Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Satya Prakash

Shri Mat Pramahinsha · 2010/12

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र श्री जवाहर विद्यापीठ NANNY भीनासर (बीकानेर) पुस्तक क्रमांक 12.618 विषय सत्यार्थप्रकाशः वंदादिविविधसच्छास्त्राप्रमाणसमन्वितः श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीम- इयानन्दसरस्वतीस्वामिविरचितः सर्वथा राजनियमे नियोजितः -) प्रार्यवत्सर १६७२६४१०२७ TATTTTTTIAAAAAAANARTA75222 अजमेरनगरे - वैदिक-यन्त्रालये मुद्रिता r दयानन्दजन्मान्द १०३ TANTRA Registered under Sections 18 & 19 of Act XXV of 1867. रकीसवीं वार २०००० संयत् १९८४ वि० { मूल्य) TOTRASTARANASI

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ओ३म् ॥ अथ सत्यार्थप्रकाशस्य सूचीपत्रम् । विषयाः पृष्ठतः- पृष्ठम् विषयाः पृष्ठतः-पृष्ठम् भूमिका ५०-५१ ५१-५७ ५७-५८ ५०-६१ ६१-६४ ६४-६५ ६५-६६ ६६-६७ ६७-६८ ६८-६६ ६६ ६६-७० ७०-७७ ७७-७- ... १ समुल्लास: ॥ ईश्वरनामव्याख्या मङ्गलाचरणसमीक्षा २ समुल्वासा ॥ पालशिक्षाविषयः भूतप्रेतादिनिषेधः जन्मपत्रसूर्यादिग्रहसमीक्षा" ३ समुल्लासः॥ अध्ययनाऽध्यापनविषयः गुरुमन्त्रव्याख्या प्राणायामशिक्षा यज्ञपात्राकृतयः सन्ध्याग्निहोत्रोपदेशः होमफलनिर्णयः उपनयनसमीक्षा ब्रह्मचर्योपदेशः ब्रह्मचर्यकृत्यवर्णनम् पञ्चधापरीक्ष्याच्या निम् 'ठनपाठनविशेषविधिः प्रन्धप्रामाण्याप्रामाण्यवि० स्त्रीशुदाध्ययनविधिः ४ समुन्लास: ॥ समावर्तनविषयः दूरदेशे विवाहकरणम् विवाहे स्त्रीपुरुषपरीक्षा १-४ अल्पवयसि विवाहनिपेयः गुणकर्मानुसारे वर्णव्यवस्था... विवाहलक्षणानि १-१३ स्त्रीपुरुषव्यवहारः १३-१४ पञ्चमहायज्ञ: पाखण्डितिरस्कारः प्रातरुत्थानादि धर्मकृत्यम्... १५-१६ पाखरिडलक्षणानि १६-१७ गृहस्थधर्माः १७-२० । पण्डितलक्षणानि मूर्खलक्षणानि विद्यार्थिकृत्यवर्णनम् २१-४७ पुनर्विवाहनियोगविषयः २१-२३ गृहाश्रमश्रेष्ठयम् २३-२४ २४ ५ समुल्नासः॥ २४-२५ वानप्रस्थविधिः संन्यासाश्रमविधिः २५-२६ २६-३२ ६ समुल्लासा ॥ ३१-३२ ३२-४० राजधर्मविषयः सभात्रयकथनम् ४३-४५ राजलक्षणानि ४५-४७ दराडव्याख्या राजकर्तव्यम् अष्टादशव्यसननिषेध ४८ मन्त्रदूतादिराजपुरुषलक्षणानि ४८-४६ / मन्त्र्यादिषु कार्यनियोगः ४६-५० | दुर्गनिर्माणव्याख्या ७६-८० ८०-८७ ... ८८-१११ ४०-४३ ... ... ८८-६१ ६१-६२ ६२ ६२-६३ :: ...

सत्यार्थप्रकाशस्य सूचीपत्रम् । :: .... । ... "५ ... १०१-१०४ सृष्ट्युत्पत्यादिविषयः विषया पृष्ठतः-पृष्ठम् विषया: शुद्धकरणप्रकार ६५-६६ ईश्वरावतारनिषेधः राजप्रजारक्षणादिविधिः ६६-६७ / जीवस्य स्वातन्त्र्यम् प्रामाधिपत्यादिवर्णनम् ६७-६८ | जीवेश्वरयोभिन्नत्ववर्णनम् करग्रहणप्रकारः ६८-६६ ईश्वरस्य सगुणनिगुणकथनम् मन्त्रकरणप्रकार १६ वेदविषयविचार: आसनादिषाड्गुण्यव्याख्या ६६-१०१ राजामित्रोदासीनशत्रुषु वर्तनम्- ८ समुन्लास॥ शत्रुभियुद्धकरणप्रकारच व्यापारादिषु राजभागकथनम् ईश्वरभिन्नायाः प्रकृतेरुपा- १०४ दानकारणत्वम् अष्टादशविवादमार्गषुधर्मेण- सृष्टौ नास्तिकमतनिराकरणम् न्यायकरणम् १०४-१०६ मनुष्याणामादिसृष्ट स्थानादिनिर्णयः साक्षिकर्तव्योपदेशः १०६-१०७ आर्यम्लेच्छादिव्याख्या साक्ष्यनृते दण्डविधिः १०७-१०८ ईश्वरस्य जगंदाधारत्वम् चौर्यादिषु दण्डादिव्याख्या १०८-१११ ६ समुल्लास: ॥ ७ सगुण्डासा ॥ विद्याऽविद्याविषयः ईश्वरविषय ११२-१३१ बन्धमोक्षविषयः ईश्वरविषये प्रश्नोत्तराणि ११२-११५ ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाः ११५-११६ १० समुल्लासः॥ ईश्वरज्ञानप्रकार: ११६ आचाराऽनाचारविषयः ईश्वरस्यास्तित्वम् १२० / भक्ष्याभक्ष्यविषयः 6. ... .. इति पूर्वार्द्धः॥ ३ A - उत्तरार्द्धः विषयाः पृष्ठत:-पृष्ठम् विपया पृष्ठता-पृष्ठ ... ... .. कवीरपन्थसमीक्षा २३२-२३३ ११ समुरखासः ॥ नानकपन्थसमीक्षा २३३-२३४ अनुभूमिका १७५ | दादूरामस्नेह्यादिपन्थसमीक्षा २३४-२३७ आर्यावर्त देशीयमतमतान्तर- गोकुलिगोस्वामिमतसमीक्षा ...२३७-२४२ खण्डनमण्डनविषयः "१७६-२५६ } स्वामिनारायणमतसमीक्षा... ... २४२-२४५ मंत्रादिलिद्धिनिराकरणम् .."१७६-१८१ | माध्यलिङ्गादितबाह्मप्रार्थ- वाममार्गनिराकरणम् " १८१-१८५ | नासमाजादिसमीक्षा २४५-२४३ अद्वैतवादसमीक्षा "२८५-१९२ | आर्यसमाजविषयः २४६ भस्मरुद्राक्षतिलकादिस० "१६२-१६५ | तन्त्रादिविषयकप्रश्नोतराषि २४१-२५३ वैष्णवमतसमीक्षा •१६५-१६८ । ब्रह्मचारिसंन्यासिसमीक्षा ... २५३-२५६ मूर्तिपूजासमीक्षा • १६८-२०३ | भार्यावर्तीयराजवंशावली २५६-२५६ पञ्चायतनपूजास० २०३-२०५ गयाश्राद्धसमीक्षा २०५ १२ समुल्लासः॥ मगन्नाथतीर्थसमीक्षा "२०५-२०७ / अनुभूमिका २६० रामेश्वरसमीक्षा २०७ / नास्तिकमतसमीक्षा २६१-२६२ कालियाकन्तसोमनाथादिसमीक्षा २०७-२०८ चारवाकमतसमीक्षा... ... २६२-२६४ द्वारिकाज्वालामुखीसमीक्षा • २०८-२०६ चारवाकादिनास्तिकभेदः २६४-२६५ • हरद्धारवद्रीनारायणादिसमीक्षा "२०६-२११ । बौद्धसौगतमतसमीक्षा २६५-२६६ गहामानसमीक्षा २११ सप्ताङ्गीस्याद्वादी २६६-२७० नामस्मरणतीर्थशब्दयोास्या २११-२१२ जैनबौद्धयोरैक्यम् २७०-२७३ गुरुमाहात्म्यसमीक्षा २१२ । श्रास्तिकनास्तिकसंवादः ... २७३-२७५ अष्टादशपुराणसमीक्षा "२१२--२१४ जगतोनादित्वसमीक्षा २७५-२७७ । शिवपुराणसमीक्षा २१४-२१५ / जैनमते भूमिपरिमाणम् २७७-२७८ भागवतसमीक्षा २१५-२१६ जीवादन्यस्य जड़त्वं पुद्गलानां- बर्यादिग्रहपूजासमीक्षा २१६-२२१ पापे प्रयोजनकत्वं च २७८-२८० मौर्वदैहिकदानादिसमीक्षा २२१-२२४ जैनधर्मप्रशंसादिसमीक्षा २८०-२६२ एकादश्यादिवतदानादिसमीक्षा २२४-२२७ जैनमतमुक्तिसमीक्षा २६२--२६३ मारणमोहनोच्चाटनवाममार्गसमीक्षा २२७-२२८ जैनसाधुलक्षणसमीक्षा २९३.-२६८ शैषमतसमीक्षा २२८-२२६ जैनतीर्थकर (२४) व्याख्या २६८-२६३ शाकवैष्णवमतसमीक्षा २२६-२३२ / जैनमते जम्बूद्वीपादिवि० २६६-३० ... ... - . ...

~~ पृष्ठत:-पृष्ट सत्यार्थप्रकाशस्य सूचीपत्रम् ॥ विषया पृष्ठता-पृष्ठ विषयाः १३ समुल्लासः॥ मत्तीरचितं इसीलाख्यम् ... मार्करचितं इजीलाख्यम् अनुभूमिका ३०४ लूकरचितं इजीलाख्यम् कश्चीनमतसमीक्षा ३०५-३१६ योहनरचितसुसमाचारः लयव्यवस्थापुस्तकम् ३१६--३२१ योहनप्रकाशितवाक्यम् हाणनपुस्तकम् ३२१-३२२ लमुपलाण्यस्य द्वितीय पुस्तकम् ३२२ १४ समुल्लासा॥ राज्ञां पुस्तकम् ३२२ अनुभूमिका कालवृत्तस्य १ पुस्तकम् ३२२-३२३ 'ऐयूवाख्यस्य पुस्तकम् ३२३ यवनमतकुरानाख्यसमीक्षा छपदेशस्य पुस्तकम् ३२३ / स्वमन्तव्यामन्तव्यविषयः ३२३-३ ३ ३ ३३४-३ ३३५-३१ ... .. ३६ ३४५-३० ३६०-३६ ... इत्युत्तरार्द्धः॥ ~ -- ओ३म् सच्चिदानन्देश्वराय नमो नमः २२३ भूमिका ४३ ३४ १ ४ जिस समय मैंने यह ग्रन्थ "सत्यार्थप्रकाश" बनाया था उस समय और उससे पूर्व संस्कृत भाषण करने, पठनपाठन में संस्कृत ही बोलने और जन्मभूमि की भाषा गुजराती होने के कारण से मुझको इस भाषा का विशेष परिज्ञान न था, इससे भाषा अशुद्ध बन गई थी। अब भाषा बोलने और लिखने का अभ्यास हो गया है। इसलिये इस ग्रन्थ को भापाव्याकरणानुसार शुद्ध करके दूसरी बार छपवाया है कहीं २ शब्द, वाक्य, रचना का भेद हुआ है सो करना उचित था क्योंकि इसके भेद किये विना भापा की परिपाटी सुधरनी कठिन थी; परन्तु अर्थ का भेद नहीं किया गया है प्रत्युत विशेष तो लिखा गया है। हां जो प्रथम छपने मे कहीं २ भूल रही थी वह निकाल शोधकर ठीक २ करदी गई है। यह ग्रन्थ १४ (चौदह ) समुल्लास अर्थात् चौदह विभागो मे रचा गया है । इस में १० (दश) समुल्लास पूर्वार्द्ध और ४ (चार) उत्तरार्द्ध में बने हैं, परन्तु अन्त्य के दो समुल्लास और पश्चात् स्वसिद्धान्त किसी कारण से प्रथम नहीं छप सके थे अब वे भी छपवा दिये हैं ॥ ( १ ) प्रथम समुल्लास में ईश्वर के ओंकारादि नामों की व्याख्या । ( २ ) द्वितीय समुल्लास में सन्तानों की शिक्षा । (३) तृतीय समुल्लास में ब्रह्मचर्य, पठनपाठन व्यवस्था, सत्यासत्य ग्रन्थों के नाम और पढ़ने पढ़ाने की रीति । ( ४ ) चतुर्थ समुल्लास में विवाह और गृहाश्रम का व्यवहार । ( ५ ) पञ्चम समुल्लास में वानप्रस्थ और संन्यासाश्रम की विधि । ( ६ ) छठे समुल्लास में राजधर्म । (७ ) सप्तम समुल्लास में वेदेश्वर विषय ( ८ ) अष्टम समुल्लास में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय । (8) नवम समुल्लास में विद्या, अविद्या, वन्ध और मोक्ष की व्याख्या । (१०) दशवें समुल्लास में प्राचार, अनाचार और भक्ष्याभक्ष्य विपय । (११) एकादश समुल्लास में आर्यावर्तीय मतमतान्तर का खण्डन मण्डन विषय । (१२) द्वादश समुल्लास में चार्वाक, वौद्ध और जैनमत का विषय । (१३) त्रयोदश समुल्लास में ईसाईमत का विषय । (१४) चौदहवें समुल्लास में मुसलमानों के मत का विषय । और चौदह समुल्लासों के अन्त में श्राों के सनातन वेदविहित मत की विशेषतः व्याख्या लिखी है, जिसको . मैं भी यथावत् मानता हूं। , भूमिका मेरा इस ग्रन्थ के बनाने का मुख्य प्रयोजन सत्य २ अर्थ का प्रकाश करना है अर्थात् जो सत्य है उसको सत्य और जो मिथ्या है उसको मिथ्या ही प्रतिपादन करना सत्य अर्थ का प्रकाश समझा है। वह सत्य नहीं कहाता जो सत्य के स्थान में असत्य और असत्य के स्थान में सत्य का प्रकाश किया जाय । किन्तु जो पदार्थ जैसा है उसको वैसा ही कहना लिखना और मानना सत्य कहाता है। जो मनुष्य पक्षपाती होता है वह अपने असत्य को भी सत्य और दूसरे विरोधी मत वाले के सत्य को भी असत्य सिद्ध करने में प्रवृत्त होता है इसलिये वह सत्य मत को प्रात नहीं हो सकता । इसीलिये विद्वान् आतों का यही मुख्य काम है कि उपदेश वा लेखद्वारा सव मनुष्यो के सामने सत्यासत्य का स्वरूप समर्पित करदें, पश्चात् वे स्वयं अपना हिताहित समझकर सत्यार्थ का ग्रहण और मिथ्यार्थ का परित्याग करके सदा श्रानन्द में रहैं । मनुष्य का आत्मा सत्यासत्य का जाननेवाला है। तथापि अपने प्रयोजन की सिद्धि, हठ, दुराग्रह और अविद्यादि दोयो से सत्य को छोड़ असत्य मे कुक जाता है। परन्तु इस ग्रन्थ में ऐसी बात नही रकवी है और न किसी का मन दुखाना वा किसी की हानि पर तात्पर्य है। किन्तु जिससे मनुष्यजाति की उन्नति और उपकार हो, सत्यासत्य को मनुष्य लोग जानकर सत्य का ग्रहण और असत्य का परित्याग करें क्योकि सत्योपदेश के विना अन्य कोई भी मनुष्यजाति की उन्नति का कारण नहीं है। इस ग्रन्थ में जो कहीं २ भूल चूक से अथवा शोधने तथा छापने मे भूल चूक रह जाय उसको जानने जनाने पर जैसा वह सत्य होगा वैसा ही कर दिया जायगा। और जो कोई पक्षपात से अन्यथा शंका वा खण्डन मण्डन करेगा उस पर ध्यान न दिया जायगा । हां जो वह मनुष्यमात्र का हितैपी हो- कर कुछ जनावेगा उसको सत्य सत्य समझने पर उसका मत संगृहीत होगा। यद्यपि आजकल बहुतसे विद्वान् प्रत्येक मतों में हैं वे पक्षपात छोड़ सर्वतन्त्र सिद्धान्त अर्थात् जो २ बातें सव के अनुकूल सव सत्य हैं उनका ग्रहण और जो एक दूसरे से विरुद्ध बातें हैं उनका त्याग कर परस्पर प्रीति से वर्ते व वें तो जगत् का पूर्ण हित होवे । क्योंकि विद्वानों के विरोध से अविद्वानों मे विरोध बढ़ कर अनेक- विध दुःख की वृद्धि और सुख की हानि होती है । इस हानि ने, जोकि स्वार्थी मनुष्यो को प्रिय है, सव मनुष्यों को दुःखसागर में दुवा दिया है । इनमे से जो कोई सार्वजनिक हित लक्ष्य मे धर प्रवृत्त होता है उससे स्वार्थी लोग विरोध करने में तत्पर होकर अनेक प्रकार विघ्न करते हैं। परन्तु "सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः' अर्थात् सर्वदा सत्य का विजय और असत्य का पराजय और सत्य ही से विद्वानों का मार्ग विस्तृत होता है, इस दृढ़ निश्चय के आलम्वन से प्राप्त लोग परोपकार करने से उदासीन होकर कभी सत्यार्थप्रकाश करने से नहीं हटते। यह बड़ा दृढ़ निश्चय है कि “यत्तदने विपमिव परिणामेऽमृतोपमम्” यह गीता का वचन है इसका अभिप्राय यह है कि जो २ विद्या और धर्मप्राप्ति के कर्म हैं वे प्रथम करने में विष के तुल्य और पश्चात् अमृत सदृश होते हैं। ऐसी वातों को चित्त में घर के मैंने इस ग्रन्थ को रचा है। श्रोता वा पाठकगण भी प्रथम प्रेम से देख के इस ग्रन्थ का सत्य २ तात्पर्य जानकर यथेष्ट करें। इसमें यह अभिप्राय रक्खा गया है कि जो जो सब मतों में सत्य २ बातें हैं वे २ सब में अविरुद्ध होने से उनका स्वीकार करके जो २ मतमतान्तरों में मिथ्या वाते हैं उन २ का खण्डन किया है । इसमें यह भी अभिप्राय रक्खा है कि जव मतमतान्तरो की गुप्त वा प्रकट वुरी वातों का प्रकाश कर विद्वान् अविद्वान् सव साधारण मनुष्यो के सामने रक्खा है, जिससे सव से लव का विचार होकर परस्पर प्रेमी हो के एक सत्य मतस्थ होवें । यद्यपि मैं आर्यावर्त देश में उत्पन्न हुश्रा और वसता हूं तथापि जैसे इस देश के मतमतान्तरों की झूठी बातों का पक्षपात न कर याथातथ्य प्रकाश करता हूं वैसे ही दूसरे देशस्थ वा मतोन्नतिवालों के साथ भी वर्त्तता हूं जैसा स्वदे के .

भूमिका ।। शवालों के साथ मनुष्योन्नति के विषय में वर्त्तता हूं वैसा विदोशयों के साथ भी तथा सव सज्जनों को भी वर्तना योग्य है। क्योंकि मैं भी जो किसी एक का पक्षपाती होता. तो जैसे आजकल के स्वमत की स्तुति, मण्डन और प्रचार करते और दूसरे मत की निन्दा, हानि और बन्द करने में तत्पर होने है वैसे मैं भी होता, परन्तु ऐसी बातें मनुष्यपन से बाहर हैं । क्याकि जैसे पशु बलवान् होकर निर्वलों को दुःख देते और मार भी डालते हैं । जब मनुष्य शरीर पाके चैसा ही कर्म करते हैं तो वे मनुष्यस्वभावयुक्त नहीं किन्तु पशुवत् हैं । और जो बलवान होकर निर्वलों की रक्षा करता है वही मनुष्य कहाता है और जो स्वार्थवश होकर परहानिमात्र करता रहता है वह जानों पशुओं का भी बड़ा भाई है। श्रव पायर्याव- त्तियों के विषय में विशेषकर ११ ग्यारहवे ससुल्लास तक लिखा है । इन . समुल्लासों में जो कि सत्यमत प्रकाशित किया है वह वेदोक्त होने से मुझ को सर्वथा मन्तव्य है। और जो नवीन पुराण तन्त्रादि प्रन्थोक्त बातों का खण्डन किया है वे त्यक्तव्य हैं । जो १२ वारहवें समुल्लास में दर्शाया चार्वाक का मत यद्यपि इस समय क्षीणास्तसा है और यह चार्वाक वौद्ध जैन से बहुत सम्बन्ध अनीश्वरवादादि में रखता है। यह चार्वाक सब से बड़ा नास्तिक है। उसकी चेष्टा का रोकना अवश्य है। क्योंकि जो मिथ्या बात न रोकी जाय तो संसार में बहुत से अनर्थ प्रवृत्त हो जायें। चार्वाक का जो मत है वह तथा बौद्ध और जैन का जो मत है वह भी १२ व समुल्लास में संक्षेप से लिखा गया है। और बौद्धों तथा जैनियों का भी चार्वाक के मत के साथ मेल है और कुछ थोडासा विरोध भी है। और जैन भी बहुत से अंशों में चार्वाक और बौद्धों के साथ मेल रखता है और थोड़ीसी बातों में भेद है । इसलिये जैनों की भिन्न शाखा गिनी जाती है। यह भेद १२ वारहवें समुल्लास में लिख दिया है यथायोग्य वही समझ लेना । जो इसका भेद है सो २ वारहवें समुल्लास मे दिखलाया है बौद्ध और जैन मत का विषय भी लिखा है। इनमें से बौद्धों के दीपवंशादि प्राचीन ग्रन्थों में बौद्धमतसंग्रह सर्वदर्शनसंग्रह में दिखलाया है उसमें से यहां लिखा है और जैनियों के निम्नलिखित सिद्धान्तों के पुस्तक हैं उनमें से चार मूल सूत्र, जैसे- १ श्रावश्यकसूत्र, २ विशेष श्रावश्यकसूत्र, ३ दशवैकालिकसूत्र और ४ पाक्षिकसूत्र ॥ ११ (ग्यारह) अङ्ग, जैसे-१ आचारांगसूत्र, २ सुगडांगसूत्र, ३ थाणगसूत्र, ४ समवायांगसूत्र, ५ भगवतीसूत्र, ६ शाताधर्म- कथासूत्र, ७ उपासकदशासूत्र, ८ अन्तगड़दशासूत्र, ६ अनुत्तरोववाईसूत्र, १० विपाकसूत्र, ११ प्रश्नव्या- करणसूत्र ॥ १२ (वारह) उपांग, जैसे-१ उपवाईसूत्र, २ रायपसेनीसूत्र, ३ जीवाभिगमसूत्र, ४ पन्नवणा- सूत्र, ५ जंबुद्धीपपन्नतीसूत्र, ६ चन्दपन्नतीसूत्र, ७ सूरपन्नतीसूत्र, ८ निरियावलीसूत्र, ६ कप्पियासूत्र, १० कपवड़ीसयासूत्र, ११ पूपियासूत्र और १२ पुष्यचूलियासूत्र ॥ ५ कल्पसूत्र, जैसे-१ उत्तराध्ययनसूत्र, २ निशीयसूत्र, ३ कल्पसूत्र, ४ व्यवहारसूत्र ओर ५ जीतकल्पसूत्र ॥ छः छेद, जैसे-१ महानिशीथबृहद्वाच- नासूत्र, २ महानिशीथलघुवाचनासूत्र, ३ मध्यपवाचनासूत्र, ४ पिंडनिरुक्तिसूत्र, ५ोघनिरुक्तिसूत्र, ६ पर्दा षणासूत्र ॥ १० (दश) पयन्नासूत्र, जैसे-१ चतुस्सरणसूत्र, २ पच्चखाणसूत्र, ३ तदुलवैयालिकसूत्र, ४ भक्तिपरिज्ञानसूत्र, ५ महाप्रत्याख्यानसूत्र, ६ चंदाविजयसूत्र, ७ गणीविजयसूत्र, ८ मरणसमाविसूत्र, ६ देवेन्द्रस्तमनसूत्र और १० संसारसूत्र तथा नन्दीसूत्र योगोद्धारसूत्र भी प्रामाणिक मानते हैं ॥ ५ पंञ्चाङ्ग, जैसे-१ पूर्व सब ग्रन्थों की टीका, २ निरुक्ति, ३ चरणी, ४ भाष्य, ये चार अवयव और सब मूल । मिलके पंचांग कहाते हैं, इनमें ढूंढिया अवयवो को नहीं मानते और इनसे भिन्न भी अनेक ग्रन्थ हैं कि । जितको जैनी लोग मानते हैं। इनके मत पर विशेष विचार १२ (वारहवें ) समुल्लास मे देख लीजिये जैनियों के ग्रन्थों में लाखों पुनरुक्त दोष हैं। और इनका यह भी स्वभाव है कि जो अपना ग्रन्थ दूसरे मत पाले के हाथ में हो वा छपा हो तो कोई २ उस ग्रन्थ को अप्रसाण कहते हैं । यह वात उनकी दे है क्योंकि जिसको कोई माने कोई नही इससे वह ग्रन्थ जैनमत से बाहर नही हो सकता। हां! न है भूमिका कोई न माने और न कभी किसी जैनी ने माना हो तब तो अग्राह्य हो सकता है। परन्तु ऐसा कोई ग्रन्थ नहीं है कि जिसको कोई भी जैनी न मानता हो इसलिये जो जिस ग्रन्थ को मानता होगा उस प्रन्थस्थ विषयक खण्डन मण्डन भी उसी के लिये समझा जाता है। परन्तु कितने ही ऐसे भी हैं कि उस ग्रन्थ को मानते जानते हों तो भी सभा वा संवाद में यदल जाते हैं इसी हेतु से जैन लोग अपने ग्रन्थों को छिपा रखते हैं। और दूसरे मतस्थ को न देते न सुनाते और न पढ़ाते इसलिये कि उनमें ऐसी २ असम्भव बातें भरी हैं जिनका कोई भी उत्तर जैनियों में से नही दे सकता। झूठ वातको छोड़ देना ही उसर है ॥ १३ वें समुल्लास में ईसाइयों का मत लिखा है । ये लोग वायविल को अपना धर्मपुस्तक मानते । इनका विशेष समाचार उसी १३ तेरहवें समुल्लास में देखिये । और १४ चौदहवें समुन्नाल में मुसल- मानों के मत विषय में लिखा है ये लोग कुरान को अपने मत का मूलपुस्तक मानते हैं। इन का भी विशेष व्यवहार १४ वे समुल्लास में देखिये । और इसके आगे वैदिक मत के विषय में लिखा है। जो कोई इसे ग्रन्थकर्ता के तात्पर्य से विरुद्ध मनसा से देखेगा उसको कुछ भी अभिप्राय विदित न होगा। क्योंकि घाक्यार्थबोध मे चार कारण होते हैं, आकाङ्क्षा, योग्यता, श्रासत्ति और तात्पर्य । जव इन चारों यार' पर ध्यान देकर जो पुरुष ग्रन्थ को देखता है तव उसको ग्रन्थ का अभिप्राय यथायोग्य विदित होता है आकाक्षा" किसी विषय पर वक्ता की और वाक्यस्थपदो की आकांक्षा परस्पर होती है । “योग्यता यह कहाती है कि जिससे जो होसके जैसे जल से सीचना । "श्रासत्ति" जिस पद के साथ जिसव सम्बन्ध हो उसी के समीप उस पद को बोलना वा लिखना। "तात्पर्य' जिसके लिये वक्ता ने शब्द च्चारण वा लेख किया हो उसी के साथ उस वचन वा लेख को युक्त करना।. बहुतसे हठी दुराग्रह मनुष्य होते हैं कि जो वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध कल्पना किया करते हैं, विशेषकर मत वाले लोग क्योकि मत के श्राग्रह से उनकी बुद्धि अन्धकार मे फंस के नष्ट हो जाती है । इसलिये जैसा मैं पुराण जैनियों के ग्रन्थ, वायविल और कुरान को प्रथम ही बुरी दृष्टि से न देखकर उनमे से गुणो का प्रहर और पी का त्याग तथा अन्य मनुष्यजाति की उन्नति के लिये प्रयत्न करता हूं, वैसा सव को कर योग्य है । इन मतो के थोड़े २ ही दोष प्रकाशित किये हैं जिनको देखकर मनुष्य लोग सत्यासत्य मर का निर्णय कर सके और सत्य का ग्रहण तथा असत्य का त्याग करने कराने में समर्थ हो । क्योंकि एक मनुष्यजाति मे वहका कर, विरुद्ध बुद्धि कराके, एक दूसरे को शत्रु वना, लड़ा मारना विद्वानों स्वभाव से वहिः है । यद्यपि इस ग्रन्थ को देखकर अविद्वान् लोग अन्यथा ही विचारेंगे तथापि बुद्धिमान लोग यथायोग्य इसका अभिप्राय समझेगे । इसलिये मैं अपने परिश्रम को सफल समझता और अपन अभिप्राय सब सज्जनो के सामने धरता हूं। इसको देख दिखला के मेरे श्रम को सफल करे । और इस प्रकार पक्षपात न करके सत्यार्थ का प्रकाश करना मेरा वा सव महाशयो का मुख्य कर्त्तव्य काम है सर्वात्मा सर्वान्तर्यामी सच्चिदानन्द परमात्मा अपनी कृपा से इस श्राशय को विस्तृत और चिरस्थायी करे ॥ अलमति विस्तरेण बुद्धिमद्वरशिरोमणिषु ॥ ॥ इति भूमिका ॥ - - t स्थान महाराणाजी का उदयपुर, } (स्वामी) दयानन्दसरस्वती.

१ * ओ३म् * CRICICILICILICHICICO सच्चिदानन्देश्वराय नमो नमः 26 262636060 රට अथ सत्यार्थप्रकाशः भधासमुद्रासः श्रोम् शन्नो मित्रः शं वरुणः शन्नौ भवत्वयंमा । शन्न इन्द्रो वृहस्पतिः शो विष्णु- रुरुक्रमः ॥ नमो ब्रह्मणे नमस्ते बायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि मतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु तद्वकारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारम् ॥ ओ३म् शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः ॥ १॥ अर्थ-(ओ३म् ) यह ओंकार शब्द परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम है क्योंकि इसमें जो अ, उ और म् तीन अक्षर मिलकर एक (ओम् ) समुदाय हुआ है । इस एक नाम से परमेश्वर के बहुत माम आते हैं, जैसे-अकार से विराट्, अग्नि और विश्वादि । उकार से हिरण्यगर्भ, वायु और तैजसादि। मकार से ईश्वर, आदित्य और प्राज्ञादि नामों का वाचक और ग्राहक है। उसका ऐसा ही वेदादि सत्य- शास्त्रों में स्पष्ट व्याख्यान किया है कि प्रकरणानुकूल ये सब नाम परमेश्वर ही के हैं । (प्रश्न ) परमेश्वर से भिन्न अर्थों के वाचक विराट आदि नाम क्यो नही ? ब्रह्माण्ड, पृथिवी आदि भूत, इन्द्रादि देवता और वैद्यकशास्त्र में शुण्ठ्यादि ओपधियो के भी ये नाम हैं वा नहीं ? (उत्तर) हैं, परन्तु परमात्मा के भी हैं । ( प्रश्न ) केवल देवों का ग्रहण इन नामों से करते हो वा नही ? (उत्तर) आपके ग्रहण करने में क्या प्रमाण है ? ( प्रश्न ) देव सब प्रसिद्ध और वे उत्तम भी हैं इससे मैं उनका ग्रहण करता हूं। ( उत्तर ) क्या परमेश्वर अप्रसिद्ध और उससे कोई उत्तम भी है ? पुनः ये नाम परमेश्वर के भी क्यों नही मानते ? जब परमेश्वर अप्रसिद्ध और उसके तुल्य भी कोई नही तो उससे उत्तम कोई क्योंकर हो सकेगा, इससे आपका यह कहना सत्य नहीं । क्योकि आपके इस कहने में बहुतसे दोप भी आते हैं जैसे-"उपस्थितं परित्यज्यानुपस्थितं याचत इति बाधितन्यायः” किसी ने किसी के लिये भोजन का पदार्थ रख के कहा कि आप भोजन कीजिये और वह जो उसको छोड़ के अप्राप्त भोजन के लिये जहां तहां भ्रमण करे। उसको बुद्धिमान् न जानना चाहिये क्योकि वह उपस्थित नाम समीप प्राप्त हुए पदार्थ को छोड़ के अनुपस्थित अर्थात् अप्राप्त पदार्थ की प्राप्ति के लिये श्रम करता है। इसलिये जैसा वह पुरुष बुद्धिमान नहीं वैसा ही आपका कथन हुआ। क्योंकि भाप उन विराट् प्रादि नामों के जो प्रसिद्ध प्रमाणसिद्ध परमेश्वर और ब्रह्माण्डादि उपस्थित अर्थों का परित्याग करके असम्भव और अनुपस्थित ?

