Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Nibandhadarsh
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निबन्धादर्श সুখনি हिन्दी में निवन्ध लिखना सिम्पान को प्रादर्श पुस्तक *गुर गोफे लेना सहित संसक गोकुलचन्द्र शर्मा एम० ए० -Ho- प्रकाशक साहित्प-भान, लिमिटेड, इलाहावाद द्वितीय मस्करण परिवधित तथा सशोधित १००० प्रति] १९२९ ई. [पारह माने
प्रसुराक,
साहित्य-भवन, लिमिटेड,
इलाहावाद।
मुद्रक,
सूरजप्रसाद खन्ना
हिन्दी साहित्य प्रेस
प्रयाग।
पृष्ठमण्या विषय-सूची विचार-भाग विपय १--प्रवेश --माधन ३-भापा और उसका माहित्यिक प ४-रिपय ५-नियन्ध-भेट ~ ३ ९ + + ७-शैली का स्वरूप ८-लकार ९-नियन्ध का आरम्भ लेख-भाग ४८ ५० ५८ ६२ १-सूर्योदय [सुबोध शैली में] -सूर्योदय [ अलकृत शैली में ] दयानन्द शतादी ४-भारत के साधु योर फकीर ५-री सिंहगढ यात्रा ६-ग्राम्य जीवन के आनन्द ५-स्वामी विवेकानन्द -निन्यानये का फेर ९-वायु-यान १०-चा विहार ११-शरीर-सत्ता ७३ १९-उत्माह २१-श्रद्धा विपय पृष्ठ सरया १२-किसान ९६ १३- एक प्यारा चरित्र [ लक्ष्मण] १०० १४-एक छड़ी की आत्म-कहानी [ काल्पनिक ] १०५ १५-पशुओं के साथ कठोरता ११० १६-कर्तव्य १७-आलस्य १२० १८-आदर्श का प्रभाव १२५ १३० २०-दरिद्रता १३३ १३७ २२-मनुष्यता १४० २३-चरित-बल १४५ २४-कलम और तलवार १४९ २५-पढने के आनन्द १५४ २६-१९२६ की चुनाव लीला १५६ २७-काशी की शोभा २८-चचपन [ सरल शैली में ] १६६ २९-बचपन [ भावात्मक ] ३०-फलदार वृक्ष [भावात्मक ] १७३ ३१-यादल [भावात्मक ] ३२-माँ का हृदय अभ्यास के लिए लेख १६८
पहली बात
इस पुस्तक का उद्देश विद्यार्थियों के सामने निवन्ध का आदर्श
रसना है। इस भार को अपने सिर पर ले चुकने के पश्चात्
हमें बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा। निमन्ध का विषय
छोटी कक्षाओं से लेकर कालेज तक रहता है। भिन्न भिन्न
श्रेणी के विद्यार्थियों की रुचि भी अलग अलग होती है। अध्या-
पको का मत भी इस रिपय में एक नहीं। किसीने चाहा कि
लेप छोटे-छोटे हो, किसीने चाहा बडे-बडे हो। किसीने कहा,
परीक्षा ही प्रधान ध्येय रखी जाय, किसीने कहा, वास्तविक
योग्यता को महत्व दिया जाय। साराश, जितने मुंह उतनी
वातें सुनने को मिली।
स्कूल के विद्यार्थियों को अपने भाव-प्रकाशन का ढग पाना
चाहिए। उनकी भाषा शुद्ध और उसका प्रयोग ठीक होना
चाहिए। भावों की गूढता और शैली की विचित्रता उनकी
ज्ञान-वृद्धि के साथ साथ स्वय बढती जायगी। आदर्श लेख का
अभिप्राय यह कदापि नहीं कि उसे रट लिया जाय। परीक्षा
हमारी शिक्षा का उद्देश नहीं, वह केवल योग्यता की जाँच का
। यदि उचित मार्ग से चलकर योग्यता में वृद्धि
एक साधन
[२] की जाय, तो परीक्षा में पास होना ध्रुव है। परीक्षक सदेव श्रेणी का विचार करके योग्यता की जाँच करता है। फिर, हमें जिस लक्ष्य का भेद करना है, उससे ऊँचा निशाना लेने से ही हमारा तीर वहाँ तक पहुँच सकता है। इसलिए लक्ष्य सदैव ऊँचा होना चाहिए। आदर्श का उग्र होना पहली बात है। तभी तो उसका अनुसरण करने से लाभ हो सकता है। इसके अतिरिक्त लेखों की सीमा नहीं। एक ही बात पर कई प्रकार से लेप लिखा जा सकता है, एक ही दृश्य को कितनी ही दृष्टियों से देखा जा सकता है। इसलिए किसी लेस को रटना न केवल व्यर्थ हो है, वरन् हानिकारक भी है। उससे हमारी बुद्धि का विकाम रुकता है। इसके विपरीत, ऊँचे श्रादर्श को सामने रसने से उसका थोड़ा भी भाव हम प्रहण कर सकें, तो भी हमारा ज्ञान बढता है। इन बातों को ध्यानमें रसकर ही हमने इस पुस्तक को लिखने की चेष्टा की है। हम मानते हैं कि योग्य शिक्षक ही लेसफ का सबसे अच्छा आदर्श है, परन्तु वह आदर्श सर्वत्र मिलना दुर्लभ है और विना नमूने के विद्यार्थियों के लिए आगे पढना भी बड़ा दुष्कर है । फिर, भाषा का प्रयोग पिना, अच्छे-अच्छे लसकों की रचना के पढे कदापि नहीं आ सकता। यही कारण है कि बडे बडे विद्वानों के सुन्दर प्रयोग हमारी जीभ पर चढ जाते हैं और उनसे हमारी भाषा में प्रौढता पाती है।
[ ३ ] इस पुस्तक के हमने दो विभाग किये हैं। विचार भाग में रचना के सभी अगो पर सक्षेप में, किन्तु पूर्णरूप से विचार किया गया है। विद्यार्थियो को निवन्ध लिखने में जो कठिनाइयाँ पडती हैं, उन पर भी पूर्ण प्रकाश डाला गया है। लेख-भाग में हमारे ३२ स्वतत्र लेखो का सग्रह है। विद्यार्थियों की सुविधा के लिए लेसों का ढाँचा भी दे दिया गया है। यों तो सहस्रो लेख लिखकर भी यह नहीं कहा जा सकता कि मब की इच्छा की पूर्ति हो जायगी, परन्तु निनन्ध की दिशा दिसाने मे इस पुस्तक मे समुचित सहायता मिलगी यह हमारी धारणा है। कुछ लेस इस पुस्तक मे छ वा सात पृष्ठों तक में आये हैं। इसलिए वे विद्यार्थियों के लिए बहुत राम्बे समझे जा सकते हैं , परन्तु, वर्णन को पूरा करने की दृष्टि से ही हमने उन्हें लिखा है। उनके वर्णन को कई भागों में बाँट देने से भिन्न भिन्न प्रकार के वर्णना के छोटे-छोटे लेस बन सकते हैं। लेस की सीमा को छोटा करके एक ही लेस में कई लेसो की सामग्री टटोलना पाठको का काम है। जैसे, भोजन सामने होने पर अपने अनु- फूल मास बनाना खानेवाले का ही काम है। आशा है इस दृष्टि से हमारे पाठक उन्हें अनुचित लम्वा न सममेंगे। रचना की भाषा के नियम, मुहाविरो के प्रयोग, चिन्हो की योजना आदि पर इस पुस्तक में कुछ नहीं लिसा गया। ऐमा करने से पुस्तक का आकार बढ जाने का भय था और एक ही [४] जगह भानुमती का-सा कुनवा जोड़ना हमें ठीक भी नहीं अँधा। हम यह मानकर चले हैं कि पाठकों को साधारण भापा तथा व्याकरण का ज्ञान है। भापा के शुद्ध तेसन आदि पर हम एक स्वतन पुस्तक लिख रहे हैं, जो शीघ्र ही प्रकाशित होगी। शब्दो के हिजो में सभा है, कहीं-कहीं किसी का हम से मतभेद हो । जैसे, 'कलम' की अपेक्षा हमने संस्कृत का शब्द 'कलम' ही अच्छा समझा है। विचार-माग में निबन्ध की भाषा और शैली के विषय में हमने अँगरेजी की पुस्तको से बहुत सहायता ली है। उसके लिए उनके लेखकों के प्रति हम विनीतभाव से कृतज्ञता प्रकाश करते हैं। छोटा भी आदर्श सामने रसना सहज काम नहीं। अपनी श्रुटियों की ओर देखकर हमें इस विषय म सोच भी हुआ। परन्तु, विद्यार्थियों के प्रामह तथा उनकी सेवा की पविन प्रेरणा से हमने इस कर्वव्य को पालन करने का साहस किया है। इसमें हमें कहाँ तक सफलता मिली है इसका निर्णय तो पाठकों के ही हाथ है। परन्तु, निनन्ध को दिशा दिसाने और पवित्र भावों को उकसाने में यदि इस पुस्तक के द्वारा हम से कुछ मी सेवा हो सकी हो, तो हम अपन को धन्य मानेंगे। गाकुलचन्द्र शर्मा
निबन्धादर्श
विचार-भाग
१-प्रवेश
वाणी हमारे हृदय-कमल की सौरभ है। हमारे मनरूपी
कृष्ण की मुरली है। उसकी स्वर-लहरी में विश्व-सगीत का
सन्देश गूंज रहा है। वह हमारे मुख-मण्डल की प्राभा, हमारे
भाव-मानस की कल-हसिनी है। नीर-क्षीर का विवेक वही
करती और हमारे गुण-अवगुण की धरती पर विचरती है।
मानव-जाति की भाषा के रूप में वही हमारी सभ्यता तथा
सम्कृति की जननी है। उसका उज्ज्वल वेश और विकसित वदन
ही हमारा ध्येय तथा गेय है।
हमारे मनोमावों की अभिव्यक्ति का साधन वाणी ही है।
इमलिए हमें ससार के सामने अपने को अपने निर्मल रूप में
रखने के लिए वाणी क्री विमलता तथा साधुता का महत्व समझ
लेना चाहिए। जो शन्द हमारे मुस से निकलते हैं, उन्हींसे लोग
अनुमान करते हैं कि हम क्या हैं और कैसे हैं , उन्हींसे हमारा
.
निबन्धादर्श] 7 गौरव तथा लायव प्रकट होता है, वे ही हमारी पुरुष प्रविधा के जनक होत हैं। शन्दी की शक्ति अपार है। इसोफे बल से भगवान् वेदव्यास, पाल्मीकि, पतञ्जलि, कणाद, कालिदास, तुलसी, शेक्सपियर आदि ने मानर-समान का अनन्त उपार किया। भार-सुरसरी की धारा को जिधर चाहे उघर वहाल जाना शन्द-मगीरथ काही काम है। श्रतएव शब्द-शक्ति की समाप्ति भगीरथ-परिश्रम के बिना नहीं हो सकती। धैर्ययुक्त तपस्या मे ही वाणी प्रसन्न होती है , वाणी की प्रसन्नता से ही निर्मल ज्योति मिलती , और तमी विविध प्रयन्ध सूमते हैं । नियन्ध हमारे मनोभावा की प्रतिमूर्ति होता है, जिमे हम लिखित वाणी द्वारा व्यक्त करते हैं। यदि उसीको हम कथित वाणी द्वारा प्रकट करें, तो वह भापण अथवा व्यारयान कहा जाता है। जिस प्रकार किसीका चिन उतारते समय पाटो का शीशा जितना अधिक निर्मल होगा, चित्र भी उतना ही स्पष्ट उत- रेगा, उसी प्रकार हमारे हृद्य फ शीशे में भी जितनी अधिक विमलता होगी, उतने ही अधिक स्पष्टरूप में हमारे भाव चिलित हो मकेंगे। इसीलिए निबन्ध में लेखक के मावों का फोटो रहता है। भावों की गहराई अथवा उथलापन प्रत्येक व्यक्ति की सम्पत्ति है-उसका सम्बन्ध अपने अपन चरित्र से है। जिसके चरित्र म जितनी ऊँचाई है, उसके भाव उतने ही ऊँचे और जितनी नीचाई है, उतना ही नीचे निक्लेंग। हमारे चरित्र की यह
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बाप हमारे एक-एक शब्द और एक-एक पनि पर सदैव लगी
रहती है। प्रात वन्ध गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस
के प्राणस्वरूप अयोध्या-सोपान के आदि में लिखा है-
"श्रीगुरुचरन-सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ।"
देखिए, आचार्य तुलसीदास किस प्रकार अपने मन के शीशे
को गुरु के चरणों की धूल से निर्मल करके मर्यादा पुरुषोत्तम
भगवान् रामचन्द्र का 'विमल यश' वर्णन करने चले हैं। इसी
प्रकार हमारी रचना चाहे छोटी हो चाहे बडी, हमे अपना
'मन-मुकुर' निर्मल करके अपने भाव व्यक्त करने चाहिएँ ।
हम जो कुछ लिग्वे, उससे पढ़नेवाले भी वही समझे जो कि हमारा
अभिप्राय है। आरम्भ से ही इस सच्चे मार्ग पर चलने से परि-
श्रमी लेखक लिसते लिखते सफल-मनोरथ हो सकता है।
२-साधन
गरुड, हवा से भीअधिक वेग से, जहाँ चाहे वहाँ जा सकता
है, यह जानकर क्या चींटियों को अपना मन्द परिश्रम छोड़ देना
चाहिए ? नहीं, प्रकृति ने न तो सब को एक-सी शक्ति ही दी है
और न वह सबसे समान कार्य की आशा ही करती है।
अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार काम करना ही प्रत्येक व्यक्ति
का कर्तव्य है । अच्छे साधनो द्वारा वही शक्ति विकसित होती
निपन्धादर्श ] ४ और धड़े-बड़े काम करती है तथा विना गुम साधनों के वही कुण्ठित होकर निफम्मी हो जाती है। प्रकृति का अटल नियम है कि वह जीवमान पोशात में अक्षात की ओर ले जाती है, अर्थात् हम जो कुछ जानते हैं, उसी के सहारे से यह हमें अनजानी बातों का बोध कराती है। यही नैसर्गिक नियम, नियन्ध विसना सीरने की पुत्री है। यथा जय पैदा होता है, तब वह बोलना नहीं जानता और न अपनी दृष्टि ही किसी एक पदार्थ पर जमा सकता है। ससार में आँख खोलते ही वह चकित होकर इधर उधर देखवा है। समय बीतने पर धीरे धीरे मब कुछ सीख तेता है। ठीक यही दशा नौसिखिये लेविक की होती है। निबन्ध लिखना सीख लेना एक दिन का काम नहीं। माया मॅजते-मॅजत हो मॅजती है और भाव उठते- उठते ही उठते हैं। परन्तु यदि हमारे ज्ञानार्जन के द्वार- हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ-सचेत रहें, तो हमारा ज्ञान भएडार स्वाभा विक रूप से ही बहुत कुछ घढता रहता है। १.-जानेन्द्रियाँ निबध की सामग्री जुटाने का सबसे पहला साधन हमारी ज्ञानेन्द्रियों है, जो जन्म से ही हमारा साथ देती है, उनमें भी आँस सब से प्रधान है। आँस के ही द्वारा हम प्रकृति के अनन्त- सौन्दर्य का अवलोकन परते, उसे हृदय में विठाते और मस्तिष्क के तन्तुओं द्वारा उसका प्रभाव स्मरण शक्ति को सौंपते हैं।
[साधन . सुनना, सूचना, चखना और छना भी अनेक प्रकार से हमे पदार्थों का गुण-बोध कराते हैं। इसलिए, प्रतिक्षण हमारी ऑरें खुली हुई रहें, अर्थात् हमें सूक्ष्म निरीक्षण करने का, धारीफी से देसने का स्वभाव पड़ जाय, तो हमारे हृदय-पट पर बाहरी जगा फा जो चित्र यनेगा, वह यहुत स्पष्ट होगा। जब तक हमें स्वय किसी बात का स्पष्ट योध न हो, हम दूसरे को किस प्रकार सममा सफत है। इस प्रकार यारीकी से देखने से हमारा ध्यान भी एक ओर लगारहता है और हमारी मेधा (धारणावती बुद्धि) भी विकसित होती है। जब तक हम ध्यानपूर्वक किसी पदार्थ का मूक्ष्म निरीक्षण न करें, हमारे लिए उमका पूरा ज्ञान होना असम्भव है। २-भ्रमण बाहरी जगत् को हम जितना अधिक देखे-भालेंगे, उतना ही अधिफ हमारे ज्ञान का गोला बढता जायगा उसकी परिधि में भिन्न भिन्न विपया का समावेश होता जायगा। इसलिए पर्यटन करना ज्ञानार्जन का दूसरा परमानश्यक साधन है। स्थान-स्थान में घूमने-फिरने से हमारे ज्ञान-कोप में जो-जो नई बातें बदसी हैं, वे हमारी निज की प्राप्त की हुई होती हैं। उनके लिए पुस्तक पढने, अथवा गुरु की सेवा में समय बिताने की आवश्यकता नहीं होती। यीच का यह समय बचने के साथ-साथ उन यातो का प्रभाव भी हमारी स्मरण शक्ति पर चिर स्थिर रहता है। हम
निषन्धादर्श]
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पदार्थों के रूप को ज्यों का त्यो समझ लेते हैं। उदाहरण
के
लिए, जिस मनुष्य ने कभी पहाड़ अथवा समुद्र नहीं देना है, उसे
अनेक नमूने दिखाने वथा सरल से सरल ढग से समझाने पर भी
उनका यथार्थ योध नहीं हो सकता। हिम से ढकी हुई और
आकाश को छूती हुई तथा नीले-नीले गगन में शान्त भाव मे
सडी हुई ऊँची-ऊँची चोटियों, अथवा कल-पल ध्वनि करके
आलिङ्गन-सा करती हुई फोमल, लोल लहरों वथा ऊँची उठती
हुई तरल तरङ्गों का आभास फेवल कानों द्वारा किस प्रकार
हो सकता है ? वह आँस हो का काम है। अन्य बहुद दृश्य
तो ऐसे होते हैं कि उनका सम्बन्ध देपने ही से है, वे वर्णन से
परे हैं। वहाँ तो "गिरा अनयन नयन बिनु बानी", ही कहना
पडता है। सच तो यह है कि पर्यटन करने से जो सहायता
हमारे भावों के विकास और कल्पना की उडान को मिलती है,
वह और फिसी तरह मिल नहीं सकती। इस व्यावहारिक ज्ञान
द्वारा हमारा अनुभव दिन पर दिन पुष्ट होता और विस्तार पाता
जाता है। हमे निरीक्षण करने के एक से एक अनूठे अवसर
प्राम होते हैं। हृदय में आनन्द की हिलोरें उठती और हमारा
नीवन सुखमय बनाती हैं। सासारिक पदार्थों का जीता
जागता चिन हमारे सामने सडा हो जाता और मूक्ष्म निरीक्षण
के द्वारा जीवन-रहस्य के पट भी हमारी आँसों के सामने खुल
जाते हैं।
[साधन Maa- 30 ..... wwwan ३-स्वाध्याय भ्रमण करने के साधन सय को सुलभ नहीं। उनके लिए धन चाहिए, अवकाश चाहिए, साहस चाहिए और चाहिए माथियो का सुयोग। परन्तु छोटी-छोटी यात्राएँ-मेले, प्रदर्शनी आदि के अवसर का उपयोग सुगमता से किया जा सकता है। जिनके पास इन साधनों का अभाव अथवा कमी है, उनके लिए तीसरा साधन स्वाध्याय है। अच्छे-अच्छे प्रन्यों का पढ़ना फेवल उन्हींके लिए आवश्यक नहीं, जिनको कि भ्रमण करने का अव- सर प्राप्त नहीं होता, वरन् भ्रमण करनेवालों के लिए भी अनि- वार्य-सा है। ग्रन्थों के अध्ययन से उनमें तुलना करने की शक्ति बढती और अपने अधूरे निरीक्षण की पूर्ति का भी मार्ग मिलता है। भिन्न-भिन्न पहलुओं से किसी पदार्थ की जाँच-पड़ताल के नये पथ सूमते और अपने भानों को व्यक्त करने का उत्माह उत्पन्न होता है । परन्तु स्वाध्याय के लिए भी बहुत सतर्क होकर आगे बढना चाहिए। आजकल के बढते हुए साहित्य के युगमें नया विद्यार्थी महज ही यह नहीं जान सकता कि किस पुस्तक के पढ़ने में उसका हित और क्सिके पढने में अहित है। भापा और भावो की दृष्टि से उत्तम और अन्छा प्रभाव डालनेवाले ग्रन्थो के चुनाव में हमें प्रारम्भ से ही किसी अच्छे गुरु की शरण में जाना होगा। यदि ऐसा गुरु हमारे माता, पिता, भाई आदि में ही कोई मिल जाय, तो सौभाग्य ही समझिए, नहीं तो बडी सावधानी के साथ नबन्धादर्श ] ८ - . Hen-sNayanesamaaa.. naam- उसकी सोज करनी चाहिए। स्मरण रसिए, स्वार्थी और नकम्मे लेखकों ने साहित्य सुरसरी को भी गन्दा करने की चेष्टा में कमी नहीं की है। ऐसे लोलुप लेखकों की दृष्टि में साहित्यिक पवित्रता का कुछ मूल्य नहीं । अयोध विद्यार्थियो की पवित्र भाव- भूमि में गन्दे और गले सडे वीज बोसे उन्हें लजा नहीं आती। इसलिए शुद्ध साहित्य का पटना अपना परम कर्तव्य समझिए । भूलकर भी गन्दा साहित्य हाथ में न आने दीजिए। उसे महा- विप समझ कर छोड़ दीजिए। ससार के महापुरुषों के जीवन- चरित, सभ्य और उन्नत जातियों के गौरव-पूर्ण तथा उदार इति- हास और वीर-गाथाएँ, सधे और स्वास्थ्य-प्रद सुन्दर वर्ण तथा याना-वृत्तान्त और वैज्ञानिक लेख पदिए। इन्हीं के द्वारा धीरे- धीरे आप स्वय शुद्ध और अशुद्ध की पहिचान करने लगेंगे। प्रन्थावलोकन का स्वभाव बनाइए और अपनी शङ्कामा का किसी सच्चे गुरु के चरणा पर शिर रसर निवारण कीजिए। निर्मल निरीक्षण के यल मे अपने पढे हुए प्रन्थों मे सार वस्तु का प्रहण कीजिए और मनोयोग के साथ गम्भीरतापूर्वक अध्ययन कीजिए। केवल किताबा के कोडे न धनिए। अपने दैनिक जीवन मे भी इस बात का ध्यान रखिए कि आप जिस प्रकार के वायु-मण्डल में विचरते हैं, वह पवित्र हो। आपकी सगति आपकी पैठक उठक और आपके सभा-सम्मे- लन ये सब आपके भाव और भाषा पर अपना प्रभाव छोडते हैं।
[ भाषा और उसका साहित्यिक रूप -- . - Neese m-4 PRIN- Aurant-name- दोपा से दूर हटना और गुणों का प्रहण करना, अथवा दूषित भापा का परित्याग और माधु भाषा से अनुगग, आपके अपने नैतिक बल पर निर्भर है। मामाजिय' मंस्कार और आचारिक व्यवहार, हमारे शिष्टाचार सम्पन्धी भावो को ढालनेगाले साँचे होते हैं। इसलिए ये सस्कार भी यो ही नहीं छोड़े जा सकते । आपकी रचनाओं में इन भावो की रेखाएँ भी प्रतितक्षिन होती है। ३-भापा और उसका साहित्यिक रूप भाषा भावों की धनिमयी मूर्ति है। माव उसका प्राण है। अथवा भाषा अखिल विश्व की हत्तन्त्रो की मदार है। विश्व के हृदय की गति के साथ-माथ भाषा की गति विय में भी उसी अनुरूप परिवर्तन होता रहता है। उचारण फी सुविधा, नये-नये आविष्कार, मामाजिफ हेलमेल का विस्तार, परिवर्तित कपि और नवीनता का प्रेम इत्यादि के कारण भापा का स्वरूप मदैव नया रूप धारण करता रहता है। फिर कभी-कभी ऐसा युग भी आता है कि कोई प्रभावशाली लेखक अथवा एक लेपक-मण्डल अपनी लेखनी के चमत्कार से भाषा के प्रवाह को एक नई दिशा में यहा देता है। इस प्रकार युग विशेष में भाषा भी अपना विशेष रूप रखती है, जिसका अध्ययन लेखक का कर्तव्य है।
निसन्धादर्श] - -- CAN Arum-imminantarrate भापा के साहित्यिक, सायादिक और प्राम्य स्वरूप का अन्तर जान लेगा भी कम आवश्यक नहीं। साहित्यिक म्बम्प यह है, जिसका प्रयोग उच्चकोटि के लेसफ करते हों। सावादिक स्वरूप ह है, जिसका प्रयोग शिक्षित समाज द्वारा गोरापाल में किया जाय और प्राम्य स्वरूप वह है जिसमें अशिक्षित जनता अपने भाव प्रकट करे। सुलेग्यकों का आदर्श साहित्यिक मापा ही अष हमे साहित्यिक स्वरूप के शब्दो, वाक्यों, परिच्छेदों (Paragraphs) और नियन्ध अथवा रचना के श्रावश्यक श्रहों की ओर भी एक रष्टि डाललेना चाहिए। शब्द की शक्ति के विषय में हम पहले लिख चुके हैं। वही शब्द लेग्नक का शस्त्र है। उसका कुशल प्रयोग न जानने में कोई लेबर लक्ष्य-भेद नहीं कर मकना । यों तो एक ही अर्थ के तानेवाले अनेक श द होते हैं, परन्तु प्रत्येक शद की आत्मा अलग है । उसकी पहिचान के मिना शब्द का प्रयोग ठीक-ठीक नहीं हो सकता। जैसे, मेघ, पायोधर, बादल, वारिवाह, धाराघर ये शद एक ही अर्थ के वाचक हैं। परन्तु 'धाराघर' कहने से मानों मूसलाधार मेह की झडी का दृश्य सामने आ जाता है, तो 'वारिवाह' से हवा में उड़ते हुए गई के गोलों के मदश मेघों को दौड़ आँपो के आगे दौड लगा जाती है। 'पायोधर' से प्यासे [ भाषा और उसका साहित्यिक रूप -armananda-... a -- 44 पपीहे की भाँति आँसें ऊपर को उचकने लगती हैं, तो 'बादल से घुमडती हुई घटाओ के दल-बादल उमडे चले आते हैं। 'मेघ' में एक प्रकार की गम्भीरता छिपी हुई है। इसी प्रकार प्रत्येक शब्द भाव की किसी विशेष बारीकी की ओर सङ्केत करता है। कुशल लेसक शब्दो की इस कोमलता का सदैव ध्यान रसता है। स्मरण रखिए- "जिस प्रकार समप्र पदार्थ एक दूसरे पर अवलम्बित है, ऋणानुबन्ध हैं, उसी प्रकार शब्द भी, ये सब एक ही विराट् परि- वार के प्राणी हैं। इनका आपस का सम्बन्ध, सहानुभूति, अनुराग-विराग जान लेना , कहाँ कय एक की साड़ी का छोर उडकर दूसरे का हृदय रोमाश्चित कर देता , कैसे एक की ईर्ष्या अथवा क्रोध दूसरे का विनाश करता, कैसे फिर दूसरा बदला लेता, कैसे ये गले लगते, पिछुडते , कैसे जन्मोत्सव मनात तथा एक दूसरे की मृत्यु से शोकाकुल होते-इनकी पारस्परिक प्रीति-मैत्री, शत्रुता तथा वैमनस्य का पता लगा लेना क्या आसान है ?" [ 'पल्लव' से] शब्दो की यह वशोत्पत्ति स्वाध्याय और अभ्यास से ही धीरे- धीरे जानी जाती है। श्रारम्भ में विद्यार्थी को चाहिए कि वह सुलेखको की भाषा में इस बात को ध्यानपूर्वक देसता जाय कि वे- पर किस शन्द का प्रयोग करते हैं। .
निबन्धादर्श -RAMARH समाज में यातचीत सुनते समय भी वह शब्दों का ठीक-ठीक प्रयोग सीसने की चेष्टा करे। वाक्य जर शन्दा का कुछ ज्ञान प्राप्त हो जाय, तभी से वाक्य- रचना की शुद्धता और सुन्दरता की ओर रुचि उत्पन्न होनी चाहिए। वाक्य योजना में नीचे लिखी हुई बातें ध्यान देन योग्य है (१) व्याकरण की स्पष्टता-पहली बार पढठे ही वाक्य की व्याकरण-सम्बन्धी रचना स्पष्ट समझ में आ जाय । (२) विस्तार-पाक्यों का विस्तार विविध प्रकाराका होना चाहिए। कोई वाक्य बहुत लम्बा तो कभी न हो और बहुत छोटा भी बहुत कम। वाक्य बहुत लम्बा होने से आँखों की यही दशा हो जाती है जो किसी चिनशाला में जल्दी-जल्दी चलनेवाले व्यक्ति की होती है। उसकी दृष्टि एक चित्र से दूसरे पर शीघ्र ही पहुँच जाती है, और किसीका भी पूर्णभार वह नहीं समझ सकता। इसके विपरीत, ठहर-ठहर कर चलने से वह अपना ध्यान प्रत्येक चित्र पर जमा सकता है। इसी प्रकार छोटे-छोटे वाक्यों से लेसक के अर्थ की स्पष्टता का योष शीघ्र हो जाता है। लम्बे-लम्बे वास्यों में प्राय व्याकरण की भूलें भी हो जाने की सम्भावना रहती है।
१३
[भाषा और उसका साहित्यिक रूप
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और पाठक का चित्त शब्दाडम्बर में ऐसा उलम जाता है कि
वह एक शब्द से दूसरे पर जाने की धुन में लेखक के अर्थ को
भूल हो सा जाता है।
(३) आश्रित याक्य-खण्ड-किसी वाक्य मे जोडे हुए अन्य
वाक्य-खण्ड उसे योझिल तथा शिधिल बनाने के कारण होते
हैं। इसलिए वे, जहाँ आवश्यक हो, प्रधान वाक्य में इस प्रकार
गूथे जायँ कि जब तक सम्पूर्ण वाक्य समाप्त न हो जाय, उसका
व्याकरण-सम्बन्ध पूरा न हो।
(४) सतोलन-लम्ये वाक्यों की रचना में, जहाँ सम्भव
हो, उनके अग-अग में ऐसी अनुरूपता हो कि प्रत्येक वाक्य
उचित रूप से नपा तुला जान पड़े। एक अग भारी और दूसरा
हलका होने से वह लड़खडाता हुआ न दिखाई दे ।
(५) एकता-एक वाक्य में केवल एक ही विचार व्यक्त
किया जाय, उससे विभिन्न और कोई भाव न पाने पावे।
(६)मसाधारणतया व्याकरण के नियमों का पालन
किया जाय, किन्तु जहाँ आवश्यक हो वहाँ परिवर्तन भी कर
दिया जाय, जिससे कि सबसे प्रधान शब्द वाक्य के आदि वा
अन्त में रसे जा सकें।
(७) अन्वय वा सहति-जहाँ विशेषण, व्याख्या अथवा
परिणाम-सूचक वाक्य-खण्ड प्रधान याक्य में जोडे जायँ, वहाँ वे
समुचित सयोजक शब्दों द्वारा मिलाये जायें।
"
निरन्धादर्श] sadewa परिच्छेद ( Paragraph) परिच्छेद के विस्तार के विषय में कोई कठोर नियम नहीं बनाया जा सकता। जिस प्रकार हमें किसी वस्तु के रखने के लिए उतनी ही बडी पिटारी की आवश्यकता होती है जितनी में कि उस वस्तुका आकार समा जाय, उसी प्रकार प्रत्येक परिच्छेद उतना ही बड़ा होना चाहिए, जिवने में केवल एक विचार विक- सित होकर आ जाय। इसके लिए इन बातों का विचार रण जाय (१) एकना--परिग्वेद में केवल एक विचार का विकास हो। (२)सार-परिच्छेद का आरम्भ ऐसे वाक्य से हो जो उसका सार रूप हो, जिससे कि उसका अभिप्राय खुल जाय, अथवा परिन्छेद हमें किसी सार वस्तु की ओर ले जाय और उसका अन्त उसी सार-चाक्य से हो । (3) अन्वय वा सहति परिच्छेद से यह प्रक्ट हो जाय कि वह उस एक ही विचार-यशाला का क्रमबद्ध और यौक्तिक विकास है, जो कि उसमे प्रमुख मार से भली भाँति जुड़ी हुई है। रचना वास्तव में लेखक के हृत्य का सन्देश होती है। उसको अन्तर-पनि एक ही होती है वह एक ही मुल भाव पर
[भाषा और उसका साहित्यिक रूप
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टिकी रहती है। वह भाव जितने निर्मल स्रोत से निकलेगा, जितनी
अयाध गति से वह यहेगा, जितनी अधिक स्वाभाविकता उसमें
होगी, ग्चना की स्रोतस्विनी नदी उतनी ही मनोहारिणी और
सुरम्य होगी। सपत उसके विचारणीय अग ये हैं
(१) एफ्ना-समष्टि रूप में रचना में एक ही प्रमुग्य
भाव होना चाहिए जो उसके अग अग में व्याप्त हो। यह भार
आरम्भ ही में व्यक पर देना अच्छा है।
(२) विश्लेषण-इस प्रमुस भाव का विश्लेपण (अगों को
अलग-अलग करके दिसाना) वैज्ञानिक रीति में उसके अगो और
उपाङ्गों में होना चाहिए, जिसमे रचना के भीतरी भागों में उनका
पृथक् विचार किया जा सके। जैसे , किसी प्रन्यके सर्ग,
सोपान, अध्याय, पाठ, प्रकरण आदि ।
(३) सकतन-इन अलग अलग भागों को ऐसे क्रम से
रखा जाय कि उनका पारस्परिक सम्बन्ध भी स्पष्ट हो और वे
सम्पूर्ण रचना से सु-सम्बद्ध हों। जैसे , किसी विशाल भवन के
दरवाजे, खिडकी, बरामदे, छज्जे, कँगूरे आदि ।
रचना हदय के उद्गारों की अभिव्यक्ति है। उसे विविध
रोतियो से व्यक्त कर सकते हैं, तो भी उसके दो मुरय भेद है,
(२) गद्य (२) पद्य । गद्य मे व्याकरण के वाक्य-रचना सम्बन्धी
नियमों के अनुसार शन्दा का स्वाभाविक प्रम रहता है और
निरन्धादर्श] १६ - PADMRA mes " म 04 Manoon. aane पद्य में लय-प्रधान प्रलकृत प्रम होता है। गद्य मामान्य वार्ता लापका स्वाभाविक माध्यम है और पद्य उत्कृष्ट कल्पनाओं का। इस पुस्तक मे फेवल गद्यमय रचना फाही वर्णन अभीष्ट है और उसमे भी विशेपर पाठशाला सम्बन्धी नियन्धों का। इस- लिए गग के भेदों पर विचार करने के पूर्व रचना के विषय पर भी थोड़ा-सा विचार कर लेना अनावश्यक न होगा। ४-विपय निपन्ध के विषय की सीमा और लेसक की शक्ति, दोनों में जबतक सामजस्य न हो, सवतक लेस अरछा नहीं हो सकता। आरम्भिक लेखक के लिए छोटे-छोटे वणन सरल और सीधी भाषा में लिसना ही बहुत है। यदि उसे दया, साहस, शोध आदि विषय लिखने के लिए दिये जायें, तो उसका मन रूपे सूखे विषयों से सजायगा और वह लेख लिखने को बड़ा कठिन काम सममाने लगेगा। इसलिए निबन्य लिग्रने का प्रारम्भ नित्य प्रति की देसी हुई वस्तुओं के वर्णन और छोटी-छोटी रोचक कहानियों के दुहराने तथा लेसन से होना स्वाभाविक और सुकर है। बचपन से इस प्रकार का म्वभाव डालना मानों सेल सेल में लेप लिसना सिपाना है। आगे चलकर लेग्म में यल लाना, भावों को समास रूप में व्यक्त करना, भाषा में लालित्य लाना आदि गुण रुचिवर्धन के साथ साथ अपने आप आने लगते हैं।
[ निवन्ध-भेद -Ins. - 4.. 0. N UP- . जायगा प्रत्येक विपय की एक सीमा होनी चाहिए। उस सीमा की परिधि को अच्छी तरह देसकर और अपनी शक्ति को तौलकर ही लेसनी उठानी चाहिए । जैसे , 'मेला' विषय पर जो लेप होगा, उसमें मेलों का इतिहास, उनका प्राचीन तथा आधुनिक रूप, धार्मिक सम्बन्ध आदि अनेक वातें आ जायेंगी । परन्तु रामलीला का मेला' अथवा 'अलीगढ की रामलीला का मेला' किंवा 'सरयू- तरण का दृश्य' इन लेसों में विपय सीमित तथा परिसीमित हो और उसका लिसना सुकर होगा। लेखक की कक्षा तथा योग्यता के अनुसार ही निनन्ध की सीमा निर्धारित कर लेना उचित है। ५-निबन्ध-भेट यो तो ऐतिहासिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, राजनीतिक, तुलना- स्मक, वर्णनात्मक आदि अनेक प्रबन्ध-भेद कहे जा सकते हैं। जिस दृष्टिकोण से किसी विषय विशेष को लिखा जाय, उसी उद्देश-विशेप से उसे एक अलग नाम दिया जा सकता है। परन्तु, साधारणतया निबन्ध में चार बातें प्रधान होती हैं,-वर्णन, कथा, व्याख्या और तर्क। इन्हीं चारों के आधार पर निबन्ध के मुख्य चार भेद किये जाते हैं, वर्णनात्मक, कथात्मक, व्याख्यात्मक और तार्किक । अन्य-अन्य प्रकार के निबन्धों का समावेश किसीन किसी रूप मे इन्हीं के अन्तर्गत हो जाता है ।
यणन
वर्णन में लेखक का उद्देश यह रहता है कि वह उस दृश्य को,
जो कि उसकी आँसो अथवा मस्तिष्क में घूम रहा है, शदों म
निकाल कर रख दे। साधारणतया किसी दृश्य पदार्थ का
निरूपण करना वर्णन कहा जाता है, परन्तु इममे यानाएँ
दैनिक वृत्त (Dire), उपन्यास आदि की भी गणना है।
और अवसर-अयसर पर तो सभी प्रकार के नियन्यो-
विशेषकर पद्य में इसका उपयोग होता है। आगे चलकर
वे विषय भी इसमें आते हैं, जिनका सम्बन्ध बुद्धि तथा
भाननामो से है।
वर्णन के अङ्ग
उच्च कोटि के लेखको के वर्णन में ये बातें पाई जाती हैं,
(१) स्थूल वर्णन (२) विस्तार (३) विविध विचार-कोण (४)
सगत भाव (4) प्रस्ताव ।
(१) स्थूल वरान (Outhne)-प्राय लेखक वर्णनीय विषय
की एक व्यापक बाह्य रेग्गा बनार लेस आरम्भ करता है
(२) विस्तार (Details)-इसके पश्चात् वह पृथक्-पृथक्
भागा का सवस्तिर वर्णन करता है। इसमे वह इस बात का
ध्यान रसता है कि जो बात जितनी अधिक प्रधान हो, उस पर
उतना ही अधिक बल रह ।
[ निवन्ध भेद emon "nanews (३) विचार कोण (Points of ster) कभी-कभी समस्त वर्णन का और भी अधिक व्यापक रूप दिखाने के लिए यह उसे भिन्न-भिन्न पहलुओं से वर्णन करता है। (2) सगत भाय (Associated ideas)- वर्णन को अधिक रोचक तथा प्रभावशाली यनाने के लिए यह अन्य विचारो तथा उद्धरणों से उसका स्पष्टीकरण करता है। (५) प्रस्ताव (Suggestions)-सभी पाठको की पि एक- सी नहीं होती, इसलिए लेखक कभी-कभी भाव का विकास न करके केवल उसका प्रस्ताव कर देता है। पाठक अपनी-अपनी कचि के अनुसार उसकी पूर्ति करते रहे। कथा कथा में लेखक का उद्देश यह रहता है कि वह क्रमागत, वास्तविक अथवा काल्पनिक घटनाओं के अनुरूप एक क्रमबद्ध विचार-माला प्रकट करे। कथा के उदाहरण पुराणों, इतिहासो, जीवनचरितो तथा उपन्यासों में पाये जाते हैं। वर्णन और कथा का अन्तर जानने के लिए यो समझना चाहिए कि वर्णन यदि चिनलेसन से मिलता है, तो कथा सिनेमा (चलते-फिरते चित्र प्रदर्शन) के अनुरूप है। चिन एक साथ ही अपने सव अङ्गो की सुन्दरता देसनेवाले के सामने रख देता है और सिनेमा में चित्रों का ऐसा तार बँध जाता है कि एक के
निवन्धा]
--
पीछे दूसरे चित्र की सचालन प्रिया में एक पूरी घटना मौन
मापा में व्यक्त हो जाती है।
कया के श्रङ्ग
कथा की उत्तम रचनाओं में ये यातें पाई जाती है,-(१)
घटनाक्रम (२) कारण और कार्य (३) दृष्टान्त (४) सक्षेप वा सार
(५) आलोचना।
(१) घटना-प्रम (Order of events)-कथा में काल और
प्रम के अनुसार घटनाओं का उत्तरोत्तर विकास होना चाहिए।
(२) कारण और काय (Cause and effect)-पटनाओं
और उनके कारणों का सम्बन्ध स्पष्ट रूप से पता देना चाहिए।
(३) दृष्टान्त (Illustration)-जहाँ कथा-वर्णन में कोई
आकस्मिक परिवर्तन हो, जिसका सममना पाठक के लिए कठिन
जान पडे, वहाँ मिलती-जुलती घटनाओं का रप्टान्त र देना
चाहिए।
(४) सक्षेप (Summarnes)-अच्छे लेखक प्राय कथा के
प्रत्येक खण्ड के अत में उसका सार दे देते हैं। इससे पाठक
को म्मरण-शक्ति का बोझ हलका हो जाता है और उसे पिछले
भाग का, जिसके साथ कि आगे का भाग मिलाना है, स्पष्ट ज्ञान
हो जाता है।
(५) अालोचना (Criticism)-जहाँ वर्णनीय घटनाओं
के बटे बड़े पात्रों का विषय आता है, वहाँ लेखकों को उनका
.
