Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Antar Ki Aawaz
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अन्तर की आवाज
मुनि ज्ञान
प्रकाशक
श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ
समता भवन, बीकानेर (राज.)
अन्तर की आवाज
मुनि ज्ञान
प्रथम सस्करण . अगस्त 2002, 2100 प्रतिया
मूल्य
15/-
अर्थ सहयोगी श्रीमान प्यारेलाल जी भडारी, अलीबाग
प्रकाशक:
श्री अ भा साधुमार्गी जैन सघ,
समता भवन, रामपुरिया मार्ग, बीकानेर
मुद्रक .
अमित कम्प्यूटर्स एण्ड प्रिन्टर्स, बीकानेर
दूरभाष: 547073
प्रकाशकीय श्रमण भगवान महावीर ने चतुर्विध सघ के कुशल सचालन का उत्तरदायित्व आचार्य श्री सुधर्मा स्वामी के कधो पर रखा। सुधर्मा स्वामी आचार्य श्री जम्बू स्वामी एव जम्बू स्वामी ने आचार्य प्रभव स्वामी के कधो पर रखा। उसके पश्चात् से आचार्य परम्परा निरन्तर गतिमान चली आ रही है। साधुमार्गी के इस दीर्घकालीन इतिहास मे ह्रास और विकास का क्रम चलता रहा है। यह सुखद सयोग रहा है कि ह्रास के विकट काल मे भी समर्थ एव सुयोग्य आचार्यो का पावन सानिध्य इस परम्परा को प्राप्त होता रहा है। श्रमण परम्परा मे लगभग 200 वर्ष पूर्व शिथिलाचार व्यापक रूप से फैलता जा रहा था। शुद्ध साधुत्व के दर्शन दुर्लभ होते जा रहे थे। क्षेत्र, धर्म स्थल एव शिष्यो के व्यामोह मे साधुता भग्न होती जा रही थी। ऐसे युग आचार्य श्री हुक्मीचन्द जी म सा का जन्म हुआ और उन्होने दीक्षित होकर आगमिक ज्ञान और शुद्ध साधुता के बल पर साधुमार्गी परम्परा को प्राणवान 녀 बनाया। आचार्य श्री हुक्मीचन्द म सा के बाद इस परम्परा को पश्चात्वर्ती आचार्यों ने उत्तरोत्तर आगे बढ़ाया। आज हमे परम प्रसन्नता है कि समता विभूति, समीक्षण ध्यान योगी आचार्य श्री नानेश के पट्टधर प्रशान्तमना, व्यसन मुक्ति के प्रेरक, श्री वाल प्रतिबोधक, आचार्य श्री रामलालजी म सा के सानिध्य मे साधुमार्ग की वह धारा विकसित रूप में उभर कर आ रही है। आचार्य श्री रामेश के निर्देशन मे श्री अ भा साधुमार्गी जैन सघ जिनशासन की सुरक्षा/सवर्धन के लिए कृत सकल्प है। सघ की शासन उन्नयन की विभिन्न प्रवृत्तियो में सत्साहित्य का प्रकाशन भी एक अह प्रवृत्ति है। प्रस्तुत कृति अन्तर की आवाज का प्रकाशन उसी ध्येय की पूर्ति है। प्रस्तुत कृति विद्वद्वर्य ओजस्वी व्याख्याता, सत प्रवर श्री ज्ञानमुनिजी म सा के ज्ञान का सदोह है। साधुमार्गी धर्म सघ के अष्टमाचार्य श्री नानेश के अन्तेवासी सुशिष्य श्री ज्ञानमुनिजी ने 13 वर्ष की अल्प आयु मे दीक्षित होकर उत्कृष्ट ज्ञान साधना, अथक लगन एव रचना धर्मिता द्वारा अपने नाम को सार्थकता प्रदान की है। मुनि श्री विद्वान साहित्यकार और सफल प्रवचनकार है। अपनी विद्वता और वक्तृत्वकला से उन्होने शासन की जो भव्य प्रभावना की है उससे सघ गौरवान्वित है। इतिहास, चितन स्मरण, काव्य उपन्यास, (3) कहानी, प्रवचन आदि अनेक विधाओ और विषयो पर आपकी गद्य व पद्य मे अनेक कृतिया प्रकाशित हो चुकी है। जो जैन-समाज मे समादृत है। प्रस्तुत कृति के लिए हम मुनि श्री के आभारी है। प्रस्तुत कृति अन्तर की आवाज का प्रकाशन अलीबाग निवासी सघ/शासननिष्ठ सुश्रावक श्रीमान प्यारेलालजी भडारी के अर्थ सौजन्य से हो रहा है। साहित्य के प्रकाशनार्थ प्रदत्त अर्थ सहयोग हेतु सघ हार्दिक साधुवाद एवं आभार ज्ञापित करता है। प्रकाशन प्रक्रिया मे सहयोग हेतु श्री उदय नागोरी धन्यवाद के पात्र है। पूरा विश्वास है मुनि श्री की कृति मे सन्निहित सदेश आत्मसात कर पाठक अतरावलोकन करने में समर्थ होगे और जीवन को सम्यक् दिशा मे अग्रसर करेगे। निवेदक शान्तिलाल सांड सयोजक साहित्य प्रकाशन समिति श्री अ भा.सा जैन सघ, समता भवन, बीकानेर अर्थ सहयोगी परिचय विद्वद्वर्य श्री ज्ञानमुनि जी म सा की प्रस्तुत कृति “अन्तर की आवाज' का प्रकाशन श्रीमान प्यारेलाल जी प्रेमराज जी भडारी, अलीबाग जि रायगढ (महाराष्ट्र) के अर्थ सौजन्य से हो रहा है, जो मूलत सोजत सिटी (राजस्थान) के निवासी है। श्री प्यारेलालजी की मातु श्री स्व श्रीमती उमरावबाई की गुरुदेव आचार्य श्री नानेश के प्रति अटूट श्रद्धा, अप्रतिम समर्पणा व अनन्य आस्था थी। आप आचार्य देव के चातुर्मास काल मे नियमित चौका लगाकर सन्त-सती दर्शन, प्रवचन श्रवण, धर्माराधना एव ज्ञानाराधना से लाभान्वित होती थी। ऐसी शासन समर्पित सुश्राविका के सस्कार विरासत मे प्राप्त कर श्री भण्डारी जी इन्हे निरन्तर अभिवृद्ध कर रहे है। किराणा के होलसेल व्यापार मे आपने प्रामाणिकता व राष्ट्रीय भावना द्वारा अपनी पृथक् पहचान बनाई है। श्रीमान प्यारेलालजी भण्डारी अनन्य गुरुभक्त, मूक समाज सेवी, आदर्श धर्मप्रेमी एव बेजोड सघ/शासन समर्पित है। सामाजिक/धार्मिक/ व्यावसायिक/सास्कृतिक/नैतिक क्षेत्रो मे विविध पदो पर रहकर आपने विशिष्ट सेवाए की है और कर रहे है। श्री अ भा साधुमार्गी जैन सघ के उपाध्यक्ष रूप में आपने सघ चेतना, सगठन सुदृढता, विविध प्रवृत्तियो सदस्य वृद्धि एव सत-सती विहार परिचर्या व्यवस्था क्षेत्रो में अभूतपूर्व, श्लाघनीय व अनुकरणीय कार्य किये है। सम्प्रति आप श्री साधुमार्गी जैन सघ, मुम्बई के उपाध्यक्ष, अलीबाग किराणा व्यापारी एसोसिएशन के अध्यक्ष तथा शासन द्वारा नियुक्त "भ्रष्टाचार निर्मूलन समिति'' अलीबाग के अध्यक्ष है। आप विगत तीन वर्षों से स्वाध्यायी सेवाए दे रहे है, जो स्तुत्य है। आपके चौविहार व शीलव्रत के प्रत्याख्यान है। आपकी देव, गुरु, धर्म के प्रति पूर्ण आस्था है। आपको भक्तामर, पुच्छिसुण, आदि कठस्थ है और आप अनवरत स्वाध्याय द्वारा शास्त्रो का ज्ञान अर्जित कर रहे है। आपने अतगडदशाग सूत्र के प्रकाशनार्थ दो बार अर्थ सहयोग प्रदान किया है। परन्तु लौकेषणा, पदलिप्सा एव प्रदर्शन से आप दूर रहते है। आपके पुत्र-द्वय व आत्मजा-द्वय सस्कारवान है और इन्होने आपके आदर्शों को आत्मसात किया है। ऐसे सघनिष्ठ भडारी परिवार के प्रति आभार। उदय नागोरी सदस्य, साहित्य प्रकाशन समिति (5) 1 2 3 4 6 13 15 अनुक्रमणिका विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ 1 अन्तर की वीणा 36 सर्वज्ञ भगवान की 36 2 सम्यक्तव उजाला 2 37. अष्ट कर्मो का भजन करने 37 3 अन्तर की ज्योति 38. तू सोच जरा नादान 38 4 मोह रिपु 39 हे प्रभुवर ! मेरी पुकार सुनो 39 5 समता पथ 5 40 भक्ति तेरी मै करता हू 40 6 धर्म हृदय में धार 41 करदो प्रभु मुझको पार है 41 7 प्रभु से पुकार 7 42 जागो भविजन जागो 42 8. अन्तर पुकार 8 43 पर्युषण सुखकारी 43 9 भव भव का प्यासा हू 9 44 झुकलो गुरुवर के चरणार 44 10 जिनवर का नाम 10 45 अन्तर के भगवान 45 11 भवो भवो मे घूमते 11 46 निज निज में ध्यान लगावो 46 12 ओ भाई रे 12 47 47 पर्युषण पर्व मनाते चलो 13 समता साधना मे रम लो 48 राजा हस्तिपाल के स्वप्न 48 14 प्रभु तुम्हारे द्वार पे 14 49 जरो प्रभु की भक्ति करिये 50 15 में जहा जहा गया 14 50 मुक्ति मे जाने का 51 16 भक्ति मे डूबा यह मन मेरा 51. समकित सुखकार 52 17 आओ भक्ति मे रम जावा 16 52 अरे सोच जरा इसान 53 18 महावीर जयती आई है 17 53 मुक्ति का पथ अपनाना है 54 19 गुरुवर मेरे महान है 18 54 जय जिनेश जय जिनेश 55 20 यह धर्म है क्षमा दीवानो का 19 56-78 मुक्तक 21 प्रभु तुम ही मेरे सहारे 20 79-82 गजल 22 प्रज्ञा के दिनेश 21 कविता 23 ओ सिद्ध प्रभु भगवान 22 85 1 जिन्दगी 24 हे भगवन मेरी विनत 23 86 25 सुन सुन रे सुन सुन 24 3 निज को पहचाने 87 26 प्रभु भक्ति 25 4 नानेश गान 88 27. मै धर्म नहीं करूगा तो 26 89 5 पछी का लालच 28 मोह का भाव हटाऊ प्रभु 27 90 6 महावीर जयती 29. भक्ति मे चित्त लगाना 28 7 आचार्य श्री जवाहर 91 30 समता योगी आचार्य नानेश 29 93 8 धुलाई करना सीखे 31. महावीर है तेरा नाम 30 94 9 दीक्षा 32 चातुर्मास समाप्ति पर 32 95 10 नव वर्ष 33 हमारा वन्दन है 33 96 11. शुभकामना 34 तभी तो मेरे भगवन है 34 97-127 शायरी 35 ध्यालो प्रभु को हृदय मंझार 35 (6) 2 क्रोध रे +
समर्पणा
करे।
समता योगी नाना गुरुवर,
समत्व भाव विस्तार
हो निमज्जित जो भी उसमे,
उसका भी
उद्धार करे।
अहेतु की कृपा सभी पर,
निश दिन वर्षण करते है,
ऐसे पावन कर कमलो मे,
सतत् समर्पित करते है।
दिनांक 25.9.99
-मुनि ज्ञान
उदयपुर
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अन्तर की वीणा
तर्ज- जय बोलो
अन्तर की वीणा बजने दो।
मानस पकज को खिलने दो।।टेर।।
विभाव का रग चढाया है,
जो बोध नही कर पाया है,
स्वभाव भाव मे रमने दो।।1।।
सुगध सदा ही देता है,
जो नही किसी से लेता है,
ऐसा ही जीवन बनने दो।।2।।
कीचड मे कमल ज्यो खिलता है,
पर कीच उसे नही लगता है,
ऐसा ही पालन करने दो।।3।।
जो सदा सदा मुस्काता है,
जो कभी नहीं मुरझाता है,
बस "ज्ञान" यही अब करने दो।।4।।
(1).
2
सम्यक्त्व उजाला
तर्ज.- जय बोलो...
गुणस्थान सीढिया चढ जाओ,
और मुक्ति महल को पा जाओ।।टेर।।
ससार एक यह सपना है,
न कोई उसमे अपना है,
अन्तर की भ्रान्ति मिटा जाओ।।1।।
सपने का सुख नहीं सुख होता,
सपने का दुःख नहीं दुःख होता
सुख दुख का भेद मिटा जाओ।।2।।
यह रिश्ते नाते झूठे हैं
पर मोहित व्यक्ति भूले हैं,
अब मोह भाव से हट जाओ।।3।।
जो आता है वह जाता है,
समतादर्शी सुख पाता है,
इस "ज्ञान" प्रकाश को पा जाओ।।4।।
२
(2)
3
अन्तर की ज्योति
तर्ज- जय बोलो
।
अन्तर की ज्योति जलने दो,
अज्ञान तिमिर को हरने दो।।टेर।।
सुज्ञान रूप यह दीपक है,
जो श्रद्धा का सदीपक है,
दीप से दीप को जलने दो।।1।।
जो मोह नीद मे सोया है,
वह आत्मभाव को खोया है,
नीद यही अब उडने दो।।2।।
जन्म-मरण का फेरा है,
नही यहा किसी का डेरा है,
अब कूच यहाँ से करने दो।।3।।
हे मुक्ति का अवधान जहाँ,
हे कर्मो का व्यवधान वहॉ,
बस धर्म चक्र को चलने दो।।4।।
(3)
4
मोह रिपु
तर्ज- जय बोलो
कर्मो का पतझड झरने दो,
मधु का मधुरस मन भरने दो।।टेर।।
जनम-जनम से भटक रहा,
अरू क्षणिक सुखो मे अटक रहा,
अन्तर तम को अब हरने दो।।1।।
मोह कर्म ने जाल बिछाया है,
जहाँ जीव भी आ अकुलाया है,
अब उसे रिपुवर से लडने दो।।2।।
विकृत रावण जग छाया है,
सीता पे हाथ उठाया है,
दूषित लकेश को हरने दो।।3।।
मोह ममता को त्यागो-त्यागो,
तज दो आलस भविजन जागो,
वीतराग भाव मन भरने दो।।4।।
नित "ज्ञान" की धारा बह जाये,
निज पर से दुर्गुण हट जाये
निर्मोही जीवन बनने दो।।5।।
+
(4)
5
समता पथ
तर्ज- जय बोलो
जो समता पथ अपनाएगा,
वो मुक्ति सौख्य को पाएगा।।टेर।।
नित जलती आग विषमता की,
नही आती भावना समता की,
तो मानव महादु ख पाएगा।। 1।।
बस प्रेम का सागर लहराये,
सहकार परस्पर दे पाये,
तब ही अभिनव रस पाएगा।। 2।।
मृग तृष्णा
मे मानव भूला,
ममता के झूले मे झूला,
वह मौत सिरहाने पाएगा।। 3 ।।
जागो जागो त्यागो-त्यागो,
स्वारथ की दुनिया से भागो,
तब "ज्ञान" अनुपम पाएगा114 ।।
(5)
5
6
धर्म हृदय में धार
तर्ज- हा होवे धर्म .
धर्म हृदय में धार, सुख को पाना है।।टेर।।
अशांत बना है सारा जीवन,
नही मिली है सुख सजीवन,
खोज लिया ससार ||1||
जगल से चल शहरो आये,
छोड झोपडी महलो आये,
किया खूब विस्तार ।।2।।
स्वारथ का विस्तार हुआ है,
मानवता का नाश हुआ है,
युग का यह आसार 113 11
धर्म मर्म को पाना होगा,
तब दुनिया का रक्षण होगा,
निश्चय लो उस धार 114 ||
राम-कृष्ण महावीर हुए हैं,
ईसा-बुद्ध और पीर हुए हैं,
किया धर्म प्रचार 11511
समता का नित भाव जगाए
ममता भाव को अब बिसराए
यही "ज्ञान" हितकार 116 11
(6)
प्रभु से पुकार
तर्ज- चिट्ठी आई है
.
