Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Shri Samvayang Sutra Ang-iv

Jatalal, Sudama,abya · 2011/01

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२१६
श्रीसूत्रकत
तथौष्ठावपि द्वावपि को छि
जिह्वां वितस्तिमात्रामाक्षिण्य ।
न्ति इति ॥ २२ ॥ तथा-
(टीकार्य) वे परमावार्मिक, प
युक्त निर्विवेकी नारकि जीरकी नाभि
कान काट लेते है। तथा मद्य मार
जिव्हाको एक बीत्ता बाहर निकाल
मूलम्-ते तिप्पमाणात
गलंति ते सोणिअपूयमं
(छाया) ते तिप्यमानार
गलन्ति ते शोणि
(अन्वयार्थ) (तिप्पमाणा)
अज्ञानी ( तालसपुटव ) सूरो ।
नरक्मे (थणति) रोते रहते है।
अन्नोंमें सार लगाये हुए (मोणि
गिराते रहते है।
(भावार्थ) वे अज्ञानी नार
के समान रातदिन शब्द करते
गये
वे नारकि जीन रक्त, प
(टीका) 'ते' छिन्नना
प्रदेशे रात्रि

पोखरतरगच्छीय ज्ञान मन्दिर, पा
श्री सुखरखची बार सावर
म
ॐ ॥
। ॐ अह।
श्री समवायाङ्ग सूत्र (चतुर्थ अंग)
मूळ तथा मूळ अने टीकानुं गुजराती भाषान्तर
ज
भापान्तरकर्ता-शास्त्री जेठालाल हरिभाइ.
सहायक-जैनशास्त्रशैली अनुसार यथामति संशोधन करनार
कुंवर जी आ णं द जी.
छपावी प्रसिद्ध करनार
श्री जैन धर्म प्रसारक सभा
13.
वीर सं २४६५]
[ विक्रम स १९९५
११.००
किंमत रु.
卐 卐

टतम
मुद्रकन
शा. गुलापचंद लालुभाई
महोदय प्रेस-भावनगर.
किंमत रुपिया प्रण

श्रीसमवायाङ्ग सूत्र (चोथु अंग) मूळ अने मूळ तथा टीकाना अर्थ साथे SEKEE टीकाकारनुं मंगलादिक- श्रीवर्धमानमानम्य, समवायाह्नवृत्तिका । विधीयतेऽन्यशास्त्राणां, प्रायः समुपजीवनात् ॥ १ ॥ श्री वर्धमानस्वामीने नमस्कार करीने समवायांग मूत्रनी वृत्ति (टीका ) प्राये करीने अन्य शास्त्रोनो आश्रय-आधार लइने मारावडे कराय छ (हुं करुं छु.). दुःसंप्रदायादसदूहनाद्वा, भणिष्यते यद्वितथं मयेह । तद्धीधनैर्मामनुकम्पयद्भिः, शोध्यं मतार्थक्षतिरस्तु मैवम् ॥ २ ॥ Emat श्री चो| अंग। समवायाङ्ग सूत्र॥ ॥१॥ दुष्ट ( खोटा) संप्रदायथी अथवा खोटा तर्क करवाथी आ शास्त्रमा माराथी जे काइ खोटुं कहेवाय, ते मारा पर अनु- कंपा करनारा बुद्धिमानीए शोध_-शुद्ध करवू, एवी रीते करवाथी मत (शास्त्रसंमत) अर्थनी क्षति न थाओ. अहीं स्थानांग नामना जीजा अंगना अनुयोग ( व्याख्या) पछी आ समवाय नामना चोथा अंगनो अनुयोग अनु- क्रमे प्राप्त थलो छे. तेथी हवे तेनो आरंभ कराय छे. तेमां फळं विगेरे द्वारोनो विचार स्थानांगना अनुयोग प्रमाणे अनुक्रमे जाणी लेवो. विशेषमा आ ( समवाय) नो समुदाय अर्थ आ प्रमाणे छे-'सम् ' एटले सम्यकप्रकारे, सम् ' एटले सम्यकप्रकारे, 'अव' एटले अधिकपणाए करीने ' अय ( अयनं )' एटले परिच्छेद-अवधारण अर्थात् जीवाजीवादिक विविध पदार्थना समूहनुं ज्ञान जेमा छे ते 'समवाय' कहेवाय छ, अथवा 'समवयन्ति '-' समवतरन्ति-संमिलन्ति' एटले विविध प्रकारना जीवादिक पदार्थों जेने विपे अभिधेय( वाच्य )पणाए करीने अवतरे छ-एकठा थाय छे ( मळे छे-जाणवामां आवे छे) समवाय' कहेवाय छे. ते समवाय प्रवचनरूपी पुरुपर्नु अंग होवाथी 'समवायांग' कहेवाय छे. श्री श्रमण भगवंत महावीर-वर्धमानस्वामीना पांचमा गणधर आर्य सुधर्मास्वामी जंबू नामना पोताना शिष्यने समवायांगनो अर्थ कहेवाने इच्छता सता ते वखते पोताना धर्माचार्य भगवानने विपे बहुमानने प्रगट करता तथा पोताना वचनने विपे समग्र १ तस्स फलजोगमगल-समुदायत्था तहेव दाराइ । तन्मेयनिरुत्तिकमपयोयणाई च वच्चाइ ॥ १ ॥ फळ (प्रयोजन ), योग ( सबंध ), मंगळ, समुदायार्थ, द्वारो, तेना भेद, निरुक्ति, क्रमप्रयोजन एटली बावत प्रथना प्रारममा प्राये कहेली होय छे. ( स्थानागनी टीकामाथी आ गाथा लखी छे.)

वस्तुना विस्तार ( समूह ) ना स्वभाव ( स्वरूप ) ने प्रगट करनार केवळज्ञाने करीने सहित श्रीमहावीरस्वामीना वचननो आश्रय ( आधार ) होवाथी आ मारुं वचन निर्विवादपणे प्रमाणभूत छ एम शिष्यनी बुद्धिने विपे आरोपण करता सुधर्मा- स्वामी प्रथम आ संबंधना सूत्रने कहे छ.-- मू०-सुयं मे आउसं तेणं भगवया एवमक्खायं- अर्थः हे आयुष्मान ( जंवू)! में सांभळ्यु छ के-ते भगवाने आ प्रमाणे कयुं छे- टीकार्थः-ते एटले जे आ रागद्वेषादिक विपम भावशत्रुना सैन्यने मूळ सहित उखेडी नांखवाथी तथा त्रण भुवनना समग्र पदार्थोने प्रकाश करनार केवळज्ञानवडे पोताना अनुभवपूर्वक विसंवाद रहित वचनवाळा होवाथी त्रणभुवनरूपी घरना आंगणामां जेनो अमृत जेवो उज्ज्वळ यशसमूह प्रसरेलो छ तेवा आ भगवान-समग्र ऐश्वर्यादिक समृद्धिए करीने सहित महावीरस्वामीए आ प्रमाणे एटले आगळ कहेवामां आवशे ते प्रमाणे आत्मादिक वस्तुतत्त्वने कह्यु छे. अथवा 'आउसंतेणं' एबुं आखं पद भगवाननुं विशेषण तरीके करवं. एटले आयुष्यवाळा-चिरकाळना जीवितवाळा एवा भगवाने अथवा पाठां- तरवडे ' आवसता ' एवं पद करीने ' मया' नुं विशेषण करवं एटले के गुरुकुळने विपे वसता अथवा विनयने निमित्ते वे करतलवडे गुरुना बे चरणकमळने 'आमृशता' एटले स्पर्श करता एवा में, अथवा ' आउसंतेणं' एटले प्रीतियुक्त मनवडे सेवा करता एवा में (आ प्रमाणे सांभळयुं छे.) भगवाने जे कयुं छे ते हवे कहेवाय छे–'एगे आया' इत्यादि. अन्य कोइ वाचनामां बीजी रीते संबंधनुं सूत्र

श्री
चोयुं
अंग॥
समवाथाङ्ग
सूत्र॥
॥ २॥
जोवामां आवे छे. ते प्रथम कहे छे.-
मू०-[ इह खलु समणेणं भगवया महावीरेणं आइगरेणं तित्थगरेणं सयंसंबुद्धणं पुरिसुत्त-
मेणं पुरिससीहेणं पुरिसवरपुंडरीएणं पुरिसवरगंधहत्थिणा लोगुत्तमेणं लोगनाहेणं लोगहिएणं लोग-
पईवेणं लोगपज्जोअगरेणं अभयदएणं चक्खुदएणं मग्गदएणं सरणदएणं जीवदएणं धम्मदएणं
धम्मदेसएणं धम्मनायगेणं धम्मसारहिणा धम्मवरचाउरंतचकवहिणा अप्पडिहयवरनाणदंसणधरेणं
वियदृच्छउमेणं जिणेणं जावएणं तिन्नेणं तारएणं बुद्धेणं बोहएणं मुत्तेणं मोयगेणं सवन्नुणा सव-
दरिसिणा सिवमयलमरुयमणंतमक्खयमवावाहमपुणरावित्तिसिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपाविउका-
मेणं इमे दुवालसंगे गणिपिडगे पन्नत्ते, तं जहा-आयारे १ सूयगडे २ ठाणे ३ समवाए ४ विवा-
हपन्नत्ती ५ नायाधम्मकहाओ ६ उवासगदसाओ ७ अंतगडदसाओ ८ अणुत्तरोववाइदसाओ
९ पण्हावागरणं १० विवागसुए ११ दिट्ठिवाए १२ । तत्थ णं जे से चउत्थे अंगे समवाए त्ति
आहिते तस्स णं अयमढे पन्नत्ते-तं जहा-]
॥ २ ॥

मूलार्थः-आ जगतमां श्रमण भगवान महावीरस्वामी के जे श्रुतधर्मनी आदिने करनारा, तीर्थने करनारा, पोतानी मेळे बोध पामेला, पुरुषोने विपे उत्तम, पुरुप छतां सिंह जेवा, पुरुप छतां श्रेष्ठ पुंडरीक जेवा, पुरुप छतां श्रेष्ठ गंधहस्ती जेवा, लोकने विषे उत्तम, लोकना नाथ, लोकने हितकारक, लोकने प्रदीप समान, लोकने विपे प्रद्योत कर- नारा, अभयने आपनार, चक्षु ( श्रुतज्ञान ) ने आपनार, सम्यगदर्शनादिक मार्गने आपनार, शरणने आपनार, जीवनने आपनार अथवा जीवोने विपे दयावाळा, धर्मने आपनार, धर्मनो उपदेश करनार, धर्मना नायक, धर्मना सारथि, धर्मना विपयमां चारे दिशाना श्रेष्ठ चक्रवर्ती समान, अस्खलित अने श्रेष्ठ एवा ज्ञान तथा दर्शनने धारण करनार, छद्मस्थपणाथी रहित थयेला, राग-द्वेषादिकने जीतनार, जीताडनार, संसारसमुद्रने तरनार, वीजाने तारनार, जीवादिक तत्वने जाणनार, वीजा जीवोने तत्व जणावनार, पोते मुक्त थयेला, बीजाने मुक्त करनार, सर्वज्ञ अने सर्वदर्शी तथा सुखकारक, अचलित, रोग रहित, अंत रहित, क्षय रहित, व्यावाधा रहित अने फरीथी भवमा आवदुं न पडे तेवा सिद्विगति नामना स्थानने प्राप्त करवानी इच्छावाळा ते भगवाने आ द्वादशांगीरूप गणिपिटक प्ररूप्यु छे. तेना नाम आ प्रमाणे.--आचारांग १, सूत्रकृतांग २, स्थानांग ३, समवायांग ४, विवाहप्रज्ञप्ति ( भगवती ) ५, ज्ञाताधर्मकथा ६, उपासकदशा ७, अंतकृत- दशा ८, अनुत्तरोपपातिक दशा ९, प्रश्नव्याकरण १०, विपाकश्रुत ११ अने दृष्टिवाद १२. तेमां जे ते (प्रसिद्ध ) चोधुं अंग समवाय नामर्नु कयुं छे, तेनो आ अर्थ कह्यो छे, ते आ प्रमाणे- टीकार्थ:--आ वाचना मोटी होवाथी तेनी व्याख्या करीए छीए आ वीजुं सूत्र संग्रहरूप प्रथम सूत्रना ज विस्तार-

चोथु
अंग ॥
श्री
समवायाग
सूत्र॥
रूपे जाणवू. आनी व्याख्या आ प्रमाणे छ.--'इह' आ लोकमां अथवा निग्रंथना तीर्थमां (जिनशासनमां ). 'बलु
शब्द वास्यनी शोभा माटे छे, अथवा निश्चय अर्थमां छे, तेथी आ ज जिनशासनमां, पण शाक्यादिक अन्य शासनमां
नहीं. 'श्रमण' एटले तपस्या करनार. आ चरमजिनेश्वरनुं माथे ज उत्पन्न थगेलं वीजुं नाम छे. ते चिपे कयुं छे के--
सहसंमतिए करीने एटले साथे ज संमतिपणाए करीने 'श्रमण' एबुं नाम थयुं छे." भगवाननों अर्थ प्रथम (सूत्रमां)
कह्या प्रमाणे जाणवो. मोटा एवा वीर ते महावीर कहेवाय छे. आ नाम मोटा साचिकपणाए करीने प्राणनो नाश करवामां
समर्थ एवा परीपहो अने उपसर्गों प्राप्त थया छतां पण कंपायमान नहीं थवाथी देवेंद्रोए प्रसिद्ध कयु छे. ते विपे कगुंछ के-
"भयंकर भयथी पण अचलित, परीपहो अने उपसर्गो प्राप्त थया छतां पण क्षमागुण धारण करवामां समर्थ अने प्रतिज्ञाना
पार पामनार होवाथी देवोए तेमनुं 'महावीर' एवं नाम कयु छे." ते भगवान केवा छे ? ते उपर तेमनां
विशेषणो आपे छे--' आठौ करोति इत्येवं शीलः' प्रथम आचारादिक ग्रंथरूप श्रुतधर्म ने तेनो अर्थ कहेनार होवाथी
रचवाना स्वभाववाळा, तथा प्राणीओ जेना बडे संसारमागरने तरे छे ते तीर्थ एटले प्रवचन कहेवाय छे. ते प्रवचनथी
भिन्न नही होवाथी, अहीं चतुर्विध संघ ज तीर्थ छ, ते तीर्थने करवाना स्वभाववाळा होवाथी भगतान तीर्थंकर कहेवाय छे
ते तीर्थकर वीजाना उपदेशथी बोध पाम्या छ एम नथी, तेथी कहे छे के–' स्वयंसंवुद्ध' वीजाना उपदेश विना
पोतानी मेळे ज हेय-उपादेय वस्तुतचने सम्यक् प्रकारे जाणनारा. आ भगवाननुं पुरुपोत्तमपणुं होवाथी सामान्य मनुष्यनी
जेवू स्वयसंयुद्धपणुं संभवतुं नथी, तेथी कहे छ के-पुरुषोना मध्ये ते ते प्रकारना अतिशय रूपादिकवडे सर्वथी उपर वर्तनार
--
॥३॥

- ( श्रेष्ठ ) होवाथी उत्तम छ तेथी पुरुषोत्तम छे. हवे सिंहादिक त्रण उपमानवडे आ भगवाननुं पुरुषोत्तमपणुं सिद्ध करता सता कहे छ के-सिंहनी जेवा शूरवीर होवाथी सिंह, पुरुपरूपे सिंह ते पुरुपसिंह कहेवाय छे. लोकोए सिंहने विपे अत्यंत प्रकृष्ट शौर्य मान्युं छे, तेथी शूरवीरपणाने आश्रीने सिंहनी उपमा आयी छे. भगवानने बाल्यावस्थामा प्रत्यनीक (मिथ्यात्वी) देव अत्यंत वीवराववा आव्यो हतो-वीवराववानो प्रयत्न कर्यो हतो तो पण ते भय पाम्या नहोता, तथा क्रीडा समये वृद्धि पामता देवना शरीरने वज्र जेवी मुष्ठिना प्रहारवडे हणीने कुब्ज करी नांख्युं हतुं, तेथी भगवाननुं शूरवीरपणुं प्रसिद्ध ज छे. तथा श्रेष्ठ एवं जे पुंडरीक एटले धोळं कमळ ते वरपुंडरीक कहेवाय छे, अने पुरुषरूप ज जे वरपुंडरीक ते पुरुषवर- पुंडरीक कहेवाय छे. अहीं भगवान सर्व अशुभ एवा मलिनपणाथी रहित छे अने सर्व शुभ अनुभावोवडे शुद्ध छे तेथी तेनुं श्वेतपणुं कर्तुं छ. तथा श्रेष्ठ एवो जे गंधहस्ती ते वरगंधहस्ती कहेवाय छे अने पुरुपरूप जे वरगंधहस्ती ते पुरुपवरगंधहस्ती कहेवाय छे. जेम गंधहस्तीना गधथी ज सर्व हस्तीओ भागी (नाशी) जाय छ, तेमना मद गळी जाय छे, तेम भगवानना ते ते देशना विहारवडे ज सात प्रकारनी ईतिओ-स्वसैन्य, पग्सैन्य, दुकाळ अने डमर-मरकी विगेरे उपद्रवो सो योजन सुधीमां नाश पामे छे. ' तेथी भगवान पुरुषरूपी श्रेष्ठ गंधहस्ती समान छे. हवे भगवान केवळ पुरुषोनी मध्ये ज उत्तम छे एटलं ज नहीं, परंतु समग्र जीवलोकमां पण उत्तम छे, तेथी कहे छे के-' लोकोत्तम' तिर्यंच, मनुष्य, नागकी अने देवरूप चार प्रकारना समग्र जीवलोकने विपे 'उत्तम' एटले ज्ञानीना (केवळज्ञान थवाथी उत्पन्न थनारा) चोत्रीश अतिशयो विगेरे अमाधारण गुणोना १. अही चारे दिशामा सो सो योजन समजवा.

चोथु अंग॥ समवायाङ्ग सूत्र॥ समूहवडे युक्त होवाथी तथा समग्र सुर, असुर, विद्याधर अने मनुष्योना समूहने नमवा लायक होवाथी प्रधान छे. भगवाननुं लोकोत्तमपणुं देखाडता सता कहे छे के-'लोकनाथ' लोकना एटले संज्ञी भव्य जीवोना जे नाथ एटले प्रभु, ते लोकनाथ कहेवाय छे. अहीं ' योगक्षेमकृन्नाथः' (जे योग अने क्षेमने करनार होय ते नाथ कहेवाय छ ) एवं शास्त्रनुं वचन छ तथी नही प्राप्त थयेला सम्यग्दर्शनादिकनो योग करवाथी अने प्राप्त थयेला एवा ते गुणोनुं पालन-रक्षण करवाथी आ भगवाननुं नाथपणुं सिद्ध थाय छे. वळी लोकनुं हित करनार होय तो ज तेनुं तात्त्विक (साधु) नाथपणुं संभवे छे, तेथी कहे छ के- लोकना एटले एकेन्द्रियादिक सर्व प्राणीसमूहना हितकर एटले तेमनी अत्यंत रक्षानो प्रकर्ष थाय तेवी प्ररूपणा करवावडे अनुकूळ वर्तनार होवाथी भगवान लोकहित कहेवाय छे. वळी आ भगवाननुं नाथपणुं अने हितकरपणुं कह्यु, ते भव्य प्राणीओने यथास्थित समग्र वस्तुसमूहने दीपाववाथी-ओळखाववाथी ज संभवे छ, अन्यथा संभवतुं नथी, तेथी कहे छ के-विशेष प्रकारना ( भव्य ) तिर्यंच, नर अने देवरूप लोकना आभ्यंतर ( अज्ञानरूपी) अंधकारना समूहने नाश करवा पूर्वक उत्कृष्ट पदाथोंने प्रकाश करनार होवाथी भगवान प्रदीपनी जेवा प्रदीप होवाथी लोकप्रदीप कहेवाय छे. आ लोकप्रदीप ) विशेपण द्रष्टलोक (प्राणीओ) ने आश्रीने कयुं छे तेथी हवे दृश्य ( देखवा लायक ) लोकने आश्रीने विशेषण कहे छे के-जे जोवामां आवे ते लोक, एवी व्युत्पत्ति करवाथी संपूर्ण सूर्यमंडळनी जेवा समग्र पदार्थोना स्वभावने प्रगट करवामां समर्थ एवा केवळज्ञानपूर्वक प्रवचन ( सिद्धांत ) रूपी प्रभाना समूहने प्रवर्ताववावडे लोकालोकरूप सर्व वस्तुसमूहना स्वभावने जे प्रद्योत-प्रकाश करवाना स्वभाववाळा ते लोकप्रद्योतकर कहेवाय छे. अहीं कोई शका करे के- ॥४॥ IA लोकनाथपणुं विगेरे विशेषणोना योग (संबंध) वाळा विष्णु, शंकर अने ब्रह्मा विगेरे देवो पण ते ते तीथिकोना मत प्रमाणे संभवे छे, तेथी आ भगवानना संबंधमा विशेष शुं आव्युं ? आवी शंका थवाथी तेनुं विशेषपणुं कहेवा माटे कहे छे के-प्राणनो नाश करवामां रसिक एवा उपसर्गो करनारा प्राणीने पण जे भय आपनारा नथी ते अभयदय कहेवाय छ, अथवा जेने सर्व प्राणीओना भयने दूर करनारी दया होय ते अभयदय कहेवाय छे, तेवा तो आ भगवान ज छे, पण हरि-हरादिक देवो तेवा नथी. वळी आ भगवान अपकार करनारानो पण अनर्थ दूर करे छे एटलं ज नहीं, परंतु अर्थनी प्राप्तिने पण करे छे, ते देखाडे छ,- शुभाशुभ पदार्थनो विभाग (विवेचन) करनार होवाथी चक्षुनी जेवा चक्षुरूप श्रुतज्ञानने जे आपे छे, ते चक्षुर्दय कहेवाय छ वळी जेम लोकमां चक्षु आपीने इच्छित स्थाने जवानो मार्ग देखाडनार पुरुष महाउपकारी होय छे- कहेवाय छे, तेम अही पण जाणवू, ते ज वावत देखाडता सता कहे छे के-सम्यग् दर्शन, ज्ञान अने चारित्ररूप मुक्तिपदना मार्गने जे आपे छे-देखाडे छे ते मार्गदय कहेवाय छे. वळी जेम लोकमां चक्षुर्नु उघाडवू अने मार्गनुं देखाडवू करीने चौरादिकथी उपद्रव पामता प्राणीओने उपद्रव रहित एवा स्थानने पमाडनार पुरुप परम उपकारी थाय छे-कहेवाय छ, तेम अहीं पण जाणवू. ते ज वावत देखाडता सता कहे छे के-शरण एटले अज्ञानरूपी उपद्रवोथी हणायेला प्राणीओने रक्षण करवानुं स्थान अर्थात् आवं स्थान परमार्थथी निर्वाण-मोक्षस्थान छे, तेने जे आपनारा ते शरणदय कहेवाय छे. वळी जेम लोकमां चक्षु, मार्ग अने शरण आपवाथी दुःखी प्राणीओने जीवित आप्यु कहेवाय छे, तेम अहीं पण जाणवू. ते बावत देखाडता सता कहे छे के जीव एटले भावप्राणनुं धारण करचुं ते अर्थात् अमरणधर्मपणुं (कोइ पण वखत मरण न थाय ते) श्री समवायाङ्ग सूत्र॥ चोथु अंग ॥ आवा जीवनने जे आपे ते जीवदय कहेवाय छे. आ हमणां कहेल विशेषणोनो ममूह भगवाननी धर्ममय मूर्ति होवाथी प्राप्त थाय छे-लागु पडे छे. तेथी चीजा पांच विशेषणोवडे भगवानना धर्ममयपणाने कहे छे-बतावे छे.-दुर्गतिमा पडता जंतुओने धारण करवाना स्वभाववाळो जे होय ते धर्म कहेवाय छे. ते धर्म श्रुत अने चारित्र एम बे प्रकारनो छे. आवा धर्मने जे आपे ते धर्मदय कहेवाय छे. अहीं धर्मनुं जे देवू ते तेना कहेवावडे ज थइ शके छे, तेथी कहे छे के- उपर कहेला धर्मने जे देखाडे एटले कहे ते धर्मदेशक कहेवाय छे. आ भगवाननुं धर्मदेशकपणुं धर्मना स्वामीपणाने लइने ज छे, पण नटनी जेवू नथी. ते बावत देखाडता सता कहे छ के-क्षायिक ज्ञान, दर्शन अने चारित्ररूप धर्मना नायक एटले यथार्थ रीते पालन करनार होवाथी जे स्वामी, ते धर्मनायक कहेवाय छे. तथा भगवान धर्मना मारथि छे. जेम रथनो सारथि रथy, रथिकनुं (रथमां बेसनारर्नु) अने अश्वोचं रक्षण करे छ, तेम भगवान चारित्र धर्मना अंगभूत एवा संयम, आत्मा अने प्रवचन ( सिद्धांत )नुं रक्षण करवानो उपदेश आपे छे, तेथी ते धर्मसारथि कहेवाय छे. तथा त्रण दिशाए समुद्र अने उत्तर दिशा तरफ हिमवान पर्वत ए चारेना पर्यंतने विपे एटले ते चारे दिशा सुधी जेनुं रवामीपणुं होय ते चातुरत कहेवाय छे, एवा चातुरंत जे चक्रवर्ती ते चातुरंत चक्रवर्ती कहेवाय छ' अने 'वर' एटले श्रेष्ठ एवा जे पृथ्वीना चातुरंतचक्रवर्ती ते वरचातुरतचक्रवर्ती एटले राजाना अमुक प्रकारना विशिष्ट अतिशयवाळा कहेवाय छे. हवे धर्मना विषयमा जे वरचा- तुरतचक्रवर्ती ते धर्मवरचातुरतचक्रवर्ती कहेवाय छे. जेम पृथ्वी उपर गर्व राजाओथी चडीयाता वरचातुरंतचक्रवर्ती होय छे, १ आ हकीकत जंबूद्वीपना भरतक्षेत्रने आश्रयीने समजवी. 73 तेम भगवान धर्मना विषयमां वीजा धर्मना रचनाराओने विप अतिशयवाळा (चडीयाता) होवाथी धर्मवरचातुरंतचक्रवर्ती कहेवाय छे. (चार गतिनो अंत करनार होवाथी पण चातुरंत चक्रवर्ती कहेवाय छे.) आ धर्मदायक विगेरे पांच विशेषणो प्रकृष्ट ज्ञानादिकनो योग सते ज संभवे छे, तेथी करीने कहे छे के-अप्रतिहत एटले टाडं, भीत के पर्वत विगेरे वडे स्खलना न पामे तेवा अथवा विसंवाद रहित एवा अथवा क्षायिकभावना होवाथी 'वर' प्रधान एवा केवळज्ञान अने केवलदर्शनने जे धारण करे छे ते अप्रतिहतवरज्ञानदर्शनधर कहेवाय छे. वळी आवा प्रकारनी ज्ञानसंपदावडे सहित छतां पण जो ते छद्म- वान एटले मिथ्या उपदेश करनार होय तो ते उपकारी थता नथी, तेथी छद्मरहितपणुं जणाववाने माटे व्यावृत्तछग कहे छे अथवा तो आ भगवानने अप्रतिहत एवं संवेदन ( ज्ञान-दर्शन ) शी रीते प्राप्त थयुं ? तेना जवावमां कहे छ के-आवरणनो सर्वथा अभाव थवाथी, ए जवाबत कहे छ के-व्यावृत्त एटले सर्वथा नाश पाम्युं छे छद्म एटले अज्ञानीपणुं अथवा ज्ञाना- वरण जेनुं ते व्यावृत्तछद्म कहेवाय छे. वळी आ भगवानने माया अने आवरणनो अभाव रागादिकनो जय करवाथी थयो छे, तेथी कहे छे के-रागद्वेपादिक आभ्यंतर शत्रुओने जे जीते छे-दूर करे छे, ते जिन कहेवाय छे तेमने. वळी आ भग- वाने रागादिक शत्रुओने जीत्या छे ते रागादिकना स्वरूपने अने तेना जयना उपायने जाणवापूर्वक ज जीत्या छ तेथी कहे छे के-छाद्मस्थिक चार ज्ञानवडे जे जाणे छे ते ज्ञापक कहेवाय छे. आ विशेषणोवडे आ भगवाननी स्वार्थसंपत्तिनो उपाय कह्यो (एटले के पोताना आत्माने ज गुण करनार कह्या), हवे स्वार्थसंपत्तिपूर्वक परार्थसंपत्तिपणाने छ विशेषणोवडे कहे छे.-'तीर्ण' संसाररूपी सागरने तरी गयानी जेवाजे तरी गयेला, ते तीर्ण कहेवाय छे. तथा 'तारक' पोताना उपदेश .. श्री चोथु अंग॥ समवायाज प्रमाणे वर्तनारा बीजा जीवोने पण जे तारे छे ते तारक कहेवाय छे. तथा 'बुद्ध' जीवादिक तत्त्वो जेणे जाण्या छे ते बुद्ध कहेवाय छे. तथा वीजा प्राणीओने पण जीवादिक तत्त्वोने (उपदेश द्वारा) जणावनारा होवाथी बोधक कहेवाय छे. तथा 'मुक्त'-बाह्य अने आभ्यंतर ग्रंथिना बंधनमांथी मुक्त-रहित थयेला. तथा तेज ग्रंथिबंधनथी वीजा प्राणीओने मूकावनारा होगाथी मोचक कहेवाय छे. तथा मुक्तपणुं छतां पण 'सर्वज्ञ' अने 'सर्वदशी' (सर्व पदाथोंने जाणनार अने सर्व पदार्थोने जोनार) एवा परतु अन्य दर्शनीओए मुक्तावस्थामा पुरुप (आत्मा) ने जड थवा रूप मान्यो छे, एवा आ भगवान नथी. तथा सिद्विगति नामर्नु स्थान के जे सर्व प्रकारनी वाधा-पीडा रहित होवाथी 'शिव' सुखकारक छे, स्वाभाविक अथवा बीजाना प्रयोगथी (प्रेरणाथी) चालवाना हेतुनो अभाव होवाथी 'अचल' अचळ छे, शरीर अने मन नहीं होवाथी 'अरुज' रोग रहित छे, अनंत अर्थना विषयवाळा ज्ञानस्वरूप होवाथी 'अनंत ' छे, सादिअनतस्थितिपणुं होबाथी 'अक्षय' नाश रहित छ, अथवा पूर्णि: माना चंद्रमंडळनी जेम परिपूर्ण होवाथी 'अक्षत' छ, पीडा करनार नहीं होवाथी 'अव्यानाध' छ, तथा संमारमा अवतरवाना कारणभूत कर्मनो अभाव होवाथी ' अपुनरावर्तक ' फरीथी कोइ वार पण ज्यांथी संसारमा आववापणुं नथी, एबुं सिद्विगति नामनुं जे 'स्थान' एटले जेने विपे जीव कर्मे करेला विकारना रहितपणे निरतर अवस्थित रहे ते स्थान अर्थात् क्षीण कर्मवाळा जीवनुं स्वरूप अथवा लोकाग्र नामनुं स्थान. अही सर्व विशेषणो आत्मस्वरूपना छ, ते लोकायनां विशेषणो तरीके कहां छ, ते आधेय (जीव ) ना धर्मो (गुणो) नो आधारमा ( लोकाग्रमां) आरोप कयों छ एम जाणवू. आवा प्रकारना स्थानने पामवानी इच्छावाळा भगवान छे, पण हजु तेने पामेला नथी; कारण के ते स्थानने जो पामेला होय तो तेने इंद्रियो नहीं होवाथी ग्ररूपणा करी शके नही. अहीं 'पामवानी इच्छाचाळा' एम जे कयुं ते उपचारथी कयुं छे, कारण के केवळी भगवान इच्छा रहित ज होय छे. ते विपे कयुं छे के-" उत्तम मुनि मोक्षने विपे अने संसारने विपे सर्वत्र निःस्पृह-इच्छा रहित ज होय छे." आ प्रमाणे असंख्य गुणसमूहरूपी संपदाए करीने सहित एवा भगवाने 'इमं आ एटले हमणां ज कहेवातुं होवाथी प्रत्यक्ष, समीपे रहेढं अने ' द्वादशांग' जेमां बार अंग रहेला छे एबुं 'गणिपिटक ' आचार्य पिटक जेवू पिटक (पेटी) एटले के जेम वालंजुकै वणिकनी पेटी सर्वस्वना आधारभूत होय छे, तेम आचार्यने द्वादशांगरूपी पेटी ज्ञानादिक गुणरत्नरूप सर्वस्वना आधारभूत छे आबु गणिपिटक भगवाने 'प्रज्ञप्तं' कयुं छे एटले के तीर्थकरनामकर्म उदयमां वर्ततुं होवाथी प्राये कृतार्थ होवा छतां पण परोपकारने माटे प्रकाश्युं छे. 'तद्यथा' ए शब्द उदाहरण देखाडवा माटे छे. आचार विगेरे वार पदोनो अर्थ सुगम छे, तेमनी व्युत्पत्ति विगेरे शब्दार्थ आगळ कहेवामां आवशे. 'तत्थ णं' ते वार अंगने विपे ('णं' शब्द वाक्यना अलंकार माटे लख्यो छे) जे चोथु अंग समवाय एवा नामनुं का छे तेनो आ अर्थ छे. आत्मा विगेरे शब्दो आ समवायना अभिधेय छे एम अध्याहार जाणवो. 'तद्यथा' ए शब्द वाचनांतरना वीजा संबंधना सूत्रनी व्याख्या जणाववा माटे छे. अही पदार्थना समूहने कहेनारा विद्वान पुरुषे अनुक्रमे ज आ ( समवाय ) कहेवो जोइए एवो न्याय छे, तेथी तेमां आचार्यमहाराज एकत्व विगेरे संख्याना क्रमना संबंधवाळा अर्थो कहेवानी इच्छावाळा होवाथी प्रथम एकत्व सहित एवा पदार्थोने अने तेमां पण सर्व पदार्थोनो भोगी आत्मा होवाथी-तेनुं प्रधानपणुं होवाथी आत्मादिक पदार्थोने, तेम ज सर्व वस्तु १ आ शब्द सज्ञावाचक छे के विशेपण छे ते समजातुं नथी. कोपमा ए शब्द नथी २ श्री समवायाज सत्र ॥ चो) अंग॥ ॥७॥ प्रतिपक्ष सहित होय छे तेथी प्रतिपक्ष सहित एवा आत्मादिक पदार्थोने ' एगे आया' इत्यादिक अढार सूत्रोवडे कहे छे. आ पदार्थो प्राये स्थानांगमां कहेला छे, तो पण अहीं कांइक कहेवाय छे.'- मू०-एगे आया, एगे अणाया, एगे दंडे, एगे अदंडे, एगा किरिआ, एगा अकिरिआ, एगे लोए, एगे अलोए, एगे धम्मे, एगे अधम्मे, एगे पुण्णे, एगे पावे, एगे बंधे, एगे मोक्खे, एगे आसवे, एगे संवरे, एगा वेयणा, एगा णिज्जरा ॥ १८ ॥१॥ मूलार्थः-आत्मा एक छे, अनात्मा एक छे, दंड एक छे, अदंड एक छे, क्रिया एक छे, अक्रिया एक छ, लोक एक छ, अलोक एक छे, धर्म एक छे, अधर्म एक छे, पुण्य एक छ, पाप एक छे, वंध एक छ, मोक्ष एक छे, आश्रय एक छे, संवर एक छे, वेदना एक छ, निर्जरा एक छे. १८. टीकार्थः-अही ' कथंचित् ' कोइ पण प्रकारे एटले कोइ पण अपेक्षाए ए शब्दनो अध्याहार समजवो. आ अध्याहार सर्व सूत्रोने विपे लेवानो छे. तेमां जीव प्रदेशार्थपणाए करीने असंख्यात प्रदेशवाळो छे, तो पण द्रव्यार्थपणाए करीने (द्रव्यनी अपेक्षाए) एक छ. अथवा क्षणे क्षणे पूर्वना स्वभावनो त्याग अने अपर (उत्तर-पछीना) स्वरूपनी उत्पत्तिना योगे करीने अनंत भेदवाळो ( जीव ) छे, तो पण भूत, भविष्य अने वर्तमान ए त्रणे काळमां अनुगामी ( रहेला) एक चैतन्य मात्रनी १. स्थानागमा विस्तारथी कयां छे, अहीं सक्षेपयी कहेवाय छे.

