गई है।
प्रातः स्मरा माल .. विद्याशानधनादिसाधनविधौ स्वायत्तता सिद्धिदा कष्टोपार्जितलाधनैनिजकृतैः स्याज्जीवित सौख्यदम् । वैपर्याद्विकलं विडम्बनसमं स्याज्जीवितं नीरसम् स्वायत्तत्वमतिप्रिय हितकरं स्फूर्तिप्रदं सर्वथा ॥७८॥ स्वानन्दं न च हापयेद्वहुविधाकार्यान्समापादयन् स्वानन्दस्तु सदा स्वपौषभृतः, नो भावनाभावितः । व्यर्थे काल्पनिके सुखे न हि सुखं तद्गर्हितं सज्जनः ज्ञेयं तत्तु 'पलायनं' स्वसुखतःभ्रांत्यां कथं स्यात्सुखम् ? ॥७९॥ तस्मात्कार्यपरो भवेद्विगतभीर्येयैकनिष्ठः पुमान् शक्याशक्यविचारणाबलयुतः सर्व समालोचयेत् । क्रोधद्वेषपरो भवेन च कदा शत्रौ तथाऽन्ये जने द्वैषाग्निर्हृदयं दहेदनुदिनं त्याज्यः स सन्तापकृत् ॥८॥ प्रद्वेषो द्विषतां भवेन्निजमनः क्षोभाय दुःखाय च क्षोभो यो मनसः स एव हृदये दौर्बल्यमापादयेत् । । दोबल्याच्च पुनर्भवेद्रिपुबलोत्साहस्य संवर्धनम् तस्माद्वेषगुणं त्यजेदतितरां द्रुह्यत्सु चारातिषु ॥८१॥ २ श्लोक ८० से ८३ तक लेखक ने स्वर्गवासी महात्माजी के तत्त्वज्ञान का अनुवाद करने का प्रयास किया है। क्रोधद्वेषादि विकारों से दूसरों की कोई हानि नहीं होती प्रत्युत हमारी ही बहुत हानि हुआ करती है । ये विकार हमको भुलावे में डालते हैं, दीवाना बना देते हैं, और इस रीति से बहुत अत्याचारों के भी कारण हो पाते हैं । अतः इनको त्यागने से हम दूसरों का कोई उपकार नहीं करते हैं अर्थात् हम हमारा ही बहुत लाभ करते हैं इसमें संदेह नहीं है।
प्रातः स्मरण माला ६५ नास्याओं रिपवः प्रदुष्टचरणा देशस्य विद्रोहकाः नो वध्या परमोच्चशांतिसहितैः सत्वाव्यशीलै नरैः। शत्रूणां प्रतिधातनं विधियुतं त्वावश्यकं धर्मतः स्मर्तव्यं त्विदमेव निग्रहविधौ द्वेषस्य नो कारणम् ॥८२॥ तेषां हृत्परिवर्तने प्रथमतः कार्यस्सुयत्नस्ततः योक्तव्याश्च सुयुक्तयो बहुविधाः सामाधुपायान्विताः । नो चेच्चापि कठोरतीव्रगदितैरन्यरूपायै बलात् सम्पाद्य स्वहितं तथा रिपुहितं मार्गेस्सतां शोभनैः ।।८३।। धन्योऽसौ मनुजःस्वकीयचरितैर्यः प्रीणयेत्सज्जनान् अन्येषामुपयोगि कार्यकरणे स्वानन्दलाभः सताम् । स्वानन्दस्तु स एव शोभनगुणो योऽन्यान्समुल्लासयेत् स्वानन्दाम्बुधिगाहने कुशलिनांशोकस्य किं कारणम् ? ॥४॥ प्राज्ञानां किल कामधेनुरपरा शुद्धावदाता मतिः दुग्धे याऽभ्युदयं रुणद्धि विपदः सूते यशांसि प्रिया। प्राज्ञानामधिकं बलं प्रभवति प्राप्ते परे संकटे अक्षोभ्या हि भवंति ते सुकृतिनस्त्वेवं हि तल्लक्षणम् ||८५|| किं सम्पाद्यमतंद्रितेन मनसा, विद्या, बलं, पौरुषस् किं वाऽलंकरणं सतां प्रियकर, शीलं प्रभावान्वितम् । कः शत्रु, निजचित्तविप्लवकरोदुर्वासनासञ्चयः किं मित्रं, सदसद्विवेक निपुणः स्वान्ते विमौदर्यः ॥८६॥ १ अक्षोभ्याः = किसी भी विपत्ति में जो विचलित नहीं होते। २ विप्लवकरः धूम मचानेवाला, क्षोभकारी 3 स्वान्तः = हृदय विमर्श =सद्विचार, यथार्थ ज्ञान । , ६ प्रातः स्मरण माला किं शास्त्रं, श्रवणेन यस्य गलति ध्वान्त स्वचित्ते स्थितम् को धर्मोऽभ्युदयादिमुक्तिफलदः कश्चार्थ, ईशे गतिः। कः कामो, जनतार्तिदैन्यहरणं न्याय्ये पथि स्थापनम् को मोक्ष, श्चरितं निरंकुशसुखं तेजस्विधर्मान्वितम् ॥८७।। मोक्षो नास्ति दिगंतधामनि क्वचिन्नवांतराले न खे पाताले न च भूतलेऽदिशिखरेऽरण्ये तथा मागरे । साऽवस्था न च मृत्युना व्यवहिता, नैर्मल्य पूर्णा परा सम्यग्ज्ञानयुता निरंकुश सुखा चात्रानुभाव्या स्थितिः ॥८॥ एवं पौरुषमेव भक्तिसुलभ त्वालम्बनीय बुधैः लोकानां हितमार्गदं सुखरं साम्यप्रतिष्ठाकरम् । सर्वप्राणिषु भ्रातृभाव जनकं न्यायप्रदं शांतिदम् देशस्याभ्युदयादिगौरवकरं चात्मप्रमोदावहम् ॥ ९॥ श्रीशे येन समर्पित स्वहृदयं सर्वाणि कर्माणिच सिद्धिस्तस्य यशोन्विता सुनियता स्वान्तस्य शुद्धि वा । अध्यात्म यदि चिन्तयेत्स मतिमान् श्रुत्यर्थमालोचयन् तत्त्वज्ञः सुविचारयनिज हृदि ध्यायन्परेशं परम् ॥९०॥ १ ध्वान्त = अन्धेरा । २.निरंकुशसुख = जिस सुख को सीमा नहीं, ऐसा सुख या आनन्द; 'अत्र ब्रह्म समश्नुते' (काठकोपनिषत् ६-१४). 'हस्ता मलक' स्तोत्र के छटवें श्लोक पर टिप्पणी लिखते हुए शंकर भगवान् कहते हैं 'जीवतस्तावत् तत्त्वज्ञानमुत्पद्यते न तु मृतस्य' प्रातः स्मरण माला ६७ क्षिप्रं तस्य सकृद्विभातममलं ज्ञानं परं प्रोल्लम्मेत् सर्वेषां विशदं विशालहृदयः संबोधयेत्स श्रितान् । सर्व तस्यभवे त्सुनिश्चयकृतं लोकस्य कल्याणकृत् चारित्र्यं खलु तस्य सोज्जलशिव चादर्शपूर्ण भवेत् ॥९॥ तत्वज्ञानसुनिश्चितार्थहृदयो यो वीतरागः क्षमी धर्मज्ञः सुविचारवान्प्रभुपरो निष्कामभक्तः शुचिः । भूतानां हितकर्मकृत् स रमते सत्कार्यनिष्ठः सुखी स्वानन्दामृतवारिधौतसुमनाः प्रोल्लासपूर्णः सदा ॥९२।। ज्ञानानन्दरसालयं श्रुतिपदैवेद्यं परं शान्तिदम् ध्येयं चाखिल योगिभि मुनिमनोहंसावतंसं प्रियम् । लीलासृष्ट जगत् त्रयं सुविमलं प्रत्यक्स्वरूपं शिवम् त्वामीशं शरण व्रजामि सहजानन्दोज्ज्वलं पावनम् ॥१३॥ . १ श्री समर्थ रामदास लिखते हैं :------ जितुकें कांहीं आपणासी ठावे । तितुके हळु हळु सिकवावे । शाहाणे करून सोडावे । बहुत जन ॥ (दासबोध १६-१०-१४) अपने को जो कुछ आता है, वह दूसरों को सिखा देना, समझा देना यह ज्ञानी पुरुषों की रीति है। २ ज्ञानी पुरुषों का आचरण 'बालोन्मत्तपिशाचवत्' रहता है ऐसा विचित्र प्रतिपादन कुछ ग्रन्थों में मिलता है। परन्तु यह कल्पना भ्रांति मूलक और जनता को संभ्रम में डालनेवाली है, अतः त्याज्य है। क्या श्रीकृष्ण भगवान् या श्री याज्ञवल्क्यजी या जो दूसरे बड़े बड़े जो आचार्य हुए हैं उनका आचरण इस प्रकार का था ? हमारे समाज में जो अनेक भ्रांत धारणाएँ प्रचलित हैं उनमें यह भी एक है।
६८ प्रातः स्मरण माला योगक्षेमधुरंधरस्य भजतां सद्बुद्धिदातुः प्रभोः 'अहोद्यमशालिनां कृतिमतां श्रेयः प्रदातुस्तथा। प्रत्यग्ज्ञानसुखात्मकस्य भवतः किं प्रार्थनीयं मया? श्रीश त्वं परमान्तरङ्ग इति मे चित्ते स्मराम्यन्वहम् ॥९४॥ तेजः कान्तिमयै विवेक कुसुमैः सद्धर्मसूत्रान्विता सौरभ्यान्वित नीतिकर्ममणिभिः श्रीवैजयन्तीसमा। मालैषा स्वपरार्थसाधनाहिता प्रोता समुल्लासिनी श्रीकृष्णाय समर्पिता भवतु वां श्रेयस्करी हृत्प्रिया ॥९॥ इति गार्गिलोपाढेन श्रीदामोदरात्मजेन महादेव शर्मणा विरचिता स्वराज्य- प्रबोध-माला सम्पूर्णा । श्रीमधुसूदनसरस्वतीकृत कुछ सुन्दर श्लोक उपर्युक्त स्वामीजी ने अपनी भगवद्गीताव्याख्या में श्रीकृष्ण भगवान् के वर्णनरूप सुन्दर श्लोक रचे हैं वह नीचे दिये जाते हैं :-- त्रयोदश अध्याय के प्रारम्भ में :- ध्यानाभ्यास वशीकृतेन मनसा तन्निर्गुण निष्क्रियम् ज्योतिः किंचन योगिनो यदि परं पश्यति पश्यतु ते । अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरम् कालिन्दीपुलिनेषु यत्किमपि तन्नीलं महो धावति ॥१॥ १ प्रोता-रची, बनाई।