नरतन पाया है, पाया है, नरतन पाया है,
भवो भवो के बाद, पुण्य पुज के साथ।।
मुश्किल से नर तन पाया है।।टेर।।
कर्मो को तू ने तोडा है, मुक्ति से नाता जोडा है,
ओ मुक्ति मे जाने वाले, लौट के फिर ना आने वाले,
सिद्ध लोक मे चला गया तू, हमको यहाँ पे छोड गया तू
मोह ममता तोड गया तूं, अपने मे ही झूम गया तू,
दुख पाते हैं सुख खोते हैं, राह तुम्हारी हम झोते हैं,
मुश्किल से नर तन पाया है।।1।।
सूख गई है मेरी नदिया, मुझ गई है मेरी कलियाँ
जिनवाणी याद कराती, भटके हुए को मार्ग दिखाती,
सुन्दर अवसर मैंने खोया, जनम-जनम मे मैं तो रोया,
तुझको मैं तो समझ न पाया, मोह ममता मे मैं भरमाया,
मन भी खाली तन भी खाली, कर्मो की है बात निराली,
दर्द हुआ तब यादे आई, कर नही पाया कुछ भी भाई,
मुश्किल से नर तन पाया है ||2||
धरती पर जब तू आया था, "ज्ञान" नही मैं कुछ पाया था,
चले गये हो तुम भी अब तो, रह गया हू मैं ही अब तो,
समझ न पाऊँ क्या है करना, दुनियाँ मे क्यों मुझको भटकना,
तू तो पूर्ण है तेरा क्या है, मेरे मन का हाल बुरा है,
तेरी वाणी मुझको कहती, मुक्ति का सदेश सुनाती,
तू ने सुख तो पूरा पाया, मेरा भाग्य मुझसे रूठाया,
(7)
शक्ति मुझको पूरी दे जा, कर्मों को मुझसे दूर भगा जा,
मेरी बात को सुनलो स्वामी, परचा तुम्हारा बडा है नामी,
मुश्किल से नर तन पाया है।।3।।
8
-
अन्तर पुकार
तर्ज- दिल के टुकड़े
प्रभु को रटते-रटते रहकर, कदम हमारे चल दिए,
बढते-बढते हम बढेगे, मुक्ति नगर मे चल दिये।।टेर।।
मन भी होगा, तन भी होगा, तव भक्ति मे वचन भी होगा।
तेरे बिना दिल न लगता,
दर्दो की जब याद आती, आखे भर-भर मेरी आती।
आके दर्शन मुझको दे जा.
शाति दे जा, ओ शाति दाता। छोड के हमको चल दिए।1111
झुके रहेगे आप चरण मे, अगर बनेगे तब शरण
सुनले पुकार सब से पहले,
चले जाएगे हम यहाँ से, पाएगे तुझको प्रभुवर मेरे।
शक्ति दे दो भक्ति लहरे,
सम्यक् "ज्ञान" को पूरा पाके, कर्म तोड के चल दिये।।2।।
(8)
9
भव भव का प्यारा हूँ
तर्ज- इक प्यार का नगमा है
भव-भव का प्यासा हूँ, नही पाया पानी है।
बदगी और किसी की नही, रट तेरी लगानी है।।टेर।।
कुछ देकर जाना है, कुछ
लेकर जाना है।
भक्ति से बढकर के. मुक्ति को पाना है।
खिल जाती मन कलियाँ, सुख सौरम पानी है।।1।।
आता जाता है, नही काई रहता है।
छोड के दुनियाँ को, एकाकी चलना है।
यादे रह जाती है, उठ जाता प्राणी है।।2।।
सोच समझ प्राणी, कर्मो की कहानी है।
सच्चा सुख पाने मे, समता ही निशानी है।
समता के सागर मे, डूबे वो "ज्ञानी” है 113 11
(9)
10
जिनवर का नाम
तर्ज- रिमझिम... .
जिनवर का नाम मन भावना होगा।
जिनवाणी सरसता सावन होगा।ाटेर।।
तेरे दर पे आके हम, खाली नही जाएगे।
मुक्ति का ही हम, वरदान पाएगे।
आत्मिक गुणो का उपवन होगा।।1।।
तेरी भक्ति से सारा ससार मैं जीतूगा।
जीतूगा, इस ससार से, उस पार मैं जाऊगा।।
अक्षय सुखो का सर्जन होगा। 12 ||
नानेश गुरु के हम गुणो को गाएगे।
जिनके उपकारो को हम भूल नहीं पाएंगे।
"ज्ञान" का नित-नित वन्दन होगा।।311
(10)
11
भवों भवों में घूमते
तर्ज- जनम-जनम का
भवो भवो मे घूमते नही पाया किनारा।
अगर प्रभु सम्बल को न पाये तो होवे नही निस्तारा ।।टेर।।
कर्मो से पूरा उलझा, भटका इस ससारे।
भरता हूँ अब आहे, कैसे दर्द विसारे।
दर्द भरे जीवन से उबकर, चाहूँ सुख ससारा।।1।।
भवो-भवो
राग-द्वेष मिटा के, मुक्ति को पा जाए।
जहाँ से फिर दुनियाँ मे, लौट के न आए।
मोक्ष नगर पहुंचाने वाले, तुम हो एक सहारा ।।2।।
भवो-भवो
दीन दुखी दुनियाँ को, नाना गुरु समझाए।
विषमता को हटाने, समता को अपनाए।
सम्यक् “ज्ञान" को पाने हेतु, मैंने तुम्हे पुकारा।।3।।
भवो-भवो
(11)
12
ओ भाई रे
तर्ज- ओ साथी रे . .
ओ भाई रे ! जिनवर पथ पर चलना।
भक्ति के रेले मे, गुणो के मेले मे।।
धर्म बिना मुक्ति नही ना ।।टेर।।
नाना गुरुवर परम ज्ञानी, चमक रहे जिनशासन नभ मे।
साधुमार्ग भी दमक उठा है, शाति सुरभि है जन-जन मे।।
डूबती नैया को पार लगाने मे, तेरे बिना और कोई ना।।1।।
इस शिविर मे बच्चे आए, ज्ञान की महकी वो खुशबू है।
इस शिविर से सन्मति पाकर, बढते जाओ यही कहूँ मै।।
शिक्षा यह भूले ना, मद मे तू फूले ना, धर्म ये भूले कभी ना।।2।।
तुझ विन गाँव रहेगा सूना, बिन पानी जिम बगिया सूनी।
फिर आने हेतु विनती करते, खिले-खिले यह बगियाँ पूरी।।
"ज्ञान" बिना क्रिया-क्रिया बिना ज्ञानी, वो ज्ञानी-ज्ञानी ना ।।3।।
(12)
13
समता साधना में रमलो
तर्ज- समझौता गमो से करलो
समता साधना मे रमलो-2 दुनियाँ मे दुख फिर भी मिलते है,
काटे-चुभते ही रहते हैं-2 कि फूल फिर भी खिलते हैं।।टेर।।
मिथ्यात्व हटेगा होगा उजाला, फिर तुम चलना ओ चलने वाले।
डूबते को तिराए, औरो को भी चलाए।।1।।
समता साधना
.
दुनियाँ मे सब घुमते आये, कर्मो के धक्के-2 सबने खाए।
दुनियाँ से सीखे जो, सच्चा पाठ पढाए।।2।।
समता साधना
जिनवाणी की मधुरिम धारा,
मिटता
दुख
जिससे सारा।
सरिता के तट पर आकर, रहना नही प्यासा 113 ।।
समता साधना
-
(13)
14
प्रभु तुम्हारे द्वार पे
तर्ज :- दिल के आसमा पे, गम की.
प्रमु तुम्हारे द्वार पे, मैं विनती लेकर आई।
आई-आई आई, विनती लेके आई।।
तेरी भक्ति से शक्ति मैंने पाई, आई टेर
दुनियाँ मे भटकी कर्मो के कारण,
दुखो को पाया मैंने, भव-भव जाकर
कर्मों को तोडो मरे करदो भलाई,
नरतन पाके मैंने, तुमको पहचाना, आई आई आई 1
डूब रही नैया को पार लगाना।
तुम ही हो मेरे प्रभु पार लगाई।। आई आई आई . 121
संबल तेरा पाके, हम उड चलेगे।
फिर नही आऐगे, साथ हम रहेगे।
दे दो सहारा मुझको, कर दो सुनाई। आई आई आई .131
.
15
मैं जहाँ जहाँ गया था
तर्ज- तू जहाँ चलेगा मेरा साया साथ होगा.
मैं जहाँ-जहाँ गया था, कर्म साया साथ आया।।टेर।।
कर्म अगर नहीं टूटेगा तो भटकूँगा भवो-भवो मे।
सुख पाऊ या ना पाऊं, दुःख होगा मुझ लवो पे।
मैं कहीं भी गया था, कर्म साया साथ आया।।1।।
तेरा अगर साथ न मिले तो, प्रमो मेरा फिर क्या होगा।
सही दिशा भूल करके, कांटों का पथ मिलेगा।
वढने लगा आगे मैं तो, कर्म साया साथ आया।।2।।
(14)
16
भक्ति में डूबा यह मन मेरा
तर्ज- कोरा कागज था यह मन मेरा .
भक्ति मे डूबा यह मन मेरा, दर्शन मैं चाहू निशदिन तेरा।
दुनियाँ मे उलझा यह मन मेरा। होवे भव पार तुझसे मेरा ।।टेर।।
बिखर न जाए मोती, तार पिरोता हूँ।
समता की भूमि मे, बीजो को बोता हूँ।
क्षमा के आगे, क्रोध भागे, आत्मा जागे।
मोह से भरा यह मन मेरा, कैसे होवे दूर यह मन मेरा ||1||
मुक्ति न पाई मैंने समता गवाई।
रोश मे भर करके, करू मैं लडाई।
ईर्ष्या मेरे सागे, दुर्गुण लागे, सद्गुण भागे,
कैसे स्थिर हो यह मन मेरा, सम्बल चाहूँ अब मैं तेरा।।2।।
जीवन मे
मृत्यु
के आने से पहले।
इन्द्रियों की शक्ति के खिरने से पहले,
मोह में न जाए, धर्म अपनाए "ज्ञान" को पाए,
विष से भरा था यह मन मेरा। जिनवर को पाए, अब मन मेरा।।3।।
(15)
17
आओ भक्ति में रम जांवा
तर्ज- म्हाने गंगा जी रो पाणी खारो-2 लागे
पावन
आओ भक्ति मे रम जावा, नाना रा गुण गौरव गावा,
गावा- गावा हिलमिल गावा,
पावन भक्ति री शक्ति स्यूं दुख दूर भागे,
म्हाने नाना गुरुरो नाम घणो व्हालो लागे।।टेर।।
श्रृगारा रा पुत्र दुलारा, मोडीलाल रा लाल है,
मेवाड देश रा चमका हीरा, सचमुच बेमिशाल है,
गुरु गणेशी शरणे आया, कियो खूब कमाल है,
समता दर्शन ध्यान समीक्षण, देने सुन्दर माल है,
थारी जय-जय नित-2 गावां, विषमता ने दूर भगावा,
11111
उगतो सूरज नित-2 चमके, करे दूर अधियार है,
कई सैंकडो दीक्षा देकर, कियो संघ विस्तार है,
हुक्म सघ री महिमा ने तो, फैलादी सुखकार है,
वदो इणरे चरणा माही, होवे दुःख निस्तार है,
आज्ञा प्राणा सु निभावां, साथ थारे मुक्ति जावा,
पावन . ||2||
आधा ने आंख्या मिल जावे, निर्धन भी धनवान है,
हिवडा माटी तुझे बिठाके, पावे देव विमान है,
रोग शोक भय दूर भगावे, एडो थारो ध्यान है,
थारी किरपा जिणवर बरसे, हो उणरो उत्थान है,
"ज्ञान" अनूठा म्हैं तो पावां, अन्तर आनन्द मे रम जावा,
पावन .113||
(16)
18
महावीर जयन्ति आई है
तर्ज- रविश रविश शशीन है.
महावीर जयन्ति आई है, हर्षित सभी को आज मन।
जयकार बार हजार है, मुस्का उठा सारा गगन।
जिन धर्म के है दिव्य भाल-भाल, झुकाऊ इनको मेरा सर ।
यही तो मेरे देव है, यही तो है मेरे सदन-3 ।।टेर।।
सिद्धार्थ तनय महावीर, त्रिशला के बाल है।
मानव को भा गये यही, देवो को भा गये यही-21
घर-घर मे मगलाचार है-2, खुशियो की नव बहार है।
ये झूम उठा ससार है, कि आये प्राणधार है।।
यही तो सबके ताज है-2, झुकाऊ इनको मेरा सर।
यही तो मेरे देव है, यही तो है मेरे सदन-2||1||
हजार ढाई जा चुके, पर लाजवाब जबाब है।
बडे-2 सिद्धान्त जो, सदैव जिन्दाबाद है।
अटल ये मेरी धारणा-2 अटल ये मेरा धर्म है।
मुझे तो इस पे नाज है, यही तो मेरा गान है।
इसी मे सब का साज है-2, झुकाऊ इस पे मेरा सर।
यही तो मेरे
11211
जीओ और जीने दो सभी को, एक यही झकार है-21
काटे निकाले भीतरी-2, खिलादे अपना ये चमन।
महावीर के झडे तले, हो जाए अपनी एकता।
प्रेम सबका राज है-2, हो जाता इसमे शात मन ।
यही तो मेरे देव हैं, यही तो ||3||
(17)
|19
गुरुवर मेरे महान् है
तर्ज- साजन मेरा उस पार है........
गुरुवर मेरे
गुरुवर मेरे महान् है, देते ये आतम ज्ञान है।।टेर।।
हम आ पहुँचे तेरे द्वार हैं, करते मिलकर तेरी पुकार हैं।
हो जाए अब मेहरबान है, कर दो बस मेरा कल्याण है।।
11111
बहुत वर्षों तक मैं तरसा हूँ, दर्शन पाकर मैं मन में हरषा हूँ,
सुख देता तेरा ध्यान है, हो जाता मुझको भान है,
गुरुवर मेरे .।।2।।
जब-जब हम तुमको ध्यायेगे, भक्ति रंग में हम खो जाएगे,
"ज्ञान" का कर दो उत्थान है, यह तो भवो भवो का गान है,
गुरुवर
मेरे. 11311
(18)
20 यह धर्म है क्षमा दीवानों का तर्ज- यह देश है वीर जवानो का . नही डरते गजसुख . यह धर्म है क्षमा दीवानो का, सरीफो का फकीरो का, इस धर्म के वीरो होय इस धर्मो के वीरो क्या कहना, यह धर्म है समता का गहना।।टेर।। जिन्दगी भरी है शूलो से, धर्म खिलाता है फूलो से, यहाँ दया है पावन होय यहाँ दया है पावन, अधरो पर दुख दर्द नही है चेहरो पर हो ऽऽऽ ||1|| मस्तक सीझे अगारो से, सहते है क्षमा विचारो से, होय नही डरते गजसुख दर्दो से, हो गये जुदा वे कर्मो से हो- ऽऽऽ ||2|| नवकार बडा है मत्रो मे, तत्रो मे और यत्रो मे, हरता दुख दारुण होय हरता दुख दारुण जीवो का, भरता है मानस वीरो का, हो ऽऽऽ ||3|| मानवता चीखे धरती पर, पर लगती नही रईसो पर, यहाँ बढता है स्वारथ होय, यहॉ बढता है स्वारथ मानव का हरता पीर परायो का हो ऽऽऽ ||4|| धर्म है सहायक जीवो का, हरता है पीर परायो का। देता सुख साधन साधन . होय देता सुख साधन मानव को भगाते कर्म दानव को, जहाँ राग द्वेष के काटे हैं, वहा दुख के सारे आटे है, इन आटरो से भव होय आटो से भव बढता है, और कर्मो से नित सडता है ।15।। (19)
21
प्रभु तुम ही मेरे सहारे
तर्ज- तू जब-2 मुझको पुकारे .