* पेक्षा एक मामा के, अपरा मनान मंनान प्रन्ये चैतन्यनो भेद (जुदा जुदा चान्य ) होपायी अनंत मानो दना पग मंग्रद नगन पाश्रीने रहेला मामान्य रुपनी अपवाए जात्मा एक ज कहेवाय छे. १. नया बान्मा नहीं ने अनात्मा गटले पटविगेरे कोड पण पदाथ ने पदार्थ पण प्रदेगाधरणाए करीने नंख्याता. असंख्याता अनं अनंता पदेगाानो तो पण नेमा प्रकारना एक परिणामरूप द्रव्याथनी उपेक्षाए एक ज छे. ए ज प्रमाणे मंगाननी पेलाप पण जाण. नुन्यम्पनी पक्षाग कहीए तो जो के धर्मास्तिकागादिक अनान्मा कथंचित् भिन्न सरूपगाला छे तो पण नेगनुं जनुपयोगम्य लक्षण एक मग्गुंज होगायी एपण जाण. २. नया दंड एक छे. ही दंड पटले मन, वचन अने कायाने खोटे मार्ग प्रवर्तारमा ने. ( मनोदंड, नागदंड, कायदंड) 'अथा हिंमा मात्र (म हिंमा) पण दंड कहेवाय के. आर्नु एकप' मामान्य नयनी अपेक्षाए जाण. एज प्रमागे मारपण जाणा. ३. नया पदंरगा के पटले के प्रसन्न मन, निन अने कायाना योग जगमा कोळ अहिंगा पण अदंड काय ले. ४. नया क्रिया एक पटले कापिकी शिगेरे ( काया, पचन अने मन संबंधी) क्रिया अथमा फेरळ आम्निस्य (आग्निक- पगुं) एफिया कहेगार छे. ने एक छे. ५. नथा अक्रिया एटले योगनो निरोध अथा नास्तिकपणुं, ने पण एक ज . ६. नया लोक एटले बर्ग, गृत्यु नने पानाल एम रण प्रफाग्नो अपना असंख्याता (आकाग) देगनासो (नौद गजनमाण लोक) १. गे पपगणेतनामा फरफार गाय ने. AAR-4 ।

श्री समवायाङ्ग चो) अंग॥ सूत्र। ॥८॥ छतां पण द्रव्यार्थनी अपेक्षाए एक ज लोक छे ७. तथा अलोक अनंत (आकाश) प्रदेशवाळो छतां द्रव्यार्थनी अपेक्षाए एक ज छे. ८. अथवा आ वे सूत्रो लोक अने अलोकनुं घणापणुं दूर करवा माटे कया छे, केमके केटलाक अन्य दर्शनीओ घणा लोक माने छे अने तेनाथी विलक्षण अलोक पण तेटला ज माने छे. आ प्रमाणे सर्वत्र एटले धर्म अधर्म विगेरेने विपे पण गमनिका करवी-भावार्थ कहेवो. विशेष आ प्रमाणे-धर्म एटले धर्मास्तिकाय ९, अधर्म एटले अधर्मास्तिकाय १०, पुण्य एटले शुभ कर्म ११, पाप एटले अशुभ कर्म १२, बंध एटले जीवने कर्म पुद्गलनो संयोग थवो ते. आ बंध सामान्यपणे एक ज छ अथवा सर्व कर्मना वधनो व्यवच्छेद (नाश) थाय त्यारे फरीथी बंध थतो नथी तेथी एक ज बंध छे. १३. आ रीते ज मोक्ष १४, आश्रव १५, संवर १६, वेदना १७ अने निर्जरा १८ ए सर्व- एकपणुं जाणवू. अहीं प्रथम अनात्म शब्दनुं ग्रहण करी सर्वे उपयोग रहित ( अचेतन) पदार्थोनुं (लोक-अलोक विगेरेनु) एकपणुं कहीने फरीथी लोकादिकनुं एकपणुं जे कडं ते सामान्य अने विशेपनी अपेक्षाए कह्यु छ एम जाण. (एटले के प्रथम अनात्मानुं एकत्व कयुं ते आत्मा सिवाय सर्व पदार्थोनु सामान्यपणे एकत्व कयुं अने पछी लोक अलोक विगेरेनुं एकत्व कयुं ते विशेषपणानी अपेक्षाए कयुं छे.) १. आ प्रमाणे सर्व शासोमां विस्तारथी कहेला आत्मादिक दरेक पदार्थोनुं एकत्व कहीने हवे पोतानी मेळे परिणाम पामेला पदार्थोनु एकत्व कहे छे.- मू०-जंबुद्दीवे दीवे एगं जोयणसयसहस्सं आयामविक्खंभेणं पण्णत्ते १ । अप्पइट्ठाणे नरए एगं जोयणसयसहस्सं आयामविक्खंभेणं पन्नत्ते २ । पालए जाणविमाणे एगं जोयणसयसहस्सं आयामविक्खंभेणं पन्नत्ते ३ । सवठ्ठसिद्धे महाविमाणे एगं जोयणसयसहस्सं आयामविक्खंभेणं पन्नत्ते ४ । अदानक्खत्ते एगतारे पन्नते ५। चित्तानक्खत्ते एगतारे पन्नत्ते ६ । सातिनक्खत्ते एगतारे पन्नत्ते ७। इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाण नेरइयाणं एगं पलिओवमं ठिई पन्नत्ता १ । इमीसे णं रयणप्पहाए पुढवीए नेरइआणं उक्कोसेणं एगं सागरोवमं ठिई पन्नत्ता २। दोच्चाए पुढवीए नेरइयाणं जहन्नेणं एगं सागरोवमं ठिई पन्नत्ता ३ । असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं एग पलि- ओवमं ठिई पन्नत्ता ४ । असुरकुमाराणं देवाणं उक्कोलेणं एगं साहियं सागरोवमं ठिई पन्नत्ता ५ । असुरकुमारिंदवजियाणं भोमिज्जाणं देवाणं अत्थेगइआणं एगं पलिओवमं ठिई पन्नत्ता ६ । असं- खिज्जवासाउयसंनिपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं अत्थेगइआणं एगं पलिओवमं ठिई पन्नत्ता ७ । असंखिज्जवासाउयगन्भवतियसंणिमणुयाणं अत्थेगइयाणं एगं पलिओवमं ठिई पन्नत्ता ८ । वाणमंतराणं देवाणं उक्कोसेणं एगं पलिओवमं ठिई पन्नत्ता ९ । जोइसियाणं देवाणं उक्कोसेणं एगं HEL श्री समनायाग चोथु अंग। सत्र॥ ॥९॥ पलिओवमं वाससयसहस्समब्भहियं ठिई पन्नत्ता १० । सोहम्मे कप्पे देवाणं जहन्नेणं एगं पलि. ओवमं ठिई पन्नत्ता ११ । सोहम्मे कप्पे देवाणं अत्थेगइआणं एगं सागरोवमं ठिई पन्नत्ता १२ । ईसाणे कप्पे देवाणं जहन्नेणं साइरेगं एगं पलिओवमं ठिई पन्नत्ता १३ । ईसाणे कप्पे देवाणं अत्थे- गइयाणं एगं सागरोवमं ठिई पन्नत्ता १४ । जे देवा सागरं सुसागरं सागरकंतं भवं मणुं माणुसो- त्तरं लोगहियं विमाणं देवत्ताए उववन्ना तेसि णं देवाणं उक्कोसेणं एगं सागरोवमं ठिई पन्नत्ता १५ । ते णं देवा एगस्स अद्धमासस्स आणमति वा पाणमांत वा उस्ससंति वा नीससंति वा १६ । तेसि णं देवाणं एगस्त वाससहस्सस्स आहारटे समुपज्जइ १७। संतेगइया भवसिद्धिया जे जीवा ते एगेणं भवग्गहणेणं सिज्झिस्संति बुज्झिस्संति मुच्चिस्संति परिनिवाइस्संति सवदुक्खाणमंतं करिस्संति ॥ १८ ॥ सूत्रम् ॥१॥ मूलार्थः-जंबूद्वीप नामनो द्वीप आयाम अने विष्कंभ (लंबाइ अने पहोलाइ ) वडे एक लाख योजननो कह्यो छे. १। सातमी नरकपृथ्वीनो मध्यनो अप्रतिष्ठान नामनो नरकावास आयाम अने विष्कंभवडे एक लाख योजननो कह्यो छे. २ । सौधर्मेंद्रनुं पालक नामनुं यानविमान आयाम अने विष्कंभवडे एक लाख योजन- कयुं छे. ३। तथा सर्वार्थसिद्ध नामर्नु ॥ ९।

महाविमान आयाम-विष्कंभवडे एक लाख योजननुं कर्तुं छे. ४ । आर्द्रा नक्षत्र एक तारावालं कर्तुं छे. ५ । चित्रा नक्षत्र एक तारावालं कर्तुं छे. ६ । तथा स्वातिनक्षत्र एक तारावालं कर्तुं छे. ७। आ रत्नप्रभा नामनी नरकपृथ्वीना केटलाएक नारकीओनी एक पल्योपमनी स्थिति कही छे. १। आ रत्नप्रभा नामनी नरकपृथ्वीना नारकीओनी उत्कृष्ट स्थिति एक सागरोपमनी कही छे. २ । वीजी नरकपृथ्वीना नारकीओनी जघन्य स्थिति एक सागरोपमनी कही छ. ३ । केटलाएक असुरकुमार देवोनी स्थिति एक पल्योपमनी कही छे. ४ । असुरकुमार देवोनी उत्कृष्ट स्थिति साधिक (कांइक अधिक) एक सागरोपमनी कही छे. ५ । असुरकुमारेंद्रने वर्जीने (असुरकुमारेंद्र सिवायना) वीजा केटलाक भवनपति देवोनी स्थिति एक पल्योपमनी कही छे. ६ । असंख्याता वर्पना आयुष्यवाळा संज्ञी पंचेंद्रिय तिर्यंच योनिवाळा केटलाक (युगलिक) जीवोनी स्थिति एक पल्योपमनी कही छे. ७। असंख्याता वर्षना आयुष्यवाळा गर्भव्युत्क्रांतिक (गर्भज ) संज्ञी केटलाक ( युगलिक ) मनुष्योनी स्थिति एक पल्योपमनी कही छे. ८. । वानव्यंतर देवोनी उत्कृष्ट स्थिति एक पल्योपमनी कही छे. ९ । ज्योतिपी देवोनी उत्कृष्ट स्थिति एक पल्योपम अने एक लाख वर्ष अधिक कही छे. १० । सौधर्म कल्पना देवोनी जघन्य स्थिति एक पल्योपमनी कही छे. ११ । सौधर्म कल्पना केटलाक देवोनी स्थिति एक सागरो- पमनी कही छे. १२ । ईशान कल्पना देवोनी जघन्य स्थिति साधिक ( कांइक अधिक) एक पल्योपमनी कही छे. १३ । ईशान कल्पना केटलाक देवोनी स्थिति एक मागरोपमनी कही छे. १४ । जे देवो सागर, सुसागर, सागरकांत, भव, मनु,

श्री
चो)
अंग॥
समवायाङ्ग
॥१०॥
-
मानुपोत्तर अने लोकहित नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय, ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति एक सागरोपमनी कही छे.
१५ । ते देवो एक अर्धमासे एटले एक एक पखवाडीए आणप्राण ले छे एटले के उच्छवास निःश्वास ले छे. १६ । ते देवोने
एक हजार व आहारनो अर्थ ( इच्छा ) उत्पन्न थाय छे. १७ । जेनी सिद्वि थवानी छे एवा (भव्य ) जे केटलाक देवो छ,
तेओ एक ( मनुष्यना ) भवने ग्रहण करवा वडे सिद्ध थशे, युद्ध थशे, मुक्त थशे, परिनिर्वाण पामशे, एटले के सर्व दुःखोनो
अंत करशे. १८ ॥ सूत्र ॥१॥
टीकार्थ:--अहीं 'जंबुद्दीवे ' विगेरे प्रथमनां सात सूत्रो आश्रयविशेषनां छे ( एटले के जंबुद्वीप, अप्रतिष्ठान नरक,
पालक विमान अने सर्वार्थसिद्ध विमान ए चार तथा आर्द्रा, चित्रा अने स्वाति ए व्रण नक्षत्र मळी कुल सात सूत्रो स्थान-
पृथ्वीने सूचन करनारा छे ) अने 'इमीसे णं रयण' विगेरे अढार सूत्रो स्थित्यादिक धर्मवाळा (स्थिति-आयुष्य विगेरेने
एटले स्थिति, उच्छवास, निःश्वाम, आहार अने मोक्षनी प्राप्तिने देखाडनारा ) छे (एटले ते ते स्थाने रहेला जीवोनी
स्थित्यादिक देखाडनारा छे.) ए सर्व सूत्रोनो अर्थ सुगम छे. तेमा जे निशेप कहेवा लायक छ, ते कहे छ.--जंबूद्वीपना
सूत्रमा ' आयास-निष्कंभवडे ' एवो कोइ ठेकाणे पाठ देखाय छ, अने कोइ ठेकाणे चक्रवाल विष्फंभवडे एयो पाठ छे.
तेमां प्रथम पाठ ठीक समवे छे, केमके अन्य स्थळे पण तेवो पाठ मांभळवामा छे. तेनो अर्थ सुगम छे. अने वीजा
पाठनो अर्थ आ प्रमाणे छे.-चक्रवाल विष्कंभवडे एटले गोळ विस्तारवडे. अही लाख योजन- जे प्रमाण कम्युं छे ते
प्रमाणांगुळना योजन समजवा. ते विपे कयुं छे के-"वस्तु(पदार्थो)नुं मान आत्मांगुले करवानुं छे, शरीर, मान उत्सेधांगुले
॥१०॥

श्री
चोथु
अंग॥
समवायाजा
"
॥११॥
तिपी देवो एटले चंद्रविमानना देवो, पण सूर्यादिक देवो न जाणवा. तेम ज चंद्रादिकनी देवीओ पण न जाणवी; केमके
चंद्र विमानना देवोर्नु ज आयुष्य एक लाख वर्ष अधिक एक पल्योपमनुं जाणवू. एवं वचन छ.” (१०) सौधर्म
कल्पना देवो एटले देव अने देवीओ बन्ने ग्रहण करवा, केमके सौधर्म कल्पमा एक पल्योपमथी ओछी स्थिति जघन्यथी
पण नथी. आ स्थिति पहेला प्रस्तर( पाथडा)मां जाणवी. (११). सौधर्म कल्पमा रहेला केटलाक देवोनी एक सागरो-
पमनी स्थिति छ एम कयुं, त्यां देवोनुं ज ग्रहण जाणवु, देवीओर्नु ग्रहण जाणवू नहीं; केमके त्यांनी देवीओनी उत्कृष्ट
स्थिति पण पचास पल्योपमनी छे, तथा अही देवोनी जे एक सागरोपमनी स्थिति कही ते मध्यम स्थितिनी अपेक्षाए
जाणवी, केमके त्यां उत्कर्षथी वे सागरोपमनी स्थितिनुं होवापणु छे. प्रस्तरनी अपेक्षाए कहीए तो आ मध्यम स्थिति
सातमा प्रस्तरमां जाणवी. (१२). ईशान कल्पमा रहेला देवोनी जघन्य स्थिति जे कांइक अधिक एक पत्योपमनी कही,
ते देव अने देवी बन्नेनी जाणवी; कारण के ते ईशान देवलोकमां साधिक एक पल्योपम विना बीजी जघन्य स्थिति
छ ज नहीं. (१३). ईशानकल्पमां केटलाक देवोनी एक सागरोपमनी स्थिति कही छे ते देवोनी ज स्थिति ग्रहण करवी.
पण देवीओनी न जाणवी, केमके ते ईशानकल्पमां देवीओनी उत्कृष्ट स्थिति पण पंचावन पल्योपमनी ज छे. (१४).
तथा जे देवो सागर-सागर नामना, ए ज प्रमाणे सुसागर, सागरकांत, भव, मनु, मानुपोत्तर अने लोकहित, अहीं समुच्च-
यर्नु जणाववापणुं होवाथी 'च' शब्द अध्याहारथी जाणवो, आ नामना विमानने एटले देवोने निवास करवाना स्थानने
पामीने, अहीं 'आसाद्य-पामीने ए अध्याहार जाणवो, आ विमानोने पामीने जेओ देवपणे ( उत्पन्न थया छे.) पण
18
॥११॥

श्री
चो)
समवायाङ्ग
सूत्र।
॥ १२ ॥
मू०-दो दंडा पन्नत्ता, तं जहा-अट्ठादंडे चेव, अणट्ठादंडे चेव १ । दुवे रासी पन्नत्ता, तं
जहा-जीवरासी चेव, अजीवरासी चेव २ । दुविहे बंधणे पन्नत्ते, तं जहा-रागबंधणे चेव, दोस-
बंधणे चेव ३ ॥ पुवाफग्गुणी नक्खत्ते दुतारे पन्नत्ते १ । उत्तराफग्गुणी नक्खत्ते दुतारे पन्नत्ते २ ।
पुवाभद्दवया नक्खत्ते दुतारे पन्नत्ते ३ । उत्तराभद्दवया नक्खत्ते दुतारे पन्नत्ते ४ ॥
इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं दो पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता १ ।
दुच्चाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं दो सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । असुरकुमाराणं देवाणं
अत्थेगइयाणं दोपलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ३ । असुरकुमारिंदवजियाणं भोमिज्जाणं देवाणं उक्को-
सेणं देसूणाई दो पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ४ । असंखिजवासाउयसंनिपंचेंदियतिरिक्खजोणि-
आणं अत्थेगइयाणं दोपलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ५। असंखिज्जवासाउयगन्भवतियसन्निपंचेंदि-
यमाणुस्साणं अत्थेगइयाणं दोपलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ६। सोहम्मे कप्पे अत्थेगइयाणं
देवाणं दो पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ७ । ईसाणे कप्पे अत्थेगइयाणं देवाणं दो पलिओ-
॥१२॥

करवानुं छे अने ( शाश्वत ) पर्वत, पृथ्वी तथा विमाननुं मान प्रमाणांगुले करवानुं छे.” (१) पालक नामर्नु यानविमान एटले सौधर्मेंद्रना आभियोगिक पालक नामना देवे करेलु एटले विकुलं यान एटले गमन, तेने माटे जे विमान ते यान- विमान, अथवा जेनावडे जवाय ते यान, अने यानरूपी जे विमान ते यानविमान, तेनुं बीजुं नाम पारियानिक कहेवाय छे. (३) 'अत्थीत्यादि' अस्ति एटले छे, केटलाक नारकीओनी एक पल्योपमनी स्थिति, ए प्रमाणे करीने (ज्ञानवडे जाणीने) मे तथा वीजा जिनेश्वरोए कहेली छे. आ चोथा पाथडामा रहेला नारकीओनी मध्यम स्थिति जाणवी. (१). एज प्रमाणे एक सागरोपमनी उत्कृष्ट स्थिति तेरमा पाथडामा रहेला नारकीओनी जाणवी. (२) असुरेंद्रने वर्जीने एटले चमरेंद्र अने बलींद्रने वर्जीने चाकीना दश नीकायना' भोमेजाणं' भूमि एटले रत्नप्रभा नामनी पृथ्वीने विपे थवापणुं (होवापर्यु) होवाथी भवनपति देवोनी एक पल्योपमनी मध्यम स्थिति जाणवी. केमके तेमनी (नव नीकायनी) उत्कृष्ट स्थिति तो कांइक ओछी वे पल्योपमनी कही छे. ते विषे का छे के-" नव नीकायमा दक्षिण तरफना भवनपतिनी उत्कृष्ट स्थिति दोढ पल्योपमनी छे अने उत्तर तरफना भवनपतिनी उत्कृष्ट स्थिति कांइक ओछी वे पल्योपमनी छे." (६). जेमनुं आयुष्य असंख्याता वर्पनुं छे तेवा जे संज्ञी एटले मनवाळा पंचेंद्रिय तिर्यंच योनि एटले तिर्यचो छे तेओमांना केटलाक एटले जेओ हैमवंत अने ऐरण्यवंत क्षेत्रमा उत्पन्न थयेला युगलिक होय छे, तेओनी एक पल्योपमनी स्थिति छे. (७). ए ज प्रमाणे मनुष्य संबंधी सूत्र पण जाणवू. तेमां विशेप ए के गर्भाशयने विपे जेमनी उत्पत्ति होय ते गर्भव्युत्क्रांतिक कहेवाय छे, अर्थात् संमूर्छिम मनुष्य नहीं. (८). वानमंतर देवो एटले देवीओ नहीं पण देवो ज जाणवा, केमके देवीओनी अर्ध पल्योपमनी स्थिति कहेली छे. (९). ज्यो-

चोथु
अंग ।।
समवायाज
सूत्र ॥
तिपी देवो एटले चंद्रचिमानना देवो, पण सूर्यादिक देवो न जाणवा. तेम ज चंद्रादिकनी देवीओ पण न जाणवी; केमके
चंद्र विमानना देवोर्नु ज आयुष्य एक लाख वर्ष अधिक एक पल्योपमनुं जाण. एयु वचन छे.” (१०) सौधर्म
कल्पना देवो एटले देव अने देवीओ बन्ने ग्रहण करता, केमके सौधर्म कल्पमां एक पल्योपमथी ओछी स्थिति जघन्यथी
पण नथी. आ स्थिति पहेला प्रस्तर( पाथडा )मां जाणवी. (११). सौधर्म कल्पमा रहेला केटलाक देवोनी एक सागरो-
पमनी स्थिति छ एम कऍ, त्यां देवोर्नु ज ग्रहण जाणवू, देवीओनुं ग्रहण जाणवू नहीं; केमके त्यांनी देवीओनी उत्कृष्ट
स्थिति पण पचास पल्योपमनी छे. तथा अहीं देवोनी जे एक सागरोपमनी स्थिति कही ते मध्यम स्थितिनी अपेक्षाए
जाणवी, केमके त्यां उत्कर्पथी वे सागरोपमनी स्थितिर्नु होवापणु छे. प्रस्तरनी अपेक्षाए कहीए तो आ मध्यम स्थिति
सातमा प्रस्तरमां जाणवी. (१२). ईशान कल्पमा रहेला देवोनी जघन्य स्थिति जे कांइक अधिक एक पल्योपमनी कही,
ते देन अने देवी बन्नेनी जाणवी; कारण के ते ईशान देवलोकमां साधिक एक पल्योपम विना वीजी जघन्य स्थिति
छ ज नहीं. (१३). ईशानकल्पमा केटलाफ देवोनी एक मागरोपमनी स्थिति कही छे ते देवोनी ज स्थिति ग्रहण करवी.
पण देवीओनी न जाणवी, केमके ते ईशानकल्पमां देवीओनी उत्कृष्ट स्थिति पण पंचावन पल्योपमनी ज छे. (१४).
तथा जे देवो मागर-सागर नामना, ए ज प्रमाणे मुसागर, सागरकांत, भव, मनु, मानुपोत्तर अने लोकहित, अहीं समुच-
यर्नु जणाववापणुं होवाथी 'च' शब्द अध्याहारथी जाणवो, आ नामना विमानने एटले देवोने निवास करवाना स्थानने
पामीने, अहीं "आसाद्य'-पामीने ए अध्याहार जाणवो, आ विमानोने पामीने जेओ देवपणे ( उत्पन्न थया छे.) पण
॥ ११॥

सोहम्मवर्डिसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसिसुभवण्णं सुभगधं सुभलेसं सुभफासं वमाइं ठिई पन्नत्ता ८। सोहम्मे कप्पे अत्थेगइयाणं देवाणं उक्कोसेणं दो सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ९। ईसाणे कप्पे देवाणं उकोसेणं साहियाइं दो सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता १० । सणंकुमारे कप्पे देवाणं जहणणेणं दो सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ११ । माहिदे कप्पे देवाणं जहणणेणं साहियाई ठिई पन्नत्ता १३ ॥ ते णं देवा दोण्हं अद्धमासाणं आणमंति वा पाणमंति वा ऊससंति वा नीससंति वा १ । तेसि णं देवाणं दोहि वाससहस्सेहिं आहारट्टे समुप्पज्जइ २। अत्थेगइया भवसिद्धिया जीवा जे दोहिं भवग्गणेहिं सिज्झिस्संति बुज्झिस्सति मुच्चिस्संति परिनिवाइस्संति सवदुक्खाणमंतं करिस्संति ३॥ सूत्रम्-२॥ मूलार्थः-दंड वे कहेला छे, ते आ प्रमाणे-अर्थदंड अने अनर्थदंड (१). राशि वे कहेली छे, ते आ प्रमाणे-जीव- राशि अने अजीवराशि (२). बंधन वे प्रकारना कह्या छे, ते आ प्रमाणे-रागबंधन अने द्वेपबंधन (३). ३

श्री
चोथु
अंग॥
समवायाज
सूत्र॥
॥१३॥
पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रना वे तारा कह्या छे (१). उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रना वे तारा कह्या छे (२). पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रना
वे तारा कह्या छे. (३) उत्तराभाद्रपद नक्षत्रना वे तारा कह्या छे. (४)
आ रत्नप्रभा पृथ्वीमा रहेला केटलाक नारकीनी वे पल्योपमनी स्थिति कही छ (१). बीजी पृथ्वीमा रहेला केटलाक
नारकीओनी वे सागरोपमनी स्थिति कही छे (२). केटलाक असुरकुमार देवोनी वे पल्योपमनी स्थिति कही छे (३). केट-
लाक असुरकुमारेंद्र(नीकाय)ने वर्जीने वीजा (नव नीकायना) भवनवासी देवोनी उत्कृष्ट स्थिति काइक ओछा वे पल्योपमनी
कही छे (४). असंख्याता वर्पना आयुष्यवाळा संज्ञी पंचेंद्रिय तिर्यंच योनिवाळा केटलाक (युगलिक) तिर्यंचोनी वे पल्यो-
पमनी स्थिति कही छे (५). असंख्याता वर्पना आयुष्यवाळा संज्ञी पंचेंद्रिय गर्भज केटलाक ( युगलिक ) मनुष्योनी
वे पल्योपमनी स्थिति कही छे (६). सौधर्म कल्पमां केटलाक देवोनी वे पल्योपमनी स्थिति कही छे (७).
ईशान कल्पमा रहेला केटलाक देवोनी वे पल्योपमनी स्थिति कही छे (८). सौधर्म कल्पमा रहेला केटलाक देवोनी उत्कृष्ट
स्थिति वे सागरोपमनी कही छे (९). ईशान कल्पमा रहेला देवोनी उत्कृष्ट स्थिति साधिक वे सागरोपमनी कही छे (१०).
सनत्कुमार देवलोकमां रहेला देवोनी जघन्य वे सागरोपमनी स्थिति कही छे (११). माहेंद्र कल्पमा रहेला देवोनी जघन्य
साधिक वे सागरोपमनी स्थिति कही छे (१२). जे देवो शुभ, शुभकांत, शुभवर्ण, शुभगंध, शुभलेश्य, शुभस्पर्श अने सौध-
मावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय छे ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति वे सागरोपमनी कही छे (१३).
ते देवो वे अर्धमासे (वे पखवाडीयाने अंते ) आन-प्राण ले छे एटले के उच्छ्वास ले छे अने निःश्वास ले छे (१).
॥१३॥

ते देवोने वे हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२). केटलाक भवसिद्धिक (जेमनी सिद्धि थवानी छे एवा भव्य) जीवो छे के जेओ वे भवने ग्रहण करवावडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे अने परिनिर्वाण पामशे, एटले के सर्व दुःखनो अंत करशे (३). सूत्र-२॥ टीकार्थ:-'दो दंडे' इत्यादि सूत्र द्विस्थानकनी समाप्तिपर्यंत सुगम छे. विशेष ए के-दंड, राशि अने बंधनना अर्थवाळा ऋण सूत्रो छ, नक्षत्रना अर्थवाळा चार सूत्रो छे, स्थितिना अर्थवाळा तेर सूत्रो छे अने उच्छ्वासादिकना त्रण सूत्रो छे. तेमां अर्थवडे एटले स्व-परना उपकार करनार प्रयोजनवडे जे दंड-हिंसा ते अर्थदंड कहेवाय छे अने तेनाथी जे विपरीत ते अनर्थदंड कहेवाय छ (१). तथा रत्नप्रभा पृथ्वीने विपे जे वे पल्योपमनी स्थिति कही, ते चोथा प्रस्तटने विपे रहेला नारकोनी मध्यम स्थिति जाणवी (१). अने बीजी पृथ्वीने विषे जे वे सागरोपमनी स्थिति कही, ते छट्ठा प्रस्तटने विपे रहेला नारकोनी मध्यम स्थिति जाणवी, (२). तथा असुरेंद्रने वर्जीने वीजा भवनवासी देवोनी जे कांइक न्यून वे पल्योपमनी (उत्कृष्ट) स्थिति कही ते उत्तर तरफना नागकुमारादिक नव नीकायने आश्रीने जाणची. ते विषे कह्यु छ के-उत्तर तरफना ( नागकुमारादिक ) असुरोनी स्थिति काइक न्यून वे पल्योपमनी छे (४). तथा असंख्यात वर्पना आयुष्यवाळा संज्ञी पंचेंद्रिय तिर्यंचो अने मनुष्योनी जे वे पल्योपमनी स्थिति कही ते हरिवर्प अने रम्यकवर्षमा जन्मेला तिर्यंच-मनुष्यो(युगलिक)नी जाणवी (५-६). ॥ सूत्र-२ ।। हवे त्रण स्थानक कहे छ-

श्री
समवायाग
सूत्र।
चोथु
अंग ॥
मू०-तओ दंडा पन्नत्ता, तं जहा-मणदंडे, वयदंडे, कायदंडे १ । तओ गुत्तीओ पन्नत्ताओ,
तं जहा-मणगुत्ती, वयगुत्ती, कायगुत्ती २ । तओ सल्ला पन्नत्ता, तं जहा-मायासल्ले णं, नियाण-
सल्ले णं, मिच्छादसणसल्ले णं ३ । तओ गारवा पन्नत्ता, तं जहा-इडीगारवे णं, रसगारवे णं,
सायागारवे णं ४ । तओ विराहणा पन्नत्ता, तं जहा-नाणविराहणा, दंसणविराहणा, चरित्तवि-
राहणा ५ ॥ मिगसिरनक्खत्ते तितारे पन्नत्ते १ । पुस्सनक्खत्ते तितारे पन्नत्ते २ । जेद्वानक्खत्ते तितारे
पन्नत्ते ३ । अभीइनक्खत्ते तितारे पन्नत्ते ४ । सवणनक्खत्ते तितारे पन्नत्ते ५। अस्सिणिनक्खत्ते
तितारे पन्नत्ते ६ । भरणीनक्खत्ते तितारे पन्नत्ते ७॥
इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं तिन्नि पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता १ ।
दोच्चाए णं पुढवीए नेरइयाणं उक्कोसेणं तिणि सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । तच्चाए णं पुढवीए
नेरइयाणं जहणणेणं तिणि सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ३ । असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं
तिणि पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ ।असंखिज्जवासाउयसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं उक्कोसेणं
॥ १४ ॥

तिपिण पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ५। असंखिजवासाउयसन्निगब्भवतियमणुस्साणं उक्कोसेणं तिषिण पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ६ । सोहम्मीसाणेसु अत्थेगइयाणं देवाणं तिषिण पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ७। सणकुमारमाहिदेसु कप्पेसु अत्थगइयाणं देवाणं तिणि सागरोवमाई ठिई पन्नत्ता ८ । जे देवा आभंकरं पभकरं आभंकरपभंकरं चंदं चंदावत्तं चंदप्परं चंदकंतं चंदवण्णं चंदलेसं चंदज्झयं चंदसिंगं चंदसिटुं चंदकूडं चंदुत्तरवळिसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं देवाणं उक्कोसेणं तिपिण सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ९ ॥ ते णं देवा तिण्हं अद्धमासाणं आणमंति वा पाणमंति वा ऊससंति वा नीससंति वा १ । तेसि णं देवाणं तिहिं वाससहस्सेहिं आहारट्टे समुप्पज्जइ २ । संतेगइया भवसिद्धिया जीवा जे तिहिं भवग्गहणेहिं सिन्झिस्संति बुज्झिस्संति मुच्चिस्संति परिनिवाइस्सति सबदुक्खाणमंतं करि- स्संति ३ ॥ सूत्रम्-३॥ मूलार्थः -~-~त्रण दंड कह्या छे, ते आ प्रमाणे--मनदंड, वचनदंड, कायदंड (१). त्रण गुप्ति कही छे, ते आ प्रमाणे-- -- -- ते देवो त्रण अर्धमासे (त्रण पखवाडीए ) आन ले छे, प्राण ले छे, एटले के उच्छ्वास ले छे, निःश्वास ले छे (१). ते देवोने त्रण हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२). केटलाक भवसिद्धिक (भव्य) जीवो एवा छे के जेओ त्रण भवने ग्रहण करवावडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे, परिनिर्वाण पामशे अर्थात् सर्व दुःखोनो अंत करशे (३). टीकार्थः-'तओ' इत्यादि सर्व सूत्र सुगम छे. विशेष एके-अहीं (आ सूत्रमां) दंड, गुप्ति, शल्य, गारव अने विरा- धना आ अर्थवाळा पांच सूत्रो छे. नक्षत्रना अर्थवाळा सात सूत्रो छे, स्थितिना अर्थवाळा नव सूत्रो छे अने उच्छासादिक अर्थवाळा त्रण सूत्रो छे. तेमां जेनावडे आत्मा चारित्ररूपी ऐश्वर्यनो विनाश करी असार ( सार रहित ) करे, ते दंड एटले कुमार्गे प्रवर्तावेला मन विगेरे. मनरूपी जे दंड ते मनोदंड, अथवा कुमार्गे प्रवर्तावेला मनवडे जे आत्माने दंडवो ते मनोदंड कहेवाय छे. ए ज प्रमाणे वीजा वे (वचनदंड अने कायदंड) पण जाणवा (१). तथा गोपवधू ते गुप्ति कहेवाय छे. एटले के मन विगेरेनी अशुभ प्रवृत्तिनो निरोध अने शुभ प्रवृत्तिनुं कर, ते (२). तथा तोमर ( भाला) विगेरे शल्यनी जेवा शल्य एटले दुःख- दायक होवाथी मायादिक शल्य कहेवाय छे. तेमां माया एटले निकृति (कपट) रूपी जे शल्य ते मायाशल्य कहे- वाय छे. अही सूत्रमा ' णं' शब्द लख्यो छे ते अलंकारने माटे छे. ए ज प्रमाणे वीजा वे शल्यो पण जाणवा. विशेष ए के निदान एटले देवादिकनी समृद्धि देखवाथी के सांभळवाथी जीव पोते विचार करे के-'आ ब्रह्मचर्यादिकनु अनुष्ठान करवाथी मने आवी समृद्धि हो ( प्राप्त थाओ)'ए प्रमाणे मननो अध्यवसाय करवो ते, अने मिथ्यादर्शन एटले तत्त्वार्थने

श्री
चो,
अंग॥
-
समवायाग
सूत्र॥
॥१५॥
मनगुप्ति, वचनगुप्ति, कायगुप्ति ( २). त्रण शल्य कह्या छे, ते आ प्रमाणे-मायाशल्य, निदानशल्य, मिथ्यादर्शनशल्य (३).
त्रण गारव कह्या छे, ते आ प्रमाणे--ऋद्धिगारव, रसगारव, सातागारव (४). त्रण विराधना कही छे, ते आ प्रमाणे-
ज्ञानविराधना, दर्शनविराधना, चारित्रविराधना (५).
मृगशीर्ष नक्षत्रना त्रण तारा कह्या छ (१). पुष्य नक्षत्रना त्रण तारा कह्या छे (२). ज्येष्ठा नक्षत्रना त्रण तारा कह्या
छे (३). अभिजित् नक्षत्रना त्रण तारा कह्या छ (४). श्रवण नक्षत्रना त्रण तारा कह्या छ (५). अश्विनी नक्षत्रना
त्रण तारा कह्या छ (६). भरणी नक्षत्रना त्रण तारा कह्या छे (७).
आ रत्नप्रभा पृथ्वीना केटलाक नारकीओनी त्रण पल्योपमनी स्थिति कही छे (१). वीजी पृथ्वीना नारकीनी उत्कृष्ट
स्थिति त्रण सागरोपमनी कही छे (२). त्रीजी पृथ्वीना नारकीनी जघन्य स्थिति त्रण सागरोपमनी कही छे (३). केटलाक
असुरकुमार देवोनी त्रण पल्योपमनी स्थिति कही छे (४). असंख्य वर्पना आयुष्यवाळा संज्ञी पंचेंद्रिय तिर्यंच योनिवाळा
(युगलिक)नी उत्कृष्ट स्थिति त्रण पल्योपमनी कही छे (५). असंख्य वर्षना आयुष्यवाळा संज्ञी गर्भज मनुष्यो(युगलिक)नी
उत्कृष्ट स्थिति त्रण पल्योपमनी कही छे (६). सौधर्म अने ईशान देवलोकमां रहेला केटलाक देवोनी स्थिति त्रण पल्योपमनी
कही छे (७). सनत्कुमार अने माहेंद्र कल्पना केटलाक देवोनी त्रण सागरोपमनी स्थिति कही छे. (८) जे देवो आभंकर,
प्रभंकर, आभंकरप्रभंकर, चंद्र, चंद्रावर्त, चंद्रप्रभ, चंद्रकात, चंद्रवर्ण, चंद्रलेश्य, चंद्रध्वज, चंद्रशृंग, चंद्रसृष्ट, चंद्रकूट अने
चंद्रोत्तरावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति त्रण सागरोपमनी कही छे (९).
॥१५॥

तिणि पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ५। असंखिजवासाउयसन्निगब्भवतियमणुस्साणं उक्कोसेणं तिण्णि पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ । सोहम्मीसाणेसु अत्थेगइयाणं देवाणं तिषिण पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ७। सणकुमारमाहिदेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं तिणि सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ८ । जे देवा आभंकरं पभकरं आभंकरपभंकरं चंदं चंदावत्तं चंदप्पसं चंदकंतं चंदवण्णं चंदलेसं चंदज्झयं चंदसिंगं चंदसिटुं चंदकूडं चंदुत्तरवडिंसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं देवाणं उक्कोसेणं तिणि सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ९ ॥ ते णं देवा तिण्हं अद्धमासाणं आणमंति वा पाणमंति वा उससंति वा नीससंति वा १ । तेसि णं देवाणं तिहिं वाससहस्सेहिं आहारटे समुप्पजइ २ । संतेगइया भवसिद्धिया जीवा जे तिहिं भवग्गहणेहिं सिज्झिस्संति बुज्झिस्संति मुच्चिस्संति परिनिवाइस्सति सबदुक्खाणमंतं करि- स्सति ३ ॥ सूत्रम्-३॥ मूलार्थः -त्रण दंड कह्या छे, ते आ प्रमाणे-मनदंड, वचनदंड, कायदंड (१). त्रण गुप्ति कही छे, ते आ प्रमाणे-- तं जहा-इत्थिकहा भत्तकहा रायकहा देसकहा ३। चत्तारि सण्णा पन्नत्ता, तं जहा-आहारसपणा भयसण्णा मेहुणसण्णा परिग्गहसण्णा ४ । चउबिहे बंधे पन्नत्ते, तं जहा-पगइबंधे ठिइबंधे अणु- भावबंधे पएसबंधे ५। चउगाउए जोयणे पन्नत्ते ६ ॥ अणुराहानक्खत्ते चउतारे पन्नत्ते १ । पुवासादानक्खते चउतारे पन्नत्ते २। उत्तरासादानक्खत्ते चउतारे पन्नत्ते ३ ॥ इमीसे ण रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं चत्तारि पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता १ । तच्चाए णं पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं चत्तारि सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं चत्तारि पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ३ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं चत्तारि पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । सणंकुमारमाहिदेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं चत्तारि सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ५ । जे देवा किढेि सुकिलुि किट्ठियावत्तं किाट्टप्पभं किट्ठिजुत्तं किट्ठिवणं किट्ठिलेसं किट्ठिज्झयं किट्ठिसिंगं किट्ठिसिटुं किटिकूडं किटुत्तरवडिंसगं विमाणं देवत्ताए भवने ग्रहण करवावडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे, परिनिर्वाण पामशे अर्थात् सर्व दुःखना अंतने करशे. (३)॥ टीकार्थः-हवे अढार स्थानक कहे छे-अही स्थिति सूत्रोनी पहेला आठ सूत्रो छे, अन ते सुगम छे. विशेप ए के-भ एटले ब्रह्मचर्य, तथा औदारिक कामभोग एटले मनुष्य अने तिथंच संबंधी विषयो, तथा दिव्य (वैक्रिय) कामभोग एटले देव सबंधी विषयो (१)। तथा 'सखुड्डगवियत्ताणं ति'-क्षुद्रक अने व्यक्त सहित. तेमां क्षुद्रक एटले वय अने श्रुतवडे नाना तथा व्यक्त एटले वय अने श्रुतवडे परिणमेला-मोटा ( नाना मोटा सर्व ) साधुओना स्थानो एटले त्याग करवानी अने सेवा-ग्रहण करवानी वस्तुओरूपी स्थानो अढार आ प्रमाणे छे-छ व्रत एटले पांच महाव्रतो अने छटुं रात्रिभोजननी विरति, कायपट्क एटले पृथ्वीकायादिक छनी रक्षा, अकल्प्य एटले न कल्पे तेवो पिंड, शय्या, वस्त्र, पात्र विगेरेरूप पदार्थ, गृहिभाजन एटले थाळी तपेली निगेरे, पर्यंक एटले मांचो विगेरे, निपद्या एटले स्त्रीनी साथे बेसबु ते, स्नान एटले शरीरने पखाळबुं ते, तथा शोभा करवी ते-ए छर्नु वर्जवं ते (३) । चूलिका सहित आचारांग नामनुं प्रथम अंग एटले के आचारांग नावे श्रुतस्कंध छ, तेमां वीजा श्रुतस्कंधमां पिंडैपणा ( अध्ययन ) विगेरे पाच चूलाओ छे अने पहेला श्रुतस्कंधमां नव ब्रह्मचर्य नामना अध्ययनो छे, ते पहेला श्रुतस्कंधना ज पदोनी आ अढार हजार प्रमाण संख्या कही छे, परतु चूलाना पदनी संख्या कही नथी. ते विषे कयु छ के-" नव ब्रह्मचर्य अध्ययनरूप वेद( आचाराग)ना अढार हजार पदो कह्या छे, अने तेनी पांच चूलिकाने साथै लइए तो घणा पदो थाय छे. " अहीं मूळ सूत्रमा “चूलिका सहित आचारांग सूत्रना" एम विशेषण आपीने चूलिका पण साधे गणी छे ते मात्र आ आचारांग सूत्र चूलिका सहित छ, चूलिका रहित नथी, एम चूलिकानी श्री समवायाङ्ग समवाय चोयुं अंग ॥७१॥ तथा बोलिदिलिपि १८. (५)। अस्तिनास्तिप्रवाद नामना पूर्वमा अढार वस्तुओ कही छे (६)। धूमप्रभा नामनी पांचमी नरक पृथ्वीनो विस्तार (पृथ्वीपिंड) एक लाख अने अढार हजार योजन प्रमाण कह्यो छे (७)। पोप अने अपाढ मासमा एक दिवस (वखत) उत्कृष्टपणे अढार मुहूर्त्तनो दिवस थाय छे अने एक दिवस (वखत) उत्कृष्टपणे अढार मुहूर्त्तनी रात्रि थाय छे (एटले के पोष मासमां मकरसंक्रांतिने रोज अढार मुहूर्त्तनी रात्रि अने अपाढ मासमा कर्कसंक्रात्रिने रोज अढार मुहूर्त्तनो दिवस थाय छे) (८)॥ आ रत्नप्रभा नामनी पृथ्वीने विषे केटलाक नारकीओनी अढार पल्योपमनी स्थिति कही छ (१)।छठी पृथ्वीने विषे केटलाक नारकीओनी अढार सागरोपमनी स्थिति कही छे (२)। केटलाक असुरकुमार देवोनी अढार पल्योपमनी स्थिति कही छे (३)। सौधर्म अने ईशान कल्पने विपे केटलाक देवोनी अढार पल्योपमनी स्थिति कही छे ( ४ ) । सहस्रार कल्पने विषे देवोनी उत्कृष्ट स्थिति अहार सागरोपमनी कही छे (५)। प्राणत कल्पमा [केटलाक] देवोनी जघन्य स्थिति अढार सागरोपमनी कही छे (६)। जे देवो काळ, सुकाळ, महाकाळ, अंजन, रिष्ट, शाल, समान, द्रुम, महाद्रुम, विशाळ, सुशाळ, पद्म, पद्मगुल्म, कुमुद, कुमुदगुल्म, नलिन, नलिनगुल्म, पौडरीक, पौंडरीकगुल्म, सहस्रारावतंसक नामना विमानमां उत्पन्न थया होय, ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति अढार सागरोपमनी कही छे (७)।। ते देवो अढार अर्धमासे ( पखवाडीये ) आन ले छे, प्राण ले छे, एटले उच्छ्वास ले छे, निःश्वास ले छे (१)। ते देवोने अढार हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२)। एवा केटलाक भवसिद्धिक जीवो छ के जेओ अढार BHA ॥७१॥ 16 मनवडे सेवे नही १, बीजाने मनवडे सेवावे नही २, मनवडे सेवता एवा पण बीजाने अनुमोदे नही ३, औदारिक संबंधी कामभोगने पोते वचनवडे सेवे नही ४, बीजाने वचनवडे सेवावे नही ५, वचनवडे सेवता एवा पण वीजाने अनुमोदे नहीं ६, औदारिक संबंधी कामभोगने पोते कायवडे सेवे नही ७, वीजाने कायवडे सेवावे नहीं ८, कायवडे सेवता एवा पण वीजाने अनुमोदे नहीं ९, दिव्य ( देव संबंधी) कामभोगने पोते भनवडे सेवे नही १०, मनवडे वीजाने सेवादे नही ११, सेवता एवा पण बीजाने मनवडे अनुमोदे नही १२, दिव्य कामभोगने पोते वचनवडे सेवे नहीं १३, वचनवडे बीजाने सेवावे नही १४, सेवता एवा पण वीजाने वचनवडे अनुमोदे नहीं १५, दिव्य कामभोगने कायवडे पोते सेवे नही १६, कायवडे बीजाने सेवावे नही १७, सेवता एवा पण बीजाने कायवडे अनुमोदे नहीं १८.(१)। अरिहंत अरिष्टनेमि भग- वानने अढार हजार साधुओनी उत्कृष्ट संपदा हती (२)। श्रमण भगवान महावीरस्वामीए वाळ, स्थविर विगेरे सर्व साधुओना आचारना अढार स्थानो कह्यां छे. ते आ प्रमाणे-छ व्रत पाळवा ६, छकायनी रक्षा करवी १२, अकल्प्य वस्त्र-पात्रादि १३, गृहस्थर्नु पात्र ( वासण ) १४, पर्यक-पलंग विगेरे १५, निपद्या-स्त्री साथे वेसवु ते १६, मान १७ अने शोभा १८ आ सर्व(छोन वर्जवु. (३)। चूलिका सहित पहेला आचारांग सूत्रना पदना परिमाणवडे अढार हजार पदो कहां छे (४)। ब्राह्मी लिपिना लखवाना प्रकार अढार कह्या छे ते आ प्रमाणे ब्राह्मी १, यावनी लिपि २, दोपउपरिका ३, खरोष्ट्रिका ४, खरशाविका ५, पहारातिका ६, उच्चत्तरिका ७, अक्षरपृष्टिका ८, भोगवतिका ९, वैणकिया १०, निन्हविका ११, अंकलिपि १२, गणितलिपि १३, गंधर्वलिपि १४, आदर्शलिपि १५, माहेश्वरी लिपि १६, दामिलिपि १७