प्रातः स्मरण माला ६६ चतुर्दश अध्याय के अन्त में पराकृतनमद्वन्धं परब्रह्म नराकृति । सौन्दर्यसारसर्वस्वं वन्दे नन्दात्मज महः ॥२॥ पञ्चदश अध्याय के अन्त में वंशीविभूषितकरान्नवनीरदामात् पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात् पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमह न जाने ॥३॥ . और भी कुछ सुभाषित दो| दोभ्या वजंतं ब्रजसदनगणाहाबनतः प्रोल्लसंतम् मन्द मन्दं हसंतं मधुमधुरगिरा मेति मेति ब्रुवन्तम् गोपालीपाणितालीतलितवलयध्वानमुग्धांतरालम् वन्दे तं देवमिन्दीवरदलविमल श्यामलं नन्दबालम् मातः, किं यदुनाथ, देहि चर्षकं. किं तेन, पातुपयः सद्योनास्ति, कदाभवेनिशि, निशा का, सान्धकारोदये। आमील्याक्षियुगं निशाप्युपगता, देहीति मातुः पुन- वक्षोजाम्बरकर्षणोद्यतकरः कृष्णः स पुष्णातु वः ।। कृष्णेनाम्ब गतेन रन्तुमधुना मृद्भक्षिता स्वेच्छया सत्यं कृष्ण ? किमेष आह मुंसली ? मिथ्याम्ब पश्याननम् । व्यादेहीति विकासिते च वदने दृष्ट्वा समस्तं जग- न्माता यस्य जगाम विस्मयपदं पायात्स वः श्रीपतिः ॥ . १ प्याला २ बलभद्र ३ खोलो ७० प्रातः स्मरण माला श्रीसमर्थ रामदास कृत मन को बोध इस हृदयग्राही उपदेश के श्लोकों की संख्या २०५ है जिसका सुन्दर भौषान्तर अादरणीय डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र ने किया है । इनमें से कुछ १ अाधुनिक पाश्चिमात्य वैज्ञानिकों की धारणा है कि हमारी निद्रावस्था में, जैसी हृदय, रुधिरामिसरण और श्वासोच्छ्वासादि क्रियाएँ चलती रहती हैं, ठीक उसी प्रकार हमारे मन में संकल्प विकल्पों के ताने और बाने बुनते रहने की क्रियाएँ भी चलती रहती हैं । क्योंकि मन भी शरीर का एक अवि- च्छिन्न भाग है और शरीर की जीवनपोषणादि ( Metabolism की ) क्रियाएँ जैसी अविराम चलती रहती हैं उसी प्रकार मनोविकास की क्रियाएँ भी निद्रा में चलती रहती हैं । देखिए Philosohby in a new key by Lusanne. K. Langer. पृष्ठ २९ तथा ३३ । बहुत से विद्वानों ने अनुभव किया है कि जिन विकट प्रश्नों का हल, उनकी जागृत अवस्था में उन्हें नहीं सूझा था, अच्छी निद्रा के बाद उनको सहजता से हो गया ! एवं मनको भी उदार विचारों से पोषण भरण करने की बड़ी आवश्यकता है, ताकि निद्रा में उसका सुन्दर विकास होता रहे । शरीर का न्याय उसे भी लागू होता है । प्राचीन ऋषियों ने भी बताया है कि हमारे मन का कार्य, हमारी निद्रा में भी होता रहता है, और इस दृष्टि से उन्होंने परमात्मा से शुभ संकल्पों के लिए प्रार्थनाएँ रची हैं, देखिए पृष्ठ २० । छान्दोग्य उपनिषद् में 'मनोऽस्य दैवं चक्षुः' (८-१२-५) पर व्याख्या श्री शंकराचार्य लिखते हैं 'मनस्तु त्रिकालविषयोपलब्धिकरणं मृदितदोषं दैवं चतुरुच्यते' । एवं श्रीरामदास ने भी मन का, प्रेम से हुए भावन उपदेश किया है। २ मिलने का पता : प्रकाशक मो. मा. खरे रामदासपेठ नागपुर म. प्रान्त करते हुए अनुनय करते उसको मन-
प्रातः स्मरण माला
चुने हुए श्लोक सभाषांतर नीचे दिए जाते हैं ।
मनाचे श्लोक
भाषान्तर 'हृदयबोध'
गणाधीश जो ईश सर्वां गुणांचा । गुणाधीश स्वामिन् ! गणाधीश नाम
मुळारंभ प्रारम्भ तो निर्गुणाचा । अगुण ब्रह्म के आदि रूप ! प्रणाम ।
नमूं शारदा मूलचत्वार वाचा । नमो शारदा! आदिवाणी स्वरूप;
गमो पंथ आनंत या राघवाचा ॥ मिले रामका मार्ग अक्षय अनूप ॥१॥
मना ! सज्जना भक्तिपंथेचि जावें । सुजन मन ! सदा राम के पथ में जात्रो
तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावें । तो तुम श्रीहरी को सहज में हि पात्रो ।
जनीं निंद्य तें सर्व सोडूनि द्यावें । जो हो लोक में निंद्य, तुम उसको छोडो
जनीं वंद्य तें सर्व भावें करावें ॥ जो हो वंद्य, उस तत्त्व से भाव जोडो ॥२॥
प्रभाते मनीं राम चिंतीत जावा। सबेरे सदा राम का ध्यान कीजै
पुढे वैखरी राम आधी वदावा। तथा कण्ठ से राम का नाम लीजै ।
सदाचार हा थोर सांडू नये तो। सदाचार को जो नहीं त्यागता है
जनीं तोचि तो मानव धन्य होतो ॥ जगत् में वही नर कहाता बड़ा है ।।३।।
मना वासना दुष्ट कामा न ये रे । हृदय ! वासना दुष्ट-कामा न होवे