सत्यार्थप्रकाश www.man. AhArA Arrrrrrrrrrrr- देवादि के ग्रहण में श्रम करते हैं। इसमें कोई भी प्रमाण वा युक्ति नहीं । जो आप ऐसा कहें कि जहां जिसका प्रकरण है वहां उसी का ग्रहण करना योग्य है, जैसे किसी ने किसी से कहा कि "हे भृत्य त्वं सैन्धवमानय" अर्थात् तू सैन्धव को ले श्रा, तब उसको समय अर्थात् प्रकरण का विचार करना अवश्य है क्योकि सैन्धव नाम दो पदार्थों का है एक घोड़े और दूसरे लवण का । जो स्वस्वामी का गमनसमय हो तो घोड़े और भोजनकाल हो तो लवण को ले आना उचित है। और जो गमनसमय में लवण और भोजनसमय मे घोड़े को ले आवे तो उसका स्वामी उस पर क्रुद्ध होकर कहेगा कि तू निर्बुद्धि पुरुष है । गमनसमय मे लवण और भोजनकाल में घोड़े के लाने का क्या प्रयोजन था ? तू प्रकरणवित् नहीं है नही तो जिस समय मे जिसको लाना चाहिये था उसी को लाता । जो तुझ को प्रकरण का विचार करना आवश्यक था वह तूने नहीं किया, इससे तू मूर्ख है, मेरे पास से चला जा। इससे क्या सिद्ध हुआ कि जहां जिसका ग्रहण करना उचित हो वहां उसी अर्थ का ग्रहण करना चाहिये तो ऐसा ही हम और आप सब लोगो को मानना और करना भी चाहिये । - अथ मन्त्रार्थः ओ३म् खम्ब्रह्म ॥ १॥ यजुः अ० ४० । मं० १७ ॥ देखिये वेदों मे ऐसे २ प्रकरणों में 'ओम्' आदि परमेश्वर के नाम हैं। श्रोमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ॥ २॥ छान्दोग्य उपनिषत् [मं० १] श्रोमित्येतदक्षरमिदछ सर्व तस्योपव्याख्यानम् ॥ ३ ॥ माण्डूक्य [ मं० १] सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपार्थसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ ४ ॥ कठोपनिषदि [ वल्ली २ । मं० १५ ] प्रशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि । रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुष परम् ॥ ५ ॥ एतमग्नि वदन्त्येक मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ६ ॥ मनु० अ० १२ [ श्लो० १२२ । १२३ ] स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः खराट् । स इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः ॥ ७ ॥ कैवल्य उपनिषत् ॥ इन्द्र मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यस्स सुपर्णो गुरुत्मान् । एक सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ ८ ॥ ऋ० सं० १ । सू० १६४ । मं०४६ ॥ भूरसि भूमिनस्यदितिरसि विश्वाया विश्वस्य॒ भुवनस्य धर्ती । पृथिवीं यच्छ पृथिवीं इथंह पृथिवीं मा हिथ्सीः ॥ ६ ॥ यजुः अ० १३ । मं० १८ ॥ इन्द्रो मह्ना रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः सूर्य्यमरोचयत् । इन्द्रेह विश्वा भुवनानि येमिर इन्द्रे' श्वानास इन्दवः ॥ १० ॥ सामवेद प्रपा० ६ । त्रिक ८ । मं० २ ॥ प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशै । यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन्त्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ११ ॥ अथर्ववेद काण्ड ११ । अ० २ । सू० ४ । मं० १ ॥ - प्रथमसमुल्लास अर्थ-यहां इन प्रमाणों के लिखने में तात्पर्य यही है कि जो ऐसे २ प्रमाणों में ओंकारादि नामों से परमात्मा का ग्रहण होता है यह लिख पाये। तथा परमेश्वर का कोई भी नाम अनर्थक नही । जैसे लोक में दरिद्री आदि के धनपति श्रादि नाम होते हैं । इससे यह सिद्ध हुआ कि कहीं गौणिक, कहीं कार्मिक और कहीं स्वाभाविक ार्थो के वाचक हैं । "श्रोम्" श्रादि नाम सार्थक हैं जैसे ( ओं वं०) "अवतीत्योम् , अाकाशमिव व्यापकत्वात् खम्, सर्वेभ्यो बृहत्वाद् ब्रह्म' रक्षा करने से ( श्रो३म् ) आका- शवत् व्यापक होने से ( खम् ) और सब से बड़ा होने से (ब्रह्म) ईश्वर का नाम है ॥ १॥ (ोभि- त्येत० ) (ओ३म् ) जिसका नाम है और जो कभी नष्ट नहीं होता उसी की उपासना करनी योग्य है अन्य की नही ॥२॥ (श्रोमित्येत ) सर वेदादि शास्त्रों में परमेश्वर का प्रधान और निज नाम (ओ३म् ) को कहा है अन्य सव गौणिक नाम हैं ॥ ३॥ (सर्व वेदा० ) क्योंकि सब वेद सब धर्मा- नुष्ठानरूप त पश्चरण जिसका कथन और मान्य करते और जिसकी प्राप्ति की इच्छा करके ब्रह्मचर्याश्रम करते हैं उसका नाम “ओ३म् ' है ॥ ४ ॥ (प्रशासिता० ) जो सव को शिक्षा देनेहारा, सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्वप्रकाशस्वरूप, समाधिस्थ वुद्धि से जानने योग्य है, उसको परमपुरुप जानना चाहिये ॥ ५॥ और स्वप्रकाश होने से "अग्नि" विज्ञान- खरूप होने से "मनु" सव का पालन करने से "प्रजापति" और परमैश्वर्यवान् होने से “इन्द्र" सव का जीवनमूल होने से "प्राण" और निरन्तर व्यापक होने से परमेश्वर का नाम "ब्रह्म' है ॥ ६॥ (स ब्रह्मा स विष्णु:०) सव जगत् के बनाने से "ब्रह्मा" सर्वत्र व्यापक होने से "विष्णु" दुष्टों को दण्ड देके रुलाने से "रुद्र" मङ्गलमय और सब का कल्याणकर्ता होने से “शिव" "यः सर्वमश्नुते न क्षरति न विनश्यति तदक्षरम्" ॥ १ ॥ “यः स्वयं राजते स खराट् ॥ २॥ योऽग्निरिव कालः कलयिता प्रलयकर्ता स कालाग्निरीश्वरः" ॥ ३ ॥ (अक्षर) जो सर्वत्र व्याप्त अविनाशी (स्वराट् ) स्वयं प्रकाशस्वरूप और (कालाग्निक) प्रलय में सव का काल और काल का भी काल है इसलिये परमेश्वर का नाम कालाग्नि है ॥७॥ (इन्द्रं मित्रं ) जो एक अद्वितीय सत्यवहा वस्तु है उसी के इन्द्रादि सव नाम हैं। "धुषु शुद्धेपु पदार्थेषु भवो दिव्यः " "शोभनानि पर्णानि पालनानि पूर्णानि कर्माणि वा यस्य सः” “यो गुर्वात्मा स गरुत्मान्” “यो मातरिश्वा वायुरिव बलवान् स मातरिश्वा' (दिव्य ) जो प्रकृत्यादि दिव्य पदार्थों में व्याप्त (सुपर्ण ) जिसके उत्तम पालन और पूर्ण कर्म हैं (गरुत्मान् ) जिसका आत्मा अर्थात् स्वरूप महान् है ( मातरिश्वा ) जो वायु के समान अनन्त बलवान् है इसलिये परमात्मा के दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान् और मातरिश्वा ये नाम हैं। शेष नामी का अर्थ आगे लिखेंगे ॥ ८॥ ( भूमिरसि०) "भवन्ति भूतानि यस्यां सा भूमिः" जिसमें सव भूत प्राणी होते हैं इसलिये ईश्वर का नाम “भूमि" है। शेष नामों का अर्थ आगे लिखेगे ॥ ६॥ (इन्द्रो मना० ) इस मन्त्र मे इन्द्र परमेश्वर ही का नाम है इसलिये यह प्रमाण लिखा है ॥ १०॥ (प्राणाय) जैसे प्राण के वश सब शरीर और इन्द्रियां होती हैं वैसे परमेश्वर के वश में सब जगत् रहता है ॥ ११ ॥ इत्यादि प्रमाणो के ठीक २ अर्थों के जानने से इन नामों करके परमेश्वर ही का ग्रहण होता है। क्योकि ओ३म् और अन्यादि नामों के मुख्य अर्थ से परमेश्वर ही का ग्रहण होता है। जैसा कि व्याकरण, निरुक्त, ब्राह्मण, सूत्रादि ऋषि मुनियो के व्याख्यानो से परमेश्वर का ग्रहण देखने मे आता है वैसा ग्रहण करना सब का योग्य है परन्तु "ओ३म्" यह तो केवल परमात्मा ही का नाम है और अश्शि आदि नामो से परमेश्वर के ग्रहण में प्रकरण और विशेपण नियम- कारक हैं। इससे क्या सिद्ध हुआ कि जह! २ स्तुति, प्रार्थना, उपासना, सर्वज्ञ, व्यापक, शुद्ध, सनातन और सृष्टिकर्ता आदि विशेपण लिखे हैं वही वही इन नामो से परमेश्वर का ग्रहण होता है और जहां २ ऐसे प्रकरण हैं कि - 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शन मिनहाना अपसगुना तद्धित करने से "तेजस" शन्द सिर रोताहै।मो भाप स्वयंप्रकारा और सूप्यादि जस्ती तोर का प्रकाश करनेवाला है इससे उस पर फा नाम "र" है । इत्यादि नामार्य उकारमात्र से प्रहल होते हैं। (श ऐश्वर्य ) इस धानुन "र" शब्द लिन्द्र होता है । "पष्ट संश्वर्यवान् वर्ततेस ईश्वरः" जिसका नत्य विचारशील दान बार जन्त पश्चर्य नर उस परमात्मा का नाम "बर" है। (दो अपराउने ) इस धातु से अधिनि ' और इगन नदिन करने से "आदित्य" गलभित्र होता है। न विराने पिनाया गन्य साध्य मानः + दितिय नायिः" मका पिनाश कभी न हो उसी ईश्वर की " अादित्य " संजा। (बा अगाधन) "" कम गनुस "3" और इसस तदित पारने से "प्रार ।" यः प्रपनया चमचमाजमना व्यवदार जानाति स प्रमा+प्रस एप प्राम:" जो निति धानात पय धगम्याग के पदार को यथावत् जानता है इससे ईश्वर का नाम "प्रार" है । इत्यादि नामा मकार से गति नाम एफ २ मात्रा से तीन २ अर्थ यहां व्याख्यात फिर नमी अन्य नामानी मोगाराने जाते हैं। सा (अन्ना मित्राश २०) इस मन्त्र में मिप्रादि नाम भी परमेश्वर याफिनाल, प्रार्थना, उपामना भी की की जाती है। श्रेष्ट इसको नेताम, कर्म, मार मारपत्य सत्य यवहारों में सबसे अधिक हो । उन सपथेष्टों में भी जो अन्यन्त श्रेष्ठ उस परमेश्वर फान है। जिसके तुल्याई न हुमा, न है और न होगा ! जब तुल्य नही तो उनन कि कार हो सकता है? जैम परमेश्वर के सत्य न्याय, दया, सर्वसामय पर सर्वतत्वादि अनन्त गुग बने अन्य शिनी सद पदार्थ या जीव के नहीं हैं। जो पदार्थ सत्य हं उसके गुण कमी बनाना मत्य दाते हैं इमलिये मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करे, उससे मित्र को कभी न करें क्योंकि प्रया, विएए, महादेव नामक पूर्वज महाशय विज्ञान, दन्य दानधादि निजट मनुष्य और अन्य माधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर ही में विश्वास करके उनी तन्तुनि, माना गोर उपासना फर्ग, उनसे भिा की नहीं की। पैसे हम सब को करना योग्य है । इसका विशेषनार मुनि आर उपासना विषय में किया जायगा। (प्रश्न ) मित्रादि नामों से सपा और इन्द्रादि दयों के मासिव व्यवहार देखने से उन्दी का ग्रहण करना चाहिये । (उत्तर) यहां उनका प्रदान करना योग्य नहीं स्यापि जो मनुष्य किसी का मित्र है वही अन्य का शत्रु और किसी से उदासीन भी बनने में माता है । इससे मुल्यार्थ में ससा आदि का ग्रहण नहीं हो सकता। किन्तु जैसा परमेश्वर सब जगत् का निशित मित्र, न किसी का और न किसी से उदासीन है, इसस भिर कोई भी जीव इस प्रकार का फी नदी हो सफ्ता । इसलिये परमात्मा ही का ग्रहण यहां होता है। हां! गाण अर्थ में मित्रादि शब्द से मुघदादि मनुष्यों का ग्रहण होता है। (निमिदा स्नेहने ) इस धातु से श्रोणादिक "क्तू" प्रत्यय के होने से "मित्र" शब्द सिर होता है। "मेद्यति स्लिाति स्निगते वा स मित्रः" जो सब से स्नेह करके और सब को प्रीति करने योग्य है इससे उस परमेश्वर का नाम मित्र है (वृञ् वरण, वर सायाम् ) इन धातुओं से उणादि " उनन् प्रत्यय होने से “वरुण" शब्द सिद्ध होता है । "यः सर्वान् शिष्टान् मुमुक्षन्धर्मात्मनो वृणोत्यथया यः शिष्टमुमुक्षुभिर्वात्मभिर्वियत वय॑ते वा स वरुणः परमेश्वरः" जो शात्मयोगी, विद्वान्, मुक्ति की इच्छा करने वाले मुक्त और धर्मात्माओं का स्वीकार करता, अथवा जो शिष्ट, मुमुनु, मुक्त और धर्मात्माओं से ग्रहण किया जाता है वह ईश्वर "वरुण' संशक है। श्रथवा "वरुणो नाम वरः श्रेष्ठः" जिसलिये परमेश्वर सव से श्रेष्ठ है, इसीलिये उसका नाम "वरुण" है । (अागतिप्रापणयोः) इस धातु से “यत्" से प्रत्यय करने से "" शब्द सिद्ध होता है और "भयं' पूर्वक (माङ माने ) इस धातु से "कनिन्" प्रत्यय होने से "श्रर्यमा" शब्द सिद्ध होता है। “योऽर्यान् स्वामिना न्यायाधीशान मिमीते मान्यान २ M अपमसमुखाः 2 तदित करने से जम" शर मिस होता है। जो पाप गंगकारा और पूर्णादि तेजस्वी लोगों का प्रकाश करनेवाला इससे उमर फा माग " । त्यादि नामा उकारमात्र होते हैं। (शिव) म धातु मे "र" द नित नांगा 1 "सर्वश्वर्यवान, पर्गत ए वरः" जिला सत्य विचारशील नाना नाम उन परमामा मामा " है। (दो अययाउने ) पान " निति और इमर नरिन गारने म "सारिन्य" गुल्द मित्र होता। न पिाने पिनाशी पर पांडलिंग, न यकीय गि" TAR विनाश कभी नही उसी ईश्वर की " आदित्य " संग। (सामना)"" पंफार धानु" और उसमें तरित करने से "मार राध्य मिलना , " नया गान्यता र सानाति स प्रश+प्रक्ष पर प्रात:" सो निधनानन मय गनर जगा , व्यकारको यथायण सानना है इससेयर का नाम "" है। न्यादि गागा मा मानना जन मात्रा से नीन २ अर्थ यहां न्यान्यन चि मी च नाना भी मौतार जान लागली (शनी मित्र घ०) स मन्त्र में मिलादिगार भी पस्योंकि मनुनि, प्रार्थना, उपासना भडीपी की जाती है । श्रेष्ठ उमान, जोग, कर्म, यमार बार मयमय व्यता में मर म मधिक हो । उन सब श्रेष्टों में भी जो अत्यन्त श्रेष्ठ उम्मका पार पादने । जिप तुल्प पाई न एमा, न है और न हांगा । जर तुल्य नहीं ना मनोरो साता ? सर परमेश्वर के सत्य न्याय, दया, सर्वसामर्थ्य और नगारिनन्न गुगन अन्य हिनी जर पदार्थ या जीप के नहीं हैं। जो पदार्थ सत्य है उन गुण कमी स्वभाव भी मन्यात मणिय मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही फी स्तुनि, प्रार्थना श्रोर उमानना , उनम मित्र की कमी न करें क्योंकि ग्रापा, विष्णु, महादय नामक पूर्वज महाशय बिहानदेय दानवाटिनिय मनुष्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर ही में विश्वास कर उनी की स्तुनि. पाना मार मानना फगे, उससे मिल की नहीं की। पैसे हम सर को करना यांन्यासका विशेष चिनार मुनि और उपासना विषय में किया जायगा। (प्रश्न) मित्रादि नामों से सपा और इन्द्रादियों को शामिल व्यवहार देगन से उन्हीं का प्रहण करना चाहिये । (उत्तर ) या उन प्राय करना योग्य नहीं फ्याँकि जो मनुष्य किसी का मित्र है वही अन्य फा शत्रु और किसी से उदासीन भी देगन में याता है। इसमें मुख्याध में ससा आदि का ग्रहण नहीं हो सकना । किन्तु जना परमेश्वर मर जगत् फा निश्चित मिश्र, न किसी का शह और न किसी से उदासीन है, इससे भिन्न कार्ड भी जीव पर प्रकार का फी नहीं हो सकता । इसलिये परमात्मा ही का ग्रहण यहां होता है। हां! गोग अर्थ में मित्रादि शब्द से सुहदादि मनुष्यों का प्रहण होता है । (निमिदा स्नेहने ) इस धातु से योगादिक "तु" प्रत्यय फ होने से "मित्र" शब्द सिर होता है। "मेधति स्निहाति स्निाते वा स मित्रः" जो सब स स्तर फरफ और सब को प्रीति करने योग्य है इससे उस परमेश्वर का नाम मित्र है. (वृन् वरगा, वर सायाम् ) इन धातुनों से उणादि " उनन् " प्रत्यय होने से "वरण" शब्द सिद्ध होता है । “यः सर्वान् शिष्टान् मुमतन्धर्मात्मनो वृणोत्यश्रया यः शिष्टमुमुचुमिर्धात्मभिर्वियत वय॑ते या स वरुणः परमेश्वरः" जो श्रात्मयोगी, विद्वान्, मुक्ति की इच्छा करने वाले मुक्त और धर्मात्मानों का स्वीकार करता, अथवा जो शिष्ट, मुमुनु, मुक्त और धर्मात्माओं पो.) से ग्रहण किया जाता है वह ईश्वर "वरुण" संज्ञक है। श्रथवा "वरुणो नाम वरः श्रेष्ठः" जिसलिये परमेश्वर से श्रेष्ठ है, इसीलिये उसका नाम "चरुण" है । (ब्र गतिप्रापणयोः ) इस धातु से "यत्" प्रत्यय करने से “धर्म्य" शब्द सिद्ध होता है और “अर्य' पूर्वक (माद माने ) इस धातु से “कनिन्" प्रत्यय होने से "श्रर्यमा" शब्द सिद्ध होता है। "योऽर्यान् स्वामिना न्यायाधीशान मिमीते मान्यान । -- २ में सव लिन नों से इस . भार प्रथमसमुताः तद्धित करने से "तेजस" शन्द सिर होता है। जो भाप सायंप्रकाश और म्यादि तेजस्वी लोकों का प्रकाश करनेवाला है इससे उस ईश्वर का नाम "तेजस" है । इत्यादि नामार्य उकारमात्र से प्रदान होते हैं। (ईश ऐश्वर्य) इस धातु से "घर" शब्द सिट होता है । "य संवर्यवान वसंते स ईश्वरः" जिसका सत्य विचारशीलशान घारगत पम्वर्ग इससे उस परमात्मा का नाम "र" है। (दो अपनाइने ) इस धातु मे "दिति ' पार इगल नांदत करने में "आदित्य" शब्द सित्र होता है। न पियते विनाशा यस्य सायदानः + अदिति आदित्यः" जिसका विनाश कमी न हो उसी ईश्वर की " अादित्य " संडा । (माअयोधने ) ":" पूर्वक दम घानु मे "1" और इससे तद्धित करने से शन सिरहाना । यः प्रसपना चराचरम्य जगता व्यहार मानाति स प्रमः प्रम एव प्रामः' सो निधान्न बानगुरु गत चगावर उगा के यहार को यथावत् जानता है इससे ईश्वर का नाम "मार" है । इत्यादि नागार्थ मातार मे गहीन होते हैं। जब एक मात्रा से तीन २ अर्थ यहां व्याल्यात फिय पर ही अन्य नामार्य भी प्रकार सशनि माता (न्ना मित्रः २०) इस मन्म में मियादि नाम भी परमेश्वर के ज्योकि न्युनि, प्रार्थना, उपासना भटही की की जाती है। धेष्ठ उसको गाते है जो गुण, कर्म, सार मत्य मत्य व्यवहारों में मर स भरिक हो। उन सव श्रेष्टों में भी जा अत्यन्त श्रेष्ट उसको पगचर फहने हैं। जिसके तुल्य काई नहुमा, न है और न दोगा। जब तुल्य नहीं तो उनने या गोकर दो सपना दे? अस परमेशर के सत्य न्याय, दया, सर्वसामर्थ्य और सर्ववत्यादि अनन्त गुण यन अन्य किनी जद पदार्थ वा जीय के नहीं हैं। जो पदार्थ सत्य दे उसके गुण कर्म भाव भी सत्य होते हैं इसलिंगे मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उसामना कर, उसने मित्र की कभी न करें क्योंकि प्रया, विपए, महादेव नामक पूर्वज मदाशय विद्यान, दत्य दानधादि निष्ट मनुष्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर ही में विश्वास करके उसी को स्तुनि, प्रार्थना और उपासना करी, उसस भित की नहीं की। पैसे हम सब को करना योग्य है । इसका शिर पिचार मुनि और उपासना विषय में किया जायगा। (प्रश्न ) मित्रादि नामों से सन्या प्रार. इन्द्रादि देवों के प्रसिद्र व्यवहार देगने से उन्हीं का प्रहण करना चाहिये । ( उत्तर ) यहां उनका प्राण करता यांग्य नहीं क्योकि जो मनुष्य किसी का मित्र है वही अन्य का शत्रु और किसी से उदासीन भी दंगने में आता है । इससे मुन्धार्थ में ससा आदि का ग्रहण नहीं हो सकता। किन्तु जैसा परमेश्वर सब जगत् फा निश्चित मिन, न किसी का शा और न किसी से उदासीन है, इससे भिन्न कोई भी जीव इस प्रकार का कभी नहीं हो सकता । इसलिये परमात्मा ही का ग्रहण यहां होता है। हां! गाग अर्थ में मित्रादि शब्द से मुरादादि मनुष्यों का प्राण होता है। (निमिदा स्नेहने ) इस धातु से 'याणादिक "क्तू" प्रत्यय के होने से "मित्र" शब्द सिद्ध होता है। "मेद्यति स्निहाति स्नियते या स मित्रः" जो सबसे तेह करके और सर को प्रीति करने योग्य है इससे उस परमेश्वर का नाम मित्र है (वृन वरगो, वर ऐसायाम् ) इन धातुओं से उणादि " उनन् " प्रत्यय होने से “चरुण" शब्द सिद्ध होता है । "यः मवान् शिष्टान् मुमुक्षन्धर्मात्मनो वृणोत्यथया यः शिष्टमुमुक्षुमिर्धात्मभित्रियते वय॑ते वा स वरुणः परमेश्वरः" जो भात्मयोगी, विद्वान्, मुक्ति की इच्छा करने वाले मुक्त और धर्मात्माओं का स्वीकार करता, अथवा जो शिष्ट, मुमुनु, मुक्त और धर्मात्माओं से ग्रहण किया जाता है वह ईश्वर "वरुण' संज्ञक है। श्रथवा "वरुणो नाम वरः श्रेष्ठः" जिसलिये परमेश्वर सब से श्रेष्ठ है, इसीलिये उसका नाम "वरुण" है। (ऋ गतिप्रापणयोः ) इस धातु से "यत्" a प्रत्यय करने से "अर्य" शब्द सिद्ध होता है और “अर्थ्य' पूर्वक (माङ् माने ) इस धातु से “कनिन्" प्रत्यय होने से "श्रर्यमा" शब्द सिद्ध होता है। "योऽर्यान् स्वामिना न्यायाधीशान मिमीते मान्यान हना स २ नु" है व्यापक जों सब सत्यार्थप्रकाश करोति सोऽर्यमा" जो सत्य न्याय के करनेहारे मनुष्यों का मान्य और पाप तथा पुण्य करनेवालों को पाप और पुण्य के फलों का यथावत् सत्य २ नियमकता है इसीसे उस परमेश्वर का नाम " अर्यमा" है। (इदि परमैश्वर्ये) इस धातु से “ रन् " प्रत्यय करने से “ इन्द्र" शब्द सिद्ध होता है “य इन्दति परमै- श्वर्यवान् भवति स इन्द्रः परमेश्वरः” जो अखिल ऐश्वर्ययुक्त है इससे उस परमात्मा का नाम “इन्द्र" है। "बृहत्" शब्दपूर्वक (पा रक्षणे ) इस धातु से "डति' प्रत्यय बृहत् के तकार का लोप और सुडागम होने से "बृहस्पति" शब्द सिद्ध होता है । “यो वृहतामाकाशादीनां पतिः स्वामी पालयिता स वृहस्पतिः जो बड़ो से भी बड़ा और बड़े आकाशादि ब्रह्माण्डो का स्वामी है इससे उस परमेश्वर का नाम "बृहस्पति" है (विष्त व्याप्ती) इस धातु से " प्रत्यय होकर “ विष्णु" शब्द सिद्ध हुआ "वैवेष्टि व्याप्नोति चराचरं जगत् स विष्णुः" चर और अचररूप जगत् में व्यापक होने से परमात्मा का नाम "विष्णु" है । "उरुमहान् क्रमः पराक्रमो यस्य स उरुक्रमः' अनन्त पराक्रमयुक्त होने से पर- मात्मा का नाम "उरुक्रम" है । जो परमात्मा ( उरुक्रमः ) महापराक्रमयुक्त (मित्रः ) सव का सुहृत् अवि- रोत्री है वह (शम् ) सुखकारक, वह (वरुणः ) सर्वोत्तम, वह (शम् ) सुखस्वरूप, वह (अर्यमा) न्यायाधीश, वह (शम् ) सुखप्रचारक, वह ( इन्द्रः ) जो सकल ऐश्वर्यवान्, वह (शम् ) सकल ऐश्वर्य- दायक, वह ( बृहस्पतिः ) सव का अधिष्ठाता (शम् ) विद्याप्रद और (विष्णुः ) जो सव मे परमेश्वर है, वह ( नः ) हमारा कल्याणकारक ( भवतु ) हो ॥ । (वायो ते ब्रह्मणे नमोऽस्तु ) (बृह बृहि वृद्धौ ) इन धातुओं से "ब्रह्म' शब्द सिद्ध होता है। के ऊपर विराजमान, सब से बड़ा, अनन्त वलयुक्त परमात्मा है उस ब्रह्म को हम नमस्कार करते हैं । हे परमेश्वर ! ( त्वमेव प्रत्यक्षस्ब्रह्मासि ) आप ही अन्तर्यामिरूप से प्रत्यक्ष ब्रह्म हो ( त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि) में प्रारही को प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूंगा क्योकि आप सब जगह मे व्यात होके सव को नित्य ही प्राप्त हैं ( ऋतं वदिष्यामि ) जो आप की वेदस्थ यथार्थ प्राज्ञा है उसी का मै सब के लिये उपदेश और आचरण भी करूंगा (सत्यं वदिष्यामि ) सत्य बोलू , सत्य मानू और सत्य ही करूंगा 'तम्मामवतु ) सो आप मेरी रक्षा कीजिये (तद्वक्तारमवतु ) सो आप मुझ आप्त सत्यवक्ता की रक्षा कीजिये कि जिससे आप की आज्ञा मे मेरी बुद्धि स्थिर होकर विरुद्ध कभी न हो। क्योंकि जो श्राप की आज्ञा है वही धर्म और जो उससे विरुद्ध वही अधर्म है (अवतु मामवतु वक्तारम् ) यह दूसरी वार-पाठ अधिकार्थ के लिये है । जैसे "कश्चित् कश्चित् प्रति वदति त्वं ग्रामं गच्छ गच्छ” इसमे दो वार क्रिया के उच्चारण से तू शीघ्र ही ग्राम को जा ऐसा सिद्ध होता है। ऐसे ही यहां कि आप मेरी अवश्य रक्षा करो अर्थात् धर्म से सुनिश्चित और अधर्म से घृणा सदा करूं ऐसी कृपा मुझ पर कीजिये मैं आपका बड़ा उपकार मानूंगा (ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ) इस में तीन बार शान्तिपाठ का यह प्रयोजन है कि विविधताप अर्थात् इस संसार मे तीन प्रकार के दुःख हैं एक "आध्यात्मिक" जो आत्मा शरीर में पाविद्या, राग, द्वेष, मूर्खता और ज्वर पीड़ादि होते हैं। दूसरा आधिभौतिक" जो शत्रु, व्याघ्र और सपादि से प्राप्त होता है। तीसरा "श्राधिदैविक" अर्थात् जो अतिवृष्टि, अतिशीत, अति उग्णता मन और इन्द्रियो की अशान्ति से होता है। इन तीन प्रकार के क्लेशो से श्राप हम लोगो को करके कल्याणकारक कों मे सदा प्रवृत्त रखिये । क्योकि आप ही कल्याणस्वरूप सव संसार के कल्याण- की ओर धार्मिक मुमुक्षुओ को कल्याण के दाता हैं। इसलिये आप स्वयं अपनी करुणा से सव जीवा के हृदय में प्रकाशित हूजिये कि जिससे सब जीव धर्म का आचरण और अधर्म को छोड़ के परमानन्द को प्राप्त हो और दुःखो से पृथक् रहै । "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुपश्च” इस यजुर्वेद के वचन से जो जगत् नाम प्राणी चेतन और जंगम अर्थात् जो चलते फिरते हैं " तस्थुपः " अप्राणी अर्थात् m . G । - प्रथमसमानाम: स्थावर जर अर्थात् पृथिवी प्रादि उन सब के यात्मा होने और मप्रकाशमा सब के प्रकाश करने से परमेश्वर का नाम "सूर्य" है । (अत मातन्यगमने) म धातु से "प्रान्मा" शब्द सिद्ध होता है। "योऽतति व्याप्नोति स यात्मा" जो सब जीवादि जगन् म निरन्तर व्यापक हो रहा है। "परश्चासावा- त्मा च य यात्मभ्यो जीवेभ्यः मूवमेभ्यः परोनिन-गः स परमात्मा" जो लय जीव प्रादि से उत्कृष्ट और जीव प्रकृति तथा प्राकाश से नी अतिसूम 'गार गार जीता का अन्तर्यामी प्रात्मा है. इसम ईयर का नाम “परमात्मा है । सामयवाले का नाम ईश्वर । “य ईश्वरपु लमर्येषु परम. श्रेष्ठः स परमेश्वरः" जो ईश्वरी अर्थात् समों में समर्थ, जिनके तुल्य कोई भी न हो इस का नाम "परमेश्वर" है। (पुत्र अभिपये, पूर्व प्राणिगर्भविमोचन ) इन धातुनी "सविता" शब्द सिद्ध होता है । "अभिषयः प्राणिगर्भविमोचनं चोत्पादनम् । यश्चराचर जगत् मुनाति गते बांपादयनि स सविता परमेश्वरः" जो सब जगत् की उत्पत्ति करता है इसलिये परमेश्वर का नाम "सधिना"। (दिनु कीड़ाधिजिगीयाव्यवहार- शुतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु ) इस धातु ले "देव" शन्द मि, होता है । (झाला) जो शुद्ध जगत् को क्रीडा कराने (विजिगीण ) धार्मिको को जितान की इलायुक्त (व्यवहार ) सब चेष्टा के साधनोपसाधनों का दाता (ति) खयम काशवरूप सत्र का प्रकाशक (स्तुनि) प्रशंसा के योग्य ( मोद) श्राप प्रानन्दम्यरूप और दुग्नग को 'ग्रानन्द देनहाग ( मद् ) मदोन्मत्तों का ताइन द्वारा (स्वप्न) सब के शयनार्य रात्रि पौर प्रलय का कारनहाग ( कान्ति) कामना के योग्य यार (गति) मानस्वरूप है इसलिये उस परमेश्वर का नाम "देव" । नयवा "यो दीव्यतिमानि स देवः" जो अपने स्यम्य में अानन्द स श्रापती क्रीडा करे प्रथमा किनी के सहायक विना लावत् नाज खान ले लय जगत् को बनाता वा सब कीमानों का प्राधार है। "विजिगीत ल देव." जो सब का जीननेद्वारा खयं: अजेय अर्थात् जिलको काटनी न जीत सके । "व्यवहारयनि स देवः" जो न्याय और अन्यायरूप व्यः वहारों का जानोहाग और उपदया, 'यश्चगचरं जगत् गातयति" जो सब का प्रकाशक, “यः स्तूयते स देवः" जो सब मनुष्यों को प्रशंसा के योग्य पोर निन्दा के योग्य न दो, “यो मोदयति स देवः" जो स्वयं अानन्दस्वरूप और दूसरों को यानन्द कराता, जिसको दुग का लश भी न हो, "या माद्यति स देवः" जो सदा हर्पित, शोकरहित और दूसरों को हर्पित करने और दुःगों से पृथक् गने वाला, ' या स्वापयति स देवः" जो प्रलय समय अव्यक्त में सब जीवों को सुलाता, 'यः कामयते काम्यते वास देवः" जिसके सब सत्य काम और जिसकी प्रानि की कामना सब शिष्ट करते हैं तथा “यो गच्छति गम्यते वा स देवः' जो सब में व्याप्त और जानन के योग्य है इससे उस परमेश्वर का नाम "देव" है। (कुवि श्राच्छादने ) इस धातु से "कुवेर" शब्द सिद्ध होता है । "यः सर्व कुवति स्वव्या त्याच्छादयति स कुवे- रोजगदीश्वरः" जो अपनी व्याप्ति से सव का श्राच्छादन करे इससे उस परमेश्वर का नाम “कुवेर" है । (प्रथ विस्तारे ) इस धातु से "पृथिवी' शब्द सिद्ध होता हे "यः पृथते सर्वजगद्विस्तृणानि स पृथिवी" जो सब विस्तृत जगत् का विस्तार करनेवाला है इसलिये उस परमेश्वर का नाम पृथिवी है। (जल घातने ) इस धातु से "जल" शब्द सिद्ध होता है "जलति घातयति दुग्रान्, संघातयति-अव्यक्तपरमा- एवादीन् तद् ब्रह्म जलम्" जो दुष्टों का तादन और अव्यक्त तथा परमाणुयों का अन्योऽन्य संयोग वा वियोग करता है वह परमात्मा "जल" संक्षक कहाता है । (काश दीसी) इस धातु से “आकाश" शब्द सिद्ध होता है, "यः सर्वतः सर्व जगत् प्रकाशयति स आकाशः" जो सब ओर से जगत् का प्रका- शक है इसलिये उस परमात्मा का नाम "आकाश" है। (अद भक्षणे ) इस धातु से "अन्न" शब्द सिद्ध होता है। अद्यतेऽत्ति च भूतानि तस्मादन्नं तदुच्यते ॥ १॥ AP सत्यार्थप्रकाश . अहमन्नमहमनमहमन्नम् । अहमन्नादोहमन्नादोहमन्नादः ॥२॥ तैत्ति० उपनि० [ अनु- वाक २ । १० ] अत्ताचराचरग्रहणात् [ वेदान्तदर्शने अ० १ । पा० २ । सू० ६] यह व्यासमुनि कृत शारीरिक सूत्र है । जो सबको भीतर रखने वा सब को ग्रहण करने योग्य, चराचर जगत् का ग्रहण करनेवाला है, इससे ईश्वर के "अन्न" "अन्नाद" और "अचा" नाम हैं। और जो इसमें तीन बार पाठ है सो आदर के लिये है । जैसे गूलर के फल में कृमि उत्पन्न होके उसी में रहते और नष्ट होजाते हैं वैसे परमेश्वर के वीच सब जगत् की अवस्था है (वस निवासे) इस धातु से "वसु" शब्द सिद्ध हुआ है । "वसन्ति भूतानि यस्मिन्नथवा यः सर्वेषु भूतेषु वसति स वसुरीश्वरः" जिसमें सब आकाशादि भूत वसते हैं और जो सव मे वास कर रहा है इसलिये उस परमेश्वर का नाम “वसु" है । (रुदिर् अश्रुविमोचने ) इस धातु से "णिच्” प्रत्यय होने से "रुद्र" शब्द सिद्ध होता है। "यो रोदयन्यन्यायकारिणो जनान् स रुद्रः" जो दुष्ट कर्म करनेहारों को रुलाता है इससे उस परमेश्वर का नाम "रुद्र" है। यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति यत् कर्मणा करोति तदमिसम्पद्यते ॥ यह यजुर्वेद के ब्राह्मण का वचन है । जीव जिसका मन से ध्यान करता उसको वाणी बोलता, जिसको वाणी से बोलता उसको कर्म से करता, जिसको कर्म से करता उसी को प्राप्त होता है। इससे क्या सिद्ध हुआ कि जो जीव जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है । जव दुष्ट कर्म कर- नेवाले जीव ईश्वर की न्यायरूपी व्यवस्था से दुःखरूप फल पाते तव रोते हैं और इसी प्रकार ईश्वर उनको रुलाता है, इसलिये परमेश्वर का नाम "रुद्र" है॥ आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नर सूनवः । ता तदस्यायनं पूर्व तेन नारायणः स्मृतः ॥ मनु० [अ० १ । श्लोक १०] जल और जीवों का नाम नारा है वे अयन अर्थात् निवासस्थान हैं जिसका इसलिये सब वों में व्यापक परमात्मा का नाम "नारायण" है। (चदि आह्लादे) इस धातु से "चन्द्र" शब्द सिद्ध होता है । 'यश्चन्दति चन्दयति वा स चन्द्रः" जो श्रानन्दस्वरूप और सब को आनन्द देनेवाला है इसलिये ईश्वर का नाम "चन्द्र' है। (मगि गत्यर्थक ) धातु से "मशेरलच्" इस सूत्र से "मङ्गल" शब्द सिद्ध होता है । “यो मङ्गति मङ्गयति वा स मङ्गलः" जो श्राप मङ्गलस्वरूप और सव जीवो के मङ्गल का कारण है इसलिये उस परमेश्वर का नाम "मङ्गल" है। (बुध अवगमने ) इस धातु शब्द सिद्ध होता है । “यो वुध्यते वोधयति वा स बुधः" जो स्वयं वोधस्वरूप और सब जीवो के वोध का कारण है इसलिये उस परमेश्वर का नाम "वुध" है । "वृहस्पति" शब्द का अर्थ कह दिया। (ईशु- चिर् पूतीभावे) इस धातु से "शुक्र" शब्द सिद्ध हुआ है । “यः शुच्यति शोचयति वा स शुक्रः" जो अत्यन्त पवित्र और जिसके सङ्ग से जीव भी पवित्र हो जाता है इसलिये ईश्वर का नाम "शुक्र" है। (चर गतिभक्षणयोः ) इस धातु से "शनैस्” अव्यय उपपद होने से "शनैश्चर" शब्द सिद्ध हुआ "यः शनैश्चरति स शनैश्चरः" जो सव में सहज से प्राप्त धैर्यवान् है इससे उस परमेश्वर का नाम "शनै- धर" है । (रह त्यागे) इस धातु से "राहु" शब्द सिद्ध होता है। "यो रहति परित्यजति दुष्टान सहयति त्याजयति पा स राहुरीश्वरः" जो एकान्तखरूप जिसके स्वरूप में दूसरा पदार्थ संयुक्त नहीं को दुष्टों को छोड़ने और अन्य को छुड़ाने हारा है इससे परमेश्वर का नाम "राहु" है। (कित निवाले से "वुध" - है - प्रथमसमुल्लास रोगापनयने च ) इस धातु से "केतु" शब्द सिद्ध होता है "यः केतयति चिकित्सति वा स केतुरीश्वरः" जो सब जगत् का निवासस्थान सब रोगो से रहित और मुमुक्षुओं को मुक्ति समय में सब रोगों से छुड़ाता है इसलिये उस परमात्मा का नाम “केतु" है। ( यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु ) इस धातु से "यज्ञ" शब्द सिद्ध होता है । “यज्ञो वै विष्णुः" यह ब्राह्मणग्रन्थ का वचन है। “यो यजति विद्वद्भिरिज्यते वा स यज्ञः" जो सब जगत् के पदार्थों को संयुक्त करता और सब विद्वानों का पूज्य है और ब्रह्मा से ले के सब ऋषि मुनियों का पूज्य था, है और होगा इससे उस परमात्मा का नाम “यज्ञ" है क्योंकि वह सर्वत्र व्यापक है । (हु दानाऽदनयोः, आदाने चेत्येके ) इस धातु से "होता" शब्द सिद्ध हुश्रा है “यो जुहोति स होता" जो जीवों को देने योग्य पदार्थो का दाता और ग्रहण करने योग्यों का ग्राहक है इससे उस ईश्वर का नाम "होता है । ( वन्ध वन्धने ) इससे "वन्धु' शब्द सिद्ध होता है “यः स्वस्मिन् चराचरं जगद्वध्नाति बन्धुवद्धर्मात्मनां सुखाय सहायो वा वर्तते स बन्धुः" जिसने अपने मे सब लोक- लोकान्तरों को नियमों से बद्ध कर रक्खे और सहोदर के समान सहायक है इसी से अपनी २ परिधि वा नियम का उल्लंघन नही कर सकते । जैसे भ्राता भाइयो का सहायकारी होता है वैसे परमेश्वर भी पृथिव्यादि लोकों के धारण रक्षस और सुख देने से “वन्धु" संज्ञक है (पा रक्षण) इस धातु से "पिता" शब्द सिद्ध हुश्रा है । यः पाति सर्वान स पिता" जो सव का.रक्षक जैसे पिता अपने सन्तानों पर सदा कृपालु होकर उनकी उन्नति चाहता है वैसे ही परमेश्वर सब जीवों की उन्नति चाहता है इससे उसका नाम “पिता' है। “यः पितॄणां पिता स पितामहः" जो पिताओ का भी पिता है इससे उस परमेश्वर का । नाम "पितामह' है। "यः पितामहानां पिता स प्रपितामहः" जो पिताओं के पितरों का पिता है इससे परमेश्वर का नाम "प्रपितामह' है । “यो मिमीते मानयति सर्वाञ्जीवान् स माता" जैसे पूर्णकृपायुक्त जननी अपने सन्तानों का सुख और उन्नति चाहती है वैसे परमेश्वर भी सव जीवों की बढ़ती चाहता है इससे परमेश्वर का नाम "माता' है । (चर गतिभक्षणयोः ) आङपूर्वक इस धातु, "आचार्य' शब्द सिद्ध होता है “य आचारं ग्राहयति सर्वा विद्या बोधयति स प्राचार्य ईश्वरः" जो सत्य आचार का ग्रहण करानेहारा और सव विद्याओं की प्राप्ति का हेतु होके सब विद्या प्राप्त कराता है इससे परमेश्वर का नाम "श्राचार्य" है । (गू शन्दे ) इस धातु से "गुरु" शब्द बना है। "यो धान शब्दान गृणात्युपदिशति स गुरुः" ॥ स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ योग सू० । समाधिपाद सू० २६ ॥ यह योगसूत्र है। जो सत्यधर्मप्रतिपादक, सकल विद्यायुक्त वेदों का उपदेश करता, सृष्टि की आदि में अग्नि, वायु, आदित्य, अगिरा और ब्रह्मादि गुरुयो का भी गुरु और जिसका नाश कभी नहीं होता इसलिये उस परमेश्वर का नाम "गुरु" है । (अज गतिक्षेपणयोः, जनी प्रादुर्भावे) इन धातुओ से "अज" शब्द बनता है "योऽजति सृष्टिं प्रति सर्वान् प्रकृत्यादीन् पदार्थान् प्रक्षिपति जानाति वा कदाचिन्न जायते सोजः" जो सब प्रकृति के अवयव श्राकाशादि भूत परमाणुओं को यथायोग्य मिलाता शरीर के साथ जीवो का सम्बन्ध करके जन्म देता और स्वयं कभी जन्म नहीं लेता इससे उस ईश्वर का नाम "अज" है । (वृह वृहि वृद्धौ ) इन धातुओ से "ब्रह्मा" शब्द सिद्ध होता है "योऽखिलं जगन्निर्माणेन वृहति वर्द्धयति स ब्रह्मा" जो सम्पूर्ण जगत् को रच के बढ़ाता है इसलिये परमेश्वर का नाम "ब्रह्मा" है "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' यह तैत्तिरीयोपनिषद् का वचन है “सन्तीति सन्तस्तेषु सत्सु साधु तत्सत्यम् । यज्जानाति चराचरं जगत्तज्ज्ञानम् । न विद्यतेन्तोऽवधिर्मर्यादा प्रस्य तदनन्तम् । सर्वेभ्यो यहत्त्वाद् ब्रह्म" जो पदार्थ हो उनको सत् पाहते हैं उनमें साधु होने से १ .

१० सत्यार्थप्रकाश ज्ञान" है " " जो आनन्दस्वरूप परमेश्वर का नाम सत्य है । जो सव जगत् का जाननेवाला है इससे परमेश्वर का नाम जिसका अन्त अवधि मर्यादा अर्थात् इतना लम्बा, चौड़ा, छोटा, बड़ा है ऐसा परिमाण नहीं है इर लिये परमेश्वर का नाम अनन्त " है। (जुदा- दाने) आड्पूर्वक इस धातु से " आदि " शब्द अं नपूर्वक " अनादि " शब्दं सिद्ध होता है।" यस्मात् पूर्वं नास्ति परं चास्ति स प्रादिरित्युच्य [महाभाष्य १ । १ । २१ ] न विद्यते आदिः कारणं यस्य सोऽनादिरीश्वरः " जिसके पूर्व कुछ न हो और परे हो, उसको आदि कहते हैं । जिसका आदिकारण कोई भी नही है इसलिये परमेश्वर का नाम अनादि है । (टुनदि समृद्धौ ) श्रापूर्वक इस धातु से " आनन्द शब्द बनता है " आनन्दन्ति सर्वे मुक्ता यस्मिन् यद्वा यः सर्वाञ्जीवानानन्दयति स आनन्दः जिसमें सव मुक्त जीव आनन्द को प्राप्त होते और जो सव धर्मात्मा जीवो को आनन्दयुक्त करता है इससे ईश्वर का नाम आनन्द " है। (अस भुवि ) इस धातु से "सत्" शब्द सिद्ध होता है "यदस्ति त्रिपु कालेपु न वाध्यते सत्सद् ब्रह्म" जो सदा वर्तमान अर्थात् भूत, भविष्यत्. वर्तमान कालो में जिसका वाध न हो उस परमेश्वर को "सत्" कहते हैं। (चिती संज्ञाने ) इस धातु से "चित्" शब्द सिद्ध होता है। " यश्चेतति चेतयति संज्ञापयति सर्वान् सज्जनान् योगिनस्ताञ्चित्परं ब्रह्म" जो चेतन- स्वरूप सब जीवो को चिताने और सत्याऽसत्य का जनानहारा है इसलिये उस परमात्मा का नाम चित्" है, इन तीनो शब्दो के विशेषण होने से परमेश्वर को सच्चिदानन्दस्वरूप” कहते हैं । “यो नित्यध्रुवोऽचलोऽविनाशी स नित्यः " । जो निश्चल अविनाशी है लो नित्य शब्दवाच्य ईश्चर है । (शुन्ध शुद्धौ) इससे "शुद्ध" शब्द सिद्ध होता है । “यः शुन्धति सर्वान् शोधयति वा स शुद्ध ईश्वर." जो स्वय पवित्र सव अशुद्धियो से पृथक् और सब को शुद्ध करने वाला है इससे उस ईश्वर का नाम शुद्ध है (वुध अवगमने ) इस धातु से "क्त' प्रत्यय होने से “वुद्ध" शब्द सिद्ध होता है। ' यो बुद्धवान् सदैव ज्ञातास्ति स वुद्धो जगदीश्वरः" जो सदा सव को जाननहारा है इससे ईश्वर का नाम (मुच्न मोचन ) इस धातु से "मुक्त "शब्द सिद्ध होता है । 'यो मुञ्चति मोचयति वा मुमुचून स मुक्तो जगदीश्वरः" जो सर्वदा अशुद्धियो से अलग और सव मुमुक्षुओ को क्लेश से छुड़ा देता है इसलिये परमात्मा का नाम "मुक्त" है। "अतएव नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावो जगदीश्वरः" इसी कारण से परमेश्वर का स्वभाव नित्य शुद्ध [ वुद्ध ] मुक्त है । निर् और पाइपूर्वक (डुकृञ् करणे ) इस धातु से निराकार शब्द सिद्ध होता है । “निर्गत आकारात्स निराकारः " जिसका आकार कोई भी नहीं और न कभी शरीर धारण करता है इसलिये परमेश्वर का नाम "निराकार" है। (अञ्जू व्यक्तिम्लक्षणकान्तिगति इस धातु से 'अञ्जन शब्द और निर उपसर्ग के योग से "निरञ्जन" शब्द सिद्ध होता है । अञ्जनं व्यक्तिलक्षणं कुकाम इन्द्रियैः प्राप्तिश्चेत्यस्माद्यो निर्गतः पृथग्भूतः स निरञ्जनः " जो व्यक्ति अर्थात् आकृति, म्लेच्छाचार, दुष्टकामना और चनुरादि इन्द्रियों के विषयों के पथ से पृथक् है इससे ईश्वर का नाम 'निरञ्जन" है । (गण संख्याने ) इस धातु से गण" शब्द सिद्ध होता और इसके आगे "ईश" वा "पति" शब्द रखने से “गणेश" और "गणपति' शब्द सिद्ध होते हैं । "ये प्रकृत्यादयो जड़ा जीवाश्च गण्यन्ते संख्यायन्ते तेपामीशः स्वामी पतिः पालको वा " जो प्रकृत्यादि जड़ और सब जीव प्रख्यात पदार्थों का स्वामी वा पालन करनेहारा है इससे उस ईश्वर का नाम " गणेश" वा "गणपति' है। "यो विश्वमीष्टे स विश्वेश्वरः" जो संसार का अधिष्ठाता है इससे उस परमेश्वर का नाम "विश्वेश्वर है। यः कूटऽनेकविधव्यवहारे स्वस्वरूपेणैव तिष्ठति स कूटस्थः परमेश्वरः ” जो सब व्यवहारो व्याप्त और सव व्यवहारों का आधार होके भी किसी व्यवहार मे अपने स्वरूप को नहीं बदलता इससे परमेश्वर का नाम कूटस्थ " है। जितने “ देव" शब्द के अर्थ लिखे हैं उतने ही "देवी' शब्द के वुद्ध" है। . ५ ११ - प्रथमसमुहास: हैं। परमेश्वर के तीनों लिङ्गों में नाम हैं, जैसे-"ब्रह्म चितिरीश्वरश्चेति" जब ईश्वर का विशेषण होगा तव "देव" जब चिति का होगा तव “देवी" इससे ईश्वर का नाम “देवी" है । (शक्ट शक्ती) इस धातु से “शक्ति" शब्द वनता है ‘यः सर्वं जगत् कर्तुं शक्नोति स शक्तिः" जो सब जगत् के बनाने में समर्थ है इसलिये उस परमेश्वर का नाम 'शल्लि" है । (श्रिञ् सेवायाम् ) इस धातु से "श्री" शब्द सिद्ध होता है । ' यः श्रीयते सेव्यते सर्वेण जगता विद्वनियोगिभिश्च स श्रीरीश्वरः” जिसका सेवन सव जगत् विद्वान् और योगीजन करते हैं उस परमात्मा का नाम "श्री" है । (लक्ष दर्शनाङ्कनयोः) इस धातु से "लक्ष्मी" शब्द सिद्ध होता है “यो लक्षयति पश्यत्यकृते चिह्नयति चराचरं जगदथवा वेदैराप्तैोगिभिश्च यो लक्ष्यते स लक्ष्मीः सर्वप्रियेश्वरः" जो सव चराचर जगत् को देखता चिह्नित अर्थात् दृश्य बनाता, जैसे शरीर के नेत्र, नासिका और वृक्ष के पन, पुप्प, फल, मूल, पृथिवी, जल के कृष्ण, रक्त खेत, मृत्तिका, पाषाण, चंद्र, सूर्यादि चिह्न वनाता, तथा सव को देखता, सव शोभाओं की शोभा और जो वेदादि शास्त्र वा धार्मिक विद्वान् योगियो का लक्ष्य अर्थात् देखने योग्य है इससे उस परमेश्वर का नाम "लक्ष्मी' है । ( पृ गतौ) इस धातु से "सरस्" उससे मतुए और डीए प्रत्यय होने से "सरस्वती" शब्द सिद्ध होता है, "सरो विविधं ज्ञानं विद्यते यस्यां चितौ सा सरस्वती' जिसको विविध विज्ञान अर्थात् शब्द अर्थ सम्बन्ध प्रयोग का ज्ञान यथावत् होवे इससे उस परमेश्वर का नाम "सरस्वती" है। "सर्वाः शक्तयो विद्यन्ते यस्मिन् स सर्वशक्तिमानीवर." जो अपने कार्य करने मे किसी अन्य की सहायता की इच्छा नहीं करता, अपने ही सामर्थ्य से अपने सब काम पूरा करता है इसलिये उस परमात्मा का नाम 'सर्वशक्तिमान" है। (णी प्रापणे ) इस धातु से "न्याय" शब्द सिद्ध होता है । "प्रमाणैरर्थपरी- क्षणं न्यायः" यह वचन न्यायसूत्रा पर वात्स्यायनमुनिकृत माल का है । "पक्षपातराहित्याचरणं न्याय जो प्रत्यक्षादि प्रमाणो की परीक्षा से सत्य २ सिद्ध हो तथा पक्षपात रहित धर्मरूप आचरण हे वह न्याय है। 'न्यायं कर्तुं शीलमस्य स न्यायकारीश्वरः" जिसका न्याय अर्थात् पक्षपातरहित धर्म करने ही का स्वभाव है इससे उस ईश्वर का नाम "न्यायकारी" है। (दय दानगतिरक्षणहिंसादानेषु ) इस धातु से 'दया" शब्द सिद्ध होता है। "दयते ददाति जानाति गच्छति रक्षति हिनस्ति यया सा दया वही दया वेद्यते यस्य स दयालुः परमेश्वरः" जो अभय का दाता सत्याऽसत्य सर्व विद्याओं को जामने, सव सज्जनों की रक्षा करने और दुष्टो को यथायोग्य दण्ड देनेवाला इससे परमात्मा का नाम "दयालु" है। "द्वयोर्भावो द्वाभ्यामितं सा द्विता द्वीतं वा लैव तदेव वा द्वैतम् , न विद्यते द्वैतं द्वितीयेवरभावो यस्मिस्तद्वैतम्" अर्थात् “सजातीयविजातीयस्वगतभेदशून्यं ब्रह्म" दो का होना वा दोनो से युक्त होना वह द्विता वा द्वीत अथवा द्वैत इससे जो रहित है, सजातीय जैसे मनुष्य का सजातीय दूसरा मनुष्य होता है विजातीय जैसे मनुष्य से भिन्न जातिवाला वृक्ष, पापाणादि, स्वगत अर्थात् शरीर में जैसे आंख नाक, कान श्रादि अवयवो का भेद है वैसे दूसरे स्वजातीय ईश्वर, विजातीय ईश्वर वा अपने आत्मा में तत्त्वान्तर वस्तुप्रो से रहित एक परमेश्वर है इससे परमात्मा का नाम "अद्वैत" है । "गण्यन्ते ये ते गुणा वा यैर्गणयन्ति ते गुणाः, यो गुणेभ्यो निर्गतः स निर्गुण ईश्वरः" जितने सत्व, रज, तम, रूप, रस, स्पर्श, गन्धादि जड़ के गुण, अविद्या, अल्पक्षता, राग, द्वेष और अविद्यादि क्लेश जीव के गुण हैं उनसे जो पृथक है, इसमे "अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्” इत्यादि उपनिपदों का प्रमाण है । जो शब्द, स्पर्श, सादि गुणरहित है इससे परमात्मा का नाम "निर्गुण' है । “यो गुणैः सह वर्तते स सगुण," जो सव. का शान सर्वसुख पवित्रता अनन्त बलादि गुणों से युक्त है इसलिये परमेश्वर का नाम "सगुण" है। जैसे पृथिवी गनादि गुणों से "सगुण" और इच्छादि गुण से रहित होने से "निर्गुण' है वैसे और जीप के गुण से पृथक होने से परमेश्वर ‘निर्गुण" और सर्वज्ञादि गुण से सहित होने १ कहाता - १२ सलार्यप्रकाशा गुण" है। अर्थात् ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है जो सगुणता और निर्गुणता से पृथक् हो । जैसे चेतन के गुणों से पृथक् होने से जड़ पदार्थ निर्गुण और अपने गुणों से सहित होने से सगुण वैसे ही जड़ के गुणों से पृथक् होने से जीव निर्गुण और इच्छादि अपने गुणों से सहित होने से सगुण । ऐसे ही परमेश्वर में भी समझना चाहिये । “अन्तर्यन्तुं नियन्तुं शीलं यस्य सोऽयमन्तर्यामी" जो सब प्राणि और अप्राणिरूप जगत् के भीतर व्यापक होके सब का नियम करता है इसलिये उस परमेश्वर का नाम "अन्तर्यामी" है । "यो धर्मे राजते स धर्मराजः" जो धर्म ही में प्रकाशमान और अधर्म से रहित धर्म ही का प्रकाश करता है इसलिये उस परमेश्वर का नाम "धर्मराज" है। (यमु उपरमे ) इस धातु से "यम" शब्द सिद्ध होता है । “यः सर्वान् प्राणिनो नियच्छति स यमः" जो सब प्राणियों के कर्मफल देने की व्यवस्था करता और सव श्रन्यायों से पृथक् रहता है इसलिये परमात्मा का नाम “यम" है। (भज सेवायाम् ) इस धातु से "भग" इससे मतुप होने से "भगवान्" शब्द सिद्ध होता है। "भगः सकलैश्वर्यं सेवन वा विद्यते यस्य स भगवान्" जो समग्र ऐश्वर्य से युक्त वा भजने के योग्य है इसीलिये उस ईश्वर का नाम "भगवान" है। (मन ज्ञाने ) धातु से "मनु" शब्द बनता है। “यो मन्यतेस मनुः" जो मनु अर्थात् विज्ञानशील और मानने योग्य है इसलिये उस ईश्वर का नाम "मनु" है । (पृ पालनपूरणयोः) इस धातु से "पुरुष" शब्द सिद्ध हुआ है। “यः स्वव्याप्त्या चराचरं जगत् पृणाति पूरयति वा स पुरुषः" जो सव जगत् मे पूर्ण हो रहा है इसलिये उस परमेश्वर का नाम "पुरुष' है। (भृक् धारणपोषणयोः ) "विश्व" पूर्वक इस धातु से "विश्वम्भर" शब्द सिद्ध होता है । “यो विश्वं विभर्ति धरति पुष्णाति वा स विश्वम्भरो जगदीश्वरः" जो जगत् का धारण और पोषण करता है इसलिये उस परमे- श्वर का नाम "विश्वम्भर" है । ( कल संख्याने ) इस धातु से "काल' शब्द बना है । “कलयति संख्याति सर्वान् पदार्थान् स कालः" जो जगत् के सब पदार्थ और जीवों की संख्या करता है इसलिये उस परमेश्वर का नाम "काल" है । (शिष्ल विशेषणे ) इस धातु से "शेष" शब्द सिद्ध होता है । “य: शिष्यते स शेषः" जो उत्पत्ति और प्रलय से शेप अर्थात् बच रहा है इसलिये उस परमात्मा का नाम "शेष" है। (आप्न व्याप्ती ) इस धातु से "प्राप्त' शब्द सिद्ध होता है। "यः सर्वान् धर्मात्मन आप्नोति वा सर्वैर्धर्मात्मभिराप्यते छलादिरहितः स प्रातः" जो सत्योपदेशक सकल विद्यायुक्त सव धर्मात्माओं को प्राप्त होता और धर्मात्माओं से प्राप्त होने योग्य छल कपटादि से रहित है इसलिये उस परमात्मा का नाम "आप्त" है। (डुकृञ् करणे ) "शम्" पूर्वक इस धातु से "शङ्कर" शब्द सिद्ध हुआ है । “यः शङ्कल्याणं सुखं करोति स शङ्करः" जो कल्याण अर्थात् सुख का करनेहारा है इससे उस ईश्वर का नाम "शङ्कर" है। "महत्" शब्द पूर्वक "देव' शब्द से "महादेव" शब्द सिद्ध होता है। "यो महतां देवः स महादेवः" जो महान् देवों का देव अर्थात् विद्वानों का भी विद्वान् , सूर्यादि पदार्थो का प्रकाशक है इसलिये उस परमात्मा का नाम "महादेव" है। (प्रञ् ितर्पणे कान्तौ च ) इस धातु से " प्रिय" शब्द सिद्ध होता है । “यः पृणाति प्रीयते वा स प्रियः" जो सब धर्मात्माओ, मुमुक्षुओ और शिष्टो को प्रसन्न करता और सव को कामना के योग्य है इसलिये उस ईश्वर का नाम "प्रिय" है । (भू सत्तायाम् "स्वयं" पूर्वक इस धातु से "स्वयम्भू" शब्द सिद्ध होता है । “यः स्वयं भवति स स्वयम्भूरीश्वरः" जो आप से आप ही है किसी से कभी उत्पन्न नहीं हुआ है इससे उस परमात्मा का नाम "स्वयम्भू" है । (कु शब्दे ) इस धातु से "कवि" शब्द सिद्ध होता है । “यः कौति शब्दयति सर्वा विद्या स कविरी- श्वरः" जो वेदद्वारा सव विद्याओं का उपदेया और वेत्ता है इसलिये उस परमेश्वर का नाम "कवि" है। ( शिबु कल्याण ) इस धातु से “शिव" शब्द सिद्ध होता है । “वहुलमेतनिदर्शनम्” इससे शिबु धातु माना जाता है, जो कल्याणस्वरूप और कल्याण का करनेहारा है इसलिये उस परमेश्वर का नाम "शिव" है । ) + . प्रथमसमुल्लास: ये सौ नाम परमेश्वर के लिखे हैं। परन्तु इनसे भिन्न परमात्मा के असंख्य नाम हैं। क्योंकि जैसे परमेश्वर के अनन्त गुण कर्म स्वभाव हैं वैसे उसके अनन्त नाम भी हैं। उनमें से प्रत्येक गुण कर्म और स्वभाव का एक २ नाम है। इससे ये मेरे लिखे नाम समुद्र के सामने विन्दुवत् हैं क्योंकि वेदादि शास्त्रो मे परमात्मा के असंख्य गुण कर्म स्वभाव व्याख्यात किये हैं। उनके पढ़ने पढ़ाने से बोध हो सकता है। और अन्य पदार्थों का ज्ञान भी उन्ही को पूरा २ हो सकता है जो वेदादि शास्त्रों को पढ़ते हैं। (प्रश्न ) जैसे अन्य ग्रन्थकार लोग आदि, मध्य और अन्त में मङ्गलाचरण करते हैं वैसे आपने कुछ भी न लिखा न किया ? (उत्तर) ऐसा हमको करना योग्य नही क्योकि जो आदि, मध्य और अन्त मे मङ्गल करेगा तो उसके ग्रन्थ में आदि मध्य तथा अन्त के बीच मे जो कुछ लेख होगा वह अमङ्गल ही रहेगा; इसलिये “मङ्गलाचरणं शिष्टाचारात् फलदर्शनाच्छुतितश्चेति" यह सांख्यशास्त्र [अ० ५। सू० १] का वचन है । इसका यह अभिप्राय है कि जो न्याय, पक्षपातरहित, सत्य वेदोक्त ईश्वर की आज्ञा है उसी का यथावत् सर्वत्र और सदा आचरण करना मङ्गलाचरण कहाता है। ग्रन्थ के प्रारम्भ से ले के समाप्तिपर्यन्त सत्याचार का करना ही मङ्गलाचरण है, न कि कही मङ्गल और कही अमङ्गल लिखना । देखिये महाशय महर्षियों के लेख को- यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि ॥ यह तैत्तिरीयोपनिपद् [प्रपाठक ७। अनु० ११ ] का वचन है । हे सन्तानो ! जो "अनवद्य" अनिन्दनीय अर्थात् धर्मयुक्त कर्म हैं वे ही तुमको करने योग्य हैं अधर्मयुक्त नहीं । इसलिये जो आधु- निक ग्रन्थों मे "श्रीगणेशाय नमः' “सीतारामाभ्यां नमः" "राधाकृष्णाभ्यां नमः" " श्रीगुरुचरणार- विन्दाभ्यां नमः नमः" " हनुमते नमः दुर्गायै नमः वटुकाय नमः” “भैरवाय नमः नारायणाय नमः" इत्यादि लेख देखने में आते हैं इनको वुद्धिमान् लोग वेद और शास्त्री से विरुद्ध होने से मिथ्या ही समझते हैं क्योंकि वेद और ऋपियों के ग्रन्थो मे कही ऐसा मङ्गला- चरण देखने में नही आता और पार्षग्रन्थो मे "ओ३म्" तथा "अथ" शब्द तो देखने में आता है। देखो- ''अथ शब्दानुशासनम्" अथेत्ययं शब्दोऽधिकारार्थः प्रयुज्यते । यह व्याकरणमहाभाष्य । "अथातो धर्मजिज्ञासा" अर्थत्यानन्तर्ये वेदाध्ययनानन्तरम् । यह पूर्वमीमांसा । "अथातो धर्म व्याख्यास्यामः" अथेति धर्मकथनानन्तरं धर्मलक्षणं विशेषेण व्याख्या- स्यामः । यह वैशेषिकदर्शन । अथ योगानुशासनम्" अथेत्ययमधिकारार्थः । यह योगशास्त्र । “अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः" सांसारिकविषयभोगानन्तरं त्रिविधदु:- खात्यन्तनिवृत्यर्थः प्रयत्नः कर्तव्यः । यह सांख्यशास्त्र । "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा"। "चतुष्टयसाधनसम्पत्त्यनन्तरं ब्रह्म जिज्ञारयम्"। यह वेदान्तसूत्र है। "ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत"। यह छान्दोग्य उपनिषद् का वचन है। "अोमित्येतदक्षरमिदसर्व तस्योपव्याख्यानम्" । यह माण्डूक्य उपनिषद् के का वचन है। ""शिवाय नमः सरस्वत्यै नमः -- . सत्याप्रकार ऐसे ही अन्य ऋषि मुनियों के ग्रन्थों में "ओ३म्" और "प्रथ" शब्द लिखे हैं वैसे ही ( अग्नि, इद, अग्नि, ये त्रिपप्ताः परियन्ति० ) ये शब्द चारों वेदों के आदि में लिखे हैं। "श्रीगणेशाय नमः” इत्यादि शब्द कहीं नहीं। और जो वैदिक लोग वेद के श्रारम्भ में " हरिः ओ३म् " लिखते और पढ़ते हैं यह पौराणिक और तांत्रिक लोगों की मिथ्या कल्पना से सीखे हैं । वेदादि शास्त्रों में " हरि" शब्द श्रादि में कही नहीं। इसलिये "ओ३म्" वा "अथ" शब्द ही ग्रन्थ के आदि में लिखना चाहिये। यह किञ्चित्मात्र ईश्वर के विषय में लिखा इसके आगे शिक्षा के विषय में लिख्य जायगा ॥ इति श्रीमहयानन्दसरस्वतीस्वामिते सत्यार्थप्रकाशे सुभाषाविभूपित ईश्वरनामविषये प्रथमः समुल्लासः सम्पूर्णः ॥ . - .