समवाय
१८॥
श्री
समवायाङ्ग
चोधू अंग
॥७०॥
अत्थेगइयाणं देवाणं अट्ठारस पलिआवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । सहस्सारे कप्पे देवाणं उक्कोसेणं
अट्ठारस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ५ । आणते कप्पे देवाणं [ अत्थेगइयाणं ] जहणणेणं अट्ठारस
सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ । जे देवा कालं सुकालं महाकालं अंजणं रिटुं सालं समाणं दुमं
महादुमं विसालं सुसालं पउमं पउमगुम्म कुमुदं कुमुदगुम्म नलिणं नलिणगुम्म पुंडरीअं पुंडरी-
यगुम्मं सहस्सारवळिसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं देवाणं (उक्कोसेणं) अट्ठारस सागरो-
वमाइं ठिई पन्नत्ता ७॥
ते णं देवा[णं अट्ठारसेहिं अद्धमासहिं आणमंति वा पाणमंति वा ऊससंति वा नीससंति
वा १ । तसि णं देवाणं अट्ठारसवाससहस्सेहिं आहारट्टे समुप्पज्जइ २ । संतेगइया भवसिद्धिया
(जीवा) जे अट्ठारसहिं भवग्गहणेहिं सिज्झिस्सति बुज्झिस्संति मुच्चिस्संति परिनिवाइस्संति सब-
दुख्खाणमंतं करिस्संति ३ ॥ सूत्रम्-१८ ॥
मूलार्थ:-अढार प्रकारनु ब्रह्मचर्य कयुं छे, ते आ प्रमाणे-औदारिक ( मनुष्य-तिर्यंच ) संबंधी कामभोगने पोते
॥७०॥

१ १४ । पलियंक १५ निसिज्जा १६ य, सिणाणं १७ सोभवजणं १८॥१॥३। आयारस्स णं भगवतो सचूलिआगस्स अट्ठारस पयसहस्साई पयग्गेणं पन्नताई ४ । वंभीए णं लिवीए अटारसविहे लेखविहाणे पन्नत्ते, तं जहा--भी १ जवणीलिया २ दोसऊरिया ३ ख(ब)रोट्टिया ४ खरसाचिया ५ पहाराइआ ६ उच्चत्चरिआ ७ अक्खरपुट्ठि(त्थि)या ८ भोगवयता ९ वेणतिया १० णिण्हइया ११ अंकलिवि १२ गणिअलिबी १३ गंधवलिवी १४ [भूयलिवि ] आदंसलिवी १५ माहेसरीलिवी १६ दामिलिवी १७ बोलिंदीलिवी १८-५ । अस्थिनत्थिप्पवायस्स णं पुवस्स अट्ठारस वत्थू पन्नत्ता ६ । धूमप्पभाए णं पुढवीए अट्ठारसुत्तरं जोयणसयसहस्सं वाहल्लेणं पन्नत्ता ७ । पोसासाढेसु णं मासेसु सइ उक्कासेणं अट्ठारस मुहुत्ते दिवसे भवइ सइ उक्कोसेणं अट्ठारस मुहुत्ता राती भवइ ८॥ इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं अट्ठारस (पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता १ । छट्ठीए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं अट्ठारस ) सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । असुर- कुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं अट्ठारस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ३ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु

भी
समवाय
१८॥
समवायाङ्ग
चो' अंग
॥६९ ॥
हवे अढार स्थानक कहे छे:-
मू०-अट्ठारसविहे बंभे पन्नत्ते, तं जहा-ओरालिए कामभोगे णेव सयं मणेणं सेवइ १ नो
वि अन्नं मणेणं सेवावेइ २ मणेणं सेवंतं पि अण्णं न समणुजाणाइ ३, ओरालिए कामभोगे णेव
सयं वायाए सेवइ ४ नो वि अण्णं वायाए सेवावेइ ५ वायाए सेवंतं पि अण्णं न समणुजाणाइ
६, ओरालिए कामभोगे व सयं कायेणं सेवइ ७ नो वि यऽपणं काएणं सेवावेइ ८ कारणं
सेवंतं पि अण्णं न समणुजाणाइ ९, दिवे कामभोगे व सयं मणेणं सेवइ १० णो वि अण्णं
मणेणं सेवावेइ ११ मणेणं सेवंतं पि अण्णं न समणुजाणाइ १२, दिव्वे कामभोगे णेव सयं
वायाए सेवइ १३ णो वि अण्णं वायाए सेवावेइ १४ वायाए सेवंतं पि अण्णं न समणुजाणाइ
१५, दिव्वे कामभोगे णेव सयं कारणं सेवइ १६ णो वि अण्णं काएणं सेवावेइ १७ कारणं
सेवंतं पि अण्णं न समणुजाणाइ १८, १ । अरहतो णं अरिष्टनेमिस्स अट्ठारस समणसाहस्सीओ
उकोसिया समणसंपया होत्था २। समणणं भगवया महावीरेणं समणाणं णिग्गंथाणं सखुड्डय-
विअत्ताणं अट्ठारस ठाणा पन्नत्ता, तं जहा-वयछकं ६ कायछक्कं १२, अकप्पो १३ गिहिभायणं
॥६९॥

ते इंगिनी मरण कहेवाय छे. आ मरण चतुर्विध आहारनुं प्रत्याख्यान करनार, शरीरनी सार-संभाळ नही करनार ( कराव- नार) अने नियमित प्रदेशमां ज रहेनाराने होइ शके छे. तथा जेमां पादप-वृक्षनी जेम उपगमन एटले रहेq होय ते पाद- पोपगमन मरण कहेवाय छे. जेम कोइ वृक्ष कोइ ठेकाणे कोइपण प्रकारे पडणुं होय ते काइ पण सम के विपम स्थान विगे- रेनो विचार कर्या विना निश्चळ ज रहे छे, तेवी रीते जे साधु रहे तेनुं जे मरण ते पादपोपगमन मरण कहेवाय छे. (९)। सूक्ष्मसंपराय गुणस्थानवाळो उपशमक अथवा क्षपक एम वे प्रकारनो होय छे, ते सूक्ष्म लोभ कपायनी किट्टिकाने वेदनार भगवान-पूज्य एवा साधु सूक्ष्मसंपरायना भावमा ( परिणाममां) वर्तता एटले ते ज गुणस्थानकमां रहेला होय ते समजवा. पण अतीत के अनागत सूक्ष्मसंपरायना परिणामवाळा न समजवा. ते एक सो ने वीश प्रकृतिमाथी सतर कर्मप्रकृतिने बांधे छे, चाकीनी (१०३) कर्मप्रकृतिओने बाधता नथी; केमके पूर्व पूर्वना गुणस्थानकोमा बंधने आश्रीने ते प्रकृतिओ विच्छेद पामी छे. तथा वळी आ कहेली सत्तर प्रकृतिमाथी पण एक सातवेदनीय प्रकृति उपशांतमोहादिक गुणस्थानकोने विपे बंधने आश्रीने प्राप्त थाय छे अने वाकीनी सोळ प्रकृतिओनो अहीं ज विच्छेद थाय छे. ते विपे कयुं छे के ज्ञान अने अंतरायतुं दशक (ज्ञानावरणनी पांच अने अंतरायनी पांच मळीने दश प्रकृति)१०, दर्शनावरणनी चार १४, उच्च गोत्र १५ अने यशकीर्ति १६, आ सोळ प्रकृतिओ सूक्ष्म कपाय(संपरायगुणस्थान)ने विष विच्छेद पामे छे अर्थात् सूक्ष्मसंपराय गुण- स्थानकथी आगळ तेनो बंध नथी. (१०)॥ साम विगेरे १७ विमानोनां नामो आपेला छे (८)॥ सूत्र-१७ ।।.

श्री
समवायाङ्ग
समवाय
१७॥
सूत्र।
चोधु अंग
॥ ६८॥
मनुष्य ) भवने योग्य एवं ( आगला भवतुं ) आयुष्य बांधीने पछी ते ( अत्यारना) आयुष्यनो क्षय थवावडे मरनारनुं जे
मरण ते तद्भव मरण कहेवाय छे. आ मरण तिर्यच अने मनुष्य ए वेने ज होइ शके छे पण देव अने नारकीने आनो
संभव ज नथी, केम के तेओ मरीने अनंतर ते ज भवमा उत्पन्न थता नथी. तथा वाळकनी जेवा वाळक एटले विरति
रहित एवा जीवो, तेओर्नु जे मरण ते वाळमरण कहेवाय छे. तथा पंडित एटले सर्वविरतिवाळा, तेओर्नु जे मरण ते
पंडितं मरण कहेवाय छे. तथा वाळपंडित एटले देशविरतिवाळा, तेओर्नु जे मरण ते चाळपंडित मरण कहेवाय छे.
तथा छस्थ मरण एटले केवळज्ञान रहित एवानुं मरण. तथा केवेळी मरण-केवळज्ञानीनु मरण ए प्रसिद्ध ज छे. तथा 'वेहा-
यसमरणं त्ति'-आकाशने विपे जे मरण थयुं ते वैहायस मरण कहेवाय छे. अर्थात् वृक्षनी शाखा विगेरेमां शरीरने
लटकावीने जे मरवू ते वैहायस मरण कहेवाय छे. तथा गृध्र एटले गीधपक्षी तेना उपलक्षणथी वीजा पण पक्षी अने शीयाळ
विगेरे वडे स्पर्श करायेलं जे मरण ते गृध्रस्पृष्ट कहेवाय छ, अथवा गृध्र विगेरेने खावा लायक छ पृष्ठ-पीठ अने उपलक्षणथी
उदरादिक अवयवो जे मरणने विषे ते गृध्रपृष्ठ मरण कहेवाय छे, कोइ महासत्त्ववाळो प्राणी (मनुष्य) हाथी के ऊंट विगेरेना
(मृतक) शरीरमां पेशी गृध्रादिकनी पासे पोतानु भक्षण करावे, ते आ मरण कहेवाय छे. तथा जेने विपे जावजीव सुधी
भक्तनु-भोजननुं प्रत्याख्यान होय ते भक्तपरिज्ञा एवा नामे करीने रूढ छे आ प्रत्याख्यान त्रिविध अथवा चतुर्विध आहा-
रना त्यागपणे थइ शके छे, तेम ज तेमां सप्रतिकर्म एटले शरीरनी सेवा-चाकरी पण करी-करावी शकाय छे. तथा जे अनश-
ननी क्रियामां अमुक नियमित प्रदेशमा हरवाफरवानी चेष्टा करी शकाय छे ते इंगिनी कहेवाय छे, तेवा इंगिनीवडे जे मरण
॥६८॥

अहीं प्राकृत होवाथी 'अ' ने बदले 'आ' दीर्घ कर्यो छे ( आवीचि ), आवा प्रकारनुं जे मरण एटले के क्षणे क्षणे आयुष्यना दळीया खरतां जाय ए रीते सर्व दळीयां खरी जाय त्यारे जे मरण थाय ते आवीचि मरण कहेवाय छे, तथा अवधि एटले मर्यादा, ते वडे जे मरण ते अवधि मैरण, एटले के नारकादिक भवना कारणपणाए करीने जे आयुकर्मनां दळियां अनुभवीने हमणां मरे छे ते ज आयुकर्मनां दळियांने फरीथी अनुभवीने ज्यारे मरशे त्यारे ते त्यांसुधीनु अवधि मरण कहेवाय छे; कारण के ते ( हमणांना ) द्रव्यनी (दळीयांनी ) अपेक्षाए फरीथी ते ज द्रव्यनुं ग्रहण थाय त्यांसुधी जीवनुं मरण थाय ते अवधि कहेवाय छे. तथा ' आयंतिय मरणे त्ति'-आत्यंतिक मरण एटले नारकी विगेरे कोइपण गतिना आयुष्यपणे कर्मना दळीयांने अनुभवीने हमणां मरण पाम्यो अने ते प्रमाणे मरण पाम्या पछी फरीथी ते दळियांने अनुभवीने (कोइपण वखत ) मज्वानो नथी, आयु जे मरण ते, ते द्रव्यनी अपेक्षाए अत्यंत होवाथी (घणुं अंते-छेवटे होवाथी) आत्यंतिक कहेवाय छे. 'वलायमरणे त्ति-' संयमना योगथी पाछा फरतां एटले जेना चारित्रपरिणाम भग्न थया होय एवा साधु. ओनुं जे मरण ते वलन्मरण कहेवाय छे. तथा वशवडे एटले इंद्रियोना विषयोनी परतंत्रतावडे जे ऋत एटले बाधा पामेला होय ते वशीत कहेवाय छे. जेम तेलवाळा दीवानी कलिका(शिखा-ज्योत )ने जोवाथी पतंगीयु वशात कहेवाय छे. ( तेवा वशार्तनुं जे मरण ते वशात मरण कहेवाय छे ) तथा अतः एटले जेना मनने विपे शल्यना जेवू शल्य एटले कोइपण जातनो अपराध होय ते अंतःशल्य एटले लज्जा के गर्व विगेरेना कारणने लीधे अतिचारनी आलोचना करी न होय, तेवानुं जे मरण ते अंतःशल्य मरण कहेवाय छे. तथा तियंच के मनुष्य संबंधी जे कोइ भवने विपे वर्ततो जंतु फरीथी ते ज (तियंच के

समवाय
१७॥
श्री
all १७४००० हजार होय छे.) तेमांना वेलंधर देवोना आवास पर्वतो लवणसमुद्रनी चारे दिशामा एक एक होवाथी कुल चार
समवायाङ्ग छे. ते पर्वतोना नाम पूर्वादिना अनुक्रमे गोस्तूभ, दकभास, शंख अने दकसीमा छे, तेमना अधिपति देवो अनुक्रमे गोस्तूभ,
सूत्र॥ Fall शिव, शंख अने मनाशील नामना नागराज छे. तथा अनुवेलंधरना आवास पर्वतो लवणसमुद्रमां चारे विदिशामां एक एक
पोएं अंग होवाथी कुल चार छे. ते अनुक्रमे कर्कोटक, विद्युत्प्रभ, कैलास अने अरुणप्रभ एवा नामवाळा छै. तथा कर्कोटक, कर्दम,
कैलास अने अरुणप्रभ एवा नामवाळा तेमना अधिपति-नागराजाओ छे. आ सर्वे (आठे ) आवास पर्वतो (जंबूद्वीपनी
॥ ६७॥
जगतीथी ) वेताळीश हजार योजन लवणसमुद्रमा जइए त्यां आवेला छे. तथा आ सर्वे ( आठे ) पर्वतो चार सो ने त्रीश
योजन अने एक कोश भूमिनी अंदर रहेला छे अने सत्तर सो ने एकवीश योजन ऊंचा छ ( १७ थी २४.) (४)। 'चार-
णाणं त्ति' जंघाचारण अने विद्याचारण मुनिओने रुचकादिक द्वीपमा जq होय त्यारे सत्तर हजार योजनथी कांइक अधिक
ऊंचे गति कर्या पछी तिरछी गति करवानी होय छे (६)। तिगिछि नामनो कूट एटले उत्पात पर्वत, के जे पर्वत उपर
आवीने पछी मनुष्यक्षेत्र तरफ जवाने माटे देवो गति करे छे. ते पर्वत अहींथी असंख्यातमा अरुणोदय नामना समुद्रमां
दक्षिण दिशाए बेंताळीश हजार योजन जइए त्यां छे (७)। तथा रुचकेंद्र नामनो उत्पात पर्वत ते ज अरुणोदय नामना
समुद्रमां उत्तर दिशाए तेटलो ज दूर रहेलो छे (८)।
'आवीई मरणे त्ति'-'आ-समन्तात् ' एटले चोतरफथी वीचिना जेवी वीचि एटले आयुष्यना दळिया खरी
जाय तेवी अवस्था जे मरणमां होय ते आवीचि मरण कहेवाय छे, अथवा तो वीचि एटले विच्छेद, तेनो जे अभाव ते अवीचि,
॥६७॥

करे (प्रवर्ते ) अने संयमना योगोने विषे व्यापार न करे (प्रवर्ते नही ) ते. तथा अपहत्य असंयम एटले उच्चारादिकने विधि प्रमाणे न परठवे ते. तथा अनमार्जना असंयम एटले पानादिकनी प्रमार्जना न करे अथवा विधि प्रमाणे न करे ते. तथा मन, वचन अने काया संबंधी असंयम एटले अशुभ एवा मन, वचन अने कायानी उदीरणा करे ते. (१) । असंय- मथी जे विपरीत ते सयम कहेवाय छे (२)। तथा वेलंधर अने अनुवेलंधर नामना देवोना आवास पर्वतोनुं स्वरूप क्षेत्र- समासनी आ गाथाओवडे जाणवू ( बृहत् क्षेत्रसमास गाथा १७ थी ). जंबूद्वीपनी जगतीथी पचाणु हजार योजन जइए अने धातकी खंडनी आ तरफनी जगतीथी पंचाणु हजार योजन आ तरफ आवीए त्यारे ते ठेकाणे (एटले लवणसमुद्रना मध्य भागे पाणीनी शिखा रहेली छे ते ) लवण शिखा चक्रवाळथी एटले रथना चक्रना आकारवडे दश हजार योजन विस्तारवाळी छे, तथा समान जळपट्टथी सोळ हजार योजन ऊंची छे अने एक हजार योजन अवगाढ छ एटले पृथ्वीमां पेठेली छे. आ लवणसमुद्रनी शिखानी उपर अर्ध योजनथी काइक ओछु एटले वे गाउथी कांइक ओछा प्रमाण जेटलुं जळ सांज सवार बन्ने काळ वधे छे अने घटे छे एटले के पाताळकलशमा रहेला वायुनो क्षोभ थवाथी वधे छे अने ते वायु शांत थवाथी घटे छे. लवणसमुद्रनी अभ्यंतर एटले जंबूद्वीप तरफनी वेळाने एटले शिखानी उपरना जळनी शिखाने वेताळीश हजार नागकुमारो धारी राखे छे, तथा बाह्य एटले धातकीखंड तरफनी वेळाने बहोतेर हजार नागकुमारो धारी राखे छै ( एटले के ते शिखा वेमांथी एके तरफ ढळी न जाय तेम अटकावे छ ). तथा अग्रोदक एटले शिखा उपरनुं अर्ध योजनथी कांइक ओछा प्रमाणवालं चधतुं जळ, तेने साठ हजार नागकुमारो धारी राखे छे. (आ वेलंधर देवो कुल १२ समवाय १७॥ श्री समवायाङ्ग सूत्र । चोथु अंग ॥६६॥ विषे नारकीओनी उत्कृष्ट स्थिति सत्तर सागरोपमनी कही छे (२)। छठी पृथ्वीने विप नारकीओनी जघन्य स्थिति सत्तर सागरोपमनी कही छ (३)। केटलाक असुरकुमार देवोनी सत्तर पल्योपमनी स्थिति कही छे ( ४ ) । सौधर्म अने ईशान कल्पने विषे केटलाक देवोनी सत्तर पल्योपमनी स्थिति कही छे (५)। महाशुक्र कल्पने विपे देवोनी उत्कृष्ट स्थिति सत्तर सागरोपमनी कही छे (६)। सहस्रार कल्पने विषे देवोनी जघन्य स्थिति सत्तर सागरोपमनी कही छे (७)। जे देवो सामान, सुसामान, महासामान, पद्म, महापद्म, कुमुद, महाकुमुद, नलिन, महानलिन, पौंडरीक, महापौडरीक, शुक्ल, महाशुक्ल, सिंह, सिंहकांत, सिंहवीय अने भाविय नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति सत्तर सागरोपमनी कही छे (८)॥ ते देवो सत्तर अर्धमासे (पखवाडीए) आन ले छ, प्राण ले छे, एटले उच्छ्वास ले छे, निःश्वास ले छ (१) । ते देवोने सत्तर हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२)। एवा केटलाक भवसिद्धिक ( भव्य ) जीवो छे के जेओ सत्तर भवने ग्रहण करवावडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे, परिनिर्वाण पामशे अर्थात् सर्व दुःखनो अंत करशे. (३)॥ टीकार्थः-हवे सत्तर स्थानक कहे छे, तेनो अर्थ स्पष्ट छे. विशेष ए के-स्थितिनां सूत्रोनी पहेला दश सूत्रो छे. का (तेमां पहेला असंयमना सूत्रमा ) अंजीवकाय असंयम एटले सुंदर सुवर्ण तथा बहु मूल्यवाळा वस्त्र, पात्र, पुस्तक विगेरे ग्रहण करवा ते. प्रेक्षाने विषे जे असंयम ते प्रेक्षा असंयम कहेवाय छे एटले के ( वेसवा विगेरेनु) स्थान अने उपकरण विगेरेनुं प्रत्युपेक्षण न करवू अथवा विधि प्रमाणे प्रत्युपेक्षण न कर ते. उपेक्षा असंयम एटले असंयमना योगोमां व्यापार -- सत्तर सो ने एकवीश योजन ऊर्ध्वपणे (ऊंचा) कहा छै (४)। लवणसमुद्र सत्तर हजार योजन मर्वाग्रवडे (तळीवेथी शिखा पर्यंत) ऊंचो को छे (५) । आरत्नप्रभा नामनी पृथ्वीना अत्यंत सरखा रमणीय भूमिभाग(भूमितळ)थी कांइक अधिक सत्तर हजार योजन ऊंचे ऊडीने-उपडीने त्यारपछी चारणो (जंघाचारण अने विद्याचारण मुनिओ)नी तिरछी गति कही छे (केमके रत्नप्रभा पृथ्वीथी साधिक सोळ हजार योजन प्रमाण ऊची लवणसमुद्रना जळनी शिखा छ तेथी तेना करतां पण हजार योजन अधिक एटले सत्तर हजार योजन ऊंचा गया पछी तिरछी गति धइ शके छ (६) । असुरना राजा चमर नामना असुरेद्रनो तिगिछिकूट नामनो उत्पात पर्वत सत्तर सो ने एकवीश योजन ऊर्धपणे (ऊंचो) कसो छ (७) । बलि नामना असुरेद्रनो रुचकेंद्र नामनो उत्पात पर्वत पण सत्तर सो ने एकवीश योजन ऊर्ध्वपणे (ऊंचो) कहोछे (८)। मत्तर प्रकारे मरण कयुं छे, ते आ प्रमाणे- आवीचि मरण, अवैधि मरण, आत्यंतिक मरण, चलाय ( वलन् ) मरण, वेशात मरण, अंतःशल्य मरण, तद्भव मरण, बाल मरण, पंडित मरण, बोलपंडित मरण, छाम्य मरण, केलि मरण, वैहायस मरण, गृध्रपृष्ठ मरण, भक्तप्रत्याख्यान भरण, इंगिनी" मरण, पादोपैगमन भरण (९)। सूक्ष्मसपराय भगवान (पूज्य) सूक्ष्मसपरायना भावमा वर्तता सता (ते गुणस्थानके रखा होय त्यारे ) सत्तर कर्मप्रकृतिओने वाधे छे, ते आ प्रमाणे-आभिनिवोधिक (मति) ज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधि- ज्ञानावरण, मनपर्यवज्ञानावरण, केवळज्ञानावरण, चक्षुदर्शनावरण अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण, केवळदर्शनावरण, सातवेदनीय, यश-कीर्ति नाम, उच्च गोत्र, दानातराय, लाभांतराय, भोगातराय, उपभोगांतराय, वीर्यातराय (१०)॥ आ रत्नप्रभा नामनी पृथ्वीने विपे केटलाफ नारकीओनी सत्तर पल्पोपमनी स्थिति कही छ (१)। पांचमी पृथ्वीने

श्री
समवाय
१७॥
समवायाशी
बोधु अंग
सुकं महासुकं सीहं सीहकंतं सीहवीअं भाविअं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं देवाणं उक्को-
सेणं सत्तरस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ८॥
ते णं देवा सत्तरसहिं अद्धमासेहिं आणमंति वा पाणमंति वा उस्ससंति वा नीससंति वा १ ।
तेसि णं देवाणं सत्तरसहिं वाससहस्सेहिं आहारट्टे समुप्पजइ २ । संतेगइया भवसिद्धिआ जीवा
जे सत्तरसहिं भवग्गहणेहिं सिज्झिस्सति बुज्झिस्संति मुच्चिस्संति परिनिवाइस्सति सबदुक्खाणमंतं
करिस्संति ३॥ सूत्रम्-१७ ॥
मूलार्थ:-सत्तर प्रकारनो असंयम कह्यो छे, ते आ प्रमाणे-पृथ्वीकाय असंयम, अप्काय असंयम, तेजस्काय असं-
यम, वायुकाय असंयम, वेनस्पतिकाय असंयम, द्वीयि असंयम, त्रींद्रिय असंयम, चतुरिंद्रिय असंयम, पंचेंद्रिय असंयम,
अंजीवकाय असंयम, प्रेक्षा असंयम, उपेक्षा असंयम, अपहृत्य असंयम, अप्रैमार्जन असंयम, मन असंयम, वचन असंयम,
काय असंयम (१)। सत्तर प्रकारनो संयम कह्यो छे, ते आ प्रमाणे-पृथ्वीकाय संयम, अप्काय संयम, तेजस्काय संयम,
वायुकाय संयम, वनस्पतिकाय संयम, द्वींद्रिय संयम, त्रींद्रिय संयम, चतुरिंद्रिय संयम, पंचेंद्रिय संयम, अजीवकाय संयम,
प्रेक्षा संयम, उपेक्षा संयम, अपहत्य संयम, प्रमार्जना संयम, मन संयम, वचन संयम, काय संयम (२)। मानुपोत्तर पर्वत
सत्तर सो ने एकवीश योजन ऊर्ध्वपणे (ऊंचो) कह्यो छे (३)। सर्व वेलंधर अने अनुवेलंधर नागराजाओना आवास पर्वतो
॥६५॥

९। सुहुमसंपराए णं भगवं सुहुमसंपरायभावे वट्टमाणे सत्तरस कम्मपगडीओ णिवंधति, तं जहा- आभिणिबोहियणाणावरणे सुयणाणावरणे ओहिणाणावरणे मणपज्जवणाणावरणे केवलणाणावरणे चक्खुदंसणावरणे अचक्खुदंसणावरणे ओहीदसणावरणे केवलदसणावरणे सायावेयणिजं जसो- कित्तिनाम उच्चागोयं दाणंतरायं लाभंतरायं भोगतरायं उवभोगतरायं वीरिअअंतरायं १०॥ इमीसे ण रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइआणं नेरइयाणं सत्तरस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता १ । पंचमीए पुढवीए नेरइयाणं उक्कोसेणं सत्तरस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । छट्ठीए पुढवीए नेरइयाणं जहणणेणं सत्तरस सागरोवमाई ठिई पन्नत्ता ३। असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं सत्तरस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइआणं देवाणं सत्तरस पलि- ओवमाइं ठिई पन्नत्ता ५ । महासुक्के कप्पे देवाणं उक्कोसेणं सत्तरस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ । सहस्सारे कप्पे देवाणं जहण्णेणं सत्तरस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ७ । जे देवा सामाणं सुसा- माणं महासामाणं पउमं महापउमं कुमुदं महाकुमुदं नलिणं महानलिणं पोंडरीअं महापोंडरीअं श्री समवाय १७॥ समवाया पत्र। चोधुं अंग ३ ॥६४ ॥ दियसंजमे चउरिदिअसंजमे पंचिंदिअसंजमे अजीवकायसंजमे पेहासंजमे उवेहासंजमे अवदसं- जमे पमजणासंजमे मणसंजमे वइसंजमे कायसंजमे २ । माणुसत्तरे णं पवए सत्तरस एकवीसे जोयणसए उर्ल्ड उच्चत्तेणं पन्नत्ते ३ । सत्वेसि पि णं वेलंधरअणुवेलंधरणागराईणं आवासपवया सत्त- रस एकवीसाइं जोयणसयाइं उद्धं उच्चत्तेणं पन्नत्ता ४ । लवणे णं समुद्दे सत्तरस जोयणसहस्साई सव्वग्गेणं पन्नत्ते ५ । इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ सातिरेगाई सत्तरस जोयणसहस्साई उद्धं उप्पतित्ता ततो पच्छा चारणाणं तिरिआ गती पवत्तति ६ । चमरस्स णं असुरिंदस्स असुररणो तिगिंछकूडे उप्पायपवए सत्तरस एकवीसाइं जोयणसयाई उड्ढे उच्चत्तेणं पन्नत्ते ७ । बलिस्स णं असुरिंदस्स रुअगिंदे उप्पायपवए सत्तरस एकवीसाइं जोयणसयाई उद्धं उच्चत्तेणं पन्नते ८। सत्तरसविहे मरणे पन्नत्ते, तं जहा-आवीईमरणे ओहिमरणे आयंतियमरणे वला- यमरणे वसहमरणे अंतोसल्लमरणे तब्भवमरणे बालमरणे पंडितमरणे वालपंडितमरणे छउमत्थम- रणे केवलिमरणे वेहासमरणे गिद्धपिट्ठमरणे भत्तपञ्चक्खाणमरणे इंगिणिमरणे पाओवगमणमरणे छे (५)। तथा चमर अने बळि ए वे दक्षिण अने उत्तर तरफना असुरकुमारना इंद्रो छ, तेमनी ' उवारियालेणे त्ति चमरचंचा अने बलीचंचा नामनी राजधानीना मध्य भागे रहेला तेमना ( वे इंद्रोना ) बे भवनने विषे ( मध्ये ) वे अवतारिकालयन एटले मध्यभागे ऊंचा अने पछी चौतरफ पार्श्वभागे अनुक्रमे उतरता उतरता वे पीठ रहेला छे, ते गोळ होवाथी आयाम अने विष्कंभवडे सोळ हजार योजन कहेला छे ( ६ )। तथा लवणसमुद्रने विपे मध्यना दश हजार योज- नमां नगरना किल्लानी जेम जळ ऊंचु रहेलं छे, तेना उत्सेध( ऊंचाइ )नुं प्रमाण सोळ हजार योजननुं छे. तेथी एम कहेवाय छे के लवणसमुद्र उत्सेधनी वृद्धिवडे सोळ हजार योजन छ (७)। आवर्त विगेरे अग्यार विमाननां नामो आपेलां छ (६)। हवे सत्तर स्थानक कहे छ:- मू०-सत्तरसविहे असंजमे पन्नत्ते, तं जहा-पुडविकायअसंजमे आउकायअसंजमे तेउकायअ- संजमे वाउकायअसंजमे वणस्सइकायअसंजमे बेइंदिअअसंजमे तेइंदियअसंजमे चउरिंदियअसं- जमे पंचिंदियअसंजमे अजीवकायअसंजमे पेहाअसंजमे उवेहाअसंजमे अवहटुअसंजमे अप्पमज्जणा. असंजमे मणअसंजमे वइअसंजमे कायअसंजमे १ । सत्तरसविहे संजमे पन्नत्ते, तं जहा-पुढवी- कायसंजमे आउकायसंजमे तेउकायसंजमे वाउकायसंजमे वणस्सइकायसंजमे बेइंदिअसंजमे तेइं- -- श्री समवाय १६ ॥ समवायात ॥ चोयुं अंग ॥६३॥ , सोळमुं अध्ययन छे, तेथी करीने गाथा नामर्नु सोळk अध्ययन छे जेमनु (जेमनी मध्ये ) ते गाथाषोडशक कहेवाय छे. ते १६ मां' समए त्ति'-नास्तिक विगेरेना समय( सिद्धांत )ने प्रतिपादन करनार अध्ययन समय नामे ज कहेवाय छे. चैतालीय नामना छंद( श्लोक )नी जातिवडे रचेलं अध्ययन वैतालीय कहेवाय छे, ए ज प्रमाणे वीजां पण अध्ययननां नामो पोतपोताना अर्थने अनुसारे जाणी लेवां. तेमां 'समोसरणे त्ति'-समवसरण एटले त्रण सो ने त्रेसठ प्रवादीओना मतनो समूह. ' अहातहिए त्ति'-जेवी वस्तु होय तेवी ज जेने विपे कहेवामां आवे ते यथातथिक नामर्नु अध्ययन, तथा ग्रंथने कहेनारुं अध्ययन ग्रंथ कहेवाय छे. 'जमइए त्ति'-यमकीय एटले यमकनी जेमा रचना करी होय ते सूत्र तथा 'गाहेति' पूर्वना पंदर अध्ययनोनो अर्थ जेमां गायो-कह्यो छे ते गाथा कहेवाय छ अथवा ते पंदर अध्ययनोमां प्रतिष्ठाभूत होवाथी पण गाथा नामर्नु अध्ययन कहेवाय छे ( १ ). मेरुपर्वतना ( सोळ ) नामना सूत्रमा एक गाथा अने एक श्लोक लख्यो छे. तेमां'मझे लोगस्स नाभी यत्ति'लोकमध्य अने लोकनाभि एम वे नाम लख्या छ. तथा उत्तर एवं नाम कयुं छे ते भरतादिक(सर्व क्षेत्रो)नी उत्तर दिशामां (मेरु) रहेलो छे. तेथी कहेलुं छे. ते विषे कयु छ के- 'सव्वेसिं उत्तरो मेरु' त्ति- सर्व क्षेत्रादिकनी उत्तरमा मेरु रहेलो छे.' तथा 'दिसाइ यत्ति'-( सर्व ) दिशाओनो आदिभूत ते दिगादि ए, पण मेरुनु नाम छ (केमके मेरुनी मध्ये रहेला आठ रुचक प्रदेशने आश्रीने पूर्वादिक दिशा-विदि- शाओनी उत्पत्ति थाय छे) तथा ' वडिंसे इय त्ति'-अवतंस-शेखरनी जेवो होवाथी अवतंस एवं पण मेरुनु नाम छे (३) । पुरुषादानीय एटले पुरुषोने मध्ये आदेय नामकर्मवाळा (पार्श्वनाथ ) (४) । तथा आत्मप्रवाद ए सातमु पूर्व , पूर्वमा सोळ वस्तुओ ( अध्ययननी जेवा विभागो) कहेल छ (५)। चमरेंद्र अने वलीद्रना अवतारिकालयन (प्रासाद मध्ये रहेली पीठिका) आयाम-विष्कमे करीने सोळ हजार योजन प्रमाण कहेल छे (६)। लवणसमुद्रना मध्य भागमा दश हजार योजनमा) उत्सेधनी ( वेळानी) वृद्धि सोळ हजार योजननी कही छे (७)। आ रत्नप्रभा पृथ्वीने विपे केटलाक नारकीओनी सोळ पल्योपमनी स्थिति कही छे (१)। पांचमी पृथ्वीने विपे केटलाक नारकोनी सोळ सागरोपमनी स्थिति कही छे (२)। केटलाक असुरकुमार देवोनी सोळ पल्योपमनी स्थिति कही छ (३)। सौधर्म अने ईशान कल्पने विपे केटलाक देवोनी सोळ पल्योपमनी स्थिति कही छे (४)। महाशुक्र कल्पने विषे केटलाक देवोनी सोळ सागरोपमनी स्थिति कही छे (५)। जे देवो आवर्त, व्यावर्त, नंद्यावर्त, महानंद्यावर्त, अंकुश, अंकुशप्रलंब, भद्र, सुभद्र, महाभद्र, सर्वतोभद्र अने भद्रोत्तरावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति सोळ सागरोपमनी कही छे ( ६ )। ते देवो सोळ अर्धमासे ( पखवाडीए) आन ले छे, प्राण ले छे, एटले उच्छ्वास ले छे, निःश्वास ले छ (१)। ते देवोने सोळ हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२)। एवा केटलाएक भवसिद्धिक ( भव्य ) जीवो छे के जेओ सोळ भवने ग्रहण करवावडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे, परिनिर्वाण पामशे अर्थात् सर्व दुःखनो अत करशे ( ३)। टीकार्थ:-हवे सोळ स्थानकनुं सूत्र कहे छे, अने ते सुगम छे. विशेप ए के-स्थितिनां सूत्रोनी पहेलां गाथापोडशक विगेरे सात सूत्रो कयां छे, तेमां सूत्रकृतांग( सुगडांग )ना पहेला श्रुतस्कंधमां सोळ अध्ययनो छे, तेमां गाथा नामनुं श्री समवाय समवायाज चोg अंग ॥६२॥ A ते णं देवा सोलसहि अद्धमासाणं आणमंति वा पाणमंति वा उस्ससंति वा नीससंति वा १ । तेसि णं देवाणं सोलसवाससहस्सेहिं आहारट्टे समुप्पज्नइ २। संतेगइआ भवसिद्धिआ जीवा सोलसहिं भवग्गहणेहि सिज्झिस्संति बुज्झिस्सति मुच्चिस्सति परिनिवाइस्संति सवदुक्खाणमंतं करिस्संति ३॥ सूत्रम्-१६ ॥ मूलार्थ:-सुयगडांगसूत्रमा सोळ अध्ययनमा छेल्लु गाथाषोडशक नामर्नु अध्ययन कहेलुं छे, ते आ प्रमाणे-समय, वैतालीय, उपसर्गपरिज्ञा, स्त्रीपरिज्ञा, नरकविभक्ति, महावीरस्तुति, कुशीलपरिभापित, वीर्य, धर्म, समाधि, मार्ग, समवसरण, याथातथिक, ग्रंथ, यमकीय (आदानीय) अने सोळमुं गाथापोडश कहेलं छ (१)। सोळ कषायो कहेला छ, ते आ प्रमाणे- अनंतानुबंधी क्रोध, अनंतानुबंधी मान, अनंतानुबंधी माया, अनंतानुबंधी लोभ, अप्रत्याख्यानकषाय क्रोध, अप्रत्याख्यान- कषाय मान, अप्रत्याख्यानकषाय माया, अप्रत्याख्यानकपाय लोभ, प्रत्याख्यानावरण क्रोध, प्रत्याख्यानावरण मान, प्रत्या- ख्यानावरण माया, प्रत्याख्यानावरण लोभ, संज्वलन क्रोध, संज्वलन मान, संज्वलन माया, संज्वलन लोभ (२)। मेरु- पर्वतना सोळ नाम कह्यां छे, ते आ प्रमाणे-मंदर, मेरु, मनोरम, सुदर्शन, स्वयंप्रभ, गिरिराज, रत्नोच्चय, प्रियदर्शन, लोक- मध्य, लोकनाभि, अर्थ, सूर्यावर्त, सूर्यावरण, उत्तर ( उत्तम ), दिगादि अने सोळमुं नाम अवतंसक (३)। पुरुषोने मध्ये आदान नामकर्मवाळा पार्श्वनाथ अरिहंतने सोळ हजार साधुओनी उत्कृष्ट श्रमणसंपदा हती (४)। आत्मप्रवाद नामना - ॥६२।।

वडिंसे इअ सोलसमे ॥ २ ॥ ३ ॥ पासस्स णं अरहतो पुरिसादाणीयस्स सोलस समणसाह- स्सीओ उक्कोसिआ समणसंपदा होत्था ४। आयप्पवायस्स णं पुवस्स णं सोलस वत्थू पन्नत्ता ५। चमरबलीणं उवारियालेणे सोलस जोयणसहस्साइं आयामविक्खंभेणं पन्नत्ता ६ । लवणे णं समुद्दे सोलस जोयणसहस्साई उस्सेहपरिवुड्डीए पन्नत्ते ७॥ इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं सोलस पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता १ । पंचमीए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं सोलस सागरोवमा ठिई पन्नत्ता २ । असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं सोलस पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ३। सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं सोलस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । महासुक्के कप्पे देवाणं अत्थगइयाणं सोलस साग- रोवमाई ठिई पन्नत्ता ५ । जे देवा आवत्तं विआवत्तं नंदिआवत्तं महाणंदिआवत्तं अंकुसं अंकुसप- लंब भदं सुभदं महाभदं सबओभई भद्दुत्तरवडिंसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं देवाणं उक्कोसेणं सोलस सागरोवमाई ठिई पन्नत्ता ६ ।

समवाय
१६॥
श्री
समवायाङ्ग
चोधुं अंग
॥६१ ॥
शकाय). तथा कार्मणशरीरकायप्रयोग विग्रहगतिने विषे ( सर्व जीवोने ), अने समुद्घात अवस्थामा रहेला केवळीने त्रीजा,
चोथा अने पांचमा समयने विषे होय छे (७)॥
हवे सोळ स्थानक कहे छे:-
मू०--सोलस य गाहा सोलसगा पन्नत्ता, तं जहा-समए वेयालिए उवसग्गपरिन्ना इत्थी-
परिणा निरयविभत्ती महावीरथुई कुसीलपरिभासिए वीरिओ धम्मे समाही मग्गे समोसरणे
आहातहिए गंथे जमईए गाहासोलसमे सोलसगे १ । सोलस कसाया पन्नत्ता, तं जहा-अणंता-
णुबंधी कोहे, अणताणुबंधी माणे, अणताणुबंधी माया, अणंताणुबंधी लोभे, अपच्चक्खाणकसाए
कोहे, अपच्चक्खाणकसाए माणे, अपचक्खाणकसाए माया, अपञ्चक्खाणकसाए लोभे, पञ्चक्खा-
णावरणे कोहे, पञ्चक्खाणावरणे माणे, पञ्चक्खाणावरणे माया, पञ्चक्खाणावरणे लोभे, संजलणे
कोहे, संजलणे माणे, संजलणे माया, संजलणे लोभे २ । मंदरस्स णं पव्वयस्स सोलस नाम-
धेया पन्नत्ता, तं जहा-मंदर मेरु मणोरम, सुदंसण सयंपभे य गिरिराया । रयणुच्चय पियदंसण,
मज्झे लोगस्स नाभी य ॥१॥ अत्थे अ सूरिआवत्ते, सूरिआवरणे त्ति अ। उत्तरे अ दिसाई अ,
॥ ६१॥

