Sanmati Library, Jaipur

Prameyaratnamala

Chhabara, Jayachandra · 2009/11

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प्रकाशक- राजमल वडजात्या मंत्री, मुनि अनंत कीर्तिग्रंथमाला कालबादेवी रोड बम्बई। - मुद्रक- मंगेश नारायण कुळकर्णी, कर्नाटक प्रेस, ४३४, ठाकुरद्वार, बम्बई।

श्री वीतरागायनमः नियमावली। मुनि श्री अनन्तकीर्ति ग्रंथमाला । १ यह प्रन्यमाला श्री अनन्तकीर्ति मुनिकी स्मृतिमें स्थापित हुई हैं जो दक्षिण कनाके निवासी दिगम्बर साधु चारित्रके तत्व ज्ञानपूर्वक पालनेवाले थे और जिनका देहत्याग श्री गो० दि. जैन सिद्धान्त विद्यालय मुरैना (गवालियर) हुआ था। २ इस प्रन्थमाला द्वारा दिगम्बर जैन सस्कृत व प्राकृत प्रन्थ भाषाटीका सहित तथा भाषाके अन्य प्रवधकारिणी कमेटीकी सम्मतिसे प्रकाशित होंगे। ३ इस ग्रन्थमालामे जितने ग्रन्थ प्रकाशित होगे उनका मूल्य लागत मात्र रक्खा जायगा लागतमे अन्य सम्पादन कराई सशोधन कराई छपाई जिल्द वधाई आदिके सिवाय आफिस खर्च भाडा और कमीशन भी सामिल समझा जायगा। ४ जो कोई इस ग्रन्थमालामें रु १००) व अधिक एकदम प्रदान करेंगे उनको ग्रन्थमालाके सव प्रन्य विनान्योछावरके भेट किये जायगे यदि कोई धर्मात्मा किसी ग्रन्थकी तैयारी कराईमें जो खर्च परे वह सब देवेगे तो अन्यके साथ उनका जीवन चरित्र तथा फोटो भी उनकी इच्छानुसार प्रकाशित किया जायगा यदि कमती सहायता देगे तो उनका नाम अवश्य सहायकोंमें प्रगट किया जायगा इस अव्यमाला द्वारा प्रकाशित सव अन्य भारतके प्रान्तीय सर- कारी पुस्तकालयोंमें व म्यूजियमोंकी लायबेरियोंमें व प्रसिद्ध २ विद्वानों व त्यागियोंको भेटस्वरूप भेजे जायंगे जिन विद्वानोंकी संख्या २५ से अधिक न होगी। ५ परदेशकी भी प्रसिद्ध लायबेरियों व विद्वानोंको भी महत्वपूर्ण अन्य मंत्री भेट स्वरूपमें भेज सकेंगे जिनकी संख्या २५ से अधिक न होगी। ६ इस प्रन्थमालाका सर्व कार्य एक प्रबंधकारिणी सभा करेगी जिसके सभा- सद ११ व कोरम ५ का रहेगा इसमें एक सभापति एक कोषाध्यक्ष एक मंत्री तथा एक उपमंत्री रहेंगे। ७ इस कमेटीके प्रस्ताव मत्री यथा सभव प्रत्यक्ष व परोक्ष रूपसे स्वीकृत करावेगे। ८ इस प्रन्थमालाके वार्षिक खर्चका बजट बन जायगा उससे अधिक केवल १००) मंत्री सभापतिकी सम्मतिसे खर्च कर सकेंगे। ९ इस ग्रन्थमालाका वर्ष वीर सम्वत्से प्रारम्भ होगा तथा दिवाली तककी रिपोर्ट व हिसाव आडीटरका जचा हुआ मुद्रित कराके प्रति वर्ष प्रगट किया जायगा। १० इस नियमावलीमें नियम नं १-२-३ के सिवाय शेषके परिवर्तनादि पर विचार करते समय कमसे कम ९ महाशयोंकी उपस्थिति आवश्यक होगी।

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श्री दि० जैन मुनि अनंतकीर्तिग्रंथमालाके मुख्यसहायक
महाशय ।
१२०२) सेठ गुरुमुसरायजी मुखानदजी बम्बई
११०१) मुनिमहाराजके आहार दान समय.
११०१) यात्रार्थ आये हुए दिलों के सधके समय
११०१) से हुकमचदजी जगाधरमलजी-दिल्ली
११.१) से. उम्मेदसिंहजी मुसद्दीलालजो-अमृतसर
५०१) श्री जैनग्रंथरत्नाकर कार्यालय-बम्बई
४११) श्री धर्मपत्नी लाला रायबहादुर हजारीलालजी-दानापुर.
२५१) से. नाथारगजी वाले बम्बई
२०१) से चुनीलाल हेमचदजी बम्बई
१०१) साहु मुमतिप्रमादजी-नजीवावाद
१०१) लाला जुगलकिशोरजी-हिसार.
१०१) श्री जनधर्मवर्धिनी समा वम्बई ।
१०१) राजमलजी घडजात्या यम्बई ।
१०१) से. वैजनाथजी सरावगी हाथरस ।
१०१) से कस्तूरचद वेचरदासजी बम्बई ।
१०१) लाला जनेन्द्रकिशोरजी।
ठि-उत्तमचद भरोसालाल-आगरा।

भूमिका। ग्रंथपरिचय । श्रीमत्सकलतार्किकचकचूडामणिमाणिकनंदिजी आचार्यका परीक्षामुख ग्रंथ सूत्र रूपसे समुपलब्ध है। जो कि यह सूत्र ग्रंथ यथा नाम तथा गुणकी कहावतको चरि- तार्थ कर रहा है क्योंकि परीक्ष्य पदार्थोंको परीक्षाका यह मुख्य कारण है । अथवा जिनके द्वारा हेयोपादेयारूप समस्त पदार्थोंकी परीक्षा होती है उन प्रमाण लक्षण फल वगैर का स्वरूप दिखानेके लिये यह ग्रंय दर्पणके समान है। इसी विषयको स्पष्ट करनेके लिये खुद ग्रंथकर्ता ही इस ग्रंथकी प्रशस्तिमें इस प्रकार लिखते हैं। परीक्षामुखमादर्श हेयोपादेयतत्त्वयोः संविदे माहशोवालः परीक्षादक्षवव्यधाम् ॥ १॥ तथा यह अंध समस्त न्याय वचनका सारभुत अमृत हैं क्योंकि इसकी शानी (मुकाविले) का सारभूत न्यायका सूत्र ग्रंथ ऐसा कोई भी अभी तक देखनेमे नहीं आया है। वास्तविक दृष्टिसे विचार किया जाय तो यह अन्य न्यायशास्त्रोंकी पूंजी है। क्योंकि इसकी उत्पत्ति श्री १००८ भगवान् जिनेन्द्रदेव तथा उनकी शिष्य परपराके प्रशिष्य तार्किक सिद्धान्त प्रधान श्रीमत् अकलंकदेवजीके वचन रूप समद्रसे सुधा सदृश हुई है। इस विषयमें श्री अनंतवीयजी महाराज इस प्रकार लिखते हैं अकलंकवचोम्भोधेरुदभ्रे येन धीमता । न्यायविद्यामृतं तस्मै नमो माणिक्यनन्दने ॥२॥ इस ग्रंथके ऊपर श्रीप्रभाचद्राचार्यजीकी बड़ी प्रमेय कमलमार्तड, और छोटी श्रीमनंतवीर्यजीकृत प्रमेयरत्नमाला टीका है । प्रभाचंद्राचार्यजी तथा उनके ग्रंथका अनंतवीर्यजीने बड़ेही महत्वसूचक शब्दोंसे स्तुतिरूप गान किया है और इस प्रमेय रत्नमालाको रचना प्रमेय कमल मार्तडके आधारपर सारवचनोंमें हुई है इस विषयको दिखाते हुए ग्रंथकारने अपनेमें कृतज्ञता तथा लघुताके साथ अपने ग्रंथमें प्रमाणीकता सूचित की है जैसे कि- प्रभेन्दु वचनोदारचद्रिकाप्रसरे सति माशा व नु गण्यन्ते ज्योतिरिंगणसनिभा ॥१॥ तथापि तद् वचो पूर्वरचना रुचिर सताम् । चेतोहरं भृतं यद्वन्नद्या नवघटे जलम् ॥२॥ इस कथनसे यह स्पष्ट सिद्ध है कि हम अथके पठन तथा मननरूप अवलंबनसे प्रमेय कमलमार्तड, तथा प्रमेय कुमुदचंद्रोदय सरीखे शास्त्रसमुद्र में प्रवेश कर समस्त न्याय विषयमे पारगत हो सकता है । अर्थात् न्याय विषयमें प्रवेश कर- नेके लिये यह प्रथ मुसद्वारही सिर्फ नहीं है किंतु इसके पढनेसे जितनी विद्वत्ता तथा जानकारी होनी चाहिये उससे कई अशमे अधिक यह ग्रंथ जानकारी तथा विद्वत्ताका विशेष साधन है। अन्यधर्ममें कारिकावलीको टीका एक मुक्तावली है और वह उस मतके विशेष शालोम प्रवेश करानेके लिये मुसद्वार माना जाता है । परतु प्रमेय रल- मालाम हमसे भी अधिक यह विलक्षणता है कि यह स्वमत परमतसवी समस्त विशेष शाखोंमें प्रवेशमार्ग प्राप्त कराने के अलावा कुछ विशेष विद्वत्ता व दक्षताको भी हासिल करा सकती है। क्योंकि इसका मूल पाया जो परीक्षामुख है वह उस लिीसे सूत्रित किया गया है कि जिसमें प्रायः सर्वही विषय परमत निरा. करणके साथ स्वमतको स्थापनास्वरूप है जैसे दृष्टान्तमे 'स्वापूर्वार्थव्यव- सायात्मक ज्ञान प्रमाणम् , इस सूत्रमे प्रमाणका लक्षण जो ज्ञान कहा है वह साथहीमें ऐसे विशेषणसे विशिष्ट है कि जिस विशेषणमे अन्य मतावलंबियों- द्वारा माने गये प्रमाणके लक्षण हैं उन सबका उसमे खडन विशेष है इसी शैली पर इस समस्त प्रथकी रचना है। और उसका विशेष खुलासा स्वरूप यह प्र- मेयरत्नमाला टीका है वह योग्य दक्षतापूर्वक विद्वत्ता तथा समस्त दर्शन प्रवेशि- ताका मुख्य कारण है। क्योंकि इस ग्रंयके विना उच्च कोटिके प्रमेयकमल मार्तण्डादि प्रथोंमें प्रवेश होना अति दुस्सह है इसी हेतुसे दयाशील श्रीमदनंत वीर्याचार्यजीने शांतिपेण नामके किसी शिष्यके लिये वैजेयके पुत्र हीरपके आ- प्रहसे इसका निर्माण किया-इस विषयको प्रथम स्वत आपनेही प्रदर्शित किया है, वैजेयप्रियपुत्रस्य हीरपस्योपरोधतः। शान्तिपेणार्थमारब्धा परीक्षामुखपंचिका । १ ऐसीही प्रख्याति कारिकावली मुकावलीके विषयमें भी है।

APN य इस ग्रंथका दूसरा नाम परीक्षामुखपचिका भी है। पर्दोके जुदे २ कर अर्थ करनेको पंचिका कहते हैं क्योंकि कहा भी है पंचिका पदभंजिका इसी. अर्थको पंडित जयचंद्रजी छावाने भी कहा है 'सूत्रनिके पद न्यारे करि तिनका न्यारा न्यारा अर्थ कहिये ताकू पंचिका कहिये है ' इत्यादि । इस टीकामें विशे- पताके साथ अर्थकी ऐसीही रचना है इस लिये इसका-परीक्षामुख पंचिका नाम भी वास्तविक है। इस टीकाका प्रमेय रत्नमाला जो नाम है वह यथा नाम तथा गुणसे खाली नहीं है। क्योंकि रत्नचीज जिस तरह स्वपरप्रकाशक होती है, उसी तरह प्रत्यक्ष परोक्षादि रूप अनेक प्रकारके प्रमाण स्वरूप प्रमेयकी माला, अर्थात् पंक्ति स्वरूप यह ग्रंथ है। तथा इस नामसे यह सूचित किया है कि भाग्यशालियोंके हृदयको यह भूषित करनेवाली हैं और भाग्यहीनोंको दुर्लभ है । जैसे रनमाला भाग्यशालियोंको ही प्राप्त होकर उनके हृदयको भूषित करती है भाग्यहीनोंको उसकी प्राप्ति होना ही दुर्लभ है इसी प्रकार भाग्यशील विशिष्ट क्षयोपशमके धारक ही इसको धारणा कर सकते हैं भाग्यहीन मंदक्षयोपशमी इसको धारण नहीं कर सकते, इसी अर्थको श्री वीरनंदिस्वामिजीनें भी सूचित किया है। गुणान्विता निर्मलवृत्तमौक्तिका नरोत्तमैः कंठविभूषिणीकृता। न हारयष्टिः परमेव दुर्लभा समंतभद्रादिभवा च भारती ॥१॥ यह ग्रंथ भी परीक्षामुख सूत्र ग्रंथके समान छह समुद्देशोंमें विभक है उनमें से छहोंके ही नाम विषय प्रतिपादनकी अपेक्षासे रखे गये हैं। वे इस प्रकार हैं। प्रमाण स्वरूप समुद्देश १ प्रत्यक्षसमुद्देश २ परोक्षसमुद्देश ३ विषय समुद्देश ४ फलसमुद्देश ५ आभास समुद्देश । ६ । इन छहों समुद्देशोंमेंसे प्रत्येक २ समुद्देशमें . क्या २ विषय है यह यद्यपि इन समुद्देशोंके नामसे ही प्रतीत होता है तथापि इनमें, विशेष २ विषय कोन २ सें है इस बातकी बहुत आवश्यकता है। इसी हेतुसे, मैने पाठकोंके संतोषके लिये कुछ विषयसूचि और सूत्र सूची बनाकर ग्रंथके साथ, लगादी है उससे इस ग्रंथके पाठक ग्रंथका कुछ ज्ञान तथा महत्व समझ सकेंगे। इस ग्रंथकी देशभाषा वचनिकामें टीका श्रीमत् पंडित जयचंद्रजी छावदाने की है जिसमें सूत्र तथा प्रमेय रत्नमालाके पदार्थ तथा भावार्थः बहुतही मनोज्ञता १जैन धर्ममें ज्ञानको स्वपरप्रकाशव माना है ७ तथा विद्वत्तासे लिखे गये है कि जिसके पठनेसे सामान्यबुद्धि भी प्रमेय रत्नमाला सरीसे पदार्थोको पखूवी समक्ष सकता है तथा कहीं कहीं विशेष स्पष्टी करनके लिये ग्रंथमें फुछ २ विशेष विषय भी सगठित किये गये हैं। वे इस ग्रंथके स्वाध्याय करनेवालोंको स्वत.ही प्रतीत हो सकते है। ग्रन्थकर्ताओंका परिचय। माणिक्यनंदिजी। मूल सूत्र पथ (परीक्षामुस) के कर्ता श्रीमन्माणिकक्यनन्दीजी एक वदेही प्रतिभाशाली विद्वान् हुए हैं क्योंकि उनने समस्त न्याय समुद्रको मथन कर यह अमृत मरीसा प्रयराज बनाया है। इस प्रथके शिवाय इनका कोई दूसरा प्रथ अभीतक देखने में नहीं आया है तथा इस विषयमें इनके पीछेके किसी भी मा- चार्यने ऐमा उल्लेख किया हो ऐसा भी देखने में अभीतक नहीं आया । और अपने विषयको इस प्रथम भी आपने कुछ भी प्रशस्ति नहीं दी है इससे हम निश्चित रूपसे आपके विषयमें कुछ भी लिस नहीं सकते तथापि इतना निश्चय हो जाता है किये या तो अकलक देवके समयके तथा उनके कुछ पीछेके और प्रभाचंद्रजीके फुछ समय पहलेके तथा उनकेही समयके विद्वान् है । क्योंकि प्रभाचद्राचार्यजीने प्रमेय कमल मार्तडकी प्रशस्तिमें-उनको गुरु शब्दसे स्मरण किया है। और गुरु शब्दके ऊपर जो टिप्पणी दीहै उसमें 'स्वस्य' लिखा है इससे स्पष्ट हो जाता है कि ये आचार्य प्रभाचंद्राचार्यजीके गुरु थे । फिर असीरके पद्यमें अप- नेको इस प्रकार लिखते हैं। श्रीपानंदिसैद्धान्तशिप्योऽनेकगुणालयः प्रभाचंद्रश्चिरंजीयाद्रत्ननन्दिपदे रतः॥१॥ इस पद्यम-पद्मनदि आचार्यका सिद्धान्तविपयका शिष्य और-माणिक्यनदिके चरणों में रत ऐसे दो विशेषण दिये हैं । उनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि सिद्धान्त विपयके शिवाय अन्य विषयके गुरु प्रभाचगजीके माणिक्य नदिजीही थे। इससे यह निश्चय हो जाता है कि श्रीमाणिक्यनदीजी तथा प्रभाचद्रजीका समय एकही है। परतुं वशीधरजी शास्त्रीने प्रमेयकमल मार्तडके उपोद्घातमें माणिक्यनंदिजीके परीक्षामुपसूत्र वननेका समय विक्रमसवत् ५६९ दिया है और प्रभाचंद्रजीका १ निर्णय-सागर प्रेसकी छपी हुई प्रतिमें । ।

८ १०६० से १११५ तक विक्रम संवत् दिया है और विद्याभूषण तथा ए. एम्. आदि पदधारक श्रीसतीश्चद्रजीने अकलंक स्वामीजीको ईसवी ८ वी शताव्दीके विद्वान् स्वीकृत किया है । प्रभाचंद्रजीने प्रमेयकमल मार्तडकी समाप्ति भोजदेवराज्यके समयमें की तथा अपनेको धारा नगरीका निवासी लिखा है। परंतु कई भोजराज्योंके होनेसे प्रभाचंद्रजीका समय भोजराज्यपरही निभरित नहीं रह सकता है। परंतु प्रमेय. कमल मार्तडके अतिम पद्यसे यह अवश्यही निश्चय हो सकता है-अकलक देवके- पीछे या भकलंक देवके समयमें। ये दोनों (माणिक्यनंदि-प्रभाचंद्र) आचार्य एकही समयके हैं। इस विषयके विशेष विचारमें हम विद्वानोंके ऊपरही निर्भ- रित हैं। अनंतजीवीर्याचार्य इन आचार्यके विषयमें हम कुछ भी नहीं लिख सकते क्योंकि इनका जो प्रमेय रत्नमाला नामक ग्रथ है उसकी प्रशस्तिमें आपने अपने ग्रंथ निर्माणका समय तथा निवास वगैर का कुछ भी उल्लेख नहीं किया है। तथा आपके सम. यादिके विषयमें हमें अन्यत्र भी इस समय तक कुछ भी विषय उपलब्ध नहीं हुआ है इस लिये इनके विषयों में इस समय विशेष परिचय देनेके लिये अस- मर्थ हूं। सामन्य परिचयमें भी सिर्फ इतनाही है कि ये आचार्य उच्च कोटिके विद्वान् थे इस विषयका ज्ञान आपके प्रमेयरत्नमाला नामक ग्रंथके अवलोकनसे ही हो जाता है। आपने अपनी जो प्रशस्ति दी है वह अर्थसहित इस ग्रंथके अतमे लगी हुई है उससे पाठकोंको इनके विषयमें जितना ज्ञान हो सकेगा वस उतनाही ज्ञान हमको है। प्रथोंके विषयमें भी इस समय आपका एक प्रमेय रत्नमालाही ग्रंथ उपलब्ध है जो कि मुद्रित हो चुका है। पं. जयचंद्रजी छावडा ढुंढाइरदेशके विशाल जयपुर नगरमें पं. जयचंद्रजी छावड़ाका जन्म तथा निवासस्थानथा। आप विक्रम उन्हींसवीं १९०० शताव्दिके एक गण्य तथा मान्य विद्वान् थे । आपके ग्रंथोंका अनुवाद पढ़नेसे मालूम होता है कि आप न्याय अध्यात्म साहित्य वगैर सर्वही विषयके अच्छे विद्वान तथा परोपकारी और उद्यमशील पुरुष थे। इस शताब्दीके विद्वानोंमेंसे पं. टोडरमल्लजीके समान आपही. -गणना योग्य तथा माननीय व्यक्ति हो सकते हैं। आपनें १३ तेरह ग्रंथोंपर ९ भाषा ववनिकायें लिखी हैं। इन सब वचनिका ग्रंथोंकी श्लोकसंख्याका प्रमाण ६० हजारके करीव है। वे १३ प्रन्थ विक्रम सम्वत्के साथ नीचे लिखे प्रमाण हैं। १८६३ ॥ १८६४ ॥ १ सर्वार्थसिद्धि १८६१ वि २ प्रमेयरत्नमाला (न्याय) १८६३ , ३ दन्यसग्रह वचनिका ४ आत्मव्यातिसमयसार ५ स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा ૧૮૬૬ १८६७ यह इस ग्रंथमालामें जल्दी निकलनेवाला है। ७ ज्ञानार्णव १८६५ ८ भकामरस्तोत्र १८७० ९ आप्तमीमांसा (देवागमन्याय) १८८६ यह ग्रंथ इस ग्रंथ मालामे तैयार हो ६ अष्टपाहुद्द चुका है; समय लिखा नही. १० सामायिकपाठ ११ पत्रपरीक्षा (न्याय) १२ मतसमुचय (न्याय) १३ चंद्रप्रभद्वितीयसर्गका न्यायभाग, समय मालूम नहीं. ये सर्व प्रथ वदेही कठिन गंभीराशयके हैं तथा बढेही महत्वके सस्कृत प्राकृत भाषाके हैं। इनमेसे पांच ग्रंथ तो केवल न्यायके हैं और सभी प्रथ उच्च कोटिके ताविक विषयके हैं तथा धर्मम हडता और भक्ति पैदा करनेवाले हैं। आप देशमा- पाके पद्य रचना करनेमे भी सिद्ध हस्त थे आपने फुटकर विनतिया वगैरः लिखी है उनकी श्लोक संख्या ११०० के करीब होगी तथा द्रव्य संग्रहको भी अपने पद्यमें लिखा है। आपकी १८७० की लिसी हुई एक पद्यात्मक चिठी वृन्दावन विलासमें प्रकाशित हो चुकी है। इन सबसे यह निश्चित होता है कि आप गद्य पद बनानेमें बहुतही सिद्ध हस्त ये। तथा सस्कृत और प्राकृतमें आपका ज्ञान ख्वही चढा बढ़ा था इस विषयका ज्ञान आपके ग्रंथों का अवलोकन करनेसे सभीको हो सकता है।

। तथा चार प्रकारके कवियोंमसे आपमें गमेककवि शकिभी श्रेष्ठ थी क्योंकि आपने नतामर इत्यादि प्रमेयरत्नमालाके प्रथम श्लोकके अर्थको 'मोक्षमार्गस्य- नेतारं' इत्यादि श्लोकके भावमें प्रदर्शित कर वनेही महत्व भरे पांडित्यको प्रद- र्शित किया है। इससे आपने यह दर्शित कर दिया है कि जिस प्रकार तत्वार्थ मोक्ष शास्त्रके ऊपर सर्वार्थ सिद्धि छोटी तथा गभीराशयवाली टीका है उसी प्रकार इस न्यायकी पूंजी स्वरूप-परीक्षामुखसूत्र पर यह प्रमेय रत्नमाला टीका है । क्योंकि (मोक्षमार्गस्य नेतार-) यह श्लोक सर्वार्थ सिद्धिका मंगला- चरण माना जाता है । तथा सूत्र ग्रंथके ऊपर छोटी और गंभीराशयकी सर्वार्थ सिद्धि टीका है उसी प्रकार इस ग्रन्थमे भी यह सर्व समानता मौजूद है इत्यादि। आपने अपनी सर्वही टीकाओम ग्रंथोंके आशयको कहीं २ वढाकर भी बहुत खुब सूरतीके साथ समझाया है। जैसे कि इस प्रमेय रत्नमालाहीमें--विशेष लिखिये है इस प्रकारसे ग्रंथके विष- यको समझानमें विशेष ख्वी की है उसी प्रकार सर्व ही (अपने टीका किये हुए) प्रयोंको समझानेमें वहुतही मनोज्ञ शैली व शक्तिको भरकस रूपसे काममें लाये हैं सर्वार्थसिद्धि तथा आप्त मीमासा वगैरः ग्रंथोंमे आपने मूल ग्रंथके आशयको अच्छी तरह समझानेके हेतुसे उनके बड़े २ टीकाग्रंथ राजवार्तिक श्लोकवार्तिक अष्ट सहस्री वगैरःको भी देशभाषामें उद्धृत करके ग्रंथोंके आशयको बहुतही भव्य बना दिया है । इस प्रकारके आपके प्रयत्नसे सामान्य भाषा जाननेवाले भी इन वहे ग्रंथोके अभिप्रायोंको समझ सकते हैं । आपकी इन सर्व कृतियोंसे मालूम होता है कि आप बढ़ेही परोपकारी महात्मापुरुष थे। तथा प्रायः सर्वही बड़े २ न्याय अध्यात्म आदि ग्रंथोंके मर्मज्ञ रूपसे जानकार थे। अर्थात् आप सर्वांगसुन्दर एक अद्वितीय विद्वान थे तथापि आपने अपनी लघुताही दिखाई है जैसा कि प्रमेयरत्नमालाके अतमे आपने अपने विषयमे लिखी है। वालवुद्धिलखि संतजन हसैं न कोप कराय इहैरीति पंडितगहै धर्मबुद्धि इमभाय ॥ इस परसे यह पता चलता है कि आप पूर्ण विद्वान् होकर भी अहंकार रहित थे। अहकारताका अभाव विद्वत्तामे सोनेको सुगंधिकी कहावतको चरितार्थ करता है। १ कविके गूढ तथा गंभीर आशयको स्पष्ट करनेवाला गमक कवि होता है।

विद्वान होकर जो अहंकार रहित होगा वही अपने वचनादि प्रयत्नों द्वारा प्राणियोंका उपकार कर सकता है तथा वही प्रमाणताका पात्र हो सकता है। संडेलवाल जातिभूपण- जयचंद्रजी छावदामें ये सर्व गुण मौजूद थे इसी कारण इनकी समाजमें विशेष प्रतिष्ठा रही तथा आगे भी कायम रहेगी। उक्त पंडितजीके विषयमे जो कुछ हमने लिखा है वह बहुत ही थोड़ा सक्षेपतासे लिखा है यदि विशेष लिखते तो एक ग्रंथका ग्रंथही वन जाता। पंडितजीने अपने थोडेसे जीवन कालमे इतने टीका तथा विनतीस्वरूप ग्रंथोंका निर्माण कर अपनी घुद्धिफी बहुत ही विचक्षण विलक्षणताका परिचय दिया है। हमने सुना है कि उक्त पंडितजी साहेबने इन ग्रंथोंके अलावा अन्य भी कई ग्रंथोंपर टीका की है। यदि यह वात सर्वाग सत्य है तो कहना पड़ेगा कि पंडि- तजोम कोई विलक्षण शक्ति थी। पाठकगण पंडितजीके विपयमें विशेष जाननेकी इच्छा रसते हों तो उनके निर्माण प्रयों में उनके हायकी लिखी हुई प्रशस्तिसे अपनी इच्छाकी पूर्ण पूर्ति करें। विनीत रामप्रसाद जैन-धम्बई।

विषय सूची। नप. १ १५ .प्रथम समुद्देश? पत्र विषयक अन्य प्रमाण कल्प- पं. जयचंदजी विरचित मंगल नाओंका परिहार । और प्रतिज्ञा तथा भाषाटीका ज्ञानही प्रमाण है इस विष- वनानेका प्रयोजन। यको दिखानेमे सहेतुकताका पं. जयचंद्रजी विरचित मूल २ निरूपण। ग्रंथ रचनाके संबंधमें कुछ वोद्धकल्पित ज्ञान प्रमाण- हेत्वात्मक वाक्य। विषयक अनध्यवसायताका संकृत टीकाकारका मंगला ३ खंडन और अध्यवसायताका चरण मंडन। माणिक्यनंदिजीको नमस्कार दो प्रकारसे अपूर्वार्थका तथा परीक्षामुख और प्रमे- निरूपण। यरत्नमालाकी प्रमाणीकता परपदार्थके समान ज्ञान अप- विषयक कथन । नाभी निश्चय करानेवाला है। टीका वननेका संबंध और इत्यादि विषयका कर्मकतृकर- टीकाके द्वितीय नामका णादि द्वारा सोदाहरण निरूपण । निरुत्यक अर्थ । तथा ज्ञानके स्वप्रकाशकहेतुका परीक्षामुख वननेका प्रयोजन। विशेषतासे निरूपण। न्याय तथा प्रमेयरत्नमाला ६ ज्ञानके स्वप्रकाशकत्वमें शब्दका निरुतिपूर्वक अर्थ। दीपकका दृष्टान्त । प्रमाण प्रमाणामासरूप प्रतिज्ञा। ७ अभ्यस्तदशामें ज्ञान स्वतः ग्रंथकी उपादेयताके कारण प्रणाम है और अनभ्यस्त अमिधेयादिका निरूपण। दशामें परतः प्रमाण है मंगलाचरणविषयक शंका ९ इस विषयका निरूपण और उसका समाधान । तथा मीमांसक मतका प्रमाणका लक्षण तया तद्. ११ खंडन। २० २४ २५ 5 १३ ८८ खंडन । ४८ ९४ द्वितीय समुहेश २ तृतीय समुद्देश. पत्र पत्र. प्रमाणके प्रत्यक्ष और परोक्ष दो। ३४ | परोक्षका लक्षण और उसके भेद । ८५ भेदका वर्णन तथा अन्य वादियों सोदाहरण स्मृतिका लक्षण, ८६ कर मानी गई जो प्रमाण आकारनिर्देशपूर्वक प्रत्यभिज्ञान संख्या है उसमें समस्त का लक्षण। प्रमाणके भेदोंका भर्तर्भाव अन्यवादिकृत उपमान प्रमा- नहीं होता ऐसा वर्णन। णका खंडन। क्रमपूर्वक सव सख्या वादि. ३५ / प्रत्यभिज्ञानके उदाहरण योका मत प्रदर्शन पूर्वक आकारसहित तक प्रमाणका लक्षण तथा उदाहरण । अनुमानका लक्षण, ९१ प्रत्यक्षका लक्षण । ४६ हेतुका लक्षण तथा अन्यवादि- मुख्य तथा साव्यवहारिकरूप स्वीकृत हेतु लक्षणका परिहार। प्रत्यक्षके भेद और साव्यव- अविनाभावका लक्षण तथा हारिकका स्वरूप और भेद। सहभावका लक्षण । नैयायिक परिकल्पित अर्थ क्रमभावका लक्षण, अविना. और आलोककी कारणताका भावका तर्कसे निर्णय होता है ऐसाकथन तथा साध्यका लक्षण । वोद्ध द्वारा माने गये जो अर्थ ५३ | धर्मी (पक्ष) का लक्षण। विषयक ताप धर्मी प्रसिद्ध होता है ऐसा ९९ ज्ञानकारण हैं उनके इस मत- कथन और उसके भेदका वर्णन का खंडन और स्वमतविष- पक्षके वचनकी आवश्यकता। १०३ यक कारणताका प्रतिपादन । पक्ष और हेतु ये दोही १०६ मुख्य प्रत्यक्षका लक्षण तथा ५६ | अनुमानके भग है उदाहरण उसमें आवरण सहितत्व और नहीं इत्यादि समर्थन । करणजन्यत्वका निषेध। वालव्युत्पत्तिके निमित्त शास्त्रमे ११० मुख्य प्रत्यक्ष तथा सर्वज्ञ विष- ५७ ] ही उदाहरणादिका उपयोग यक अन्यवादि स्वीकृत अन्यथा है इत्यादि। मतोंका परिहार और अपने दृष्टान्तके भेद और अन्वय १११ मतका स्थापना व्यतिरेक दृष्टान्तका लक्षण । खंडन। ९८ और तदुत्पत्ति . १ पत्र. उपनयनिगमनका लक्षणा उर्द्धता सामान्यका दृष्टान्त १८० ११२ अनुमानके स्वार्थ और परार्थ सहित लक्षण तथा विशेष ११३ विषयके भेद । भेद तथा उनके लक्षण । पर्याय विशेषका उदाहरण १८१ हेतुके भेद प्रभेदोंका सोदाह- ११५ सहित लक्षण । रण वर्णन । व्यतिरेक विशेषका उदाहरण १८५ आगमका लक्षण, मीमासित १३३ / सहित लक्षण । कल्पित वेदके अपौरुषेय- पंचम समुद्देश. फलका लक्षण तथा फलके भेद। १८७ त्वका खंडन। नामजाति गुण क्रिया आदि छठा समुद्देश. १५० आभास सामान्यका लक्षण स्व. १९० स्वरूप शब्दका अर्थ नहीं रूपाभास सामान्यका लक्षण । है क्योंकि शब्द और अर्थके सबंधका अभाव प्रत्यक्षाभासका उदाहरण सहित १९५ लक्षण। है फिर शब्दमें प्राप्तप्रणीत परोक्षाभासका लक्षण, उदाहरण १९६ पना होनेपर भी सत्यार्थ सहित स्मरणाभास, प्रत्यभिज्ञा. ज्ञान किस प्रकार हो नाभासका लक्षण । सकता है इस प्रका- रकी शंकाका उत्तर ताभास, अनुमानाभास तथा १९७ तथा उसमें दृष्टान्त। अनुमानके अवयवाभासमें बौद्ध अन्यापोह ज्ञानरूप पक्षाभासका लक्षण । १५१ आगमको प्रमाण मानता भेदसहित हेत्वाभासका लक्षण । २०० है तथा कोई अन्य प्र- भेदपुरस्सर दृष्टान्ताभासका २०५ लक्षण। कार भी मानता है उन वालप्रयोगाभासका लक्षण । २०७ सबका निराकरण । आगमाभासका उदाहरणसहित २०९ चतुर्थ समुद्देश. लक्षण । विषयका लक्षण तथा अन्य वा- १५७ संख्याभासका लक्षण सोदाहरण । २१० दिकल्पित सत्ता प्रधान आदि विषयाभास। २१२ विषयके लक्षणका खडन । फलामास। २१४ अनेकान्तात्म वस्तुके समर्थनके १७९ नय तथा नयाभास । २१७ हेतु तथा समान्य विषयके भेद मूलग्रंथकर्ताकी प्रशस्ति । २१८ सस्कृतटीका कर्ताकी प्रशस्ति । २१९ और तिर्यक् सामान्यका उदा भाषाटीका कर्ताको प्रशस्ति । २२१ हरण सहित लक्षण। इति। - परीक्षामुखसूत्रसूची। पृष्ठ. १० १५ १७ १९ मंगलाचरण । प्रमाणादर्थसंसिद्धिस्तदाभासाद्विपर्यय । इति वक्ष्ये तयोर्लक्ष्म सिद्धमप्ठ लघीयसः॥१॥ प्रथम समुद्देश. सूत्र १ स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मक ज्ञान प्रमाणम् २ हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थ हि प्रमाणं ततो ज्ञानमेव तत्. ३ तनिश्चयात्मक समारोपविरुद्धत्वादनुमानवत् ४ अनिश्चितोऽपूर्वार्थ. ५ दृष्टोऽपि समारोपात्ताहक ६ स्वोन्मुखतया प्रतिभासनं स्वस्य व्यवसायः ७ अर्थस्येव तदुन्मुखतया ८ घटमहमात्मना वेभि. ९ कर्मवत्कर्तृकरणफियाप्रतीते १० शब्दानुचारणेपि स्वस्यानुभवनमर्थवत् ११ कोवा तत्प्रतिभासनमर्थमध्यक्षमिच्छस्तदेव नेच्छेत् १२ प्रदीपवत् १३ तत्प्रामाण्यं स्वतः परतव द्वितीयसमुद्देश. १९ २० २० २१ २१ २२ २३ २४ २५ १ तद्वेषा ४६ २ प्रत्यक्षतरभेदात ३ विशदं प्रत्यक्षम् ४ प्रतीत्यन्तराव्यवधानेन विशेषवत्तया वा प्रतिभासनं वैशद्यम् ५ इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तं देशत: सान्यवहारिकम् ६ नालोको कारणं परिच्छेद्यत्वात्तमोवत् ७ तदन्वयव्यतिरेकानुविधानाभावाच केशोण्डकज्ञानवन्नकंचरज्ञानवच्च ४९ १६ ८८ ८ अतबन्यमपि तत्प्रकाशकं प्रदीपवत् ५३ ९ स्वावरणक्षयोपशमलक्षणयोग्यता हि प्रतिनियतमर्थ व्यवस्थापयति १० कारणस्यच परिच्छेद्यत्वे करणादिना व्यभिचारः ५५ ११ सामिप्रीविशेषविलेषिताखिलावरणमतीन्द्रियमशेषतो मुख्यम् ५६ १२ सावरणत्वे करणजन्यत्वे च प्रतिवन्धसंभवात् तृतीयसमुद्देश. १ परोक्षमितरत् २ प्रत्यक्षादिनिमित्तं स्मृतिप्रत्यभिज्ञानतर्कानुमानागमभेदम् ३ संस्कारोद्वोधनिवन्धना तदित्याकारी स्मृतिः ८६ ४ सदेवदत्तो यथा ८६ ५ दर्शनस्मरणकारणक सङ्कलनं प्रत्यभिज्ञानं तदेवेदं तत्सदृशं तद्विलक्षणं ८६ तत्प्रतियोगीत्यादि. ६ यथा स एवायं देवदत्तः, गोसदृशो गवयः, गो विलक्षणो महिषः, इदमस्मादरम्, वृक्षोयमित्यादिः, ७ उपलम्भानुपलम्भनिमित्तं व्याप्तिज्ञानमूहः इदमस्मिन्सत्येव भवत्यसति न भवत्येवेति च ८ यथामावेव धूमस्तदाभावे न भवत्येवेतिच ९० ९ साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानम् ९१ १. साध्याविनामावित्वेन निश्चितो हेतुः ९१ ११ सहक्रमभावनियमोऽविनाभावः १२ सहचारिणोाप्यव्यापकयोश्च सहभावः १३ पूर्वोत्तरचारिणो. कार्यकारणयोश्चक्रमभावः ९५ १४ तत्तिनिर्णय. '.१५ इष्टमवाधितमसिद्ध साध्यम् १६ संदिग्धविपर्यस्ताव्युत्पन्नानां साध्यत्वं यथास्यादित्यसिद्धपदम् १७ भनिष्टाध्यक्षादिवाधितयोः साध्यत्वं माभूदितीष्टावाधितवचनम् ९४ .

१७ ९८ १८ नचासिस्वदिष्ट प्रतिवादिन १९ प्रत्यायनाय हीच्छा वक्तुरेव २० साध्यं धर्म कचित्तद्विशिष्टोवा धर्मी ९८ २१ पक्षइति यावत् २२ प्रसिद्धो धर्मी २३ विकल्पसिद्ध तस्मिन्सत्तेतरे साध्ये १०० २४ अस्ति सर्वज्ञो नास्ति खरविषाणम् १०० २५ प्रमाणोभयसिद्धे तु साध्यधर्मविशिष्टता १०१ २६ अग्निमानयं देश परिणामी शब्द इति यथा १०२ २७ व्याप्ती तु साध्यं धर्मएव १०३ २८ अन्यथा तदघटनात् १०३ २९ साध्यधर्माधारसदेहापनोदाय गम्यमानस्यापि पक्षस्य वचनम् १०३ ३० साध्यधर्मणि साधनधर्माववोधनाय पक्षधर्मोपसहारवत् १०४ ३१ को वा त्रिधा हेतुमुक्त्वा समर्थयमानो न पक्षयति १०५ ३२ एतद्वयमेवानुमानाम नोदाहरणम् १०६ ३३ न हि तत्साध्यप्रतिपत्य तत्र यथोकहेतोरेव व्यापारात् १०७ ३४ तदविनाभावनिश्चयार्थ वा विपक्षे वाधकादेव तत्सिद्धे. ३५ व्यक्तिरूप च निदर्शन सामान्येन तु व्याप्तिस्तत्रापि तद्विप्रतिपत्तावन• १०८ वस्थान स्यात् दृष्टान्तरापेक्षणात् ३६ नापि व्याप्तिस्मरणार्थ तथाविधहेतुप्रयोगादेव तत्स्मृते १०८ ३७ तत्परमभिधीयमानं साध्यधर्मिणि साध्यसाधने सन्देहयति १०८ ३८ कुतोन्यथोपनयनिगमने १०९ ३९ न च ते तदने साध्यधर्मिणि हेतुसाध्ययोवचनादेवासशयात् १०९ ४० समर्थन वा वर हेतुरूपमनुमानावयवो वास्तु साध्ये तदुपयोगात् ११० ४१ वालव्युत्पत्यथं तत्रयोपगमे शास्त्र एवासौ न वादेऽनुपयोगात् ११० ४२ दृष्टान्तो द्वेधाऽन्वयव्यतिरेकभेदात् १११ ४३ साध्यव्याप्तं साधन यत्र प्रदश्यते सोऽन्वयदृष्टान्तः १११ ४४ साध्याभावे साधनाभावो यत्र कथ्यते स व्यतिरेकदृष्टान्त. १११ ४५ हेतोरुपसहार उपनय. ११२ ४६ प्रतिज्ञायास्तु निगमनम् ११२ " ४७ तदनुमानं द्वधा ११३ v८ स्वार्थपरार्थभेदात् ११३ ४९ स्वार्थमुक्तलक्षणम् ११३ ५० परार्थतु तदर्थपरामर्शिवचनान्जातम् ११३ ५१ तद्वचनमपितद्धेतुत्वात् ११४ ५२ सहेतुधोपलब्ध्यनुपलब्धिभेदात् ११५ ५३ उपलब्धिर्विधिप्रतिषेधयोरनुपलब्धिश्च ११५ ५४ अविरुद्धोपलब्धिर्विधौ षोढा व्याप्य कार्यकारणपूर्वोत्तरसहवरभेदात् ११५ ५५ रसादेकसामग्र्यनुमानेन रूपानुमानमिच्छद्धिरिष्टमेव किंचित्कारणं हेतु. ११६ यंत्र सामर्थ्याप्रतिबंधकारणान्तरवैकल्ये ५६ नच पूर्वोत्तरचारिणोस्तादात्म्यं तदुत्पत्तिवा कालव्यवधाने तदनुपलब्धेः ११८ ५७ भाव्यतीतयोमरणजागृब्दोधयोरपि नारिष्टोद्वोधौ प्रति हेतुत्वम् ११९ ५८ तद्व्यापाराश्रितं हि नदभावभावित्वम् ११९ ५९ सहचारिणोरपि परस्परपरिहारेणावस्थानात् सहोत्पादाच. १२० ६. परिणामीशब्दः कृतकत्वात्, य एवं स एवं दृष्टो यथा घटः, कृत १२१ कश्चायं, तस्मात्परिणामीति यस्तु न परिणामी स न कृतको दृष्टो यथा वन्ध्यास्तनंधयः, कृतकश्चायं तस्मात् परिणामी ६१ अस्त्यत्र देहिनि बुद्धिाहाराटेः १२२ ६२ अस्त्यत्र छाया छत्रात् १२२ ६३ उदेश्यति शकटं कृतिकोदयात् ६४ उदगाद्भरणि. प्राक एव १२३ ६५ अत्यत्र मातुलिंगेरूपं रसात् १२३ ६६ विरुद्धतदुपलब्धिः प्रतिषेधे तथा १२४ ६७ नास्त्यत्र शीतस्पर्श औष्ण्यात् १२४ ६८ नास्त्यत्र शीतस्पर्टी धूमात् १२४ ६९ नास्मिन् शरीरिणि सुखमस्ति हृदयशल्यात् १२४ ७० नोदेष्यति मुहूर्तान्ते शकट रेवरमुदयात् १२५ ७१ नोदगाद्भरणिर्मुहूर्तात्पूर्व पुष्योदयात् १२५ ७२ नात्यत्र मित्तौ परमागाभावोऽवाग्भागदर्शनात १२५ ७३ अविरुद्धानुपलब्धिः प्रतिषेधे सप्तधा स्वभावव्यापककार्यकारणपूर्वो- १२५ त्तरसहचरानुपलंभभेदात् १९ १२६ १२६ १२६ १२७ १२७ १२७ १२७ १२८ १२८ १२८ १२९ १२९ १२९ १३० ७४ नास्त्यत्र भूतले घटोऽनुपलब्धेः ७५ नास्त्यत्र शिंशपा वृक्षानुपलब्ध ७६ नास्त्यत्र प्रतिवद्धसामोऽमि—मानुपलब्धे ७७ नास्त्यत्र धूमोऽननेः ७८ न भविष्यति मुहूर्तान्ते शकट कृतिकोदयानुपलब्धे ७९ नोदगाद्भरणिमुहूर्तात् प्राकएव ८० नात्यत्र समतुलायामुन्नामो नामानुपलब्धे ८१ विरुद्धानुपलब्धिर्विधीत्रेधा विरुद्धकार्यकारणस्वभावानुपलब्धिभेदात् ८२ यथास्मिन् प्राणिनि व्याधिविशेपोस्ति निरामयचेष्टानुपलब्धे ८३ अस्त्यत्रदेहिनिदु खमिष्टसयोगाभावात् ८४ अनेकान्तात्मकं वस्वेकान्तस्वरूपानुलब्धे ८५ परपरया सभवत्साधनमत्रैवान्तावनीयम् ८६ अमूदन चक्रे शिवक स्थासात् ८७ कार्यकार्यमविरुद्धकार्योपलब्धी ८८ नास्त्यत्रगुहाया मृगकीडन मृगारिसशब्दनात् कारणविरुद्धकार्य विरुद्धकार्योंपलब्धी यथा ८९ व्युत्पन्नप्रयोगस्तुतथोपपत्यान्यथानुपपत्यैव ९० अग्निमानय प्रदेशस्तथैवधूमवत्वोपपत्तेधूम-वत्वान्यथानुपपत्ते ९१ हेतुश्योगो हि यथा व्याप्निग्रहण विधीयते सा च तावन्मात्रेण व्युत्पनरवधार्यते ९२ तावता च साध्यसिद्धि ९३ तेन पक्षस्तदाधारमूचनायोक ९४ आप्तवाक्यदिनिववनमर्थज्ञानमागम चतुर्थसमुद्देश १ सामान्यविशेषात्मा तदर्थीविषय २ अनुवृत्तव्यावृत्तप्रत्ययगोचरत्वात् पूर्वोत्तराकारपरिहारावाप्तिस्थिति लक्षणपरिणामेनार्थकियोपपत्तेश्च ३ सामान्य द्वेधा नियंगूढताभेदात् ४ सदृशपरिणामस्तिर्यक् खण्डमुण्डादिषु गोत्ववत् १३० १३१ १३१ १३१ १३२ १३२ १३३ १५७ १७८ १७९ १७९ २० ६ विशेषश्च ५ परापरविवर्तव्यापि द्रव्यमूद्धता मृदिव स्थासादिषु १८० १८. ७ पर्याय व्यतिरेकभेदात् १८१ ८ एकस्मिन्द्रव्ये क्रमभाविनः परिणामा पयांया आत्मनि हर्ष विषादादिवत् १८१ ९ अर्थान्तरगतो विसदृशपरिणामो व्यतिरेको गोमहिषादिवत् १८५ पंचम समुद्देशा. १ अज्ञाननिवृत्तिहानोपादानोप्रेक्षाच फलम् १८७ २ प्रमाणादभिन्नं मिनं च ३ या प्रमिमीते सएव निवृत्ताज्ञानो जहात्यादत्ते उपेक्षा चेति प्रतीतेः १८८ छठा समुदेश. १ ततोऽन्यत्तदाभासम् १९० २ अस्वसंविदितगृहीतार्थदर्शनसंशयादयः प्रमाणाभासाः १९० ३ स्वविषयोपदर्शकत्वाभावात् १९३ ४ पुरुषान्तरपूर्वार्थगच्छतृणस्पर्शस्थाणुपुरुषादिज्ञानवत् १९३ ५ चक्षुरसयोर्द्रव्ये संयुक्तसमवायवच्च १९४ ६ अवैशये प्रत्यक्षं तदाभासम् बौद्धस्याकस्माद्धमदर्शनाद्वहिविज्ञानवत् १९५ ७ वैशद्यपि परोक्षं तदाभासं मीमासकस्य करणज्ञानवत् ૧૧૬ ८ अतस्मिस्तदिति ज्ञानं स्मरणाभासं जिनदत्ते स देवदत्तो यथा १९६ ९ सदृशे तदेवेदं तस्मिन्नेव तेन सदृशं यमलकवदित्यादि १९६ प्रत्यभिज्ञानाभासम् १० असंवद्धे तज्ज्ञानं तर्काभासं यावॉस्तवपुत्रः स श्याम इति यथा १९७ ११ इदमनुमानाभासम् १९७ १२ तत्रानिष्टादिपक्षाभासः १९७ १३ अनिष्टो मीमासकस्यानित्यः शब्दः १९८ १४ सिद्ध श्रावणशब्दः १९८ १५ बाधित. प्रत्यक्षानुमानागम लोकस्ववचनैः १९८ १६ तत्र प्रत्यक्षवाधितो यथा अनुष्णोऽग्निद्रव्यत्वाज्जलवत् १९८ १७ अपरिणामी शब्द कृतकत्वाद् घटवत् १८ प्रेत्याऽसुखप्रदोधर्म पुरुषाश्रितत्वादधर्मवत् १९९ १९ शुचिनरशिर.कपालं प्राण्यंगत्वाच्छंखशुक्तिवत् १९९ १९९ २१ २०० २०० २०० २०१ २०१ २०१ २० मातामे वंध्या पुरुषसंयोगेप्यगर्भत्वात् प्रसिद्धवंध्यावत् २१ हेत्वाभासा असिद्धविरुद्धानेकान्तिकाकिंचित्कराः २२ असत्सत्तानिश्चयोऽसिद्ध २३ अविद्यमानसत्ताक परिणामी शब्द चाक्षुषत्वात् २४ स्वरूपेणैवासिद्धत्वात् २५ अविद्यमाननिश्चयो मुग्धबुद्धिं प्रत्यगिरत्र धूमात् २६ तस्य वाज्यादिभावेन भूतसघाते सदेहात् २७ सांख्यं प्रति परिणामी शब्द कृतकत्वात् २८ तेनालातत्वात् २९ विपरीतनिश्चिताविनाभावो विरुद्धोऽपरिणामी शब्द कृतकत्वात् ३० विपक्षेप्यविरुद्धयत्तिरनैकान्तिक ३१ निवितवृत्तिरनित्य. शब्द प्रमेयत्याद् घटवत् ३२ आकाशे नित्येप्यस्य निश्चयात् ३३ शंकितवृतिस्तु नास्ति सर्वज्ञो वक्तृत्वात् ३४ सर्वज्ञत्वेन वकृत्याविरोधात् ३५ सिद्धे प्रत्यक्षादिवाधिते च साध्येहेतुरकिंचित्करः ३६ सिद्ध श्रावण शब्द शब्दत्वात् ३७ किञ्चिदकरणात् ३८ यथानुष्णोऽग्निद्रव्यत्वादित्यादौर्किचित्कर्तुमशक्यत्वात् ३९ लक्षण एवासौदोषोव्युत्पन्नप्रयोगस्य पक्षदोषेणैव दुष्टत्वात् ४० दृष्टान्ताभासा अन्वयेऽसिद्धसाध्यसाधनोभया. ४१ आपौरुषेय शब्दोऽमूर्तत्वादिन्द्रियसुखपरमाणुघटमत् ४२ विपरीतान्वयश्च यदपौरुषेयं तदमूर्तम् ४३ विद्युदादिनातिप्रसगात् ४४ व्यतिरेके सिद्धतव्यतिरेका परमाण्विन्द्रियसुखाकाशवत् ४५ विपरीतव्यतिरेकश्च यन्नामूर्ततन्नापौरुषेयम् ४६ वालप्रयोगाभास पंचावयवेषु कियद्धीनता ४७ अमिमानयं प्रदेशो धूमवत्वाद्यदित्य तदित्यं यथा महानस ४८ धूमावॉश्चायम् ४९ तस्मादग्निमान् धूमवॉश्वायम् २०१ २०१ २०२ २०२ २०२ २०३ २०३ २०३ २०३ २०३ २०४ २०४ २०४ २०५ २०५ २०६ २०६ २०७ २०७ २०८ २०८ २०८ २२ ५० स्पष्ट तया प्रकृतप्रतिपत्तेरयोगात् ५१ रागद्वेषमोहाकान्तपुरुषवचनाजातमागमाभासम् २०९ ५२ यथा नद्यास्तीरे मोदकराशयः संति धावव माणवकाः २० ५३ भदगुल्यग्रे हस्तियूथशतमास्ते इति च २०९ ५४ विसंवादात् २०१ ५५ प्रत्यक्षमेवकं प्रमाणमित्यादि संख्याभासम् २१० ५६ लौकायतिकस्य प्रत्यक्षतः परलोकादिनिषेधस्य परखुद्वयादेश्वासिद्धे २१० रतद्विषयत्वात् ५७ सौगतसाख्ययोगप्रभाकरजैमिनीयाना प्रत्यक्षानुमानागमोपमानार्थापत्य- २११ भावैरेकैकाधिकाप्तिवत् ५८ अनुमानादेरतद्विषयत्वे प्रमाणान्तरत्वम् २११ ५९ तर्कस्येव व्याप्तिगोचरत्वे प्रमाणान्तरत्वं, अप्रमाणस्याव्यवस्थापकत्वात् २११ ६. प्रतिभासभेदस्यच भेदकत्वात् २१२ ६१ विपयाभास. सामान्य विशेषोद्वयं वा स्वातंत्रम् २१२ ६२ तथा प्रतिभासनात्कार्यकारणाच २१२ ६३ समर्थस्य करणे सर्वदोत्पत्तिरनपेक्षत्वात् २१३ ६४ परापेक्षणे परिणामिकत्वमन्यथा तदभावात् २१३ ६५ स्वयमसमर्थस्याकारकत्वात्पूर्ववत् २१३ ६६ फलाभास प्रमाणादभिन्न भिन्नमेव वा २१४ ६७ अभेदे तदू व्यवहारानुपपत्ते २१४ ६८ व्यावृत्यापि न तत्कल्पना फलान्तराद् व्यावृत्याऽफलत्वप्रसंगात ६९ प्रमाणान्तरादू व्यावृत्येवाप्रमाणत्वस्य २१५ ७० तस्माद्वास्तवो भेद २१५ ७१ भेदेस्वात्मान्तरवत्तदनुपपत्तेः २१५ ७२ समवायेऽतिप्रसंगः २१६ ७३ प्रमाणतदाभासौ दुष्टतयोद्भावितौ परिहतापरिहतदोपौ वादिनः २१६ साधनतदाभासौ प्रतिवादिनो दूषणभूपणे च ७४ संभवदन्यद्विचारणीयम् २१७ परीक्षामुखमादर्श हेयोपादेयतत्वयोः संविदे मादृशोवालः परीक्षादक्षवव्यधाम् ॥१॥ इति.

निवेदन इस ग्रंथका सशोधन श्रीयुत पडित पन्नालालजी सोनी तथा मैंने किया है सभव है कि अज्ञान वश इसमें बहुतसी त्रुटियां रह गई होंगी तथा मैंने जो यह भूमिका और विषय सूची तथा सूत्र सूची लिखी है वहा भी प्रमाद हुआ ही होगा उसका खयाल न कर पाठकगण हमें अनुगृहीत करेंगे। निवेदक- रामप्रसाद जैन, बम्बई।

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ॐ स्वर्गीय पंडित जयचंदजी विरचित हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। दोहा। श्रीमत वीरजिनेश रवि तम-अज्ञान नशाय । शिवपथ वरतायो जगति वंदौं मैं तसु पाय ॥ १॥ माणिकनंदिमुनीशकृत ग्रंथ परीक्षाद्वार । करूं वचनिका तासकी लघुटीका अनुसार ॥२॥ ऐसैं मगलपूर्वक प्रतिज्ञा करी । अब परीक्षामुखनाम सस्कृतसूत्रबध माणिक्यनंदिआचार्यकृत ग्रंथ है ताकी वडी टीका तो प्रमेयकमलमार्तड- नाम है सो प्रभाचन्द्र आचार्यकृत है, तामै तौ विशेष करि वर्णन है । बहुरि छोटी टीका प्रमेयरत्नमाला है सो लघु अनन्तवीर्य आचार्यकृत है ताकै अनु- सार मै देशभापामय वचनिका लिखू हू । तामै बुद्धिकी मंदतातै तथा प्रमादतै कहू हीनाविक अर्थ लिख्या होय तो पंडितजन हास्य मत करियो, मूलपथ देखि शुद्ध करलीजियो । इहा कोई कहै जो प्रमाणके प्रकरण तौ सस्कृतवचनरूपही चाहिये, देशमापामय वचनतें हीनाविक कहना वणै तौ विपर्यय होनेतै बडा दोप लागै। ताका समाधान-जो यह तौ सत्य है देशभापाके वचन अपभ्रश बहुत है तहा अर्थ विपर्ययरूपभी भासै परन्तु कालदोपतै सस्कृ- तके पढनेवाले विरले हैं, अर केई हैं ते भी गुरुसंप्रदायके विच्छेद २ हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। होने अर्थ यथार्थ न समझें है तातै संस्कृतका भावार्थ समझनेकू देश- भाषा करिये हैं । अर जे विशेष पडित हैं ते मूलप्रथ तथा सस्कृतटीकातें समझेहींगे। जैनमतमै प्रमाणनयरूप स्याद्वाद न्यायके पथ बहुत हैं तिनिके अर्थ समझनेंकू यह प्रकरण बड़ा उपकारी है तातै याका भावार्थ देश- भाषामयभी लिखिये हैं। अर जे जिनमतकी आज्ञा मानें हैं तिनिकै अर्थका विपर्ययभी न होयगा जेता यथार्थ समझेंगे तेता तौ यथार्थ रहेहीगा अर कहीं अन्यथा होयगा तौ विशेष बुद्धिवान पडितनिका संयोग भये यथार्थ होयगा, जैनमतके श्रद्धानवाले पुरुष हठयाही नाही होहै तातै देशभाषा करनेमै दोप न लागैगा ऐसे जाननां । तहा प्रथमही याका संबंध ऐसा--जो पहले श्री अकलंकदेव आचार्य भये, ते कैसे भये, अपनी निर्दोष ज्ञान अरु सयमरूप संपदा ताकरि प्रत्येकबुद्ध श्रुतकेवली सूत्रकार आदि बडे ऋपीश्वर तिनिकी महिमांकू आप लेत भये, बहुरि कल्याणरूप भये । बहुरि समस्त तार्किकनिका समूह तिनिविषै जे बड़े तार्किक तेई भये चूडामणि तिनिकी किरण सारिखी नमनक्रिया ताकरि मिली है चरणनिके नखनिकी किरण जिनिकी। भावार्थ-बड़े बड़े तार्किक जे तर्कशास्त्रके वेत्ता ते जिनिके चरण से हैं । बहुरि कविता करना, टीका करना, वाढ जीतना, वक्तापणा करना, यहु च्यारि प्रकार पंडितपणा तिसके जाननेके इच्छुक तृषातुर ग्रहण करनेके इच्छुक जे विनयकरि नम्रीभूत शिष्यजन तिनिसहित किया आप अनुभव जिनू. ऐसे भये, तिनि. तर्क प्रथानिके सात प्रक- रण रचे । बृहत्रय, लघुत्रय, चूर्णिका । ते अतिकठिन जिनिमै मन्दबुद्धि प्रवेश न करि सकै, ताक् तिनि. मन्दबुद्धीहूनिका प्रवेश होनेके अर्थ तिनिहीका अर्थ लेकर धारा नगरीकैविषै श्रीमाणिक्यनंदिआचार्य तिनिनै यह परीक्षामुख नाम प्रकरण रच्या । तिसका विवरण करनेके , स्वर्गीय प० जयचदजी विरचित- इच्छुक जे लघु अनतवीर्य आचार्य ते तिसकी आदि विष नास्तिकताका परिहार, शिष्टाचारपालन, पुण्यकी प्राप्ति. निर्विघ्न शास्त्रकी समाप्ति आदि फलक चाहते सते श्लोक कह हैं,- नतामरशिरोरत्नप्रभारोतनखत्विपे। नमो जिनाय दुर्वारमारवीरमदच्छिदे ॥ १॥ याका अर्थ-टीकाकार कहै हैं जो जिन कहिये कर्मशत्रुके जी- तने हारे जे अरहत परमेष्ठी तिनि मनिके अर्थ हमाग नमस्कार होह। कैसे है जिन-नमे जे देवनिके मम्तक तिनिके मुकुटानिके मणिनिकी प्रभा तिमवि पोई है मिली है चरणके नखनिकी किरण जिनिकी । भावार्थ-अरहंत परमेष्ठीकू च्यारि प्रकारके देव नमस्कार कर है । बहुरि कैसे है कठिन है निवारन जाका ऐसा जो कामरूप मुभट ताका मटके छेदन हारे है । इस शोकमै मारवीरमदन्छिटे ऐसा विशेषण जिनका है ताका ऐमाभी अर्थ है,—मा कहिये लल्मी ताहि राति कहिए ताकू मार कहिए, मो इस मार गब्दके अर्थ ते मोक्षमार्गके दाता भये । बहुरि वीर शब्दकरि वि कहिए विशेप करि ईर कहिए समस्त पदार्थनिकू जाननहारे हैं ऐमैं सर्वज्ञ भये । बहुरि मदच्छित् कहिए मानकपायके छेदनहारे है, ऐसे मद ऐमा उपलक्षणपढते सर्व रागादिकका नाश करन हारे भये ऐसे " मोक्षमार्गस्य नेतारं " इत्यादि सूत्रकी टीका वि कहे जे आप्तके तीनू विशेपण ते सिद्ध भये । बहुरि अन्य प्रकार कहै, है,—मा कहिये प्रमेयका प्रमाणरूप जाननहारा केवलज्ञान मोई भया रवि कहिये सूर्य, बहुरि इरा कहिये वाणी दिव्यध्वनि, ये टोज कैसे ? दुर्वार कहिये खोटे हेतु दृष्टातनिकरि निवारन जिनका न होय ऐसे जाके होय सो दुरिमारवीर कहिये । बरि मढ कहने ते सर्व रागादिक लेने तिनकौं छदै मो मच्छित है ।

. हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। कहिये । ऐसें भी ते आप्तके तीनू विशेषण भये ऐसा जाननां । ऐसे मंगलकै अर्थि नमस्कार कीया। तहां मगल दोय प्रकार हैं--एक मुख्यमंगल, दूजा अमुख्य मंगल । तहा मुख्यमंगल तौ जिनेन्द्र के गुण- निका स्तोत्र करना है अरु अमुख्यमंगल लौकिक है तहा दधि अक्षत आदि हैं । सो इहां मुख्यमगल जिनेद्रके गुणनिका स्तोत्र है सो ही किया है। आर्गे इस ग्रंथके कर्ताक टीकाकार नमस्कार करै है; अकलंकवचोऽभोधेरुद्दभ्रे येन धीमता। न्यायविद्यामृतं तस्मै नमो माणिक्यनन्दिने ॥२॥ याका अर्थ-तिस माणिक्यनदिनाम आचार्यकै अर्थि हमारा नम- स्कार होहु-जा बुद्धिवाननैं अकलक कहिये कर्मकलंककरि रहित श्रीव- र्द्धमानस्वामी अथवा अकलकनागा आचार्य तिनिके वचन अथवा अक- लंक कहिये निर्दोष सर्वज्ञकी दिव्यध्वनि सोही भया समुद्र तातै न्याय- विद्यारूप जो अमृत सो मथिकरि काव्या-प्रगट कीया ऐसे हैं। इहां लौकिक कथा है जो नारायण समुद्र मथिकरि चौदह रत्न काढे तिनिमैं अमृतभी है सो प्रसिद्ध अपेक्षा अलंकाररूप वचन है आगै इस प्रथकी बड़ी टीका 'प्रमेयकमलमार्तण्ड' है ताका कर्ता प्रभाचन्द्र आचार्य है ताकी महिमा दोय श्लोकमै करै है; प्रभेन्दुवचनोदारचन्द्रिकाप्रसरे सति । मादृशाः कनु गण्यते ज्योतिरिंगणसनिभाः ॥३॥ तथापि तद्वचोऽपूर्वरचनासचिरं सताम् । घेतोहरं भृतं यद्वन्नद्या नवघटे जलम् ॥४॥ इनिका अर्थ-प्रभाचन्द्रनाम आचार्यके वचनरूप उदार चादणीका फैलना होते हम सारिखे आग्यानामा कीटजीवतुल्य कौन गणनामै गणिये तोऊ हम इस ग्रंथकी टीका करै है सो जैसैं नदीका जल स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- नवीन घटविपैं किळू घालिये सोह गीतल होय पीवनेवाले पुरुपनिके चित्तक प्रिय लाग तेसैं तिस प्रभाचद्रके वचनही अपूर्व रचना कहिये तिनिकू नई रचनास्प किये सते मुदर सत्पुम्पनिके चित्तक हरनहारे होयंगे। आर्गे यह टीका जिस निमित्तते वणी है सो संवध कहै है;- बजेयप्रियपुत्रस्य हीरपस्योपरोधतः । शातिपेणार्थमारन्धा परीक्षामुखपचिका ॥५॥ याका अर्थ-वैजेयका प्यारा पुत्र जो हीरपनामा ताकी प्रार्थनाते शातिणनामा कोई शिष्य है ताके पढनेके आर्थि यह परीक्षामुखनामा अथकी पंचिका आरभी है। इहा “परीक्षामुख" ऐसा नामका अर्थ ऐसा, जो परीक्षानाम विचारका है जो वस्तु ऐसे है कि नाही है कि अन्यप्रकार है ऐसा विचारक कहिए मो इहा प्रमाणका लक्षण आदिकी परीक्षा करिये हैं इस द्वारत सर्वही वस्तुकी परीक्षा होय है नाते परीक्षामुख है । बहुरि ताकी टीकाकू पचिका कही सो मूत्रनिके पद न्यारे करि तिनिका न्यारा न्यारा अर्थ कहिये ताक पचिका कहिए है, सो इस टीकामै मूत्रनिका भिन्न भिन्न पदनिका अर्थ करियेगा तातै पंचिका नाम है । याका दूजा नाम प्रमे- यरत्नमालाभी है। आगै मूलप्रथका आदि सूत्रकी सूचनिका कहै है;- श्रीमत् कहिये पूर्वापरविरोवरहितपणा सो ही जो श्री लक्ष्मी ताकरि महित ऐसा जो न्याय सो ही भया समुद्र जामै अगणित प्रमेय वस्तु- रूप रत्न भरे सो ही है सार जामै ऐसा न्यायरूप समुद्र ताके अवगाहन करनेकू अव्युत्पन्न जे न्यायशास्त्रके अभ्यासरहित पुरुप ते असमर्थ है, ऐसा विचारि श्रीमाणिक्यनन्दिनाम आचार्य तिनिके अवगाहनेकू जिहा- cor हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। जसारिखा यह परीक्षामुखनाम प्रकरण रचै है । इहा न्याय ऐसा शब्द है सो 'नि' उपसर्ग पूर्वक 'इण् गतौ' धातुकै घञ्प्रत्यय करण अर्थमैं जोड्या है तातै ऐसा अर्थ होय है--जो कोई प्रकार नियमकरि प्रमेय- पदार्थका स्वरूप जाकरि जाणिये सो न्याय है । अथवा नयप्रमाणरूप युक्ति ताका कहनेहारा होय ताकू भी न्याय कहिये । वहुरि याका श्रीमान् विशेषण किया ताका यहु अर्थ -जो निवधिपणा होय सो श्री, अथवा श्रद्धान आदि गुणका उपजावना है लक्षण जाका ऐसी श्रीकरि युक्त होय सो श्रीमान् । बहुरि याकू समुद्र कह्या सो रूप- कालंकार करि कडा सो याका विशेषण किया जो अमेयप्रमेयरत्नसार है। सो अमेय कहिये मिथ्यादृष्टीनिकरि जाननेमै न आवै अथवा गणनारहित अनंतानंत ऐसे जे प्रमेय कहिये प्रमाणकरि जिनिकू जानिये ऐसे जीव आदिपदार्थ वस्तु है । बहुरि रत्ननिविपै सार होय सो रत्नसार कहिये, ऐसै अमेय प्रमेय है रत्न सार जामै ऐसैं बहुव्रीहि समास है । बहुरि अमेय प्रमेय जे रत्न तिनिकरि सार है-उत्कृष्ट है ऐसा न्यायरूप समुद्र है ऐसे तत्पुरुप समास है। ऐसे इस परीक्षामुख प्रकरणके संबध, अभिधेय, शक्यानुष्ठानइष्टप्रयोजन इनि तीनूनिको जानें विना परीक्षावान पुरुप- निकी प्रवृत्ति या विष होय नाहीं, इस हेतुतै तिनि तीनूनिका अनुवाद कहिये पूर्वाचार्यनि करि कह्या होय तिस अनुसार कहना सो है पुरस्सर कहिये मुख्य जामै । बहुरि वस्तु जाका कथन कीजिये सो ऐसा इहां वस्तुशब्दकरि प्रमाण अर प्रमाणाभास लेना ताका निर्देश कहिये स्वरूप कहनां तिस विषै पर कहिये उत्कृष्ट-तत्पर ऐसा प्रतिज्ञाका श्लोक कहै है। भावार्थ-इस ग्रंथका आदिका श्लोक है तामैं अभिधेय संबध शक्या- नुष्ठानइष्टप्रयोजन इन तीनूको जनाय अर प्रमाण अर प्रमाणाभासका लक्षण जो पूर्वाचार्यनिकरि कह्या है तिनिका अनुसार ले कहनेकी प्रतिज्ञा करै है;- स्वर्गीय प० जयचदी विरचित-- प्रमाणादर्थसंसिद्धिस्तदाभासाद्विपर्ययः । इति वक्ष्ये तयोर्लक्ष्म सिद्धमल्यं लघीयसः ॥ १॥ याका अर्थ-प्रमाणतै अर्थकी ससिद्धि होय है, बहुरि प्रमाणाभा- सः अर्थकी ससिद्धि नाही होय है-विपर्यय होय है। या हेतु” मै प्रथ- कर्ता हू सो तिस प्रमाणका अरु प्रमाणाभासका लक्षण कहूगा । टीका-अह कहिये मैं प्रथकर्ता माणिक्यनदिआचार्य हूँ सो तल्लक्ष्म कहिये प्रमाण अर तदाभास इनि दोऊनिका लक्षण है ताहि वक्ष्ये कहिये कहूगा। सिद्ध कहिये पूर्वाचार्यनिकरि प्रसिद्ध किया सो ही। बहुरि कैसा ? अल्प कहिये थोरे अक्षरनिकरि कहने योग्य अरु अर्थतें महान् । बहुरि कौनक विचारि करि कहूगा अतिशय करि लघु जे शिष्य- जन तिनिकू विचारि करि । इहा लघुपणा बुद्धिकृत ग्रहण करना, शरीर- परिमाणकृत न लेणा, जाते छोटे शरीरवालेहू बडे बुद्धिवान होय है, बहुरि अवस्थाकृत भी न लेणा जातै छोटी अवस्थावालेभी केई बड़े बुद्धिवान होय है, तातै जिनिमैं बुद्धि थोडी होय ते इहा लघुशब्दकरि ग्रहण करनें। इहा लक्षणका तौ स्वरूप ऐसा जानना-जो बहुत वस्तु एकठी मिलिरही होय तिनिभैसू जुदी करनेका जो किछु वस्तुमैं प्रसिद्ध चिह्न होय सो लक्षण होय । बहुरि सिद्ध विशेपणतैं अपनीही रुचि करि नाही कीया पूर्व कह्या तिसही अर्थरूप है ऐसा जनाया है। बहुरि अल्प कह- नेते यामैं योरे अक्षरनिमै ही अर्थ बहुत है ऐसे याका निष्प्रयोजनपना निपेध्या है। यह प्रमाण तदाभासका लक्षण कौन हेतु” कहिये है जाते अर्थ जो जानने योग्य वस्तु ताकी ससिद्धि कहिये प्राप्ति होना अथवा जानना ये दोऊ प्रमाणतें होय हैं यातै । बहुरि केवल प्रमाणते अर्थकी ससिद्धि होय है, ऐसाही नाहीं है प्रमाणाभासतै अर्थससिद्धिका अभावभी होय है यातै दोऊहीका लक्षण कहना। बहुरि इति ८ हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। शब्द है सो हेतु अर्थमैं है अर याका समुदायार्थ उपरि कह्या सो जानना। इहा तर्क-जो अभिधेय, सबंध, शक्यानुष्ठानइष्टप्रयोजन इन तीननि करि सहित शास्त्र होय हैं । तहा इस प्रकरणका जहा ताई अभिधेय अरु संबंध ये दोऊ न कहिये तहा ताई याका उपादेयपणा न होय-यहु ग्रहण करने योग्य न होय। इहा उदाहरण-जैसैं काहूनै कह्या जो यह वध्याका पुत्र जाय है, आकाशके फूलनिका जाकै मस्तक सेहुरा है, मरी- चिका-भाडलीमैं स्नान करि जाय है, सुसाके सींगका धनुप धारे है, ऐसे कहनेमैं किछू वस्तु नाही अवस्तु कहे तातें यामैं अभिधेय-अर्थ नाही । बहुरि काहू. कह्या-दश दाडिम हैं, छह पूवा हैं, चरवी है, छलीका चाम- ड़ा है, मासका पिंड है अथवा अहो देखो यह गेरू है स्पष्ट किया ताका पिता शीला होय गया ऐसे वचन कहे तिनिमै काहूका सबंध न मिल्या- प्रलापमात्र भये । ऐसे शास्त्रमैं अभिधेय सम्बन्धरहित वचन होयतौ परीक्षावान आदरै नाही । बहुरि तैसैं ही जो अशक्यानुष्ठानइष्टप्रयोजन होय जाका ग्रहण करना कठिन होय अरु अपने इष्ट होय तो जैसे मर्पका मणि सर्वज्वर–रोगका हरनहारा है ऐसे कहनेमै रोगका हरणा तौ इष्ट है परन्तु तिसका ग्रहण करना कठिन है ऐसे वचनकू परीक्षावान आदरै नाही । तैसैंही शक्यानुष्ठान अनिष्टप्रयोजन होय, जैसैं काहूनै कह्या माताका विवाह करना, तौ याका करना तौ सुगम है परन्तु यह इष्ट नाही सो ऐसे वचन भी परीक्षावान आदरै नाही | तातें ये तीनूं ही या शास्त्रके कहे चाहिए ? ताका समाधान;-आचार्य कहै है जो यहु सत्य है । या प्रकरणके अभिधेय प्रमाण अरु प्रमाणभास है ते तो इस श्लोकमैं प्रमाण तदाभास पदका ग्रहण कहे ही, जातें इस प्रकरणकरि प्रमाण प्रमाणाभासकाही स्वर्गीय प० जयचदजी विरचित- ९ है कथन करिये है । बहुरि सबध है सो अर्थका सामर्थ्यही आया जातै या प्रकरणकै अरु प्रमाण प्रमाणाभासरूप अभिधेयकै वाच्यवाचक है लक्षण- जाका ऐसा सवध प्रतीतिमैं आवैही है। बहुरि प्रयोजन गक्यानुष्ठानरूप अरु इष्टरूप है सोभी आदि श्लोककरिही लखिये है, जातै प्रयोजन दोय प्रकार एक साक्षात्, दूजा परपरा। तहा इस श्लोकमै 'वक्ष्ये ऐसा पद है सो या पटकरि साक्षात् प्रयोजन कहिये है जाते समय विपर्ययरहित शास्त्रका ज्ञान होनेते शिष्यजन देखि लैंगे, शिष्यजननिहीकू विचारि करि कहनेकी प्रतिज्ञा करी है सो यही साक्षात् प्रयोजन है, बहुरि परप- राप्रयोजन अर्थका ज्ञान तथा प्राप्ति है सो आदि श्लोकमैं 'अर्थससिद्धि' ऐसा पद है ताकरि कह्या, जातै शास्त्रके ज्ञानकै अनतर अर्थका ज्ञान तथा प्राप्ति होयगी ऐसे जानना । फेरि तर्क, जो समस्त विघ्नके नागकै आर्य इष्टदेवताका नमस्कार शास्त्रकी आदि विर्षे चाहिये सो इस प्रकरणके कगन न किया सो कहा कारण ? ताका समावान,-आचार्य कहै है जो ऐसै न कहना, जातें नम- स्कार मन अरु कायकरि भी सभव है तातें ऐसैं जानू मन करि अरु कायकरि शास्त्रके प्रारभ करतें कर लिया होयगा। बहुरि वचनकरि नमस्कारभी इस आदि वाक्यकरि जानना, जाते केई वाक्य ऐसे है जिनका दोय आदि अर्थभी देखिये है, जैसे काहूनै कह्या 'श्वेतो वावति' ऐसे वाक्यके टोय अर्थ होय है, एक तौ ऐसा जो 'श्वा' कहिये कूकरा (कुत्ता) सो 'इत कहिये या तरफ धावति' कहिये दोडै है । बहुरि दूजा अर्थ- जो श्वेत कहिये धोला गुणयुक्त कोई दोडै है । ऐसे दोय अर्थकी प्रती- ति है । तहा आदिके वाक्यकै वि नमस्काररूप अर्थभी है, सोही कहिये है,-तहा अर्थ कहिये हेयोपादेयरूप वस्तु ताकी ससिद्धि कहिये यथार्थ-

