Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikanershri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Kismat Ka Khiladin
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किस्मत का खिलाड़ी
[गजसिंह चरित्र]
मूल लेखक
श्रमणसूर्य आशुकवि प्रवर्तक
मरुधरकेसरी श्री मिश्रीमलजी महाराज
रूपान्तरणार
श्री सुकनमुनि
प्रकार
श्री मरुधरकेसरी साहित्य प्रकाशन समिति
पोपलिया बाजार, यावर
पुस्तक :
किस्मत का खिलाड़ी
मूल चरित्र लेखक :
मरुधरकेसरी श्री मिश्रीमलजी महाराज
रूपान्तरकार:
श्री सुफन मुनि
प्रकाशक :
श्री मरुधरकेसरी साहित्य प्रकाशन समिति
पीपलिया बाजार, ज्यावर [राज.]
मुद्रक :
सतीशचन्द्र शुक्ल
वैदिक मन्त्रालय, अजमेर
द्वितीयवार :
वि० सं २०४७, वैशाख पूर्णिमा
मई १९९०
मुल्य : ८ रुपया
अपनी बात . जनसाहित्य के चार अनुयोगों में धर्मकथानुयोग किंवा परितानुयोग एक महत्वपूर्ण तथा सवंजन-सुलभ मुबोध अनुयोग है । चरिण या कथानक के माध्यम से किसी शाश्वत सत्य का उद्घाटन बहुत ही रोचक एवं जनभोग्य होता है । इसलिए जैन साहित्य का बहुत बड़ा भाग चरितानुयोग में प्रथित-गुम्फित है । प्राकृत-संस्कृत-अपभ्रंश-गुजराती तथा राजस्थानी भाषा का भंडार इस चरिय साहित्य से समृद्ध है। श्रमणमूर्य प्रवर्तक गुरुदेव श्री मिश्रीमलजी महाराज की मान्य कला से प्राज कोन जैन अनभिन्न है ? वे जितने प्रोजस्वी तेजस्वी प्रवत्ता थे, उतने ही तेजस्वी तथा प्रवाहशील गावि थे, प्राशुकवि थे । उनकी ललितकाव्य-कला ने जहां पांडवयशोरसायन, जैन रामायण जैसे महागाव्यों की सजना की है, पहाँ संगाड़ों ही लघुचरियों, हजारों श्लोक, दोहा, गीतिना प्रादि से राजस्थानी भाषा के गाय-भंडार को मुमोभित किया है । गुरुदेव श्री नी कविता जितनी महज और सुबोध है उतनी ही मार्मिक और शिक्षाप्रद भी है । आज भी ये मैकड़ों श्रावक-श्राविकानों के नाण्ठान हैं, तथा अनेक श्रमण- अगणिया व्याख्यानों में उनका सरन वाचन करके जन-जन को प्रतिबोध देते है। सुत समय से लोगों की, दानकर नई पीढी में. सुषमा-पुपतियों व विद्यापियों भादि को मांग माती रही है कि गुरुदेव श्री के परिणाम राजस्थानी भाषा की गपिता में - -
(४)
होने से हम पढ़कर उनका वांछित लाभ नहीं उठा सकते
एक तो काव्य वैसे ही दुर्बोध होता है, फिर राजस्थानी ।
डिंगल-पिंगल मिश्रित, अतः उनका हिन्दी रूपान्तर किय
जाय तो अधिक लोगों के लिए उपयोगी होगा।
जनता की इसी भावना का ध्यान रखकर गुरुदेव श्री
चरित्र काव्यों का हिन्दी रूपान्तर प्रस्तुत करने की यह योजन
फलवती हो रही है।
प्रस्तुत 'किस्मत का खिलाड़ी' उपन्यास में गजसि
चरित्र का हिन्दी रूपान्तर है । इस चरित्र में गुरुदेव श्री
कथानक को बड़े ही सरस और चमत्कारपूर्ण ढंग से मो
दिया है । मनुष्य का पुण्य-प्रभाव उसे कहाँ; किस रूप में सप
लता प्रदान करता है और जीवन में कितने उतार-चढ़ा
दिखाता है इस तथ्य की सुन्दर और हृदयस्पर्शी अभिव्य
इस चरित्र में हुई है । मैं इस मूल कथा के सम्बन्ध में अधिर
यहाँ न कहकर पाठकों की रुचिपूर्वक पढ़ने का अनुरोध भ
कर देता हूं।
मेरा यह लघु प्रयत्न पाठकों को रुचिकर लगने
कारण अव द्वितीय संस्करण निकाला गया है । यह जीवन
समत्व भावना का जागरण करेगा, ऐसी मैं कामना करता हूँ
वैसाख शु. १५, संवत् २०४७ --उपप्रवर्तक सुकन मुनि
-
. भरतक्षेत्र में एक नगर था, माण्डवगढ़ । यहाँ का राजा था जामजशा । नगर सुन्दर था । प्रजा नुशहाल थी। हो राजा न्यायप्रिय, वीर गोर प्रजावत्सल था। सब कुछ ठोया- हो-ठीक था। राजा प्रजा का पितातुल्य पालन-पोषण करने वाला और प्रजा राजा को चाहने वाली । सव सबके अनुकूल व में और सबको अपने लिए गव अनुकूलताएं प्राप्त थीं। फिर भी एक प्रतिकूलता थी । वह भी इनलिए कि अनुकूलता के साथ मन्प्रतिकूलता भी रहती है, जैसे फूल के साथ कांटा । यह प्रति- घटा गालता प्रथया दुःण यह था कि राजा जामजशा के कोई संतान यति नहीं थी। विडम्बना यह कि राजा के सात रानियां थीं। डिप रानियां सात और पुत्र एक भी नहीं । राजा तो यही चाहता भरपा नि किसी एक के ही पुत्र हो जाए । मेरा वंश तो चले और प्रजा को भावी राजानी माना मिले । पर रानियां नाहती थी कि हम सभी पुत्रवती बनें । अपना-अपना स्वार्थ नगभी सोचते हैं। राजा जामजणा के नाथ रानियों में जो दामवती नाम को रानी पी, यह अन्य छहों से कुछ अलग-धलग रहती पी। कारण, उसका स्वभाव ही ऐसा था । पानफाश्री, श्रीमती, रत्न- माला, पासन्ती, भानिनी पौर बसन्तमाला-~-ये छही एक गुट है।
२ / किस्मत का खिलाड़ी । में रहती थीं। ये सब एक-से स्वभाव की थीं। सव-की-सब तीखे स्वभाव की, चतुर-चालाक और त्रियाचरित्र में प्रवीण थीं। इसीलिए राजा को बनाकर रखती थीं। राजा भी इन्ही के वश में था, सो इनकी चतुराई के कारण वह भोली-भाली दामवती रानी की उपेक्षा-सी करता था । यों कहें कि दामवती रानी तो इसी बात की रानी थी कि राजा की सात रानियों की गिनती पूरी करती थी। दामवती धर्मनिष्ठा थी। उसका क्षण-प्रति-क्षण धर्म को समर्पित था। संकट, दुःख, सुख और सुदिन सब कर्मो का फल है, इस सिद्धान्त में उसकी अटल आस्था थी । इसीलिए वह मानती थी कि मेरे पति मुझ पर प्यार नहीं करते और मेरी छहों सौतों के वश में रहते हैं, इसका कारण मेरे पूर्वकृत कर्म ही हैं । यों तो परम्परा और वंशानुगत प्रभाव से राजा जाम- जशा और उनकी अन्य छहों रानियां भी जैनधर्म को मानने वाली थीं, पर इनका मानना मात्र एक लकीर पीटना ही था और इसके विपरीत रानी द्रामवती पूरी तरह निर्ग्रन्थ धर्म की उपासिका थी। वह नित्य नियम से सामायिक-प्रतिक्रमण आदि धर्म-क्रियाएँ करती थी। नवकार मन्त्र पर तो उसका अटूट विश्वास था । संतान के विषय में भी रानी दामवती का सोचने का ढंग परोपकार पूर्ण था। वह सोचती थी, हम सातों-की-सातों बांझ निकलीं। यदि मेरे कोई पुत्र न हो, पर किसी के भी हो जाए । मैं पुत्रवती नहीं वनूंगी तो क्या हुना मेरे स्वामी तो पुत्रवान् बन जायेंगे । राजसिंहासन का उत्तरा, . ।
फिस्मत का खिलाड़ी/३ धिकारी युवराज माण्डवगढ़ की प्रजा को मिल जायगा और स्वामी को वंग-उद्धारक मिलेगा । यही क्या कम होगा। ऐसी थी रानी दामवती। वह परम सुन्दरी भी थी पौर थी समस्त नारी गुणों से मण्डित सन्नारी-पतिव्रता । यह पय भाग्य की ही तो बात थी कि ऐमी रानी को भी राजा हृदय रो नहीं चाहता था बलि अन्य छहों को प्रसन्न करने के लिए कभी-कभी तो उसकी स्पष्ट उपेक्षा भी कर देता था। ऐसे ही दिन बीत रहे थे। माण्डवगढ़ के प्राम-पास छोटे-बड़े कई गांव थे। इन्हीं गांवों में से एक छोटा गांव था जहां निर्धन मजूर लोगों की यस्ती थी। यहां के अधिकांश घर फूम के छाजन के थे । कुछ अच्छे भी थे, पर वे भी कच्चे मिट्टी के थे। इस गांव में लगाड़हारे, भेड़-बकरियां पालने वाले गड़रिये, मृत-पशुओं को उठाने वाले चाण्डाल, धोबी, कुम्हार पीर बदई प्रादि विविध जाति के मजूर रहते थे । इनकी स्त्रियों भी पुरुषों के साथ काम करती थीं। उनके बच्चे भी रूखी-सूखी खायर, फटा- चिघड़ा तन पर लपेटे रहते थे। ऐने जीवन में भी नव-नो-सब गन्त थे । प्रभाव तो मन के अनुभव करने की चीज है । धनी भी सोचते है कि मैं लखपती ही रहा, करोड़पति नहीं बन पाया । ये भी प्रभाव अनुभव करते हैं, इसलिए उनके जीवन में प्रभाव होता है । इसके विपरीतल गांव के लोग अभाव में भी 'ह' का अनुभव करते थे, इनलिए गुग्गी पोर मस्त थे। नगा मोचने का रंग पा---गाय-भसे नहीं है, पर भेड़े तो ।
४ / किस्मत का खिलाड़ी
'हैं'। अच्छी साड़ी नहीं है, पर नीले रंग की खद्दर की चूनर
तो 'है'। इस गाँव के लोग अपने-अपने धन्धे के सम्बन्ध में
निकट के नगर, राजधानी माण्डवगढ़ में भी आते-जाते थे।
बड़े लोग तो नगर की कृत्रिम सुन्दरता के अभ्यस्त हो
गए थे। पर जब बच्चे अपने माता-पिता के साथ पहली बार
जाते तो माण्डवगढ़ के दृश्यों को ऐसे आँखें फाड़-फाड़ कर
देखते, जैसे ये सपनों के देश में आ गए हों । नगर के राजपथ
तक उनको चक्कर में डाल देते । एक बार दो बालक अपनी
मां के साथ माण्डवगढ़ आये तो लम्बे-चौड़े भव्य राजपथ को
देखकर बोले-
"अम्मा ! यह क्या है ?"
"बेटा ! यह यहां की रथ्या है।"
"रथ्या ! क्या होती है मां ?"
"अरे, तू तो रथ्या भी नहीं जानता? इस पर रथ
चलते हैं। इसलिए इसे रच्या कहते हैं ।
"तो रथ क्या होता है माँ ?"
मां ने बताया-
"जैसे हमारे गाँव में वैलगाड़ियां होती हैं, वैसे ही बैठ
कर जाने के लिए नगरवासियों के पास रथ होते हैं। रथों में
चार या छह चक्र होते हैं। इनमें दो बैलों की जगह चार
घोड़े जोते जाते हैं । इनमें सोने-चांदी की चमक भी होती है
और ये बहुत तेज दौड़ते हैं। वस, अब मेरे कान मत खाना ।
देखते चलो।"
किस्मत का खिलाड़ो/५
।
बच्चे देखते चले । रध्याएँ देखीं । उनके किनारे दोनों
बोर खड़े प्राम, शाल्मली, अशोक आदि के छायादार वृक्ष
खे। जब बाहरी भाग समाप्त हो गया तो राजपथ के
दोनों पोर बने राजकीय अतिथिणाला के भव्य भवन देवे ।
गर के बीचों-बीच विशाल सरोवर भी देखा । इसके घाट
स्फटिक पत्थर के बने थे। मां के साथ उसके दोनों बच्चों ने
पानी पिया इसी सरोवर में और फिर एक बच्चे ने कहा-
"अम्मा, हमारे गाँव की पोखर का पानी फैसा गन्दा
रहना है । पोखर से बढ़ा भी है यह तो ।"
मां ने कोई जवाब नहीं दिया । इसका जवाब भी क्या
देती? बच्चों की उँगली पकड़े चली जा रही थी। यह स्त्री
चाण्टालिनी थी। बाल इसके पति ने किसी सेठ की मरी
गाय गो उठाकर फेंका था। उसी के बदले फुछ लेने यहाँ
नगर में पाई थी। सवेरे का वक्त था। जब वह मुंह-अधेरे
उठकर चली तो प्राठ और दस वर्ष के उसके दोनों बच्चे भी
पीछे पर गए कि अम्मा हम भी तुम्हारे साथ चलेंगे । हमने
सभी मरण्टयगढ़ नगर नहीं देखा । चाण्डाल ने भी सहारा दे
दिया-लेती जायो । स्त्री को प्रयोले वैसे भी नहीं जाना
माहिए। बच्चे नाप रहेंगे तो अच्छा ही है। इसका अर्थ
चाण्डालिनी ने गुर, और ही समभा । कृत्रिम रोप के साथ
पोली-
"अपने होने पर पया मुझे कोई सा जायगा ? तुम
बड़े बहमी हो । पुरुप होते भी बड़े की है।"
?
६ / किस्मत का खिलाड़ी वच्चे हाथ-मुंह धोने वाहर भाग गए थे। एकान्त देव चाण्डाल ने शृगार रस के छींटे देना शुरू कर दिया बोला- "गण्डक की माँ ! काली होने पर भी तुम इतनी सुन्दर लगती हो कि क्या कहूँ ? जैसे गोरे मुंह पर काली-कजरारी आँखें फवती हैं, ऐसे ही गोरी गोरी नगर की स्त्रियों के बीच तुम लगोगी । भला, मैं तुम्हें अकेली कैसे जाने दूंगा ?" पति द्वारा अपनी प्रशंसा सुनकर रोनी नाम की यह चाण्डालिनी फूलकर कुप्पा हो गई । यद्यपि पैंतालीस की थी। पर अव अपने को पोडशी समझने लगी। पति द्वारा की गई प्रशंसा का कुछ जवाब देना चाहती थी। पर शब्द मिल नहीं रहे थे । कुछ-न-कुछ कहना था, सो इतना ही कह पाई- "वनाने की कला में तो तुम एक हो ही । ऐसा ही डर है तो तुम्हीं चलो मेरे साथ ।" इतने में गण्डक और मण्डक दोनों बच्चे या गए । वने- वनाये कार्यक्रम के अनुसार रोनी उन्हें लेकर माण्डवगढ़ के लिए चल दी। खेतों की पगडंडियाँ और फिर कच्चा दगड़ा पार करके वह जव नगर के राजपथ पर पहुंची तो बच्चों ने प्रश्न करने शुरू कर दिये । रथ्या और रथ का परिचय बताने के बाद रोनी सरोवर पर पहुंची। उसके बच्चों ने पानी पिया। दिन निकल पाया था। रोनी ज्योंही सरोवर की सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आई कि राजा जामजशा घोड़े पर सवार होकर बाग की ओर जा रहा था। रोनी ने आकस्मिक -
किस्मत का खिलाड़ी/७
ढंग से राजा को देखा और फिर जैसे कुछ याद आ गया हो,
उसने अपने मुंह को पल्ले से ढक लिया और राजा की ओर
से पीठ भी फेर ली। राजा को यह सब अटपटा लगा।
नियमानुसार तो भूमि तक मत्था टेक कर रोनी को राजा का
अभिवादन करना चाहिए था । पर हुअा ऐसा गि राजा को
पाश्चर्य भी हुआ और बुरा भी लगा । उसने तुरन्त घोड़ा मोड़
दिया । राजगभा के द्वार पर घोड़ा छोड़ा। सीधा सभा में
पहुंचा । मन्त्री प्रादि पहले से ही सभा में उपस्थित थे । अाज
राजा गो समय से पहले सभा में पाया देख सब-के-सब कुछ
पकराये । कुछ-न-कुछ बात तो है, यह सोच मन्त्री प्रादि राजा
मे मुख की अोर देखने लगे। राजा की मुख-मुद्रा प्राज कुछ
पठोर थी । महामन्त्री फूलसिंह भी कुछ पूछने का नाहस नहीं
पार पा रहा था । सिंहासन पर बैठते ही राजा ने महामंत्री
फूल सिंह से कहा-
"मंत्रिवर ! सरोवर में बाग की ओर जो पथ जाता है,
उस पथ पर एक चाण्डालिनी नगर की भोर प्राती मिलेगी।
उसे यहाँ ले पायो । उसके साथ दो बच्चे भी हैं । यम की
पुषी-मो काली है।"
मंत्री तुरन्त उठा । दो सेवकों को मारे मे ही साय ने
लिया। पाण्टालिनी उसे नगर गी पोर प्राते हुए तो नहीं
मिली। बल्पिा नगर से लौटते हुए मिली। 'अव तो शकुन
बिगड़ गया । नाम भी बिगड़ गया । निरवंशी-अपनी राजा
मा सपेरे-सपेरे ही मह दिन गया । प्राज तो गाना भी नहीं
-
८/ किस्मत का खिलाड़ी
?
मिलेगा। जाने क्या न हो जाए ?' यही सव सोच,
चाण्डालिनी रोनी गण्डक-मण्डक को साथ लिए अपने गांव के
लौट रही थी। मंत्री ने उसका मार्ग रोककर कहा-~~
"चलो हमारे साथ ! नरदेव जामजशा बुलाते हैं।"
कांप गयी रोनी। सोचने लगी-~'जो सोच रही थी,
हो ही गया । बड़े-बूढ़ों की कहावतें गलत थोड़े ही हैं ? मैंने
क्या बिगाड़ा है राजा का ? बुला रहा है । जाने क्या करेगा ?
सब बोलूं तो मरी और झूठ बोलकर भी बच नहीं सकती।
अव तो जाना ही पड़ेगा। 'चित्त भी मेरी, पट्ट भी मेरी
और अण्टा मेरे वाप का।' यह कहावत यदि कहीं सच होती
है, तो राजा के साथ ही होती है।' इस तरह शंका-आशंकाओं
से भरी डरी-झिझकी और सहमी-सहमी रोनी मंत्री के पीछे
पीछे चल दी। बच्चे भी पीछे-पीछे लगे थे। वे तो
कुछ
भी
नहीं समझ पाये थे। अपनी बाल-बुद्धि से कुछ समझने का
प्रयाम अवश्य कर रहे थे । अब तो वे अपनी मां से भी कुछ
नहीं पूछ सकते थे । आपस में ही धुसर-पुसर करते चलते थे
उसी समय एक श्रेष्ठी का रथ जा रहा। उसे देख गण्डन
ने मण्डक से धीरे-से महा-
"मण्डक ! देख यह रहा रथ । ऐसा ही तो अम्मा
बताया था।"
"अरे हां । यह तो बहुत अच्छा है।'' मण्डक ने कहा-
"इस पर तो धुजा (ध्वजा) भी फहरा रही है।"
गण्डक का ध्यान दूर मे पाते हाथी की ओर गया
किस्मत का खिलाड़ी / ९
।
गि दिखाते हुए उसने कहा-
"देख मण्टक ! यह हाथी है। ऐसा हाधी तो एक बार
मारे गांव में भी पाया था न । तूने देखा था ?"
"हो देखा था गण्टक भया !" मण्डक चोला-"इसके
दशी दो दांत बाहर निकले हुए हैं।"
गण्डन बोला--
"ऐसे ही हाथीदांत तो हमारे बापू जंगल से लाये थे ।
उसके चूड़े हमारी अम्मा पहनती हैं । वापू कहते थे कि हाथी
दांत खाने के और होते हैं और दिखाने के और होते हैं।"
इन्ही बातों में राजभवन पा गया। नो मंजिल ऊँचे
पव्य भवन को दोनों बालक बड़े प्राश्चर्य से देखने लगे। मंत्री
राजसभा को जाने के लिए मुड़ा । रोनी ने मुड़गार अपने बच्चों
तो ऊपर मुंह उठाये खड़े देगा तो आवाज दी-"यायो !"
दोनों बच्चे दौड़कर मां के पास पहुंचे । फिर सव बड़े फाटक
। पास पहुँचे । यह फाटक मोने मे मदा था । जगह-जगह
रा, पना, पुराराज के बने हुए फूल लगे थे । प्रहरी खड़े थे।
पचने मंगो को अभिवादन किया। "मेरे पीछे प्रायो। "
म्हगार मंत्री फाटक में घुमा । पीछे-पीछे रोनी भी गयी।
गीतर पहुंची। प्रजाजन की दीर्घा में खड़ी हो गयी रोनी ।
जा ने मंत्री को नफेत दिया तो पह रोनी रो सिंहासन के
नगट ले गया । भयभीत रोनी ने भूमि तक माधा टेककार
राणाको प्रणाम किया पौर फिर प्राने भाग्य का निर्णय
गनने के लिए सही हो गयी।
-
१० / किस्मत का खिलाड़ी
--
राजा ने कहा-
"कौन हो तुम ?"
"आपकी प्रजा हूँ अन्नदाता।"
"सो तो मैं देख रहा हूँ। नाम-धाम ?"
रोनी बोली-
"अन्नदाता ! माण्डवगढ़ के पास की मजूरपल्ली
रहने वाली चाण्डालिनी रोनी हूँ।"
"खेर छोड़ो।" राजा ने गम्भीर होकर कहा-
देखकर तुमने अपना मुंह क्यों ढक लिया था ? सच बता
वहानेवाजी तो चलेगी नहीं । मेरी ओर से पीठ फेरकर
हो गयी थीं तुम तो ?"
रोनी चुप रही। सच ही कहना था और सच कहने
उसका साहस नहीं हो रहा था । तव राजा ने उसका सा
बढ़ाया
"रोनी ! सच बोलने वाला कभी घाटे में नहीं रहत
फिर मैं तो तुम्हें यह आश्वासन भी दे रहा हूँ कि सच किर
भी कड़वा हो मैं उसे पसन्द करता हूँ। सच बोलनेवाले
सात गुनाह माफ कर देता हूँ।'
राजा के इस अभय-पाश्वासन से रोनी का भय
हुग्रा । वह सोचने लगी-'मैं क्या कुछ अपनी ओर
कहूंगी? पूरा लोक कहता है कि अपुत्री का मुंह सवेरे-स
नहीं देखना चाहिए । अब जो हो, सो हो। सच कहूंगी
तो।' यह सोच रोनी ने कहना शुरू किया-
किस्मत का खिलाड़ी / ११ - "अन्नदाता ! मैं अपढ़-गेवार लोक-विश्वास और लोक- मत को ही शास्त्र मानकर जीती हूँ। समस्त लोक यह कहता है कि अपुत्री मनुष्य का प्रभात में मुख-दर्शन ऐसा अशुभ होता है कि दिनभर खाना नसीब नहीं होता । हम मजूर रोज कुत्रा खोदगार रोज पानी पीते हैं । मुझे भी आशंका हुई कि आज जाने क्या हो, सो मैंने यह अपराध कर डाला। क्षमा कर दीजिए महाराज !" राजा बोला- "तुम निर्दोप हो रोनी ! अन्धविश्वास के चक्कर में पड़ गयीं तुम । तुम्हारी सरलता और भोलापन भी सराहनीय है। तुमने सच बोला, इसके लिए मैं तुम्हें कुछ पुरस्कार अवश्य दूंगा। मेरा पुरस्कार अन्न-भोजन का होगा, ताकि लोकमत पर प्राधारित तुम्हारा यह अन्धविश्वास भी मिट जाए पि. अपुत्री मनुष्य के मुख-दर्शन से भोजन नहीं मिलता।" रोनी की जान में जान आ गयी। प्रमान मन से उसने पोचा ---. 'लोकानुभव उल्टा हो गया आज तो। घर जाकर मैं लगा-मूना बनाती पोर मनचाहा मिष्टान्न भोजन दे रहा है राजा।" राजा ने अपनी पाकशान्दा से देर सारी मिठाई, पूड़ी- पगावाग धादि रोनी की झोली में भरवा दिये । इतने कि दो दिन भर पेट पाए । माध में गेहूं-चावलों से भरी एग, नाड़ी भी भेजी । बहुत पग धी रोनी । इतना तो वह पूरे जीवन पी मजूरी में भी न पाती। गाड़ी उनके पोछे-पीछे चल रही थी। -
१२ / किस्मत का खिलाड़ी
-
रास्ते में मण्डक ने मीठाई मांगी। रोनी ने मुस्कराकर मोठं
झिड़की दी-
"हिश ! इतना भी सवर नहीं। पर चलकर सभी
खायेंगे।"
इधर जव रोनी बहुत देर गये तक घर नहीं पहुँची तो
उसका पति बहुत झंझलाया । उसे कुछ खा-पोकर जंगल जाना
था। मन-ही-मन बड़बड़ाया चाण्डाल-"प्राने दो आज ।
खाल उधेड़ दूंगा । जरा से काम में इतनी देर लगा दी । जाने
कहाँ-कहाँ मटरगश्ती करती-फिरती है।"
रोनी घर पहुंची। धान्य से भरी गाड़ी द्वार पर रुकवा
दी। उसकी ओर चाण्डाल की पीठ थी, सो वह अपने पति
. का आक्रोशपूर्ण चेहरा नहीं देख पायी । भीतर घुसते ही पूड़ी.
३. पावान और मिठाई यह सोचकर रखे कि चाण्डाल बहुत खुश
९गा। सब कुछ पटकने के बाद रोनी बोली-
"गण्डक के बापू ! यह देखो, मैं क्या ले पायी ?"
घूमकर चाण्डाल ने रोनी के एक लात जमाई और
तड़ातड़ दस-बीस थप्पड़ मारने के बाद पूछा-
"कहां रही अव तक ? मुफ्त के पकवान उड़ाती-फिरत
है । मैं नहीं जानता था कि तु यहां तक गिर जायगी।"
रोनी को भी ताव आ गया । बोली
"शिकारी की तरह झपट मारने लगे। मैं तो अवला
हूँ सो पिट ली। इन तरह बिना बात के किसी वरावर वाले
को मारते तो मजा चखा देता।"
--
किस्मत का खिलाड़ी / १३
Pre
"तो तू विना बात के मारना कहती है ?" चाण्डाल
डा-"यह माल कहाँ से उड़ा लायी? कोई यों ही दे
T? कंजूस बनिये बामनों तक को तो कभी इतना देते नहीं,
| चाण्डालों को देंगे ? मैं सब जानता हूँ। चिकने मुंह को
विल्ली चाटती है।"
"तुम तो कुछ भी नहीं समझते। मुझे भी अपना-जैसा
भिते हो । तुम खुद तो ताक-झांक करते हो । अब किसकी
सम खाऊँ ? स्त्री मैं भी हूँ और रानी भी स्त्री ही है।
हारे पास राज-पाट नहीं, पर मैं अपने दोनों बच्चों की कसम
ती कि तुम्हीं मेरे लिए राजा हो। तुम्हारे कारण ही मैं
पने को रानी समझती हूँ।"
चाण्डाल कुछ नरम पड़ा । उसने पूछा-
"अच्छा भागवान ! मान ली तेरी बात । पर एक तो
इतनी देर में पाई और फिर यह मिठाइयां और पकवान
पाई। फिर भला किसे सन्देह नहीं होगा ?"
रोनी बोली-~--
"अगर तुम मेरी मार वापस ले लो तो तुम्हें ऐसी बातें
ताऊँ कि तुम्हारा सन्देह ही न मिटेगा, बल्कि तुम बहुत शुभ
हो जानोगे।"
गुम होगार बोला चाण्डाल----
"अरे रोनी ! यह मार तो अपनेपन की थी । तू नका
रा मान गई ? अब तो यही उपाय है कि बदले में तू मुझे
र।"
--
.
१४ / किस्मत का खिलाड़ी
?
तुम मोठा!
"हाय दैया ! कैसा पाप चढ़ाते हो तुम
बोल दिये, इसी से मेरा दर्द ठीक हो गया।"
चाण्डाल बोला-
"अब बात को लम्बी मत कर । इस मिठाई का भेद
वता दे।"
रोनी ने बताया
"तुम्हें मिठाई की पड़ी है। बाहर देखो साल-दो साल
कट जाएँ, इतने धान्य से भरी राजा की गाड़ी खड़ी है। यह
सब राजा ने ही दिया है।"
"क्यों ? राजा ने क्यों दिया ?" चाण्डाल ने पूछा ते
हंसकर रोनी बोली-
"तुम क्या समझते हो ? यही कि राजा का मन अपन
सातों रानियों से उतर चुका है और वह तुम्हारी रानी रोन
पर रीझ गया है ?"
"तू तो हंसी करती है रोनी ! बताती क्यों नहीं ?"
फिर रोनी ने यादि से अन्त तक सब कुछ अपने पति
को बताया । सब कुछ सुनाने के बाद रोनी ने देखा कि उसक
पति उसकी आशा के अनुसार खुश नहीं हुा । नाखुश भी
नहीं हुआ, बलि गम्भीर हो गया । रोनी ने पूछा-
"क्या सोचने लगे आप? इतना पाकर भी गुण नहीं
हुए।"
चाण्डाल बोला-
"रोनी! यह सब वापस करके आं। यह अन्न हमें नहीं
किस्मत का खिलाड़ी / १५
-
पचेगा। लोगविश्वास युगों के अनुभव के बाद स्थिर होता
है । लोक विश्वास के अनुसार अपुत्री राजा का अन्न मी नहीं
पचता । इसके खाने से बीमार पड़ेगे हम
।"
रोनी ने पूछा--
--
।
"ऐसा कैसे हो जायगा ? अन्न क्यों नहीं पचेगा ?"
चाण्डाल ने बताया-
"अनुभव गरके देख ले । गाड़ी में से कुछ दाने विखेर
कर देख । पास में ही अपने घर से लेकर विखेरना । पक्षी राजा
के ग्राम तो नहीं चुगंगे।"
रोनी ने प्रयोग करके देखा। उसे यह देख कर बड़ा
आएचर्य हुआ कि पक्षियों ने राजा के धान्य का दाना छुपा
भी नहीं । रोनी ने तत्काल निश्चय निया-'जब पक्षियों का
यह हाल है तो बात ठीक ही है। लोटा दूं राजा को। आज
का दिन तो इसी प्राने-जाने में बीतेगा । बात तो वही हुई जो
होनो थो । अपुत्री राजा के मुंह देखने से ग्राज का दिन निरा-
हार ही बनेगा।
पाण्डाल भी बिना पाये धनुप-बाण लेकर वन को चला
गया । गण्ड-मण्डक को रोनी ने पाण्यासन दिया-
"बेटा ! लौटकर कुछ बनाऊंगी। प्राज तो ऐसे ही
1 चीतेगा । जाने किसके पुण्य से हमारे देश में अकाल नहीं पड़ता
घरना ऐसे अपुमी राजा के राज्य में जाने कितनों को कितने
दिन भूपों मरना पड़ता । तुम यहीं सेलना में प्राती हूँ।"
राजा द्वारा प्राप्त पूड़ी-पकवान और मिठाई नेकर
--
१६ / किस्मत का खिलाड़ी
रोनो धान्य भरी गाड़ी के साथ-साथ पुनः नगर की ओर चः
दी। गाड़ी राजसभा के सम्मुख रुकी । राजसभा समाप्त हो
का समय भी होता जा रहा था । रोनी सभा में पहुंची। बिन
किसी भूमिका के रोनी ने राजा से करुणापूर्ण स्वर में निवेद
किया--
"अन्नदाता ! हम सब आपका दिया ही खाते हैं । अ
प्रजावत्सल और न्यायप्रिय सम्राट् हैं। फिर भी हम लो
विश्वास को त्यागकर नहीं जी सकते। आपका धान्य हम न
ले सकते । क्षमा करें नरनाथ !"
कहते-कहते रोनी रो पड़ी। राजा उसके हृदय
सरलता जानते थे। अतः पूछा-
"रोमो मत रोनी । मेरी प्रजा को निर्भीक होना चाहि
धान्य लौटाने का कारण स्पष्ट कह दो। तुम्हें मुझसे ग
भय नहीं है।"
रोनी ने पुन: कहा-
"स्वामी ! पाप मारें या छोड़ें। यह धान्य में नहीं
सकती । आज मैंने यह धान्य पक्षियों को चुगाया । उन्होंने '
नहीं चुगा । लोकविश्वास कहता है नि सन्तानहीन राजा
धान्य पचता नहीं।''....
आगे कुछ नहीं कह पाई रोनी । राजा ने भी कुछ न
पहा । सिंहासन से उठते-उठते राजा ने मंत्री फूलसिंह
कहा-
"मंत्री! रोनी को जान दी। सभा विजित गारद
--
शिस्मत का खिलाड़ी / १७
F
-
धीर तुम हमारे एकान्त कक्ष में प्रायो।"
सभा विसर्जित हो गई। मंत्री राजा के पास पहुंचा।
बीरदास-गंभीर राजा ने मंत्री से कहा---
"मंत्री ! सब कुछ तुम देख-सुन चुके हो। ऐसी दशा
मैं अब माण्डवगढ़ में नहीं रह सकता। जो दगा प्राज
पाण्डान पत्नी की है, वही सब की है। सबका विश्वास
वही है, जो रोनी का है। बस, अन्तर इतना है कि रोनी के
मनोभाव जानने का अवसर प्रा गया प्रोर वाकी लोगों की
त उनके मन में है । जिस राजा का मुंह उसकी प्रजा देखना
। चाहे, उस राजा को प्रजा पर शासन करने का कोई अधि-
पार नहीं । अब तुम गम्हानो यह राज्य । मेरी प्रोर से प्रजा-
शानन करी । मैं अब अपना राज्य छोड़कर जाऊंगा।"
"यहाँ जायेंगे आप?
मंत्री फूलसिंह ने कहा-
'राजन् ! चीन-गोनों के कोसने गे कहीं ढोर भरते हैं ? अापके
बारे में जो रोनो ने सोचा है, ऐसा प्रजानी लोग ही सोचते
संग। छोटे लोगों के अन्धविश्वास की चिन्ता करके पाप
अपना राज्य छोड़ देंगे ?"
"ययों नहीं खोट दूंगा? अवश्य छोड़ दूंगा मैं ।" राजा
: दृढ़ता से पाहा----"मंत्री ! ऐसे अपमान-भरे जीवन से
परला माहीं अच्छा है ? मैं रोनी को दण्ड दे सकता था, पर
सपा मनोभाव तो नहीं बदल सकता था? तुम हठ मत
रो। यदि मुझे राजा मानते हो तो मेरे प्रादेश का पालन
रो।"
....