तिर्यच के बादर वायुकाय वैक्रियने करे छे, त्यारे (ते वैक्रियना ) प्रारभ करनार औदारिकनुं प्रधानपणुं होवाथी ज्यांसुधी ते क्रियपर्याप्तिवडे पर्याप्तपणाने न पामे (पर्याप्तो न थाय) त्यांसुधी औदारिक चैक्रियनी साथे मिश्र कहेवाय छे. ए ज प्रमाणे आहारकनी साथे पण औदारिकनी मिश्रता जाणवी. तथा वैक्रियशरीरकायप्रयोग चैक्रियपर्याप्तिवाळाने एटले पर्याप्त थयेलाने होय छे. तथा वैक्रियमिश्रशरीरकायप्रयोग (वैक्रिय पर्याप्ति) जेनी पूरी न थइ होय एवा देवने अथवा नारकीने कार्मणनी साथै मिश्रता जाणवी, अथवा (ते मनुष्य अने तियेचने) लब्धियेनियनो त्याग करती वखते औदारिकमां प्रवेश करवाने समये औदारिकने ग्रहण करवा माटे ( वैक्रियनी) प्रवृत्ति होवाथी वैक्रियना प्रधानपणाने लीधे औदारिकनी साथे पण (वैक्रियनी) मिश्रता थइ शके छ एम केटलाक आचार्यों कहे छे. तथा आहारकशरीरकायप्रयोग ते आहारक शरीरनी निष्पत्ति थाय त्यारे तेनु ज प्रधानपणुं होवाथी धाय छे. तथा आहारकमिश्रशरीरकायप्रयोग, आहारकनो त्याग करवापूर्वक अन्य- (औदारिक )ने ग्रहण करवा माटे उद्यमवंत थयेलाने औदारिकनी साथे मिश्रता थाय छे. आनो भावार्थ ए छे के-ज्यारे आहारक शरीरवाळो थइने कार्य कर्या पछी फरीथी औदारिकने ग्रहण करे छे त्यारे आहारकनुं प्रधानपणुं होवाथी औदा रिकमां प्रवेश करवानो व्यापार होवाथी ज्यां सुधी सर्वथा ( संपूर्ण ) आहारकनो त्याग न करे त्यां सुधी औदारिकनी साथे मिश्रता होय छे. अही कोइ शंका करे के-ते आहारक शरीर करनार जीवे पोतानुं ते औदारिक शरीर सर्वथा ( विलकुल ) मूक्युं नथी परतु पूर्वे जेधुं चनावेलुं हतुं तेवु रहेलं ज होय छे, तो ते औदारिक शरीरने ग्रहण करवानुं ज क्यां छे ? उत्तर- तारं कहेवू सत्य छे, तो पण औदारिक शरीरने पाएं ग्रहण करवाने माटे प्रवृत्त थाय छे तेथी ग्रहण करे छे ज ffal ? एम कही ११

HAR
:
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समवाय
१५॥
श्री
समवायाङ्ग
यत्र॥
चोथु अंग
॥६॥
नानु छ तो पण तेना अंधकार( श्यामता)ना किरणोनो समूह घणो मोटो छे तेथी तेनु आवरण करवामां कांइ दोष आवतो
नथी (३)। तथा पंदर मुहूर्त सुधी चंद्रनी साथे जेमनो संयोग रहे छे एवा छ नक्षत्रो पंदर मुहूर्त्तना संयोगवाळा कहेवाय
छे. ते आ प्रमाणे-शतभिषक, भरणी, आर्द्रा, अश्लेषा, स्वाति, ज्येष्ठा-आ छ नक्षत्रो पंदर मुहूर्त्तना संयोगवाळा छे. (४)।
तथा ' चेत्तासोएसु मासेसु त्ति'--स्थूळ न्यायने आश्रीने कहीए तो चैत्र अने आश्विन मासने विषे पंदर मुहूर्त्तनो
दिवस अने पंदर मुहूर्त्तनी रात्रि होय छे, अने निश्चयथी कहीए तो चैत्र मासमां जे दिवसे मेष संक्रांति वेसे तेज एक दिवस-
रात्रि अने आश्विन मासमां जे दिवसे तुला संक्रांति बेसे ते ज एक दिवसरात्रि पंदर पंदर मुहूर्त्तवाळी होय छे (५)॥
'पओगे त्ति'-प्रकर्षे करीने जे योजन-जोडq ते प्रयोग कहेवाय छे एटले के निश्चळपणे आत्मानो क्रिया करवाना
परिणामवाळो व्यापार. अथवा तो क्रिया करवाना परिणामवाळा कर्मनी साथे आत्मा प्रकर्षे करीने जोडाय ते प्रयोग कहेवाय
छे. तेमां सत्य वस्तुना विचारनुं कारणभूत जे मन ते सत्य मन, अने तेनो जे प्रयोग एटले व्यापार ते सत्य मनप्रयोग कहेवाय
छे. ए ज प्रमाणे बाकीना सर्वने विषे जाणवू. विशेष ए के-'औदारिकशरीरकायप्रयोग' आ ठेकाणे औदारिक शरीर जे ते
ज पुद्गल स्कंधना समुदायरूपपणाए करीने उपनीयमान-वृद्धि पामतुं होवाथी काय कहेवाय छ, ते कायनो जे प्रयोग ते
औदारिकशरीरकायप्रयोग कहेवाय छे एम ( समासनो) विग्रह करवो. आ प्रयोग पर्याप्ता जीवनो ज जाणवो. तथा औदा-
रिकमिश्रकायप्रयोग अपर्याप्तकनो जाणवो. अही उत्पत्तिने आश्रीने एटले जीवनी उत्पत्ति समये प्रारंभ करेला औदारिकशरी-
रनु प्रधानपणुं होवाथी औदारिक (योग) कार्मण( शरीरयोग)नी साथे मिश्र थाय छे, तथा ज्यारे मनुष्य के पंचेंद्रिय
॥६०॥

एटलो अध्याहार राखवानो छे. 'पंदरमो पंदरमो भाग ' ए ठेकाणे वीप्सा( वारंवार )ना अर्थमां वे वार बोलाय छे, जेमके 'ते पगले पगले जाय छे' इत्यादि एटले के हमेशां पंदरमो पंदरमो भाग चंद्रनी लेश्या (प्रकाश ) एटले कांति अर्थात् ते कांतिनुं कारण होवाथी लेश्या एटले मंडळ पण कहेवाय छे, ते चंद्रमंडळने आच्छादन करीने ध्रुवराहु रहे छे. ते ज हकिकत देखाडता सता कहे छ के-'तद्यथा-ते आ प्रमाणे-पहेली (एकमनी) तिथिने विपे चंद्रनी लेश्याना पहेला पंदरमा भागने आवरीने रहे छे, आ ज क्रमे करीने पंदरमे दिवसे (अमावास्याए) पंदरीया पंदर भागने आवरीने रहे छे । तथा 'तं चेव त्ति'-शुक्लपक्षमा प्रतिपदादिक तिथिने विपे चंद्रलेश्यानो ते ज पंदरमो भाग देखाडतो देखाडतो एटले पंदरमा भाग जेटलो पोते दूर जवाथी प्रगट करतो प्रगट करतो ध्रुवराहु रहे छे. अहीं आ मावार्थ छे-चंद्रना मंडळना सोळ भाग करवा, तेमां एक सोळमो भाग कायम उघाडो ज रहे छे. बाकी जे पंदर भाग रह्या तेमांथी राहु हमेशां एक एक भागने कृष्णपक्षमा आवरे छे अने शुक्लपक्षमा एक एक भागने मुके छे-छोडे छे. ते विपे ज्योतिष्फरंडक नामना प्रकीर्णक ग्रंथमां का छ-"सोळ भाग करीने तेमांथी पंदर भाग जेटलो चंद्र (कृष्णपक्षमां) हानि पामे छे, (शुक्लपक्षमा) तेनी ज्योत्स्ना (कांति) तेटला(पंदर) भाग जेटली वृद्धि पामे छे." अहीं कोई शंका करे के-चंद्रनुं विमान एक योजनमांथी एकसठीया पांच भाग ओछा करीए तेटला (१६) प्रमाणवालं छे, अने राहुनु विमान ग्रहविमान होवाथी अर्ध योजनना प्रमाणवालं छे, तेथी पंदर दिवसे करीने मोटा चंद्रविमानने नानुं राहुविमान शी रीते सर्व आवरण करी शके ? आ शंकानो जवाव आपे छ के-जे आ ग्रहविमानोनुं अर्ध योजनप्रमाण कयुं छे ते प्राये करीने कर्तुं छे, तेथी राहुग्रहनुं विमान योजनप्रमाणवालं पण संभवे छे. अथवा राहुनुं विमान ?

समवाय
१५ ॥
श्री
समवायाङ्ग
सूत्र॥
चोधु अंग
॥ ५९॥
जे कुंभादिकने विषे तेओने पकावे छे ते कुंभ नामनो छे ११, 'वालत्ति'--जे कदवना पुष्प सरखा लालचोल आकारवाळी
अने वजना जेवी तथा तपावेली वैक्रिय चालकाने विषे चणानी जेम तेओने पकावे ( शेके ) छे ते वालुका नामनो छ १२,
'वेयरणी इय त्ति'--वैतरणी एवा नामनो परमाधार्मिक छ, ते अत्यंत तपाववाथी उकळता एवा परु, रुधिर,
सीसु, तांबु विगेरेना रसवडे भरेली तथा जेनुं प्रयोजन सामे पूरे तरवार्नु छे एवी यथार्थ नामवाळी वैतरणी नदीने
विकुर्वीने तेमां ते नारकीओने तराववावडे कदर्थना पमाडे छे १३, 'खरस्सरे त्ति'-जे वज्रना कांटावाळा शाल्मली
वृक्ष उपर नारकीने चडावीने पछी कठोर शब्द करता एवा तेने अथवा पोते कठोर शब्द करतो सतो तेने खेंचे छे ते
खरस्वर नामनो छ १४, 'महाघोस त्ति'-जे भय पामेला अने नाशी जता एवा नारकीओने पशुनी जेम मोटो घोष
करवा पूर्वक वाडामा रुंधे छे ते महाघोप नामनो छे १५, 'एवमेव (एते ) पन्नरसाहिय त्ति'-' एवं ' एटले अंब
विगेरे क्रमवडे आ परमाधार्मिको जिनेश्वरे पंदर कह्या छे (१)।
धुवराहू णं'-राहु वे प्रकारनो होय छे-एक पर्वराहु अने वीजो ध्रुवराहु. तेमा जे पर्वने विपे एटले पूर्णिमा के
अमावास्याने विपे चंद्र के सूर्यनो उपराग (ग्रहण) करे ते पर्वराहु कहेवाय छे, अने जे हमेशां चंद्रनी समीपे चाले छे ते
ध्रुवराहु कहेवाय छे. ते विषे कह्यु छ के-" काळं राहुनु विमान हमेशां चंद्रनी साथे ( नीचे ) रहेलं होय छे, ते चंद्रनी
नीचे चार अंगुल छेटुं चाले छे." तेथी आ ध्रुवराहु कहेवाय छे. 'णं' शब्द वाक्यना अलंकार माटे छे. बहुलपक्ष-
(कृष्णपक्ष ) नो अर्थ प्रसिद्ध छे, तेना 'पाडिवयं ति'-प्रतिपदा एटले एकमनी तिथिने आदि करीने '-आरंभीने
.
.
॥ ५९॥

जेओ पहली त्रण नारक पृथ्वीने विपे नारकीओनी कदर्थना करे छे. तेमना नाम कहेवा माटे वे गाथाओ मूळमां आपी छे. आ परमाधार्मिको जुदा जुदा व्यापारने लीधे पंदर जातिना होय छे. तेमां ' अंवे त्ति'-जे परमाधार्मिक देव नारकीओने हणे छे, पाडी दे छे, बांधे छ अने उपाडीने आकाशमां फेंके छे ते अंब नामनो कहेवाय छ १, 'अंबरिसी चेव त्ति' जे परमाधार्मिक ( अंवे) हणेला नारकीओने शत्रपडे कफडा करीने कडाइमां मुंजवा (शेकवा) योग्य करे छे, ते अंपरिपी नामनो छे २, 'सामे त्ति 'सामे त्ति'-जे दोरडा अने हस्तना महारादिकवडे शातन, पातन विगेरे करे छे अने जे वर्णथी पण काळो छे ते श्याम नामनो छे ३, 'सयले त्ति यावरे त्ति'---वळी चीजो शवल नामनो परमाधार्मिक छे, ते आंतरडा, चरबी, हदय, काळजु विगैरेने उसेडी नांखे छे, तथा वर्णवढे पण शवलकर एटले कावरचितरो छ ४, 'रुद्दोवरुद्दे त्ति' जे शक्ति अने भाला विगेरे शस्रोने विपे नारकीओने परोवे छे ते रौद्र-भयंकर होचाथी रौद्र नामनो छ ५, वळी जे तेओना (नारकीओना) अंगोपांगने भांगी नांखे छे ते अत्यंत रौद्र होवाथी उपरौद्र एवा नामनो छ ६, 'काले त्ति'-जे कडाइ विगेरेमा ( नारकीओने ) रांधे छे तथा जे वर्णवडे पण काळो छे ते काल नामनो छे ७, वळी त्यारपछी चीजो महाकाळ नामनो परमाधार्मिक छे, ते (तेना) चीकणा मांसना ककडा करीने (तेने ज) खवरावे छे, तथा ते वर्णथी पण अति काळो छ ८, 'असिपत्ते त्ति'-असि एटले खड्न, तेना आकारवाळा पांदडांओवालं वन विकुर्वीने ते वनमां आवेला नारकीओना असिपत्रोने पाडवावडे तल तल जेटला ककडा करे छे, ते असिपत्र नामनो छे ९, 'धणु त्ति'-जे धनुपथी भूकेला अर्धचद्रादिक पाणीवडे तेमना कर्णादिक अंगोनुं छेदन-भेदन विगैरे करे छे ते धनु नामे छे १०, 'कुंभे त्ति -- 118111

समवाय
१५ ॥
श्री
समवायाङ्ग
सूत्र॥
चोथु अंग
॥५८॥
त्यामृषा मनप्रयोग, सत्य वचनप्रयोग, मृषा वचनप्रयोग, सत्यमृषा वचनप्रयोग, असत्यामृपा वचनप्रयोग, औदारिक
शरीर कायप्रयोग, औदारिकमिश्रशरीर कायप्रयोग, वैक्रियशरीर कायप्रयोग, वैक्रियमिश्रशरीर कायप्रयोग, आहारकशरीर
कायप्रयोग, आहारकमिश्रशरीर कायप्रयोग, कार्मणशरीर कायप्रयोग (८)॥
आ रत्नप्रभा पृथ्वीने विषे केटलाक नारकीओनी पंदर पल्योपमनी स्थिति कही छे (१)। पांचमी पृथ्वीने विपे केटलाक
नारकीओनी पंदर सागरोपमनी स्थिति कही छे (२)। केटलाक असुरकुमार देवोनी पंदर पल्योपमनी स्थिति कहेली छे (३)।
सौधर्म अने ईशान कल्पने विपे केटलाक देवोनी पंदर पल्योपमनी स्थिति कही छे (४)। महाशुक्र कल्पने विपे केटलाक
देवोनी पंदर सागरोपमनी स्थिति कही छे (५) जे देवो नंद, सुनंद, नंदावत, नंदप्रभ, नंदाकांत, नंदवर्ण, नंदलेश्य,
नंदध्वज, नंदभृग, नंदसृष्ट, नंदकूट, नंदोत्तरावतंसक विमानने विपे देवपणे उत्पन्न थया होय छे ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति
पंदर सागरोपमनी कही छे (६)।
ते देवो पंदर अर्धमासे ( पखवाडीए ) आन ले छे, प्राण ले छ, एटले उच्छ्वास ले छे, निश्वास ले छे (१)। ते देवोने
पंदर हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२)। एवा केटलाक भवसिद्धिक जीवो छे के जेओ पंदर भवने ग्रहण
करवावडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे, परिनिर्वाण पामशे, अर्थात् सर्व दुःखनो अंत करशे (३)।
टीकार्थ-आ पंदरमुं स्थान सुगम छे तो पण ते विपे कांइक लखाय छे.--अहीं स्थितिना सूत्रोनी पहेलो सात सूत्रोछे.
तेमां परम-मोटा एवा अधार्मिक, ते संक्लिष्ट परिणामवाळा होवाथी परमाधार्मिक कहेवाय छे, ते एक जातना असुर छे, के
॥५८॥

मूलार्थ-पदर परमाधार्मिक कह्या छे, ते आ प्रमाणे--अंव, अंबरिपी, श्याम, शवल, वळी वीजा रौद्र, उपरौद्र, काल, तथा वीजो महाकाल, असिपत्र, धनु, कुंभ, वालुक, वैतरणी, खरस्वर अने महाघोप ए पंदर कह्या छ (१)। श्रीनमि नामना अर्हन् पंदर धनुप् प्रमाण ऊंचा हता (२)। ध्रुव राहु कृष्णपक्षनी प्रतिपदाने आरभीने दररोज चंद्रनी लेश्या( कळा )नो पंदरमो पंदरमो भाग आवरीने (दवावीने) रहे छे, ते आ प्रमाणे-एकमनी तिथिए एक पंदरमा भागने (आवरे छे ), चीजने दिवसे वे भाग, त्रीजने दिवसे त्रण भाग, चोथने दिवसे चार भाग, पांचमे पांच भाग, छहने रोज छ भाग, सातमे सात भाग, आठमे आठ भाग, नवमीए नव भाग, दशमीए दश भाग, अग्यारशे अग्यार भाग, चारशे वार भाग, तेरशे भाग, चौदशे चौद भाग अने पंदरसीए एटले अमावास्याए पंदर भागने आवरीने रहे छे (३)। तथा शुक्लपक्षमा ते ज पंदरीया एक एक भागने देखाडतो देखाडतो ( आवरण रहित करतो) रहे छे, ते आ प्रमाणे--प्रतिपदाए पंदरीया एक भागने देखाडे छे (बीजने दिवसे वे भाग देखाडे छे ) यावत् पूर्णिमाने रोज पंदरे भागने देखाडे छ (खुल्ला करे छे) ( ४ ) । छ नक्षत्रो पंदर मुहर्त्तवाळा कया छे, ते आ प्रमाणे-शतभिपक, भरणि, आर्द्रा, अश्लेषा, स्वाति तथा ज्येष्ठा, आ छ नक्षत्रो पंदर मुहूत्र्तवडे संयुक्त होय छे (एटले चंद्र साथे पंदर मुहर्त योगवाळा रहे छ ) (५)। चैत्र अने आश्विन मासमा पंदर मुहर्त( ३० घडी पळो दिवस होय छे, अने ए ज प्रमाणे चैत्र अने आश्विन मासमां पंदर मुहर्त्तवाळी गत्रि होय छे (६)। विद्यानुप्रवाद नामना पूर्वमां पंदर वस्तु ( अध्ययननी जेवा विभाग ) कहेल छे (७)। मनुष्यने पंदर प्रकारना प्रयोग (योग-व्यापार ) कहेला छे, ते आ प्रमाणे--सत्य मनप्रयोग, मृपा मनप्रयोग, सत्यमृपा मनप्रयोग, अस-

समवाय
१५॥
श्री
समवायाङ्ग
चोयुं अंग
॥ ५७॥
इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइआणं नेरइआणं पण्णरस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता
१ । पंचमीए पुढवीए अत्थेगइआणं नेरइयाणं पण्णरस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । असुरकु-
माराणं देवाणं अत्थेगइयाणं पण्णरस पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ३ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु
अत्थेगइआणं देवाणं पण्णरस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । महासुक्के कप्पे अत्थगइआणं देवाणं
पण्णरस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ५ । जे देवा गंदं सुणंदं गंदावत्तं गंदप्पभं गंदकंतं गंदवण्णं
णंदलेसं गंदज्झयं गंदसिंगं गंदसिटुं णंदकूडं पंदुत्तरवर्डिसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं
देवाणं उक्कोसेणं पण्णरस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ ॥
ते णं देवा पण्णरसण्हं अद्धमासाणं आणमंति वा पाणमति वा उस्ससंति वा नीससंति वा
१ । तेसि णं देवाणं पण्णरसहि वाससहस्सेहिं आहारटे समुप्पजइ २ । संतेगइआ भवसिद्धिआ
जीवा जे पन्नरसहिं भवग्गणहिँ सिज्झिस्संति बुज्झिस्संति मुच्चिस्संति परिनिवाइस्संति सबदुक्खा-
णमंतं करिस्संति ३ । सूत्रं-१५ ॥
॥५७॥

ह
पंचमीए पंचभागं छट्ठीए छभागं सत्तमीए सत्तभागं अट्ठमीए अट्ठभागं नवमीए नवभागं दसमीए
दसभागं एकारसीए एकारसभागं बारसीए बारसभागं तेरसीए तेरसभागं चउद्दसीए चउद्दसभागं ।
पन्नरसेसु पन्नरसभागं ३ । तं चेव सुकपक्खस्स य उवदंसेमाणे चिट्ठति, तं जहा-पढमाए पढमं
भागं जाव पन्नरसेसु पन्नरसभागं ४। छ णक्खत्ता पन्नरसमुहुत्तसंजुत्ता पन्नत्ता, तं जहा-सताभ-
सय भरणि अद्दा असलेसा साई तहा जेट्ठा । एते छण्णक्खत्ता पन्नरममुहुत्तसंजुत्ता ॥१॥ ५।
चेत्तासोएसु णं मासेसु पन्नरसमुहत्तो दिवसो भवति, एवं चेत्तासोएसु णं मासेसु पन्नरसमुहुत्ता
राई भवति ६ । विजाअणुप्पवायस्स णं पुवस्स पन्नरस वत्थू पण्णत्ता ७। मणुसाणं पण्णरस-
विहे पओगे पन्नत्ता, तं जहा-सच्चमणपओगे मोसमणपओगे सच्चमोसमणपओगे असञ्चामोसम-
णपओगे सच्चवइपओगे मोसवइपओगे सच्चमोसवइपओगे असच्चामोसवइपओगे ओरालिअसरीर-
कायपओगे ओरालिअमीससरीरकायपओगे वेउवियसरीरकायपओगे वेउवियमीससरीरकायप-
ओगे आहारयसरीरकायपओगे आहारयमीससरीरकायप्पओगे कम्मयसरीरकायपओगे ॥ ८॥

श्री समवायाङ्ग समवाय १५॥ चोधु अंग आवा चातुरंत जे चक्रवर्ती ते चातुरंतचक्रवर्ती कहेवाय छे एवो समासनो विग्रह करवो. तेना रत्नो एटले पोतपोतानी जातिमा उत्कृष्टपणाने पामेली वस्तु, कमु छ के-" जाति जातिने विषे जे उत्कृष्ट वस्तु होय ते रत्न कहेवाय छे.". गाहावह त्ति' गृहपति एटले कोठारी, 'पुरोहिय त्ति'-पुरोहित एटले शांतिकर्म विगेरे क्रियाने करनार, 'वड्डइ त्ति' वर्धकि एटले स्थ, मकान, छावणी विगेरे बनावनार, मणि एटले पृथ्वीनो विकार विशेष, काकिणी एटले सुवर्णमय अधिकरणी ( एरण )ना संस्थानवाळी होय छे. (बाकीना रत्नोना अर्थ स्वयमेव जाणी लेवा). आ चौद रत्नमां पहेला सात पंचेंद्रिय अने वीजा सात एकेंद्रिय छे (७) श्रीकांत विगेरे आठ विमानोनां नाम छे (७) ।। इति सूत्र-१४॥ हवे पंदर स्थानक कहे छे:- मू०-पन्नरस परमाहम्मिआ पन्नत्ता, तं जहा-अंबे अंबरिसी चेव, सामे सबले त्ति आवरे । रुद्दोवरुद्द काले अ, महाकाले ति आवरे ॥१॥ असिपत्ते धणु कुंभे, वालए वेअरणीति अ। खरस्सरे महाघोले, एते पन्नरसाहिआ ॥२॥ १। णमी णं अरहा पन्नरस धणूई उई उच्चत्तेणं होत्था २ । धुवराहू णं बहुलपक्खस्स पडिवए पन्नरसभागं पन्नरसभागेणं चंदस्स लेसं आवरेत्ताणं चिट्ठति, तं जहा-पढमाए पढमं भागं बीआए दुभागं तइआए तिभागं चउत्थीए चउभागं m एटले कपाय जेने होय ते सूक्ष्मसंपराय एटले लोभना छेल्ला परमाणुओने वेदनार कहेवाय छे. आ (सूक्ष्मसंपराय ) बे प्रकारनो छे, ते कहे छे-उपशमक एटले उपशमश्रेणिने पामेलो अथवा क्षपक एटले क्षपकश्रेणिने पामेलो. आ दशमुं जीवस्थान कयु १०, तथा जेने मोह एटले मोहनीय कर्म उपशांत छे एटले सर्वथा उदयावस्थाने पामेल नथी ते उपशांत- मोह एटले उपशमवीतराग कहेवाय छे. आ उपशमश्रेणिनी समाप्तिने वखते ११ मे गुणठाणे जीव एक अंतर्मुहर्त सुधी होय छे. त्यारपछी अवश्य त्यांथी पडे ज छे ११, तथा जेनो मोह सर्वथा क्षीण थयो छे एटले सत्तामा पण रह्यो नथी ते क्षीणमोह एटले क्षीणमोहवीतराग कहेवाय छे, आ गुणस्थान पण एक अंतर्मुहूर्त सुधी ज होय छे (त्यारपछी तरत उपरना गुणस्था- नके चडे छे) १२, तथा सयोगी केवळी एटले मन विगेरेना व्यापारवाळा केवळज्ञानी १३, तथा अयोगी केवळी एटले मन विगेरे योगना व्यापार जेणे रुंध्या छे एवा शैलेशीकरणने पामेला मात्र पांच इस्व अक्षरना उच्चार जेटला काळ सुधी ज रहेनार, ए चौदमुं जीव (गुण)स्थान छे. १४. (५)। 'भरहे'-भरत अने ऐरवतनी जीवा. अहीं भरत अने ऐरवत-एबे क्षेत्र प्रत्यंचा चडावेला धनुपने आकारे रहेला छे, तेथी तेमनी जीवा (प्रत्यंचा) होइ शके छे. तेमां हिमवान पर्वतनी आ तरफनी ( दक्षिण तरफनी) आंतरा रहित (छेल्ली) प्रदेशनी जे श्रेणि ते भरतनी जीवा कहेवाय छे, अने शिखरी पर्वतनी पेली वाजुनी जे आंतरा रहित प्रदेशनी श्रेणि ते ऐरवतक्षेत्रनी जीवा कहेवाय छे. (६)।' चाउरंतचक्कवहिस्स त्ति' चार अंत एटले विभाग छ जे पृथ्वीने विपे ते चतुरंत भूमि कहेवाय छे. तेने विपे जे स्वामीपणे थयेला ते चातुरंत कहेवाय छे. १. चार दिशाना अंत सुधीना ते क्षेत्रना स्वामी.

समनाम
१४ ॥
भी
समवायाङ्ग
॥
चो अंग
॥५५॥
तेनो स्वाद रहे छे, ते विषे शास्त्रमा कयुं छे के-"कोइ जीव उपशम सम्यक्त्वथकी पडयो अने हजु मिथ्यात्वने पाम्यो
नथी, तेनी वच्चेना भागमा छ आवलिका सुधी सास्वादन सम्यक्त्व होय छे." आवा आस्वाद सहित जे सम्यग्दृष्टि ते
सास्वादन सम्यग्दृष्टि कहेवाय छे एम ( कर्मधारय समासनो) विग्रह करवो २, 'सम्मामिच्छदिहि त्ति' जेनी दृष्टि
सम्यक् अने मिथ्या छे ते सम्यग्मिथ्यादृष्टि कहेवाय छे एटले के जेने अमुक प्रकारचें दर्शनमोहनीय कर्म उदयमां आव्यु
होय ते ३, तथा अविरत सम्यग्दृष्टि एटले देशविरति रहित ( एकलो सम्यग्दृष्टि ) ४, तथा विरताविरत एटले देशवि-
रतिवाळो अर्थात् श्रावक ५, तथा प्रमत्तसंयत एटले कांइक प्रमादी सर्वविरतिवाळो ( साधु ) ६, तथा अप्रमत्तसंयत एटले
सर्वथा प्रमाद रहित एवो ते ज ( सर्वविरतिवाळो साधु ), तथा 'नियट्टी' अहीं क्षपकश्रेणिने के उपशमश्रेणिने पामेली
जीव के जेना दर्शनसप्तक क्षीण थया होय अथवा जेना दर्शनसप्तक उपशांत थया होय ते निवृत्तिवादर कहेवाय छे. तेमां
निवृत्ति एटले जे गुणस्थानकने समकाळे (एकी साथे ) पामेला जीवोना अध्यवसायनो भेद (विशेष प्रकारनो अध्यवसाय)
जेमा प्रधान (मुख्य ) होय एवो जे बादर एटले बादर संपरायवालो ते निवृत्तिबादर कहेवाय छे ८, तथा 'अणियटि-
बायरे त्ति' अनिवृत्तिवादर, आ (गुणस्थानवाळो ) आठ कपाय खपाववानो के उपशमाववानो आरंभ करे त्यारथी अने
नपुंसकवेदना क्षयनो के उपशमनो आरंभ करे त्यारथी आरंभीने (लइने) बादर लोभना खंडने खपावे अथवा उपशमावे
त्यां सुधी होय छे ९, तथा 'सुहुम संपराए त्ति' सूक्ष्म एटले संज्वलन लोभनो असंख्यातमो अंश, तेवो सूक्ष्मसंपराय
१. दर्शन मोहनीयनी सात प्रकृति.
॥ १५ ॥

8 ~~ - जेमा अनेक प्रकारनी विद्याना अतिशयो वर्णन करायेल छे ते विद्यानुप्रवाद (१०) पूर्व छ, 'अवंझ पाणाउ बारसं । पुव्वं ' जेमां सम्यग् ज्ञानादिक अवंध्य-सफळ एवा वर्णन करायेल छे ते अवंध्य नामर्नु अग्यारसु (११) पूर्व छे, जेमां प्राण एटले जीव अने तेना आयुष्य अनेक प्रकारे वर्णन करायेल छे ते प्राणायु नामर्नु बारमुं ( १२ ) पूर्व छे, 'तत्तो किरियविसालं '-त्यारपछी जेमां विशाळ एटले विस्तीर्ण एवी कायिकी विगेरे २५ क्रियाओ भेद सहित कहेवामां आवेल छे ते क्रियाविशाळ नामनुं तेरमुं (१३) पूर्व छ, तथा ' पुव्वं तह बिंदुसारं च '-अहीं 'लोक' ए शन्दनो लोप कयों छे एम जाणवू. तेथी अक्षरना विदुनी जेम (अनुस्वार जेम अक्षरने माथे होय छे तेम) लोकना सारभूत एटले सर्वोत्तम जे छे ते लोकबिंदुसार नामर्नु चौदमुं (१४) पूर्व छे. (२) । तथा 'चोद्दस वत्थूणि त्ति'-वीजा पूर्वने विषे जे वस्तु एटले विभाग विशेष छ ते चौद मूळ वस्तु छे, परतु चूलावस्तु तो बार छे (३)। तथा 'साहस्सिओ'-सहस्रो जे तेज साहस्य एटले हजार कहेवाय छे (४) । तथा ' कम्मविसोही'-कर्मविशोधि मार्गणाने एटले ज्ञानावरणादि कर्मविशु- द्धिनी गवेपणाने आश्रीने जीवना (गुण )स्थानको चौद कहेला छे, ते आ प्रमाणे-जेनी दृष्टि मिथ्या एटले विपरीत होय ते मिथ्यादृष्टि कहेवाय छे एटले के जेने उदयमां आवेलुं अमुक प्रकारचें मिथ्यात्व मोहनीय कर्म उदयमां होय ते १, तथा सासायणसम्मदिहि त्ति' काइक ( जराक ) तत्त्वश्रद्धाना रसना आस्वाद सहित जे होय छे ते सास्वादन कहेवाय छे. अही घंटालोलाना न्याये करीने उपशम सम्यक्त्वनो त्याग करेलो होय छे, ते त्याग कर्या पछी छ आवलिका सुधी १. अनतानुबंधी कपायना उदयथी उपशम समकितने वमी नाखवु, एटले खाधेल वस्तु वमता तेनो स्वाद प्रथम खातां आवेलो तेवो फरीने गळामां आवे ते घंटालाला न्याय समजवो.

1104
समवाय
१४॥
श्री
समवायाङ्ग
सत्र ॥
चोथु अंग
॥५४॥
परिपूर्ण न थइ होय तेवा, आ एक ग्राम-समूह थयो. ए ज प्रमाणे आ सूक्ष्म पर्याप्ता एटले ते ज प्रमाणे (पर्याप्त नाम
कर्मना उदयने लीधे ) पोतानी पर्याप्ति परिपूर्ण थइ होय तेवा, आ बीजो ग्राम थयो. ए ज प्रमाणे बादर एटले बादर नाम-
कर्मना उदयने लीधे बादर एवा पृथ्व्यादि एकेंद्रियो, ते पण पर्याप्त अने अपर्याप्त भेदने लीधे वे प्रकारना जाणवा. एज प्रमाणे
द्वींद्रियादिक पण जाणवा. विशेष ए के-पंचेंद्रिय बे प्रकारना छे, एक संज्ञी एटले मनपर्याप्ति सहित अने वीजा असंज्ञी एटले
मनपर्याप्ति रहित (१) तथा 'उप्पायपुवे' इत्यादिक त्रण गाथा छे. तेमां प्रथम उत्पादपूर्व एटले जेमां उत्पत्तिने आश्रीने
द्रव्यो तथा पर्यायोनी प्ररूपणा करी छे ते उत्पाद पूर्व कहेवाय छे, जेमां ते द्रव्यादिकना ज अग्र एटले परिमाणने आश्रीने
तेनी प्ररूपणा करी छे ते अग्राणीय पूर्व कहेवाय छे, 'तइयं च वीरियं पुव्वं'-जेमां जीवादिकनुं वीर्य कहेवामां आवेल छ
ते वीर्यप्रवाद नामर्नु त्रीशुं पूर्व छ, 'अत्थीनत्थिपवाय'-जे (वस्तु) जे प्रकारे लोकमां छे अने जे वस्तु जे प्रकारे लोकमां
नथी, ते ( वस्तु) ते प्रमाणे जेमां कही छे ते अस्तिनास्तिप्रवाद नामर्नु (४) पूर्व छ, 'तत्तो नाणप्पवायं च'-जेमां
मत्यादिक ज्ञान तेना स्वरूप अने भेदो विगेरे सहित कहेवामां आवेल छे ते ज्ञानप्रवाद (५)पूर्व छे, 'सचप्पवायपुव्वं' जेमां
सत्य एटले संयम अथवा सत्य वचन भेद सहित अने प्रतिपक्ष सहित कहेवामां आवेल छे ते सत्यप्रवाद (६) पूर्व छ,
त्यारपछी 'आयप्पवायपुव्वं 'जेमा आत्मा एटले जीव अनेक नयोवडे कहेवामां आवेल छे ते आत्मप्रवाद (७)
पूर्व छे, जेमां ज्ञानावरणादिक कर्मोनुं स्वरूप कहेवामां आवेल छे ते कर्मप्रवाद (८) पूर्व छ, 'पञ्चक्खाणं भवे नवम'
जेमा प्रत्याख्याननुं स्वरूप वर्णन करेल छे ते प्रत्याख्यानप्रवाद नामर्नु नवमुं (९) पूर्व छ, 'विजाअणुप्पवायं
-
॥५४॥

समुद्रने मळे छे, ते आ प्रमाणे-गंगा, सिंधु, रोहिता, रोहिताशा, हरी, हरिकांता, सीता, सीतोदा, नरकांता, नारीकांता, सुवर्णकूला, रुप्यकूला, रक्ता, रक्तवती (८)। आ रत्नप्रभा नामनी नरकपृथ्वीनेविपे केटलाक नारकीओनी चौद पल्योपमनी स्थिति कही छे (१)। पांचमी पृथ्वीने विपे केटलाक नारकीओनी चौद सागरोपमनी स्थिति कही छे (२)। केटलाक असुरकुमार देवोनी चौद पल्यो. पमनी स्थिति कही छे ( ३)। सौधर्म अने ईशान कल्पने विपे केटलाफ देवोनी चौद पल्योपमनी स्थिति कही छ (४)। लांतक कल्पने विपे देवोनी चौद मागरोपमनी उत्कृष्ट स्थिति कही छे (५)। महाशुक्र कल्पने विपे देवोनी जघन्य स्थिति चौद सागरोपमनी कही छे (६)। जे देवो श्रीकांत, श्रीमहित, श्रीसौमनम, लांतक, कापिठ, महेंद्र, महेंद्रकांत, महेंद्रो- त्तरावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय, ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति चौद सागरोपमनी कही छे (७)। ते देवो चौद अर्धमासे ( पखवाडीए ) आन ले छे प्राण ले छे, एटले उच्छ्वास ले छे, निःश्वास ले छ (१)। ते देवोने चौद हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२) एवा केटलाएक भवसिद्धिक जीवो छे के जेओ चौद भवने ग्रहण करवावडे सिद्ध धशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे, परिनिर्वाण पामशे अर्थात् सर्व दुःखनो अंत करशे ( ३ ) । टीका-चाँद स्थानकनु सूत्र सुगम छे. विशेप ए के अहीं स्थितिना सूत्रोनी पहेलां प्रथम आठ सूत्रो छे. तेमां चौद 'भूतग्राम-भूतो एटले जीवो, तेना ग्राम एटले समूहो, ते भूतग्राम कहेवाय छे. तेमां सूक्ष्म एटले सूक्ष्म नामकर्मना उदयमां वर्तवापणुं होवाथी पृथ्व्यादि एकेंद्रियो, ते केवा के अपर्याप्ता एटले के अपर्याप्त नामकर्मना उदयने लीधे पोतानी पर्याप्ति I

श्री
समवाय
१४ ॥
झमवायाङ्ग
सत्र ॥
बोधु अंग
॥५३॥
मूलार्थः-चौद प्रकारना भूतग्राम ( जीवना समूह ) कह्या छे, ते आ प्रमाणे-सूक्ष्म अपर्याप्ता, सूक्ष्म पर्याप्ता, वादर
अपर्याप्ता, बादर पर्याप्ता, द्वींद्रिय अपर्याप्ता, द्वींद्रिय पर्याप्ता, त्रींद्रिय अपर्याप्ता, त्रींद्रिय पर्याप्ता, चतुरिंद्रिय अपर्याप्ता,
चतुरिंद्रिय पर्याप्ता, पंचेंद्रिय असंज्ञी अपर्याप्ता, पंचेंद्रिय असंज्ञी पर्याप्ता, पंचेंद्रिय संज्ञी अपर्याप्ता, पंचेंद्रिय संज्ञी पर्याप्ता (१)।
चौद पूर्व कह्या छे, ते आ प्रमाणे-उत्पाद पूर्व, अग्राणीय, त्रीनुं वीर्यप्रवाद पूर्व, अस्तिनास्तिप्रवाद, त्यार पछी ज्ञानप्रवाद,
सत्यप्रवाद पूर्व, त्यार पछी आत्मप्रवाद पूर्व, कर्मप्रवाद पूर्व, प्रत्याख्यानप्रवाद नवमुं छे, विद्यानुप्रवाद पूर्व, अवंध्यप्रवाद
पूर्व, बारमुं प्राणायु पूर्व, त्यारपछी क्रियाविशाल पूर्व, तथा विदुसार पूर्व (२)। अग्राणीय पूर्वने विषे चौद वस्तु (अध्ययन
जेवा विभागो) कहेल छे (३)। श्रमण भगवान महावीरस्वामीने उत्कृष्ट चौद हजार श्रमणसंपदा हती (४)। कर्मविशोधि
मार्गणाने आश्रीने चौद जीवस्थानो (गुणस्थानको) कह्या छे, ते आप्रमाणे-मिथ्यादृष्टि, सास्वादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्या-
दृष्टि, अविरत सम्यग्दृष्टि, विरताविरत (देशविरत), प्रमत्त संयत, अप्रमत्त संयत, निवृत्ति बादर, अनिवृत्ति बादर, सूक्ष्म-
संपराय उपशामक अथवा क्षपक, उपशांत मोह, क्षीणमोह, सयोगीकेवळी अने अयोगीकेवळी (५)। भरत अने ऐवत क्षेत्रनी
जीवानो आयाम (लंबाइ) चौद चौद हजार चार सो ने एकोतेर योजन तथा एक योजनना ओगणीशीया छ भाग छ (६)।
एक एक चातुरंत (चारे दिशाना अंत सुधी) चक्रवर्ती राजाना चौद रत्नो कहेला छे, ते आ प्रमाणे-स्त्री रत्न, सेनापति
रत्न, गाथापति रत्न, पुरोहित रत्न, वार्धकि (इजनेर) रत्न, अश्व रत्न, हस्ती रत्न, खड्ग रत्न, दंड रत्न, चक्र रत्न, छत्र
रत्न, चर्म रत्न, मणि रत्न, काकिणी रत्न (७)। जबूंद्वीप नामना द्वीपने विषे चौद मोटी नदीओ पूर्व-पश्चिम लवण-
॥५३॥

है इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं चउदस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता १ । पंचमीए णं पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं चउद्दस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । असुरकु- माराणं देवाणं अत्थेगइयाणं चउद्दस पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ३ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं चउद्दस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४। लंतए कप्पे देवाणं उकोसेणं चउद्दस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ५ । महासुके कप्पे देवाणं जहणणेणं चउद्दस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ । जे देवा सिरिकंतं सिरिमहिअं सिरिसोमनसं लंतयं काविट्ठ महिंदं महिंदकंतं महिंदुत्तरव- डिंसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं देवाणं उक्कोसेणं चउद्दस सागरोवमाइंठिई पन्नत्ता ७॥ ते णं देवा चउद्दसहिं अद्धमासेहिं आणमंति वा पाणमति वा उस्ससंति वा नीससंति वा १ । तेसि णं देवाणं चउद्दसहिं वाससहस्सहिं आहारट्टे समुप्पज्जइ २ । संतेगइया भवसिद्धिआ जीवा जे चउद्दसहिं भवग्गहणहि सिज्झिस्संति बुझिस्संति मुच्चिस्संति परिनिवाइस्संति सबदु- क्खाणमंतं करिस्संति ३॥ सूत्रम्-१४ ॥

समवाय
श्री
समवायाङ्ग
सूत्र ॥
चोथु अंग
॥५२॥
अग्गेणीअस्स णं पुवस्स चउद्दस वत्थू पन्नत्ता ३। समणस्स णं भगवओ महावीरस्स चउद्दस
समणसाहस्सीओ उक्कोसिआ समणसंपया होत्था ४ । कम्मविसोहिमग्गणं पडुच्च चउदस जीव-
ट्ठाणा पन्नत्ता, तं जहा-मिच्छदिट्ठी सासायणसम्मदिट्ठी सम्मामिच्छदिट्ठी अविरयसम्मपिट्ठी
विरयाविरए पमत्तसंजए अप्पमत्तसंजए निअट्टिबायरे अनियटिबायरे सुहुमसंपराए उवसामए
वा खवए वा उवसंतमोहे खीणमोहे सजोगीकेवली अयोगीकेवली ५ । भरहेरवयाओ णं
जीवाओ चउद्दस चउद्दस जोयणसहस्साइं चत्तारि अ एगुत्तरे जोयणसए छच्च एगूणवीसे भागे
जोयणस्स आयामेणं पन्नत्ता ६ । एगमेगस्स णं रन्नो चाउरंतचकवहिस्स चउद्दस रयणा पन्नत्ता,
तं जहा-इत्थीरयणे सेणावइरयणे गाहावइरयणे पुरोहियरयणे बढइरयणे आसरयणे हत्थिरयणे
असिरयणे दंडरयणे चकरयणे छत्तरयणे चम्मरयणे मणिरयणे कागिणिरयणे ७। जंबुद्दीवे णं दीवे
चउद्दस महानईओ पुत्वावरेण लवणसमुदं समप्पति, तं जहा-गंगा सिंधू रोहिआ रोहिअंसा, हरी
हरिकंता सीआ सीओदा नरकंता नारिकांता सुवण्णकूला रुप्पकूला रत्ता रत्तवई ८॥
॥५२॥

- भाग ( गोळाकार ) तेनुं एक योजन, ते सूर्यमंडळ-योजन कहेवाय छे. ' णं' शब्द वाक्यना अलंकार माटे छे. जेना एकसठ भागे करीने एक योजन थाय अर्थात् एक योजनना अडसठ भाग करवा, तेमांधी तेर भाग ओछा करीए तेटलं एटले एकसठीया अडताळीश भाग जेटलं ते सूर्यमंडळ छे (८)॥ वजना नामथी चार, वइरना नामधी अग्यार अने लोकना नामधी पण अग्यार एम चोत्रीश विमानना नामो कयां छ (६)। सूत्र-१३॥ हवे चौद स्थानक कह छ- मू०--चउद्दस भूअग्गामा पन्नत्ता, त जहा-सुहुमा अपज्जत्तआ सुहुमा पजत्तया बादरा अपज्जत्तया वादरा पज्जत्तया वेइंदिया अपजत्तया वेइंदिया पज्जत्तया तेंदिया अपज्जत्तया तेंदिया पज्जत्तया चउरिदिआ अपज्जत्तया चउरिदिया पज्जत्तया पंचिंदिआ असन्निअपज्जत्तया पंचिंदिया असन्निपज्जत्तया पंचिंदिआ सन्निअपजत्तया पंचिंदिया सन्निपज्जत्तया १ । चउद्स पुवा पन्नत्ता, तं जहा-उप्पायपुव्वमग्गेणियं च तइयं च वीरियं पुव्वं । अत्थीनत्थि पवायं तत्तो नाणप्पवायं च ॥ १॥ सच्चप्पवायपुव्वं तत्तो आयप्पवायपुव्वं च । कम्मप्पवायपुव्वं पञ्चक्खाणं भवे नवमं ॥ २ ॥ विजाअणुप्पवायं अवंझ पाणाउ बारसं पुव्वं । तत्तो किरियविसालं पुढं तह विंदुसारं च ॥३॥२।

श्री
समवाय
समवायाम
-
चोयुं अंग
॥५१॥
4
लोक अर्धचंद्रने आकारे रहेलो छे, ते पूर्व-पश्चिम लांबो अने दक्षिण-उत्तर पहोळो छे, तेना मध्य भागे तेरमा पाथडामां शक्रना
निवासभूत विमान छे, ते सौधर्मदेवलोकनो अवतंसक एटले मुकुटनी जेम प्रधान-मुख्य होवाथी सौधर्मावतंसक एवा सार्थक
नामवालं छे. अहीं'णं' शब्द वाक्यना अलंकार माटे छे. ते विमान जेने विपे तेरमुं अर्ध छे ते अर्धत्रयोदश कहेवाय छे
एटला लाख योजन एटले साडाबार लाख योजन आयाम-विष्कंभवाल्लं कहेलं छे ( तेवू ज तेनी सामेनी बाजुए ईशाना-
वतंसक विमान साडा चार लाख योजननुं छे.) (३)। तथा जातिने विषे एटले जळचर पंचेंद्रिय तिर्यग्गतिने विषे
कुल कोटिना योनिप्रमुख एटले उत्पत्तिस्थानमां थयेला जे शतसहस्र (लाख) ते अर्धत्रयोदश छे एटले के साडा
वार लाख कुळकोटि कही छे ( ५ ) । तथा पाणाउस्स'-जेमां प्राणीओना आयुष्यनुं विधान भेद सहित
कहेवामां आवेल छे, ते प्राणायु नामनुं वारमुं पूर्व छे, तेमां तेर वस्तु एटले अध्ययननी जेवा तेर विभागो कहेला छे
(६)। तथा गर्भमां एटले गर्भाशयमा जेमनी उत्पत्ति होय ते गर्भव्युत्क्रांतिक कहेवाय छे. आवा जे पंचेंद्रिय तियंच
योनिवाळा जीवो, तेमनो प्रयोग एटले मन, वचन, कायानो व्यापार तेर प्रकारनो कह्यो छे. एटले के कुल पंदर प्रयोगो
(योगो) छे तेमांथी आहारक अने आहारकमिश्र ए वे कायप्रयोग तिर्यवोने होता नथी, केम के ते संयमीने ज होइ शके
छे, अने संयम तो संयत मनुष्योने ज होय छे, तिर्यंचने होतो नथी, तेथी तेर योग होय छे. तेमां मनना प्रयोग चार
छे-सत्य, असत्य ( मृपा), बन्ने (सत्यमृपा) अने बन्ने नहीं ( असत्यामृपा). ए ज रीते चार वचनना प्रयोग मळी आठ
थया. तथा औदारिक विगेरे पांच कायप्रयोग जाणवा. ए रीते तेर थाय छे. (७)। तथा सूर्यमंडळ एटले सूर्यमंडळनो वृत्त-
॥५१॥

- कहेवाय छे ३, तथा अकस्मात् एटले धार्या विना अन्यना वध माटे प्रवृत्ति करी अने वीजानो ( अन्यनो) वध थइ जाय ते अकस्मात्दंड कहेवाय छे ४, तथा टिनी एटले बुद्धिनी जे विपर्यासिका अथवा विपर्यासिता (विपर्यासपणुं), ते दृष्टि- विपर्यासिका अथवा दृष्टिविपर्यासिता कहेवाय छे एटले के मतिनो भ्रम, ते वडे जे दंड एटले प्राणीनो वध, ते दृष्टिविपर्या- सिकादंड अथवा दृष्टिविपर्यासितादंड कहेवाय छ, अर्थात् मित्रादिकने जे अमित्रादिकनी बुद्धिथी हणवो ते ५, तथा मृपावाद एटले पोताने माटे अथवा अन्यने माटे अथवा बनेने माटे जे असत्य चोलचु, ते अमत्य ज जे हिंसानुं कारण थाय ते मृपा- वादप्रत्ययदंड कहेवाय छे ६, ए ज प्रमाणे अदत्तादानने आश्रीने दंड पण जाणवो ७, तथा मनने विपे जे थयेलो ते आध्यात्मिक दंड एटले बाह्य निमित्तनी अपेक्षा विना शोकादिकथी उत्पन थतो दंड ते आध्यात्मिक दंड कहेवाय छै ८, तथा मानप्रत्यय एटले जात्यादिक मदना हेतुमाळो दंड ९, तथा मित्रद्वेषप्रत्यय एटले माता-पितादिकनो अल्प अपराध छता पण मोटो दंड करवो ते १०, मायाप्रत्यय एटले मायाने आश्रीने जे दंड करवो ते ११, ए ज प्रमाणे लोभप्रत्यय दंड पण जाणवो १२, तथा ऐर्यापथिक एटले केवळ योगने ज आश्रीने जे कर्मबंध एटले उपशातमोह विगेरे गुणस्थानक- वाळाने सातवेदनीयनो बंध थाय ते १३. (१)। तथा 'विमानपत्थडत्ति'-विमानना उपर-नीचे रहेला पाथडा (तेर) छे (२) । तथा 'सोहम्मवडिसए'-सौधर्म देव- १. मृपावादने आधीने जे पोताना आत्माने दड एटले कर्मबंधन थाय, एवो अर्थ पण अन्यत्र करवामा आव्यो छे ते पण अही घटी शके छे. एज प्रमाणे सर्वत्र उत्तरोत्तर जाणवू. जेथी आत्मा दडाय-फर्मवध करे तेनु नाम दंड जाणवो ।

समवाय १३॥ श्री समवायाजा सूत्र॥ चोधुं अंग ॥५०॥ विषे केटलाक देवोनी तेर सागरोपमनी स्थिति कही छे (५) जे देवो वज्र, सुवज्र, वजावर्त, वज्रप्रभ, वज्रकांत, वज्रवर्ण, वज्रलेश्य, वज्ररूप, वज्रशृंग, वज्रसृष्ट, वज्रकूट, वज्रोत्तरावतंसक, वइर, वइरावर्त, वइरप्रभ, वइरकांत, वइरवर्ण, वइरलेश्य, वइररूप, वइरशृंग, वइरसृष्ट, वइरकूट, वइरोत्तरावतंसक, लोक, लोकावर्त, लोकप्रभ, लोककांत, लोकवर्ण, लोकलेश्य, लोकरूप, लोकशृंग, लोकसृष्ट, लोककूट, लोकोत्तरावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय, ते देवोनी उत्कृष्ट तेर सागरोपमनी स्थिति कही छे (६)॥ ते देवो तेर अर्धमासे ( तेर पखवाडीए ) आन ले छे, प्राण ले छे, एटले उच्छ्वास ले छे, निःश्वास ले छे (१)। ते देवोने तेर हजार वर्षे आहार करवानी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२)। एवा केटलाक भवसिद्धिक ( भव्य ) जीवो छे के जेओ तेर भव ग्रहण करवावडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे, परिनिर्वाण पामशे, अर्थात् सर्व दुःखनो अंत करशे (३) ॥ टीकार्थ:-आ तेर स्थानकना सूत्रमा कांइक लखे छे-अहीं स्थितिना (६) सूत्रोनी पहेलां आठ सूत्रो तेमां करवं ते क्रिया एटले कर्मवंधना कारणभूत चेष्टा, ते( क्रिया )नां जे स्थानो एटले भेदो अर्थात् पर्यायो, ते क्रिया- स्थानो कहेवाय छे. तेमां अर्थने माटे एटले पोताना शरीर, स्वजन अने धर्मादिकना प्रयोजन माटे जे दंड करयो एटले त्रस-स्थावर जीवोनी हिंसा करवी, ते अर्थदंड कहेवाय छ, आ पहेलं क्रियास्थान थयुं १, आनाथी जे विलक्षण एटले प्रयोजन विना जे दंड करवो (हिसा करवी ) ते अनर्थदंड कहेवाय छ २, तथा हिंसाने आश्रीने एटले आ शत्रु विगेरेए मारी हिंसा करी हती, हिंसा करे छ अथवा हिंसा करशे एम धारीने जे तेनो दंड एटले विनाश करवो ते हिंसादंड विपर्यासने लीधे दंड, मृपावादना कारणवाको दंड, अदत्तादानना निमित्तवाळो दंड, आध्यात्मिक ( भनना निमित्तवाळो) दंड, मानना निमित्तवाळो दड, मित्र परना द्वेपने आश्रीने दंड, मायाने आश्रीने दंड, लोभ निमित्तवाळो दंड, तथा तेरमो ईर्यापथना हेतुवाको दड (१)। सौधर्म अने ईशान देवलोकने विपे विमानना तेर पाथडा कह्या छे (२)। सौधर्मावतंसक नामनुं विमान तेरसुं अर्ध एटले साडापार लाख योजन आयाम अने विष्कंभवाल्लं (लांबू-पहोलं) कयुं छे (३)। एज प्रमाणे ईशानावतंसक विमान पण जाणचं ( ४ )। जळचर पंचेंद्रिय तिर्यंच योनिवाळा जीवोनी जाति कुळकोटिनां उत्पत्ति स्थानो अर्ध त्रयोदश (साडावार) लाख कह्या छ (५)। प्राणायु नामना पूर्वमां तेर वस्तु कहेली छे (६)। गर्भव्युत्क्रांतिक पंचेंद्रिय तियंच योनिवाळा जीवोनो प्रयोग (मन, वचन, कायानो योग) तेर प्रकारे कसोछे, ते आ प्रमाणे-सत्य मनप्रयोग, मृपा मनप्रयोग, सत्यमृपा मनप्रयोग, असत्यामृपा मनप्रयोग, सत्य वचनप्रयोग, मृपा वचनप्रयोग, सत्यमृपावचनप्रयोग, असत्या- मृपा वचनप्रयोग, औदारिकशरीरकायप्रयोग, औदारिकमिश्रशरीरकायनयोग, चैक्रियशरीरकायप्रयोग, बैंक्रियमिश्रशरीर- कायप्रयोग, कार्मणशरीरकायप्रयोग (७)। सूर्यन मंडळ एक योजनमाथी योजनना एकसठीया तेर भाग ओछं करीए तेटलं ( योजन) कहेलुं छे (८)॥ आ रत्ननभा नामनी नरकपृथ्वीने विपे केटलाक नारकीओनी तेर पल्योपमनी स्थिति कही छ (१)। पांचमी पृथ्वीने विपे केटलाक नारकीओनी तेर सागरोपमनी स्थिति कही छे (२)। केटलाक असुरकुमार देवोनी तेर पल्योपमनी स्थिति कही छे ( ३)। सौधर्म अने ईशान कल्पने विपे केटलाक देवोनी तेर पल्योपमनी स्थिति कही छे (४)। लांतक कल्पने -

श्री
समवाय
१३ ॥
समवायाङ्ग
सत्र॥
चोथु अंग
॥४९ ॥
तेरस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । लंतए कप्पे अत्थेगइआणं देवाणं तेरस सागरोवमाई ठिई
पन्नत्ता ५। जे देवा वजं सुवजं वजावत्तं वजप्पभं वजकंतं वज्जवण्णं वज्जलेसं वजरूवं वजसिंग
वजसिटुं वज्जकूडं वज्जुत्तरवडिंसग वइरं वइरावत्तं बइरप्पभं वइरकंतं वइरवण्णं वइरलेसं वइररूवं
वइरसिंगं वइरसिटुं वइरकूडं वइरुत्तरवर्डिसगं लोगं लोगावत्तं लोगप्पभं लोगकंतं लोगवणं
लोगलेसं लोगरूवं लोगसिंग लोगसिटुं लोगकूडं लोगुत्तरवडिंसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि
णं देवाणं उक्कोसेणं तेरस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ ।
ते णं देवा तेरसहिं अद्धमासेहिं आणमंति वा पाणमंति वा उस्ससंति वा नीससंति वा १ ।
तेसि णं देवाणं तेरसहिं वाससहस्सोहि आहारट्टे समुप्पजइ २। संतेगइआ भवसिद्धिआ जीवा
जे तेरसहिं भवग्गहणेहिं सिज्झिस्संति बुज्झिस्संति मुच्चिस्संति परिनिव्वाइस्संति सव्वदुक्खाण-
मंतं करिस्संति ३ ॥ सूत्रं-१३ ॥
मूलार्थ:-तेर क्रियानां स्थानो कह्यां छे, ते आ प्रमाणे-अर्थदंड, अनर्थदंड, हिंसादंड, अकस्मात्दंड, दृष्टिना
॥४९॥

स्थडा पन्नत्ता २ । सोहम्मवाडंसगे णं विमाणे णं अद्धतेरसजोयणसयसहस्साइं आयामाविक्खभेणं पन्नत्ता ३। एवं ईसाणवडिंसगे वि ४ । जलयरपंचिंदिअतिरिक्खजोणिआणं अद्धतेरसजाइ- कुलकोडीजोणीपसुहसयसहस्लाइं पन्नत्ता ५ । पाणाउस्त णं पुवस्स तेरस वत्थू पन्नत्ता ६ । गन्भवतिअपंचेंदिअतिरिक्खजोणिआणं तेरसविहे पओगे पन्नत्ता, तं जहा-सच्चमणपओगे मोसमणपओगे सच्चामोसमणपओगे असञ्चामोसमणपओगे सञ्चवइपओगे मोसवइपओगे सच्चा- मोसवइपओगे असच्चामोसवइपओगे ओरालिअसरीरकायपओगे ओरालिअमीससरीरकायपओगे वेउविअसरीरकायपआगे वेउब्विअमीससरीरकायपओगे कम्मसरीरकायपओगे ७। सूरमंडलं जोअणेणं तेरसे (स)हिं एगसट्ठिभाग(गे)हिं जोयणस्स ऊणं पन्नत्तं ८ । इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं तेरस पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता १। पंचमीए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं तेरस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं तेरस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ३ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइआणं देवाणं

श्री
समवायाङ्ग
सूत्र ॥
चो,
अंग।
१
॥४८॥
एम बे प्रवेश थाय छे. तथा 'एगनिक्खमणं' जे वंदनमा एक निष्क्रमण (वहार नीकळवू) होय ते. एटले के-आव-
श्यिकी भणीने अवग्रहथकी ( एक ज वार ) बहार नीकळे छे, केम के बीजी वार अवग्रहथकी बहार नीकळवार्नु ज नथी.
पण पगमां पडीने ज सूत्र समाप्त करवानुं छे ( आखुं सूत्र भणी जवानुं छे) (३)। तथा 'विजया राजधानी ' विजया
नामनी राजधानी एटले के-आ जंबूद्वीपने विपे विजय नामना पूर्वद्वारनो अधिपति विजय नामनो देव एक पल्योपमनी
स्थितिवाळो छे, तेनी विजया नामनी राजधानी असंख्याता द्वीप समुद्रो पछी आवता जंबूद्वीपमा छे (४) । तथा राम एटले ।
नवमा बळदेव ( बार हजार वर्षनुं कुल आयुष्य पाळीने ) पांचमा देवलोकमा देवपणुं पाम्या (५)। तथा सर्व जघन्य
रात्रि एटले उत्तरायणना छेल्ला अहोरात्रनी रात्रि वार मुहूर्तनी एटले चोवीश घडीनी छ (८)। ए ज प्रमाणे दिवस पण
सर्व जघन्य वार मुहूर्त्तनो होय छे, ते दक्षिणायननो छेल्लो दिवस होय छे (९)॥
माहेंद्र, माहेंद्रध्वज, कंचु, कबुग्रीव, विगेरे तेर नाम विमानना छे (६) सूत्र-१२ ॥
हवे तेर स्थानक कहे छे.-
मू०-तेरस किरियाठाणा पन्नत्ता, तं जहा-अट्ठादंडे अणट्ठादंडे हिंसादंडे अकम्हादंडे दिट्ठि-
विपरिआसिआदंडे मुसावायवत्तिए अदिन्नादाणवत्तिए अज्झथिए मानवत्तिए मित्तदोसवत्तिए
मायावत्तिए लोभवत्तिए इरिआवहिए नाम तेरसमे १ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु तेरस विमाणप-
-
॥४८॥

- - यथाजात सता अने वीजा तेनी समान धर्मवाळा वंदनोने कहेवानी इच्छावाळा सता (ग्रंथकार) एक गाथा कहे छे.-'दुओणए '- अवनति एटले अवनत अर्थात् मस्तकनुं नमावयु ते. जे वंदनमां वे वार अवनत होय ते व्यवनत कहेवाय छे. तेमां एक ज्यारे प्रथम ज " इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहियाए " ए प्रमाणे चोली अवग्रहनी अनुज्ञा लेवा माटे नमन करे ते. तथा वीजुं ज्यारे वीजी चार अवग्रहनी अनुज्ञापनाने माटे नमन करे ते. तथा -साधु थवारूप जन्मने आश्रीने तथा योनिमार्गे वहार नीकळवारूप जन्मने आश्रीने एम वे प्रकारे यथाजात कहेवाय छे. तेमा मात्र रजोहरण, मुखवस्त्रिका अने चोलपट्टवडे ज साधु थयो हतो, अने वे हाथ जोडीने ज योनिमांथी नीकळ्यो हतो, तेथी आवा प्रकारनो थइने ज वादे, अथवा ( बन्ने प्रकारना जन्म वखते ) आटली वस्तु विना (जन्म) होय नही तेथी (ते वंदन ) यथाजात कहेवाय छे तथा 'कृतिकर्म (कितिकम्म)'-एटले वंदनक, ते 'वारसावयं' द्वादशावर्त एटले चार आवर्तवालं अर्थात् जेमां सूत्रना नाम अंतर्गत रहेला होय एवी विशेष प्रकारनी कायचेटा के जे साधुजनमां प्रसिद्ध छे ते (अहोकायं काय इत्यादि) द्वादशावर्त कहेवाय छे. तथा ' चउसिरं' जे वंदनमा चार (वार) मस्तक (नमाववानु) होय ते चतुःशिरः चंदनक कहेवाय छे. एटले के प्रथम प्रवेश करे त्यारे शिष्यना क्षामणासमये शिष्य अने आचार्य संबंधी वे मस्तक तथा फरीथी नीकळीने प्रवेश करे त्यारे पण ते ज चे मस्तक, एम चार मस्तक जाणवा. तथा 'तिगुत्तं'-त्रण गुप्तिवडे गुप्त, अथवा (तिसुद्धं ) पाठांतरनी अपेक्षाए पण त्रण गुप्तिवडे ज शुद्ध ( एवं वंदनक). तथा 'दुपवेसं' जे वंदनकने विपे वे (वार) प्रवेश होय ते. तेमां अवग्रहनी अनुज्ञा लइने प्रवेश करनारने पहेलो अने पछी फरीथी नीकळीने प्रवेश करनारने वीजो

श्री
समवायाङ्ग
चोथु
अंग ॥
१४७
अने असंभोगनुं कारण थाय छे, ते आ प्रमाणे-अक्षनिपद्या (स्थापनाचार्य) विना (सूत्रार्थनी)व्याख्या करनार अने सांभळ-
नारने प्रायश्चित्त लागे छे. तथा निपद्या (आसन) उपर बेसीने (शिष्य) सूत्रार्थने (गुरु पासे ) पूछे, तथा जो आलोचनाने
आलोवे तो ते ज प्रमाणे तेने प्रायश्चित्त लागे छ (१). तथा 'कहाए य पवंधणे'-वादादिक पांच प्रकारनी कथानुं
जे करवू ते कथाप्रबंधन कहेवाय छे. तेमां संभोग अने असंभोग थइ शके छे. (पांच प्रकार आ प्रमाणे-) तेमां
कोइ मतनो स्वीकार करीने पांच अवयववाळा अथवा त्रण अवयववाळा ( अनुमान प्रमाणना) वाक्यवडे जे ते
मतने सिद्ध करवो, ते छळजाति रहित सत्यार्थर्नु अन्वेषण करनार वाद कहेवाय छे, ते ज वाद जो छळजातिवडे
पराभवना स्थानरूप होय तो ते जल्प कहेवाय छे, जे ठेकाणे वाद करनारा वेमांथी एकना पक्षने ग्रहण करनार हाजर
होय अने बीजाना पक्षने ग्रहण करनार कोइ न होय तो ते मात्र दूपण आपवामां ज प्रवृत्त होवाथी वितंडा कहेवाय छे,
तथा चोथी पॅकीर्णकथा छे, ते उत्सर्ग मार्गनी कथा अथवा तो द्रव्यास्तिक नयनी कथा कहेवाय छ, तथा पांचमी निश्चय
कथा छे, ते अपवाद मार्गनी कथा अथवा पयार्यास्तिक नयनी कथा कहेवाय छे. तेमां पहेली त्रण कथाओ साध्वी विना
बीजानी साथे करवा लायक छे, परंतु जो साध्वी साथे करे तो तेने प्रायश्चित्त लागे छे. (ते त्रण वार प्रायश्चित्त ले त्यां
सुधी संभोगने लायक छ अने) चोथी वार प्रायश्चित्त ले तो पण ते विसंभोगने लायक छे (असांभोगिक छे). आ प्रमाणे
वे गाथानो संक्षेपथी अर्थ कह्यो. तेनो विस्तरार्थ तो निशीथ सूत्रना पांचमा उद्देशकना भाष्यमाथी जाणी लेवो (२).
तथा 'दुवालसवत्ते किहकम्मे'-द्वादशावर्त कृतिकर्म-वंदनक कहेलं छे. आ द्वादशावर्तनो ज अनुवाद करता
॥४७॥

दिकने विषे जे ठेकाणे घणा साधुओ एकठा मळे ते समवसरण कहेवाय छे. अही क्षेत्रने आश्रीने सर्व साधुओनो साधारण अवग्रह होय छे अने वसति( उपाश्रय )ने आश्रीने साधारण अने असाधारण बन्ने प्रकारनो अवग्रह होय छे. आ कहेवा- वडे वीजा पण अवग्रहो उपलक्षणथी जाणी लेवा. ते अनेक प्रकारना छे, ते आ प्रमाणे-वर्षावग्रह, ऋतुबद्धावग्रह अने वृद्धवासावग्रह. आ दरेकना साधारणावग्रह अने प्रत्येकावग्रह एम चब्बे भेद छे. तेमां जे क्षेत्र वर्पाकल्प विगेरेने माटे एकी o साथे भिन्न गच्छवाळा चे विगेरे साधुओए अनुज्ञा लइने ग्रहण कयु होय, ते साधारण अवग्रह कहेवाय छे. परतु जे क्षेत्रनो केटलाक ( एक समुदायना ) साधुओए अनुज्ञा लइ आश्रय कर्यो होय, ते प्रत्येक अवग्रह कहेवाय छे. आ प्रमाणे होवाथी आ अवग्रहोने चिपे आकुट्टीने लीधे ( हिंसाने लीधे ) अनाभाव्य (अकल्प्य ) एवा शिष्यरूप सचित्तने के वस्त्रादिक अचित्तने ग्रहण करनारा तथा अनाभोगवडे ग्रहण करेली वस्तुने पाछी नहीं आपनारा साधुओ समनोज्ञ अने अमनोज्ञ कहेवाय छ, तथा तेओ प्रायश्चित्तवाळा थाय छे अने छेवट असंभोग्य थाय छे. तथा पार्श्वस्थादिकने अवग्रह ज होतो नथी, तो पण जो ते क्षेत्र नानुं होय अने पोते संवेगी साधुओ अन्यत्र निर्वाह करी शके तेम होय तो ते क्षेत्रनो त्याग ज करे अने जो ते पार्श्वस्थादिकनुं क्षेत्र मोडं होय अने संवेगी साधुओ अन्यत्र निर्वाह करी शके तेम न होय तो तेना क्षेत्रमा पण प्रवेश करे अने सचित्त शिष्यादिकने ग्रहण करे, तेथी प्रायश्चित्तवाळा पण थता नथी. ते विपे कयुं छे के-“ अदत्त अने अकल्प्यने ग्रहण करवाथी समनोज्ञ अने अमनोज्ञ थाय छे. वेमां अमनोज्ञने संभोगथी जुदा करवा. तथा निर्वाहने अभावे पार्श्वस्थादि. कनी अनुज्ञा लइने रही शके छे. (१)" (१०) तथा 'सनिसिज्जा य संनिपद्या एटले आसनविशेप. ते संनिपद्या संभोग

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श्री
चोथु
अंग ॥
समवायाङ्ग
सूत्र ॥
॥४६॥
सर्व पूर्वनी जेम जाणवू (६). तथा ' अन्भुट्ठाणे त्ति यावरे'-अभ्युत्थान एटले पोते आसननो त्याग करे, ते अपर
एटले बीजूं संभोग के असंभोग स्थान जाणवू. तेमां पावस्थादिकनी सामे जो पोते अभ्युत्थान करे तो ते ते ज प्रमाणे असं-
भोग्य जाणवो. आ अभ्युत्थानवें उपलक्षण होवाथी ( आ बीजी त्रण बावत पण जाणवी)-पाहुणो ( परोणो) के ग्लाना-
दिक अवस्थावाळो होय तेनी पासे 'हुं तमारी विश्रामणादिक ( सेवादिक ) शुं करूं ? ' ए प्रमाणे प्रश्नना स्वरूपवालं
किकरपणुं करे, तथा न्यासकरण एटले पार्श्वस्थादिकनो धर्म जोइ संविनधर्मथी भ्रष्ट थयेल साधुने फरीथी त्यां ज (साधु-
धर्ममा ज) स्थापन करवो ते, तथा अविभक्ति एटले अपृथक्पणुं अर्थात् अभेदपणुं तेने करतो एवो साधु अशुद्ध अने असं-
भोग्य थाय छे. आ सर्व वावतोने आगममां कहा प्रमाणे करे तोते शुद्ध अने संभोग्य जाणवो (७). तथा 'किइकम्मस्स
य करणे' कृतिकर्म एटले वंदन, तेनुं करवं. आ वंदन विधि प्रमाणे करे तो ते शुद्ध छे अने अन्यथा ते ज प्रमाणे असं.
भोग्य छ एम जाणवू. आनो विधि आ प्रमाणे-जे साधु वायुवडे स्तब्ध शरीरवाळा होवाथी उठवु विगेरे क्रिया करवामां
अशक्त होय, ते अस्खलितादिक गुणे करीने सहित एवा सूत्रनो ज मात्र उच्चार करे, ए ज प्रमाणे आवर्त अने मस्तक नमा-
वq विगेरे जेवी शक्ति होय ते प्रमाणे अवश्य करे, आ प्रमाणे अशठ ( शठता रहित ) प्रवृत्ति करवी ए ज वंदनविधि छ
(८). तथा 'वेयावच्चकरणे इय' वैयावृत्त्यनुं करवू एटले आहार अने उपधि आपवादिकवडे, मूत्रादिकनी कुंडी (पात्र)
आपवादिकवडे, अधिकरण दोषने शमाववावडे तथा सहाय आपवावडे उपष्टंभ (टेको) आपचो ते. आ विषयमा संभोग
अने असंभोग थाय छे. (९). तथा 'समोसरणं' जिनेश्वरनी स्नात्रपूजा, तेना स्थनी पाछळ चालवू तथा पट्टयात्रा-
॥४६॥

थयेल न होय, अथवा ते पार्श्वस्थादिक होय, अथवा तो स्त्री होय, तेने (आ सर्वने अथवा तेमांधी कोइने पण ) पोते वाचनादिक करे (आपे) तो ते ते ज प्रमाणे प्रण वार (प्रायश्चित्त लीधा) पछी असंभोग्य थाय छे (२). तथा भक्त- पानना विषयमा उपधि प्रमाणे जाण. निशेष ए के त्यां (उपधि द्वारमा) परिकर्म अने परिभोग कह्या हता तेने बदले अहीं भोजन (जमवू) अने दान (आप) ए वे कहेवा (३). तथा 'अंजलीपग्गहे त्ति य'-अहीं ज्या ज्या इति शब्द लख्या छे ते सर्व उपदर्शनना अर्थवाला अने च शब्द लख्या छ ते सर्व समुच्चयना अर्थवाळा छ एम जाणवू. अहीं अबलिप्रग्रह-हाथ जोडवा एम लग्व्यु छे, तेना उपलक्षणधकी वंदनादिक पण जाणी लेवा. ते आ प्रमाणे-सांभोगिक के अन्य सांभोगिक संविग्न- (साधु )ने पोते वंदन करे, हाथ जोडे, क्षमाश्रमणने नमस्कार छ एम बोले, तथा आलोचनानं माटे, सूत्रने माटे अने अर्थने माटे आसन पाथरे, आ सर्वन करनार पोते शुद्ध छे, पण आ सर्व पार्श्वस्थादिकने करे तो उपर प्रमाणे (त्रण वार प्रायश्चिच ग्रहण करतो सतो ) संभोग्य अन (त्यारपछी) असंभोग्य जाणवा (४). तथा 'दायणे य' दान (शिष्यगण वीजाने सोपवो ते ) तेमां एक साभोगिक पोते पोताना ज सांभोगिकने शिष्यना गण सोंपे अथवा तो ते सांभोगिक ते शिष्यगपने वसादिक उपग्रह आपवामा असमर्थ होय तो अन्य साभोगिकने पोतानो शिष्यगण सोपे, तो ते शुद्ध छे; परतु कारण विना विसंभोगिकने के पार्थस्थादिकने के साधीने ते शिप्यगण सोंपे तो ते पूर्वनी जेम ज सभोग्य अने असंभोग्य थाय छे. (५). तथा 'निकाए अ' निकाचन एटले छंदन अर्थात् निमंत्रण करवु ते. तेमा शय्या, उपधि अने आहारवडे तथा शिष्यगण सोपवावडे तथा स्वाध्यायवडे सांभोगिक साधु पोताना सांभोगिक साधुने निमंत्रण करे तो ते शुद्ध छे. शेप

H?
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*
श्री
समवायाङ्ग
चोथु
अंग ।।
॥४५॥
-निमेषोन्मेष कर्या विना स्थिर रहीने कायोत्सर्ग करवानो छ (१)
तथा सम् एटले एकपणाए करीने ( साथे रहीने) सरखा आचारवाळा साधुओनुं जे भोजन (भोगवटो) ते संभोग
कहेवाय छे. ते संभोग उपधि विगेरे स्वरूपवाळा विषयना भेदथी बार प्रकारनो छे.-तेमां ' उवही०' इत्यादि
वे गाथाओ मूळमां आपी छे. तेमां उपधि एटले वस्त्र-पात्र विगेरे, ते उपधिने संभोगिक साधु बीजा संभोगिक
साधुनी साथे रहीने उद्गम, उत्पादना अने एपणाना दोष रहित विशुद्धने ग्रहण करे तो ते शुद्ध जाणवो अने अशुद्धने
ग्रहण करे तेम ज तेने बीजो प्रेरणा करे त्यारे ते प्रायश्चित्त ग्रहण करे. आ रीते व्रण वार अशुद्ध ग्रहण करी त्रणे वार प्राय-
श्चित्त ले तो ते त्यां सुधी ज संभोगने लायक छ, अने चोथी वखते प्रायश्चित्त अंगीकार करे तो पण ते विसंभोगने ज लायक
छे, एम जाणवू. वळी ( संभोगिक साधु ) विसंभोगिकनी साथे अथवा पासत्थादिकनी साथे अथवा साध्वीनी साथे रहीने
कारण विना शुद्ध अथवा अशुद्ध उपधिने ग्रहण करे अने वीजानी प्रेरणाथी प्रायश्चित्त ग्रहण करे तो पण ते त्रण वार पछी
चोथी वारे असंभोग्य थाय छे. ए ज प्रमाणे उपधिनुं परिकर्म ( साफसुफ ) अने परिभोग ( भोगवटो) करनार साधु
संभोग्य अने असंभोग्य थाय छे. ते विषे कयुं छे के-" एक चार, वे वार के त्रण वार आलोचना करनारने प्रायश्चित्त
होइ शके छे. त्यारपछी-त्रण वार प्रायश्चित्त लीधा पछी आलोचना करे तो पण ते असंभोग्य थाय छ।१।" (१) तथा 'सुय'-
संभोगिक साधु के अन्य सांभोगिक साधु पोतानी पासे श्रुत भणवा आव्यो होय, तेनी पासे पोते विधिपूर्वक वाचना, पृच्छना
विगेरे करे तो ते शुद्ध छे. परंतु ते आवनार (साधु ) अविधिथी प्राप्त थयेल होय, अथवा ( भणवाना इरादाथी) प्राप्त
॥४५॥

टीकार्थ:-हवे वार स्थानक कहे छे, ते सूत्र सुगम छे. विशेप ए के-स्थितिना सूत्रोनी पहेलां अग्यार सूत्रो कयां छे. तेमां विशेष प्रकारना (सारा) संहननवाळा अने श्रुत( आगम )वाळा भिक्षु( माधु )ओनी जे प्रतिमा एटले विशेष प्रकारना अभिग्रहो ते भिक्षुप्रतिमा कहेवाय छ । तेमां एक मासनी ( वे मासनी ) त्याथी आरभीने सात मासनी प्रतिमा सुधी सात प्रतिमाओ उत्तरोत्तर एक एक मासनी वृद्धिवाळी अने एक एक भात-पाणीनी दत्तिवडे पृद्धिवाळी जाणवी ( एटले के एक मासनी पहली प्रतिमा, तेमां एक मास सुधी हमेशा भात-पाणीनी एक एक दत्ति लेवानी होय छे. ए जरीते वीजी चे मासनी, तेमां हमेशा मात-पाणीनी वे वे दत्ति, ए ज रीते घृद्धि करता सातमी सात मासनी, तेमा हमेशां भातपाणीनी सात सात दत्ति लेवानी होय छे एम सात प्रतिमाओ थइ ). तथा जे प्रतिमाने विप सात रात्रिदिवस होय छे ते एटले सात सात रात्रिदिवसनी त्रण प्रतिमाओ होय छ, अर्थात् सात प्रतिमानी पछी आठमी प्रतिमा सात रात्रिदिनसनी, ए ज प्रमाणे (सात रात्रिदिवसनी) नवमी वीजी अने दशमी त्रीजी प्रतिमा जाणवी. आ त्रण प्रतिमाओमा क्रियाए करीने विशेष छ ( वधारे तफावत छ ). ते आ प्रमाणे-आठमी प्रतिमाने विपे चतुर्थभक्त तप, ग्रामादिकनी वहार रहेg अने उत्तान (चिता सू) विगेरे आसने रहेवार्नु छ, नवमी प्रतिमाने विपे उत्कटुक विगेरे आसनवडे विशेपे रहेवानुं छे, अने दशमीने विपे वीरासनादिकपडे विशेपे रहेवानुं छे तथा एक अहोरात्रना ( रात्रिदिवसना) प्रमाणवाळी अग्यारमी प्रतिमा छे, तेमां छठभक्त तप करवानो छ एटलं विशेप छ अने एक रात्रिना प्रमाणवाळी चारमी प्रतिमा छ, ते अहम- भक्त तपनी छे. तेमा छेल्ली रात्रिए हाथ लांबा रासी वे पग मेळा राखी, काइक कायाने नम्र राखी (नमाची) नेत्रना श्री समवायाङ्ग चोथु अंग॥ सूत्र॥ ॥४४॥ रात्रि बार मुहूर्त्तनी कही छे ८ । ए ज प्रमाणे दिवस पण ( सर्व जघन्य चार मुहूर्त्तनो) जाणवो ९। सर्वार्थसिद्ध नामना विमाननी उपली स्तूपना अग्रभागथकी वार योजन उपर ऊंचे जइए त्यां ईपत्प्राग्भार नामनी पृथ्वी कही छे (त्यांथी उत्सेधांगुलना एक योजने लोकांत आवे छे) १० । ईपत्प्राग्भार नामनी पृथ्वीना वार नाम कहेलां छे, ते आ प्रमाणे-ईपत् १, ईपत्प्राग्भार २, तनु ३, तनुकतर ४, सिद्धि ५, सिद्धालय ६, मुक्ति ७, मुक्तालय ८, ब्रह्म ९, ब्रह्माव- तंसक १०, लोकप्रतिपूरणा ११ अने लोकाग्रचूलिका १२ ।। ११ ।। आ रत्नप्रभा पृथ्वीने विपे केटलाक नारकीओनी बार पल्योपमनी स्थिति कही छे १। पांचमी पृथ्वीने विषे केटलाक नारकीओनी वार सागरोपमनी स्थिति कही छे २ । केटलाक असुरकुमार देवोनी बार पल्योपमनी स्थिति कही छे ३। सौधर्म अने ईशान कल्पने विषे केटलाक देवोनी बार पल्योपमनी स्थिति कही छे ४ । लांतक कल्पमा केटलाक देवोनी वार सागरोपमनी स्थिति कही छे ५ । जे देवो माहेंद्र, माहेंद्रध्वज, कंबु, कंवुग्रीव, पुंख, सुपुंख, महापुंख, पुंड, सुपुंड, महापुंड, नरेंद्र, नरेंद्रकांत अने नरेंद्रावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय, ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति वार सागरोपमनी कही छे ॥६॥ ते देवो चार अर्धमासे ( पखवाडीए ) आन ले छे, प्राण ले छे, एटले उच्छ्वास ले छे, निःश्वास ले छे १ । ते देवोने चार हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे २ । एवा केटलाक भवसिद्धिक (भव्य) जीवो छ के जेओ वार भवने ग्रहण करवावडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे, परिनिर्वाण ( शीतळता ) पामशे अर्थात् सर्व दुःखना अंतने करशे ॥ ३ ॥ ॥४४॥ - मूलार्थ:-बार भिक्षुप्रतिमाओ कही छे, ते आ प्रमाणे-एक मासनी भिक्षुप्रतिमा १, वे मासनी भिक्षुप्रतिमा २, त्रण मासनी भिक्षुप्रतिमा ३, चार मासनी भिक्षुप्रतिमा ४, पांच भासनी भिक्षुप्रतिमा ५, छ मासनी भिक्षुप्रतिमा ६, सात मासनी भिक्षुप्रतिमा ७, (त्यार पछी) पहेली सात रात्रिदिवसनी भिक्षुप्रतिमा ८, बीजी सात रात्रिदिवसनी भिक्षुप्रतिमा ९, त्रीजी सात रात्रिदिवसनी भिक्षुप्रतिमा १०, एक रात्रिदिवसनी प्रतिमा ११, एक रात्रिनी भिक्षुप्रतिमा १२ । १ । वार प्रकारनो संभोग कह्यो छे, ते आ प्रमाणे-उपधि, श्रुत, भक्तपान, अंजलिप्रग्रह, दान, निकाच (निमंत्रण), वळी चीजें अभ्युत्थान, कृतिकर्म करवू, वैयावचनुं कर, समवसरण ( साधुओर्नु एकत्र संमीलन थq ), संनिपद्या ( आसन ) अने कथाप्रबंध । २ । वार आवर्तवाळं कृतिकर्म (वंदन) कां छे, तेमा २५ आवश्यक छे ते आप्रमाणे-द्विअवनत (जेमांवे वार अर्ध नमवू पडे ते), यथाजात (प्रव्रज्या तथा प्रसूतिना जन्मनो देखाव जेमां होय ते), चार आवर्तवालं कृतिकर्म (अहो, कार्य विगेरे), चउसिर (जे वंदनमा चार बार मस्तक नमाववानुं होय ते), त्रिगुप्त (त्रण गुप्तिपडे गुप्त), दुपवेस । (जेमां वे वार प्रवेश होय ते), एग निख्खमण (जेमां एक बार वहार नीकळवार्नु होय ते) ३ । विजया नामनी राजधानी आयाम- विष्फंभवडे (लंबाइ-पहोळाइवडे ) पार हजार योजन कहेली छ ( वीजा जंबूद्वीपमां जगतीथी पार हजार योजन जइए त्यारे आवे छे) ४ । राम नामना नवमा वळदेव पार सो वर्प प्रमाण पोतानुं सर्व (आ) आयुष्य पाळीने देवपणुं पाम्या छे ५। मेरुपर्वतनी चूलिका विष्कंभ( पहोळाइ )वडे मूळमां वार योजन प्रमाण कही छे ६ । जंबूद्वीप नामना द्वीपनी वेदिका (जगती) मूळमां विष्कंभवडे चार योजननी कही छे ७ । (आखा चर्पमां) सर्व जघन्य ( नानामां नानी) OP Je श्री समवायाङ्ग चोथु अंग॥ ॥४३॥ इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइआणं नेरइयाणं बारस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता १ । पंचमीए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं बारस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं बारस पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ३ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं बारस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । लंतए कप्पे अत्थेगइयाणं देवाणं बारस सागरोव- माइं ठिई पन्नत्ता ५ । जे देवा मंहिंदं महिंदज्झयं कंबुं कंबुग्गीवं पुखं सुपुंखं महापुंखं पुंडं सुपुंडं महापुंडं नरिंदं नरिंदकंतं नरिंदुत्तरवडिंसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं देवाणं उक्कोसेणं बारस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ ॥ ते णं देवा वारसण्हं अद्धमासाणं आणमंति वा पाणमंति वा उस्ससंति वा नीससंति वा १ । तेसि णं देवाणं बारसहिं वाससहस्सेहिं आहारटे समुप्पज्जइ २ । संतेगइया भवसिद्धिआ जीवा जे बारसहिं भवग्गहणोहिं सिन्झिस्सति बुज्झिस्संति मुच्चिस्संति परिनिवाइस्संति सव्वदुक्खाणमंतं करिस्संति ३॥ सूत्रम् ॥-१२ ॥