प्रभु तुम ही मेरे सहारे, मुझे करदो भव से किनारे,
हर पल तेरा नाम पुकारे, सुख पाऊ नही तेरे बिना रे।
मेरे जीवन को सजादो, उसे त्याग मे लगा दो।
मेरे प्यारे भगवन् शरण तेरी आ गया, प्रभु मन भा गया ।।टेर।।
देखो फसा हू मै प्रभु, जग के मोहक कीच मे।
बनके रूप पतगा मै, चूभा रहा हूँ तीर मे।
राग रूप इक छेद बन, जल से नाव भरा गई।
तेरी शक्ति भक्ति ही, जीवन धन्य बना गई।
मुझे राग से हटादो, मुझे द्वेष से बचा दो।
मेरे प्यारे भगवन, शरण तेरी आ गया, प्रभु मन भा गया।।1।।
हीरा अमोला पा उसे, मैने यू ही गवा दिया।
जीवन पुण्य बचाके मै, अर्ध्य चढाने आ गया।
तिमिर भरे इस देह मे, दीप जलाने आ गया।
भक्ति करने आपकी, चरणो मे मैं आ गया।
मुझे पाप से हटादो, मुझे पुण्य मे लगादो मेरे प्यारे ||2||
दुख तपते ससार मे, पाके क्षीण फूहार मे।
भूल के अपने आपको, भटका इस बहार मे।
जीवन के सही ज्ञान को, पाने के लिए आ गया।
लेके शरण तुम्हारी अव, सच्चे गुरु को पा गया।
मुझे भोगो से हटा दो, मुझे योगो मे लगा दो।
मेरे प्यारे भगवन शरण
11311
y
(20)
22
प्रज्ञा के दिनेश
तर्ज- हीरा मिसरी का
प्रज्ञा के दिनेश, नमो महावीराण।
तीर्थो के तीर्थेश, नमो महावीराण।।टेर।।
कुण्डनपुर मे जन्मे भारी।
झूमे सारे नर और नारी।
देते शुभ सदेश, नमो महावीराण।।1।।
धन वैभव और छोडी नारी।
तप सयम मे रहते भारी।
ध्यान करे ध्यानेश, नमो महावीराण।।2।।
कष्ट परिषह भारी सहते।
उपसर्गो से नही घबराते।
वन्दते सब देवेश, नमो महावीराणं।।3।।
स्यादवाद् का दीप जलाया।
सत्य अहिसा पाठ पढाया।
जय-जय हो जिनेश, नमो महावीराण।।4।।
"ज्ञान" अनूठा प्रभु
ने पाया।
बिगुल धर्म का तेज बजाया।
पा गए मुक्ति देश, नमो महावीराणं ।।5।।
(21)
23
ओ सिद्ध प्रभु भगवान
तर्ज- ऐ मेरे दिल नादान.
ओ सिद्ध प्रभु भगवान, मुझे शरण मे ले लेना।
मिट जाए कर्म सारे, मुझे सिद्धि वर देना।।टेर।।
तुम तिरते-तिराते हो, मुझ को भी तिराना है।
जन्मो से लगी भटकन, अब उसको मिटाना है।
जन्म, जरा, मृत्यु से, मुझ को हटा देना ।।1।।
क्षण-क्षण बदले जीवन, नही सुख का ठिकाना है।
कषाय हटाकर के तव चिन्तन लाना है।
अमूर्त रूप भगवन् अब मुझको दिखा देना।।2।।
सब मेरे मै उनका, यह भाव सदा रखना।
स्वारथ की दुनियाँ मे, परमार्थ भाव रखना।
मिलेगा "ज्ञान" केवल, फिर मुक्ति पा लेना,
ओ सिद्ध प्रभु
||3||
..
.
(22)
24
हे भगवन
तू मेरी विनति
तर्ज-दिल दिवाना
हे भगवन तू मेरी विनति सुन लेना ।
हम पापी हैं तव भक्ति बिन बदले ना ऽऽ ||टेर।।
अनन्त जन्म से घूम रहा हूँ, कैसे मुक्ति पाऊँ।
मानव तन को पाकर के, भी समझ तुझे ना पाऊँ।
इस भटकन को और कोई भी जाने ना ऽऽ
||1||
हम पापी हैं.
तव भक्ति से शक्ति पाकर, विजय श्री पा जाऊँ।
विश्व व्योम मे फैल के तेरा, गुण
गौरव मे गाऊँ।
तव भक्ति बिन सार न कोई पाए ना ऽऽ
11211
हम पापी हैं
सच्ची सेवा करके जो भी, साथ तुम्हारा पाए।
अनहोनी को होनी बना दे, सत्य ध्वजा फहराए।
"ज्ञान" क्रिया से मुक्ति को तू पा लेना ऽऽ,
||3||
हम पापी हैं
(23)
25 सुन सुन रे सुन सुन रे तर्ज- उड उड रे उड उड रे कर्म कट्या. . सुन सुन रे सुन सुन रे सुन सुन रे म्हारा अन्तर मनवा। कर्म कट्या मुक्ति पासी-21|टेर।। तेरे मेरे का स्वार्थ बडा है। लडता उसमे तू भी खडा है। मुक्ति का नही पथ पासी। ||1|| मोह भाव को मन से हटाले। समता को तूं मन मे रमाले। सुख शाति सदा ही मिल जासी। 1121॥ आत्म ज्योति को तू प्रगटाले। पाप तमस को दूर भगाले। तब ही तो आनन्द पासी। 11311 कर्म कट्या. कर्म कट्या कर्म कट्या मानव का तन दुर्लभ पाया। मानवता बिन सजा न पाया। भव भ्रान्ति कैसे मिट पासी। 114॥ चार काट कर "ज्ञान" को पाले। आठ काट कर मुक्ति पाले। शाश्वत सिद्धि मिल जासी। कर्म कट्या मुक्ति..... .11511 (24)
26
प्रभु भक्ति
तर्ज- ए दिल-ए दिल
सुदूर रहते हो तुम हमसे,
पाएगे कैसे तुमको दिल से, एक जिन-ए-जिन
भक्ति मे दिल लगाकर रहूँगा,
चरणो मे सिर को नमाके चलूगा, ऐ जिन-ए-जिन ।।टेर।।
ये राग क्या है, विराग क्या है,
पता न मुझको तव भक्ति क्या है।
अमूर्त पन है फिर आकृति है,
तेरी अनोखी लगती कृति है।
क्षमा की राहो पे चलना होगा,
काम विभावो से बचना होगा।
कष्टो से मैं कभी न डरूगा।
तव भक्ति मे मन को रग लूगा।
ए जिन-ए जिन
भक्ति से दिल को तरास लूगा,
फिर नूर तेरा तलाश लूगा
मन मोह इतना रगीन क्यो है,
बतादो जग मे लगाव क्यो है।
मुझे है तुमसे सुख शान्ति चाहत,
मिलेगी तुमसे कर्मो से राहत।
ए जिन-ए जिन
भटका न पाए कोई भी हमको,
पूजेगे हरदम हम सब भी तुमको।
(25)
मुझे तो दुनिया का न कोई डर, जब से बिठाया है तुमको निज घर। विषयों ने मिलकर जुदा किया तो। फिर मैं जमाने से लडकर रहूंगा, खुदा की कसम मे जी कर रहूंगा। ऐ जिन ऐ जिन....... ....... 27 मैं धर्म नहीं करूँगा तो तर्ज- तू कल चला जाएगा . मैं धर्म नही करूगा तो मैं कहाँ जाऊँगा। मैं दान नहीं देऊंगा तो मैं कहां जाऊँगा। मैं शील नही पालूंगा तो मैं कहाँ जाऊँगा। मैं तप नहीं करूंगा तो मैं कहाँ जाऊँगा।टेर।। धर्म-ध्यान तो कही, मन मे न लाऊँ मैं। नरतन पाया मैंने, कैसे सार पाऊ मैं। सार नहीं पाऊँगा तो मैं कहां जाऊँगा।।1।। दुनियाँ में कौन है, किसको पुकारूँ। मोह भरे जीवन में, प्रमु कैसे धारूं। जिन को नहीं पाऊँगा, तो मैं कहा जाऊँगा।।2।। कर्म तोड कर मुझे आगे-2 वढना। भटकता नहीं है मुझे मुक्ति प्राप्त करना। सम्यक्त्व नहीं पाऊँगा तो मैं कहाँ जाऊँगा।।3।। बज उठेगी वहाँ सुख की शहनाई। फिर नहीं आएंगे कहता मैं जाई। यह "ज्ञान नहीं पाऊँगा तो मैं कहाँ जाऊँगा।411 44 (26)
28
मोह का भाव हटाऊँ प्रभु
तर्ज- सच्चा भगत बन
मोह का भाव हटाऊँ प्रमु, ध्यान तुम्हारा ध्याकर के।।टेर।।
मूर्णा भाव को दिल से हटा के।
सच्ची श्रद्धा दिल मे जगा के।
एक ही ध्यान मे ध्याऊँ प्रभु 11111
आओ अब हम ध्यान लगाए।
मन तद्रा को
दूर भगाए।
सोई दुनियाँ जगाऊँ प्रभु ||2||
"ज्ञान" अनुपम
उसमे भरा है।
देह भेद ही निश्चय खरा है।
देह का मोह हटाऊँ प्रभु ||3||
वर्ण नही है जहाँ पे मेरा।
निर्लेप रूप है वहाँ पे मेरा।
रूप नही अब पाऊँ प्रभु 114।।
समता दीप को मन मे जलाए।
ममता तिमिर
को दूर भगाए।
"ज्ञान" यही पथ पाऊँ प्रभु, 15 ।।
(27)
29
भक्ति में चित्त लगाना
तर्ज- जीवन सफल बनाना
।
भक्ति मे चित्त लगाना, लगाना भवी नरतन माय जी।।टेर।।
तेरा मेरा भेद हटाके।
मुक्ति पथ पर कदम बढाके।
समता की बीन बजाना, बजाना प्रभु
ध्याता मैं हूँ ध्येय तुम हो।
गाता मैं हूँ गेय तुम हो।
प्रेय का ध्येय मिटाना, मिटाना प्रभु .।।2।।
शाश्वत सुख है लक्ष्य हमारा ।
टूट कभी नही तार तुम्हारा।
तार से तार मिलाना, मिलाना प्रभु
11311
म
A
(28)
30
समता योगी- आचार्य नानेश
तर्ज - नीला घोडा रा असवार
.
नाना गुरु महान है, वन्दन बार बार।
पाट आठ पे दीपते, दुनिया मे हितकार ||दोहा।।
जिनशासन रा थे श्रृंगार, समता रो थे करो प्रचार।
समता देता ही जाजो जी।।टेर।।
दाता गाव मे जन्म लइने आया जगरे माय ।
कपासन मे लीनी दीक्षा, भरी जवानी माय।
शिष्य गणेशी रा सुखकार, करी साधना थे हितकार,
समता देता ही जाजो जी।।1।।
महलो मे थे पदवी पायी, राजा नही महाराज।
ज्योति फैली जग मे थारी, झुकती सकल समाज ।
साधुमार्ग रा थे आधार, भवी जीवो के हो पतवार ।
समता देता ही जाजो जी।।2।।
नाना नाम मे शक्ति भारी, नाना दुख मिटाय।
श्रद्धाभाव से कियो जापतो, सुख शान्ति मिल जाय।
मन वाछा ने पूरण हार, चिन्ता सारी चूरण हार।
समता देता ही जाजो जी।।3।।
ध्यानो मे है ध्यान समीक्षण, हितकारी जग माय।
यशो दुदुभी बजती भारी, सभी दिशाओ माय।
सद्गुणो रा थे भडार, दूर कियो है मन विकार
समता देता ही जाजो जी।।4।।
करे विनति हम सब मिलकर, सुनो एक अरदास।
कर्म जोड के मुक्ति दे दो, होवे तब विकास।
"ज्ञान" धनरा थे दातार, सब जीवो रा तारणहार।
समता देता ही जाजो जी।।5।।
(29)
31
महावीर है तेरा नाम
तर्ज -नीला घोडा रो असवार
महायोगी महावीर के, झुकते हम चरणार।
जिनकी भक्ति भाव से, बेड़ा होता पार।।दोहा।।
कुण्डलपुर मे जन्मे आप, मेट्यो जगरो सब सताप।
भक्ति गीत गुंजाएं हम ।।टेर।।
सुरगण सारे दौड़े आये, जन्म महोत्सव माय।
मेरू ऊपर लेग्या थाने, मन मे मोद मनाय।
त्रिशला सिद्धार्थ है मां बाप, तीन ज्ञान ले जन्मे आप।
भक्ति गीत गुजाएं हम।।1।।
पंच मुष्टि लोच करी ने, लीनो सयम धार।
तप संयम मे झोकी काया, किया आत्म उद्धार।
पायो-पायो ज्ञान अनाप, दर्शन को भी नहीं हैं माप।
भक्ति गीत गुजाए हम ।।2।।
अर्जुन जैसो हिंसक तिरग्यो, तव चरणो मे आय।
चोर भयंकर रोहिणेय भी, गया मुक्ति के माय ।
जपते मिलकर तेरा जाप, दूर हो सारे मेरे पाप।
भक्ति गीत गुजाए हम। 13 ||
छ काया का पाठ पढाया, स्याद्वाद सिद्धान्त।
सुरभि फैली जग मे तेरी, कैसी शांत प्रशांत।
पायो-पायो मुक्ति धाम, सुख शान्ति है आठो याम ।
भक्ति गीत गुंजाएं हम 114 11
(30)
मा बाप के वर्द्धमान हो, वृद्धि हुई घर माय।
देवो के तुम महावीर हो, दैविक शक्ति भगाय।
आओ आओ आतमराम, मिलते सुख के मीठे आम।
भक्ति गीत गुजाए हम ।।5।।
याज्ञिक हिंसा दूर भगाई, दिया खूब उपदेश।
"ज्ञान" सूर्य जब उदय मे आया, तम का रहा न शेष।
जग मे तेरा है प्रताप, मिटाया तीन लोक का ताप।
भक्ति गीत गुंजाए हम।।6।।
(31)
32
चातुर्मास समाप्ति पर
अब हुआ पूर्ण चौमास, विदाई म्हे लेवा जी म्हे लेवा,
अब करजो धर्म ध्यान, सीख आ म्हे देवा जी म्हे देवा ।।टेर।।
गुरु आज्ञा पा कोटा आए।
चार मास भी यही बिताए।
अब तो करना है विहार . ||1||
जिनवाणी का पान कराया।
धर्म का सच्चा मार्ग बताया।
पावे मुक्ति धाम ....
.. 11211
भाई बहनो ने ठाठ लगाया।
तप सयम को खूब रमाया।
किये त्याग पच्चखाण।।3।।
स्नेह सभी का हमने पाया
भाई बहनो ने खूब निभाया।
यह भूल न पाए बात।।4 !!
अन्तिम बात को ध्यान से सुनलो।
यहाँ आकर सामायिक करजो।
होसी जद कल्याण | 5 ||
रगडा झगडा कभी न करजो।
हिलमिल करके सिगला रहजो।
होसी तब उत्थान ।।6।।
प्रवचन भीक्षा तप सयम मे।
दर्द हुआ यदि किसी के मन मे।
करे क्षमायाचना खास
विदाई म्हे. 11711
(32)
33
हमारा वंदन है
तर्ज- आज हमारे दिल मे
आज प्रभु चरणन् मे हमारा वदन है,
करने बैठे भक्ति प्रभु का सुमिरण है।
श्रद्धा के पुष्प चढाये, करे हम अर्चन हैं,
करने बैठे भक्ति प्रभु की सुमरण है।।टेर।।
भक्ति से तुम्हारो, दुख दर्द भागे,
पशु पक्षी भी प्रेम में पगे,
सुख अनुपम पाये हो ऽऽऽ 2 जिनके हम गायक हैं,
आज भी जिनवाणी हमारी सहायक है।।1।।
तोडो कर्मो की लडी, जोडो मुक्ति से कडी,
अनत शाति तो मिलती यही।
हमको भी यह बताये हो II 2 प्रभु मेरे पावन है,
जपने से ही जिनको बने मन सावन है।।2।।
मेरी है यह चाह, न हो तुम जुदा,
भव-2 मे तेरा साथ हो सदा,
दिल की बात बताये हो ऽऽऽ-2 तुम्ही मेरे जीवन हो,
दुनियाँ से बेखबर, मैं रहूँ तेरे आगन मे ।।3।।
(33)
34
तभी तो मेरे भगवन् है
वर्ज- ना कजरे की धार.