२१
[निबन्ध-भेद
-
--000-00amavam-00-memomsnu0.00-
1400MMPRE
--
- 4000
चरित्र चित्रण आवश्यक जान पड़ता है और उनके कार्यों तथा
हेतुओ फी आलोचना लाभप्रद सिद्ध होती है।
व्यारया
व्याख्या में लेखक का उद्देश्य वैज्ञानिक रीति से शान कराना
है। इसका सिद्धान्त ज्ञात की ओर से अज्ञात की ओर बढ़ना
है। यही रीति शिक्षा देने में काम लाई जाती है।
व्याग्या में
प्राय अमूर्त वा व्यापक विपयो का ज्ञान कराया जाना है।
जैसे , दया, क्षमा, शिक्षा आदि ।
व्याख्या के अङ्ग
वैज्ञानिक रचनाओं में ये बातें पाई जाती हैं-(१) मूलतत्वों
की स्थापना, (0) लक्षण वा परिभाषा, (३) विवेचन,
(४) पर्सालोचन।
(१) मूलतत्वां की स्थापना (A Foundation of Facts)
विज्ञान की प्रत्येक शाखा कुछ मूल-तत्वों पर निर्भर रहती है, जो
कि मानव-समाज के निरीक्षणों तथा अनुभवो से प्राप्त होते हैं ।
(२) परिभाषा (Definition)-किसी पदार्थ-उसकी
क्षमता, उसकी प्रक्रिया आदि के बताने के लिए पारिभापिक
शब्दो की आवश्यकता होती है । परन्तु, उन शब्दों का व्यारया
में प्रयोग करने के पूर्व उनकी परिभाषा का ज्ञान करा देना
चाहिए, जिससे पाठक लेसक के अभिप्राय को समझ जाय ।
8 नियन्धादर्श (३) वियना (Inductton )-प्राविप नियमा की पोज क लिए जन चैमानिक सलों के अलग अलग विभाग तथा तुलना करना जो उन नियमों हो द्वारा उत्पन्न होते हैं। (४) पानोचन (Deductions) स्थापित वा निश्चित नियमों का विशेष अरस्थात्रा में प्रयोग करना। यही वैज्ञानिक प्रणाली धार्मिक, आधारिक, सामाजिक आदि निबन्धों की व्याग्या में भी प्रयुक्त करनी चाहिए। पहले उनके मूलतत्वों को हेढा जाय, फिर पारिभाषिक शादी या शान कराया जाय। इसके पश्चान् विवेचन और पालोचन से विषय को स्पष्ट किया जाय। तर्क में लेखक का उद्देश दूसरों के विश्वास, या व्यवहार पर प्रभाव डालने का प्रयत्न होता है। इसके प्रधान क्षेत्र सदाचार, धर्म, राजनीति आदि हैं। कथित भाषण भी इसीमें सम्मिलित हैं। इसके दो मोत्तम शख हैं-युक्ति और प्रशोधन । -- तर्क के अग तार्किक निबन्धों में इन यादों से लेग्यफ की मान-सीमा का परिचय मिलता है-(१) विपय (१) युक्ति-विधान (३) प्रमोधन- चातुरी। wr [शेती (१) विषय (Thumt)यह बापश्यक है कि लपक फो विषय के म्यूल सिद्धान्ता, विस्तार की विशेषतायो नया मुग्य मुख्य पहलुओं का परिवार हो। पाठकों या सोताओ का मनोयोग स्थिर रमने तथा इन्माह उपप करोफे तिम् ये यातें यहुत ही आरश्या है। (२) युक्ति-विधान (The Methods of Logic;-पाठों (विशेपपर विपक्षी तथा आलोचनात्मक) को अपनी यात मनशान के लिए लेयर को न्याय-सगव युक्तियों दनी पाहिए। वेिचन, पऱ्यातोपन, माटश्य प्रादि सभी ढग पाम मेंतान पाहिए, जिससे कि अपने मत का प्रतिपादन और विपशी मत पा खण्डन हो। (३) प्रपोधन-चातुरा (The Devices of Persuatior)- जिम प्रकार युक्ति का प्रभार बुद्धि पर पड़ता है, उसी प्रकार प्रयोधा का भावनाओं पर । इसनिए पतुर रोग्यफ यायका, दोनों का प्रयोग करता है। यह पाठको या श्राताओं की मनोवृत्तियों को हिताता और भावों को उभारता है, जिससे कि उनका प्रेम, पृणा, साहस, भय, सहानुभूति, विरोध और कभी-कभी उनकी धार्मिफ, प्राचारिफ और देशाभिमान की भावनाएँ भी लेसक की ओर सिंच थाती है। ६-शेली (Styley तिपने का ढग शैली पहलाता है। कोई लेम्बक किस प्रकार अपने भावी की अभिव्यक्ति करता है, यही बात उसकी नियन्धादर्शन H 4mMORALoadM- शैली में देखने की होती है नियन्ध का सर्वस्व शैली ही है। जिस प्रकार, 'सवन, नयन, मुख, नासिफा, सय के एक रहनि, सहनि, चितयनि धानि, चतुरन की क्षु और ।' उसी प्रकार एक ही बात कुशल लेखक की शैली में अन्या की अपेक्षा कुछ और ही हो जाती है। शैली हो लेप के फौशल का प्रकाश है। उसमें लेखक के सस्कार, चरित्र, विचार आदि की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। सिले हुए फूल की भाँति उसमें लेखक के हृदय-कुसुम के कोमल अग अलग अलग दिखाई देते हैं। उसीमे से उसके चरित्र की भीनी-भीनी सुगन्ध पाठको के मन पर अपनी मोहनी डालती है। इसलिए प्रारम्भ से हो शैली के विकास में बडी सावधानी से काम लेने की आवश्यकता है। अच्छे-अच्छे लेखकों का आदर्श सामने रसकर आगे बढना चाहिए । नदी की मुक्त-धारा की भौं ति उसमें हमारी ध्वनि और गति एक होकर बहती हुई दिखाई द । शब्दों, विचारों के प्रकाशन तथा वाक्य-रचना की दृष्टि से शैली कई प्रकार की होती है। १-शब्द-प्रधान क्सिी भाव के अभिन्यक्त करने मे शदो की जितनी सख्या से काम लिया जाता है, उसके विचार से शैली के तीन भेद हैं- (१) वाग्बहुल ( Verbore ) जिसमें शादी की अत्यधिकता पाई -- [शैली dese --- beneu -- M 400000 +Maa- जाती है। (२) सक्षिप्त ( Concise), जिसमें थोड़े शब्दों से काम लिया जाता है । (३) निर्दिष्ट ( Precise ), जिसमे न तो शन्द यहुत अधिक होते हैं, न बहुत कम । २-विचार-प्रधान विचारो के प्रकाशन में जिस ढग से चुनाव किया जाता है उससे शैली के दो रूप होते हैं,-(१ अलकृत (Ornate) जिसमें अलकारमयी अथवा चित्र विचित्र भाषा का प्रयोग किया जाय (२) सुरोध (Plain), जिसमें भापा सरल हो। ३-रचना-प्रधान वाक्य-रचना की दृष्टि से भी शैली के दो भाग हैं-(१) धारा- वाही (Flowing), जिसमें शब्दो का अन्वय सरल हो। (6) जटिल (involved), जिसमे श दो का अन्वय मिश्रित हो । इन मोटे-मोटे भेदो के अतिरिक्त शैली के लक्षण-विशेप के अनुसार उसका कोई भी विशेष नाम रखा जा सकता है। जैसे , (१) सरूपक, जिसमें रूपको की बहुलता हो । (२) विशेषणात्मक, जिसमें विशेषणों का प्रयोग अधिक हो । (३) लुमपद, जिसमे भावो का पूर्ण प्रकाश न हो। (४) उद्घोष ( Bombastic ), जिसमे साधारण, सरल शब्दों की अपेक्षा ऐसे शब्द अधिक प्रयुक्त हों जिनका स्वर बहुत ऊँचा हो । (५) उप्र व कटु, जिसमे कटुता का आभास हो (६) व्यग्य, जिसमें उलटे अर्थों से भाव समझा
निबन्धादर्श]
२६
-
-
जाय। श्रयं विरोधिनी, सिमे एक विचार को साधने के लिए
नमक विरोधी विचार रखे जायें।
यालोचनात्मक दृष्टि
किसी मन्य की शैली की परीक्षा के लिए इन बातों पर ध्यान
सपना चाहिए-(१) उस समय की भाषा की अवस्था (6) प्रन्य
के रचनाकाल तक का उस विषय का विकास, (३) लेसफ की
मौलिकता।
७-शेली का स्वरूप
शैली का स्वरूप इन अनी म विभक्त किया जा सकता है-
(१) विचार (Thought ). (२) कथन (Expression )
(३) अनुभूति (Feeling)
पिचार
विचार के मुरय गुण हैं,-(१) सरलता ( Simphcaty),
(२) स्पष्टता (Clearness ), (३) आरोहण ( Range)
१-सरलता
सरल विचार-शैली में ये बातें पाई जाती हैं।
(१) भाव सरलता से समझ लिये जाते हैं, क्योंकि उसमे
पाठका की योग्यता पर पूर्ण विचार रखा जाता है।
(२) अमूर्त वा भाव-बोधक उदाहरणों के स्थान मे प्राय
मूर्त वा प्रत्यक्ष उदाहरण दिये जाते हैं।
२७ [शैली का म्वरूप H Nenadean suestion - (३) सामान्य व्यापर कथनों को छोड़फर विशेपार्थ-बोधक कथन को प्रधानता दी जाती है। जैसे ,वेल तमाशा के स्थान में थियेटर, सरकस, मूला, पुश्ती आदि । (४) लुमपद और सक्षिप्त प्रयोग काम में नहीं ताये जाते । २-स्पष्टता स्पष्ट शैली में ये यातें पाई जाती है (१) माधारणतया गाद उनके सामान्य अर्थों में ही प्रयुक्त किये जाते हैं, यदि उनका अन्यथा प्रयोग किया जाता है तो प्रसग में असामान्य अर्थ के सम्बन्ध में कुछ सफेत रहता (२) जहाँ शादी के फई अर्थ होते हैं, यहाँ एक परिच्छेद- विशेप में केवल एक ही अर्थ प्रयुक्त किया जाता है। (३) कोई अमंगत कथन नहीं होता, जिससे फि विचारी की अस्पष्टता सूचित हो। (४) प्रमुख विचारों को ओजस्विता के साथ और पहले रसा जाता है और उनके आश्रित अन्य विचार यधारधान लाये जाते हैं। (५) एक विचार से दूसरे विचार में उचित सक्रमण होता है। ३-यारोहण समुचित पारोहण में ये धातें पाई जाती हैं (१) विचार, विषय के अनुरूप होते हैं।
निबन्धादर्श] IA . adra sumasumeendan (२) अब तक किसी विषय में जो कुछ जाना जा चुका है। उस ज्ञान से काम लिया जाता है। इसे युगगत (Up todate)', जान कहते हैं। कथन के गुण ये हैं--(१) रुचि ( Choice), (२) अनुक्रम (Order), (३) स्वर मधुरता (Melody), (४) यथार्थता (AFpropriateness) १- रूचि जहाँ कथन मे रुचि होती है, वहाँ ये यावें पाई जाती हैं (१) लेखक अपना अभिप्राय पाठकों पर प्रकट करने के लिए चुने हुए शब्दो तथा पदों का व्यवहार करता है। (२) अव्यवहृत शब्दो तथा अति प्राचीन-जो प्रचलित न हो-कथनों का प्रयोग नहीं किया जाता। (३) ग्राम्यता वा अश्लीलता से बचाव रखा जाता है। (४) व्याकरण की प्रचलित अशुद्धियाँ नहीं पाई जाती। -अनुकम जहाँ कथन में अनुकम हो, वहाँ ये बातें पाई जाती है (१) पाठक, वाक्यों, वाक्य-पण्डों तथा परिच्छेदो के अन्वय को तुरत समझ लेता। (२)शब्दो का अनुक्रम हिन्दी-हग का ही होता है, सस्कृत अथवा इंग्लिश का अनुकरण नहीं। २-
२९
[शैली का स्वरूप
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11
---
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4BNNN
.
३-म्वर-मधुरता
जहाँ भापा श्रुति-मधुर होती है, वहाँ कानों तथा मस्तिष्क
को अद्भुत आनन्द प्राप्त होता है। इस प्रकार के कथन में ये बातें
पाई जाती हैं-
(१) कर्कश-स्वर-वाले शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता ।
(२) दो ऐसे शब्द साथ-साथ नहीं प्रयुक्त किये जाते, जिन
से कि अरोचकता उत्पन्न हो।
' (३) उन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जिनका कि स्वरा.
घात एक दूसरे से तुरत मेल खा जाय ।
(४) कथन में इतनी विविधता होती है कि एकरसता दूर
रहे।
४-यथार्थता
जहाँ कथन विचार के अनुरूप होता है, वहाँ ये बातें पाई
जाती है-
(१) सरल भाव सरल शब्दों में व्यक्त किये जाते हैं।
(२) परिवर्धित विचार ऐसी पारिभाषिक भांपा में व्यक्त
किये जाते हैं, जो सहज ही में समझी जा सके।
(३) उदात्त विचार मानों स्वत उत्कृष्ट भाषा में व्यक्त
होते हैं।
(४) क्रिया का वेग छोटे-छोटे वाक्यों के प्रयोग द्वारा प्रभा-
वित होता है।
५
निबन्धादर्श]
AL
PHeambaramain
Rand
pailewanay Munnatee
(५) वर्णनात्मक पदों में ध्वनि, गति तथा आकार आदि को
व्यक्त करने के लिए उन्हींके अनुकरणशील शडों का प्रयोग
किया जाता है। जैसे, गरम, सङ्गपड़, कलफल, पुवार आदि।
अनुभूति
अनुभूति म इन गुणों का समावेश रहता है,-(१) प्रवृत्ति
(Passiot), (0) ओज (strength), (३) कान्ति वा मनो.
रमता (Charm)।
१-प्रवृत्ति
उन रचनाआ में जो कि इन्द्रिय-त्ति को आइष्ट करती हैं, ये
वातें पाई जाती हैं।
(१) वे मानव जाति, अन्य प्राणियों तथा प्रकृति के प्रति
प्रेम , औरों के साथ सुग्व, दुप वा सामान्य दशाओ में सहा-
नुभूति तथा अनिवार्य निपत्ति के अवसर पर करुणा के भावों को
जामत् करती हैं।
(२) वे अन्याय पर क्रोध , अपमान पर रोप और महाभय
में शक्का की कठोर कल्पनाओं को उत्तेजित करती हैं।
२-योज
ओजस्विनी रचनाओं में ये लक्षण पाये जाते हैं
(१) प्रकृति के व्यापार अथवा माननीय चरितों के वर्णन,
हमारे हृदय में बल की भावनाएँ भरते हैं।
३१
[शैली का स्वरूप
144-
H.
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;?
(0) प्रकृति के रहस्य हमें उत्कृष्ट भावो की ओर ले जाते हैं।
(३) जहाँ भोज की भिन्न भिन्न श्रेणियाँ व्यक्त की जाती हैं,
वहाँ वे ऐसे नम में रखी जाती हैं कि उत्तरोत्तर उत्कर्प द्वारा
पराकोटि पर पहुँच जायें।
(४) जहाँ विपरीत भावनाएँ पर्णित हो, यहाँ वे इस
प्रकार साथ साथ रखी जाती हैं कि अर्ध-पिरोधिनी युक्तिद्वारा
ओज की मात्रा अधिक बढ जाय ।
(५) विचारों का बल बढाने के लिए अलहार और रूपको
का प्रयोग किया जाता
३-कान्ति
कुछ रचनाओ में विशेष मनोरमत्र तथा याहादित करने की
दुर्धर शक्ति होती है, जो इन कारणों से जन्म लेती हे--(१)
लालित्य ( Elegance), (२) रसझता ( Taste) (३) विनोद
(Humonr), (४) सारस्य अथवा वाक्चातुरी (wit),
(५) लेग्नक का कोई विशेष अनिर्वचनीय जादू ।
१-लालित्य-सुललित रचनाओ में ये बातें पाई जाती है-
(१) सुरुचिपूर्ण शब्दो का चुनाव ।
(२) परिष्कृत कथनो की योजना ।
(३) ध्वनि, लय तथा सतोलन की सूक्ष्मता की ओर वह
भ्यान, जिसको कि परिमार्जन (पालिश) कहते हैं।
नियन्यादर्श] ३२ antarwaroran news and- २-रसज्ञता-जो रचनाएँ -सु-रसिकता के लिए प्रसिद्ध हैं उनमें ये गुण होते हैं (१) धर्म और सदाचार की ओर समुचित ध्यान । (२) भिन्न भिन्न कोटिके पाठकोंके विचारोंके लिए सम्मान | (३) विषम विचारों का बचाव । (४) सामाजिक प्रयोगों की पहिचान । (५) सत्य से हटानेवाली अतिशयोक्ति का अभार । ३-विनोद-विनोदमयी रचनाएँ वे होती हैं, जो अपने अथवा औरों के दीपो क्या विफलताओं पर आनन्द देनेवाली मीठी- मीठी हसी दिलाती हैं। वास्तविक विनोद में ये बातें देखने (१) हास्य की एक मलक हो । (0) विफलता को ही ओर सङ्केत हो, व्यक्ति को और न हो। (३) दोपके साथ जो गुण हो, उसे भी स्वीकार किया जाय । (४) विनोद सोहार्दिक हो, शात्रविक न हो, उसमें 'अनुराग हो, वैर न हो। (५) उसमें वाक्-चातुर्य का पुट सदैव रहे। ५-चारचातुरी चाक्चातुरी की रचनाएँ वे हैं, जो औरों पर हँसी वा हपहा लगाने का प्रभाव उत्पन्न करती हैं। वाक्चातुरी के ये तक्षण हैं [ अलङ्कार 10-Namous (१) विपरीत विचारों का विचित्र सयोग । (२) इन विचारों पर सोचने का मौलिक ढग । (३) शब्दों पर श्लेप (एक ही शन्द का कई अर्थों में प्रयोग)। (४) शब्दों की नाप-तोल अर्थात् शब्दों का अपव्यय न हो, गिने चुने शदों में बात हो जाय | ८-अलङ्कार यों तो सहज-सुन्दर को भूपण निरर्थक हैं। यदि विचार चुभता हुआ हो, तो भापा की सजावट से क्या ? सुबोध भाषा ही भाव प्रकाशनका स्वाभाविक ढग है, परन्तु जिस प्रकार कभी- कमी घुमावदार घाटियों अथवा एक दूसरे के गले लगती हुई बेलों की नयनाभिराम निकुलों के दर्शन से एक निराला ही आनन्द प्राप्त होता है, उसी प्रकार भाषा में अलवारो को रङ्ग- चिरगी से इन्द्र-धनुप की-सी छटा झलकने लगती है। भार-प्रकाशन में सुबोध रीति का परिवर्तन हो अलङ्कार है। जहाँ क्लिष्ट भानों को शब्दों में व्यक्त करना हो, वहाँ उन्हे सुगमता- पूर्वक दिखाने के लिए अलङ्कार का प्रयोग किया जाता है और इसके साथ ही वे अधिक प्रभावशाली भी बन जाते हैं। यहाँ हम अलङ्कार के पारिभाषिक नामो में अपने पाठकों को न उलझाकर केवल कुछ आलङ्कारिक प्रयोगो का दिग्दर्शन करा ३ निबन्धादर्श] ४ AMH nanewweweremnort " देना ही उचित समझते हैं। जिन्हें इस विषय में अधिक जान कारी प्राप्त करनी हो, वे अलधारक प्रन्था का अवलोकन करें, क्योकि इस विषय पर पृथक ही अनेक ग्रन्थ हैं। अलङ्कारों के प्रयोग में हमारे दृष्टि-योण को असरय दिशाएँ हो सकती हैं, परन्तु प्राधार रूप से तीन वाते हैं, जिनमें सब का समावेश हो जाता है। वे ये हैं-(१) सरूपता वा सादृश्य (२)विरोध, (३) समीपता । सरूपता मिलती-जुलती यातो से किसी भार का स्पष्ट योध कराना वा उत्कर्ष पढाना सरूपता का लक्षण है। इसमें जिन पदार्थों की तुलना की जाय, उनमें समान गुणों का मिलान किया जाता है। वह गुण चाहे एक हो वा अधिक । समान गुणों की न्यूनायिकता के विचार से इस प्रकार के अलङ्कार भी अनेक प्रकार के हो जात (१) 'उसके दाँत ऐसे उज्ज्वल थे जैसे दूध। यहाँ श्वेतता का गुण प्रहण किया गया है, न कि एक के ठोस होने और दूसरे के पतलेपन का। (e) 'सोमदेव काला नाग है, उससे सचेत रहना। इसम प्रहार करने का भाव छिपा हुआ है। (३) 'विपद् के बादलो का सामना करने के लिए शस्त्र सज्जित रहो। इसमे दो भिन्न कोटि के अलङ्कारा का मेल है।
[ अलङ्कार
-.-Roas.40-
.
.
(४) 'तुलसी' की कविता-सरिता मे भक्ति का सरस प्रवाह है।
'सूर' में भी वही यात है, उसमें सरय-भाव का स्रोत उमड़ रहा है।
'केशव' के काव्य-कानन में निसर्ग-रमणीयता है,पर, झाड-मसाड
और रोडो से मार्ग कण्टकाकीर्ण है। 'बिहारी' रसिकों के
शस्यश्यामल क्षेत्र हैं। यहाँ तुलना में सलग्नता है।
(५) 'राम के आलिङ्गन के लिए सरयू तरङ्गरूपी हाथ बढा
रही थी।' यहाँ निर्जीव पदार्थ मे सजीवता का भाव है।
(६) 'उसके पास रोटियाँ नहीं हैं ।' 'वह कालिदास है।'
विद्यार्थि-ससार अलग ही है। मेरा दूसरा हाथ नहीं है।'
इनमें क्रमश 'भोजन, कवि, दशा, सहायता' का भार है, जो
। दूसरे मिलते-जुलते शब्दो द्वारा व्यक्त किया गया है ।
इसी प्रकार और भी अनेक भेद हो सकते हैं।
विरोध
कभी-कभी विरोधी भाव से कोई विचार सहज ही समझ
मे आ जाता और उसका सौन्दर्य बढ जाता है। इस प्रकार
के अलङ्कार के भी अनेक भेद है। जैसे-
(१) 'कवि के रोने मे प्रानन्द आता है।' विरोध का सीधा
ढग है।
() 'वह बालक नहीं है।' यह "चतुर" कहने का ढग
विरोध के निषेध रूप में है।
निवन्यादर्श]
।
(३) 'छोटा-सा पीज हो बड़े वरगद का पिता है। यहाँ
शादी में विरोध है कि छोटे से बडे की उत्पत्ति है।
(४) "धर्मशीलता तब जग लागी। पावा दरस हमहुँ वड
भागो।' यह व्यग्य है। यहाँ रावण की अधर्मशीलता से
अभिप्राय है।
(५) 'श्रापकी कठोर कृपा ने ही उसे विगाडा।' 'कठोर कृपा'
में शब्द-विरोध है।
(६) 'धनवान् कजूस से बढकर कौन दरिद होगा"
इसी प्रकार और भी उदाहरण समझिए ।
ममीपता
इस प्रकार के अलङ्कारा में सगत भावों से अर्थ जाना जाता
(१) 'उममी लखनी में चमत्कार है।' यहाँ लेखनी से लेखक
की रचना का ज्ञान होता है।
(२) 'श्रापको प्याला प्रिय है। प्याला' यहाँ शराय का
द्योतक है।
(३) 'मैंने तुलसी का अध्ययन किया है।' यहाँ 'तुलसी' से
उन प्रन्थों का अभिप्राय है।
(४) उसकी जेब भारी है। यहाँ 'जेन' धन के लिए
आया है।
[नियन्ध का आरम्भ
.
.
(५) 'यह वढ-बदकर यातें करता है।' यह मूला कहने का
कुछ कम अप्रिय ढग है।
(६) 'सन सन', घड घड', 'कल क्ल', 'मन मन', आदि
ध्वनियों के अनुकरण से यने हुए शब्द हैं।
(७) 'कर्मयोग उसका मूलमत्र है , फर्म के लिए वह अपना
धन दे सस्ता है , तन दे सकता है , यही नहीं, अपना जीवन दे
सक्ता है।' इस में उत्तरोत्तर उत्कर्प है।
(८) 'उसने अपना चरित्र खोया, स्वास्थ्य सोया,धनग्बोया,
वत्र खोये। इसमें प्रधानता का क्रम से पतन है।
है-निवन्ध का आरम्भ
यद्यपि शैली के स्वरूप में कही गई बातो को आँखों के सामने
रखने से किसी भी प्रकार की रचना का मार्ग खुल जाता है,
तथापि नये लेखकों को आरम्भ में जिस कठिनाई का अनुभव
होता है, वह भी भुला देने योग्य नहीं है। यह तो मानी हुई बात
है कि जिस विषय पर लेख लिसना है उसका थोडा बहुत ज्ञान तो
विद्यार्थियों को होना ही चाहिए, परन्तु यह सब कुछ होते हुए
भी उनमें से बहुत से यह नहीं समझ सकते कि लेप किस
प्रकार आरम्भ किया जाय, कैसे उसे निभाया जाय और कैसे
उसका अन्त किया जाय । प्राय इसी प्रकार के प्रश्न विद्यार्थियों
द्वारा शिक्षकों के सामने रखे जाते हैं।
निबन्धादर्श]
३८
Nisa
.
Mundean Marwarm Ramarape
जिम प्रकार बढे हुए पानी का प्रवाह जिघर मार्ग पाता है
उधर ही उमड पड़ता है, उसी प्रकार उठे हुए भावों में जो
लहरें-सी आती हैं, उन्हींको समुचित शन्दों में लिख देना सर्वोत्तम
विधि है। इसीको सीधा अपने विषय पर आ जाना कहते हैं।
कुशल लेखक इधर-उधर के भमेले में न पडकर इसी मार्ग का
अमलम्बन फरते हैं। परन्तु यह मार्ग जितना स्वाभाविक है
उतना सुलभ नहीं। इसका एक कारण तो व्यक्गित प्रतिभा
की न्यूनाधिकता है, जो सर्वथा मनुष्य के अधिकार की बात नहीं।
दूसरा बचपन से ही सूक्ष्म निरीक्षण तथा भाव प्रकाशन का
स्वभाव न डालना है। यह व्यावहारिक कठिनाई किस प्रकार
दूर की जाय यह एक प्रश्न है । इसी पर यहाँ विचार करना है ।
जिस विषय पर लेस लिसना हो, सबसे पहले उसको सीमा
को अच्छी तरह जाँच लिया जाय कि किन-किन विचारों का
निर्वाह उसके अन्तर्गत हो सकता है, तव आगे बढा जाय। किसी
विषय की व्यापकता, उसके शला की गूढता अथवा अन्य किसी
कारण से हिचकने की आवश्यकता नहीं, जरा साहस से काम
लेने से बड़ी-बड़ी जटिल गुत्थियाँ खुल जाती है। तैरनेवाला
पानी की गहराई की परवा नहीं करता, उसकी दृष्टि तो सदैव
पहुँचनेवाले किनारे पर रहती है।
विषय की सीमा का अनुमान कर लेने पर उसमें तन्मय हो
जाना चाहिए और जो-जो पिचार उसके सम्बन्ध में मन में उठे
[ निवन्ध का प्रारम्भ .... , उन्हे सकेतरूप से लिखते जाना चाहिए । विचारते समय भावों के किसी क्रम अथवा बन्धन की आवश्यकता नहीं , क्योंकि इससे ठते हुए विचारो की शृङ्खला टूट जाने तथा उसमें गाँठ लग जाने का भय है । जब सब विचार एक बार लिम लिये जायँ, तब उनका क्रम स्थिर करना उचित है। वह इस प्रकार कि जो भाव पहले व्यक्त करना है, उसे पहले लिखा जाय और जो उसके पीछे लिखना है उसे पीछे। विशेष ध्यान इस बात पर रहे कि उन सक्में सा तार्किक सम्बन्ध रहे कि स्वाभाविक ही एक से दूसरा निक- लता हुआ जान पडे और लेप में प्रधान विषय का पूर्ण परिपाक हो जाय। इसे लेस का ढाँचा, पूर्व विचार, विचार-सारिणी, विचार-तालिका वा अन्य किसी ऐसे ही नाम से पुकार सकते हैं। लेख प्रारम्भ करने से पूर्व का ढाँचा बना लेना परमावश्यक है। इसके निना लेग का कोई अङ्ग वडा, कोई छोटा, कोई काना, कोई कुनडा, कोई लूला और कोई लँगडा हो जायगा। अन्त में उस कुरूप रचना पर, विज्ञापन के लिए बने हुए चित्रो की भाँति किसीको घृणा आयेगी तो किसीको हँसी। नये लेखकों को तो इसके बिना आगे बढना ही न चाहिए, वरन् बडे- बडे और सिद्धहस्त लेपक भी इसका आश्रय किसी किसी रूप में लेते ही हैं। एक बार ढाँचा बना चुकने पर यह आवश्यक नहीं कि फिर उसमे कुछ परिवर्तन ही न किया जाय । यदि लिखते-लिखते वीच
निबन्धादर्श]
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में कोई नया भार उठ सदा हो, अथवा किसी भार को छोड़ना
हो, तो वैसा अवश्य करना चाहिए, पान्तु बड़ी सावधानी के
साथ ! ऐसा करते समय देस लेना चाहिए कि तार्किक क्रम म
कोई विक्षेप तो नहीं पड़ा।
विचार समह कर लेने पर लेख लिखना सुगम हो जाता
है। डॉचे के एक एक विचार एक एक परिच्छेद (पौराप्राक)
अलग लिप देने से लेख सहज ही पूरा हो सकता है।
एक बात और है। विचार भी सुलझ गये और दाँचा भी
सामने है, पर फलम नहीं चलती। समझ नहीं पड़ता कि किन
शन्दों या वाक्यो से प्रारम्भ करें। यह दशा ठीक वैसी ही है,
जैसी कि उस यानी की होती है, जिसके सामने नाव सही है, जो
यह भी देख रहा है कि और नावें जा रही हैं, जिम यह भी ज्ञान
है कि नाव पानी में हबती नहीं , परन्तु पैर उठाते ही सोचता है
कि नाव पलट न जाय, किस स्थान पर पैर रखकर चहूँ। वह
भय पूर्वक पैर रखता है और नाव जरा डगमगा जाती है। इसमें
दोप नाव का नहीं, भय मे वह स्वयं अपने शरीर को साधना भूल
गाया है और उसे नाव की तैरने की शक्ति में अविश्वास उत्पन्न
हो गया है। जहाँ उसन अपने को सँभाला, देखा कि नाव ठीक
चलने लगी है।
कभी यह न साचिए कि लेस आरम्भ परन का कोई ऐसा
मार्ग मिल जायगा, जैसे पक्की सडक। नहीं, सड़कें सन स्थाना में
[ निनन्ध का प्रारम्म नहीं होती। पगाडियों, पहाडी घाटियाँ, और नदियों के तट भी मार्ग है और वे स्वाभाविक सौन्दर्य में सड़कों से कहीं पढकर हैं। उनकी नैसर्गिक छटा घड़ी मनोहारिणी होती है। इसीलिए तो यह कहा गया है कि जो भाव अपने मन में उठे,उसे अपने ढग मे स्वाभाविक रूप में योरों के सामने रसिए। अपने शादी तथा वाक्या में अपनी ही रुचि का सर्वोत्तम धुनाव पर लीजिए और लेख प्रारम्भ कर दीजिए। यही सपसे अच्छा मार्ग है। इसके अतिरिक जिन मागों का अवलम्यन किया जाता है, वे भी एक नहीं अनेक है। धुरन्धर लेग्यकों की शैली के अनुकरण पर अवलम्यित होने के कारण ये हमारे लिए अच्छे पथ-प्रदर्शक का फाम देते हैं। यहुधा लेखफ इन मार्गा का अनुसरण करते है- लेस की एक सुन्दर भूमिका थाँधी जाती हैं, जिससे पाठको की रुचि प्रारम्भ से ही अपनी ओर आकृष्ट हो। परन्तु, इस प्रकार की भूमिका का उत्तम होना भी अपने ही मस्तिष्क पी उपज पर निर्भर है। किसी मिलते-जुलते उदाहरण द्वारा, अथवा नितान्त निरोधी दृष्टान्त द्वारा प्रधान विषय पर आना भी एक ढग है। इसमें इतना ध्यान रहे कि भूमिका यहुत लम्बी न हो, विषय के अनुरूप ही हो। चुने हुए तथा चुभते हुए शब्दो में लिसकर उमे प्रमाव-शालिनी बनाया जाय । फ्भी-कभी एक आकर्षक वास्य द्वारा विपय का महत्व दिसा दिया जाता है, जिससे पाठक तुरत इस ओर झुक जायें।
निबन्धादर्शन ४२ विषय के भुमधुर अथवा मीपण परिणाम द्वग भी पाठकों का हृदय हिला दिया जाता है और वे सचेत कर दिये जाते हैं। अपन हृदय के विकार, हर्प, ग्रोध, घृणा, विस्मय आदि के सूरक गदों द्वारा भी पाठकों के मन पर अधिकार जमाया जाता है। कभी-कभी क्या का सार आदि मे ही लिपफर विषय को स्पा करने में सहायता पहुँचाई जाती है। बड़े-बडे विद्वानों या कति फोविदों के उद्धरण भी लेप के आदि में लिए दिये जाते हैं। इन विषय पर बड़ा अच्छा प्रकाश पड़ता है। परन्तु, ऐसे अमवरणे के चुनाव में बड़ी चतुराई को आवश्यक्ता है । उसका भाव विपर + प्रधान विचार का सूचक होना चाहिए और उनके शदों बिजली की मी शक्ति हो, जो छूते ही पाठकों के हृदय में स्मृति उत्पन्न कर दे । परिस्थितियों के वर्णन तथा कालम से भी अनेक लेप प्रारम्भ किये जाते हैं। प्राय ऐतिहासिक लेखों में ऐसा ही होता है। भविष्य का चित्र खींच देना वा अतीत को रेखाओं का आभास करा दना भी इसी श्रेणी के लेसों का डग है। दैनिक जावन के मिन भिन्न भागो से किसी अद्भुत पटना को चुनकर लिप देना भी एक नया प्रभाव लाता है। इसमें लेपक की मर्म- सत्ता का नमूना प्रारम्भ ही में मिल जाता है और पाठक श्रद्धा के भाव लेकर पढना आरम्भ करता है। कहीं-कहीं वर्णना में अनुकरणवाली ध्वनियाँ, जैसे, घडडड धडडड़, धू धू, सननन सननन, मममम इत्यादि के द्वारा भी दृश्य का चित्र पाठकों के ।
[ निवन्ध का प्रारम्भ ... 1. 04 Can -- सामने आ जाता है। किसी प्राकृतिक छटा का मनोरम वर्णन अथवा किसी वीभत्सकाण्ड की एक झलक भी अतुलनीय आक- पण उत्पन्न करती है। इसी प्रकार और भी अनेक ढग काम में लाये जा सकते हैं। लेखक की उदार और विशद कल्पना इन सत्र की जननी है। इसके अतिरिक्त कोई-कोई लेसक मोटे-मोटे अक्षरो से अथवा शब्दों के नीचे रेखाएँ खीचकर किसी वात का महत्त्व प्रकट करते हैं। परन्तु, ये बालकों को नहलाने की बातें हैं। अच्छे पाठक स्वय सार ग्रहण करते हैं। हाँ, किसी गणित वा चिकित्सा की पुस्तक में ऐसे नियम, जो अत्यावश्यक हो और जिनके लिए अन्य बातो का पढना निरर्थक-सा प्रतीत हो, यदि मोटे-मोटे अक्षरों में दे दिये जाय, तो वे लाभप्रद सिद्ध होते हैं। लेस आरम्भ कर देने पर विपय का मध्य भाग सजह ही लिसा जा सकता है। तत्सम्बन्धी सभी विचारों का समावेश उसमे हो जाता है। एक बात इसमे विशेष ध्यान देने की है। बहुत से लेखक अन्य-अन्य विद्वानो के उद्धरण देने के बडे प्रेमी होते हैं। ऐसे उद्धरणों का चुनाव बहुत बढिया होना चाहिए और उनकी अधिक भरमार कभी अच्छी नहीं-विशेषकर छोटे-छोटे निवन्धों में। हाँ, तुलनात्मक निबन्धों में इनका होना एक बडा भारी गुण है । यदि कोई अनतरण किसी अन्य भापा से लिया नियन्धादर्श] गया है, तो हिन्दी पाठकों के लिए उसका हिन्दी रूपान्तर अथवा भाव अवश्य दिया जाय। अब अन्तिम कठिनाई निवन्ध को समाप्त करने की है। जो रोचकता निवन्ध के आरम्भ करने के लिए आवश्यक है, वही उसे समाप्त करने के लिए भी। यदि अन्त अच्छा न हुआ, तो लेख का प्रभाव बहुत कम हो जायगा और किमी-किसी दशा में तो मिट ही जायगा। यहाँ लेसकको अपने बलका पूर्ण प्रयोग करना है। उसे अपने सन्देश की आत्म-शक्ति का प्रभाव दिखाना है, जिसके द्वारा वह पाठक को अपना करके छोड दे। आरम्भ की भाँति समाप्ति के लिए भी कोई निश्चित मार्ग नहीं है। उसकी सजीवता लेखक की लेखनी की जीवनी शक्ति पर ही निर्भर है । अपने उद्- गारों को स्वाभाविक रूप में रख देना ही इसका भी सर्वोत्तम मार्ग है। पथ प्रदर्शन के लिए नीचे लिसी कुछ बातो पर ध्यान रखना चाहिए- ओजस्विनी भाषा में विषय का सक्षिम सार लिसकर पाठको को प्रभावित किया जाय । अन्त मे मला व बुरा परिणाम दिसा- कर उसे विचार-मग्न कर दिया जाय। किसी उत्थान व पतन का दृष्टान्त सामने रखकर उसके मन में सुधार की आकाक्षा को जागृत कर दिया जाय । समाज,देश या जाति की किसी अवस्था पर प्रकाश डाला जाय । विषय का प्रतिपादन करते हुए उसी के अनुरूप कोई अवतरण दे दिया जाय। कोई रोचक वर्णन F
[नियन्ध फा भारम्भ
अपस्यानुसार उत्तरोतर र पा अपनत पनाग जाया पूर्णपर
मम्बना में मरियपी भागा पापक पिन गप दिया जाय ।
अपनी र मम्मकिपा भार पिशेष निम्प दिया नारा, अपना
पाईमनार का विषय पोदोद दिया गय भोर पाठर अपनी-
भीमपि मार गए पर विचार पो रहें।
4
लेख-भाग १-सूर्योदय [सुवोध शैली में ] विचार-मूची (१) उप काल और सेतो की शोभा। (0) वागो की वहार । (३) सरोवर का तट। (४) समुद्र और आकाश। (५) पहाडों का दृश्य। (६) प्रति के पाठ। पीली फट गई। सूर्य उगने लगा। चारो और उजियाला छा गया । अँधेरे में चैन उडानेवाले उल्लू छिप गये। चमगीदड उलटे पॉव जा लटके। जिधर देखिए उधर निराली ही शोभा दिखाई देती है। सेतों पर बहार हो बहार है। हरियाली से हृदय को बडा हर्ष होता है । पृथ्वी ने मानों धानी चादर ओढ ली है। नन्हीं- नन्हीं पत्तियों पर ओस की बूँदे मोतियों-सी चमक रही हैं। क्यारियों में कहीं-कहीं तितलियाँ पुदक रही हैं । बागों में पेडों पर पसेरू चहक रहे हैं। कोमल पत्तियाँ हवा में हिल हिलकर लहलहा रही हैं। फूल फूले नहीं समाते । हँस- [सूर्योदय Amirmwarmire -in-H-0.00 Noneer arane AON हँसकर लोगों को हँसा रहे हैं। वृक्षा की कुसओ पर येलो के रग विरगे यूटे-बड़े सुहावने लगते हैं। फलो की शोभा दूनी हो गई है। जी चाहता है कि टक्टकी लगाकर इन्हींको देखो । सरोवर के तट पर बैठने से कैसा आनन्द मिलता है। पिले हुए कमलों पर भैरों की भीड़ रागिनी-मी अलाप रही है। धफवा- चक्वी उछल-उछलकर गले मिल रहे हैं। नहानेनाते परे तड़के आगये हैं। उनके गोता लगाने से जल में जो लहरें उठती है, वे मनको मोहे लेती हैं। सूर्य भगवान् को अर्घ्य देते हुए पूजा- पाठ-करनेवाला का दर्शन भी बड़ा ही भय है। समुद्र के धरातल पर तो सूर्य-देव पानी से निकलते जान पड़ते हैं। उनकी किरणें दूर-दूर तक फैलकर पानी के ऊपर एक अनोसी ही छपि दिसाती हैं। कहीं-कहीं उठती हुई दिन्न भिन्न लहरों में तो कई-कई रग एक साथ ही दिखाई देते हैं। ऊपर वादलों को छूकर किरणों ने कैसी-कैसी प्राकृतियों यना दी। समझ नहीं पड़ता ऊपर देखें या नीचे। दोनो ओर एक से एक बढकर सौन्दर्य है। पहाडो की वर्क से ढकी हुई चोटियों पर तो जादू-सा हो रहा है। अभी लाल, अभी हरा, अभी पीला, अभी बैंगनी कैसे-कैसे रग बदल रहे हैं कि आँस घोसा सा जाती है। ऐसे ही दृश्य दय
निबन्धादर्श]
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पर मनुष्य की तुच्छ बुद्धि पर हँसी आने लगती और ईश्वर
की सत्ता का ज्ञान होने लगता है।
जिस प्रकार प्रकृति के अगों में सूर्योदय से नया रस उत्पन
होता है, उसी प्रकार हमारे शरीर से भी आलस्य दूर भाग जावा
और पुर्ती आने लगती है । हम कुछ देर तक घूमते-फिरते मात -
काल की वायु का सेवन करते और नया बल लेकर कार्य में जुट
जाते हैं । सूर्य भगवान स्वय दिनभर अथक परिश्रम करके हमे
परिश्रम और उन्नति का पाठ पढाते हैं।
२-सूर्योदय
[अलकन शैनी में]
विचार-सूची
(१) प्रकृति का आँगन।
(२) प्राची दिशा।
(३) नदी का तट।
(४) वृक्षों के शिपर।
(५) हिम से ढकी हुई चोटियाँ ।
(६) अन्य विहार-क्षेत्र।
प्रकृति के ऑगन में सूर्य चन्द्र, तारे-नक्षत्र, विजलो बादल,
नदियाँ-सागर, मरने-सोते, वन-जगल आदि की पाल-क्रीडा होती
ही रहती है । जिधर देखिए उधर ही आँसें नाचने लगती हैं। यदि
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४९
[ सूर्योदय
.
