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Parasara Smriti
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॥ श्री ॥
धर्म शास्त्र
पाराशरस्मृतिः।
भाषा टीका युक्तः
धर्म शास्त्र विषयक सकल प्रायश्चित्त शुद्धि
निर्णय मानव धर्म प्रचारकः।
काशी निवासी पं० गुरू प्रसाद शर्मा
द्वारा भाषानुपादित
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* बम्बई
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बाबू हरीनारायण वर्मा कुसेल
कचौडीगली काशीने छपवाया।
जे. एन राव द्वारा काशी नागेश्वर प्रेस, में छपा।
प्रथम वार १५०० } सं० १९२३ ई मूल्य ।)
बाल
.... . मा रोकने में. 8 श्री. पाराशरस्मृतिभाषाटीकाकी विषयानुक्रमणिका । विषयः पूंछोंक विषय. पृष्ठांक: अध्याय १. अध्याय ७. षट्कर्म करनेसे ब्रामणोंको सौख्य- काठ आदिक बनाये पात्रों की लाभ, अतिषिसत्कारका फल शुद्ध और रजस्वला स्त्री परस्पर और सामान्यतासे वर्ण चतुष्ट- स्पर्श करें तो उसका प्रायश्चित्त यका कर्म अध्याय ८:: अध्याय २. कलियुगमें गृहस्थ के अावश्यक: अकामसे बंधन लादिमें गौ मरजाय काँका साधारणतासे कथन ".." तो उसका प्रायश्चित्त अध्याय- अध्याय मननमरणके अशौचकी शुद्धिको भलीभांति गोंकि रक्षा करनेकी इच्छासे बांधने अध्याय १: प्रतिमान से वा अतिक्रोधादिस मरे- गोहत्या हाय तो उसका हुये स्त्री पुरुषों का दाह आदि प्रायश्चित्तं. करने में प्रायश्चित, तकृच्छ का अध्याय १० लक्षण और परिवेदनादि भगम्यसो गमनका चारों वर्षों के दोषका विचार २.८ याग्य प्रायश्चित्त अधणय अध्याय ११ मलिया कुत्रे आदिसे काटनेमें शुद्धिः चांडालादिसे मारेहुए. अशुद्ध वीर्यआदि पदार्थक भक्षणमें ब्राह्मणके देहका स्पर्श करनेमें प्रायश्चित्त और शूद्रान्नभक्षणमें प्रायश्चित्त और अग्निहोत्रीका ब्राह्मणको प्रायाचित देशान्तरमें मरण हाय तो उसकी अध्याय क्रियाका बिचार विष्ठा मंत्र आदि भक्षणमे प्रायश्चित अध्याय ६ और ब्राह्मणहत्याका माणियाकी हिंसाका प्रायश्चित्तकथन ३८ प्रायश्चित ॥ इति पराशर स्मृतिविषयानुक्रमणिका समाप्ता ।। ....
- श्रीगणेशाय नमः। अथ पाराशरस्मृति भाषा टोका सहित। अथातोहिमशैलाग्ने देवदारुवनालये। व्यासमेकानमासीनमपृच्छन्नृषयः पुरा ॥१॥ 30 श्रीगणेशायनमः ॥ मंगलाचरण पूर्वक इसनंथका बयानहरीि विहान् यों लिखता है कि किसी समय ऋषि लोगों ने हिमालय पर्वत के शिखर पर देवदास वृक्षों के बन में एकाग्र चित होकर 'वैठे हुये व्यासजी से ऐसा प्रश्न किया ॥ १ ।। 'मानुषाणाहितं धर्मवत मानेकलौयुगे। शौचाचारयथावच्च बद सत्यवती सुत ॥२॥ कि हे सत्यवती के पुत्र आप हम लोगों से मनुष्यों के जो धर्म इस कलियुग में हितकारी हो सक्ते हैं तथा उनके शौच और आचार भी विधि पूर्वक कहें ।। २ ।। १ यद्यपि इस मंथका नाम पाराशरस्मृति ऐसा सुनने से पहिले पहिल हर एक मनुष्य के मनमें आवेगा कि इसे पराशरजीने रचा है । परन्तु जब इस मन्थका बोड़ा सा भी पढ़ेंगे तो स्पष्ट प्रतीत होगा कि पराशरजीने जो धर्मकी बातें व्यासजी और उनके साथी ऋषियों को सुनाई थी उन सबो को किसी मनुष्य ने अथवा उन्ही ऋपियो मै से अन्यतम् ने इकटटी कर लोकोपकार के निमित्त लिखकर मंथ रच दिया है अथ पाराशरस्मृति। । तच्छुत्वाऋषि वाक्यं तुसशिष्योऽन्यर्क सन्निभः ।। प्रत्युवाचमहातेजाः श्रुतिस्मृतिविशारदः॥३॥ ऋषियों के इस वाक्य को सुनकर अपने शिष्यों के मध्य में बैठे तथा अग्नि और सूर्य की भांति अति तेजस्वी रूप देख पड़ते हुये और श्रुति स्मृति ( अर्थात् वेद और धर्म शास्त्र ) में परम विपुण नीव्यास जी बोले ॥ ३ ॥ न चाहंसर्वतत्वज्ञः कथंधर्मवदाम्यहम् ।। अस्मत्मितवै प्रष्ठव्य इतिव्यासः सुतोवदत्॥४॥ मैं सम्पूर्ण बातों का तत्व नहीं जानता तो धर्म क्यों कर कह सकू इस हेतु हमारे पिता से ही पूछना चाहिये ऐसा पराशर के सुत व्यासजी ने कहा ॥ ४ ॥ ततस्तेऋषयः सर्वधर्मतत्त्वार्थकांक्षिणाः ॥ ऋषिव्यासंपुरस्कृत्यगतावदरिकाश्रमम् ॥५॥ अनन्तर वे सव ऋषि लोग धर्म तत्व जानने की इच्छा व्यासजी को अगाड़ी कर वंदरिका श्रम को चलषड़े ॥ ५ ॥ नानापुप्यलताकीणफलपुप्य रलंकृतम्। नदी प्रसूवणोपेतं पुण्यतीर्थोपशोभितम ॥ ६॥ वहां पर अनेक भांति की फूली हुई लतायें फैल रही थी, विविध प्रकार के फल और फूलों से वडी शोभा हो रही थी, नदियों झरने चल रहे थे, 'अच्छे २ पवित्र तीर्थों से आश्रम सुहावना हो रहा था।॥ ६॥ मृगपक्षिनिनादाड्यं देवतायननारतम् ।। यक्षगंधर्वसिद्धश्च नृत्यगीतैरलं कृतम् ॥७॥ बहुत से मृग और पक्षियों के शब्द चारों ओर सुनाई दे रहे थे, देवताओं के मंदिरों को घेरासा वध रहा था यक्ष गंधर्व सिट लोगों के नृत्य और गान से अधिकतर शोभा हो रही थी।
. भाषा टीका सहित। तस्मिन् नृषिसभामध्ये शक्ति पुत्रं पराशरम् ॥ सुशासीनं महातेजा मुनिमुख्यगणैर्टतम् ॥ ८॥ ऐसे आमम के वीच ऋषियों की जो सभा हो रही थी उसमे गुण्य २ मुनियोके मध्य तुख पूर्वक बैठे हुए शक्ति के पुत्र श्री पराशर सीको बटे तेजस्वी ॥ ८ ॥ कृतांजलिपुटोभूत्वा व्यासस्तुऋषिभिः सह ॥ प्रदक्षिणाभिवादैश्चस्तुतिभिः समपूजयेत् ॥ ९॥ श्रीव्यासजीने ऋषिगणों समेत दोनों हाथ जोडकर तथा प्रदक्षिणा और प्रणाम करके एवं स्तुतियों से भी प्तन्तुष्ट किया ॥६॥ अथ संतुष्टहृदयः पराशरमह मुनिः ।। भाहसुस्वागतं ब्रही त्यासीनोमुनिपुंगवः ॥१०॥ तष पराशर महामुनिने अपने हृदय में बहुत प्रसन्न होकर कहा कि अपने शुभागमनका वृत्त कहिये अनन्तर मुनियो में श्रेष्ट १० कुशलंसम्यगित्युक्त्वाव्यासः पृच्छत्यानंतरम् ॥ यदिजानासिमेभक्तिं नहाहाभक्तवत्सल ॥११॥ श्रीव्यासजी मली भांति कुशल हैं ऐसा कुछ कर बैठे और यो बोले कि हे भक्तवत्सल ! यदि आप मेरीभक्ति अपने में जानते अथवा भापका स्नेह मुझ पर है तो ॥ ११ ॥ धर्मकथयमेतातभनुग्राह्योह्यहंतव ॥ श्रुतामेमानवाधर्मा वासिष्टाः काश्यपास्तथा ॥ १२॥ हेतात.! मुशे धर्म बसलाइये क्योंकि मैं आपका अनुग्रह पात्रहूं मैने मनु, मसिष्ठ, करयप, ।। १२ ।। गार्गीयागौतमीयाश्चतथाचौशनसाः स्मृताः ॥ अत्रेर्विष्णाश्चसंवाहनादंगिरसस्तथा ॥ १३ ॥ गर्ग गौतम. उचाना चात्रि.विष्णु संवर्तः दध, अंगिरा, ॥१३॥ ।
४ अथ पाराशरस्मृति। शातातपाश्चहारीताचाज्ञवल्क्यात्तथैवच ॥ आपस्तंब कृता धर्मा: शंखस्यलिखितस्यच ॥१४॥ शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्या आपस्तंच, शल लिखित ॥१४॥ कात्यायनकृताश्चैवतथा प्राचेतसाम्मुनेः ॥ श्रुताद्यते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यामेन विस्मृताः । १५ ॥ कात्यायन, तथैव पाचेतस मुनि के कहे हुए धर्मों को सुना है और आपने जो श्रुति अर्थात् वेदों के अर्थ मुझ मे कहे उन्हें भी में नहीं भूलाहूँ ॥ १५ ॥ अस्मिन्मन्वंतरेधर्माः कृतत्रेतादिकयुगे । सर्वेधर्माः कृतेजाताः सर्वेनष्टाः कलौयुगे॥१६॥ इसी * मन्यतंर में सत्ययुग और त्रेतादियुग के जो धर्म हैं उन्मे से सत्ययुग में तो सारे धर्म थे और कलियुग में संघ के सब दूर होगये हैं ॥१६॥ चातुर्वर्ण्यसमाचार किंचित्साधारणंवद ॥ चतुर्णा मपिवर्णानां कर्त्तव्यं धर्मकोविदैः ॥ १७॥ चारों वर्गों का जो कुछ साधारण आचार है सो कहिए कि जिसे धर्म निपुण चारों वर्णके लोग करें ॥ १० ॥ बेहिधर्मस्वरूपज्ञसूक्ष्म स्थूलं च विस्तरात् ।। व्यास वाक्यावसानेतु मुनिमुख्यः पराशरः ॥ १८॥ आप धर्मका स्वरुप जानते हैं इस हेतु सूक्ष्म और स्थूल दोनों धर्म विस्तार पूर्वक कहिए व्यासकी वाते. हो चुकने पर मुनियों में प्रधान पराशर जी ।। १८ ॥ * अर्थात वैवस्वतमन्वंतरमें और देवताबोके ७१ युगोकाएक मन्वंतर होता है। धर्मस्यनिर्णयं प्राहसूक्ष्म स्थूलं च विस्तरात् ॥ :
पू भाषा टीका सहित। शृणुपुत्रपूर्वक्ष्यामि शृण्वंतुमुनयस्तथा ॥ १९ ॥ धर्म का शुक्ष्म और स्थूल दोनो विध निर्णय विस्तार पूर्वक यो कहने लगे कि हे पुत्र ! तुम सुमो और सारे मुनि गण भी सुनें (इस भांति श्रोताओं को सावधान किया ) ॥ १६ ॥ कल्पेकल्पे क्षयोत्पत्याब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।। श्रुतिस्मृति सदाचारनिणेतारश्चसर्वदा ॥२०॥ हर एक कल्प (संसारोस्पत्ति ( काल मे व्रत्मा, विष्णु, और महन्धर (शिव) ये तीनो क्षीण हो कर उत्पन्न होते और श्रुति ( वेद ) स्मृति, ( धर्मशाला ) तथा सदाचार, (होलिकादि ) का निर्णय नदा करते हैं ॥ २० ॥ नकश्चिद्वेदकाचवेदस्मृत्वाचतुर्मुखः। तथैवधर्मान्स्मरतिमनुः कल्पांतरेतरे ॥ २७॥ बेद का कर्ता कोई नहीं है चतुर्मुख ब्रह्मा ने वेदको स्मरण किया इसी भांति प्रति कल्पांतर मे मनुजी धर्मों का स्मरण कते हैं ॥ २१ ॥ अन्येकृतयुगेधर्मास्त्रेतायांद्वापरयुगे ॥ अन्येकलियुगे पुंसांयुगरूपानुसारतः ॥ २२ ॥ सत्ययुग मे पुरुपो के धर्म और ही थे और त्रेता में कुछ और तथा छापर में उससे भी मिन्न थे इसी भांति कखियुग के धर्म दूसरे ही हैं जैसा युग तैसे धर्म होते है ॥२१॥ तपः परं कृतयुगे त्रेतायांज्ञानमुच्यते ॥ द्वापरयज्ञमेवाहुनमेकंकलौ युगे ॥ २३ ॥ सत्य युग में तपस्याही वड़ा धर्म था त्रेता में ज्ञान को परम धर्म मानते थे द्वापर मे यज्ञ को और कलियुग में केवल दान ही धर्म है ॥ २६ ॥ कृतेतुमानवाधर्मास्तायांगौतमाः स्मृताः।
अथ पाराशरस्मृति ।
द्वापरे शाखलिखिता; कलोपाराशरा स्मृताः ॥ २४ ॥
सत्ययुग मे मनु के कहे हुये धर्म; अता में गौतम के, द्वापर मे
सख लिखित के, और कलियुग में पराशर के धर्म माने जाते हैं।॥२४॥
त्यजेदेश कृतयुगे बेतायां प्राममुत्सृजेत् ॥
द्वापरे कुलमेकं तु कतारं तु कलौयुगे ॥ २५ ॥
सत्ययुग में पाप करनेवाले के देश को छोडना चाहिए प्रेता में
उसके गांपको, द्वापर में उसके कुलको और कलियुग में उस करने वाले
ही को त्यागना होता है ॥ २५ ॥
कृने संभाषणाद्देव त्रेतायांस्पर्शनेन च ॥
द्वापरत्वन्नमादाय कलोपतति कर्मणा ॥२६॥
सत्ययुग में पापी के साथ बोलनेही से प्रेता में स्पर्श कर्नेले
द्वापर में उसका अन्न लेनेसे मनुष्य पतित होता है और कलियुग में
तो पाप कर्म करने सेही पतित होता है अन्य था नहीं ॥ २६ ॥
कृतेतारक्षणिकः शापातायां दशदिनैः ।।
द्वापरे चैकमासेनकलौ संवत्सरेणतु ॥ २७॥
सत्ययुग में कोई सराधै तो उसीक्षण उसका फल हो जाता
है त्रेतामें दसदिन के बीच होला, द्वापर में एक महीनेपर और
युग मे बरसभर के अन्तर होता है । २७ ॥
अभिगम्य कृतेदानं त्रेतास्वाहूयदीयते ।।
द्वापरेया च मानायसेवयादीयतकलौ ॥२८॥
सत्ययुग में प्राध्यण के घरपर जाकर लोगदान देते हैं त्रेता में
बुलाकर देते द्वापर में मांगने परदेते, और कलियुग में जो सेवाकरे
उसे देते हैं. ॥ २८॥
अमिगन्योतमैदानमाहू यैवतुमध्यमम् ।।
अधम याचमानाय सेवादानंतु निष्फलम् ॥ २९ ॥
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भाषा टीका सहित ।
किसी के घर पर जाकर देना उत्तम दान है, बुलाकर देना
मध्यम है, मांगने पर देना अधम दान है और सेवाफरने पर जो
दिया वह निष्फल होता है ॥ २९ ॥
जितोधमोह्य धर्मेण सत्यं चैवानृतेनच ॥
जिताश्चौरैश्चराजानः स्त्रीभिश्च पुरुषाजिताः ॥३०॥
उस कलियुग में धर्म से अधर्म प्रवल होता है सच्चे से भूठा
राजाओं से चोरलोग, और पुरुपोंसे स्त्री प्रबल होती है ॥ ३० ॥
सीदतिचाऽग्निहोत्राणि गुरु पूजापूणश्यात ॥
कुमार्यश्वपूसूर्यते तस्मिन्कलियुगे सदा ॥३१॥
भग्निहोत्रके कम ढीले पडजाते, गुरुक्षों की पूजा न हो जाती
है और कारी लड़कियों को बच्चे जन्मते हैं यही बर्ताव सदा हो
जाता है ॥ ३१ ॥
कृतत्वस्थिगताः पाणास्त्रेतायां मांसमाश्रिताः ।
द्वापरे रुधिरं चैवकलौत्वन्नादिषुस्थिताः ॥३२॥
सत युग में प्राण हलियों में रहता है, ताके मध्यमांसो द्वापर
में रुधिर के वीच पोर कलियुग में अन्नादि (खानेपीने ) में प्राण
रहता है।॥ ३२ ॥
युगेयुगे च येधर्मास्तत्रतत्र च ये द्विजाः ।।
तेषांनिंदा न कर्तव्या युगरूपाहितेद्विजाः॥ ३३॥
हर एक युग के जो धर्म है और उन २ युगों में जो दिन होते हैं
उनकी निन्दा करनी योग नहीं क्योंकि वे युगों के रूपही है ॥३३॥
युगेयुगेतुसामर्थ्यशेषमुनि विभाषितम् ।।
पराशरेणचाप्युक्तं प्रायश्चित विधीयते ॥३४॥
युग २ के सामर्थ्य तथा जो विशप वाते हैं उन्हें और अनेक
मुनियों ने अथवा पराशर ने भी कहा है उससे जो कुछ शेषग्रंथात्
न्यून वा अधिक हो उसी मे प्रायश्चित होता है ॥ ३४ ॥
अथ पाराशरस्मृति । अहमद्यैवतत्सर्वं मनुस्मृत्यत्रदीनिकः ।। चातुर्वण्य समाचारं शृण्वन्तुमुनिपुंगवाः ॥ ३५ ॥ मै माजही उन सबो की तुवकर आपलोगो से चारोवणों के समाचार कहताहूंहे ऋषि धेष्ट ! आप लोग सुनें ॥ ३५ ॥ पराशरमतं पुण्यं पवित्रनं पापनाशनम् ।। चिंतितंब्राह्मणार्थायधर्मसस्थापनायत्र॥ ३६ ॥ यहपराशरता कथितधर्मशाल पाठकरने से पुण्य जनतहोता है अनुष्ठान करने से पवित्र स्वर्गदायक होता है और नरकांविनिवृत्ति करने से पापनाशक्त ब्राह्मणोंहे निमित्त और घनस्थापन के लिए चिंतितहुआ है ॥ २६ ॥ चतुर्णामपिवानामाचारो धर्मपालकः। आचार स्रष्टदेहानां भवेधर्मः पराङ्मुखः ॥ ३७॥ चारों कणोंका धर्म आचार से ही पालित होता है और जिन्के सरीर आचार सभ्रष्ट हैं उनले धर्म भी बिनुन होजाता है .. ३७ षट्कर्माभिरतो नित्यं देवतातिथिपूजकः ।। हुतशेषतुझुंजानोब्राह्मणोलावसीदति ।। ३८ ॥ छक्रमों ( रेशर्म आगे ले जावेंगे } मैं सदा रन रहनहारा और देवता तथैव अतिथियों का पूजन करने हारा और हुनशेष अर्थात् वैश्वदेवकर्म से बचा हुआ अन्न भोजन करनेवाला जो. ब्राह्मण है उन्न दोष नहीं होता है । ३८ ॥ संध्यास्तानं जपोहोमो देवतानां च प्रपूजनम् ॥ आतिथ्य वैश्वदेवंच षट्कर्माणि दिनेदिने ॥ ३९ ॥ तीनों संश्याओं में स्वान, गायत्री जप होम देवताओं का पूजन अतिथि सत्कार और बलियश्चदेव,छोर प्रतिदिन कर्तव्य हैं ३९॥ इटोबायदिबारेष्यो सूर्चः पंडितएवंदा ।
.......MAP MA--- भाषा टीका सहित। संप्राप्तो वैश्वदेवांते सोतिथिः स्वर्गक्रमः॥४०॥ मित्र हो अथवा शत्रु, सूर्व हो वा पण्डित चाहे कैमा भी मनुष्य वैश्वदेव के अंत में आया तो वह स्वर्ग प्राप्त कराने हारा अतिथि कहलाता है ॥१०॥ दूराचोरगतश्रांतं वैश्वदेव उपस्थितम् ।। अतिर्थितं विजानीयानातिथिः पूर्वमागतः ॥४१॥ जो दूरसे आया हो, थाहो, और धैश्वदेष के समय पहुंचा हो उसे अतिथि जानो न कि जो पहिले कभी आगया हो ॥४१॥ नपृच्छेद्गोत्रचरणे स्वाध्यायं च ब्रतानि च ॥ हृदयं कल्पयेत्तस्मिन्सर्वदेवमयोहिसः॥ ४२ ॥ ऐसे अतिथि का गोत्र और शाख तथा वेद और प्रत न पूचना पाहिए उसपर अपना चित्त लगावे वही सर्व देव स्वरूप होता॥४॥ नैकग्रामीणमतिथिं संग्रहीत कदाचन ॥ अनित्यमागतोयस्मात्तस्मादातथि रुच्यते ॥४३॥ एकही गांव के रहने वाले को अतिथि समझ के कभी न लेना क्योंकि अतिथि का अर्थ यही है कि जो नित्य न आवे ॥१३॥ अतिथिंचसंप्राप्त पूजयेत्स्वागतादिना ।। तथासनप्रदानेनपादप्रक्षालनेन च ॥४४॥ उक्त समय में आये हुये अतिथि को स्वागत आदि कपन कर्के आसन देने से और पांव धोने से पूजन करे ॥ ४४ ॥ श्रद्धयाचान्नदानेन प्रियप्रश्नोत्तरेण च ।। गच्छतश्चानुयालन प्रीतिमुत्पादयेद्गृही॥४५॥ प्रद्धा पूर्वक भोजन देने से उस्की प्रिय बातें पूछने और कहने से और जब चलने लगे तो उसके पीछे पीछे कुछ दूर पहुचाने से उस्की प्रसंता गृहस्थ को करनी चाहिये ॥ ४५ ॥ .
१० अथ पाराशरस्मृति अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते ।। पितरस्तस्यताऽश्नति दशवर्षाणि पंच च ॥४६॥ जिसके घरले अतिथि निराश होकर चला जाता है उसके पितार लोग पंद्रवर्ष भोजन नहीं लेते ॥ १६ ॥ काष्ठाभारसहस्रेण घृतकुंभ शतेन च ॥ अतिथिर्यस्य भग्नाशस्तस्य होमोनिरर्थकः ॥४७॥ जिस्का अतिथि निराश हुआ वह चाहे १००० भार ईधनसे और १०० घड़े घीसे भी होम करे तो भी वह निष्फल है ॥ १७ ॥ सुक्षेत्रे वापयेहीजं सुपात्रेनितिपेद्धनम् ॥ सुक्षेत्रेचसुपात्रेचघुप्तदत्तननश्यति ।। ४८॥ अच्छे खेत में वीज बोना और सुपात्रको धन देना क्योंकि सुखेन और लुपात्र में बोया और दिया हुआ नष्ट नहीं होता। अपूर्वः सव्रतीविप्रोह्य पूर्वश्चातिथिस्तथा । वेदाभ्यासरतो नित्यमपूर्वोहि दिनोदिने ॥४९॥ अच्छे ब्रतवाला नाश्मण अतिथि और वेदाभ्यास में रत रहने हारा मनुष्य ये प्रतिदिन भी आवे तो इन्हें अपूर्वही. अर्थात् नया आया हुआ जानना ।। ४९ ॥ बैश्वदेवेतु संप्राप्ते भिक्षुके गृहमागते । उद्धृत्य वैश्वदेवार्थ भिक्षांदत्वा विसर्जयेत् ॥५०॥ वैश्वदेवके समय में यदि कोई भिक्षुक घर में भाजावे तो वैश्व: देवके लिये अन्न निकाल कर शेष उस भिखारीको भिक्षा देकर विदा कर देना ॥ ५० ॥ यतिश्चब्रह्मचारीचपक्वान्नस्वामिनावुभौ ॥ तयोरन्नमदत्वा च भुक्त्वा चांद्रायणंचरेत् ॥ ५१ ॥ पके हुए अन्नके स्वामी सन्यासी और ब्रह्मचारी है इसलिये यदि भाषा दीका सहित। पनको विना दियेही श्राप भोजन करे तो चान्द्रायण ब्रतकरना चित है दद्याच्चभिक्षात्रितयं परिब्राब्रह्मचारिणे ॥ इच्छयाच ततो दद्याद्विभवे सत्यवारितम् ॥५२॥ संन्यासी और ब्रह्मचारी इन दोनों को पहिले तीनों मिक्षा अर्थात् जल, अन्न, पुन: जल देकर यदि सामर्थ्य हो तो यथा रुचि और भी वस्तु देवै कुछ निषेध नहीं है ॥ ५२ ॥ यतिहस्तेजलं दद्य दयंदद्यात् पुनर्जलम् ।। तद्भेक्ष्यमेरुणातुल्यं तज्जलंसागरोपमम् ॥ ५३ ॥ यती के हाथ में पहिले जल देना तय भिक्षा देनी अनन्तर पुनः जल देना तो वह भिक्षा मेरु पर्वत के तुल्य होती है, और वह जल समुद्र के तुल्य होता है ॥ ५३ ॥ यस्यच्छहयश्चैव कुंजरारोहमृद्धिमत् ।। ऐंद्रस्थानमुपासीत् तस्मात्तनविचारयेत् ॥ ५४॥ जिसके छत्र, घोड़े, हाथी, और बड़े मूल्य के सिंहासनादि होते ऐसे ऐन्द्रस्थान (इन्द्रके तुल्य पदवी) पर पह पहुंचता है इस हेतु उस ( यति के विषय ) का विचार न करना ॥ ५४ ॥ वैश्वदेवकृतंदोषं शक्तोभिक्षुईपोहितुम् ॥ नहिभिक्षुकृतदोष वैश्वदेवोब्योहान ॥ ५५ ॥ वैश्वदेव में जा दोष किया हो उसे भिक्षु हरा सक्ता है परन्तु भिक्षुक के प्रति जो दोष किया हो उसे वैश्वदेव नहीं छुड़ा सक्ता है ॥ ५५ ॥ अकृत्वावैश्वदेवंतु ये भुति द्विजातयः ।। तेषामन्नंन जंती काकयोनिब्रजति ते॥५६॥ जो द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्री और वैश्य ) वैश्वदेव किए विना ही भोजन कर लेते हैं उनका अन्न भोजन न करना चाहिये. क्यों कि वे काक योनि में जाते हैं ॥ ५६ ॥ .
अथ पाराशरस्मृति अकृत्वावैश्वदेवं तु मुंजते येद्धिजाधमाः ॥ सर्वेतनिष्फलाज्ञेयाः पततिनरकेऽशुचौ ॥ ५७॥ वैश्वदेव विना कियेही जो द्विजाबाद भोजन करतेहैं, वे सब निष्फल होते और अपवित्र नरक में गिरते हैं ।। ५७ ।। वैश्वदेवविहीनाये आतिथ्येन बहिष्कृताः ।। सर्वे ते नरकं यांतिकाकयोनिनजति च ॥५८।। जो धैश्वदेवः कर्म से रहित हैं और अतिथि सत्कार से वहिर्मुख हैं वे सब नरक और काक योनि को जाले हैं ।। ५८ ॥ शिरोवेष्टयतुयोसुंक्त दक्षिणाभिमुखस्तु यः ।। वामपादेकरंन्यस्थतढरक्षांसिझुंजते ।। ५९ ॥ शिर में वस्त्र लपेट कर जो भोजन की तथा वायें पांव पर हाथ रख कर जो भोजन कर्ता हैलो मानो राक्षस भोजन, कते हैं। ५६ यतयेकांचनं दत्वा तांबूलं ब्रह्मचारिणे ॥ चौरेभ्योप्यमयं दत्वा दातापिनरकंबजेत॥६०॥ यहि सन्यासी को सोना दे, ब्रह्मचारी को पान दें और चोरों को अमय दान दे तो यह दाता भी नरक को प्राप्त होता है।॥१०॥ शुक्लवस्त्रं च यानं च तांबूलं धातुमेवच ।। प्रतिगृह्यकुलंहन्यात्प्रति गृह्णाति यस्य च ॥ ६१ ।। जो यती अथवा, ब्रह्मचारी शुक्लबस्न सवारी, तांबूल, और धातु ( सोना चांदी आदि ) दान ग्रहण करें तो वह अपने और देने वाले दोनों के कुलकी हत्या का है ।। ६१ ॥ चौरोवा या चांडालः शत्रुर्वपित घातकः॥ वैश्वदेवेतुसंप्राप्ते सोतिथिः स्वर्गसंक्रमः ।। ६२ ॥ चोर चांडाल, शत्रु, अथवा पित घाती भी हो, और वैश्वदेव समय में अजावै तो वह स्वर्ग प्रद अथिति होता है ।। ६२ । -- - भाषा. टीका सहित। नगृह्णातितुयोविषो अतिथिं वेदपारगम् ॥ अदत्तं चान्नात्रंतुभुक्त्वामुंक्ततुकिल्विषम् ६३ ॥ जो ब्राह्मण वेद पारगामी अतिथि को नहीं लेता और बिना दिया हुआ ही अन्न खाना है, तो वह पाप भोजन का है ॥ १३ ॥ ब्राह्मणस्य मुखक्षेत्र निरूपरम कंटकम् ।। वापयेत्सबबस्तूनिसाकृषिः सर्वकामिका ।। ६४॥ ब्राह्मण का मुख उस खेत के तुल्य है, कि जिसमें काटे और असर न हो इस,हेतु उस में सब प्रकार के बीज बोने चाहिये क्योंकि यह खेती सब कामना देती है ।। ६४ ॥ अवताहनधीयाना यत्र भेद चहिजाः ॥ तंग्रामदंडयेद्राजा चौरभक्तप्रदोहिसः ॥ ६५ ।। जिस गांव में अनपढे और विना ब्रत क द्विज रहते हो उस मामको राजा दंड देवे, क्योंकि वह चोरों का खिलाने हारा है॥१५॥ क्षत्रियोहिप्रजारक्षन् शस्त्र गणिः प्रदंडवान् ॥ । निश्रित्यपरसैन्यानि क्षितिधर्मेणपालपेत् ॥६६॥ क्योंकि क्षत्रिय कों चाहिये कि प्रजाओं की रक्षा करे,.हाथ में शस्त्र धारण कियेही रहे, दंड • ली भांति दे और दूसरे की सेनाओं को जात र धर्म पूर्वक पृथ्वी को,पालन करे ॥ ६६ ॥ कुलकाज्जाता भूषणोल्लिखितोऽपिवा ॥ खड़गेनाक्रम्प जीत वीरभोग्यावमुंधरा ॥ ६७॥ किमी के कुल में परंपरा से लक्षती नहीं जन्मी है, और न किसी के भूषण में लिखी है, इस हेतु अपने. खङ्ग के वला से लेकर उस्का भोग करे, क्योकि वसुंधरा पीरोही के भोगने योग्य है ॥ ६७.॥ पुष्यंपुष्यं विचिनु सन्मूनच्छेदैनकारयेत् ॥ मालाकारहवाऽरामे न यथांगारकारकः॥ ६८॥ नश्रीः कुलका अथ पाराशरस्मृति जिस भांति माली फुलवारी में वृक्षों का केवल फूल चुनता है जड़ समेत नह उखाड़ लेता इसी भांति राजा भी मजा से थोड़ी २ मन लेवे और कोला बनाने हारों की भांति जड़ चूल ले उनका इच्छेद न करे ।। ६८ ॥ लाभकर्मतयारत्नं गवांचपरिपालनम् ॥ कृषिकर्मचवाणिज्यं वैश्यवृत्तिवाहता ॥ ६९ ॥ वैश्यों की वृत्ति यह है कि, व्योहार, देना, रत्नों का क्रय विक्रय कर्ना गौओं को पालना, और राणिज्य करना ॥ ६९ ॥ शूद्रस्यद्विजशुश्रूषा परमोधर्म उच्यते ॥' अन्यथाकुरुतकिंचित्तद्भवेत्तस्यनिष्फलम् ॥ ७० ॥ शूद्रका परम धर्म द्विजों की सेवा करना है इससे अन्यथा जो कुछ वह कर्ता है सो सव उस्का निष्फल होता है ।। ... लवणं मधुतैलं च दधितकंघृतपयः ॥ नदुष्येच्द्रजातीनां कुर्यात्सर्वेषुविक्रयम् ॥ ७१ ॥ शूद्रों का लवण, मधु, तेत, दही, छाछ, घी, और दूध इनका दोष नहीं सय के पास बेच सक्ता हैं . ७६ ॥ विक्रीणन्मद्यमांसानि भक्ष्यस्यचभक्षणम् ॥ कुर्वन्नगम्यागमन शूद्रः पतति तक्षणात् ।। ७२ ।। मद्य और मांस को बेचने से, अमक्ष्य को भक्षण कर्ने से और अगम्या स्त्री का गमन पर्ने से उसी क्षण शूद्र पतित होता है।।७२॥ कपिलानीरपानेन ब्राह्मगीगमनेनच ॥ वेदाक्षरविचारेण शूद्रस्वनरकंध्रुवम् ॥ ७३ ॥ इतिपाराशरीय धर्मशास्त्रे चतुर्वण्याच.रो नामंत्रयलोयायः ॥ १॥ कपिला गौका दूध पीने से ब्राह्मणो का संग कर्ने से, और वेद के अधरों को विचा कर्ने से शूद्र को नरक अवश्य होता है।। ७३ ॥ इति पाराशर धर्मशान भावाटीकायांचातुर्याचारोनाम प्रथमोऽन्याय ...