* अथ द्वितीयसमुल्लासारम्भः A G प्रय शिक्षा प्रवक्ष्यामः मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेद ॥ यह शतपथ ब्राह्मण का वचन है। वस्तुतः जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात् एक माता, दूसरा पिता और तीसरा प्राचार्य होवे तभी मनुष्य ज्ञानवान होता है । वह कुल धन्य ! वह सन्तान बड़ा भाग्यवान् । जिसके माता और पिता धार्मिक विद्वान हों। जितना माता से सन्तानों को उपदेश और उपकार पहुंचता है उतना किसी से नही । जैसे माता सन्तानों पर प्रेम [ और ] उनका हित करना चाहती है उतना अन्य कोई नही करता, इसलिये (मातृमान् ) अर्थात् "प्रशस्ता धार्मिकी माता.विद्यते यस्य स मातृमान्" धन्य वह माता है कि जो गर्भाधान से लेकर जबतक पूरी विद्या न हो तबतक सुशीलता का उपदेश करे ॥ माता और पिता को अति उचित है कि गर्भाधान के पूर्व, मध्य और पश्चात् मादक द्रव्य, मद्य, दुर्गन्ध, रूक्ष, बुद्धिनाशक पदार्थों को छोड़ के जो शान्ति, आरोग्य, बल, बुद्धि, पराक्रम और सुशी- लता से सभ्यता को प्राप्त करे वैसे घृत, दुग्ध, मिष्ट, अन्नपान श्रादि श्रेष्ठ पदार्थों का सेवन करें कि जिससे रजस् वीर्य्य भी दोपों से रहित होकर अत्युत्तम गुणयुक्त हो । जैसा ऋतुगमन का विधि अर्थात् रजोदर्शन के पांचवे दिवस से ले कर सोलहवे दिवस तक ऋतुदान देने का समय है उन दिनों में से प्रथम के चार दिन त्याज्य हैं, रहे १२ दिन उनमें एकादशी और त्रयोदशी को छोड़ के वाकी १० रात्रियों में गर्भाधान करना उत्तम है। और रजोदर्शन के दिन से ले के १६ वी रात्रि के पश्चात् न समागम करना । पुनः जवतक ऋतुदान का समय पूर्वोक्त न श्रावे तबतक और गर्भस्थिति के पश्चात् एक वर्ष तक संयुक्त न हो । जब दोनों के शरीर में आरोग्य, परस्पर प्रसन्नता, किसी प्रकार का शोक न हो। जैसा चरक और सुश्रुत मे भोजन छादन का विधान और मनुस्मृति में स्त्री पुरुप की प्रसन्नता की रीति लिखी है उसी प्रकार करें और वः । गर्भाधान के पश्चात् स्त्री को बहुत सावधानी से भोजन छादन करना चाहिये । पश्चात् एक वर्ष पर्यन्त स्त्री पुरुष का सङ्ग न करे । बुद्धि, वल, रूप, आरोग्य, पराक्रम, शान्ति श्रादि गुणकारक द्रव्यों ही का सेवन स्त्री करती रहै कि जबतक सन्तान का जन्म न हो। जब जन्म हो तव अच्छे सुगन्धियुक्त जल से वालक को स्नान, नाड़ीछेदन करके सुगन्धि- गुक्त घृतादि के होम * और स्त्री के भी स्नान भोजन का यथायोग्य प्रवन्ध करे कि जिससे चालक और * बालक के जन्म-समय में "जातकर्मसंस्कार" होता है उसमें हवनादि वेदोक कर्म होते हैं वे "संस्कार विभि" मे सविस्तर लिख दिये हैं। 2 4 १६ सत्यार्थप्रकाश vvvv . स्त्री का शरीर क्रमशः श्रारोग्य और पुष्ट होता जाय । ऐसा पदार्थ उसकी माता वा धायी खावे कि जिससे दूध में भी उत्तम गुण प्राप्त हो । प्रसूता का दूध छः दिन तक वालक को पिलावे पश्चात् धायी पिलाया करे परन्तु धायी को उत्तम पदार्थो का खान पान माता पिता करावें । जो कोई दरिद्र हों, धायी को न रख सके तो वे गाय वा वकरी के दूध में उत्तम ओपधि जो कि बुद्धि, पराक्रम, आरोग्य करने- हारी हो उनको शुद्ध जल में भिजो, औटा छान के दूध के समान जल मिला के चालक को पिलावें। जन्म के पश्चात् बालक और उसकी माता को दूसरे स्थान में जहां का वायु शुद्ध हो वहां रक्खें, सुगन्ध तथा दर्शनीय पदार्थ भी रक्खें और उस देश में भ्रमण करना उचित है कि जहां का वायु शुद्ध हो। और जहां धायी, गाय, बकरी आदि का दूध न मिल सके वहां जैसा उचित समझे वैसा करे । क्योंकि प्रसूता स्त्री के शरीर के अंश से वालक का शरीर होता है इसी से स्त्री प्रसवसमय निर्वल होजाती है, इसलिये प्रसूता स्त्री दूध न पिलावे । दूध रोकने के लिये स्तन के छिद्र पर उस ओपधि का लेप करे जिससे दूध नवित न हो। ऐसे करने से दूसरे महीने में पुनरपि युवती होजाती है । तबतक पुरुप ब्रह्मचर्य से वीर्य का निग्रह रक्खे, इस प्रकार जो स्त्री वा पुरुप करेगे उनके उत्तम सन्तान, दीर्घायु, बल पराक्रम की वृद्धि होती ही रहेगी कि जिससे लव सन्तान उत्तम, बल, पराक्रमयुक्त, दीर्घायु, धार्मिक हों। स्त्री योनिसङ्कोचन, शोधन और पुरुष वीर्य्य का स्तम्भन करे । पुनः सन्तान जितने होंगे वे भी सव उत्तम होगे। वालका को माता सदा उत्तम शिक्षा करे जिससे सन्तान सभ्य हों और किसी अङ्ग से कुचेष्टा न करने पावे । जव बोलने लगे तव उसकी माता वालक की जिह्वा जिस प्रकार कोमल होकर स्पष्ट उच्चारण कर सके वैप्ता उपाय करे कि जो जिस वर्ण का स्थान, प्रयत्न अर्थात् जैसे "प" इसका प्रोष्ठ स्थान और स्पष्ट प्रयत्न दोनों ओष्ठों को मिलाकर बोलना, ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत अक्षरों को ठीक २ वोल सकना। मधुर, गम्भीर, सुन्दर, स्वर, अक्षर, मात्रा, पद, वाक्य, लंहिता, अवसान निन्न २ श्रवण होवे । जब वह कुछ २ बोलने और समझने लगे तव सुन्दर वाणी और बड़े, छोटे, मान्य, पिता, माता, राजा, विद्वान् श्रादि से पण, उनसे वर्तमान और उनके पास वैठने श्रादि की भी शिक्षा करें जिससे कही उनका अयोग्य व्यवहार न हो के सर्वत्र प्रतिष्ठा हुआ करे । जैसे सन्तान जितेन्द्रिय विद्याप्रिय और सत्संग में रुचि करें वैसा प्रयत्न करते रहें। व्यर्थ क्रीड़ा, रोदन, हास्य, लड़ाई, हर्ष, शोक, किसी पदार्थ में लोलुपता, ईर्ष्या, द्वेपादि न करें । उपस्थेन्द्रिय के स्पर्श और मर्दन से वीर्य की क्षीणता नपुंसकता होती और हस्त में दुर्गन्ध भी होता है इससे उसका स्पर्श न करें । सदा सत्यभाषण शौर्य, धैर्य, प्रस- नवदन श्रादि गुणो की प्राप्ति जिस प्रकार हो, करावें । जब पांच २ वर्ष के लड़का लड़की हो तव देवनागरी अक्षरों का अभ्यास करावे। अन्यदेशीय भाषाओं के अक्षरो का भी। उसके पश्चात् जिनसे अच्छी शिक्षा, विद्या, धर्म, परमेश्वर, माता, पिता, प्राचार्य, विद्वान्, अतिथि, राजा, प्रजा, कुटुम्ब, वन्धु, भगिनी, भृत्य आदि से कैले २ वर्तना इन बातो के मन्त्र, श्लोक, सूत्र, गद्य, पद्य भी अर्थसहित कंठस्थ करावे । जिनसे सन्तान किसी धूर्त के बहकाने में न आवे और जो २ विद्याधर्मविरुद्ध भ्रान्तिजाल मे गिरानेवाले व्यवहार हैं उनका भी उपदेश करंद, जिससे भूत प्रेत आदि मिथ्या वाती का विश्वास न हो। गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरन् । प्रेतहारैः समं तत्र दशरात्रेण शुष्यति ॥ मनु० [अ० ५ । ६५ ] अर्थ-जव गुरु का प्राणान्त हो तब मृतक-शरीर जिसका नाम प्रेत है उसका दाह करनेहारा शिष्य प्रेतहार अर्थात् मृतक को उठानेवालों के साथ दश दिन शुद्ध होता है। और जब उस शरीर xnraanwar , द्वितीयसमुल्लासः ७ का दाह होवुका तव उसका नाम भूत होता है अर्थात् वह अमुकनामा पुरुष था। जितने उत्पन्न हों वर्तमान मे श्रा के न रहे वे भूतस्थ होने से उनका नाम भूत है। ऐसा ब्रह्मा से लेके आज पर्यन्त के विद्वानों का सिद्धान्त है, परन्तु जिसको शङ्का, कुसंग, कुसंस्कार होता है उसको भय और शङ्कारूप भूत, प्रेत, शाकिनी, डाकिनी आदि अनेक भ्रमजाल दुःखदायक होते हैं। देखो जब कोई प्राणी मरता है तब उसका जीव पाप, पुण्य के वश होकर परमेश्वर की व्यवस्था से सुख दुःख के फल भोगने के अर्थ जन्मान्तर धारण करता है। क्या इस अविनाशी परमेश्वर की व्यवस्था का कोई भी नाश कर सकता है ? अज्ञानी लोग वैद्यकशास्त्र वा पदार्थविद्या के पढ़ने, सुनने और विचार से रहित होकर सन्निपात ज्वरादि शारीरिक और उन्मादकादि मानस रोगों का नाम भूत प्रेतादि धरते हैं। उनका औपधसेवन और पथ्यादि उचित व्यवहार न करके उन धूर्त, पाखण्डी, महामूर्ख, अनाचारी, स्वार्थी, भङ्गी, चमार, शूद्र, म्लेच्छादि पर भी विश्वासी होकर अनेक प्रकार के ढोंग, छल, कपट और उच्छिष्ट भोजन, डोरा, धागा आदि मिथ्या मन्त्र यन्त्र बांधत बंधवाते फिरते है, अपने धन का नाश, सन्तान आदि की दुर्दशा और रोगों को बढ़ाकर दुःख देते फिरते हैं। जब आंख के अंधे और गांठ के पूरे उन दुर्बुद्धि पापी स्वार्थियों के पास जाकर पूछते हैं कि "महाराज ! इस लड़का, लड़की, स्त्री और पुरुष को न जाने क्या होगया है ?" तब वे बोलते हैं कि “इसके शरीर मे बड़ा भूत, प्रेत, भैरव, शीतला आदि देवी भागई है जवतक तुम इसका उपाय न करोगे तवतक ये न छूटेंगे और प्राण भी लेलेंगे । जो तुम मलीदा वा इतनी भेट दो तो हम मन्त्र जप पुरश्चरण से झाड़ के इनको निकाल दें।" तव ये अंधे और उनके सम्बन्धी वोलते हैं कि "महाराज! चाहे हमारा सर्वस्व जाओ परन्तु इनको अच्छा कर दीजिये ।' तब तो उनकी वन पड़ती है। वे धूर्त कहते हैं "अच्छा लाओ इतनी सामग्री, इतनी दक्षिणा, देवता को भेट और प्रदान कराओ।" झांझ, मृदङ्ग, ढोल, थाली लेके उसके सामने वजाते गाते और उनमें से एक पाखण्डी उन्मत्त होके नाच कूद के कहता है "मैं इसका प्राण ही ले लूंगा।" तब वे अंधे उस भङ्गी चमार आदि नीव के पों मे पड़ के कहते हैं "आप चाहे तो लीजिये इसको बचाइये।" तव वह धूर्त बोलता है "मैं हनुमान हूं, लाओ पक्की मिठाई, तेल, सिन्दूर, सवा मन का रोट और लाल लंगोट ।" "मैं देवी वा भैरव हूं, लाओ पांच बांतल सद्य, वीस मुर्गी, पांच बकरे, मिठाई और वस्त्र" जब वे कहते हैं कि “जो चाहो सो लो" तब तो वह पागल बहुत नाचने कूदने लगता है । परन्तु जो कोई बुद्धिमान उनकी भेट पांच जूता दंडा वा चपेटा लाते मारे तो उसके हनु- मान्, देवी ओर भैरव झट प्रसन्न होकर आग जाते हैं, क्योकि वह उनका केवल धनादि हरण करने के प्रयोजनार्थ ढोंग है॥ और जब किसी ग्रहग्रस्त, ग्रहरूप, ज्योतिर्विदाभास के पास जाके वे कहते हैं "हे महाराज! इसको क्या है ?" तव वे कहते हैं कि "इस पर सूर्यादि क्रूर ग्रह चढ़े हैं। जो तुम इनकी शान्तिपाठ, पूजा, दान कराओ तो इसको सुख होजाय, नहीं तो बहुत पीड़ित होकर मरजाय तो भी आश्चर्य नहीं । (उत्तर ) कहिये ज्योतिर्वित् ! जैसी यह पृथिवी जड़ है वैसे ही सूर्यादि लोक हैं। वे ताप और प्रका- शादि से भिन्न कुछ भी नहीं कर सकते। क्या ये चेतन है जो क्रोधित होके दुःख और शान्त होके सुख दे सके ? (प्रश्न ) क्या जो यह संसार मे राजा प्रजा सुखी दुखी हो रहे हैं यह ग्रहो का फल नहीं है ? ( उत्तर ) नहीं, ये सब पाप पुण्यो के फल हैं। (प्रश्न ) तो क्या ज्योतिःशास्त्र झूठा है ? (उत्तर) नहीं, जो उसमें अंक, वीज, रेखागणित विद्या है वह सब सच्ची, जो फल की लीला है वह सब झूठी है। (प्रश्न) क्या जो यह जन्मपत्र है सो निष्फल है ? (उत्तर) हां, वह जन्मपत्र नहीं किन्तु उसका नाम "शोकपत्र' रखना चाहिये क्योकि जब सन्तान का जन्म होता है, तव सव को आनन्द होता है - र सत्यार्थप्रकाशः जा आनन्द तबतक होता है कि जबतक जन्मपत्र बनके ग्रहों का फल न सुनें, जव पुरोहित जन्मपत्र बनाने को कहता है तब उसके माता, पिता पुरोहित से कहते हैं "महाराज ! श्राप बहुत अच्छा जन्मपत्र वनाइये" जो धनाढन्य हो तो बहुतसी लाल पीली रेखाओं से चित्र विचित्र और निधन हो तो साधारण रीति से जन्मपत्र बनाके सुनाने को पाता है। तब उसके मा बाप ज्योतिपीजी के सामने बैठ के कहते हैं इसका जन्मपत्र अच्छा तो है ?" ज्योतिषी कहता है "जो है सो सुना देता हूं। इसके जन्मग्रह बहुत अच्छे और मित्रग्रह भी बहुत अच्छे हैं जिनका फल धनाढय और प्रतिष्ठावान्, जिस सभा मे बैठेगा तो सब के ऊपर इसका तेज पड़ेगा, शरीर से आरोग्य और राज्यमानी होगा।" इत्यादि बातें सुनके पिता श्रादि बोलते हैं “वाह २ ज्योतिषीजी आप बहुत अच्छे हो ।" ज्योतिषीजी समझते हैं इन बातों से कार्य सिद्ध नही होता। तब ज्योतिषी बोलता है कि "यह ग्रह तो बहुत अच्छे हैं, परन्तु ये ग्रह क्रूर हैं अर्थात् फलाने २ ग्रह के योग से ८ वर्ष में इसका मृत्युयोग है ।" इसको सुनके माता पितादि पुत्र के जन्म के आनन्द को छोड़ के, शोकसागर में डूबकर ज्योतिषीजी से कहते हैं कि "महाराजजी ! अब हम क्या करे ?' तब ज्योतिषीजी कहते हैं "उपाय करो।" गृहस्थ पूछे "क्या उपाय करें" ज्योतिषीजी प्रस्ताव करने लगते हैं कि “ऐसा २ दान करो । ग्रह के मन्त्र को जप कराओ और नित्य ब्राह्मणो को भोजन कराओगे तो अनुमान है कि नवग्रहो के विघ्न हट जायेगे।" अनुमान शब्द इसलिये है कि जो मर जायगा तो कहेंगे हम क्या करे, परमेश्वर के ऊपर कोई नहीं है, हमने तो वहुतसा यत्न किया और तुमने कराया उसके कर्म ऐसे ही थे। और जो वच जाय तो कहते हैं कि देखो, हमारे मन्त्र, देवता और ब्राह्मणों की कैसी शक्ति है ! तुम्हारे लड़के को बचा दिया। यहां यह वात होनी चाहिये कि जो इनके जप पाठ से कुछ न हो तो दूने तिगुने रुपये उन धूर्ती से ले लेने चाहिये । और वचजाय तो भी ले लेने चाहिये क्योकि जैसे ज्योतिषियों ने कहा कि "इसके कर्म और परमेश्वर के नियम तोड़ने का सामर्थ्य किसी का नहीं' वैसे गृहस्थ भी कहे कि “यह अपने कर्म और परमेश्वर के नियम से बचा है तुम्हारे करने से नहीं" और तीसरे गुरु श्रादि भी पुण्य दान करा के श्राप ले लेते हैं तो उनको भी वही उत्तर देना, जो ज्योतिषियों को दिया था। अब रह गई शीतला और मन्त्र तन्त्र यन्त्र आदि । ये भी ऐसही ढोग मचाते हैं। कोई कहता है कि " जो हम मन्त्र पढ़ के डोरा वा यन्त्र बना देवें तो हमारे देवता और पीर उस मन्त्र यन्त्र के प्रताप से उसको कोई विघ्न नही होने देते।" इनको वही उत्तर देना चाहिये कि क्या तुम मृत्यु, .परमेश्वर के नियम और कर्मफल से भी बचा सकोगे ? तुम्हारे इस प्रकार करने से भी कितने ही लड़के मर जाते हैं और तुम्हारे घर में भी मर जाते हैं और क्या तुम मरण से बच सकोगे ? तव वे कुछ भी नहीं कह सकते और वे धूर्त जान लेते हैं कि यहां हमारी दाल नही गलेगी, इससे इन सब मिथ्या व्यवहारो को छोड़कर धार्मिक, सब देश के उपकारकर्ता, निष्कपटता से सबको विद्या पढ़ाने वाले, उत्तम विद्वान् लोगो का प्रत्युपकार करना, जैसा वे जगत् का उपकार करते हैं, इस काम को कभी न छोड़ना चाहिये । और जितनी लीला रसायन, मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण श्रादि करना कहते हैं उनको भी महापामर समझना चाहिये। इत्यादि मिथ्या वातों का उपदेश बाल्यावस्था ही में सन्तानों के हृदयो में डाल दे कि जिससे स्वसन्तान किसी के भ्रमजाल में पड़के दुःख न पावे और वीर्य की रक्षा में आनन्द और नाश करने मे दुःखप्राति भी जना देनी चाहिये । जैसे "देखो जिसके शरीप : में सुरक्षित वीर्य रहता है तब उसको आरोग्य, वुद्धि, वल, पराक्रम बढ़ के बहुत सुख की प्राप्ति हो है। इसके रक्षण में यही रीति है कि विषयों की कथा, विषयी लोगों का संग, विषयों का ध्यान, स्त्री दर्शन, एकान्त सेवन, संभाषण और पर्श नादि कर्म से ब्रह्माचारी लोग पृथक् रद्द कर उत्तम १ . - - हितीयाला १५ और पूर्ण विद्या को प्राप्त होवें । जिसके शरीर में वीर्य नहीं होता वह नपुंसक महाकुलक्षणी और जिसको प्रमेह रोग होता है वह दुर्बल, निस्तेज, निर्बुद्धि, उत्साह, साहस, धैर्य, बल, पराक्रमादि गुणों से रहित होकर नष्ट हो जाता है। जो तुम लोग सुशिक्षा और विद्या के ग्रहण, वीर्य की रक्षा करने में इस समय चूकोगे तो पुनः इस जन्म में तुमको यह अमूल्य समय प्राप्त नहीं हो सकेगा। जब तक हम लोग गृह- कर्मो के करनेवाले जीते हैं तभी तक तुमको विद्याग्रहण और शरीर का बल बढ़ाना चाहिये।" इसी प्रकार की अन्य २ शिक्षा भी माता और पिता करे । इसीलिये "मातृमान पितृमान्" शब्द का ग्रहण उक्त वचन में किया है अर्थात् जन्म से ५ वे वर्ष तक वालको को माता, ६ ठे वर्ष से ८ वें वर्ष तक पिता शिक्षा करे और ६ वें वर्ष के प्रारम्भ में द्विज अपने सन्तानो का उपनयन करके प्राचार्यकुल में अर्थात् जहां पूर्ण विद्वान् और पूर्ण विदुषी स्त्री शिक्षा और विद्यादान करनेवाली हों वहां लड़के और लड़कियो को भेज दें और शूद्रादि वर्ण उपनयन किये विना विद्याभ्यास के लिये गुरुकुल मे भेज दें। उन्ही "के सन्तान विद्वान् , सभ्य और सुशिक्षित होते हैं, जो पढ़ाने में सन्तानों का लाइन कभी नहीं करते किन्तु ताड़ना ही करते रहते हैं। इसमे व्याकरण महाभाष्य का प्रमाण है:- सामृतैः पाणिभिर्ध्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः । लालनायिणो दोषास्ताडनायिणो गुणाः॥ [अ० ८।१।८] अर्थ-जो माता पिता और आचार्य सन्तान और शिष्यो का ताड़न करते हैं वे जानो अपने । सन्तान और शिप्यों को अपने हाथ से अमृत पिला रहे हैं और जो सन्तानों वा शिष्यों का लाइन करते । हैं वे अपने सन्तानो और शिष्यों को विष पिला के नष्ट भ्रष्ट कर देते हैं। क्योकि लाइन से सन्तान और शिष्य दोषयुक्त तथा ताड़ना से गुणयुक्त होते हैं। और सन्तान और शिष्य लोग भी ताड़ना से प्रसन्न है और लाइन से अप्रसन्न सदा रहा करें। परन्तु माता, पिता तथा अध्यापक लोग ईर्ष्या, द्वेष से ताड़न ६ न करें। किन्तु ऊपर से भयप्रदान और भीतर से कृपादृष्टि रक्खें । जैसी अन्य शिक्षा की वैसी चोरी, जारी, आलस्य, प्रमाद, मादक द्रव्य, मिथ्याभाषण, हिंसा, क्रूरता, ईर्ष्या, द्वेष, मोह आदि दोपों के छोड़ने । और सत्याचार के ग्रहण करने की शिक्षा करे। क्योंकि जिस पुरुप ने जिसके सामने एक वार चोरी, द जारी, मिथ्याभाषणादि कर्म किया उसकी प्रतिष्ठा उसके सामने मृत्युपर्यन्त नहीं होती । जैसी ६ हानि प्रतिज्ञा मिथ्या करनेवाले की होती है वैसी अन्य किसी की नहीं। इससे जिसके साथ जैसी प्रतिज्ञा करनी उसके साथ वैसे ही पूरी करनी चाहिये अर्थात् जैसे किसी ने किसी से कहा कि "मैं म तुमको वा तुम मुझसे अमुक समय मे मिलूंगा धा मिलना अथवा अमुक वस्तु अमुक समय मे तुमको का मैं दूंगा" इसको वैसे ही पूरी करे नही तो उसकी प्रतीति कोई भी न करेगा। इसलिये सदा सत्यभापण ही और सत्यप्रतिज्ञायुक्त सब को होना चाहिये। किसी को अभिमान न करना चाहिये । छल, कपट वा वे! कृतघ्नता से अपना ही हृदय दुःखित होता है तो दूसरे की क्या कथा कहनी चाहिये । छल और कपट * उसको कहते हैं जो भीतर और बाहर और रख दूसरे को मोह मे डाल और दूसरे की हानि पर | ध्यान न देकर स्वप्रयोजन सिद्ध करना। कृतघ्नता" उसको कहते हैं कि किसी के किये छुप. उपकार ही को न मानना । क्रोधादि दोप और कटुवचन को छोड़ शान्त और मधुर वचन ही बॉल और बहुत म यकवाद न करे। जितना बोलना चाहिये उससे न्यून वा अधिक न बोले । बद्रों को मान्य दे, ७० सामने उठकर जा के उच्चासन पर बैठावे प्रथम “नमस्त" कर । उन क सामन उनमासन पर सभा में वैसे स्थान में बैठे जैसी अपनी योग्यता हो और दूसरा काई न दटाव । विराय 막 पर AA २० सत्यार्थप्रकाश करे । सम्पन्न होकर गुणों का ग्रहण और दोषों का त्याग रक्खे । सजनों का संग और दुष्टों का त्यार अपने माता, पिता और प्राचार्य की तन मन और धनादि उत्तम उत्तम पदार्थों से प्रीतिपूर्वक सेवा करे यान्यस्माक सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि ॥ यह तैत्ति० [प्रपा० ७ । अनु० ११] इसका यह अभिप्राय है कि माता पिता प्राचार्य अपने सन्तान और शिष्यों को सदा सर उपदेश करें और यह भी कहैं कि जो २ हमारे धर्मयुक्त कर्म हैं उन उनका ग्रहण करो और जो २ दु कर्म हों उनका त्याग कर दिया करो । जो २ सत्य जाने उन २ का प्रकाश और प्रचार करे । किर्स पाखण्डी, दुष्टाचारी मनुष्य पर विश्वास न करे और जिस २ उत्तम कर्म के लिये माता, पिता और श्राचार्य श्राज्ञा देवें उस २ का यथेष्ट पालन करे जैसे माता, पिता ने धर्म, विद्या, अच्छे आचरण श्लोक "निघण्टु" “निरुक्त" "अष्टाध्यायी" अथवा अन्य सूत्र वा वेदमन्त्र कण्ठस्थ कराये हो उन २ क पुनः अर्थ विद्यार्थियो को विदित करावे । जैसे प्रथम समुल्लास मे परमेश्वर का व्याख्यान किया है उर्स प्रकार मानके उसकी उपासना करे । जिस प्रकार आरोग्य, विद्या और चल प्राप्त हो उसी प्रकार भोजन छादन और व्यवहार करे करावे अर्थात् जितनी क्षुधा हो उससे कुछ न्यून भोजन करे । मद्य मांसादि के सेवन से अलग रहैं । अज्ञात गम्भीर जल मे प्रवेश न करे क्योकि जलजन्तु वा किसी अन्य पदार्थ से दुःख भोर जो तरना न जाने ता डूब ही जा सकता है "नाविज्ञाते जलाशये" यह मनु का वचन है, अविज्ञात जलाशय मे प्रविष्ट होके स्नानादि न करें !! दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं. वस्त्रपूनं जलं पिवेत् । सत्यपूतां बदेवाचं, मनःपूतं समाचरेत् ॥ मनु० [अ० ६ । ४६] अर्थ-नीचे दृष्टि कर ऊंचे नीचे स्थान को देख के चले, वस्त्र से छान के जल पीव, पवित्र करके बचन बोले, मन से विचार के आचरण करे ॥ माता शत्रुः पिता वैरी येन वालो न पाठितः । न शोमते सभामध्ये हंसमध्ये वको यथा ॥ चाणक्यनीते अध्या० २। श्लो० ११ ॥ वे माता और पिता अपने सन्तानो के पूर्ण वैरी हैं जिन्होने उनको विद्या की प्राप्ति न कराई, वे विद्वानों की सभा मे वैसे तिरस्कृत और कुशोभित होते हैं जैसे हंसो के बीच में बगुला । यही माता, पिता का कर्तव्य कर्म परमधर्म और कीर्ति का काम है जो अपने सन्तानो को तन, मन, धन से विद्या, धर्म, सभ्यता और उत्तम शिक्षायुक्त करना ! यह बालशिक्षा मे थोड़ासा लिखा इतने ही से वुद्धि- मान् लोग वहुत समझ लेगे । इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिकृते सत्यार्थप्रकाशे सुभापाविभूपिते वालशिक्षाविषये द्वितीयः समुल्लासः सम्पूर्णः ॥ २ ॥ से A 4 " . अथ तृतीयसमुल्लासारम्भः . R- .. अथाऽध्ययनाध्यापनविधिं व्याख्याम्याम: । अब तीसरे समुल्लास में पढ़ने पढ़ाने का प्रकार लिखते हैं । सन्तानों को.उत्तम विद्या शिक्षा, गुण, कर्म और स्वभावरूप प्राभूषणों का धारण कराना माता, पिता, प्राचार्य और सम्बन्धियों का मुख्य कर्म है। सोने, चांदी, माणिक, मोती, मूंगा श्रादि रत्नो से युक्त श्राभूषणों के धारण कराने से मनुष्य का प्रात्मा सुभूषित कभी नहीं हो सकता। क्योंकि श्राभूषणों के धारण करने से केवल देहा. भिमान, विषयासक्ति और चोर श्रादि का भय तथा मृत्यु का भी सम्भव है । संसार में देखने में श्राता है कि आभूषणों के योग से बालकादिकों का मृत्यु दुष्टों के हाथ से होता है । विद्याविलासमनसो धृतशीलशिक्षा, सत्यव्रता रहितमानमलापहाराः । संसारदुःखदलनेन सुभूषिता ये, धन्या नरा विहितकर्मपरोपकाराः॥ जिन पुरुषों का मन विद्या के विलास में तत्पर रहता, सुन्दर शीलस्वभावयुक्त, सत्यभाषणादि नियम पालनयुक्त, और जो अभिमान अपवित्रता से रहित, अन्य की मलीनता के नाशक, सत्योपदेश, विद्यादान से संसारी जनों के दुःखों के दूर करने से सुभूषित, वेदविहित कर्मों से पराये उपकार करने में रहते हैं वे नर और नारी धन्य हैं। इसलिये आठ वर्ष के हो तभी लड़कों को लड़कों की और लड़- कियों को लड़कियों की पाठशाला में भेज देवें। जो अध्यापक पुरुष वा स्त्री दुष्टाचारी हों उनसे शिक्षा न दिलावें । किन्तु जो पूर्ण विद्यायुक्त धार्मिक हों वे ही पढ़ाने और शिक्षा देने योग्य हैं । द्विज अपने घर में लड़कों का यज्ञोपवीत और कन्याओं का भी यथायोग्य संस्कार करके यथोक्त आचार्य कुल अर्थात् अपनी २ पाठशाला में भेज दें। विद्या पढ़ने का स्थान एकान्त देश में होना चाहिये और रे लड़के और लड़कियों की पाठशाला दो कोस एक दूसरे से दूर होनी चाहिये । जो वहां अध्यापिका और अध्यापक पुरुष वा भृत्य, अनुचर हों वे कन्याओं की पाठशाला में सव स्त्री और पुरुषों की पाठशाला में पुरुष रहैं। स्त्रियों की पाठशाला में पांच वर्ष का लड़का और पुरुषों की पाठशाला में पांच वर्ष की लड़की भी न जाने पावे । अर्थात् जबतक वे ब्रह्मचारी वा ब्रह्मचारिणी रहैं तबतक स्त्री वा पुरुष का दर्शन, स्पर्शन, एकान्तसेवन, भाषण, विषयकथा, परस्परक्रीड़ा, विषय का ध्यान और सङ्ग इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहैं और अध्यापक लोग उनको इन बातों से बचावें जिससे उत्तम-विद्या, शिक्षा, शील, स्वभाव, शरीर और आत्मा से बलयुक्त होके आनन्द को नित्य बढ़ा सकें । पाठशालाओं से एक योजन अर्थात् चार कोस दूर ग्राम वा नगर रहै । सव को तुल्य, वस्त्र, खान पान, श्रासन दिये जायें, चाहे वह राजकुमार वा राजकुमारी हो चाहे दरिद्र के सन्तान हों, सब को तपस्वी होना चाहिये। इनके माता पिता अपने सन्तानों से वा सन्तान अपने माता पिताओं स न मिल सकें और न किसी प्रकार का पत्रव्यवहार एक दूसरे से कर सकें, जिससे संसारी चिन्ता से रहित होकर केवल विद्या .

२२ सत्यार्यप्रकाश . बढ़ाने की चिन्ता रक्खें । जब भ्रमण करने को जायें तव उनके साथ अध्यापक रहें जिससे किसी प्रकार की कुचेष्टा न कर सकें और न आलस्य प्रमाद करें। कन्यानां सम्प्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम् ॥ मनु० [अ० ७ । श्लोक १५२ ] इसका अभिप्राय यह है कि इसमें राजनियम और जातिनियम होना चाहिये कि पाचवे अथवा आठवें वर्ष से आगे कोई अपने लड़कों और लड़कियों को घर में न रख सके । पाठशाला में अवश्य भेज देवें, जो न भेजे वह दण्डनीय हो । प्रथम लड़को का यज्ञोपवीत घर में हो और दूसरा पाठशाला में प्राचार्यकुल में हो । पिता माता वा अध्यापक अपने लड़का लड़कियों को अर्थसहित गायत्री मन्त्र का उपदेश करदें। वह मन्त्र यह है- ओ३म् भूर्भुवः स्वः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ [ यजु० अ० ३६ । मं०,३] इस मन्त्र में जो प्रथम (ओ३म् ) है उसका अर्थ प्रथमसमुल्लास मे कर दिया है, वहीं से जान लेना। अब तीन महान्याहृतियों के अर्थ संक्षेप से लिखते हैं। "भूरिति वै प्राणः” “य. प्राणयति चराs- चरं जगत् स भूः स्वयम्भूरीश्वरः" जो सव जगत् के जीवन का आधार, प्राण से भी प्रिय और स्वयम्भू है उस प्राण का वाचक होके "भूः" परमेश्वर का नाम है । "भुवरित्यपानः" "यः सर्व दु.खमपानयति सोपानः" जो सब दुःखों से रहित, जिसके सङ्ग से जीव सव दुःखों से छूट जाते हैं इसलिये उस परमेश्वर का नाम "भुवः' है । “स्वरिति व्यानः" "यो विविधं जगद् व्यानयति व्याप्नोति स व्यानः" जो नानाविध जगत् में व्यापक होके सव का धारण करता है इसलिये उसं परमेश्वर का नाम "स्वः” है । ये तीनों वचन तैत्तिरीय श्रारण्यक [प्रपा० ७ । अनु० ५] के हैं (सवितुः ) “यः सुनोत्युत्पादयति सर्व जगतु स सविता तस्य' जो सब जंगत् का उत्पादक और सव ऐश्वर्य का दाता है ( देवस्य ) “यो दीव्यति दीव्यते वा स देवः" जो सर्व सुखों का देनेहारा और जिसकी प्राप्ति की कामना संब करते हैं उस परमात्मा का जो ( वरेण्यम् ) “वर्तुमर्हम्" स्वीकार करने योग्य अति श्रेष्ठ (भर्गः) "शुद्धस्वरूपम्" शुद्धस्वरूप और पवित्रं करनेवाला चतन ब्रह्मस्वरूप है ( तत् ) उसी परमात्मा के स्वरूप को हम लोग (धीमहि ) "धरेमहि" धारण करे । किस प्रयोजन के लिये कि ( यः ) “जंगदीश्वर.” जो सविता देव परमात्मा (नः),"अस्माकम्” हमारी (धियः) "युद्धीः' बुद्धियो को (प्रचोदयात् ) "प्रेरयेत्" प्रेरणा करे अर्थात् बुरे कामों से छुड़ाकर अच्छे कामों में प्रवृत्त करे । “हे परमेश्वर । हे सच्चिदानन्दानन्तस्व. रूप ! हे नित्यशुद्धवुद्धमुक्तस्वभाव ! हे अज निरञ्जन निर्विकार ! हे सर्वान्तर्यामिन् ! हे सर्वाधार जगत्पते! सकलजगदुत्पादक! हे अनादेः ! विश्वम्भर । सर्वव्यापिन् ! हे करुणामृतवारिये ! सवितुर्देवस्य तव यदो भूर्भुवः स्वर्वरेण्यं भर्गोऽस्ति तद्वयं धीमहि दधीमहि धरेमहि ध्यायेम वा कस्मै प्रयोजनायेत्यत्राह । हे भगवन् ! यः सविता देवः परमेश्वरो भवानस्माकं धियः प्रचोदयात् । स एवास्माकं पूज्य उपासनीय इष्टदेवो भवतु नातोऽन्यं भवत्तुल्यं भवतोऽधिकं च कञ्चित् कदाचिन्मन्यामहे" हे मनुष्यो ! जो सब समर्थों में समर्थ सच्चिदानन्दानन्तस्वरूप, नित्य शुद्ध, नित्य वुद्ध, नित्य मुक्तस्वभाववाला, कृपासागर, ठीक २ न्याय का करनेहारी, जन्ममरणादि क्लेशरहित, श्राकार रहित, सव के घट २ का जाननेवाला, सब का धर्ती पिता, उत्पादक, अन्नादि से विश्व का पोषण करनेहारा, सकल ऐश्वर्ययुक्त, जगत् का निर्माता, शुद्धस्वरूप और जो प्राप्ति की कामना करने योग्य है उस परमात्मा का जो शुद्ध चेतनस्वरूप उसी को हम धारण करें। इस प्रयोजन के लिये कि वह परमेश्वर हमारे आत्मा और वुद्धियों का अन्तर्यामिस्वरूप हमको दुष्टाचार अधर्मयुक्त मार्ग से हटा के श्रेष्ठाचार सत्य मार्ग में चलावे, उसको ।

- - - , - तृतीयसमुल्लासः २३ छोड़कर दूसरे किसी वस्तु का ध्यान हम लोग नही करें। क्योंकि न कोई उसके तुल्य और न अधिक है। वही हमारा पिता राजा न्यायाधीश और सव सुखो का देनेहारा है । इस प्रकार गायत्रीमन्त्र का उपदेश करके सन्ध्योपासन की जो स्नान, आचमन, प्राणायाम आदि क्रिया हैं सिखलावे । प्रथम स्नान इसलिये है कि जिससे शरीर के बाह्य अवयवों की शुद्धि और श्रारोग्य-श्रादि होते हैं। इसमे प्रमाण- अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति, मनः सत्येन शुध्यति। विद्यातपोभ्यां भूतात्मा, बुद्धिज्ञानेन शुध्यति॥ . [ मनु० अ०५ । श्लोक १०६ ] यह मनुस्मृति का श्लोक है। . जल से शरीर के बाहर के अवयव, सत्याचरण से मन, विद्या और तप अर्थात् सब प्रकार के कष्ट भी सह के धर्म ही के अनुष्ठान करने से जीवात्मा ज्ञान अर्थात् पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों के विवेक से बुद्धि, दृढ़ निश्चय पवित्र होते हैं। इससे स्नान भोजन के पूर्व अवश्य करना। इसरा-प्राणायाम-इसमे प्रमाण-.; , योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्याते ॥ [ योग०. साधनपादे। सू० २८] यह योगशास्त्र का सूत्र है। । 'जब मनुष्य प्राणायाम करता है तव प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और मान' का प्रकाश होता 'बाता है । जबतक मुक्तिन हो तबतक उसके आत्मा का ज्ञान बरावर बढ़ता जाता है ॥ दयन्ते ध्मायमानानांधातूनां हि यथा मलाः। तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ।। . [ मनु० अ०.६ । ७१] यह मनुस्मृति का श्लोक है। जैसे अग्नि में तपाने से सुवर्णादि धातुओ का मल नष्ट होकर. शुद्ध होते हैं वैसे प्राणायाम करके मन आदि, इन्द्रियों के दोष-क्षीण होकर निर्मल हो जाते हैं। प्राणायाम का विधि- प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां चा:प्राणस्य ॥ योग. समाधिपादे] सू०३४ ॥ जैसे अत्यन्त वेग से वमन होकर अन्न जल वाहर निकल जाता है वैसे प्राण को बल से बाहर 'फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोकदेवे । जब वाहर निकालना चाहे तव मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच रक्खे तबतक प्राण वाहर रहता है। इसी प्रकार प्राण वाहर अधिक ठहर सकता है। जब घबराहट हो तब धीरे २ भीतर वायु को ले के फिर भी वैसे ही करता जाय, जितना सामर्थ्य और इच्छा हो। और मन 'में (ओ३म् ) इसका जप करता जाय । इस प्रकार करने से आत्मा और मन को पवित्रता और स्थि- रता होती है । एक "बाह्यविषय" अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना । दूसरा "श्राभ्यन्तर" अर्थात् भीतर जितना प्राण रोका जाय उतना रोक के । तीसरा "स्तम्भवृत्ति" अर्थात् एक ही वार जहां का तहां प्राण को यथाशक्ति रोक देना । चौथा "वाह्याभ्यन्तराक्षेपी' अर्थात् जव प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तव उससे विरुद्ध न निकलने देने के लिये बाहर से, भीतर ले और जब बाहर से भीतर श्राने लगे तव भीतर से बाहर की ओर प्राण को धक्का देकर रोकता जाय । पेसे एक दूसरे के विरुद्ध क्रिया करे तो दोनो की गति रुककर प्राण अपने वश मे होने से मन और इन्द्रिय भी स्वाधीन होते हैं। रल पुरुषार्थ वढ़कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप होजाती है. कि-जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है । इससे मनुष्यशरीर मे वीर्य वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर वल, पराक्रम, - यता सव शास्त्रों को थोड़े, ही काल में समझ कर उपस्थित कर लेगा। स्त्री भी इसी प्रकार tea - - f म २४ सत्यार्थप्रकाश करे। भोजन, छादन, बैठने, उठने, बोलने, चालने, बड़े छोटे से यथायोग्य व्यवहार करने का उपदेश करें । सन्ध्योपासन जिसको ब्रह्मयज्ञ भी कहते हैं। "आचमन" उतने जल को हथेली में ले के उसके मूल और मध्यदेश में ओष्ठ लगा के करे कि वह जल कण्ठ के नीचे हृदय तक पहुंचे, न उससे अधिक न न्यून । उससे कण्ठस्थ कफ और पित्त की निवृत्ति थोड़ीसी होती है। पश्चात् "मार्जन" अर्थात् मध्यमा और अनामिका अंगुली के अग्रभाग से नेत्रादि अङ्गों पर जल छिड़के । उससे आलस्य दूर होता है। जो आलस्य और जल प्राप्त न हो तो न करे । पुनः समन्त्रक प्राणायाम, मनसापरिक्रमण, उपस्थान, पीछे परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना की रीति लिखलावे । पश्चात् "अघमर्षण" अर्थात् पाप करने की इच्छा भी कभी न करे। यह सन्ध्योपासन एकान्त देश में एकाग्रचित्त से करे | -अपां समीपे नियतो नैत्यिकं विधिमास्थितः । सावित्रीमप्यधीयीत गत्वारण्यं समाहितः॥ [ मनु० अ० २ । १०४ ] यह मनुस्मृति का वचन है। जङ्गल में अर्थात् एकान्त देश में जा, सावधान हो के, जल के समीप स्थित हो के नित्यकर्म को करता हुश्रा सावित्री अर्थात् गायत्री मन्त्र का उच्चारण, अर्थज्ञान और उसके अनुसार अपने बाल चलन को करे, परन्तु यह जप मन से करना उत्तम है। दूसरा देवयक्ष जो अग्निहोत्र और विद्वानों का संग सेवादिक से होता है । सन्ध्या और अग्निहोत्र सायं प्रातः दो ही काल में करे । दो ही रात दिन की सन्धिवेला हैं अन्य नहीं । न्यून से न्यून एक घंटा ध्यान अवश्य करे। जैसे समाधिस्थ होकर योगी लोग परमात्मा का ध्यान करते हैं वैसे ही सन्ध्योपासन भी किया करे । तथा सूर्योदय के पश्चात् और सूर्या- 'स्त के पूर्व अग्निहोत्र करने का समय है उसके लिये एक किसी धातु वा मट्टी के ऊपर १२ वा १६ अंगुल चौकोन उतनी ही गहिरी और नीचे ३ वा ४ अंगुल परिमाणं से वेदी इस प्रकार वनावें अर्थात् ऊपर जितनी चौड़ी हो उसकी चतुर्थीश नीचे चौड़ी रहै। उसमें चन्दन पलाश वा आघ्रादि के श्रेष्ठ काष्ठों के टुकड़े उसी वेदी के परिमाण से बड़े छोटे करके उसमें रक्खे उसके मध्य में अग्नि रखके पुनः उस पर समिधा अर्थात् पूर्वोक्त इन्धन रख दे एक प्रोक्षणीपात्र ऐसा और तीसरा प्रणीतापात्र इस प्रकार का और एक इस प्रकार की आज्यस्थाली के अर्थात् घृत रखने का पात्र और चमसा ऐसा सोने, चांदी का काष्ठ का वनवा के प्रणीता और प्रोक्षणी में जल तथा घृतपात्र में घृत रख घृत को तपा लेवे । प्रणीता जल रखने और प्रोक्षणी इसलिये है कि उससे हाथ धोने को जल लेना सुगम है। पश्चात् उस घी को अच्छे प्रकार देख लेवे. -फिर-इन मन्त्रो से होम करे ॥ ‘ओं भूरग्नये प्राणाय स्वाहा । भुवर्षायवेऽपानाय स्वाहा । खरादित्याय व्यानाय स्वाहा । भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा ।। इत्यादि अग्निहोत्र के प्रत्येक मन्त्र को पढ़कर एक २ आहुति देवे और जो अधिक माहुति देना हो तो:- विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद्भद्रं तन्नु आसुंव ॥ [ यजु० अ० ३० । ३] इस मन्त्र और पूर्वोक्त गायत्री मन्त्र से आहुति देवें । "ओं भूः" और "प्राणः" आदि ये सब नाम परमेश्वर के हैं। इनके अर्थ कह चुके हैं। "स्वाहा” शब्द का अर्थ यह है कि जैसा ज्ञान प्रात्मा में हो ܐ ܪ तृतीयसमुहास: वैसा ही जीभ से बोले, विपरीत नहीं। जैसे परमेश्वर ने सब प्राणियों के सुख के अर्थ इस सब जगत् के पदार्थ रचे हैं वैसे मनुष्यों को भी परोपकार करना चाहिये ॥ (प्रश्न) होम से क्या उपकार होता है ? ( उत्तर ) सब लोग जानते हैं कि दुर्गन्धयुक्त वायु और जल से रोग, रोग से प्राणियों को दुःख और सुगन्धित वायु तथा जल से आरोग्य और रोग के नष्ट होने से सुख प्राप्त होता है। (प्रश्न) चन्दनादि घिसके किसी के लगावे या घृतादि खाने को देवे तो बड़ा उपकार हो । अग्नि में डाल के व्यर्थ नष्ट करना बुद्धिमानों का काम नहीं। (उत्तर) जो तुम पदार्थविद्या जानते तो कभी ऐसी बात न कहते क्योंकि किसी द्रव्य का प्रभाव नहीं होता। देखो जहां होम होता है वहां से दूर देश में स्थित पुरुष के नासिका से सुगन्ध का ग्रहण होता है वैसे दुर्गन्ध का भी । इतने ही से समझलो कि अग्नि में डाला हुआ पदार्थ सूक्ष्म हो के फैल के वायु के साथ दूर देश में जाकर दुर्गन्ध की निवृत्ति करता है । (प्रश्न) जब ऐसा ही है तो केशर, कस्तूरी, सुगन्धित पुष्प और अतर श्रादि के घर में रखने से सुगन्धित वायु होकर सुखकारक होगा। (उत्तर) उस सुगन्ध का वह सामर्थ्य नहीं है कि गृहस्थ वायु को बाहर निकाल कर शुद्ध वायु का प्रवेश करा सके क्योकि उस में भेदक शक्ति नही है और अग्नि ही का सामर्थ्य है कि उस वायु और दुर्गन्ध- युक्त पदार्थों को छिन्न भिन्न और हलका करके बाहर निकाल कर पवित्र वायु का प्रवेश कर देता है। (प्रश्न ) तो मन्त्र पद के होम करने का क्या प्रयोजन है ? (उत्तर) मन्त्रों में वह व्याख्यान है कि जिसले होम करने के लाभ विदित हो जायँ और मन्त्रों की आवृत्ति होने से कण्ठस्थ रहें वेद-पुस्तकों का पठन पाठन और रक्षा भी होवे । (प्रश्न ) क्या इस होम करने के विना पाप होता है ? (उत्तर) हो । क्योंकि जिस मनुष्य के शरीर से जितना दुर्गन्ध उत्पन्न हो के वायु और जल को बिगाड़ कर रोगोत्पत्ति का निमित्त होने से प्राणियों को दुःख प्राप्त करता है उतना ही पाप उस मनुष्य, को होता है। इसलिये उस पाप के निवारणार्थ उतना सुगन्ध वा उससे अधिक वायु और जल में फैलाना पाहिये । और खिलाने पिलाने से उसी एक व्यक्ति को सुखविशेष होता है। जितना 'घृत और सुग न्धादि पदार्थ एक मनुष्य खाता है उतने द्रव्य के होम से लाखों मनुष्यों का उपकार होता है। परन्तु जो मनुष्य लोग घृतादि उत्तम पदार्थ न खावें तो उनके शरीर और आत्मा के वल की उन्नति न हो- सके, इससे अच्छे पदार्थ खिलाना पिलाना भी चाहिये, परन्तु उससे होम अधिक करना उचित है इस- लिये होम करना अत्यावश्यक है । (प्रश्न ) प्रत्येक मनुष्य कितनी आहुति करे और एक २ पाहुति का कितना परिमाण है ? (उत्तर) प्रत्येक मनुष्य को सोलह २ आहुति और छः २ माशे घृतादि एक एक माहुति का परिमाण न्यून' से न्यून चाहिये और जो इससे अधिक करे तो बहुत अच्छा है । इस- लिये आर्यवरशिरोमणि महाशय ऋषि, महर्षि, राजे, महाराजे, लोग वहुतसा होम करते और कराते थे। जबतक इस होम करने का प्रचार रहा तबतक आर्यावर्त देश रोगो से रहित और सुखो से पूरित था, भय भी प्रचार हो तो वैसा ही होजाय । ये दो यज्ञ अर्थात् ब्रह्मयज्ञ जो पढ़ना पढ़ाना संध्योपासन । ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना करना, दूसरा देवयज्ञ जो अग्निहोत्र से ले के अश्वमेध पर्यन्त यज्ञ और विद्वानों की सेवा संग करना परन्तु ब्रह्मचर्य में केवल ब्रह्मयज्ञ और अग्निहोत्र का ही करना होता है। प्राह्मणत्रयाणां वर्णानामुपनयनं कर्तुमर्हति । राजन्यो यस्य । वैश्यो वैश्यस्यैवेति । शद्र- मपि कलगुणसम्पन्न मन्त्रवर्जमनुपनीतमध्यापयदित्येके ॥ यह सुश्रुत के सूत्रस्थान के दूसरे अध्याय का वचन है। ब्राह्मण तीनों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, क्षत्रिय क्षात्रय और वैश्य, तथा वैश्य एक वैश्य वर्ण का यज्ञोपवीत कराके पढ़ा सकता है। म M - . - ! A -- 1 सत्यार्थप्रकाश im और जो कुलीन शुभलक्षणयुक्त शूद्र हो तो उसको मन्त्रसंहिता छोड़ के सब शास्त्र पढ़ावे, शुद्ध, पढ़े परन्तु उसका उपनयन न करे, यह मत अनेक प्राचार्यों का है । पश्चात् पांचवें वा पाठवे वर्ष से लड़के लड़कों की पाठशाला मे और लड़की लड़कियो की पाठशाला में जावें । और निम्नलिखित नियमपूर्वक अध्ययन का आरम्भ करें । पत्रिंशदाब्दिकं चयं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् । तदर्धिकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा ॥ मनु० [अ०३।१ अर्थ--आठवें वर्ष से आगे छत्तीसवे वर्प पर्यन्त अर्थात् एक २ वेद के साङ्गोपाङ्ग पढ़ने बारह २ वर्ष मिल के छत्तीस और आठ मिल के चवालीस अथवा अठारह वर्षों का ब्रह्मचर्य और छ पूर्व के मिल के छब्बीस वा नौ वर्ष तथा जबतक विद्या पूरी अहण न कर लेवे तवतक ब्रह्मचर्य रक्खे पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विधेशति वर्षाणि तत्प्रातःसवनं, चतुर्विशत्यक्षरा गाय गायत्रं प्रातःसवनं, तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा चाव वसव एते हीदर्थ सर्व वासयन्ति ॥ १ तञ्चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध न्दिनसवनमनुसंतलुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो भवति ॥ २॥ अथ यानि चतुश्चत्वारिशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिन सवनं चतुश्चत्वारिशदक्षरा त्रिष्टुप् त्रैष्णु माध्यंदिन सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीद, सर्व रोदयन्ति ॥३ तं चेदेतस्मिन्वयसि किञ्चिदुपतपेत्स च्यात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यंदिन सबनं तृतीयस वनमनुसन्तनुतेति.माहं प्राणाना रुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीत्युद्धैव तत एल्यगदो ह भवति ॥४, अथ यान्यष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि तत्तृतीयसवनमष्टाचत्वारिशदक्षरा.- जगती जागतं तृतीय सवनं तदस्यादित्यान्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीदर्थ सर्वमाददते ॥ ५ ॥ तं चेदेतस्मिन् वयासे किञ्चिदुपतपेत्स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसंवनमायुर नुसंतनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्वैव तत एत्यगदों हैव भवति ॥६। यह छान्दोग्योपतिपद् [प्रपाठक ३ खण्ड १६ ] का वचन है। ब्रह्मचर्य तीन प्रकार का होत है कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम, उनमे से कनिष्ठ-जो पुरुष अन्नरसमय देह',और पुरि अर्थात् देह मे शया करनेवाला जीवात्मा यज्ञ अर्थात् अतीव शुभगुणा से सङ्गत और सत्कर्तव्य है इसको आवश्यक है कि -२४ वर्ष पर्यन्त जितेन्द्रिय अर्थात् ब्रह्मचारी रहकर वेदादि विद्या और सुशिक्षा का ग्रहण करे और -विवाह करके भी लम्पटता न करे तो उसके शरीर मे प्राण बलवान् होकर सव शुभगुणो के वास करा नेवाले होते हैं । इस प्रथम वय मे जो उसको विद्याभ्यास मे संतप्त करे और वह आचार्य वैसा ही उप देश किया करे और ब्रह्मचारी ऐसा निश्चय रक्खे कि जो मैं प्रथम अवस्था मे ठीक २ ब्रह्मचारी, तो सेरा शरीर और आत्मा आरोग्य बलवान होके शुभंगुणों को बसानेवाले मेरे प्राण होगे। हे मनुष्यो तुम इस प्रकार से सुखो का विस्तार करो, जो मैं ब्रह्मचर्य का लोप न करूं २४.वर्ष के पश्चात् गृहाय. करूंगा तो प्रसिद्ध है कि. रोगरहित रहूंगा और श्रायु भी मेरी ७० वा ८० वर्ष तक रहेगी । मग ब्रह्मचर्य यह है: जो मनुष्य ४४ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचारी रहकर वेदाभ्यास करता है उसके प्राण, इन्द्रिय are 1- 3 - -- - -- 1 Een 1 तृतीयसमुल्लासा अन्तःकरण और आत्मा बलयुक्त हो के सब दुष्टों को रुलाने और श्रेष्ठों का पालन करनेहारे होते हैं। । जो मैं इसी.प्रथम वय में जैसा आप कहते हैं कुछ तपश्चर्या करूं तो मेरे ये रुद्रूप प्राणयुक्त यह मध्यम ब्रह्मचर्य सिद्ध होगा। हे ब्रह्मचारी लोगो ! तुम इस ब्रह्मचर्य को बढ़ाओ जैसे मैं इस ब्रह्मचर्य का लोप न करके यज्ञस्वरूप होता हूं और उसी आचार्यकुल से श्राता और रोगरहित होता हूं जैसा कि यह ब्रह्मचारी अच्छा काम करता है वैसा तुम किया करो । उत्तम ब्रह्मचर्य ४८ वर्ष पर्यन्त को तीसरे प्रकार का होता है, जैसे ४८ अक्षर की जगती वैसे जो ४८ वर्ष पर्यन्त यथावत् ब्रह्मचर्य करता है, उसके प्राण अनुकूल होकर सकल विद्याओं का ग्रहण करते हैं । जो आचार्य और माता पिता अपने सन्तानों को प्रथम वय में विद्या और गुणग्रहण के लिये तपस्वी कर और उसी का उपदेश करें और वे सन्तान आप ही आप अखण्डित ब्रह्मचर्य सेवन से तीसरे उत्तम ब्रह्मचर्य का सेवन करके पूर्ण अर्थात् चारसौ वर्ष पर्यन्त आयु को बढ़ावें वैसे तुम भी बढ़ाओ। क्योंकि जो मनुष्य इस ब्रह्मचर्य को प्राप्त होकर लोप नही करते वे सब प्रकार के रोगो से रहित होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त होते हैं ॥ . चतस्रोऽवस्थाः शरीरस्य वृद्धिौवनं सम्पूर्णता किञ्चित्परिहाणिश्चेति । प्रापोडशादृद्धिः । आपञ्चविंशतेयौवनम् । आंचत्वारिंशतः सम्पूर्णताः । ततः किञ्चित्परिहाणिश्चेति ।। पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे । समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात्कुशलो भिषक् ।। यह सुश्रुत के सूत्रस्थान ३५ अध्याय का वचन है। इस शरीर की चार अवस्था हैं एक (वृद्धि) जो १६वें वर्ष से लेके २५वें वर्ष पर्यन्त सव धातुओ की बढ़ती होती है। दूसरी (यौवन) जो २५ वे वर्ष के अन्त और २६वे वर्ष के श्रादि में युवावस्था का प्रारम्भ होता है। तीसरी (सम्पूर्णता)जो पञ्चीसवे वर्ष से लेके चाली- सवें वर्ष पर्यन्त सबंधातुओं की पुष्टि होती है। चौथी (किञ्चित्परिहाणि) जब सव साङ्गोपाङ्गं शरीरस्थ सकल धातु पुष्ट होके पूर्णता को प्राप्त होते हैं । तदनन्तर जो धातु बढ़ता है वह शरीर में नहीं रहता, किन्तु स्वप्न, प्रस्वेदादि द्वारा वाहर निकल जाता है, वही ४० वां वर्ष उत्तम समय विवाह का है अर्थात् उत्तमोत्तम तो अड़तालीसवे वर्ष मे विवाह करना । ( प्रश्न ) क्या यह ब्रह्मचर्य का नियम स्त्री वा पुरुष दोनों का तुल्य ही है ? ( उत्तर ) नहीं जो २५ वर्ष पर्यन्त पुरुप ब्रह्मचर्य करे तो १६ (सोलह ) वर्ष पर्यन्त कन्या, जो मुरुप ३० वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचारी रहे तो स्त्री १७ वर्प, जो पुरुष ३६ वर्ष तक रहे तो स्त्री १८ वर्ष, जो पुरुष ४० वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य करें तो स्त्री २० वर्प, जो पुरुष ४४ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य करे तो स्त्री २२ वर्ष, जो पुरंप ४८ वर्ष ब्रह्मचर्य करे तो स्त्री २४ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य सेवन रक्खे अर्थात् ४८ वें वर्ष से आगे पुरुप और २४ वें वर्ष से आगे स्त्री को ब्रह्मचर्य न रखना चाहिये, परन्तु यह नियम विवाह करने वाले पुरुष और स्त्रियो का है और जो विवाह करना ही न चाहे वे मरण पर्यन्त ब्रह्मचारी रह सकते हों तो भले ही रहे परन्तु यह काम पूर्ण विद्यावाले जितेन्द्रिय और निर्दोष योगी स्त्री और पुरुष का है । यह बड़ा कठिन काम है कि जो काम के वेग को थांभ के इन्द्रियो को अपने वश में रखना। ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्यायग्रवचने च । शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अ- ग्निहोत्रञ्च स्वाध्यायग्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचनें च । प्रजा च स्वाध्यायग्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च ॥ यह तैत्तिरीयोपनिषद् [प्रपा० ७ । अनु० ६ ] का वचन है। पढ़ने पढ़ानेवाला के नियम हैं। ४ सत्यार्थप्रकाश (ऋतं०) यथार्थ भावरण से पढ़ें और पदावे (सत्यं० ) सत्याचार से सत्य विद्याओं को पढ़ें वा पड़ा। (तपः० ) तपस्वी अर्थात् धर्मानुष्ठान करते हुए वेदादि शास्त्रों को पढ़ें और पढ़ावें (दमः०) बाग इन्द्रियों को बुरे भाचरणों से रोक के पढ़ें और पढ़ाते जायें (शमः ) मन की वृत्ति को सब प्रकार के दोषों से हटा के पढ़ते पढ़ाते जायें (अग्नयः०) माहवनीयादि अग्नि और विद्युत् आदि को आन पढ़ते पढ़ाते जायें और ( अग्निहोत्रं० ) अग्निहोत्र करते हुए पठन और पाठन करें करावें (प्रतिथयः) भतिथियों की सेवा करते हुए पढ़ें और पदावें (मानुपं०) मनुष्यसम्बन्धी व्यवहारों को यथायोग्य करते हुए पढ़ते पढ़ाते रहैं (प्रजा०) सन्तान और राज्य का पालन करते हुए पढ़ते पढ़ाते जायें (प्रजन) वीर्य की रक्षा और वृद्धि करते हुए पढ़ते पढ़ाते जायें (प्रजाति:०) अपने सन्तान और शिष्य का पालन करते हुए पढ़ते पढ़ाते जायें। पमान सेवेत सततं न नियमान् केवलान् बुधः । यमान्पतत्यकुर्वाणो नियमान् केवलान् भजन् ॥ मनु० [अ० ४ । २०४] यम पांच प्रकार के होते हैं। तत्राहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥ योग [ साधनपादे सू० ३०] मर्थात् (अहिंसा) वैरत्याग (सत्य ) सत्य मानना, सत्य बोलना और सत्य ही करना (अस्तेय) अर्थात् मन वचन कर्म से चोरी त्याग ( ब्रह्मचर्य ) अर्थात् उपस्थेन्द्रिय का संयम (अपरिग्रह) अत्यन्त लोलुपता स्वत्वाभिमानरहित होना इन पांच यमों का सेवन सदा करे, केवल नियमों का सेवन अर्थात्:- शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥ योग० [ साधनपादे सू० ३२] (शौच) अर्थात् स्नानादि से पवित्रता (सन्तोष ) सम्यक् प्रसन्न होकर निरुद्यम रहना सन्तोष नहीं किन्तु पुरुषार्थ जितना होसके उतना करना हानि लाभ में हर्ष वा शोक न करना (तप) मर्थात् कष्टसेवन से भी धर्मयुक्त कर्मों का अनुष्ठान ( स्वाध्याय) पढ़ना पढ़ाना (ईश्वरप्रणिधान) ईश्वर की भाक्तिविशेष से आत्मा को अर्पित रखना ये पांच नियम कहाते हैं । यमों के विना केवल इन नियमों का सेवन न करे किन्तु इन दोनों का सेवन किया करे जो यमो का सेवन छोड़ के केवल नियमों का सेवन करता है. वह उन्नति को नही प्राप्त होता किन्तु अधोगति अर्थात् संसार में गिरा रहता है:- कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता । काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिक [ मनु० अ० २। २८] अर्थ-अत्यन्त कामातुरता और निष्कामता किसी के लिये भी श्रेष्ठ नहीं क्योंकि जो कामना न करे तो वेदों का ज्ञान और वेदविहित कर्मादि उत्तम कर्म किसी से न होसकें इसलिये:- खाध्यायेन व्रतैोमैस्वैविद्येनेज्यया सुतैः । महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ मनु० [अ० २ । २८] अर्थ-(स्वाध्याय ) सकल विद्या पढ़ने पढ़ाने (व्रत) ब्रह्मचर्य सत्यभापणादि नियम पालने (होम) अग्निहोत्रादि होम सत्य का ग्रहण असत्य का त्याग और सत्य विद्याओं का दान देने (विद्येन) बेदस्थ कर्मोपासना झान विद्या के ग्रहण ( इज्यया) पक्षष्टयादि करने ( सुतैः ) सन्तानोत्पत्ति (महायो) ब्रह्म, देव, पित, वैश्वदेव और अतिथियों के सेवनरूप पंचमहायज्ञ और ( यज्ञैः) अग्निष्टोमादि तक शिल्पविया विधानादि यत्रों के सेवन से इस शरीर को ब्राह्मी अर्थात् वेद और परमेश्वर की भक्ति का 4 --- । m , आधाररूप ब्राह्मण का शरीर किया जाता है। इतने साधनों के विना ब्राह्मणारीर नहीं बन सकता:- इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहाखि । संयमे यत्नमातिष्ठद्विद्वान् यन्तेव वाजिनाम् ॥ मनु [२/८८], अर्थ-जैसे विद्वान् सारथि घोड़ों को नियम में रखता है वैसे मन और आत्मा को खोटे कामों: में बँचनेवाले विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों के निग्रह में प्रयत्न सब प्रकार से करे क्योंकि- इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोपमृच्छत्यसंशयम् । सनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं नियच्छति ॥ मनु० [२३] अर्थ-जीवात्मा इन्द्रियों के वश होके निश्चित बड़े २ दोषों को प्राप्त होता है और जब इन्द्रियों अपने वश में करता है तभी सिद्धि को प्राप्त होता है:- वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च । न विप्रदुष्टमावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कहिचित् ॥ मनु० [२७] जो दुष्टाचारी अजितेन्द्रिय पुरुष है उसके वेद, त्याग, यक्ष, नियम और तप तथा अन्य पञ्चे काम कभी सिद्धि को प्राप्त नही होते:- दोपकरणे चैव स्वाध्याये चैव नैत्यिके । नानुरोधोऽस्त्यनध्याये होममंत्रेषु चैव हि ॥ १॥ नैत्यिके नास्यनध्यायो ब्रह्मसत्रं हि तत्स्मृतम् । ब्रह्माकुतिहुतं पुण्यमनध्यायवषद्कृतम् ॥ २॥ मनु० [२। १०५ । १०६.] वेद के पढ़ने पढ़ाने, सन्ध्योपासनादि पंचमहायज्ञों के करने और होममन्त्रों में अनभ्याय- वेषयक अनुरोध (श्राग्रह ) नही है क्योंकि ॥ १॥ नित्यकर्म में अनध्याय नहीं होता जैसे श्वास प्रश्वास उदा लिये जाते हैं वन्द नहीं किये जा सकते वैसे नित्यकर्म प्रतिदिन करना चाहिये न किसी दिन छोड़ना क्योंकि अनध्याय में भी अग्निहोत्रादि उत्तम कर्म किया हुश्रा पुण्यरूप होता है जैसे झूठ बोलने में सदा पाप और सत्य बोलने में सदा पुण्य होता है वैसे ही खुरे कर्म करने में सदा अमध्याय और अच्छे कर्म करने में सदा स्वाध्याय ही होता है। अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वर्द्धन्त आयुर्विद्या यशो बलम् ॥ मनु० [२।१२१] .. जो सदा नम्र सुशील विद्वान् और वृद्धों की सेवा करता है उसका आयु, विद्या, कीर्ति और घल ये चार सदा वढ़ते हैं और जो ऐसा नहीं करते उनके आयु आदि चार नहीं बढ़ते ॥ अहिंसयैव भूतानां कार्य श्रेयोऽनुशासनम् । वाक्चैव मधुरा श्लंघणा प्रयोज्या धर्ममिच्छता ॥१॥ यस्य वामनसे शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा । स वै सर्वमवाप्नोति वेदान्तोपगतं फलम् ॥२॥ मनु० [२। १५६ । १६० विद्वान् और विद्यार्थियो को योग्य है कि वैखुद्धि छोड़ के सब मनुष्यों को कल्याण के. मार्ग का उपदेश करे और उपदेष्टा सदा मधुर सुशीलतायुक्त वाणी बोलें । जो धर्म की उन्नति चाहे वह सदा सत्य में चले और सत्य ही का उपदेश करे ॥ १॥ जिस मनुष्य के वाणी और मन शुद्ध तथा सुरक्षित सक्ष रहते हैं वही सव वेदान्त अर्थात् सब वेदों के सिद्धान्तरूप फल को प्राप्त होता है ॥२॥ ] ५ ३ - - २ . १० सत्यार्थप्रकाश संमानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विपादिव । अमृतस्येव चाकाङ्क्षदवमानस्य सर्वदा ॥ मनु० [२। १६२] पही ब्राह्मण, समग्र वेद और परमेश्वर को जानता है जो प्रतिष्ठा से विप के तुल्य सदा डरता है और अपमान की इच्छा अमृत के समान किया करता है ॥ अनेन क्रमयोगेन संस्कृतात्मा द्विजः शनैः । गुरौ वसन् संश्चिनुयाद् ब्रह्माधिगमिकं तपः। मनु० [२। १६४] इसी प्रकार से कृतोपनयन द्विज ब्रह्मचारी कुमार और ब्रह्मचारिणी कान्या धीरे २ वेदार्थ के वानरूप उत्तम तप को वढ़ाते चले जाये ॥ योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ॥ मनु० [२.। १६८] जो वेद को न पढ़ के अन्यत्र श्रम किया करता है वह अपने पुत्र पौत्र सहित शूद्रभाव को शीघ्र ही प्राप्त होजाता है। वर्जयेन्मधु मांसञ्च गन्धं माल्यं रसान् स्त्रियः । शुक्तानि यानि सर्वाणि प्राणिनां चैव हिंसनम् ॥ १॥ श्रभ्यङ्गमञ्जनं चादणोरुपानच्छत्रधारणम् । काम क्रोधं च लोभं च नर्तनं गीतवादनम् ।। २ ।। धृतं च जनवादं च परिवाद तथाऽनृतम् । स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भनुपघानं परस्य च ॥ ३ ॥ एकः शयीत सर्वत्र न रेत: स्कन्दयेत्वचित् । कामाद्धि स्कन्दयत्रेतो हिनस्ति व्रतमात्मनः॥४॥ मनु० [२। १७७-१८० ] ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी मद्य, मांस, गन्ध, माला, रस, स्त्री और पुरुष का सङ्ग, सव खटाई, प्राणियों की हिंसा ॥ १ ॥ अङ्गों का मर्दन, विना निमित्त उपस्थेन्द्रिय का स्पर्श, आंखों में अञ्जन, जूते और छत्र का धारण, काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोक, ईप्या, द्वेष, नाच, गान और . वाजा बजाना ॥२॥ द्यूत, जिस किसी की कथा, निन्दा, मिथ्याभाषण, स्त्रियों का दर्शन, श्राश्रय, दूसरे की हानि आदि कुकर्मों को सदा छोड़ देवें ॥ ३॥ सर्वत्र एकाकी सोवे वीर्यस्खलित कभी न करे, जो कामना सें वीर्यस्खलित, करदे तो जानो कि अपने ब्रह्मचर्यव्रत का नाश करदिया ॥ ४ ॥ वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्म चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः आचार्याय प्रियं, धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदित- ध्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । खाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अति- थिदेवो भव ।' यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । यान्यस्माकसुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि । ये के चास्मच्छेयाश्रसो ब्राह्मणास्तेपां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम्। 'श्रद्धया देयम् । अश्रद्धया देयम् । श्रिया देयम् । हिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् । अथ यदि ते कमविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् । ये. तत्र ब्राह्मणाः सम्मशिनो युक्ता अ युक्ता अलूक्षा धर्मकामाः स्युर्यथा, ते तत्र वरन् । तथा तत्र वर्त्तथाः । एष आदेश एप उपदेश ।