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रात में चाँदनी छिटकती है, तो दिन में सूर्य की किरणे कलोल
करती हैं । एक एक दृश्य अनुपम ही है । सूर्योदय को ही लीजिए।
कितना सुहावना, कितना मनोरम, कितना रमणीय कि देखते
देखते हृदय लोट पोट हो जाय । मनुष्यो की वात ही क्या
उसे देस कलियाँ तक सिल जाती हैं । उस प्रकाश पुज में अद्भुत
आह्लादिनी शक्ति है।
प्राची दिशा की रगभूमि मे जिससमय वह फुटबाल उछालती
दिखाई देती है, आँसे उस उछालनेवाले खिलाडी के दर्शनों को
आतुर हो उठती हैं । उसके किरण-जाल में प्रफुल्लता की तरङ्गे
अठखेलियाँ-सी करती चली आती और अन्धकार की छाती में
तीर की तरह चुभ जाती हैं। हमारी नाडियों में नये रक्त का
मचार होने लगता और कार्य का समय आरम्भ हो जाता है।
किसी नदी के तट पर सडे हो जाइए। बाल-रवि का प्रति-
विम्ब पानी मे लोट-लोटकर नहाता और अपने सुनहरी बाल
सुसाता प्रतीत होता है । कमलों की पत्तियों पर पड़ी हुई ओस
की चूदों मे मोतियों का भान होता है । फूलों के ओठ सुल जाते
और पंखडियाँ सिलसिलाती-सी दिखाई देती हैं । भौरी की
गुसार भगवान भास्कर के गुणो का गान-सा जान पड़ती है।
हरे-हरे वृत्तों की चोटियो पर हरियाली और लाली का सुन्दर
ममागम नयनों को अपूर्व आनन्द देता है। ऐसा जान पड़ता है
मानो अशुमाली का स्वागत करने के लिए वे अपने पाणि-पल्लव
४
निबन्धादर्श]
५०
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गई । ऐ,
पसार रहे हा । उन पर बैठे हुए विहग-वृन्द का कोलाहल समुद्र की
ठती हुई कल्लोलो की होड करता है। इन्हींके मुप मे मानो
मरस्वती देवी जहा-तहा वीणा को महार सुनाती फिरती है ।
धर्फ से ढकी हुई हिमालय की चाटियो पर उपा का प्रकाश
पडते ही एक अलौकिक अभिनय होने लगा। वह चाँदनी के सरो-
वर मे निकली हुई श्वेतता क्रम-श्रम से अरुणिमा में परिवर्तित
हो गई । आँसे उठ न पाई कि हरा, पीला, धैगनी, नारगी आदि
बहुग्गी दृश्य दीस पडा, और चोटियाँ इन्द्र धनुप का उपमान वन
माया भी हट्टने लगी। फिर वही श्वेतता, परन्तु
प्रकाश मे कुछ-युव धु धली सी दिखाई दे रही है। क्या कोई नट
है, जो इस नाटर की नाल उतार द?
सागर व विशाल वक्षस्थल पर, वन, पवन की अन्तर-पटी म
तथा मम्स्थल की विशाल गोर में सर्वत्र ही सूर्योदय के साथ
अभ्युदय की मलक आने लगती है। उमगो का स्रोत उमड पडता
और खेलने के लिए मैदान सुल जाता है। सेलनेगले हँसन
हमत उस मैदान में सूद पडतें और जीवन का आनन्द लुटते हैं ।
३-दयानन्द शताब्दी
विचार तालिश
(१) शिवरानि-जागरण की घटना।
(0) महर्षि दयानन्द सुधारक रूप में।
।
[ दयानन्द शतान्दी Hea Recenue aalaa- (३) समारोह का दृश्य । (४) प्राध, थार्य-जीवन। (५) रानि ओर प्रात काल की चर्या । (६) यज्ञ-मण्टप। (७)प्रधान-मण्डप । (८) अन्य समाएँ, सन्यामि-मण्डल । (९) आर्य समाज की सहिष्णुता । (२०) जलस। (१) प्रवेश एक दिन था, जब शिव-रानि-जागरण करत हुए एक युवा ने देखा कि एक चुहिया आती है और शिवजी के ऊपर श्रद्धा- सहित चढाये हुए भोग का भोग लगाती है। शिव-लिङ्ग ज्यो का त्यों हैं , उसमें देवत्व की काई प्रक्रिया दृग्गोचर नहीं होती। इस घटना से युवा के अन्तर्पट खुल गये। उसने यज्ञाग्नि के लिङ्ग-स्वरूप शिव की प्रतिमा में अन्धकार की एक रेसा देखी और समत्त आर्य-लोक पर उसका प्रभाव पाया। उसका हृदय द्रवित हो गया और इस अन्धकार फो मिटाकर जातीय जागृति फैलाने का सकल्प उसने किया। वह मोह निद्रा को भग कर तत्तण वहाँ से चल पड़ा। 'तीन लोक से न्यारी' मथुरा में उसे लोकोत्तर आलोक मिला। वहाँ उसने श्रीस्वामी विरजानन्द सरस्वती के चरणा में बैठ आर्य धर्म का गहन अध्ययन किया। .
निरन्धार्श] ५२ m4m-onin-man-4000rsnuvesanaleone sar- उस प्रज्ञाचक्षु गुरु ने अपने शिष्य को वह मत्र दिया, जिमने सोई हुई हिन्दू जाति में नवजीवन का सञ्चार किया। उस घटना को सौ वर्प-सफल सौ वर्ष हो गये। वह युवा महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती था। उसकी दया म उस समय कोमलता न थी, कठोरता थी। पर, वह आनन्द से परि-पूरित थी, यह इन सौ वर्षों ने प्रमाणित कर दिया। उसे हमारी वन-मूसंता पर दया आती थी, और उस पर वगिराने ही में उसे आनद आता था। वह बुरे को बिगाडना ही न जानता था, भले को बनाना भी जानता था। उसकी सूझ बडी पैनी थी। वह चतुर किमान था और सुरचि-सम्पन माली भी। मे अपनी सेती निराना और पौधों का तराशना पूब आता था। पर वह यती या। उसके शृङ्गार में उसकी सजावट में- निसर्ग रमणीयता थी , उसमें ललितकला, काव्य, नाटक, आदि को स्थान न था। वह मुधारक था धर्म प्राण था , उसका उद्देश ही और था। वर्तमान आर्य-समाज, गुग्गुल आदि उसकी सगठन शक्ति के मुफ्ल हैं। उसीका पुण्य-स्मृति स्वरूप, सवत् १९८१ विक्रमीय का शिव- रात्रि-सप्ताह भगवान कृष्ण की अवतार-भूमि मथुरापुरी में बड़े समारोह के साथ मनाया गया। इस शतादि-सम्मेलन की धूम देश विदेश में मच गई थी और चारों ओर से आर्य-जनता ही नहीं, समस्त हिन्दू-समुदाय का समुद्र उमड़ पड़ा था। मथुरा - - ५३ [ दयानन्द शताब्दी ORNRements 000000...aapna ------ जकशन स्टेशन और नगरी के बीच में मानों दूसरी मथुरा यस गई थी। दो तीन लास मनुष्यों की यह निवासस्थली युक्तप्रान्त के बडे से बड़े नगर की समता कर रही थी। रात के समय यमुना को पार करती हुई वी० पी० सी० आई० रेतवे की गाडी जन वहाँ पहुँचती थी, तो प्रथम ही भानु-नन्दिनी के तट पर नीले जल में दीपमाला से प्रकाशित मथुरा का प्रतिनिम्य अलौकिक ही दोस पड़ता था। सिटी स्टेशन से पढते ही थोड़ी दूर पर सीधे हाथ को शतान्दी के शिविरों की शोभा चन्द्र-ज्योत्स्ना में ऐसी प्रतीत होती थी, मानों मथुरा के इस ओर शुभ्र-सलिला भागीरथी ने अपनी यहिन यमुना के घर आकर आतिथ्य प्रहण किया हो और उसके तट पर मुनियों की फुटीरें बन रही हो । (२) प्राय इतने विशाल समुदाय का प्रवन्ध आर्य-स्वय-सेवकों द्वारा वहाँ के नियोजकों ने ही किया था। पुलिस की सहायता नहीं ली गई थी। फिर प्रवन्ध भी कैसा? आदर्श। स्टेशन से उतरते ही, कोई क्तिना ही अनजान क्यो न हो, कुछ कष्ट ही नहीं । तुरन्त स्वयं सेवको से सहायता मिलती थी। ठहरने के लिए, मानों घर में जा बैठे। साने-पीने का सामान सर सस्ता और सुलभ । भिन भिन्न प्रान्तों के लिए अलग-अलग शिविर थे। प्रत्येक के साथ उन्हींकी रुचि के अनुकूल पदार्थों की दुकानें
निबन्धादर्श]
।
खुली हुई थी। प्रधान बाजार में सब प्रकार के फा और अन्य
साय पदार्थ प्राप्त थे। पुस्तकों की दूकानें, प्रदर्शनी आदि सभी
कुछ था। यह तो या सो था ही, इन सबके ऊपर थी भ्रात
भाव की भावना। जिस प्रेम, जिस सहानुभूति, जिस उल्लास
और जिस मादगी के साथ यहाँ लोग रह रहे थे, यदि वही
जीनन हमारे परिवारा में व्यतीत होने लगे, तो आर्य-गोरव के
पुनरुत्थान में देर न हो और 'शत जीवेम शरद' की कामना
पूरी हो जाय।
(३ ) याय-जीवन
रानि के समय सानन्द सोइए । पत्ता भी नहीं सडकने का।
स्वय सेवको और ब्रह्मचारियों का पहरा, उनके बदलते हुए सजग
सङ्केत (Watch-wonds) और वे भी देववाणी मे हिन्दू-स्वराज्य
की सुध दिलाते थे। ऐसा प्रतीत होता था, मानों क्सिी सैन्य
शिविर में पडे हो। ब्राह्म मुहूर्त के आते ही आर्य-गायन की
मधुर तान कानों मे पडती थी। टोलियाँ की टोलियाँ गाती हुई
कितनी भव्य थीं, कहा नहीं जा सकता। नर नारियों का इतना
मुन्दर समागम कहाँ देखने को मिलेगा? थार्य-ललनाओ ने
परदे को हटाकर मानो अविद्या का परदा फाड दिया था। उस
दिन मुझे मालूम हुआ कि आज हमारा घर हमारा है। धार्मिक
जीवन सचमुच सर्वोपरि है। श्रात्मा को सीमें शान्ति
मिलती है।
[ दयानन्द शताब्दी नित्य-कृत्य से निवृत्त होकर यज्ञशाला में जाइए । सुगन्ध से माना मारा ससार महक रहा है। शारीरिक पवित्रता के साथ मन पूतता का कैसा मधुर मिलन है। पार्यों के इस तत्वज्ञान को शतमुप से प्रशसा करनी पड़ती है। हवन-गन्ध के साथ वायुमण्डल मे मत्रों की गूंज श्रात्म-परीक्षा की ओर ले जाती है और पतितातिपतित भी एक बार उत्थान के लिए अग्रसर हो जाता है। दिन्य विचारो का यही प्रभाव है। उत्मर के प्रधान मण्टप मे चारों ओर आर्य-जीवन की झलक दिखाई देती है। गुरुकुल के ब्रह्मचारियों, मन्यासियो, विद्वानो, कविकोविदो का रङ्गमञ्च पर समागम वडा ही हृदय-हारी है। चारों आश्रम मानो वहाँ एकन हैं। साम गान के साथ कार्या- रम्भ होते ही वह कोमल और मधुर स्वरापली कर्णगोचर हुई कि आत्मा आनन्द मे लीन हो गया। उस मञ्जुल गान को सुनकर ध्यान आया कि क्या सोचकर गोस्वामी तुलसीदास ने 'बटु- समुदाई' के वेद पाठ को 'मादुर-बुनि' से उपमा दी थी। कहाँ यह लय और कहाँ वह दर्र-टर्र। इसके अनन्तर उपदेशों की झडी लगती थी और धर्मजिज्ञासुओ को पिपासा उस पीयूप- चर्पण से शान्त होती थी । दयानन्द का दयानन्दत्व मौ वर्ष पश्चात् स्पष्ट दिसाई दे रहा था। आर्य-कुमार-सभा, कवि-सम्मेलन, आर्य स्वराज्य-सभा, अमृतोद्धार-समा, शुद्धि-ममा इत्यादि इत्यादि का यहाँ तक वर्णन निबन्धादर्श] alee Mmmmmmmmmmnter 1400m -em- किया जाय। सन अपने अपने ढग के निराले थे। परन्तु, सन्यासिया के सम्मेलन को चर्चा किये बिना आगे न बढा जायगा। भगवा वस्या की उस लटक मे कुछ अद्भुत ही छवि थी। महर्षि दयानन्द के प्रताप की किरणें उन्हीं मुद्राओं मे प्रतिलक्षित हो रही थी। वहीं मस्तक सतत मुका रहना चाहता था। महर्षि के सन्देश-वाहक, निस्वार्थ सेवा के मूर्तिमान अवतार, वेद ज्ञान क प्रचारक वही नर-रन थे। उन्हें देखकर चौद्ध भिक्षुओं की कल्पना हो पाई। 'बुद्ध शरण गच्छामि' का मन स्मरण आ गया। आर्य-जाति। अपने जीवन के फल को तूने इन्हीके रूप में समाज को अर्पण करना सीमा है। यही समर्पण तेरी निश्व-प्रेम की श्रद्धाञ्जलि है। जिस प्रकार घरसात में बढी हुई नदी का जल शरद ऋतु में निर्मल होता है, उसी प्रकार आर्य-समाज की प्रारम्भिक कट्टरता रूपी जलधारा इस शत शरद के पश्चात् महिष्णुता की विमल धारा बन गई थी। विधर्मियो के वनावटी साधुओं को पकड लेने पर भी और उन्हें शस्त्रादि सहित पाकर भी दयापूर्वक छोड देना सर्वथा आर्य धर्म के अनुरूप ही था। प्रारम्भ में आर्य- समाज पर उपल-वर्षा करनेवाले अन्य भाई भी उतने ही उत्साह से भाग ले रहे थे, जितने से कि दयानन्दी। सन्देश की पवि- त्रता इसीको कहते हैं। सभव है कि कोई इतिहास-प्रेमी अशोक के ममय के चौद्ध-सम्मेलनों की भाँति, इस श्राशा से गया हो [ दयानन्द शताब्दी - Non- .00 ... MH- 4PM .. . Hen- -- कि आर्य-समाज अपने धार्मिक सिद्धान्तो में कुछ युगानुकूल परिवर्तन करेगा और ससार को कुछ नया सन्देश देगा और उमे इसमे कुछ निराशा हुई हो। परन्तु जो कुछ था, वह था अभूतपूर्व और प्रायोचित । (४) जलूम - एक यात रह गई। पहले दिन का नगर-कीर्तन और जलूम इतिहास का एक अचिन्तितपूर्व दृश्य था। वेद-भगवान की सवारी उस मथुरापुरी में निक्ली, जहाँ भगवान कृष्ण के भक्तो का दुर्ग है। उसमें जो सफलता हुई और जो भ्रातृ भार प्रदर्शित किया गया, उससे प्रतीत होता था कि आर्यसमाज की यमुना सनातन धर्म की गगा में किस प्रकार मिल रही है। भक्ति और प्रेम की तरगो का कैसा फौतूहलवर्धक उतार-चढार था। शिविरों से लेकर नगर के मिरे तक नर-नारियो की भीड इस प्रकार जा रही थी, जैसे समुद्र के धरातल पर धाराएँ। यो तो सारा जलूस ही अनुपम था, परन्तु वेदों की सवारी के पीछे सन्यासियों का मण्डल और उसमें ऊँचा उठा हुआ स्वामी श्रद्धानद का मस्तक उनके भावी उत्सर्ग की सूचना दे रहा था। महिलाओ का इतना बडा समारोह तो आज तक कहीं न हुश्रा होगा। देवियों के उस सम्मेलन से भारतमाता के उज्ज्वल मुस की कल्पना सहज ही की जा सकती थी। इतनी भीड श्राश्चर्य- जनक शान्ति के साथ जा रही थी कि उस पावन गृह के समीप
निबन्धादर्श]
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पहुँची, जहाँ ब्रह्मचारी दयानन्द अपने गुरु के पास स्वाध्याय
मिया करते थे। उस समय अपूर्व उल्हास था, उस टूटे-फूटे
घर की दीवारों को देसपर कौन फ्ल्पना कर मकता था, कि
यहाँ से एक ऐसी श्रात्मा का उदय होगा, जिससे समस्त
मसार आलोक्ति हो जायगा ? सच है, "लाल गुदडी में
नहीं दिपे रहते।"
४-भारत के साधु और फकीर
पिचार नालिका
(१) धर्म के नाम पर निराली लीलाएँ।
(0) सच्चे साधु।
(३) हमागे मूर्यता।
(१) देवतानो की गाढ ।
(५) माधुग्रा दे विचित्र ढग।
(६) महन्तों की माया।
(७) माँगते ममय का त्याग ।
धर्म मूमि भारत मे धर्म के नाम पर न जाने क्या क्या
नीलाएँ होती रहती हैं। कही मोन बाँटा जाता है, कहीं पुन
लुटाये गत हैं। वहीं पाप धोये जाते हैं, वहीं ताप सोये जाते
। कहीं दाग द्वारा ठगी का बाजार गर्म रहता है, तो कहीं
टोलकम्यजरी पर गा अलाप कर मौन बडाई जाती है। कहीं
[ भारत के साधु और फकीर
चिमटा चटाता है, तो कहीं मुँडचिरा सिर पटक्ता है।
क्या-क्या कहे-"नाना वाहन नानाकारा। नातायुधधर नाना-
चारा ॥" इन नाना भाँति के जीवों को देख एक तो हसी प्राती
है और एक कलेजे में फसक उठती है। "ना जानूं का भेष में
नागयण मिलि जाइ" की पात समझ में आती है, पर इन
विराट् भेपधारियो को देस वाला बन जाती है। इनमे श्रद्धा
लाते समय न जाने क्यो सिर हिलने लगता है।
-
वह दिन था, जब भारत के गौरव-स्वरूप साधु-सन्यासी
सासारिक मझटो को छोड़कर अपने पवित्र उपदेशों से ससार का
उद्धार करते और समाज-सेवा के द्वारा मोन-लाम करते थे।
ममाज भी उनकी सेना मे अपने को धन्य मानता था। लोगो
ने उनके सुस को देवा, त्याग को नहीं , स्वातत्र्य को देसा, बलि-
दान को नहीं , वेप को दसा, उद्देश्य को नही।
फल यह हुआ
कि आज वामन लास से अधिक भिसारी भारत-माता की छाती
पर चढे निर्लपज विहार करते हैं। क्या करे, 'वेप प्रताप पूजि-
चत तेऊ' महात्माओं में अब भी हमारी वैसी ही श्रद्धा है। उनके
चरण जहाँ पडें, वहाँ हमारी आँसें बिछे, वे जहाँ रहें वहाँ हमारे
तीर्थ बनें, उनके पुनीत पदार्पणमे हमारे घर पवित्र होते रहे, यही
हमारी कामना है। उनके चरणों पर नत-मस्तक होकर यहाँ
नामधारी साधुश्रो का चिन हमे सोचना है ।
निनन्धादर्श ] ६० Hanumar इन नामधारी फकीरा की मौज का महल हमारी मूर्सवा की नींव पर पड़ा है। मारतीय घरों में ही धर्म का स्वरूप शेष है और वहीं अविद्या का अपाडा जम रहा है। गृह देवियाँ धर्म का सात्विक स्वरूप भूल रही हैं और भूत-पूजा की ओर बढ रही हैं। दान पुण्य हिन्दू जाति की सदा से विशेषता रही है, परन्तु अन पान विचार का ज्ञान जाता रहा है। हमारा हृदय शीघ्र ही पिघल जाता है, और हम "मनहुँ मीचु चोटी गहे, देत विलम्ब न लाउ" को पवित्र प्रेरणा में फलाफन का विचार छोड बैठते हैं। हमारी इस भूल से हमारे समाज का, हमारे देश का अहित हो रहा है, यह देखकर भी हमारी आँसें नहीं खुलतीं। ऐसी धर्माधता अवाञ्छनीय है, उसका समर्थन कोई समझदार नहीं कर सम्ता। देवताओं के नाम पर माल उडा-उड़ाकर मम्द रहना और कुकर्म करना कहाँ की साधुता है ? स्वार्थ की इस भावना ही ने तो हमारे देवताश्रा की मरया बरसाती मेढकों की तरह बढा दी है। कोई जीप, कोई वृक्ष, कोई मूर्ति, काई जलाशय ऐसा है, निसमें देवभारन अाया हो? बड़े करकट की पूजा तक हमें करते हैं । कल्यानी, मसानी, काली, वराही, देवता, जसैया, सैयद, मीयाँ, चामड़, पथवारी, पीपल, बेर, आक, वयूल आदि अगणित देवता हैं। इन सब में ईश्वर की सर्वव्यापक्ता का ही भाव हो सो [ भारत के साधु और फकीर - - N . भी आकर्षक वस्तु हमारा देवता बन सकती है। जब यहाँ रेल- गाडी चली ही थी, तय लोग उसके ए जिन की पूजा करते थे। भैरव के भक्त भोपा वनकर लूटते हैं। मुसलमान नादिया की पीठ मे जीभ, टाँग श्रादि काटकर जोड देते और गुसाई बन कर शङ्कर यभोला करते हुए पुजते हैं। सपेरे, कजड, भगना वस्त्र पहनकर साधु बनते हैं। कोई कमर में घटे लटकाकर एक कोडा चटकाते हुए भक्तो को मूंडते हैं। रग विरगी गुदडी पहन कर वा कान फाडकर कोई कोई योगिराज पनते हैं। क्सिीके हाथ में सप्पर और गले में हहियों की माला रहती है, वे अपने को शरभग ऋपि की सन्तान कहते हैं, भक्ष्याभक्ष्य को पाकर कोई अघोरपथी बनते हैं। कोई नगे घूमकर परमहस पदवी के पात्र बनते हैं। कोई इन्द्रिय को नाथ कर जितेन्द्रियता का दम भरते हैं। कोई एक हाथ ऊपर को उठाकर ही स्वर्ग को चढते हैं। कोई सारे अङ्ग में विभूति लगा कर, जटाएँ बढाकर पहुँचे हुए महापुरुष बनते हैं। कोई फेरी लगाते और कोई कधे पर काँवर लटकाकर 'धनुषधारी राम' की ध्वनि लगाते हैं। कोई चिमटा और चूड़ियाँ लिए घूमते हैं। कोई ज्योतिप वा रमल बताकर माँगते हैं। किसी ने एकतारा, सजरी आदि बजाकर सगीत द्वारा ही भिक्षा का नया ढग निकाल रसा है। सक्षेप में, आकाश के तारों की भाँति दरिद्र-मण्डल के ये नक्षत्र अविद्या के अन्धकार में जहाँ-तहाँ चमकते फिरते हैं ।
निरन्धादर्श]
-
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इनके अतिरिक्त कुछ प्रतिष्ठित नामधारी फकीर है। ये
फकीर नहीं कहलात, पर कर्म-विचार से फकोरों से कुछ कम नहीं
है। उनमे पुरोहित, पण्डा, गुसाई आदि हैं। बडे बडे महन्तो
की कथा न पूछिए। वे बडे हैं , हाथियों पर चढकर माँगते हैं,
गद्दी तक्रिया के सहारे पड़े विहार करते हैं, भोगमे योग का दावा
उन्हीको , उनके मठों मे, निहारी में, मन्दिरो मे, धर्मशालाओ
मे पुण्य प्रार्थना के पीछे जो कुछ होता है, उसे लिखने बैठे तो
भारत का एक काला महाभारत वन जायगा । 'वहाँ ऊँची दूकान
और फीका परवान', इतने ही मे सब समझ लीजिए।
माँगते समय का इनका स्वरूप देखिए। वह रूप धारण
करेंगे, ऐसी त्यौरी बदलेंगे, ऐसा रग चढायेंगे, ऐसा स्वाँग भरेंगे
कि यदि उनी मांग पूरी न हुई तो न जाने किस आपत्ति का
पहाड टूट पडे । शाप तो इनके मुंह पर है और पाप इनके
हृदय में। हमारी धर्म-वृत्ति हमारी इच्छा शक्ति को पोच बना
देती है और हम इन ढोंगियों के सामने प्राय लच जाते हैं ।
यदि इन देश-क्लटो का यो ही पोपण होता रहा, तो हमारे नाश
के दिन दूर नहीं।
५-मेरी सिहगढ़-यात्रा
पूर्व विचार:-
(१) प्रतारना, तानाजी
बलिदान)।
का
श्रात्मोत्सर्ग (प्राण
६३
[ मेरी सिहगढ याना
(२) सिहगढ की स्थिति।
(३) पूना से प्रस्थान और मार्ग के दृश्य, मोढा नदी का
वोध।
1
(४) मावली कुली और वर्षा की बौछार ।
(५) चढाई।
(६) ऊपर के दृश्य,-ताना जी की समाधि, शिनालय,
जलाशय, आदि
(७) उतार ।
एक असहाय अपला सिंहगढ के पहाडी दुर्ग मे पोरगर के
सिपहमातार उदयभानु के पजे मे पड गई थी। उसने छत्रपति
शिवाजी को सन्देशा भेजा कि आप आकर इस अत्याचारी से
मेरी धर्म रक्षा करें, यदि आज की रात और बीत गई, तो मेरा
प्राण असम्भव हो जायगा । जिम ममय यह सदेश आया, महा-
राज शिवाजी एक और दुर्ग को विजय करने में लगे हुए थे।
उनके वीर सामन्त तानाजी के हाथ में सन्देश पर पहुंचा, तो उस
सुभट के भुजदण्ड फडक उठे । परन्तु सेना और सिपाही कहाँ ?
