Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Shadankar Adaivet Vedant Ka Nirgun Kavya Par Prabhav

Saxsena,sarveshvar Dayal · 2010/12

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नये साहित्य-स्रष्टा
सम्पादक सच्चिदानद वात्स्यायन
काठ की घण्टियाँ
[कहानियों, कविताएँ, उपन्याम ]
सर्वेश्वरदयाल सकसेना
भारतीय ज्ञानपीठ · काशी

ज्ञानपीठ लोकोदय ग्रथमाला हिदी प्रयाङ्क-८७
प्रथमाला सम्पादक
लम्मीचद्र जैन
प्रकारक
मत्रो भारतीय नानपाठ
दुर्गाकुण्ड रोड वाराणसी
प्रथम सम्करण
१९५९
मूत्य मात स्पय
मुए
बाबू जन पागल
समनि मुग्णालय वाराणसो

भूमिका कारिका हाता and अपनी पहली पुस्तक प्रकाशनसे लेखाका जानानन्त हागा उसकी गुस्ता अथा गम्भारताला उपक्षा दिये रिना मैं यह कहना चाहता हूँ कि प्रस्तुन ग्रपका प्रकाशन मैर लिए उससे कम यानन नायक नहीं है। बल्कि उममें एक एमा स ताप भी है जो कि लम्बका सन्तापसे चिल्कुल मिन उसरा आधार सल अरन कृतित्वमें विश्वास नहीं बल्कि एक ममूने साहित्यमें आस्था होती है--जिममें अपन अलावा मग तित्व मो सम्मिलित है। वास्तवमें नप माहिरय घ" नामम इस प्रयमालाका आरम्भ ही इम "यापक आयामा प्रतिबिम्ब है। हिला समवती जिम युगम बुजुगाने नया रचना प्रतिक्षामा प्रकट किया और मध्य-वसर लागोन गति राषकी दुाइटी, पुरान आलायकोने शाश्वत मारताय मूल्लोका उपक्षाका दुपडा राया और नय शालाचीन अमाधुध निदेशा परिभाषाओन देशी प्रतिमा का दना दनका उपमम किया, उसमें यह जन उन यावेस व्यनियों में से रहा जिहान नयी मादित्य प्रतिमामें विश्वास नहीं खोया धोर मा उमका माग प्रशस्त परोसलिए भरसक उद्यम करने रह-और शति भरम अधिक भत्सना सहते रहे । इस परिश्रमरा उसन सही और वन्य समझा ता कल अकारयश ना, इसरिए कि उसने अनुमर किया कि मम मरान परिस्थितिमें कट रचना कर देना पयाप्त नहीं है, उसर अनुकूल परिस्थितियोर लिए सबप करना मा आवश्यक है। 'नय माहिग्य पटा'नयमालामें भमरा ऐम माहिरकारोकी रचना पारका सम्मुख सस्थित करनाअभाट है मिहोन न स्वल नया या रानक या अदा चरित्रा है, वरन् बिना साहित्यिस घातल उस सपका ४ काठका घपियाँ भी प्रतिनिम्चित करता है जो इस कालरे साहित्यकारको अपनी नियाकी रक्षा लिए और अपने क्ला मूल्यांकी प्रतियाक लिए करना पडता रहा । यह नहीं कि ऐसे सभी लखक इस मालामें आ जायेंगे-जिनकी रचनाएँ स्वतन्त्र रूपसे प्रकाशित हो चुकी हैं या हो रही हैं वे इसमें नहीं भा लिये जा सक्त है, क्योकि एक आर उसकी कार आवश्यकता भी नहीं है और दूसरो आर उससे न किसाकी क्षति हानवाली है, न किमी प्रति अन्याय । यह इस सघषकी बहुमुखता और ज िलताका एक चिह है कि समरता कृतिकार प्राय एक्से अधिक माध्यमामें रचना करते है। ऐसे लेखक कम है जो केवल कानाकार, या क्वल कति या उपन्यासकार या नारस्कार या आलाचक हों। यह निरादरफ्नमौला' होनका शौक नहीं है, न अनुशासनहीनता अथवा अराजक्ताका चिह, न साधनाकी कमा अथवा गुरु शिष्य पद्धतिको उपक्षा। और यह भी एक अत्यत एकागी सत्य हागा जगर कहा जाय कि आर्थिक कारणांस कृतिकारका सभा तरह की चीजें लिग्वनी पडती हैं। यदि कवि लोग कहानियाँ और रेडियो रूपक लिखन लगते और समीक्षा नाश्यकार ( पाठ्यक्रमापयागा) हा जाते और बात वीं तक रह जाती, तर ता श्रार्थिक प्रभावकी प्रधानता माननी पडती । पर ऐमे मा उनादरण अनक मिलेंग जहाँ सफल कहानीकारान कविता लिखना आरम्भ क्यिा है और आग्रहपृवक कविता लिखते हा चले गये है-यद्यपि कविता-मसे कुछ आय नहीं हाती रही है जब कि कहानियाँका माँग बराबर बनी रही है और उना लिए पशगा पारिश्रमिक पालना भी अमम्भव नहा रहा है। यह बहुमुपता इस प्रथमालामें प्रतिबिम्बित हा, यह उसर उनेश्यका स्वाभारिस परिणाम है। बिना उसर वह कैस समारीन सघर्षों और प्रवृत्तियाका प्रतिनिधिय कर सकता है पर वह इसलिए भा ग्राह्य और अभिनन्नाय है कि इस प्रकार यह प्रत्यक प्रथमा एक प्रातिकर विविधता दे देती है । एक पुस्तक एक साथ हा एक साहित्यकारका पूरा प्रतिनिधित्व कारका घटियाँ भी करे, और नाना रम यतनामे पाठस्को रसनाको लुमाये और तृम भी को यह सम्भावना इस प्रयमालाका न केरल अपने रगम एक मात्र प्रयान बना देता है वान् आजका स्थितिमें एक महत्त्वपूर्ण और मूल्यगन् प्रयोग मा पाटायग, आशा है, दमे इमो कसमे ग्रहण करगा। कारका धनिया"7 लपक भा उन लागासे हैं ला पहल कानाकारर रूपमें मामन भाये ! विश्वविद्यालय-बीरनमें ही कदानिर्यापर प्रतियागितामे पुरमत हाना मसरजाक लिए ऐमा काइ चारा नहीं यो कि यह कहानियाकी बजाय कविताएँ लिम्बन लगें। मन् १८४३ म १६५० तक वह कहानियार हा लपक य । सन् ९५० में उदार करिता निपना आरम्भ किया तब एमा भी काइ कारण नहीं था कि वह कहा नियों लिवना छाड-अयान् बाहर काइ कारण नहीं था आन्तरिक चाप्यताएँ ता कलाकार जीपनका श्रग है। तीन-चार वपन का यमय अन्तरालय बाट उहो। फिर कुछ कहानियाँ निनी । 'साया हुआ जल' नामका र उपन्याम या लम्बा रूप क्या मा मी समय लिखी गया। सर अनन्तर रिचार-पाँच वपका कायान्तरार रखा, निमर बाद फिर कुछ कहानियों और एक (अयया डेद) नया उपन्याम लिया गया। एमा क्यों हुआ। इम पडताल नि नदेह लेबर कृतित्व अपयन और मूल्याक्नर लिए उपयोगी हगो अपने आपमें भी यह रोचक हा मरना है । रितु दम भूमिमे उसमें जाना आपसा नहीं है। या इतना का कहना यये है कि प्रत्यक सपानकी रचनाएँ पदनार यह पष्ट हो जाता है कि लेविन न पवल माध्यम पदला है बल्कि उसको सवेनाश स्तर और उनकी निशा माल गयी है। इस प्रकार कहाना लपक कुछ पर कविता लिम्वर ३ रि पहानोका आर शेरता है तो पिर उस समका नही उगवा जिस कर छोड़ गया था, बल्कि एक नय ६ काठका घणियाँ प्रदेशमें नयी राहपर चलता हुआ अपनेका पाता है। इसी प्रकार कवि जन गद्य लेखनन अन्तराल के बाद फिर का य क्षेत्रमें लौरता है, तो वह भी एक नये आयाममें। इनमस कुछ परिवतन तो साध साध वयस्कतार परिणाम हा ही सक्ने हैं। आरम्भमी कहानियों में हम अगर 'प्रसाद' की ( यद्यपि अधिक सामा जिक प्रमा' का ही) अनुगूंज पा सकते हैं और आरम्भिक कवितामें सीधी सहज भाषामें गीत लिनवाल 'पञ्चन की छाप, तो यह अस्या भाषिक नहीं है । कि तु क्रमश कृतिकारका अपना यक्तित्व विशद और पुण्तर हावर सामन आता गया है और बादकी रचनायोंमें हम ना अन्तर देसत है-सिभित्र माध्यमका अथवा एक ही माध्यमकी पृवापर रच नामि यह क' और '' के प्रभावका अन्तर नहीं है, वह असन्दिग्ध रूपस सपश्वर का ही सपनार निभान पहलू हैं अलग अलग परिस्थितियोंक साथ एक हो, किन्तु अनका मुख, सघनार घात प्रतिघात पनाना रूप परिणाम। सर्वेश्वर इन परिपतनाम प्रति कहाँ ता सजग ये य- नहीं कहा जा सक्ता । न उस सजगताका तत्काल हाना या न हाना ही पाठको लिए काइ आत्यन्तिक मदन रपता है। और न इस सम्बन्धमें प्रकट किये गये लवकर अभिमतका ही ज़रूरतस मारा महल देना चाहिए। कृति कार अपनी रतिक बारमें जा कुछ कहता है उसको ठोक ठीक समझना या सहा गारव देना भी उतना हा दाक्षिण्य माँगता है, जितना कि नारीको अपने रिपयमें कही गयी बात । दानों ही बातें अथहीन कभी नहीं होती, लकिन दानाका हा अभिप्राय यह नही दाता जा शलोंमें अभिहित हा । इसलिए सर्वेश्वर अगर कहते हैं कि 'जब वह गीतको परिपाटी छाडकर एक नये प्रकारकी करिता लिम्बन लग तर उहें इसका भान नहीं था कि वह एक परती क्षत्रमें प्रवरा कर रह है या नयी भूमि ताट र हैं', तो आरश्यक नहीं है कि इस सच मानकर भी तत्वत् ग्रहण किया जाय ।

कारका पहिया इसी प्रकार अपनी का यमय कहानियोंकी उनकी दी हु. यह मफा कि हमने साचा था कि कहानी नहीं निगे, इसलिए जा रहाना लग्ना गया वह पितामय हा गया निराधार न हार मा यां-की-त्या ग्राह्य अगर मैं यह कहूँ रिसरका पहल करि मानता हूँ, वा यह नसमझा जाय कि मैं उनरी कहानियाँमे प्रभावित नहीं हूँ बल्कि उनकी इघरकी कहानियाँ और 'पागल कुत्तोंका मसाहा' नाममा नया सामतिर लघु उपन्याम मराशिमें नय रहाना-साहित्य में एक विशिष्ट म्यान रावत है। उन्हें पहल कपि माननमें में उनसरी रचनाका मूल्याग्न नहीं बल्लि उनी सन्नार प्रकारका निम्पण करना चाहता हूँ। अनुभसा स्तर--- माता सरना और भाग्य परिता आयमी सम्मका स्तरकरिताका है कि मि सत्यम प्रयासन है, यह उसी क्षेत्रमा है । मैं कहना चाहता हूँ कि अपना सामानिधि, और भरना रचनाओंमें सनशाद गहरा सामाजिर ननारे पापन सर्वेश्वरका सर प्रथम अनुभवस प्रयासन है, सन्मसे कपल आनुपगिर रूपले । बटार सय रचनाएँ, जिनका याम सामानिस पाखण्टोंसे लेकर राजनीतिक मतमादौ तर पैग हुआ है, या सा-रूप जान पडेंगा । किन्तु जब भी करितारे साथ का निरापण सगता है.--और उस रिशपण दामोनिय मान लिया जाना हैतर यह विशेषण अनिसाय भी हा जावा है, और उस प्रकारकी परितामा निशिष्य म्पस करिता नहीं कहा पाता। जिस हम 'सरिरिकर पाएट्रा' कहते हैं, उस ग्यल 'सायर' मी पद दने हैं किन्नु ययल 'पापा' सिर नहीं पहने। इसलिए सरसर जीम पारेमे मग अचारणा यांनी सो रह जाती है। उनरा वाया 'सेयर' जा गय और पद दानों रूपों में प्रकट हुआ है उनर परिसर की प्राथमिस्तारापरिन नहीं करता।

कारका धपियाँ कवि और कहानीकार दानां ही देश-कालसे बँधे हैं। किन्तु निरपवाद हानेका आग्रह न किया जाय ता यह कहा जा सस्ता है कि कहानाकारकी दृष्टि देशका र अधिक रहती है और कविर कान काल्की झनकार की ओर अधिक लगे रहते है। दूसर शब्दोंमें कहानाकारका सदभ समाज और उसमा विस्तार हाता है, कविका सटभ जीवन और उसकी गहराई। रस रिसे भी सर्वेश्वर पहल कवि हैं। उनकी कहानियां और उनक उपयासीकी प्रवृत्ति भी गहराइकी पड़ताल का है। बाह्य वास्तविक्ताकी उपक्षा या अवज्ञा की नहीं है, किन्तु लखककी दृष्टि उसीसे उलझकर रह जानेका तैयार नहीं। इसलिए उनकी गद्य रचनायोंमें भी एक प्रकारको कायमयता है। गद्यमें भी यथाथको मूत करनेक उनक साधन कविके माधन हैं। रूपाकारामा वणन वदा प्रधान नहीं है और बिन अथवा समेत ही यथायका दशाते नही अवगत कराते हैं। निस्स देह इसका एक कारण यह भी है कि कहानियमि भी करिताकी भौति सर्वेश्वर 'जो टीपता उमा पदे 'जा' उससे व्यस्त हैं और उस उभार अथवा उघाडपर मामन लाना चाहते हैं। यह नहीं मिजा दाखता है जा सत्य ही है, उस वद मिथ्या या अयथाथ मानते हैं बल्कि स्वय मिथ्या भी अयथाय नही है। फिर भी आकारोंकी भिल्लामें जो अभिप्राय ऊँधा हुआ है और घुर रहा है वह मुक्त हार हमारे सामन आवे, यही उनका आग्रह है श्रीर इसमें सफलता उना नि साहित्यिक कृतिकी सफलता है। "सी लिए जा उनकी रचनाओं में परिस्थितियार प्रति निद्रादया भार और परिवतनका पाकाक्षा है, या यह सट है कि वह नारका बाल दनेसे ही मन्नु नही है। उनका यथना समझत हुए वह 'भीतरसे बलन पर बल दत है। और इस 'भातर' म अभिप्राय श्वल अवचेतन यथायस नहीं है जैमा कि माया हुआ जल प कुछ अशोस (और शीपक्से मी) पनित हाता है भीतर' वह है जा बाहर साथ रागात्मक सम्बध कारका पणियाँ नोहता है और उन सम्मघासे मूल्यांस अग्चारणा करता है। क्योरि बलना मूल्योका अल्ना, इसलिए नये रागात्मक सभ्य घासरी प्रतिया श्रापश्या है और टम लिए बाहर और भीतर नोंमें नान्ति वाहित है। स्या मर्मेश्वरमा रचनाएँ समारीन' है । जिस रखामी कृतियों पम्तया समरती परिदृश्यम सम्बद्धती हैं---अपने समयमा सामाजिर यदिरग जिनमें स्पष्ट निरूपित होता है उसे समरालान मान लेना आसान हाता हालकिन जिनगीसग्ना समरालीन पथायता कालर आयाममें मिन्टना चाहताना बारेमें इस प्रश्नका उत्तर दना रतना सरल नहीं हाना । सशरको अब तपसी रचनामारे आधारपर यह ता अभी नहीं पहा जा मस्ता हि आना सामाजिक यथार्य पूरी तरह ना पाटमें आ गया है, जिउमा चिन्तारका उदान नाप लिया है लेकिन इतना बिना समाच पाना सता है कि उनकी सवेनामें समरालीनतामा स्पान है। दूसरे शन्नो ममालान यथार्य उनकी मुट्टाको पकडमें हा या ना, उनकी चेतना द्वारा श्ररश्म नाप लिया गया है । और ऐसो रचनार तालालित प्रभासी दृश्मेि मयारित हानेर मी स्थायित्वा गुण उममें अधिरता है। मरा विश्वास है कि पिया एक नये साहित्य का नया सुधि हाना नाते ही मम्मानित न होगी बल्कि हायर और उसकी रच नाओं पुरान पर जानेपर भी अपनी ताज़गा और रातिसे पाटोग प्रभारित करती रहगी। प्रस्तुत सस्तन नर प्राय चार वपन लावन या व्यास नापता है इसमें मी विकामरे रक्षण सष्ट है, किन्तु और मी ताजा मनमें-मुम भाग्यशाल जिसे हलवित रूपमें पानेका मुयोग मिला है, और जा में आया करता हूँ अब शीघ्र प्रायमें पायेगा- सर्वेश्वर ग्मि साहस और सामपर साथ आग व है, वह उनक मारी मुपरापी प्रति ता है। हमारे साहित्यर लिए भी सारा सरत है। -सचिदानन्द वास्यायन

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AU अनुक्रम भृमिरा ( सचिटानाद वात्स्यायन) कहानियाँ टूबना हुआ चौर १६ ३८ साना पून क्मरामर गया टूट हुए पद वनमा प्रेम विवाह मौतकी चाया E ११६ १२६ स्नेह और स्वाभिमान पत्परत पूल यह चित्र १६६ १७७ मौतम आदें क्षितिजा पार रूप और "श्वर निन्दगा और मौत दिल्पक मातर घरमात अब भी आता है भगतजा माएर श्यामगर गुना पुलियानाला आदमा मामाएँ २६६ २२. २४६ १२ काठका घपियाँ कविताएँ जन कलम उठाता हूँ यता परछाद है मने आगाज़ दी है २५७ २५६ २६१ यह साँझ अॅवगेका मुसाफिर अजनी देश है यह यह भी क्या रात मुहागिनका गीत उत्तर विपशता रात भर माँकी याद बीसवीं शतानी एक कपिकी समाधिपर एक प्यासी आमाका गीत फुलभरियाँ छूटी र थिरता नही कौन है। शान्तिमयि तुम हा शान्त पागमुनी-मी तुम विगत प्यार अहसे मरे या हा तुम तुम कहा २५७ २६८ २६६ २७१ २७४ २७६ २७७ २७८ २७६ २८७ २८६ २६० २६१ २६२ २६४ २६६ २९८ चौकोनी चौग्नाम या अनुक्रम ग्रान पहलाबार ३१० कर रात ३१६ सच्याका श्रम गौरा शामका सर एस नयी प्याम टायगरकी बचिया प्रेम-नीर तारा लिपा रक्षा में पवदा ३२८ नये यपर ३४. बननारकागात-" " ३४७ ३४६ २५० मापनका गात गीत चरवाहाका युगलमान माधी-पानी आया गान रह गया टेकिन कार युग-बागरणका गात स्वानी ममयमें २५५ ३५८ . तांवर प्ल घाम गगनकी मान नाग धबगर ६० पाम पेगाडा १४ कारका घण्टियाँ कलाकार और सिपाही वबीका टेंक आटेकी चिडिया सिपाहियोंश गीत थरमस ३७३ ३७५ ३७६ ३७८ ३७६ मुबह हुई ३८१ ३६१ ૨૯૨ ३६३ ३६६ पास्र और आरमी खाली ने, पागल कुत्ते और बासी कविताएँ तेज़ासे जाती हुई सामाजिक अभियान सरकाशी गाटी काफी हाउसमें एक मलादामा चुपाई मारो दुलहिन दा नक सलाहें सौनय बाध आत्म साक्षात्सर प्लेफाम मब कुछ कहलना बार मैंन क्त्र कहा काठमी घपियाँ उपयास माया हुआ जल ४११ ४१७ ४२३ ४२५ ४२७ म्वर्गाया माँ का

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बरसात अब भी आती है
[ कहानियाँ]
२

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इवता हुआ चॉद
कोई विश्वास करे या न करे, लेकिन म सच कहता हूँ, कि
उसका कुल इतना ही टोप था कि वह गोगे न थी। वह किसी
अभिशापकी बलीकी डॉहसे सॉवरी थी। यों उसकी आँख पडी-
वडा थीं । अपनी वन्द परफोको जन वह ग्वोरती थी, तो लगता,
जैसे सपनोनी पखुरिया पर मामूमियत रहरा गयी हो, मुसकराती
थी, तो जैसे वेमीकी जजीरें टूट रही हो, और बोल्ती थी, तो
उस म्पन्दनहीन, शान्त, मधुर, स्वरको सुनकर लगता, जैसे किमी
खामोश गहरे-नीले ममुद्रमें चाद डब रहा हो। वह नाहर-भोतर
हर ओर सुदर थी, रूपके माँचेमें ढली हुई, अमृतके सरोवरम
नहायी हुई । रेस्नि वह गोरी न थी । उमका सॉवलापन, उसका
नस-नसम, एक जहरीला दद नन कर उमडा करता था, पर उसने
कभी उसे अधरां और ऑग्वोकी राहो छलने नहीं दिया। उसके
पति एक धनी पण्डा थे । आँखोकी कमनोरी आरे इञ्च मोटे चश्म
के शाशेसे दूर होती थी और दिमागकी चिडचिडाहट पनी या
घोडेकी पीठमे । उसके पाम एफ सी ठाटका एका था, जिसका
गान सिकोगेके मेटेके समय निम्वरती थी। घोडेका नाम था
नपार । इलाहाबादम वैसा घोडा कोई दूसरा नहीं था । शहरभरमें
उमकी शोहरत थी। उसके दिरमें पन्ना और घोडेका वनन नगर
था। घोडेके लिए भी प्सने सोने और चॉग के जेवर बनना रसे ये
और नौकर रख रक्खे थे। उसका घोडा भी टण्ढई और घी पीता