१८ / किस्मत का खिलाड़ी
"मंत्री ! तप से सब कुछ सम्भव हो जाता है । मैं में
सदा के लिए जा रहा हूं? वन में जाकर किसी देवी-देव
की आराधना करके उसे प्रसन्न करूंगा और सन्तान प्रा
का वरदान लेकर लौटूंगा, या फिर नहीं लौटूंगा।"
बुद्धिमान मंत्री ने राजा की बात पर मन-ही-मन टिप्प
की-'पौद्गलिक सुखों के लिए राजा देवी-देवता का
करेगा? ऐसा ही तप यदि कर्मों का क्षय करने के लिए
तो उद्धार न हो जाए। भाग्यलिपि के विरुद्ध कौन देवी-देव
इतना समर्थ है, जो इसे सन्तान होने का वरदान दे ? पर
पता, भाग्य की भावी का यही विधान हो कि राज्य को
ढंग से सन्तान मिले। तो जाने ही दूं राजा को। मेरे रोग
.... से रुकेगा भी नहीं।'
यह
सोच मंत्री राजाज्ञा से सहमत हो गया । सब शास
व्यवस्था सम्भाल ली। इधर जब रानियों ने सुना तो रनिव
में कुहराम मच गया। राजा ने उन्हें भी समझाया। रानि
को भी मानना पड़ा। श्याम वस्त्र पहनकर और श्याम
पर ही सवार होकर राजा जामजशा ने माण्डवगढ़ नगर ,
दिया ।
भले मनुप्य जव बिछुड़ते हैं तो मानो प्राण ही हर ते
हैं । राजा को जाते देख सभी रोये । बहुतों ने तो तुलय
रोनी चाण्डालिनी को कोसा भी । राजा ने सबको रोते छोड़
रात को ठहरते और दिन को चलते राजा जामजशा बहुत
पहुंच गया । एक वन में एफफर राजा ने निश्चय किया
। - हर रायशुभ मुंह देखने से रोनी का क्या बिगड़ा? यही वि. पलाएका दिन चाना नहीं मिला होना । पोर मेरा क्या हमा, मो जर देख ही रहा है।" किस्मत का खिलाड़ी / १९ है। अव प्रागे नहीं जाना है। इसी वन में एकूगा । माण्डवगढ़ से देतो बहुत दूर पा गया । अव यह वृक्षमूल ही मेरा घर होगा। इन और वन के कन्द-मूल भोजन । घोटे के लिए भी यहां पर्याप्त पास है।" न एका पेड़ के नीचे की भूमि साफ करके राजा ने चादर नाविरमाई। घोड़ा पेड़ में बांध दिया और लेट गया । कितना हिएगान्त था यहाँ । सुनने के लिए पक्षियों का कलरव और वो गुनाने गे लिए कोई नहीं । राजा घोड़े से ही बातें कर लेता। पाउससे कहा राजा ने---- 'को "प्यारे अण्व ! तू बोलता नहीं है, पर सुनता-समझता रे रोगो राब है। प्रव तू ही मेरा साधो, सखा और भाई है । तेरे महारे मैंने संगाड़ों गोसों की दूरी तय करली । अब सवेरे-सवेरे शास्तू तो मेरा मुंह देवा करेगा ? पर तू मनुप्प की तरह और रनिदरोनी की तरह अंधविश्वासी नहीं है । रोनी मेरा प्रभात-मुख- रानिदर्शन अपशकुन मानती थी, पर तू ही बता, क्या उसका मुख- [म दर्शन अशुभ नहीं था ? सवेरे-सवेरे मैंने भी तो उसका मुंह देिवा पा, सो देश अपना नगर छोड़ देना पड़ा । पर फोन रहे घोर किससे महे ? लोक है कि अंधविश्वास पर जी रहा है । मौन जाने राजा की बात पोड़े ने सुनी या नहीं। पर राणा गागन अदम हल्का हो गया था । ॥ .
तू
-
"अरे राजा! मंजिल से पहले ही रुक गया
जानता नही, जो बैठते हैं, उनका भाग्य भी बैठ जाता है भो
जो सोते हैं, उनका भाग्य भी सोता है।"
"तो फिर कहां है, मेरी मंजिल ?" राजा जामजशा
अंतरिक्ष से उद्बोधन करने वाली देवी से पूछा--"कब त
चलूं ? कहां तक चलूं ? माण्डवगढ़ को सैकड़ों कोस दूर छो
प्राया। अव तो इसी वन में..""
वीच में ही देवी बोली-
"राजन् ! आगे भी तुम्हें वन में रुकना है। दक्षि
५५॥ की ओर जानो । यहां से सौ योजन दूर दक्षिण वन
तुम्हारी इच्छा पूरी होगी।
"जाऊँगा अम्ब !" राजा ने कहा-"पर वहां के
मिलेगा मुझे ?"
देवी ने कुछ कहना चाहा और तभी राजा का घोर
बड़ी जोर से हिनहिनाया । राजा की प्रांख खुल गई । निःश्या
छोड़ते हुए राजा उठा और मन-ही-मन बोला-"तो यह सपन
था। कसा सपना था यह ? आधी बात ही जान पाया प्रो
सपना भंग हो गया। अब ? अब क्या करूं? जितना देवी
बताया, उतना तो करू' । सवेरा हो जाए, वस दक्षिण दिर
?
।
किस्मत का खिलाड़ी| २१
की पोर ही चलना है।"
सवेरा हो गया । सरोवर के पास राजा नित्यकर्म से
निवृत्त हुमा । सवार हो गया घोड़े पर । चार दिन तक बड़ी
तीव्रगति से घोड़ा दौड़ाया । सौ योजन पूरे हो गये । एक सघन
सुन्दर वन में पहुंच गया राजा । एक वटवृक्ष के नीचे घोड़े को
बांध दिया और स्वयं भी बैठफर सोचने लगा-"यहां तक तो
पा गया । पर यहाँ तो कोई नहीं है । यह पहाड़ कितना ऊंचा
है। यहाँ पया कोई रहता होगा ? अव तो यहां कोई नहीं
है।" यों सोचते-सोचते राजा का ध्यान एक पोर गया। उधर
वापी के पास एक स्त्री बैठी थी । बुतूहलवश राजा उस स्त्री
{ के पास पहुंच गया और बोला-
"गौन हो तुम ? दुःख की मारी लगती हो ? किसी
सार्थ से बिछुट गई हो क्या ? ऐसे बड़े वन में तुम्हें अकेला
देखकर मुझे बड़ा प्राश्चर्य होता है ।"
स्त्री ने अपने प्रोठों पर तर्जनी ऊँगली रख कर राजा
को संकेत दिया कि बोलो मत । चुप रहो । फिर पर्वत मी
प्रोर हाथ उठाकर पुनः संकेत से समझाया कि इधर से खतरा
है। स्त्री के बजने पर राजा मीन तो हो गया, पर उसके मन
में प्रतृप्त जिज्ञासा गी बैचेनी बढ़ गई । अव वह अपने मन से
ही प्रश्न करने लगा और उम स्त्री के विषय में तरह-तरह के
अनुमान लगाने लगा। कुछ ही देर बीती नि पहाड़ को प्रोर
बड़ी जोर गा पट्टहास हुमा । घव अनचाहे ही वापी के पास
पठी स्त्री के मुंह से ये शब्द एकाएमा निपाल पढ़े-
२२ / किस्मत का खिलाड़ी
"कहीं छिप जायो । बड़ा भयंकर राक्षस आ रहा है।
कहां छिपता राजा ? उसने पहाड़ के ऊपर से
भीमकाय निशाचर को आते देखा तो भयवश वापी में ही कूः
पड़ा। अथाह पानी था वापी में । जाने कहां पहुंचा राजा
साँस रुक जाने से वह बेहोश हो गया । वहुत देर बाद जब उ
होश आया तो देखा कि वह एक फेनिल शय्या पर लेटा है
जिस स्थान पर उसकी शय्या है, वह एक रत्नजटित भवन है
और वहाँ तरह-तरह के नृत्य-नाटक हो रहे हैं। राजा उठका
बैठा हो गया और देवांगना-किन्नरियों का नृत्य देखने लगा
नृत्य की समाप्ति के बाद एक देवी उसके पास आई औ
बोली-
"अब कैसी तवीयत है तुम्हारी ? वापी में डूबने से तु
बेहोश हो गये थे । मैं तुम्हें यहाँ ले आई। कुछ इच्छा हो त
कहो।"
"लेकिन तुम कौन हो ?
कौन हो ?" राजा ने पूछा-~~ "यहाँ क्यं
ले प्राई मुझे ? मुझे तो उसी स्त्री के पास पहुंचा दो, नहीं ।
मैं वापी में कूदा था । जाने कौन है वह स्त्री, और कोन
वह राक्षस ?"
देवी बोली-
"मेरी पूछते हो तो सुनो । मैं इन्द्राणी देवी की सर्ख
दासी त्रिदशी देवी हूँ। परोपकार की भावना से मैं तुम्हें यहाँ
ले पाई । अव जहाँ कहोगे, वहीं पहुंचा दूंगी।"
-
राजा बोला---
"देवी ! अव मेरी इच्छा इन्द्राणी देवी से मिलने की
। मुझे उनसे मिला दो। मैं उनसे ही कुछ मागूंगा।"
देवी बोली-
"वे तो पूर्णिमा की रात को मिलेंगी। जहां से तुम
पाये हो, उसी वन में पूनम की रात वे हम सब सखियों के
थ नृत्य करने भाती हैं।"
"पूनम की रात ?" राजा ने कहा-"तव तो पच्चीस
दन सक प्रतीक्षा करनी होगी। देवी ! तुम मुझे वापी से
हर उस दुखिया स्त्री के पास ही पहुंचा दो। मैं उसका दुःख
र गारना चाहता हूँ। जिस समय मैं उससे कुछ पूछ रहा
T, तव तो सूर्यास्त होने वाला था । वही समय राक्षस के
ने का होगा। तभी उसने कुछ नहीं बताया था । दिन में
ने बतायेगी ही।"
देवी बोली
"तुम उस राक्षस को भी मारोगे । मैं तुम्हें चार
टिगत देती हूँ। ये तुम्हारे बड़े काम प्रायेंगी।"
यह गाह निदशी देवी ने राजा को चार गुटिकाएँ दी
और उनके अलग-अलग गुण बताये कि पहली गुटिका को मुंह
रख लेने से तुम थकोगे नहीं। प्रतिद्वन्द्वी जितना ही बलवान
है, नमी-न-कभी तो वह धफेगा ही और तुम कभी नहीं
कोगे। दूसरी गुटिका हाथ में लेने से अभेद्य द्वार भी अपने
आप खुल जायगा । तीसरी गुटिका हर प्रकार के विप का
वारण मरेगी घोर चौपी गुटिका दिशा ज्ञान बताने वाली
-
।
२४ / किस्मत का खिलाड़ी
है। राजा ने चारों गुटिकाओं के गुण समझकर सम्हाल २
रख लिये । देवी ने तुरन्त उसे वापी के बाहर पहुंचा दिया
दिन के उजाले में राजा ने पुनः अपना घोड़ा ज्यों-का-त्यों बैं:
देखकर सोचा, जैसे एक रात सुन्दर सपना देखकर बीती हो
धीरे-धीरे चलकर राजा दुखिया स्त्री के पास पहुंचा । पूर्वा
का समय था । तभी देवी सरस भोजन के दो थाल दे गयी
राजा ने उस स्त्री से भोजन करने का आग्रह किया।
उसने भोजन नहीं किया । कारण बताया कि अपने अभिग्रह
अनुसार उसने अन्न-जल का त्याग कर रखा है। रा
गोला-
"तब तो आप पर बहुत संकट है। तभी तो पाप इत
दुर्बल हो गयी हैं । यदि गोपनीय न हो तो मुझे अपनी कहा
सुनायो।"
-
?
"
स्त्री वोली
"सुना दूंगी । सुनाने में क्या जाता है ? पर मेरा दु
तो मेरी मौत के साथ ही समाप्त होगा।'
"मैं प्राण देकर भी प्रापका दुःख दूर करूंगा। अब
मैं भी आपकी बात सुनकर ही भोजन करूंगा।"
स्त्री अपनी कहानी सुनाने लगी-
"धर्मभ्रात ! जैसे तुम राजा हो, वैसे ही मैं भी कि
राजा की बेटी और किसी राजा की रानी हूं। भाग्य ने य
मुझे ऐसी जगह पटक दिया है, जहाँ न मैं जीवितों में हूँ
न मरी ही हूँ।
-
"
किस्मत का खिलाड़ी | २५ कहते-कहते रानी फी आँखों में आंसू छलक पाये । प्रांगू पोंछते हुए रानी ने पुनः कहा--- "मानकपुर के राजा कनकसेन मेरे पिता हैं और गोरीपुर के राजा विजयसेन मेरे स्वामी हैं। मेरा नाम विजय- श्री है । एक दिन ऐसा हुआ कि यही राक्षस जो यहां पर्वत गुफा में रहता है, आधी रात को अट्टहास करता हुआ राज- भवन पहुंचा, मेरे स्वामी को जगाकर इस असुर ने कहा कि राजा तू मुझे अपनी रानी दे दे। नहीं तो मैं तेरा सर्वनाश कर दूंगा । असुर की ऐसी अनुचित मांग मेरे पति भला कैसे सुन पाते ? कोई भी पति नहीं सुन सकता। मेरे पति राजा विजयसेन ने राक्षस को ललकारा। उस दिन यदि युद्ध होता, गोई एक अवश्य मारा जाता । पर वाह रे मेरा भाग्य ! मेरे पति का हृदय बदल गया। उन्होंने सोचा, मेरी रानी परपुरुप- गामिनी और व्यभिचारिणी है। निश्चय ही इसका राक्षस से पूर्व प्रेम होगा । तभी तो यह रानी को लेने पाया है । वरना या यों ही पा जाता ? यह तो बड़ा गहरा रहस्य खुला । यो विनार पलट जाने से मेरे स्वामी ने राक्षस से नरम पड़ कर पहा, ले जायो भाई ! राक्षस ने मेरा हाथ पकड़कर खींचा। में अपने पति के चरणों से लिपट कर बोली-मुझे बचा लो रियामी ! पति ने मुझे पैरों से धक्का देकर कहा--दूर हो जा व्यभिचारिणी ! अव क्यों त्रियाचरित्र रचती है ? मैं तो सब जानता हूँ। "धर्मात ! बह राक्षस मुझे जबरन यहाँ ले पाया ।
२६ / किस्मत का खिलाड़ी मैंने बहुत हाथ-पैर पटके, पर कुछ नहीं कर पाई। यहां मैंने इससे स्पष्ट कह दिया कि यदि मेरे साथ बल प्रयोग किया तो अपनी जीभ खींचकर प्राण दे दूंगी । मैं सती नारी हूँ। तू मेरी लाश ही पा सकता है, मुझे नहीं । "राजन् ! इस पर राक्षस ने कहा कि कुछ ही दिनों में तेरे होश ठिकाने आ जायेंगे । अपने आप समर्पण करेगी। तभी से राक्षस मेरे राजी होने की प्रतीक्षा करता है। मैंने उसी दिन से अन्नजल त्यागकर नवकार मन्त्र का स्मरण प्रारंभ कर दिया है । बस, यही है, मेरी राम कहानी।" पूरी व्यथा-कथा सुनने के बाद माण्डवगढ़ के राजा जाम- जशा ने पूछा- "इस समय कहाँ होगा, वह पापी असुर ?" रानी ने बताया- "सवेरे ही निकल जाता है। नर-भक्षण करके पहाड़ी गुफा में सोता है । संध्या को यहाँ चला आता है और रातभर मेरी खुशामद करता है । इस समय दोपहर है। गुफा में पड़ा सो रहा होगा।" "याज की रात वह देखेगा ही नहीं।" राजा ने कहा- "मैं अभी जाकर उसे मारता हूँ।" अाश्चर्य के साथ रानी ने कहा- "तो क्या तुम मारने जाओगे उसे ? नहीं तुम मत जाना वह बड़ा बलवान है । तुम्हें मार कर खा जायेगा।' राजा बोला- -
किस्मत का खिलाड़ी / २७
।
"धर्म भगिनी ! काल से बड़ा वलवान कोई नहीं होता।
काल के अनेक रूप होते हैं। कभी-कभी तो महातुच्छ चींटी
जीमान बन जाती है। यदि मेरा काल उसके
। यदि मेरा कान उसके हाथ में है तो
में उनके हाथों से मांगा। और यदि उसे ही मेरे हाथों से
परना है तो मरेगा ही। विधि-विधान को अटल मानकर तुम
नश्चिन्त रहो।"
"णमो अरिहंताणं" का उच्चारण करते हुए राजा पहाट
पर पहुंचा । गुफा ढूंढ ली उसने । गुटिका के प्रभाव से गुफा-
द्वार पर अटकी भारी शिला अपने प्राप सरक गयी। निर्मीक
होकार राजा भीतर घुस गया । नरभक्षी अमुर सो रहा था।
राजा ने उसे अावाज दी-
"उट जा अमुर ! तेरा माल एक मानव के रूप में श्रा
गया है।"
राक्षस उठा । राजा को ऐसे देखा, जैसे सिंह हरिण को
रखता है। फिर अट्टहास करके बोला-
"आज मैं थोड़ा भूखा भी रह गया था । तुझे जाकर
पिनी
भूख मिटाऊँगा।"
राजा तुरन्त बाहर पाया। राक्षस ने उसका पीछा
न्या । गुफा के बाहर दोनों भिट गये। राजा विजयसेन की
निी दोनों का दन्द युद्ध दूर से देखने लगी। एक प्रहर तक
गा-दौड़ी पोर उठा-पटकी हुई । राक्षस थक गया, कभी तो
पता ही। पर गुटिका के प्रभाव से राजा जामजशा नहीं
का । अन्त में राजा राक्षस के ऊपर चढ़ गया और कृपाप
----
२८ / किस्मत का खिलाड़ी
।
निकाल कर वोला-
"दो-चार सांस और ले ले। तेरा अन्त आ गया।
अपने को अमर समझकर भारी भूल की । अरे अधम ! म
तो कोई नहीं है। एक सन्नारी पतिव्रता का हरण करके।
कितना बड़ा पाप किया है ?"
राक्षस गिड़गिड़ाया। गिड़गिड़ाकर बोला-
"अरे राजा ! शरण में आये वैरी को भी छोड़ देते
मैं तो तुम्हारा बैरी भी नहीं हूँ। अव तो मैं तुम्हारी श
हूँ। जो कहोगे सो, करूंगा। मांस-भक्षण कतई त्याग दूंग
आज से तुम्हारा दास बनकर रहूंगा। प्राणों की भिक्षा दे
"
मुझे।'
राजा को दया आ गयी । छोड़ दिया राक्षस को।
देश दिया-
"जितने जीव तुम्हारी कैद में हैं, सब को मुक्त क
उनके घर पहुंचा दो। फिर आओ तुम्हें दूसरा व
वताऊँगा।"
राक्षस ने राजाज्ञा का पालन किया । सवको पहुंचा
आया तो राजा जामजशा ने दूसरा आदेश दिया-
"अव शौरीपुर के राजा विजयसेन को उठा लायो ।
आ गया राजा विजयसेन। राजा जामजशा ने :
अपनेपन से फटकारा-
"भगिनीपति ! रखते हो, मेरी धर्म बहिन विजय
को ? इसने अब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं किया । जीभ खीं
-
किस्मत का खिलाड़ो | २९ । र प्राणान्त करने की धमकी दी रासक्ष को। जानते हो यों ? इसलिए कि यह पतियता है । तुमने अपनी पतिव्रता त्नी पर मन्देह करके अच्छा काम नहीं किया है। बोलो, या कहोगे प्रब ?" राजा विजयसेन बहुत लज्जित हुा । बोला- "तुम बहन-भाई-दोनों ही मुझे क्षमा करो। मैंने हा भारी अपराध किया है। यदि क्षमा नहीं करते तो जो ती दण्ड दोगे, मैं स्वीकार करुगा।" "दण्ड ? हो दण्ड तो दूंगा ही।" राजा जामजणा ने हा-"नारी के प्रति सबसे बड़ा अपराध है, उसके चरित्र को तांछित करना, तुमने यह घोर अपराध किया है । इसका दण्ड ही है कि अब रानी विजयश्री से क्षमा मांगगार अपने साथ जानो। "यह भी कोई दण्ड हुप्रा?" राजा विजयसेन ने हँसकर महा - "तुम नर के रूप में कोई देव ही हो।" राजा जामजशा ने कहा- "देव होना गया बहुत अच्छी बात है ? मनुप्य के भी पुर पत्र्तव्य होते हैं । मनुष्य, मनुप्य ही बना रहे, यही या गाम है ? अब छोड़ो इन बातों को । अव जायें प्राप।" राजा विजयसेन ने कहा- "प्रब तो तुम्हें भी मेरी एक बात माननी पड़ेगी। कार तो तुम पर ही नहीं सकते। क्योंकि मेरी बात म्हारी बहिन के मन की बात भी होगी। बात यह है कि %Ary- - བ། -
३० / किस्मत का खिलाड़ी
अव तुम्हें भी हमारे साथ शौरीपुर चलना होगा।"
तीनों शौरीपुर पहुंचे। कुछ दिन तक राजा जामजः
विजयसेन राजा का मेहमान बनकर रहा । फिर अनुम
लेकर वह पुनः यथास्थान वापी के निकट आ गया और व
वृक्ष
के नीचे डेरा जमाया। राक्षस उसकी सेवा में रहने
गया । स्मरण किया तो इन्द्राणी देवी की दासी सखी
भोजन लेकर आ गई। राजा ने उससे कहा-
"देवी ! अब तो परसों ही पूर्णिमा है । पुनः याद दि
रहा हूँ। मुझे इन्द्राणी के दर्शन करा दो। तुम्हारी अनुशं
से ही वे मुझे पुत्र प्राप्ति का वर देंगी।"
देवी बोली-
"राजन् ! मुझे तुम्हारा दुःख मालूम है। मैं स
+qi नामक इन्द्राणी देवी से तुम्हारी बात कहूंगी ३
उनका आदेश प्राप्त करके तुम्हें उनके पास ले जाऊंगी।
वे तुम पर प्रसन्न हो गई तो तुम्हारे सव संकट दूर
जायेंगे।"
दो दिन और वीते तो राका रजनी भी आ गई। यः
स्थान सन देवियों के साथ देवियों की रानी इन्द्राणी पाय
बड़ी देर तक नृत्योत्सव हुअा। चांदनी में स्नान करते
जव सब वैठकर वस्त्र बदलने लगी तो राजा जामजशा
परिचित देवी ने इन्द्राणी से कहा---
"स्वामिनी ! आपके दर्शनों की प्राकांक्षा में एक र
लगभग एक महीने से आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। सन्
किस्मत का खिलाड़ी | ३१
--
F
प से यह बहुत दुःखी है । लोक विश्वास के अनुसार उसकी
राजा सवेरे-सपेरे अपने अपुत्री राजा का मुख देखना भी नहीं
माहती।
"स्वामिनी! आपके द्वार से अभी तक कोई खाली
लोर निराग नहीं लौटा। प्रापकी दया-अनुकम्पा का मैं उसे
नाश्वासन दे चुकी हूँ । मेरी बात राखो मां ! और उसका
संगाट दूर गारो।"
इन्द्राणी हंसकर बोली-
"निदणी ! तू ऐसे ही काम करती फिरती है। अब
ने पह ही दिया है तो मैं उसका काम तो करूगी, पर पहले
उसगी परीक्षा अवश्य लूंगी।"
यह कह नागेन्द्र देव की पत्नी इन्द्राणी देवी वटवृक्ष
के
नीतीने पहुंची और एका पोडशी बाला का रूप बनाकर बोली-
'पोहो, मेरा भाग्य कैसा है कि आप मुझे यहीं मिल
दूतए। भाग्य कृपा से ही मैंने पापको पहचान लिया कि प्राप
पाण्डवगढ़ के यशस्वी राजा जामजशा है।
"राजन् ! मैंने किशोर वय में ही यह प्रतिज्ञा कर ली
गयी कि मैं विवाह करगी तो प्रापसे ही करूगी, नहीं तो
। बुधारी ही रहेंगी। यद्यपि पाप मानव हैं और मैं देव कन्या
पर विवाह तो मन का होता है। मेरा मन आप पर है तो
माप मेरे लिए देव से भी बदगार हैं।"
राजा चोला-
"देवी ! तुन्छ मानव एका देवी का पति कसे बन
पा
३२ / किस्मत का खिलाड़ी
-
सकता है ? फिर मैंने तो सात विवाह कर लिये ।
विवाहों में भी निराशा ही मिली । छोड़ो ये बातें। मैं नि
और ही चिन्ता में घुल रहा हूँ।'
पोडशी वाला रूप में देवी इन्द्राणी बोली-
"अवधिज्ञान के बल से मैं आपकी चिन्ता भी जा
हूँ। आप बस हाँ कह दें, तो मैं पापको सन्तान-सुख भी
सकती हूँ। आपको मेरी एक छोटी-सी बात भर माननी
वह यह कि आप अरिहंत धर्म का त्याग कर दें। वस ।
मैं आपकी और पुत्र भी आपके हो जायेंगे।"
राजा जामजशा देवी की शर्त सुनते ही उत्तेजित
गया। बोला-
"क्या कहती हैं आप ? देवी होकर भी आप असं
। सम्भव नहीं बना सकतीं। जानती तुम्हारा देवत्व
के सहारे खड़ा है ? आज में जितना सुखी हूँ, माम
के ही कारण और सभी दुःख मेरे कृतपापों का ही फल
अव मैं तुम्हारी एक नहीं सुनूंगा । चली जाओ यहां से ।
त्यागकर तो मैं इन्द्र का पद भी नहीं चाहूंगा।"
अब देवी ने भय दिखाया
"राजन् ! जानते हो, मेरी वात न मानने का ।
परिणाम हो सकता है ? मैंने तुमसे विवाह करने का निश
किया है और यह भी निश्चय किया है कि तुमसे धर्म छु
कर ही विवाह करूंगी। मेरी शक्ति और बात न मानने
परिणाम सोच लो । तबाह कर दूंगी।"
-
किस्मत का खिलाड़ी / ३३ "मौत से बढ़ी सजा तुम दे भी क्या सकती हो ? जा नं हंसगार गाहा--"धर्म के लिए मर मिटना धर्मवीरों लिए एन अवसर होता है । मैं भी इस अवसर को खोला ही चाहता।" परीक्षा पूरी हो गई। राजा जामजशा की धर्मदृढ़ता य इन्द्राणी देवी गद्गद् हो गई । अपने रूप में प्रकट होकर मानली. ! मैं तुम्हारी परीक्षा ले रही थी। जिन द्राणी को देखना चाहते थे, मैं वही हूँ। वर मांगो।" राजा देवी के चरणों में गिर पड़ा । बोला- "मैं धन्य हुया अम्ब ! तुमसे क्या छिपा है ? मन की या पूरी गारो जगदम्चे !" "राजन् देवी ने कहा- - "राजन् ! छह महीने बाद तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। पाच तक तुम्हें क्या करना है, सो बताती हूँ। आज से तुम्हारे से। प्रबाट होंगे । तुम्हें बारह वेला प्रायम्बिल तप करने हैं और तेरह तेला। फिर अट्ठम तप करना है। इसी क्रम से दह माह तक धर्माराधन करो। उसके बाद पुनः मेरे पास रहीं माना।" गह नह देवी अन्तर्धान हो गई । वापी के निकट रह- हार राजा प्रत-उपवास करने लगा । असुर उसकी सेवा करता नने । छह महीने पूरे हुए। पपिनी नाम की इन्द्राणो देवी नः प्रभाट हुई और उसने सात प्रानफल राजा को देकर --
३४ / किस्मत का खिलाड़ी
-
.
कहा
"राजन् ! ये फल अपनी रानियों को देना । इनके स
से तुम्हारी सातों रानियां गर्भवती होंगी और तुम तो।
ही पुत्र चाहते थे, जवकि अब तुम सात पुनों के नि
बनोगे।"
इतना कह देवी अन्तर्धान हुई और राजा घोड़े
सवार होकर माण्डवगढ़ नगर की ओर चल दिया । दूरी व
थी। सैकड़ों कोस-योजन जाना था। कई दिन-रात काम
था। लेकिन राजा का मन तो कभी का माण्डवगढ़ पहुँच र
था। कुछ ही दिन बाद वह तन से भी पहुँच जायगा।
3
"
'अरे ! बाग में यह कौन यात्री पाया ? लगते तो
"र, राजा हैं । हाँ, वही तो हैं । वही श्याम वर्ण घोड़ा है,
गि पर सवार होकर इन्होंने माण्डवगढ़ छोड़ा था।"
के अपने से ही बातें करते-करते माण्डवगढ़ के राजोद्यान
। माली राजा जामजगा के निगट पाया। राजा का मुख
री पोर था। वे जलविहार कुण्ड पर बैठे सद्यःविकसित
पनों को शोभा देख रहे थे । माली ने पास पाकर बाहा-
"अन्नदाता की जय हो ! अाज का प्रभात बड़ा शुभ
। पाप रात ही आये होंगे । रात भर उद्यान में रहे ? सेवक
'भाभा दी होती तो..!"
मुंह फेरे-फेरे ही राजा ने कहा-
"उद्यानरक्षन ! आज का प्रभात मंगलमय तुम्हारे
ये मेरो हो गया ? गया तुम लोक-विश्वास से दूर रहते
? तुम देखोगे मेरा मुंह ?"
भगवान की शपथ खाकर कहता हूँ अन्नदाता, कि
गले जन्म में भी मैं आपकी प्रजा बनने का आकांक्षी हूँ।
ग तो मूर्य है, जो अपने नाम नहीं देखते और अपुत्री राजा
: प्रभात मुख-दर्शन अशुभ मानते हैं । अन्नदाता ! मैं तो
?
३६ / किस्मत का खिलाड़ी
रात दिन इस उद्यान में शकुनों (पक्षियों) के बीच में रहा
इसलिए शकुन-अपशकुन (शुभाशुभ संकेत) की वैसे भी
परवाह नहीं करता । इसी उद्यान में दसियों वार मैंने j
की देशना सुनी है। और फिर जो आपको निस्संतान
उससे बड़ा मूर्ख है ही कौन ? माण्डवगढ़ की प्रजा क्या
सन्तान नहीं है ?
राजा जामजशा ने माली की ओर मुख किया
वोले-
"सब तुम्हीं जैसे तो नहीं हैं माली ! लोकविश्वा
भय से मैं सवेरे-सवेरे तुम से मिलना नहीं चाह रहा।
तुमने मेरी शंका तो दूर कर दी, पर मुझे तो सभी के
की बात सुननी पड़ती है, सो इतने महीने राजधानी से
-
-
"माली ! अब मैं सफल मनोरथ होकर लौटा हूँ
एक-दो नहीं, सात-सात राजकुमारों से राजभवन भर जा
तुम नगर जाओ और महामन्त्री फूलसिंह को हमारे पा
संवाद पहुंचाओ।"
माली दौड़ा-दौड़ा गया और महामन्त्री को सब
बता दिया । फिर तो यह संवाद विजली की तरह पूरे
में फैल गया। रोनी चाण्डालिनी तक भी बात पहुँच
अव तो लोग रोनी की भी प्रशंसा करने लगे कि रोनी ते
कारण राजा ने सन्तान प्राप्ति का वरदान प्राप्त कर ति
रानियाँ शृंगार करने लगीं। पूरा नगर ही सजाया ।
।
किस्मत का खिलाड़ी / ३७ बार भी मन्त्रियों, सभासदों और नगर के विशिष्ट जनों को साथ कार महामात्य फूलसिंह उद्यान पहुँचे । आज वे फूल से कले हुए थे। बड़ी धूमधाम से राजा ने नगर में प्रवेश किया। पासमय विणेप दरवार लगा। राजा ने अपनी यात्रा का 'तान्त सबको प्रादि से अन्त तक सुना डाला। फिर वे यथा- या गय अन्तःपुर में पहुंचे। सभी रानियां एक ही जगह इकट्ठी थीं। पटरानी मुखमिवती अपने भवन में थी। वह यह सोचकर नहीं आई कि 'चक नाथ मिलने में मेरी उपेक्षा होगी। सोतें छोटा-ऋशी गरोगन रंगी। । उनका एक गुट रहता है। वे मेरे हैं तो क्या मेरे हस नहीं पायेंगे ? चे भी तो जानते हैं कि इनके साथ मैं सही रहती। इधर राजा ने भी दामवती की उपस्थिति-अनु- 'धार स्थिति पर कोई ध्यान नहीं दिया । वे ज्यादा देर बैठे भी हीं। बंटते भी फैले ? राजसभा संचालन का काम सबसे शाहले था। रानियों के पाग तो रात में भी बैठ सकते हैं । पहा सोच रागा ने देवी प्रदत्त मातों पाल एक स्थान पर रख- भार महा---- ह "एल-एन सालों बांट लेना । सातों के पुत्र होंगे । देवी मान मिथ्या नहीं होगा। मैं चलता हूँ।" अपनी बात पाहार राजा पुनः राजनभा पहुँचे । एमा- पोका पान नयने उठा लिया। दामवती रानी के हिस्से का एक मच गया । एक बोली-~- " गौतन पान पाचायें ?' रोजच
३८ / किस्मत का खिलाड़ी
दूसरी वोली-
"हुँअ ! क्या होगा पहुँचाकर ? हम ही बोट
खायेंगी। उसे तो वाँझ ही रहने दो।"
"ठीक है-ठीक है।" कहकर सव सहमत हो रहे
सातों फल छ: रानियों ने ही खाये । दामवती को कुछ
मिला । होनहार ही ऐसी थी कि दामवती रानी को नि
फलों की गुठलियाँ । दामवती की दासी ने गुठलियां मन
स्वामिनी को देते हुए कहा-
"आपने कहा था न कि मेरे हिस्से का फल न मिले
गुठलियाँ ही ले आना । सो ले आई हूँ। ये भी उनसे मौत
नहीं पड़ीं। बाहर पड़ी थीं, सो उठा लाई ।
रानी दामवती बोली
"दासी ! फल भी गुठलियों से ही तो बनते हैं । गुट
तो बीज होती है। भगवान् पार्श्वनाथ का स्मरण कर !
सबको ही खाऊँगी । तू धोकर सवको एक जगह पीस दे।
रानी ने गुठलियों का चूर्ण खाया । कड़वाहट के कान
आधा भाग ही खा पाई । शेप आधा घोड़ी के आगे उल
दिया। भाग्य की बात-पाठों ही गर्भवती हुई। सातों रानि
और आठवीं घोड़ी। नौ महीने बीते तो फल खाने वाली
रानियों ने एक-एक पुत्र को जन्म दिया। देवी के वरदान प
के साथ उन छहों को कपट-ईया का फल भी साथ ही मि
गया, अर्थात् छहों के राजदुलारे काने-कुबड़े, अंधे-लूले अं.