केवल दो सौ मावली जाति के वीर साथ लेकर वह आधी रात के
समय दुर्ग के समीप पहुँचा । निशा के गहन अन्धकार मे अगम्य
पर्वत की चोटी पर चढकर, उस अवला की रक्षा मे, उन मुट्ठी
भर वीरा ने जिस प्रकार अपने प्राण बलिदान किये और शाही
सिपहसालार का वध किया, वह वीर-गाथा मेरे हृदय मे
निबन्धादर्श ] ६४ AuN --- HN ~ -one 4-- -- बहुत पहले ही सिंहगढ-दर्शन की बलवती इच्छा उत्पन्न कर चुकी थी। जिस समय मैं पूना पहुँचा, वर्षा हो रही थी। श्रीयुत केलकर ने मुझे सम्मति दी कि यह समय सिंहगढ जाने के लिए अनुकूल नहीं है। परन्तु, फिर ऐसा सुयोग मिले न मिले, यह विचारकर मैंने जाने का ही निश्चय किया । सिंहगढ पूना से पन्द्रह मील की दूरी पर है । ग्रीष्म ऋतु में वहा के धनी मानी सज्जन प्राय सिंह- गढ ही चले चाते हैं। पश्चिमी घाट की सुहावनी श्रेणी और शीतत समीर उन्हे वहाँ पीच ले जाती है। इसके अतिरिक्त स्कूल तथा कालेज के विद्यार्थियों और अनेक यात्रियों तथा मिना की गोष्ठियाँ आनन्द मनाने के लिए वहाँ जाती आती रहती हैं। पूना से सिंहगढ जाने आने में पूरा दिन लग जाता है। इस लिए कुछ फन और चिड़ा (चावल और मेवाओं का एक प्रकार कास्मादिष्ट चवेना) लेकर मैं तोंगे पर सवार हुआ। वर्षा के कारण पहाठी मार्ग बहुत निगड जाता है, इस कारण तोंगेवाले ने बारह रुपये लिये । मार्ग मे महाराष्ट्र प्रान्त के प्रामों की छटा देखने को मिली । वही पुराने ढग का हल और प्राय यहाँ की सी ही घसापट सर्वन है। छोटी-छोटी बातों में कुछ अन्तर भले ही रहे । ताड के वृक्ष बहुत निमाई देते हैं, कहीं-कहीं तो इनके याग हैं। पूछनेसे पता लगानि यहाँ के लोग ताडी बहुत पीते हैं। - ।
[ मेरी सिंहगढ यात्रा "- a. meanwhere 2014hout da ग्यारह मील चलने के पश्चात् मोढा नदी का बाँध दृष्टिगोचर हुआ। यह नदी पूना के समीप ही होकर वहती है। अगरेजों ने चाँध बाँचकर इसकी धारा को यहाँ रोक दिया है। दोनों ओर छोटे-छोटे पहाडो के बीच में नदी का रुका हुमा जल धने बीच मे फैला हुआ है । इस लम्बे चाडे जलाशयको झील कहना अनुचित न होगा। जिन्हाने नरोरा पर ग गा का पुल देसा है, ये इमकी कुछ-कुछ कल्पना कर सस्ते हैं । यहाँ पहाडियाँ होने के कारण इसकी शोभा कहीं अधिक बढ़ गई है। मीलो के विस्तार में पड़ी हुई यह जल-राशि चाँदी की सुन्दर चद्दर-सीप्रतीत होती है और जहाँ तहाँ लोहे के फाटको के सुदृढ धाँध के उपर से गिरता हुआ सलिलसमूह भरने का अद्भुत श्रानन्द देता है। ऊपर से गिरती हुई पानी की धारा जब नीचे आकर छिन्न भिन्न होती है, तो ऐसा जान पडता है, मानो किसीने मातियों के टेर बसर दिये हो । जिस श्रोर दृष्टि जाती, उधर ही चाँदनी मी छिटकी जान पडती है। इस मनोहर दृश्य को दसकर मैं फिर सिंहगढ की ओर बढ़ा। लगभग एक मील तक सा एक ओर पहाडी, दूसरी ओर इस झोल का दृश्य सामने रहा । तन एक मोड आया। दोनों ओर वृक्षों की हृदय-हारिणी शोभा और सामने उठत हुए सिंहगढ़ की सिंहतुल्य ही धज मन में न जाने क्या-क्या भाव उत्पन्न कर रही थी । सायङ्काल के चार बजे से इस धन में सिंहों का भय उत्पन्न हो जाता है । मैं एक बजेके लगभग सिंहगढ के नीचे पहुँचा।
निबन्धादर्श1
नाँगैपाले ने कहा, "यावृजी, शीत ही लौट श्राइगा, नहीं तो श्राप
मुझे व मेरे घोड को न पायेंगे, कोई सिंह पाकर समाप्त कर देगा।"
इतने ही म ताँगे की सडायड़ सुनकर मानली कुली दौड़ आये,
और 'सुडची, बुड़ची' कहकर मुझे घेर लिया। मैं घुछ न समझा,
तोगमाला भी न मममा सका। मैंने लाने का समेत किया, तो
एक उरसी वे तोग उठा लाये। अब मैं मममा कि ये लोग
कुरमी को खुडची कह रहे थे। इसी पर बिठाकर ये लोग
यानियो को ऊपर ले जाते हैं। चढाने और उतारने का किराया
तीन म्पया गर्नमट की ओर से नियत है।
इतने ही में वर्षा की एक चौछार आगई। ये लोग मुझे पास
ही वन की घनी छाया में स्थित अपने एक टूटे-से मन्दिर में लिया
ले गये। मन्दिर दुर्गा वा काली का था। उस निर्जन स्थान में
काले काले मावलियों से घिरा हुआ मैं, यहाँ की भयङ्करता का
अनुभव कर रहा था। उनकी भाषा थोड़ी थोड़ी, सो भी अनु-
मान से, समझ लेता था। एक छाया मे मुझे पडावर वे लोग
भीगते रहे। दीनता उनपे चहरे पर टपक रही थी। उन्होंने
बतलाया कि यहाँ के ये क्यारियों के बराबर सेत भी पटवारियों
के द्वारा नपे पड़े हैं, वे लोग लगान भी कठिनता से द सकते
और इस दरिद्र वेश मे रहते हैं।
वर्षा वन्द होत ही आठ कुली मुझे कुरसी पर बिठारर चले।
चढाई इतनी कडी है कि कहीं-कहीं तो सीधी दीवार-सी पर
६७ [ मेरी सिंहगढ यात्रा चढना पडता है। यद्यपि वीन मील ही चढना उतरना पडता है, तथापि इतने मे ही छठी की सुध आ जाती है। नैनीताल और मसूरी की चढाइयाँ इसके सामने कुछ नहीं। मैंने क्तिनी ही चढाइयाँ पैदल पार की हैं, परन्तु इसे देखकर मैं भी दग रह गया और उन मावलिया को भूरि-भूरि प्रशसा करने लगा। पर्वत से उतरते हुए सफेद साँपा की भाँति अनेक झरने, बुले-बुले पत्ता से प्रसन्नवदन हरे-हरे वृक्ष , कहीं-कही पर नगे, किन्तु प्रकृति के लाडिले मुसुकराते हुए मावली वालक मेरे मन मे हर्ष की हिलोरें उठा रहे थे। कुछ काल में ही दुर्ग द्वार के सँडहर दृष्टिगोचर हुए और हम सिंहगढ की चोटी पर जा विराजे । ऊपर देखें तो चारों ओर सन्नाटा था। पेशवा के भवनों का स्थान पारसी-बँगलों ने ले लिया था। कुछ और लोगों के बँगले भी वहाँ थे, परन्तु थे सन बन्द। अब मैं अतीत काल के आर्य- गौरव के चिह्न देसने चला। वीरवर तानाजी को समाधि देर- कर मैंने प्रणाम किया। समीप ही एक पक्की दीवार दिखाई दी। एक मावली से मैंने पूछा, तो उत्तर मिला कि यही वह स्थान है जहाँ से ताना जी चढे थे। दीवार सिर से ऊँची थी, मैंने ऊपर चढकर देखना चाहा। वे लोग कहने लगे कि आप भय से नीचे गिर जायेंगे, उपर न जाइए। बहुत कुछ कहने-सुनने पर उन्होंने सहारा देकर मुझे ऊपर चढाया। देसा तो, दाँतो मे उंगली दवाई। बाप रे बाप । चालीस फीट ऊँची सडी दीवार और निरन्धादर्श] ६८ 444Me - नीचे निल्नु न ढालू पहाडी। ऑसे फट गई। दिन में भी तो उस पर चदना सहज नहीं। फिर आधी रात के अंधेरे में किम प्रकार उन वीरों ने चढाई को होगी, यह दृश्य मेरो आँखों में घूम गया। कुछ काल के लिए मेरे माथे में राष्ट्रवीर शिवाजी के वीर न्यों की कल्पना चक्कर काटती रही। उत्तरा तो मावलियों से पूछा-"क्या तुम अब भी इस पर चढ़ सकते हो ?" "हा" बहते हुए उन्होंने पेट पर हाथ रखा और मैं रो पड़ा। इसके उपरान्त में उस शिवालय में पहुँचा, जहाँ वीरश्रेष्ठ शिराजी निन्य-प्रति दर्शन को आते थे। एक पुजारी आया, उमने दर्शन कराये। मैंने उसे कुछ पत्र-पुष्प भेंट किये। पास हो मन्दिर की ओर मुख किये लोकमान्य तिलक का बगला था। फेस के उम गले में मुनियों की फुटीरों की छवि विद्य- मान थी। वहाँ से चलकर एक जलाशय देखा। दुर्ग के ऊपर यह स्वामाथिक, सुदा किन्तु छोटा सा जलाशय अनुपम हो है। इसका निर्मल नौर, और उसमें तैरती हुई लाल, सुनहरी मछलियों मन को मोह लेती हैं। यहीं से पूना तक एक मार्ग- द्वाय इसका जल पहुंचाया गया है, और वह पूना में दो कुण्डों में जाकर जमा होता है। अब भी वहाँ के अनेक लोग नल को छोडकर इसोका जल पीते हैं । पेशवा के समय में इसीका जल राज भवनों में भी पिया जाता था। मैंने इसीके तट पर बैठकर जलपान किया। यहीं से टोरना, पहालगद
[प्राम्य जीवन के बानन्द
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आदिक दुर्ग दिमाई देते थे। वह पर्वत-माला क्या थी, छत्रपति
शिवाजी की कीर्ति पताका ही इधर-उधर ऊँची उठ रही थी।
कुछ ध्यान मे मन था कि मारलियों ने देर होने से सिंह के भय
की मुध दिलाई।
उतरते समय उन्होंने मुझ से ऊपर की ओर मुंह करके कुरसी
पर बैठने को कहा। मैंने हठ किया कि मुझे डर नहीं लगेगा
और मैं अच्छी तरह देखता हुआ चलूंगा। परन्तु, उन्होने न
माना और कहा कि ढाल बहुत है, आप गिर जायेंगे। मैंने उन्ही
की बात मान ली और उतरा तो उसे सच पाया। न मानता तो
गिरना तो ध्रुव ही था, कभी-कभी नीचे को देखने से भी भय
लगता था। कोई मित्र-मण्डली मेरे साथ न थी, इस बात पर
पश्चात्ताप करता हुआ, मैं नीचे उतरा । चार बज चुके थे। शीत
ही कुलियो से विदा ले, ताँगे पर चढकर चल दिया। भावों के
हिंडोले मे मूलता हुअा, अपने जीवन को धन्य मान रहा था
कि पूना आगया।
६-ग्राम्य जीवन के आनन्द
विचार-तालिका'-
(१) अवर्णनीय मिठास ।
(२)प्रात काल , जगल का आनन्द ।
(३) दिन का काम , निश्चिन्तता।
-
निबन्धादर्श]
Mee
पक्ष,
।
(४) मध्या , गति।
(५) पाग, तातार, सेतो की क्यारियाँ ।
(६) शिक्षा, मामाजिक जीवन, स्वाभाविकता।
मोलाहल से दूर, आधुनिक सभ्यता के अछूत और मरलता
के सपूत ग्राम्यजीवन में जो आनद है, वह नगगे की भन भन
म मगन मनुष्या को कहाँ प्राप्त ? यद्यपि वहाँ न बिजली के पने
हैं, न नल का जल, न दमदमाती लम्बे हैं, न मोटर वा रेल का
न मेवे और फ्लों की मण्डियाँ हैं, न मिठाइयो की
दूकान
परन्तु, फिर भी वहाँ कुछ ऐमी मिठास है कि वहाँ सचमुच स्वर्ग
का वास है।
प्रात मात उठिए। घडी देखने का काम नहीं। यहाँ तो
घडी घडी प्रकृति अपनी घडी तिये सडी है। धूप और चाँदनी
मे हो समय जान लिया जाता है, तारे भी उममें सहायता करते
हैं। जगल में जाइए। लहलहाते हुए वृक्ष अपने पत्तों के बहाने
हाथ हिला हिलाकर बुलाते हैं। समीर अपने मुग्यावह स्पर्श से
मुस को सिला दता है। खुते मैदान में शौच क्रिया से निवृत्त
हजिए! क्सिी लसपती नगर-वासी का शौचालय भी उतना
निम्तन और म्यास्थ्यकर न होगा, जितना कि ग्राम के क्गला तेली
का। कुएँ की मुंडेर पर ताजी दाँतुन करते समय और मर्द पानी
मेम्नान करके डण्ड लगाते समय तो आनन्द की सीमा नहीं
रहती। कहाँ वह वायु-सेवित सतेज ललाट और कहाँ गन्दगी
[प्राम्य जीवन के प्रानन्द 4. .. . Montron- 4000 44004 Momentarin om400 मे भरे नगरों के निवामिया के नीरम घेरे? फिर कहाँ दुहनी मे उठता हुश्रा फेनराता गर्मागर्म दूध और कहाँ पनी हुई चाय ? कहाँ धौरी के दही से निगती हुई तोनी और छाट पौर रहाँ दुकाना के मिके हुए परवान। दिा में गौएँ चगई तो प्रन गोपाता की भाँति मीठा करत रह। हल जोता तो परिश्रम द्वारा जीन माल दिया। काम पाना और मगन रहा 'माधो तेन, न उधो पे दे।।' निश्चिन्नता हो इम जीवन का सार है। ममार ने छत दिद्र मे दूर रहते हैं। येद ओर उपनिपट या तत्व जीवन में ही मिला हुआ है। भोनन ओर पहना। इता माधारण, इतना ग्वाभाविक कि चाह तो पि-जीवन व्यतीत रें। लाक हित के लिए तो मानो ग्रामीणों का जन्म ही हुआ है। -न्हीके परिश्रम पी कठिन माई हमारी वेप भूपा, मान पान आदि का आधार है। मध्या हुई। घर तौटे। गाय को मेगा की। बैलो को चारा टाला। चौपात पर चार श्रादमियों में मन नहलाया ! मोटा-मोटा जो मिला पेट भरकर साया। पन पडा तो रामायण की पोथी पढ ती। याल-चयों से बात की। मो गये। गहरी नीट आई। उठे तो वही पुनीत प्रात माल ! चिड़ियाँ चहक रही हैं , और भगवान भास्कर मुस्कुराते हुए चले आ रहे हैं। - निरन्धादर्श] ७२ w म यदि ग्राम के समीप कोई नदी वा तालार हुआ, तो आनन्द चोगुना हो गया। वहीं पशु भी कलोल करते हैं और वहीं अपना मी मनोविनोद हो रहा है। जहाँ याग वर्गाचे हैं, वहाँ के सुस का तो कहना ही क्या। ताजा ताजा फल खाने को मिल जाता है और मनोहर दृश्य दसने को। यह कुछ भी न हो ता क्या १ पेतों की क्यारियों में ही कैमर के से फूल खिले रहते हैं। फूली हुई मरमों का सुहावना दृश्य मीलों तक पीताम्परी छटा उपस्थित कर देता है। समय समय पर रमास और मटर की फलियाँ, चने के होले, मक्षा की भुटियाँ, वानरे की चालें, महकती हुई मेंदें, सिलते हुए सरयूजे, रस भरे पोडे,गुड की भेलियाँ, मैथी, थुए का माग, गानर, मूलियाँ आदि प्रत्येक ऋतु के रममय पदार्थ प्राप्त होते हैं। उन धुली हुई गारों को सात-पान पायों में पानी लगाने मे जो म्याद और श्रानन्द है, वह रमतुल्ला में नहीं। कहा जा सकता है कि वहाँ शिना की कमी है , ज्ञानरिज्ञान के माधन यहाँ नहीं है। सामानिक जीवन की विविधता भी वहाँ नहीं है , पशुओं का-सा जीनन है। परन्तु, प्रकृत जीवन के सामने इस जखाल का मूल्य क्तिना है ? हमारी ज्ञान-वृद्धि के माय साय अशान्ति का साम्राज्य बढ गया है । शरीर-सेवा, और भौनिक मुख के ही पीछे हम पड गये हैं। एक व्यक्ति दूमरे व्यक्ति का, एक जाति दूसरी जाति का, एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का, क्सि ७३ [ स्वामी विवेकानन्द प्रकार गला घोट रहा है, इमे कौन नहीं जानता ? कर्तव्य का क्षेत्र तो ग्रामो मे भी कम नही, तत्वज्ञान के लिए यहाँ का एकान्त जीवन ही अच्छा है। दुर्व्यसनो से दूर रहने के लिए प्राम सुरक्षित दुर्ग हैं। जीवन की सरलता और विचारों की निमलता वहाँ से बटकर अन्यन दुर्लभ है। भ्रातृ-भाव और सहानुभूति की तो ग्राम मानों जन्मभूमि ही हैं। यदि कृत्रिमता के कमनीय कलेनर मे हमारी आँसें न उलझ गई हों, तो ग्राम्य जीवन ही स्वाभाविक जीवन है। उसमें सुर मन मोहक मधुरता और बाल- सुलभ मरराता है। १५-स्वामी विवेकानन्द पूविकारः- (२) जन्म , वश, पूर्वज। (२) शिक्षा, विद्यालय जीवन । (३) आस्मिक अशाति । श्रीरामकृष्ण परमहस के दर्शन । (४) सन्यास, योग-साधन । (५) अमेरिका इगलैण्ड-भ्रमण, वेदान्त का प्रचार । (६) कोलम्यो से अलमोडा तक । (७)शरीर त्याग। (८) जीवन विचार।
निबन्धादर्श] . - 4000 weaveen -- लर नरेन्द्र ने ९ जननरी, १८६ ई.जन्म लिया था। पही पाक पीर स्वामी विमानन्द के नाम मे विरयात दृश्या, निमर्ग गणना ससार रे मर्मात्तम उपप्राओं, और आध्यामिर नवनानियामकी जाती है। वह सरस्थ जाति के दत्त-शा रन था। ग्मा पूर्वज मरल, भक्त, और वर्मजीरन थे। उनके पितामह ने अपने अन्तिम जीवन में सपास ग्रहण किया था, और ग्मो पिता कलकत्ता हाईोर्ट के अटनी (रीन ) । जानकी माता विचिन मंचारती की। दत्तरशी दम गहन भक्ति-परायणता, ताकिर मूक्ष्मनष्टि और प्रपर प्रतिमा में वह चीन छिपा दुआ था, नो म्वामी पिकानन्द में अङ्कुरित, परनित, कुमुमिन और ललित फलान्वित हुआ। 'होनहार विग्नान के होत चाग्ने पात', यह कहावत नरेन्द- नाथ पर चरितार्थ गेनी पी। बाल्यकान से ही ग्नमें यह महा- नुभूति, भ्रातृ भार, विशुद्ध भनि, भगवत्प्रेम और अध्यात्मानुराग पाया नाता पानिननरि- अन्त में विश्व विख्यात बना दिया। वे नर कुल में थे, तभी मे हिदू-दर्शना के अध्ययन में परायण रस्ते और प्रसिद्ध तत्वज्ञानी हर्ट स्पेन्मर की पुस्तकें पटा करते थे। का जाना है कि पालन में पहुँचकर उहोंने न्वय म्पेन्मर को एक पत्र लिया था, जिमम रसके कुछ आयामिक विचागी आलोचना की गई थी। न्न पत्र में उन्होंने निस प्रनिमा का परिचय दिया था, उसे देसार पेन्मर भी मुग्ध ७५ स्वामी विवेकानन्द 4 man हो गया था, और उमने उन्हें मत्य की योज के तिए प्रोत्माहित किया था। श्रम नह समय पाया, जर नरेन्द्र के विचारों में प्रान्ति पन्न हुई। वे यूरोपीय दर्शन-प्रन्यो को पढते, परन्तु उनके पनार्थ वाट मे उनकी तृप्ति न होती थी। ये कट्टर ईश्वर वादी थे। उनकी पिपासाकुलित श्रास्मा सत्य की पोज के लिए छटपटा रही थी। वे "पी ।" पास कर चुके थे, कानून की तैयारियों पर रहे थे, परन्तु, उनका मस्तिष्क अन्धकार और शदात्रा से पूर्ण था, उनके मनस्ताप का ठिकाना न था। वे ऐसे प्राध्या- त्मिक गुरु की पोज में थे, जो उनकी शाआ का निवारण करने उस अन्धकार को दूर करे। उनसे यह चिरसाक्षित आशा पूर्ण हुई और उन्हें दैवी प्रकाश के दर्शन हुए। नरेन्द्र के एक चचा उन्हें श्री रामकृष्ण परमहम क पाम ले गये । परमहस पहुँचे हुए महात्मा थे- -उन्होंने भारमा को जान लिया था। यह नरेन्द्र के जीवन नाटक का पट परिवर्तन या। इम मिलन मे अद्भुत हृदयस्पर्शिता थी। प्रथम दर्शन ही ने गुरु-शिष्य को बाँध दिया। उम वीतराग, तपोवन साधु ने अपने इष्टदेव भगवान् श्रीकृष्ण की गुणारती में कुछ गाने के लिए कहा। निवेकानन्द ने स्वर-सर्वस्व मे मधुर तान छेडी, और ऐसी छेडी कि अनेक शिग्यो से परिनेष्टित ध्यानस्थ गुरु की हत्तनी के तार झङ्कार उठे। दिव्यानन्द ओर भगवान कृष्ण की प्रसन
निरन्धादर्श ]
७६
1.
44
Mrs.
आभा से उनका मुसमण्डल आलोकित हो गया, उस गायन
जनिल भव्य दर्शन की कल्पना हमारे शरीर मे थरथरी उपजाता,
और हिन्दू हृदय को भक्ति से भर देती है । इस प्रकार गुरु शिष्य
के उस जीवन-सम्बन्ध का आरम्भ हुआ, जिसने शिप्य के
भविष्य-जीवन की अखिल धारा को बदल दिया।
१६ अगस्त, १८८६ ई० को श्रीरामकृष्ण ने अपनी मानव-लीला
सवरण की। उस समय उनके अनेक शिष्यों ने सासारिक जीवन
छोड़कर श्री रामकृष्ण-ममाज का मगठन किया। स्वामी विवेका
नन्द ने भी मन्यास लिया, और वेदान्त प्रचार के लिए सहर्प
अपना जीवन समर्पित किया। कुछ काल अपने गुरुभाइयो के
साथ कार्य करके वे हिमालय में योग-साधन के लिए चले गये।
ति त पहुँचकर उन्होंने वौद्ध मत का भी अध्ययन किर
समस्त भारत में भ्रमण करके वेदान्त की विजय पताका
इसी समय मदरास प्रान्त के कुछ लोगों ने शिकागो में
धार्मिक महासभा में स्वामी विवेकानन्द को भेजने .
किया। चन्दा एकत्र किया गया, और स्वामीजी
पहुँचे।
अमेरिका पहुँचकर उन्हें महाविपत्ति का सामना कर
चन्दे के थोड़े से रुपये समाप्त होगये। अपरिचित दश में
स्वामीजी को द्वार द्वार भटकना पड़ा । उसी समय एक बुढिया
की दृष्टि उनपर पड़ी। उनके यहाँ कुछ चुने हुए मित्रो का भोज
.
.
[ स्वामी विवेकानन्द -- होनेवाला था। यह सोचकर कि स्वामीजी का यह विचिन घेप मित्रों के विनोद का कारण होगा, उसने उन्हें भी निमन्त्रण दिया। भोज के समय विनोद के स्थान में स्वामी ने अपने मस्तिष्क और हदय के यल मे बुडिया के मित्रो को चक्ति ही नहीं कर दिया, वरन् अपना प्रशसक भक्त बना लिया। हिन्दू-दर्शन पर म्वामीजी के प्रतिमाशाली वातालाप मे उन्हें पता लगा कि उनके लिए उम विपय का सममना भी कठिन है। फिर क्या था ? अमेरिका में उनकी धूम मच गई। धार्मिक महासभा में उन्होंने जिस प्रकार भारत का मस्तक उँचा किया, उस पर वहीं के 'न्यूयार्क हैराल्ट' पत्र ने लिया था "धार्मिक महासभा में विवेकानन्द निम्मन्देह महान मूर्वि हैं। -नफा भाषण सुनने के पश्चात् हमें अनुभव हुआ कि इस विद्वान् राष्ट्र के लिए धर्म-प्रचारक भेजना कितनी मूर्खता है।" अमेरिका के अनेक नरनारी उनके शिष्य बन गये। वेदान्त ममाज की स्थापना भी उन्होंने यहा की। उनके शिष्यों में श्रीयुत मण्ड्सवर्ग (स्वामी कृपानन्द ), कुमारी मागैरेट मोविल (भगिनी निवेदिता) आदि ने केपल शिष्यत्व ही प्रहण नहीं किया, परन् वेदान्त के प्रचार में अपनी समस्त शफि तथा योग्यता भी लगाई। वहाँ से वे इगलैण्ड गये और वहाँ दो महीने तक वेद तथा उपनिपदों पर व्याख्यान देकर सम्मानित LA PAY निबन्धादर्श] ७८ --- --- -an-..- - १८९६ इ० में स्वामीजी अपनी जन्मभूमि भारन को लौट और कालम्बो में उतर। कोलम्बो मे अलमोड़ा तक के भ्रमण म मातृ-भूमि ने इस प्रकार नाहि पसार कर उनका आलिङ्गन निया कि वह भ्रमण ही एक जलूस-सा हो गया। जहाँ जहाँ वे गये, उन्होंने वेदान्त का मन जनता में फ का। उनकी सबसे बडी इच्छा यही थी कि वेदान्त पा सार्वभौम प्रचार हो, और हिन्दू जाति सदाचार अध्यात्म तथा तत्वज्ञानमें अन्य जातियाको प्रकाश दिसानवाली रहे। स्वदेश में भी इसके लिए उन्होंने प्राण पण से चेष्टा की। अथक परिश्रम करते करते उनका स्वास्थ्य विग- डने लगा। इमी कारण वे जापान का निमत्रए भी स्वीकार न कर सके। परन्तु स्वास्थ्य के पीछे उन्होंने अपना कार्य न छोडा। १९०० ई० के जुलाई मास का मनोरम और शुभ्र प्रभात-काल था। स्वामी जी ने ध्यान-योग किया, फिर सस्कृत में कुछ नवीन शिष्यों को उपदेश दिया। दोपहर पीछे वेद ज्ञान से श्रात्म तुष्टि करके वे फिर समाधि-लीन हुए। सध्या के समय शान्त और नीरव भ्रमण किया। टहलपर लौटे तो प्रार्थना करने बैठ गये, और दिव्यालोक मे निमन हो गये। रात के नौ बजे उनकी अविनाशी आत्मा देह-बन्धन को छोडकर अलोक को उड गयी। स्वामी विवेकानन्द के केवल ४ वर्ष के जीवन में 'सत्य, शिव सुन्दरम्' का कैसा उज्ज्वल मिलाप है। कैसा आश्चर्य जनक -७९ [ निन्यानरे का फे me ANN. +4 New . और जादूभरा उना प्रभार था। उनका स्वरूप तेजस्वी और प्रभुता-मम्पन्न था, उनकी वाणी मे गौरव-भरी गूंज थी। वे अपने मनोभानों को यडी अन्छी तरह व्यक्त करते थे। इन सर का उपयोग उन्होंने आर्य-गौरव को बढाने और आर्य धर्म के प्रचार में किया। उनका हृदय प्रेम और दया से पूर्ण था। उनकी दश भक्ति भी अगाध थी। वे अपने भाषणों में भारत के शिसरासीन गौरन-काल का वर्णन करते करते हर्षातिरेक से भूमने लगते थे । उन्होंने वेदान्त को नवीन रूप में रसा। ने वैज्ञानिक विचार- वेत्ता थे, छिद्रान्वेपण उनका काम न था। उन्होंने जो कुछ ज्ञानार्जन किया, सर मातृ-भूमि के चरणा पर चढा दिया। अपने प्रबुद्ध जीवन से वे भारत में नवजीवन भर गये। ऐसे ही सपृत, देश का सिर ऊँचा उठाते, ओर मरकर भी अमर यन जात है। -निन्यानवे का फेर विवारी (१) लाला भोलानाथ और न दू का जीवन । (0) लालाजी की धर्म-पत्नी का पश्चात्ताप । (३) लाला (४) ललाइन को करणा। (५) निन्यानवे की पोटली, परिणाम । का उत्तरा नियन्यादर्श] hin ands- - PR ---- 041 H AM लाला मोलानाय कोहली शहर के अन्छ परा में गिनी नाती थी। वे बड़े माधु-स्वभाव, कृती और मितव्ययी थे। नकी धर्म पत्नी भी दया या अवतार और भक्ति की प्रतिमा थीं। उनका पुन दीनानाथ और कन्या विमला भी अपन मा याप की नहार सन्तान थे। सब के सब इतना मरल जायन बिताते थे, कि पाम पडोस के ही नहीं, नार ८ सभी तो उनका नाम लेन थे। रनके पडोस में एक नन्दू हथेरिया भी रहता था। मिट्टी के बर्तन और खिलोने पनायर यह पैन की छानता था। नो पुछ फ्मा कर लाता, वह सब खाने पीने में नित्य उड़ा सा था। चार पैसे पोछे डालना तो उसने मीसा हो न था, न उसे क्ल की चिन्ता थी, न आज का विचार । विपत्ति का यह ध्यान ही न करता था, सन्तान के लिए भी कभी सोचता न या। निय उसके घर में सुगन्धित भोजन की गन्ध और मसालों की महक उठा करती थी। आज पूड़ियाँ उड़ रही हैं, क्ल हलवा , परसों दही-बड़े आदि को चाट धन रही है, तो अतरसों क्षीर-पाक । लालाजी और नन्दू के जीवन में उतना ही अन्तर था जितना कि दोनों ध्रुवों में । लालाजी की धर्म-पनी अपने चौबारे से यह सब दृश्य देखा करती थी। एक दिन उनसे न रहा गया और अपने स्वामी से कहने लगी कि आप इतना कमाते हैं फिर भी पाने पीने में क्जूसी करते हैं। नन्दू की ओर तो देखिए। परिश्रम करता
[निन्यानवे का फेर
है और जीवन का आनन्द लूटता है। ऐमा भी क्या, भगवान्
धन दे तो उसका उपभोग पूर्ण रूप से करना चाहिए। हमारा
जीनन इस धन की रसवाली के ही लिए तो नहीं बना है। मैं
मानती हूँ कि आप समय-समय पर दुखियों की सहायता करने
में पीछे नहीं रहते , तो भी अपने शरीर पर उतना व्यय नहीं करते,
जितना कि आप जैसे धनी को करना चाहिए। मेरी समझ में
तो यह बात आपको शोभा नहीं देती।
भोलानाथ नाम के भोलानाथ थे, ये वडे चतुर , ताड गये
कि श्रीमतीजी का मन भोग के आनन्द ने लुभा लिया है। ऐसे
मनुष्य थोडे होते हैं, जो जीभ को लगाम लगा सकें। जीभ के
म्वाद के पीछे कितने अपना जीवन नहीं दे बैठे ? जीने के लिए
माना और साने के लिए जीना, इन दोनों का अन्तर लाला
भोलानाथ जानते ही थे, अपने जीवन मे उसका व्यवहार भी
करते थे। साना उनका सर्वस्व न था, वे शरीर को पुष्ट करने
वाला, किन्तु सादा भोजन ही पसन्द करते थे। अपनी पत्नी के
प्रश्नों का उत्तर उन्होंने इस प्रकार दिया-प्रिये । साने पीने के
लिए ही यह शरीर नहीं बना, ये तो इसकी रक्षा के साधन हैं।
परोपकार के लिए भगवान् ने हमें यह शरीर दिया है। यह
शरीर औरो के लिए भार-रूप न बन जाय, इस वात का ध्यान
सर को रखना चाहिए। मिताहार और मित विहार इसके लिए
परम आवश्यक है। ऐसा न करने से हम परावलम्बन की ओर
निबन्धादर्श] मुक जाते हैं। यदि हमारे पाँव सौर मे थाहर निकल गये, तो ठीक न होगा, 'तते पाँव पसारिए जेती लॉनी सौर। इससे हमारी स्वाधीनता दिन जाती है और चिन्ताएँ श्रा घेरती है। चतुरों की दृष्टि भविष्य पर सदैव रहनी है। भगवान् न करे, नन्दू के घर में कल ही से रोग का प्रवेश हो जाय, तो येचारा क्या करेगा? उस समय इमकी दशा कितनी दयनीय होगी। यह श्रानन्द में भूला हुआ है, इसे आगे की कुछ चिन्ता नहीं। न बाल-बच्चों का कुछ ध्यान है, न अपने तन का। ऐसी विचार शून्यता पशुओं का लक्षण है, मनुष्य को तो भगवान् ने युद्धि । यह सुनकर उनका हृदय पिघल गया। नन्दू के घरे भविष्य की कल्पना से ललाइन की आँखों से करुणाच टपकने लगे। चे पतिदेव से बोली-"तो क्या आप अपने पडोसी को यों ही मटकने देंगे?" "अच्छा, इसकी युति सोचूंगा।" इतना कहकर लालानी दूकान का चले गये । लौटकर आये तो उन्होंने एक पोटली में निन्यानवे रुपये वाँध- कर नन्दू के घर में डाल देने को कहा। पन्नी ने बिना कुछ किन्तु परन्तु किये उनकी आज्ञा का पालन किया । नन्दू ने पोटली पाकर ईश्वर को धन्यवाद दिया । परन्तु सोला तो निन्यानवे ही निकले। उसने सोचा कि एक और हो तो पूरे सौ हो जायें। पहली बार जीरन में रमे अर्थ-चिन्ता लगी। एक एक
[वायुम्यान
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दो-दो थाना करके उसने रुपया पूरा किया और सौ फी पूरी
पोटली को वह सतृष्ण नेत्रोंसे देखने लगा। फिर सोचा कि ऐसी
एक और हो तो फैसा ? यस उसने जोड़ना बारम्म किया। अब
हलवा और रसगुल्ले कहाँ ? वही दाल-भात और रोटी का सादा
भोजन रह गया। ज्या-ज्यों पोटली में रुपये बढ़ने लगे, त्या-त्यों
नन्दू के भोग विलास घटने लगे। लाजाजी ने पन्द्रह दिन
पश्चात् पत्नी से पूछा कि अब नन्दू फा क्या ढग है। उन्होंने
लालाजी की सराहना करते हुए कहा-नाथ । अय तो वह
निन्यानवे के फेर में पड़ गया है।"
६-वायु-यान
विचार-सूची :-
(१) पुष्पक विमान और हवाई जहाज ।
(0) गुब्बारे और हाइड्रोजन गैस का आविष्कार |
(३) वायु-पोत वा मोटर मशीन से चलनेवाले गुबारे।
(४) वायुयान और गुब्बारो का अन्तर ।
(५) वायुयानों की करामात ।
(६) व्यापार और जीवन पर प्रभार ।
(७) श्राकाश-विहार।
(८) रणक्षेत्र की भयङ्कर मूर्ति ।
नियन्धादर्श ] 4+ . पुष्पक विमान पर चढकर राम लका से अयोध्या आये थे, यह कथा आज मे २५ वर्ष पूर्व स्वप्न की सी वात प्रतीत होती थीं। किन्तु, आज घरघराते हुए हवाई जहाज जब हमारी नजरों के ऊपर मँडराते हैं, तब हमे वह स्वप्न प्रत्यक्ष रूप में दिसाई देता है। विज्ञान की माया विचित्र है। कुछ वर्ष पूर्व, लोग जिन बातो पर हँसते थे, आज वे हमारे दैनिक जीवन का अङ्ग हो रही हैं। वायुयानों की क्था के पूर्व गुन्नारो तथा वायु पोतो की कहानी जानना पड़ा जरूरी है। ईसा की अठारहवीं मदी के अन्तिम भाग में बैलून यानी गुन्नारे का आविष्कार हुआ, इसके पश्चात् एक प्रकार की गैस का अन्वेपण हुआ, जिसे हाइड्रोजन गैस कहते हैं। इसी गैस के द्वारा ये गुन्गारे हवा में तैरते फिरते थे। जिस प्रकार पूर्व काल में नौकाएँ तथा जहाज पालों द्वारा पानी पर चलते थे, उसी प्रकार ये गुबारे हाइड्रोजन गैस के बल पर हवाके सिलौने थे। बीसपा सदी के प्रारम्भ में एक नया आविष्कार हुआ। अग्निबोट की तरह इन गुजारो का मोटर मशीन से चलाना सभव हो गया। जर्मनी के काउण्ट जैपलिन नामक व्यक्ति ने यह आविष्कार किया और उमीके नाम पर ये वायु-पोत "जोपलिन" के नाम से प्रसिद्ध हुए तथा जलपोतों की भाँति चलने लगे। जर्मन-महायुद्ध म इनसे पाम लिया गया था। परन्तु, ये वायु पोत वायु-यान नहीं कहे जा सकते ।
[ वायु-यान
400+naana
M
+Nareere---
.