२२
कारका घपियाँ
-
तुम्हे क्या मालूम कि तुम्हारे यहाँ न सानेसे वहाँ मॉका कलना
खुरचता होगा।"
और मै इस वाक्यको सुननेमे अधिक उनके मुखकी ओर
देख रहा था निस पर स्नेह भरे उपालम्भको गम्भीर दर्दीली
छाया था। उसे देख कर मे पानी पाती हो गया । एक ओर मैं
उनकी वाइम तेइस साल का जवाना, भरे कच्चे शहतूत-सी उमर
देयता और दूसरी ओर नन वुजुर्गियतकी बाताका अर्थ सोचता ।
जो अभा तक मॉ हुइ भी न गे वह मॉक क्लेनेकी बात क्या
समझ में कुछ करने हा जा रहा था कि वह बोल उठी-
"अकेल पडे रन्ते हो, इधर उधरमा सोचते होगे, तपीयत
घबड़ाता नोगा।" मैने कुछ दनी जबानसे इस वाक्यम निहित
सच्चादको टारनेका गरजमे क्या-"नहा तो।"
वे बोरी-"मुझमे छिपाओ मत । घरकी चहारदीवारीम बन्द
रहने पर भा हम रोग आदमाका नम-नम समझती है।"
चुप रह गया । वे फिर कुछ मुसफरा कर बोला-
तुम्हारा खाना भा बना लिया है, बुरा तो नहीं है, खा
ता लोगे हा मरे हाथा"
मै शरममे गड गया।
वे बागे-"गरम किम बातका । क्भा-क्मा मुम्नी आ ही
जाना है। मैं हा दवा जयमे व गये है यम दिनमें एक हा पार
खाना बनाना हूँ। अरे रिए इतना झझट कौन करे। फिर
यता ता दिन भर घरमें हा पड़ा रहना पटता है। तुम राग पढ़ने
ग्मिन चार रस टास्मे बाआगे नहीं तो पढ़ोगे क्या अपने

यरमात जर भा आता है
माने-पीनेमा ग्यार करो । खुट जी न क्यिा करे तो मेरे पाम
चन आया करो, मै बना दिया हंगी।" उनकी बात सुनकर
मेरे दिमागमें एक वाक्य घूम रहा था-'
-"म्नेह और महानुभूतिको
कीमत वहीं समझ सकते है, उनमे ही मिल सकती है, जो इसमे
जीवनमें वचित हों।" मेरा हृदय कुछ भर-मा आया। मैं क्मिीकी
उपापा सह सकता हूँ, क्याकि इसका आदी हो गया हूँ, लेक्नि
किमीमा प्यार मेरे लिए अमह्य हो जाता है। मै कुछ भरी-सी
आवाजमें गोला-"टतना ही बहुत है, इससे अधिक तकलीफ मै
आपको स्मि अधिकार पर टॅ, और अगर दें भा तो उस एहमान
सा वाला कैमे दे मलूंगा ?"
वे कुछ गम्मीर हो गया । बोली-
"तुम रोग पढ़ लिख कर भी ऐमी बातें करते हो। कोट
किमी पर ण्मान नहीं करता। एहसानका बोझ वो मानते है जो
म्वाथा होते हैं, निनका हृदय स्टार नहीं होता। मेरे एल्सामा
पला देनेको क्या इतनी बड़ी दीया कम है तुम्हारे लिए ? और
अगर मुझे ही बरसा देना चाहते हो तो मरने पर मेरी या क
आना।"
उनके ये एक एक वाक्य तारमे मेरे करनेमें चुभ गये और
आन तक चुमे हुए है। मैं केमे बताऊँ मि उम दिन एक मामूली
पदा लिम्बी नाराने मामने मैंने अपनेको कितना छोटा मन्मूम
पिया था ।
मन माना ग्वा लिया और फिर तो अम्मर जब वे अपने लिा
ग्वाना बनाती, मेरे लिग भी बना रेनों, और फिर मुझे बिना चूँ-

२४
काठकी घणियाँ
होगे तुम
१
चपड क्येि हुए खा लेना पडता । अक्सर मेरा बना हुआ साना
नौरको दे दिया जाना और मुझसे कह देती-"क्या बना पाते
रूया-सूग्वा बिना नमक मिचका " मै इसका क्या
जवान देता। एक बार शायद कुछ कहा भी तो बोल उठा-
"हा रोगामा जिन्दगा ही खाना बनाते बीतती है। पेना
होनेसे कर मरने तक रहा हम रोगासे नहीं छूटता । जानते हो
हम औरतारा सबसे बडा साथी इस जीवनम कौन होता है ?
चूल्हा
।" और हँस पड़ा । म निस्त्तर हो गया।
उनका म्वाम्य अक्सर निगडा रहता । एक दिन वे खाना
बना रहा था। उस दिन शायद तबायत अधिक खरान थी। चौके
गिर पड़ी। खबर पाने पर जन में पहुँचा तो
व चारपाद पर पड़ी थीं। नौकरानी बैठी पखा झर रही था। मुझ
देयते ही मुमाराने लगी, वही वेचमीकी मुसकराहट । मुझ उहें
दबकर कुछ तकलीफ हुई।
'तुम रतनी बीमार रहती हो, अपना दमा क्या नहीं करती
भाभा ?" मैने कहा।
वर एक पासो हँसा हँसकर बोला--"क्या करना है "
मैने ना-"क्या सून रही, वामार परे रहना अच्छा लगता
है। मुझ ता इतना ममझाता हो, सुट नहा समभनी ।" व
।
मही चदर आया,
चुप ।
मैने दतन रिनामे प्राप्त म्ने अधिकारमा प्रयोग करते हुए
पा- अगर तुम अपना त्या नहीं करोगा तो मैं तुम्हाग कोई
करना गं मानूंगा और न तुम्हारे हाथरा गाऊँगा ही। यह नहीं

बरसात अब मा आता है २५ हो सकता कि तुम मर-मर कर बनाया करो और मैं साया - मेरी बातें सुनकर उनी ऑसें उल्छा आया । क्यो, यह में कैसे बताऊँ ? उहोने केवल इतना कहा-यह भी एक हवी हुई आवाज़में- "तुम क्या जानो १ औरत अपनी दवा अपने-आप नहा कर सरता। मैं इस कथन पर सोचता रना, मेरा दिर उमडता रहा । बार- चार मनमें आता, औरतको क्या इतना भी अधिकार नहा है ? ना कि वह सैक्डो रुपये महीने पानीकी तरह जुए और ऐनामें ज्डा दते हैं, क्या इनकी पाच पैसेकी दवा नहीं कर सकते ? रेकिन उत्तर कौन देता? मैंने पता नहीं क्या सोचते हुए कहा--"तुम महानिन क्यों नहा रम लेती हो?" उन्होंने एक रूग्वा जनाब दिया--"महगनिनके हाथका हम रोग नहीं खाते।" और मे इस क्थनकी सत्यताके बारेम सोचता रहा । जब कि पण्डा महराज रेस्ट्रॉ और अग्रेनी होटलोमें शुम छिप कर चार मार सस्ते ह और यह भी छुआछूतका इतना ढोग नहीं रचतीं। पिर बात क्या है ? बादम नौकगनीमे नात हुआ कि पडाजी महरानिनका सर्च एक वेकारका खर्च समझते है, जबकि घरमें एक पनी है चाहे वह मर ही क्यो न रही हो। उनके इस रूले उत्तरसे मुझ स समय लगा जैसे मुझे यह प्रश्न नहीं पटना चाहिए था। मैने बात करते हुए कहा- कारकी घण्टियाँ "तुम्हारी तबीयत कनसे खराब हे-भाभी ?” उहाने मरी तरफ्मे मुँह फेर लिया, नेमे उहे मेरा यह प्रश्न निरकुल अच्छा नहीं लगा और ग्वामाग रहा । मेर मुखमे निकर पडा-"नहा बताओगी ?" वे चुप रहा। मैने कहा- "अच्छी बात है ।" और उदास उठ कर जाने लगा। मेरे जानेका आर पार वो कुछ भारी आवाजमें बोली-- "साना खा लो मैंने तुम्हार लिए हा बनाया है, नहीं तो सुनहका खाना मरे लिए रक्खा था।" मै दटसे तिलमिला उठा। इस बामाराम मरे लिए खाना । मरे मुगमे निकल पडा-" -"मैं नहा खाऊँगा।" और मै तेजासे उपर चला गया। जाकर मम्ति' कमें एक दर्द भरा तूफान लिगे हुए चारपाद पर गिर पड़ा । थोडी देर बाद, नौकराना थाला लिये हुए आयो और मरे सामने रग्वना हुइ बोली-"उन्हाने बना है,उह मेरा क्मम है.--ग्वा रें।" मै चुपचाप खाने लगा और नौकरानी बताने रगा कि क्सि तरह र निरे परमें दो मानेका बच्चा था तभी पडा जाने उनको बहुत मारा था । इतना मारा था कि वे चारपादमे एक महाने तक बिल्कुल उठ नही सका थीं और तभामे य वामार रन्ता है । ना तो दनका तनदुरम्ना उन अन्टा था। नितना काम वा करती था, उनना दृमग साइ क्या करेगा? और आन दम घामाराकी हास्लम भा मारा राम युर मरता है, स्नि उनस दिल्में जग मा भा टया नी । मैंने पृग-

बरसात अरभा आता ह
२७
"क्यों मारा था "
वह बोली-“वाहर किमाने मनाक डा दिया था कि उनकी
चीनी काली है और वम घरमें सारी गुम्सा उतार दी।" वह बैठी
बताती रही कि कैमे घोड पानी चाउक उन पर टूट गयी थी। किम
तरह उनकी एक एक नम फोडे-सी ढर्ट करता थी और वह महीने
भर तक हल्ली तेल लगाती रही थी। "मारतेमके आदमा है लक्नि
ऐसी मार नहीं मारते"-वह कहती रही । वहीं किसा प्रयगम उसने
यह भी बताया कि यह मा राजपाट इहींकी बढीरत है। उनके
बाप बहुत धनी पडा थे और यह अकेली रडकी थो। मरने पर
मन कुछ इन्हीं के नाम लिव गये। यह न होती तो यह रईसी न
होती । और थाली उठाते उठाते भी कहती रही-"टतनी नेक और
इतनी सीधी औरत आजक्रकी दुनियाम मिलना मुश्किल है।
अभी अलग हो जाय तो उनके सार ठाठ हवा हो जॉय । एक वह
हैं और एक ये है जिसने अपना सब कुछ नन्हीं के नाम लिखना
दिया है । हम लोग तो इहींके भरोसे जी रहे हैं, वाचू। जिम
दिनमे नहीं रहेंगी इस घरमें एक भी नौकर नहीं टिकेगा।"
उस दिनकी बात यहीं समाप्त हो जाता है यद्यपि उस रात में
वडे गहरे मानसिक उथल पुथरमें था और दूसरे दिन जर शामको
बढ़ते अंधेरेम पटा था तभा नौकरानाने मार कहा था-"मलकिन
ने पहा है अगर पर न रह हा तो चले आय ।" मै उनके पास
जाकर खड़ा हो गया, वे चारपा पर पड़ी थीं। लगता था जैसे
उनका तगायत बिल्कुल ठीक नहीं है। मुझ देखते हा बोली-
"क्ल नाराज हो गये।
--

कारकी घण्टियाँ "तुम्हारी तबीयत क्यमे खरान है-भाभी ” उहाने मेरी तरफ्मे मुंह फेर लिया, नेमे उहें मेरा या प्रश्न निरकुल अच्छा नहा लगा और खामोश रहीं। मेर मुखमे निकल पड़ा-"नहीं आताओगा ?" व चुप रहीं । मेने कहा- "अच्छी बात है ।" और उनास उठ कर जाने लगा। मेरे जानेकी आहट पाकर वो कुछ भारी आवानमें गोलीं-- "खाना खा लो-मैंने तुम्हार लिए ही बनाया है, नहीं तो सुनह का खाना मरे लिए रखा था।" मे दरसे तिलमिला उठा। इस नामाराम मरे लिए खाना । मरे मुसमे निकल पडा - "में नहीं खाऊँगा" और मै तेजीसे उपर चरा गया। जाकर मम्तिा में एक दर्द भरा तुफान लिय हुए चारपाई पर गिर पड़ा। थोदा देर बाट, नौकराना थाला लिये हुए आयो और मेरे सामने रखता हुइ बोटी-"उन्हाने क्या है,उहें मेरी क्सम है--ग्वा है।" मै चुपचाप म्वाने रगा और नौकरानी बताने लगी कि किस तरह र इनर परमें दो महानेका बच्चा था तभी पढ़ा जाने इनको बत मारा था । इतना मारा था कि वे चारपाइमे एक माने तक बिल्कुल उठ नी मका थीं और तभाम ये बीमार रस्ती है। ना ता इनका तनम्म्ता बटुत अच्छा था। नितना मम वो करता था, उनना तमग का क्या करेगा? और आन इम चामाराकी हान्नमें भा माग राम पुट करता है, स्नि उनके रिलमें ज़रा मामा दया नहीं। मैंने पृग-

२७
बरसात भर मा आता है
"क्या मारा था"
वह बोली-“बाहर स्मिान मनाक य दिवा या किटनी
ची सला है और यम घग्में सारा गुम्या जार दी।" व पैठा
बताता रही रि मे घोड वाला चानुस न पा हद गनी गादिम
तरह उनसरी एक-एक नम फोड-मी दर करता थी और वह मटाने
भर तक हल्ला तेल लगाती रहीया।"मारतेमसे आठमा है लन्नि
ऐसी मार नहीं मारते" यह कहता रही। वहीं किमी प्रमान उमने
यह भी बताया कि यह मर गनपा- इन्हानी बोलत है। इन
बाप बटुत धना पटा थे और यह अग लड़की थी। म्ने पर
सब कुछ उन्होंम नाम लिख गय । पद न होती तो रहमान
होता । और नागठाते-टाते मी मनी ली-"इतनी
इतनी सास औरत आरककी दुनिया में मिटना बुध
अभा अलग हो जाय तो ना मार टाट हवा हो और
है और एक ये है निमने अपना मर गुरु बन्दा
दिया है । हम सा तो इन्हार मगेन ना-है, 7
दिनमे नहीं रहगा हम घाम एक मा नोरनाक
म दिनकी रान यही समाप्त हा मानव
बड़े गहरे मानमिक व्यर-युपत्र या रोग
बढ़ते अपने पढ़ा या तभी नीनगरका
कहा है अगर पढ़ न हानी
जाकर सड़ा हो गया, २ बापट -
उनका तगायत रिकुल टारबाट
" नागन हो गया
M

२८
काठका घपियाँ
मैने मा-
मने कहा-"नहीं तो । और फिर तुममे नाराज होना ।"
व बोली-"झूठ क्यो बोलते गे?"
-"तुम मुझसे छिपाती क्या हो भाभी । इतना
टुरार क्या रखता हो ? क्या म म लायक नहीं है कि तुम अपने
मनसरी बात मुझमे रह मको?" यह बोला-"तुम गलत समझते
हो। इन आठ दम दिनाम ही तुम मेरे नितने अपने हो गये हो
उतना शायट कोद नहीं हुआ। मेने अपने जापनकी एक-एक यात
तुम्ह बता दा है। कुछ भी नहीं छिपाया। फिर हम औरताकी
जिदगीमें ऐसा होता ही क्या है जो छिपाया जा सके।"
मैने कहा-"ओफ् । क्तिना सफेद झूठ बोल गयी तुम ।
अपना यामाराफा बात कल तुमने मुझमे नहीं छिपाया था ? रफिन
क्या समझता हा मुय पता नहा रगा ? मुझे सत्र मालूम हो गया।"
वन पोला--"ता क्या भरा हुआ तुम्हारा
तकगफ ही
बढ़ा होगा।" मैने कहा-"उमम अधिक तगफ मुझे तुम्हारे
टुगमे हुए था।" यह बारी-"किनन नादान हो तुम । कोई
औरत अपने पतिकी बुराइ र सस्ता है।"
मैने क्या-"अगर बुरा है ता उमे बुरा नेम क्या हानि
है ?' उनान कना-"नहीं। पति दवता हाता है। दुनियाकी
निगाहमें बुरा होने पर भी औरतकी निगाहमें वह बुरा नहीं होगा ।
ऑग्नो उमे युग कन्न या समयनेका का हक नहा है।"
मै बाग-' उनका रता वरमा पर भा तुम ण्मा रह रही
हा।' ने गान्त म्बरम रहा-"तो क्या हुआ? प्यार भा तो
?

बरमात अब भा आता है करते हो" मेने कहा--"व्यर्थ उनका पक्ष मत रो। तुम्हें नितना प्यार वे करते है म जानता हूँ-वकार मुझसे कुछ कहलाओ नहा।" वह योग-"तुम रोग नहीं समझ सस्ते । पति जो कुछ करता है, ठीक करता है। पतिके हाथसे काट पाना भी औरतक लिए स्वर्ग है।" मैं चुप हो गया। उसी समय जूतोकी चरमर हुई। मैंने देसा पटा जी सामने खडे देख रहे थे। भाभा देरी हुइ थीं, एक गुलाबी चादर ओढ़े हुए, और मै उनके पास ही उसी चारपाई पर बैठा था। मुझ इस तरह देविकर जैसे वे ठिठक गये और मेरे नमस्तेका विना उचर दिये हुए ही सावे अपने कमरेमे चले गये। वे गॉबसे अभी दस दिन बाद वापस आ रहे थे। मुखे इस प्रकार अपनी पत्नीकी चारपाई पर बैठे देखकर उन्हाने क्या सोचा होगा। सोचार मैं किसा आशकासे कॉप सा उठा और हतप्रभ-सा मामी के मुखकी ओर देखने लगा। वह मुझे परेशान देख चुछ मुसक रार बोली-"तुमसे कुछ नहीं कहेगे। अगर-कुछ कहना होगा तो मुझसे कहेंगे। इस समय बहुत गुम्सा हो गये है। तुम जाओ अपने कमरेमें । मैं समझा दूंगी तो शायद सर ठीक हो जायगा।" और में अपने कमरेमें चरा गया। मेरा दिल कॉप रहा था । सोचता था कहीं उनकी मुसीबत न करें। मुझे मालूम नहीं उस रात वैमे क्या हुआ ? किन दूसरे दिन सुबह जब मुझ बुलाया गया तर वे अपनी पत्नी साथ उसी चारपाई पर चुपचाप बैठे ये। मेरे लिए पासम उर्सी पड़ी था, मै उम पर बैठ गया। कुछ दा एक पुटार वातोके बाद बात ही बातम मेंने कहा- --

३०
कारका घटियाँ
"मै जनमे आया हूँ, तरसे मै ठेग रहा है कि इनका तगायत
टास नहीं है, आप इनका दलान कीनिए ।"
वह चासे बोला-"अरे । पहल पर देखा है रमलिए ऐमा
रग रहा है तुम्हें । यहॉ तो दो साल्मे यहा रफ्तार है। थोडी
टुत सरान होती है फिर ठीक हो जाती है।"
वह बोल-"कायटेसे खायें पिय तो तनीयत काह खराब
हो । कहना मानती नहीं है, अट-सट खा रती है तो भुगतें । मुझ
क्या करना है "
रतना कहकर वे उठकर बाहर चल गये । इधर इनकी तनियत
बहुत खराब होता गया और उधर घरमें तमाम आगरा औरतें
चुप चुपो बुलायी जाने लगा। एक दिन मेने घडी हिम्मत करके
भाभासे कहा-
"तुम्हें कुछ मालूम भा है ?"
उन्होने पीश आना नमें कहा-"हॉ, सब मालूम है । मैने
उहें जानत दे दा है।"
मैं आश्चयमे उममा मुँह देखने लगा। व फिर वोरी-"मरे
मना करनेमे व मानते थोड हा ना, और फिर मै तो बामार हा
रहता है। क्या करें बचारे ? मै क्मिा लायक ही नहीं हूँ।"
मैं मन रह गया। मने बोरसे क्या-"लेकिन यह बुरा
वर चरन्मे वार स्टी मा चुपला आगनमें--"पतिस लिए
पुट भा बुरा नहीं है । फिर आत्मी तो पमा करते हा है । सस
आरमा करते ह, रहें सब गोभा देता है।"
मैंने कुछ बाय कर क्ला-"पर क्या यह ज्यादता नहीं है?"