तृतीयसमुल्लास * एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ॥ तैत्तिरीय० [प्रपा०, ७ । अनु० ११ । क० १।२।३।४] प्राचार्य अन्तेवासी अर्थात् अपने शिष्य और शिष्याओं को इस प्रकार उपदेश करे कि तू: सदा सत्य वोल, धर्माचरण कर, प्रमादरहित, होके पढ़ पढ़ा, पूर्ण ब्रह्मचर्य से समस्त विद्याओं को ग्रहण और प्राचार्य के लिये प्रिय धन देकर विवाह करके सन्तानोत्पत्ति कर, प्रमाद से सत्य को कभी मत छोड़, प्रमाद से धर्म का त्याग मत कर, प्रमाद से आरोग्य और चतुराई को मत छोड़, प्रमाद से उत्तम ऐश्वर्य की वृद्धि को मत छोड़, प्रमाद से पढ़ने और पढ़ाने को कभी मत छोड़, देव-विद्वान् और माता पितादि की सेवा में प्रमाद मत कर । जैसे विद्वान् का सत्कार करे उसी प्रकार माता, पिता, श्राचार्य और अतिथि की सेवा सदा किया कर । जो अनिन्दित धर्मयुक्त कर्म हैं। उन सत्यभाषणादि को किया कर, उनसे भिन्न मिथ्याभाषणादि कभी मत कर । जो हमारे सुचरित्र अर्थात् धर्मयुक्त कर्म हो उनका ग्रहण कर और लो हमारे पापाचरण हों उनको कभी मत कर,जो कोई हमारे, मध्य में उत्तम विद्वान् धर्मात्मा ब्राह्मण हैं, उन्ही के समीप बैठ और उन्हीं का विश्वास किया कर, श्रद्धा से देना, अश्रद्धा से देना, शोभा से देना, लज्जा से देना, भय से देना और प्रतिज्ञा से भी देना चाहिये । जब कभी, तुझ को कर्म वा शील तथा उपासना ज्ञान में किसी प्रकार का संशय उत्पन्न हो तो जो,वे. विचारशील. पक्षपातरहित योगी अयोगी श्राईचित्त धर्म की कामना करनेवाले धर्मात्मा जन हों जैसे वे धर्ममार्ग में, वः वैसे तू भी उसमें वर्त्ता कर । यही आदेश, आज्ञा, यही उपदेश, यही वेद की उपनिषत् और यही, शिक्षा है। इसी प्रकार वर्तना और अपना चालचलन सुधारना चाहिये । अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह काहिचित् । यद्यद्धि कुरुते किंञ्चित् तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ।। मनु० [ २ 1.४]] मनुष्यों को निश्चय करना चाहिये कि निष्काम पुरुष में नेत्र का संकोच विकाश का होना भी, सर्वथा असम्भव है इससे यह सिद्ध होता है कि जो २ कुछ भी करता है वह २ चेष्टा कामना के विना नही है ॥ आचारः परमो धर्मः श्रुत्युक्त स्मार्त एव च । तस्मादस्मिन्सदा युक्तो नित्यं स्यादात्मवान् द्विजः॥१॥ आचाराद्विच्युतो विनो न वेदफलमश्नुते । प्राचारेणं तु संयुक्तः सम्पूर्णफलभाग्भवेत् ॥ २॥ मनु० [१ । १०८ । १०६] कहने, सुनने, सुनाने, पढ़ने, पढ़ाने का फल यही है कि जो वेद और वेदानुकूल स्मृतियों में प्रतिपादित धर्म का आचरण करना इसलिये धर्माचार मे सदा युक्त रहे ॥ १॥ क्योकि जो धर्माचरण से रहित है वह वेदप्रतिपादित धर्मजन्य सुखरूप फल को प्राप्त नहीं हो सकता और जो विद्या पढ़ के धर्माचरण करता है वही सम्पूर्ण सुख को प्राप्त होता है ॥२॥ योऽवमन्येत ते मुले हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः। स साधुभिर्वहिष्कार्यों नास्तिको वेदनिन्दकः॥ मनु० [२। ११] जो वेद और घेदानुकूल प्राप्त पुरुषों के किये शास्त्रों का अपमान करता है उस वेदनिन्दक: नास्तिक को जाति, पति और देश से वाह्य कर देना चाहिये, क्योंकि:- वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ 'मनु० [२।१२] -- -- . . ܝܚ नि पर - ३२ सत्यार्थप्रकाशा घेद, स्मृति, वेदानुकूल आप्तोक्त मनुस्मृत्यादि शास्त्र, सत्पुरुषों का श्राचार जो सनातन अर्थात घेदवारा परमेश्वरप्रतिपादित कर्म और अपने आत्मा में प्रिय अर्थात् जिसको श्रात्मा चाहता है जैसा कि सत्यभाषण, ये चार धर्म के लक्षण अर्थात् इन्हीं से धर्माऽधर्म का निश्चय होता है जो पक्षपास- रहित म्याय सत्य का ग्रहण असत्य का सर्वथा परित्यागरूप श्राचार है उसी का नाम धर्म और इससे विपरीत जो पक्षपातसहित अन्यायाचरण सत्य का त्याग और असत्य का ग्रहणरूप कर्म है उसी को अधर्म कहते हैं। अर्थकामेवसकानां धर्मज्ञानं विधीयते । धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥ मनु० [२। १३] जो पुरुष (अर्थ) सुवर्णादि रत्न और (काम) स्त्रीसेवनादि में नहीं फंसते हैं उन्हीं को धर्म का ज्ञान प्राप्त होता है जो धर्म के शान की इच्छा करें वे घेद द्वारा धर्म का निश्चय करें क्योकि धर्माधर्म का निश्चय विना वेद के ठीक २ नहीं होता। इस प्रकार प्राचार्य अपने शिष्य को उपदेश करे और विशेषकर राजा इतर क्षत्रिय, वैश्य और उत्तम शूद्र जनों को भी विद्या का अभ्यास अवश्य करावें । क्योंकि जो ब्राह्मण हैं वे ही केवल विद्याभ्यार करें और क्षत्रियादि न करें तो विद्या, धर्म, राज्य और धनादि की वृद्धि कभी नही हो सकती । क्योंकि ब्राह्मण तो केवल पढ़ने पढ़ाने और क्षत्रियादि से जीविका को प्राप्त होके जीवन धारण कर सकते हैं जीविका के आधीन और क्षत्रियादि के आशादाता और यथावत् परीक्षक दण्डदाता न होने से ब्राह्मणादि सब वर्ण पाखण्ड ही में फँस जाते हैं और जब क्षत्रियादि विद्वान् होते हैं तव ब्राह्मण भी अधिक विद्या भ्यास और धर्मपथ में चलते हैं और उन क्षत्रियादि विद्वानो के सामने पाखण्ड झूठा व्यवहार भी नहीं कर सकते और जब क्षत्रियादि अविद्वान् होते हैं तो वे जैसा अपने मन में आता है वैसा ही करते कुराते हैं । इसलिये ब्राह्मण भी अपना कल्याण चाहे तो क्षत्रियादि को वेदादि सत्यशास्त्र का अभ्यास अधिक प्रयत्न से करावे । क्योंकि क्षत्रियादि ही विद्या, धर्म, राज्य और लक्ष्मी की वृद्धि करनहारे हैं; कभी भिक्षावृत्ति नहीं करते इसलिये वे विद्याव्यवहार में पक्षपाती भी नहीं हो सकते और जब सब वर्गों में विद्या सुशिक्षा होती है तब कोई भी पाखण्डरूप अधर्मयुक्त मिथ्या व्यवहार को नहीं चला सकता इससे क्या सिद्ध हुआ कि क्षत्रियादि को नियम में चलानेवाले ब्राह्मण और संन्यासी तथा ब्राह्मण और संन्यासी को सुनियम में चलानेवाले क्षत्रियादि होते हैं । इसलिये सब वर्गों के स्त्री पुरुपो में विद्या और धर्म का प्रचार अवश्य होना चाहिये। अब जो २ पढ़ना पढ़ाना हो वह वह अच्छे प्रकार परीक्षा करके होना योग्य है-परीक्षा पांच प्रकार से होती है । एक-जो २ ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव और घेदों से अनुकूल हो वह २ सत्य और उससे विरुद्ध असत्य है। दूसरी जो २ सृष्टिक्रम से अनुकूल वह सत्य और जो २ सृष्टिक्रम से विरुद्ध है वह सव असत्य है जैसे कोई कहे कि विना माता पिता के योग से लड़का उत्पन्न हुआ ऐसा कथन-सृष्टिक्रम से विरुद्ध होने से सर्वथा असत्य है । तीसरी-"प्राप्त" अर्थात् जो धार्मिक विद्वान्, सत्यवादी, निष्कपटियों का संग उपदेश के अनुकूल है वह २ ग्राह्य और जो २ विरुद्ध वह २ अग्राह्य है । चौथी-अपने आत्मा की पवित्रता विद्या के अनुकूल अर्थात् जैसा अपने को सुख प्रिय और दुःख अप्रिय है वैसे ही सर्वत्र समझ लेना कि मैं भी किसी को दुःख वा सुख दूंगा तो वह भी अप्रसन्न और प्रसन्न होगा। और पांचवी-पाठों प्रमाण अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शम्द,ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और प्रभाव इनमें से प्रत्यक्ष के लक्षणादि में जो २ सूत्र नीचे लिखेंगे वे परन्यावशास्त्र के प्रथम और द्वितीय अध्याय के जानो।

PO तृतीयसमुल्लास इन्द्रियार्थसन्निकर्पोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकम्प्रत्यक्षम् ॥ न्यायसू० अ०१। आह्निक १। सूत्र४॥ जो श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और प्राण का शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध के साथ अव्यव: हित अर्थात् श्रावरणरहित सम्बन्ध होता है, इन्द्रियों के साथ मन का और मन के साथ प्रात्मा के संयोग से ज्ञान उत्पन्न होता है उसको प्रत्यक्ष कहते हैं परन्तु जो व्यपदेश्य अर्थात् संज्ञासंशी के सम्बन्ध से उत्पन्न होता है वह ज्ञान,न हो । जैसा किसी ने किसी से कहा कि "तू जल ले श्रा" वह लाके उसके पास धर के बोला कि “यह जल है" परन्तु वहां "जल" इन दो अक्षरों की संज्ञा लाने वा मंगानेवाला नहीं देख सकता है। किन्तु जिस पदार्थ का नाम अल है वही प्रत्यक्ष होता है और जो शब्द से शान उत्पन्न होता है वह शब्दप्रमाण का विषय है। "श्रव्यभिचारि" जैसे किसी ने रात्रि में खम्भे को देख के पुरुष का निश्चय कर लिया जब दिन में उसको देखा तो रात्रि का पुरुषज्ञान नष्ट होकर स्तम्भशान रहा ऐसे विनाशीशान का नाम व्यभिचारी है सो प्रत्यक्ष नहीं कहाता । “व्यवसायांत्मक" किसी ने दूर से नदी की बालू को देख के कहा कि “वहां वस्त्र सूख रहे हैं जल है वा और कुछ है" "वह देवदत्त खड़ा है वा यज्ञदत्त" जबतक एक निश्चय न हो तबतक वह प्रत्यक्षशान नहीं है किन्तु जो अव्यपदेश्य, अन्य- भिचारि और निश्चयात्मक ज्ञान है उसी को प्रत्यक्ष कहते हैं। दूसरा अनुमान- अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतो दृष्टञ्च ॥न्याय ।०१।०१।०५।। जो प्रत्यक्षपूर्वक अर्थात् जिसका कोई एकदेश वा सम्पूर्ण द्रव्य किसी स्थान वा काल में प्रत्यक्ष हुआ हो उसका दूर देश से सहचारी एक देश के प्रत्यक्ष होने से अदृष्ट अवयघी का शाल होने को अनुमान कहते हैं। जैसे पुत्र को देख के पिता, पर्वतादि में धूम को देख के अग्नि, जगत् में सुख दुःख देख के पूर्वजन्म का ज्ञान होता है । वह अनुमान तीन प्रकार का है । एक “पूर्ववत्" जैसे बादलों को देख के वर्षा, विवाह को देख के सन्तानोत्पत्ति, पढ़ते हुए विद्यार्थियों को देख के विद्या होने का निश्चय होता है, इत्यादि जहां २ कारण को देख के कार्य का शान हो वह “पूर्ववत्" । दूसरा "शेषवत्" अर्थात् जहां कार्य को देख के कारण का ज्ञान हो जैसे नदी के प्रवाह की बढ़ती देख के ऊपर हुई वर्षा का, पुत्र को देख के पिता का, सृष्टि को देख के अनादि कारण का तथा कर्ता ईश्वर का और पाप पुण्य के आचरण देख के सुख दुःख का ज्ञान होता है * इसी को “शेषवत्" कहते हैं । तीसरा “सामा. न्यतोदृष्ट" जो कोई किसी का कार्य कारण न हो परन्तु किसी प्रकार का साधर्म्य एक दूसरे के साथ हो जैसे कोई भी विना चले दूसरे स्थान को नहीं जा सकता वैसे ही दूसरों को भी स्थानान्तर में जाना विना गमन के कभी नही हो सकता। श्रनुमान शब्द का अर्थ यही है कि "अनु अर्थात् प्रत्यक्षस्य पश्चान्मीयते शायते येन तदनुमानम्" जो प्रत्यक्ष के पश्चात् उत्पन्न हो जैसे धूम के प्रत्यक्ष देखे विना भदृष्ट प्रति का ज्ञान कभी नही हो सकता। तीसरा उपमान- प्रसिद्धसाधासाध्यसाधनमुपमानम् ॥ न्याय० । अ० १ । श्रा० १ । सू० ६ ॥ जो प्रसिद्ध प्रत्यक्ष साधर्म्य से साध्य अर्थात् सिद्ध करने योग्य ज्ञान का सिद्धि करने का साधन हो उसको उपमान कहते हैं । “उपमीयते येन तदुपमानम्" जैसे किसी ने किसी भृत्य से कहा * और पाप पुण्य भाचरण का, सुख दुःख देख के ज्ञान होता है। । के सत्यार्थप्रकाशः कि "तू विष्णुमित्र को बुलाला" वह बोला कि "मैंने उसको कभी नहीं देखा" उसके स्वामी ने कहा कि "जैसा यह देवदत्त है वैसा ही वह विष्णुमित्र है" वा जैसी यह गाय है वैसी ही गवय अर्थात् नीलगाय होती है, जब वह वहां गया और देवदत्त के सदृश उसको देख निश्चय कर लिया कि यही विष्णुमित्र है उसको ले आया। अथवा किसी जङ्गल में जिस पशु को गाय के तुल्य देखा उसको निश्चय कर लिया कि इसी का नाम गवय है ॥ चौथा शब्दप्रमाण- आप्तोपदेशः शब्दः ॥ न्या० । अ० १ । आ० १ । सू० ७॥ जो आप्त अर्थात् पूर्ण विद्वान्, धर्मात्मा, परोपकारप्रिय, सत्यवादी, पुरुपार्थी, जितेन्द्रिय पुरुष जैसा अपने आत्मा में जानता हो और जिससे सुख पाया हो उसी के कथन की इच्छा से प्रेरित स. मनुष्यों के कल्याणार्थ उपदेष्टा हो अर्थात् [जो] जितने पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों क झान प्राप्त होकर उपदेष्टा होता है । जो ऐसे पुरुष और पूर्ण बात परमेश्वर के उपदेश वेद हैं उन्हीं के शब्दप्रमाण जानो॥ पांचवां ऐतिह्य- न चतुष्ट्वमैतिद्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात् ॥ न्याय । अ० २। आ० २ । सू० १॥ जो इतिह अर्थात् इस प्रकार का था उसने इस प्रकार किया अर्थात् किसी के जीवनचारिक का नाम ऐतिह्य है। छठा अर्थापत्ति- "अर्थादापद्यते सा अर्थापत्तिः" केनचिदुच्यते "सत्सु घनेपु वृष्टिः सति कारणे कार्य भवतीति किमत्र प्रसज्यते, असत्सु घनेषु वृष्टिरसति कारणे च कार्य न भवति" जैसे किसी ने किसी से कहा कि “बद्दल के होने से वर्षा और कारण के होने से कार्य उत्पन्न होता है। इससे विना कहे यह दूसरी बात सिद्ध होती है कि विना बद्दल वर्षा और विना कारण के कार्य कभी नहीं हो सकता ॥ सातवां सम्भव- "सम्भवति यस्मिन् स सम्भवः"कोई कहे कि "माता पिता के विना सन्तानोत्पत्ति, किसी ने मृतक जिलाये, पहाड़ उठाये, समुद्र मे पत्थर तराये, चन्द्रमा के टुकड़े किये, परमेश्वर का अवतार हुआ, मनुष्य के सींग देखे और वन्ध्या के पुत्र और पुत्री का विवाह किया' इत्यादि सव असम्भव है क्योंकि ये सब बातें सृष्टिक्रम से विरुद्ध हैं। और जो वात सृष्टिक्रम के अनुकूल हो वही सम्भव है ॥ पाठवां अभाव- "न भवन्ति यस्मिन् सोऽभावः" जैसे किसी ने किसी से कहा कि "हाथी ले आ" वह वहां हाथी का प्रभाव देखकर जहां हाथी था वहां से ले आया। ये आठ प्रमाण । इनमें से जो शब्द में ऐतिह और अनुमान में अर्थापत्ति, सम्भव और प्रभाव की गणना करें तो चार प्रमाण रह जाते हैं। इन पांच प्रकार की परीक्षाओं से सत्यासत्य का निश्चय मनुष्य कर सकता है अन्यथा नही ॥ धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधाभ्यां सत्वमानानिःश्रेयसम् ॥ वैशेषिक । अ० १ । आ० १ । सू० ४ ॥ जव मनुष्य धर्म के यथायोग्य अनुष्ठान करने से पवित्र होकर “साधर्म्य" अर्थात् जो तुल्य धर्स हैं जैसा पृथिवी जड़ और जल भी जड़ "वैधर्म्य" अर्थात् पृथिवी कठोर और जल कोमल, इसी प्रकार से द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इन छः पदार्थों के तत्वज्ञान से अर्थात् स्वरूप- पान से "निःश्रेयसय"पोत को प्राप्त होता है।

4 । तृतीयसमुल्लासः पृथिव्याऽपस्तेजोवायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि ॥ वै०।१०११पा.१०५॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन ये नव द्रव्य हैं। क्रियागुणवत्समवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणम् ।। वै० । अ० १ । आ० १। सू० १५ ॥ "क्रियाश्च गुणाश्च विद्यन्ते यस्मिंस्तत् क्रियागुणवत्" जिसमें क्रियागुण और केवल गुण रहें उसको द्रव्य कहते हैं। उनमें से पृथिवी, जल, तेज, वायु, मन और आत्मा ये छः द्रव्य क्रिया और गुणवाले हैं। तथा श्राकाश, काल और दिशा ये तीन क्रियारहित गुणवाले हैं। (समवायि) “समवेतुं शीलं यस्य तत् समवायि, प्राग्वृत्तित्वं कारणं समयायि च तत्कारणं च समवायिकारणम्" "लक्ष्यते येन तल्लक्षणम्” जो मिलने के स्वभावयुक्त कार्य से कारण पूर्वकालस्थ हो उसी को द्रव्य कहते हैं जिससे लक्ष्य जामा जाय जैसा आंख से रूप जाना जाता है उसको लक्षण कहते हैं । रूपरसगन्धस्पर्शवती पृथिवी ॥ वै० । अ० २ । आ०.१ । सू० १॥ रूप, रस, गन्ध, स्पर्शवाली पृथिवी है । उसमें रूप, रस और स्पर्श अग्नि, जल और वायु के योग से हैं। व्यवस्थितः पृथिव्यां गन्धः ॥ वै० । अ० २। प्रा० २ । सू० २॥ पृथिवी मे गन्ध गुण स्वाभाविक है । वैसे ही जल में रस, अग्नि में रूप, वायु में स्पर्श और आकाश में शब्द स्वाभाविक है। रूपरसस्पर्शवत्य आपो द्रवाः स्निग्धाः ॥ वै० । अ० २ । आ० १ । सू० २॥ रूप, रस और स्पर्शवान् द्रवीभूत और कोमल जल कहाता है । परन्तु इनमें जल का रस । स्वाभाविक गुण तथा रूप स्पर्श अग्नि और वायु के योग से हैं । अप्सु शीतता ॥ वै० । अ० २। आ० २ । सू० ५ ॥ और जल में शीतलत्व गुण भी स्वाभाविक है ।। तेजो रूपस्पर्शवत् ॥ वै० । अ० २ । आ० १ । सू० ३॥ जो रूप और स्पर्शवाला है वह तेज है। परन्तु इसमें रूप स्वाभाविक और स्पर्श वायु के योग से है॥ स्पर्शवान् वायुः ॥ वै० । अ० २ । आ० १ । सू० ४ ॥ स्पर्श गुणवाला वायु है । परन्तु इसमें भी उष्णता,शीतलता, तेज और जल के योग सेरहते हैं। त श्राकाशे न विद्यन्ते ॥ पै० [अ० २। आ० १ । सू० ५ ] रूप, रस, गन्ध और स्पर्श आकाश में नहीं हैं। किन्तु शब्द ही आकाश का.गुण है ॥ निष्क्रमणं प्रवेशनमित्याकाशस्य लिङ्गम् ॥ वै० । अ० २। आ० १ । सू० २० ॥ जिसमे प्रवेश और निकलना होता है वह आकाश का लिङ्ग है ॥ कार्यान्तराप्रादुर्भावाच शब्दः स्पर्शवतामगुणः ॥ वै० । अ० २। श्रा० १ । सू० २५ ॥ अन्य पृथिवी श्रादि कार्यों से प्रकट न होने से शब्द स्पर्श गुणवाले भूमि श्रादि का गुण नहीं है किन्तु शब्द श्राकाश ही का गुण है। अपरस्मिन्नपरं युगपचिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि ॥ वै० । अ०. २.। आ० २। सू०६॥ जिसमे अपर पर (युगपत् ) एकवार (चिरम् ) विलम्ब (तिमम् ) शीत्र इत्यादि प्रयोग होते वहा हैं उसको काल कहते हैं। ona वह तिह पार । तुल 6 . है , सत्यार्थप्रकाश जो द्रव्य और गुंण का समान , जातीयक कार्य का आरम्भ होता है उसको साधर्म्य कहते हैं। जैसे पृथिवी में जड़त्व धर्म और घटादि कार्योत्पादकत्व स्वसदृश धर्म है वैसे ही जल में भी जड़त्व और हिम आदि स्वसदृश कार्य का आरम्भ पृथिवी के साथ जल का और जल के साथ पृथिवी का तुल्य धर्म है अर्थात् "द्रव्यगुणयोर्विजातीयारम्भकत्वं वैवर्म्यम्" यह विदित हुआ है कि जो द्रव्य और गुण का विरुद्ध धर्म और कार्य का आरम्भ है उसको वैधयं कहते हैं जैसे पृथिवी में कठिनत्व शुष्कत्व और गन्धवत्व धर्म जल से विरुद्ध और जल का द्रवत्व कोमलता और रस गुणयुक्तता पृथिवी से विरुद्ध है। कारणभावात्कार्यभावः ॥ वै० । अ० ४ । आ० १ । सू० ३ ॥ कारण के होने ही से कार्य होता है ।- न तु कार्याभावात्कारणाभावः ॥ वै० । अ० १ । श्रा० २ । सू० २॥ कार्य के अभाव कारण का अभाव नहीं होता। कारणाऽभावात्कार्याऽभावः ॥ वै० । अ० १ । आ० २ । सू० १॥ कारण के न होने से कार्य कभी नहीं होता ॥ कारणगुणपूर्वकः कार्यगुणो दृष्टः ॥ वै० । अ० २ । आ० १ । सू० २४ ॥ गुण होते हैं वैसे ही कार्य में होते हैं। परिमाण दो प्रकार का है:- अणु महदिति तस्मिन्विशेषभावाद्विशेषाभावाच्च ॥ वै० । अ० ७ । आ० १। सू० ११॥ (अणु) सूक्ष्म (महत्) बड़ा जैसे त्रसरेणु लिता से छोटा और द्वन्यणुक से बड़ा है तथा पहाड़ पृथिवी से छोटे वृक्षों से बड़े हैं । । सदिति यतो द्रव्यगुणकर्मसु सा. सत्ता ॥ वै० । अ० १ । प्रा० २ । सू०७॥ जो द्रव्य गुण और कर्मों में सत् शब्द अन्वित रहता है अर्थात् “सद् द्रव्यम्-सद् गुरु:- सत्कर्म" सत् द्रव्य, सत् गुण, सत् कर्म अर्थात् वर्तमान कालवाची शब्द का अन्वय सब के साथ से जैसे कारण मे रहता है। । .. भावोनुवृत्तेरेव हेतुत्वात्सामान्यमेव ॥ वै० । अ० १ । आ० २.। सू० ४ ॥ : जो सब के साथ अनुवर्तमान होने से सत्तारूप भाव है सो महासामान्य कहाता है यह क्रम भावरूप द्रव्यों का है और जो अभाव है वह पांच प्रकार का होता है ॥ क्रियागुणव्यपदेशाभावात्प्रागसत् ॥ वै० । अ० ६.। आ० १ । सू० १ ॥ क्रिया और गुण के विशेष निमित्त के अभाव से प्राक् अर्थात् पूर्व (असत्) न था जैसे घट, वस्त्रादि उत्पत्ति के पूर्व नहीं थे इसका नाम प्रागभाव ॥ दूसराः- : सदसत् ॥ वै० । अ० ६ । आ० १ । सू० २ ॥ : जो होके न रहे जैसे घट उत्पन्न होके नष्ट होजाय यह प्रध्वंसाभाव कहाता है। तीसरा:- सच्चासत् ॥ वै० । अ० ६ । प्रा० १ । सू० ४ ॥ जो हो और न होवे जैसे "अगौरश्वोऽनश्वो गौः' यह घोड़ा गाय नहीं और गाय घोड़ा नहीं अर्थात् घोड़े में गाय का और गाय में घोड़े का अभाव और गाय में गाय, घोड़े में घोड़े का भाव है। यह अन्योन्याभाव कहाता है। चौथा:- . - ॥ 1. एतीयसमुल्लासेः it mummiam यच्चान्यदसदतस्तदसत् ॥ वै० । अ०६ । आ० १ । ०५ ॥ जो पूर्वोक्त तीनों अंभावों से भिन्न है उसको अत्यन्ताभाव कहते हैं । जैसे-"नरक" अर्थात् मनुष्य का सीग “खपुष्प" आकाश का फूल और “वन्ध्यापुत्र" वन्ध्या कापुत्र इत्यादि.॥ पांचवां- नास्ति घटो गेह इति सतों घटस्य गेहसंसर्गप्रतिषेधः ॥ वै० । अ०६ | आ०१। सू० १०॥ घर में घड़ा नहीं अर्थात् अन्यत्र है, घर के साथ घड़े का सम्बन्ध नहीं है, ये पांच प्रभाव कहाते हैं। इन्द्रियदोपात्संस्कारदोषाच्चाविद्या ॥. वै० । अ०है। आ० २ । सू० १०॥ इन्द्रियो और संस्कार के दोष से अविद्या उत्पन्न होती है ॥ तदुष्टज्ञानम् ॥ वै० । अ०६ । आ० २ । सू० ११ ॥ जो दुष्ट अर्थात् विपरीत ज्ञान है उसको अविद्या कहते हैं। अदुष्टं विद्या ॥ वै० । अ० ६ । आ० २ । सू०:१२ ॥ जो अदुष्ट अर्थात् यथार्थ ज्ञान है उसको विधा कहते हैं। पृथिव्यादिरूपरसगन्धस्पर्शा द्रव्या नित्यत्वादनित्याश्च ।। बै० । अ०७। श्रा० ११ २० २॥ एतेन नित्येषु नित्यत्वमुक्तम् ॥ वै० । अ० ७ । आ० १ । सू० ३ ॥ जो कार्यरूप पृथिव्यादि पदार्थ और उनमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श गुण हैं ये सब द्रव्यों के अनित्य होने से अनित्य हैं और जो इससे कारणरूप पृथिव्यादि नित्य द्रव्यों में गन्धादि गुण हैं चे नित्य हैं। सद्कारणवन्नित्यम् ॥ वै० । अ० ४ । प्रा० १ । सू० १ ॥ जो विद्यमान हो और जिसका कारण कोई भी न हो वह नित्य है अर्थात्:-"सत्कारणवद- नित्यम्" जो कारणवाले कार्यरूप गुण हैं वे अनित्य कहाते हैं । यस्येदं कार्य कारणं संयोगि विरोधि समवायि चेति लैङ्गिकम् ॥बै० अ०६।०२। सू०१॥ इसका यह कार्य वा कारण है इत्यादि समवायि, संयोगि, एकार्थसमवाये और विरोधि यह चार प्रकार का लैङ्गिक अर्थात् लिङ्गलिङ्गी के सम्बन्ध से ज्ञान होता है । “समवायि" जैसे आकाश परिमाणवाला है "संयोगि" जैसे शरीर त्वचावाला है इत्यादि का नित्य संयोग है "एकार्थसमवाय" एक अर्थ मे दो का रहना जैसे कार्यरूप स्पर्श कार्य का लिङ्ग अर्थात् जाननेवाला है "विरोधि" जैसे हुई वृष्टि होनेवाली वृष्टि का विरोधी लिङ्ग है "व्याप्ति":- नियतधर्मसाहित्यमुभयोरेकतरस्य वा व्याप्तिः॥ निजशक्युद्भवमित्याचार्याः॥ आधेयशक्तियोग इति पञ्चशिखः ॥ सांख्यसूत्र ॥ [अ० ५] २६ । ३१ । ३२] . जो दोनों साध्य साधन अर्थात् सिद्ध करने योग्य और जिससे सिद्ध किया जाय उन दोनों भथवा एक, साधनमात्र का निश्चित धर्म का सहचार है उसी को व्याप्ति कहते हैं जैसे धूम और अग्नि का सहचार है ॥ २६ ॥ तथा व्याप्य जो धूम उसकी निज शक्ति से उत्पन्न होता है अर्थात् जव देशान्तर में दूर धूम जाता है त विना अग्नियोग के भी धूम स्वयं रहता है। उसी का नाम व्याप्ति है अर्थात् अग्नि के छेदन, भेदन, सामर्थ्य से जलादि पदार्थ धूमरूप प्रकट होता है ॥ ३१ ॥ जैसे महत्तत्त्वादि में प्रकृत्यादि की व्यापकता बुद्धयादि मे व्याप्यता धर्म के सम्बन्ध का नाम व्याप्ति है। जैसे शक्ति रूप और शक्तिमान् प्राधाररूप का सम्बन्ध है ॥ ३२ ॥ इत्यादि शास्त्रों के प्रमाणादि से परीक्षा . - - Swar - - सत्यार्थप्रकाशः पढ़ें और पढ़ावें । अन्यथा विद्यार्थियों को सत्य वोध कभी नहीं हो सकता जिस २ ग्रन्थ को पढ़ावें उस २ की पूर्वोक्त प्रकार से परीक्षा करके जो सत्य ठहरे वह २ ग्रन्थ पढ़ावें जो २ इन परीक्षाओं से विरुद्ध हों उन २ ग्रन्थों को न पढ़े न पढ़ावें क्योकिः- लक्षणग्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिः॥ लक्षण जैसा कि "गन्धवती पृथिवी" जो पृथिवी है वह गन्धवाली है ऐसे लक्षण और प्रत्य- क्षादि प्रमाण इनसे सव सत्याऽसत्य और पदार्थों का निर्णय हो जाता है इसके विना कुछ भी नहीं होता। अथ पठनपाठनविधिः॥ अब पढ़ने पढ़ाने का प्रकार लिखते हैं-प्रथम पाणिनिमुनिकृत शिक्षा जो कि सूत्ररूप है उसक रीति अर्थात् इस अक्षर का यह स्थान यह प्रयत्न यह करण है जैसे "प" इसका ओष्ठ स्थान स्पृ प्रयत्न और प्राण तथा जीभ की क्रिया करनी करण कहाता है इसी प्रकार यथायोग्य सव अक्षरों के उच्चारण माता पिता आचार्य सिखलावें । तदनन्तर व्याकरण अर्थात् प्रथम अष्टाध्यायी के सूत्रों क पाठ जैसे "वृद्धिरादैच्” फिर पदच्छेद जैसे "वृद्धिः, श्रात्, ऐच् वा श्रादैच्" फिर समास "श्राच्च ऐर आदेच्" और अर्थ जैसे "आदेचां वृद्धिसंज्ञा क्रियते" अर्थात् आ, ऐ, औ की वृद्धि संज्ञा [ कीजाती है "तः परो यस्मात्स तपरस्तादपि परस्तपर;" तकार जिससे परे और जो तकार से भी परे हो वा तपर कहाता है इससे क्या सिद्ध हुआ जो आकार से परे त् और त् से परे ऐच् दोनों तपर हैं तपर का प्रयोजन यह है कि इस्व और प्लुत की वृद्धि संज्ञा न हुई । उदाहरण ( भागः ) यहां "भज्" धात से "धम्' प्रत्यय के परे "घ, " की इत्संज्ञा होकर लोप होगया पश्चात् “भज् अ" यहां जकार पूर्व भकारोत्तर अकार को वृद्धिसंज्ञक श्राकार होगया है। तो भाज् पुनः "ज" को ग् हो प्रकार के साथ मिलके "भागः" ऐसा प्रयोग हुआ। “अध्यायः" यहां अधिपूर्वक “इङ्' धातु के स्थान में "" प्रत्यय के परे "ऐ" वृद्धि और उसको आय हो मिल के "अध्यायः" । "नायकः" यहां "नी" धातु के दीर्घ ईकार के स्थान में "एवुल्" प्रत्यय के परे "हे" वृद्धि और उसको आय होकर मिल के "नायकः" । और "स्तावक." यहाँ "स्तु" धातु से "एवुल्' प्रत्यय होकर इस्व उकार के स्थान में भी वृद्धि प्राव आदेश होकर अकार में मिल गया तो "स्तावकः" । (कृञ् ) धातु से आगे "एबुल्" प्रत्यय ल की इत्संज्ञा होके लोप “वु" के स्थान मे अक आदेश और ऋकार के स्थान में "आर" वृद्धि होकर "कारकः" सिद्ध हुआ। जो २ सूत्र आगे पीछे के प्रयोग में लगें उनका कार्य सव बतलाता जाय और स्लेट अथवा लकड़ी के पट्टे पर दिखला २ के कच्चा रूप धर के जैसे "भज्+ घञ्+सु" इस प्रकार धर के प्रथम घकार का फिर ज् का लोप होकर "भज्+अ+सु" ऐसा रहा फिर श्रको आकार वृद्धि और ज् के स्थान मे "' होने से "भाग्+अ+सु" पुनः अकार में मिल जाने से "भाग+सु" रहा, अव उकार की इत्संज्ञा “स्" के स्थान मे “रु” होकर पुनः उकार की इत्संज्ञा लोप होजाने पश्चात् "भागर" ऐसा रहा अव रेफ के स्थान में (:) विसर्जनीय होकर "भागः" यह रूप सिद्ध हुआ। जिस २ सूत्र से जो २ कार्य होता है उस उसको पढ़ पढ़ा के और लिखवा कर कार्य कराता जाय इस प्रकार पढ़ने पढ़ाने से वहुत शीघ्र दृढ़ बोध होता है। एक बार इसी प्रकार श्रष्टा 'ध्यायी पढ़ा के धातुपाठ अर्थसहित और दश लकारों के रूप तथा प्रक्रिया सहित सूत्रों के उत्सर्ग अर्थात् सामान्य सूत्र जैले "कर्मण्यम्" कर्म उपपद लगा हो तो धातुमात्र से अण् प्रत्यय हो जैसे "कुम्भकारः” पश्चात् अपवाद सूत्र जैसे ‘ानोऽनुपसर्गे कः" उपसर्गभिन्न कर्म उपपद लगा हो तो आकारान्त धातु से "क" प्रत्यय होवे अर्थात् जो बहुव्यापक जैसा कि कमीपपद लगा हो तो सर इस्व इ के तृतीयसमुल्लासः धातुओं से "अण्" प्राप्त होता है उससे विशेष अर्थात् अल्प विषय उसी पूर्व सूत्र के विषय में से आकारान्त धातु को "क" प्रत्यय ने ग्रहण कर लिया जैसे उत्सर्ग के विषय में अपवाद सूत्र की प्रवृत्ति होती है वैसे अपवाद सूत्र के विषय मे उत्सर्ग सूत्र की प्रवृत्ति नहीं होती। जैसे चक्रवर्ती राजा के राज्य मे माण्डलिक और भूमिवालो की प्रवृत्ति होती है वैसे माण्डलिक राजादि के राज्य में चक्रवर्ती की प्रवृत्ति नहीं होती इसी प्रकार पाणिनि महर्षि ने सहस्त्र श्लोको के बीच में अखिल शब्द अर्थ और सम्बन्धो की विद्या प्रतिपादित करदी है । धातुपाठ के पश्चात् उणादिगण के पढ़ाने मे सर्व सुबन्त का विषय अच्छे प्रकार पढ़ा के पुनः दूसरी वार शङ्का, समाधान, वार्त्तिक, कारिका, परिभाषा की घटना- पूर्वक, अष्टाध्यायी की द्वितीयानुवृत्ति पढ़ावे । तदनन्तर महाभाप्य पढ़ावे । अर्थात् जो बुद्धिमान् पुरु- पार्थी, निष्कपटी, विद्यावृद्धि के चाहनेवाले नित्य पढ़ें पढ़ावें तो डेढ़ वर्ष में अष्टाध्यायी और डेढ़ वर्ष में महाभाष्य पढ़ के तीन वर्ष में पूर्ण वैयाकरण होकर वैदिक और लौकिक शब्दो का व्याकरण से बोध कर पुनः अन्य शास्त्रो को शीघ्र सहज में पढ़ पढ़ा सकते हैं । किन्तु जैसा बड़ा परिश्रम व्याकरण में होता है वैसा श्रम अन्य शास्त्रो मे करना नहीं पड़ता और जितना बोध इनके पढ़ने से तीन वर्षों में होता है उतना वोध कुग्रन्थ अर्थात् सारस्वत, चन्द्रिका, कौमुदी, मनोरमादि के पढ़ने से पचास वर्षों में भी नहीं हो सकता। क्योंकि जो महाशय महर्षि लोगो ने सहजता से महान् विषय अपने ग्रन्थों में प्रका- शित किया है वैसा इन जुद्राशय मनुष्यों के कल्पित अन्थो में क्योकर हो सकता है । महर्षि लोगों का श्राशय, जहांतक होसके वहांतक सुगम और जिसके ग्रहण में समय थोड़ा लगे इस प्रकार का होता है और क्षुद्राशय लोगो की मनसा ऐसी होती है कि जहांतक बने वहांतक कठिन रचना करनी जिसको बड़े परिश्रम से पढ़ के अल्प लाभ उठा सके जैसे पहाड़ का खोदना कौड़ो का लाभ होना । और आर्ष ग्रन्थो का पढ़ना ऐसा है कि जैसा एक गोता लगाना बहुमूल्य मोतिया का पाना व्याकरण को पढ़ के यास्कमुनिकृत निवड और निरुक्त छः वा आठ महीने में सार्थक पढ़े और पढ़ावें। अन्य नास्तिककृत अमरकोशादि मे अनेक वर्ष व्यर्थ न खोवे । तदनन्तर पिङ्गलाचार्यकृत छन्दोग्रन्थ जिससे वैदिक लौकिक छन्दों का परिज्ञान, नवीन रचना और श्लोक बनाने की रीति भी यथावत् सीखें । इस ग्रन्थ और श्लोकों की रचना तथा प्रस्तार को चार महीने में सीख पढ़ पढ़ा सकते हैं। और वृत्तरत्नाकर आदि अल्प- बुद्धिप्रकल्पित ग्रन्थो में अनेक वर्प न खोवे । तत्पश्चात् मनुस्मृति, वाल्मीकीय रामायण और महाभारत के उद्योगपर्वान्तर्गत विदुरनीति आदि अच्छे २ प्रकरण जिनसे दुष्ट व्यसन दूर हों और उत्तमता सभ्यता प्रात हो वैसे को कायरीति से अर्थात् पदच्छेद, पदार्थोक्ति, अन्वय, विशेष्य विशेषण और भावार्थ को अध्यापक लोग जनावे और विद्यार्थी लोग जानते. जाये । इनको वर्ष के भीतर पढ़लें । तदनन्तर पूर्व- मीमांसा, वैशेविक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त अर्थात् जहांतक वन सके वहांतक ऋपिकृत व्या- स्यासहित अथवा उत्तम विद्वानो की सरलव्याख्यायुक्त छः शास्त्रो को पढ़े पढ़ावें। परन्तु वेदान्त सूत्रों के पढ़ने के पूर्व ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक इन दश उपनिपदो को पढ़ के छः शास्त्रों के भाष्य वृत्तिसहित सूत्रों को दो वर्ष के भीतर पढ़ावे और पढ़ लेवे । पश्चात् छः क्पो के भीतर चारो ब्राह्मण अर्थात् ऐतरेय, शतपथ, साम और गोपथ ब्राह्मणों के सहित चारो वेदो के स्वर, शब्द, अर्थ, सम्बन्ध तथा क्रियासहित पढ़ना योग्य है। इसमे प्रमाण:- - स्थाणुरयं भारहारः किलाभृदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् । योऽयम इत्सकलं भद्रमश्नुते नाकमेत ज्ञानविधूतपाप्मा ॥ [ निरुक्क १ । १८] । १२ सत्यार्थप्रकाश . यह निरुक्त में मन्त्र है। जो वेद को स्वर और पाठमात्र पढ़ के अर्थ नहीं जानता वह जैसा, वृक्ष, डाली, पत्ते, फल, फूल और अन्य पशु धान्य आदि का भार उठाता है वैसे भारवाह अर्थात् भार का उठानेवाला है और जो वेद को पढ़ता और उनका यथावत् अर्थ जानता है वही सम्पूर्ण श्रानन्द को प्राप्त होके देहान्त के पश्चात् ज्ञान से पापों को छोड़ पवित्र धर्माचरण के प्रताप से सर्वानन्द को प्राप्त होता है। उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाच॑मुत त्वं शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । उतो त्वस्मै तन्वं विसौ जायेव पत्य उशती सुवासाः ॥ ऋ० । मं० १० । सू० ७१ । मं० ४ ॥ जो अविद्वान् हैं वे सुनते हुए नही सुनते, देखते हुए नहीं देखते, वोलते हुए नहीं बोलते अर्थात् अविद्वान् लोग इस विद्या वाणी के रहस्य को नहीं जान सकते किन्तु जो शब्द अर्थ और सम्बन्ध का जाननेवाला है उसके लिये विद्या जैसे सुन्दर वस्त्र आभूषण धारण करती अपने पति की कामना करती हुई स्त्री अपना शरीर और स्वरूप का प्रकाश पति के सामने करती है वैसे विद्या विद्वान् के लिये अपने स्वरूप का प्रकाश करती है अविद्वानों के लिये नहीं। ऋचो अक्षरै परमे व्योमन् यास्मिन्देवा अधिविश्वै निषेदुः । यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ३० ॥ मं० १ । सू० १६४ । मं० ३६ ॥ जिस व्यापक अविनाशी सर्वोत्कृष्ट परमेश्वर में लव विद्वान् और पृथिवी सूर्य आदि सव लोक स्थित हैं कि जिसमें सव वेदों का मुख्य तात्पर्य है उस ब्रह्म को जो नहीं जानता वह ऋग्वेदादि से क्या कुछ सुख को प्राप्त हो सकता है ? नही २ किन्तु जो वेदों को पढ़ के धर्मात्मा योगी होकर उस ब्रह्म को जानते हैं वे सब परमेश्वर में स्थित होके मुक्तिरूपी परमानन्द को प्राप्त होते हैं । इसलिये जो कुछ पढ़ना वा पढ़ाना हो वह अर्थज्ञान सहित चाहिये । इस प्रकार सव वेदो को पढ़ के आयुर्वेद अर्थात् जो चरक, सुश्रुत आदि ऋषि मुनिप्रणीत वैद्यक शास्त्र है उसको अर्थ, क्रिया, शस्त्र, छेदन, भेदन, लेप, चिकित्सा, निदान, औषध, पथ्य, शरीर, देश, काल और वस्तु के गुण ज्ञानपूर्वक ४ (चार) वर्ष के भीतर पढ़ें पढ़ा। तद- नन्तर धनुर्वेद अर्थात् जो राजसम्बन्धी काम करना है इसके दो भेद एक निज राजपुरुपसम्बन्धी और दूसरा प्रजासम्बन्धी होता है । राजकार्य में सभा सेना के अध्यक्ष श स्त्रास्त्रविद्या नाना प्रकार के व्यूह का अभ्यास अर्थात् जिसको आजकल "कवायद" कहते हैं जो कि शत्रुओं से लड़ाई के समय में क्रिया. 'करनी होती है उनको यथावत् सीखें और जो २ प्रजा के पालन और वृद्धि करने का प्रकार है उनको 'सीख के न्यायपूर्वक सब प्रजा को प्रसन्न रक्खे दुष्टों को यथायोग्य दण्ड श्रेष्ठो के पालन का प्रकार सब प्रकार सीखलें । इस राजविद्या को दो २ वर्ष में सीखकर गान्धर्ववेद कि जिसको गानविद्या कहते हैं उसमें स्वर, राग, रागिणी, समय, ताल, ग्राम, तान, वादिन, नृत्य, गीत आदि को यथावत् सीखें परन्तु मुख्य करके सामवेद का गान वादिनवादनपूर्वक सीखें और नारदसंहिता आदि जो २ आर्य ग्रन्थ है उनको पढ़ें परन्तु भडुवे वेश्या और विपयासक्तिकारक वैरागियों के गर्दभशब्दवत् व्यर्थ आलाप कभी न करे। अर्थवेद कि जिसको शिल्पविद्या कहते हैं उसको पदार्थ गुण विज्ञान क्रियाकौशल नानावित्र पर्दार्थों को निर्माण पृथिवी से लेके आकाश पर्यन्त की विद्या को यथावत् सीख के अर्थ अर्थात् जो ऐश्वर्य को बढ़ानेवाला है उस विद्या को सीख के, दो वर्ष में ज्योति शास्त्र सूर्यसिद्धान्तादि जिसमें वीजगणित, अडू, भूगोल, खगोल और भूगर्भविद्या है इसको यथावत् सीखें। तत्पश्चात् सव.प्रकार को हस्तक्रिया, यन्त्रकला आदि को सीखे परन्तु जितने ,ग्रह, नक्षत्र, जन्मपत्र, राशि, मुहूर्त-श्रादि के ?

