Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Kavi Shri Mala Udiya
Front matter
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कचिनी माला
उहिया
कषि
गंगाधर मेहेर
सम्पारक
प्रहलाद प्रधान
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा
प्रकामा
मोहनहात भट्ट
मम्मी
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति
हिदीनगर, गर्मा
मधिकार मुरमित
प्रपम संस्करप-1..
बा.९०
मूम्प- २/-
गरमागप्रेम
irmपर पा
भामुख न विषय है कि राष्ट्रमाणा-पर-समिति वर्ग अपने कार्य सामने २५ म १९६५ में से की है। इस उपाप मनये अभवाछे रमत-जयन्ती माहोरसको अवसर प ममी भारतीय भाषाओंके मान्य कवियोवा ज्या को उत्तर पाष्यका परिचय कवि-श्री मा पन्चीस पुस्तकामे हिन्-मानुपाद महिट समित मी योजना के अन्तर्गत प्रस्तुत अन्य पाठको मम आ रम है। यपि किसी मी मात्र सर्वप्रष्ठ काव्य-सका निश्चय मा एक कठिन कार्य । फिर भी अपनी सीमाओंने प्यानमें रमते हुए गम्यम्प ठग-उन मापाऑक विपी राम की पुक्क पर्य सम्पन्न किया गया है। प्रत्येक पुस्तफो भारम्म धिम माषा विकी रचनाओष क्या किया गया है इस मापा मास्पिना परिचय और पवि विश्नपा परिचय दिया गया है। बिम के दो पवियोका पुनय किया गया। उस पु-प्रव करते समय म १९२ मे पूर्वका सास्पि मौर १५२ मेगा माठित्य-कम हरहमे एक विमानमा ध्यान रमी गाया परम या है कि गमग सन् १९२ के पूर्वक सबा १९२ के बाप मारियम प्रवास्ति विचार-धायम एक विशेष प्रकारका प्रध्याव-सा पया माता।। श्री प्रकार प्रजमीन प्रस्तुत पुस्तकमे मैपति माहित्यको पुने, मम्पादित करने और मध्यारो अमारी रेशान मिना तथा परी सिम्पममी परजीन अनूदित कर म्स कप प्रस्तुत कम महयोग दिया है। पुमतको संकलित पित्र कम्लीक मैनेजर 'राष्ट्मापा ममवाय प्रेम करके मरम्पत्यमे उपाय हुआ। गम्पो आवरण सानो बक्या में भी बी एन अमजी (04, समले में गम्टीटपू आफ अपार आई, गाउया मायोग मिला। उसके लिा ममिति ममेकी जमके अतिरिक्त पा या अन्याय दृष्टयोमे विन-विनमा प्रत्यक्ष व अश्त्याल सहयोग मिल । प्रति मी ममित अपनी ताता व्यक्त प्रती ।। भाग प्रमात संप पाठयोको घधिकार एवं उपयोगी प्रतीत होगा। hilarning en मन्त्री राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, बर्मा -
अनुकमणिका
पृष्ठांक
उहिया-साहित्य-परिपप [प्रारम्भम १.२.6]
करि-परिचय
पराम्प-मम्यय
कवि-धी मासा
सडिया
-
تھی کہ
--
गंगाधर मेहेर
अनुक्रमणिका
पृष्ठांक
उहिया-गाहित्य परिपप [प्रारम्भम १.२.]
पनि परिपय
पाम्प-सम्पय
कवि-श्री माता
उड़िया
URN
--
गगाधर मेहेर
अनुक्रमणिका
पृष्ठांक
उपिया-साहित्य परिषम [प्रारम्भम १.२.तर]
पवि-परिमय
उडिया साहित्य परिचय [प्रारम्मसे १०२० तक ]
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उड़िया साहित्य परिचय [प्रारम्मसे ११२० तक]
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उडिया भाषा
और
उसका साहित्य
हासाकी पापा नाम दिया है। किन्तु डीसा दम भापाका उच्चारण
मोहिमा ( मौर देसका नाम मोरिसा । वोरिपाको मोड़ विषयसे मुत्तम
माना जाता है। इसका उत्पत्ति कम इस प्रकार है -बोइविपम> मोरपिप>
वापि>मोरिपा या मोपिया! सासम्म मागधीरा सयम और डिया
मापाम मामी प्रालो बाउस समय पाये जाते है। संसद प्रोंमें मोहरा
उमरा पग भी पाया बाता है मौर भरतनाटप-शाम्ब गृषिमापा या
मोनीका उत्सव पाया जाता है।
पबरामौर बादाम पाखिोरमा
होना बराणा र विमापा मार स्मृता १.५.
इसम पग पता कि सिषी मनकी प्रपम स्वामीम रहिया मापा
विमापा या गोत्रो नाम मोपोंकी दृष्टि माने पी पी पीर भी लिने प्राशन
पारमोर मनासमार इमका मापार हानिक वर्गको मापा थी। इसलिए प्राप्त
मस्विकार मागपन राई
शामिलामी मोगातोश्य परिमेम्यारे
४ - भर्मात पादरी में तरेप पा गरेप मार पौरसेनी मारिफ योगस गोडी मा रगड़िया पापा बनी। हो सकता है कि प्रारम्मम पिया भाषा मापार पापरी या कोई प्राविही मापा हो। मेरिन भागको मा मापा मम्पयनसे पता चला है किया मार्प पर्पी मापामोंमें मास मौर इसका सम्मम्प मागधी अपरा मर्ममागासे t। प्रास्त मम्मताकार राम पनि पपरी गाड़ी भारि भापामोको मामधी का है। उहियाका मामी बर्षमापपीसे सम्बन्ध रिवाने का तात्पर्य है। हिमा-शाहिरका सम्बन्ध सम्पाग्य प्रान्तीय साहित्य समान पारखीय मार्म पापा माएिपमे है। भारतीय मार्यमापारि तिन-कममें बाधुनिक भारतीय भार्य मापा पूर्ण रूपमें विभिन्न प्रातही अपप्रम मापाएँ है। या भाषा भी प्राध्या भारत मत मापनी मनमा बर्षमागणीने उत्पन्न होने कारण पूर्ण अपप्रपामे अपर। और मान बो दोहा के गानोंकी पापा पूर्वी सपत मानी पाती है। इसलिए बोर गान मी बहर को गीपा माहिया भी प्रारम्भिा पाला पाप माना जाता है। पापा नाहिसा पपरपा भाई मिसापाप गोसारे । इम प्रसार मरमा माहिरप पा मित्र मारियको गीया-मारिया मारिपान माना जाए तो गप्पा-मालिया निम्नमिति प्रसारमान- विमानापिया बा माता कास-बिमानम (१) मारि पुष-यतिवृत्त पप या मारमाराम गुप ११वी अपमा १४ी मामी पर्यन्त। (२) सम्य पुग-१बी गनाम्नामे दो मामी प्रपम नाप पर्पन्न । (क) मम्म पुप-ति पुरा पा पामिन बा या रापमा मुर ११मीने १७बीमारीपर्यन । (a) सरमाय प-निरात पा रोग भन्न पुरी मरीने १९बी प्रमाणना। (1) मामिलाप पा स्वालाम्प पर-पीनी प्रपस मामले annोनर देना होगा मिलीभीबाग मातिापमान माला लगा मार मार । नायिकामानिमा पर मी लिने र बा भमानी गे गत मागिरी प्रतिपाति पारिरामी पुरती और म मुरगामी लोकानी | आदियुग - चड़िया साहित्य मावि पुगको सारता-युग भी कहा जाता है। क्योंकि इस पुरके मुम्म कवि के सारसारास । मिस्तु इमड़े पहनेका साझिय भी इस मामले मनात। पहले का नया है कि बोर माम मो पोहा को नदिया पाक्षिपके प्रारम्भिक काममा प्राप माना जाता है। वएप यह भी बाधि युगम बन्तमस्त । भापाको दृष्टिले वाम्म वो है ही। पाहपा परीपा होहिपा मारिदिमामी। म यतिरिका गौरव मौगनाप सन्तिपा हालिपा मारि सिौका दिया साहित्यमें बार-बार उस्लेव पाया पाता है। साहिस्पिक मापी दृष्टिसे भी और मान को रोमा' में प्रविमित्र विचारणारा बारि काठीन और पूर्व मम्म मामीन उदिवा साहिरप मिलती है। मा परम्परा मम्म मुप तक पम्ती गाई। सारणात पुराणों ' नारामानन यात सामी ॥ सुपानिधि मौर 'पम्ब सवा साहित्यमें मूम्प मा समाधि नीपरम्म निरम्यान, राप साधना मोगल मारिको पचा पार-बार वनेम बाती है भो मोर मान मोरोए में भी पाई पाती है। मान मो दोहा' बोरियाच कामी बोरियान सम्बन्ध है को कालिका भार नोंमेसे एक है बाकी तीन पूर्णगिरी कामापा और मीहह है। एक बोगियान' सान बमोहबानते अमर हो सकता है। किन्तु पार पीठॉमेटे एक मोरियान एपीठ पा उड़ीसा ही है। जिसम्म पारा को ही नही म्म मा सरोकी भी परम्परा सी बा रही है। उन गानकि राम 'परमम्मरी' (पटहमम्मी) पुरी (गुग्गरी) पाच (रेवाल) भैरवी 'कामोर भनी' (धनाधी) रामको ( रामकेरी) राणी' मानसी' (माछपी) पारि बार भी जीया शाम्प बोंमें पाये जाते है। रोहे भी शिवे पाते । पित्र काम बन्धीय पपेन भन्यो बपने दोहोरे लिहलेका गोब किया है। दोहण महार हा भी हा बातापा। परपी कामे बबन पा पाराना हो गई। भीमा-साहित्य सम्मामापातरा भी बहुत प्रबोप मिला है। पौट गान बोहा में रेप पारका सम्माघापा एक बान मिलता है शालत भोर पर माहि पापी हापित बात माह निव मायेपो। संसार पहिल बांना पहित उप पिणे पामाप n बार बिमाएत परिमा। पिका पुहिक ए सिना समि॥ को सो युपी तो मिली। पौ चीर चोर साधी॥
। मित मिते दिमाता बिहे पय पुतम टेपन पाएर पीत 'चिरिते ठीक इसी प्रकारा मध्यामापा गौपरा एक भबन दिया मावा. या - कहिले कि प्रते बाइ रे मनुमा । पलस्तरे पाब पसा हरा पापुषी मामे मार ॥ हिदिपिकतानि माम्बासा मा पातलो किकमा पर। टोकार मार पापपरे गते पानि बनिधि पर। कुम्भीर मा बात पसर मेगा गहा न पचे। परिया मितरे लिपि न पाहता साना मरिष प॥ बेदम मारपि मुक्षि डार मेरस माहरे गृपा । मुषा गोहि रत्न पलटकरे मम्मारि गिनी बिम्बमा ॥ पिपरि वाडा विमा होमिता मा पहिला पूति । बिसर मा मारत प से एकति ॥ x को मापुस धिमानि भानुपिो मुहे रहि। हिमाच पोरे पास में बसे गारापी हो।। मोग्गनावरे मामम इस प्रकारबाठमे मनन गोपामापा प्रमित है। उन माममे माय मोपचाप मामक एप पुगामी पाई पाती है। मानारों पर मामना मा प्रतिगप विषय है और परमार पाणी पुणा-भी प्रतीत होती है। मसी पापा गया है और इसका भी ध्या नाशियो बारिपाम या पाता है। न भरपुष पर पोगगनापती मिगी। पा मही मम मदर'मोरणगाना आतियारमा मोरपनापरी भाग तो यादी पौ। हीमाला गोष्मिीने मिरापमा जारमा रियाया पर भोगागारि गोगामी निवीर या TE पारसपमें जनमोप्प हा नरिवली गई जिप पम्मी माराम भी। निमानी पाप frTrया-मागिपरे माहिमाम मापनमाया प्रभार पर।ग परगार्म मि भी गा माता मोरया भी एर मात्र मात्रामा म मालागरे बराभान मी for पा र मोरगा माnt मामि माना पगार निरिपती। यही गा मा गा जी भी है। गरी से कोपा मिरी | Rॉम (पण बाप मार पर पता भाग नेपाल प्राचीन काम- ७ 1 मसम्म पेड नही (५) नि निरनारे सेठ मतम सीमुमुना मा पोति प्रत्यक्ष बरान्ति भाष-मेरी सिप्पा विश्वास इसकी तुलना दोहाकोप के मोहसि की पा सकती है। इसमें भिगुरेर का इस प्रकार म दिया गया है-"दुइ परे तुझा र मत करि मुसीय । राम पाहान्ति सठी रुप करिम। मे पण पुनि मुमा मात्रापर मम्मे। येहाङ्क विभुबेर गोलि।" [ोनों कानॊमें मैगुमी रेकर बच्छी ठए बन्द करना। पत मीर चार चम (म्यान) करना। मामाधम गो पनि मुमने माती है उसको 'पिनुर' कहा जाता है।] 'मिपुरेद मार्गोका बास पेर तो नहीं है, इसमे भी संभ्याभापाका प्रयोग किया गया है पपा तपत समुरे पिता नपाइता निर मातार पर्ने पाइनबाला बीर। पे पर मामा तेरे पाणि तासम्गे परते हम गुम्मुने पुधि। इन दोहोको पोषीमे सोकशा पया मोर गवर्मे इनकी टीकापीमा। रहोसाके सेसन्त माटोंमें एक विचित्र परम्परा पाई जाती है। परम्परा बनुसार संसठ माटोंमे संसात और विभिन्न प्रकारकै प्रान प्रयोप किए जाते है। किन्तु पिणा चाहियो माविमालीन ससत नाटकोंमें प्राप्त पर मानमें गहमा मापाका प्रमोम किया गया है। कपिसेन ऐबके परमुराम विजय नामक संस्कृत मागोममें एक सहिमा माम पाया जाता है पैसे राये पोबत मन मुनि पुमा पर रमिण कर बामेष मोहे पनु धरना कोपेनबोलावीर त तुसे अमित मो तात मावतोर परियामारमा। मुप रागन हो हिए तोर रामेबाबपना । उत्पारि। अपियरे (६ सन् mm से १४७) मापसापानीको सारिप माना जाए तो वह भी मारिमारके मम्तर्गठहै। यह बसमा मनिामे मुरसित है और मानाम गुरुम्मिर ममान इसमें डोसाके रामघोंका पौर पमपाप मम्मिरके नियमोश इतिहास सिपिण्ड है। सिवन्तो मनुमार मग बंग प्रथम रामा नीमगमरेपने ई सन् १. (पान २४ पिन गुम्म रामी रमहराफे नि) इमम्मिरो भियना गुरूपिया पा। मेकिन भापाको दृष्टिमे विचार करनेपर यह इतना प्राचीनदी मालूम होता होसाना । मम . - किसकी मापा परपती पम्मी सेवन मुबोध करने के लिए भाषाको परत दिया हो। इसरोंका मन कि यह मयतमाम १५ो सवामी रामवयसरे रामत कामम मियाई पई भी। मापसापानी मतिरिक्त दिया मप दुत मासा साझिय भी मिनता है। उसमें सोमनाथ बत या परमात प्रसिद। पासको निरिक्षक महीं है पर भाषामे यह भी मापीन सौ प्रतीत होती है। इसमें सोमनापी पी पूजा विधान है। हम मेयरकामाम मनात है।रम मो परता परमेपर मिा और मोडा रेवी पार्वती है। इस कवा वार रिष्मानीत जाते है। इसकी भाषा परिमानित मोरगती प्रमाहीत है। इस कामा मोर एक मरयम मासपूर्व पब समुपाधि । इसको भी सारना-पूर्व माल (१५ो या १४ी सरी)पापस पाता है। यह पुस्तक सम्पूर्ण प्राप्त नहीं है। प्राप्त सम्पूर्ण पा भी नहीं है। इस या एपपरामा पिामा नारापमानन बगपूत सामी । मम एक पामप्रप्ट पोनीका वृत्तान बनित और पा र सम्पदाममा प्रय-ना मानून पाता है। इमको मापा बम दा मोर भत्या प्रमाहमीक तमा नी परिपाय है। पानेसे मातम होता कि याच परिष गवर्म पा रामि एतर्म सिता गा। इसकी पना अनुमान और यया भारि पूर्व मात्रा मिलते है। वहीनही मपरामर +नियममा पाक्न मिया गया है। महिमपान नामके पाग! पाश्मि तामरणार पिसी स्तुति की है। गपमुष पर एक गग प्रम पसमा पनिषा मी मला पूर्वपाल या बारेमालासपाता। बनवा बाराम। मरिन उनापान मितिमी। पर एक बाप्प रम प्रपात पाप और इमर मिनाली पर पाया और पानामाप विपासान। इममें गिरी भरयण पुरी पौ तिमि पराग्य रमगी जलापारी पर। भारतारात भर पहा पाए तो पारमारागही गीमा पर पातीय मार और रिमा-मारिमारि मा प्रतिनिधि है। पाने भारी मुनि और माममे माती मूर्म मन्तिबारि गारमासन मामा जी अप गरा मा परिमार गरपान हए पे। सागप पान मी मन नारा है। TOमोर नोरमारे पनि मामिला भीर मामा सामान तीन १५२ मा mरिण गरनार दी मारनामोपोगाने पाशिमा।।
उनकी तीन कृतियां उपतष्प है--विसका रामायम 'महाभारत' मौर पुरान' । प्रारकादास अपने कपमरे बनुसार विठका रामायण उनकी म रचना है। इसमें रेपोस्पर्मे मीताकी महवा बतलाई यां। या पिका रामायन बमुव रामापर' पर मापारित है। पिन्तु 'मद्भुत पिन' का साम पिर बिका रामापममें सहस्त्रमुग हो गया । मौर पाएका र पहा विसराहो पाई। बिका रामायग' में नारी पौर प्रपिसका प्रामाम्प पाया गया है। सारनासो लिए प्रम्बामसे यह पग्निम है। गीपुराम' में सापासने दर कहा है प्रपमे रामायण पितीपे महामारत तृतीये वनमा भापयत। [मैने प्रपम रामा म्पकी रचमा की उसके बाद महामारतकी मोर उसके बाद गपत की।] यहाँ रामापना वर्ष है- मिरा रामायण और मागमतका बर्ष की मागयत' या पोपुराण है। विका रामापन निम प्रकार पतिका मागम्य पाया गया है, उसी प्रसार पाणीपुण्षम भी। इसकी रचना मापय पुराण- पासुर-सा उपास्मान मार देवी भागवतपर मामारित है फिर भी इसमें मौस्मिता । पपीपुरानमें महिपापुर, मपिसि म्पमें पपित है। कपिलसिंह समका पुष पा। उसने परमडे बारेमें गा मया कि पितासिक रमपसे त होकर उसकी पत्नी प्रमरवा सिहलम पाग पई। यहाँ माप बपिनी धर्म साम यमो मारन स्वातक महिपके बमपूर गमन करनेसे महिपसि रा कपिट कग्मेि सम्बार पाकर कपिकसि। सिर पया मोर रमने अपनी पी प्रमोवासे में को। उससे सब मुनकर उसने महिपासुरको अपने पुत्रके पाप म्यिा । मरेमाने महिपामुरती पम्पा शिपये पर प्रावि दिम्बिग्य मापतीरे साप विवाह पुम्म निमुम्मका सायपर माक्रमग दुका बारिमाप लपिरिम बास्पान पसन्मुप मुम्भ-निसम्म कान्तिमा रमाबीर्य पीरममका बिमोचन वारिका र महिणमुरका एलगिरि उत्पादन सूप पम्पका मौर बम्तमें मारिपामुरमा बम पणित है। इममें पुर-गपिनियों वापिका बमन गत्या मनाग्म है। इममें गि री अपेक्षा पास धर्मा प्राधान्य रिवाया गया है। यहाण पत्तम सिया या है। बाद पॉकी मामर सम्पाटको नियम महा। धमें एक पपिनमें तय पर तो इसमें तीम है किन्तु मम्द तुम मिमवी है। सेपिम मायके महापत्रके अधिकारियोंने मे बवतकर समामर बत् चतुपमासमें परिणत कर दिया। र वही भार उपनाम है।
'महाभारत' मारमासका सबसे का पान मोर मासे पास प्रमिय भी। इमे भी परंपायरोम परिणत कर मुरत यिा गया है। मेरिन उमा एमपुर संस्करण मी मिकामानेको परप्या हो रही है। यह बिमाम प्रप मम संशात पाभारतमा अनुवाद मरी है। बहना भापार तो हैकम इममे पहा विषम है मोर पर्व सममे भी। मूग महामारी तीन पीरा नाम मारमारामी महामारनमें नरी पतीम:-तानि मामा मार महाप्रपात । ते तीन नाम मिलते है-- मध्यपश पारा पा ऐपिस अपार मारतावानने मारि पर्वको वरपर करीया मल्प और पदा और गरिमा परेवाले मामला या ऐपिए। मुस महामारलम मरा पर्व पाप पाए: उप मोर पिस पर्वमपि एप उपर्व। Artो रफ पर्व है मनुगामम परको गरिपा गया। और महाप्रम्पार पो गर्यारोहण परमे पोर पिया मरा है। परमे काही पाक मारलारामामरामान भूमपा महामारल पा मनपार मही पर मि मापालि। पर मम भक्ति महापा पगारीमापन-अमर्षे मी पविषम ही ही मूलपानी कि या पग है। हो मम मनुपहार नमावीमामानित बना रिया गया है और पतीनही मानो पतिकमरिया गया है। महाररर भाषनग पर मून महामारनपन परमे रिया पयाt frनु मारमारामी महरामा भाग पानी पर रपीम परा भायोगमान माधि पर है। मनमामो प्रम मापने पापा मोमर और प प रिमाया। माग गातारानी है। गौरामप-मम मम पर- भागामारम्बन अपाग्यान माणगो सीमागमा पारिस पी माणसामने है। योगमा मम मम प्रामी गोरी मई है। मा . प प माना भूना मोहोरा दिन या मापा भी मानी गोगानमार र गन्ध tferture नाम मिनीt 'पोरा पपोतरामा गनन में माना जाना मारा। नपानी गट मागमारामा। समानामा पर जगार माया मोर पसाती पनि म गाम मागगयो मोगा। पोलीसारमा miraniगामाग। पागार गाम पर Anापारमा, और मामा श्रोति गोगा गि गराराला पापमानात पापी माया और 77MATMA Tm पना मूतको मोहे गावमें पता। भूतमे साफ लिए इए एक सौ बस्सी मन निक देना माग्य किया। यह उनीमाकी सोनकपा है। बचमा की कहानी भी इसी प्रकार की है। यह कहानी भी उद्दीमाम काफी प्रचलित है। मारमाबासने मपनी महामाखमें इसे मान दिया है । कृष्ण- बेनी नगी तटपर मेम नामका एक माहों का। काठ काटनेक मिवाय यह पुजनही पामता पm एक बार पर पग तूफान वाया तो पाठके बिना उसने एक दिनका उपवास किया। मरे दिन बब उसकी पत्नीने यंगससे काठ सानेके लिए कहा तो बापूसाही झकरबगतको मया। राम्रोमें एक मन्दिर सो गया। साम हो गई वो महारापर उठा मोर मन्दिरके भीतर बार उसने देखा कि यहाँ पमा विप्पु और महेमाकी पार (काप्ठ विपप) की बनी हुई मतिया है। मत उमन विप्पुकी उस प्रतिमाको गकर उसको वा मृदा कार मममकर कारना प्रारम्म दिया। यह रेबार मिण पराबए और उसके कहने मनुसार तीम रिना मोबम पिया। तीन रिनके बाद मामर या फिर काटने हमा वा इमेमा लिए उमकी अवस्था हो । यह देखकर बनमा नामके उमर पडोमीने भी ऐसा ही स्मिा तो महेश्वर, मस्प पारपार, उसको नबसे चीरन गये। ममतने पूण कि यह प्रमेर क्यों ? मिमगीने रमूर मार मानी, मौर पानपमें बनर होता है। तुम मानी होगेर या मूठ है। भारणा पाप्मान भी पूर महामारत नहीं है। मारदा एम्पुत्सित पुस्प पा सहरेषक कलमानुमार उस पाकर मीमने सुर-शेमो एक गम्भस रमे नाम रिमा रावको भूत पावना भूत प्रेत पिसाच मोमिनो रापमी पिशाचिनी मादिने माफर तया मारमीको शासकर पी प्रगट की मफिन भारवाठो पहनानार मौर उसे वृत्मिा तया मावा गामकर ये उसे छोड़कर बस गए। बदमें मम्बिका सिपार और पागदी सियारिन माई और उन्होंने भी रस को किया किन्न रमाके सामने बम्बिा मियाग्ने महाभारत पुरके दिनों में होगाला मारी भटनामाकी भविष्यवाणी की मौर अपनी पपविनाकारण बीमित होकर पपिपिर सामने मप वर्मन किया। बह पूर्व पम्ममे रिस सपप जयसन माग और उमसी पानी मेनाकी पम्या मदनिकाको इनके मामानुमार कारण पाम , पापा पा रम ममय रास्ते में उसस रमा करनेके कारमले रम पाप दिया पार पापा रीमाकौली है। स्पर्मागापा ममय मारमाराम पागका उग्रीमा बीष काए थे। उम ममप में चित्रोपका पारकर पमेनगर या पावनपर (पारपुर) पर पो उपी पामपानी भमरासीमापी कन्या मुहानोम मिटिका बिरामा। मुरानीट मातरमें ा कि या रिवाइके दिन मर पाएनी मेफिन पनि परापमा पारण यम नम ही लगा मरा!