बरसात अब मा आता है वे गो--"ज्यादती क्या है ? भगवानने उन्हें बटा बनाया है, मालिक बनाया है । वे सर करने के लिए आजाद है। हम लोगो की तरह गुलाम योटे ही न है।" मेरे जामें एक जोरका विद्रोन टा। जीमें आया कि मैं चिल्ला कर रहूँ-"नागकी यही अघ भक्ति उसे तबाह कर रही है। सत्र कुछ मका होने पर भा उमे कुछ नहीं मिलता । मर कुछ दे देने पर भी वह कुछ नहीं पाती, एक हत्का-मा प्यार तक नहीं । आन पुम्प निगटता जा रहा है, दिन पर दिन उमाका अप-भक्तिरे कारण मी लिए बुरा होता जा रहा है।" पर उनकी ऑखाके उम अटिग पिग्वामके सामने कुछ कहनेकी हिम्मत नहीं पी । तभी उन्होंने मुय पुचकार कर कहा- "तुम उन्हें दोष मत दिया करो। उनकी भी मनवरी समझा करो।" और मैं टम वाक्यके पीछ टिपी दुई पनि-पूनाकी भावना पर तिरमिग गया । उनकी तनायन दिन पर दिन मगर होती गयी। वह चारपाई से लग गयी । लेकिन उनकी मोड टीस्मे दवा नहीं हु । जन पर म ज्यादा रट होता था, ज्यादा दम्न आते थे, पासके वैद्यनीक यहासे चूग्न आ जाता था। उनको कुछ भी हजम नहीं होता था। नितना थोडा-बहुत म्वाती थीं मर निकल जाता था। कम- जोग बढ़ती जाती थी, रक्नि किमीको रो चिन्ता नहीं थी। वाहर बैठकमें मे ही दिन दिन भर 'फ्गा' जमता था, भग छनती था, नाच-रग होता था, दावतें पड़ती थीं, टहाके लगते थे। एक दिन में निट पकड गया और मिना निमीकी हाँन' .

३२
काठका घटियाँ
सुने हुए डार वुला राया। डाक्टरने देवकर कहा- आप
लोग अब तक सोते रहे क्या ? इहें ऑताका टी० पी० हो गयी
है। आतें सड गयी है । अब भी समय है किसी विशषज्ञको फौरन
दिनगदये । ऑतें काटकर खडकी ऑते लगायी जागी । जल्ली
कीनिए, वरना हाथ धो नेटिग्गा।"
टाकरके जाने पर वे बोरे-"अरे । ये डाक्टर एसे ही
डराया करते हैं। निमको इश्वर मारना चाहेगा कोई नहीं बचा
सस्ता । वकार है चार पाँच हजार रुपया फेंफ्ना मेरी समझसे
तो।" और फिर भाभीका ओर मुँट कर बोले—"और फिर यदि
तुम्हारी इच्छा हो ही तो कोशिश कर ली जाय ।"
उन्होंने दृढ हो पर उत्तर दिया-"निलकुल बेकार है । जीना
होगा तो जा हा नाऊँगी। तुम स्पया वरबाट मत करो । मुझे तो
लगता है, कुछ भी नहीं है, सन ठाक हो जायगा, तुम घबडाओ
मत ।"
उसा दिन शामको वे १४००) की मोटर-सायकिल खराद
राये और उस पर घूमने निकल दिये । म उनके पास बैठा रहा ।
मेरा दिल बहुत घरा रहा था। वे बोला-"मुम्त क्या हो?"
पिर अपने ही आप बोले-"मैं जानती हूँ तुम क्या सोच
रहे हो। मैं अच्छी तर हर यातमें उनका इच्छा समझनी हूँ,
जानती हूँ वे क्या चारते है, क्या नहीं। इसीनिगा मै मुद पर
से ही एमे काम र नाता है, तो उनका इच्छाक प्रतिपूर होते
हैं। औरत प्यार चाहता है।" पता नहीं कैमे भरी भरा आमनम

बरसात भव भी आता है
।
-
-
इतनी बातें उनक मुखसे हट दृट कर निकली और फिर खामोश
हो गयी ।
हम दोना बहुत देर तक गुमसुम रहे । साँझ हो चुकी थी।
सूरजको डूबते देख घरके उम दारानमें अधकार उमड आया
था । वातावरण सॉय-सॉय कर रहा था। स्सिी मरे हुए हिरनकी
पथरायी ऑखोकी तरह यह खामोशी भयानक थी। पर हम चुप
थे। क्सिीके भी मुखसे जैसे आवाज़ निकरनेको तारत ही नहीं
रह गयी। उस मैले बिस्तरेके, मटमैले तक्येिके आकाशमें, मुझे
लगता था, जैसे एक चॉट इयता जा रहा है, उसकी रोशनी पीकी
पडती जा रही है और अधकार घना होता जा रहा है । मेरे दिल
में दर्द की काली रहरें उमडने रगी। आखिरकार वही बोली-
"सुम्त क्यो हो ?"
मै कुछ उत्तर नहीं दे पाया। बढ़ना हुआ अधकार मिवाय
इसक कि अपनेमें ही धना हो-हो कर रह जाय, दूर डूबते हुए
चॉदसे कभी कुछ कह पाया है । फिर मै हो क्या कहता
वो बोलीं--"खाना आज नहीं खाया है, लगता है।"
मैने कहा--"खा लूंगा।"
उन्हान कहा-"मुझम तो हिलने का भी सामरथ नहीं है। नहीं
तो बना देता।" और उनसे आँखोंसे ऑमुआकी दो बडी वडा
वूदें वह गयी । फिर बोली-उमडे हुए तूफानको शायद रोकती
?
''तुम कहा करते थे कि तुम तरकारियाँ बहुत अच्छी बनाते

काठका घण्टियाँ हो। आन पराठा तरकारी वनाओ, म खाऊँगी।" और एक पीरापन रिये हुए मुमरा दी। मैने कहा- रक्नि तुम तो कहती थी फि मे दूसरेके हाथ का नहीं खाता।" वह नोरा-"रक्नि तुम जब दूसरे कहाँ हो।" मैने उनकी इच्छानुसार बडे उत्माहसे खाना बनाया और डाक पास रे गया। थारी मामने रख कर बोरा--"तुमने इतने मनमे क्या था, इसनि टाल्नेगी हिम्मत तो नहीं पडी, लपिन अगर तुम न खाओ तो बहुत अच्छा हो।" यह बोली-“बेकारका बात मत सोचो, खा पाकर मरने दो, आखिर मरना है ही।" मेंने कहा-"तर मै तुम्हें नहीं खाने देंगा।" वर बोलीं-"अच्छा, पर हो कौर साउँगा।" मैन कहा-"नहीं," और थाली उठा कर उपर रख आया । रहोंन कहा-"यह अच्छा नहीं पिया तुमने, मरते हुए आरमार सामनेसे थारी हा रा ।" पिर वो--"वो तो साना खा चुके है न।" -ॉ, अपने पडासा दोस्तर यहाँ खा पीर मिनेमा दम्पने गये ह।" तभा मरे स्मिी टोम्नने बाहर आवाज़ दी, म चग गया और जर मैं सैर कर आया, ता मैने दया, उन्होंने नौकराना द्वारा थारी मँगा रा है और तक्यिा सहारे चैटा सा रती है । मुझ दम पर मुमाराया और योग- मैन ग-

बरसात भामा आता है
टार,
" तो मेरा कोई एहमान तुम्हारे ऊपर नहीं रहा न।"
मेरे गरार पर जैसे पर्मियों चल गयो । उन्हाने बार पाना पाते
हुए, एक निचिन्त म्बरमें --"अन चाहे भगवान् नरस्में ही
तुमसे छूआछूत
मैं महा निगाह पायी
उस ममयमे उनी तबीयत और ग्वरान होने लगी। दसरे
दिन गने हम रोगार माथ ताग सेग्नेरी इच्छा प्रकट का।
यह एछ पिचिन था, तर मी भाट साहन लारण अच्छ न टेब कर
और अन्तिम इच्छा समझ बैठ गये। हम तीना मुरिरमे एक गाजी
खेल पाये निममें वर हार गया । फिर उन्होंने एक मास सोच
कर पत्ता फेंक दिया और मरी आर देखकर जोरसे परेशान सा
विलायी-"तुम कुछ भी कटो, मैं यह नहीं मानती ।" पता नहा
इसके क्या अब थे। उन्हाने दस हारसे क्या समझा १ रेग्नि
मैंने इतना जबर देखा जैमे उन्हें टम हारमें तम्गफ हुई है और
उना मागे सुगा टुप्त हो गयी।
वह मुहका समय था। फिर दिन भर उनी तनीयत तेनीमे
निगडता हा गया। हम लोग सब पास बैठे रहे । चुरन वाले वैद्य
दवाकी पुड़िया मुँहम डालते रहे । रस्नि माम तक यह चर
चमी। मरते समय इन्गेने दो इन्छा प्रकटका । वन लगभग अन्त
तर रोलती री, टम्बती रही, ममझनी म्हा, रेरिन यह खुशी जा
तास गेलने पहले तक थी नहीं थी। पहली इच्छा उनका अपने
पतिमे था। निमो अनुमार उन्हाने उनका पैर अपने पाम स्पर
लिया और उन चरणाकी धलि अपने मायने लगा रा । और दूसरी
इन्मनुमार न्होंने मुझ युर गया । मै र जडवत बैठा था । पति

कारका घण्टियाँ
।
को पाससे हट जाने को कहा और उनके जाने पर मुझसे
धारे से बोली-
"मुझे तुम्हार ऊपर बहुत यकीन है। मेरे मरनेके वाद एक
काम कर देना।"
मैं चुपचाप सड़ा रहा। बोला नहीं। डर था कहीं भीतरका
तूफान बाहर न फूट पडे
व बोली-"इनकी जल्दा हा क्मिी सुदर गोरा सड़कीसे
शादा करा दना ।"
और फिर उन्होंने अपनी बडी नटी सुन्दर आँखें मेरी जल-भरी
ऑमाम डार दी और वे दयते दसते पथरा गयी । रेक्नि पथरा
पथराते भी उन्हाने मुभमे बहुत कुछ कह दिया । काश कि वह
'कुछ' भी मेरा कलम लिम्व सस्ती, फिर मै दुनियाको बताता कि
वह हत्या था, एक निर्दोपका हत्या थी, एक रेफिन नहा
नहूँगा, क्याफि वह क गई थी 'हे' दोष मत देना। पतिका
टोप नहीं होता । लेकिन क्या उस पतिका भी नहा, जो उनकी
राग र कर घर आते समय हो राहम नाऊमे कह रहा था-
"टा कहते हो तुम । घर तो उनड गया। जल्दाहा वमाना
भा पगा। उस रडकामे शाटा तय करो निसे मेरेमें दखा था ।
कोशिश करोगे ता उमा माँ मान नायगी। वे रोग बहुत
गरान है।"
और नाऊ रह रहा था-"अच्छा सरकार, दसरा हो जाय
जरा।"

बरसात भर भा आता है "हॉ हॉ, सो तो हो ही जायगी, लेकिन तू नातचीन अभीमे गुम्भ कर दे।" और मै मनानसे रोते समय उम निनन मागमें, इन लोगा की ये बातें सुन रहा था, और दूर प्रतिपन बहते हुए आधी रातके अधकारके बीच, आकागके उस फोनेम इरता हुआ चाँद देग्य रहा था । एए चाँट तो हर ही गया । रस्नि दर न निम- टिमाते हुए धरोमें, ऐसे क्तिने ही चांद इन जाते हागे-और उनकी चॉटनी किमी अंधेरे कोनेम, अघभत्ति और अत्याचारी परतामें घुट-घुट कर दफ्न हो जाती होगी। .

-
-
सोनेके पूर्व
टम समय आधी रात बीत चुका है। इस कमरेका दीपारा
पर खामोगा ऊन-मा रहा है। में चानती हूँ कि मुझ नींद आ
जाय, रफिन इतनी हरकी सी चान भी बातमीमा यहाँ पूरा नहीं
होता। मुझे अपने ऊपर गुम्मा आता है, उन हवार अलसाये
हुए पाका पर गुम्सा आता है, जो रह रह कर बाहर बरमती हुई
परमातको रगान नाग फुहार चुराकर क्भा कभा मेरे ऊपर टार
गुटगुटा जाते है। वार मुये ऐसा लगता है कि मुझे नींद
रगभग आ गयी है और अब में कोइ मधुर सपना देखने वाली है।
अपने थर हुए हाथ पैर, थकारने माठे माठे ददमे चूर शरीरका
मान अन म ग्वा चुरी हूँ। क्वल मेरी आँखें इस कामल शय्या
पर छाये हुए अधारमें कुछ खान रहा है। निल्कुल पास
मिाहाने म्हर पर एक जार रखा है, उसरा पानी कमा राल,
कमा नाग, सभी पाग मा रगता है। बुलाता हाथ, आमलट,
मोमा, चायर ट और ग्मा तरह चम्मच और काटाका सम्पर,
टुन यारा हम आज भा बाच-बाचमें एक एक करक आ
नाता है। और फिर रहा नार भा छाग, सभा उडा, सभा
लाल, भा नाग,भा पाग, पिर राल हा नाता है, और वह राल
पाथ उपर उठ रहा है। धारे धार और नाचे-नाचे - नार भाट
रहा है, अपरे-मे घिग हुया वर टेनीपे नाच रहा है । उममा रग
रना पल्ला गर, रंग,नाग पाग बदलता नाना है, फिर अचा

बरसात अर मा भाता है नक गिर पटता है। पर्श पर गिर कर हटनेकी जोरको झनझनाहट आती है और मेरे उपर ढर मा पानी छल्क कर गिर जाता है। चाक कर मेरी ऑग्य खुल जाती है, देसता है भीगी हवामा एक झोमा सिटमी के दरवाजे भडभडा गया है और मेरे ऊपर एक फुटार टाल गया है। मैं चाहूँ नो बिडकी चन्द र सफनी है, मेरा कपटा और निम्तरा भीग चला है, पर यह फुटार अच्छी भी तो रगता है। फिर उ कसे १ हाय हिलने तकको जी नहीं चाहता है। रगता है, जैसे जान नहा है, शरीर शिथिल है, निनान है। कई बार मैंने कोगिश की है खिडकाक भी लगे दरवाजाको बन्न करनेकी, जो ह्याक दशारे पर खुलने और बन्न होने पर चौवर और दरवाजासे टकरा कर झनझना पडते है, पर हिल- हुल जो नहीं सक्ती हूँ। ऐमी हारता हवाम कारण अपने-आप दरवानाक बन्द हो जाने पर मुझे खुशी होती है और फिर यह सोचता हुई कि अब कोइ झाका नहीं आयेगा, मैं आसें वन्द करने लगती हूँ। निम रेस्तरॉम मै आनसे काम करने लगी है, उसके मालिका चेहग मेरी ऑग्वाक आगे बनने लगता है। मुझ यह बुरा लगता है क्योंकि मैं मोना चाहता हूँ, इसलिए कुछ ग्वीझ कर में पल सूर ज़ोरसे दनाता जाती है, उन्हें नमश और जोगी दराती जाता है, यहाँ तक मि पुतलियाँ उद करने लगती है और फिर ऑखें शिथिल हो जाता है, स्नि मसरी शकर मिटनी नी । गोरा-गोरा चेहरा, पिचके गाल, मायक बायो तरफ मूखे-मुसे गिरे हुए बाल, मत्थे पर तान मल चिनम मा गुम्मा और भी परेगाना, मोटे-मोटे ओठ, जो मालूम पडते है उसके चेहरे पर -

४०
कारकी धपियाँ
हटा लो
।
।
अलगसे जोडे गये है। कभी कभी वे दॉतोसे दबाये जाते है,लकिन
दॉतारी परडम एक चौथाइ ही आ पडते है। कभी कभा मुमक
राते है । एमे अवसर पर व और भी भद्दे लगते है। ओफ । ये
भद्दे आठ मरे सामने क्या आ रहे है । हे भगवान् , इहे
मरे मामनेमे । पर ये और और स्पष्ट होते जा रहे है। उनका
आमार भी बड़ा होता जा रहा है । अब ये बहुत बड हा गये है।
मेरा ऑसें दर्द करने लगा है, स्नि ऐमा लगता है जैसे ये पत्थर
के हारर पलमा पर नम गये है। इतना बडा आकार देखकर मुझे
हँसी आती है, नी, भय लगता है । ओफ । यह चायका सफेद
प्याला सर ओठारे सामने क्तिना छोटा लगता है। जैसे दृध
पात समय पर हरकी-मी सफ्दी उसके ओठाके एक कोनेम रह
गयी हो। पथरको दो बड पाटसे उसक आठ अप सुर रह है।
मैं नहीं चाहता ये खुल, कोइ उहें हटाओ, मुझे बचाओ । वे
खुल गये, मुझे डर लग रहा है, आज भी निकल रही है-
'तुम्हारा नाम " मी क्रश, नीरम, अधिकारक गवसे
भरा आवाज । मै इतना भयाना आवाजका उत्तर नहीं दूँगी, नहीं
दूंगी। पर रगता है जैसे मै कॉप रना, उत्तर दे रही हूँ।
"मिम मोना फार", मेरी आमाज बद्त कॉपी है ।
'मिम । ऐन्ग नियन। बहुत अच्छा । बटुत सृन ।" ओप। यह
आपन' या भदा मुमरान । मैं नहीं बरताश्त कर सस्ती । उमसे
इन बरे-बड ओटामा मुमरानम उमरी टाटा-छोग धूततासे भरी
आमें भा अब पैर गया है। व ऑमें कुछ और चमका है, वे ओठ
युट मिट स और सुन है।
.
।

दरसात अब भा आती है। "नवेरपये माहवार आवान और रश,नीरम, मनानक पर पता नहीं क्यों शुट मोटे लग रह है। जी में आता है एक बार वह यह वाक्य फिर ग दे । पर- "शम ममय लो। और में यह मन नहीं ममयना चाहती। काम, रेम्नगॅमें, ईश्वर अचारे । रिमी तरह यह नर मग आँन्वोमे -ट जाता । लगता है मैं पूरी तारनमे पपके न ओठाको हटा रही हूँ, पर वे इतने भाग निहले नहीं। नहीं- विमक गये है, क्योंकि मरे हाथ दद करने का है और ऑम्बॉके मामने यर रेम्नगा नीली-नोग दीवार आ गयी है । मेगे ऑग्में देखती है और ममयती है कि खुरी दुई है। मै गार गार जल्ली-जल्ली अपनी माग्वे बोलता और बन्द करती हूँ, पर क्या कद मेरी पल्में पटुत भारी लगती है । नगअर यह नीला दीवार म्बो गरी है और भैग ऑम्वारे मामने स्मरेका अपार भी सामोरा है। घना अपेग, ऑम्म मुला-की-खुनी है । एक हली भी कोशिश की मन पर यन्त करने की, पर लगता है जैसे वे हिल्ती ही नहीं, लोग मेरी आँने खुग है और उनके मामने पूम रहा है घना अपेग, निमकी गति हर क्षण तेज होता जा रही है। सानो पाम एक मूं-मूकी आरान आ रही है। मैन मममने- का कोगिरी। यह पाटरकी ते हवा है जो मुनाई दे रहा है । पर यह आवान और तेन होती जा रही है । जी में आता है कि सान बन्न कर,, पर हाथ निगनेकी तबीयत नहीं करनी। मिलने ही नहा । अपरेका नृत्य ऑम्बोरे मामने अब घामा होता जा रहा है। रक्नि आनान तेन होती जा रही है और हवामा

१२
कारकी घपियाँ
एक जोरका झामा आया । ग्विडकीके दरवाने भडमे सुल गये ।
पानामा बहुत बडी बडी उदे पिम्तर पर आ गिरी और गिरती
रहीं। न्वा तेज़ामे आ रही है, अपने असन्य परवा पर पानाकी कभी
भा छोटी छोटी और कभी कभी नडा दें लादे नुए। पानीका
चौडार जोरसे आ रही है और लगातार मेरे ऊपर पड़ रही है ।
म भाग सी हूँ, निम्तर भीग रहा है, पर यह विचार बनने भी नहीं
पाता कि एक सावरक धने कुहामेम छिप जाता है और म भूल
सी जाती हूँ। इस समय केरल मुझ वडा तेन आवाज सुनाई पड
रही है। गायद ऑधी भी आ गयी है । म तेज़ आनाज़म एक
मोठा आवाज़ भा सुना दने लगा।
"तुम्हारा काम है मुसकरा कर लोगारे पास जाना और पूछना,
आप क्या चाहते है ?" यह वही आगाज़ है जिसके सुननेसे मै
मरना बेहतर समझता हूँ, पर लगना है जैसे मै कह रहा हूँ 'अच्छा'।
आरान तेज होती जा रही है और बार बार मुझ सुनाई देता
है, "तुम्हारा काम है मुमकराना, तुम्नग काम है मुसकराना
मुमाराना-मुमाराना।" या आगाज़ तेज़ और तेज तथा
पतग हाता जा रहा है, उस ऑधाक गोरम जो मैं मुन रही हूँ।
मरे हाथ पैर पर अब रगता है नम कोइ हथौर मार रहा है ।
पटक मार मरा भारा पन् यपने लगता ह । कानाम गूंनता हुद
ऑधाका आवान अर धारे धारे स्म होने लगा है। पर वर पती
आगरान तन हाने रगा है, फिर यहा नाग मा नापार। तेन
प्रका, रग रिगे परे पार आत्मा कह, अट्टाम बातचात,
गाना, पुमामाना, पिचित्र विचित्र म्बर, चम्मच-यॉगका बापट,
.