हो-211
ना क्रोध का आकार, ना मोह का विकार।
ना अहं का प्रसार, तभी तो मेरे
भगवन्
अतर मे ज्ञान भरा, करते तुम दान खरा।
गाते हम गान तेरा, तुम्ही तो मेरे भगवन हो।।टेर।।
अनन्त शक्ति के धारक, समता की बहती धारा,
तुम सुख के हो प्रदाता, कर्मो को तूने मारा।
मिले शान्ति जब दिखे तू-2 करते हो दुख निवार।
अतर में ज्ञान भरा 11111
सारी दुनिया चली आई, तेरे चरणो मे शीश नमाई,
तुम सबके तारण हारे, देवो ने गाथा गाई,
थे अनगड तुम्हे ध्याकर-2 जीने का राज मिला,
अतर मे ज्ञान भरा, करते तुम दान खरा,
गाते हम गान तेरा. 11211
तेरे नयनो से शाति झरती, चलने पर फूल खिलते,
तेरा "ज्ञान” है निराला, पशु पक्षी भी आ हसते,
तेरा जीवन है, संजीवन, मैं पाऊँ सुख अपार,
अंतर मे ज्ञान भरा . |13 11
+
,
(34)
35
ध्यालो प्रभु को हृदयमंझार
तर्ज- सेवोसिद्ध सदा
ध्यालो प्रभु को हृदय मझार, जिससे होगा सब श्रेयकार ।।टेर।।
अमूर्त रूप है सिद्ध प्रभु का, दिव्य तेज के लार।
सभी कर्म की क्षपणा करके, किया आत्म उद्धार ।।1।।
अचल अमल अविकार रूप है, अतुल
शक्ति भण्डार।
सादि अनत रूप आपका, अनन्त गुणा
विस्तार 11211
जाग्रत होकर निज जीवन से, जगा दिया ससार।
ज्योत-ज्योत मे ज्योत विराजे, अभेद भाव के लार ।।3।।
जन्म, जरा, मृत्यु के भय से, हुए दूर हितकार।
देह भाव से ऊपर उठकर विदेह भाव स्वीकार।।4।।
राग-द्वेष को दूर भगाया, वीतरागता धार ।
निराकार-आकार चेतना का करके विस्तार। 15 ।।
विमल भाव से निश दिन प्रभु का, करे ध्यान सुखकार।
आत्मा का परमात्म भाव मे, तब होवे विस्तार।।6।।
अक्षय रूप मे लीन आप तो, अक्षय रूपता धार।
"ज्ञान" भी अक्षय, दर्शन अक्षय, निरूज नित्यता लार,
ध्यालो प्रभु को..
को.. . 117||
(35)
36
सर्वज्ञ भगवान की
तर्ज- सुबह और शाम की
सर्वज्ञ भगवान की, भक्ति युक्त भाव से।
करो तुम उपासना हो-हो करो तुम आराधना
सम्यक्त्वी के भाव से, सम्यक् ज्ञान पाय के।
करो तुम आराधना हो-हो करो तुम आराधना।।टेर।।
क्रोधादिक कषाय भरे है, मिथ्यात्व की अवधारणा।
अनन्त काल से भटक रहे तुम, करो अपूर्व साधना।
ग्रन्थि पार जाना, सम्यक् द्वार पाना।
करो तुम उपासना, हो हो करो तुम उपासना।।1।।
शम दम और निर्वेद भाव से, आगे बढ़ते जाना।
दुखी जीव को देख सदा ही, दया भाव उर लाना।
आस्था का बाना, रग मजीठा लाना।
करो तुम उपासना हो हो 11211
देव गुरु की भक्ति करके, सच्ची शान बढाना।
सत्य अहिसा- अनेकान्त से, जीवन को विकसाना
शील को अपनाना, दुर्गुण सब विसराना
करो तुम उपासना हो हो।।3।।
औपशमादिक से हटकर के क्षायिक भाव जगाना।
शुद्ध स्वरूपी समझ के निज को, आगे बढते जाना।
यश लिप्सा नही लाना- विनय भाव मे आना।
करो तुम उपासना हो हो 114 ।।
(36)
वीर प्रभु की भक्ति करके, वीरता प्रकटाना। शत्रु [-मित्र पर समता रखकर क्षमा शील बन जाना। धर्म ध्यान ध्याना, श्रेणी पर चढ जाना। करो तुम उपासना हो हो-21 15 ।। कर्म चतुष्टय तोड के तुम को, चतुर्थ ध्यान मे आना। योग निरोध की करके क्रिया, सर्व सिद्धियाँ पाना। "ज्ञान" पुज बन जाना लौट कभी नही आना। करो तुम उपासना हो-हो-2116 ।। 37 अष्ट कर्मो का भंजन करने तर्ज- जरा सामने तो अष्ट कर्मो का भजन करने, अतर का खोलो द्वार है। अन्तर मे बैठा परमात्मा, उसे पाना ही जीवन का सार है।।टेर।। यथाप्रवृत्ति से बढकर के, अपूर्वकरण मे जाना है। अनिवृत्ति से आगे बढकर समकित को प्रकटाना है। यह मुक्ति का निश्चित द्वार है, भव्यो का उत्तम सार है। अतर मे बैठा ||1|| पर मे भी अपने को देखो, तब जीवन सरसाना है। दुर्गुण मे भी सद्गुण मिलते, कृष्णभाव को लाना है। होगा तब ही तो क्षायिक भाव है, समकित का हो निखार है। ||2|| अप्रमत्त भाव से नित नियमो को, नित प्रति करते जाना है। बूद-बूद से घट भर जाता, ऐसे ही भर जाना है। नही क्षण भर भी करना प्रमाद है, हो गुणो का तव निखार है। अतर मे 1|3|| मोह कर्म ही सबसे घातक, भव-भव मे भटकाता है। लांछित करके सारा जीवन, अपयश खूब बढाता है। नहीं माना जातात हातात अतर मे
38
तूं सोच जरा नादान
तर्ज- तूं भूल के अपने आप.
तू सोच जरा नादान, प्रभु धर ध्यान, लगा मन सारा
दुनिया से करके किनारा ।।टेर।।
नही कोई तुम्हारा अपना है,
यह दुनिया सारी सपना है।
नही कोई चलेगा साथ, समझ मन प्यारा।
दुनिया से करके किनारा ||1||
जो रिश्ते लगते प्यारे है, एक समय बाद सब खारे है।
देने को तत्पर प्राण, हरे वही प्राण हमारा।
दुनियाँ से करके किनारा ।।2।।
इस तन के मोह को त्याग जरा।
झट धर्म-ध्यान मे लाग खरा।
पायेगे मुक्ति धाम, मिले सुखसारा।
दुनियाँ से करके किनारा ।।3।।
जड तत्त्वो मे नही फसना है।
जो चेतन उसमे अपना है।
कर ले तू उसका "ज्ञान” मिटे भव सारा । 14 ।।
.
(38)
39
हे प्रभुवर ! मेरी पुकार सुनो
तर्ज- उठ भोर भई
को
अय भगवन ! मेरी पुकार सुनो,
भव पार करो, भव पार करो।
तुम कर्मो का सब भार हरो,
भव पार करो, भव पार करो।।टेर।।
हम जन्म-2 से भटक रहे,
मिथ्यात्व मोह मे अटक रहे,
दुनियावी सुखो मे लटक रहे, भव पार करो।।111
तुम तिरते और तिराते हो,
कर्मो से मुक्त कराते हो,
भव्यो को पार लगाते हो, भव पार करो।।2।।
हमें सच्चे
सुख
पाना है,
दुख द्वन्द्व को दूर भगाना है,
अब शरण तुम्हारी आना है, भव पार करो।।3।।
तुम अनन्त शक्ति के दाता हो,
हम सबके भाग्य विधाता हो,
तुम मुक्ति पथ सधाता हो, भव पार करो 11411
तुम विमल भाव के धारक हो,
विभाव भाव के वारक हो,
सब विघ्नो के सहारक हो, भव पार करो।15।।
मैं कौन कहाँ से आया हूँ,
यह समझ न अब तक पाया हूँ,
यह पाने "ज्ञान" में आया हूँ भव पार करो 11611
(39)
40
भक्ति तेरी मैं करता हूँ
तर्ज- तेरी अदाओ पे
भक्ति तेरी मैं करता हूँ, गुण तेरे गुण मैं गाता हूँ।
चरणो मे तेरे झुकता हूँ, शुभ तेरे दर्शन पाता हूँ।।टेर।।
जरा सुनलो प्रभु कुछ कहना है,
चरणो मे निशदिन अब रहना है।
देखो मेरे कर्मो को दूर हटाओ,
अन्तर मन का दीप जलाओ।
तुम हो ज्योति, बाती मैं हूँ,
तेल उसमे भी भरना, दे दो तुम मुझे शरणा-3
तुझे देख खुशी से भरता हूँ।।1।।
प्रमुवर तुम क्या चाहते हो,
मुझको क्यो तुम विसराते हो।
प्रश्न इसीलिए मैं करता हूँ,
हर वक्त कृपा तव चाहता हूँ।
छाया तेरी मैं पाऊँगा,
"ज्ञान" सही मैं पाऊँगा-3
शरण तेरी बस चाहता हूँ|12||
41
कर दो प्रभु मुझको पार है
तर्ज- हमको सिर्फ तुमसे
करदो प्रमु मुझको पार है, करदो प्रभु मुझको पार है।
कह रही है मेरी आत्मा, करदो सुख विस्तार है।।टेर।।
करते रहे हैं भव-भव भ्रमण,
मेरा कब यहा से होगा सिद्धि मे गमन-2,
शुद्ध भावना शुद्ध साधना,
तेरे चरणों मे आये रहने सर्वदा।
दम ना लेंगे तुमसे दूर हम,
तेरे चरणों मे ध्यान है।।1।।
चलते नहीं हम तेरी राह पर,
एक क्षण भी, तेरी मन मे आई ना लहर-2,
हम विमावों में, हम विकारो मे,
भटक कर हम हुए बदहाल हैं,
अब तो हम पे कर दो महर,
आए हम तेरे द्वार हैं।12।।
(41)
42
जागो भवी जन जागो......
तर्ज- बच्चे मन के सच्चे
जागो भवीजन जागो, जग जग कर लाभ उठाओ।
कर्म काटकर मुक्ति पाने, आत्म ध्यान मे आओ।।टेर।।
समय सुहाना आया है, गुरु चरणो को पाया है,
समता का तुम पाठ पढो, दान शील मे आगे बढो,
गुरु ऐसे नही मिल पाए, चूके वो ही पछताए,
नाना गुरु का करके सुमरण, जो चाहो सो पाओ,
जागो भवीजन जागो
11111
निज पर का अवधान करे, महापुरुषो का गान करे।
सहनशीलता आ जाए, कमी नही हम घबराए।
प्रभु भक्ति मे रम जाए, महा पापी भी तिर जाए।
हर सकट मे समता रखकर, धर्म ज्योत जलाओ।
जागो भवीजन जागो .||2||
भाग्य हमारे अच्छे हैं, कर्म काटने पक्के हैं।
सत्य अहिसा पाठ पढे, सम भावो मे आगे बढे।
मेरा तेरा दूर हटे, एक भावना जाग उठे।
देह ध्यान से ऊपर उठकर, आत्म भाव मे आओ।
जागो भवीजन जागो 11311
कृष्ण भाव को अपनाएँ, दुर्गुण दृष्टि विसराएं।
गज सुख सा वैराग्य जगे, मोह भाव सब दूर भगे।
सोमिल बना सहायक है, कर्म कटे भयानक है।
इसी बात को सोच के मन में, द्वेष भाव मिटाओ।
जागो भवी जन जागो. .11411
(42)
मृत्यु कण-कण मे पाए, रिश्ते एक ना बच पाए।
दौलत आनी जानी है, नरतन बहाता पानी है।
काम वासना दूर हटाकर, अन्तर "ज्ञान" जगाओ
जागो भवी जन जागो 1511
43
पर्युषण सुखकारी
तर्ज-बोलो-बोलो सदा जयकार
छाया-छाया है हर्ष अपार, पर्युषण सुखकारी।
उदयपुर मे आई है बहार, पर्युषण हितकारी।।टेर।।
अमूल्य अवसर हाथ मे आया, योग सुनहरा पाया।
समय साधकर गुरु चरणो मे, पुण्य कमाओ भाया।
हो जाओ सभी तैयार पर्युषण हितकारी।।1।।
तप की झडी लगाओ साथ मे, काम क्रोध हटाओ।
गुरु भक्ति मे मन को रमाकर, अन्तस ताप मिटाओ।
जपो जाप मत्र नवकार, पर्यषुण हितकारी।।2।।
तन भी जड है मन भी जड है, मिट्टी का यह ढेला,
विषय वासना के कारण से, होता सभी झमेला।।
छोडो-छोडो इसे बदकार पर्युषण हितकारी।।3।।
सत्य अहिसा को अपनाकर, मन सताप मिटाओ,
रगडे-झगडे सभी मिटाकर, सब को गले लगाओ।
बहे-बहे प्रेम की धार पर्युषण हितकारी।।4।।
अशन पान और देह सजावट, तन से दूर हटाओ,
तप-जप और सयम मे लगकर, द्विव्य रूपता पाओ।
तब होगा सभी सुखकार पर्युषण हितकारी।।5।।
शुभ भावना मन ला कर, तप का तेला ठाओ,
करो प्रार्थना
प्रभु
चरणों मे, "ज्ञान" धर्म का पाओ।
करो करो सभी इस बार . पर्युषण हितकार। 16 ।।
(43)
44
झुकलो गुरुवर के चरणार
तर्ज-तेरे फूलो से भी प्यार
..
करलो जीवन का श्रृंगार, झुकलो गुरुवर के चरणार,
जो भी होना चाहे भव पार, ये गुरुवर है तारणहार ।।टेर।।
इच्छा के
दॉता-गॉव मे जन्म जो पाए, शाति करने जग मे आए।
मोडी कुल को ये चमकाए, श्रृगारा के मन को भाए।
जपता मन मे जो भी नरनार, ये पूरणहार।
जो भी होना चाहे भव पार ||1||
गुरु गणेशी शरणे आए, त्याग वैराग्य खूब निभाये।
आगम मथन मे रम जाए, गुरु चरणो मे सब विसराऐ।
सेवा की गुरु की सुखकार, ये कर्मो के चूरणहार।
जो भी होना चाहे भवपार ||2||
दलितो को धर्मपाल बनाया, ध्यान समीक्षण सबको भाया।
धर्मध्यान का ठाठ लगाया, शासन को भी खूब दीपाया।
समता का करते हैं परचार, ये है कलियुग के अवतार ।
जो भी होना चाहे भवपार ।।3।।
अधे को भी ऑखें दिलाए, निर्धन को धनवान बनाए।
बिगडी बाते सारी बनाए, दुख दारिद्य दूर भगाएं।
जपता मन में जो भी नरनार, ये सकट के मोचन हार।
जो भी होना चाहे भवपार ||4||
नाना गुरु के पुण्य सवाए, देख-देखकर सब चकराए।
ऐसे गुरु को जो विसराए. पुण्यहीन भी वही कहाए।।
जो भी पाना चाहे नरनार, ये तो सब कुछ है दातार जो भी होना चाहे भवपार ।।5।। जैन धर्म का ध्वज फहराते, जन जन मन को यह सरसाते। अह ना फिर भी मन मे लाते, साधुमार्ग की शान बढाते।। सच्चे "ज्ञान" का करते हैं विस्तार, ये हैं 36 गुणभंडार।। जो भी होना चाहे भवपार 11611 45 अन्तर के भगवान तर्ज- गाले-गाले ऐ चेतन 11111 11211 ध्यावो-2 तुम भक्ति भाव से, अन्तर के भगवान ।।टेर।। अपने लोक मे प्रभु जो बैठे, उसकी कर तू खोज, जड चेतन की समझ प्राप्त कर, पाले सच्ची मौज। ध्यावो ध्यावो अनेक बीच एकाकी तुम हो, करलो अपना ध्यान। शक्ति अनता भरी है उसमे, उसका कर अवधान। ध्यावो ध्यावो दुख द्वदो की आग निखारे, तेरा आतम रूप। समत्व भाव से सहन करे तो, हो जाए अरूप। ध्यावो ध्यावो तेरा मेरा छोड दिवाने, सत्य रूप पहचान। सत्य स्वरूपी चित्त मे तेरे, प्रकटेगे भगवान्। ध्यावो ध्यावो "ज्ञान" अनता दर्श अनता, शक्ति अनती जान। विश्व रूप रहा है तुझमे, कर उसका तू भान। ध्यावो ध्यावो 11311 11411 11511 (45)
46
निज-निज में ध्यान लगाओ
तर्ज- वीरा रूमक झूमक.
अब निज मदिर मे आओ, निज-निज मे ध्यान लगाओजी।।टेर।।
भव-भव में मै भटकायो, नही समझ स्वय ने पायो,
जड चेतन भान कराओ जी अब निज ||1||
मैं तन से खूब सजायो, खा खाकर खूब बढायो,
पर उसे स्वस्थ ना पायो जी अब निज
112||
अपने मे शक्ति भारी, जो दे कर्मो ने मारी,
उस शक्ति ने आन जगाओ जी : अब निज. ।।3।।
निज का है रूप निराला, जो भरा है, सुख का प्याला,
उसको पीओ पिलाओ जी अब निज 1141
जो निज की प्रेक्षा करता, जो निज अवगुण को हरता,
तो "ज्ञान" अनूठा पाओ जी . अब निज 11511
(46)
47
पर्युषण पर्व मनातो चलो
तर्ज- अपना कर्तव्य करते चलो
...