. गीमपुर बार दुर्योधन मपने सारे कामगदुमारकी पीटपर नही सन्तरणपणे है यहाकामिन। महमहारेशीय महामाख भी देखने में माता है या परमी कवि रामानाब रायने नामाबारपर एसपी करिता विी है। इस प्रकाराम होग देखते है किहममें गोसाको कियान्तिया मवेषिया मी-पहार तीर्य मिया सामारिक रोति-रिवागार्म-सम्प्रदाय सभी समिनिट। माम बरमार मन्य नार्मोस उस माला विरात मी इममें सिपियर। बाए तो यह एक विशाल जातीय प्रत्य है। यह राम इतिहास और पुराणका यम पा इस युगकी मुग्य प्रवृत्ति ऐतिहासिक पा पौराणिक दी। इसी पुषः गीपा साशियका बहिष्ट उम्मेलनमा पा। उरिया साहित्यका वा परमेय निई मंगत सारिरय या पुगबापापर नही हुमा बस्ति बम कार्मे मौक्षिा रचनाएँ भी हां - मुखामिति की दए और भी मौलिक पसाएँ र बी। मागामारी गली मी प्रशारकी एम बना है। यह भी पतीगा मर्म मिगी न मम गोन (कोपर) रोनग्यापन किया गया है। इसमें मोरणा मयुरा पानी मार पुन शिव पास कोरतरो सम्बोधित र मपनी मानमिस पपा मान मातो पापालस्य रमा एअनुपम वगामाइनी भाग मापन सरल और बारको मसीहै। गारिया माया प्रथम मत पाप।इमार या सारिय कोहिमालयमै बायन ममरमा बोरापनागर बराम हामने पारमानीको मिररामले पामोहिमा म सानी हमा मरोने माती पोनिया मिली। कम्पनवामोरे पानापामो मार एकनिदियो सिम मा परीर तर परम पिया गया है। हमरा मा प्राय माना है। मा मकर मागिता पाए वापराम गिरगानी माघार है। और श्री रामगोपालग जालोरर मरागिति हार पर मार्ग पर गपुग रापली निकामी मामनिराम गिनीमा (गवर) एमागमपापा यमागला रापाला। 'गमा परि मुखर और मात्रा म माग भारता मोबनुमाए गए। मा पवार (मी) में मिया पपा और रिमिन प्रणाम निगा मगर पिया राम गिमिक निमारप माग तरलरमा गारपि। इमतीमागप्राचीन-नी नगर पागप भार और नो पृषी te - १३ । । प्रताप राम पातिपराम प्रमृतिने 'राम विभा' मा उन दिया है। इसी मुमका पार एक काम्प है पामिलाप । इमो रमिता गिधर्मकर रामहै। इनका ममर निकित सपमे निर्धारित नहीं है पिलु प्रतापराप पाश्रािम धाम्य मन्त्र प्रमनियनि लो उपमिलाप ा उस्मा किया है। इसमें गामामुग्फी पापा उपा और प्रामक पुत्र अनिस्वका पिता पति । इमर्म मारमावामा महामालमें बमिन 'पावर' का प्रमाप परिमभित होता है। उपाय पिता पामामुर मात्र भर पा पर गोणितपुरका गमा पा। मारमाबामः मनुमार पोणितपुर बनरिणी वटपरबाहममें मार रम प्रमान । मौर महानही राम मौर पौर रमीट भी रिवाई पर है। एम मुसको भार एक बिपना है कि इस पालम मम माम्प प्रम्पोस यामें बनुगा भी प्रस्तुत पिपापपा है। कपि परगावग्ने अपदेश पाठ- पौषित पा गया पचानुसार पिया है। मनुवारकी नापा मरत और भार प्रसामनमें ममर्म म प्रसार हम खाते है कि हम युपमे रहिया माहित्यमा विभिन्न रिमामॉमें बिनाममा। माय-युग पम्प युमका को भापोंमें विभाजन किया गया है-पूर्व मध्य मुप मोर उत्तर पम्प पुर। (८) गप्प पुष पूर्व मम्पपुरको मकिन पुप भी कहा पा माता मेरिन यह पनि पपानुपपा नहीं मान मिसाई प्रेम प्रधान नही पोग प्रधान है। हममें मप मापना बार पिसमाग ताप प्रधान है। हम माविका प्रम- एपिट गर्म हो उममें प्रधानन्या तीन पाराएं मगर बाएंपी-धर्म मारा पुराण प्राय और पाप्प पारा। धर्म पाराम गोड मान मी मा की मृम्प साधना माती है। पषी पामें है परवमि हरिह मस्व मून विध पिने पाप , पुम दिम स्पो एप सम्पामा भापपियोरा मा होहि बिताता इमम यह भी माहिर होता है कि प्रायमे पित्त या मनरा मना है। मगिए पश मया है- मन पर मनुप्पामाम् पार बसपानयोः। इस प्रकारको मृम्प मापना लिए राप मापना बक्षित मौर मार माधना के लिए माही पीप। मनिए पीपासप तव नेपाt पाया मारेन मिरिच परम मुझ माया मम्मनि पौर तम्माद पार्पि तो प्रतिदिन मुमपे भारपेन नाही योर्प पाय मिसम्पमिरि सो भवन पोम्पुराने बार दुर्योधन अपने सारे ममामारी पोटपर पानी सन्तरम करते है, यह बड़ा कानिकपन है। यह बमलाई काधीनाप महामाणमें भी देखने में बापापा परबों कपि पनामाप एमने सीमापारपर एम्बी कविता मिली है। इस प्रकार हम कोपरेखते किइसमें गोसावी किरन्तिवा रेगिया मी पहाट ती भूमिया सामाजिक रीतिरिवाज धर्म-सम्प्रदाय समी समिविप। नाम परपरमम्प नार्मोस रसपामा इतिहास मी इप्समें लिपिबर। सपहा पाए तो या एक विशाल मातोय पम्प है। यह बात विहास मोर पुरामका पप पा इस युमकी मुख्य प्रवृत्ति ऐतिमासा या पौराविक बी। इसी युममें सडिया पाहिपका पबिप उन्मेकमा पा। दिया साहित्यका मह सम्मेप सिर्फ संसठ तारिख या पुण्पर मामापर मही इमा बस्ति इस काम मातिा बनाएँ भी rty पुमानिकी तप और भी मौलिक पसाएँ ईपी। मार्चपरासी कंपनी इसी प्रकारको एक पहा। पह भी पौवीणा कममे किया लेकिन इसमे कोण (कोपर) को सम्बोधन पिया गया है। इसमें बीमो मगप पाने माप पुष पिता पोरा कोमवती अम्बोधित कर अपनी मानसिक पका पाठ करती है। पापासम्म रसमा एा बनुपम साम्य है। इसकी भाषा बत्पण सरखोर भाष गोही ममसी है। यह गाया साहित्यमा प्रथम को अपराम्प है। इस बार सहिया माशिप भोलि साहित्यसे मायन्व समरमा बौर पमोर राम पासने पाएमासी को किरपामने 'कान्त कोमि भावमासने हातीय मोति' तमा पूजने मगही कोहनियां मिली। पपसबायोड बगलापासने इमार एक पर्व कीमि' किती निममें इसका परीर व परम पिया पया है। समका सरा प्राय महाभाष है। या बम बरापिठहा पाएर पल पर सब है। इसम मिष-यादी सम्पार। और भी पमबमनीमानसे मानोरम सफा प्रतिपाप विषय है। वल परम बोको पोडार इन पुर्ण काम माल पी सिते गए। ती युग्म ममासने 'एम-विमा (राम-विवाह) नामक एक माण निसाना ये सारना पास परपती । 'राम-पिमा पानि मुशीष मीर हनुमान परम वृत्ताव तारका रासरे अनुसार दिए गए है। यह सम्म मारनो (मों) में सिता गया और विभिन्न कामे विभिन्न पर-पपिनियोरा म्पबहार किया था। इसमें विपामि निमाप मेका परणुपम दर्प- रमा रामपरित पमित है। इमकी नापा प्राचीन-सी कती है। स्पेन मम्म उनके पितामा बनमप भय और समय पूर्ववती फाग 1 1 - प्रताप राम कार्तिकवास प्रमृतिने 'राम पिमा मा उस्मेवा किया है। इसी मुगका वार एक माम्प उपानिप । इसके पिता पिपुर पास है। इनका समय निश्चित पसे निर्धाप्ति नहीं है जितु प्रतापराम कातिकवास धममय मम्म प्रवियोंने इनके उपामिलाप का उत्सव किया है। सर्गे गामामुरकी कन्या उपा और प्रद्युम्न पुष मानिसका बिगाहू गित। इसमें सारावासके महाभारत, बर्पित 'उपारण का प्रभाष परिक्षित होता है। उपाका पिता पानामुर सहर मग या मोर योनितपुरका एनापा। सारकावासो मनुधार घोणितपुर धरिमाके वरपर पा। इसमें गंगार रस प्रमान ई मार पहारही कलम मौर पौर रमोडी मी रिवाई पड़ते है। बस युगको मौर एक विशेपता है कि इस कालम संस्कार काम्प अम्मसि समियाम बनुवार भी प्रस्तुत किया गया है। कवि परगीपरने पपदेवक मौत- पौकिका चदिया पचानुगार किया है। अनुवारको भाषा सरस पौर भाष प्रकाशन समर्ष है। इम प्रकार हम देखते है कि इस पुपर्म रहिमा साहित्यका विभिन्न विमानोंमें विकास हुभा। मम्प-युग मम्म युगका पो भापॉम विभाजन किमा गया पूर्व मम्म मुग मीर उत्तर मम्म-युग। (क) पूर्व मम्म पुग पूर्व मम्ममुगको भक्वि युग भी मा पा सकता है दिन यह भक्ति पानुरापा मही शान मिमा है प्रेम प्रधान नही पोन प्रमाण है। इसमें काम सापना मोर पिपनमाण तत्व प्रमान है। हम माविका प्रति- दृष्टिग तो उसमें प्रधानतया तीन बाराएँ नगरमाएंगी-धर्म पारा पुण्णधारा और बाम्म भारा। धर्म भाराम और पान बो रोहा की पून्य साधना बाती है। पर्चा पर है पेरममि ए हि सवा सून चिब बिहमे पाप न पुन चिड पहले भूण पम्पबा काय पिमोरा मा होहि मिसभा एमसे या मी बाहिर होता किम्पसे चित या मनका सम्बन्ध है। इसलिए कहा गया है- मन पब मनुष्यामाम् पारम्बन्धमोहयो । इस प्रकारको भूप साधना लिए काय साधना अपेवित और पाय साप्रमाके लिए माही मौष मभिए भी कारपान ने का काया पेन मिशिनच पाम मुर्व प्राप्यते पामनि मौर तस्मात् कापि तो प्रतिदिन समये भावयेम नाही मोम काम सियापसिदि स्त्री भुवन - निमय किकर प्रयाति। बाद कार्य म होने से इस पग्ममें - सिडि, म परम सु मिलता है। मत काय सिरिक लिए प्रशिरिन समयके बनुमार नारी दोपण बम्पास करना चाहिए । त्रिभुवनय मिमकाय सिर होनेसे माप सिरिया रासिया बाती है। इसमें कायको निमुवन निम्मका गया है। इसी पिणनझार बल्लक प्रीम है। सब्पि रोड़ा कोष म कहा एलपुरतरि यमुना एत्त पा सामा पत्नु प्रबाप बारामती एनपन रिपाका [सौम वा मुरमरित ममा पमुनासा पंपा सापर। इसमें प्रयाग बारामती और धीमे बना-सूर्य है।] भी कास तबके उपर्युक्त पतोल मोर एक सय करने की बात प्रतिदिन समये! प्रतिबिना समय क्या है ? मेरिनीकारन समयका म दिया है- भाषाप सिमान्त किपाकार इत्यादि । मोरखना नामसे प्रचमित सप्तांग योम कार का दम्भवत इपीके पाप सम्बार है। इस साधना मनुसार साताराम विभिन्न सर सापनाकी विधि। नाप पन्यमे यही परम्परा चली बाती है। इसमें भी नामयोगी सामना मशागईमार पिम्ममाग तत्वका सरख । सिडो मोर भागोका साधना मारकरीम्करोग एक मन्तर है उपास्य देवतागाम। मिले भनुसार- पणिम तमह समय बचाना ऐपिपुर बत्तन्त भाषा [पगित सफत सास्म म्याम्पान करता है किन्तु हमें पुरयास करते है यह मही मानता।] मर्मत गस्थित राही उपास्प है। नाक बनुसार पुरक मानपर पिएमा पए । मौर भी गौ मुल समारमानमें पुखकी युगमय मूर्मिती पसना की नरबी। उसके मान शिव-पार्वती मा मा किन्तु इनमें सबसे अनुरापाप्मकी युगक मूर्तिसलिए उड़िया साहित्यक पूर्व मम्प युग मा माताह मनाट पम्म रापाप्मकी युगल मूनिक ही माभातारमा पस्नेत मिलता है और सौको निरव गोको निरपरान स्वात्यादि करा पाई। या महा पट्टामून्य उसमीय वैष्णो माम पम्प पुरी बपनाप मोर पपाप्मकी युगल मूति एक मोर भिन्न है। सामना मापं पितु ही रहा। माना है काय माघमा और वोपनाही योग। पीया साहित्य इस पूर्व मम्म मुगको पम्पसता पुग भी बाart। बारामहास पगलाबास,बमनाम पोषन्तम बोर मापरात। मी ममप तम्यदेव उड़ौमा आए रे मोर उडी माराम पर महापुरुषार माष नम्प मापन पिया वा गितमा पम्पमया माम पा गया। पहमेसे पम्पमारेभी। मम्मुतामन्ती राम्प सहिता में इन सिए परमसता मौर पम्बाचा पोगों नाम माते है। पम्पमाता मा सम्प्रदायो मुस्प ने भी। उनकी पांच यादियां पी और उमम बमराम समतारक मन्बो बमम्नावरास पोग्य नाम या बत्तीस ममर मग्मक यगोषन्तवास साम पञ्चासर मपक मनम्न पास एगासर मना और सभ्युतानन्ददास ममामर मात्र उपासक। समसे यह पता चलता है कि ये समम्मपबादी। पषमताबों में प्रत्येकाने मात्र किन पहन करा गया है कि मारिकामसे सौन पाराएँ पती माती पी-धर्म-धाण पुराण भारा और काम्म गरा। बहरामात रममा साम-कास रोग सन् १४७२ पा। पासवा मॉमे पेप्ट थे। उनके पिचारा नाम मोमनाम महाराट मोर माताका नाम बम्पुरती मा यमुमा पा।मान मिम मा योग मिप पनि सारा । उमकी मस्ती रेतकर भी तम्य देव उनको मत्त पमराम कहा करते । इसलिए ये मत्त बहराम के मामसे प्रसिद है। सिरिसे सम्बन्धित उनकी बहौकिक पगिकी बनेक घटनाएं प्रचलित है। उनगपाणिरामापन डौमाम मत्यन्त प्रमिव है। मारहादामन महा भारत समान पणिवृत्त मिखा गया था। इमलिए इमका माम आणि रामायम' पा गया। किन्तु मुद्रित पुस्तफमें इसको भी चतुर्पभामरी वृत्त परिणनित कर दिया गया है। सपा मसकी मामयममोहन रामायण है पाकिसयमान' दि पयस्नाय पोकीमामासे यह रामायण लिखी गई थी। मागमा महाभारतको तए यह मी माम्मीकि रामायनमा ठीक-ठीक बनुमार नही है। प्य शूनचरित परपुगम परित मादिमें मन्तर वो है ही उमरे मतिरिका उड़ीसाका परिष माने लिए भी कामसम यावे है जैसे महादेवका बाम स्पान सास हौसाका पपिनाम ही है। रामनने गीमा चिरगामेत्र (पासपुर) में तपम्बाकर पियनीमे पर प्राप्त निन्या भागार सेनापतियोंका बम्म स्थान रडीमादे को पचमभिरि,बमाई गाभणारयारिको बताया गया है। इसमें गड़ीसाना पातीय और सामाजिक जीवन पूर्णरूपमें प्रति विम्बित हवा है। माता भी उड़ीमाही -मी कमी है। यान्य पुराण साहित्यकी पाराम माना है। रम्होने योग और वर परक प्रम्प भी बना मिला है। इनमें मेनमार, बह्माग भूपोर पोलिमार मिटानाम्पर, मनगीना ममरकोप गीता गुप्त मीना भारि प्रमुन। गुण पीताकत भार हो मम्पाप उम्हाने मिने ये। उममा मेप मम एम र बारामधाम में पूर्ण कमा। उनकमाम्ममि बटयामास पमप्ठपोरी भाव ममा मारि प्रधान। 'भाष समुद्रमपिन पाम्पमा एमपूर्ण प्रम्प गुणिया या रप याबाद ममय बलराम ससने मारी पोप परम्पर पानेरी पेप्टा की तो गवाही मानामे पणाने रहे प्रासादर निमाम रिया। इस मपमानमरठकर देगा मुहाण पाल गए, मोर नहीं एक गादीवीन रप बना ठाकुरोको बैठाकर मपन्नावगीको पोसने एवं मिला करने गये। पर नहीं पता। परभावमा पारेर बम पनपति महायन सर्व वापर वमको काए नो रप बसा। इस स्तुतिमे सना वर्ष इतना अभिमान है कि एक सच्चा मक्त की इसे मिल सकता है। इसमे पमप्प और गानाग सब एक हो गए है। इसकी भाषा मी पर्दमपी मौरस मी मस्मन्त मनुष्य इस पर नेका होम समाना नही गाता हरि हो-भाति मिरवरिकि नहि। सासाचे बिमय पर बीताई।। मावतारपिपनेबार। रवीबोजाइ मेने देने पार॥ हरि हो-हात बाग मार होने बार। बात बलरामर तुहिमाष्ट ॥१॥ हरि दो-बो पे पुद्धि मरिषान्तु । बलिमारजकिपा सन्तु ॥१॥ हरि होगापा सम्पे का निपन प्रोती। बोपरे पति भीति। भाष तो रस तुब मीना। बननाते गीगोद मिलिता ।। ही हो-परा परितो गन्ता गिर। बात ही कर हरि होकामोच य दोर नाहि । सौता पवन मेसा बोराण। मापसे पुरा मते माणित। तानि पुपि पर गतु॥ ही हो गया? काब मोहिला तोर । बलिया रात पर पार men हर हो-रस्तारि हरि पापान हेत। शिका मालपाम माम बाहित ।। माप तु मोपरे मा मनोति । परतीरि संचे पारित। हरि होहि पापा हेतु परम। बहरामरात , पाप्पmm इस्पारि १७ इममें इस प्रकारके ०४८ पर है। मरेमामग्मित उमहान कई बाएँ मौर कीमिया मिली। उनका भीममममीताका श्याम एप पचानुमान भी मिलता है। बगनापास पम्ममवाम मितीय मत्रा सपनामदास है। उनरा बामहाप करोग मन् १४९ है। उनके पिता पुरी निकट करिमारपुर पासी पुराप पंा। पिताका नाम पमपानहाम वा और माताका नाम पपमानी। ये मासम्म सारी मोर पाठ सापकी उमम पुरी मन्दिरक बायपर पास भामणकी प्राचात म्पास्या करते है। कहा जाता है कि १८ मादी उम्रम गहरामदामम उन्होंने रीमानी पी मौर • माझी उममें उमा सिरामा मामी सन्य र उनकी सलाकिक गतिखार उनका बनिया काने कम। इसलिए उनकी वरिया उपाधि हो मा मौर उनका सम्प्रदाय मतिको सम्माया मामम प्रमिर। उनकी तिमोंमें महम प्रमिड यीममामा मुहारो या नबामरा बनम मरस मुमपुर मार मुमत पचासमार है। पर दाना मानिरा किम वृत्त का माम मापन पड़ गया। लिो प्रानाम रामायगरे ममान पा उममें अधिक पागीमाम प्रचलित है। हम पपापार फार नामा मागपापम भापत नगी मीर परपर मामबत पारी पाई गाता है। यान मी मुष्प गण्या पास हरिलाम मोर मागका सर मनुवार मुनाया है। इस मापनका भी एकाप पम्म बरि प्रचलित है और यहीं-नही मापब मामम मम कम्त ही मममा पाता है। मगम्नायगमन एपान म्मन्ध तक मनुगार भी रिमा पा। इमम भी मूर मागवनम बोसमात ममा पा गाना || मात्र बार भयोग मात्र पर महापशम इमको पूरा किया था। नारप परफयोम वाप माना मुन मामा मामिया 'मन गिक्षा' धर्म पोरनी पारि प्रमिर है। इनमें मी पहो पाय-मापना मान मिमा भक्ति सपनाम माहात्म्य निसानागा एसय मावि पनिवरिपए है। इन अनेक ममा प्रम मोप्राप्त बिनम रामति करना अगमषित अस्पताकत निय पुप्प पीना जयमाय बरिणाबोधि मागणी मादि प्रमि। उपायोमे दहिगर बामगीन पर मुनि मपनी मनुन मुमति मारिपाटी बसाएँ है। मा मनिपाई मौर पुछम बागाभी पुगार प्रधान है। पियाम- पभोक्तराज मायका बाम ईन् १४९१-१४९३ मोहमाया। उको पिता का नाम बमुमक्तिक (पप्राय मस्सिा) मोर मावाका माम चापा १२ साल की उममें परोपर उन्होंने भारत मोतीपॉका पमम पिमा और मन्डप पुरमाए। प्रकार है कि राहोंने उम्प देवसे पोधा को मिला पा जोमन यापम भरते थे। इन्होंने समापार रामकी भगिनी मम्यना देवी पापी रना कोई पुराम नही मिला। सामना पर पम्पोर्म मरोम केस का विषारोपय मामसे या पचानुवार मिया है। उसासे रनली मार उस पुपकी पार्मिक प्रवृत्ति स्पष्ट हो पाती है। उन्होने प्रेमभक्ति का पीता मिती दी मिसमे सर साबमासे समाधि माम और समाधि समस्याम राबरण मितरासका वर्णन pिe पर किया गया है! उनहोंने राप पष्टिका मार अविष्य पुराण मारुका गारि कई माहिकाएं भी लियो। मेकिन उसको सरसे प्रसियर गोविन्द गौवा है। वह गोवा मयत वनप्रिय है मौर माय योगी गोप या (एन हत्या) के साथ मा-मार मिमान करते है। उनके समरन (निर्गम भगम) भी प्राप्त है। ममतास उसका बम्म मत करीब सन् १४९२ मा घिभु मनन्त नामसे प्रति है। उसके पिता कपिल मोर माया मारी थी। ये मुके सपासण। प्रचार है कि बताने धनको पूर्ममाराम एगर मम्म रिवाया और एक हमारहोरी गिहारोबी। के सोपानुसार गन्होंने पठनपारेर और निरमामापसे सामालार दिया और नित्यानन्द मोवामासे पानी पी। बोममिमा पितर सापक थे। उनके गठम सब प्रापिठाए। गनि भवन पौमिण स्तोत्र पग बाबिल सार नस बनन्त समार बागव पुमा मालिसा उपरेपवर ठौम्यापर (बाबरमामा या भविष्यवाणी) और व ग मापद एका प्रश्न तिवापा। हेतु वाय भागवत में मगर पाम मोरवयोम तल मायनी ठल राम तल मारिमित है। हममें भी सम्मा मापा'का प्रयोग निगममा है। अपुताराम उन पामराम पिपपम पर मनासिर मनम ई सन् विना पप ११. और मरो माग र ४५ है। मरे पिता दीनान पशिया और माता पमापठो पी। उपरा परम निमाया भाममे हुमा पाऔर उसकी मारी माय मौकमि मेम्मान म विपमान है। भमा रोषा नरो वारेने भी मामेर रेखा पाता है। किसने नित्यानन और मरे समान बजने है।
पम्पसबामों में इनकी रचना सबसे वनिम पाई बाठी है। मणानार 'संदिता में कहा गया है कि तिम संहिता अठत्तरी गीता पंधान सप्तबिभरे। उप सानु बारम पनि भविष्य मत परे। पच पचावती मेक में गाय सा भीसम्म महिमा। वो मापे हि बरमकुमार ब्रह्म सारस्वत सीमा ।। मर्माद उन्होंने ११ सहिझाएँ, ७८ माताएं, २० सानुपरित साप हरियम १२ उपचानुचरित २ मविप्य मासिकाएँ गौर एस भाव मच-पच मारि (जिससे कोकि नीतीसा टीका शिलाम मोगात मुनये निर्णय भवन मावि शामिल है) मिथे। चमके बने पम्म प्रकासित है। नमो भनेक प्रामिण-यप्रकाशित पत्पोंमें 'मया सविा 'पोठि सहिता' अपार संहिता' 'मन संहिता' 'मन संहिता' 'तन सहिता' 'मनाइत सहिता' मकमित महिला' मादि प्रमुख है। प्रकाशित प्रन्माम पुरापोंमें सात वर्षांपाला हरिष प्रभान है। यह संस हरिसंसका मनिकम वनुवाद नहीं है इसमें नामतत्व निराकार उत्त योपत्तत्व सप्त पाम्पामिक प्रभिम माविका म्याम्पान किया गया। इसमें मोगान्त बेदाग सिता नामान्त मागि मम्परायों का विभिन्न मठोंका उम्मेव भी पाया जाता है। यह एक मत्परत उपारेय प्रम्ब है। इसमें अच्युताननास भिवती "हिण भारे मतेश तुम्क बसे थे। एप बोर तेजि मोड हिमु मजे"। यहाँ कबीरफा मन याव माता है हिम मजे बह हुई भये मोफ। इस मावा र प्रकृति बमापार संहिता ज्यामीम परत मावि मनेक सम्ब है। उनकी बार एक प्रसिद्ध है मोपासा मोमाजमो परिवेळ (भोपाको का मागोटना मौर काठी वेग)। मोगात, मुदामाका प्रान मौर श्रीरामाका उत्तर है। इमा बास गौरनी माहित्यका प्रारम्भ मा । किरासने पचम जगन्नाप परिसामु सिवा निमम पम्पसवाडि एक मभिषा जगमा रास की पीरनीरीमा है। इनमेवानमिना भक्ति या तलमीय पग धर्म प्रतिपारित ध्मिा गया है। विभिन्न मम्प्ररामों मोर गावारि माप ठन्यदेव की बीवनी बार गोलीय मम्प्रापले मग्य प्पो जीवनकी एक मत मिली है। रिवापरराम सन्की पोगा पताम्बीके प्रबमारी। समालो गजादी प्रारम्मम सिरवासने पंचम्प पापगत सिवा पा। पहा संहिता २० 'माग पुराण पम्पमतामाको पम्पराम दिप्मुगम पुराण के रचयिता सम्पदास बधाकार सरिता के पिता मन्बास सुधारसार पीठा + पमिता मनमणिरास पाच पाता रिमिता सारिकावास प्रमुख है। तत्परामने निर्गुण माहात्म्य मी निवा पा। देवरिमा वामूल प्रार निवासी थे। बारिकावासने पसम्मापवासको मागपतको मी पूर्ण थ्यिा ना। पर मौठा योग तया एक स्वप्ट प्रन्यो। उन्होंने परोपमणि णि पुण्म मावि भी मिला पा। पर यूगर्भ बार भी अनेक पुराण लिये गए थे। महापामने इसी काधम विष्य पुराण' पप पुराग' 'नोमादि महोदय' विहार पुराम' कातिक पुरान' 'मान पुरान' बापान पुरा गरी माहारम्य' मारि मि। ये पुरानो बस-टीक पचाननाद मही बल्कि पौराणिक मारयापिकाबोपर माधारिप पुराचा विप्र सवाणिवका विषिष हरिबप भी इसी काहनामिपिन का मभिप्राय ! कि यह विभिन्न मोमें लिया गया और मोपडीला पाक सोस्यसे लिखित होने के कारण पुस मप समाप भो मा गए है। हकपरपासने मध्यारम गमायम' का पचानुबाद भी किया था। मौवगोविर का रस पारिधि मामसे वामनरासा पीर पर पचानुमान भी मिला है। इस काली नमन साहित्य सातवेग प्रसि मुमतमान में किन्तु कृष्ण भक्त। गम्होंने मनेक रसारमा प्रतिगाम मिले। पहा एक बात और मानमें रखनी चाहिए। पासवामकि समय पम्प-- र सहीसा बाफर पुरोम बार दिन तक ऐ। पम्पमधाोंने अपना पिदम रखते हुए भी वाय देवकी महिमा मीकार कर लिया।बार्मिक सम्प्रभागाडी पवि बार पाहियपर इसका अस्या प्रभाव का विस कितने ही प्रेम मन्देि उपासक हो गए। पोवायरी मपरीके तटपर रायरामामन्दीरम्परा मिसन और समाप ऐतिहासिक है। पयपमानन्द गुर भपिठक पपासा। उन्होंने अति में पदापनी मिती है। बम में रन रिरि प्रेममापी मय पर पामोली भापा ही नही पा सकती है। इसलिए सीमा भी प्रगति में कितनी ही परापती पाई जाती है। गवरामानम भी उसी प्रकार है। उनके संग मान भी पुरी निवार्था मम्मामै एसे है। शिधी महान्तिकी बहन मापनी रानी भी इमी प्रकारकी कानी । म अनेक पर पीप और परापलीम पापे जाते है। उनके पहिया पर भी पापे पए है। पति की परम्पराम पामारम्पनि राप पाए मारि करिमाने। मिई कमि ही नहीं पर उणियाम भी पूछ भक्त मावि हुए थे। सनबम्युमा हान पर प्रभा गुजराण मीमामृत मलित बाबावित है। प्रमपनपने भी इमी परम्पराम मवानुराम गीपाप बारि मिनी दी।