वरमात अत्रमा आता है . चार, राफी, टोम्स, आमट, घूमती दुई त तग्यिाँ, नार-बार मनेनली घटी, वह लाओ, यह लाओ, वहाँ जाओ, उनसे पूठो, पेमोकी बनवन, मैनेनरसा मेन पर सिगरेटका ऑ, रोगोंकी मेरी और धरती तुर्ट आँन्य । मत्र तेनाने मरे दिमागके अन्दर घम-मी रटी है । पूग रेम्नॉ धम रा है, मग घम ग्ना है, मैं बु धम रही हूँ, चारपाट धम रही है । ओफ । यह मर क्या हो रहा है। जामें आता है मैं चिल्लाऊँ, नगे जोग्मे चिल्गाऊँ, पर मेग आगन नहीं निचल्ती । मुये चक्कर आ रहा है। लगता है में आममान से जमीन पर गिर ग्नी हूँ। मन मन् मु-की आवाज़ । बीच-बीच म - मोटे ओठ और पिर मार्ग म्बर-तुम मुमगना नहीं जानती, कल माम्ब कर आना, अगर काम करना हो।" मैं निल- मिन्ग स्टी हु । नाच, कुत्ता । मुमगना माम्बकर आओ । मैं नहा आजगी । नहा काम नगी । पर यह आवाज गूंज ग्टी है आगी की तरह, तूफानका तरह मेरे सनामें- ओषा में मोना चाती हूँ। क्मिी तर नाद आ जाती। पर नहीं आनेगा शापट । नहीं, मारेगी, नर आवेगी । आफ् । टन समय लगने लगा है जैसे माग तूफान ग्वामोरा हो गया है । धुंण् गहरे कटरे वाटल, मनियम घुर मे रहे है । अब भी मन चीज़ घुम मा रहा है रक्नि उनका आकार बना और गति गिदिन-मी होता जा रग है। मैं ता चाहती हूँ कि उनका आकार मिलकुल मि जाय -और मर गान हो जान । तन्द्रासी लहर पर उनीट बग्में कोर्ट म्वप्नारा गीत एक हल्ली कम्पन-मी लग कर रगनीरा शालिमाकी तपन मुथपर पैग द और में मुक्ति पा ।

४६
काठमाघपियाँ
,
निकलती और ये मुखाकृतियाँ छोग-वडी अनेक आकारासरी
होकर मेरी ऑरवाके समय छाय दुग अधकारमें मॅडराती हुइ मुझे
टरा रहा है । इनकी सान्या बढ़ती ही जा रहा है । प्रत्येक आकार
जल्दी जल्दी परिवर्तित होकर और भयानक होता जा रहा है।
उम अधारको पृष्ठ भूमिपर निनमें ये चेहो नाच रहे है, कपल
तमाम वासनासे भरी हुइ अनेराने आकागकी ऑखें स्पष्टतया
चमस्ता हु मेरी ओर घूर रहा है। लगता है उनका
वामनात्मक चमक मरे अङ्ग-अङ्गपर छुरियाँ चला रहा है। मैं
तिलमिला उठता हूँ, मानो ये खा जायगा मुझ । मै कॉप रहा है
और व चमर रहा है और भयानर होकर । कानाम एक आवाज़
घूम रहा है, तडप रही है गरन रती है, 'तुम्हारा काम है मुसक
राना' 'मुमाराना' । भयमे म मूग रहा हूँ । म चाहता हूँ क्मिी
तरहमे य हर नायँ या मर प्राण निकल जाये। ये धूरती हुई
भयानक ऑमें इस अन्धकारमें अद्गारा-मी जल रती है। मुझपर
बरस रहा है। म जल रही हूँ, तडप राहूँ, स्नि यन् आवाज
आता हा ना रहा है 'तुम्नारा काम है मुसराना मुमाराना।'
गायर आनकी रात में सो नी मगा, मर समगा या नहीं
यह भा न पर माना। रतना ता रगता है जैसे मैं अपमरी हो
गया है। य ऑम्ब म अधारमें नाचता हा जा रहा है। इनका
भयानस्ता बढ़ता हा ना रहा है । मन्या चिन्छुआफ टम बन चन
कर य मुख मार रहा है। मैं ना रहा हूँ, दम्व रहा हूँ जबरनम्ता,
परवा, अरले अमहाय, और य आगन प्रतिक्षण गूंजता ना रहा
है.--"तुम्हाग काम है मुमरगना मुसम्मना ।"

कमला मर गयी
"मुना हे मला मर गयी ।" मॉ ने अपने म रम्ब चौडे
ग्वतम निममें उसने तमाम घर-सी बात लिखा है, एक कोने
में यह भी लिख दिया है। मे इसक लिम्बने की मने कोई
जमरत न समझी हो और पता नहीं कैमे यह लाग्न जमको स्लम
से निकल पड़ी हो। आगर अनन्त नानाके च मे मिली
मारे ग्ने पर कोई कह पड "दन्वा नहीं तुमने, अभी एक तारा
हटा था" और फिर अपने कामम लग जाय । एक बात थी जो
सूचनाक रूपमें निरत पडा । उमक पाल कोई रिचार, कोई गहग
अनुभूति, कोई सहानुभूति नहीं, केवल एक सूचना-सूचनामान ।
मैंने यह पक्ति पढ़ा । कई बार पटी । कइ ढगमे पढ़ा, विभिन
म्वगधात दे देकर पढ़ी। मम्भर है काद दद, कोई हल्ली सहानु-
भूति इसके पार मिल ही जाय पर लगता है सत्र निरर्थर है।
इस पत्तिो पड़े रहनेम या निकार टेनमें खतका वहीं कुछ बनता-
निगडता नहीं, यह अपनेम पूर्ण है और मरी जिन्दगी भी है,
ठीक इस परमी तरह । कमराका नाम क्नॉमि कोने में था बहुत
आँखें गडाकर देखने पर, मन्तिाक पर जोर टालने पर ही पना
लगता है, मक रहने ने इम लम्चे चौड जापन पर कहीं कोई
प्रभार नहीं दाग और आन उमरे न रहने ने की कुछ एमा
नहीं दिया कि उसका कुछ कमी स्वर । लरिन कमा 'मर गया।
यद्यपि यह 'मर जाना' भट मैं दिन भरम सैरडा यार सुनता हूँ
maitra

४८
काठका घपियाँ
पर-कार प्रभाचीन पर-क्मराक साथ दस 'मर जाने का
सम्बध कुछ अनीन लगता है। लगता है मर गया तो कोई बात
नहीं, स्नि अगर न मरती तो अच्छा था। यदी औराम और
कमलामें मेरे लिए भेट है। जब जिन्दा थी, दम दुनियाम रहकर
भी वह मरे लिा नहीं था, लेकिन आन मर जाने पर जैसे
चह मरे
लिए कुछ हो गयी हो । जन तक वह जिन्दा था मैंने कभा उसक
लिए कुछ नहीं सोचा लकिन आज जन वह मर गयी है, में उसके
लिए कुछ सोच रहा हूँ। उमको जिन्दगाने तो नती, लगता है
उसकी मौतने कहा थोडा बहुत उसको मुझसे बॉघ दिया है।
एक घना कोहरा है मेरा आँखाके आगे,निमम मे उममे सम्बन्धित
म्मृतियाँ टोल रहा है । एक घटना पफडम आ रही है। मुझे आश्चर्य
है कि यह घग्ना आन तक मुझ याद क्या है ? आनमे लगभग
बारह वप पृषकी बात है,जब मे नो या दस वपका रहा हगा, कमला
का परिवार मेरा पडोसी था। मेरे घरसे लगभग दो फ्लामपर
उमफा घर था । उसकी माँ और मेरी माँ म बहुत परती था और
अम्मर वे लोग एक-दूसरेने यहाँ आया जाया करती थीं। यही
कारण हमारे उमक सम्पम आनेका था। या बच्चाका सम्पर्क
परिवारका अपक्षा अधिक शीघ्र और गहरा हो जाता है फिर वह
ता मेरा समरयम्का भा थी । सेल कदम हम लागाको बहुधा एक
दूसरेका जरूरत पडता थी। मै स्वभावसे ही गम्भीर था और
नितना हा मै गम्भार था उतना ही वह चञ्चल थी। शामका
समय था। मेरा मकान बटुत छोग सपरैलया था और वह भी
एक गगमे । इसीलिए प्रमाश जल्दी निदा रे रेता था। मै बैठा
।

वरमात भर मा आता है पढ़ रहा था। मग शिवर रायरमे भा अधिकाला था अन अनेरा जाते ही म साल्टेनरा प्रताझा करने लगता था क्योंकि मुझ म दगार दर लगने लगता था। उस अरमें उमस काल- कार चरम मा मपर नॉन रहतहकर चमा उटत थे, जन वर मुये हिमान लगाते समय रहीं गुणाभागमें गलती बग्नपर टॉरना था उम ममय मुझन जबर गलता होना था और माधारण गलतिया पर जन वह मेरे मन परटकर चिल्लाता या तर में आँय रन्दर वीय स्टना था, दाम कम स्नि माँ द्वारा सुनाया हुई गनमारी रहाना या कक अधिक १ मे अपसगपर म निमार भूनकर भगवान या ग्ने रगता था। उस दिन पमा हा अवसर था वर में भगवान्त यार कर रहा था। पर मेरे कान पर रहा था और कमरमें अरा डा गया था। तभी कमला पिता आय थे। पटाने का-'मास्टर साहनग दमे दा मिनका रहा तो दे ढालिए । म प्रमा हो उठा, यह माचार मि भगानन मरा पुकार सुन ली। लेकिन में योग कमर वार प्रकाराम गामा, मै ना चेगा दबार पटाक्यानि च माधमे तमनमा रा था। मैं त टर गया और बग होकर गायत मनासरा प्रताराम अपरावा-मा नस और दखने लगा। मुप स्ले दबार वे पडे नेम्वरमें बोल-"आदरे आटये, म्म क्या गय?" और व तेनाने चर पटे एक और गरी निममें उनका घर था। कुछ नो टग्मे और उछ डोग होना सारण में पिछड़ जाना था रेक्नि नरी निगाह घूमन ही में नौकर उनका गध पाड रना या । गम्त मर र मुममे कुछ नहा राल, लक्नि १

कारका घण्टियाँ
.
घट तो पागमा राम्ता मेरे लिए स्तिना स्टदायी रहा होगा,
न्सका अनुमान इसीसे किया जा सकता है कि वह आन तक मुझ
याद है। उम गाम निसम अँधेरा उमड रहा था और मार
D-मॅ कर रहे थे, म कितना वेचैना लिये भाग रहा था, यह मे
आज भा नहीं भूलता। सोचता था कहीं कमाने शिकायत तो
ननी कर दा है । केसी शिकायत करेगी व १ मैने उसे मारा तो
है नीं । फिर इधर मुझमे उससे झगडा भी तो नहा हुआ । क्भा
सोचता था शायद उसे कहीं चोट लग गयी हो और उमने सुद
वचने लिए मेरा नाम लगा दिया गे। कभा सोचता हो सस्ता
हे उममे कुछ नुकमान हो गया हो, कोई चीज़ टूट गद हो, काइ
चीज़ खो गया हो या कोई चीज़ उसने चुराकर खा री हो और
खुद सजासे बचनेके लिए उसने मेरा नाम लगा दिया हो। वम
इतना हा मरी उस समयकी मानसिक परिधि थी। इसके आगे
में नहीं सोच मरता था । परेशान और टरा हुआ, जर म मकान
म पहुँचा तो मैने देवा, मानस डे ऑगनम चारपादपर उसकी
मॉ बेटी पानटान बन्द कर रही है। एक पतली छडा पासम रखी
है। क्मराके हाथ बंधे है और वह जोर जोरसे सिसकियाँ भर रहा
है से उसने बटुत मार ग्वायी हो । उस समय उसे देखकर मुझे
तरस ना आया वरिक मे और डर गया। उसके पिताने का-
"लो इमसे पृट रो।"
मॉने बट इतमानानमे कहा, "तुम्हीं न पूछ ले।"
"मै क्यो पृहूँ? तुम्ही अपना पिरियामा बहुत तरफ्दारा करता
हो । तुम्हा पृछो न ।” और रतना कहकर वे तेजासे घूमने लगे।

वरमात अवमा नाता है थोडी रस नि मनागडा गरा। सर चुप ये। कार मग मिमकिया मर रही या कोना अमटा पद, ऑनरा नीचा नाचा गवारें, अपरेमे भग हुआ वगमता, पिंगाम गा दुआ तोता ना मेरी तरह मन्म-महम नजर आ रहा है। मैंने स्टमार मी आर आन्न स्टाया लग्नि रह ऑग्में नीची क्यि गेनी ही जा रही थी। मखामागीमे मग टर टना जा रहा था, मरी टागें ऑप रहा थी । आखिरकार उमस मॉ बाग पर प्याग्न---- "वे, तू कर यहा आना था। मच-मत्र पोग्ना ।" पना मी या मरे मुं-मे आरान ना निरा। फिर नाग- "जर हम और त्याग तेरे घर गय थ, तर तुन ओर रमा मस्ति यापर चुपचाप मकानमें आय थ । यूट मन नाटना । महाग्नने मन दय लिया है। बता रहा था।" मैंने कहा, "बा हो।" उतरे याप गोरे.-"तुममे ग्मिने काथा आनेरे लिए ?" ना आगन बटुत रही थी। घगकर स्टने हा मन बार दिया किमन्यन"। क्या यह म आर तक नहीं समझ पाना । गाय- मर निलम दर हा हा कि कहीं मरे ऊपर न कई आफ्न आ जाय । उमा पिना मग उत्तर सुनकर जारमे चिल्लाय- "देन लिया, अपनी लासी ग्नून " और उसकी ओर घूर-धूकर तेनाम घूमने लगे। माँ योगे, "क्या युग गया था।" मन का, "या सेलने।" उन्होंने सि पूा, "क्या सेग्ने "

५२
कारा घपियाँ
॥
।
मेने फौरन जपान दिया, "घरा।" क्यारिय टोना पति
हा सना था । दानाला समाप था। हम रोग घरो नाते थे। मैं
हमेशा कागज, चमकारी पनी और दपता आदिमा घरोटा बनाता
था। मेरे पिताकी कानपर अक्सर शीगणी पैनिगम चाडर बरस
आते थे, निहे वे के ऊपर एक रखार काले जटकर आरमारा
सी बना देते थे। सामने झालर, रफ्तार दर, नाल ल कागना
की पृल पत्तिया, सुनहरो स्पली पनियाक सिंहासन आदि और
ग्म नकार मेरा घरादा सनता था। माता पिता भा थोडा बटुत
हाथ बा दते थे। दीपाला खत्म हानेक बाद खिलौो निकार
लिय जात थे और हम इनमें पिता रखते थे ।मलाने भा घरादा
बनाया था रक्नि मिट्टाका । दो कोठेका घरोदा था उसका जा
दालानम एक कोनेमें बना था। रम्ब-रम्ब इटे रग्बकर उमने
दागर उना ला था, उम पर मिट्टी चढ़ा चूनाकारा भी हो गयी थी।
बाच पाचम गेर घोरकर उमन पृल पत्तिया बनाया थी। चाँद
मरन तारे आदि घरादक उपर दावार रूपा आकाशमें बने थे।
उम दिन मर घर पता नहीं क्या था । तमाम औरतें आया थीं।
क्मग, उममा वा वहन और माँ भा आयी था । मब लोग पर
अपने अपने कामम लगे थे, म कमगको अपना घराटा दिखा
रा था और समझा रा था, क्म उसम पातल्या घो लगेगी,
वर जन वनगा तब भगवान्क खाने का समय हागा । भातर कहाँ
टाया जनगा और का ज्यादा रात हो जाने पर भगवान् सोयेंगे।
मना रथ्मा का सायंगा, यह गणश ता मायेंगे। कौन सा तस्यिा,
चार लल्मा जाता है और कौन सा गणेश ना का, आदि-आदि ।

परमाव भर मा माता है
मेरे घर्गो दम्ब-उन्ध उमर मन्न अपना घरोटा भी निबननेरा
उक्टा पर रही थी। मा वगै जिन मिशु और गारसा
तर पापा ना मन टेवा पा। मानामे मे जनक पहा नगे
गया। कृमचाट घरमा राम करना पटता था। नौकर था
मना गा पार हा बाजार था अन मन गाम रल्ला बनिना,
नमर, स्तुपा नेन, तरकाग आदि का कम परता था, लन नाना
परना था। दाने पगिचित थी, आता था। मामा मार और
ग्यारी मना नगढिमें जुत। ऊपग्मे माता पिता की निगरानी
रखते थे। घग्मे बाहर निकलने न्दा देत ये। जना न्याला
दरर-मर लटकार माय मेकर मैं बगर हो जागा, गाला
सान्त्र पाऊँगा इत्यादि । वैर, में मारा वर्गटा नगे दन्न सरा
था। उसने 1, "चग मरा घर्गना रन आयो । तुमम तो
अन्य नग हे नविन मर गाजा तुम्हारेमे कुत अच्छा है।"
.
और हम लोग गिना तन मॉकर बोर घग्म, मुनमान बरन
घरमें घुस गये थे। घोटर मामनेकी चारदीवारीमें एक आग
विद्या था निम पर मने अपनी मां और पती धोती टानी
पा, उस पर म रोग ट प और में मर गणा जाने देख
टेमकर हम ग्ा था। वह रग था, "गणा हे या धारामन, ताट
निग है उनक"। और उमा मिट्टारा घरी बना मैने कुछ
म पारमन पढ़ जो मुये मात पाने गगरिया
माता पिना आपसमाना रे, वैटिक माया पृग-मृग ना या
और
मटरमको तर निरन्मे अपरी पाना

५४ कारका घपिण्या रस पूजा करता था । और उसर काट दरखाना सुरा दग्य महरिन काम करने आया थी और हम लोग उटमर चर गय थे। कुन इतना ही बात था। लेकिन उनके पिता मेरा "गैदा," उत्तर मुनार जोरसे चिलाये, “यह सब म जानता हूँ।" और फिर अपना पत्नीमे बोल- "वह तो मे पहले ही जानता था । यह सर उसकी हा शरारत है, अभी दम वपम हा उसके ये हाल है। बदमाश, चुडेल कहा का। ग तोड दो उससरी जो यह कलमे घरसे बाहर निस्ते।' उनका मॉ कुछ नला बोला, क्वल मुझमे इतना कहा, “जाओ" । मै मुक्ति पाये पीक तरह भागा। एक रम्या दालान पडता था दरवाने तक पढेचनेमें । जब म दरवाने तक पहुँचा तो कमलाके चाग्वर रानेका आगाज मुनाद दी । मै रक गया । मैने उसक गाल पर पड़ा हुट जोरकी चपतकी आवान सुनी और उसके बाद उसक पितासा जोरसे गरन, “म पूंछता है आखिर कोनेम छिपा घरौदम बेटी उमरे साथ क्या कर रही था'। इतना सुनकर मै चल गया । म उस समय यह न समय ससा कि आखिर हमने क्या गुनाह किया था, उनना क्या मतन्य था । पर आज बात मममम आता है और उनका वेवफा पर तरस भी आता है । उमर बाद लगभग दस दिन बाद मरा कमराकी मुलाकात हुइ, वर बटुत गम्भीर थी। उसी चचरता पता नहीं कहाँ उड गयी था । वर मॉक पाम अपनावटा वन्नर साथ कुछ रने आयी था। मरे क्मरेम भा पर आया । मैं नया नया कापिया पर कागज़ चढ़ा रना था । मरे पास वर सडा रहा चुपचाप ग्वामाश । मैं भी चुप

परमात अब मा भाता है
५५
चाप था। यद्यपि मे टमर रिस रहा था। उसने
दता,
"तुम्हें तो नहा मारा मानाने ।”
मैंने कहा, "नहीं।"
कुछ दर सर मैंने फिर पूटा-
"तुझ माग क्या था, मग?"
घर पोली-“पता नहीं क्यों करते लहरोक मार बस्ने
में नहा सेलना चाहि" । पिर पर चग गयी। मैंने उस दिन
अपनी मा में पूछा, उसने मी गरटरे लडक्लिोर माथ नहीं
गेरने।" और तमे स्टविया के साथ रोरते समय में मोचना यन
बुग है और अमर अपने सार सेलने वाग लडक्यिोंमे मै कर
"मैं रडा हूँ तुम्हारे माथ नदी सेागा।"
सो बार फिर कमन्गसे मुगरात नी हुई। भारत रे
लोग मरान टोटकर रिमी टुमरी तटमील में चन गये थे। बचपन
7 दिनोंम साथी बनते और एते देर नहीं लगती । न जाने स्निने
माथी रनते हैं न जाने विनने जाते है, मरियमें उमका गाई
सम्पा-नोम्या हम नहीं रख पाते । फिर और नये नये माथी ने,
समिन कोडण्या माथी नगें बना जो स्मृति रूपमें भा मेरे मनिक
मेंतिना रहता। हमरा कारण मेरी गम्भीर प्रनि थी। वेल-वृन्मे
मुझ विशप मोर नदी या फिर मे रडोरे औ म गथा हाने
भा हैं जो रेल कृटमें भाग न न्ने हो। चार-पाँच मान ता फिर
कमगका कोई पता न रहा। उसके बार जर में नमी क्गमम
था, कोई वर येउना यग एक गादी पहा । मुझे भी मोक