मना सर्वथा पापबुद्धी नको रे । हृदय ! पाप की बुद्धि को तू न ढोवे ।
मना धर्मता नीति सोडूं नको हो । हृदय ! धर्म की नीति को तू न त्यागे
मना अंतरीं सारवीचार राहो ॥ हृदय ! सद्विवेक-प्रभा नित्य जागे ॥४॥
मना पापसंकल्प सोडून द्यावा । सदा पाप-संकल्प को दूर कीजै
मना सत्य संकल्प जीवीं धरावा । सदा सत्य संकल्प पै चित्त दीजै ।
मना कल्पना ते नको वीषयाची। विषय वासना-कल्पना भी न आवे
विकारें घडे हो जनी सर्व छी छी । बिकारी यहाँ लोक-निन्दा हि पावे ॥५॥
૭૨
प्रातः स्मरण माला
नको रे मना क्रोध हा खेदकारी । करो क्रोध को दूर है खेदकारी
नको रे मना काम नानाविकारी। तथा काम त्यागो, बड़ा है विकारी ।
नको रे मना सर्वथा अंगिकारूं । न हो मत्त मद से कि है नाशकारी
नको रे मना मत्सरू दंभभारू || हटा भार दो दम्भ मत्सर का भारी ॥६॥
मना श्रेष्ठ धारिष्ट जीवीं धरावें । सदा चित्त में धैर्य ही को गहो मन !
मना बोलणें नीच सोशीत जावें। कड़ी बात भी शान्ति ही से सहो मन !
स्वयें सर्वदा नम्रवाचे वदावें । सदा नम्र वाणी सभी से कहो मन
मना सर्व लोकांसि रे नीववावें । सभी को इसी भांति अानद दो मन ||७||
देहे त्यागितां कीर्ति मागें उरावी। मिटे तो मिटे तन् न यश मिटने पाये
मना सज्जना हेचि क्रीया धरावी । सुजन मन ! करो काम ऐसे सुहाये ।
मना चंदनाचे परी त्वां झिजावें । पिसो चाहे चन्दन से तुम कष्ट सहकर
परी अंतरीं सज्जना नीववावें ।। करो शान्त सन्तुष्ट सज्जन का अन्तर ।।८।।
को त्याग
दीजै।
सदा सर्वदा प्रीति रामी धरावी । सदा सर्वदा राम में प्रीति कीजै
दुःखाची स्वयें सांड जीवीं करावी । स्वयं चित्त से दुःख
देहेदुःख तें सूख मानीत जावें । जो हो देह का कष्ट सुख उसमें मानो
विवेकें सदा स्वस्वरूपी भरावें || विवेकस्वरूपी सदा निज को जानो ॥६॥
जनीं सर्व सूखी असा कोण आहे । यहां कौन है, सर्व सुख जो कि पाले,
विचारी, मना तूंचि शोधूनि पाहे । विवेकी, तुही शोध ऐसा लगा ले ।
मना स्वाचि रे पूर्वसंचीत केलें । किया पूर्व संचित हृदय ! कर्म जैसा
तया सारखे भोगणे प्राप्त झाले ॥ हुअा प्राप्त है तुझको भव भोग वैसा ॥१०॥
मना मानसीं दुःख आणू नको रे । हृदय ! चित्त में दुःख को मत बुलारे
मना सर्वथा शोक चिंता नको रे । हृदय ! सर्वथा शोक चिन्ता न ला रे ।
विवेके देहेबुद्धि सोडूनि द्यावी । विवेकी ! हटा देह-बुद्धित्व-रोग
विदेहीपणे मुक्ति भोगीत जावी ॥ विदेही-पने से परा भुक्ति भोग ॥११॥
प्रातः स्मरण माला ७३ , दिनानाथ हा राम कोदण्डधारी । धनुर्धर प्रभू राम, दीनों के स्वामी पुढे देखतां काळ पोटी थरारी । उन्हें देख होता है यम भी प्रणामी । मना वाक्य नेमस्त हे सत्य मानी। निर पवाद है सत्य ही शास्त्रबानी नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ।। उपेक्षा करेंगे न दासाभिमानी ।।१२।। समाचिया सेवका वक्र पाहे । समर्थ-प्रभू-भक्त को वक्र देखे असा सर्व भूमंडळी कोण आहे ?। हुअा कौन ऐसा कहां, कौन लेखे ? जयाची लिळा वर्णिती लोक तीही। त्रिलोकी में लीला विजय की बखानी नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ।। उपेक्षा करेंगे न दासाभिमानी ॥१३॥ । सदा सर्वदा देव सन्नीध आहे । निकट हैं सदा सर्वदा वे निरामय कृपाळूपणे अल्प धारिष्ट पाहे । जो कुछ धैर्य हो तो मिलेंगे दयामय । सुखानन्द अानन्द कैवल्यदानी । सुखानन्द अानन्द कैवल्यदानी नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी ।। उपेक्षा करेंगे न दासाभिमानी ॥