- मह दो धर्म-वाराकी प्रवृत्ति हुई। मारि युपके गान रामकी रामनिमा सम्प-कारापरी नहीं भी। इस सुपर्म कामना भी रिकाम कम नहीं हुमा मा। - समय हाम्रो प्रकार पाये बान है-एक पौरामिड कमायम्नुपर पारित और इमरामाणि या कासनिक कगाम्नु पर। मिमुमारामका उपामिलाप पिपरासकी कपटकठि मकी पनापती विसाम कातिपदानकी निमवी रिमा बारिईपारापिक पहै। 'उपामिलाप' काम्पम मानिसका प्रेम मरिणम ममित है। उनकी प्पोम्पर नायिका बर्मनका प्रभाव सेममयपर भी पड़ा है। रपटस' पय-राका मान मयन करने के लिए भीमप्या मारी पारममा मट धर्म रेषित इम काम्पक प्रत्लान (मम) + प्रारम्ममें माहा पीना। मावती विनाम में दुर्योधनको पुषी बनारतो मौर भीरुप्मा पुन पाम्मका मुप्त नय और विवाह गति। इसमें परवीजनमें पमित विपपड़ी भूपमा पूर्वी के मन्तम पी या है। रश्मिनी विमा (भिवाइ) : माममे हो इसकी कया- तुम्पर है। पिपपास पर इमका उपरोपई। उनका पामरामाय मिया मसानुराम रिमा दिपम ईरालका प्रबम मिहन । हाकिर पा काम्पनिक कसाबम्नुपर मापासि कार्पोमें प्रतापरामको पपिसमा रामचम पटनायककी हाराबती पीपरासको काम्पन्नता पुमा हरिपतनको कागती मावि प्रधान है ममिमेमा का माशर होक कमा है। इसका नायक मन्यौपुष महिमामिप मोर नायिका राममो मिर्ममा है। विधानपमें उनका प्रेम गुम हवा पा और मने विपत्तियां मेलार नन्तम उनका मिलनया पा। हारापती कालनित कमावस्तु पर भावाति मौर भूमार रम प्रपान है। इमा नायक पात्र नही है। यह एक साधारण है। गौर नायिका मभिगात रंगकी नहीं बल्कि एक गवानी (मिठाई बनानेापी)ीमी। यही मका एक प्रधान मिष्ट्रप । पाम्पममता एक नास्पनिक पाम्प है। हीगारतो डोरपातु तो दाम्पनिक है ही साय-मार 1 उममें सीता ताम-मय का भी प्रयाप दिया गया है। पुनाव हरिपनन एक अच्छे मगी। (1) उत्तर मम्म पुग रतर मम्म मुगदो रीति पास भी पापा ममा। मतिम बार रीतिकात माता है। किन्तु एमका मर्प महमही कि इसमें पक्तिको प्रर्मपारा विकास यई। भानमिश्रा और पयामन्ति मपया सलीम और गौड़ीय दोनों पाराएं चलती रही। बाय ही प्रेमक्तिकी पाए प्रबल होने कगी। ऐना ऐना म्यामायिक मौपा। किन्नु पूषमम्प पुनः अन्तिम काम पनि कामा मूषपाउ हो ममा पा। इस पति पाना हिन्दी रीति काम पर माश्य २२ इस काम पौराषिक और काल्पनिक दोनों प्रकार काम्म पाये जाते है। इस युगके समी कायोंमे कमावस्तु मोर मापनामिका एक-से 11 सबमें माकस्मिक पर्यन मिहन पिफ वनुचिन्तन एवं पुमिमम पमित है। नापिनाएं निमित्त माष है। पर्वम प्रधान है। नायिकामोनी पियोंका पवागार सीवा तर का मचा-पिव पर्षन किया गया है। मुंमार रसका पारम्प है। महा-मा गंगार मस्तीप्स भी हो मया है। सब प्रकार माहवारीका और क्लिट सनोका पोष्ट प्रयोग किया गया है। कोप पथ मप्रग पत्र साहित्य शास्त्र काम मात्र और भम्पाग्य पास्मोकी पारिप सर्वनामें सहायता की पई । माया- भाभिमण प्रबोंकाकामा ही क्या। उपेन भम्बने इसकोपराठा कर पोचा दिया। इसलिए इस का नाम हो मम्मकाल पा गया। वस्तुप पह का उनके पहोम्से हो एक हो क्या पा। मनाय नमः (१० से १०.१) पनवम भम्म उपेन मम्मो पितामह । एमसरके रामा पे। उन्होंने रामायण पर बाधारित 'रनाम विकास' गौर काम्पनिय व्यावस्तुपर माधारित त्रिपुर मुरारी' मान मरी' 'एक- मम मनरेखा' इमारती' माविमाप मिले थे। उनपर 'विशालकी शप स्प। सनो 'एन परीमा' मष परीक्षा' और 'गय परीमा' ये तीन मग प्रल मोर चौपदी भूपन भारि सगीव पम्प भी रपमध है। उपेन्तु मम्मपर धनमा प्रभाव स्पष्ट है। मापाता कि मुनाप विकास को टक्कर विवार' सिवा वयापा। नमरात मेदितीय मानक (१९५१-१५८१) वारिम्प सिरप (१५२६-१७१३) + ममयमें मोरित । रोविकपि । पदोने पामिक काम्मम रीविका और पर्यम रतीय और पौड़ीय मार्गाका मममाय किताबा। सहीने 'रम पाठोत काम सिवा था। जिसकी प्रत्येक पत्रिका प्राम अमर पारावाप्प पर एक मपूर्व काम्प है। माप नियमकी रक्षा करते हुए भी यह एक मत्पाड कलित मभर काम्य है। इस कविता सात भ्यक्तित्व स्पष्ट है। परिवारैम कहते दिपा करे मुहं स्तुति एपिता ना? विपत्ति मौर पिताके बारेमकहते है- रधि हो कापि निर्मत वित्त । अपमणि रसिक पगिन ।। वितरिमापार विस काहा । हेम हि पारे चिपिपा। - - - भूपति पगित इसके अलावा इनकी "रानमीता रसदिनौर (उत्तपरक) 'प्रस्ताव सिम्पु' (उपदेय परफ) 'मायकेहि ममारस' मौर बात पण तोण मक प्रतियां पाई जाती है। दे सारपस पाएन २ मोर विपत होकर पिम्प सिहक समपमें उड़ीसा माये । देवम्पराससे मन मेकर पीसी सम्प्रदायमें शैक्षित हए । रमिया मम्छी तरहसे सोसार बगमारवासी भाबत धमान नयामरी वृत्तम 'प्रेमपंचामृष्' लिचा पा जिसमे रुप्मकी होग यनित है। यह भी सीसाम बस्यम्त प्रममित है। उनका भूपति कांतीसाक मामसे एक यात्रीसा भी मिलता है। देर न पाप्त उनकी रहस्य मम्मरीपर मानमिमाको अपेमा प्रसा- मपिका प्रभाव मधिक है। उन्होंने पप्टर कमल सर मौर महापोम पोठम स्थित पन्नाचमीकी स्तुति करते हुए भी मोपियों का मार गोपिर्योम मी रामाका श्रेष्ठरा प्रठिपारित पिया है। उनके मठम गोपिर्यो प्रसारसेही प्रेम भगिन मिस्ती है। इनका काम निश्चित नहीं है। पदापती रासी मौर उनका परिवार पूर्व स्पसे गौड़ीय सम्प्रापके मनुयायी पा। उनके पति वनक्षेबरसासने १९९५ में प्य वस्य पम्रोषय' पुष भीमरासने हरिभक्त चन्द्रोदय मौर भक्ति रत्न माला और उनके पौत्र पामिरासने १९९८ में उपासना पोरस मियापा। उन्होंने स्सप पूर्वतम मिया पा। इसम पीरप्प सारिका पूर्व मधुराम पूगतर मौर सबमें पूमठम प्रतिपारित किए पए है। तोमान विचार पामपुरके अधिषासी पे। उन्हाने 'सौम मुनरी' पद्मावती परिचय रमरका चित्रोपमा परिमका बोर 'पावन विहार किया पा। वृन्दावन बिहार एक पौराणिक काम्प है और उममें गप्प मीका पित है। बाकी सभी पाम्पनिम काप्प है। रसके पापोंम इमेप यमा मन्तलिपि परिसिपि तमा मोमुत्रापि बन्योका समास है मौर गम रीति कासके सर कमन विधमान है। पदमावती परिणय' १७ ५ में पूर्ण हुमा बा। लिपिक भम्र की माता भी हमी प्रमारसा एक काम्प है। इमपा रीति पालकी छाप सकी। उम्रमम्मरे चाचा पे मेधा भी उपयुमय पृष्ठ भूमिमें पैदा हुए को उनका जन्म १८५ में और भृत्य १७२५ मे हईपी। मो पुमसर राम परिवार पे मार प्रमजप पौर । पोत पया कि पौरपर पितामहला परेप प्रमाण पड़ा मा। रोगप्पा भी उनपर प्रमार पम न पा । उनका प्रमिर रहीग विमान पाप नम्मर भयो रपुनार क्लिाम सारमें मिया गया था। नामम मप्ट है कि ऐन विपमरमनु एक हो । रितु माम सा गया पुनाथ - प . विकास की जगह पर दही विकास ! माम मान ही पर सारा काम्प कारादि नियमसे किया गया है। हर एक पवित्र मारिम कार माता हैसा कि महम्मदासरे रसकमोड में कार से पतिया पुरू होती है। सिर्फ इतना नहीं इसके प्रत्येक मर (सर्ग) में पास बत्तीस मावि रापदि संस्थाके पर भी माए है। सन्होंने रसास्तोल सारमे एक ग कौतुक सिचापा मिसमै नामक समान मारिमौर मात नाम है। पमा बम्प पौराणिक कायोंमें तुमपरिमय गोला विहार रामाहीमामा बनारसारा मारि मुस्म है। तुमारिषय में 'सापयि नियमका पान किया ममा है। मबमारसरङ्ग सम्पूर्ण कापम बना पा कापरि मात्रा कोई मही है। उनके कासनिक काम्पोमें मुम है--'हायप्पमती' फोटिसाण सुन्दरी रसिकायती प्रेम मुअनिधि 'भापवतो' 'मोनामती' मारतो कसापती मावि। उनका एक मासारित प्रत्व है रमपम्पक बिसके पाप परिच्छेगॉम र म पांच मभर मारिका नियम रक्षित है। चित्र काम्प बन्योरम एक चित्र और मल काम्पका बना नमूना है। सम्होने एक कोप सत्य भी किया। गीता विमान में कान्त पान्त मारि मरयमरीको कर समाको समाया गया है। एरतिरिक्त इनकी कारमूपम पातु मावि मोतक हतियां और रचनाएँ पाई जाती है। इनकी रचनामा रोधिकार सभी मतमोरा सम्पूर्ण विकासमा है। कपा-वस्तुम लियो रीविकाबीन काम्बके साथ काम समान मिष्टवा मोर यूटोपित गठ मानाम है। कहीरही पानेमे पर अत्यन्त सरस और तक माते है। किन्तु उनमें कोई मौतरी बात छिपी रवो है। एक पर मारिए। साप्नमें मापम्पमती साप पवमानका संयम होनेके पार पानामान बता पाता है बोर भारम्पपदीकी नीव पूर बानेपर उपेन भय हवे है पति चातुरो बाहिका निशि मा बामे नहि रिम्प ताम माधिरे इम्त बाब नाप बोलि मति परे पापाप। मगीरे। विधि या परी हिसा हर मरिष बिरे।। या कारt! पर मरत मार तिरिनु मस्त पता है कि हामभरली परमानकातीठो माया पर्यो गाटतो? पीपा पोस्ती है मौर एब-सग्निपरहार यो फेनी है। इसका अभिप्राय है कि मायाका नाम पापमान है मत ना पाप मोर पान है। इसलिए क्या मे तुला रापिम पमे पए ? मार्म भी तुना गगि है या उसको राह निकल गया ? फेय-भार पहर समान मामा है मामलापम्मे परे पप। पुर समापन पर्वतक समान उम। म प्रसार उनी मने फूट पर है। - - - २५ - सचमुष रीति पनाम रे मीतीय है। इसलिए इस एपको युग पहा बाता है। मग मग मीमुमसरफे इसी मम्म पराने में पेश हुए मारपमध्य मम्मके छोटे भाई मोविण्य भयो हापे। उन्होंने भी रसनि' मोर विनोक- मोहिनी' रीति काम्प मिया था। ऐति मार सिबाय मन्प पाराएँ भी प्रयामाना। मिषनाप पुम्बिाने मितिम महाभारतके समान विभिन्न पदोंमें मरपन्त सरस गानीमें विचित्र रामामन' मिनी भी गो मत्यम मोकप्रिय सपना है। सिर्फ माया ही मही चन दिनों भी शिमुखों मोर प्रौदों के लिये पाहिल्य मुष्टिमी पाठी मी। विपिन रामायम उसी प्रकारको सृष्टि है। बनाई सकी 'गोपी माया भी इसी प्रकार का साहित्य है। एप मपुरा यमनकबार मोपियोंकी करुण बास्पा इसमें बरे ममस्पर्शी गसे पगिठ है। इसकी भाषा सरस मोर मार है। इसमें समस्नीलता भी मा गई है। पुराणाराम पिताम्बररासका मरधिा पुराण भाता है। यह मम पनाका बबिका मनुमार नही है इसमे पाठ मतर है। बीवनी धाराम रामदासकी दायिता भत्रि बाती है। मा माम समान इममें माताको जीवनी दी गई है-भगेरिया गुमाहापौरभी भी। पूर्णाकर भालोपनासे पता चला है कि मम्पमा उपिया साहिरममें को प्रवृत्तियां स्पष्ट पी एफ मर्म पी मोर दूसरी रीतिभी। साब-साप यह भी पाय करनेकी गादि पम्पसमा समय वन्योर उमेसा माये थे मोर धीरे-धीरे उनका भी सम्प्रदाय बम बमाने कला पा। काम क्रममे बीमा बप्पा धर्मम स्पान पोहोप अंजा पम मेने लगा। इसलिए मम्माम माहित्यक वारीमा साक्षिपमें मौड़ीप प्मा धर्म और निमामीन समन पोनोंका समन्वय रेखनमें माना है। इस मातम काम प्राय पपा म प्रेम पर है और कहीं-कही मीमता भी बा गई है। किन्तु जारणकी कोकाको बानील मही कहा था सामा। उनमें प्रधान याम बिह-सपामार कपिमूर्य गमा (सापुचरण दास)। रे माया रिपास मिजारी पाम पाहुए रे मोर पुरी परापोर कियोसा (१०२० से १०८५) से उनको कबिसूर्य ब्रह्मा को उपाधि मिठी थी। उन्होंने 'कीर्तन रखकरे रचयिता बाबा पिसारासस रोमा मोपी मौर रनरा रीक्षा नाममा पाषरण पास।वेगौडीय सम्प्रायः ममापी पे। रहीय विकास के समान उन्होंने भाव नियममे मिषम्पर विछाम काम्प लिा पा। उन्होंने प्रेम तरपिनी प्रेमी प्रेमचिन्तामणि कसित कोषमा स्मरणीपिका युगतरमामृतपणे युमकरमामृत मेंबरी मारि सो प्रम्ब मिले थे। यस्तरमामृत तरीके मितीय परम (अप) प्रत्येक पदक प्रापे पनि मारिम'कारिबारिक वार वा बारिसरणार - २६ मियम और प्रत्येक पंक्तिके बन्स्य मर्ग, रेफ युक्त परा मिपम पालन किया गया है। उनी काम्पोंमे प्रमाणका प्रेम हो मुस्मतया पणित है। बीर किसोरेपो पुष प्यापसुन्दरोषने मनुराग कश्यता मियो पी पिसमें अलपति नियम पाक्ति है। यह मो रामायण परक इति । मात परमरास चमका मधुरा मंपत उड़ीसा मरयन्त प्रसिर । इसमें रुप्यकेस मम तककी सीका पति और मोपियोना विभम मोर पियवर्गन अत्यन्त मर्मस्पर्ण रीति काम स्पर्ण पठेपए भी भाषा सरसमे मानकी अपेमा प्रेमी पेप्लवका प्रतिपादन किया गया है। उनका मनदोगामातीगा मी मोहम्मको समान गुमनेमाती भापामे लिया गया है। मामी मरयम्द तोपप्रिय बना है। हम बाबा फमा गर, पाँठोमा मणिमा आदि मौर भी नमकी कई रचनाएँ पाई पाती है। मनिमम्म सामना तिहार ( २०१७-१८.७) मके शिक्षा और पोनापुर सार परमवाप्स (सदानन्य करिसूर्य) । रासपूत ने मार उनके पूर पुष्प पश्चिमसे माए थे। उनके विरण चिन्तामनिमें माधुर्य मपित गौर रीठिका मपूर्ण समम्बर है। दनकृष्णरास रसम्लो' मौर उपेतममारे रहीत विकास में साप इसकी बगना हो सच्ची है। पैदि कास्की सारी वियपताएँ इसम रिपमान है पाप-साप नि माधव समित माषण मादिम प्रतिपारित प्रेम-माधुर्य बारकाम्म-माधुर्पसे भी यह रचना माझानित। पिजीवन के प्रारम्भिर बिॉम सनाने प्रीति चिन्तामगि मुमालपा रसवन्ती प्रेमस्या रसकमा मारिनास्पमित काम्म मार गान मोहिमे। इस पाममें सर्गोठ या पंचायण तो भी हुए। जिनमें बसमाती पट्टनाप गारपरम अधिकारी पोपानहम पट्टनायक प्रसिट है। पा ज प्रेम ही इन सबके साम्पक उरमीप्य है। मोपाम पर पौषित रे । कोटिपुम हीमो माघमें नगर पर बर मा पाते है। मोकाहम पिरिक हरिचरण पसागरास' नियामा। जिनकी भापापर गति राप्रमाव रिवाईसाहे। , मोसमीतमय है। इस गीतको परम्पराम बलरेरण कषिपूर्व माते है। उमका चमत्पर सोमय भार प्रमिर है। उन्होंने म्भिार मानर पम्पूरलार' मारिष काम मये है। किशोर मानत चम्पू गोगनपत गौर पचाग सरिया मगौतम मिया गया है। बताया ममाम प्रत्येकमा प्रत्येपमारिम , ' ग गारिका नियम t। ये पम्पू गीत भी कीरिपुर में मम्पम प्रमाना। उनकी म १८९८ में हुई पी। मोने पर कमा' नाम: एक कासनिराम्म भी मियापा। इममे पता पना प्रेम भक्ति मौर रोनिका सब पमा ममियर मही हो पापा पा पारिक विगुर रीति काम्प भी गिवे गाते थे।
२७ पिपर रोति परम्पराम पमणि महापात्र भी माते है। रीति सममानुसार उनके प्रबन्धपूमनमोग्य में भी गप्प मौर रश्मिनोका विवाह गणित है । मे हाम्य प्रिय भी मार 'यमपिएम्म नामसे उमड़ी हास्य पूर्व रचनाजोंग एस संग्रह पाया जाता है। उनका धम्मात ११. और मृत्यु का स १८५६ बा। इम भाप प्रमानठया पोम्पपिताम पाये जाते है-पासमनारयाना मौर मरे भीम भोगनाबके यो महत्वपूर्ण प्रन्नई-ममरतरप' गौरपतुस्निोबा ममर तरम बत्तासीन एक ऐतिहासिकपटमा नागपुरी चिमनागी बापूः सापमानासी पगा शिलोचन महेम् महारया वर्मन निरागसे किया गया है। इसमें हास्य रमा मी ममावेग है। यह एक ऐतिहासिक मापद।'पदिनोप' एक हास्य रम प्रधान काम्प मौर पर मी पपौ। चतुर पौरपपई-तुर या पगिताका ग्निोर जिमके भार मेर पिये गये है-हामविनोर रमबिनोर नीतिस्निोप मोर प्रोत्ति बिनोस । रनरा गुनिचापि मामका एकाम्प मिलताही यह हिन्दी सोरठ राममें हिन गया है। ममवत उन रिनों भी हिला राष्ट्रमापा भी। उन्होने निनाम्या भी निवे- पारादिमियमसे मम्मिका विकास प फापर नियममे पयामरामोरमब पास्पनिलाम्म कसता निधि मिलणा मादि। उनका पम्म १ १७॥ में मौर मृत्यु पायर १७९५ मैंगनी। भीम भोई बम्मान्ध मौर गारिक सम्म (मारिणामी)। पुम्मिपरिया मा महिमा धर्मक मनुयायी ये मौर मीमा गोमाह नामः । ये निरसर पे मफिन उम्झेन पनताकी सरम मार सबक मापा स्तुति चिनामपि म निस्पग गोगा और ममेरा भोंकी रचनापी दी। रनको पनामि महिमा धमके अनुसार निराकार पुम्पमा प्रतिपाइन किया गया है। मनमुष प्रमारिए मोर प्रसारम् । रन कान११.-१८९१ मिलिए रीनिपापम उनको नहीं रखना चाहिए। मेषित माहित्य प्रनिही प्टिमे ये बोर पान मोरो मार पम्पमचाकी परमराम माते है कि बापुनिक कालमे। इसलिए सारो यहाँ म्यान दिया गया है। याधुनिक पुग 'मम्म युग्म महाम(१९९८-१७३५)मोर मरठामाल(१७- १५ १)मा पारमे टिपा पार पुरु हो माग है। अंग्रेज सीमामे ईम १८ में बाए और पड़ीम मानिए पुम प्रारम्भ होता है। माधुनिक पुपका प्रासर प्राप' मा प्रानॉम एग्-मा हुमा है। परीपरिक प्रमश्म रही मामे मौर कहीं पीछे नहीं रम दोपही पाता। ई मन् १८०1 में अंग्रेजीमा मानेपर स्पा मिनरी मारे धम प्रचार को पारा लिए, रामपुरमे पाइलमा मा अपार प्रममित हुआ। इमीगण्या पूनिके लिए अमीनीया मपिडान मारपणाम उहिया वाहगामी मिया गया। गिमा की नीति भी मात दीप मोर एक मम्प पिजिन ममार २८ उभरकर सामने माया । अंदगी परने माता को मोहरीमें मुविधाएँ बामे सनी। माना प्रकारसे मोगांकी ममी पासमोर अंग्रेजी शिक्षाप्रति मारप्ट किया गया। उसी भासमें उड़ीसामे मीपण मास पा चिसो सिाईवक विस्तार बार प्रचारको बहुत सहारा मिठा। इसका सम्मान मासे होगा। मिसमरी सोग महसि जावे । उड़ीसापर अधिकार बमाने पाहते बंगात मप्रेगरि सासमाधिकार गायुका पा। बेगान रामा राममोहन रायो प्रभागमे पहा मी मिपाका प्रसार मौर उस फमाप एम नम्प मिमिद समारकी सृष्टि हो पायी। उसके मनुक्स म साहित्यका बाधिरि महा मी हमा। कोप मात्र हुए और उसी प्रकारके एक समारको सृष्टि हुई। इसके मूनम अंग्रेजी भाषा पौर मानिक परतिको सिक्षा पी। इसलिए बोपाम परे मिसमरी फोकि हावाम पा रखाको उदाताके यानी मराठी मार सीमा ओय पी करने से। पा राम पिकाला पाठवा और यह करीब साफ कपमा। इसलिए इसको पाठपपुस्ताकार मी पापा समता है। प्रेमी गिमके प्रभावसे भवनों माचार म्पबार मार साहित्य के प्रति भी होग माप हुए और यषि साहित्य पर रिप्रभामा जितु पापीम प्रान्तीय सास्पि बोर किया फारसी साहित्यसे सम्भूनम से विभिन्न मही इए। हिनी साहित्यका भी बोहार प्रभाव पड़ा। उसी पाम प्रधान कपि रामानाम प्रम । रामामा पप सम पूर्व पुरगामी महापाम १४ ममोर पेक्षा.में हमापा। उनकी सिमा प्रवेमिका परीक्षा होगी। पटक शिक्षक और बादमें विद्यालय निरीक्षक (ए। उन्होने का पाठप पुस्तक पी मिती पी किन्तु अपने दाम्प लिए प्रसिर । उनपर पथपियर, मिस्टन मास्टर स्काट भारिका प्रमार है। होंने पिर्मिम मौरबिसवापारपर बेरार मौरी मौर मझट्वापार पर पपा बासेपारम्पयाममीमापारपा पार्वती (मपूर्ण) काम म्यिा का। पितु पीक कहानिपोपर बापारित होनेपर भी मनोमाम इस प्रकार बाल दिए गए है और वहीसा स्वलो उसकी मारपों पहाड़ों और भूगोलको इस प्रकार और रिया पपा है कि उनमें विषमीपन ममता ही नहीं। सपमुष के मापन गुमा शिपी है। पिडिया गमका एक व काम और उसमें उनहा रगामयोर मार एवारमोन एप मौर्यरोष स्पष्ट है। उन्होंने मनपरी' 'प्यादिकम' मारिप ऐनिमामिक काम्प भी पिये। सब गीलाई निहामपर भाधारित है। महायागा गमित्रातर म मिविर प्रथम सोपा मालाम्प है। इमपर मिलना प्रमाप सप्ट है। इसकी मापा सोही गीत है। इनम दुधिष्ठिरका मारोहम पवित्र है। गम्हनि मेपर और तुमती सा नामम तुस्सी पसली - उहियाम पचानुवार भी किया है। उन्होंने पौरामिक रीतिसे बेबीस र खिा पा। इस बाबा 'दुर्योधनका सनरी सतरण' 'शिवायोकी उत्साहाणी' माविकी फुटकर कविताएं भी मिली है। १८९६ म मारवारी फिसेम मनुष्ठिन परवारको सम्म कर उन्होंने पार' नामसे एक पगारमक ऋषिता भी मियो पी। उसम उपाधि पाने वालों को भम करते हुए, अपनी शिक्षा प्रभावसे कृपपमामी सोगोंपी रिसी सहाई गई है। इवानीय युवा विवेकी बारि उनछ गाम भी पाए जाने पितु उसे गव नही पा पा सकता। पचकी भाषा मौर सीम उन्होने एक मुगान्तरणारी परिवर्तन दिया। बाधुनिक सुमके ने घटा माने जाते है। उनकी रचनाएँ पमामात्र प्रचावी * मामसे पी है। मधुसून राब( १८५५-१९१२) रस पास एक बौर परास्त्री कमिय। उमरे पूष पुष्प मराठे थे। उन्हाने एफ.