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भाषा टीका सहित ।
अतःपरंगृहस्थस्थकर्माचारं कलौयुगे।
धर्मसाधारणं शक्त्या चातुर्वण्र्याक्रमागतम् ॥१॥
पहिले अध्याय में विशेप और साधारण धर्म कहे, अव दूसरे
अध्याय में प्रकार प्रतिज्ञा कर्ने हैं कि इसके अनन्तर गृहस्थका जो
आचरण कलियुग में चारवर्णों के क्रमले (पूर्व १ कलियुगों
में जो चारों वाँका क्रमपूर्वक ) चला आया है ॥ १ ॥
तं प्रवक्ष्याम्यहंपूर्व पराशरवचो यथा ॥
षट्कर्मसहितोविप्रः कृषिकर्म च कारयेत् ॥२॥
उसे और शक्ति अर्थात् समार्य के न्युन वा अधिक होने से
जो साधारण धर्म होता है उसे भी मैं उसी भांति कहूंगा, कि मैसे
पहिले पराशर का वचन है (प्रथमोध्याय में उक्त) छओं कर्म सहित
ब्राह्मण को श्वेती भी करानी चाहिये ॥ २ ॥
तुषितं तृषितं आंतं वलीवईनयोजयेत् ॥
हीनांगंब्याधितंक्लीवं बूषविप्रोनवाहयेत् ॥ ३॥
भूखे, प्यासे, और थके हुए बैल को जुए में न जोते, जो बैल
अंगहीन हो अथवा रोगी हो तथा क्लीव (बधिया किया) हो उसे
तो इलमें वाधना ही न चाहिये ।। ३ ।।
स्थिरांगनीरुजं दृप्तं सुनई पंढ वर्जितम् ।।
• वाहयदिवसस्याई पश्चात्स्नानसमाचरेत् ॥४॥
जिस बैलकै अंग दृढहो, रोग रहित हो दर्पले भराहो डकारें
मारता हो, बधिया न हो इस भांति के वैल को आधा दिन जोते पीले
स्मान करे ॥४॥
जयंदेवार्चनहोमं स्वाध्यायं चैवमभ्यसेत् ॥
एकद्वित्रिचतुर्विमान्भोजयेत्स्नातकानद्विजः॥५॥
द्विजों को चाहिये कि जप देवपूजन, होम, और वेदका अध्ययन
प्रतिदिन करे एक, दो, तीन, वा चार ब्राह्मण ब्रह्मचारियों को
भोजन करावे.॥५॥
अथ पाराशरस्मृति स्वयंकृतथाक्षेत्रे धान्यैश्चस्वयमजितैः ॥ निर्वपेत्यंचयज्ञाश्च क्रतुदीक्षां चकारयेत् ॥ ६॥ अपने जोते खेत में अपने कमाने में, जो अन्न हो उनमें पंच 'यज्ञ (लिवैश्व देव आदिक) और बडे यज्ञों को भी करावे तिलारसानविकेया विक्रेयाधान्यतस्सनाः ।। विपस्यैवविधात्ति स्तृणकाष्टादिविक्रयः ॥ ७ ॥ तिल और रस (घीतेल आदि) कभी न बेचे यदिखेचे तो अन्न से बदलाकरले ब्रामण की धृत्ति ऐसी होती है, तृण और काठ प्रादिकोंका विक्रय करलेवे ॥ ७ ॥ ब्राह्मणश्चत्कृषि कुर्यात्तत्महादोषमवाप्नुयात् ॥ अष्टागवंधर्महलं षङ्गवंशत्तिलक्षणम् ॥८॥ बाह्मण खति करे, तो उस्को वडा दोष लगता है, पाठ घेलका हल धर्म हल होता है और छ. थैलों से वृत्तिके अर्थ ॥ ८ ॥ चतुर्गवनृशंसानां द्विगवंगोजिघांसुबत् ।। द्विरावंबाहयेत्पादं मध्यान्हेतुचतुवम् ॥ ९॥ चार बैलों से निर्दयी लोगोंका. और दो बैलों ने गौशी हत्या कर्ने हारों का सा होता है। दो बैलों का हल पहर भर जोतना पाहिये चार बैलांका दो पहर तक ९ ॥ षड़गवंतुत्रिया माहेष्टभिःपूर्णतुबाहयेत् ॥ नाप्नोतिनरकेप्वैवं वर्तमावस्तुवैद्विजः॥ १० ॥ क थैलों का. तीन पहर तक और आठ वैलों से पूरे दिनभर जोते। इस भांति जो द्विज वर्ताव का है वह नरक में नहीं जाता ॥१०॥ दानंदद्याच्चैवैतेषां प्रशस्तस्वर्गसाधनम् ॥ संवत्सरेण यत्पापं मत्स्यघातीसमाप्नुयात् ॥ ११ ॥ दान भी देवै तो उन कर्षकों का यह अत्युत्तम स्वर्गसाधन होता --
भाषा टीका सहित।
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है। जो पाप मछली मारने वाले को बरस भर में होता है ॥ ११ ॥
अयोमुखेनकाष्ठेन तदेकाहेनलांगली ।।
पाशकोमत्स्यंघाती चब्याधःशाकुनिकस्तथा ॥१२॥
उतना लोहे जडे हुए काठ हल से एकही दिन में हल जोतने
माले को होता है । फांसी देने हारा, मछली मारने वाला, व्याधा,
(शिकरी) चिडीमार ॥ १२ ॥
अदाताकर्षकश्चैव पंचैतेसमभागिनः॥
कंडनीपेषणीचुल्ली उदकुंभीचमार्जनी ॥ १३ ॥
और जो भदाता खतिहर हैं यह पांचों तुल्य पाप भागी होते हैं
भोषली, चक्की, चुल्ही, पानीका पडा, मार्जनी (झाडू) ॥ १३ ॥
पंचसूनागृहस्थस्य अहन्यहनिवर्त्तते ॥
वैश्वदेवौवलिमिक्षा गोग्रासोहतकारकः ॥१४॥
ये पांचों हत्याके स्थान गृहस्थको प्रतिदिन होते हैं । वैश्वदेव
बलि, भिचा, गोग्रास, और हंतकार ॥ १४ ॥
गृहस्थाप्रत्यहंकुर्यात्सूनादोषैन लिप्यते ॥
वृत्तच्छित्वामहभित्वा हत्वाचकृमिकीटकान् ॥ १५ ॥
प्रतिदिन गृहस्थ करे, ते उसे पूर्वोक्त हत्याके दोष नहीं लगते
वृक्षको काट पृथिवी को फाह और कृमि कीटों को मार कर ॥ १५ ॥
कर्षक:खलयज्ञेन सर्वपापैः प्रमुच्यते ।।
योनदद्याद्विजातिभ्यो राशिमूलमुपागतः ॥ १६॥
खतिहारखल यज्ञके द्वारा सब पापों से छूटजाता है। अन्नकी
राशी पर आये हुये विजोको नहीं देता ॥ १६ ।।
सचौरःसचपापिष्टो ब्रह्मन्नतंविनिर्दिशेत् ॥
राज्ञेदत्वातुषड्भागं देवानांचेकविंशकम् ॥ १७ ॥
matter १८ अथ पाराशरस्मृति- वह पापी, चोर, और ब्रह्मघाती कहाता है। राजाको छठा भाग और देवतों को इक्कीसवां. १७ ॥ विप्राणांत्रिंशकभागं सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥ क्षत्रियोपिकृषिकृत्वा देवाविप्रांश्चपूजयेत् ॥ १८॥ और ब्रामणों को तीसरा भाग देकर सब पापों से मुक्त होता है क्षत्री भी खेली करके देवता और प्राणणों की पूजा करै ।। १८ ॥ वैश्यः शूद्रस्तथाकुर्या कृषिवाणिज्यशिल्पकम् ॥ विकर्मकुर्वतेशद्राः द्विजशुश्रूषयोज्झिताः ॥ १९ ॥ वैश्य तथा शुद्र भी खेती, वाणिज्य, और शिल्प ( कारीगरी) करें, जो शूद्र नाह्मण की शुश्रूषा (सेवा) छोडदेते हैं व अपने कर्म से विरुद्धकर्म कर्नेहारे होते हैं ॥ १९ ॥ भवत्यल्पायुषस्तेवै निरयंयांत्यसंशयम् ॥ चतुर्णामपिवर्णानामेषधर्मः सनातनः ॥ २० ॥ इति पाराशरीयेधर्मशास्त्रे गृहस्थधर्माचारोनामद्वितीयोऽध्यायः||२|| वे थोड़े दिन जीते हैं और निश्चय कक नरक में जाते हैं। यह धर्म चारों वर्गों का सनातन ले चला आता है ॥ २० ॥ इति द्वितीयाध्यायः ॥ २ ॥ अतः शुद्धिप्रवक्ष्यामिजनमरणेतथा ।। दिनत्रयेणशुद्ध्यतिब्राह्मणाः प्रेतसूतके ॥१ अब जन्म और मरण में जितने दिनों कर्के शुद्धि होती है. सो कहूंगा मरणाशौच में ब्याह्मण लोग तान दिनमें शुद्ध होते हैं ( सम नोदकों के मरण में यह शुद्धि जाननी ) ॥ १ ॥ क्षत्रियोहादशाहनवैश्यः पंचदशाहकैः ।। शूद्रः शुद्धथतिमासेन पराशरवचोयथा ॥२॥ छत्री बारह दिनमें वैश्य पन्द्रह दिनमें और शूद्र.महीने भरमें शुद्ध पराशर के वचनानुसार होताहै (सपिण्डों के मरणमें यह शुद्धि जानना ), ॥२॥ a - . भाषा टीका सहित । १४ उपासनेतुविप्राणामंगशुद्धिश्चजायते ॥ ब्राह्मणानांप्रसूतौतुदेहस्पर्शाविधीयते ॥३॥ अग्निहोत्र आदि काँ की उपासना के लिये तो उतने समय तक ब्रामणोका अंग शुद्ध हो जाता है ( आशौचमें भी अग्नि होत्रादि करसक्त हैं ) और प्रसूति अर्थात् जनना शौच में बाह्मणों का शरीर स्पर्श कनें में कुछ दोष नहीं ॥ ३ ॥ जतौविनोदशाहेनद्वादशाहेनभूमिपः ॥ वैश्यः पंचदशाहनशूद्रोमासेनशुद्ध्यति ॥ ४ ॥ पुत्र आदि के जन्म होने में ब्राह्मण दस दिनों में, क्षत्रिय १२ दिनों में, वैश्य १५ दिनों में और शुद्ध एक महीना में शुद्ध होता है ॥४॥ एकाहाच्छुद्धयतोविप्रोयोग्निवेदसमन्वितः ॥ त्र्यहात्केवलवेदस्तुद्विहा नोदशभिहिनैः॥५॥ जो ब्राह्मण अग्निहोत्र कर्ता हो और वहझी पढाहो वह एकही दिन में शुद्ध होताहै । केवल वेदही पढें हो तो तीन दिनों में और जो दोनों से रहित हो वह दस दिनों में शुद्ध होताहै ॥ ५ ॥ जन्मकर्मपरिभ्रष्टः संध्योपासनवजितः॥ नामधारकविप्रस्तु दशाहंसूतकीभवेत् ॥ ६ ॥ जो ब्राह्मण जन्म प्रभृति अपने कमों से परिभ्रष्ठ हो संध्योपासन भी न कर्ताहो और नाम मात्रका ही ब्राह्मण कहलाताहो उसे दस दिन अशौच लगता है।॥ ६ ॥ अजागावोमहिष्यश्य ब्राह्मणीनवसूतका ॥ दशरात्रेण शुद्ध्येत भूमिस्थंचनवोदकम् ॥७॥ धकरी, गौ, भैंस, और ब्राह्मणी ये सब नवप्रसूता दिनों में शुद्ध होते हैं तथा नया पानी बरसा हो और भूमिपर पड़ाहो वह भी दस दिनों में शुद्ध होताहै ।। ७ ।। . होतो -
Kaa
और
अथ पाराशरस्मृति-
एकपिंडास्तुदायादाः पृथग्दारनिकेतनाः ॥
जन्मन्यपिविपत्तीच तेषांतत्सूतकं भवेत् ॥८॥
जो सपिंड है ( एकही पुरुषसे. उत्पन्न है ) परन्तु भिन्न जाती
की स्त्री से जन्म हुये हैं वेदावाद कहलाते हैं उन्हे भी जन्म . और
मरणमें अपने पिताकासा आशौच होता है ॥ ८॥
तावत्तत्सूतकंगोत्रे चतुर्थपुरुषेणतु ॥
दायाद्विच्छेदमाप्नोतिपचमोवात्मवंशजः ॥९॥
इनदायादों की सपिण्डता तीन पुरुष तक रहती है
उतनेही तक यह गोत्र का आशौच भी उन्हे रहता है. चौथे पुरुष
में उनकी दायादता छूटजाती है अर्थात् आदि पुरुष से पांचवां
दायाद नहीं रहता है ॥९॥
चतुर्थदशरात्रं स्यात्वग्निशाः पुंसिपंचमे ॥
षष्ठेचतुरहाच्छुद्धिः सप्तमेतुदिनत्रयात् ॥ १० ॥
चोथे तक दस दिन का प्राशौच पांचवें में छः दिन, बठे ।
चार दिन और सातवें में तीन दिनका आशौंच होता है ।।१० ॥
भृग्वग्निमरणेचैव देशांतरमृतेतथा ॥
वाजेप्रेत्तेचसन्यस्तेसद्यः शौचविधीयते ॥११॥
पहाड से गिरकर, अग्नि से जलकर, परदेस में, जन्म काल ही
में, और सन्यास लेकर जिसका मरण हावै उसका आशौच उसी चण
स्नान करने से निवृत्त हो जाता है ॥ ११ ॥
देशांतरमृतः कश्चित्सगोत्रः श्रूयतेयदि।
नत्रिरात्रमहोरात्रं सद्यः स्नात्वाशुचिर्भवेत् ॥ १२ ॥
यदि कोई देशांतर में अपना सपिंड मरजावै और वर्षदिन
अनन्तर सुनै तो उसका त्रिरात्र आदि नहीं लगता स्नान करके
उसीक्षण शुद्ध हो जाता है ॥ १२ ॥
भाषा दीका सहित । देशांतरगतोविप्रः प्रवासात्कालकारितात् ॥ देहनाशमनु प्राप्तस्तिथिनज्ञायतेयदि ॥ १३ ॥ कोई ब्रामण परदेश में कालको प्राप्त हो गया और उसके मरण की तिथि न ज्ञात हो तो ॥१३॥ कृष्णाष्टमीत्वमावस्या कृष्णाचकादशीचया ॥ उदकपिण्डदानंचतत्र श्राद्धं च कारयेत् ॥ १४॥ कृष्णपक्ष की अष्टमी अमावस और एकादशी को उस्का पिण्डो दक दान करना तथा श्राद्धभी करना चाहिये ॥ १४॥ अजातदन्तायेवाला ये चग द्विनिः सृताः ॥ नतेषामग्नि संस्कारो न शौंच नोदकक्रिया ॥ १५॥ जिन वालको को दांत जमा न हो और जो गर्भ से निकलेहीहों उनके मरणे पर अग्निदाह, आशौच और जलदानादिक नहीं होते१५ यदिगौविपद्येतसवनेवापियोषितः॥ यावन्मासस्थितोगर्भो दिनतावत्तुरूपकम् ॥ १६ ॥ यदि किसी स्त्रीका गर्भपतन हो अथवा गर्भस्राव हो तो जितने महीने का वह गर्भ हो उतनेही दिन उस्का सूतक जानना १५ आचतुर्थाद्भवेत्नावः पातः पंचमषष्ठयोः ।। अतऊर्ध्वप्रसूतिः स्याद्दशाहंसूतकंभवेत् ॥ १७॥ चार महीने तक गर्भ गिरे तो उसे स्राव कहते हैं पांचवें वापठे मासमें गिरे तो उसे पात बोलते हैं इसके उपरान्त गिरे तो वह प्रसव. गिना जाता है उसका सूतक दस दिनों तक होता है ॥ १७ ॥ दंतजातेनुजातेचकृतचुडेचसंस्थिते । अमिंसस्कारणे तेषांत्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥ १८ ॥ दांत जमा हो वा न जमा हो और उसके मरणे पर यदि उसे भनिदाह करें तो सपिंडों को तीनदिनों का आशौच होता है इसी.
श्रथ पाराशरस्मृति- भांती चौख अर्थात् मुंडन होने पर जोषालक मरे उसका भी तीन दिन आशौच होता है ॥ १८ ॥ आदतजन्मनः सद्य आचूडान्नैशिकीस्मृताः ॥ त्रिरात्रमाव्रता देशादशरात्र मतः परम् ॥ १९॥ दांत जमने तक उसी छन उससे उपरांत चौल होने तक एक. :. दिन चौल होने पर व्रतबंध होनेताई तोनदिन और ब्रतबंध होने पर दसदिन का आशौच होता है ॥ १९ ॥ ब्रह्मचारी रहे येषां हूयते च हुताशने ।। सम्पर्कचेन्नकुर्वन्ति न तेषां सूतकंभवेत् ॥२०॥ ब्रह्मचारी को और जिसके ग्रह में अग्निहोत्र होता हो उन्हें, जन्म और मरणका आशोच नहीं लगता यदि आशौच वालों से खाने पीने बैंठने का संसर्ग न रक्खे तो ॥ २० ॥ संपर्कादुष्यतोवनो जननेमरणतथा ॥ संपर्काचनिवृत्तस्य नप्रेतनैवसूतकम् ॥ २१ ॥ जन्म अथवा मरण में ब्राह्मण संपर्कही से दोष भागी होता है यदि संपर्क न करे तो उसे सूतक वा प्रेतांशौच नहीं लगता है ।२.१० शिल्पिनः का रुकावैद्यादासीदासाश्चनापिताः॥ राजानः श्रोत्रियाश्चैवतयः शौचा:प्रकीर्तिताः ॥ २२ ॥ शिल्पी (चितेरा आदि ) कारुक ( रसोइयाप्रभृति ) वैद, दासी, दास, नाई, राजा, शौर श्रोत्रिय ( वेद पाठी ) इन सबों का आशौच शुद्धि उसीछन हो जाता है ।। २२ ।। सबतोमंत्र पूतश्च आहितग्नि श्चयोहिजः॥ राज्ञश्चसूतकंनास्ति यस्यचेच्छति पार्थिवः ॥ २३ ॥ किसी व्रतको करनेवाला, सत्र अर्थात् यज्ञ से पवित्र हुआ और अग्निहोत्र करनेहारा जो द्विज हो उले. और राजाओं को सूतक नहीं होता, तथा जिसे राजा चाहै उसे भी सूतक नहीं होता है ॥ २३.
२३ . भाषा टीका सहित । उद्यतोनिधनेदान आििवप्रोनिमंत्रितः॥ तथैव ऋषिभिष्टं यथाकालेनशुद्ध्यति ॥२४॥ मरने पर उद्यत हुया, और दान करने में उद्यत, जो प्रात ( व्याधि आदिसे पीडित ) हो, और नवता हुआ ब्राह्मण इन्हें भी ऋषियों ने कहा है कि उस अपने अपने कार्य समय में शुद्ध हो जाते हैं ॥२४॥ प्रसवेगृहमेधीतु न कुर्यात्संकरंयदि ॥ दशाहाच्छुध्यतेमातात्ववगाह्यपिताशुचिः ॥२५॥ यदि गृहस्थ पुत्रादि के जन्म होने से प्रसूती का स्पर्श न करे तो पिता उसी क्षण स्नान करके शुद्ध हो जाता है और माता दस दिनों में शुद्ध होती है ।। २५ ॥ सर्वेषांशावमाशौचं मातापित्रोस्तुसूतकम् ।। सूतकमातुरेवस्या दुपस्पृश्यपिताशुचिः॥ २६ ॥ मरण में तो जितने उसके सपिंड हैं उन सबों को छूना न चाहिये और जन्म होने में केवल पिता और माता ही को न स्पर्श करना तिस्में भी पिता तो स्नान आचमन करने केअनन्तर स्पर्श योग्य हो जाता है परन्तु माता दस दिन तक बराबर अशुद्ध रहती है ॥२६॥ यदिपन्यां प्रसृतायां संपर्ककुरुते द्विजः॥ सूतकंतुभवत्तस्य यदिविप्रः षडंगवित् ॥ २७ ॥ स्त्री को प्रसव हो और ब्रामण उसको स्पर्श धादि कर ले तो चाहे वह वेद के षडंग ( शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त ज्योतिष, छन्द ) भी जानता हो तब भी दस दिन बराबर अशुद्ध रहेगा छूने योग्य न होगा ॥ २७ ॥ संपर्काज्जायतेदोषो नान्योदोषोस्तिवैद्विजे । तस्म्गर्सवप्रयत्लन संपवर्जयेद्बुधः ॥२८॥ संपर्क से द्विज को दोष होता है. और दोष उसको नहीं है इस भंथ पाराशरस्मृति हेतु बुधिमान को चाहिये सर्वथा उस संपर्क से बचा रहे ॥ २८ । विवाहोत्सवयज्ञेषु त्वंतरामृतसूतके ॥ पूर्वसंकल्पितंद्रव्यदीयमाननदुष्यति ॥ २६ ॥ विषाह, उत्सव (ब्रतबंधादि) और यज्ञ इनके मध्य यदि जन्म वा मरण हो जाय तो पहिले संकल्प किये हुये द्रव्योंको देने में दोष नहीं होता ॥ २९ ॥ अंतरातुदशाहस्य पुनमरणजन्मनी॥ तावत्स्यादशुचिर्वितो यावत्तत्स्थादनिर्दशम् ॥३०॥ यदि एक आशौच पडा हो और दस दिन के भीतर ही दूसरा जन्म अथवा मरण पुनः हो जावै तो पहिले श्राशौच में दस दिनो में ही उस दूसरे की भी शुद्धि हो जाती है कोई कोई इस वचन का अर्थ यों करते है कि जपतक बचिमें आपडे हुए दूसरे आशौच के दस दिन पूरे न होलें तबतक वरावर ब्राह्मण को अशुचि रहती है. ॥ ३० ॥ ब्राह्मणार्थविपन्नानां वदिगोग्रहणेतथा ।। आहवेषुविषन्नाना मेकरात्रं स शौचकम् ॥ ३१ ॥ जिन्का मरण प्रामण की रक्षा के निमित्त बंदी ( कैदी)के छोड़ा ने और गौ के छुडाने में हुआ हो तथा संग्राममें जो मरे हों उन्का एक दिन रात अशौच होता है.॥ ३१ ॥ द्वाविमोपुरुषो लोके सूर्यमडल भेदिनौ । परिबाट्योगयुक्तश्च रणेचाभिमुखोहतः ॥ ३२॥ पे दोनो पुरुष सूर्य का मंडल पंध कर स्वर्ग में जाते हैं एक यो- गकरने हारा संन्यासी और दूसरा जोरण में सन्मुख होकर मरे ॥३२॥ यत्रंयत्रहतः शूर शत्रुभिः परिवेष्टितः ॥ अक्षयांल्लभतेलोंकान यदिक्लीवनभाषते ॥ ३३ ॥ शर. मनुष्य चाहे जहां कहीं भी शत्रुओं के घेरा में पड़कर मारा जावे से अक्षय बोक मिलते हैं पर तु यदि कातर पचन न बोला कातर पचन न बोला होए -- भाषा टीका सहित। २५. संन्यस्तंब्राह्मणदृष्ट्वास्थानाच्चलतिभास्करः ॥ एषमेमंडलभित्वा परंस्थानंप्रयास्यति ॥ ३४ ॥ संन्यासी हुए ब्राह्मण को देख सूर्य कांप उठले हैं कि यह मेरा मण्डलवेध कर ब्रह्मलोक में जावेगा ॥ ३४ ॥ यस्तुभग्नेषुसैन्येषु विद्रवत्सु समततः ॥ परित्रातायदागच्छेत्सचक्रतुफलं लभेत् ॥३५॥ सेनाओं के इधर उधर भागने पर उनकी रक्षा के लिये जो सन्मुख होता है उसे यश करने का फल होता है ।। ३५ ॥ यस्यच्छेदवंतगात्रं शरमुद्गरयष्टिभिः ।। देवकन्यास्तुतंवीरं हरतिरमयंतिच ।। ३६ ॥ जिस वीर पुरुष के शरीर में बाण मुद्गर और लाठियों की चोट से घाव हो जाता है उसे देवताओं की कन्याएं ले जाकर विहार करती हैं ॥ ३६॥ देवांगनासहस्राणि शरमायोधनेहतम् ॥ त्वरमाणाः प्रधाचंति ममम ममेतिच ॥ ३७॥ हजारों देवांगनाएं रण में मारे हुए शूर के निकट यों कहती हुई दौड़ कर आती हैं कि यह मेरा भर्ती है यह मेरा भर्ती हे ॥३७॥ ययज्ञसैघं स्तपसाचावप्राः स्वर्गेषिणोवात्रयथैवयांति क्षणेनयांत्येवहितंत्रवीराः प्राणन्सुयुद्धेनपी सना३८ जिस स्वर्ग में मैकडों यश और नास्या मे शो जिस भांति जाते हैं उसी भांति अच्छे युद्ध में प्राणदेकर चीरलोग भी वहां पर एकही छिन में जाते है ॥ ३८ ॥ जितेनलभ्यतेलक्ष्मीमतेनापिसुरांगनाः॥ क्षणध्वसिनिकायस्मिन्कोचिंतामरणेरणे ॥ ३९ ॥ जीत हो तो संपदा मिले और मरणे से देवांगना मिले तो ऐसे रण में इस छण भंगी काया की कौन सी चिन्ता है ।। ३६ ॥ '..
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२६
प्रय पाराशरस्मृति-
ललाटदेशेरुधि रसूवच्चयस्याहवेतुप्रविशेच्चवक्त्रम् ॥
तत्सोमपनौनकिलास्यतुल्यंसंग्रामयज्ञेविधिवच्चदृष्टम्
युद्ध में जिसके मस्तकसे रुधिर गिर कर मुह में पड़ता है तो वह
उसके विधिवत् यज्ञ में सोमयान करने के तुल्य होता है ।। ||
अनाथंब्राह्मणं प्रेतं येवहतिद्विजातयः॥
पदेपदेयज्ञफलमानुपुाल्लभंतिते ॥ ४ ॥
जो द्विजातिलोग किसी अनाथ मरे हुए ब्राह्मणको दाह करने
के लिये उठा ले जाते हैं तो वे जितने पांव चलते हैं उन हर एक
में उन्हें यज्ञका फल होता जाता है ।। ११ ॥
नतेमामशुभंकिंचित्पापं वाशुभकर्मणां ।।
जलावगाहनातेषां सद्यःशौचविधीयते ॥४२॥
उन भले काम करने हारोंको कोई अशुभ और पाप
नहीं होता तथा जल में स्नान करने से उनकी शद्धिं मी उसी
छिन हो जाती है ॥ ४२ ॥
असगोत्रमबंधुंचप्रेतीभूतंद्विजोत्तम
वहित्त्वाचदहित्वासप्राणायामेनशुद्धयति ॥ ४३ ॥
जो ब्राह्मण अपना सगोत्र और बंधु न हो उसे ले जाने और
दाह करने ले तो एक प्राणायाम करने से शुद्धि होती है ॥ १३ ॥
अनुगम्येच्छयाप्रेतंज्ञातिमज्ञातिमेववा ॥
स्नात्वासचैलरपृष्ट्वानिवृतमाश्यविशुद्धयति ॥४४॥
अपनी इच्छा से यदि किसी जाति अधवा परजाति के मुर्दे के
पौधे जावे तो वस्न समेत स्नान कर्के अग्नि का स्पर्श करें और उस
दिन घी वाकर रहे तब शुद्ध होता ॥४४॥
क्षत्रियंमृतमज्ञानाबाह्मणोयोनुगच्छति ॥
एकाहमशुचिर्भूत्वापंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ १५ ॥
२७ भाषा टाकासाहत। जो ब्राह्मण अज्ञान से किसी मरे हुए क्षत्रिय के पीछे जाता वह एक दिन रात अशुद्ध रहता है और दूसरे दिन पंचग व्य खाने से शुद्ध होता है ॥१३॥ शवंचवैश्यमज्ञानाद्ब्राह्मणोह्यनुगच्छति ॥ कृत्वाशीचंद्विरानंच प्राणायामानषडाचरेत ॥१६॥ मरे हुए वैश्य के पीछे यदि अज्ञान से ब्रामण जावे तो दो दिन आशौच करके छः प्राणायाम करे तब शुद्ध होता है । ४६ ॥ प्रेतीभूतंतुयःशूद्रं ब्राह्मणौज्ञानदुर्बलः ॥ अनुगच्छेन्लीयमानंत्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥४७॥ जो अज्ञानी ब्राह्मण मरे हुए शूद्रके पीछे जाता है वह तीन दिन अशुचि रहता है ।। १७ ॥ त्रिरात्रेतुततःपूर्णेनदींगत्वासमुद्रगाम् ॥ प्राणायामशतंकृत्वा घृतंप्राश्यविशुद्धयति ॥ ४८॥ तीन दिन बीतने पर किसी समुद्र गामिनी नदी में जाकर सौ प्राणायाम करे और घी भोजन करे तो शुद्ध होता है ।। ४८ ॥ 'विनिवर्त्ययदाशुद्राः उदकांतमुपस्थिताः॥ द्विजैस्तदानुगंतव्याएषधर्मःसनातनः॥ ४९ ॥ जय शुद्र लोग दाह करके किसी जलाशय के निकट बोट आ तब उनके पास ब्राह्मण प्रभृति जावें यह सनातन धर्म है ॥१९॥ तस्मादद्विजोमतंशूद्रं नस्पृशेन्नचदाहयेत् ॥ दृष्टेसूर्याबलोकेनशुद्धिरेषापुरातनी ॥५०॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे जननभरण सुतकादि शुद्धिर्नाम तृतीयोध्यायः ॥३॥ 48 .
प्रथं पाराशरस्मृति-
इस लिये द्विज लोग मरे हुए शूद्रको नं. वें और न जलावे
और देखलें तो भी सूर्य की और ताकने से शुद्ध होते है यही
रीति पुरातन है ।। ५० ॥
इतिः श्रीरतीयो ध्यायः ॥ ३ ॥
आतिमानादतिक्रोधात्रस्नेहाहायदिवाभयात् ॥
उधनीयात्स्त्रीपुमान्वा गतिरेषाविधीयते ॥ १॥
यदि कोई पुरुष अथवा स्त्री अपने मानकी हानि से, अस्यन्त
क्रोध से बडे प्रेम से, और अति भयस आत्मवध करें (मरजावे.)