अपंग हुए। करनी व्यर्थ कभी नहीं जाती। नौ महीने से गुर
-
।
किस्मत का खिलाड़ी / ३९
न ऊपर बीत जाने पर रानी दामवती ने सुन्दर पुत्ररत्न को
न्म दिया। ऐसा कि जैसे चाँद का टुकड़ा हो अथवा प्राची
सा ने बाल रवि को जन्म दिया हो। फिर पांच महीने
और बीते तो घोड़ी ने भी एक बछेड़ा दिया । चौदह महीने
तः घोड़ी ने बछेड़ा जन्मा।
रानी दामवती ने अपने पुत्र का रहस्य छिपाया। किसी
को नहीं बताया कि मेरे पुत्र हुआ है । अपनी विश्वस्त दासियों
सहयोग से उसने पण्डित को बुलाकर नामकरण संस्कार की
संधि पूरी की और उसका नाम रखा 'गजसिंह कुमार' । अव
हानी को अपने पति की उपेक्षा का भी कोई दुःख नहीं था ।
'ति का साकार प्रेम चन्द्रखण्ड-सा राजकुमार उसकी गोद में
T। इधर उसकी सौते-छहों रानियां भी खुश थीं। लेकिन
निकी खुशी का कारण यह था कि दामवती बांझ ही रह
का। गाने-वड़े हुए तो क्या, हमारे पुत्र तो हैं। ईर्ष्यालु
अपने प्रभाव में इतना दुःखी नहीं होता, जितना कि दूसरों के
काभाव में गुरी होता है । यही हाल इन रानियों का था।
दिन बीतते रहे। महीने बीते । वर्ष भी वीत गए।
च वर्ष बीते । गणसिंहयुमार पांच वर्ष का हो गया ।
पेटा भी पाच वर्ष का था । अब वह पूरा अश्व था । पशु-
सायनो जन्म से ही दौड़ने लगते हैं और पांच वर्ष में तो
हार पूरे हो जाते है । रानी गजसिंह को बताती-बेटा, यह
श्यनुत तेरा सहोदर भाई-जसा है। यह भी देवी के फल से
या है। गजमुमार भी घोड़े को बहुत प्यार करता । घोड़ा
४० / किस्मत का खिलाड़ी
नि
भी बहुत समझदार था । पशु होते हुए भी उसमें मनुष्य
सा विवेक था । जव से कुमार ने बोलना-समझना शुरू
था, अर्थात् लगभग ढाई वर्ष की उम्र से रानी ने उसे घर
ही स्वयं पढ़ाना शुरू कर दिया । गजकुमार संस्कारी नी
था ही, सो पाँच वर्ष का होते-होते वह वड़ों को अचा
डालने वाली बातें जान गया था। माता द्वारा दी गई शि
उसने मन्त्र की तरह हृदयंगम कर ली थीं। पहली र
माता ही होती है । माता तो ऐसी विलक्षण गुरु होती
गर्भकाल में ही अपने गर्भस्थ शिशु पर अच्छे संस्कार
में समर्थ होती है। माता जैसा चाहे, वैसा ही अपनी
को बना सकती है। वीर भी माता के बनाये बनते
कायर-कपूत भी माता के बनाये बनते हैं। दामवती ने
पुन को सच्चे अर्थो में सच्ची माता का सपूत बनाया थ
गजकुमार रलों की जड़ी गोल-गोल टोपी पहनत
रंग की टोपी की परिधि में से निकलते काले ।
वान बड़े अच्छे लग रहे थे । देह पर पीले रंग का
था । उठी हुई देह के कारण पांच वर्ष का गजसिंहकुम
वर्ष का-सा लगता था । परों में छोटे-छोटे मखमल के
(जूते) थे। एक दिन मन्त्री फूलसिंह रानी दामवती के :
आया । रानी के पास ही गजसिंह बैठा था और वह
के कटोरे में दूध पिला रही थी। मन्त्री ने रानी को
किया और पास ही रखी चौकी पर बैठ गया । चौर्य
की थी। बैठने के बाद मंत्री ने रानी से पाहा-
।
किस्मत का खिलाड़ी/४१
"महारानी जी ! आपका कुमार ही माण्डवगढ़ की
। यी प्राणा का केन्द्र है। अब तक मैंने यापकी आना मानी
कुमार को राजसभा में नहीं ले गया। पर आज तो पाप
प्रार्थना माने और राजकुमार को मेरे माय भेज दें।"
रानी बोली-
"महामन्त्री ! राज्य भर में तुम्हीं इस रहस्य को
नते हो कि में भी पुत्रवती हुँ। या फिर मेरी विश्वस्त
चरी दामियां जानती हैं । तो क्या अब तुम अपने वचन
भूलकर इस रहस्य को प्रकट करोगे ? यह यह रहस्य
रन्ट हो गया तो मेरे पुत्र का भला नहीं है । इसकी विमाताएँ
। इसके प्राण लेने पर तुल जायेंगी। जाने के क्या-क्या
ड्यन्त्र रचेंगी ? उनकी दृष्टि में तो मैं बांझ ही हूँ। तभी
। सब पल उन्होंने ही खाये थे । भगवान पार्श्वनाथ की कृपा
i, जो मैं जूठी गुटन्निनों से ही पुरवती बन गई ।"
मन्त्री बोला
"महारानी ! प्रापगी नव यातें सत्य हैं । पर क्या
दिनाथ
স की गापा अय नहीं रहेगी? क्या कुमार के
ज्य उगनी रक्षा अब नहीं करेंगे? आप ही बतायें बादलों
की प्रोट में यं गाय तक छिपा र नवत्ता ?"
"अभी इमे बड़ा होने दो।" रानी दामवती ने राहा-
'प्रागिरमे राजसभा में प्राप ले जाना ही क्यों चाहते हैं ?"
मन्त्री बोला-~-
--
४२ / किस्मत का खिलाड़ी
।"
"प्रजा का भ्रम दूर करने के लिए । कनकधी रानी
कुमार अन्धा है। रत्नमाला के पुत्र का माथा ही नहीं
गोल-गोल सिर है। इसी तरह छहों के छहों का रूप हाः
स्पद है। सबके सब हास्यरस के आलम्बन हैं और उ
बातें हास्यरस का उद्दीपन हैं । जब वे सभा में जाते हैं
प्रजा वर्ग के लोग कहते हैं कि इन छहों में कौन ऐसा है,
माण्डवगढ़ का भावी शासक वने ? कोई भी तो नहीं।
मैं प्रजा के साथ राजा को भी दिखा देना चाहता हूं नि:
देखो, यह है गजसिंहकुमार-राजा-प्रजा की भावी प्राः
धर्मवती सच्ची माता का सपूत है यह गजकुमार
रानी मौन हो गई । मंत्री ने उसके मौन का सही
मान लगाते हुए कहा-
'महारानीजी ! आप निश्चिन्त रहिए। जैसे मैं न
को ले जाऊँगा, उसी तरह इन्हें वापस भी कर जाऊँ
मेरी मानें, प्रकाशपुंज की किरणें फूटने दीजिए।"
रानी मुस्कराई। दाएँ हाथ की अनामिका उंगली
अपनी आँख की कोर से उसने काजल छुड़ाया और कुमा
दिठौना लगा दिया। मंत्री ने कुमार का हाथ पकड़ा और र
सभा ले गया। जव गजसिंहकुमार सभा में पहुंचा तो सः
निगाहें उस पर टिग गई । कई स्वर उठे-महामात्य थे।
यह देवपुत्र-सा कौन है ? राजा ने पूछा-
"महामात्य ! कौन है यह ? बड़ा सुन्दर बालक
गन्त्री ने सभी की जिज्ञामा शान्त करने के उद्देश
।
-
किस्मत का खिलाड़ी / ४३ 'बर में बताया "पृथ्वीनाथ ! यह आपका ही पात्मज और प्रजा की प्राशा राजकुमार गजसिंह हैं। पट्टमहिपी दामवती जननी हैं।" "ओह ! तो हम अभी तक नहीं जान पाये ?" राजा T-"तो क्या यह भी नहीं जानता कि हम इसके पिता "जानता है राजन् ! यह जानता है कि आप उनके जानें क्यों राजा को एकाएक ही क्रोध आ गया और "यदि यह जानता है तो फिर यह दुरभिमानी है माता ने क्या हमारा अपमान करने इसे भेजा है ? इसे क्यों नहीं सिखाया कि पिता को अभिवादन किया है । यदि यह मेरा पुन है तो इसने मुझे अभिवादन क्यों चया ? पिता के नाते न सही, राजा के नाते और राज- को मर्यादा के नाते इने अभिवादन करना चाहिए था।" मन्त्री बोला--- "राजन् ! प्रापिर चालक ही तो है। बालक नादान । प्रापमा पुष है। पने क्षमा करें और अपने अंक में ।" राजा बोला- "पानका मूल सकता है। लेकिन बाद दिनाने परनो --
४४ / किस्मत का खिलाड़ी
प्रणाम करना चाहिए ?"
मंत्री कुछ कहना ही चाहता था कि राजा ने उसे
कर कहा-
"महामन्त्री ! हमारे प्रश्नों का उत्तर यह छोपरा
देगा।"
मंत्री मौन हो गया और उसने गजसिंह से धीरे
कहा "प्रणाम करो कुमार ! तुम्हारे पिता भी हैं और रात
भी हैं।"
गजसिंह ने निर्भीकता के साथ कहा-
"राजन् ! आप भी सुनें और सभा भी सुने । बर्नर
च्युत पिता भी पिता नहीं रहता और राजा भी राजा
रहता । आपने पिता की दृष्टि से मेरी माता की भी और
की और मेरी भी। राजा की दृष्टि से अन्याय फिया । र
देवी ने यही कहा था कि मेरी मां को फल न दिया जाए।
"राजन् ! मैं केवल सात को ही प्रणाम करता,
उनमें मेरे प्रणाम की अधिकारिणी सर्वप्रथम मेरी माता दा.
वती है। माता के उपकार से कोई भी जीव उमाण नहीं
मरता । दूसरा प्रणाम तीर्थकर भगवान् को। तीसरा प्रा.
उन गुरुदेव को जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाते है
चौथा प्रणाम में जिनधर्म को करता हूँ, जिसकी आराधना
निस्सन्देह जीव का उद्धार होता है। पानवां प्रणाम में म.
के नमान ही उपकारिणी धरती माता को करता हूँ, कि
अाधार पर समस्त प्राणिजगत् है। छठा प्रणाम में अपने
।
फिस्मत का खिलाड़ी / ४५ गड्ग को करता हूँ, जिसे निर्वलों का बल मानकर मैंने धारण किया है और सातवां प्रणाम मैं सहोदर तुल्य उस अश्व- सुत को करता हूँ, जो उसी फल वीज से उत्पन्न हुआ है, जिससे मैं । इसके अतिरिक्त आठवां कोई ऐसा नहीं है, जिसे मैं प्रणाम का।" गजसिंह की ऐसी खरी, विवेकपूर्ण, निर्भीकता से पुष्ट और तर्कसंगत बातें सुनकर लोग धीरे-धीरे धन्य-धन्य पाहने गे। सय बड़े प्रसन्न हुए। कहने लगे--"कैसा होनहार तेजस्वी लिगा है। इतनी छोटी उम्र में यह हाल है। कौन कहेगा क यह पांच वर्ष का है। इसकी मानसिक दशा तो सोलह 'पं की जैसी है।" सब तो प्रसन्न हुए, पर राजा के हृदय में कुमार की से तीर-गी चुग गई और वह अपना क्रोध प्रकट करने के लए णब्द पकड़ने लगा। जब राजा से नहीं रहा गया तो ना- "रे कुलांगार ! अपने पिता को नमन न करने वाला ( मेरा कंसा पुत्र है ? जी चाहता है, अभी तेरा गिरोच्छेद गजकुमार ने तपाक से कहा- ---- "पिता का कर्तव्य न निभाने वाले को मैं नया पिता सानूं ? आपने मेरे साथ पिता जैसा किया ही क्या है ? अपनी नासानी उपेक्षा और अवमानना करने वाले को मैं हरगिज गिन नहीं गारगा।"
४६ / किस्मत का खिलाड़ी
इतना सुनते ही राजा जामजशा मापे से बाहर हो गया
और तुरन्त कोप से बाहर खड्ग खींच कर बोला-
"ठहर जा ! अभी तेरा शिरोच्छेद करता हूँ।"
क्रोधातुर राजा नंगा खड्ग लिए सिंहासन से नीचे उतर
अाया। सभा में हाहाकार मच गया। चतुर मंत्री फूलनिह में
राजा का हाथ पकड़कर कहा-
"यह क्या करते हैं नरराज ? इसे मारकर अपयश
सिवा आपको क्या मिलेगा? पराक्रम तो वरावर वाले प्रति-
द्वन्द्वी पर दिखाया जाता है। खेल-खेल में बालक पिता की
मूंछे तक पकड़ लेते हैं, फिर भी पिता मुदित होते हैं । मात्र
पहला दिन है । बालक ही तो है यह। धीरे-धीरे सब समः
जायगा।"
राजा का हाथ ढीला पड़ गया। खड्ग को कोर में
डालते
हुए उसने मंत्री से
कहा-
"मंत्री ! तुम्हारे कहने से इसे छोड़ रहा हूँ। इसे मेर
प्रांखों के सामने से ले जायो। अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने में
लिए मैं इसे जीवित रसुंगा । आज सबके सामने प्रतिज्ञा करत
हूँ कि इसे एक दिन नमन करना ही पड़ेगा। आज नहीं त.
बड़ा होने पर मैं इसका शिरोच्छेद अवश्य करूगा।"
भवितव्यतावश राजा का विचार एकाएक ही पन:
गया। राजकुमार को अभी जीवित ही रहना था, इसनि
राजा की प्रतिज्ञा एक बहाना बन गई। गजयुमार को लेक
मंत्री रानी दामवती के पास पहुंचा और पूरा समा-प्रसंग गुरु
-
।
किस्मत का खिलाड़ी / ४७
हाला । तव मंत्री के सामने रानी ने गजसिंहकुमार को
माया-
में
"बेटे ! तूने नादानी का काम किया। पिता के नाते न
है तो राजा के नाते उन्हें प्रणाम करने में क्या घट जाता?
ले ! कोई अपने कर्तव्य से हटे तो हटता रहे, पर हमें तो
हटना चाहिए । वे मेरे पति हैं। उन्हीं के नाते मैं रानी
और तू राजकुमार है । यदि प्रत्यक्ष में वे पिता का कर्तव्य
ही निभा रहे हैं तो परोक्ष में तो उन्हीं के वैभव से तू पल
ना है । मुझे तेरी बातें अच्छी नहीं लगती।"
"तो माँ ! तुम भी मुझे ही दोप देती हो ? जिस काम
। मेरा विवेन स्वीकार नहीं करता, उसे मैं कैसे करूँ ?"
रानी दामवती कुछ नाहना ही चाहती थीं कि मंत्री ने
भार से कहा-
"अच्छा जाग्रो कुमार
तुम खेलो। महारानी से मैं
तें करता हूँ।'
जब कुमार चला गया तो मंत्री ने रानी से कहा-
"महारानीजी ! बात तो आपकी ठीक है। पर बच्चा
सा अनुभव गरता है, वैसा हो तो करेगा। इस समय वह
मभाने से मानेगा नहीं, बल्कि उसके भीतर विद्रोह भर
आयेगा । आप ही सोचें कि महाराज अन्य राजपुत्रों को गोद में
जाते है । लाल लाते हैं और पूरा प्यार देते हैं, इन अन्तर
1, दुहरे व्यवहारमा प्रभाव बाल-मन पर तो पड़ता ही है ।
घ पाप राव गुप मेरे ऊपर छोडिए । कुमार पांच वर्ष के हो
।
-
,
४८ / किस्मत का खिलाड़ी
।
गए हैं। मैं इनकी पढ़ाई की व्यवस्था करता हूँ। किसी
वहत्तर कलाओं में दक्ष होकर निकलेंगे तो देखना जगत् ।
सामने झुकेगा।"
"यह तो आपने मेरे ही मन की बात कह दी।"
दामवती बोली-"यहाँ रहेगा तो विमाताओं की पांच
खटकता रहेगा।"
राजकुमार गजसिह की शिक्षा का भार मंत्री फूल
अपने ऊपर ले लिया और कुमार को नगर के यशस्वी मा
को सौंप दिया। गजसिंह प्रतिभावान पोर संस्कारी व
था, सो गुरुदेव उसे बड़े हौसले से विचादान देते थे ।
समय का रुख पलट गया था।
इधर गजसिंह की बातें दामवती रानी की छहीं
ने सुनी तो जल-भुनकर राख हो गई। लेकिन यह जा.
उन्हें परम प्रसन्नता हुई कि रानी दामवती की तरह महा
उसके बेटे को भी पास नहीं डालते ।
अब हम इस विषय में भी सोचें कि अपने ही हो
पुत्र से राजा जामजशा क्यों द्वेष रखता था । अपने रूप
सौजन्य से सबका मन मोहने वाला गजसिंहकुमार राजा
प्रायों में क्यों चटकता था? परम पतिव्रता रानी दामयत
उपेक्षा राजा आखिर क्यों करता था ? इन प्रश्नों का
एक ही है और वह है, पूर्व जन्म के बैर गंस्कार । वरः
के प्रत्यक्ष कारण तो बनाये जाते हैं या बन जाते हैं, पर
नहीं । जो हमें मुहाता है, उसके अपराध भी मोदमयी गी
किस्मत फा खिलाड़ी / ४९ लगती हैं और जो पूर्व-संस्कारों के कारण खटकता है, उसकी नचित वातें भी अपराध लगती हैं । यही दशा राजा जामजशा नौर गजसिंहकुमार की थी। राजा को अपने लूले-लंगड़े पुत्र को जी-जान-से प्यारे लगते थे और गजसिंहकुमार शत्रु-सा लगता था। समय सर-सर-सर बीत रहा था । गजसिंहकुमार उम्र बड़ा और विद्या में परिपक्व होता जा रहा था। रानी नामवती के लिए तो वह ऐसा अनमोल रत्न था कि वह धन्य सी । प्रांखों से दूर रहने के कारण राजा जमाजशा गजसिंह- जगार के विषय में अब कुछ नहीं सोचता था । D --
4
माण्डवगढ़ के नर-नारियों को आकर्षित करता
गजसिंहकुमार घोड़ा दौड़ाता हुआ राजपथ से नगर के व
उद्यान भ्रमण को जाता । रत्नजटित मूठ वाला खड्ग में
में झूलता था । कंधे पर धनुष और पीठ पर तूणीर । उन
वीरवेश निर्वलों के मन में भी उत्साह भरता था और
ऐसा कि कुमारियां सांसें भरतीं। जिस अश्व पर युः
सवारी करता था, वह वही घोड़ा था, जिसका जन्म
फल की गुठलियों के खाने से हुआ था, जिन्हें खाकर र
दामवती ने कुमार को जन्म दिया था। गजसिंहकुमार
वहत्तर कलाओं में निष्णात तरुण था।
घूमते-घूमते गजसिंहकुमार एक दिन नगर से बहुत
निकल गया । एक मैदान में घोड़ा रोक कर पेड़ से बांध :
और पेड़ के नीचे बैठकर थकान मिटाने लगा। बैठा
कुमार पैर के अंगूठे से धरती कुरेदने लगा कि मिट्टी हटने
कुछ चमक दिखाई दी। कुतूहल हुया ता कुमार ने यह
ही खोदना शुरू कर दिया। भाग्य ऐसे ही हाथ पकड़कर
है। चोदने पर कुमार को अपार धन मिला । स्वर्ण-मुद्रा
भरे कलश और ढेर सारे रत्न । कुमार ने अपने उत्तर
नब धन वांध लिया और अश्व पर रखकर घर ले प्रा
संध्या की मुरमई चादर से यातावरण ढका था, दलित
।
किस्मत का खिलाड़ी/ ५१
-
। इस रहस्य को नहीं जान पाया ।
अव कुमार ने अपनी योजनाएँ वनाई । जहाँ धन मिला
, वहीं एक भव्य भवन बनवाया और अभेद्य दुर्ग की रचना
- डाली। चारों ओर उद्यान भी लगवाया। पांच वर्ष इसी
म में बीते । फिर रानी मां को लेकर कुमार अपने इसी दुर्ग
न में रहने लगा। अब वह विना राज्य का राजा बन गया।
ने सचिवादि की नियुक्ति कर ली। गजसिंहकुमार की
पद जुड़ने लगी । दूर-दूर से लोग उसकी सभा में आते थे।
र के मान्य लोग अव राजा जामजशा की सभा में न जाकर
सिंहकुमार की सभा में जाते थे । नगर के तथा नगर से
र के गावि, विद्वान और पण्डित भी अब गजसिंह की सभा
शोभित करते थे । बिना राज्य का राजा गजसिंह लोगों
समस्यायें भी बड़े आश्चर्यपूर्ण ढंग से सुलझाता था। राजा
पजशा को सभा अव सूनी-सूनी और खाली-सी रहती
। राजा अपनी सभा की शून्यता के कारण से अनभिज्ञ
। तरह-तरह के अनुमान लगाता था, पर कोई कारण
को समझ में नहीं पाता था।
अपनी काव्य पहेलियों, दृष्टिकूट एलोकों तथा नाना
नारों से मण्डित काव्य छन्दों द्वारा गजसिंहकुमार का
मुग्ध पारने वाला एका सिद्ध कवि एक दिन अकस्मात् ही
।। जामजमा को मिल गया। यह कवि गजसिंह की सभा
जा रहा था और राजा घोड़े पर चढ़कर नगर में
धूम
'पा। थों अपारमात् राजा तथा कवि की भेंट हो गई
५२ / फिस्मत का खिलाड़ी
?
थी। पहले यही कवि राजा जामजशा की सभा की
वढ़ाता था। आज राजा ने पूछा-
"कविवर ! तुम तो बहुत दिनों से आये ही नहीं।
रहते हो ? आज आना।"
इतना कहकर राजा आगे बढ़ गया और कवि
कारण भी नहीं बता पाया। कवि ने विचार किया कि
पुत्र की सभा में न जाकर पिता की सभा में ही जाऊ
इसके पुत्र के वैभव की कविता सुनाकर इसे चमत्कृत म
यह सोच कवि राजा जामजशा की सभा में पहुंचा और
पुराना ग्रासन ग्रहण किया।
राजा ने जो प्रश्न मार्ग में कवि से पूछे थे, यह
सभा में भी पूछे । उत्तर में कवि ने ये काव्य पंक्तियां
छोटा है आपसे पर मानवों का इन्द्र है।
लगता सना में मानो, तारों मध्य चन्द्र है ।
बिना राज्य का राजा, अरु काम-सा अनूप है।
देखो तो लगेगा मानो, भूपों का भूप है ॥
ऐसा शतदल फूल वह कि रसग्राही भौरे ।
पुरानो पुष्पवाटिका छोड़, जाते वहाँ दौड़े ॥
राजा ने शोध पूर्ण स्वर में कवि से
पूछा-
"रे कल्पना-जीवी कवि ! मेरे रहते ऐसा मौन
जो बिना राज्य का राजा बन गया और तुम सब या
-
हो?"
निर्माण होणार कवि ने कहा-
किस्मत का खिलाड़ी / ५३ - "तो फिर स्पष्ट सुनें राजन् ! आपका ही पुत्र गजसिंह- र विना राज्य का राजा है। आपके ही राज्य में एक र उनकी परिपद् भी जुड़ती है । वह ऐसा उदार है कि '-एक श्लोक पर झोली भर-भर कर स्वर्ण देता है । आपके तो मात्र वाहवाही ही मिलती है। उसकी सभा तो क्षात् इन्द्र सभा है । बड़े-बड़े मानी उसे नमन करते हैं । गजसिंह के प्रति राजा का सोया वर जाग्रत हो गया । व से राजा वोला. "जिसने मुझे नमन नहीं किया, लोग उसे नमन करें ? म भी मुंहफट की तरह मेरे सामने उसकी प्रशंसा के पुल धते हो ?.."ठीक है, तब वह वालक था । पर अाज तो नहीं । अब उसे कोई नमन नहीं करेगा और मेरे खड्ग में इतनी 'क्ति है कि मैं उससे नमन करा लूंगा।" । पावि ने कहा- "राजन् ! अपने ही हाथों अपना अनिष्ट करने वाले हसार में प्राप ही दीसे । आप अपने काने-कुवड़े पुत्रों के लिए ।। मरे जाते हैं और सुपुत्र-होनहार गजसिंह को अपना शत्रु हनते हैं। पाश्चर्य ! घोर आश्चर्य ! उसी से आपका कुल पालो- शांत होगा। वह तो हीरा है । ऐसा धर्मप्राण पुरुष मैंने दूसरा नहीं - । प्राप इतना भी नहीं जान पाये कि आपके ही राज्य में ना की तरह पुजनेवाला गजसिंह एक असाधारण पुरुष है । ना एक दिन वह दिग्-दिगन्त में अपना यश फैलायेगा।" चीन में ही राजा ने गर्जना की- -
५४ / किस्मत का खिलाड़ी
-
"वस वस, वन ! अव कुछ न पाहना। तुम्हारा त.
साहस, जो मेरे शत्रु की प्रशंसा मेरे सामने करो । मुझे उप
देने वाले कौन होते हो तुम ? उसे तो मैं बाद में देगी
पहले तुम्हें ही प्रसाद देता हूँ।"
कवि को फटकारने के बाद राजा ने अपने सेवकों
आदेश दिया-
"इस शब्दप्रपंनी को धक्के मार कर बाहर नि
दो।"
राजाज्ञा पाते ही सशस्त्र सैनिक उठे। उनमे पहले मई
उठ गया और जाते-जाते कहता गया----
"मैं स्वयं ही चला जाता है। पर याद रगना अहंकार
हमेशा पिटता है, मिटता है।"
कवि चला गया तो राजा ने पारक्षी सैनिकों को ग्रा
दिया.
"सुभटो ! गजसिंह में जाकर कहो कि मेरा
तुरन्त छोड़ दे । भविष्य में मैं यह सुनना नहीं चाहता
राज्य की सीमा में कहीं भी वह रहता है । यदि वह
आज्ञा का उल्लंघन करे तो पकड़कर ले पाना ! मैं गा के
तले कुचलवाकर उसका गजसिंह नाम ही मिटा दंगा।"
गजसिंह के शौर्य-पराक्रम की चर्चा राजा के मेनि।
सुन चुके थे, अतः राजाजा मुनकर भी वे मौन खड़े रहे।
राजा और भी कुढ़ गया। क्या करे अब ? मैनिकों थे. पर
ही राजा शक्तिमान बनता है। जब मैनिक ही अवार
-
किस्मत का खिलाड़ी/ ५५
थे तो गजसिंह का मानमर्दन कैसे कराये ? इन्हीं सैनिकों में
एक यवन सैनिक भी सरदार था। उसके अधीन कुछ सौ यवन
सनिक थे। राजा को प्रसन्न करने के उद्देश्य से वह अपने
प्रासन से उठा और वोला-
"पृथ्वीनाथ ! मुझे आदेश दें । मैं पापका काम
पलंगा।"
"तुम?" राजा ने कहा-"अच्छा तुम्हीं जायो । दो में
से एक काम करना है । या तो उसे मेरी राज्य सीमा से बाहर
खदेड़ देना है या फिर बाँधकर यहां ले आना है।"
साथी सैनिकों को लेकर यवन सरदार गजसिंह की सभा
में पहुंच गया । गजसिंह के व्यक्तित्व का उस पर ऐसा प्रभाव
पढ़ा कि वेचारा भीगी विल्ली बन गया । उसका मनोवल
पौर साहस ऐसा गिरा कि राजा का सन्देश गजसिंह से कहने
का भी साहस नहीं हुआ । परम विनीत और क्षमा प्रतिमा
गजसिंह ने यवन सरदार से उसका कुशल-क्षेम पूछा और
गाहा-
"तुम राजा जागजशा के सैनिक सरदार हो। मेरे
अतिथि हो । मैं तुम्हारे प्रागमन का स्वागत करता हूँ।'
यपन सरदार गद्गद् हो गया। मन में सोचा, 'हमारा
राजा ऐसा मूर्ख है कि विना कारण के ऐसे महापुरुष से वैर
मानता है । हम इससे क्यों विगाड़ें ? हमेशा वीर का ही साथ
देना पाहिए। पाखिर यही तो एक दिन माण्डवगढ़ का राजा
बनेगा। इसे राजा बनने से रोक भी कौन सकता है ? यह तो
"
५६ / किस्मत का खिलाड़ी -- -- उत्तराधिकारी भी है और शक्ति-सम्पन्न भी है। मैं हार राजा की समस्त सेना भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ साती इसके पास ऐसे-ऐसे बाँके वीर हैं कि एक-एक सैनिक बीस- के लिए पर्याप्त होगा।' यह सोच, यवन सैनिक सरदार अपने आने का कारण छिपा लिया और गजसिंहकुमार प्रशंसा करने लगा। फिर बातचीत की औपचारिकता के का कुमार ने यवन सैनिक सरदार से पूछा- "अब तुम अपने आने का कारण भी कह दो। अनि किसी न किसी उद्देश्य से ही तो आये होगे ?" कुछ झेपते हुए सैनिक सरदार ने कहा- "अब क्या कहूँ कुमार ! आपके पिता का सन्देश हो ऐ. कि मुंह नहीं खुलता । कैरो कहूँ आपसे ? . "दुत को तो निर्भीक होना चाहिए। जो भी पात निस्संकोच बतायो । तुम्हें मुझसे डरने की जरूरत भी क्या है तुम क्या अपनी ओर से कुछ कहोगे ? सच-सच कह डालो वीर सैनिक सरदार ने कहा- "आपके पिता राजा जामजशा का संदेश है कि उनकी राज्य सीमा लाग दें। नहीं तो वे प्रापको नष्ट ३ डालेंगे।' "बस, इतनी-सी बात" कुमार ने कहा-"प्रय रु उत्तर भी सुन लो । गिम स्थान पर मैंने अपना दुर्ग बना है, यह भूमि मारवाड़ की राज्य सीमा में नहीं मानी । है कुमार वोला- ।
किस्मत का खिलाड़ी / ५७ राजा की यह भूमि है, उससे अनुमति लेकर ही मैंने अपना दुर्गभवन बनवाया है। माण्डवगढ़ की राज्यसीमा के निकट होने के कारण तुम्हारे राजा को ऐसा भ्रम हुआ है कि मैं उनयो राज्य में रह रहा हूँ। "सरदार ! अब तुम्हीं बतायो कि तुम्हारे राजा किस अधिकार से मुझ पर कोई दवाव डाल सकते हैं। अव यदि वे गुरु पर प्राक्रमण भी करेंगे तो यह प्राक्रमण मात्र मुझ पर ही नहीं, उस राजा पर भी प्राक्रमण माना जायगा, जिसके राज्य पी यह भूमि है। अतः हम दोनों आक्रामक राजा जामजशा फा सामना करेंगे । फिर जिसकी हार-जीत हो, वह होगी। "सरदार ! यहीं मुझे अपार धन धरती में गड़ा मिला था। मैंने मालूम किया कि यह भूमि किस राज्य की है। पता लगाकर मैं तत्सम्बन्धी राजा के पास गया और उसका ( सन उसे लौटाना चाहा । तब राजा ने कहा-'मेरा नहीं है यह यन, मेरा होता तो मुझे न मिलता। वीसियों बार मैंने उसी भूमि पर पड़ाव डाला है। घोड़े बांधने के लिए खूटे भी खुद- पाये है, पर मुझे धरती में छिपा यह धन कभी नहीं मिला, पत: मैं तो लूंगा नहीं' तब मैंने कहा कि आप नही लेते तो मैं इसका उपयोग आपके राज्य की वृद्धि के लिए ही करूंगा। इस प्रस्ताप पर राजा ने कहा--तो वह भूमि भी मैं तुम्हें हेता हूँ। तुम वहाँ कुछ भी बनवालो। राजा की इच्छा स्वी- शार पार मैंने पनि वर्ष में यहां अपना दुर्गभवन बनवाया है । भर रामा जामजगा क्योंकर मुभासे अपनी राज्य सीमा
५८ / किस्मत का खिलाड़ी
५.
त्यागने को कहते हैं ?"
यवन सैनिक सरदार ने सब बातें गौर से सुनी
वोला-
"अब चलूंगा कुमार ! राजा जामजशा का प्रम:
जाकर मिटाऊंगा । मैं सब कुछ समझ चुका हूँ।"
गजसिंह कुमार से विदा लेकर यवन सैनिक सरसा
अपने साथियों सहित माण्डवगढ़ की ओर चल दिया ।
गजसिंह ने सभा विसर्जित की और अपनी माता रानी दाम
को सव समाचारों से अवगत कराया। रानी ने कुमार
समझाया-
"पुत्र ! तू पिता से वैर क्यों बौधता है ? उनके साम
झुका क्यों नहीं जाता ?"
.
"अम्ब ! उनकी बात मान तो ली मैंने । वे चाहने
कि मैं उनके राज्य में न रहूँ, सो मैंने पहले ही उनका राज
त्याग दिया। अब वे यह कहें कि मेरे राज्य के निकट
रहो तो यह कैसे संभव है ? यहां की भूमि उठाकर तो
कहीं ले जा नहीं सकता। फिर मैं तो स्वयं ही पिता के मा
पड़ना नहीं चाहता । वे ही मुझसे उलझते हैं।"
"तेरी बातों का मेरे पास जवाब ही क्या है ?"
दामवती बोली-"बस, इतना याद रखना कि यभीमा:
मत छोड़ना ।"
"
कुमार वोला-
।
कुमार बोला-
किस्मत का खिलाड़ी/ ५९
"मां ! विश्वास करो। तुम्हारे दूध की गरिमा को
कभी लज्जित नहीं होने दूंगा।"
रानी पुलया उठी और कुमार को अङ्क में भरकर चूम
लिया।
x
X
X
-
इधर यवन सैनिक सरदार ने कुमार के साथ हुई बातों
जनिचोड़ राजा जामजशा को सुनाया तो राजा आग-बबूला
हो गया और मन्त्री फूलसिंह से बोला-
"मुनते हो मन्त्री ? कैसा अविनीत है गजसिंह ! आज
ग्यारह वर्ष पहले तुम्हीं ने बालक कहकर उसे बचा लिया
गा। पर अाज तो वालक नहीं है ? अव क्यों न मैं उसका
गेर धड़ से अलग कर दूं ?"
मंत्री ने कहा-
"राजन् ! पहले औचित्य पर विचार करें। गजसिंह
कुमार दूसरे राजा की राज्यभूमि में रह रहा है । उससे श्राप
हुए कैसे कह सकते हैं ? दूसरे, वह असाधारण वीर भी है।
जान्न रहने में ही आपकी भलाई है।"
इस पर राजा ने मंत्री को आड़े हाथ लेते
हुए कहा-
"मंत्री ! मालूम पड़ता है, तुम भी उसकी खा चुके हो?
स्पष्ट हो तुम उसका पक्ष ले रहे हो। मुझे कुल्हाड़ी और
गपड़ी के वार्तालाप की बात अब सच दीख रही है। जव
मल्हाटी या प्रहार लकड़ी पर हुआ तो लकड़ी कहने लगी-
मुल्हाडी ! दोप तेरा नहीं, मेरा ही है । यदि मेरा
६०/ किस्मत का खिलाड़ी
एक अंग तेरा साथी न बनता तो तेरी क्या हिम्मत थी, जो
तू मुझे काटती ? मेरे ही वंश का एक कुंडा-वेंट तेरे साप
है, तभी तू मुझे काट रही है । सो मंत्री ! राजा का ही एक
अंग तुम मंत्री, कुलांगार गजसिंह के साथ हो तो वह क्यों न
अकड़ेगा ?"
मंत्री ने कहा-
।
"राजन् ! फिर तो यह कहावत भी आपने सुनी होगी.
कि किस घुटने को उघाडूं ? इस एक को उघाडूं तो भी मेरी
लाज जाती है और इस दूसरे को उघाडूं तो भी मेरी लाम
जाती है । घुटने तो दोनों एक के ही हैं । मेरे लिए आप और
गजसिंह दोनों ही अपने हैं। उसे मैं शत्रु मान भी में
सकता हूँ?"
"ठीक है, अब तो स्पष्ट हो गया।" शोध से मुदि
भींचते हुए राजा ने कहा-"अव में ही अपने भनी
निपटूंगा । मुझे किसी के सहयोग की जरूरत नहीं।"
यह कहते हुए क्रुद्ध-क्षुब्ध राजा सिंहासन से उठ गया
सभा में एक विशेष सन्नाटा था । इधर गजसिंह कुमार धनां.
राधन करते हुए आनन्द से अपने दिन बिता रहा था। मन
ही-मन माण्डवगढ़ की प्रजा उसे चाहती थी।
एक दिन कहीं दूर देश का एक ज्योतिपी गनिहार
की परिषद् में आया। स्वाभाविक रूप से कुमार को प्रा
भविष्य जानने की इच्छा हुई । उसने ज्योतिषी में यहा---
"ज्योतिविद ! ज्योतिप को एकदम झूठ भी नहीं कर
।
किस्मत फा खिलाड़ी /६१ जा सकता और एकदम सत्य भी नहीं। उसकी कुछ घोप- णाएँ तो तीर में तुक्का की तरह सही निकल भी पाती हैं और कुछ एकदम निराधार । तुम्हारा क्या विचार है ?" ज्योतिषी ने कहा- यह दोप "महागाग ! ज्योतिप विद्या तो सच्ची हो है । निश्चित ही वह भविष्य का नेत्र है । यदि झूठी होती तो नास्तिकों के विरोध के बावजूद भी वह आज तक जीवित न रहती। यदि इसकी कुछ बातें झूठ भी हो जाती हैं तो यह दोप ज्योतिपी का है, ज्योतिष का नहीं । अपूर्ण ज्ञानी के हाथ में पड़कर तो अच्छी से अच्छी विद्या दोषपूर्ण हो जाती है। आप ही बतायें गि यदि कोई धन्वी लक्ष्यवेध न कर सके तो धनु- विद्या का होगा ?" गजसिंह मुस्कराया और बोला- "यदि ऐसी ही बात है तो हमारा भविष्य दावे के साथ बतायो।" ज्योतिपी ने तुरन्त प्रश्न लग्न निकाल कर गणित फलाया। फिर गजसिंह को फलादेश सुनाते हुए बोला- "महामान्य ! यदि दादा असत्य हो जाए तो मैं ज्योतिषी नाहाना छोड़ दूंगा । अब अाप अपना भविष्य सुनें । आप बारह वर्ष तक विदेश भ्रमण करेंगे और जब लोग तो पार राज्यों के राजा तथा चार राजमान्यानों के पति बना मोटगे।" गमसिंह बोला-
६२ / किस्मत का खिलाड़ी
"ज्योतिर्विद ! एक बात यह बताओ कि मैं घर छोर.