ए तकको सिमा सहङ्गको बी मोर राधा- नाम रायके समान पहमे शिक्षक होकर पायम स्कूल इम्पेक्टर हए। किन्तु प्रापिसे + पिसा ही। उनाने बने पाठप पुस्के निधी मार नमी प्रसमम मनेक कारिताएँ भी। नमके गीद और कविताएँ नीया साहित्यम एस प्रमुख सान रखती है। समागी । मठ उगकी करितामाका प्राग वा माननमपठा ममितभाष और सिर प्रेम । इसपिए ये मात्र फपिक स्पम प्रसिद्ध है। उनकी जीवन चिन्ता मारास प्रति अपि प्राने देवापतरम हिमाचले गय सत्सब पदमपनि पारि कवितामोम ये मान सष्ट है। उनकी कमियामोम पेशारमबोम की भी छाप स्पष्ट है। उन्होंने चतुगपी (Sonnct) मी मियो पी। उहिमाका मर भी उनका भी है। गचकी मापाको उदोने परिमाणित स्प रिया मीर प्रबन्ध साहित्यका प्रवर्तन किया। उन्होंने बाल रामायण 'उत्तर रामचरित मीर मुछ मबसी परितामीरा मनुवार मी च्यिा पा। ममोनर सेक- कार्य नामक विधी कवितामा "निर्वामित का विकाप" नामसे सत्पन्न मुफप मनुषार किया है। उनकी रचनामोका संग्रह एक प्रतापगमे छपा है। रामार राय विपकर नाटककारक रूपम प्रसिब है। उन्होंने प्रेमवरो नामसे एक गापा काम्म सिधा पा। उनका बिगासिनी एक चपम्पास भी उपस गिसम मयठाकालीन चयोमाका मुमार चिभित है। उसके पहले सौरामिनी नामसे एप उपम्यास म मामिक पविराम धारावाहिक से प्रकापित होता था। किन्तु पत्रिकामा प्रकापन पम्द हो पानेके कारण प.मरा हो ए गया मोर पेप मम दो मी गया। उमा एक मोर उपत्यास माहिती सादुर मग इसवनु पनिकाम प्रकापिय मा पा किन्तु मोरे ही दिलामें पविका ही बन हो गई। गोषण भी हो मे नहोमारे प्रमुख उपप्पामार माने जाते है। बंगमा माटोका मभिनय देवकर उनकी एप्टि माटाकी मार मारप। होम बात पे कि उपियाम नार सफा हा ही महीं सकता किन्तु उन्होंने पुस्पोरामरेषले पारित लेखनमें हाय गामा नौर 'डानकारी' नाटक लिया। इसका पिनय सफल हुमा जिससे उत्साहित होकर मौरसोग भी नाटक लिबने समे। नहोनि ऐतिहासिक समाविक बीर पीराषिक माटम मौति नाटक प्रहसन या पाबा मारि विपर्योपर भी घिरे है। उसके माटक है-रामचकावरी' बनमाला रामबाबास सबम बिस्मारक युग धर्म काम्बनमाठी पम्प मीना हाठापाठी रामाविक बिन मझ (मौति नाटम) निकास मौर बुगर प्रइसन है तथा 'महको एक मात्रा है। उन्होंने हिलस्तानी राग रामिनियोका नाटकों पानोंमें सफल प्रयोग किया है। इन रिलों बातोयटाला सन्मेप हो पा पा वा सार ही साप समार सुपारको मानना भी बह रही पी। ये दोनों रमकी कृतियोम प्रतिफमित है। शिन्तु समान मुधार माय ससक्तिक परम्परानुसार पारवे पे सकियो सिमाकी मम्म मनुहति पर। इमी काम्म उमेतपत सरकारले 'पदमाता' नामक उपन्यास मियापा। इन महावा ममिवरण महापान पनमोहन महारमा बामगा पमा मुल देव मारिनोरमेक हो गए है। वायुविक काम पूॉक प्रम पर्याय मेमोन मना मनिगरापर हिया और इसी रेस्पसे अंग्रेजी गिमागे माप भी सुपरमी पौ। भारतम गी शिमा तीन-तोपन शासन मोर पसरपपर प्रतिष्ठित पी। पहा पोपम करने लिए माए ये साम्य सासनकी बापहोर हाबमे मना पररी हमा। मौर उसक लिए सिमाफ माम्पमसे एक बर्षही मुष्टि करना भी मावस्यकामा जिससे लोग मपनेको मरोश इसरा सतरण समाथे। इस प्रकार यहाँ से घोपा मोकी सुष्टि rt एक पौरारोडी मार दूसरी मी सिमा प्राप्त नीकरणाहोंकी। एक बात और उस समय वेगात लिहार नदीमा पर प्रान्तमा मोर उसकी रामानी कसत्ता पी। अपनाने पर सूर्यास्त कानून (Sun-ict Law ) पनाया गिसके अनुसार गो ममीवार सूर्यास्तक पाने मकाया एकम नही गावेठामा चमकी मीरारी उसी दिन नीलाम को गाती थी। इस कानूनो पारम उमाकी बनेर जमारारियो मारिम्पोक हाबमें हो गई। एक परम्परागत पुग्ने समानका कोपमा मौर मये समागा मागिरि। बगासने पामे जागी सिमा सीमार महीस मममरान गोमा पाए। यहाँको विमाके पननमें भी रही मोमोना मुम्म हाप पा। र उपी ममय रायग्रतात मित्र मारिहोगाने एक वादो हम चलाया कि उहिमा एररपतन भाषा नही है। इस प्रकार उडीमा प्रग सीमा मापा और सदिमा ममतिकार एस भारी विपत्ति रिपाई। पम्मिन रिमोमों मौर मरहना प्रतिकार लिए यहाँ उता मम्मिमनी नामको एक सम्मा १९ में स्थापित की ग' बिमक प्रतिष्ठाता मयुमुदन राम । इमो मारा - एर मोर उका साहित्य सम्मिकिती प्रविष्याई। इस पर भी मापा बार साहित्यके उत्थानके लिए सोग सामने भाए, जिनमें मुस्म ये फकौरमोइन सेनापति मिली फीर मोहन सेनापति (१८४२-१९१८) ये साफ मोर कुमार भिस्पीये। उनॉनेवार उपन्यास लिये हम्मा हमाण वाम्गुष्ठ माम और प्रायश्चित्त । मराठा मासन काम्पीटि जीसावा एकदम पि'म उमा में रिया पया परमरा होन नपे ममीवार पर निर्मग्य पोपन का पोसम्त निष छमाष माठमष्ठ के बमीरार रामबन मगराब दिया पगा है। माधुनिक शिक्षा प्राप्त निम्न-मम्म बाकि मोर्गाने किस प्रकार देवको तहस-नास पर दिवा मा उसका एक परिप्रेपिठ भित्र मामु मोर प्रायरिषठ में मिम्ता है। कर्मपावी। इसलिए सभी हतियोंम पुष्पका सम्पाय मौर पापका पतन विधाया है। उन्होंने अनेक गस्प भो थिये है। 'गस्प सपनामसे उनका यी पागॉमें संग्रह प्राभिवावा है। इनमें ये ससारपारो रुपमें प्रकट हुए है और प्रेगो सिक्षाके मकोको इनमे करो समालोचना की गई है। दिनु भाषा उप नही है। इसके लिए उन्होंने हास्य पर पर पिताका पहारा खिया है। किन्तु मह पाठकपर बहुत करमपूप पड़ पाता है। हम रसम में गोगई। उन्होल भपना मारमनीवन परित भी किया पा उसम मदिनधिसमायकी मीमांकी मिस्ती है। रनोंने रामायण महाभारत विहरियप नौम्प उपमिपा मारिता पचानुगार किया था। बारावतार उत्तर प्रमण' मारिकाम्य किये। नमको अनेक फुटकर कवितायों पा संग्रह अवसर मासरे मे किया पपाई किन्तु पचलो अपेषा उनका पर अधिक बमिष्ठ है। इन्ने सक्तिशाली और प्रभाषणामी कि कोम उन्हीके नामसे माधुनिक मुमका मामकरण करते ह। ये सब प्रभारसे डीसाकोषतीको सन्तान। जी पासनमौर ग्रेजी भापाको पाम से हुए भी चिन्होंने अपनी दृष्टि मिट्टीकी तरफ मोड़ी उनमें फकीर मोहन सेनापति पे। इसी कालमें गमाघर मेहेर नम्पकिमोर बम पितामणि महान्ति समी- काम्त महापान पोराडपम् प्रहराय भिकारीपरम पट्टमाया मोपीनाप नन्द बागि और कई प्रसिद कवि भीर स्वर हुए। उगमसे गमाघरको पर्श मग होगी। मसिारमा ( १८७५-१९२८) पश्तो कपि माम्याने परिचित हैगोर रनकी कविता सगोम्प पस्त्री है भी। वो पानी पिप निसरपी गरम भूमि प्रभामगोत भारि म पस्पो करिताएं सिपी है। उन्होंने पमिप्य एक पाप और मरना एक उपम्पास भी भिवे है। उनके समारोषनारमा मेख भी। पिग्मामपि महात्रि बोले- काम्पों रपम्यामों ना पस्पों माता मोर पिताबो ना मोर भार विगत खगोंमें उनका वह प्रश्नपित हुवा है। रङ्गिया भाति या मापा प्रति स्ने। ।
इनका मुख उपारान है। मम्मीकान्त महापाप हास्म रसके एक सफल मिस्सी। उनकी भनेक मंगारमक माम्किाएँ हास्य रसात्मक कविताएँ तपा प्यगपूर्ण नाटक उपमन्ध है। कणा मामु उनका एक अपूर्व मौर सपूर्ण उपम्यास है। सामी पपासमी उनकी एक नाटिका पौपापन प्रहरामा मंग मोर मिप मधिर तीव्र होता है। उनकी बाई महाति पाश्मिीर पर नी में इस प्रकारक कर मंगोंका समाए। उन्होंने पाठे होकमयामी और मोकोवियोंका घेण्य किया था। उनका पापा-कोस मारतोय प्रान्तीय भाषामौर्म सबसे विमाम है। भिकारीपरण पट्टनायक प्रपमत माटककार है। उनके माटक है-'कटा विषय संसार चित्र मुशीता' वादि। उन्होने भीर विनय माला परम सामान म भी लिखा था। पीछे उन्होंने पुटीर सिल्पी निवासका प्रारम्भ किया और एक युटौर शिप सिरीज' निकाली गोपीनाप नम मुस्मा प्रमहार। उन्होंने चड़िया भागवत पापीय रामायन बोर सारता महामारत बारिकी पापित्यपूर्ण जामोचना मिली। उन्होने एक प्रति मभिमान पौर पहिया मापा तल पर उसी मामसे एक शिक्षा मन्त्र मिखा है। इसके मामा सम्हाने सात नाटको बोर कार्पोका बनुमाद भी किया था। प्रबका रूपमें रामाभाग राय पुष पभिमपम राय मोर पिपनापार भी प्रस्याव है। इस प्रकार पर किया साहित्यकी उन्नति हो पीपी तो मानिक युपके बम फ्यायर मन्तिम पाम बीसवी पवामी प्रारम्भमे फिर परिवर्तन हुना। रामानाष मधुमूवम मोर फकीरमोहन समकालीन पे। रामानापने प्रतीच्य अभ्यताका बागान किया था मौर मम्मूदन ने उस पारामे प्राय संस्स्वा पोन किया था। फकीरमोहनने अंग्री पासका स्वागत करते हुए मंगी सिमा तुफमौकी मोर कोगोका मान मार्पित किया था। मम्पम्पिोर पम्मीकी मोर होगोंको पए थे। लेकिन ये सच पातीपणापादो करिये। इस प्रकार हम देखते है कि रे-मोर रेपमे पातीयता मागृत होती पई। १९.४ मे रकम सम्मिन्नीकी प्रतिष्ठा १९५मग विमोर भान्दोमन मोर १९१२ में बिहार नदीमा प्ररेम पगमारा इस पातीय सनारा बैग और तौर हुवा। नदीमामे भी भागा सम्पारित उड़ीमा एक बार प्ररेप हो ममा। इम उम्र जातीयता बोधो माग ममाग मुमार और बनठाकी मा का पार्यक्रम मामित कर दिया गया। इसी गेम्पम रीमिमो मायबारो माथी मापानम ए पाती बम विधालय म्यापि पिा गया निमः प्रतिगता पापरयुगाम । मत्पपासी कामियाने मया मार्ग मेगा माहिरय गौर मए पुगी मापका, मिसरा काम मरयापारी पुल पा बया। मम रोमामा गौर और बातीयता मोर इतना रस पाकिमारा ग्मिी प्रसारका अपमान पनि मही पल । यहाँ तक रि राधानाने मनिमायरी पार्वती मारिकाम्पो गीमा निरामपर या मारोप पिया पा उमम भी प्रतियारिया।
। इम बातीय गागरम और मरममारी वन विपासपो मुस पे मोपमा बाम मोर उनके मातानसे उदार होकर मीमापास गोशापरीन मिम पासिम्प मिप सिंगर मिप इपिवास प्रमुख इसमें पापिठ हुए। कपासिन्यु मिमने रडीमाका इतिहाम कोणार भोर पाराबाटी रहीसा प्राचीन पौरब प्रम्मापक ऐखिहासिक पम्प लिये। सिंगराव मिभने संसात रामायणका मनुवार रिमा। नीसामासने टेनिसनकी प्रिम्सम है बापारपर प्रमायिनी मार नोएस मा मामारपर समामा मिना बा मौर वारवेक नया कोगाई रोकाम्य मिव मे मिनमें भातीयताका मान अस्पन उम्र है। नहाने बाप जीवन नामक एक प्रबन्ध प्रापौर भगवामानाको टीका वत्पन्त पापित्य पूर्व मुखबन्धमें सिवाये । 'समर यो मस्कृति' 'मोडिया साहित्यका कम 'परिणाम माधि उनकी मार मोतिया है वो कुछ परपर्ती काठकी है। मोरारी मिम + नाटक - पुरपोत्तम र मौर मुहन्ददेष । उनकी पापा कबितानोंका संग्रह कामिका पिमाप बालेक्षिा मामधे प्रकामिठ इए है। ये मापा कमिवाम सिर इस्त। उमर ममापिनी निर्वासिता 'मटान्तर मादिकई उपन्यास भो । मेपोमियनकी एक बोपनी भी । परवी कामकी भी उनकी भने रतिया निमम गई पामीर मोशियारे मो स्थान उनकी बारम जोगनी उपनाम है। इसी काम महारमा पाँबाने काँग्रेसका नेतृत्व कर १९२१६ में मसायोग मानोन पुरुर रिमा । उड़ीसा भेग प्रस्तुत पा। सरपगारी बन विधामपके पारमिनि मौन पाते ही रसम महयोग दिया मौर उन लोगोंको पेट पाना पड़ा। पोपबम्पु रास पर हमारी बाम ये रे पो कारा करिता बरमापा सबकास बिम्ता मौ माहात्म्य मपिणेवा मर्मपर मारिकी सपना की थी। धर्म पर में कोपाल गित्पी गिम महापमा पुष पमपरण करण बीवन जि रिया पया है। सन् १९२१ तक या माहित्पड़ी यही संमिष्ठ कहानी और बनो पारवा रहमा माहिरपके विहानकी मति ही गल बाती है। [मोर-मन् १९२ से मार पका गीया साहित्यका समिप्त परिचय कपि-पी माता-बासिनीपरम पाभिमाही में रिमा पमा है। कहिया में -३
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गगाधर मेहेर [करि-परिचय ]
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गगाधर मेहेर सम्बम्पुर सिमे परमा वहसीसी परिचममे एक छोटी-सी बमीगht परपाती। पी ९ भगस्त, १५६९ मापन पूर्णिमाको मंगाधर मोरका परम मा। मोर उनकी उपाधि है। बारिसे में 'मुखिया' पे मोर मुभिमा मोप प्राय मेहर' कहते है। मोर म्पपसायकी एप्टिसे हावी या सुमारे होते है। पुनको पहिया 'मुना' या मुलिया (मोठिया) मा पाता है। वीरानीको उड़िया साहित्पर्म मोठिया कबीर पा गया है। पीर मुखिया' रेबार मेहेर मुनिया' भागम पावा रिममिमा वोर मुखिया' में कोई सम्बन्ध है। मुठिया होप समात पुर और पास-पास मम्मममें रहो है। लेकिन उनकी मापा दिया गया सम्बत पुर्व योमी भी नहीं है स्त्तीसगड़ी या परिसा भी नहीं। न मोर्गोपी भाषामा सम्पयन महाहमा है। लेकिन उसका जत्तीसगड़ी या परिमारे और रत्तर या पश्चिम की मापासे सम्बन्ध है। उस बाविको स्थियोंका पहिमाषा भी कुछ मम है। स्वपापसे में सोय गो सरह मार धर्मपययम होने है। पेपाघर पूर्णम सम्पापुर पारी निवासी थे। उनके प्रपितामा प मेहर बरपामा । उनले पाँच काये इसलिए उनका परिवार पांच भाईमा परिपार पहनाणा मीर ना मकान पर मन्दिर या भागबन ममप लिस्ट भारतानिए युनिवठिया मी कहलाता है। वह काम गहियानी होगा। पी (मदिर) या भागवत माप साधारण बैठावाने म्पमें पाहत होता।
३८ यहाँ पाषु-सम्यासी कोग मापर मामय भी सते है। यहाँ साधारणतया धर्म पाएँ होती है। ऐसे ही एक परिपारम गगावर मेहेर का पम्म हुमा पा। पंगापर मेहेरके पितामह सशशिष मोर सब हो। पस्न पुनमा पनका मुल्म प्रापसाम बा। पा मोर म्पोतिप विधाका भी उन्हें मान पा। पदापिपको पुत्र पे मोर सनमेसे बेष्ठ सम्म मोर गगाधर पिता थे। इसी माणका नाम सेवती बा। पंगापरको पिमा प्राम्य पाठामार्मे मुहाईपी। रसके पिठाको एक पाटवाकी पाठयाका दो बिसमे पिया भामबत पाठ एवं काम्म प्रबो म पाए पाते। किमनु ममारक बन्मसे पूर्व ही गा पाठसाला टूट की पी। इसलिए अपने मकानके निकट एक अन्य पातिकी पाठशालामें उन्होंने सिविरम्त किया। उन दिनों पहले सिविरम् मा 'सिरिस्तु' विचार म मा इत्यादिपमाला सिवाईमाधोपी। विवहाँ 'रास पम्बामामोतीन-चार बप्पाप हप ही पे किया पाठयाणा मी टूट गई। मह बार उनके पिता उनी नाम एनबीवा पाने कपे। माम लगाता दीमाप्रामक दललीय प्मा सम्परामके अनुमार एक तत्तपरक मोर विद्या मुल मन्प है। एम्म उनके साथ पार्क पार-मारका भी परोपे।हो ममर गको संम्पा पनीन-तीत हो गई। और गरमा उनके पिताकी एक पाठमाला हो गई। ही गंगाधर गम्मापरासकी 'भारत' पपपरम सके 'मधुप मपह बारिक हमीदपसेमा सम्ले । इस समय एक मबापरटी उपस पर्प भी हो गई पौ। सी उममे उनकी पानी भी गई। मापी धर्म पो हो गया। उनके पिज का युननेम पवना ध्यानमरते थे इसलिए पिना रिए उसे समग कर दिया गया। करिनों तक उन लोगों की बहुत कपमे पुरामसर परला पा। बहुत महामुनीक पार रहे पै सम्पत्ति से हिस्सा मिका गित निवारण हमा। इन अमटीमें पाठमाला टूट पर मोर पहाफिा कम बल हो गया। मनोराहीमे एकूहका। उममें उनकीनाम मियानेकी का भी पी रिनु पिमीमेसनही मामा कारण यह पाकि उन निकि ममूनो मनुनार परि कोई मायामिन ए तो उन पिताको बरकरार कन पारीरिक मोगना पातापा। एक बार मणापासीबार बरपाती बाए । पारे (मगर) पिसी पन ने पिपिए पापक स्विात माम तरमीला पाम लिवा पिया। इमम गवारगी प्रसन्न ही हुए, उनसे भषिचना रामा 30 वो पल हो गया। मरे रिन पारामा उनको बुला मेममा मोरये नियमित रामनिवास राम माले स्पे। समरपुरम मीम रोगहरको पुराग-पाठ होता पा। उन पिलों परपमरासद रामापपा पाठ होता था। मन रमको मुननेरी पाने में पुरिन मलम गुपस्सिा हे ।
३९ फितु पिता रा गटे जाने पर ये फिरम पाने मये। कभी कभी स्फमद पि पाठप-पुस्तक मसाबा परम पिपासापरका सोना पनपास भी पड़फर मुनाते । वातक गंमाभरको मह बड़ा मम्मा हपापा। इस पर पारी कक्षा तक उनकी गिमा गांवमें गई। पर परीक्षा देनेके लिए सम्ममपुर मानेका प्रश्न उठा तो उन पिनाने बन मति नहीं है। पकि पिन । महानदीम बारबी पिस मावसे ही पार करना पाता गा इसलिए उन पिनाको उन्हें भेजने का साहम मही हुवा। इस प्रकार परीक्षा रेनेसे बपिठोकर रो पो। फिर उमी पमा पाने ममे। परीब एक माह बाद धिक्षकने स्वयं हीळी रक्षा भी प्रारम्भ कर दी जिसमे माय पाठप कम साप 'रपुषग' मी पाया जाता था। किन्तु पुछ ही दिनारे बाद पिलर- डीपर पते जानेसे मत पाचवी पया तक ही फममा। छठी कक्षा माप-माप पंगारकी पढ़ाई भी बन हो गई। पहाईकमाष-साम के परपर पग बुमने पाम, पिनाकी मरप भी करते। मारे विचारी बीवन में कभी उनको एक बन्छा पड़ा मा पूर्वा पहलनेको नहीं मिला। पड़ाई ममाप्त होनेपर रिनभर में परम काम किया करत रे रुफिन जब कमी पौड़ा पर ममम मिलता तो उसे ये पाने में ही मगाते थे। मापनेपर बो भी बग्गी पुस्ता रहें मिल पाती है उसका मम्मपन पते २। कभी-कभी तमस्मुफ में रमे भी मिल पावे में बिसे ये फिवाब गरीनेमें ग्मय करते। धीरे-धीरे रहाने कपडा बुनमे का नाम सी वरहसे मोघ मिया मीर १६ सामही बम्बाम उनका निगमम हो गया। पारी बार उन पिवाने पोरे-धीरे परिवार-पोपण का भार भी उनपर दिया नया स्मयं बुनामि मुक्त हो साहारी और रकीकरम कगे। इस प्रकार उमा बीवनकम पा रहा पाकिबरपामी पूरमे ए नए गिरमाए जिन्होंने पगापरसो परीमा रेनलिए परिण लिया। इसलिए 'फर उन्न मतम अपना नाम निवालिया पाबीम सापकी उम्र मम्मतपुर मार डान दिया। उनकी कपि मनोटिवी फहत उने मा विपमि समामिम पर समिम ममकर ऐ मतए पिमेन सा टिम मिसारणीगाठमाना पान मफिकेटही मिना इमी माटिफिको उन भाषी जीबनेकी गमिर्धारित की वा इमाम बमपा भनिप्पमें उन्हें मोरी मिली। पपापर मपने माता-पिताकी एक मान सम्मान मलिए प रमको मांग भिए नहीं मापा नहीं माने रेमा पाइने । यस परपाली समाचार पपगमित्रो रमकी पाप्यतामा परिषय मिमा तो उन्होंने यही उमें अपनी जमीशराम एक ममान पो नीरोरी। उनकी सनगाह मान स्पानिलकी गई, जो रामकीय मनुमत मममी गाती पो। परमनि काम कारबाहो यई। गत Yo । बमार होने के कारण अपने पेप्रेसे हो पुमार करने ममे सपिन म्याय परसे रिमपित महोइए। एक बार पनपा नामक एक प्राममें मनाधिकार प्रमुत्त बमाने फारम परपालाई बमीपार मौर मुरवार विस्थ एफ मुपदमा पायर हमा। मुखवारगद रहनेपर भी पंगाधरमे सामी देने के लिए साफ इनकार कर दिया। उनकी बात म मानकर मुबारने सामी करमा दी परन्तु उमडी सचाईकी मबाहीसे सबको जुर्माना हमा। अपीतमें बमोरारको दो रिकार मिठो ठेपित मापी सबका पुर्माना कायम पा। इसपर मीपर तो रमाए पितु मुबार दिया नहीं उनका पार पूर्ववत् हा। फिर ममीवारी में बमोबा नाम सम्मा मौर मुख्तारले उनकी बमोनका कार्य कर पिए पाम्य किया। उनकी सफाई बारमबोबार बार पीवाने उमकी मास मारिरक पदपर नियुक्त किया और धीरे धीरे समार, मागार मादि मनेर हिसार्यो कार्य भार उमें सौपा। उसकी तमसार हैप) ८ से १.) १० से १५) मय बनो। सन् १८.९ में परपाती एसियन महरिरको मृत्यु हो गई। मौकरने पंगापरली नामकी सिफारिप कर उस बपा नियुगा करा दिया। मा २ ) से पर) तक तम परिई। इस नौकरी परपागम करीब तीन माम ऐ फिर उगारला होनेपर में सम्मनपुर बिरेपुर मोर पदमपुर भी जाना पड़ा। सन् १९१७ मे पैरान कर र रिम पदमपुरम हो रहे । पदमपुर (पुरा समर) मीरारमे मपनी रामपाली नगरी गपदर मामक ए गांव उन्हें भागीरो काम रिमा पा मोर की स्मृति मा लिए एक नव स्वापिट माता माम विरपुर रपा पा। महारजी पपरमें पी समय बमापारीमामतमें सिर काम भी करते थे। किन्तु महापमा उनले मनको म भागापा माली वाम-मपरपाठी हार माना पा । बरसाही पापता बमोगर अनुरोपमे मे बरपामी होट माए गौर नही मार-मुरित नियुक्त ही पति अम्पाय मत्वाधार मोर पवारम भुषहोकर रहन नौकरी गोरी। यही हो । भारम-पर्या की राष्टम बहुर बड़ी पार भी। मनि वामगारेमाहिप सिक गुफपाही नामन्दिरामद पिपुषन रेखने पर मन मोर भूमि रोगापामन पर रहें बामगार्म पर सिए निमाबित पिया। फितु मनि मस्तीपार पर दिया। पर राममेगा अमितापीही एएथे। मलामो पा राणा कौन मा? ब उम रामाकी मेगा राम राहोणपा मरे पगा को मारे भए नि गी पर हमला ग्ना मम बहार भगात पा। भार्गही दो हो। अपनी भूमिमा पारी की ए०एरा प्रबामाको भरने गए रम्हाने एक महामनाया संमन रिया मोर उममें मुपारी प्रभार पाम गए । संगापरणको प्रपप पानीमे रोमामा हरियो । यो सागकी मसापु ही मृत्य हो पई। फिर मन् १९१७ में परती भी रणरम बनी।