१०
हिन्दी प्रमेयरत्नमाला !
ज्ञान सो प्रमाण” होय है, तहा मा कहिये लक्ष्मी अन्तरग तो अनं-
तचतुष्टयरूप अरु बाह्य समवसरणादिकरूप; बहुरि आण कहिये शब्द
इनि दोनिका द्वन्द्वसमासते माण ऐसा भया, बहुरि उपसर्ग जोड्या
तब प्रमाण भया सो इस उपसर्गके योग” ऐसा अर्थ भया जो ऐसी
प्रकृष्ट उत्कृष्ट लक्ष्मी हरि-हर-ब्रह्मा आदिकू लौकिकदेव मान है तिनिकै
नाही । बहुरि ऐसी दिव्यध्वनि वाणी प्रत्यक्ष अनुमान प्रमाणते विरोध-
रहित अन्यकै नाही, ऐसा प्रमाणनाम भगवान अरहतकाही भया ऐसैं
असाधारण गुण दिखावना-कहना है सो भगवानका स्तवनहीं है तातै
अर्थकी ससिद्धिकू अवश्य कारणभूत जो प्रमाण कहिये भगवान अर्हन्त
तातै तौ अर्थकी ससिद्धि सम्यग्ज्ञान होय है । बहुरि प्रमाणाभास जे
हरिहरादिक तिनितै अर्थकी ससिद्धिका अभाव-मिव्याज्ञान होय है । इस
हेतुतै इस प्रकरण” तिनि प्रमाण प्रमाणाभासका लक्षण कहूंगा। ऐसे
कह्या तैसा आगैं सूत्र कहियेगा ।जो "सामग्रीविशेष" इत्यादिक तिनिमैं
सर्वज्ञ असर्वज्ञका निश्चय करियेगा। ऐसै अरहतका सत्यार्थस्वरूप
कहनां सो मगलरूप भया, अन्यका निषेध सो अमगलका निषेध है ऐसा
जानना।
आगैं अब कहनेंकू प्रारभ किया जो प्रमाणतत्व तावि अन्यवादी-
निकै च्यारि विप्रतिपत्ति हैं । स्वरूपविप्रतिपत्ति १ सख्या विप्रतिपत्ति
२ विपयविप्रतिपत्ति ३ फलविप्रतिपत्ति ४ ऐसैं च्यारि । तिनिमै प्रथ-
मही स्वरूपकी विप्रतिपत्तिका निराकरणकै अर्थि सूत्र कहै है । इहा वि-
प्रतिपत्ति नाम अन्यथा जाननेका है सो प्रमाणका स्वरूप अन्यवादी
अन्यप्रकार कहै है सो बाधासहित है, सत्यार्थ नाहीं, ऐसा इस सूत्रतै
सिद्ध होय है-
स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणम् ॥ १ ॥

स्वर्गीय प० जयचदजी विरचित- ११ . . याका अर्थ-स्व कहिये आप आत्मा अपूर्वार्थ कहिये पहिले जाकी प्रमाणता न भई ऐसा अन्य वस्तु इनि दोऊनिविपै व्यवसायात्मक कहिये व्यापारकरि निश्चय करने स्वरूप जो ज्ञान सो प्रमाण है । इहा प्रमाण शब्दकी निरुक्ति ऐसी,-'प्र' कहिये प्रकर्परूप सगय, विपर्यय, अनध्यवसायकरि रहित होय कार 'मीयते ' कहिये वस्तुस्वरूपक जानिये जा करि सो प्रमाण है, ऐसे करणसाधनरूप निरुक्ति है, सो ऐसा ज्ञान विटोपणकरि तो जे अज्ञानम्प सनिकर्ष आदिकू प्रमाण मानें है तिनिका निराकरण भया । तहा लघु नैयायिकमतवाले तौ इंद्रियकै अर पदार्थकै सबध होना ऐसा जो सन्निकर्प ताकू प्रमाण मान है, अर बडे पुराणे नैया- यिक ते कर्ती कर्म आदि कारकनिका सकलपणाकू प्रमाण मान है । वहुरि साल्यमतवाले इन्द्रियनिकी प्रवृत्तिहीकृ प्रमाण मानै है । बहुरि प्राभाकर जे मीमासकमतके भेटवाले अज्ञानरूप जो ज्ञाता का व्यापार ताकू प्रमाण मान है तिनिका निषेध ज्ञान कहनेतै भया। बहुरि बौद्धमती प्रमाण ज्ञान- हीकू कहे है परन्तु प्रमाणका भेट जो प्रत्यक्ष ताके च्यारि भेद करै हैं । स्वसवेदनप्रत्यक्ष १ इन्द्रियप्रत्यक्ष २ मानसप्रत्यक्ष ३ योगिप्रत्यक्ष ४ ऐसें यह च्यारूही प्रकारका प्रत्यक्ष निर्विकल्प व्यापार करि रहित मानें है तिनिके निराकरणकै अर्थ व्यवसायपदका ग्रहण है। जो व्यापाररूप सविकल्प होय-निश्चय करनेवाला होय सो प्रमाण है । बहुरि अर्थपदका ग्रहणते जे वाह्य पदार्थका लोप करनेवाले विज्ञानाद्वैतवादी बौद्धमती तथा ब्रह्माद्वैतवादी वेदान्तमती तथा दीखती वस्तुका लोप करनेवाले शून्यएकान्तवादो तिनिका निराकरण है। बौद्धमतीके च्यारि भेद है तहा माध्यमिक तो सर्वशून्य मान है, बहुरि योगाचार वाह्यपदार्थकू शून्य मानें है ज्ञानकू अद्वैत मान है, बहुरि सौत्रातिक अनुमानका विषय अनुमेयकू अवस्तु माने हैं, बहुरि वैभापिकभी सर्व वस्तुकू शून्य १२ हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। है -मानें है । बहुरि अर्थका अपूर्व विशेषण है सो गृहीतग्राही पहले ग्रहण किया--जान्या ताहीकू ग्रहण करै-जानै ऐसा जो धारावाही ज्ञान ताकै प्रमाणताका निषेधकै आर्थ है, धारावाहीज्ञान प्रमाणका फलरूप प्रमिति है करणस्वरूप प्रमाण नाही । बहुरि स्वपदका ग्रहणते ज्ञानकू परोक्षही मानैं ऐसे मीमासकमती तथा ज्ञान स्वसंवेदनस्वरूप नाही परहीकू जान है-आपकू आप जान नाही ऐसे मानने वाले साख्य- मती तथा ज्ञान है सो दूसरे ज्ञान करि जानिये है आपकू आपही जाने नाही ऎसैं माननेवाले यौगमती नैयायिक इनिका निषेध है; ज्ञान स्वपर- प्रकाशक है। ऐसैं अव्याप्ति अतिव्याप्ति असभव ऐसे तीन लक्षणके दोष हैं तिनितै रहित भलै प्रकार ठहरया निश्चय भया प्रमाणका लक्षण ऐसैं यहु सूत्र है सो प्रमाणभूत है। तहा अनुमानप्रमाणका प्रयोग- स्वरूप या सूत्रकू दिखाइए है,-तहा प्रमाण तौ इहां धर्मी है ता विर्षे यह लक्षण कह्या सो साध्य है, बहुरि प्रमाण जो धर्मी सो ही इहा हेतु कहना। इहा प्रश्न;-जो प्रमाण शब्दकै तौ प्रथमा विभक्ति है अर हेतु विपै पचमी होय है सो प्रमाण शब्द हेतु कैसै ? ताका समाधान;-जो कोई जायगा,प्रथमा विभक्ति अंतपदभी हेतुस्वरूप होय है, जैसैं कह्या है 'प्रत्यक्षं विशदं ज्ञानं' इहा साध्य साधनका प्रयोग करिये तव प्रथमाभी हेतुरूप है, इस सूत्रका प्रयोग ऐसे किया है, "प्रमाण है सो स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मक ज्ञान है, काहे तैं जाते प्रमाणपना याहीकै है, तातें जो स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मक ज्ञान नाहीं सो प्रमाण नाहीं जैसे संशयादिक स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मक नाही ते प्रमाणभी नाहीं तथा घट आदि जडपदार्थ ते भी ऐसे नाही ते प्रमाण नाही, बहुरि प्रमाण है सो ऐसा है, तार्ते स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मक ज्ञान है सो ही प्रमाण स्वर्गीय पं0 जयचदजी विरचित- १३ है।" ऐसै अनुमानके पंच अवयवरूप यह सूत्र है । धर्मी अर साध्य दोऊ स्वरूप पक्ष कहिये ताका वचन सो प्रतिज्ञा है, साधनका वचन सो हेतु है, व्याप्तिकू लार लगाय दृष्टातका वचन सो उदाहरण है, दृष्टात• अरु पक्षकू समान कहना हेतुको सकोचना सो उपनय, साध्यका नियम कहना सो निगमन, ऐसै इनि पाचनिका स्वरूप आगै सूत्रकार कहसी । ऐसें सूत्र है सो प्रमाणभूत है आप्तका यह वचन है तातें तो आगमप्रमाणरूप होहै, बहुरि अनुमानके अवयवरूप होहै । बहुरि सूत्रका ऐसा भी स्वरूप कह्या है;-जामै अक्षर अल्प होय, बहुरि जामै सदेह न उपजै, बहुरि सारर(स)हित होय निःसार नाही होय, बहुरि जामैं निर्णय गूढ होय, अर्थ गंभीर होय, बहुरि शब्द अर्थ जामैं निर्दोष होय, बहुरि हेतु- सहित होय, बहुरि सत्यार्थ होय ऐसा होय सो सूत्र है, सो इस प्रकर- णके सर्वसूत्रनिका ऐसा स्वरूप जानना। इहा प्रमाणकूही हेतु कह्या सो असिद्ध नाही है जातै सर्वही प्रमाणका स्वरूप कहनेवालेनिकै प्रमाणसा- मान्यविषै विप्रतिपत्तिका अभाव है, प्रमाणसामान्य प्रसिद्ध है जो ऐसे नाही मानिये तो अपना इष्टतत्वकू साधना परका इष्टतत्वकू दूपण देना न होय प्रमाण विना काहेतै साथै काहेरौं दूपै । इहा तर्क,-जो धर्मीहीकू हेतु कहे प्रतिज्ञाका एकदेश भया सो असिद्धनामा हेत्वाभास भया । ताका समाधान;-जो ऐसे नाही, प्रमाणका विशेपकू धर्मीकरि अरु प्रमाण सामान्यकू हेतु कहैं तिनिकै दोप नाही आवै है इसही वचनतै या हेतुकू अपक्षधर्म कहै सो भी नाही है जातें सामान्य है सो समस्त विशेपनिमैं व्यापक होय है सो पक्षका धर्मही है । बहुरि हेतुकै पक्षका वर्मपणाका बलकार साध्य प्रति गमकपणा नाही है साध्य विना न होना इस बल- तैं ही साध्य प्रति गमकपणा है सो यहु साध्यान्यथानुपपत्ति कहिये, १४ हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। है सो इहा प्रमाणनामा हेतुकै स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मक ज्ञाननामा साध्यते नियम करि पाइए है सो विपक्ष जो सशयादिक तिनिविपै यह साध्यान्यथानुपपत्ति नाहीं है सोही वाधक प्रमाण है ताके बलते निश्चयस्वरूप है। इसही कथन इस हेतुकै विरुद्धपणा बहुरि अनैकान्तिकपणा भी निराकरण भया ऐसा जानना जाते विरुद्ध हेतुकै अरु व्यभिचारी हेतुकै अविनाभावका नियमका निश्चय सो ही लक्षण जाका ऐसी व्याप्तिका अयोग है यातै प्रमाणत्वनामा हेतु तै यथोक्त साध्यकी सिद्धि होयही है, यह केवलव्यतिरेकी हेतु है तातें साध्य प्रति गमकही है । जैसैं ऐसे हेतु और भी कहै हैं;-जीविता शरीर आ- स्मासहित है, जातै प्राणादिसहितपणा है, जो आत्मासहित नाहीं होय सो प्राणादिसहित नाही होय-श्वासोच्छासादिक्रिया जामै नाहीं होय जैसै मृ- तकशरीर, ऐसैं प्राणादिमत् पणा हेतु केवलव्यतिरेकी है याका अन्वयव्याप्ति- रूप दृष्टात नाही तातें केवलव्यतिरेकी कहिये, तैसैं प्रमाणत्वनामा हेतु भी केवलव्यतिरेकी जानना, याकाभी अन्वयव्याप्तिरूप दृष्टात नाही है। इहा पहले कह्या था जो प्रमाण सशयादिरहित वस्तुक् जानै है सश- यादिकका स्वरूप न कह्या सो ऐसे है-जो टोय पक्षमै ज्ञान समान होय—निर्णय न होय सकै, जैसैं स्थाणु था ता विपै अंधकारादिके नि- मित्ततै संशय उपज्या 'जो यह स्थाणुहै कि पुरुप है। ऐसे दोऊ पक्षमें निश्चय न भया, जो कहा है सो तौ संशय है । बहुरि 'दोऊ पक्षमै एकका अन्यथाका निश्चय होना सो विपर्यय है! जैसैं स्थाणु था ता विपैं ऐसा निश्चय भया जो यह पुरुपही है, ऐसा विपर्यय है । बहुरि अनध्यवसाय- जामैं चलते तृणादिका स्पर्श भया तहा ऐसा 'ज्ञान जो कछु है' ऐसैं जामैं सशय भी नाही अन्यथा निश्चय भी नाही यथार्थ निश्चय भी नाही सो अनध्यवसाय है। .

स्वर्गीय प० जयचदजी विरचित- १५ बहुरि अन्याप्त अतिव्याप्त असभवि ये तीन लक्षणाभास कहे । ति- निका स्वरूप ऐसा--जो लक्ष्य काहू वस्तुकू स्थापि ताका लक्षण करिये सो जो लक्षण लक्ष्यके सर्वविशेपभेदनिमे न व्यापै कोईमै होय कोई विशेपमै न होय सो लक्षण अव्याप्तस्वरूप है । बहुरि जो लक्षण लक्ष्य स्थाप्या तामैं भी होय अरु जो लक्ष्य नाही तामै भी होय सो अति- व्याप्त है । बहार जो लक्ष्य स्थाप्या तामैं नाही संभवै सो असभवि है सो इहा प्रमाण तो लक्ष्य है अर स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मक ज्ञान लक्षण है, सो ज्ञान ऐसा कहनेमै तौ सम्यग्ज्ञानके पाच भेद है ते परोक्ष प्रत्यक्ष प्रमाणके भेट है तिनिमै सर्वमै पाइए है तातै अव्याप्त लक्षण नाही। बहुरि व्यवसायात्मकविशेपणते सशयाटिक अप्रमाण ज्ञान हैं तिनिमै व्यवसाय कहिये यथार्थ निश्चयस्वरूपपणा नाही तातै तिनिमें व्याप नाही ताते अतिव्याप्त नाही । बहुरि स्वविशेषणते असभव टोप भी नाही है जो आपकृ न जाने सो परकू भी न जानै ऐसा असभवढोप याम नाही। ऐसे त्रिदोपरहित लक्षण जानना । जो लक्ष्य अप्रसिद्ध होय ताका प्र- सिद्ध चिह्न होय सो लक्षण होय है ॥१॥ आगे अब अपना कहा जो प्रमाणका लक्षण ताका ज्ञान ऐसा विशेषण किया, ताक समर्थनरूप दृढ करते सते आचार्य सूत्र कहैं हिताहितमासिपरिहारसमर्थ हि प्रमाणं ततो ज्ञान- मेव तत् ॥ २॥ याका अर्थ-हि कहिये जातै हितकी प्राप्ति अहितका परिहार वि समर्थ प्रमाण है तातें ऐसा ज्ञानही है । अज्ञानरूप सन्निकर्षादिक- विपैं यह सामर्थ्य नाही । तहा हित तौ सुख है जातै सर्व प्राणी मुखही चाहै हैं, बहुरि सुखका कारण है सो भी हित ही है । बहुरि हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। - अहित दुःख है जातै सर्व प्राणी दुःखकू दूरि किया चाहै हैं बहुरि दुःखका कारण है सो भी अहित ही है इहां दोऊनिका द्वंद्वसमास है। बहुरि प्राप्ति अरु पंरिहारका द्वंद्वसमास करणां ताकू यथासंख्य लगा- वनां, तब हितकी प्राप्ति अहितका परिहार ऐसा भया । इनि दोऊविषै समर्थ कहिये करनेकी शक्तियुक्त ऐसा । बहुरि 'हि' शब्द हेतु अर्थमै है तातें ऐसा अर्थ भया जो हिताहितकी प्राप्ति परि- हार विौं समर्थ है सो ही प्रमाण है । तातै प्रमाणपणां करि मान्या जो वस्तु सो ज्ञानही होने योग्य है। अज्ञानरूप जे अन्यमतीनिकरि मार्ने सन्निकर्ष आदि प्रमाण ते हितकी प्राप्ति अहितका परिहारवि समर्थ नाही तातै ते प्रमाण नाही | या सूत्रका अनुमान प्रयोग ऐसे करना;- 'प्रमाण ज्ञान ही है, यह तौ धर्मी अर साध्यके वचनरूप प्रतिज्ञा भई, बहार ‘हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थपणारौं' यह साधनका वचनरूप हेतु भया, बहुरि 'जो ज्ञान है सोही ऐसा है अन्य ऐसा नाही जैसैं घट आदि जड़पदार्थ यह व्यतिरेकव्याप्तिरूप दृष्टांतका वचन सो उदाहरण भया, बहुरि 'ऐसा यह प्रमाण है' यह उपनय भया, बहुरि 'तातें हिताहितप्राप्ति- परिहारविषै समर्थ जो प्रमाण सो ज्ञान ही है। यह निगमन भया । ऐसे पांच अवयरूप अनुमानका प्रयोग या सूत्रका होय है । इहा हेतु, असिद्ध नाही है जातै परीक्षावान पुरुष हैं ते हितकी प्राप्ति अहितका परिहारकै अर्थिही प्रमाणकू विचार हैं, निष्प्रयोजन व्यसनमात्रही प्रमा- णकी कथनी नाही करें है। ऐसै सर्वही प्रमाणके कहनेवाले मानें हैं॥२॥ आगै बौद्धमती कहैं हैं जो सन्निकर्पादिक अज्ञानरूप ही प्रमाणकू मान हैं तिनिके निराकरणकै अर्थि ज्ञानहाँकै प्रमाणपणा कहा सो तौ होहु याकू हम नाही निषेधै हैं, बहुरि तुम व्यवसायात्मक ज्ञानका विशेषण किया सो या विौं हम युक्ति नाही देखें है जो यह तुम कैसे हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १७ कही हो ? हमारै तौ अनुमान प्रमाणके तो व्यासायात्मकपणाकरि प्रमा- णपणाका अंगीकार है, बहुरि प्रत्यक्षप्रमाणक तो निर्विकल्पणा होते ही सत्यार्थपणारौं प्रमाणपणा वर्ण है, ऐसे बौद्ध कहे ताके समाधानकै अर्थि सूत्र कहै है- तन्निश्चयात्मक समारोपविरुद्धत्वादनुमानवत् ॥३॥ याका अर्थ-~-तत् कहिये प्रमाणस्वरूप कहा जो ज्ञान सो निश्च- यात्मक कहिये निश्चयस्वरूप है, काहे ते ' जातै समारोप कहिये सश- यादिक तिनित विरुद्ध है यथार्थ है, जैसे अनुमान है तैसै । इहा याका प्रयोग ऐसे-तत् कहिये सो प्रमाणपणाकरि मान्या वस्तु यहु तौ धर्मी भया, बहुरि यह निश्चयात्मक कहिये व्यवसायस्वरूप है यहु साध्य है, दोऊ मिल्या हुवा पक्ष है, याका वचनकू प्रतिज्ञा कहिये । वहुरि समारोपविरुद्धपणातें यह हेतु है, इहा समारोप नाम सशयाटिकका है। वहीर अनुमानवत् यह दृष्टातका वचन सो उदाहरण है । इहा यहु अभिप्राय है जो समय विपर्यय अनध्यवसाय स्वभाव जो समारोप जिसका विरोधी जो वस्तुका ग्रहण कहिये जानना सो है लक्षण जाका ऐसा व्यवसायस्वरूपपणाकू होते ही अविसवादी पणा कहिये बाधारहित सत्यार्थपणा सो वर्ण है, बहुरि जो अविसवाटी पणा है सो ही प्रमाण- पणा है । ऐसें बौद्धमतीने मान्या जो न्यारि प्रकारका प्रत्यक्षप्रमाण ताकै प्रमाणपणाकू अगीकार करनेका इच्छुक है तो समारोपका विरोधी जो ग्रहण-जानना सो है लक्षण जाका ऐसा निश्चयात्मक ज्ञानकू ही प्रमाण मानना योग्य है। इहा बौद्धमती कहै है जो समारोपका विरोधी अरु व्यवसायात्मक ये दोऊ रूप तो एक ज्ञानहींके भये तहा साध्यसाधनभाव एक बानहीकै हि.प्र. २ १८ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचितmins कैसै वर्षे ? ताकू आचार्य कहै है-ऐसे न माननां जातैः इनि दोऊ निकै ज्ञानस्वभावकार अभेद होते भी व्याप्यव्यापक जो धर्म तिनिका आधारपणां कार भेदभी वर्ण है, जैसे शीतूं नामा वृक्ष है ताकै शीतूं पणांकै वृक्षपणांत अभेद होते भी व्याप्यव्यापक धर्मके आधारपणांकार भेद वण है । भावार्थ-व्यापककै तौ व्याप्य बहुत है बहुरि व्याप्यकै सो व्यापक एक ही है, तहां व्यापककू तौ गम्यसंज्ञा कही है अरु व्याप्यकू गम- कसंज्ञा कही है, सो इहा व्यवसायस्वरूप ज्ञान तौ व्यापक है जातें यथा- र्थनिश्चयात्मक जो प्रमाण ताविषं भी वर्ते है अरु अन्यथानिश्चयात्मक जो विपर्यय ज्ञान तामैं भी वर्ते है। बहुरि समारोपका विरोधीपणा है सो यथार्थनिश्चयात्मक ज्ञान विर्षे ही प्रवत्र्त है, विपर्ययविर्षे नाही है ताते भेद है; जैसे वृक्षपणां तौ सर्व वृक्षनिमैं वत्त है सो व्यापक है बहुरि शीतूं- पणां शीतूं वृक्षविषै ही वः है तातें व्याप्य है, तातै शीतूंपणां तौ वृक्ष- विर्षे गमक भया अर वृक्षपणा शीसूकै गम्य भया, ऐसा जननां ताते साध्यसाधनभाव वणै है। बौद्धमती प्रत्यक्ष प्रमाणाका लक्षण कल्पना- रहित अभ्रात ऐसा कहै है, ताकू अविसंवादस्वरूप कहें हैं, अर्थक्रियाहीत कहैं हैं, वस्तुका प्राप्त करनेवाला कहैं हैं, याहीकू वस्तुका प्रवर्तकं कहें हैं, अपने विषयका दिखावनेवाला कहैं है, वस्तुविर्षे निश्चय उपजावन- हारा कहैं हैं सो ऐसा तो व्यवसायात्मक विशेषण किये ही बणेंगा बहुरि अनुमानकू बौद्धमती सविकल्प सामान्यमात्रविषयस्वरूप कहैं हैं ताकू इहा दृष्टात कीया है जो जैसे अनुमानकू निश्चयस्वरूप सवि. कल्प मानें हैं तैसें प्रत्यक्षकू भी मानों, सर्वथा निर्विकल्पकै प्रमाणपणां वणे नाही । बहुरि इहां समारोपका विरोधी कह्या सो विरोध तीनप्रकार: होय है, एक तौ सहानवस्थानलक्षण, जहां दोऊ विरोधी एकठे हैं नाही जैसे प्रकाश अरु अंधकार । बहुरि दूजा परस्परपरिहारलक्षण, जैसे 4 हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १९ ह ताकू 'एकठे तो है परन्तु स्वरूप मिले नाही जैसे रूपगुण अर रसगुण, एक वस्तुमै रहै स्वरूप जुदा जुदा है ही । तीसरा वध्यघातकलक्षण, परस्पर घातकरें जैसे सर्पक अरु न्योलाकै वैर होय । सो इहा समारोपकै अरु यथार्थनिश्रयान्मकके सहानवस्थानलक्षण विरोव है, यथार्थ निश्चय होय तहा समारोप सशय विपर्यय अनव्यवसाय रहै नाही ॥३॥ आगै अब प्रमाणका लक्षणमैं अपूर्व विरोपणसहित अर्थका ग्रहण समर्थन कर दृढ करता सता-तिसकू स्पष्ट करता सता मूत्र कह है; अनिश्चितोऽपूर्वार्थः ॥४॥ याका अर्थ-जाका पूर्व निश्चय न भया होय ऐसा वस्तु अपूर्वार्थ है। तहा जो अन्य प्रमाणकरि सशयादिकका व्यवच्छेद करि निश्चय न किया ऐसा जो अर्थ कहिये वस्तु सो अपूर्वार्थ है । ऐसा कहने करि ईहा ज्ञानका विषय वस्तुकू पहिले अवग्रहादिक करि ग्रहण किया ताकै गृहीतग्राहीपणा होते भी पूर्वार्थपणा नाही है, जातै ईहादिक ज्ञानका विषयभूत वस्तु अवग्रहके ग्रहे पीछै जो अवान्तरविशेप कहिये अन्या- वशेष सो अवग्रहादिकरि निश्चय नाही होय है तातै पूर्वार्थ नाही है, अपूर्वार्य ही है ॥ ४ ॥ आगै कहै हैं, जो अपूर्वार्थ कह्या सो याही प्रकार है कि कोई अन्य भी प्रकार है ऐसे पूछ सूत्र कहै है, दृष्टोऽपि समारोपात्तादृक् ॥५॥ याका अर्थ-जो वस्तु पूर्व देख्या होय-प्रमाण निश्चय किया होय पी ताविर्षे सशयादिक जो समारोप सो होय जाय तौ वस्तु 'ताइक्' कहिये विना निश्चय कीया समान है-अपूर्वार्थ है । तहा 'दृष्टोऽपि'

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२० स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित-
कहिये अन्य प्रमाणकरि ग्रह्या होय तो भी तादृक् कहिये अपूर्वार्थ ही.
है। इहां ऐमा अर्थ भया जो अनिश्चित ऐसे पूर्व कह्या सो ही केवल
अपूर्वार्थ नाही है, देखे विर्षे भी संशयादिक होय जाय सो भी अपूवार्थ,
है । इहा ऐसा अर्थ है जो अन्यप्रमाणकरि पहली ग्रह्या था सो धुंधला
आकारपणा करि निर्णय न होय सकै सो भी वस्तु अपूर्व है जाते
तिसविर्षे प्रवल् जो समारोप कहिये संशयादिक तिनिका व्यवच्छेदं “
नाही है ।। ५॥
आरौं जे ज्ञानकू स्वप्रकाशक नाही मानें हैं ते कहैं हैं जो विज्ञानक
अपूर्वार्थ व्यवसायात्मकपणा तौ होहु परन्तु स्वव्यवसाय तौ हम नाही
जानैं हैं, ऐसें कहै ताकू उत्तरका सूत्र कहै है;-
स्वोन्मुखतया प्रतिभासनं स्वस्य व्यवसायः ॥६॥
याका अर्थ-अपनें सन्मुखपणां करि अपना प्रतिभासना सो अपना
व्यवसाय है। अपने स्वोन्मुखपणां सो तौ 'स्वोन्मुखता' कहिये ऐसे
अपना अनुभव ताकरि प्रतिभासना प्रतीति होनां सो 'स्वस्य व्यवमाय:
कहिये । तहा मैं मेरै ताई जानू हूं ऐसी प्रतीति जाननीं ॥६॥
इहां दृष्टान्तका सूत्र कहै हैं;
अर्थस्येव तदुन्मुखतया ॥७॥
याका अर्थ-जैसैं अर्थ कहिये अन्यपदार्थ ताकै सन्मुख होय ताकू।
जाने है तैसे ही आपके सन्मुख होय अपनी तरफ देखै तब आपकू,
जानैं । इहां 'तत्' शब्द करि तौ अर्थका ग्रहण करना जैसैं अर्थक
सन्मुखपणा करि प्रतिभासनां होय तब अर्थका निश्चय होय हैं, 'तैसे
अपने सन्मुखपणा कर अपनां प्रतिभासनां होय तब अपना निश्चय
होय है ॥७॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। २१ - आगैं इहा उल्लेख कहै हैं,-( दृष्टान्त दार्टान्तिकका उदाहरणकू उल्लेख कहिये);- घटमहमात्मना वेनि ॥८॥ याका अर्थ-मैं आपही करि घट है ताहि जानू हू । इहा 'अह ऐसा तो कर्त्ता है, 'घट' कर्म है, 'आत्मना' करण है, 'वेद्मि' ऐसी क्रिया है । सो जैसे आप आपकरि घट वस्तुकू जानैं है तैसे आप आपकरि आपकू भी जानें है ऐसा जानना ॥ ८ ॥ आगै इहा नैयायिक तौ कहै है,-ज्ञान है सो अन्यपदार्थकू ही निश्चय करै है-कर्महीकू जानै है आपकू नाही जान है, आप करण है तथा आत्मा जो कर्त्ता है ताक भी नाही जाने है तथा फलरूप क्रिया है ताकू भी नाही जान है। इहा जैनमत अपेक्षा अज्ञानका नाश होना हेयोपादेयका जानना तथा वीतरागतारूप होना ऐसा प्रमाणका फल जानना। वहरि मीमासकनिमै भट्टमतवाले कहै है-जो कर्ता अरु कर्मक ही ज्ञान जान है, आप करण है सो आपकू आप नाही जान है अर क्रियारूप फलकू भी नाही जान है। बहुरि मीमासकमतमैं ही जैमि- नीय मत हैं ते कहैं है कर्त्ता कर्म क्रियाक् ज्ञान जानै है अरु आप करण है सो आपकृ आप नाही जानैं है । बहुरि मीमासकमतमै ही प्रभा- करका मत है मो कहै है-कर्म क्रियाहीकू ज्ञान जाने है आत्मा कर्त्ताकू अर आप करणकू नाही जान है। सो ये सर्वही मत प्रतीतिबाधित हैं ऐसा दिखावता सता सूत्र कहैं है, कर्मवत्कर्तृकरणक्रियाप्रतीतेः ॥९॥ याका अर्थ-ज्ञानविपैं जैसैं कर्मकी प्रतीति है तैसै ही कर्ता, करण, क्रियाकी प्रतीति है ऐसै पूर्वसूत्रका हेतुरूप यहु सूत्र है, तातै पचमी २२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- ३ विभक्ति अन्तमै है। तहा ज्ञानका विषयभूत वस्तु है सो तौ कर्म कहि- ये है, जातें कर्मका स्वरूप ऐसा है जो क्रियाकै व्याप्य होय-प्राप्त होने योग्य होय तथा रचनें योग्य होय तथा विकार करने योग्य होय सो इहा ज्ञप्तिक्रियाकै व्याप्य ज्ञानका विषय वस्तु ही है। बहुरि कर्मवत् कह्या सो यह उपमा अलंकाररूप दृष्टान्तका वचन भया । बहुरि की आत्मा है । बहुरि करण प्रमाणरूप ज्ञान है । बहुरि क्रिया प्रमिति है। तिनिका द्वंद्व समास करि प्रतीति शब्दः षष्ठीतत्पुरुष समास करना, ताकै अंतविर्षे हेतु अर्थ मैं पंचमी विभक्ति करनी । इहा वृत्तिमै 'का' ऐसी पंचमीकी संज्ञा है सो जैनेन्द्रव्याकरण अपेक्षा है। ऐसे पहले सूत्र कह्या तामैं अनुभवका उल्लेख है ता विर्षे यथा अनुक्रम संबंध करणां तब ऐसा अर्थ होय है-जो ज्ञान जैसैं अपना विषयभूत वस्तु जो कर्म ताकी प्रतीति करै है तैसें ही कर्ता आत्माकी तथा करणरूप आपकी तथा क्रियाकी प्रतीति करै है यातें जैसे घटकू मैं आप करि जान हू ऐसी प्रतीति करै है तैसैं ही कर्ता करण क्रिया विष भी मैं, इनिकू जानू हू ऐसी प्रतीति करै है यामैं बाधा नाहीं है, अनुभवसिद्ध है । इहा ऐसा जानना जो एक ही ज्ञानमैं कर्ता आदि अनेक कारक अवस्था भेद विवक्षा कार सभवै है तातें जैनमत स्याद्वाद है तामैं अपे- क्षातै विरोध नाहीं है, सर्वथा एकांतीनिकै विरोध आवै है ॥ ९॥ । आगै कोई कहै जो यह कर्त्ता आदिकी प्रतीति कही सो तौ शब्दका उच्चारमात्र ही है वस्तुका स्वरूपका बलतें तौ नाही उपजी, कहने मात्र है, वस्तुस्वरूप ऐसैं नाहीं, ऐसा प्रश्न होते सूत्र कहैं हैं; शब्दानुच्चारणेऽपि स्वस्यानुभवनमर्थवत् ॥१०॥ याका अर्थ--यह कर्ता आदिकी प्रतीति ज्ञाने के होय है सो शब्दका उच्चार विना भी होय है ऐसैं आपका अनुभव आपकै है जैसे, nAWAAAAAA हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। २३ अन्य अर्थका अनुभवन है तैसे ही आपका है । तहा जैसे घट आदिक शब्द है तिनिका उच्चार किया विना भी घट आदि वस्तुका ज्ञानविपैं तदाकार अनुभव होय हे तैसें ही 'मैं हू में है ऐसा जो अन्तरङ्गकै विर्षे सन्मुख होते आपका तदाकारपणा करि प्रतिभास होय है सो गब्दके उच्चार किये बिना ही आपकरि अनुभव कीजिये है ॥ १० ॥ आगें इस ही अर्थ युक्तिपूर्वक अन्यबादीका उपहाससहित वचन जैसे होय तैसे मूत्र कहे है,- को वा तत्प्रतिभासिनमर्थमध्यक्षमिच्छेस्तदेव तथा नेच्छेत् ॥ ११ ॥ याका अर्थ-तिस ज्ञान करि प्रतिभास्या जो अर्थ कहिये वस्तु ताकू प्रत्यक्ष इष्ट करता मता पुरप ऐसा कौन है जो तिस ज्ञानहीकू प्रत्यक्ष इष्ट न करे, इष्ट फर ही । इहा 'को वा' ऐसा कहने तै लौकिक जन तथा परीक्षक जन मर्व ही लेणें । बहार 'तत्प्रतिभासिन' कहिये तिस ज्ञानकरि प्रतिभासनेका जाका स्वभाव होय सो लीजिये । ऐसा जो प्रत्यक्ष विपयरूप वस्तु ताकू प्रत्यक्ष इष्ट करता पुरुप सो ऐसा कौन है जो 'तदेव! कहिये सो ही ज्ञान ताहि तथा' कहिये प्रत्यक्षपणाकार नाही इष्ट करें 'अपितु' कहिये निश्चयतै इष्ट करें ही करै। जातै विषयी जो ज्ञान ताका प्रत्यक्षपणा धर्म है सो उपचार करि ताके विषयभूत पदार्थक प्रत्यक्ष कहिये है, मुख्य तौ प्रत्यक्षपणा ज्ञानका धर्म है । इह ऐसा जानना-जो मुख्यका अभाव होते बहुरि प्रयोजन अरु निमित्त होते उपचार प्रवर्त्त है सो इहा अर्थकै तौ प्रत्यक्षपणा मुख्य नाही है अरु प्रत्यक्षपणा मुख्य धर्म ज्ञानका है सो ताकै विपयभूत अर्थ विपै प्रत्यक्षपणाका उपचार है सो प्रयोजन तो इहा व्यवहारका प्रवर्त्तना है अरु निमित्त इहा ज्ञानकै अरु वस्तुकै विषयविषयीभाव सबध है सो है, २४ स्वर्गीय पं० जयचदजी विरचित- ऐसा जाननां । जो ऐसे न मानिये तौ अप्रामाणिकपणां कहिये अपरी- क्षकपणाका प्रसंग आवै है ॥ ११ ॥ आगै इहा इसका उदाहरण कहै हैं; प्रदीपवत् ॥ १२॥ याका अर्थ-जैसैं दीपककै प्रत्यक्षता अर प्रकाशता विना तिस- करि भासे जे घटादिक पदार्थ तिनिकै प्रकाशता प्रत्यक्षता न वणै तैसैं प्रमाणस्वरूप ज्ञानकै भी जो प्रत्यक्षता न होय तो तिसकरि प्रतिभास्या अर्थक भी प्रत्यक्षता न वणै । इहा तात्पर्य कहै है-ताका प्रयोग-ज्ञान है सो अपने प्रतिभास करनें विपै आपतै अन्य जो समानजातीय अन्य अर्थ तिसकी अपेक्षा न चाहै है यह तो धर्मिसाध्यका समुदायरूप पक्षका वचन सो प्रतिज्ञा है। प्रत्यक्ष पदार्थका गुण होते अदृष्ट जो शक्ति ताकी व्यक्तिरूप अनुयायिकरणपणातें यहु हेतु है । बहुरि प्रदी- पभासुराकारवत् यह उदाहरण है । इहा भावार्थ ऐसा-जो ज्ञान अपने जाननें विपै अन्यज्ञानकी अपेक्षा न करै है आप ही आपकू जानें है जातै ज्ञान आत्मा ही का गुण है सो जाननेकी शक्तिकी व्यक्तिरूप करण अवस्थाकू प्राप्त होय है । आपकी प्रमिति प्रति आपही करण है जैसे दीपककी प्रकाशरूप लोय है सो आपके प्रकाशनेमें अन्य लोयकी अपेक्षा नाही करै है, आप ही आपकू प्रकाशै है, ऐसें जानना ॥१२॥ आगें कोई आशंका करै है जो प्रमाणका लक्षण कह्या सो ऐसा तौ होहु तथापि इस प्रमाणकी प्रमाणता 'स्वतः' कहिये आपहीतै होय है कि 'परतः ' कहिये अन्यतै होय है ? जो स्वतः ही कहोगे तौ अवि- प्रतिपत्ति होयगी आप अन्यथा भी ग्रहण करै ताका निपेष काहेत होयगा ? बहुरि परतें कहोगे तो अनवस्थानामा दूषण आवैगा जाते , हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । २५ प्रमाणकी प्रमाणता अन्यनै होय तब तिस अन्यकी प्रमाणता काहेरौं होय ? वहरि तिसकी भी अन्यते कहिये तो कह ठहरना नाही तब अनवस्था भई। ऐमै दोज आशकाका निराकरणकरि अपना मत स्थापते सते सूत्र कह है । इहा ऐसा भावार्थ-जो मीमासकमती तौ प्रमाणका प्रमाणपणा म्वतः कहें है अप्रमाणपणा परतः कहै है । वहुरि साख्य- मती प्रमाणपणा ती परत अप्रमाणपणा सत कहे है । बहुरि नैयायि- कमती दोज ही परत होय है ऐसें कह है । ऐसें बहुत बादीनिकरि अन्य अन्य प्रकार कहनेंते समय उपजै है तातै कथचित् म्वत कथंचित् परत. ऐसे स्याद्वादत यथासिद्धि होय है ऐसे मूत्र कहे है,- तत्प्रामाण्यं स्वतः परतश्च ॥ १३॥ याका अर्थ-तिस प्रमाणका प्रामाण्य कहिये प्रमाणपणा कथचित् आपहीत होय है कथचित् परते होय हे । तहा मूत्रनिके सप्रदायमै ऐसी परिभाषा है जो वाक्य कहिये मूत्र हैं ते सोपस्कार कहिये अन्यपदनिका अध्याहार–मेलना सहित होय है, मो इहा ऐसी प्राप्ति करणी, जो अभ्यासदगा वि तौ प्रमाणका प्रमाणपणा आपहीतै होय है, वहरि अनभ्यासदशा विपै परत होय है। ऐसे कहनेंते दौऊ एका- न्तका निराकरण भया । इहा कथचित अनभ्यास दशा विपै परत प्रमाणपणा कहनेमे अनवस्था जैमैं एकान्त कहनेमैं आये है तैसै समान नाही आवे है जात अभ्यस्तविषयस्वरूप जो अन्यज्ञान ताकरि आप ही प्रमाणपणा होय है ताकरि अनवस्थाका परिहार होय है ऐसा अगी- कार हमनें किया है । अथवा प्रमाणका प्रमाणपणा उत्पत्तिविषै तो परतें ही हो है जात विशिष्ट नवीन कार्यका होना विशिष्ट नवीन कार- णते ही होय है। बहुरि विषयका जाननेंरूप तथा विपयविपै प्रवर्त्तनें- रूप जो प्रमाणका कार्य ता विपैं अभ्यासदगामै तो आपही प्रमाणता .

२६ स्वर्गीय प० जयचंदजी विरचित- है, बहुरि अनभ्यासदशाविर्षे परतै प्रमाणता होय है, ऐसा निश्चय है ।। इहा अभ्यासदशा तौ सो कहिये जहा वारवार ग्रहण होय अनभ्यास जो प्रथम ही ग्रहण होय सो कहिये। जैसै जा गावमै आप बसै ताका सरो- वरका जल आपकै अभ्यासमैं आप रह्या होय तहा तिसका जलका प्रमाणपणा तथा जलज्ञानका प्रमाणपणा आपकै आपहीत होय है ताकी प्रमणता करने में अन्य प्रमाणादिकका सहाय चाहै नांही तिस सरोवरकै समीप जाते ही स्नान करना, जल भरना, पीवना आदि कार्य निशकपणे करै है सो इहा तो अभ्यासदगावि स्वतः प्रामाण्य भया। बहुरि सो ही पुरुप अन्यनामादिक जाय तहां मार्गमैं दूरितें जलका निवास देखै तहा अपने ज्ञानकी तथा जिस जलरूप विषयकी प्रमाणता आई नाही, विचारने लगा यह जल है कि भाडली है ? कि कांश फूलि रह्या है ? कि मोकू अन्यथ दीखै है ? ऐसा सशय उपज्या तहा जे जलकी प्रमा- णता करनेके कारण पूर्व अभ्यासमै थे, जो जहा अन्य लोक जल भरि ल्यावते होय तथा जल भरते होय तथा घट आदि जलके पात्र जहां दीखते होय तथा कमलनिकी सुगंध आवती होय मींडके बोलते होय इत्यादि कारणनित तिस जलकी प्रमाणता आवै तहा अनभ्यासदशाविषे परतें प्रमाणपणां कहिये । बहुरि उत्पत्तिमै परहीतें कह्या सो अन्तरंग तो ऐसा ही ज्ञानावरणका क्षयोपशम अर बाह्य पापकर्म आदि दोषरहित अपना ज्ञान होय । बहुरि ज्ञानके कारण जे इंद्रियादिक ते निर्दोप निर्म- लता आदि गुणकरि युक्त होय तव नवीन प्रमाणतारूप कार्य उपजै, जातै विशिष्ट कार्य होय जो विशिष्ट कारण ही होय । बहुरि विपायका जाननेंरूप क्रिया है लक्षण जाका अर विपयविषै प्रवृत्ति होना लक्षण जाका ऐसा जो प्रमाणका कार्य ताविर्षे अभ्यासदशाविषै तो प्रमाणकी प्रमाणता आपहीतै होय है अर अनभ्यासदशाविर्षे परतै होय है, ऐसा निश्चय कीजिये है।

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। २७ . इहा मीमासकमती कहै है, जो प्रमाणपणाकी उत्पत्तिविर्षे विज्ञा- नके कारण जे निप नेत्र आदिक तिनित भिन्न अन्य कारणकी अपे- क्षापणा है सो असिद्ध है.-अन्यकारण नाहीं है ताते प्रमाणका प्रमाण- पणा निम प्रमाणहीत होय है जाते तिस प्रमाणतै अन्य वस्तुका ही अभाव है, अर जो कहोगे अन्यकारण नेत्रादिकके निर्मलपणा आदि गुण है ते है ना यह कहना वचनमात्र है-वस्तुभूत नाही, जातै विधिकी मुख्यताकरि अथवा कार्यकी मुल्यताकरि गुणनिकी प्रतीति नाहीं है प्रमाण सिवाय गुण न्यारे किछु भासते नाही प्रत्यक्ष कार तो किळू गुण प्रमाणते न्यारे दाखै नाही जात प्रत्यक्ष तो इन्द्रियनिकार जानना है सो इन्द्रियनिकी प्रवृत्ति अतीन्द्रियविप होय नाही इन्द्रियनित किळू न्यारे ही गुण दाखै नाही। बदरि अनुमानकरि किछू गुणनिका लिंग दीखे नाही, ताकरि अनुमान कीजिये, इन्द्रियनिकरि लिग ग्रहण होय तब अनुमान होय है अर लिंगका भी लिंग अनुमानकरि ग्रहण करना कहिये तो अनवस्था आयें है तातै प्रमाणते न्यारे गुण प्रमाणसिद्ध नाही । बहुरि प्रमाणकी अप्रमाणता तो आपहीतै होय है अर प्रमाणता परहीने हाय जैसा विपर्यय भी कह्या न जाय, जातै पक्षधर्म, सपक्षे सत्व, विपक्षाब्यावृत्ति इनि तीनम्प सहित जो लिंग तिसहीत केवल अनुमान प्रमाणकै प्रमाणपणा उपजता देखिये ह। अन्वय व्यतिरेक करि एसे ही उत्पति दीखे है अन्य प्रकार तो नाही । बहुरि ऐसे ही प्रत्यक्षवि भी लगावणा जो निपि नेत्रादिकरि ही प्रमाणमणा उपजे है अन्यप्रकार नाही । तैसे ही आगमविप भी लगावणा जो आप्तका कह्यापणा आगममे गुण होते आगमका प्रमाणपणा तिस गुणते नाही है, तिस आगमविप गुणनितें दोपनिका अभाव है अर दोपनिके अभावतै सशय-विपर्ययस्वरूप जो अप्रमाण- २८ स्वर्गीय पं० जयचदजी विरचित- . पणा ताका अभाव होते स्वाभाविक प्रमाणपणा निर्दोप आप ही तिष्टै है तातें यह ठहरी जो प्रमाणपणा उत्पत्तिविषै अन्यसामग्रीकी अपेक्षा नाही करै है । बहुरि विपयका जाननेकी क्रियारूप जो अपना कार्य ताविर्षे अपने जाननेकी भी अपेक्षा न कर है । जो प्रमाण आप आपकू जानैं तब अन्यविपयकू जाणें ऐसी अपेक्षा नाही चाहै है, जातै आपका प्रमाणपणा जाने विना ही ज्ञानकै विपयके जानने की क्रियारूप कार्य देखिये है । बहुरि कहोगे जो जाननक्रियामात्र तो प्रमाणका कार्य नाही जातै जाननक्रियामात्र तो मिथ्याज्ञानविपै भी पाइए है। जाननक्रियाका विशेष है सो तौ पहली प्रमाणकी प्रमाणता ग्रहण होय तब उपजै सो "ऐसा कहना भी बालकका विलास है विना समझ्या कहना है जाते प्रमाणका प्रमाणपणा ग्रहणके उत्तरकालमैं उत्पत्ति अवस्थातें जानन- क्रियाका विशेप कळू भासै नाही, जैसा जानना प्रमाणपणा ग्रहण होते होय है तैसाही विना ग्रहण किये होय है जाका प्रमाणपणा ग्रहण किया जो यह मेरा ज्ञान प्रमाण है तिसतै भी विषयके जाननेमैं तो किछू विशेष भासता नाही, निर्विशेष विपयकी उपलब्धि है । बहुरि कहोगे जो जाननेमात्रका तौ सीपकै विर्षे रूपेका ज्ञान भया तामैं भी सद्भाव है सो याकै भी प्रमाणका कार्यपणाका प्रसग आवै है। तो ऐसे तौ जब होय जो वस्तुविर्षे अन्यथापणाकी प्रतीति अर अपने कारणकरि उपज्या दोषका ज्ञान इनि दोऊनिकरि निराकरण न कीजिये सो इहां सीपवि. रूपाका ज्ञान होय तौ ताका निराकरण होय है जो यह रूपा नाही सीप है । वहार नेत्रनिमै दोप है तातें रूपा दीखै है ऐसैं तिस- ज्ञानका बाधक है तातै तिसकै प्रमाणपणाका प्रसग नाही आवै है । तातें जिस वस्तुविर्षे प्रमाणका कारणका तौ दोपका ज्ञान अर बाध- ककी प्रतीति न होय तहा प्रमाणका प्रमाणपणा आपहीत होय है हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । २९ बहुरि ऐसे अप्रमाणपणाविषे नाही है अप्रमाणपणा परतै ही होय है, जातें विज्ञानके कारण” भिन्न जो दोपस्वभावरूप सामग्री ताकी अपेक्षा सहितकरि अप्रमाणपणा उपजै है । बहुरि अप्रमाणताकी निवृत्तिस्वरूप जो अप्रमाणका कार्य ताविपै अपना अप्रमाणतारूप स्वरूपका ग्रहणकी सापेक्षा है ही सो जैतै अपनी अप्रमाणताकू न जाणौ तेतै अपना अन्यथापणारूप जो विपय तातै पुरुपकू नहीं निवृत्तिरूप करै है, अप्र- माणताकू जाणें तबही विषयका अन्यथापणा जाणि छोडै, ऐसै मीमासक स्वतः प्रमाणकी पक्षकू दृढ किया । अव याका निराकरण आचार्य करै है;-जो यह मीमासक कह्या सो सर्वही बडे अज्ञानरूप अन्धकारका विलास है, सो ही कहिये है- प्रथम तौ प्रामाण्यकी उत्पत्तिविपै अन्य सामग्रीकी अपेक्षापणा असिद्ध कह्या सो असिद्ध नाही है, आगमके आप्तका कह्यापणारूप जो गुण ताका सनिधान होते सतै ही आप्तप्रणीत वचन विर्षे प्रमाणता देखिये है, जातै जिसके अभावतें तौ अनुत्पत्ति अर जिसके सद्भावतै उत्पत्ति होय सो तिसका कारण होय है ऐसा लोकमैं प्रसिद्ध है सो आगमकी प्रमाणता सत्यार्थ आप्त होते होय है न होते नाही होय है, सो जो मीमासक. कह्या जो विधिकी मुख्यताकरि तथा कार्यकी मुख्यताकरि गुणनिकी प्रतीति नाहीं है, तहा प्रथम तो आप्तके कहे शब्दविपै गुणनिकी प्रतीति नाही है ऐसा कहना अयुक्त है जाते ऐसे होय तौ आप्तके कहेपणेंकी हानिका प्रसंग आवै है, अनाप्तका वचनकै समान ठहरै है, अर जो कहै नेत्र आदिकै विर्षे गुणनिकी अप्रतीति है तो सो भी अयुक्त है, नेत्रनिके निर्मलपणा आदि गुण है ते स्त्री बालक गुवाल सर्वके प्रसिद्ध हैं-सर्व जाने है, जो ये नेत्र निर्मल है ये निर्मल नाही है। बहुरि जो कहै निर्मलपणा तौ नेत्रका स्वरूप ही है गुण नाही है ३० स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- तौ हेतुकै अविनाभावकरि रहितपणाहै सो भी स्वरूपकी विकलता ही है दोप नाही है ऐसे गुणका निषेध तैसें ही दोपका निषेध दोऊ समान भये । बहुरि कहै जो स्वरूपकी विकलता है सो ही दोप है तौ लिगकै तथा नेत्राटिककै तिसका स्वरूपका सकलपणा है सो ही गुण है ऐसै क्यो न कहिये ? ऐसे ही आप्तके कहे शब्द विपै भी मोह, राग, द्वेष आदि लक्षण दोपका अभाव सो ही यथार्थज्ञानादिलक्षण गुणका सद्भावकू अंगीकार करता मीमासक अन्य प्रमाणीवपै ऐसै न मानै सो उन्मत्त कैसैं नाही ? उन्मत्त ही है। बहुरि मीमासक. कह्या जो शब्द विष गुण तौ है परन्तु प्रमाणको उत्पत्तिविषै ते व्यापार नाही करें हैं, दोपका अभाव है सो ही प्रमाणकी उत्पत्तिविषै व्यापार करै है । सो यह कह्या तौ सत्य परंतु युक्त नाही, जाते कहनेमात्र ही करि साध्यकी सिद्धिका अयोग है जातें गुणनितें दोपनिका अभाव है । ऐसें कहनें विपै तौ अज्ञान ही कारण है अन्य किछू नाही है, भावार्थ-~-यह भूलि करि कहै है । फेरि मीमासक कहै है;-जो अनुमानविर्षे तीनरूप सहित जो लिंग तिस हीमात्र करि उपजी प्रामाण्यकी उपलब्धि होय है सो ही तहां हेतु है । ताकू कहिये ऐसे नाही है याका उत्तर तो पहले दिया था तहा तीनरूप पणा है सो ही गुण है, जैसे तिसकी विकलता कहिये तीनरूपपणातूं रहित सो ही दोप है, ऐसे हेतु है सो भलै प्रकार मान्यां हुवा है। ऐसे ही अप्रा. माण्यविपै भी कह्या जाय है तहा दोषनि तै गुणनिका अभाव है तिनिके अभावतै प्रमाणपणांका अभाव होते अप्रमाणपणा स्वाभाविक तिष्ठे ही है । ऐसैं अप्रामाण्य स्वतें ही आवै है ताका भिन्न कारणते उपजनेंका वर्णन उन्मत्तभापित ही ठहरै है। भावार्थ-जो मीमांसक प्रामाण्य तौ स्वतै कहै है अर अप्रामाण्य परतें कहै है सो इहां दोज ही स्वतॆ होय हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । ३१ है ऐसे दिखाय तिसका मत खडन किया है । बहुरि विशेष कहै है, जो गुणनितै दोपनिका अभाव है ऐसे कहता जो मीमासक सो ऐसे याके कहनेमैं यहु आया जो गुणनित ही गुण होय है जातै अभाव है अन्यभावस्वभावपणा है अभावभी भाव ही रवरूप है तातें अप्रामाण्यका अभाव है सोही प्रामाण्य है सो एते ही कहनेमैं तो परकी पक्षका निरा- करण होय नाही जाते यह कहना तो परपक्षका विरोधक नाही । बहुरि अनुमानते भी गुण प्रतीतिमैं आवै है सो ही कहिये है,---प्रामाण्य है सो विज्ञानके कारण भिन्न जे कारण तिनितें उपजै है जातै प्रामा- ण्य है सो विज्ञानतें अन्य है अर कार्य है जैसे अप्रामाण्य है ऐसा प्रयोग है। तथा अन्य प्रयोग कहै है;-प्रमाण अर प्रामाण्य दोऊ भिन्न कारणते उपजे है जाते ये भिन्न कार्य हैं, जैसे घट अर वस्त्र भिन्न कार्य है सो घट तो माटी नामा कारणते वणे अर वस्त्र सूतनामा कारण वर्णं ऐसे भिन्न कार्य होय सो भिन्न कारणहीतै होय । तातें यह ठहरी जो प्रामाण्य है सो उत्पत्तिविपै परकी अपेक्षा सहित है, भावार्थ-परते उपजे है। वहरि तैसे ही प्रमाणका कार्य जो विषयका जाननेंरूप क्रियास्वरूप तथा विपयविर्षे प्रवृत्तिस्वरूप ताविपै अपना ग्रहणकी अपेक्षा नाही है, ऐसा एकान्त नाही है । मीमासकनै कह्या था जो अपना स्वरूपका आपकरि जाननें विपै परकी अपेक्षा नाही है सो कोई अभ्यस्त विषय होय तहा ही परकी अपेक्षाका अभावका व्यवस्था- पन है अर अनभ्यस्तविषय होय तहा तो जलमरीचिकाका साधारण प्रदेश होय तहा जलका ज्ञान परकी अपेक्षाहीत होय है । याका प्रयोग ऐसा,-यह जल सत्य है जाते जैसा जलका आकार होय तैसा विशिष्ट आकारधारीपणा याम है । याका समर्थन--जो घट है पाणी भरनहा- रीका समूह है मींडकनिके शब्द है कमलनिका गव आवै है इनिसहित - ३२ स्वर्गीय पं0 जयचदजी विरचित- भासता कहै तो तौ है जैसे प्रत्यक्ष देख्या जल होय तैसैं यहु है ऐसैं अनुमानज्ञान तथा जलकी अर्थक्रियाका ज्ञानतें पहले जलका ज्ञान हुवा था तैसी ही ताक प्रमाणता कहिये यथार्थपणां सो बहुतकालपर्यन्त कल्पिये ही है जाते पहले अनुमानप्रमाणकै स्वतः सिद्ध प्रामाण्य भया तिसतै इस जलज्ञा- नकै प्रमाणता भई तातै पहले अनभ्यस्तमै परतै प्रमाणता कहिये । बहुरि मीमासक. कहा था जो प्रामाण्यके ग्रहणके उत्तरकालमै उत्पत्ति अवस्थातै जाननेमै किछू विशेप नाही भासै है जो प्रमाण उपजतैं जैसा था जैसा ही पीछे है। ताका उत्तर:-जो अभ्यस्तविपयविषै विशेप न यह हम भी मानें है जातै तहा पहले निःसन्देह विषयका जाननेंका विशेपका अंगीकार है । बहुरि अनभ्यस्तविषयविर्षे कहै तो जाननेमै विशेप है ही, प्रामाण्य ग्रहणके उत्तरकालमै विषयका अवधारण कहिये नियमरूप स्वभाव लिये प्रतिभास भया, यह ही विशेप प्रतिभास भया । बहुार मीमासक कहै है---जो प्रामाण्यकै अरु जान- नक्रियाकै तौ अभेदभाव है इनिमैं पहली पीठें होनां कैसै वणै ? ताईं कहिये है; जो ऐसे नाही है जातै सर्व ही जाननेकी क्रिया प्रमाणस्व- रूप नाही है अर प्रामाण्य है सो जाननक्रियास्वरूप है ही, तातै कथं- चित् भेद भया, तातें दोप नाही । बहुरि मीमासक. कह्या जो बाधक अर कारण दोपका ज्ञान इनि दोऊनिकरि प्रमाण्यका निराकरण होय है सो यह कहना भी निष्फल है जातें अप्रामाण्यविपैं भी ऐसे कह्या जाय है, सो ही कहिये है-पहले तो ज्ञान अप्रमाणरूप ही उपजै है पी, बाधारहित ज्ञान अर गुणका ज्ञान होय ताकै उत्तरकालविपै तिस अप्रमाणरूप ज्ञानका निराकरण होय है । तातै यह निश्चय भया जो प्रामाण्य अथवा अप्रामाण्य अपने कार्यविर्षे कोई जायगां आभ्यासकी अपेक्षा स्वतै होय है कोई जायगा अनभ्यासकी अपेक्षा परतें होय है सो ऐसे ही निर्णय करना योग्य है।

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ३३ ऐसैं बौद्धमती तौ प्रमाणकी प्रमाणता आपहीतै मानें हैं, अर नैयायिक परतै ही मान है, अर मीमासक उत्पति अर ज्ञप्तिविर्षे प्रमाणता दोऊ आपहीतै अर अप्रमाणता परहीरौं मानै है, अर साख्यमती प्रमाणता तौ परत मानै हैं अप्रमाणता आपहीतै मानें हैं तिनि सर्वनिका निराकरण स्याद्वादतै होय है । आगें इहा टीकाकारकृत श्लोक है,- देवस्य सम्मतमपास्तसमस्तदोष वीभ्य प्रपञ्चरुचिरं रचितं समस्य। माणिक्यनन्दिविभुना शिशुवोधहेतो- मानस्वरूपममुना स्फुटमभ्यधायि ॥ १ ॥ याका अर्थ- देवस्य ' कहिये अकलङ्कदेवनामा आचार्य ताका समस्तदोषरहित विस्तारकरि सुन्दर भलै प्रकार मान्या ऐसा जो न्यायशास्त्रमै प्रमाणका स्वरूप ताहि विचारिकरि माणिक्यनदिनामा जे समर्थ आचार्य तिनिनै इस परीक्षामुखशास्त्रविपै सक्षेपकरि रच्या जो प्रमाणका स्वरूप तिसक बालक जे अल्पज्ञानी तिनकै ज्ञान करनें आर्थ मैं अनन्तवीर्य आचार्य प्रगटकरि कह्या है ॥ १३ ॥ छप्पय । आप जानि परवस्तु अपूरवका निश्चय कर करणरूप जो ज्ञान ताहि भाष्या प्रमाण वर । उपजै परतें आनकू गहै अभ्यास विन अभ्यास सहाय्य आनका लिये प्रकासै ॥ अकलंकदेव जैसे कह्या माणिकनंदि विचारि उर । भाष्यो स्वरूप संक्षेप यह ग्रन्थ परीक्षाद्वार धुर ॥ इति परीक्षामुखकी लघुवृत्तिकी वचनिकाविर्षे प्रमाणका स्वरूपका उद्देश समाप्त भया । हि.प्र. ३ द्वितीय-समुद्देश। (२) आगै प्रमाणका स्वरूपकी विप्रतिपत्ति दूरि करि अब सख्याकी विप्रतिपत्ति निराकरण करता संता आचार्य सकल प्रमाणके भेदनिकी रचनाका संग्रह जामैं पाइये अर प्रमाणकी संख्या जामै पाइये ऐसा सूत्र कहै है; तवेधा ॥१॥ याका अर्थ—सो प्रमाण दोय प्रकार है। इहा तत्शब्दकरि तौ प्रमाणका परामर्श करना । सो ही प्रमाण पहले स्वरूपकरि निश्चय किया सो दोय प्रकार है । इहा एवकार अवधारण अर्थमें लेना जो संक्षेपकरि प्रमाणकी संख्या दोय है एक तीन आदि नाही है । यामैं प्रमाणके जे ते भेद हैं तिनि सर्वका अन्तर्भाव है ॥१॥ आगै जो प्रमाणकी संख्या दोय भेदरूप कही सो दोयपणा प्रत्यक्ष अनुमान भेदकार भी संभव है ताकी आशंका दूरि करनेकू प्रमाणके जे समस्त भेद तिनिका सग्रह करनेवाली ऐसी संख्याकू प्रगट करै है- प्रत्यक्षतरभेदात् ॥२॥ याका अर्थ-पहले सूत्रमै कही जो प्रमाणकी दोय संख्या सो प्रत्यक्ष अर परोक्ष ऐसे दोय भेदते है। तहा प्रत्यक्षका लक्षण आर्गे कहसी तिसत इतर कहिये अन्य परोक्ष ऐसे दोय भेदतै प्रमाणकी सख्या दोयरूप है। अन्यमतीनिकरि कल्पित जो प्रमाणकी एक दोय तीन च्यारि पाच छह प्रकार संख्या ताका नियमविर्षे समस्त प्रमाणके भेदनिका अन्तर्भाव किया न जाय है सो ही कहिये है,-प्रथम तौ हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ३५ AAAAAAP चार्वाक मतवाला एक प्रत्यक्ष प्रमाण ही माने है ताविर्षे अनुमानका अन्तर्भाव होय सक नाही है जात अनुमानतै प्रत्यक्ष विलक्षणस्वरूप है, तिनि टोजनिकै सामग्री अर स्वरूप भेदरूप है-न्यारे न्यारे है । इहा चार्वाक कहै है;-प्रमाण तो एक प्रत्यक्ष ही है दूजा अनु- मानदिकल्प परोक्षप्रमाण कहो है मो परोक्षप्रमाण नाही हे जाते परोक्ष- प्रमाणमे विसवाद है-बाधा आवे है । सो दिखा है, देखा, अनुमान प्रमाणका स्वरूप ऐसा कया है जो निश्चित अविनाभावस्वरूप जो हेतु तात लिंगी जो माध्य ताकै विषै जो ज्ञान नो अनुमान है, ऐसा अनु- मानप्रमाण माननेवालाका मत है । नहा लिंग दोय प्रकार, तामै एक स्वभावलिंग ताविप बहुल अन्यथापणा देखिये है। सो ही कहिये है, कयायला नकार नहित जे आमला ते इस देशकालसबधी देखिये हैं ते देशान्तर कालान्तर तथा अन्य व्यका सवध होते अन्यप्रकार भी देखिये है तात जो स्वभाव हेतुकरि अनुमान कीजिये है तौ तामै व्यभिचार आवै ऐसा अनुमान कीजिये जो आमला होय है ते कषायला होय है तो कोई देशकालमै अन्य द्रव्यके सवधतै रस अन्यप्रकार होय तब अनुमान, व्यभिचार आवै । अथवा कोई देशमै आम्रवृक्ष है कोई देशमै लता-आकार आम्र है अथवा कोई देशमै शीसू लताकू कहें हैं, तहा कोई ऐसा अनुमान करें जो यह वृक्ष है जातें भीसू है तौ जिस देगर्भ लताकू शीनूं कहै है तातै व्यभिचार भया । ऐसे ही कार्यलिंग मानिये तामै भी व्यभिचार है जैसे चूमते अग्निका अनुमान कीजिये है सो धूम इन्द्रजालके घटेमै अग्नि विना देखिये है तथा बंबीमें धूम अग्नि विना नीसरती देखिये है तातें अग्निका अनुमान व्यभिचारी होय है। ताते एक प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, याहीकै अविसंवादकपणा है--निर्वाध सत्यपणा है।