कर जाऊँगा ही क्यों ? मुझे तो कोई कारण ऐसा नहीं दोबत
कि मैं विदेश गमन करूं।"
ज्योतिपी बोला-
"जब जाना होता है तो स्वतः ही मन में प्रेरणा
आती है और कारण भी ऐसे बन जाते हैं, जो पहले से हमारं
कल्पना में आते ही नहीं। यह सब कैसे होगा, इसे तो भवि
ही बतायेगा।"
"ठीक है, जो होगा सो देखा जायेगा। सब मिला
मेरा भविष्य तुमने अच्छा ही बताया है । देश-विदेश देखने में
खूब अवसर मिलेगा।"
मुस्कराकर ज्योतिपी ने कहा-
"देखिए, अभी से आपके मन में देशाटन को इस
जाग्रत हो गई न? देव ऐसा ही चमत्कारी होता है।"
ज्योतिपी की बात पर गजसिंह हंसा और फिर पा
भर कर स्वर्ण मुद्राएँ दक्षिणा में देकर उसका सम्मान किया
जय वह जाने लगा तो भीतर भवन से प्रतिहारी ने मा
ज्योतिपी से कहा-
"आपको महारानी दामवती बुलाती हैं।'
"मां की भी नुन अाग्रो।" यह कह गमिह में
हारी के माय ज्योतिषी को माता दामवती के पास भेज दिन
रानी ने सम्मानपूर्वगः उसे चौकी पर यंठाया और बोली---
"विप्रवर ! मैं तो तुमसे कुछ भविष्य-दविष्य पु
-
किस्मत का खिलाड़ी / ६३
हो । बल्कि तुम्हें तो मेरा एक काम करना है। अगर करो
गाहे ?"
ज्योतिपी बोला-
"महारानीजी ! जो काम मेरी सामध्यं के भीतर होगा,
उसे क्यों न करूगा? आप प्राज्ञा करें।"
रानी दामवती बोली-
"विप्रवर ! तुम तो देश-विदेश घूमते ही हो । बड़े-
पड़े राजानों के पास आते-जाते हो। अतः तुम मेरे लिए एक
प्रवधू ला दो। किसी देश की राजकन्या से मेरे पुत्र का
नग्न करा दो तो मैं आपकी बड़ी आभारी रहूँगी।"
"हाँ-हाँ अवश्य ।" ज्योतिषी ने कहा-'"बहुतेरे राजा
अपनी राजकन्याओं के लिए योग्य राजकुमार के बारे में पूछते
भी रहते हैं। अब मैं सीधा पुरपइठान जाऊंगा। मुझे याद
माता है कि उनके कोई कन्या है।"
रानी ने पुलक नार ज्योतिषी विप्र को पर्याप्त स्वर्ण-रत्न दे
हाले । यथासमय खा-पीकर ज्योतिपी ने प्रस्थान कर दिया।
ज्योतिषी द्वारा बताया गया अपना भविष्य कुछ दिन तक तो
एमार के मन मस्तिष्क में रहा, फिर वह भूल ही गया ।
इपित भी यही है कि अपने पैर के नीचे दवे वर्तमान को देखा
होगाय । यदि वर्तमान हो देखा जायगा तो भविष्य स्वतः ही
म बन जायगा । मुनिजन अपने वर्तमान के सहारे ही तो
भविष्य में मुक्ति मोक्ष पाते हैं। समय बीतता जाता है और
वर्तमान भूत तथा भविष्य वर्तमान बनता जाता है। जब हम
।
६४ / किस्मत का खिलाड़ी
-
सीधे तनकर खड़े हों तो जो हमारी पीठ पोछे है, वह
परों के नीचे दवा वर्तमान है और आंखों के सामने
अथवा न दीखने वाला-~-दोनों ही तरह का भविष्य है।
मान सुधारने की प्रेरणा के लिए कभी-कभी मुड़कर मार
भी देखा जाता है और भविष्य का विचार करके वर्तमान में
सम्भाला जाता है। महत्त्व तीनों का ही है, पर सा"
वर्तमान की ही है । भूत-भविष्य के लिए रोने वाले मामा
को खो देते हैं।
.
5
गई नगरों मोर गांवों का भ्रमण करते हुए ज्योतिपी
वन पुरपाठान के उद्यान में पहुंचा। रात को उद्यान में ही
लोया या । सवेरे उठयार देखा तो चम्पकमाला अपनी सखियों
साथ रथ से उतरी। यह उसी का उद्यान था। कौन थी
हि चम्पकमाला ? राजा गुलाबसिंह की एकमात्र पुत्री का
म चम्पकमाला ही था । पुरपइठान के राजा गुलाबसिंह
और-वीर और न्यायप्रिय शासक थे। उनका छोटा-सा नगर
रपश्यान पूर्ण समृद्ध और खुशहाल था। चम्पकमाला अनिन्द्य
हुन्दरी वाला थी । केगर, हल्दी और चन्दन के मिश्रण से जैसा
गगार्पण रंग तैयार होगा, ऐसी ही देहकान्ति राजकुमारी
पिकामाला की थी।
हिंडोले पर चम्पगामाला बैठी थी। दो सखियां उसे
मुला रही थी। इतने में दो परिचारिकाएँ कुछ फूल तोड़कर
ई पोर फूल देने के बाद एक ने कहा
"राजकुमारीजी ! हमारे उद्यान में कोई पुरुप बैठा
। माप माझा दें तो उसे आपके समक्ष उपस्थित करें।
गाने बाग में घुसने का वह अपराधी है।"
"तब तो जरूर कोई परदेशी होगा। वहीं चलें। देखें
-
न है।"
किस्मत का खिलाड़ी / ६६
-
-
इधर ज्योतिषी ने एक झलक चम्पकमाला भी
तो मन में सोचा, अहा ! दोनों को जोड़ी कैसी मुन्दर रनो
यदि गजसिंह कुमार कामदेव है तो यह साक्षात् रति है
इतने में चम्पकमाला पास आ गई और बोली-
"जानते हो, मेरे बाग में घुसने का क्या दण्ड होता है।
विप्र ने कहा-
'राजकन्ये ! कुछ ऐसा भी है, जिसे तुम नहीं जामगर
कहो तो वताऊँ ?"
"ऐसो क्या बात है ? हम भी सुनें" राजकुमारी में
विप्र से कहा तो उसकी एक सखी वोली-
"राजकुमारीजी ! बातों में फंसा कर यह याने प्राः
पर परदा डालना चाह रहा है । इसे पहले उद्यान प्ररोग में
दण्ड ही सुना डालो।"
राजकुमारी ने सखी से कहा-
"मन्जरी ! जायगा कहाँ ? पहले इसी की मुन में ।।
तो विप्र सुना डालो।"
?
-
-
464
विप्र ने सुनाया-
"माण्डवगढ़ का राजकुमार गजसिंह है तो मोल
पा, पर उमले पराक्रम का वर्णन करने की शक्ति र
नहीं है। मप तो ऐमा है कि कामदेव देगें तो गरमा ना
यहत्तर फलानों का स्वामी वह नरश्रेष्ठ अनुपम सुवगा है।
विप्र का मनोविज्ञान काम कर गया। राजमार्ग
गुण-श्रवण अनुराग का नियम नाग हो गया और '
किस्मत का खिलाड़ी / ६७
-
?
चभोर-सी हो गई । मन्जरी सखी ने राज कन्या की मनोदशा
खो तो विप्र से बोली-
"अब तुम्हारी यही सजा है ये सब बातें महाराज
लायसिंह से जाकर कहो। अब हमारी सखी तो गई
म मे।"
ज्योतिषी उठकर चला गया और सखियां राजकुमारी
छेड़-छाड़ करने लगीं। मन्जरी ने
पूछा-
"सखी ! विना देखे ही यह हाल है तो देखकर क्या
ल होगा ?"
चम्पकमाला कुछ नहीं बोली। विपुला ने कहा-
"राजकुमारीजी ! रात आपने वह कौनसा सपना
पा था कि आपका चाहने वाला इसी बाग में आया है।"
उत्तर दिया मन्जरी ने-
"विपुला ! तू भी अब रात के सपने की बात करने
गी? ये दिन तो इनके दिवास्वप्न देखने के हैं । चल अव
जभपन चलें । देखें वह परदेशी विप्र क्या बातें करता है।'
सव-गी-सब रथ में बैठकर राजभवन पहुंची। इधर
भा में पहुंचकर ज्योतिर्विद विप्र ने राजा गुलावसिंह को
गीर्वाद देकर अतिथि प्रासन ग्रहण किया । तदनन्तर राजा
पूषा---
"यहो विप्र ! कुछ विदेश का सुनाने लायक हो तो
पम्प सुनायो।"
विप्र दोला-
-
६८ / किस्मत का खिलाड़ी
"राजन् ! ऐसा शुभ संवाद सुनाऊँगा कि मार में
प्रसन्न हो जायेंगे। मैंने राजकन्या चम्पकमाला के अनुसार
राजपुत्र देखा है।"
राजा बोले-
"विप्र ! ऐसी बहलाने वाली बातें तो मैं बाहर
चुका हूँ। वहुतेरे राजकुमार मैंने देसे, पर कोई भी मु.
राजकुमारी के लिए नहीं जंचा। कोई रूप में प्रतिकूल है है
किसी की उम्र कम है। कोई ठीक भी है तो व्यसनी है।
भी तुम सुनामो किस राजपुत्र के बारे में कह रहे थे ।'
विप्र बोला-
"राजन् ! आप यह तो सोचें कि जिस भाग ने राम
कुमारी चम्पकमाला को जन्म दिया है, उसने उसके अनु
वर पहले ही पैदा कर दिया होगा। पूर्व जन्म के जोडे ।
अलग-अलग इस धरा पर अवतीर्ण होते हैं। मगर
मिलाता है । मैं जिस राजपुत्र की बात कहने जा रहा
उसका जन्म ही राज कन्या के लिए हुआ है। माया
राजा जामजशा का राजकुमार गजसिंह हर दृष्टि ने पर
व अद्वितीय है।"
"फिर तो यह भी कहो कि कामदेव का रूप होगा
होगा इन्द्रमा प्रतापी?"
"भी पाहीं ज्यादा ।" विप्र ने बड़े प्रागरिक
के साथ कहा । ग पर राजा गुलामिद प्रहार
हंसा, हमा मलिए कि उसने को चम्प में माना था पोर
३
किस्मत का खिलाड़ी / ६९
उसका व्यंग्य समझा नहीं था सो कह दिया कि इससे भी
यादा । तव राजा गुलावसिंह ने स्पष्ट करके कहा-
"अरे विप्र ! मुझे क्यों बहलाते हो ? माण्डवगढ़ के
राजा के यहां भी मेरे दूत हो पाये हैं। उसके तो सभी पुत्र
नने-भेड़े और लंगड़े-लूले हैं । तुम धोखा देकर मेरी बेटी की
कदीर फोड़ना चाहते थे ?. वोलो, इस धोखे का क्या दण्ड
म्हें । विप्र हो, इसलिए प्राणदण्ड तो नहीं दूंगा, अतः अपने
ण्ड का निर्णय तुम्हीं दो।"
विप्र बोला-
"राजन् ! यही तो फमाल है :कि कभी-कभी दोनों
बरोधी बातें सत्य होती हैं । आपने जो कहा वह भी सत्य है
और मैंने जो कहा वह भी पत्थर की लीक है।"
"राजन् ! माण्डवगढ़ नरेश के छह पुत्र तो ऐसे ही हैं,
से कि आपने वताये हैं। पर उपेक्षिता पटरानी दामवती
। लाड़ला गजसिंह तो कुछ और ही है । वह षोडशवीय
राजदुलारा बहत्तर कलाओं में पारंगत है। अपने ही वल
राधम और पुण्य प्रभाव से वह दूसरे राजा के राज्य में
गंभवन बनाकर अपनी माता के साथ रह रहा है । उसे आप
प्रेगे तो स्वयं ही मेरे कथन से सहमत हो जायेंगे । इससे
सधिमा क्या दावा गारू. कि यदि मेरे कथन का शतांश भी
हो तो आपका खड्ग और मेरा सिर ।"
राजा पर प्रभाव पड़ा । वोला-
"फिर तो ठीक है । अव तुम हमारी अतिथि-शाला में
।
।
-
७० / किस्मत का खिलाड़ी
ठहरो। मैं महारानी जी से भी परामर्श कर लूं। का
माला तो सव की बेटी है, अतः प्रजाजनों से भी पा.
लूंगा। तदनन्तर मेरे मन्त्री आदि माण्डवगड़ जाये
पानसुपारी तथा श्रीफल लेकर वर पक्का कर आयेंगे।"
चम्पकमाला ने बाग में ही अपने भावी पति ने दि.
गुण सुने थे। वह तो तभी से गजसिंह के सपने देश रहो में
उसकी मनोदशा का वर्णन उमकी मन्जरी और
सखियों ने रानी से कर दिया । अत: जब राजा गुलाई
ने रानी से परामर्श किया तो रानी एकदम सहमत हो :
हुई, वरन जोर देकर कहा कि अब किसी से मत पूछो।
प्रादमियों को भेजकर वर पक्का करा दो। विधाता
जोड़-तोड़ भिड़ाता है। राजा के विश्वासी दुत माया
लिए रवाना हो गए।
मुना था, उससे भी ज्यादा गनिह दीवा। पुर
इवान के राजदूत रानी दामवती से मिले और राहत
चम्पकमाला का हप वर्णन करते श्रीफल दे दिया । गों
बननवद्ध हो गए । वचनो मे ही बेटी बेटा पराये होते.'
चम्पकमाला गुलामिह राजा के लिए पराई हो गई । वि
पक्का करके दुन पुरपश्टान वापस पाये पोर गजानन
सिंह को मय समाचार दिये। गब बाने यथार्य पार
पहन सुश हुमा। ग्रानी बेटी के भाग्य को मगरः ।
ज्योतिविद विषयटनदेकर ममानित किया।
विप्र में नजकुमारी के विवाद भी निक
जैसा
किस्मत का खिलाड़ी ) ७१
अब दोनों पक्ष तिथि को पकड़ने की उत्सुकता से प्रतीक्षा करने
लगे । राजकुमारी तो एक-एक दिन गिनती थीं।
x
x
X
विवाह पक्का हो जाने के बाद गजसिंह के यहाँ नित्य
नये उत्सव मनाये जाते थे । इन उत्सवों के होने और इसके
रोछे जो कारण था, इसकी खवर राजा जामजशा के पास भी
रहुंच गई । खवर तो हवा में उड़कर पहुंच जाती है। राजा
जामजशा अपने ही पुत्र की बढ़ोत्तरी को नहीं सह पाया ।
प्रब उसने मन्त्री फूलसिंह से भी परामर्श नहीं किया और
तुरन्त रेशम के कपड़े पर एक पत्र लिखवाया। फिर एक
जोड़ी श्याम वस्त्रों के साथ उस पत्र को श्याम घोड़े पर ही
पवस्थित पार दिया और रातोंरात पत्र, वस्त्र और अश्व
गजसिंह के दुर्गभवन के द्वार के सामने पहुंचा दिये । घोड़ा
भवन पर बंधा था। उसकी गर्दन में गोल-गोल डंडों में
निपटा पत्र चंधा था और पीठ पर वस्त्र रखे थे।
सवेरे गजसिंह ने अपने भवन द्वार पर घोड़ा बंधा देखा
को तुरन्त पत्र के डन्डे सीधे कर पत्र पढ़ने लगा। पत्र इस
प्रकार धा-
-
"गजसिंह, मेरा आदेश है कि तुम तुरन्त ही मेरा राज्य
छोड़कर नहीं भी चले जाओ। तुम्हारे निष्कासन के लिए
पाला घोड़ा और काले कपड़ों का प्रवन्ध भी मैंने कर दिया
है। अब मेरे प्रादेश का औचित्य भी सुनो-समझो।"
"गजसिंह ! जिस भूमि पर तुम्हारा भवन बना
है, वह
७२ / किस्मत का खिलाड़ी
भूमि मेरी भी है और उस राजा की भी है, जिसने सुन्न:
भूमि दी है। दरअसल यह भूमि अशासित भूमि है पोलो
राज्यों के सार्थ यहां ठहरते हैं। मेरा पड़ाव भी की।
बार लगा है । सीमा निकटता की दृष्टि से यह माण्डमा
अधिक निकट है । अत: संयुक्त भूमि होने के कारण मेरे।
अनुमति के विना तुम यहां नहीं रह सकते।"
"गजसिंह ! मेरे यादेश को टालने का अर्थ
होगा । युद्ध का परिणाम तुम जानते हो हो । जितना
हो, उसके साथ इतना और सुन लो कि या तो तुम्हारी में
दामवती विधवा होगी या पुष-हीना । दोनों तरह उन्म।
हानि है।"
गजसिंह ने तीन बार पत्र पढ़ा। फिर निश्प fm
'मुझे जाना ही चाहिए । राजयुद्ध तो बहुत बड़ी समरभूति
लड़ा जाता है और गृहयुद्ध घर के प्रांगन में। पर गृहगुजर
युद्ध से अधिक भयंकर होता है। फिर यह तो गृहयुत के
राजयुद्ध भी होगा । पिता की बात भी रह जायेगी । मा
एक दिन कहती थीं कि पिता की बात मान मयों न
इसके अतिरिक इस निष्कासन में मेरा भी हिना !
निकले बिना भाग्य की परीक्षा नहीं होती
को मोनो मोवले गनिह को ज्योतिषी की मार
बार प्राग:---मोनिती कायन मरा हो । तभी
मन में प्रस्थान की प्रेरणा उठ रही है। बेकिन न
माका होला ? को होगा, जो होगा । अब ना जाना है
।"
।
किस्मत का खिलाड़ी /७३
ग तरह पक्का निश्चय कर गजसिंह ने घोड़े की पीठ
र बंधे पाले वस्त्र उतारे और पहन लिये । घोड़े को वहीं
और माता दामवती के पास प्रस्थान की अनुमति लेने पहुंचा।
जिसिंह को अशुभ मूचक काले वस्त्रों में देख रानी दामवती
चौकी पीर घबराई तथा अचकचाकर पूछा-
"कुमार ! यह क्या वाना पहन लिया तूने ? उतार दे
नहें। काले कपड़े भो कहीं पहने जाते हैं ?"
।
पुमार बोला-
"अम्ब !
?
तुम काला डिठौना लगाती थीं न । अब मैंने
नांगोपांग डिठोना लगा लिया। देखो तो काले वस्त्रों में अच्छा
वहीं लगता यया ?"
रानी चोली-
"तू समझता क्यों नहीं ? अशुभ विनोद भी कहीं किया
माता है ? उतार दे ये कपड़े ।"
प्रय गजसिंह ने पिता का पत्र माता को सुनाया और
कहा कि गृहयुद्ध को टालने के लिए मेरा जाना जरूरी ही नहीं
अनिवार्य है। ग्रहयोग ही ऐसे हैं कि मुझे वारह वर्ष तक
धाहर ही रहना है । दामवती रानी के लिए यह अनहोनी बात
भी। यह रोने लगी और उसने पुत्र के दोनों हाथ पकड़ कर
पहार
"बैठ मेरे पास । कुछ भी हो जाय । मैं तुझे कहीं नहीं
भाने दूंगो । यह भी तो सोच तेरी वाग्दत्ता का क्या होगा।"
"होगा क्या ?" गजसिंह बोला--"जो होना होगा सो
७४ / किस्मत का खिलाड़ी
।
होगा । मेरा रुकना तो असम्भव ही है। अम्ब ! पार भी
सोचें कि सिंहनी होकर कातर बन रही हैं ! सिंहनी है ।
वन में चाहे जहाँ घूमते हैं । राम की माता कोगना र
चौदह वर्ष तक पुत्र के बिना नहीं रहीं ? फिर मैं तो दोन
कम के लिए जा रहा हूँ।"
रानी दामवती बोली
"ठीक है । मैं भी तुझे अव नहीं रोकेंगी। पर
में
इतनी बात तो माल ले कि आज मत जालोरे ३
जाना ।"
"हाँ, इसमें क्या बात है ?" गजसिंह ने --
आज यहीं रहेगा। कल ही जाऊँगा।
"तो ये श्याम वसन तो उतार दे । मुझे बहुत पुरे
हैं ।" माता के कहने पर गजसिंह ने श्याम वरान उतार fe
धीरे-धीरे दिन ढला । धर्मनिष्ठ माता के धर्मनिष्ट पुन
दिन डूबने से पहले भोजन किया । माता ने यही
परोसा । खा-पीकर गजसिंह घूमने चला गया। यदि
मो गया । पर चिन्तामग्न रानी दामवती वो नीद नहीं
वह सोचने लगी-"रातभर के लिए तो कुमार
से समा गया। यदि पोर भी दो-चार दिन के लिए :
तो भावरें उलवा दूं। पर अब कसे रोकू । हो, या अपद :
शूलपाणि की बात नहीं टालता । यह यदि हा हो
अवश्य रोक कर पहले व्याह तो करा देता। मेरे भाई
पाणि का नगर प्रहटपुर यहा से माट योजन दर है।"
1
किस्मत का खिलाड़ी/७५
जबसे पाये । प्रयत्न तो करूगी ही।"
यह निश्चय कर रानी दामवतो चुपके-से उठीं और
त मार्ग से रडिया-रेवारी के घर पहुंच गई। रडिया वक्त
: फाम पाने वाला एक सामन्त था-स्वामिभक्त सामन्त ।
नी ने रेवारी की पत्नी से कहा तो उसने बहाना बना दिया
' ये तो ससुराल गये हैं । रानी ने उसकी बात पर विश्वास
में किया और दनदनाती हुई भीतर चली गईं। देखा तो
इया सो रहा है । जगाया उसे । रडिया हड़बड़ा कर उठा
र रानी दामवती को सामने देखकर बोला-
"पाप कुशल से तो हैं ? इतनी रात गये आप क्यों
? किसी भी सेवक को भेजकर बुलवा लेतीं।"
रानी बोली-
"वीर रडिया ! अधिक बातें करने का समय नहीं है ।
काम है । यदि कर सको तो उठ बैठो। मेरे भाई का
र प्रहरपुर यहाँ से साठ योजन दूर है । वोलो रातों-रात
से यहाँ ले प्रायोगे ? यदि भैया शूलपाणि ग्राज रात को ही
पा सके तो अनर्थ हो जायगा ।"
रढ़िया उठा । परों में पदत्राण डालते हुए बोला-
"यह तो कुछ भी मुश्किल नहीं । मेरे पास गंगा-यमुना
मि को दो ऐसी साड़नी (ऊंटनी) हैं कि हवा से बातें करते हुए
निती है । वे रातभर में दस चक्कर यहाँ से अहटपुर तक के
र सकती है। अब भाप इतना बता दें कि आपके भाई अथवा
लिमिह फुमार के मामा शूलपाणि से कहना क्या है ?"
७६ / किस्मत का खिलाड़ी
बड़े-बड़े ही रानी दामवती ने रडिया को
समन्ना दी। हाथ में ज्योतिपुंज दण्ड (नगाल) नेवार
रड़िया। दोनों सांडनी ली। एक पर स्वयं वा पा
यमुना को पीछे डाल लिया । करीब चालीप गोलमाल
के बाद उसे एक स्त्री मिली। उनके वन्य जाले !
अस्पष्ट श्री। रड़िया ने उसे टोकाकौन हो तुम
कहा-रजनी । मैं रात्रि की देवी रजनी है।
तभी सवेरा होता है। रड़िया बोला-
"तब तो आज तुम्हें नै जाने नहीं बंगा! प्रार
तुम्हारी ही जरूरत है।"
रात की देवी बोली-
"अनिश्चित काल के लिए में कैसे व्हर पाई।
मेरे चले जाने की प्रतीक्षा कर रहे होंग, उना करा
चकवा-बकवी तो मेरे पाते ही अलग हो जाते हैं।'
मेरे पास इतना समय नहीं है कि तुमने का
फई। रड़िया ने कहा-'अद यदि तुम मिल ही में
तुम्हें अपना काम होने तक बांध कर रखूगा ।' हा
रडिया ने रजनी देवी को पकड़ लिया और नानी की
बांध दिया । रात में ही शूलपाणि के भवन पर पहुंच
पर प्रहरियों ने उने अलमामि से नहीं मिलने दिया
पल की देर उसे अखर रही थी। अत: नांदनी को
के पीछे पहुंचा । स्ती के सहारे ऊपर चढ़ गया प्रार
को नव वृत्तान्न मुनाफर अपने माय ले लिया।
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किस्मत का खिलाड़ी / ७७ नों माण्डवगढ़ के निकट बने गजसिंह के दुर्गभवन में प्रा पे । वहन-भाई आपस में मिले । समस्या पर विचार-विमर्श प्रा । शूलपाणि ने सुझाव दिया "वहिन ! अनिच्छापूर्वक कुमार को रोकना ठीक नहीं । मैंने सब बातें सुन-समझ ली हैं। इन परिस्थितियों में मार का विदेशगमन उचित ही है । इन बारह वर्षों में जाने क्या से क्या हो जाए।" रानी चोली-- "भैया शूलपाणि ! तुम्हारी बात मैं मानती हूँ। पर न्हें यहाँ बुलाने का एक प्रयोजन यह भी है कि पुरपइठान के जा गुलावसिंह को कन्या चम्पकमाला से कुमार का विवाह राके उसे विदेश भेजना चाहिए । विवाह के बाद दो भाग्य हो जाते हैं । इस प्रकार कुमार विदेश जायगा तो चम्पक- ला का भाग्य भी उसके साथ रहेगा।' ।" शूलपाणि बोला- "लेपिन यों अचानक रातोंरात राजा गुलावसिंह विवाह इले पो तैयार कैसे हो जायगा ?" रानी बोली- "नहीं होगा तो न हो, पर फिर हमारा दोष तो न गा। यह भी तो अनुचित है कि कुमार के बारह वर्ष तक "हर रहने की सूपना न देकर हम राजा गुलावसिंह को में रखें।" "ठीक है तो हम अभी पुरपश्वान जाते हैं।" शूलपाणि - म -
७८ / किस्मत का खिलाड़ी
ने कहा-'"रातों रात ही लौट आयेंगे।"
रड़िया, शूलपाणि और गजसिंह कुमार तीनों ग.
यमुना साँड़नियों पर पुरपइठान के लिए प्रस्थान फर दिप
रात की देवी सांडनी की पूंछ से बंधी छटपटा रही थी।।
तो रात न वीते, यह भी अपने हाथ में था। यथासमय मा
सब पुरपइठान पहुंच गए। राजा गुलाबसिंह को जगाया :
उसे सब बातें बताई । सब कुछ सुनने के बाद राजा ने कहा-
"आप लोग कुछ अनहोनी-सी करने आये हैं । राजा
बेटी का विवाह क्या यों गुपचुप होता है ? इस तरह से
नगरवासियों को भी पता नहीं चलेगा।"
शूलपाणि वोला
"अब आप ही सोचें। सव स्थिति-परिस्र्थाित मा
सामने है।
राजा बोला-
"अन्तिम निर्णय चम्पकमाला का ही होगा। मैं उसने
कर अभी बताता हूँ।"
राजा ने चम्पकमाला से पूछा तो उस प्रायजतना
लज्जा त्याग कर स्पष्ट बताया-
'पिताजी ! विवाह तो उसी दिन हो गया, निय
अापने श्रीफल देकर वाग्दान किया था, अब तो भांबरे पड़ने ।
बाह्य रीति शेप है । आर्यकन्या जीवन में एक ही बार किए
करती है। विवाह मन से होता है, मो हो चुका । गह।
उनके विदेशगमन की, तो यह मब तो मेरा भाग्य है।"
।
किस्मत का खिलाड़ी / ७९
वस, अब क्या देर थी? रातोंरात विवाह हो गया ।
-पकमाला को वहीं छोड़कर गजसिंह कुमार रातोंरात ही
सने दुर्गभवन में या गया । रडिया ने रात की देवी को मुक्त
र दिया । सवेरा हो गया । श्याम वस्त्र पहने कुमार गजसिंह
म अश्व पर ही सवार होकर भाग्य-परीक्षा करने चल
या । रानी दामवती बहुत रोई । शूलपाणि भी दुःखी हुआ ।
जी ने रडिया को बहुत धन दिया, उसके साहसिक कार्य के
प्रस्थान से पूर्व माता दामवतो ने जो शिक्षाएँ दी थीं, वे
मार गजसिंह ने हृदय में धारण कर ली । माता ने कहा था
परधन और परदारा से सदा वचना। जैनधर्म पर जो
प्रास्था है, उससे कभी मत डिगना । दुखियों का दुःख
का दूर करना और बारह वर्ष पूरे करके जल्दी लौटना । मैं
नकर बारह वर्ष काढूंगी।
6 कहाँ जाना है ? किधर जाना है, इसका कोई लिए नहीं था। गजसिंह के मन में तो यही एक बात धी पिद जाना है । अब तो हर वन, हर पहाड़ और सर-सरिताएं . ठहरने के स्थान थे और हर नगर, हर गांव उसके माने थे प्रवासी के लिए दूसरे के घर भी अपने ही हो जाते है अकेला था गजसिंह । धर्म, धैर्य, साहस और भलमनमा उसके अदृश्य साथी थे। अकेली भलमनसाहत ही एम. ई- साथिन है जो जहां जाती है, सफलता दिलाती है। गरी निर्वलों का वल और दुखियों का महारा था । अनजाने में बिना सोचे और अनायास ही वह पुरपश्ठानपुर पहुंच ग विवाह के समय रात में ही उसने यह नगर देखा था, मोन दिन में उसकी वीथियां और राजपथों को देखकर वह नहीं जान पाया कि मैं अपनी ससुराल पुरपइठानपुर प्राण मूर्यास्त मे देर थी। गजसिंहकुमार ने गोना--- नगर तो अच्छा है। हमारे माण्डवगढ़ से है तो छोटा , बड़ा साफ-सुथरा है। आज की रात तो यही ठहर गा। क्या नाम है, इस नगर का? कोई याता-जाना हो तो होगा कोई नाम । आज तो यहीं बाग में ठहगा। प्रार , किस्मत का खिलाड़ी/८१ वृक्ष मूल में ही तो ठहरता पाया हूँ। आज भी यहीं सही । रदि पुरु वात बन गई तो यहीं के राजा के यहां नौकरी कर लूंगा 1 बारह वर्ष यहीं, इसी एक नगर में कट जायेंगे। सबेरे राना से भी मिलूंगा। ऐसा निश्चय कर गजसिंह ने पेड़ से घोड़ा बांध दिया । राजकुमारी चम्पकमाला रथ में बैठकर कहीं जा रही थी, रथ में से भाक कार उसने देखा तो अपने पति को पहली झलक में ही पहचान लिया । मन्जरी को रथ से नीचे उतार कर बोली- "मन्जरी ! तूने पहचाना ? अरी ये तेरे जीजा हैं । मैं चलकर अपना भवन सजाती हूँ और तू इन्हें लेकर आ । का घोड़ा अश्वशाला में बंधवा देना।" -- मन्जरी ने पूछा- "सखी ! पया कहकर लाऊँ ? क्या कह दूं कि तुम्हारी '' बुलाती हैं।" "मुझसे क्या पूछती है ?" तनिक सकुचाकर चम्पक- माला ने मन्जरी से वाहा-"जैसे भी प्रायें, ले आ । चतुर तो तू बहुत है।" उदलती-पादती मन्जरी गजसिंह के पास पहुंच गई और मोली- "पलो मेरे साथ । मेरी सखी तुम्हें बुलाती हैं।" कुमार ने आश्चर्य से देखा, मन्जरी को। फिर . "जान न पहचान और तुम्हारो सखी बुलाती हैं ? ... है ।
८२ / किस्मत का खिलाड़ी
-
"
क्यों बुलाती हैं वे ?
नटखट मन्जरी ने छेड़ते हुए कहा-
"आप पर तरस खाकर बुलाती हैं। यहां खुले में
काटते वे आपको देख नहीं सकतीं। आज की रात उन्हीं
भवन में 'सुख से' काटना।"
'सुख से' वाक्यांश मन्जरी ने विशेष जोर देकर कहा-
कुमार मौन रहा । क्या कहूँ, यही वह सोच रहा था।
में मन्जरी ने फिर कहा-
"पुरुप होकर आप डरते हैं ! मेरी सखी क्या गुरु
बुलाती हैं ? उनका साहस देखो और अपना देखो। प्रार
घोड़ा मैं अश्वशाला में सुरक्षित बंधवा दूंगी।
कुमार ने सोचा-'चलकर देखू तो सही, क्या रहा।
कुछ गड़बड़ होगी तो लौट आऊँगा। बड़ी विचित्र स्त्री
जो यों निर्भय होकर बुलाती है।'
मन्जरी के साथ चल दिया कुमार । गुप्तमार्ग से ।
पांचवी मंजिल पर कुमार को ले गई। उसने सजी-
चम्पकमाला को देखा तो दंग रह गया । अपनी प्रिया हो ।
पहचाना उसने । उसके रूप-सौन्दर्य को देखकर ही का
था । एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े थे दोनों । दोनों में
कोई नहीं बोला । कुछ क्षण बाद कुमार ही बोला-
"राजभवन में तुम्हें देखकर मैं समझ गया हूँ हि
राजकन्या हो और यह भी लगता है कि तुम
भी हो । क्यों बुलाया है मुझे ? परदारा से बचने मारे
NA
किस्मत का खिलाड़ी/८३ - अव पलकें झुकाये चम्पकमाला बोली- "परदारा त्यागी हैं आप इसीलिए तो अपने स्वामी को नाया है । स्वामी ! मेरे साथ सात फेरे लगाकर ही प्रागे न नने के लिये रुक गए । मैं मांवर की ही बात नहीं मानूंगी । जो जीवनभर संग-साथ चलना-रहना है।" "तो तुम....?" इतना ही कह पाया कुमार कि चम्पकमाला पुनः ली- "स्वामी ! राजा गुलाबसिंह की कन्या चम्पकमाला पर- रा नहीं है । मेरा सौभाग्य है कि आप पा गए और दुर्भाग्य ३ कि प्रापने मुझे पहचाना ही नहीं।" बोला कुमार- "कसे पहचानता ? उस रात तुम अवगुण्ठन में थीं प्रार ।, रात की छाया । दीपालोक में मैं तुम्हें देख भी तो नहीं या।" इतने में पीछे से प्राकर मन्जरी बोली- "मैंने दीपक में भाज इतना तेल डाल दिया है कि तुम नों के संग-संग जागता रहेगा। अब 'मतलब की बातें' रो। मैं तो चलो।" गुमार ने मुड़कर मन्जरी को देखा । तनिशा मुस्करा कर गि गई मन्जरी। चम्परामाला ने आगे बदगार रण हुए। गजसिंह ने उने वक्ष ने लगा किस्मत का खिलाड़ी / ८४ दोनों शय्या पर बैठे। रात पा चुकी थी। दोनों रातिको त्यागी थे इसलिए दोनों ने दूध ही पिया। फिर बातें एक वातों में रात कटी । सवेरे उठकर कुमार ने प्रस्थान कोप मती मांगी तो चम्पकमाला बोली- "आप तो ज्योतिप को मानते हैं और ग्रहयोग के प्रम में भी विश्वास करते हैं । तब क्या प्राण प्रतिकूल तिथि प्रस्थान करेंगे? कुमार बोला- "मेरा प्रस्थान तो माण्डवगढ़ के निकट अपने सुगंभ से माना जायेगा। यह तो वीच का पड़ाव है । पहार प्रस्थान तिथि कौन देखता है ? लोग रात को पड़ाव पर हैं और सवेरे चल देते हैं।" "लेकिन पत्नी से अनुमति लेना विल्कुल अलग बात मेरी अनुमति के बिना आप जाना चाहें तो जाएँ पर आज जाने की अनुमति नहीं दूंगी।" हंसकर बोला कुमार- "ऐसे ही मां ने एक दिन रोक लिया था। एक कहने से रुका तो तुम मिल गई। उसी रात तो माह था हमारा। आज की रात यदि तुम्हारे कहने से गंगा जाने क्या मिल जाए। इसलिए तुम्हें नाराज गाकर जाऊंगा।" चम्पकमाला बोली- "मिलेगा क्यों नहीं ? कुछ ऐसा मिलेगा दिया - ?