तृतीयसमुल्लास फल के विधायक ग्रन्थ हैं उनको झूठ समझ के कभी न पढ़ें और पढ़ावें ऐसा प्रयत्न पढ़ने और पढ़ानेवाले करे कि जिससे वीस वा इक्कीस वर्ष के भीतर समग्र विद्या उत्तम शिक्षा प्राप्त होके मनुष्य लोग कृतकृत्य होकर सदा आनन्द में रहें जितनी विद्या इस रीति से बीस वा इक्कीस वर्षों में हो सकती है उतनी अन्य प्रकार से शतवर्ष में भी नही हो सकती ॥ ऋषिप्रणीत ग्रन्थों को इसलिये पढ़ना चाहिये कि वे बड़े विद्वान् सर्व शास्त्रवित् और धर्मात्मा थे और अनृषि अर्थात् जो अल्प शास्त्र पढ़े हैं और जिनका आत्मा पक्षपातसहित है उनके बनाये हुए प्रन्थ भी वैसे ही हैं। पूर्वमीमांसा पर व्यासमुनिकृत व्याख्या, वैशेषिक पर गौतममुनिकृत,न्यायसूत्र पर वात्स्यायन- मुनिकृत भाष्य, पतञ्जलिमुनिकृत सूत्र पर व्यासमुनिकृत भाष्य, कपिलमुनिकृत सांख्यसूत्र पर भागरि- मुनिकृत भाष्य, व्यासमुनिकृत वेदान्तसूत्र पर वात्स्यायनमुनिकृत भाष्य अथवा बौधायनमुनिकृत भाष्य वृत्तिसहित पढ़ें पढ़ावे इत्यादि सूत्रों को कल्प अङ्ग में भी गिनना चाहिये जैसे ऋग्यजु, साम और अथर्व चारों वेद ईश्वरकृत हैं वैसे ऐतरेय, शतपथ, साम और गोपथ चारों ब्राह्मण, शिक्षा, कल्प, व्या- करण, निघण्टु, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष् छः वेदो के अङ्ग, मीमांसादि छः शास्त्र वेदों के उपाङ्ग, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थवेद ये चार वेदों के उपवेद इत्यादि सब ऋषि मुनि के किये ग्रन्थ हैं इनमें भी जो २ वेदविरुद्ध प्रतीत हो उस २ को छोड़ देना क्योंकि वेद ईश्वरकृत होने से निभ्रान्त खतःप्रमाण अर्थात् वेद का प्रमाण वेद ही से होता है ब्राह्मणादि सब ग्रन्थ परतःप्रमाण अर्थात् इनका प्रमाण वेदा- धीन है वेद की विशेष व्याख्या ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में देख लीजिये और इस ग्रन्थ में भी आगे लिखेंगे। अव जो परित्याग के योग्य ग्रन्थ हैं उनका परिगणन संक्षेप से किया जाता है अर्थात् जो २ नीचे ग्रन्थ लिखेंगे वह २ जालग्रन्थ समझना चाहिये । व्याकरण में कातन्त्र, सारस्वत, चन्द्रिका, मुग्धबोध, कौमुदी, शेखर, मनोरमादि । कोश में अमरकोशादि । छन्दोग्रन्थ में वृत्तरत्नाकरादि । शिक्षा में अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामि पाणिनीयं मतं यथा इत्यादि । ज्योतिष में शीघ्रवोध, मुहूर्त्तचिन्तामणि आदि। काव्य में नायिकाभेद, कुवलयानन्द, रघुवंश, भाव, किरातार्जुनीयादि । मीमांसा में धर्मसिन्धु, व्रतार्कादि। वैशेषिक में तर्कसंग्रहादि । न्याय में जागदीशी श्रादि । योग में हठप्रदीपिकादि । सांख्य में सांख्यतत्त्व- कौमुद्यादि । वेदान्त में योगवासिष्ठ पञ्चदश्यादि । वैद्यक में शार्ङ्गधरादि। स्मृतियों में मनुस्मृति के प्रक्षिप्त श्लोक और अन्य सव स्मृति, सव तंत्र ग्रन्थ, सव पुराण, सव उपपुराण, तुलसीदासकृत भाषारामायण, रुक्मिणीमङ्गलादि और सर्व भाषाग्रन्थ ये सव कपोलकल्पित मिथ्या ग्रन्थ हैं। (प्रश्न) क्या इन ग्रन्थों मे कुछ भी सत्य नहीं ? ( उत्तर ) थोड़ा सत्य तो है परन्तु इसके साथ बहुतसा असत्य भी है इससे 'विषसम्पृक्तान्नवत् त्याज्याः" जैसे अत्युत्तम अन्न विष से युक्त होने से छोड़ने योग्य होता है वैसे ये ग्रन्थ हैं। (प्रश्न ) क्या आप पुराण इतिहास को नहीं मानते ? ( उत्तर) हां मानते हैं परन्तु सत्य को मानते हैं मिथ्या को नहीं (प्रश्न ) कौन सत्य और कौन मिथ्या है ? (उत्तर):- ब्राह्मणानीतिहासान् पुराणानि कल्पान् गाथा नाराशंसीरिति । यह गृह्यसूत्रादि का वचन है । जो ऐतरेय, शतपथादि, ब्राह्मण लिख आये उन्हीं के इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी पांच नाम हैं श्रीमद्भागवतादि का नाम पुराण नहीं (प्रश्न ) जो त्याज्य ग्रन्थो मे सत्य है उसका ग्रहण क्यों नहीं करते ? (उत्तर) जो २ उनमें सत्य है सा२ वदादि सत्य शास्त्रों का है और मिथ्या उनके घर का है। वेदादि सत्य शास्त्रों के स्वीकार में सब सत्य का होजाता है। जो कोई इन मिथ्या ग्रन्थों से सत्य का ग्रहण करना चाहे तो मिथ्या भी उसके गले .

सत्यार्थप्रकाश - जावे । इसलिये "असत्यमिश्रं सत्यं दूरतस्त्याज्यमिति" असत्य से युक्त ग्रन्थस्थ सत्य को भी बैं छोड़ देना चाहिये जैसे विषयुक्त अन्न को । (प्रश्न ) तुम्हारा मत क्या है ? (उत्तर) वेद अर्थात् जो वेद में करने और छोड़ने की शिक्षा की है उस २ का हम यथावत् करना छोड़ना मानते हैं । जिसलि वेद हमको मान्य है इसलिये हमारा मत वेद है । ऐसा ही मानकर सब मनुष्यों को विशेष आर्यों व ऐकमत्य होकर रहना चाहिये (प्रश्न ) जैसा सत्यासत्य और दूसरे ग्रन्थों का परस्पर विरोध है वै अन्य शास्त्रों में भी है जैसा सृष्टिविषय में छः शास्त्रों का विरोध है:-मीमांसा कर्म, वैशेपिक काल न्याय परमाणु, योग पुरुषार्थ, सांख्य प्रकृति और वेदान्त ब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति मानता है क्या य विरोध नहीं है ? ( उत्तर ) प्रथम तो विना सांख्य और वेदान्त के दूसरे चार शास्त्रों में सृष्टि उत्पत्ति प्रसिद्ध नहीं लिखी और इनमें विरोध नहीं क्योंकि तुमको विरोधाविरोध का ज्ञान नहीं। तुमसे पूछता हूं कि विरोध किस स्थल में होता है ? क्या एक विषय में अथवा भिन्न २ विषयों में (प्रश्न ) एक विषय में अनेकों का परस्पर विरुद्ध कथन हो उसको विरोध कहते हैं यहां भी सृष्टि ए: ही विषय है (उत्तर) क्या विद्या एक है वा दो, एक है, जो एक है तो व्याकरण, वैद्यक, ज्योति प्रा का भिन्न २ विषय क्यों है जैसा एक विद्या में अनेक विद्या के अवयवों का एक दूसरे से भिन्न प्रतिप दन होता है वैसे ही सृष्टिविद्या के भिन्न भिन्न छः अवयवो का शास्त्रों में प्रतिपादन करने से इनमें कुः भी विरोध नही जैसे घड़े के वनाने में कर्म, समय, मिट्टी, विचार, संयोग, वियोगादि का पुरुपार्थ, प्रकृति के गुण और कुंभार कारण है वैसे ही सृष्टि का जो कर्म कारण है उसकी व्याख्या मीमांसा में, समर की व्याख्या वैशेषिक में, उपादान कारण की व्याख्या न्याय मे, पुरुषार्थ की व्याख्या योग में, तत्त्वों वे अनुक्रम से परिगणन की व्याख्या सांख्य में और निमित्तकारण जो परमेश्वर है उसकी व्याख्या वेदान्त शास्त्र में है। इससे कुछ भी विरोध नही । जैसे वैद्यकशास्त्र मे निदान, चिकित्सा, ओषधि, दान और के प्रकरण भिन्न २ कथित हैं परन्तु सव का सिद्धान्त रोग की निवृत्ति है वैसे ही सृष्टि के छ कारण हैं इनमें से एक २ कारण की व्याख्या एक २ शास्त्रकार ने की है इसलिये इनमे कुछ भी विरोध नहीं इसकी विशेष व्याख्या सृष्टिप्रकरण में कहेगे ॥ पथ्य जो विद्या पढ़ने पढ़ाने के विघ्न हैं उनको छोड़ देवें जैसा कुसङ्ग अर्थात् दुष्ट विषयीजनों का संग, दुष्टव्यसन जैसा मद्यादि सेवन और वेश्यागमनादि, वाल्यावस्था में विवाह अर्थात् पच्चीसवें वर्ष से पूर्व पुरुष और सोलहवें वर्ष से पूर्व स्त्री का विवाह होजाना, पूर्ण ब्रह्मचर्य न होना, राजा, माता पिता और विद्वानों का प्रेम, वेदादि शास्त्रो के प्रचार में न होना, अतिभोजन, अतिजागरण करना, पढ़ने पढ़ाने परीक्षा लेने वा देने मे आलस्य वा कपट करना, सर्वोपरि विद्या का लाभ न समझना, ब्रह्मचर्य से बल, बुद्धि, पराक्रम, आरोग्य, राज्य, धन की वृद्धि न मानना, ईश्वर का ध्यान छोड़ अन्य पापाणादि जड़ मूर्ति के दर्शन पूजन में व्यर्थ काल खोना, माता पिता, अतिथि और आचार्य, विद्वान् इनको सत्य मूर्ति मानकर, सेवा सत्संग न करना, वर्णाश्रम के धर्म को छोड़ ऊर्ध्वपुण्डू, त्रिपुण्ड्र, तिलक, कंठी मालाधारण, एकादशी, त्रयोदशी आदि व्रत करना, काश्यादि तीर्थ और राम, कृष्ण, नारायण, भगवती, गणेशादि के नामस्मरण से पाप दूर होने का विश्वास, पाखण्डियों के उपदेश से विद्या पढ़ा में अश्रद्धा का होना, विद्या धर्म योग परमेश्वर की उपासना के विना मिथ्या पुराणनामक भागवतादि की कथादि से मुक्ति का मानना, लोभ से धनादि में प्रवृत्त होकर विद्या में प्रीति न रखना, इधर उधर व्यर्थ घूमते रहना इत्यादि मिथ्या व्यवहारों में फँस के ब्रह्मचर्य और विद्या के लाभ से रहित रोगी और मूर्ख बने रहते हैं ॥ रायण, शिव सृतीयसमुलासा माजकल के संप्रदायी और खार्थी ब्राह्मण आदि जो दूसरों को विद्या सत्संग से हटा और अपने जाल में फंसा के उनका तन, मन, धन नष्ट कर देते हैं और चाहते हैं कि जो क्षत्रियादि वर्ण पढ़कर विद्वान् हो जायेंगे तो हमारे पाखण्डजाल से छूट और हमारे छल को जानकर हमाग अपमान करेंगे । इत्यादि विघ्नों को राजा और प्रजा दूर करके अपने लड़कों और लड़कियों को विद्वान् करने के लिये तन, मन, धन से प्रयत्न किया करें। (प्रश्न ) क्या स्त्री और शूद्र भी वेद पढ़ें ? जो ये पढ़ेंगे तो हम फिर क्या करेंगे? और इनके पढ़ने में प्रमाण भी नही है जैसा यह निषेध है:- स्त्रीशूद्रौ नाधीयातामिति श्रुतेः ।। स्त्री और शूद्र न पढ़ें यह श्रुति है ( उत्तर) सब स्त्री और पुरुष अर्थात् मनुष्यमात्र को पढ़ने का अधिकार है। तुम कुत्रा में पड़ो और यह श्रुति तुम्हारी कपोलकल्पना से हुई है। किसी प्रामाणिक ग्रन्थ की नहीं। और सब मनुष्यों के वेदादि शास्त्र पढ़ने सुनने के अधिकार का प्रमाण यजुर्वेद के छब्बीसवें अध्याय में दूसरा मंत्र है:- यथेमां वाचे कल्याणीमावदानि जनेभ्यः । ब्रह्मराजन्याभ्याथं शूद्राय चार्याय च खाय चारणाय ॥ [ यजु० अ० २६ । २] परमेश्वर कहता है कि (यथा ) जैसे मैं (जनेभ्यः ) सब मनुष्यों के लिये (इमाम् ) इस (क- ल्याणीम् ) कल्याण अर्थात् संसार और मुक्ति के सुख देनेहारी (वाचम् ) ऋग्वेदादि चारों वेदों की वाणी का (आ, वदानि ) उपदेश करता हूं वैसे तुम भी किया करो। यहां कोई ऐसा प्रश्न करे कि जन शब्द से द्विजों का ग्रहण करना चाहिये क्योंकि स्मृत्यादि ग्रन्थो में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही के वेदों के पढ़ने का अधिकार लिखा है स्त्री और शूद्रादिवों का नही (उत्तर)-(ब्रह्मराजन्याभ्याम् ) इत्यादि देखो परमे- श्वर स्वयं कहता है कि हमने ब्राह्मण, क्षत्रिय, (अर्याय ) वैश्य, (शूद्राय ) शूद्र और (खाय) अपने भृत्य वा स्त्रियादि ( अरणाय ) और अतिशूद्रादि के लिये भी वेदों का प्रकाश किया है अर्थात् सव मनुष्य वेदों को पढ़ पढ़ा और सुन सुनाकर विज्ञान को बढ़ा के अच्छी बातों का ग्रहण और बुरी बातों का त्याग करके दुःखों से छूट कर आनन्द को प्राप्त हो । कहिए अब तुम्हारी बात माने वा परमेश्वर की ? नै परमेश्वर की वात अवश्य माननीय है । इतने पर भी जो कोई इसको न मानेगा वह नास्तिक कहावेगा। क्वें' क्योंकि "नास्तिको चेदनिन्दकः" वेदों का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है। क्या 1, परमेश्वर शूद्रों का भला करना नहीं चाहता ? क्या ईश्वर पक्षपाती है कि वेदों को पढ़ने सुनने का प, शूद्रों के लिये निषेध और द्विजों के लिये विधि करे ? जो परमेश्वर का अभिप्राय शूद्रादि के पढ़ाने मुर्ग सुनाने का न होता तो इनके शरीर में वाक् और श्रोत्र इन्द्रिय क्यों रचता । जैसे परमात्मा ने पृथिवी, पार जल, अग्नि, वायु, चन्द्र, सूर्य और अन्नादि पदार्थ सब के लिये बनाये हैं वैसे ही वेद भी सब के लिये प्रकाशित किये हैं। और जहां कही निषेध किया है उसका यह अभिप्राय है कि जिसको पढ़ने पढ़ाने क; से कुछ भी न आये वह निर्वृद्धि और मूर्ख होने से शूद्र कहाता है । उसका पढ़ना पढ़ाना व्यर्थ है और गु, जो स्त्रियों के पड़ने का निषेध करते हो वह तुम्हारी मूर्खता, स्वार्थता और निर्बुद्विता का प्रभाव है द्या देखो वेद में कन्याओं के पढ़ने का प्रमाण:- ब्रह्मचर्येण कन्याः युवानं विन्दते पतिम् ॥ अथर्व० [कां० ११ ।म० २४।०३। मं०१८] जैसे लड़के ब्रह्मचर्य सेवन से पूर्ण विद्या और सुशिक्षा को प्राप्त होके युवति, विदुपी, अपने 'अनुकूल प्रिय सदृश स्त्रियों के साथ विवाह करते हैं वैसे ( कन्या) कुमारी (ब्रह्मचर्येण ) ब्रह्मचर्य सेवन से वेदादि शास्त्रों को पढ़ पूर्ण विद्या और उत्तम शिक्षा को प्राप्त युवति होके पूर्ण युवावस्था में अपने नागा - घर हित ७ 5 सत्यार्थप्रकाश - सदृश प्रिय विद्वान (युवानम् ) पूर्ण युवावस्थायुक्त पुरुष को (विन्दते) प्राप्त होवे इसलिये स्त्रियों को भी ब्रह्मचर्य और विद्या का ग्रहण अवश्य करना चाहिये (प्रश्न ) क्या स्त्री लोग भी वेदों को पढ़ें ? ( उत्तर) अवश्य देखो श्रौतसूत्रादि में: इमं मन्त्रं पत्नी पठेत् ॥ अर्थात् स्त्री यज्ञ में इस मन्त्र को पढ़े। जो वेदादि शास्त्रों को न पढ़ी होवे तो यज्ञ में खर- सहित मन्त्रों का उच्चारण और संस्कृतभापण कैसे कर सके भारतवर्ष की स्त्रियों में भूषणरूप गार्गी श्रादि वेदादि शास्त्रों को पढ़ के पूर्ण विदुपी हुई थी यह शतपथब्राह्मण में स्पष्ट लिखा है । भला जो पुरुष विद्वान और स्त्री अविदुपी और स्त्री विदुपी और पुरुष अविद्वान् हो तो नित्यप्रति देवासुर संग्राम घर में मचा रहै फिर सुख कहां ? इसलिये जो स्त्री न पढ़ें तो कन्याओं की पाठशाला में अध्यापिका क्या- कर होसकें तथा राजकार्य न्यायाधीशत्वादि गृहाश्रम का कार्य जो पति को स्त्री और स्त्री को पति प्रसन्न रखना घर के सब काम स्त्री के आधीन रहना इत्यादि काम विना विद्या के अच्छे प्रकार कभी ठीक नहीं हो सकते ॥ देखो आर्यावर्त के राजपुरुषों की स्त्रियां धनुर्वेद अर्थात् युद्धविद्या भी अच्छे प्रकार जानतीर्थ क्योंकि जो न जानती होती तो केकयी आदि दशरथ आदि के साथ युद्ध मे क्यांकर जा सकती ? और युद्ध कर सकती। इसलिये ब्राह्मणी और क्षनिया को सब विद्या, वैश्या को व्यवहार विद्या और शूद्रा के पाकादि सेवा की विद्या अवश्य पढ़नी चाहिये । जैसे पुरुषो को व्याकरण, धर्म और अपने व्यवहार के विद्या न्यून से न्यून अवश्य पढ़नी चाहिये वैसे स्त्रियों को भी व्याकरण, धर्म, वैद्यक, गणित, शिल्पविद्य तो अवश्य ही सीखनी चाहिये। क्योंकि इनके सीखे विना सत्यासत्य का निर्णय, पति आदि से अनुकूल वर्तमान, यथायोग्य सन्तानोत्पत्ति, उनका पालन वर्द्धन और सुशिक्षा करना, घर के लव कार्यो को जैस चाहिये वैसा करना कराना वैद्यकविद्या से औपत्रवत् अन्न पान बनाना और वनवाना नही कर सकती जिससे घर में रोग कभी न आवे और सब लोग सदा आनन्दित रहैं। शिल्पविद्या के जाने विना घर का वनवाना, वस्त्र आभूषण आदि का वनाना वनवाना, गणितविद्या के विना लव का हिसाव समझना समझाना, वेदादि शास्त्रविद्या के विना ईश्वर और धर्म को न जानके अधर्म से कभी नहीं बच सके । इस लिये वे ही धन्यवादाई और कृतकृत्य है कि जो अपने सन्तानों को ब्रह्मचर्य, उत्तम शिक्षा और विद्या से शरीर और आत्मा के पूर्ण वल को बढ़ावे जिससे वे सन्तान मात, पित, पति, सासु, श्वशुर, राजा, प्रजा, पड़ोसी, इष्ट मित्र और सन्तानादि से यथायोग्य धर्म से वर्ते । यही कोश अक्षय है इसको जितना व्यय करे उतना ही बढ़ता जाय अन्य सव कोश व्यय करने से घट जाते हैं और दायभागी भी निजभाग लेते हैं और विद्याकोश का चोर वा दायभागी कोई भी नही हो सकता इस कोश की रक्षा और वृद्धि करने वाला विशेप राजा और प्रजा भी हैं। कन्यानां सम्प्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम् ॥ मनु० [७ । १५२ ] राजा को योग्य है कि सब कन्या और लड़को को उक्त समय से उक्त समय तक ब्रह्मचर्य में रखके, विद्वान् कराना । जो कोई इस आज्ञा को न माने तो उसके माता पिता को दण्ड देना अर्थात् राजा की आज्ञा से आठ वर्ष के पश्चात् लड़का बा लड़की किसी के घर में न रहने पावे किन्तु आवा र्यकुल में रहे जवतक समावर्तन का समय न आवे तबतक विवाह न होने पावे ॥ सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते । वार्यनगोमहीबासस्तिलकाञ्चनसर्पिपाम् ॥ मनु० [४ । २३३] - तृतीयसमुल्लास: ७ . संसार में जितने दान हैं अर्थात् जल, अश, गौ, पृथिवी, वस्त्र, तिल, सुवर्ण और घृतादि इन सब दानों से वेदविद्या का दान अतिश्रेष्ठ है। इसलिये जितना वन सके उतना प्रयत्न तन, मन, धन से विद्या की वृद्धि मे किया करें । जिस देश में यथायोग्य ब्रह्मचर्य विद्या और वेदोक्त धर्म का प्रचार होता है वहीं देश लौभाग्यवान होता है। यह ब्रह्मचर्याश्रम की शिक्षा संक्षेप से लिखी गई है इसके आगे चौथे समुल्लास में समावर्तन और गृहाश्रम की शिक्षा लिखी जायगी ॥ इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिकृते सत्यार्थप्रकाशे सुभाषाविभूपिते शिक्षाविषये तृतीयः समुल्लालः सम्पूर्णः ॥ ३॥ . .- '.

2929CCCXCOLICCICIecercesegWrocdegere Decor अथ चतुर्थसमुल्लासारम्भः ber 3606060606260000 GOGO GOG अथ समावर्त्तनविवाहगृहाश्रमविर्षि वदयामः . वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम् । अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत् ।। मनु० [३२] जव यथावत् ब्रह्मचर्य्य [ में] श्राचार्यानुकूल वर्तकर, धर्म से चारों वेद, तीन वा दो अथवा एफ वेद को साङ्गोपाङ्ग पढ़ के जिसका ब्रह्मचर्य खण्डित न हुआ हो वह पुरुष वा स्त्री गृहाश्रम में प्रवेश करे॥ तं प्रतीतं स्वधर्मेण ब्रह्मदायहरं पितुः । स्रग्विणं तल्प आसीनमर्हयेत्प्रथमं गवा ॥ मनु० [३।३] जो स्वधर्म अर्थात् यथावत् प्राचार्य और शिष्य का धर्म है उससे युक्त पिता जनक वा अध्य पक से ब्रह्मदाय अर्थात् विद्यारूप भाग का ग्रहण, माला का धारण करनेवाला अपने पलङ्ग मे बैठे हु। प्राचार्य को प्रथम गोदान से सत्कार करे वैसे लक्षणयुक्त विद्यार्थी को भी कन्या का पिता गोदान है सत्कार करे ॥ गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधि । उद्वहेत द्विजो भायां सवर्णा लक्षणान्विताम् मनु० [३।४ गुरु की आज्ञा ले स्नान कर गुरुकुल से अनुक्रमपूर्वक श्रा के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अप पर्णानुकूल सुन्दर लक्षणयुक्त कन्या से विवाह करे ॥ असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः । सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने।। मनु० [३५] जो कन्या माता के कुल की छः पीढ़ियों में न हो और पिता के गोत्र की न हो उस कन्या से विवाह करना उचित है । इसका यह प्रयोजन है कि:- परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षाद्वषः ॥ शतपथ० ॥ यह निश्चित वात है कि जैसी परोक्ष पदार्थ मे प्रीति होती है वैसी प्रत्यक्ष में नहीं। जैसे किसी ने मिश्री के गुण सुने हो और खाई न हो तो उसका मन उसी मे लगा रहता है, जैसे किसी परोक्ष वस्तु की प्रशंसा सुनकर मिलने की उत्कट इच्छा होती है वैसे ही दूरस्थ अर्थात् जो अपने गोत्र वा माता के कुल में निकट सम्बन्ध की न हो उसी कन्या से वर का विवाह होना चाहिये । निकट और ५ विवाह करने में गुण ये हैं:-(१) एक-जो वालक बाल्यावस्था से निकट रहते हैं परस्पर क्रीडा लड़ाई और प्रेम करते एक दूसरे के गुण, दोष, स्वभाव, बाल्यावस्था के विपरीत माचरण मानवे .

- चतुर्थसमुल्लासः जो ने भी एक दूसरे को देखते हैं उनका परस्पर विवाह होने से प्रेम कभी नहीं हो सकता, ( २ दूसरी-जैसे पानी में पानी मिलाने से विलक्षण गुण नहीं होता वैसे एक गोत्र पितृ वा मातृकुल में 'विवाह होने में धातुओं में अदल बदल नही होने से उन्नति नहीं होती, (३) तीसरा-जैसे दूध में मिश्री या शुख्यादि ओपधियों के योग होने से उत्तमता होती है वैसे ही भिन्न गोत्र मातृ पितृकुल से पृथक् वर्तमान स्त्री पुरुषों का विवाह होनी उत्तम है, (४) चौथा-जैसे एक देश में रोगी हो वह दूसरे देश में वायु और खान पान के बदलने से रोगरहित होता है वैसे ही दूर देशस्थों के विवाह होने में उत्तमता है, (५) पांचवें-निकट सम्बन्ध करने में एक दूसरे के निकट होने में सुख दुःख का भान और विरोध होना भी सम्भव है, दूरदेशस्थों में नहीं और दूरस्थों के विवाह में दूर २ प्रेम की डोरी लम्बी बढ़ जाती है निकटस्थ विवाह में नहीं, (६) छठे-दूर २ देश के वर्तमान और पदार्थों की प्राप्ति भी दूर सम्बन्ध होने मे सहजता से हो सकती है, निकट विवाह होने में नही । इसलिये:- दुहिता दुहिता दूरेहिता भवतीति ॥ निरु० [३।४] कन्या का नाम दुहिता इस कारण से है कि इस का विवाह दूर देश में होने से हितकारी होता है निकट रहने मे नहीं, (७) सातवे-कन्या के पितृकुल में दारिद्रय होने का भी सम्भव है क्योंकि जय २ कन्या पितृकुल मे आवेगी तव तब इसको कुछ न कुछ देना ही होगा, (८) श्राठवां-कोई निकट होने से एक दूसरे को अपने २ पितृकुल के सहाय का घमंड और जब कुछ भी दोनों में वैमनस्य होगा तव स्त्री झट ही पिता के कुल मे चली जायगी एक दूसरे की निन्दा अधिक होगी और विरोध भी, क्योंकि प्रायः स्त्रियों का स्वभाव तीक्ष्ण और मृदु होता है इत्यादि कारणों से पिता के एक गोत्र माता की छः पीढ़ी और समीप देश में विवाह करना अच्छा नही ॥ महान्त्यपि समृद्धानि गोऽजाविधनधान्यतः । स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥ मनु० [३६] चाहे कितने ही धन, धान्य, गाय, अजा, हाथी, घोड़े, राज्य, श्री आदि से समृद्ध तो भी विवाहसम्बन्ध में निम्नलिखित दश कुलो का त्याग करदेः- हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम् । क्षय्यामयाव्यपस्मारिधितृकुष्ठिकुलानि च ॥ मनु० [३।७] जो कुल सक्रिया से हीन, सत्पुरुषों से रहित, वेदाध्ययन से विमुख, शरीर पर बड़े २ लोम भथया बवासीर, क्षयी, दमा, खांसी, आमाशय, मिरगी, श्वेतकुष्ठ और गलितकुष्ठयुक्त हों, उन कुलों की कन्या वा वर के साथ विवाह होना न चाहिये क्योंकि ये सब दुर्गुण और रोग विवाह करनेवाले के कुल में भी प्रविष्ट होजाते हैं इसलिये उत्तम कुल के लड़के और लड़कियों का आपस मे विवाह होना चाहिये। नोव्हेत्कपिलां कन्यांनाऽधिकाङ्गी नरोगिणीम् । नालोमिकां नातिलोमांन वाचाटान्न पिङ्गलाम् ।। मनु० [३८ न पीले वर्णवाली, न अधिकाङ्गी अर्थात् पुरुष से लम्बी, चौड़ी, अधिक क्लवाली, न रोगयुक्का, न लोमरहित, न बहुत लोमवाली, न बकवाद करनेहारी और भूरे नेत्रवाली ॥ नवृचनदीनाम्नी नान्त्यपनवनामिकाम् । न पश्यविप्रेष्यनाम्नी न च भीषपनामिकाए । मनु० [३] ये कुल हो -- सत्यार्थप्रकाश न क्ष अर्थात् अश्विनी, भरणी, रोहिणीदेई, रेवतीबाई, चित्तरी आदि नक्षत्र नारकली तुलासा, गेंदा, गुलावी, चंपा, चमेली श्रादि वृक्ष नामवाली, गङ्गा, यमुना श्रादि नदी नामवाली चांडाली आदि अन्त्य नामवाली, विन्ध्या, हिमालया, पार्वती आदि पर्वत नामवाली, कोकिता, आदि पक्षी नामवाली, नागी, भुजंगा आदि सर्प नामवाली, माधोदासी मीरादासी शादि प्रेग्य नामवालं भीमकुवरी, चंडिका, काली यादि भीषण नामवाली कन्या के साथ विवाह न करना चाहिये क्योंकि नाम कुत्सित और अन्य पदार्थों के भी हैं। अव्यङ्गाङ्गी सौम्यनाम्नी हंसवारणगामिनीम् । तनुलोमकेशदशनां मृदङ्गीमुदहेरिस्त्रयम् ॥ मनु० [३।१०] जिसके सरल सूधे अङ्ग हो विरुद्ध न हों, जिसका नाम सुन्दर अर्थात् यशोदा, सुखदा या हो, हंस और हथिनी के तुल्य जिसकी चाल हो, सूक्ष्म लोम केश और दांतयुक्त और जिसके स प्रङ्ग कोमल हों वैली स्त्री के साथ विवाह करना चाहिये । (प्रश्न ) विवाह का समय और प्रकार कौन अच्छा है ( उत्तर) सोलहवे वर्ष से ले के चौबीस वर्ष तक कन्या और पञ्चीसवें वर्ष से ले के अ तालीसवें वर्ष तक पुरुप का विवाह समय उत्तम है। इसमे जो लोलह और पच्चीस में विवाह कर निकृष्ट, अठारह वीस की स्त्री तीस पैतील या चालीस वर्ष के पुरुष का मध्यम, चौवीस वर्ष की र और अड़तालीस वर्ष के पुरुप का विवाह होगा उत्तम है । जिस देश में इसी प्रकार विवाह की वि श्रेष्ठ और ब्रह्मचर्य विद्याभ्यास अधिक होता है वह देश सुखी और जिस देश में ब्रह्मचर्य विद्याग्रहण रहित वाल्यावस्था और अयोग्यों का विवाह होता है वह देश दुःख में डूब जाता है। क्योकि ब्रह्मवर्य विद्या के ग्रहणपूर्वक विवाह के सुधार ही ले लव वातो का सुधार और विगड़ने से विगाइ हो जाता है । (प्रश्न) अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा च रोहिणी । दशवी भवेत्कन्या तत ऊर्ध्व रजस्वला ॥१॥ माता चैव पिता तस्या ज्येष्ठो भ्राता तथैव च । त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम् ॥ २॥ ये श्लोक पाराशरी और शीवबोध मे लिखे हैं । अर्थ यह है कि कन्या की आठवें वर्प विवाह में गौरी, नववे वर्ष रोहिणी, दशवे वर्ष कन्या और उसके आगे रजस्वला संज्ञा होती है ॥ १॥ जो दशवं वर्ष तक विवाह न करके रजस्वला कन्या को माता पिता और बड़ा भाई ये तीनों देख के नरक में गिरते हैं। (उत्तर) ब्रह्मोवाच । एकक्षणा भवेद् गौरी द्विक्षणेयन्तु रोहिणी । त्रिक्षणा सो भवेत्कन्या ह्यत ऊर्य रजस्वला ॥१॥ माता पिता तथा भ्राता मातुलो भगिनी स्वका । सर्वे ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम् ॥ २॥ यह सद्योनिर्मित ब्रह्मपुराण का वचन है । अर्थ-जितने समय में परमाणु एक पलटा खाने उतने समय को क्षण कहते हैं जब कन्या जन्मे तव एक क्षण में गौरी, दूसरे मे रोहिणी, तीसरे मे कन्या और चौथे में रजस्वला हो जाती है ॥१॥ उस रजस्वला को देख के उसके माता, पिता. भाई, नामा और बहिन सब नरक को जाते हैं॥२॥ ... (प्रश्न ) ये श्लोक प्रमाण नहीं (उत्तम ) क्यों प्रमाण नहीं ? क्या जो ब्रह्माजी के श्लोक प्रमाण नहीं तो तुम्हारे भी प्रमाण नहीं हो सकते (प्रश्न) वाह २ पराशर बार काशीनाथ का भी- प्रमाण नहीं - चतुर्थलमुलाला करते (उत्तर) वाह जी वाह क्या तुम ब्रह्माजी का प्रमाण नहीं करते, पराशर काशीनाथ से ब्रह्माजी बड़े नहीं है? जो तुम ब्रह्माजी के श्लोको को नही मानते तो हम भी पराशर काशीनाथ के श्लोकों को नहीं मानते (प्रश्न ) तुम्हारे श्लोक असंभव होने से प्रमाण नही क्योकि सहल क्षण-जन्म लमय ही मे बीत जाते हैं तो विवाह कैसे हो सकता है और उस समय विवाह करने का कुछ फल भी नहीं दीखता (उत्तर) जो हमारे श्लोक असंभव हैं तो तुम्हारे भी असंभव हैं क्योंकि पाठ, नौ और दशवें वर्ष में भी विवाह करना निष्फल है, क्योकि सोलहवें वर्ष के पश्चात् चौवीलवे वर्ष पर्यन्त विवाह होने से पुरुष का वीर्य परिपक्क, शरीर बलिष्ठ, स्त्री का गर्भाशय पूरा और शरीर भी बलयुक्त होने से सन्तान उत्तम होते हैं * जैसे आठवे वर्ष की कन्या मे लन्तानोत्पत्ति का होना असंभव है वैसे ही गौरी, रोहिणी नाम देना भी अयुक्त है। यदि गोरी कन्या न हो किन्तु काली हो तो उसका नाम गौरी रखना व्यर्थ है। और गौरी महादेव की स्त्री, रोहिणी वासुदेव की स्त्री थी उसको तुम पौराणिक लोग मातृसमान मानते हो । जव कन्या- मात्र मे गौरी आदि की भावना करते हो तो फिर उनसे विवाह करना कैसे संभव और धर्मयुक्त हो सकता है ! इसलिये तुम्हारे और हमारे दो २ श्लोक मिथ्या ही हैं क्योंकि जैसा हमने "ब्रह्मोवाच करके श्लोक बना लिये हैं वैसे वे भी पराशर आदि के नाम से बना लिये हैं। इसलिये इन सव का प्रमाण छोड़ के वेदो के प्रमाण से सब काम किया करो। देखो मनु में- 2 त्रीणि बर्षारयुदीक्षेत कुमाSतुमती सती । अवं तु कालादेतस्मादिदेत सदृशं पतिम् ॥ मनु० [९।६०] . कन्या रजस्वला हुए पीछे तीन वर्ष पर्यन्त पति की खोज करके अपने तुल्य पति को प्रात होवे । जव प्रतिमास रजोदर्शन होता है तो तीन वर्षों में ३६ वार रजस्वला हुए पश्चात् विवाह करना योग्य है इससे पूर्व नहीं॥ काममामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यमित्यपि । न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥ मनु० [ । ८१] चाहे लड़का तड़की मरणपर्यन्त कुमार रहें परन्तु असदृश अर्थात् परस्पर विरुद्ध गुण कर्म गा स्वभाववालो का विवाह कभी न होना चाहिये । इससे सिद्ध हुआ कि न पूर्वोक्त लमय से प्रथम वा असदों का विवाह होना योग्य है । -- -- m * उचित समय से न्यून अायुवाले श्री पुरुष को गर्भाधान में मुनिवर धन्वन्तरिजी सुश्रुत मे निपेध करते है.- जनपोउशवर्षायाममाप्तः पञ्चविरातिस् । यद्याधत्ते पुमान् गस कुतिस्थ. स विपद्यते ॥ १॥ जातो वा न चिरन्जीवज्जीवेदा दुर्यलेन्द्रियः । तस्मादत्यन्तवालायां गर्भाधान न कारयेत् ॥ सुश्रुत शारीरस्थाने अ० १० । श्लोक ४७ । ४८ ॥ अर्थ- सोलह वर्ष से न्यन वयवाती स्त्री मे पच्चीस वर्ष से न्यून आयुवाला पुरप जो गर्भ को स्थापन करे तो वह कुरिस्थ हुशा गर्भ विपति को प्राप्त होता अर्थात् पूर्ण झाल तक गर्भाशय में रहकर उत्पन्न नहीं होता । अथवा उत्पत्र हो तो फिर चिरकाल तक न जीवे वा जीवे तो दुर्वलेन्द्रिय हो, इस कारण से अतिवाल्याव- दुई स्थावाली स्त्री में गर्म स्थापन न करे ॥ २ ॥ ऐसे २ शासोल नियम और सृष्टिकम को देखने और बुद्धि से विचारने से यही सिद्ध होता है कि १६ वर्ष म्यून स्नी और २५ वर्ष से न्यून पायुचाता पुरप भी गर्भाधान करने के योग्य नहीं होता, इन नियमों से विपरीत न को करते हैं वे दुःखभागी होते है । स० दा० ॥ . जा

सत्यार्यप्रकाश
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(प्रस) विवाह करना माता पिता के प्राधीन होना चाहिये वा लड़का लड़की के माधीनुरो
(उत्तर) लड़का लड़की के माधीन विवाह होना उत्तम है। जो माता पिता विवाह करना कभी चार
तो भी लड़का लड़की की प्रसन्नता के विना न होना चाहिये क्योंकि एक दूसरे की प्रसन्नता से
होने में विरोध बहुत कम होता और सन्तान उत्तम होते हैं। अप्रसन्नता के विवाह में नित्य क्लेश ही ए
रहता है विवाह में मुख्य प्रयोजन वर और कन्या का है माता पिता का नहीं क्योंकि जो उनमें परस्पर
प्रसन्नता रहे तो उन्ही को सुख और विरोध में उन्हीं को दुःख होता और-
सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्ना भार्या तथैव च । यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥
मनु० [३।६०]
जिस
कुल
में स्त्री से
पुरुष
और
पुरुष
से स्त्री सदा प्रसन्न रहती है उसी कुल में श्रानन्द, लक्ष्म
और कीर्ति निवास करती है और जहां विरोध, कलह होता है वहां दुःख, दरिद्रता और निन्दा निवास
करती है । इसलिये जैसी स्वयंवर की रीति पार्यावर्त में परम्परा से चली आती है वही विवाह उत्तम
है। जव स्त्री पुरुप विवाह करना चाहे तव विद्या, विनय, शील, रूप, आयु, वल, कुल, शरीर का परि
माणादि यथायोग्य होना चाहिये जबतक इनका मेल नहीं होता तवतक विवाह में कुछ भी सुख नई
होता और न बाल्यावस्था मे विवाह करने से सुख होता।
युवा सुवासाः परिवीत आगात्स उ श्रेयान्भवति जायमानः । तं धीरासः कवयं उन्नयन्ति
स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ॥ १॥ ऋ० ॥ मं० ३ । सू० ८ । मं० ४ ॥
आधेनवो धुनयन्तामशिश्वीः शबघाः शशया अद्मदुग्धाः । नव्यानव्या युवतयो भवन्ती-
महदेवानामसुरत्वमेकम् ॥ २ ॥ ऋ० ॥ मं० ३ । सू० ५५ । मं० १६ ॥
पूर्वीरहं शरदः शश्रमाणा दोषावस्तौपसौ जरयन्तीः । मिनाति श्रियं जरिमा तनूनामप्य
नु पत्नीवृषणो जगम्युः ॥ ३ ॥ ऋ० ॥ मं० १ । सू० १७६ । मं० १॥
जो पुरुष (परिवीतः ) सव ओर से यज्ञोपवीत ब्रह्मचर्य सेवन से उत्तम शिक्षा और विद्या से
युक्त (सुवासाः) सुन्दर वस्त्र धारण किया हुआ ब्रह्मचर्ययुक्त (युवा) पूर्ण ज्वान होके विद्याग्रहण
कर गृहाश्रम में (श्रागात् ) आता है (स, उ ) वही दूसरे विद्याजन्म मे (जायमानः ) प्रसिद्ध होकर
(श्रेयान् ) अतिशय शोभायुक्त मङ्गलकारी (भवति ) होता है (स्वाध्यः ) अच्छे प्रकार ध्यानयुक्त (मन-
सा) विज्ञान से (देवयन्तः ) विद्यावृद्धि की कामनायुक्त (धीरासः ) धैर्ययुक्त (कवयः) विद्वान् लोग
(तम् ) उसी पुरुष को (उन्नयन्ति) उन्नतिशील करके प्रतिष्ठित करते हैं और जो ब्रह्मचर्यधारण विद्या
उत्तम शिक्षा का ग्रहण किये विना अथवा बाल्यावस्था में विवाह करते हैं वे स्त्री पुरुष नष्ट भ्रष्ट होकर
विद्वानों में प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं होते ॥१॥
जो (अप्रदुग्धाः) किसी ने दुही नहीं उन (धेनवः ) गौओं के समान ( अशिश्वीः ) वाल्या
वस्था से रहित (शबघाः ) सब प्रकार के उत्तम व्यवहारों को पूर्ण करनेहारी (शशयाः) कुमारा-
वस्था को उल्लंघन करनेहारी ( नव्यानव्याः ) नवीन २ शिक्षा और अवस्था से पूर्ण (भवन्तीः) वर्त:
मान (युवतयः) पूर्ण युवावस्थास्थ स्त्रियां ( देवानाम् ) ब्रह्मचर्य सुनियमो से पूर्ण विद्वानो के (एकम् )
अद्वितीय (महत्) बड़े (असुरत्वम् ) प्रज्ञा शास्त्र शिक्षायुक्त प्रज्ञा में रमण के भावार्थ को प्राप्त होती
हुई तरुण पतियों को प्राप्त होके (आधुनयन्ताम् ) गर्भ धारण करें। कभी भूल के भी वाल्यावस्था में
पुरुष का मन से भी ध्यान न करें क्योंकि यही कर्म इस लोक और परलोक के सुख का साधन है।
बाल्यावस्था में विवाह से जितना पुरुष का नाश उससे अधिक स्त्री का नाश होता है ॥२॥