पर्युषण पर्व मनाते चलो, जीवन मगल-मगल बनेगा
सत्य धर्म फैलाते चलो . जीवन मंगल-2
||टेर।।
जैन जगत का आया त्यौहार, महापर्व लगे सुखकार,
आत्मभाव बढाते चलो · जीवन मगल-2 111||
आओ करेगे अपनी पहचान, मिथ्या मोह का करेगे निदान,
देव गुरु धर्म रमाते चलो जीवन मगल-2 ||2||
गुरु सबल मिला है हमे, करलो सार्थक सब जन उसे,
तप की भेट चढाते चलो
जीवन मगल-2 11311
महापुरुषो का जीवन सुनो, अपने कर्मो को उससे धुनो,
निज को पाचन बनाते चलो . जीवन मगल-2 114।।
सेठ सुदर्शन सी श्रद्धा जगे, अर्जुन माली का यक्ष भागे,
कृष्ण भाव जगाते चलो जीवन मगल-2 11511
एवन्ता मुनिवर की नाव तिरि, सब सतो को शिक्षा मिली,
समता निज में रमाते चलो जीवन मगल-2 11611
पर्युषण पर्व मे जीवन सजे, महापुरुषो को नित-2 भजे,
"ज्ञान" ज्योत जलाते चलो जीवन मगल-2 11711
(47)
48 राजा हस्तिपाल के स्वप्न तर्ज- खडी नीम के नीचे .. राजा हस्तिपाल यूं बोले, वचनामृत रस बरसाओ, सपने देखे आज अजीब प्रभु, अर्थ कृपा कर फरमाओ।।टेर।। हस्ति एक बडा ही सुन्दर, किन्तु फस गया दल-दल मे, वीर कहे सुन राजन् ! ऐसे कुसंगत की दल-दल मे, फस जायेगे साधु-साध्वी, सयम तजते तुम पाओ, सपने देखे आज .1111 हस्तिपाल- बहुत रम्य एक बाग उजाडे, ऐसा देखा बन्दर था, संघ नायक होगा ऐसा ही, सघ उपवन है सुन्दर सा। महाव्रतो के पेड मनोरम, शिथिलाचार से उजडाओ सपने देखे आज भगवान- 11211 हस्तिपाल- कल्प वृक्ष सब आशा पूरे, विष जन्तु से लिपटाया, भगवान दानवीर श्रावक जन तरु सम, लिंगधारी ने भरमाया। चूसेगे सब सत्व वे उनका, राजन तुम ये समझ जाओ। सपने देखे आज.. ||3|| हस्तिपाल- काक पक्षी मिष्ठान को तजकर, खाने अशुचि दौड चला, भगवान कष्टो से घबराकर साधक, छोडेगे निज गच्छ भला, शिथिल गच्छ जा कहे अन्य को, मौज बहुत तुम भी आओ। सपने देख आज . 11411 हस्तिपाल- बलशाली एक सिंह केसरी, कीडे उसको है खाते। भगवान जैन धर्म है सिंह सम, किन्तु स्व तीर्थी ही तडफाते। (48) अदर-अदर काटेगे, पर तीर्थी चाहे भय खाओ। सपने देखे आज 11511 हस्तिपाल- देखा कमल उकरडी खिलते, पद्माकर खिलने वाला। भगवान दुष्कुल वाले तिर जाऐगे, धर्म ध्यान का पी प्याला। ऊँचे कुल वाले दुर्व्यसनी, पापो मे लिपटे पाओ। सपने देखे आज 11611 हस्तिपाल- देखा भगवन कृषिवरो को, जो बीजो को बोते थे। सडे-गले उपजाऊ भू मे, अच्छे उसर खाते थे। धर्मीजन को दान न देगे, धर्म हीन भरते पाओ। सपने देखे आज भगवन- 11711 हस्तिपाल- देखा धूल से सना पडा इक, काम कुम को कोने मे। भगवान सु साधु को कोई न पूछे, आत्म दीप सजोने मे। पाखण्डी शिथिलाचारी को, यश पूजापात सपने देखे आज 11811 पाओ। अर्थ सुना सपनो का नरवर ! मन ही मन मे अकुलाया मावी ऐसा दुखमय होगा, छोडू मे चचल माया। शाश्वत लक्ष्मी को पाओ तुम, कहे वीर न घबराओ। सपने देखे आज 11911 . हस्तिपाल भगवान चरणो मे, जीवन अर्पित करते हैं। रत्नत्रयी के सच्चे साधक, वन शिव रमणी को वरते है, "ज्ञान" सुपावन जिनवाणी का, आराधन कर जय पाओ, सपने देखे आज ||10|| (49)
49
जरा प्रभु की भक्ति करिये
तर्ज- जरा सामने तो
जरा प्रभु की भक्ति करिये, इस भक्ति से बेडा पार है,
जो करता है भक्ति ध्यान से, वो पा जाता मुक्ति द्वार है।।टेर।।
गौतम ने भक्ति की थी प्रभु की, करते थे आज्ञा पालना।
विनय भाव से भक्ति वे करते, करते थे सयम साधना।
तोडी मोह की दीवारे एक साथ है, पाया ज्ञान अनुपम सार है।।1।।
सेठ सुदर्शन चलने लगे तब, आया था अर्जुन सामने।
मुद्गर घुमाकर चिल्ला उठा वह, सेठ को अब तो मारने।
प्रभु भक्ति का यही कमाल है, यक्ष शक्ति बनी निस्सार है।।2।।
तीन दिनो से भूखी थी वह तो, मिला नही था खाने को।
उडदो के बाकुले पा के प्रभु को, लगी थी वह तो ध्याने को।
लेते चन्दना से प्रभुवर आहार है, हो जाता तब उद्वार है।।3।।
नि स्वार्थ भाव से भक्ति जो करता, जीवन की शुद्धि साथ मे।
द्रव्य भाव से तन्मय जो बनता, सिद्ध निरजन नाथ मे।
पा जाता शिव सुख धाम है "ज्ञान" भक्ति ही तारणहार है।।4।।
(50)
50
मुक्ति में जाने का मन करता है
तर्ज- तुमसे मिलने को मन
मुक्ति मे जाने का मन करता है, ओ प्रभु,
मुक्ति मे जाने का दिल करता है।
तुमसे ही मुझको सुख मिलता है।।टेर।।
जब से तुमको है ध्याया मैने प्रभु ।
तब से दुनियाँ को भूला हूँ मै तो विभु ।
नहीं भाती है मुझको यह जग की सफर-2|
ये मन तेरे ही चरणो मे नमता है।11।।
तोडो कर्मो के बधन मेरे घने।
सुख की बीन भी निशदिन मेरी बजे।
तेरी भक्ति से होता है जीवन अमर ||2||
तुम तिरते तिराते हो भगवन् बडे ।
शरण तेरी ले भक्त ये सारे खडे ।
जिस शरण से शक्ति मिलती प्रखर।।3।।
सम्यक् "ज्ञान" का तेज नित मिलता रहे।
जिन का पथ भी सदा मुझे दिखता रहे।
नही टूटे कडी मेरी करुणा सभर ।।4।।
164)
51
समकित-सुखकार
तर्ज- हॉ होवे धर्म
.
धारो समकित सुखकार, प्यारे जीवन मे,
खिले अन्तर का उद्यान, प्यारे जीवन मे।।टेर।।
बिन समकित के क्रिया विकृत,
होवे आत्मा कैसे झकृत।
श्रद्धा तारण हार, प्यारे जीवन मे।।1।।
सूत्र बिना नही सूचि सुहाती,
इतस्तत वह गिरती जाती।
समकित से उद्धार, प्यारे जीवन मे।।2।।
देव गुरु अरु धर्म को जाने,
सच्चे पथ को पूर्ण पहचाने।
"ज्ञान" दर्शन सुखकार प्यारे जीवन मे।।3।।
:
(52)
52 . अरे सोच जरा इंसान तर्ज- घुडलो घुमेला जी अरे सोच जरा इसान, पYषण आयो है जी आयो है। अब करनो निज उद्धार, सदेशो लायो है जी लायो है।।टेर।। लाख चौरासी भटकत आयो, सच्चो सुख तो कदी न पायो, अब करनो है पच्चक्खान सदेशो।।1।। क्रोध मान ने दूर भगाणो. मायालोम सू पिण्ड छुडाणो, होसी जद कल्याण सदेशो।।2।। भाई-भाई सू हाथ मिलाणो, झगडो सारो अठे मिटाणो, दोष सभी विसराय सदेशो।।3।। आत्म शुद्धि रो पर्व है आणो, भौतिक सू मोह छुडाणो, छोडो सब जजाल सदेशो।।4।। राग द्वेष को मन से निकालो, सामायिक को मन मे बिठालो, कहते हैं भगवान सदेशो। 1511 भाइयो बहिनों हिलमिल आओ, जिनवाणी को सुनकर करो ज्ञान की बात सदेशो।।611 आत्मभाव से चिन्तन करलो, मोह भाव ने झटपट तजदो, होसी बेडो पार सदेशो। 17 ।। जाओ, (53)
53
मुक्ति का पथ अपनाना है
तर्ज- जय बोलो
मुक्ति का पथ अपनाना है,
और मोह भाव विसराना है।।टेर।।
विषम भाव का घेरा है,
भव-भव का एक ही फेरा है।
बस चक्कर यही मिटाना है।।1।।
भाई-भाई से झगडा है,
और तेरे मेरे का रगडा है।
इस रगडे को ही मिटाना है।।2।।
कैकयी ने झगडा मचाया था,
और राम भरत बिछुडाया था।
ईर्ष्या का भाव मिटाना है।।3।।
वीतरागता पाना है,
अरू राग भाव विसराना है।
अब "ज्ञान" की ज्योत पाना है।।4।।
*
54
जय जिनेश, जय जिनेश
तर्ज- जय गणेश
जय जिनेश, जय जिनेश, जय जिनेश देवा।
कर्म सारे तोड के, पाये मुक्ति मेवा ।।टेर।।
गृहस्थ जीवन छोड के, सयम जीवन धारा,
घाती कर्म तोड के, पाया ज्ञान सारा।
चवर बीजे, छत्र धारे, देव करे सेवा।।1।।
अकाल को सुकाल करे, इच्छा पूरे सारी,
रोग सारे दूर करे, कष्टो के निवारी।
मणियो के सिंहासन पर, शोमे
प्रभु
मेरा 11211
चरण सेवा करूँ, तेरी तोडे भव फेरे,
ज्ञान का अनुदान करे, रहूँ साथ तेरे।
भव-भव से पार करो, तारणहार खेवा।।3।।
(55)
मुक्तक
विषमता की विष वल्लरी का तुमने विस्तार किया है।
समता सुरभि को फैलाकर शाति का विस्तार किया है।
वन्दन
अभिवन्दन
अभिनन्दन गुरुवर।
डूब रही मेरी किश्ती को तुमने ही उबार लिया।
Lexa
श्रुतसागर मे डुबकी लगाकर रत्नाकर को प्राप्त किया।
सयम से अनुप्राणित होकर अमृतत्व को प्राप्त किया।
पावन दर्शन तेरे करके पावनता को प्राप्त किया।
संयम पाकर मैंने गुरुवर तव चरणो को प्राप्त किया।
KG
YOR
गाहर्थ्य भाव से मुझे उठाकर संयम का अनुदान दिया।
काच के टुकडो को हटाकर कोहिनूर प्रदान किया।
सर्वात्मना समर्पित होकर मैं चरणो में झुकता हूँ।
सुखामास से मुझे हटाकर सच्चा सुख प्रदान किया।
5M
20
(56)
मौन भाव से भक्ति तेरी निशदिन मैं तो करता हूँ।
आत्मभाव मे तुम्हे रमाकर समत्व साधना करता हूँ।
भावरश्मियाँ तुम्हारी पाकर तिमिर दूर मैं करता हूँ।
कृपा वर्षण हो सदा सर्वदा
यही भावना रखता हूँ।
Lema
ध्याता मैं हूँ ध्येय तुम्ही हो तुमको ही मैं ध्याता हूँ।
डूब रही किश्ती को तिराने पतवार तुम्हारी पाता हूँ।
भक्ति मे निमज्जित होकर निशदिन दर्शन पाता हूँ।
मौन भक्ति को मुखरित करने यह अवसर मैं पाता हूँ।
ISRO
-
विषमभाव को दूर हटाने तव चरणो मे आया हूँ।
समर्पणा का अर्घ्य चढाने भाव सुमन मैं लाया हूँ।
भक्ति से मुक्ति को पाने तव शरण मे आया हूँ।
भवो-भवों के बध काटने राह तुम्हारी आया हूँ।
6YR
(57)
जवाहर के सानिध्य को पाकर आगम मन्थन प्राप्त किया।
गुरु गणेश को पाकर तुमने आत्मिक धन को प्राप्त किया।
झुक झुक करके मैं झुकता हूँ तेरे पावन चरणो मे।
मेरा तेरा भेद मिटाकर नानेशत्व को प्राप्त किया।
दिक् दिगन्त तक तेरे यक्ष का निष्कलक विस्तार हुआ।
दिव्य गगन मे सुरपति बोले दुषमा मे यह सार हुआ।
भक्ति युक्त जो शीश नमावे बेडा उसका पार हुआ।
तव स्पर्श को पाया जिसने उसका भी उद्धार हुआ।
HOKa
521
श्रृंगारा ने संयम देकर सच्चा तव श्रृंगार किया।
मोडी आज्ञा से मुण्डित होकर आत्ममाव विस्तार किया।
आत्म बोध को सदा जगाकर स्वपर का कल्याण किया।
पतित हो रहे जन जीवन का तुमने ही उत्थान किया।
Ke
SAR
(58)
Test नाना आधार नाना . गुण भडार है, नाना मम पावन चरण मे. वन्दन भास्कर दिव्य है, करते तेज वन्दना भाव से, से, करने पाप बारबार। प्रकाश। नाना करू प्रणाशा ख नाना समता नाना चरण त्रियोगान्वित सार है, करने है, करने विषम सुधार । सुशरण से, होता बेडा पार। समर्पणा. मेरी लो स्वीकार। भाव से, कर दो अब उद्धार। वन्दन करता साधुमार्ग की पवित्र परपरा का तुमने उत्थान किया। तेरा-मेरा भेद मिटाकर एक्य भाव प्रदान किया। मन्थन करके तुमने सच्चा शास्त्रों का अवधान किया। इसीलिए तो भक्त जनो ने तेरा ही यशगान किया। YOR (59)
पूज्य तुम्ही हो पूजक मैं हूँ तेरी पूजा करता हूँ।
साध्य तुम्ही हो साधक मैं हूँ तेरी साधना करता हूँ।
सेव्य तुम्ही हो सेवक मै हूँ तेरी सेवा करता हूँ।
वन्ध्य तुम हो वन्दक मै हूँ तेरी वन्दना करता
R
गेय तुम हो गायक मै हूँ गान तुम्हारा गाता
ऊर्जा तुम हो लटू मै हूँ तेरी ऊर्जा पाता
तेरी भक्ति करके मैं तो आत्म शक्ति को पाता हूँ।
वन्दन करके तेरे चरणो मे अजर अमर पद पाता हूँ।
.
PEOS
चार गति अरू लाख चौरासी भटकत, भटकत आया हूँ।
दुख द्वन्दों की घोर निशा में क्षीण तेज नहीं पाया हूँ।
अमित पुण्य का उदय हुआ तब मानव जीवन पाया हूँ।
शाश्वत सुख को निज में पाने तेरी शरण में आया हूँ
5:1?