फिस्मत का खिलाड़ी /८५
-
नों का प्रीति-फल ही होगा।"
चम्पकमाला का संकेत समझते हुए कुमार ने पुनः
उसे
क्ष से लगाया और बोला-
"रात की बातें दिन में नहीं करते । मेरे यहां रहने से
म मां बन जायो तो इससे अच्छी बात क्या होगी।"
प्रात: उठकर माला जप प्रादि किया । स्नान श्रादि से
गवृत्त हो वह अपने काम में लग गया। फिर तो उसे चार
दन और रुकना पड़ा । किसी न किसी बहाने से राजकुमारी
रो रोपा लेती थी। लेकिन पांचवें दिन की प्रभात नहीं एका
जिसिंहपुगार। जब राजकुमारी अपने पति को रोकने में
फल हुई तो बोली-
"मैं आपको रोग नहीं सकती, पर प्रापके साप तो
वश्य जा सकती हूँ । प्राधा अंग यहां छोड़ कर आप जा भी
ने गाते हैं ?"
कुमार ने अपनी असमर्थता प्रकट की तो राजकुमारी ने
"रवामी ! यदि में गर्भवती हो गई तो मेरी गाली दुर्गति
होगी, यह भी तो प्राप सोचें । मेरी ममुराद पाले मादापि मेरा
विश्वास नहीं करेंगे । अंजना की सामने भी तो नहीं किया
गुगार ने समभाषा-
"प्रिये ! मती-मन्नारियों को गले लोकापवादों में करी
परना पाहिए।"
८६ / किस्मत का खिलाड़ी
फिर राजकुमारी ने हठ नहीं लिया। कुमार प्रजेला
चल दिया। कई दिन तक चलने के बाद यह पुरस्टाल में
वहुत दूर निकल गया । एक वन में रुका तो वहां
। बड़े चमन
ढंग से चम्पकमाला प्रकट हो गई। कुमार को बड़ा प्राय
-
हुआ । वोला-
?
-
-
"तुम ही हो या कोई देवी अपनी माया से चम्पमा
वन गई है ? तुम यहां एकाएक कैसे प्रकट हो गई ?"
चम्पकमाला ने बताया-
"अब आपको ज्यादा चक्कर में नहीं डालूंगी। प्रार
साथ नहीं लाये, पर मैं आ गई । स्वामी! अपनी लतिर
सिद्धि के वल से मैं सूक्ष्म अदृश्य होकर अापके पदमाण पर
चिपक कर यहाँ तक चली आई।"
गंभीर होकर कुमार ने कहा-
"प्रिये ! त्रियाहठ कभी-कभी बड़ा भयंकर परिगान
दिखाता है। यदि मैं संयोग से पुरपइठान न पाता तोहुर
क्या करती ? मेरी विवशता है। तुम्हें मैं साथ नहीं रो र
उकता। लौट जायो। अपनी विद्या से ही अपने पीहर में
पहुँच जायो।"
चम्पकमाला ने अपना निश्चय सुनाया-
"अब कुछ भी हो । स्वामी, मैं पीहर तो हरगिज न
नाऊँगी। लोग क्या सोचेंगे। आप भी माय मत ले जा
आपके लौटने तक यहीं वन में रह कर तप कर गो। र
पाप कुछ न रहना ।"
-
किस्मत का खिलाड़ी /८७ यह कह चम्पगमाला वहीं वट वृक्ष के नीचे ध्यान लगा पर बैठ गई । कुमार ने ग्रागे प्रस्थान कर दिया । X X X 1- . पोतनपुर नामक नगर में रूपसेन नाम का राजा राज्य मारता था। इसी नगर के निकट गजसिंहकुमार पहुँच गया । रात हो गई थी। नगर तीन कोस दूर था। अतः नगर के बाहर ही कुमार एक उजड़े वाग में ठहर गया । यह वाग बहुत पुराना था । मूख गया था यह वाग। घास तक सूखी थी। प्रय यहाँ कोई नागरिक भ्रमण करने नहीं पाता था । पुराने पेड़ों के गोटरों में गिद्ध, उल्लू अादि पक्षी रहते थे। चिमगादड़ें भी बहुत थीं । इनके मल से उद्यान की धरती सफेद छींटों से रंगी पड़ी थी। आस-पास के कुछ लोग मूखी लकड़ी बीनने दिन में यहाँ अवश्य प्राते थे, वैसे कोई भूल कर भी नहीं धाता था। इसी उद्यान में एक सूखी इमली के नीचे पुमार ने अपना उत्तरीय विछाया और लेट गया । घोड़ा भी पास ही बाँध दिया था। रात को गिद्ध पंख फड़फड़ाते थे । उल्लू- फोनों की लड़ाई भी होती थी। उल्लू को दिन में नहीं दीखता पौर कोपा रात में अंधा हो जाता है। नो उल्लू सोते गोत्रों पर भागमण करते तो गांव-गांव के चीत्कारों को सुनकर गुमार बार-बार बीच-बीच में जाग उटता था । उटगार टा हो गया कुमार और मन-ही-मन बावड़ाया-'यह काली विचित बात है कि शान्ति ने गेह उपान में घार नोरयता होदरा राशि में भी प्रगांति है। प्राच तो जान मार ही राज पाटनी पड़ेगी।
८८ / किस्मत का खिलाड़ी
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यों सोच-विचार करके कुमार पुनः सो गया । चमात
यह हुआ कि कुमार के पुण्य-प्रभाव से सूखा-उजड़ा उद्यान
रात-भर में ही हरा-भरा हो गया। पुण्यों का प्रभाव ऐ।
होता है कि जब राम को वनवास हुआ था तो सूपा-उमा
दण्डक वन भी हरा-भरा हो गया था। राम, सीता में
लक्ष्मण के रहने से दण्डकवन की शोभा ऐसी अनुपम हो र
थी कि वन में रहना सबको सुहाने लग गया था। बाद में वर
वन जव पुनः सूना हो गया तो भूला-भटका एक गावि हर
पथिक वहां पहुंच गया और वन की भयानकता देवकर उस
मुख से ये शब्द अपने पाप निकल पड़े-
"सांय-सांय करता है जंगल ।
राम के बाद किसी को वनवास न हुआ
यह कवि यदि अाज पोतनपुर नगर के इस उजड़े-
उद्यान में होता तो कहता-
"कभी उल्लू बोलते थे यहाँ
आज कौन सच मानेगा इसे ?"
जाने किस पुण्यशाली को वनवास मिला आग ?
आज की कुछ बात ही और है।
लताएँ विटपों से ऐसे लिपटी हैं,
जसे प्रिया प्रियतम से।"
गयेरे लकड़हारे लाड़ी बीनने आए । ज्यान मोरे
ता प्रांखें मलने लगे---'कहीं हम भूलकार गजोयान में तो
?"
?
किस्मत का खिलाड़ी/८९ गए । कसी हरियाली है। अब तो स्वार्थी भौंरे भी जाने ।मे प्रा गए ?' फिर सबने पेड़ के नीचे लेटे गजसिंहकुमार देखा । आपस में बोले- "अरे देखो रे ! यह कोई देव यहाँ रुका है । वन देवता दर्शन हो गए हमें । चलो मालिन से कहें।" दोहे-दौड़े सब मालिन के पास गये और एक ही सस अनहोना शुभ संवाद सुना दिया। मालिन को विश्वास हृमा तो एक बोला- "यहाँ बैठे-बैठे विश्वास होगा भी नहीं, चलकर अपनी पों से देखलो।" मालिन बाग में पाई और गजसिंह के समक्ष हाथ जोड़ र पड़ी हो गयी । बोली वह- "चन देवता ! प्राप रूठे थे, सो यह वाग उजड़ा था। जि प्राप स्वयं ही प्रकट हो गये और इस वाग की काया पट दी। मेरा तो उद्धार हो गया । क्या सेवा करूं पिनी?" - कुमार बोला- - "माता ! में कोई देवता-वेवता नहीं हूँ। तुम्हारी । तरह मनुष्य हूँ। देश-देशान्तरों का भ्रमण करने निकला १, सो यहां ठहर गया। यहां कोई उद्यानरक्षक नहीं दीखा, सलिए बिना अनुमति के ठहर गया। अब तुम इसकी कानपिन मिल गई हो तो ठहराई (मूल्य) देता हूँ। इसे वीकार करो।"
९० / किस्मत का खिलाड़ी
यह कह गजसिंह ने पांच सुवर्ण मुद्रा मालिन के हार
रख दी। मालिन की अांखों में चमक आ गई। बोली---
"तब तो किसी नगरसेठ के पुत्र हो गा किसी
के राजा।"
"यह भी नहीं।" कुमार ने कहा-"तुम्हारे सब का
मान गलत हैं। खैर छोड़ो ये बातें । इस नगर का परितः
दो। मैं कुछ दिन इसी नगर में ठहरना चाहता है।"
मालिन बोली-
"ये सब बातें घर पर ही होंगी। आज मेरी कुटिया
चलें और कुछ दिन सेवा का अवसर दें। आपने इतनी प्रति
ठहराई दे दी है कि महीनों आप मेरे घर पर ठहरें तो
पूरी न हो।"
मालिन के चातुर्य पर कुमार मुस्कराया । उसे हर
था ही, सो मालिन के साथ चल दिया और अब उसी के. द.
रहने लगा । जब कुछ दिन बीत गये तो कुमार ने सोगा।
अब तो यहाँ के राजा रूपमेन से परिचय करना चाहिए।
लुका-छिपा कव तक रहूँगा? यह सोच गजसिंह कुमार
दिन पोतनपुर के राजा रूपसेन की सभा में पहुंग गया !
रूप और व्यक्तित्व में राजा रूपसेन इतना प्रभावित हुए।
वाह पकड़कर अपने सिंहासन के निकट ही बैठाया । उसने
बात की, मानो, पहले से ही जान-पहनान हो । सिंहासन
बैठने का निषेध करते हुए गजसिंह ने आना-कानी की।
कहा था कि इन काले कपड़ों में अापके पाग बेटने हा
reON
।
किस्मत का खिलाड़ी / ९१ -छा लगूंगा। राजा ने उसकी इस बात पर टिप्पणी की कि हे काले हैं, तभी तो तुम्हारा मुख काले बादलों में से कता चन्द्र-जैसा है । फिर तो और भी बातें हुई। फिलहाल मार ने अपना परिचय छिपा लिया। राजा ने भी ज्यादा पारेदा । पर उससे आग्रह किया कि अब तुम मेरे यहां रहोगे । विनोद में कुमार ने पूछा- "वेतन क्या मिलेगा ?" "अरे तो तुम नौकरी करोगे? कैसी बातें करते हो सार ?" राजा ने बड़े अपनेपन से यह बात कही। कुमार भी अपनापन जताया और बोला- "नौकर बनकर तो मैं भी रहना नहीं चाहता । पर यह नहीं चाहता कि यों ही निठल्ला आपके दरवार में बैठा है। मेरी प्रार्थना यह है कि मैं अपनी इच्छा से राजहित र प्रजाहित के काम करूं और बदले में बस गुजारा में सी का शासन स्वीकार नहीं कर सकता। अपने पिता तक नहीं किया। क्या कर ? स्वभाव ही ऐसा है । ।" राजा रूपसेन बोला- "मुझे स्वीकार है । कहीं रहो, कहीं घूमो और जो चाहो करो-न करो। पर इसके साथ मेरी प्रार्थना यह है कि म सदा मेरे माथ रहोगे।" "पापको प्रार्थना को प्रादेश मान कर मैं सदा प्रापक प रहूंगा । चों पाहो पि. रात-दिन के लिए प्रापना ग- ९२ / किस्मत का खिलाड़ी । यही हुया । गजसिंहकुमार राजा रूपसेन का नाम वनकर रहने लगा। अव उसके रहन-सहन के ठाट-बाद भी कर गए थे । भ्रमण के समय जब वह अश्वारूढ़ होकर राजा साथ जाता तो पोतनपुर के नर-नारी उसे प्यासी निगाहों से देखते । इसी क्रम में एक दिन वह राजा के साथ वनश्रमय में जा रहा था। अभी दोनों राजपध के चौराहे पर ही लिएर दिशा से आँधी का-सा ववण्डर उठते देखा। दोनों विटामा बवण्डर निकट आया और उसमें से एक विशालकार र प्रकट हुआ । असुर को देखकर तो राजा को भिग्धी-सी : गई । सवेरे के समय पोतनपुर के जो नर-नारी प्रा-मार वे भी भयभीत होकर इधर-उधर लुक-छिप गए। राम अपनी बात बड़ी जोर से कही- "हे राजा ! मेरे नियमित भोजन का प्रबन्ध कर। आदमी प्रतिदिन तू मुझे अपने नगर से दे । यदि नहीं देगा ? तेरे नगर का सफाया कर दूंगा।" भयातुर राजा ने स्वीकृति दी- "जैसी प्रापकी इच्छा । अाज में व्यवस्था कार, कल से दो आदमी, जहाँ आप कहेंगे-~~या जाया करेंगे । यह सुनते ही अमुर मुंह फाड़कर हेमा । गणित नहीं रहा गया । बोला गजसिंह- "हे अधम राक्षस ! तू बिना मौत मरने यहाँ गयो म माया ? चुपचाप चला जा और पेड़-पत्तों को गारर -
किस्मत फा खिलाड़ी/९३
क्रोध की साक्षात् प्रतिमा राक्षस यह बात कैसे सुन
साता? वोला---
"यह बकरी का बच्चा भी बोलने लगा ? श्रा प्राज
पहले तुझे ही खा डालूं । देखे कैसे खिला-खिलाकर तेरा नाश
गा। प्रकाश से नीचे पाऊंगा और चोटी पकड़कर उठा
२ जाऊंगा।"
यह कह राक्षस अाकाश में उड़ गया। राजा ने भयभीत
होकर गजसिंह से कहा-
"यह क्या नया संकट मोल ले लिया तुमने ? वह देखो,
ऊपर से मुंह फाड़कर पा रहा है।"
गजसिंह ने राजा रूपसेन को कोई उत्तर नहीं दिया और
अनुप पर बाण चढ़ा दिया। उस अद्भुत धन्यी ने वाणों की
चला ऐसी छोड़ी कि राक्षस के फटे मुंह में डाट-सी लगा
दी । राक्षस बड़ा ग्रुद्ध हुआ। धड़ाम से धरती पर खड़ा हुआ
क
कुमार ने उसकी दोनों भुजाएं काट डाली। पोतनपुर की
इतों पर ऐसी भीड़ हो गई कि छत-छज्जे टूटे पड़ते थे । समस्त
र-नारी इस नर-अमुर युद्ध को देखने लगे । सबके हृदय धड़क
रहे थे। लेकिन सबको प्राशा बंध गई कि गसिंह
चक्ति नहीं है, यह इस मायावी असुर को अपश्य मारेगा ।
घर भसुर ने अपनी माया फैलाई तो वहां बहतेरे
मसुर हो गए । देवता तना भी इस महा संग्राम को देखने पा
गये। पर वाह रे वीर गजसिंह ! उसने सब को ललकारतो म
महा-
।
साधारण
९४ / किस्मत का खिलाड़ी
ने
water
"पापियो । मेरे पिता ने भी असुर से नाक रगड्या की
पापपुज जितना भारी होगा, वह पुण्य से उतना होगा
नष्ट होगा। ढेर सारे अंधकार को एक किरण मिटा देतः ।
पायो ! सब आयो।"
गजसिंह के पुण्यों का ऐसा प्रभाव था लिइन्द्रा दे।
ने सब असुरों की माया को उलटा घुमा दिया । ये सब
बचाकर भाग गए। वही असुर वचा सो उसे कुमार ने शा
नहीं छकाया । तानकर एक ऐसा वाण वक्ष में मारः
पापी असुर ढेर हो गया। फिर तो नगर में हू हू मच र
सब हू हू हूँ, अरे रे रे करते फिरते थे । राजा रूपसेन ने
छाती से लगा लिया कुमार को और बोले ----
"भला, सुनने वाला कौन मानेगा कि तुमने पहाड़
असुर को मारा होगा? पर हम सब तो देख रहे हैं कुमार
तुम्हारे बरावर तोलकर सोना दान करवाऊंगा।"
कुमार बोला-
"जग की यह रीति भी कैसी उल्टी है कि संबट
पर दान-पुण्य किया जाता है । पहले से ही यह सब होगा
तो ऐसे असुर अपने आप बनकर निकल जाएं।"
फिर तो घर-घर चर्चा हुई। असुर के शव को
यादमियों ने मिलकर घसीटा । महीनों नर-असुर गुद्ध
रही। गसिंह कुमार तो अब पोतनपुर में ऐसा छा गया
बच्चा-बच्चा उसको जान गया। अब उसके लिए प्रमाण ।
और अलग दाम-दासी थे।
किस्मत का खिलाड़ी / ९५ । प्रब चोर-उचक्के और दस्यु गजसिंह के नाम से ही ने लगे। अब रात में चोरियां नहीं होती थीं । पोतनपुर के ग घर खुले छोड़कर रात को निश्चिन्त सोते थे। गजसिंह बल-पराक्रम की चर्चा दूर-दूर के नगर देशों में भी पहुंच की थी । वहुत-सी कुमारियाँ अब यह चाहने लगी थीं कि बारा व्याह हो तो गजसिंह के साथ ही हो । लेकिन चाहने प से किसकी इच्छा पूरी होती है ? जिसकी इच्छा प्रबल पौर जिसका स्नेह सच्चा हो उसे तो मिलने वाला मिल ही ता है । अव दूर-दूर के लोग यह भी जान गए थे कि गज- ह पुमार माण्डवगढ़ के राजा जामजशा का साता पुत्र है । ।
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मालवदेश की राजधानी धारापुरी नगरी में सुरेलमार
राजा राज्य करता था। उसके एक पुगी थी। नाम या
फूलदे सुन्दर ही नहीं थी, बल्कि विद्या-बुद्धि में यह मः
सरस्वती थी। उसने चौसठ विद्याएँ पढ़ ली थीं। धना
का अध्ययन गहरे पैठ कर किया था। किसी दिन दूर देश में भी
एक कवि ने राजा सुरेन्द्र के सामने गसिंह कुमार के २१-१
और शौर्य-पराक्रम की चर्चा काव्य-पाठ करप में पारा
संयोग से उस दिन फूलदे भी सभा में थी। अनदेगे मात्र
पर वह मन-ही-मन अनुरक्त हो गई और प्रतिज्ञा कर ली
'जो भी हो, मैं गजसिंह कुमार की ही चरणदासी बन
यों राजा सुरेन्द्र भी चाहता था कि गजसिंह कुमार र
जामाता बने । पर जब उन्हें अपनी पुत्री के अभिग्रहमा
चला तो सोने में सुगन्ध वाली बात हो गई। राजा ने मन
को बुलाकर परामर्श किया और कुछ चतुर दूत पोरनार
दिये।
जिस दिन धारापुरी के राजा के दून पोजगार
राजा की सभा में पहुंचे, उस दिन गजसिंह यहां मरी
भ्रमण करने नगर से बाहर गया हुआ था। सब बारे जा,
वाद पोतनपुर के राजा रूपसेन ने घारापुरी के दुनों को भी
किस्मत का खिलाड़ी / ९७
-
दे दिया-
"गजसिंह गा क्या पता कहां है । वह तो घूमते-फिरते
भाण्टवगढ़ से यहाँ पाया था, सो जाने अव कहां चला गया।
फिर उस पावारा का क्या ठिकाना ? पिता ने देशनिकाला दे
दिया, सो मारा-मारा फिरता है । अपने राजा से कहना कि
'उम पावारा को अपना जामाता न बनायें।"
यस दूत वापस हो गए और धारापुरी पहुंच राजा
परोन द्वारा कही गई सव बातें अपने राजा सुरेन्द्र को बता
बौं । राजा ने अपने मंत्री से कहा-
"मन्त्रिवर ! हम तो अपनी लड़की के हठ से परेशान
है । अब कहाँ ढूंढ़े गजसिंह को ? मेरी राय में तो फूलदे को
पोतनपुर की रानी ही वना दें। पोतनपुर के राजा रूपसेन भी
तो नाम नहीं।"
मंत्री बोला-
"राजन् ! विवाह तो मन-मिले का सौदा है। यदि आप
- पिता के अधिकार से राजकुमारी का विवाह पोतनपुर के
राजा रूपसेन से कर भी देंगे तो दोनों का जीवन नरक हो
जायगा ।"
"तो फिर गजसिंह को कहाँ से पैदा करें ?" राजा
गुरेन्द्र ने पूछा तो मन्त्री ने कहा-
"ऐसी जल्दी क्या है ? दूतों को माण्डवगढ़ भेजें । क्या
पता गजसिंहकुमार माण्डवगढ़ मिल जाएं।"
"अच्छी बात है।" राजा ने निःश्वास छोड़ते हुए
;
९८ / किस्मत का खिलाड़ी
कहा-"यदि माण्डवगढ़ भी नहीं मिला तो फिर मैं
रूपसेन को ही अपना जामाता बनाऊंगा।"
मन्त्री ने फिर कुछ नहीं कहा। राजा ने मानेन
माण्डवगढ़ भेजे । यथासमय वे सब निराश लौटे | Ham.
कर राजा सुरेन्द्र ने पोतनपुर के राजा के पास ही टीका
दिया। विवाह पक्का हो गया और तिथि भी निश्चित हो गई।
दोनों ओर तैयारियां होने लग गई । धारापुरी के राज में में
नगर के वाहर उद्यान में वरात के ठहरने की व्यवस्था पर
शुरू कर दिया । समय एक ही महीने का था और मार
बहुत कुछ होना था । उद्यान के बाहर पड़े मैदान मोतिला
में वाँधकर अस्थायी रूप से अश्वशाला, गजशाला और र.
शाला बनवाई। बरात के ठहरने के लिए बड़े-छोटे गिरि
आदि की व्यवस्था थी।
इधर पोतनपुर का राजा रूपसेन भी तयारी गारो लगा
उसने पड़ोसी मित्र राजाओं को निमन्त्रण भेज दिये । पर
.५ फूलदे को व्याहने वह बड़े ठाट-बाट से-राजा
जा वनकर जाना चाहता था। इसका 'मती सन
गजसिंहकुमार को किसी-न-गिसी तरह मालूम हो गया है।
धारापुरी के दूत पहली बार गजसिंह की अनुपस्थिति
पोतनपुर के भरे दरबार में आये थे। राजा ने
को गणसिंह के विरुद्ध भड़काया था। उस समय तो दरमा
अपने राजा के अनगलवायन का विरोध न कर, परदा
में गजसिंह के कान भर दिये। दूसरी बार जब धारापुरी
किस्मत का खिलाड़ी / ९९ टीगा लेकर आये थे, तब गजसिंह भी सभा में था । गज- ह ने मन-ही मन सोचा-'यह फूलदे मेरी मांग है और यह ती राजा छल से मेरा टीका स्वयं ले रहा है। मैं भी कांटे । गांटे से निकालूंगा।' चतुर गजसिंह ने अपने किसी भी व्यवहार से यह प्रकट ही किया कि सब मुझे मालूम है । वल्लिा यही जाहिर किया जैसे मुझे कुछ भी मालूम नहीं है । राजा रूपसेन भी अपनी सलता पर फूला नहीं समा रहा था। बरात के प्रस्थान का समय प्राया । रूपसेन ने गजसिंह मार को नगर-रक्षा का भार सौंपते हुए कहा- "कुमार ! तुम्हारे ऊपर ही सब कुछ छोड़कर जा रहा । प्राधी से अधिक सेना यहीं रहेगी । मेरे पीछे तुम नगर | गुरक्षा का ध्यान रखोगे, ऐसी मुझे प्राशा है। मंत्री प्रादि । मेरे साथ जा रहे हैं।" कुमार ने श्राश्वासन दिया- "यह तो मेरा कर्तव्य ही है। इनी कर्तव्य-पालन के दले तो मुझे प्रापकी कृपा मिल रही है तो क्या इन उत्तर- पित्य से लापरवाह रहूंगा ? श्राप निश्चिन्त होकर धारापुरी गए। यहाँ गोई पटका नहीं होगा।" राजा रूपसेन ने निश्चिन्त होकर हो घोर लाप हो बड़े साह के साथ घारापुरी को प्रस्थान किया । घर गनिर ने गर-रक्षना, प्रारक्षी सचिव तथा सभी प्रगानकों को मायर --- ,
१०० / किस्मत का खिलाड़ी
"मैं कुछ दिन के लिए बाहर जाता हूँ। मेरे को
व्यवस्था उसी तरह सम्हालना जैसे मेरे सामने सम्हानी में
इतना भी ध्यान रहे कि मेरे प्रस्थान की बात बाद में
रूपसेन को भी मालूम न हो। परना तो तुम जानो
हो।"
धमकी और प्यार-दोनों
~दोनों तरह से समझा कर मार
का लाडला गजसिंह भी घारापुरी की ओर चल दिया।
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द्वारपूजन होने में अभी बहुत देर थी। फूलो का
सखियों के साथ अपना वर देखने चुपचाप गई। पेगी :
में से उसने वरवेश में पोतनपुर के राजा रूपसेन गो देना
सखी से बोली-
"सखी ! यह तो मेरे गजसिंह कुमार नहीं है। मैं
साय व्याह नहीं करूंगी। मेरे साथ धोखा हुमा है।
x
x
राखी ने पूछा-
"राजकुमारी ! तुमने कैसे जाना किये थे नती है ?
मी तो पोतनपुर में ही रहते हैं।"
फूलदे बोली-
"सखी इतनी मोटी वात में नहीं समगी?
उन तो देख। दस बच्चों का बाप लगता है।
सखी ने माता-
"राजकन्ये ! अब नया हो माता ? यदि म:
विवाह से इन्कार करोगी तो तुम्हारे पिता को या
फिस्मत का खिलाड़ी | १०१
-
पलेगा।"
फूलदे ने दृढ़ता से कहा-
"भवरें पड़ने से पहले सब कुछ हो सकता है । मैं
ली युक्ति करगी कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न
-
"अर्थात् ?" सखी ने पूछा।
फूलदे ने सखी के कान में कहा-कुछ बताया और
गि में ही बोली-
"जैसा मैंने तुझे सिखाया है, तू मेरे पिता से जाकर कह
चल अव राजभवन चलें।"
सखियों सहित फूलदे राजभवन लौटी और उसकी
मी
तुरन्त ही उसके पिता चम्पापुरी के राजा सुरेन्द्र के पास
फिर बोली-
"पृथ्वीनाथ ! राजकुमारी का संदेश है कि द्वार-पूजन
'पा विवाह की अन्य रीतियां तभी होंगी, जब वर मान्या की
'गरयात्रों का समाधान करेगा।"
"समस्या ? कैसी समस्या?" राजा ने कहा--"समस्या
यह नई समस्या कहां से आ गई ?"
राजकुमारी की सपी ने गाहा-
"पाप तो जानते ही हैं कि राजकुमारी गो गाय
हेलियाँ और नाव्य समस्याएँ पूछने तथा हल करने का मौर
रामजीवन से ही रहा है। प्रतः पहले दे वर गे माय
मरवाएं पूगी । जग बनाये सात परदे है । पर इन परदों
:
१०२ / किस्मत का खिलाड़ी
।
को पहले तोड़ेगा, तव भांवरें पड़ेंगी।"
राजा मुस्कराया और बोला-
"इसमें क्या बात है ? यह सब भी हो भाषा
उद्यान में सूचना भिजवाता हूँ।"
सखी सफल मनोरथ होकर राजकुमारी के पास
और उससे बोली-
"राजकन्ये ! तुम्हारी युक्ति काम कर गई। पर
खटका है कि यदि तुम्हारे परदे राजा रूपसेन ने ही को
तो फिर क्या होगा ?"
फूलदे बोली-
"असम्भव है सखी! सती की रक्षा उसमा
करता है। भांवरें नहीं पड़ी तो क्या हुमा ? मन से और
अभिग्रह से मैं गजसिंहकुमार को ही अपना पति मान चुत
रूपसेन का बाप भी मेरे परदों को नहीं तो !
लौटकर ही जायगा।"
यही हुआ भी। जब राजा पसेन के पास
पिता का समस्या समाधान का संदेश पहुंचा तो माग
गया । मंत्री से वोला---
"मंगो । अव या करोगे ? मैं तो काम
नहीं जानता । बिना व्याह के लोटने से जगमाई होग
मंत्री बोला-
"उपाय से मब काम ठीक हो जाते हैं। अभी
गया था तो मैंने एक योगी को धनी रमादे देवा मा :
।
-
किस्मत का खिलाड़ी/ १०३
लोग बड़े चमत्कारी होते हैं। मैं उसी को ले आता हूँ।
वर वेश में पहले उसी को राजकुमारी के पास ले चलेंगे ।
जसे पारिश्रमिक दे देंगे। फिर भाँवरें आपके साथ पड़
जायेंगी।"
"कुछ भी करो। पर जल्दी करो।"
मंत्री योगी के पास पहुंचा और उसे राजा के पास ले
पाया । यह योगी कौन था ? वही था, जिसे फूलदे चाहती
थी। माण्डवगढ़ का राजदुलारा गजसिंहकुमार ही पोतनपुर
से योगी वेश में यहां पाया था। राजा रूपसेन ने भक्तिभाव
में अपनी बात योगी रूपी गजसिंह के सामने रखी-
"योगिराज ! श्राप तो परोपकारी होते ही हैं । मुझे
:: संगाट से उवारो। मेरा काम बना दो भगवन् ! फूलदे ने
काव्य पहेली गी नई वात अटका दी है।"
योगी वोला-
"राजन् ! कपट सफल तो होता है, अवश्य होता है,
- पर अन्त तक सफल नहीं होता । अन्त में कपट प्रदग्य
खुलता है । तुम्हारा यह काम तो मैं कर दूंगा कि राजकुमारी
यो प्रश्नों का उत्तर दे दूं। इस फापट मा घन्त क्या होगा,
यह तुम्हारे भाग्य पर निर्भर है।"
बुमार ने रूपसेन के उस कपट की घोर त लिया
पा, जिस कपट से उसने कुमार का टीला अपने लिए ले निमा
:: पा। पर राजा रपसेन दुमरी दात ही नगमा । उमने जोर्न
- सारा पोलियों का हल कराने पाले कामो कपट सबला,
-
१०४ / किस्मत का खिलाड़ी --- ३ । Pram सो वोला- "यह सब मेरे ऊपर छोड़ो। इसमें कापरी है ? किराया देकर सभी काम कराते हैं । मैं भी सुमारे। जहाँ कहोगे, वहीं एक भव्य मठ बनवा दंगा।" राजा रूपसेन की नासमझी पर गसिंद कुमार गुर राया । बोला कुछ नहीं । झटपट गाम हुआ । गति: वर वेश में सज गया था। गिने चुने लोगों के साथ परो र यथार्थ वर गजसिंह फूलदे के भवन में पहुंचा 1 चुने हुए में राजा रूपसेन और उसके चार मन्मी भी थे। सन के पीछे बैठी थी। पारदर्गक परदे में से जाने गजसिंह को देखा तो उस पर मोहित हो गई और मन-ही- सोचा-'मेरा मन इन पर मोहित हुआ है तो निरसन ? वे ही होंगे । भीतर की प्रां अपने प्रियतम को भर लेती हैं। मती का मन स्वप्न में भी गैर पुरुष पर पि. नहीं होता । मेरा यह भी अनुमान है कि इनको रामा ने ही अपनी ओर से भेजा होगा।' मी बरत राज फूलदे जाने क्या-गया गोच रही थी। उसी नाम: भी उनके पास बैठी थों । कन्यापक्ष की पोर में और धा, क्योंकि राजा गुरेन्द्र ने राजगुमारी के पन कार को ही वाल माना था। वह विवाह के अन कामों में का गनगिह कुमार परदे के सामने पर ना " बंटा या । उनी ने बान की-- "राजकन्ये । मया बातें परदे में सीमा : " Prem -- r.w
फिस्मत का खिलाड़ी / १०५
वस्त्र
राजकुमारी वोली-
"परदे तोड़ने का काम तो पापको करना ही है । प्राप
। तो और मुझे पायें।"
"हाघी पोर सिंह तो परदे तोड़ा ही करते हैं।"
इन शब्दों में गजसिंह ने अपने नाम का संकेत दे दिया।
-हो-गन फूल उठी फूलदे । अव तो उसका मन हवा से
करने लगा। उसने ये पंक्तियाँ कहीं-
"परवे तो केवल बातों के
न दीसे
फोई।
यातों से ही तोड़ो प्यारे
होना हो सो होई ॥"
कुमार ने तुरन्त उत्तर दिया
"बातों से बातें फाटूगा
इसमें परो न संशय ।
फहो समस्या अपनी जल्दी
मुशको है किसका भय ?"