चतुर्थसमुल्लासा जैसे (नु) शीघ्र (शश्रमाणाः) अत्यन्त श्रम करनेहारे (वृषणः) वीर्य सींचने में समर्थ पूर्ण युवास्थिायुक्त पुरुष (पतीः ) युवावस्थास्थ हृदयों को प्रिय स्त्रियों को (जगम्युः) प्राप्त होकर पूर्ण शतवर्ष वा उससे अधिक आयु को आनन्द से भोगते और पुत्र पौत्रादि से संयुक्त रहते हैं पैसे स्त्री पुरुष सदा वतै जैसे (पूर्वीः ) पूर्व वर्त्तमान (शरदः) शरद ऋतुओं और (जरयन्तीः) वृद्धावस्थाको प्राप्त कराने वाली ( उषसः ) प्रातःकाल की येलाओं को ( दोषा) रात्री और (वस्तोः) दिन (तनूनाम् ) शरीरों की (श्रियम् ) शोभा को (जरिमा) अतिशय वृद्धपन वल और शोभा को दूर कर देता है वैसे (अहम् ) मैं स्त्री वा पुरुष (उ) अच्छे प्रकार (अपि ) निश्चय करके ब्रह्मचर्य से विद्या शिक्षा शरीर और आत्मा के बल और युवावस्था को प्राप्त हो ही के विवाह करूं इससे विरुद्ध करना घेदविरुद्ध नाहोने से सुखदायक विवाह कभी नही होता ॥३॥ जवतक इसी प्रकार सब ऋपि मुनि राजा महाराजा आर्य लोग ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ ही के स्वयंवर विवाह करते थे तबतक इस देश की सदा उन्नति होती थी। जब से यह ब्रह्मचर्य से विद्या का न पढ़ना, बाल्यावस्था में पराधीन अर्थात् माता पिता के श्राधीन विवाह होने लगा तब से क्रमशः आर्यावर्त देश की हानि होती चली आई है। इससे इस दुष्ट काम को छोड़ के सज्जन लोग पूर्वोक्त प्रकार से स्वयंवर विवाह किया करें । सो विवाह वर्णानुक्रम से करें और वर्णव्यवस्था भी गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार होनी चाहिये । (प्रश्न) क्या जिसके माता पिता ब्राह्मण हों वह ब्राह्मणी ब्राह्मण होता है और जिसके माता पिता अन्य वर्णस्थ हों उनका सन्तान कभी ब्राह्मण हो सकता है ? (उत्तर) हां बहुत से होगये, होते हैं और होंगे भी जैसे छान्दोग्य उपनिषद् में जावाल ऋषि अज्ञात- कुल, महाभारत मे विश्वामित्र क्षत्रिय वर्ण और मातङ्ग ऋषि चांडाल कुल से ब्राह्मण होगये थे, अब भी जो उत्तम विद्या स्वभाववाला है वही ब्राह्मण के योग्य और मूर्ख शूद्र के योग्य होता है और वैसा यहीं आगे भी होगा। (प्रश्न) भला जो रज वीर्य से शरीर हुआ है वह बदल कर दूसरे वर्ष के योग्य कैसे हो सकता है ? (उत्तर) रज वीर्य के योग से ब्राह्मण-शरीर नहीं होता किन्तुः- स्वाध्यायेन जपैहोमस्त्रविद्येनेज्यया सुतैः। महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः॥ मनु० [२।२८] इसका अर्थ पूर्व कर आये हैं अब यहां भी संक्षेप से कहते हैं ( स्वाध्यायेन) पढ्ने पढ़ाने जपैः) विचार करने कराने, नानाविध होम के अनुष्ठान, सम्पूर्ण वेदो को शब्द, अर्थ, सम्बन्ध, स्व- रोच्चारणसहित पढ़ने पढ़ाने (इज्यया) पौर्णमासी इष्टि प्रादि के करने, (सुतैः) पूर्वोक्त विधिपूर्वक धर्म से सन्तानोत्पत्ति (महायज्ञैश्च) पूर्वोक्त ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेवयश और अतिथियश (यज्ञैश्च) अग्नि- दोमादियश, विद्वानो का संग, सत्कार, सत्यभापण, परोपकारादि सत्यकर्म और सम्पूर्ण शिल्पविद्यादि पढ़ के दुष्टाचार छोड़ श्रेष्ठाचार में वर्त्तने से (इयम् ) यह (तनुः) शरीर ( ब्राह्मी) ब्राह्मण का क्रियते ) किया जाता है । क्या इस श्लोक को तुम नहीं मानते ? मानते हैं, फिर क्यों रज वीर्य के रोग से वर्णव्यवस्था मानते हो ? मैं अकेला नहीं मानता किन्तु बहुतसे लोग परम्परा से ऐसा ही गगनते हैं (प्रश्न) क्या तुम परम्परा का भी खण्डन करोगे? (उत्तर) नहीं परन्तु तुम्हारी उलटी समझ को नहीं मान के खण्डन भी करते हैं (प्रश्न ) हमारी उलटी और तुम्हारी सूधी समझ है इसमें क्या ग्माण ? ( उत्तर ) यही प्रमाण है कि जो तुम पांच सात पीढ़ियों के वर्तमान को सनातन व्यवहार गनते हो और हम वेद तथा सृष्टि के प्रारम्भ से आजपर्यन्त की परम्परा मानते हैं देखो जिसका पिता रेष्ठ वह पुत्र दुष्ट और जिसका पुत्र श्रेष्ठ वह पिता दुष्ट तथा कहीं दोनों श्रेष्ठ या दुष्ट देखने में भाते इसलिये तुम लोग भ्रम में पड़े हो देखो मनु महाराज ने क्या कहा है:- श हा . वात व एकम सहार स्था धन सत्यार्थप्रकाश ? येनास्य पितरो याता येन याता पितामहाः । तेन यायात्सतां मार्ग तेन गच्छन्न रिष्यते ॥ मनु० (४ । १७८) जिस मार्ग से इसके पिता, पितामह चले हों उसी मार्ग में सन्तान भी चले परन्तु (सताम्) जो सत्पुरुष पिता पितामह हों उन्हीं के मार्ग में चलें और जो पिता, पितामह दुष्ट हो तो उन के मार्ग में कभी न चलें । क्योंकि उत्तम धर्मात्मा पुरुषों के मार्ग में चलने से दुःख कभी नहीं होता इसको तुम मानते हो वा नही ? हां २ मानते हैं। और देखो जो परमेश्वर की प्रकाशित वेदोक्त वात है वही सना तन और उसके विरुद्ध है वह सनातन कभी नहीं हो सकती। ऐसा ही सव लोगों को मानना चाहिये वा नहीं ? अवश्य चाहिये। जो ऐसा न माने उससे कहो कि किसी का पिता दरिद्र हो और उस का पुत्र धनाढय होवे तो क्या अपने पिता की दरिद्रावस्था के अभिमान से धन को फेंक देवे ! क्या जिसका पिता अन्धा हो उसका पुत्र भी अपनी आंखो को फोड़ लेवे ! जिसका पिता कुकर्मी हो क्या उसका पुत्र भी कुकर्म ही करे! नही २ किन्तु जो जो पुरुषो के उत्तम कर्म हो उनका सेवन और दुष्ट कर्मों का त्याग कर देना सब को अत्यावश्यक है । जो कोई रज वीर्य के योग से वर्णाश्रम व्यवस्था माने और गुरु कर्मों के योग से न माने तो उससे पूछना चाहिये कि जो कोई अपने वर्ण को छोड़ नीच, अन्त्यज अथवा कश्चीन, मुसलमान हो गया हो उसको भी ब्राह्मण क्यों नहीं मानते ? यहां यही कहोगे कि उसने ब्राह्मण के कर्म छोड़ दिये इसलिये वह ब्राह्मण नही है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो ब्राह्मणादि उत्तम कर्म करते हैं वे ही ब्राहणादि और जो नीच भी उत्तम वर्ण के गुण कर्म स्वभाववाला होवे तो उसको भी उत्तम वर्ण में और जो उत्तम वर्णस्थ होके नीच काम करे तो उसको नीच वर्ण में गिनना अवश्य चाहिये । (प्रश्न) ब्राह्मणोस्य मुखमासीवाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भयाशुद्रो अजायत ॥ यह यजुर्वेद के ३१ वे अध्याय का ११ वां मन्त्र है। इसका यह अर्थ है कि ब्राह्मण ईश्वर के क्षत्रिय बाहू, और शूद्र पगों से उत्पन्न हुआ है इसलिये जैसे मुख न बाहू आदि और वाहू आदि नमुख होते हैं। इसी प्रकार ब्राह्मण न क्षत्रियादि और क्षत्रियादि न ब्राह्मण हो सकते (उत्तर) इस मन्त्र का अर्थ जो तुमने किया वह ठीक नहीं क्योकि यहां पुरुष अर्थात् निराकार व्यापक परमात्मा की अनुवृत्ति है। जब वह निराकार है तो उसके मुखादि अङ्ग नही हो सकते, जो मुखादि अङ्गवाला हो वह अर्थात् ब्यापक नहीं और जो व्यापक नहीं वह सर्वशक्तिमान् जगत् का स्रष्टा, धर्चा, प्रलयकर्त्ता, जीव के पुण्य पापों की जानके व्यवस्था करनेहारा, सर्वज्ञ, अजन्मा, मृत्युरहित आदि विशेषणवाला नहीं है सकता इसलिये इसका यह अर्थ है कि जो (अस्य) पूर्ण व्यापक परमात्मा की सृष्टि में मुख सब में मुख्य उत्तम हो वह (ब्राह्मणः ) ब्राह्मण ( वाहू ) "वाहुर्वै बलं बाहुः वीर्यम्" शतपथब्राह्मए' बल वीर्य का नाम याहु है वह जिसमे अधिक हो सो ( राजन्यः ) क्षत्रिय (ऊरू) कटि के अधोभा और जानु के उपरिस्थ भाग का ऊरू नाम है जो सव पदार्थों और सब देशो में ऊरू के वल से जा भावे प्रवेश करे वह (वैश्यः ) वैश्य और ( पद्भ्याम् ) जो पग के अर्थात् नीचे श्रङ्ग सदृश मूर्खत्वात गुण वाला हो वह शूद्र है । अन्यत्र शतपथ ब्राह्मणादि में भी इस मंत्र का ऐसा ही अर्थ किया है जैसे यस्मादेते मुख्यास्तस्मान्मुखतो ह्यसृज्यन्त इत्यादि । जिससे ये मुख्य हैं इससे मुख उत्पन्न हुए ऐसा कथन संगत होता है अर्थात् जैसा मुख अङ्गों में श्रेष्ठ है वैसे पूर्ण विद्या और उत्तम गुण कर्म स्वभाव से युक्त होने से मनुष्यजाति उत्तम ब्रा कहाता है । जब परमेश्वर के निराकार होने से मुखादि अङ्ग ही नहीं हैं तो मुख श्रादि से उत्पन्न मुस, वैश्य ऊरू . के सहा के से -- चतुर्थसमुल्लासः असम्भव है। जैसा कि वन्ध्या स्त्री के पुत्र का विवाह होना! और जो मुखादि अङ्गों से ब्राह्मणादि उत्पन्न होते तो उपादान कारण के सदृश ब्राह्मणादि की आकृति अवश्य होती। जैसे मुख का आकार गोलमाल है वैसे ही उनके शरीर का भी गोलमाल मुखाकृति के समान होना चाहिये । क्षत्रियो के शरीर भुजा के सदृश, वैश्यो के ऊरू के तुल्य और शूद्रों के शरीर पग के समान आकार वाले होने चाहिये ऐसा नहीं होता और जो कोई तुमसे प्रश्न करेगा कि जो २ मुखादि से उत्पन्न हुए थे उनकी ब्राह्मणादि संज्ञा हो परन्तु तुम्हारी नहीं क्योकि जैसे और सब लोग गर्भाशय से उत्पन्न होते हैं वैसे तुम भी होते हो। तुम मुखादि से उत्पन्न न होकर ब्राह्मणादि [संज्ञा का] अभिमान करते हो इसलिये तुम्हारा कहा अर्थ व्यर्थ है और जो हमने अर्थ किया है वह सच्चा है। ऐसा ही अन्यत्र भी कहा है जैसाः- शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् । क्षत्रियाज्जातमेवन्तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥ मनु० [१० । ६५] जो शूद्रकुल में उत्पन्न होके ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के समान गुण कर्म स्वभाव वाला हो तो वह शूद्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होजाय, वैसे ही जो ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यकुल मे उत्पन्न हुआ हो और उसके गुण कर्म स्वभाव शूद्र के सदृश हों तो वह शूद्र होजाय, वैसे क्षत्रिय वा वैश्य के कुल मे उत्पन्न होके ब्राह्मण ब्राह्मणी वा शूद्र के समान होने से ब्राह्मण और शूद्र भी होजाता है। अर्थात् चारो वर्णों मे जिस २ वर्ण के सदृश जो २ पुरुप वा स्त्री हो वह २ उसी वर्ण में गिनी जावे। धर्मचर्यया जघन्यो वर्णः पूर्वं पूर्व वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ ॥ १॥ अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णो जघन्यं जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ ॥२॥ ये आपस्तम्ब के सूत्र हैं। अर्थः-धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने से उत्तम २ वर्गों को प्राप्त होता है और वह उसी वर्ण में गिना जावे कि जिसं २ के योग्य होवे ॥१॥ वैसे अधर्माचरण से पूर्व २ अर्थात् उत्तम २ वर्णवाला मनुष्य अपने से नीचे वाले वर्गों को प्राप्त होता है और उसी वर्ण में गिना जावे ॥२॥ जैसे पुरुष जिस जिस वर्ण के योग्य होता है वैसे ही स्त्रियों की भी व्यवस्था समझनी चाहिये । इससे क्या सिद्ध हुआ कि इस प्रकार होने से सव वर्ण अपने २ गुण कर्म स्वभावयुक्त होकर शुद्धता के साथ रहते हैं अर्थात् ब्राह्मणकुल मे कोई क्षत्रिय वैश्य और शूद्र के सदृश न रहे और क्षत्रिय वैश्य तथा शूद्र वर्ण भी शुद्ध रहते हैं अर्थात् वर्णसंकरता प्राप्त न होगी। इससे किसी वर्ण की निन्दा वा अयोग्यता भी न होगी। (प्रश्न) जो किसी के एक ही पुत्र वा पुत्री हो यह दूसरे वर्ण में प्रविष्ट होजाय तो उसके मा वाप की सेवा कौन करेगा और वंशच्छेदन भी हो जायगा । इसकी क्या व्यवस्था होनी चाहिये ? (उत्तर) न किसी की सेवा का भङ्ग और न वंशच्छेदन होगा क्योंकि उनको अपने लड़के लड़कियों के बदले स्ववर्ण के योग्य दूसरे सन्तान विद्यासभा और राजसभा की व्यवस्था से मिलेगे, इसलिये कुछ भी अव्यवस्था न होगी। यह गुण कर्मो से वर्णों की व्यवस्था कन्याओं की सोलहवे वर्प और पुरुषों की पञ्चीसवे वर्ष की परीक्षा मे नियत करनी चाहिये और इसी क्रम से अर्थात् ब्राह्मण वर्ण का ब्राह्मणी, क्षत्रिय वर्ण का क्षत्रिया, वैश्य वर्ण का वैश्या, शूद्र वर्ण का शूद्रा के साथ विवाह होना चाहिये तभी अपने २ वर्गों के कर्म और परस्पर प्रीति भी यथायोग्य रहेगी। इन चारों वर्णों के कर्त्तव्य कर्म और गुण ये हैं:- अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रतिग्रहश्चैव ब्राह्मण ना मनु० [१ --- -- ५६ सत्यार्थप्रकाशः शमो दमस्तपः शौचं चान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ २॥ भ० गी० [अध्याय १८ । श्लोक ४२] ब्राह्मण के पढ़ना, पढ़ाना, यक्ष करना, कराना, दान देना, लेना, ये छः कर्म हैं परन्तु "प्रतिग्रह प्रत्यवरः" मनु० । अर्थात् (प्रतिग्रह) लेना नीच कर्म है ॥ १ ॥ (शमः ) मन से बुरे काम की इस भी न करनी और उसको अधर्म में कभी प्रवृत्त न होने देना (दमः ) श्रोत्र और चनु आदि इन्द्रि को अन्यायाचरण से रोक कर धर्म में चलाना (तपः) सदा ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होके धर्मानुसार करना (शौच)- अद्विर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति । विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिानेन शुध्यति ॥ मनु० [५। १०६] जल से याहर के श्रा, सत्याचार से मन, सत्याचार से मन, विद्या और धर्मानुष्ठान से जीवात्मा और शान बुद्धि पवित्र होती है। भीतर रागद्वेषादि दोप और बाहर के मलों को दूर कर शुद्ध रहना अर्थात् सत्या सत्य के विवेकपूर्वक सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग से निश्चय पवित्र होता है। (शान्ति अर्थात् निन्दा स्तुति सुख दुःख शीतोष्ण क्षुधा तृपा हानि लाभ मानापमान श्रादि हर्प शोक छोड़ के धर्म मे दृढ़ निश्चय रहना (आर्जव ) कोमलता निरभिमान सरलता सरलस्वभाव रखना कुटिलतादि दोष छोड़ देना (ज्ञान) सब वेदादि शास्त्रों को साङ्गोपाङ्ग पढ़के पढ़ाने का सामर्थ्य विवेक सत्य च निर्णय जो वस्तु जैसा हो अर्थात् जड़ को जड़ चेतन को चेतन जानना और मानना (विज्ञान ) पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों को विशेषता से जानकर उनसे यथायोग्य उपयोग लेना (आस्तिक्य) कभी वेद, ईश्वर, मुक्ति, पूर्व परजन्म, धर्म, विद्या, सत्सङ्ग, माता, पिता, प्राचार्य और अतिथियों की सेवा को न छोड़ना और निन्दा कभी न करना ॥ २॥ ये पन्द्रह कर्म और गुण ब्राह्मण वर्णस्थ मनुष्यों में अवश्य होने चाहिये ॥ क्षत्रिय- प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च । विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः । [मनु० ११८६] शौर्य तेजो धृतिर्दाच्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ २ ॥ भ० गी० [अध्याय १८ । श्लोक ४३] न्याय से प्रजा की रक्षा अर्थात् पक्षपात छोड़ के श्रेष्ठों का सत्कार और दुष्टों का तिरस्कार करना सब प्रकार से सब का पालन (दान) विद्या धर्म की प्रवृत्ति और सुपात्रों की सेवा में धनादि पदार्थों का व्यय करना (इज्या) अग्निहोत्रादि यश करना वा कराना (अध्ययन) वेदादि शास्त्रों का पढ़ना तथा पढ़वाना और (विषयेपु०) विषयों में न फँस कर जितेन्द्रिय रह के सदा शरीर और आत्मा से बलवान रहना ॥ १॥ (शौर्य्य) सैकड़ों सहस्रों से भी युद्ध करने मे अकेला भय न होना ( तेज. सदा तेजस्वी अर्थात् दीनतारहित प्रगल्भ दृढ़ रहना (धृति) धैर्यवान होना ( दाक्ष्य ) राजा और प्रजासम्बन्धी व्यवहार और सव शास्त्रों में अति चतुर होना (युद्धे) युद्ध में भी दृढ़ निशंक रहो उससे कभी न हटना न भागना अर्थात् इस प्रकार से लड़ना कि जिससे निश्चित विजय होवे आप जो भागने से या शत्रुओं को धोखा देने से जीत होती हो तो ऐसा ही करना (दान) दानशीलता रखना ( ईश्वरभाव ) पक्षपातरहित होके सब के साथ यथायोग्य वर्तना, विचार के देना, प्रतिज्ञा पूरी काना उसको कभी भङ्ग होने न देना। ये ग्यारह क्षत्रिय वर्ण के कर्म और गुण हैं ॥ २॥ वैश्यः- पशूनां रक्षणं दानमिन्याध्ययनमेव च । वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च । मनु० [१।३०] बरे चतुर्थसमुल्लासः ५७ (पशुरक्षा) गाय अादि पशुओं का पालन वर्द्धन करना (दान) विद्या धर्म की वृद्धि करने कराने के लिये धनादि का व्यय करना ( इज्या) अग्निहोत्रादि यज्ञों का करना (अध्ययन) वेदादि शास्त्रों का पढ़ना (वणिक्पथ ) सब प्रकार के व्यापार करना (कुसीद ) एक सैकड़े में चार , छः, पाठ, वारह, सोलह वा बीस ानों से अधिक व्याज और मूल से दूना अर्थात् एक रुपया दिया हो तो सौ वर्ष में भी दो रुपये से अधिक न लेना और देना (कृषि ) खेती करना, ये वैश्य के गुण कर्म . हैं। शुद्रः- ॥ एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ मनु० [१।६१] शूद्र को योग्य है कि निन्दा, ईर्ष्या, अभिमान आदि दोषों को छोड़ के ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा यथावत् करना और उसी से अपना जीवन करना यही एक शूद्र का गुण, कर्म है ॥ ये संक्षेप से वर्णों के गुण और कर्म लिखे । जिस २ पुरुष जिस २ वर्ण के गुण कर्म हों उस २ वर्ण का अधिकार देना । ऐसी व्यवस्था रखने से सव मनुष्य उन्नतिशील होते हैं। क्योंकि उत्तम वर्णों को भय होगा कि जो हमारे सन्तान मूर्खत्वादि दोषयुक्त होंगे तो शूद्र होजायेंगे और सन्तान भी डरते रहेंगे कि जो हम उक्त चाल चलन और विद्यायुक्त न होंगे तो शूद्र होना पड़ेगा । और नीच वर्णों को उत्तम वर्णस्थ होने के लिये उत्साह बढ़ेगा। विद्या और धर्म के प्रचार का अधिकार ब्राह्मण को देना क्योंकि वे पूर्ण विद्यावान् और धार्मिक होने से उस काम को यथायोग्य कर सकते हैं। क्षत्रियों को राज्य के अधिकार देने से कभी राज्य की हानि वा विघ्न नहीं होता। पशुपालनादि का अधिकार वैश्यों ही को होना योग्य है क्योंकि वे इस काम को अच्छे प्रकार कर सकते हैं। शूद्र को सेवा का अधिकार इस- लिये है कि वह विद्यारहित मूर्ख होने से विज्ञानसम्बन्धी काम कुछ भी नहीं कर सकता किन्तु शरीर के काम सव कर सकता है । इस प्रकार वर्णो को अपने अपने अधिकार में प्रवृत्त करना राजा श्रादि का काम है॥ विवाह के लक्षण ब्राझो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथाऽसुरः । गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ मनु० [६ । २१] विवाह आठ प्रकार का होता है एक ब्राह्म, दूसरा देव, तीसरा आर्प, चौथा प्राजापत्य, पांचवां श्रासुर, छठा गान्धर्व, सातवां राक्षस, आठवां पैशाच । इन में से विवाहों की यह व्यवस्था है कि-वर कन्या दोनों यथावत् ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्वान् धार्मिक और सुशील हो उनका परस्पर प्रसन्नता से विवाह होना "ब्राह्म" कहाता है । विस्तृत यज्ञ करने मे ऋत्विक् कर्म करते हुए जामाता को अलङ्कारयुक्त कन्या का देना "दैव" । वर से कुछ लेकर विवाह होना "आप"। दोनों का विवाह धर्म की वृद्धि के अर्थ होना “प्राजापत्य" । वर और कन्या को कुछ देके विवाह होना "प्रासुर"। अनियम, असमय किसी कारण से दोनों की इच्छापूर्वक वर कन्या का परस्पर संयोग होना "गान्धर्व' । लड़ाई करके बलात्कार अर्थात् छीन झपट वा कपट से कन्या का ग्रहण करना "राक्षस"। शयन वा मद्यादि पी हुई पागल 'कन्या से बलात्कार संयोग करना "पैशाच" । इन सब विवाहों में ब्राह्मविवाह सर्वोत्कृष्ट, दैव और प्राजा- पत्य मध्यम, प्रार्प, पासुर और गान्धर्व निकृष्ट, राक्षस अधम और पैशाच महाभ्रष्ट है। इसलिये यही । निश्चय रसना चाहिये कि कन्या और वर का विवाह के पूर्व एकान्त में मेल न होना चाहिये क्योंकि युवावस्था में स्त्री पुरुष का एकान्तवास दूपणकारक है । परन्तु जब कन्या या वर के विवाह का समय हो अर्थात् जब एक वर्ष वा छः महीने ब्रह्मचर्याश्रम और विद्या पूरी होने में शेष रहे तव उन कन्या -- । -- - ।

५८ सत्यार्थप्रकाशः वर और कुमारों का प्रतिविम्व अर्थात् जिसको “फोटोग्राफ" कहते हैं अथवा प्रतिकृति उतार के कन्या की अध्यापिकाओं के पास कुमारों की, कुमारों के अध्यापकों के पास कन्याओं की प्रतिकृति भेज दें जिस २ का रूप मिल जाय उस २ के इतिहास अर्थात् जो जन्म से लेके उस दिन पर्यन्त जन्मचरिः का पुस्तक हो उनको अध्यापक लोग मंगवा के देखें जब दोनों के गुण कर्म स्वभाव सदृश हो त जिस २ के साथ जिस २ का विवाह होना योग्य समझे उस २ पुरुप और कन्या का प्रतिविम्व औ इतिहास कन्या और के हाथ में देवें और कहें कि इस में जो तुम्हारा अभिप्राय हो सो हमको विदि कर देना । जव उन दोनो का निश्चय परस्पर विवाह करने का होजाय तव उन दोनों का समावर्त्तन एक समय मे होवे । जो वे दोनो अध्यापकों के सामने विवाह करना चाहें तो वहां, नहीं तो कन्या के माता पित के घर में विवाह होना योग्य है। जब वे समक्ष हों तव उन अध्यापकों वा कन्या के माता पिता श्रा भद्रपुरुषों के सामने उन दोनों की आपस में बात चीत, शास्त्रार्थ कराना और जो कुछ गुप्त व्यवह पूछे सो भी सभा मे लिखके एक दूसरे के हाथ में देकर प्रश्नोत्तर कर लेवे । जब दोनों का दृढ़ प्रे विवाह करने में होजाय तव से उनके खानपान का उत्तम प्रवन्ध होना चाहिये कि जिससे उनका शरी जो पूर्व ब्रह्मचर्य और विद्याध्ययनरूप तपश्चर्या और कष्ट से दुर्वल होता है वह चन्द्रमा की कला समान वढ़ के थोड़े ही दिनो में पुष्ट होजाय । पश्चात् जिस दिन कन्या रजस्वला होकर जव शुद्ध । तव वेदी और मण्डप रचके अनेक सुगन्धादि द्रव्य और घृतादि का होम तथा अनेक विद्वान् पुरु और स्त्रियों का यथायोग्य सत्कार करें । पश्चात् जिस दिन ऋतुदान देना योग्य समझे उसी दिन " स्कारविधि" पुस्तकस्थ विवि के अनुसार सब कर्म करके मध्य रात्रि वा दश वजे अति प्रसन्नता सब के सामने पाणिग्रहणपूर्वक विवाह की विधि को पूरा करके एकान्तसेवन करें। पुरुष वीर्यस्थाप और स्त्री वीर्याकर्षण की जो विधि है उसके अनुसार दोनो करें । जहांतक वने वहांतक ब्रह्मचर्य के वीर को व्यर्थ न जाने दें क्योकि उस वीर्य का रज से जो शरीर उत्पन्न होता है वह अपूर्व उत्तम सन्तान होता है। जब वीर्य का गर्भाशय में गिरने का समय हो उस समय स्त्री पुरुष दोनों स्थिर और नासिक के सामने नासिका, नेत्र के सामने नेत्र अर्थात् सूधा शरीर और अत्यन्त प्रसन्नचित्त रहे, डिगें नहीं पुरुष अपने शरीर को ढीला छोड़े और स्त्री वीर्य्यप्राप्ति समय अपान वायु को ऊपर खीचे । योनि के ऊपर संकोच कर वीर्य का ऊपर आकर्पण कर के गर्भाशय मे स्थिति करे * । पश्चात् दोनों शुद्ध जल से स्नान करें । गर्भस्थिति होने का परिज्ञान विदुषी स्त्री को तो उसी समय होजाता है परन्तु इसका निश्चय एक मास के पश्चात् रजस्वला न होने पर सब को हो जाता है। सोंठ, केसर, असगन्ध सफेद इलायची और सालममिश्री डाल गर्म कर रक्खा हुआ जो ठण्डा दूध है उसको यथारुचि दोने पीके अलग अलग अपनी २शच्या मे शयन करें। यही विधि जव २गर्भाधान किया करें तव २ करना उचित है जब महीने भर में रजस्वला न होने से गर्भस्थिति का निश्चय होजाय तव से एक वर्ष पर्यन्त स्त्री पुरुष का समागम कभी न होना चाहिये । क्योकि ऐसा होने से सन्तान उत्तम और पुनः दूसरा सन्तान भी वैसा ही होता है। अन्यथा वीर्य व्यर्थ जाता दोनो की आयु घट जाती और अनेक प्रकार के रोग होते हैं परन्तु ऊपर से भापणादि प्रेमयुक्त व्यवहार अवश्य रखना चाहिये । पुरुष वीर्य की स्थिति और स्त्री गर्भ की रक्षा और भोजन छादन इस प्रकार का करे कि जिससे पुरुष का वीर्य स्वप्न में भी नष्ट न हो और गर्भ में वालक काशरीर अत्युत्तम रूप, लावण्य, पुष्टि, वल, पराक्रमयुक्त होकर दशवें महीने में जन्म होवे । विशेष उसकी रक्षा चौथे महीने से और अतिविशेष आठवें महीने से आगे करनी चा * यह बात रहस्य की है इसलिये इतने ही से समग्र बातें समझ लेना चाहिये विशेष लिखना उचित नहीं।

-- 7" -- -- द्वार और सन्तान वतुर्थसमुहास: हिये। कभी गर्भवती स्त्री रेचक, रूक्ष, मादकद्रव्य, बुद्धि और बननाशक पदार्थों के भोजनादि का । सेवन न करे किन्तु घी, दूध, उत्तम चावल, गेहूं, मूंग, उर्द आदि अन्न पान और देश काल का भी सेवन युक्तिपूर्वक करे । गर्भ में दो संस्कार एक चौथे महीने में पुंसवन और दूसरा आठवें महीने में सीमन्तो- भयन विधि के अनुकूल करे । जव सन्तान का जन्म हो तब स्त्री और लड़के के शरीर की रक्षा बहुत । सावधानी से करे अर्थात् शुण्ठीपाक अथवा सौभाग्य शुण्ठीपाक प्रथम ही बनवा रक्खे उस समय । सुगन्धियुक्त उष्ण जल जो कि किञ्चित् उष्ण रहा हो उसी से स्त्री स्नान करे और बालक को भी स्नान करावे । तत्पश्चात् नाड़ीछेदन वालक की नाभि के जड़ में एक कोमल सूत से वांध चार अंगुल • छोड़ के ऊपर से काट डाले । उसको ऐसा बांधे कि जिससे शरीर से रुधिर का एक विन्दु भी न जाने पावे । पश्चात् उस स्थान को शुद्ध करके उसके के भीतर सुगन्धादियुक्त घृतादि का होम करे । तत्पश्चात् सन्तान के कान में पिता "वेदोसीति' अर्थात् 'तेरा नाम वेद है' सुनाकर धी और सहत को लेके सोने की शलाका से जीभ पर "ओ३म्' अक्षर लिखकर मधु और घृत को उसी शलाका से चटवावे । पश्चात् उसकीमाताको देदेवे।जो दूध पीना चाहे तो उसकी माता पिलावे, जो उसकी माता के दूध न हो तोकिसी स्त्री की परीक्षा करके उसका दूध पिलावे । पश्चात् दूसरी शुद्ध कोठरीवा कमरे में कि जहां का वायु शुद्ध हो उसमें सुगन्धित घी का होम प्रातः और सायंकाल किया करे और उसी में प्रसूता स्त्री तथा वालक को रक्खे । छः दिन तक माता का दूध पिये और स्त्री भी अपने शरीर की पुष्टि के अर्थ अनेक प्रकार के उत्तम भोजन करे और योनिसंकोचादि भी करे । छठे दिन स्त्री बाहर निकले के दूध पीने के लिये कोई धायी रक्खे । उसको खान पान अच्छा करावे । वह सन्तान को दूध पिलाया करे और पालन भी करे परन्तु उसकी माता लड़के पर पूर्णदृष्टि रक्खे किसी प्रकार का अनुचित व्यवहार उसके पालन में न हो । स्त्री दूध वन्द करने के अर्थ स्तन के अग्रभाग पर ऐसा लेप करे कि जिससे दूध नवित न हो। उसी प्रकार का खान पान का व्यवहार भी यथायोग्य रक्खे । पश्चात् नामकरणादि संस्कार संस्कारविधि' की रीति से यथाकाल करता जाय । जब स्त्री फिर रजखला हो तव शुद्ध होने के पश्चात् उसी प्रकार ऋतुदान देवे ॥ ऋतुकालाभिगामी स्यात्स्वदारनिरतः सदा । ब्रह्मचार्येव. भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥ मनु० [३। ५०] जो अपनी ही स्त्री से प्रसन्न और ऋतुगामी होता है वह गृहस्थ भी ब्रह्मचारी के सदृश है। सन्तुष्टो भार्यया भा भर्ना भार्या तथैव च। यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥ १॥ यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसन्न प्रमोदयेत् । अप्रमोदात्पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्त्तते ॥२॥ स्त्रियां तु रोचमानायां सर्व तद्रोचते कुलम् । तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते ॥३॥ मनु० [३।६०-६२] जिस कुत में भार्या से भी और पति से पनी अच्छे प्रकार प्रसन्न रहती ई उसी कुल में सब सौभाग्य और ऐश्वर्य जिवास करते हैं । जहां कलह होता है वहां मन्य और दारिद्रय स्थिर होता है॥१॥ जो स्त्री पति से प्रीति और पति को प्रसन्न नहीं करना ना बाद के अग्रसन्न होने से काम उत्पन्न नहीं होता ॥ २॥ जिस स्त्री की प्रसन्नता में सब कुन पन्न होता उसकी अप्रसरता सब अप्रसस अर्थात् दु.खदायक होजाता है ।। ३ ॥ + " . सत्यार्थप्रकाश पेभितृमिचैताः पतिभिर्देवरैस्तथा । पूज्या भूपयितव्याच वहुकल्याणमीप्सुमिः ॥ १॥ त्रि नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राऽफलाः क्रियाः॥२॥ गोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् । न शोचन्ति तु यत्रैता बर्द्धते तद्धि सर्वदा ॥३॥ स्मिादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छौदनाशनैः । भूतिकामैनर्नित्यं सत्कारेपूत्सवेषु च ॥ ४ ॥ मनु० [३ । ५५-५७ । ५8 ] पिता, भाई, पति और देवर इनको सत्कारपूर्वक भूपणादि से प्रसन्न रक्खें, जिनको बहुत कल्याण की इच्छा हो वे ऐसे करें ॥१॥ जिस घर ॥ जिस घर में स्त्रियो का सत्कार होता है उसमें विद्यायुक्त पुरुप के देवसंज्ञा धरा के अानन्द से क्रीड़ा करते हैं और जिस घर में स्त्रियों का सत्कार नहीं होता वहां व क्रिया निष्फल होजाती हैं ॥ २॥ जिस घर वा कुल में स्त्री लोग शोकातुर होकर दुःख पाती हैं ह कुल शीघ्र नष्ट भ्रष्ट होता है और जिस घर वा कुल में स्त्री लोग शानन्द से उत्साह और प्रस- बता से भरी हुई रहती हैं वह कुल सर्वदा वढ़ता रहता है ॥ ३ ॥ इसलिये ऐश्वर्य की कामना करनेहारे मनुष्यों को योग्य है कि सत्कार और उत्सव के समयों में भूपण वस्त्र और भोजनादि से स्त्रियों का नेत्य प्रति सत्कार करें ॥ ४ ॥ यह बात सदा ध्यान में रखनी चाहिये कि "पूजा" शब्द का अर्थ सत्कार है और दिन रात में जब २ प्रथम मिले वा पृथक् हो तव २ प्रीतिपूर्वक "नमस्ते" एक दूसरे से करें ॥ सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया । सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया ॥ [मनु० ५। १५०] स्त्री को योग्य है कि अतिप्रसन्नता से घर के कामों में चतुराईयुक्त सव पदार्थों के उत्तम संस्कार तथा घर की- शुद्धि रक्खे और व्यय मे अत्यन्त उदार [न] रहै अर्थात् [ यथायोग्य खर्च करे और ] सब चीजें पवित्र और पाक इस प्रकार वनावे जो ओपधिरूप होकर शरीर वा आत्मा में रोग को न आने देवे, जो जो व्यय हो उस का हिसाव यथावत् रखके पति आदि को सुना दिया करे घर के मौकर चाकरों से यथायोग्य काम लेवे घर के किसी काम को बिगड़ने न देवे ॥ स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या सत्यं शौचं सुभाषितम् । विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥ मनु० [२। २४०] उत्तम स्त्री, नाना प्रकार के रत्न, विद्या, सत्य, पवित्रता, श्रेष्ठभापण और नाना प्रकार की शिल्पविद्या अर्थात् कारीगरी सव देश तथा सव मनुष्यों से ग्रहण करे । सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न चूयात् सत्यमग्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥१॥ भद्रं भद्रमिति ब्रूयाद्भद्रमित्येव वा वदेत् । शुष्कवैरं विवादं च न कुर्यात्केनचित्सह ॥ २ ॥ मनु० [४ । १३८ । १३६] सदा प्रिय सत्य दूसरे का हितकारक बोले अप्रिय सत्य अर्थात् काणे को काणा न वोले, अनृत अर्थात् झूठ दूसरे को प्रसन्न करने के अर्थ न बोले ॥१॥ सदा भद्र अर्थात् सव के हितकारी वचन बोला करे शुष्कवैर अर्थात् विना अपराध किसी के साथ विरोध वा विवाद न करे । जो २ दूसरे का हितकारक हो और वुरा भी माने तथापि कहे विना न रहे ॥२॥ पुरुषा वहवो राजन् अवतं प्रियवादिनः । अप्रियस्य तु पभ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥ उद्योगपर्व-विदुरनीति० ॥

चतुर्थसनुलासा- हे धृतराष्ट्र ! इस संसार में दूसरे को निरन्तर प्रसन्न करने के लिये प्रिय बोलने वाले प्रशंसक लोग बहुत हैं परन्तु सुनने में अप्रिय विदित हो और वह कल्याण करनेवाला वचन हो उसका कहने और सुननेवाला पुरुष दुर्लभ है। क्योंकि सत्पुरुषों को योग्य है कि मुख के सामने दूसरे का दोष कहना और अपना दोष सुनना परोक्ष में दूसरे के गुण सदा कहना । और दुष्टों की यही रीति है कि सम्मुख मे गुण कहना और परोक्ष में दोषों का प्रकाश करना । जवतक मनुष्य दूसरे से अपने दोष नहीं कहता तवतक मनुष्य दोषों से छूटकर गुणी नहीं हो सकता। कभी किसी की निन्दा न करे जैसेः- "गुणेपु दोपारापणमसूया" अर्थात् "दोषेषु गुणारोपणमप्यसूया" "गुणेषु गुणारोपणं दोषेषु दोषारोपणं च स्तुतिः" जो गुणों में दोष दोपों में गुण लगाना वह निन्दा और गुणों में गुण दोषों में दोषों का कथन करना स्तुति कहाती है अर्थात् मिथ्याभाषण का नाम निन्दा और सत्यभाषण का नाम स्तुति है । बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च । नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमांश्चैव वैदिकान् ॥१॥ यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति । तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्यं रोचते ॥२॥ मनु० [४ । १६ । २०] जो शीघ्र बुद्धि धन और हित की वृद्धि करनेहारे शास्त्र और वेद हैं उनको नित्य सुनें और सुनावें ब्रह्मचर्याश्रम में पढ़े हों उनको स्त्री पुरुष नित्य विचारा और पढ़ाया करें ॥ १ ॥ क्योंकि जैसे २ मनुष्य शास्त्रों को यथावत् जानता है वैसे २ उस विद्या का विशान बढ़ता जाता और उसी में रुचि बढ़ती रहती है ॥ २॥ ऋपियज्ञं देवयज्ञ भूतयज्ञं च सर्वदा । नृयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत् ॥१॥ मनु० [४ । २१] अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञश्च तर्पणम् । होमो देवो चलिभाँतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥ २ ॥ मनु०.[३। ७०] खाध्यायेनार्चयेदृषीन् होमैर्देवान् यथाविधि । पितॄन् श्राद्धैश्व मृनन्नैर्भूतानि वलिकर्मणा ॥३॥ मनु० [३।८१] दो यज्ञ ब्रह्मचर्य मे लिख आये वे अर्थात् एक वेदादि शास्त्रों का पढ़ना पढ़ाना संध्योपासन मोगाभ्यास, दूसरा देवपश विद्वानों का संग सेवा पवित्रता दिव्य गुणों का धारण दातृत्व विद्या की उन्नति करना है ये दोनों यज्ञ सायं प्रातः करने होते हैं ॥ सायंसायं गृहति! अग्निः प्रातःप्रातः सौमनसस्य॑ दाता ॥ १ ॥ प्रातः प्रांतर्गृहप॑तिर्ने अग्निः सायं सायं सौमनसस्य दाता ॥ २॥ अ० कां० १६ । अनु० ७.। मं०.३ ॥ ४ ॥ तस्मादहोरात्रस्य. संयोगे ब्राह्मणः सन्ध्यामुपासीत । उद्यन्तमस्तं यान्तमादित्यमभिध्यायन् ॥३॥ ब्राह्मणे [ पड्विंशत्राह्मणे प्र० ४ । ख० ५] न तिष्ठति तु यः पूर्वी नोपास्ते यस्तु पश्चिमाम् । संशूद्रवदवहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥४॥ मनु० [२ । १०३] जो सन्ध्या २ काल में होम होता है वह हुत द्रव्य प्रातःकाल तक वायुशुद्धि द्वारा सुखकारी होता है ॥ १॥ जो अग्नि में प्रातः २ काल में होम किया जाता है वह २ हुत द्रव्य सायरल . ६ अवार्थका वायु की शुधि द्वारा यल घुद्धि और भारोग्यकारक होता है ॥ २॥ इसीलिये दिन और रात्रि के सन्धि में अर्थात् सूर्योदय और अस्त समय में परमेश्वर का ध्यान और अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिये ॥३॥ ., और जो ये दोनों काम सायं और प्रातःकाल में न करे उसको सज्जन लोग सव द्विजों के कर्मों से बाहर निकाल देवें अर्थात् उसे शूद्रवत् समझे ॥ ४॥ (प्रश्न) त्रिकाल सन्ध्या क्यों नही करना ?, (उत्तर.).तीन समय में सन्धि नहीं होती प्रकाश और अन्धकार की सन्धि भी सायं प्रातः दो ही वेला - होती है। जो इसकी न मानकर, मध्याह्नकाल में तीसरी सन्ध्या माने वह मध्यरात्रि में भी संध्यो- पासन क्यों न करे? जो मध्यरात्रि में भी करना चाहे तो प्रहर २ घड़ी २ पल २ और क्षण २ की भी सन्धि होती हैं, उनमें भी सन्ध्योपासन किया करे । जो ऐसा भी करना चाहै तो होही नहीं सकता और किसी शास्त्र का मध्याह्नसंध्या में प्रमाण भी नहीं इसलिये दोनों कालों में संध्या और अग्निहोत्र करना समुचित है, तीसरे काल में नही । और जो तीन काल होते हैं वे भूत, भविष्यत् और वर्तमान के भेद से हैं संध्योपासन के भेद से नही। तीसरा "पितृयज्ञ' अर्थात् जिस में देव जो विद्वान् , ऋषि जो पढ़ने पढ़ाने हारे, पितर जो माता पिता आदि वृद्ध ज्ञानी और परम योगियों की सेवा करनी । पितृयज्ञ के दो भेद हैं एक श्राद्ध और दूसरा तर्पण । श्राद्ध अर्थात् "श्रत्" सत्य का नाम है "श्रत्सत्यं दधाति यया क्रियया सा-श्रद्धा श्रद्धया यत् कियते तच्छ्राद्धम्" जिस क्रिया से सत्य का ग्रहण किया जाय उसको श्रद्धा और जो श्रद्धा से कर्म किया जाय उसका नाम श्राद्ध है । और "तृप्यन्ति तर्पयन्ति येन पितॄन् - तत्तर्पणम्" जिस जिस कर्म से तृप्त अर्थात् विद्यमान माता पितादि पितर प्रसन्न हों और प्रसन्न किये-- जायँ उसका नाम तर्पण है, परन्तु यह जीवितों के लिये हैं मृतकों के लिये नही ॥ ओं: ब्रह्मादयो देवास्तृप्यन्ताम् । ब्रह्मादिदेवपल्यस्तृप्यन्ताम् । ब्रह्मादिदेवसुतास्तृप्यन्ताम् । ब्रह्मादिदेवगणास्तृप्यन्ताम् ॥ ' इति देवतर्पणम् "विद्वा सो हि देवाः" यह शतपथ ब्राह्मण का वचन है-जो विद्वान् हैं उन्ही को देव कहते हैं जो साङ्गोपाङ्ग चार वेदों के जानने वाले हों उनका नाम ब्रह्मा और जो उनसे न्यून पढ़े हों उनका भी नाम देव अर्थात् विद्वान् है। उनके सदृश उनकी विदुषी स्त्री ब्राह्मणी देवी और उनके तुल्य पुत्र और शिष्य तथा उनके सदृश उनके गण अर्थात् सेवक हों उनकी सेवा करना है उसका नाम श्राद्ध और तर्पण है॥ अथर्षितर्पणम् ओं मरीच्यादय ऋषयस्तृप्यन्ताम् । मरीच्यावृषिपल्यस्तृप्यन्ताम् । मरीच्यावृषिसुतास्तृप्य- न्ताम् । मरीच्यावृषिगणास्तृप्यन्ताम् ॥ इति ऋषितर्पणम् जो ब्रह्मा के प्रपौत्र मरीचिवत् विद्वान् होकर पढ़ावें और जो उनके सदृश विद्यायुक्त उनकी स्त्रियां कन्याओं को विद्यादान देवें उनके तुल्य पुत्र और शिष्य तथा उनके समान उनके सेवक हों उनका सेवन और सत्कार करना ऋषितर्पण है। अथ पितृतर्पणम् ओं सोमसदः पितरस्तृप्यन्ताम् । अग्निप्वाचाः पितरस्तृप्यन्ताम् । वर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम् । .. -- 3 , . ~ चतुर्थमा सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम् । इविर्भुजः पितरस्तृप्यन्ताम् । श्राज्यपाः पितरस्तृप्यन्ताम् । [ सुका- लिनः पितरस्तृप्यन्ताम् । ] यमादिभ्यो नमः यमादीस्तर्पयामि । पित्रे खधा नमः पितरं तर्पयामि । पितामहाय स्वधा नमः पितामहं तर्पयामि ।' [प्रपितामहाय स्वधा नमः प्रपितामहं तर्पयामि । मात्रे स्वधा नमो मातरं तर्पयामि । पितामझै स्वधा नमः पितामहीं तर्पयामि । [ प्रपितामा स्वधा नमः प्रपितामही तर्पयामि । ] खपल्यै स्वधा नमः स्वपत्नी तर्पयामि । सम्बन्धिभ्यः स्वधा नमा सम्बन्धिनस्तर्पयामि । सगोत्रेभ्यः स्वधा नमः सगोत्रस्तिर्पयामि ॥ इति. पितृतर्पणम् "ये सोमे अगदीश्वरे पदार्थविद्यायां च सीदन्ति ते सोमसदः" जो परमात्मा और पदार्थविद्या में निपुण हों वे सोमसद् । “यैरग्नेविद्युतो विद्या गृहीता ते, अग्निवाचा:" जो अग्नि अर्थात् विठ्ठदादि पदार्थों के जाननेवाले हों वे अग्निष्वात्त । "ये बर्हिषि उत्तमे व्यवहारे सीदन्तिं ते बर्हिषदः" जो उत्तम विद्यावृद्धियुक्त व्यवहार में स्थित ही वे बर्हिषद् । “ये सोममैश्वर्यमोषधीरस वा पान्ति पिबन्ति चा. ते सोमपाः" जो ऐश्वर्य के रक्षक और महौषधि रस का पान करने से रोगरहित और अन्य के ऐश्वर्य के रक्षक औषधों को देकेरोगनाशक हों वे सोमपा। "ये हवि:तुमत्तुमर्ह भुञ्जते भोजयन्ति वा ते हविर्भुजः" शेरे मादक और हिंसाकारक द्रव्यों को छोड़ के भोजन करनेहारे हों वे हविर्भुज । “य भाज्यं छातुं प्राप्तुं या.योग्यं रक्षान्त वा पिवन्ति त आज्यपाः" जो जानने के योग्य वस्तु के रक्षक और घृत दुग्धादि खाने और पीनेहारे हों वे आज्यपाः । “शोभनः कालो विद्यते येषान्ते सुकालिनः" जिनका अच्छा धर्म करने का सुखरूप समय हो वे सुकालिन् । ये दुष्टान् यच्छन्ति निगृह्णन्ति ते यमा न्यायाधीशाः" जो दुरों को दण्ड और श्रेष्ठों का पालन करनेहारे न्यायकारी हों वे यम । “यः पाति सपिता' जो सन्तानों का अन्न और सत्कार से रक्षक वा जनक हो वह पिता । " पितुः पिता पितामहः पितामहस्य पिता प्रपितामह जो पिता का पिता हो वह पितामह और जो पितामह का पिता हो वह प्रपितामह “यो मानयति सा 'माता" जो श्रन और सत्कारों से सन्तानों, का मान्य करे वह माता । "या पितुर्माता सा पितामही पितामहस्य माता प्रपितामही" जो पिता की माता हो वह पितामही और पितामह की माता हो वह प्रपितामही । अपनी स्त्री तथा भगिनी सम्बन्धी और एक गोव के तथा अन्य कोई भंद्र पुरुप वा वृद्ध हों उन सयको अत्यन्त श्रद्धा से उत्तम अन्न, वस्त्र, सुन्दर यान आदि देकर अच्छे प्रकार जो तृप्त करना अर्थात् जिस २ कर्म से उनका श्रात्मा तृप्त और शरीर स्वस्थ रहे उसं २ कर्म से प्रीतिपूर्वक उनकी पेषा करनी वह श्राद्ध और तर्पण कहाता है । चौथा वैश्वदेष-अर्थात् जब भोजन सिद्ध हो तय जो कुछ भोजनार्थ बने उसमें से लवणान और क्षार को छोड़ के धृत मिष्टयुक्त अन्न लेकर चूल्हे से अग्नि अलग धर निम्नलिखित मन्त्रों से पाहुति और भाग करे। वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृहेऽग्नौ विधिपूर्वकम् । माभ्यः कुर्य्यादेवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्यहम् ।। मनु० [३/८४]-. जो कुछ पाकशाला में भोजनार्थ सिद्ध हो उसका दिव्य गुणों के भर्थ उसी 40 बिचित मन्त्रों से विधिपूर्वक होम नित्य करे- - सट्टा ६४ सत्यार्थप्रकाश - में . - होम करने के मन्त्र ओं अग्नये स्वाहा । सोमाय स्वाहा । अग्नीपोमाभ्यां स्वाहा । विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा । धन्वन्तरये स्वाहा । कुबै स्वाहा । अनुमत्यै स्वाहा । प्रजापतये स्वाहा । सह द्यावापृथिवीम्यां स्वाहा । स्विष्टकृते स्वाहा ॥ इम प्रत्येक मन्त्रों से एक २ वार आहुति प्रज्वलित अग्नि में छोड़े पश्चात् थाली अथवा भूमि पत्ता रख के पूर्व दिशादि क्रमानुसार यथाकम इन मन्त्रों से भाग रक्खे:- ओं सानुगायेन्द्राय नमः । सानुगाय यमाय नमः । सानुगाय वरुणाय नमः । सानुगाय सो- माय नमः । मरुद्भ्यो नमः । अद्भ्यो नमः । वनस्पतिभ्यो नमः । श्रियै नमः । मद्रकाल्यै नमः। ब्रह्मपतये नमः । वास्तुपतये नमः । विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः । नक- चारिभ्यो भूतेभ्यो नमः । सर्वात्मभूतये नमः ॥ इन भागों को जो कोई अतिथि हो तो उसको जिमा देवे अथवा अग्नि में छोड़ देवे । इसके अनन्तर लवणान्न अर्थात् दाल, भात, शाक, रोटी आदि लेकर छः भाग भूमि में धरे । इसमे प्रमाण- शुनां च पतितानां च वषचां पापरोगिणाम् । वायसानां कृमीणां च शनकैनिषेद्भुवि ।। मनु० [३।१२] इस प्रकार "श्वभ्यो नमः, पतितेभ्यो नमः, श्वपग्भ्यो नमः, पापरोगिभ्यो नमः, वायसेभ्यो नमः, कमिभ्यो नमः''धरकर पश्चात् किसी दुःखी, बुभुक्षित प्राणी अथवा कुत्ते कौवे आदि को देवे । यहां नम. शब्द का अर्थ अन्न अर्थात् कुत्ते, पापी, चांडाल, पापरोगी, कौवे और कृमि अर्थात् चींटी अादि को अन्न देना यह मनुस्मृति आदि की विधि है । हवन करने का प्रयोजन यह है कि पाकशालास्थ वायु का शुद्ध होना और जो अज्ञात अदृष्ट जीवों की हत्या होती है उसका प्रत्युपकार कर देना ॥ अब पांचवीं अतिथिसेवा--अतिथि उसको कहते हैं कि जिसकी कोई तिथि निश्चित म हो अर्थात् अकस्मात् धार्मिक, सत्योपदेशक, सब के उपकारार्थ सर्वत्र घूमने वाला पूर्णविद्वान्, परमयोगी, सन्यासी गृहस्थ के यहां श्रावे तो उसको प्रथम पाद्य अर्घ और आचमनीय तीन प्रकार का जल पश्चात् आसन पर सत्कारपूर्वक विठाल कर खान पान आदि उत्तमोत्तम पदार्थों से सेवा शुश्रूषा करके उसको प्रसन्न करे । पश्चात् सत्सङ्ग कर उनसे ज्ञान विज्ञान आदि जिनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होवे ऐसे ऐसे उपदेशों का श्रवण करे और अपना चाल चलन भी उनके सकुपदेशानुसार रक्खें। समय पाके गृहस्थ और राजादि भी अतिथिषत् सत्कार करने योग्य हैं परन्तु- पापण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालवृत्तिकान् शठान् । हैतुकान् वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् । मनु० [४ । ३०] (पापण्डी) अर्थात् वेदनिन्दक, वेदविरुद्ध आचरण करनेहारा (विकर्मस्थ) जो घेदविरुद्ध कर्म का कर्त्ता मिथ्याभाषणादि युक्त जैसे विडाला छिप और स्थिर रहकर ताकता २ झपट से भूषे प्रादि प्राणियों को मार अपना पेट भरता है वैसे जनों का नाम वैडालवृत्तिक (शठ ) अर्थात् हठी, दुराग्रही, अभिमानी, आप जानें नहीं औरों का कहा माने नहीं ( हैतुक) कुतर्की व्यर्थ बकनेवाले जैसे कि भाजकल के. वेदान्ती बकते हैं हम ब्रह्म और जगत् मिथ्या है वेदादि शास्त्र और ईश्वर भी कल्पित है इत्यादि गपोड़ो हांकनेवाले (षकवृत्ति ) जैसे पक पक पैर उठा ध्यानावस्थित के समान होकर कर देकर Jion . चतुर्थसमुल्लास १५ मच्छी के प्राण हरके अपना स्वार्थ सिद्ध करता है वैसे आजकल के वैरागी और बाकी आदि हठी दुराग्रही वेदविरोधी हैं ऐसों का सत्कार वाणीमात्र से भी न करना चाहिये । क्योंकि इनका सत्कार करने से ये वृद्धि को पाकर संसार को अधर्मयुक्त करते हैं। श्राप तो अवनति के काम करते ही हैं परन्तु साथ मे सेवक को भी अविद्यारूपी महासागर में दुबो देते हैं। इन पांच महायज्ञों का फल यह कि प्रलयज्ञ के करने से विद्या, शिक्षा, धर्म, सभ्यता आदि शुभ गुणों की वृद्धि । अग्निहोत्र से वायु, पृष्टि, जल की शुद्धि होकर वृष्टि द्वारा संसार को सुख प्राप्त होना अर्थात् शुद्ध वायु का श्वासास्पर्श खान पान से श्रारोग्य, बुद्धि, वल, पराक्रम बढ़ के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का अनुष्ठान पूरा होना इसीलिये इसको देवयज्ञ कहते हैं। पितृयज्ञ से जव माता पिता और ज्ञानी महात्माओं की सेवा करेगा तब उसका शान बढ़ेगा। उससे सत्यासत्य का निर्णय कर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करके सुखी रहेमा । दूसरा कृतज्ञता अर्थात् जैसी सेवा माता पिता और प्राचार्य ने सन्तान और शिष्यों की की है उसका वदला देना उचित ही है। वलिवैश्वदेव का भी फल जो पूर्व कह पाये नही है । जयतक उसम अतिथि जगत् में नहीं होते तबतक उन्नति भी नहीं होती उनके सब देशों में घूमने और सत्यो- पदेश करने से पाखण्ड की वृद्धि नहीं होती और सर्वत्र गृहस्थों को सहज से सत्य विज्ञान की प्राप्ति होती रहती है और मनुष्यमात्र में एक ही धर्म स्थिर रहता है। विना अतिथियों के सन्देहनिवृत्ति नहीं होती सन्देहनिवृत्ति के विना दृढ़ निश्चय भी नहीं होता । निश्चय के विना सुख कहां! ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थो चानुचिन्तयेत् । कार्यक्लेशाँच तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च ॥ मनु० [ ४ । ६२] रात्रि के चौथे प्रहर अथवा चार घड़ी रात से उठे आवश्यक कार्य करके धर्म और अर्थ, शरीर के रोगों का निदान और परमात्मा का ध्यान करे कभी अधर्म का आचरण न करे क्योंकि:- नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिख । शनैरावर्त्तमानस्तु कर्मूिलानि कुन्तति ॥ मनु० [४। १७२] किया हुआ अधर्म निष्फल कभी नहीं होता परन्तु जिस समय अधर्म करता है उसी समय फल भी नहीं होता इसलिये अज्ञानी लोग अधर्म से नहीं डरते तथापि निश्चय जानो कि यह अधर्मा- चरण धीरे धीरे तुम्हारे सुख के मूलों को काटता चला जाता है। इस क्रम ले- अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नाजयति समूलस्तु विनश्यति ॥ मनु० [४।१७४] जय अधर्मात्मा मनुष्य धर्म की मर्यादा छोड़ (जैसे तालाब के धंध को तोड़ जल चारों ओर फैल आता है वैसे ) मिथ्याभापरण, कपट, पाखण्ड अर्थात् रक्षा करनेवाले वेदों का खण्डन और विश्वास- घातादि कर्मों से पराये पदार्थों को लेकर प्रथम बढ़ता है, पश्चात् धनादि ऐश्वर्य से खान, पान, वस्त्र, भाभूपण, यान, स्थान, मान, प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है अन्याय से शत्रुओं को भी जीतता है पश्चात शीम नष्ट हो जाता है जैसे जड़ काटा हुआ वृक्ष नष्ट हो जाता है वैसे अधर्मी नष्ट भ्रष्ट हो जाता है । सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत्सदा । शिष्यांश्च शिष्यार्मेण वाग्वादरसंयतः ॥ मनु० [४ । १७५] जो [ विद्वान् ] वेदोक्त सत्य धर्म अर्थात् पक्षपातरहित होकर सत्य के प्राव और के परित्याग न्यायरूप वेदोक्त धर्मादि भार्य अर्थात् धर्म में चलते हुए के समान धर्म है किता किया करे। .

६६ . ] ३ सत्यार्थप्रकाशः ऋत्विक्पुरोहिताचार्मातुलातिथिसंश्रितैः । बालवृद्धातुद्यैातिसम्बन्धिवान्धवैः ॥ १ मातापितृभ्यां यामीभिर्धात्रा पुत्रेण भार्यया । दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् ॥ मनु० [४ । १७६ । १८० (ऋत्विक् ) यज्ञ का करनेहारा (पुरोहित) सदा उत्तम चाल चलन की शिक्षाक (आचार्य) विद्या पढ़ानेहारा (मातुल ) मामा (अतिथि) अर्थात् जिसकी कोई श्राने जाने निश्चित तिथि न हो (संश्रित ) अपने ओश्रित (चाल) बालक (वृद्ध) बुड्ढा (धातुर) पी - (वैद्य) आयुर्वेद का ज्ञाता (ज्ञाति) स्वगोत्र वा स्ववर्णस्थ ( सम्बन्धी, श्वशुर आदि (वान मित्र ॥ १ ॥ (माता) माता (पिता) पिता ( यामी) वहिन (भ्राता) भाई (भार्या) स्त्री (दुहि पुत्री और सेवक लोगों से विवाद अर्थात् विरुद्ध लड़ाई वखेड़ा कभी न करे ॥२॥ अंतपास्त्वनधीथानः प्रतिग्रहरुचिर्द्विजः। अम्भस्यश्मप्लवेनैव सह तेनैव मजति॥मनु० [४१ एक (अतपाः) ब्रह्मचर्य सत्यभाषणादि तपरहित दूसरा (अनधीयानः ) बिना पढ़ा तीसरा (प्रतिग्रहरुचिः) अत्यन्त धर्मार्थ दूसरों से दान लेनेवाला ये तीनों पत्थर की नौका से स मे तरने के समान अपने दुष्ट कर्मों के साथ ही दुःखसागर में डूबते हैं । वे तो डूबते ही हैं दाताओ को साथ बुवा लेते हैं:- त्रिध्वंप्येतेषु दत्तं हि विधिनाप्पर्जितं धनम् । दातुर्भवत्यनाय परत्रादातुरेव च ।। मनु० [४।१६३] जो धर्म से प्राप्त हुए धन का उक्त तीनों को देना है वह दान दाता का नाश इसी जन्म in लेनेवाले का नाश परजन्म में करता है । जो ऐसे हों तो क्या हो यथा प्लनेनौफ्लेन निमज्जत्युदके तरन् । तथा निमज्जतोऽवस्तादज्ञौ दातृप्रतीच्छकौ ॥ मनु० [४ । १६४] जैसे पत्थर की नौका मे बैठ के जल मे तरनेवाला डूब जाता है वैसे अज्ञानी दाता ग्रहीता दोनो अधोगति अर्थात् दुःख को प्राप्त होते हैं । पाखण्डियों के लक्षण । धर्मध्वजी. सदालुब्धकामिको लोकदम्भकः । वैडालव्रतिको ज्ञेयो हिंस्रः सर्वाभिसन्धकः ॥१॥ अधोदृष्टिकृतिक स्वार्थसाधनतत्परः । शठो मिथ्याविनीतश्च बकवतचरो द्विजः ॥ २॥ मनु० [४ । १६५ । १६६ ] (धर्मध्वजी ) धर्म कुछ भी न करे परन्तु धर्म के नाम से लोगो को ठगे ( सदालुब्धः) "लोभ से युक्त ( छाझिकः ) कंपटी (लोकदम्भकः ) संखारी मनुष्य के सामने अपनी बड़ाई के गपा मारा करे (हिनेः) प्राणियों का घातक अन्य से वैरबुद्धि रखनेवाला (सर्वाभिसन्धकः ) सव ओर वुरों से भी मेल रक्खे उसको वैजालबतिक अर्थात् विडाले के समान धूर्त और नौघ समझो ॥१ (अयोदृष्टिः) कीर्ति के लिये नीचे दृष्टि रक्खे (नैष्कृतिकः ) ईय॑क किसी ने उस का पैसा भर रोध किया हो लो उसका चल्ला प्राण तक लेने को तत्पर रहै (स्वार्थसाधन) चाहैं कपट विश्वासघात क्यों न हो अपमा प्रयोजन साधने में चतुर ( शठः ) चाहैं अपनी बात झूठी क्यों न परन्तु हठ कभी न छोड़े ( मिथ्याविनीतः ) झूठ मूठ ऊपर से शील संतोष और साधुता दिखलावे (0 क - " .