१४|| • सदा देवकाजी झिजे देह ज्याचा । सदा देव के कार्य में देह लभ सदा रामनामें वदे नित्य वाचा । सदा राम के नाम में जीभ मन । स्वधर्मेंचि चाले सदा उत्तमाचा । सदा जो स्वधर्मस्थ है तत्त्वज्ञानी जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ॥ यही राम का दास है धन्य प्राणी ॥१५॥ १ श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धान्त से परमात्मा के कार्यों को करने वाला पुरुष ही 'अनन्यभक्त' कहलाता है । श्री यदुनाथ कहते हैं :- मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः निर्वैरः सर्व भूतेषु यः स मामेति पाण्डव (गी. अ. ११ श्लो. ५५) परमात्मा के इच्छित कार्य तो वे ही हैं जिनसे समाज का धारण, सुरक्षा तथा प्रगति बनती है । प्राणिमात्र सुखी रहे और मानवता की सर्वांगीण ७४ प्रातः स्मरण माला सदा बोलण्या सारिखें चालताहे । स्वयं वह करे जो कि मुख से बनाने अनेकी सदा एक देवासि पाहे । अनेकों में हैं एक प्रभू यह जो जाने; सगूणीं भजे लेश नाही भ्रमाचा | सगुण को भजे, हो न भ्रम की निशानी जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ।। यही राम का दास है धन्य प्राणी ॥१६॥ प्रगति, आत्मबल से होती रहे यही परमात्मा को संतोष-जनक हो सकता है । ऐसे कार्यों में तत्पर होने के लिए ही (अर्थात् प्रथमतः दुष्टों का शासन और धर्म के रक्षण के लिए ही) भक्तोत्तम अर्जुन को श्री भगवान् ने उपदेश दिया था । परन्तु काल की गति कुछ विचित्र है। आज हम भक्ति का इन बातों से कुछ सम्वन्ध है मानने को तयार नहीं हैं ! भक्तिमार्ग का सामाजिक स्वास्थ्य तथा प्रगति से बड़ा निकट सम्बन्ध है । प्रायः संसार में जिन व्यवहारों को भक्ति कहते हैं वे केवल भक्तिमार्ग के फलक हैं, प्रारम्भ मात्र हैं, सच्ची भक्ति तो कोसों दूर है । निष्कलंक और निःस्वार्थ बुद्धि से परमात्मा को सन्तुष्ट करने वाले कार्यों को करते रहना ही अनन्या भक्ति तथा देवपूजा है । 'देवो भूत्वा देवानप्येति' (बृ. ४-१-२) का भी यही मर्म है । देव बन कर ही देव का कार्य सुन्दर हो सकता है । साधा- रण सेवक भाव से देव का कार्य ठीक नहीं हो सकता । देवता के इच्छित कार्यों को करने वाला पुरुष ही अन्ततो गत्वा देवतात्म भाव एवं मुक्ति को प्राप्त कर ले सकता है। उपर्युक्त श्लोक में श्री समर्थ जी ने भी इसी श्री भगवद्गीता के उच्च- तम उपदेश को जनता में प्रचलित कर, नयी जागृति उत्पन्न कर दी । उनके समय में देवकार्य ही देश तथा समाज के कल्याण का कार्य था। और इसी ऊँची नींव से उन्होंने राष्ट्र के कल्याण का कार्य कर दिखाया । और यूँ देखा जाए, तो देव कार्य, देश कार्य और समाज स्वास्थ्य कार्यों में कोई भेद ही नहीं हो सकता । तत्त्वज्ञान की यही शिक्षा है, भेद मानना हमारी भूल है।
प्रातः स्मरण माला
७५
क्रमी वेळ जो तत्त्वचिंतानुवादें। करे हर घड़ी तत्त्व चिन्तानुवाद
नं लिंपे कदा दंभवादें विवादें । न हो दम्भ या व्यर्थ वादा विवाद ।
करी सूखसंवाद जो ऊगमाचा। रहे ब्रह्म चिन्ता में तल्लीन बानी
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ।। यही राम का दास है धन्य प्राणी ॥१७॥
दिनाचा दयाळू मनाचा मवाळू । दयापाल दीनों का मन का मयालू
स्नेहाळू कृपाळू जगी दासपाळू । वो दासों का है पाल, प्रेमी
कृपालू।
तया अंतरीं क्रोधसंताप कैंचा। न हो चिन में क्रोध-सन्ताप हानी
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ॥ यही राम का दास है धन्य प्राणी ॥१८॥
न वेंचे कदा ग्रंथिंचा अर्थ कांहीं । न कुछ गांट से खर्च होता कहीं है
मुखें नाम उच्चारितां कष्ट नाहीं । लिया नाम तो मुख को भी दुःख नहीं है।
महा थोर संपारशत्रू जिणावा । मगर काटता है भवशत्रु-घेरे