तो उसकी गति यह होती है ॥ १ ॥
पूयशोणितसंपूर्णे त्वंधेतमसिमज्जति ।
षष्ठिवर्षसहसाणि नरकंप्रतिपद्यते ॥२॥
कि पीव और रक्त से भरे हुए अन्धतामसनामी नरक
साठ हजार बरस तक पड़ा रहता है ॥ २ ॥
नाशौचंनोदकनाग्नि नाश्रुपातंचकारयेत् ॥
वोढारोग्निप्रदातारः पाशच्छेदकरास्तथा ॥ ३ ॥
उक्त प्रकार से मरने हारे का आशौच, उदकदान, और दाह
कर्म, नकरे तथा उसके अर्थ रोदन भी न करे उनके लेजाने, दाह
फरने, और बन्धन काटने हारों की ॥ ३ ॥
ततकृच्छ्रणशुद्धयंती त्येवमाहप्रजापतिः ॥
गोमिहत्तथोडंब्राह्मणेनतुघातितम् ॥४॥
शुद्धि तप्तकृच्छ्रनत से होती है ऐसा प्रजापति कहते हैं। गौओं
से मारा हुअा, अपने से मेरा हुआ, (जैसा पहिले कहआए हैं अति
क्रोधादि से.) और ब्राह्मणों करके मारा हुआ जो हो ॥४॥
संस्पृशतितुयेविप्रावोढारश्चाग्निदाश्चये ॥
अन्येयेचानुगतारः पाशच्छेदकराश्चये ॥५॥
भाषा टीका सहित ।
उसे जो कोई बाह्मण छूवें, उठाकर ले जावें, दाह करें, और
उसकी रथी के पीछे चलें अथवा गलेका वंधन का तो॥ ५ ॥
तप्तकृच्छ्रेणशुद्धास्ते कुर्युाह्मणभोजनम् ॥
अनडुत्सहितांगांच दद्युर्विप्रायदक्षिणाम् ॥ ६॥
धे तप्तकृच्छ व्रत करके शुद्ध होकर ब्राह्मण भोजन करावें और
वृषम सहित गौ ब्राह्मण को दक्षिणा देवें ॥६:
व्यहमुष्णंपिवेद्वारित्र्यहमुष्णंपयःपिवेत् ॥
त्र्यहमुष्णपिवेत्सर्पि वायुभक्षोदिनत्रयम् ॥ ७॥
तप्तकृच्छ्वत यों होता है कि पहिले तीन दिन उष्णजल पीकर
रहे उसके अनन्तर तीन दिन उष्ण दूध पीवे, पुनः तीन दिन तप्त
घी पीवे उसके पीछे तीन दिन कुछ न खावे ऐसे बारह दिन में यह
बत होता है।
षट्पलंतुपिवेदंभः त्रिपलंतुपयः पिवेत ॥
पलमेकंपिवेत्सर्पिस्तप्तकृच्छंविधीयते ॥८॥
( ऊपर जो उष्णआदि पीने की कहा है उसका तोल यह है.) कि
२४ तोले जल पीना, ११ तोले दूध और ४ तोले धी पीना तव तप्त
कृच्छ्र होता है) ॥८॥
योवसमाचरद्विप्रः पतितादिष्वकामतः॥
पंचाहंवादशाहवाहादशाहमथापिवा ॥९॥
जो ब्राह्मण पदितादिकों के साथ अनिच्छा पूर्वक ५।१० अथवा
१२. दिनों तक रहे ॥ ९॥ .
मासाईमातमेकंवामासद्वयमथापिवा ॥
अब्दार्द्धमब्दमेकंबाभबेदूर्वहितत्समः ॥ १० ॥
वा ३५ दिनों तक श्रवाः । वा ६ मास तक रहे वा एक वर्ष
तक रहे तो वक्ष्यमाण प्रायश्चित्त करे यदि वर्ष दिन से अधिक
साथ रहे तो उन्हीं के तुल्य हो जाता हैं ॥१०॥
अथ पाराशरस्मृति-
त्रिरात्रंप्रथमेपनेद्वितीयकृच्छमाचरेत् ॥
तृतीयेचैबपनेतुकृच्छ्रेसांतपनंभवेत् ॥ ११ ॥
इन आठों प्रकार के संसर्गका प्रायश्चित्त कमसे यो जानना कि
त्रिरात्र कृच्छ्र, कृच्छ्रसान्त पन, १११ ॥
चतुर्थेदशरात्रस्यात्पराकः पंचमेमतः ।।
कुर्याचांद्रायणंषष्ठेसप्तमेवैदवद्वयम् ॥ १२ ॥
दशरात्र, पराक, चांद्रायण, दो ऐन्दव ॥ १२ ॥
शुद्धयर्थमष्टमेचव षण्मासान्छच्छमाजरेत् ।
पक्षसंख्याप्रमाणेन सुवर्णान्यपिदक्षिणा ॥ १३ ॥
और छः महीने तक कृष्बत करना पड़ता है और दक्षिणाभी
इन में क्रम से पहिले में एक दूसरे में दो सुवर्ण (मोहर ) इसी माता
एक सुवर्ण अधिक करके ब्राह्मण को दी जाती है ॥ १३ ॥
ऋतुस्नातातुयानारी भरिनोपसति ।
सामृतानरकंयातिविधवाचपुनः पुनः ॥ १४ ॥
: : जो स्त्री ऋतु. स्नाता ( रजस्वला स्नान कर चुकी) हो और
अपने पति के पास नजावे तो बह मरने पर नरक में पडती और
बारम्बार विधवा भी होती है ॥ १४ ॥
ऋतुस्नातांतुयोभायांसन्निधौनोपगच्छति ॥
घोरायांभ्रूणहत्यायां युज्यतेनात्र संशयः ॥१५॥
' जो पुरुष निकट, रहकर भी अपनी ऋतु स्नाता स्त्री के पास
नहीं जाता उसे वडी भारी गर्भ हत्या होती है इस मै कुछ सन्देह
ही नहीं ॥ १५ ॥
दरिद्रव्याधितधृत्तभतारयानमन्यते ॥
साशुनीजायतेमृत्वासुकरीचपुनः पुनः ॥ १६ ॥
जो स्त्री अपने दरिद्र रोगी अथवा धूर्न पत्ति का भी अपमान
करे तो वह मरकर कशी और सूकरी वारंवार होती है.॥ १६॥
भाषा टीका सहित।
पत्यौजीवतियानारी उपोष्यब्रतमा चरेत् ॥
आयुष्यंहरतेभर्तुः सानारीनरवं ब्रजेत् ॥ १७ ॥
पतिके जीते ही जो नारी उपवासकरके व्रत करती है वह अपने
पतिकी आयुष्य की हानि करती है ॥ १७ ।।
अपृष्ट्येचवभार यानारीकुरुतेव्रतम् ॥
सर्वतद्राक्षसान्गच्छदित्येवमनुरब्रवीत ॥ १८॥
जो स्त्री अपने पतिके बिना पूछे ही व्रत करती है उसका सब
फज राक्षसोहीको होता है ऐसा मनुने कहा है ॥ १८ ॥
बांधवानांसजातीनांदुर्च्ततंकुरुतेतुथा ॥
गर्भपातंचयाकुर्यान्नतांसंभाषयेत्क्वचित् ॥ १९ ॥
जो स्त्री अपने कुटुंब और जातिकी वडी भारी हानि करे और
औषष प्रभृति के द्वारा गर्भ पात करे उससे बोलना कभी
न चाहिये ॥१९॥
यतपापंब्रह्महत्याया द्विगुणंगर्भपातने ॥
प्रायश्चित्तंनतस्यास्तितस्यास्त्यागोबिधीयते ॥२०॥
ब्रह्महत्यासे दूना पाप गर्भ पालन करने में होता है और उसका
प्रायश्चित्त अर्थात् शोध भी नहीं होसकता इसहतु ऐसी स्त्रीका त्याग
ही करना विहित है ॥ २० ॥
नकार्यमावसथ्येननग्निहोत्रेणवापुनः ॥
समवेत् कर्मचांडालोयस्तुधर्मपराङ्मुखः ॥ २१ ॥
जो मनुष्य धर्म से विमुख है उसके आवसथ्य और अग्निहोत्र
करने से क्या होता है अर्थात् कुछ सिद्ध नहीं वह कर्मचाण्डाल
कहाता है ॥२१॥
ओघवाताहृतंवीजं यस्यक्षेत्रेप्ररोहति ।।
सक्षेत्रीलभतेवीज़नबीजोक्षागमर्हति ॥ २२॥
३२ अथ पाराशरस्मृति- जल और वायु के वेग से यदि कोई वीज लुड़क कर कहीं दूसरे के खेत में जा जमे तो उस खेत का स्वामी ही उस वीज को लेता है न कि उस चीज के स्वामी को भी भाग मिलता है ॥ २२ ॥ तहत्परस्त्रियाःपुत्रौहौसुतौकंडगोलको । पत्यौंजीपतिकुंडश्तुमृतेभर्तरिगोलकः ॥ २३ ॥ इसी भांति पर स्त्री को भी कुण्ड और गोलक दो पुत्र होते भर्ता जीता रहे उस समय उपपति से जो पुत्र उत्पन्न हो उसे कुंड और पतिके मरने पर जो उपजे उसे गोलक कहते हैं ॥ २३ ॥ औरस क्षेत्रजश्वव दत्त:कृत्रिमकासुतः ॥ दद्यान्मातापितावायं सपुत्रोदत्तकोभवेत् ॥ २४ ॥ औरसे, ( अपनी सजातीय भार्या में उत्पन्न क्षेमज, दचक,. और कृत्रिम इतने प्रकारके पुत्र होते हैं जिस पिता वा माता किसी को दे वही दत्तक पुत्र होता है ॥ २४ ॥ परिवत्तिःपरिवत्ता ययाचपरिविद्यत ।। सर्वेतेनरकंयांति दातृयाजकपंचमाः॥ २५ ॥ 'परिवित्त, (जिसके छोटे भाईन पहिले अपना व्याह कर लिया हो) परिवेना (उसी परिचित्तका वह छोटा भई। और जिस कन्या को परिवेत्ता व्याह, तथा उस कन्या का दाता और उसका व्याह कराने हारा ब्राह्मण ये मांचों नरक में जाते हैं. ॥ २५ ॥ द्वौंकृच्छ्रौपरिवित्तेस्तु कयाय कृच्छ्रएवच ॥ कृच्छातिकृच्छौदातुम्तु होताचांद्रायणंचरेत् ॥ २६ ॥ परिवत्ति को दो कृच्छ्बत करने चाहिये, कन्याको एक कृच्छू दाता को कृच्छव्रत करना होता है और व्याह कराने हारा चांद्रायण करे ॥ २६ ॥ कुजवामनपंढषुगद्दषुडपुच ।। जात्यंधवाथिरमूकतदाष परिविंदत. ॥ २७॥ -- भाषा दीका सहित । जिस्का जेठा भाई कुबड़ा, वौना, नपुंसक तोतला अज्ञानी (जड़ ) जन्मांध वधिर अथवा गूंगा हो तो उसके छोटे भाई को पहिले व्याह करने से दोष नहीं होता है ॥ २७ ॥ पितृव्यपुत्रःसापत्नपरनारीसुतस्तथा । दाराग्निहोत्रसंयोगेनदोषःपरिवेदने ॥ २८॥ चचेरे और सौतीले भाई को तथा दत्तकादि परनारी सुतों को जेठे भाई से पहिलेही व्याह और अग्निहोत्र करने में दोष नहीं है।॥ २८ ॥ ज्येष्टोभ्रातायदातिष्ठ दाधाननैव कारयेत् ॥ अनुज्ञातस्तुकुर्वीत शंखस्यबचयनयथा ॥ २९॥ यदि जेठा भाई व्याह वा अग्निहत्र करने की इच्छा न रखता हो और उसकी आज्ञा लेकर छोटा भाई अग्निहोत्र करने की इच्छा न रखता हो और उसकी प्राज्ञा लेकर छोटा भाई अग्निहोत्र आदि करले तो शंख के पचन है कि उसे दोष नहीं ।। २९ ॥ नष्टेमृतेप्रबजिते क्लीवेचपतितेपतौ। पंचस्वापत्सुनारीणां पतिरन्योविधीयते ॥३०॥ जिसका पति नष्ट ( अर्थात् जिसका विदेश जाने आदिमे कहीं पताही न लगे ) मृत प्रव्रजित, (संन्यासी) नपुंसक और पतित होवे इन पांच प्रकार की विपत्तियों में उस स्त्री को अन्यपति विहित ॥ ३०॥ मृतभर्तरियानारीब्रह्मचर्यबूतस्थिता ॥ सामृतालभतेस्वर्ग यथातेब्रह्मचारिणः ॥३३ ॥ भर्ती के मरने पर जो स्त्री ब्रह्मचर्य वर्त करती हुई अपने दिनों को चिताती है वह मर कर वह्मचारीयों की भांति स्वर्ग में जाती है ॥ ३१॥ तिसः कोट्योईकोटीच यानिलोमानिमानवे ॥
Martini ३४ अथ पाराशरस्मृति- तात्वकालंब सेत्स्वर्गे भर्तारंयानुगच्छति ॥ ३२॥ जो स्त्री अपने पति के मरने पर उसी के साथ प्राण त्याग करती है वह साढे तीन करोड अर्थात् जितने रोंगटे देह में है उतने परस स्वर्ग में वास करती है ॥ ३२ ॥ व्यालग्राहीयथाव्यालं वलादुद्धरतेविलात् ।। एवंस्त्रीपतिमुद्धृत्य तेनैवसहमोदते ॥ ३३ ॥ इतिपाराशरीयेधर्मशास्त्रे उद्वन्धनादिमृतशुद्धि मचतुर्थोऽध्यायाम जिस प्रकार सर्प पकडने हारे बिल के अन्दर से भी अपने करतब के बलसे सर्प बाहर खींच ही लेते हैं उसी भांति नीच स्थल में भी पडे हुए अपने पतिको सती स्त्री बाहर निकाल लेती और उसी के साथ विहरती है ॥ १३ ॥ ॥ इति चतुर्थोध्यायः ॥ ४ ॥ वृकश्वानशृगालादि दष्टीयस्तुद्विजोत्तमः ॥ स्नात्वाजपेत्सगायत्री पवित्रांवेदमातरम् ॥ १॥ जिस ब्राह्मणको बृक ( वीग अथवा वध्याड़ ) कुत्ता और शृगाल (गीदड) प्रभृतिने काट खाया होतो वह स्नान करके वेदकी माता. गायत्री का जप करे ॥१॥ गवांगोदकस्नानान्महानद्योस्तुसंगमे ।। समुद्रदर्शनाहापिशुनादष्टः शुचिर्भवेत् ॥२॥ अथवा कुत्तेका काटा हुआ गौ के शृंगके जल से वा दो महानदों के संगग में स्नान करे किंवा समुद्रका दर्शन करे तोभी शुद्ध हो जाता है ॥२॥ वेदविद्याव्रतस्नातः शुनादष्टोहिजोयदि॥ सहिरण्योदक स्नात्वाघृतप्राश्यविशुद्ध्यति ॥ ३॥ यदि किसी ऐसे ब्राह्मणको कुत्ता काटें कि जो वेद और चौदहीं विद्याओंको जानता हो तथा अच्छे २ ब्रत किएहो तो वह सोना भाषा टीका सहित । ३५ धोकर उस पानी से नहाले और धी खाले इतने ही से शुद्ध होता है ॥३॥ सब्रतस्तुशुनादष्टोयस्त्रिरात्रमुपावसेत् ॥ घृतंकुशोदकंपीत्वाव्रतशेषसमापयेत् ॥ ४ ॥ जो किसी ब्रतको कररहा हो उस वीच उसे कुत्ता काटलेवे तो वह तीन दिन उपवास करे और घी तथा कुशोकाजल पीवे अनन्तर उस अपने ब्रतको जो शेष रहा हो उसे पूरा करे । ४ ॥ अबतसुब्रतोवापिशुनादष्टोभवेद्दिजः ॥ प्रणिपत्यभवेत्पूतोविप्रैश्चक्षुर्निरीक्षितः ॥ ५॥ चाहे प्रत वाला हो अथवा ब्रत करने हारा न हो कैसाभी द्विज यदि कुत्तेसे काटा जाकर ब्राह्मणों को दण्डवत् करे और ब्रामण लोग उसे आंखभर देखदें तो वह शुद्ध हो जाता है ॥५॥ शुनाघ्राताऽवलीढस्य नखैर्विज़िखितस्यच ॥ अद्धिःप्रक्षालनंप्रोक्त मग्निनाचोपचुलनम् ॥६॥ जो वस्तु कुचेने संघ, चाट, अथवा नखोंसे खसोट ली हो उसको जल से धोकर श्रागमें सेक दे तो शुद्ध हो जाती है ॥ ६ ॥ ब्राह्मणीतुशुनादष्टा जंबुकेनवृकेणवा ।। उदितंग्रहनक्षत्रदृष्ट्वासद्यः शुचिर्भवेत् ॥७॥ जिस बामणी को कुचे, गीदड अथवा वीगने काट लिया हो तो वह उगे हुए ग्रह अर्थात् चन्द्र वा नक्षत्र अर्थात् तारों का दर्शन करने से नसीछन शुद्ध हो जाती है ॥ ७ ॥ कृष्णपक्षयदासोपोनदृश्यतकदाचन ॥ यांदिशबजतेसोमस्तांदिशंचाऽवलोकयेत् ॥८॥ कदाचित् कृष्णपक्ष हो ,और चन्द्रमा न देखपडे तो जिस दिशा में चन्द्रमा जाते हों उस दिशाको देखलें ॥८॥ असन्राह्मणकेयामेशुनादष्टोद्विजोत्तमः ।।
ता
अथ पाराशरस्मृति-
वृषप्रदक्षणीकृत्यसद्यः स्नात्वाशुचिर्भवेत् ॥ ६ ॥
किसी ऐसे गांव में जब मणको कुत्ता काटे कि जहां दूसरा
माह्मण कोई न हो तो बैल की प्रदक्षिणा करस्नान करडाले झट
शुद्ध हो जाता है ।। ९ ॥
चाण्डालेनश्वपाकेन गोभिर्विप्रैर्हतोयदि ॥
आहितारिनहतोबिनो विषेणात्महतोयदि ॥१०॥
यदि कोई अग्निहोत्री ब्राह्मण चाण्डाल, (ब्राह्मणी में से शूद्र जन्म
हुआ ) श्वपाक, (क्षता में उग्रसे उत्पन्न) गौ, अथवा ब्राह्मण द्वारा
मारागया हो किंवा विष खा कर आपही मरगया हो तो ॥ १० ॥
दहेत्तंब्राह्मणविप्रो लोकानौमंत्रवर्जितम्।
स्पृष्ट्वावोदकाचदग्ध्वाच सपिण्डेषुचसर्वदा ॥ ११ ॥
उसे उस्के सपिण्डों में से कोई ब्राह्मण लौकिक अग्नि में बिना
मंत्र पढे हीजलादेवे, स्पर्श, हवन, और दाह कनें हारा सपिण्ड॥११॥
प्राजापत्यंचरेत्पश्चाद्विप्राणाम्नुशा सनात् ॥
दग्ध्वास्थीनिपुनातीरैः प्रक्षालेयद्विजः ॥ १२ ॥
ब्राह्मणों को आज्ञा से भाजपत्य व्रतकरे । दाह करके पुनः वह
द्विज उसकी हड्डियां लेकर दूध से धोये ॥ १२ ॥
स्वेनाग्निनारवमंत्रेण पृथगेतत्पुनदेहेत् ॥
आहितोनिर्दिजः कश्चित्प्रवसन्कोलचादितः ॥ १३ ॥
और अपनी. अग्नि तथा अपने मंत्र से उन्हें पुनः अन्यत्र
जलावो । यदि कोई अग्निहोत्री विजः परदेश में जाकर कास
: यश से॥१३॥
देहनाशमनुप्राप्तः तस्याग्निवसतेगृहे ।।
प्रेताग्निहोत्रसंस्कारः श्रूयतांमुनिपुंगवाः ॥ १४॥
मरजावे और उसकी अग्नि उसके घर में हो नो उस मुर्दे और
उसकी अग्निका संस्कार है श्रेष्ठ मुनियों आप सुनें ॥ १४ ॥
भाषा टीका सहित । २७ कृष्णाजिनंसमास्तार्य कुशैस्तुपुरुषाकृतिम् ॥ षट्शतानिशतंचैव पलाशानांचबुंततः ॥१५॥ काले मृगका चर्म फैलाकर उसपर कुशोका पुरुषका सरूप बनाना कुशन मिले तो पलाशके सातसौ पत्तों में से ॥ १५ ॥ चत्वारिंशच्छिरेदद्याच्छतंकंठेतुविन्यसेत् ॥ बाहुभ्यांदशकंदद्या दंगुलीषुदशवतु ॥ १६ ॥ चालीस पने सिर में देना, सौपत्ते गले में, दोनों बाहों में दस अंगुखीयों में दस ॥ १६ ॥ शतंतुजघनेदद्याद द्विशतंतूदरेतथा ॥ दद्यादष्टौवृषणयोः पंचमेढ़ेतुविन्यसेत् ॥ १७॥ नघनमें सौ,दोसौ पेटमें, दोनों अंडोंमें आठ, लिंगमें पांच॥१७॥ एकविंशतितूरुभ्यां त्रिशतंजानुजंघयोः । पादांगुलीषुदद्यात्षट् यज्ञपात्रततोन्यसेत् ॥१८॥ दोनों ऊरुओं कीस, जानु और जंघाओं में तीनसौ, और पांवकी अंगुलियों में छः पत्ते देवे तप यज्ञके पात्रोंको रक्खे ॥ १८ ॥ शम्यांशश्ने विनिक्षिप्य अरणींमुष्कयोरपि ॥ जुहूंचदक्षिणेहस्ते वामेतूपभृतंन्यसेत् ॥ १९॥ शम्याको लिंगके ऊपर, अरणी को अंडों के ऊपर, जुहूको दाहिने हाथ पर, उपभृतका बाएं हाथ पर ॥ १९ ॥ पृष्टेतूलूखलंदद्यात्पृष्टेचमुशलंन्यसेत् ॥ उरसिक्षिष्यदृषदंतंडुलाज्यतिलान्मुखे ॥२०॥ पीठ पर मुसल और उलूल देवे, छाती पर दृषत् देवे, चांवल, धी, और तिलोंको मुंह में देवे ॥ २० ॥ श्रोत्रेचप्रोक्षणींदद्या दाज्यस्थालींचचक्षुयोः ।
अथ पाराशरस्मृति- कर्णेनेत्रेमुखेघ्राणे हिरण्यशकलंन्यसेत् ॥२१॥ कानों पर प्रोक्षणी पात्र देवे आंखों पर आज्यस्थाली तथा कान आंख, मुंह, और नाक में सोनेका टुकड़ा देवे ॥ २१ ॥ अग्निहोत्रोपकरण मशेषतत्राबिन्यसेत् ॥ असौस्वर्गायलोकाय स्वाहेत्येकाहुतिसकृत् ॥ २२ ॥ लारा अग्नि होत्रका उपकरण वहां रखकर (असीस्वर्गीय- लोकायस्वाहा ) ऐसा कहकर एकहीबार आहुती ॥ २२ ॥ दद्यात्पुत्रोथवाभ्राता ष्यन्योवापिच बांधवः॥ यथादहनसंस्कार स्तथाकाविचक्षणैः ॥२३॥ पुत्र अथवा भ्राता देवे किंचा कोई दूसरा बांधव हो तो वह भी 'दे अनन्तर जैसा दाहका संस्कार होता है. तैसा विज्ञजन करें ॥२३॥ ई दृशंतुविधिकुर्यात् ब्रह्मलोकगतिः स्मृता ॥ दहतियेद्विजा स्तंतुं तेयांतिपरमांगतिम् ॥ २४ ॥ इस प्रकारकी विधि करने से ब्रह्मलोककी गति होती है, जो ब्राह्मण उसकी दाह करते हैं वे परमगति को पाते हैं ॥ २४ अन्यथाकुर्वतेकर्म त्वात्मवुद्ध्याप्रचोदिताः ॥ भवत्यल्पायुषस्तेवै पतंतिनरकेशुचौ ॥२५ ।। इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ जो कोई अपनी बुद्धिकी कल्पना से अन्यथा कर्म करते हैं तो वे अल्पायु होते हैं और अति अपवित्र नरक में पड़ते हैं ॥ २५ ॥ इति श्री पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ अतःपरंप्रवक्ष्यामिपाणिहत्यासुनिष्कृतिम् ।। पराशरेणपूर्वोक्ता मन्वथैपिचविस्तृताम् ॥ १ ॥ अव जीवों की हत्या करने पर जिस प्रायश्चित्त से मनुष्य शुद्ध होता है सो मैं जैसा पराशर ने पहिले कह रक्खा है और मनुवा भाषा टीका सहित । ३६ क्यों मैं भी विस्तार सहित है कहता हूं ॥१॥ क्रौंचसारसहंसाश्च चक्रबाकंचकुक्कुटम् ॥ जालपादचशरभ हत्वाऽहोरात्रतःशुचिः॥२॥ क्रौंच, (कूज ) सारस हंस, चकई, चकवा, कुक्कुट, (मुर्गा) और जालपाद, (जिनके पाद एक चर्म से जुडे होते अर्थात् वतक मुर्गाषिया इत्यादि ) तथा शरम को मारे तो एक दिन रात उपवास करने से शुद्ध होता है ॥२॥ वलाकाटिट्टिभोवापि शुकपारावतावपि ॥ अटी नवकघातीचशुद्ध्यतेनक्तभोजनात् ॥३॥ बलाका, टिटिम, तोता, पारावत ( पनडूवी) अटीन, और बक को मारे तो रात में भोजन करने से शुद्ध होता है ॥ ३ ॥ वृककाककपोतानां सारीतित्तिरघातकः॥ अंतर्जलउभेसंध्ये प्राणायामेनशुद्धयति ॥ ४॥ वृक (घीग ) काक, कबूतर, सारी और तिशिर को मारे तो सांझ सधेरे जल में प्राणायाम करने से शुद्ध होता है ॥ ४ ॥ गृधूश्येनशशादीनामूलकस्यचघातकः ॥ अपक्कीशादिनतिष्ठेत् त्रिकालमारुताशनः॥५॥ गिद्ध, बाज, शश, (खरगोश ) और उल्लूको मारे तो पहिले दिन बिनपक्की बस्तु खाकर रहे दूसरे दिन तीसरे पहर भोजन करे तीसरेदिन कुछ भी न ग्वावे तो शुद्ध होता है ॥ ५ ॥ वल्गुनीटिटिभानांच कोकिलाखंजरीट । केलाविकारक्तपक्षेषुशुध्यतनक्तभोजनात् ॥ ६॥ वल्गुनी, सिडिभी कोयल, खंजरीट, लाविका, ( वटेर ) और जिनके परलालहों उन्हें सारे तो रातको भोजन करने से शुद्ध होताहै।६। कारंडवचकोराणां पिंगुलाकुररस्य च ॥ .
अथ पाराशरस्मृति- भारद्वाजादिकहत्वा शिवसंपूज्यशुद्ध्यति ॥७॥ कारंडव, चकोर, पिंगला, कुरर और भारद्वाजादि पचियोंको मारे तो शिवकी पूजा करने से शुद्ध होता है ॥ ७ ॥ भेरुंडचाषभासांश्च पारावतकपिजलम् ॥ पक्षिणांचैवर्सेवांमहोरात्रमभोजनम् ॥८॥ मेरुंड, चाष, (निलकंठ वा गरूड ) मास पारावत, और कर्पिः जलप्रभृति सबपक्षियों के मारने में एक दिनरात भोजन न करे ॥८॥ हत्वामूषकमार्जारसोऽजगरडंडुभान्. ।। कृसरंभोजयेद्विप्रान्लोहदंडंचदक्षिणाम् ॥९॥ चूहा, दिल्ली, सर्प अजगर और इंडुम, (पानी का सर्प) मारे तो कृसरान्न (तिल मूंग की खिचडी) ब्राह्मणोंको खिलावे और लोहेका दड दक्षिणा में देवे ॥ ९ ॥ शिशुमारंतथागोधांहत्वाकूर्मचशल्लकम् ॥ वृताकफलमक्षीचाप्यहोरात्रेणशुद्धयति ॥१०॥ शिशुमार ( ससु) गोधा ( गोह) कछुआ, और शल्लक (साही) को मारे तो एक उपवास करे अथवा बंताकफल खाकर एक दिन रात रहे इतनेही से शुद्ध होता है ॥ १० ॥ वृकजंबुकऋक्षांश्चतरक्षणांचधातकः ।। तिलप्रस्थंडिजेदद्या द्वायुभक्षोदिनत्रयम् ॥११॥ बृक जवुक. रीछ तरक्षु तरख ) को मारे तो एक प्रस्थतिल ब्राह्मण कोदे और तीन दिन उपवास करे ।। ११ ॥ गजस्यचतुरंगस्वमहिषोष्ट्रनिपातने ॥ प्रायश्चित्तमहोरात्रं त्रिसंध्यमवगाहनम् ॥१२॥ हाथी घोडा भैसा और ऊंट के मारने से एक दिन रात व्रतकरे और तीनो संध्याओं में (प्रातः सायं मध्यान्ह । स्नानकरें ॥१३ ।। भारतमी संस्थाओं में प्रातः मापं मध्यान्ह ? स्नानकर भाषा टीका सहित ४१ कुरंगवानरसिंह चित्रंब्याच घातयन् ॥ शुद्धधतेसत्रिरात्रेण विप्राणांतर्पणेनच ॥ १३॥ हरिन, वानर, सिंह, चित्ता, और वाघ को मारे तो तीन दिन को ब्रत करे और ब्राह्मणों को तुष्ट करके भोजन करावे ॥ १३ ॥ मृगरोहिवराहाणामवेर्वस्तस्यघातकः॥ अफालकृष्टमश्नीया दहोरात्रमुपोष्यसः ॥ १४ ॥ मृग, रोही, शूकर, भेंड, और बकरेको मारकर एकदिन उपवास दूसरे दिन वह अन्न खावै जो बिना जुती हुई धरती में उपजा हो तव शुद्ध होता है ॥ १४ ॥ एवंचतुष्पदानांच सर्वेषांवनचारिणाम ॥ अहोरात्रोषितस्तिष्ठे ज्जपन्वैजातवेदसम् ॥ १५॥ इसी भांति सम्पूर्ण प्रकार के और जंगली चारपायों के मारने पर एक दिन रात उपास करै और जात वैदस मन्त्र को जपता रहे ॥ १५॥ शिल्पिनंकारूकंशुद्ध स्त्रियंवायस्तुघातयेत् ॥ प्राजापत्यद्वयकृत्वावृषकादशदक्षिणा ॥ १६ ॥ चितेरे, रसोइये, शूद्र और स्त्री को जो मारे वह दोप्राजापत्य व्रत करे और दसगी एक बैल दक्षिणा दे तव शुद्ध होये ॥ १६ ।। . वैश्यवाक्षत्रियवापिनिर्दोषयोऽभिघातयेत् ।। सोतिकृढयंकुर्याद् गोविंशदाक्षिणांद्ददेत् ॥ १७॥ जो निर्दोष क्षत्री अथवा वैश्य. को मारे वह दो अति कृच्छ्वत: करे और वास गौ दक्षिणादे ॥ १७ ॥ वैश्यंशुद्धक्रियासक्तविकर्मस्थंद्विजोत्तमम् ॥ हत्वाचांद्रायणंतस्यत्रिंशद्गाश्चैवदक्षिणा ॥ १८ ॥ यदि यज्ञ आदि क्रिया अथवा जप पूजा में बैठे हुए वैश्य
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अथ पाराशरस्मीत-
अथवा शूद्र को मारे किंवा किसी अपने धर्म से व्युत प्रारमणको
मारे तो चांद्रायण व्रत करके तीस गौ दक्षिणादेव ॥ १८ ॥
चण्डालहतवान् कश्चिद्ब्राह्मणोयदिकंचन ॥
प्राजापत्यंचरेत्कृछंगोद्वयंदक्षिणांददेत् ॥ १९ ॥
यदि कोई ब्राह्मण चाण्डालको मारे तो प्राजापत्य कृच्छ्वत करे
और दो गौ दक्षिणादे ॥ १६ ॥
क्षत्रियेणापिवैश्येनशूद्रेणैवेतरेणच ॥
चांडालस्यवधेपाप्ते कृच्छ्रार्द्धनविशुद्ध्यति ॥ २० ॥
क्षत्रिय वैश्य और शूद्र अथवा अन्य भी कोई यदि चाण्डाल को
मारे तो आधा कृच्छू करने से शुद्ध होता है ॥ २० ॥
चारैःश्वपाकोचाण्डालो विप्रेणाभिहतोयदि ॥
अहोरात्रोपितः स्नात्वापंचगव्येनशुद्धयति ॥२१॥
यदि चोरी करने हारे श्वपाक अथवा चाण्डाल को ब्रामण मारे
तो एक दिन रात उपास करके पंचगव्य खावें ॥ २१ ॥
श्वपाकंचापिचाण्डालविपुः सेभाषतेयदि ॥
हिजसंभाषणकुर्यात्सावित्रींचसकृत्जपेत ॥२२॥
श्वपाक अथवा चाण्डाल से यदि ब्राह्मणं बात चीत करे तो
धामणसे बोलकर एक पार गायत्री जपे तव शुद्ध होता है ।॥ २२ ॥
चाण्डालै सहसुप्ततुत्रिरात्रमुपवासयेत् ।।
चाण्डालैकपथंगत्वा गायत्रीस्मरणाच्छुचिः ॥ २३ ॥
चाण्डालके साथ सोनेहारें को तीन दिन उपास कराना और
पाण्डाल के साथ राह में चला हो तो. गायत्री स्मरण करने से
शुद्ध होता है ॥ २३ ॥
चाण्डालदर्शनेसद्यआदित्यमवलोकयेत् ॥
चायडालस्पर्शनेचैवसचैलेंस्नानमाचरेत् ॥ २४॥
भाषा टीका संहित। ४३ चाण्डालको देखे तो झटपट सूर्य की और ताक दे चाण्डाल को छू लेवे तो सचैल (कपडे समेत) स्नान कर डाले ॥ २४ ॥ चाण्डालखातवापीषुपीत्वासलिलमग्रजः ॥ अज्ञानाच्चैकमुक्तेन लहोरात्रेणशुद्धयति ॥२५॥ यदि ब्राह्मणने बिना जाने चाण्डाल की खुदाई हुई वापी वा कूप आदिमें से जल पी लिया होतो एक सक्त करे और जान बुझकर नहाया वा पानी पीया होतो एक उपवास से शुद्ध होता है ॥ २५ ॥ चाण्डालभांडसंस्पष्टपीत्वाकूपगतेजलम् ।। गोमूत्रयावकाहारस्त्रिरात्राच्छुद्धिमाप्नुयात् ॥ २६ ॥ यदि चाण्डालने अपना भांडा पानी के लिये किसी कूप में डाला हो और उस कूप के जलको पीये तो तीन दिन तक गोमून में यावक पकाकर खाने से शुद्ध होता है । ०६ ॥ चाण्डालघटसंस्थंतुयत्तोयपिवते द्विजः ॥ तत्क्षणात्तिपतेयस्तु पूजापत्यसमाचरेत् ॥ २७ ॥ यदि चाण्डाल के भाण्डे का जल कोई पीले और उसी बन ससे वमन कर दे तो वह प्राजापत्य धूत करे ॥ २७ ।। यदिनक्षिपतेतोय शरीरेयस्यजीर्यति । प्राजापत्यनंदातश्यं कृच्छंसांतपनंचरेत् ॥२८॥ कदाचित् वमन न किया और वह जल उस्के पेटमेंही पचगया तो कृच्छ्र सान्तपनकरे ॥ २८ ॥ चरेत्सांतपनविप्रः प्राजापत्यमनंतरः॥ तदईतुचरेद्वैव्यः पादंशूद्रस्यदापयेत् ॥.२६ ॥ यह सान्तपन ब्राह्मण करे क्षत्रिय होतो प्राजापत्य करे, वैश्य और शुद्र प्रजापत्य का चौथाई व्रत करें ॥ २९ ॥ भांडस्थमंत्यजानांतु जलंदधिपयः पिवेत् ॥ --
अथ पाराशरस्मृति-
ब्राह्मणः क्षत्रियोवैश्यःशूद्रश्चैवप्रमादतः॥३०॥
यदि अंत्यज ( चांडाल आदि ) वर्तन का जल दही वा दूध
चारो वर्ण में से कोई पीले ॥ ३० ॥
ब्रह्मकू!पवासेनद्विजातीनांतुनिष्कृतिः ॥
शूद्रस्यचोपावसेन तथादानलशक्तितः ॥३३ ।।
तो प्रथम तीन वर्षों की शुद्धिब्रह्मकूर्च व्रत करनेसे होती है और शूद्र
एक उपवासतथा अपपीशक्ती मर दान कर्ने से शुद्ध होता है |॥३१॥
भुंक्त ज्ञानाद्विजश्रेष्ठःचांडालान्नकथंचन ।।
गोमूत्रयावकाहारो दशरात्रेणशुद्ध्यति ॥ ३२॥
यदि किसी भांति विना जाने चाण्डाल का अन्न ब्रामण खालेवे
तो गौके सूत्र में यावक पकाकर दस दिन खाने से शुद्ध होता है
जान बुझ कर खावेतो चांद्रायण करे.॥ ३२॥ ..'