काठरा घण्टियाँ
।
साथ जाना पड़ा। माँ ने बताया, मिला और उसकी माँ भी आयी
है। क्या शाता थी। बारात मला बाहर गयी था। घर पर रान
रात भर औरते गाती बजाती था । मै चाहर लडकाम वेठना था ।
क्सिा कामसे म मा के पास एक क्षणको भातर गया। मैने
देगा, तमाम औरतें बैठा ह और उनके बीचममा नाच रहा है।
मुझ आन भा उसका वन रूप नहीं भूलना। गौरवर्ण, अत्य त मुन्दर,
हँसमुग्य मूरत और गज़नका गार। मे दरबार में फौरन विमा
गया । एक का जन नाच रही हो तर यहाँ खड होर देखना
मेर सम्बारके विरुद्ध था। मे कमरेक बाहर निकल आया । यद्यपि
मेरा जा कमराका नृत्य दग्वनेको करता था । इसालिये कुछ देर
दरवाजाको दराजको देखता रहा । उस समयकी दृष्टि आलोचना
का नहीं प्रशसाका था । रक्नि मनाने मुझ वह नाच न देखने
दिया । यह सोच कर कि लोग दखेंगे तो क्या कहेंगे ? और फिर
इसतरह र छिप कर रडकीका नाच दयते नुय । मै चला आया।
अपनेका कितना दबाया था मने, यह आन मुझे महसूम हो रहा
है। दृसर दिन मॉ ने कहा-
"मला तुझे पूछ रहा था।"
मै खामाश रना । सफा नगरान हा क्या हा सकता है । वे
फिर बोली, "मुना है तुने, मग गावती बहुत अच्छा है, पता
नहीं उम देनातम रह कर उसने यह सब क्गमे सीखा है।" कुछ
सरचारा-
“गाती भी बहुत अन्धा है । मगर बडी वेहया हो गयो
है। गरम तो उसमें है हा नहीं | मने ता सरी मॉसे कह दिया
-
।

रसात भर मा नाता है
नाचना-गाना बुरा नहीं पर ज्यादा मत उममाओ नहा तो निगड
जायगी।"
इस पार फिर पॉच साल तक कमना नहीं मिली। इन पाँच
वपाम मरी जिन्गा रिकुल ही बदर गयी । मे क्यासे क्या हो
गया, इसका अनुमान मा लगाना कठिन है। शिन्गाक नय-नये
परटे खुल, नयी नया चीजें आयीं, उनका आरपण इतना प्रनर
या कि मेरे हत्यमें कमन्गका रसमा अम्निर मा ममाप्त हो
गया । र घाना याद आ रही है । मैं उम शहरम गया हुआ था
जहाँ कमलाक पिता बदल र आ गय थे। उनक विभागमें हर
दूसरे-तासर थप बना हुआ करता था। मै अपने चाचाक या
टहरा था । एक दिन सायके समय उन्होने ग-"आआ चरो
.
घूम आप ?"
मैने कहा, "कहा नायगे ?"
वे बोल, "प्ररिपोरस यहाँ।"
"कौन सारिशोर मै कुछ योचता हुआ योग ।
"तरे घरक पड़ोसम वे यदुत दिन रह हैं, तू नहीं जानता ?"
उन्हान आश्चयम रहा। मुझ याद आ गया जमिगार
स्मन्गक पिताका नाम है।
मैने कहा, "क्तिनी दूर है उनका घर ?"
उगने कहा "टो मील
मैने कहा था "आप हो आन्य । दा मोल जानेका मेरी
हिम्मत नहीं है ना गंग हाता तो सोचता।"

५८
काठका घण्टियाँ
।
आज मै सोचता है कमलाके लिए कुछ दूर चल्ने तस्सी
तमलोफ मै नहीं उठा सकता था । सतना भी स्नेह उसके लिए मेरे
दिल्म नहा था जब कि वेफार मै न जाने कितना इधर उधर घूमा
करता था। चाचा चले गये और में पड़ा पडा ग्रामोफोन पर पिटे
हुए रेकाट बनाता रहा। जेसे मिलाकी मुलाकातमे उहें बनाना
ज्यादा कीमती हो।
दो महीने बाद मुझ फिर मिहीं छुट्टियाम चाचाके पास जाना
पडा । किसी बातके अवसर पर वह कहने लगे।
"उस बार तेरा जिन मैने प्रक्शिोरक यहाँ किया था। मैंने
बताया राजन आया है पर कुछ थका हुआ था इसलिए नहीं
आया । वे रोग तो कुछ नहीं बोले । रक्नि उनकी लड़की कमला
है न, वह जैसे तेरे न जानेसे कुछ चिढी था, क्ह रही थी-
'हॉ साहब यड आदमी है । पर न घिम जाते इतनी दूर तक
आते हुए | अगर वह कर रहे तो उनको आप अवश्य भेन
गनियगा नहीं तो जन पिर आयें तर पहियगा कमाने बुलाया
है, अगर इस पर भा न आय तो मुझ इत्तरा काजियेगा मै सुद
आऊँगा। यह क्या इसानियत है किनार बार वह यहा आ
चुक रक्नि यहाँ एक बार भी नहीं आये । जैसे यह उनका घर
ही न हो। हम रोगासे उन्हें कोर मतलव हा न हो ।" चाचा
रतना रहकर नामोग हो गय, कुछ और काम करने लग गये
और म सोच रहा था कि स्निना आरमायता है इम स देशमें ।
चाचा चाचामे कह रहे थे, "धरी मुँ-फर रडकी है, ऐसा बातूनी
रडका तो मैने की दग्बी नहीं, काफा रटेगनें भी है।"

बरसात अब भा आता है
चाची बोली, "जो भी हो। मैने नो उमकी बहुन पनामी
उनी है। तमाम कारनके रटरे उस पीच पड रहते ह । मकी
माँ कर रहा यी बडा आफ्न है दम रडकाके मारे। ना शाला
कर देती तो हमारा मिलता पर दनक बाप घर वेट ल्डा पाना
चाहते है।"
चाचा नोल, "यहाँ मिम्र अस्मिारका गलनी है । क्या मे
इधर-घर जानफ्रेंस वगेरहमें नाचने-गाने नाने दते हैं। जमाना
नाजुक है, लडरियाको तनिक भी आना नहीं दनी चाहिए।"
चाचा वोगे "वे विचारे ता नहीं चाहत पर उमर आगे
स्मिीका चलनी नहीं।"
"रडाफ आगे मॉ यापकी न चर" चाचा कट कर हमने
रगे। चाचा रोनी, "पात तो कुछ एमा ही है । वर रहम करने
लगती है, माँ राप कोद जवान ना द पाते। फिर जरान रदसपर
मग्नी भा तो नहीं रीजा मस्ती ।'
मैने चाचा चाचाकी य बातें सुना और सुनकर कमगक प्रति
मरा श्रद्धा पर गयो । क्यामि में अच्छा तम्ह जानता हूँ कि टम
समानमें एक बहुत बड़ा दल एमा है निमा राम हा मारा
रदरिया नाम करना होता है । मुझ हर एमे आग्मीमे नफरत
है आ किमी रपीर परेम बात करते समय उमरे चग्नि पर
भाप करता है। फिर अमा हमारे समानमें जामीन रूपम काट
पर रह हैं। स्ला क्या है, मे व क्या ममयें ? बगरा आडम
नरी कुन्मिन मनावृत्तिया वर गन्गा नगा करती है निमम ये
नरो कोद रेंगते है । हमें तो आर एम आना चाहिए जो
।
--

६०
कारका घण्टियाँ
स्लाका उन्नति करें, फिमा भा अरोधका परवाह न करें और उनसे
जो अपना समीणनारे कारण क्य या क्सारमा अपमान करते
है ऐमा ठोकर मारें नि आख सुल्ने पर गटगा भरी दुनिया भी
उहें पृगका भरा लगने लगे।
मने उसा क्षण निश्चय किया कि म दम बार कमलासे अपाय
मिलेगा । पर कुछ एसे कारण आ गये कि मुझे बिना मिले ही चला
आना पटा । फिर पूरे एक वप तक मै चाचाक पास भा रहीं जा
सफा । इस बार यद्यपि मिलाको देखने का इच्छा था । ०७०
का परीक्षा दकर जन मे गर्माका छुट्टियासे घर गया तो पिताने कहा,
"तू पयानपुर चरा जा । मनकिशोरका निमत्रण पाया है। खुद
भा वचारे पद बार कह चुके है। हम लोगाने तो जानेम बडा
झझट है पर क्मिाका नाना जरूरी है। उनका रडकीका शादी
है।" मने पछा, "बडा रडकी का ।" उन्हाने कहा, "नहा,
कमलामा।"
मुझ आमतौरमे विना माटीमें जानेमे तकलीफ होता है पर
पता नहीं मि प्रेरणासे में वहाँ एक दिवम पहरे हा पहुँच गया ।
वन एक तहमीर थी। देहात और गर दोनाका मिश्रण । लोगोने
मुग तस साल या रखा था, अत जल्ला पचाना नहीं । फिर
तो मानम अपनी प्रतिके कारण मैने बहुतसे काम ओढ़ लिये ।
वरात लागरमे आयी थी। पूरा गाटी सम गे गयी पर म
क्मगमा दयन सा । भाषरारे ममय रात अधिक हो जानेसे
मो गया और फिर जनासेका देय भार करना मेरी ड्यी था,
- अन मुव की नना स्ना पा । चरते समय दोना दलगम कापा
॥

वरमात भरमा आता है
यगडा-मा हो गया । रडापाले रडमा साथ र जाना चाहते थ
और रसीरागस मन्ना था कि मिटा नहीं हागा । स्टकारा
तबीअत खरान है, एक ता इतना लम्बा मफर पिर पाका कम
भग हो जायगा, उमस ाि फिर हो जारगा। उन्हें रकाने
मारना नता है। रस्नि आग्निकार स्टस्वालाका हा बात हुद।
कमगमा निगइ करना हा पटा।
घग्मे स्टेशन ना माल या । बारातका पहुँचाने मुझे भी स्टान
नाना पटा । क्यारि मामान अधिक था और उमा गाडामे राहीर
'बुर' करना या 1 स्टेशन पहुँच कर मालूम हुआ कि गाडा चार
घटे 'ला' है । लेग स्टेगन । स्टेशन मास्टरमा टन्छा पूरा कर देने
पर वै म्य य सर काम करने लगे । म मुक्त हो गया। स्टेशन के
पाछे आमरे धो छायादार वृक्ष थे। वहीं पर दरिया रिछी । सुबह
सात बनेरा ममय था। चार घट लट हानेर मारण गाटी ग्यारह
बने आती | अन मारे घराता, नरातिमा भोनन आदि प्रार
करनेम लग गये। वरानियाम कुछ म्नान करने, और लाग इन्तनाम
करने और नामी गप्प मारने बैठ गये । कमलको पालमा एक
फोनमें, एक पटकी आटम सबमे अरग दर रवी था। मरे रिलम
रह-रह कर मन में नम चरनी चराता पार मिल स्नेटच्या
उठ रती था पिर वह वामार भा तो या । पर हिम्मत नहीं पढ़
रही था। उमसे जो एक नर-वधू हो, उसमे जो दुनियामी ननराम
गैर हो, बात करना मुय एF गुनाह लगता था। तमा एक
नौस्रानान जो पारकारे साथ सायी या, आरर कहा, आपको

६२
कारका घफिग्याँ
सयत होते
'बनि' बुला रही है । म चरा गया । समीप पहुंचते हा एक बड़ा
धीमा और मीठा म्बर सुनाया दिया । उसने कहा-
'आओ, अन ता तुम बहुत बडे नो गये।" और इतना कह
कर उसने पालकामा एक तरफका पदा बिरकुल उठा लिया और
बोली, “आआ बैठ जाआ।" मैं झिझक्ते झिझकने बेठ गया। उमो
पिसी प्रकारसे आदम्बरमा प्रदशन नहीं किया, नमम्मार ता नहीं।
उसके दम पहल वाक्यने दस साल की दूरा मिना दी। में कुछ
हुए बोला--
"तुम्ही कौन छोटी रह गयी हो।" वह एक फाकी हँसा हँस
पड़ा। वह एक उम्टा मल्वार और ओटना पन्ने थी। बहुत
दुबला, कमजोर और पाला लग रही था । वधू का तरह वह तमाम
आभूषणासे सना थी। मैंने या ही वात चरानेको कहा-
सरपार करमे पहनने रगा हो ?"
"साहौर का है," व्यग्यसे वह चोला ।
म चुप रहा । उमने नौकरानाको बुलाकर कहा-"उपर चला
जाओ, स्मिा ग्धर मत आने दना ।" फिर बाला-
"दस माल बाद मिन रहे हो । रडका न होती तो तर देवता
कैसे ना मिलते ?" में चुप रहा। मरी आँखाके सामने तमाम
पिटय बातें नाचने लगी।
"मरे घर पाम तक आते थे पर मरे यहाँ आनेम तुम्हारे
पैर थकते थे। बुलाया तब भी नहीं आय । आन भा अगर न
बुराता तो शायर नहीं आते ?" मै कुछ बाल न सा । इतने
-

यामान अब भा आता है
म्ने-से शिकायत करनेगले भी जीवनम यहाँ मिलते हैं। द पिर
बोली-
"मेरी मादीमें कैमे आ गये । अच्छा हुआ चरे आये। तुत
मानता मानी थी, तुम क्मिी तरह मा जाते तुम्ह देख रेती
चलनी नार ।" य- 'चलला वार' उसने कितनी दर्द भरी आमानमें
कहा था । यह कुछ स्ककर फिर रहने लगा-
"तुम जैसे ही आये मुझ मालूम हो गया । यद्यपि भीतर नहा
आये तुम । मिटाई भिनपाड या । मोचा मन जाने लोग काम
कानमें भून नाय और तुम गर्म और तरलपकी नहसे याहा रह
नाओ।" मुझे याद आया, जब में आया था तब नास्ता र रेनेर
बाद एक नाश्ता और आया T } नॉक्गनीने पृथ्ने पर रहा था,
"भीतरसे भेता है।" मैंने समझा मीमा जाने मेगा दोगा। और
यर भीतर वाला नाश्ता ही में टीस्मे कर सा था क्योंकि यह
अच्छा था । निगाह आदिम दा प्रकारका चीनें चना करती है।
कुछ मामूली और कुछ बास ढगसे। यह क्रती रही-
"समझम नहीं आता तुममें इतनी गर्म क्या है ? इसका
चाहिए था तुममा लडका बनाता, मुझरोल्डमा ।" इतना कर
यह हँस पड़ा । पर मैं सामोग ही ना । सने पूछा-~-
"ये मुम्नी क्या ? कुछ उगम लिख रह हो । तुम्हारे बारेमें
तो सुना था तुम कापी पुमिनार हो।"
मैंने कहा, "बचपनी बात याद आ रही है।"
वह पुलक
उठी "मच तुम्हें बचपन सर पाते याद है। मैं तो जानता थी
--

कारका घण्टियाँ
दूर ही रहना
भूट गये हागे । तभा न निटा रहार भी तुम्हारे गिा स्मग मर
गयी थी।"
मने कहा, "चुप रहा, क्या सकता हो।"
वर पोरा, "गस्त कहता हूँ क्या ? या तो अपने पडे
आदमी समझते रह नागे । साचते होगे काल नम पढ़ता हूँ और
वह एक मामूला पटी रिग्वा दहाता रडमा, उसमे
अच्छा । ज्यादा पर रनेका तुम्ह घमट दो गया है । यहाँ तो
गँवार ही रह गयी | वटुत चाहा, बहुत सर पका पर मेरी चला
ही नहीं । काग, म भा कार नमें पढ़ पाता।" इतना कहते रहते
उसको आगाज हर गया । मो देखा जैसे वह यथासे भर
उठा है।
मैने का, “अच्छा चुप भी रहो, बहुत कह चुकी हो !"
फिर जैस - सचमुच या प्रमग टालकर अपनेको हरका करता
हुद बोली-
"यादा न करोगे ?"
मेंन क्ला, “म शादा करूँगा हा नहीं।"
"क्या क्या किमासे मान्यत हो गया है ?"
"नी तो।"
वह हैमते हुए वारा, "मैंने सोचा शायर कार नम फिसासे
मोहरत हो गया हा।"
मै
चारा, "क्या कारज मोह रत करनेकी जगह है ?"
उसने कहा, "रडा तो यहा समझते है ।" उसका यह
नरान सुनकर मैं चुप हा गया । थोडा दर याद बोला-

बरमात अत्रमा माता ह ३७ "तुमने फ्मिीमे मोहन की है।" "कोर्ट टम राना मिल ही नहीं।" पर मुमगिते दुा बाग। मैंने कहा, "मैने तो सुना था तुम्हागत्मिीसे मोर त हो गयी है।" उसने 3 की आगनमें कहा, “यह नगें मुना मै आराग हूँ, वनमारा हूँ ? विपर नहीं, न जाने क्निने रडामे मेग मम्बर है ? वर चर कानफ्रेमोंमें नाचता गाता पिरती हूँ ?' मग चैत्रा पर पर गया। मैंने उमर मुम्बकी ओर दवा निममें घोर उपना और प्रणाके चिह्न । मैंने उन नल्ने गरनसे पट म्ने पे पूछा, "तुमने नत्य-कला क्हामे मावी ? कमन्ग, मैंने तुम्गर नाका वटी ताराफ मुना है।" मरा नात उनर - न हमा न मुमरगयी, वैसे ही गम्भीरतापूर्वक बोग- "माग्वा क्या है ? स्नि मीम्वना चाहता थी। इतने ही पर तो या हाल है -अगर मीम्बना तो क्या होता जर म उममें मीतूंगी।" इतना कहते-कन्ते उममी आगन जैसे उमारे मनुढमें टूर गयी और व टतना पैनी दृष्टिमे शून्यम देखने लगा कि मैं महम गया । उमरे चेहरे पर जैसे पथकी आता फाहर भी दिल दर्न उमट आया था। मरे मुवमे निमल पटा- "मग ॥ उमने कहा, "गे" मैने कहा, "तुम्हागे तबीयन बगन है-ल्ट लाओ" मने मग, "क्या ? क्या लग्नेमे तगायत अच्छा होजायगी." मन कहा, "हाँ आराम ता मिन्गा ।"

कारमा घपियाँ
वह बोली, “मुय आराम नहीं चाहिए । और अगर लेना हा
होगा तो एक साथ चितामें हा स्टेगा।" उसकी ऑय वैमी हो
बनी रहा निम्तेज, पैनी, गून्यको फाडकर ग्वा जानेका प्रतीक्षाम ।
में घबरा उठा।
मेने कहा, "मिला, गम्भार मत बनो । याडा देरे लिए
तो मेरे सामने खुश रो।" मेरा इतना कहना था कि वह खिल
ग्विार म पडा । लक्नि ऐसी हँसी निसके पाछे कोद अनुभूति
नना । भयानक । निम्टारियारे नमले सी । म सर झुका कर बैठ
गया । मुझे परेशान देख व कुछ शात होकर बोला-
"जानते हा में कहा जा रहा है।"
मैने मुसकराकर कहा, “लाहौर ।"
व भी बोला कुछ मुसकराकर, "नहा जी, मरने ।"
मने कहा, 'चुप रहो। क्या मरने मरने लगायी । गुभ अवमरा
पर एसा वाते नहीं की जाता। तबीयत तो याही ग्वराब हो जाता
है । वहाँ पहुँचागा सन ठाक हो जावगा।"
यह बाला, “यह तनायत ठाक होनेके लिए खराब नीं
हुइ है।"
मेने
कुछ झलारर कहा, 'रेसे ?"
उसन रहा, 'मुझ टी० बा० है।"
मै चौक उठा, पर सयत होर बाला, "ता क्या हुआ? होमला
ग्ममा अच्छा हा नाआगा।"
वह योग, "होमग हा ता नहा है। फिर एक गँगार और

बरसात मा आता है
।
देहाती बनकर जीनेमे मरना ही अच्छा।" रहकर वह एक पीकी
हँसी हसने लगी।
तमा अचानक उसके पति पर दृष्टि गयी जो कुछ दूर पर
खडे बडे क्सिीसे बातें कर रहे थे। नाटे और मोटे, सूट पहने
हुए। बड़े भद्दे । कमला जितनी हा टुनी पती, सुदर थी, वह
उतने ही नाटे मोटे और भद्दे ये । पढे भा ये तो गायद हाई स्कृत
फेल । रपया था, व्यापार करते थे।
मेने पूछा, "देखा उनको–पमन्द हे !"
यह हँस पड़ी और मुंह विचमा कर गोला, "उम गणेश जी
ऐसे है-मोटे धमधूसर ।" मै भी हसन लगा।
मने क्या-- पाटीके पहरे नहा देया था ?" उसने 'न'
सूचक गदन हिलायी। फिर चोरी-
"माटीमें रडकियोसे कौन पृछता है । फिर मुझमे सिरा
हिम्मत थी, जानते ही थे मै मना कर इती। सैर, वाचूजाक सर
की बा टरी । बेचारोफी बडा रनामा हो रही या । ये रोग
भी अन्छे ही ह-केवल सूरत पसन्द का, दल-ओहेज भी
नहा रिया ।"
तमा मुझे एसा रगा, जैसे कुछ लैग मुझ ग्वोज रह है क्याकि
गाटा आनेका समय हो गया था । मै उठनेको हुआ। मग दिल
भर आया था । उम थोडी देरकी बानचातन मुझे दर्दम भर
दिया था।
मैने
पूछा, "मेर लायक कोर सेवा।"
वह फिर फीमा हसामें बोली, “मरे रिए ? मेरे लिए अब

कारका घफियाँ
कुछ नहा चाहिए । मने जो जो चाहा मुझ नहा मिला, मुझ नीं
दिया गया । और अब आखिरा वक्तम जरूरत भी क्या ?" कुछ
स्करर फिर बोला, "तुम्गरे चाचा कह रह 4 तुम रग्वक हो रह
हो। अखबाराम माफी रिसते पढते हो । म तो रह गयी । बहुत
सी चीन कहना चाहता था, लिखना चाहता थी, पर दम रायक
नहा है। कुछ एमा करो कि य- दुनिया बदर सक, हम स्त्रियामा
आगन मा लोग मुझे और सुननेका जरूरत ममयें। काश । म
तुम्हारा तर मोती तो दुनियाको सताती कि एसा जिन्दगासे लटमा
का गला घाटकर मार डालना अच्छा है।"
मेग ऑखासे ऑसू निक्ल पटे और म एक क्षण भी अधिक
उदग्नेमें अपने को असमर्थ पाफर तेनासे चग आया और काम
करने लगा । गाडी चरते समय उसने इशारा क्यिा । म डबेके
साथ दौडने लगा। उसने कहा, "देखा भूलना नहीं चाह मिला
मर भा जाय ।" और फफक कर रा पडा । म पाछे छूट गया
और वह ऑखासे खो गयो ।
आर आन कमला मर गया । जाम आता है मै यह वास्य
'मला मर गया' बार-बार दोहराऊँ। तब तक दोहराऊँ जनतक
दुनिया उसे सुनकर यह न माचने लगे कि आखिर वह क्या मर
गयो । एक पोधा था निसे पनपने नहीं दिया गया, निमे कुचरा
गया, जो अन्तिम सॉस तक इस कुचर जानेके खिलाफ विद्रोह
करता रहा और दुनिया निम पर हमता रही और आन निसे
भूल गया । मॉने मी जन्दरन भी नहीं समझी कि मगमा
मरना दो रादनम रिख देता। कुछ एमा लिखनी जिसमें कुछ

६६
परमात भर मा आता है
विचार होता, उछ अनुभूति होती, कुछ मवेदना होती । पर यह
'मिग मर गया' ---विचार गूय, हत्य गूय, समेटना गून्य-सा
वास्य----ऐमी तो न जाने क्तिनी मिलाएं रोज मरती ह । कोई
म्हॉ तक मोचे। पर पर कमन्ग, जैसे लगता है तुम मर
गयी तो कोई बात नहीं पर न मरती तो अच्छा था वैर अन
तो क्मला मर ही गयी। काग, वन अब भी जीती रहती।
पर जीती केमे?