करणे इअ । समोसरणं सनिसिज्जा य, कहाए अ पबंधणे ॥२॥" २ । दुवालसावत्ते कितिकम्मे पन्नत्ते, तं जहा-“दुओणयं जहाजायं, कितिकम्मं बारसावयं । चउसिरं तिगुत्तं च, दुपवेसं एग- निक्खमणं ॥१॥ ३ । विजया णं रायहाणी दुवालस जोयणसयसहस्साइं आयामविक्खंभेणं पण्णत्ता ४ । रामे णं बलदेवे दुवालस वाससयाइं सवाउयं पालित्ता देवत्तं गए ५। मंदरस्स णं पवयस्स चूलिआ मूले दुवालस जोयणाई विक्खंभेणं पण्णत्ता ६ । जंबूदीवस्स णं दीवस्स वेइआ मूले दुवालस जोयणाइं विक्खंभेणं पण्णत्ता ७ । सवजहणिया राई दुवालसमुहुत्तिआ पण्णत्ता ८। एवं दिवसोऽवि नायवो ९। सबट्ठसिद्धस्स णं महाविमाणस्स उवरिल्लाओ थूभिअग्गाओ दुवा- लस जोयणाई उद्धं उप्पइआ ईसिपब्भारनामपुढवी पण्णत्ता १० । ईसिपब्भाराए णं पुढवीए दुवालस नामधेज्जा पण्णत्ता, तं जहा-ईसित्ति वा ईसिपब्भाराति वा तणूइ वा तणूयतरि त्ति वा सिद्धित्ति वा सिद्धालए त्ति वा मुत्तीति वा मुत्तालए त्ति वा वंभे त्ति वा बंभवडिसए त्ति वा लोक- परिपूरणे त्ति वा लोगग्गचूलिआइ वा ११ ॥ , श्री समवायाङ्ग चोथु अंग॥ सूत्र॥ ॥४२॥ विष्कंभथकी शिखरना विष्कभने आश्रीने मेरुपर्चत अग्यारमा भागे ओछो छे. कोना अग्यारमा भागे ? ते कहे छे-उच्च- त्वना अग्यारमा भागे. एटले के-मेस्तुं ऊंचपणुं नवाणु हजार योजननुं छे. तेनो अग्यारमो भाग नव छे, ते नव हजारे करीने हीन एवो विष्कंभ पृथ्वीतळना विष्कभनी अपेक्षाए शिखरतळने विपे छे; केमके शिखर उपर एक हजार योजननो विष्कंभ छे अने मूळमां दश हजार योजननो विष्कंभ छे (७)॥ ब्रह्म विगेरे वार विमानना नामो छे. (६) सूत्र (११) हवे बार स्थानक कहे छ- मू-बारस भिक्खुपडिमाओ पन्नत्ताओ, तं जहा-मासिआ भिक्खुपडिमा, दोमासिआ भिक्खुपडिमा, तिमासिआ भिक्खुपडिमा, चउमासिआ भिक्खुपडिमा, पंचमासिआ भिक्खुपडिमा, छमासिआ भिक्खुपडिमा, सत्तमासिआ भिक्खुपडिमा, पढमा सत्तराइंदिआ भिक्खुपडिमा, दोच्चा सत्तराइंदिआ भिक्खुपडिमा, तच्चा सत्तराइंदिआ भिक्खुपडिमा, अहोराइआ भिक्खुपडिमा, एग- राइआ भिक्खुपडिमा १ । दुवालसविहे संभोगे पन्नत्ते, तं जहा-" उवहीसुअभत्तपाणे, अंजली- पग्गहे ति य । दायणे य निकाएआ अब्भुटाणेति आवरे ॥१॥ कितिकम्मस्स य करणे, वेयावच्च- १ आ आठमीथी वारमी सुधीनी पाच समजवी. ॥४२॥ -- . माटे छे. लोकांतथकी अग्यार सो ने अग्यार योजननी अवाधाए करीने एटले वच्चे व्यवधान ( आंतरूं) करीने लोकां- तनी अदर ११११ योजने ज्योतिपचक्रनो पर्यंत-छेडो कह्यो छे. आ वाचनांतरनी व्याख्या छे, ते विपे कह्यु छ के- " अग्यारसो ने एकवीश तथा अग्यार सो ने अग्यार योजन प्रमाण मेरु अने अलोकनी अवाधाए ज्योतिपचक्र चार चरे छे अने रहेलुं छे." | परतु आ चालती वाचनाने विपे तो आ हमणां व्याख्यान करेला वे आलावा उलटा पण देखाय छे' (२)। 'एज्ञारसयमुत्तरं विमाणसयं भवति त्ति मक्खायं ति' अही 'म' अक्षर आगम संबंधी होवाथी आवो अर्थ करवो- अग्यार सहित सो विमान (अर्थात् १११) विमान होय छे एम करीने (जाणीने) 'आख्यातं' एटले भगवाने तथा बीजा केवळीओए कयु छ एवं सुधर्मास्वामीनुं वचन छ (६)। मेरुपर्वत पृथ्वीतळथकी शिखरतळने विपे ऊंचाइना प्रमाणथी अग्यारमे भागे ओछो कह्यो छे आनो भावार्थ आ प्रमाणे छे-मेरुपर्वत भूमितळथी आरभीने शिखरतळना उपला भाग सुधी विष्कभनी अपेक्षाए अगुल विगेरेना अग्यारमा अग्यारमा भागे करीने हानि पामतो सतो उपर उपर कहेलो छे. आनी भावना आ प्रमाणे छे-मेरुपर्वतनो विष्कंभ भूमितळमां दश हजार योजन छे, त्यांथी एक अंगुल ऊंचा जइए त्यारे तेनो विष्कम अंगुलनो अग्यारमो भाग ओछो थाय छे. ए प्रमाणे गणतां अग्यार अगुल ऊचे जइए त्यारे एक आगळ घटे छे. एज न्यायवडे अग्यार योजन जइए त्यारे एक योजन घटे छे, ए ज रीते अग्यार हजार योजने एक हजार योजन घटे छे, तेथी नवाणु हजार योजने नव हजार योजन घटे छे. तेथी शिखर उपर एक हजारनो विष्कंभ रहे छे. अथवा तो पृथीतळना १ अहीं टीकामा त्रीजा सूत्रनी व्याख्या प्रथम करी छे अने वीजा सूत्रनी व्याख्या पछी करी छे

श्री
समवायाङ्ग
सत्र ॥
चोर्यु
अंग॥
॥४१॥
-
एवा ) अर्थमां छे, अने ' अपि ' शब्द छे ते संभावनाना अर्थमां छे. आवो साधुतुल्य जे श्रावक होय ते हे श्रमण !
हे आयुष्मान! अग्यारमी प्रतिमा धारक कहेवाय छे एम सुधर्मास्वामीए जंबूस्वामीने संबोधन करवापूर्वक कॉ. आनो भावार्थ
ए छे के-पूर्वे कहेला सर्व गुणे करीने सहित जे श्रावक क्षुरवडे मस्तक मुंडावे अथवा मस्तके लोच करे, साधुनो वेप
धारण करे, ईर्यासमिति विगेरे साधुना धर्मनुं पालन करे, भिक्षाने माटे गृहस्थना कुळमां प्रवेश करे त्यारे 'प्रतिमा
वहन करनारा मने-श्रमणोपासकने भिक्षा आपो' ए प्रमाणे बोले तथा 'तुं कोण छे ? ' एम तेने कोइ पूछे त्यारे ' हुं
प्रतिमा वहन करनार श्रमणोपासक छु,'ए प्रमाणे जवाव आपे. आ प्रमाणे अग्यार मास सुधी करे, ते अग्यारमी प्रतिमा
कहेवाय छे ११ । वळी अन्य पुस्तकमां आ प्रमाणे वाचना (पाठ) छे-दर्शनश्रावक ए पहेली प्रतिमा, कृतव्रतकर्मा ए वीजी,
कृतसामायिक ए त्रीजी, पौषधोपवासनिरत ए चोथी, रात्रिभक्तपरिज्ञात ए पांचमी, सचित्तपरिज्ञात ए छट्ठी, दिवा
ब्रह्मचारी रात्रे परिमाणकृत ए सातमी, दिवसे अने रात्रिए पण ब्रह्मचारी तथा स्नान रहित होय तथा केश, रोम
अने नखने उतारे नहीं ए आठमी, आरमपरिज्ञात अने प्रेपणपरिज्ञात ए नवमी, उद्दिष्टभक्तवर्जक ए दशमी अने श्रमणभूत
एवो पण होय ते हे श्रमण ! हे आयुष्मान ! अग्यारमी प्रतिमा कहेवाय छे. वळी कोइ ग्रंथमां आ प्रमाणे छे-आरभपरिज्ञात
ए नवमी, प्रेष्यारंभपरिज्ञात ए दशमी तथा उद्दिष्टभक्तवर्जक अने श्रमणभूत ए अग्यारमी. आवो पण पाठांतर छ (१)।
तथा जंबूद्वीप नामना द्वीपने विपे मेरुपर्वतथी अग्यार सो अने एकवीश अधिक एटला योजननी अबाधाए एटले
व्यवधाने करीने ( आंतरे ) ज्योतिपर्नु चक्र चार चरे छे-भ्रमण करे छे (३)। तथा 'णं' ए शब्द वाक्यना अलंकार
॥४१॥

- कयों होय, ते थापक 'सचित्ताहारपरिज्ञात' कहेवाय छे. आ सातमी प्रतिमा छे. अही भावार्थ ए छे के-पूर्वे कहेली छए प्रतिमाना अनुष्ठान सहित सात मास सुधी जे थावक प्रासुक आहार करे तेने आ सातमी प्रतिमानुं आराधन थाय छे ७ । तथा आरभ एटले पृथ्वीविगेरेनुं मर्दन करवू ते, परिज्ञात एटले पूर्वनी ज जेम जाणीने जेणे निषेध को होय, ते श्रावक 'आरभपरिज्ञात' कहेवाय छ, आ आठमी प्रतिमा छे. अही भावार्थ ए छे के पूर्वे कहेला समग्र अनुष्ठान सहित आठ मास सुधी पृथ्व्यादिक आरभनुं जे वर्जवं ते आठमी प्रतिमा कहेवाय छे ८ । तथा प्रेप्य एटले आरभना कार्यमांप्रेरणा करवा लायक चाकरो जेणे परिज्ञात एटले निषेध कर्या होय ते श्रावक 'प्रेष्यपरिज्ञात' कहेवाय छे ते नवमी प्रतिमा. आनो भावार्थ ए छे के-पूर्वे कहेला समग्र अनुष्ठान सहित श्रावक नव मास सुधी वीजानी पासे आरभ करावे नही ते नवमी प्रतिमा छे ९ । तथा उद्दिष्ट एटले ते ज (प्रतिमा वहन करनार ) श्रावकने उद्देशीने करेलु जे ओदनादिक भक्त ते उद्दिष्टभक्त कहेवाय छे, ते जेणे परिज्ञात एटले जाणीने निषिद्ध कयु होय ते श्रावक 'उद्दिष्टभक्तपरिज्ञात' प्रतिमा धारक कहेवाय छे. अही भावार्थ ए छे के-पूर्वे कहेला समग्र गुण सहित श्रावक दश मास सुधी आधार्मिक भोजननो त्याग करे, सजायावडे मस्तकने मुंडावे अथवा शिखावाळो रहे, तथा कोइ कोइ पण घरनो वृत्तात पूछे त्यारे पोते ते वात जाणतो होय तो 'हुँ जाणुं छु' एम कहे अने न जाणतो होय तो 'हं जाणतो नथी' एम कहे, आ प्रमाणे जे उत्कृष्ट- पणे विचरे ते श्रावकने दशमी प्रतिमा कहेवाय छे १० । तथा श्रमण एटले निग्रंथ, तेनुं अनुष्ठान (क्रिया) करवाथी जे तेना जेवो होय ते 'श्रमणभूत ' एटले साधुतुल्य कहेवाय छे. अहीं सूत्रमा जे 'च' शब्द छे ते समुच्चय ( अने . .

श्री
चोथु
अग।
समवायाग
सूत्र ॥
॥४०॥
प्रतिमा धारण करे. आ अर्थवाल्छं सूत्र अधिकार करेला आसूत्र अने पुस्तकोने विषे देखातुं नथी. परंतु उपासकदशांग विगेरेमां
प्राप्त थाय छे-देखाय छे. तेथी तेने आधारे आ अर्थ देखाडयो छे. तथा पर्व सिवायनी बीजी तिथिओमां दिवसे ब्रह्मचारी
रहे अने ' रत्ति' रात्रिने विपे, शुं करे ? ते विपे कहे छे के-रात्रिए स्त्रीओनु अथवा तेमना भोगोनुं प्रमाण जेणे कयु
होय ते 'परिमाणकृत' कहेवाय छे. आनो भावार्थ आ प्रमाणे छे-दर्शन, व्रत, सामायिक अने अष्टम्यादिक पर्वतिथिना
पौषधोपवास ए चारे प्रतिमा सहित श्रावक पांच मास सुधी पर्वतिथिने विपे एक रात्रिनी प्रतिमा धारण करे (कायोत्सर्ग करे)
अने शेष तिथिओमां दिवसे ब्रह्मचारी रहे अने रात्रिए मैथुनर्नु परिमाण करे, स्नान न करे, तथा धोतीयानो कछोटो (काछडी)
न बांधे. आ रीते करवाथी आ पांचमी प्रतिमा थाय छे. ते विषे अन्य शास्त्रमा कयुं छे के-" अष्टमी अने चतुर्दशीने विपे
एक रात्रिनी प्रतिमा धारण करे, स्नान न करे, दिवसे भोजन करे, धोतीयानो कछोटो छूटो राखे, तथा प्रतिमा सिवायनी
तिथिओमां दिवसे ब्रह्मचारी अने रात्रे मैथुन- परिमाण करनार थाय." ५। तथा दिवसे अने रात्रीए पण ब्रह्मचारी, अस्नायी-
स्नान रहित, अहीं कोइ ठेकाणे आ प्रमाणे का छे-'अनिसाइ'-अनिशादी एटले रात्रिए भोजन न करे ते, 'वियडभोई'
प्रगट प्रकाशमां एटले दिवसे ज पण रात्रिए नही, दिवसे पण प्रकाश विनाना स्थानने विपे भोजन न करे, ते
विकटभोजी कहेवाय छे, तथा 'मोलिकडे- 'धोतीयानो कच्छ बांधे नही ते. आ छठी प्रतिमा कहेवाय छे. अही
भावार्थ ए छ के--पांचे प्रतिमाने विपे कहेला अनुष्ठान सहित छ मास सुधी ब्रह्मचारी रहे, तेने आ छठी प्रतिमानुं
आराधन थाय छे ६ । तथा सचित्त आहार जेणे परिज्ञात एटले ते( सचित्त आहार )ना स्वरूपादिक जाणवाथकी त्याग
।॥ ४०॥

- 37.73 एवा एकला सम्यग्दर्शननो जे स्वीकार करयो ते पहेली प्रतिमा कहेवाय छे १ । तथा (वे मास सुधी) कयु छ अणुव्रता- दिकनुं श्रवण, मान, इच्छा अने स्वीकाररूप कर्म जेणे एटले समकित पामेला जे श्रावके ( बहुव्रीहि समाम ) ते कृवत्रतकर्मा' एटले अणुव्रतादिकने धारण करनार कहेवाय छे. ए पीजी प्रतिमा २। तथा सामायिक एटले सावध योगनो त्याग अने निरखद्य योग- सेवन जेणे देशथी कयु होय ते 'मामायिककृत ' कहेवाय छे. अहीं व्याकरणना आहिताग्नि० ' ए सूबे करीने 'त' प्रत्ययवाला (कर्मणि भूतकृदंत ) 'कृत ' शब्दने समाममा पहेलो न मूकतां पाछळ मृक्यो छे. आ प्रमाणे पौषध व्रत ग्रहण कर्या विना समकित अने अणुव्रतादिक महित एवो श्रावक व्रण मास सुधी हमेगां माज सवार बन्ने संध्याममय मामायिक कर ते त्रीजी प्रतिमा ३ । तथा पोपने एटले कुशळ धर्मनी पुष्टिने- आहारत्यागादिक अनुष्ठानने धारण करे ते पापध कराय , जावा पोपटे जे उपरसन एटले एक रात्रिदिवस सुधी रहे ते पौषधोपवान कहेबाय छे. अथवा पोपध एटले अष्टमी निगरे पर्वतिथि, तेने विप उपवास-अभक्तार्थ करवो त पाप- धोपवाम कवाय छे. आ तो मान व्युत्पत्ति ज करी एटले गमाम प्रमाणे शब्दार्थ कयो, पण आ शब्दनी प्रवृत्ति तो आहार, शरीरसत्कार, अनमचर्य (मैथुन) अने च्यापारनो त्याग करखो ने ज छ, आवा पौषधोपवामन विपे जे निरत-आमक्त होय ते 'पोपधोपवामनिरत' कवाय छे. पावकनी आ चोथी प्रतिमा कहंगाय ए प्रस्तुत छे. आनो भावार्थ ए छ के-पहेली व्रण प्रतिमा सहित श्रावक चार मान सुपी अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या अने पूर्णिमा ए चार पर्वतिथिए आहारपोपधादिक चार प्रकारना पापधनो स्वीकार करे, ते चोधी प्रतिमा फहमाय छे ४ तथा पाचमी प्रतिमाने विष अष्टम्यादिक पर्वतिथिए एक रात्रिनी

श्री
चोधु
अंग॥
समवायाङ्ग
सूत्र॥
॥३९॥
केटलाक नारकीओनी अग्यार सागरोपमनी स्थिति कही छे (२)। केटलाक असुरकुमार देवोनी अग्यार पल्योपमनी
स्थिति कही छे (३)। सौधर्म अने ईशान कल्पने विपे केटलाक देवोनी अग्यार पल्योपमनी स्थिति कही छे (४)।
लांतक कल्पमा केटलाक देवोनी अग्यार सागरोपमनी स्थिति कही छे (५)। जे देवो ब्रह्म, सुब्रह्म, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मप्रभ,
ब्रह्मकांत, ब्रह्मवर्ण, ब्रह्मलेश्य, ब्रह्मध्वज, ब्रह्मसृष्ट, ब्रह्मकूट अने ब्रह्मोत्तरावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय
ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति अग्यार सागरोपमनी कही छे. (६)।
ते देवो अग्यार अर्धमासने छेडे आन ले छे, प्राण ले छे, एटले उच्छ्वास ले छे, निःश्वास ले छ (१)। ते देवोने
अग्यार हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२)। एवा केटलाएक भवसिद्धिक जीवो छ के जेओ अग्यार भव ग्रहण
करवावडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे, परिनिर्वाण ( शीतळता) पामशे, अर्थात् सर्व दुःखना अंतने करशे (३)॥
टीकार्थः-हवे अग्यार स्थानक कहे छे, तेनो अर्थ पण सुगम छे. विशेप ए के-अही प्रतिमा विगेरेना अर्थवाळा सात
सूत्रो छे, अने स्थिति विगेरेना नव सूत्रो छ । तेमां साधुओनी जेओ उपासना करे एटले सेवा करे ते उपासको एटले
श्रावको कहेवाय छे, तेमनी प्रतिमा एटले अभिग्रहरूप जे प्रतिज्ञा ते उपासकप्रतिमा कहेवाय छे. तेमां दर्शन एटले समकित,
तेने अंगीकार करनार जे श्रावक ते दर्शन श्रावक कहेवाय छे. अहीं प्रतिमानो प्रस्ताव छतां पण प्रतिमा अने प्रतिमावा-
कानो अभेद उपचार करवाथी प्रतिमावाळा( श्रावक )नो निर्देश कयों छे. ए रीते उत्तरना (पछीना) दरेक पदोमां
जाणवू. आनो भावार्थ ए छे के-(एक मास सुधी) अणुव्रतादिक गुण (व्रतो) विना ज मात्र शंकादिक शल्य रहित
॥३९॥

१ , मूलार्थ:--श्रावकनी अग्यार प्रतिमाओ कही छ, ते आ प्रमाणे--समकितधारी श्रावक (समकित नामनी प्रतिमा) जेणे व्रतकर्म ग्रहण कयु होय ते २, जे हमेशा सामायिक करतो होय ते ३, पोपधोपवासमां आसक्त-तत्पर ४, दिवसे ब्रह्मचारी अने रात्रे जेणे (भोगर्नु) परिमाण कयुं होय ते ५, दिवसे अने रात्रे पण ब्रह्मचारी, स्नान रहित, प्रकाशमां भोजन करनार अने धोतीआनो कछोटो (काछडी ) न मारे ते ६, सचित्त आहारनो त्यागी ७, स्वयं (जाते-पोते) आरभनो त्यागी ८, प्रेष्यनो त्यागी ९, पोताने उद्देशीने करेला आहारनो त्यागी १० तथा श्रमणभूत (साधु जेवो) थाय ते ११. हे आयुष्मान श्रमण (जंवू ) ! आ अग्यार प्रतिमाधारी श्रावक जाणवो (१) तथा लोकांतथी अवाधावडे-व्यवधानवडे अर्थात् अग्यार सो ने अग्यार योजन अंदर आवीए त्यांथी ज्योतिपनी शरुआत थाय छे (२)। जंबूद्वीप नामना द्वीपने विपे मेरुपर्वतथकी अग्यार सो ने एकवीश योजन चारे बाजु जडए त्यांथी ज्योतिपचक्र चार चरे छे (३)। श्रमण भगवान् महावीरस्वामीने अग्यार गणधरो हता, ते आ प्रमाणे---इंद्रभूति, अग्निभूति, वायुभूति, व्यक्त, सुधर्मा, मंडित, मौर्यपुत्र, अकंपित, अचल- भ्राता, मेतार्य अने प्रभास (४) । मूळ नक्षत्रना अग्यार ताराओ कह्या छे (५) । नीचेना त्रण ग्रैवेयकमां वसता देवोना एक सो अग्यार विमानो छे एम मे कयु छ ( ६ )। मेरुपर्वत शिखर उपर पृथ्वीतळथी ऊंचाइना प्रमाणथी अग्यारमा भागे ओछा विष्कंभवाळो कह्यो छे, अर्थात् ९९ हजार योजन उंचो छ तेना अग्यारमे भागे ९००० आवे तेटलो ओछो एटले समभूतला उपर दश हजार योजन विष्कंभवाळो छे ते उपर एक हजार योजन रहे छे. (७) आ रत्नप्रभा पृथ्वीमा रहेला केटलाक नारकीओनी अग्यार पल्योपमनी स्थिति कही छ (१)। पांचमी पृथ्वीने विपे

श्री
समवायाङ्ग
चोथु
अंग॥
यत्र ।
॥३८॥
इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं एकारस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता
१। पंचमीए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं एक्कारस सागरोवमाई ठिई पन्नत्ता।असुरकुमाराणं
देवाणं अत्थेगइयाणं एकारस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता३। सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं
देवाणं एकारस पलिओवमाइंठिई पन्नत्ता। लंतए कप्पे अत्थेगइयाणं देवाणं एकारस सागरोवमाइं
ठिई पन्नत्ता ५ । जे देवा बंभं सुबंभं बंभावत्तं बंभप्पभं बंभकंतं बंभवण्णं बंभलेसंबंभज्झयं बंभ-
सिंगं बंभसिटुं बंभकूडं बंभुत्तरवळिसगं विमाणं देवत्ताए उबवण्णा तेसि णं देवाणं ( उक्कोसेणं)
एक्कारस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ ॥
ते णं देवा एकारसण्ह अद्धमासाणं आणमंति वा पाणमति वा ऊससंति वा नीससंति वा
१। तेसि णं देवाणं एक्कारसण्डं वाससहस्साणं आहारटे समुप्पजइ २ । संतेगइआ भवसिद्धिआ
जीवा जे एक्कारसहिं भवग्गहणेहिं सिज्झिस्सति बुज्झिस्संति मुच्चिस्संति परिनिवाइस्संति सवदु-
क्खाणमंतं करिस्संति ३ ॥ सूत्रम्-११ ॥
॥३८॥

पणुं, तेनुं कारण होवाथी अनग्न वृक्ष कहेवाय छे (८) । घोप विगेरे अग्यार विमाननां नामो छे (१४) ॥ (सूत्र--१० ॥) हवे अग्यार स्थानक कहे छे-- मू०-एकारस उवासगपडिमाओ पन्नत्ता, तं जहा-दसणसावए १, कयव्वयकम्मे २, सामा- इअकडे ३, पोसहोववासनिरए ४, दिया वंभयारी रत्ति परिमाणकडे ५, दिआ विराओ विवंभ- यारी असिणाई विअडभोई मोलिकडे ६, सचित्तपरिणाए ७, आरंभपरिणाए ८, पेसपरिणाए ९, उद्दिठ्ठभत्तपरिणाए १०, समणभूए ११ आवि भवइ समणाउसो १ । लोगंताओ इक्कारसएहिं एक्कारहिं जोयणसएहिं अवाहाए जोइसंते पण्णत्ते २। जंबूदीवे दीवे मंदरस्स पव्वयस्स एक्कारसहि एकवीसोहिं जोयणसएहिं अवाहाए जोइसे चारं चरइ ३ । समणस्स णं भगवओ महावीरस्स एक्कारस गणहरा होत्था, तं जहा-इंदभूई अग्गिभूई वायुभूई विअत्ते सोहम्मे मंडिए मोरियपुत्ते अकंपिए अयलभाए मेअजे पभासे ४ । मूले नक्खत्ते एकारसतारे पन्नत्ते ५ । हेट्ठिमगेविजयाणं देवाणं एकारसयमुत्तरं गेविजविमाणसतं भवइ ति मक्खायं ६ । मंदरे णं पवए धरणितलाओ सिहरतले एक्कारसभागपरिहीणे उच्चत्तेणं पन्नत्ते ७ ॥

चोथु
अंग ॥
श्री
समवायाङ्ग
सत्र।
॥३७॥
लोकने जाणवा माटे एटले लोकना ज्ञान माटे. वळी विशिष्ट ज्ञानथकी चित्तनी समाधि थाय ज छे, तेथी आ पांचमुं स्थान
जाणवू ५ । ए ज प्रमाणे अवधिदर्शननुं सूत्र पण जाणवं, आ छटुं स्थान जाणवू ६ । तथा ते माधुने पूर्वे नहीं उत्पन्न थयेलं
एवं मनपर्यव ज्ञान उत्पन्न थाय छे, शा माटे ? ते कहे छे-अढी द्वीप, वे समुद्रने विपे रहेला पर्याप्त संज्ञी पंचेंद्रिय जीवोना
मनमा रहेला भाव(पदार्थ)ने जाणवा माटे एटले मनना ज्ञान माटे, आ सातमुं स्थान जाणवू ७ । तथा ते साधुने पूर्व नहीं
उत्पन्न थयेलं केवळज्ञान उत्पन्न थाय छे. शा माटे ? ते कहे छे-केवळज्ञानवडे जे केवळ एटले परिपूर्ण जोवाय ते लोक (अने
अलोक) एटले लोकालोकस्वरूप तेने जाणवा माटे. वळी केवळज्ञान चित्तसमाधिनो भेद छ तेथी ते चित्तसमाधिनुं स्थान
कहेवाय छे. अहीं केवळीने मन होतुं नथी तेथी चित्तनो अर्थ चैतन्य लेवो. आ आठमुं स्थान थयु ८ | ए ज प्रमाणे केवळ-
दर्शननु सूत्र पण जाणवू. विशेप ए के अहीं 'जोवाने माटे' एम कहेवू. ए नवमुं स्थान थयु ९। तथा केवळीमरणवडे मरे
एटले केवळीमरण करे. शा माटे ? ते कहे छे-सर्व दुःखनो नाश करवा माटे. आ केवळीमरण सर्व स्थानोने विपे उत्तम
समाधिस्थान छे. ए दशमुं स्थान थयु १० । (२)। तथा अकर्मभूमिना एटले भोगभूमिमां उत्पन्न थयेला मनुष्योने दश
प्रकारना कल्पवृक्षो उपभोगपणाने माटे प्राप्त थयेला छे तेमां मत्तांग वृक्ष मदिराना कारणभूत छे. भृगांग वृक्ष भाजन
(वासण)ने आपनार छे. त्रुटितांग वृक्ष तूर्य( वाजिन )ना अंगने प्राप्त करनार छे, दीपशिख वृक्ष प्रदीपर्नु कार्य करनार
छे, ज्योति एटले अग्नि, तेनुं काम करनार ज्योतिवृक्ष छे, चित्रांग वृक्ष पुष्प आपनार छे, चित्ररस वृक्ष भोजन आपनार छे,
मण्यंग वृक्ष आभरण आपनार छे, गेहाकार वृक्ष भवन( गृह )पणाए करीने उपकार करनार छे, अनग्नत्व एटले वस्त्र सहित-
॥३७॥

स्वप्न जोवाथी ( साधुने) चित्तनी समाधि थाय छे, तेथी आ चित्तसमाधिनुं वीजुं स्थानक जाणवू २ तथा संज्ञान एटले संज्ञा, ते संज्ञा जो के हेतुवादोपदेशिकी, दृष्टिवादोपदेशिकी अने दीर्घकालिकोपदेशिकी एवा भेदवडे अनुक्रमे विकलेंद्रियने, सम्यग्दृष्टिने अने समनस्क( मनवाळा )ने होवाथी त्रण प्रकारनी छे, तो पण अहीं दीर्घकालिकोपदेशिकी संज्ञा ग्रहण कर- वानी छे, ते संज्ञा जेने होय ते संज्ञी एटले समनस्क (मन सहित ) कहेवाय छे. ते संज्ञीन जे ज्ञान ते संज्ञीज्ञान कहेवाय छ. आ संज्ञीज्ञान आ अधिकार करेला (चालता) सूत्रमा बीजी रीते घटी शकतुं नथी, तेथी जातिस्मरण ज्ञान ज लेवानुं छे. आधुं ज्ञान पूर्वे नही उत्पन्न थयेलं ते साधुने उत्पन्न थाय छे. शा माटे उत्पन्न थाय छ ? ते उपर कहे छे के--पूर्वना भवोने स्मरण करवा माटे. जेने पूर्व भवन स्मरण थयु होय तेने संवेग उत्पन्न थवाथी चित्तनी समाधि उत्पन्न थाय छे तेथी आ त्रीजुं समाधिस्थान जाणवू ३ । तथा ते साधुने पूर्वे नहीं उत्पन्न थयेलं एबुं देवतुं दर्शन थाय छेकारण के ते देवो ते साधुना गुणो जोवाथी तेने दर्शन आपे छे. शा माटे दर्शन आपे छे एटले ते दर्शननुं शुं फळ ? ते उपर कहे छे के- दिव्य-श्रेष्ठ देवर्द्धि-उत्तम परिवारादिक समृद्धिने, दिन्य देवद्युति-विशेष प्रकारनी (उत्तम) शरीर अने आभरणादिकनी कांति तथा दिव्य देवानुभाव-उत्तम वैक्रिय शरीर करवू ए विगेरे प्रभावने जोवा माटे एटले आ सर्व देखाडवा माटे ( देवो दर्शन आपे छे). देवना दर्शनथी आगमना अर्थने विपे दृढ श्रद्धा अने धर्मने विष बहुमान थाय छे अने तेथी चित्तनी समाधि थाय छे. आ प्रमाणे देवनुं दर्शन चित्तसमाधिनुं चोधुं स्थान जाणवू ४। तथा ते साधुने पूर्वे नहीं उत्पन्न थयेलं अवधिज्ञान उत्पन्न थाय छे. शा माटे उत्पन्न थाय छे ? ते उपर कहे छ के-नियमित (अमुक) द्रव्य, क्षेत्र, काळ अने भावरूप अवधिवडे-मर्यादावडे THI श्री चो) अंग॥ समवायाङ्ग सूत्र। साधु होय तेने ( ते साधुने ) " असमुत्पन्नपूर्वा "-पूर्व अनादि अतीत( भूत )काळने विपे नहीं उत्पन्न थयेली (धर्म- चिंता)उत्पन्न थाय छे. जो कदाच पूर्वे उत्पन्न थइ होय तो अपार्ध पुद्गलपरावर्त सुधीमां ते (साधु )नु अवश्य कल्याण ( मोक्षगमन ) थयु होय. तेथी पूर्व उत्पन्न नहीं थयेली धर्मचिंता उत्पन्न थाय छे, एम कडं. शा माटे आ (धर्मचिंता) उत्पन्न थाय ? ते उपर कहे छे के-सर्व एटले समग्र धर्म एटले जीवादिक पदार्थोनो स्वभाव, उपयोग, उत्पत्ति विगेरे अथवा श्रुतादिरूप धर्मने 'जाणित्तए '---ज्ञपरिज्ञावडे जाणवाने माटे तथा जाणीने प्रत्याख्यानपरिज्ञावडे त्याग करवा लायक कर्मनो त्याग करवा माटे. अर्थात् धर्मना ज्ञाननी कारणभूत एवी धर्मचिता उत्पन्न थाय छे. आ ( धर्मचिता) उपर कहेली समाधिनुं उपर कहेल लक्षणवालं स्थानक थाय छे. आ प्रथम स्थान जाणवू १ । तथा स्वप्ननुं एटले निद्राने आधीन थयेला संकल्प-विकल्पना ज्ञान, दर्शन एटले अनुभवq ते स्वमदर्शन कहेवाय छे. आq कल्याण (मोक्ष)नी प्राप्तिने सूचन करनारुं पूर्वे नही उत्पन्न थयेलं स्वप्नदर्शन उत्पन्न थाय छे, ते जेम भगवान महावीरस्वामीए अस्थिक गाममां शूलपाणि यक्षे करेला उपसर्गने छेडे (काइक नेत्र वींचाता) जोयुं हतुं. शा माटे आई स्वप्नदर्शन थाय ? ते उपर कहे छे-जे प्रकारे सत्य होय ते प्रकारे एटले सर्वथा व्यभिचार दोप रहित एवा ते स्वप्नना फळने जोवा-जाणवा माटे एटले के अवश्य थनार मुक्ति विगेरे शुभ स्वप्नना फळने जोवा माटे साधुने तेवू स्वप्नदर्शन थाय छे. कोइ पुस्तकमां 'सुमिणं'ने ठेकाणे सुजाणं ' एवो पाठ छे. त्यां आवो अर्थ करवो--सत्य अने अवश्य थनार 'सुयानं '-सुगतिने जोवा माटे-जाणवा माटे, अथवा 'सुज्ञानं '-थनार शुभ अर्थना ज्ञाननो अनुभव करवा माटे आवं स्वप्न आवे छे. वळी कल्याणने सूचवनार सत्य - स्थिति दश सागरोपमनी कही छे (१३)। जे देवो घोप, सुघोप, महाघोप, नंदिधोप, सुस्वर, मनोरम, रम्य, रम्यक, रमणीय, मंगलावर्त अने ब्रह्मलोकावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय, ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति दश सागरोपमनी कही छे (१४)॥ ते देवो दश अर्धमासे ( दश पखवाडीए ) आन ले छे, प्राण ले छे, एटले उच्वास ले छे, निःश्वास ले छे (१)। ते देवोने दश हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२) एवा केटलाक भवसिद्धिया जीवो छे के जेओ दश भव ग्रहण करवावडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, मुक्त थशे, परिनिर्वाण ( परम शीतळता ) पामशे, अर्थात् सर्व दुःखनो अंत करशे. (३)। टीकार्थ-आ दश स्थानकनुं सूत्र सुवोध छे, तो पण काइक लखाय छे-अही सर्व मळीने पचीश सूत्रो छे. तेमां लाघव एटले द्रव्यथी अल्प उपधि राखवी ते अने भावथी गौरव( ऋद्धि, रस अने साता गौरव )नो त्याग करवो ते. तथा त्याग एटले सर्व संगनुं वर्जवं अथवा संविग्न अने मनोज्ञ साधुने दान आपq ते, तथा ब्रह्मचर्यवडे जे रहे ते ब्रह्मचर्यवास कहेवाय छे (१)। तथा चित्त एटले मननी समाधि एटले समाधान अर्थात् प्रशातता, तेना स्थानो एटले आश्रय अथवा भेदो ते चित्तसमाधिस्थानो कहेवाय छे, तेमां धर्मों एटले जीवादिक पदार्थोना उपयोग, उत्पत्ति विगेरे स्वभावो, तेमनी चिंता एटले विचार, अथवा तो सर्वज्ञे कहेलो श्रुतचारित्ररूप धर्म हरिहरादिकना कहेला धर्मथकी प्रधान-उत्तम छ एम जे विचार, ते धर्मचिंता कहेवाय छे. अहीं ' वा ' शब्द लख्यो छे ते आगळ कहेवाशे एवा वीजा समाधिस्थाननी अपेक्षाए विकल्प (अथवा )ना अर्थवाळो छ (एज प्रमाणे सर्व 'वा' शब्दो जाणवा). ' से ' एटले जे कल्याणने भजनार ( उत्तम )