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ।। करो राम की चित्त ! चिंता सबेरे ॥१६॥
बहू चांगले नाम या राघवाचें । मला नाम श्रीराम जी का विमल है
अती साजिरें स्वल्प सो फुकाचे । बिना दाम का स्वल्प, सुन्दर, सरल है ।
करी मूळ निर्मूळ घेतां भवाचे । जपे नाम, निर्मूल हो 'भव' यह कच्चा
जिवा मानवा हेंचि कैवल्य साचें ।। मनुष्यों का यह ही है कैवल्य सच्चा ॥२०॥
विवेकें क्रिया आपुली पालटावी । विवेकी बनो, कुक्रिया लौट दो तुम
अती श्रादरें शुद्ध क्रीया धरावी । जो है शुद्ध सन्मार्ग सादर गहो तुम
जनीं बोलण्यासारिखें चाल बापा। जो कहते हो वह अाप करके दिखाश्रो
मना कल्पना सोडि संसान्तापा || है संसारदा कल्पना, तुम हटाओ ॥२१||
तुटे वाद संवाद तेथे करावा । हटे वाद, संवाद ऐसा गहो रे
विवेके अहंभाव हा पालटावा । विवेकी ! अहंभाव कुछ भी न हो रे ।
जनीं बोलण्या सारिखें आचरावें । कहे बुद्धि जो, यदि वही श्राचरेगी
क्रियापालटे भक्ति पंथेचि जावें ॥ क्रिया शुद्ध होगी, सुभक्ती मिलेगी ॥२२॥
७६
प्रातः स्मरण माला
नसे गर्व अंगी सदा वीतरागी। न हो गर्व तन में सदा वीतरागी
क्षमाशांतिभोगी दयादक्षयोगी । क्षमा शांति भोगी दयादक्ष योगी ।
नसे लोभना क्षोभ ना दैन्यवाणा। न हो लोभ न क्षोभ ना दीन वाणी
इंही लक्षणीं जाणिजे योगिराणा || उसे जानिये योगिराज प्रमाणी ||३||
बरा निश्चयो शाश्वताचा करावा । जो शाश्वत है उस पर हि निश्चय जमायो
म्हणे दास संदेह तो नीरसावा । कहे दास सन्देह अपना हटायो ।
घडीने घडी सार्थकाची करावी । हृदय ! हरघड़ी अपनी सार्थक हि कीजै
सदा संगती सज्जनाची धरावी ॥ सदा सन्त सत्संग में चित्त दीजै ॥२४॥
देहेबुद्धि ते ज्ञानबोधैं त्यजावी । तजो देह की बुद्धि सज्ञान से तुम
विवेकें तया वस्तुची भेटि घ्यावी । विवेकी ! तो सद्वस्तु सम्मान से तुम ।
तदाकार हे वृत्ति नाही स्वभावें । चिदाकारता न स्वतः ही उदित है
म्हणोनी सदा तेंचि शोधीत जावें ॥ अतः उसके हित यत्न करना उचित है ।।२५।।
असे सार साचार तें चोरिलें से । असल सार जो तत्त्व वह गुप्त सा है
इहीं लोचनी पाहतां दृश्य भासे । दृगों से तो बस दृश्य ही भासता है ।
निराभास निर्गुण तें आकळेना । निराभास निर्गुण गहा है न जाता
अहंतागुणे कल्पितां ही कळेना । अहंता के गुण से न वह दीख पाता ॥२६॥
तिन्ही लोक जेथून निर्माण झाले । त्रिलोकी त्रिदेवों को जिसने रचा है
तया देवरायासि कोणी न बोले । न उस पर-पिता को कोई पूछता है।
जगी थोरला देव तो चोरला से ! यहाँ श्रेष्ठ होकर यहीं वह छिपा है
गुरूवीण तो सर्वथा ही न दीसे ॥ गुरू के बिना क्या कहीं वह दिखा है ? ॥२७॥
गुरू पाहतां पाहतां लक्षकोटी । गुरू नामधारी करोड़ों यहाँ हैं
बहूसाल मंत्रावळी शक्ति मोटी । लिये मंत्र तंत्रावली शक्तियाँ हैं ।
मनी कामना चेटकें घात पाता । चपल-चित्त वाचाल चेटक-विधाता
जनीं व्यर्थ रेतो नव्हे मुक्ति दाता || सभी व्यर्थ है रे ! न वे मुक्ति दाता ॥२८॥
प्रातः स्मरण माला
७७
सदा सर्वदा राम सन्नीध आहे । सदा राम तो पास ही है तुम्हारे
मना सज्जना सत्य शोधूनि पाहें । करो सत्य का शोध तुम्ही चित्त प्यारे ।
अखंडीत भेंटी रघूराजयोगू । अखंडित है रघुराज का तुम से योग
मना सांडिं रे मीपणाचा वियोगू ॥ हृदय ! हो सका यदि अहंता वियोग ॥२९॥
मही निर्मिली देव तो पाकळावा । उसे देख, जो सृष्टि का है विधाता
जया पाहतां मोक्ष तत्काळ जीवा । जिसे जीव लख मुक्ति तत्काल पाता।
तया निर्गुणा लागिं गूणी पहावे । अगुण के लिये यदि गुणों को गहोगे
परी संग सोडूनि सूखी अमावे ॥ असंगी रहो तो सुखी सत्य होंगे ॥३०॥
वसे हृदयीं देव तो कोण केसा ?। 'बसा जो हृदय में वो है देव कैसा ?'