* - चतुर्थलमुलासा ६७ त) बगुले के समान नीच समझो ऐसे २ लक्षणों वाले पाखण्डी होते हैं उनका विश्वास वा भी न करें। वर्म शनैः सच्चिनुयाद् वल्मीकमिव पुत्तिकाः । परलोकसहायार्थ सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ १॥- नामुत्र हि सहायार्थ पिता माता च तिष्ठतः । न पुत्रदारं न ज्ञातिधर्मस्तिष्ठति केबलः ॥२॥ एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते । एकोनुभुक्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम् ॥ ३॥ मनु० [४ । २३८-२४०-] एकः पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजनः । भोक्वारो विप्रमुच्यन्ते का दोपेण लिप्यते ॥४॥ [ महाभारते उद्योगप० प्रजागरप० ॥ अ० ३२] मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ । विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ॥५॥- मनु० [५] २४१] स्त्री और पुरुष को चाहिये कि जैसे पुत्तिका अर्थात् दीमक वल्मीक अर्थात् वांमी को बनाती सब भूतों को पीड़ा न देकर परलोक अर्थात् परजन्म के सुखार्थ धीरे धर्म का संचय करें ॥१॥ परलोक में न माता न पिता न पुत्र न स्त्री न ज्ञाति सहाय कर सकते हैं किन्तु एक धर्म ही क होता है ॥२॥ देखिये अकेला ही जीव जन्म और मरण को प्राप्त होता, एक ही धर्म का फल ख और अधर्म का जो दुःखरूप फल उसको भोगता है ॥ ३ ॥ यह भी समझ लो कि कुटुम्ब में रुप पाप करके पदार्थ लाता है और महाजन अर्थात् सव कुटुम्ब उसको भोगता है भोगनेवाले गी. नहीं होते किन्तु अधर्म का कर्त्ता ही दोष का भागी होता है ॥ ४ ॥ जब कोई किसी का धी मर जाता है उसको मट्टी के ढेले के समान भूमि में छोड़कर पीठ दे बन्धुवर्ग विमुख होकर.. जाते हैं कोई उसके साथ जानेवाला नहीं होता किन्तु एक धर्म ही उसका सङ्गी होता है ॥५॥ तस्माद्धर्म सहायार्थ नित्यं सचिनुयाच्छनैः । धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ॥ १॥ धर्मप्रधान पुरुपं तपसा हतकिल्विपम् । परलोकं नयत्याशु भावन्तं खशरीरिणम् ॥ २॥ मनु० [४ । २४२ । २४३ ]. । उस हेतु से परलोक अर्थात् परजन्म में सुख और जन्म के सहायार्थ नित्य धर्श का सञ्चय २ करता जाय क्योकि धर्म ही के सहाय से बड़े २ दुस्तर दुःखसागर को जीव तर सकता है ॥१॥ जो पुरुप धर्म ही को प्रधान समझता जिसका धर्म के अनुष्ठान से कर्त्तव्य पाप दूर हो गया उसको . राखरूप और आकाश जिसका शरीरवत् है उस परलोक अर्थात् परमदर्शनीय परमात्मा को धर्म न प्राप्त कराता है ॥२॥ इसलियेः- दृढकारी मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन् । अहिंस्रो दमदानाभ्यां जयेत्स्वर्ग तथावतः ॥ १ ॥ वाच्या नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः । तान्तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः॥२॥ प्राचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः । आचाराद्धनमक्षव्यमाचारो हन्त्यलक्षणम् ।।३॥ मनु० [४ । २४६ । १५६ ] सटा पदकारी, कोमल स्वभाव, जितेन्द्रिय, हिंसक, क्रूर दुष्टाचारी पुरुषों से पृथक् vale मा मन को जीत और वियादि दान से सुख को प्राप्त होचे ॥१॥ परन्तु यह भी ध्यान में - -- सत्यार्थप्रकाश और है कि जिस वाणी में सब अर्थ अर्थात् व्यवहार निश्रित होते हैं वह वासी ही उनका भूत वाणी ही से सव व्यवहार सिद्ध होते हैं उस वाणी को जो चोरता अर्थात् मिथ्याभाषण करता है वा सब चोरी आदि पापों का करनेवाला है ॥२॥ इसलिये मिथ्याभापणादिरूप अधर्म को छोड़ जो धर्म चार अर्थात् ब्रह्मचर्य जितेन्द्रियता से पूर्ण आयु और धर्माचार ले उत्तम प्रजा तथा अक्षय धन को मात होता है तथा जो धर्माचार में वर्तकर दुष्ट लक्षणों का नाश करता है उसके आचरण को सहा किया करें। क्योंकि:- दुराचारों हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः । दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च । मनु [४ । १५७] जो दुष्टाचारी पुरुष है वह संसार में सज्जनों के मध्य में निन्दा को प्राप्त दुःखभागी निरन्तर व्याधियुक्त होकर अल्पायु का भी भोगनेहारा होता है । इसलिये ऐसा प्रयत्न करे:- यद्यत्परवशं कर्म तत्तयत्नेन वर्जयेत् । यद्यदात्मवशं तु स्यात्तत्वत्सेवेत यत्नतः ॥ १॥ सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥२॥ मनु० [४ । १५६ । १६०] जो २ पराधीन कर्म हो उस २ का प्रयल से त्याग और जो २ स्वाधीन कर्म हो उस २ । प्रयत्न के साथ सेवन करे ॥ १॥ क्योंकि जो २ पराधीनता है वह २ सव दुःख और जो २ स्वाधीनत वह २ सब सुख यही संक्षेप से सुख और दुःख का लक्षण जानना चाहिये ॥ २॥ परन्तु जो एक दूत के आधीन काम है वह २ आधीनता से ही करना चाहिये जैसा कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे श्राधीन व्यवहार । अर्थात् स्त्री पुरुष का और पुरुष स्त्री का परस्पर प्रियाचरण अनुकूल रहना व्यामि चार वा विरोध कभी न करना पुरुष की आज्ञानुकूल घर के काम स्त्री और बाहर के काम पुरुष आधीन रहना दुष्ट व्यसन में फंसने से एक दूसरे को रोकना अर्थात् यही निश्चय जानना । जव विवाह होवे सब स्त्री के साथ पुरुष और पुरुष के साथ स्त्री विक चुकी अर्थात् जो स्त्री और पुरुष के सार हाव; भाव, नखशिखानपर्यन्त जो कुछ हैं वह वीर्यादि एक दूसरे के श्राधीन होजाता है। स्त्री वा पुरुष प्रस त्रता के विना कोई भी व्यवहार न करें। इन में बड़े अप्रियकारक व्यभिचार, वेश्या, परपु काम हैं। इनको छोड़ के अपने पति के साथ स्त्री और स्त्री के साथ पति सदा प्रसन्न रहैं । जो रणवर्णस्थ हों तो पुरुष लड़कों को पढ़ावे तथा सुशिक्षिता स्त्री लड़कियों को पढ़ावे नानाविध और वक्तृत्व करके उनको विद्वान् करें । स्त्री का पूजनीय देव पति और पुरुष की पूजनीय म सत्कार करने योग्य देवी स्त्री है। जबतक गुरुकुल में रहें तबतक माता पिता के समान को समझें और अध्यापक अपने सन्तानों के समान शिष्यों को समझें। पढ़ानेहारे अध्यापक अध्यापिका कैसे होने चाहियें- आत्मज्ञानं समारम्मस्तितिक्षा धर्मनित्यता । यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥१॥ निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते । अनास्तिकः श्रद्दधान एतत्पण्डितलक्षणम् ॥२॥ तिनं विजानाति चिरं शणोति, विज्ञाय चार्थ मजते न कामात् । नासम्पृष्टो घुपयुक्ते परार्थे, तत्प्रज्ञानं प्रथम पण्डितस्य ॥ ३ ॥ नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम् । आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः ।। .

---- . चतुर्थसमुल्लास ६४ प्रवृत्तवाक् चित्रकय अहवान् प्रतिभानवान् । आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते ॥५॥ श्रुतं प्रशानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा । असंभिन्नार्यमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः॥ ६॥ ये सब महाभारत उद्योगपर्व विदुरप्रजागर [ अध्याय ३२ ] के श्लोक हैं। अर्थ-जिसको आत्मशान सम्यक् प्रारम्भ अर्थात् जो निकम्मा आलसी कभी न रहे, सुख, दुःख, हानि, लाभ, मानापमान, निन्दा, स्तुति में हर्ष शोक कभी न करे, धर्म ही में नित्य निश्चित रहै, जिसके मन'को उत्तम २ पदार्थ अर्थात् विषय सम्बन्धी वस्तु आकर्षण न कर सकें वही पण्डित कहाता है ॥ १॥ सदा धर्मयुक्त कर्मों का सेवन, अधर्मयुक्त कामों का त्याग, ईश्वर, वेद, सत्याचार की निन्दा न करनेहारा, ईश्वर आदि में अत्यन्त श्रद्धालु हो यही पण्डित का कर्तव्याकर्त्तव्य कर्म है ॥ २॥ जो कठिन विषय को भी शीघ्र जान सके, बहुत कालपर्यन्त शास्त्रों को पढ़े, सुने और विचारे, जो कुछ जाने उसको परोपकार में प्रयुक्त करे, अपने स्वार्थ के लिये कोई काम न करे, विना पूछे वा विना योग्य समय जाने दूसरे के अर्थ में सम्मति न दे वही प्रथम प्रज्ञान परिडत होना चाहिये ॥ ३ ॥ जो प्राप्ति के अयोग्य की इच्छा कभी न करे नष्ट हुए पदार्थ पर शोक न करे, आपत्काल में मोह को न प्राप्त अर्थात् व्याकुल न हो वही बुद्धिमान् पण्डित है ॥ ४॥ जिसकी वाणी सव विद्याओं और प्रश्नोत्तरों के करने में प्रतिनिपुण, विचित्र, शास्त्रों के प्रकरणों का वक्ता, यथायोग्य तर्क और स्मृतिमान् ग्रन्थों के यथार्थ अर्थ का शीघ्र वक्ता हो वही पण्डित कहाता है ॥ ५॥ जिसकी प्रज्ञा सुने हुए सत्य अर्थ के अनु- फूल और जिसका श्रवण बुद्धि के अनुसार हो जो कभी आर्य अर्थात् श्रेष्ठ धार्मिक पुरुषों की मर्यादा का छेदन न करे वही पण्डित संशा को प्राप्त होवे ॥ ६॥ जहां ऐसे ऐसे स्त्री पुरुष पढ़ानेवाले होते हैं वहां विद्या धर्म और उत्तमाचार की वृद्धि होकर प्रतिदिन प्रानन्द ही बढ़ता रहता है । पढ़ने में अयोग्य और.मूर्ख के लक्षणः- अश्रुतश्च समुन्नधो दरिद्रश्च महामनाः । अर्थांचाऽकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः ॥१॥ अनाहूतः प्रविशति ह्यपृष्टो बहु भाषते । अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥२॥ ये श्लोक भी महाभारत उद्योगपर्व विदुरप्रजागर [ अध्याय ३२ ] के हैं। अर्थ--जिसने कोई शास्त्र न पढ़ा न सुना और अतीव घमण्डी दरिद्र होकर बड़े २ मनोरथ करनेहारा विना कर्म से पदार्थों की प्राप्ति की इच्छा करनेवाला हो उसी को बुद्धिमान् लोग मूढ़ कहते हैं ॥ १॥ जो बिना बुलाये सभा व किसी के घर में प्रविष्ट हो । उच्च श्रासन पर बैठना चाहे, विना पूछे सभा में बहुतसा वके, विश्वास के अयोग्य वस्तु वा मनुष्य में विश्वास करे वही मूह और सवं मनुष्यों में नीच मनुप्य कहाता है ।। २ ।। जहां ऐसे पुरुप श्रध्यापक, उपदेशक, गुरु और माननीय होते हैं वहां अविद्या, अधर्म, असभ्यता, कलह, विरोध और फूट वढ़ के दुःख ही बढ़ जाता है । अव विद्यार्थियो के लक्षणः-- श्रालस्यं मदमोहौ च चापलं गोष्ठिरेव च । स्तब्धता चाभिमानितं तथाऽत्यागित्वमेव च । एते वै सप्त दोपाः स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः ॥ १॥ सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम् । सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा त्यनेमुखम् ॥२ ' ये मी विदुग्रजागर [ अध्याय ३६] के श्लोक है। १० -- . --- । -- . -- - ७०. सत्यार्थप्रकाश अर्थ--(आलस्य ) अर्थात् शरीर और बुद्धि में जड़ता, नशा, मोह किसी वस्तु में फँसावट, संपलता और इधर उधर की व्यर्थ कथा करना सुनना, पढ़ते पढ़ाते रुक जाना, अभिमानी, अंत्यागी, होना ये सातं दोप विद्यार्थियों में होते हैं ॥ १।। जो ऐसे हैं उनको विद्या कभी नहीं पाती। सुख भोगने की इच्छा करने वाले को विद्या कहां? और विद्या पढ़नेवाले को, सुख कहां ?, क्योंकि विषयसुखार्थी विद्या को और विद्यार्थी विषयसुख को छोड़ दे ॥ २ ॥ ऐसे किये विना विद्या कभी नहीं हो सकती और ऐसे को विद्या होती है:---- 'सत्ये रतानां सततं दान्तानामूर्ध्वरेतसाम् । ब्रह्मचर्य दहेद्राजन् सर्वपापान्युपासितम् ॥ जो सदा सत्याचार में प्रवृत्त, जितेन्द्रिय और जिनका वीर्य अधःस्खलित' कभी न हो उन्ही का ब्रह्मचर्य सच्चा और वे ही विद्वान होते हैं ॥ १ ॥ इसलिये शुभ लक्षणयुक्त अध्यापक और विद्या र्थियो को होना चाहिये । अध्यापक लोग ऐसा यत्न किया करें जिससे विद्यार्थी लोग सत्यवादी, सत्य- मानी, सत्यकारी, सभ्यता, जितेन्द्रियता; सुशीलतादि शुभगुणयुक्त शरीर और आत्मा का पूर्ण वल बढ़ा के समन वेदादि शास्त्रो में विद्वान् हो सदा उनकी कुचेष्टा छुड़ाने में और विद्या पढ़ाने में चेष्टा किया करें। और विद्यार्थी लोग सदा जितेन्द्रिय, शान्त, पढ़नेहारो में प्रेम, विचारशील परिश्रमी होकर ऐसा पुरुषार्थ करें जिससे पूर्ण विद्या, पूर्ण आयु, परिपूर्ण धर्म और पुरुषार्थ करना आजाय इत्यादि ब्राह्मण वर्णों के काम हैं । क्षत्रियों का कर्म राजधर्म में कहेंगे । [वैश्यों के कर्म ब्रह्मचर्यादि से वेदादि विद्या पढ़ [ विवाह करके ] देशों की भाषा, नाना प्रकार के व्यापार की रीति, उनके भाव जानना, वेचना, खरीदना, द्वीपद्वीपान्तर में जाना आना, लाभार्थ काम का प्रारम्भ करना, पशुपालन और खेती की उन्नति चतुराई से करनी करानी धन का बढ़ाना, विद्या और धर्म की उन्नति मे व्यय करना, सत्यवादी निष्कपटी होकर सत्यता से सव व्यवहार करना, सब वस्तुओं की रक्षा ऐसी करनी जिससे कोई नष्ट न होने पावे । शूद्र सव सेवाओ में चतुर, पाकविद्या मे निपुण, अतिप्रेम से द्विजों की सेवा और उन्हीं से, अपनी उपजीविका करे और द्विज लोग इसके खान, पान, वस्त्र, स्थान, विवाहादि में जो कुछ व्यय हो सब कुछ देवे । अथवा मासिक कर देवें । चारों वर्गों को परस्पर प्रीति, उपकार, सज्जनता, सुख, दुःख, हानि, लाभ में ऐकमत्य रहकर राज्य और प्रजा की उन्नति में तन, मन, धन का व्यय करते रहना.। स्त्री और पुरुष का वियोग कभी न होना चाहिये क्योकि पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् । स्वप्नोन्यगेहवासश्च नारीसन्दूषणानि षट् ॥ मनु० [.६ । १३ ] मद्य भांग आदि मादक द्रव्यों का पीना, दुष्ट पुरुषों का सङ्ग, पतिवियोग, अकेली जहां तहां व्यर्थ पाखंडी प्रादि के दर्शन के मिस से फिरती रहना और पराये घर में जाके शयन करना वा वास। ये छः स्त्री को दूपित करने वाले दुर्गुण हैं । और ये पुरुषों के भी हैं पति और स्त्री का वियोग दो प्रकार का होता है कही कार्यार्थ देशान्तर मे जाना और दूसरा मृत्यु से वियोग होना इनमें से प्रथम का उपाय यही है कि दूर देश में यात्रार्थ जावे तो स्त्री को भी साथ रक्ने इसका प्रयोजन यह है कि बहुत समय तक वियोग न रहना चाहिये ( प्रश्न) स्त्री और पुरुष का बहु विवाह होने योग्य है वा नहीं ( उत्तरं ) युगपत् न अर्थात् एक समय में नही (प्रश्न ) क्या समयान्तर मे अनेक विवाह होने चाहिये (उसर) हां जैसे:- :: :सा चेदक्षतयोनिः स्याद्गतप्रत्यागतापि वा। पौनर्भवेन भर्ना सा पुनः संस्कारमईति ॥ मनु० [। १७६] - ७ . maimmiminnan ) चतुर्थसमुल्लासः जिस स्त्री वा पुरुष का पाणिग्रहणमात्र संस्कार हुआ हो और सैयोग' न हुआ हो अर्थात् क्षतयोनि स्त्री और अक्षतवीर्य पुरुप हो उनका अन्य स्त्री वा पुरुष के साथ पुनर्विवाह होना चाहिये कन्तु ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य वर्गों में क्षतयोनि स्त्री क्षतवीर्य पुरुष का पुनर्विवाह न होना चाहिये। प्रश्न) पुनर्विवाह में क्या दोप है ? (उत्तर) (पहिला) स्त्री पुरुष में प्रेम न्यून होना क्योंकि जब हे तव पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुप छोड़ कर दूसरे के साथ सम्बन्ध कर ले (दूसरा) जव ही वा पुरुप पति व स्त्री के मरने के पश्चात् दूसरा विवाह करना चाहे तवः प्रथम स्त्री वा पूर्व पति के दार्थों को उड़ा लेजाना और उनके कुटुम्ब वालो का उनसे झगड़ा करना (तीसरा) बहुत से भद्रकुल T नाम वा चिह्न भी न रह कर उसके पदार्थ छिन्न भिन्न होजाना (चौथा ) पतिव्रत और स्त्रीवत धर्म ए होना इत्यादि दोपों के अर्थ द्विजो में पुनर्विवाह वा अनेक विवाहं कभी न होना चाहिये । (प्रश्न) व वंशच्छेदन हो जाय तव भी उसका कुल नष्ट होजायगा और स्त्री पुरुष व्यभिचारादि कर्म करके गर्भ- तनादि बहुत दुष्ट कर्म करेंगे इसलिये पुनर्विवाह होना अच्छा है ( उत्तर ) नहीं २ क्योंकि जो स्त्री रुप ब्रह्मचर्य में स्थित रहना चाहें तो कोई भी उपद्रव न होगा और जो कुल की परम्परा रखने के ये किसी अपने स्वजाति का लड़का गोद ले लेगे उससे कुल चलेगा और व्यभिचार भी न होगा और जो ब्रह्मचर्य न रख सकें तो नियोग कर के सन्तानोत्पत्ति करले (प्रश्न) पुनर्विवाह और नियोग क्या भेद है ? (उत्तर) (पहिला ) जैसे विवाह करने में कन्या अपने पिता का घर छोड़ पति के र को प्राप्त होती है और पिता से विशेष सम्बन्ध नहीं रहता और विधवा स्त्री उसी विवाहित पति : घर में रहती है । ( दूसरा ) उसी विवाहिता स्त्री के लड़के उसी विवाहित पति के दायभागी होते । और विधवा स्त्री के लड़के वीर्यदाता के न पुत्र कहलाते न उसका गोत्र होता न उसका स्वत्व न लड़कों पर रहता किन्तु वे मृतपति के पुत्र वजते, उसी का गोत्र रहता और उसी के पदार्थों के यभागी होकर उसी घर में रहते हैं। (तीसरा) विवाहित स्त्री पुरुष को परस्पर सेवा और पालन रना अवश्य है और नियुक्त स्त्री पुरुष का कुछ भी सन्बन्ध नहीं रहता। (चौथा ) विवाहित स्त्री रुप का सम्बन्ध मरणपर्यन्त रहता और नियुक्त स्त्री पुरुष का कार्य के पश्चात् छूट जाता है। पांचवां) विवाहित स्त्री पुरुप आपस में गृह के कार्यों की सिद्धि करने में यत्न किया करते और युक्त स्त्री पुरुष अपने २ घर के काम किया करते हैं (प्रश्न) विवाह और नियोग के नियम एकसे वा पृथक् २ ? (उत्तर) कुछ थोड़ासा भेद है जितने पूर्व कह आय और यह कि विवाहित स्त्री पुरुप क पति और एक ही स्त्री मिल के दश सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं और नियुक्त स्त्री पुरुप दो वा र से अधिक सन्तानोत्पत्ति नहीं कर सकते अर्थात् जैसा कुमार कुमारी ही का विवाह होता है वैसे लकी स्त्री वा पुरुप मर जाता है उन्ही का नियोग होता है कुमार कुमारी का नही । जैसे विवाहित को पुरुष सदा सङ्ग मे रहते हैं वैसे नियुक्त स्त्री पुरुप का व्यवहार नहीं किन्तु विना ऋतुदान के समय कत्र न हो जो स्त्री अपने लिये नियोग करे तो जब दूसरा गर्भ रहे उसी दिन से स्त्री पुरुप का सम्ब- लूट जाय । और जो पुरुप अपने लिये करे तो भी दूसरे गर्भ रहने से सम्बन्ध छूट जाय । परन्तु ही नियुक्त खी दो तीन वर्ष पर्यन्त उन लड़को का पालन करके नियुक्त पुरुप को दे देवे । ऐसे प्रक धवा खी दो अपने लिये और दो २ अन्य चार नियुक्त पुरुषो के लिये सन्तान कर सकती और एक तखीफ पुरुप भी दो अपने लिये और दो २ अन्य २ चार विधवायां के लिये प्र उत्पन्न कर सकता ऐसे मिलकर दश २ सन्तानोत्पत्ति की श्राशा वेद में है। इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु । दास्यां पुत्रानाधैहि पतिमेकादशं कृधि ऋ० ॥ मं० १० । मू० ८५ मं०४५.॥ ? २ १२ सत्यार्थप्रकाशः . - in . . हे (मीदव, इन्द्र) वीर्य सिंचने में समर्थ ऐश्वर्ययुक्त पुरुष तू इस विवाहित स्त्री वा विधव स्त्रियों को श्रेष्ठपुत्र और सौभाग्ययुक्त कर विवाहित स्त्री में दश पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं के को मान । हे स्त्री ! तू भी विवाहित पुरुष वा नियुक्त पुरुषों से दश सन्तान उत्पन्न कर और ग्यारह पति को समझ । इस वेद की आशा से ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यवर्णस्थ स्त्री और पुरुष दश दा सन्तान से अधिक उत्पन्न न करें । क्योंकि अधिक करने से सन्तान निर्वल, निर्वृद्धि, अल्पायु हो हैं और स्त्री तथा पुरुप भी निर्वल, अल्पायु और रोगी होकर वृद्धावस्था में बहुतसे दुःख पाते है (प्रश्न ) यह नियोग की वात व्यभिचार के समान दीखती है- ( उत्तर ) जैसे विना विवाहितों का व्या चार होता है वैसे विना नियुक्तों का व्यभिचार कहाता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जैसा नियम विवाह होने पर व्याभिचार नही कहाता तो नियमपूर्वक नियोग होने से व्यभिचार न कहावेगा । जैसे- दूसरे की कन्या का दूसरे के कुमार के साथ शास्त्रोक्त विधिपूर्वक विवाह होने पर समागम में या चार वा; पाप लज्जा नहीं होती वैसे ही वेदशास्त्रोक्त नियोग में व्यभिचार पाप लज्जा न मानना चाहि (प्रश्न). है तो ठीक, परन्तु यह वेश्या के सदृश कर्म दीखता है ( उत्तर) नहीं, क्योंकि वेश्या समागम में किसी निश्चित पुरुष वा कोई नियम नही है और नियोग मे विवाह के समान नियम हैं जैसे दूसरे को लड़की देने दूसरे के साथ समागम करने में विवाहपूर्वक लज्जा नही होती वैसे ही नियोग में भी न होनी चाहिये। क्या जो व्यभिचारी पुरुष वा स्त्री होते हैं वे विवाह होने पर भी कुकर्म से बचते हैं ? (प्रश्न ) हम को नियोग की बात में पाप मालूम पड़ता है (उत्तर) जो नियोग की यात मे पाप मानते हो तो विवाह में पाप क्यों नहीं मानते ? पाप तो नियोग के रोकने में है क्योंकि ईश्वर के सृष्टिक्रमानुकूल स्त्री पुरुष का स्वाभाविक व्यवहार रुक ही नहीं सकता, सिवाय वैराग्यवान् पूर्णविद्वान योगियों के ? क्या गर्भपातनरूप भ्रूणहत्या और विधवा स्त्री और मृतकस्त्री पुरुषों के महासन्ताप को पाप नही गिनते हो क्योंकि जबतक वे युवावस्था में हैं मन में सन्तानोत्पत्ति और विषय की चाहना होनेवालों को किसी राज्यव्यवहार वा जातिव्यवहार से रुकावट होने से गुप्त २ कुकर्म वुरी चाल से होते रहते हैं इस व्यभिचार और कुकर्म के रोकने का एक यही श्रेष्ठ उपाय है कि जो जितेन्द्रिय रह सकें वे विवाह वा नियोग भी न करे तो ठीक है । परन्तु जो ऐसे नही हैं उनका विवाह और आपत्काल मे नियोग अवश्य होना चाहिये । इससे व्यभिचार का न्यून होना प्रेम से उत्तम सन्तान होकर मनुष्यों की वृद्धि होना सम्भव है और गर्भहत्या सर्वथा छूट जाती है। नीच पुरुषों से उत्तम स्त्री और वेश्यादि नीच स्त्रियों से उत्तम पुरुषों का व्यभिचाररूप कुकर्म, उत्तम कुल में कलंक, वंश का उच्छेद, स्त्री पुरुषों को सन्ताप और गर्भहत्यादि कुकर्म विवाह और नियोग से निवृत्त होते हैं इसलिये नियोग करना चाहिये (प्रश्न) नियोग में क्या २ बात होनी चाहिये ? ( उत्तर ) जैसे प्रसिद्धि से विवाह, वैसे ही प्रसिद्धि से नियोग, जिस प्रकार विवाह में भद्र पुरुषों की अनुमति और कन्या वर की प्रसन्नता होती है वैसे नियोग में भी अर्थात् जब स्त्री पुरुष का नियोग होना हो तब अपने कुटुम्ब में पुरुष स्त्रियों के सामने [प्रकट करें कि ] हम दोनों नियोग सन्तानोत्पत्ति के लिये करते हैं । जव नियोग का नियम पूरा होगा तब हम संयोग न करेंगे । जो अन्यथा करें तो पापी और जाति वा राज्य के दण्डनीय हो। महीने २ में एकवार गर्भाधान का काम करेगे, गर्भ रहे पश्चात् एक वर्ष पर्यन्त पृथक् रहेंगे । (प्रश्न) नियोग अपने वर्ण में होना चाहिये वा अन्य वर्णों के साथ भी ? (उत्तर) अपने वर्ण में वा अपने से उत्तम वर्णस्थ पुरुष के साथ अर्थात् वैश्या स्त्री वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण के साथ, क्षत्रिया क्षत्रिय और ब्राह्मण के साथ, ब्राह्मणी ब्राह्मण के साथ नियोग कर सकती है। इसका तात्पर्य यह है, कि वीर्य सम या उत्तम वर्ण का चाहिये अपने से नीचे के वर्ण का नही । स्त्री और पुरुष की सृष्टि का यही साथ - चतुर्थसमुल्लासः शाक प्रयोजन है कि धर्म से अर्थात् घेदोक्त रीति से विवाह वा नियोग से सन्तानोत्पत्ति करना (प्रश्न) र पुरुप को नियोग करने की क्या आवश्यकता है क्योंकि वह दूसरा विवाह करेगा ? (उत्तर) हम पर लिख पाये हैं द्विजों मे स्त्री और पुरुष का एक ही वार विवाह होना वेदादि शास्त्रों में लिखा है, द्वितीयवार दश नहीं । कुमार और कुमारी का ही विवाह होने में न्याय और विधवा स्त्री के साथ कुमार पुरुष और पायुकुमारी स्त्री के साथ मृतस्त्रीक पुरुष के विवाह होने में अन्याय अर्थात् अधर्म है। जैसे विधवा स्त्री के पाते साथ पुरुप विवाह नहीं किया चाहता वैसे ही विवाह और स्त्री से समागम किये हुए पुरुष के का विवाह करने की इच्छा कुमारी भी न करेगी । जव विवाह किये हुए पुरुष को कोई कुमारी कन्या निया और विधवा स्त्री का ग्रहण कोई कुमार पुरुप न करेगा तव पुरुप और स्त्री को नियोग करने की | श्रावश्यकता होगी। और यही धर्म है कि जैसे के साथ वैसे ही का सम्बन्ध होना चाहिये (प्रश्न') में जैसे विवाह में वेदादि शास्त्रों का प्रमाण है वैसे नियोग में प्रमाण है वा नहीं, ( उत्तर) इस विषय में { चर्चा यहुत प्रमाण हैं देखो और सुनोः- वेत कुहस्विद्दोपा कुह वस्तौरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोपतुः । को वो शयुवा विधवैव देवर नि * मर्य न योपा कृणुते सधस्थ आ ॥ ऋ० ॥ मं० १० । सू० ४० । मं० २ ॥ भी उदीर्घ नायभिजीवलोकं गतासुमतमुप शेप एहि । हग्रामस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युजनित्य- की। मुभि सं बभूथ ॥ ऋ० ॥ मं० १० । सू० १८ । मं० ८ ॥ (अश्विना) स्त्री पुरुपो ! जैसे (देवरं विधवेव ) देवर को विधवा और ( योषा मर्यन्न ) विवाहिता स्त्री अपने पति को ( सधस्थे) समान स्थान शय्या में एकत्र होकर सन्तानोत्पत्ति को (आ, कृणुते ) सव प्रकार से उत्पन्न करती है वैसे तुम दोनो स्त्री पुरुप (कुहविद्दोपा) कहां रात्रि की व और (कुह वस्तः ) कहां दिन मे वसे थे ? (कुहाभिपित्वम् ) कहां पदार्थों की प्राप्ति ( करतः ) की? चौर (कुहापतुः ) किस समय कहां वास करते थे ? ( को वां शयुत्रा) तुम्हारा शयनस्थान कहां है ? न्द्रिय तथा कौन वा किस देश के रहनेवाले हो ? इससे यह सिद्ध हुना कि देश विदेश में स्त्री पुरुष सङ्ग ही ग्रापार में रहे । और विवाहित पति के समान नियुक्त पति को ग्रहण करके विधवा स्त्री भी सन्तानोत्पत्ति कर लेवे (प्रश्न ) यदि किसी का छोटा भाई ही न हो तो विधवा नियोग किसके साथ करे ? (उत्तर) देवर के साथ परन्तु देवर शब्द का अर्थ जैसा तुम समझते हो वैसा नही देखो निरुक्त में- देवरः कस्माद् द्वितीयो वर उच्यते ॥ निरु० अ० ३ । ख० १५ ॥ देवर उसको कहते हैं कि जो विधवा का दूसरा पति होता है चाहे छोटा भाई वा बड़ा भाई प्रथया अपने वर्ण वा अपने से उत्तम वर्ण वाला हो जिससे नियोग करे उसी का नाम देवर है । हे (नारी) विधवे तू (एतं गतासुम् ) इस मरे हुए पति की श्राशा छोड़ के (शेपे ) वाकी पुरुषों में से (अभि, जीवलोकम् ) जीते हुए दूसरे पति को ( उपैहि ) प्राप्त हो और ( उदीर्च ) इस बात का विचार और निश्चय रख कि जो (हस्तनाभस्य दिवियोः ) तुझ विधवा के पुनः पाणिग्रहण करनेवाले नियुक्त पति के सम्बन्ध के लिये नियोग होगा तो (इदम् ) यह (जनित्वम् ) जना हुश्रा बालक उसी नियुक्त ( पत्युः) पति का होगा और जो तू अपने लिय नियोग करेगी तो यह सन्तान (तव ) तेरा दोगा। ऐसे निशययुक्त (अभि, सम्, बभूथ ) हो और नियुक्त पुल्प भी इसी नय पालन करे।। हासन रम रवार वेश गोग ; १० जताई नि काति तीन का '७४ सत्यार्थप्रकाश . अदैवृघ्न्यपतिघ्नी हैधि शिवा पशुभ्यः सुयमाः सुवची । प्रजावती चीरसर्देवृकामा स्यो मग्नि गार्हपत्यं सपर्य ॥ अथव० ॥ कां० १४ । अनु० २ । मं० १८ ॥ हे (अपतियदेवृघ्नि) पति और देवर को दुःख न देने वाली स्त्री तू ( इह ) इस गृहमा (पशुभ्यः ) पशुओं के लिये (शिवा) कल्याण करनेहारी (सुयमाः) अच्छे प्रकार धर्म नियम में (सुवर्चाः ) रूप और सर्व शास्त्र विद्यायुक्त (प्रजावती) उत्तम पुत्र पौत्रादि से सहित (वीरसूः) वीर पुत्रों को जनने ( देवृकोमा ) देवर की कामना करने वाली (स्योना) और सुख देनेहारी पा देवर को (एधि ) प्राप्त होके ( इमम् ) इस ( गार्हपत्यम् ) गृहस्थसम्बन्धी (अग्निम् ) अग्निहोत्र (सपर्य) सेवन किया कर ॥ तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ॥ मनु० [६ । ६६] जो अक्षतयोनि स्त्री विधवा हो जाय तो पति का निज छोटा भाई भी उससे विवाह कर कता है (प्रश्न ) एक स्त्री वा पुरुष कितने नियोग कर सकते हैं और विवाहित नियुक्त पतियों नाम क्या होता है ( उत्तर ):- सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद् उत्तरः । तृतीयौ अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्य॒जाः' ऋ० ॥ मं० १० । सू० ८५ । मं० ४० ॥ हे स्त्रि ! जो (ते) तेरा (प्रथमः ) पहिला विवाहित (पतिः ) पति तुझको (विविदे) होता है उसका नाम (सोमः ) सुकुमारतादि गुणयुक्त होने से सोम जो दूसरा नियोग से (विविदे। प्राप्त होता वह ( गन्धर्वः) एक स्त्री से संभोग करने से गन्धर्व जो (तृतीय उत्तरः ) दो के पश्चान तीसरा पति होता है वह (अग्निः ) अत्युष्णतायुक्त होने से अग्निसंज्ञक और जो (ते) तेरे (तुरीय चौथे से लेके ग्यारहवे तक नियोग से पति होते हैं वे ( मनुष्यजाः ) मनुष्य नाम से कहाते हैं । जै (इमा त्वमिन्द्र) इस मन्त्र से ग्यारहवे पुरुष तक स्त्री नियोग कर सकती है वैसे पुरुष भी १९४५ स्त्री तक नियोग कर सकता है। (प्रश्न ) एकादश शब्द से दश पुत्र और ग्यारहवें पति को क्यों गिने ? (उत्तर ) जो ऐसा अर्थ करोगे तो "विधवेव देवरम्" "देवरः कस्माद् द्वितीयो वर उच्यते "अदेवृघ्नि" और "गन्धर्वो विविद उत्तरः" इत्यादि वेदप्रमाणो से विरुद्धार्थ होगा। क्योंकि ७ अर्थ से दूसरा भी पति प्राप्त नहीं हो सकता। देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ् नियुक्तया | प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये ॥१॥ ज्येष्ठो यवीयसो भायां यवीयान्वाग्रजस्त्रियम् । पतितौ भवतो गत्वा नियुक्तावप्यनापदि ॥२॥ औरसः क्षेत्रजश्चैव ॥३॥ मनु० [६ । ५६ । ५८ । १५६ ] इत्यादि मनुजी ने लिखा है कि (सपिण्ड ) अर्थात् पति की छः पीढ़ियों में पति का वा बड़ा भाई अथवा स्वजातीय तथा अपने से उत्तम जातिस्थ पुरुप से विधवा स्त्री का नियोगः चाहिये । परन्तु जो वह मृतस्त्रीक पुरुष और विधवा स्त्री सन्तानोत्पत्ति की इच्छा करती हो तो नियो होना उचित है। और जव सन्तान का सर्वथा क्षय हो तव नियोग होवे। जो आपत्काल अर्थात् के होने की इच्छा न होने में बड़े भाई की स्त्री से छोटे का और छोटे की स्त्री से बड़े भाई का होकर सन्तानोत्पत्ति होजाने पर भी पुनः चे नियुक्त आपस में समागम करे तो पतित होजाये एक नियोग में दूसरे पुत्र के गर्भ रहने तक नियोग की अवधि है इसके पश्चात् समागम न करें । 4 4 N N ३ - न . S चतुर्थसमुलाला जो दोनों के लिये नियोग हुआ हो तो चौथे गर्भ तक अर्थात् पूर्वोक्त रीति से दश सन्तान तक हो सकते । पश्चात् विषयासक्ति गिनी जाती है, इससे वे पतित गिने जाते हैं। और जो विवाहित स्त्री पुरुष भी दशवें गर्भ से अधिक समागम करें तो कामी और निन्दित होते हैं अर्थात् विवाह वा नियोग सन्तानों नही के अर्थ किये जाते हैं पशुवत् कामक्रीड़ा के लिये नही ( प्रश्न ) नियोग मरे पीछे ही होता है.वा मजीते पति के भी ? (उत्तर) जीते भी होता है- रह अन्यमिच्छख सुभगे पति मत् ॥ ऋ० ॥ मं० १०. । सू० १० ॥ । जय पति सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ होवे तव अपनी स्त्री को आज्ञा देवे कि हे सुभगे ! सौ. भाग्य की इच्छा करनेहारी स्त्री तू (मत्) मुझ से (अन्यम् ) दूसरे पति की ( इच्छस्व ) इच्छा कर क्योंकि अब मुझ से सन्तानोत्पत्ति न हो सकेगी । तव स्त्री दूसरे से नियोग करके सन्तानोत्पत्ति करे। परन्तु उस विवाहित महाशय पति की सेवा में तत्पर रहे वैसे ही स्त्री भी जव रोगादि दोपों से ग्रस्त होकर सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ हो तव अपने पति को आज्ञा देवे कि हे स्वामी श्राप सन्तानोत्पत्ति की पति इच्छा मुझसे छोड़ के किसी दूसरी विधवा स्त्री से नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कीजिये ! जैसा कि पाण्डु राजा की स्त्री कुन्ती और माद्री आदि ने किया और जैसा व्यासजी ने चित्राङ्गद और विचित्र वीर्य के मरजाने पश्चात् उन अपने भाइयो की स्त्रियों से नियोग करके अम्बिका में धृतराष्ट्र और अम्बालिका में पाण्डु और दासी में विदुर की उत्पत्ति की इत्यादि इतिहास भी इस बात में प्रमाण हैं ।। प्रोपितो धर्मकार्यार्थ प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः। विद्यार्थ षड् यशोथ वा कामार्थ त्रीस्तु वत्सरान् ॥१॥ वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याब्दे दशमे मृतप्रजा । एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥ २॥ मनु० [8। ७६ । ८१] विवाहित स्त्री जो विवाहित पति धर्म के अर्थ परदेश गया हो तो अाठ वर्ष, विद्या और ते कीर्ति के लिये गया हो तो छः और धनादि कामना के लिये गया हो तो तीन वर्ष तक वाट देख के भी पश्चात् नियोग करके सन्तानोत्पत्ति करले, जव विवाहित पति आवे तव नियुक्त पति छूट जावे ॥१॥ को वैसे ही पुरुष के लिये भी नियम है कि वन्ध्या हो तो आठवे (विवाह से आठ वर्ष तक स्त्री को गर्भ न वा रहे ), सन्तान होकर मरजावे तो दशवें, जव २ हो तव २ कन्या ही होवे पुत्र न हों तो ग्यारहवें वर्ष तक योग और जो अप्रिय बोलने वाली हो तो सद्यः उस स्त्री को छोड़ के दूसरी स्त्री से नियोग करके सन्तानो त्पत्ति कर लेवे ॥ २॥ वैसे ही जो पुरुप अत्यन्त दुःखदायक हो तो स्त्री को उचित है कि उसको छोड़ के दिन दूसरे पुरुप से नियोग कर सन्तानोत्पत्ति करके उसी विवाहित पति के दायभागी सन्तान कर लेवे । इत्यादि प्रमाण और युक्तियों से स्वयंवर विवाह और नियोग से अपने २ कुल की उन्नति करे जैसा { " औरस" अर्थात् विवाहित पति से उत्पन्न हुआ पुत्र पिता के पदार्थों का स्वामी होता है वैसे ही "क्षेत्रज" अर्थात् नियोग से उत्पन्न हुए पुत्र भी मृतपिता के दायभागी होते हैं। अब इस पर स्त्री और पुरुप को ध्यान रखना चाहिये कि वीर्य और रज को अमूल्य समझे। जो कोई इस अमूल्य पदार्थ तिनको परस्त्री, वेश्या चा दुष्ट पुरुषों के सङ्ग में खोते हैं वे महामूर्ख होते हैं। क्योंकि किसान वा माली मूर्ख त होकर भी अपने खेत वा वाटिका के विना अन्यत्र वीज नहीं बोते । जोकि साधारण वीज और मूर्य त्ति का ऐसा वर्तमान है तो जो सर्वोत्तम मनुष्यशरीररूप वृक्ष के वीज को कुक्षेत्र में खोता है वह महामूर्स शाहाता है क्योंकि उसका फल उसको नहीं मिलता और "आत्मा वै जायते पुत्रः" यह ब्राह्मण अन्यों जाये का वचन है। वित I म - 7 कर --

सत्यार्थप्रकाश
अङ्गादगात्सम्भवास हृदयादर्धिजायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ॥
निरु०३।४॥
हे पुत्र तू अङ्ग २ से उत्पन्न हुए वीर्य से और हृदय से उत्पन्न होता है इसलिये तू मेरा पान
है मुझ से पूर्व मत मरे किन्तु सौ वर्ष तक जी। जिससे ऐसे २ महात्मा और महाशयों के शरीर उत्पा
होते हैं उसको वेश्यादि दुष्टक्षेत्र में बोना वा दुष्टवीज अच्छे क्षेत्र में वुवाना महापाप का काम है!
(प्रश्न ) विवाह क्यों करना ? क्योंकि इससे स्त्री पुरुष को बन्धन में पड़के बहुत संकोच करना और
दुःख भोगना पड़ता है इसलिये जिसके साथ जिसकी प्रीति हो तबतक वे मिले रहें जब प्रीति छ
जाय तो छोड़ देवें (उत्तर) यह पशु पक्षियों का व्यवहार है मनुष्यों का नहीं । जो मनुष्यों में विवा
का नियम न रहे तो सब गृहाश्रम के अच्छे २ व्यवहार सब नष्ट भ्रष्ट होजायं । कोई किसी की सेव
भी न करे और महा व्यभिचार बढ़कर सब रोगी निर्वल और अल्पायु होकर शीघ्र २ मरजायें । को
किसी से भय वा लज्जा न करे । वृद्धावस्था मे कोई किसी की सेवा भी नहीं करे और महाव्याभिचार
वढ़कर सव रोगी निर्वल और अल्पायु होकर कुलो के कुल नष्ट होजायें । कोई किसी के पदार्थों र
स्वामी वा दायभागी भी न हो सके और न किसी का किसी पदार्थ पर दीर्घकालपर्यन्त स्वत्व र
इत्यादि दोषों के निवारणार्थ विवाह ही होना सर्वथा योग्य है । (प्रश्न) जव एक विवाह होगा एक पुत
को एक स्त्री और एक स्त्री को एक पुरुप रहेगा तव स्त्री गर्भवती स्थिररोगिणी अथवा पुरुष दीर्घरोग
हो और दोनों की युवावस्था हो, रहा न जाय, तो फिर क्या करें ? (उत्तर) इसका प्रत्युत्तर निक्षेत्र
विषय में दे चुके हैं । और गर्भवती स्त्री से एक वर्ष समागम न करने के समय में पुरुप से वा दी
रोगी पुरुष की स्त्री से न रहा जाय तो किसी से नियोग करके उसके लिये पुत्रोत्पत्ति करदे, पत्नु
वेश्यागमन वा व्यभिचार कभी न करें। जहांतक हो वहांतक अप्राप्त वस्तु की इच्छा, प्राप्त का रहन
और रक्षित की वृद्धि, बढ़े हुए धन का व्यय देशोपकार करने में किया करें। सब प्रकार के अर्था
पूर्वोक्त रीति से अपने २ वर्णाश्रम के व्यवहारो को अत्युत्साहपूर्वक प्रयत्न से तन, मन, धन से सर्वना
परमार्थ किया करें। अपने माता, पिता, शाशु, श्वशुर की अत्यन्त शुश्रूषा करें । मित्र और अड़ोसी.
पड़ोसी, राजा, विद्वान्, वैद्य और सत्पुरुपो से प्रीति रख के और जो दुष्ट अधर्मी हैं उनसे उपेक्षा अर्थात
द्रोह छोड़कर उनके सुधारने का यत्न किया करे । जहांतक बने वहांतक प्रेम से अपने सन्तानों
विद्वान् और सुशिक्षा करने कराने में धनादि पदार्थों का व्यय करके उनको पूर्ण विद्वान् सुशिक्षायुल
करदें और धर्मयुक्त व्यवहार करके मोक्ष का भी साधन किया करें कि जिसकी प्राप्ति से परमानन्द भोग
और ऐसे ऐसे श्लोकों को न माने जैसे:-
पतितोपि द्विजः श्रेष्ठो न च शूद्रो जितेन्द्रियः । निर्दुग्धा चापि गौः पूज्या न च दुग्धवती खरी ॥१॥
अश्वालम्भं गवालम्भं संन्यासं पलपैत्रिकम् । देवराञ्च सुतोत्पत्ति कलौ पञ्च विवर्जयेत् ॥२॥
नटे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ । पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ॥३॥
ये कपोलकल्पित पाराशरी के श्लोक हैं । जो दुष्ट कर्मचारी द्विज को श्रेष्ठ और श्रेष्ठ कर्म
कारी शूद्ध को नीच मानें तो इससे परे पक्षपात, अन्याय, अधर्म दूसरा अधिक क्या होगा ? क्या दूध
देनेवाली वा न देनेवाली गाय गोपालो को पालनीय होती हैं वैसे कुम्हार आदि को गधही पालनीय नहीं
होती? और यह दृष्टान्त भी विषम है क्योंकि द्विज और शूद्र मनुष्य जाति, गाय और गवही भिम
जाति हैं कथञ्चित् पशु जाति से दृष्टान्त का एकदेश दाष्टोन्त में मिल भी जावे तो भी इसका श्राशर
अयुक्त होने से यह श्लोक विद्वानों के माननीय कभी नहीं हो सकते ॥१॥