गुमार के पाशुपवित्व को देखकर पोतनपुर का राजा
सेन दंग रह गया। इधर फूलदे ने पोले परदे के रूप में
ली समस्या पीले रंग की पूची----
टपट बोली फूलकुमारी,
"पोत पर्ण का
फते टूटे पोला परदा,
गहले पर यह पहला ॥"
१०६ / किस्मत का खिलाड़ी
धन्य ॥"
सुजान।
गजसिंहकुमार ने तुरन्त उत्तर दिया-
"पीत वर्ण वसुधा का प्यारा,
और सुनो कुछ अन्य ।
कंचन पीला सुरगुरु पोले,
पीत वर्ण है
फूलदे वोली-
"लाल रंग की बातें कह दो,
प्यारे
चतुर
परदा तोड़ो लाल रंग का,
कसे
हो मतिमान ॥"
कुमार ने उत्तर दिया-
"लाल रंग की सुनो कहानी,
प्यारी
फूल-कुमारी
लाल-लाल तव हाय रंगे हैं,
मेंहदी की छवि प्यारी ।
लाल वर्ण अनुराग-राग का,
लाल-अरण
तव गंग।
लाल रंग को उपा सुन्दरी,
लाल ही बाल पतंग ॥"
यों यानी ही बातों में लाल रंग गी परया :
हल भी गनिहकुमार ने कर दिया तो मुलगी
ने नीले रंग के परदे को तोड़ने में लिया
इनका उत्तर भी कामवतियों में प्रकार fram
किस्मत का खिलाड़ी / १०७ .- - "है वायुकाया नीलवर्णी, टूटता यों नील परदा । कल-फल बहती कालिन्दी का नील जल ही बहता सदा ॥" हरे परदे के उत्तर में गजसिंहकुमार ने अनेक रंग गिनाते हए कहा कि हरे पन्ने का हार पहनकर व्याह की तैयारी मारो। फिर प्रसन्न होते हुए फूलदे ने चौथे श्वेत रंग के परदे की समस्या रखी तो गजसिंह ने कहा-- "तेजस्काया शुभ्र श्वेत रंगी, भामिनी प्यारी सुनो। श्वेत-शुभ्र दन्त मुक्ता तुम्हारे हंस ग्रीवा से चुनो। गजदांतों का हार ले, ओ फूलादे नार । उठो पहनकर कंठ में, मैं भी हूं तैयार ॥" इन सब बातों को सुन-सुन कर पोतनपुर के राजा स्प- सेन को बार-बार सन्देह होता था कि हो, न हो, यह गजसिंह ही है। यह बड़े चक्कर में था। कभी सोचता गजसिंह को तो मैं पोतनपुर नगर रक्षा का भार देकर छोड़ पाया हूँ, यह यहां से पा सकता है। यह सब दुविध गनिघुमार ने अपनी पहचान नि. सो मह बिल्कुल बदला ही हुआ था मेहरा यर-मुकुट (मौर) घोर की लड़ियों से ढका हुआ था
१०८ / किस्मत का खिताड़ी
आवाज भी बदल ली थी। वह फूलदे के प्रश्नों का
बदल कर देता था। लेकिन राजा रूपसेन को मन
होता था कि किसी न किसी बहाने गजसिंह गज
याता था । पहली बार तो उसने राजकुमारी को समरे
दिया था कि हाथी और सिंह तो परदे तोड़ा हो परो
वार गजदांतों के हार की बात कह दी । राजा मान के
में पाया कि इस किराये के वर को हटा हो।
न हो कि इसी के कंठ में अभी वरमाला पहा
परिस्थिति की नाजुकता को देखकर गन्मी ने उन
मसक दिया और राजा रुपनिह चुप बैठा रहा ।
इधर गजसिंहकुमार फूलदे के प्रश्नों का
जा रहा था। उसने शेप अन्य रंगों के परदे भी को
राजकन्या की प्रतिमा रुपी युक्ति सफल हो गई। गा"
टूट चुके थे। बाद में काव्यात्मर नोकको भी
एकाएक ही रागकुमारी उठी। हाथ म;
अपने और कुमार के बीच का भीना परदा अगन भर
पोर बड़े वेग मे कुमार के कंठ में पहले तो घरमा
और फिर बारमाला भी डाल दी।
पुगार उलगन में पड़ गया । वह रामार
परः के दाम लिए वचनयन था,
रामाने ती बाहे. याने मंठ टा. पोर
चमी-गलत मा गया-
किस्मत का खिलाड़ी / १०९ "माण्टव-मालय एक है, मादि-अन्त है एक । बाधा है बस बीच की, त्याग न अपनी टेक ॥" यह कहते हुए गजसिंहकुमार एकदम बाहर चला या । फिर उसका कुछ पता नहीं चला। राजा रूपसेन गी पान में जान पाई। वह अपने साथियों को लेकर पुनः उद्यान पहुंचा । उद्यान में ही बरात ठहरी हुई थी। यथास्थान चने के बाद राजा रूपसेन ने अपना मन्त्री धारापुरी के संजा गुरेन्द्र के पास इस संदेश को देने के लिए भेजा कि मरया-समाधान का काम समाप्त हो चुका है। राजकुमारी ' गाथित सातों परदे वर ने तोड़ दिये हैं। अब भांवरों की पारी कीजिए। .. राजा सुरेन्द्र भावरों की तैयारी कराने लगा । इधर पियां फूलदे को दुलहिन के वेश में सजाने लगीं । व्याह के जग बढे लम्बे होते हैं इसी काम में घण्टों लगने थे। शृंगार मारती हुई राजकुमारी फूलदे गनिह गाषित हे को अर्थ-गूढार्थ पर विचार करने लगी। उगमार- रिता ने ठोका ही सोचा कि उक्त दोहे का अभिधात्मक- मेधा सादा शाब्दिक अर्थ तो यही है नि: ' माय' और मालप' मा पहला वर्ण 'मा' प्रौर अन्तिम वर्ण 'च' एक ही धादि अन्त एक हुना। बीच पार ही दोनों को प्रसन बचे हुए हैं। इसका व्यंजनात्मक गूला कर कि माया राजकुमार गजसिह और मालर को रामारो फर है । धारापूरी मानव की ही तो रामानी है
११० / किस्मत का खिलाड़ी
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का राजा रूपसेन आदि बीच में बाधा बने हुए
राजकुमारी को निश्चय हो गया कि जिसने मेरे ।
तोड़ा और जिसके कंठ में मैंने वर माला र
राजकुमार गजसिंह ही हैं।
चतुर राजकुमारी ने संकेत गे वासियों को हटाकर
और केवल चारों अन्तरंग सपियों को ही अपने पार
दिया। फिर उसने सखियों को मनपी या
कहा-
"सखियो! यदि मेरी भांबरें पोगर र
रूपसिंह के साथ पड़ गई तो अनर्थ हो जायगा । निगम
सात भाँवरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, मोगा:
जीवन की अन्तिम सांस तक चलना पड़ता है।
नहीं करूगी तो भांवरों को शाश्या मर्यादा मिटा
फिर मुझे रुपमेन की ही बनना पड़ेगा। मिला: រ៉េ
होता है, जो पहले मन से और फिर वरमाला REE
परका विवाह माण्डवगढ़ के राजकुमार गमिह पर
गया है।"
एन. मी बोली
"तुम्हारी सब बातें ठीक है. पर मगिर"
कहीं पता नहीं है और गाय यही जानते है कि ? '
ने ही तुम्हारे परदे तोड़े हैं नया उन्ही में
वरमाला डाली है। प्रतः तुम भांबरों पर
करोगी?"
किस्मत का खिलाड़ी / १११ राजकुमारी बोली- "यदि इन्कार नहीं करूंगी तो विष खाकर प्राणान्त । कर सकेंगी ? तू ही बता, पर-पुरुप की अंकगायिनी कैसे D, ?" सपी ने कहा- "धर्य के साथ कोई युक्ति निकालो। पीलयती की वजय सदा से होती पाई है।" राजकुमारी वोली- "युक्ति तो निकाली निकलाई है। तू पिता से जाकर ह दे कि मेरा विवाह वरमाला डालने की रीति से ही ग्पन्न माना जाए और बिना भांवरों के ही मुझे पोतनपुर लिये विदा किया जाय । भाँवरे में नहीं डालूंगी।' ऐसा ही हो गया। मालवराज सुरेन्द्र ने कुछ जीभ- र अपनी लाड़ली बेटी की बात मान ली। इनमें कोई हर्ज ने नहीं पा । अतः उन्होंने पोतनपुर के राजा अर्थात् अपने पाकथित जामाता रूपरोन के पास संदेश भिजवाया कि व भायरें नहीं पड़ेगी। वैसे ही मैं यधागमय अपनी बेटी प्रापके साथ विदा कर दंगा । बेटी ने बरमाना डालने को ही विवाह मान लिया है। इस संदेश से राजा र पमेन प्रनाम हो गया । भांवरें पड़े न पड़े। मुरप वान गो फगये पुलहिन के रूप में उसने साप बाना पा, नो पर जाही डीपी। पधानमय बरात विदा हुई। भापतीने पार
११२/ किस्मत का खिलाड़ी
फूलदे डोली से उतरकर रथ में बैठी। जो रस में :
रूपसेन भी था। राजा सुरेन्द्र ने आंसू पौरसार वेदों को
दी। रानी ने भवन में ही बहुत-सी बातें समर
था कि वेटी! तेरे पति राजा रूपसेन के और
हैं । तू अपनी सौतों को भी बड़ी बहन हो मानना।
वरात चल दी। आगे पीछे सेना थी मा
बीच में फूलदे और रूपसेन का रथ था ।
पोतनपुर के बीच एक वन में वरात का पारा!
पुनः वरात चलने को हुई तो फूलदे में राना
कहा-
"मैं अब यहाँ से आगे नहीं जाऊँगी।mire:
पति की मंगल कामना के लिए बारह वर्ष
"बारह वर्ष तक?" आश्चर्य से बोला राम
"मुझ पर ऐगा क्या संकट है, जियो सिमा
वर्ष तक तप करोगी?"
फूलदे बोली-
"पतिन्नता नारियां पति के भविष्य free
हैं । मेरा स्वभाव ही ऐसा है कि जो वा मोटा
उसे करती अवश्य हैं। मेरे पिता ने मेरी कोई कार
नहीं टाली। मापसे काव्याला गाण्यानो
भांवरों का न पड़कर वरमाला से हो विवादमा
उदाहरण है। तो क्या यार मेरी वान को
भले ही वालें, पर मैं तो नहीं टलंगी प्रानी में "
-
किस्मत का खिलाड़ी / ११३
..
राजा पसेन फूलदे के प्रोजस्वी वत्तव्य पार उसके तेज
दव गया। बोला-
"तुम जैसा कहांगी वैसा मारूगा । पर इस जंगल में
तुम अकेली तप कैसे करोगी?"
फूलदे बोली-
"तप तो अकेले ही होता है। फिर भी बारह वर्ष तक
मुझे यहां करा रहना है, इसके लिए भी मैने सोच लिया है।
मेरे पास काफी रत्न हैं । इन रत्नों से मै यहाँ एक सरोवर
बनवाऊँगी। यही अपने लिए एक सुन्दर पुटीर भी बनवा
गी। अपनी सखियों को में साथ लाई हूँ, वे मेरे नाथ रहेंगी।
फिर में अकेली कैसे हो गई ? पति को प्रतिमा मदा मेरे हृदय
में रहेगी।"
गूगं परोन फूलदे गी पतिभक्ति पर मुग्ध हो गया !
यह मूत्रं यह नहीं समझ पाया गि फूलदे गजसिंह की प्रतिमा
को ही अपने हृदय में धारण गरेगी, मेरी नही । उनने तो यही
मगमा कि यह लव प्रपञ्च मेरे मुव के लिए ही गार रही।
सोचने के बाद उसने फूलदे से कहा-
"अब तो मेरा धन तुम्हारा ही है । अतः भरोवर प्रादि
गोपवस्था मैं अपने धन से ही किये देता है।"
फूलदे ने निषेध करते हुए गन्हा-
"नहीं ! मेरा अभिग्रह हो एमा। म अभियान
दाबाद पति ना सब गुछ मेरा है और मान-मन-धन ने पति
को।"
११४ / किस्मत का खिलाड़ी
वस फिर तो फूलदे की ही बात रही। रामा
पर्याप्त मजदूर सरोवर बनवाने के लिए छोड़ ।
वनने लगा । सब सामग्री धारापुरी से फूलवे ने में:
एक वर्ष में पक्का स्फटिक घाटों वाला विशाल सर
हो गया । फूलदे ने मजदूरों, कारीगरों की मनासे'
उन्हें विदा कर दिया। अब वह अपनी सधियों के समान
ही सरोवर के समीप स्थित फुटीर में रहने लगी।
अधिक समय वह नमस्कार मन्त्र का जाप करती और
मूल फल ‘खाकर रहती। उसके मन में गरािष्ट्र भारत
यह दोहा गूंजता रहता-
"माण्डव-मालव एक हैं, आदि-अन्त है एक ।
बाधा है बस बीच की, त्याग न अपनी टेक ॥'
उसके पति-मिलन का विश्वास पनि ।
निर्देश पर टिका था कि "त्याग न अपनी टेनः" ।
टेक पर जमी थी और उसे विश्वास था.
उसका मन-मीत उससे यहीं ग्राफर मिलेगा।
8 राजा रूपसिंह जव दुलहिन विना मूनी-सी बरात लेकर गोगनपुर पहुंचा तो उसे गजसिंहकुमार वैसा ही मिला, जना छोट गया था। उसका रहा-सहा सन्देह भी जाता रहा । उसे निश्चय हो गया कि मेरे पीछे गजसिंह यहीं रहा है। योगी पी जिस युवक से मैंने अपना काम निकलवाया था, वह तो पोई पीर ही होगा। पर वह मुझसे मिले बिना चना काही गया ? अपने कार्य का पुरस्कार लेता जाता । मैंने तो उसके लिए मठ बनवाने की बात भी कही थी। परोपकारी योगी বিনা गुछ लिये ही दूसरों का काम करते हैं । इस तरह नोच- विचार पारवे पोतनपुर नरेण स्पसेन ने अपना मन मान्यता पार लिया । लेकिन दुलहिन साथ नहीं पाई, इमना गलान भगोगो गणसिंह गो फूलदे के अभिग्रह का पता राजा र पगेन मेही चला था । रूपसेन ने सार्वजनिक रप में सभी को बनाया था कि उसकी नववधू उसी पी मंगल-गामना के लिए दोनों राज्यों के बीच वन में तप-साधना कर नही। यान भी हिपाने मी नहीं थी। यह नहीं थी। यह तो मिली भी पति के लिए गोरा की बात है कि उसकी पत्नी उनके लिए लोर हुधा। --
११६ / किस्मत का खिलाड़ी
-
लेकिन रूपसेन का गौरवान्वित होना मान प्रम या प्रय
सिंह द्वारा गौरव का अनुभव करना एक साता !
फूलदे के काव्य पाण्डित्य, धर्मनिष्ठा और पतिमाशा
ही मन सराहना करता था । पर अपनी परिस्ि
होने के कारण वह फूलदे को ला नहीं सकता था।
सोचा करता था-'बारह वर्ष तक तो ऐसे ही भार।
फूलदे को माण्डवगढ़ लेकर जा नहीं सकता और यह
पुर में भी ला नहीं सकता । क्योंकि यहां रायती नाम:
तो वह राजा रूपसेन की ही रानी है। उधर पुराना
राजदुलारी चम्पकमाला भी वन में वट वृक्ष के नीले
रही है और इधर फूलदे सरोवर बनवाचार मामला
है । जाने हम सबने पूर्व भव में ऐसे या पाfri
पति-पत्नी आपस में मिल भी नहीं रामले ? कभी
दुर्दिन के बारह वर्ष बीतेगे और एक जगह होगे सत्र।
ऐसे ही दिन बीत रहे थे और नार या
पति-मिलन की साधना करते हुए फूलदे नार बले में मा
पर ही रहती थी । गजसिंहकुमार के मन में जो कि ?
उठी सो एक दिन घोड़े पर सवार हो र ?
हुच गया, जहाँ फूलदे थी। सरोवर पर परमार
कुमार और घोड़े को पानी पिलाया। पदे :
कर अपनी मची को कुमार के पास भेजा गया है
पहा.
"प्रापको इन मरोबर की मालकिन ।
।
f
--
है
किस्मत का खिलाड़ी/ ११७ "क्यों बुलाती हैं ?" कुमार ने प्रश्न किया । फूलदे की सखी वोली- "प्रापने घोड़े को मालकिन की अनुमति लिए विना नके सरोवर का पानी पिलाया है, इसलिए आपको वहाँ "चलो चलते हैं।" यह कहते हुए गजसिंह फूलदे की ग्री के पोछे-पीछे चल दिया। फूलदे और कुमार-दोनों एग दूसरे पो पहचान लिया । घोड़े से उतरा कुमार और बलदे अपने प्रासन से खड़ी हो गई । अब क्या कहे राज- हमारी ? अन्त में घोड़े के पानी पीने के बहाने से ही उसने गत छेड़ी । उसने कहा- "पापने मेरी अनुमति के बिना ही घोड़े को पानी कैसे पनाया ?" गजसिंह वोला "मुझे क्या पता था पाप पानी का भी मूल्य लेती हैं ? बाप-जोख करके श्राप यह बता दें कि मेरे घोड़े ने आपके रोपर का कितना पानी घटाया है, उतने का ही मूल्य मैं दे गा।" कुमार ने चातुर्य पर फूलदे मन-ही-मन पुलकित हुई । फेर भी बोली- "तो मूल्य देंगे आप ? पानी का तोल तो मैं अवश्य Im दूंगी, पर ग्राप मूल्य नहीं दे पायेंगे । यदि मूल्य देने की हो मागप्पं है तो बतायें एक लड़की को आप बीच मझधार में ।
११८ / किस्मत का खिलाड़ी
छोड़ कर क्यों भाग गए । क्या वही माग
कौन पुरुष होगा, जो अपनी ही विवाहिता लोगो
के लिए छोड़कर भाग जायगा ?"
कहते-कहते रो पड़ो फूलदे । उसमा
गया। आगे कुछ कह नहीं पाई । गजसिंह ने उस
लिया और बोला-
"मैं बड़ा स्वार्थी हूँ प्रिये ! यही हो
चाहिए ? कंचन को कुन्दन बनाने के लिए मैं माय
गया था। मुझे भरोसा भी तो था कि मेरे लिए
की तरह तपोगी और कुन्दन बन जानोगी।
"प्रिये । तुम्हीं बतानो में क्या विवश नहीका
न भागता तो पोतनपुर का रागा मुझे तुम्हारे पा
करने देता ? जाने क्या हो जाता । दूसरे, मैं या
कि तुम्हारी काव्य समस्याओं का समाधान माना
हो जाऊं।"
"यह तो मैं भी जानती है कि जो जिला
उसे हर हालत में मिलता ही है।" रामामा
कहा-"कुछ भी हो, अब में पापको नी गाने
अपने पिता को मय कुछ बताऊँगी । बोई कार
परम प्रमन नहों।"
गजमिह मौन रहा। फिर मान्य
होती रही । मलियो बनान ले प्रा। कुमार
फूलदे ने भी गाये। दोनों की शान म ' !
किस्मत का खिलाड़ी / ११९
।
।
ही बीती।
रात विताने के बाद गजसिंह कुमार नित्य कर्म से
वृत्त हुआ और धर्मनिन्याएं सम्पन्न करने के बाद फूलदे
चोला-
"प्रिये ! अब मैं तुम्हें अपनी योजना समझता हूँ । अब
• का काम तुम्हारी युक्तियों से पूरा हुया और अब आगे का
म हम दोनों मिलकर करेंगे। अभी तुम अपने पिता को
र मत बतायो । अभी मैं सब की नजरों से छिपकर रहूंगा।
"प्रिये ! अव तो मैं सीधा पोतनपुर ही जाऊँगा । पयों
गेरी अनुपस्थिति पोतनपुर के राजा रूपसेन के मन में
देह पैदा करेगी। मुझे नित्य उसकी सभा में उपस्थित बने
ना है।"
इतना सुनने के बाद राजकुमारी वोली-
"प्राप फिर जाने की बात कहने लगे ? अब मैं प्रापको
में जाने दूंगी।"
गजसिंह बोला-
"पहले पूरी बात तो सुन लो । मैं ऐसी योजना बना
हूँ कि हमारा-तुम्हारा मिलना रोज होता रहेगा ।
गपुर में एम. मालिन रहती है। पहली बार जद में
नपुर में आया था तो उस मालिन के नगे उजड़े बाग में
रापा। जाने से रातोंरात उसका बाग हरा-भरा हो
।, पर यह मालिन इसका श्रेय गुभो ही देती हैं और
मागतो भी बहुत है। मैं मालिन के घर में राजा के मदन
१२० / किस्मत का खिलाड़ी
।
--
तक एका गुप्तद्वार बनवाता हूँ। पोतनपुरमा
और शिल्पकार मुझे बहुत मानते हैं । र,
तैयार हो जायगी।"
फूलदे बोली-
"नो क्या मुझे राजा म्पसेन के मन
पड़ेगा?"
"अभी नहीं।" गसिंह बोला--."
अभी तुम यहीं रहो । फिर राजा के भवन में रहती
ही क्या है ? जगजाहिर तो तुम उसी गी गो
उससे कहना कि यारह वर्ष पूरे होने का ?
ही अपना त पालूंगी। फिर मैं निल मा :
बाद शौर्य पराक्रम के साथ ही यह भेद प्रगट होगा।
क्षीण-मी मुस्कान पलदे में प्रोटी पर
बोली-
"जय चार वर्ष प्रापके वियोग में ला कि
महीने भी काट ही दंगी। पर ये महीने हा गर ।
चौतगे।
"मो नो में भी जानता है।" गई
'वियोग-पोदा फेवल नारी को ही नहीं,
ती है । फिर प्रतीक्षा करने में नोनारी
-
2.
।
पलदे ने हंगार माता----
"ह बात नोनयमा?" "
किस्मत का खिलाड़ी / १२१
।
-
-
योग काटने में बहुत छटपटाती है ।"
IF "अच्छा, तो मैं चलू । देर हो रही है।"
यह कहते हुए गजसिंह ने घोड़े को एड़ लगाई । चलते-
देते उसने हाथ उठाया । फूलदे ने आवाज देकर कहा-
| "घोड़े के पानी का मूल्य तो देते जाते ?"
दूर से ही कुमार ने कहा-
"इनाट्ठा ही दूंगा।"
बस वह प्रोझल हो गया। घोड़े की टापों से उड़ती
न को ही फूलदे देखती रही। यथासमय गजसिंह पोतनपुर
दो राजसभा में पहुंच गया। वह नित्य राजसभा आता था ।
"जा की अनुमति लेकर वह अव पुनः मालिन के. घर में ही
है. इने लगा। राजा रूपसेन ने पूछा भी कि यहाँ जो तुमको
ग्य की ओर से भवन मिला है, उसमें क्या परेशानी है
छ । कुमार ने कहा कि मेरा पोतनपुर के जीवन का प्रारम्भ
कालिन के घर में ही हुआ है। अत: मैं अपनी पुरानी औकात
को याद करते हुए उसी के घर रहा करूंगा। इस पर राजा
पमेन गो भी कोई आपत्ति नहीं हुई।
गजसिंह ने पांच महीने में ही मालिन के महल से
राजभवन तक सुरंग तैयार कर ली। जिस बड़े कमरे में सुरंग
का द्वार गुनता था, उसमें नीचे एक भूगृह भी था, अर्थात्
खाना । सब काम ठीक करने के बाद एक दिन रात को
जिगिए, फूलदे के पास पहुंच गया और अपनी सफलता की
।
हाल माने के बाद यहा-
१२२ / किस्मत का खिलाड़ी
।
*
"जैसा मैंने तुम्हें बताया है, वंशा हो सके।
रूपसेन के पास भिजवा देना। और हां, वह तुम्हें
सो चली तो जायोगी ही। इसके बाद जब यह तुम्हें
ले जाये तो तुम कहना कि मैं सभी कमरे देवार प्रा।
एक कमरा निश्चित करूंगी। तुम सुरंगद्वार या
रहने के लिए मांगना।"
इतना कहने के साथ ही कुमार ने सुरंग बाले रमो
कई पहचानें बता दी। इनमें मुख्य पहचान यह पी।
के फर्श पर जहाँ सुरंग-द्वार था, वहां एक स्था,
चिह्न भी बना था। फूलदे को सब तरह से पार
कुमार पुनः पोतनपुर पहुंच गया।
इधर फूलदे ने राजा रूपसेन को पत्र लिया
"नरदेव ! फूलदे की प्रार्थना सुनें । मैंने नगर में
वन में वारह वर्ष तक पति की मंगल-कामना
करने का अभिग्रह किया था। वह अभिग्रह ज्यों या
पर उसमें अब थोड़ा-सा अन्तर हो गया है।
"नरनाथ ! साढ़े चार वर्ष तो वन में वी!
शेष साढ़े सात वर्ष में नगर में प्रापर भवन में ही
ऊँगी। यह फेर-बदल केवल स्थान का ही है। शेरमा
वत् ही रहेगा । अर्थात् भवन कक्षा में भी मैं एलान
ही रहकर धर्माराधन करूंगी और पूर्ण ब्रह्मग
अत: मेरी व्यवस्था करायें।
.
--
।
किस्मत का खिलाड़ी / १२३ पुनश्च- "अपने लिए नरदेव और नरनाथ सम्बोधन को अन्यथा समझना । जिस दिन मेरे व्रत-नियम का सुखद-अभीप्सित रणाम सामने आयेगा, उसी दिन में खुल्लमखुल्ला अपने ते को प्राणनाथ और प्राणेश्वर कहूंगी।" अपने चातुर्यपूर्ण पत्र में फूलदे झूठ भी नहीं बोली और जा रूपसेन को सन्देह भी नहीं होने दिया। यह पत्र पाकर जा रूपसेन वड़ा प्रसन्न हुश्रा। तुरन्त रथादि तैयार कराये र फूलदे को ले आया । जव फूलदे भवन में पहुंची तो पूर्व श्चयानुसार उसने एक-एक करके सव कक्ष देखे । जव फर्श छोटा-सा स्वास्तिक चिह्न जिस कक्ष में दीखा, उसे ही पने लिए चुन लिया। फर्श के ऊपर जो सुरंग द्वार था, पी के ऊपर फूलदे ने अपना पलंग विछवाया । अव वह उसी रहने लगी । धारापुरी से पाई उसकी चारों सखियां वन- ध्य सरोवर पर रहती थीं और यहां भी साथ ही थीं । ये रों बड़ी चतुर और स्वामिनी सखी के लिए प्राणोत्सर्ग रने वाली थीं। भवन और राजा रूपसेन की गतिविधियों ो सव सूचनाएं ये समय-समय पर सखी स्वामिनी फूलदे को ती रहती थीं। धव फूलदे के जीवन की गति ऐसी वन गई, जिसमें वह हत गुम थी। रात को चुपचाप सुरंगद्वार से गजसिंह फूलदे पास धाता था और रात भर उसी के पास रहता । रात- ति भर दोनों चौपड़ सेलते, काव्य चर्चा करते और भिन्न- र प्रसंगों पर बत्तरस का रस लेते । ऐसे ही रातें बीतती;
१२४ / किस्मत का खिलाड़ी
दिन भी वीतते।
एक दिन सवेरे गजसिंह कुछ देर तक सो।
जाने की तैयारी कर ही रहा था कि राजा रूपोन में
दी । गजसिंह हड़बड़ाकर नीचे तलघर में छिप गया पोर:
जाते अपना हार छोड़ गया। जब राजा रूपसेन सापको
सन्देह हुआ। उसने पूछा-
"यह हार किसका है ?
"मेरा ही है।" फूलदे ने बताया ।
राजा रूपसेन ने वह हार तोड़ दिया मोर बोला-
"पुरुषों के हार पुरुप ही बींध सकते हैं । यदि टुन
ही है तो इसे वींधकर दिखाओ।"
फूलदे ने कहा-
"पाप बाहर जाएँ । मैं एकान्त में इस हार ।
का-त्यों कर दूंगी।"
राजा रूपसेन मन-ही-मन कुढ़कर बाहर हो गया।
से पट बन्द करके फूलदे तलघर में पहुंनी । गमिट ने ।
ठीक करके फूलदे को दे दिया । फूलदे हार लेकर
र वह हार राजा रूपसेन को दिखा दिया । पोल
तो हो गया पर मन का सन्देह दूर नहीं हुप्रा । उसने
सोचा--'रोज की चोरी कभी तो युलेगी। पर
रंगे हाथों पकडूंगा। मैं क्या जानता नहीं, यह हार
का है । उसके कंठ में मैं इमे वर्षों से देश रहा है।
वह ममा में पाया कि नहीं।' यह सब सोचते हुए
-
...
किस्मत का खिलाड़ी / १२५ अपने गाक्ष में सभायोग्य कपड़े बदलने गया । इतनी देर में बगिह सुरंग मार्ग से मालिन के घर पहुंचा और फिर राज- पा गया। जब राजा रूपसेन सभा में पाया तो उसे गज- यथा प्रागन पर बैठा मिला । बड़ा आश्चर्य हुअा राजा लेन को । उसके मन में बड़ी खलबली होने लगी। इधर फूलदे ने अपनी एक सखी से कहा "मनी ! एक-न-एक दिन तो यह भेद खुलना ही है । । गुलना है तो मैं अब खोलना चाहती हूँ। अपने ही पति को चोरी-चोरी मिलूं, यह एक विडम्बना ही है । अतः तू पुरुष वेश बनाकर सीधी धारापुरी जा और मेरा पत्र पिता राजा सुरेन्द्र को देना । जवानी भी उन्हें सब कुछ मा । उनसे कहना कि उनके जामाता पर संकट है । सेना सहायता को पावें।" इनके बाद पूलदे ने अपने पिता को एक पत्र लिखा, उसमें - में अन्त तक सब बातें स्पष्ट करके लिख दी। यथासमय हो सग्री धारापुरी पहुंच गई । धारानरेश ने अपनी पुत्री हर पला तो बड़े चकराये । फिर अपनी पुत्री के चातुर्य तरम प्रसप्त भी हुए । पोतनपुर के राजा रूपसेन को धूर्तता - बढ़त मुख भी हुए। तुरन्त सेना सजाई और पोतनपुर लए प्रस्थान कर दिया। घर गाई दिन के प्रयास में राजा रूपसेन को एक दिन र मिल गया । यह बहुत सवेरे उठा और फूलदे के कक्ष- से सटकर पड़ा हो गया। फूलदे के साथ उसने पुरुष
१२६ / किस्मत का खिलाड़ी
--
..
स्वर की हँसी के कहकहे भी सुने । तुरन्त बार नाम:
गजसिंह तुरन्त सुरंगद्वार से मालिन के घर भाग गया।
फर कुछ देर में ही फूलदे ने द्वार खोला। प्रने को
राजा रूपसेन ने पूछा-
"किससे बातें कर रही थी ?"
"अपने प्राणेश्वर से।"
फूलदे ने टका-सा जवाब दिया।
जल-भुन गया राजा रूपसेन । पुनः
बोला-
"सती-सावित्री ! यह बता तेरे कितने पनि
तो मैं हूँ तेरा । तू अपने किस उपपति से बातें गार रही
"राम राम राम !" अपने दोनों कानों पर हार
हुए फूलदे मुस्कराई । बोली-"कैसी पाप की गो
आप ? सती-सावित्री के एक ही पति होता है।
थाम कर सुन लो। पाप-जैसे पुरुष तो मेरे भाई :
प्राणाधार तो एक गजसिंहकुमार ही हैं, जो
राजकुमार हैं । उन्होंने ही मेरी परदा-समस्याम्रो पार
किया। उनके कण्ठ में ही मैंने वरमाला आनी
अपनी वहन-परदारा के प्रति ऐगे भाव रखते
"अब उस गजसिंह को ही देगा।" '
रूपसेन राजा ने क्रोध में पर पटक पोर मात्रा मार
गया। यहाँ उसे गजसिंह बैठा मिला। रामाने
उमसे पाहा-
"गजसिंह ! तुम मेरे नौकर हो । प्रा: प्रा
किस्मत का खिलाड़ी / १२७
जनी नौकरी से हटाता हूँ । मेरी राजसभा, मेरा नगर और
1 राज्य छोड़कर कहीं भी चले जायो।"
* "अवश्य चला जाऊंगा।" गजसिंह ने कहा-"पर मेरा
न तो मुझे दे दो। नरभक्षी असुर से मैंने आपके नगर की
की। चोरों से प्रापके नगर को सुरक्षित किया । जव
प धारापुरी गए थे, तव भी नगर की सुरक्षा व्यवस्था मैंने
। ।ये सब काम क्या रोटी-कपड़े पर होंगे? लोक-परिषद्
न्याय कराम्रो।"
* गजसिंह को टालने के लिए राजा रूपसेन मुंहाँगा धन
गे लिए भी तैयार था । अतः वोला-
* "फिर तुम यह भी कहोगे कि वेतन कम दिया । अतः
घ-समझकर बता दो क्या दे दूं। वेतन लो और अपना
हता पकड़ो।"
। "यस बीस सहस्र मुद्रा ही दे दो।"
। राजा ने तुरन्त वीस सहस्र स्वर्णमुद्रा खजाने से
जसिंह को दिलवा दी। गजसिंह ने सुवर्ण मुद्रानों की पोट
-बी और बांटना शुरू कर दिया। सभी जरूरतमन्दों को
पौर बहुत-पुष मालिन को भी दे दिया । जब वह नगर
कार चला तो लोग रोते थे । बहुत सारे लोग काफी दूर
। उसके पोटे-पीछे गए । राजा रूपसेन को चकमा देने के
सही उसने ऐसा किया था । न्याय-नीति से उसे रूपसेन
नौकरी में मुक्त होकर ही कुछ करना था।
:: कृछ समय याद गजसिंह पुनः लौटकर राजा की सभा
सामोर
१२८ / किस्मत का खिलाड़ी
.
में आया । राजा ने आश्चर्यपूर्ण कोध के साथ पु...
"अब क्यों आये हो?"
गजसिंह ने निर्भीकता से कहा
"राजन् ! अव तो मैं आपका नौकर नहीं है।
हूँ, आपको यह चेतावनी देने आया हूँ कि मेरी पो
भवन में है। उसे सौंप दो । वरना फिर सुद गे कि
हो जायो । सिंह की पत्नी गीदड़ नहीं हो सकती।"
रूपसेन ने क्रोध में ही कहा---
"टीका मेरे लिए चढ़ा था । विवाह मेरे गाव पर
हुआ था । तुम कौन होते हो, फूलदे को मपनी याने
तुम से मैं क्या युद्ध करूगा ? तुम्हें तो मेरे यार
ठिकाने लगा देंगे।"
यह कह राजा रूपसेन ने अपने सगल मंदिर
मादेश दिया-
"देखते क्या हो ? पकड़ लो इसे।"
गजसिंह ने भी खड्ग खींच लिया। गिनी में
का इतना साहस नहीं हुआ कि पाड़ा भी हो जामा
गजसिंह के शौर्य का भय था और कुछ उससे मार
सैनिकों ने राजा रूपसन के आदेश की प्रज्ञा कर दी।
देखिये, तभी एक गूचक ने हांपते हुए गूगना दी--
"पृथ्वीनाथ ! धारानरेश चतुरंगिणी गंगा का
पुर पर चढ़ाई करने पा रहे हैं।"
राजा पसेन के हाथ-पांव फूल गए । मा
किस्मत का खिलाड़ी / १२९
-
नं
बोगका मुख पीला पड़ गया। फिर तो धारानरेश का दूत भी
T गया। उसने स्पष्ट रूप से फारण वतागर युद्ध को चुनौती
दी। अब तो पासा पूरी तरह पलट गया । सचिवों को
कर रूपसेन धारानरेश का स्वागत करने गया। उन्होंने
गनपुर के राजा रूपसेन को बहुत फटकारा ।
अन्त में वही हुआ, जो होना था । रूपसेन ने गनिह.
शूनदे और राजा सुरेन्द्र, सबसे क्षमा मांगी। राजा सुरेन्द्र
श्री पार जामाता को साथ ले गए । एक बार फिर धारापुरी
वधू-मी राजी। गजगिह पोर फूलदे के विवाह का उत्सव
न: मनाया गया। दोनों अभी तमा ब्रह्मचर्य व्रत का पालन
र रहे थे । अब सात भांवरें भी पड़ी।
राजा सुरेन्द्र ने अपने जामाता को पन्द्रह गाँव दल में
दय । प्रब गजसिंह राज जामाता के साथ पन्द्रह गांवों मा
सिका भी धा । अलग भवन, दाग-दासी, रोना यादि मे गाय
'ह गुग ने अपना दाम्पत्यजीवन बिता रहा था। सब माम
अलावर गारते हुए उगका अश्वारोहण का पुराना मोम प्रय
ती ज्यों-का-त्यों बना पा । नाम-मयेरे निल और से जन
ती मग होता यह पोड़ा दौड़ाते हुए बहुत दूर-दूर तक पुमने
मान जाता । ऐने हो उगले दिन बीतते थे।
--
"
9
एक दिन घूमते-घूमते गजसिंहकुमार धारापुरी में
दूर निकल गया। गंगा किनारे के एक मन में प्रकार
को लाली ने उसे पागे बढ़ने से रोक दिया, नहीं हो
आगे भी जाता । पुण्य सलिला गंगा की महिमा हो ।
है । घोड़े को पेड़ से बांधकर कुमार गजसिंह भानीरो
धवल सौन्दर्य को देखने लगा । एकाएक उनकी दरिया
में बैठे ध्यानावस्थित मुनि पर टिकी । धीर-पग में ना
त्सर्ग में लीन मुनि के निकट पहुंचा और भाग्यन्दना कर
वैठ गया । मुनि का ध्यान पूरा होने की प्रतीक्षा करने पर
मन ही मन उसने अपने भाग्य को सराहा---'प्रारमा
कितना पुण्यमय है कि मुझे वीतरागो मुनि दर्शन हु।
सभी जन धन्य हैं। जिन्हें सन्तदर्शन होते हैं । पात में
हमारी ही तरह मानव हैं, पर कितना अन्तर है हम
रियों में और संसार-त्यागी सन्तों में ! में बन में :
संसार त्यागी नहीं हूँ और ये श्रमण गंगार :
संमार त्यागी हैं । बहुत लोग गूछते हैं. और पर।
संसार में रहकर ये संसार त्यागी को माने जा
वही लोग करते हैं जो नंसार का अर्थ नहीं जा ! "
है क्या ? जहां कोई अपना न हो, यहाँ त
.
-
शिरमत पा विलादी/१२१
।
-
न हो, यही संसार है । अतः जो गंगार के गाठे अपगन्य में
फगे हैं, वे वन में रहकर भी नंसारी है। यह दृश्य-जगन
गंगार नहीं है, बल्लिा माता-पिता, भाई, पुष, परनी अपना
गरीर, धन, भवन, कुटुम्ब और मित्रादि यही दम चीजें
गंसार हैं। इनका कटा अपनत्व त्याग देना संसार में पहले
हुए भी गंमार त्याग देना है।'
गजसिंह अभी जाने क्या-नया मोचता कि उसका ध्यान
• तोते की टें-टे ने भंग कर दिया। लाल चोंच, हरे पंच प्रोर
ले में प्रकृति द्वारा पहनाई गई नीली बंटी । बसा भागा नग
हा था यह तोता । पहले यह डाल पर ऊपर बैठा था और
विटें करते हुए नीचे उतर प्राया । यह शुकः बार-बार
नि के चरणों में लोटने लगा । ऐना जगता या मह मिनी
प्ट से घटपटा रहा है। थोड़ी ही देर बाद मुनि का ध्यान
रा हो गया । फिर कुमार ने मुनि की विधिवत् वंदना की।
दनगर कुमार ने पूछा-
"महामुने ! यह शुग बहुत परेशान बीचमा । नारा
प्ट होगा इसे ?"