टूटे हुए पस
मेरा ऑखोम आनकी शाम जल रहा है । भावना न्स नदा
का भॉति जिमक किनारे म एफ टूटे हुए पत्थर पर बैठा हूँ,
छल्म ठा ह । सूरज टन रहा है। नदाका लहरें रार नो गया
ह । दिनक सपनाका फन बन कर ग्वामोशा चारा ओर छाने
रगा हे । नटीपी बोच धाराम एक बास पडा है, जिसपर कतरा
की पक्ति बैठी हुई जर नाडा कर रहा है। गायद रनरे लिए ही
या बॉस टाल दिया गया हे जो कि नीचे हा-नाचे तार द्वारा
घाटमे बंधा है। मेरी ऑसे इन कवृतरापर जम-सा गया है।
टरते हुए सरतकी लार रेशमी फिरण उनक फडफडाते हुए पखा
पर झलमलगा रही ह । य स्तर छाटे छोटे गोल घेराम उड उड
कर रहरोम टुक्यिों रते है और बॉसपर आ बैठते हैं। उनके
पडफडाते हुए पम्प ही इस खामोशाको भग कर रहे है । फितने
प्यारे लगते ह ये । गुशामे भरे हुए, मम्ताम सरार । काश,
आदमीका जिन्दगी भी एसी टी होती, उसे भी दुनिया उतनी ही
अच्छा रगती नितना टन कतराको ये लहरें लग रहा ह । उसका
निन्गाम भा कोई एसा आधार होता नॉ यह जायनर सघषा
म डुबक्यिा लगा गान्तिपूरक बैठ अपने पख फ्डपडा सरना ।
रगता है मै गल्त न रहा है। सरक जावनमें एक निश्चित
आधार है । मारो दुनिया अच्छा लगता है, सुशाम भरा हुद,
मम्ताम टना हु।

बरसात भरमा भाता ह
तमा न उमदिन गीगसे यह पृटने पर नि ज़िन्दगी क्या
है ? उमने जगार दिया या 'मम्ता और आनन्द ।और रतना
कहते-कन्ते वर गोय चुलबुला रटका इतनी जोरका टहाका
मार क नमी थी कि मेन पर ग्क्वा दुआ गागा गिलाम नाचे
जा गिग था। जोरमे उर्माको पाउ धक्का देती हुइ एक अंगटाई
रकर यह उठ गरी हुद या और एक मस्ता भगे लापरवाहान
माय -तना कह कर चरी गयी था कि 'मैं हें वकूफ समझता
हजो तुम्हारी तर मुंह पनाये गम्भार हो मोचा करते हैं कि
निन्गी क्या है निन्दगी मम्ता है, मम्ना-एक गम-गम चायका
प्याला । खुट पियो, दूमगेको पिगओ।' में अपना वाका चाय
खम क्न्ते हुए उन जमान पर निम्बरे हुए रॉचरे टुकटोको देम्ब
रहा था और दवरमे मना रहा था कि में तो वरनाट होगया,
जाननको मम्ती मान रेनेका पता नहीं क्यो नम रिलमें कोई उमग
हा नहीं उठता, गायर गायके गटोंमें वकूफ होऊँ, पर यर
रटका, कुछ ऐमा कर कि, जीवन भर जिन्गाके नारेम यही
मोचती रहे, युग रहे एक सुगनमार बुबुल्की तरह निन्गा
का पामन्ती टाल पर चहता करे । उमके हर म्बग्में प्रमन्ननारे
एमे ही इन्द्र धनुष लहराते रहें, उमका हर अनामे निन्गीकी
मिठाम ऐमे ही यॉश करे, उमरा हर उडान गरनम पर मोया
गुटगुटी-मी हो, र मी ही चचन-मुजम्मिम गगन बनी
रहे, सुट हमे दृमरोंगो माये ।
गागर पिता एस धनी आदमी थे। आरामरे मभी मापन
उमके पेराके नाचे पारड़ो मे निछ थे। दुख-दर क्या है, उसने

कारका घण्टियाँ
जाना ही ना था, ऑसू भी निक्ले ये तो खुगासे भर हुए | वह
पर ऐसो तितली थी निसफ चारा ओर पृरारे भारसे लदा हुइ
स तकी जवानी झूल रही थी, पतझडकी कल्पना भा गायद उसरे
लिप दभर थी। मुझे कभी-कभी लगता था जैसे निन्गीको मस्ती
मानने लिए वह मनर है।
एक वप नाद उसकी शादी होगया। लडका पना लिवा, मुशील
और अच्छा नौकरीपर था। उसकी खुगी इन स्चूतराके धुले हुए
पग्वामी तरह और निग्वर आयो थी। उस भाग्यपर लोग इपा
करते थे और व- सररहत्या मम्तीकी गुलाबी पसुरियो ढेरपर
बैठा हुइ खुशामा धूपम अपने सतरगे पख सुग्गा रही थी। म
उन दिना उसके पडोमम रहा करता था। उसके यहाँ म चतुधा
आया नाया करता था। एर दिनकरी वात याद आता है-म जब
उसके यॉ पहुंचा तो उसमी मामा ऑखें भरी भरी सी थीं । पृछने
पर पता चला कि उनका कहना शाला मिरकुल नहीं मानता ।
उनका पटना है अब वह बरी दुइ, शादी होगया, कुछ गम्भार
रना सीसे, चचल्ना छोड द, रारत न करे । नस तरह वह
अपना जिनगा कैमे चरावेगा? रक्नि वह जैसे सुनती ही नहीं, हर
ममय ऊधम मचाया करता है। मुझे लगा जैसे जिन्दगाक लिए
गम्भारता दुनिया ज़रूरा समझता है। स्तिना समदा है दुनिया ?
यन चञ्चरता और गरारत भा बटे भाग्यसे मिलता है, नितने दिन
यह जापनमें रह उतना ही अच्छा। उधर शीग और मम्त थी।
उमा ऑपासे रगता मे चल रही नो-ॐ रहने दो
टनियारो-उमका परवाह हा क्या कर हम ।' उसका शरारताकी

बरमात सवना आता है
पाँखें खुर्ग हुद थी और उनका किलकारियोंसे घर गूंज
रहा था।
अब यह घटना यवम-सा हो रही है । चाहूँ तो कुछ
और
मोच मरता हूँ पर पता नहीं क्यों जी नहीं करता । यो खुशीरी
यात
नुय ज्यादा याट भा नहीं रहती। फिर यह घटना हुए भी ता
लगभग दम वप हो गये। मुझ आश्चर हो रहा है कि इस समय
मुये शीगी याद मे आ गयी ? अच्छा होता उसकी याद इस
ममय न आती । यह सॉझ, यह इबा-ड्या-मा मूरज, यह छलका
छनमा-मा अंग, यह मूनापन, यह खामोगी और यह एक-एक
करके क्यूतरोका -डर नटीके तटपर बने ऊँचे-ऊँचे मकानाके
मोम्बोमें जा-बार बेठना यह क्या क्म है मुये उदासीने
भरने के लिए बैर, में भी इस एक क्यूतरका तरह, जो सरको
वीं वामपर डोड नारे स्निारेके गम ऊँचे मकानके उस मोग्वेमें
टुक्कर बैठ गया है, गाराको अरमोडेमें छोड चला आया था।
पिनाकी बरी हो गयी था आगरे, और में उनके साथ फिर
आगरेमें ही चम गया। अल्मोडा टू सा गया, आगरेके ही
नियामा से माने जाने लगे हम रोग।
अरमोडा छूटा, गीला छूटी। फिर जिन्दगाम कौन एक दूसरेकी
याद करता है। आज-कनकी दुनियामें मन अपने अपने में ही लगे
हैं। सगे मम्बा तक तो अगर दूर-दूर गहगेमें पड़ गये तो एक
दसरको यार नहीं करते, फिर पाम पडोम और एमी मामूली जान
पहिचानती मुदत के दिनकी होता है। मे पर-व्यवहारमा
होना तो एक बहुत बडी बात है । यहा हुआ गीगके साथ। इन

७१
कारका घग्यिो
दस वषा तक उसके बारेम कुछ पता नहा रगा। फोर जरूरत भी
नहा यी पता लगानेशा । उसका अपनी दुनिया था, वह भा हर
तरन्से भरी पुरी, फिर क्या करना था। एक्टम भर सलिए नहीं
पाया कि उस जेमा शोख और मम्त स्टका मने अभा तर दुसरा
नहीं देखा।
इधर दो महीने पूर्व ऐमा हुआ कि मुझे ममरी जाना पड़ा।
याना एक रइस मिफा निमत्रण या, फिर पिसी परतीय स्थानमें
कुछ दिन रहनेका लल्च मेरे लिए बहुत बड़ा चीन है। एक दिन
ण्मा हुआ कि धूमकर हम लोग लौर रह थे, थर बहुत ज्यादा
गये थे, मिटने कहा-'चरो पासमें हो एक रेस्तरॉ है वहा
चाय पालें।
मैंने कहा 'ना भाइ, घर ही चलो। फिर अगर चाय हो पीनी
है तो अपने शान नीक रेस्तरॉम पियेंगे ।'
वह ऑस दवारर वोरा-'चरो भी वहाँ तितलियाँ सन
करता ह।'
उम समय मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रग था। थक इतना
गया था कि ज्यादा कुछ कहने या झगडनेको भा निम्मत नहीं रह
गया था। में चला गया। रेस्तरॉ नित्सुर नया था और क्रानेसे
सना था। मालिक्ने चरानेक रिए दो रडकियाँ रखी थी
गायट उनममे एक ग-इण्डियन भा थी। दोम्त साहस वोरे-
'भट, मुझे तो एक पग हिम्बा र रेने दो, मेरे लिए तो ज़ि दगा
रही है।"
मने कोर आना-याना नहीं का । कुछ सुम्न सा खामाश बैठा
रहा । चाय लकर पगे-दण्डियन मिम आया। मेरे सामने ट्रे
।
.

वरमात अरमा नाता है
ग्बते हुए र नुमरगते ना उनमे वोर्गनिसका जप था-'ओप
ओ, उन दिनोर पाट ताप ला रहे है।
गोम्न गोरे,"क्या टपर आने इत्तफाक ना नदी दुथा,
जा तुम्हाग जाट-मग मुमान दुत याद आता म्हा।।
मैने दमा नाच आम्ब ठाकर उमा और देवा । मुये पर
टननी उरमूरत लगा कि नाग मेरा बॉम्ब नी नहा उठा और में
चुपचाप चाय बनाने लगा। मेरे दोन पूछने लगे, वह नपामारी
डोग का है ? मे मिपाआ-यह उन गमाता है। मेग
मामान उमारे हार मेनना।"
और वह 'ओ गाट" रहती हुद चग गया थी। थोरी देर
पाट वर लटका आयी । मफेट मयार और मफेट औदनी पन्ने।
गम्भार और मुन्र पवित्रता अग-अङ्गमे टपकता था। मेरे दोस्त
एटर मा और देम्बत रह । कुछ मुसक्गये, कुछ बोले, रेक्नि
पर चुपचाप उनका मामान रबर चर्ग गरी। उसो जाने
बाट गायट अपना यंप मिगनेरे गिा मुभमेल-'पा गम्भार
रदा है, नगमा भी निपर नरी दता। रेम्तगमें एमा लागे
गम्बना हानी चालिए। यहा तो मम्न पुग्लप आरमा चागि।
इननी हमान और तना मुनानगा । कुछ ममझमें नहीं आना।"
मैं मोचता रग, आदमा अगर अपनेने नटरर दृमरेसा ओग्मे
मोचने ग्गे ता दुनिया में स्मिारा मा मममनेमें गरता न करे।
पता नगमा निन्गाश यर कौन-मा परिन्टेट नगे, उमर
रिम्पर क्या बात ग्रानो, हम क्या जाने ?
म रोग लाफा देर तर बैठे रहे। ३ नीं आया. पर वह

कारका घपियाँ
?
एंग्लो इण्टियन मिस कहबार आयी और पृटता रहा, और मेर दोस्त
से हॅसा मज़ाक भी करता रही। मै चुपचाप चाय पीता रहा और
सोचता रहा, व इम मिमकी तरह मम्त क्या नहीं र पाता वह
इतनी गम्भीर चया है ? गायट उसे रेस्तरॉमा वातावरण पसन्द
नहीं ! अगर नहीं है तो वह किमलिए काम करने को मजबूर है ?
मेरे दिल्म उसके लिए एक सहानुभूति घर कर गया। जितना हा
मे सोचता था यह सहानुभूति उतना ही घना हाती जा रहा था।
और मनमें उसके हर रहस्य जान रेनेसी कण्ठा उमड पड़ा ।
कमा-कभी उममा चेहर। ऑग्याक आगे यूर जाता, लगता उछ
परिचित मा हे पर यह विचार बननके पहले ही मिट जाना ।
उस दिन हम ाग चाय पार चले गये। राम्तेमें उसीके
बारेमें बात चीत चरती रहा । टोम्तने बताया उसका नाम शाग
है । वह अरमोडाके स्मिा अच्छे परिवारकी रडा है। मुरो
अचानक उस शालाको याद आयो । मेरा दिर बुरी तरह कॉप
उठा । नस-नम सिहर उटा पर मेन अपनेको धैय बँधाया या सोच
कर कि अरमारे भरम कोद एक ही शारा तो हागी नहीं। पर नाने
क्या उम दिन दिर वचेन रहा, रातको ठीकमे सो भी न सका।
पार चार उमा रयार आता रहा और उसका वा शोग्यी मम्ता
दम शीराका ग्यासी और गम्भारतामे टकराता रहा।
दसर दिन सुबट होते हा म काइ बगना निकाल अक्ल हा
रेस्तराँ में पहुँच गया और चुपचाप एक कानेम नेठ गया। वन चाय
रकर आया । म मर झुकाये तुर रिया था। मेरे मुग्वसे यका
या निरल पग, 'अगर कुछ तमगाफ न हो तो बना दानिा ।।

चायातमरमा आता है
व गडी चाय बनानी रही और म लिम्बता रण। पाचमें दम
न कि 'चीनी पक हा चानच टानियेगा' मेग निगाह उपर स्ट
गी और मा चहा मगे आँबामें जर आया। मदन
चेरेमें भीगा मावा और चुगह वालप नाच-नाचर
हो जाता था। में जम गया था, र पशोपशम था। मरियता
रहा यद्यपि लिखने में आ नहीं लगा। इसकी चरी जा चुरी
थी। मैं बहुत देर तक बैठा राम करता रहा। बदमाग चाय
राया और बनाने लगी। मैं पूछनी रेटा---
"तुम्हाग नाम भीग है ?" यर उपयोगे नहीं। चुपचाप
चाय प्यालमें डारती रहीं। मने फिर यूटा~~
"तुम अरमान मैनेता मापी राहो न ?' र
चुप रही, रेग्नि मने टमा जैसे उसका चेहा एक पट गया है।
जलीने दध दारी है और भागना चानी है। मेरे मुम्बने
उमसी पेचनी टम्ब महमा सिर पटा-~-
"तुम मुव पन्चान नहीं रही हो, में प्रता हूँ तुम्हारे पोम
बाग वैप का पद पिना चानी टाने ही तेनासे चर्ग
गया। में मम ना, मुथ नगा जैसे मनमो रिलको चोट पहुंचाया
है। मेग माग गरीर अनानाने लगा। दिमाग चतर वाने
रगा ! ऑमें नाम छन् उग आया । चार प्यारमे उनी हुई
गम-गम मापम नुवानी पर की गान्वा और चुनगुगाहट नाचती
हु निम्बाइ ता और मरे दिमागम तेजामे व गुट मिगत
ताटने लगा निगा मनी है मना-एक गम-गम बायका
प्याग सुर पिया दूभगको पिंगा और मैं मोचने लगा रह

७म
कारका घपियाँ
आखिर यह
.
सब कितना आज सच होगया । फिर यह उस दिन मरे सामने नहीं
आयी । मे दो तीन दिन तक रगातार गया रक्नि वह मेरा
निगाहसे भी बचनेका कोशिश करती रही। रधर मेरा छुट्टियाँ
खत्म हो रही थीं। मै केवल एक बार उसमे मिरकर माफा
मॉग लना चाहता था । उसमे पृछना चाहता था,
सर क्या हुआ ? यह सारा पग्वितन उसम, उममी दुनियाम,
उसके म्यभारमें, मेरी समझम कुछ नहीं आता था । चौथे दिन मै
उदास सा एक कोनम बैठा था । यह पग्लो इण्टियन मिस गायद
छुट्टी पर था । वन चाय लेकर आयों हो । उमेदवार मेरी आँखें
छल्ला आयो ।
म। कहा-"शाला यह सब क्या हुआ ?"
वह कुछ ना बोली। चाय बनाता रहा और उसकी आँखा
से टप-टप ऑसू गिरते रहे । म कुछ पृठ नहीं सका। वह सिर
नाचा स्यि ही बोला-
"तुम क्रसे यहाँ मत आया करो।" और चरी गया । मुझ
लगा जैमे स्तना कहनेम हा उसे क्लिना कष्ट हुआ हो, उसे
ददके स्तिने घने बादल चीरने पर हा ।
उम दिनम फिर में वहाँ न ना समा। रच्या न रते हुए
भा छुट्टी खत्म होनेर मारण यॉ चरा आना पना । फिर अपना
उरझन हा इतने रिल रूपमे सामने आया कि उतना याद न
रख सका।
आने वाद आनसे दो माम पृव दोम्तका खत आया ।
लिखा था, गागने उममे मेर वारेम पूछा था और रो रहा था,

०६
बरमात अन मा भाना है
रह ग्ग पीपर अन दम रेम्नग में काम नहीं करेगा। मानिक
ज्यादती करता है। उसे उमस अपमान ग्नेका क्या हक है?
वह बत्रीकी औगत है, अपना अपमान नहीं मह माना है। उमे
भी मारेगी और खुट भी मर जायगी।
मने मोचा, अच्छ ही है वह य राम ठोड द । घोटा-मा
पटी दी है, क्रिमा तर कुछ और पन र म्यून आनिमें दो जाने।
हमारे समाजरा वातावरण अमा एमा नहीं बन पाया है कि नोट
गगा रटा रेम्नग में काम करे। म्यून, अस्पताल आदिरी नौकरी
फिर भी कुछ बप नाती है यद्यपि उनमें राम रग्ने पालियाको
भी रोग जुग न्नेसे मान नहीं आते। फिर भी रेम्नगॅमा नौगमे
खुटा बचाये।
लेक्नि पन्द्रन दिन पाट दोस्तका फिर गत आया था।
लिम्बा था, गायट अब छोट द, अभी तक तो उसने स्मिी तर
कर लिया । मरे पट जा ग्वन आया उसमें लिखा था-'वट
सुा तो नना है रक्नि लगता है जैसे - टोटनेमे मनर है।
और आन त आया था-'अब व कुछ युग रहता है।
उमका बना है किस्मिी तरह जिन्गा सारना है। यह काम
नहीं छोटेगी, जैमे चन्ता जा रहा है चलता जा रहा है।'
दम ममर घना अकार छा गया है। कुछ म्पष्ट नगें।
देर में चमक टनी है। यता असम्था मेरे मस्निकरी है।
कुछ ममममें नरी आता दुनिया क्या है ? म क्या है ? निन्गा
क्या है ? मून न गया है। चाग ओग्मे अपेरा बढ़ता हुआ मेरे
अगर ना रहा। मारे स्तर पर-टक अपने-अपने घामटमें