स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- ताका समाधान आचार्य करै है;~-जो यह कह्या सो बाल कहिये अज्ञानी ताका विलास सारिखा भासै है जातै जो वार्ता कही सो उप- पत्तितै शून्य है-बणती न कही। सो कहिये हैं;-इहा दोय पक्ष पूछिये जो परोक्षकै प्रमाणपणा निषेधै है सो याके उत्पत्तिके कारणके अभावतै निषेधै है कि आलंबनके अभावतें निषेधै है ? तहा प्रथम तौ पहला पक्ष जो उत्पादक कारणका अभाव सो तौ नाही बणै है जाते याका उत्पादक कारण सुनिश्चित भई जो साध्यतै अन्यथा अनुत्पत्ति ताका नियमका निश्चय सो है लक्षण जाका ऐसा जो साधन कहिये हेतु ताका सद्भाव है। बहुरि दूजा उत्तरपक्ष जो आलंबनका अभाव सो भी नाही है जातै याका आलंबन जो अग्नि आदिक सो समस्त जे विचार करनेंविर्षे चतुर है चित्त जिनिका तिनिकै सदाकाल प्रतीतिमै आवै है, अग्निकू आलंब्यकरि अनुमान उपजै सो आलंबनका अभाव कैसै कहिये । अर जो स्वभावहेतुकै व्यभिचारकी संभावना कही सो भी अयोग्य है जातै स्वभावमात्र ही हेतु नाही होय है, जो व्याप्यरूप स्वभाव होय सो व्यापक प्रति गमक होय है सो ही हेतु होय यातें व्याप्यकै व्याप- कतै व्यभिचार नाही है, जो व्यभिचार होय तो वह व्याप्य ही न कहिये । इहा अन्य विशेष कहैं हैं, जो ऐसैं अनुमानकू व्यभिचारी कहकरि उत्थापन करनेवाला जो चार्वाक ताकै प्रत्यक्ष प्रमाण भी नाही. ठहरैगा, तहा भी अविसंवादपणा अर मुख्यपणा ये दोऊ ही अनुमान विना निश्चय नाही होगा जातै प्रमाणपणाकै अर अविसवादकपणाकै. तथा मुख्यपणाकै अविनाभावीपणा है सो अनुमान मान्या विना कैसे निश्चय होय, प्रमाणका सत्यार्थपणां तौ अनुमान ही करै है। बहुरि जो कार्यनामा हेतुकै भी व्यभिचार बताय अन्यथाका संभावन किया सो, भी विना विचारया किया, नीकै विचारया परीक्षारूप किया कार्य सो, हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ३७ कारण” नाही व्यभिचरै है-कारणकू साधै ही है। जैसा धूम अग्निका कार्य पर्वतके तट आदिविषै अतिसघन धवलपणा करि फैलता पाइये है तैसा इद्रजालके घडा आदिविषै नाही देखिये है । बहुरि जो कह्या वा- विपै अग्नि विना धूमका सद्भाव है सो हम पूछ है तहा यहु बबी अग्नि- स्वभाव है कि अनग्निस्वभाव है ? जो अग्निस्त्रभाव है तौ अग्नि ही है तिसतै भया धूमकै अन्यथाभाव कैसैं कल्पिये, अर जो अग्निस्वभाव नाही है तो तिसतै भया वूम ही नाही तब तहा विना अग्नि भया धूम कैसैं कहिये--अग्नित व्यभिचार कैसैं मानिये। सोही कह्या है इहा श्लोक 'उक्त च ' है, ताका अर्थ-जो गक्रमूर्दा कहिये बबी सो जो अग्नि- स्वभाव है तौ अग्नि ही है अर अग्निस्वभाव नाही है तौ तहा धूम कैसे होय । बहुरि विशेप कहै है, जो चार्वाक प्रत्यक्ष एक प्रमाण मानैं है सो परशिष्यकू प्रत्यक्ष प्रमाण कैसे कहेगा परपुरुपका आत्मा प्रत्यक्ष ही करि ग्रहण करिवेक असमर्थ है, अर कहैगा जो वचन आदि कार्यके देखनेतै परके बुद्धि आदि जानिये है तौ कार्यतै कारणका अनुमान आया ही, अनुमानका निषेध कैसे करै है । बहुरि जो कहै, लोकव्य- बहारकी अपेक्षा अनुमान मानिये ही है परलोक आदिकके सद्भावविर्षे ही अनुमानका निपेध कीजिये है जातै परलोकका अभाव है। ताकू कहिये,—जो परलोकका अभाव कैसैं मान है जो कहेगा मेरै परलोककी तो १ अग्निस्वभावः शक्रस्य मूद्ध चेदग्निरेव सः। अथाननिस्वभावोऽसौ धूमस्तत्र कथं भवेत् ॥१॥ लिखित वचनिका प्रतिमें यह श्लोक नहीं लिखा है । सस्कृत प्रतिम 'उक्त च' कहकर दिया है सो वहासे लेकर लिखा है। -सम्पादका ३८ स्वर्गीय पं0 जयचंदजी विरचित- उपलब्धि नाही-मोकू दाखै नाहीं तातै अभाव मानूं हूं तौ अनुपलब्धि- नामा लिंगकरि उपज्या अनुमान एक और आया, निषेध तौ न भया । बहुरि प्रत्यक्षका प्रमाणपणां भी स्वभावहेतुर्ते उपजी जो अनुमिति जाकू अनुमान भी कहिये तिस विना न बणैगा सो यह पहले कह आये है यातें अब काहेर्दू कहै । इस अनुमानका समर्थन बौद्धमंतका आचार्य वर्मकीर्ति किया है, ताका श्लोक है ताका अर्थ:----प्रत्यक्ष प्रमाण सिवाय अन्य प्रमाणका सद्भाव तीन हेतुतै होय है,-प्रथम तौ प्रमाण अर अप्रमाण सामान्यका ठहरनां प्रत्यक्ष सिवाय अन्य प्रमाण विना होय नाहीं प्रत्यक्षमैं विपर्यय ही ग्रहण भया होय ताका निषेधकू अन्य प्रमाण चाहिये । दूसरै अन्यकी बुद्धिका जाणपणा प्रत्यक्षतें नाहीं तातै अन्य प्रमाण चाहिये जाकरि अन्यकी बुद्धिका ज्ञान होय, सो वचन आदि कार्यनित अनुमान होय है। तीसरा परलोक आदि अदृष्ट वस्तुका निषेध करनेंकू अन्य प्रमाण चाहिये। ऐसै सौगत जो बौद्धमती है सो चार्वाक एक प्रत्यक्ष प्रमाण मानै ताकै दूजा अनुमान प्रमाणका सद्भाव दिखाय अर आपका स्थापनें• अनुमानका समर्थन करि कहै है, जो प्रत्यक्ष अर अनुमान ये दोय प्रमाण हैं। तहा आचार्य कहैं हैं;-ऐसैं दोय प्रमाण मानता जो बौद्ध सो भी युक्तवादी नाही है जातै स्मृतिनामा प्रमाण विसवादरहित निर्वाध है ताका सद्भाव है । याकू विसवादरहित कह करि प्रमाण न मानिये तो देनें लेने आदिका व्यवहारका लोपकी प्राप्ति आवै है, पहले काहूको धन सौप्या पीछे ताकू यादि करै मागै। बहुरि जाकू सोप्या ताकू यादि १ यदप्युक्त धर्मकीर्तिना, प्रमाणेतरसामान्यस्थितेरन्यधियो गतेः। प्रमाणान्तरसद्भावः प्रतिषेधाच्च कस्यचित् ॥ इति - हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ३९ करि कहै इसकू में धन सौंप्या था मो यह प्रत्यभिज्ञान होय तब सौप्या धन मागै है सो स्मृतिकू प्रमाणभूत न मानिये तौ देनें लेनेका व्यव- हार नाहीं होय । बहुरि वह कहै जो स्मृति तौ अनुभवन किये वस्तुविपै होय है सो जिसकाल स्मृति होय तिस काल अनुभूयमान जो वस्तु जाविप स्मृति भई सो वस्तु विद्यमान नाही तातै विपयरहित जो स्मृति सो तौ प्रमाणभूत नाही। ताकू कहिये-जो ऐसें नाही, जो तिस काल विषय विद्यमान नाही है तोऊ अनुभवन किया था जो वस्तु तिसका आलबनतें स्मृति भई तातै निरालब नाही, निरालब तो जब होय जो अकस्मात् विना अनुभूत वस्तुविपै स्मृति होय सो ऐसे होय नाही। अर ऐसैं अनुभूत वस्तुविप स्मृति होते भी निरालबन कहिये अर अप्रमाण कहिये तो प्रत्यक्षकै भी अनुभूत वस्तुवि अप्रमाणपणा ठहरै। वौद्धमती प्रत्यक्षकू अतीतपदार्थविपयरूप कहै है तातै स्मृति अती- तानुभूतार्थ विपयतें अप्रमाण कहैगा तो प्रत्यक्ष भी ऐसा न ठहरैगा ऐसे कया है । अथवा अनुमानकरि पहिले अग्निका निश्चय भया पीछे ताविर्षे प्रत्यक्ष प्रवा सो ऐसा प्रत्यक्ष भी अप्रमाण ठहरैगा । अर अपना जो विषय है ताका प्रतिभासना प्रमाण कहिये तो अपना विप- यका प्रतिभासना तौ स्मरणविपै भी है ही याकू अप्रमाण कैसैं कहिये। बहुरि विशेप कहें है,जो स्मृतिकू अप्रमाण कहिये तो अनुमा- नकै प्रमाणपणाकी वार्ता भी कहना दुर्लभ होय है जातें स्मृतिकार व्याप्तिक याद किये अनुमान होय है, विना स्मृति व्याप्तिका स्मरण नाही तव अनुमानका उत्थान काहेरौं होय । तातें यह कहना जो स्मृतिकै प्रमाणता है जाते अनुमानकै प्रमाणपणाकी याही तैं प्राप्ति है यहु न होय तौ अनुमानकै प्रमाणपणाकी प्राप्ति नाही है । ऐसे यदु स्मृति सो बौद्धमतीकै मान्या जो प्रत्यक्ष अनुमानरूप प्रमाणकै दोयप- ४० स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- णाकी संख्याका नियम ताहि विगाडै है-निषेधै है तातें हमारी चिंता- करि कहा साध्य है। तैसैं ही प्रत्यभिज्ञान प्रमाण है सो भी बौद्धकी दोयपणाकी संख्याका नियमका निराकरण कर है । तिस प्रत्यभिज्ञानाका भी प्रत्यक्ष अनुमा- नविर्षे अतर्भाव न होय है । इहा बौद्धमती तर्क करै है, जो प्रत्य- भिज्ञानविपैं 'तत्' कहिये सो है ऐसा तो स्मरण भया अर 'इद' कहिये यहु है ऐसा प्रत्यक्ष भया ऐसैं ये दोय ज्ञान भये इनितै न्यारा तीसरा तौ ज्ञान भया नाही ताकू हम प्रत्यभिज्ञान मानै अर न्यारा प्रमाण कहैं यात तिस प्रत्यभिज्ञानकरि प्रमाणकी सख्याका निषेध कैसे होय ? ताका समाधान आचार्य करै है;----जो यह कहना भी युक्त नाही जाते प्रत्यभिज्ञानका विषयरूप जो पूर्वापरका जोडरूप वस्तु- भूत अर्थ ताकू स्मृति अरु प्रत्यक्ष ये दोज ही ग्रहण करनेकू समर्थ नाही है, पहली अर पिछली दोऊ अवस्थावि वर्त्तर्नेवाला जो एक द्रव्य सो प्रत्यभिज्ञानका विषय है । यहु स्मरणकरि ग्रहणमैं आवै नांही जातै स्मरणका तौ पूर्व अनुभवन जाका भया सो ही विपय है। बहुरि प्रत्यक्षकरि भी ग्रहणमै आवै नाही जातै प्रत्यक्षका विपय तौ वर्तमान अवस्था ही है । बहुरि बौद्धनैं कह्या जो स्मरण अर प्रत्यक्षतै न्यारा तौ प्रत्यभिज्ञान नाही सो यह कहना भी अयुक्त है । पूर्वोत्तरअवस्थाविपैं अभेदका ग्रहण करनेवाला तीसरा प्रत्यभिज्ञान प्रतिभासमै आवै है। स्मृति प्रत्यक्षमै कोई एककै तौ पूर्वोत्तर अवस्थाविधैं व्यापक जो अभेद ताका ग्रहणस्वरूपपणा नाही है जातै इनि दोउनिके विषय न्यारे न्यारे हैं । वहुरि यहु प्रत्यभिज्ञान प्रत्यक्षविर्षे अन्तर्भाव होय नाही तथा अनु- मानवि अन्तर्भाव होय नाही जातै प्रत्यक्ष तौ वर्तमान निकटवर्ती वस्तुकू ग्रहण करै है याका यह ही विषय है अर अनुमान है सो हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । ४१ अविनाभूत जो लिंग ताकरि सभावित जो वस्तु ताकू ग्रहण करै है याका यह विषय है, पूर्व-उत्तर पर्यायव्यापी जो एकपणा सो प्रत्यक्ष अनुमानका विषय नाही । बहुरि प्रत्यभिज्ञान है सो स्मरणविपै भी अन्तर्भूत नाही प है जातै पूर्व-उत्तरका एकपणा स्मरणका भी विषय नाही है। बहुरि इहा कोई कहै जो सस्कार अर स्मरणका सहायकरि ये इंद्रिय है ते ही प्रत्यभिज्ञानकू उपजायै हैं सो जो इन्द्रिय उपजै सो प्रत्यक्ष ही है तातै प्रत्यभिज्ञान न्यारा प्रमाण नाही ? ताकू आचार्य कहै है,जो ऐसी कहनेवाला तो अतिमूर्ख ही है जातें अपने विप- यकृ मुख्यकरि प्रवर्त्तता जो इन्द्रिय ताके सैकडा सहकारी सहाय मिलै तोऊ अन्यके विषयवि प्रवर्त्तनेंरूप जो अतिशय ताका अयोग है, इन्द्रिय अपनें अपने विप ही प्रवत्ते हैं । अर यह अतीत वर्तमान अवस्थाविर्य व्यापी जो एक द्रव्य मो इन्द्रियनिका विपय नाही, अन्य ही है । इन्द्रियनिका विषय तो रूप ही है ये तावन्मात्र ही विपयविपै चरितार्थ है। बहुरि अदृष्ट जो पुण्यपापकर्म तिसके सहकारीपणाकी अपेक्षा स्वरूप होयकरि भी इन्द्रिय इस पूर्वापर अवस्थाका एकत्वविपैं नाही प्रवत्र्त है तहा भी पूर्वोक्त दोप ही आवै है, सहकारीके बलतै इन्द्रिय अपनें विपय सिवाय प्रवत्त नाही । बहुरि विशेप कहै है, जो अदृष्ट कहिये पूर्वकृत कर्म अर वारणा- ज्ञानरूप सस्कार आदिकी अपेक्षात प्रत्यक्षकै एकत्व विषयवि. प्रवर्तना कह्या तो ऐसे प्रवर्तना आत्माहीकै तिस एकलका विज्ञान क्यो न करिपये जाते देखिये है जो स्वप्न सारस्वत चाण्डालिक आदि विद्याके सस्कारत आत्माकै विशिष्ट जानकी उत्पत्ति होय है | तहा अतीत अना- गत वर्तमानके लाभ अलाभकी सूचना जातै होय सो स्वप्नविद्या है । बहुरि अन्यतै ऐसा न वणै ऐसा वादीपणा कवीश्वरपणा आदिकी कर- ।

४२
स्वर्गीय प० जयचंदजी विरचित-
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णहारी सारस्वत विद्या है । बहुरि नष्ट मुष्टि आदिकी सूचना जारौं होय
सो चाण्डलिक विद्या है । इहा बहुरि नैयायिकमती तर्क करै है, जो
अंजन आदिके संस्कारतें नेत्रकै भी ऐसा अतिशय देखिये है ? ताका
समाधान;-आचार्य कहै है, ऐसे नाहीं है जातै नेत्रके अतिशय होय
है सो अपने विषयविर्षे ही होय है अपना विषयकू नाही उलंधै है,
ऐसा तो नाहीं जो अजनके सस्कारतें नेत्र अपना विपय सिवाय जो
रस गंध तिनिकौ जाणै, सो ही कह्या है; 'उक्तं च श्लोक है ताका अर्थ:-
जहा अतिशय देखिये है सो अपनें विपया उलंधिकरि नाही होय
है श्रोत्रकी प्रवृत्तित रूपवि. तो अतिशय होय नाहीं जो होय तो दूर-
वर्ती तथा सूक्ष्मवस्तुके देखनेविपै नेत्रकै अतिशय होय ।
इहा नैयायिक फेरि कहै है;-जो यह श्लोक तौ सर्वज्ञके निपेधकै
अयि मीमासकनै कह्या है इहां तुमने कह्या सो मिले नाहीं यह दृष्टान्त
विषम है ? ताका सामाधान;-इहा दृष्टान्त इन्द्रियनिकै अन्यके विपय-
विपै प्रवर्तनका अतिशयका अभावमात्र दिखावनेकी समानतामात्र कह्या
है तातै बणै है, दृष्टान्तका सर्वही धर्म तौ दार्टान्तविषै होय नाही जो
सर्व ही धर्म मिलै तौ दृष्टान्त नाही दार्टान्त ही होय है । तातै यह
निश्चय भया जो प्रत्यक्ष अनुमानतै न्यारा ही प्रत्यभिज्ञान वस्तुभूत है
जातें इसकी सामग्री अर स्वरूप दोऊ ही भेदरूप न्यारे ही है । बहुरि
यह प्रत्यभिज्ञान अप्रमाण नाही है जातें इस प्रत्यभिज्ञानतें अर्थकू जाण-
करि तिस विर्षे प्रवर्तनेवालाकै अर्थकियामै विसंवाट नाही है, जैसे
प्रत्यक्षकरि विपयवि प्रवर्तनेवालेकै विसंवाद नाही तैसैं इहा भी
१ तथा चोकम् --
यत्राऽप्यतिशयो दृष्टः स स्वार्थानतिलंघनात् ।
दूरसूक्ष्मादिदृष्टौ स्थान रूपे श्रोत्रवृत्तितः ॥ १॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । ४३ , नाही । वहुरि इस प्रत्यभिज्ञानका विषय पूर्वोत्तर अवस्थाका एकपणा है ताका लोप कीजिये तो बध मोक्ष आदिकी व्यवस्था बहुरि अनुमान प्रमाणकी व्यवस्था न ठहरै जाते एकत्व विना बध्या सो ही छूटया ऐसे न ठहरे, तथा अनुमानका साधन जो लिंग ताका सबधका ग्रहण एकन्या विना कैसे होय. बहुरि या प्रत्यभिज्ञानका विपयवि4 वाधक प्रमाण भी नाही हैं, जो वावक होय तो प्रमाणपणा न मानिये जाते प्रत्यक्षकै अर अनुमानकै तिस प्रत्याभिज्ञानके विपयत्रिपै प्रवृत्ति ही नाही बाधक कैसे होय, अर प्रवृत्ति होय तो तिसका साधक ही होय बावक तौ न होय | तहा बद्रत कहनेंकरि पूरी पडो, प्रत्यभिज्ञान प्रमाण न्यारा ही है। बरि तैसे ही बौद्धकी प्रमाणसख्याका विरोधी बाधारहित तर्क- नामा प्रमाण आवे ही है सो यह तर्कनामा प्रमाण प्रत्यक्षविपैं अन्तर्भूत नाही होय है जाते। मायक अर साधनकै जो व्याप्यव्यापकभाव है ताका समस्तपणा करि मर्वक्षेत्रकालका ग्रहण तर्कका विषय है, सो प्रत्यक्षका विषय नाही है, यह इन्द्रियप्रत्यक्ष है सो सर्वदेशकालसवधी जे व्यापार है तिनिक करनेक समर्थ नाही जाते यह प्रत्यक्ष प्रमाण विचा- ररहित है अर इन्द्रियनिके समीपवर्ती पढार्य याका विषय है । बहुरि तर्ककै विषयकू अनुमान भी ग्रहण करनेंकू समर्थ नाही है जाते याका भी जिस देश आदिमै तिष्टता पदार्थ है सो ही विषय है, व्याप्ति सर्व देगकालसवधी है सो अनुमानका विषय नाही । बहुरि जो व्याप्तिकू अनुमानका विषय मानें तो तहा टोय पक्ष पूछिये,--जो व्याप्तिकू ग्रहण कर सो अनुमान तिस व्याप्तिसू सिद्ध भया सो ही है कि अन्य अनु- मान है ? जो कहेगा तिसव्याप्तिसू सिद्ध भया सो ही है तौ तहा इतरेतराश्रयनामा दूपण आवेगा जातै पहले व्याप्तिग्रहण होय तब पीछे स्वर्गीय पं० जयचदजी विरचित- अनुमान सिद्ध होय, बहुरि अनुमान सिद्ध भये पीछे व्याप्तिग्रहण होय ऐसे दौपतै दोजकी सिद्धि नाही है । बहुरि कहै जो अन्य अनुमानते अविनाभावस्वरूप व्याप्ति ग्रहण होय है तौ अनवस्थानामा दूपणरूपी वघेरी तिसपक्षकू भखि जाय है जाते अनुमान तौ व्याप्तिके ग्रहण विना होय नाही अरु व्याप्ति अन्य अनुमानकरि ग्रहण होय तौ तिस अनु- मानकी व्याप्ति अन्य अनुमानकरि होय ऐसैं कहूं ठहरै नाही तब अन- वस्था दूषण आवै । तातै अनुमानका विषय व्याप्ति नाही सिद्ध होय है। बहुरि साख्यमती आदिकरि कल्प्या जो आगम उपमान अर्थापत्ति अभावप्रमाण तिनिकरि भी समस्तपणाकरि अविनाभावस्वरूप व्याप्तिका ग्रहण नाही है जाते तिनि प्रमाणनिकै अपने अपने विषयका ग्राहक- पणा है तातें व्याप्ति तिनिका विषय नाही । वहुरि साख्यमती आदि तिनि प्रमाणनिका व्याप्ति विपय मानें भी नाही है । तहा आगमका विपय तौ वस्तुका सकेतकरि ग्रहण करना है। अर उपमानका विषय सादृश्यभाव है । अर्थापत्तिका विषय अर्थका अन्यथा न होना है, एक वस्तुकी सामर्थ्यतै अन्य अर्थ आय पडै सो अर्थापत्ति है। वहुरि अभा- वका विषय अभाव ही है । इनिका विपय व्याप्ति नाही। इहा बौद्धमती फेरि कहै है; जो प्रत्यक्षकै-पीछे विकल्प होय है-विचार होय है तातें साध्यसाधनभावका ज्ञान समस्तपणाकरि होय है तातै तिस व्याप्तिके ग्रहणकै अर्थ अन्य प्रमाण नाही हेरना । ताका समाधान आचार्य करै है,-जो यह कहनेवाला भी युक्तवाढी नाही, जातै इहा ताकू दोय पक्ष पूछिये-जो तिस विकल्पकै प्रत्यक्षकरि ग्रहे विषयका व्यवस्थापकपना है कि प्रत्यक्ष करि ग्रह्या नाही ऐसे विपयका व्यवस्थापक- पना है ? जो कहैगा प्रत्यक्षकरि ग्रहे विपयकू ही थापै है तौ दर्शनस्वरूप प्रत्यक्षकी ज्यो ताकै पीछे भया निर्णयकै भी नियतविषयपणा ही ठहरया हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । ४५ व्याप्ति तो ताका विपय न ठहरैगा । बहुरि कहेगा जो प्रत्यक्षकरि नाही प्रह्या विषयकू थापै है तौ यामैं भी दोय पक्ष है, प्रत्यक्षकै पीछे भया विकल्प ज्ञान है सो प्रमाण है कि अप्रमाण है ? जो कहेगा प्रमाण है तौ प्रत्यक्ष अनुमान सिवाय तीसरा प्रमाण आया जातै दोऊ प्रमाणमैं याका अन्तर्भाव नाही होय है। बहुरि कहेगा अप्रमाण है तौ तिसतै अनुमानकी व्यवस्था न ठहरैगी जातै व्याप्तिके ज्ञानकू अप्रमाण माने तिसपूर्वक अनुमान भी प्रमाण न ठहरैगा जातै सन्दिग्ध आदि जो लिंग तातै उपज्या अनुमानकै प्रमाणताका प्रसग आवैगा। तातै व्याप्तिका ज्ञान जो तर्क सो विचारसहित विसवादरहित प्रमाण प्रत्यक्ष अनुमान दोय प्रमाणतै न्यारा ही मानना योग्य है । यातै बौद्धकरि मान्या जो प्रमाणकै दोयकी सख्याका नियम सो नाही है। याही कथनकरि अनुपलभ कहिये जाका सद्भाव ग्रहण नाही तिसतै बहुरि कारणका अर व्यापकका अनुपलभतें कार्यकारणभाव अर व्याप्य- व्यापकभावका ज्ञान होय है यह ही व्याप्तिका ज्ञान है ऐसा कहना भी निराकरण किया, जातें अनुपलभ तौ प्रत्यक्षका विशेप है अर कारण आदिका अनुपलभ है सो लिंग है सो लिंगकरि उपज्या अनुमान है है यातै प्रत्यक्ष अनुमानकरि व्याप्तिग्रहणमैं पहले दोप दिखाये ते ही जानने। इस ही कथनकरि प्रत्यक्षका फल जो ऊहापोह-जो पहले तर्क उपजै जो यह कैसे है पीछ ताका निराकरणकरै ऐसा विकल्प- ज्ञान ताकरि व्याप्तिका ज्ञान है ऐसा वैशेपिकमती माने है ताका भी निराकरण किया जातै प्रत्यक्षका फलकू प्रत्यक्ष अथवा अनुमान कहै तौ ते तौ व्याप्तिकू विपय करै नाही अर तिनि अन्य कहै तौ न्यारा प्रमाण ठहरया ही । बहुरि कहै जो व्याप्तिका जाननेरूप विकल्प तौ प्रमाण ठहरै नाही तो यह कहना भी युक्त नाही जातै फल है तौऊ यातै ४६ स्वर्गीय पं0 जयचदजी विरचित- अनुमान होय है सो अनुमान याका फल है ताका कारणपणाकी अपेक्षा याकै भी प्रमाणपणां युक्त है यामै विरोध नाही जैसे इन्द्रियकै अर अर्थक जुडनेंरूप सन्निकर्ष होय ताका फल जो विशेपणका ज्ञान ताके विशे- ष्यका ज्ञानस्वरूप जो फल ताकी अपेक्षाकरि प्रमाणपणा मानिये है तैसें यह भी मानना । यातै वैशेषिककरि मान्या जो जहापोह विकल्प ताहीकै प्रमाणान्तरपणां आवे है, प्रमाणपणाकू उलंधि नाही वत्त है। याही कथनकरि तीन च्यारि पाच छह प्रमाणकी संख्या कहनेवाले जे साख्य अर अक्षपाद कहिये नैयायिक अर प्रभाकर जैमिनीय मीमा- सक ते अपनें अपने प्रमाणकी सख्याके थापनेक समर्थ नाही हैं ऐसैं कह्या जो न्याय तिसकरि स्मृति प्रत्यभिज्ञान तर्क इनि तीन प्रमाणनिकै तिनि सांख्यमती आदिनिकरि माने प्रमाणकी संख्याका विपक्षपणां है, स्मृत्यादि तिनिके प्रमाणकी सख्याकू निराकरण करे हैं ॥२॥ आ» प्रथम प्रमाणका भेट जो प्रत्यक्ष ताके निरूपण करने• सूत्र कहै है। विशदं प्रत्यक्षम् ॥३॥ -विशद कहिये स्पष्ट जो ज्ञान सो प्रत्यक्ष प्रमाण इहां ज्ञानकी तौ अनुवृत्ति करनी, अर प्रत्यक्ष है सो तौ धर्मी है अर विशद ज्ञानस्वरूप साध्य है अर प्रत्यक्षपणा हेतु करना | सो ही प्रयोग कहिये है,—प्रत्यक्ष है सो विशद ज्ञानस्वरूप ही है जाते प्रत्यक्ष है, जो विशद ज्ञानस्वरूप नाही सो प्रत्यक्ष नाही जैसे परोक्ष, इहा विवा- दमै आया प्रत्यक्ष है तातै विशद ज्ञानस्वरूप ही है, ऐसे अनुमानके पांच अवयवरूप प्रयोग या सूत्रका है। इहां कोई कहै जो यह प्रत्यक्षपणा हेतु किया सो सूत्रमैं तो एक धर्माहीका शब्द प्रत्यक्ष ऐसा था तिसहीकू -हेतु किया सो पक्षका वचनरूप जो प्रतिज्ञा ताका अर्थका एकदशकू याका अर्थ- - mc .

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला ! ४७ हेतु किया सो यह हेतु असिद्ध है । ताका समाधान आचार्य कहै है,- जो प्रतिज्ञा कहाँ है अर तिसका एकदेश कहा है तब वह कहै जो धर्मका अर धर्मीका समुदाय सो प्रतिज्ञा है ताका एकदेश वर्मी अथवा धर्म है सो तिसमैंसू एक कह्या सो ही प्रतिज्ञाका एकदेश है ऐसा धर्मी हेतु असिद्ध है, ताका समाधान-जो धर्मीकै हेतुपणा कहते अ- सिद्धपणाका अयोग है जात तिस वर्मीकै पक्षके प्रयोगकालविपैं जैसे असिद्धपणा नाही है तैसै ही हेतुके प्रयोगविपैं भी असिद्धपणा नाही है धर्मी प्रसिद्ध ही कह्या है । बहुरि वह कहै है जो धर्माकू हेतु कहते अन- न्वयनामा दोप आवै है जातें धर्मी साध्यतै अन्वयस्वरूप नाही । ताका समाधान-जो ऐसें नाही है इहा प्रत्यक्ष विशेप तौ धर्मी है अर प्रत्यक्ष सामान्य है सो हेतु किया है सो सामान्य है सो विशेपविर्षे अन्वयरूप है ही जातै सामान्य है सो विशेप विना नाही होय है । बहुरि कहै जो साध्य जो धर्मी ताकै हेतुपणा होतै प्रतिज्ञाका एकदेशस्वरूप असिद्ध हेतु होय है कि नाही ? ताकू कहिये-जो ताकै प्रतिज्ञाका एक देश- पणात असिद्धपणा नाही है साध्यकै तौ स्वरूप ही करि असिद्धपणा है। जो प्रतिज्ञाका एक देशपणा करि असिद्धपणा कहिये तो धर्मी भी प्र- तिज्ञाका एकदेश है ताकरि व्यभिचार होय है । बहुरि कहै जो इहा धर्मीकू हेतु किया अर व्यतिरेकव्याप्तिरूप व्यतिरेक ही दृष्टान्त कह्या सो सपक्षविर्षे याकी वृत्ति नाही तातें अनन्वय दोप आया, ताका समा- धान-जो यह भी असत्य है जातें बौद्धमती सर्व वस्तुकै क्षणभगका सगम है सो ही स्वरूप है ऐसे मानै है तहा सत्वकू हेतु करै है कि जो जो सत् है सो सर्व क्षणभंग है सो ऐसा सत्वनामा हेतुकै सपक्ष नाही जाते सर्व ही पक्षमैं आय गये, सो ऐसे हेतु भी अनन्वयदोषरूप १ क्या।

४८ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- भये तब हेतुका उदय नाही होय है । अर कहै ऐसे हेतुकै विपक्षविर्षे वाधकप्रमाणका अभाव है अर पक्षमै व्यापकपणा है तातें दोप नाही अन्वयवान्पणां है तो हमारा भी हेतु ऐसा ही है, याकै वाकै समानता भई तब दोष काहेका है ।। ३ ।। आगै प्रत्यक्ष विशद ज्ञानकू कह्या सो विशदपणांका स्वरूप कहै प्रतीत्यन्तराव्यवधानेन विशेषवत्तया वा प्रतिभासन वैशद्यम् ॥ ४॥ याका अर्थ-जो अन्यप्रतीति वीचिमै न आवै आप ही जानें अर विपयकू विशेषनिसहितपणाकरि जानै सो विशदपणां है । तहा एक प्रतितितै दूसरी अन्य प्रतीति होय सो प्रतीत्यंतर कहिये तिसकरि जाकै अव्यवधान होय-वीचिमैं अन्यप्रतीति न आवै, तिस अव्यवधानकरि जो प्रतिभासना सो वैशद्य कहिये । इहां जो अवायज्ञानकै अवग्रह ईहा प्रतीतिकरि व्यवधान है, अवायकै पहली अवग्रह ईहाकी प्रतीति होह है तौऊ तिस अवायज्ञानकै परोक्षपणा नाही है जाते इहा विषय जो पदार्थ अर विषयी जो विषयका जाननेवाला ज्ञान ताके भेदकरि प्रतीति नाही है । जहा विषयविषयीके भेद होते व्यवधान होय तहां परोक्षपणां होय है । इहां जो अवग्रहका विषय है ताकी तिस ही कार प्रतीति है, ईहाका विषय है ताकी तिस ही करि प्रतीति है, अवायका विषय है ताकी तिस ही करि प्रतीति है: परंतु ये सारे प्रत्यक्ष ही हैं अर इनिका विषय प्रत्यक्ष ही है, प्रतीत्यन्तर न कहिये । यातै ऐसा नाही जो जो जाका विषय है ताकी प्रतीति पहले अन्यकी प्रतीति बीचिमैं आवै तब होय । बहुरि कोई कहे जो ऐसे है तौ पहिले अग्निका अनुमान भया होय पीछे सो ही पुरुप अग्निकू देखै तब अग्निका देखनाकै.परोक्ष- - हिन्दी प्रमेयरत्नमाला ! ४९ पणा आवै है ? ताईं कहिये-~-जो यह कहना अयुक्त है जातै इहा देखना प्रत्यक्ष है भिन्न विषयपणाका अभाव है तातै प्रतीत्यन्तर नाही, देखनेते प्रतीति भई है सो ही प्रत्यक्ष है ऐसैं नाही जो पहिले अनुमान प्रतीति भई तिसतै प्रत्यक्षकी प्रतीति भई । इहा अग्नि वस्तु है ताकू अनेक प्रमाण करि अपनें अपनें विपयसारू जाननेमैं दोष नाही जातै विसदृश सामग्री करि उपजै जो भिन्न विपयविपै प्रतीति सो प्रतीत्यं- तर कहिये है तातै पहले अनुमानकी प्रतीति भई सो अपने विषय- विपै भई अर प्रत्यक्ष प्रतीति भई सो अपने विषयविक् भई इनिकै पर- स्पर कार्यकारणभात्र नाही है। बहुरि विशदपणा केवल एतावन्मात्र ही नाही है यामै विगेपनिसहितपणा करि भी प्रतिभासना है। वस्तुका आकार वर्ण रस गंध स्पर्श आदिके जे विशेप तिनिकरि वस्तुका सर्वस्व देखना सो वैगद्य है ।। ४ ।। आगे सो प्रत्यक्ष दोय प्रकार है एक मुख्य प्रत्यक्ष, दूजा साव्यव- हारिक प्रत्यक्ष, सो आचार्य दोऊनिकू मनमै धारि पहले साव्यवहारिक प्रत्यक्षकी उत्पत्ति करनेवाली सामग्री अर तिसके भेदनिका सूत्र कहैं इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तं देशतः सांव्यवहारिकं ॥५॥ याका अर्थ---इन्द्रिय अर मन है कारण जाकू ऐसा जो एकदेश विशद ज्ञान सो साव्यवहारिक प्रत्यक्ष है । इहा विशद अर ज्ञानकी अ- नुवृत्ति लेणीं । यातें देशतै विशद ज्ञान होय सो साव्यवहारिक प्रत्यक्ष प्रमाण है ऐसा अर्थ भया। तहा 'स' कहिये समीचीन-भला प्रवृत्ति- निवृत्तिरूप जो व्यवहार सो सव्यवहार है तिसविपै होय सो साव्यव- हारिक कहिये । बहुरि कैसा है ? इन्द्रिय कहिये नेत्र आदिक अर अ- हि.प्र. ४ स्वर्गीय पं. जयचंदजी विरचित- निन्द्रिय कहिये मन ये दोऊ हैं निमित्त कहिये कारण जाकू । सो इट न्द्रिय मन समस्त भी कारण हैं भर व्यस्त कहिये न्यारे न्यारे भी कारण, हैं। तहां इन्द्रियनिके प्रधानपणांत मनके सहायतै उपजै सो तौ इन्द्रिय, प्रत्यक्ष है, बहुरि कर्मक क्षयोपशमतें विशुद्धि होय ताकी अपेक्षासहित जो मन तिसहीतै उपजै सो अनिन्द्रिय प्रत्यक्ष है। तहां इन्द्रिय प्रत्यक्ष है सो अवग्रह, ईहा, अवाय, धारणाभेदतै च्यार प्रकार है सो भी बहु, अवहु, बहुविध, एकविध, क्षिप्र, अक्षिप्र, अनिसृत, निसृत, अनुक्त, उक्त, ध्रुव, अध्रुव, इनि बारह विषयनिके मेदनिकरि अड़ता; लीस भेद होय हैं, ते पांचूं इन्द्रिय प्रति होय हैं सो दोयसै चालीस,होय। ऐसे ही मनके प्रत्यक्षके अड़तालीस मिलाये दोयसै अठ्यासी भेद होय हैं, सो ये तो अर्थकी अपेक्षा भये । बहुरि व्यंजन विषयका अव- ग्रह ही होय है सो मन अर नेत्र द्वारै नांही होय तातै च्यार इन्द्रियनिकै द्वारै बहु आदि बारह विषयका अवग्रह होय ताके अड़तालीस भेद होय । सर्व भेले किये इन्द्रिय अनिन्द्रिय प्रत्यक्षके तीनसै छत्तीस भेद होय हैं। इहां प्रश्न--जो स्वसंवेदननाम प्रत्यक्ष अन्य है सो क्यों न कह्या ? ताका समाधान-ऐसें न कहनां जाते सो संवेदन सुख ज्ञान आदिका अनुभवनस्वरूप है सो मानसप्रत्यक्षमैं आय गया अर इन्द्रियज्ञानको स्वरूपका संवेदन सो इन्द्रियप्रत्यक्षमैं आय गया । जो ऐसे न मानिये तौ तिस ज्ञानकै अपने स्वरूपका निश्चय करनेका अयोग आवै है। बहुरि स्मरण आदिका स्वरूपका संवेदन है सो मानसप्रत्यक्ष ही है अन्य नाही है सो स्वसंवेदन प्रत्यक्ष कहिये ही है, परन्तु जुदा भेट नाही॥५॥ आगै नैयायिक कहै है जो प्रत्यक्षका उत्पादक कारण कहताजों अंथकार इन्द्रियादिककू, कारण कहे तैसे ही अर्थ -अर-आलोककू कारण, २ हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ५१ NA - क्यो नाही कहे । अर्थ कहिये वस्तु ताकरि भी ज्ञान उपजै है अर आलोक कहिये प्रकाशकार भी ज्ञान उपजै है इनिक् विना कहे कारण- निका सकलपणाका सग्रह न भया तब शिष्यजनकै भ्रम ही रहेगा जात कारण एते है ऐसा निश्चय न होयगा। जो परम करुणावान भगवान हैं तिनकै शिण्यजनकै भ्रम होय ऐमी चेष्टा न होय है ऐसी आशका नैयायिककी दूरि करनेंकू मूत्र कहैं है, नार्थालोको कारणं परिच्छेद्यत्वात्तमोवत् ॥६॥ याका अर्थ-अर्थ कहिये वस्तु अर आलोक कहिये प्रकाश ये दोज ही साव्यवहारिक प्रत्यक्ष कारण नाही हैं जाते ये परिच्छेद्य कहिये जानने योग्य जेय है। जैसे अधकार जेय है तैसे ही ये हैं । याका अर्थ मुगम है ताते टीकाकार टीका न करी है। इहा बौद्धमती तर्क करै है---जो वाह्य आलोकका अभाव सो ही अधकार है इस न्यारा किछू अन्धकार वस्तु है नाही तातै सूत्रमै अन्धकारका दृष्टान्त सावनविकल है-यामैं साधन नाही ? ताकू आचार्य कहैं है;-~जो ऐसैं नाही है जो ऐसे होय तौ बाह्यप्रकाशकू भी ऐसे कहिये, जो अधकारका अभाव सो ही प्रकाश, इस सिवाय अन्य किछू वस्तु नाही । ऐसें तौ तेजवान पदार्थ हैं तिनिका असभव आवै है। सो याका विस्तारकरि निरूपण प्रेमयकमलमार्तण्ड याकी बड़ी टीका ताका नाम याका अलकार है तामैं प्रतिपादन किया है सो जानना ||६|| आगें इस सूत्रके साध्यक साधनेंविर्षे अन्यहेतु कहै है, तदन्वयव्यतिरेकानुविधानाभावाच केशोण्डकज्ञा- नवन्नक्तश्वरज्ञानवच्च ॥७॥ याका अर्थ-अर्थ भर आलोककै सान्यवहारिकप्रत्यक्षके कारण- पणाका अन्वय-व्यतिरेकका अनुविधानका अभाव है । ऐसा नियम नाही ५२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- जो अर्थ आलोक होतें तो ज्ञान उपजै अर नाही होते न उपजै जैसे केशनिका गुच्छाका ज्ञान होय है। काहूकै मांछरनिका समूह मस्तकपरि. उडै था सो काहूकू केशनिका झूमका दीख्या ऐसैं तौ अर्थ ज्ञानका कारण नाही है अर अंधकारमैं विलाव आदिकू दीखै है तातें प्रकाश : ज्ञानका कारण नाही । इहा कारणकार्यकै व्याप्तिका प्रयोग करै है-- जो जाकै अन्वय-व्यतिरेकका जोड़ न करै सो तिसका कार्य नाही जैसैं केशनिका झूमकाका ज्ञान, सो ज्ञान अर्थका अन्वय-व्यतिरेकपणा नाही करै है अर्थ तौ मांछरनिका समूह था अर ज्ञान केशनिका झूमकाका भया। तैसैं ही आलोक जो प्रकाश है, तहां यह विशेष है जो नक्तंचरका दृष्टान्त है ते नक्तंचर विलाव आदि हैं तिनि• अंधारमैं दीखै है जो प्रकाश ही ज्ञानका कारण होय तौ तिनि• अधकारमैं ज्ञान कैसै होय ॥७॥ इहा बौद्धमती तर्क करै है;-जो विज्ञान है सो अर्थ करि उपजै अर्थकै आकार होय सो अर्थका ग्राहक होय, ज्ञानकी अर्थतें उत्पत्ति न मानिये तो विषय प्रति नियमका अयोग ठहरै-घटके ज्ञानका घट ही विषय ऐसा नियम न ठहरै । बहुरि अर्थतें उपजना है सो आलोक जो प्रकाश तामैं अविशिष्ट है तातें 'ताद्रूप्य ' कहिये तदाकार होना, तिससहित ही जो ' तदुत्पत्ति' कहिये अर्थतें ज्ञानका उपजनां ताकै विषय प्रति नियमरूप हेतुपणा है। ज्ञान ज्ञेयका भिन्न काल है तोऊ ग्राह्य ग्राहकभावका अविरोध है, तैसे ही हमारे कह्या है, इहां श्लोक है ताका अर्थ-कोई पूछे जो जाका भिन्नकाल होय सो ग्राह्य कैरे होय तौ ताकू कहै है-जे युक्तिके जाननेवाले हैं ते ऐसैं कहैं। हैं- १ तथा चोकम्- भिन्नकालं कथं ग्राह्यामिति चेद ग्राह्यतां विदुः। हेतुत्वमेव युक्तिशास्तदाकारार्पणक्षमम् ॥ १॥ t/ हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ૨ यहु जो हेतुपणा है-अर्थकै ज्ञानकी उत्पत्तिका कारणपणा है सो ही ग्राह्यपणा है, कैसा है यह हेतुपणा ? अर्थके आकारक ज्ञानमें अर्पण करनेविपै समर्थ है । भावार्थ-जो अर्थकै ज्ञानका उपजावणापणा है सो ही तिस अर्थके आकार होना ज्ञानकै करै है ऐसी बौद्धकै आशका होते सूत्र कहै है,- अतज्जन्यमपि तत्प्रकाशकं प्रदीपवत् ॥ ८ ॥ याका अर्थ-जो ज्ञान अर्थकरि न उपजे है तौऊ अर्थका प्रका- गक है जैसे दीपक घट आदि अर्थते उपज्या नाही तौऊ तिनिका प्रकाशक है तैसें जानना । तहा अर्थकरि जन्य नाही है तोऊ ताका प्रकाशक है ऐसा अर्थ भया सो इहा 'अतजन्य' ऐसा शब्द है सो उपलक्षणरूप है ताकरि अतदाकार कहिये अर्थाकार न होय तौऊ ताका प्रकाशक है ऐसा भी ग्रहण करना । बहुरि दोऊ ही अर्थमै प्रदीपका दृष्टान्त है जैसे दीपककै घटादिककरि जन्यपणा नाही तथा तिनिकै आकारपणा होय नाही नौऊ तिनिकू प्रकाशै है तैसें ज्ञानकै भी है ऐसा अर्थ भया ॥ ८ ॥ डहा बौद् कहै है जो अर्थतें तौ उपज्या नाही अर अर्थकै आकर न भया ऐसे ज्ञानकै अर्थका साक्षात्कारीपणा कहोगे तो नियमरूप दिशा देश कालवी जे पदार्थ तिनिका प्रकाश प्रति नियमका अभाव होनेते सर्व ही विज्ञान अप्रतिनियन विपय कहिये न्यारे न्यारे नियमरूप विपय जाका होय ऐसा न ठहरेगा ऐसी बौद्धकी आशका होते सूत्र कहै है,- स्वावरणक्षयोपशमलक्षणयोग्यतया हि प्रतिनियत- मर्थ व्यवस्थापयति ॥९॥ याका अर्थ-अपना आवरण जो ज्ञानावरण वीर्यान्तराय कर्म नाका क्षयोपशम सो है लक्षण जाका ऐसी जो योग्यता ताकरि प्रति- स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- , नियत जो जो जिस ज्ञानका अर्थ होय सो ही विषय ताक व्यवस्था है। तहा अपना आवरण तिनिका क्षय कहिये उदयका अभाव बहुरि तिनिहीका सत्ता अवस्थारूप उपशम ये दोऊ है लक्षण जाका ऐसी जो योग्यता सो यह तौ कारणरूप है ताकरि प्रतिनियत जो अर्थ ताहि स्थापन करै है-अपना विपय कर है सो ज्ञान प्रत्यक्षप्रमाण है ऐसा सूत्रमैं वाक्य शेप है । बहुरि 'हि' शब्द है सो ' यस्मात् । अर्थमै है ताते ऐसा अर्थ भया जो जाते ऐसे है तातें बौद्ध आशका करी थी जो प्रतिनियत अर्थकी व्यवस्था न होगी सो ऐसा दोप नाही है। इहा यह तात्पर्य है जो तादूग्य कहिये तदाकारपणा अर तदुत्पत्ति कहिये तिसतै उपजना अर तदध्यवसाय कहिये तिस स्वरूप अर्थका निश्चय ये तीनू कल्पिकरि भी योग्यता अवश्य मानने योग्य है, इस विना तीनूं ही व्यभिचारसहित है । सो ही दिखाइए है;-ताद्रूप्यकै समान अर्थ- करि व्यभिचार है जो ज्ञान तदाकारपणातै उपजै सो जिस पदार्थ उपजै तिस समान अन्यपदार्थकू तिसकाल क्यो जानै नाही सो पदार्थ भी तौ तिसही आकार है, यह ही व्यभिचार। बहुरि तदुत्पत्तिकै इन्द्रि- यआदिकरि व्यभिचार है, इन्द्रियतै उपजै है अर इन्द्रियनिकू तिसकाल क्यो नाही जानै, यह ही व्यभिचार । बहुरि तिनि दोऊनिकै भी समान अर्थ समनंतर प्रत्ययनिकरि व्यभिचार है, पहिले क्षण जैसै नीलका ज्ञान भया सो दूसरे क्षण सो ज्ञान तिस नील ज्ञानका उपजावनहारा है अर तिसतैं तदाकार भी है अर पहले क्षणका ज्ञानकू क्यो जानै नाही यह ही व्यभिचार । बहुरि ताद्रूप्य तदुत्पत्ति, तदध्यवसाय, इनि तीनूंनिकै धोला शखकै विपैं पीलेका ज्ञान होय तहा व्यभिचार है, काहूके नेत्र- विर्षे कामला रोग था ताकू धौला शख पीला दीख्या तहा धोला आका- रकरि पीला आकारका ज्ञान उपज्या । बहुरि जो तदाकार ज्ञान अर

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
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तिसका निश्चय भया सो ऐसा ज्ञानकरि दूजे क्षण तैसा ही ज्ञान उपज्या
सो तदाकार भी है तिसका निश्चयस्वरूप भी है: अर पहले क्षणका
पीताकारज्ञान क्यो नाही जाने, यह ही व्यभिचार । ऐसै च्यारू ही
प्रकार यह व्यभिचार भया, ताक् क्षयोपशमलक्षणयोग्यता मानना श्रेष्ठ
है । इस ही कयनकरि जो बौद्धनै ऐसे कह्या ताका श्लोक है ताका
अर्थ-प्रत्यक्ष ज्ञान निर्विकल्प है ताहि अर्थ रूपता विना अन्य कोई
अर्थ करि नाही रच, अर्थरूपता ही प्रत्यक्षरूप निर्विकल्प ज्ञानकू अर्थकार
जोड है तातै प्रमेयका जानना प्रमाणका फल है प्रमेयरूप होना सो ही
ताका प्रमाण है, ऐसे कहना निराकरण किया जातै समान अर्थनिके
आकार भये जे अनेक ज्ञान तिनिविर्षे प्रमेयरूप होनेका सद्भाव है।
बहुरि बौद्धमती यहु सारूप्य मान है सो समानपरिणामरूप समान्य ही
सारूप्य है सो सामान्यक वस्तुभूत नाही मान है सो अवस्तुभूत होय
सो काहेका सारूप्य ? तात यह ही ठहरै है जो क्षयोपशमलक्षण
योग्यता है सो ही विषय प्रति नियमका कारण है ॥९॥
आगे कोई ऐसा मानै है-जो अर्थ है सो ज्ञानका कारण है याहीत
अर्थ जेयरूप कहिये है ऐसा मतकू निराकरण करै है ताका सूत्र;-
कारणस्य च परिच्छेद्यत्वे करणादिना व्यभिचारः १०॥
याका अर्थ-जो कारणकै परिच्छेद्यत्व कहिये ज्ञेयपणा मानिये तो
नेत्रादि करण है तिनिकरि व्यभिचार होय है, ते कारण तौ हैं अर
परिच्छेद्य नाही है आप आप नाहीं जाने है । इहा वह कहै जो हम
कारणपणातै परिन्छेद्यपणा नाही कहैं हैं परिच्छेद्यपणानै कारणपणा कहै
.
१ एतेन यदुक्क
अर्थेन घटत्येनां न हि मुक्त्वार्थरूपताम् ।
तस्मात्प्रमेयाधिगते प्रमाणं मेयरूपता ॥१॥

૧૨ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- N हैं जो ज्ञेय होय सो कारण होय तौ ऐसैं कहे केशनिका झूमका आदि- करि व्यभिचार होय है सो पूर्वै कह्या ही था काहूके मस्तक परि मांछेर उडै थे सो काहूकू केशनिका झुमका दीख्या सो ते मांछर ज्ञानके कारण न भये ॥ १०॥ आगै अब अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष जो मुख्य प्रत्यक्ष ताहि कहै है; सामग्रीविशेषविश्लेषिताखिलावरणमतीन्द्रियमशे षतो मुख्यम् ॥ ११॥ याका अर्थ-सामग्री जो द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावलक्षण ताका विशेष जो सर्वकी पूर्णता-एकता मिलना ताकरि दूरि भये हैं अखिल कहिये समस्त आवरण जाके ऐसा, बहुरि अतीन्द्रिय कहिये इन्द्रियनिकू उलंधि वर्ते, बहुरि अशेषतः कहिये समस्तपणांकरि विशद कहिये स्पष्ट ऐसा ज्ञान मुख्य प्रत्यक्ष है ॥ ११॥ इहां कोई पूछ समस्तपणाकरि विशदपणांविर्षे कहा कारण है. ? ताकू कहिये-ज्ञानका प्रतिबंध जो कर्म ताका अभाव कारण है हम ऐसे करें हैं । फेरि पूछे तहां भी कहा कारण है ? ताकू कहिये अतीन्द्रियपणां है अर अनावरणपणा है ऐसैं कहैं हैं फेरि पूछे यह भी काहेरौं है ? ताका समाधानकू सूत्र कहै है सावरणत्वे करणजन्यत्वे च प्रतिबंधसंभवात् ॥१२॥ याका अर्थ-जो ज्ञानकै आवरणसहितपणां होय अर इंद्रियजन्य- पणा होय तौ प्रतिबंध संभवै तातै निरावरण अतीन्द्रिय होय सो. ही मुख्य प्रत्यक्ष है । इहा कोई कहै कि अवधि मनःपर्यय ज्ञानका इंस सूत्रकरि ग्रहण न भया ताः यह लक्षण अव्यापक है ? ताकू आचार्य कहै है-ऐसें न कहना तिनि दोऊनिकै भी अपने विपयविर्षे समस्त पणांकरि विशदपणां आदि धर्म संभव है। बहार ऐसे मति-श्रुतज्ञानकै - तो हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ५७ अपने विपयविौं भी विशदपणा नाही है ऐसैं अतिव्यक्ति दूपणका भी परिहार है सो यह अतीन्द्रिय अवधि, मनःपर्यय, केवलके भेदतै तीन प्रकार मुख्य प्रत्यक्ष है जाते ये आत्माके सनिधिमात्रकी अपेक्षातै उपजै हैं; अन्य इन्द्रिय आदिकी अपेक्षा इनिकै नाही है। इहा मीमासकमती भट्टमताका आशय ले कहै है, जो समस्त विपयविपै विशदका अवभासनेवाला ज्ञानकै अर तिस ज्ञानसहित पुरु- पकै प्रत्यक्ष आदि पाच प्रमाणका विपयपणाका अभावपणाकरि अभाव प्रमाण सो ही भया विपमसर्प ताकरि नष्ट भई है सत्ता जाकी तिस- पणातें कौनकै मुख्य प्रत्यक्ष होय है। भावार्थ-सर्वका जाननेवाला ज्ञान अर सर्वज्ञ ये पाचू ही प्रमाणका विषय नाही-अभाव प्रमाणका विषय है तातें अभाव ही सिद्ध होय है । सो ही कहै है,--प्रथम प्रत्यक्ष प्रमाण है ताका सर्वज्ञ विपय नाही, जातै प्रत्यक्षकै तौ रूपा- दिक नियमरूप जे विपय तिनिविर्षे प्रवर्त्तनपणा है इन्द्रिय प्रत्यक्ष जो विषय सवधरूप होय अर वर्त्तमान होय ताही विषय (वि) प्रवत्र्त है सो समस्तका ज्ञाता सर्वज्ञ इन्द्रियनितें सबद्ध नाही वर्तमान नाही । बहुरि अनुमानतें भी ताकी सिद्धि नाही है, जातै ग्रहण किया है संबंध जानें ऐसा पुरुपकै वस्तुका एकदेश देखनेंतै दूरववर्ती वस्तुविर्यै बुद्धि होय है सो सर्वज्ञका सद्भाव" अविनाभावी कार्यलिंग तथा स्वभावलिंग हम नाही देखै हैं जाते अनुमान करें, जातै सर्वज्ञके जानें पहली तिसका स्वभाव अर तिसका कार्य जो तिसके सद्भाव" अविनाभावीका निश्चय करनेका असमर्थपणा है । वहुरि आगमप्रमाणकरि भी ताकी सिद्धि नाही है । इहा दोय पक्ष-आगम नित्यरूप तिसके सद्भावकू जनावै है कि अनित्य आगम जनावै है ८ तहा नित्य आगम तौ ताका सद्भाव नाही जनावै है जात नित्य तौ अर्थवादरूप है प्रयोजनमात्रकू कहै है ।

५८ स्वर्गीय पं. जयचंदजी विरचित- N अपौरुषेय वेद है सो कर्मविशेष जो यज्ञ आदि शुभकार्य ताका संस्त- बन कहिये प्रशसादिक ताकै विपै प्रवीण है सो पुरुषविशेषका जनावन- हारा नाही । पुरुष तौ आदि लिये हैं अर नित्य आगम वेद है सो अनादि है सो अनाठिकै आदिमान पुरुषका कहना वण नाही । बहुरि जो अनित्य आगम स्मृति पुराण आदि है ते सर्वज्ञकू साधै है ऐसैं कहिये तौ तिस अनित्य आगमकै (कू) भी सो सर्वज्ञका कह्या कहिये तो सर्वज्ञका निश्चय पहिले किया विना ताका प्रमाणपणांका निश्चय नाही होय है, बहुरि इतरेतराश्रयनामा दोष आवै है, सर्वज्ञके कहे पणेंतें तौ तिस आगमका प्रमाणपणां सिद्ध होय अर तिस आगमका प्रमाणपणांकी सिद्धितै सर्व- ज्ञकी सिद्धि होय ऐसे इतरेतराश्रयदोष होय । बहुरि असर्वज्ञका कह्या आगमका प्रमाणपणा ही नाही ताकै सर्वज्ञका प्ररूपणविपै प्रवीणपणां है ऐसा कहना ही अतिशयकरि असभाव्य है । बहुरि सर्वज्ञसमान अन्यका ग्रहणका असभवतै उपमान प्रमाण ताका सद्भाव नाही जनावै है । बहुरि अर्थापत्तिप्रमाण है सो भी सर्वज्ञका जनावनेवाला नाही है जाते याका अनन्यथाभूत वस्तुतें जानना है, सो कोई ऐसा वस्तु नाही जो सर्वज्ञ- विना न होय ताकरि अर्थापत्ति सर्वज्ञकू जनावै । बहुरि जो वर्मादिक- पदार्थ है तिनिका उपदेश है ताकरि अर्धापत्ति होय ऐसै कहिये तौ धर्म आदिका उपदेश तौ व्यामोहते भी सभव है, जाते उपदेश दोय प्रकार है सम्यक् उपदेश, मिथ्या उपदेश । तहा मनु आदि ऋषि भये हैं तिनिका तौ सम्यक् उपदेश है जातै तिनिकै यथार्थज्ञानका उदय सो वेदमूल है-वेद उपज्या है । बहुरि बुद्ध आदिका उपदेश है सो व्यामोहपूर्वक है जातै तिनिकै ज्ञान वेदतै उपज्या नाही ते-वेदा- र्थके जाननेवाले नाही । तातै सर्वज्ञ पांचू ही प्रमाणका विषय नाही, तहा अभाव प्रमाणहीकी प्रवृत्ति है ताकरि सर्वज्ञका अभाव ही जानिये हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ५९. -प्रथम तौ है । पाच प्रमाणका तौ व्यापार भावके अशविर्षे ही होय है ऐसैं भट्टमती अपने मतका समर्थन कीया । अब आचार्य ताका प्रतिविधान करै है, कह्या जो सर्व- जकै प्रत्यक्षादिक प्रमाणका अविषयपणा है सो अयुक्त है जाते तिस सर्वज्ञका ग्राहक अनुमान प्रमाणका सभव है, सो ही कहै है,-कोई पुरुप सकल पदार्थका साक्षात् करनेवाला है जातै तिनि पदार्थनिके ग्रहण करनेका स्वभावपणाके होते सतें प्रक्षीणप्रतिबधप्रत्ययपणा है, भावार्थ-सूक्ष्म आदि पदार्थनिकू ग्रहण करनेका पुरुपका स्वभाव है सो ज्ञानका प्रतिबंधक कर्मके नाग भये ज्ञान प्रकट होय है। जो जिसका ग्रहणस्वभावपणाकू होतै प्रक्षीणप्रतिबधप्रत्यय होय सो तिसका साक्षात् करनेवाला होय जैसे जाका तिमिर दूरि भया ऐसा नेत्र सो रूपका साक्षात् करनेवाला होय, सो इहा तिसके ग्रहणरूप स्वभावपणाके होते प्रक्षीणप्रतिबंधप्रत्ययस्वरूप विवादमै आया कोई पुरुप है । ऐसे च्यार प्रयोगका अनुमानकरि सर्वज्ञका सद्भाव मीमासककू आ चार्य. बताया । बहुरि सकल पदार्थनिका ग्रहणस्वभावपणा कह्या सो आत्माकै असिद्ध नाही है जातै आत्माका ऐसा स्वभाव न मानिये तौ वेदतें सकलपदार्थका ज्ञान होय ऐसे कहनेका अयोग आवै है, जैसे आधे पुरुपकै आरसेतूं रूपकी प्रतीतिका अयोग होय तैसैं । बहुरि व्याप्तिज्ञानकी उत्पत्तिके बलतै समस्तपदार्थसबधी परोक्षज्ञानका सभव मानिये ही है, इहा केवल एक ज्ञानकै विशदपणा जो स्पष्टपणा-प्रत्यक्ष- पणा ताही विपैं विवाद है । तहा आवरणाका दूर होना ही कारण है, जैसे धूलिते आवरण तथा बरफका आवरण कोई पदार्थकै होय सो आवरण दूर होय तब पदार्थ स्पष्ट दीखै तैसै ज्ञानकै कर्मका आवरण दूर होय तब ज्ञान स्पष्ट प्रगटै है । बहुरि पूछ है जो प्रक्षीणप्रतिब- -६० स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- धप्रत्ययपणा कैसे है ? ताका समाधान प्रयोग करै है;-दोष अर आवरण कोई पुरुप विौं मूलते नाश होय है जातै इनकी हानि बधती बधती देखिये है सो जाकी बचती हानि है सो कोई वि. मूलते समस्त भी नाश होय है, जैसै अग्निके पुटका पाकतें दूर भये हैं कीट अर कालिमा आदि अतरग बहिरग दोज मल जाकै ऐसे सुवर्ण शुद्ध होय है तैसे ही वधती बधती हानिरूप दोप अर आवरण हैं, ऐसा प्रयोग जानना । बहुरि विवाढमैं आया जो ज्ञान ताकै आवरण कैसे सिद्ध है जातै प्रतिपेध है सो विधिपूर्वक है ? इहां कहिये है--विवादमै आया जो ज्ञान सो आवरणसहित है जाते अपने विपयकू अविशदपणाकरि जनावनहारा है जैसे रज करि तथा धूम बरफ आदि करि पदार्थ अंतरित होय है आच्छादित होय है तैसै है। बहुरि कोई कहै आत्मा तौ अमूर्तीक है सो अमूर्तपणातै आवरणका अयोग्य है ? सो ऐसे नाही है, चैतन्यकी शक्ति अमूर्तीक है तौऊ मदिरा तथा मांचणा कोदूं आदि करि याकै आवरण होय है । कोई कहै मदिरादिकरि तौ इन्द्रियकै आवरण है तो ऐसे भी नाही है जाते इन्द्रिय तौ अचेतन है सो आवरण भये भी अनावरणा समान ही है बहुरि स्मरण आदिका प्रतिबंधका अयोग होय, मतवालाकै स्मरण नाही है जो इंद्रियहीकै आवरण होय तौ मदोन्मत्तकै स्मरण कैसैं न होय । बहुरि मनकै भी आवरण न कहिये जाते आत्मा विना अन्य मनका निषेध आण करेंगे तातै अमूर्तिककै आवरणका अभाव नाही है । तातै तद्ग्रहण स्वभावपणा होते प्रक्षीणप्रतिबंध प्रत्ययपणा हेतु है सो असिद्ध नाही है । बहुरि यह हेतु विरुद्ध भी नाही है जातै विपरीत जो विपक्ष आत्माकै सूक्ष्मादिग्रहण स्वभावका ताविपैं निश्चयस्वरूप जो अविनाभाव ताका अभाव है। वहुरि यहु हेतु अनैकान्तिक भी नाही है जातै एकदेशकरि तथा साम- . अभाव हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । ६१ स्त्यकरि विपक्षकै विपै वृत्तिका अभाव है। बहार कालात्ययापदिष्ट भी नाही है जाते यातें विपरीत अर्थका स्थापनेवाला प्रत्यक्षप्रमाण तथा आगमप्रमाणका अभाव है । बहुरि सत्प्रतिपक्ष भी यह हैतु नाही है जातें इसका प्रतिपक्षसाधनेका हेतुका अभाव है। इहा मीमासक कहै है-जो याका प्रतिपक्षका साधनका अनुमान यह है ताका प्रयोग-विवादमै आया जो पुरुप सो सर्वज्ञ नाही है जातै वक्ता है, पुरुष है, हास्तदिकसहित है ऐसै तीन हेतुतै पुरुष सर्वज्ञ नाही जैसे हरेक गैलै चालता पुरुष सर्वज्ञ नाही तैसें । ताका समाधान आचार्य करै है, जो यह कहना सुन्दर नाही जाते वक्तापणा आदि तीन हेतु कहे ते समीचीन भले हेतु नाही । इहा तीन पक्ष पूछिये, जो वक्तापणा कहा सो प्रत्यक्ष-अनुमानत विरुद्ध अर्थका वक्तापणा कह्या कि अविरुद्ध अर्थका वक्तापणा कह्या कि वक्तपणा सामान्य कह्या ? इनि तीन सिवाय चौथी गति नाही है। तहा प्रथमपक्ष तौ न बणै हैं याकै तौ सिद्धसाध्यपणाका प्रसग है जातै प्रत्यक्ष अनुमानतें विरुद्ध अर्थ कहै सो सर्वज्ञ काहेका ? बहार दूसरा पक्ष कह्या सो यह विरुद्ध है जातै प्रत्यक्ष अनुमान विरुद्ध अर्थ कहै सो ऐसा वक्तापणा तौ ज्ञानके अतिशयविना न बणै जामै ज्ञान बहुत होय सो ही वक्ता सत्यवादी होय। बहुरि वक्तापणा सामान्य है सो भी विपक्षतै अविरुद्ध है । तातै प्रकरणगोचर जो साध्य असर्व- ज्ञपणा ताकू साधनेविषै समर्थ नाही । ज्ञानकी बधवारी होते वक्तापणाकी हानि दीखै नाही, उलटा ज्ञानकी वधवारीवालाकै वचनकी प्रवृत्तिकी बधवारीका सभव है । इस ही कथनकरि पुरुपपणा हेतु भी निराकरण किया। पुरुपपणा होते जो रागदिदोपदूपत होय तौ सिद्ध साध्यता ही है ताकै सर्वज्ञपणाका अभाव सिद्ध ही है अर रागादि दोपकरि दूपित नाही होय तौ हेतु विरुद्ध है, वीतराग विज्ञान आदि गुणनिकरि युक्त ६२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- है पुरुपपणाका सर्वज्ञ विना अयोग है । बहुरि पुरुपपणा सामान्य है सो -सन्दिग्धविपक्षब्यावृत्तिक है असर्वज्ञपणाका विपक्ष सर्वज्ञपणा सो कोई 'पुरुपमैं होय भी तातै विपक्षतै व्यावृत्ति संदेहरूप है । ऐसें सकल पदा- र्थका साक्षात्कारीपणा कोई पुरुपकै सिद्ध होय है इस अनुमानते यातै पाच प्रमाणका विषय सर्वज्ञ नाही ऐसे कहना अयुक्त बहुरि असर्वज्ञवादी कहै है-जो इस अनुमानविपै सामान्य सर्वज्ञपणा सिद्ध भया सो यह सर्वज्ञपणा अरहंतकै है कि अन्यकै है ? जो कहोगे अन्य जे बुद्ध आदि तिनिकै है तौ अरहंतके वाक्य अप्रमाण ठहरेंगे। बहुरि कहोगे अरहंतके है तो आगम करि सामर्थ्यकरि अथवा स्वशक्ति कहिये अविनाभावी लिंगपणा ताकरि अथवा ताका दृष्टान्तका अनुग्रह करि तिस हेतुतै अरहतको सर्वज्ञ जाननेका असमर्थपणा है जाते हेतुकै अन्यपक्ष जो बुद्धादिक तिनिविपै भी समानवृत्ति है, जैसे हेतुतै अर- हतकै साधिये तैसे ही बुद्ध आदिकै भी सिद्ध होयगा । ऐसै असर्व- ज्ञवादी मीमासक आदिक कहैं । सो यह कहना भी तिनिकै अपने घातकै अर्थि कृत्य कहिये करतूति तथा शस्त्रविशेप तथा मारीका उठा- वना है जातै ऐसे पूछना है सो तौ सर्वज्ञसामान्यका माननेंपूर्वक है। -सो सर्वज्ञ सामान्य मान्या तब अपनी पक्षका घात भया । अर जो सर्वसामान्य न मानिये तो काहूहीकै सर्वज्ञपणां नाही है ऐसे ही कहना। बहुरि प्रसिद्ध अनुमानविपै भी इस दोषका सभवकरि जातिनामा दूष- णरूप उत्तर होय है, सो ही कहिये है;-जैसे काहूनै अनुमान किया जो शब्द नित्य है जातै प्रत्यभिज्ञानकरि जान्या जाय है, ऐसे कहनें" जातिवादी कहै है-शब्दकू व्यापकरूप नित्य साधिये है कि अव्याप- करूप नित्य साविये है ? जो अव्यापकरूप नित्य साधिये है तौ व्याप- कपणा करि मान्या जो शब्द सो किछू भी अर्थकू पुष्ट नाही करै है

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला ।
६३
व्यापक माननां निरर्थक ठहरया, मीमासक शब्दकृ व्यापक मान है। बहुरि
व्यापकरूप शब्द नित्य साधिये तो आगमकरि अथवा सामर्थ्यकरि
अथवा अपनी शक्तिकरि तथा दृष्टान्तके अनुग्रहकरि व्यापकपणा नाही
निश्चय होय है जात अव्यापक नित्यपक्षवि भी याकी समानवृत्ति है,
तात जाति-उत्तर होय है। दोज पक्षवि प्रश्न उत्तर समान होय जाय
तहा जातिनामा दूपण होय है । ऐसें पूर्व सर्वज्ञका साधनरूप हेतु कह्या
सो निर्दोप है तातें सर्वज्ञ सिद्ध होय है। बहरि जो अभावप्रमाणकरि
सर्वज्ञकी सत्ता ग्रासीभूत करी कही सो भी अयुक्त है-तिस सर्वज्ञका
ग्राहक अनुमानप्रमाणका सद्भाव होते पाच प्रमाणका अभाव है मूल
जाका ऐसा जो अभाव प्रमाण ताकी उत्पत्तिकी सामग्रीका अयोग है
जाते है मीमांसक ! तेरे ही मतमै ऐसा कह्या है ताका श्लोक है,
ताका अर्थ-वस्तुका सद्भावकू ग्रहण करि बहुरि ताका प्रति-
योगीकू यादि करि इन्द्रियनिकी अपेक्षारहित मनसबंधी नास्ति-
ताका ज्ञान उपनै है अन्यप्रकार नाही उपजै है । ऐसे होते तीनकाल
तीन लोकस्वरूप जो वस्तु ताका सद्भावका ग्रहणविपै कोई काल कोई
क्षेत्रवि ग्रहण किया जो सर्वज ताका स्मरण होते कोई क्षेत्र कालविपै
ताकी नास्तिताका ज्ञानरूप अभावप्रमाण युक्त होय है, अन्यप्रकार नाही
है। सो कोई छद्मस्थ असर्वज्ञजनकै तीन जगत तीनकालका ज्ञान नाही
वणे है तात सर्वज्ञ अतीन्द्रियका ज्ञान न होय है, यह सर्वज्ञपणां चैत-
न्यका धर्म है तात अतीन्द्रिय है सो भी असर्वज्ञ जनका विषय नाही
ऐसे होते अभावप्रमाण कैसे उदयकू प्राप्त होय । असर्वज्ञ पुरुषकै तिस
सर्वज्ञके अभावकी उपजावनेंकी सामग्रीका संभवका अभाव है । वहुरि
१ गृहीत्वा वस्तुसद्भावं स्मृत्वा च प्रतियोगिनम् ।
मानसं नास्तितासानं जायतेऽक्षानपेक्षया ॥२॥

६४
स्वर्गीय पं0 जयचंदजी विरचित-
जो असर्वज्ञकै सर्वकाल सर्वक्षेत्रका ज्ञान मानि सर्वज्ञके अभावका उप-
जनेंकी सामग्री मानिये तो ऐसें जाननेवालाहीकै सर्वज्ञपणा ठहरया ।
बहुरि कहै-~~-जो इस क्षेत्र कालमै सर्वज्ञका अभाव साधिये है तौ युक्त
नाही यामैं सिद्धसाध्यपणाका प्रसग आवै है कोई क्षेत्र कालकी अपेक्षा
सर्वज्ञका अभाव सिद्ध ही है, सिद्धकू कहा साधिये । तातें मुख्य अती-
न्द्रियज्ञान समस्तपणाकरि विशद ऐसा सिद्ध भया।
बहुरि सर्वज्ञका ज्ञान अतीन्द्रिय है तातै अपवित्रका देखना तिसका
रंसका आस्वादन करना ऐसा दोप भी निराकरण भया, अशुच्यादिकका
देखनां रसका आस्वाद करना दोप तौ इन्द्रियज्ञान अपेक्षा कह्या
वीतरागकै यह दोप नाही।
बहुरि पूछे है--जो अतीन्द्रियज्ञानकै.विशदपणा कैसे है; हम तौ
नेत्रादिकतै स्पष्ट ज्ञान होता जानैं हैं । ताका समाधान;-जैसे सांचा
स्वप्नका ज्ञानकै तथा भावनाका ज्ञानकै विशदपणां है तैसैं इन्द्रियनि
विना भी विशदपणा जानना, जातै देखिये है~भावनाके बलतें दूर-
देश अन्यदेशवर्ती वस्तुकौं विशद जानिये है, जैसे कया है ताका श्लोक
है; ताका अर्थ---काहू कामीजनकू बदीखानेमै दीया सो कहै है;-
देखो ! यह गुप्त आछाद्या जुड्या जो बंदीखानांका घर तहां ऐसा
अंधकार जो सूईके अग्रभागकरि भी भेद्या न जाय तहा मेरे नेत्र मीचिं-
करि में बैठा तोऊ तिस स्त्रीका मुख मोकू प्रगट दीखै है । ऐसा काहू
कामीका वचन है सो ऐसे बहुत उदाहरण हैं। इन्द्रियानिके संबंध विना
केवल मनकै ही द्वारा विशद-स्पष्ट प्रतिभास होय है, ऐसे मीमासककू
तौ उत्तर दिया ।
१ पिहिते कारागारे तमसि च सूचीमुखाग्रदुर्भद्ये।
मयि च निमीलितनयने तथापि कान्ताननं व्यकम् ॥१॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ६५ अब इहा नैयायिक बोले है, जो सर्वज्ञपणाकी तौ सिद्धि भई परंतु आवरणके अभावत सर्वज्ञपणा है यह नाही वणे है, गरीर इन्द्रिय लोक आदि ये कार्य हे तिनिके निमित्तपणाकरि सर्वजकी सिद्धि होय है । बहरि डहा गरीर आदि कार्यनिका होना बुद्धिवान पुरुपकार किये होय है मो असिद्ध नाही है जात अनुमान प्रमाण आदिकतै इह नीकै प्रसिद्ध होय है, मो ही कहिये है, ताका प्रयोग करे है-नाही निश्चयमै आये-विवादमे आये जे पृयित्री पर्वत वृक्ष गरीर आदिक सो कोई बुद्धिवान पुरुपके रचे है तिम हेतुक है जाते ये कार्यरूप है कार्य होय सो किया विना होय नाही । बहुरि इनिका उपादान अचेतन है। बहुरि इनिका सनिवेश कहिये आकाराटिकी रचना सो भलै प्रकार है ऐसे आकारादिक बुद्धिमान पुरुप विना होय नाही जैमै वस्त्र आदिका वनावनेवाला कारीगर तिनिकी यथास्थान रचना बनावै तैसैं ये काहनें बनाये है । वहरि आगम भी तिस सर्वज्ञका प्रतिपादक सुनिये है, सो वेदका वचन है-' विश्वतश्चक्षु' कहिये सर्व तरफ जाके नेत्र हैं-समस्तक देखे है, 'उन विश्वतो मुख.' कहिये सर्व तरफ जाका मुग्य है, बद्दरि 'विश्वतो बाद ' कहिये सर्व तरफ जाका भुजानिका व्यापार है, 'उत विश्वत पात् ' कहिये सर्व तरफ जाके पग हैं-~सर्व व्यापक हैं, बहुरि ‘सबाहभ्या धमति' कहिये पुण्य पापतै सर्वकू जोड़े है-सर्व प्राणीनिकै पुण्य पापका सयोग कर है, ऐसा 'सपतत्रैः द्यावा- भूमी जनयन् देव एक.', कहिये एक देव ईश्वर है सो पृथिवी आकाशकू परमाणूनिकरि उपजावता मता पर्ने है । बहुरि व्यासका वचन ऐसा १-विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतो वाहुरुत विश्वतः पात सम्याटुभ्यां धमति सम्पतत्रैवाभूमी जनयन् देव एक ॥ हि प्र.५ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- है;-ताका श्लोक है ताका अर्थ, यह जतु कहिये जीव सो अज्ञानी है आप ही आपकै सुख दुःख करिवेकू असमर्थ है यात ईश्वरका प्रेरया हुआ स्वर्ग तथा नरककू गमन करै है । बहुरि ऐसे भी न कहना जो अचेतन जे परमाणु आदि कारण तिनिहीकरि कार्यकी निष्पत्ति होय है तातै बुद्धिमान कारणका अनर्थकपणा है जाते अचेतनकै कार्यकी उत्पत्तिविपै आपहीते व्यापार करनेका अयोग है-जड़ आप ही कार्य करि सके नाही, जैसे कोलीके राछ वेम तुरी अर ततु इनितै आपहीते वस्त्र बणे नाही कोली पुरुप व्यापार करै तब वणै । बहुरि ऐसे चेतनकै भी अन्यचेतनपूर्वक कार्य करना नाही है जाते यामैं अनवस्था आवै । ईश्वर है सो सकल पुरुषनितै बडा है समर्थ है अतिशयकी हदकू प्राप्त है, सर्वज्ञवीज कहिये जगत्का कारण सर्वज्ञ सो ही बीज है । बहुरि क्लेश कर्म विपाक आशय इनिकरि अपरामृष्ट है-रहित है । बहुरि अनादिभूत अविनाशी ज्ञानका संभव जाकै है, ऐसे ही पतंजलिनै कह्या है-क्लेश कहिये अविद्या १ अस्मिता १ रागद्वेष १ अभिनिवेश १, तहा अविद्या तौ विपरीत जानना सो है, बहुरि अस्मिता कहिये अहंकार, रागद्वेष कहिये सुख-दुःख तथा ताके साधनविष प्रीति- अप्रीति, अभिनिवेश कहिये अपना ईश्वरपणाका भगका भय, ये तो क्लेशके विशेष | बहुरि कर्म कहिये धर्म-अधर्मके साधन यज्ञ अर ब्रह्महत्यादिक। बहुरि विपाक कहिये जाति आयु भोग, तहा जाति देव मनुष्य आदि- १-अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्ग वा श्वभ्रमेव वा ॥१॥ २-यदाह पतञ्जलि,- क्लेशकर्मविपाकाशयरपरामृष्टः पुरुषः सर्वशः स पूर्वपामपि गुरुः कालेनाविच्छेदादिति ।