एकैकंयासमश्नायाद्गोमूत्रेयावकम्यच ।।
दशाहनियमस्थस्यत्रतंतस्तुविनिर्दिशेत् ॥ ३३ ॥
इस व्रत गौके मूत्र में पके हुए याक्क का एकही एकग्रास
प्रतिदिन खाना होता है। और दस दिन नियम से रहना पड़ता है ३
अविज्ञातस्तुचांडालो यत्रवेश्मनितिष्ठति ।।
विज्ञातरूपसंन्यस्य द्विजाःकुयुरनुग्रहम् ॥ ३ ॥
जिस्के घस्में बिनाजाने चाण्डाल रहता हो तो.जय उसे जाने
झट दूरकरे और ब्राह्मणों के उपदेश से प्रायश्चित्त करे ३४ ।।
मुनिवक्त्रोद्गतान्धर्मान् गायतोवेदपारगाः ॥
पतंतमुद्धरेयुस्तं धर्मज्ञाः पापसंकटात् ॥ ३५ ॥
थेद पारंगत याह्मण लोग उस पतित होते मनुष्य का उद्धार
ऐसे पाप संकट से पराशर आदि मुनियों के कहे हुए धमों को
बतना कर करें.॥ ३९ ॥
वा कर करें ॥ ३५ ॥
भाषा टीका सहित। ५ दध्नाचसर्पिषाचैव क्षीरगोमूत्रयावकम् ॥ मुंजीतसहभृत्यैश्च त्रिसंध्यमवगाहनम् ॥३६॥ गौके मूत्र में पके हुए यावकखो दही घी और दूध के साथ अपने मृत्यों समेत भोजन करे और तीनों संध्या स्नान किया करे ॥ ३६ ॥ यहम्भुञ्जीतदध्नाचत्र्यहम्भुजीतसर्पिषा ॥ यहंतारेण जीत एकैकेनदिनत्रयम् ॥३७॥ तीन दिन दही के साथ तीन दिन घी के और तीन दिन दूध के साथ खावे और अंत में पुनः एक २ दिन इन हर एक के साथ खावे तो घारह दिनमें यह व्रत होता है ॥ ३७ ॥ भावदुष्टं न भुंजीत नोच्छिष्टकृमिदूषितम् ॥ दधिक्षीरस्यत्रिपलं पलमेकंघृतस्यतु ॥ ३८ ॥ अमेध्य बुद्धि जिसमें होजावे उसे न खाये जूठा न खावे और कृमि से दूषित को भी न खावे । दधि और दूध तो तीन २ पल (अर्थात् १२ तोले ) और धी एक पल (लोलेलेवे ॥ ३८ ॥ भस्मनातुभवेच्छुद्धिरुभयोःकांस्यताम्रयोः । जलशौचेनवस्त्राणां परित्यागेनमृण्मयम् ॥ ३९ ॥ कांस और तामे की शुद्धि भस्म (राख) से होती है वस्त्रों की. जह से और माटी के बर्तन की,त्याग देने से शुद्धि है ॥ ३९ ॥ कुसुभगुडकार्पास लवर्णतैलसर्पिषी । हारेकृत्वातुधान्यानिदद्याद्वेश्मनिपावकम् ॥१०॥ कुसुम, गुड़, कपास, लवण तैल घी और दूसरे अन्न भी घर 'के द्वार पर निकाल ले और घर में आग जला॥ १० ॥ एवंशुद्धस्ततःपश्चात्कुर्याद्ब्राह्मणतर्पणम् ॥ त्रिंशतगावृषचैकंदद्याद्विप्रेषुदक्षिणाम् ॥ ४१ ॥ ।
m4 अथ पाराशरस्मृति-- इस भांति शुद्ध होकर कर पीछे से ब्राह्मण भोजन करावे तथा तासगौ और एक बैल ब्राह्मणों को दक्षिणा देरे । ११ ॥ पुनर्लेपनखातेन होलजाप्येन शुद्धयति ।। आधारेणच विप्राणां भूमिदोषोन विद्यते ॥ ४२ ॥ पुनः उस गृहकी भूमिको लीपने .खने से और होम जाप से शुद्ध कर तथा ब्राह्मणोंको बैठाने से भी भूमिका दोष नहीं रहता (यहां तक घर में चांडाल रहने का प्रायश्चित्त ९. (इलोकों में चांडालैःसहसंपर्कमा समासाईमेवंचा ।। गोमूत्रयावकाहारोमासान विशुद्धयति ॥ ४३ ।। यदि चांडालादिकों के साथ एक श. आवे महीने तक संसर्ग रहा हो तो गोमूत्र में पके हुए यावकको १५ दिन खाने से शुद्ध होता है ॥ १३ ॥ रजकीचर्मकारीचलुब्धकीवेण्डजीविनी ॥ चातुर्वर्ण्यस्यतुगृहेत्वविज्ञातातुतिष्ठति ॥ ४४ ॥ रजकी, ( घोषिन ) चमारी व्याधस्त्री और अण्डजीषिनी, (घरकारिन ) यदि ये चारों वर्षों में से किसी के घर में विना जाने रही हों !! १४ ॥ ज्ञात्वातुनिष्कृतिकुर्यात्पूर्वोक्तस्यार्द्धमेवतु ।। गृहदाहनकुर्वीत शेषसर्वच कारयेत् ॥ ४५ ॥ तो जर जाने तव पहिले कहे हुएका आधा प्रायश्चित्त करे। गृहदाहन करे और सब करे । ४५.॥ गृहस्याभ्यंतरंगच्छे च्चांडालोयदिकस्यचित् ॥ तमागाराद्विनिःसार्य मुद्धातुविसर्जयेत् ॥ ४६॥ यदि किसी के घर में चांडाल चला जाये तो उसे घरके वाहिर निकालकर मिट्टी के बर्तनों को फेंक देव ॥ १६॥ ------ । .. भाषा टाका सहित। रसपूर्णतुमृद्भाडं नत्यजेत्तुकदाचन ॥ गोम्येनतुसंमिश्र जलैंः प्रोक्षौद्गृहंतथा ॥४७॥ जिन मिट्टिके बर्तनों में घी तेल आदि रस भराहो उन्हें न त्यागे और गौ के गोवर से घर लिपवा देवें ।। ४७ ॥ ब्राह्मणस्यव्रणद्वारे पूयशोणितसंभवे ॥ कृमिरुत्पद्यतेयस्य प्रायश्चित्तकथंभवेत्॥४८॥ यदि ब्राह्मण को व्रण होकर रक्तपीव वहता हो और उसमें कृमि पड़जावें तो उसका प्रायश्चित्त क्यों कर होवे ॥४८॥ गवांमूत्रपुरीपेण दाधक्षीरणसर्पिषा ॥ यहस्नात्वाचपीत्वाच कृमदष्टःशुचिभवेत् ॥ ४९ ॥ कि तीन दिन तक पंचगव्य से स्नान करे पंचगव्यही खावे तो कृमिदोष से शुद्ध होता है ॥ ४९ ॥ क्षत्रियोपिसुवर्णस्य पंचमाषान्प्रदायतु ॥ गोदक्षिणांतुवैश्यस्या प्युपवासंविनिदिशेत् ॥ ५० ॥ तात्रिय हो तो उसे पांचमाशे मोना भी दान देना होता है और वैश्य को एक उपास करके एक गौ देना होती है ॥ ५० ॥ शूद्राणांनोपवासः स्यात् शूद्रोदानेनशुध्यति ॥ आछिद्रमितियहाक्यं वदंतिक्षितिदेवताः॥५१॥ शूद्रों को उपवास नहीं वे दान मात्रसेही शुद्ध होते हैं बाह्मणलोग 'अछिद्रमस्तु' इस वाक्यको जब कहेंतो ॥ ५१ ॥ प्रणम्यशिरसाग्राह्य मग्निष्टोमफलंहितत् ।। जपछिद्रतपश्छिद्रं यच्छिद्रंयज्ञकर्मणि ॥ ५२ ॥ प्रणाम कर्के माथे चढ़ाना उस्का फल अनिष्टोमयज्ञके तुल्यहोता है जप, तप, और यज्ञमें भी जोछिद्र (न्यूनता) हो ॥ ५२ ॥ सर्वभवतिनिच्छद्ब्रह्मणैरुपपादितम् ।। .
- अथ पाराशरस्मृति- व्याभिव्यसनिनिश्रांतनुभिक्षेडामरेतथा॥५३॥ सो सब ब्राह्मणों के वाक्यसे परिपूर्ण होजाता हो यदि कोई व्याधि ग्रहस्त हो, किसी पितृ सेवा आदि व्यसनमें पड़ाहो, थकाहो दुर्भिक्ष में और राजोपद्रव में पड़ाहोतो ॥ ५३ ॥ उपवासोवतंहोमोहिजसंपादितानिवाः ।। अथवावाह्मणास्तुष्ठाःसबैकुर्वत्यनुग्रहम् ॥५४॥ 'उपवास, व्रत, होम आदि ब्रह्मणद्वारा करावे अथवा बामणलोग सन्तुष्ट होकर अनुग्रह करे कि तू शुद्धहुआ, तोभी शुद्ध होता है ५४ सर्बान्कामानवाप्नोतिद्विजसंपादितरिह ।। दुर्बलेनुग्रहः प्रोक्तस्तथावैवालवृद्धयो ॥ ५५ ॥ ब्रह्मण द्वारा व्रतादि संपादन कराने से वहां पर सव कामना पूरिहोती हैं और जो दुर्घलहो तथा वालक और वृद्ध इनमें ब्राह्मणोंको (सभासदों वा परिषत् को) अनुग्रह करना चाहिये ।। ५५ ॥ नतोऽन्यथाभवेहोष स्तस्मान्नानुग्रहःस्मृतः ।। रोहाहायदि वालोभाद्भयादज्ञानतोऽपिवा. ॥ ५६ ॥ इनसे विना दोष होता है इसमे औरों में अनुग्रह कर्ना मना है यदि लेह लोभ भय अथवा अज्ञानले औरों पर अनुग्रह करतो ५७ कुर्वत्यनुग्रहयेतुतत्पापलेषुगच्छति ॥ शरीरस्याऽत्ययेप्राप्ततिनियमंतुये ।। ५७ :। वह पप उन्हीं ब्राह्मणों को लगजाता है । जिस्के शरीर नाश हो जाने की दशाहो उसे जो नियम व्रत उपदेश करें ॥ ५७ ॥ महत्कार्योंऽपरोधेच नस्वस्थस्यकदाचन ।। स्वस्थत्यमूढाःकुर्वति वदतिनियमतुये ॥ ५८॥ अथवा किसी घड़े कर्ममें वझेहुए को उपदेशकरें तथा स्वस्थ मनुष्यों को कदाचित् न करें और जो लो। मूना से स्वस्थ के वद ले आपही नियम व्रत करें ॥८॥ । ..
भाषा टीका सहित । तेतस्यविघ्नकर्तारःपततिनरकेऽशुचौ ॥ स्वयमेवव्रतंकृत्वाब्राह्मणंयोऽवमन्यते ॥ ५६ ॥ ये सब उस्के विघ्नकरनेहारे हैं अति अशुचि नरक में पड़ते हैं। जो कोई ब्राह्मणों को अपमान कर उनसे विना पूछे आपही धूत करले तो॥ ५९ ॥ वृथातस्योपवासस्यान्नसपुण्येनयुज्यते ॥ सएवनियमोग्राह्योयमेकोपिवदेहिजः॥ ६० ॥ उस्का उपवास वृथा होता है पुण्य उसे नहीं मिलता उसी नियम को करना जिसे एक भी ब्रामण बतलादेवे ।। ६० ॥ कुर्याद्वाक्यं द्विजानांतुअन्यथाभ्रूणहाभवेत् ॥ ब्राह्मणोजंगमतार्थ तीर्थभूताहिसाधवः ॥६॥ ब्राह्मणों का वाक्य करे नहीं तो भ्रूणहा (गर्भहत्यारा ) होता है धामणलोग जंगम तीर्थ हैं और साधुजन भी तीर्थ हैं ॥ ६१ ॥ तेषावाक्योदकेनैव शुद्धयंतिमलिनाजनाः ॥ ब्राह्मणायानिभाषतमन्यतेतानिदेवताः ॥६२॥ उनके वचन रूपी जल से मलीन जन शुद्ध हो जाते हैं । जिन यातों को ब्राह्मण कहदेते हैं देवता भी उन्हें मानते हैं ॥ ६२ ॥ सर्वदेवमयोविप्रो नतहचनमन्यथा । उपवासोबतं चैवस्नानंतीर्थजपस्तपः । ६३ । ब्राह्मण सर्वदेवमय है उस्का वचन अन्यथा नहीं । उHAI, स्नान, तीर्थ, जप और तप ॥ १३ ॥ विप्रैः संपादितं यस्य सम्पूर्णतस्यतत्फलम् ॥ अन्नाद्यकीटसंयुक्ते मक्षिका केशदूषिते ॥ ६४ ॥ जिस्को ब्रामणों ने संपन्न किया उसे उसका सारा फल हामा है। भन्नआदि वस्तु में यदि कीटपडे अथवा सक्खी वा केश पड़जावें ५० अथ पाराशरस्मीत- तदंतरास्पृशेच्चापः तदन्नभस्मनास्पृशेत् ॥ भुजानश्चैवयोविनः पादहस्तेन संस्पृशेत् ।। ६५ ॥ तो उसके मध्य जल और भस्म छिड़कने से शुद्ध होता है। जो नाक्षण भोजन करते समय हाथ रहे अपना पांव छूले ।। ६५ ॥ स्वमुच्छिष्टमसौर्युक्ते योभुक्तभुक्तभाजने ॥ पादुकास्थान जीत नपर्यकस्थितोपिवा ॥६६॥ वह उच्छिष्ट भोजनका प्रत्ववायः पाता है । मुक्तपात्र में भोजन से भी यही दोष है। पाहुका पर और खट्दा आदि पर बैठ कर भोजन न करे ।। ६६ ।। श्वानचाण्डालहक्चैव भोजनपरिवर्जयेत् ।। यदन्नप्रतिषिद्धस्यादन्तशुद्धिस्तथैवच ॥ ६७ ॥ कुत्ते और चाण्डाल के सामने भोजन न करें। भोजन में जो अन्न प्रतिषिद्ध है और जिस भांती अन्नशुद्धि होती है ।। ६७ ॥ यथापराशरेणोक्तं तथैवहिवदामिवः ।। शंतद्रोणाटकस्यान्नं काकश्वानोपघातितम् ॥६॥ ये बाते जिस प्रकार पराशर मुनिने कही हैं मैं भी आपलोगोंसे उसी ढंगले कहता हूं एक द्रोणाटक ( भर पहुए अन्नको यदि काक अथवा कुत्ता स्पर्श करदे ) ॥ ६८ ॥ कैलेंदशुद्धतेचेति ब्राह्मणेभ्योनिवेदयेत् ।। काकश्यानाऽवलीढंतु द्रोणान्ननपरित्यजेत् ॥ ६ ॥ तो वह किस भांती शुद्ध होगा ऐसा ब्रामगों से पूछे और काक था कुत्ते का जुटारा हुआ द्रोणमाए अन्न त्याग न करे ।। ६९ वेदवेदांगविहिधर्मशास्त्रानुपालकैः॥ प्रस्थाद्वात्रिंशतिद्रोणाः स्मृतोद्विप्रथआढकः ॥ ७० ॥ वेद वेदांग जाननेहारे और धर्मशास्त्र का पालन करनेहरो T .. भाषा टीका सहित। ५१ प्राथणों नै ३२ प्रस्थों का एक द्रोण और दो प्रस्थ का एक आढक कहा है ॥ ७० ॥ ततोद्रोणाढकस्यान्नं श्रुतिस्मृतिविदोविदुः ॥ काकश्वानावलीदंतु गवाघू तखरेणवा ॥ ७१॥ इसी प्रमाण से द्रोणाढक का अन्न श्रुति स्मृति वेत्ताओं ने अत्याज्य कहा हुआ है जिस अन्न को काक और कुत्ते ने जुठारा हो अथवा गौ वा गधे ने सूंघ लिया हो ॥ ७१ ॥ स्वल्पमन्नत्यजेद्विप्रः शुद्धिोणाढकोभवेत् ॥ अन्नस्योद्धृत्यतन्मानं यच्चलालाहतंभवेत् ॥७२॥ तो थोड़े अन्न को ब्राह्मण त्याग कर देवे और द्रोणाढक भर होने से शुद्धहीं गिना जाता है किन्तु इतना मान करना पड़ता है कि जितने में लाला ( लार) लगी हो उतना अन्न निकाल कर फेंक देना ॥७२॥ सबर्णोदकमभ्युक्ष्य हुताशैनवदापयेत् ॥ हुताशनेनसंस्पृष्टं सुवर्णसलिलेनच ॥७३ ।। और जो शेष है उस्को सुवर्ण के जल से सेक करके अग्नि से तपाना जब वह अन्न अग्नि और सोने के जल से संपृष्ट हुआ ७३ विप्राणांब्रह्मघोषेणभोज्यंभवतितत्क्षणात् ॥ स्नेहोवागोरसोवापि तत्रशुद्धिःकथंभवेत् ॥७४॥ और ब्राह्मणों की वेदध्वनि से उसी छन शुद्ध होकर भोजन के योग्य हो जाता है परन्तु यदि स्नेह ( घी तेल आदि) अथवा गोरस (दूध दही ) हो तो उस्की शुद्धि क्यों कर होगी ॥ १४ ॥ अल्पंपरित्यजेत्तत्रस्नेहस्योत्पवनेनच ।। अनलज्वालयाशुद्धिगोरसस्यविधीयते ॥७५ ॥ कि उसमें से थोड़ा निकाल लेना और स्नेह द्रव्य को उत्पवन करनेसे ( अर्थात् कुशा के पत्र से कुछ २ उछाल देने से) मौर .
अब पराशर जी के वाक्यानुसार द्रव्यों की शुद्धि यों है कि
अथ पाराशरस्मृति-
गोरस की शुद्धि अग्निज्वाला से होती हैं ॥ ७५ ।।.
इतिप्राणिहत्यादिनिष्कृति मषष्ठोऽध्यायः ॥६॥
इति श्रीपाशर स्वृति षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
अथातोद्रव्यशुद्धिस्तु पराशरवचोयथा ॥
दारवाणां तुपात्राणांतत्क्षणाच्छुद्धिरिष्यते ॥ १॥
काठ के पात्रों में यदि अमध्य वस्तु लंग जाये तो उन्हें कुछ
छील देने से शुद्धि हो जाती है ॥ १ ॥
मार्जनायज्ञपात्राणांपाणिनायज्ञकर्मणि ॥
चमसानांग्रहाणांच शुद्धिःप्रक्षालनेनच ॥ २॥
आर यज्ञकर्म में यज्ञपात्रों की शुद्धि हाथ से पोंछने करके
जाती हैं चमस तथा ग्रह नामक पात्रों की शुद्धि जल से धोने
होती है ॥२॥
चरूणांश्रुक्श्रुवाणांच शुद्धिरुष्णेनवारिणा ॥
भस्मनाशुद्धधते कांस्यं ताम्रमम्लेनशुद्धयति ॥ ३ ॥
चरुनु क् और स्त्र प इन पात्रोंकी शुद्धिं उष्ण जल कर्के प्रक्षात्य
से होती है । कांसे का पात्र भस्म (राख) से मलने से शुद्ध होता है
और तामे की शुद्धि अम्ल (खदाई) से होती है ॥ ३ ॥
रजसाशुद्धयतेनारी बिकलंयानगच्छति॥
नदीवेगेनशुड्यते लेपोयदिनदृश्यते ॥४॥
नारी अर्थात् पित्तल के पात्र की शुद्धि रज (धूलि वा मिष्टी ) में
होती है. ( कोई यो अर्थ करते हैं कि नारी अर्थात् स्त्री की शुद्धि रजों
धर्म से होती है),परन्तु जो विकल अर्थात् अति भ्रष्ट न हुई हो तो
नदी की शुद्धि वेग से होती है यदि लेप न देख पड़े तो.॥४॥
वापीकूपतड़ागेषु दूषितेषुकथंचन ॥
उद्धृत्यवैकुंभशतं पचगव्येनशुध्यति ॥ ५॥
भाषा टीका सहित। यदि किसी भांति वापी, कूप, और तडाग दूषित हो गए. हों तो सौघड़े जल निकाल कर पंचगव्य डालने से शुद्ध होते हैं ॥५॥ अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षातुरोहिणी ॥ शवर्षाभवेत्कन्याअलऊ रजस्वला ॥६॥ आठ वर्ष की लड़की गौरी कहलाती, नौ वर्ष की रोहिणी और दस वर्ष की कन्या कहलाती है इसे उपरांत रजस्वला कहाता है ६ प्राप्तेतुद्वादशवर्षे: याकन्यांनप्रयच्छति ॥ मासिमासिरजस्तस्याः पिवंतिपितरोनिशम ॥७॥ धारह बरस होने पर जो कन्या को नहीं दान कर देते तो उन के पितर उस कन्धाका रज प्रतिमास में पीते रहते हैं ।।७।। , माताचैवपिताचैव ज्येष्टोभ्रातातथैवच ॥ त्रयस्तेनरकयांति दृष्ट्वाकन्यारजस्वलां ॥८॥ माता, पिता, और जेठा माई ये तीनों रजस्वला कन्या को देखने से नरक में जाते है ॥ ८॥ यस्तांसमुहहेतकन्यां ब्राह्मणोमदमोहितः ॥ असंभाष्योहपोक्तेयः सविप्रोवृषलीपतिः ॥६॥ जो ब्राह्मण मदसे मोहित होकर उस रजस्वला कन्याको व्याह लेना है वह असंभाषणीय और पंक्तिवाह्य होकर वृषलीपति कहलाता है ॥ ९॥ यःकरोत्येकरात्रेणं बृषलीलेवनंद्विजः ।। सभक्ष्यभुग्जपन्नित्यं निभिर्वविशुद्धयति ॥ १० ॥ ऐसी वृषली का संग जो द्विज एक रात भर कर्ता है वह तीन घरम तक भिक्षा मांग के खातारहै और नित्यही जप करता रहे तष शुद्ध होता है ॥ १० ॥ अस्तंगतेयदासय चाण्डालपतितस्त्रियम् ॥ ।
अथ पाराशरस्मृति- सूतिकास्पृशतश्चैव कथंशुद्धिर्विधीयते ॥ ११ ॥ सूरजके श्रस्त हो जाने पर यदि चाण्डाल, पतित अथवा सूति का स्त्री को छुलेवे तो उसकी शुद्धि क्यों कर हो ॥ ११ ॥ जातवेदंसुवर्णंच सोममार्गविलोक्यच ।। ब्राह्मणानुमतश्चैव स्नानंकृत्वाविशुद्धयति ॥ १२ ॥ जातवेद (अग्निवाचन्द्रमा) सुवर्ण और चंद्रपथको देखकर ब्राह्मण की आज्ञालेकर सपैल स्नान करने से. शुद्ध होता है ।। १२ ।। स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यं ब्रह्मणीब्राह्मणों तथा ॥ तावत्तिष्ठन्निराहारो त्रिरात्रेणैवशुद्धयति ॥ १३ ॥ यदि ब्राह्मणी रजस्वला किली दूमरी रंजस्वला आमणी को छूलेवे तो उन रजोधर्म के तीन दिनों तक विना भोजन किये रहै तो तीन दिनों में शुद्ध होती है ॥ १३ ॥ स्पृष्ट्रवारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणीक्षत्रियांतथा ॥ अर्जकृच्छ्रेचरेत्पूर्वापादकत्वऽनंतरा ॥ १४ ॥ यदि ब्राक्षणी रजस्वला क्षत्रिया रजस्वला को छलथे तो ब्राह्मणी अर्द्धकृच्छ ब्रतकरे और क्षत्रिया पादकृच्छ्रकरे ॥ १४ ॥ स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणीवैश्यां । तथापादहीनचरेत्पूर्वापादमेकमनंतरा ॥ १५॥ मायणी रजस्वला वैश्यारजस्वलाका स्पर्श करे तो प्रामणी त्रिपादकृच्छ करे और वैश्य पादच्छूझरे ॥ १५ ॥ स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणीशूद्रजांतथा । कृच्छ्रेणशुद्धयतपूर्वाशूद्रादानेनशुद्धयति ॥ १६ ॥ ब्राह्मणी रजस्वला शुद्रा रजस्वला को वे तो ब्राह्मणी पूरा कृछू अंत करने से शुद्ध होती हैं और शूद्रादान देनेसे शुद्ध होती है ॥१६॥ स्नात्वारजस्वलायातु चतुर्थेहनिशद्धयति। '..