करीब एक साल पार उमा पूसरा विवाह हुमा। वपने दूसरे मो भगवान मेहेरके लिए सिप चिन्तित पते पे क्योकि ये उसे, वो उन तिमाहीरे सबै गौर न कोई जीवन-निर्वाह की पबम्पा ही कर सके थे। ये उसे बहुत प्यार करते पे मार इमष्ठा मपने पास ही बने। मायम नमक एक पौत्र भी बिनोरथम मोर, मी ए पर मिमी मी मौकरीपर है। गमापरलीश बाम एक धार्मिक परिवार में हमा पा। सरपनमें ही उमकी पढ़ाई पुस्पईपी रासपम्पाम्मामी भागवत उगा मारमा पोतासे। राम पम्बाम्यापी भापबतमाही एम्बप है जिसमें मोपियोंकी पक्तिका एक प्रेष्ठ निर्णन है। 'नारमा पीग बोनापरामकी मिली हुई है मौर उसमें पीरप्पको बार-नीता मोगरत और कुछ उपरेमारमा कयाएँ गति है। उनकी सिक्षामें प्राचीनता और मामलामा सम्मिमप। उनकी पिसारा प्रारम्म प्राचीन पतिको पाठमालामें हमा सपना र भर्ती हुए मापुनि परतिके का। सन् १८८२ में सोने के बाप मापीन री काम्प 'गावपातो' 'मुमद्रा परिमय' 'रसिकहाणपनी दोग बिलास' रम पस्तोस'ने मामरके पाकवि हरयको मत्यम्ह मानोदित किया। गरे पनि-चीवनमें इस मिामा मापद मालपूर्व समान है। इस प्रकार मूवन यूपर रापानापरे ऐति ामिक पाम बीने हुए समिप्रकारले पनि भी पह पा सकते है। उन्होंने एक पग मानिक युपमें रखा सकिन प्राचीन युगसे पूमतय विलग माए। उनकी प्रामक कवितामोंमें रीविकामकी शान म्पप्ट है बिमा का स्थापकिमी है। चको सिमा बनुमार उनक मामने रीनाप्प उपेम सम्म बाम । उमकी पतिता अनुकरम कर नहाने रस रहार लिया। २० काम्प उपा अमिष्ट-परफहै। वितु एक रात म्पान ने योग्य है कि रीडिभाम्पके मनुसरमपर सिचित्र होने पर भी एम एनाकर की भापा रिपष्टता नहीं है भापा सरस मोर मपुर है। म प्पनाच न्वीपर मेष मनोपर। रसा सूता हर बीमायावपाकर। रतिपति वितथि श्याम कुमार। रमपीय शि रेमि मुने बाप पर। रमत संहारपे र मवतार। Tian विमापा भी धार ।। मभिरवि रमपी मिस्तार । इम कषिताको हमी नियमसे परमा चाहिए। पविले इमो प्राधित कर एप प्रडि रामानाष राम पाम भगी। बहन म हुए और उनकी प्रतिमा पवार गत प्रेमाहन दिया। में इम पाकर ४२ अब पि गमाघर द्वारा रामानाप रायमारा प्रदचित मार्यमें बने रुपे। उनाने ऐतिमार्ग और पसर पोको छोड़कर सरत गरया व अपनाए। उन्होंने पाम निरिक्षको संगला मी में बल रिया गौर मोटी-सी मबवरनिका बोहार फिरसे बस्पारण लिया। यह मौर भी यमाही वा। बत यह प्रगट है कि ययाधरने मापाकी ऐसी बरसी उसे और भविक सरस बना पिया ठया उसम नटन भाषा समावेश किया। उनपर रामानाम पय कायाना काफी प्रभाव पड़ा। उनका प्रथम काम्प नुमती । दुमती पर राधानापको उपा की छप सप्ट रिपाई देती है। पपन्तके उपारे साप पठोर दोनो परीक्षाम उत्तीग होने के बाद विवादाम पाणिप्रहम होते ही दोनोडी मृत्यु होती है। सम्भोग गारम पर मार विप्रमम्म जाता है। गिन उपा मोर अयन्तकी र भारतीय पके मिस मह Atlantas race पर मापारित है। गंगाधरको इसकी रस योजना वो मी गमी किन पावस्तु घायर नही मो। इमलिए सिपी मनापरने इन्दुमतीको कमा बुनी। यह मावस्तु पानिरासह रघुपए से की गई। परन्तु यह अनुमाद कही है। कपि मास्पातर म काते है - उपा में सशरीर प्राप में करे प्रदान परिवार मापा मिपीमापापि न पिये तपाणि ताहि माहि मोर मागा? तवाहि हर नाहि रहि थप पा पिश का हिरिएर पारि या कह माहिम [मिस सर्व पाक्तिमामने मारीर प्रायोको प्रदान किया है उसकी बनमा किन मापा की पाए ! यह पाय परपती भी गमती शगी। मेरी पपा गणना ' फिर भी इन रिचामे अपनी-अपनी रषिक बनुरूप हे पिना रा भी तो नही गाना इममिए मै दो-बाबा महाराही हा हूँ। पदुमती पाम्प मुम होता है कि कम मत वर्गममे । यमरम बा प्रमेम मुमती प्रवेग पामोडी वरमा प्रतिा पपन मरने मम पिया पमा है। पमाघग्ने रामानामी गपार पणारा मिस पर्मनगरिया है और परिपस गराधापी जापाग पनपते हुए मामा मपोगन लिया है। उनकी उपमायाम कुछ पारम्परिक है और कुछ उनकी मपनी है। उन्ह अपने परिणाम पुर उपमाएं माहरण पर उनका प्रयास रिया है। इम्दुमती पाकर भी यपानाम गने उनकी पूर्व प्रनमा की। निमम उमर बार माहन मिपा। इमर बार उनहोंने सलामी प्रारम्भ पिया नाकामी म भी रामानापीय विचार घाग प्रतिदिनह। यपानापामार मपनी प्रामा प्रति प्रणमा है। यपानार रापा मापाम पूर्ण (गर गौरी) पनमापा पटक (मस्ति कारी) दामाबर (सपा) मौर मामपामर पापाताका स्थान दिया है ममारने पश्चिमी मम्मी मम्मापुर बालागीर मामा बाधिको भी पान दिया है इम पापः प्रपम पम उतनपा पार गत किया पया है। उमो मारपन मी रोहिणी उपक मयूर मधमें राम पश्य मोर प्रभा ('उकरप्रमा' मयू मम्मम प्रापित एक मामापा मम पाहता। उमः पाम पूरा मुहम पर कपमें बौर मुझ रामानामा ममें राहुए। भा: मन्त्रम निर्जी प्रापी भी मोष ही को। प मच उरकम मामाकी पूमा काम है मार पूमा लिए मातहै। ये परत- बा रष पिता बिहिबा सा हेगपति तरबर, नयन पात मामम झोतकम, से मरे प्माधित देता प्राम हेमा पुतरित मने हेता तरि मनु मार पाए होर अपि निमग्नित। पउसळ हामी मपूगै जो पी पाश्म न मम प्रागिन पिया मया गा माराम उपमान है। इमरामप में मकाण माप "प पसना भाष गातुर्प युतई। इमम मपि उमाहितहार माप उगहाने कीपाबमामामामपिता इसकी पारम्नु मरामारत में मी मा है। युमी ६ ममान "म भी पुगतनको नग्नपश्यिा गा है। मोर इमामार मादाएँ और मम्प पा- सम्पूर्ण भारतीय है। कीपर की पिना समर पापग्गी विमपुरम प। पमार मार्षमा पमप्राय माल मौर बाधाम पर पे। उस माई मनिगरपानिया गपाग और सम्पर पे। एमी पपिम्पिन्निमि सिखते - उन्होने कीपक नर को रबमा की। इसमें पाप-पुष्प धर्म-अधर्म कालीमा मन्वमें धमकी धर्मपर मोर पुश्पको पापपर विजय दिखाई गई है। इस पम्पमें भपा, मी, भयानक हास्य नापि रसोगा समावेश किया गया है। इसमें असम्त वर्मम सम्मापन समा मुम्परियोंका मामा पर्मन मार मरमन्द ममोरम हुमा है। सन् १९.ई में पीपल बप की रचना की नमी। इसके बाद बहु दिनों तक मी ममा मए। कीचड़ गई' * मुबान्धर्म एवानाम गमाघसा दुर्भाग्य किये उपौसा पराए है। मनात सौम्पर्यो पासिनी प्राति देनी और प्रति वीज पर पुरोहित को पापका माम मौर मास्मीविका पिर सहबरमा। उपरपूर्तिकी बटिक समस्या समाधाम उनके जीवनका प्रगान स्परपाप बन पमा पा।" इससे मालूम होता है कि रािप उनकी प्रतिभा विकासकी एक प्रधान सावट भी। सन् १९०८ में गवानारको मृत्पातर Cr होने सनही किया था। सन् १९.९को रामानायकी भाव-समामें थी गरमोहन पपा उपस्थित रे गौर ने उस परिवेगले अभिभूत हो पए। उन्होंने गंगापरके पास पिटठी विनेका नियम घिया मोर उनके साथ मम्पर्क स्थापित किया। यह पयामरके कवि और में एक महत्वपूर्ण पटना है। राशिप माना पारिवारिक अनार और पृष्ठपोपरखा एका पाबसे बम और नीरष पमाघरको उन्होंने मुखर किया। उनकी मिानस मेवनी पर उनकी समस्त हनियोग प्रापना भार उन्होंने अपने अपर मे मिया । दसरा फहमा बौम्या पाय । भयोमा दम्प में तीन स या एप है (३) रामपमा बमिपेठ साप और बनवास । (२) पुत्र पिरहमे कोयम्पाकी समस्या और (३) बनवासमै प्रत्यावर्तन साप भरस मिशन और सम्माभिपे। इस मग रस्म पान रसपूर्ण है। मितीय परम पुत्र-विहित मावनापा एक मरण पारसस्प रमपूर्न पिन रिया गया है। इसमें गंगावर माने हा भाग मबीए है। रातिपय कारण उहे पहिक मुय नही मिला और माहिप-सपबिभावसे ये मानसिक मानकर म। ऐमी परिस्थिमिका पए। ये माहिम-मेगा पाना पाहते पिनुबमोन पापडे वापर पारण कोही सो। निमिए भयोमा इप्पर बार पमिमी पाप हाप पापा। पावती से मातम होई रिमोहन पाउन पाम रायम्मानमा निशम भेगा पा। इन बार पुराम पा मगन साहिल पर निशाना साधा और ग्मती इष्टि गई मापनमा पाए पो कोर पर और पदमिनी पाम्पमें पिल्पमत मवर नहीं है पपि लागन बना काफी! भिषय हो श्रीमदी ४५ - की पर प्रतिभाको विकसित मास्था की इन है और पर्मिनी निष्क्रिय- निम्पन अबम्बा की। पमिनी काम्पमें रैम्प मभिमान मौर विवसताकी भोर सन है। कीचा-ब का कीषा यहाँ बतागहीन है पो है पदिमनी मोर पपना है मीला। इसमें भी धर्म मौर मार्मका इन है गोमाकी मनेकों प्यों पर भी पवित्रता और धर्मपरापमा परिम्नी मफ्ने घमपर म्मिर एती है। काम्प अपूर्ण है किन्तु परिणति स्पष्ट है। महादीनके बारेमें बनी मौर मनको उक्ति स्सप्ट प्रवाई ह। उमफ परमी कायाम म पैसाका बोर मधिक विशाम हमा है। प्रेमापरक रागाही मनने एक बच्चा चित्र उपस्थित किया है। हम देखते है कि उनकी प्रतिमा धीरे-धीरे उमामित हो ही पी। में करते है-- ममेकर पाहि प्रतिभा मपित बम्पचा न पारे मा बमहमे मदि। इसलिए पदमिनी की सृष्टिमै उनका मन नहीं भरा बार उन्होंने उसे ममूग छोड़ दिया। उन्होंने बार बड़ी सृप्टिकी माना की मोर उनकी दृपि कामिानकी मोर मई। कामिदरामी भेष्ठ इति बभिनानपान्तमम् t मोने उसे हापमें मिया । एक प्रतिमापाठी पक्ति ही जाहिरासकी कीति पर हाथ रखका माहम कर माता है। पर मिर्फ अनुमार नही है। कालिमाम सम्पूर्ण काम्य-सौनका समावेश हममें नही किया मया है। समान बौर भी कहा है कि भारत में मापा नायिका हायकी प्रणव चिनाएं पिस्ता पपसे चिषित नही हो पाती म्सोको दृष्टिम रखार उसके उपिया काम्य म्पम रचाकी स्वतन्त्रता प्रयुक्त हुई। मर्वात् कामिक मतले माटको कारण मासिराम बिम विमानों का विस्तृत विकास नहीं कर पाये उन्होंने काम्य होने कारण उसका पर विस्तार किया है। पर क्या है? यह प्रभय । गंगापरने अपने काम्पका नाम का प्रमा यस्तरी और सपोमा नाम रखा है-प्रपय मेर, 'प्रमय परम प्रपय प्रमूग प्रणय मौरम 'पुप्पे कोर' 'प्रणय फळे प्रभागा। मुमता मारमे मम्म गॉती मरेला प्रपया कि पिम्तार किया गया है। इसमें कपि सम्म सुपौर परम्परा मनुयायी हो गए है। मन खिक की सक्ति-अस्ति भी है। मम स्परा भी प्रयोप च्यिा पारिनु इन सबमें ये मस्पन मत है। दिनीय सर्ममें मबीन प्रगापुर रागाई मन और विरान मौर मला मानसिक समस्याका विरुणपत्र दिया गया है को पीय सर्गरे 'प्रथम परिवेप की सृष्टि करनेमें महायक होता है। इसमें राग मानला मौर मनियों मिन मामाप पतोति मारिमरपनासपाही हुए है।
मिस्ती गमापर अमल कापत से नहीसाको भी इसमें है माए है। प्पर राधमांना भानमम वरपरको सिए स्पर्ममे गए थे। इस मामगका कारण पा देवनम्यामोने रासस म्याका अपमान कियामा। एक दिम जगन्नाथपुरी सात पर नीगची नीचे पारित भया दमा ममा पवित्र मारि पाम्माएँ पूमती थी गमसराम पम्पा सा बहाँ माई मोर उनमे सपड़ागमा। यह भी एक मुन्दर पिt दुप्पम्त भार सन्सलामा पुनर्मिसमरा इस्य भी हा चमतारी मी नाटकीय हुभाई। इसमें प्रतिवर्मन भी अपने रंगका है। प्रपय मतरी में प्रगम या सम्भोग गंपारका भिम दिया गया। ससके बार कमि को दृष्टि गई विप्रसम्म ग्रंपार या पार रसको मोर। रत्तरराम - एको रसः काप एक निमित्तमेवाए, मिर पुषा पुपमिवामपते रिपनि । इस रस हटतम मासम्बनी मिसनकार राम गौर सीपा। इसलिा कपिका ध्यान उनकीबोर मया और तपस्विनी की रचना की। तपस्विनी'सीत ही है। ऐसा करता है कि इस मामकरनमें उनपर कामिनासा प्रभाव पापा काहिरासने रा है- नृपत्य पर्यापम पालनम् यदस एक बर्मा मनमा प्रभातः । निस्मितात्पेषमतररपप तपरिवतामाम्यमबेगनीया ।। मरपतिका पपिप धर्म पालन ही मन प्रगीत धर्म है। इसलिए निर्वासित होनेपर मुझे बन्य तपस्वियोको समान देवमा पाहिए । किन्तु मामिलासपी मपेवा तपस्विनी में ममभूतिका मभिक प्रमार प्रतीत होता है। भवभूति सीतारे समय कहते है- परिपा, दुह पोल सुबरम पपती रितोस रोष माननम् । करपस्म मूतिरपा परीरिकी पिएम्पमेष बनमेति मानदी। पाणा और पोस मुहर बामनपर विनोत पपरी पड़ी थी। पम पमें बाकी पण रमको मूर्तिमा परीग्पा-पिए म्पपा-मी बनमें माती है। लम्बिनी काम यहीमे गुर होता है। मामगात सौतामा बिनम्न सम्पार मारिपूर्ण श छो, रिया पया । पानको ही महा पमरा मी सग मष्ट पराममान पाभीपी मारन मप्ररित है और बीभूत पवा बाक है। रानदिम परम ग्मम रूप देना परिमेय पाए म मोर समान हमा मया है। राम और मौना बोकि मानमिन न रा पति और रागा राम मानम यमाई मार भारमी मरम मार्गफी बिरय ही है। पहले-
प्राप्ति-यसरे नृपति
मुसरि स्वमाये बमि।
पर धर्मरामे र निज कामे
पारेम पारा पहि।
[प्रचार प्राप्ति या स्वमापत राणाको सुबकी बलि देनी पड़ती है।
सधर्म रग्युसे पर रामा अपने तम्प कमसे एक यम भी नहीं चल सकता।
किन्तु इसका मर्म मह नहीं कि सोता प्रति रामका प्रेम पट पया।
मन्त धन प्पर एम पहते है
माहि सिना प्रह-प्रेम सरे
मी प्रिया कमस कसि।
पमिति पुति महान हरि,
कामणि मन महि।
हो र म मात।
मुनि मते सर, कममिनी मोर
होर टक टक।
बस तु पथर, महोई कर
पर बस चाली।
मासिका पवन म बहिषु पन
कपिय प्राण सभाति ।
[राम पे मी नहीं पाते । रोनेसे मया मार्यसे बह निष्कासित हो पाएमा
तरोबर सूख पाएमा और मममिनी सीता मूव पाएगी। राम एपको पत्थर कर
मेह नातीको रोकते है।बोर पोरसे निस्वास भी नही मेते ठाधिसममिनी
सीता कम्पित महोबाए।]
रामपान इस प्रेम को सौवा बाराती पी इसलिए कालिदासने को कहा है
बाध्यात्वया मापनात रामा पानी मिसामयि यसममम ।
मोनोकवार पदमारहाषी भुताप कि तरसर दुतस्य ।।
यह कपि गमापरकी सिनार बार है। मसायरसी सी रामको
माय नहीं कह सरती। इमलिए उपस्थिती की भूमिराम मंमार कहते
है-होने (सीता) निमिनको मपमा माप-रोप पर किम प्रगर पति
ममिकीना गौर रम्पवाका परिचय रिया है-मामी पति-हित-मापिनी-
YE तपस्पाम परिभितका तपस्विनी समे किस प्रकार दिन म्पतीत पिए, नसे प्रष्ट करणाही एस पुस्तक का प्रमान देवर। प्रपयिनी सीता और पली सीग मम र पानीस्व माप की विषय हुई। प्रमयिनी सीता निर्वासिता होनेपर परीर त्यागना भारी है परन्तु पत्नी सीता पर भी बेश-रक्षा का मार है इसीलिए वे उससे विरत होती है। यही प्रमायिनी सीता मतीत बीपनका एक विपर मिपा गया है विससे काप रस बार भी मूर्तिमन्त हो उटाई। किन्तु मे कभी राममनो कोसती नहीं। निर्वासनका कारण ये अपने माम्म या अपने धर्म को ही समानती है। प्रकृति प्रेमी कपि सापरले उमसा महानी पोपरी पारि मारियों पसतीप्य वा मादि ऋतुओं उमा नपा सम्मा बारिमार्गे गौर बनुकम्मा भारिपायों को भी सजीव मूर्तिमान् बार मनुष्यो सुप सुषमा सापी सममा है। प्रकृति-चिपममें ये बत्यन्त मिपुन है। तपस्थिती कायम पाप पर्व मोर प्रत्येक सर्प मपने पूर्व है। प्रत्येक सर्ग एक-एक काम करा पा सकता है। इसम सप सौन्दर्य हठे ए पी बाप सौन्दर्य है यह वा काम्यात्मक अवम पाम है। इन कामोतारा गंगाधरले बने फुटकर कविताएं मी तिची है। हममें नई जीवन रमन भविषार सिर-प्रेम रेप-प्रेम पातिप्रेम बारिकी म्पप्ट मूचना मिलतीन कवितामोका साह कविता प्रमोस 'बायपाली कमिण माला पक संगीठ मारिग या पगाई इनमें पामिश नही है। कविता पकोड के परम्पास में नयेम प्रधान मान । मुम्बरमा वि परकीती मरिकि समन-मनपर पेरमाचका पर्मावान हुमा पा ऐसा पिनास है। इसलिए रस पानाम पचास हमार यहाँ एक पेठा मगता है। इसकी परखनी चपा परबममे सिधित एसपीय समिबि बी इसकी सोमनाप नियम भी इसी प्रकारले साग निको पालो मतिरित पनुन बासर गौर वर्ण चित्र नमाkिet। पपी सोनटकवत पप गप - नियम मिती गई। गर्म पानी कौरन-मनमौरसरर-मकौमनी मौसी मिस्ठी है। उनकी प्रथम पविता है पनि । नपाप गाम्य जीवन में पो मार पी दोबारोपण मा पा इमर्म पतकासपूर्ण विकास माई। ममृतमय ममुमय में इसी प्रकार का भाव है। पौरन गिन प्रसार मामय सीप्रसार मापस भी। मपुमय में पहने है- गिर रेख मपरस्य रे मोवन, विलमपुमप मधुर सरण गरिब हाम हो पाप मरममयरेबीपन । बानीप महापार प्रपप बम बम्प सदा साम। बना मार एक एक सप ती रेसु पन्ति तापरे भीरमा [निस मामय है। मन मरमा पाप भरमका मम दर कराई। पननीरा स्मा गाया प्रमय गुप बन मौर बन्न पाका सा काम पिताका मार, प्रत्येक पा-एक मरने है बीरब वापरकर वे है।] इममें मा मात्रा में अनापते मघ मरन्ति सि पर का मषु उपात्त स्वर है, पाते कान्ता को पुष का नही। रमका रेस-प्रेम पी बार कौटिमा उतळ माली में काले है बडिषित कर रतन, रम्पिषित तहिं जनता रंग। माय बदिषिते वाहते पान हेर महि दि मो सौष्ठर मम । [मावून बस पपा है तो उसे पाटार अनामे परेला पाहिए। माग पहैि तो उसे मार रेनेसे क्या मरा मोफा मम नहीं होगा ?] धार भी यह बात सच्ची है। भार भावगत एण्यका पूंमा रठा है। किन्तु उनन 'मातृभूमि' रविता में है कि बालक अपने परमे सधि पर, परमे पार पारेसे पाम और पामम सामानर मात्रा है-म प्रकार पसमा गाम बना ही माता. एहिको शामाया पायकवा देशापा निवारा बीपने प्रतीत हबार रमित हए सर्वया। मामि भात-भाषा रे ममता या रे बनीम नाहि वायु पो बानि गरे मपिण मान रहिले काहिं। कीया मे-४ प्रामसे राम्प पम्पसे देस रेप विपरयोग माना जीवन में उत्पप्त होता है। मातृभूमि और मातृभापाके प्रति गिसमें ममता पैरा मही हा है उसे परिमानिमि गिना जाए तो बज्ञानी पहा ने। सनरा देश प्रेम इस प्रकार का मा। सामानिक वत्माचारों को देखकर मी ग्नका हरम रो उठसा पा। बिटिम सासन काममें सामकोको धर्मापवार हा पाण था। उनको हम्म कर - मन पार प्पस्त सरा पर स्परने घन पार बिरसित पबिगा पाये। बीवन मा समकाम होकर भार सातु मम्प बोलि पान्ति धर्म सस्तार। इन पस्सिपॉमें घासकामा मोपित बिया गया यह माग भी सत्य है। इसी सुरमे उन्होंने भारती भावना गाई है। इसमे मोपेन्द्रही स्तुधि किन्तु स्हिप्ट वर्ष में पराचीन भारतकी अग्रिनहि प्रति उक्ति है। में सस्मारक मनोवृत्ति के तपा पम्पायन पासन पक्षपाती। इसी मनोवृत्तिको लेकर उन्होंने पह संजीव सिवा पा। इसकी फसमा एम अभूतपूर्ण रूपमा है। बनिम की पगिस परिणाम इस प्रकारको कल्पना पाई जाती है। रूपक समीठमें मम्न की महिमा अपिणा मीरण पककी बात्माचा भूमि मिभार और विभिन्न पस्पोको पि पनिव है। इसमें प्रयुषत छ सम्बलपुर मम्मामें प्रचम्ति हलिया पीठ मा पिसान पोत सिया गया है। इसमें सरकारी भाषना और शिष पस्याम भावना साप साप कारण मी है। पमपी महिमाका पवार से हुए कहते है मन पाई सतिले सीतारे इस - मारेकोपिक मनी बस । पाहि देश मानगा मामोर सहि । बधि मा ।। पिका गौरव' म सम्पणारे विकामपि की रेला मधिप्त विवरण रिपा गया और करा पड़ा है हपि तो मेरे पितो पुरान। कृषि बिना रह पारा पराम। सपि पेनि पति हरि पेनि सम्म पिब मायु भी सम्पर सभा हए तम्महे ।।
पर की मारमनपा में एक मादर्स पफ का पावन रिया गया है। पक
काम मोर देतरे मेतरे विभाग
बिमारित एकान्ते पाये हरिनाम।
पान मोर ठिमेत पक्षी माने
निखरे मिाचते मो पान सुमन्ते
एक प्यान हे 117
मोहो पान पामिते रठे तास पान
ममुमरी ठान्ति ए पाहार तान
गते गते बिहारि ठिमुमि मोरे,
पिएर बिधिर महिमा स्मरान्ति
मोर 11
इस प्रकार प्रमापर अपनी कवितायोंकी मरम्म पाती सापकर
सन् १९५४ में पैर ममावस्या दिन परलोक मिपारे। वे पूर्णिमा दिन इस
सोफ, माए ये बोर अमावस्या नि महासे सशके लिए पते भए।
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गंगाधर मेहेर [काव्य-सम्मप] करि-भी माता- R १,माममे प्रमात चतुप सग मंपळे मासा रवा बिक-राविमा मानकी-बसन-सुपा हाये बहि, करपस्तये नौहार मुक्ता घरि उपहार सस्तोक बासम्बाहार प्रोगमे रहि, कळफष्ठ-कम्छे कहिना, परसम रिम सती, राति पाहिसा ।" ॥१॥ मरुण कपाय बाप्त, कुसुम काम्ति विकाश, प्रशाम्तम्प, विश्वास रिमन्ति मने, के योगेश्वरी माप्ति मपुर भापे मायाप्ति गरान्ति परामि-उपशमने, स्वर्ग कि मोहारम्ति मर्ममुबन ॥२॥ समोर सगीत पाए, ममर बीमा बनाए मुरभि मप्सने पाए रपा निरो, कुम्मादमा होह भाट मारम्मिता स्तब पाठ कलिंग मासा पाट मगपगे, सहित मधुरे कहिसा, "ठ सतो राग्य रापि, राति पाहिसा।" " -उड़िया १ आमममें प्रमात चतुप सर्ग प्रस्फुटित कमलके समान नत्रवासी मगलमयी उपा मानकीके दशमकी अभिमापा मेकर माई और परमें शवनम रूपी मोतियोंकी मारा कर सीताफ प्रांगणमें खड़ी होरर मधुर वाणीसे बोसी- "हे देवि । मोर हो गया है उठो दर्शन दो।" ||१|| - सूर्यगी बरुम किरणाने साप गेरुया वस्त्र पहनकर उपा माई है, मानो मुम्दर गम्भीर रूप धारणकर कोई योगदवरी हो सीताका दुख-दर्द दूर करनेके लिए स्वर्ग भवतरित हुई है। वह आश्वासन देती हई मबीवन प्रदान करमेरे लिए सीताको गुमाती है---॥२॥ उपाफा मादेश पारर समीर गीत गाने सगा प्रमर बीणा वगान मगे, सुरभि नाचने एगी। महोया भाटमा स्प धारणकर स्तवम पाठ करमे एगा। पेष्ठ भाटो रुपमें कलिंग (प्यामा) आया और सहित मठमे गोला- हे राजरामो रात बीत गई, उठो। ॥
कषि-मी माता-
मुनि-मुखे बेर-स्वन पूम कसा श्यामबन
उठिसा भेदि गगन उच्च माकार
अनुच्छे र सुपति ममम्त प्रतिकि गति
बिहिता कि सरस्वती वोमा सकार,
बेलवेळ बन उगवळ,
मा बळे पेम्हे बढि मासिमा बळ ॥४॥
एकाळे ब्रह्मचारिणी ममुकम्पा तपस्विनी
मासि बनकम्बिनो पा गम्भीरे
बोइमे, उठ बहि, उपा सुकुमारको
मासिछि बर्शन गर तोप बिधिरे,
तमसा रहिछि मनाई
कोळ करि परे सुष समिया पाई ॥५॥
पपिनी-दर-शिशिर विमुरे पर रश्मिर
प्रतिबिम्ब परि, बोर राम मूरति
सोकारित चित्त फलके करि चिषित
हेस आसन परिपत नामको सस्ती,
ममि ममुकम्पा पमरे
बम्बिने पार पर सविनयरे ॥६॥
बोइमे ताकु प्रशसि, "तुम्भे तिमिर विम्यसि
रवि-मायमन-वासि हम संसारे,
तुम्म कोम परण करे ज्योति माहरण
तहि मार्ग शाम 7 मारे,
नाम सउरम रसिके,
शुभ सम्पारिनो हम रपुर्वशिके। ॥७॥
-उपिया
मुनिके मुबसे मि सृत वेद-मत्रको मधुर ध्वनिसे सपन श्याम कानन
गूंज उठा। ओंकारकी प्रनि आकाशको भेदती हुई अन्तरिक्षकी
ओर अग्रसर हो वैकुष्ठके निवासियोंको मानन्दित कर पातास्मी बोर
अपसर हुई मानो वह सरस्वतीकी वीणाकी मगर ही हो ।
मम्मके प्रमावसे जिस प्रकार सेर प्रमाणित होता है उसी प्रकार
सूर्यके तेबसे वन प्रकाशमान हुआ। ||४||
इसी समय तपस्विनी अनुकम्पाने बनकनन्दिनी मानकीके पास
आकर कहा-“हे वैदेही! सुकुमारी उपा तुम्हारे द्वारपर बड़ी है
उठो दशन दो। तुमको भी गोदमें लेकर सतोप पानेके लिए रास्ता
दख रही है। 111
"
कमरूपर परी हुई शवममकी खूपों पर जैसे प्रखर किरणे प्रति-
मिम्बित होती है उसी प्रकार वीर रामचन्द्रको मूर्तिको शोकाकुल
हृदय रूपी पटपर पित्रित कर सती भानकी बासनसे उठी। मनुकम्पानो
प्रणाम करके मिनयरे साप उपाकी परण-मन्दना की ।।६।।
सीसामे उपाकी प्रशंसा करते हुए कहा-'तुम अधकारको दूर
मरने वामी हो । तुम रविने मागमनका कारण हो । तुम्हारे बिन स्मिग्घ
परोंका अनुसरण करती हुई ग्योति माती है उन्हीं परणोंकी
दर बापा पर मैं तुम्हारी धरण माती हूँ। हे शुम्र-सौरम रसिरे !