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ६७ पणा, आयु कहिये आयुर्वल, मुख दुःखका भोगना सो भोग ये विपा- कके विशेष । बहुरि आशय कहिये निवृत्ति ताई जो भाव लाग्या रहै सो ऐसे भावनिकरि सर्वज्ञ पुरुप स्पर्शित नाही है । सो सर्व ही विर्षे गुरु है वडा है कालकरि जाका विच्छेद नाही है, ऐसे पतजलिके वचन हैं चहुरि अवधूत जो सन्यामीनिका आचार्य ताके ऐसे वचन है, श्लोकका अर्थ, हे भगवन् । एते विशेषण तेरे ही हैं, प्रथम तौ जो काहूकरि हत्या न जाय ऐसा ऐश्वर्य ते ही है, बहुरि स्वभावहीतें विरागता तेरै ही है, वहरि स्वभावतै उपजी तृप्तिता तेरै ही है. बहुरि इन्द्रियनिका वश करना तेरै ही है, बहुरि अत्यन्तमुख तेरे ही हैं, वहुरि आवरणरहित शक्ति तेरे ही है, बहुरि सर्वविषयका जाननहारा ज्ञान तेरै ही है ऐसा अवधूतका वचन है। ऐसे ईश्वर सर्वते वडा है तातै कार्यके करनेंमैं अनवस्था नाही है। बहुरि तहा ईश्वरकी सिद्धिक कार्यत्वनामा हेतु है सो असिद्ध नाही है, अवयवसहितपणाकरि कार्यत्वकी सिद्धि है जो अवयवनिकरि सहित होय सो कार्य है सो किया ही होय । बहुरि यह हेतु विरुद्ध भी नाही है जात याकी विपक्ष जो विना किया होना ताविर्षे वृत्तिका अभाव है। बहुरि अनेकान्तिक भी नाही है विपक्ष जे परमाणु आदि तिनि विपैं याकी अप्रवृत्ति है, परमाणु आप कार्य नाही । बहुरि प्रकरणसम भी नाही है जातै प्रतिपक्षकी सिट्रिका कारण जो अन्य हेतु ताका अभाव है। २-ऐश्वर्यमप्रनिहत सहजो विराग- स्तृप्तिर्निसर्गजनिता वशितेन्द्रियेषु । आत्यन्तिकं सुखमनावरणा च शक्ति- निं च सर्वविपयं भगवस्तवैव ॥ इत्यवधूतवचनाच्च ।

६८ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- बहुरि इहा कोई कहै-~याका प्रतिपक्षका साधन हेतु है, ताका प्रयोग -तनु आदि बुद्धिमान हेतुक नाही है जातै देख्या है कर्ता जाका ऐसा जो प्रासाद आदिक तिनितै यह तनु आदि विलक्षण हैं, प्रासाद आदि सारिखे नाही, जैसैं आकाश आदिक है, ऐसैं याका प्रतिपक्षका हेतु है तनु आदिककै अकर्ताकू साथै है, तातै कार्यत्व हेतु प्रकरणसम है। ताकू नैयायिक कहै है-यह कहना अयुक्त है जातै इस हेतुकै असिद्धपणा है, सनिवेशविशिष्टपणांकरि प्रासादादिकतै समानजाती- यपणाकरि शरीरादिकका उपलंभ है जैसे प्रासादादिकका आकार रचना- विशेष है तैसै ही शरीरादिकका आकार ऐसा ही रचना विशेष है। बहुरि कहोगे जैसा प्रासादादिकवि संनिवेशविशेप देखिये है तैसा तनुशरीर आदि विष नाही तौ सर्व ही एकसे सर्वस्वरूप तौ होय नाही कोईमै किच्छू विशेष होय कोईमैं किछू होय । अतिशय- सहित सनिवेश होय सो सातिशय काकू जनावै है, जैसे प्रासा- दादिक, जो प्रासाद सुन्दर वणै तब जानिये चतुर कारीगरनै वणाया है। बहुरि कोईका तौ कर्ता दृष्ट है-जानिये है फलाणांनैं बनाया है अर कोईका कर्ता अदृष्ट है जाण्या न पड़े है तौ इनि दोऊ रीतिते तौ बुद्धिवानका किया अर बुद्धिवान न किया स्वयमेव है ऐसा सिद्ध होय नाही । मणि मोती आदिका कर्ता कौन देख्या ये स्वयमेव भये ठहरै है, ऐसै सनिवेशविशेप हेतु सिद्ध है। इस ही कथनकरि अचेतन उपादानपणां आदि हेतु भी दृढ किया। ऐसैं बुद्धिवान हेतुक तनु आदि है ऐसा भलै प्रकार कह्या हुवा बणै है । इस ही हेतु” सर्वज्ञ- पणा सिद्ध होय है। ऐसे नैयायिकनै अपना मत दृढ किया । ताका समाधान आचार्य करै है; जो यह कहना अनुमानरूप मुद्रा करनेकू धनकरि रहित दरिद्रीके वचन है जातै कार्यत्व आदि हेतु हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । ६९ कहे निनिकै असम्यक् हेतुपणाकरि तिनि हेतुनिकरि उपज्या ज्ञानकै मिध्यारूपपणा है, तो ही कहिये है-यह कार्यत्वनामा हेतु कह्या सो याका कहा स्वल्प है, स्वकारणमत्तासमवायस्वरूप कार्यत्व है, कि अभूत्ग भावित है, कि अक्रियादीके कृतबुद्धि उत्पादक- पणा है, कि कारण व्यापारक अनुविधायीपणा है ? इनि मिवाय गतिका अभाव है, ऐने चार पक्ष पूछिये हैं। तहा आदिका पक्ष कहेगा तो योगीश्वरनिके समस्त कर्मका नाशनामा जो कार्य सी भी कार्यत्वपक्षम ही है ताविप कार्यत्वनामा हेतुकी अप्रवृत्ति है यान हेतु भागासिद होयगा । जो हेतु पक्षके कोई देशमैं न व्यापै सो भागामिद्ध कहिये । सो इस कर्मका नागविय स्वकारणसमवाय भी नाही भर मत्तासमवाय भी नाही । बस्नुको मत्ताम् एकता होय सो तो मचानमवाय कहिये, बरि वस्तुके कारण एकता होय सो स्वका- रणनमवाय कहिये। सो कर्मका नाश प्रध्वमनामा अभावस्वरूप सो याम मत्ता मी नाही अर समवाय भी नाही जाते सत्ता तो द्रव्य, गुण, क्रियाक आधार मानिये है, बहुरि समवाय द्रव्य, गुण, कर्म, मामान्य. विगेप, इनि पाच पदार्थम वर्त्तनेवाला मानिये है यह नया- यिक-शेषिकका मन है। नहा पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश, दिशा आत्मा, काल, मन, ये नय तो द्रव्य मानें हैं। बहुरि बुद्धि, मुख, दु ग्व, इन्छा, दंप, प्रयत्न, सस्कार, धर्म, अधर्म, रूप, रस, गध, स्पर्ग, नल्या, परिमाण, पृथक, सयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, १-मता पस्तुक एकना होय सो ती सत्तासमवायस्वरूप कार्य वस्तु है बहुरि वस्तु के कारणमृ सत्तार्क एक्ता होय मो स्वकारणमत्तासमवायस्वरूप कार्य है ऐम दोऊमे ही कहिये, वस्तुभ या वस्तुके कारणमे मतासमवाय मान्या याते सत्ताममयायलक्षण कार्यका स्वरूप मान है।

- स्वर्गीय पं. जयचंदजी विरचित- ७० + 7 द्रवत्व, स्नेह, शब्द, ए चौईस गुण मानें हैं। बहुरि प्रसारण, आकु. चन, उत्क्षेपण, गमन, आगमन, ये पांच कर्म मानें हैं। पर सामान्य अपर सामान्य ये दोय प्रकार सामान्य मानें है। विशेष अनेक हैं.सो इनिमें अभाव नाही । अभावनामा सातवां पदार्थ न्यारा है। बहुरि कहे। जो अभावका परित्याग करि इहा भाव ही विवादाध्यासितकरि पक्ष. किया है तातै तुमनें दोप बताया सो इहा नांही प्रवेश करै है? ताकू कहिये-जो अभावकू कार्यका पक्षमैं न लीजिये तो मुक्तिके अर्थी जे मुनि तिनिकै ईश्वरका आराधनां अनर्थक ठहरैगा जाते तिस.कर्मनाशके. कार्यविर्षे ईश्वरका आराधना किछू करनेवाला नाही । बहुरि यह सत्ता- समवाय कार्यका स्वरूप मानना विचार किये सैंकडां प्रकार खंड्या जाय है तातै कार्यत्व हेतु स्वरूपासिद्ध है, जातै सो सत्तासमवाय पदार्थ उत्पत्ति भये होय है कि उपजते संतेकै होय है ? जो कहेगा उत्पत्ति भये होय है तौ तहा भी पूछिये जो छतेनिकै होय कि अछतेनिकै जो कहेगा अणछतेनिकै होय है तौ गदहाके सींग आदिकै भी सत्ता- समवायका प्रसंग आवैगा । बहुरि कहेगा जो छते पदार्थनिकै होय है तौ तहां पूछिये जो सत्तासमवायतें होय है कि आपहीतें होय है ? तहां प्रथम सत्तासमवाय” कहेगा तौ अनवस्थाका प्रसग आवैगा जाते, पहले पूछया था जो छत्ते पदार्थकै होय है कि अणछतेनिकै सों ही विकल्प फेरि पूछिये तब अनवस्था चली जाय । बहुरि कहेगा' पदार्थ- निकै आपहीतें सत्तासमवाय है तौ जुदा सत्तासमवायका मानना अ- नर्थक है । बहुरि दूजा कहै जो पदार्थ उपजते संतेनिकै सत्तासमवाय है जात पदार्थनिकी निष्पत्ति अर संबंध इनि दोऊनिकै एक कालपणा, का अंगीकार है तौ पूछिये जो यह सत्तासंबंध है सो , उत्पादतै भिन्न है कि अभिन्न है ? जो कहेगा भिन्न है तो उत्पत्तिके असत्त्व” शर्विः . TH हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ७१ ANS Ans.nn --- शेष भया तो उत्पत्तिकै अर अभावक भेद कैसै भया । बहुरि कहेगा उत्पत्तिकार सहित वस्तुकै सत्व है तातै उत्पत्ति भी तैसा नाम पावै है तो ऐसा कहना भी मूर्खपणाकरि ही है जाते इहा उत्पत्तिका-सत्त्वका विवाद है तहा वस्तुका सत्व कहना कबहू न वणेगा । बहुरि यामैं इतरेतराश्रयटोप आचेगा, वस्तुाव उत्पत्तिका मत्त्व होते तिस ही काल भया सत्तासवधका निधय होय अर तिसका निश्चय होय तब ही तिस वस्तुके सत्त्वकार उत्पत्तिका सत्त्वका निश्चय होय ऐसे इतरेतराश्रय होय है । बहरि इम टोपके दूर करनेकी इच्छाकरि उत्पत्तिकै अर सत्तासंबं- धकै एकता मानिये तो सत्तामबध ही कार्यत्व भया तातै बुद्धिमानहेतु- पणा तनु आदिक होते आकाश आदिकरि हेतु अनेकान्तिक भया जाते आकाश आदिवि सत्तासबब तो है अर कार्यपणा नाही। नित्यव- स्तुकै कार्यपणा होय नाही नाते बुद्धिमानहेतुकपणा भी नाही । ऐसे सत्तासमवाय तो कार्यत्व नाही तसे ही स्वकारणमबध भी कार्यत्व नाही, जो चर्चा सत्तासबध है सो ही इहा भी लगावणीं । बहुरि कहै जो स्वकारणसमवाय अर सत्तासमवाय दोऊ सत्रय कार्यत्व है तौ सो भी युक्त नाही है, तिनि मबधनिकै भी कदाचित् काल होते तो समवायकै अनित्यताका प्रसग आवे जैसे घट आदिककै अनित्यता है तैसे, वहरि सदाकाल कहै तो सर्वकाल तिस कार्यपणाका उपलभ क- हिये प्राप्ति नाका प्रसग आवै । वहरि इहा कहै जो वस्तुनिके उत्पादक कारणनिकी निकटता न होय तब समवाय न होय याने सर्वकाल उपलभका प्रसग न आवै तौ तहा पूछिये है-वस्तुकी उत्पत्तिके अर्थ तो कारणनिका व्यापार है अर उत्पाद स्वकारणसत्तास- मवायस्वरूप है सो यह सर्वकाल है ही, ऐसे तो कारणका ग्रहण अन- र्थक ही है। ब्रहरि कहै जो वस्तुकै कारणका ग्रहण उत्पत्तिकै अर्थि तौ - ७२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- नाही अभिव्यक्तिकै आर्थ है, सो यह भी कहना वार्तामात्र ही है- वस्तुके उत्पादकी अपेक्षाकरि अभिव्यक्ति कहनां बणे नाही, वस्तुकी अपेक्षा अभिव्यक्ति कहिये तो ताविपै कारणके आवनें पहले भी कार्य- वस्तुका सद्भावका प्रसग आवै है । बहुरि उत्पादकै अभिव्यक्ति भी असभवरूप है जातै स्वकारणसत्तासंबंध है लक्षण जाका ऐसा जो उत्पाद ताकै वस्तुके कारणके व्यापार पहले सद्भाव होते वस्तुका सद्भावका प्रसंग आवै है जातै वस्तुके सत्त्वका सो ही लक्षण इहां है । सो पहले सत्-रूप होय ताकै ही कोई कारणकरि आच्छादित होय ताकी अभि- व्यजककरि अभिव्यक्ति होय, जैसैं घट आदि वस्तु अधकारकरि आ- च्छादित होय तव दीपक आदि अभिव्यंजककरि ताकी व्यक्ति होय तेसैं इहा भी जानना । तातें अभिव्यक्ति आर्य कारणका ग्रहण करनां युक्त नाही । तातै स्वकारणसत्तासंबंध तौ कार्यत्र नाही है । बहुरि अभूत्वा भावित्वनामा दूसरा पक्ष है सो भी कार्यत्व नाही है ताकै भी विचारका सहवापणा नाही है, परीक्षा किये अयुक्त ही है जातें अभूत्वा भावित्वपणा है सो पहले न होय करि आगामी होय ताकू कहिये है। सो भिन्नकालविषै जो टोय क्रिया ताका आधारभूत जो कर्त्ता ताकै सिद्धि होते सिद्धि होय है जाते अतीतकालवाची जो 'क्त्वा' प्रत्यय तदन्तपद- करि विशेपित जो वाक्यका अर्थपणा तिसरूप है, जैसे 'भुक्त्वा व्रजति' इत्यादि वाक्यार्थ है । कोई पुरुप भोजन करि चलै है, तहा 'भुक्त्वा' ऐसा तो अतीतकाल भया 'पीछे चलै है । सो यह भावीकाल है सौ इहा दोऊ कालविपै क्रिया दोयका आधार पुरुप है सो इहां कार्यत्वविर्षे भवन अभवन' कहिये होना न होना रूप जो टोय क्रिया ताका आधारभूत एक कर्ताका अनुभव नाही है जातै अभवनका आधारकै अविद्यमानपणाकरि अर भवनका आधारकै विद्यमानमणाकरि भाव ' हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। -~- अभावका एक आश्रयकै विरोध है, भावार्थ-कार्य है सो भावस्वरूप ही है अभावस्वरूप नाही है । अर जो अविरोध मानिये तो तिनि टोजनिकै पर्यायमात्रकरि ही भेद आये वस्तुभेद नाही आवै । अथवा कोई प्रकार अभूत्वा भावित्व है सो कार्यत्वका स्वरूप होहु तोऊ तनु आदिक सर्वविय नाही माननेते हेतु भागासिद्ध होय है जाते हमारे पृथिवी पर्वत समुद्र उद्यान आदि पहली न होय करि होते नाही मा- निये है जात हमारे जैनीनिके पृथिवी आदिका सदाकाल अवस्थान माने हैं। बहुरि कहै जो पृथिवी आदिकै अवयवसहितपणाकरि आ- ढिसहितपणा साधिये है सो ऐसा कहना भी विना सीखेकरि कह्या है, जातै इहा दोय पक्ष पूछिये, अवयवनिवि अवयवाकी प्रवृत्तिते है कि अवयवनिकरि आरभिये है यात है ? इनि दोऊ ही पक्षनिविर्षे अवयवसहितपणाकी अनुपपत्ति है। जो प्रथम पक्ष लीजिये तो अव- यवसामान्यकरि अनेकात है जातै अवयवसामान्य है सो अवयव- निवि वत्त है अर कार्य नाही है। बहुरि दूसरी पक्ष जो अवयवनि- करि अवयवी आरभिये है तो साध्यतै अविशिष्ट है जाते आदिसहित- पणा साधिये है मो ही अवयवनिकरि आरभिये है ऐसा हेतु कह्या याम साध्यतै विशेष कहा भया । बहुरि कहै-जो यह सनिवेश है आ- काररूप रचनाविशेष है सो ही सावयवपणा है सो ही घट आदिकी ज्यों पृथिवी आदिविष पाइए है याते अभूत्वा भावित्व ही कहिये है सो ऐसे कहना भी सुन्दर नाही, सनिवेशके भी विचारका असहपणा है- परीक्षा किये वणे नाही है । इहा दोय पक्ष पूछिये, यह सनिवेश है सो अवयवनिका सबध है कि रचनाका विशेष है ? जो कहेगा अव- यवनिका सबध है तौ आकाश आदिकरि अनेकात होगा जाते आ- कागकै ममस्त मूर्तीक द्रव्यका सयोग है कारण जाकू ऐसा प्रदेश- ७४ स्वर्गीय पं० जयचढजी विरचित- निका नानापणांका सद्भाव है। इहा कहै--जो आकाशकै विर्षे तौ प्रदेश उपचरित है तौ समस्त मूर्तीक द्रव्यनिका संबंधकै भी उपचरितपणा आया तब आकाशकै सर्वगतपणा भी उपचरित ठहरया, तव श्रोत्रकै अर्थक्रियाकारीपणा न ठहरेगा श्रोत्र इन्द्रिय आकाशतै जुडै तब शब्द आकाशका गुण है सो ग्रहण होय है ऐसे नैयायिक मानैं है सो सबंध उपचरित ठहरै तब श्रोत्रकै अर्थक्रियाकारीपणा-शब्दका ग्रहण करना है सो न ठहरैगा जातै आकाश उपचरित प्रदेशरूप मान्या है। बहुरि कहै जो धर्म अधर्मके संस्कार” श्रोत्रतै अर्थक्रिया होय है, ताकू क- हिये-जो उपचरित तौ अभावरूप है सो ताके तिनि धर्मादिकरि उपकारका अयोग है जैसे गदहाके सीगकै कळू काहूकरि उपकार न होय तैसै है। तातै अवयवनिका सबंधस्वरूप जो संनिवेश कह्या सो तौ किछू भी नाही । बहुरि दूसरी पक्ष रचनाविशेप है सो मानिये तौ हमारे जैनिनकै पृथ्वी आदि रचनाविशेषकू सावयवरूप कार्यस्वरूप नाही मानिये है तातै यह हेतु भागासिद्ध होय है सो यह दूपण अवस्थित होय है ऐसैं अभूत्वा भावित्व है सो विचारमैं नाही बणै है। बहुरि तीसरा पक्ष अक्रियादीकै कृतबुद्धिका उत्पादकपणा है, याका अर्थ यह-जो कार्यके उपजनेकी क्रिया तौ न देखी तौऊ ताविपै ऐसी बुद्धि उपजै जो यह काहूनें किया है सो यह कार्यपणा मानिये तो दोय पक्ष पूछिये है, सो ऐसी बुद्धि उपजै जो पहले काहूनै संकेत किया होय जो ऐसा तौ किया ही होय है ताकै उपजै है कि विना ही संकेत उपजै है ? जो कहेगा संकेत करने- वालेकै उपजै है तौ आकाश आदिकै भी बुद्धिमानकरि कियापणा ठहरैगा। तहा भी कहूं खोदिकरि माटी काढ़े तब खाना (डा) होय जाय आकाश प्रगट होय तहा ऐसी बुद्धि उपजै है जो यह आकाश काहून हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १.4 Aurna किया है जात पूर्व खोटता डेन्या था तथा काहक वचनत निश्चय किया था तहा मा सकेन भया या जो बोदेते आकाश नीकसे है तान इहा कृनबुद्धि उपने है। इहा कहै---जो यह बुद्धि ता मिथ्या है तो तेरी भी बुनि अन्यविप किये उपजे है मो मिश्या क्यों न होय ? बाधाका सदाय अप्रतिप्रमाण विरोधका अन्यवियु ममानपणा है, जो आ- कामविष कृतबुद्धिम बावक बनायेगा मो ही तन्याठिकमै आयेगा, अरि काका ग्रहण दोज ही जायगा प्रत्यक्ष नाही है । इहा प्रमाणकी समानताका प्रयोग देगा -पृथिवी आदिक है ने बुद्धिमान हेनुक नाही हैं जान हम आदिककै नाही ग्रहण करने योग्य याका परिमाण अर आधार है, जना आकाग आदिकका परिमाण आदि नाही ग्रहणमैं आये है नने यह भी है ऐमा प्रमाण पृथिवी आदिका कर्ताका निपे- चका समान है । नातं इतममय कहिये जाने सकेन किया ताके तो पृथिवी आदिकविर्ष गतवुद्रिका उपजावनहारापणा नाही है। बहार अनममय कहिय नाही किया है सकेन जाने ताकै भी कृतबुद्धिका उपजायनहाग नाही जान यह अमिद्ध है बिना संकेत किये कृतवुद्धि उपजे नाही जो उपजे तो विप्रतिपत्ति नाही हाय सर्वहीके उपजे । कोई को-जो अग्नि शीतल है तो जाकै अग्निका संकेत नाही सोएमें जाने जो शीतल ही होगी याम मदेह न उपजे तैसे पृथिवी आदि कार्य काडके किये बता तो किये ही मानै न किये बताने ती विना किये ही गाने । बदर चौथा पक्ष कारणब्यापागनुविधायिपणा है, याका अर्थ यह-जो जमा कारणका व्यापार होय तिसके अनुसार तसा ही कार्य होय । सो इहा दोय पक्ष पूछिये, तहा जो कारणमात्र ही की अपेक्षा कहै नी यह विरुद्ध होय जति कार्य तो अबुद्धिमानके किये भी होय ७६ स्वर्गीय पं0 जयचदजी विरचित- है सो विपक्षकू साध्या तब कारणविशेष जो ईश्वर ताकी सिद्धि भई तातै विरुद्ध भया । बहुरि कारणविशेषकी अपेक्षा कहै तौ इतरे- तराश्रयनामा दूषण आवै, कारणविशेष जो बुद्धिमान ताकी सिद्धि होते तौ तिसकी अपेक्षाकरि कारणव्यापारानुविाधयित्वस्वरूप कार्यत्व सिद्ध होय अर तिसतै ताके विशेपकी सिद्धि होय ऐसैं इतरेतराश्रय भया । बहुरि इहा सनिवेशविशिष्टपणा अर अचेतन-उपादानपणा ये दोज भी हेतु हैं ते कहे जे दोष तिनकरि दुष्ट है-निर्वाध नाही, तारौं न्यारे नाही विचारे हैं । सनिवेशविशिष्ट तौ सुख आदिविप नाही वत्तै तातै भागासिद्ध है, सुख आदि कार्य तौ है अर रचनाविशेपरूप नाही है । बहुरि अचेतनोपादानपणा ज्ञानस्वरूप कार्य- वि. नाही तातै भागासिद्ध है, ज्ञान कार्यरूप तौ है अर अचेतनोपादा- नरूप नाही ऐसैं भागासिद्धनामा दूपण तहा भी सुलभ है । बहुरि ये हेतु विरुद्ध है जातै दृष्टातके अनुग्रह कहिये घट आदि दृष्टातका बल ताकरि शरीररहित सर्वज्ञपूर्वक साधन किया है अर घटका कर्ता कुंभ- कार है सो शरीरसहित असर्वज्ञ है तातै हेतु विरुद्ध होय है। बहुरि कहै- जो ऐसै तौ धूमतै अग्निका अनुमान कीजिये तामै भी यह दोप आवैगा सो दोप नाही आवै है जातें तहा तृणकी अग्नि तथा पान आदिकी अग्नि सर्व ही अग्निमात्रविड़ें व्याप्त जो धूम सो देखिये हैं तैसैं इनि हेतु- निमै नाही देखिये है जो सर्वज्ञ तथा असर्वज्ञ जो कर्ताका विशेष ताका आधार जो कर्त्तापणा सामान्य तिसकरि कार्यत्वनामा हेतुकी व्याप्ति है ऐसे नाही देखिये है अर सर्वज्ञ जो कर्त्ता ताकी इस अनुमान पहले असिद्धि है, इस ही अनुमानकरि कर्त्ता साधिये है। बहुरि यह हेतु व्य- भिचारी है बुद्धिवान कारण विना भी विजली आदि कार्य प्रकट होय है । बहुरि सूता आदि पुरुपकी अवस्थावि बुद्धिपूर्वक विना भी कार्य हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । ७७ होते देखिये है । बहुरि कहै जो शिव तिनि कार्यनिविपै भी अवश्य कारण है तो ऐसा कहना अतिमुग्धका विलास है जातें तहा शिवका व्यापारका असभव है जातें गिव गरीररहित है अर ज्ञानमात्र ही करि कार्यकारीपणा वणे नाही, बहुरि इच्छा अर प्रयत्न ये दोऊ शरीरविना संभवे नाही, ताका असभव आप्तपरीक्षा आदि प्रथनिविपै पुरातन बडे आचार्यनिकरि विस्तारकरि कह्या है तातै डहा नाही कहिये है। बहुरि जो महेश्वरकै क्लेश आदिका रहितपणा अर निरतिशयपणा अर ऐश्वर्य आदि सहितपणा कह्या सो सर्व ही आकाशके कमलकी मुगध ताका वर्णन सारिखा है जातें जाका आधार सिद्ध होय नाही तातै हमारै आढरने योग्य नाही । तातै महेश्वरकै सर्वज्ञपणा कहै सो नाही। बहुरि ब्रह्मकै सर्वज्ञपणा कहै सो भी नाही है जात ताका सद्भावका कहनेवाला जनावनेवाला प्रमाणका अभाव है । तहा प्रथम तो प्रत्यक्ष- प्रमाण ताका जनावनेवाला नाही है, जो प्रत्यक्ष ब्रह्म दीखे तौ विप्रतिपत्ति नाही होय, सन्देह काहेकू होय । बहुरि अनुमान भी ताका सिद्धि करने- वाला नाही है जातै ब्रह्मते अविनाभावी जो लिंग ताका अभाव लिंग विना अनुमान कैसैं होय । इहा ब्रह्मवाढी कहै है--प्रत्यक्षप्रमाण ब्रह्मका ग्राहक है ही जातै नेत्र उघाड़िकर देखे लगता ही निर्विकल्प अभेदरूप सत्तामात्रकी विवि दीखे है ताका विषयपणाकरि प्रत्यक्षकी उत्पत्ति है, सर्व वस्तु एक सत्तारूप भास है, बहुरि जो सत्ता है सो ही परमब्रह्मका स्वरूप है, ताका श्लोकका अर्थ-प्रथम ही आलोचना कहिये दर्शन- १ तथा चोकम- अस्ति हालोचनाशानं प्रथमं निर्विकल्पकम् । बालमूकादिविज्ञानसदृशं शुद्धवस्तुजम् ॥ १॥ gro

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स्वर्गीय प० जयचंदजी विरचित-
मात्र ज्ञान है सो निर्विकल्पक है-भेदरहित है जैसा वालक तथा मूक
कहिये गूगा बहरा आदिकै ज्ञान होय है तैसा होय है सो यह ही शुद्ध
वस्तुतै उपज्या है । भावार्थ-शुद्धसत्तामात्र अभेद ब्रह्मका स्वरूप है।
बहुरि कोई कहै--विधिकी ज्यों परस्पर जुदायगीरूप निषेध भी प्रत्यक्ष-
करि प्रतीतिमै आवै है तातै विधिनिषेधरूप द्वैतकी सिद्धि होय है सो
ऐसे नाही है जातै प्रत्यक्षका विषय निषेत्र नाही है, सो ही हमारै कहीं
है; ताका श्लोकका अर्थ-पंडित पुरुष है ते प्रत्यक्षप्रमाणकू विधान
करनेवाला कहैं है निषेध करनेवाला न कहै है तातें एकत्व जो अद्वैत
ताके कहनेवाला आगम है सो तिस प्रत्यक्षकरि न वाधिये है । बहुरि
अनुमानते भी ब्रह्मका सद्भाव पाइये है, ताका प्रयोग-ग्राम बाग
आदि पदार्थ है ते प्रतिभासमात्रमैं सर्व प्रवेशकरि रहे हैं जातें प्रतिभा-
समानपणा सबकै पाइये है जो प्रतिभासै है सो सर्व प्रतिभासकै मध्य
आय गया जैसे प्रतिभासका स्वरूप, ऐसे ही सर्व विवादमै आये पदार्थ
प्रतिभासै है, ऐसे च्यार प्रयोगरूप अनुमानतें ब्रह्म सिद्ध होय है । बहुरि
तिसके आगममैं भी वचन बहुत पाइये है 'जो हूवा अर जो होयगा
बहुरि यह वर्तमान है सो सर्व एक पुरुष है, ऐसा वचन है । बहुरि
श्लोक है, ताका अर्थ;-'इट सर्व' कहिये यह जो प्रत्यक्ष सर्व दीखे है
सो निश्चयतें ब्रह्म है इस जगतमैं नानारूप किछू वस्तु नही है अर
१ तथा चोक्तम्-
आहुर्विधात प्रत्यक्षं न निषेधृ विपश्चितः।
नैकन्वे वागमस्तेन प्रत्यक्षण प्रबाध्यते ॥ १ ॥
२-सर्व वै खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ।
आरामं तस्य पश्यन्ति नतं(तत्) पश्यति कश्चन ॥१॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
७९
लोक है सो तिस ब्रह्मके आराम कहिये विवर्तरूप पर्यायनिकू देखै
तिसकू कोई न देखै है ऐसा वेटका वचन सुनिये है । इहा कोई पूछे
परमब्रह्मकै ही परमार्थ सत्त्व होते घट आदिका भेद भासै है सो
कैसे है ? सो ऐसा तर्क इहा नाही करना जातै सर्व ही घट आदि वस्तु
है ते तिसके विवर्त्तपणाकरि भासै है जैसे दर्पणकै विष प्रतिबिंत्र
भासे है तैसै है । एक ही वस्तुके अपरमार्थरूप अनेक प्रतिबिंब भास
सो विवर्त्त कहिये । बहुरि सर्व ही भेद हैं तिनिकै ब्रह्मका विवर्त्तपणा
असिद्ध नाही जाते प्रमाणकरि सिद्ध होय है, ताका प्रयोग-विवादमैं
आया जो विश्व लोक सो एक कारणपूर्वक है जातै एकरूपते जुडि
रहा है, जैसैं घडा हाडी ढाकणा डीवा आदिक है ते माटीस्वरूप हैं
तातै अन्वयरूप है सो ये माटीनामा कारणपूर्वक ही है तैसै सत्रूप करि
जुड़े सर्व वस्तु है। तैसें ही आगम भी ताका साधक है, ताका श्लोकका
अर्थ-जैसे माकडी है सो जालाके ततूनिका एक कारण है अथवा
जैसे जलका चद्रकातमणि कारण है अथवा जैसै कूपलनिका बडवृक्ष
कारण है तेसैं सर्व जीवनिका एक ब्रह्म कारण है, ऐसे ब्रह्मवादीने
अपना मत दृढ किया।
अब ताकू आचार्य कहै है-हे ब्रह्मवादी । यह तेरा कहना
जैसे मदिराका रसकू पानकरि गदगद वचन कहै तैसा है अथवा
माचणा कोदू खायकरि गहला होय मूर्ख विलास करै-यथा
कथंचित् कहै तैसा है जातै यह विचारमै आवे नाही-परीक्षामैं न
आय सके है। जाते जो ते प्रत्यक्षकै सत्ताविपयपणा कह्या तहा दोय
पक्ष पूछिये है,-निविशेषसत्ताविपयपणा कहा कि विशेपसहित
१-ऊर्णनाभ इवांशूनां चद्रकात इवाभसाम् ।
प्ररोहाणामिव प्लक्षः स हेतुः सर्वजन्मिनाम् ॥१॥

स्वर्गीय पं0 जयचंदजी विरचित- - सत्ताका जनावनहारा कह्या ? तहा प्रथम पक्ष तौ न बणै है जाते सत्ताकै सामान्यरूपपणा है तातै विशेपकी अपेक्षारहितपणाकरि सत्ताका प्रतिभास होय नाही जैसै गोत्वसामान्य है। सो काबरा घोला आदि विशेपरहित प्रतिभासता नाही, जातै ऐसा कह्या है जो विशेषरहित सामान्य है सो सुस्साके सींगसमान अवस्तु है, बहुरि सामान्यरूपपणा सत्ताका सत् सत् ऐसा अन्वयरूपबुद्धिका विपयपणाकरि प्रसिद्ध ही है । बहुरि दूसरा पक्ष कहेगा तौ परमपुरुषकी सिद्धि न होयगी जाते परस्पर न्यारे ग्यारे है आकार जिनके ऐसे विशेषनिका प्रत्यक्षतै प्रतिभास होय है। बहुरि अनुमानका साधन कहा जो प्रतिभासमानपणा सो भी समीचीन नाही जातै विचारमैं बनता नाही। तहा दोय पक्ष पूर्छा हैं-यहु प्रति- भासमानपणा स्वतै होय है कि परतै होय है ? जो कहेगा स्वतै होय है तौ नाही बणेगा जातै हेतु असिद्ध है जातै पढार्थानका स्वयमेव प्रकाशन है तौ नेत्र मीचिये अथवा प्रकाश नाही होय तहा भी प्रति. भासना होहु सो नाही होय है तातै असिद्ध है। बहुरि कहेगा परतें होय है तौ विरुद्ध है परतै प्रतिभासनां पर विना न बणै, बहुरि प्रति- भासमात्र भी नाही सिद्ध होय है जात तिस प्रतिभासकै ताके विशेप- नितै अविनाभावीपणां है, बहुरि प्रतिभासकै विशेष मानिये तो द्वैतका प्रसंग आया । बहुरि किछू विशेप कहै है अनुमानका उपायभूत जे धर्मी हेतु दृष्टात ये प्रतिभासै है कि नाही ? जो कहेगा प्रतिभासै है तो प्रतिभासमांही प्रवेश भये प्रतिभास है कि तातै बाह्य न्यारे प्रतिभासै है ? जो कहेगा प्रतिभासमांही प्रतिभासे है तो साध्यकै माही ही आय पड़े तिनितै अनुमान कैसे होय, बहुरि प्रतिभासकै बाह्य प्रतिभासैं है तौ हेतुकै तिनिहीकरि व्यभिचार भया। बहुरि जो कहै-प्रतिभासै नाही है तो धर्मी आदिकी व्यवस्थाका अभाव है तब तिनि विना हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ८१ अनुमान कैसे होयगा । बहुरि ब्रह्मवादी कहै है---जो अनादि अविद्याके उदयतै यह सर्व असबद्ध है ? तहा आचार्य कह है-यह कहना भी महा-अज्ञानका विलास है जाते अविद्याविप भी पहिले कहे जे दोप तिनिका प्रसग है । बहुरि कह-जो अविद्या सर्वविकल्पनितै रहित है तात दोष नाही आये है सो यह कहना भी अतिमुग्वका वचन है जाते अविद्याका कोई ही रूपकरि प्रतिभासका अभाव होते तिसका स्वरूप ही अवधारण मैं आवे नाही । बहुरि और भी इहा विस्तार करि विचार है सो देवागमस्तोत्रका अलकार जो अष्टसहस्ती ताविप है ताते इहा विस्तार न कीजिये है । बहुरि समस्त भेदनिकै विवर्त्तपणा कह्या, तहा एकरूपकरि अन्वयपणा हेतु है सो अन्वय करनेवाला अर अन्वीयमान कहिये जाका अन्वय करिये सो वस्तु इनि दोऊनिकरि अविनाभावीपणाकरि पुरुपाद्वैतकू निषेधै है यातै अपना इष्ट जो अद्वैतब्रह्म ताका विघातकारीपणातै विरुद्ध है। बहुरि अन्वितपणा है सो एक हेतुक जे घट आदि कविप अर अनेक हेतुक जे स्तभ कुभ कमल आदिविषै दोऊविपै पाइये हैं तातें अनैकान्तिक है। बहुरि पूछिये-जो यह अद्वैत ब्रह्म है मो जगतनामा कार्य कौन अर्थि करै है, तहा च्यार पक्ष है,--एक तो अन्यका संग्या करै, दूसरै कृपाके वशतै करे, तीसरा क्रीटाके वशते करे, चौथे स्वभावहीतैं करै। तहा जो कहै- अन्यका प्रेरया करै है तो स्वाधीनपणाकी हानि भई अर द्वैतका प्रसग भया । वहुरि कृपाके वश करना कहै तो कृपावि दुःखिनिका तो न करनेका प्रसग आव जगतमै द ग्वी है ही अर तिसकै कृपाका करणां तो परके उपकार करनेते वणे, बहुरि सृष्टि रचे पहली प्राणी है नाही तिनिकी कृपाकै अघि नवीन सृष्टि रचै तो कृपाकै अर्थ रचना युक्त होय, बहुरि कृपावि तत्पर होय ताकै प्रलयका विधान युक्त होय नाही, हि प्र ६ ८२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- बहुरि प्रलय तौ प्राणीनिके अदृष्ट जो पाप ताके वशतै होय है तो ऐसै तौ स्वाधीनपणाकी हानि होय है, कृपाविषै तत्पर होय ताकै पीडाका करना अर अदृष्ट-पाप ताकी अपेक्षाका अयोग है। बहुरि क्रीड़ाके वशते करना कहै तौ क्रीड़ा अर्थि प्रवृति करनेमै प्रभुपणा नाही जैसे वालक क्रीड़ा करनेंकू उपाय गीन्दड़ी आदि बनावै तैसें ठहरै यामै कहा वडाई, बहुरि क्रीडाका उपाय बनाया जो जगत अर याकरि साध्य जो सुख ताकी एक काल उत्पत्ति भई चाहिये, जातै समर्थ कारणके होते कार्यका अवश्य होना होय, जो समर्थ कारण न होय तौ अनुक्रम भी तिसतै कार्य न होय, जैसे दीपक है सो काजलका पाड़नां तेल शोपणा बातीका बालनां प्रकाश करना एककाल करे है यह सामर्थ्य है, अर ऐसे न होय तौ अनुक्रमकरि भी ये कार्य न होय । बहुरि कहै-ब्रह्म स्वभावहीतै जगतकू रचे है जैसे अग्नि स्वभावहीतै बालै है पवन स्वभावहीतैं चले है ता यह कहना भी अज्ञानका वचन है, पहले कहे जे दोप ते मिटै नाही, सर्व दोष आवे है, सो ही दिखावै है ताका प्रयोग-समस्त अनुक्रमतै उपजता जो विवर्त्तका समूह सो एककाल उपजै जातें जिस सहकारी कारणकी अपेक्षा कीजिये सो एककाल उपजै जातै जिस सहकारी कारणकी अपेक्षा कीजिये सो भी ब्रह्महीकरि साधने योग्य है ताका एककाल संभव है। भावार्थ-सर्व ही ब्रह्मके कार्य मानिये हैं, तहा ब्रह्म तौ समर्थकारण है ही बहुरि सहकारी चाहै तौ सो भी तिसहीका किया होय तव सर्वजगत एककाल उपज्या चाहिये, बहुरि अग्नि पवनका उदाहरण दिया ताकै भी विषमपणा है, कोई कालविर्षे स्वहेतु जो काष्ठादिक ताकरि उपज्या अग्निके दहन करनेकी शक्ति स्वरूपपणाकी प्राप्ति मर्याद रूप है जिस देशकालमै भया तेता ही है, अर ब्रह्मविपैं तो नित्यपणा सर्वव्यापकपणा हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ८३ अर सर्वसामर्थ्य स्वरूप एकस्वभावरूप कारणकरि उपजावापणा है सो देशकालका न्यारा न्यारा नियमरूप कार्यनिविपै बणे नाही। सो ऐसें ब्रह्मकी असिद्धि होते वेदनिमै ताकी सुप्त अवस्थाका कहना अर ताकी जागृत अवस्थाका कहना अर तिस परमपुरुषनामा महा- भूत ताका निश्वास वेद है ऐसा कहना आकाशके कमलकी सुगधका वर्णन सारिखा है, सो अग्राह्य पदार्थ है विपय जाका तिस स्वरूप होने- तै आदरने योग्य नाही है, असत्यार्थकू कौन आदरै । बहुरि जो ब्रह्मके साधनेविषै आगम प्रमाण कह्या " सर्व वै खल्विद ब्रह्म " इत्यादि "बहुरि ऊर्णनाभ' इत्यादि सो सर्व ही कहे विधानकरि अद्वैतका विरोधी है यातै अवकाश नाही पावै है । बहुरि आगमकू अपौरुपेय कहै है सो वण नाही याका विस्तार आज कहसी तातै पुरुपोत्तम परमब्रह्म कहै सो भी परीक्षामै नाही आवे है । ऐसैं मुख्यप्रत्यक्षका वर्णन किया, तहा सर्वज्ञकी सिद्धि यथार्थ करी, अन्यवादीकी वाधाका परिहार किया । इहा टीकाकारकृत श्लोक है,- प्रत्यक्षतरभेदभिन्नममलं मानं द्विधैवोदित देवैर्दीप्तगुणैर्विचार्य विधिवत्संख्याततेः संग्रहात् । मानानामिति तद्दिगप्यभिहितं श्रीरत्ननंद्याव्हयै- स्तद्वयाख्यानमदो विशुद्धद्धिपणैर्बोद्धव्यमव्याहतम् ॥१॥ याका अर्थ-'देवै , कहिये श्रीअकलकदेव आचार्य जैसे विधि जिनागममैं है तैसे विचारिकरि अर प्रत्यक्ष अर परोक्ष भेटकरि भिन्न निर्दोपप्रमाण दोय प्रकार ही कया, कैसे है आचार्य : दीत कहिये देदीप्यमान है सम्यग्दर्शन आदि गुण जिनिमैं बहुरि प्रमाणनिक ८४ स्वर्गीय पं. जयचंदजी विरचित- संख्याकी पक्तिका संग्रह कहिये संक्षेपतै तिनि प्रमाणनिका उपदेश श्रीमाणिक्यनदिनाम आचार्य भी ऐसे ही करया, बहुरि तिनिका व्याख्यान यहु मै अनन्तवीर्य आचार्यने किया है सो विशुद्धबुद्धीनिके मानने योग्य है कैसा है व्याख्यान ? अव्याहत कहिये वावारहित है । बहुरि श्लोक- मुख्यसंव्यवहाराभ्यां प्रत्यक्षमुपदर्शितम् । देवोक्तमुपजीवद्भिः सूरिभिर्जापितं मया ।। २ ।। याका अर्थ-प्रत्यक्ष प्रमाण मुख्य-संव्यहारके भेदकार दोय प्रकार अकलंकदेवजीनै कह्या सो ही माणिक्यनंदिजीनें दिखाया सो ही मै अनंतवार्यनै जनाया है ॥१२॥ सबैया तेईसा। श्री अकलंक मुनीश भजो परतक्ष परोक्ष प्रमाण जु दोउ । ता मधि हू परतक्ष कह्यो व्यवहार यथारथ भेद है सोउ ।। माणिकनंदि लयो अनुसार कह्यो तसु आगम जानहु कोउ। वृत्ति रची जु अनंत सुवीरजि देशकथामय मैं सब जोउ ॥ ऐसे परीक्षामुखनाम प्रकरणकी लघुवृत्तिकी वचनिकाविर्षे द्वितीय समुहेश समाप्त भया ।

तृतीय-समुद्देश। (३) आगें अब प्रत्यक्ष-परोक्षभेदकरि प्रमाण दोय प्रकार कह्या ताविर्षे प्रथमभेद जो प्रत्यक्ष ताका व्याख्यानकरि अर परोक्ष प्रमाणकू कहै है, परोक्षमिरत् ॥१॥ याका अर्थ-प्रत्यक्षतै इतरत् कहिये अन्य विलक्षण सो परोक्ष है। इहा कह्या जो प्रत्यक्ष ताका प्रतिपक्षीकू इतर शब्द कहै है तातै तिस प्रत्यक्षते इतरत् ऐसा पाइये सो परोक्ष प्रमाण है । प्रत्यक्षका स्वरूप विशद कह्या था इहा अविशद ग्रहण करना ||१|| आगै याके सामग्री अर स्वरूपभेद कहते संते सूत्र कहैं हैं, प्रत्यक्षादिनिमित्तं स्मृतिप्रत्यभिज्ञानतर्कानुमानागम- भेदम् ॥२॥ याका अर्थ-~-प्रत्यक्ष आदि प्रमाण है निमित्त जाकू ऐसा परोक्ष प्रमाण है ताके पाच भेट हैं, स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान आगम ऐसें। तहा प्रत्यक्ष अर आदिशब्दकरि परोक्ष ग्रहण करना ये दोऊ निमित्त है-उत्पत्तिकू कारण हैं सो तौ यथावसर निरूपण करियेगा। बहुरि प्रत्यक्ष आदि हैं निमित्त जाकू ऐसा समास करना। स्मृति आदि- विपै द्वन्द्वसमास करना ॥२॥ आर्गे अनुक्रममैं आया जो पहलै स्मृति ताहि दिखावते सते सूत्र कहैं हैं;- - ८६ - स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- संस्कारोबोधनिवन्धना तदित्याकारा स्मृतिः ॥३॥ याका अर्थ-संस्कारका जो उद्वोध कहिये प्रगट होना सो है निधन कहिये कारण जाळू, वहुरि तत् कहिये पूर्व अनुभवमै आया था ताका 'सो है। ऐसा यादि आवना ऐसा जाका आकार है ऐसी स्मृति है। इहां 'भवति ऐसी क्रिया सूत्रमे वाक्यशेपते लेनी ॥ ३ ॥ आगै याका उदाहरण कहै हैं, स देवदत्तो यथा ॥४॥ याका अर्थ-जैसे पहले काहू पुरुपकू देख्या था सो वर्त्तमान- मैं मनविपै यादि आया जो 'सो फलाणा पुरुप' ऐसा स्मृति प्रमाण - है ॥४॥ आगे प्रत्यभिज्ञानप्रमाण कहनेका अवसर है सो कहै है दर्शनस्मरणकारणकं सङ्कलनं प्रत्यभिज्ञानं तदेवेदं तत्सदृशं तडिलक्षणं तत्पतियोगीत्यादि ॥ ५॥ याका अर्थ-वर्तमानका दर्शन-पूर्व देख्या ताका स्मरण ये ढोन्यों है कारण जाकू ऐसा जोड़रूप ज्ञान ताकू प्रत्यभिज्ञान कहिये । सो च्यार प्रकार है---वर्तमानमैं काहू वस्तुक देखिकरि अर ताकू पूर्व दे- ख्या था ताकू याटिकरि ऐसा जान्यां जो 'यह सो ही है। ऐसा तो एकत्र- प्रत्यभिज्ञान है । बहुरि वर्तमानमै देख्या तिस सारिखा पूवै देख्या था ताकू जान्या जो 'यह तिस सारिखा है। सो सादृश्य प्रत्यभिज्ञान है। वहुरि वर्तमानमै काहूकू देखिकरि तिसते विलक्षण पूर्व देख्या था ताकू यादिकरि तिसते विलक्षण जान्या जो 'यह तिसतै विलक्षण है। सो त. द्विलक्षण प्रत्यभिज्ञान है । बहुरि पूर्वै देख्या था तिसका वर्तमानमै प्रति- योगी कहिये जिस अवश्य जोड़ मिली जाय ऐसा अन्यपदार्थकू देखि

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
८७
जान्या जो 'यह तिसका प्रतियोगी है। सो तत्प्रतियोगी प्रत्यभिज्ञान है।
आदिशब्दतें और भी पूर्वापरका जोडरूप ज्ञान होय सो जानना । इहां
दर्शन-स्मरणकारणपणातें सादृश्यादिक जाका विषय होय सो भी प्र-
त्यभिज्ञान ही कह्या है । वहुरि जिनिके मतमै सादृश्यविपयकू उपमान-
नामा जुदा प्रमाण कहा है तिनिके मतमै लक्षण्यादिक जाका विषय
ऐसा ज्ञान भी अन्य प्रमाण ठहरैगा, सो ही कह्या है, ताका श्लोकका
अर्थ, प्रसिद्ध पदार्थके समान धर्मपणातै साध्यका साधना सो उप-
मानप्रमाण मानिये तो तिसके असमानविलक्षणधर्मतै साध्य साधना
सो प्रमाण कहा कहिये, किछू कह्या चाहिये । बहुरि जहा सज्ञा जो
नामरूप पदार्थ ताका प्रतिपादन जो सज्ञा पहले सुनी थी तातै
जोडरूप प्रतिपादन करिये सो प्रमाण न्यारा कहना, ऐसे उपमानकू
न्यारा प्रमाण मानें दोप आचै है । बहुरि यह यातें अल्प है, यह यातें
बहुत है, यह यातै दूर है, यह यातै निकट है, यह यातै ऊँचा है,
यह यातै नीचा है, बहुरि इनके निपेध यह यातै अल्प नाही है इत्यादि,
ऐसे प्रत्यक्ष देख्या पदार्थविपै परस्पर अपेक्षातै अन्यभावका निश्चय
होय है सो ये अन्य प्रमाण ठहरै तब अपने इष्ट जो प्रमाणकी सख्या
ताका विघटन होय है। तातै उपमान प्रमाण न्यारा मानना युक्त नाही ||५||
आगै इनि प्रत्यभिज्ञानका भेदनिका अनुक्रमकरि उदाहरण दिखा-
वता सता सूत्र कहै है,
१-तथा चोक्तम्-
उपमानं प्रसिद्धार्थसाधासाध्यसाधनम् ।
तद्वैधात्प्रमाणं किं स्यात्सशिप्रतिपादनम् ॥१॥
इदमल्पं महद्रमासनं प्रांशु नेति वा ।
व्यपेक्षातः समक्षेऽर्थे विकल्पः साधनान्तरम् ॥२॥

८८
स्वर्गीय प० जयचंदजी विरचित-
.
यथा स एवायं देवदत्तः, गोसदृशो गवयः, गोवि-
लक्षणो महिषः, इदमस्माद्दूर, वृक्षोऽयमित्यादि ॥६॥
याका अर्थ-जैसे काहू पुरुपकू देखिकरि कहै ' यह पहले देख्या
था सो ही पुरुप है। यह तो एकत्वप्रत्यभिज्ञानका उदाहरण भया। बहार
काहून बनविपै गवयनाम तिर्यच प्राणी देखिकरि जानी 'जो गऊ पहले
देख्या था तिस सारिखा यह गवय है' यह सादृश्यप्रत्यभिज्ञानका उदा-
हरण है। वहुरि भैंसाकू देखिकरि यह जान्या 'जो पहले गज देख्या था
तातें विलक्षण यह भैसा है। यह तद्विलक्षण प्रत्यभिज्ञानका उदाहरण
है। बहुरि काहू वस्तुकू निकट देखिकरि अन्य काहूकू ऐसै जान्यां 'जो
यह यातै दूर है। यह तत्प्रतियोगी प्रत्यभिज्ञानका उदाहरण है । वहुरि
काहू वृक्षक देखिकरि वृक्षसामान्यकी सज्ञाकू यादि करि जानें 'जो यह
वृक्ष है। यह भी प्रत्यभिज्ञान है। बहुरि आदिशब्दकार अन्यभी उढा-
हरण हैं-जैसैं पहले सुन्या था तथा देख्या था जो जलका अर दूधका
भिन्न करनेवाला हंस होय है, बहुरि कहू जल दूधकू भिन्न करता देखि
जान्या जो 'यह हस है। यह भी प्रत्यभिज्ञान भया । वहुरि पहली
सुन्या था जो छह पाटका भ्रमर होय है, बहुरि छह पाद देखिकरि पहले
सुण्या ताकू यादिकरि जाण्या जो ‘यह भ्रमर है। यह भी प्रत्यभिज्ञान
भया । बहुरि पहले सुण्या था जो सात पान जाकै एकलगमै होय सो
१-पयोऽम्वुभेदी हंसः स्यात् षट्पादैर्भमरः स्मृतः।
सप्तपर्णैस्तु तत्वज्ञविज्ञेयो विषमच्छदः ॥ १ ॥
पंचवर्ण भवेद्नं मेचकाख्यं पृथुस्तनी ।
युवतिश्चैकशृंगोऽपि गण्डकः परिकीर्तितः ॥२॥
शरभोऽप्यष्टभिः पादैः सिंहश्चारुसटान्वितः॥३॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । विपमच्छद वृक्ष होय तब सात पत्र देख पहले सुण्या ताकू यादकरि जान्या जो यह 'विषमच्छद है। भीमसेनी कर्पूरकी उपजावनेवाली जो चेलि तापू भी विपमच्छद कहैं हैं, यह भी प्रत्यभिज्ञान है। बहुरि पहले सुण्या था जो पंचवर्णका मेचकनामा रत्न होय है तब कहू पच- वर्णका देखकर पहले सुण्या ताकू यादिकरि जानैं 'यह मेचकनाम रत्न है, यह भी प्रत्यभिज्ञान भया। बहार पहले सुनी थी जो जाकै कुच बड़े भारे विस्तारसहित होय सो स्त्री होय है पी3 भारे स्तन देखि पहले सुनींकू यादकरि जानैं जो यह स्त्री है। यह भी प्रत्यभिज्ञान भया । बहुरि पहले सुन्या था जो जाकै एक सीग खग होय सो गैडा होय है पीछे एक सींग देखि पहलेकू यादकरि जाण्या जो 'यह गैंडा है' यह भी प्रत्यभिज्ञान है । बहुरि पहले सुन्या था जो जाकै आठ पग होय सो शरभ होय है पीछे आठ पग देखि पहले सुनेकू यादिकरि जानी जो यह गरभ है' शरभ ऐसा नाम अष्टापदका है यह भी प्रत्यभिज्ञान है। बहुरि पहले जान्यां था जो जाकै सुन्दर मस्तकपरि सटा कहिये केश- निकी लटी बहुत होय सो सिंह होय है पीछे सटाकू देखिकरि पहले जाण्याकू यादकरि जानैं 'यह सिंह है। यह भी प्रत्यभिज्ञान है। ऐसैं इनिक आदि देकरि ये उदाहरण हैं । इनिके नामके शब्द सुनि बहुरि तैसा ही हस आदिकू देखिकरि पहले सुनेकू यादिकरि तैसे ही प्रतीति करै तब तिनिका सकलनरूप जोडका ज्ञान भया सो प्रत्यभिज्ञान कह्या है जाते इनिमै देखना अर याद करना ये दोऊ कारण सर्वमैं समान हैं। बहुरि अन्यमतीनिकै ये न्यारे प्रमाण ठहरे हैं जातै उपमानप्रमाणवि इनिका अन्तर्भाव नाही होय है तब प्रमाणकी सख्या बिगडै है ॥६॥ आगै ऊह कहिये तर्क प्रमाणके कहनेका अवसर पाया है ताकू कहैं हैं।

स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- उपलंभानुपलंभनिमित्तं व्याप्तिज्ञानमूह इदमस्मिन् सत्येव भवत्यसति न भवत्येवेति च ॥७॥ याका अर्थ-उपलंभ तौ प्राप्ति अनुपलभ अप्राप्ति ये दोऊ है निमित्त जाकू ऐसा व्याप्तिका ज्ञान सो ऊह कहिये तर्कप्रमाण है। तहां यह याकै हो” सतें ही होय ऐसा तौ अन्वय, बहुरि यह न होय तौ नहीं होय ऐसा व्यतिरेक, ऐसे दोऊनितै व्याप्तिज्ञान है । इहा उपलंभ तौ प्रमाणमात्रका ग्रहण करना । जो प्रत्यक्षहीकू उपलंभ शब्दकरि ग्रहण कीजिये तो अनुमानके विषय जे साधन तिनिविपै व्याप्तिका ज्ञान न होय । इहा कोई कहै-व्याप्ति तो सर्वोपसंहारवती है सर्व क्षेत्र-कालका संग्रहकरि प्रतीति कीजिये है सो अतीन्द्रिय ही साध्य होय अर ताका साधन भी अतीन्द्रिय होय तौ तिस साध्यकरि साध- नकै व्याप्ति कैसे जानी जाय ? ताका समाधान-जो ऐसें नाहीं है, जैसैं प्रत्यक्षके विपय साध्य-साधन होय तिनिविपै व्याप्ति जानिये है तैसै ही अनुमानके विपय साध्य-साधनकैविषै भी व्याप्ति जाननेका अविरोध है । जाते व्याप्तिका ज्ञान जो तर्क ताकै परोक्षपणा मानिये है ॥ ७॥ इहा याका उदाहरण कहैं है; यथाग्नावेव धूमस्तभावे न भवत्येवेति च ॥८॥ याका अर्थ-जैसै अग्निके होते ही वूम होय अग्निके अभाव होते धूम नाही ही होय ऐसैं । इहा अतीन्द्रिय साध्यसाधनका उदाहरण ऐसा-जो जैसे सूर्यकै गमनशक्तिसहितपणा साध्य करै अर गतिमानप- णाकू हेतु करै सो ये दोऊ ही अतीन्द्रिय है-सूर्यकी गमनशक्ति दीखै नाही अर चलता भी दीखै नाही सो यह आगमगम्य है। बहुरि

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला ।
९१
।
याका समर्थन यह-जो जब दूरि देश जाय तब जानिये चालै है, ऐसे
अनुमान दृढ होय है। ऐसे ही अन्यत्र जानना ॥ ८ ॥
आगै अनुमान अनुक्रममै आया ताका लक्षण कहैं है,-
साधनात् साध्यविज्ञानमनुमानम् ॥ ९ ॥
याका अर्थ-साधन कहिये हेतु तातै साध्य कहिये साधनें योग्य
जो वस्तु ताका विज्ञान होय सो अनुमान प्रमाण है ॥ ९ ॥
आगें साधनका लक्षण कहैं है,
साध्याविनाभावित्वेन निश्चितो हेतुः ॥ १० ॥
याका अर्थ-साव्यतै अविनाभावीपणाकरि जो निश्चय किया होय
सो हेतु कहिये । इहा बौद्धमती कहै है-जो हेतुका लक्षण तीनरूप-
पणा ही है ताके होते ही हेतुकै असिद्ध आदि दोषका परिहार बणै है,
सो ही कहिये है,-प्रथम तौ हेतु पक्षका वर्म होय तब असिद्धपणा
दोपका परिहार होय तातें ताके अर्थि हेतुकू पक्षधर्मरूप कहिये । बहुरि
सपक्षविपै जाका सत्व होय सो विरुद्धपणाका निराकरणकै अर्थि है ।
बहुरि विपक्षविपै जाका असत्व होय सो अनेकान्तिकके निषेधकै अर्थि
है, ऐसे तीनरूप हेतु कहै, सो ही कहिये है-श्लोकका अर्थ,-दिग्-
नागनामा बौद्धमतका आचार्य हेतुकै तीन रूपनिविपै निर्णय वर्णन
किया है जातें ये तीन रूप असिद्ध विरुद्ध व्यभिचारी जे हेतु सदूषण
तिनिके प्रतिपक्षी हैं । ताका समाधान आचार्य करै है, जो यह कहना
अयुक्त है जातै अविनाभावका नियमका निश्चय होते तीनू दोपनिका
परिहार वणै है, अविनाभाव है सो साध्यविना न बणना है । इस अ-
१-हेतोत्रिवेपि रूपेषु निर्णयस्तेन वर्णित ।
असिद्धविपरीतार्थव्यभिचारिविपक्षत ॥१॥

१२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- विनाभावपणाकू ही अन्यथानुपपन्नपणा ऐसा नाम कहिये, सो यहु अन्यथानुपपन्नपणा असिद्ध हेतुकै संभवै नाही । जातें ऐसा कह्या है जो अन्यथानुपपन्नपणा असिद्धकै नाही सिद्ध होय है। वहुरि विरुद्धहे- तुकै भी तिसके लक्षणकी उपपपत्ति नाही वणे है जाते साध्यतै विप- रीत अविनाभावस्वभावरूपविर्षे साध्यतै अविनाभावनियमलक्षणकी अनुपपत्ति है जाते दोऊनिकै विरोध है। बहुरि व्यभिचारी हेतुवि भी तिस प्रकृत कहिये कह्या लक्षणका अवकाश नांही है जात विम्द्धवि हेतु सो ही इहा जानना । तातें हेतुका स्वरूप अन्यथानुपपत्ति ही श्रेष्ठ है अर तीन रूपता श्रेष्ठ नाही है। जात तिस त्रिरूपताक होते भी यथोक्तलक्षणका अभाव होते हेतुकै साध्य प्रति गमकपणा नाही देखिये है, सो ही कहिये है-जैसे काहूकै पहले पाच पुत्र भये थे ते श्याम भये थे तिनिकू देखिकरि तिनिकी ज्यो ही ताकी स्त्रीकै गर्भविषै तिष्ठताकै भी तिसपुत्रपणां नामा हेतु" श्यामपणां साधनें मैं तीनरूपपणा तौ संभव है-जातै गर्भमैं तिष्ठताकै तिसके पुत्रपणां है यह तौ पक्षधर्मपणा भया । बहुरि सपक्ष अन्य पुत्रनिमैं तिसके पुत्रपणा है ही। वहुरि अन्यके पुत्रमैं गौरपणा है तिनि विपक्षनितें व्यावृत्ति है ही । ऐसें तीनरूप होते भी साध्य जो श्यामपणा तिस प्रति गमकपणा नाही, गर्भमै तिष्ठता गौर भी होय तौ बाधक कहा । इहां गैद्ध कहै-जो इस हेतुमैं विपक्षतें व्यावृत्ति नियमरूप नाही दीखै है तातै गमकपणा नाही ताकू कहिये-~जो यह कहना भी मुग्धका विलास है, जाते तिस विपक्षतै व्यावृत्ति कहिये न्यारापणाकै ही अविनाभावरूपपणा है, अन्य दोयरूपका सद्भाव होय अरु विपक्षत व्यावृत्ति न होय तौ हेतुकै अपने साध्यकी सिद्धि प्रति गमकपणाकी अनिष्टि होते सो विपक्षतै व्यवृत्ति ही हेतुका निर्वाध लक्षण करनां । 2 हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ९३ जारौं ताका सद्भाव होतै अन्य दोयरूपकी अपेक्षा विना ही साध्य प्रति गमकपणा बने है । इहा उदाहरण-जैसे अद्वैतवादीकै प्रमाण है जातै अपने इष्टका साधन अनिष्टका दूषणकी अन्यथा अप्राप्ति है प्रमाण विना साधन-दूपण बणै नाही । इस हेतुमै पक्षधर्मपणा नाही है सपक्षविपै अन्वय भी नाही है, केवल एक अविनाभावमात्रहीकरि साध्य प्रति गमकपणाकी प्रतीति है साध्यकू साधै है । बहुरि बौद्धादिकनैं और भी कही है-जो पक्षधर्मपणाका अभाव होतें भी हेतुकू गमक कहिये तौ काकके कृष्णपणातें यह प्रासाद कहिये महल धवल है ऐसे हेतुकै भी गमकपणा आवै है, भावार्थ-कोई श्वेत महल था तापरि काक बैठा था तहा काहू. कह्या जो महलकू धवल कहिये है सो काकके काला- पणाकी अपक्षातै साधिये है, ऐसे कहे काकका कृष्णपणा पक्ष जो प्रासाद ताका धर्म नाही अर पक्षधर्म विना हेतुकै गमकपणा नाही । ताका समाधान आचार्य करै है-जो यह कहना भी इस ही कथन- करि निराकरण किया जातें अन्यथानुपपत्तिका बलहीकरि पक्षधर्मरहित हेतुकै भी साधुपणा मान्या है, सो इस तेर प्रयोगमैं अन्यथानुपपत्ति नाही है । ता” हेतुका स्वरूप अविनाभाव ही प्रधान है जाकू अन्य- यानुपपत्ति भी कहिये सो ही अगीकार करना, जातै अविनाभावकू होते तीनरूपपणा न होते भी हेतुकै साध्य प्रति गमकत्वका दर्शन है। तातै तीनरूपपणा हेतुका लक्षण नाही है जाते याकै अव्यापकपणा है, सो ही कहिये है-बौद्ध आप मान है जो जहा सर्व पदार्थनिविर्षे क्षणिक- पणा साध्य थापै है ताका सत्त्व आदि साधन थापै है ताका सपक्ष नाही है सर्वहीकू साधतै (2) पक्षमैं सर्व आय गये सपक्ष न रह्या तब तहा त्रिरू- पपणाकी हानि भई तौऊ गमकपणा मान है। बहुरि इस ही कथनकरि नैयायिक हेतुकै पंचरूपपणा मानें है सो भी नाही वर्षे है ऐसै कह्या ९४ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- जानना। पक्षधर्मपणा बहुरि सपक्षसत्वपणां सो तौ अन्वयरूप अर विप- क्षतँ व्यावृत्तिपणां सो व्यतिरेकरूप, अर अबाधितविषयपणां, असत्प्रति- पक्षपणां ऐसैं पाच लक्षण हैं | तिनिकै भी अविनाभावहीका विस्तारपणां है । पंचरूपपणा अविनाभावहीका विशेप है। जो बाधितविषय है सो जाका विपय साध्य ही बाधासहित होय ताकै अविनाभावका अयोग है जाकै प्रतिपक्षीसहितपणा होय ताकी ज्यों ऐसे जानना । बहुरि साध्या- भास जाका विपय ताकै असम्यक् हेतुपणा है--समीचीनहेतुपणा नाही जाते जैसा पक्ष कह्या तैसा ताका विपयका अभाव है। तिस ही दोप- करि हेतु दोषसहित है। यातै यह निश्चय भया जो साध्यतै अविना- भावीपणाकरि निश्चित होय सो ही हेतु है ॥ १०॥ आगै अविनाभावका भेद दिखावते सते सूत्र कहै हैं; सहक्रमभावनियमोऽविनाभावः ॥११॥ याका अर्थ-साध्य साधनकै लार एककाल होनेका नियम सो तौ सहभावनियम कहिये, बहुरि जहा कालभेदकार साध्य साधन अनुक्रमतै होय सो क्रमभावनियम है। ऐसै अविनाभाव नियम दोय प्रकार है ॥११॥ आगै सहभावनियमका विषय दिखावते सते सूत्र कहै है, सहचारिणोाप्यव्यापकयोश्च सहभावः ॥१२॥ याका अर्थ–सहचारीनिकै जैसैं रूप रसकै एक वस्तुविर्षे युग- 'पत् रहनेका नियम है। बहुरि व्याप्यव्यापकपणाकै जैसे वृक्षपणांकै अरु शीतूंपणाकै व्याप्यव्यापकभाव नियम है । ऐसै सूत्रवि सप्तमीविभक्ति करि विपय दिखाया है सो सहभावनियम जानना ॥ १२॥ आगें क्रमभावनियमका विपय दिखावते संते सूत्र कहैं है;