श्री
समवायाङ्ग
जो,
अंग॥
सूत्र॥
॥३५॥
छे (३) श्री अरिष्टनेमि अरिहंत भगवान ऊर्ध्व ऊंचाइमां दश धनुष हता (४) कृष्ण वासुदेव ऊर्ध्व ऊंचाइमा दश धनुष हता
(५)। राम बळदेव ऊर्ध्व ऊंचाइमां दश धनुप हता (६) दश नक्षत्रो ज्ञाननी वृद्धि करनार कह्या छे, ते आ प्रमाणे-" मृगशीर्ष,
आर्द्रा, पुष्य, त्रण पूर्वा, मूळ, अश्लेपा, हस्त अने चित्रा आ दश नक्षत्रो ज्ञाननी वृद्धि करनारा छे १.” (७) । अकर्मभूमिमां
रहेला मनुष्योने उपभोगने माटे दश प्रकारना कल्पवृक्षो प्राप्त थयेला कह्या छे, ते आ प्रमाणे-" मत्तांगक, भृगांग,
त्रुटितांग, दीपशिख, ज्योति, चित्रांग, चित्ररस, मण्यंग, गेहाकार अने अनग्न ॥ १ ॥(८)
आ रत्नप्रभा पृथ्वीने विषे [ केटलाक ] नारकीओनी जघन्य दश हजार वर्षनी स्थिति कही छे (१)। आ रत्नप्रभा
पृथ्वीने विपे केटलाक नारकीनी दश पल्योपमनी स्थिति कही छे (२)। चोथी पृथ्वीमां दश लाख नरकावासा कह्या
छ (३)। चोथी पृथ्वीमां [ केटलाक ] नारकीओनी उत्कृष्टथी दश सागरोपमनी स्थिति कही छे (४)। पांचमी पृथ्वीने
विपे [ केटलाक ] नारकीओनी जघन्यथी दश सागरोपमनी स्थिति कही छे (५)। [ केटलाक ] असुरकुमार देवोनी जघ-
न्यथी दश हजार वर्पनी स्थिति कही छे (६)। असुरेद्रने वर्जीने [ केटलाक ] भवनपति देवोनी जघन्यथी दश हजार
वर्षनी स्थिति कही छे (७)। केटलाक असुरकुमार देवोनी दश पल्योपमनी स्थिति कही छे (८) । चादर (प्रत्येक )
वनस्पतिकायनी उत्कृष्ट स्थिति दश हजार वर्पनी कही छे (९)। [ केटलाक ] वाणव्यंतर देवोनी जघन्य स्थिति दश
हजार वर्पनी कही छे (१०)। सौधर्म अने ईशान कल्पने विपे केटलाक देवोनी दश पल्योपमनी स्थिति कही छे (११)।
ब्रह्मलोक कल्पमां देवोनी उत्कृष्ट स्थिति दश सागरोपनी कही छे (१२)। लांतक कल्पमां [ केटलाक ] देवोनी जघन्य
॥३५॥

- मूलार्थ-दश प्रकारनो साधुधर्म कह्यो छे, ते आ प्रमाणे-क्षांति १, मुक्ति (निर्लोभता )२, आर्जव ३, मार्दव ४, लाघव (अकिंचन) ५, सत्य ६, संयम ७, तप ८, त्याग (दान) ९, ब्रह्मचर्यवास १० (१) । दश चित्तनी समाधिना स्थानो कह्या छे, ते आ प्रमाणे--ते(साधु)ने सर्व धर्म जाणवाने माटे कोइ वखत पूर्वे (जन्मांतरोमां ) उत्पन्न नही थयेली एवी धर्मचिंता (धर्म संबंधी विचार ) उत्पन्न थाय ते १, स्वप्ननुं साचेसाचं फळ जोवाने-जाणवाने माटे तेने कोइ वखत पूर्वे उत्पन्न नही थयेलं स्वप्नदर्शन उत्पन्न थाय ते २, पूर्वभवन स्मरण करवा माटे तेने कोइ वखत पूर्वे नही उत्पन्न थयेलं एवं संज्ञीज्ञान ( जातिस्मरण ज्ञान ) उत्पन्न थाय ते ३, दिव्य देवनी समृद्धिने, दिव्य देवनी कांतिने अने दिव्य देवना अनुभा- वने जोवा माटे तेने कोइ वखते पूर्व उत्पन्न नही थयेलं एवं देवनुं दर्शन थाय ते ४, जवधि(मर्यादा )वडे लोकने जाणवा माटे तेने पूर्वे कोइ वखत उत्पन्न नही थयेलं एवं अवधिज्ञान उत्पन्न थाय ते ५, अवधिवडे लोकने जोवा माटे तेने कोइ वखत पूर्वे उत्पन्न नही थयेलं एवं अवधिदर्शन उत्पन्न थाय ते ६, यावत् एटले अढीद्वीप अने वे समुद्रमा रहेला संज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्तकना मनमा रहेला भाव(विचार)ने जाणवा माटे तेने कोइ वखत पूर्वे उत्पन्न नही थयेलं एवं मनपर्यवज्ञान उत्पन्न थाय ते ७, सर्व लोकने ( तथा अलोकने पण ) जाणवा माटे तेने कोइ वखत पूर्व उत्पन्न नही थयेलं एवं केवळज्ञान उत्पन्न थाय ते ८, समग्र लोकने (तथा अलोकने पण) जोवा माटे तेने कोइ वखत पूर्वे उत्पन्न नहीं थयेलं केवळ- दर्शन उत्पन्न थाय ते ९, सर्व दुःखोनो क्षय करवा माटे ते (पूर्वे कोइ वखत नही थयेला) केवळी मरणवडे मरण पामे (सिद्ध थाय ) ते १० । (२)। मंदर (मेरु)पर्वतनो विष्कंभ (विस्तार) मूळने विपे (समभूतळा पृथ्वी उपर) दश हजार योजन कह्यो

चोधुं
अंग ॥
श्री
समवायाङ्ग
सूत्र ॥
शा
॥३४॥
कुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं दस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ।८। बायरवणस्सइकाइयाणं उक्को-
सेणं दस वाससहस्साइं ठिई पन्नत्ता । ९ । वाणमंतराणं देवाणं [अत्थेगइयाणं] जहणणेणं दस
वाससहस्साई ठिई पन्नत्ता । १० । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं दस पलिओव-
माइं ठिई पन्नत्ता । ११ । वंभलोए कप्पे देवाणं उक्कोसेणं दस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता । १२ ।
लांतए कप्पे देवाणं [ अत्थेगइयाणं ] जहणणेणं दस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता । १३ । जे देवा
घोसं सुघोसं महाघोसं नंदिघोसं सुसरं मणोरमं रम्मं रम्मगं रमणिजं मंगलाव बंभलोगवडिं-
सगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं देवाणं उक्कोसेणं दस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता । १४ ।
ते णं देवा दसण्हं अद्धसासाणं आणमंति वा पाणमति वा ऊससंति वा नीससंति वा । १ ।
तेसि णं देवाणं दसहिं वाससहस्सोहिं आहारटे समुप्पज्जइ । २। संतेगइआ भवसिद्धिआ जीवा
जे दसहिं भवग्गहणहिं सिज्झिस्सांत बुज्झिस्संति मुच्चिस्संति परिनिव्वाइस्संति सव्वदुक्खाणमंतं
करिस्संति । ३ ॥ सूत्रम्-१० ॥
॥३४॥

" वुड्डिकराइ नाणस्स ॥१॥ ।७। अकम्मभूमियाणं मणुआणं दसविहा रुक्खा उवभोगत्ताए उवत्थिया पन्नत्ता, तं जहा-" मत्तंगया य भिंगा, तुडिअंगा दीवजोइ चित्तंगा । चित्तरसा मणि- अंगा, गेहागारा अनिगिणा य ॥१॥" ॥ ८॥ इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए [ अत्थेगइयाणं ] नेरइयाणं जहणणेणं दस वाससहस्साई ठिई पन्नत्ता । १ । इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं दस पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता । २ । चउत्थीए पुढवीए दस निरयावाससयसहस्साइ पन्नत्ता । ३ । चउत्थीए पुढ- वीए [अत्थेगइयाणं] उक्कोसेणं दस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता । ४ । पंचमीए पुढवीए [ अत्थे- गइयाणं ] नेरइयाणं जहणणेणं दस सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता । ५। असुरकुमाराणं देवाणं [अत्थेगइयाणं] जहण्णेणं दस वाससहस्साइं ठिई पन्नत्ता । ६ । असुरिंदवज्जाणं भोमि- जाणं देवाणं [अत्थेगइआणं ] जहणणेणं दस वाससहस्साइं ठिई पन्नत्ता । ७ । असुर- १ काटखूण काउंसमा लखेल पाठ लखेली प्रतमा नथी. ते पाठनी जरूरीआत पण जणाती नथी.

1
19.1
श्री
समवायाग
सूत्र॥
चो)
अंग ॥
|॥३३॥
समुप्पजिज्जा अहातच्चं सुमिणं पासित्तए २, सपिणनाणे वा से असमुप्पण्णपुल्वे समुप्पजिज्जा पुव्वभवे
सुमरित्तए ३, देवदंसणे वा से असमुप्पण्णपुवे समुप्पजिज्जा दिवं देविद्धिं दिव्वं देवजुइं दिव्वं देवाणु-
भावं पासित्तए ४, ओहिनाणे वा से असमुप्पण्णपुव्वे समुप्पजिज्जा ओहिणा लोग जाणित्तए ५,
ओहिदसणे वा से असमुप्पण्णपुब्वे समुप्पजिजा ओहिणा लोगं पासित्तए ६, मणपज्जवनाणे
वा से असमुप्पण्णपुव्वे समुप्पजिज्जा जाव मणोगए भावे जाणित्तए ७, केवलनाणे वा से अस-
मुप्पण्णपुव्वे समुप्पजिज्जा केवलं लोगं जाणित्तए ८, केवलदंसणे वा से असमुप्पण्णपुब्वे
समुप्पजिज्जा केवलं लोयं पासित्तए ९, केवलिमरणं वा मरिजा सबदुक्खप्पहीणाए १० । २ ।
मंदरे णं पबए मूले दस जोयणसहस्साइं विक्खंभेणं पन्नत्ता । ३ । अरिहा णं अरिटुनेमी दस
धणूइं उद्धं उच्चत्तेणं होत्था । ४ । कण्हे णं वासुदेवे दस धणूइं उढे उच्चत्तेणं होत्था । ५ । रामे
णं बलदेवे दस धणूइं उद्धं उच्चत्तेणं होत्था । ६। दस नक्खत्ता नाणवुड्डिकरा पन्नत्ता, तं
जहा-" मिगसिर अद्दा पुस्सो, तिपिण अ पुव्वा य मूलमस्सेसा । हत्थो चित्तो य तहा, दस
॥३३॥

. होय ते बहुसम कहेवाय छे, तेथी करीने ज रमणीय-मनोहर एवा भूमिभागथकी एटले पर्वतनी अपेक्षाए नही, तेम ज नरकनी अपेक्षाए पण नही, परंतु आठ रुचकनी अपेक्षाए (आ भूमिभाग) जाणवो ए तात्पर्यार्थ छे. (आवा भूमिभाग थकी नव सो योजन ऊंचे ) 'आवाहाए' एटले वच्चे करीने 'उवरिल्ले एटले उपर रहेला 'तारारूप' एटले तारानी जाति 'चार एटले भ्रमणने करे छे (३) ॥ अर्थात् आ समभूतळा पृथ्वीथी ९०० योजन सुधीमा-तेनी अंदर ज्योतिप्चक्र भ्रमण करे छे. 'नवजोयणिया' एटले नव योजन लांबा ज मत्स्यो जंबूद्वीपमा प्रवेश करे छे. जो के लवणसमुद्रमां पांच सो योजन लांबा मत्स्यो संभवे छे, तो पण नदीओना मुखने विपे जगतीना रध्र(वांका)नी योग्यता प्रमाणे आवा (नव योजनना) ज प्रवेश करी शके छ एम जाणवू. अथवा लोकस्वभाव ज आवो छे, एम जाणवू (१)। जंबूद्वीपमा पूर्व दिशाए रहेला विजयद्वारनी एक एक वाहाए एटले पडखे भौम एटले भूमिमा रहेला नगरो अथवा अन्यना मते विशिष्ट स्थानो रहेला छे (२)। तथा व्यंतरोनी सुधर्मा सभा नव योजन ऊर्ध्वपणे ऊंची छे (३)॥ तथा पक्ष्म विगेरे वार, सूर्य विगेरे पण वार अने रुचिर विगेरे अग्यार विमानना नामो छ (६)॥ सूत्र ९ ॥ हवे दश स्थानक कहे छे. मू-दसविहे समणधम्मे पन्नत्ते, तं जहा-खंती १ मुत्ती २ अजवे ३ मद्दवे ४ लाघवे ५ सच्चे ६ संजमे ७ तवे ८चियाए ९ बंभचेरवासे १०।१। दस चित्तसमाहिट्ठाणा पन्नत्ता, तं जहा-धम्मचिंता वा से असमुप्पण्णपुवा समुप्पजिज्जा सवं धम्मं जाणित्तए १, सुमिणदसणे वा से असमुप्पण्णपुवे

.
श्री
चो|
अंग॥
समवायाङ्गा
सूत्र।
॥३२॥
करनार होवाथी तेमां मनोहर अने रमणीयपणुं होवाथी मनोरम एवा इंद्रियोने जोनार अने ध्यान करनार एटले एकाग्र चित्त.
पणाए करीने जोनार न होय, ते चोथी ४, प्रणीतरसभोजी एटले घी विगेरे रसना टीपा पडता होय तेवा भोजनने करनार न
होय, ए पांचमी ५, पान-भोजननु अतिमात्र एटले अतिप्रमाण जेम होय तेम सदा आहार करनार न होय ए छठी ६, पूर्वनी
क्रीडाने स्मरण करनार न होय, तेमां रत एटले मैथुन अने क्रीडित एटले स्त्रीओनी साथे वीजी क्रीडा, ते करनार न होय
ए सातमी ७, शब्दानुपाती न होय, रूपानुपाती न होय, गंधानुपाती न होय, रसानुपाती न होय, स्पर्शानुपाती न होय
अने श्लोकानुपाती न होय, एटले कामने उद्दीपन करनार शब्द, रूप विगेरेने तथा पोतानी कीर्तिने अनुसरनार न होय, ते
आठमी ८ तथा सातसौख्यप्रतिवद्ध-उदयमां आवेला सातवेदनीय कर्मथकी (प्राप्त थयेल) जे सुख, तेना प्रतिवंधवाळो न होय.
आ कहेवाथी प्रशमसुखनो नाश न कह्यो, ते नवमी गुप्ति छे ९. आ व्याख्यान वे वाचनाने अनुसारे कयुं छे, केमके दरेक
(बन्ने ) वाचनाना सूत्रो एवा ज (सरखा ज) छे (१) । तथा जे कुशळ अनुष्ठान ते ब्रह्मचर्य कहेवाय छे, तेने कहेनारा
अध्ययनो पण ब्रह्मचर्य ज कहेवाय छे. ते ( अध्ययनो) आचारांग सूत्रना प्रथम श्रुतस्कंधमां कहेला छे (३) ।।
तथा अभिजित् नक्षत्र साधिक नव मुहूत्ततॊ सुधी चंद्रनी साथे योगने-संबंधने करे छे. अही जे अधिकपणुं कडं ते एक
मुहूर्त्तना बासठीया २४ भाग (३) तथा एक बासठीया भागना ६७ भाग करीए तेमांथी ६६ भाग (६६) जेटलं
अधिक जाणवू (१)। तथा अभिजित् विगेरे नव नक्षत्री चंद्रनी उत्तरदिशाए संबंधने करे छे एटले के उत्तरदिशामा रहेला
ते नक्षत्रो दक्षिणदिशा तरफ रहेला चंद्रनी साथे संबंध करे छे (२)। (आ रत्नप्रभा पृथ्वीना) अत्यंत समान भाग जे
॥ ३२॥

ध्वज, पक्ष्मशृंग, पक्ष्मशिष्ट, पक्ष्मकूट, पक्ष्मोत्तरावतंसक, सूर्य, सुसूर्य, सूर्यावर्त, सूर्यप्रभ, सूर्यकांत, सूर्यवर्ण, सूर्य- लेश्य, सूर्यध्वज, सूर्यशृंग, सूर्यशिष्ट, सूर्यकूट, सूर्योत्तरावतंसक, रुचिर, रुचिरावर्त, रुचिरप्रभ, रुचिरकांत, रुचिरवर्ण, रुचिर- लेश्य, रुचिरध्वज, रुचिरशृंग, रुचिरशिष्ट, रुचिरकूट, रुचिरोत्तरावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय ते देवोनी नव सागरोपमनी स्थिति कही छे (६) । ते देवो नव अर्धमासने अंते ( नव पखवाडिये ) आन ले छे, प्राण ले छे, एटले उच्छ्वास ले छे, निःश्वास ले छे (१)। ते देवोने नव हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२) । एवा केटलाक भवसिद्धिक ( भव्य ) जीवो छे के जेओ नव भवने ग्रहण करवावडे सिद्ध थशे यावत् सर्व दुःखनो अंत करशे (३)॥ टीकार्थ-आ नव स्थानकनुं सूत्र पण सुगम छे. विशेप ए के-अहीं ब्रह्मगुप्ति, ते( ब्रह्म )नी अगुप्ति, ब्रह्मचर्य अध्य- यन अने पार्श्वनाथ संबंधी चार सूत्रो छे, ज्योतिष्कने माटे त्रण सूत्रो छे, मत्स्य, नगर, सभा अने दर्शनावरणने माटे चार सूत्रो छे, तथा स्थित्यादिकने अंगे ते ज प्रमाणे एटले स्थितिना संबंधमा छ अने उच्छ्वासादिकना त्रण सूत्रो छ । तेमां ब्रह्मचर्यनी गुप्तिओ एटले मैथुननी विरतिने रक्षण करवाना उपायो ( ते नव गुप्तिओ आ प्रमाणे )-स्त्री, पशु अने नपुंसकवडे संसक्त एटले व्याप्त-सहित एवा शय्या आसनने एटले शयन अने आसनने अथवा वसति ( उपाश्रय ) अने आसनने सेवनार न थाय ( सेवे नही ) ए पहेली गुप्ति १, स्त्रीनी कथा कहेनार न थाय, ए बीजी २, स्त्रीओना समू- हने सेवनार एटले उपासक ( निरंतर परिचयवाळो ) न थाय, ए त्रीजी ३, स्त्रीओना नेत्र नासिका विगेरे चित्तनुं आकर्षण

श्री
समवायाङ्ग
चोथु
अंग॥
सूत्र ।।
अभिजित् नक्षत्र साधिक नव मुहूर्त सुधी चंद्रनी साथे योग( संबंध )ने पामे छे (१)। अभिजित् विगेरे नव नक्षत्रो
चंद्रनी साथे उत्तर दिशामां योगने पामे छे, ते नक्षत्रो आ छे-अभिजित् , श्रवण, यावत् भरणी (२)। आ रत्नप्रभा
पृथ्वीना अति सरखा अने रमणीय भूमिभागथकी नव सो योजन ऊर्ध्वलोकमां एटले उपला भागमा (नव सो योजन
ऊंचे जइए त्यांसुधी) ताराओ चारने चरे छे ( चाले छे-गति करे छे-रहेला छे )(३)॥
जंबूद्वीप नामना द्वीपमा ( लवणसमुद्रमांथी) नव योजन प्रमाणवाळा मत्स्यो प्रवेश करता हता, ( प्रवेश करे छे
अने प्रवेश करशे ) (१)। विजयद्वारनी एक एक वाहाने विपे (वे पडखे ) नव नव भौम एटले नगरो (भूमिगृहो)
कहेला छे (२)। वानव्यंतर देवोनी सुधर्मा नामनी सभाओ नव योजन ऊर्ध्व ऊंची कही छे (३)। दर्शनावरणीय
कर्मनी नव उत्तरप्रकृतिओ कही छे, ते आ प्रमाणे-निद्रा, प्रचला, निद्रानिद्रा, अचलाप्रचला, स्त्यानद्धि, चक्षुदर्शनावरण,
अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण अने केवळदर्शनावरण (४)॥
आ रत्नप्रभा पृथ्वीने विषे केटलाक नारकीओनी नव पल्योपमनी स्थिति कही छे (१) । चोथी पृथ्वीने विषे केटलाक
नारकीओनी नव सागरोपमनी स्थिति कही छे (२) । केटलाक असुरकुमार देवोनी नव पल्योपमनी स्थिति कही छे (३) ।
सौधर्म अने ईशान कल्पमा केटलाक देवोनी नव पल्योपमनी स्थिति कही छे (४) । ब्रह्मलोक कल्पने विपे केटलाक देवोनी
नव सागरोपमनी स्थिति कही छे (५)। जे देवो पक्षम, सुपक्ष्म, पक्ष्मावर्त, पक्ष्मप्रभ, पक्ष्मकांत, पक्ष्मवर्ण, पक्ष्मलेश्य, पक्ष्म-
१ ज्योतिपचक्र समभूतलाथी सात सो नेवुथी नव सो योजन सुधीमा ज छे.
ॐ
॥३१॥

तेसि णं देवाणं नवहिं वाससहस्सेहिं आहारटे समुप्पज्जइ २ । संतेगइया भवसिद्धिया जीवा जे नवहिं भवग्गहणेहिं सिज्झिस्संति जाव सवदुक्खाणमंतं करिस्संति ३ ॥ सूत्रं-९॥ मूलार्थ-ब्रह्मचर्यनी गुप्तिओ नव कही छे, ते आ प्रमाणे स्त्री, पशु अने नपुंसकना संबंधवाळा शय्या अने आसनने सेवनार न थाय-सेवे नहीं १, स्त्रीओनी कथा कहेनार थाय नही-कहे नही २, स्त्रीओना समूहने सेवनार थाय नही ३, स्त्रीओना मनोहर अने मनोरम इंद्रियोने (अगोपागोने ) जोनार अने ध्यान करनार थाय नही ४, प्रणीत (घी-दूधवाळा) रसनु भोजन करनार थाय नही ५, प्रमाणथी अधिक पान-भोजननो आहार करनार थाय नहीं ६, पूर्व स्त्रीनी साथे करेला मैथुन के वीजी क्रीडाने स्मरण करनार थाय नही ७, शब्दानुपाती (कामने उद्दीपन करनारा शब्दने अनुसरनारो) न थाय, एज रीते रूपानुपाती न थाय, गंधानुपाती न थाय, रसानुपाती न थाय, स्पर्शानुपाती न थाय अने श्लोकानुपाती ( पोतानी कोई श्लाघा करे तेने अनुसरनार अथवा पोते पोतानी श्लाघाने अनुसरनार ) न थाय ८, तथा साता-सुखना प्रतिबंधवाळो न थाय ९ (१)। ब्रह्मचर्यनी अगुप्तिओ पण नव कही छे, ते आ प्रमाणे-स्त्री, पशु अने नपुंसकना संबंधवाळा शय्या अने आसनने सेवनार थाय, यावत् साता-सुखना प्रतिबंधवाळो थाय (२)। नव ब्रह्मचर्य (ना अध्ययनो) कह्या छ, ते आ प्रमाणे-" शास्त्रपरिज्ञा, लोकविजय, शीतोष्णीय, सम्यक्त्व, यावती, धुत, विमोहायण, उपधानश्रुत अने महापरिज्ञा ॥१॥" (३)। पुरुषोना मध्यमा आदेयनामकर्मवाळा ( मानवा लायक ) श्रीपार्श्वनाथ अरिहंत नव रत्नि (हाथ ) ऊर्ध्व ऊंचाइपणे हता (४)॥ ६

श्री
समवायाङ्ग
सूत्र॥
चो)
अंग ।।
वरणे केवलदसणावरणे । ४ ।
इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं नव पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता १ ।
चउत्थीए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं नव सागरोवमाई ठिई पन्नत्ता २। असुरकुमाराणं
देवाणं अत्थेगइयाणं नव पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ३ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं
देवाणं नव पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । बंभलोए कप्पे अत्थेगइयाणं देवाणं नव सागरोवमाई
ठिई पन्नत्ता ५ । जे देवा पम्हं सुपम्हं पम्हावत्तं पम्हप्पभं पम्हकंतं पम्हवण्णं पम्हलेसं पम्हज्झयं
पम्हसिंगं पम्हसिटुं पम्हकूडं पम्हुत्तरवडिंसगं सुजं सुसुजं सुजवित्तं सुजपभं सुज्जकंतं सुज्जवण्णं
सुज्जलसं सुजज्झयं सुज्जसिंगं सुजसिटुं सुज्जकूडं सुज्जुत्तरवळिसगं रुइल्लं रुइल्लावत्तं रुइल्लप्पभं रुइ-
ल्लकंतं रुइल्लवणं रुइल्ललेसं रुइल्लज्झयं रुइल्लसिंगं रुइल्लसिटुं रुइल्लकूडं रुइल्लुत्तरवडिंसगं विमाणं
देवत्ताए उववण्णा तेर्सि णं देवाणं नव सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ ॥
ते णं देवा नवण्हं अद्धमासाणं आणमंति वा पाणमंति वा ऊससंति वा नीससंति वा १।
॥३०॥

जहा-इत्थीपसुपंडगसंसत्ताणं सिज्जासणाणं सेवणया जाव सायासुक्खपडिबद्धे यावि भवइ ।२ । नव बंभचेरा पन्नत्ता, तं जहा-सत्थपरिपणा लोगविजओ सीओसणिज्ज सम्मत्तं । आवंति धुत विमोहा [यणं] उवहाणसुयं महपरिण्णा ॥१॥३। पासे णं अरहा पुरिसादाणीए नव रयणीओ उद्धं उच्चत्तेणं होत्था ४ ॥ अभीजी नक्खत्ते साइरेगे नव मुहुत्ते चंदेणं सद्धिं जोगं जोएइ १ । अभीजियाइया नव नक्खत्ता चंदस्स उत्तरेणं जोगंजोएंति, तं जहा-अभीजि सवणो जाव भरणी २ । इमीसेणं रयण- प्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ नव जोयणसए उद्धं आवाहाए उवरिल्ले तारा- रूवे चारं चरइ ३। जंबुद्दीवे णं दीवे नवजोयणिआ मच्छा पविसिंसु वा ३ । १ । विजयस्त णं दारस्स एगमे- गाए वाहाए नव नव भोमा पन्नत्ता। २ । वाणमंतराणं देवाणं सभाओ सुहम्माओ नव जोयणाई उद्धं उच्चत्तेणं पन्नत्ता । ३ । दंसणावरणिज्जस्स णं कम्मरस नव उत्तरपगडीओ पन्नचा, तं जहा- निद्दा पयला निद्दानिद्दा पयलापयला थीणद्धी चक्खुदंसणावरणे अचक्खुदसणावरणे ओहिदसणा-

श्री
चोएं
अंग।
समवाया
॥२९॥
तेमां ते आठेना नाम वताव्या छ (८) । तथा आठ नक्षत्रो चंद्रनी साथे प्रमर्दने एटले चंद्र तेओनी मध्ये थइने गति करे
छे एवा प्रकारना योगने-संबंधने करे छे. आ विपे लोकश्री नामना ग्रंथमां कयुं छे के-" पुनर्वसु, रोहिणी, चित्रा, मघा,
ज्येष्ठा, अनुराधा, कृत्तिका अने विशाखा-आ आठ नक्षत्री चंद्रना उभय योगवाळा छे. " वळी जे नक्षत्रो दक्षिण अने उत्तर
ए बन्ने दिशाना योग( संबंध )वाळा होय ते नक्षत्रो कोइक वखत प्रमर्द योगवाळा पण होय छे. ते वावतमां लोकश्रीनी
टीका करनारे कह्यु छ के-" आ नक्षत्रो उभय योगवाळा एटले चंद्रनी उत्तर अने दक्षिण दिशाए जोडाय छे-संबंध पामे
छे. अने कदाचित् चंद्रवडे करीने भेदने पण पामे छे (९)॥ तथा अर्चि विगेरे अग्यार विमाननां नामो छे. (६) ।
सूत्र-८॥
हवे नव स्थानक कहे छ-
मू०-नव वंभचेरगुत्तीओ पन्नत्ताओ, तं जहा-नो इत्थीपसुपंडगसंसत्ताणि सिज्जासणाणि
सेवित्ता भवइ १, नो इत्थीणं कहं कहित्ता भवइ २, नो इत्थीणं गणाई सेवित्ता भवइ ३, नो
इत्थीणं इंदियाणि मणोहराई मणोरमाइं आलोइत्ता निज्झाइत्ता भवइ ४, नो पणीयरसभोई ५,
नो पाणभोयणस्स अइमायाए आहारइत्ता ६, नो इत्थीणं पुवरयाइं पुव्वकीलिआई समरइत्ता
भवइ ७, नो सद्दाणुवाई नो रूवाणुवाई नो गंधाणुवाई नो रसाणुवाई नो फासाणुवाई नो सिलो-
गाणुवाई ८, नो सायासोक्खपडिवद्धे यावि भवइ ९ । १ । नव वंभचेर अगुत्तीओ पन्नत्ताओ तं
॥२९॥

आश्रीने ज ) पोतानो लाभ पामी शके छे, तेम संघ पण माताने नहीं मूकतो सतो ज संघपणाने पामे छे, अन्यथा पामतो नथी, तेथी ईर्यासमिति विगेरे प्रवचन माताओ कहेवाय छे. (२)। तथा व्यंतर देवोना चैत्यवृक्षो तेमना नगरोमां सुधर्मादिक सभानी पासे रहेली मणिपीठिकानी उपर सर्व रत्नमय तथा छत्र, चामर अने ध्वजादिकथी अलंकृत (सुशोभित ) होय छे. ते वृक्षो वे श्लोकोवडे आ प्रमाणे जाणवा-"पिशाचोना चैत्यवृक्ष कलंब नामना छ, यक्षोना वट नामना छे, भूतोना तुलसी नामना छ, राक्षसोना कंडक नामनाछे, किन्नरोना अशोक नामना छ, किपुरुपना चंपक नामना छ, भुजंगोना नाग नामे छे अने गंधर्वोना चैत्यवृक्ष तुंवरु नामना छे." (३) । जंबू एटले उत्तरकुरुमां पृथ्वीना परिणामवाळो जंबूवृक्ष छे तेनुं नाम सुदर्शना छे (तेनी उपर सुस्थितदेवनो आवास छे) (४)। एज प्रमाणे कूटशाल्मली पण वृक्षविशेप छे, ते देवकुरुने विपे रहेलो छे, तेनी उपर गरुडनी जातिवाला वेणुदेव नामना देवनो आवास छ (५)। जगती एटले जंबूद्वीपरूपी नगरना किल्ला जेवी फरती पाळ बांधी होय ते (६) । तथा पुरुषोना मध्यमां आदेय नामकर्मवाळा (सर्व पुरुषोने मानवा लायक) त्रेवीशमा तीर्थकर श्रीपार्श्वनाथ अहंतने आठ गणो एटले सरखी वाचना अने क्रियावाळा साधुसमुदाय हता, अने आठ गणधरो एटले तेमना नायक सरिओ हता. तेमनुं आ आठ संख्या प्रमाण स्थानांग सूत्रमा अने पर्युपणाकल्पमां संभळाय छ; परतु आवश्यकसूत्रमा अन्यथा संभळाय छ, तेमां कह्यु छ के-" दस नवगं गणाण माणं जिणिंदाणं " अर्थात् “पार्श्वनाथने दश गणो अने दश गणधरो हता. ( महावीरस्वामीने नव गण ने अग्यार गणधरो जाणवा.) आ प्रमाणे का छे ते अही (आ सूत्रमां) वे गणधरोनु अल्प आयुष्य हशे इत्यादिक कारणने लीधे वेनी विवक्षा करी नथी एम जाणवू. अहीं मूळ सूत्रमा 'सुभे' इत्यादि श्लोक कहीने PAR

श्री
समवायाग
चोधुं
अंग ।।
सूत्र॥
॥२८॥
होय ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति आठ सागरोपमनी कही छ (६)॥
ते देवो आठ अर्धमास( पखवाडीया )ने अते आन ले छे, प्राण ले छे, एटले उच्चास ले छ, निःश्वास ले छ (१)।
ते देवोने आठ हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२)। एवा कोइ भवसिद्धिक ( भव्य ) जीवो छ के जेओ आठ
भवने ग्रहण करवा वडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, यावत् सर्व दुःखनो अंत करशे ( ३ )॥
टीकार्थ:-हवे आठमा स्थाननी व्याख्या करे छे, ते पण सुगम छे. विशेपमा ए के अही मदनां स्थानो, प्रवचन
माता, चैत्यवृक्ष, जंवृवृक्ष, शाल्मली वृक्ष, जगती, केवळीसमुद्घात, गणधर अने नक्षत्रना अर्थवाळा नव सूत्रो छ, स्थितिना
अर्थवाळा छ अने उच्छासादिकना अर्थवाळा त्रण सूत्रो छ । तेमा मदना एटले अभिमानना जे स्थानो एटले आश्रयो ते
मदस्थान कहेवाय छ, ते मदना स्थानो जाति विगेरे छे, तेथी तेने ज मदना प्रधानपणा तरिके बतावता सता कहे छ
जाइमए' इत्यादि. जातिवडे जे मद करचो ते जातिमद कहेवाय छे. ए ज प्रमाणे वीजा पण स्थानो जाणवा. अथवा
मदना जे स्थानो एटले भेदो ते मदस्थान कहेवाय छे. ते ज कहे छ-'जाइमए' इत्यादि. ए ज प्रमाणे वीजा स्थानो
पण जाणवा. (१)। तथा प्रवचन एटले द्वादशांगी अथवा तेना आधारभूत संघ, तेनी माता जेवी माता एटले प्रवचनने उत्पन्न
करनारी, ते प्रवचन माताओ ईर्यासमिति विगेरे आठ छ; केमके तेमने आश्रीने ज द्वादशांगी साक्षातपणे अथवा प्रसंगोपात
प्रवर्त छे. अर्थात् जेनाथी जे प्रवर्ते तेने आश्रीने मातानी कल्पना करी शकाय छे. (ईसिमित्यादिकथी द्वादशांगी प्रवर्ते
छे, तेथी ईयांसमित्यादिक तेनी माता कही शकाय छे ) तथा संघना पक्षमा जेम वाळक माताने छोडया विना ज ( तेने
॥ २८॥

देवोना चैत्यवृक्षो आठ योजन ऊर्ध्व ऊंचा कया छे (३)। सुदर्शना नामनो वृक्ष आठ योजन ऊ ऊंचो को छ ४)। गरुडदेवना आवासरूप कूटशाल्मली वृक्ष आठ योजन ऊर्ध्व ऊंचो को छे (५)। जंबूद्वीपनी जगती आठ योजन ऊर्ध्व ऊंची कही छे (६)। केवळीसमुद्घात आठ समयनो कह्यो छे, ते आ प्रमाणे-पहेले समये दंड करे, वीजे समये कपाट करे, त्रीजे समये मंथ करे, चोथे समये मंथना आंतराओ पूरे, पांचमे समये मंथना आंतरानुं संहरण करे ( काढी नांखे), छठे समये मंथनुं संहरण करे, सातमे समये कपाटन संहरण करे अने आठमे समये दंडनुं संहरण करे. त्यारपछी आत्मा शरीरमा रहेलो थाय (आत्माना प्रदेशो शरीरमां ज समाइ जाय ) (७)। पुरुपोने मध्ये आदेय नामकर्मवाळा ( मान्य करवा लायक) पार्श्वनाथ अरिहंतने आठ गणो अने आठ गणधरो हता, तेना नाम आ प्रमाणे-" शुभ, शुभघोप, वसिष्ठ, ब्रह्मचारी, सोम, श्रीधर, वीरभद्र अने यश ॥१॥ (८)। आठ नक्षत्रो चंद्रनी साथे प्रमर्द( वच्चे थइने गमन करवा )ना योगने पामे छे, ते नक्षत्रो आ छे–कृत्तिका, रोहिणी, पुनर्वसु, मघा, चित्रा, विशाखा, अनुराधा अने ज्येष्ठा (९)। आ रत्नप्रभा पृथ्वीने विपे केटलाक नारकीओनी आठ पल्योपमनी स्थिति कही छ (१)। चोथी पृथ्वीमां केटलाक नारकीओनी आठ सागरोपमनी स्थिति कही छ (२)। केटलाक असुरकुमार देवोनी आठ पल्योपमनी स्थिति कही छे (३)। सौधर्म अने ईशान कल्पने विपे केटलाक देवोनी आठ पल्योपमनी स्थिति कही छे (४)। ब्रह्मलोक कल्पने विपे केटलाक देवोनी आठ सागरोपमनी स्थिति कही छ (५)। जे देवो अचिं, अचिमालि, वैरोचन, प्रभंकर, चंद्राभ, सूर्याभ, सुप्रतिष्ठाभ, अगिचाभ, रिटाभ, अरुणाभ अने अरुणोत्तरावतंसक नामना विमानमा देवपणे उत्पन्न थया

श्री
चोथु
अंग ॥
समवायाग
सूत्र।
॥२७॥
१ । चउत्थीए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं अट्ठ सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । असुर-
कुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं अट्ठ पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ३ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु
अत्थेगइयाणं देवाणं अट्ठ पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । बंभलोए कप्पे अत्थेगइयाणं देवाणं
अट्ठ सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ५ । जे देवा अञ्चिं अच्चिमालिं वइरोयणं पभंकरं चंदाभं सूराभं
सुपइट्ठाभं अग्गिञ्चाभं रिट्ठाभं अरुणाभं अरुणुत्तरवडिंसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं
देवाणं उक्कोसेणं अट्ठ सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ ॥
ते णं देवा अट्टण्हं अद्धमासाणं आणमंति वा पाणमंति वा ऊससंति वा नीससंति वा १ ।
तेसि णं देवाणं अट्ठहिं वाससहस्सेहिं आहारटे समुप्पज्जइ २ । संतेगइया भवसिद्धिया जीवा जे
अट्टहिं भवग्गहणेहिं सिज्झिस्संति बुझिस्संति जाव अंतं करिस्संति ३॥ सूत्रं-८ ।
मूलार्थ-आठ मदना स्थानो कह्या छे, ते आ प्रमाणे-जातिमद, कुलमद, बलमद, रूपमद, तपमद, श्रुतमद, लाभमद,
ऐश्वर्यमद (१)। आठ प्रवचन माताओ कही छे, ते आ प्रमाणे-ईर्यासमिति, भापासमिति, एषणासमिति, आदानभांड-
मात्रनिक्षेपणासमिति, उच्चारप्रस्रवणखेलजल्लसिंघाणपारिष्ठापनिकासमिति, मनगुप्ति, वचनगुप्ति, कायगुप्ति (२)। वाणव्यंतर
॥ २७॥

(S . मणगुत्ती वयगुत्ती कायगुत्ती २ । वाणमंतराणं देवाणं चेइयरुक्खा अट्ठ जोयणाई उद्धं उच्चत्तेणं पन्नत्ता ३ । जंबू णं सुदंसणा अट्ट जोयणाई उद्धं उच्चत्तेणं पन्नत्ता ४ । कूडसामली णं गरुलावासे अट्ठ जोयणाई उद्धं उच्चत्तेणं पन्नत्ता ५ । जंबुद्दीवस्स णं जगई अट्ठ जोयणाई उद्धं उच्चत्तेणं पन्नत्ता ६ । अट्ठसामइए केवलिसमुग्धाए पन्नत्ते, तं जहा-पढमे समए दंडं करेइ, बीए समए कवाडं करेइ, तइए समए मंथं करेइ, चउत्थे समए मंथंतराइं पूरेइ, पंचमे समए मंथंतराइ पडिसाहरइ, छटे समए संथं पडिसाहरइ, सत्तमे समए कवाडं पडिसाहरइ, अट्टमे समए दंडं पडिसाहरइ, ततो पच्छा सरीरत्थे भवइ ७ । पासस्स णं अरहओ पुरिसादाणिअस्स अट्ठ गणा अट्ट गणहरा होत्था, तं जहा-“ सुभे य सुभघोसे य, वसिट्टे वंभयारि य । सोमे सिरिधरे चेव, वीरभद्दे जसे इय ॥ १॥ ८ । अट्ठ नक्खत्ता चंदेणं सद्धिं पमई जोगं जोएंति, तं जहा- कतिया १, रोहिणी २, पुणवसू ३, महा ४, चित्ता ५, विसाहा ६, अणुराहा ७, जेट्ठा ८ । ९ ॥ इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं अट्ठ पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता

श्री
चो)
समवायाङ्ग
अग॥
सूत्र॥
॥ २६॥
छ, विशेषमा ए के सातमो केवळीसमुद्घात वेदनीय, नाम अने गोत्र कर्मना आश्रयवाळो छे. ( अर्थात् ते ३६ कर्मोनी
स्थितिने आयुष्यकर्मनी सरखी करनारो छे ) (२)। तथा रनि एटले लांबी आंगळीओवाळो हाथ. आवा सात हाथ
महावीरस्वामी ऊर्ध्व ऊंचाइवडे कहेला छ अर्थात् तिर्यक् पहोळाइवडे नही (३) ।
तथा [ अभिजित् विगेरे सात नक्षत्रो पूर्व द्वारवाळा छ एटले के आ नक्षत्रो जे दिवसे होय ते दिवसे पूर्व दिशा तरफ
प्रयाण करनार मनुष्यने शुभ थाय छे. एज प्रमाणे अश्विनी विगेरे सात नक्षत्रो दक्षिणद्वारवाळा छे, पुष्य विगेरे सात
नक्षत्रो पश्चिम द्वारवाळा छे अने स्वाति विगेरे सात नक्षत्रो उत्तरद्वारवाळा छे एम सिद्धांतनो मत छ.] परंतु अही तो
मतांतरने आश्रीने कृत्तिका विगेरे सात सात नक्षत्रो पूर्वादिक द्वारवाळा कह्या छै. तथा चंद्रप्रज्ञप्तिमां तो आ बावतमां
घणा घणा मतो देखाड्या छे. (२-५)।
स्थितिना सूत्रमा सम विगेरे आठ विमानना नामो आपेला छे. (९)॥ (सूत्र-७) ।
हवे आठ स्थानक कहे छ.-
मू०-अट्ठ मयट्ठाणा पन्नत्ता, तं जहा-जातिमए कुलमए बलमए रूवमए तवमए सुयमए
लाभमए इस्सरियमए १ । अट्ठ पवयणमायाओ पन्नत्ता, तं जहा-ईरियासमिई भासासमिई
एसणासमिई आयाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिई उच्चारपासवणखेलजल्लसिंघाणपारिद्वावणियासमिई
॥ २६॥