बायु-यान की बात ही और है। गुगारे और वायु-पोत हवा
से हलकी चीजें हैं, और वे हवा में हाइड्रोजन गैम के सहारे उड़ते
है। परन्तु, वायु-यान हवा में भारी पदार्थ है और यह मशीन के
बल से हवा को चीरता हुआ जाता है । यही दोनो मे अन्तर है।
वायु-यान वास्तवमे हवा में उड़नेगाती मशीन है।
वायुयानो की करामात हम अपनी आँसो देस ही रहे हैं।
निस पृथ्वी की प्रदक्षिणा की ए पना भी कठिन थी, वह इन वायु-
यानों ने प्रत्यक्ष करके दिखा दी। अटलाटिक महासागर को
स्तिने ही उडा पार कर चुके । कराँची से लण्डन को डाक
इन्हींके द्वारा जाने रागी। देश विदेशा का अन्तर अय कुछ
दिनों का समर रह गया। भारत मे इगलैंड जाने में भर केवल
पाँच दिन लगते हैं।
अभी इन घायु-यानो का आविष्कार हुए २५ ही वर्ष हुए हैं,
इतनही अल्पकाल में इनम अद्भुत सफलता प्राप्त हुई है। व्यापार
पर तो इनका विश्वव्यापी प्रभाव पड़ेगा ही, हमारे जीवन और
हमारी आदतों में भी एक भारी विप्लप मच जायगा। जो परि-
वर्तन रेलों और पानी के जहाजी ने हमारे जीवन में किया है,
उससे कहीं अधिक गम्भीर परिवर्तन भविष्य में इन वायु-यानों
द्वारा होने की सम्भावना है।
वह दिन दूर नहीं, जन आकाश में चलते फिरते इन नगरी
किया करेंगे। इनके स्थिर हो जाने पर,
नियन्धादर्श]
women Her
Prerana
-
जैसी कि आशा है, आकाश में मेले लगा करेंगे, उत्सव हुआ
करेंगे, सेत फूद होंगे और आकाश हमारा घर-आँगन हो
जायगा।
रणक्षेत्र में इन विशालकाय व्योमचारियों से जय अग्निवर्षा
हुआ करेगी, तर तो प्रलय हो मच जायगा। कोई गढ, कोई दुर्ग,
कोई पर्वत, कोई सीमान्त प्रदेश अथवा मागर का विशाल वक्षस्थल
भी इनको गहरी मार से शरण न दे सकेगा। गत महायुद्ध में
तो इनकी उम्र तीन ही चार वर्ष की थी, तभी इन्होंने क्या कम
गजब ढाया था। अब तो ये तरुण हो गये हैं। भगवान न करे
कि कभी कभी इस प्रलय-कार्य में प्रवृत्त होकर ये अपना दुष्ट
रूप दिसावे ।
१०-वर्षा-विहार
गर्मी की तपन से तपी हुई पृथ्वी के अोठों पर वर्षा की बूदें
पडते ही उसका मुख हरा-भरा हो गया। उसके मुलसे हुए गात्र
पर रोमावली-सी पडी हो गई। वृक्षो और खेलों पर बहार आ
गई। घरों के भीतर वा सस की टट्टियों से बाहर निकलफर
विहार करने के दिन भी आ गये। चारों ओर जंगल मे मगल
होने लगा। प्रकृति ने अपनी धानी साडी पहन ली और धुमके
दूत बादल प्रियतम के सदेश ले-लेकर दौड़ने लगे। कोयल की
'कुहू कुहू' और पपीहा की 'पी पी ध्वनि हृदयों में चुभने लगी।
[ वर्षा विहार . nandeamalaman MNNNNN --04 -- जहाँ रेतीली लपट से आँखो मे तिलूले उठते थे, वहाँ जल ही जल हो गया और उनपर विहार करते हुए सारस तथा चमवार ऑसो को हँसाने लगे। सारन की मनभावनी फुहारों के लहरुए लहरा रहे हैं। धीमा धीमा शीतल पवन चल रहा है। मतवाले मयूर इस प्रकार नाच रहे हैं, मानो अपने पसों के चॅदोघे दिसा दिमाकर इन्द्र से कह रहे हा कि लो हमारी ये आँखे तुम्हारे सहस्र नेनो से किसी प्रकार कम नहीं। चूंदों की टप टप पानी पर मोती-से उछाल रही है। उस समय पानी मे क्रीडा करती हुई गाय भैंसों और ग्वाल-बाला की डुबकियो से दो की होड-मी हो चती है। सेतों के पौध और वृक्षों फी डालियों पर हरियाली ही हरियाली बरस रही है। कहीं कही क्यारियों में बीर-वधूटियों के बहाने वर्षा ने अपनी रत्नराशि से कुछ लाल, पृथ्वी पर बसेर दिये हैं। पोखरों मे मेढक टर्र टर्र करते हुए अपना पेट ही फाडे डालते हैं। वृक्षों पर मजीरे ओर झींगुर मार रहे हैं। बगुले पख फैला फैलाकर चाँदनी-सी तान रहे हैं और उडते हुए सारसों की अवली हवाई जहाजों की उपमा बन रही है। नदियाँ अठखेलियाँ करती हुई इतरा रही हैं। ऐसी भँवराती हुई चलती हैं कि अपने आप ऐंठी जाती हैं। पेड़ों के पॉर उसा- डती और किनारो को काटती हुई वे अपनी प्रगल्भता का परिचय दे रही हैं। मरनों और प्रपातो का घड घड-नाद घुमडते हुए निबन्धादर्श ] ८८ an keewan-n. बादलो को जगाव-सा देता है। मेघा की तड़कन के साथ उनका तमतमाते हुए उतरना और पहाड़ों की चोटियों की दड़कन के साथ उनका थरथराते हुए फिसलना ऐसा जान पड़ता है, मानों दो पहलमान असाडे में पैतरे बदल रहे हा। तालानों में कमल मुकुलित वदन पडे हैं। उन पर पानी की बूंदें पड़ती और ढल जाती हैं। उनका उम ओर ध्यान ही नहीं, मानो वे फमलनयन की प्रतीक्षा में उत्कण्ठ हैं। वागो मे विचित्र ही यहार है। वर्षा का रस रसालों के रूप में टप टप गिरता हुआ टपका धन जाता है, और भद भद गिरती हुई जामुनें मानो भादो के नामकरण-सस्कार की सूचना देती हैं । इतना ही नहीं, और आगे बढकर जम्बूद्वीप का नाम भी वे अपने ही जन्म के कारण बताती हैं। भारत का विचित्र मेवा आम के बहाने वो अपना सर्वस्व वागो को देकर वहाँ विहार करती जान पडती है। और 'वावा जी के वाग मे दुशाला ओढ़े खड़ी हुई मोतियो में जडी कुक्डी की तो वात ही निराली है। किसानों की वह लाडिली कैसी भोली भाली और सहज सुन्दरी है । आकाश के सेलो की तो उपमा ही नहीं मिलती। बादलो के मुण्ड एक से एक नई क्रीड़ा करते हुए अनेक रूप धारण करते हैं। उनकी चपलता देसकर वर्षा में बन्दर भी भीगी बिल्ली बन जाते हैं। कभी वे गाय, बछडे से दिखाई देते हैं, कभी हाथी और सिंह से बन जाते हैं। कभी पहाडा से प्रतीत होते हैं,
९
[शरीर-क्षा
भी वन उपरन-से लगते हैं। कभी मन बहलाते हैं, कभी प्रलय
चाते हैं। उनके पास सत्र से सुन्दर सिलौना एक है। वह
इन्द्र धनुष। बस, उनकी उस धनुही मे विधाता की चित्रकारी
माप्त हो गई है। उसे देखकर वर्षा के आँगन में फिर और
छ देखने को नहीं रह जाता। हाँ, बिजली की चमक में प्रकृति
न्दरी के कङ्कण और जुगुनुओ के रूप में उसके केश-कलाप के
प्प गुच्छ भी मनोहारिणी छवि देते हैं।
११-शरीर-रत्ना
LIKHAROBARAS
नेचार-तालिका :-
BIKANER RAJPUTA
(१) आत्मा का मन्दिर, शरीर-यंत्र।
(0) धर्म का प्रथम साधन ।
(३) स्वाभाविक और कृत्रिम जीवन , एक राजा और
कणाद ऋपि ।
(४) जातीय प्रतिष्ठा , अर्जुन ओर उर्वशी , दधीचि ।
(५) सरल जीवन और उच्च विचार ।
(६) स्वास्थ्य के नियम ।
(७) तन, मन, धन का सम्बन्ध ।
शरीर आत्मा का निवास है, उसका मन्दिर है । यही वह रथ
है जिसपर बैठकर मनोदेव इन्द्रियों के घोडे दौडाते, और आकाश
गताल की सैर किया करते हैं। यदि इसके पहिये ढीले हो
,
निबन्धादर्श ] new HHH - AND menta . बादलो को जगाव-मा देता है। मेघों की तडकन के साथ उनका तमतमाते हुए उतरना ओर पहाडो की चोटियों की दड़कन के साथ उनका थरथराते हुए फिसलना ऐसा जान पड़ता है, मानों दो पहलवान अखाडे मे पैतरे वदल रहे हों। तालागो में कमल मुकुलित-वदन खडे हैं। उन पर पानी की बूंदें पड़ती और ढल जाती हैं। उनका उस ओर ध्यान ही नहीं, मानों वे कमलनयन की प्रतीक्षा में उत्कण्ठ है। नागो मे विचिन ही वहार है। वर्षा का रस रसालों के रूप में टप टप गिरता हुआ टपका बन जाता है, और भद भद गिरती हुई जामुनें मानो भादो के नामकरण-सरकार की सूचना देती हैं। इतना ही नहीं, और आगे बढकर जम्बू-द्वीप का नाम भी वे अपने ही जन्म के कारण बताती हैं। भारत का विचित्र मेवा आम के बहाने वर्षा अपना सर्वस्व वागो को देकर वहाँ विहार करती जान पडती है। और 'वावा जी के वाग मे दुशाला ओढ़े पडी हुई' मोतियो मे जडी कुक्डी की तो यात ही निराली है। किसानो की वह लाडिली कैसी भोली भाली और सहज सुन्दरी है । आकाश के सेलो की तो उपमा ही नहीं मिलती। बादलों के मुण्ड एक से एक नई क्रीड़ा करते हुए अनेक रूप धारण करते हैं। उनकी चपलता देखकर वर्षा में बन्दर भी भीगी बिल्ली बन जाते हैं। कभी वे गाय, बछडे से दिखाई देते हैं, कमी हाथी और सिंह से बन जाते हैं। कभी पहाडो से प्रतीत होते हैं, ८९ [ शरीर-रक्षा H- N4 कभी वन-उपवन-से लगते हैं। कभी मन यहलाते हैं, कभी प्रलय मचाते हैं। उनके पास सन से सुन्दर सिलौना एक है। वह है इन्द्र धनुष । यस, उनकी उस धनुही मे विधाता की चित्रकारी समाप्त हो गई है। उसे देखकर वर्षा के आँगन में फिर ओर कुछ ठेसने को नहीं रह जाता। हॉ, बिजली की चमक में प्रकृति सुन्दरी के कङ्कण और जुगनुओं के रूप मे उसके केश-कलाप के पुष्प गुच्छ भी मनोहारिणी छवि देते हैं। ११-शरीर रक्षा . - . विचार-तालिका BIKANER KAJPUT (१) आत्मा का मन्दिर , शरीर-यंत्र । (0) धर्म का प्रथम साधन । (३) स्वाभाविक ओर कृत्रिम जीवन , एक राजा और करणादपि। (४) जातीय प्रतिष्ठा , अर्जुन और उर्वशी , दधीचि । (५) सरल जीवन और उच्च विचार । (६) स्वास्थ्य के नियम । (७) तन, मन, धन का सम्बन्ध । शरीर आत्मा का निवास है, उसका मन्दिर है। यही वह रथ है जिसपर बैठकर.मनोदेव इन्द्रियों के घोडे दौड़ाते, और आकाश पाताल की यदि इसके पहिये ढीले हो।
निधन्धादर्श] २० ------ HernuANB000 400-4-udmessember जायँ उनको कमानियों में दम न रहे-तो इतने दचे लगें कि सारी कमर रह जाय और जीवन-याना दूभर हो जाय। इसके क्ल-पुणे कील-फाँटे इतने पेचीदा हैं कि उनका सँभालना हँसी मेल नहीं, सूरे-पूरों ही का काम है। कुशल कारीगर ही उन्हें ठीक निठा सक्ता है और इसका नव निर्माण (Overhauling) तो कुछ अर्थ रखता है। जो इसकी धुरी का काँटा ठीक रसते और उचित रूप से इसकी देसभाल, साज-सँभाल करते रहते हैं, उन्होंने लिए यह हलका और सुखावह सिद्ध होता है । "शरीरमाद्य पलु धर्म-साधनम् ।" अर्थात् निश्चय ही शरीर धर्म का सब से पहला साधन है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं, तो मन म्नस्थ नहीं रह सकता, मन स्वस्थ नहीं, तो विचार स्वस्थ नहीं होते, और जन विचार स्वस्थ नहीं तो, धर्म की साधना कहाँ ? इसलिए, शरीर को स्वस्थ रखना हमारा परम कर्तव्य है, इसके चिना जीवन सुखमय हो ही नहीं सकता। चालक से लेकर घूढे तक और राजा से लेकर सन्यासी तक सन को शरीर-रक्षा का ध्यान रसना पडता है। शरीर स्वस्थ न हो तो सामारिक भोग व्यर्थ हो जाते है। अच्छे में अच्छे पदार्थ, वस्त्र, आभूपण इत्यादि रोगी शरीर के लिए योम के तुल्य हैं। उसे उनमें फोकापन ही दृष्टि आता है, वे उसके सन्ताप का ही कारण होते हैं। आत्मा परमात्मा का स्वरूप है। उसके इस मन्दिर को यदि हम स्वन्ध और शुद्ध न रखें, तो बड़ा पाप होगा। परन्तु, इस [शरीर-रक्षा . - -- . H पाप को हममे से कितने पाप समझते हैं ? अतिमात्रा में भोजन, विहार करना तो हमारे लिए साधारण-सी बात हो गई है, वरन् ऐसा न करें तो हम समझते हैं कि हमने शरीर का सुप ही क्या भोगा। प्रकृति ने हमारे साद्य पदार्थों को जिस रूप में उत्पन्न किया है, उसमें हमने इतने परिवर्तन कर डाले हैं, उनसे इतने व्य- सन बना डाले हैं कि जीभ उनकी ओर ऐसी दोडती है कि रोके नहीं रुकती। हमने एक स्थान पर पढा था कि एक राजा के यहाँ कुशल वैद्य इसलिए रखे जाते थे कि वे सुपादु भोजन के पश्चात् उसे वमन (उलटी) करा दिया करें, जिससे कि वह फिर शीघ्र ही अन्य स्वादिष्ट पदार्थ खा सके। इस चटोरेपन का फल यह हुआ कि कुछ काल मे ही उसकी आँतें बोन गई और वह जीयन की घड़ियाँ गिनने लगा। दूसरी ओर महर्षि कणाद को देखिए। वे परिश्रम के साथ एक-एक फण बीनकर सादा भोजन करते थे। आज उनका रचित वैशेपिक शास्त्र ससार को चकित कर रहा है। सरल जीवन और कृत्रिम जीवन के ये स्पष्ट उदाहरण हैं। दूर क्यों जायें, अपनी ओर ही न देखें। प्रात काल से लेकर सध्या तक हममें से बहुतों का मुँह बकरी की भाति चलता ही रहता है। आँतो को आराम देना तो हम जानते ही नहीं । समझते हैं पेट साली रहा, तो प्राण निकल जायेंगे। यह शरीर के साथ अत्याचार नहीं, पाप नहीं, तो क्या है ? सच तो यह है कि हम बहुधा साने के लिए जीते हैं, जीने के लिए नहीं साते ।
निरन्धादर्श] १२ शरीर का सम्बन्ध केवल अपने ही तक होता, तो भी कुछ वात न थी। मुख की तेजस्विता, शरीर को गठन और अङ्गों की चारुता पर आति तथा दश की प्रतिष्ठा भी अवलम्बित है। जब हम किसी अँगरेन, फ्रेंच, जापानी, वा जर्मन जाति के पन्चे, युवक या युक्ती को देखते हैं और अपने यहाँ के पोले पीले चेहरों, और मुके हुए कन्धो तथा अस्थि-पलरों से तुलना करते हैं, तो हृदय मे हूक उठने लगती है। उस समय हम सोचते हैं कि इस प्रकार की दरिद्र-मूर्तियों को लेकर भारतवर्ष किसके सामने मुँह उठा सकता है। एक समय था, जव इसी भारत का पुन अर्जुन सुरलोक मे गया, तब उसके तेजस्क बदन को देख अप्सरा उशी उस पर मुग्ध हो गई। अर्जुन ने भी विनीत भार से कह दिया-'कुन कलक जनि देउ मातु हम भारतवासी।' आज हममें से कितन कुल कलङ्क नहीं बन गये? जिस अवस्था में अन्य जातियों के मनुष्य युवा प्रतीत होते हैं, उसीमे हम बूढे जान पड़ते हैं। बहुत से तो जान भी नहीं पाते कि यौवन कर श्राया और कब गया। यह सर शरीर की उपेक्षा का परिणाम नहीं तो क्या है ? जिस आर्य-जाति के ऋपि दधीचि की हड्डियाँ लेकर सुरपति इन्द्र ने अपना वन बनाया, उसकी यह दशा देख कलेजा ऊपर को आता है। 'सरल जीवन और उच्च विचार हमारे मनस्वी पूर्वजों का मूलमत्र था और उसकी सिद्धि स्वस्थ शरीर पर निर्भर है।
[शरीररक्षा Jadee aan PAN .. PRO -tan-ameen-man-mommont- HAN स्वास्थ्य-रक्षा के नियम जानने के लिए यो तो विज्ञान की एक शासा आयुर्वेद अलग ही है, परन्तु घुछ मोटी-मोटी यातें हैं, जिनपर ध्यान रपने से स्वास्थ्य सहज नहीं निगडता। शरीर की रचनाका आवश्यक मान प्रत्येक नर-नारी को होना चाहिए फिर अपने-अपने शरीर की विशेष याती पर उसे म्बय ध्यानरसना चाहिए। इतना होने पर जीवन के मुरय आधार वायु, जल और भोजन-वस्त्र का उचित रूप से काम में लाना है। इनकी शुद्धता परमावश्यक है। शरीर की शक्ति चलने, फिरने, करने से तीण होती रहती है। उसकी पूर्ति के लिए नींद स्वाभाविक साधन है। गहरी नींद आने से हमारा रक्त फिर से वेगपूर्वक चलने लगता और हममें स्फूर्ति आ जाती है। इसके अति- रिक्त शरीर के रग-पुट्ठो को दृढ रखने तथा नसों में रफ-सञ्चार के लिए किसी न किसी प्रकार का व्यायाम अत्यावश्यक है। सय दवाएँ छोड़कर फेवल व्यायाम करने से ही शरीर नीरोग रह सकता है। व्यायाम की मात्रा भी प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग अलग होती है। बलावल का विचार करके व्यायाम करने से ही लाभ होता है। गागर में सागर भरने के समान स्वास्थ्य के कुछ नियम नीचे लिखे जाते हैं (१) शुद्ध और स्वच्छ वायु के सेवन पर सन से पहले ध्यान दिया जाय। प्रात काल शुद्ध और खुली हवा में भ्रमण करना सर्वोत्तम है। इससे हलका और अच्छा व्यायाम भी हो जाता
निबन्धादर्श]
९४
है। रात के समय मुंह ढंककर न सोया जाय । मकान में काफी
दरवाजे और सिक्यिों हो और वे खुले रह । सॉस सदैव
नाक से ली जाय। गहरी साँस ली जाय और हया को कम
छोड़ा जाय।
(२) स्वच्छ और सर्द पानी पिया जाय। यदि जल स्वच्छ
न हो तो औटाकर वा फिटकरी डालकर स्वच्छ कर लिया जाय ।
स्नान को भी पूर्ण महल दिया जाय। ठडा वा ताजा जल ही
स्नान के लिए अधिक उपयोगी है। रोगियों को गरम जल काम
में लाना भी हितकर है। स्नान के पश्चात् शरीर को स्वन्ध
और मोटे कपड़े से खून रगडकर पोंछ लिया जाय ।
(३) भोजन पूर्व भूप लगने पर किया जाय, परन्तु भूसा भी
न मरा जाय । एक वार का भोजन पचने पर ही दूसरी वार कुछ
साया जाय । दाल, भात, रोटा, शाक आदि का सादा, सुपच और
पौष्टिक भोजन ही किया जाय । बहुत से मिश्रित पदार्थ वा मसालों
के बने हुए भोजनो से बचा जाय । अपनी रचि के अनुकूल पदार्थ
चुन लिए जायें और एक ही प्रकार का भोजन लगातार न
किया जाय। बदलते हुए अन्न शाक श्रादि व्यवहार में लाये
जायें। भोजन के साथ स्निग्ध पदार्थ, जैसे घी आदि अरश्य
खाये जायें। दूध और फल स्वाभाविक तथा सात्विक भोजन
हैं। भोजन नियत ममय पर किया जाय, चबा-चबाफर किया
जाय और भोजन के पश्चात् दाँतों को साफ कर लिया जाय।
९५ [शरीररसा raapan Nan + H- (४) वग्न सादे किन्तु साफ सुथरे हो । तग या फसे हुए न हों। शरीर रोगी न हो तो व्यर्थ बहुत से पत्रों की आवश्यकता नहीं। (५) व्यायाम नित्य और नियमित रूप से किया जाय । उतना ही व्यायाम किया जाय, जिससे यकारट न जान पड़े। प्रात काल का समय इसके लिए सर्वोत्तम है। राव का समय ठीक नहीं। व्यायाम के पूर्व स्नान किया जाय, अथवा व्यायाम के पश्चात् जन कि रक्त का सञ्चार साधारण रीति से होने तगे। भोजन के पश्चात् न्यायाम कदापि न किया जाय, न व्यायाम के पश्यात् तुरत भोजन किया जाय । (६) गहरी और शान्त निद्रा स्वास्थ्य की सहचरी है । ६ से ८ घटे तक सोना आवश्यक है। दस ग्यारह वर्ष तक के यशों को कम से कम १० घटे सोने दिया जाय । (७) नशीले द्रव्यों से जहाँ तक हो बिल्कुल पचा जाय । इन बातों पर ध्यान देने से स्वास्थ्य ठीक रहेगा। माहार और विहार मे सदैव सयम की वडी भारी आवश्यकता है। जो लोग वेदान्त फी लटक में शरीर-सेवा को मूर्खता समझते हैं, वे मूलते हैं। तन, मन और धन का साथ है। जिसके पास पुष्ट तन नहीं, उसके पास विकसित मन का मस्तिष्क नहीं। जिसके पास मन नहीं उसके पास धन वा वैभव नहीं। यह यात शङ्कातीत है। इसलिए, शरीर-सगठन की ओर प्रथम ,
निय पार्श]
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...
दृष्टि होनी चाहिए। मक्षेप में इसके तीन साधन हैं-मयम,
नियम और यायाम।
१२-किसान
मिट्टी से रत्न उत्पन्न करना विमान का ही फाम है। उसकी
पमीने की कमाई में मय का सामा है। यह एक रूप से मनुप्य
मान का अनदाता और पशु-पक्षियों तक का पानना है।
दिन भर परिश्रम करके जय यह सोने को जाता
तय यह भी
नहीं सोचता कि मैन ससार या क्या उपकार किया। इसके
म्वार्थ में भी परार्य है, उसकी सेवा यड़ी निकाम है। पहते हैं
कि जैसा धान्य होता है वैसी ही बुद्धि बनती है, अर्थात् निस
प्रकार की कमाई का पैसा होता है, प्राचार-युद्धि पर उसका वैसा
ही प्रभाव पड़ता है। एक जुआरी या चोर के धान्य से पुमति,
और मेहनती मजदूर के धान्य से मुमति उत्पन्न होती है। इस
ष्टि से विमान का धान्य वडा उत्तम और मुबुद्धि-जनक है।
ग्मरे जीवन में माधु भार ही प्रधान है।
उसकी दिनचर्या तो देखिए । मानवाल उठना, सेत पर जाना,
गाय, बैल आदि की सेवा करना, अपने ही हाथों से उत्पन्न किये
हुए शुद्ध अन्न का भोजन करना और कठोर परिश्रम परके
वसु धरा पर हरे हरे पौधे उगाना, कैसे आनन्दमय अन्य
हैं। फल फूलों से युक्त सेतों में अपने परिश्रम को फलवा
कलता देख उसे उतनी ही जानन्द मिलता है, जितनी कि पुत्र-जन्म में पिता को | एक ओर उसके वालपच्चे बैठे हैं। दूसरी ओर सेती लहलहा रही है। नीचें धरती माता और ऊपर किसी वृक्ष की छाया वा फेवले अम्बर है। उसीमे मग्न हैं और काम कर रहे हैं। कितनों सतोपी और पवित्र जीवन है। ने शीत का भय है, ने ताप की चिन्ता , न वर्षा से विचलित होते हैं, न वायु-चेगे से व्याकुल । सभी ऋतुएं उनके सामने से हँसती खेलती निकल जाती है, और वे उनको अनिन्द लूटते हैं। पके हुए अन्नं का दामादानी समेटते समय का उनका परिश्रम बडो ही विलक्षण होता है। उस समय उन्हें अपने तन-वर्दन की मौं सुध नहीं रहती, उनके कर्तव्य की पराकाष्ठा हो जाती है। भारतीय किसानों की दशा देखकर करुणा उत्पन्न होती है। यहाँ की २५ करोड प्रजों के जीवन को आधार सेंती ही है, वरने या कहना चाहिए कि इसे देश के किसानों की जागृति तथा सुप- समृद्धि परं ही भारतवर्ष को उत्थान निर्भर है। वहीं किसान- जाति यहाँ महाकष्ट भोग रही है। अधिकाशं किसानों के पास ईतनी भी द्रव्ये नहीं कि वे समय पर सेतों में बीज डाल सके, अछे बैले मोल ले सकें और उनका पालन कर सकें। इसके लिए वे प्राय साहूकारों वा जमींदारों के आश्रित हैं। उनकी अमाई पर ये नर-गृद्ध ऐसे टूटते हैं कि उन्हें ठठेरी बना देते हैं।
निरन्धादर्श ]
Hệ
--
पाने को मिलता है, न लागत का दाम शेष रहता है। या
दुर्भित पड जाय, तो उनके प्राणों ही पर श्रा बनती है। रि
दिन उनके बल का हास हो रहा है। दूध घी की तो बात है
क्या, वेचारे बहुतेरे तो छात्र को भी तरसत हैं। छोटे-छा-
रोगो को भी सहन करने का बल उनमें नहीं रह गया, फिर में
मियाभिमान पीछा नहीं छोडता । ऋण ले-लेकर विवाह आ
में अपव्यय करते हैं और उसके दुष्परिणाम भोगते हैं । "बुझ
क्षित किं न करोति पाप" अर्थात् भूपा क्या पाप नहीं क
डालता ? इस उक्ति के अनुसार उनका आचारिक पतन -
आरम्भ हो गया है। अपने अनन्त समय को वे आलस्य में निक
देते हैं।
जापान के किसाना की ओर देखिए । वहा भूमि की इत
कमी है कि कहीं कहीं तो एक एक परिवार के भाग में एक से
आता है। परन्तु, उसीमें वे सब कुछ प्राप्त करते हैं। किर
जापानी के पास एक सेत भी है, तो उसीके कोने में एक क्या
छोटे से उपचन की भी होगी। बचे हुए समय में उनके वा
वच्चे आर वे स्वय रेशम श्रादि के वस्त्र धुनकर वा और कोई घरे
धन्धा करके द्रव्य कमाते हैं। हमारे यहा भी सूत कातना पा
के बडे-बडे घरानो का धन्धा था, परन्तु हम अब उसे छोड 4
हैं। हम बडे बन बैठे हैं और हमारी आँतों पर चोट पड र
। हम यह भूल गये हैं कि वडापन का पिता परिश्रम है
२९ [फिसान समय ही धन है। अमेरिका आज खेती की ही पदौरास ससार या महा समृद्धिशाती देश है। यहाँ का किसान मोटर में बैठकर अपने खेतों की सैर फरता, और यहाँ के यड़े-बड़े जमीदारों को मोल रो मकता है। पिन्तु, काम के समय हम उसे पुटम्ना पहने, और पुशाल हाथ में तिये अपने नौकरों के साथ येत में पाते हैं। वह अपनी आवश्यकताओं के लिए दूमरों का मुंह नहीं तारता, वरन् अपना भाग्य अपने ही हाथों यनाता है। हमारे विमान भाई भी कोरी प्रतिष्ठा छोडकर यदि अपने समय को याम में लारें, अपने काम में अपने फो स्वतन्त्र कर लें, तो कोई कारण नहीं कि उनके दुप दूर न हो जायें। कोई आस. मान से उनके फष्ट छुड़ाने नहीं आयेगा, अपना भाग्य उन्हें आप यनाना होगा। इसमें सन्देह नहीं कि देश पे नेताओं तथा सर- कार का ध्या इस 'भोर प्रतिदिन यढ रहा है, तो भी अपने दोप तो आप ही मिटाने होंगे। काम तो हमें ही करना होगा। इस रत्नगर्भा भारत-भूमि में इतनी उर्वरा शक्ति है कि उससे केवल यह देश ही धन-धान्य पूर्ण नहीं हो सकता, परन् अपनी उपज बाहर भेज भेजकर विश्व का भरण पोपण पर सस्ता है। यहाँ का व्यापार, यहाँ का उदयम, यहाँ का शिल्प, सय यहाँ की खेती पर ही निर्भर है। यदि हमारी शिक्षा सेती की ओर ही मुक जाय, तो हमारे युनफ पढ़ लिसकर गा रें। कितनी भूमि विना M
निबन्धादर्श]
१००
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hvan-00-00-s.
है, और हम भूसे नगे विदेशा में मजदूरी करके पराई ठोकरें खाते
हैं। इंगलैंड, फ्रास, जर्मनी आदि के किसानो के परिश्रम तथा
उनके प्राम्य सुषों की फल्पना भी हम लोग नहीं करते । जो सुस
वहाँ के किसानों को है, यहाँ के अमीरों और रईसों को नहीं,
इसमे तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। वहाँ के प्रामों के झोपड़ों में
लक्ष्मी निवास करती है। यहाँ के किसानों की मुख-श्रीमही-
पालों की स्पर्धा का कारण होती है। यदि हम भी वैसा ही
परिश्रम करें, वैसी ही तत्परता से काम लें, तो हमारा स्वराज्य
हमारे हाथ है। विश्वास रम्बिए, परिश्रम सदैव फल देता है।
-
१३-एक प्यारा चरित्र
[लक्ष्मण]
पूर्व विचार :
(१) चरित्र की आन।
(२)सया स्वरूप।
(३) युद्ध-प्रियता और निर्भीकता।
(४) नटपटपन और आशा का अङ्कुश ।
(५) चारित्रिक विजय।
(६) अनन्य सेवा।
(७) जीवन का फल ।
१०१ [ एक प्यारा चरिम Pasana . लक्ष्मण । तुम्हारे चरित्र में एक अनोपीआन है। राम लोक- ललाम हैं , कवि की कृति के नायफ है। भरत नायकन मही, पर रामायण के प्राण हैं। और तुम ? तुम तुम्हीं हो। तुम्हारी यात में कुछ यात है और तुम्हारे ग में कुछ रग। तुम राम के अनुजीवन हो । त्याग फेसन हो, तपस्या के धन हो, वीरता की मूर्ति हो, पराक्रम की स्फूर्ति हो। तुम सेवा क असतार हो, मात- भक्ति के मितार दो ओज की ओस हो, अद्धा के कोप हो। तुम क्षाव-तेज के रोप हो और रण-प्राङ्गण के निर्घोप हो। तुम्हारी तडप में एक कडक है और तुम्हारी वाणी पड़ी येधक है। तुम्हारे सध्ये स्वरूप का दर्शन हमें स्वयवर समा में हुआ। उपस्थित योद्धामों पर गाज गिर चुकी थी। क्षत्रिय समाज राजा जनक को "धीर विहीन मही मैं जानी" को सह चुका था। तुम्हारे कानों में वह पोर पड़ी और तुम तड़प गये। राजा जनक ज्ञानी होंगे अपने घर के, विदेह होगे पियों के लिए, मुनियों के लिए। तुम्हारे लिए वे अनुचित वक्ता थे। क्षत्रियत्व का अप- मान तुम्हारा अपमान या रघुकुल का विरस्कार था। यह यात सर से पहले तुम्हांको सूमी। राम के इशारे से तुम तोहू का चूंट पी गये, पर तुम्हारे सिंहनार्जन से आकाश गूंज गया, जनक पेटा गये। "फन्दुक इव ब्रह्माण्ड उठा" मे तुम्हारा पिलाड़ीपन खुल-खुलकर खेल रहा है। तुम्हारी कर्मण्यता "काचे घट जिमि डारो फोरों" में फूट पड़ी है। Free निबन्धादर्श] rametweewaaaved04- -Naers eman क्षन कुल के काल जामदग्न्य परशुराम के ब्रह्मतेज और महा- मोध के सामने बडे बडे योधा तितर बितर जो जाते हैं, और तुम्हें विनोद सूझता है । तुम्हारा 'दूध मुस' वहाँ वन मुप बन जाता है। कोई डरे, कोई दने, कुछ हो तुम्हें भय नहीं। तुम्हारे लिए तो जो लड़ने आये, फिर वह शङ्कर ही क्यो न हों, तुम उसे छकान को तैयार हो। तुम वहाँ उसका पद नहीं देखते, मद नहीं देसते । वह तुम्हारा प्रतिद्वन्द्वी है और तुम्हे उससे दो-दो हाय करने मे रप आता है। चाहे राम 'नयन तरेरें' वा 'लोक अनु. चित पुकारे तुम देह में से निकले ही पडते हो। तुम नटपट भी कम नहीं। दास दासियो तक पर हाथ छोड़ देवे हो । तभी वो मन्थरा की भुनभुनाहट पर कैकेयी को मन्देह होता है कि "दीन्ह लपन सिस असि मन मोरे।" सरे इतने हो कि चूकते अपने पिता तक से नहीं। सुमन से दशरथ के विपय में, न माने, कुछ अट सट कह ही दिया। इतने पर भी अङ्कुश मानते हो। तुम्हारे जीवन सर्वस्व राम हैं। राम की आँखों का एक डोरा तुम्हारे रोप रूपी ज्वालामुखी के उभार को झाग- सा बिठा देता है। तुम राम को जानते हो और राम तुम्हें। वननास हुआ। सीता व्याकुल हो उठी। बडे उत्तर प्रत्युत्तर के पश्चात् न्होंने राम पर विजय पाई। तुम भी वहाँ गये और "देह गेह सय मन" तृण तोडकर "चितनत ठाढे," में अपना जादू राम पर डाल १०३ [ एक प्यारा चरित्र . . Chun . दिया। उन्होंने कुछ कहा भी तो "मैं शिशु प्रभु सनेह प्रतिपाला" में बानी मार ले गये। तुम्हारे उस मौन में तुलसी ने एक और गीता छिपा दी। तुम्हारी सेना जीवन पथ का एक प्रदीप है। राम सीता सो रहे हैं और तुम धनुप वाण लिये वीरासन पर बैठे उनकी शरीर- रक्षा कर रहे हो। एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, एक पर्प नहीं, दो वर्ष नहीं , पूरे चौदह वर्प। यह अनन्य भक्ति जगतीतल पर अलभ्य है । चित्रकूट मे राम के ललाट पर चिन्ता की रेसा मल- की नहीं कि तुमने भरत जैसे धर्म धुरन्धर को भी उलटी सीधी सुना डाली । तुम्हारे लिए "प्रकट करउँ रिस पाछिल आजू" का अवसर आ गया। तुम्हारे हृदय में उबाल आया, परन्तु राम के "सुनहुँ लपन भल भरत सरीपा। विधि प्रपञ्च महँ सुना न दीपा" कहते ही बैठ गया। किष्किन्धा में राम के "सुग्रीवहु सुधि मोरि पिसारी" कहत ही तुम उसके सिर पर जा धमके। राम की मैत्री का भी सयाल न करते हुए, उसे पून फटकाग । पञ्चपटी में तनिक मकेत मिला कि शूर्पणसा के नाक कान न थे। मेघनाद-वध में तुम्हारे अखण्ड प्रत और बल का पता चला। लि वन भी कुण्ठित हो गया था, उसके वध में तुम्हारे शक्ति लगने पुर. स्नेह-सर्वस्व का
निनन्धादर्श]
१२४
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लिए जहाँ अवध करत मुँह लाई' और "जो जनतेउँ अन बन्धु
निछोहू । पिता पचन नहिं मन मोहू।" में तो ये सीता हो
नहीं, पूज्यचरण दशरथ को भी एक ओर उठाकर रख देते हैं।
तुम्हारे जीवन का फल वहाँ मित नाता है।
भ्रातृ-भक्ति म तुम्हारी अनन्यता ही नहीं, अन्धता भी थी।
सगर्भा सीता को जनशून्य पन में छोड़ते भी तुम्हें भागा पीछा न
हुमा । तुम ग्लानि से गल गये , सटोर से दब गये, पर काम कर
गये। तुमने भाई का मान निभाया और अन्त स निमाया।
एक बार सीता के मर्म-वचनी से विद्ध होकर तुम रामाशा का
उलपत कर गये थे-मीता को अकेली छोड चले गये थे।
क्या उसी कारण इस अन्याय पर भी तुम न बोले। राम
ने जब सुपीव आदि की बात मानकर समुद्र से प्राथना करना
आरम्भ किया था, तब तुमसे न रहा गया था। “कायर
मन कर एक अधारा। दैव-दैव पालसी पुकारा।" तुमने
कह ही डाला था। यदि सीता परित्याग पर भी लोकमत के
विरुद्ध तुम्हारा स्वर ऊँचा उठा होता, तो हमें तुमसे कुछ कहना न
था। कौन जाने तुम्हारे द्वारा उस दुपिया का कल्याण हो जाता।
तुम्हारा वहाँ का मौन हमें अपरता है। तुमने स्त्रियों की
कोमलता का ज्ञान ही मुला दिया था क्या ? उर्मिला की तो
कभी सुध करते भी हम तुम्ह नहीं पाते। कुछ भी हो, सुमित्रा
नन्दन । तुम पुण्यवान हो, एक तान हो। तुम्हारे चरित्र में एक
[एक छडी की आत्मकहानी 4-0son . वीरोचित आन और भ्रातृ सेना के लिए मनुजोचित त्याग है, जिसका लानण्य हमे तुम्हारी ओर सीच ले जाता है। १४-एक छड़ी की आत्म-कहानी . [फाल्पनिक ] पूर्व-विचार :- (१) मानसरोवर का तट। (२) ब्रह्मपुन , भागीरथी स्नान । (३) सागर का गम । (४) कोलम्यो से रामेश्वर, बम्बई, कराँची । (५) सेठ के साथ रेगिस्तान में । (६) कवि के साथ नैनीताल, जन्मभूमि की दर्शनाभिलापा। मैं अपने पिता 'ओके' की अङ्क मे क्रीड़ा करती और मान- सरोवर के रमणीय तटपर विहार करती हुई हसों की सुन्दर जोडियों को देख देखकर प्रफुल्लित होती थी। ब्रह्मपुत्र का निर्मल नीर मेरे पिता के चरण धोता ओर कलनाद करता हुआ न जाने कहाँ चला जाता था कि फिर लौटता ही स था। मैं कभी कभी सोचा फरती कि यों ही जीवन के दिन जारर फिर नहीं लौटते । स्वर्ण कमलों की रज से सुरभित पवन के झांके मेरे कर-पल्लव हिला हिलाकर मुझे सेलाते थे। निर्मल नीलाम्बर के " निरन्धादर्श ] १०६ - and an -- Peru nume- नाचं निछी हुई मानस-सर की श्वेत तथा शुभ्र जलराशि शुचिता की मातान् मूनि थी। अनक मणि शिलाएँ पड़ी हुई थीं, निन पर कहीं कहीं मुनियो का मञ्जुल दर्शन मोद का कारण था। हिमाचल की मुक्ता धवल चोटियाँ और कैलाश के दिव्य दर्शन मेरे सौभाग्य के सूचक थे। दिन रात निराली ही छवि रहती थी। प्रकृति का पुण्य भवन ही माना वहाँ था। उस शुभ्र तथा शान्त तपोभूमि में जन्म लेकर मैं अपने जीवन को धन्य मान रही थी कि एक दिन मेरे पिताजी पानी में गिर पड़े और में भी काँपती हुई उनकी गोद मे लिपट गई । जल की प्रीति ही कितनी? जो नित्य ही पिताजी का पाद प्रक्षालन करता था, वही उनकी समाधि स्थली बन गया। तल म पड़े हुए शिलाखण्डों की चोट साते साते मैं तो मूर्छित हो गई , पिताजी का क्या हुआ सो मुझे पता नहीं। मुझे जब चेत हुश्रा तो मैंने देखा कि मैं उनकी गोद से पिछुडकर आसाम प्रान्त के ब्रह्मपुत्र के मोड पर एक सोसल मे अटकी पड़ी हूँ। "पापी जल । तूने क्या क्यिा, किस जन्म का बदला लिया ?" कह हो रही थी कि एक लहर के चपेट में आकर फिर बह निस्ली। पाण्डवों के राजसूय यज्ञ की भूमि पाण्डुनगर के दर्शन करती हुई, ब्रह्मपुत्र से सिञ्चित प्रान्त का अवलोकन करती और डुबकिया लगाती चली जा रही थी कि पुण्य सलिला भागीरथी में स्नान करने का मौभाग्य प्राप्त हुआ। जिस अमृत के लिए मुर १०७ [ एक छडी की आत्म-कहानी - -- re- आशा बडी समुदाय तरसता है, उसे अनायास ही पाकर मैंने अपने दुर्दिनो को भी धन्यवाद दिया। इस सुप से कुछ मतोप मिला ही था कि डेल्टा को पङ्किल भूमि में मेरे पाँव फँस गये। गगा और ब्रह्मपुत्र की धारा भी हटकर बहने लगी और मैं वहाँ त्रिशङ्कु पनी अटकी रही। एक एक दिन करके दो वर्ष गीत गये, सोच लिया कि सड़ सडकर यों ही प्राण जायँगे। फिर भी कभी कभी उद्धार की कल्पना किया करती थी। बलगती है, यदि यह न हो तो भय से ही मनुष्य के प्राण निकल जाया करें। कालान्तर में घनघोर वर्षा हुई और नदियों मे वाढ आई मेरा भी दूह ढह गया और में उछलती कूदती सागर की गोद में जा पडी। यहा मेरे ऊपर घोर मङ्कट आया। इधर तो नदी का प्रवाह आगे को ढकेलता था, उधर सागर की लहरें पीछे पटक देती थी। उनके अन्योन्य-मुसालिङ्गन में मेरा बुरी तरह चर्वण हुआ। मेरी सारी पाल छिल गई। ज्यों त्यो करके समुद्र के क्रोड में शान्ति मिली। इतना विशाल जल- विस्तार मैंने पहले कभी न देखा था। उसे देखकर मेरी दृष्टि चौंधिया गई। परन्तु, तल पर तैरती हुई नौकाओ तथा जल- पोतो को देखकर कुछ धैर्य हुआ। समुद्र के तट का अवलोकन करती, और लहरों से टकराती हुई मैं अपने जीवन के दिन पूरे कर रही थी कि एक जलयान की कील में अटक गई। समुद्र के निबन्धादर्श १०८ -Ram 4maranteedom वक्षस्थल को चीरता हुआ वह यान मुझे कोलम्बो ले पहुँचा । वहाँ उसने अपना लहर डाला। उस बन्धन से मैं इतना दुखी थी कि मरने की दुआ मना रही था। इतने ही में एक फारीगर की दृष्टि मुझ पर पड़ी, और वह मुझे अपने घर ले गया। सपोवन से छूटकर लक्षा में मुझे शरण मिली, यह सोच-सोचकर मैं बड़ी शिन थी कि उस कारीगर ने मेरा घाग-भल करके मुझे तपाया। चाकू की नोंक से मेरी स्वपा को छीला, और मेरा मुँह मोड़फर मेरे ऊपर रग- रोगन चदा दिया। कमों का फल भोग समझकर मैंने यह सब कुछ सहा। फिर उसने मुझे एफ सेठ के अर्पण कर दिया। उसके साथ साथ में रेलगाधी पर सगर हुई। इस परिवर्तन को देखकर मैं चकित थी, और भाग्य-लीला पर आश्चर्य कर रही थी। सेठ के साथ मुझे श्री रामेश्वर-धाम में शिवजी के दर्शनों का सु-अवसर मिला। भारत-माता के मुफुट से गिरफर फिर उसके चरण छू मैंने समझा कि अभी कुछ पुण्य शेष है। मलयानिल की पूत गन्ध का आनन्द लेती, दक्षिणी भारत का भ्रमण करती में सेठ के साथ अम्बई पहुँची। इस नगर में मैंने मनुष्य की बुद्धि का चमत्कार देखा। शान्ति और अशान्ति की तुलना करने बैठी ही थी कि स्टीमर में बिठाकर कराँची पहुँचाई गई। सेठ अपनी कोठी का निरीक्षण कर वहाँ से अपनी जन्म- भूमि जैसलमेर को चला। मार्ग मे मरुस्थल को धूल फॉकती, [ एक छड़ी की आत्म-कहानी moortoos PAN - . . . और ऊँट की पीठ पर चढी जा रही थी। उस समय मेरे मनस्ताप की सीमा न थी। विधि-गति प्रति बलवान' के सिवाय मेरे मुख से कुछ न निकलता था। इस रेगिस्तान में मेरे निर्वासन के तीन महीने राम राम करके कटे। सेठ फिर दिल्ली को चला, और अपने घ्यवसाय की धुन मे मुझे दिल्ली स्टेशन पर ही भूल गया। डिव्ये में कोई न देख पाया, तो एक कुली ने मुझे उठा लिया। वहाँ एक कवि की फरुरण- दृष्टि मुझ पर पड़ी, और उसने आठ आने पैसे देकर फुली से मुझे मोल ले लिया। मेरे जीवन के दिन कुछ फिरे। वह मुझे अपने साथ लेकर नैनीताल रहता है। मैं प्रात काल पर्वतीय प्रान्त में भ्रमण करती और सन्ध्या को सही-ताल की सैर फर पाती हूँ। वह एकान्त भ्रमण करता हुश्रा जब मुझे धुमाता चलता है, तो मेरे सिरे की नोंक पर उसकी दृष्टि एकाग्र हो जाती, और उससे उसकी कल्पना उडान भरने लगती है। उस समय उसके हृदय से जो भाव प्रसूत होते हैं, वे विश्व को नया सन्देश देते हैं। यह सुन सुनकर मैं भी फूली नही समाती है। वह भी मुझे प्राणों से प्यारी रखता है। अपने मित्रों के साथ वह कैलाश-यात्रा का विचार कर रहा है। यदि ऐसा हुआ, तो मैं फिर फैलाश-दर्शन कर सपूँगी, और उसे मान-सरोवर ले जाने के लिए अपनी सारी मौन-शक्ति लगा दूंगी, और यदि उसमे सफल हो गई, तो जन्म-भूमि के दर्शन ,
निबन्धादर्श]
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पा जाऊँगी। असर पार कवि के चरण पकड लूंगी और
अपनी करण-व्यथा से उमके हृदय को द्रवित र मान-सरोवर में
ऐसी डुबकी लगाऊँगी कि फिर न निक्लूंगी। सम्भर है मेरी
स्मृति में उस कवि के कुछ उद्गार भी निकल पडें , और मेरा न
होना होने से भी बढ जाय ।
१५-पशुओ के साथ कठोरता
विचार-तालिका:-
(१) पशुओं के आनन्दमय दृश्य ।
(0) पशुओं का सुख-दुख का ज्ञान ।
(३) गारों की दशा।
(४) दुधारू पशु।
(५) अमेरिका और भारत की तुलना ।
(६) सधारी व पशु।
(७) रक्त निकालने की क्रिया।
कुदक्ते हुए घोडों की गाडी में बैठकर चित्त कैसा प्रफुद्धित
होता है। फूलों और हरियाली से जगमगाते हुए जगल में जाते
हुए रथ के बैलो के धुंधरों की घोर कैसी श्रुति-सुखद होती है।
हष्ट पुष्ट गायों की दुहती हुई धार की पर्र मर्र ध्वनि मुँह में लार
ले आती है। धरती को छोडकर चलते हुए शिकारी कुत्तों की
उडान देयकर विनोद की सीमा नहीं रहती । सुनहरी और स्पहरी
-
[ पशुओं के साथ कठोरता Hotu -- भूलो के उपर रपे हुए रग विरगे हौदे सहित हाथी का झूमना देए हमारा भी मिर झूमने लगता है। ऐसे अवसरों पर हम पशुओं के साथ की गयी कठोरताओ को भूल जाते हैं। परन्तु, यह सिक्के का चमकता हुआ चेहराहै, उसकी दूसरी ओर कुछ और है। मूक पशु अपनी बात कह नहीं सकता। परन्तु प्रत्येक प्राणा सुख दुस का वैसा ही अनुभव करता है जैसा कि मनुष्य । पशु अपने शरीर को सुस पहुँचाना चाहते हैं और ज्ञान शून्य होने के कारण शारीरिक सुख ही उनका तो सर्वस्व है। मनुष्यता के विचार से न सही, तो उनकी उपयोगिता तथा सेनाओ के विचार से ही उनके प्रति सदय व्यवहार हमारा कर्तव्य है। इम कर्तव्य का पालन हम कहाँ तक करते हैं, इस पर तनिक दृष्टिपात कीजिए। गाँवों में जाइए , बैलो की दशा देखिए । दिन भर हल जोतना पानी सींचना, गाडी चलाना उनका काम है । परन्तु, उनके साने पीने की हमे कितनी चिन्ता है ? ठीक समय पर चारा देना वा पानी पिलाना तो विरले ही किसान जानते हैं। पानी के लिए तो उन्हें पोसरों में ही छोड दिया जाता है और कभी कभी तो वेचारो को कीचड मे से चूस चूसकर पानी पीना पड़ता है । काम किसा हाथ में एक काँटेदार छडी रहती है, जिसे मे चुभोता रहता है। कितने ही बैलो के लत ।
नियन्धादर्श] H0 - anwar - H ive Wre- पुट्ठा पर इस प्रकार के छेदा का छत्ता सा बन जाता है। तिस नकी खुराक के लिए साफ और पारीक भूसा भी नहीं, दान तो दर्शन ही यहाँ ? कभी कभी तो पेड़ों की पत्तियों में उनके कटते हैं। जरा बलहीन हुए कि उन्ह वेचकर फटने भेन दिए दुधारू पशुओं के साथ दूध देते समय के और ठार स के न्यवहार में याफाश पाताल का अन्तर है। स्वार्थका अक्छा उदाहरण कही ही मिले तो मिले । जहाँ पारागाह में, तो बेचारे धरती माता की गोद में कुछ सहारा पा लेते है। जमींदारा के बढ़ते हुए पेट में धारागाहों का पसि सभी सर जा रहा है । सो भूमि के टुक टुकड़े को जुता बनाने पर हैं। यदि उनका पस घले यो वे सोधियों भी सोना, चांदी, पी ताँबे पो पनाकर साय। परन्तु, भगवान् की लीला अमरी ऋषिमता के इन भक्तों का अधिकार परिमित है। जहाँ धारा- की कमी है, यहाँ के पशुओं पर घोर संकट रहता है। पुरे से धारा, सो भी भरपेट नहीं मिलती। जिनका दूध पी पीकर पुष्ट हुए, काम निकलने पर उन्होंकी इतनी उपेक्षा। सस हद है। उस समय हम इतना भी सो नहीं सोचत स्थि पुष्ट पशुओं का दूध ही हमारे लिए विशेष हितकर है। श्री दृष्टि से भी निर्मल पशु फैसे अधिक दूध दे सकता है ? सुना है कि अमेरिका में गायों का दूध दुईसे समय मि (एक मधुर बाना) धजाया जाता है। गाय उसकी ता - ११३ [ पशुओं के साथ कठोरता H4 मस्त होकर सारा दूध प्रसन्नतापूर्वक छोड देती हैं। जरा हमारे यहाँ की कथा सुनने के पूर्व हृदय को थाम लीजिए। कलकत्ते में गायों के छोटे छोटे वछडा को इसलिए मार डाला जाता है कि उनके वाँधने को स्थान कहाँ से आवे, और दूध का कुछ भाग भी उनके पेट में चला जायगा। उनकी पाल में भूसा भरकर गायों को धोखा दिया जाता है कि मानो उनका यथा जीवित है। यह तो पशुप्रो के अज्ञान से लाभ उठाने की बात हुई। अब और लीजिए। गायें प्राय दूधको चढा लेती हैं। इसलिए उनकी योनियों में उनकी पूंछ का झन्वा धंसा दिया जाता है और कोई नृशस तो अपना हाथ तक उसमें डाल देते हैं। इस क्रिया को वहाँ 'फका ' कहते हैं। इस क्रिया से दूध चढाने में वे असमर्थ हो जाती हैं। यह है हमारी गोभक्ति का एक नमूना। दूसरा लीजिए। कुछ दिनों तक केवल आमों की पत्तियाँ गाय को सिलाने से उसके पेशाव में एक प्रकार का हरा रंग पैदा हो जाता है, जो बडे मोल का होता है। इस लालच से अनेक गायों को केवल श्राम की पत्ती साने को दी जाती है। इसका फल यह होता है कि गाय थोड़े दिन पीछे मर जाती है। रिस रिस कर प्राण निकलना इसे कहते हैं। कहिए, अब भग वान कृष्ण के भक्त हम हैं, या अमेरिका के वे निवासी जो वाँसुरी की भाँति पियानो की तान सुनाकर गायो को सुस देते हैं ? तभी तो वे नित्य नया नवनीत साते और दूध की नदियाँ बहाते हैं .