MAR AAR meron. हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ९५ पूर्वोत्तरचारिणोः कार्यकारणयोश्च क्रमभावः ॥१३॥ याका अर्थ-पूर्वोत्तरचारी कहिये पहली पी, होय ते कृतिका नक्षत्रका उदय अर रोहिणीका उदय पूर्वोत्तरचारी है तिनिकै क्रमभाव नियम है । वहुरि कार्यकारणकै जैसे धूमकै अर अग्निकै कार्यकारणभाव है तिनिकै क्रमभाव नियम है ॥ १३ ॥ आगें इस प्रकारका अविनाभावका ग्रहण कैसे प्रमाणकरि होय है तहा कहै है प्रत्यक्ष प्रमाणकरि तो ग्रहण नाही जातै प्रत्यक्षका विषय तौ निकटवर्ती वस्तु है । बहुरि अनुमानकरि भी ग्रहण नाही जातें प्रकृत अनुमानकरि ग्रहण मानिये तो इतरेतराश्रय दूपण आवै अर अन्य अनुमानकरि मानिये तो अनवस्था दूपण आवै । बहुरि आगम आदिका भी यह अविनाभाव विषय नाही जातै तिनिका न्यारा न्यारा विषय है सो प्रसिद्ध है। तातै अविनाभावकी काहू प्रमाणकरि प्रति- पत्ति नाही, ऐसी आशका होतै ताका ग्राहक प्रमाणका सूत्र कहैं हैं, तर्कात्तन्निर्णयः ॥१४॥ याका अर्थ-पूर्व कह्या है लक्षण जाका ऐसा जो तर्क प्रमाण ताका द्वितीयनाम ऊह है तातै तिस अविनाभावका निर्णय है-यह अविनाभाव ताका विषय है ॥१४॥ आगै अब साध्यका लक्षण कहैं है,- इष्टमवाधितमसिद्धं साध्यम् ॥ १५ ॥ याका अर्थ-जो साधने योग्य होय सो साध्य कहिये, तिस सा- ध्यके तीन विशेषण है,-साधनेवालेकै इष्ट होय जाकू साधनेका अभि- प्राय होय ऐसा, बहुरि जो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणकरि बाध्या न जाय ऐसा, बहुरि जो पहले सिद्ध न किया होय ऐसा सो साध्य - है ९६ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- इहा अन्यवादी दूपण कहै है-जो इष्टकू साध्य कहे आसन शयन भोजन यान मैथुन इत्यादिक भी इष्ट है ते साध्य ठहरै है ? ताकू आचार्य कहै है-ऐसी कहनेवाले अतिमूर्ख है जातै विना अवसर कहनेवालाकै अतिप्रलापीपणा है, इहा तौ साधनका अधिकार किया है जो साधनका विषय होय ताकी अपेक्षा इहा इष्ट कह्या है ॥१५॥ आगें आपनैं कह्या जो साध्यका लक्षण ताके विशेषणनिकू सफल करते सते प्रथम ही असिद्ध विशेपणकू दृढ़ करनेकू सूत्र कहै हैं, सन्दिग्धविपर्यस्ताव्युत्पन्नानां साध्यत्वं यथा स्या- दित्यसिद्धपदम् ॥ १६ ॥ याका अर्थ-सन्दिग्ध विपर्यस्त अव्युत्पन्न इनिकै साध्यपणा जैसे होय इस हेतु साध्यका असिद्धपदरूप विशेपण है । तहां काहू क्षेत्रमै अंधकार आदिके निमित्ततै खड़ा पदार्थ देखि विचारै जो यह स्थाणु है कि पुरुप है ? ताका निश्चय न होय ज्ञान दोऊ तरफ स्पर्शता रहै ऐसे संशयकरि व्याप्त जो वस्तु सो तो संदिग्ध है। बहुरि सत्यार्थतै विप- रीत वस्तुका निश्चय करनेवाला जो विपर्यय ज्ञान ताका विषयभूत जो वस्तु जैसै सीपविक् रूपेका ज्ञान तहा रूपा आदि विपर्यस्त वस्तु है । बहुरि नाम जाति संख्या आदि विशेपनिका ज्ञान विना जो अनिर्णीत विषयरूप वस्तु निश्चय विना ग्रहण करनां जाका होय सो वस्तु अव्यु. त्पन्न है यह अनध्यवसायज्ञानका विषय जानना । इनि तीननिकै साध्य- पणा कहनेकै अर्थि असिद्धपदका ग्रहण है, ऐसा अर्थ जानना ॥१६॥ आगें अब इष्ट अर अबाधित इनि दोऊ विशेषणनिका सफलपणां दिखावते संते सूत्र कहैं हैं, हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। अनिष्टाध्यक्षादिबाधितयोः साध्यत्वं मा भूदितीप्टावा- धितवचनम् ।। १७॥ याका अर्थ-अनिष्टकै अर प्रत्यक्षादि प्रमाणकरि वाधितकै साध्य- पणा न होय इस तु र अर अबावित ऐसा वचन है । अनिष्ट तौ जैसें मीमासककै शब्दकै अनित्यपणा है जाते मीमासक शब्दकू नित्य मानें है सो अनित्य साध तो अनिष्ट होय । बहुरि शब्दकै अश्रावणपणा कहिये श्रोत्रके मुनने न आवना साधै तो प्रत्यक्षप्रमाणकरि बाधित होय आदिशब्दकरि अनुमान-आगम लोक-स्ववचनकार बाधित लेनें । इनिका उदाहरण अकिंचित्कर हेत्वाभासका निरूपण करसी तिसके अव- सरमै प्रयकार आप विस्तारकरि कहसी यातें इहा न कहिये है ॥१७॥ इहा साध्यका असिद्धविशेषण तौ प्रतिवादी जो पीछे उत्तर कहै ताहीकी अपेक्षाकरि है जाते पहले पक्ष स्थापै ऐसा जो वादी ताकै प्रसिद्ध ही है, बहुरि इष्टपट है सो वादीको अपेक्षा ही है ऐसा विशेष दिखावनेंकू मूत्र कहैं है,- न चासिद्धवदिष्टं प्रतिवादिनः ॥१८॥ याका अर्थ-जैमै प्रतिवादीकी अपेक्षा असिद्धकू साध्य कहिये है तैमैं ताकै इष्ट साध्य नाही है । इहा ऐसा प्रयोजन है-जो साध्यके सर्व ही विशेषण सर्वकी अपेक्षा नाही है कोई कोईकी अपेक्षा है कोर्डकी अपेक्षा है । बहूरि असिद्धवत् ऐसा व्यतिरेककू मुख्यकार उदा- हरण दिया है । जैसैं असिद्ध प्रतिवादीकी अपेक्षा है तैसैं इष्ट ताकी अपेक्षा नाही है ऐसा अर्थ है ॥ १८॥ आर्गे यह काहेतै कया ऐसैं पूसूत्र कहैं हैं, प्रत्यायनाय हीच्छा वक्तुरेव ।। १९ ॥

स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- याका अर्थ-परकू प्रतीति उपजावनेंकू इच्छा वक्ता ही की है ताते, इष्ट वादीहीकी अपेक्षा है । जो इच्छाका विषय ताकू इष्ट कहिये ताकी. पर• प्रतीति कहनेवाला ही उपजावै तातें ताहीकी इच्छा कही ॥१९॥ आगें पूछे है कि यह साध्य धर्म है कि इस साध्य धर्मकरि विशिष्ट धर्मी है ! ऐसे प्रश्न होते तिसका भेद दिखावते संते सूत्र कहैं हैं;- साध्यं धर्मः कचित्तद्विशिष्ठो वा धर्मी ॥२०॥ याका अर्थ-धर्म है सो साध्य है, बहुरि कोई जायगां तिस साध्यधर्मकरि विशिष्ट धर्मी है सो साध्य है । जाकै आधार साध्य वस्तु होय सो धर्मी कहिये तिसकी अपेक्षा साध्या धर्म कहिये । इहां ऐसा अर्थ है-जो व्याप्तिकालकी अपेक्षाकरि तौ साध्यनामा धर्म ही साध्य है, बहुरि काई जायगा प्रयोगकालकी अपेक्षा तिस साध्यधर्मकरि विशिष्ट धर्मी साध्य है जाते सूत्रके वाक्य हैं, ते उपस्कारसहित होय हैं, सूत्रमैं पद ऊपरतें लाइये ताकू उपस्कार कहिये सो इहां अपेक्षाका पद उपरतें आया है। इहां भावार्थ ऐसा-जो धर्मीकै साध्यपणां तौ प्रयोग कालहीविय कोई ठिकाने है । जहां अनुमानकै प्रतिज्ञा हेतु आदि अव- यव वचनकरि कहिये ताकू प्रयोग कहिये । अर जहां व्याप्ति जनाइये तहां साध्य धर्मही जोड़िये है साधनकै साध्य धर्महीते है ॥२०॥ आरौं साध्यधर्मकरि विशिष्ट जो धर्मी तिसका नामान्तर कहिये अन्य नाम कहैं हैं- पक्ष इति पावत् ॥ २१॥ याका अर्थ-जाकै आधार साध्य होय सोधर्मी कहिये ताहीका दूसरा नाम पक्षमा है। इहां प्रश्न-जो धर्मधर्मीका समुदाय सो पक्ष है ऐसा, पक्षका स्वरूप पुरातन आचार्य अकलंक देव आदिकरि कहा है सो इहां - - T

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
९९
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धर्मीहीकू पक्ष कह्या सो सिद्धान्तका विरोध कैसैं न भया' ताका समा-
धान आचार्य करै है-जो ऐसैं नाही है जाते साध्य जो धर्म ताके
आधारपणाकरि विशेषितरूप किया जो धर्मी ताकू पक्षवचनकरि
कहतें भी दोपका अवकाश नाही है। रचनाका विचित्रपणामात्रकरि
तात्पर्यका निराकरण नाही होय है तातें सिद्धान्तका अविरोध है॥२१॥
इहा बौधमती कहै है धर्मीकू पक्ष कह्या सो तौ होहु परतु धर्मी है
सो विकल्पबुद्धिकैविपैं वर्तमान ही है अर वस्तुस्वरूप नाही है जातें
अनुमान अनुमेयका व्यवहार सर्व ही बुद्धिकरि कल्पिये है, बुद्धिकरि
कल्पे जे धर्म धर्मी तिस न्यायकरि बाह्य ताका सत्व है कि नाही है ऐसी
अपेक्षा नाही करै है" ऐसा हमारै कह्या है सो ताकै निराकरणके अर्थि
आचार्य सूत्र कहैं हैं,-
प्रसिद्धो धर्मी ॥२२॥
याका अर्थ-धर्मी है सो प्रसिद्ध है कल्पित ही नाही है इहा यह
अर्थ है--जो बाह्य अर अन्तरंग पदार्थका नाही है आलबनभाव जाकै
ऐसी विकल्पबुद्धि है सो ही धर्मीकू स्थापै है सो ऐसे नाही है। जो
धर्मी अवस्तुस्वरूप होय तौ तिसकै व्यापार जो साध्यसाधन ताकै भी
वस्तुस्वरूपणा न बणे जाते अनुमानकी बुद्धिक परपराकरि भी वस्तुकी
व्यवस्थाका कारणपणाका अयोग होय । तातै विकल्पकरि अथवा अन्य-
प्रमाणकरि स्थापन किया जो पर्वत आदिक सो अनुमानका विषयस्वरूप
होता संता धर्मीपणाकू गये है। ऐसा निश्चय भया जो धर्मी प्रसिद्ध है
बहुरि तिसकी प्रमिद्धि है सो कोई वि तौ विकल्पतें, कोई विर्षे प्रमा,
णतें है, कोई वि प्रमाण अर विकल्प दोऊनितें है, ऐसें एकातकरि
विकल्पवि0 ही ल्यायाकै अथवा प्रमाण प्रसिद्धहीकै धर्मीपणा नाही ॥२२॥

१००
स्वर्गीय पं. जयचंदजी विरचित-
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आगै मीमांसक कहै है जो धर्मीकी विकल्पतै प्रतिपत्ति होते तुमारे
साध्य कहा है ऐसी आशंका होतें सूत्र कहै है;-
विकल्पसिद्धे तस्मिन् सत्तेतरे साध्ये ॥२३ ।।
याका अर्थ-तिस धर्मीकू विकल्पसिद्ध होतें सत्ता अर इतर कहिये
असत्ता दोऊ साध्य है । इहा सुनिर्णीत कहिये भलै प्रकार निश्चय
किया जो असंभवद्वाधक प्रमाण ताका बलकरि तौ सत्ता साध्य है।
बहुरि योग्य जो अनुपलब्धि ताका बलकरि असत्ता साध्य है । ऐसैं
सत्ता असत्ता साध्य है ऐसा वाक्यशेप लेना ॥ २३ ॥
इहां उदाहरण कहैं है
अस्ति सर्वज्ञो नास्ति क्षरविषाणम् ।। २४ ॥
याका अर्थ-सर्वज्ञ है, इहा तो विकल्पसिद्ध जो सर्वज्ञ धर्मी ता-
विर्षे सत्ता साध्य है । बहुरि खरविषाण नाही है, इहा गदहाकै सींग
विकल्पासिद्ध धर्मी है तावि. असत्ता साध्य है । या सूत्रका अर्थ सुग-
म है सो टीकाकार टीका न लिखी है ।
इहा ममिासक कहै है-जो असिद्ध है सत्ता जाकी ऐसा जो धर्मी तात्रि
सद्भाव अर अभाव अरु भावाभाव इनि ताही धर्मनिकै असिद्ध विरुद्ध
अनेकान्तिकपणा है तातें अनुमानके विपयपणांका अयोग है तातै सत्ता
अर असत्ताकै साध्यपणा कसैं बर्णै । सो ही कह्या है श्लोकका
अर्थ-जो सत्ता साधिये है सो तहा हेतु भावका धर्म है तो
असिद्ध है, अर अभावका धर्म है तौ विरुद्ध है, दोऊका धर्म है तो
व्यभिचारी है सो ऐसी सत्ता कैसै साधिय ? ताका समाधान आचार्य करें
१ असिद्धो भावधर्मश्चेद् व्यभिचार्युभयाश्रतः ।
विरुद्धो धर्मो भावस्य सा सत्ता साध्यते कथं ॥१॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १०१ हैं, जो यह कहना अयुक्त है जाते मानसप्रत्यक्षवि भावरूप ही धर्मीका प्राप्तपणा है । बहुरि कहै-तिस धर्मीकी सिद्धि मानसप्रत्यक्षमै होते ताका सत्त्वमी आय गया तातें अनुमान व्यर्थ है, सो ऐसैं नाही है-तिसका सत्व अगीकार भया तौ ऊपर वादी धीटपणातें-प्रतिपक्षप- णातै अगीकार न करै तब तिसकू सिद्ध करनेकू अनुमानका सफलपणां है। बहुरि कहै---जो मानसप्रत्यक्षमैं आकाशका फूलकाभी सद्भावकी संभावनाते अतिप्रसग आवै । सो ऐसे भी नाही है, जाते आकाशके फूल- का ज्ञानकै वाधक प्रतीतिकरि निराकरण भई है सत्ता जाकी ऐसा अस- त्वरूप वस्तु विषयपणाकरि ताकै मानसप्रत्यक्षाभासपणा है । बहुरि इहा कहै जो ऐसे होते घोडाकै सींग इत्यादिककै धर्मीपणा कैसे बणेगा ? तो ऐसा तर्क न करना जातै धर्मीका प्रयोगकालवि. वावक प्रत्ययका उदय नाही है तातें धर्मीका सत्त्वकी सभावना है । बहुरि सर्वज्ञादिक धर्माविपै साधकप्रमाणका अभावपणाकरि सत्व प्रति सशय बताये तो संशय नाही है, सुनिश्चितासंभवद्वावकप्रमागपणाकरि जैसे सुख आदिकै विपै सत्त्वका निश्चय है तैसैं सत्त्वका निश्चय है, तहा सशयका अयोग है । सुनिश्चितासंभवद्वायकप्रमाण जाकू कहिये जहा भलै प्रकार निश्चय किया असंभवता बाधक प्रमाण होय, भावार्थ-बावक- प्रमाण निश्चयतें न होय ॥ २४ ॥ आरौं प्रमाणसिद्ध अर उभयसिद्ध जो धर्मी तिनिविय साध्य कहा है ऐसी आशंका होते सूत्र कहैं हैं; प्रमाणोभयसिद्धे तु साध्यधर्मविशिष्टता ॥२५॥ याका अर्थ-प्रमाणसिद्ध अर प्रमाणविकल्पसिद्ध इनि दोऊ धर्मी वि. साध्य जो धर्म ताकरि विशिष्टता जो धर्मीपणा सो ही साध्य है।

१०२ स्वर्गीय पं0 जयचंदजी विरचित- इहां पहले सूत्रमै 'साध्ये' ऐसा द्विवचन है तोऊ अर्थके वशतें इहाँ एकवचन ही संबंध करना, साध्यधर्मविशिष्टता साध्या ऐसै । बहुरि प्रमाण अर उभय कहिये प्रमाण विकल्प दोऊ ऐसे दोय भातिकरि सिद्ध जो धर्मी ताविषै साध्य जो धर्म ताकरि विशिष्टता साध्य है। दोऊ प्रकारके धर्मावि जो साध्यका पूर्वस्वरूप कह्या सो ही धर्म ताकरि सहितपणां साध्य है । जहा जैसा साध्य होय तैसाहीकरि युक्त धर्मी साध्य है । इहा यह अर्थ है-जो प्रमाणकरि प्राप्त भया भी वस्तु विशिष्टधर्मके आधारपणाकरि विवादमै आवै सो साध्यपणांकू नाही उलंध, साध्य होय ही । ऐसे ही प्रमाण विकल्प विषै भी जोड़ि लेना ॥२५॥ आगै प्रमाणसिद्ध अरु उभयसिद्ध दोऊ धर्मी अनुक्रमकरि दिखावते संते सूत्र कहै हैं:- अग्निमानयं प्रदेशः, परिणामी शब्द इति यथा ॥२६॥ याका अर्थ यह प्रदेश अग्निसहित है यह तौ प्रत्यक्षप्रमाणसिद्ध धर्मी है, बहुरि शब्द है सो परिणामी है इहां शब्द धर्मी है सो उभय- सिद्ध है जो शब्द श्रवणमै आया सो तौ श्रवणप्रत्यक्ष प्रत्यक्षप्रमाणसिद्ध है अर अन्यदेशकालवर्ती शब्द विकल्पसिद्ध है । इहा अग्नि जहा सा- धिये है सो प्रदेश प्रत्यक्षप्रमाणकरि सिद्ध है, बहुरि शब्द है सो उभय- सिद्ध है जातै अल्पज्ञानवाले पुरुषनिकरि अनिश्चित दिशा-देश-कालविर्षे व्याप्त जे सर्व शब्द ते निश्चय करनेंकू समर्थ नाही हूजिये है तोऊ तिस प्रति अनुमानका निरर्थकपणा है, अनुमान तो अल्पज्ञ ही करै है॥२६॥ आगै प्रयोगकालकी अपेक्षा साध्यका नियम दिखावता संता सूत्र कहै हैं:- हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । १०३ व्याप्तौ तु साध्यं धर्म एव ॥२७॥ याका अर्थ-व्याप्तिविर्षे साध्य है सो धर्म ही है । याका अर्थ सुगम है यातें टीका नाही । इहा अर्थ जिस धर्मीविपैं जो साध्य साधिये ताकू तिस धर्मीका धर्म कहिये । ऐसा साध्य जो धर्म सो ही साधने योग्य है । व्याप्ति साध्यसाधनहीकै होय है ॥२७॥ आगै धर्मीकै भी साध्यपणा होते कहा दोप है, ऐसे पूछे सूत्र कहै है। अन्यथा तद्घटनात् ॥२८॥ याका अर्थ-जो धर्मीकू साध्य करिये तो धर्मीकै अर साधनकै व्याप्ति वणे नाही । इहा अन्यथा शब्द है सो पहले व्याप्तिविपै साध्यधर्म कह्या तिसतै विपर्यय अर्थमै है, तातै ऐसै कहना जो धर्मीकै साध्यपणा होते व्याप्ति बणे नाही । यह सूत्र पूर्वसूत्रका हेतुरूप है । धूमके दर्श- नते सर्व जायगा पर्वत अग्निमान है ऐसी व्याप्ति नाही करी जाय है जाते यामै प्रमाणते विरोध आच है ॥ २८ ॥ आगै बौद्धमती कहै है-जो अनुमानविपैं पक्षका प्रयोगका असभव है तातै प्रसिद्धो धर्मी' इत्यादि वचन अयुक्त है जाते तिस धर्मीकै सामर्थ्यलब्धपणा सामर्थ्यतै जाणिये है, बहुरि जाणे पीछे भी ताका वचन कहना सो पुनरुक्तताका प्रसंग आवै है, जातै ऐसा कह्या जो अर्थतै आय प्राप्त हुवा तौऊ ताका फेरि वचन कहना सो पुनरुक्त है, ऐसे सौगत. पक्ष करी ताका निराकरणकू आचार्य सूत्र कहैं हैं, साध्यधर्माधारसन्देहापानोदाय गम्यमानस्यापि प- क्षस्य वचनम् ॥ २९॥ याका अर्थ-पक्ष है सो साध्य जो धर्म ताका आधार है तातें साध्यकू साधिये तब ऐसा सन्देह पड़े जो कौंन जायगा इस साध्यकू १०४ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- - साधिये है ताके सन्देह दूर करनेकू जाननैमैं भी आया जो पक्ष ताका वचनकार प्रयोग करना। साध्य सो ही धर्म ताका आधार ताविर्षे संदेह पड़े जो अग्निकू पर्वत आदिमै साधिये है कि महानस आदिमैं ? ऐसा सन्देहका अपनोद जो दूर करना तिसकै अर्थि गम्यमान भी जो सा. ध्यका आधार पक्ष ताका वचन कहना-प्रयोग करनां । इहां पक्षका गम्यमानपणा ऐसे है जो साध्यसाधनकै व्याप्यव्यापकभाव दिखावनेकी अन्यथा अप्राप्ति है। साध्य साधनकै व्याप्यव्यापकभाव दिखावते ति- सके आधारस्वरूप पक्षकू भी जानिये है तौ ऊपरके सन्देह दूर कर- नेकू पक्षका वचन कहनां युक्त है ॥ २९ ॥ आगें याका उदाहरण कहै हैं;- साध्यधर्मिणि साधनधर्मावबोधनाय पक्षधर्मोपसं- हारवत् ॥ ३० ॥ याका अर्थ-साध्यकरि विशिष्ट जो धर्मी पर्वतादिक ताविपैं सा- धन धर्मका जाननेकै अर्थ जैसैं पक्षधर्मका उपसंहाररूप जो उपनय ताका प्रयोग करिये है तैसें पक्षका भी प्रयोग करनां । साध्यकरि विशेपणरूप जो धर्मी पर्वतादिक तहां साधनधर्मकै जाननेंकै अर्थि जैसै पक्षधर्मका उपसंहाररूप उपनय कहिये है जातें पक्षधर्म जो हेतु ताका उपसंहार कहिये संक्षेप करना सो उपनय है जैसे अग्नि- मान साध्यका प्रयोगविर्षे धूमवान् यहु है ऐसा उपनय कहना ताकी ज्यों पक्षका भी प्रयोग युक्त है । इहां यह अर्थ है-जो साध्यतै व्याप्त जो साधन ताकै दिखावनेकरि तिस हेतुके आधारका जाणपणा होते भी नियमरूप जो धर्मी ताका संबंधीपणाकै दिखावने• जैसे उपनयका प्रयोग करिये है तैसैं साध्यकै विशिष्ट जो धर्मी ताका संबंधीपणां जनावने• पक्षका भी वचन कहनां ।

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १०५ बहुरि किछू विशेप कहै है; जो हेतुका प्रयोग करिये है ताका समर्थन भी अवश्य है-कहने योग्य होय है जातै बिना समर्थन हेतुप- णाका अयोग है, ऐसे होते समर्थनका प्रयोगते ही हेतुकै सामर्थ्य सिद्ध- पणा होय तब हेतुका प्रयोग भी अनर्थक ठहरै है। इहा कहै जो हेतुका प्रयोग न करिये तो समर्थन किसका कहिये ? तौ ताकू कहिये- जो पक्षका प्रयोग न करिये तो हेतु किसका कहिये ? ऐसैं यह प्रश्नो- त्तर समान है। तातै कार्य, स्वभाव, अनुपलभ, ऐसे तीन भेदकरि हेतुकू कहता तथा पक्षधर्मपणा आदेि तीन प्रकार हेतुकू कहकरि ताका सम- र्थन करता जो बौद्धमती ताकरि पक्षका प्रयोग भी अंगीकार करने योग्य ही है । इहा भावार्थ ऐसा-जो बौद्धमती अनुमानका प्रयोग करता व्युत्पन्न पडितकै एक हेतु ही माने है, ताकू कह्या है जो पक्षका वचन भी मानने योग्य है जातै पक्ष कहे विना साध्य जा ठिकानें साधिये तामैं सन्देह रहै तौ पक्षके वचन विना दूर होय नाहीं । बहुरि हेतुका समर्थन बौद्ध करै है-ताकू चेत कराया जो जा हेतुका समर्थन हेतु कह्या तब पहला हेतु तौ पक्ष ही भया सो पक्षका प्रयोग निषेध किये हेतुका भी प्रयोग अनर्थक ठहरै है, समर्थन ही कहना युक्त ठहरै है । तातै पक्षका ही वचन पहले क्यों न कहना, ऐसें जानना ॥३०॥ आगे इस ही अर्थके कहनेकू सूत्र कहै है, को वा त्रिधा हेतुमुक्त्वा समर्थयमानो न पक्ष- यति ॥३१॥ याका अर्थ-'को वा' कहिये वादी प्रतिवादी ऐसा कौन है जो तीन प्रकार हेतुकू कहकरि अर ताका समर्थन करता सता तिस हेतुकू पक्ष न करे, करै ही करै । इहा 'को' ऐसा कहनेत वादी प्रतिवादी कोई लेना । बहुरि 'वा' शब्द है सो निश्चय अर्थमैं है, सो युक्तिकरि १०६ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- । पक्षप्रयोगका अवश्य भाव होतै निश्चयतें कौन पक्ष नाहीं करै है, अवश्य करै ही है । कहा करता संता हेतुका समर्थन करता संता-हेतुकू कह करि ही समर्थं है विना कहे नांहीं समर्थ है । इहां समर्थनका स्वरूप ऐसा-जो हेतुका असिद्धपणा आदि दोपका परिहारकरि अपने साध्यकू अर साधनकू सामर्थ्यरूप प्ररूपणा करनेकू समर्थ वचन होय सो ही समर्थन है । सो हेतुके प्रयोगकै पी, वौद्धमतीकरि अंगीकार किया है तातै सूत्रमैं उक्त्वा' ऐसा वचन है ॥ ३१॥ अब इहा साख्यमती कहै है-जो पक्षका प्रयोग तो होहु परन्तु पक्ष, हेतु, दृष्टात, भेदकरि अनुमानके तीन ही अवयव है । बहुरि मीमासक कहै है---प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, भेदकरि च्यार अवयवस्वरूप अनुमान है। बहुरि यौग कहिये नैयायिक कहै है-~प्रतिज्ञा, हेतु, उदा- हरण, उपनय, निगमन, भेदतै पाच अवयवस्वरूप अनुमान है। तिनिके मतकू निराकरण करते संते अपनें मतवि सिद्ध जो अनुमानके अवयव दोय तिनिहीकू दिखावते संते सूत्र कहैं हैं:- एतद्वयमेवानुमानाङ्गं नोदाहरणम् ॥३२॥ याका अर्थ-अनुमानके अवयव पक्ष अर हेतु ये दोय ही है अर उदाहरण नाही है । ये पक्ष अर हेतु तिनिका द्वय कहिये द्विक सो ही अनुमानके अग है अधिक नाही है। इहा एवकारकरि उदाहरण आ- दिका निपेध सिद्ध होतें भी परमतके निराकरणकै आर्थ फेरि उदाहरण नांही है ऐसा वचन कह्या है ॥ ३२॥ आगै सो उदाहरण कहा साध्यकी प्रतिपत्तिकै अर्थि है कि हेतुकै अविनाभावके नियमकै अर्थि है कि व्याप्तिके स्मरणकै अर्थ है ? ऐसै, तीन विकल्पकरि तिनिळू दूपणरूप करते संते सूत्र कहै है हिन्दी प्रमेयरत्नमाला! १०७ है न हि तत्साध्यप्रतिपत्त्यङ्गं तत्र यथोक्तहेतोरेव व्यापारात् ॥३३॥ याका अर्थ-यह उदाहरण है सो साध्यकी जो प्रतिपत्ति ताका अंग नाही है जातै साध्यविपैं तो जैसा हेतु कह्या तिसहीका व्यापार । उहा तत् कहिये उदाहरण सो साध्यकी प्रतिपत्ति कहिये साध्यका ज्ञान ताका अग-कारण नाही है ऐसा सबध करना जाते तिस साध्यकी प्रतिपत्तिविपै यथोक्त जो साध्यतै अविनाभावीपणाकरि निश्चय किया हेतु तिसहीका व्यापार है ॥ ३३ ॥ आगै दूसरे विकल्पक शोधता संता सूत्र कहैं है, तदविनाभावनिश्चयार्थ वा विपक्षे बांधकप्रमाणब- लादेव तत्सिद्धेः ॥ ३४ ॥ याका अर्थ-'तत्' ऐसी अनुवृत्ति लेनी, बहुरि 'न' ऐसा निपेध की भी अनुवृत्ति लेनी, ताकरि यह अर्थ भया-जो उदाहरण तिस साध्यकार हेतुका अविनाभाव निश्चय करनेकै आर्थि नाही है जातें विपक्षविपैं बाधक प्रमाणके बलते ही अविनाभावनिश्चयकी सिद्धि होय है ॥ ३४॥ बहुरि किछू विशेप कहै हैं, जो उदाहरण तौ व्यक्तिरूप है, सामान्यके बहुत विशेष होय तिनिमैं एक विशेषकू व्यक्ति कहिये, सो व्याप्तिक समस्तपणैकरि कैसै गमक होय, तिस व्यक्तिविपै व्याप्तिकै आर्थ अन्य उदाहरण हेरना पडै है ताकै भी व्यक्तिरूपपणाकरि सामा- न्यरूप जो व्याप्ति ताका निश्चय करनेका असमर्थपणा है यातै और १ मुद्रित सस्कृत प्रतिमें 'वाधकप्रमाणवलादेव' इसके स्थानमें 'वाधकादेव' इतना ही पाठ है।

१०८ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- 11 और उदाहरणकी अपेक्षा होते अनवस्था दूषण होय है, सो ही सूत्रमैं कहैं हैं:- व्यक्तिरूपं च निदर्शनं सामान्येन तुव्याप्तिस्तत्रापि तद्विप्रतिपत्तावनवस्थानं स्यादू दृष्टान्तान्तरापेक्षणात् १ 1- याका अर्थ-निदर्शन कहिये उदाहरण सो तो व्यक्तिरूप है जिस साध्यसाधनकै जोड़िये तहा ही लागै, बहुरि व्याप्ति है सो सामान्य करि- है सर्व साध्यसाधनमैं व्यापै है, सो एक उदाहरणते व्याप्तिका निश्चय नाही होय तहा दूसरी जायगा उदाहरणकै विौं भी तिस व्याप्तिते साध्यसाधन जोड़िये तब अन्य दृष्टांत चाहिये ऐसे अन्य दृष्टांतकी, अपेक्षा करनेंतें अनवस्था होय है ।। ३५॥ आगें तीसरा विकल्पविर्षे दूपण कहै है;- नापि व्याप्तिस्मरणार्थ तथाविधहेतुप्रयोगादेव त- स्मृतेः ॥ ३६॥ याका अर्थ यह उदाहरण व्याप्तिके स्मरण कहिये यादि करनेकै अर्थि नाही है जाते अविनामावस्वरूपहेतुके प्रयोग करनेंहीतै तिस व्याप्तिका स्मरण होय है । ग्रहा है साध्यतै संबंध जानें ऐसा पुरुषकै हेतु दिखावनेंहीकरि व्याप्तिकी सिद्धि होय है। जानैं संबंध न प्रथा होय ताकै सौ दृष्टांतकरि भी स्मरण न होय जाते स्मरण तो पहली अनुभव होय ताहीका होय है, ऐसा भावार्थ है ॥ ३६॥ आगें ऐसैं सो इस उदाहरणके प्रयोगकै साध्य पदार्थ प्रति उपयो- गीपणां नांही है उलटा संशयका कारणपणा ही है ऐसे दिखावै है; तत्परमभिधीयमानं साध्यधर्मिणि साध्यसाधने संदेहयति ॥ ३७॥ ܨ ܫ aari

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
१०९
Sher
याका अर्थ-सो उदाहरण पर कहिये केवल कह्या हुआ साध्यके
धर्मावि साध्य अर साधनकू संदेहसहित करै है । जाते दृष्टान्तका
धर्मीविर्षे साध्यतै व्याप्त जो साधन ताकू दिखावतै भी साध्यके धर्मी-
विपैं तिस साध्यका अर साधनका निर्णयका करनेका अशक्यपणा है
ऐसा वाक्यशेप है । भावार्थ-उदाहरण कह्या हुवा साध्य साधनकू सदे-
हरूप करै है ॥ ३७॥
आगें इस ही अर्थक व्यतिरेककू प्रधानकरि दृढ करते संते कहै
-
कुतोऽन्यथोपनयनिगमने ॥ ३८ ॥
याका अर्थ-जो उदाहरण कहें सदेह न उपजता तौ उपनय
अर निगमन इनि दोऊनिका प्रयोग काहेकू करते । जातै यह जान्या
जो उदाहरणके प्रयोगते सशय होय है ॥ ३८ ॥
आगै नैययिक कहै है-जो उपनय निगमन इनि दोऊनिकै भी
अनुमानका अगपणा है, जो इनिका प्रयोग न कीजिये तो निर्दोप
साध्यकी सिद्धिका अयोग है तिसके निषेधकै आर्थि सूत्र कहै है,-
न च ते तदङ्गे, साध्यधर्मिणि हेतुसाध्ययोर्वचनादे-
वासंशयात् ॥३९॥
याका अर्थ-ते उपनय निगमन भी तिस अनुमानके अंग ही
नाही है जाते साध्यके धर्माविप हेतु अर साध्यके वचनतै सशयका
निराकरण है । उपनय निगमनका स्वरूप आगें कहसी । अर इहा
एवकारकरि ऐसा जानना जो दृष्टान्त आदिके प्रयोग विना ही प्रतिज्ञा
हेतु" ही साध्यकी सिद्धि होय है-संशय मिटि जाय है, ऐसा भावार्थ
है ॥ ३१ ॥

स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- आगें विशेष कहैं हैं जो दृष्टान्तादिक कहकरि भी हेतुका समर्थन अवश्य कहनां जाते विना समर्ध्या हेतुकै अहेतुकपणां है या सो समर्थन ही श्रेष्ठ है, जो हेतुस्वरूप है अथवा अनुमानका समर्थन भी होहु जाते साध्यकी सिद्धिवि ताहीका उपयोग है उदाहरण आदिक अनुमानके अवयव नहीं है, इस ही अर्थरूप कहें हैं;- समर्थनं वा वरं हेतुरूपमनुमानावयवो वाऽस्तु साध्ये तदुपयोगात् ॥ ४०॥ याका अर्थ-हेतुका समर्थन है सो ही श्रेष्ठ है सो हेतुरूपही है, अर यह समर्थन अनुमानका अवयव भी होहु जाते साध्यवि तिसका उपयोग है-साध्य याते दृढ़ होय है । इहा सूत्रमैं पहला 'वा' शब्द है , सो नियमकै अर्थ है । बहुरि दूसरा 'वा' शब्द है सो न्यारा पक्षके सूच- नेकू है। अब शेष या सूत्रका अर्थ सुगम है ॥४०॥ आगें पूछे हैं कि दृष्टांत आदिक विना मन्दबुद्धीनिका समझावनेंका असमर्थपणां है तातै पक्षहेतुके प्रयोगमात्रहीकरि तिनिकै साध्यकी प्रति- पत्ति कैसे होय, ऐसे पूछे सूत्र कहैं हैं;- बालव्युत्पत्यर्थं तत्त्रयोपगमे शास्त्र एवासौ न वादेऽनुपयोगात् ॥४१॥ याका अर्थ-~-बाल कहिये अल्पज्ञानी तिनिकै ज्ञान होनेकै अर्थि.' उदाहरण उपनय निगमन ये तीन अवयव तिनिका अंगीकार होते भी' शास्त्रहीविय तिनका मानना है, अर वादविर्षे नाही जाते वादविषैः इनिका उपयोग नाही प्रयोजन नाही-जातै वादके कालविर्षे शिष्य समझावने नाही, व्युत्पन्ननिहीका वादकैविय अधिकार है-जे न्यायविष। प्रवीण है तिनिहींका वादवि अधिकारीपना है ॥ ११॥ " हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १११ ..-...-.. आर्गे वाल जे अल्पज्ञानी तिानेके समझावकै अर्थि उदाहरण आदि तीन प्रयोग शास्त्रवि अगीकार किया, तिनि तीननिका स्वरूप दिखाएँ है दृष्टान्तो देधाऽन्वयव्यतिरेकभेदात् ॥ २४ ॥ याका अर्थ---जा वि साध्य साधन ये दोय अत कहिये धर्म अन्व- यकू मुख्यकार तथा व्यतिरेककू मुख्यकार प्रत्यक्ष दृष्ट होय सो दृष्टान्त । याका अर्थ ऐसा--जो दृष्ट कहिये प्रत्यक्ष देखे हैं अन्त कहिये साध्यसायनरक्षण धर्म जहा ऐसा दृष्टान्तगन्दका अर्थ है । सो दोय प्रकार है-अन्वयदृष्टान्त, व्यतिकदृष्टान्त ॥ ४२ ॥ तहा प्रयन अन्वयदृष्टान्तकू दिखावते सन्ते सूत्र कहै है,- साध्यव्याप्तं साधनं यत्र प्रदर्यते सोऽन्वयदृष्टान्तः ॥४३॥ याका अर्थ-जा वि माध्यकार व्याप्त जो सावन सो नियमरूप दिखाइए सो अन्वय दृष्टात है । इहा व्यतिपूर्वकपगाकरि दिखावै ऐसा अभिप्राय है । जैसे जहा जहा धूमनहितपणा है तहा अग्निसहितपणा, जैसे रसाईका स्थान, ऐ. अन्वयात जानना ॥ ४३ ।। आर्गे दूसरा भेद दिखाये है- साध्याभावे साधनाभावो यत्र कथ्यते स व्यतिरे- कदृष्टान्तः ॥४४॥ याका अर्थ-जाके न होते जो न होय सो व्यतिरेक कहिये, सो यहा प्रधान होय सो न्यतिरेक हान है | जसे जहा अग्नि नाहीं तहा नियमकर धूम नाही, जेसे ज का निवास । एमैं व्यतिरेकदृष्टान्त जानना १४६ ॥

स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- आगै अनुक्रममैं आया जो उपनय ताका स्वरूप निरूपण करै है:- हेतोरुपसंहार उपनयः ॥ ४५ ॥ याका अर्थ-इहां 'पक्षे' ऐसा अध्याहार लेना, ताकरि यह अर्थ है; जो पक्ष विपै हेतुका संक्षेप करिये सो उपनय है । धूमवान्पणां हेतु” अग्निमानपणा काहू जायगां साथै ताका दृष्टान्त कहकार अर हेतुडूं पक्षका विशेषण करे, जैसै कहै-जो यह धूमवान है ऐसा कहना उपनय है । याकी निरुक्ति ऐसे है-'उपनीयते' कहिये फेरि उचारिये हेतु जा करि सो उपनय है, ऐसा जानना ॥४५॥ आगें निगमनका स्वरूप दिखावै है;- प्रतिज्ञायास्त निगमनम् ॥ ४६॥ याका अर्थ-जहां प्रतिज्ञाका उपसंहार करिये सो निगमन है इहा उपसंहारकी अनुवृत्ति लेनी । प्रतिज्ञाकू साध्य जो धर्म ताकरि वि- शिष्टपणांकरि दिखावना । जैसे पहले प्रतिज्ञा कहै जो यह पर्वत अग्नि- मान है पीछे हेतु दृष्टान्त उपनय कहकरि फेरि फेरि प्रतिज्ञाकू सकोच- करि नियम कर जो तातै अग्निमान ही है, ऐसे प्रतिज्ञाका संक्षेप करना सो निगमन है ॥ ४६॥ आगें अन्यबादी तर्क करै जो शास्त्रविर्षे दृष्टान्त आदि कहनें ही ऐसा नियम तौ मान्या नाही तब आचार्य इहा तिनि तीननिकू कसैं दिखाये ? ताका समाधान-जो इहा ऐसा तर्क न करना जातें आप आचार्य इनि तनूनिकू अंगीकार न किये है तोऊ जिनमतके अनु- सारी आचार्यनि. शिष्यके वशझरि प्रयोगकी पारेपाटीतैं मानें है सो प्रयोगको परिपाटी तिनिका स्वरूप जिनि. न जान्या होय तिनकरि करी जाय नाही इस हेतुतै तिनिका स्वरूप भी शास्त्रवि कहना ही + हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ११३ योग्य है। ऐसे सो अनुमान मतभेदकरि दोय अवयव, तीन अवयव, प्यार अवयव, पाच अवयवस्वरूप मानिये है सो अनुमान दोय प्रकार ही है ऐसे दिखावते सते सूत्र कहे है, तदनुमानं वेधा ।। ४७॥ याका अर्थ-सो अनुमान टोय प्रकार है ।। ४७ ॥ आगै सो दोय प्रकारपणाकृ कहें हैं;- स्वार्थपरार्थभेदात् ।। ४८॥ याका अर्थ-स्वार्यानुमान परार्थानुमान ऐसे भेदकरि दोय प्रकार है । अपनी अर परकी जा अनुमानविय अन्यथा मानि ताका दूर होना यामा फल है तात टोय ही प्रकार है ऐमा अभिप्राय जानना ॥४८॥ आगै स्वार्थानुमानके भेदकू कहे हैं,- स्वार्थमुक्तलक्षणम् ॥ ४९ ।। याका अर्ध" साधनासाव्यविज्ञानमनुमान " ऐसा पूर्व अनुमा- नका लक्षण कया था मो ही स्वार्यानुमान जानना ॥ १९ ॥ आगै दूसरा अनुमानका भेढक दिखावते सते सूत्र कह है, परार्थ तु तदर्थपरामर्शिवचनाज्जातम् ॥ ५० ॥ यामा अर्थ-तिम स्वानुमानका जो अर्थ साध्यसाधन है लक्षण जाका तिमकृ जो अपना विषय कर प्रगट कर ऐसा जाका स्वभाव होय सौ तदर्थपरामर्गी कहिये ऐसा जो वचन तिसतै उपज्या होय ज्ञान सो परार्थानुमान है। इहा नैयायिक कह है-पचावयवरूप वचना- त्मक परार्थानुमान प्रसिद्ध है सो इहा स्वार्थानुमानका अर्थका प्रति- पादक वचनकर उपज्या ज्ञानकू परार्यानुमानपणा कहता जो आचार्य सो तिस वचनकू कैसे ग्रहण न किया ? ताका समाधान करै है-जो हि.प्र. ८ ११४ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- ऐसैं न कहना, जाते वचन तौ अचेतन है सो अचेतनकै साक्षात् प्रमिति जो प्रमाणका फल ताका कारणपणां नाही है, तातें मुख्य प्रमाणपणाका अभाव है, बहुरि मुख्य अनुमानके कारणपणात तिस वचनकै उपचरित अनुमानका व्यपदेश कहिये नाम कहना सो नाही निवारण कीजिये है ॥ ५० ॥ आगें परार्थानुमानके वचनकै जो कह्या उपचारकरि परार्थानुमान- पर्णा सो ही आचार्य सूत्रकरि कहै हैं;- तद्वचनमपि तद्धेतुत्वात् ।। ५१ ।। याका अर्थ-तिस परार्थानुमानका वचन है सो भी परार्थानुमान है जाते ज्ञानरूप जो परार्थानुमान ताका कारण है । इहां ऐसा जानना- जो उपचार है सो मुख्यका अभाव होते प्रयोजन अर निमित्त होते प्रवत्र्त है । तहा वचनकै मुख्य अनुमानपणाका तौ अभाव है अर तिसका कारणपणां है सो ही परार्थानुमानपणाविषै निमित्त है ताते परार्थानुमानका प्रतिपादक वचन भी परार्थानुमान है ऐसा संबंध करना, जाते कारणविर्षे कार्यका उपचार होय है। अथवा परार्थानुमानका प्रतिपादक जो वक्ता ताका अनुमान सो है कारण जाकू ऐसा परार्थानु- मानका वचन सो भी अनुमान है ऐसा संबंध करना, इस पक्षविर्षे कार्यवि. कारणका उपचार होय है । बहुरि वचनकै अनुमानपणां 'कहतै प्रयोजन ऐसा जो अनुमानके प्रतिज्ञा आदि अवयव हैं तिनिका शास्त्रविर्षे व्यवहार है सो ही प्रयोजन है जाते ज्ञानस्वरूप अनुमान निरश है अभेदरूप है । तातें अवयवरूप भेदका व्यवहार नाही किया- जाय है वचनकरि अवयवनिका प्रयोगरूप व्यवहार प्रवर्ते है ॥ ५१ ॥ आगै सो ऐसे 'साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानं' ऐसा अनुमानका सामा- य लक्षण है सोही अनुमान दाय प्रकार है ऐसैं तिसके प्रकार विस्ता- हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ११५ रसहित कहकरि अव साधन है सो रक्षण कह्या ताकी अपेक्षा एक है तौऊ अतिसंक्षेपकार भेदरूप किये दोय प्रकार हैं, ऐसे करें हैं;- स हेतुधोपलब्ध्यनुपलब्धिभेदात् ॥ ५२ ॥ याका अर्थ-सो हेतु दोय प्रकार है; उपलब्धि अनुपलब्धि ऐसे दोय भेदतै । याका अर्थ सुगम है। जो पदार्थ विद्यमान भावरूप प्रहणमैं आवै सो उपलब्धि कहिये, बहुरि जो पदार्थ ग्रहणमैं नाही भाथै अभावरूप सो अनुपलब्धि कहिये ॥ ५२ ।। आगै अन्यवाटी कहै है-जो उपलब्धि है सो विधिहीका साधक है बहरि अनुपलब्धि है सो प्रतिपेधहीका साधक है ऐसा नियम है; तहां आचार्य तिसके नियमकू निषेध करता संता उपलब्धिकै अर अनु- पलब्धिः अविशेषकरि विधिप्रतिषेधका साधकपणा है, ऐसे करें है;- उपलन्धिर्विधिप्रतिपेधयोरनुपलब्धिश्च ॥ ५३ ॥ याका अर्थ...-उपलब्धि है सो विधि अर प्रतिषेध दोऊनिकी साधक है, बहरि अनुपलब्धि भी तैसे ही दोजनिकी साधक है । याका अर्थ पहले काया सो ही है ॥५३ ॥ आगें अब उपलब्धिका भी सक्षेपकार विरुद्ध अविरुद्ध भेदते दोय प्रकारपणा दिखावते संते अविरुद्ध उपलब्धिकै विधिसाध्य होते विस्ता- ते भेद कह है- अविरुद्धोपलब्धिविधौ पोढा व्याप्यकार्यकारणपर्यो- त्तरसहचरभेदात् ।। ५४ ।। याका अर्थ-अविरुद्धोपलब्धि कहिये साध्यतै विरुद्ध नाही ऐसी जो प्राप्ति सो विधि कहिये वस्तुका सद्भाव ताकू साधै ऐसी छह प्रकार है । साध्यतै व्याप्यस्वरूप, साव्यका कार्य, साध्यका कारण, साध्यतै ११६ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- पूर्व प्रवर्ते, साध्यतै पीडै दीखे, साध्यकै साथि ही रहै, ऐसे छह भेद हैं । इहा सूत्रीवर्ष समास ऐसे करना-पूर्व, उत्तर, सह, इनि तीन शब्दनिका द्वन्द्वसमासकरि पीछे चर शब्द करनां सो द्वंद्वतै चरशब्द प्रत्येककै लगावणा, तब पूर्वचर, उत्तरचर, सहचर ऐसा होय । पीछे व्याप्य आदिकरि द्वंद्व करना तातै पूर्वोक्त अर्थ भया ॥ ५४ ॥ इहा सौगत कहिये बौद्धमती सो कहै है-विधिका साधन दोय प्रकार ही है, स्वभाव अर कार्य ऎसैं । वहुरि कारणकै तौ कार्यतै अविना- भावका अभाव है तातें साध्यका लिंग नाही जाते कारण हैं ते कार्य- सहित अवश्य होय नाही ऐसा वचन है। बहुरि इहा कहोगे जो-जा कारणका सामर्थ्य काहूर्ते रुकै नाही ऐसा कारण है सो कार्य प्रति गमक होय है सो ऐसा कहना न बनेगा जातै सामर्थ्य तौ इन्द्रिय- गोचर नाही जो कारणमैं विद्यमान भी है तौ ताका निश्चय होय सकै नाही ? ताका समाधान आचार्य करें है -ऐसा कहना विना विचारे है, ऐसे दिखावनेक सूत्र कहै है;-- रसादेकसामय्यनुमानेन रूपानुमानामिच्छद्भिरिष्ट मेव किंचित्कारणं हेतुर्यत्र सामर्थ्याप्रतिबंधकारणा- न्तरावैकल्ये ॥ ५५॥ याका अर्थ—आस्वादमैं आया जो रस तातै तिसके उपजावनहारी फल आदि सामग्री ताका अनुमान कीजिये है । पीछै तिस अनुमानतें रूपका अनुमान होय है ऐसे मानता जो बौद्धमती ताकरि ता. किछु कारणकू हेतु मान्या ही है जिस कारणविषै सामर्थ्यका रोकने- वाला न होय तथा सहकारी अन्यकारणका विकलपणा न होय, समस्त सहकारी आय मिलै तिस कारणकै कार्य जो साध्य ता प्रति गमकपणा होय है, जातै पहला रूपका क्षण है सो अपना सजातीय जो - हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ७ पिछलारूपका क्षणस्वरूप कार्य ताहि करता सता ही रूप” विजातीय जो रस तिसस्वरूप कार्यकू करै है, ऐसे रस रूपका अनुमान• इष्ट करता मानता जो बौद्धमती सो किस ही कारण हेतु इष्ट कर ही है- मान ही है, जातै पहला रूपका क्षण है तातें अपना सजातीय रूपका दूसरा क्षणकै व्यभिचार नाही है, उत्तर क्षणनामा कार्यकू उपजावै ही है। जो ऐसे न मानें तो रसकै ही काल रूपकी प्राप्तिका अयोग ठहरै। बहुरि अंत्यक्षणनैं प्राप्त भया जो कारण तथा अनुकूलमात्रहीकू नाही लिंग मानिये है । जाकरि मणिमत्र आदिकरि जाकी सामर्थ्य रुकनेते तथा अन्य सहकारी कारणका सकलपणा न होनेरौं कार्य नाहीं उपजावै तब कारणनामा हेतुकै व्यभिचारीपणा आवै। अर दूसरे क्षण कार्य प्रत्यक्ष देखिकरि कारण मानि तिस कारणले अनुमान करिये तब अनु. मानकै अनर्थकपणा आवै । हमनें तौ कार्यतै अविनाभावीपणाकरि निश्चय किया ऐसा जो छत्र आदि कारण ताकू छाया आदिका लिंग- पणाकरि अगीकार किया है । जहा जाकी सामर्थ्य तौ काहूकरि रुकै नाही अर सहकारी अन्यकारणका सकलपणा होय कोई सहकारी घटता न होय ऐसा निश्चयनै कारणकू हेतु मान्या है सो तिस ही कारणकै लिंगपणा है, अन्य जामैं व्यभिचार दीखै सो कारण हेतु नाहीं है ताते बौद्ध कहै सो दोष नाहीं है। इहा भावार्थ यह-जो बौद्धमती कारणकू तौ हेतु कहै नाही अर मानैं ऐसैं जो काहूनै अधारेमैं विजोरा आदि फलका रस चाल्या तब ताका अनुमान भया जो यह रस विजोरा आदिका है। पी• तिस विजोरा आदि कारणतै ताकै रूपका अनुमान किया सो ऐसे अनुमानमैं तौ कारण हेतु आया ही, अर यामें व्यभिचार भी नाहीं । जातै सर्व तत्वकू क्षणिक मानि ऐसें कहै है-पहला क्षण तौ कारण है भर उत्त- स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- रक्षण ताका कार्य है सो पहलै रूपकै क्षण पिछला रूपक्षणकू उप- जाया तैसें ही पहलै रसकै क्षण पिछले रसक्षणकू उपजाया ऐसे दोऊ समानकाल कारण अर कार्य भये । तहा कारणनै कार्यका अनु- मान निर्यभिचार होय है । ऐसा नाही-जो प्रथमक्षण दूजे क्षणका अनुकूलमात्र ही कारण है जाते इहा तिसकी सामर्थ्यका रोकनेवाला कोई नाही अर सहकारीकी घटती नाही; अथवा अन्त्यक्षणमात्र नाही जाते कार्य न उपजै । अर अब कार्य अवश्य उपजै तब व्यभिचार काहेका ? ऐसे जामैं व्यभिचार नाही सो कारण हेतु अवश्य मानना योग्य है॥५५॥ आगै अब पूर्वचर अर उत्तरचर हेतुका स्वभाव, कार्य, कारणनामा, हेतुनिविषै अन्ताव नाही, तातै न्यारे ही भेद है, ऐसैं दिखावै हैं;- न च पूर्वोत्तरचारिणोस्तादात्म्यं तदुत्पत्तिर्वा काल- व्यवधाने तदनुपलब्धेः ॥५६॥ याका अर्थ-पूर्वचर अर उत्तरचर हेतुकै तादात्म्य अर तदुत्पत्ति नाही है जातै इनिकै कालका व्यवधान है--कालका बीचिमैं अंतर है, सो जहां कालव्यवधान होय तहा तादात्म्य अर तदुत्पत्तिकी अप्राप्ति है। तादात्म्य तौ स्वभाव अर स्वभाववान्कै कहिये अर तदुत्पत्ति कार्य कारणकै कहिये । भावार्थ-साध्यसाधनकै तादात्म्यसंबंध होते स्वभाव हेतुवि. अंतर्भाव होय, अर तदुत्पत्तिसंबंध होते कार्य अथवा कारणविषै अन्तर्भाव होय । सो पूर्वचर उत्तरचर हेतुकै अंतर है तातें दोऊ ही संबंध नाही, तातै स्वभाव कार्य कारणमैं इनिका अन्तर्भाव ने होय, जो सहभावी होय तिनिकै ही तादात्म्य संबंध होय, अर अनंतर होय तिनिकै ही हेतु कहिये कारण अर फल कहिये कार्य ऐसा भाव होय, कालके अन्तरमैं ते दोऊ ही भाव नाही ।। ५६ ।।

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। ११९ - तब इहां तर्क करै है जो-कालका व्यवधान कहिये अंतर होतें भी कार्यकारणभाव देखिये है जैसे जागताकी दशाका ज्ञानकै अर सोयकरि फेरि जागताकी दशाका ज्ञानकै कार्यकारणाभाव है, तथा मरणकै अर पहले आवते अरिष्टकै कार्यकारणभाव है, ऐसा तर्कका परिहारकै अर्थ सूत्र कहै है। भाव्यतीतयोमरणजाग्रहोधयोरपि नारिष्टोद्बोधौ प्रति हेतुत्वम् ।। ५७ ।। याका अर्थ-आगामी होगा ऐसा तो मरण अर पहले जागै था ताका अतीतज्ञान इनि दोऊनिकै मरणकै पहलै आया जो अरिष्ट अर सूता पाछै जाग्याकी अवस्थाका ज्ञान इनिकै कारणकार्यभाव नाही है। अरिष्ट तौ आवै अर मरण होय तथा नाही भी होय अर सूता जागै पूर्वली बात यादि आवै तथा नाही यादि आवै ।। ५७ ।। याहीका समर्थन करें हैं;- तव्यापाराश्रितं हि तद्भावभावित्वम् ॥ ५८॥ याका अर्थ-इहा 'हि' शब्द हेतु अर्थमैं है तातै यह अर्थ है जाते तिस कारणके सद्भाव होते कार्यका होना है सो कार्यमै है सो कारणके व्यापारकै आश्रय है, तातै जो पूर्व कहे जाग्रत्दशा अर प्रबोधदशाका ज्ञान अर मरण अर अरिष्ट इनिकै तौ कारणकै अर कार्यकै कालका अतर है तहा कारण व्यापारका आश्रय काहेका तातै कार्यकारणभाव नाही है । इहा यह अर्थ-जो अन्वय व्यतिरेककरि निश्चयरूप सर्वत्र कार्य- कारणभाव है सो ये दोऊ कार्य प्रति कारणके व्यापारकी अपेक्षा लिये ही होय है जैसे कुभकारकै कलश प्रति होय है । जो कुभकार होय तो कलश होय न होय तौ न होय तैसें है । सो जे अतिव्यव- स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- हित कालके अंतरसहित होय तिनिविर्षे कारणका व्यापारका आश्रित- पणा कहां ? भावार्थ-ऐसा तर्क किया-जो कोई पुरुष रात्रिकू जागते कार्य विचारि सूता पीछे प्रभात जाग्या तब जो विचाया था सो यादि आया तहा पहली अवस्थाका ज्ञान पीछली अवस्थाका ज्ञानकू कारण भया । बहुरि मरणकै पहले अरिष्ट आवै है तिनिकू मरण कारण है। ऐसे कालके अंतर होतें भी कार्यकारणभाव होय है । ताका समाधान आचार्य किया जो ऐसैं नाही जाते कार्य है सो कारणके व्यापारकै आश्रय है सो जिनिकै कालका अतर है तिनिकै कारणका व्यापारका आश्रय कहातें होय । कार्य-कारणकै तौ अन्वयव्यतिरेकपणां है । जो कारण होय तौ कार्य होय ही होय, कारण न होय तो कार्य न होय । सो जहा कालका अन्तर होय तहां कारणके व्यापारका आश्रय कार्यकै संभवै नाही, बिना व्यापार कार्य होय नाही, ऐसा जाननां ।। ५८ ॥ आगैं सहचर हेतुकै भी स्वभाव कार्य कारण हेतुनिविपै अंतर्भाव नाही है, ऐसा दिवावै है। सहचारिणोरपि परस्परपरिहारेणावस्थानात्सहो- त्पादाच ॥ ५९॥ याका अर्थ-जे सहचारी एककाल लारा रहैं है तिनिकै भी तादात्म्य अर तदुत्पत्ति नाही होय है जाते परस्पर स्वरूपभेदकरि परिहार पाइए है अर एक काल दोऊका उत्पाद है। तातै व्याप्यव्यापकभाव अर कार्यकारणभाव नाही है तातें न्यारा ही हेतुपणां है । इहां यह अभि- प्राय है-परस्पर परिहारकरि जिनिका ग्रहण होय है तिनिकै तादात्म्य नांही तातें तौ स्वभावहेतुवि अन्तर्भाव नाही । अर जिनिकी साथ उत्पत्ति है तिनिका कार्यविषं तथा कारणविर्षे अन्तर्भाव नाही जाते एककाल वत्तै जिनिकै कार्यकारणभाव नाही है, जैसे गऊकै बावा दा- 1 हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १२१ हिणा सींग है तिनिकी साथ उत्पत्ति है परस्पर कार्यकारणभाव नाही तैसैं जानना । बहुरि एककाल उपलै तिनिकै कार्यकारणभाव मानिये तौ कार्यकारणकै प्रति नियमका अभावका प्रसंग आवै । इहा एक वस्तु- वि. दोय भाव ति, तौऊ तिनिकै स्वरूपभेदतै तादात्म्य न (१) कहिये, जैसे रूप-रसमै स्वरूप भेद है अर एकवस्तुमैं दोऊ है ही । बहुरि जिनिकै साथ उत्पाद नाही ऐसे धूम अग्नि आदि तिनिकै कार्यकारण- भाव है ही । तातै सहचर न्यारा ही हेतु है ॥ ५९॥ आगैं अब कहे हेतुनिके उदाहरण कहैं हैं । तहा पहले क्रममैं आया जो व्याप्यनामा हेतु ताहि उदाहरणरूप करते सते कहे जे अन्वय व्य- तिरेक तिनिकू प्रधानकरि शिष्यके आशयके वश” कहे जे अनुमानके प्रतिज्ञादिक पाच अवयव तिनिकू दिखावै है, परिणामी शब्दः कृतकत्वात्, य एवं स एवं दृष्टो यथा घटा, कृतकश्चार्य, तस्मात्परिणामीति, यस्तु न परि- णामी स न कृतको दृष्टो यथा वंध्यास्तनंधयः, कृत- कश्चायं, तस्मात्परिणामी ॥६॥ याका अर्थ-शब्द है सो परिणाभी है यह तौ प्रतिज्ञा है, जातें कृतक है यहु हेतु है, जो कृतक है सो परिणामी देखिये है जैसैं घट है यहु अन्वयव्याप्तिपूर्वक उदाहरण है, बहुरि यह शब्द कृतक है यह उपनय है, तातै परिणामी है यहु निगमन है। ऐसें तौ अन्वयव्याप्ति- करि पंच अवयव दिखाये, बहुरि जो परिणामी नाही है सो कृतक नाही देखिये है जैसे बाझका पुत्र यहु व्यतिरेकव्याप्तिपूर्वक उदाहरण है । अरु यहु शब्द कृतक है तातै परिणामी है । ये व्यतिरेकव्याप्तिकार दिखाये ते पाचूं ही समझनें । इहा अपनी उत्पत्तिविर्षे जो परके व्यापा- रकी अपेक्षा करै ऐसा भाव होय सो कृतक कहिये । सो ऐसा कृतक . . १२२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- पणां कूटस्थ जो सदाकाल एक अवस्थारूप रहै ऐसा नित्यपक्षविर्षे नाही बणै है। बहुरि क्षणिक जो समय समय अन्य अन्य ही होय ताविर्षे भी नाही बण है, तातै परिणामीपणां होते ही वणै है ऐसे आगैं कहसी । इहां परिणामीकी निरुक्ति ऐसी जो पूर्व आकारका तौ परिहार उत्तर आकारकी प्राप्ति अर दोऊमै स्थिति ऐसा जाका लक्षण सो परिणाम, सो जाकै होय सो परिणामी कहिये । बहुरि कृतकका ऐसा स्वरूप कहनेंतें कार्यपणांका कोई स्वरूप कहै जो स्वकारणसत्ता- समवायकू कार्यत्व कहिये, तथा अभूत्वाभावित्वकू कार्यत्व कहिये, तथा अक्रियादर्शिनोऽपि कृतबुद्धयुत्पादकत्वं' ऐसा कहै, तथा 'कारणव्यापा- रानुविधायित्व' ऐसा कहै, ते सर्व निराकरण किये । कृतकका ऐसा ही अर्थ सर्वत्र जानना । ऐसै कृतकपणा हेतु है सो शब्दकै परिणामीपणांकू साधै है, सो परिणामीपणातै व्याप्य है तातें व्याप्यनामा हेतु भया ॥६०॥ आगै कार्यहेतुकू कहैं हैं:- अस्त्यत्र देहिनि वुद्धिाहारादेः ॥ ६१ ।। याका अर्थ-या प्राणीविर्षे बुद्धि है जातै याकै वचनादिककी प्रवृत्ति है । इहा आदि शब्दतै व्यापार आकारविशेप आदि लेने । वचनादिकी चतुरता आदि बुद्धि विना होय नाही । ऐसै बुद्धिका कार्य वचनादिक हैं ते बुद्धिनामा कारण जो साध्य ताकू साधैं हैं तातै कार्य- नामा हेतु भया ।। ६१॥ आगै कारणहेतुकू कहैं हैं;- अस्त्यत्र छाया छत्रात् ॥ ६२ ।। याका अर्थ-~-इहा छाया है जाते छत्र देखिये है। काहू जायगां छत्र देख्या तब जाणी जो याकै नीचे छाया भी है, जहा छत्र है तहां हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १२३ , छाया भी होय ही । ऐसें छत्रनामा कारणहेतु छायानामा साध्यकू साधै है तातै कारणहेतु भया ।। ६२ ॥ आगै पूर्वचर हेतुकू कहैं हैं, उदेष्यति शकटं कृत्तिकोदयात् ।। ६३ ॥ याका अर्थ-रोहिणी नक्षत्र उगिसी जातै कृत्तिका नक्षत्रका उदय देखिये है । इहा 'मुहूर्तान्ते' ऐसा सम्बंध करना जा ऐसा नियम है जो कृत्तिकाका उदय भये पीडै एक मुहूर्तमैं रोहिणीका उदय होय है। सो पहले कृत्तिकाका उदय देख्या तब जानी रोहिणी एक मुहू- तैमै अवश्य उगिसी, ऐसा पूर्वचर हेतु कृत्तिकाका उदय भया ॥६३॥ आगें उत्तरचर लिंगकू कहैं हैं;- उदगारणिः प्राक्तत एव ॥ ६४॥ याका अर्थ-भरणी नक्षत्रका उदय पहले भया जातें कृत्तिकाका उदय देखिये है । इहा मुहूर्ततें पहलै ऐसा संबध करना । काहूनै कृत्ति- का नक्षत्रका उदय देखिकरि जान्या जो यातें मुहूर्त पहले भरणीका उदयका नियम है सो वह भी उदय पहले भया है । यहु भरणीके उदय पीछे उदय है तातें उत्तरचर हेतु कहिये ॥ ६४ ॥ आगै सहचर लिंगकू कहैं है, अस्त्यत्र मातुलिंगे रूपं रसात् ।। ६५ ।। याका अर्थ-इस मातुलिंग कहिये विजोराकैवि रूप है जातें रस है | काहू. अंधारेमैं मातुलिंगका रसका स्वाद लिया तब जान्या यह मातुलिंग है तामैं रूप भी है । इहा रस हेतु है सो रूपतै सहचर है । ऐसैं अविरुद्धोपलब्धि हेतुके छह भेद कहे ॥ ६५ ॥ आगै विरुद्धोपलन्धिकू कहें हैं,- १२४ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- विरुद्धतदुपलब्धिः प्रतिषेधे तथा ॥६६॥ याका अर्थ-साध्यतै विरुद्ध जे पदार्थ तिनिसबंधी जे व्याप्य कार्य कारण पूर्वचर उत्तरचर सहचर तिनिकी उपलब्धि है सो प्रतिषेध साध्य- विर्षे तथा कहिये पूर्वोक्त प्रकार ही छह भेद रूप है ।। ६६ ॥ आगें तहा साध्यविरुद्धच्याप्य उपलब्धिकू कहैं हैं;- नास्त्यत्र शीतस्पर्श औष्ण्यात् ॥ ६७ ॥ याका अर्थ-~-इस जायगा शीतस्पर्श नाही है जात उष्णपणां है, इहा शीतस्पर्श साध्य है सो प्रतिषेधरूप है तातै विरूद्ध अग्नि है तिसत व्याप्यस्वरूप उष्णपणा है सो शीतस्पर्शतै विरुद्ध व्याप्योपलब्धिहेतु है ॥ ६७ ॥ आणु विरुद्ध कार्यका उपलंभ कहे हैं:- नास्त्यन्न शीतस्पर्टी धूमात् ॥ ६८॥ याका अर्थ--इहा शीतस्पर्श नाही है जातै धूम है । इहां भी प्रति- षेधरूप साध्य शीतस्पर्श तातै विरुद्ध अग्नि है ताका कार्य धूम है सो हेतु है शीतस्पर्शका प्रतिपेधकू साधै है सो साध्यविरुद्धकार्योपलब्धि हेतु भया ॥ ६८॥ आणु विरुद्ध कारणकी उपलब्धि कहें है; नास्मिन् शरीरिण सुखमस्ति हृद्यशल्यात् ॥६९॥ याका अर्थ---इस प्राणीविपैं सुख नाही है जाते याके हृदयमैं शल्य है । इहा सुखका विरोधी जो दुःख ताका कारण जो हृदयशल्य सो हेतु है सो सुखके प्रतिषेधकू साधै है। सो प्रतिषेध साध्यविष विरुद्ध कारणोपलब्धि हेतु भया ॥ ६९ ॥ आर्गे विरुद्ध पूर्वचर हेतुकू कहैं है- हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । १२५ नोदेष्यति मुहूर्तान्ते शकटं रेवत्युदयात् ॥ ७० ॥ याका अर्थ-~-इस मुहर्त्तके अन्तमैं रोहिणी नाही उगैगा जातै रेव- तीका उदय है। इहा रोहिणीके उदयत विरुद्ध जो अश्विनीका उदय ताकै पूर्वचर रेवतीका उदय हेतु है सो रोहिणीके उदयका प्रतिपेधकू साधै है, सो विरुद्धपूर्वचर हेतु भया ॥७०॥ आगे विरुद्ध उत्तरचर लिंगकू कहै है, नोदगादरणिर्मुहर्तात्पूर्व पुष्योदयात् ॥ ७१ ।। याका अर्थ-भरणी नाही उगी है मुहूर्त्ततै पहली, जातै पुष्यका उदय है । इहा भरणीके उदयतै विरुद्ध पुनर्वसुका उदय है ताकै उत्त- चर पुण्यका उदय हेतु है सो भरणीका उदयका प्रतिपेधकू साधै है, सो विरुद्ध उत्तरचर हेतु भया ॥७१॥ आगै विरुद्ध सहचर हेतुकू कहै है; नास्त्यत्र भित्ती परभागाभायोर्वाग्भागदर्शनात् ॥७२॥ याका अर्थ-या भीतिविपै परले भागका अभाव नाही है जातें वैला एक भाग देखिये है । इहा परले भागका अभावकै विरुद्ध जो तिस परले भागका सद्भाव ताकै सहचर जो पैलाभाग ताका दर्शन सो विरुद्ध सहचर हेतु है । ऐसे विरुद्धोपलव्धि हेतुके छह भेद कहे ॥७२॥ आगें साध्यतै अविरुद्ध जो अनुपलब्धि कहिये अप्राप्ति ताके भेद कहै हैं- अविरुद्धानुपलब्धिः प्रतिषेधे सप्तधा स्वभावव्याप- ककार्यकारणपूर्वोत्तरसहचरानुपलंभभेदात् ॥ ७३ ।। याका अर्थ-साध्यतै अविरुद्धकी अनुपलब्धि सो प्रतिपेधविषै सात प्रकार है,-स्वभाव, व्यापक, कार्य, कारण, पूर्वचर, उत्तरचर, १२६ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- सहचर, इनि भेदनितें । इहां स्वभाव आदि पदनिका द्वंद्व समास है, तिनिका अनुपलभ ऐसै पीछे षष्ठीतत्पुरुष समास है ।। ७३ ॥ आज स्वभावानुपलंभका उदाहरण कहैं हैं;- नास्त्यत्र भूतले घटोऽनुपलब्धेः ॥ ७४ ॥ याका अर्थ-या पृथिवीतलवि. घट नाही है जातै अनुपलन्धि है, दीखै नांही है । इहां कोई पिशाच काहूकू दीखै नाही तथा परमाणु आदि सूक्ष्म वस्तु काहूकू दी नाही अर तिनिका नास्तित्व है नाही ताते हेतुकै ब्यभिचार आवै है तौ ताके परिहारकै अर्थ इहां उपल- ब्धिलक्षण प्राप्तपणा कहिये दृश्यपणा जामैं है अरु दीखै नांही है, हेतुका ऐसा विशेपणकरि लेणा । इहा केवल भूतल घटरहितस्वभाव है सो ही अनुपलब्धि है सो प्रतिपेधस्वरूप जो घट ताकै अविरुद्ध है सो घटके प्रतिषेधकू साधै है, तातै स्वभावानुपलंभ हेतु भया ॥७४ ।। आगें व्यापकानुपलब्धि हेतुकू कहैं हैं;- नास्त्यत्र शिंशपा वृक्षानुपलब्धेः ॥७५॥ याका अर्थ---इस क्षेत्रमैं शीतूं नाही है जाते वृक्षकी अनुपलब्धि है- वृक्ष दीखै नाही । इहा वृक्ष व्यापक है ताके अभाव होते तिसके व्याप्य शीसू है ताका भी अभाव है सो वृक्षकी अनुपलब्धि शीतूंके प्रतिषेध… -साधै है, तातै व्यापकानुपलब्धि हेतु है ॥ ७५॥ आगें कार्यकी अनुपलब्धिकू कहैं है;- नास्त्यत्राप्रतिबद्धसामोऽग्नि—मानुपलब्धेः ॥७॥ याका अर्थ-इस जायगा नाही रुकै है सामर्थ्य जाका ऐसी अग्नि नाही है जातै धूमकी अनुपलब्धि है । इहा अग्निका कार्य धूम है सो अग्निका विशेषण किया जो अप्रतिबद्ध सामर्थ्य सो इस विशेषण” धूम-

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला !
१२७
नामा कार्यकू अवश्य निपजावै ऐसी अग्निका प्रतिपेध है सो साध्य है।
इहा धूमनामा कार्य दीखै नाही, यह हेतु अग्निके प्रतिषेधकू साधै है ।
तात कार्यानुपलब्धिनामा हेतु भया ॥ ७६ ॥
आणु कारणका अनुपलंभकू कहै हैं।
नास्त्यत्र धूमोऽनग्नेः ॥ ७७॥
याका अर्थ---इस जायगा धूम नाही है जाते अग्नि नाही है । इहा
अग्नि धूमका कारण है सो ताकी अनुपलब्धिते धूमका प्रतिपेध साध्या
है, तातै कारणानुपलंभ हेतु भया ॥ ७७ ॥
आगें पूर्वचरकी अनुपलब्धिकू कहैं है,-
न भविष्यति मुहूर्तान्ते शकटं कृत्तिकोदयानुप-
लव्धेः ॥ ७८॥
याका अर्थ-मुहूर्त्तके अंतमैं रोहिणीका उदय न होसी जातें कृत्तिकाका
उदयकी अनुपलब्धि है, नाही दीखै है । इहा मुहूर्त्तके अंतमैं रोहिणीका
उदयका प्रतिपेध साध्य है ताका कृत्तिकाके उदयका अनुपलंभ पूर्व-
चरानुपलब्धि हेतु है ।। ७८ ॥
आग उत्तरचरकी अनुपलब्धिकू कहैं हैं;-
नोदगाद्भरणिर्मुहूर्तात्माक्तत एव ॥ ७९ ॥
याका अर्थ-मुहूर्त पहली भरणि नाही उगी है जाते कृत्तिकाका
उदयकी अनुपलब्धि है । इहा मुहूर्त पहली भरणिके उदयका प्रतिषेध
साध्य है ताका कृत्तिकाका उदयकी अनुपलब्धि हेतु है सो उत्तरचरा-
नुपलब्धि हेतु भया ॥ ७९ ॥
आगै सहचरकी अनुपलब्धिका अवसर है, सो कहै है,-
नास्त्यत्र समतुलायामुन्नामो नामानुपलब्धेः ॥८॥

१२८ स्वर्गीय पं0 जयचंदजी विरचित- - ।' । याका अर्थ-इस बराबर ताखड़ीकैविर्षे डांडी : एक, वोर: ऊंची नाही है जातै दूसरी बोर नींची डांडीकी अनुपलब्धि है । एक चोर नीचापणां एक वोर ऊंचापणा सहचर हैं तिनिमें एकका निषेध साध्य एकका निषेध हेतु भया, सो सहचरानुपलब्धि हेतु है ||८|| आर्गे विरुद्ध कार्य आदिककी अनुपलब्धि विधि वि संभव है ताके भेद तीन ही हैं, तिनिकू दिखावनेकू कहैं हैं;- विरुद्धानुपलब्धिर्विधी त्रेधा विरुद्धकार्यकारणस्व भावानुपलब्धिभेदात् ।। ८१ ॥ याका अर्थ-साध्यतै विरुद्धकी अनुपलब्धि सो. विधिसाध्यविर्षे तीन प्रकार है; विरुद्धकार्यानुपलब्धि कहिये साध्यतै विरुद्ध पदार्थका कार्यका अभाव, बहार विरुद्धकारणानुपलब्धि कहिये साध्यते विरुद्ध पदार्थका कारणका अभाव, बहुरि विरुद्धस्वभावानुपलब्धि कहिये साध्यते विरुद्ध पदार्थका स्वभावका अभाव, इनि भेदनितें ॥ ८१ ॥ आगै तिनिमैं विरुद्धकार्यानुपलब्धिकू कहैं हैं;- यथास्मिन् प्राणिनि व्याधिविशेषोऽस्ति निरामय- चेष्टानुपलब्धेः ॥ ८२ ॥ याका अर्थ-इस प्राणीविर्षे रोगका विशेष है जातें नीरोग चेष्टा कि याविर्षे अनुपलब्धि है। इहां व्याधिविशेषका सद्भाव साध्य है तिसतै विरोधी व्याधिविशेषका अभाव है ताका कार्य नीरोग चेष्टा ताकी अनुपलब्धि हेतु है, सो विरुद्ध कार्यकी अनुपलब्धिनामा हेतु भयो । आर्गे विरुद्धकारणकी अनुपलब्धिकू कहैं हैं;- अस्त्यत्र देहिनि दुःखमिष्टसंयोगाभावात् ।दिशा याका अर्थ-इस प्राणीविर्षे दुःख है जातें इंष्टः 'संयोगका, याकै अभाव है । इहां दुःखके विरोधी सुख ताका कारण इष्टसंयोगीताकी RA + 14 .