(60)
नाना नाम है नाना काम है नाना समतावान है।
नाना भक्त है नाना तेज है नाना नाम महान् है।
नाना गुरु है नाना लक्ष्य है नाना ही भगवान है।
नाना जपते नाना रटते हो जावे उत्थान है।
AGRO
निराधार हूँ इस दुनियाँ मे केवल तू आधार है।
डूब रही मेरी किश्ती का एक तू ही पतवार है।
अन्तरग को ध्याने वाले तेरे
शुद्ध
विचार है।
दुख दर्द को दूर हटाकर तू ही सुख दातार है।
MORG
।
भगवान से भी कमी-कमी भक्त बड़ा हो जाता है।
दातार से भी कमी-कमी ग्राहक बड़ा हो जाता है।
अनेकान्त की व्याख्या मे क्या नही सभव है।
नरक गामी भी कभी-कभी मोक्षगामी हो जाता है।
(61)
519
भक्ति करके तेरी मैने आत्म शक्ति को पाया है।
समता सुरभि पाकर तेरी अनुपम सुख को पाया है।
अज्ञ तिमिर के बीच मे तुमने सही मार्ग दर्शाया है।
इसीलिए तो गुरुवर तुमने आयरियाणं पद पाया है।
स्वार्थ, स्वार्थ घर-घर में आग लगा रहा
रहा है।
और भाई को
भाई को भाई से ही लडा रहा है।
बैंक बेलेन्स पति और पत्नी का
पत्नी का न्यारा
न्यारा है।
स्वार्थ संदेह ही संदेह
ही संदेह पैदा करा
रहा है।
-
NG
SYON
मधुर आवाज से आदमी दूसरों को अपना बना रहा है।
जहरीली आवाज से अपनों को भी पराया बना रहा है।
जिसे बोलने का तरीका ही नहीं आता वह।
अपनी ही आवाज से एक दूसरे मे आग लगा रहा है।
5.49
(62)
STOR
महावीर ने दुनियाँ को अहिसा का पाठ पढाया है।
हिसा न हो मेरे बस मानव यही समझ पाया है।
स्वार्थ ने दिल पर उसके गहरा रग जमाया है।
परमार्थ मे भी इसीलिए उसने अपना स्वार्थ छिपाया है।
6OR
आज नारी को
पति नही धन
चाहिए।
आज नारी को सेवा नहीं मेवा
मेवा चाहिए।
आज की बदलती दुनियाँ को देखते हुए भाइयो।
आज नारी को शील नही श्रृंगार चाहिए।
YOR
आज
पुरुष को
दान नही गुमान चाहिए।
आज
पुरुष को पत्नी नहीं प्यार
चाहिए।
आज की बिगडी
बिगडी दुनियाँ मे जीने वालो।
आज पुरुष को इनाम नहीं सम्मान चाहिए।
(63)
सुख को पाने के लिए इन्सान दौड लगा रहा
जहाँ जाए वहीं पे खूब धूम मचा
रहा है।
पसीने की तरह ही अपना खून बहा रहा है।
इतना करके भी वह सच्चा सुख नहीं पा रहा है।
होली का यह पावन अवसर कैसा सुन्दर आया है।
कर्म कलिमल को धुलवाने आत्मानन्द को लाया है।
होली खेले हम सब मिल कर गुरु सानिध्य को पाया
कर्म तोड मुक्ति को पाने धर्म रग रगाया है।
693
।
राग द्वेष का कीचड धोले मन में मोद मनाना है।
विमाव वृत्तियो से हटकर के स्वभाव गाव में आना है।
तेरे मेरे की नींव हिलाकर विभाव महल गिराना है।
समता सेवा को अपना कर नाना गूंज गूंजाना है।
50
(64)
~
होली खिलादो गुरुवर नाना विभाव हमारे धुप जाए।
अनन्त जन्मो से विकृत जीवन धुप कर पावन बन जाए।
चतुर्विध सघ आप सामने बार-2 निहार रहा है।
पावन ऊर्जा खूब बहादो सिद्ध स्वरूपी बन जाए।
PORR
RORS
ROY
गुरु दर्शन की पावन वेला ने दर्द सभी विसराया है।
गुरु दृष्टि की पावन ऊर्जा से मानस मेरा सरसाया है।
गुरु हस्त को सिर पे पा मन अमित शाति को पाया है।
असीम गुणो को ससीम शब्द व्यक्त नही कर पाया है।
YOER
गुरु माता और गुरु बहिनो का अनुपम सगम पाया है।
असीम स्नेह को पाकर सबका मन मेरा हर्षाया है।
क्षीर
समुद्र
हो
गुरुवर नाना
डुबकी लगाकर हम सबने उसमे अमृतत्व को पाया है।
सम
(65)
शरीर उपेक्षा करके तुमने समता का प्रचार किया।
गॉव-गॉव मे भरे जहर पर अमृत का उपचार किया।
असिधारा के पथ पर चलकर तुमने पर उपकार किया।
विषयों मे डूबे लोगो को ब्रह्मचर्य आधार दिया।
गाँव-गाँव में जाकर तुमने वो खुशबू फैलाई है।
धर्म ध्यान और पच्चक्खाणों की अनुपम धार बहाई है।
उस खुशबू को पा लोगो ने, दुर्गन्ध सभी विसराई है।
जिन धर्म की ध्वजा पताका तुमने सर्वत्र फहराई है।
re
PXC
शिष्य शिष्याएं द्वार खडी दिल से यह पुकार रही।
समता सुरभि से भरदो हमको होवे कर्म उपचार सही।
राग द्वेष की जजीरे टूटे पावे केवल ज्ञान सही।
मुक्ति मे ले जाने वाले तुम्ही एक आवार राही।
6
51001
(66)
होली का रग खेलाकर धो धो सारे पाप सही ।
पावन होवे तन मन मेरा लगी है मन मे आश यही।
नाना गुरु के पावन चरणो मे यही एक है माग सही।
जन्म-जन्म का बन्धन तोडो कहता मन हर बार यही।
YOR
।
।
चौमासे की आशा लेकर गुरु द्वार पर आते है।
खुले लॉटरी गॉव हमारे यह भाव सुनाने आते हैं।
कही भी खोले कही भी जावे श्रद्धा हमारी दृढतम है।
एक धारा मे बहकर के हम, बन्धन मुक्ति पाते है।
ORO
-
समवसरण की रचना भारी देख सभी हर्षाते हैं।
दूर-दूर से पछी आकर अपनी प्यास बुझाते हैं।
दुखमी युग मे लोकोत्तर पुरुष को पाकर के,
साधु-साध्वी श्रावक-श्राविका सब ही मोद मनाते है।
(67)
XENO
शचि भूत बना जीवन को आत्म पुण विकसाया है।
तेरी मेरी तोड दिवारे समत्व रूप अपनाया है,
हाथ जोड कर वन्दन मेरा तेरे पावन चरणो मे
नाना नाना गुणो को पाकर नानेशत्व को पाया है।
--
Sxe
अग्नि मे तप तप कर जैसे स्वर्ण चमक को पाता है।
धक्के मुक्के खाकर योद्धा, देह शक्ति को पाता है।
कष्टो को तुम कष्ट न समझो वह शक्ति को देता है।
कर्म ठोकर सहकर साधक बन्धन मुक्ति पाता है।
ध्येय एक है, ध्यान एक है भेद रेख अब रही नहीं।
साधक एक है साध्य एक है, सृष्टा सर्जक रहा नहीं।
भाग्य एक है, प्रनु एक है,
दृष्टा दृश्य रहा नहीं।
अभेद रूप के बीच में देखो द्विरूपता रही नहीं।
5453
5.
(68)
प्रवचन प्रश्नोत्तर के कारण से, सतत् प्रेरणा करता था।
आत्मीय भाव के कारण सबको जोर देकर के कहता था।
दर्द हुआ यदि किसी को तो क्षमायाचना चाहता हूँ।
वियोग भुलावे धर्म निभावे, यही कामना करता हूँ।
धन नही श्रद्धा ने जहॉ पे अपना जोर जमाया है।
एश नही भक्ति ने जहाँ पे अपना रग दिखाया है।
शुद्ध भक्ति और गुरु श्रद्धा को हमने यहाँ पे पाया है।
इसलिए तो नाना गुरु ने चातुर्मास यहाँ पे ठाया है।
उठो त्यागो प्रमाद तजो अब गुरु जगाने आये है।
दुख द्वन्दो मे उलझे मानव को राह बताने आये है।
जडत्व छोड के चेतन समझो ये समझाने आये है।
अधर्म तजो और ज्ञान को पाओ ये गुरु सिखाने आये है।
(69)
शचि भूत बना जीवन को आत्म पुष्प विकसाया है।
तेरी मेरी तोड दिवारे समत्व रूप अपनाया है,
हाथ जोड कर वन्दन मेरा तेरे पावन चरणो मे
नाना नाना गुणो को पाकर नानेशत्व को पाया है।
SHOO
GRO
अग्नि मे तप तप कर जैसे स्वर्ण चमक को पाता है।
धक्के मुक्के खाकर योद्धा, देह शक्ति को पाता है।
कष्टो को तुम कष्ट न समझो वह शक्ति को देता है।
कर्म ठोकर सहकर साधक बन्धन मुक्ति पाता है।
YOR
ध्येय एक है, ध्यान एक है भेद रेख अब रही नही।
साधक एक है साध्य एक है, सृष्टा सर्जक रहा नही।
भाग्य एक है, प्रभु एक है, दृष्टा दृश्य रहा नही।
अभेद रूप के बीच मे देखो द्विरूपता रही नही।
RORO
(68)
प्रवचन प्रश्नोत्तर के कारण से, सतत् प्रेरणा करता था।
आत्मीय भाव के कारण सबको जोर देकर के कहता था।
दर्द हुआ यदि किसी को तो क्षमायाचना चाहता हूँ।
वियोग भुलावे धर्म निभावे, यही कामना करता हूँ
जार
।
धन नही श्रद्धा ने जहाँ पे अपना जोर जमाया है।
एश नही भक्ति ने जहाँ पे अपना रग दिखाया है।
शुद्ध भक्ति और गुरु श्रद्धा को हमने यहाँ पे पाया है।
इसलिए तो नाना गुरु ने चातुर्मास यहाँ पे ठाया है।
उठो त्यागो प्रमाद तजो अब गुरु जगाने आये है
दुख द्वन्दो मे उलझे मानव को राह बताने आये है।
जडत्व छोड के चेतन समझो ये समझाने आये है।
अधर्म तजो और ज्ञान को पाओ ये गुरु सिखाने आये है।
(69)
गुरुवर का प्रवेश हुआ तब आनन्द मगल छाया है।
भाई बहिन और बच्चे बच्ची सब मे खुशिया छाई थी।
खाना पीना सबको भूले, दौड दौड कर आते थे।
उत्साह और उमगो का अपूर्व रूप बतलाते थे।
श्रद्धा भक्ति का रग बिरगा पुष्प यहाँ महकाया है।
त्याग तपस्या का निर्झर भी सबने खूब बहाया है।
नाना गुरु के चरणो मे झुककर श्रद्धा सुमन चढाया है।
चातुर्मास जब पूर्ण हुआ तब, वियोग रूप यह आया है
आप सभी भाग्यशाली है इसमे कोई सदेह नही।
देवगण भी ईर्ष्या करते ऐसा मिलता योग नही।
चार क्षण के लिए तरसते इन चरणो मे आने को।
चार मास जो मिले आपको इसका कोई जोड नही।
(70)
नाना गुरु का नाना रूप है नाना दुख मिटाता है।
नाना नाम से नाना ध्यान से सच्चे सुख को पाता है।
नाना जपना नाना रहना नांना रोग मिटाता है।
इच्छित तत्त्व मिल जावे जो नाना को ध्याता है।
ROY
HOW
चौमासे की आशा लेकर गुरु द्वार पर आते हैं।
खुले लाटरी गॉव हमारे यह भाव सुनाने आते हैं।
कही भी खोले कही भी जाए श्रद्धा हमारी दृढतम है।
एक धारा मे बहकर के हम बन्धन मुक्ति पाते हैं।
YOU
समवसरण की रचना भारी देख सभी हर्षाते हैं।
दूर दूर से पछी आकर अपनी प्यास बुझाते हैं।
वाणी सुनकर तेरी गुरुवर तृप्त सभी हो जाते हैं।
भक्ति से आवेष्टित होकर जय गुरु नाना गाते हैं।
(71)
भव्य जीवो ! जोश जगाए समय अपूर्व जाता है।
पाया नही यदि गुरु चरण से तो पीछे पछताता है।
व्रत नियम अरु त्याग तपस्या जो मन से अपनाता है।
दुख द्वन्दो से ऊपर उठ वह सुख शाति को पाता है।
दया धर्म को मन मे रमाकर मन प्रक्षालित करना है।
अपावनता को पावन करने गुरु सानिध्य मे रहना है।
गुरु ऊर्जा से तेज को पाने पावर निज मे भरना है।
नाना गुरु की चरण शरण मे सुख शान्ति को वरना है।
YOG
बहु बीता
थोडा रहा यही भी
भी बीता जाता है।
बीता अवसर नही लौटता शास्त्र यह समझाता है।
त्याग तपश्चर्या करने वाला जीवन सफल बनाता है।
भोग रोग मे जीने वाला अनेको जन्म बढाता है।
(72)
सुनलो भक्तो नीद जगाओ जिनवाणी अपनाना है।
दुख द्वन्दो से पिण्ड छुडाने भक्ति मे रम जाना है।
साधुमार्ग की यशोपताका खूब-2 फहराना है।
सुरभि लेकर गुरु चरणो की सुख शान्ति को पाना है।
सयम साधना करना मुझको तेरा ही आधार हो।
भव जलधि से तिरना मुझको तुम ही एक पतवार हो।
दुख मुक्ति सुख पाना मुझको तुम ही सुखागार हो।
अनन्त शक्ति ही पाना मुझको तुम ही सुखागार हो।
प्रभु हम पर कृपा करावे मेरी यही पुकार है।
दूर रहे चाहे पास रहे बस तेरा ही आधार है।
दिल धडकन की तरह धडकते तेरे ही विचार है।
मेरे जीवन की अन्तिम श्वासो तक तेरा ही विस्तार है।
R
(73)
अप्रमत भाव से जागृत रहकर संयम पालन करता रहूँ।
कर्म निर्जरा करने खातिर स्वाध्याय मे रमता रहूँ।
विवेक भाव से सभी क्रियाए सदा-2 करता रहूँ।
कृपा भाव प्रभु रहे आपका भक्ति सदा करता रहूँ।
संयम सुरभित जीवन तेरा, अग जग मे विकसाया है।
शीतल छाया देकर जग को आगे से आगे बढ़ाया है।
त्रियोग समन्वित करू वन्दना, तेरे पावन चरणो मे।
दिव्य देशना से हम सबका, अन्तर दीप जलाया है।
कलीकाल के दुखमी युग मे अपूर्व तेज प्रकटाया है।
अज्ञ तिमिर में भटके जन को, मजिल तक पहुँचाया है।
देहभाव से हटकर तुमको, विदेह भाव सरसाया है।
इसीलिए तो गुरुवर तेरा, आत्म चमन विकसाया है।
(74)
अभिनन्दन करते तेरे चरणो का, पावन जीवन पाने को।
वन्दन करते तव चरणो का, आत्मभाव विकसाने को।
समर्पणा करते तव चरणो मे, निज रूप प्रकटाने को।
भव भव से उबारे हमको, मोक्ष रूप दिलाने को।
O
आज कमी ज्ञानियो की नही, उसे समझने वालो की है।
आज कमी ध्यानियो की नही, उसे अपनाने वालो की है।
आज कमी साधुओ की नही, उसमे जीने वालो की है।
आज कमी आचार्यो की नही, सघ चलाने वालो की है।
आज अवनि को अम्बर को मिलाया जा रहा है।
आज पापियो को धर्मी बतलाया जा रहा है।
आज की दुनिया का रूप कुछ निराला ही है।
आज हेवानो को महान् बताया जा रहा है।
MOR
(75)
आज गरीबो को धनवान बताया जा रहा है।
आज प्रस्तरो को भगवान् बताया जा रहा है।
आज धर्म योगियो को धर्म का दावेदार बताया जा रहा है।
आज विद्वानो को भी मूर्ख बताया जा रहा है।
आज देश में
देश मे विषमता आग लगा रही है।
स्वार्थ लिप्सा और नेतागिरी उसमे हवा लगा रही है।
कभी आसाम तो कभी पजाब तो कभी कश्मीर मे,
सत्ता की आग मानवता को जला रही है।
5YOR
RO
आज बुरे को अच्छा दर्शाया जा रहा है।
आज नकली को असली बतलाया जा रहा है।
कलियुग आ गया है भाई कलियुग।
जहॉ खराब को अच्छा बतलाया जा रहा है।
KC
(76)
राजनीति चापलूसो से भरी जा रही है,
तो धर्मनीति अधभक्तो से भरी जा रही है
चापलूसो एव
अधभक्तो के कारण ही,
देश एव धर्म की स्थिति निरन्तर बिगडती जा रही है।
M
जहाँ कौए को कोयल बतलाया जा रहा है,
जहाँ अवगुणियो को गुणवान बतलाया जा रहा है।
राजनीति मे हो चाहे, धर्म नीति मे देख लो,
अधिकतर बदर को बजाज बनाया जा रहा है।
आज योग्यता की नही पदो की लडाई ज्यादा है,
आज भोग की नही सग्रह की लडाई ज्यादा है।
जिधर देखो उधर लडाई ही लडाई
क्योकि आज गुणो की नही, ईर्ष्या की लडाई ज्यादा है।।
है,
(77)
दर्पण मे तुम देख देखकर तन की शुद्धि करते हो, ज्ञान तेज को दूर भगाकर अज्ञतिमिर को भरते हो। प्रकाश बीच भी देख न पाते लडखडाते चलते हो, विभाव बीच मे सुख खोज के, अरण्य रोदन करते हो। शुद्ध नीर को पाकर के भी अरण्य रोदन करते हो, अमृत मे भी जहर मिलाकर विषमय जीवन करते हो। बगुला भक्ति खूब दिखाकर, कपटभाव मे रहते हो, प्रभु भक्ति का स्वाग रचाकर, स्वार्थपूर्ति करते हो। (78) Par- -
europe
गजल
(79)
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टी.वी.