५५
भाषा टीका सहित ।
कुर्याद्रजोनिवृत्तौतु देवपित्र्यादिकर्मच ॥ १७॥
जो रजस्वलाहो वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है और
देव व पित् कार्यों को तो रज की निवृत्ति होने पर करे ॥ १७ ॥
रोगेनयद्रजःस्त्रीणामन्वहंतुप्रवर्तते ॥
नाशुचिः साततस्तेनततस्याकालिकंमलम् ॥ १८॥
यदि रोग करके प्रति दिन स्त्री को रज निकले तो वह
उस रज से अशुद्ध नहीं होती क्योंकि वह अकालिक मल
गिना जाता है ॥ १८ ॥
साध्वाचारानतावतस्य द्रजोयावत्प्रवर्तते ॥
रजोनिवृत्तौगम्यास्त्री गृहकर्मणिचैवहि ॥ १९॥
जष तक रज निवृत्त न हो तब तक साधुकर्म (देवपूजादि)
श्री न करे रज निवृत्त होनही पर स्त्री गमन के और गृह कार्य के
योग्य होती है ।। १९ ।।
प्रथमेहनिचाण्डाली द्वितीयेब्रह्मघातकी ।।
तृतीयेरजकीनोक्ता चतुर्थेहनिशुद्धयति ॥ २० ॥
रजोधर्म में पहिले दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी
और तीसरे दिन रजकी के तुल्य स्त्री रहती है चौथे दिन
शुद्ध होती है ॥२॥
आतुरेस्नानउत्पन्ने दशकृत्वोहनातुरः॥
स्नात्वास्नात्वास्पृशंदेनं ततः शुद्ध्यत्सआतुरः॥२१॥
यदि किसी आतुर (सगी आदि) को नहाना अनपड़े तो
अनातुर ( स्वस्थ मनुष्य ) दसपार नहा नहा करके उसे छूवे तब वह
आतुर शुद्ध हो जाता है ॥ २१ ॥
उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः शुनाशूद्रेणवापुनः ॥
उपोष्यरजनीमेकां पंचगव्येनशदध्यति ॥२२॥
५६ अथ पाराशरस्मृति- उच्छिष्ट अर्थात् जूठे मुहवाले मनुष्य को दूसरा उच्छिष्ट अर्थात् जूठे मुहवाला पुरुष कुत्ता अथवा शूद्र छेव तो एक रात उपवास करके पंचगव्य खाने से शुद्ध होता है ॥ २२ ॥ अनुच्छिष्टेनशुद्रण स्पर्शस्लानविधीयते ।। तेनोच्छिष्टेनसंस्पृष्ट-प्राजापत्यसमाचरेत् ॥ २३ ॥ यदि अनुच्छिष्ट शूद्ने छुआ हो तो स्नान करे और उछिने छुआ होतो प्राजापत्य व्रत करके शुद्ध होता है ।। २३ ॥ भस्मनाशुद्ध्यतेकांस्यं सुस्यायन्नलिप्यते ॥ सुरामात्रेणसंस्पृष्टं शुद्ध्यतेऽग्न्युपलेखनैः ॥ २४ ॥ भस्म मलने से वह कांसेका पात्र शुद्ध होता है जिसमें सुरा (मदिरा) का लेए न हो और यदि मदिरा से ही छू गया हो तो आग डालने से शुद्ध होता है ।। २४ । गवाघ्रातानिकांस्यानि श्वकाकोपहतानिच ।। शुद्ध्यति दशाभिक्षारैःशूद्रोच्छिष्टानियानिच ॥२५॥ जिस कांसको गौने संघलिया हो अथवा कुत्ते वा काकने दूषित किया हो तो वह दसयार खारी मिट्टी के मलने से शुद्ध होता और इसी भांती शूद्रका जूठा कांसा भी शुद्ध होता है ।॥ २५ ॥ गड्षंपादशौचंच कृत्वाचकांस्यभाजने ॥ पण्मासान्भुविनिक्षिष्य उद्धृत्यपुनराहरेत् ।। २६ ॥ यदि कांसे के पात्र में कुल्ली करे वा पाव घोवे तो छ: महीने तक उसे पृथ्वी में गाडरक्खे अनन्तर निकाल लावे ॥ २६ ॥ आयसेवायसानांच सीसस्याग्नौविशोधनम् । देतमस्थितथाश्रृंगं रौप्यसौवर्णभाजनम् ॥ २७॥ लोहे के पात्रको लोहे से घिसे और सीसे को अग्नि में डालने से , शुद्धि होती है दंत, हड्डी, शृग, रूपे और सोने का पात्र ॥ २७ ॥ मणिपात्राणिशंखचत्येता प्रक्षालयेज्जलें।
। भाषा टीका सहित । ३७ पाषाणेनतुसंघर्ष एषांशुद्धिरुदाहता ॥ २८ ॥ मणिपत्र और शंख इन्हें जल में घोडाले और पत्थर से घिसे तो इनकी शुद्धि होती है ॥ २८ ॥ मृणमयेदहनाच्छुधिर्धा यानांमार्जलादपि । देण्डवल्कलचीराणां चौमकासवाससाम् ॥ २९ ॥ मिट्टी के पात्रकी शुद्धि अग्नि में जलाने से और धान्यों को जल के छोटे देने से । वेण्डपात्र अर्थात् बांसकी टोकरी आदि तथा पल्क लचीर (भोजपत्रादिक रस्त्र) असली (तीसी) और कपास के "वस्त्रों की भी॥ २६ ॥ -और्णनत्रपटानांच प्रोक्षणाच्छुद्धिरिष्यते ॥ मुजोपस्करशूपाणां शाणस्यफलचर्मणाम् ॥ ३० ॥ इसी माती जन और नेत्र (रेशम) के वस्त्रों की शुद्धि जलक छोटे देने से ही होती है। मुंज. उपस्कर, ( झाडू आदि) सूप, शण की रसी, फल और चर्म की ।। ३० ।। तृणकाष्ठस्यरज्जूनामुदकाभ्युक्षणंमतम् ॥ तुलिकाद्युपधानानि रक्तवस्त्रादिकानिच ॥ ३१ ॥ तृण, काठ, रस्सियों की शुद्धि जल छिड़कने से होती है रुई के सफिये, रंगेहुए वस्त्र आदिको ॥ ३१ ॥ शोषयित्वार्कतापेन प्रोक्षणाच्छुद्धितामियुः । माजोरमक्षिकाकीटपतंगकृमिदर्दुराः ॥ ३२॥ धूप में सुखाकर जलका छोटा दे तो शुद्ध होते हैं. विल्ली,मक्खी कीट, पतंग, कृषि, और डड्ड ॥ १२ ॥ मेध्यामेध्यंस्पृशंतोपि नोच्छिष्टमनुरब्रवीत् ।। महीस्पृष्ट्वागतंतोय याश्चाप्यन्योन्यविग्रुषः ॥३३ ॥ ये पवित्र और अपविन्न वस्तुओंको छूकर भो :(विभष्टा) . .1 लियोबृद्धाश्चवालाश्चतदुष्यंतिका अथ पाराशरस्मृति- नहीं होते ऐसा मनुने कहा है । धरती में गिरकर जो जल मावे और योजनेमें जो आपस में थूकके कणिके पड़ते हैं । १३ भुक्तोच्छिष्टतथास्नेहं नोच्छिष्टंमनुरब्रवीत् ।। तांबूलेक्षुफलेचैव भुक्तस्नेहानुलेपने ॥ ३४ ॥ भोजन में वारम्बार ग्रास लेनेसे अन्न और तेल श्रादि वारंवार लेकर लगाने में जूठे नहीं होते यह भी मनुने कहा है। पान, ईख, फल, भोजन किए हुए चिकने (घी) का लेप, ॥ ३४॥ मधुपर्केचसोमेच नोच्छिष्टंध तोविदुः । रथ्याक ईमतोयानिनाव पंथास्तृणानिच ॥ ३५ ॥ मधुपर्क और सोमलता का रप्त इनमें जूठापन धर्म से ही नहीं होता है । गली, कीचड़, जल, नौका, सडक और तृण ॥ ३५ ॥ मारुतार्केणशुद्धतिपंक्येष्ठकचितानि ।। अदुष्टासतताधारा वातोडूताश्चरेणवः ॥ ३६ ।। सप धूप और पॉयु लगने से शुद्ध होते हैं. इसी भांति पकी इंटोंका ढेर भी सदा बहती हुई धारा और वायु से उड़ी हुई धूल अशुद्ध नहीं ॥ ३६ ॥ क्षुतेनिष्टीवनेचैवदंतोच्छिष्टेतथानृते ॥ ३७ ॥ स्त्री, बालक, और घृद्ध इन्हैं. भी. कभी दोष नहीं। छींकने थूकने, दांतों में जूठा रह जाने, और झूठ बोलने में ॥ ३० ॥ पतितानांचसंभाषे दक्षिणश्रवणस्पृशत् ॥ अमिरापश्चवेदाश्चसोमसूर्यानिलास्तथा ॥ ३८ ॥ तथा पतित, के साथ बात चीत करने में दहिने कानको छुचे क्योंकि अग्नि, जल बेह, चन्द्रमा,सूर्य और वायु ॥ ३८ पतसर्वेपिविप्राणांश्रोत्रेतिष्टतिदक्षिणे ॥ VC..
भाषा टीका सहित। प्रभासादीनिर्थािनि गंगाद्यासरितस्तथा ।। ३६ ॥ ये सवी वाषणों के दाहिने कान में रहिते हैं। प्रभास आदिक तीर्थ और गंगा आदिक नदियां भी ॥ ३६ ।। विप्रस्यदक्षिणेकर्णेसान्निध्य मनुरब्रवीत ॥ देशभंगप्रवासेवा व्याधिषुव्यसनेष्वपि ॥ ४०॥ ब्राह्मण के दक्षिण कर्ण में सन्निहित रहती हैं ऐसा मनुने कहा है । देशोपद्रव में विदेश में, व्याधि और व्यसन में ॥ ४० ॥ रक्षेदेवस्वदेहादिपश्चाद्धर्मसमाचरेत् ।। येनकेनचधर्मेण मृदुनादारुणेनवा ॥४१॥ अपने देह धादिकी रक्षा पहिले करले पश्चात् धर्म करे जिस किसी धर्म से अर्थात् मृदु वा दारुण से ॥ ४१ ॥ उद्धरेद्दीनमात्मानं समोधर्ममाचरेत् ॥ आपत्कालेतुनिस्तीर्णशौचाऽचारविचिन्तयेत् ॥४२॥ अपने दीन आत्मा का उद्धार करके पीछे से समर्थ होकर धर्माचरणकरे आपत् काल वीते जाने पर शौच और भाचारकी चिंता करे ॥ ४२ ॥ शुद्धिंसमुद्धरेत्पश्चास्त्वस्थोधर्मसमाचरेत् ॥ इतिपाराशरीये धर्मशास्त्रेद्रव्यशुद्धि नामसप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥ शुद्धि भी निकाललो पीछे से धर्माचरण करना ।। इति श्रीपाराशर धर्म शास्त्रस्य पण्डिन गुरुमसाद कृत भाषा विकृतौ द्रव्य शुदिर्नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७.१. गबिंधनयोकेषुभवेन्मृत्युरकामतः । अकामकृतपापस्य प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ १॥ यदि पांधने वा जोतते समय पिना चाहे हो गी बैल की मृत्यु ... ६० अथ पाराशरस्मृति- हो जाये तो इस अनचाहे पाप का प्रायश्चित्त क्योंकर होगा। वेदवेदांगविदुषां धर्मशास्त्रंदिजालताम् ॥ स्वकर्मरतविप्राणां स्वकंपापंनिवेदयेत ॥२॥ कि वेद वेदांग और धर्म शास्त्र के जानने हारे विद्वानों को अपना पाप कहना।। २॥ अतऊर्ध्वप्रवक्ष्यानिउपस्थानस्यलक्षणम् । उपस्थितोहियायेनव्रतादेशनमर्हति ॥ ३॥ अब उन विद्वानों के पास जाने का प्रकार सुनो जय उचित प्रकार से उनके पास सावे तो ब्रतोपश के योग्य होता है । सद्योनिःसंशयेपापेनझुंजीतानुपस्थितः ॥ भुजानोवर्द्धयेत्याएं पर्षद्यन्ननविद्यते ॥४॥ जहां पर पर्षद ( विद्वानों का समान हो और पाप किसी को निश्चय करके जगही जावै तो वह विद्वानों के पास जावे विना गए चाहे जितनी देर लगे भोजन न करें यदि भोजन कर तो उसका पाप बढ़ जाता है | संशयेतुनभोक्तव्ययावत्कर्मविनिश्चयः ।। प्रमादस्तुनकर्तव्यों यथैवासंशयस्तथा ॥ ५ ॥ सन्देह पाप का हो गया हो तद भी बिना निश्चय किये भोजन न करे इस में प्रभार गलती वा चूक) कभी न करें जिसमें सन्देह दूर होय सो करे ।। ५ कृत्वापानगृहेत गुह्यमालविवईते ॥ स्वल्पं वाथप्रभृतंवा धर्मविद्भ्योनिवेदयत् ॥ ६ ॥ पाप करके छिपावे नहीं छिपाने से पढता है थोड़ा हो वा बहुत धर्म विज्ञों से कह सुनावे ।।६। तेहियापेकृतेवेद्याः हतारश्चैवपाप्मनाम् ॥
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भाषा टीका सहित।
व्याधितस्ययथावैद्या बुद्धिमंतोरुजापहाः ॥७॥
वेही पाप के मारने हारे वैद्य हैं जैसे रोगी मनुष्य के रोग
छुडाने हारे बुद्धिमान वैद्य होते हैं ॥ ७ ॥
प्रायश्चित्तेलमुत्पन्नेह्रीमान्सत्वपरायणः ॥
मुद्गरार्जवसंपन्नः शुद्धिगच्छेतमानवः ॥ ८॥
प्रायश्चित्त श्रा लगे तो राज्जा, धीरता और बारम्बार नव्रतासे
युक्त होने से मनुष्य शुद्ध हो सक्ता है ॥ ८ ॥
सचैलोबाग्यतः स्नात्वाक्लिन्नवासा:समाहितः॥
क्षत्रियोवाथवैश्योवा ततःपर्षदमाब्रजेत् ॥९॥
मौन होकर वस्त्र समेत नहाले उन्हीं गीले वस्त्रों से सावधानी
रख कर क्षत्री हो वा वैश्य हो पर्षत के पास जावे ॥ ९ ॥
उपस्थायततःशीघ्रमातिमान्धरणींब्रजेत् ।
गात्रैश्चशिरसाचैवनचकिंचिदुदाहरेत् ॥ १०
वहां जा झटपट अति दुःखी हो कर भूमि पर सिर और
सारा देह लम्बा कर दडवत् कर और मुह से कुछ भी न बोले ॥१०॥
सावित्र्याश्चापिगायत्र्याःसंध्योपास्त्यग्निकार्ययोः ॥
अज्ञानात्कृषिकारोब्राह्मणानामधारकाः॥११॥
जो ब्राह्मण गायत्री वा सावित्री नहीं जानते नक्षा सध्या वंदन
और श्राग्निहोत्र नहीं जानते नती करते हैं यह नाम मात्र को
ब्राह्मण हैं ॥ ११ ॥
अवतानामसन्त्राणांजातिमानोपजीविनाम् ॥
सहस्रसःसमेतानांपरिषत्वनविद्यते ॥ १२ ॥
विना व्रतवाले, विना मंत्र जानने वाले, जाति मानसे ही मामण
जीविका करने हारे ब्राह्मण यदि हजारों इकठे हों तो परिषत् नहीं
कहे जा सकते ॥ १२ ॥
अथपाराशरस्मृति-
यहदंतितमोमूढामूर्खाधर्ममतहिदः ।
तत्पापंशतधाभूत्वा तहक्तृनऽधिगच्छति ॥ १३ ॥
जो वे अज्ञानी और धर्म के न जानने हारे मूर्ख लोग
कहते हैं तो वह पाप सौगुणा होकर उन कहने वालों को
गजाता है ॥१३॥
अज्ञात्वाधर्मशास्त्राणिपायश्चित्तंददातियः ।।
प्रायश्चित्तीभवेतपूतःकिल्विष्पर्षदिब्रजेत् ॥ १४ ॥
धर्म शास्त्र विना जानेही जो प्रायश्चित्त बतलाता है
प्रायश्चित्ती शुद्ध हो जाता है और उसका पाप उस बतलाने हारे
पर्वत् में लग जाता है ॥ १४ ॥
चत्वारोवात्रयोवापि ययुर्वेदपारगाः ॥
सधर्मइतिविज्ञेयो नेतरैस्तुसहस्रशः ॥ १५ ॥
चार वा तीन वेदपारग मनुष्य जो कहैं वही धर्म जानना दूसरे
सैकडों वा हजारों के कहने से भी धर्म नहीं होता ॥ १५ ॥
प्रमाणमार्गमार्गतो येधर्मप्रवदंति वै॥
तेषामुहिजतेपापसभूतगुणवादिनाम ॥ १६ ॥
प्रमाण का पथ चाहने हारे लोग जो धर्म कहते हैं उन्हीं वस्तुतः
सत्यगुण कहने वालों से पाप डरता है ॥ १६ ॥
यथाश्म निस्थितंतोयं मारुतार्केणशुद्ध्यति ॥
तथैवपर्षदादेशात्पापनश्यतिनान्यथा ॥ १७॥
जैसे पत्थर में पड़ा हुआ जलवायु और सूर्य के आतप से शुख
होता है इसी भांति पर्षत के ही धनलाने में पाप छूटता है अन्य
या नहीं ॥१७॥
नैवगच्छतिकतारं नैवगच्छति पर्षदम् ।।
मारतार्कादिसंयोगा त्यापनश्यतितोयवत् ॥ १८॥
भाषा टीका सहित। न कनें हारे को और न पर्षप्त को पाप लगता है किन्तु वायु और सूर्य के संयोग से जल की नाई नष्ट हो जाता है ।। १८ ॥ चत्वारोवायोत्रापि वेदवंतोग्निहोत्रिणः॥ ब्राह्मणानां समर्थोंये परिषत्साभिधीयते ॥ १९॥ चार अथवा तीन वेदजानने हारे अग्निहोत्री जो प्रामणों में समर्थ हो उन्हीं को. परिषत् कहते हैं ॥ १९ ॥ अनाहिताग्नयोयेन्ये वेदवेदांगपारगाः॥ पंचत्रयोवाधर्मज्ञाः परिषत्साप्रकीर्तिता ॥२०॥ और जो अग्निहोत्री नहीं है परन्तु वेद और घेदांगों को जानते है उन्में से पांच वा तीन धर्मवत्ता मनुष्य जहां एकत्र हों तो वह भी परिषत् कही जाती है ।। २० ॥ मुनीनामात्मविद्यानां द्विजानांयज्ञयाजिनाम् ॥ वेदव्रतेषुस्नातानामकोपिपरिषद्भवेत् ॥२१॥ आत्म विद्या जानने हारे मुनि, यज्ञकर्म कर्ने कराने में निपुण प्राह्मण और पद तथा ब्रतों में परम निपुण ब्राह्मणों में से एक को मी पर्षद् कहते है ।। २१ ॥ पंचपूर्वमयाप्रोक्ता स्तेषांचासंभवेत्रयः ॥ संवृत्तिपरितुष्टाये परिषत्साप्रकीर्तिता ॥ २२ ॥ पहिले मैंने पांच प्रकार कहे उन्के असंभव में तीन जो अपनी. राति में तुष्ट रहने हारे ब्राह्मण हैं वहीं परिवत् हैं. ॥ २२ ॥ अतऊर्चतुयोवप्राः केवलंनामधारकाः॥ परिषत्वनतेष्वस्ति रहसगुणितष्वपि ॥ २३ ॥ अनन्तर जो केवल नाम के नाश्मण हैं वे हजार गुण भी हो तो उन्में परिषद नहीं होती ॥ २३ ॥.. यथा काष्टमयोहस्ती यथाचर्ममयोमृगः ।।'
॥ अथ पाराशरस्थति- ब्राह्मणास्त्वनधीयान स्त्रयस्तेनामधारका ॥ २४ ॥ जैसे काठ का हाथी चाम का मृग इत्ती मांति दिन एटा ब्राह्मण ये तीनों नाम मात्र के हैं ॥ २४ ॥ ग्रामस्थानंयथाशून्य यथारूप स्तुनिर्जलः ।। यथाहुतमनम्नाच अमंत्रोब्राह्मणस्तथा ॥ २५॥ जैसे सूना गांव निर्जल कूप, और बिना अग्नि का होम तैसाही मंत्र हीन वाइमण भी है ॥ २ ॥ यथापढीफलःस्त्रीषु यथागौरूपरफला ॥ यथाचाज्ञेफलंदानं तथाविप्रोऽनुचोऽफलः॥२६॥ जैले नपुंसक स्त्रियों को निष्फल, अपर पृथ्वीनिष्फल, और मूर्ख को दान दिया निष्फल तैसे ही. विना बेद का पाह्मण निष्फल है॥६॥ चित्राकर्मयथानेकैरंगैसन्मील्यतेशनैः ।। ब्राह्मण्यमपितद्वद्धि संस्कारैत्रिपूर्वक ॥ २७॥ जैसे कई रंगों से घी.रे. २. चित्र बनता है इसीभांति मंत्रपूर्वक संस्कारों से ब्रामणता सिद्ध होती हैं ।। २७ ।। प्रायश्चित्तंप्रयच्छति येद्रिजानामधारकाः॥ तेद्विजाः पापकर्माण: समतानरकययुः ॥ २८॥ लो नाममात्र के ब्राह्मण प्रायश्चित्त देते हैं, वे पापी नाहमण सब मरफ में जाते हैं ॥ २८ ॥ येपठतिद्विजावेदं पंचयज्ञरताश्चये ।। त्रैलोक्यतारयंत्येव पंचेंद्रियरताअपि ॥ २९ ॥ जो बाहमण वेद पढ़ते हैं और पंचयज्ञकर्ते वे पंचेंद्रिय रत भी हो तो भी तीनोलोकको तारतही है ।। संप्रणीतभशानेखुदीप्तोरिनःसर्वभक्षकः ॥
. भाषा टीका सहित । तथाचवेदविद्विप्रः सर्वमक्षोऽपिदैवतम् ॥३०॥ जैसे श्मशान आदि में जलती हुई आग सब प्रकारकी वस्तु का भक्षण करती है इसी भांति वेदवित् ब्राह्मण सर्व भक्षी हो तो भी देवता ही है ।। ३०॥ अमेध्यानितुसर्वाणि प्रक्षिप्यंतेयथोदके । तथैवकिलिक्सर्वप्रक्षियेच्चद्विजानले ॥३१॥ जैसे हर प्रकारके मैले जल में डाले जाने से दूर होते हैं तैसे ही सब पाप ब्राह्मण में डालने से जाता हैं ॥ ३१ ॥ गायत्रीरहितोविप्राशूद्रादण्यशुचिर्भवेत् ।। गायत्रीब्रह्मतत्वज्ञाः संपूज्यतेजनैर्हिजाः ॥३२॥ गायत्री रहित ब्राह्मण'शुद्रसे भी अधिक अशुद्ध होता है गायत्री और ब्रह्मतत्व के जानने हारे ब्रामण और लोगों से पूजे जाते हैं ।। ३२॥ दुःशीलोपिद्विजःपूज्योनतुशूद्रोजितेंद्रियः ॥ कापरित्यज्यगांदुष्टांदुहेच्छीलवतीखरीम् ॥३३॥ मारमण दुःशील भी पूजने योग्य है और शूद्र जितेन्द्रिय भी तो न पूजिए कौनऐसा है जो दुष्टा गौको छोड़ बड़ी सूधी गधी को | दुहेगा ॥३३॥ धर्मशास्त्ररथारूढा वेदखड्गधराद्विजाः ॥ क्रीडार्थमपियंबूयुःसधर्मःपरमःस्मृतः ॥ ३४ ॥ धर्मशास्त्ररूपी रथ पर चढ़े और वेदरूपी खड्। को धारण किए जो ब्रामण हैं वे क्रीडा के अर्थ भी जो कहैं वही परम धर्म होता है ॥ ३४ ॥ चातुर्वेद्योविकल्पीचअंगविधर्मपाठकः ॥ त्रयश्चाश्रामिणोमुख्या:पर्षदेषादशावरा ॥ ३५।। चातुर्वेद्य (चारों वेद जाननेहारा ) विकरपी (धर्म पर्षत्प्रायभिसों अथ पाराशरस्मृति- प्रमाण वाला) अंग (वेदांग ) जानने हारा, धर्मशास्त्री और तीनों मुख्यआश्रमी ( ब्रह्मचारी आदि) यह पर्षत् दसपा दस से अधिक की होती है ॥ ३५ ॥ राज्ञश्चानुमतेस्थित्वापायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥ स्वयमेवनकर्तव्यं कर्तव्यास्वल्पनिष्कृतिः ॥ ३६ ॥ राजा की समति से प्रायश्चित्त पतलाव आपही न पतलावे छोटा प्रायश्चित्त हो नो आप भी बतला देवे ॥ ३६ ॥ ब्राह्मणांस्तानतिक्रम्य राजाकर्तुयदिच्छति ॥ तत्पापंशतधाभूत्वा राजानमनुगच्छति ॥ ३७ । उन बामणों का उलंघन कक जो राजा कर्मे को इच्छा करे तो वह पाप सौगुणा होकर राजा को जा लगता है ।। ३७ ।। प्रायश्चित्तंसदादद्यादेवतायतनाग्रतः॥ आत्मकृछंततःकृत्वाजेपेद्वैवेदमातरम् ॥ ३८॥ देवता के मंदिर वा तीर्थ के सामने संदा प्रायश्चित्त देना अनन्तर पर्पद भी प्रायश्चित्त बतलाने के कारण अपने आपभी व्रत करे और गायत्री जपे ॥ ३८ ॥ सशिखंवपनंकृत्वात्रिसध्यमवगाहनम् ॥ गवांमध्येबसेद्रात्रौ दिवागाश्चाप्यनुबजेत् ॥ ३६॥ ( अब जो प्रायश्चित्त में कर्ना है सो यो है) कि शिखा सहित मूर मुडाकर त्रिकाल स्नान, रात को गौओं के बीच रहना, दिन को गौओं के पीछे २ चलना ॥ ३९ ॥ उष्णोवर्षतिशीतेवाः भारुतेवातिवाभृशम् ।। नकुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वातुशक्तितः॥४०॥ गर्मी, वर्षा, शीत अथवा आधी में भी यथा भी यथाशक्ति, गोभी गौनों की रक्षा किए बिना अपनी रक्षा न करे।
EPHAR भाषा टीका सहित। आत्मनोयदिवाऽन्येषांग्रहक्षेत्रेथवाखल ॥ भक्षयन्तींनकथये पिवंतंचैववत्सकम् ॥४१॥ अपने वा और किसी के घर खेत अथवा खलिहान में गौखाती हो तो तो न बतलावे और बछरा पीता हो तो भी न कहे ॥ ४१ ॥ पिवंतीषु पिबेत्तोयं संविशतिषुसीवशेत् ॥ पतितांपकलग्नांवासर्वप्राणैः समुद्धरेत् ॥४२॥ गाय जल पीने लगे तो श्राप जल पीवे जब वे सोवै वा वैठेतो आप भी सोवै पैठे, गौ कहीं गिरपड़ी हो वा पंक में फंसी हो तो अपना सारा बल लगाकर उसे उठावे ॥ १२ ॥ ब्राह्मणार्थे गवार्थेवायस्तुप्राणानपरित्यजेत् ।। मुच्यतेब्रह्महत्याया गोप्तागोब्राह्मणस्थच ।। ४३ ॥ ब्रामण वा गौके अर्थ जो अपने प्राणोंको त्यागे वह ब्रह्महत्या से छूट जाता है तथा जिसने गौ अथवा ब्राह्मण के बंध में रक्षा की हों वह भी ब्रह्महत्या से छूट जाता है ।। ४३ ॥ गोवधस्यानुरूपेणप्राजापत्यविनिर्दिशेत् ॥ प्राजापत्यंततःकच्छविजेतचतुर्विधमः ॥४४॥ गोषध के अनुरूप ( सदृश ) प्राजापत्य मन बतलाना इसी लिये प्राजापत्य और कृच्छ्रका चार प्रकारसे विभाग करना ॥ १४ ॥ एकाहमकभक्ताशी एकाहंनक्तभोज़नः ।। .: अयाचितात्वेकमहरेकाहंमारुताशनः॥१५॥ एक दिन एक भक्त ( एकवारभोजन ) करे, एक दिन रातको खाधे, एक दिन विनामांगे जो मिल जाए सो खावे, एक दिन न खावे॥४५॥ दिनद्वयंचेंकभक्तोहिदिननक्तभोजनः ॥ दिनदयमयाचीम्यादहिदिनम्मारुताशनः ॥ ४६ ।। --
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अथ पाराशरस्मृति-
दो दिन एक भक्त करें, दो दिन रात में खावे, दो दिन
विनमांगे और दो दिन कुछ न खावे ॥ ६ ॥
त्रिदिनंचैकभक्ताशीनिदिननश्तभोजनः ।।
दिनत्रयमयाचीस्यानिदिनमारुताशनः ॥४७॥
तीन दिन एकभक्त, तीन दिन रातकों, तीन दिन विनमांगे
और तीन दिन कुछ न खावे ।। ४७ !!