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १२९ अनुपलब्धि हेतु है सो दुःखके सद्भावकू इष्टसयोगका अभाव साधै है, ताते विरुद्धकारणानुपलब्धि हेतु भया ॥ ८३ ॥ आगै विरुद्धस्वभावानुपलब्धिकू कहै हैं,- अनेकान्तात्मक वस्त्वेकान्तस्वरूपानुपलब्धः॥८४॥ याका अर्थ-वस्तु है सो अनेकान्तस्वरूप है जाते एकातस्वरू- पकी अनुपलब्धि है । इहा अनेकान्तात्मकका विरोधी नित्य आदि एकान्त है सो लेना बहुरि तिसका ज्ञान नाही लेना जातै एकान्तका ज्ञानकै तौ मिध्याजानरूपपणाकरि उपलभका सभव है । एकान्तका स्वरूप अव- स्तुभूत है ताकी अनुपलब्धि हेतु है सो वस्तुकू अनेकान्तस्वरूप साथै है, तातै विरुद्धस्वभावानुपलब्धि हेतु भया ।। ८४ ॥ आगें पूछे है कि व्यापकविरुद्ध कार्यादिकका बहुरि परंपराकरि अविरोधी कार्यादि लिंगनिका बहुलताकरि उपलभका सभव है सो ते भी आचार्य उदाहरणरूप किये नाही ? ऐसी आशंका होतै सूत्र कहै परम्परया संभवत्साधनमत्रैवान्तर्भावनीयम् ॥८५॥ याका अर्थ--परपराकरि जे साधन कहिये हेतु सभवते होंहि ते इनि कार्य आदि हेतुनिविर्षे ही अन्तर्भाव करनें ॥ ८५ ॥ आग तिस ही हेतुके उपलक्षणकै आर्थ दोय उदाहरण दिखावें है, अभूदन चक्रे शिवकः स्थासात् ॥ ८६ ॥ याका अर्थ-इस चाकीवर्षे शिवक पहले हुवा है जातै स्थास देखिय है। इहा ऐसा भावार्थ-जो कुभार चाकपरि माटीका पिंड धरि वासण वणाव है तब पिंडके आकार अनुक्रमतै करै है, तिनकी संज्ञा हि.प्र.९ १३० स्वर्गीय पं0 जयचंदजी विरचित- . ऐसी-शिवक, छत्रक, स्थास, कोश, कुसूल इत्यादि; सो इहां काहूनें स्थास देख्या तब जान्यां जो इहां पहले शिवक भया था ॥८६॥ सो इस हेतुकी संज्ञातौ कही अर अन्तर्भाव कौनमें भया ऐसी आशंका होते कहें हैं। कार्यकार्यमविरुद्धकार्योपलब्धौ ॥ ८७ ॥ याका अर्थ--यह कार्यका कार्य है सो अविरुद्ध कार्योपलब्धिविर्षे अंतर्भाव करनां । इहां सूत्रवि अन्तर्भावनीयं ऐसा उपरले सूत्रत संबंध करना । पहले शिवककार्य छत्रक भया ताका कार्य स्थास भया सो याकू अविरुद्धकार्यकी उपलब्धिविर्षे अन्तर्भूत करनां ॥ ७ ॥ आरौं दृष्टान्तद्वारकरि दूसरा उदाहरण कहैं हैं;- नास्त्यत्र गुहायां मृगक्रीडनं मृगारिसंशब्दनात्, कारणविरुद्धकार्य विरुद्धकार्योपलब्धौ यथा ॥ ८८॥ याका अर्थ-इस पर्वतकी गुफाविर्षे मृगका क्रीडन नहीं है जोते नाहर बोले है । इहां कारणविरुद्ध कार्य है सो विरुद्धकार्यकी उपलब्धि विर्षे अन्तर्भूत करना । यह सूत्र पहले सूत्रका दृष्टांतरूप है, जैसे इहां अन्तर्भाव तैसैं पहले सूत्रमैं जाननां जाते मृगक्रीड़ाका कारण मृग है ताका विरोधी मृगारि कहिये नाहर है तिसका कार्य संशब्दन कहिये बोलनां है सो मृगकी क्रीड़ाके अभावकू साधै है, तातें हेतु है। जैसे विरुद्धकार्यकी उपलब्धिविर्षे अन्तर्भूत होय है तैसैं पहले कह्या सो तिसमें अन्तर्भूत जाननां ॥ ८८॥ आण बाल कहिये अल्पज्ञ ताकै ज्ञान करनेकै आर्थ पांच अवयवः निका प्रयोग है ऐसे कह्याथा सो जो व्युत्पन्न होय ज्ञानवान होर गाग- .

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १३१ शास्त्रवि प्रवीण होय, तिस प्रति प्रयोगका नियम कैसे है, ऐसी आशका होते सूत्र कहै है,- व्युत्पन्नप्रयोगस्तु तथोपपत्त्याऽन्यथानुपपत्यैव वा ।।८९॥ याका अर्थ-न्यायशास्त्रकै विपै प्रवीण जो व्युत्पन्न ता प्रयाग कीजिये सो दोय ही प्रकार है-एक तौ तथोपपत्ति कहिये साध्य होते ही हेतुकी उपपत्ति है, दूसरा अन्यथोपपत्ति कहिये साध्यका अभाव होते हेतुकी अनुपपत्ति ही है, ऐसे दोय प्रकार है, इनिमै एकका प्रयोग करना । इहा व्युत्पन्न प्रयोगका समास ऐसा-जो 'व्युत्पन्नका प्रयोग ऐसे 'पष्टी तत्पुरुष, तथा व्युत्पन्नकै अर्थ ऐसे चतुर्थीतत्पुरुप ।। ८९ ॥ आगँ तिसही अनुमानका रूप कहैं है, अग्निमानयं प्रदेशस्तथैव धूमवत्त्वोपपत्तेधूमवत्त्वा- न्यथानुपपत्तेर्वा ॥९॥ याका अर्थ यह प्रदेश अग्निमान है जाते तैसे होते ही धूमवानप- णाकी या उपपत्ति है-धूमवानपणा वण है, अथवा धूमवानपणाकी अग्निमानपणा विना अनुपपत्ति है-धूमवानपणा नाही वण है; ऐसैं प्रयोग करना ॥९॥ आगें पूछे है जो साध्यसाधनते न्यारे ऐसे दृष्टान्त आदिककै व्याप्तिकी प्रतिपत्ति प्रति उपयोगीपणा है ये भी उपकारी है सो व्युत्प- नकी अपेक्षा इनिका प्रयोग कैसे नाही; ऐसैं पूछे सूत्र कहें हैं;- हेतुप्रयोगो हि यथा व्याप्तिग्रहणं विवधीयते सा च तावन्मात्रेण व्युत्पन्नैरवधार्यते ॥ ९१ ॥ याका अर्थ-व्युत्पन्न पुरुष हेतुका प्रयोग करै हैं ते जैसे व्याप्ति ग्रहण होजाय तैसे करें है सो तिस व्याप्तिकू व्युत्पन्न पुरुप तिस हेतुके

१३२
स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित-
प्रयोग मात्रहीकरि अवधारण करें हैं-निश्चय करें है। इहा 'हि' शब्द
है सो हेतु अर्थमैं है तातै ऐसा अर्थ भया । जातें तथा उपपत्ति अन्यथा
अनुपपत्ति ऐसै अन्वय व्यतिरेक रूप व्याप्तिका ग्रहणकू न उलंधि करि
हेतुका प्रयोग व्युत्पन्न करै है, तातै ताकरि ही व्युत्पन्न है ते व्याप्तिका
निश्चय करि ले है, दृष्टान्तादिकका किछू प्रयोजन न रह्या । दृष्टान्ता-
दिककै व्याप्तिकी प्रतिपत्ति प्रति अगपणा जैसे नाही है तैसें पहले
कह आये, इहा फेरि काहेकू कहिये ॥ ९१ ॥
आगै दृष्टान्त आदिका प्रयोग है सो साध्यकी सिद्धिकै अर्थि भी
फलवान नाही है, ऐसैं कहैं है;
तावता च साध्यसिद्धिः॥ ९२ ।।
याका अर्थ-तावता कहिये विपक्षविर्षे जाका असंभव निश्चित
होय ऐसे हेतुके प्रयोगमात्र होकरि साध्यकी सिद्धि है, दृष्ठान्तादिकका
प्रयोजन नाहीं ॥ ९२ ॥
आगैं इस ही कारणकरि पक्षका प्रयोग है सो भी सफल है ऐसे
दिखावते सते कहैं है;-
तेन पक्षस्तदाधारसूचनायोक्तः॥ ९३ ॥
याका अर्थ-जा कारणकरि पूर्वोक्त विधानही करि व्याप्तिकी
प्रतिपत्ति होय तिस कारणकरि तिसका आधारका सूचन कहिये साध्यतै
व्याप्त जो साधन ताके आधारके सूचनेंकै अर्थि पक्ष कह्या है । इस
कहनेंकरि बौद्धमती कहै है ताका निराकरण किया, बौद्धमतीका श्लोकका
ऐसैं परोक्ष प्रमाणके भेदनिविपै अनुमानका निरूपण किया।
१ ततो यदुक्तं पेरण,-
तद्भावहेतुभावौ हि दृष्टान्ते तददिनः ।
ख्याप्यते विदुषां वाच्यो हेतुरेव हि केवलः॥१॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १३३ अर्थ-जे साध्यव्याप्त साधनकू नाही जानैं है तिनि प्रति पडितजन दृष्टान्तविपैं साध्यसाधनभाव पक्ष हेतुभाव कहैं है अर पडितकू तौ एक हेतु ही कहने योग्य है, ऐसे बौद्धमती कहै है । जो पडितनिकै तो एक हेतु प्रयोग ही युक्त है, तिनिका निराकरण करि पक्षहेतु दोऊ प्रयोग- निका स्थापन किया है । जातै व्युत्पन्न प्रति जैसा कह्या तैसे हेतुका प्रयोग करै तौऊ पक्षके प्रयोग विना साधनकै नियमरूप आधारपणाका निश्चय न होय ।। ९३ ॥ आगै अनुमानका स्वरूप प्रतिपादनकरि अब अनुक्रममैं आया जो आगम ताका स्वरूपकू निरूपण करनेंकू कहैं हैं;- आप्सवाक्यादिनिबंधनमर्थज्ञानमागमः ॥१४॥ याका अर्थ,-आप्तका वाक्य आदि है कारण जावू ऐसा अर्थका ज्ञान सो आगमप्रमाण है। तहा जो जिस उपदेशादि कार्यविर्षे अव- चक होय सो तहा आप्त है ऐसे आप्तके वचन, अर आदिशब्दकरि अगुली आदिकी समस्या लेनी, सो है कारण जाकू ऐसा अर्थ ज्ञानकू आगमप्रमाण कहिये । इहा इस सूत्रकी पदव्यवस्था ऐसी-जो 'अर्थज्ञान' ही कहिये तो प्रत्यक्ष आदितें भी अर्थज्ञान होय है तिनि- विर्षे अतिव्याप्त होय, तातै वाक्य निवधन कह्या। बहुरि ऐसे भी कहे हरेकके वाक्यनिवधनविपै अतिव्याप्ति होय, तारौं आप्त कह्या, । बहुरि ऐसैं भी कहे आप्तका वाक्य काननिकरि सुण्या तब श्रावण प्रत्यक्ष मति- ज्ञानरूप सान्यवहारिक प्रत्यक्ष भया ताविपैं अतिव्याप्ति होय यातै अर्थज्ञान ऐसा कह्या, ऐसे आगमका लक्षण निर्दोष है । इहा अर्थका स्वरूप तात्पर्यरूप जानना । १-मुद्रित सस्कृत प्रतिमें 'वाक्यादि' .इसके स्थानमे 'वचनादि' ऐसा पाठ है।

१३४ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- बहुरि आप्तशब्दके ग्रहणतैं मीमासक आगमकू अपोरुपैय मान हैं ताका निराकरण है । बहुरि अर्थज्ञान पदकरि अन्यापोह कहिये अन्यके निषेधकू बौद्धमती शब्दका अर्थ मानें हैं ताका निराकरण है, तातै अन्यापोहज्ञान आगम प्रमाण नाहीं । तथा शब्दका केई ऐसा अर्थ मानै है-जैसे काहूनै कह्या जो 'घट ल्याव' तब ताकू सुणि ऐसा विचारै जो जल भरनेकै आर्थ घट मंगावै है, यह वाक्य ऐसैंसूचै है, ऐसा अभिप्राय कल्पि घट ल्यावै; सो ऐसा अभिप्रायकै अर्थपणाका निराकरण है, तातै अभिप्राय सूचन आगमप्रमाण नाही । अब मीमासकमतका विशेप जो भट्टमत तिसका पक्षी कहै है। जो यह आगमका लक्षण असंभवी है जातै शब्दके नित्यपणां है तातें आप्तका कह्यापणाका अयोग है । बहुरि शब्दकै नित्यपणा है जाते याके अवयव जे अक्षर तिनिकै व्यापकपणा है सर्वदेशमै अक्षर व्याप रहे हैं, अर नित्य हैं तातै शब्द भी नित्य ही है । बहुरि अक्षरनिका व्यापकपणां असिद्ध नांही है, एक जायगा उच्चारणरूप भया जो गौशब्दका गका- रादिक अक्षर सो प्रत्यभिज्ञानकरि अन्य देशविषै भी ताका ग्रहण होय है, जो एकदेशमै सुन्या था गकारादिक सो ही अन्यदेशमैं सुन्या तब जान्यां जो सो ही यह गकारादिक है । बहुरि ताका नित्यपणां तिस प्रत्यभिज्ञानकरि ही निश्चय भया जातै कालान्तरकैविषै भी तिस ही गकारादिकका निश्चय होय है । बहुरि इस हेतु” भी नित्यपणा निश्चय कीजिये जो शब्दकै संकेतकी नित्यपणा विना अप्राप्ति है सोही कहिये है। -एक शब्दका संकेत ग्रहण किया ऐसा शब्द अन्य ही श्रवणमैं आया मानिये तो इस विना संकेत ग्रहण किये शब्दः अर्थकी प्रतीति- रूप ज्ञान कैसे होय ? जो इस शब्दका यह ही अर्थ है १ अरु अर्थरूप' प्रतीति लिये ज्ञान होयही है। सो इहां भी संकेतमैं ऐसा जानिये है - हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १३५ हैं कि पहले सुन्यां था सो ही यह शब्द है, प्रत्यभिज्ञान इहा भी सुलभ है। इहा संकेतका उदाहरण ऐसा--जो गोशब्दका संकेत खुर ककुद लागूल सास्नादिक सहित अर्थ विर्षे है। बहुरि अक्षरनिकै अथवा शब्दकै नित्यपणा होतै सर्वपुरुपनिकरि सर्वकालमैं सुननेंका प्रसग आवे है, ऐसा भी न मानना-जातै शब्दकी अभिव्यक्ति कहिये श्रवणमैं आवै ऐसा प्रगट होना सदाकाल नाही सभवै है। बहुरि याका असभवका कारण यहु-जो शब्दके अभिव्यजक कहिये प्रगट करनेवाले पवन तिनिकै अक्षर अक्षर प्रतिन्यारा न्यारा पणा है तालुवा होठ आदि सबधी पवन न्यारे न्यारे है सो वक्ताके प्रेरे पवन चलै तब अक्षर प्रगट होय । बहुरि ऐसा नाही जो ये पवन नाही वणै हैं जात प्रमाणतै पवन प्रसिद्ध है, सो ही कहिये है-जे वक्ताके मुखकै निकटदेशवर्ती पुरुप हैं ते तौ अपना स्पर्शनप्रत्यक्ष प्रमाणकरि शब्दके व्यजक पवननिकू ग्रहण करें ही हैं जानें ही है, बहुरि वक्ताके दूरदेशवर्ती है ते मुखकै समीप तिष्ठते जे तूल कहिये रज फूफढा सूक्ष्म तिनिके चलनेंतै अनुमानरूप जानें है । बहुरि सुननेवालाका कानके प्रदेशनिविपै शब्दके सुनने- की अन्यथा अनुपपत्तिः अर्थापत्तिप्रमाणतै भी निश्चय कीजिये है- जो पवन शब्दकू न प्रेरै तौ श्रोताका कान ताई कैसै जाय । तातै पवन” शब्दके अक्षरनिकी अभिव्यक्ती होय है तातै सर्वकाल सर्वकार नाही सुनिये है । बहुरि अभिव्यक्तिपक्षमै सर्वकरि सर्वकाल सुनका प्रसंगरूप दोप बतावै तौ उत्पत्तिपक्षमैं भी ये दोप आवै हैं, भावार्थ- मीमासक शब्दकू नित्य मानें है अर अभिव्यक्ति सदा नाही मानें है । ताकी पक्षमैं अनित्यपक्षकार उत्पत्ति माननेवाला जो नैयायिक सो दोप बतावै तौ ताकू मीमासक कहै है-जो अनित्य पक्षमैं ये ही दोष बरावर आवै हैं। सो ही कहै है-यह शब्द है सो पवन अ ।

१३६ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- आकाशका संयोग सो तौ असमवायिकारण कहिये सहकारी कारण अर आकाश समवायिकारण इनितै दिशा देश आदिका अविभाग करि उपजता होय है सो सर्व हीकरि तौ सुननेंमै न आवै, नियमरूप न्यारे न्यारे दिशा देशमै तिष्ठते पुरुपनिकरि सुनिये है। तैसे ही नित्य- पक्षमै अमिव्यज्यमान कहिये प्रकट होता सुनिये है, ऐसे समान भया । बहुरि अभिव्यक्तिका संकरपणा भी नाही है जातै यहभी दोऊ पक्षमैं समान है । सोही कहिये है:-जैसे तालु आदिका संयोगतै जो वर्ण जिस” उपजै है सो तिसही उपजै है अन्यका संयोगतै अन्य नाही करिये है, तैसे ही अन्यध्वनिका अनुसारी तालु आदि है ते अन्यध्वनि- का आरंभ नाही करै है । तातें संकरपणाका दोष वतावै तो यहभी समान ही आवैहै । तातै उत्पत्तिपक्ष अर अभिव्यक्तिपक्षविर्षे समानपणा होते एक ही पक्षविपै प्रश्नका अवसर नाही, ऐसें मीमासक कहै है हमारा कहना सर्वही निश्चित है। बहुरि किळू और कहै है, जो अक्षरनिकै अर तिनिस्वरूप जो शब्द ताकै कूटस्थस्वरूप नित्यपणां भी मति होहु तौऊ वेदकै अनादिपरंपराकरि चल्या आवनेंतें नित्यपणां है, तातैं आगमका पौरुषेय लक्षण किया ताकै अव्याप- कपणा दूपण आवै है। बहुरि यह प्रवाहकरि परपराकरि नि- त्यपणा है सो अप्रमाण स्वरूप नाही है, अबार भी याका कर्ता कोई दिखै नांही । बहुरि अतीत अनागत कालविपै याका कर्ताका अनुमान करावनेवाले लिंगका अभाव है। जे साध्य साधन अतीन्द्रिय हैं तिनि- का संबंध सदाकाल अतीन्द्रिय है ताकू इन्द्रियनिकार ग्रहण करने- योग्यपणाका अभाव है, जातें ऐसैं कह्या है जो लिंग प्रत्यक्षकरि ग्रहण होय सो ही है तिसहीतै अनुमान होय है। ग्रहण किया है सबंध जानें ऐसे पुरुषकै एक देशके देखने जो पदार्थ इन्द्रियनित न भिडै ऐसा

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला
१३७
परोक्ष ताका ज्ञान होय है सो अनुमान है। बहुरि वेदके कर्ताकी
अर्थापत्ति प्रमाणतें भी सिद्धि नाही होय है जाते जाके होते अवश्य
अन्य पदार्थ आय पडै तिसतै अर्थापत्ति होय सो अनन्यथाभूत
अर्थका अभाव है। बहुरि उपमान प्रमाणभी वेदका कर्ताका साधक
नाही जाते उपमान उपमेय दोज ही प्रत्यक्ष नाही । यातें केवल अभाव
प्रमाण ही रखा सो वेदका कर्ताका अभावहीकू साधै है । बहुरि ऐसे
नाही कहना-~-जो पुरुषका सद्भावका साधना जैसे दु:साम्य है तैसे
याका अभावका भी साधना दु.साध्य है, यात सगयकी आपत्ति आत्रै
जात तिसके कर्ताका अभावके साधकप्रमाण मुलभ है । अबार काल-
वि तौ तिसके अभाववियु प्रत्यक्ष प्रमाण साधक है । अतीत अनागत
कालविपै अभावका साधक अनुमान प्रमाण है । इहा अनुमानके दोय
प्रयोगक श्लोक है, तिनिका अर्थ-अतीत अनागत काल है ते वेदके
कर्तीकरि रहित हैं जात 'काल' ऐसा शब्दकार कहनेयोग्य अर्थ है जैसा
अवार काल तैसे ही ते भी काल है ॥ १॥ बहुरि कोई पूछे वेदका
पढना कैसे है ? तौ ताकू कहिये-जो वेदका पढ़ना है सो सर्व ही
चेदके पढ़नेपूर्वक है पहले पढे हैं ते अन्यकू पढाएँ है, ऐसे ही परि-
पाटी चली आवै है जाते " वेदका अध्ययन" ऐसे पदकरि वाच्य
कहिये कहने योग्य अर्थ है जैसे अबार कोई पढ़े है सो ऐसे ही पढनेकी
परिपाटी है ॥२॥ वहुरि तैसे ही अन्य प्रयोग कहै है,-वेद है सो
(१) तथा च-
अतीतानागतौ कालौ वेदकारविवर्जितौ ।
कालशब्दाभिधेयत्वादिदानीन्तनकालवत् ॥१॥
वेदस्याध्ययनं सर्व तदध्ययनपूर्वकम् ।
वेदाध्ययनवाच्यत्वादधुनाध्ययनं तथा ॥२॥

१३८ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- अपौरुषेय है जात संप्रदायका अविच्छेद होतें जाका कर्ताका स्मरण नाही, कथनी नाही, वेदके सप्रदायीकी परिपाटीमै काहूनै कर्त्ता देख्या नाही, सुन्या नाही, कह्या नाही, जैसैं आकाशका कर्ता काहूनैं कह्या नाही तैसैं । बहुरि अर्थापत्ति प्रमाण है ताकरि वेदके कर्त्ताका अभाव निश्चय कीजिये है जातै वेदकी प्रमाणता है लक्षण जाका ऐसा अनन्यथाभूत पदार्थका दर्शन कहिये सद्भाव देखिये है । जातें धर्म आदि अतींद्रिय पदार्थ है विपय जाका ऐसा जो वेद ताका अल्पज्ञ पुरुपनिकरि करनेका असमर्थपणा है । अर अतींद्रिय पदार्थका देखनेवाला पुरुपका अभाव ही है ता वेदका प्रमाणपणा अपौरुषेयपणाहीकू साधै है । ऐसैं मीमासकनै अपना वेदकै अपौरुपेयपणांकू दृढ़ किया पौरुपेय आगमकू दूपण दिया । अब आचार्य याका प्रत्युत्तरकी विधि करै है—प्रथम तौ जो कह्या कि अक्षरनिकै व्यापीपणाविपै अर नित्यपणां विपै प्रत्यभिज्ञान प्रमाण है सो यह तो असत्य है, तिसवि ज्ञान प्रमाण होय तौ एकव- र्णका अनेक देशविपै सत्त्व होतें खंड खंडरूप प्रतिपत्ति होय सो तौ नाही है। एकदेशमैं एकवर्ण अखंड ग्रहण होय है। दूसरे देशमैं दूसरा तिस सारिखा अखंड न्यारा ग्रहण होय है, सो जो अक्षर सर्व- देशमै व्यापक होय तौ एक ही देशमैं एकवर्णका समस्तपणांकरि ग्रहण कैसै वर्षे, नाही वणै । जो ऐसे होय एक ही देशमैं अक्षर समस्तपणां करि ग्रहण होय तौ व्यापक न ठहरै, ऐसैं भी व्यापकपणा मानिये तौ घट आदिककै भी व्यापकपणाका प्रसंग आवै । ऐसें भी कह्या जाय जो घट सर्वगत है जातें नेत्र आदिके निकटतै अनेक देशविर्षे प्रतीतिमैं आवै है । बहुर जो कहै घटके उपजावनहारे माटीके पिंड अनेक देखिये हैं तातें अनेकपणा ही है। तथा बड़ा घट छोटा घट हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १३९ ऐसा देखिये है तो यह तौ अक्षरनिविपै भी समान है, तहा भी वर्ण वर्ण प्रति न्यारे न्यारे तालुवा आदिक कारणके समूह तथा तीव्र मंद आदि धर्म भेदका संभवका अविरोध है । बहुरि तालुवा आदिककै अक्षर- निका व्यजकपणा आगै इहा ही निपेव करसी, तातै यह कथन इहा ही रहौ । बहुरि कहै है जो अक्षरनिकै व्यापीपणा होते भी सर्वक्षेत्रमैं सर्वस्वरूपकरि प्रवृत्तिसहित हैं, तातै तुम कहो सो दोप नाही । ताकू आचार्य कहै है,--ऐसे होते तो सर्वथा एकपणाका विरोध आवै है जाते देशका भेदकरि एककाल सर्वस्वरूपकरि सर्वक्षेत्रमैं प्रतीतिमैं आवै ताकै एकपणा वणे नाही, यामै प्रमाणविरोध है । ताका प्रयोग गो शब्दका गकार आदि अक्षर हैं ते प्रत्येक अनेक ही हैं जाते एककाल भिन्न न्यारे न्यारे क्षेत्रनिविपै सर्वस्वरूपकरि जैसो उच्चा- रण है तैसो ही समस्तपणाकरि प्रत्येक ग्रहण होय है, जैसैं घट आदि न्यारे न्यारे देखिये है तैसे। बहुरि कहै कि सामान्य पदार्थ सर्व जायगा प्रतीतिमैं आये है अर एक है ताकरि हेतुकै व्यभिचार आवैगा, तौ इहा सो व्यभिचार नाही है, सदृश परिणामस्वरूप सामान्यकै भी अनेकपणा है। वहरि चन्द्रमा सूर्य आदिक एककाल अनेक क्षेत्रमै तिष्टते पुरुष पर्वत आदि अनेक प्रदेशनिमै तिष्ठयापणाकरि अनेक न्यारा न्यारा देखें हैं अर चन्द्रमा सूर्य एक एक ही है तिनिकरि भी व्यभिचार नाही है जाते ते अतिदूरवर्ती है एकदेशमैं तिटें हैं तोऊ नातिके वशतै अनेक क्षेत्रमै न्यारे न्यारे तिष्ठे दीखै है । सो जो भ्रान्तिरहित सत्यार्थ होय तातै भ्रातिसू दौखे तिनिकरि व्यभिचारकी कल्पना करना युक्त नाही। बहुरि जलके पात्रवि चन्द्रमा सूर्य आदिका प्रतिबिंब न्यारा न्यारा दीखै अर चन्द्रमा सूर्य एक एक ही हैं, अर ते प्रतिबिंब भ्रान्तिरूप भी नाही तिनिकरि भी व्यभिचार नाही है जातै चंद्रमा सूर्य आदिका - स्वर्गीय पं0 जयचंदजी विरचित- १४० प्रकाशकी समीपताकी अपेक्षाकरि जल तैसे ही चन्द्रमा सूर्य आदिके आकाररूप परिणाम जाय है यातै न्यारा न्यारा प्रतिबिंब दीखें है ते अनेक हैं, तातै अनेक प्रदेशविपैं एक काल समस्तस्वरूपकरि ग्रह- णमै आवै ऐसा एक विपयका असंभाव्यमानपणात तिसविर्षे प्रवर्त्तमान जो प्रत्यभिज्ञान सो प्रमाण नांही यह निश्चय भया । तैसें ही नित्य- पणा भी प्रत्यभिज्ञानकरि नाही निश्चय होय है जाते नित्यपणां है सो एक वस्तुकै अनेकक्षणमैं व्यापीपणां है, सो ऐसा नित्यपणा तौ वीचिमैं-अन्तरालविर्षे सत्ताका ग्रहण विना निश्चय न कह्या जाय । बहुरि प्रत्यभिज्ञानहीका वलकरि अन्तरालविर्षे सत्ता न जानी जाय है-वीचिमैं सत्ताका सभव नाही सिद्ध होय है जातै प्रत्यभिज्ञानके सादृश्यतें भी संभवनेका अविरोध है। बहुरि घट आदिविपै भी ऐसा प्रसंग नाही आवै है जातै ताकी उत्पत्तिविपैं अन्य अन्य माटीके पिडस्वरूप कारणका असंभवपणांकरि अतरालवि सत्ताका साधनेंका समर्थपणा है, भावार्थ-पहले घटकू देख्या पी, तिसहीकू फेरि देख्या तब एकत्वप्रत्यभिज्ञान भया जो यहु घट सो ही है, तहा कहै याके अन्तरालमै सत्ता कैसैं सधी ? ताका समाधान किया है जो अन्य अन्य मांटीके पिंडतै घट उपजै ताकी जुदी सत्ता होय, इहां अन्य माटीका पिंडते उपजना नाही ताते तिसहीकी सत्ता सधी । अर शब्द- विर्षे ऐसे नाही -पहले शब्द सुन्या ताका कारण अन्य -सुन्या ताका कारण अन्य है । तातै अपूर्व कारणनिका व्यापार संभव- नेतै अन्तरालविपै सत्ताका संभव नाही है। वहुरि जो और कह्या- संकेतकी अन्यथा अप्राप्ति है जो शब्द नित्य न होय तौ पदार्थविर्षे संकेत नाही वर्णै । सो ऐसा कहना भी पुरुपका स्वरूप विना जाण्यां कहै है जा” अनित्यविषं भी यहु जोड़नां बरौं है । सो ही कहै है- था फेरि हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १४१ प्रह्या है सकेत जाका ऐसा जो दड ताका नाश होते अब अगृहीतस- केतदंड अन्य ही ग्रहणमै आवै है। ऐसे होते तिस अगृहीतसकेतदडतै दंडी ऐसा कहना न होय, तेसै ही ग्रहण करी है व्याप्ति जाकी ऐसे धूमका नाश होते अन्य धूमके देखनेंतै विना व्याप्ति ग्रहण अग्निका ज्ञानका अभाव होय । सो दंडीका व्यपदेश तथा धूमतें अग्निका ज्ञान होय ही है, अर ते अनित्य हैं तातै अनित्यविपै सकेत होय ही है । बहुरि इहा कहै-जो दडी इत्यादिविपै तौ सदृशपणातै यह प्रतीति होय है ताते हमारी पक्षमै दोष नाही, तो इहा शब्दविपै भी सदृशप- णातै अर्थकी प्रतीति होते कहा दोप है ? शब्दकू नित्य मानि खोटा अभिप्राय क्यों करना, ऐसे माने अन्तरालविपै अदृष्ट सत्त्वकी भी कल्पना न होय । वहुरि जो और कह्या कि-शब्दके व्यंजक पवनकै न्यारा न्यारापणा है तातै एक काल मुनना न होय है, सो भी कहना विना सीखे कया है,-समान एक कर्णइन्द्रियकरि ग्रहणमैं आवै, अर समान ही जाका उदात्त अनुदात्तादि धर्म, अर समान ही क्षेत्रवि तिष्ठते विषय विषयी कहिये कर्ण इंद्रिय अर शब्द, तिनिविर्षे न्यारे न्यारे पवनकरि न्यारे न्यारे ग्रहणका अयोग है एक ही काल ग्रहण चाहिये । सो ही कहै है, -श्रोत्र इन्द्रिय है सो समान क्षेत्रवि तिष्टता समान इन्द्रियकरि ग्रहणयोग्य समान ही जिनिका धर्म, ऐसे जे गकारादि शब्दनामा पदार्थ तिनिका ग्रहणकै अधि न्यारा न्यारा सस्कार करनेवाला पवनकरि संस्कार करने योग्य नाही होय है, एक ही पवन सस्कारकतें गकारादि पदार्थका ग्राहक होय है जाते श्रोत्र है सो इन्द्रिय है, इन्द्रिय हैं ते ऐसे ही हैं, जैसे नेत्र इन्द्रिय है सो अंजनादिकका सस्कार एकही करि अपना सर्व विषयकू ग्रहण कर है, तिसविपै न्यारे न्यारे अंजनादिकके सस्कार १४२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- नाही चाहै है । वहुरि शब्द हैं ते भी न्यारे न्यारे संस्कारक जे पवन तिनिकरि सस्कार करने योग्य नाही है जातें समान इन्द्रियकरि ग्रहण करने योग्य समान धर्म स्वरूप समान क्षेत्रमैं तिष्ठे, ऐसे होते एककाल इंद्रियकरि सबंधरूप होय हैं जैसे घट आदि होय है। बहुरि कहै जो उत्पत्तिपक्षमैं भी यह दोष समान है सो ऐसे नाही है जातें माटीके पिंड अर दीपक इनिके दृष्टान्तकरि कारक व्यंजक पक्षमैं विशेषकी सिद्धि है । विद्यमान घटका माटीका पिंड तौ कारक है अर दीपक ताका व्यंजक है, परन्तु ऐसै विशेष है जो एक घट करनेकै अर्थि लिया एक माटीका पिंड सो तौ एक ही घटकू करै है अन्यकू नाही करै है, अर दीपक एक घटके प्रकाशनेकै अर्थि जोया सो तिस घटकू प्रकाशै अर अन्यकू भी प्रकाशै । तेसैं शब्दका व्यंजक एक पवन सो एककाल प्रकाशै तब सर्व शब्दका श्रवण एककाल ही चाहिये सो नाही है । यह दूपण है सो अभिव्यक्तिपक्षमैं आवै अर उत्पत्तिपक्षमैं तौ नाही आवै । तातै बहुत कहनेकरि पूरी पड़ो-शब्दकै उत्पत्ति 'पक्ष ही मानना योग्य है। बहुरि और कह्या-जो प्रवाहके नित्यपणाकरि वेदकै अपौरुषे- यपणां है, तहा दोय पक्ष पूछने ? शब्दमात्रकै अनादि नित्य- पणा है कि केई विशिष्टशब्दनिकै अनादि नित्यपणा है ? जो -कहेगा शब्दमात्रकै है तौ जे शब्द लौकिक हैं ते ही वेदके हैं, तातें यह कहनां तौ अल्प ही भया जो वेद तो अपौरुषेय है अर -लौकिक शब्द अपौरुषेय नाही ? सर्व ही शास्त्रनिकै अपौरुषेयता आवैगी। बहुरि कहैगा-जो विशिष्ट अनुक्रमरूप चले आये हैं ते ही शब्द अनादि नित्यपणाकरि कहिये है, तो इहा भी दोय पक्ष 'पूछने ते शब्द जिनिका अर्थ जानने में आया ऐसे हैं कि जिनिको

३
हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
१४३
अर्थ जाननेमै न आया ऐसे हैं ? जो कहेगा-उत्तर पक्ष है अर्थ
जाननेंमै न आया ऐसे है तौ तिनिकै अज्ञानस्वरूप अप्रमाणताका प्रसग
आवैगा । वहुरि कहैगा आद्यका पक्ष है जो अर्थ जाननेमैं आया ऐसे
हैं तौ पूछिये तिनिका व्याख्यान करनेवाला अल्पज्ञ है कि सर्वज्ञ है ?
जो कहेगा-अल्पज्ञ है तौ जिनि वेदवाक्यनिका संबंध कठिन है जान-
नेमैं न आवै तिनिका अर्थ अन्यथा भी होय जाय तब मिथ्यात्वस्वरूप
अप्रमाणपणा होय । सो ही कही है, ताका लोकका अर्थ-मेरा यह
अर्थ है अर यह नाही है ऐसा शब्द ही तो आप कहै नाही, पुरुप ही
शब्दका अर्थ कल्पै हैं अर पुस्प है ते रागादि दोपनिकरि दूपित है ।
इहा विशेप ऐसा जो अल्पज्ञका कह्या अर्थमै विशेष नाही, तातै काहूनै
कह्या जो वेदका वचन है "अग्निहोत्र जुहुयात स्वर्गकामः" ताका अर्थ-
ऐसा जो स्वर्गका इच्छुक पुरुप है सो अग्निहोत्रनैं होमै । तब काहू.
कह्या~याका यह अर्थ नाही, याका अर्थ ऐसा है-जो अग्नि है
ऐसा श्वानका नाम है ताका होत्र कहिये मास सो 'जुहुयात्' कहिये
खाय जो स्वर्गका इच्छुक होय सो तथा अग्नि ऐसा नाम ही श्वानका
ताका होत्र कहिये मास सो खाय ऐसा भी अर्थ क्यों न होय । ये
अर्थ अल्पज्ञके कहे कहिये तो ऐसे ही सर्व ही अर्थ अल्पज्ञके कहे है
ते प्रमाण कैसे होहिं । अथवा यामै समय उपजै जो याका कैसा अर्थ
है तव अप्रमाणपणा आवै । बहुरि दूसरा पक्ष जो-वेद सर्वज्ञकरि
जान्यां अर्थ रूप है सो ही अनादिपरपराते चल्या आवै है, ता धर्म जे
है
१-तदुक्तम्-
अयमों नायमर्थ इति शब्दा वदन्ति न ।
कल्प्योऽयमर्थः पुरुपैस्ते च रागादिविप्लुताः ॥१॥

१४४ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- यज्ञादिक तिनिविपै चोदना कहिये वेदवाक्यमैं प्रेरणा तिष्ठै है सो ही हमारै प्रमाण है, ऐसा कहना तो वाध्या गया । वहुरि अतीन्द्रियार्थ प्रत्यक्ष करनेविषै समर्थ जो पुरुष सर्वज्ञ ताका सद्भाव होते तिसके वचनकै भी चोदनाकी ज्यों अर्थ निश्चय करावनेंवालापणाकरि प्रमाण- पणा” यह वचन तौ वेदकै पुरुषका कियापणांका अभावकी सिद्धिका प्रतिबंधक होय, भावार्थ-सर्वज्ञ ठहन्या तब अर्थका निश्चय ताका वचनसूं होयहीगा अर वेढ• अपौरुषेय माननां वृथा होयगा । वहुरि कहै-जो वेदका वक्ताकै अल्पज्ञपणां होतै भी यथार्थ व्याख्यानकी परं- पराकरि संप्रदायका संतानका विच्छेद नाही होनेकरि वेद सत्यार्थ ही मानिये है ? ताकू कहिये ऐसे नाही जाते अल्पज्ञकै अतीन्द्रिय पदार्थनि- विर्षे निःसन्देह व्याख्यानका अयोग है, जैसैं अंधाकरि बैंच्या जो अंधा ताकरि अनिष्ट देशकू छोडि वांछित देशका मार्गविष प्राप्त करनां वण नाही । वहुरि किछू विशेष कहै है-जो अनादित व्याख्यानकी परं- परातै चल्या आया कहै तौज वेदका अर्थ• संबंध• ग्रहणकरि पार्छ भूलनेते तथा वचनकी प्रणिता विना औरतूं और अर्थ कहनेते तथा खोटे अभिप्रायतें व्याख्यानका अन्यथा करनेंतें निर्वाध तत्वका प्रकाश- नका अयोगतै अप्रमाणता ही होय । सो ही देखिये है;-अबारके पंडित भी ज्योतिपशास्त्रादिकविर्षे रहस्य यथार्थ जानते भी खोटे अभि- प्रायतें अन्यथा व्याख्यान करें हैं । बहुरि केई जानते भी वचनकी प्रवीणता विना नी कहै नांही जाने ते अन्यथा उपदेश करै हैं। बहुरि केई वाच्यवाचकका संबंध भूलिकरि अयथार्थ कहैं हैं । जो ऐसे न होय तौ वेदके वाक्यार्थविर्षे भावना विधि नियोगरूप अर्थका अन्य- थापणांकरि विवाद कैसे होय । भट्टके शिष्य तौ भावनाकू वाक्यार्थ मानें है । वेदान्ती विधिकू वाक्यार्थ मानें है । प्रभाकरवाला नियोग• वा- हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १४५ क्यार्थ मानैं है । बहुरि मनु याज्ञवल्क्य आदि ऋपिनिकै श्रुतिका अर्थकै अनुसार स्मृतिके निरूपणविपै अन्य अन्य प्रकारपणा कैसे होय । तातै प्रवाहपरिपाटीविपै भी वेदक अयथार्थपणा ही है । यातें यह ठहरी जो अतीतानागतकालवि4 वेदका कर्त्ता नाही । काल शब्दवाच्यपणा हेतु- करि ऐसै कह्या सो भी अपनें मतका निर्मूल करनेका हेतुपणाकरि विपरीत साधनतै यहु हेतु हेत्वाभास ही है । सो ही कहिये है, इहा श्लोक है, ताका अर्थ- अतीत अनागत काल है ते वेदके ज्ञाताकार रहित है जातें काल शब्दका अर्थ है जे कालशब्दकरि कहिये ते ऐसे ही हैं जैसे अबार का काल । बहुरि विशेष कहै हैं कि कालशब्दका अर्थ अतीत अनागत कालका ग्रहण होते होय सो तिनिका ग्रहण प्रत्यक्षतें होय नाही जाते ते अतीत अनागत काल इन्द्रियगोचर नाही ! अर अनुमान” तिनिका ग्रहण होतें भी साध्यकरि तिनिका सम्बन्ध निश्चय करनेंकू नाही समर्थ हूजिये है जात प्रत्यक्षतै ग्रहण किया साधनकही साध्यका सबध मानिये है, सो है नाही । बहुरि मीमासक कालनामा द्रव्य भी नाही मानें है। बहार कहै-जो अन्यवादी काल मान है तिनिकी ही मानि ले. करि तिनिकू कह्या है काल वेदक करि रहित है, ऐसा मानो-इनिकै व्याप्यव्यापकभाव है, सो काल व्याप्यकू मानों हो तौ वेदकर्ताकार रहितपणा व्यापककू भी मानों ऐसा प्रसगसाधनतै दोष नाही । ताकू कहिये-जो परफैं तो इहा साध्य साधन कहिये वेदके कर्ताकरि रहितपणाकै अर कालकै व्याप्यव्यापकपणाका अभाव है । अबार भी (१) अतितानागतौ कालौ वेदार्थज्ञविवर्जितौ । कालशब्दभिधेयत्वादधुनातनकालवत् ॥ हि.प्र. १० स्वर्गीय पं0 जयचंदजी विरचित- देशान्तरविर्षे वेदका कर्ता अष्टकदेव आदिका बौद्धमती आदिनिक अंगीकार है । वौद्धमती घेदका कर्ता अष्टकदेवकू मानें है। वैशेषि- कमती ब्रह्माकू मानें है । जैनी कालासुरकू मानें है। बहुरि जो आरभी कह्या-वेदका अध्ययन वेदका अध्ययन पूर्वकही है इत्यादिक, सो भी विपक्ष ने पुरुपके किये शास्त्र तिनिका अध्ययन ताविपैं भी समान है । जैसे भारतका अध्ययन है सो सर्वही गुरुके अध्ययनपूर्वक है जात तिसके अध्ययन पद करिही वाच्य अर्थ है जैसै अबार अध्ययन कीजिये है ऐसै समान जानना । बहुरि और कह्या-जो वेदका कतीका सप्रदायमै कथन नाही किसीकं यादि नाही जो फलाणे कत्तीका किया है ऐसा ही संप्रदाय चल्या आवै है ताका विच्छेद भी नाही हुवा । तहा कहिये-जो इस हेतुमैं जीर्णकूप आरामवन आदिकार व्य- भिचारके दूर करनेकू सप्रदायका न होना ऐसा विशेपण किया तौऊ विशेष्य जो कर्त्ता यादि नाही ऐसा है सो विचार किये याका ही अयोग है तातें यह हेतु नाही । यामैं तीन पक्ष पूछिये--कर्ताका यादिपणा वादीकै नाही है कि प्रतिवादी कै नाही है कि सर्वही मैं नाही है । जो वादिकै नाही है तौ यामै दोय पक्ष पूछिये----कर्ताका स्मरणका अभाववादी• कर्ता नाही दीख्या ताते है कि कर्ता के ', अभावहीत है, जो कहै कर्ता दीख्या नाही ताते है तौ पिटकत्रय बौद्धका ग्रंथ है; ज्ञानपिटक, वंदनपिटक, चैत्यपिटक, तिनिक भी अपौरुषेयपणा आया । बौद्धकै शिष्यनिभी तिनिका कर्ता देख्या (२) भारताध्ययनं सर्व गुर्वध्ययनपूर्वकम् । तदध्ययनवाच्यत्वादधुनाध्ययनं यथा॥ इस श्लोकका अर्थ वचनिकामें लिखातो है परन्तु जैसे अन्यत्र “ताका श्लो. कका अर्थ" ऐसा लिखकर वादमें लिखा है वैसे नहीं लिखा है।

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला १४७ नाही । अर कहै वौद्ध कर्ता मानें है तातें अपौरुपैयपणा नाही तो इसही हेतुते वेदवि अपौरुषेयपणा मति होहु । बहुरि जो कहै कर्ता के अभावत है तौ जे कर्त्ताका अभाव कर्ताके अस्मरण तैं मानें तो यामैं इतरंतराश्रय दूपण आव है, कत्र्ताका अभाव तें तौ तिसका अस्मरण सिद्ध होय अर तिसकं अस्मरण” तिसका अभाव सिद्ध होय। वहरि कहै—कि प्रमाणपणाकी अन्यथा अप्राप्ति तैं तिसका अभाव सिद्ध होय है जो कर्त्ता होय तौ प्रमाणपणा न होय ऐसे इतरेतराश्रय नाही आवै है। तो ऐसें नाही है जात अप्रामाणका कारण जो पुरुषविशेप ताहीका प्रामाण्यकरि निराकरण है, पुस्पमात्रकातौ निराकरण है नाही। बहुरि कहै जो अतीन्द्रिय पदार्थके देखने वालाका अभावतें अन्य पुरुषविशेपकै प्रमाणपणाका कारणपणाकी अप्रप्ति है यात सर्वथा पुम्पका अभाव सिद्वही है । तो ताकू कहिये--जो सर्वज्ञका अभाव काहे ते है ८ जो कहै प्रमाणपणाकी अन्यथा अप्राप्ति ते सर्वज्ञका अभाव है तौ इतरेतराश्रयपणा है, बहुरि कहै कर्ताक अस्मरणत है तो चक्रकनामा दूपण है । वेढविपै कर्त्ताके अस्मरणतै तौ सर्वज्ञका अभाव सिद्ध होय, बदरि संवैज्ञका अभाव सिद्ध होय तब वेटकैं प्रमा- णपणाकी अन्यथा अनुपपत्ति सिद्ध होय और जब प्रमाणापणाकी अन्यथा अनुपपत्ति सिद्ध होय तब कर्ताका अभाव सिद्ध होय तिसकू सिद्ध होते काका अस्मरण सिद्ध होय ताके सिद्ध होते फेरि सर्वज्ञका अभाव सिद्ध होय, ऐसे चक्रकका प्रमंग होय है । वहुरि कहै सर्वज्ञका अभाव अभावप्रमाणतेंसिद्ध होय है। तौ ताकू कहिये-~जो सर्वज्ञका साधक अनुमान प्रमाणका प्रतिपादन पहले किया ही था तातै अभाव- प्रमाणके उत्थानका अयोग है जाते पाच प्रमाण भावरूप है तिनिका अभाव होय तव अभाव प्रमाणकी प्रवृत्ति होय, ऐसे मीमासक. कह्या स्मरण है १४८ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- है, ताका श्लोक है ताका अर्थ:-"जिस वस्तुके स्वरूपविर्षे पांच प्रमाण न उपजै तहा वस्तुका अभावका ज्ञान होनेकै अर्थि अभावकै प्रमाणता है, ऐसे कह्या है" | तातें वादीकै तौ वेदका काका अस्म- रण नाही वणै है । वहुरि दूजा पक्ष जो प्रतिवादीकै है ऐसे कहै। तौ ताकै भी नाही वर्षे है जातै प्रतिवादी कर्ता वेदका स्मरण करही है। बहुरि सर्वही कहै तो भी नाही वणै है जातै वादीकै वेदका कर्त्ताका अस्मरण है तौऊ प्रतिवादीकै ॥ बहुरि मामासक कहैं है- जो प्रतिवादी वेदविपै अष्टकदेवकू आदि देकरि बहुत कर्ता स्मरै है, यातै स्मरणकै विवादतै प्रमाणता नाही है, तातै सर्वकै कर्त्ताका अस्म- रणही सिद्ध होय है । ताकू कहिये-~-जो कर्त्ताका विशेषविही विवाद है कर्त्तासामान्यविपैतौ विवाद है नाही यात सर्वकै काका अस्म- रण असिद्ध है। बहुरि सर्व प्राणीनिके ज्ञानका विज्ञानकरि रहित जो अल्पज्ञ पुरुप सो सर्वकै कर्ताका अस्मरण कैसे जानै । तातै वेद- विर्षे अपौरुषेयपणांका स्थापनेका असमर्थपणां है । तातै आगमका लक्षण किया ताकै अव्यापकपणा नाही है। बहुरि असंभवीपणा दूष. णभी नाही है पौरुषेयपणा साधनेविर्षे प्रमाण बहुत है, सोही कहै है; वृहत्पंचनमस्कारनामा स्तोत्र पात्रकेसरीकृत है ताकी काव्यका अर्थ:- जातै जन्ममरणसहित जे ऋषि तिनिके गोत्र आचरण आदि नाम १-प्रमाणपञ्चकं यत्र वस्तुरूपेण जायते। वस्तुसत्तावबोधार्थ तत्राभावप्रमाणता ॥ इति २-सजन्ममरणर्षिगोत्रचरणादिनामश्रुते- रनेकपदसंहतिप्रनियमसन्दर्शनात् । फलार्थिपुरुषप्रवृत्तिनिवृत्तिहत्वात्मनां श्रुतेश्च मनुसूत्रवत्पुरुषकर्त्तकैव श्रुतिः ॥ इति

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
वेदमैं कहे हैं, बहुरि अनेक पदनिका समूहरूप न्यारे न्यारे छदरचना
वेदमैं देखिये है, बहुरि फलके अर्थी जे पुरुष तिनिकी प्रवृत्ति निवृत्तिके
कारण स्वरूप वेदमैं कहे है ते सुनिये है "स्वर्ग का वाछक अग्निष्टोम-
करि पूजै" इत्यादिक तो प्रवृत्तिके वाक्य, बहुरि "कादा न खाइये, दारू
न पीवै गऊकू पगते स्पर्शना नाही," इत्यादि निवृत्तिके वचन वेदमैं
हैं जैसैं मनु ऋपिके सूत्रमै हैं तैसे, तारौं वेद है सो पुरुषका ही किया
है। ऐसा भी वचन हमारे आचार्यनिका है। बहुरि अपौरुषेयपणा
वेदक होते भी प्रमाणता नाही वणे है जात प्रमाणपणाका कारण जे
गुण तिनिका वेदविपै अभाव है । वहुरि मीमासक कहै है-जो गुण-
निकरि किया ही तौ प्रमाणपणा नाही, दोपका अभावकरि भी प्रमाण-
पणा है, सो दोपका आश्रय पुरुप है ताकै कापणाका अभाव होते
भी वेदकै प्रमाणपणा निश्चय कीजिये है, गुणके सद्भावहीत नाही है सो
ही हमारे कही है ताका श्लोकका अर्थ-शब्दकै विपै टोप उपजै
है सौ तौ वक्ताकै आधीन है ऐसा निश्चय है, बहुरि कहू दोपका
अभाव है सो गुणवान वक्तापणाकै आधीन है, जाते वक्ताके गुणनि-
करि दूर किये जे दोष ते फेरि शब्दभै आवे नाही, बहुरि यह पक्ष
समीचीन है जो वक्ताका अभावकरि तिस वक्ताकै आश्रय जे दोप ते
शब्द न होंहि । ताका समाधान आचार्य करै है-जो यह कहना
भी अयुक्त है जाते मारा अभिप्राय मीमासकनै जाण्या नाही, जातै
हमनें तौ वक्ताकै अभाव होते वेदकै प्रमाणपणाका अभाव है ऐसैं कह्या
(१) शब्दे दोपोद्भवस्तावद्वक्ताधीन इति स्थितम् ।
तदभावः क्वचित्तावगुणवद्वक्तृकत्वतः॥१॥
तद्गुणैरपकृष्टानां शब्दे संक्रांत्यसंभवात् ।
यहा वक्तुरभावन न स्युर्दोषा निराश्रयाः॥२॥

१५० स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- नाही । हमनें तो ऐसैं कह्या है-जो वेदके व्याख्यान करनेवालेनिकै अतीन्द्रिय पदार्थनिका देखनां आदि गुणनिका अभाव होते दोषनिका अभाव नाही, तातै वेदविप भी ढोपनिका सद्भाव आवै, तब प्रमाणप- णाका निश्चय नाही, ऐसै कहैं हैं। तातै अपौरुषेयपणा होतें भी वेदकै प्रमाणपणाका निश्चयका अयोग है । तातें इस अपौरुषेयपणां रूप वेद करि हमारा आगमके लक्षणकै अव्यापीपणां अर असभवीपणा नांही है। यातै बहुत कहनेकरि पूरी पड़ो॥ ९४ ॥ आगें वौद्धमती कहै है जो शब्दकै अर अर्थक संबंधका अभाव है ताते शब्द अन्यका निषेधमात्र कहनेवाला है, नाम जाति गुण क्रिया आदि स्वरूप शब्दका अर्थ नाही है ताते शब्दके आप्तप्रणीतपणां होते भी यातें सत्य अर्थका ज्ञान कैसे होय ? ऐसे तर्क होते सूत्र कहूँ हैं- सहजयोग्यतासंकेतवशाद्धि शब्दादयो वस्तुप्रति- पत्तिहेतवः ॥९५ ॥ याका अर्थ—सहज कहिये स्वभावभूत योग्यता कहिये वस्तुस्वरूप विषै पुरुषका अभिप्रायका नियम "जैसैं पृथु वृघ्नोदर आकाररूप मांटीका रूप है सो घट है" ऐसै सकेतके वशतें 'हि' कहिये प्रकटपण ते पूर्वोक्त आप्तप्रणीत शब्द अर आदि शब्दत अंगुली आदिकी समस्या है ते वस्तुकी प्रतिपत्ति कहिये ज्ञान ताकू कारण है ॥ ९५॥ आगें याका उदाहरण कहैं हैं; यथा मेादयः सन्ति ।। ९६ ।। याका अर्थ-जैसे मेरु आदिक हैं ते हैं । इहां बौधमती कहै है-जो जे ही शब्द तौ अर्थके होते देखे ते ही शब्द अथके अभाव , ताकू आचार्य हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १५१ होत भी देखिये है तौ अर्थके कहनहारे शब्द कैसे ? कहैं हैं--यह भी कहना अयुक्त है जात जे अर्थके कहनहारे शब्द नाही है तिनित अर्थके कहनहारे शब्द अन्य ही हैं, सो अन्य व्यभि- चार होते अन्यकै कहना युक्त नाही, जाते यामै अतिप्रसग दूषण आवै है । जो ऐसे न मानिये तो इन्द्रजालके घडेमैं धूम होते भी अग्नि नाही ऐसे व्यभिचार होते पर्वत आदिके विपै धूम होय ताकै भी व्यभिचारका प्रसग ठहेरे । बहरि जो कहै-यत्नतै परीक्षा किया कार्य कारणकू उलधि वर्त्त नाही, तो ऐसे इहा भी समान जानना, जो शब्द जिस अर्थमै होय तिसक ही कहै है नाके परीक्षा किया शब्द है सो अर्थकू नाही व्यभिचरै है। ऐसे होते अन्यका निषेधक शब्दार्थपणाकी कल्पना है सो प्रयासमात्र ही है। वहरि अन्यापोह कहिये अन्यका निषेध शब्दका अर्थ नाही ठहेरे है जाते प्रतीतिविरोव है प्रतीतिमै ऐसैं आवता नाही । जाते गौ आदि शब्दके मुनने से यह अन्य नाही ऐसा सामान्य अभाव जो तुन्छाभाव सो तो प्रतीतिमै आवै है नाही' तिस गऊ गव्दते साम्नादिमान पदावि प्रतीति देखिये है, गजतै अन्यकी बुद्धि जात होय ऐसा तहा अन्य शब्द ल्यावना । बहुरि कहै-एक ही गज शब्दत दोय अर्थकी प्रतातिका सभावन है तातै अन्य शब्द ल्याव नेते प्रयोजन नाही । ताक कहिये-जो ऐसें नाही, एक शब्दकै दोय विद्ध अर्थके कहनेका विरोध है असभव है। बहुरि विशेष कहै है जो गऊ शब्दकै गजतै अन्यकी व्यावृत्ति विपय होते पहले तो गऊ नाही ऐसी प्रतीति आवे है, सो ऐसे तो वन नाही लोककै तौ पहले ही गज अर्थकी प्रतीति होय है यात अन्यापोह शब्द का अर्थ नाही । बहुरि विशेष कहै है जो अपोह कहिये निषेध सो मामान्य है, तो शब्दका अर्थपणाकी प्रतीतिमै लिया हुवा पर्युदास प्रतिषेधरूप १५२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- - । है कि प्रसज्य प्रतिषेधरूप है ? ऐसे टोय पक्ष पूछिये । जहा विधिको प्रधानता होय निषेध गौण होय तहा पर्युदासप्रतिपेध होय । इहां जाका निषेध करना होय ताके शब्दकै पूर्वे नकार ल्यावै, जैसे काहूनें कह्या 'अब्राह्मणकू ल्याव ' तहा जानिये ब्राह्मणका ती निषेध है अर अन्य वैश्यादिककी विधि है तिनिकू बुलावै है। बहुरि जहां विधिकी तौ अप्र- धानता होय अर निषेधकी प्रधानता होय तहा प्रसज्य प्रतिपेध होय इहा क्रियाकी साथ नकार ल्यावै जैसे काहू. कह्या-ब्राह्मणकू न ल्याव' तहा जानिये नाही ल्यावनेंकू कहै है, इहां अत्यंत निषेध जानना । सो इहा अन्यापोह शब्दार्थविपैं दोय पक्ष पूछि तहा कहै-पर्युदास प्रति- पेध है तौ गऊपणा ही नामान्तरकरि कह्या जातै अभावके अभावकै तौ अन्यभावका सद्भावपणा ही है, गज के अभावका अभाव कह्या तब गजका ही अन्य नाम का। बहुरि इहा पूछिये जो गऊ शब्दकै' वाच्य अश्व आदिकी निवृत्ति है लक्षण जाका ऐसा अभाव कहा है । जो कहै अपना स्वलक्षण जो क्षणिक निरन्वय तिसस्वरूप है, तो यह तो वण नाही जातें स्वलक्षण तो सकल विकल्प अर वचन इनिके गोचर” दूरवर्ती है । बहुरि कहै जो काबरापणा आदि व्यक्तिरूप है तो यह भी नाही है, जातै बौद्ध शब्दकू सामान्यका वाचक कहै है सो काब- रापणा आदि विशेपरूप व्यक्ति तिनिकू कहें शब्दकै सामान्यका वाचक कहनेका अभावका प्रसग आवै है । तारौं समस्त जे गऊकी व्यक्ति तिनि विर्षे अन्वयकी प्रतीतिका उपजावनहारा अर तहा न्यारा न्यारा समस्तपणाकरि व्यक्तिनिविषै वर्तमान ऐसा सामान्य ही गोशब्दका अर्थ है, ताहीका अपोह ऐसा नाम करतै तौ नाममात्र ही भेद होय है अर्थ- भेद तौ नाही । तातै आदिका पक्ष जो पर्युदासनिपेध सो तौ श्रेष्ट नाही । बहुरि दूसरा पक्ष जो प्रसज्यप्रतिपेध सो भी श्रेष्ठ नाही है जातै - हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । १५३ गज आदि शब्दनिका प्रसज्यप्रतिपेध होय तब कोई बाह्य पदार्थ विपै प्रवृत्तिका प्रयोग होय, अर तुच्छाभाव मानिये तो नैयायिकमतका प्रवेशका प्रसंग जावै । बहुरि विशेप कह है-जो गज आदिक जे सामान्य शब्द हैं, बहार जे गावलेय कहिये काबरा आदिक विशेप गट हैं तिनिकै बौद्धके अभिप्रायकरि पर्यायगदपणा आवै अर्थका भेदका अभाव ठहरै जातै एक अपोह ही सर्व शब्दानिका अर्थ ठहरै, जैसे वृक्षका दूसग नाम पाठप इत्यादि पर्याय गब्द है तिनिका अर्थ न्यारा नाही ते ठहरे। बदर तुन्छा भाव कहिये सर्वथा अभाव ताकै विषे भेद युक्त नाही है । मसृष्टत्व, एकत्व, नानात्व भेद हैं ते तो वस्तु ही विर्य प्रतीतिमै आप है। बहुरि अभावविर्षे भेद मानिये तो वस्तुप- णाकी प्राप्ति आय है जाते वस्तुपणाका लक्षण भेद स्वरूप है । बहुरि निषेध करने योग्य जे गऊ शब्द अस्त्र आदिक ते ही भये सबंधी तिनिके भेदः अभावम भेद कहै तो यह वर्णं नाही जातै प्रमेय अभि- धेय आदिक जे विविरुप शब्द है तिनिकी प्रवृत्तिका अभावका प्रसग आवै । जात प्रमेय आदि गव्दनि 'व्यवन्छेद्य' कहिये निषेध करने योग्य अप्रमेय आदि हे मो ताके अतद्रूपकरि भी अप्रमेय आदिरूप- पणा होने तिस अग्रमेय आदितै व्यवच्छेदका अयोग है, तातै तहा प्रमेय अभिधेय इत्यादि शब्द वाच्य अपोहविषै सबधीके भेदतै भेद कैसे होय । बहुरि विशेप कह है-शावलेय काबरा आदि शब्दनिविर्षे अपोह कहिय निषेध सो एक ही नाही ठहरै है जाते व्यक्ति व्यक्ति विपैं न्यारा न्यारा ही ठहरे है । वरि कहै-जो काबरा आदि शब्द अपो- हका भेद नाही करै है तो ताकू कहिये-अश्व आदि शब्दभी भेद करनेवाले मति होह जाके अपने सामान्यमाही जे काबरा आदि गुण ते भेद करनेवाले नाही, ताकै अश्व आदि भेद करनेवाले कहना तो अति- १५४ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- साहस है, जत्री है । वस्तुके भी सबंधीके भेदतें भेद न पाइये तक अवस्तुकै कैसे होय ? सो ही कहिये है,-एक ही देवदत्त आदि नामा कोई पुरुष कडा कुंडल आदि पहेरे तब तिनि सवधीनिकै भेदते अने- कपणां होय नाही । बहुरि विपेश कहै है -संबंधीके भेदतें भेद भी कहूं होहु परतु वस्तुभूत सामान्य मानें विना अन्यापोह है आश्रय जाका ऐसा संबंधी है सो तुमार होने योग्य न होय है, सो ही कहिये है -जो काबरा आदि वि. वस्तुभूत सारूप्य कहिये समानता ताका अभाव है तो अश्व आदिका परिहार करि तहां ही तिनिका विशेषरूप यह गऊ है ऐसा नाम अरु ज्ञान कैसे होय हाते संबंधीका भेदकार भेद चाहै है तो सामान्य भी वस्तुभूत अगीकार करनां योग्य है । वहुरि विशेष कहै है-जो अपोह शब्दार्थको पक्ष विषै सकेत ही वणें नाहीं जातै तिस अपोह के ग्रहणका उपायका असभव है । तहां तिसका ग्रहण विपै प्रत्यक्ष प्रमाण समर्थ नाही जातै प्रत्यक्षका तौ वस्तु विषय है, अन्यापोह तौ अवस्तु है । वहुरि अनुमान भी ताका ग्रहणका उपाय नाही जात अनुमान तौ स्वभाव तथा कार्य वस्तुका लिंग होय तिस करि उपजै है, अपोह है सो तौ निरुपाख्य कहिये निःस्वभाव है ताते स्वभावलिंग नाही अर अर्थक्रियाकरि रहित है तातै कार्यलिंग नाही ॥ बहुरि विशेप कहै है-गज शब्दकै अगऊका अपोह कहनहारापेगां होतै गऊ ऐसा शब्दका कहा अर्थ होय ? जातै विना जाण्याकै विधि निशेधविपै अधिकार नाही है। जो कहै अगज की निवृत्ति गऊ शब्दको अर्थ है तौ इतरतराश्रयनामा दोप आवैगा, अगऊका व्यवच्छेद तौ अगऊका निश्चय भयें होय बहुरि सो अगऊ गऊकी निवृत्तिस्वरूप है, बहुरि गज है सो अगजका व्यवच्छेदरूप है ऐसे इतरेतराश्रय दोष है । बहुरि अगऊ इस पदमैं भी गज ऐसा उत्तरपद है ताका अर्थ भी ऐसैं हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । १५५. -~-- ही विचारना, गऊकी व्यावृत्तिते अगजका निश्चय होय अगऊकी व्यावृ- त्तिते गऊका निश्चय होय । बहुरि कहै जो अगऊ ऐसे इहा गोश- ब्दका अर्थ विधिरूप और ही है, तो अपोहही शब्दार्थ है ऐसा कहना विगडेगा । तातें कही जो युक्ति ताकरि विचान्या हुवा अपोहका अयोग है । तातै अन्यापोह शब्दका अर्थ नाही है यह निश्चय भया जो सहज योग्यताके वशते शब्दादिक हैं ते वस्तुकी प्रत्तिपत्तिके कारणा है ।। ९६ ॥ इहा श्लोकः- स्मृतिरनुपहतेयं प्रत्यभिज्ञानवज्ञा प्रमितिनिरतचिन्ता लैंगिक सङ्गतार्थम् । प्रवचनमनवयं निश्चितं देववाचा रचितमुचितवाग्भिस्तथ्यमेतेन गीतम् ।। याका अर्थ.--इस अधिकारवियु निर्वाध तौ स्मृतिप्रमाण कह्या, बहुरि आदरनेयोग्य प्रत्यभिज्ञान प्रमाण कह्या, बहुरि प्रमिति कहिये प्रमा- णका फलरूप ज्ञान तिसविरें लीन ऐसा चिंता कहिये तर्क प्रमाण कह्या, बहुरि यथार्थ है अर्थ जाम ऐमा लैंगिक कहिये अनुमान प्रमाण कह्या, वहुरि निर्दोप प्रवचन कहिये आगम प्रमाण कह्या । ये पाच परोक्षप्र- माणके भेद अकलकदेव आचार्यके वचनकरि निश्चय किया हुवा माणिक्यनदिनै उचितवचन करि रच्या हुवा मैं अनन्तवीर्य आचार्य यह यथार्थ गाया है ॥ १॥ छप्पय स्मृति वरनी निरदोप तथा प्रतिमिज्ञा सांची, तर्क यथारथरूप बहुरि अनुमा शुभ वांची।

१५६ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- आगम बाधारहित, देव अकलंक विचारा, ताके वच अनुसार नंदिमाणिकनें धारा ॥ तेही अनंतवीरज गणी भापे मेद परोक्षके। देशमाषभापी पढो गुणी सुबुद्धी नर जिसे ॥१॥ ऐसें परीक्षामुखप्रकरणको लघुवृत्तिकी ववनिकाविर्षे परोक्षका प्रपंच तीसरा समुद्देश समाप्त भया॥

चतुर्थ-समुद्देश। EXI.C- (४) आगै प्रमाणकी स्वरूप सख्या विप्रतिपत्तिका निराकरण करि अब प्रमाणका विपयकी विप्रतिपत्तिका निराकरणकै अथि सूत्र कहै है,- सामान्यविशेषात्मा तदर्थो विषयः॥१॥ याका अर्थ-सामान्य विशेष स्वरूप तिस प्रमाणका अर्थ है ताकू विषय कहिये । तहा 'तत्' शब्दकरि प्रमाण लेना ताकै ग्रहण करने योग्य जो अर्थ सो विषय है ताका विशेपण सामान्य अर विशेप है आत्मा जाका, ऐसा है । सामान्य अर विशेपका स्वरूप आगे कहसी । इनि दोनिका ग्रहण तथा आत्मशब्दका ग्रहण है सो केवल सामा- न्यहीकै तथा केवल विशेपहीकै तथा केवल दोऊ स्वतत्रकै प्रमाणका विषयपणाका प्रतिरोधकै अर्थि है, न्यारे न्यारे ही केवल विषय नाही । तहा केई तो सत्ता सामान्यहीकू प्रमाणका विपय मान है तिनिमैं सत्तामात्र देह जो परम ब्रह्म ताकै तौ प्रमाणका विषयपणा का निराक- रण पूर्व सर्वज्ञके विवादविप कियाहीथा । जातै सत्ता मात्रकै केवल सामान्यपणा है सो प्रमाणका विषय नाही । बहुरि तिस शिवाय अन्य विचारिये है, तहा साख्यमत वाले ती प्रधानकू सामान्य कहै है सो प्रमाणका विषय मान है, ताका वचनका श्लोक है, ताका अर्थ ऐसा जो सत्त्व रजः तम ये तीन जामै पाइये, बहुरि अविवेकी कहिये महत् १ त्रिगुणमविवेकि विपयः सामान्यमचेतनं प्रसवधर्मि । व्य तथा प्रधानं तद्विपरीतस्तथा च पुमान् ॥

१५८ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- आदितै भेदरहित बाह्यविषयस्वरूप अभिन्न एक रूप ऐसा सामान्य, बहुरि अचेतन कहिये जड, बहुरि उत्पत्तिधर्मस्वरूप, बहुरि न्वक्त कहिये प्रकट दीखे, तैसें तौ प्रधान है; बहुरि तिसतें विपरीत कहिये उलटा विशेषणस्वरूप अर तैसा पुरुष है ऐसें सांख्य कहै है। ताकू दोय पक्ष पूछिये-जो ऐसा प्रधान केवल महत् आदि कार्यके निपजावनें प्रवत्त है सो काहूकू अपेक्षा लेकरि प्रवत्र्ते है कि बिना अपेक्षा ही प्रवृत्ति है ? जो कहै अपेक्षा लेकरि प्रवत्र्ते है तो किसकी अपेक्षा ले है, सो निमित्त कहनां जाकी अपेक्षा लें। प्रवः । तहा कहै-जो पुरुषका प्रयोजन ही याके प्रवर्त्तनैमैं कारण है जातें ऐसा कह्या है, पुरुषार्थ हेतु करि प्रधान प्रवत्र्ते है। तहां पुरुषार्थ दोय प्रकार है; एक तौ शब्द आदि विषयका प्रहण करनां, दूजा गुण तो स्पर्श आदि अरु पुरुषतें अन्य जो प्रधान तिनितें पुरुषकै. भेदका देखनां, ये दोय पुरुषार्थ कहे हैं । ताकू आचार्य पूछे है कि यह सत्य है तैसैं प्रवर्तता भी प्रधान है सो पुरुषकृत किछू उपकार लेकरि प्रवत्र्त है कि नाही लेकरि प्रव” है ? जो कहेगा पुरुषकृत उपकार लेकरि प्रवत् है तौ तहा पूछ है-कि सो उपकार प्र. धानतें भिन्न है कि अभिन्न है ? जो कहै-भिन्न है, तो यह उपकार' प्रधानका है ऐसा नाम काहेरौं भया ? जो कहै-प्रधानकै अर उपका- रकै संबंध है, तो समवायादिक संबंध सांख्य माने ही नाही तब संबंध- काहेका ? बहुरि तादात्म्य कहै तौ भेद कैसैं कहिये, तादात्म्य तौ, भेदका विरोधी है । बहुरि दूजा पक्ष कहै जो उपकार प्रधानते अभिन्न है तौ प्रधान ही तिस पुरुष करि किया ठहन्या । बहुरि कहै- जो प्रधान पुरुप है उपकारकी अपेक्षा विना ही प्रवत्त है तौ मुक्तात्मा. प्रति भी प्रधान प्रवत्ते, यामैं विशेप नाही । या ही कथन करि 'निरपे- क्षप्रवृत्ति पक्ष भी निराकरण किया, तहां भी हेतु कह्या सो ही जानना ।। . .