निनन्धादर्श] - -- ५-Ana और हमारे लिए बन गये हैं वनस्पति घी, कोकोजिम, और सूभर तथा सॉपों तक को चर्तियाँ। क्या आपको पता है कि इलैए में एक गाय का मूल्य २५००१ तक है ? जाता है । सवारी और घोमे के पशुओं की दशा पर भी रोना आता है। किराये के घोडों में कितने ही ऐसे होते हैं, जो महादुर भोगत हैं। उन्ह राराक तो कम दी जाती है और काम लिया जाता है अधिक। यदि तेज न चतें तो बडी निर्दयता के साथ बहें पीटा । इस्केवालों को पोडो की रास में प्राय चमड़े के तस्मे बँधे रहते हैं। जब वे उन्हें धुमाकर मारते है तो घोडों के मर्म स्थान पर चोट लगती है। पैसा हृदय विदारक दृश्य है । इको वाला तो जोविरा के फेर में अन्धा पन ही जाता है, सवारियों भी अपना उत्तर-दायित्व नहीं समझती। पहले तो मरियल घोडों वाले शो में पैठना ही अधर्म, फिर पैसों के लोभ से बैठ भी गये तो जल्द हॉकने की पुकार मचती है। इस प्रकार बैठनेवाले भी पाप समाते हैं। इस अत्याचार से वे अधिकारी भी नहीं वच सक्ते, जो ऐसे इकों को किसी कारण से पास दे देते हैं। बोझे से लदे हुए थैला गयो आदि को देखिए। प्राय उनके पैर एक दूसरे से लगते हैं और उनमें लोहू मे भरे घाव हो जाते हैं, परन्तु उनका पीछा नहीं छोड़ा जाता। सामर्थ्य से अधिक लदाई के साथ-साथ डडे का प्रहार मानो उनकी सेवा का उपहार होता है।
११५ [ पशुओं के साथ कठोरता - Hasan. -- M 0 4u सच तो यह है कि इस दिशा में हमारा नैतिक पतन इतना हो गया है कि हम मनुष्य कहलाने योग्य नहीं रहे । माँस के लिए भी पशुओं का बलिदान किया जाता है। इस तुन्छ जीवन के लिए यह कठोर कर्म कहाँ तक उचित है इसे तो विचारशील ही जानें, परन्तु मारने की विधियों पर विचार करना आवश्यक है। हमने अपनी आवश्यकताओं के पीछे जीर का तो कुछ मूल्य ही नहीं रहने दिया। इतने पर भी हमारी सभ्यता की डीग वड़ी भारी है। अलमोडा के पास एक पहाडी है। यदि मैं भूल नहीं करता तो उसका नाम मोती पहाडी (Pearl-Hill) है। वडा सुन्दर नाम है और काम ? "विप-रस भरा कनक घट जैसे" वहाँ जीवित पशुओ का रक्त निकाला जाता है । क्सिलिए सो पता नहीं । सरकार की ओर से वहाँ एक कार्यालय है, जहाँ पशुओकों खून मोटा ताजा किया जाता है । फिर एक मशीन द्वारा उनका रक्त निकालते हैं। सुना है रक्त निकलते समय पशुका काँपना रौरव नरक की यत्रणा की सुध दिलाता है । रक्त निकालने पर फिर उसे पून खिलाया पिलाया जाता है, और मोटा होने पर फिर वही पाशविक क्रिया की जाती है। दो तीन वार मे बेचारा पशु प्राण दे बैठता है। कहा जाता है कि रक्त निकालने का यह सुधरा हुआ ढग है। अधिक से अधिक रक्त चूसने की इस क्रिया को हम क्या कहें ? इसमे सन्देह नहीं कि यह मनुष्यता का नगा नाच है।
निरन्धादर्श] Nason- -uaemovate १६-कर्नव्य पूर्व विचार:- (१) पर्वव्य की महिमा और क्षेत्र । (0) कहना और करना, फर्वन्य की मूर्तियाँ। (3) कर्तव्य की कठोरता, राम, प्रताप, हरिश्चन्द्र। (४) कर्तव्य की मिठास। (५) कर्तव्य-धीर। क्तव्य की महिमा अपार है। इसके मर्म को जान लेना जीवन के तत्व को पहुँच जाना है। मनुष्य मात्र का जन्म कुछ करने के लिए हुआ है और कुछ कर जाना ही कर्तव्य का पालन है। इस प्रफार करनी के अवसर जीवन में प्राय' आते जाते ही रहते हैं। जिस अवसर पर जो करणीय है, यही हमारा कर्तव्य है, धर्म है। करणीय कमां की मरया निश्चित नहीं की जा सकती। अनेक सत्कार्य हैं, जिनमें कर्नव्य-पालन के अवसर पाते हैं। अपनी अपनी शक्ति के अनुमार उन सत्कार्यों का पूरा करना ही हमारा वर्तव्य है। उदाहरण के लिए, भूखे को अन्न देना कर्तव्य है, गिरते को उठाना कर्तव्य है , दीन-दुखियो की महायता पर्तव्य है , साधुओं की रक्षा और पापी को दण्ड देना कर्तव्य है, न्याय पर दृढ रहना और दया दिखाना कर्तव्य है , सत्य, स्वन्य, धर्म, न्याय वा प्रण पर बलि हो जाना तन्य है। इसी प्रकार और भी ११७ [कर्तव्य H न H समझिए। इन कर्तव्यों में कुछ कर्तव्य सामान्य हैं, जो मनुष्य जन्म लेने ही के कारण हमारे धर्म हैं और कुछ एसे हैं, जिनका भार हमने स्वयं अपने ऊपर ले लिया है। दूसरे प्रकार के कर्तव्य हमारे विशेष कर्तव्य कहलाते हैं। जैसे, विद्याध्ययन प्रत्येक व्यक्ति को उचित है, परन्तु वही विद्यार्थी का परम कर्तव्य है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की धारणा के अनुसार कोई कार्य विशेष उसका प्रधान कर्तव्य बन जाता है। कहना जितना सरल, करना उतना ही कठिन है। इसलिए कर्तव्य वीरों को कठिनाइयों को पार करने के लिए सदैव कटिबद्ध रहना पड़ता है। उनका जीवन उनके कर्तव्य में हो जाता है। उनका सुस, उनका प्रानन्द, सर कुछ कर्तव्य के अर्पण हो जाने । हैं और कर्तव्य करके उन्हें एक अलौकिक आनन्द का अनुभव होता है,जो इहलोक के आनन्दों से कहीं बढकर है। अपने चारो ओर ही आँप खोलकर देखिए, कर्तव्य की मूर्तियों मुस्कुराती हुई सडी हैं । सूर्य, चन्द्रमा, तारे, नक्षत्र, पृथ्वी, पवन, जल, अनल सर अपने-अपने काम में ऐसे लीन हैं, मानों इन्हें अपने तन की सुध ही नहीं। क्या मजाल, इनके वर्तन्य में तनिक भी ढील हो जाय वा थोडी-सी देर भी वे थककर बैठ जायें । जहाँ डट गये, डटे हैं। कर्तव्य के सामने फन खिलता, अपनी गन्ध छोडता और मुरझा जाता है। चाहे वह उपनन में हो, चाहे निर्जन वन में, चाहे उसे कोई देसे, चाहे न देये, वह अपने कर्तव्य में मम है ।
नियन्यादर्श] AM --~-- muRe- है कर्तव्य की कठोरता भी बडी विलक्षण है। साधारण दृष्टि में तो उसका प्रदर्शन अनौचित्य की मीमा को पहुँच जाना है। परन्तु, जो कर्तव्य पर श्रारूद है, वही जानता है कि उसे किन भावनाओं से प्रेरित होकर वैसा करना पड़ता है। अग्नि का धर्म जलाना। इम कर्म में त्रुटि न करना ही उसका कर्तव्य है। फिर यदि गोद का पालक भी भूल से उसके पास पहुँचता और मे लेने को हाथ बढाता है, तो अग्नि उसे तुरन्त जला देना है। इससे अधिक निर्दयता और क्या होगी ? परन्तु, प्रकृति के नियमो में इतनी अटलता न हो, तो उसका न्यापार ही चन्द हो नाय । तनिक ढील के पीछे न जाने क्या में क्या हो जाय ? वर्तव्य नो न करा दे मो थोडा है। राम के मामने निरपराधा, मती- शिरोमणि, सगर्भा सीता पड़ी हैं और वे हदय पर वस रखकर लक्ष्मण को उनके परित्याग की आज्ञा देते, तथा लक्ष्मण से पालन करते हैं। महाराना प्रताप के रामकुमार और रानकुमारी वन में वृक्षों की छाल के आटे की रोटियों पा रहे हैं, उन्हें भी बिल्ली छीन ले जाती है और वे पत्थर बन बैठे देखते हैं। राना हरिश्चन्द्र का प्राणाधार पुन मर जाता है, गनी शैव्या उसे मरघट मे लाती है , उमरे पास केवल एक ही काल है, उसका शिलाप मुनकर पत्थर पमोजते और वृक्ष ग देते हैं, परन्तु पभ्यत और लकुट लिये राजा श्रावे और बिना कर चुकाये उसकी मनर-निया भी नहीं होने देते हैं। अभी अभी कुछ ही महीनो की यात है, .
११९ [कर्तव्य . आया अटलाटिक महासागर के वरमूदा द्वीप समूह में एक भारी तूफान , जहाज डूबने लगा। रक्षा के लिए नावें श्रागईं, परन्तु मख्या में कम थीं। जहाज का कप्तान और उसके सहायक ३५ कर्मचारी, तब तक नावों पर आकर प्राण बचाना नहीं चाहते, जब तक कि एक भी यानी शेप है। फलत सब के सब अपना काम करते हुए सागर के अनन्त गर्भ में सदा को सो जाते हैं। इस आत्म-बलिदान का कारण क्या है ? केवल कर्तव्य की प्रेरणा। कर्तव्य में ऐसी क्या मिठास है, जो इन सब कठोर कर्मों को करा डालती है ? हाँ, उसमे कुछ ऐसी ही मिठाम है, जिसके वर्णन मे वाणी मौन है। कर्तव्य पालन को एक लगन होती है और उस लगन म अपना पराया नहीं देखा जाता । उस मार्ग में सकीर्णता नहीं, उसका पथ सर के लिए खुला हुआ है। उसकी प्रेरणा परमात्मा के द्वारा अन्तर-ध्वनि से होती है, उसकी पूर्ति शान्ति तथा मतोप लाभ होता है। चार पाने का मजदूर काम करके कैसी सुख की नीद सोता है। प्रजा को सुसी करके राजा के मनोरजन की सीमा नहीं रहती। रोगी को चगा करके वैद्य वा डाक्टर का हृदय छलाँगें भरने लगता है। पानी में डूबते हुए को बचाकर तैरनेगला अपने को धन्य मानता है। शिष्य को विद्या वितरण कर प्राचार्य को अनन्त आह्लाद होता है। प्रतिद्वन्द्वी को पछाडकर पहलवान् प्रफुलित निबन्धादर्श] १२० 4 N 4- - 04- Answer- हो जाता है। इनका सुख यदि इन्हींसे पूछा जाय, तो वे भी कह न सकेंगे, अनुभन ही कर सक्त हैं। जो अपन कर्तव्य पालन में जितना कुशल है, जितना सचेत है, उसकी महिमा उतनी ही महान है। उसकी कीर्ति भुवनव्यापिनी और उसका चरिन सुर-चन्द्य होता है। उसके चरण चिह्नो को देस औरों को दिशा सूझती है । " महाजनो येन गत स पन्था अर्थात् जिस मार्ग से बड़े जन गये हैं वही मार्ग है, यह मर्यादा ऐसे ही पुरुप पुङ्गवो द्वारा स्थापित होती है। वे ही जाति, समाज और राष्ट्र के अग्रगन्ता होते हैं। ऐसे ही कर्मवीर मानव-कुल के दीपक होते हैं। वे कर्तव्य-पालन ही से असम्भव को सम्भव कर दिपाते और जीवन में विजय पाते हैं। १७-आलस्य . विगर सची:- (१)"अजगर करें न चाकरी, पछी करेंन काम " (0) निद्रा का अर्थ, अर्जुन, नेपोलियन, लक्ष्मण, कुम्भकर्ण । (३) आलस्य के सखा, सिंह का पुरपार्थ । (४) दैनिक जीवन, नगर और गाँव की दशा । (५) अपनी सेवा , बुडरो निलसन, गाँधी। (६) हमारी प्रतिज्ञा।
१२१ [ भालस्य "अजगर करें न चाकरी, पछी फरें न काम । दास मलूका कहि गये, सन के दाता राम ॥" ऐसी ही उक्तियों हैं, जो आलसियो के मुख से सुनी जाती हैं। अकर्मण्य जीवो को उन्हें सुनकर सतोप भी हो जाता है। परन्तु, उनमे तत्व कितना है इसकी ओर से वे आँखें मूंद लेते हैं। ऊपर के दोहे मे यह ठीक है कि अजगर चाकरी नहीं करते, परन्तु पडे- पडे मिट्टी भी तो साते रहते हैं, उन्हे हमारे-से दिव्य पदार्थ भी तो नसीव नहीं होते। इमीसे प्रकट है कि अजगर का जीवन धूल चाटने का जीवन है। पत्तियो का काम न करना हमारी समझ में नहीं आता। हाँ, मनुष्य महाशय ने यदि समस्त सृष्टि को अपनी ही बपौती समझ लिया हो, तो सभव है कि पक्षी कुछ नहीं करते और पराई सम्पत्ति पर हाथ फेंकते हैं । हमे तो पक्षियो का जीवन पुनीत जीवन दृष्टि आता है, हम उसमे पद-पद पर कर्मशी- लता के लक्षण पाते हैं। उप काल में ही सदैव उठकर चहचहाना आलस्य को ढकेल देना नहीं तो क्या है ? दाने-दाने को चुनकर साते हुए फुदकते फिरना स्फूर्ति के झूले में झूलना नहीं तो क्या है ? वही फल-मूलादि पाना, सो भी वावन तोले पाव रत्ती, क्या पि-जीवन की सालिकता की समता नही ? अमेरिका का महान् आविष्कर्ता एडीसन दिन रात में केवल दो घटे सोया करता था, सो भी चार वार में आधा आधा घटा करके वह कहा करता पू भोजन करता हूँ। था कि मैं
निबन्धादर्श]
१२
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रहता हूँ। उन्ही चिड़ियों को अपने घेरे में घसीटना, हम तो
कहगे, पालसियो की अलस-कल्पना का एक नमूना है।
निद्रा कर्मवीरों को निजाम देती, और परिश्रम-जनित बालस्य
का दूर हटाकर उन्ह चैतन्य बना देती है। वही आलसियों को
शरण-स्थती वनकर उन्ह 'शनैश्चर' वनाती है। अर्जुन को गुहा
केश कहा जाता था। गुडाकेश उसे कहते हैं जिसने निद्रा को
वशीभूत कर लिया हो। नेपोलियन सात सात दिन तक लगा
नार घोडे की पीठ पर चढा रहता था। जब भगवान राम और
देवी मीता शयन करते थे, तर धनुप वाण चढाये और वीरासनपर
बैठे हुए उग्रीव लक्ष्मण जागते दृष्टि प्राते थे। तभी तो
विजय श्री उनके गले में जयमाल डालती थी। उधर कुम्भकर्ण,
रावण आदि का वृत्त क्सिसे छिपा है ? "उम्भकर्णी निद्रा" एक
कहावत बन गई है। जागृति वल की और पालस्य दैत्यत्य की
पहिचान है।
आलस्य के आत ही गेग, दारिद्रय, विनाश, मलिनता, परा
धौनता श्रादि सके ससा भी एक-एक करके आ जाते हैं।
आलसी की इन्छाशक्ति निर्मल होने लगती और उसे अपनी
शक्ति में अविश्वास उत्पन्न हो जाता है। छोटे से छोटा काम भी
उमे पहाड प्रतीत होता है। वह भाग्य-वादी बन जाता और
पुरुषार्थ को दूर हो से प्रणाम करता है। वह नहीं मोचता कि
"न हि सुतस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुसे मृगा ।" अर्थान् सिंह जैसे
१२३ [आलस्य Phonroen *HOPartner Hometha+Punar पुस्पार्थी के मुँह मे भी उसके सोते समय पशु अपने आप नहीं चने जाते। बड़े से बडे पराममी को भी परिश्रम से ही मन कुछ मिलता है। अपने नित्य-जीवन मे ही हम आलम्य के कारण कितने कष्ट उठाते हैं, मोचने की बात है। भगवान् के विना मूल्य दिये हुए श्रमूल्य पदार्थ शुद्ध जल, वायु आदि का ही सेवन हममें से कितने करते हैं? यदि प्राण धारण करने के लिए वे आवश्यक न हा तो, हम तो उन्हें छोड़ ही हैं। हमारे सामाजिक-जीवनके अनेक दुग्यो का मूल भी यही बालस्य है। गाँवों के सादा जीवन में भी आलम्य का इतना प्रवेश हो गया है कि लोग पडे पडे हुका गुड- गुडाते रहेगे, परन्तु घरी को भलीभाँति लीपेंगे पोतेंगे भी न । बेगें की सडॉयद सू पते रहेंगे, परन्तु चार पार पागे वदार कूड़ा न डालेंगे। शहरों की गन्दगी का तो वर्णन न करना ही अच्छा। चुगी का मगठन न हो, तो 'नगर' का अर्थ 'नरक' सोलहो आने ठीक उतरे। चुगी के होते हुए भी बेचारे गरीबों की गतियों में जाइए, वहाँ नरक मे क्म यातना नहीं। आलस्य इनना कि अपनी बला दूसरों के सिर पर फेंक देना चतुराई सममी जाती है और कोसा जाता है सरकार को, भाग्य को, कलि- काल को। औरो की सेवा तो दूर, हम अपने शरीर को भी फभी कभी उतार फेंकना चाहते हैं। कहार नहीं पाया, बैठे हैं। क्यों नहाय, निनन्धादर्श] १०४ 344 H -40-4rmwarwal शान विगड़ जायगी । गन्दगी रहे, रहने दो, गेग प्राए, आने दो। हम बडे आदमी हैं, काम करना अपना काम नहीं। कैसे तुच्छ विचार हैं ? अमेरिका का प्रेसीडेंट वुडरो विल्मन अपने कमरे में आप झाडू लगा सकता है, महात्मा गाँधी अपना पुरता श्राप धो सकते हैं, परन्तु, भारतीय यालक भी अपना काम आप करते राजाने लगे हैं। यडपन का यह भार रह गया है, और पराधी- नता प्राण निकाले लेती है। "श्रात्मदासा तपस्विन" अर्थात् तपस्वी अपने सेवक आप होते हैं , आर्यों का यह आदर्श था । परन्तु, अब हम तपस्वी नहीं रह गये, भोगी और फलत रोगी हो गये हैं। आलस्य ने यहाँ अड्डा जमा लिया है। यदि इस पापो से पीछा छुडाना है, तो आज से हम प्रतिज्ञा करें कि कभी आलस्य न करेंगे। प्रात काल आँप खुलते ही शल्या को छोड़ार पडे हो जाये और विस्तर लपेट कर रख दें। अपने नित्य-कर्म अपने हाथ से करें, उनमें पराधीन न हो। हाथ- पावों को हिलने दें और शरीर मे फुरती पाने दें। अपनी इन्छा को बलवती बनायें और मकल्प पर दृढ रहें। अपने शरीर, अपने मन पर स्वाधीनता मान करें। तभी हम सच्ची स्वा. धीनता पाने के अधिकारी होगे और हम न केवल अपना धरन औरो का भी कल्याण कर सकेंगे। परमेश्वर से नित्य हमारी पहली प्रार्थना यही हो कि भगवान । हमें आलस्य से सदैव दूर रखिए।
१०५
[आदर्श का प्रभाव
म.
१८-आदर्श का प्रभाव
विचार सूची:
(२) मनुष्य उन्नतिशील प्राणी है।
(२)मानुपी बुद्धि की विशेषता ।
(३) आदर्श का महत्व ।
(४) आदर्श का क्षेत्र , एकलव्य का दृष्टान्त ।
(५) आदर्श आत्माएँ, नेलसन, प्रताप, नेपोलियन, बुद्ध,
ईसा आदि।
(६) आदर्श के पान।
(७) प्रकृति का परिवर्तन ।
मनुष्य उन्नतिशील प्राणी है। यद्यपि चिडियो के बच्चों की
भाँति वह पस निकलते ही विना सिसाये उड़ नहीं सकता तथापि
अपनी बुद्धि के बल से उसने जिन वायुयानों का आविष्कार किया
है। उनसे वह न केवल उडता है, किन्तु अनेक विस्मय-जनक कार्य
। उसके ज्ञान का विकास धीरे धीरे, परन्तु दूरगामी
और चिरस्थायी होता है। मानवीय ज्ञान के छिपे हुए अङ्कुरो
के ऊपर से ज्यों ज्यो अज्ञान का परदा हटता जाता है, त्यो त्यो
उसकी शक्तियाँ प्रकाश में आती जाती है। इस विकाश में उस
के आसपास की परिस्थितियाँ, सगीति शिक्षा, विचारों का आदान
करता
निरन्धादर्श] १२६ 4-4-PRANKanon4.0 49-Defin -- प्रदान, अवसरा का सुयोग, और आदर्श का प्रभान इत्यादि भनक साधना का हाथ रहता है। या तो, पशु पक्षिया को भी सिमाने से वे बहुत से काम कर ने लगते हैं। तोते राम रट लेते हैं, वन्दर, रीछ नाच-तम्शे दिखाते हैं, घोडों में नई नई चारों आ जाती हैं। परन्तु, ये सर मनोविनोद की सीमा तर ही रहत है। मनुष्य की बुद्धि पर शिक्षा का निचित ही प्रभाव पड़ता है । उसको सोती हुई शक्ति में चम त्कार उपन्न हो जाता है। जैमे सूर्यन्त मणिपर प्रकाश की किरणें पड़ते ही वह प्रज्वलित हो उठता है, वैसे ही मानव बुद्धि में ज्ञान के आलोक के स्पर्श से एक अपूर्व स्फुरणा उत्पन हो जाती है। उसकी दशा वैसी ही होती है, जैसी कि जल की तरङ्गों पर तैल की पूँद की । वह प्राप्त की हुई शिक्षा को न केवल प्रहण ही करती, वरन उसे बढा पढाफर निविध प्रकार से व्यक्त करने लगती है। इस निया में वह कभी कभी गुड-कपी गुरू की चेली शकर बन जाती है। विचारगीलो की इस बुद्धि-विचक्षणता के कारण ही तत्वज्ञान को निति होती रहती हैं। विकास की यह गुम शक्ति ईश्वरीय प्रसाद है । इसके उभारने में श्रादर्श से बढकर अन्य कोई साधनकाम नहीं करता । गुर जन शिक्षा देता है, तर शिष्य की बुद्धि की पहचान करता है और उसी के अनुरूप शिक्षा की योजना का कार्य गुरु के ही ऊपर, निर्भर रहता है। मम्भव है इसमें गुरु से भूल हो जाय, और १२७ [ आदर्श का प्रभाव उसका प्रभाव अभीष्ट के प्रतिकूल हो। परन्तु श्रादर्श में इज्या- रूप गुणों का चुनार सर्वथा सोपांगाले के अधीन है। जिस ओर उसकी देवी शक्तियों का गुयार हो, उधर ही उसे मार्ग मिल जाता है। सोसने का यही ढह स्वाभाविक है, इसलिए यह संक्डो उपरेशों से यदमर है। इसके अनिरिक्त कोरे उप-शों के रूप की कल्पना ही सरनों पाती है, और आदर्श माय शिक्षा माना सजीय होकर मामने सढी हो जाती है। आदर्श साकार प्रतिमा प सामान है और कोरा उपदेश निराकार श्वर फ तुल्य । इसलिए पहला सुरोध है और दूसरा दुरधिगम्य । आदर्श या क्षेत्र सन है। मुटियों से लेकर प्रासादों तक, अपढो से लेकर धीमानी तक इमकी महिमा समान है। आचार्य द्रोण के धनुर्विशान कौशल की चर्चा जय यन प्रदेश में पहुँचौ, नो भोले-भाले एक्तव्य नामक भीत के हृदय में महत्वाकाता या अद्गुर उभर आया। उमने आचार्य के चरणों पर शीश जा मुराया और धनुर्विद्या शिक्षण की जिज्ञासा प्रकट की। यद्यपि पशाभिमान ने उस दीन की उत्कण्ठा को ठुकरा दिया, तथापि आदर्श ने उसकी बाँह पकड़ी। यह गुरु द्रोण की प्रतिमा बना- कर श्रद्धा सहित तीर छोडने का अभ्यास करने लगा। फल यह हुआ कि उसने कालान्तर में प्राचार्य के प्रिय शिष्प तथा अद्वि- तीय धनुर्धर अर्जुन की समता कर दिखाई। यह देख द्रोण स्तम्भित रह गये। गुरु का नाम पृछने पर भेद खुला तो उनके
किया
१.८
भान्वी मीमा न रही। भार्ग के प्रमाण कायद एक
যাল পরে ইষ্টি ইন জােয় বল মা আর
नगर निसनाटा है।
ग्मिक मामने च आरी है, वही ऊँचा चढ सस्ता है।
यी नहीं, वह अपनी पविनावस्था में भी आदर्ग की ओर देखता
श्रा अपने को ममाने रह सकता है। आदर्ग पुस्प किसी
निशप देश वा नावि के नहीं होते, वे मर हैं। उनके गुण
ममन्त मंमार की सम्पचि हो जाते हैं, वे जान के जातीय धन
है 1 क्या रिवर मलमन का पराक्रम केवल इंगलैंड तक ही परि-
मिव है ? क्या महाराना प्रताप को धीरता और वीरता केवल
हिन्दुओ की ही सम्पत्ति है ? क्या नेपोलियन का अदम्य उत्साह
माम काही अधिकार है ? क्या महामा युद्ध, ईसा, मुहम्मद
आदि के मिद्धान्त एकदेशीय है। कदापि नहीं, इन आदर्शों से
ममन्त मानन-जाति का उपकार हो रहा है। इनकी ओर प्रत्येर
होनहार व्यक्ति की प्रॉमें उठती हैं। इनकी प्रात्माएँ भूतकाल
के गर्भ में सो नहीं गई, वे भविष्य के लिए भी वैसा ही मन्देश
दे रही है, जैसा कि उन्होंने अपने जीवनकाल में दिया था। ऐसी
ही पामाओं के पवित्र मौरभ मे वायुमरल परिपूरित हो रहा
है,निसम मॉम
होती हैं।
श्रादर्श के इम
। कि वह
भी आदर्श-जीवन धना
मनोवृति
*
[ आदर्श का प्रभाव के अनुकूल आदर्श का चुनाव प्रत्येक व्यक्ति का फर्तव्य है। हाँ, अपनी शक्ति की ओर भी ध्यान रखना चाहिए। जिस प्रकार निजली वादलो के ही गर्भ में छिप सकती है, उसी प्रकार आदर्श को विद्युन्छक्ति को भी मेघनगम्भीर पुरुप ही धारण कर सकते हैं। केवल आदर्श के दर्शनों पर मुग्ध होने से काम नहीं चलता । उसकी प्राप्ति के साधन-स्वरूप दृढ सकल्प, कर्मशीलता, अध्यव- माय आदि गुण भी होने चाहिए। जैसा पात्र होगा, वैसा ही प्रभान उस पर आदर्श का पडेगा। क्या बुरी प्रवृत्तिवालों को बुरा ही आदर्श हूँढना चाहिए, यह भी एक प्रश्न हो सकता है। जीवन में कभी-कभी ऐसे अव- सर आया करते हैं कि प्रवृत्तियों में घोर परिवर्तन हो जाता है। महर्षि वाल्मीकि का उदाहरण सबके सामने है। किस प्रकार एक घटना ने उनको व्याध से ऋपि बना दिया। यदि बुरी वृत्ति- वाला भी अच्छे प्रादर्श को ग्रहण करेगा, तो उसकी प्रवृत्ति में परिवर्तन प्रारम्भ हो जायगा , विचारा की शुद्धता उसमे आने लगेगी और यह अपने आदर्श का उपयुक्त पात्र बन जायगा। प्रवृत्ति के अनुकूल आदर्श हुँढने से यह अभिप्राय नहीं कि दुर्गुणों का आदर्श हूँढा जाय। पवित्र भानना, उन्नति का प्रथम साधन है, दर्गुण तो पतन के पायक हैं। वीरता, देशभक्ति, सत्यता, दानशीलता, सेवा, दया, पवित्रता आदि गुणं है, जो श्रादर्श के . प्राण हैं। आदर्श में गुणों के साथ, h भ-
निबन्धादर्श ]
१३०
MAP
हाती है। वही गुण हमारी प्रवृत्ति का पथ प्रदर्शक और हमारी
उनति का हेतु होता है।
१६-उत्साह
विचार-सूची :-
(१) शरीर की चेतनशक्ति , उसका प्रभाव ।
(0) उत्साह ही जीवन, अनुन्साह ही मरण है।
(३) उत्साह मे विश्वास, आनन्द का श्राश्रय ।
(४) अभिमन्यु, नेपोलियन, लव, कुश ।
(५) पुरुप-सिंह, परिणाम ।
कभी तो हमारा हृदय काम करने के लिए हिलोरें लेने लगता
है और कभी हम निष्क्रियता की ओर मुक जाते हैं। यह क्यों ?
कारण यह है कि हमारे शरीर में जो चैतन्य शक्ति है, उसके
जाप्रत रहने पर तो हृदय मे उमड़ें उठती हैं और जब वह किन्हीं
अन्य चेष्टाओ से दर जाती है तो शिथिलता आने लगती है।
यो तो जातक प्राण शरीर में है, हृदय की धडकन यन्द नहीं हो
मक्ती , परन्तु उसमें ठती हुई उमङ्गों के समय के कम्पन और
चेष्टाशून्य समय के फम्पन में वडा भारी अन्तर है। एक्म
चेतनता का, और दूसरे में जडता का निवास है। चेतनता की
इम अवस्था को ही उत्साह की अवस्था कहते हैं।
१३१ 4404 UN - उत्माह ही जीवन और अनुत्साह ही मरण है। उत्साह से भरा हुआ हृदय भवसागर की याधाओ की चिन्ता न करता हुमा, इस प्रकार आगे बढ़ता है, जैसे कोई जलयान समुद्र की अनन्त जलराशि पर लहराता हुया जा रहा हो। यह जीवन को सेल समझता है और सदैव विजय की ही आशा रखता है। इसके विपरीत, उत्साहहीन पुरुप, जीवन-जरानिधि में पड़कर अपने हाथ- पाँव चलाना भूल जाता और हुप् हुप् करता हुआ रसातल फी ओर जाता है। पहला कर्मवीर सिपाही की भाँति कमर कसे हुए निर्द्वन्द्व घूमता है, दूसरा फायरता का फवारा लिये हुए रक्षा का स्थान ढूँदता है, अनुत्साही की आँसों के आगे सदैव अँधेरा ही अँधेरा रहता है, उसे सूझना ही नहीं कि किधर जायें। अपना जीवन तक उसे भार हो जाता और ससार उसे असार प्रतीत होता है। ऐसे ही पुस्पों को जीवन्मृत कहते हैं, अर्थात् वे जिन्दा ही मुर्दा हैं। जिन्हें उत्साह की शक्ति में विश्वास है, वे सदैव साहस का सहारा लेते हैं। कर्म ही उनका विशाल क्षेत्र है, और निरन्तर उद्योग ही अमोघ अस्त्र । वे विफलताश्रो से घबराते नहीं, वरन् उनसे पाठ सीसकर दूने उत्साह से काम करते हैं। सिद्धि उनके पीछे-पीछे चलती है। पराये मुस की ओर देसना वे जानते ही नहीं। अपना मार्ग वे आप ननाते और दूसरों के लिए उदाहरण बनते हैं। उनके फूल के समान खिले हुए चेहरे
सिधारी]
-
को देखकर लोगों को प्रममता हाती और वनो र मार्ग
है। 31मी पार-दान, पान-पान रायग भाको मत
दिराई दनापौर हारे माप गल में पास भी पनगी
यन जाते हैं। यजीया मापी युगपुन , भिम पुरीन
स्थर म माठी पदन-पान मगहै।
पारगड़े महारपिया समचालित कौरव-गना के गागा जय
भीम और युधिष्ठिर सय मदोगाद हो गये हैं, सप गाला वर्ष
का अभिमन्यु पाज्यूह भेदन के लिए भागे बदाया। पीनियन
না দিন am বাঃ কী থাং কৃষ্টে স ব গ য়ী
तरफ जा टूटा मा। पानक ल्य और सारा ने जादिनी रामको
सेना फेस मा दिये थे। क्या आपने कभी विधार किया
है कि यह फिम शशि का प्रभार या' अक्षम्य अमाह की
ही गदिमा थी। यदिान होना यो भाग यापुसानों में
उड़त दुए आकाशगरी योर अपने पगें में पो होये। इस
उत्साह के पी चिनने "प्रपन प्राग्य पर नहीं पा पेठे। परन्तु,
बमम पोरों को प्रमाद नहीं हुमा, बरन उनका साइम पर
रहा है। रमाही पौर सदैव प्राणी को येशी पर कर काम
किया करते हैं।
ऐगे पुरप सिहों के विचार और संकल्प हद होते हैं। माइ
का पल उनके रोम-रोम में समा जाता है। रदवा रूपी कपच
और उत्साह रूपी शब रोफर वे मासिक दुर्पलवानो की सेना
१३३
[दरिद्रता
--
LAL
M
.