कारका घपियाँ
।
आकर बैठ गये है और नम बॉस पर अकेला एक क्यूतर
बैठा
है । मुझे लगता है यह वनी क्यूतर है निसमा एक पम टूट गया
-~-यह उड नेम मजबूर है । अभी एक घण्टे पूर्व क्मिी गरारता
लडकेने जो नदीम ना रहा था, नीचे ही नाचे जाकर उसे पकड
लिया था । उमफा एक ही पख उसके हाथम आया और वह
फटपटा कर निकल भागा पर उसका पख जैसे बेफाम हो गया ।
स्टमा टरक मारे उसे वैमा ही छोड भाग आया था। मे तामे
देख रहा हूँ वर चुपचाप बैठा है। उसकी मम्ती, उमा खेल
सन बन्द । वह अकेला हे, तनहा अकेग-मोइ भी उसके पास
नहीं । पख चालाके माथ सभा उडान भर रते ह रेक्नि निसरे
पख टूट जाते ह उसमा कोइ साथ नहीं देता । वह अपने सारे
साथियाका मम्तासे हुवक्यिों लगाते हुए देवता रहा है और
अव सपके चले जाने पर अपनी मजबूरी पर ऑसे भर रहा है ।
वह बार बार पर फडफडाता है और उट कर तरके मकानके मोसे
म आ बैठना चाहता है । वह कोशिश कई बार कर चुका है,
बारिश्त आध बालिग्त उठ भी चुका है पर जी ममोस कर रह
गया है । शाग भी है इस क्तृतर-सी। उसके भो पर रिसा
अदृश्य शक्तिने तोट दिये है। व- भी चुपचाप जहाँ बेठ गया
हे बैठ गयी है। तभी तो वह कहता है-'किसी तरह जिन्दगी
कारना है जैसे चलता जा रहा है चलता जा रहा है।' आजको
वह है, हो सकता है कल को वर निराधार हो जाय । इस छोटेसे
आधारका ही क्या भरोसा? जर माता पिता पनि सन छोड कर चल
गये और आन उसका फोद नहीं । अकेली है अक्री । इतना धन

परसात अवमाता
है
,
होनेपर भी आज वह एक पाको मोन्तान है। और ऐमा अमहाया-
वस्थाम उसकी मस्ती और ममी मुमरान भी उसका माथ छोट
कर चली गयी। मेरा दिल भर उठा है, ऑग जा आयी हैं।
अभी वह चूतर दो-तीन फुट तक उट आया था। मे खुश था
कि किनारे तक आ जायगा पर वन रहरीमें ही गिर पटा और
अन निराधार वहता चला जा रहा है । गीग रह रही है, मैं वह
रहा हूँ, हम मन नह रहे है। उप जीवन भी क्या है ? एक मनसूरी,
घेर घेर कर मनयूरी, यहाँ हम हसते हैं मनगरे ही कारण,
रोते ह मनमराके ही कारण । मनरी केवल मजबूरी, घेर घेर
कर मनगरी। और कुछ नहा है निन्दगी क्या ?
.

वेवसी समारम अपना पराया कोई नहीं, जो अपना समझे वहा अपना है और ना पराया समझे, वह अपना होनपर भा पगया है। नमा आधारपर ना दुनियामें क्सिीको अपना मान पाता है । इसालिए समान द्वारा निर्मित रिश्ताकी दावार मुझे बॉध नहीं पाती यदि वे क्वर नामकी हैं, यदि उनमें कोई गर्मा नहीं, स्नेह नहीं । मेरी एक मारी है, नाम है मधु । या सारी और जानाका रिश्ता एक मजारका रिश्ता होता है, उनका म्नेह भा एक मज़ाक का आवरण लिये होता है, वहीं कोई गम्भीरता इस रिश्तेका नाम लते समय हमारे सामने नहीं आती । लेकिन मेरे गम्भीर पभावने लगता है मजारको पनपने नहा दिया, मज़ाक्की खींच-तानके कारण नस सम्मधमें भी ज्वार भाटा नहीं आया, कभी चढ़ाव उतार नहीं दिग्वाइ दिया । वह फिसा छोटे जलाशयकी तरह स्नेह की चाँदनाम चुपचाप एक सा बना रहा। शादीके पहरेसी एक बात याद आता है तब स्टम्याराका ओरसे सगाइकी रम्म होता है, उसी समय मरी इनसे मुलाकात हुई थी और तभा मुझे एक नय अपरिचित व्यक्ति के स्नेहमें वगत् वध जाना पड़ा था। मुबमा समय था । दारानरे सम्भापर फैला हुइ देशी अगूर माल्लासे छनकर रेरामा धूप आ रहा था। रात भर ट्रेनमें जागने के कारण म काफी या सा बेटा था। नहा धो ल्नेपर भी नींदकी

बरसात नभा आता है।
,
खुमारी नली गयी थी। तभी वह एक गुरागी साडामें लिपरी हुई
आयी और मेर पाम नमस्ते करक बैठ गयी । नोंद आते समय
हम किमा प्यारे सपनेशा स्वागत जमे पिना हिल-डुले करते है,
वैसे ही मैने उनका स्वागत किया। एक ता नोंदम भरे होने के
कारण, दूसरे वह साग वातावरण एक माडीके बार की तरह लगने
के पारण, जा मुझे हर क्षण रपटता जा रहा हो, मै सिना हिले
ने उस आरामकुर्मीपर कुछ मोचता-सा ऑखें यन्ट क्यि टा
रहा। वह क्तिनी देर बैठी रही यह मुझे यार नहीं । मुझे
खामोश देखकर उन्हें स्मय ही बोलना पड़ा।
"नात मग हे आपरा ऑग्वा में | आप भीतर जाकर सो
जादय नहीं तो तबीयत खरार हो जावेगी। जन नाश्ता वगैरह हो
जायगा तर म गा दूंगी।"
स्मिी नये व्यक्तिरे मुम्बमे इतनी आत्मीयता भरे चास्य सुनने
को म मिलते है। इस पहरे चास्यने ही हायके पासो
किमी अनजान तारको झनझा दिया। मैं मोना चाहता तो जरूर
था पर उम ममय बढ़ा भद्दा ग रहा था। मैंने या ही रापपासे
पहा, "ह, जाने नीनिए, फिर देखा जायगा । रक्नि मेरे पार
चार मना करने पर भी वन मानी नहा और मुझे भीतर स्मरेमें
जाकर सोहा जाना पडा । यह जि मुझे अच्छी लगी। कभी
भा हम भीतरसे चार तो छह और बाहरसे कहते कुछ है।
उम समय भीतग च्यार अनुरसे गया जिद हमें मरैर अच्छा
रगता है और वास्ता भातर और याहरका यह अतर यहुन
व्याहार-युगल व्यगि हा ममझ पाते है । जब तक मैं मोना रहा

कारका धपियाँ
।
वह वाहर दालानम बैटी इम वातका निगराना करता रहीं किग
कोइ आकर मुझे जगा न दे। कहीं कोई शोर न हो कि मेरा
नाद हट जाय । रगमग दो घण्टे बाद पिसी सम्परमै मेरी ऑग्व
खुल गयी। मने देखा कि वह पास ही मेज पर नाश्ता लगाये खड़ी
है और मुमराते हुए कह रही है .
"अभी नोंद पूरी नहीं हुई-नाश्ता कर रीनिए तब फिर मो
जाइयेगा। आपमे मिल्ने बहुतसे रोग आये थे, मैने सनको मना
कर दिया ।" उस सारे वातावरणम मुझे यहा एक एसा प्राणी दीग्व
पडा निसे बिना किमी बनावरके मेरे आरामका चिता हो । मैं
नाश्ता करता रहा और मरे महज़ एक ही बारक कहने पर वह भी
मेरे साथ खाने रगा । जैसे वह जानता हा कि मुझस अम्ल खाया
नहा जायगा और दो बार कहनेकी मेरा आदत न हो।
म मिर्च विपुल नहीं खाता, उमने उस थोडी हा देरम जान
रिया। समोसेक प्लेटम हाथ लगाते ही वह चोरी, "इन दो को मत
खान्येगा", और उसने उहें अलग कर दिया। बादमें मालूम हुआ
उममें केवल मनाक रिए मिच हा मिच भरी है। पता नहीं
क्या मैने उनसे एक झपटमर उठा लिया और उसे यह कहते
हुए मुंहसे लगा लिया, "जब आपने मरे लिए खासतौरसे बनाया
तन मै जबर खाऊँगा।" लेकिन इसक पहर कि मै उसे मुखम
रस स उमने मुँ-से छीन लिया और प्रा दर रखती हुई वारी,
"मिचें बहुत तेज़ है । आपको तकलीफ होगा।"
मैं सोचने लगा, अपने मनासे आनदसे इसे मरी तस्लीपका
1

६५
में
परमात जब भा आता है
ज्यादा ग्न्याल है। जहाँ म्नेह होता है वहाँ व्यक्ति मजाक भी ऐमा
ही करना चाहता है जिसमे दुसरेको आराम पहुँचे तकलीफ नहीं।
मैंने कहा, "लेक्नि मजाक तो खत्म हो गया । आपकी सारी
मेहनन भी वेकार गयी।"
मेरे इस कथनसे उसका चेहरा गर्ममे रार हो गया । और
वह अपनी झेप मिटाती दुई बोली, "तो क्या हुआ ?"
चुप रहा। कुछ देर बाद वोला
"आप बहुत अच्छी है । आपका नाम क्या है ?"
चन बोला, "मधु।"
मैंने पूछा, "आप गाना आता है ?"
उसने कहा, "हाँ, थोडा-बहुत ।"
मे बोला, "मुनाइयेगा ?"
उमने कोड आनाकाना नहीं की। चुपचाप हारमोनियम रे
आया और गाने लगी। एक गाना गाकर वह बोली, "नीचे बहुत
काम करना है। मैं अब जाती हूँ। आप युग न मानें तो आपको
फिर सुना दूंगी। आप तब तक ग्रामोफोन बनाइये।" और वह
रेसाद लगा कर चली गयी। में मोचने लगा, इम समय मेग
बन्ना - बडी आमानामे गल सस्ती थी। रोग ऐमे अवमरा पर
चूमने नहीं
ग्न चन क्षणाम अपने म्नेहमय यहारके कारण ही उसने
मुझे अपना बना लिया । मरे ऐसे भानुक आत्मा म्नेहके हाथा
बड़ा जी कि जाते है। उम दिन दोपहरको मर काम

काठका घपियाँ
जल्दी जल्दी खतम करनेके बाद वह मरे पास ही बैठी रही।
कहती रटी
"आपको देखकर ऐसा लगता है जैसे कि मै आपको बरसोमे
जानती होऊँ।" और फिर अपने मन का अपनी ज़िन्दगी की बहुत
सी बातें कीं। उसके सामीप्यने समयका लम्बाईका अनुभव ही
नहा होने दिया । रातको भूग नहीं थी। मैने उसे मना किया कि
में खाऊँगा नहा पर वह मानी नहा । निमने मेरा थोडा भी रयाल
किया हो उसको कोई भी वात टाल देना, मरे बूतेकी बात नहीं ।
वह खाना ले आया।
मने कहा-"खा लूंगा तुम्हारा रहना मान कर, पर एक
भी पृडी रखने की परमें जगह नहा है।" म साने लगा और
आखिरकार उसने ही अपना हाथ रोक लिया और बोली, “अर
आप मत खाइये।"
मेंने कहा, "तुम समझी रेफिन देरम-बेसार विला दिया
तुमने । कहीं तबीयत खराब हो गयी तो "
वह दृढतापूर्वक बोली-"नहीं होगी।" और उसने एक छोटे
भी के गिलासमें शराबके रगवाला कोई लाल दया दी और मै
मुसकराते हुए पीकर सो गया। उसके उस समयके विश्वास भरे
अग्ल म्नेहके प्रतीक रूपम यह गीशस गिलास और वह लाल
त्वा वटुत दिना तक मेरी ऑग्वाके सामने नाचते रह ।
चरते ममय वन बहुत रोती रही। घर भर उसका मजाक
बनाते रह । मेरा भी नी भरा भरा मा था। मै नहा जानता था
कि एक दिन हा अन्दर म्नेमा बधन इतना मनत भी

।
परमात भरमा बाता है
हो मरता है। फिर दो मास बाट उमसी गादी हो गया । मेग
गाता उमरी गाटोके एक महीने बाद हुई।
यह उममे दृमरी मुलाकाता अपमर था। इस बार भी वह
मुझ वैसी ही लगी। उसकी सूनी मॉगमें सिन्दरकी एक मोटी रेखा
को छोड़कर उसमें और को परिपतन जैने नुझ नहीं दिखाई
दिया। स्न्हिीं अप्रत्याशित घग्नाआके कारण धारात लिम्बमे
पहुँची । सकी शिकायतोंके पहाड खड हो गये। मरने स्वागत
क्यिा रेक्नि एक विन्न मनमे । मेरा हदय उस मारे ढाग और
बनापग्मे हर कोई एक ऐमा आधार चाहता था जहाँ मच्ची
महानुभूति हो, मचा म्नेह हो। यह मिला मॉरोके चाट मसी
आँग्वामें । उसने पूनमन् मुमगर मेरा स्वागत क्यिा और
पिना शिकायतका एक वाक्य कहे हुए ही मुये पसानेमे तर देवकर
उसने पम्या हॉकना गुरु पिया और बोग, “आनकल का सफर
यग तस्गफ्देह होता है। राम्तेम कोई तगप तो नहीं हुई
आप रोगोंगे"
मैने परे हुए निरमे कहा, "आपको भी को शिकायत
"
करनी है क्या
है। गारीका
यह नोरी, "शिकायन कैमी ? एक तो लानके दिन, इतनी
चारातें चलती है। फिर दो-दो तीन-तीन जगह गाही बदलनी होती
जाना भी कोई समम्मर तो नहीं।"
मैंने कहा, "तुम ऐमा मोचती होन, रोग तो नहीं सोचते।"
वर चुप रही। मैं भीतर औरतोंमें बैठाया। घग्में तमार औरतें थीं,
मोंने माठे-सट्टे गहने दिये ही-पर यह जैसे लगता था अपने

म
कारका धपिया
म्नेहमय व्यवहारके कोमल म्पशमे दन उलगनोंका चोटको सहा
रही हो । नर नारीमे भरे हुए उस मानम मरे निराधार मनको
ऐसा लगता जैसे यही मेरी अपनी हो, और सर पराय । तभी तो
छोटेमे लेकर बड तस्का कहना टाल देनेपर भा उसका कहना
मानकर मुझ साना पड़ा और यह बात दूसरासे निरपर चोट भा
कर गयी। फिर तो घर भरकी इच्छा सीके माध्यमसे मुझ तक
पहुँची । मने भी कोई आपत्ति नहीं की। इस बार हम रोग और
करीन आ गये। कहा कोई दूरी, कहीं कोई दुराव से रह ही
नहीं गया। आडम्बरहीन, प्रगानहीन सम्बध । एसा सम्बध,
जॉ अपने मनकी हर बात कही जा सके, जहाँ एक दुसरेका हर
क्षण ग्न्याल रफ्ग्या जाय, जहाँ म्वय तकगफ उठा लेनेपर भी दूसरे
को आराम देनेकी रच्छा उमड पडे। वह हर क्षण मेरे पास रही
और समयका बोझ पर सा हरका हो गया। और इस बार चरते
समय हम दानाको दुगुना तरीप हुइ ।
तासरी मुलाकात गोनेके अवसर पर हुइ, लगभग एक वर्ष बाद,
और तीसरी मुलाकात ही ऐसी थी कि मुझ कुछ रिखना पड़ा।
इस बार उसके पति महोदय भी आये थे। उसके बहुत से
पत्र आये ये जिनमें लिखा रहता था कि 'वे' मुझसे मिलने के लिए
वात उत्सुक है । वे बार-बार मुझसे मिलने के लिए पूरी तैयारी कर
रेते है पर मिहीं खाम अडचनार कारण मनर रह जाते है पर
अपनी स अवसरपर उनमे जर मुगनात होगी। मै भी थोडा
यात उत्सुर या, यद्यपि नये नये आदमियासे मिग्नेकी उत्सुस्ता
मेरे दिरम कभा नहीं उटना । खैर। वे पश्चिमी साँचे में ढल हुए

बरसात अत्रमा माता है
व्यक्ति थे। पूरे अप ट-टेट । घरपर भी सूट पहननेवाले। हर
क्षण अंगरेजी ही पोरते थे। मिगरेट रतनी पाते थे कि उमका
तारतम्य ही नहीं हटने पाता था। मुझसे उनका परिचय हुआ।
वे बहुत देरतक कश्मीर-समम्या पर बात करते रहे और मैं चुप
चाप सुनता रहा।
योडी देर बाद जब वे नीचे चले गये तन मधुमे मेरी मुलाकात
हुई । वह आयी उछ उतास सी। मेने पृछा-"तुम अबतक यहाँ
थीं मधु ? मेरी ऑखें तुम्हें खोजते खोजते थक गयी।"
वह बोली-"नीचे उनके कपडे वगैर- ठीक कर रही थी।"
मैं सोचने लगा, स्तिना अजीब है यह कि में एक घण्टेसे
आकर बैठा है और वह नीचे कपडे ठीक करनेम लगी थी
जब कि उसके खतोसे लगता था कि उसे एक एक क्षणकी देर
असह्य है, मुझे वह फौरन देग्वना चाहती है।
मुझे मालूम हुआ कि वे दिनमें दम बार कपडे वदरते थे और
उमे हर बार उनका ठीको तह करनी पड़ती थी।
--"चरो अच्छी ट्यूटी है।"
वह कुछ मुसरा दी।
वह दो मिनट बैठा भी न थी कि हडबडा कर यह कहते हुए
उठ गयो, “च उनके नहानेका इन्तज़ाम करना है।" मुझे उसका
इस तरह पोरन चग जाना कुछ अच्छा नहीं लगा। फिर वह दो
तीन घण्टे तक उहें न रानी बुगती और मनाती-सँगारती रही
और फिर वह ऊपर मेरे कमरेमें एक नया सूट पटने, मुंहमें मिगरे
मैंने कहा-

कारको घण्यिा
दबाये और हाथम एक पूरा 'श्री कामरम' का दिना रिये हुए
आ पहुँचे और बोले-अँगरेजीम ।
"आपको यह जगह केमा लगी ?"
मैने कहा-"मुझ ता वह हर जगह अच्छा लगती है जहाँ
कोइ अपना हो।"
उन्हाने कहा-"यहाँ बिनरी नहीं, पानी नहीं, दिल्चम्पाके
लिए सिनेमा वगैरह भी नहीं । में तो यहाँ एक दिन भी नहीं रह
सफ्ना । रडी परेशानी है। सोचता हूँ, चिना फैनक दोपहर में
सोऊँगा कैमे"
मै कहता ही क्या ? यही सोचता रहा कि उनकी भी
मनबूरा है, आदत पड गयी हे क्या करें ?
भोजनक समय उन्हाने मधुको ड्यूटी दी कि वह बराबर उन
पर परवा झले, नहा ता वह खा न सकेंगे। वह बेचारा पखा झलती
रही रविन से कुछ वेमनसे और मै सोचता रहा उमे भी मरे
साथ खाना चाहिए था। भोजनके उपरान्त वह फिर उनमें लग
गई। गायद वे नीचे सोते रहे और वह बेठी परखा झलती रही।
मैं भी ऊपरक कमरम पडा सोचता रहा-"अच्छा ही है, पत्नी
होती ही है इसीलिए कि पतिको आराम दे। फिर इतना स्नेह
परनेवाला पत्नी मिलती ही कहाँ है ?"
रगभग तीन वनेके मेरा आँख लग दी रता थी कि ये लोग
उपर गररे कमरेमें आ डटे और जोर-जोरसे गप्प मारते और
विग्विाते रह । मेरा नोंद जो आ भी रहा था, भाग गयी । रात
भर गाडाम या भी ना मोया था, मिरम दद होने लगा । पर उन

बरसात अब भा आता है रोगोमा गोर स्म न हुआ। उनके पतिके कहकहे दागारों तक्को कँपा देते थे। मैंने कई बार सुना कि वह कह रही है "जरा धारे धारे उस कमरेमें वह मो रहे है।" पर जैसे उन्हें इसकी परवान ही न हो। उनके कहरहे और उनकी विलम्विाहट आती ही रही। मधु भा बीच-बीचमें जोरसे हँस पडती थी और मैं सोचता था उस दिनकी यात निम दिन वह मुझे मोता देय क्मिीको भी आने तक न देता थी। आधे घण्टे तक लगातार करवटें बदल्नेपर भी मैं सो न सका। सोचने लगा पडा-पडा क्या क्नगा, म्टेगन चरा चलूँ, कुछ सामान बुक कराना है, उसका दन्तजाम कर दूं। मैं उठ खडा हुआ। कुरता टाल चल पड़ा। उहोंने जाते देस पूछा-"क्नॉ भाइ माह ?" मैंने कहा-"म्टेशन, चरते ह आप भी ? एक घण्टेमें आ जायेंगे।" वे बोल-"ओ गाट, इतनी धूपमें मैं नी जा सकूँगा।" मैंने मधुगी ओर देवा, उसका दृष्टिमें बड़ी वेरमी दिखाई दी। जैमे या जो कुछ हुआ सर उसकी अनिन्छामे और पर समझ रही हो कि मैं सो पानेमें असमय होनेके कारण ही जा रहा हूँ। उमके ओठ कॉप। कुछ उसने पहना चाहा, पर रह गयी। मैं चरा गया। टेढ घण्टे याट वापस आया। मिरमें बडी जोरका दर हो रहा था। वह स्मिा तर मेरे पाम आयी । मुझ देखते ही योग- "मिग्में टट हो रहा है क्या ?" मैंने हाँ सूचर गरदन हिला दी। -