पुसे श्रादरे साधक प्रश्न ऐसा । सुश्रादर से साधक ने पूछा जो ऐसा ।
देहे टाकितां देव कोठें रहातो । 'घुटी देह तो देव रहता कहाँ है,
परी मागुती ठाव कोठे पहातो ? ॥ पुनर्वास अपना वो गहता कहाँ है ? ॥३१॥
असे हृदयीं देव तो जाण ऐसा । 'बसा जो हृदय में वो है देव ऐसा
नभाचे परी व्यापकू जाण तैसा । परात्पर ये आकाश व्यापक है जैसा ।
सदा संचला येत ना जात काहीं । सदा स्थीर है वह देव, अाता न जाता
तयावीण कोठे रिता ठाव नाहीं ॥ न उसके बिना स्थल कहीं लक्ष्य प्राता।॥३२॥
नभी वावरे जो अणु रेणु कांहीं । परमरेणु के अणु जो भ्रमते कहीं हैं
रिता ठाव या राघवे वीण नाहीं। बिना राम के स्पष्ट वे भी नहीं हैं।
तया पाहता पाहतां तेचि जालें । उसे लख सभी हैं वही रूप पाते
तेथे लक्ष अालक्ष सर्वे बुडालें ॥ वहाँ लक्ष्य दुर्लक्ष्य सब हैं समाते ॥३३॥
मना गूज रे तूज हे प्राप्त जाले । हृदय ! तुझको यह गोप्य यदि ज्ञात होवे
परी अंतरीं पाहिजे यत्न केले । प्रयत्नों में अंतर न कुछ होने पावे ।
सदा श्रवणें पाविजे निश्चयासी । न खो वेद वाक्यों में विश्वास को तू
धरी सज्जनी संगती धन्य होसी ॥ सदा सन्त-सत्संग कर धन्य हो तू ॥३४॥
७८
प्रातः स्मरण माला
राष्ट्रीय गीत
करना है निर्माण
करना है निर्माण हमें नव भारत का निर्माण
हमें हमारी देश की जग में बढ़ानी होगी शान । करना है
यही हमारी सब धरती हो खेतों से हरियाली
फूल-फलों से झूम रही हो बन बन डाली डाली
नदी नहर सरवर बरखा के जल से बरसे धान । करना है ० ॥
हिमगिरि के ऊँचे शिखरों पै फूल चढ़ाने जायें
रत्नाकर के अतल नीर को खोज रत्न धन पायें
गाएँ बन कुञ्जों की मनहर, सुन्दरता के गान । करना है ।।
कोई न भेद रहे आपस में हम सब भाई भाई
भारत की सब सन्तानों में सच्ची प्रेम सगाई
सत्य अहिंसा के प्रण से पत्थर में प्रगटें प्राण । करना है ॥
-पिनाकिन ठाकोर
अभियान गीत
हिमाद्रि तुङ्ग शृङ्ग से
प्रबुद्ध शुद्ध भारती-
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला
स्वतंत्रता पुकारती-
प्रातः स्मरण माला
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पन्थ है-बढ़े चलो बढ़े चलो !
असंख्य कीर्तिरश्मिया
विकीर्ण दिव्यहार-सी
सपूत मातृ-भूमि के
रुको न शूर साहसी !
अराति सैन्य सिन्धु में -- सुवाडवाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो ----बढ़े चलो बढ़े चलो !
अयशंकर प्रस
वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्
शस्यश्यामलां मातरम् ।
शुभ्र ज्योत्स्ना-पुलकित यामिनीम्,
फुल्लकुसुमित-द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनी सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम् ॥
त्रिंशकोटिकण्ठ-कलकल-निनाद कराले
वि त्रिंशकोटिभुजैर्घतखरकरवाले,
प्रातः स्मरण माला
अबला केन मा एत बले
बहुवलधारिणी नमामि तारिणम्
रिपुदल वारिणी मातरम् ॥
तुमि विद्या तुमि धर्म,
तुमि हृदि तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणाः शरीरे।
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भाक्ति,
तोमारि प्रतिमा गड़ि मन्दिरे मन्दिरे ।
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमल-दल-विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम्,
वन्दे मातरम् ।
श्यामलां सरला सुस्मितां भूषिताम्
भरणी भरणी मातरम् ॥
-बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय
तः स्मरण माला
भारत भाग्य विधाता
जनगणमन-अधिनायक जय हे भारत-भाग्यविधाता ।
पंजाब सिंधु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल वंग
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छल जलधितरंग
तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशिस माँगे,
गाहे तव जयगाथा ।
जनगण मंगलदायक जय हे भारत-भाग्यविधाता ।
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय, जय हे ।।
अहरह तव आह्वान प्रचारित, सुनि तव उदार वाणी
हिंदु बौद्ध सिख जैन पारासिक मुसलमान ख्रिस्टानी
पूरब-पश्चिम आसे
सिंहासन-पाशे,
प्रेमहार है गाथा ।
जनगण-ऐक्याविधायक जय हे भारत-भाग्यविधाता ।
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय, जय हे ॥
यात्री,
तव
बाजे,
पतन-अभ्युदय-बंधुर पन्था,
युगयुगधावित
हे चिरसारथि, तव रथचक्रे मुखरित पथ दिनरात्रि ।
दारुण-विप्लव-माझे
शंखध्वनि
संकटदुःखत्राता।
जनगण पथपरिचायक जय हे भारत-भाग्यविधाता ।
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय,
जय जय, जय हे ॥
८२
प्रातः स्मरण माला
घोर तिमिरघन निबिड़ निशीथे पीड़ित मूर्छित देशे