मुनि बोले-
"अब तो दलकप्टी के प्रा का समय मा नया ।
का पर्श करो। अभी सय वागमनमा जानी।"
यादेश का रहस्य न समझते हुए भी, मुनि का मादेशः
पर नाले की भावना से चुमार ने तोते का पानी
देखते-देखते एक सुन्दर मानव बन गया । दमा भार
देशना का अमृत तो पिलाते जाइए प्रमो! गंगार 77
१३२ / किस्मत का खिलाड़ी
हुमा गजसिंहकुमार को, उसके कुछ पूछने से पह
बोले-
"यह विद्याधर मकरध्वज है । एन."
ने इसे विद्यावल से शुग बना दिया था। तुम्हारे सा
निज रूप पाना था, सो पा लिया।"
"वत्स! इस समय इतना ही जान लोक
यह स्वयं ही तुम्हें बतायेगा । आज को रात को
साथ इस वन में ही पाटनी है । मैं भी एक उतरदा
निवृत्त हुा । अब तुम दोनों बातें करो में..."
"ऐसे कैसे ?" कुमार बीच में ही पो.
अापके वचनों में है।"
गजसिंहकुमार की प्रार्यगा पर मुनि ने कुमार
तत्त्व समझाया। उन्होंने कहा-
"वत्स ! देखने में सभी मनुष्य एक
कोई किसी प्रबलतरको यों ही मार देता । तुमने
नो मारा था न? यह विद्याधर तुम्हारे हाल के एक में है."
गुक काया से मुरा हुमा ? ऐसी बहानी बा ।
कारण है पुण्य-प्रभाव । मनुष्य चाहे तो तुम
बता सकता है कि मयको मृट्टी में करने
एका कर्म ही है-अञ्छा काम और "
संचय में लोग चाय पद का नाम:
लिए उन्हें संमार में पाना ही पड़ेगा IIT :
।
पिस्मन या पिकाती/ १३३
गयोनों के बंध रूप दुःय और सुखो को भोगने ः लिए
जन्म-मरण है, अर्थात् गंगार का प्राधानमन । किन पुण्य
मागे--सबसे प्रागे हाई प्रभर का एम. सम्म धर्म ही है।
मनुष्य जन्म पुण्यार्जन के लिए नहीं, धर्माराधन कारः मोक्ष
पाने के लिए है। धर्म ही सार है। धर्म का मुन यावर
पोर पुण्य ने सभी गुन्न सण्डित । गिन्तु पुण्य में धर्म
निगाट है।"
मुनिदेव ने बड़ी लम्बी देशना दी। गनिह पहले नही
प्रणवतों का पालन करता था । अब उगी धाग्यापार भी
अलर हो गई। मुनि अन्यत्र ध्यान मारने चले गए। पर
गमसिंह गुगार और विद्याधर मगरध्वज में बातें होने लगी।
विद्याधर ने अपनी पापबीती कुमार को गुनाई। उसने कहा
nि मैं वैतादग पर्वत पर स्थित गण्ठपुर नगर में रहने वाला
विद्याधर राजा मकरध्वज हैं। मेनी मानी : निमुन्दरी ।
गया गाहूँ तुमसे, उसने सप भी अपने नाम के अनुरूप पारा ।
विद्याधर ने याने महा नि: शुमार ह. मुसा भी
घड़ी दुरी चीज है । लोग चाहते . नि: मेरी पत्नी सुपर
हो-यात सुन्दर हो शोर सुन्दरता भी हो। पर या !
ऐनी बात सुन्दर पत्नी भी दिन का सामना
लोग मूच्छिा होकर गिर पड़े ! जागिर न नमा
भीतर भी तो दो गिनीनी अमुकरता रिपती
गरी और कुरुपा स्त्री-पोनों के भीतर ही नामा
स.-मांग, प्रकार जाने
वाला
-
.
१३४ / किस्मत का खिलाड़ी
में अंधेरा करने वाले घने वाल भी तो एक दिन धारको
तरह जल जाते हैं । तव उनमें दुर्गन्ध भी कैसी बुरी प्राय
है।
कुमार ! अपनी आपबीती तो मैं सुनाऊंगा ही । *
एक प्रसंग सुना दूं। वातों ही बातों में एक दृष्टान्त याद छ
गया, सो सुन ही लो। एक राजा की राजकुमारी बड़ी मुखर
थी। ऐसी ही सुन्दर कि देखने वाले पागल बनें । रागा के
मन्त्री के पुत्र ने प्रतिज्ञा कर ली कि मैं या तो राजकुमारी में
व्याह करूंगा या फिर मर जाऊँगा । उस मनचले ने अपना
सन्देश गुप्त रूप से राजकन्या के पास पहुंचा दिया । रान.
कुमारी बड़ी चतुर थी। मेरे कारण एक युवक मारा जार
यह तो अनर्थ होगा । यह युवक वासना का कीड़ा, मूगं और
कामी है। मेरे तन पर मरता है। यदि मैं इससे व्याह कर
भी लूं तो यह किसी और पर भी ऐसे ही मरेगा। एम
मुझसे इसका मन भर जायगा और जब मुझसे सुन्दर
और को देखेगा तो ऐसी ही प्रतिज्ञा करेगा । अतः इसे गा
लाना चाहिए । राजकन्या ने मंत्रिपुत्र को सत्पथ पर लाने
की युक्ति सोचली । उसने मंत्रिपुत्र के पास सन्देश भिजवाय
फि आठवें दिन तुम मेरे निजी भवन में आना ।
विवाह करूंगी। मेरी दासी तुम्हें लिवाने आयेगी।
इसके बाद राजकुमारी ने रेचक प्रौपध खा ली।
दस्त होने लगे । मिट्टी के पात्र में वह मल त्याग करती और
उसे सुन्दर रेशमी वस्त्रखण्ड से ढकवा देती। आठ दिन
फिल्मत का गिलादी १३५ वीगियों पात्रों में उसने मल त्याग किया और वस्त्र से ढकवा दिया । पाठ दिन में उसकी दशा बढी बुरी हो गई । मूग्न कर वाटा हो गई। अांखें गढे में बैठ गई और दांत बाहर निकाल पाये । अब वह कुरूप-सी हो गई। ऐमी निमोई उसे पहचान न सके । पाठवें दिन राजकुमारी ने अपनी दानी को मंनिपुन ये: पास भेजा । मंत्रिपुत्र दासी के साथ प्राया। भवन में प्राकार पूजा-पाहां है मेरे सपनों की रानी ? दानी ने शय्या पर लेटी राजकुमारी की ओर इशारा कर दिया । मंत्रिपुत्र ने पास जाकर राजकुमारी को देखा तो बोला- "यह तो राजकुमारी नहीं है । मैंने क्या उन्हें देगा नहीं है ? यह तो हड्डियों का ढांचा जाने कौन है ?" राजकन्या ने मुस्करा कर कहा- "मैं ही राजकुमारी है। गया मुभने व्याह नहीं पारोगे?" "तुम हो राजकुमारी ?" मंत्रिपुर ने युद्ध गौर से देय- पर गहा-"तो तुम ही हो । पहनान लिया मैने । बापांना गातिल तिल तो वैसा ही है, पर तुम्हारी सुन्दरला तो क्या मा ? तुम्हारा मंचन-सा सिन्दुरी रंग नहीं उर गया ? प्राय से बैठ गई ? गानों में गड्ढे और दांत भी बाहर AM- भाये है।" राजकुमारी ने एमः पोर सारा मारक कहा--- "यह देग्रो । इन दने पात्रों में मेरी गुमला मरी है। ।
१३६ / किस्मत का खिलाड़ी
-
मुझे चाहो तो मैं यहाँ हूँ ही और मेरी सुन्दरता चाहो तो
मिट्टी के पात्रों में जाकर देख लो।
"दासी ! जा इन्हें मेरी सुन्दरता दिखा दे ।"
दासी ने रेशम का कपड़ा उठाया तो दुर्गन्धपूर्ण मा.
को देखते ही भागा मंत्रिपुत्र। सब कुछ समझ में प्रा गा
उसकी । अव तो वह राजकुमारी के चरणों में गिर पड़ा।
बस, इसी बात से उसे वैराग्य हो गया।
कुमार ! मेरी अपनी कहानी पीछे रह गई । अब मैं
अपनी मूल बात पर पाता हूँ । मैं पहले ही कह चुका हूं
मेरी रानी रतिसुन्दरी अपनी नाम के अनुरूप अनुपम सुन्दरी
है । एक दिन मैं उसके साथ वन में भ्रमण को प्राया। हम
दोनों एक द्रुमतल पर बैठे वातें कर रहे थे। मेरा सिर उमटी
कदली स्तम्भ-सी चिकनी जंघा पर रखा था। किसी अन्य
विद्याधर ने मेरी रानी के सौन्दर्य को देखा तो मर गिटा!
नीति-मर्यादा भूलकर वह आकाश से नीचे उतर आया और
मेरी अंकशायिनी का हाथ पकड़ लिया । बस, मैं प्राप
. हर हो गया । मैं तो भिड़ गया उस दुष्ट विद्याधर में।
उसके ऊपर चढ़ बैठा । ज्यों ही खड्ग से मारने को हुआ कि
मेरी ही पत्नी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली-
"छोड़ दो इसे।"
मैंने कहा-
"तो तुम इसे छुड़वाती हो ?'
मेरी पत्नी ने मुझे समझाया---
-
किस्मत का खिलाड़ी/१३७
"स्वामी ! यह मत भूलो कि दया धर्म का मूल है।
अपने शत्रुनों पर भी दया करनी चाहिए । इने मारकर व्यर्थ
ही प्राप दुस्सह कर्म का बन्ध करेंगे । अपने मिय का दण्ड श
नायर ने पा लिया । अव छोट भी दो इने।"
पत्नी की बात मानकर मैने उसे छोड़ दिया और पत्नी
को लेकर अपने नगर खण्डपुर गया। कुछ दिन बीते कि एक
दिन मैं अपनी पत्नी के साथ राजभवन की वाटिका में बैठा
पा । उस दुष्ट विद्याधर ने चुपके में मेरे ऊपर अभिमंत्रित जन्न
हिद दिया और मैं तोता बन गया । वा, मैं उड़बार यहाँ प्रा
गया । मुनि के श्राश्रय में मुझे संतोष हुअा । अन्तर्यामी मुनि
मेरा रहस्य जान गए और मुझे सान्त्वना दी नि एम दिन को
पुण्यात्मा जीव यहाँ पायेगा, तब तुम उसके स्पर्म ने अपना
गए पानोगे।
मुमार ! यही है मेरी राममाहानी। प्रब जाने मेरी
रानी नहीं होगी ? बस रातभर की ही तो बात है। ललो
सुगरें लेकर मैं अपने नगर में जाऊँगा ही प्रोर नभी जागा
गिरी प्राणप्रिया पर क्या-क्या बीती होगी।"
दूसरे दिन गजसिंहकुमार विद्याधर मगरयाज के नाम
सो नगर राण्टपुर गया। पति-पत्नी दहे प्रेम ने मिले।
राजभवन में बड़ी बुणितां मनाई गई। मदने नाथ टगार
पास । साज गी रसोई विद्याधरी रति-सुन्दरी ने ही अपने ही
एषों में बनाई थी। गनारायण चौर गा.मि. ने नाम द्वार
१३८ / किस्मत का खिलाड़ी
खाया और रतिसुन्दरी ने दोनों को परोसकर खिलाया।
X
X
अव यह भी स्पष्ट कर दें कि क्या विद्याधरी रतिसुन्दर
पर-पुरुषगामिनी थी? अपने पति मकरध्वज के अतिरिक्त व
पहले से ही किसी अन्य विद्याधर पर अनुरक्त थी । अपने प्रेम
द्वारा वह अपने पति को मरवाना चाहती थी। उसी के संके
पर उसका उपपति मकरध्वज विद्याधर को मारने आया था
लेकिन उपपति निर्वल निकला, सो मकरध्वज ने उसे नी
गिरा लिया। जव मकरध्वज उस दुष्ट विद्याधर को मार
लगा तो रतिसुन्दरी घबराई और उसने धर्म की दुहाई देश
अपने प्रेमी को छुड़वा दिया। उसने कहा था कि दया धर्म ५
मूल है । अपने शत्रुओं पर भी दया करनी चाहिए । इसे मार
कर आप व्यर्थ ही दुस्सह कर्म का बंध करेंगे। अपने नियर
दण्ड तो इस कायर ने पा लिया। अव छोड़ ही दो से
रतिसुन्दरी ने कायर शब्द कहकर अपने उपपति को धिकाा
था कि तू इस मौके से लाभ न उठा सका । मगरध्वज वेगा
क्या जानता था कि धर्म की आड़ लेने वाली उसकी पर
ऐसी है। यदि वह उस दिन उसकी बातों में न पाता तो उ
कीरकाया में न आना पड़ता।
रतिसुन्दरी के पर-पुरुप भोग की कलई तो त्या
जव उसने गजसिंह पर डोरे डाले । जिस समय वह अपने प
के साथ बैठे गजसिंहकुमार को भोजन परोस रही थी, तभ
वह उस पर अनुरक्त हो गई थी। जैसे-तैसे उसने दिनमा
किस्मत का खिलाड़ी / १३९ -- --- -- - -.. दिवाये के लिए रात को वह पति के शयनकक्ष में सोई थी। पर जब उसका पति मो गया तो चुपके से उठी और गनिह हे शयनकक्ष में पहुंच गई। पैर का अंगूठा पगड़कर जगाया उरो । हड़बड़ाकर उठा गजसिंह । मामने पट्टी रनिमुन्दरी मां देया तो श्राश्चर्य से बोला- "पाप ? श्राप यहाँ कैसे ?" "प्राप-ग्राप क्यों पाहते हो प्यारे?" रतिसुन्दरी ने काम- विह्वल होकर कहा-"प्रानो और मुझे भोग का अमृन दो।" गय कुछ समझ गया कुमार । बोला- "भोग तो विष है सुन्दरी !" "तो तुम मेरी याचना को टुयाराग्रोगे ?" बोली रनि- गुन्दरी-"योसे नर हो ? तुम्हें देखकर तो बड़ी भी जवान हो ‘जाती है।" गजसिंह ने स्पष्ट कहा- "यहाँ तुम्हारी दान नहीं गलेगी। में रचदारा-मंतोषी । जिस काम के लिए तुम मेरे पास प्राई हो, वह काम नंमार में गुनिया किया करती हैं । नारीवेण में तुम कूमारी हो सकती हो, पर मैं मर ही हूँ। अपनी नारी के लिए नर और मेष नयके लिए भाई, पुष या पिता।" रतिमुन्दरी गो ऐसे अपमान की प्रामा नहीं थी। भीतर ही भीतर बहुत युद्ध हुई। पर वह अक्सर ग्रोध न मार गारने का नहीं था। रतिसुन्दरी ने नोचा नि. पदि दान मगर मै हल्ला गारूगी तो मेरी ही देज्जती होगी। क्योंधि --
.
१४० / किस्मत का खिलाड़ी
-
-
मैं ही इसके कक्ष में आई हूँ। मेरा पति पूछेगा कि यदि दू
सती है तो तू इसके कक्ष में क्यों आई, तव में क्या गाहगी ?
अतः अपने मन का क्रोध-प्रतिशोधभाव छिपाकर रतिसुन्दर
बोली-
"युग-युग जीनो । मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रही थी।
धन्य हो तुम।"
यह कह रतिसुन्दरी अपने पति के शयनकक्ष में गई
और चुपचाप लेट गई । नींद नहीं आई उसे । उसने सोचा--
'पति के रहते तो मैं उसकी आँखों में धूल भोगकर अपने
प्रेमी के साथ रमण कर सकती हूँ, पर इसके रहते असम्भव
ही है। मेरे प्रेमी ने मेरे पति को तोता बना दिया था। इस
ने उसे पुनः निजरूप दिया और यहां ले पाया। अब पहले
इसी को मिटाऊँगी और फिर वाद में अपने पति को भी।
तभी मेरी चैन की छनेगी।'
ऐसा सोचते विचारते ही उसने रात काटी। कुछ दिन
यों ही बीते । गजसिंह भी इस घटना को पी गया । रति-
सुन्दरी ने अपने प्रेमी विद्याधर को सब बातें बता दी । ने
अाश्वासन दिया-
"चिन्ता मत करो। इसी गजसिंह के स्पर्श से मकरध्या
तोते से पुनः मनुष्य बन गया था तो मैं पहले उसे ही मन्द
कर दूंगा। बाद में पुन: उसे तोता बना देगा। फिर
उसका स्पर्श करेगा ?"
अवसर देखकर एक दिन रतिसुन्दरी के प्रेमी विद्यार
-
फिस्मत का खिलासी/१४१ को में गजसिंह के गाक्ष के चारों ओर प्राग लगा दी। बचाने वाले हाथ हजार होते हैं और बहुत लम्बे होते हैं । गजसिंह मो प्रांग ऐन वक्त पर खुल गई। वह वीर गय्या पर से उठकर भवन की छत पर चढ़ गया। छत से छतों पर होता हया प्राग के घेरे से बाहर हो गया । उपपति विद्याधर उसके पीछे- पछि भागा । गजसिंह ने तक-तान कर वाण मारा और एन. ही वाण में दुष्ट विद्याधर का प्राणान्त कर दिया । फिर तो आग का हल्ला मच गया। विद्याधर मकर- ध्वज भी जाग गया था । नगरवासियों के प्रयास से भाग पर काबू पा लिया गया। बहुत कुछ जल गया और बहुत कुछ बन गया । गजसिंहकुमार मकरध्वज का हाथ पकड़कर रति- सुन्दरी के उपपति विद्याधर के शव के पास ले गया और सव उसे बता-समझा दिया। मकरध्वज तो इतना क्रुद्ध हुमा तुरन्त ही अपनी पत्नी की नाग. काटकर घर-नगर दोनों जगह से बाहर निकाल दिया । व्यभिचारिणियों के लिए यह दण्ड कुछ अधिक नहीं। यह तो लोक का दण्ड है। इसमें गन्देर न करें कि ऐसी स्त्रियों को पानवां, छठा या गोई न गोई नरणः निश्चय मिलता है। कौन-सा नरम मिलता गमें दो मत हो सकते हैं, पर नरक मिलता है, इसमें दो मत नहीं, भले ही सूर्य पश्चिम में उदित हो जाए। लोक-परलोक दोनों को या किसी एक को बिगाड़ने वाले गाम हो पाप है। युध पापों को अपराध नाह दिया जाता है, पर परलोगः रेनिए उनमा बंध भी होता ही है । मा कि यो
१४२ / किस्मत का खिलाड़ी
इस काण्ड के बाद गजसिंह विद्याधरों में पुजने लगा।
खंडपुर के सभी लोग उसे चाहने लगे । अब कुछ दिन के लिए
तो वह धारापुरी और फूलदे को भुला बैठा । उसने सोना--
पुरपइठान की राजदुलारी चम्पकमाला वन में तप कर रहा
है । फूलदे उससे तो बहुत अच्छी है। क्योंकि वह अपने पिता
की देख-रेख में है । अतः मैं तो अब कुछ अन्य देश देशकार हो
लौटूंगा । भाग्यपरीक्षा के लिए बारह वर्ष के लिए निकला
था। तो क्या एक जगह रहकर भाग्यपरीक्षा होगी ? पोतात.
पुर में भाग्यपरीक्षा हुई और फिर हुई धारापुरी में। गी:
माण्डवगढ़ ही बैठा रहता तो फूलदे कैसे मिलती और यति
धारापुरी ही रहता तो मकरध्वज जैसे विद्याधर से मिला
कैसे जुड़ती । ? सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि दुर्लभ सन्न वे
दर्शन हुए और उसकी देशना सुनने को मिली।
बहुत कुछ सोचने के बाद गजसिंह ने यही निश्चय
कि अब जल्दी धारापुरी लौटकर नहीं जाऊँगा। कुछ दिन
यहाँ खंडपुर में रहूँगा और यहां से आगे जाकर अन्य देश,
नगर, वन-पर्वत देखूगा।
गजसिंह के दिन खंडपुर में बड़े प्रानन्द से बीत रहे थे।
क्योंकि विद्याधर राजा मकरध्वज उसका बहुत आभारी था।
संसार में जिसके पुण्य प्रवल हों, उसके सभी अनुकूल रहने ।
और पद-पद पर उसके लिए सुख-ही-सुख हैं। फिर गर्ग:
का तो स्वभाव भी ऐसा था कि नगरवासी उमः बिना देर
के दास थे।
10 बन - विराट नगर वत्मदेश की राजधानी था। जैसा कि कर उसका नाम था, विराट नगर बहुत विशाल और विराट था। यदे-बट्टे धनकुबेर, इस नगर में रहते थे । गभी के भवन भव्य और ऊंचे-ऊँचे थे, जिनके सुनहरी कंगूरे दूर से ही चमकते थे। इन नगर के पास-पास के गांव भी प्राकृतिक शोभा से मी गम्पन्न थे, जिनको नगर का भीड़भाड़ भरा कोलाहल पूर्ण जीवन पसन्द नहीं था, ऐसे बहुत-से श्रेष्ठी र्गावों में हवेली ना बनाकर रहते थे। रत्नशाह नाम का एक धनी-मानी श्रेष्ठी विराटनगर के निकट गांव में रहता था। उसके कई भवन * नगर में भी थे । लम्बा,चांडा व्यापार था उसका । गांव में उसके रोत भी धे। कृषि, पशुपालन, किराना, रत्नादि का विक्रय यादि कई चीजों का उसका व्यापार था । श्रेष्ठी रत्नशाह एगः विदुषी मान्या श्री रत्नदे । एकमात्र वही उसफे एका मलान धी। श्रेष्ठिपुरो रत्नदे पारकला प्रवीण और संगीत- य, नग्न, चित्रकारी, पुतविद्या प्रादि ग्रनेगा काला-विधायों में निपुण पी। वह सुन्दर भी बहुत भी। विराटनगर में चन्द्र नाम ना राजा बाप भागा था। रानीपो नन्द्रावती । इन राजदम्पती पती पुत्री थी नुपडदे । यह मो अनुपम सुन्दरी और विद्यापारंगता थी। राजा के मन्त्री म
१४४ / किस्मत का खिलाड़ी
मतिसार की पुत्री देवलदे राजपुत्री सुघड़दे की बराबर
उम्र वाली और विद्याकलाओं में भी बराबर थी। दोनों सविता
थीं, संग-संग पढ़ी थीं और संग-साथ सेली भी थीं।
जब दोनों विवाहयोग्य हो गई तो भी साथ-साथ ही उठगी-
बैठती थीं। इन दोनों का वहनापा श्रेष्ठिकन्या रत्नदे से भी
था । यो तो राजकन्या सुघड़दे मन्त्रिकन्या देवलदे और डी-
कन्या रत्नदे-तीनों ही सखियां थीं, पर रत्नदे राव इनो .
प्रायः कम ही रह पाती थी, क्योंकि उसके पिता श्रेष्ठी रन
शाह अव प्रायः गांव में रहते थे। फिर भी रत्नदे जम म:
होता, रथ में बैठफर चाहे जव अपनी सखियों के पास पर
जाती और फिर तीनों में जमकर गप-शप होती । विवाहयोग
कुमारी कन्याओं में प्रायः व्याह को बातें ही होती है । कोई
अपनी विवाहित सखियों की चर्चा करती हैं और पानी का
कल्पित पति के बातों के चित्र बनाया करती हैं। यही बार में
तीनों भी करती थीं।
एक दिन सवेरे-सवेरे ही रत्नदे राजभवन पहुंची। रानी
से
"रानी मां ! सखी सुघड़दे गहाँ गई ? मैं तो इसी
जल्दी पाई थी कि भवन पर ही मिलेगी, पर सोरे-गदेरे र
कहाँ ?"
-
महारानी चन्द्रावती बोली-
"पाठ-दस दिन से वह सवेरे ही कामदेव में गन्दिरमा
जाती है। मन्त्रिकन्या देवलदे भी उसके साथ आती है।
किस्मत का खिलाड़ी / १४५ । - । - । भर पीछे प्रा जायगी । तुम उसके पक्ष में घंटो । मै दानी से गई देती हूँ, यह गुपड़दे का कक्ष खोल देगी।" रत्नदे बोली- "मैं अकोली बैटगार पया करोगी? मैं भी उसे मन्दिर में ही जाकर मिन्न लूंगी। पर माँ, यह तो वतायो कि काम- देव पूजन की उसे क्या जरूरत पड़ गई ? उसका व्याह तो : रत्नगद ये राजा रत्नचन्द्र से पवना हो ही गया है । छह महीने : पीछे तो घरात भी प्रायेगी।" रानी चन्द्रावती बोली- "तुम छोकरियों के मन की मैं क्या गार्ने ? नू उनी में पूना । वैसे कामदेव तो कामनायों को पूर्ण करने वाला देव ६. । पति के अलावा उसकी कोई और इच्छा होगी, जिनके लिए वह उसका नित्य पूजन करती है ।" रत्नदे बोली- "रानी मां ! इतना तो सभी जानते है कि अभिलापिन पति की सामना के लिए ही कामदेव का पूजन किया जाना है । पर होगी कोई बात । मैं भी अब मन्दिर जाती हूँ। रानी ने प्रेप्टियन्या रलदे को रोगत हा महा- "रल ! तू मन्दिर जायेगी और वह घर मायेगी। धं कर पड़ेगा । क्या पता वह गित मार्ग में प्रापै । अगर भाना ही है तो तु मन्त्री मतिसार के भवन चली जा। नंभव है राजयुमारी लीटगार गुछ देर मन्मिभवन पर देवलदे यो काम साप पारे, यहाँ तुझे यह अवश्य मिल जायेगी।" - ह
१४६ / किस्मत का खिलाड़ी
"अच्छा तो मैं चली।" कहकर उछलते-कूदते रलो
वाहर भाग गई । उसका रथ खड़ा ही था। उसमें बैठकर मंत्री
मतिसार के भवन पहुंची तो राजकुमारी सुघड़दे और मन्त्रि-
सुता देवलदे दोनों मिल गई। दोनों को एक साथ देख रलदे
ने उपालंभ-सा देते हुए कहा-
"तो आप दोनों यहाँ बैठी हैं और हम राजभवन पर
प्रतीक्षा कर रहे थे।"
देवलदे बोली-
"आ सखी, तेरी ही कमी थी। तू तो गांव में गया तो
लगी, तेरे दर्शन तो दूज का चन्दा हो गए।"
"प्राकर क्या करूं ? तुम दोनों के मिलने काम
ठिकाना हो, तब तो मैं रोज ही आऊँ ।" आसन ग्रहण कार
हुए रत्नदे ने कहा-"सखी सुघड़दे ! कामदेव पूजन की य
नई बीमारी क्यों पाल ली?"
उत्तर दिया मन्त्रिकन्या देवलदे ने । वह बोली-
"सखी रत्नदे ! मैं तुझे सब कुछ बताती हूँ। यह
जानती ही है कि कामदेव की आराधना क्यों की जाती
मनभाये पति की कामनापूर्ति के लिए ही कामदेव की पूः
होती है । हमारी सखी राजकुमारी सुपड़दे ने निश्चय दिया
कि वह दामवती के लाड़ले माण्डवगढ़ के राजकुमार गर्ग
के साथ ही व्याह करेंगी। छह महीने के पूजानुष्ठान मे मा
देव अवश्य इच्छा पूरी करते हैं।"
रत्नदे बोली-“लेकिन यह तो बड़ी अजीब-सी दया
सो
किस्मत फा खिलाड़ी / १४७
राजकुमारी का व्याह रत्नगढ़ के राजा रत्नचन्द्र से पक्का हो
धशा है। छह महीने पीछे ही राजगढ़ के राजा बरात लेकर
आयेंगे । इधर गजसिंहकुमार का कोई ठिकाना नहीं कि ये
रहा है। ऐसी दशा में बात कैसे बनेगी ?
"सखी देवलदे ! हम कान्याएँ तो विवश होती हैं। मां-
पि जहाँ व्याह गार देते हैं वहीं जाना पड़ता है । मुझे तो एक
गगीत की ये पंक्तियां याद पाती हैं, जिसमें एक कन्या अपने
पंडा से कहती है-
"हम तो बाबुल तेरे खूटे को
गइया,
जहाँ चांधी वधि जाये
हम तो चाबुल तेरे अंगना की चिड़ियां,
जहाँ उड़ाओ उडि जाये रे।"
इन गीत में कन्या विवश है।
देवलदे बोली-
"गसो रत्नदे ! मैं तेरी बात काटती कय हूँ ? लोक की
Ifगट परपरा तो यही है । पर गांधर्व विवाह भी तो हम
गयों में होता ही है । कितनी ही वन्यात्रों ने अपने मनभावन
माय अपनी इच्छा से विवाह किया है । तुम्हारी बात तो
लागू होती है. जब कन्या की अपनी कोई इच्छा पहले ने
नी पर के साथ न हो तब जिसके माता-पिता विवाह
र देते है, यही गनभावन, पतिपरमेश्वर प्रोर प्राणेश्वर हो
है। यहां पर तो बात ही दूसरी है।"
रमदे बोली-
-
-
१४८ / किस्मत का खिलाड़ी
को
।
"तुम्हारी वात भी मैं नहीं काटती। पर समस्या कम
यह है कि रत्नगढ़ का राजा अपनी वाग्दत्ता हमारी ।"
सुघड़दे से व्याह किये बिना मानेगा नहीं। इधर महाराज
अपनी वचन-रक्षा के कारण राजा रत्नचन्द्र का ही पक्ष ने कहा
यह तो बड़ी कठिन समस्या आ पड़ी । यदि गजसिंह का
का कहीं पता भी होता तो उन पर गुप्त सन्देश भी भिना:
जाता।"
अब तक राजकुमारी सुघड़दे मौन बैठी थी। वह अब
विषय में हो रही देवलदे और रत्नदे की बातें ही गुना
थी। अब वह बोली । उसने रत्नदे से कहा-
"सखी रत्नदे ! समस्या कठिन है, तभी तो देश
का सहारा मैंने लिया। या तो छह महीने में ।
इच्छा किसी-न-किसी अकल्पित ढंग से पूरी करेंगे या fre
अगले जन्म में अपने पति को पाऊंगी। गांठ में फन्दा :
मरना तो मेरे हाथ की बात है।"
देवलदे ने प्रसंग बदला---
"छोड़ो अव ये बातें । प्रानो ग्राज एना-ग. बार
हो जाय । बहुत दिनों से हम चौपड़ नहीं गेली ।"
"हमारा आपस में खेलना भी क्या सेलना है ?
की हार-जीत समान ही है । मजा तो तब आये जब यो ।
खिलाड़ी टकराये।"
देवलदे ने विनोद किया-
"तो तू किसी पुरुष के साथ खेलने की दर
फिस्मत का खिलाड़ी / १४९
-
तिभा कर ले कि जो तुझे चौपड़ खेलने में जीते वही तेरा
ति बने।"
"तू उल्टी वात पाहती है सखी।" रत्नदे बोली-"
in बाजी हारने वाले के साथ भी व्याह पर लूंगी । पर कोई
बिलाड़ी प्राये तो पहले । जो मेरा पति होगा, उनी गे
लंगी।"
देवनदे वोली-
"रत्नदे ! तेरी बातें बड़ी अटपटी हैं । तेरे मन में अभी
गोगोई पुरप है नहीं, प्रौर यह पहले मान रही है कि यह
पलाड़ी ही होगा। क्या पता वह निरा बनिया ही हो ।
णिवपुत्री गो वणिकपुत्र ही तो मिलेगा।"
अव राजकुमारी ने भी इस विनोद में भाग लिया। यह
ली-.
"सखियो ! तुम दोनों की बात पर मुझे एक चुटकला
द भा गया 'एक प्रौढ़ स्त्री एक दुकान पर छोटे गिशु ने.
पटे लेने गई। दुकानदार उन स्त्री को जानता पा। उसने
रापर्य से पूछा-प्ररे तुम शिशु के लिए कपड़े ले रही हो ?
श्री भैपी नहीं । तपाक से जवाब दिया-तो क्या अब होंगे
भी नहीं ?"
इस पुटगले पर देवलदे और रत्नदे दोनों हमने-नने
ट-पोट हो गई। हंसते-हंसते मन्त्रिवान्या देवलदे बोली-
"यह स्त्री पी दड़ी गतुर घोर विचित्र भी पी । जद
हा तमा बांझ रही तो भी उसे विधान पानि बच्चे नहीं
and
१५० / किस्मत का खिलाड़ी
हुए तो क्या अब होंगे भी नहीं । तुम्हारा चुटकला भी सा
जगह खूब जमा पर हमारी बातचीतों से इसी संगत :
बिल्कुल नहीं बैठी।"
"अब पूरा दिन संगत वैठाने में लगाओगो पा
खेलोगी भी। आज जमकर वाजी होगी। मैं रलदे को
इसके गांव नहीं जाने दूंगी। कल यह भी मेरे साथ का
मन्दिर जायगी।"
यो बातचीत का सिलसिला समाप्त हुमा। तीनों इ.
कर खेलने लगीं । जोड़ी पूरी करने के लिए मंभिकन्या नेमा
एक अन्तरंग दासी को बैठा लिया। इन तीनों सविनों में का
भारी अभिन्नता थी। तीनों बड़े प्रेम रो रहती थी।
X
खंडपुर में गजसिंह को खूब मान-सम्मान गिला । नि
धर राजा मकरध्वज तो उस पर वलिहार था। वशिहार र
न होता ? पुण्यों के धनी गजसिंह ने उसे अपने स्पर्श से भी
काया से मुक्त करके पुनः विद्याधर रूप में परिणत निया
उसके पत्नी-प्रतिद्वन्द्वी रतिसुन्दरी के उपपति को यमः
पहुंचाया था और दुराचारिणी नारी रतिसुन्दरी से भी
कारा दिलाया था। अपने इन तीनों अद्भुत मार्यों में पर
दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया था। ताइनगिरी को मिला।
निवासी अन्य विद्याधर राजा भी उसे नमन करने का
लेकिन गजसिंह को यह प्रतिष्ठा और मान-सम्मान :
बांधकर न रख सका । उनका पथ-साहलर Tics
फिल्मत का पिलादी १५१ में ही रहता था । सो नित्य भ्रमण के समय में वह एक दिन बहरा पूर जंगल में पहुँच गया। जब वन में ही सूर्यास्त हो गया तो गसिंह ने सोचा---'अव पुनः लोटगर पंटपुर तो जा नहीं सकता । वैसे भी श्रव में किसी दूसरे नगर-देश जाऊँगा । अत: पाज श्नी वन में रात काटूं । सवेरे प्रागे नहीं जाऊँगा।' यह सोच गजसिंह वन में ठहरने के लिए उपयुक्त स्थान देखने लगा। ऐसा स्थान जहाँ निगट ही जलागय भी हो। इसी ढूंछ-खोज में उसे एक रम्य पाश्रम मिल गया । इन धाश्रम योगी अपने चारों भोर अग्नि जलापार बीच में बंटा तप गर रहा था । गजसिंह ने दूर से योगी को देखा तो निश्चय निया-'इसी प्राश्रम में रात काटुंगा । योगी से सत्संग भी हो जाएगा। इस योगी का तप कितना कठिन है । तप तो सभी पाठिन होते हैं। हर सम्प्रदाय में तप-साधना की अनग- अलग विधियां होती हैं, पर काया कष्ट तो सभी उठाते हैं। नश्रमण भी कितनी पाठोर साधना करते हैं । लन ही तप में पदी शक्ति है।' यह सब सोचते हुए गजसिंह योगी के निकट प.चा घोर चन्दन किया तो अग्नि परिधि को पार मारोगी बाहर पाया और गजसिंह से बोला- "मायो गजसिंह ! तुम व लाये । मैं जानता था कि सुम सानोगे।" पोगी हारा अपना नाम लिए जाने से मनिह वदा परित हुघा । कुशासन पर बैटो हुए उगने पोनी के - "योगिराज! आप मेरा नाम से जान गए परतो ?