टीवी ने देखो घर घर मे खुशियाँ भर दी है।
यारो दोस्तो की मटर गस्ती बंद कर दी है।
घर बैठे नही उकताते हैं अब लोग।
मेहमानो ने मेजबानों में उदासी भर दी है।
मम्मी-डैडी चून्नू-मुन्नू सभी ने एकता करली है।
टीवी की स्क्रीन पर जमा दृष्टि,
छोटे बडे की सीमा विसर दी है।
मन्दिर-मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारा
सब ही अब तो खाली है।
जन शून्य जन पथ हो सारे,
होली डे की वही निशानी है।
राम-कृष्ण-महावीर भूलाये,
अमिताभ- धर्मेन्द्र मन भाये हैं।
अभिवादन तो सारे भूले,
मिलने से भी कतराये हैं।
पेट काटकर टीवी लाना, इज्जत का प्रश्न बनाया है।
उठते बैठते खाते-पीते, दृष्टि को वहीं जमाया है।
(81)
बेड टी
सूर्य की अरुणिमा ज्यों-ज्यों आती,
उदासी त्यों-त्यो गहराती।
मन मचलता नहीं उठने को, नींद नींद ही मन भाती।
तेज सूर्य को आच्छादित करने,
गेट लॉक सब कर देते।
रजनीपति की तरह सोचकर
रात शेष मन को कह देते।।
अन्दर वेदना भड़क उठी तब,
नींद हराम सारी होती।
उनींदी नींद मे हो अलसाए,
बेड. टी. ही मन में होती,
टूथ गंदगी उदर धोने का,
इससे बड़ा क्या साधन होगा?
मसनद के सहारे देह फैलाकर,
पाश्चात्य संस्कृति प्रदर्शन होगा।
(82)
कविता
EMOR७
MOR
(83)
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जिन्दगी
जिन्दगी को जीने के लिए, अनचाहे भी कुछ करना जरूरी है।
जिन्दगी को जीने के लिए, हा और ना दोनो ही जरूरी है।
जिन्दगी को जीने के लिए, रोना भी जरूरी है तो हसना भी जरूरी है।
जिन्दगी मे जीने के लिए, अमृत जरूरी है तो जहर पीना भी जरूरी है।
जिन्दगी को जीने के लिए, हर मोड से सही गुजरना भी जरूरी है।
जिन्दगी को जीने के लिए सयोग के साथ वियोग भी जरूरी है।
जिन्दगी जीना इतना आसान नही,
जिन्दगी जीने के लिए, जिन्दा दिल होना जरूरी है।
हर कडवाहट के पीछे मुस्कराहट चाहिए।
हर गम के पीछे सरगम चाहिए।
जिन्दगी की सरिता बहती उभय तटो के बीच।
उसे बहने के लिए दोनो तट चाहिए।
जिन्दगी वह चकडोलर है, जिसे जीने के लिए,
ऊपर से नीचे घुमाव चाहिए।
जिन्दगी को जीने के लिए दोस्तो।
नवनीत सा कोमल और इस्पात सा मजबूत दिल चाहिए।
(85)
क्रोध
जन्म-जन्म का कलिमल धोने,
आत्म बोध साकर करे।
भक्ति मे निमज्जित होकर,
कर्मो का परिहार करे।।
क्रोध भाव को दूर हटाकर,
क्षमा भाव स्वीकार करे।
तेरा मेरा भेद हटाकर,
अभेद रूप विस्तार करे।।
तन की हानि मन की हानि,
क्रोध रूप विकार करे।
जीवन का सब नूर हटाकर,
निज गुण पर अधिकार करे।।
मित्र भाव को दूर हटा यह,
शत्रु भाव विस्तार करे।
प्रेमभाव नही रहे किसी से,
प्रभु भक्ति निस्सार करे।
क्रोधानल मे जले तप सभी, भव-2 का विस्तार करे।
क्रोधभाव से दूर रहे मन, "ज्ञान" सदा स्वीकार करे।
(86)
3
निज
को
पहचानें
विभाव भाव में भटके निज का,
निज से ही विज्ञान करें।
आत्मभाव मे लगा समाधि,
भव-भव का अतिहान करें।
जन्म-जन्म से भटके निज का,
अब तो हम उत्थान करें।
मोह ममता से दूर हटें हम,
समता का संधान करे।
निज की प्रेक्षा पर मे करके,
रक्षा हित अनुदान करें।
अवगुण से दृष्टि हटाकर,
परगुण का बखान करें।
भक्तिभाव से हो अनुप्राणित
जिनवर का गुणगान करें।
क्लेश भावना दूर हटाकर शान्ति का वितान करें
दीप जलाना है अन्तर का,
ऐसा ही अब ध्यान करें।
कर्म पर्त को
दूर हटाकर
अखिल विश्व का "ज्ञान" करें।।
(87)
4
नानेश गान
.
.
.
नाना है ज्ञानी, गुण गरिमा धणी
कर्मों से लड रहे, समता के तीर।।
द्वेष से हटे।1। राग से टले-2
मुक्ति के पथ पर कदम कदम चले द्वेष.
छोड मोह जाल को, सयम के स्वीकार से।
शास्त्रो को पढ़ लिए, प्रज्ञा के निखार से।
क्षमा को समा लिया, ज्यो दूध मे हो नीर।।
ध्यान मे लगे।2। सदा-सदा जगे-2
दिन और रात सदा भक्ति मे लगे ध्यान..
दीप अपना जगा लिया, मन अधकार मे।
आत्मा तेज बढ चला, भीतरी प्रकार मे।
समता को रमा लिया, ज्यूं द्रौपदी का चीर
नाना नाम है 13 | नाना काम है-2
नाना ही मानवो का नयनाभिराम है। नाना.
नाना के नाम से होते सब काम हैं।
नाम तेरा हम रटे, सुबह और शाम है।
यश तू ने फैला लिया, ज्यू बहता समीर।।
दिव्य भाल है, 141 करे कमाल है-2
सघ को चमका रहे, गुरु नानालाल है।
दातों तले अगुली जो, देखकर दबा रहे।
शत्रु मित्र सब मुझे खूब-2 सराह रहे।
"ज्ञान" धन खूब पाया, फिर भी हो फकीर।।
(88)
5
पंछी का लालच
उडते पछी को दिखाया जब धान,
समझ नही पाया कि बिछाया है जाल।।
लालच मे आकर फसाया है पांव,
तब हुआ है उसको लालच का भान।
उडना चाहकर भी उड़ नहीं पावे।
तडफडाकर वह आसू बहावे।
दयार्द्र हो दृष्टि सर्वत्र घूमावे,
आकर मेरा कोई जाल तुडावे।।
पर पास उसके नहीं कोई आवे,
हस हसकर दृष्टा लाभ उठावे।
पछी मन ही मन तिलमिलावे,
और एक दिन वह मुख मृत्यु के जावे।।
नहीं उसका कोई साथ निभावे,
क्यों फिर ऐसा साथ बनावे।
तोड उसे वह आगे बढ जावे,
तो मुक्ति महल को वह पा जावे।।
(89)
महावीर जयन्ति
आए थे दुनियाँ में, तब शांति समीर बहाया था।
जगाने सुप्त चेतना को, अर्हत् नाद गुंजाया था।
अंध विश्वास और रुढियों से,
जन श्मशान बनाया था।
श्मशान जैसी दुनियाँ को, फिर से आबाद कराया था।
आत्मा से कषायो को, जिसने दूर भगाया था।
केवल ज्ञान दर्शन का दीप जिसने जलाया था।
अन्तर की वीरान गलियो को,
गुण कुलित बनाया था।
क्रान्ति के मसीहा को, समी ने शीश झुकाया था।
दया दान दमन का,
प्रचार सर्वत्र कराया था।
क्रूराति क्रूर हिसक को.
अहिंसक पूर्ण बनाया था।
घोरतिघोर तमिस्त्रा में दीप तू ने जलाया है,
सत्य की राह बता करके पर को भी अपनाया है।
ऐसे वर्धमान को हमने शीश झुकाया है,
तेरे सिद्धान्तों पर जीना है, जन्म प्रतीक आया है।
(90)
7
आचार्य श्री जवाहर
जैन जवाहर देश का,
देता सच्चा ज्ञान।
पतित भी पावन हो उठे,
पाकर नवसधान।।
अल्पारभ महारम का,
दिया दिव्य अवबोध।
दया धर्म फैला दिया,
आगम वाणी शोध।।
शासन जब परतत्र था,
करने को स्वतत्र।
पाठ पढाया देश को,
समझो अपना तत्र।।
क्रान्ति का सही नाद किया,
जिनशासन के माय।
यशो पताका फहराई,
दिक् दिगन्त के माय।।
दिव्य तेज था आपका,
दिव्य आपका भाल।
दिव्य ज्ञान था आपका,
दिव्य आपका ध्यान।।
जन्मजात थी आपकी,
प्रखर प्रतिमा सार।
चमकाएं सुधी लोग भी,
देखे तेरा निखार।।
(91)
षष्ठ पाट पर आप श्री,
शोमे थे अभिराम।
जगाने जीव मात्र को,
विचरे हो अविराम।।
द्वय जवाहर देश मे,
गॉधी का उच्चार।
पंडित नेहरू अरु एक ये,
करते देश सुधार।।
भौतिक पिण्ड रहा नहीं,
गुण का है उद्याना
ग्रहण करे हम एक भी,
होवे तब उत्थान।।
जवाहर ने गणेश को,
दिया अपना स्थान।
नाना अष्टम पाट पर,
गुण रत्नो की खान।।
पा पावन सानिध्य को,
पावन हुआ समाज।
चरण-शरण में मैं खडा,
दे दो आतमराज।।
(92)
8
धुलाई करना सीखें
भीतर की धुलाई,
बाहर के प्रक्षालन से सभव नही।
आदमी की परछाई,
बिना आदमी के सभव नही।।
कर्ज की भरपाई,
बिना चुकाए संभव नहीं।
मन की रुलाई,
बिना दुख के समव नहीं।।
तन की अकडाई,
बिना मान के सभव नही।
समझो इन तथ्यो को,
बता रहे जिन सत्यो को
क्योकि रहे जिन कथ्यों को
सुख की शहनाई,
बिना
सुख
दिए सभव नहीं।।
(93)
9
दीक्षा
राग से विराग की साधना है
दीक्षा
देहाध्यास से हटकर विदेह की और जाना है
दीक्षा
बन्धन से मुक्ति की प्रक्रिया है
दीक्षा
चैतन्य का उर्वारोहण है
दीक्षा लेना सरल है
निभाना उतना ही कठिन है
पर जो निभा लेता है
मन वचन काया से
कृत कारित अनुमति से
उसके
शाश्वत सुख पाना भी
उतना ही सरल है
(94)
10
नव वर्ष
नव वर्ष की काम्य कामना,
सतत् समर्पित करते हैं।
गम विसरा कर अपने सारे,
नव तेज हम भरते हैं।
भेद भाव की रेखा मिटा दें,
अभेद भावना ले आवें
प्राणी प्राणी अभेद रूप में,
दुःख सुख भागी बन जावें।
सुख
जीवन का सही साध्य नहीं।
सदा बहार बन जाए जीवन,
कुसुम रूप का साक्ष्य यही।
कोयल कूकी पक्षी चहका,
सबने हर्ष मनाया है।
हरीतिमा धरा पर छाई,
बसंत सुनहरा आया है।
दुख मे रोना,
में हंसना,
(95)
11
शुभ कामना
नव वर्ष की काम्य कामना, सदा-2 स्वीकार करे
कर्म तोड़ मुक्ति को पाने, गुरु बोध साकार करे।
आधि-व्याधि और उपाधि का सदा निस्तार करे।
शांत भाव मे लगा समाधि, संयम का विस्तार करे।
नाना गुरु की पूर्ण सन्निधि, पावे यह विचार करे।
सकाम भाव सब धोकर सारे, तन मन का विकार हरे।
भव-भव मे अटकी नैया का, आओ अब उद्धार करे।
शाश्वत सुख को शाश्वत पाने,
अपना अब सुधार करें।
आत्मिक सुरभि पूर्ण फैलाकर,
जग को हम भरपूर भरें।
निज की प्रेक्षा पर मे करके,
अपना जीवन नूर करें।
दीप तेज ने हमें सिखाया,
कर्म जला कर प्रकाश करें।
बुझी लौ तब हमको पावे,
उसमे भी प्रकाश भरें।
(96)
शायरी
अब भूल
उठ जाग जरा और नीद उडा,
के गाफिल मत बन जा।
छोड के रगडे झगडे सारे,
बस समतामृत
को पीता जा।।
अब तक कोई रहा नही हैं,
नही कोई बच पायेगा।
जिसके पीछे भाग रहा तू
वह सब मिट्टी बन जाएगा।।
मात-पिता भाई बन्धु
इन झूठे रिश्तो को समझ जरा।
यह नहीं तेरा साथ निभाए,
सोच समझ मत उलझ जरा।।
चन्द समय का जीवन तेरा,
तोड ने किसी का दिल जरा।
जिस दिल मे भगवन बसे हैं,
करले प्यार अब फक्त जरा।।
(97)
समय अधिकतर बीत गया,
यह भी बीतता जाता है।
पाया नही यदि प्रभु चरणो का,
तो पीछे पछताता है।।
खुले हाथ से प्रभुवर तुमको,
अमूल्य रत्न बरसाते है।
लेने वाले ऊग उडावे,
तो ही वे कुछ पाते है।।
बन्द करो वे बाते सारी,
सुखाभास जो देती है।
आओ चले अब गुरु चरणो मे,
जो सच्चे सुख को देती है।
तोडो वे सब कषाय मिनारे,
खीचे भेद की रेखाएं।
समता का पानी बरसा कर,
अभेद करो वे सीमाएँ।।
(98)
छोड के इन जड तत्त्वो को,
आत्म तत्त्व को पाता जा।
शान्त बनेगा तेरा जीवन,
अमर सौख्य को पाता जा।।
मेरा-मेरा करते-करते ही,
यह दीर्घ जिन्दगी बीत गई।
छोडी नही ये बाते अब भी,
तो रही सही भी रीत गई।।
स्व को बदलो पर को बदलो,
जिसको अपना समझा है।
इसी समझ को बदलो अब तो,
तब ही सच्चा कब्जा है।
ह
उठो जागो अगडाई ले लो,
ये
गुरु
जगाने आए है।
गौण करो विषयो को अब तो,
ये रत्न अमूल्य लाए हैं।
(99)
मै मै तो ममकार बतावे,
मै ही तेरा दिनकर है।
मै को समझ लिया है जिसने,
पाता ज्ञान वह सुखकर है।।
मन को भूलो, तन को भूलो,
भूलो प्रभु की भक्ति मे।
भूल गए घर सारी दुनियाँ को,
तब नही रहेगे व्यष्टि मे।।
अस्तित्त्व भूल के निज का मैने,
पर का रग लगाया है।
इसलिए तो एकान्त सुख तो,
कभी नही मिल पाया है।।
दुख मिटाके, सुख को देने,
दूज प्रतीक यह बतलाती।
द्वि धारा के बीच मे समता,
तेरे मन को सरसाती।।
(100)
तेरा कहना सत्य नही है,
मेरा कहना सत्य सही है।
तेरा-मेरा रगडा मिटावे,
वीर कहे आचार्य वही है।
.