Poonam -
RomansooneNasana
का सहार कर देते हैं। कार्य करानेवाली यदि कोई शक्ति है, तो
अदम्य उत्साह ही है। यही उत्साह सद्धि, सिद्धि, तथा धर्म,
अर्थ, काम, मोक्ष चारों फलों का दाता है। यही मानव-हृदय
में निवासकर बुद्धिपूर्वक कार्य करता हुआ, आत्मा को प्रकाशनान
बनाता है। यही पतितो को उठाता और मृतकों को जिलाता है।
२०-दरिद्रता
पूर्व विचार :
(१) दरिद्रता का तिरस्कार ।
(२) दरिद्रता के दारुण दुस, विदेश में भारतीय कुली।
(३) "नगी क्या नहाय, क्या निचोड़े।"
(४) शारीरिक और मानसिक पवित्रता ।
(५) दरिद्रता का उजला अग ।
(६) दरिद्र नारायण
दरिद्रता का वो नाम हो चुरा। इस पिशाचिनी के पाश मे
पडकर, जो दशा होती है, उसकी तो कल्पना करते समय भी
रोमाञ्च हो आता है। उसके वेश मे ही मलिनता, धृणा, दीनता,
दुर्वलता, दुतकार, तिरस्कार आदि का निवास है। दरिद्र को दूर
नहीं जाना, उसके घर में ही उसका अनादर होने लगता है।
वन्धु-बान्धव और मित्रमण्डली तो पीछे, उसके पुत्र क्लब तक
उसका मुख देखना नहीं चाहते। नीचातिनीच से लेकर नरपाल
निरन्धादर्श] १३४ तक इसके वश में होकर धूल खा जाते हैं। इसके फेर में पहर पडे-बडे धीरों का आसन हिल जाता, बुद्धिमानों की बुद्धि चकरा जाती और बलवानों की नसें ढीली पड़ जाती हैं। उनकी आँसों के आगे अन्धकार छा जाता और ये किंकर्तव्यविमूढ हो जात हैं। दरिद्रता का दारुण दुस ज्ञान को हर लेता और मनुष्य को निकम्मा कर देता है । दरिद्र व्यक्ति के चेहरे से, उसकी आँसों से, उसकी चाल से, उसकी बातों से और उसके व्यवहार से, ऐसी दीनता टपक्ती है कि उसका प्रभाव चारों ओर छा जाता है। वह जहाँ जाता है, करुणा उसके साथ-साथ चलती है। उसे देस- कर दया आती और देखनेवालो पर उदासी छा जाती है। किसी जाति वा देश की दरिद्रता देसकर तो आठ आठ आँसू रोना पड़ता है। भारत और भारतवासियो की दशा, कहाँ कहाँ हमारा सिर नीचा नहीं कराती ? हमारे पेट को तिल्ली इतनी बढ़ जाती है कि ठेस लगते ही फट जाती है। तपेदिक, मलेरिया, चेचक, हैजा, प्लेग आदि के तो हम आहार हैं। ये मुंह फाड़ फाडकर हमारे ऊपर दौड पडते हैं। विदेश मे जाइए, कुलियों के वेश में हमारी दरिद्रता मारी-मारी फिर रही है। वहाँ हम कोई राष्ट्र ही नहीं, ब्रिटिश साम्राज्य के एक अग हैं। जब हम अपने घर में हो दास हैं, तो बाहर की बात ही क्या ? वहाँ हमारे लिए ऐसे नियम बन रहे हैं कि हमारा प्रवेश ही वहाँ कठिन हो चला है।
१३५ [ दरिद्रता . मजदूरी के लिए हम और उपभोग के लिए वे, जिन्होंने हमारे ही हाथा से उन भूमियो को जगल से उपरन बनाया है । 'नगी क्या नहाय, और क्या निचोंडे ?" ठीक है। दरिद्रो के मनोरथ भी मन के मन ही में रह जाते हैं। उनकी काम करने की शक्तियाँ मन्द पड़ जाती हैं। अभ्युदय और उत्थान की लहरें उनके मस्तिष्क में पानी की भाँति उठती और वहीं विलीन हो जाती हैं। वे क्या करें? कोई व्यापार हाथ में लें तो धन चाहिए, कोई उद्यम करें तो साधन चाहिए, सेती करें तो लागत चाहिए। कोई काम ऐसा नहीं, जो विना धन के पूरा हो सके। युग ऐसा है कि पूँजीपतियों की हो तूती बोल रही है। श्रमजीनी- दल मगठित हो रहा है, जो इसी दरिद्रता के कष्टों के अनुभव का फल है। परन्तु, कोरे सगठन से दरिद्रता दूर नहीं हो सकती। अपने पैरो आप सडा होना होगा । दरिद्रता का कारण केवल धनाभाव ही नहीं, शारीरिक और मानसिक दरिद्रता भी कुछ कम नहीं है । शारीरिक दरिद्रता के कारण हम किसीसे आँख से आँख नही मिला सकते। हमारा तेज मलिन पड जाता ओर हम कोडे मकोडो की गणना में आ जाते हैं। सृष्ट पुष्ट और ऊचे पूरे व्यक्ति का प्रभाव ही कुछ और होता है। वह अपने कार्य को भलीभाँति सम्पादन कर सकता और समाज वा राष्ट्र के गर्व का कारण हो सकता है। मानसिक दरिद्रता इससे भी वढकर है। एक कहानी प्रचलित है कि सिंह निनन्धादर्श] De000-Mmomoments फा वधा भेदों म रहकर में में करने लगा था, उसका मनोवृत्ति ही बदल गई थी। सिंह का शरीर रयते हुए भी वह महार करना न जानता था। इसी प्रकार मानर-समाज के मस्तिष्क में जर दरिदवा घर कर लेती है, तर यह मानर-समाज ही नहीं रह जाता। उसके विचारा में अभिमान, अभ्युदय, साता आदि के भान ही मन्द पड़ जाते और कभी-कभी तो मर जाते हैं। भारतवासिया की दास-मनोवृत्ति देश के पतन या एक महान कारण हो रही है और यडे-बडे बलशाली राष्ट्रों के बीच में छोटा सा स्विटजरलड स्वातंत्र्य-सुस का मांग कर रहा है। यह है मानसिक दरिद्रता का भेद। कभी कभी बुराई से भी भलाई उत्पन्न होती है। इमी प्रकार दरिद्रता के भी कुछ अानन्द है। अर्ध अनर्थकर है, अर्थात् धन से बुराइयों पैदा होती हैं, यह थात भी निराधार नहीं। धन की प्रचुरता प्राय अनेक दुर्व्यसनो की ओर ले जाती है। आचारिक पवित्रता के दर्शन जितने दरिद्र-कुल में होते हैं, उतने सम्पत्तिशालियों के परिवार में नहीं। धनाढ्य, लोकापवाद से भय नहीं पाता और दरिद्र धर्मभान होता है। सत्य है, "दोनहिं सन कह लरसन है, दीनहि तनै न कोय।" धन के मद में हम अन्धे हो जाते और अनुचित काम करने में भी नहीं लजाते हैं। यही कारण है कि ब्रह्मचर्य आश्रम के तीन पुनीत प्रत रखे गये थे-(१) दरिद्रता के व्रत से हमारा यही अभिप्राय था कि
[ श्रद्धा
भान
.. 04M
ममाज के भावी सेनको की दृष्टि प्रारम्भ हो से सरपर रहे।
वहाँ समता का भाव रहे और हम अपने नागरिक जीवन का
महत्व जान जाये।
जो लोग लोक सेवा की दृष्टि से दारिद्र्य प्रत धारण करते हैं,
वे दरिद्र नहीं। वे तो सेवा के द्वारा सेव्य बन जाते हैं। महात्मा
गाँधी ऐसे ही दरिद्र नारायण हैं। वे दरिद्र बनकर दरिद्रो को
देख रहे हैं। यदि वैसा सकल्प, वैसे विचार, वैमा परिश्रम,
पवित्रता और वैमी धुन, हम में भी हों तो न हम दरिद्र रहे, न
हमारा देश।
२१-श्रद्धा
विचार-सूची:-
(१) श्रद्धा पर्वता को भी चलायमान बना देती है।
(0) आचार्य बसु, बुद्ध, शङ्कर, नानक ।
(३) सफलता की पहली सीढी , व्यापक लक्ष्य, अटल
विश्वास।
(४) आत्म निर्भरता, परमात्मा का श्राश्रय ।
(५) मधुर फल, दयानन्द, ईसा, गुरु गोविन्दसिंह ।
(६)"यो यच्छद्ध स एन स ।" मैजिनी का उपदेश ।
Faith can move mountains"
अर्थात श्रद्धा पर्वती को भी चलायमान बना देती है।
V
निबन्धादर्श १३८ utha 44dN --- MH 0000000000 ऊपर के वाक्य में एक गम्भीर तत्व निहित है। जो पर्वत घडे. वडे तूफानो और आँधियों के वेग से विचलित नहीं होते, जो पृथ्वी को अन्तराग्नि के विस्फोट को भी झेल जाते हैं, वे श्रद्धा के वल से किस प्रकार चल-विचल हो जायेंगे, इस बात को मानने में साधारण बुद्धि सिर हिलाती है। परन्तु, यदि भाषा के अल- झार पर ध्यान दिया जाय, तो वास्तव में बाधाओं के पर्वत श्रद्धा के बन से सामने से हट ही नहीं जाते, चूर चूर हो जाते हैं। आश्चर्य नहीं, यदि श्रद्धा की अटलता पर्वती की श्रचलता को भी दूर कर दे । श्रद्धा के बल का अनुमान भी सहज नहीं। इसने ऐसे ऐसे काम कर दिसाये हैं, जिनकी कल्पना भी कभी किसीने नकी थी। श्रद्धा के ही सहारे विज्ञानाचार्य जगदीशचन्द्र बसु ने वृक्षों में जीव की कल्पना को प्रत्यक्ष प्रमाणित कर दिया। उनके द्वारा आविष्कृत यनों का चमत्कार देखकर योरप, अमेरिका आदि पाश्चात्य देश, ओठों पर उँगली रप गये। बुद्ध, शङ्कर, नानक ने ससार की विचारधारा को पलट दिया। कोलम्बस, न्यूटन, स्टीफन आदि ने क्या-क्या कर दिखाया, सो भी सभ्य ससार से छिपा नहीं है। भगवान् कृष्ण ने गीता में सत्य ही कहा है- "श्रद्धावाँलभते ज्ञान तत्पर सयतेन्द्रिय ।" अर्थात् जितेन्द्रिय ओर तत्पर हुश्रा श्रद्धावान् पुरुप, ज्ञान को प्राप्त करता है। फिर, वह ज्ञान किसी प्रकार का क्यों न हो। बडे बडे दार्शनिक, वैज्ञानिक [श्रद्धा 7 . . MAH Maa -- amane +-- - . . आविष्कारक, लेसक, शिल्पी, योगी, ऋषि, मुनि, वीर, योधा ही नहीं, चोर, डार तक श्रद्धा के आधार पर ही अपने अपने कार्य में सफल हुए हैं। सफलता की पहली सीढी श्रद्धा ही है। यदि ध्रुव श्रद्धा अर्थात् अटल विश्वास नहीं, तो हम न तो अपनी शक्तियों को एकाम कर सकते हैं और न किसी फर्म में तत्पर वा तन्मय हो सकते हैं। हमारे जीवन का लक्ष्य ऐसा हो कि हमारे समस्त जीवन का समावेश उसमें हो जाय। वह हमारे रोम रोम में व्याप्त हो, हमारी समस्त शक्तियाँ उसीके आकर्षण से अनुबद्ध हों, उसमे हमारा अनन्य भाव हो , दूसरी बात पर हमारा ध्यान ही न जाय। इतना होने पर उसकी सफलता में हमारा अटल विश्वास हो, कोई शक्ति हमें उसकी पूर्ति में योग देने से न रोक सके। हम उसीके लिए जियें, उसीके लिए मरें। सोते. जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते हम उसीका चिन्तन करें। इस प्रकार का अटल विश्वास होने पर हम आत्म-निर्भरता मे काम लें। एक बार बुद्धि के बत से ऊँचा और व्यापक लक्ष्य निश्चित करके हम अपने नियम श्राप बनायें। ससार हमारी उस लगन पर हँसे वा वाह-वाह कहे, हमे इसकी चिन्ता न हो। हमारा भाव केवल एक हो कि हमने उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जन्म लिया है, निना उसे पूरा किये हमें मरने का भी अव- काश नहीं। इसके निना हमारा जीवन ही निष्फल है। लोक
निबन्धादर्श ]
१४२
.
40
m
-
Road
"अपने हृदयो को श्रद्धा से परिपूर्ण करो। केवल मुँह से
श्रद्धा का नाम न लो, वरन् अपर्ने रोम रोम में श्रद्धा भरो।
अपने मन और वाणी को एक बनाओ, अपने आचरणों को
पवित्र करो। अपने लक्ष्य की सिद्धि में तन्मय होकर लग
जाओ। अपने जीवन को यहाँ तक धर्ममय बनाओ कि लोग
तुमको धर्म की, निस्पृहता की, लोक-सेवा की, अनन्यता की,
सात्विक श्रद्धा की, चलती फिरती मूर्ति समझने लगे।"
२२-मनुप्यता
पूर्व विचार.
(१) मनुष्य सर्वोत्तम प्राणी है।
(२)मनुप्यता का पद ।
(३) स्वार्थ और परार्थ।
(४) मनुष्यता के गुण और मनुष्य की शक्ति ।
(५) पारस्परिक घृणा का जन्म ।
(६) मनुष्यता का स्थान और उसकी सोज ।
इस बात से किसीको इनकार नहीं कि मनुष्य सर्वोत्तम
प्राणी है। वह अपनी बुद्धि के वल से ससार की मुस-सम्पत्ति
का अधिकारी हुआ है। अपने गुणो से वह अन्य जीवधारियों
से कहीं अधिक विकास कर गया है। नये-नये आविष्कारों
तथा अपने निर्माण-कौशल द्वारा उसने नैसर्गिक सृष्टि की शोभा
१४३
[ मनुष्यत्ता
44
सौगुनी बढ़ा दी है। इसलिए उसे वसुन्धरा के भोग करने का
अधिकार है और यह कहना अनुचित नहीं माना जाता कि ससार
की मन सामग्रियाँ मनुष्य के सुसके लिए बनाई गई हैं।
मनुष्य इन अधिकारों तथा बुद्धिवल के द्वारा सरका
स्वामी अवश्य है, परन्तु मनुष्यता इन सबसे ऊपर है। केवल
शक्ति द्वारा अधिकार प्राप्त करलेना एक धात है और सद्गुण
द्वारा किसीके मन को वश मे कर लेना दूमरी। सद्गुण की
मोहनी शक्ति का पद बहुत ऊँचा है। मनुष्यता मनुष्य का ऐसा
ही सद्गुण है, जिसकी ओर विश्व का हृदय अपने श्राप सिंच
आता है।
उच पद के साथ उसका एक उत्तरदायित्व होता है। वह
उत्तरदायित्व अपने अधिकार और शक्ति का दूसरो के कल्याण
के लिए प्रयोग करना है। इमीको परार्थ कह सकते हैं। अपने
सुख प्रादि के लिए कार्य करना स्वार्थ है, स्वार्थ स्वभावत सभी
प्राणियों में पाया जाता है, परन्तु परार्थ के लिए उद्यत होना,
विकसित विचारों तथा उच्च भावनाओं के विना असम्भव है।
यही पदार्थ
भावना मनुष्य को मनुष्य बनाती और उसे इस लोक
से ऊँचा उठाकर सुरवन्ध बना देती है।
पराये दुःख मे सहानुभूति दिखाना, जीवमान के कल्याण की
इच्छा रमना , परोपकार के लिए त्याग दिसाना, पीडितो की
रक्षा में अपनी शक्ति लगाना, पतितों को उठाना और दुष्टों का
,
निमन्याद]
44+0-
एमन फरना आदि से रापुद्ग है, गोमाय भी विभूमि है।
यदि अभिमान के वश महोकर अथवा अन्य किसी कारण
म पोई व्यक्ति ममाज के लिए दुप याटेरा या दंतु हा,
सो
याह मनुष्य पद से गिर जाता है। अपने पापा भारित
प्रयोग करने में यह पशुता के पारा में पड़ जाता है। मन
में आर यह मनु'य पो मनुष्य नहीं सममा और अपने
आपको सर्वशक्ति-मम्पन्न समगो लगता है। उस समय में
अपने जीवन को शरणमारता और परिमित शाल का शान
नहीं रहता।
मनुष्यता ये नाते को भूतफर हो एफ जाति दूसरी जाति को
बन्धन में डालती और एक राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र पर अधिकार जमाने
की ताक में रहता है। इसी विचार में कारण पुरुप और मीच
पो भावा पढ़ती जाती और पारस्परिक घृणा का जन्म होता
है। यात यहाँ तक यद जाती है यि गोरे भाग्य कालों या पीलों
पो तुच्छ सममते हैं, वो द्विज शूद्रों को एना तक पाप मानते है ।
मनुष्य जाति की एकता उस ममय ध्यान में भी नहीं पाती और
इम अपने भाइयों के साथ दो श्वान शूकर का सा व्यवहार करने
में लज्जित नहीं होते। तारो की याव यह है कि गह मर
सभ्यता के नाम पर किया जाता है। जो प्रमभ्य है, अशिक्षित
हैं, वे हमारी दया और सहानुभूति के पात्र नहीं, पृणा के पारस
थन जाते हैं।
[परिव-पल imananewmmarAmrammame 4murmeniamong prmanomenon-Monda- मनुष्यता का निवास मनुष्य के मुन्दर पेश वासभ्य व्यवहार में नहीं, किन्तु उसके उदार हृदय और शुद्ध आचरण में है। यदि हम मनुष्य हैं, तो हमारा धर्म है कि हम दूसरों को भी मनुष्य पनाने, यदि हम पड़े हैं, तो दूसरा को ऊँचा उठायें। साराश यह है कि यदि हम मउग्यता का सोज है, तो हम मनुप्या में मिरों उनके हृदयो को टटोों और उनकी सेवा को अपना "महा- भाय मममें। २३-चरित्र-चल विचार-मूवी (१) गौतम , प्रमाद , पाण्डर । (२) परिन मनुष्य की निज की सम्पत्ति है। (३) चरित्र की छाया। (४) चरित्र-रक्षा, भीष्म, योर पैरागी, पर्ण। (५) चरिन शीलता। गौतम ने राज-पाट छोड़ दिया। श्राधी रात के समय पुन- कलर का मोह तोड, वे घर मे चल दिये, म्यय राजा से रक्ष बन गये। वैदिक धर्म की हिंसा के विपरीत उन्होंने अपना स्वर ऊँचा उठाया। तोक उनके विरुद्ध हो गया, परन्तु फिर भी वे बुद्ध हुए। उनकी शरण में सहस्रों ही नहीं, करोड़ों-अर्या निवन्धादर्श] १४६ +4 ansar How-more- - के वन गिराये गये। उस यालक को पहाड़ी की चोटियों से पटका गया , कुम्हार के आवें म फूया गया , होलिका की गोद में जलाया गया, किन्तु उसका याल भी वोका न हुआ। वैरागी, युद्ध और बालक प्रहाद के पास कौन-सा घल था, जिससे वे जगद्वन्ध हुए , अपनी अकिश्वनता में भी सम्राटों से बढ गये ? किम बल मे हमारे ऋषि-मुनियों ने वन के कन्द, मूल, फल सार शास्त्रो की रचना की थी? सिके बल वन-चन भट- कते हुए पाएटर, फौरनों की सद्गठित-सेना मे लोहा लेने में समर्थ हुए थे? यह सर चरित-बल की ही महिमा थी। चरिन मनुष्य की निज की सम्पत्ति है। इसके सामने ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ तक तुन्छ हैं। वह धान, वैराग्य और भक्ति से भी परे है। ममार के सब सद्गुण एक ओर, और चरिन दूमरी ओर रसकर तौलिए, चरित्र का ही पलड़ा भारी रहेगा। चरित्र ही गुण की भूमि है। जिस प्रकार पानी का कोई रग नहीं होता, वह जैसे रंग में मिल जाना, वैसाही उसका भी रंग हो जाता है, इसी प्रकार गुण भी जैसे चरित्र में मिलता है, चैमा ही रूप धारण करता है। यदि हमारा धन चला गया, तो कुछ नहीं गया , यदि हमारा स्वास्थ्य चला गया, तो कुछ चला और यदि हमारा चरित चला गया, तो सब कुछ चला गया। "प्राचार परमा धर्म" अर्थात् आचार ही सब से बड़ा धर्म है। यदि किसीने शास्त्रों का अध्ययन किया, धर्म के तत्व । गया, १४७ [चरित्र-बल H को पहचाना, परन्तु उसके अनुकूल आचरण न किया, तो क्या किया? किसी गधे पर प्रन्थों का बोझ लाद दिया जाय, तो क्या वह विद्वान हो जायगा ? चरित्रवान् का अल्पज्ञान भी चरितहीन के अगाध पाण्डित्य से बढ़कर है। हम विद्याध्ययन में अनेक कष्ट उठाते और साधुओं की सगति तथा सेरा में लगे रहते हैं। शारीरिक तप तथा मान- सिक ध्यान में मम और सत्य की सोज वा विज्ञान के विचार में निरत रहते हैं। साहित्यिक ग्रन्थों का मन्थन तथा पुराणों का पारायण करते हैं। इन सबका ध्येय चरित्र का निर्माण ही होता है। चरित्र को साधुता वा असाधुता ही हमारे जीवन की छाया है। उसीको देस देखकर लोग हमे पहचानते और हमारी पद- प्रतिष्ठा की श्रेणी नियत करते हैं। हम कुछ करें वा न करें, हमारा चरित्र मानव-समाज पर निरन्तर अपनी छाया डालता रहता है। एक दीप्तिमान तपस्वी के तेज को देसकर देसनेवाले के मन में जिस प्रकार प्रकाश की भावना का उदय होता है, उसी प्रकार एक मद्यप के मद्यपान द्वारा विकृत-बदन को देखकर अन्धकार की रेसा उसके सामने सिंचे विना नहीं रहती। बडे-बडे विद्यालयों तथा गुरुकुलो की शिक्षा का ध्येय वहाँ की डिग्रियाँ ( वो ए एम ए श्रादि) नहीं, वरन् यहाँ की वह पवित्र और उच्च भावना है, जिसके द्वारा हमारे चरित्र मे प्रेम था, उपकार, कर्तव्य, सेना विनय और शील श्रादि के अङ्कुर निबन्धादर्श] १४८ mona . विपत्तियों के पहाड टूट पड़े हैं , धन, जन, सर्वस्व छीना गया है, नगी तलवार सिर पर नाच रही है, हाथियों के पाँवों तले कुचला गया है, तो भी चरित्रवान् अपने चरित्र पर अटल रहे हैं। चरित्र को दानेवाली शक्ति आज तक न उत्पन हुई और न हो, वह अजेय है। चरित्र भगवान् का प्यारा और सङ्कट का महारा है। भीम के पास एक चरित है, वे उसके बल पर भगवान कृष्ण को चुनौती देते है। उनके सामने भगवान् अपना प्रत तोडकर रथ का चक्र धारण करते और भीष्म हँस देते हैं। वीर-बैरागी सिक्ख के पुत्र का क्लेजा उसकी आँखों के सामने निकाला जाता, और उसकी छाती में मारा जाता है। पर उसकी आँखें चरित्र बल से ध्रुव हैं, वह अपने धर्म पर अटल है । कर्ण रण क्षेत्र में घायल पड़ा है, उसके काच और कुण्डल अजेय हैं, उन्हींसे वह अमर है। विप्र-वेप में कृष्ण उसके पास जाते हैं, और क्वच-कुण्डल की भिक्षा मांगते हैं। फर्ण छप्रवेशधारी ब्राह्मण को पहचान लेता है, परन्तु कवच-कुण्डल उतारकर चरित्र की लज्जा रमता है। धन्य है इन चरिनशीलों की जननी को, धन्य है इनकी धरिती को। मनुष्य जन्म पाकर यदि हम कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं, तो. सरमे पहले हमें चरिन-यल प्राप्त करना चाहिए। सासारिक वैभव और सम्पत्ति पीछे की बातें हैं। अपनी नीति-कुशलता और वाक्चातुरी के बल से भोले और अपढ़ लोगों से धनार्जन करने
१४९
[कलम और तलवार
4
90.heag
44
--
बाते क्या समाज में विप का श्रीज योनेवाले एक सम्पत्तिशाली
यकीत से अपने पेन पर परिश्रम करके रूपी-सूची पानेगला
एफ चरित्रवान स्मिान यही अच्छा है। परिन की पवित्रता के
शिए किसी विशेप वायुमण्डल की आवश्यकता नहीं। उसका
क्षेत्र किमानी, व्यापारिया, पीलों, मजदूरों, गृहस्थो, सन्यासियों,
धचो, यूदा सभीके समाज में है । अपने अपने धर्म को
पहचानने और निश्च्छत मानना में काम करो से शील की रक्षा
सर्वत्र हो सकती है। रहीम करि की इन पक्रिया में सपरिनता
या शील-युक जीवन का सार छिपा है
"रहिमन रहिनो या भलो, जौ ला शील समूच ?
शील-दौल जय देपिये, तुरत फीजिये फूच ।।"
२४-कलम और तलवार
पूर्व विचार :-
(१) शेर वरी की लड़ाई।
(२) जर्मनी, नेपोलियन ।
(३) दोना की प्रवृत्तियों की तुलना ।
(४) कलम का विराट रूप ।
(५) बीज क्लम ही योती है।
(६) दोनों की विजय , अकबर और तुलसीदास ।
(७) प्रेम की विजय।
निबन्धादर्श ] Masad H 4. comen - कमल और तलवार की लडाई देखने में तो शेर और घरी की लडाई है। तलवार तो दूर, उसका नन्हा-सा वचा चाकू भी अगर चाहे तो कलम के टुकडे टुक्डे उड़ा दे । भला, कहाँ गिड़गिडाती हुई मुँहफ्टी कलम और कहाँ चमचमाती हुई पानी दार तलवार ? कहाँ उसको 'झड़क , झड' और यहाँ इसकी चर चर' ? कहाँ उसकी वहाई हुई रक्त की नदियाँ और कहाँ इसके मुँह से टपकती स्याही की बूंदें ? तुलना की कोई बात भी तो हो । परन्तु यह छोटी-सी दो जीमवाली छरहरी नागिनी शेषनाग की सहचरी की भाँति पृथ्वी को उठाये उठाये फिरती है। जर्मनी इसके ऊपर तलवार लेकर टूट पड़ा। इसकी लिखी हुई सन्धि की उसने धज्जियाँ उड़ा दी। यह नागिनी चुपचाप पड़ी अवसर ताकती रही और चारवर्ष पीछे वरसेलीज़ में वह डक मारा कि जर्मनी से नाक रगड़वा दी। मुन्ना अभी तक पेट के वल घिसट रहा है। रूसो और वाल्टेयर के हाथ में पहुँच कर इसने वे नीज बोये कि योरप के सारे सम्राट दहल गये और फिर महान विजयी तेगधारी नेपोलियन को भी सेंट हेलेना का पानी पिला दिया। निस्सन्देह तलवार के सामने यह तुन्छ पदार्थ है, परन्तु इसके पेट में डाढी है । इसका वार ऐसा गहरा और ऐसा मर्म भेदी होता है कि उसका मारा सहज नहीं पनपता। यह विधाता के अड्कों की भाँति राष्ट्र और समाज के भाग्य विधावाओं के हाथ मे नित्य कितने ही भाग्यों का निर्णय करती रहती है ।
[ क्लम और तलवार moonverternataravase Boad dounter Pre VPN दोनों ही हमारे हाथ के हथियार है। एफ बैठे बैठे हृदयों पर प्रहार करता है, दूसरा रण-क्षेत्र में गर्दन पर । गहरी दृष्टि मे ऐसा जाय तो एक का क्षेत्र यहा विशाल और दूसरे का साचित है। कलम मानर-हत्य की सम्पूर्ण प्रवृत्तियों में एकमा फाम परती है और तलवार फेवत मोध तथा रोष की पोपिका- मान है। तलवार भय की जननी है , लोध की प्रतिमूर्ति है । वह शनु को अधीन करके सनपूर्वफ आत्म-समर्पण पराती है और जहाँ वह पास से ओमल हुई कि विलित यैरी का हृदय विप्लव करने लगा। फलम श्रद्धा, महानुभूति, प्रेम, ल्या आदि का वह जादू डालती है कि सदा के लिए उसकी फान पकड़ी छरी हो जाते हैं। उसको विजय चिरस्थायिनी होती है, वह हमें अधीन करके भी हमारी स्वतत्रता का अपहरण नहीं करती, वरन उसे विकसित होने का अवसर देती है। पिरापिणी करम जिस समय अपने क्षेत्र में कीडा करती है, उम समय “जाफी रही भावना जैमी। प्रमु-मूरति देखी तिन प्रत्यन हो जाता है। कभी यह सृष्टि के सौन्दर्य का चित्र सींचने लगती है, तो कभी धनुप की टवार और शनों की माझार से कानों को फोड डालती है। कभी शिम-ताण्डव कराके बालाजाल की पुष्प वर्षा करती है, तो कभी भूकम्पन और प्रभ- अन-वेग की भय-विभीपिका दिसाती है, कभी मज्जा, मास, मलादि के वर्णन से अरुचि उत्पन कराती है। तो कभी वात्मन्य ।
निबन्धादर्श ] १५२ N -- . -nor -Reason- 24n-H के प्रसार में अरोचकता को प्रर्द्धचन्द्र देती है। कभी पीडिता के चीत्कार से करुणा के आँसुओं की झडी लगाती है, तो कभी भक्ति-रस की अमृतधारा में यहा देती है। कभी अोज की उमड़े उठावी, कभी अपने दुष्कृत्यो पर लजाती है। कभी शान्त-लोक में विचरण कराती और कमी माया के प्रपञ्च में डुबाती है । उसकी नोंक मे जिस भूमि को कुरेदा जाय, उसीमें भिन्न भिन्न भावा की प्रसूति होने लगती है। तलवार की वीर-गाथाओं का वीज-चपन भी कलम ही करती है। जो निरक्षर भट्टाचार्य हैं, वे अपनी आँखों से बहुत कुछ काम लेते हैं, पर तो भी कलम के प्रभार मे वे नहीं बच सक्ते। रण- कडया की तान सुनते ही उनकी भी रगें फड़क उठती है और उनका हाथ तलवार ही पर पड़ता है। वीरभाव का उद्रेक कलम के ही यल से किया जाता है । तलवार का कार्य समाप्त होने पर बीभत्स- काण्ड के दृश्य से जो निराग उपन्न होता है, वह भी फलम ही की कृपा से दूर होता है। कुरुक्षेत्र के समरागण में एकमान धनुर्धर अर्जुन का गाण्डीव जर हाथ से छूट पड़ा था, तर "क्षुद्र हृदयटोग्ल्य त्यक्त्वोत्तिष्ठ परतप फहने तलवार नहीं आई थी, वहाँ कृष्ण के रूप में कलम ही चोल रही थी। तलनार मे विजय लती और अखण्ड-कीर्ति स्थापित होती है। इस विचार मे भी क्लम की करतूत कम नहीं। एक ही
१५३
[क्लम और तलवार
---
उनका
काल में सम्राट अकबर और गुसाई तुलसीदास ने जन्म लिया।
एक ने तलवार के बल से विशान माम्राज्य की स्थापना की, दूसरे
ने एक छोटी-सी कोठरी में बैठकर कलम चलाई । दोनो कीर्तिशाली
हुए। परन्तु गोस्वामी जी जनता के हृदय-सम्राट् हैं।
साम्राज्य आज भी एकटन है, वरन् दिन दिन बढ रहा है। वे
फेवल भारत के ही नहीं, विश्व के सम्राट् बन रहे हैं । उनकी
विचार-धारा में डुबकी लगाकर भारतीय सभ्यता और सदाचार
अपने दिव्यतेज का प्रकाश फैला रहे हैं और अकवर का
साम्राज्य क्या हुआ? वह अँगरेजो के हाथ में चला गया, उसकी
प्रभुता विलीन हो गई। तुलसी का साम्राज्य यावचन्द्रदिवाकर
रहेगा और उसकी कार्ति-कौमुदी असख्य हृदयो को शान्ति देती
रहेगी। क्या योरप का कोई भी सन्नाट शेक्सपियर की समता
कर सकता है।
प्रेम की विजय ही सच्ची विजय है। याहु-बल की शक्ति
का लोहा मानकर पराजित पक्ष दव जाता है, उसके हृदय पर
विजय नहीं प्राप्त होती। उसके दबे हुए भावो का उभार जर
अवमर पाता है, तो ज्वालामुखी का-सा उद्गार होने लगता है।
कलम का उदगार हृदय का उद्गार है। वह सीधा हृदय को
मृता है। उसकी विजय में मुनियो की शान्ति और वीरों की
कान्ति दोनों का अलौकिक धोल-मेल है। यह कुसुम-कोमल,
और कुलिश-कठोर है , यही उसकी विचित्रता है।
.
निनन्ध दर्श] H सभा- २५-पढ़ने के आनन्द चिना रिसी उद्देश के पढना, पढना नहीं, पढना यही है, निसमे विवेक और विचार बढे। इस प्रकार के पढ़ने में जो श्रानद है, वह वाणी के वर्णन का विषय नहीं , वह अनुभव के हृदय की ज्योति है। त्रैलोक्य का मौन्दर्य और तीनों काल की सम्पदा उसके अन्तर्गत ही रहती है। स्वाध्याय के सुख-लोक मे, सुर-लोक एक पर्ण-कुटी है। सूर्य, चन्द्र, तारागण उसके प्रकाश-मन्दिर की फुल मडियाँ हैं। उसमें सच्चिदानन्द के सत् सयोग में आनन्द का आनन्द है, उसकी विश्व- नाटिका में मानस-हस का मरोर है। और चित् एक कोने में बैठकर मनमाने सुस का माधन पढ़ने में मिलता है। जी चाहे तो वाल्मीकि के तपोवन में विचरण कीजिए , जी चाहे तो हल्दीघाटी में प्रताप के प्रताप का उत्कर्ष देखिए । चाहे सूर के पदों पर भ्रमर बनकर मॅडराते रहिए, चाहे तुलसी के मानस सर में डुबकी लगाइए। चाहे व्यास के अति विक्रम का ध्यान कीजिए। चाहे कालिदास के काव्य-लोक का आनन्द लूटिए । चाहे वेद और उपनिपदो का मनन कीजिए, चाहे गीता के गौरव में गोते लगाइए। चाहे शेक्सपियर की मानव- प्रकृति का विवेचन कीजिए, चाहे मिल्टन को ज्ञान-गरिमा को [ पढ़ने के श्रानन्द MuseumaANNRN -- -- सram004 - 00000000004 श्रवगाहिए। अगणित प्रन्थों के महोदधि में जितना जितना गहरा पैठिए, उतने ही घढिया रत्न निकालते रहिए । प्रन्यों में समता का साम्राज्य है। यहाँ राजा-रक्ष का प्रश्न ही नहीं। जिनकी ड्यौदी से लोगों को दुतकार दिया जाता है, उनसे वहाँ सूर हँस-हँसकर बातें करत हैं। जिनके तेज के सामने आँख नहीं उठ सकती, उनके वरापर बैठकर वहाँ वाद- निनाद होता है । क्षण में बालक, क्षण में युवा, क्षण मे वृद्ध, क्षण में पुरुप, क्षण में नारी, जो रूप चाहें धारण कर लें, कोई देख ही नहीं सकता। वहाँ किसीको किसी प्रकार की रोक-टोक नहीं , सवको पूर्ण स्वाधीनता है। वहाँ सय प्रकार का समाज है, जैसी रचि हो चुन लीजिए । भय, विपाद, घृणा, लज्जा, क्रोध, करुणा, दया, दान, विनोद, हँसी सब वहाँ एक ही आँगन में खेलते हैं। आत्मपरीक्षा का तो पढने में अलभ्य अवसर प्राप्त होता है। एक दूसरे से तुलना करके गुणों के ग्रहण और दोपो के परित्याग की भावना जाग्रत् होती है। आलोचनात्मक दृष्टि से जगत् को देपने का स्वभाव बनता और बुद्धि का द्वार खुल जाता है। सफलता का मार्ग दृष्टि पाता और विफलताओं पर विजय का उत्साह उमडता है। जीवों पर दया, लोक की सेवा, जीवन की पवित्रता, कर्म की निष्ठा, ईश्वर में श्रद्धा, पाप से निवृत्ति और धर्म में प्रवृत्ति के भावो का उदय होता है। भूत, भविष्यत, वर्त- मान दोनो काल की कल्पना विद्यमान रहती और मनोत्तियों
निबन्धादर्श]
१५६
.
..
.
H
-
।
के मनोरखन के साथ माया के आवरण में मानसिक शान्ति की
माँकी होने लगती है। उस मौन-लोक के प्राणी बड़े साधु, सुहृद्,
उदार और मिलनसार हैं। उनके साथ रहकर, ससार के
मायावी जीवों से मिलना तुच्छ प्रतीत होता है। उनकी सगति
आनन्द और अतुलनीय मोद विनोद है।
२६-१९२६ की चुनाव लीला
पूर्व विचार :-
(१) सदिया की दासता , वोट का अधिकार ।
(२) बाट क्या है?
(३) वोट के अधिकारी।
(४) कौमिलों में देश सेवा ।
(५) राजनैतिक दल ।
(६) चुनाव-लीला के कुछ अभिनय ।
(७) कार्यकर्ताओ की करतूतें।
(८) मत भेद।
सदियों से दासता के वन्धन में पड़ी हुई भारतीय जनता
अपनी पगधीनता का अनुभव करने लगी है। ससार को स्वतन
जातियों को देखरर उसके भी हृदय में स्वतनता की भावना प्रबल
हो उठी है। इस उठती हुई भावना को देसफर हमारी चतुर
सरकार ने भी कुछ अधिकार दिये हैं, जिनके द्वारा हम धीरे धीरे
१५७
[१९२६ की चुनाव लीला
--
1.