पमनी कही छे (३)। केटलाक असुरकुमार देवोनी सात पल्योपमनी स्थिति कही छे (४) । सौधर्म अने ईशान कल्पने विपे केटलाक देवोनी सात पल्योपमनी स्थिति कही छ (५) । सनत्कुमार कल्पमां देवोनी उत्कृष्ट स्थिति सात सागरोपमनी कही छे (६) । माहेंद्र कल्पमा देवोनी उत्कृष्ट स्थिति सातिरेक सात सागरोपमनी कही छे (७)। ब्रह्मलोक कल्पमां देवोनी साधिक सात पल्योपमनी जघन्य स्थिति कही छ (८)। जे देवो सम, समप्रभ, महाप्रभ, प्रभास, भासुर, विमल, कंचनकूट अने सनत्कुमारावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थाय छे ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति सात सागरोपमनी कही छ (९)॥ ते देवो सात अर्धमासे (सात पखवाडीयाने अंते ) आन ले छ, प्राण ले छे एटले उच्छवास ले छे, निःश्वास ले छे (१)। ते देवोने सात हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२)। एवा केटलाक भवसिद्धिक ( भव्य ) जीवो छ के जेओ सात भवने ग्रहण करवा वडे सिद्ध थशे, बुद्ध थशे, यावत् सर्व दुःखनो अत करशे. (३) टीका:-आ सूत्र पण सुगम छे. विशेप ए के अहीं भय, समुद्घात, महावीरनुं शरीर, पर्वतो, क्षेत्रो अने क्षीणमोह- नीयना अर्थवाळा छ सूत्रो छे, नक्षत्रना अर्थवाळा पांच सूत्रो छे, स्थितिना अर्थवाळा नव सूत्रो छे अने उच्वासादिकना अर्थवाळा त्रण ज सूत्रो छे. तेमां जे सजातीय जीवथी भय उत्पन्न थाय ते इहलोक भय कहेवाय छे, विजातीय जीवथी जे भय थाय ते परलोक भय कहेवाय छे, द्रव्यने आधीने जे भय थाय ते आदान भय कहेवाय छे, बाह्य निमित्त विना जे पोताना मनना संकल्पविकल्पवडे उत्पन्न थाय ते अकस्मात् भय कहेवाय छे, वाकीना (आजीविका भय, मरण भय अने अश्लोक भय ) प्रसिद्ध ( सुगम) छे. विशेषमा ए के-अश्लोक एटले अपकीर्ति (१)। ममुद्धातो पूर्वे कह्या प्रमाणे (६)

श्री
समवायाङ्ग
यत्र ।।
चो)
अंग॥
॥२५॥
जे णं सत्तहिं भवग्गहणेहिं सिज्झिस्सति जाव सव्वदुक्खाणमंतं करिस्संति ३ ॥ (सूत्रम्-७)॥
मूलार्थः -भयना स्थानो सात कह्या छे, ते आ प्रमाणे-आ लोक संबंधी भय, परलोक संबंधी भय, आदान भय,
अकस्मात् भय, आजीविका भय, मरण भय, अश्लोक (अकीर्ति) भय (१)। सात समुद्घात कह्या छ, ते आ प्रमाणे-
वेदना समुद्घात, कपाय समुद्घात,
मारणांतिक समुद्घात,
वैक्रिय
समुद्घात,
तेजस
समुद्घात, आहार समुद्घात, केवळी
समुद्घात (२)। श्रमण भगवान महावीरस्वामी सात रत्नि ( हाथ ) ऊंचा हता (३)। आ जंबूद्वीप नामना द्वीपमा सात
वर्षधर पर्वतो कह्या छे, ते आ प्रमाणे-क्षुल्लहिमवान, महाहिमवान, निपध, नीलवंत, रूपी, शिखरी अने मेरु (४)। आ
जंबूद्वीप नामना द्वीपमा सात वर्षों (क्षेत्रो ) कह्या छ, ते आ प्रमाणे--भरत, हैमवत, हरिवर्प, महाविदेह, रम्यक, ऐरण्य-
वत अने ऐरवत (५)। जेन मोहनीय कर्म क्षीण थयु छे एवा भगवान एक मोहनीय कर्मने वर्जीने पाकीनी सात कर्म-
प्रकृतिओने वेदे छ (६)॥
मघा नक्षत्रना सात तारा कह्या छ (१)। कृत्तिका विगेरे सात नक्षत्रो पूर्व दिशाना द्वारवाळा कह्या छ ( पाठांतरना
मते अभिजित् विगेरे सात नक्षत्रो पूर्व द्वारवाळा कह्या छ ) (२)। मघा विगेरे सात नक्षत्रो दक्षिण द्वारवाळा कह्या छे
(३)। अनुराधा विगेरे सात नक्षत्रो पश्चिम द्वारवाळा कह्या छ (४)। धनिष्ठा विगेरे सात नक्षत्रो उत्तरद्वारवाळा कह्या छ (५)।
आ रत्नप्रभा नामनी पृथ्वीने विपे केटलाक नारकीओनी सात पल्योपमनी स्थिति कही छ (१) । त्रीजी पृथ्वीने विपे
नारकीओनी उत्कृष्ट स्थिति सात सागरोपमनी कही छ (२)। चोथी पृथ्वीने विपे नारकीओनी जघन्य स्थिति सात सागरो-
॥ २५ ॥

इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं सत्त पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता १ । तच्चाए णं पुढवीए नेरइयाणं उक्कोसेणं सत्त सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । चउत्थीए णं पुढवीए नेरझ्याणं जहणणेणं सत्त सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ३। असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं सत्त, पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं सत्त पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ५ । सणंकुमारे कप्पे देवाणं उक्कोसेणं सत्त सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ । माहिंदे कप्पे देवाणं उक्कोसेणं साइरेगाइं सत्त सागरोवसाइं ठिई पन्नत्ता ७ । बंगलोए कप्पे अत्थेगइयाणं देवाणं सत्त साहिया सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ८ । जे देवा समं समप्पमं महापमं पभासं भासुरं विमलं कंचणकूडं सणंकुमारवळिसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं देवाणं उकोसेणं सत्त सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ९ ॥ ते णं देवा सत्तण्हं अद्धमासाणं आणमंति वा पाणमति वा ऊससंति वा नीससंति वा १ । तेसि णं देवाणं सत्तहिं वाससहस्सेहिं आहारट्टे समुप्पजइ २। संतेगइया भवसिद्धिया जीवा

श्री
समवायाङ्ग
चोधुं
अंग॥
सूत्र ।
॥ २४ ॥
स्थिविना सूत्रमा स्वयंभू विगेरे वीश विमानोनां नाम कयां छे (६) ॥ (सूत्र-६)
हवे सातमु स्थान कहे छ-
मू०-सत्त भयट्ठाणा पन्नत्ता, तं जहा-इहलोगभए परलोगभए आदाणभए अकम्हाभए
आजीवभए मरणभए असिलोगभए १। सत्त समुग्धाया पन्नत्ता, तं जहा-वेयणासमुग्घाए
कसायसमुग्घाए मारणंतियसमुग्घाए वेउब्वियसमुग्घाए तेयसमुग्घाए आहारसमुग्घाए केवलिसमु-
ग्घाए २ । समणे भगवं महावीरे सत्त रयणीओ उद्धं उच्चत्तेणं होत्था ३। इहेव जंबुद्दीवे दीवे सत्त
वासहरपव्वया पन्नत्ता, तं जहा-चुल्लहिमवंते महाहिमवंते निसढे नीलवंते रुप्पी सिहरी मंदरे ४
इहेव जंबुद्दीवे दीवे सत्त वासा पन्नत्ता, तं जहा-भरहे हेमवते हरिवासे महाविदेहे रम्मए
एरण्णवए एरवए ५ । खीणमोहेणं भगवया मोहणिज्जवज्जाओ सत्त कम्मपयडीओ वेए(ज)ई ६ ।
महानक्खत्ते सत्ततारे पन्नत्ते १ । कत्तिआइआ सत्त नक्खत्ता पुव्वदारिआ पन्नत्ता (पाठांतर-
अभियाइया सत्त नक्खत्ता) २। महाइआ सत्त नक्खत्ता दाहिणदारिआ पन्नत्ता ३ । अणुरा-
हाइआ सत्त नक्खत्ता अवरदारिआ पन्नत्ता४।णिट्ठाइआ सत्त नक्खत्ता उत्तरदारिआ पन्नत्ता ५॥
॥२४॥

SS बंधायेला ते कर्मप्रदेशोने खेरवी नांखे छे. आ समुद्घातो अहीं वेदनादिकना भेदवडे छ कया छे. तेमां पहेलो जे वेदना समुद्घात छे ते असातावेदनीय कर्मना आश्रयवाळो छ, वीजो कपायसमुद्घात छे ते कपायनामना चारित्रमोहनीय कर्मना आश्रयवाळो छे, त्रीजो मारणांतिक ममुद्घात छे ते अंतर्मुहर्त शेष रहेला आयुष्यकर्मना आश्रयवाळो छे, चाकीना वैक्रिय, तैजस अने आहारक ए नामना त्रण समुद्घात छे ते शरीरनामकर्मना आश्रयवाळा छे. तेमा वेदनासमुद्घातवडे व्याप्त ( सहित) थयेलो जीव वेदनीयकर्मना पुद्गलोनु शाटन (खेरव ) करे छ, कपायसमुद्घातवडे व्याप्त थयेलो जीव कपायना पुद्गलोनुं शाटन करे छे, मारणांतिक समुद्घातबडे व्याप्त थयेलो जीव आयुष्यकर्मना पुद्गलानो घात करे छे, वैक्रियसमुद्धा- तथी व्याप्त थयेलो जीव आत्मप्रदेशोने गरीरमाथी बहार काढीने ( ते प्रदेशोनो) शरीरनी जेटली उंचाइ अने जाडाइ होय तेटला प्रमाणवाळो अने लंबाइमां संख्याता योजन प्रमाणवाळो दंड बनाये छे, बनावीने पूर्व वांधला चैक्रियशरीरनामकर्मना पुद्गलोने स्थूळना अनुक्रमे (एटले प्रथम घणा मोटा होय तेने, पछी तेनाथी नाना, पछी तेनाथी नाना ए रीते ) शाटन करे छे-खेरवे छे. ए ज प्रमाणे तैजस अने आहारकनामना समुद्घातर्नु पण व्याख्यान कर. (५) । तथा ' अर्था- वग्रह '-अर्थन एटले सामान्य रीते जेनु स्वरूप कही न शकाय एवा शब्दादिकनुं ' अब '-प्रथम एटले व्यंजनावग्रहनी पछी तरत ज जे ग्रहण करवु एटले जाणवू ते अर्थावग्रह कहेवाय छे. ते अर्थावग्रह निश्चय नयनी अपेक्षाए एक समयनो अने व्यवहारनयनी अपेक्षाए असंख्य समयनो होय छे. ते अर्थावग्रह थोत्रादिक पांच इद्रियोपडे अने नोइंद्रिय(मन)बडे उत्पन्न (प्राप्त ) थतो होवाथी छ प्रकारनो को छ (६)॥

श्री
समवायाङ्ग
चोथु
अंग ॥
सूत्र ।।
॥ २३ ॥
वीरोत्तरावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय, ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति छ सागरोपमनी कही छे (६)॥
ते देवो छ अर्धमासे (छ पखवाडियाने अंते ) आन ले छे, प्राण ले छे, एटले उच्छ्वास ले छे, निःश्वास ले छ (१)।
ते देवोने छ हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२) । एवा कोइक भवसिद्धिक (भव्य) जीवो छ के जेओ छ भवने
ग्रहण करवावडे सिद्ध थशे, यावत् सर्व दुःखनो अंत करशे (३) ॥
टीकार्थः-हवे छ स्थाननुं सूत्र कहे छे, ते सुगम छे. विशेष एके-अहीं लेश्या, जीवनिकाय, बाह्य तप, आभ्यंतर तप,
समुद्घात अने अवग्रहना अर्थवाळा छ सूत्रो ,नक्षत्रने अर्थ वे सूत्रो, स्थितिने अर्थे छ अने उच्छ्वासादिकने अर्थे त्रण सूत्रो छे.
तेमां लेश्यानुं स्वरूप आ प्रमाणे कहे छ-" कृष्णादिक द्रव्यना समीपपणाथी (काळा विगेरे पुद्गळो आत्मानी पासे
रहेला होवाथी) स्फटिकनी जेवा निर्मळ आत्मानो जे परिणाम-अध्यवसाय थाय ते परिणामने विषे आ लेश्या शब्द प्रवर्ते
छे ॥ १॥" इति (१)। तथा बाह्य शरीरना शोषण वडे जे कर्मना क्षयर्नु कारण थाय छे ते चाह्य तप कहेवाय छे (३)।
चित्तनिरोधनी मुख्यतावडे जे कर्मना क्षयर्नु कारण थाय ते आभ्यंतर तप कहेवाय छे (४)। तथा छाद्मस्थिक एटले केवळी-
पणा विनानी अवस्थामा जे थाय ते समुद्घात छ छे. समुद्धात शब्दनो अर्थ कहे छे- सम् '-ऐक्यपणाए करीने तथा
उत्'-प्रवळपणाए करीने (अत्यंत) जे 'घात'-निर्जरण एटले खेरवी नांखवू ते समुद्घात कहेवाय छेकारण
के वेदनादिक परिणामवाळो जीव वेदनीयादिक कर्मना घणा प्रदेशो के जे काळांतरे अनुभव करवा लायक होय
तेने उदीरणावडे खेंचीने उदयमां नांखी तेनो अनुभव करीने निर्जरण (क्षय) करे छ अर्थात् आत्मप्रदेशो साथे
.
॥२३॥

छहिं भवग्गहणहिं सिज्झिस्संति जाव सव्वदुक्खाणमंतं करिस्संति ३ ॥ सूत्रम्-६ ॥ मूलार्थ:-छ लेश्याओ कही छ, ते आ प्रमाणे-कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, तेजोलेश्या, पद्मलेश्या, शुक्ल- लेश्या (१)। छ जीवनिकाय कहेला छे, ते आ प्रमाणे-पृथ्वीकाय, अप्काय, तेजस्काय, वायुकाय, वनस्पतिकाय, त्रसकाय २)। छ प्रकारनो बाह्य तप कह्यो छे ते आ प्रमाणे-अनशन, ऊनोदरिका, वृत्तिसंक्षेप, रसत्याग, कायक्लेश, संलीनता ३)। छ प्रकारे आभ्यंतर तप कह्यो छे, ते आ प्रमाणे प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान, उत्सर्ग (कायोत्सर्ग) (४) । छानस्थिक-छ समुद्घातो कडा छे, ते आ प्रमाणे-वेदनासमुद्घात, कपायसमुद्घात, मारणांतिकसमुद्घात, वैक्रियसमुद्घात, तैजससमुद्घात, आहारकसमुद्धात (५) छ प्रकारनो अर्थावग्रह कह्यो छे, ते आ प्रमाणे-श्रोत्रंद्रियअर्था- वग्रह, चक्षुइंद्रियअर्थावग्रह, घ्राणेंद्रियअर्थावग्रह, जिवेंद्रियअर्थावग्रह, स्पशेंद्रियअर्थावग्रह, नोइंद्रियअर्थावग्रह (६) कृत्तिका नक्षत्रना छ तारा कया छ (१)। अश्लेषा नक्षत्रना छ तारा कया छे (२)। आ रत्नप्रभा पृथ्वीने विषे केटलाक नारकीओनी छ पल्योपमनी स्थिति कही छ (१)त्रीजी पृथ्वीने विपे केटलाक नारकीओनी छ सागरोपमनी स्थिति कही छे (२) केटलाक असुरकुमार देवोनी छ पल्योपमनी स्थिति कही छे (३)। सौधर्म अने ईशान कल्पने विप केटलाक देवोनी छ पल्योपमनी स्थिति कही छे (४) सनत्कुमार अने माहेंद्र कल्पने विपे केटलाक देवोनी छ सागरोपमनी स्थिति कही छे (५) त्या जे देवो स्वयंभू, स्वयंभूरमण, घोप, सुघोप, महाघोप, कृष्टिघोप, वीर, सुवीर, वीरगत, वीरश्रेणिक, वीरावत, वीरप्रभ, वीरकात, वीरवर्ण, वीरलेश्य, वीरध्वज, वीर,ग, वीरशिष्ट, वीरकूड अने

श्री
समवायाङ्ग
चोथु
अंग॥
॥२२॥
जिभिदियअत्थुग्गहे फासिंदियअत्थुग्गहे नोइंदियअत्थुग्गहे ६ ॥
कत्तियानक्खत्ते छतारे पन्नत्ते १ । असिलेसानक्खत्ते छतारे पन्नत्ते २॥
इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं छ पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता १ । तच्चाए णं
पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं छ सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । असुरकुमाराणं देवाणं अत्थे-
गइयाणं छ पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ३ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं छ पलि-
ओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । सणंकुमारमाहिदेसु अत्थेगइयाणं देवाणं छ सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता
५। जे देवा सयंभु सयंभूरमणं घोसं सुघोसं महाघोसं किद्विघोसं वीरं सुवीरं वीरगतं वीरसेणियं
वीरावत्तं वीरप्पभं वीरकंतं वीरवणं वीरलेसं वीरज्झयं वीरसिंगं वीरसिटुं वीरकूडं वीरुत्तरवडिंसगं
विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसि णं देवाणं उक्कोसेणं छ सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ ॥
ते णं देवा छण्हं अद्धमासाणं आणमति वा पाणमंति वा ऊससंति वा नीससंति वा १।
तेसि णं देवाणं छहिं वाससहस्सेहिं आहारटे समुप्पजइ २। संतेगइया भवसिद्धिया जीवा जे
"
॥ २२॥

४, पांचमे सात सागरोपम ५, छठे दश सागरोपम ६, सातमे चौद सागरोपम ७, आठमे महस्रार देवलोके सतर सागरो- पम ८ अने त्यारपछी दरेक देवलोके अने दरेक ग्रेवेयके एक एक सागरोपमनी वृद्धि करवी. तथा वात, सुचात इत्यादिक विमानना वार नामो वात शब्दना अभिलापवडे अने तेटला ज नामो सूर शब्दना अभि- लापवडे जाणवा (६) ॥ सू०५॥ हवे छ स्थानक कहे छ.- J मू०-छ लेसाओ पण्णत्ता, तं जहा-कण्हलेसानीललेसा काउलेसा तेउलेसा पम्हलेसासुकलेसा १छ जीवनिकाया पन्नत्ता, तं जहा-पुढवीकाए आऊकाए तेउकाए वाउकाएवणस्सइकाए तसकाए २। छबिहे वाहिरे तवोकम्मे पन्नत्ते, तं जहा-अणसणे उणोयरिया वित्तीसंखेवो रसपरिचाओ कायकिलेसो संलीणया ३। छविहे अभितरे तवोकम्मे पन्नत्ते, तं जहा-पायच्छित्तं विणओ वेया- वञ्च सज्झाओ झाणं उस्सग्गो ४ । छ छाउमत्थिया समुग्घाया पन्नत्ता, तं जहा-वेयणासमुग्धाए कसायसमुग्धाए मारणंतिअसमुग्घाए वेउब्वियसमुग्धाए तेयसमुग्घाए आहारसमुग्घाए ५ । छविहे अत्थुग्गहे पन्नत्ते, तं जहा-मोइंदियअरथुग्गहे चक्खुइंदियअत्थुग्गहे घाणिदिअअत्थुग्गहे

चोथु
अंग॥
श्री
समवायाङ्ग
सूत्र॥
॥२१ ॥
वखते जे समिति एटले स्थंडिलादिकना दोष दूर करवापूर्वक प्रवृत्ति करवी ते पांचमी समिति. आ प्रमाणे पांच समिति
कहेवाय छ (७) तथा अस्तिकाय एटले प्रदेशोनी राशि ( समूह), ते धर्मास्तिकायादिक पांच छे, तेमनुं लक्षण (विपय)
अनुक्रमे गति, स्थिति, अवगाह, उपयोग अने स्पर्शादिक छे. (एटले के गति करवामां सहाय आपे ते धर्मास्तिकाय, स्थिर
रहेवामां सहाय आपे ते अधर्मास्तिकाय, अवकाश आपे ते आकाशास्तिकाय, उपयोगवाळा होय ते जीवास्तिकाय अने
वर्ण, गंध, रस, स्पर्शवाळा होय ते पुद्गलास्तिकाय जाणवा.) ८.
स्थितिनां सूत्रोने विपे स्थिति( आयुष्य )नो उत्कृष्टादिक विभाग आ प्रमाणे जाणवो-साते नरकपृथ्वीमां अनुक्रमे
आ प्रमाणे स्थिति (उत्कृष्ट) जाणवी-एक सागरोपम १, त्रण सागरोपम २, सात सागरोपम ३, दश सागरोपम ४, सतर
सागरोपम ५, वावीश सागरोपम ६ अने सातमीमां तेत्रीश सागरोपम ७॥१॥ पहेली पृथ्वीमा जे उत्कृष्ट स्थिति कही
छे ते बीजी पृथ्वीमा जघन्य स्थिति जाणवी. (एम उत्तरोत्तर जाणी लेवू). आ तरतम योग सर्वत्र जाणवो, पहेली रत्नप्रभा
पृथ्वीने विष दश हजार वर्षनी जघन्य स्थिति कही छे ॥ २ ॥" तथा--" पहेला देवलोकमां उत्कृष्ट वे सागरोपम १,
बीजामां साधिक वे सागरोपम २, त्रीजामां सात सागरोपम ३, चोथामां साधिक सात सागरोपम ४, पांचमामां दश साग-
रोपम ५, छठामां चौद सागरोपम ६, सातमामां सतर सागरोपम ७, आ प्रमाणे सौधर्मथी सातमा शुक्र देवलोक सुधी
समजबुं. त्यारपछी दरेक देवलोके तथा दरेक ग्रैवेयके एक एक सागरोपमनी वृद्धि करवी. (हवे जघन्य स्थिति कहे छे )
पहेले देवलोके एक पल्योपम १, वीजे देवलोके साधिक पल्योपम २, बीजे वे सागरोपम ३, चोथे साधिक वे सागरोपम
॥२१॥

सुगम छे. (१)। तथा जे कामना कराय एटले इच्छाय ते काम कहेवाय छे. एवा (इच्छाता एवा जे) गुणो एटले शब्दादिक पुद्गलना धर्मो, ते कामगुण कहेवाय छे. अथवा तो कामने एटले मदनने ( कामदेवने) उद्दीपन करनारा जे गुणो, ते कामगुण एटले शब्दादिक कहेवाय छे (३) । तथा आश्रवद्वार एटले कर्मने ग्रहण करवाना मिथ्यात्वादिक उपायो (४) । संवर एटले कर्मने नही ग्रहण करवाना ( रोकवाना ) जे द्वार एटले उपायो ते संवरद्वार एटले मिथ्यात्वादिक आश्रवना द्वारथी विपरीत एवा सम्यक्त्वादिक कहेवाय छे (५)। निर्जरा एटले देशथी कर्मनो क्षय, तेना जे स्थान एटले आश्रयो अर्थात् कारणो, ते निर्जरास्थान एटले प्राणातिपातविरमणादिक कहेवाय छे. आ प्राणातिपातविरमणादिक स्थानोने ज 'सर्व' शब्दवडे विशेपित करीए त्यारे ते महाव्रतो थाय छे ते पूर्वे ( वीजा ) सूत्रमा कयां छे, अने ते स्थानोने ज स्थूल शब्दवडे विशेषित करीए त्यारे ते अणुव्रतो थाय छे. आ पाचेने निर्जराना स्थान कह्या ते साधारण छे, तेथी तेओर्नु अहीं निर्जरास्थान कयु छ ( ६ ) । तथा समिति एटले सारी प्रवृत्ति. तेमां ईर्यासमिति एटले गमन करती वखते सम्यक् प्रकारे एटले जीवहिसा न थाय ते प्रकारे प्रवृत्ति करवी ते, भापासमिति एटले दोष रहित वचननी प्रवृत्ति करवी ते, एषणा- समिति एटले बेतालीश दोपने वर्जीने भात-पाणी ग्रहण करवामां प्रवृत्ति करवी ते, आदान एटले भांड, पात्रना अने वस्त्रादिक उपगरणना समूहने ग्रहण करती वखते तथा निक्षेपण एटले स्थापन करती वखते समिति एटले सारी रीते जोवा- पूर्वक ( तथा पडिलेहण करवापूर्वक ) सारी रीते प्रवृत्ति करवी ते चोथी समिति, तथा उच्चार एटले विष्ठा, प्रस्रवण एटले मूत्र, खेल एटले थुक, सिंघाण एटले नासिकानो श्लेष्म अने जल्ल एटले शरीरनो मेल-आ सर्वने परठवचा (त्याग करवा)ने

श्री
चोएं
अंग॥
समवायाङ्ग
सूत्र ॥
॥ २० ॥
केटलाक देवोनी पांच सागरोपमनी स्थिति कही छे (५)। जे देवो वात, सुवात, वातावर्त, वातप्रभ, वातकांत, वातवर्ण, वातलेश्य,
वातध्वज, चातशृंग, चातशिष्ट, वातकूट, वातोत्तरावतंसक, सूर, सुसूर, सूरावर्त, सूरप्रभ, सूरकांत, सूरवर्ण, सूरलेश्य, सूरध्वज,
सूरझंग, सूरशिष्ट, सूरकूट अने सूरोत्तरावतंसक नामना विमानमां देवपणे उत्पन्न थया होय ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति पाच
सागरोपमनी कही छे (६)॥
ते देवो पांच अर्ध मासे ( पांच पखवाडीयाने छेडे) आन ले छे, प्राण ले छे, एटले उच्छ्वासले छे, निःश्वास ले छे (१)।
ते देवोने पांच हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे. (२) । एवा केटलाक भवसिद्धिक जीवो छे के जेओ पांच भव
ग्रहण करवा वडे सिद्ध थशे यावत् सर्व दुःखनो अत करशे (३)।
टीकार्थ-पांच स्थाननुं सूत्र पण सुगम छे. विशेप ए के-क्रिया, महावत, कामगुण, आश्रय, संवर, निर्जरास्थान,
समिति अने अस्तिकायना अर्थवाळा आठ सूत्रो छे, नक्षत्रना अर्थवाळा पांच सूत्रो छे, स्थितिना अर्थवाळा छ सूत्रो छे अने
उच्लासादिकना अर्थवाळा त्रण सूत्रो छे. तेमा क्रिया एटले विशेष प्रकारना व्यापार. तेमां कायावडे जे क्रिया नीपजे ते
कायिकी एटले कायनी चेष्टा कहेवाय छे. जेनावडे आत्मा नरकादिकने विपे अधिकार कराय (नरकादिमां जाय) ते
अधिकरण कहेवाय छे. ते अधिकरणवडे जे क्रिया नीपजे ते आधिकरणिकी एटले खड्गादिक बनाववा विगैरेनी क्रिया.
प्रद्वेप एटले मत्सर, तेनावडे जे क्रिया नीपजे ते प्रादूपिकी कहेवाय छे. परितापन एटले ताडनादिक विशेष प्रकारनुं
दुःख, तेनावडे जे नीपजेली क्रिया ते पारितापनिकी कहेवाय छे, अने पांचमी प्राणातिपातिकी क्रिया प्रसिद्ध-
॥२०॥

मूलार्थः-पांच क्रिया कहेली छे, ते आ प्रमाणे-कायिकी, आधिकरणिकी, प्राइपिकी, पारितापनिकी, प्राणातिपातिकी क्रिया (१) पाच महाव्रत कया छे, ते आप्रमाणे--सर्वथा प्राणातिपातयकी विरम, सर्वथा मृपावादयी विरम, सर्वथा अदत्ता- दानधी विरम, सर्वथा मेथुनथकी विरम, सर्वथा परिग्रहथकी विरम (२)। पांच कामगुण कया छे, ते आ प्रमाणे-शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श (३) । पाच आश्रवद्वार कया छे, ते आ प्रमाणे-मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कपाय, योग (४)। पांच संवरद्वार कह्या छे, ते आ प्रमाणे-सम्यक्त्व, विरति, अप्रमाद, अकपाय, अयोग (५)। पांच निर्जराना स्थान कह्या छे, ते आ प्रमाणे-ग्राणातिपातथी विरमयु, मृपावादी विरम, अदत्तादानधी विरमयुं, मथुनधी विरमगुं, परिग्रहथी विर- मg (६)। पांच समिति कही छे, ते आ प्रमाणे-ईयांसमिति, भापासमिति, एपणासमिति, आदानभांडमात्रनिक्षेपणा समिति, उच्चार प्रसवण खेल सिंघाण जल्ल पारिठापनिका समिति (७)। पांच अस्तिकाय कया छे, ते आ प्रमाणे- धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, नीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय (८)। रोहिणी नक्षत्रना पाच तारा कडा छ (१)। पुनर्वसु नक्षत्रना पांच तारा कया छ (२) । हस्त नक्षत्रना पाच तारा कह्या छे (३) । विशाखा नक्षत्रना पांच तारा कह्या छे (४) । धनिष्ठा नक्षत्रना पांच तारा कया छे (५) । आ रत्नप्रभा पृथ्वीने विपे केटलाक नारकीओनी पाच पल्योपमनी स्थिति कही छे (१)। त्रीजी पृथ्वीने विपे केटलाक नारकीओनी पांच सागरोपमनी स्थिति कही छे (२)। केटलाक असुरकुमार देवोनी पांच पल्योपमनी स्थिति कही छे (३) । सौधर्म अने ईशान कल्पने विप केटलाक देवोनी पांच पल्योपमनी स्थिति कही छे (४) । सनत्कुमार अने माहेंद्र कल्पमा

श्री
समवायाङ्ग
चो)
अंग॥
॥१९॥
इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं पंच पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता १
तच्चाए णं पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं पंचसागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । असुरकुमाराणं देवाणं
अत्थेगइयाणं पंचपलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ३।सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं पंच-
पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । सणंकुमारमाहिदेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं पंच सागरोवमाई
ठिई पन्नत्ता ५। जे देवा वायं सुवायं वायावत्तं वायप्पभं वायकंतं वायवण्णं वायलेसं वायज्झयं
वायसिंगं वायसि, वायकूडं वाउत्तरवडिंसगं सूरं सुसूरं सूरावत्तं सूरप्पभं सूरकंतं सूरवणं सूर-
लेसं सूरज्झयं सूरसिंगं सूरसिटुं सूरकूडं सूरुत्तरवडिंसगं विमाणं देवत्ताए उववण्णा तेसिणं देवाणं
उक्कोसेणं पंच सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ ॥
ते णं देवा पंचण्हं अद्धमासाणं आणमति वा पाणमंति वा ऊससंति वा नीससंति वा १ ।
तेसि णं देवाणं पंचहिं वाससहस्सेहिं आहारटे समुप्पज्जइ २ । संतेगइया भवसिद्धिया जीवा जे
पंचहिं भवग्गहणेहिं सिन्झिस्संति जाव अंतं करिस्सति ॥ सूत्रम्-५ ॥
॥१९॥

- s वायकिरिया १ । पंचमहत्वया पन्नत्ता, तं जहा-सबाओ पाणाइवायाओ वेरमणं, सबाओ मुसावायाओ वेरमणं, सबाओ अदत्तादाणाओ वेरमणं, सबाओ मेहूणाओ वेरमणं, सवाओ परिग्ग- हाओ वेरमणं २ । पंच कामगुणा पन्नत्ता, तं जहा-सद्दा रूवा रसा गंधा फासा ३ । पंच आसव- दारा पन्नत्ता, तं जहा-मिच्छत्तं अविरई पमाया कसाया जोगा ४। पंच संवरदारा पन्नत्ता, तं जहा- सम्मत्तं विरई अप्पमत्तया अकसाया अजोगया ५ । पंच निजरट्ठाणा पन्नत्ता, तं जहा-पाणाइ- वायाओ वेरमणं, मुसावायाओ वेरमणं, अदिन्नादाणाओ वेरमणं, मेहुणाओ वेरमणं, परिग्गहाओ वेरमणं ६ । पंच समिईओ पन्नत्ताओ, तं जहा-ईरियासमिई भासासमिई एसणासमिई आया- णभंडमत्तनिक्खेवणासमिई उच्चारपासवणखेलसिंघाणजलपारिद्वावणियासमिई ७।पंच अस्थिकाया पन्नत्ता, तं जहा-धम्मस्थिकाए अधम्मत्थिकाए आगासत्थिकाए जीवत्थिकाए पोग्गलत्थिकाए ८॥ रोहिणी नक्खत्ते पंचतारे पन्नत्ते १ । पुणवसुनक्खत्ते पंचतारे पन्नत्ते २ । हत्थनक्खत्ते पंचतारे पन्नत्ते ३ । विसाहानक्खत्ते पंचतारे पन्नत्ते ४ । धणिट्ठानक्खत्ते पंचतारे पन्नत्ते ५॥

श्री
चोधु
अंग॥
समवायाङ्ग
सूत्र ॥
॥१८॥
करी मनने जे अति स्थिर राखवू अने योगनो जे निरोध करवो, ते शुक्लध्यान कहेवाय छे' (२)। तथा चारित्रने विरोध
करनारी स्त्री विगेरे संबंधी जे कथा ते विकथा कहेवाय छे (३) । तथा असातवेदनीय अने मोहनीय कर्मना उदयथी प्राप्त
थयेल आहारनी इच्छादि रूप जे चेतनाविशेष ते संज्ञा कहेवाय छ (४) । तथा जीव कपाय सहित होवाथी कर्मने योग्य
एवा पुद्गलोने जे ग्रहण करे ते बंध कहेवाय छे. (ते बंध चार प्रकारनो छे) तेमां प्रकृति एटले कर्मना अंशो-भेदो जे
ज्ञानावरणीयादिक आठ, तेनो जे बंध ते प्रकृतिबंध कहेवाय छे, तथा ते प्रकृतिओनी ज स्थिति एटले जघन्यादिकपणे
रहेवु, तेनो जे बंध ते स्थितिबंध कहेवाय छ, तथा तीवादिक भेदवाळो जे विपाक ते अनुभाव एटले रस कहेवाय छे, तेनो
जे बंध ते अनुभावबंध कहेवाय छे. तथा जीवना असंख्याता प्रदेशोने विषे कर्मना अनंतानंत प्रदेशो के जे दरेक कर्म-
प्रकृतिए नियत परिमाणवाळा छे तेनो जे बंध एटले संबंध ते प्रदेशबंध कहेवाय छे (५) ।
तथा कृष्टि, सुकृष्टि विगेरे वार विमानो पूर्वे कहेला विमानना नामने अनुसारे जाणवा. (६). सूत्र ४ ॥
मू०-पंच किरिया पन्नत्ता, तं जहा-काइया अहिगरणिया पाउसिया पारितावणिया पाणाइ-
१ आर्तध्यान-इष्ट वियोग, अनिष्ट सयोग, रोगचिंता, अग्रशौच. रौद्रध्यान-हिंसानुबंधी, मृपानुवधी, स्तेयानुवधी,
सरक्षणानुबधी. धर्मध्यान-आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, सस्थानविचय. शुक्लध्यान-अन्यत्व पृथक्त्व सविचार,
एकत्व पृथक्त्व अविचार, सूक्ष्मक्रिया अनिवृत्ति, समुच्छिन्न क्रिया निवृत्ति.
॥१८॥

नारकीओनी चार सागरोपमनी स्थिति कही छे (२)। केटलाक असुरकुमार देवोनी चार पल्योपमनी स्थिति कही छे (३)। सौधर्म अने ईशान कल्पने विपे केटलाक देवोनी चार पल्योपमनी स्थिति कही छे (४)। सनत्कुमार अने माहेंद्रकल्पने विषे केटलाक देवोनी चार सागरोपमनी स्थिति कही छे (५)। जे देवो कृष्टि, सुकृष्टि, कृष्टिकावर्त, कृष्टिप्रभ, ऋष्टियुक्त, कृष्टिवर्ण, कृष्टिलेश्य, कृष्टिध्वज, कृष्टिभंग, कृष्टिशिष्ट, कृष्टिकूट अने कृष्टयुत्तरावतंसक नामना विमानने विपे देवपणे उत्पन्न थया होय, ते देवोनी उत्कृष्ट स्थिति चार सागरोपमनी कही छे (६)॥ ते देवो चार अर्ध मासे (चार पखवाडीयाने छेडे) आन ले छे, प्राण ले छे एटले उच्छ्वास ले छे, निःश्वास ले छे (१)। ते देवोने चार हजार वर्षे आहारनी इच्छा उत्पन्न थाय छे (२) । एवा केटलाक भवसिद्धिक (भव्य) जीवो छ के जेओ चार भवने ग्रहण करवा बडे सिद्ध थशे, यावत् सर्व दुःखनो अंत करशे (३) सूत्र-४ ॥ टीकार्थः-आ चार स्थानतुं सूत्र पण सुगम छे. विशेष ए के-कपाय, ध्यान, विकथा, संज्ञा, बंध अने योजनने माटे छ सूत्र कयां छे, नक्षत्रने माटे त्रण कयां छे, स्थितिने माटे छ कयां छे, अने शेष त्रण सूत्र पूर्वनी जेम जाणवां. एक अंतर्मुहर्त सुधी चित्तनी एकाग्रता अने मन, वचन, कायाना योगनो जे निरोध करवो, ते ध्यान कहेवाय छे. तेमां मनोज्ञ अने अमनोज्ञ वस्तुने विपे वियोग अने संयोगादिकने कारणे चित्तनो जे व्याक्षेप ते आर्तध्यान कहेवाय छे. हिंसा, असत्य, चोरी अने धनना रक्षण माटे जे चित्तनी व्याकुळता ते रौद्रध्यान कहेवाय छे, आज्ञा विगैरे पदना (शब्दना) अर्थना स्वरूपनो विचार करवामां जे चित्तनी एकाग्रता ते धर्मध्यान कहेवाय छे. तथा चौद पूर्वमा रहेला श्रुतर्नु अवलंबन

ॐ
चोधु
अंग ॥
श्री
समवायाङ्ग
॥१७॥
उववण्णा तेसि णं देवाणं उकोसेणं चत्तारि सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ६ ॥
ते णं देवा चउण्हऽद्धमासाणं आणमंति वा पाणमंति वा ऊससंति वानीससंति वा १ । तेसिं
देवाणं चरहिं वाससहस्सेहिं आहारट्टे समुप्पज्जइ २ । अत्थेगइया भवसिद्धियाजीवा जे चउहिं
भवग्गहणहिं सिज्झिस्संति जाव सवदुक्खाणं अंतं करिस्संति ३॥ सूत्रम् ४ ॥
मूलार्थ:-चार कपाय कह्या छै, ते आ प्रमाणे--क्रोधकपाय, मानकपाय, मायाकषाय, लोभकपाय (१)। चार
ध्यान कह्या छे, ते आ प्रमाणे-आर्तध्यान, रौद्रध्यान, धर्मध्यान, शुक्लध्यान (२)। चार विकथा कही छे, ते आ प्रमाणे-
स्त्रीकथा, भक्तकथा, राजकथा, देशकथा (३)। चार संज्ञा कही छे, ते आ प्रमाणे-आहारसंज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुनसंज्ञा,
परिग्रहसंज्ञा (४)। चार प्रकारनो बंध कह्यो छे, ते आ प्रमाणे-प्रकृतिबंध, स्थितिवंध, अनुभावबंध, प्रदेशबंध (५)।
चार गाउनो एक योजन कह्यो छे (६)॥
अनुराधा नक्षत्रना चार तारा कह्या छ (१)। पूर्वापाढा नक्षत्रना चार तारा कह्या छे (२)। उत्तरापाढा नक्षत्रना
चार तारा कह्या छ (३)।
आ रत्नप्रभा पृथ्वीने विपे केटलाक नारकीओनी चार पल्योपमनी स्थिति कही छे (१)।त्रीजी पृथ्वीने विपे केटलाक
॥१७॥

तं जहा-इत्थिकहा भत्तकहा रायकहा देसकहा ३।चत्तारि सण्णा पन्नत्ता, तं जहा-आहारसण्णा भयसण्णा मेहुणसण्णा परिग्गहसण्णा १ । चउविहे बंधे पन्नत्ते, तं जहा-पगइबंधे ठिइबंधे अणु- भावबंधे पएसबंधे ५ । चउगाउए जोयणे पन्नत्ते ६ ॥ अणुराहानक्खत्ते चउतारे पन्नत्ते १ । पुवासादानक्खते चउतारे पन्नत्ते २।उत्तरासादानक्खत्ते चउतारे पन्नत्ते ३॥ इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं चत्तारि पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता १ । तच्चाए णं पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं चत्तारि सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता २ । असुरकुमाराणं देवाणं अत्धेगइयाणं चत्तारि पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ३ । सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं चत्तारि पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता ४ । सणंकुमारमाहिदेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं देवाणं चत्तारि सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ५ । जे देवा किर्टि सुकिढेि किट्ठियावत्तं किट्टिप्पभं किट्ठिजुत्तं किट्ठिवणं किट्ठिलेसं किट्ठिन्झयं किट्ठिसिंगं किढिसिटुं किट्टिकूडं किट्ठत्तरवडिंसगं विमाणं देवत्ताए

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Shri Samvayang Sutra Ang-iv

Author
Jatalal, Sudama,abya
Title
Wrtika, Sudharma Bdrbahu Silalink Wrtika, Sudharma Bdrbahu Silalink Wrtika, Sudharma Bdrbahu Silalink
File name
Shri Samvayang Sutra Ang-iv
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/01
Publisher
Shba.,shri Jain Darm Prasarak
Language
Sanskrit
Pages
148
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
446185
Barcode
99999990027806.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
5edJOrkYfCo
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Shri Samvayang Sutra Ang-iv