चतुरहंत्वकभक्ताशीचतुरहंक्तभोजनः ।।
चतुर्दिनमयाचीस्याच्चतुरहमारुताशनः ।। ४८ ॥
चार दिन नक्त, चार दिन अयाचित और चार दिन वायु
भक्षण करे ( यहीचार प्रकार हैं) ॥ ४८ ॥
प्रायश्चित्तेततस्तीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥
विप्राणांदक्षिणांदद्यात्पवित्राणिजपे द्विजः ॥ ४६॥
प्रायश्चित्त करचुके तो ब्राह्मण भोजन करावे. ब्राह्मणों को
दक्षिणादे और पवित्र मन्त्रों को जप द्विज अर्थात् ब्राह्मण आदि
तीनों वर्गों को करना चहिये । ४९ ॥
ब्राह्मणाम्भोजयित्वातुगोध्नःशुद्धेन्नसंशयः ।।
इति पाराशरस्मृति अष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥
ब्राह्मणों को भोजन करावे तो गौ की. हत्याकरने हारा शुद
होता है इस में सन्देह नहीं ॥
इति पाराशरस्मृति अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
गवांसंरक्षणार्थाय नदुष्येद्रोधबंधयोः ॥
तद्धंतुनतंविधात्कामाकामकृतंतथा ॥ १ ॥
गोऔ की रक्षा के निमित्त यदि उनका रोघ ( घर अथवा वाले
में रोकना) और बंधन करे और उत्तनेहीं से गौ मरजावे तो दोष
नहीं क्योंकि इसको गोयध नहीं कहते तथा कामाकामकृत भूख
चूक या भोखा चोखा जो हो उसे भी बंध न समझना ॥ १ ॥
भाषा टीका सहित।
।
दण्डाद्यदनान प्रहाराद्यदिपातयेत् ॥
प्रायश्चितंतदाप्रोक्तं द्विगुणंगोबधेचरेत् ॥ २ ॥
दण्ड (जो हाथ के अंगूठे इतना मोटा काष्ठ से अधिक प्रमाण
वाले लगुड़ (लाठी ) श्रादि से ताडन करके मार डाले तव अकाम
कृत में दूना प्रायश्चित्त गौवध में करे ॥ २ ॥
रोधबंधनयोत्क्राणि घातश्चेतिचतुर्विधम् ॥
एकपादंचरेद्रोधेद्वौपादौवंधनेचरेत् ॥ ३ ॥
रोकना बांधना, जोतना, और मारना इन चार प्रकारों से गोषध
होता है तो रोध में एक चौथाई ब्रत करे और वांधने में दो चौथाई
(आधा) करे . ३ ॥
योकोषुतुत्रिपादस्याच्चरेत्सर्वनिपातने ।
गोवाटेवागृहेवापि दुर्गेष्वथसमस्थले ॥ ४ ॥
जोतने में तीन चोथाई और मारने में साराही प्रायश्चित करे
गौ के वाडे गृह, दुर्ग, (किला अथवा वीहड जगह जैसे पर्वत आदि)
और समस्थल (समथर वा मैदान) || ४ ||
नदीष्वथसमुद्रेषुत्वन्येषुचनदीमुखे ॥
दग्धदेशेमृतागावःस्तंभनाद्रोधउच्यते ॥ ५॥
नदी, समुद्र अथवा और किसी स्थल में नदियों के मुहाने में
दग्ध देश (जहां आग लगी हो ) उस में यदि राकेनस गौ मरजादे
तो उसे रोष कहते हैं ॥ ५ ॥
योक्दामयदोरैश्चर्कठाभरणभूषणैः ।
गृहेचोपिवनेवापिवद्धः स्याद्गौमतोयदि ॥६॥
योत्क, (पाश, जोता, वा नाधा, वामक गाडी के जुओ का
नाधा ) दोर (रस्सी) कंठा भरण (कंठा वा गण्डा) और भूषण
आदि से बंधे हुए गो की मृत्यु चाहे घर अथवा पन में
हो जाये तो ॥६॥
भाषा का सहित।
तदेववंधनविद्यात्कामाकामकृतंचयत् ।।
हलेवाशकटेपंक्तौपृष्टेवापीडितोनरैः ॥ ७॥
इसीको बंधन समझना और जो कामो काम कृत कहते सो
यही है हल, गाडी और पंक्ति, (दोचार गौओं को एक साथ जोड
कर गलबांधने ) में अथवा पृष्ट (पीठ पर लादने ) में मनुष्य से
पीडित होकर ॥ ७ ॥
गोपतिमृत्युमाप्नोतियोत्क्रोभवतितबधः ॥
मत्तः प्रमत्तउन्मत्तश्चेत्तनोवाऽप्यचेतनः ॥८॥
बैल परजावे नो उसबंधको योक रहते हैं। मत्त, ( धनसे)
प्रमत्त, ( मदिरादिसे) और उन्मत्त, ( ग्रह भूतपिशाचादिसे) यदि
सावधानता अथवा असावधानता में ॥ ८ ॥
कामाकामाकृतक्रोधो दण्डैहन्यादथोपलैः ।।
प्रस्तावामृतावापितदिहेतुनिपातने ॥९॥
च्छा अथवा अनिच्छा से क्रोधकः दण्ड अथवा पत्थर
मारे और मरजावे तो इसी को निपातन कहते हैं ॥ ६ ॥
अंगुष्ठमात्रस्थूलस्तु वाहुमात्रंप्रमाणतः ॥
आर्द्रस्तुसपलाशश्च दण्डइत्यभिधीयते॥१०॥
अंगुष्ट के तुल्यमोटा और बाहुकी वरावर लवा और गीता जो
पत्ते समेत हो उसे दण्ड कहते हैं ॥ १० ॥
मूर्छित पतितोवापि दण्डेनाभिहतःसतु ॥
उत्थितस्तुयदागच्छेत्पंचसप्तदशाथवा ॥ ११ ॥
दंडके मारन से चूञ्छित हो अथवा गिरपड़े परन्तु पुनः उठकर
मादि पांच सात अथवा दस पांवचले.॥ ११ ॥
ग्रासंवायदिग्रहणीयात्तोयवापिपिवेद्यदि ॥
पूर्वव्याध्युपसृष्टश्चत्प्रायश्चित्तनविद्यते ॥ १२॥
21 - - अथ पाराशरस्मृति- अथवा घास आदिखाले वा पानी पी और पहिले से रोगी तो उसके मरने पर कुछ प्रायश्चित्त नहीं है ॥ १२ ॥ पिंडस्थेपाढमेकंतुहौपादौगर्भसंमिते ॥ पादोनंबतमुद्दिष्टं हत्यागर्भमचेतनम् ॥ १३ ॥ पिण्डस्थ, ( पंद्रहदिनों का गौकागर्भगिरावेतो एक चौथाई व्रतक रे, गर्भ संभित ( महीने भर ) के गिराने में दोचौथाई और अचेतन (सात महीने से पहिलेका) गर्भगिराने में तीन चौथाई तकरे॥१३॥ पादेंगरोमवपनं द्विपादेश्मश्रुणोपिच ।। त्रिपादेतुशिखावज संशिखंतुनिपातने ॥१४॥ एक चौथाई में शरीर के रोनमुडन करावें दोचौथाई में रोम और दाढीमूंछभी मुडावे तीन चौथाई में शिखाछोड खारे शरीरको मुण्डन करावे और निपातन में तो शिखासमेत गुण्डन करावे ॥ १४ ॥ पादेवस्त्रयुगंचैव द्विपादेकांस्यभाजनन् । त्रिपादेगोबृषदद्याच्चतुर्थेगांद्वयंस्मृतम् ॥ १५॥ चौथाई बत करे तो वस्त्रब्राह्मण को दक्षिणादे दोचौथाई-अर्थात् आधा ब्रत करे तो कासेका पात्रदे, तीन चौथाई नत जब करे तो बल देवै सारा व्रत करे तो दो गौ दक्षिणादे ॥ १५ ॥ निष्पन्नसर्वगोत्रस्तु दृश्यतेवासचेतनः ॥ अंगप्रत्यंगसंपूर्णो द्विगुणंगोबतंचरेत् ॥१६॥ जय गौके गर्भ में चेतन अर्थात् जीव पडा हो सारे अंग प्रत्यंग बन गये होवें उस समय जो उसका निपात करे तो दूनी गोहत्या व्रत करे ॥ १६॥ पाषाणेनैवदंडेन गावोयेनाभिघातिताः ॥ शृंगभंगेचरेत्पादं द्वौपादौ नेत्रघातने॥ १७॥ यदि कोई पत्थर वा दंडे से गौ को मारे और उस्की सीध दूर जाये वा आंख फूटे तो पहिले में चौथाई और दूसरे में आधा मत
७३
अथ पाराशरस्मृति-
करे ।। १७ ॥
लांगूलेपादकृच्छंतु चौपादावस्थिभंजने ॥
त्रिपादचैवकर्णेतु चरेत्सर्वनिपातने ॥१८॥
पुच्छ तोडे तो पादकृच्छ्र करे और हड्डी टूटे तो आधा कृच्छकरे
कान तोडे तो तीन चौथाई व्रत करे मरजाये तो सारा व्रत करे ॥१८॥
अंगभंगस्थिभंगे च कटिमंगेतथैवच ।।
यदिजीवतिषण्मासान्प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ १९॥
सींघ टूटे षा हड्डी टूटेअथवा कमर टूटजाये और उस्के अनन्तर
भी वह गौ छ महीने तक जीता रहै तो प्रायाश्चत नहीं होता है १६
ब्रणभगेचकर्त्तव्यः स्नेहाम्यंगस्तुपाणिना ।।
यवसश्योपहर्तव्यो यावत्दृढवलोभवेत् ॥ २०॥
यदि गोका फोड़ दे तो अपने हाथ से उसमें तेल वा घी लगाये
और जब तक वह गो दृढ और वली न हो नव ताई उसको हरी
घास ले आकर दिया करे ॥२०॥
यावत्संपूर्णसर्वांग स्तावत्तपोषयेन्नरः ।।
गोरूपंब्राह्मणस्याग्रे नमस्कृत्वाविसर्जयेत् ॥२१॥
जब तक उसका सारा अंग पूरा न हो तबतक उसका पोषण
वह नर करे अनन्तर उस गौ का किसी ब्राह्मणको नमस्कार करके
दे देवे ॥२१॥
सद्यः संपूर्णसर्वांगो हीनदेहीभवेत्तदा ।।
गोघातकस्यतस्याई प्रायश्चित्त विनिर्दिशेत् ॥ २२॥
जब उसके अंग सब अच्छे होगए हो तव गौका देह छूट जावे
तो उसमें धातक को आधा प्रायश्चितदेना। २२ ॥
काष्ठलोष्टकपाषाण शस्त्रेणैवोडतोबलात् ॥
व्यापादयतियोगांतु तस्यशुद्धिं विनिर्दिशेत् ॥२३॥
७३ भाषा टीका सहित। काष्ठ ईट पत्थर अथवा शास्त्रोंसे ही जो उद्धत मनुष्य वला स्कारसे गौका मारे तो उसकी शुद्धि यों करनी ॥ २ ॥ चरेत्सांतपनकाष्ठे प्राजापत्यंतुलोष्टके ॥ । तप्तकृच्छंतुपाषाणे शस्त्रेणैवातिकृच्छकम ॥२४॥ सांतपन ब्रत काठे से मारने में, ईट में प्राजापत्य, पत्थरमे तप्स कृच्छ, और शस्त्र से मारने में अति कृच्छू ब्रत करे ॥ २४ ॥ पंचसांतपनेगावः प्राजापत्येतथात्रयः॥ तप्तकृछेभवत्यष्टा वतिकृच्छ्त्रयोदश ॥२५॥ सान्तपन ब्रत के बदले पांच गौदान होते हैं, प्राजापत्यके तीनगौ, तप्तकृच्छ्र में आठगौं, और अति कृच्छ्र में तेरह नौ होती है ॥ २५ ॥ प्रमापणेप्राणभृतांदद्यात्तत्प्रतिरूपकम् ॥ तस्यानुरूपमूल्यंवादद्यादित्यब्रवीन्मनुः॥ २६ ॥ जिसकी गौ वा कोई पशु मारा हो तो उसके स्वामी को पैसाही पशुदेदेवे अथवा दो मनुष्य जो उसका मोल कह दे सो देवे ऐसा मनुने कहा है ।। २६ ।। अन्यत्रांकनलक्ष्याभ्यां वाहनेमोचनेतथा॥ सायंसंगोपनार्थच नदुष्येद्रोधर्वधयोः॥२७॥ वृषोत्सर्ग आदिमें जो शस्त्रले अंकन (चक्रत्रिशूलादि) होता हे तथा उसी अंकन के निमित्त जो गोयम से लक्ष्य (चिन्ह ) किया जाता.है. उस्में वाहन (गोनलादने) और मोचन { गोनउतारने मे. और संध्या समय में रक्षा केलिये जो रोध और बंध किया जाता हैं उससे गौ मरजावे तो दोष नहीं ॥ २७ ॥ अतिदाहेतिबाहे च नासिकाभेदनेतथा॥ नदीपर्वतसंचारे प्रायश्चित्तविनिर्दिशेत् । २८॥ पदि अत्यंत दाह (दागना ) अथवा वाहन (लादना) वो जरे.
७१ । अय पाराशरस्मृति- तना) किंवा नासिका मेदन (नाकवेदनाः गोकाकर और ऐसी नदी अथवा पर्वत में जहां मरने का भयहाँ चरा उस्में यदि गौनरजाये तोया.प्रायहिचतकरे ॥ २९ ॥ अति दाहेचरेत्पादंद्वौपादौवाहनेचरेत् ॥ नासिक्यपादहीनंतु चरेत्सर्वनिपातने ॥ २९ ॥ कि अति दाहमेंपाद, दो पाद अति वाइन में नाधने में नानपाइ और निपात में सारही प्रायश्चित्त करे ॥ २६ ॥ दहनात्तुविपथेत अनद्धा योक्त्रयंत्रितः॥ उक्तंपराशरेणैवोकंपादयथाविधि ॥ ३० ॥ यदि गौ घरमें आग लगने से मरजावे जुड़े में नधा हुमा मरे तो पराशरनेही एकपाद (चौथाई) व्रत यथाविधि करने कहा है ॥ ३०॥ रोधनबंधनचैव भारप्रंहरणंतथा ॥ दुर्गप्रेरणयोक्त्रं च निमित्तानिवधस्वषट् ॥३१॥ रोधन, बंधन, भार, प्रहार, दुर्ग अर्थात् विषमस्थल में लेजाना; और जुएमें जोतना ये ६ वधके निमित्त हैं।॥ ३१ ॥ बंधपाशसुगुप्तांगो म्रियतेयदिगोपशुः । भवनेतस्थपापीस्था प्रायश्चित्ताईमहति ॥ ३२॥ वंधन, और पाश (गलेका धन) से जकडा हुनाही यदि गौ वा बैल किसी के घरमें मरजावे तो वह भी पापी होता है-से भाषां प्रायश्चित्ल करना चाहिये ।। ३२ ॥ . ननारिकेलैनचशाणवाले नचापिमौजेर्नचवल्क श्रृंखले. एतैस्तुगावोननिबंधनीया मध्यातुतिष्ठेत्परशुंगृहीत्वा३३ नारियल, शण, चाल, मुंज, और वल्क (दरत की हाल ) रस्से से और लोहे का श्रृंखले (सिंकडी, वा सकिद) इनमें गौका नधावे यदि बांधतो परशु ( काटने का शस्त्र). कर वडारहे ॥३३॥ - ७५ भाषा टीका सहित । कुशै काशैश्चयनीयाद्गोण्शुंदक्षिणामुखम् ॥ पाशलमाग्निदग्धेषुप्रायश्चित्तंनवियते ॥३४॥ गौको कुश और काश की रस्सी से दक्षिण मुंह बांधे तो पाश लगे रहने और अग्नि में जलजाने से दोष नहीं ॥ २४ ॥ यदितत्रभवेत्काष्ठंप्रायश्चित्तकथंभवेत् ॥ जपित्वायावनीदेवीं मुच्यतेसर्वकिल्विषात् ॥ ३५॥ यदि कुश काश की रस्सिओं में काट भी लगाकर बांधा होतो यो प्रायश्चित्त होना है कि गायत्री वा पावमानी ऋचा को अष्टोत्तर सौ जप के उस पाप से छूटता है ॥ ३५ ॥ प्रेरयनुकूपवापीषुवृक्षच्छेदेषुपातयन् ॥ गवाशनेष्टविक्रीणं स्ततःप्राप्नोतिगोवधम् ॥३६॥ कूप, वापी, और जहांपर वडे २ वृक्ष काटे जाते हो ऐसे स्थलों में ले जावे अथवा गोमचक (म्लेच्छ । के हाम वेचे तो गौवध का प्रायश्चित्त करे ।। ३६ ॥ आराधितस्तुयः कश्चिद्भिन्नकक्षोयदाभवेत् ॥ श्रवणंहृदयभिन्न मनोवाकूप संकटे ॥ ३७॥ यदि किसी वैल को यत्नसे पुष्ट करके दौडाने आदि में उसका कक्षहीन वा छाती फट जावे अथवा कूप आदि संकट के स्थूल में गिर पडे ॥ ३७॥ कूपादुत्क्रमणेचैव भग्नोवानीवपादयोः । सएवम्रियतेता त्रीपादास्तुसमाचरेत ॥३८॥ कूप से निकलते समय भी यदि गर्दन वा पांव टूट जाये और उसी से वह वैल मरे तीन चौथाई प्राजापत्य व्रतकरे ॥ ३८ ॥ कूपखातेतटाबंधे नदीबंधेप्रपासुच ।। पानीयेषुविपन्नानांप्रायश्चित्तनविद्यते ।। ३६ ॥
कोई अथ पाराशरस्मृति- पुराने कूपके गर्त में तटावंध, (जिसे वांध कहते है। मैं मंदी बंध (सेतु वो पुल ) में प्रपा, ( पौंमले.) में और यदि पानी के गर्ने वीच डूब मरेतो प्रायश्चित्त नहीं होता है ।। ३९ ॥ कूपखातेतटाखाते दीर्घखातेतथैव च ॥ स्वल्पेषुधर्मखातेषु प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥४०॥ कूपखात तटाखात दीर्घ खाते. और छोटे २ जो धर्म लाते है इन्मगिरकर मरजाने से प्रायश्चित नहीं है ॥ ४०॥ वेश्मद्वारेनिवासेषुयोनरः खातमिच्छति ॥ स्वकार्यगृहखातेषु प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥ ४१ ॥ घरके वारपर गौंओंके निवासस्थल (रहने की जगह ) में जो कोई अपने कार्य के लिए गर्तकरे और गृहनिर्माग के लिये जो गर्तहो इन्में मरजावे तो प्रायश्चित्त होता है ।। ४१ ।। निशिबंधनिरुद्देषु सर्पव्याघ्रहतेषु च ॥ अग्निविद्यद्विपन्नेषु प्रायश्चित्तनबिद्यते ॥४२॥ रातमें बांधले वा निरोध करनेसे, सर्प अथवा व्याघ्र के द्वारा अग्नि लगने वा विद्युत (विजली गिरनेसे जोमरे ) उसमें प्रायश्चित्त नहीं ॥ १२ ॥ ग्रामघातशरोघेण वेश्मभंगान्निपातने ॥ अतिवष्टिहतानांच प्रायश्चित्तंनबिद्यते ॥४३॥ ग्रामको घेरकर शत्रुलोग मारते हो और उनके वाणसे गौं भी मरजांवे तथा घरगिरनेसे मरै अथवा बडी बृष्टिहोनेसे मेरै तो उसमे ब्रायश्चित्त नहीं ॥ ४३ ॥ संग्रामेप्रहतानांच येदग्धावेश्मकेषुच ॥ दावाग्नियामघातेषु प्रायश्चित्तनविद्यते ॥ १४ ॥ संग्राममें, घरके बीच जलकर; दावाग्निमें जंगल ने आग लगने और जव गांवका गांवघात होरहा हो इन स्थूलों में गौमरेतो भाषा टीका सहित। प्रायश्चित्त नहीं हैं।॥ १५ ॥ यत्रितागौश्चिकित्सार्थं गूढगर्भविमोचने॥ यत्नेकृतेविपधेत प्रायश्चित्तंन विद्यते ॥४५॥ श्रौषधकेलिये जो गौ वांधी गई है तथा पेट में जो गर्म कर गया उस्के निकालने में यदि गौ मरे तो दोष नहीं ॥ ४५ ॥ व्यापन्नानांबहुनांच रोधेनेवंधनेपिवा॥ भिषङमिथ्योपचारेण प्रायश्चित्तबिनिर्दिशेत् ॥१६॥ बांधने या राधन कर्ने में यदि पहुत सी गौ मर जावे और वैध के उलटे पुल? औषध देने से मेरे तो यहां पर प्रायश्चिच होता गोवृषाणांविपत्तीच गवतः प्रेक्षकाजनाः ॥ अनिवारयतांतेषां सर्वेषां गतकंभवेत् ॥४७॥ यदि गौ वा षैल कहीं कूप आदि में गिरकर वा किसी प्रकार मरजावे और उन्के पचाने में यत्न न करे चुप चाप जो लोग देखा करें उन सोंको प्रायश्चित होता है ।। ४७ ॥ एकोहोर्यबहुभिः समेतैनज्ञायतस्यहतोभिघातात् ॥ दिव्येनतेषामुपलभ्यता निवर्तनीयोनृपसन्नियुक्तः ४८ जहां कई मनुष्यों ने मिल कर एक को मारा हो और यह न बूझ पड़े कि किस्की चोट से गौ मरी तो दिव्य ( शपयादि) से उन्के बीच मारने 'हारे का निश्चय करके राजनियुक्त मनुष्य उसे अलग कर सब को दिखखा दे ॥ १८ ॥ एकाचेहहुभिः काचिदेवाद्यापादिताक्कचित् ॥ पादपादतुहत्यायाश्चरेयुस्तेपृथक् पृथक् ॥४९॥ यदि एक गौको कई मनुप्यों में मारा हो तो वे सब एक एक चौधाई प्रायश्चिचं करे ।। ४९ ॥
भाषा दीका सहित । हतेतुरुधिरेदृश्यव्याधि ग्रस्तः कृशोभवेत् ।। लालाभवतिदष्टेषु एवमन्वेषणंभवेत् ॥ ५० ॥ किस कारण से गौ की मृत्यु हुई इस्के जानने का उपाय याँ कि हघिर देख पड़े तो मारा हुआ जानना कृश ( दुवना होकर मरा हो तो व्याधि से मरा जाने लाला (मुंह से लार) बहती हो तो सांप के काटने से मरा जाने ॥ ५० ॥ ग्रासार्थचोदितावापि अध्वाननैवगच्छति ।। मनुना चैवमेकेन सर्वशास्त्राणिजानता॥५१॥ और खाने के लिए प्रेरणा कर्ने मी न चले तो भी उसे कष्टित जानना ऐसा मनुजी ने जो सर्व शास्त्रज्ञाता है इन्की मृत्यु का हेतु जानने का उपाय कहा है ।। ५१ ।। प्रायश्चित्तंतुतेनोक्तं गोप्नंचांद्रायणंचरेत् ॥ केशानांरक्षणार्थायद्विगुणवतमाचरेत् ॥५२॥ उन्हों ने प्रायश्चित्त भी. यों कहा है कि गोधन से चांद्रायण करा और यदि केशों का मुंडन न करावेतो.दना व्रत करे, ॥ ५२ ।। द्विगुणवतआदिष्ठेदक्षिणाद् द्विगुणाभवेत् ।। राजावाराजपुत्रोवाब्राह्मणोवाबहुश्रुतः ॥५३ ।। दूने व्रत में दक्षिणा भी दूनी होती है राजा, राजाका भवमा बहुश्रुत ब्राह्मण ॥ ५३ ॥ अकृत्वावपनतेषांप्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ।। यस्यनद्विगुणदान केशांश्चपरिरक्षतः।। ५४ ॥ कोई भी यदि हत्यारों को केशमुंडन कराये विना दूना श्चियन करावे ॥.५१ ॥ तत्पापंतस्यतिष्ठतमृत्वाच रकंबजेत् ॥ यत्किंचितक्रियतेपासर्वकेशेषुतिष्ठति ।। ५५ ।।
अथ पाराशरस्मृति- ७८ तो वह पाप उस्का रहता है और देह त्याग करें पर नरक में पड़ता है जो कुछ पाप करे सो सब केशों में रहता है ॥ ५५ ॥ सर्वान्केशान्समुद्धत्य छेदयेंदगुलिद्वयम॥ एवंनारीकुमारीणां शिरसामुडनस्मृतम् ॥५६॥ स्त्री और कुमारी का मुंडन यों होता है कि सारा केश पकड़ के अपर २ का दो दो अंगुल बाल काट लेवे ॥५६॥ नस्त्रियाः केशवपनं नरेशयना सनम् ॥ नचगोष्ठवसेद्रात्रौ नदिवागाअनुब्रजेत् ॥ ५७ ॥ स्त्रियों को सारे केशका मुंडन, दूर होकर सोना, बैठना, गौ- शाला में रात का रहमा, और दिनमें गौओं के पीछे पीछे जाना ये काम नहीं कर्ने होते हैं ॥ ५९ ॥ नदीषुसंगमे चैव अरण्येषुविशेषतः॥ नस्त्रीणामजिनवासोबतनेवसमाचरेत ॥५॥ विशेष कके नदी नदियों के संगम और जंगल में नियों को न पास देना लथा मृगचर्म भी उन्हें न पहिनाना ऐसी भांति उनसे व्रत कराना चाहिए ।। ५८॥ त्रिसंध्यंस्नानमित्युक्तं सुराणामनंतथा ॥ बंधुमध्येब्रतंतासां कृच्छ्रचांद्रायणादिकम् ॥५६॥ त्रिकाल स्नान देवताओं का पूजन और अपने वधुओं के मध्य रहना इस भांति त्रिों का कृच्छ्र चान्द्रायणादि व्रत होता है ॥ ५९॥ गृहेषुसततंतिष्ठेच्छचिनियममाचरेत् ।। इहयोगावधं कृत्वाप्रच्छादयितुमिच्छति ॥६॥ घर में ही सदा पवित्र रह कर स्त्रियां नियम करें जो कोई. गोहत्या करके इस संसार में छिपाना चाहना है सो ॥१०॥ सयातिनरकंघोरं कालसूत्रमतशयम् ॥
५०
अथ पाराशरस्मृति-
विमुक्तोनरकात्रस्मान्मर्त्यलोकेप्रजायते॥६१॥
घोर नरक कालसूत्र नामी में निस्सन्देह जा पड़ता है. उस नरक
से छूट कर जब पुनः मर्त्यलोक में आता है तो ॥ ६१ ॥
क्लीवोदुःखीचकुष्टी च सप्तजन्मनिवैनरः ।।
तस्मात्प्रकाशयेत्पापस्वधर्मसततं चरेत् । ६२॥
क्लीन (नपुंसक ) दुःखी और कुष्टी सात जन्म तक होता है
इस हेतु पाप को प्रकट करके सदा अपने धर्म को करे ॥ ६२॥
स्त्रीवालभृत्यगोविप्रे ष्वतिकोपविवर्जयेत् ॥
इतिपाराशरीये धर्म शास्त्रे गोरक्षणार्थ गोविपति
प्रायश्चित्तंनामनवमोऽध्यायः ॥ है।
स्त्री, वालक, भृत्य (नौकर ) गौ और ब्राह्मण इनके ऊपर अति
कोष न करे।
इति श्री ००००० नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
चातुर्वर्येषुसर्वेष हितांवक्ष्यामिनिष्कृतिम् ॥
अगम्यागमनेचैव शुद्धौचांद्रायणचरेत् ॥ १॥
चारों वर्ण के लोगों के लिए बड़ी हितकारी शुद्धि अवकडूंना
(अपनीनी के बिना ) अन्य स्त्री में जाये तो चान्द्रायण व्रत करने से
शुद्ध होता है ॥१॥
एकैकंहासयेद्यासं कृष्णेशुक्लेचबईयेत् ॥
अमावास्यांनभुजीत ह्येषचाद्रायणेविधिः ॥ २॥
कृष्णपक्ष में एक २ ग्रास घटाते जाना, और शुक्ल पक्षमें एक
एक बहाते जाना और अमावास्या को कुछ भी भोजन न करे यही
बान्द्रायणी विधि है ॥ ६॥
कुक्कुटीडप्रमाणत ग्रासवैपरिकल्पयेत् ॥
अन्यथा जातदोषणनधर्मोनचशुध्यते ॥३॥
--
भाषा का सहित ।
१
प्रायश्चित्तततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ।।
गोद्वयंवस्त्रयुग्मंच दद्याद्विप्रेषुदक्षिणाम् ॥४॥
कुक्कट (मुर्गी के अंडे की बरावर ग्रास बनाना यदि घट
वह करे तो दोष होने से धर्म और शुद्धि दोनों नहीं होती है ॥३॥
चांडालीवाश्वपाकीवा अनुगच्छतियोहिजः ॥
त्रिरात्रमुपवासित्वा विप्राणामनुशाशनात ॥५॥
मातश्चित्त करचके नो ब्राह्मण भोजन करावे और दोगी तथा
दोवस्त्र प्रात्मणों को दक्षिणा देवे ॥ ४ ॥
सशिखंवपनंकृत्वा प्राजापत्यद्वयंचरेत् ॥
ब्रह्मकूर्चततः कृत्वा कुर्याद् ब्राह्मणतर्पणम् ॥६॥
जोदिज चाण्डाली अथवा श्वपाकी में गमन करता है वह तीन
दिनरात उपवासकर्के ब्राह्मणों की आज्ञा से ॥५॥
गायत्रींचजपन्नित्यं दद्याद्गोमिथुनद्वयम् ।।
विप्रायदक्षिणांदद्या च्छुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥ ७॥
शिलासमेते मुण्डन कराकर दोप्राजापत्य करे अनन्तर ब्रमकूर्ष
प्रतककै बामण भोजन करावे ॥ ६ ॥
गोयंदाक्षिणांदद्या च्छदिपाराशरोब्रवीत् ॥
तत्रियोबाथ वैश्योवा चांडालींगच्छतोपिवा ॥ ८॥
गायत्री का नित्यंही जपकरे और दोबैल तथा दोगौ ब्रामण
कोदे तथा दक्षिणाभी देतो निश्चय कके शुद्ध होता है ॥॥॥
दक्षिणा दो मौदे ऐसी शुद्धि पराशर ने कही है यदि क्षत्रिय,
अथवा वैश्य चाण्डाली में गमन करेतो ॥ ८ ॥
प्राजापत्यद्वयंकुर्यात् दद्याद्गोमिथुनद्वयम् ।।
श्वपाकीवाथचांडाली शूद्रोवायदि गच्छति ॥९॥
तो मोह से इनमें गमन कके तीन कृच्छ्र व्रत करे और तीन
अथ पाराशरस्मृति-
दो प्राजापत्य कके दोगौ दो पैल दान दे । यदि कोई शूद्र
अथवा चाण्डाली में जावे ||
प्राजापत्यंचरेत्कृच् चतुर्गोमिथुनंददेत् ॥
मातरंयदिगच्छेत्तु भगिनीस्वसुतांतथा ॥ १० ॥
तो प्राजापत्य कृच्छ कर्के चार गौ चार येल दान दे.यदि
माता, बहन, और निज पुत्री में गमन करे ।। १० ॥
एतास्तुमोहितो गत्वाकृच्छाणित्रीणिसंचरेत् ।।
चांद्रायणत्रयंकुच्छिश्नच्छे देनशुद्ध्यति ॥११॥
चांद्रायण भी करेतदन्तर लिंग कारडाले तप शुद्ध होता है ।। ११
मातृष्वसृगमेचैवात्ममदानकृतनम् ।।
अज्ञानेनतुयोगच्छेत्कुंर्याच्चांद्रायणत्रयम् ।। १२॥
मासी में भी गमन करतो अपना लिंग काटडाले जो कोई इनमें
भज्ञान स गमन करे वह तीन चान्द्रायण करे ॥ १२ ॥
दशगोमिथुनं दद्या च्छुदिपाराशरोब्रवीत् ।
पितृदारान्समारुम मातुराप्तांचभ्रातृजाम् ॥ १३॥
इस गौ और दस चल दान दें तो पराशर ने शुद्धि कही है, पिता
की बियों में (अर्थात् अपनी माता को सौतिनो में गमन करे
अथवा माता की सखी में वा भाई की कन्या में ॥ १३ ॥
गुरुपत्नीस्नुषा चव भ्रातृभातिथैवच ॥
मातुलानीसगोत्रांच प्राजापत्यत्रयंचरेत् ।। १४ ॥
गुरु की पत्नी में, पुत्रको वधू में, भाई की स्त्री में, मामी, सार
समात्रा स्त्रो में, गपन करें तो तीन प्राजापत्य व्रत करे ॥ १४ ॥
गोयंदक्षिणांदत्वा मुच्यतेनात्रसंशयः॥
श्यादिगमने महिण्युष्ट्रीकपीस्तथा ॥ १५ ॥
'भाश टाका सहित। और दो गौ दक्षिणादतो शुद्ध होता है पशु, वेश्या मैस कंटिन मानरी,॥१५॥ खरींचसूकरीं गत्वा प्राजापत्यसमाचरेत् ॥ गोगामीचत्रिरात्रेण गामेकांब्राह्मणेददेत् ॥१६॥ गधी और शूकरी में गमन करे तो प्राजापत्य व्रत करे गौ में गमन करे तो तीन दिन रात उपवास कके एकगी बाह्मणकोदे ॥१६॥ महिष्युष्ट्रीखरीगामी त्वहोरात्रेणशुद्धयति ॥ अमरेसमरेवापि दुर्भिक्षे वाजनक्षये ॥ १७॥ भैस, ऊंटिन और गधी में यदि एक ही वार गमन करे तो एक दिन रात उपवास कने से शुद्ध होता है राका, युद, दुर्मिक्ष, (काल) महामारी ॥ १७ ॥ बंदिग्राहभयार्ती वा सदास्वस्त्रीनिरीतयेत् ॥ चाण्डालैः सहसंपक्वयानारीकुरुतेततः ॥१८॥ पल से ासी करण, राजा और चोर के भय से सदा अपनी स्त्री की रक्षा की जो स्त्री चाण्डाल का संग की है तो॥१८॥ विप्रान्दशवरान्कृत्वा स्वयंदोषप्रकाशयेत् ॥ आकंठसंमितेकूपे गोमयोदककर्दमे ॥ १६ ॥ वह बडे उत्कृष्ट दश ब्राह्मणों के सामने अपने दोष को को और गले पर्यंत किसी कूप वा गर्त में जन और गोवर की कीपर बनाकर॥ १९॥ तत्रास्थित्वानि राहारावहोरात्रेणनिष्क्रमेत् ॥ सशिखंवपनकृत्वामुंजीया द्यावकोदनम् ॥ २० ॥ उसमें दिन रात विन भोजन किएही खडी रहे अनन्तर निकल कर दूसरे दिन शिखा समेत मुण्डनकराव और यपका भात खावर. त्रिरात्रमुपवासित्वात्वेकरात्रंजलवसेत् ॥
. अथ पाराशरस्मृति- शंखपुष्पीलतामुलं पत्रंबाकुसुमंफलम ॥ २० ॥ तदनन्तर तीनदिन उपवास कर्के एक दिन रात जल में संडी रहे सातवें दिन शख पुप्पी लता का फल, फूल, जड़ वा पत्ते में से कोई एक ॥ २१ ॥ सुवर्णपंचगव्यंचक्काथयित्वापिवेज्जलम् ॥ एकभक्तंचरेत्पश्चा द्यावत्युष्पवतीभवेत् ॥ २२ ॥ और सोना तथा पंचगव्य इन सघों को इकट्टा जल में और उस जल को पीछे पीवे जव तक रजस्वला न हो एक अक्तत करती रहै ॥ २२ ॥ ब्रतंचरतितद्यावत्तावत्संवसतेवहिः । प्रायश्चित्तेततश्चीणे कुर्यादब्राह्मणभोजनम् ॥२३॥ जब ताई व्रत करे तव तक बाहर निवास करे प्रायश्चिच करके ग्राहण भोजन करावे । २३ ॥ . गोहयंदक्षिणांदद्याच्छुद्धिंपाराशरोब्रवीत् ।। चातुर्वर्ण्यस्यनारीणां कृच्छुचांद्रायणंचरेत् ॥ २४ दो गौ दक्षिणादे तो शुद्ध होती है ऐसा पराशर ने कहा है यदि इच्छा पूर्वक चारो वर्ण को स्त्रिशं चाण्डाल का संग करें तो कच्छ और एक चान्द्रायण व्रत करें.॥ २४ ॥ यथाभूमिस्तथानारी तस्मात्तांनतुदूषयेत् ॥ बंदिग्राहेणयाभुक्ता हत्वाबदाबलाद्भयात् ॥२५॥ जैसी पृथ्वी तैसी ही स्त्री होती है इस से उसको दूषण न जो स्त्री वलात्कार से बांध मार करके दासी बनाई जाक भोगी गई हो ॥ २५ ॥ कृत्वासांतपतंकृच्छ्र शुद्ध्येत्याराशरोब्रवीत् ॥ सकृतभुक्तातुयानारी नैच्छंतीपापकर्मभिः॥२६॥ .'