+
" -
स्वराज्यपथ की ओर ले जाये जा रहे हैं। हमारे चुने हुए प्रति-
निधि कौंमिलों में जाते और वहा हमारी भलाई पर विचार करते
हैं। चुनाव के इस अधिकार को वोट कहते हैं।
घोट क्या है? वोट ही वह पवित्र अधिकार है, जिसका
'कन-कन' जुडने से स्वराज्य रूपी 'मन' बनेगा। हमारा यह
अधिकार जन्म सिद्ध है, ईश्वर-दत्त है। हमारे देश के भाग्य
पर अवलम्बित है, और हमारी योग्यता का सार यही है।
गवर्नमेन्ट क्या है ? कोई भूत नहीं, प्रेत नहीं, देव नहीं, राक्षस
नहीं, और वह कोई होआ कदापि नहीं। हमारी राय के अनु-
सार जो नियम या कानून बनें, उन्हींको हम सब मानें यही
गवर्नमेन्ट है और हमारी राय ही वोट है। इसलिए वोट ही
गवर्नमेन्ट का माँ पाप है। जिस प्रकार वेटे का सपूत वा कपूत
वनाना माँ-बाप के हाथ में है, उसी प्रकार गवर्नमेन्ट का अच्छा
वा बुरा वनाना वोट की करामात है । वोट गवर्नमेन्ट रूपी वरगद
का छोटा-सा बीज है। परन्तु, यह ऐमा हथियार है कि ठीक
बैठे तो विपक्षी का धुआँधार उडा दे, ओर चूक जाय तो अपना
ही सिर धड से हटा दे। इसलिए, बहुत समझ-बूझकर और
कुशलता के साथ इसका प्रयोग करना उचित है।
इतना बड़ा हथियार हमारे उन भाइयों के हाथ में आ गया
है, जिनमें से बहुत से इतने भोले हैं कि वे देश वा राज्य शासन
आदि का नाम तक नहीं जानते। वे जानते हैं कि राज्य की सेनाएँ
निबन्धादर्श]
-
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H
Post
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के मनोरजन के साथ माया के आवरण में मानमिक शान्ति की
मॉकी होने लगती है। उस मौन-लोक के प्राणी पडे साधु, मुहृद्,
उदार और मितनसार हैं। उनके साथ रहकर, ससार फे
मायानी जीवा मे मिलना तुच्छ प्रतीत होता है। उनकी मगति
में आनन्द और अतुलनीय मोद विनोद है।
२६-१९२६ की चुनाव लीला
पूर्व विचार :-
(१) सदिया की दासता, वोट का अधिकार ।
(२) वाट क्या है।
(३) वोट के अधिकारी।
(४) कौंसिलों में देश सेना।
(५) राजनैतिक दल।
(६) चुनाव-लीला के कुछ अभिनय ।
(७) कार्यकर्नाा की करतूतें ।
(८) मत भेद ।
सदियों से दासता के बन्धन में पड़ी हुई भारतीय जनता
अपनी पराधीनता का अनुभव करने लगी है। ससार की स्वतन
जातिया को देखकर उसके भी हृदय में स्वतत्रता की भावना प्रबल
हो उठी है। इस उठती हुई भावना को देखकर हमारी चतुर
सरकार ने भी कुछ अधिकार दिये हैं, जिनके द्वारा हम धीरे धीरे
을
[ १९२६ की चुनाव लीला
स्वराज्यपथ की ओर ले जाये जा रहे हैं। हमारे चुने हुए प्रति-
निधि कौंसिलों में जाते और वहा हमारी भलाई पर विचार करते
हैं। चुनाव के इस अधिकार को वोट कहते हैं ।
वाट क्या है ? वोट ही वह पवित्र अधिकार है, जिसका
'कन-यन' जुड़ने से स्वराज्य रूपी 'मन' बनेगा। हमारा यह
अधिकार जन्म सिद्ध है, ईश्वर-दत्त है। हमारे देश के भाग्य
पर अवलम्नित है, और हमारी योग्यता का सार यही है।
गवर्नमेन्ट क्या है ? कोई भूत नहीं, प्रेत नहीं, देव नहीं, राक्षस
नहीं, और वह कोई होआ कदापि नहीं। हमारी राय के अनु-
सार जो नियम वा कानून बनें, उन्हींको हम सर माने यही
गवर्नमेन्ट है और हमारी राय ही वोट है। इसलिए वोट ही
गवर्नमेन्ट का मौ-याप है। जिस प्रकार वेटे का सपूत वा कपूत
बनाना माँ-बाप के हाथ में है, उसी प्रकार गवर्नमेन्ट का अच्छा
वा चुरा बनाना वोट की कयमात है । वोट गवर्नमेन्ट रूपी वरगद
का छोटा-सा बीज है। परन्तु, यह ऐसा हथियार है कि ठीक
बैठे तो विपक्षी का धुआँधार उडा दे, और चूक जाय तो अपना
ही सिर धड़ से हटा दे। इसलिए, बहुत समझा-बुझकर और
कुशलता के साथ इसका प्रयोग करना उचित है।
इतना पडा हथियार हमारे उन भाइयों के हाथ में आ गया
है, जिनमें से बहुत से इतने भोले हैं कि वे देश वा राज्य-शासन
आदि का नाम तक नहीं जानते। वे जानते हैं कि राज्य की सेनाएँ
निबन्धादर्श] man-emaman-mumme । वडी बलवती हैं, पुलिस वड़ी कठोर है, हाकिम बड़े होशियार हैं। उन्हें शासन के सहारक स्वरूप का अनुभव-जन्य वोध है, उसके सुधारक स्वरूप का बहुत कम वा नहीं के तुल्य । मन और नमक उनके सर्वस्व हैं, परमेश्वर हैं। उन्हें अन्य झमटो से घृणा है। सरकार कोई हो उन्हें चिन्ता नहीं, वे अलपराम अपनी गुदडी में मस्त हैं। स्वाधीनता वा दासता का वे अनुभव ही नहा करत । अन रहे वे, जो पराधीनता के कष्टो से अकुला उठे हैं, जो देश को स्वतन देखने के लिए लालायित है, जो दश पर सर्वस्व निछावर कर रहे हैं। वे ही कौंसिलों में प्रवेश करने के लिए आगे बढते और चुनाव-लीला का नाटक सेलते है। सरकार के साथ काम करके यदि देश की कुछ सेवा हो सकती है, तो उसका सबसे अच्छा अवसर कौंसिलों मेंही मिलता है। प्रत्येक देश का उद्धार वहाँ के पुरुप-रनो के द्वारा ही हुआ है। उन्हींने मस्तिष्क की उपज पर देश का भाग्य निर्माण अव लम्बित है। इसलिए योग्य से योग्य और सच्चे देश-सेवियो के लिए ही वोट देना और उन्हें चुनना चाहिए। परन्तु यश की लालसा बडी प्रबल होती है। स्वार्थ का त्याग वडा कठिन है। प्रमुख का प्रेम बुद्धि पर परदा डाल देता है। ऐसे ही कारणो से हमारी मनोवृत्ति में दासता ने ऐसा विकार उत्पन्न कर दिया है, कि हम एक स्वर से कुछ कह ही नहीं सक्ते। अपनी अपनी weekee Makwan उपली पर अपना अपना गग अलापते हैं। इसी रण म बन्धु- विरोध का निन्दनीय अभिनय होता है। १९२६ को चुनाय-लीला में य-बड़े विचिन रश्य देखे। देश में चार प्रधान दत थे। (१) असहयोगी दल (क) कापस दल वा स्वराज्य-दरा (३) बता कापस दल (8) नरम दल। पहला दल चुप था, वह सरकार से मिलने में देश को भलाई ही नहीं देगता। चौथा दल सरकार से इतना मिलना चाहता है कि जनता उममे सतुष्ट नहीं दूसरा दल सरकार को दबाकर स्वराज्य पीनना चाहता है और तीसरा भी पाहता यही है, पर सरकारी पदों को स्वीकार करके। इन्हीं दूसरे-तीसरे दलों का सघर्प इम चार में हुआ। उसमे हमारी मनोवृत्ति का पूरा पता चल गया। घड़ी बड़ी अद्भुत तीलाएँ हुई। यहीं गोपियों के मनो हरनेवाली घाँसुरी बजी, कहीं मोर मुकुट के मोती-लाल धमके। फहीं द्रौपदी की लाज-पत रखी गई, कहीं याल-मण्डलियाँ फेलि परती रहीं। कही कशी, कश, यकामुर जय कर लिये गये, कहीं जरासंध को पीरने के लिए सेन चले। निस्सन्देह नये नये पैतरे यदी गये, पर चोट कहाँ पड़ी? अपने ही भाइयों के सिर पर, अपनी ही माता की छाती पर। बड़े बड़े पूज्य चरणो मे, वन्द- नीय बाहुओं से, महामान्य मुसो से ऐसा गॅदला पानी उलीचा गया कि राजा इस नगे नाच को देखकर अपने अङ्ग सिकोड के चुनाव निबन्धादर्श] १६० meen-4. Namasan More . 4-0- ream-armen- कन्छप वन गई। भोली श्रद्धा भटक-मटककर वाक्ली हो गई। पतन अपने पस फैला-फैलाकर उछलता फिरा। पैमेवानी ने अपन पैसे का पानी की भाँति बहाकर प्रमुवा के पद चूमे। जाति पाँति के चौधरिया ने रािरी के नाम पर नाम लूटा। हिन्दू-हितैपियो ने हिन्दुत्व की आड़ में कीर्ति कमाई। मुसलमानों ने मुसलिम हितों की रक्षा का राग अलापा । चन्ने की कमा से लडसडानी हुई सस्थाओ ने दान का नाम निकाला। प्यासे गरीनों ने कुएँ खुदनाये। पदधारियों ने अपनी पदवी को लग्ना रसी। सम्पन्धियों ने सम्बन्ध निभाया। किसानों ने जमींदारो के प्रति अपनी भक्ति दिपाई। जमींदारों ने अपनी शान फा नमूना दिसा दिया। जिनकी जीभ में पल था, उन्होंने जीविका तक कमाई। वे कभी इस उम्मेदवार के और कभी उस उम्मेदवार के गीत गाकर अपनी जेब गरम करते रहे। यह सब हुआ उस पवित्र नाम पर, उस पुनीत वेदी पर, जिसका नाम राष्ट्रीयता है। देवी स्वतत्रता की पूजा इस विध की गई। भोले "वोटर' जब 'वोट" देने जाते थे, तन तो जिस छल से, जिस प्रपच से, जिस नीति से काम लिया जाता था, उसे देखकर हृदय वैठा जाता था। उम्मेदवारों के नाम तक का उच्चारण येचारे बहुत से न कर सकते थे। वोट दे चुकने पर उनका बोझ उतर जाता था, उन्हे ऐजेंट रूपी मच्छरों से मुक्ति मिल जाती थी। विशाल भारत और उसकी इस अन्धी सन्तान [ काशी की शोमा ... . को कल्पना करके शरीर में रोमाञ्च हो उठता है। राम-राज्य की यह प्रजा आज स्वराज्य के लिए किस अवस्था को पहुंच गई है। मत-भेद बुरी बात नहीं। वह उन्नति का लक्षण है। परन्तु उसमे राग-द्वप, वैर-विरोध, छल-छिद्र न होना चाहिए। कौंसि- लोमें जाना देश की सेवा है, सम्मान उसका फल है न कि वह उसका ध्येय । मृत्यु शय्या पर पड़ी हुई मातृ-भूमि के साथ सेल करना उचित नहीं। ऐसी दशा में उसके योग्यतम पुन को ही उसको सेवा-शुश्रूपा करने दो। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, अछूत, धनी, निर्धन सभी उसके पुत्र हैं। इन सकोर्ण भावो को छोडकर उसके सेवक चुनो। बोट की परित्रता की रक्षा करो। चुनार के स्वार्थपूर्ण नाटक का अन्त कर दो। ऐमी लीलाएँ सेलो, जिनका प्रभाव राष्ट्र की एकता, उसके गौरव तथा प्रताप के उत्कर्ष का कारण हो। तभी स्वाधीन भारत के दर्शन होगे और तुम अपना राज आप कर सकोगे। २७-काशी की शोभा पतित पावनी पुण्य-तोया श्रीगगाजी के तट पर विश्वनाथपुरी काशी की शोभा अनुपम ही है। अविनाशी शङ्कर के त्रिशूल पर शोभित यह वही काशी है, जो चिर काल मे हिन्दू-धर्म, आर्य- सस्कार और संस्कृत भाषा को सरक्षिका रही है। भारत के कोने. कोने से लासो यात्री प्रतिवर्ष यहाँ आते और गगा-जल मे स्नान ११ निबन्धादर्श] ." H Rameworm पर चारों फल पाते हैं। यहाँ के विशाल प्रासाद उन वयोवृद्ध सम्बन्धियों से भरे रहते हैं, जो काशी-धाम में प्राण परित्याग करने के लिए लालायित रहते हैं। अनेक धर्माचायाँ, धुरन्धर विद्वानो, प्रबुद्ध प्रचारकों, पति कोविदों वथा साधु-सन्यासियों से इसकी गोद समय समय पर सुशोभित होती रही है। यहीं डोम के घर में सत्य की हरिश्चन्द्री छटा छिटकी थी। यहीमे तुलसी ने अपनी कोमलकान्त-पदावली और भारतेन्दु ने ललित नाटका- वली में राष्ट्र भाषा हिन्दी की नूतन धारा बहाई थी। यहीं महामना पण्डित मदनमोहन मालवीयजी ने विश्वविद्यालय की स्थापना कर हिन्दू जाति का मस्तक ऊँचा किया है। भगस्ती भागीरथी मुड़कर मानों यहाँ विश्वनाथ के दर्शनों को बढ़ी चली आती हैं। उसी मोड़ पर कोई सौ फीट ऊँचा पहाड़ी तट है, जिस पर इस पुण्य-दर्शन पुरी के गगनचुम्बी प्रासाद, स्वर्गोपम-देव-मन्दिर और मनोरम घाट तीन मील तक मुचनमोहिनी छटा उपस्थित करते हैं। नौकामढ होकर प्रात - काल सामने से इसकी छटा का अवलोकन कीजिए। अपूर्व दृश्य दृष्टि पाता है। सुरसरी की सलिल धारा से उठती हुई सोपान-माला मानों स्वर्ग की नसेनी-सी बन जाती है। जत मे निकले हुए चबूतरों पर आसन बाँधे ध्यानावस्थित भकों का मुसमण्डल पविन भावों की प्रेरणा करता है। गंगे-गगे" कहते हुए नगे यात्रियों का सुन्दर स्नान घड़ा मनोहारी होता है। तृण-
.
युवक, भमण पी भागास आये हर
फ्ल-फूल, पराठी-माला और रिपजोन ६,
मितना। नीने-नीले गगन-गगइ.
भवन, चिन पिचिन मन्दिर, उठा हु
बना देता है कि वह साक्षाा शहर का
पर लेती है और इनरा जल में पड़ता
जान पडता है, मानों गगा ३ गुण ग
निर्मित छनों के मण्डप में विराजमान dिge
माना-मण्डित माधु जहाँ-तहाँ निराrreri
स्थल पर छोटे छोटे मठों में विराजमान
मे गगा की मोर पद्ध-दृष्टि, उत्तम प्र trime
से प्रवीत होते हैं । स-शुति का
किये सीदियों पर पढ़ती उवरवी -
फिरती मूर्ति-मी लगती हैं । मिन्न गहने
उधर विहार करते हैं। नादियों का नि
राहट-कौपीन-धारी साधुओं का विशाल ?
और उनपर फहराती हुई तोरण-पनाया
हैं। इन मयका बहुरगो दृश्य सद
Meem
*
• फ्रीडा कर रही हो।
काशी सदा से विद्या का पेट
विश्वविद्यालय वा बनारस हिन्दू-यूनोद
inter
निबन्धादर्श १६४ ने अपना भवन निर्माण कर उसे अपना चिरनिवास घोषित कर दिया है। प्रधान नगरी से कुछ ऊपर गगा-तट पर स्थित तीन मील लम्बा और उतना ही चौडा यह विशाल विद्यापीठ भारत में ही नहीं, विश्व भर में अपनी समता नहीं रखता । इस पुण्य-स्थली में प्रवेश करते ही हिन्दुत्व का प्रभाव और धर्म की निर्मल भावना हृदय पर बलात् अपना अधिकार जमा लेती है। प्रवेश मार्ग पर लगी हुई दोनो ओर की पुलकित पादपावली और दूर ही से दृष्टि आती हुई सरस्वती के मन्दिरा की चोटियों, मानों हिन्दू-गोरव की उठती हुई पताकाएँ प्रतीत होती हैं। वहाँ के वायु-भण्डल में हो घुछ ऐसी सौरभ है, जो शरीर को छते ही विशद विचार उत्पन कर देती है। छानालयों, विद्यालयों तथा आचार्यों के आश्रमों के पटमण्डप, फ्लश, क्गरे भी मौन भाषा में कुछ ऐसा सङ्केत करते हैं कि आर्य जीवन की सरलता और उसके विचारोत्कर्ष का दृश्य एक साथ ही सामने आ जाता है। धानो या प्राचार्यों की कोई विशेष वेश-भूपा नहीं, तो भी उनकी मजल मुद्राओं पर हिन्दू-जीवन की छाप-सी लगी जान पड़ती है। आर्य-जाति के अतीत गौरव के चिह्न और पूर्वीयता की प्रतिमूर्ति यहाँ के छात्रालयों तथा विद्यालयों में प्राचीनता और आधुनिकता का गगा-जमुनी मधुर सम्मिलन पद पद पर प्रति- लक्षित होता है । "विद्या धर्मेण शोभते ।" विद्या धर्म से ही शोभा पाती है का भाव यहाँ साकार विद्यमान है। साहित्य, [ काशी की शोभा INNavanaakaasan avasana Homemad-means - विज्ञान, ललित क्ला, प्राणि शास्त्र, वनस्पति-शास्त्र, भूगर्भ-विज्ञान, फपि विज्ञान, आयुर्वेद, राजनीति, आदि के लिए पृथक्-पृथक् विद्यालयों की योजना की गई है। साहित्य-विद्यालय का प्रधान भवन यद्यपि यहुत विस्तृत नहीं तथापि बड़ा ही भव्य है। वहाँ माय नित्य ही देश विदेश के विद्वानो के गम्भीर तथा पाण्डित्य- पूर्ण भाषण सुनने का सौभाग्य प्राप्त होता है। शिल्प विद्यालय के द्वार पर विश्वकर्मा की मूर्ति के दर्शन करते ही भारतीय कला- कौशल का स्मरण हो आता है और भीतर प्रवेश करके बडे-बडे यतों पर काम करते हुए भारतीय युवको का परिश्रम और उनका शिल्प-कौशल देखकर आशा की एक ज्योति भविष्य के उज्वल गर्भ में चमकती दिपाई देती है। यहाँ के छात्र यूनीवरसिटी का आवश्यक सामान स्वय ही बनाते और बाहर का भी काम करते हुए अध्ययन करते हैं। रात को बिजली का प्रकाश भी यहीं से होता है। यो तो कई एक विशाल छात्रालय हैं और धन रहे हैं, किन्तु महिला-छात्रालय यहाँ की विशेषता है। नियों की शिक्षा को भी उतना ही महत्व दिया जा रहा है जितना कि पुरुषों की शिक्षा को। इन्हें देख-देखकर तक्षशिला और नालन्द के मठ ध्यान में घूम जाते हैं। अभी अनेक विद्यालय तथा छानालय बनने को शेप हैं। जिस समय वे भी बन जायेंगे और जैसा कि निश्चित है, विश्वविद्यालय के चारों ओर गगाजी से निकालकर एक नहर बहाई जायगी, उस समय
निबन्धादर्श ]
womewan
इस तपोवन की शोभा इन्द्रपुरी से भी यद जायगी, इसम
सन्देह नहीं।
पूज्यपाद महामना मालवीयजी जिस भवन में निवास करते हैं
वह छोटा-सा, परन्तु वडा चित्ताकर्पक है , वह मुला देने की वस्तु
नहीं। उनकी प्रेम और वात्सत्व-भरी चातें वहीं सुनने को मिलती
हैं। ये एकादशी के दिन अपने श्रीमुख से जन गीता, उपनिषद,
पुराण आदि की कथा सुनाने बैठते हैं, तर उनके मुख से फूल से
झड़ते है । उस ऋषि-परिवार को देस देसकर सतयुग की कल्पना
सहज ही की जा सकती है। अपने आरोपित पौधे के फल-फूल
छान-समुदाय को देख-देख उनका हृदय गद्गद् हो जाता और
उनको वचन-धारि-धारा से वे पुष्प-पल्लन भी लहलहाने लगते हैं।
वात-बात और गात-गाव में उनके भव्य भायों की मूर्ति वहाँ प्रति-
लक्षित होती है। सच तो यह है कि काशी-धाम कहीं हो, पर
उसका वर्तमान निवास विश्व विद्यालय ही है, जहाँ पूज्यचरण
मालवीयजी ने भारत का मस्तिष्क लाकर रख दिया है। वहीं
शङ्कर के डमरू नाद से काशी का गगन गुमायमान होता है।
२८-बचपन
[सरलशैली में ]
पूर्व विचार :--
(१) जीवन का सब से सुन्दर समय ।
१६७ [ पचपन 4444440pandan Moonamann... wwe- HI H- 4. ------ (0) पविनता की मूर्ति , गोदी का साल। (३) सच्चरिनता का साक्षात् स्वरूप , Child is the father of man (४) जाति और राष्ट्र का जन्मदाता । पचपन जीवन का सबसे सुन्दर समय है। उसका मूल्य भी सनमे अधिक है। उसकी अनोपता, मरलता, प्रसनता अपने ही लिए नहीं, ससार भर के लिए मुसदायिनी है। इस अवस्था में वह स्वर्गीय सुग्र प्राप्त होता है, जो छल छिद्र और माया से परे है। उस ममय भले चुरे का ज्ञान हमें नहीं होता और न हमारे हृदय में स्वार्थ की भावना ही होती है। अनुभव में उत्पन्न हुई कटुता बचपन में देखने को भी नहीं मिलती। पालक के भोलेपन में मनुष्य का सथा भाव भरा रहता है। सुन्दर पालक को देखकर कोन मुग्ध नहीं हो जाता ? उसके मुस पर खिले हुए फल की सी प्रसन्नता झलकती है, जिसे देखकर दुस और विषाद दूर भागते हैं। उसका धूल धूसरित अट्न पवि- व्रता की मूर्ति होता है, जिसे देख-देखकर बड़े-बड़े अवधूत योगी और मुनि तक सिहाते हैं। दरिद्र से लेकर राजा तक की झोप डियो तथा महलों में एक-सा आनन्द देनेपाली सूरत प्यारे बचे ही की होती है। माता गोदी में अपने लाल को लेकर लोक्य का राज्य भी तुन्छ समझती है, उस समय उसे इन्द्रलोक भी फीका जान पड़ता है।
निबन्धादर्श ]
१६८
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सच्चरित्रता का वो साक्षात् स्वरूप ही घातक है। मनुष्य के
सद्गुणों का असली दर्शन इसी अवस्था में होता है। इसी वीज
से मनुष्यता का वृक्ष उत्पन्न होता है। वचपन ही वह शाखा है,
जिसे जिधर चाहो मोड लो। जहाँ इस शाखा को उचितरूप से
सँभाला जाता है, वहाँ यह सुन्दर होकर फलती-फनती है और
जहा इसकी ओर ध्यान नहीं दिया जाता, वहाँ यह जगली वृक्ष
का रूप धारण कर अपनी कटीली डालें फैलाती है। एक अंग्रेज
कवि का यह कथन कि "Child is the father of man"
(धालक ही मनुष्य का पिता है ) निल्कुल ठीक है, क्योंकि चालक
के ही गुण विकास पाकर मनुष्य का रूप धारण करते हैं।
यालक ही किमी जाति वा राष्ट्र के जन्मदाता हैं। उन्होंके
चरिन से देश और जाति का मस्तक ऊँचा था नीचा होता है।
इसलिए बचपन ही वह दशा है, जिसके सुधारने से भविष्य का
कल्याण होता है।
२६-बचपन
[भावात्मक ]
पूर्व विचार :-
(१) घचपन की स्मृति ।
(२) मोली मुद्रा।
(३) वचपन का अर्थ ।
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निबन्धादर्श ] १७० HOM an ramme ग्रूरता की मूर्ति और शस्त्रों से सज्जित महायोधा भी मेरी ओर देस मोम बन जाता था , रत्नों की ज्योति से जगमगाते हुए भवन फा स्वामी, एक जौहरी भी अपनी रख राशि को तृण-तुल्य मम- झता था, रान पाट सोये हुए विपएण-वदन राजकुमार के ललाट पर भी हर्ष की रेसा सिंच जाती थी, वीतराग मुनियों के मन में भी ममता हिलोर लेने लगती, और कनियों का मनोमयूर तो नृत्य करने लगता था। तुमसे क्सि कुघड़ी में मेरा वियोग हुआ ? किस छलिया ने मुझे तुम से छुटाया ? इस जगजाल में पकडकर अब मुझे धोध हुआ है कि तुम में क्या बात थी, जो मर पर मोहनी डाल देती यी। वचपन । मैं तो समझता हूँ 'घच' का अर्थ है बचना, और 'पन' दशा का योधक है, अर्थात् मचने की दशा। किससे बचने की दशा ? माया से, छल से, जाल से, प्रपञ्च से, जजाल से, तुम्हारा यही अर्थ है न ? अवश्य यही है। अरे। तभी उस समय 'वचा, बच्चा' कह कर लोग मुझे पुकारते थे। मैं उस समय सचमुच बचा था। उन नफ्टे लोगों ने ही मेरा भी बचपन छीनकर मेरी नाक काट डाली। अब तो मेरी आकृति ही निगड गई, अब मुझ मे वह मोहकता कहाँ ? चिता तुम्हारे द्वार से दूर रहती श्रोर दिन रात सेल फूद में मन लगा रहता था। वह जीवन ही सेलमय था। कभी छत पर जा चढे, तो कभी पेड़ा की डालियों पर, कभी सेतों की सैर
। बचपन
Dammamomen
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की, तो कभी मैदानो मे गेंद-बल्ला जा सेला। हाथ पाँव नि-
शङ्क होकर चलते थे, न चोट की चिन्ता थी, न थकान का भय ।
भोजन के लिए जो मिलता था उसी को वडी रुचि से खाते थे।
स्फूर्ति इतनी थी कि काम करने में श्रालस्य किसे कहते हैं यह
जानते ही न थे। पौरुष की लालसा इतनी बढ़ी हुई थी कि कॉटे
ककड, साई-पदक, माड-मसाड, छत-कॅगूरे, चोटी-टीले, जाडा.
गर्मी, आँधी ओले किसी का भय ही न था। साहस के कार्यों में
अद्भुत आनन्द प्राता था । ठोकर लगी तो उठ खडे हुए, मानों
कुछ हुआ ही नहीं। हानि-लाभ का ज्ञान ही न था, राग-रोप
को जानते ही न थे। भेद-भाव का नाम न था, सर अपने
थे, पराये का पता ही न था। सो गये तो सपेरा ही हुआ, नींद
उचटने का क्या काम ? उस समय हम अवधूत थे। हमारे लिए
राजा, रङ्क समान थे, हम अपने घरके सम्राट् आप थे।
जन हमारी किसी इच्छा की पूर्ति न होती थी, तो हम रो
पडते थे। रोना ही हमारा वल था-हमारा हथियार था।
शायद हम अपनी दशा पर उस समय खिन्न हो उठते थे, हम
अपनी उम पराधीनता को भी सहन न कर सकते थे, जो हमारी
ही कल्याण-कामना से प्रेरित थी। माँ की चढी हुई भौहें भी
उस समय हमारे लिए असह्य थीं, हमें उनके अन्तर-तल की स्नेह
धारा दृष्टि न पाती थी। हमारी निरङ्कुशता हमें अनुभव का ही
अङ्कश मानने मानने को बाध्य करती थी। हम उस
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निरन्धादर्श] १७२ ramanuman Ramananew N ७. " " से भी स्वतनता पाने को छटपटावे थे। क्या हमारी उसी काम- ना का फल यह बढकर बन्धन है ? क्या उसीके दण्ड-स्वरूप हमें उम सुख से वञ्चित किया गया है ? क्या वास्तव में वह अपराध इतना गहरा था ? अपराधी का दण्ड-विधान करते समय भी उस की नीयत देसी जाती है। इस दृष्टि से तो हमारी वह भावना क्षणिक थी। हम तो इतने भोले थे कि अभी जिससे रुष्ट होकर अलग जा बैठे, थोडी ही देर में उसी से फिर श्रा मिले, अभी जिस बात पर रोते राते आसमान हिला दिया। एक खिलौना पाकर उसे ही भूल गये। गोस्वामीजी के मत में भी, “ वालक एक सुभाऊ। इनहिं न सत विदूपर्हि काऊ ।।" कदापि यह फल हमारी उस भोली मावना का नहीं। उसके लिए तो हम आज भी तरस रहे हैं। सृष्टि के रंग रूप दसकर हम भटक गये। हमारा वाल- स्वभाव उन्हे देस मचल गया और हमारी हठ हमें वहाँ से हटा लाई। परन्तु, मार्कण्डेय ऋपि की भाँति हमने यह लोक-लीला देख ली। अव हम जीवन-जलधि की तरङ्गों के थपेड़े साते-साते अधीर हो गये हैं। चारो ओर जल ही जल है, ओर-छोर. का पता नहीं। हमारा ज्ञान रसातल को चला गया है, अभिमान चूर्ण हो गया है। भगवन । हमारे अभिलाषा रूपी बट-वृक्ष के किसी पल्ब पर उसी बाल-मुकुन्द वेश में आ विराजिए। तभी वेडा पार होगा। हम सदैव ही तुम्हारी खस्थली के वालक हैं, १७३ [फलदार वृक्ष ++ Non . Haawaon-e-0000Narenger हमें वहीं सेलने दीजिए। वहीं हम आपको रिमाते, सिमाते, घिराते रहे। ३०-फलदार वृक्ष [भावात्मक ] पूर्व-विचार (१) सोना और सुगन्ध । (२) विश्राम-दान , अलौकिक सम्पत्ति । (3) स्वाभाविक्ता और कृत्रिमता । (४) सहवास की इच्छा। , (५) प्रभाव । सोना और सुगन्ध दोनों का मुयोग यदि कहीं देखने को मिलता है तो फलदार (वृक्षों में। भव्य-दर्शन और तत्काल फल कैसा मधुर सम्मिलन है। औरों को फल दान देकर जीवन का पल इन्हीं को मिला है। धन्य हैं वे प्राणी जो इन्हीं का-सा परफाजी जीवन बिताते हों। एक ही स्थान पर पड़े हुए, वर्षा, शीत और पाम सब कुछ सहकर श्रान्त पथिकों को अपनी छाया में विश्राम देनेवाले तरु- वर। तुम्हारे इस आजन्म , की जाय। तुम्हें देख-देखकर शान्ति मिली, नीचे बैठकर कितनों ने तक प्रशसा . , तुम्हारे निबन्धादर्श] १७४ mannamokaamasomammumonanesamare Pasa , मधुर फल पाकर कितनों ने सुधा-रस पान किया, तुम्हारी छाल उतारकर कितनो ने अपनी प्राण रक्षा की, तुम्हारी पत्तियोंसे केतनो का उदर भरा, तुम्हारे ऊपर पत्थर फेककर कितनो ने फल पाये और क्तिने तुम्हारे चरणों में बैठकर 'युद्ध' यन गये, इसका तुम्हें कुछ पता है ? पर, तुम वैसे ही मुसुकराते हुए पड़े हो, तुम- ने तो औरो के लिए अपने को घुला ही नहीं, मुला भी दिया है। यह नम्रता और वह परोपकार । तुम्हारी इस सम्पत्ति पर कुवेर का कोप निछावर। पतिया के प्राणाधार । मुझे भी अपनी अङ्क में शरण दो। मैं इस सभ्य-जगत् से ऊर गया हूँ। यहाँ से स्वाभाविकता प्राण लेकर भाग रही है। यहाँ तो मसालों की चटपटाहट, मिठाइयों की भरमार और पटरस भोजन के विविध प्रकार जीभ को चैन नहीं लेने देते। आँतो को इतना लादा जाता है कि वे बोझ के मारे दाँत दिया जाती है, और ब्रश तथा पाउडर (फूंची और मजन) के मारे दाँतों की जड सोसली हो गई। शरीर ढकने के लिए तो हमने कीडा को मार-मारकर रेशम और पशुओ को नोच नोंच कर ऊन निकाली है। वह सब कुछ करने पर भी बीमारियो की यह दशा है, कि डाक्टरों ने सुइयों से सारा शरीर छेद डाला है। मैं तुम्हारे पास रहँगा। पक्षियों का क्ल-स्व मुझे ब्रह्म मुहूर्त में उठा दिया करेगा। अहा ! उस समय नील गगन के नीचे [फलदार वृक्ष *-N- ... -- . और रस-मय - पत्तियों में छिपी हुई लाल-लाल नारगिया, पके श्राम, सुगन्धित तथा सुस्वादु केले, मन ही मन मुसुकराते हुए गुलावी सेन, अनूठे असरोट और लाल लाल लीचियाँ, कहाँ तक कहूँ अमरूद, घेर, अनार, सन्तरे, पट्टे मिट्ट नीयू, लुकाट, करड़ी, सरयूज, खीरा, तरनूज इत्यादि समय समय पर मेरे मन को गुलाब-सा मिला देंगे। मै इनका आनन्द लढूंगा। डरिए न, तोडूगा नहीं। तुम जिन्हें छोड दोगे, उन्हींको प्रसादपत् उठा लूँगा। दाँतुन के लिए तुम्हारी डाडियो पर भी हाथ न डालूंगा। इस सात्विको भोजन में दाँत तो यों ही मोती से चमकेंगे। और साफ साफ होंगी तो दाँत पहले माफ रहेंगे। सोने के लिए तुम्हारी पुरानी पत्तियों पर पड़ा रहूँगा, उन्हीं से शरीर ढक लूँगा। तुम तो तोतो से भी नहीं ऊनते हो, जो तुम्हें कुतरते ही रहते हैं, तो क्या मुझे अपने पास न बुलाओगे ? तुम्हारी तपश्चर्या के प्रभाव से यदि मैंने कुछ सीख लिया तो मेरा जीवन सार्थक हो जायगा। उसमें सरलता, स्वाभाविकता और नियमितता आ जायगी। वहाँ मुझे मायाजाल से मुक्ति मिलेगी और मेरे विचारों में विमलता का वास होगा। मैं वहाँ तुम्हारे माली को सोनँ गा और यदि वह मिल गया तो जीवन्मुक्त हो जाऊँगा। तरुवर । इसीलिए मैं तुम्हें चाहता हूँ, मुझे इसी फल की इच्छा है।
निरन्धादर्श ] 4 ३१-बादल [भावात्मक] प्रव-विचार :- (१) बादला का अल्हड़पन, नयनाभिराम दृश्य । (२) उपकार म अपकार। (३) बल का दुरुपयोग। (४) नीच प्रकृति। (५)गुणा की ओर। बादला हवा पर सवार होकर तुम इतने इतरा चले। तुम धनी हो, वली हो, मानी हो, दानी हो, पर वावले हो, उतारले हो, अभिमानी हो, अज्ञानी हो। मैं तुम्हें बचपन से देख रहा हूँ। तुम्हारी लीला हो निराली है। बडे होने पर लोगों में समझ आ जाती है, पर तुम अपने अल्हडपन में ही मस्त हो । जन तुम्हारी अठसेलिया की ओर हम देखते हैं, तब तुम बड़े ही नयनाभिराम दृष्टि पाते हो। शरद की मुक्ता धवल चाँदनी मे चन्द्रमा की किरणो के झूले पर मूलते हुए तुम, हमारे नयनो में भूलने लगते हो। उप काल में मरीचिमाली के कर-स्पर्श से तुम्हारी आमा बैसी कमनीय प्रतीत होती है। साभ्य गगन में तुम्हारा पीत- लोहित वर्ण और उसपर विखरा हुआ सुरम्य रश्मि-जाल गुफा को लौटते हुए सिंह की उपमा बन जाता है। तुम्हारा पर्वतीय पाटल auhammamPre- R 4000 म demeans- - or-u4NMOMnoteomona विहार जज के गोवारण का दृश्य उपस्थित कर देता है। वृक्षों के शिखरों पर तुम मुकुट-से प्रतीत होते हो । पाश्रम में इन्द्रचाप से अलङ्कत तुम्हारा गान रसिकता से रेसाविन चित्र-सा जान पहता है। तुम्हारे मस्तक पर चमकती हुई बिजली की झलक तुम्हारे उग्र प्रभाव को प्रकाशित करती है। परन्तु, मादल "All thatgluttera is not gold" (सभी प्रकाशवान पदार्थ सुवर्ण नहीं होते)। जीवन धन । तुम जीवन-वर्षा करके वसुधा मे जीरन लाते हो। परन्तु, विवेक से काम कम लेते हो। तुम्हारी वर्षा का विशेष भाग मिलता है पापाण-भूमि पर्वतों को धा जलराशि समुद्र को। बाग-बगीचे, खेती-बारी पर तुम्हारी कृपा प्राय यदा कदा, समय-समय ही होती है और ऊपर पर मूसलधार गिराने में तो तुम्हारे 'गाँठ के पूरे और ऑस के अन्धे होने में सन्दह ही नहीं रहता। जहाँ तुम स्वय पत्थर बनकर गिरते हो, मला यहाँ क्या लाभ उठाते हो? अपने प्राण जायें सो जायें, पर औये का नाश हो, यही बात है न ? घनश्याम । तुम स्वय काला रूप धारण करते हो, पर कालों पर बिजली बनकर गिरते हो। यह कहाँ का न्याय ? इस जातिद्रोह में क्या लाभ ? घुमड़-घुमड और उमड-उमड़कर तम प्रलय मचाते हो। तुम्हारा अभिमान तुम्हारे बल के साथ बदसा है। इसमे तुम मुँह की साकर भी लजित नहीं होत । जानने १२ - म. 4. हो कि निर्धन के धन गिरिधारी' फिर भी वही अकड। बताओ तो, तुमने अपने हिमायतो इन्द्र को लेकर भी जज के ग्वाल बालों का क्या कर लिया था? उस समय तुम पानी पानी तो हो गये, पर डूबकर मरे नहीं। ध्रुव की तपस्या में ही तुमने विन डालने में क्या कमर रायी थी ? पर, वह ध्रुव ही रहा और तुम ध्रुव से ध्रुव तक दौड तगाकर भी अध्रुव हो रहे । तुम्हें पता है तुम कहाँ जन्मे हो, तुम्हारा स्थान कहाँ है? इसी धरती पर। इसलिए धरती पर पाँव रसकर चलो। सूर्य के तज से ऊँचे उठ गये तो क्या तुम्हारा स्वभाव बदल गया ? तुम तो सदा से नीचे की ओर जानेवाले रहे हो। ऊँचे चढकर कुछ ऊँची बातें भी सीस लो। हवाई घोडे पर क्या चढे, अन्ये बनकर उड़ते हो। तभी तो पहाडी से टकर पाकर तुम्हारे दाँत टूटते हैं। हवा के चक्कर मे तुम ऐसे आते हो कि घनचकर बन जाते हो। तुम अपने गुणों की ओर देखो। तुम महादानी हो, सर को देते हो, किसीको विमुख नहीं करते। परन्तु, पात्र परीक्षा में अधूरे हो। चातक ने युग निता दिये, पर तुम्हारी अनन्य भक्ति से कभी मुँह न मोडा। परन्तु आज तक तुमने उसका दुबमोचन किया ? क्या अन भी उस दीन पर तुम ओले गिरा- पर अपनी कठोरता का परिचय नहीं देते। ऐसा क्यो ? भक्तों की तो भगवान् भी सुध लेते हैं, परीक्षा की भी सीमा होती है। ~ [ माँ का हृदय Diary . तुम केले पर गिरो, तो कपूर बनकर ससार को महका दो। सीप के मुख मे गिरो, नो जगत् को मोतियों से जगमगा दो, सेतो पर गिरो, तो पृथ्वी का अञ्चल धानी परिधान से लहलहा दो और भारतीय किसान प्रजा तुम्हारी छत्रच्छाया में राम-राज्य का अनु. भव करने लगे। पर कब ? जब तुम्हारा सकल्प ध्रुव हो, तुम्हे शुभाशुभ का विवेक हो। इसीसे तो हम कहते हैं कि तुम वावले हो, उतावले हो। ३२-मॉ का हृदय माँ, तुम्हारा हृदय कितना कोमल है। फल-सा नहीं माँ, वह तो कॉटों मे पला है, उसमे तो कोडे वमते हैं। मोम-सा ? नहीं माँ, वह तो मक्खियो का मल है। मक्सन-सा नहीं माँ, बिलोते-निलोते उसका तो मन ही मसल दिया गया है, वह शीत से कडा और धूप से ढीला हो जाता है। फेन-सा ? नहीं माँ, वह तो छूते ही बैठ जाता है। रेशम-सा ? नहीं माँ, वह तो कीडो का कफन है । रोम-सा ? नही माँ, वे तो हवा लगते ही उड जाते हैं। राम की गुडियों सा ? नहीं माँ, वे तो हाल ही विला जाती हैं। मॉ, तुम्हीं बता दो कैसा ? माँ कैसी हो, बता दो। ऊँ। हँसती तो हो, नात नहीं बताती। अन्छा जाने दो। माँ, तुम्हे नींद नहीं आतो? तुम तो जब देखो तर जगती ही दिखाई देती हो । तुम्हारी गोद नहीं दुसती ? ।
निबन्धादर्श] १८० तुम तो मुझे उममें बदाये ही पदाये फिरती हो। तुम्हें पिन नहीं लगती ? तुम तो मेरे मैल-युचेने अनों को धोती-पोड ती ही रहनी हो। तुम्हारी छावी नहीं पिराती ? तुम तो मुझे काम घेनु को नाई मदाही दूध पिलाती हो। तुम्हें कोई चीच नहीं भाती ? तुम तो मन मेरे हो लिए रस प्रोड़ती हो। पुम्हारा ध्यान और कहीं नहा जाता ? तुम तो मानों मेरे रोने ही को घेठी चैठी मुनती रहती हो। माँ तुम्हें कभी पुछ पीड़ा नहीं होती। तुम तो मेरे सामने हँमती मुमकुराती ही रहती हो। मा, तुम क्यों भूली मूली फूली नहीं समाती १ तुम्हें कुछ धन नहीं चाहिए ? मुझे ही तुम रन समझती हो। माँ। मेरे तन फी धूल से ही सुम कान्तिमती हो। मेरे मुखड़े पर तुम यलि जाती, और उसे चूमकर मर कुछ पा जाती हो । मैं বৃদ্মায় खिलौना हूँ माँ और तुम मेरी गोदी। । माँ, तुम मेरी गैया हो और मैं तुम्हारा यछड़ा। तुम तो प्रेम को पुतली हो । माँ, तुम्हारे पलफ मेरे विद्यौने हैं। तुम गैया-मी भोलो हो, पर मेरी ओर क्सिीको आँस उठते ही तुम यापिनी से । दया तुम्हारे घर को भिसारिनी है माँ। तुम्हारे लिए तो मैं सदा अबोध हूँ। कुछ भी कर टालें, तुम्हें तैश नहीं आता माँ। तुम मुझे दुधमुँहा हो मानती हो। तुम्हारे लिए मेरा कोई अपराध अपराध ही नहीं, तुम सब को सुधारने की आशा पढकर १८१ [माँ का हदय . an H 4 . रखती हो। तुम्हारी ममता अथाह है माँ । उसकी तह मे आशा की अनन्त धारा अगाध गति से बहती रहती है। बहुत से सुहृद मिलते हैं माँ। पिताजी की आमा मुझ म रहती है, मिन मन ही दे देते हैं ? सखा सर्वस्त्र अर्पण करते हैं , सहोदर जीवन में ही मिला देते हैं , पुत्र पुत्री अनुराग की प्रतिमा ही हैं, पत्नी के प्राण ही पति में रहते हैं। परन्तु, तुम्ह कोई नहीं पहुंचते माँ। माँ, तुम्हारे हृदय मे हृदय का भी निवास है। हाँ, याद आई माँ। ये सर तो पीछे के सम्बन्धी हैं। मेरे जीवन की पहली सॉस तुम्हारी ही साँस थी। तुमने और मैंने तो एक ही नली के द्वारा महीनों साँस ली है। मेरा तुम्हारा जीव ही एक है माँ। फिर क्या न तुम्हारा हृदय तुम्हारा ही हृदय हो ? माँ, हृदय तो तुम्हारे ही पास है, और तो सब सहृदयता की भूलभुलैयाँ हैं।