जाग्रत छिल तव अविचल मंगल नतनयने अनिमेषे ।
दुःस्वप्ने आतंके
रक्षा करिले अंके,
स्नेहमयी तुमि माता ।
जनगण दुःखत्रायक
जय हे भारत-भाग्यविधाता ।
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय, जय हे ॥
तव
रात्रि प्रभातिल, उदिल रविच्छाव पूर्व-उदयगिरिभाले,
गाहे विहंगम, पुण्य समीरण नवजीवन रस ढाले ।
करुणारुण-रागे
निद्रित भारत
जागे
तव चरणे नत माथा ।
जय जय जय हे, जय राजेश्वर, भारत-भाग्यविधाता ।
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय, जय हे ॥
FORMATROrise.saret आत्म विज्ञान (पृष्ठ संख्या ४०६-क्राउन ई साइज) 'अद्वैत विज्ञान के महत्वपूर्ण विषय पर एक अनमोल पुस्तक विद्वानों की सुन्दर सम्मतियाँ लेखक तथा प्रकाशक :- श्री. म. दा. गाडगील इंजीनियर, आनंद विलास. काचीगुडा, हैदराबाद-दक्षिण. पुस्तक ऊपर के पते पर मिल सकती है । मूल्य ५-०-० रुपया बम्बई के 'धर्मयुग' दिनांक १०-१-१९५४ की संख्या में प्रकाशित सम्मतिः- उपर्युक्त पुस्तक प्राचीन वेदान्त का अाधुनिक अध्ययन है । शंकराचार्य को लेकर लोगों ने इतना भ्रम और इतनी ऊटपटांग धारणाएँ फैला दी हैं कि आज ब्रह्मसूत्र का अपना मौलिक अस्तित्व ही नहीं रहा । केवल कर्मण्य वेदान्त की उक्ति प्रत्युक्तियों का जाल ही वेदान्त बन गया है । द्वैताद्वैत के अनार्य सिद्धान्तों का ऐसा छप्पर लोगों ने वेदान्त सूत्र के वासों पर छा ढिया है कि वासों का अस्तित्व ही छिप गया है। श्री गाडगील ने अपनी इस पुस्तक में अहं ब्रह्मास्मि, जगत् मिथ्या और जगत् का कारण अज्ञान, आदि प्रचलित अनिष्टकारी वेदान्तीय भ्रांतियों का निराकरण कर के एक स्वस्थ और बुद्धिगम्य शांकर वेदान्त, जनता के सामने रखा है । २१६ पृष्ठों का पहला प्रबंध अात्म विज्ञान विषय से ही अोतप्रोत है । दूसरा निबन्ध ईशावास्योपनिषद् पर है । जिसमें उपनिषद् का सरल हिन्दी अनुवाद दिया गया है। अनेक परिशिष्टों में विभिन्न मतमतान्तरों का अध्यात्म विषयक अनुशीलन किया गया है। अनेकों उपयोगी विवरण पत्रक देकर लेखक ने विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है । अत्यंत परिश्रम से लिखा गया यह विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ; वास्तव में मनन और अनुशीलन योग्य है । अध्यात्म विद्या के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए यह पठनीय है। भाषा की दुरूहता यदि उसमें न होती तो संभवतः वह अधिक सुबोध हो सकती । लेखक की विषय प्रतिपादन शैली बड़ी तर्कपूर्ण और हृदयहारिणी है । ऐतिहासिक घटना क्रम ...... ...... को ध्यान में रखते हुए उन्होंने भारत के सामाजिक विकास के साथ प्राध्या- त्मिक विचारधारा का जो समन्वय इस ग्रन्थ में किया है वह सराहनीय है। श्राशा है प्रकाशक अगले संस्करण में पुस्तक को अधिक जनगम्य बनाने का प्रयत्न करेंगे। मद्रास के 'हिन्दू' पत्र के दिनांक २८-३-१९५४ की संख्या में प्रकाशित सम्मति :- Atma-Vigyan or the Science of the Soul is a scholarly treatise on the Adwaita Philosophy by Sri M. D. Gadgil who has made a deep study of the subject both from the philosophical and practiacal points of view. The book was originally written in Marathi and has been translated into Hindi by the iuthor himself for the benefit of those who know the Rashtrabhasha... .The auther is a great devotee of Sri Shankara and refutes all the arguments that have been put forward against Shankara's theory of Mayavad. He is of the opinion that even some of the commentators of Shankara, like Sri Vachaspathy Misra and Sri Madhusudan Saras. wathy have made mistakes in expounding Shankara's theory of Adwaitavada and that is why the great Acharya is sometimes misunderstood. The aim of the author in writing this book is to bring to light the unifying power of Hindu Dharma and he contends that the more the secret laws of nature are revealed to us by the discoveries of science, the more we shall be able to realise the power of the unique Atmajyoti. The book will be of great interest to students of philosphy and the illustrating charts given in the book will help the reader to understand clearly the various points explained by the author. AVADANANDAN
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