भाषा टीका सहित। तो वह सान्तपन कृच्छ करके शुद्ध होती है ऐसा पराशर ने कहा जिस विन चाहती स्त्री को पाप कर्मियों ने एक ही वार भोग किया हो ॥२६॥ प्राजापत्येनशुद्ध्येतऋतुप्रस्रवणेन च ॥ पतत्यईशरीरस्य यस्यभार्यासुरांपिवेत् ॥ २७॥ वह प्राजापत्य व्रत और ऋतुकाल में रज के वहने से शुद्ध होती जिसका भार्या सुरा पी ले तो उसकी आधा शरीर पतित होती है ॥ २७ ॥ पतिताईशरीरस्य निष्कृतिनविधीयते ॥ गायत्रींजपमानस्तु कृच्छ्रेसांतपनंचरत् ॥२८॥ जिसका आधा शरीर पतित हुआ उसकी शुद्धि नहीं वह गायत्री जपता हुआ कृच्छू सान्तपन ब्रत को करे ॥ २८ ॥ गोमूत्रंगोमयंतीर दधिसतिः कुशोदकम् ॥ एकरात्रोपवासश्च कृच्छंसांतपनस्मृतम्॥२९॥ एक दिन गोमूत्र पीकर रहे दूसरे दिन गोवर, तीसरे दिन गौ का दूध, चौथे दिन गौका दही, पांचवें दिन घी, छठे दिन कुशा का जल पीकर रहै और सातवे दिन उपवास ब्रत करे यही कृष्ट्र सांत पन व्रत कहा है ॥ २९ ॥ जारेणजनयेद्गर्भ मृतेत्यक्तेगतेपतौ ॥ तांत्यजदपरेराष्ट्र पतितांपापकारिणीम् ॥३०॥ जो स्त्री अपने पाने के मरने, त्यागने, और विदेश जाने पर जार से गर्भवती हो तो उस पापिनी को दूसरे राज्य में पोर आना ॥ ३०॥ ब्राह्यणातुयदागच्छेत्परपुन्सासमान्विता। सातुनष्टाविनिर्दिष्टानतस्यागमनंपुनः॥३७॥ जो बाह्मणी किसी दूसरे पुरुष के साथ जाये तो वह नया प्रय पाराशरस्मृात- कहाती है उसको पुनः आगमन नहीं होता ॥ ३९ ॥ कामान्मोहाच्चयोगच्छेत्त्यक्त्वावंधून्सुतारपतिम् ॥ साऽपिनष्टापरलोकमानुषेषुविशेषतः ॥३२॥ जो अपने बथु, मुन, और पति को छोड़ कर काम अथवा मोह से चली जावे वह भी परलोक में नष्ठा होती है और इस लोक में तो अधिक नष्टा होती है ॥ ३२ ॥ मदमोहगतानारी क्रोधादंडादिताडिता ॥ अद्वितीयगताचैव पुनरागमनं भवेत् ।। ३३॥ कोई स्त्री मद मोह से चली जाये और क्रोध में आकर दरं आदि से ताडित होकर यदि अकेली नावे तो उसका पुनः मागमन होता है ।। ३३ ॥ दशमेतुदिनेप्राप्तेप्रायश्चित्तनविद्यते ।। दशाहनत्यजेन्नारी जजन्नष्टस्तुतांतथा ॥ ३४॥ यदि दस दिन चाहर हो बीत जावें तो प्रायश्चित नहीं हो सक्ता इस लिए दस दिन तक स्त्री को त्याग कर न रखना दस दिन त्यात हो रहै तो स्वयं नष्ट होकर ॥ ३४ ॥ भर्ती चैवचरेत्कृच्छू कृच्छ्राई चैववांधवाः ।। तेषांभुक्ताचपीत्वाच अहोरात्रेणगुड्यति ॥३५॥ भता भी एक कृच्छ्र व्रत करे और मवधि आधा कृच्छ्र.. प्रत करें उनके घर भोजन करने और पानी पीने से दिन रात उपवास करे तो शुद्ध होता है ।। ३५ ॥ ब्राह्मणीतुयदागच्छे परपुंसाविवर्जिता । गत्वापुंसांशतयाति त्येजयुस्तांतुगोत्रिणः॥३६॥ ब्राह्ममणी यदि अकेली. चलोनाचे और सौ पुरुषों जाकर पावतों उसे गोत्री खोग छोड्दवै ।। ३६ ॥ पुसोयदिएहंगच्छत्तदाशवंगहभवेत् ।। पास
६७.
भाषा दीका सहित।
पितृमातृगृहंयच्च जारस्यैवतुतद्ग्रहम्॥३७॥
यदि वह अपने पुरुष के घर जावे तो बह घर अशुद्ध हो जाता
माता पिता के घर जावतो वह जारकाही घर होता है ॥ ३७ ॥
उल्लख्यतद्गृहपश्ची संचगव्येनशोधयेत.॥
त्यजेच्चमृण्मयंपात्र वस्त्रकाष्ठंचशोधयेत् ॥ ३८॥
उसघर को भूमि और मिट्टी को कुछ २ छीलकर पीछे. पंचगव्य
में लीपदेव । मिट्टी के वर्तनों को फेंकदेवे और वस्त्र तथा काष्ट को
धो डाले । ३८॥
संभारांश्लोवयेत्सर्वान् गोबालश्चफलोद्भवान् ॥
ताम्राणिपंचगव्येन कांस्यानिदशभस्माभिः ॥३६॥
और भी जो घरकी वस्तु हैं उनी शुद्ध करडाले अर्थात् . फल
वनेहुए को गोवालों से तान को पंचबव्य से और कामे के बर्तनों
। दसवार भस्म लगाने से शुद्धकरे ।। ३६ ॥
५ प्रायश्चित्तंचरेद्विप्रो ब्राह्मणैरुपपादितम् ।।
गोयंदक्षिणांदद्यात्प्राजापत्यद्वयं वरेत् ॥४॥
यदि ब्राह्मणहो तो दूसरे ब्राह्मणों का कहाहुआ प्रायश्चित्म करे
दो गौ दक्षिणादेये और दो प्राजापत्यकरे ॥ ४० ॥ .
इतेषामहोरात्र पंचगव्यनशोधनम् ॥
उपवासैर्ऋतैः पुण्यः स्नानसंथ्यार्चनादिभि ॥४१॥
और वर्ण हो तो एक दिन रात उपवास कर्के पंचगव्य से शुद्ध
होते है । उपवास, व्रत, पुण्य, स्नान, संध्या, और पूजन आदि. ४१
जपहोमदयादानैः शुद्येतब्राह्मणादयः ॥
आकाशंवायुरग्निश्च मध्येभूमिगतंजलम् ॥१२॥
जप, होम, दया और दान इतनी बातोंसे ब्रामण आदि वर्ण
शुद्ध होते है,। आकाश, वायु, अग्नि, और पृथ्वी पर पड़ा हुआ शुद्ध
जल ये सप ॥ १२ ॥
अथ पाराशरस्मृति-
नदुष्यंनिचदर्भाश्च यज्ञेषुचमसायथा ॥
इति पाराशरीये धर्म शास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
और कुशा जैसे यज्ञो में चमले पात्र को दोष नहीं लगता इसी
भांति सदा शुद्धही रहते हैं ।
इति श्रीपाराशरीय धर्म शास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥१०॥
अमेध्यरेतोगोमांसंचांडालनमथापिवा-।।
यदिभुक्तंतुविप्रेणकृच्छंचांद्रायणंचरेत् ॥ १ ॥
यदि कोई ब्राह्मण अमेध्य ( मनुष्य को हड्डी, शव, विष्टा, मूत्र..
मातुरज, वसा, प्रस्वेद, नेत्रमल, इलेष्मा ) और वाय तथा गोमांस
अपवा चाण्डाल का अन्न इनमें से एक भी वस्तु अपनी इच्छा पूर्वक
खाले तो चांद्रायण करे अनिच्छा से खावे तो कृच्छ. ब्रत करे ।। १.॥.
तथैवक्षत्रियोवैश्योप्यर्द्धचांद्रायणंचरेत्।।
शुद्रोऽप्येवयदाभुंक्ते प्राजापत्यसमाचरेत् ॥२॥
और दत्रिय वा वैश्य खा लेवे तो श्राधा चांद्रायण करें शूद्र
भी खाबे तो प्राजापत्य व्रत करे ॥२॥
पंचगव्यंपिवेच्छूद्रो ब्रह्मकूर्चपिवेविजः ।
एकद्वित्रिचतुर्गावोद द्याहिप्राद्यनुक्रमात् ॥ ३ ॥
प्रत करने पर शुद्र तो पंचगव्य पीवे और तिनि वर्ण ब्रह्मकूर्च
पीवें तथा क्रम से एक दो तीन और चार गौ चारों वणों को दक्षिणा
शुद्रान्नंसूतकान्नञ्चअभोज्यस्यान्नमेवच ।।
शंकितप्रतिषिद्धान्नपूर्माच्छिष्टतथैवच ॥४॥
भी देनी पड़ती है ॥ ३ ॥
शूद्रका अन्न, सूतक का अन्न, चन्द्र सूर्य ग्रहण में दिया अन्न
अभाज्य भनुप्है का अन्न, शंकित (अर्थात भोज्य है वा-अभोज्य है
इस शंकाका आस्पद) अन्न प्रतिषिद्ध अन्न ( देवनिर्माल्य आदि)
और उच्छिष्ट (जूठा) अन्त ॥ ४ ॥
भषा टीका सहीत
यदिभुक्तंतुविप्रेण अज्ञानादापदापिवा ॥
ज्ञात्वासमाचरेत्कृच्छ ब्रह्मकूचतुपावनम् ॥ ५॥
यदि ब्राह्मण भोजन करते चाहे अज्ञानसे अथवा विपत्ति में
तो पीछे जानकर कृच्छ्बत कर और कूर्च पीवे तो शुद्धहोता है ॥ ५॥
बालैनकुलमाजोरै रन्नमुच्छिष्टितं यदा ॥
तिलदर्भोदकैःपोक्ष्य शुद्धतेनात्रसंशयः ॥ ६ ॥
चालक (जो पांच वर्ष से अधिक न हो ) नेवरा. विल्सी इन
सयोंने यदि अन्नको जूठा किया हो तो तिल और कुंशाके जलसे
उसको प्रोक्षण करे तो निस्सन्देह शुद्ध होता है।॥ ६ ॥
शुद्रोप्यभोज्यंभुक्त्वान्नंपंचगव्येनशुद्धयति ॥
क्षत्रियोवापिवैश्यश्च पाजापत्येनशुद्धयति ॥७॥
शुद्र ने भी अभोज्य अन्नका भोजन किया हो तो पंचगव्य
पीने से शुद्ध होता है और क्षत्रिय वा वैश्य ने खा लिया हो तो
प्राजापत्य करने से शुद्ध होते हैं ॥ ७ ॥
एकपंक्त्युपविष्टानांविप्राणांसहभोजने ॥
योकोपित्यजेत्पात्रंशेषमन्ननभोजयेत् ॥८॥
एक पंक्ति में बैठे हुए बामणों में से यदि एक भी भोजन करना
छोड़ दे तो औरों को भी भोजन छोड देना चाहिए (अर्थात् शेष
अन्न उच्छिष्ट हो जाता है ) ॥ ८ ॥
मोहादुर्भूजीतयस्तत्र पंक्ताबुच्छिष्ट भोजने ॥
प्रायश्चित्तंचरेडिपः कृच्छ्रेसातपनंतथा ॥९॥
यदि कोई बामण मोहसे उक्त पंक्ति में उच्छिष्ट अन्न को
भोजन करे तो कृच्छ्र सान्तपन व्रत कर यही प्रायश्चित है ॥६॥
पीयूषश्वेतलशुनं वृताकफल गूजनम् ॥
पलाण्डुंबृत्तनिर्यासान्देवस्वकवकानिच ॥ १० ॥
ऊंटनी को दूध, और भेडाका दूध:जा अज्ञान से प्रामण अथ पाराशरस्मृति- पीयूष (नवीन जल) श्वेतलशुन, श्वेतवृताक, ( भंटा, बैगन पा पताऊ ) गंजन, पलाण्ड, (प्याज वा गठे') वृक्षों की नियोस ( गोंदः) देवस्व देयता को चली हुई वस्तु और कलक कुकुरमुरों.)॥१०॥ उष्ट्रीक्षारमवीतीर मज्ञानाझुंजतेद्विजः।। त्रिरात्रमुपवासेन पंचगव्येनशुद्धयति ॥ ११ ॥ " " खाले तो तीन दिन उपवास करके पंचगव्य पीवे तब शुद्ध होता मण्डूकंभक्षयित्वातु मूषिकामांसमेवच.॥ ज्ञात्वाविपूस्त्वहोरात्रंयावकान्नेनशुद्ध्यति ॥ १२ ॥ मण्डूक (डडूचा मेघा) और भूषिक (चूहे का मांस मामण जान कर , खा लेतो दिन रात यावक (यतका भात) साने शुद्ध होता है ॥ १२॥ क्षत्रियश्चाप्रिवेश्यश्च क्रियावंतौशुचिबतौ ॥ तद्गृहेतुहिजै भोज्यंहव्यकव्येषुनित्यशः ॥ १३ ॥ जो क्षत्रिय और वैश्य पवित्र रहते और धर्म किया करते उनके घर में ब्राह्मण को देवः पितृ कार्यों में सदा मोजन करना चाहिये ॥ १३ ॥ घृतंदीरंतथातैलं गुडस्नेहेनपाचितमः॥ गत्वानदीतटेत्रिशे भुंजीयाच्छद्रभोजनम् ॥ १४ ॥ शद्र के घरका घी सेल दूध गुड और घी से पका हुआ पदार्य जो हो इतनी ही वस्तुओं का भोजन केवल ब्राह्मणको करना चाहिये सो भी नदी के तट पर जाकर खाला शुद्र के घर में न खाना ॥१४॥ मद्यमांसरतनित्यंनीचकर्मप्रवर्तकम् तशूद्रवजयेद्विप्राश्वपकमिवदूरतः ॥ १५ ॥ जो शद्र मय और मांस में नित्यही रतहो अर्थ . - भाषा यका सहित। और नीच कर्म अर्थात् ( चमडा काटना इत्यादि) को 'कराती हो उस शुद्रको ब्राह्मण दूर से हीवापाक का नाई चरादे॥ १५ ॥ द्विजशुश्रूषणरतान्मद्यमांसविवजितानः ॥ स्वकर्मनिरतान्नित्यंतांश्छद्रान्नत्यजेद्विजः ।। १६॥ जो शूद्र द्विजों की शुश्रुषा: में रतहो. मथ"मांस को फोडे हुए हों नित्य ही अपने कर्म में रस रहे :उन"शद्रों' को द्विज कभी न त्यांगे ॥१६.!! . अज्ञानादुर्भुजतेविप्राः सुतकेमृतकेपिवा ॥ प्रायश्चित्तं कथंतेषांवर्णेवर्णेविनिर्दिशेत् ॥ १७ ॥ यदि ब्राह्मण लोग बिना जाने सूतक अथवा मृतक में भोजन करखें तो उनका हर एक वर्गों के गह में खाने से पथक :प्रायश्चित यों कहना चाहिये कि॥१७॥ गायश्यऽष्टसहस्रेणशुद्धिः स्याच्द्रसतके ॥ वैश्येपंचसहस्रणत्रिसहसेणक्षत्रिय ॥ १८॥ चन्द्र के घर सूतक में भोजन करें तो आठ 'सहस्र' गायत्री जपने से शनि होती है, वैश्य के सूतक में पांच सहसू और क्षत्रिय के घर तीन सहसू से शुद्धि होता हैं ॥ १८ ॥ ब्राह्मणस्ययदाभुक्ते डेसहसेतुदापयेत् ॥ अथवा वामदेव्येन साम्नाचैकेनशुद्धयति ॥ १९॥ भारै ब्रामणके घर सूतक में भोजन किएहों तो दो सहन गायत्री जपे अथवा वामदेव्य सामका एक ही पाठ करे तो भी शुद्ध होता है ॥ १९॥ शुष्कानंगोरसस्नेह शूद्भवेश्मनाहृतम् ॥ पक्वविप्रगृहेभुक्तंभोज्यंतन्मनुरब्रवीत् ॥ २० ॥ सूखाअन्न, गोरस और स्नेह (अथात् घी तेल ) शुद्र के घर से लाकर बामण के घर में प्रकाया हो तो मनुजी ने उसे भोजन. करनेके योग्य कहां है ॥ २० ॥ 1.
अथ पाराशरस्मृति-
आपत्कालतुविप्रेणभुक्तशुद्धगृहेयदि ।।
मनस्तापेनशुयतेद्रुपदांवासकृजपेत् ॥ २१ ॥
यदि आपत्काल में ब्राह्मण ने शूद्र के घर भोजन किया हो तो
मनमें सन्ताप करने से शुद्ध होता है अथवा एकवार (द्रुपदा) मंत्र
का जप करदे ॥२१॥
दासनापितगोपालकुलमित्राईसीरिणः ॥
एतेशूद्रेषुभोज्यान्ना यश्चात्माननिवेदयेत् ॥ २२ ॥
दास, नापित, गोपाल, अपने कुलका मित्र, और अर्द्धसीरी
इतने शूद्रों का अन्न भोजन करना चाहिए तथा जिस शूद्र ने आप
को समर्पण कर दिया हो उसका भी अन्न भोज्य है ॥ २२ ॥
शुद्रकन्यासमुत्पन्नो ब्राह्मणेनतुसंस्कृतः ॥
असंस्काराद्धवेदासः संस्कारादेवनापितः ।। २३ ॥
जो शुद की कन्या में ब्राह्मण से उत्पन्न हुा उम्मका यदि
संस्कार करदे तो नापित हो जाता है और संस्कार न हुआ
वही दास कहलाता है. ॥ २३ ॥
क्षत्रियाच्द्रकन्यायांसमुत्पन्नास्तुयःसुतः ।।
सगोपालइतिख्तोभोज्येचिनसंशयः ॥ २४ ॥
जो पुत्र शुद्र की कन्या में क्षयित्र से उत्पन्न हो उसे नो पालक
करते हैं उसका अन्न निस्संदेह ब्राह्मणों को खाना चाहिए ॥२५॥
वैश्यकन्यासमुद्भुतोब्राह्मणेनतुसंस्कृतः ।।
सोह्यदिकइतिज्ञेयो भोज्योविप्रैर्नसंशयः ॥ २५ ।
प्राण से वैश्य की कन्या में जो. उत्पन्न हो और संस्कार भी
उसका हो तो वहीं, अधिक (अर्द्धसीरी) है. स्सिंदेह उसका आ
बामणों को भोज्य है॥ २५ ॥
भांडस्थितमभोज्यानां जलंदधिघृतपयः ॥
अकामतस्तुयोभुक्ते प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ २६ ॥
+ भाषा टीका सहित। ६३ यदि अभोज्यों के वर्तन में रक्खे हुए जल, दधि, घी, और दूध जो चिनाजाने खाले उसका प्रायश्चित्त क्यों करहो ॥ २६ ॥ ब्राह्मणःक्षत्रिशेवैश्याशूद्रोवाउपसर्पति ॥ ब्रह्मकूयॊपवासेन योज्यावर्णस्यनिष्कृतिः ॥ २७ ॥ चारों वर्गों में से चाहे जो होतो उसकी शुद्धि ब्रह्मकूर्षके पीकर और एक उपवास करने से हो जाता है ।॥ २७ ॥ शूद्राणांनोपवासःस्याच्छूद्रोदानेनशुद्धयति ॥ ब्रह्मकूर्चमहोगनश्वपाकम पिशोधयेत ॥२८॥ शुद्रों को उपवास नहीं करना होना शुद्र दान देनेसे शुद्ध होता है ब्रह्मकूर्च पीकर दिन रात रहे तो श्वपाक भी शुद्ध हो जाता है ॥२८॥ गोमत्रंगोमयंक्षीरं दधिसर्पिःकुशोदकम् ॥ निर्दिष्टपंचगव्यंच पवित्रंपापशोधनम् ॥ २९॥ गौका मूत्र, गोबर, दूध, दही घी, और कुशोंका जल येही मिलकर पंचगव्य होता है. जो परम पवित्र और पापों को शोधने हारा है ॥२९॥ गोमूत्रंकृष्णवर्णाया:श्वतायाश्चैवगोमयम् ।। पयश्चताम्रवर्णायारक्तायाग्रह्यतेदधि ॥३०॥ काली गौका भूत्र, धत गौका गोचर वेत गौका गोचर ताम्रपर्णा गौका यर्णा गौका दूध, और लाल गौका दही ॥ ३०॥ कपिलायाघृतंग्राह्यसर्वकापिलभेववा । मूत्रमेकपलंदद्या दंगुष्टाईतुगोमयम् ॥ ३१ ॥ कपिला गौंका घी, अबवा ये सब वस्तु कपिलाही की लेनी मूक एक पल (४ तोला) लेना, अर्द्ध अगुष्ट तुल्य गोवर लेना ॥१॥ क्षीरंसप्त पलंदद्या दधित्रिपलमुच्यते ॥
भय पाराशरस्पति- घृतमेकपलंदद्यात्पलमेकंकुशोदकम् ॥ ३२ ॥ दूध सातपल (२८. तोले) देना, दही तीन पल (१२ तोले) देना, घी एक पल ( ४ तोलें) देना, कुशोदक पल देना॥ २३॥ गायत्र्यादायगोमूत्रगंधद्वारेतिगोमयम् ॥ आप्यायवेतिचक्षीरं दधिक्रावणस्तथादधि ॥ ३३ ॥ गायत्री पढकर गोमूत्र लेना, (गन्धबार) मन्त्र परकर गोवर लेना । आप्यायस्व.) इस मन्त्र से दूध (दधिकारण इस मन्त्र स दही, ॥ ३३ ॥ तेजोसिशुक्रमित्याज्यं देवस्यत्वाकुशोदकम् ॥ पंचगव्यंमृचापूतं स्थापयेदग्निसन्निधौ ॥ ३४ ॥ (तेजोसिशुक्रम् ) सः मन्त्र से धो लेना,' (देवस्यत्वाम मनसे दही, कुशादेकलेना, उक्तऋचाओं से पवित्र, किए हुए ज्यको अग्निके समीप रखना ॥ ३४ ॥ आपोहिष्टेति चालोड्यमानस्तोकेतिमंथनम् ।। सप्तवारास्तुयेदभी अच्छिन्नाग्राः शुकस्विषः ॥३५॥ ( आपोहिष्टा) इस मंत्रसे उसे हिसाना, और मानस्तोंक) इस मंत्रसे मंथन करना अनन्तरः सप्तवार: (अर्थात् सातः अपराधों को निवारण करने हारे) ऐसे कुशों से कि जिनका अग्रभाग कटान हो और हरे हो ॥ ३५ ॥ एतैरुद्धृत्यहोतव्यं पंचगव्यं यथाविधि इरावतीइदंविष्णुर्मानस्तोकेचशंवती ॥ ३६॥ इन कुशाओं से पंचगव्य उठाकर विधि पूर्वक होम करना करने की ऋचाएं (इरावती) (इदं विष्णुर (मानस्ताक) (शंषती).ये है ।। ३६ ।। तव्य हुतशेषपिवेहिजा ॥
भाषा-टीका सहित। आलाड्यप्रणवेनैव निर्मथ्यप्रणवेनतु ॥३७॥ इन्हीं से होम करना होम से जो बच रहै उसे (द्विजोगायों पीवे कि प्रणव पाठकर उसकी , आलोडन करें उसी प्रणव से ही मधे ॥ ३७॥ उद्धृत्यप्रणवेनैव पिवेच्चप्रणवेनतु॥ यत्त्वगस्थिगतंपापंदेहेतिष्ठतिदेहिनाम् ॥ ३८॥ और प्रणव सेही निकाल कर प्रणवही से :पावे जो कुछ ही और चमडे में मनुष्यों का पाप रहता है ॥ ३८ ॥ ब्रह्मकूचंदहत्सर्व यथैवाग्निरिवेन्धनम् ॥ पवित्रंत्रिषुलोकेषुदेवताभिरधिष्ठितम् ॥३९॥ उसे यह ब्रह्मकूर्च सम्पूर्ण रूप से भस्म करदेता है जैसे भाग ईधन को जला देती है यह तीनों लोक में पवित्र है और देवताओं से भधिष्ठिन होता है अर्थात् इसमें देवता रहते हैं ॥ ३९ ॥ बरुणश्चैवगोमूत्रगोमयेहव्यवाहनः॥ दनिवायुःसमुद्दिष्टःसोमावीरेघृतेरविः॥४०॥ मरुण गोमूत्र में, गोबर में अग्नि, वही में.. वायु,' पो. में सूर्य, और दूध में चन्द्रमा रहते हैं ॥१०॥ पिवतःपतितंतोयं भोजनेमुंखनिःसृतम् ॥ अपेयंतद्विजानीयाद्भुक्त्वाचान्द्रायणचरेत ॥४॥ पानी पीते समय जो पानी गिर पड़े ओर मोजन करते समय जो अन्न मुंह से निकल पड़े तो वह पानी-न पीना चाहिए और. भन्न खाना न चाहिए यदि खावे तो चान्द्रायण प्रत करे ॥४१॥ कूपेचपतितंदृष्ट्वाश्वशृगालञ्चमर्कटम ॥ अस्थिचर्मादिपतितं पीत्वाध्याअपोहिजः ॥ ४२ ॥ यदि रूप में कुत्ता, नीदर, और थानर की हड्डी अथवा वर्भपड़ा . .