श्वेत वस्त्र जब रगा गया तो,
न समझ उसे मै तब पाया।
विस्मृत होकर के उसमे,
अपने पन को विसराया।।
पर को मेरा करने पाछल,
निज को भी मै बिसराया।
छक्का मारने बेट उठाया,
पर चोट नही मै कर पाया।।
विष मिश्रित तेरे भोजन मे,
अमृत रस को ग्रहण किया।
पीकर हो गई मृत्यु तेरी,
तब अमृत
को मारक मान लिया।।
(101)
महावीर का नाम लगाने,
स्तूप वीर के बनवाते।
दाना देकर जाल बिछाते,
पछी उसमे फंस जाते।।
शाश्वत सुखो को पाने हेतु,
इन्द्रियो मे जो समा गया।
क्षणिक सुखो के वेग मे उसने,
शाश्वत सुख को गवा दिया।।
सुबह शाम तक घूमा वह तो,
फिर भी खडा वही पे है।
क्योकि घेरा तोड न पाया,
इसलिए जमी पे हैं।
पानी जहाँ ऊपर से आता,
कूप रिक्त वहाँ हो जाता।
फूट पडे जब भीतर से निझर,
तो वह कभी खतम नही हो पाता।
(102)
..
भेद भाव की रेख मिटा दे,
अभेद भावना ले आवे।
प्राणी-प्राणी अभेद रूप मे,
दुख सुख
भागी बन जावे।।
मोह भाव जब राज्य जमाता,
सही भाव सब सुप्त हो जाता।
विभावो की ही दौड
धूप
मे
नर तन को भी वह खो जाता।।
गुरुवर आवे दर्शन पावे,
अमृत यहाँ पर नित बरसे।
समता का महकाता उपवन,
इस धरती पर नित सरसे।।
प्यासी धरती प्यासे पछी,
आशा तुम्हारी कर बैठे।
सुखी धरती को फिर लहलहाने,
बाट तुम्हारी वो देखे।।
(103)
सरजाम है तुम्हारा वर्षों का,
पर पता नही है पल-पल का।
व्यापार तुम्हारा जन्मो का.
पर हिसाब नही है कण-कण का।।
आत्मशक्ति को जागृत करना,
या क्रोध भाव मे रम जाना।
या मुक्ति सुख को पा जाना,
या नरक मे गोते खा जाना।।
भ्रान्त मन मे सच्चाई का,
अवकाश कही नही रह पाता।
भ्रान्ति ही भ्रान्ति के कारण,
जीवन सही नहीं बन पाता।
पत्थर की गाय को कितना ही दूह लो,
दूग्ध बूद नहीं मिल सकता।
मिट्टी कण घाणी मे पीलो,
तेल बूद नही मिल सकता।।
(104)
चिन्ह बाहरी से असली का,
सत्य तथ्य नही मिल सकता।
चमक-दमक के आकर्षण
व्यक्ति उसमे फस जाता।।
.
भाग्य योग से हीरा पाया,
ना समझी से फैक दिया।
कच्ची रोटी के भय से,
जरूरत से ज्यादा सेक लिया।।
जिसको जीवन समझ रहे हो,
वह जीवन नही
मृत्यु
है।
असली जिसको समझ रहे हो,
असली नही वह नकली है।।
जन्म सामने मौत खडी है,
फिर भी हमने बिसराया।
गाडी चलाई बिना सिगनल की,
भान एक्सीडेट ने करवाया।।
(105)
भौतिकता की आग मे तुमने,
अपने तन को झोक दिया।
इसी नौक-झोक ने तेरे,
सुख का झरना सोख लिया।।
पानी मे भी वह शक्ति है,
पत्थर काट के बढ जाता।
गति बनाओ अपनी वैसी,
तो कर्म सख्त भी कट जाता।।
अस्थिरता पर खडे
हुए
हो,
स्थिरता कैसे पाओगे।
कालकूट विष को पीकर के,
कैसे अमरता पाओगे।।
कालचक्र जो घूम रहा है,
कोई रोक न उसे पाता।
उसके पहले जो बढ जाता,
सुख शाश्वत भी वो पाता।।
(106)
दुख मे रोना
सुख
मे हसना,
जीवन का सही साध्य नही।
सदाबहार बन जाये जीवन,
जीवन का सही साक्ष्य यही।।
कोयल कूकी पक्षी चहका,
सबने हर्ष मनाया है।
हरीतिमा धरा पर छाई,
बसन्त सुनहरा आया है।।
नाना गुरु की पूर्ण सन्निधि,
पाकर हम निहाल हुए।
पतझड मे बसन्त समाया,
सब कुछ यहाँ बहाल हुए।।
क्रोध भाव को दूर हटाकर
क्षमा भाव अपनाना है।
विषम भाव से हटाके निज को,
समता मे रम जाना है।।
(107)
बजर भूमि पर दिया बीज,
नही फलप्रदायी बन पाता।
मोह भाव मे भटका जीवन,
शान्ति कभी नही पा पाता।।
आधि-व्याधि और उपाधि,
का सदा निस्तार करे।
शात भाव से लगा समाधि,
सयम का विस्तार करे।।
वीतराग की पूर्ण सन्निधि,
पावे यह विचार करे।
विषम भाव सब धोकर सारे,
तन-मन का विकार हरे।।
भव-भव मे अटकी नैया का,
आओ सब उद्धार करे।
शाश्वत सुख को शाश्वत पाने,
अपना अब सुधार करे।।
(108)
आत्मिक सुरभि पूर्ण फैलाकर,
जग को हम भरपूर भरे।
निज की प्रेक्षा पर मे करके,
अपना जीवन नूर करे।।
.
दीप तेज ने हमे सिखाया,
कर्म जलाकर प्रकाश करे।
बुझी लौ जब हमको पावे,
उसमे भी प्रकाश भरे।
पावन प्रज्ञा हमे जगाकर,
आत्म रूप विकसाना है।
तेरी मेरी तोड दीवारे,
मुक्तानन्द को पाना है।।
विनय भाव से लगा समाधि,
सयम मे रम जाना है।
शास्त्रो का आलोकन करके,
नवनीत ज्ञान का पाना है।।
(109)
प्रज्ञा से कर धर्म समीक्षण,
दूर-दूर फैलाना है।
दीप-दीप से दीप जलाकर,
दूर अज्ञता भगाना है।।
दृढ सकल्प सत्साहसी बनकर,
आगे-आगे बढ जाना है।
कैसी भी हो विकट विपत्ति,
कभी नहीं घबराना है।।
शत्रुभाव को दूर हटाके,
प्रेमभाव अपनाते जा।
भूल के सारे वैर विरोध को,
पर्व सवत्सरी मनाते जा ।।
या क्षमा धर्म अपनाते जा,
या क्रोध भाव मे रमते जा।
यह पर्व सवत्सरी जाता है,
तू सोता रह या जगता जा।।
(110)
यह समय लौट के नही आता,
भले लाख प्रयत्न तू करता जा।
सोच-सोच मे बीता दिया तो,
फिर गाफिल बन के रोता जा।।
विभावभाव को सदा निवारे,
स्वभाव भाव को सदा स्वीकारे।
समता पथ को अपना करके,
आत्म भाव को सदा निवारे।।
पुद्गलो मे आनन्द नही है,
दिखने वाला सत्य नही है।
नकली हीरा चमक रहा है,
असली कभी वह रहा नही है।।
जन्म जन्म से भटक रहा है,
कर्मो से वह उलझ रहा है।
शाति-शाति चाहने पर भी,
शाति का नही नाम रहा है।।
(111)
भौतिकता की दौड बढी है,
जिन्दगी उसमे सदा अडी है।
समय अनन्त बीता दिया पर,
गाडी फिर भी वही खडी है।।
साध्य रूप को पाने हेतु,
सतत् साधना करना है।
कर्मो की सब तोड दीवारे,
मुक्ति सुख को वरना है।।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा,
तोडे इस दीवार को।
एककार हो रूप हमारा,
छोड चले अधिकार को।।
अपने से अपनो को देखे,
चले सदा असिधार पे।
बाधाओ से कभी न डरना,
डूबे नही मझधार मे।।
(112)
अस्तित्व हमारा कपित होता,
रहना नही उस आगार मे।
छोड चलो उस धन दौलत को,
उन्मुक्त गगन विस्तार मे।।
अनुभूति की अभिव्यक्ति को,
कर पाना आसान नही।
इसीलिए तो इसलिए का,
अर्थ बडा आसान नही।।
उन्मुक्त गगन मे चलो चले अब,
बन्धन यह सुखकार नहीं।
सदा सर्वदा साथ निभावे,
दृढ सकल्प आधार यही।।
स्वर्ण पिजरा मेवा आदि,
पक्षी को सुखकार नहीं।
उन्मुक्त गगन मे दाना न मिलता,
फिर भी कुछ दरकार नहीं।।
(113)
ज्ञान भाव को दिल मे रमाकर,
करो आचरण सुखकार।
कर्म कटेगे वे चट्टानी,
देते दुख की जो भरमार।।
चट्टानो से निर्झर फूटे,
देह ताप जो हर लेता।
ज्ञान पयोधि का निर्झर तो,
आत्म ताप को हर देता।।
जन्म-जन्म से इन कर्मो का,
छूटा कभी सहकार नही।
इसलिए तो उभर उभर कर,
आते हैं विचार वही।।
रवि उष्मा से झुलसे तन को,
शीत नीर लगे सुखकारी।
अनत जन्म से प्यासे मुझको,
जिनवाणी लगे अमृतकारी।।
द
(114)
रवि उष्मा से झुलसे तन को,
तरू छाया है सुखकारी।
अनत जन्म से झुलसे मुझ पर,
प्रभु शरण ही दुखहारी।।
दृश्यमान जगत् कुछ और है।
अन्तरतम कुछ ओर।
बाह्य जगत को छोडकर,
चलो भीतर की ओर।।
प्रभु भक्त दो अस्तित्व है,
दिखते दुनियाँ बीच।
एकमेक हो जाए तब,
मिलता सुख सदीप।।
सत्य ही भगवान है,
बढना उसकी ओर।
असत्य नीद को तोडकर,
चले
प्रभु
की ओर।
(115)
अवगुणी प्रेक्षी बनने से पहले,
देखे निज की ओर।
दोष समीक्षा करके अपनी,
चले गुणो की ओर।।
गुण-गुणी मे भेद न होता,
चाहे कुछ भी हो जावे।
आत्मा से नही चेतन हटता,
ज्यो दूध श्वेत न हट पावे।।
आओ चले अब निज मन्दिर मे,
प्रभु की भक्ति करना है।
तेरा-मेरा भाव भुलाकर,
एक्य भाव मे रमना है।।
प्रभुवर दे दो शक्ति मुझको,
तोडू सारा यह जजाल।
सुषुप्त चेतना करके जागृत.
जला दू अपना दिव्य मशाल ।।
(116)
दूर खडे हो
तुम
तो मुझसे,
आओ मेरे अन्तर
तेरा दीप जलाकर मुझमे,
बद करो मुझे बख्तर मे।।
जिस बख्तर मे मुझको प्रमुवर,
दुनिया का अहसास न हो।
उमड-उमड कर जो आते,
उनका जहॉ आभास न हो।।
करनी हमको ऐसी करनी,
यह जकडन नही आ पावे।
सदा रहूँ मैं साथ तुम्हारे,
विभुवर ऐसा कर जावे।।
इस किनारे तुम खडे हो,
उस किनारे मैं खडा।
अल्प सत्व है प्रभुवर मेरा,
कैसे तीरूँ यह पाट बडा।।
(117)
हे प्रभुवर तुम सुन लो मेरी,
क्यो मुझको तरसा रहे।
दे सहारा मुझको अब तो,
क्यो नही पार लगा रहे।।
क्या तडफन ही लिखी है मुझमे,
तृप्ति नही दे पाओगे।
प्रभु भक्ति का तार मिलाया,
क्यो तुम नही सुन पाओगे।।
जन्म-जन्म से भटके जीवन मे,
आत्म दीप जलाना है।
कर्म-कलिमल धोकर सारा,
परमानन्द को पाना है।।
सोच-सोच के सोच लिया है,
आत्म जागृति लाना है।
सब कुछ छोड के तव चरण मे,
मुझको दौड लगाना है।।
(118)
मोह-जकडन को तोडने हेतु,
आत्म-तेज जगाना है।
परिजन बधन तोड के अब तो,
शरण तुम्हारी पाना है।।
ज्ञान तेज को पाना हो तो,
सत्साहसी बन जाओ।
तन-मन की सुध-बुध खोकर,
एक भाव मे रम जाओ।।
आत्म तार से मन को जुडना,
इन्द्रियो का आधार वहीं।
आत्म तार का प्रभु
से
जुडना,
शक्ति का आधार वही।।
तडफन-जकडन तोडो अब तो,
परम रूप को पा जाओ,
जग की परवाह छोड के अब तो,
आत्म सापेक्ष तुम बन जाओ।।
(119)
आत्ममाव को जागृत करके,
जिनवाणी अपनाना है।
आत्मा से परमात्म भाव को,
सदा-सदा ही पाना है।।
मुझ मे मैं तुझको देखू,
निज मोह को विसराऊँ।
तुझ मे ही तो मुझको मिलाकर,
परम सौख्य को पा जाऊँ।।
तुझ मे मुझमे दूरी बडी है,
कषाय मिनारे बीच खड़ी है।
भी बाधकता मे,
दुर्दान्त और घातक कडी है।।
मोह शत्रु
मुझमे विमुवर तुझको देखू,
तेरा-मेरा भेद मिटें।
तन के रिश्ते तोड के सारे,
परम रूप का बोध मिले।।
(120)
*
तन से नही मैं मन से पूजूं,
तुझे हृदय मे बिठलाया।
खुशियो मे गम दामन गर दो,
दुख दर्दो को विसराया।।
ताकत जिसमे ज्यादा होती.
खींच उसे वह झट लेता।
प्रमु तुम्हारा गहरा रिश्ता,
मुझगे तव चिन्तन को देता।।
परम शक्ति का झरना भीतर में,
उसमे
तुम स्नान करो।
राग-द्वेष का कलिगल धोकर,
समता रस का पान करो।।
दिन भर पूरा वीत गया,
पर प्रभु भक्ति का पता नहीं।
कर्मो ने तुझे जकड लिया है,
बन्धन तेरा मेरा बडा यही।।
(121)
शक्ति जगाकर तुमको अपनी,
उलझन को सुलझाना है।
दो तटो के बीच मे सरिता,
अब तुम को सही बहाना है।।
मन की उदासी तन मे आती,
वही वचन मे आ जाती।
ज्वालाओ को कितना भी ढक दो,
पर उष्णता नही छिप पाती।।
साध्य रूप को पाने हेतु,
सतत् साधना करना है।
सब विघ्नो को दूर हटाकर,
समता पथ पर चलना है।।
दे दो प्रमुवर मुझको,
दूरी अव तो दूर करो।
खुशबू अपनी अब फैलाकर
जीवन मेरा नूर करो।।
(122)
५
प्यासे पड़े इस तन मन मे.
शाति का सचार करो।
देह-विदेह का रूप बताकर,
आत्ममाव विस्तार करो।।
जन्म-जन्म से कर्मों की परते,
आत्म स्वभाव दबा रही।
दूर हटा दो उन पर्तो को,
जो अज्ञानता फैला रही।।
मिल पाया।
दुर्लभ अवसर पाकर के भी,
लाभ नही
कुछ
विघ्न बाधाएँ बीच खडी हैं,
तथ्य नही तब सध पाया।।
भावो की दूरी दूर हुई पर,
नही साधना सध पाई।
नही साधना के गिलने,
साध्य सिद्धि नही हो पाई।
(123)
निरापद हो मार्ग हमारा,
तेज गति बनाना है।
ब्रेक भी हो हाथ हमारे,
फिर आगे बढ जाना है।।
दुनियाँ मे जो सार भूत है,
वह तुम मे भरपूर है।
इसीलिए तो तेरी साधना,
करती हमको नूर है।।
चन्दना ने करी साधना,
बन्धन सारे टूट गए।
आत्मा से परमात्मा मिलन के,
तब बन्धन अटूट बने।।
कर्म निकाचित किए हैं हमने,
कैसे हो उद्धार भला।
समभाव से सहने होगे,
होगे तब निस्तार भला।।
(126)
4
अनुकूल बीच पतिकूलता,
दौड-दौड के आती है।
कितना भी इसे दूर हटाया
फिर-फिर करके जाती है।
अनादि काल सेमेरे पर
राग-भाव अनुसार
इसलिए तो निज का निल
सदा-सदा विशेष रहा।।
निज से निज को सदा जगाकर
निजत्व रूप प्रकटाना है।
निज में ही तत्त्व निजानन्द को,
सदा-सदा पा जाना है।
(127)
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