गा जर पड़े है परन्तुः- इस वी प्रशंसनीय है। परन्तु तभा गृहाधम ममुख होता है जर स्त्रीयार पुरुप दाना परस्पर प्रसता चतुर्धसमुजाता जव असालम्भ अर्थात् घोड़े को मार के पथवा [गवालम्भ ] गाय को मार के होम करना ही वेदविहित नहीं है । तो उसका कलियुग में निषेध करना वेदविरुद्ध क्यों नहीं? जो कलियुग में इस मनीचं कर्म का निषेध माना जाय तो नेता आदि में विधि प्राजाय । तो इसमें ऐसे दुष्टं काम का श्रेष्ठ युग में होना सर्वथा असंभव है। और संन्यास की वेदादि शास्त्रों में विवि है। उसका निषेध करना निर्मूल है । जव मांस का निषेध है तो सर्वदा ही निषेध है । जब देवर से पुत्रोत्पत्ति करना वेदो में लिखा है तो यह लोकफी क्यों भूसता है ? ॥२॥ पदि (नष्टे ) अर्थात् पति किसी देश देशान्तर को चला गया हो घर में ली नियोग कर लेवे योउसी समय विवाहित पति पाजाय तो वह किसकी स्त्री हो ? कोई कहे कि विवाहित पति की, हमने सीमाना परन्तु ऐसी व्यवस्था पाराशरी मे तो नहीं लिखी । क्या स्त्री के पांच ही श्रायत्काल हैं जो रोगी जरंपड़ा हो वा लड़ाई होगई हो इत्यादि आपत्काल पांच से भी अधिक हैं इसलिये ऐसे ऐसे श्लोको को महाकभी न मानना चाहिये ॥ ३॥ (प्रश्न) क्यॉजी तुम पराशर मुनि के वचन को भी नहीं मानते ? (उत्तर) चाहे किसी का वचन हो परन्तु वेदविरुद्ध होने से नहीं मानते और यह तो पराशर का वचन भी नही है क्योंकि जैसे "ब्रह्मोवाच, वशिष्ठ उवाच, राम उघाच, शिव उवाच, विष्णुरुवाच, देव्युवाच" इत्यादि सेप्ठों का नाम लिख के ग्रन्थरचना इसलिये करते हैं कि सर्वमान्य के नाम से इन ग्रन्थो को सब संसार समान लेवे और हमारी पुष्कल जीविका भी हो। इसलिये अनर्थ गाथायुक्त ग्रन्थ बनाते हैं। कुछ २ प्रक्षिप्त श्लोकों को छोड़ के मनुस्मृति ही वेदानुकूल है अन्य स्मृति नहीं । ऐसे ही अन्य जालग्रन्थो की साम्यवस्था समझलो (प्रश्न ) गृहाभम सबसे छोटा या बड़ा है ? (उत्तर) अपने २ कर्त्तव्यकर्मों में सब यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् । तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ १॥ [ मनु० ६ । ६.] यथा वायु समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः । तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥२॥ उपेल् यस्मात्त्रयोप्यामिणो दानेनामेन चान्वहम् । गृहस्थेनैव धाय॑न्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥ ३ ॥ स संधायः प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता । सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यों दुर्घलेन्द्रियैः ।। ४ ।। [ मनु० ३ । ७७-७४] जैसे नदी और बड़े २ नद तबतक भ्रमते ही रहते हैं जबतक समुद्र को प्राप्त नहीं होते, तीस येसे गृहस्थ ही के आश्रय से सब आश्रम स्थिर रहते हैं विना इस आश्रम के किसी आश्रम का कोई व्यवहार सिद्ध नहीं होता। जिससे ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी तीन श्राश्रमों को दान और प्रतादिदे के प्रतिदिन गाथ ही धारण करता है इससे गास्थ ज्येष्ठाश्रम है अर्थात् सब व्यवहारों में शुरन्धर काता: नितिये डोमोज और संचार इच्छा करता हो वह प्रयत्न से गृहाश्रम सा धारण करे। जो रहाधन दुर्वलान्य अर्थात् भील और निर्मल एरपों से धारण करने योग्य है उत्तको अच्छमार धारण करे । इसलिये जितना कुछ व्यवहार संसार में है उसका श्राधार गृहाश्रम है। जो यह महान न होता तो सन्तानोत्पत्ति के न होने से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यासाश्रम पदा से हो सकते जो फोई गृदाश्रन की निन्दा करता है वही निन्दनीय है और जो प्रशंसा करता युर - कार धन : प्रये पते ॥ पालन सत्यार्थप्रकाश सुख का विद्वान्, पुरुषार्थी और सब प्रकार के व्यवहारों के ज्ञाता हों। इसलिये गृहाश्रम के कारण ब्रह्मचर्य और पूर्वोक्त स्वयंवर विवाह है। यह संक्षेप से समावर्तन, विवाह और गृहाश्रम विषय में शिक्षा लिख दी। इसके आगे वानप्रस्थ और संन्यास के विषय में लिखा जायगा ॥ इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिकृते सत्यार्थप्रकाशे सुभाषाविभूपिते समावर्तनविवादगृहाश्रमविपये चतुर्थः समुल्लासः सम्पूर्णः ॥ ४ ॥ Kk F , अथ पञ्चमसमुल्लासारम्भः अथ वानप्रस्थसंन्यासविधि वक्ष्यामः 'ब्रह्मचर्याश्रमं समाप्य गृही भवेत् .गृही भूत्वा वनी भवेद्वनी भूत्वा प्रव्रजेत् ॥ शत० कां० १४ ॥ मनुष्यों को उचित है कि ब्रह्मचर्याश्रम को समाप्त करके गृहस्थ होकर वानप्रस्थ और वान- प्रस्थ होके संन्यासी हो। अर्थात् यह अनुक्रम से श्राश्रम का विधान है ॥ एवं गृहाश्रमे स्थित्वा विधिवत्स्नातको द्विजः । वने वसेत्तु नियतो यथावद्विजितेन्द्रियः ॥ १॥ गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः । अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥ २ ॥ संत्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वं चैव परिच्छदम् । पुत्रेषु भार्या निक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ॥ ३ ॥ अग्निहोत्रं 'समादाय गृह्यं चाग्निपरिच्छदम् । ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः ॥ ४ ॥ मुन्यन्नैर्विविधैर्मध्यः शाकमूलफलेन वा । एतानेव महायज्ञान्निर्वद्विधिपूर्वकम् ॥ ५ ॥ मनु० [६ । १-५] इस प्रकार स्नातक अर्थात् ब्रह्मचर्यपूर्वक गृहायम का कर्ता द्विज अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य गृहाश्रम में ठहर कर निश्चितात्मा और यथावत् इन्द्रियों को जीत के वन में वसे ॥ १ ॥ परन्तु जय गृहस्थ शिर के श्वेत केश और त्वचा ढीली हो जाय और लड़के का लड़का भी हो गया हो तव वन में जाके वसे ॥ २ ॥ सब ग्राम के श्राहार और वस्त्रादि सब उत्तमोत्तम पदार्थी को छोड़ पुत्रों के पास स्त्री को रख वा अपने साथ ले के वन से निवास करे ॥ ३ ॥ साङ्गोपाङ्ग अग्निहोत्र को ले के नाम से निकल इन्द्रिय होकर भरण्य में जाकं बसे ॥ ४ ॥ नाना प्रकार के सामा आदि अन्न, सुन्दर २ शाक, मूल, फल, फूल कंदादि से पूर्वोक्त पंच महायज्ञ को करे और उसी से प्रतिषिसेवा भौर आप भी निर्वाह करे ॥५॥ स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याक्षान्तो मैत्रः समाहितः । दाता नित्यमनादाता सर्वभूतानुकम्पकः ॥१॥ भप्रयत्नः सुखार्थेषु ब्रह्मचारी धराशयः । शरणेप्वममश्चैव वृक्षमूलनिकेतनः ॥ २ ॥ मनु० [६।८।२६] स्वाध्याय अर्थात् पढ़ने पढ़ाने में नि [य] युक्त, जितात्मा, सबका मित्र, इन्द्रियों का दमन- सीस, विद्यादि का दान देनेदाग और सब पर दयानु, निसी से कुछ भी पदार्थ न ले। इस प्रकार सदा वर्तमान रे ॥ १ ॥ शरीर के सुख के लिए शति प्रयत न सरे भिन्तु वमचारी [हे] भांद अपनी ५० सत्यार्थप्रकाश (M स्त्री साथ हो तथापि उससे विषयचेष्टा कुछ न करे, भूमि में सोवे, अपने आश्रित वा स्वकीय पदार्थो ममता न करे, वृक्ष के मूल में वसे ॥२॥ तपाश्रद्धे ये युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैवचयां चरन्तः । सूर्यद्वारेण ते " प्रयान्ति यत्राऽमृतः स पुरुषो स्यव्ययात्मा ॥१॥ मुण्ड० ॥ खं० २ । मं० ११ ॥ जो शान्त विद्वान् लोग वन में तप धर्मानुष्ठान और सत्य की श्रद्धा करके भिक्षाचरण हुए जंगल में वसते हैं वे जहां नाशरहित पूर्ण पुरुष हानि लाभरहित परमात्मा है, वहां निर्मन प्राणद्वार से उस परमात्मा को प्राप्त होके आनन्दित हो जाते हैं ॥१॥ अभ्यादधामि समिधमग्नै व्रतपते त्वर्यि । व्रतञ्च श्रद्धां चोपैमीन्धे त्यो दीचितो अहम् ।। यजुर्वेद ॥ अध्याय २० । मं० २४ ॥ वानप्रस्थ को उचित है कि मैं अग्नि में होम कर दीक्षित होकर व्रत, सत्याचरण और को प्राप्त होऊ-ऐसी इच्छा करके वानप्रस्थ हो । नाना प्रकार की तपश्चर्या, सत्संग, योगाभ्यास,. चार से ज्ञान और पवित्रता प्राप्त करें । पश्चात् जब संन्यासग्रहण की इच्छा हो तब स्त्री को पास भेज देवे फिर संन्यास ग्रहण करे । इति संक्षेपण यानप्रस्थविधिः ॥ - . । -- १ . वानप्रस्थ के चौथे भाग अथ संन्यासविधिः वनेषु च विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः । चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा सङ्गान् परिव्रजेत् ॥ मनु० [६ । ३३] इस प्रकार वन में आयु का तीसरा भाग अर्थात् पचासवे वर्ष से पचहसरवें वर्ष होके आयु संगो को छोड़ के परिवाट् अर्थात् संन्यासी हो जावे ( * गृहाश्रम और बानप्रस्थाश्रम न करके संन्यासाश्रम करे उसको पाप होता है वा नहीं ? (उत्तर) है और नहीं भी होता (प्रश्न ) यह दो प्रकार की बात क्यों कहते हो ? (उत्तर) दो प्रकार की क्योकि जो बाल्यावस्था में विरक्त होकर विषयों में फंसे वह महापापी और जो न फंसे वह पुण्यात्मा सत्पुरुष है। यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रबजेदनाद्वा गृहागा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् ॥ ये ब्रामलग्रन्थ के वचन । जिस दिन वैराग्य प्राप्त हो उसी दिन घर वा वन से संन्यास ग्रहण करलेवे पहिले का पक्षक्रम कहा और इसमें विकल्प अर्थात् वानप्रस्थ न करे, गृहस्थाश्रम ही से संन्यास ग्रहण और तृतीय पक्ष यह है कि जो पूर्ण विद्वान् जितेन्द्रिय विषयभोग की कामना से रहित करने की इच्छा से युक्त पुरुष हो ब्रह्मचर्याश्रम ही से संन्यास लेने और वेदों में भी ( पतयः विजानतः) इत्यादि पदों से संन्यास का विधान है, परन्तुः- नाविरतो दुश्चरितानाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ।। कठ० । वन्नी २। मं० ३३ ॥ : जो दुराचार से पृथा नहीं, जिनको शान्ति नहीं, जिसका आत्मा योगी नहीं और मन शाम्त नहीं है यह सम्वास लेके भी प्रधान से परमात्मा को प्राप्त नहीं होता इसलिये:-' - चमसमुल्लास.. ६९ यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेद् ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ।। कठ० । वल्ली ३ । मं० १३ ॥ संन्यासी बुद्धिमान् वाणी और मन को अधर्म से रोक के उनको ज्ञान और आत्मा में लगावे और उस ज्ञातवात्मा को परमात्मा मे लगावे और उस विज्ञान को शान्तस्वरूप आत्मा मे स्थिर करे। परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायानास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थ स गुरुमेवा- भिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ मुण्ड० । खं० २ । मं० १२ ॥ सव लौकिक भोगों को कर्म से संचित हुए देखकर ब्राह्मण अर्थात् संन्यासी वैराग्य को प्राप्त होवे क्योकि अकृत अर्थात् न किया हुआ परमात्मा कृत अर्थात् केवल कर्म से प्राप्त नहीं होता इस. लिये कुछ अर्पण के अर्थ हाथ में ले के वेदवित् और परमेश्वर को जाननेवाले गुरु के पास विज्ञान के लिये जावे, जाके सव सन्देहो की निवृत्ति करे परन्तु सदा इनका संग छोड़ देवे कि जो:- अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः खयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः । जनधन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ १॥ अविवायां पहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति वालाः । यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात् तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ २॥ मुण्ड० । खं० २। मं०८॥ जो अविद्या के भीतर खेल रहे अपने को धीर और पंडित मानते हैं वे नीच गति को जाने- हारे मूढ़ जैसे अंधे के पीछे अंधे दुर्दशा को प्राप्त होते हैं वैसे दुःखों को पाते हैं ॥१॥जो यहुधा अविद्या में रमण करनेवाले बालवुद्धि हम कृतार्थ हैं ऐसा मानते हैं जिसको केवल कर्मकांडी लोग राग से मोहित होकर नहीं जान और जना सकते वे आतुर होके जन्म मरणरूप दुःख मे गिरे रहते हैं ॥२॥ इसलियेः- वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परा- मृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ मुण्ड० । ख० २ । मं० ६ ॥ जो वेदान्त अर्थात् परमेश्वर प्रतिपादक वेदमन्त्रों के अर्थशान और आचार में अच्छे प्रकार निश्चित संन्यासयोग से शुद्धान्तःकरण संन्यासी होते हैं वे परमेश्पर में मुक्तिसुख को प्राप्त हो भोग के पश्चात् जब मुक्ति में सुख की अवधि पूरी हो जाती है तब वहां से छूटकर संसार में आते हैं मुक्ति के विना दुःख का नाश नहीं होता क्योंकिः- न चै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपइतिरस्त्यशरीरं वायसन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः॥ दान्दो० । [प्र० ८ । खं० १२] जो देहधारी है वह सुख दुःख की प्राति से पृथक् कभी नहीं रह सकता और जो शरीर- रहित जीवात्मा मुक्ति में सर्वव्यापक परमेश्वर के साथ शुद्ध होकर रहता है तब उसको सांसारिक मुख दुःस प्राप्त नहीं होता इसलिये:- पारा विवावार बोकषणायाब न्युत्थायाथमिचाचर्य परन्ति । ग्रा० ० १४।०५।०२।२०१] २ सत्यार्थ प्रकाश + क त लोक में प्रतिष्ठा वा लाभ धन से भोग वा मान्य पुत्रादि के मोह से अलग हो के संन्यास्र लोग भिक्षुक होकर रात दिन मोक्ष के साधनों में तत्पर रहते हैं। प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं तस्यां सर्ववेदसं हुत्वा ब्राह्मणः प्रव्रजेत् ॥ १॥ यजुर्वेदत्राह्मणे ॥ प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम् । श्रात्मन्यग्नीन्समारोप्य ब्राह्मणः प्रबजेद् गृहात् ॥२॥ यो दत्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभयं गृहात् । तस्य तेजोमया लोका भवन्ति ब्रह्मवादिनः ॥३॥ । मनु० [६ । ३८ । ३६] प्रजापति अर्थात् परमेश्वर की प्राप्ति के अर्थ इष्टि अर्थात् या करके उसमें यशोपवीत शिखादि चिह्नों को छोड़ आहवनीयादि पांच अग्नियों को प्राण, अपान, ब्यान, उदान और समान इन पांच प्राणों में आरोपण करके ब्राह्मण ब्रह्मवित् घर से निकल कर संन्यासी हो जावे ॥ १॥२ सब भूत प्राणिमात्र को अभयदान देकर घर से निकल के संन्यासी होता है उस ब्रह्मवादी अर्थात् परमेश्वरप्रकाशित वेदोक्त धर्मादि विद्याओं के उपदेश करनेवाले संन्यासी के लिये प्रकाशमय अर्थात् मुक्ति का आनन्दवरूप लोक प्राप्त होता है । (प्रश्न ) संन्यासियों का क्या धर्म है ? ( उत्तर ) धर्म 'पक्षपातरहित न्यायाचरण, सत्य का ग्रहण, असत्य का परित्याग, वेदोक्त ईश्वर की आज्ञा का पालन, परोपकार, सत्यभापणादि लक्षण सव आश्रमियो का अर्थात् सव मनुष्यमान का एक ही है परन्तु संन्यासी का विशेष धर्म यह है कि:- दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिवेत् । सत्यपूतां वदेवाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥ १॥ बुद्धयन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं वदेत् । सप्तद्वारावकीणां च न वाचमनृतां वदेत् ॥ २ ॥ 'अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः । आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ।। ३ ॥ क्लुप्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान् । विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ ४ ॥ इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वेषक्षयेण च । अहिंसया च भूतानाममृतत्वाय कल्पते ॥ ५ ॥ दुषितोऽपि चरेद्धम यत्र तत्राश्रमे रतः । समः सर्वेषु भूतेषु न लिंग धर्मकारणम् ॥ ६ ॥ फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्वुप्रसादकम् । न नामग्रहणादेव तस्य बारि प्रसीदति ॥ ७ ॥ प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोपि विधिवत्कृताः । व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमन्तपः ॥ ८ ॥ दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः । तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोपाः प्राणस्य निग्रहात् ॥६॥ प्राणायामैर्दहेदोषान् धारणाभिश्च किल्विपम् । प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान् ॥१०॥ उच्चावचेषु भूतेषु दुर्जेयामकृतात्माभिः । ध्यानयोगेन संपश्येद् गतिमस्यान्तरात्मनः ॥ ११ ॥ अहिंसयेन्द्रियासऑर्वेदिकैश्चैव कर्मभिः । तपसश्चरणैश्चोगुस्साधयन्तीह तत्पदम् ॥ १२ ॥ यदा भावेन भवति सर्वभावेषु निस्पृहः । तदा सुखमवाप्नोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ।। १३ ।। चतुर्भिरपि चैवैतैनित्यमाश्रमिभिर्विजैः । दशलक्षणको धर्मः सेवितव्यः प्रयत्नतः ॥ १४ ॥ 'वृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ १५ ॥ भनेन विधिना सर्वास्त्यनका संगा-शनैः शनैः । सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्को ब्रह्मण्येवावतिष्ठते ॥ १६ ॥ स० प्र०६।[४६॥ ४८ ॥ १६ ॥ ५२ । ६० । ६६ । ६७ । ७०-७३ । ७५ । ८०।८१ । ६१ । ६२] . - .

बि पाई पंचमसमुन्नासः जब सन्यासी मार्ग में चले तब इधर उधर न देखकर नीचे पृथिवी पर दृष्टि रख के चले। सदा वस्त्र से छान के जल पिये निरन्तर सत्य ही वोले सर्वदा मन से विचार के सत्य का ग्रहण कर असत्य को छोड़ देवे ॥१॥ जव कही उपदेश वा संवादादि में कोई संन्यासी पर क्रोध करे अथवा निन्दा करे तो सन्यासी को उचित है कि उस पर आप क्रोध न करे किन्तु सदा उसके कल्याणार्थ उपदेश ही करे और एक मुख का, दो नासिका के, दो आंख के और दो कान के छिद्रो मे बिखरी हुई वाणी को किसी कारण से मिथ्या कभी न बोले ॥ २॥ अपने आत्मा और परमात्मा में स्थिर अपेक्षारहित मद्य मांसादि वर्जित होकर श्रात्मा ही के सहाय से सुखार्थी होकर इस संसार में धर्म और विद्या के बढ़ाने में उप- देश के लिये सदा विचरता रहे ॥ ३ ॥ केश, नख, डाढ़ी, मूछ को छेदन करवावे सुन्दर पात्र दण्ड और कुसुम्भ श्रादि से रंगे हुए वस्त्रों को ग्रहण करके निश्चितात्मा सव भूतों को पीड़ा न देकर सर्वत्र विचरे ॥ ॥ ४ ॥ इन्द्रियों को श्रधर्माचरण से रोक, रागद्वेप को छोड़, सब प्राणियों से निवैर वर्तकर मोक्ष के लिये सामर्थ्य बढ़ाया करे ॥ ५॥ कोई संसार मे उसको दूषित वा भूषित करे तो भी जिस किसी आ- श्रम में वर्त्तता हुआ पुरुष अर्थात् संन्यासी सब प्राणियों में पक्षपातरहित होकर स्वयं धर्मात्मा और अन्यों को धर्मात्मा करने में प्रयन किया कर । और यह अपने मन में निश्चित जाने कि दण्ड, कमण्डलु और कापायवस्त्र आदि चिह्न धारण धर्म का कारण नहीं हैं, सव मनुष्यादि प्राणियों के सत्योपदेश और विद्यादान से उन्नति करना संन्यासी का मुख्य कर्म है ॥ ६ ॥ क्योकि यद्यपि निर्मली वृक्ष का फल पीस के गदर जल में डालने से जल का शोधक होता है तदपि विना [ उसके ] डाले उसके नामकथन वा श्रवणमात्र से जल शुद्ध नहीं हो सकता ॥ ७॥ इसलिये ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मवित् संन्यासी को उचित है कि ओंकारपूर्वक सप्तव्याहृतियों से विधिपूर्वक प्राणायाम जितनी शक्ति हो उतने करे परन्तु तीन से { तो न्यून प्राणायाम कभी न करे यही संन्यासी का परमतप है ॥ ८॥ क्योंकि जैसे अग्नि में तपाने और गलाने से धातुओ के मल नष्ट होजाते हैं वैसे ही प्राणो के निग्रह से मन श्रादि इन्द्रियो के दोष भस्मी- भूत होते हैं ॥ ६ ॥ इसतिये संन्यासी लोग नित्यप्रति प्राणायामों से श्रात्मा, अन्तःकरण और इन्द्रियों के दोप, धारणाओ से पाप, प्रत्यहार से संगदोप, ध्यान से अनीश्वर के गुणों अर्थात् हर्प शोक और अविद्यादि जीव के दोपों को भस्मीभूत करें ॥ १० ॥ इसी ध्यानयोग से जो अयोगी अविद्वानों को दुःख से जानने योग्य छोटे बड़े पदार्थों में परमात्मा की व्याप्ति उसको और अपने आत्मा और अन्तर्यामी परमेसर की गति को देखे ॥ ११॥ जव भूतों से निर्वैर इन्द्रियों के विषयो का त्याग, वेदोक्त कर्म और अत्युन तपश्चरण ले इस संसार में मोक्षपद को पूर्वोक्त सन्यासी ही सिद्ध कर और करा सक्ने हैं अन्य कोई नहीं ॥ १२ ॥ जव सन्यासी सब भावों में अर्थात् पदार्थों में निःस्पृह कांक्षारहित और सब बाहर भीतर के व्यवहारों में भाव से पवित्र होता है तभी इस देह में और मरण पाके निरन्तर सुख को प्राप्त । होता है ॥ १३ ॥ इसलिये ब्रहाचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासियों को योग्य है कि प्रयत्न से दश लक्षणयुक्त निम्नलिखित धर्म का सेवन करें ।। १४ ॥ पहिला लक्षण-(धृति ) सदा धैर्य रखना । दुसरा-- (क्षमा) जोकि निन्दा स्तुति मानापमान हानिलाम अादि दुःखो में भी सहनशील रहना । तीसरा- (दम ) मन को सदा धर्म में प्रवृत कर शवम से रोक देना अर्थात् अधर्म करने की इच्छा भी न उठे। चौथा-(भस्तेय ) चोरीत्याग र्थात् विना पाता वा छल कपट विश्वासघात वा किसी व्यवहार तथा पेपिर उपदेश त परपदार्थ का ग्रहण करना चोरी और उसको छोड़ देना साहकारी कहानी है। पाचवा सोच ) रागडेप पापात छोड़ो भीतर और जल मृत्तिका मार्जन श्रादि से बाहर की एवि. प्रता रखनी । इटा-(दन्दिरनिना)माचरणों से रोक के इन्द्रिता को धर्म ही में सदा चलाना। di-(पी.) गावालय भिनान जन्य पदार्थ दु का सह प्रालस्य प्रमाद यादि को छोड़ के सत्यार्थप्रकाश A - लोक में प्रतिष्ठा वा लाभ धन से भोग वा मान्य पुत्रादि के मोह से अलग हो के संन्या लोग भिक्षुक होकर रात दिन मोक्ष के साधनों में तत्पर रहते हैं । प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं तस्यां सर्ववेदसं हुत्वा ब्राह्मणः प्रव्रजेत् ।। १ ॥ यजुर्वेदत्रामणे ।। प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम् । अात्मन्यग्नीन्समारोप्य ब्राह्मण प्रबजेद् गृहात् ॥२॥ यो दत्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभयं गृहात् । तस्य तेजोमया लोका भवन्ति ब्रह्मवादिनः ॥३॥ मनु० [६ । ३८ । ३६] प्रजापति अर्थात् परमेश्वर की प्राप्ति के अर्थ इष्टि अर्थात् यश करके उसमें "शिखादि चिह्नों को छोड़ आहवनीयादि पांच अग्नियों को प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान पांच प्राणों में प्रारोपण करके ब्राह्मण ब्रह्मवित् घर से निकल कर संन्यासी हो जाये ॥ १ ॥२॥ सब भूत प्राणिमात्र को अभयदान देकर घर से निकल के संन्यासी होता है उस ब्रह्मवादी अर्था परमेश्वरप्रकाशित वेदोक्त धर्मादि विद्याओ के उपदेश करनेवाले संन्यासी के लिये प्रकाशमय अर्थ मुक्ति का आनन्दस्वरूप लोक प्राप्त होता है । (प्रश्न ) संन्यासियों का क्या धर्म है ? ( उत्तर ) धर्म पक्षपातरहित न्यायाचरण, सत्य का ग्रहण, असत्य का परित्याग, वेदोक्त ईश्वर की आज्ञा का पाल परोपकार, सत्यभापणादि लक्षण सव आश्रमियो का अर्थात् सब मनुष्यमात्र का एक ही है परन्तु संन्यासी का विशेष धर्म यह है कि:- दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिवेत् । सत्यपूतां वदेवाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥ १॥ क्रुद्धचन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं वदेत् । सप्तद्वारावकीणां च न वाचमनृतां वदेत् ॥ २ ॥ अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः । आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ।। ३ ॥ क्लुप्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान् । विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ ४ ॥ इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वेपक्षयेण च । अहिंसया च भूतानाममृतत्वाय कल्पते ॥ ५ ॥ दुषितोऽपि चरेद्धर्म यत्र तत्राश्रमे रतः । समः सर्वेषु भूतेषु न लिंग धर्मकारणम् ॥ ६ ॥ फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम् । न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीइति ॥ ७ ॥ प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोपि विधिवत्कृताः । व्याहृतिप्रणयुक्ता विज्ञेयं परमन्तपः ॥८॥ दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः । तथेन्द्रियाणां दद्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥६॥ प्राणायामैदहेदोषान् धारणाभिश्च किरिखपम् । प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान् ॥१०॥ उच्चावचेषु भूतेषु दुईयामकृतात्मभिः । ध्यानयोगेन संपश्येद् गतिमस्यान्तरात्मनः ॥ ११ ॥ अहिंसयेन्द्रियासहैवैदिकश्चैव कर्मभिः । तपसश्चरणैश्चोग्रैस्साधयन्तीह तत्पदम् ।। १२ ।। यदा भावेन भवति सर्वभावेषु निस्पृहः । तदा सुखमवाप्नोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ १३ ॥ चतुर्भिरपि चैचैतैर्नित्यमाश्रमिभिर्विजैः । दशलक्षणको धर्मः सेवितव्यः प्रयत्नतः ॥ १४ ॥ "वृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ १५ ॥ अनेन विधिना सर्वास्त्यका संगाशनैः शनैः। सर्वद्धन्द्रविनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते ॥ १६ ॥ सजु०प्र०६।[४६। ४८ । ४६ । ५२ । ६० । ६६ । ६७ । ७०-७३ । ७५ । ८००१ । ६१ । ६२] : 7 .

क पंचमसमुल्लासा जब सन्यासी मार्ग में चले तय इधर उधर न देखकर नीचे पृथिवी पर दृष्टि रस के चले। सदा वस्त्र से छान के जल पिये निरन्तर सत्य ही योले सर्वदा मन से विचार के सत्य का ग्रहण कर असत्य को छोड़ देवे ॥१॥ जब कही उपदेश वा संवादादि में कोई संन्यासी पर क्रोध करे अथवा निन्दा करे तो संन्यासी को उचित है कि उस पर आप क्रोध न करे किन्तु सदा उसके कल्याणार्थ उपदेश ही करे और एक मुख का, दो नासिका के, दो आंख के और दो कान के विद्रो मे विखरी हुई वाणी को किसी कारण से मिथ्या कभी न बोले ॥ २॥ अपने यात्मा और परमात्मा में स्थिर अपेक्षारहित मद्य मांसादि वर्जित होकर श्रात्मा ही के सहाय से सुखार्थी होकर इस संसार में धर्म और विद्या के बढ़ाने में उप- देश के लिये सदा विचरता रहे ॥ ३॥ केश, नख, डाढ़ी, मूछ को छेदन करवावे सुन्दर पान दण्ड और कुसुम्भ श्रादि से रंगे हुए वस्त्रों को ग्रहण करके निश्चितात्मा सव भूतों को पीड़ा न देकर सर्वत्र विचरे ॥ ४ ॥ इन्द्रियों को अधर्माचरण से रोक, रागद्वेप को छोड़, सब प्राणियों से निवैर वर्तकर मोक्ष के लिये सामर्थ्य बढ़ाया करे ॥ ५॥ कोई संसार में उसको दूपित चा भूपित करे तो भी जिस किसी आ- श्रम में वर्त्तता हुआ पुरुष अर्थात् संन्यासी सव प्राणियों में पक्षपातरहित होकर स्वयं धर्मात्मा और अन्यों को धर्मात्मा करने में प्रयत किया कर । और यह अपने मन में निश्चित जाने कि दण्ड, कमण्डलु और काषायवस्त्र आदि चिह्न धारण धर्म का कारण नहीं हैं, सब मनुष्यादि प्राणियों के सत्योपदेश और विद्यादान से उन्नति करना सन्यासी का मुख्य कर्म है ॥ ६ ॥ क्योंकि यद्यपि निर्मली वृक्ष का फल पीस के गदर जल मे डालने से जल का शोधक होता है तदपि विना [ उसके ] डाले उसके नामकथन वा श्रवणमात्र से जल शुद्ध नहीं हो सकता ।। ७ । इसलिये ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मवित् सन्यासी को उचित है कि ओंकारपूर्वक सप्तन्याहृतियों से विधिपूर्वक प्राणायाम जितनी शक्ति हो उतने करे परन्तु तीन से तो न्यून प्राणायाम कभी न करे यही संन्यासी का परमतप है ॥८॥ क्योंकि जैसे अग्नि में तपाने और गलाने से धातुओं के मल नष्ट होजाते हैं वैसे ही प्राणो के निग्रह से मन आदि इन्द्रियों के दोप भस्मी- भूत होते हैं ॥ ६ ॥ इसतिये संन्यासी लोग नित्यप्रति प्राणायामों से आत्मा, अन्तःकरण और इन्द्रियों के दोप, धारणाओं से पाप, प्रत्यहार से संगदोप, ध्यान से अनीश्वर के गुणों अर्थात् हर्प शोक और अविद्यादि जीव के दोषों को भस्मीभूत करें ॥ १० ॥ इसी ध्यानयोग से जो अयोगी अविद्वानों को से जानने योग्य छोटे बड़े पदार्थों में परमात्मा की व्याप्ति उसको और अपने आत्मा और अन्तर्यामी परमेश्वर की गति को देखे ॥ ११ ॥ जव भूतों से निर्वैर इन्द्रियों के विपयो का त्याग, वेदोक्त कर्म और अत्युग्र तपश्चरण ले इस संसार में मोक्षपद को पूर्वोक्त संन्यासी ही सिद्ध कर और करा सक्ने हैं अन्य कोई नहीं ॥ १२ ॥ जव सन्यासी सब भावों में अर्थात् पदार्थों में निःस्पृह कांक्षारहित और सव बाहर भीतर के व्यवहारों मे भाव से पवित्र होता है तभी इस देह में और मरण पाके निरन्तर सुख को प्राप्त होता है ॥ १३ ॥ इसलिये ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासियों को योग्य है कि प्रयत्न से दश लक्षणयुक्त निम्नलिखित धर्म का सेवन करें ॥ १४ ॥ पहिला लक्षण-(धृति ) सदा धैर्य रखना। दूसरा-- (क्षमा) जोकि निन्दा स्तुति मानापमान हानिलाभ आदि दुःखो मे भी सहनशील रहना । तीसरा- (दम ) मन को सदा धर्म में प्रवृत्त कर अधर्म से रोक देना अर्थात् अधर्म करने की इच्छा भी न उठे। चौथा-(अस्तेय ) चोरीत्याग अर्थात् विना आज्ञा वा छल कपट विश्वासघात वा किसी व्यवहार तथा वेदविरुद्ध उपदेश से परपदार्थ का ग्रहण करना चोरी और उसको छोड़ देना साहूकारी कहाती है। पांचवां--(शौच ) रागद्वेष पक्षपात छोड़ के भीतर और जल मृत्तिका मार्जन श्रादि से बाहर की पवि- त्रता रखनी । छठा-( इन्द्रियनिग्रह ) अधर्माचरणों से रोक के इन्द्रियो को धर्म ही मे सदा चलाना। सातवां-(धीः) मादकद्रव्य बुद्धिनाशक अन्य पदार्थ दुष्टो का सङ्ग बालस्य प्रमाद अादि को छोड़ के सत्यार्थप्रायः अप्ठ पदार्थों का सेवन सत्पुरुषों का सङ्ग योगाभ्यास से बुद्धि को बढ़ाना । आठवां-(विद्या) पृथिः से लेके परमेश्वर पर्यन्त यथार्थज्ञान और उनसे यथायोग्य उपकार लेना सत्य जैसा आत्मा में वैसाम में, जैसा मन में वैसा वाणी में, जैसा वाणी में वैसा कर्म में वर्त्तना विद्या, इससे विपरीत प्राविद्या है। नववां-(सत्य) जो पदार्थ जैसा हो उसको वैसा ही समझना, वैसा ही बोलना और वैसा ही करता भी । तथा दशवां-(अक्रोध) क्रोधादि दोषों को छोड़के शान्त्यादि गुणों को ग्रहण करना धर्म या लक्षण है। इस दश लक्षणयुक्त पक्षपातरहित न्यायाचरण धर्म का सेवन चारो श्राश्रमवाले करें और .. वेदोक्त धर्म ही में आप चलना और दूसरों को समझा कर चलाना संन्यासियों का विशेष धर्म है ॥१॥ इसी प्रकार से धीरे २ सब संगदोषों को छोड़ हर्ष शोकादि सब द्वन्द्वों से विमुक्त होकर संन्यासी ही में अवस्थित होता है संन्यासियों का मुख्य कर्म यही है कि सब गृहस्थादि आश्रमों को सब प्रकार के व्यवहारों का सत्य निश्चय करा अधर्म व्यवहारों से छुड़ा सब संशयो का छेदन कर सत्य धर्मयुद्ध व्यवहारों में प्रवृत्त कराया करें ॥ १६ ॥ (प्रश्न ) संन्यासग्रहण करना ब्राह्मण ही का धर्म है वा क्षत्रियादि का भी ? (उत्तर) बाहर ही को अधिकार है क्योंकि जो सव वर्गों में पूर्ण विद्वान् धाम्मिक परोपकारप्रिय मनुष्य है उसी म ब्राह्मण नाम है विना पूर्ण विद्या के धर्म, परमेश्वर की निष्ठा और वैराग्य के संन्यास ग्रहण करने में संसार का विशेष उपकार नही हो सकता इसीलिये लोकश्रुति है कि ब्राह्मण को संन्यास का भधिकार है अन्य को नहीं यह मनु का प्रमाण भी है:-- एष बोऽभिहितो धर्मो ब्राह्मणस्य चतुर्विधः । पुण्योऽक्षयफलः प्रेत्य राजधर्मान् निबोधत ॥ मनु०६ ॥ ७॥ यह मनुजी महाराज कहते हैं कि हे ऋषियो ! यह चार प्रकार अर्थात् ब्रह्मचर्य, [गृहस्थ वानप्रस्थ और संन्यासाश्रम करना ब्राह्मण का धर्म है यहां वर्तमान में पुण्यखरूप और शरीर पर पश्चात् मुक्तिरूप अक्षय आनन्द का देनेवाला संन्यास धर्म है इसके आगे राजाओं का धर्म मुझ से सुनो। इससे यह सिद्ध हुआ कि संन्यासग्रहण का अधिकार मुख्य करके ब्राह्मण का है और क्षत्रियादि का ब्रह्मचर्याश्रम है (प्रश्न ) सन्यासग्रहण की आवश्यकता क्या है ? ( उत्तर ) जैसे शरीर मे शिर की आवश्यकता वैसे ही आश्रमों में संन्यासाश्रम की आवश्यकता है क्योकि इस के विना विद्या धर्म कभी नही बढ़ सकता और दूसरे श्राश्रमों को विद्याग्रहण गृहकृत्य और तपश्चर्यादि का सम्बन्ध होने से अव. काश बहुत कम मिलता है । पक्षपात छोड़ कर वर्तना दूसरे श्राश्रमो को दुष्कर है जैसा सन्यासी सर्वतोमुक्त होकर जगत् का उपकार करता है वैसा अन्य पाश्रमी नहीं कर सकता क्योकि संन्यासी को सत्यविद्या से पदार्थों के विज्ञान की उन्नति का जितना अवकाश मिलता है उतना अन्य आश्रमी को नहीं मिल सकता । परन्तु जो ब्रह्मचर्य से संन्यासी होकर जगत् को सत्य शिक्षा करके जितनी उन्नति कर सकता है, उतनी गृहस्थ वा वानप्रस्थ आश्रम करके संन्यासाश्रमी नही कर सकता ( प्रश्न) सन्यास ग्रहण करना ईश्वर के अभिप्राय से विरुद्ध है क्योकि ईसर का अभिप्राय मनुष्यो की वढती करने में है जव गृहाश्रम नहीं करेगा तो उससे सन्तान ही न होगे । जब संन्यासाश्रम ही मुख्य है और सब मनुष्य करे तो मनुष्यो का मूलच्छेदन हो जायगा ( उत्तर ) अच्छा, विवाह करके भी बहुतों के सन्तान नहीं होते अथवा होकर शीव नष्ट हो जाते हैं फिर वह भी ईश्वर के अभिप्राय से विरुद्ध करने वाला हुआ जो तुम कहो कि "यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोपः" यह किसी कवि कावचन है, अर्थ- मो यत्न करने से भी कार्य सिद्ध न हो तो इसमे क्या दोष ? अर्थात् कोई भी नहीं । तो हम तुम से पंचमसमुहास छते हैं कि गृहाश्रम से बहुत सन्तान होकर आपस में विरुद्धाचरण कर लड़ मरें तो हानि कितनी गड़ी होती है, समझ के विरोध से लड़ाई बहुत होती है, जब संन्यासी एक वेदोक्तधर्म के उपदेश से गरस्पर प्रीति उत्पन्न करावेगा तो लाखों मनुष्यों को बचा देगा सहनों गृहस्थ के समान मनुष्यों की आदती करेगा और सव मनुष्य सन्यासग्रहण कर ही नहीं सकते क्योंकि सव की विपयासक्ति कभी नही छूट सकेगी, जो २ संन्यासियों के उपदेश से धार्मिक मनुष्य होंगे वे सब जानो संन्यासी के पुत्र तुल्य हैं (प्रश्न) संन्यासी लोग कहते हैं कि हमको कुछ कर्त्तव्य नहीं अन्न वस्त्र लेकर आनन्द में हना, अविद्यारूप संसार से माथापच्ची क्यों करना ? अपने को ब्रह्म मानकर सन्तुष्ट रहना, कोई आकर पूछे तो उसको भी वैसा ही उपदेश करना कि तू भी ब्रह्म है तुझ को पाप गुण्य नही लगता क्योंकि शीतोष्ण शरीर, तुधा तृपा प्राण, और सुख दुःख मन का धर्म है । जगत् मिथ्या और जगत् के व्यवहार भी सव कल्पित अर्थात् झूठे हैं इसलिये इस में फंसना बुद्धिमानों का काम नहीं। जो कुछ पाप पुण्य होता है वह देह और इन्द्रियों का धर्म है श्रात्मा का नही, इत्यादि उप- देश करते हैं और आपने कुछ विलक्षण सन्यास का धर्म कहा है अव हम किसकी बात सच्ची और किसकी झूठी मानें ? ( उत्तर ) क्या उनको अच्छे कर्म भी कर्त्तव्य नहीं ? देखो "वैदिकैश्चैव कर्मभिः" मनुजी ने वैदिक कर्म, जो धर्मयुक्त सत्य कर्म हैं, संन्यासियों को भी अवश्य करना लिखा है । क्या भो- -जन छादनादि कर्म वे छोड़ सकेंगे ? जो ये कर्म नहीं छूट सकते तो उत्तम कर्म छोड़ने से वे पतित और पापभागी नहीं होंगे ? जब गृहस्थों से अन्न वस्त्रादि लेते हैं और उनका प्रत्युपकार नहीं करते तो क्या वे महापापी नहीं होंगे ? जैसे आंख से देखना कान से सुनना न हो तो आंख और कान, का होना व्यर्थ है वैसे ही जो संन्यासी सत्योपदेश और वेदादि सत्यशास्त्रों का विचार, प्रचार नहीं करते तो वे भी ज- गत् में व्यर्थ भाररूप हैं। और जो अविद्यारूप संसार से माथापच्ची क्यों करना आदि लिखते और कहते हैं वैसे उपदेश करनेवाले ही मिथ्यारूप और पाप के वढ़ानहारे पापी हैं । जो कुछ शरीरादि से कर्म किया जाता है वह सब आत्मा ही का और उसके फल का भोगने वाला भी प्रात्मा है । जो जीव को ब्रह्म बतलाते हैं वे अविद्या निद्रा में सोते हैं। क्योंकि जीव अल्प, अल्पज्ञ और ब्रह्म सर्वव्यापक स- र्यक्ष है ब्रह्म नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभावयुक्त है और जीव कभी बद्ध कभी मुक्त रहता है । ब्रह्म को सर्वव्यापक सर्वज्ञ होने से भ्रम वा अविद्या कभी नहीं हो सकती और जीव को कभी विद्या और कभी अविद्या होती है ब्रह्म जन्ममरण दुःख को कभी नही प्राप्त होता और जीव प्राप्त होता है इसलिये वह उनका उपदेश मिथ्या है (प्रश्न ) संन्यासी सर्व कर्मविनाशी और अग्नि तथा धातु को स्पर्श नही करते यह बात सच्ची है वा नहीं (उत्तर) नहीं "सम्यङ् नित्यमास्ते यस्मिन् यद्वा सम्यङ् न्यस्यान्त दु:- बानि कर्माणि येन स सन्यासः स प्रशस्तो विद्यते यस्य स सन्यासी" जो ब्रह्म और जिससे दुष्ट कर्मों का स्याग किया जाय वह उत्तम स्वभाव जिस में हो वह संन्यासी कहाता है इसमें सुकर्म का कर्ता और दुष्ट कर्मों का नाश करनेवाला संन्यासी कहाता है (प्रश्न ) अध्यापन और उपदेश गृहस्थ किया करते हैं पुनः संन्यासी का क्या प्रयोजन है ? ( उत्तर ) सत्योपदेश सव श्राश्रमी करें और सुने परन्तु जितना अवकाश और निष्पक्षपातता संन्यासी को होती है उतनी गृहस्थों को नही । हां, जो ब्राह्मण हैं उनका यही काम है कि पुरुष पुरुषों को और स्त्री स्त्रियों को सत्योपदेश और पढ़ाया करे | जितना भ्रमण का अवकाश संन्यासी को मिलता है उतना गृहस्थ ब्राह्मणादिकों को कभी नहीं मिल सक्ता । जब ब्राह्मण घेदविरुद्ध आचरण करे तव उनका नियन्ता संन्यासी होता है । इसलिये संन्यास का होना उचित है। (प्रश्न ) "एकरात्रि वसेद् ग्रामे" इत्यादि वचनों से संन्यासी को एकत्र एकरात्रिमात्र रहना श्राधिक नि- पास न करना चाहिये । ( उत्तर ) यह वात थोड़े से अंश में तो अच्छी है कि प्रवास करने से १२ ८६ सत्यार्थप्रकाश J " A ५ - का उपकार अधिक नहीं हो सकता और स्थानान्तर का भी अभिमान होता है राग द्वेप भी अधिक होता है परन्तु जो विशेष उपकार एकत्र रहने से होता हो तो रहे जैसे जनक राजा के यहां चार चा महीने तक पञ्चशिखादि और अन्य संन्यासी कितने ही वर्षों तक निवास करते थे । और "एकत्र । रहना" यह वात आज कल के पाखण्डी सम्प्रदायियो ने वनाई है । क्योंकि जो संन्यासी एकत्र धिक रहेगा तो हमारा पाखण्ड खण्डित होकर अधिक न बढ़ सकेगा (प्रश्न):- यतीनां काञ्चनं दद्यात्ताम्बूलं ब्रह्मचारिणाम् । चौराणामभयं दद्यात्स नरो नरकं ब्रजेत् । इत्यादि वचनो का अभिप्राय यह है कि संन्यासियों को जो सुवर्ण दान दे तो दाता मरक प्राप्त होवे ( उत्तर ) यह बात भी वर्णाश्रमविरोगी सम्प्रदायी और स्वार्थसिन्धुवाले पौराणिकों की हुई है, क्योंकि संन्यासियों को धन मिलेगा तो वे हमारा खण्डन बहुत कर सकेंगे और हमारी होगी तथा वे हमारे आधीन भी न रहेंगे और जव भिक्षादि व्यवहार हमारे आधीन रहेगा तो डरते जब मूर्ख और स्वार्थियो को दान देने में अच्छा समझते हैं तो विद्वान् और परोपकारी संन्यासियों देने में कुछ भी दोष नही हो सकता देखो मनु० विविधानि च रत्नानि विविक्तेषूपपादयेत् ॥ नाना प्रकार के रत्न सुवर्णादि धन (विविक्त ) अर्थात् सन्यासियों को देवे और वह श्रोश भी अनर्थक है क्योकि सन्यासी को सुवर्ण देने से यजमान नरक को जावे तो चादी, मोती, हीरा आदि देने से स्वर्ग को जायगा (प्रश्न ) यह पण्डितजी इसका पाठ बोलते भूल गये यह ऐसा है कि “यति हस्ते धनं दद्यात्' अर्थात् जो संन्यासियो के हाथ में धन देता है वह नरक में जाता है (उत्तर) या भी वचन अविद्वान् ने कपोलकल्पना से रचा है । क्योकि जो हाथ मे धन देने से दाता नरक को जब तो पग पर धरने वा गठरी वांधकर देने से स्वर्ग को जायगा इसलिये ऐसी कल्पना मानने योग्य नहीं। हां, यह बात तो है कि जो संन्यासी योगक्षेम से अधिक रक्खेगा तो चोरादि से पीड़ित और मोहित भी हो जायगा परन्तु जो विद्वान् है वह अयुक्त व्यवहार कभी न करेगा, न मोह में फंसेगा क्योंकि का प्रथम गृहाश्रम में अथवा ब्रह्मचर्य में सव भोग कर वा सब देख चुका है और जो ब्रह्मचर्य से होता। वह पूर्ण वैराग्ययुक्त होने से कभी कही नही फँसता (प्रश्न ) लोग कहते हैं कि श्राद्ध मे संन्यासी श्रावे या जिमावे तो उसके पितर भाग जाये और नरक में गिरें ( उत्तर ) प्रथम तो मरे हुए पितरों का आना और किया हुआ श्राद्ध मरे हुए पितरो को पहुंचाना ही असम्भव वेद और युक्तिविरुद्ध होने से मिथ्या है। और जब आते ही नही तो भाग कौन जायेगे जव अपने पाप पुण्य के अनुसार ईश्वर की व्यवस्था से मरण के पश्चात् जीव जन्म लेते हैं तो उनका श्राना कैसे हो सकता है ? इसलिये यह भी वात पेटा पुराणी और वैरागियों की मिथ्या कल्पी हुई है। यह तो ठीक है कि जहां संन्यासी जायेंगे वहां यह मृतकश्राद्ध करना वेदादि शास्त्रो से विरुद्ध होने से पाखण्ड दूर भाग जायेगा (प्रश्न ) जो ब्रह्मचर्य से सन्यास लेवेगा उसका निर्वाह कठिनता से होगा और काम का रोकना भी अति कठिन. है इसतिये, गृहाश्रम वानप्रस्थ होकर जब वृद्ध होजाय तभी संन्यास लेना अच्छा है ( उत्सर) जो निर्वाह न कर सके इन्द्रियों को न रोक सके वह ब्रह्मवयं संन्यास न लेवे, परन्तु जो रोक सके वह क्यों न लेवे.' जिस पुरुप ने विषय के दोष और वीर्यसंरक्षण के गुण जाने हैं वह विषयासक्त कभी नहीं होता और उनका वीर्य विचाराग्नि का इन्धनवत् है अर्थात् उसी में व्यय होजाता है। जैसे वैद्य और औषधों की आवश्यक्ता रोगी के तिये होती है वैसी नीरोगी के लिये नही । इसी प्रकार जिस पुरुष वा खा से - . पंचमसमुल्लास ७ को विद्या धर्मवृद्धि और सब संसार का उपकार करना ही प्रयोजन हो वह विवाह न करे । जैसे पंचशिखादि पुरुष और गार्गी आदि स्त्रियां हुई थी इसलिये संन्यासी का होना अधिकारियों को उचित है और जो अनधिकारी संन्यासग्रहण करेगा तो आप इवेगा औरो को भी बुवावेगा जैसे सम्राट" चक्रवर्ती राना होता है वैसे "परिवाद' संन्यासी होता है प्रत्युत राजा अपने देश में वा स्वसम्वन्धियों में सत्कार पाता है और संन्यासी सर्वत्र पूजित होता है ॥ विद्धत्त्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन । स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥१॥ [ यह ] चाणक्य नीतिशास्त्र का श्लोक है--विद्वान् और राजा की कभी तुल्यता नहीं हो लकती क्योकि राजा अपने राज्य ही में मान और सत्कार पाता है और विद्वान् सर्वत्र मान और प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है। इसलिये विद्या पढ़ने, सुशिक्षा लेने और बलवान् होने श्रादि के लिये ब्रह्मचर्य, जब प्रकार के उत्तम व्यवहार सिद्ध करने के अर्थ गृहस्थ, विचार ध्यान और विज्ञान बढ़ाने तपश्चर्या करने के लिये वानप्रस्थ और वेदादि सत्यशास्त्रों का प्रचार, धर्म व्यवहार का ग्रहण और दुष्ट व्यवहार के त्याग, सत्योपदेश और सब को निःसंदेह करने आदि के लिये संन्यासाश्रम है । परन्तु जो इस न्यास के मुख्य धर्म सत्योपदेशादि नहीं करते थे पतित और नरकगामी हैं। इससे संन्यासियो को चित है कि सत्योपदेश शङ्कासमाधान, वेदादि सत्यशास्त्रों का अध्यापन और वेदोक्त धर्म की वृद्धि इयत्न से करके सब संसार की उन्नति किया करे (प्रश्न ) जो संन्यासी से अन्य साधु, वैरागी, गुसाई, साखी आदि हैं वे भी संन्यासाश्रम मे गिने जायेगे या नहीं ? ( उत्तर) नही पांकि उनमे संन्यास का एक भी लक्षण नहीं, चे वेदविरुद्ध मार्ग में प्रवृत्त होकर वेद से [ अधिक ] अपन संप्रदाय के प्राचार्यो. वचन मानते और अपने ही मत की प्रशंसा करते मिथ्या प्रपंच में फंसकर अपने स्वार्थ के लिये, सरों को अपने २ मत में फंसाते हैं सुधार करना तो दूर रहा उसके बदले में संसार को वहका कर प्रधोगति को प्राप्त कराते और अपना प्रयोजन सिद्ध करते हैं इसलिये इनको संन्यासाश्रम मे नहीं न सकते किन्तु ये स्वार्थाश्रमी तो पके हैं ! इसमें कुछ संदेह नहीं । जो स्वयं धर्म मे चलकर सव सार को चलाते हैं जिससे आप और सव संसार को इस लोक अर्थात् वर्तमान जन्म में परलोक अर्थात् दूसरे जन्म में स्वर्ग अर्थात् सुख का भोग करते कराते हैं वे ही धर्मात्मा जन संन्यासी और हात्मा हैं । यह संक्षेप से संन्यासाश्रम की शिक्षा लिखी । अब इसके आगे राजप्रजाधर्म विषय लेखा जायगा ॥ - -- 4 . । इति श्रीमहयानन्दसरस्वतीस्वामिकृते सत्यार्थप्रकाशे सुभाषाविभूपिते वानप्रस्थसंन्यासाश्रमविषये पञ्चमः समुल्लासः सम्पूर्णः ॥ ५॥ more ५ अथ षष्ठसमुल्लासारम्भः अथ राजधर्मान् व्याख्यास्यामः राजधर्मान प्रवक्ष्यामि यथावृत्तो भवेन्नृपः । संभवश्व यथा तस्य सिद्धिश्च परमा यथा ॥ १ ॥ ब्राझं प्राप्तेन संस्कार क्षत्रियेण यथाविधि । सर्वस्यास्य यथान्यायं कर्त्तव्यं परिरक्षणम् ॥ २॥ मनु० [७॥१।२] श्रव मनुजी महाराज ऋपियों से कहते हैं कि चारो वर्ण और चारों श्राश्रमों के व्यवहार कथन के पश्चात् राजधर्मों को कहेंगे कि किस प्रकार का राजा होना चाहिये और जैसे इसके होने का सम्भव तथा जैसे इसको परमसिद्धि प्राप्त होवे उसको सब प्रकार कहते हैं ॥१॥कि जैसा परत विद्वान् ब्राह्मण होता है वैसा विद्वान् सुशिक्षित होकर क्षत्रिय को योग्य है कि इस सब राज्य की रक्षा न्याय से यथावत् करे ॥ २॥ उसका प्रकार यह है- त्रीणि राजाना विदथै पुरुणि परि विश्वानि भूषः सदांसि॥ ऋ०॥०३ । सू०३८ ।म०६॥ ईश्वर उपदेश करता है कि ( राजाना ) राजा और प्रजा के पुरुष मिलके (विदथे ) सुखप्राष्टि और विज्ञानवृद्धिकारक राजा प्रजा के सम्बन्धरूप व्यवहार मे (त्रीणि सदासि ) तीन सभा अर्थात् विधा य॑सभा, धर्मार्यसभा, राजार्यसभा नियत करके (पुरूणि) बहुत प्रकार के (विश्यानि) समग्न प्रजा सम्बन्धी मनुष्यादि प्राणियों को ( परिभूपथः ) सव ओर से विद्या स्वातन्त्र्य धर्म सुशिक्षा और धनारि से अलंकृत करें॥ तं सभा च समितिश्च सेना च ॥१॥ अथव० का० १५ । अनु० २ । व० है । मं० २॥ सभ्य सभा मे पाहि ये च सभ्योः सभासदः॥२॥ अथर्व० कां०१६ । अनु०७।३० ५५ ।मं०६॥ (तम् ) उस राजधर्म को (सभा च) तीनों सभा (समितिश्च ) संग्रामादि की व्यवस्था और (सेना च) सेना मिलकर पालन करें ॥१॥ सभासद् और राजा को योग्य है कि राजा सा सभासदों को आज्ञा देवे कि हे (सभ्य ) सभा के योग्य मुख्य सभासद् तू (मे ) मेरी (सभाम् ) सभा की धर्मयुक्त व्यवस्था का ( पाहि ) पालन कर और (ये च ) जो (सभ्याः) सभा के योग्य (सभासद सभासद् हैं वे भी सभा की व्यवस्था का पालन किया करे ॥२॥ इसका अभिप्राय यह है कि एक स्वतन्त्र राज्य का अधिकार न देना चाहिये किन्तु राजा जो सभापति तदाधीन सभा, सभाधीन राजा राजा और सभा प्रजा के आधीन और प्रजा राजसभा के प्राधीन रहे यदि ऐसा न करोगे तो:- राष्ट्रमेव विश्याहन्ति तस्माद्राष्ट्री विशं घातुकः । विशमेव राष्ट्रायाद्यां करोति तस्माद्राष्ट्री विश मत्ति न पुष्टं पशुं मन्यत इति ॥ शत० कां० १३ । प्र० २ । वा० ३ । [कं० ७।८ को - ] . - - षष्ठसमुल्लास: जो प्रजा से स्वतन्त्र स्वाधीन राजवर्ग रहे तो ( राष्ट्रमेव विश्याहन्ति) राज्य में प्रवेश करके रजा का नाश किया करें जिसलिये अकेला राजा स्वाधीन वा उन्मत्त होके ( राष्ट्री विशं घातुकः) प्रजा का नाशक होता है अर्थात् (विशमेव राष्ट्रायाद्यां करोति ) वह राजा प्रजा को खाये जाता (अत्यन्त पीड़ित करता) है इसलिये किसी एक को राज्य में स्वाधीन न करना चाहिये जैसे सिंह या मांसाहारी इष्ट पुष्ट पशु को मारकर खालेते हैं वैसे (राष्ट्री विशमत्ति) स्वतन्त्र राजा प्रजा का नाश करता अर्थात् किसी को अपने से अधिक न होने देता श्रीमान् को लूट खूट अन्याय से दण्ड लेके अपना प्रयोजन पूरा करेगा, इसलियेः- इन्द्रो जयाति न परी जयाता अधिराजो राजंसु राजयातै । चर्कत्य ईडयो वन्धश्चोपसयौ न स्यौ भवेह ॥ अथर्व० कां० ६ । अनु० १० । २०६८ । मं० १ हे मनुष्यो ! जो (इह) इस ममुष्य के समुदाय में (इन्द्रः) परम ऐश्वर्य का कर्ता शत्रुओं को (जयाति ) जीत सके (न पराजयाते ) जो शत्रुओं से पराजित न हो (राजसु ) राजाओं में (अवि- राजः ) सर्वोपरि विराजमान (राजयाते ) प्रकाशमान हो (चरीत्यः ) सभापति होने को अत्यन्त योग्य (ईन्यः) प्रशंसनीय गुण कर्म स्वभावयुक्त (वन्यः ) सत्करणीय (चोपसद्यः ) समीप जाने और शरण, लेने योग्य (नमस्यः )सव का माननीय ( भव) होवे उसी को सभापति राजा करे । इमन्दैवा असपत्नसुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठयाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय ॥ यजु० अ० है । मं. ४० ॥ हे (देवाः ) विद्वानो राजप्रजाजनो तुम ( इमम् ) इस प्रकार के पुरुष को (महते क्षत्राय ) बड़े चक्रवर्ति राज्य ( महते ज्येष्ठव्याय) सब से बड़े होने ( महते जानराज्याय ) बड़े २ विद्वानों से युक्त राज्य पालने और ( इन्द्रस्येन्द्रियाय ) परम ऐश्वर्ययुक्त राज्य और धन के पालने के लिये (अस. पत्नसुवध्वम् ) सम्मति करके सर्वत्र पक्षपातरहित पूर्ण विद्या विनययुक्त सव के मित्र सभापति राजा को सर्वाधीश मान के सय भूगोल शत्रुरहित करो और- 'स्थिरा वः सन्त्वायुधा पग़णुदै वी उत प्रतिष्कमै । युष्माकमस्तु तर्विषी पनीयसी मा मर्त्य- स्य मायिनः ।। ऋ० ॥ मं० १। सू० ३९ । मं० २॥ ईश्वर उपदेश करता है कि हे राजपुरुषो ! (वः) तुम्हारे ( श्रायुधा) आग्नेयादि अस्त्र और शतघ्नी अर्थात् तोप भुशुण्डी अर्थात् वन्दूक धनुष् वाण तलवार आदि शस्त्र शत्रुओं के (पराणुदे.) पराजय करने (उत प्रतिष्कभे) और रोकने के लिये (वीळू ) प्रशंसित और (स्थिरा ) दृढ़ (सन्तु) हों (युप्माकम् ) और तुम्हारी (तविषी) सेना (पनीयसी) प्रशंसनीय (अस्तु ) होवे कि जिससे तुम सदा विजयी होश्रो परन्तु (मा मर्त्यस्य मायिनः ) जो निन्दित अन्यायरूप काम करता है उसके लिये पूर्व वस्तु मत हो अर्थात् जबतक मनुष्य धार्मिक रहते हैं तभी तक राज्य बढ़ता रहता है और जब दुष्टाचारी होते हैं तब नष्ट भ्रष्ट होजाता है । महाविद्वानो को विद्यासभाऽधिकारी, धार्मिक विद्वानों को धर्मसभाधिकारी, प्रशंसनीय धार्मिक पुरुषों को राजसभा के सभासद् और जो उन सब में सर्वोत्तम गुण कर्म स्वभावयुक्त महान् पुरुष हो उसको राजसभा का पतिरूप मान के सब प्रकार से उन्नति करे । तीनो सभाओ की, सम्मति से राजनीति के उत्तम नियम और नियमों के आधीन सब लोग वर्ते सव के हितकारक कामों में सम्मति करें सर्वहित करने के लिये परतन्त्र और धर्मयुक्त

Satya Prakash

Author
Shri Mat Pramahinsha
Title
Satya Prakash
File name
Satya Prakash
Text
OCR done
Citation
1884
Published
2010/12
Publisher
Vaidik Yentralye Ajmer
Language
Sanskrit
Pages
101
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
545978
Barcode
99999990024173.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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