1 अथ पाराशरस्मृति- हुआ देखें और उस अपवित्र जलको द्विज पीले तो आगे जो प्राय रिचर.कहेंगे सो करे ॥ ४२ ॥ नारंतुकुणपंकाविड्वराहंखराष्ट्रकम् ।। गावयंसौप्रतीकंच मायूमुखद्गकंतथा ॥ ४३ ।। तथा मनुष्य कौवे, गांव के सूकर, गधे वा ऊंट गवय, सुप्रतीक, मयूर और गैंडे ॥ ४३ ॥ वैयाघ्रमासेहवाकूपेयदिनिमज्जति ।। तडागस्थाऽथदुष्टस्यपीतस्यादुदकंयदि ॥४४॥ व्याघ, रीछ, और सिंह का मुर्दा, यदि कूप अथवा तडाग में डूब गया हो और उसका दुष्ट जल यदि कोई.पीवे ॥ ५.४ ॥ प्रायश्चित्तंभबेत्पुंसः क्रमेणतेनसर्वशः ।। विप्रःशुद्धचेतत्रिरात्रेण क्षत्रियस्तुदिमहयात् ॥४५॥ तो क्रम से सारा ऐसा प्रायश्चित्त पुरुष को होता है कि ब्राह्मण तीम दिन और तत्रिय दो दिन के उपवास से शुद्ध होता है ॥ १५ ॥ एकाहेनतुवैश्यस्तुशूद्रोनक्तेनशुद्धयति । परपाकनिवृत्तस्य परपाकरतस्च ॥४६॥ पैश्य एक दिन के उपवास से और शुद्र नक्त ( रात में ) भोजन करने से शुद्ध होता है। परपाकनिवृत्त और परपाकरत ॥ ४६॥ अपचस्यचभुक्त्वान्नं द्विजश्चांद्रायणचरेत् ॥ अपचस्यतुयदान दातुरस्यकुतः फलम् ॥४७॥ तथा अपचकाअन्न, यदि बिज खालेवे तो चान्द्रायण करे जो कोई अपचको देता है तो उस दाता को फलकहां है. ॥ १७ ॥ दाताप्रतिर हीताच होतोनिरवगामिनौ । गृहीत्वाग्निसमाराप्य पंचयज्ञान्ननिर्वपेत् ॥ ४८ ॥ दाता और प्रतिग्रहीता वे दोनोंही नरक में जाते हैं। जो अनि भषा टीका सहीत समारोपण करके पंचयज्ञों को नहीं करता ॥ ४८ ॥ परपाकनिवृत्तोसी मुनिभिः परिकीर्तितः॥ पंचयज्ञान्स्वयंकृत्वापरान्नेनोपजीवति ॥४९॥ मुनियों ने उसे परपाक निवृत्त कहा है। जो पंचयज्ञों को करके के भन्नसे जीता है ॥ ४९ ॥ सततंप्रातरुत्थायपरपाकरतस्तुसः ॥ गृहस्थध योविप्रो ददांतिपरिवर्जितः।। ५० ।। मदा पातः काल उठकर सो परपाकरत कहलाना है। जो धामण गृहस्थ धर्मा होकर देता नहीं ॥ ५० । ऋषिभिर्धर्मतत्वज्ञैरपचः परिकीर्तितः । युगेयुगेचयेधर्मा स्तेपुतेषुचयेद्विजाः ॥५१॥ उसे धर्मतत्व को जानने हारे ऋषियोंने अपच कहा है । युग २ दूसरे के जो धर्म है और उनयुगों में जो द्विज है ॥ ५१ ॥ तेषांनिंदानकर्तव्यायुगरूपाहितेहिनाः ॥ हुंकारंब्राह्मणस्योक्त्वात्वंकारंचगरीयसः॥५२॥ उनकी निन्दा न की चहिये क्योंकि वे द्विज युगरूपही हैं । यदि ब्राह्मण को हुंकार कर और वडे को त्वंकार (तू) कहै ।। ५२ ॥ स्नात्वातिष्ठन्नहाशेषमभिवाय प्रसादयेत् ।। ताडयित्वातृणेनापिकंठेवध्वापिवाससा ॥ ५३ ।। तो जितना वह दिन शेषहो उतनी देर तक स्नान करके बैठा रहै भौर उनको प्रणाम करके मसन्न करावे तिनकेसे भी मारे अथवा गले में बससे भी पांधे। ५३ ॥ बिवादेनापिनिर्जित्यपूणिपत्यपूसादयेत् ।। अवगूर्यत्वहोरात्रंत्रिरात्रंक्षितिपातने :: ५४ ॥ अथवा विवाद में भी जति ले तो प्रणाम करके प्रसन्न कराये अथ पाराशरस्मृति- मारन को दंडआदि उठाये तो एक दिनरात, उठाकर धी पर फेके तो तीन दिन ॥ ५४॥ अतिकृच्छ्रेचरुधिरेकृच्छ्राभ्यंतरशोणिते ॥ नवाहमतिकृच्छ्रः स्यात्पाणिपूरान्नभोजनः ॥५५॥ और मारने से मधिर निकल अवे तो अतिकच्छ्र, चमड़े भीतर ही रुधिर जमजाये तो कृच्छ्र प्रतकर नव दिन तक एक पसर ( मूठी वा प्रमृति ) मर अन्न भोजन ककै रहै ! ५५ ॥ त्रिरात्रमुपवासःस्यादतिकृच्छ सउच्यते ।। सर्वेषामेवपापानां संकरेममुपस्थित ॥५६॥ अनन्तर तीन दिन उपवास करे तो अति कृच्छ्वत होता है सब पाप का जच संकर (मेल) होजाये तो॥: ६.॥ दशसाहसमभ्यस्तागायत्रीशोधनपरम् ॥ दस सहस गायत्री का जप करने से परम शोधन होता है इतिपाराशरधर्मशास्त्रे, एकादशोऽध्यायः॥११॥ इति एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ दुःस्वप्नंयदिपश्येत्तु बांतेवातुरकर्मणि ॥ मैथुनेप्रेतधूमैच स्नानमेवाविधीयते ॥१॥ यदि दुःस्वप्न देख, वमन करे, क्षौर करावे, मैथुन करे, प्रेत धूमलगे तो स्नान मात्र विहित है ॥.१ ॥ अज्ञानात्प्राश्यविण्मूत्रं सुरासस्ष्टष्टमेवच ॥ पुनःसंस्कारमर्हतित्रयोवाद्विजातयः ॥ २॥ अज्ञान से यदि विष्टा वा मुनखा. पीले और शुरा (मय) से मिला हुआ पदार्थ खालें तो तीनों विज वर्ण पुनः संस्कार के योग्य हो जाते हैं ॥ २ ॥ अजिनमेखलाडै भैक्षचर्यात्रतानिच ॥
भाषा बीका सहित । निवर्ततेद्विजातीनां पुनः संस्कारकर्मणि ॥ ३॥ पुनस्सं कार जब द्विजों का होता है तो अजिन, (मृगचर्म) मेखला, और दण्ड, पलाशादि का तथा भैल्यचर्या और ब्रत ये महीं करने पड़ते ॥ ३ ॥ विष्मूत्र यचशुद्धयर्थ प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ पंचगव्यंचकुर्वीतस्नात्वापीत्वाशुचिर्भवेत् ॥४॥ और विष्टा मत्र की शुद्ध होने के लिए प्राजापत्य प्रत करे पंच गव्य भी करे स्नान के उपरांत उस पीकर शुद्ध होते हैं। जलाभिपतने चैव प्रव्रज्यानाशकेषु च ।। वृत्यावासतवर्णानांकथंशुद्धि विधीयते॥५॥ जो मनुष्य जल में इव कर वा भग्नि में जलकर अथवा पहाड से गिरकर किंवा सन्यासी होकर अनशन ब्रत करके म मनसे चाहे हो और इस अपनी संकल्प बृत्तिसे बच रहे हो ( अर्थात् ) उपायों से मरने को साधन सके होली उन चारों वर्ण के लोगों की शुद्धि क्यों कर हो ॥५॥ प्राजापत्यहयेनैव तीर्थाभिगमनेन च ॥ वृषेकादशदानेन वर्णाः शुद्धयंतितेत्रयः ॥६॥ तीनों वर्ण तो यो शुद्ध होते हैं कि दो प्राजापत्य करके किस तीर्थ में जा स्नान कर और दस गौ एक वैल दान देवें ॥ ६ ॥ ब्राह्मणस्यप्रवक्ष्यामिवनंगत्वाच तुष्पथे । सशिखंबपनंकृत्वाप्राजापत्यद्वयंचरेत् ॥ ७ ॥ और ब्राह्मण की शुद्धि यों होगी धन में जाकर चौराहे के मध्य बैठ कर शिखा मन मुण्डन करावे दो पाना रत्य बन करे ॥ ॥ गोयंदक्षिणांदद्याच्छुदिपाराशरोवधीत् ॥
अब पारा यरस्मृति-
मुच्यतेतेनपापेन ब्राह्मणत्वंचाच्छति ॥८॥
दो गौ दक्षिणादेतो शुद्ध होता है ऐसा पराशरने कहा बस
पापसे मुक्त होकर पुनः ब्राह्मणता को पाता है !! ८ ॥
स्नानानिपंचपुण्यानि कीर्तितानिमनीषिभिः ।।
आग्नेयंबारुणंब्राह्मवायव्यंदिव्यमेवच ॥९॥
पांच प्रकार के स्नान पण्डितों ने पवित्र कहा है अर्थात् आया
पारुण, ब्राह्म, वायव्य, और दिव्य ॥९॥
आग्नेयभस्मनास्लानमवगाह्यतुवारुणं ।।
आपोहष्टतिचब्राह्मयं वायगोरजः स्मृतम् ॥ १०॥
भस्म सारे भंगमें मलनेसे श्राग्नेय स्नान होता है जल में नहाने
से वारुण ( आपोहिष्टा) इस मंत्रसे मार्जन करने से प्रात्म गौकीरज
से वायव्य.॥१०॥
यत्तुसातपवर्षेण स्नानंतदिव्यमुच्यते ॥
तत्रस्नात्वातुगंगायां स्नातोभवतिमानव ॥११॥
और जव धूपनिकली हो उसी समय वर्षा भी पडे उसमें
नहाने से दिव्य स्नान होता है उसमें नहाकर मनुष्य गंगा का स्नान
करने हारा होता है ।। ११ ॥
स्नातुंयांतद्विजंसर्वे देवाः पितृगणैः सह ।।
बायुभूतास्तुगच्छति तृषार्ताः सलिलार्थिनः ॥१२॥
जव द्विज स्नान करने को लते तो उनके पीछे २ सारे देवता
पितरों सहित वायु होकर (हवा बनकर) प्यासे हुए जल के लिए
जाते हैं ॥१२॥
निराशास्तनिवर्तते बस्त्रनिष्पीडनेकृते॥
तस्मान्नपीडये नमकृत्वापितृतर्पणम् ॥ १३ ॥
जब धोती निचोडे ले तो वे निरास हो फिर जाते इस हेतु
चक पितृतर्पण न कर लेवे तन ताई घोती न धोये ॥ १ ॥
•. भाषा टीका सहित। रोमकूपेष्ववस्थाप्य यस्तिलैस्तर्पयेपितृन् । तर्पितास्तेनतेसर्वे रुधिरेणमलेनच॥ १४॥ . 12035 जो मनुष्य अपने रोमके गर्तों पर तिल रखकर पितरों का. तर्पण करता है वह मानो उन पितरों का रुधिर और मल से तर्पण करता है।॥ १५ ॥ अवधूनोतियः केशानस्नात्वाप्रस्रवतेहिजाः ॥ आचमेद्वाजलस्थोपि सवाह्यः पितृदैवतैः॥ १५॥ जो हिज स्नान करके अपने केशों को फटकारता है, गीले कपड़ों से भूतने लगता अथवा सूखा वस्त्र पहिनकर जल में खड़ा हो आचमन करता है वह देष पितृ कार्य से वास होता ( नहीं कर सत्ता) है।॥ १५ ॥ शिरः प्रात्यकंठंवा मुक्तकक्षशिखोपिवा ॥ विनायज्ञोपवीतेन आचांतोप्यशुचिर्भवेत् ॥१६॥ शिर अथवा गले में वस्त्र लपेट, कच्छ [ धोती के टोंक] अथवा शिला को खोल यज्ञोपवित के विना आचमन कर भी ले तथापि भशुद्ध रहता है ॥ १६ ॥ जलेस्थलेस्थानोचामेज्जलस्थश्च वहिस्थले। उभेस्पृष्ट्वासमाचामे दुभयत्रशुचिर्भवेत् ॥ १७ ॥ पाहर खड़ा होकर जल में और जल में खड़ा हो कर बाहर आचमन न करे यदि एक पांव जल में और एक बाहर रफ्ते होतो चाहे जिस प्रकार प्राचमन करे शुद्ध ही होता है ॥ १७ ॥ स्नात्वापीत्वाक्षुतेसुप्तेभुक्त्वारथ्योपसर्पणे । आचांतःपुनराचाहासोविपरिचायच ॥१८॥ स्नान, भोजन, जापान छींक, सो और गली भैंपल कर बोवार आचमन करे इसी भांति वम पहिन कर भी॥१८॥ क्षुतनिष्ठीवनेचैबदंतोच्छिष्टतथाऽनृते ॥
१०३ अष पाराशरस्माते- पतितानांचसंभाष दक्षिणश्रवणंस्पृशेत् ॥ १९ ॥ धींकने, थूकने, दांत में जूठा रहने अठ बोलने और पतितों साप बोलने पर दहिना काम छूलेवे ।। भास्करस्यकरैःपूतं दिवास्नानंप्रशस्यते ॥ अप्रशस्तनिशिस्नानं राहोरन्यत्रदर्शनात् ॥ २० ॥ दिन में स्नान करना प्रशस्त है क्योंकि सूर्य की किरणों वह पवित्र किया होता ग्रहणके बिना रात में नहाना प्रशस्त नहीं है ।। २० ॥ मरुतोवसवोरुद्रा आदित्याश्चाथदेवताः॥ सर्वसोमेप्रलीयतेतस्माहानंतुसंग्रहे ॥ २१ ॥ मावत् , बसु, द्र, आदित्य, और सारे देवता चद्रमा छुफजाते हैं इस हेतु महण में दान करना चाहिए (कि देवताओं.. की रक्षा हो) ॥२१॥ खलयज्ञविवाहेच संक्रांतेग्रहणेतथा.॥ शर्वादानमस्त्येववनाऽन्यत्रतुविधीयते ॥ २२ ॥ खल यज्ञ अर्थात् खलिहान, विवाह, संक्रांति, और ग्रहण में रात का दान करना और कभी भी रात को दान न करना पाहिए ॥२२॥ पुत्रजन्मनियज्ञेचत्थाचात्ययकर्मणि ॥ राहोश्चदर्शनेदानं प्रशस्तंनाभ्यदानिशि ॥ २३ ॥ पुत्र जम्म यज्ञ मरण और राहु के दर्शन (ग्रहण ) में रात के समय दान प्रशस्त होता है इससे अन्य समय में नहीं ॥ २३ ॥ महानिशातुविज्ञेयामध्यस्थं पूहरद्वयम् ।। पदोषपश्चिमौयामौदिनवस्नानमाचरेत् ॥ २४ ॥ ऑविचले दो पहर हैं. वहीं महानिशा होती है और संध्याको भाषा टीका सहित । महर तथा पिछले पहर की राय में दिन के तुल्य स्नान करना चाहिये ॥२४॥ चैत्यवृक्षश्चितिःपूयश्चांडाल मोलविक्रयी ॥ एतास्तुब्राह्मणःस्पृष्ट्वासवासाजलनाविशत् ॥२५॥ चैत्यवृष ( अर्थात् श्मशान के वृक्ष ! और चिति अर्थात् प्रसिद्ध कोई मृत्तिकादि समूह वा इमशान पूय ( अर्थात् दुर्गधि युक्त मज्जा पा पीव ) चांडाल, और सोमलता वेचने झारा यदि इनमें से किसी को प्रात्मण छू लेवे तो वस्त्र सहित जल में स्नान करे ॥ २५ ॥ अस्थिसंचयनत्पूर्वं रुदित्वास्नानमाचरेत् ।। अंतर्दशाहेविप्रस्यहूयर्चमाचमनंस्मृतम् ॥ २६ ॥ पति अस्थि संचयन (अर्थात् मरने के अनन्तर चार दिन ) के पूर्व यदि प्रामण रोवे तो स्नान करके शुद्ध होता है उससे उपरांत दस दिन के भीतर रोवे तो आचमन भाष करके पवित्र होता है ॥२६॥ सर्वगंगासमेतोयं राहुयस्तेदिवाकरे ॥ सोमनस्तेतथैवोक्तं स्नानदानादिकर्मसु ।। २७॥ सूर्य अथवा चन्द्रग्रहण में जो कोई जलस्नान दानादिक में मिले वही गा के समान फल देता है ॥ २७ ॥ कुशैःपूतंभवेत्स्नानं कुशेनोपस्पृशेदजः ॥ कुशेनचोद्भुतंतोयंसोमपानसमभवेत् ।। २८ ।। कुशसे स्नान पवित्र होता है कुशके साथ ही ब्राह्मण आचमन कर जो जल शके साथ उठाया जाता है वह सोमपान के तुल्य होता है ।। २८॥ अग्निकार्यात्परिभ्रष्टाः संध्योपासनवर्जिताः ॥ वेदचैवानधीयानाः सर्वेतेवृषलाःस्मृताः ॥ २६ ॥ अग्निहोत्रसे परिभ्रष्ट (युत वा विमुख ) संध्या वंदन घोडे -- १०१ अथ पाराशरस्मृति- हुए और वेद न पढने हारे प्रामण वृषध अर्थात शूद तुल्य होते हैं ॥ २६ ॥ तस्मादषलभीतेन ब्राह्मणेनविशेषतः ।। अध्येतव्योप्येकेदशो यदिसर्व शक्यते ॥ ३० ॥ इस हेतु अर्थात धृषल होने के भय से ब्राह्मणको चाहिये कि सारा न पडता वेद का एक भागही पढलेवें ॥ ३० ॥ शुद्रान्नरतपुपस्याधीयमानस्यनित्यशः॥ जपतोजुव्हतोवापिगतिरूद्मन विद्यते ॥३१॥ जो कोई शुद के अन्न और रसले पुष्ट है यह चाहे निस्य पैदा ध्ययन, जप, और होम किया करे परन्तु उसकी उसम' पति नहीं होता है ॥ ३१.॥ शूद्रान्नशूदूसंपर्कःशूद्रेणतुसंहासनम् ॥ शूदातज्ञानागमश्चापिज्वलंतमपिपातयेत् ॥ ३२ ॥ शद का अन, शद का सनर्ग, शुद के साथ बैठना, और शूद जान सीखना, इन बातों से अग्नि समान तेज वाला भी जन्मण पतित हो जाता है ।। ३२ ॥ याशूद्यापाचयेन्नित्यंशदीचगृहमेधिनी ॥ वर्जितःपितृदेवेभ्योरौरवंयातिसहिजः ॥ ३३ ॥ जिस द्विजकागक शदी पनाती है और जिसकी गृहणी (स्त्री) शर्मा है तथा पितृ और र्देष कार्य में जो पर्जित (विमुख) है वह सरप नरक में जाता है ॥ १३ ॥ मृतकमृतकपुष्टांगं द्विजशद्वान्नभोजिनम् ॥ अहंतनविजानामिकांकांयोनिगमिष्यति ॥ ३४॥ मरण और सूतक के आशौचवा ला का अन्न खाने हारा तथा शुद्रका अन्न भोजन कनेहारा अथवा शुद्र का अन्न उसके मृतक भाषा दीका सहीत । सुतक में भोजन कर्ने हास) दिज यह नहीं जानते कि किस किस योनि में जावेगा ॥ ३४ ॥ गंधोद्वादशजन्मानिदशजन्मानिसूकरः । श्वयोनौसप्तजन् मानिइत्यवंमनुरब्रवीत ॥३५॥ मनुने यों कहा है कि वारह जन्म गृध्र (गिद्ध) दसजन्म सूकर (सुअर) और सातजन्म कुत्ते की योनि में वह पड़ता है ।। ३५ ॥. दक्षिणार्थतुर्थीविप्रः शूद्रस्यजुहुयाछविः॥ ब्राह्मणस्तुभवेच्छद्रः शूद्रस्तुब्राह्मणोभवेत् ॥ ३६ ॥ यदि दक्षिणा के लोभ से ब्राह्मण शूद्रकी हवि (स्वीर आदि) होम करे तो वह ब्रामण शूद्रहो जाता है और वह शूद्र बामण वन जाता है ॥ ३६॥ मौनव्रतसमाश्रित्यआसीनोनवदेहिजः ।। भुजानाहिवदेद्य स्तुतदन्नंपरिवर्जयेत् ॥३७॥ जिसने मौन होकर भोजन कर्नेका संकल्प किया हो और .. भोजन कर्ने समय मेंही यदि बोलदिया हो तो जितना अन्न पच रहा हो उसे न खावें छोड दे ॥ ३७ ।। अर्द्धभुक्ततुयाविप्रस्तस्किन्पाने जलंपिवेत् ॥ हतंदैवचपित्र्यंचआत्मानंचवघातयेत् ॥३८॥ जो ब्राह्मण आधा तिहाई भोजन कर्ते ही उसी भोजन पात्र में जल पीलेवे तो देवकार्य वा पितृकार्य तथा निज श्रात्मा को भी वह हतं.( नष्ट.) कर्ता है. ॥ ३८ ॥ भुजानपुतुविशेषु योओपात्रविमुंचति ॥ समूढः सचपापिष्टो ब्रह्मघ्नः सखळूच्यते॥३९॥ ब्रामणों के भोजन कते समय जो पहिले पात्र (भोजन कर्ना छोड देता है वह मूर्ख, पापिष्ट, और ब्रांमध्न कहलाता है ॥ ३९ ॥ भाजनेषुचतिष्ट सुस्वस्तिकुर्वन्तियेद्विजाः॥ नदेवास्तृप्तिमायातिनिराशा-पितरस्तथा ॥ ४०॥ . ...
जो गृहस्थ दयायुक्त होकर धर्मही की चिन्त अपने
अथ पाराशरस्मृति-
भोजन पात्र उठने वा चलित होने नहीं पाए इसके वीचमें ग्रामण
लोग यदि स्वस्ति बोल उठतो देवता तृप्त नहीं होते और पितर लोग
निरास होजाते हैं ॥ ४० ॥
अस्नात्वानव जीत अजप्त्वाग्निमपूग्यच ।
नपर्णपृष्ठे जीतरात्रौदीपंविनातथा॥४१॥
विना स्नान, जप और अग्नि होत्रके किए ही भोजन न करे नया
पत्ते की. पीठ पर भी भोजन न करे और रात के समय दीपक विनी
नं भोजन करे॥ ४१ ।। :
गृहस्थस्तुदयायुक्तो धर्ममेवानुचिंतयेत्।
पोष्यवर्गीथसिद्ध्यर्थं न्यायवीसबुद्धिमान ॥ ४२ ॥
पाज्यवर्ग (स्त्रीपुत्र भृत्य आदि) की अर्थ सिद्धि के लिए न्याय वर्ती
(न्याय वा नीति पूर्वक चलता.) हो तो वही बुद्धिमान् कहाताहै।४२॥
न्यायोपार्जितवित्तेनकर्तव्यंह्यात्मरक्षणम् ॥
अन्यायेनतुयोजीवेत्सर्वकर्मवाहष्कृतः ॥४३॥
न्याय से जो धन, उपार्जन करे उसी से अपने आपकी रक्षा करे
और जो अन्याय से जीबन करे वह सव को लें. वहिष्कृत होता
अग्निचित्कपिलासंत्रीराजाभिक्षुमहोदधिः।
दृष्टमात्राः पुनंत्यतितस्मात्पश्येत्तु नित्यशः ॥४.
अग्निहोत्री अथवा इष्टका. चयनकारी कपिलागौं, यज्ञकर्नेहारा
राजा, संन्यासी, और समुद्र, ये देखनेही से पवित्र करते हैं इस
लिए इन्हें नितं नित देवे ।। ४४
अरणिकृष्णमाजीरंचदनसुमणिघृतम् ॥
तिलानकृष्णाजिनंछांगगृहेचे निरक्षयेत॥ ४५ ॥
अरणि, (जिसे मथकर यज्ञ में आगनिकालते हैं) काली बिल्ली,
चन्दन, अच्छी मणि, घी, तिल, कृष्णाजिन (कान्ले मृगाकाचर्म)
और घ करा इतनी वस्तु घरमें रखनी चाहिये ।। ४५॥
॥ ४३ ॥
भाषा टीका सहित। गंवांशतसैकवृषयत्रतिष्ठत्ययंत्रितम् ॥ तत्क्षेत्रदशशुणितंगोचर्मपरिकीर्तितम् ॥ ४६॥ जितनी दूरमें सौ गौ और एक बैल खुले हुए खडे हों उससे दसमने स्थल को गौचर कहते हैं ॥ ७ ॥ ब्रह्महत्यादिमिर्मत्योमनोबाक्कायकर्मभिः॥ एतद्गोचर्मदानेन मुच्यतेसर्वकिल्विषे॥४७॥ यदि इस गोचका दान मनुष्य करे तो ब्रह्म हत्यादिक जो मानसिक वाचिक और कायिक पाप है उन से छुट जाता है ॥४७॥ कुटुंविनेदारिद्रायश्रोत्रियायविशेषतः ॥ यहानंदीयतेतस्मैतदानंशुभकारकम् ॥१८॥ कुटुंव वाले दरिद्र और विशेष करके वेद पाठी बामण को जो दान दे वह दान शुभ फल देने हारा होता है ॥ १८ ॥ वापीकूपतडागाद्यैर्वाजपेयशेतैर्मखैः। गवांकोटिप्रदानेनभमिहानशुद्धयति ॥४९ ॥ जो मनुष्य किसी की भूमि हर लेवे वह चाहे सैकड़ों वापी कूप, तडाग, अदि बनावे अथवा वाजपेय आदि सैकड़ों यज्ञ करे और कोटि गौ दान करे तो भी शुद्ध नहीं होता है ॥ ४० ॥ अष्टादशदिनादास्नानमेवररजस्वला । । अतऊर्ध्वत्रिरात्रस्यादुशनामुनिरब्रवीत ॥५॥ यदि अठारह दिन के भीतर ही स्त्री रजस्वला.हो तो तीन दिन अशुचि होती है ऐसा उशना मुनि ने कहा है ।॥ ५० ॥ युगयुगदर्यचैवत्रियुगंचचतुर्युगम् ॥ चाण्डालसूतकोदक्यापतितानामधाक्रमात् ॥५१॥ पतित रजस्वला प्रसूति स्त्री, और चाण्डाल इन सवा से क्रम क और १३ हाथ के अंतराल से रहना ॥५॥ ततः सन्निधिमात्रेण संचलस्नानमाचरेत् ॥ स्नात्वावलोकयेत्सूर्यमज्ञानात्स्पृशतयदि॥५२॥ - .. - अथ पाराशरस्मृति- यदि इनने के समीप वे आन-पडै तो वस्न समेत स्नान करडावे यदि अज्ञान से इन्हें लेवे तो स्नानकर्के सूर्य का अवलोकन मानसे स्पर्श में ८००. गिनती जप भी होता है ) ॥ ५२ ॥ - विद्यमानेषुहस्तेषु ब्राह्मणोज्ञानदुर्वलः ।। -तोयपिवेत बक्तेणश्चयोनौजायतेधुवम् ॥ ५३ ।। हाथ रहते ही यदि कोई अल्प ज्ञानी ब्राह्मण नदी में मुंह लगा कर पानी पीवे तो वह अवश्य जुत्ते की योनि में पड़ता है ।। ५३ ।। यस्तुक्रुद्धः घुमान् ब्रूयाज्जया यास्तुअगम्यातम् ।। ". पुनरिच्छतिचेदेनां विप्रमध्येतुश्रावयेत ॥ ५४॥ यदि कोई.ब्राह्मण क्रुद्ध होकर अपनी स्त्री को अगम्यता (अर्थात माता वा भमिनी । बोलदे और पुन: उस्का संग किया चाह तो प्राणों की परिषत् के मध्य जाकर सुनावे ॥ ५४॥ श्रांताक्रुहस्तमांधोवाक्षुत्पिपासाभयादितः॥ द्वानं पुण्यमंकृत्वाप्रायश्त्तिदिनत्रयं ।। ५५ ॥ कि मैं श्रात, ( थकाढुआ) Qध, तमोध (अधानी अथवा क्षुधा और प्यास से किंवा भय से पीड़ित होकर ऐसा कह बैंठी अथवा दान और तीर्थ यात्रादि पुण्य का कहकर न करे तो भी ब्राह्मणों को यही पूवोक्त कारण सुनावे और उन्के कहने स्ने तीन दिन उपवास करे ॥ ५५ ॥ उपस्पशेतत्रिषवर्णमहानद्युपसंगमे ।। चीणोतेचैवगाँदद्यादब्राह्मणान्भोजयेश ॥५६॥ और समुद्र गामिनी नदी के संगम में त्रिकाल स्नान करें अन न्तर एक गौदान दे और दस ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ ५६ ॥ दुराचारस्यविप्रस्यनिषिद्धाचरणस्यच ॥ अन्नंभुक्ताहिजाकुर्यादिनमकमभोजनम्॥ ५७॥ जो ब्राह्मणं दुराचारी (विहित कर्मनकर्ता) हो और जो निषि द्वा चरण (अविहितकर्मकर्ता) हो उस्का अन्न यदि कोई द्विजे भोजन करे तो एक दिन उपवास करना ५७ ॥
, मुक्त होग " भाषा टीका सहित सदाचारस्यविप्रस्यतथा वेदान्तवादिनः ।। भुक्त्वान्नमुच्यतेपापादहोरात्रन्तरान्तरः ॥ ५९॥ (यदि उपचास न कर सके) तो किसी सदाचार नामण तथा. ''वेदानवेत्ता . अथवा वेदान्तवादी ) ब्राह्मणका अन्न दूसरे २ दिनखावे तो उसपाप से जाता है ॥ ५८ ऊवॉच्छिष्टमधेोच्छिष्टमंतरिक्षमृतौतथा ॥ कृच्छ्त्रयंप्रकुर्वीतभाशेचमरणेतथा ॥ ५९॥ यदि कोई ऊोजिष्ट ( वनादिसजूठेमुंह) अधोच्छिष्ट. मूत्र पुरीषसे अशुद्ध)होकर अथवा खट्वा वा अहारी आदि अन्तरिक्षमें मर, जावेतो उस्के निमित तीन कृच्छू करानेसे ( अथवा व्रत के षदले उतनी गौदान देने से) शुद्धहोता है यही प्रायश्चित्त आशौच में मरे हुए का भी है ॥ ५ ॥ कृच्छ्रदेव्ययुतंचैवप्राणायामशतहम् ।। पुएर तीर्थनाशिरः स्नानद्वादशसंख्यया ॥६० ॥ एक अयुन १०००० गायत्री जपने से भी एक कृच्छ्रेवत का फल होता है तथा दोसौ प्राणायाम कर्ने से एककृच्छहोता हैं, और किसी पुण्य तीर्थ में लान करें जव सिरके बाल सुखंजाबैं पुनः स्नान करे इसप्रकार वारहबार स्नान कसे मी एक कृच्छब्रतहोताहै ।। ६० ॥ द्वियोजनंतीर्थयात्राकृच्छ्रमकप्रकल्पितम् ॥ गृहस्थःकामतःकर्याद्रेितसःस्खलनभुवि ॥ ६॥ दोयोजन तीर्थकी और बले. तो भी एक कृच्छत्रत होता है. यदि गृहस्थ अपनी इच्छासे वीर्य भूमि में गिरावेः॥ ११ ॥ सतसंतजपेहेव्याःप्राणायामस्त्रिभिासह ।। चातुर्विद्योपपन्नस्तु बिधिवेद्विप्रघातके॥ ६२॥ तो एक सहस्र गायत्री जपकर और तीन प्रणायाम करें जो ब्रह्म धातीहो उस्को चारों वेद जानने हारा विप्र ॥ ६२ ॥ समुद्रसतुगमनप्रायश्चित्तसमादिशेत् ॥ सेंबधपथेभिक्षांचातुर्वर्ध्यात्समाचरेत् ६३॥
पुनःप्रत्यागतोवेश्मवासार्थमुपसर्पति ॥ ६० अथ पाराशरस्मृति- समुद्रसेतु (रामेश्वर के दर्शन के लिये) गयन करनेका प्राय श्चितपतलाचे सेतुबंधजातेहुए मार्ग में चारौंवर्गों के घरभिक्षामांगे । वर्जयित्वाविकर्मस्थान्छन्त्रोपानाद्विवर्जितः ॥ अहंदुष्कृतकर्मावैमहापातककारकः ॥ ६४ ॥ विरुद्ध कर्म कर्ने हारोंके घर भिक्षा न करे और छाता, जूता, पास न रक्खे नया ऐपा कह कर शिक्षा मांगे कि.. दुष्कृत कर्म फर्नेहारा महापातकी हूँ ।।.६४.।। गृहद्वारेषुतिष्ठामिमिक्षार्थीब्रह्मघातकः ॥ गोकुलेषुचवलेच्चैवग्रामेषुनगरेषुचं । ६५ ।। ब्रा घातक घरके द्वारपर भिक्षा के अर्थ खड़ा हो गौओं के मध्य ग्राम और नगरों में बासकरै ।। ६५ ॥ तपोबनेषुतीर्थेषुनदीप्रसूबणेषुच ॥ एतेषुख्यापयन्नैनः पुण्यगत्वातु सागरम ॥६६॥ तपोवन, तीर्थ, नदी, झर्ने, इनस्थलों में अपना पापकहता हुआ पवित्र सागर में जाकर ॥६६॥ दशयोजनविस्तीर्णशतयोजनमायतम् ।। रामचन्द्रसमादिष्टनलसंचयसचितम् ॥ ६७ ॥ दस योजन चौड़ा सौ योजन लषा, रामचन्द्र के कथन से ने संचय क रचितकिया ॥ ७ ॥ सेतुदृष्ट्वासमुद्रस्यब्रह्महत्यांव्यपोहति । सेतुदृष्ट्वाविशुद्धात्मात्ववगाहेतसागरम् ॥ ६८ ॥ ऐसे समुद्र सेतुको देखकर ब्रह्महत्या से छूट जाता है सेतुदर्शन से शुद्धदेहहोकर समुद्र में स्नान करे ॥ ६८ ॥ यजेतवाश्वमेधेनराजातुपथिवीपतिः ॥ यदि पृथ्वी का पति राजा हो तो अश्वमेघ यज्ञकने से ब्रह्महत्या हता है पूनः घर में आकर वास करे ।। ६६ । '..
भाषा दीका सहित । सपुत्रःसहभृत्यश्चकुर्यादब्राह्मणभोजनम् ॥ गाश्चैवैकशतंदद्या चातुर्विद्येषुदक्षिणाम् ॥ ७० ॥ पुत्र और भार्या तथा भृत्यों समेत ब्राह्मणों को भोजन करावे और चारों वेद जानने हारे ब्राह्मणों को एक सौ गौदक्षिणादेंवे ७० ब्राह्मणानांप्रलादेन ब्रह्महातुविमुच्यते । विंध्यादुत्तरतोयस्यसांसः परिकीर्तितः ॥ ७१ ॥ 'और बाह्मणों की प्रसन्नता से धूमघाती शुद्ध होताहै जिस्का निवास विंध्य पर्वत के उत्तर भाग में हों ।। ७१.। पराशरमतंतस्यसेतुबंधस्यदर्शनम् ।। सवनस्थास्त्रियहत्वाब्रह्महत्यावतंचरेत् ॥७२॥ उसी को पराशर के मत से सेतुबंध का दर्शन विहित है यज्ञ कर्ती हुई स्त्री को मारे तो ब्रह्महत्याका ब्रत करे ॥ ७२ ॥ मद्यपश्चहिजाकुर्यान्नदीगत्वासमुद्रगाम् ॥ . चांद्रायणेतपश्चा”कुर्यात्राह्मणभोजनम् ॥ ७३ ॥ मद्यपि ब्राह्मण भी ब्रह्म हत्या बूत करे और समुद्र गामिनी नदी में 'स्नान कर के चान्द्रायण करे तदन्तर ब्रामण भोजन करावे ।। ७३ ॥ अनडुत्साहितांगांचदद्याद्विप्रेषुदक्षिणाम् ॥ सुरापानसत्कृत्वा अभिवणासुरांपिवेत् ॥ ७४ ॥ एक बैल और गौ ब्राह्मणों को दक्षिणा देवें जो एकवार सुरा (मद्य ) पीकर अग्नि समान तप्स कर्के सुरा पीकर मरजावें ॥ ७ ॥ सपावयेदिहात्मा मिहलो केपरनच ।। अपहत्यसुवर्णतुब्रह्मणस्यनतःस्वयम् ॥ ७५॥ सो अपने आत्मा को इस लोक और परलोक दोनों में शुद्ध कर्ता यदि बालम के सुवर्ण चोरी करे तो अपनेही. आप ॥ १५ ॥ गच्छेन्मुसलमादाय राजानस्ववधायतु , इतः शुद्धिमवाप्नोति राज्ञाऽसौमुक्तएकच ॥ ७६ ॥ हाथमें मूसल लेकर राजा के पास अपने वध के अर्थ जावें --.-... Andparenamedareer Honi अथ पाराशरस्मृति- । है राजा उस्से मारे तो शुद्ध होता है और राजा उसे छोड़दे तो भी शुद्ध होजाता है । ७६ ॥ कामंतस्यतुकृतंयत्स्थानान्यथावधमहति ॥ आसनाच्छयनाद्यानात्सभाषात्सहभोजनात् ॥ ७७ ।। यदि जान बूझकर ब्राह्मण का सोना चुराया हो तब उस्का वध कर्ना अव्यथा बध के योग्य नहीं होता है एकत्र बैठने और सोने से तथा एकहीं सवारी पर चढकर चलने और साथ भोजन कनें सें.७७ संक्रामंतोहपापानि तैलविन्दुरिवासि चांद्रायणयावकंच तुलापुरुषएवच ॥ ७८॥ एक को पाप दूसरे को उसे भांति लगजाता जैसे तैल काविन्दु पानी में फैल जाता है चान्द्रायण यावक, तुलापुरुष, ॥ ७८ ॥ गवांचैवानुगमनंसर्व पापप्रणाशनमः ॥ एतत्पराशरशास्त्र श्लोकानांशतपंचकम् । ७९.॥ और.गौओं के पीछे २ चखना इन से हर एक प्रकार : का. पाप नष्ट होता है ॥ ७ ॥ हिनवत्यासमायुक्तं धर्मशास्त्रस्यसंग्रहः॥ यथाध्ययकर्माणिधर्मशास्त्रमिदंतथा ।। ८० ।। यह पराशर का बनाया हुआ पांच सौ और वानमें श्लोक का धर्म शास्त्र संग्रह है जैसे वेदाध्ययन से पुण्य होता है उसी प्रकार इसे धर्म शास्त्र के पढने से भी पुण्य है ॥ ८॥ अध्येतव्यप्रयत्नननियलस्वर्गकामिना ।। इति श्रीपाराशरेधर्मशालेसकल प्रायश्चित्तनिर्णयो नामद्वादशोऽध्यायःसमाप्तः ॥१२॥ इस हेतु जो स्वर्ग कामना करे वह नियम पूर्वक इसे पढे । इति भी पराशर धर्म शास्त्र भाषा विवृत्ती पण्डित गुरु प्रसाद कृताया सकल प्रायश्चित्त निर्णयो.नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ ॥ इति. श्री पाराशर स्मृतिरिया पूर्तिमागमत् ॥
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* विज्ञापन * श्रीभगवद्गीता भाषा। आजकल भारतवर्ष में अज्ञानता प्राप्तको देखकर स्त्री पुरुष के दूर करने के लिये परम- न हितैषी मित्रोंने कई बार मुझसे कहा कि कोई पुस्तक होना चाहिये कि जिससे स्त्री पुरुष के लिये शिक्षा हो और सरल हिन्दी भाषा हो जों कि समझ में आ जाय मैने सोचा कि आजकल गीता से बढकर कोई संसार में पुस्तक नहीं है सोई भगवद्गीता सरल हिन्दी भाषामें खूब मोटे अक्षरों में छापकर प्रकाशित किया गया है जिसमें अठारह अध्याय का माहात्म्य भी पृथक् २ पुराणोक्त लिखा गया है कि जिसके पढने से ज्ञान प्राप्त होता है जिन, महाशयों को आवस्यक्ता होवे शीघ्र मगा लेवें अगर पुस्तक बिक गई तो पछतावा ही हाथ रहेगा। पुस्तक मिलने का पता- दो बाबू हरिनारायण वर्मा बुक्सेलर, कचौड़ीगली वनारस सिटी।
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