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १५९ बहुरि विशेष कहैं हैं जो प्रधान कोई प्रकारकरि सिद्ध होय तो कही बात सारी वणे सो प्रधानकी तो सिद्धी ही होय नाही, काहू प्रमाण करि निश्चय किया जाय नाही । इहा सांख्य कहें है-जो कार्य जगतमै होय है तिनि एक अन्य देखिये है तातै कोई एक कारण करि उपजवापणां मानना, बहुरि जे महत् अहकारादिक कार्य है तिनिके भेदनिका परिणाम देखिये है । ताते इनि दोज हेतुनितें जैसे घट घटी सरावा आदिकै एक माटीका अन्वय अर भेदपरिणाम टेखिये हैं ताका कारण एक मृत्तिका दी है तैसे महत् आदि कार्यनिक एक अन्वय देखनेत बदर भेदनिका परिणाम देखनेंते एकरूप कारण प्रधान मानिये है, ऐसे प्रधानकी सिद्वि है। तहा आचार्य कहे है-यह चर्चा तो मुन्दर नाही जात मुख दुःख मोहरूपपणा करि घट आदिकै अन्वयका अभाव है, जटकै चेतनका अन्यय होय नाही मुखादिकका अन्वय तौ अन्तरंग तत्व ही के पाइये है तात सर्व ही कार्यनिकै तौ एक अन्वय वण्यां नाही । दहा साग्व्य कहे-जो अन्तरङ्ग तत्वकै तौ सुख आदिका परिणाम नाही अर सुख दुःखादिकरूप परिणामता जो प्रधान ताके संसर्गत आत्मांक भी ते प्रतिभासे है। तहा आचार्य कह है—यह भी वर्ण नाही, जो प्रतिभासमान वस्तु नाही ताकै भी संसर्गकी कल्पना कीजिये तो तत्वकी संख्याका नियमका निश्चय नाही होय, सो कहीं है, ताका श्लोकका अर्थ:- जो ससर्गत ही अविभाग कहिये अभेद मानिये जैसे लोहके गोला- अर अग्निक है तैसे तो सर्व वरतुकै भेद अभेदकी व्यवस्था कहिये नियम ताका उच्छेद होय जाय, ऐसे तत्वकी संख्याका नियम ठहरै संसर्गादविभागश्चेदयोगोलकवह्निवत् । भेदामेव्यवस्थैवमुत्पन्ना सर्ववस्तुपु ॥ १॥ इति । के १६० स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- नाही । बहुरि जो परिणामनामा हेतु कह्या सो एक स्वभावरूप मांटीतै भये जे घट घटी सरावा आदि तिनिविपैं भी है, बहुरि अनेक स्वभा- वरूप जे पट कुटी मुकुट शकट, आदि तिनि विषै भी पाइये है, यातै हेतु अनैकान्तिक है; तातै प्रधान जो प्रकृति ताकी सिद्धि नाही है, सो ऐसे प्रधानका ग्रहणके उपायका असंभव है । अथवा सभवै तौऊ तिसतै कार्यकी उत्पत्तिका अयोग है। साख्यनैं जो कह्या ताकी दोय आर्या है, 'तिनिका अर्थः-प्रकृतितै तौ महान् होय है जो उत्पत्तिते लगाय नाश ताई स्थायी रहै ऐसी बुद्धिकुं महान् कहै है, बहुरि तिस महान्तै अहकार होय है, बहुरि तिस अहंकारतै पोडश गण होय है (ते श्रोत्र त्वचा चक्षु जिह्वा घ्राण ये तो पांच बुद्धि इन्द्रिय, अर पायु उपस्थ वचन पग हाथ ये पाच कर्म इन्द्रिय है, एक मन है, रूप रस गंध शब्द स्पर्श ये पाच तन्मात्रा है ऐसैं सोलह भये ) बहुरि तिस पोडशगणते पाच जे तन्मात्रा तिनि” पाच भूत उपजै है, ते कहिये हैं,-रूप तौ अग्नि होय है, रस तैं जल होय है गधतै भूमि होय है, शब्दतै नभ होय है, स्पर्शतै पवन होय है; ऐसैं सृष्टिका क्रम है। तहा मूल प्रकृति तौ विकृति रहित है (विकार रहित है ) अर याका कोई कारण भी नाही, बहुरि महत् आदि है ते प्रकृतिकी सात विकृति हैं अर सोलह गण है सो विकार है; ऐसैं विकार हैं ते सात अर सोलह तेईस हैं। बहुरि पुरुष है सो विकृति भी नाही अर प्रकृति भी नाही । ऐसें पचीस तत्व १ यदुक्तं परेण-प्रकृतेर्महान् ततोऽहंकारस्तस्माद्गणश्च षोडशकः। तस्मादपि षोडशकारपंचभ्यः पंच भूतानि ॥१॥ वचनिकाकी प्रतिमें दो आर्याओंका उल्लेख है परन्तु मुद्रित संस्कृत प्रतिमें उपरिलिखित सिर्फ एक यही आर्या है, दूसरी नहीं है।

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १६१ है कहे । तिनिका वर्णन वध्याके पुत्रका मुरूपपणाका वर्णन सरीखा है याका विषय असत्यार्थ है, ता आदरने योग्य नाही । प्रकृतितै कार्यकी उत्पत्ति वर्ण नाही । आकाश तो अमूर्तीक है अर पृथ्वी आदि मूर्तीक तिनिकै एक कारणते उपजनेंका अयोग है । जो ऐसे न मानिये तो अचेतन जो पचभूतका समह ताते चैतन्यकी सिद्धि होय, तब चार्वाकम- तकी सिद्विका प्रसग आवे । तत्र साख्यमतका वास भी न रहै । वहुरि सत् कार्यवाद साख्य कर है ताका प्रतिपेध " प्रमेयकमलमार्तड ' प्रथ- विप विस्तारकरि कहा है, सो इहा नाही कहिये है, या प्रथक सक्षेप- परूपणा है पति, ऐमे जानना । ऐसे विचार किये सामान्यमात्रही प्र- माणका विषय बणे नाही इहा ताई साल्यमतीसू चरचा आगै साल्य आदि सामान्यहीकू तत्त्व कहे है तेसै बौद्धमती कहैं है-जो विशेष ही तत्त्व है, वस्तुम्बर प है, ये ही प्रमाणका विषय है जात तिनिक असमान आकारनिकरि सामान्य आफारनितै समस्तपणा करि भिन्नम्वरूपपणा है, भावार्थ-विरोप है ते सामान्यतै सर्वथा भिन्न ही हैं। नैयायिक सामान्य सर्वथा एक माने है सो ऐसे एक सामा- न्य अनेक विशेपनि विपै व्याति करि वर्तनके सभवका अभाव है। एक सामान्य अनेक विशेपनिम कैसे व्याप। तिस सामान्यकै एक व्यक्ति वि समन्तपणा कर तिष्टना पात्र तिस ही काल अन्य व्यक्ति वि पायर्नेका अभावका प्रसंग आत्र है । बहरि जो कहिये-तिस ही काल अन्यव्यक्ति विर्य भी पाटा है तो मामान्य नाना ठहरै जातै एक ही काट भिन्नदेशपणाकरि तिष्ठते जे व्यक्ति तिनिविपे समस्तपणाकरि जैसे व्यक्ति न्यारे न्यारे । तेसै लामान्य भी न्यारे न्यारे पावै । बहुरि जो ऐसे होते भी सामान्य नानापणा न होय तो व्यक्ति भी न्यारे न्यारे मति होह । तातें जो बुद्धि करि अभेद मानिये है सो ही सामान्य हि.प्र. ११

१६२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित-
है वस्तुभूत नाही । सो हमारे कह्या है, ताका श्लोकका अर्थः-जो
पदार्थ एक जायगा देखिये सो अन्य जायगा कहूं न देखिये है ताते
बुद्धि विपैं अभेदकल्पना सो ही सामान्य है, यातै भिन्न और कछू नाही
है। बहुरि बौद्ध ही कहै है:-ते विशेप परस्पर संबंधरहित ही हैं जातें
तिनिकै संबंध विचारया हुवाका अयोग है। जो एकदेशकरि विशेपनिकै
संबंध कहिये तो एक परमाणुकै छहौही दिशातें छह परमाणुका एककाल
संयोग होते परमाणुकै छह अंशपणाकी प्राप्ति होय, सो परमाणुकै
छह अश कहना संभव नाही । वहुरि सर्वस्वरूपकरि संबंध कहिये तो
पिंडकै अणुमात्रपणाका प्राप्ति आवै । बहुरि अवयवीका भी निषेध है
तातै विशेषनिकै परस्पर सबंध नाही वणै है । बहुरि अवयवीका निषध
ऐसे है जो वृत्तिविकल्प कहिये अवयवीकी अवयवनिविर्षे वृत्तिका
विचार ताकरि तथा अनुमानकरि बाधाही आवै है । सो ही कहिये है,
वौद्ध नैयायिककू कहै है-अवयव हैं ते अवयवीविपै वत्तें हैं यह तौ
तैं मानीही नाही है बहुरि अवयवी है सो अवयवनिविषै वत्र्ते है ऐसे
मानी है; सो इहा दोय पक्ष पूछिये है-जो एकदेशकरि वर्ते है कि
सर्वस्वरूप करि वत्तें है? जो कहै एकदेशकरि वर्ते है तौ अवयवीकै
अवयवनि सिवाय अन्य अवयवका प्रसंग आवै, वहुरि तिनि विष भी
अन्य एकदेशकरि अवयवी वत्तै तब अनवस्था पावै । बहुरि कहै सर्व
स्वरूपकरि अवयवी अवयवनि विपै वत्र्ते है, तौ पूछिये-एक एक अव-
यव प्रति स्वभावभेदकरि वत्त है कि एकरूपकरि वत्र्ते है ! जो कहै-
(१) तदुक्तम्-
एकत्र दृष्टो भावो हि क्वचिन्नान्यत्र दृश्यते ।
तस्मान्न भिन्नमत्स्यन्यत्सामान्यं वुद्धयभेदतः ॥१॥

, हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १६३ स्वभावभेदकरि वत्र्त है तो अवयवी बहुत ठहरें है । बहुरि कहै-एक- रूप करि वर्त है, तौ अवयनिकै एकरूपपणा ठहरै है । अथवा स्वभा- वभेदकरि तथा एकरूपकरि ऐसे पूछना मति होहु, ऐसे ही कहना- न्यारे न्यारे एक एक अवयवनि करि एक एक अवयवी समस्तपणाकरि वत्तै तौ अवयवी बहुत ठहरें हैं । ऐसे होते वृत्तिविकल्पत बाधा आवै ॥ अब अनुमानतै बाधा दिखावै है-जो देखने योग्य होता सता भी ग्रहणमैं न आवै सो नाही ही है, जैसे आकाशका कमल, तैसैं अवय- चनिविपै अवयवी ग्रहणमै नाही आवै है । वहुरि जाका ग्रहण न होते जाकी बुद्धि का अभाव, सो तिसतै अन्य अर्थ नाही जैसे वृक्षका ग्रहण नाही तहा वन नाही ॥ पहले अनुमानतै तौ अवयवनिविर्षे अवयवी नाही ऐसा सिद्ध किया, इस अनुमानौं भिन्न अर्थ नाही ऐसा कह्या ॥ ऐसे अवयवीका निषेध किया, सबधका पूर्व निषेध किया ही था | इनि दोज हेतुनित रूप आदिके परमाणु हैं ते निरंश हैं परस्पर स्पर्श- नेवाले नाही सर्वथा भिन्न भिन्न ही है, बहुरि ते एक क्षणमात्र स्थायी है नित्य नाही है जिनका क्षण क्षणमैं विनाश होय अन्य उपजें है जातै विनाश प्रति अन्यकी अपेक्षा नाही है ॥ याका प्रयोग ऐसा--जो जिस भाव प्रति अन्यकी अपेक्षा नाही करै है सो तिस स्वभाव विर्षे नियमरूप है जैसै स्वकार्य पट आदिकी उत्पत्तिविर्षे अन्तमै जो ततु आदि सामग्री है सो अन्य कारण नाही चाहै है सो तिस स्वभावविर्षे नियत है । बहुरि इहा कोई आशका करै-जो घट आदिका नाश मुद्रादिककार होय है यह अन्यकी अपेक्षा है ॥ तहा बौद्ध दोय पक्ष पूछ है---जो घट आदिका नाश मुद्रादिक करै है सो नाश घटते भिन्न कर है कि अभिन्न करै है ? जो भिन्न करै है तौ नाश घटते भिन्न रह्या तब घटकै स्थिति ही भई ॥ इहा कहै जो विनाशके संब- - १६४ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- म - धर्ते घटकू भी नष्ट भया ऐसैं कहिये तो सद्भावकै अर अभावकै संबंध कहा है ? जो कहै तादात्म्य है सो तौ नाही वण जात भाव अभा- वकै तौ भेद है । बहुरि कहै-जो तदुत्पत्ति कहिये कार्यकारणसंबंध है तौ सो भी नही है जात अभावकै कार्यका आधारपणां वर्णं नाही। बहुरि कहै-मुद्गर घटका नाश घटतें अभिन्न कर है तौ घट आदिही किया ठहरै नाश अर घटमैं भेद नाही; ऐसे होते घटतौ पहले है ही, तिसर्ने किया कहा ? ऐसैं घटतें अभिन्न नाश कहनेमैं करणा वृथा होय है । ऐसें नाशकै अन्यकी अपेक्षारहितपणां सिद्ध भया । सो परमाणु- निकै विनाशरूप स्वभावका नियमपणां साधै ही है । बहुरि अनित्य विशेषरूप परमाणु तिनिकै तिस स्वभावका नियमपणां सिद्ध होते' तिनितें अन्य जे आत्मा आदिक विवादगोचर भये वस्तु तिनिकै सत्त्व नामा आदि हेतुकरि साधते इस दृष्टांतकरि क्षणस्थितिस्वभावपणांकी सिद्धि होय ही है । सो ही कहिये है:-जो सत् है सो सर्व एकक्षण- स्थितिस्वभावरूप हैं जैसैं घट है तैसैं ही सत् रूप भये भाव हैं, ऐसे तौ वहिर्व्याप्ति मुख करि अनुमान किया । अब अन्ताप्ति मुख करि, अनुमान करै है-अथवा सत्व है सो ही विपक्ष जो नित्य ता विर्षे वाधक प्रमाणका वलकरि दृष्टान्त विना ही समस्त वस्तुकै क्षणिकपणांका अनुमान करावै है । सो ही कहिये है;-सत्त्व है सो अर्थक्रिया करि व्याप्त है, बहुरि अर्थक्रिया है सो क्रमयोगपद्यकरि व्याप्त है, बहुरि क्रम अर यौगपद्य ये दोऊ हैं ते नित्यतै निवृत्तिरूप होते अपनी व्याप्य अर्थक्रियाकू लार ले निवृत्तिरूप होय हैं, भावार्थ-नित्यमैं अर्थक्रिया न बण है, बहुरि सो अक्रिया है सो अपनां व्याप्य सत्त्वकू लार है नित्यमैं सत्त्व नाही रहै है, ऐसे नित्यकै क्रम योगपद्य करि अर्थक्रि. याका विरोध है, तातें अर्थक्रिया विना सत्त्वका असंभव नाही, सोही हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १६५ विपक्ष जो नित्य ताविर्षे वाधकप्रमाण है । बहुरि नित्यकै अनुक्रम करि तथा युगपत् अर्थक्रिया नाही संभव है, नित्य जो एकही स्वभाव करि पूर्व अपर काल विषै होते दोय कार्य करै तौ कार्यका भेद करनेवाला नाही होय जाते नित्यकै एक स्वभावपणा है । जो नित्यकै एक स्वभा- वपणा होतें भी कार्यकै नानापणा है तौ अनित्य विषै कार्यके भेदते कारणका भेदकी कल्पना निष्फल ही होय है। तैसा एक ही कोई कारण कल्पने योग्य होय है जाकरि एक स्वभावरूप एक ही करि समस्त चराचर वस्तु उपजै । बहुरि नैयायिक कहै जो नित्य वस्तुकै स्वभावका नानापणा ही कार्यके भेदतै मानिये है, तौ तहा पूछिये-जो ते स्वभाव तिस नित्य वस्तुकै सदा सभवते हैं तो कार्यका संकरपणा आवेगा जीव अजीव नर नारक एक काल उपजते ठहरेंगे ? बहुरि ते स्वभाव सदा नाही संभवते हैं तो तिनिकी अनुक्रमतें उत्पति होने विर्षे कारण कहा है, सो कह्या चाहिये ? तिस नित्यतैं ये है ऐसे एक स्वभावतै उत्पत्ति होते तिनि स्वभावनिकै भेदके असभवनेते सो ही कार्यनिकै युगपत् प्राप्ति संभवै । बहुरि कहै-जो नित्य कारणकै सह- कारी कारण क्रमतें होय तिस अपेक्षा करि ताके स्वभावनिका अनुक्रम करि सद्भाव है, तातें तुम कह्या जो दोप; सो नाही । ताकू कहिये- जो ऐसैं कहना भी नीकै मिले नाही, जो नित्य है अर समर्थ है ताकै परकी अपेक्षाका अयोग है। बहुरि सहकारी कारणकरि सामर्थ्य करणा मानिये तो नित्यताकी हानि आवै, सहकारिनैं नई सामर्थ्य उजाई तब नित्य कहा रह्या | बहुरि कहै--सहकारी कारण नित्यतै सामर्थ्य भिन्न ही उपजावै है यातें नित्यताकी हानि नाही, तौ नित्य तौ अकिंचित्कर रह्या, कछू करनेवाला नाही, सहकारी करि उपजाई जो सामर्थ्य तिसहीकै कार्यकारणपणा ठहरया । बहुरि कहै नित्य अर १६६ - स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- सामर्थ्यकै संबंध है तातै नित्यकैं भी कार्यकारीपणा कहिये तौ तहां दोय पक्ष पूछ हैं-संबंध एक स्वभाव है कि अनेक स्वभाव है ? जो कहेगा तिस सामर्थ्यकै संबंध है सो एक स्वभाव है तो एक स्वभाव संबंध होते सामर्थ्यकै नानापणाका अभावतें कार्य विौं भेद न ठहरैगा। बहुरि कहेगा संबंधकै अनेक स्वभावपणा है तथा अक्रमवानपणां है तो ऐसे होते कार्यकी ज्यों तिस सामर्थ्यकै भी सकरपणा आवैगा, जड करनेकी अर चेतनकरनेकी सामर्थ्यकै सकरपणा आवैगा। ऐसे सर्व आवर्तन होयगा तब चक्रक दोपका प्रसंग आवैगा, तातै नित्यकै अनु- क्रमकार कार्यका करणा नाही वण है । बहुरि युगपत् एक काल भी नाही वणै है:-समस्त कार्यनिकी एककाल उत्पत्ति होतें दूसरे क्षण कार्यका न करना आया तव अर्थक्रियाकारीपणा न रह्या तव अवस्तु- पणाका प्रसंग आवै है । ऐसै नित्यकै क्रमयोगपद्यका अभाव सिद्ध ही है । ऐसै वौद्धमती अपना मत दृढ किया, जो विशेप ही वस्तुस्वरूप है सामान्य वस्तु स्वरूप नाही, वहुरि ते विशेप परस्पर असंबद्ध ही हैं सबद्ध नाही, अवयवी नाही, बहुरि ते एक क्षणस्थायी ही है नित्य नाही। ऐसें तीन पक्ष कही तिनि तीनोंहीका निराकरणकै अर्थ अव आचार्य कहै है;-ऐसी कहनेवाला बौद्ध भी युक्तवादी नाही जाते सजतीय विजातीय न्यारे न्यारे अशरहित जे विशेप तिनिका ग्राहक प्रमाणका अभाव है । प्रत्यक्ष प्रमाणकै तौ स्थूल स्थिर साधारण आका-, ररूप वस्तुका ग्राहकपणा है तातै अशरहित वस्तुका ग्रहणका अयोग है, परस्पर संबंधरूप नाही ऐसे परमाणु नेत्र आदिकरि नाही प्रतिभास हैं जो प्रत्यक्ष नेत्र आदिकरि दी तौ विवाद कैसै रहै । इहा बौद्ध कहै है-जो पहले तो निरंश क्षणरूप परमाणु ही दीखें हैं पीछै विकल्पकी वासना तौ अन्तरङ्ग रूप ताके वलतै अर वाह्य अन्तराल न दीखै तातें हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १६७ अविद्यमान भी स्थूल आदि आकार विकल्पबुद्धि वि. प्रतिभासै है, सो ऐसा विकल्प तिस निर्विकल्प प्रत्यक्षके आकार करि मिल्या हूवा अपना विकल्पव्यापारकू गौणकरि प्रत्यक्ष व्यापारकू मुख्यकरि प्रवत्र्त है तातें प्रत्यक्ष सारिखा दीखै है तहा आचार्य समाधान करैं है-जो यह कहना तौ वालक अज्ञानीका विलास है, जातै निर्विकल्पज्ञानका ही अनुभवन नाही है, निविकल्प सविकल्पका भेद पहले ग्रहण होय तब अन्य आकारके मिलनेकी अन्य आकारवि. कल्पना युक्त होय है, जैसे पहले स्फटिकमणि अर जपाकुसुम न्यारे न्यारे देखे होंय पीछे स्फटि- ककै डक लाग्या दीखै तब ऐसी कल्पना सभवै जो यह स्फटिक जपा- कुसुमते रगित टीखै है, जो न देखे होय तो ऐसी कल्पना न होय । या ही कथनकरि निर्विकल्प सविकरपकै युगपत् वृत्ति तथा क्रमवृत्तिमैं भी शीघ्र वृत्तिते एकपणाका निश्चय होय है ऐसा कहना भी निराकरण किया। ताकै भी घीज लेणैर्ते प्रतीति आवै तिस समानपणा है। अथवा तिनि निर्विकल्प सविकल्पका एकपणाका निश्चय कौनसे ज्ञान करि करिये ? प्रथम तो विकल्प ज्ञानकरि तौ निश्चय नाही होय जातै विक- ल्पज्ञान निर्विकल्पकी बातका जाननेवाला नाही । बहुरि अनुभव ज्ञान- करि निश्चय नाही होय जात अनुभव विकल्पकै अगोचर है । वहुरि निर्विकल्प सविकल्प जाका विषय नाही ऐसा ज्ञान भी तिनिका एक- त्वका निश्चय विपै समर्थ नाही, यामै अतिप्रसग दूपण है अन्यका विपय अन्यकरि ग्रहण होते अतिप्रसंग है। तातै प्रत्यक्षबुद्धिवि तौ भिन्न असवधरूप परमाणु प्रतिभासै नाही । बहुरि अनुमानबुद्धिविपैं भी नाही प्रतिभासै हैं जाते तिसतै अविनाभूत जो स्वभावलिंग अरु कार्यलिंग ताका अभाव है । अर स्थूल स्थिर सावारणका अनुपलभते विशेप ही तत्व है ऐसें कहै तौ अनुपलभ लिंग है सो असिद्ध ही है १६८ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- जारौं अन्वयरूप आकारका अर स्थूल आकारका प्रत्यक्ष देख मैं आवनां कह्या ही है । बहुरि बौद्धनें कह्या जो परमाणुकै एक देशकरि अर सर्व स्वरूपकार संबंध नाही वर्षे है, सो याका परिहार यह ही-जो ऐसे हम भी सबंध नाही मान है, हम तो ऐसैं माने हैं जो लूखा चीकनाकै समान जातीयकै तथा विजातीयकै दोय अधिक गुण होय तौ कथं- चित् स्कंधकै आकार परिणामै ताकै संबंध मानै है । बहुरि वौद्धनैं जो अवयवीका अवयवनिविर्षे वृत्तिविकल्प आदि दूपण कह्या, तहां अव. यवीकी वृत्ति ही जो न वर्णै तौ अवयवी व” ही नाही है ऐसै कहनां था, एक देश आदि विकल्प न कहना था जातें एक देश आदि विकल्पक तौ अन्य विकल्प विशेषतॆ अविनाभावीपणा है। सो ही कहिये है-अवयवी अवयवनिविपें एक देशकरि नाही व” है, सर्वस्वरूपकार भी नाही वत्र्ते है ऐसे कहतै ऐसा आया~जो अन्य प्रकारकरि वर्त है, अर ऐसैं न मानिये तो, नाही वत्तै है-ऐसे ही कहना । ऐसें विशेषका निपेधकै अवशेपका अंगीकाररूपपणां है । तातें कथंचित् तादात्म्यारूपकरि अवयवीकी अवयवनिविर्षे वृत्ति है ऐसा निश्चय कीजिये है, जहा जे कहे दोप तिनिका अवकाश नाही है। बहुरि विरोध आदि दोपका निपेध आगें करसी यातें इहा विस्तार नाही किया है । बहुरि जो वस्तुकै एकक्षणस्थायिपणा विर्षे हेतु कहा- जो जिस भाव प्रति इत्यादि, सो भी अहेतु है जातै हेतु असिद्ध आदि दोपकरि दूपित है। तहा प्रथम तौ नाशविर्षे अन्यकी अपेक्षा” रहित- पणा हेतु कह्या सो असिद्ध है जातें घटादिकका अभावकै मुद्गर आदि- के व्यापारका अन्वय व्यतिरेकका अनुसारीपणा तिसके अभाव प्रति कारणपणा है, मुद्गराकी दिये घट फूटै न दे तौ न फूटै । इहा आशंका करै-~-जो मुद्गराकी देना कपालकी उत्पत्तिकू कारण है, अभाव तौ हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १६९ निरपेक्ष ही है ? ताकू कहै है-जो कपाल आदि पर्यायातरका सद्भाव है सो ही घट आदिका अभाव है। बहुरि तुच्छाभाव कहिये सर्वया अभाव, सो समस्तप्रमाणकै अगोचर है ताकी वात ही न करनी । बहुरि विशेष कहै है-अभाव है सो जो स्वाधीन होय तौ अन्यकी अपेक्षारहितपणा विशेषणयुक्त होय, सो बौद्धमतविौं सो अभाव स्वाधीन मान्या नाही यात हेतुका प्रयोगकाही अवतार नाही । बहुरि यह अ- न्यानपेक्षपणा हेतु है सो अनैकान्तिक है जाः शालिके वीजकै कोदूका अकुरका उपजना प्रति अन्यकी अपेक्षारहितपणा है तौऊ तिस कोदूके अकुराके उपजनेंके स्वभाव प्रति नियमरूपपणा नाही है । बहुरि बाद्ध कहै जो हेतुका विशेषण ऐसा किये दोप नाही, जो विनाश स्वभाव होते अन्यानपेक्ष है तो तहा कहिये पदायक सर्वथा विनाशस्वभावपणा ही असिद्ध है। पर्यायरूपकरि ही पदार्थनिकै उत्पाद विनाश मानिये है द्रव्यरूपकरि उत्पाद विनाश नाही है, जातै ऐसा वचन है ताका श्लोकका अर्थः- जो पदार्थ उपजै है अर विनशै है सो यर्यायनयका विषय है, बहुरि द्रव्यनयकार आलिंगित वस्तु नित्य है न उपजै है न विनशै है । अन्वय कहिये पहिले पिछलेकै जोड तिसरहित जो विनाश सो निरन्वयविनाश तिसकू होते पहले क्षणते उत्तर क्षणकी उत्पत्ति नाही वगै है, जैसे मूवा मोरकी कुहुक नाही होय तेसैं । ऐसे पदार्थनिका सर्वथा विनाश- स्वभावपणा युक्त नाही जाते कथचित् द्रव्यरूपकरि पूर्वरूप जानै न (१) आर्या-समुदेति विलयमृच्छति भावोनियमेन पर्ययनयस्य । नोदेति नो विनश्यति मावनया लिंगितो नित्यम् ॥१॥ इति वचनात् ।

१७० स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- छोड्या ऐसा भी वस्तुस्वरूपका संभव है। बहुरि द्रव्यके रूपका ग्रहण होनेका असमर्थपणातें द्रव्यका अभाव नाही है । तिस द्रव्यके ग्रहणका उपाय जो प्रत्यभिज्ञानप्रमाण ताका बहुलपणे पावनां है, तिस प्रमाणकै पहले प्रमाणपणां कह्याही है। बहुरि उत्तरकार्यकी उत्पत्तिकी अन्यथानुप- पत्तितें भी द्रव्यकी सिद्धि होय है, द्रव्य न होय तौ उत्तरकार्यकी उत्पत्ति न होय। बहुरि जो क्षणिक साधनेंविधैं सत्त्वनाम अन्य हेतु कह्या सो भी विपक्ष जो नित्य तावि सत्त्व नाही तैसै क्षणिकमै भी नाही है, तातें सत्व हेतुतै भी क्षणिक साध्यकी सिद्धि नाही होय है । सो ही कहिये है--सत्त्व है सो अर्थक्रियातें व्याप्त है, बहुरि अर्थक्रिया है सो क्रम- योगपद्यकरि व्याप्त है, ते क्रम यौगपद्य दोज क्षणिकर्ते निवृत्तिरूप हुये संते अपनें व्याप्य जो अर्थक्रिया निवृत्तिरूप होती अपने व्यापर्ने योग्य जो सत्त्व ताहि लेकरि निवृत्तिरूप होय है; ऐसैं नित्यकी ज्यो क्षणिककै भी गधाके सींगवत् सत्त्व नाही है । ऐसे क्षणिकवि सत्त्वकी व्यवस्था नाही है । बहुरि क्षणिक वस्तुकै क्रम यौगपद्यकरि अर्थक्रियाका विरोध है सो असिद्ध नाही है जातै ताकै देशकरि किया अर कालकरि किया जो क्रम ताका असंभव है। जो अवस्थित एक होय ताहीकै अनेक देश अर कालकी कला तिनिविपै व्यापीपणा होय सो देशक्रम अर कालक्रम कहिये है। सो क्षणिकविपै ऐसा देशक्रम अर कालक्रम नाही है जातें बौद्धमतमै ऐसैं कह्या भी है, ताका श्लोकका अर्थ-जो वस्तु जिस क्षेत्रमै है सो तहा ही है बहुरि जिस कालमै है सो जहा ही है यातै पदार्थनिकै देशकाल विर्षे व्याप्ति नाही है; ऐसैं आप कह्या है । (१) यो यत्रैव स तत्रैव यो यदैव तदैव सः। न देशकालयोाप्तिर्भावानामिह विद्यते ॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । १७१ बहुरि पूर्व उत्तर क्षणनिकै एक सतानकी अपेक्षा करि भी क्रम नाही सभत्रै है जाते जो सतानकू वस्तुभूत मानें तौ तिसकै भी क्षणिकपणा ठहरै तब तिसकी अपेक्षा क्रम नाही वण है । अर अक्षणिकपणा होते भी वस्तुभूतपणा मानै तौ वस्तुभूतपणा करि तिस सतानही करि सत्त्व आदि हेतुकै अनैकान्तिकपणा आवै । बहुरि सन्तानकू अवस्तुभूत मानें तो भी तिसकी अपेक्षा क्रमयुक्त नाही होय । बहुरि युगपत्पणा करि भी क्षणिक विष अर्थक्रिया नाही सभवै है । इहा दोय पक्ष-जो युगपत् एक स्वभाव फरि नानाकार्य करणा मानिये तौ तिसके कार्यकै एकपणा ठहरै, बहुरि जो नानास्वभाव कल्पिये तो ते स्वभाव तिसक्षण करि व्याप चाहिये । सो जो एक स्वभाव करि ते क्षणिक तिनि स्वभा. वनिमै व्यापै तो तिनि स्वभावनिकै एकरूप ठहरै, वहरि जो नानास्त्र- भाव करि व्याप तौ अनवस्था दूपण आवै जातै फेरि एक स्वभाव अनेक स्वभावका प्रश्न चल्या जाय । बहुरि बौद्ध कहै है जो एक पूर्व क्षणकै एक उत्तर क्षणविपै उपादानभाव है सो ही अन्य जे रूप रसादिक तिनिधि तिसक्षणकै सहकारी भाव है यह ही स्वभाव भेद है; तो ताक आचार्य कहै है --नित्य एकरूप वस्तुकैं भी क्रमकरि नानाकार्य करनेवालेके स्वभावका भेद अर कार्यका सकरपणा मति होड, ऐसा दूपण तें कया था सो मति होह । इहा बौद्ध कहै-जो अक्रमतै क्रमवान् वस्तुकी उत्पत्ति नाही तातै नित्यकै ऐसे नाही, तो ताकू कहिये-तैसें ही क्रमरहित जो क्षणिक सो एक है अनश है ऐसे कारणते युगपत् अनेक कारणनिकरि सावने योग्य जे अनेक कार्य तिनिका विरोध है, तातै तामैं भी कार्यकारीपणा नाही है । बहुरि विशेप कहै है, वौद्धकू पूछ है-तेरे पक्ष विर्षे कार्यकारीपणा सत्कै मान है कि असत्कै मानें है ? जो सत्कै कार्यका कर्त्तापणा मानैं है १७२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- तो सकलकालकी कला विषै व्यापीजे क्षण तिनिक एकक्षणवर्तीपणांका प्रसंग औवगा। बहुरि जो दूसरा पक्ष असत्कै कार्यकारीपणा मार्नेगा -तौ गधाकै सींग आदिके भी कार्यकारीपणा ठहरैगा जातें गधाका सींग भी असत्रूप है, यामै विशेष नांही । बहुरि सत्त्वका लक्षण अर्थ- क्रियाकारीपणां है सो असत्कै कार्यकारीपणां मानै ताकै व्यभिचार आबैगा । तातै विशेप एकांत है सो कल्याणकारी श्रेष्ठ नाही । ऐसे विशेप एकान्त माननेवाला जो बौद्धमत ताकी पक्षका निराकरण किया, यातै विशेप एकान्त वस्तुस्वरूप नाही तातै प्रमाणका विपय नाही है। इहा ताई बौद्धमतीसू चर्चा है। आगै नैयायिकतूं चर्चा करै हैं;-अब कहैं हैं जो सामान्य विशेष दोऊ परस्पर अपेक्षारहित है ऐसै नैयायिकमती मानें है सो तिनिका मत भी युक्तिकरि युक्त नाही है, सो कहै है जातें तिनिकै परस्पर भेद होतें दोजमैं एकका भी स्थापन करनेका असमर्थपणा है । सोही कहिये है;-विशेप कहिये व्यक्तितै तौ प्रथम द्रव्य गुण कर्म पदार्थ हैं। वहुरि सामान्य पर अपर भेदतै दोय प्रकार है । तहा परसामान्य तौ सत्तास्वरूप है तिसतै विशपनिकै भेद होते विशेषनिकै असत्ताकी प्राप्ति आई, तैसे ही प्रयोग है--द्रव्य गुण कर्म है ते असत् रूप है-जातै सत्तात अत्यंत भिन्न है जैसे प्राक् अभावादिक अभाव हैं तैसें । इहा सत्तातै अत्यंत भिन्नपणा हेतु है ताकै सामान्य विशेप समवाय पदार्थनित व्यभिचार नाही है जाते तिनि विषै स्वरूप सत्त्वकू अभिन्न नैयायिक माने हैं। बहुरि नैयायिक कहै है-जोद्रव्यादि पदार्थनिकै प्रमाणकरि सिद्धपणां है तौ धर्मीका ग्राहक प्रमाण ताकरि तुमने हेतु कह्या सो वाधित है, जिस प्रमाणकरि द्रव्य आदिक निश्चय कीजिये है तिसही प्रमाणकरि तिनिका सत्त्व निश्चय हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १७३ कीजिये है । इहा तुम कहोगे-द्रव्य आदिक प्रमाण सिद्ध नाही है तौ तुमारे हेतुकै आश्रयकी असिद्धि आवैगी, ताका उत्तर आचार्य कहें है-जो यह कहना अयुक्त है जातै इहा हमनैं प्रसगसाधन किया है। परका इष्ट लेकरि परकै अनिष्ट वतावना सो प्रसगसाधन है, सो इहा प्राक् अभावादिविपै सत्त्वतें भेद है सो असत्त्वतें व्याप्त पाइये है सो व्याप्य है, तातै तिस भेदका द्रव्यादिवि अंगीकार है सो व्यापक जो असत्त्व ताका अगीकारतें अविनाभावी है, ऐसे इहा प्रसगसाधन है। ताते नैयायिकने कह्या प्रमाणवाधित आदि दोप, सो नाही आवै है, पढार्थानकू नैयायिक जैसे भेदाभेद माने था तिसहीकी अपेक्षा लेकरि प्रसगसाधन किया है । इसही कथनकार द्रव्य आदिककै भी द्रव्यपणातै भेद होते अद्रव्यादिपणा विचरया जानना । बुहरि आचार्य नैयायिककू पूछे है--कि द्रव्य गुण कर्म सामान्य विशेप समवाय इनि छह पथिनिकै परस्पर भेद होते न्यारे न्यारे अपने स्वरूपकी व्यवस्था कैसे है ? जो कहेगा-द्रव्यका द्रव्य ऐसा नाम द्रव्यत्वका सबधते है तौ द्रव्यत्वके सबंध पहले द्रव्यका स्वरूप कहा है, सो कह्या चाहिये जाकार सहित दव्यत्वका सवय होय ? जो कहै-द्रव्य ही स्वरुप है तौ तिसका द्रव्य ऐसा नाम तौ द्रव्यत्वका सबसप कारणहोय है तातें द्रव्य ऐसा स्वरूपका प्रयोग है । वहरि कहै-जो निजरूप तौ सत्त्व है तो ताका भी सत्त्व ऐसा नाम सत्ताके सबधत करनेते द्रव्यका निजरूप नाही वनगा । ऐसे ही गुण आदिवि भी कहि लेना । ऐसे होते केवल सामान्य विगेप समवाय इनि तीन हीकै स्वरूप सत्त्व करि तसौ नाम बनैं है, तातै तिनि तीन ही पदार्थनिकी व्यवस्था ठहरै है । बहुरि इहा नैयायिक कहै है-नैयायिक वैगेपिकका अभिप्राय एक ही है तातै नैयायिक ही नाम लिख्या है, इहा सामान्य नाम योगमत जानना, अर द्रव्यादिक सप्त ही पदार्थ वैगेपिक कहै है। अब यह कहै है- १७४ स्वर्गीय पं० जयचदजी विरचित- स्याद्वादी जैनी जीव आदि पदार्थनिकै सामान्यविशेपस्वरूपपणां मानें हैं सो तिनि सामान्य विशेपका वस्तुतै भेद अभेद हैं ते विरोध आदि आठ दोपके आवनेतै एक वस्तुविपै नाही सभ3 है, सो ही कहै है- भेद अभेद दोऊ विधि प्रतिपेधस्वरूप है ते एक जो अभिन्न वस्तु ताविपै संभवै नाही, जैसे शीत उष्ण स्पर्श दोऊ एकविपै नाही संभव तैसैं, ऐसे तो विरोध दूपण आया। बहुरि भेदका आधार अन्य अभे- दका आधार अन्य, ऐसैं वैयविकरण्य दूपण आया । बहुरि जिस स्वरू- पकू मुख्यकार भेद वत्र्ते है अर जिसकू मुख्य कार अभेद व” है ते दोऊ स्वरूप भिन्न हैं तथा अभिन्न हैं, बहुरि तहा भी भेदाभेदके कल्प- ने” अनवस्था दूपण है । बहुरि जिस रूपकरि भेद है तिस ही रूप- करि भेद भी अभेद भी है ऐसै सकर दूपण है, बहार जिसकरि भेद है तिसकरि अभेद है जिसकरि अभेद है तिसकरि भेद है, ऐसे व्यति- कर दूपण है । बहुरि भेदाभेद स्वरूपपणा होतै वस्तुका असाधारण आकारकरि निश्चय करनेकू असमर्थपणा है, तातै संशय दूपण है। तिस ही हेतुतै अप्रतिपत्ति दूपण है । तिस ही हेतुतै अभाव दूषण है । ऐसे अनेकान्तात्मक वस्तु भी निश्चित नाही होय सके हैं, ऐ नैया- यिक कहै हैं। तहा आचार्य कहैं हैं:-ऐसै कहनेवाले भी प्रती स्वरूप कहनेवाले नाही जातै प्रतीतिगोचर वस्तु होय तामैं विरोधका है। विरोध तो जैसे दीखै नाही तैसैं कहै तामै हैं, तहा जोर से आवें तहा कहा विरोध ? भेदाभेदतै एक वस्तुमै दोज प्रगट दी हैं। इहाज। शीत उष्णस्पर्शका दृष्टात कह्या सो धूपदहनका घट आदि एक अवयर्वा शीत उष्ण स्वभावकी प्राप्तितें विरोधका दृष्टान्त अयुक्त है, धूप हनके घडेमै शीत उष्ण दोज स्पर्श होय हैं। आदि शब्दकरि संध्याविर्षे काश तमका साथि अवस्थान होय है । एक वस्तुकै चल अचल रक्त अरक्त 'भव -

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
१७५
आवरणसहित आवरणरहित इत्यादि विरुद्ध धर्मनिका युगपत् देखना
है । तैसे कहे जे भेदाभेद तिनिकै भी विरोध नाही है । इस ही कथ-
नकरि वैयाधिकरण्य भी निराकरण किया, तिनि भेदाभेदकै एक आधार-
पणाकरि प्रतीतिमैं समानाधिकरण है, इहा भी चल अचल आदि पहले
दृष्टात कहे ते जानने । बहुरि जो अनवस्था नामा दूपण कह्या सो भी
स्याद्वादमतकू नाही जाननेवालेकरि वताया है, स्याद्वादीनिका यह मत है-
सामान्य विशेप स्वरूप वस्तुवि4 सामान्य विशेप है ते ही भेद हैं जाते
भेदशब्दकरि तिनिकू ही कहे हैं, बहुरि द्रव्यरूप करि अभेद है ऐसा
कह्या है सो द्रव्यही अभेद है जाते वस्तुकै एकानेक स्वरूपपणा है,
अथवा भेदनयका प्रधानपणाकरि वस्तुके धर्मनिकै अनतपणा है तातै
अनवस्था नाही है । सो ही कहिये है-जो सामान्य है बहुरि जे
विशेष है तिनिक अन्वयरूप आकारकरि अर व्यावृत्त कहिये न्यारा
न्यारा आकारकरि भेद है, बहुरि तिनिकै अर्थक्रियाके भेदतै भेद है,
वहरि तिस अर्थक्रियाक शक्तिभेदतें भेद है, सो शक्ति भेद भी सह-
कारीके भेदते है, ऐसे अनत धर्मनिका अगीकार करनेते अनवस्था
काहे होय ! सो ही कह्या है, ताका लोकैका अर्थ:-जो मूलनाशका
करनहारा होय ताहि अनवस्था दूपण पडित कहै है, वस्तुकै अनतपणा
होत अथवा विचारनेकू असमर्थता होय तहा अनवस्था दूपण नाही,
जो अनवस्था होय तो भी दूपण न कहिये । बहुरि जो सकर
अर व्यतिकर ये दोज दूपण है ते भी मेचक ज्ञानके दृष्टान्तकरि बहुरि
सामान्य विपके दृष्टान्त करि दूर किये । इहा सकर दूपणके निराकर-
(१) तथा चोक्तम् ---मूलक्षतिकरीमाहुरनवस्थां हि दूपणम् ।
वास्त्वानत्येऽप्यशक्तौ च नानवस्था विचार्यते॥१॥

१७६ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित-- णकू दृष्टान्त मेचक ज्ञान अनेकवर्णाकार वस्तुके जाननेकू कह्या है। बहुरि सामान्य विशेष ऐसे जो जो ही गऊपणा अपनी व्यक्तिनिकी अपेक्षा सामान्य, सो ही महिप आदिकी अपेक्षा विशेष, ऐसे दृष्टान्त- करि व्यतिकर दूपण नाही । इहां कहै-जो मेचकज्ञान विषै तौ जैसा वस्तुमै अनेकवर्णाकार था तैसा प्रतिभासै है, तौ ताकू कहिये इहां हमारे भी जैसी वस्तु है ताका तैसाही प्रतिभास होहु, ताका पक्षपातका अभाव है । बहुरि जैसा वस्तु है ताका तैसा निर्णय भया तहा संशय नाही युक्त है, संशय तौ चलितज्ञानरूप है, अचल प्रतिभासविौं संशय बनैं नाही । बहुरि जो वस्तु प्राप्त भया सिद्ध भया ताकै विषै अप्रति- पत्ति कहनां यह तो अतिधीठपणा है । वहुरि जाकी उपलब्धि होय तहां अनुपलभ भी नाही सिद्ध है तातै अभाव भी नाही । ऐसै इनि दूपण- नितै रहित प्रत्यक्ष अनुमान प्रमाणकरि अविरुद्ध अनेकातात्मक वस्तुका कहनेवाला अनेकान्तमत है सो सिद्ध है। इस ही कथन करि अवयव अवयवीकै गुण गुणीकै कर्म कर्मवान्कै कथंचित् भेद है कथंचित् अभेद है सो कहे जानने । अब नैयायिक कहै है जो समवायके वशतै भिन्न पदार्थ विर्षे भी अभेदकी प्रतीति है जाकै ब्रह्मतुल्य ज्ञान न उपज्या ताकै, भावार्थ----जाकै अतीन्द्रिय ज्ञान नाही ताकै भिन्न पदार्थ विषै भी समवायतै अभेदका ज्ञान है। ताईं आचार्य कहै है--जो ऐसै नाही जातै समवाय भी पदार्थतै भिन्न ही है ताके स्थापनेकी असमर्थता है । सो ही कहिये है-इहां दोय पक्ष हैं, समवायकी वृत्ति है सो अपना समवायी पदार्थनिविपै वृत्ति सहित है, कि वृत्तिरहित है ? जो कहै वृत्तिसहित है तौ तहा भी दोय पक्ष करें हैं, जो यह वृत्ति आपही करि वृत्तिसहित है कि अन्यवृत्ति करि है ? जो कहै- आपही करि है तो यह पक्ष तौ नाही वण है, समवायविौं अन्य हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १७७ समवायका अगीकार नाही पाचही पढार्य समवायीपणां है, ऐसा नैयायिकका वचन है। बहुरि अन्य वृत्तिकी कल्पना करै तौ सो वृत्ति अपनें सबधीनिविय वर्त है कि नाही ? ऐसे कल्पना करते अन्य वृत्तिकी परपराकी प्राप्तिते अनवस्था आवै । इहा कहै अपनें संवधीनिविर्षे अन्यवृत्तिकै अन्यवृत्तिका अंगीकार नाही तातै अनवस्था नाही आये, तो ताकू कहिये-समवायविर्षे भी अन्यवृत्ति मति होहु । अब फेरि नैयायिक कहै है--जो समवाय है सो अपने आश्रयविर्षे वृत्तिरूप नाही मानिये है, तो ताकू कहिये-छह पदार्थनिकै आश्रितपणा है ऐसा प्रथका विरोध आवैगा, नैयायि- कका सूत्र है-जो नित्य द्रव्य विना छह पदार्थ अन्यके आश्रय है सो ऐसा सूत्र विरोध्या जाय । बहार नैयायिक कहै है-जो समवायि पदार्थनिके होते ही समवायकी प्रतीति है तातें समवायकै आश्रितपणां कल्पिये है, तो ताकू कहिये-मूर्तद्रव्यनिकू होते ही दिशाद्रव्यका लिंग जो यह यातें पूर्व दिशाकरि है इत्यादिक ज्ञान ताकै वहरि कालका लिंग जो पर अपर आदि प्रतीति ताका सद्भावतै तिनि दोऊ द्रव्यानिकै भी तिनि मूर्त द्रव्यनिका आश्रितपणा ठहरैगा। तातै सूत्रमैं कह्या जो नित्य द्रव्य विना अन्यकै आश्रितपणा है, ऐसा कहना अयुक्त भया । बहुरि विशेष कहै है—जो समवायकै अनाश्रितपणा होते सबधरूप- पणा ही न वणे है, तैसें ही प्रयोग है-समवाय है सो सवध नाही है जाते याकै अनाधितपणा है जैसे दिशा आदि द्रव्य अनाश्रित है तैसे | इस प्रयोगविपैं समवाय जो धर्मी सो कथचित् तादात्म्यरूप है अर अनेक है ताकू हम मान्या है तातै धर्मीका ग्राहक जो प्रमाण ताकरि वाधा नाही है। वहरि आश्रयासिद्ध दूपण न कहना । बहुरि तिस समवायकै आश्रितपणा होते भी यहु दूपणा कहिये है, समवाय हि.प्र. १२ है, न १७८ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- है सो एक नाही है जाते संबंधस्वरूपपणां होते याकै आश्रितपणां है जैसैं संयोग सबंध है । इहा सत्ताकरि हेतुकै अनेकान्त होय है ताते हेतुका संबंधस्वरूपपणा होते ऐसा विशेपण किया है। अब नैयायिक फेरि कहै है-जो संयोग विर्षे तौ द्दढ संयोग शिथिल संयोग इत्यादि, नानापणांकी प्रतीति है तातै नानापणा है अर ऐसैं समवायविर्षे तौ. नांही जाते समवाय तौ तिसः विपरीत है, ताकुं आचार्य कहैं हैं जो. ऐसें नाही जाते समवायविर्षे भी उत्पत्तिमानपणा विनश्वरपणांकी प्रती- तिरूप नानापणां सुलभ है। बहुरि कहै--संबंधी पदार्थके भेदतें सम- वायवि नानापणा है तौ सयोगविर्षे भी तैसैं ही नानापणा समान एक ही विपै तो प्रश्न युक्त नाही । तारौं नैयायिककरि कल्पित समवायकै विचार कर अयोग्यपणा है, ताः तिस समवायके वशर्ते गुण गुणी आदि विर्षे अभेदकी प्रतीति नाही वणै है । बहुरि नैयायिक कहै है- जो अवयव अवयवी आदिका भिन्न प्रतिभास है ता” तिनिकै भेदही है। ताकू आचार्य कहैं हैं जो यहु नाही जात भेदप्रतिभासकै अभे, दतै विरोध नाही है, घटपट आदिकै भेद है तौऊ कथंचित् अभेद वण है । सर्वथा प्रतिभासकै भेदकी असिद्धि है जाते यहु सत् है इत्यादि अभेद प्रतिभासका भी सद्भाव है । तातें कथंचित् भेदाभेदात्मक, द्रव्य- पर्यायात्मक, बहुरि सामान्यविशेषात्मक तत्व है, सो जलकी तीर देखनें- वाले पक्षी देखने में आया तिस न्यायकरि नैयायिक अपना मत साधे, था ताकै स्याद्वादमतमैं कह्या तत्त्व भी देखने में आया, यातें बहुत कह नेकरि पूर्णता होहु ॥१॥ आगै अव अनेकान्तात्मक वस्तुके समर्थनकै अर्थिही दोय हेतु कहैं; 4 ६ हैं- अनुवृत्तव्यावृत्तप्रत्ययगोचरत्वात् पूर्वोत्तराकारपरि हारावातिस्थितिलक्षणपरिणामेनार्थक्रियोपपत्तेश्च ॥शी - हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १७९ याका अर्थ-अनुवृत्त कहिये अन्वयरूप अर व्यावृत्त कहिये न्यारा न्यारा रूप इनिका जो प्रत्यय कहिये ज्ञानमैं प्रतीति ताकै गोचरपणातें, वहुरि पूर्व परिणामका छोडना उत्तर परिणामका ग्रहण करना इनि दोजनिकरि सहित स्थितिरूप सो है लक्षण जाका ऐसा जो परिणाम तिसकरि अर्थ क्रियाकी प्राप्ति है तातें । तहा अनुवृत्त आकार तो जैसे अनेक गज विषै गऊ गऊ ऐसी प्रतीति, सो है। बहुरि व्यावृत आकार कहिये यह गऊ श्याम है यह काबरा है ऐसै न्यारी न्यारी प्रतीति, सो है । तिनि दोऊ प्रतीतिनिकै गोचर कहिये विपय ताका भाव ताते अनेकातात्मक वस्तु है। इस हेतुकरि तौ तिर्यक् सामान्य अर व्यतिरे- कलक्षण विशेष इनि दोऊ स्वरूप वस्तु साध्या । बहुरि पूर्व आकारका त्याग उत्तर आकारकी प्राप्ति अर इनि दोऊनिकरि सहित स्थिति सोही है लक्षण जाका ऐसा जो परिणाम तिसकरि अर्थ क्रियाकी उपपत्ति है, तातें सामान्यविशेपात्मक वस्तु है । इस हेतुकरि ऊर्द्धता सामान्य अर पर्यायनामा विशेप इनि दोज रूप वस्तु समर्थ्या है ॥ २॥ आगें पहले कह्या जो सामान्य ताका भेदकू कहै है;- सामान्य देधा तिर्यगूद्धताभेदात् ॥३॥ याका अर्थ-सामान्य दोय प्रकार है, तिर्यकू सामान्य, অঞ্জনা सामान्य ऐसैं भेदतै ॥३॥ आगें पहला भेद जो तिर्यकू सामान्य ताकू उदाहरणसहित सदृशपरिणामस्तिर्यक् खंडमुंडादिषु गोत्ववत् ॥४॥ याका अर्थ-सदृश कहिये सामान्य जो परिणाम सो तिर्यक् सामान्य है जैसे अनेक खाडी मूडी गऊ हैं तिनिविपै गऊपणा है। तहां १८० स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- जो गऊपणा आदिकू सर्वथा नित्य एक रूप मानिये तौ क्रम योगपद्य करि अर्थ क्रियाका विरोध आवै अर सर्व व्यक्तिनिविष न्यारा न्यारा समस्तपणे वृत्तिका अयोग आवै । तातै अनेक है अर सदृशपरिणाम स्वरूप ही है, ऐसा तिर्यक सामान्य कह्या ॥४॥ आगै दूसरा भेद जो ऊर्द्धता सामान्य ताकू दृष्टान्तसहित दिखावें हैं; परापरविवर्तव्यापि द्रव्यमूर्खता मुदिव स्थासा- दिषु ॥५॥ याका अर्थ---पर कहिये पूर्वकालभात्री अपर कहिये उत्तरकालभावी विशेप पर्याय तिनिविपै व्यापनेवाला जो द्रव्य सो उद्धता सामान्य है जैसैं स्थास कोश कुसूल आदि मृत्तिकाकी अवस्था विपै मृत्तिका व्यापी है । इहा सामान्य शब्दकी अनुवृत्ति लेणीं । ताकरि यह अर्थ होय है जो यह उद्धता सामान्य है सो कहा है ? द्रव्य है, सो ही परापरवि- वर्त्तव्यापी ऐसा विशेपणरूप कीजिये है, पूर्व अपरकालवर्ती तीन काल वि अन्वयरूप है ऐसा अर्थ है, जैसे चित्रका ज्ञान एक है ता विपैं एक कालभावी जे अनेक अपनें विर्षे आये चित्रके नील आदि आकार तिनिकी व्याप्ति है तैसे एककै भी क्रमतै होय, ऐसा परिणाम तिनिविर्षे व्यापीपणा है। ऐसा अर्थ जानना ॥ ५॥ आगें विशेषकै भी दोय प्रकारपणा है, ऐसे दिखावै है, चिशेषश्च ॥६॥ याका अर्थ-विशेष है सो भी दोय प्रकार है । इहा द्वेधा शब्दका अधिकार करि सबंध करना ॥ ६॥ सो ही कहें हैं,- .

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १८१ पर्यायव्यतिरेकभेदात् ॥७॥ याका अर्थ-सो विशेष दोय प्रकार है, पर्याय अर व्यतिरेक ऐसे भेदते ॥७॥ आगें पहला विशेपका भेदकू कहैं हैं,- एकस्मिन् द्रव्ये क्रमभाविनः परिणामाः पर्याया आत्मनि हर्षविषादादिवत् ॥८॥ याका अर्थ-एक द्रव्यविपै क्रमभावी परिणाम है ते पर्याय हैं जैसैं आत्माविपै हर्प अर विपाद अनुक्रमतै होय है ते पर्याय हैं । इहा आत्मद्रव्य अपनी देह प्रमाण मात्र ही है व्यापक नाही है, बहुरि बट- कणिका मात्र छोटासा नाही है, बहुरि कायकै आकार परिणये जे पृथ्वी अप तेज वायु आकाश तावन्मात्र चार्वाकमती कहै है सो नाही है। तहा आत्माकू यौगमती व्यापक कहैं हैं, तिनिका तौ अनुमानका प्रयोग ऐसा है-आत्मा व्यापक है जातै द्रव्यपणाकू होते अमूर्तिकपणा है जैसैं आकाश व्यापक है। ताकू पूछिये-~-जो अमूर्तपणा है सो जो रूपा- दिक स्वरूप मूर्तीकपणा है ताका प्रतिषेधरूप अमूर्तपणा है तौ मन- करि अनेकान्त है । यौगमती मनकू द्रव्य मानें हैं अर अमूर्तपणा ठह- राया है तौहू व्यापक नाही, यह व्यभिचार आया । बहुरि कहै-अ- सर्वगत द्रव्यका परिमाण मूर्तपणा है ताका निपेध अमूर्तपणा है तो पर जे हम तिनि प्रति साध्य समान हेतु है, आत्माकै व्यापकपणा साध्य है तैसा ही व्यापकपणा हेतु भया । बहुरि अन्य अनुमान कहै- जो आत्मा व्यापक है जाते अणुपरिमाण अधिकरणकका अभाव होते नित्य द्रव्य है, इहा नित्य है ऐसा ही हेतु कहै तो परमाणुविर्षे गुण भी नित्य है ताकरि व्यभिचार आवै ताके परिहारकै आर्थि नित्य द्रव्य १८२ स्वर्गीय पं. जयचंदजी विरचित- कह्या । बहुरि द्रव्य ही कहते तो घट भी द्रव्य है ताकरि व्यभिचार आवै ताके परिहारकै अर्थ नित्य विशेपण किया। बहुरि नित्य द्रव्य ही कहतै मनकरि अनेकान्त होय ताके परिहारकै अर्थ अणुपरिमाणा- नधिकरण कह्या, इहा भी आकाशका दृष्टान्त है । सो यह अनुमान भी समीचीन नाही है। जाते अणुपरिमाणानधिकरणपणा हेतुका विशे- षण है तहां निषेध पर्युदास है कि प्रसज्य है ? जो कहेगा-पर्युदास- है तौ अणुपरिमाणका प्रतिपेध कारकैसा परिमाण है ? महापरिमाण है कि अवान्तरपरिमाण है कि परिमाणमात्र है ? जो कहै-महापरिमाण है तौ हेतु साध्य समान ही है जातै व्यापकपणा साध्य है महापरिमाण हेतु कह्या सो समान भया। बहुरि कहै----अवान्तर परिमाण है तो हेतु विरुद्ध है, अवान्तरपरिमाणाधिकरणपणा है सो अव्यापकपणाहीकू साधै है । बहुरि कहै-परिमाणमात्र है तौ तिसकू परिमाणसामान्य अंगीकार करना, ऐसे होते अणुपरिमाणका प्रतिपेधकरि परिमाणसामा- न्याधिकरणपणा आत्माकै है ऐसै कह्या ठहरै सो वणे नाही, यामै विशेप अधिकरणरहितकी सिद्धिका प्रसंग आवै है; जातै आत्माकै विषै परिमाणसामान्य व्यवस्थित नाही । तो कहा है ? परिमाणकी व्याक्त- निविपै ही व्यवस्थित है, सामान्य होय सो तो अपने विशेपनिमै रहै । वहुरि अवान्तरपरिमाण अर महापरिमाण इनि दोऊनिका आधार- पणा करि आत्मा न पावै तब परिमाणमात्र अधिकरणपणा आत्मा विपै निश्चय किया जाय नाही । बहुरि आकाशका दृष्टान्त कहै-सो साध- नरहित होय, आकाशकै तौ महापरिमाणाधिकरणपणाकरि परिमाणमा. त्राधिकरणपणाका अयोग है । बहुरि नित्यद्रव्पणा है सो सर्वथा असिद्ध है, सर्वथा नित्यकै क्रम योगपद्यकरि अर्थक्रियाका विरोध है । वहुरि कहैगा-दूसरी पक्ष प्रसज्य प्रतिषेध है, तौ प्रसज्य प्रतिषेध तौ तुच्छा- हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १८३ भाव कहिये सर्वथा अभाव रूप है, ताका ग्रहणका उपायका असंभव है, तातै ताकै हेतुका विशेपणपणा ही नाही । बहुरि अगृहीतविशेपण हेतु है, सो कछू है नाही जातै ऐसा वचन है जो विशेष्यविपै बुद्धि है सो अगृहीतविशेपणस्वरूप नाही है, विशेपणकू ग्रहण किये विशेष्यकी बुद्धि होय है । बहुरि तुच्छाभावका ग्रहणका उपाय प्रत्यक्ष प्रमाण नाही है जाते प्रत्यक्षकै तुच्छाभावके सवधका अभाव है । प्रत्यक्ष तौ इन्द्रियकै आ पदार्थकै सन्निकर्पत उपजे सो नेयायिक्रमतविपै प्रसिद्ध है । अर विशेपण विशेष्यभाव सबधकी कल्पना करै तौ अगृहीतकै विशेषपणा नाही है, ऐसे तो पूर्व कद्या, सो ही इहा दूषण है तातें आत्मद्रव्य व्यापक नाही है ॥ बहुरि बटकणिका मात्र भी नाही है, सुन्दर स्त्रीका कुच जघनस्पर्शनके कालविर्षे रोम रोममै आव्हाद आकार सुखका अनुभव होय है जो ऐसे न होय तो सर्वाग विपै रोमाच आदि कार्यका उपजनेका अयोग होय । वहरि इहा कहै जो अणमात्र आत्माकै भी शीघ्र वृत्तित आलात च- क्रकी ज्यो युगपतका प्रतिभास होय है तोहू क्रमकरि सर्वाग सुख होय है तो इहा अयुक्त है जाते तिस मुखका कारण अन्त करणका अन्य अन्य सबधकी कल्पना होते वीचिमै व्यवधान कहिये अन्तरका प्रसग आवै हे, सुखमै विच्छेद वीचि वीचि हवा चाहिये । अर मनका सबन्ध विना ही सुख मानिये तो सुखकै मानसप्रत्यक्षपणाका अयोग है । बहुरि पृथ्वी आदि भूतचतुष्टयस्वरूपपणा भी आत्माकै नाही है जाते पृथ्वी आदि तौ अचे- तन है सो अचेतनतै चैतन्यकी उत्पत्तिका अयोग है । बहुरि पृथ्वी आदिके धारण प्रेरण द्रव उष्ण स्वभावरूपतै चैतन्यकै अन्वयका अभाव है जातें पृथिवीका धारण स्वभाव है पवनका प्रेरण स्वभाव है जलका द्रव स्वभाव है अग्निका उष्ण स्वभाव है, इनि स्वभावनित चैतन्यका देखना

१८४
स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित-
जानना स्वभावकै अन्वय नाही दीखै है । बहुरि तुरतके भये वालककै
स्तन आदिविपै अभिलापका प्रसंग आवै है, अमिलाप तौ प्रत्यभिज्ञान
हो” होय है, प्रत्यभिज्ञान स्मरण होते होय है स्मरण अनुभव होते होय
है, ऐसे पूर्व अनुभव होना सिद्ध होय है जातै वीचिकी दशा विपै तैसै
ही व्याप्ति है । बहुरि मरण भये पीछे व्यन्तरकुलविपै आप उपजै ते
आय कहैं जो मै फलाणा हू सो व्यतर भयाहू ऐसैं कहते देखिये है।
बहुरि केईकनिकै पूर्व भवका स्मरण होय है । ऐसै चेतनकै अनादिपणां
सिद्ध होय है, सो ही कह्या है ताका श्लोक है ताका अर्थ-तिसही
दिनका उपज्या वालककै तिसही दिन स्तनकै लागणेकी इच्छा होय है,
बहुरि व्यन्तरका देखना, भवस्मरणका होना, पृथ्वी आदि भूत अचेतनतें
अन्वय नाही; ऐसै च्यार हेतुनितें स्वभावहीकरि ज्ञाता द्रव्यस्वरूप नित्य
सिद्ध होय है। वहुरि ऐसै न कहना--जो अपना देहप्रमाण आत्मा
है, ऐसे कह मैं भी प्रमाणका अभाव है यात सर्वत्र संशय है जाते
देह प्रमाण साधनें विपै अनुमान प्रमाणका सद्भाव है । सो ही कहै
है-देवदत्तनामा पुरुपका आत्मा निसके देह विष ही है, बहुरि
तहा सर्वत्र ही विद्यमान है जाते तिस देह विपै ही बहुरि तहां
सर्वत्र ही अपना असाधारण गुणका आधारपणाकरि ग्रहण होय है।
जो जहा ही बहुरि जहा सर्वत्र ही अपना असाधारण गुणका आधार-
पणाकरि पाइये सो तहा ही बहुरि तहां सर्वत्र ही विद्यमान होय,
देवदत्तके घर विषै ही बहुरि तहा सर्वत्र ही पाइये ऐसा अपना असाधा-
(१)तथा चोकम् --
तदहजस्तनहातो रक्षोभिवस्मृतः ।
भूतानन्वयनासिद्धः प्रकृतिज्ञः सनातनः ॥१॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १८५ - रण भासुर प्रकाशपणा आदि गुण जाकै ऐसा दीपक है तैसें ही देव- दत्त पुरुषका देह विपै ही अर देह वि. सर्वत्र ही आत्मा है, आत्माके असाधारण गुण ज्ञान दर्शन मुख वीर्य है ते सर्वांगविपै तिस देह विर्षे ही पाइय हैं । इहा देह विर्षे ही आत्मा है ऐसा कहने तै तौ व्यापकका निषेध भया, अर देह विप सर्वत्र है ऐसैं कहने तै वटकणिका मात्रका निषेध भया । इहा लोक है ताका अर्थ----मुख है सो तौ आल्हादनके आकार है, विज्ञान है सो मेय कहिये जानने योग्य वस्तुका जानना है, शक्ति है सो क्रिया करि अनुमानमै आवै है जैसे तरुण पुरुषकै स्त्रीका समागमवि होय है, आनट अर जानना अरु सामर्थ्य ये तीनू तहा ताकै प्रकट देखिये हैं ऐसा वचन है । तात आत्मा अपनी देहकै प्रमाण ही निश्चित भया ॥ ८ ॥ आगै विशेषका दूसरा भेदकू कहै है,- अर्थान्तरगतो विसदृशपरिणामो व्यतिरेको गोम- हिपादिवत् ॥९॥ याका अर्थ- अन्य अन्य पदार्थ विपै पाइये ऐसा विसदृश परिणाम है सो व्यतिरेकनामा विशेप है, जैसे गऊ भैसि आदि न्यारे न्यारे विल- क्षण परिणाम स्वरूप है तैसे । जातै विसदृशपणा है सो प्रतियोगीके ग्रहण होते ही होय है जैसे गजत भैसि विसदृश है । इहा गऊ प्रति- योगी है ताका ग्रहण है । बहुरि या विसदृशपणाकै परकी अपेक्षा स्वरूप होते वस्तुपणा नाही है, अवस्तुविपैं तो आपेक्षिकपणाका अयोग है जातै अपेक्षाकै वस्तुनिष्ठपणा ही है अवस्तुविपै अपेक्षा नाही होय है ॥ ९॥ ऐसे प्रमाणके विपयका निरूपण किया । (१) सुखमाल्हादनाकारं विज्ञानं मेयवोधनम् । शक्तिः क्रियानुमेया स्याद्यूनः कान्ता समागमे ॥

१८६
स्वर्गीय पं0 जयचंदजी विरचित-
इहा श्लोक:-
स्यात्कारलांछितमबाध्यमनन्तधर्म-
सन्दोहवर्मितमशेषमपि प्रमेयम् ।
देवैः प्रमाणवलतो निरचायि तच्च
संक्षिप्तमेव मुनिभिर्विवृतं भयैतत् ॥१॥
याका अर्थ-श्री अकलकदेव आचार्यनें समस्त ही प्रमाणका
विषय जो प्रमेय ताका निरूपण किया, कैसा है प्रमेय-स्यात्कार
कहिये कथंचित् प्रकार ताकरि चिह्नित है याही अवाध्य कहिये निर्वाध
है, बहुरि कैसा है-अनत धर्मका जो समूह ताकरि सहित है, सो
काहेतै कह्या है-प्रमाणके वलतै कह्या है तातै प्रमाणभूत है; सो ही
मुनि जे माणिक्यनदि आचार्य तिनिनै संक्षेपकरि कह्या है, सो ही मैं
अनंतवीर्य आचार्य विवरणरूप किया है ॥ १ ॥
सवैया।
अकलंक देव मुनि रची जो प्रमेयधुनि,
स्यादवाद चिह्नतें अशेष निरवाध है ।
मानको सहाय पाय लखे जे अनंत धर्म,
मंडित अखंड पंडितांकै हु अगाध है ।।
रत्ननंदि ताहि जानि संक्षेप किया वखान,
ताका विसतारसं अनंतवीर्य साध है।
देशमयी कथा रूप किया बुद्धि सारू मैंभी
पढौं सुनौ भव्यजीव मिथ्यामत वाध है ॥१॥
ऐसे परीक्षामुख प्रमाणप्रकरणी लुघुवृत्तिकी वचनिका
वि विषयका समुद्देशनामा चौथा
अधिकार पूर्ण भया ॥४॥

अथ पंचम समुद्देश।
[५]
आगै प्रमाणके फलकी विप्रतिपत्तिका निराकारणकै आर्थ सूत्र
कहै है
अज्ञाननिवृत्तिहानोपादानोपेक्षाश्च फलम् ॥१॥
याका अर्थ-अज्ञानकी तौ निवृत्ति कहिये अभाव होना बहुरि
हान कहिये त्याग अर उपादान कहिये ग्रहण अर उपेक्षा कहिये उठा-
सीनता वीतरागता एते प्रमाणके फल है ॥ तहा फल टोय प्रकार है
साक्षात् कहिये लगता ही, अर पारपर्य कहिये परपरा करि । तहा
साक्षात्
तो अज्ञानका नाश होना फल हे जातै वस्तुका यथार्थ ज्ञान
होय तिस ही काल अज्ञानका नाश होय है, करणरूप ज्ञान सो तौ
प्रमाण है अर क्रियारूप जानना सो फल हैं सो ही अज्ञानकी निवृत्ति
है । बहुरि परपराकरि ग्रहण त्याग अर वीतरागता ये फल हैं जात
प्रमेय वस्तुका निश्चय भये पीछे होय है । सो यहु दोय प्रकारका ही
फल प्रमाणते भिन्न ही है ऐसे तो नैयायिक मानें हैं । बहुरि प्रमाणते
अभिन्न ही है ऐसे बौद्धमती मान है ॥ १ ॥
तिनि दोऊनिका मत निराकरण करि अपना मत स्थापनेंकू सूत्र
कहै हैं,
प्रमाणादभिन्न भिन्नं च ॥२॥

१८८
स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित-
aamsal
याका अर्थ-प्रमाणते प्रमाणका फल कथंचित् अभिन्न है कथं-
चित् भिन्न है ॥२॥
आगै कथंचित् अभेदके समर्थनकै अर्थ हेतु कहैं है;-
यः प्रमिमीते स एव निवत्ताज्ञानो जहात्यादत्ते उपे-
क्षते चेति प्रतीतेः ॥ ३ ।।
याका अर्थ-जो आत्मा प्रमेयकू प्रमाणकरि यथार्थ जानें है सो
ही दूर भया है अज्ञान जाका ऐसा होय करि अनिष्टका त्याग करै है
इष्टका ग्रहण करै है जो आपके इष्ट अनिष्ट न जानै ताविपैं मध्यस्थ
होय है वीतराग होय है ऐसे प्रतीति है। इहा ऐसा अर्थ जानना
जिस ही आत्माकै प्रमाणकै आकार परिणाम होय है तिसहीकै फल-
रूपपणाकरि परिणाम होय है, ऐसे एक प्रमाताकी अपेक्षाकरि प्रमाण
फलकै अभेद है। बहुरि प्रमाण करणरूपपरिणाम है फल क्रियारूप
है; ऐसैं करणक्रिया परिणामके भेदतै भेद है, ऐसे मेदक सामध्यसिद्ध-
पणा है तातै भेदका समर्थन हेतु न्यारा न कह्या है ॥३॥
ऐसे प्रमाणके फलका निरूपण किया।
इहां श्लोक-
पारम्पर्येण साक्षाच फलं वेधाऽभ्यधायि यत् ।
देवैर्भिन्नमभिन्नं च प्रमाणातदिहोदितम् ॥१॥
याका अर्थ-श्रीअकलंकदेव मुनिनै प्रमाणका फल साक्षात् अर
'परंपराकरि दोय प्रकार कहा सो प्रमाणतै भिन्न अर अभिन्न कह्या है,
-सो ही या प्रकरणविपै माणिक्यनंदिआचार्यनैं कह्या है ॥१॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १८९ mam दोहा। परंपरा साक्षात करि भिन्न अभिन्न विचारि । देव कह्यो फल मानको सो ही या मधि धारि ॥१॥ ऐसै परीक्षामुख प्रमाण प्रकरणकी लघुवृत्तिकी वचनिकावि फलका समुद्देश नामा पांचमां अधिकार संपूर्ण भया।