कारका घमियाँ
वह बोली-'मे अभी तेर पर आता हूँ।"
मैं ऊपर बडी देर तक बैठा प्रती या करता रता। आधे
घण्टे बाद वह आयी, कपडे बरे हुए कहीं जाने की तैयाराम ।
उसे देखते ही मेरे मुग्वसे निक्ल पड़ा-
"मने समझा था तुम तेल रा रही हो।"
उसकी आँखें नीची हो गया । मुसमान उदासीम बदल गयी।
लाचारीके चिह्न उमके मुखपर अदित हो गये और में उसके
उतास चेटरेको देखकर सोचता रहा-"जाननम सफलता चाहते
हो तो अभिनय का सांसो। अभी यही नाचे किलकारियाँ मार
रही थी और अब । केसा अच्छा अभिनय है ?"
वह इयती सी आवाज़म बोग।
"एक बात कहे ?"
-"हो न।"
वह बोग-"आपमा तनीयत नहीं लग रही है-चलिए
आपको नदीकी तरफ घुमा लायें। वो भी चल रहे है।"
मैन कहा--"तुम लोग हो आओ, मै नहीं नाऊँगा।"
मरे इस उत्तरसे मेने देखा वह बहुत उदास हो गयी है।
अत मै कपडे पहनने लगा और सोचने लगा वेचारी कँम गई
होगी रिमा काममें, नहीं आ सका । मन कहता था यह निलकुल
गरत है । नाचे तार वह पतिके आगे सब कुछ भूल गया । उसे
मेरी चिता हा क्या हो ? पर उसकी वेश्मा भरा ऑग्वं बार बार
ग्विच जाती था और मुझ इस निफ्प पर पहुँचने नहीं देती था ।
मैं तैयार हुआ ही था रि स्मिाने बाहर आवाज़ दी। मैं नाचे चग
मेने कहा-

बरसात मरमा आता ह
।
गया । मधुसे रहता गया कि एक माह आ गये हैं, मैं उन्हें पाँच
मिनट में विटा से आया। इत्तपास्मे नरापिटा करते-करते
दम मिनट हो गये। मै तेजीमे घरकी ओर बढ़ा। घग्पर पता
चला, पति और पत्नी पाँच मिनट तक दन्तनार करके चर गये।
मैंने सोचा, हाँ देर तो हो हा गया, चलो राम्तेम पाड लेंगे।
पर न जाने क्यो दिमागमें एस वात गूंज जाती थी। म्नेहना
आधिक्य ममयका पानन्दी जेमी शृग्वा हमेगा तोड दता हे, फिर
पॉच मिनटका जगहपर पचीम मिनट भा इन्तनारी की जाती है।
मरे माथ वहाँ के रिश्तेके कोड भाद थे, वे भी हो लिये । हम
रोगोंने तेजीमे अपने दम बताये ताकि दह पक्ड रें, पर दुत
दूर तर उनका पता न चरा। सूरन डर गया था। सॉझता
घुधमा चारो ओर फैल गया था। म च्चे निजन राम्तेपर,
जो दोनों और घने पडोमे ढा था, कापी अंधेरा छा गया था।
हम रोग यातें कम करते थे और केचन यह सोचते हुए कि
इतनी जली स्तिनी दूर निल गये, तेनामे चले जा रहे थे।
मा योरे-"अपरेके कारण दर तक तो रिवाइ नहीं
देता । टाच होता तो देयते, गायट आगे जा रहे हो।"
मैने पूछा- 'कोई दूसग राम्ता तो नहीं ?"
व्होने कहा-"है तो, रेस्नि वतुत गन्न । घरमे गायद
नहीं गये होगे।"
तभी दो काली आकृतियों मामने जाता दुई टिमा दीं।
हम रोगाने मोचा, हो सस्ता है के दूसरे रोग हो, अत पाम
जास्त निश्चित कर रेनेपर हा टोक्ना उचित होगा।

१४
काठका घण्टियाँ
पास जानेपर बिल्कुल साफ मालूम हो गया कि वही है ।
उहाने कहा- "वुरायें ?"
मने कहा-"शायद काइ प्राइवेट बात कर रहे हो । हम
लोग रुकावट क्यो बनें ? वे जरूरत समझेंगे तो खुद साथ हो
लेंगे।" हम लोग भी बात करते हुए बगरसे निकल गये । मधुने
मुझे देखा भी, पर वह बोली नहा । मैने सोचा, पति पन्ना है,
बहुत-सी बातें रहती है, कोई मामला चल रहा है, हस्तक्षेप करना
उचित नहीं । नदीके तीर तक शायद उन लोगाफी बातें खतम
हो जायँ, फिर वहाँ हम रोग साथ हो लेंगे। हम रोग जल्दीसे
क्दम बढ़ाकर ढारपर जाकर बैठ गये पर वे रोग दिखाई ही
न दिये। उस समय पूर्णमासीका चाँद आकाश पर निकल
आया था । दृध मा चाँदनी चारो ओर पैर गयी थी। नदाके
किनारे बड़ी ऊबड़-खाबड नमीन थी जिसम खरसूजे और
तरनृजके सेत थे। ऊँचे-ऊँचे टोरा पर मूंज और सरपतके
सूखे झाड़ सोये
हुए
थे । वा धारे धारे बह रही थी। गति
कारण नदी सिमट कर एक नाले सी हो गयी थी। उसफा पाट
बडा चौड़ा था। लगता था बरसातम काफी बढ़ जातो होगी।
नदासी दारपर उतरते ही एक शिवाला था, पास ही एक कुआँ
निममा जगत सफेद थी। ढार बहुत ज्यादा था, नीचे बहुत दूर
गहरादम नदी बहती था। वे रोग उपर कुएँकी जगतपर ही बैठ
ग्य । हम लाग एक बार फिर बगरसे हा निस्ल गये। उन लोगाने
देखा भी, पर जैसे हम रोग कोइ अजनी हों, उहें हमसे कोई
मतन्न हा न हो । ढारमे उतरकर हम लेग नदाफ तौरपर पानाके
।
।

भरसात भर मा भाता है
पाम एक टूटे पथपर बैठ गये। पानीमें रम्मी-जम्बो घाम हिल
रही थी,निमपर चाँदी फिरण पियल-फिसर अप्रकाग्मे लुका-
छिपा सेल रही थी । दृर नतीका ऊँचा गारा नय बना था।
चॉट के एक कोणम होनेर कारण उसकी सारी परछाई स ठढी
वान पर मिमा हुइ नडी भी मान्म पर रहा थी। हवामी रामे
सम्पर की ऊंची-ऊंची निगरी हुई प्रतिमाएँ उरड बापड जमानकी
मुंडेगपर रिल ली थी और उनके वाचमें छिप हुए छोटे-छोट
खग्यूनाके मेन ऑपामे यूर टन थे। आरायर ताराकी तरह
नटीसी गी धामम कुछ स्पर-उधर मपर पूल दिन रह ।
कोई चिडिया तेनामे नार-बार नगरी ल्गो ठूती हुद चस्कर
काट जाती था, म म्यामोग चॉटनाम, मोय " बानापरणम एक
मूंसी आवान भर हाती था और पर निगाहाना पडने बाहर
हो जाती थी।
कितना मन्ग लग रहा था यह मागस माग वातावरण, और
मैं सोच रहा था यह तुम्बट मनोरम रम्यम्यग का टापरको
निनी भयानक हो जायेगी। चादरा गातर सिग्णाकी जगर
आग परमेगी, रेगममे रगते तु मग्पतरे पीने पाल दर स्पगमे
धधक उठेंगे। यह टपरी पार पागर होर, अपना पत्र
वाहे वोल, जमानमे आसमान तानाचानको मून रेनेशच्या
लिय रडती फिरेगी, उम मासून कगारर अपर मुबकर पर नाग,
यह राणा जन बोलने लगेगा। यह पानाका धाम जो मनमय
माधा हरी ओदना ओढ़ मड़ा है, युग्म कर पानानें गिर पनगा।
यन सारी निन्गा मौनमें चार बारगा। पर मनाग्म गन्यम्बन

कारका धपियाँ
मे सोचता हूँ, क्या सचमुच यह परवश थी ? अगर था भी
तो क्या यह उचित था ? पतिरे आगे क्या नारीको अपना
यक्तित्व मसल देना चाहिए, अपनी आगाज घोर देनी चाहिए ?
में क्या जवान हूँ? और अगर कोई जवान देता हूँ तो दुनिया
उसे मानेगी ही का?

प्रेम-विवाह ऊ-कुटे सर धुंधुआरे पारगको हार चॉर इस समय आसामी नोगे धारी तेलामे भाग रहा है। नीचे पामे भीगे दुा पड़-पल्या अशा धुंधले आवरणमें खामोग बोरे बाये मिर झुमाये, मेरी ऑम्बारे मामनेमे तेनीमे गुजरते जा रहे हैं । ट में पूर्णतया खामागी है। मर रटे-मात्रे पट रहा है। म्यानाभावर कारण मैं नीचे ट्रक पर हा बैठ गया है और मेरे गलकी रथ पर अपने नह मुन्टा बन्चेको लिये पर सो रही है। बिपीने यपकर आते हुए ददी बार झोरे उमरे रेराम-मे नागो आनिम्ता आहिम्ना वेणाक कठोर वचनमे मुक्त कर रह है और दा-चार हल्ले बाल काल रेरामर नागर धागा ने उनके गोरे मुम्बपर स्टरा रह है। बिडीसी ओगेनीपर मोनीकी यालग- सी लपी पानाकी बूट कभी-कभी क्मिी मम्त वाक थारसे हट जाता हैं और डर चाटका विग्णोको हटाना हुई, उनके मुम्बपर जा गिरता हैं। उय शान्त मुम्बमण्डलपर एक हल्ला-मी पपा रहग जाती है। मै दम मान्यमें ड्य-मा गया हूँ। लगता है तन-मन और प्राणपर एक नामा डा गया है। के टन याराका तरह विचारोंरे हल्ले-बल्ले यारु मर मस्ति कम मा विमी अनगन ढगमे न जाने कितनी मम्ना और नगीग मुगधि चुगरे हुए आ रहे ह । कभी-कभी किया मरत झारेमे म बिना आगेनापर

कारका घपियाँ
लटका हुइ जलकी चूदाकी तरह ही मेरी नाजु भावनाएँ दृट
जाती है। एक सिहरन होती है और बस फिर वही प्रम । स्तिना
सुन्दर चॉद है ?
क्या प्यार इस चाँद सा नना है जो निरागा और एकामापन
क कनरारे बादाको हटा आदमामी जिदगीकी नीय आसमानी
घाटोमें चमक उठता है ? क्या कामनाआ और इच्छाआमी सर्प
भरी दुनिया इन भीगे हुए पड परल्वाकी भॉति ही सामोग सिर
झुकाये सो नहा जाती, तृप्ति बन बनकर बरसता हुई रन शीतल
फिरणो म ? जिन्दगीका पृा भरी अँधेरी घाटीमें क्या प्यारको
चॉदी फिरणे सुनहरी तितरियां-सी वरस नहीं पडता और सपनामी
हर पॉखुरीपर मगलमयी आकाक्षाआमी फिरणे थिरक नदी उटती ?
प्यारकी चाँदनी स्तिनी मधुर है, प्यारक हर माकेम स्तिना
नगा है, प्यारकी रागिनीम कितनी मस्ती है। मरे इन विचाराम
कुछ यरघा पड़ रहा है। इस नम टढा नाम कॉपती हुई एक
सगीतकी माटी रटर आ रही है । बगरके ड म कोई मम्तीमें
भरा हुआ गा रहा है
अपने पिया सन योला गुजरिया
हमें रागला नाम उजरिया ना-
इस गानेम इस वातावरणम चारों ओर नादका सम्र है। चारा
ओर मब नादर नशम झूम रहे है । रगता है जैसे में भी जो कुछ
सोच रहा हूँ वह नाटम और एमा नीदमें जिमम बहुत प्यारे प्यारे
सपने इद्र धनुष से पख पमार कर छा जाते है । क्याकि यह सर
गरत है। मेरे दन पिचाराम करपना हा सरपना है। निनमे मुझे

१०१ बरसात अब भी जाता है चिट है यद्यपि मेरे वेहोगीक क्षणामें ये मुझपर ऐमी छा जाती है कि मैं मारा वास्तविस्ता भूल जाता है। मेरे बगलम जो सो रही है, यह मेरी दूरके रिश्तेकी बडी वह्न हे । उनकी ओर देखते हो विचारोफा एक सस्त झोका आ जाता है। और प्यारके प्रति कपनासे सँगारी हुई मेरी मासूम नाजुक भावना दृट मी जाती है । आजमे चार वर्ष पहले उहोने भी किसी को प्यार किया था । मै सोच सस्ता हे, स्त्री होनेके नाते और विश्वविद्यालय उच्चतम क्यामें साहित्यको विद्यार्थिनी होनेके नाते प्यारके प्रति उनके भी सपने बडे रगीन रह होंगे। उनकी रगोनी तितके पखा या इद्र धनुपके रंग सी क्षणिक नहीं रही होगी। तभी तो उन्हाने अपने प्यारके मासूम सुकुमार दीपाको समाजसी ऑधामें रग रिया । सोनेका चमरमें खोयी हुई धनवान् पिताकी ऑखामें भी धूलकी ढेरीकी ओर देखना पड़ा, निपम उनकी प्यारी राडली वेीसी मुमान चमक रही था। रखपती ल्ड केको छोडकर मी रडकेमे उन्हें शादी करनी पड़ी। उनका विवाह हो गया-प्रेम विवाह । मुझ याद आती है विवाहके पहलकी एक रात, जन टाइनिंग रेगिल पर सत्र बैठे थे। पिताने गरामी छुट गरके नाचे उतारते हुए उनकी ओर घूर कर दया था और बड टु पी म्यरमें गाल ये, "पछताओगा रूपा । प्यार आत्मिक सम्बध हो सकता है पर विवाह आर्थिक सम्बध है । प्यार नहीं, स्पया जरूरी है मिाह के लिए । तुम्हें आगे चरकर स्पयेसरी क्मा म्यगा और तर या प्यार ग्वोयग लगने रगेगा । यह र क्षणिक भानुस्ना है १०२ कारका घपियाँ जिसम आकर तुम सत्र चाज़ पर ठोकर मार रहा हो। आन तर कोद भी 'पर मेरिन' मेरे सामने एमा नहा आया है निममा अत असफल या दुसान्त न हुआ हो।" इन्होंने उत्तर दिया था, 'हो सकता है, पिता जी, लेक्नि मेग विश्वास है कि प्यार अभागाम भा सुपी र सस्ता है । मै हर परिस्थितिम रह लूंगी और आप मुझ प्रसन ही देखेंगे । धनक यधनम विवाहका बाँधना विवाहका अपमान करना है। विहिके लिए धन नहा प्यारका जरूरत है । आप मुझे क्षमा करेंगे।" इसके आगे वे कुछ बोर नहीं थे। रतना कहते हुए उठ गये थे कि "तुम मिद्धात कह रनी हो-क्रियात्मा जगत्म यह सब एमा ना होता।" मुझे लगता है जेसे वास्तवम नियात्मक जगतम एसा नहा होता । प्यारका नशा भावुस्ताकी मदिराका परिणाम हे । भानुक्ता समाप्त होते हा प्यारका नशा उग्वड जाता हे । भावुकता चिरस्थाया नहा होता । उसका निमाण और अन हर क्षण प्रत्याशित है । इमीनिला प्यारके अस्तित्व पर विश्वास नहीं पिया जा सस्ता । यही कारण है कि अनेकानेक प्रम विवाह कुछ साला वाद रूसे सूसे विराह रन जाते है । एसे विवाह जो गरम मौतक फटे-से रगते है । चतुत-से एसे विवाह भा उदाहरणाथ मरा ऑखोंके सामने आना चाहते है, जहाँ प्रारम्भमा प्रम अतम इतना धृणाम परिवतित हो गया कि एक दमरे पर जान द देनेक स्थान पर जान र रेनेसा पात तर सोचा जाने रगा। रेक्नि म यत सन विचार अपना आग्याके सामने आने नहा दना चाहता। मानना परयात अब मा आता है १०३ हूँ य- मेरी मनोरी है क्यारि प्यारने लिए मेरे हत्यम एक इतना कोमल पहर है जो किमी तरह भी उमस भयर पटाहुमा झुगटार बरमूरत रूप देग्वना नहीं चाहता और नाम पर मान ही कर मरना है। फिर भी उनका वाम्नरिक रुप मरे दिमागमें चिंचा दुआ है। हम समय मरी अगम्था ऐमी नहीं है कि मैं इसपर निश्चित रूपमे कुछ सोच सकूँ । मै धरा रा है। एक ओर तो मग हन्य पश्य बहुत प्रल हो गया है और नमरी ओर कुछ तानी घग्नाआके कारण मेरा मस्तिष्क पर भी प्रकार है। मैं नतों चाहता कि मैं इम ममय निकुन भा दम विषय पर मायूँ लेकिन न चाहने पर तो विचार और भी तेनीमे आते है। मेरे एक मित्र ह जो म्यभावमे बहुन कुछ परि है। बच्छन् सपनाह प्रतिर । इनर का कृपामे धनसा अभार पनर पाम नीं। चित्रगो प्रामक है और चित्रकारीमे कुछ गौर भी है उन्हें। उनका प्रेम विवाह हुआ। उनकी पनामा प्रति ठीक नसी-मी है । वह एक कुगर सगीनता और वाटिका है । म्वन्टन्नता और रापपाहा रनरी नम-नसमें भर्ग है । गत दिनामे में यट नाननेकी कोशिशम था कि आखिर उनका प्यार कहॉमे शुरू टोना है। वर मौन-मा म्यान है जहाँ वे दोनों एक दमरेको प्यार करते हा । क्यानि मेरे मामने वे हमेगा झगडते । ना यगटे मे नी होते थे निमसरी तहमें प्यार हो, अपितु भयाना उपसा होती या उनका तहम । नरे इस तरह व्यवहारमे मै वटुत गिना तक बटुत परेशान रहा, क्यारिन दिना में मोचता था कि प्रेम बिनाको अमपत्ताका कारण आर्थिर है । रम्नि यहाँ तो उसका प्रान ही १०४ कारका घपियाँ न उटता था। दधर दिन मुझे मालूम हुआ कि वे दोना अलग हो गये है और अलग-अलग रहने लगे है । इतना मनमुटार बढ जानेपर आश्चय हुआ । उनसे मैं फौरन मिला । कुछ अननान वनते हुए मने पृछा, “भाभी कहाँ ह ?" "उनका बात मत कर, रज्वन", रहोंने बहुत दुपा और ग्विन होते हुए कहा। "क्यो ? क्या अब वह जो विवाहके पहले थीं नहा है ? जिनके उपर तुम तन, मन, धन सब निडावर क्येि हुए थे। निनके एक दशनक हेतु तुम म्वर्गके देवताआको भी टुकरा सकते थे । वह प्यारका अमरता निसपर अखड विश्वास था क्या एम कोरा सपना . ही था " "यह अनीर बात म तेरे मुँहसे सुन रहा हूँ।" वह क्षण भर चुप रहे फिर बाले “पर अजीब नहीं, सत्य है यह । उहे अन मुझमें निल्सुर रचि नहा रह गयी था। मेरी पितुर परवाह उहे न थी। विवाहके पहल वह अपनेसे अधिक मुझे प्यार करता थीं और अब वह मुझसे अधिक अपने को प्यार करती है। रहें मेरा स्याल लिकुल नहा रह गया है। वह अपनी धुनम हा मम्त रहती है, अपनेसे नटकर शायद वह और कुछ रयाल करना भी नीं चाहती।" मैं कुछ समझ न सका । कुछ ही दिना बाद मै उनकी पत्नासे मिना । वह चित्र रस समय मेरा ऑयाके सामने नतना स्पष्ट खिंच गया है कि दम वातावरणमा प्रभाव धृमिन-सा हो गया है। एक परताय म्यानपर उहाने एक सुदर सा चंगा रे रखा था तो

Shadankar Adaivet Vedant Ka Nirgun Kavya Par Prabhav

Author
Saxsena,sarveshvar Dayal
Title
Shadankar Adaivet Vedant Ka Nirgun Kavya Par Prabhav
File name
Shadankar Adaivet Vedant Ka Nirgun Kavya Par Prabhav
Text
OCR done
Citation
1951
Published
2010/12
Publisher
Kashi,bharatiya Gyanpith
Language
Sanskrit
Pages
101
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
515011
Barcode
4990010022673.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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