तुम रमुगपकी मंगलकारिणी वनो। ॥७॥
कषि-श्री माता-
(५
उस्सुक हरये राशि-शेषरे वामम-धात्री
समता निर्मळ-गामी पवित्र-धारा
भांगणे कुसुम बिन्ति सुवासित मोर सिधि
मंगल-प्रदीप रचि प्रभाती द्वारा
मुहम मीन-जपमे
बापिता सीता-सती शुभागममे ॥८॥
उ तापसकन्माणक बाबर-बन्या
पसाबने बगत-पाया-सती पान
वाहारि मवगाहने मनुकम्पाक गहणे
तमसा घार बहने ले गमम;
सतींकि तमसा मकरे
घेमि स्महे मासिपिसा तरग-करे ॥९॥
ममृत मधुर स्वरे भापिमा परितोपरे
"मामा पो, मो मानसरे, पिहा आशा
करिव मके विहार रामनामी-हाहार
सीता करि परिहार भोप-पिपासा
भाग्यवती मोते संसारे
बोलिये तो' पोगु एका पर सारे ॥१०॥
बने बने ममि ममि गण पुरके न ममि
बह पापा अतिमि सा जीयने
भधार गुचन पगि मातोक सुरा म मणि
बाछि दूर सरणी मत बरने,
ममम कपि सरल
तोय-माने तोपि तीरवासी-सकळ ॥११॥
१९
-उपिया
मिर्ममगात्री तमसा पवित्र धारा रुपी मांगनको सुगधित
पससे सीपकर फूम बिछाकर तथा तारोंका दीप जलाकर
अपने मीन-नयनोसे उत्सुकता साप तुम्हारे पागमनकी राह देख
रही है ।।८।।
वापस कयार्मोके स्नेहमें दूवी, ससारमें येष्ठ सती सीता मनुकम्पा
भाविके साप तमसामें स्नान करनेके लिए मुटियासे निकलीं। अपने
वरंग हपी कसे तमसाने सतीका मालिंगन किया । ९॥
तमसाने मधुर पाणीसे कहा
'मैं परम सन्तुष्ट हूँ।
है बेटी ! मुझे स्वप्ममें भी यह माशा म पी कि राजपमी सीता
सांसारिप भोग-विलासफो छोरकर अंगसमें आएंगी और मेरी
गोदमें निमोसें रेंगी। फेवम तुम्हारे कारण सारा संसार मुझे
सौमाम्पबती मानगा ॥१०॥
मंगल-गम भ्रमण करती हुई जीवनमें नाना प्रसारक विष्म-
माधाओं को सहन करती हुई, धमारमें दुख मीर प्रमागमें सुख म मान-
कर सवस स्वच्छ स्पसे विनम्र पाली पा रही हूं। सभी तट-बासियारा
शोक मिटाकर उनको पीतल करती हूँ ॥११॥
पवि-भी मासा- ६० मम्बाकिनी गोगवरी से सबु गुने मो' सरि तपापि वर्धन करिणन्ति गौरव तमि तो पवित्र पर-चिन्ह अक्षय सम्पर रिविषर-पर प्रर मग सौरम ताहा पिता मोर बांछित तबमाबे हेरपिति मने सांछित ॥१२॥ सीसा बोरने, "पनीर-मधुर ए स्वच्छ मीर भीर नहें बननीर क्षीर प्रत्यक्षे, गिरि-स्तन बिनिसृत हो आसुछि ममृत- धारा परि सीतामृतकमपा समे, मोहो तुत मो' मा ए देशे मो पुणे विदीर्ण-वक्षा तमसा बेहो ।।१३।। ऐर भेरिमति पृष्ठ से पाच हेछि पृष्ट तपापि मुताकु तुष्ठ करिमा पाई फिटार स्नेह-सोचन प्रीति मधुर-चपन विम्यासे चाटु रचन कर रहा, पम्य धन्य मा तो हाय मो उस आतप पाई गानुकामय ॥१४॥ [ तपस्विनी ]
गड़िया
मन्दाकिनी, गोदावरी नदिमा मरे ही समान है, किन्तु तुम्हारे
पवित्र चरण-स्पर्शसे ही उनकी पीसि बढ़ी पी। वे देवताओंके
पद रबसे सुशोभित होती ही आई है। मेरी भी यही कामना पी
मौर में इसके विना अपनको तुम्छ मानती पी। ॥१२॥
सीवान कहा- यह मोर स्वच्छ सुवासित और मधुर है। यह
मीर नहीं वस्ति मननीका कोर है। पर्वत स्पी स्तनसे प्रवाहित
हुई यह अमृतमयी धारा सीताके लिए अमृत के समान है । अहो ! तू
मे इस प्रदेशमें मेरे बसे विदीर्म हदयो मौके समान है ॥१३॥
(तुम्हारे) हवयमें ऐसा छेद हमा है कि वह तुम्हारी पीठके
मार-मार भी दिखाई परता है । समापि मपनी कन्याको सन्तुष्ट करनेके
लिए स्नहमपी दृष्टिसे निहारते हुए प्रीतिपूर्ण मधुर वाणोसे मन
बहसानेकी पेप्टा करती है । हे पनमि! तेरा इदम धन्य है। जिसके
पारण मेरा महान दुपारपण-सा प्रतीत होने छगा है।"
॥१४॥
कवि-श्री माता- २ सीताक बिलाप सप्तम सर्ग भिक्षा विअन्ते बळे परि मो कर बिमाने बसाइला नेइ सस्वर कसि बिमय केते केले तन, म कसा कर्मपात तहि पुर्णन मो ॥१॥ जाणिवेश मुहें गुणर चिन्ह बाहारे साधुयेग, भितरे मिग्न । मनन्ति होके सबशुभर धम, के नाणे धर्म नाम बहा यम गो ॥२॥ रमिन मुबल बाहिता रप कम्पाइ घमयोपे गगमपप कारिकि येते ते मारो, बिस्तीम हेमा रप पोप-गरमे गो ॥३॥ रप कावरे भापा हेब विफल जामि पकाारेति भूपा सकत देबिसि नोमाने हो विकास पोण शरीरे मेम्हे हे निश्चम गो In तमु संकोपि तुंग पारपचय मिडिले परस्परे समि ता भय, मवनी कमे होइ गमा मीरब, सुधि रहिसे मप बिग सब गो ॥५।।
-हिमा
२. सीताका पिलाप
सप्तम सग
[माप्रममें सौताका मतीतको स्मरण पर विलाप]
मिक्षा देते समय मुप्त रावणने वलात् पिमानमें पीप मैठाया ।
मन कितनी ही अनुमय-विनय की मौर धमकियां भी दीं, सकिन उस
सुर्नम (रावण) ने ध्यान नहीं दिया ॥१॥
तर मन समता कि उसके भनुरूप गुण महीं होता। सिर्फ
उसका कपरी बेश ही साघुका है परन्तु भीतरसे यह सर्वपा भिन्न है।
लोग घमको मंगलमय मानते है सकिन यह पौन जानता है कि
मम भी धर्म कहासा है ॥२॥
उस दुष्ट राबणने दक्षिणको मोर बाकाय मार्गको कम्पित परो
हुए मौर तेग गर्दन करते हुए रम पछाया। म उन म्बरस विसाप
परने मगी सपिन वह रप-ध्वनिगममें विलीन हो गया ॥२॥
रप-ध्वनिमें मरी करण ध्वनि गिफ्म हो जाएगी मह जानकर
मैन घरीरसे सकस आमरण उतार पर फेंग दिए। मने देखा कि
मदिया मिरल होपर शीर्ण पारीर धारण कर मानो नियस
हो गइ ॥४॥
भयभीत होकर पो-या म मपमा परीर मंपित पर
यापसमें भिग्न सग। धीरे-धीरे पृप्पी नीरव हो गई मौर पमु-पसी
सब भयभीत होकर छिप गए ॥५॥
कविन्धी माता-
६४
.
पूर्व पश्चिम याम्य ककुममय
कमे विशिसा गाड मीलिमामय,
मही तयाण किछिन हेसा दृष्ट,
तहि मप्प रप माहिमा पुष्ट गो॥६||
मप्रे दिशिता रिंगमूत रावत,
को ममिति ताफु बन-मनत,
पेतिकि हेता रप हा पाश पाश,
मर्सस्य म्योतिपुष्य हेमा प्रकाश गो ॥७॥
मापिहिमम तेषितारा साळ
रिबसे छम्ति रहि कुरळ,
विषु बिरहे सेमि नमोमबळ
हरपे बालुछन्ति बिरहामळ गो ॥८॥
किया मो मस्र्पतीळा होइछि शेष,
वामनपुरे हेरमछि प्रदेश?
रेविति मनोहर महाळीमेगी
विशम्ति रम्प हेम-पळस पेनि गो ॥९॥
शिशिमा मे पुर-अहाळी बोषि,
मगर रमिणम्ति स्परसोधिति
स्पकरे हम्म भिर कळसमान
रपामि करणम्ति मावस्यमाम गो ॥१॥
सेकाळे मने मोर हसा विचार,
अटा योगी मिश्धे पामनचार,
ताम्त पास सिविता पशि
उम्बाइ दीप्त पति-भति-असि गो ॥१॥
-उड़िया पूर्व, पश्चिम मौर पक्षिम-ये तीनों दिशाएँ क्रमश पने अधकारम विलीन हो गई। पपकारके कारण पृप्पीपर कुछ भी दिवसाई नहीं पण। ऐसे समयमें दुष्टने रप पसाया ॥६॥ साममे कुछ समय भाभा विघलाई दी मिसे मैंने दावामस ही सममा। रप जितमा ही समीप जाने लगा उतनी ही उसकी तेजोमयी म्योति प्रकाशित होने लगी 110) यह सोना मानो उद्गग सब माकाश माग त्याग करके दिनामें मुग के मुमा प्रकाशित है। मानो ये पन्द्रमाके विरहमें भ्यथित होकर नम-मपस छोड़कर हृदय, विरतानस पस ॥८ अपवा मेरी सोसारिक फीला समाप्त हो चुकी है इस. लिए मैं मानो यमपुरमें प्रवेश कर रही हूँ। स्वर्ग कला-युक्त सुन्दर रिबलाई पानेवासी बहुत सी इमारतें मैमे देखीं ॥९॥ मानो सूर्यने भपनी प्रवर किरणोंसे सोमेके उन पमोंको मारकर उरम्बत किया है ॥१०॥ उस समय मुसे एसा सगने सया कि यह योगी निश्चय ही यमदूत है मौर में पति-भक्ति स्पी दीप्त वसवार उंपी किए यमराम सम्मुख सगन उपस्थित होनेवाली हूँ ॥११॥ ६. गाया में- कपिपी मासा- ता परे रघुपति मोते मनार बोइते स्महम्प मेले मनाइ प्रसंगु बळि नाहि भगते पाप, कुसंगी सगे मिळे घोर सन्ताप गो ॥१२॥ कामाग्ध पानबर पाप-भबने मिस, स्परशि पिन पाप तो मने, नपारे करि आउ तोते प्रहण प्रहम कसे हेब लोकगईण।" ||१|| पळर पळ कसे मोघे गमन बार फि ताकु रवि पाए पन? मनळ शिक्षा परि भनळ रहि हेते से बळ वर्षे पने मिशाइ गो ॥१४॥ मामिति, पिमि सिना परि जीवन सेबिखि बोसि प्रमु पबमधरण, म हेवि परि परस्पा मालन, जीबने मान मोर कि प्रयोजन गो ॥१५॥ ? बहिनिह पाहि पाहि पीमुख ए\ मधिक मोर लि अछि मुच रगय हेमे रहे अवश्य प्राण प्रमु मीभंगे याइ पाहब स्पान गो ॥१५॥ मो तनु बध ऐसे हेबत बार, ताहाकु कराइब पारपे सार से ताराप्ठ बायरो हस्ते कराह देव प्रमु पादुमा मोते है ॥१५॥ [ तपस्विनी
-चड़िया
उसके बाद रामचन्द्रबीने मुझसे स्नेह रहिस दृष्टिसे बुलाकर
कहा- 'कुसगसे बड़फर पाप संसारमें नहीं है और कुसगी साप रहने के
कारण बहुत पुप मेसना पड़ता है ।।१२।।
तू कामान्ध राक्षसके पापपूर्ण भवनमें पी इसलिए पापने
तेरे हृदयको स्पध किया होगा अत में तुझे महम नहीं कर
सकता । यदि में सुमे ग्रहण करें तो यह मोर्गोके सामने मुरा मालूम
होगा।' ॥१३॥
पानीकी धारा पर वादससे अलग होकर मीचे गिर पाती है
सब क्या यादछ फिर उसे रख सकता है? यदि अम्नि शिवाके समान
वह अपनेको माछाकर भस्म कर दे तो फिर मापस गाकर मह पावसमें
मिस सकती ह। ॥१४॥
मैने सोचा कि प्रमुफे पप परणकी समाकी आशामें ही मैने
जीवन धारण किया था। अब यदि परण छूनेचे अधिकारके योग्य
भी नहीं है तो इस जीवन धारणसे क्या प्रयोजन ? ॥१५||
पीचरोंकी मोर देखती हर्ष में अपने शरीर को मसा दूंगी
क्योंकि इससे बढ़कर मेरे लिए मौर क्या सुख है। वरीके मन
मानेसे यह प्राम भवस्य प्रभुके भीमंगमें स्पाम प्राप्त कर सकेगा,
अर्थात् मिसकर एम हो भाएगा ॥१६॥
मेरा शरीर दग्ध होकर अवश्य राम होगा मौर वृक्षोंमें वायके
सपमें उपयोगी होगा । उस वृसकी छड़ी (में स्थित मुझे) पर
वाई पय अपने कौशरसे प्रभुके लिए पादुका बमाएगा उस समय
भी मुझे प्रमुषी पद सेवामा सौभाग्य मिलेगा ही ॥१७॥
कवि-भी माता- ३ मीष्मे-पर्णन अष्टम सर्ग बीबने पठबन बदिसा सम बसन्त पनि बने हेता प्रीपम , पुबा पाकति यथा हुए प्रमरा, प्रणतर होइ मासिता बरा सुस विषय-मोगतृष्णार परि सध्यार का ममतप्पा सुम्बरी। तुळा दिसानिमाळमळी तक, कपन धन काळे देशात। पळास मंगे माह पूर्व सुरंग अभिस्य एहिपरि भव-प्रम- तापे मधिकतर मस्ती फुटिता, मधिक बास तार अंगु एटिता । साधु राय सापे ए मटळ, परम्प हए शामित-पा प्रबळ, कुवन अमाइला ताहरपे, साधब पाइ साधु अबस्य रसे । एक हाये गहुँ कसे विचार, प्रीपर्मे करूपिबा बास सम्बार, बरपा हेसे मही हेग शोतळ, शान्ति समि नीब नन्तु सकछ करम केतकी त बासरूपम, मुहम्ति, करिने से होकतपंप, मपण करि बन रहमाम भार मिया हसि-हसि तक ससार । गण कमलिनी रम्बार मपा सहर्षे समर्पम करि से कपा बोरसा मुहि पार तुम्मर संगे मासिपि काळ-सिन्धु-संग-तरंगे ।
उपिया ३ ग्रीष्म-वर्णन अप्टम सर्ग [षाममा प्राप्मामान प्रतिवर्षन] मिस प्रकार जीवनमें यौवन वदवा , उसी प्रकार मसन्त बढ़ते- चार प्रीम रूपमें बदल गया । यौवन पक्ति जैसे तजमय होती है, उसी प्रकार प्रमग घूप अधाने एगी। विषय-भागक सुखमें मतृप्तिके समान मुगवटमा स्पी मुन्दरी सभ्यरित हुई। सेमरको दई इस प्रकार ती दिखती है, जिस प्रकार पसरा धन मौरपर तिजोरीसे उड़ता है। जिस प्रकार पसासके फूटका रग अब यह नहीं हा इसी प्रकार समारपीसा खा भी बनिस्प है। जिस प्रकार म धूप पाकर मोमरा अधिन फूलता है और अपनी मुगध पारों ओर फैलाता ह उसी प्रकार का पाकर साघुना हवय भी दा होता है, जिससे उन्हें या मोर चाम्ति मिलती है । वसा फूलको देखकर प्रजमस्सिमा पानम्बसे फूल घटती है उसी प्रकार साघुको दवार साधु प्रसन्न होता है। दोनोंन 'मिसकर मह निश्चय किया हदि हम दोनों तमाम ग्रीष्म ऋतु मर इसी प्रकार सुवास मितरण करती रहेंगी तदनन्तर वर्षा होगी, पप्पी शीतस होगी पर संसार सब गीप धाम्ति पाएँगे। कदम्ब मौर केवा मी मपमी मुमासके लिए केस नहीं है। वे भी जन-जनका बानम्द दान करनेवासे है। पन मनरे रवन करना मार हमारे उपर ह हम उसको पूरा कर वनस्पति जन्मसे मुक्त होंगे। कमसिनीने प्रसन्न हो सिर उनकर समर्थन करते हुए महा-मैं भी नाम-समुद्रकी केपी तरंगामें तुम सोमो सास इंगी।
कवि-भी माला-
bo
४. प्रणयांकुर
प्रमम सग
नय बेरम्पास जय काठियास भाप्ती-प्रिय-नन्दन
तुम्मे मानगुल कविमपलिर सताट-मोमि-बम्बम ।
तुम्म परपरे समाइछि विधि मोहब-राबन्धन,
तुम्म पछे पाइ मारती पर बिनये करें गरम ।
पेरें पपे पमि अमिय गुरु है, मारती-कुसुम-बने,
सेहि पपेपालि तोळिवि कुसुम पनि मेते मयने ।
मपमे परिख यतने महिकि म पास मोर हस्त,
से रम्य गळर कुसुम पयमे रहिवि होद निरस्त ।
मोळिता कुसुमे हार गुम्बि रेमि गलस माननी-हरे,
भक्तिरे मननी-पाप-परमे पूणि मन मम्बाइबि मुरे ॥१॥
प्रदुतळा गळा सिधि मारम्मिमे मब मसिकार मूळे,
मपुकर एक पडिला एकाळे ये पिता निमाळी से।
नगर पुपि बसि बसे पारम्बार सुम्बरो मुममपळे,
बिताडित हेमे ग.पाए पुभि मुहर्म: गर्व तळे ।
रोप गुगु स्वरे वेळे परे करि मिए प्रमिग,
पहि पाए तहिं पाए चपठार मयम पसकहीन ॥२॥
१
नदिया
४ प्रणयाकुर
प्रपम सर्ग
हे भारतीके प्रिय पुप कालिदास और वेदव्यास ! तुम्हारी जय हो ।
सुम पविर्योक शानवाता गुरु हो एक समाटमें शोभित चन्दनके समान
हो तुम्हारे परषोंमे विधिने मेरे हृदयका बन्धन मगाया है।
तुम्हारा मनुफरमार में भी उसी भारतीषी घरम-वन्दना विनयने
साप कर रहा हूँ। हे गुरु आपने जिस मार्गसे भारतो पुष्पगममें
प्रमण किया है, मैं भी उस मार्गपर पतंगा पा सामने आए हुए उन्हीं
फूलोंको तोर गा बिन बिनपर मेरा हाप पहुंच सकता है। मिनपर
मेरा हाप नहीं पहुंच सकता, यल करने पर भी उम गरी शाबाोंने
पुप्पाने पयनसे में पश्चितही दूंगा। मैं उन तोरे हुए पुष्पोंकी
मासा गूंपकर अपनी तस्कल बननीके बमपर पहना दूंगा सपा
मक्ति पूर्वक रसके परण कमलोंमें मपने मनको सीन पर हर्पित
होऊँगा ॥१॥
[पतताका नामम पचान समच]
एक वार सकुतलाने मलिकाकी गामें पानी गाना
प्रारम्भ ही किया पा फि उसी समय नव मस्मिका फूलोंपर बैठा हुमा
भौरा तहते हुए सुन्दरीके मुखपर मा मैठा । वह वार-चार उरता है
मौर बैठता है मौर हा इसे फिर उड़ पाता है और फिर नीचे मा
पाता है। सभी-कभी दोर्म गुम्ममके साप माराने सगठा है । फल-
सस्प इस मवलापी भपलक दृष्टि वह यहां नहीं पाता है, उसका
मनुसरमपरती है ॥२॥
कवि-धी माता- ७२ करपाळि को रठि मुक्ति वक्ष रेरि कटि प्रोपा मागि, मलि सिदि मर्सको भगिरे परिपाए पपळागो। ए मुस्प बान भाम्य समिपाट केहि त म पिले कति, सुरोगना नृत्य मोरस मगन्ते वेपिप्से पुरपति । लग्ना बिरहित स्वार्ष बिमरित निव-निता नाट, सारस्म-शोभित सास्य फोकाहि देविपान्ति सुरराट? में पारित देखि मश्विनी-अमय-मळधित विवस्वान धन-पस्तविस-सम्-मम्तराळ रमा कता तक मान सेवळ हस्तिमा-सार्वभौम पाहि होोगले स्तम्भीमूत, प्रविम याइ मा पवि कले हर ए पपा एका मरमुप्त । अघोरे सुबरी सती कि सापिसा--मास-मास प्राणमित से गम्भीर बाणो होइगता सेहि सास्य-सहार-गीत । बनु प्रतिवमी रठि हेना सेहि रम्प-स्वर-सहवरी, पमम्मुत-सुपा-मोहन मात्र कि मरिप्रदेला हर-भरि । समापिता पा बीणा काम-घु बगाइरेता प्रकार, हमाइले राजा घर्प-मगि ता कुसुम-पम-टकार ॥३॥ [ प्रपप तरी.]
७३
ररिया
वह हाय हिसाती है निहारती है गदन घुमाती है, पमर
मुकाती है मरा उस भोरेको हटानेकी चेष्टामें नृत्य भावों और मुद्रामोका
सम्भार हो जाता है। इस नृत्यको देखकर अपनेको सौभाग्यवान मानने-
वाछा वहाँ कोई नहीं था। देव-बालाओंके नृत्यको नीरस मानकर इन्द्र भी
इसे देख रहे थे। सुर-पासाओंके नृत्य सम्पास्पद तपा स्वार्प पूर्ण
ही वो ठहरे, इन्द्रने कभी इस प्रकार सरलतासे सुशोभित मुस्प देसा
पा? कमशीकी प्रणय प्रणालीको सूर्यने भी नहीं देखा, क्योंकि समन
पस्मनोंकी छायामे सूर्यको छिपाकर उसके सम्मानकी रक्षा की। सिर्फ
हस्तिनापुरके महाराज इसे देवर स्तम्ध हो गए। पाश्चर्य है कि
उन्होंने अपने हवयको पठोर कैसे बना लिया। मम म्याकुल होकर
सुन्दरीने सहेलियोंफो पुकारा हे सवियो भावो-मामो। उस समय
उसकी वाणी नृत्यकी सहचरी संगीत बन गई। यही ध्वनि वममे गूंज उठी
और स्वरकी सापिनी बनी। ऐसा प्रतीत होने लगा मामो कामदेवने
चन्द्रसे सुधा साकर उसे सुघा-मत्रसे मन्त्रिस किया हो तपा रति द्वारा
समाए षीणाके सारोंको किसीने छू लिया हो। इस प्रकारको कामदेवके
पुष्प धमुपकी टेकार समझकर रागा धर्य च्युत हो गए ॥३॥
कदि-मो मासा-
७४
५. प्रणय पालन
द्वितीय सर्ग
हरय गहार बियेफ सोहिका मग-सम्मिळम-पप,
उमा होइ मम बोहमा, "विवेक परिछि तो मनोरप।
प्रत्यक्ष रेखिए होई साइछि परे कर सम्मिळम,
कर समप बुमिए समय म पिता बाळार मन ।
मनरे सम्मति पिया विषयरे प्रमाण परपपि बाहुँ,
कुरुबक कटा सगा चाहिंसा, कह कि करम्ता मार?
बोलियु अयातु पाळिकार मन मघोन मटे पितार,
पालिका मुह मे मुबती, ता मने माहिं पित-अधिकार।
स्वामीम युबती स्थापोन ममरे करिधि कर मर्पण,
साली सनीय, साक्षी तारय सामी पाच माजीमण ।
विवेक-"सेहि स्वेन्टाबार गुणिमुनिबर मन्ति यपपिय?
मम-विर तप सीळ मुनिक विवेक नहें कि तोठं प्रमुख ?'
विवेक-"से कर बग्यमे हलाकि काहिज्छा हो माहिं पाणि',
मन-"सारिका-बरने हुळहुळ रेसे सहर्षे प्रातिराणी ।
जाणि म पारित, सिक्त होइपिता रमणी-हात-कमळ,
स्वर मा मागिम मिये मुझपर बाढिपिम पूत मळ ।"
-रधिमा
५. प्रणय पालप
द्वितीय सग
[दुष्यन्त हायमें हम]
उदय वो पानसे विवेक दैहिक मिलनकी राह देने मगा । उस
समम मनमे उपस्थित होकर कहा-है वियेक सेरी इच्छा पूर्ण हुई।
हापोंमें हाथ मिला हुआ है यह प्रत्यक्ष दिख रहा है । हाप अपग करते
समय सूने यह समझा कि यह माराम नहीं पी और सम्मतिके
लिए यदि प्रमाण माहता है तो कुरुपकने (साड़ीमें) कांटे उपना मुंह
फेरकर देखा है। अब मतामो वह और क्या कर सकती है । तू यह माह
सकता है कि कन्याका मन पिताके अधीन है। लेकिन वह युवती है
मासिका नहीं। युपतीके मनपर पिताका अधिकार महीं रहता।
इस स्वाधीन युवतीने स्वाधीन भावसे, इम्त-अर्पण किया है। इसमी
साती देनेवाली है यो सहेलियो, उसका अपना हृदय तपा आस-पासके वृक्ष
और सताएँ ।
विवेक-'इस स्वेच्छाचार कर्मको सुमकर यदि महर्षि कुर
होंगे तो?'
मन- चिर सपस्थी मुनिका हदय क्या तुमसे अधिक विशाल
नहीं है?
विवेक- उस कर व घनमें न उसू म्पनि को गई, न पलार्प हो
दिया गया पा?'
मन-प्राति देवीने मैनाके मुखसे प्रसन्मताकी उम घमि की
है। क्या तू नहीं गान पाया कि रमणीका कर-समस गोसा पा, जिसे
घायद तूने पसीना माना! पर यह स्वयं ब्रह्माके द्वारा सा गया
पवित्र पस है।
कवि-भी माता-
विषक-तिम पिसे किए उचारिसा बेब मरम भारि कपा?"
मम- बसन्त कोक्छि उसने भापपिसा, 'मीरामस्य सीता यया
विवेक- 'स्वच्छ अबळा कर परिवार नहई कि बसाकार?"
मन- 'प्रभये युवती कर याचि येवा सम्मति माहि कम्बार ।
प्रणय-राम्परे प्रमपिर बळ प्रमपिनी मार. पाए
धन संपर्षण प्यतीत विद्युत कोठा तार म पाए।'
विवेक- 'पमबळे येथे प्रीति विपुतर गमन काहिकि भीम ?
मम- गबन कि ताहा अपते बाबा बम्पति प्रेम-शिपिम?
हाय पोइसा "म यहि याइछि तहिनि म पते मंग,
विषम विरह-विप होइपिब नीबार सुगमग ।
७७
उड़िया
विवेक- वहाँ तो कोई ब्राह्मण नहीं पा, बेद म म बादिका
उच्चारण किसने किया?
मन- बसन्त कोकिलने मानो उधे स्वरोंमें मत्रोंका पाठ किया-
घीरामस्य सीता यपा।
विवेक-'सहज ही किसी अवसाका हाप पकड़ना पया बलात्कार
4
मन–'प्रमय कासमें युवतीको हाय देनेमें सज्या महीं है। प्रेमके
राग्यमें प्रेमिका प्रेमीकी समप शक्तिको इंढती रहती है। यदि वादकोंमें
संपर्प म हो तो बिजमी उसके अंक महीं दिवसाई परती।'
नियक- मेम भौर दामिनीमें मगर प्रीति है वो गर्नम क्यों ?"
मन- यह भीम गर्छन महीं है-ससारमें यह प्रीविका रिणिम
है। हृदयने कहा- मैं वहाँ पा रहा हूँ महाँ घरीरका सहयोग न
होनेसे बिरह स्पी विपसे गोवनकी सरसता नष्ट हो पाएगी।'
७८
करि-भीमासा-
म प्रणय प्रसून
सृतीय सग
प्रियम्बरा हसि अनसूया प्रति बोसा, पार तो' हार,
में याहा बाणा गाइति, तु एवं मार कि ना एक बार ?'