अथ षष्ठ समुद्देश। r- -wome (६) आगै अब कह्या जो प्रमाणका स्वरूप आदि चतुष्टय तिनिका आ- भास कहिये कहै जैसैं नाही अर तिनि सारिखे दीखै तिनिकू कहै है- ततोऽन्यत्तदाभासम् ॥ १॥ याका अर्थ-ततः कहिये कह्या जो प्रमाणका स्वरूपादिक तातें अन्यत् कहिये विपरीत सो तदाभास कहिये ताका आभास है । इहा कह्या जो प्रमाणका स्वरूप संख्या विषय फल ये च्यार भेद तिनितें अन्यत् विपरीत सो तदाभास हैं ॥१॥ आगें क्रममैं प्राप्त भया जो स्वरूपाभास ताकू दिखाएँ हैं- अस्वसंविदितगृहीतार्थदर्शनसंशयादयः प्रमाणा- भासाः॥२॥ याका अर्थ-अस्वसंविदित कहिये आपकरि आपकू न जाने, गृहीतार्थ कहिये ग्रह्याकू ग्रहण करे, दर्शन कहिये सामान्याकारमात्रका ग्राही, संशय कहिये संदेहरूप, आदि शब्द” विपर्यय अनध्यवसाय ये सर्व प्रमाणाभास है। इहा अस्वमंविदित गृहीतार्थ दर्शन संशयादि इनिका द्वन्द्वसमास करना । वहुरि आदि शब्दकरि विपर्यय अनध्यवसायका ग्रहण करना । तहां ज्ञान अस्वसंविदित है जात अन्य ज्ञानकरि प्रत्यक्ष होय है ऐसैं नैयायिक मती कहै है, ताका प्रयोग, सो ही कहैं हैं- ज्ञान है सो आपतै न्यारा जो ज्ञान ताकरि जानने योग्य है जाते वेद्य हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । १९१ कहिये जाकू जानिये सो तौ ज्ञेय है, जैसैं घट है । तहा आचार्य कहैं हैं-यह कहना मिले नाही, इहा धर्मी जो ज्ञान ताकै अन्य ज्ञानकरि वेद्यपणा होते साध्यकै मध्य आय पडनेंते धर्मीपणाका अयोग है जातें धर्मी तौ प्रसिद्ध ही होय है । वहुरि धर्मी ज्ञानकै स्वसविदितपणा कहिये तो तिस ही करि हेतुकै अनेकान्तपणा है । बहुरि महेश्वरका ज्ञानकरि व्यभिचार आवै है जातें महेश्वरका ज्ञान अस्वसविदित कहै तौ सर्वज्ञपणा न ठहरै, स्वसविदित कहै तौ स्वमतकी हानि होय है । वहुरि व्याप्तिज्ञानकरि भी अनेकान्त कहिये व्यभिचार आवै है । बहुरि अस्वसविदित ज्ञानते अर्थकी प्रतिपत्तिका अयोग है जातें जो ज्ञापक कहिये जनावनेवाला अप्रत्यक्ष होय सो जनावनेयोग्यकू जनावै नाही । जो ऐसे होय ज्ञापक विना जाण्या भी जणावै तौ शब्द कानतें सुण्या विना अर्थकू जनावनेवाला ठहरै, लिंग धूमादिक नेत्रकरि देख्या विना अग्नि आदिकू जानवर्नेवाला ठहरै । इहा कहे-~जो लगताही अन्य ज्ञान है ताकरि ग्रहण करिये है, तौ ताकै भी विना ग्रह्याकै परका जनावनेवालापणा नाही तब ताके ग्रहणकू तिसतै अन्य ज्ञान कल्पनें योग्य ठहरै तहा भी तिसतै अन्य कल्पना ऐसे अनवस्था आवै । ताते अस्त्रसविदित ज्ञान ऐसा नैयायिकका पक्ष श्रेष्ठ नाही । इस ही कयनकरि मीमासक कहै है-जो करण ज्ञानकै परोक्षपणा- करि स्वसविदितपणा नाही है करणज्ञान परोक्ष ही है ता” अस्वस- विदित ही है ताका भी निराकरण किया जाते ऐसे ज्ञानते भी अर्थका प्रत्यक्षपणाका अयोग है। इहा मीमासक कहै है-जो करण ज्ञान है सो कर्मपणाकरि प्रतीतिमै न आवै है तात याकै प्रत्यक्षपणा नाही है प्रत्यक्ष तौ कर्मज्ञान है, तौ ताकू कहिये-ऐसैं कहें फलज्ञा- नके भी प्रत्यक्षपणा न ठहरेगा । बहुरि कहै-फलपणाकरि प्रतिभास- १९२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- नेतै प्रत्यक्षपणा है तौ करण ज्ञानकै भी करणपणांकरि प्रतिभासनेते प्रत्यक्षपणां होहु । तातें अर्थ जाननेंकी अन्यथा अप्राप्तितें जैसे करण ज्ञान कल्पिये है तैसैं अर्थका प्रत्यक्षपणाकी अन्यथा अप्राप्ति ज्ञानकै प्रत्यक्षपणा भी होहु । बहुरि कहै-जो नेत्र आदि करणकै अप्रत्यक्ष- पणां होतें भी रूपका प्रगटपणां होय है, तिसत व्यभिचार आवै है। तहा कहिये-जो भिन्न है कर्ता जातें ऐसा करणक ही यहु व्यभि- चार है, अभिन्नकर्तृककरण होते सतै तौ कर्त्ताका प्रत्यक्षपणां होते तिस कातें अभिन्न जो करण ताकै कथंचित् प्रत्यक्षपणांकार अप्रत्यक्ष एका- न्तका विरोध है, जैसे प्रकाश स्वरूपकै अप्रत्यक्षपणां होतें प्रदीपकै प्रत्यक्षपणा होतें विरोध है तैसें ॥ बहुरि गृहीतग्राही जो धारावाही ज्ञान सो गृहीतार्थ प्रमाणाभास है। बहुरि बौद्धकरि मान्यां जो निर्वि- कल्पस्वरूप प्रत्यक्ष प्रमाण सो दर्शन है, सो अपनें विषयका उपदर्श- कपणा याकै नाही है तातें अप्रमाण है । जाते तिस विषयभूत पदा- र्थतें उपज्या जो व्यवसाय कहिये निश्चय ताहीकै अपनां विपयका उप- दर्शकपणा है । बहुरि बौद्ध कहै है जो व्यवसायकै प्रत्यक्षपणां नाही प्रत्यक्षके आकार करि अनुरक्तपणा ही है तातै प्रत्यक्षकै तौ प्रमाणपणां है अर व्यवसाय है सो तौ गृहीतग्राही है यातै अप्रमाण है। तहां आचार्य कहैं हैं-यह सुभाषित नाही, दर्शन है सो विकल्परहित है ताका उपलंम नाही तातै ताका सद्भावका अयोग है। बहुरि सद्भाव मानिये तो जैसैं नील आदिक विषै उपदर्शक है तैसैं क्षणक्षयादिविषै भी ताका उपद, र्शकपणा ठहरै है। बहुरि कहै-जो क्षणक्षयादि विर्षे क्षणिकतै विपरीत अक्षणिकका संशयादिरूप समारोप होय यातॆ ताका उपदर्शक नाही, तो ताकू कहिये-यह सिद्ध भई नील आदि विर्षे समारोप जो संशयादिक ताका विरोधी जो ग्रहण सो है लक्षण जाका ऐसा निश्चय होय है-तिस . --- हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १९३' स्वरूप ही प्रमाण है अन्य तटाभास है। बहुरि संशयादि है ते प्रमा- णाभास प्रसिद्ध ही है। नहा संगय है सो तो दोय तरफका स्पर्शन करनेवाला है जैसे खेतमै गप्या स्थाणुको देखि जाकै यह स्थाणु ही है ऐसा निश्चय नाही, सो विचार यह स्थाणु है कि पुरुष है ! ताका निश्चय नाही होने से यह प्रमाणाभास है । बहुरि अन्य विप अन्यका विकल्प निश्रय सो विपर्यय है, जैसे सीपविष रूपाका निश्चय । बहुरि विशेषका निश्चय नाही सो अनध्यवसाय है, जैसे चालताक तृण लागे तब जाने किळू है, विशेष निश्चय नाही ॥ २ ॥ आगे कहै है इनि अस्वसविदित आठिकै प्रमाणभासपणा कसैं है; ताका सूत्र- स्वविपयोपदर्शकत्वाभावात् ।। ३ ।। याका अर्थ-जात ये अस्वसंविदित आदिक है तिनिकै अपनां विषयका उपदर्शकत्व कहिये निधायकपणा ताका अभाव है तातें ये प्रगाणाभास है ॥३॥ पुरुपान्तरपूर्वार्थगच्छत्तृणस्पर्शस्थाणुपुरुषादि- ज्ञानवत् ॥ ४ ॥ आर्गे इनि विर्ष दृष्टात अनुक्रमत कहें है,- याका अर्थ-अन्य पुरुषका ज्ञानकी ज्यों अस्वसंविदित ज्ञान अपना विषय विप नाही प्रवत है तातै प्रमाण नाही, पूर्व ग्रह्या है अर्थ जानें ऐसा ज्ञानकी ज्यों गृहीतार्थ ज्ञान प्रमाण नाही, चालताकै तृणस्पर्श- ज्ञानकी ज्यों दर्शन प्रमाण नहीं हैं, स्थाणु पुरुष ज्ञानकी ज्यों संगय प्रमाण नाही है, आदि शब्दत विपर्ययादिक तथा ऐसे और भी जानने ते सारे प्रमाणभास है ॥ ४ ॥ हि.प्र. १३ - १९४ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- आगें जो संनिकर्प प्रमाण कहै है तिस प्रति दृष्टान्त कहैं हैं--- चक्षुरसयोर्द्रव्ये संयुक्तसमवायवच ॥५॥ याका अर्थ-नेत्रकै अर रसके द्रव्यविर्षे संयुक्त समवाय स्वरूप सन्निकर्ष है सो जैसैं प्रमाण नाही तैसैं और भी सनिकर्ष प्रमाण नाही। इहां यह अर्थ है-जैसे नेत्र अर रसक द्रव्यविर्षे संयुक्त समवाय है तौऊ प्रमाण नाही तथा चक्षु रूपमै संयुक्त समवाय है सो भी प्रमाण नाही है तातें यह भी प्रमाणाभासही है, यह अतिव्याप्ति कहीं सो उपलक्षणरूप है, ऐसे ही अन्य इन्द्रियके सन्निकर्ष अप्रमाण जाननें। इहां नेत्रकरि रूपकै संयोग भया अर रूप अर रसके एक द्रव्य विर्षे समवाय है सो रसकरि भी समवाय भया सो संयुक्त समवायनामा सनिकर्ष तौ भया अरु नेत्रकै रसका ज्ञान न भया तातै प्रमाण न भया तब अतिव्याप्ति दूषण भया । बहुरि अव्याप्ति दूषण है जातें नेत्र इंद्रिय विना अन्य इन्द्रियनिकै संनिकर्ष है अर नेत्र प्रमाण है तहां संनिकर्ष व्यापै नांही तातै अव्याप्ति है । बहुरि संनिकर्षकू प्रत्यक्ष प्रमाण कहैं हैं तिनिक नेत्रकै विौं संनिकर्षका अभाव है नेत्र पदार्थतें भिडै नांही ताते नेत्रप्रत्यक्षमै संनिकर्षलक्षण संभव नाही तब असंभवी दूषण भी है। इहां नैयायिक कहै है-जो नेत्र प्राप्त अर्थका जाननेवाला है जाते वीचिमैं अन्य पदार्थ आडा आवै तब जानैं नाही है जैसे दीपककै भौति. आदि आडी आय जाय तिस अर्थकू प्रकाशै नांही तैसें, भावार्थ-नेत्र भी पदार्थतें जुडिकर ही जाणे है ताः सनिकर्षकी सिद्धि है। ताकू आचार्य कहै है:-यह भी साधनां समीचीन नाही जातें नेत्रकै काचं भोडल आदि आडा आय जाय तौऊ नेत्र ताकरि व्यवहित पदा- र्थकू प्रकाशै है ता” हेतु असिद्ध है। बहुरि वृक्षकी शाखा अर चन्द्र माकू एक काल नेत्र देखै है सो नाही ठहरै यह प्रसग आवै है। बरि

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
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कहै-इहा क्रमसू देखे है तहा पुरुपकै युगपत् देखनेका अभिमान है,
सो ऐसे भी न कहना जाते कालका अतर नाही दीखै है एकही काल
है। वहुरि विशेष कहै हैं..जो क्रमका ज्ञान तौ प्राप्ति भये ही नेत्रकै
जाननेका निश्चय भये होय है, क्रम प्राप्ति विपै अन्य प्रमाण तौ नाही
है । इहा कहै जो नेत्र इन्द्रियकै तैजसपणा है इस हेतुकार प्राप्त
अर्थका प्रकाशपणा है यह अन्य प्रमाण है, तौ ताकू कहिये-यह
नाही है, तैजसपणाकी सिद्धि नाही होय है । इहा नैयायिक तैजसपणा
साधनेकू प्रयोग करै है-नेत्र है सो तैजस है जात रूपादिक गुण है
तिनिमै सू रूपका ही यह प्रकाशक है जैसे दीपक है । आचार्य कहै
है-यह भी प्रयोग विना विचारया किया है जाते इहा प्रदीपका दृष्टान्त
कहा सो तौ तैजस है अर मणि तथा अंजन आदिक पार्थिव हैं पृथि-
वीतै उपमें है तेज रूपकू प्रकारौं है । बहुरि नेत्रकू तेजोद्रव्यके रूप
प्रकागनेंते तैजस कहिये तो पृथिवी आदिके रूपका प्रकाशक है, तातें
याकै पृथिवी आदि करि रच्यापणाका प्रसग आवै है, भावार्थ-नेत्र
भी पार्थिव ठहरै है। तातै सनिकर्पकै अव्याकपणा है । तातें प्रमाण-
पणा नाही । बहुरि करण ज्ञानकरि याकै व्यवधान है, सन्निकर्ष भये
पीछे इन्द्रिय ज्ञान पदार्थकू जाणें है सन्निकर्षही जानैं नाही । ऐसे
करण ज्ञानकरि व्यवधान भया सन्निकर्षकरि ही तौ अर्थका सवेदन
नाही भया तातें सन्निकर्प प्रमाणाभासही है ॥ ५॥
आगै प्रमाण सामान्याभास कहि करि अब प्रमाणविशेषका आभास
कहैं है, तहा प्रत्यक्षभास कहें हैं,
अवैशये प्रत्यक्षं तदाभासं बौद्धस्याकस्माद्धमदर्श-
नादह्निविज्ञानवत् ॥६॥

स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- . याका अर्थ-अविशदपणा होते प्रत्यक्ष मानै सो प्रत्यक्षाभास है जैसैं बौद्धमतीकै अकस्मात् निश्चय भये विनाही धूम देखने” अग्निका विज्ञान बौद्ध निर्विकल्प प्रत्यक्ष मानें है जैसैं धूमकी परीक्षा निश्चय विना अग्निका अनुमान करै । सो विना निश्चय तदाभास है तैसैं प्रत्यक्षाभा- सही है प्रमाण नाही ॥६॥ आगै परोक्षाभासकू कहें हैं। वैशद्येऽपि परोक्षं तदाभासं मीमांसकस्य करणज्ञा- नवत् ।।७॥ याका अर्थ----जहा वैशद्य होय तहां भी परोक्षमार्ने सो परोक्षाभास है जैसैं मीमांसक करणज्ञान विशद है तोऊ ताकू परोक्ष मानें है तेसै। यहु पहले विस्तारकरि कह्या ही है ॥ ७ ॥ आगें परोक्षके भेदाभासकू कहते संते क्रममै आया जो स्मरणा भास ताकू कहैं हैं;- अतस्मिँस्तदिति ज्ञानं स्मरणाभासं जिनदत्ते स देव- दत्तो यथा ॥८॥ याका अर्थ--जो अनुभवविर्षे आया नाही ताका स्मरणा सो स्मर- णाभास है जैसैं जिनदत्त पुरुपकू पूर्व देख्या था अर यादि देवदत्तक किया जो सो देवदत्त । ऐसें ॥ ८॥ आरौं प्रत्यभिज्ञानाभासकू कहें हैं,- सदृशे तदेवेदं तस्मिन्नेव तेन सदृशं यमलकवदि- त्यादि प्रत्यभिज्ञानाभासम् ॥ ९॥ याका अर्थ-सदृश विपैं तौ सो ही यहु है अर तिस ही विर्षे यहु तिस सारिखा है जैसे दोयका जुगल विषै एक देखै इत्यादि प्रत्य- - , - हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १९७ भिज्ञानाभास है ॥ इहा प्रत्यभिज्ञान दोय प्रकारकाकू लेय प्रत्यभिज्ञाना- भास भी दोय प्रकार कह्या, एकत्वनिबधन, सादृश्यनिबधन | तहा एकत्वविपै तौ सादृश्यका ज्ञान, अर सादृश्यविर्षे एकत्वका ज्ञान, सो प्रत्यभिज्ञानाभासं है ॥९॥ आगें तर्काभासकू कहैं हैं;- असंबद्धे तज्ज्ञानं ताभासं यांवॉस्तत्पुत्रः सः श्याम इति यथा ॥१०॥ याका अर्थ--असबद्ध कहिये अविनाभावरहित विषै अविनाभा- वका ज्ञान सो तर्काभास है, जैसैं काहूकै अन्य कोई पुत्र श्याम देखि कहै—याके जे ते पुत्र हैं तथा होयगे ते सर्व श्याम हैं; ऐसै व्याप्ति कहना तर्काभास है ॥ १०॥ आगें अनुमानभास कहैं हैं,-- इदमनुमानाभासम् ॥ ११ ॥ याका अर्थ-इद कहिये आगें कहैं हैं सो अनुमानाभास है ॥११॥ आरौं तिस अनुमानाभासविर्षे तिसके अवयवाभास दिखावनेंकरि समुदायरूप अनुमानाभासकू दिखावनेंकी इच्छाकरि पहले पहला अव- यवाभास कहैं है, तत्रानिष्टादिः पक्षाभासः ॥ १२ ॥ (१) मुद्रित सस्कृत प्रतिमें “यावॉस्तत्पुत्रः स श्याम इति यथा यह पाठ सूत्रमे नहीं दिया है किन्तु टीकामें दिया है और परीक्षामुख सूत्र जो अलग पुस्तककी आदिमे प्रकाशित है वहा सूत्रमेंही ऐसा पाठ दिया है। लेकिन-यह पाठ सूत्र में ही होना चाहिये।

mim १९८ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- याका अर्थ-तिनि अवयवनिविर्षे अनिष्ट आदि शब्दकरि वाधित प्रसिद्ध ये पक्षाभास हैं । इष्ट अबाधित असिद्ध लक्षण साध्य पूर्फे कहा था सो ही पक्ष कह्या था ॥ १२ ॥ आर्गे तिनिविपरीत तदाभास है, ऐसे करें है- अनिष्टो मीमांसकस्यानित्यः शब्दः ॥ १३ ॥ याका अर्थ-अनिष्ट पक्षाभास तौ मीमासककै शब्द अनित्य है। मीमासक शब्दकू नित्य मानें है सो अनित्य कहै तौ ताकै अनिष्ट है ॥१३॥ आगै असिद्धतै विपरीत सिद्ध पक्षाभास कहैं है;- सिद्धः श्रावणः शब्दः ॥१४॥ याका अर्थ-शब्द है सो श्रावण है, ऐसे पक्ष कहै तौ सिद्ध पक्षाभास है जातै शब्द तौ सुननेमैं आवै है सो श्रावण है ही फेरि साथै तौ सिद्ध पक्षाभास है ॥ १४ ॥ आगै अबाधिततै विपरीत वाधित पक्षाभासकू कहते संते सो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणकरि वाधित है ऐसै दिखावते संते सूत्र कहैं हैं; बाधितः प्रत्यक्षालुमानागमलोकस्ववचनैः ॥१५॥ याका अर्थ-वाधित पक्ष है सो प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, लोक, स्ववचन, इनि करि है तातै बाधित पक्षाभास पच प्रकार जाननां ॥१५॥ आर्गे इनिका अनुक्रमकरि उदाहरण कहै है - तत्र प्रत्यक्षबाधितो यथा, अनुष्णोऽग्निद्रव्यत्वा- जलवत् ॥१६॥ याका अर्थ-तिनि विपै प्रत्यक्ष वाधित-जैसे अग्नि है सो अनुष्ण कहिये शीतल है जातें याकै द्रव्यपणा है जैसे जल शीतल है तैसैं । है हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। १९९ इहा अग्नि है सो उष्ण स्पर्श स्वरूप है सो अनुष्ण कह्या तब स्पर्शन प्रत्यक्षकरि बाधित भया ॥ १६ ॥ आगै अनुमानवाधित कहैं हैं- अपरिणामी शब्दः कृतकत्वात् घटवत् ॥ १७ ॥ याका अर्थ-गब्द है सो अपरिणामी है जाते याकै कृतकपणा है, कन्या होय है, जैसे घट कन्या होय है । इहा अपरिणामी पक्ष है सो नित्य पक्ष है, सो शब्द कृतकपणा हेतुतै परिणामी सधै है, इस अनुमानकरि नित्य पक्ष वाधित है ॥ १७ ॥ भागें आगमवावित कहैं हैं:- प्रेत्याऽसुखप्रदा धर्मः पुरुषाश्रितत्वाधर्मवत् ॥१८॥ याका अर्थ:-~वर्म हे सो परलोकविर्यै दुःख देनेवाला है जातें यह पुरुपकै आश्रय है जैसे अधर्म पुरुषकै आश्रय है तातें दुःख देने- वाला है । इहा पुरुषके आश्रयपणातै अधर्म धर्म अविशेषरूप है तोऊ आगमविपै धर्मकै परलोकमैं मुखका कारणपणा कह्मा है, तातै पक्ष आगमवावित है ॥ १८ ॥ आगै लोकवावित कहै हैं; शुचि नरशिरकपालं प्राण्यंगत्वाच्छंखशुक्तिवत् ॥१९॥ याका अर्थ-~मनुष्यका मस्तकका कपाल कहिये खोपरी सो पवित्र है जाते याकै प्राणीका अगपणा है जैसे शख सीप पवित्र मानिये है तैसे । इहा लोकवि मनुष्यकी खोपरी प्राणीका अग है तोऊ अपवित्र मानिये है, अख सीप प्राणीके अग हैं तिनिक पवित्र मानें है तैसैं खोपरीकू पवित्र कहना लोकवावित है ॥ १९ ॥ आगै स्ववचनवाधित कहैं है,

२०० स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित-
माता मे बंध्या पुरुषसंयोगेऽप्यगर्भवातू प्रसिद्धवं-
ध्यावत् ॥ २०॥
याका अर्थ-मेरी माता वाझ है जातै पुरुपका संयोग होतें भी
ताकै गर्भवतीपणा नाही है जैसे अन्य प्रसिद्ध वंध्या है तैसैं । इहां मेरी
माता कहने वध्या कहना अपना यचनहीतै वाधित भया, जो वंध्या
है तो आप पुत्र कैसै भया ॥ २०॥
आगै क्रममै आये जे हेत्वाभास तिनिकू कहें हैं;-
हेत्वाभासा असिद्धविरुद्धानकान्तिकाकिंचि-
त्कराः ॥ २१॥
याका अर्थ हेत्वाभास च्यारि है; असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक, .
अकिंचित्कर ऐसे ॥ २१ ॥
आज इनिका यथानुक्रमकरि उदाहरणसहित लक्षण कहैं हैं;-
असत्सत्तानिश्चयोऽसिद्धः ॥ २२ ॥
याका अर्थ--असत् है सत्ता अर निश्चय जाका सो असिद्ध हेत्या-
भास है ॥ सत्ता अर निश्चय जो है सो " सत्तानिश्चयौ " कहिये, नहीं
है सत्ता अर निश्चय जाको सो असत्सत्तानिश्चय कहिये ॥ २२ ॥
आगें पहला भेदकू कहै हैं;
अविद्यमानसत्ताकः परिणामी शब्दः चाक्षुषत्वात्
॥२३॥
याका अर्थ-नाही विद्यमान है सत्ता जाकी सो असत सत्ताक
नामा असिद्ध हेत्वाभास है जाते शब्द है सो परिणामी है जातै चाक्षुष
है । इहा शब्द तौ श्रावण है अर चाक्षुष हेतु सूं साधै सो शब्दविर्षे
चाक्षुपपणाकी सत्ता नाही ॥ २३॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। २०१ - आगै कहैं हैं कि इस हेतु असिद्धपणा कैसैं भया १,- स्वरूपेणैवासिद्धत्वात् ॥ २४ ॥ याका अर्थ---यह स्वरूपकरि ही असिद्ध है चाक्षुपपणा शब्दका स्वरूप नाही ॥२४॥ आगें प्रसिद्धका दूसरा भेदकू कहै हैं;- अविद्यमाननिश्चयो मुग्धवुद्धिं प्रत्यग्निरत्र धूमात्॥२५॥ याका अर्थ-प्रविद्यमान है निश्चय जाका सो असत् निश्चय हे. त्वाभास है जैसे मुग्धबुद्धि जो भोलाजीव तिस प्रति कहै इहा अग्नि जातै धूम है ॥ २५॥ आगे याकै असिद्धता कैसे ? ऐसे पूछे कहैं है,- तस्य वाप्पादिभावेन भृतसंघाते संदेहात् ॥२६॥ याका अर्थ-तिस धूम नामा हेतुकै वाफ आदिपणाकरि पृथिवी आदि भूतसघातविपै सदेहते असत् निश्चय है । मुग्धकै विद्यमान धूम- वि भी विना समस्या सदेह उपजै जो यह वाफ है कि धूम है ॥२६॥ आगै अमुग्ववुद्धि प्रति और असिद्धका भेट कहैं हैं, सांख्यं प्रति परिणामी शब्दः कृतकत्वात् ॥२७॥ याका अर्थ~साख्य मती प्रति कहै-जो शब्द परिणामी जातै कृत कहै ॥ २७॥ याका असिद्धपणावि कारण कहैं है, तेनाज्ञातत्वात् ॥ २८॥ याका अर्थ-तिस साल्यकरि नाही, जानवापणातें जाते साख्यके मतमै आविर्भाव तिरोभाव ही प्रसिद्ध है उत्पत्ति आदि प्रसिद्ध नाही २०२ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- है । तातै शब्द कृतक है ऐसा साख्यमती नाही जाणै है ताते याकै भी असिद्धपणां है ॥ २८॥ आगै विरुद्ध हेत्वाभासकू दिखावता संता सूत्र कहै है- विपरीतनिश्चिताविनाभावो विरुद्धोऽपरिणामी शब्द: कृतकत्वात् ।। २९॥ ‘याका अर्थ-विपरीत कहिये विपक्ष विषै है अविनाभावका निश्चय जाका ऐसा विरुद्ध हेत्वाभास है जैसे अपरिणामी शब्द है, इहां कृत- कपणा हेतु है सो अपरिणामका विरोधी जो परिणाम ताकरि व्याप्त है तातै विरुद्ध है ॥ २९॥ आगें अनैकान्तिक हत्वाभासकूँ कहें है;- विपक्षेऽप्यविरुद्धवृत्तिरनैकान्तिकः ॥ ३० ॥ याका अर्थ-विपक्षविपैं भी अविरुद्ध है वृत्ति जाकी सो अनैका- न्तिक हेत्वाभास है । इहा 'अपि' शब्दतै ऐसैं जानिये जो केवल पक्ष सपक्षविपै ही याकी वृत्ति नाही है, विपक्षविर्षे भी है । सो यह हेत्वा- भास दोय प्रकार है; निश्चित विपक्षवृत्ति, शकितविपक्षवृत्ति ॥३०॥ तहा आदि भेदकू दिखावता संता सूत्र कहैं हैं;- निश्चितवृत्तिरनित्यः शब्दः प्रमेयत्वादू घटवत् ॥ ३१ ॥ याका अर्थ-जाते नित्य जो आकाश ताकै विर्षे भी याका निश्चय है, भावार्थ----इहा प्रमेयपणा हेतु है सो पक्ष जो शब्द ताविषै अनि- त्यपणा साध्य है ताविपैं भी है अर याका सपक्ष घट ताविषै भी है अर विपक्ष जो नित्य आकाश ताविप भी निश्चयकरि पाइये है, ताते निश्चितविपक्षवृत्ति हेत्वाभास भया ।। ३१ ।। आगें याकी विपक्षकै वि निश्चितवृत्ति कैसे है ऐसी आशका होता सूत्र कहें हैं;-

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
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आकाशे नित्येऽप्यस्य निश्चयात् ।। ३२ ॥
याका अर्थ-अस्य कहिये या हेतुको नित्य आकाश जो है ताकै
विर्षे निश्चय है यात ॥ ३२ ॥
आणु शकितविपक्षवृत्तिकू उदाहरणरूप कहै हैं,-
शंकितवृत्तिस्तु नास्ति सर्वज्ञो वकृत्वात् ॥ ३३ ॥
याका अर्थ-सर्वज्ञ नाही है जातें जाकै वक्तापणा है । इहा वक्ता-
पणा हेतु शकितविपक्षवृत्ति अनेकान्तिक है ॥३३॥
आगै याक भी विपक्षविपै शकितविपक्षवृत्ति कैसे है ? ऐसी आशंका
करि कहें है,
सर्वज्ञत्वेन वकृत्वाविरोधात् ।। ३४ ।।
याका अर्थ-जाते सर्वज्ञपणाकरि वक्तपणाकै अविरोध है । इहा
अविरोव यह-जो ज्ञानका उत्कर्प होते वचननिका अपकर्प नाही
देखिये है, बहुत ज्ञान होय तब वचन स्पष्ट नीसरै है यह निरूपण पहले
किया है । तात वक्तापणा हेतु है सो विपक्ष जो सर्वज्ञका सद्भाव है
तहा शंकित हे मदेहरूप है, वक्तापणा होते सर्वज्ञपणा होय भी हैं नाही
भी होय है | तातें शकितविपक्षवृत्ति अनैकान्तिक हेत्वाभास भया ३४
आगै अकिंचित्कर हेत्वाभासका स्वरूप कह है,-
सिद्धे प्रत्यक्षादिवाधिते च साध्ये हेतुरकिंचित्करः
॥३५॥
याका अर्थ-जहा साध्य सिद्ध होय तथा प्रत्यक्ष आदि प्रमाण-
करि बाधित होय तहा हेतु अकिचित्कर हे ॥ ३५॥
आगें इनिक उदाहरणरूप कहै है,-
सिद्धः श्रावणः शब्दः शब्दात्वत् ॥ ३६॥

-२०४ स्वर्गीय पं० जयचदजी विरचित- याका अर्थ-जैसे शब्द है सो श्रावण है श्रवण इन्द्रियका गोचर है यातें श्रावण कहिये है जातै याकै शब्दपणा है । इहा शब्दपणा हेतु है सो श्रावणपणा साध्य है सो तो पहले ही सिद्ध है हेतु तौ किछू साध्या नाही ता” अकिंचित्कर है ॥ ३६॥ आर्गे याकै अकिंचित्करपणा कैसै है सो कहिये है- किंचिदकरणात् ॥ ३७॥ याका अर्थ—इस हेतुनै किछू किया नाही तातै अकिंचित्कर है सो हेत्वाभास है ॥ ३७॥ आगें दूसरा भेद प्रत्यक्षादिवाधित जाका साध्य होय ताकू पहला भेदका दृष्टान्तरूप करनेका द्वारही करि उदाहरणरूप करें है, यथाऽनुष्णोऽग्निद्रव्यत्वादित्यादौ किंचित्कर्तुमश- क्यत्वात् ॥ ३८॥ याका अर्थ-जैसै अग्नि है सो अनुष्ण है जाते याकै द्रव्यपणां है । इहा अग्नि उष्ण है, अर अनुष्ण कह्या सो साध्य स्पर्शनप्रत्यक्षकरि चाधित है तातै इस द्रव्यपणा हेतुकै अकिंचित्करपणा है जातें इहां किछू किया नाही, जैसे इहा किछू किया नाही तैसे ही पूर्व सूत्रमैं जानना ॥ ३८ ॥ बहुरि यह अकिंचित्करपणां दोप हेतुका लक्षणके विचारका अवसर विपैं ही अर वादकाल वि नाही है ऐसे प्रकट करते संते कहै हैं; लक्षण एवासौ दोषो व्युत्पन्नप्रयोगस्य पक्षदोषेणैव दुष्टत्वात् ॥ ३९॥ याका अर्थ-यहु अकिंचित्करपणां हेतुका दोष है सो लक्षण कहिये शास्त्रविषै ही है, वाद वि व्युत्पन्नका प्रयोग है सो पक्षके - हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । २०५ दोपहीकरि दृपित है हेतुका दोप प्रधान नाही । व्युत्पन्न ऐसा पक्षका प्रयोग ही न करें अर करें तो तहा पक्षाभास कहना, जो सिद्ध साध्य कहै तो सिद्ध पक्षाभास कहना, बाधित साध्य कहै तौ वाधित पक्षाभास कहना । अकिंचिकर हेत्वाभासका कहना गास्त्रमै ही प्रधान है, वादमैं नाही ॥ ३९ ॥ आगै दृष्टान्त हे सौ अन्यय व्यतिरेकके भेदतै दोय प्रकार कह्या है तातै आभास भी दोय प्रकार ही है, तहा अन्वयदृष्टान्ताभासकू करें दृष्टान्ताभासा अन्ययेसिद्धसाध्यसाधनोभयाः ॥४०॥ याका अर्थ-दृष्टान्ताभास है ते अन्वयविर्षे तो तीन है, असिद्ध साध्य, असिद्धसाधन, असिद्धसाध्यसावन ऐसें । अर इनिका अर्थ ऐला-मसिद्ध है साध्य जा विधै सो असिद्ध साध्य अन्वयदृष्टान्ता भास कहिये, इत्यादि जानना ॥ ४० ॥ जागै इनि तीननिके उदाहरण एक ही अनुमानके प्रयोग विपै दिखाव है,- अपौरपेयः शब्दोऽमूर्तत्वादिन्द्रियसुखपरमाणुघट- वत् ॥ ४१ ॥ याका अर्थ-गब्द है सो अपौरुषेय है पुरुषका किया नाही जाते अमू- तीक है, इहा तीन दृष्टात ह ते आभास है, इन्द्रिय मुखकी ज्यों, परमाणु की ज्यों, घटकी ज्यो । तहा इन्द्रियमुखकी ज्यों, यह तौ असिद्धसाध्य है, इहा इद्रियमुख पौरुषेय दृष्टात है अर अपौरुषेयपणा साध्य है सो इद्रियमुखमैं असिद्ध है तातें असिद्ध साध्य भया । परमाणुकी ज्यो, यह असिद्धसाधन है. हा सावन अमूर्तीकपणा है, सो परमाणु तौ मूर्तीक २०६ स्वर्गीय पं0 जयचंदजी विरचित- - है, परमाणुदृष्टान्तमैं अमूर्तपणां साधन असिद्ध है तातै असिद्धसाधन भया । बहुरि घटकी ज्यों, यह असिद्धसाध्यसाधन है, घट पौरुषेय भी है अर मूर्तीक भी है अर इहां साध्य अपौरुषेय है साधन अमूर्तीकपर्णा है तातें दोऊ घटमैं असिद्ध भये ॥ ११ ॥ आगें कहैं हैं साध्यतै व्याप्त साधन दिखावनां ऐसे अन्धय दृष्टाः न्तका अवसरमैं कह्या था सो जहां इसते विपरीत उलटा कहै सो भी दृष्टान्ताभास है। विपरीतान्वयश्च यदपौरुषेयं तदमूर्तम् ॥ ४२ ॥ याका अर्थ-जहां अन्वय विपरीत कहै जैसे जो अपौरुषेय सो अमूर्तीक है । इहां जो अमूर्तीक है सो अपौरुषेय है ऐसे अन्वय कहना था सो उलटा कह्या ताते यह भी दृष्टान्ताभास है ॥ ४२ ॥ आर्गे याकै दृष्टान्ताभासता कैसे है सो कहैं हैं;- विद्युदादिनातिप्रसङ्गात् ॥ ४३ ।। याका अर्थ-विद्युत् कहिये वीजली आदिकरि अतिप्रसंगरौं ' दृष्टा- न्ताभास है जातें उलटा अन्वय कहे वीजलीकै भी अमूर्तपणांकी प्राप्ति आवै है, वीजली अपौरुषेय तौ है परन्तु मूर्तीक है ॥ ४३ ।। - आगें व्यतिरेक उदाहरणाभासकू कहैं हैं;- व्यतिरेके सिद्धतव्यतिरेकाः परमाण्विन्द्रियसुखाः काशवतू ॥४४॥ याका अर्थ-पहले प्रयोगमैं ही लगाइये है-शब्द है सो अपौरुषेय है जात याकै अमूर्तीकपणां है जो अपौरुषेय नाही सो अमूर्तीक नाही जैसें परमाणु है; इद्रियसुख है, आकाश है । ये व्यतिरेक दृष्टान्ताभास हैं, इनिविपैं साध्य साधन उभय तीनिका व्यतिरेक असिद्ध है। तहाँ - हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। २०७ परमाणु तो अपौरुषेय है तातै यह तौ असिद्धसाध्य व्यतिरेक भया जातै इहा व्यतिरेक ऐसे है जो अपौरुषेय न होय सो अमूर्तीक नाही जैसे परमाणु, सो परमाणुकै अपौरुषेयपणा साध्यते व्यतिरेक न भया । बहुरि इन्द्रियसुख है सो असिद्धसाधन व्यतिरेक है जाते यह अमूर्तीक है, सो अमूर्तीक- पणा साधन व्यतिरेक नाही भया । बहुरि आकाश है सो असिद्ध- साध्यसाधन व्यतिरेक है जाते यह अमूर्तीक भी है अर अपौरुषेय भी है साध्य साधन टोजते व्यतिरेक नाही भया । ऐसे तीन व्यतिरेक- दृष्टान्ताभास कहे ॥४४॥ आर्गमायका अभाव होत साधनका अभाव है ऐसे व्यतिरेक उदाहरणके अवसरमै कद्या था ताविप तिसत विपरीत कहै सो भी दृष्टान्ताभास है, यह दिखाये हैं,- विपरीतव्यतिरेकश्च यन्नामूर्त तन्नापौरुषेयम् ।।४५|| याका अर्थ-जो अमूर्तीक नाही सो अयौरुषेय नाही ऐमैं कहना सो विपरीतव्यतिरेक है । इहा जो अपौरुषेय नाही सो अमूर्तीक नाही ऐसे कहनाथा सो उलटा कथा ताते विपरीतव्यतिरेक दृष्टान्ताभास ही है । ऐसें दृष्टान्ताभास कहे ॥ १५ ॥ आगै वालव्युत्पत्तिकै अर्थ उदाहरण उपनय निगमन ये तीन अव- यव कहे ये सो अब वाल अस्पज्ञानीकू तिनितै घाटि कहै तौ प्रयोगा- भास कहिये, ऐमै कह हैं,- बालप्रयोगाभासः पंचावयवेयु कियद्धीनता ॥ ४६ ॥ याका अर्थ-अनुमानके पाच अवयव अल्पज्ञकू कहने, तिनिमैं घाटि कहै सो बालप्रयोगाभास है ॥ ४६ ।। आगे याका उदाहरण कहै हैं, - २०८ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- - भास है अग्निमानयं प्रदेशी धूमवत्त्वाधदित्थं तदित्थं यथा महानसः ॥४७॥ याका अर्थ--यह प्रदेश अग्निसहित है जातें याकै धूम सहितपणां है, जो ऐसे होय (धूमसहित होय ) सो अग्निसहित होय जैसे महानस कहिये रसोई घर । इहा तीन ही अवयव कहे तातें 'बालप्रयोगा. भास है ॥ ४७॥ आणु च्यार अवयवका प्रयोग होः प्रयोगाभास कहैं हैं;- धूमवाँश्चायम् ॥ ४८॥ याका अर्थ-धूमवान् यह है । इहा तीन अवयव तौ पहले सूत्रके लेणें अर एक यह कहै ऐसे च्यार अवयव कहैं सो भी बालप्रयोगा- ॥ ४८ ॥ आण अवयवनिक विपर्ययकरि क्रमहीन कहै तोऊ प्रयोगाभास कहिये, ऐसै कहैं है;- तस्मादग्निसान धूमवॉश्वायम् ॥ ४९ ॥ याका अर्थ—तातै अग्निमान् है बहुरि यह धूमवान् है । इहां नि- गमनकू पहले कह्या उपनयकू पीछे कह्या तातें क्रमभग भया, ताते प्रयोगभास है ॥ ४९॥ आगै यह प्रयोगाभास कैसे ? ताका हेतु कहै है, स्पष्टतया प्रकृतप्रतिपत्तेरयोगात् ॥५०॥ याका अर्थ-जाते क्रमहीन अनुमानका अयोग करै तहां स्पष्टप- णाकरि प्रकृत अर्थकी प्रतिपत्तिका अयोग है। शिष्यकै स्पष्ट ज्ञान होय नाही तातें प्रयोगाभास है ॥५०॥ आगै अब आगमाभासकू कहैं है- हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। २०९ रागढेपमोहाकान्तपुरुषवचनाजातमागमाभासम् ५१ याका अर्थ-रागद्वेष मोहकरि सहित जो पुरुष ताका वचनकरि जो ज्ञान होय सो आगमाभास है ॥५१॥ आगै याका उदाहरण कहै है;- यथा नद्यास्तीरे मोदकराशयः संति धावध्वं मा- णवकाः॥ ५२॥ याका अर्थ-जैसे, नदीके तीर लाइनिकी राशि है सो हे बालक हो । दौडो ल्यो । इहा कोई पुस्पकू वालकनिकरि व्याकुल करि राख्या था तब तिनिक अपना लार छुडावनें बहकाबनेंके वाक्य कहता भया कि-नदीकै तीर लाडूनिके ढेर हैं तो हे वालक हौ । तुम तहा जाय ल्यो, ऐसें कहि तिनिक नदीक तीर चलाये । ऐसें अपणा प्रयोजन साधनेकू कछू कहै सो आप्तका वचन नाही तातै आगमाभास है ॥५२॥ आगें इस उदाहरणमात्रकरि सतुष्ट न होते अन्य उदाहरण कहैं है,- अंगुल्यग्ने हस्तियूथशतमास्ते इति च ॥५३ ॥ याका अर्थ-बहुरि यह उदाहरण जानना-जो अगुलीका अग्र- भागविप॑ हस्तानिका समूहका सैकडा तिठे है । इहा साख्यमती अपने आग्मकी वासनाम लीन है चित्त जागा सो प्रत्यक्ष अनुमानकरि विरुद्ध सर्वही सर्व जायगा विद्यमान है ( सर्व सर्वत्र विद्यते ) ऐसे मानता सता ऐसे वचन कहै है तातै यह अनाप्तके वचनपणात आगमाभास है ॥ ५३॥ आगै इनि दोज वचननिकै आगमाभासपणा कैसे है ताका हेतु कहैं है:- हि प्र. १४ २१० स्वर्गीय पं. जयचंदजी विरचित- 1 विसंवादात् ॥ ५४॥ याका अर्थ-जाते ऐसे वचनके अर्थवि विसंवाद है। तातै अवि- संवादरूप जो प्रमाणका लक्षण ताके अभावतें ऐसे वचन आगमाभास हैं ॥ ५४॥ आज संख्याभासकू कहैं हैं;- प्रत्यक्षमेवैक प्रमाणमित्यादि संख्याभासम् ॥५५॥ याका अर्थ-~-जो एक प्रत्यक्ष ही प्रमाण है इत्यादि कहै सो संख्या- भास है । प्रमाण प्रत्यक्ष परोक्षके भेदकरि दोय कहे तहां तिसतै वि. रीतपणाकरि कहै-एक प्रत्यक्ष प्रमाण ही है तथा प्रत्यक्ष अरु, अनु- मान ऐसें दोय हैं इत्यादि नियम करै सो संख्याभास है ॥ ५५ ॥ आगै प्रत्यक्ष ही एक प्रमाण है ऐसैं कहनां कैसे संख्याभास है ऐसे पूछे सूत्र कहैं हैं;- लोकायतिकस्य प्रत्यक्षतः परलोकादिनिषेधस्य पर, बुद्ध्यादेश्वासिद्धरतद्विषयत्वात् ॥ ५६ ॥ याका अर्थ-एक प्रत्यक्ष ही प्रमाण माननेवाला जो लोकायतिक कहिये चार्वाकमती ताक परलोक आदिका निषेधकी अर. परकी बुद्धि आदिको अनुमान आदि प्रमाण विना प्रत्यक्षहीत असिद्धि है 'जाते.ये परलोक आदिका निषेध परबुद्धि मादि प्रत्यक्षका विषय नाही॥याको विस्तार पहले संख्याका निरूपणवि कीया ही है सो इहां नाहीं कहिये है ॥ ५६॥ आगैं और वादीनिकी प्रमाणकी संख्याका नियम भी बिगड़े है ऐसे चार्वाकमतके दृष्टान्तके द्वारकरि तिनिके मतविर्षे भी संख्याभास ऐसे दिखाबैं हैं;- --

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
२११
सौगतसांख्ययोगप्राभाकरजैमिनीयानां प्रत्यक्षानु
मानागमोपमानार्थापत्त्यभावैरेकैकाधिकैाप्तिवत् ५७
याका अर्थ--जैसै बौद्ध, साख्य, नैयायिक, प्राभाकर, जैमि-
नीय कहिये मीमासक इनिम, बौद्धझै प्रत्यक्ष अनुमान” दोय,
साख्यकै प्रत्यक्ष अनुमान आगम ये तीन, योगकै प्रत्यक्ष अनुमान
आगम उपमान ये च्यार, प्राभाकरकै प्रत्यक्ष अनुमान आगम
उपमान अर्धापत्ति ये पाच, बहुरि जैमिनीय अभावसहित ये ही छह,
ऐसा सख्याका नियम है सो इनिका व्याप्ति विपय नाही यातै व्या-
प्तिका ग्रहण करनेवाला तर्क प्रमाण वधै तब सख्या विगडै तैसै चार्वा-
ककी भी सख्या परकी बुद्धि आदि प्रत्यक्ष विपय नाही ताकू ग्रहण
करनहारा अनुमान आदि ववै तब ताकी सख्या विगडै है । भावार्थ-
जैसैं सौगतादिक प्रत्यक्ष अनुमान आदि एक एक वधता प्रमाणकरि
व्याप्तिकू तर्क विना ग्रहण न करि सके है तैसै चार्वाक भी प्रत्यक्ष
करि परवुद्धि आदिकू ग्रहण न करि सके, ऐसा अर्थ है ॥ ५७ ॥
आज चार्वाक आदि कहै-जो परबुद्धयादिकी प्रतिपत्ति प्रत्यक्षकरि
मति होहु अन्यतै होसी, ऐसी आशकाकरि कहै है,
अनुमानादेतद्विषयत्वे प्रमाणान्तरत्वम् ॥ ५८ ॥
याका अर्थ-अनुमान आदिकीर परवुद्धिका ग्रहण मानिय है तो
अन्य प्रमाणपणा आया। इहा तत् शब्द करि परबुद्धयादिकपणा है यात
अनुमानादिककै परबुद्धयादिक विपयपणा होतै प्रत्यक्ष एक प्रमाण है
ऐसा बादकी हानि होय है ॥ ५८ ॥
आगें इहा उदाहरण कहैं है,
तर्कस्येव व्याप्तिगोचरत्वे प्रमाणान्तरत्वं, अपमा-
णस्याव्यवस्थापकत्वात् ॥ ५९॥

२१२
स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित-
.
याका अर्थ-जैसे तर्ककै व्याप्तिविपयपणा होते अन्य प्रमाणपणां
है बौद्धादिककै अन्य प्रमाण आवै है तैसें ही परखुद्धयादि अनुमानका
विपय मानिये तव अन्य प्रमाणपणा आवै है, अर जो कहै तर्क अप्र-
माण है तौ अप्रमाणकैं व्याप्तिका व्यवस्थापकपणां नाही है । इहा ऐसा
विशेष--जो एक प्रत्यक्ष ही प्रमाणका वादी चार्वाक है ताकरि वहुरि
प्रत्यक्ष आदिमें एक एक अधिक प्रमाणका वादी बौद्धादिक है तिनिकरि
स्वसंवेदन प्रत्यक्ष इन्द्रियप्रत्यक्ष ऐसे तो प्रत्यक्षके भेद अर प्रत्यक्ष अनु-
मान आदि भेदप्रतिभासका भेदकरि ही प्रमाणका भेद वक्तव्य है अन्य
किछू गति नाही है । सो प्रतिभासका भेद चार्वाक प्रति तो प्रत्यक्ष
अनुमानविप॑ है अर बौद्धादिक व्याप्तिज्ञान जो तर्क अर प्रत्यक्षादिन-
माण इनिविर्षे है, तातै सर्वहीकी प्रमाणसंख्या विगड़े है ॥ ५९॥
सो ही दिखावें हैं:-
प्रतिभासभेदस्य च भेदकत्वात् ॥६०॥
याका अर्थ-जाते प्रतिभास भेदकै ही प्रमाणका भेदकपणां है
तातै सर्वकी संख्या विगडै है। चार्वाककै तौ अनुमान विगाहै है जाते
प्रत्यक्षतें अनुमानका प्रतिभास जुदा है। अर बौद्धादिककै तर्क विगाडै
है जात प्रत्यक्ष अनुमानादिकतै तर्कका प्रतिभास जुदा है ।। ६०॥
आगै अब विषयाभासकू दिखावनेंकू कहै हैं;-
विषयाभासः सामान्य विशेषो दयं वा स्वतंत्रम्॥६१
याका अर्थ-प्रमाणका विपय सामान्यही एक कहै अथवा विशे-
षही एक कहै अथवा दोऊही स्वाधीन कहै तौ विपयाभास है ॥६॥
आगें पूछे है कि इनिक विपयाभासपणा कैसे है तहां कहै हैं,
तथाऽप्रतिभासनात्कार्याकरणाच ॥१२॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। २१३ याका अर्थ-जाते जैसे सामान्यमात्र विशेपमात्र दोऊ मात्र कह्या तैसे प्रतिभास नाही है वहुरि यह कार्य कारणहारा नाही है ।। ६२॥ आगें इहा आचार्य अन्यवादीकू पूर्छ है जो सामान्य आदि एका- न्तस्वरूप कार्यकू करै सो आप समर्थ होय करै है कि असमर्थ होय करै है ! तहा समर्थ पक्षमैं दूपण कहै हैं, समर्थस्य करणे सर्वदोत्पत्तिरनपेक्षत्वात् ।। ६३ ॥ याका अर्थ-जो कह सामान्य आदि समर्थ होय कार्य कर है तो कार्यकी सर्वकाल उत्पत्ति चाहिये जाते अन्यकी अपेक्षारहितपणा है ६३ बहुरि कहे सहकारीका सापेक्षते कार्य करै है यातै सर्वकाल उत्पत्ति नाहीं है ती तहा कहैं हैं, परापेक्षणे परिणामित्वमन्यथा तदभावात् ।। ६४ ।। याका अर्थ-जो परकी अपेक्षा करे तो ताके परिणामीपणा आवै पहलै न किया सहकारी आया तब किया तव सामर्थ्य नवीन आया तात परिणामी भया अर जो ऐसे न मानिये तो कार्य होनेंका अभाव है। भावार्थ-सहकारिरहित अवस्थाविपैं तौ कार्य न करै अर सहका- रीका सबध भये कार्य करे तब पहला आकार छोड्या उत्तर आकार ग्रह्या दोऊमै आप स्थित रह्या, ऐसे परिणामकी प्राप्ति होते परिणामी- पणा आया, वहरि ऐसे न मानिये तो जैसे पहले अभाव अवस्थाविर्षे कार्य करनेका अभाव है तैसे ही उत्तर अवस्थाविपै अभाव है ॥६॥ आगें दूसरा पक्षमै दोष कहैं है, स्वयमसमर्थस्याकारकत्वात्पूर्ववत् ॥६५॥ याका अर्थ-आप असमर्थ होय तौ कार्य करनेवाला नाही है जैसे पहले सहकारी विना कार्य करणहारा न था तैसैं अब भी नाही ॥६५॥ - २१४ स्वर्गीय प० जयचंदजी विरचित- आगँ फलाभास• प्रकाशता सता कहै है,---- फलाभासः प्रमाणादभिन्न भिन्नमेव वा ॥६६॥ याका अर्थ-प्रमाणतै फल अभिन्न ही कहै अथवा भिन्न ही कहै सो फलाभास है ॥ ६६ ॥ आगै इनि दोऊ पक्षमै फलाभासता कैसै ? ऐसी आशंका होते आद्य पक्ष जो प्रमाणतै फल अभिन्न ही है ऐसी ताक फलाभासता- विपै हेतु कहैं है:- अभेदे तद्व्यवहारानुपपत्तेः ॥ ६७ ।। याका अर्थ-जो प्रमाणतै फल अभेद ही कहिये तो प्रमाण फलका व्यवहार वर्णै. नाही, के तौ प्रमाण ही ठहरै कै फल ही ठहरै जातै दूसरा पदार्थ ही नाही ॥ ६७ ।। आगै कहै-संवृत्ति कहिये उपचार है नाम जाका ऐसी जो व्या- वृत्ति कहिये जुदायगी अवस्तुरूपताकरि प्रमाणफलकी कल्पना होहु, ऐसे कहें उत्तर कहैं है;- व्यावृत्त्यापि न तत्कल्पना फलान्तरादयावृत्याऽफ- लत्वप्रसंगात् ॥ ६८॥ याका अर्थ--जो व्यावृत्ति कहिये अवस्तुरूप जुदायगी ताकरि भी फलकी कल्पना नाही युक्त है जातै अन्यफलतै व्यावृत्ति कहिये जुदा- गगी ताकरि अफलपणाका प्रसंग आवै है । इहां यह अर्थ है-जैसे विजातीय फल जो अप्रमिति तिसतै व्यावृत्ति कहिये जुदायगीकरि फलका व्यवहार है तैसै अन्यप्रमितिरूप जो सजातीय फल तिसतै भी जुदायगी है, ऐसे अफलपणा ही आया ॥ ६८ ॥ अब इहा ही अभेदपक्षवि दृष्टान्त कहैं हैं;- हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। २१५ प्रेमाणान्तराचावृत्येवाप्रमाणत्वस्य ॥ ६९ ॥ याका अर्थ-जैसे अन्य प्रमाण करि व्यावृत्ति कहिये जुदायगी करि अन्य प्रमाणकै अप्रमाणपणाका प्रसग आवै है तैसै ही फलकै जानना । इहा भी पहले फलमै प्रक्रिया कही सो ही जोडि लेणीं । भावार्थ-जैसे प्रमाण ऐसे कहे अप्रमाणकी व्यावृत्ति है तौ अन्य प्रमा- णतै व्यावृत्त प्रमाण है सो भी अप्रमाण ठहरै तब ऐसे कहै ताके मनमै प्रमाण न ठहरै तेसैं ही विजातीय फलतै व्यावृत्त फल प्रमिति है सो ही सजातीय फल जो अन्य प्रमिति तिसतै भी व्यावृत्त है ऐसै अफल ही ठहरै ॥ ६९ ॥ आगै अभेद पक्षकू निराकरण करि आचार्य इस कथनकू संकोचैं हैं। तस्माद्वास्तवो भेदैः ॥ ७० ॥ याका अर्थ-तातै भेट है सो वस्तुभूत है, प्रमाण फलकै एकान्त करि अभेद ही नाही हे ।। ७० ॥ आगै भेद पक्षक दूपता सताकहै हैं,-- भेदे त्वात्मान्तरवत्तदनुपपत्तेः ।। ७१ ॥ याका अर्थ-प्रमाणकै अर फलकै सर्वथा भेद ही होते अन्य आत्माकी ज्यों यह याका फल है ऐसैं कहना न बने ।। ७१॥ आगें वादी कह-जो जिस आत्मविपै प्रमाण समवायरूप है तिस ही वि4 फल भी है ऐसे समवाय सबव करि प्रमाण फलकी व्यवस्था है तातें अन्य आत्मा विपै ताका प्रसग नाही, सो ऐसै कहना समीचीन नाही ऐसें कहै है;- (१) मुद्रित सस्कृतटीका प्रतिमे 'प्रमाणान्तरात्' इसके स्थानमे 'प्रमाणात्' इतनाही पाठ है (२) मुद्रित संस्कृतटोका प्रतिमें " तस्माद्वास्तवोऽमेद ऐसा पाठ है।

२१६ स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- - समवायेतिप्रसङ्ग ॥ ७२ ॥ याका अर्थ-समवाय संबंध होते अतिप्रसंग आवै है। भावार्थ- समवाय तौ नित्य है अर एक है व्यापक है सर्व आत्माकै समवाय तौ समान धर्म है तातैं यह इसहीका समवाय है ऐसा प्रतिनियम नाही ताते अतिप्रसग आवै है ॥ ७२ ॥ आगैं स्वपरपक्षका साधन दूषणकी व्यवस्था दिखावै है। प्रमाणतदाभासौ दुष्टतयोद्भावितौ परिहृतापरिह- तदोषौ वादिनः साधनतदाभासौ प्रतिवादिनो दूषण- भूषणे च ॥७३॥ याका अर्थ-वादीनें प्रमाण अर प्रमाणाभास स्थापे तिनि• प्रति- वादी दूषणसहित किये अर फेरि वादी ताका दोषका परिहार किया तथा परिहार न किया तौ ते दोज वादीकै साधन अर साधनाभास हैं अर प्रतिवादीकै दूषण अर भूषण दोज हैं । इहा ऐसा अर्थ है-वादी प्रमाण स्थाप्या प्रतिवादी ताकू दूषण दिया फेरि वादी तिस दोषका परिहार किया तो सोही वादीकै साधन है अर प्रतिवादीकै दूपण है। बहुरि जो वादी प्रमाणाभास कह्या अर प्रतिवादी ताकू प्रमाणाभास दिखाया फेरि वादी ताकू स्थाप्या नांही प्रतिवादीका वचनका परिहार न किया तौ तिस वादीकै सो साधनाभास है अर प्रतिवादीकै सो ही भूषण है।॥७३॥ आगें कह्या प्रकारकरि समस्त विप्रतिपत्तिका निराकरणद्वार करि पूर्व प्रमाणतत्व कहने की प्रतिज्ञा करी थी ताकी परीक्षा करि अब नय. आदिका स्वरूप अन्य शास्त्रमैं प्रसिद्ध है सो तहातै विचारनां, ऐसें. दिखावता संता सूत्र कहैं हैं;- हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। २१७ संभवदन्यद्विचारणीयम् ।। ७४ ॥ याका अर्थ-प्रमाणके स्वरूप” अन्यत् कहिये और संभवता होय सो विचारना । संभवत् कहिये विद्यमान अन्यत् कहिये प्रमाणके रूपते और जो नयका स्वरूप सो अन्य शास्त्रवि प्रसिद्ध है सो विचारना, इहा युक्तिकरि जानना । तहा मूल नय तौ दोय हैं, द्रव्यार्थिक, पर्या- यार्थिक भेदते । तहा द्रव्यार्थिक तीन प्रकार हैं, नैगम, संग्रह, व्यवहार भेदतै । बहुरि पर्यायार्थिक च्यार प्रकार है, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ, एवंभूत भेदतै । तहा परस्पर गौण प्रधानभूत जो भेदाभेद तिनिका है प्ररूपण जामै सो तौ नैगम है “ नैक गमो नैगमः" ऐसी निरुक्तितें, भावार्थ-यह नय एक ही धर्मविषै नाही वहै, विधि निषेधरूप सर्वही धर्मनिमैं एककू मुख्यकरि अन्यकुं गौणकरि सकल्पमैं ले वर्ते है । बहुरि सर्वथा भेदहीकू कहै सो नैगमाभास है । बहुरि प्रतिपक्षकी अपेक्षारहित सत्तामात्र सामान्यका ग्रहण करनहारा सो सग्रह है । सर्वथा सत्तामात्र कहै ऐसा ब्रह्मवाद सो सग्रहाभास है । बहुरि सग्रहकरि ग्रह्या ताका भेद करनहारा व्यवहार है । कल्पनामात्र कहै सो व्यवहाराभास है। शुद्धपर्यायग्राही प्रतिपक्षीकी अपेक्षा सहित होय सो ऋजुसूत्र है। क्षणिक एकान्त नय है सो ऋजुसूत्राभास है। बहुरि काल कारक लिंगनि आदिका भेदते शब्दकै कचित् अर्थभेद कहै सो शब्दनय है। अर्थभेद विना शब्दनिहीकै नानापणाका एकान्त कहै सो शब्दाभास है। बहुरि पर्यायके भेदतै अर्थकै नानापणा कहै सो समभिरूढ है। पर्यायका नानापणा विनाही इन्द्रादिक शब्दनिकै भेद कहै सो समभि- रूढाभास है। बुहुरि क्रियाके आश्रयकरि भेदका प्ररूपण करै 'याही प्रकार है' ऐसा नियम कहै सो एवभूत है। क्रियाकी अपेक्षारहित क्रियाके वाचक शब्दनिविषै कल्पनारूप व्यवहार करै सो एवभूतनयाभास है ।

२१८
स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित-
।
-
."
..
ऐसे नय तदाभासका लक्षण संपकरि कया। विस्तारकरि नयचक्र
ग्रंथत तथा तत्वार्थसूत्रकी टीकातें जाननां । अथवा 'संभवत् । कहिये
विद्यमान संभवता अन्य वादका लक्षण अर पत्रका लक्षण अन्य शास्त्रमैं:
कह्या है सो इहां जानना, तैसें कद्या है-" समर्थवचनं वाद" याका
अर्थ-जहा वादी प्रतिवादीकै अथवा आचार्य शिष्यकै पक्ष प्रतिपक्षका
ग्रहण” समर्थ वचनकी प्रवृत्ति होय सो वाट कहिये, जो हेतु दृष्टान्त
आदि करि निर्वाध वचन होय सो समर्थवचन कहिये । बहुरि पत्रका
क्षण कह्या है, ताका श्लोकका अर्थ-जो प्रसिद्ध जे पाच अनुमानके
अवयव ते जामै पाइये बहुरि अपना इष्ट अर्थका साधक होय बहुरि
निर्दोष गूढ जे पद ते जामैं वाहुल्यपणे होय ऐसा वाक्य होय सो
निर्दोष पत्र कहिये ॥७॥
आगैं अब आचार्य प्रारंभ किया ताका निर्वाह अर अपनां उद्धत-
पणांका परिहार दिखावता संता कहैं हैं।
श्लोक-परीक्षामुखमादर्श हेयोपादेयतत्त्वयोः ।
संविदे मादृशो बालः परीक्षादक्षवद्यधाम् ।।
याका अर्थ-मैं मंदबुद्धी परीक्षामुख नाम प्रकरण किया है, कैसा.
है यह हेय उपादेय तत्वका दिखावनेंकू आरसा सारिखा है, कौनकी
ज्यौं किया है-जैसैं परीक्षावि चतुर होय करे तैसें किया है, बहुरि
कौन आर्थ किया है-मो सारिखे मन्दबुद्धीनिकै ज्ञानकै आर्य किया
है। इहां वाल ऐसा पद कह्या तहां तौ उद्धतताका परिहारका वचन है।
बहुरि शास्त्रका प्रारंभ करि निर्वाह करनेंतें तत्वज्ञपणां निश्चय होय ही
(१) पत्रलक्षणम्-
प्रसिद्धावयवं वाक्यं स्वेष्टस्यार्थस्य साधकम् ।
साधुगूढपदप्रायं पत्रमाहुरनाकुलम् ॥१॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला।
२१९
।
है । बहुरि आरसाकी उपमा है सो जैसैं आपका अलकार आदिकरि
मंडित सुन्दरपणा अथवा विरूपपणा अरसामैं दीखै तैसै यामैं हेय उपा-
देय तत्व साधन दूपण द्वार करि दीखे हैं । वहुरि परीक्षादक्षकी ज्यो
कह्या सो जैसे परीक्षावान् अपना प्रारभ्या शास्त्रकू निर्वाहै तैसैं मै भी
निर्वाह किया है । ऐसा अर्थ है ।।
आगै टीकाकारकृत श्लोक है।
अकलंकशशाधैर्यत्प्रकटीकृतमखिलमाननिभनिकरम् ।
तत्संक्षिप्त सूरिभिरुरुमतिभिर्व्यक्तमतेन ॥ १ ॥
याका अर्थ-जो अकलक आचार्य रूप चद्रमाकरि प्रमाण अर
प्रमाणभासका समूह समस्त प्रगट किया सो माणिकनादि आचार्यनै
संक्षेपकरि कह्या, कैसे है आचार्य~-बड़ी है बुद्धि जिनकी, बहुरि सो
ही में अनतवीर्य आचार्य व्यक्त ( प्रगट ) किया है ॥ १ ॥
ऐसें परीक्षामुखनाम प्रमाणप्रकरणकी लघुवृत्ति-
की वचनिकावि प्रमाणआदिका
आभासका समुद्देशनामा छठा
परिच्छेद समाप्त
भया॥
आगै टीकाकार इस टीकाकी उत्पत्तिके समाचार कहै है,-
श्लोक-श्रीमान् वैजेयनामाऽभूदग्रणीर्गुणशालिनाम् ।
वदरीपालवंशालिव्योमद्यमणिसर्जितः ॥१॥
याका अर्थ-श्रीमान् कहिये लक्ष्मीवान् वैजेयनामा गुणनिकरि
शोभायमाननिविपै
मुख्य होता भया, कैसा है--बदरीपालका वशकी
जो आलि कहिये पक्ति परिपाटी सोही भया आकाश ताविपैं सूर्यसमान
महान् होता भया ॥१॥

२२० स्वर्गीय पं० जयचंदजी विरचित- बहुरि श्लोकः- तदीयपत्नी भुवि विश्रुताऽऽसीत् नाणांवनामा गुणशीलधीयो। यां रेवतीति प्रथिताम्बिकति प्रभावतीति प्रवदन्ति सन्तः ॥२॥ याका अर्थ-तिस वैजेयकी स्त्री पृथिवीविर्षे प्रसिद्ध नाणांव ऐसा है नाम जाका ऐसी होती भई, सो कैसी है-गुणनि करि शोभाय- मान बुद्धि अर लक्ष्मी जा पाइये, बहुरि जाकू रेवती ऐसा भी नाम प्रगट कहें हैं तथा अविका ऐसा भी नाम कहैं हैं तथा सत्पुरुष प्रभा- वती ऐसा भी नाम कहैं हैं ॥२॥ बहुरि श्लोक- तस्यामभूद्विश्वजनीनवृत्ति- दर्दानाम्वुवाहो भुवि हीरपारव्यः । स्वगोत्रविस्तारनभोंऽशुमाली सम्यक्त्वरत्नाभरणार्चिताङ्गः ॥३॥ याका अर्थ-तिस वैजेयकी नाणांबनामा स्त्रीवि हीरपनामा पुत्र होता भया, समस्त लोककू हितकारी है वृत्ति जाकी, बहुरि दान देनेकू पृथ्वीविष मेघसारिखा है बहुरि अपना गोत्रका विस्तार सो ही भया आकाश ताविपैं सूर्यसमान है, बहुरि सम्यक्त्वरूप रत्नका आभरणकरि शोभित है अंग जाका ऐसा होता भया ॥३॥ बहुरि श्लोक- तस्योपरोधवशतो विशदोरुकीत्तें- माणिक्यनंदिकृतशास्त्रमगाधबोधम् । (१) मुद्रित संस्कृत टीका प्रतिमें 'गुणशीलसीमा' ऐसा पाठ है।

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला। २२१ स्पष्टीकृतं कतिपयैर्वचनैरुदारै- लिप्रयोधकरमेतदनन्तवीर्यैः ॥ ४॥ याका अर्थ-तिस हीरपके आग्रहके वशतै मैं सत्य आचार्य अनतवीर्य माणिक्यनंदिकृत अगाधबोधरूप जो शास्त्र ताहि केई विस्तार रूप वचननि करि यह स्पृष्ट किया है, कैसा किया है-वाल जे मंदबुद्धी तिनिकै प्रकृष्ट ज्ञानका करन हारा है, बहुरि हीरप कैसा है. निर्मल है बडी कीर्ति जाकी ॥ ४ ॥ ऐसे परीक्षामुस प्रकरणकी लघुवृत्ति प्रमेय- रत्नमाला है दूसरा नाम जाका सो समाप्त भई॥ छप्पय । कलो प्रमाण स्वरूप, बहुरि संख्याविधि नीकी, फुनि तसु विषय विचार, सार फल विधि हू लीकी । तदाभास विस्तार कियो, परमत निषेध कर सुनि भवि लखै यथा स्वरूप, निज परमत जिम वर ।। मुनिराज बड़ो उपकार यह, कियो परीक्षामुखकथन । तसु देश वचनिका शुभ वनी, सुगम पढन सुनना मर्थन । आगै या वचनिका होनेके समाचार लिखिये है, (दोहा) ग्रंथ परीक्षामुखतनी, बनी वचनिका येह । समाचार ताके कहूं, सुनों भव्य जुतनेह ॥१॥ (चौपई) देश डुढाहर जयपुर जहां, सुवस वसैं नहिं दुःखी तहां। नृप जगतेश नीतिवलवान, ताकै बड़े बड़े परधान ॥ २ ॥ १ मनन.

२२२
स्वर्गीय पं. जयचंदजी विरचित-
प्रजा सुखी तिनिकै परताप, काहूक न वृथा संताप ।
अपने अपने मत सव चलें, जैनधर्महू अधिको भलैं॥३॥
तामैं तेरहपंथ सुपंथ, शैली बडी गुनी गुनग्रंथ ।
तामैं मैं जयचन्द्र सुनाम, वैश्य छावडा कहै सुगाम ॥४॥
मैं तौ आतम द्रव्य विशुद्ध, जाति नाम कुल सबै विरुद्ध ।
तौऊ कर्मतणे संयोग, है विभाव परिणतिको भोग ।।५।।
अशुभ मंदते शुभ अनुराग, धर्मबुद्धि जागी धनि भाग ।
तव विचार यह भयो सुसार, जैन ग्रंथ पढ़ि करि निरधारि॥६॥
पढ़ते सुनतै भयो सुवोध, न्याय ग्रंथको भी कछु शोध ।
स्यावाद जिनमतमें न्याय, ताकी रीति लखी कछु पाय ॥७॥
तर्फे विचारी इस कलिकाल, जैनन्याय बुध विरले भाल ।
प्रकरण देश वचनिकारूप, लघु सो होय करूं जु अनूप ॥८॥
तव यह लख्यौ न्यायको द्वार, कियो वचनिकारूप उदार।
भव्य पढ़ौ मन लाय अशेप, न्याय देशमै करो प्रवेश ॥९॥
निज परमतको जानों भेद, मिटै विपर्यय बुधिको भेद ।
स्वपरतत्त्वकौं जानि विचार, तजो विभाव रहो अविकारा॥१०॥
रत्नत्रय मारग लगि ताम, पहुचो मुक्तिपुरी सुखधाम ।
यह उपदेश जिनश्वरदेव, भॉप्यो ग्रहो करो तिनि सेव ॥११॥
पंडितजनसं यह अरदासि, करूं परोक्ष मान मद नासि ।
हीनाधिक जो यामैं होय, मूल ग्रंथ लखि सोधो सोय ॥१२॥
(दोहा)
बालवुद्धि लखि संतजन, हसै न कोप कराय ।
इहै रीति पंडित गहै, धर्मबुद्धि इम भाय ॥ १३ ॥

हिन्दी प्रमेयरत्नमाला । २२३ (छप्पय) नमूं पंचगुरुचरन सदा मंगलके दाता, वंदं जिनवरवानि सुनें पावै सुख साता । वीतरागता धर्म नमू जो कर्मनाशकर, चैत्यधाम अरु चैत्य नमूं सम्यकप्रकाशपर ॥ ए नव वंदन योग्य हैं जिनमारगमैं नित्य ही, मैं ग्रंथ अंतमंगल निमित करी वंदना सत्य ही १४ (दोहा) अष्टादश गत साठि त्रय, विक्रम संवत माहि । सुकल अमाढ सुचाथि बुध, पूरण करी सुचाहि ॥ १५ ॥ लिखी यह जयचंदन, सोधी सुन नंदलाल बुध लसि भाल जु शुद्धकरि, वांची सिखवौ बाल ॥ १६ ॥ इति श्रीपरीक्षामुख जैनन्यायप्रकरणकी लघुवृत्ति प्रमेयरत्नमालाकी श्री जयचदजीछाबडारुत देशभावामय बचानेका सम्पूर्ण। है

Prameyaratnamala

Author
Chhabara, Jayachandra
Title
Prameyaratnamala
File name
Prameyaratnamala
Text
OCR done
Published
2009/11
Publisher
Bombay, Anantkirti Grantha Mala
Language
Sanskrit
Pages
248
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain sahitya
DLI number
344287
Barcode
99999990234160.00
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Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Copyright permitted
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