अनमूपा हसि मोइला, 'तो नीत, परि नहर मो' गोत,
में गीत गाइसे पराण देवता होइमिये उपनीत ॥१॥
हार मोहिपिते कि ये पूमिव शकुन्तला प्राणेश्वरे ?"
गतसा चित्त आनेपिप्ता, भूति म पिता तक भापरे
प्रियम्बा ताहा बाणि पाकुम्तठा-केश समारिया मुळे
पुष्प भामरणे मपिता तार केश कम करमळे ॥२॥
अमसूमा एणे मवसर पार पूर्ण परियेसा
प्रिपम्पमा पूनि बोरता, "समनि गाम एवं एक बार ।'
ममस्या समे बप्ति हसि करि सममीकि सावधान,
"रेश वासियदे पराण-देवता , बोति मारम्भिसा गान mm
पूत पाच हेसे कोकिळ मासा मापा मगर भाषा,
पुण्य पक्व हेते पराप बता प्रण करम्ति मामा ।
मिमळ पगमे बम मिते सिमा दिशान्ति परमपणे,
मिर्मळ पीरति गात होइपिसे पामा वासम्सि बने ।
मुमन प्राति समा विकृति शुणा माहि काळे काळे,
से कया सम्पपा बार म्यवस्था मधि रिमो सवो मा?
एम-परीक्षर रतम पासे ग कि पारा छाडि?
विकशित फुल हस्तरे पहिले के रोणि पदे माहि ॥५॥
उडिया
.
६ प्रणय प्रसून
तृतीय सग
[राबा गुप्मत स्वायतही कापना]
प्रियम्बदाने हंसपर अमसूयासे कहा- अपनी मारा रख दे।
मुझे वो मालूम था मैने गाया अब तू भी एक बार गा। अनसूयान
हेस कर कहा- मेरा गीत तेरे जैसा नहीं है। अभी मेरे गीत गामेसे
प्राप-देवता उपस्थित हो जाएंग ॥१॥
मासाने विना या अपितकर सकुन्तमा प्राण परकी पूजा करेगी।
पान्तसारा ध्यान दूसरी ओर पा इसलिए उसने यह गार्तालाप महीं
सुमा । प्रियम्बया यह गानकर पाकुन्तलाके केसा संवारने लगो तमा
कोरसे फूलोंके पाभरगों द्वारा उनका पेश विन्यास किया ॥२॥
इस अवसरपर बनसूयान मामा पूरी कर दी। प्रियम्बदान पिर
कहा-'हे सहरी अब तो एक मार गायो। अनसूयाने हसत हुए
बैठार सबीको सावधान पर दिया और कहा- देखो प्राण-देवता
या जाएगे! यह कहकर उसने गाना प्रारम्भ कर दिया ॥३॥
भामरे पफ पानेसे कोमस बाती है और मधुर स्वरसे गाठी
है। इसी प्रकार पुप्पक पा पानपर प्राण-देवता था पर अभिसापा
पूर्ण करते है। जिस प्रकार हापमें घर हुए आइनमें निमस
बारापमा पद रिवाई परता है उसी प्रकार पुट प्रीति प्राप्त
होनेपर लोग पास आते हैं ।।४।।
मुजोशी प्रतिमा विात हाना कभी मुना नहीं गया। लकिम
पया इम उमिका विपरीत हाना मेरी सबीके भाम्पमें है? रत्न प्राप्त
होमेपर गौहरी क्या उसे छोड़ सकता है? विकसित फूप प्राप्त
हानेपर क्या कोई उस परोस पुषलता है? ॥५॥
कपि-यो माता- रसमा वित म पिसे ममत काहाकु लागिह पिता ? मा' कमा रुभिसे विशुष्क पस्करी होयाए पासबिता । मास मों सदीर परापवता, पाहिकि मुषि हो? सम्मुबारे परे विरामित हम मो सबी पूनिय मुरे।" ॥६॥ 'मान रिम रवि प्रियम्बरा सपी बोइला परिहास, 'विमुत बेगरे बासिलेनि नृप तो गईर-बर स्परे। 'मासिनेमि नप भवरे चमकि कुम्सला मा पाहि. निकुम्म दुआरे रमा होम्ति प्राणप्रिय मरसा 100 [ प्रणय यसरी से] -रदिया बिस अमृतके प्राप्त होनेसे शुष्क वलरी भी पस्सवित हो जाती है, वह अमृत विना रसनाकी विकृतिके क्या कभी किसीको कटु मग सकता है ? हे मेरी सबीके प्राण-देवता! यामो हृदयमें क्यों छिपे हो ? एक बार सामने आओ सम्मुख धानेपर मेरी सबी तुम्हारी पूजा करेगी ॥६॥ प्रियम्बदान हंसकर कहा- ' गाना बन्द करो सुम्हारा मेवफ-सा स्वर सुन कर 'महारान था गए हैं। महाराप आ गए है' यह सुनकर सकुन्तलाने पॉककर देवा, निकुष्य द्वार पर प्राम प्रिय रागा बरे ह ।।७।। करपिया मे.--
कवि-भी माता-
८२
. प्रणय सौरम
चवर्ष सर्ग
एकाळे मुनीन आसि स्नेहष्टि र मान्तळा प्रति,
विधारिसे मने शकुन्तवाहीन हे मो बम सम्प्रप्ति ।
से विचार र विलोमित होगमा मुनिवरंफर,
मपाळमाळसी गग प्रवेशिने येसने हमलाकर ।
र मारोळने नयनपुगळे बळ हेला एक छ,
विकम्मित सरे स्वत मासिपाए मळम-पळा पळ ।
सेहि काळे परिकपा कहिपान्ते मा याापाता बहि,
पान्चतर हे पच फिटिगहे पाप कि पारा रहि ?
समय पाइने बीबने प्रवृत्ति फटि पहिचाए मासि
प्रवृत्ति बगित के भछि पगते कि गृही कि बनबासी ॥१॥
बसि मुनि पा सुताष्ट्र बसाइ भपे स्पिर करि मन
सस्महे बोइसे "माजा पो, तु आदि गमिगु पति सरम ।
पिन तपोबने गाम्तिर भबमे सनी सगे बेळि रगे,
पगि एपर सम्पत्ति-सरिळ-संसार सिन्धु-सरंगे ।
माय बिमा केहि सागरे पनि सभा पोर विपर,
ससार-सागर पारे महापोत एकमात्र स्वामि-पर।
मारीमानकर सामोरि बिर स्यामिक धरण स्थग,
सामी सरा पतिप्रसार सगिनी स्वामि-प्रीति-अपवर्ग ।
स्वामी गुरु स्वामी परम बारपद स्वामि-सेमा नारोपर्म,
समामि-परे भक्ति मार्चमारे मति मपि तु करिनुपर्म ॥२॥
-रदिया
। प्रणय सौरम
चतुपसर्ग
[ मुनिरा बान्तलाको रपरे]
इसी समय महर्षिने आकर स्नेहपूर्ण दृप्टिस शकुन्तलाको देखकर,
मनमें विचार किया कि शीप ही यह बन शकुम्ता विहीन हो
पाएगा। इस विचारसे महपिके हृदयमें हरूषस मप गई मृमासके
ठोमी हापीके कम पनमें प्रवेश परनेसे जिस प्रकार हरूपस मम
पाती है, ठी, उसी प्रकार हृदयमें हलचल मचनेके कारण मुनिकी
मावोंमें पानी छपकने एगा। जिस प्रकार पञ्चस तासावमें क्मसके
पत्तोंपर पानी मपने आप पहुंपता है, उसी प्रकार वातचीत करते-करते
वमायास ही उनकी गांवोंसे अधु-धार वहने गी। जिस प्रकार मार्गमें एक
मा बानेसे पपिक रुक नहीं सकता उसी प्रकार समय आमेपर जीवन में
प्रवृत्तिका विकास होता है। गृहस्प बोर वनवासी दोनों ही इस
संसारकी प्रवृत्तिसे अलग महीं हो पाते हैं ॥१॥
महर्षिने मनको स्पिरपरकायाको पास बैठाया मोर स्नेहपूर्ण भावसे
कहा- मेरी बेटी बाग तू पतिके पर पाएगी। मानतकत शान्त
सपोवनमें सहेसियोंरे साप मती थी। वव सुसे सम्पदापूर्ण संसार
रूपी सामरमें प्रवेश परना होगा। यदि कोई विना नापके सागरमें
प्रवेश कर सो पोर विपत्तिम प, पाता है। ससार रूपी सागरको
पार करनक सिए स्वामी-पद ही एकमात्र महा नौना है। स्वामी ही
नारीका ईवर माना जाता है और स्वामी-पद मारी मिए स्वगमे
समान है। सदमी हमेसा पतिवतार साप रहती है मौर स्वामी-प्रेमसे
मपपर्गमा सुख मिलता है। स्वामी श्रेष्ठ गुरु मौर मित्र होता है।
स्वामीकी सेवा परमा नारीका घम है इसलिए स्वामीफे घरोंमें ध्याम
पित पर मषितपूर्वक अपना नाम परना ॥२॥
दो कपि-भी माता- । स्वामी या कहिले पुष्कर हेकहें पाळने हेतु तत्पर, परे या बारित मारतहि के हेतु माहि मप्रसर । व पिप्ले मनेर करिए ता स्वामियरन मात्र, परिहास को तीन ममिबु प्रति-परिहास पात्र । स्वार्मिक भोमम परे तु मुम्बिए सोइए शयन परे, स्वामिकर भग्या तेमिमा पूर्वक उषितु प्रत्युपरे अवसर दे माहि तो मेज पर पुस निरीक्षभे, सोबर हे निर्ममे मिकटे रहियेषु नाहि क्षणे । स्वामी येथे रोष करिख अपना करिये यदि भर्समा, से बोप न पेनि मत शिरे सहि करि तक बना ॥३॥ मिन करे राधि लिये बेरपितु पतिकि अन्न म्मम्मन, भोमन समये पाशे उमा होर पाळिए घरि म्यनन । स्मामि-सेवा कार्य जारी प्रतिनिधि कापि करिए माहि पिता बेतमर परिचारिका पर तु परमाद । स्वामी तो सबनो-भार पहिछम्ति तो गिरे ताक परन, केले भैर्य तोहो पाई प्रयोगम रहि सरा स्मरण । बास भूपणर गई म करिए मना सहि पाई मळि, पाहा वे तोपे सन्तोघे पेनिए माणिताहा तो मळि । शाशु चरण सेपियु मिति गृहर बता मणि, शाभुटि स्वामिर पूमा सिंहासम सब सम्पार बनि it मणार मळिरे देवेन बठिय अधिके करिए स्नेह, बिमना हेते से कोळ मामि मासि ता मुख ह। मार येते पुरजारो पि वा करितु भगिनी मान से कपा करापि न करिबु यहि हंब तक मपमान । गुरजन हि पाप मासिते उनि तेरि मासन, पचासम पग्नि सबिनये करितु मृदु भाषण । रम्प हासो म परिए पुणि न करितु उपहास, परिहास एळे करिबु नाहिदि सपोजन मान हास । निये परिपत पार निव गृह रतिपियु परिष्कार, परिमनकर पुन गुपियु कापितु प्रतीकार ||ut
-उडिया
स्वामीकी आमा पठिन होनेपर भी तू उसे तत्परतासे पालन करना।
एकाध बार मदि माराव भी हो जाएं तो उसपर कभी म्यान म
देना। स्वामीको देवते ही हृदयकी बेदनाको भूम पाना मौर परिहास
करनेपर भी चन्हें परिहासके योग्य न समझना। स्वामीके भोजन
करने के पश्चात् तू भोजन करना मोर रायन करनेके याद ही सोना ।
सुबह स्वामीके बिस्तर छोडनेस पहसे हो सुमे उठ पाना चाहिए । अन्य
पुस्पोको देखने के लिए कभी मपनी आँखोंको मनसर न देना तथा सगे-
सहोदरोंको भी एकान्समें पास इनका अपसर म देना। स्वामी
यदि स्ठ पाएं मा मिन्दा करें, तो भी उनसे नाराय म होकर उसे सहन
करना और उनकी अर्चना करना ॥३॥
अपने हापसे मोबन बनाकर स्वप ही स्वामीको खिलाना और
खाते समय पास रहकर पवा मरुना। स्वामीकी परिचयकि झिए
कभी भी दूसरी नारीको नियुक्त न करना पा तन-होम परिपारि-
काको परसे भगा देमा । हेरे स्वामी मिन्होने सारी पुग्बीका भार ग्रहण
किया है, उन्हींक परम तेरे सिरपर है इसलिए स्मरण रखना कि तुझे
मम्पधिक धैर्यको आवस्यकता है। वस्त्राभूपगोकी याचना ठपा उनपर
गर्व म करना जो भी दे उसे अपने उपयुक्त समसार प्रसन्नता साप
प्रहण करना। महीवसा मानकर रोग सासमी परग-सेवा करना। सास
हो स्वामीको पूजा सिंहासनका मोर सर्व सम्पदाओंकी खान है ।।४।।
नमो छ परनेपर न वीसना पस्कि अधिक स्नेह करना।
मारार होनपर हाप-मुख सहला कर उसे गोदमें से हेमा। और मी
गितनी परिचित नारियो हों उन्हें भो बहन-सी मानना। निससे उनका
मपमान हो एमा काम कमी भी न करता । वहाँको याते हुए
रेख उनके सम्मानाय भासम छोर दना मोर उनका उपासन देकर
उनसे मिनरके साए मधुर सम्मापण करना। कभी अट्टहास म
करना और कभी किसीका उपहास भी न करना। परिहासमें भी
मभी किसो सहेसीका अपमान न करना । स्वय स्वमा रह कर अपने
पर-बारको भी स्वच्छ रखना। परिजनोंका दुच मुनना और उसका
मिवारण परना ॥५॥
कपि-मी माता
समाहूत होद आसि केहि तोर अयपा प्रशसा कसे,
मानिवि तार मागमन तोते उकिवा करशळे ।
स्वामी दोप, शेप धम्माइया तो पणिव माप्ति ये मारी,
ताकपा विषम विप मणिपिळु से एका तोर भगारि ।
एते रिन याए मनिपिछु प्रिय सम्पत्ति तो तपोवन,
एपर मणिदु मदिळ-अबमो हेसा तोर
प्रियमन ।
तपोवन-महो-बह-गत स्नेह महीरे करियु
भ्यस्त
मृग-मृगो-गत ममता करि मानव-समाज गत।
स्वामी तोर अपि स्वरूप मणित करिन्ति राग्यापम,
से मामम-नीति रमणे नियर बीबम करिषु मम ।
[
प्रथम बारी है]
८७
।
उपिया
यपि कोई विना पुलाए बाकर तुम्हारी प्रशसा करे, तो उसका
वागमन मेरे लिए हानिकारक ही होगा-ऐसा मानना। स्वामीपर
स्प्ट होने के लिए यदि कोई नारी तेरे सामने उनका वोप-वर्मन परे, तो
उसकी मातको बहर-सा मानना और उसे परिन-सी समझना। सूने
बाग तक इस तपोवनको अपना प्रिय धन माना पा सेमिन बारसे तू
सारे मसारको अपना प्रिय घन मानेगी। तेरा वह स्नेह यो अव सक
पोगनके वृक्षों को प्राप्त पा, बन उसे समस्त विश्वपर न्यौछावर करना
होगा और मृग-मृगीको दी जानेवाली ममताको सारे मानव समामको
देना होमा । सेरे स्वामी राम्याश्रमको रक्षामें ऋपिके समान है, तुझे उस
माधमकी मोतिको रमाके सिए मपमे जीवनको योग्य पनामा होगा ॥६॥
कदिपी मासा-
G प्रणय फल
पप्ठ सग
शिशिर-सबने बम्मिमा नम्न
मनोहर पवम्त,
ता देखि शिशिर मानम्बे भघोर हेला मेम्हे उनमत्त ।
स्पूळ उर्ण-पास बाछि-बाछि मा पेडि सकळ पान,
सुपाद पोधूम-राशि दाने कमा पात्रमोजि समाधाम ।
इजुमा-माम सपा-सपा करि क्षेपिका केदारनामें,
कुसुम-कुसुम-रम्मित बसम पाइसे रसिक सर्वे।
रिप-रिगे येता हरिपारमित मधुमय शुभ
मातप तापित बमे बितरिता सम सम सातपत्र,
गगनपारिकि बापाई पत्र
मेसा पक-पदमाम,
करिनेता पम धूळि-विरचित भैरी-चम्ब-सोपान ।
निर्वासित पन-सका मानिसा हो होइ पयायुक्त,
पीतरिकम्पित प्रभातकु कसा हुनाटिका-कारामुक्त ।
रात्रि मोभिता सुवीर्ष समय हसम्तो वहन पर
ममा परि ता पुरस्कार येला चमिका-पीयुप-बणा।
विगगनामाने हटि हटि मेते पातठ-पारळ-पाव,
गिर-योति-मोमीयोतिष्णा-मगाळपूर को म्पोति-हाट ।
सुनारी पर रहिते सुबग-हार संपन्ने म्पस्स,
बनातप पा मलिए हेले महोरात्र मचि हस्त ।
[ प्राय जसरी ]
उड़िया G प्रणय फल पष्ठ सर्ग [ मरतो गम्मपर प्रकृतिका मानर ] पिपिर कारमें रनमें सुन्दर रूपवान पुत्रन बम सिमा उसे देवार गिशिरस हरयमें अत्यन्त आनन्दका प्रादुर्भाव हुआ। माना ऊनी कपा सम्दूकोंको दान कर दिए गए ( रख दिए गए )। पके हुए गहूसे बाह्मण भोजन गया गया गन्नेको टुकर-टो पर खतोंमें बोया गया। रसिक रोगोंको नाना पूरा रगारे वस्त्र-दान स्वस्प मिले । सूबकर गिरे हुए पीले पत्तै मानो मिमत्रण मकर नारा दिशामोंगी ओर चले मौर धूपसे तपे लोगोंका ताप हरनेक मिए साइ-पत्र वाम किए गए। और पवार (बारयापक) न गगनगारियाँका दनक सिए पत्र सिया । एसा एगन लगा मानो मारने आकाम तक जाम रिए धूसका एक सम्मा ही निर्मिठ पर लिपा हो। कुम्हसाए हुए कमलाको मानो दयाई हो लोटा साया। पीतकालीन प्रभातको पुहरके ववनम मुमत मिया। सम्मी रात मानो अंगीठीको सेबर दण भाग रही थी उसे क्षमा कर, चम्निमा स्पी अमृतमा उमे दान किया। दिग् वघुमाने छ करम लास पीने वस्त्र रिए, चिर ग्यातिकामी तारा-गण हाटसे ग्याति हरण परके सुनारी* और बबूर, मोनेका हार गूंपनमें म्पस्त हैं। सेमर वृन्द सुग्दर परोया मगानेसे रिए परमें सूई र प्रस्तुत है। * मुमारी-पापस मिप ममें महानो म माप फर हमार पौस गरे मन मुतापम फूल फूलने ।
कवि-भी मासा
१०
२.तत्काळ लक्ष्मी
जय गो उकळ-सक्ष्मी एकमात्र मुम्ररी तु बसुधारे,
प्राकृतिक शोमा-राशि रहिछम्ति तो मगरे एकामारे।
तोहो बास पाई मछि केते तुंग सुन्दर ळ शिविर
अस्पषय मार बर्मनाकरपे भकति नाहि कपिर।
प्रिय मृग मृगी बुलछन्ति तोर तम्बु तळ भूमिसणे,
बुप्तम्ति मतगमयूब पानवारिपतगये।
तो बिहार पाई स्पाने स्थाने देते रम्य उपवनमान,
विविप सुबास फूसे पूर्ण हो रहिमणि बिचमान ॥१॥
काहि मितिळ मिटि कामन तो पालित अतुपन,
भति प्रमोबरे बळ बळ होइ पम्ति विचरन ।
काहि घेनु पम भर दुर्वारळ-क्यामळ परगी बसे,
परि धरि पुमा-बामर गळन्ति एका तोहो सेवा सम्म ।
काहि मुमित मताळिमान होइणि मुसग्नित,
तोते बोळारा पाई बिहगमे रसि गाउछन्ति गीत ।
काहि मुसोतळ पबळ अपळ होइछि पत्तकयित,
पस्सा-ममम परि तरंगण परिगे सपापित ।
नितिका मापा मटम्ति परा तो प्रिय केळिसरोबर,
तहि मध्ये ते केले पिरि केष्टि-माप मति मुम्मर ॥२॥
-उडिया २. उत्कल तामी हे उतरू छक्ष्मी ! विश्वको एकमात्र सुन्दरी !! तेरी मय हो !!! एक ही साप प्रकृतिकी शोभाराभिर्मे तेरी गोव पूर्ण है। ऊप-भि पर्वो ये शिविर, तेरे निवासके कारण कितने मझे हगने लगे है- गिसके सौन्दर्यका वर्णन करनेमें कपि भी असमर्प है। प्रिय पशुगम सेरी भूमिपर विचरण कर रहे हैं। दाम-वारिसे भीगे हुए कपोमवाले मतवाले हापिर्योक समूह भूम रहे हैं। तेरे बिहारके लिए जगह-बगहपर रमणीर पुष्प-वाटिकाएँ हैं यो विविध सुगन्ध युक्त फूलोंसे भरी हुई विद्यमान है॥१॥ पर्वोंके पास पने जगमोंमें मेरे पालतू पशु मुग-के-भुग प्रसम्न होकर घूम रहे हैं। कहीं गायें खेतोसे नम दूर्वा बाकर प्रसन्मताके साम तेरे सिए पूंछको सर-सी गमा रही हैं मौर कहीं फूलोंसे सर्दी मतामों के बने हुए सूरे सुशोभित हो रहे हैं। तुझे मुमानेने सिए पभोगण बैठकर गीत गा रहे है । कहाँ-नहीं सफेव परपरकी पट्टानें विछी हुई है, जो पलंग सी प्रतीत होती हैं। पते रुपी पवे धारण रिए बुम पारों दिशार्मोम बोहै। पिसिका' मौर मेनुपा' तेरे मीसा-सरोवर है मौर कहींगही बीचमें पहाड़ोंने सुम्पर माप-पे गाल रखे हैं ॥२॥ पालिका-पुरी सिनेमें स्थित एक प्राम। २ अगुपा-टा निमकी कमी।
पाधि-भी मासा.
प्रिय सहभरी महसिसुग्घरो हो मति सायपान,
स्थाने स्पाने सोहो पाई पोइमछि केते मळेकारमान ।
प्रधानपाटरे सम्पादि पोइछि सबळ रन सोमम्त,
लोकमुचे पार सुपरिमा कपा म्यापिणि रिगरिंगत।
केमम्स कोपाळे गोपूछि मस्तके कापपणे वषि,
सोसागि पोइछि 'गमह, गर्भ पिम्प मधामनि पनि।
पर्व बहेब तारामानकर रीप्तिकि पाहिले पार,
समा पुळिन पोहमछि देश तोसागि मताहार ।
सो हरे बिरामे गामात रेस मबळ परक हार,
मुपति चनिन-रतन पबिते प्रमा विकाशुणि तार ।।
तोहो पे मुग्ध हो मगाम हादि पवाराबती पुर,
काळिमनातव विपिनबिहार सुख करि मनु दूर
पूर्वाधळ पूछे रिममि प्राये बिनेकरि मोळाबळे
प्रेमे मार्मिगम काछम्ति तोते प्रकाप माहपुगळे ।
काशीपाम छादि आसि जिनोमन रहिसे एकाप्रबने,
तिनि नोपन त कम्यन्ति तो भम्प म्प गर्भने ।
से विश्वपावन शिवनाकर
गमना मनुसरि
बारहवी यासिसे करतब बेो चिनोत्पळा माम परि ।।४।।
परेपितोहू 'समसाई' बो भाये मासिगन पके,
समसाई कर सागि हाहार शिरि पहिगता तळे ।
सेहिठारे भूमि होइला गमीर बी मोमि भोगि हार,
पमित-गातुका राशि पर यहि होरमणि स्तूपाकार ।
ऐये हीराकुर मामे ममिहित होहमठि सेहि स्थान,
केले हीरा तहुँ पाई तो गुमरे हन्ति धनवान III
-रदिया
तेरो प्रिय सखी प्राति सुन्दरीने यही सावधानीसे सरे लिए
जगह-वगह किसने हो असकारोंको रखा है, प्रधानपाटमें उम्पल
रस्न सोमन्त संजोकर रखा ह मिसको सुन्दरता लोगों द्वारा
भारों ओर फली है। कौशमसे गोधूसरीने एलाटपर काबके काम
वचित कर, तेर सिए गूमई के गर्भ मापामणि हिफारस रखा
है। समुद्र के तटपर तेरे लिए मुक्ता माछा रखी हुई है जिसकी कास्ति
वाराको भी लगाती है। देषीय राज्य तुम्हार हारके समान
सुशोभित है, ररनोंके समाम रागापोंसे उसकी घोमा यड़ रही है ।।३।।
-
समान
तेरे सौन्दर्यसे मुग्ध हो श्रीजगन्नाप द्वारकापुरी छोड़कर मौर
कारिन्दी तटके वन विहार करने आनन्दको त्यागपर, पूर्व दिशामें
सूर्यके
नीलापल घाममें पिरामिस हो विशाल
बाहु फैसाकर तुझे प्यारसे बामियन करते है। त्रिलोचन शिव
काग्री धाम छोरगर तरे एकान पनमें रहते हैं। यहाँ तेरे मौन्दर्यस
उनी तीनो वि प्रसन्नता प्राप्त करती है। इस विश्वके मगममारी
चिता अनुमरण पर गाहगी भी गुप्त बेपमें विमोत्पसा नाम धारण
पर माई है ॥
राहमें समसाई दगी मे उसे देवार प्यारमे गल समा
रिल्या । दमोके हापोंसे गलेको मुक्तामासा टूट कर नीचे पितर गई।
यहाँ हारकी नोक परमेरे पारण भूमि गम्भीर हो गई मौर प्रोरी हुई
गास पमकर पहारक समान हो गई। आयकम यह स्पान हीरापुणने
मामसे प्रसिग है। बहसे हीरा प्राणकर मचाने मिलन मोग धनवान
हुए हैं। ॥१॥
सवि-भी माता- १४ मने-मने फेसे में बोइसि, धम्य-धम्प गो उत्कळ मात । सर्व बरेबी हेग्छम्ति तोर विराट कोळरे मात । एण बिमबने बोलुमाम्ति परा सर्व तीर्य प्रेमि हरि पतितपावन-से रहिछन्ति मोळापळे बिने करि । एमु मार्दा कमि कहियाइम्ति "कलो घिनोपळा गया, श्वेत तरंगिणो गुपते होइछि मेमुळ स्यामतरगा। सहसा रिशिसा विराट मूरति बिरामित सम्मुखये, राजराजेश्वरी येथे रपपर गा परम कम्म् करे ॥६॥ " सुनीळ विस्कग परमलम्बित पुटिळ कुसळ काम्ति जन्मारछि मने बोधिविक्षोमित सरितपतिर मास्ति । समलिट पार रचित किरीट बिमानित मस्तकरे, किए म कहिद मुकुट गरिछि विश्वकर्मा मिन करे । किरीट पोमा शोभित कर्मछ कर्मभूषा मस्तीकपि, मम्सीकादि सट जुम्पने पुन्तळ झोभाहि पाणि बदि । रक्ष करे बंग भूषण तेलंमी-भूषण दक्षिनेतरे, चरपमुगळे सरिया भूपण गोमा सम्पारन करे ॥७॥ छम्मा तरपिणीगण मृत्य मारम्मिते मनोहर बेश परि विविध भूपणे विभूपित होइ कुसुमे सागि कयरी । होरकमपित-को चित्रोस्पळा तहि पिला मप्रगया, ममरमुपने मत्तकोमाळे शो पतन ता पण् पिता ब्राह्मणी मुबण-मुसुमरे मणि धूळ, मुस्यमोळे पणु म पिमा पुळव समुषिमा स्वम फूल । सिंहभूमि राज-उपान कुसुम रपिस मुरम्प हार रेमगि 'ब' मोइसि सहित संपे नापिमा तार ।।८।।
१५
रड़िया
मेरे मनने वारम्बार कहा हैहे उत्तम-जननी । धन्य है।
सेरी ही पवित्र गोदमें मुब देवी देवताओंने मम टिया है इसीटिए
मानी लाम कहते है कि तमाम तीयोगो साप पर पतित पावन स्प
धारण भी हरि नीरायठमें विरायमान हैं। इसलिए आर्य पापिने
कहा ह कलियुगमें चित्रोन्पसा ही गगा है। श्वेत तरगिणीने अपनी
मचुछ स्याम सरगका गुप्त रखा है। सहमा एक विराट मूर्ति सम्मुख
आई मा चारों धाम (भुवनेश्वर, याबपुर काणा और पुरी) में
म्याप्त है ॥६॥
इसक सम्ब वासोंग मौन्दर्य सागरका भ्रम कराता ह। मम्तम्पर
गगनचुम्बी मकुट मुगोमिव है। इसका दवार पौन नहीं रहेमा कि
विश्वकर्माने इसे समय अपने हापोंसे निमाण दिया है। मागरकी
मसियो किरीटमे सौन्दर्यको दुगुना कर देती है मागरको क्लीस
एगकर पूर्ण कुन्तल सौन्दयको और बढ़ा रहा है। दक्षिणम वगासका
अलकार मुगामित है और वाई पार तैलंगका सरिया बरणोंगी
मोमा बड़ा रहा ह ।।७।।
तरंग मनोहर बेप धारणकर तया भिन्न-भिन्न मसंगारोंसे
मुसग्मित हा फूलोंको कबरी सनराकर मापन मर्गी। सुरपुरम
उर्वधीक समान हीरों आभूषणोंमे कवरी समाई हुई पित्रोत्परा नदियों में
श्रेष्ठ ह । उसक पीछ सानक फासे पय-रापिका समाए हुए प्राह्मणी
पी। वह नृत्पमें इस प्रकार मान थी कि रित हुए फूलोंपर उसका
प्यान नहीं पा। सिमिरे रामोपानको पुष्पमाल गरम पहनकर 'देव'
मोर माइसि भी उसक साप मापती पी ॥८॥
कवि-भी मासा-
गारपिते मधु-स्वरे मधुमय पम्यास गोतावळी,
कोइलि मस्त प्रामपी शिखरी पेपिते पुष्पाम्बळि ।
सिंह भूपकर वर्म-परिमय शुभ्र कोत्तिष्यम परि
स्वर्णमयी स्वम रेशा मासिपिका घेमि बह सहपरो।
बतरनी कानन कुसुम करिपिसा मामरण,
पास सोमे ताहु मृगम्मे डि पिले देवीगम ।
भार्गको विस्पा या एलचिरा मारि तरंगिमोभेप्पो
चम्पा पुरिमना पुन्नाग विविध पुप्पे ममिषिसे गो ॥९॥
-उडिया । के वेदम्यासको गीतावसीका मधुर स्वरसे गा रही थी और 'बाझमी' कोयमके मस्तक पर फौंको पश्यसि दे रही थी। सिंह महाराजको कीति-पताका धारण कर तथा सबिओंको साप मेकर स्वर्णमयी स्वमरेखा भाई पी। वतरणी सुन्दर फूलोंके मामरण पहनकर आई। इसलिए सुगन्धके लोभस सुरगण उसे मवरके समान मेरे हुए थे। मार्गवी, विस्पा, दया, रत्नरिय मादि नदियोंने बम्पक परिमना मौर पुन्नागी मासासे पवरी सजाई पो ॥९॥ गीमा मे.
कषि-मी मासा
१८
१० चन्द्र-रजनी
पूर्णिमा प्रकोपे पूर्णचम भागमन
चाहि तरतरे सा रजनो रमणी।
मसाटे घेनिसा शुभ सवल रतन,
कणपुगे प्रगामस्स्प मनोहर मनि ।
रंगाघरे मग्बहास करि परकाश
देमाइला सुबिमळ प्रसम्न मान
हष्ट पुष्ट कळेबारे उम्मवळि आकाश,
चनहि कोमळ करे कसे वासिंगन ।
मपुरे मधूर मिशि हेसा मधुमय,
ए योग मिळा हेसे सौमाम्प समय ॥१॥
से शोभारे उहसिता पाषाण हण्य,
नळामपे उस्ससिका कुमर कानन
घरापरे उस्तसिता मोपमिमिचय
गगने रस्सासमय चकोर गायन ।
बनपरे पुरे-पुरे प्रदीप उस्तास
उस्ससिन देवाळप पानपटा स्व
हरपे-हरये महाउत्सास बिकाश
उस्लासे पळन्ति
ठाये-ठाये गिमुगणे।
रस्सास नहषि करि विश्व मधिकार,
प्रमटर माधिपत्प
सबत
स्वीकार ॥२॥
उड़िया
१० चन्द्र-रजनी
more
पुर्णिमानी रातमें पूर्णचन्द्र के आगमनको देखकर रणनी स्पी
नारीने शीप ही अपना शृगार कर लिया । ललाटमें शुक्र स्पी उसम्बल
मपि और मानों व बौर मगरय दोनोंको पहन मिया। इस तरह
साठ मोठोंमें मम्द मुस्कान फैलाकर प्रसन्न चित होकर प्रकाशित
हुई। और पुष्ठ सरीरसे याकाशको उवमासित कर मनमाने कोमल
हार्मोंसे उसका बालिंगन किया । मधुरके साप मधुर द्रव्य मिझकर
मधुमय बन गया । ऐसा सयोग सौभाग्यसे ही मिलता है ॥१॥
ऐसी क्षोमासे पत्परका हृदय भी उस्मासित हो उठा । पमा
पार्यो में कुमुदवन प्रस्फुटित हो गए। पृप्पीपर मताएँ उस्लासित हो
गई। वाकायका उस्मास चकोरके गीतसे फैल गया। नगरमें और
घर घरमें प्रदीप्त उस्लासका प्रकाश छा गया । पंच और बटोंकी
भनिसे मन्दिरोंको प्रसन्नता प्रगट होने संगी। प्रस्पेस हदयमें
असीम उस्लासका प्रादुर्भाव होने एगा। जगह-जगह बानन्द-सागरमें
गोते सगात वाला-वृन्द श्रीग-कौतुक करने लगे। सारे विश्वपर
उस्लासका साम्राग्य छा गया है। वक्षयानका आधिपत्य सर्वत्र स्वीकार
होता है ॥२॥
समि-भी मासा १.. मूरती सप्तपि पनीर मपुर परसन पाइ पाहिम बसिपाम्ति पप, सारे करम्ति भावय मंगळ भारती, पनीची हस्तरे सागि प्रकोप सपत । मागरे सुषार मुख बाहि अम्पति, मम्मम्मम्म हसि कस्याम्ति महास, रमनीकि बोतमान्ति घम्परे मुबती, स्वर्णेय मुमीमयम हेले तोर पास दु काळपिमी काळी मोहिम बात मानव यामब, देव सब तो भकत ॥३॥ [विता पोस
ܨ.;
दिया
सप्तऋषि (वारा गम) रात्रिकी सुन्दर मूर्तिका दर्शन करमेने
लिए रास्ता देख रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो उत्तर दिशामें
राविकी मंगप्ठ बारवी सिए सात प्रदीप सरे हों। सम्बासे मुग पिाए
अरूधपी मुस्कराती हुई, उपहास करती हुई कहती है है रणनी, तू बड़ी
सौभाम्पमातिनी है। सर्मके देवतागण भी तेरे वास है। तूने कास
सपिणी मालीके समान ससारको वश कर लिया। मानय,
मौर देव-सभी हेर मक्त बौर पुबारी हैं।।३।।
दानव
कादि-श्री भासा- ११ अमृतमय मय विकसित गन्य, सरस कविता बन बिहग मधुर तान शिशु सरळ वरळ गान मब प्रफुस्स कमळ कामन मब सूकुमार भिशु भानम ममृतमप अमृतरप मसाइ मेउछि जीवन ॥१॥ धीर बळित पोतळ बात, चिर सहित कुमुवमाब मीर पवळ पमिकामाम, मीररानरम पनमाळ मपुर मासोक उपार, नवपत्तनपतित दुपार ममृतमय अमृतरय मग्मा पेसरि ससार ॥२॥ मिटिमिटि बकसक तारा टपटप मळ्यर धारा तम नाशने पाक्ति धूपिण, तममुक्त सबमी इप्टि, गिरिगरम प्रसूत निर्भर, दूर तम्फित प्रपात मार, ममृतमप ममतरप नीयन करछि नग्गर ॥३॥ मुं। ममृत सागर दिन, म उठिपिसि तेगि सिग्यु ससि मिििण ममृत धारे, गति करण से बहपारे, पये शुपिगसे पाप तापरे होर गिशिर बसिदिता परे, अमृतमप ममतरय सहित मिगिदि सागरे in
उड़िया
२१ अमृतमय
नव प्रस्फुटित फूलोको मुगन्ध नबीन मौर सरस कविताका छन्व,
बम विहगोग मधुर सर, कोमल और सरस चिमुबाका सुरीला गान
नक प्रस्फुटित नमसका पन और सुकुमार शिशुओं मुख अमृतमय
अमृतधायस गीवनका यहा सेते है ॥१॥
मन्द-मन्द वहनमामा शीतम पवन सदा सुन्दर चन्द्रमा, दूध सी
सफेद ग्योत्स्ना, नोर-दान पुशम मममाला उपाका कोमस और मधुर
मामाक और नए कोमस पत्तोंपर गिरी हुई गवनमको र अमृतमय
अमृतस्रासमें विश्वमा हवा देती हैं ।।२।।
टिमटिमाते और जगमगाते हुए सारे टपाटप गिरती हुई
मेममामाको धारा एक तमका नाश करनक लिए तुम्हारी शक्ति दोस्ती
ह। मन्धकारसे मुक्त प्रसन्न अनि परोंसे याते हुए मरन दूर तक
उछमनबारे प्रपात, अमृतमय अमृतके सोतस पीवनको गर्मरित कर
रहे है।।३।।
में तो अमृत सागरसी एक ब हूँ सिन्धु छोपर मैं पापा
पर उठी पी यहाँस गिरफर अमृतको घाराम मिली हुई हूँ। उस
सागरको ओर गति पीठ हो रही हूँ गहमें यदि पापके तापसे तापित हो
पर मुख गाऊँगो तो उस समय भी भवनमको यूंद होकर ही गिरेगी।
ममृतमय अमृतधाराक साय सागरम मिस्पर एकाकार हो गाउँगी ॥४॥
कषि-मी मासा-
१०१
विश्वनाथदर कामा कम्बर
मघुमर बन्म स्पळ
पाहि पर प्रति सच्चे को पति
पाइयु करणाघळ रे नीबम !
हेलेह तु साम कस्मानिधान राम्पर करिष्ठ बास
बड़ाहले कर ताषोपयर
माझे महेछ निराश रे जोवन
सर्परष्ट मन मुसरे सबम ले बोझिपाए माटि
मानमष्टे मघु न सागिले स्वार
मान गर पिम बाटि रेनीबम I mil
१००
-उडिया
विश्वनामको हृदय स्पी गुफा हो मधुर मरनेका सम-स्मान
ह। इस हरनको देख कर यदि उपर रखोगे तो विश्व-बन्धका
दशनकर पामोग। तेरे छाट होने पर भी करुणामयके राग्यम
तेरा निवास है। है जीवन! हाप बहाभागे तो चरण पानमें
निराश नहीं हागे। सांप काटे हुए आदमीरे मुवमें नमक देने पर वह
उसे मिट्टी बताता है। इसी प्रकार यदि मूवको यह गान बमृत तुल्य
म एमे तो हे जोगन ! उस शान सी यूटी पाठ र पिसाा ॥४।।
सधि-मी मासा-
१३ ताकु मध्य घोलि यानि धर्म भवतार!
मन यार व्यस्त सा परस्व हरने,
घन यार विवळित गणिका परमे
बीबम या कम सम तोककर मार,
ताकुमप्य बोलिपान्ति धर्म अबतार ॥१॥
बिरपा मार मोर.पाए धर्मनीति मुष्प,
बुधि पार कस्याए प्रत सस्प गुण,
घने कीत हेग्पाए पाहार विचार,
ताछु मध्य बोलिपाम्ति धर्म मवतार ॥२॥
सुबग हरम करि वाम करे पान,
घने करिपाए प्रभु सम्तोप विधान,
साहिबाकु दोष रिए नाना उपहार
ताफ मप्य योसिपाम्ति धर्म अवतार ।।३।।
ग्रमण पर पाई पाइपाए मता,
पापाए मोहि ऐगे पवित्र मपा,
कस्साए ममतार मपम्पबहार,
ताठ मय वोसिपान्ति धम मवतार ४॥
पहिर्गत होयाए पर, मुम्प रे
पागा शगाम्य माणि घरे मरे,
सेहिम्पमान पुमि देवाए दमार,
ताकु मम्प बोलियाम्ति धर्म मवतार ॥५॥
उड़िया १३ उसे मी धर्मावतार कहा जाता है! जिसका मम परस्य मपहरणमें हमेशा व्यस्त रहता है, विसका घम गणिकाके परणसे कुचला पाता है, जिसका जीवन साखों लोगों मारसे दमा रहता है उसे मी धर्मका अवतार कहते है। ||१|| जिसकी विवा धर्म नियोका सिर मूवी रहती ह मिसकी वि सैकगे सत्योंको पूर्ण करती रहती है, जिसके पिचार घनसे मोल लिए जाते हैं, उसे भी धर्मका अवतार कहते ह ! ॥२ जो स्वर्ग हरण कर तांपा दान देता है यो धनसे अपने प्रमको सन्तुष्ट करता है अपने दोप छिपाने के लिए नाना पेंट देता है, उसे भी धर्मका भवतार कहते हैं ! ॥३॥ प्रमग-सके सिए को भत्ता प्राप्त होता है, उसे हाप मानेवाला परिोका पता भरोए कर रक्त पूसता है फमताको जो वरबाप करता रहता है उसे भी धर्मका भवतार कहते है। ॥४॥ बाप्ती हापोंसे घरसे मिकमा हुया गारियोंसे धन छावर पर भरहे, फिर वागारमें उस धनका प्रदर्शन करे उसे भी धर्मका अपतार कहते हैं। ॥५॥ - कवि-भी मासा १४ मारती-मावना गोसम-मपळे मापे सम करि कहन्ति मारती-किशोरी मारस-मपळे याहा कस माय मन हेचनाहिं पाशोरि, मोपेन, छळे नास्ति कुछ नाशिक, पाहा पिसा माम्म-निमत्व तहिर मिव प्रभुता प्रकाशित ॥१॥ विसमें हरा विकर्म ग्रा बशीभूत कस सकळे, बासर यामिनी पापि पारिनु तुम्म परसेवा न कसे, ताहिर, गारपम येसास, घन मम पग गर्ने मेष्टि करि परसेबन शिवाइस ॥२॥ तुम्म हासे हास, तुम्म भापे माप रहिना तुम्म परे मति, तुम्म कमा बिमा भगते माम्मर रहिमा माहिं मन्य गति, गोपेन, हुम्मरि गिते चामिल, तुम्भ मरे माति निर गररब निमर परण पठितुं ॥३॥ , उड़िया २११ । भारती-मापना [यह पूरी करिता सिप्ट है। इसमें एक बोर महाँ भग्मान कृपयकी स्तुति है, यही इमरी और मेरमोंके प्रति मापाय बनताका बामेय भी व्यक्त है। पाठमोफी मुनिया के लिए सिप्ट पोका दूसरा वर्ष प्रत्पक उनके वनुपायक मीच ही दिया गया है। गोमोर घाममें प्रभुको लक्ष्य पर मारतकी लसनाएँ कहती है- हे माभ, भारत भूमिमें तुमने जो लीलाएं की, वे कभी भुलाई नहीं जा सकतीं। हे गोपन्द्र एम करके तुमने हमारी जाति और कुल नष्ट किया है। मो मो हमारा अपनापन है उस पर तुमने अपनी प्रभुताका प्रकाष्य किया है। पोमा माप-तोपान्तरमें मंग। योपेन्द्र-पोव-दीपके मधियामी निय। बमस परामित कर, मर्मस भय दिखा कर, सवको अपने वशमें कर लिया है । तुम्हारी परण-सवा किए विना हमें दिन रात चैन नहीं है। उसपर फिर सुमने उदारता की है हमारा धम-मन उदरस्प कर तुमने पर-सेवा करमा सिखलाया है।।२।। पायमिर-पर्ममेण्टी सरकारी बनाकर। - तुम्हारी हसीमें हंसी है और तुम्हारी बातोंमें याद । इस प्रकार तुम्हारे परामें मन रमा हा है। तुम्हारी बर्षा सेवारे विना ससारमें हमारी दूसरी गति नहीं है । ह गोपेन, तुम्हारे निर्देचसे ही हम चल रही है। तुम्हारे मदमे मतवासी हाकर हमन अपने गौरवको अपने ही पैरोंस कुषल दिया है ॥३॥ मुम्म मरे-तुम्हारे मन।
कदि-मी माता- ११२ मसने बसने मायने सपने तुम्म परे मम रहिला, मान देखि क्षणिक दिए सीवनत माम्म बहिसा, गोपेर, बाण तुम्भे समुहदर, तुम्मर भासम पासम काशन समस्त रिशिमा सुम्बर ४॥ तुम्मर कथारे मधुर रहिसा करि मेहर कळमा, तुम्म बानाकमा , स्फुरिसे सनु याक हेसा मसमा, पोपेग, निम वास विप मणिम, मन्त्ररे मोहित तम्बर तुम्भर महत कररिणिते ॥५॥ माम्म क्षीर सर सामोरे पुष्ट बम्पर मनाइ, भय तमि सिना धारममिवीरे करि म पारिसे सहा गोपेग, एपमा कहिषिम पा, जय ग माति के कपा का पूर्व प्रतिमा मनुयायो ॥६॥ गाम्धिनीग-कार पटाला रिम स्नेह गष्ठि हेसा शिपिळ, तहे मगागता किस हेत तुम्मे सहिं पूर्व मना कि पित, पानबाळे, परिषय हेमा याहार, माहा मागि हेमा सरळ कळाह माम बढ़ास ताहार 101 -सपिया भोजनमें, परिधान, शयममें बौर स्वप्नमें भी तुम्हारे चरणोंमें ही मन छगा रहा। मदनको क्षण मात्र भी देखने पर विरह हमारे मीवनको मसाने लगा। हे गोपेन्द्र । तुम प्रपश्यको मानते हो। तुम्हारा उन्ना बैठना पातमीत, भ्यपहार सभी सुन्दर लगते हैं ||४|| मर-नरेबिये-पराब न हमसे। तुम्हारी वागीमें मधुरता है। तुमने हवयको माप लिया है। तुम्हारी सारी बातें न सुनने तक सभी दलोना (पीका ) लगता है। अपना वास भी हमे गहर-सा हो प्रतीत होता है। तुमने म त्रसे मोहित कर छिया है । तुम्हारी मुरलीके छिए हमने अपनी महत्ता वोई ॥४॥ बात-चन। तबरे तुम्मर-मिन कपोकपि। हमारे दूध, मखम मौर मसाईसे परिपुष्ट तुम्हारी पक्तिको देवार बलबान बीर पुस्प भी तुमसे युद्ध करनेमें समर्थ नहीं है। हे गोपेन्द्र ! यह कैसी बात कही! विजयम उमत्त होकर मव तुम क्या कहमे नगे हो, तुम तो मपनी प्रतिझाको निभानेवास हो ।।५।। प्रतिक्षा अनुपापी -- बारममिवीरे-मीनोपीर। जय य माति (पर) भारतको स्थापीनता रेनको प्रतिभूति मम करनेको काय कर कहा गया है। मिस दिन भरने यह सम फिया उसी दिनसे स्नेह-गाँठ रोरी पर गई। उसीसे मासूम हो गया कि पूर्वमे तुम क्या हो गए हो। मिस पायासीके लिए यह सारी कसह हुई, उसका मान तुममे बढ़ाया इसीसे तुम्हारा परिषय मिस गया ॥७॥ पम्पनीर-सापनापी निया-(प) मामा मामीषा सत्यापा मान्दोमन। पाम्बा-ममृतसरम मोतीनगरे पपय परिपानामाठा बाप। करिया में
कवि-भी माता-
गान्धिमीच कष्ट गममा नकरि
बम्बिपुर कसे गमन,
काम न पातित पूरे पार कर्म
येते हाहाकार करना
अमते, कीरतिर बामा उडिसा,
पार निर्मा मेष्टि करशळ बळे
उपसेनानम् वड़िता ॥८॥
परे नमागसा तुम्म माम्म मेर
तुम्मे बनीपान्तरमिबासी,
बाल्य जीवनरे माम्भर घमरे
बदिखा पाई पिस मासि,
गोपेशा, तुम्भे हे बिश्वबिस्यात
माम्म सगे एक मारे पळिी
हेरछि एवं सागमात ॥९॥
गक्ति न शिम तुम्म परे या
मासिपिस मिन मामरे,
सरळ हरय मणि सिना परे
रमित मति स्नेहावरे,
गोपेम, काहिब कम उपकार
पाहा करिम मिज स्वार्थ पाई
म पिसा माम्म परकार ॥१०॥
तुम्मर मापरे तुम्मर पराये
मुपळमान पिसे मासि,
कोपन स्वभाव हमे है माम्भर
समस्ते पिसे नाहि पासि,
करिसे न पिप्से बसन हरम
दुरपर-सुता पिन्तिमार पाण
करिन पिसे से प्राण ॥११॥
सरिया कारागार। अक्रूरने अपने कप्टकी परवाह न की मौर कप्पकी नगरीकी बोर प्रस्पान किया। हम लोगोंने बहुत हाहाकार किया। फितना हक्न पा! किन्तु तुमने कान सक नहीं दिया। ससारमें तुम्हारी कोक्ति-पताका उनी। तुम्हारे कोशरसे सब विपत्ति दूर हुई मौर उग्रसेनका मानन्द पड़ा ।।८।। पापिनीस पप- पायोनि-पप्प-महारमा गांधीका अपना-अप्ट। यमिपुर- पार निमा मेष्टि करमाळके-पाणियामेष्टको सहायतासे । हेमालन-प्रथप सेनाकी प्रसनता। मा में तुम्हारे बोर हमारे वीचके भदका कारण मालूम हुषा कि सुम द्वारिकाके ही निवासी हो । गात्म कालमें हमारी सम्पत्तिसे बदनके लिए माए पे। हे गोपेन्द्र, तुम विश्व विस्पात हुए । इतने दिम तक हमारे साप पछे, गार हमारे साप पसनेमें मान मगती है ॥९॥ बापावर-निवासी पर रेप (लिटिस डीप) में एमेगा। हम तुमको मपने पर वुसानेके लिए नहीं गई पी। तुम्ही अपने स्वार्षके मिए माए थे। तुमको यति सरल हृदयवासा पानकर हो तो स्नेह-मावरसे हमने तुम्हें अपने भरमें रखा पा। हे गोपेन्द्र, तुम कहोगे कि तुमने हमारा उपकार किया है। किन्तु तुमने जो भी किया हो मपने स्वार्थके लिए ही हमें उसको पस्त महीं पी॥१०॥ तुम्हारे पहम तुम्हारे ही समान बमराम आए। ये श्रेषी पे सेकिन उन्होंने हमारा कुछ विगाहा नहीं था। उन्होंने पस्त्रहरण मही रिया या। और प्रार्थना परवावी द्रौपदीके पास वसा नहीं भरा पा॥११॥ मुष्ठमान--मुसलमान। बसन हरण-पही भारतीय कापाच-चित्तका मास। पुष्परमुतावित पार पाश फरिमपिते से प्रेरणदर पर-दर देश मात् इपहर मुता = मुसको चिन्तार कार पाप :पारपास = काप्ति नाही मनाया।
ह-बी माना-
माम्म कर परि चाहि-बासि कमे
तुम्म पराकम बदिसा,
तुम्भ बिना बाम्मे चलि म पारिए
कपा मुनिबाट परिसा,
बोवन, जीविका तुम्मरि हातरे,
मेह तुम्भ पर मामारे रहित
कागि मम्मः कातरे ॥१२॥
पफ मारिबार धरम तुम्मर
विषकूट कर माहार,
तुम्म पुतनारो-महिमा करा
मारी गठरव प्रसार,
तुम्मर, पर्म कळिवार गुम्कर,
बन्धु गोलिया? सनावळ रेस
प्राण न रहिमा सकिर ॥१३॥
कृष्णा कृष्ण पेमि भारत विळख
उपुभिता कपट पाशे,
यहि रम, तहि मिनय निात्रय
रहिगमा सोक विश्वासे,
बोइले दुशासन मूळ कारण,
विधाता बियान संपनीय मुहें
फेमन्त हुमन्ता बारम? ॥१४॥
विराट विमल मुझे भोपको
कौनळे पापा मम्रने,
पोपे मधिकारी निमपसरि
रहि परम बमने,
उत्तर, मिळिसा पाहा दोषकाळे,
पूर पळ बळ होइसा विरित
पर देवा हसा पाळे ॥१॥
उड़िया हमारे हाप पकर धीरे-धीरे बसने ही कारण तुम्हारी शक्ति की तुम्हारे बिना हम लोग जी नहीं सकेंमी, अन्त में यही बात सुननेको मिती। जीवन और पीषिका तुम्हारे हाप दे एवं तुम्हारे परगोंकी माशा रखकर रो रो कर मर रही है ।।१२।। कर परि-दस्त पारन कर कर (टैक्स) की सहायतासे । - बैस मारना तुम्हारा धर्म है और विषपान करना तुम्हारा काम है। पूतनाकी महिमा वाई, वो नारी-गौरवका प्रसार करती है। सुम्हारा मन्त पाना बग दुर्गम है । बन्धु मामकर गिसको सैय भस दिया, उसीके प्राग गए ।।१३।। पप मारिवार परम तुम्बर -गोहपा तुम्हारा धर्म है। माहार-तुम पिस्ट पाते हो। पुतनारी महिमा का नारी पर प्रसार पुमारी पनि नारी-महिमा (नारीकी पवित्रता) मारी-मारको बहाती है। कृष्ण और रुष्णाको लेकर कपटी पासे भारत में विफव पदा हुवा। वहाँ रुप्म है वहाँ बिनय ह—यह विश्वास लोगोंमें छा गया । कहते है दुशासनही उसकी मा पा परन्तु विधिका विधान मसषमीय है। यह कसे दूर किया जा सकता है ? ॥१४॥ हम्मा हम पेनि-भारतीय नर-नारीको मेकर। कपरपाशे-ह करके। पहिला पहा भारतीय होवे है। एमासमराब पासन-म्पवस्था । पाणय पुन कोसससे विराट सुब-वभव भोगा। ऐपमें स्वय हटकर सेवामें नियुक्त रहे । मन्तम पो उत्तर मिमा उससे पूर्ण कोसल मामूम हो गया मौर केबस सिरपर हाथ धरना ही रह गया ॥१॥ निरास मिर-पिट देपा विपुत विपर। पापर मरने-पागासे बना र मारेला कपालेकर (एक्स) मा निश्चित हुमा मस्तकार हाव बरकर हाय-हाय करना।
. कवि-बी मासा- बह-याबोरे कुरु मन्न बाइ पापा नय बाछिसे तुम्म अपमाने एस वहि मने दुर्योधन दोष मिसे, तुम्भदे मकति पाए उमर, तुम्मर सरिया मपापन पक्षे महेता को सुभकर ॥१६॥ म योपि ममरे भर्पर सारे उचित स-कार मरिब, का गुरु हस्व दोर्ष या माश्य हेगा योग्य ताहा करिव, पाठक, सेहि मार तुम्म हासरे हेब विचारक बोति विरघक बणाउछि मिति मापरे ।१४।।