१५२ / किस्मत का खिलाड़ी
mment
बड़े आश्चर्य की बात है।"
योगी बोले-
"गजसिंह ! यों तो योगवल से सब कुछ जाना जा माता
है । पर मैं तो तुम्हें इसलिए जानता हूँ कि तुम मेरे बौहिर
हो । मैंने योगपथ ले लिया तो क्या मैं यह नहीं जानता।
गजसिंह नाम का मेरे कोई दौहित्र है । हाँ, पहचाना मैंने तुम्हे
अपने योगवल से ही।"
फिर तो और भी वातें होती रहीं। गजसिंह ने प्रायः
में ही रात विताई । फिर तो वह इक्कीस दिन तक योगी
पास ही रहा । बाइसवें दिन जब गजसिंह ने ही प्रस्थान
अनुमति मांगी तो योगी ने कहा-
"गजसिंह ! तुम अब वत्सदेश की राजधानी विराटन
जानो। वहां तुम्हें अन्यान्य सफलतायें मिलेंगी।
"वत्स ! मैं तुम्हें अक्षय तूणीर दे रहा हूँ। तुम अनगिः
बार शरसंधान करोगे तो भी इसके वाण कमी प्रमाण
होंगे। साथ ही मैं तुम्हें अजेय धनुप देता हूँ । इमामीटर
से
शत्रु बहरे हो जायेंगे और तुम अकेले ही ग मैना ?
सफाया उसी तरह करदोगे जैसे गरुद्रराज मांग
करता है।"
इसके अतिरिक्त योगी ने गजसिंह को प्रभेद्य यवन ।
दिया। इस कवच में यह गुण था कि शत्रु का कोई अन्य
कोई भी शस्त्र उस पर सफल नहीं हो सकता था। दाग,
तलवार सभी विफल होंगे, ऐसा गुण उन देवाधितिका
किस्मत का गिलाड़ी/ १५३ धा। . सब कुछ देने के बाद योगी ने पुनः कहा- "पत्ल ! मैं तुम्हें यह प्राणीप देना है कि अपने स्पर्म मे अन्धों गो दृष्टि दोगे, मोदी को निरोगी बनायोगे और सभी प्रसाध्य रोगों गो दूर कर दोगे। तुम्हारे कर-स्पर्श से बड़े-बड़े नमसारी परिवर्तन होंगे।" इसके बाद गुरु का प्राणीप प्राप्त कर गजसिंह पोटे पर बिटकर विराटनगर की भोर चल दिया। कुछ दिनों में यह विराटनगर के उमी गांव में पहुँचा, जहां घेप्टी लगाह रहता था । उसकी चतुर पुत्री रत्नदे भी अपने माता-पिता ने माथ एसी गांव में रहती थी। घोदा दोटाता हुघा गणसिंह पन- पर पर पहुँचा । पनिहारिने उसे पानी अायों से देखने नगी-- 'गंगा रूप पाया है ! वह कामिनी कितनी भाग्यमानी होगी जिगना यह पति होगा।' मव उसे अपनी-अपनी घोर पीच गीं। गजसिंह ने एक से पानो मांगा तो सभी अपना-अपना पानण उठागर पानी पिलाने को उयत हुई। एक के. पाला से उसने पानी पिया और उनके कला पर हाम फेरा तो यह मिट्टी मा गला सोने का हो गया । सब-सी-सव पनिहारिने पार पाट-पाहगार नोने ये पने गाला नो देगने लगीं। एक ने नो गनिहरा हापही पर निश पोर चोली- "परदेशी मेरे पर चलो। प्रधा साचो, पौगोकर पो रात बितायो।"
१५४ / किस्मत का खिलाड़ी
"मैं अकेला किस-किस के घर रहूंगा।" यह महर
सिंह ने अपना हाथ छुड़ाया और बोला-"मैं तोगी
किसी
वृक्षमूल में रात काट लूंगा।"
बस अब वह पनघट से हटकर गांव के चौराहे
पहुंच गया। वहां उसने सुवर्ण खण्डों के ढेर लगा दिये ।।
भर में हल्ला मच गया कि हमारे गांव में कोई सिमा
पाया है। उसके आस-पास बड़ी भारी भीड़ गट्ठी हो र
सबने झोली भर-भरकर स्वर्णखण्ड ले तिये । इसमोर
श्रेष्ठी रत्नशाह भी था। वह आग्रह करके गजन्हि को
घर ले गया। श्रेष्ठी ने मन-ही-मन सोचा कि यह
पुरुष तो मेरा जामाता वनने योग्य है। यही सोचार
गजसिंह को अपने घर ले गया था। गजसिंह को माने :
में बैठाकर श्रेष्ठी ने अपनी पुत्री को बुलाकर महा-
"रला वेटी ! देख ये कौन आये हैं ! प्ररोगी
हमारे गांव में बड़ी चर्चा है । ये बड़े सिद्धपुरुष हैं। शर
चौराहे से घर आ रहा था तो इन्होंने एका अन् गोम
पर हाथ फेर दिया। ऐसा चमत्कार हुआ कि उगेम
दीखने लगा।
"बेटी! अब यह हमारे मेहमान है गोमा
सत्कार की जिम्मेदारी मैं तुझे सौंपता है। हम बरेय
हैं, जो इन्होंने हमारा प्रातिथ्य स्वीकार किया।"
वस फिर तो गजसिंह को पड़ी गंश हुई।
रत्नदे उसके साथ चौपड़ खेलने बैठी। मुलने में पहने ।
फिरमन पा जिलाधी १५५
-
-
पूछा-
"पाप ये पिनादी हैं । प्राप नीनगेन में भी मिल
होंगे ?
गजमिह बोला-
"राजपुत्रों को सभी विद्याप पानी पानी है। राजा
व्यापार नहीं मारता, फिर भी वह वाणिज्य गला गोरता है,
गयोंगि व्यापारियों से ही उसे पर मिलता है। यदि राजा
पाणिज्य का नारा ग न जाने नो यपिक गार देने में
चतुराई दिशायें।"
रत्नदे हंगकार बोली-
"मैं तो पणिक मान्या गनिए में तो या कमी कि
मापारी ही अपने गर से राजा गोप भरले है।"
प्रसंग बदलते हुए गजसिंह ने पाहा---
"भूल बात पर प्रायो । तुम चोपड़ गेलने की बात पर
रही पी । सो पदि मजा हुघा मिलाड़ी मिले तो गलने में
मेरा भी मन लगता है।"
"तो फिर येलकर देखें।" पद माहत किया
रगदेने पोपट विधाया । मेल र हो गया । गर्मागायुमार
पानी पर पाजी हारला गया। पड़ा माया मजगिर।
लोला---
"तुग तो गजवी दिलानि
नोटा
रानो मैं भी तुम्हारी-गी मुगल रामकिनाकार
रत्नदेयोनी---
१५६ / किस्मत का खिलाड़ी
-
"यदि वचन दो तो बताऊं?"
"कैसा वचन ? गजसिंह वोला।"
रत्नदे बोली-
"यदि मेरे साथ व्याह करो तो मैं अपनी सची देशात
के पास पहुंचा दूंगी । वह अद्वितीय खिलाड़िन है।"
"तुम बस उसका पता बता दो मैं स्वयं चला जाऊंगा।"
"वता दूंगी । पर व्याह वाली बात पहले होगी ?"
गजसिंह ने झट रत्नदे का हाथ पकड़ लिया और
वोला-
"तो बिना शर्त के नहीं बतायोगी ?"
"ना !" रत्नदे ने मुस्करा कर कहा ।
मुस्कराकर ही गजसिंह बोला-
"बड़ी नासमझ हो।"
"कैसे?" रत्नदे ने पूछा।
गजसिंह वोला.
"पाणिग्रहण को ही तो विवाह कहते हैं। मैंने तुम्हारा
हाथ पकड़ लिया तो भी तुम नहीं समझी कि मैंने तुम्हारी
इच्छा स्वीकार करली । पुरुप जिसका हाथ पकड़ लेते हैं, उसे
झूठ-मूठ ही नहीं पकड़ते।"
लजाकर रत्नदे गजसिंह के चरणों में झुक गई ।
चिवुन के नीचे हाथ लगाकर गजसिंह ने उसका महा
किया और बोला-
"अब तो पाणिग्रहण की धूम-धाम बासी रह गई ।
--
.
किस्मत का गिलादी | १५७
अपने योगी
गुरु
की पाना से मुझे विराटनगर जाना है।
तुम अपनी सखी देवलदे का पता भी बता दो, उसने में
घोपड़ विद्या की कला भी मीन लूंगा।"
रत्नदे ने पता बताते हुए कहा-
"विराटनगर में राजा चन्द्र की पुत्री राजकुमारी-
नुपरदे पी सनी है, मन्त्रिकन्या देवलदे। दोनों मेरी भी
रासियाँ हैं । प्राप जा तो रहे ही है दोनों प्रापको वहीं मिल
जायेंगी। राजकुमारी भी प्रापको पाने के लिए कामदेव की
पूजा करती है। देवलदे सहित हम तीनों एक जगह बंध
जायेंगी, इससे अच्छा और पया होगा ?"
रात पाटी । सवेरा हमा। पा-पीकर गनिह विराट
नगर के लिए रवाना हो गया ।
-
राजा चन्द्र की मुता मुघटदै नगर के बाहर उद्यान
में कामदेव का पूजन गारने पाई। साथ में जो मधियां पी,
ये सब रप ये पान ही नहीं। प्रपली गुपदेही पूजा या
पाल लिये मन्दिर में प्रविष्ट हुई। धूप-दीप, नंधे में उगने
मागदेव की प्रतिमा का पूजन किया। फिर प्रांग दाद कार न
सरह पातं न्दर में चोली-..
"हे देव ! प्राज छह महीने पूरे होगा। गा
संकल्प लेकर मैंने पापको पाराधना र पीपी, पर भारतो
मुभी गिराया दोखरी । मेगा ममनी नोपनी जगाला
नहीं भोर रत्नगद का राजा रलपन्द्र परनों समा दातार
१५८ / किस्मत का खिलाड़ी
"
पा जायगा । उसके साथ मेरा बलात् विवाह होगा। प्राय
बतायें कि मैं उससे विवाह करूगी? कभी नहीं कर
मैं अभी पाश बंधन से घुटकर मरती हूँ। पर इनाम
रखना कि अब कोई कन्या आपका पूजन नहीं करेगी।
लोक यही कहेगा कि राजकन्या सुघड़दे ने छह महीने ।
कामदेव के सामने नाक रगड़ी । कामदेव कुछ नगर पाता
वह फांसी लगाकर मर गई। मरना तो अब पड़ेगा हो ।
इतनी प्रार्थना करने के बाद सुघड़दे ने एक बार
देवप्रतिमा के सामने सिर झुकाया और देवल (मदिर)
बाहर आकर एक पेड़ पर साड़ी का एक छोर बांधा। "
उसे खींच कर देखा कि ठीक-मजबूत बंधा है या नहीं।
बाद दूसरे छोर का पाश (फन्दा) बनाकर गले में आना।
जैसे ही कूदने को हुई कि फन्दा ऊपर से कट गया और गुर
सूखे पत्तों के ढेर पर गिरकर मूच्छित हो गई।
गजसिंह भी उस समय उद्यान में था। यह पेड़ की
...... में से राजकुमारी की गतिविधि देख रहा था। उसी ग
कुमारी को मरने से बचाया था। बड़े वैग गं मापार
फन्दा काट दिया था। उसने मूच्छित मुघड़दे का गीत होर
किया । जब राजकन्या को होश आया तो बोली-
"तो तुम्हीं ने बचाया है मुझे ? क्यों बचाया ? मा
तो मुझे है ही। ऐसे कब तक बचायोगे तुम ? प्राविर:
कौन हो? क्यों पाये हो यहां ?"
राजकुमारी के सभी प्रश्नों का उतार ददे माग
किस्मत का खिलाड़ी / १५९
। उसने पाहा--
-
"मैं तो यह नहीं मानता कि मैंने तुम्हें बनाया । गनी
" पुण्य उन्हें बचाते हैं । पुण्यों के बल से बचाने में बहाने तो
जारों होते हैं । अव मेरा परिचय सुनो। मैं एक यात्री हैं।
गण्टयगढ़ से यात्रा गारने निगला हूँ। नाम गज सिंह है।"
"मेरे प्राणेश्वर !" बटे हर्ष से राजकुमारी तना ही
र पाई और हर्ष मी अनि गे पुनः मूचित हो गई। जब
पुन: होश आया तो अपलक नयनों से गनसिंह को देखने लगी।
फिर बोली-
"विधाता के यहां देर है, अन्धेर नहीं। यह बात मेरी
गिना में प्राज अच्छी तरह प्रा गई। मेरी गाम-पूजा प्राज
अफल हो गई। प्रापक साथ विवाह गारने का मैने अभिकर
लिया था । प्राप मेरे प्राणपति है। अब अपने दम गप को
सार्थक करो और मेरे साथ गांधर्व विवाह मारक गुरे मनाय
करो।"
गलिए बोला....
"विवाह तो मैं अप पारगा। गान्तिः मेरे यार
विवार के अधीन रहना हो तुम्हारा जीवन । पर गांध
विचार नहीं मारू गा । तुम्हारे माता-पिता विधिवत मान
६, भावरें पढ़ें ऐसी धूमधाम से विवाह करना ।
नुपड़ने बोली-
"ऐसा नहीं हो ना प्रायंपुष ! विराटनगर जाना
हााि हूँ। परनों सा रत्ना समका
-
१६० / किस्मत का खिलाड़ी
।
+
जायेगी । अनेक राजा जुड़ेंगे। कुछ बरात में और बुराम
में, इन सवसे मोर्चा लेकर विवाह करना क्या संभा हो
मेरी मानो तो गांधर्व विवाह करके मुझे अपने घोड़े पर:
कर कहीं भी ले जायो।"
गजसिंह वोला-
"रत्नदे को भी ले जाना है । तुगरो विवाह भी कर
है और देवलदे से चौपड़ बाजी की गला भी सोचती
तुम चिन्ता मत करो। सब ठीक हो जाएगा। तुम्हें पता
देता हूँ कि रत्नगढ़ के राजा रत्नचन्द्र को हराकर तुमने
करूंगा । यदि मुझे अपना पति मानती हो तो मेरी शनि ५ः
भरोसा भी करो । अब तुम जानो और देवलदे को नहीं
देना।"
सुघड़दे बोली-
"आर्यपुत्र ! आप मेरे साथ चलें । मैं अपने भान
छिपाकर रखूगी। वहीं देवलदे को भी बुला दूंगी।
"छिपकर तो कुछ करना हो नहीं है ।" मांग :
कहा-"मैं या तो इसी उद्यान में रहूँगा या किमी पाया
में ठहरूंगा । अपने कार्य की योजना में स्वयं ही बनाsiri:
बस फिर गजसिंह की मूर्ति हृदय में बसागर राजमा
सुघड़दे राजभवन चली गई । उसने मंत्रिकामा
को बुलाकर सव बातें हैंस-हसकर बताई । गत पुछ गुना
वाद देवलदे ने सुघड़दे से कहा-
"सखी! देव पर भरोमा रमादेव महामा
--
पिरमत का खिलाड़ो १६१ । । -- Garam- है। जब तेरी इतनी इच्छा पूरी हो गई तो इतनी भी होगी लिये दामवती सुत रत्नगढ़ के राजा के भी मान मारेंगे। अब । तो मैं भी यही चाहती हूँ कि तेरी सोल बन जाऊँ । में अपने पिता से कहूंगी कि वे तेरे पिता राजाचन्द्र को इसके लिए राजी करें कि वे तेरा विवाह राजा रत्नचन्द्र से न करणे गज- गिह से ही करें। "असली बात छिपा रही है।" हसकर मुपद ने महा-"तू अपने पिता से यही महंगी रिः मेरा ब्याह भी उनी साथ मार दो।" देवलदे चे चिमोटी काटते हुए राजगुमारी ने महा- "तो तु मेरी सोत बनेगी ? घरी पगनी सोग बनकर भी नू मेरी सखी ही रहेगी। रत्नदे तो तुमने पहले ही मेरी सोत बन गई। उसी ने तो तेरा अता-पता दिया था। जा, जागर उद्यान में उन्हें चौपट गाला में प्रवीण बनामारा।' एतने में रानी चन्द्रावती-मुघटदे सीमा प्रा गई तो इन दोनों राधियों को चना-चरः बन्द हो गई। इधर गमि उपान में बैठा-वंठा मोच रहा था यहां उधान में एकर तो कृष्ट नहीं होगा । नगर में जाकर पहले गुरु परमार नागरिकों को दिखाने चाहिए । फिर राजा को निशाना सादा पगमा रहेगा । यह सोन गणसिंह घोड़े पर नाघार नगर थे रुपयों तथा बाजारों में घूमने लगा। पोड़ा दौड़ाते हुए उनने एमः बसो दुनान पर हम पा -
१६२ / किस्मत का खिलाड़ी
।
सेठ को बैठे देखा तो चुपचाप घोड़े से उतरा और उस
आँखों पर हाथ फेर दिया। हाथ फेरते ही ऐसा नमा
हुआ कि वह अन्धा सेठ आश्चर्य से बोल उठा । पंधो
तरह उसने अपने दोनों हाथ फैला दिये और चिल्ला-पिता
कर वोला.
"देखो रे लोगों ! मुझे अब सब कुछ बीयता है ।
है यह देवता, जिसने मुझे सुदृष्टि दो।"
यह कहते हुए दृष्टि प्राप्त सेठ ने गजसिंह गो मा
भुजायों में भर लिया। फिर तो भीड़ इकट्ठी हो गई ।
के सव गजसिंह के रूप और उसके करतबों की सराहना कर
लगे । फिर तो सुदृष्टि प्राप्त सेठ उसे अपनी हथेली पर
गया। विराटनगर में यह बात फैल गई कि हमारे नगर
कोई सिद्धपुरुप आया है । सेठ के घर बहुत रोगी पाने
गजसिंह ने सबको नीरोग कर दिया । कोड़ियों पर
अंजलि में लेकर जल छिड़का तो उनका वर्षों का कोई
हो गया। फिर तो राजकुमारी गुघड़दे और मंभिरमा ?
भी गजसिंह से मिलने औरे बधाई देने आई। मुगी।
गजसिंह को देवलदे का परिचय दिया--
"यही है वह पण्डिता, जिसके सामने बड़े-बड़े हि
नहीं ठहरते । रत्नदे और मैंने इसीसे चौपट मेनका गोला।
"अब तो मैं भी सीलूंगा।" कुमार ने मन
कही तो देवलदे बोली-
"पहले चौपड़ का युद्ध तो जी । विराटनगर
किस्मत का खिलाड़ी / १६३
?
।
यारियां तो देखो, रत्नगढ़ के राजा के बागत में पचा नहीं
हो रहा है ? यदि उसने युद्ध नहीं जीता गया तो मेरी मनी
मगपरदे मे प्राण नहीं बचेंगे।"
कुमार कुछ नहीं बोला । पोंकि दर्शकों और नोगियों
भी भील एकादम बढ़ गई थी। फिर ये दोनों गागिर्या भी
पचली गई।
तीसरे दिन रत्नगढ़ का राजा रत्ननन्द्र बरात नकार
inा गया । उसकी बरात में कई देश के राजा भी। सबकी
गम्मिलित सेना भी बहुत बड़ी थी। वरात उसान में ठहरी ।
नगर में भारी चहल-पहल थी। गली-गली में गंधद्रव्यों और
प्रवीर-गुलान की कीनद हो गई थी। द्वार-झार पर पमनपा
सी । मोतियों की झालरों से नगर मोभित हो रहा था।
भार पूजन की तैयारियां हो रही थी। राजा चन्द्र सपा उपरे
साहबोगी बरात का स्वागत करने उचान जा घुन घे । विवाह
माण्डप में बहुत-सी नारियां बैठी मंगल गीत गा रही थी।
पये की सखिया-दासियाँ उसका श्रृंगार कर रही थी
पार धनात भय एवं प्राशंका मे सुपरदे बहुत घबरा रही थी।
दनदे उसे समझा रही थी कि सनी ! पदराने में नहीं
। होगा वही, जो होना । पर सुपरदे बोली-
"अब प्यामा मर ही जागा, तब मरोबर गढवाने में
पालाभ ? अनी वार-पूजन होगा और फिर माचरे मी प
गी। ये जाने गह गो से है।"
"मैं जाती हूँ।" देवनये बोली-~~"इन पा
मा
-
।
१६४ / किस्मत का खिलाड़ी
की याद दिलाकर पाती हूँ।"
यह कह देवलदे उठी ही थी कि एक दासी ने
हुए समाचार दिया-
"बड़ा भयंकर युद्ध हो रहा है। एक और राणा रत
चन्द्र की सेना है और दूसरी ओर वही सिमपुण है.
अन्धे सेठ को दृष्टि दी थी।"
सुघड़दे और देवलदे दोनों ही हपित हुई और दामो
पूछा-
"तूने देखा ? आगे बता कैसे हुमा गुट ।"
दासी बोली-~-
"बरात के लोग द्वार-पूजन को पा रहे थे। प्रामे
पर वर राजा रत्नचन्द्र थे। उनके आगे-पीछे मना
थी। इतने में ही उस सिद्धपुरुष ने एका टीले पर मेर
छोड़ना शुरू कर दिया। सेना में भगदड़ मर गई । मा
पहले उन्होंने कई रथों की ध्वजाएं मार दी। उग योर ::
ने घोपणा की कि आज मैं किसी का वश नहीं :
क्योंकि विवाह जैसे शुभ काम में किसी गा या नही
चाहिए । पर तुम्हें युद्ध करने योग्य नहीं छोडगामा
वीर ने सैनिकों के हाथों, उँगलियों और पनों को
करना शुरू कर दिया है । अब ये निता पार
न तो तलवार पकड़ सकते हैं और न बाण छोटो
"अरी, चल हम ऊपर करोने में देगी।" पर
हए देवलदे ने सुघड़दे का हाथ परक्षा और जीजार
-
किस्मत का खिलाड़ी / १६५
दोनों सखियां भरोसे से गजमिह का गुद्ध गोगन देन रही
थीं।
-
राजा चन्द्र ने कार के साथ पूछा-
"यदि तुम शुभ विवाह के कारण किसी का वध नहीं
कर रहे तो फिर विवाह जसे शुभ कार्य में बाधा ययों टाल
रहे हो?"
गजसिंह ने भी हुंगार के साथ उत्तर दिया---
"इसलिए कि राजमान्या का विवाह मेरे नाम होगा।
जिसे मान्या न चाहे, उस वर के साथ विवाह रोकना ही मेरी
बाधा गा उद्देश्य है।"
राजा बोले-
"तो तुम अपने निये गा फल भोगोगे । मेरे मंनिग तुम्हें
पड़ने पा रहे हैं। प्राण प्यारे है तो समर्पण कर दो।"
कुमार ने माहा---
"अभी तो तेल देखो और लेग की धार देगो । गनिः
को पकड़ने वाले ने अभी जन्म नहीं लिया है।"
"इतना अहंमार ?" राजा ने कहा।
"अहंकार नहीं।" गजनिह ने कहा---
मात्मविश्वास बोल रहा है। अपनी मां के दूध भी लाज
रानी है।"
यह कहते हुए गनिह ने अपने धनपनी टंकार में
पक्ष मे मैनिकों के मान दहदे पार दिये । प्रमेन पर ले
कारण शाले. बाप टूट-टूट जाते थे । घर पुकार
१६६ / किस्मत का खिलाड़ी
."
1
?
अक्षय तूणीर के वाण समाप्त हो न होते थे। उसने तो र
वर्षा की कि आकाश ढक गया । ब्रा-छानों मेरि
युद्ध को देख रही थीं । अन्त यह हुआ कि रलगाकर
रत्नचन्द्र के सैनिक भागने लगे । घोड़े उल्टे लोट परे।
हाथी, उसी की सेना को रोदने लगे । राजा लगा
लौटने में ही कुशल समझी।
इधर राजा चन्द्र ने मंत्री मतिसार से पूधा-.
"मंत्रिवर ! अब क्या करना चाहिए ?
पाना तो असम्भव ही लगता है।"
मंत्री मतिसार ने कहा-
"राजन् ! मुझे देवलदे ने सब कुछ यतालिका
राजकन्या का अभिग्नह इसी के साथ विवाह करने, म
प्राणोत्सर्ग करने का है। दूसरे, यह सब विशि राममा
उपयुक्त है । इसका रूप और गोयं तो आप हो ।
"तो तुम्ही जायो।" राजा बोला--"TIT:
स्वागतपूर्वक ले जायो।"
मंत्री मतिसार ने कुमार की ओर था
श्वेत ध्वजा ले लो । श्वेत ध्वजा इनका मत मी '
वन्द करो, हम समझौते के लिए ग्रा रहे हैं!
देव कुमार ने युद्ध बन्द कर दिया। मंडी में
गजसिंह कुमार को राजा नन्द्रका पालामा ५
उतरफर गमिह ने राजा से कहा-
"राजन् ! क्षमा करना ।
।
-
किस्मत पा दिलाठी १६७ चाहता था, इसीलिए मुझे यह सब बग्रेला करना पड़ा।" राजा बोले- "यदि तुम यह सब न पारने नो हम तुम्हारा परिचय भी केंगे पाते ? तुम्हें जामाता बनाकर में धन्य हो गया।" राजा ने फिर मंत्री ने कहा--- "मंपियर ! सब कुछ तैयार है। इनी विवाह मण्डप में राजकुमारी का विवाह होगा । तुम बर को तैयार करायो।" मंत्री बोला- "राजन् ! कुमार आपके ही जागाना नहीं है, मेरे यार श्रेष्ठी रत्नशाह के भी है । राजगुमारी गुपये के नाय मेली : पुत्री देवलदे और श्रेप्टिगन्या रत्नदे ने भील नाटम में मुग्न १ भाग लिया है।" हसने लगे राजा चन्द्र । बोने-- "अरे ये छोकरियां तो हग बुजुर्गों में भी धागे निकल गई । भला हम तीनों पिता ऐमा जागाना अनेक पाये ! जल्दी करो। तीनों नदियों को पय बेग में वार नराम्रो । । फिर तो तीनों गा विवाह समारातियणी :: तुल तीन पलियां भी गनिहकुमार के । हे यानन्द : नगा गजसिंह । कुछ ही दिन बार विराटनगर में अंग- पापाय धाये तो राजा चन्द्रघणगार बननमा गरि बना राजा । प्रन गमिर दलदे काम गरे, देवनदे और रानदे उनकी समिधा घी ! गजा गजमिन -
१६८ / किस्मत फा खिलाड़ी
प्रजा का पालन न्यायनीति से करने लगा।
वारह वर्ष पूर्णता की ओर बढ़ रहे थे । भार पर
फूलदे और चम्पकमाला को लेकर माण्डवगढ़ लोटनामा
था। उसे अब अपनी माता दामपती की पाव भोपाल।
सो एक दिन गजसिंह ने राज-काज विलक्षण मंत्री मरिनार यो
सौंपा और अपनी तीनों पत्नियों सहित पोतापुर को यो
प्रस्थान कर दिया। साथ में अपार चतुरंगिणीसेना को भी
11 -- गजसिंह की अपार सेना देखते ही पोतनपुर के राजा रपमैन के छक्के छूट गए। यह तो उम अकेले के शौयं मे ही गात पा चुका था। अब भला उसका नामना कसे करता ? परः मंपियों सहित रूपसेन ने गसिंह का स्वागत किया और बोला- "मैं तो तुमसे वैसे ही हारा हूँ । अब तो तुम दत्मदेश के राजा भी हो। लेकिन अब तुम पोतनपुर के भी राजा खगोगे । मेरे कोई पुत्र नहीं है तो तुमसे अच्छा उत्तराधिकारी न मिलेगा? मैं अव धर्म की शरण में जागर प्रात्मोद्धार मागा।" पोतनपुर नरेण रपमेन ने संयम ले लिया और गर्मागह प्रय पोतनपुर के राज-सिंहासन पर बेटा। वहां की प्रजातो पहने ही गणसिंह को चाहती थी। उग नगगय ने पर- शी असुर से पोतनपुर पी प्रजा को प्राणरक्षा की दी। मतिमाली प्रजाराम राजा पो पार किस देश गीप्रमा धन्य नहीं होगी? पुछ दिन में पोतनपुर की रामपवरचा टोल फरये, पलिए रागा गालय की राजनगरी धारापुरी पपा । पाल्दे जापनी तीनों सोनों से नगी-महोदरा दानों को नए
१७०/ किस्मत का खिलाड़ी
फूलदे, सुघड़दे, देवलदे और रत्नदे ये चार पलिया,
सिंह के । चारों चार दिशायों की तरह गमित को
थीं। चारों अपने बीते प्रसंगों की माहानी आप में मा
पोतनपुर में मालिन के घर से सुरंगद्वार से गणित
छिपकर मिला करता था, यह प्रसंग फूलदे हम हमारर
थी। ये सब बातें गजसिंह के सामने ही होती नी ।
में एक दिन सुघड़दे ने गजसिंह को उपातम्भ दिशा---
"मुझसे चोरी-चोरो गांधर्व-विवार पर
और मेरी बड़ी बहन से चोरों की तरह मिलते थे।"
गजसिंह ने भी तपाक से जवाब दिया-
"ये तो सबकी जानकारी में रागा
थीं। इसलिए यह नाटक करना पड़ा।
भी
के राजा की पत्नी बन जाती तो तुम में भी किया
मिलता।'
ऐसे ही रसचर्चा में दिन बीते :
धारापुरी के राजा सुरेन्द्र.के मन में बरामद भार!
भी गजसिंह को राजपाट सौंप कर बनना ?
पहले उसे राजा सुरेन्द्र ने पन्द्रह गांव में दिखे थे, ५
राज्य ही दे दिया। गजसिंह अब तीन गों
गया। यहां का भार भी उसने मंत्रियों को भी
पलियों तथा अपार गेना के माय पुरमा
कर दिया । मार्ग में चम्पकमाला उगे मिली।
के बीच इस बार चम्पकमाला उनी
यदि तुम
"
किस्मत का खिलाड़ी / १७१ -- - गह ने उस नपम्बिनी को पहचान लिया । पास आकर उसने महा- "प्रिये ! तुम पंचन से कुन्दन बन गई । तुम्हारे हठ के कारण मैं तुम्हें तुम्हारे पीहर नहीं लौटा सका । यह देखो, रहारे तप के कारण ही मुझे इतनी भारी सफलता मिली है।" पहले नो चम्पकमाला चकराई । फिर एक दम पत्ति को चान गार उसके चरणों में गिर पड़ी। प्रांखों में खुशी के गांगू थे और प्रोठों पर हसी भी थी । बोली- "स्वामी ! इस बार में मात खा गई। पहले जब मेरी मंजरी गरी भापको उद्यान से रंगभवन में लाई थी, तब श्राप गुभो नहीं पहचान पाये थे। इस बार में नहीं पहचान पाई । गिन गया मेरी तपस्या का यही फल मिला कि मेरे लिए गार गोतले भागे ?" गनिह ने असमंजग में पड़ी फूलदे, सुघड़दे प्रादि चारों शोर देखते हुए पाहा- "प्रिय ! ये नारों तुम्हारी प्रीति का विस्तार ही हैं । गाभिन गमभो । पटरानी तो तुम्हीं रहोगी। प्रायो, मैं एन तुम्हारा परिचय तो दूं । ये चारों सोच रही होंगी कि हमारा पनि एक तपस्विनी से क्यों पर प्रेमालाप कर रहा है।" फिर गजसिंह ने चारों का परिचय चम्पकमाला को पिया मोर चम्पकमाला का परिचय चारों को दिया । चम्पक- हाला मी पनियत्ति से चारों ही प्रभावित हुई। सुघड़दे
१७२ / किस्मत का खिलाड़ी
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"वहन, तुम वैसे भी तो हम चारों से गलो हो ।
हो तुम तो। फिर तुम्हारी पतिभक्ति तो लो:
उसकी छाया भी नहीं। अतः हम चारों तुमारे कार :
बनकर ही रहेंगी।"
फिर देवलदे ने पाहा-
"राजा तो अनेक करते हैं। वे अनेक भी
रहती हैं । पुरुष बड़ा अहंकारी होता है न, इमानि राम
रूप में वह अपने पुरुषत्त्व का गौरव दिवाने if
विवाह करता है।
रत्नदे ने भी अपनी कही । वह बोली-~--
"अब इन पर रोक लगेगी । ही अब हममी
देंगी । जैसे पुरुष के पांच इन्द्रियां होती है. ऐसे ही हम
ही रहेंगी।"
गजसिंह ने पांचों से कहा-
"तुम पांचों यह भी तो सोचो कि मुझ पर भी
तुमने हाथ पैर कितने पटके थे । कोई वानी
तुड़वाती थी। कोई कामदेव की पूजा करनी थी गौर
चौपड़ मेलने में सिद्ध बनती थी।"
सब हंगने लगी। इस तरह का किन ?
मंगल रहा । फिर गजसिंह पुरसइटान पडेगा ! "
सिंह पहले तो चकराया कि यह कौन ?
आ गया । फिर तो सब मालूम ही होगा
गजसिंह का नगर प्रवेश रोमी धनधाम से मनाया, '
।
।
किस्मत का खिलाड़ी | १७३ - : मुमारी चम्पकमाला का व्याह ही हो रहा हो । उसने जामाता सेनाहा भी- "जामाता! परिस्थिति ऐमी बनी कि अचानक ही तुम अपने गामा शूलपाणि के साथ रात में आ गए । तव विवश होकर गुझे अपनी बेटी का विवाह ऐसी स्थिति में करना पड़ा for किसी ने जाना भी नहीं । फिर तुम जाने नाव प्राये और बेटी को लेकर चले गये। मैंने तो इसकी बहुत ढूंढ़-खोज गराई थी। बाद में इसकी सखी मंजरी ने ही सब रहस्य बताया था। तभी से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था । अब मैं अपनी इच्छा से गूब उत्सव मनाऊंगा, ताकि सभी जानें कि मेरा जामाता कसा है। फिर तो तुम्हें मेरा दीक्षा-महोत्सव । गनाना है।" "तो आप भी मुझे छोड़कर जायेंगे ? विराट नगर के राजा पन्द्र गए । पोतनपुर के रूपसेन और धारापुरी के राजा गुरेन्द्र भी प्रणगार बने । धाप भी मुझे छोड़ जायेगे ?" राजा गुलाबसिंह बोला- "परस ! यह तो हमारे प्रार्यवंश को अमिट परम्परा । राज्य तो किसी राजा के नाप जाता नहीं । उसका धर्म ही साप जाता है।" यही हुआ । पुर, दिन बाद राजा गुलाबसिंह ने भी '' भागपती दीक्षा अंगीकार कर ली । अब गजसिंह चार राज्यों १ मा राजा मा.विराटनगर, पोतनपुर, धारापुरी और पुर- . पान । अपनी पांचों पलियों के साथ गसिंह कुछ दिन .
१७४ / किस्मत का खिलाड़ी
पुरपइठान में रहा । अब उसे माण्डवगर आना
अव :
उसकी माता दामवती ने वचन ले लिया थाfram
पूरे होते ही लौट आना, नहीं तो मैं प्राण ला मी
गजसिंह ने अपने सुयोग्य मंत्रियों को शामन भार
पांचों पत्नियों और अपार सेना के साथ उगने माग
ओर प्रस्थान कर दिया। मार्ग में जो राजा मिली।
सिंह को नमन करते थे। भेंटादि देकर सभी सन:
स्वागत करते थे।
बड़ी-बड़ी मधुर-मनोहर कल्पना करते हुए।
माण्डवगढ़ की ओर बढ़ रहा था।
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इधर माण्डवगढ़ के राजा जामजशा . ?
अंधे, लूले-लंगड़े, कुरूप और अयोग्य थे । बले हो ।
निकम्मे ही रहे । उनके करतबों को देश-देन कर राजा
जशा बड़ा खीझता था। अब वह गजसिंह के गाने
अपने बुरे व्यवहार पर बहुत पछताता था। पर
अव क्या होता ? एक दिन उसने अपने मन को पीने
मंत्री फूलसिंह के सामने रखते हुए कहा-
"मंमिवर ! तुम्हें तो याद है कि एक दिन ।
चाण्डालिनी ने सवेरे-सवर गेरा मुगदगंन मनु
अपुरो राजा का प्रभात मुखदर्शन अगुभ होता है,
विश्वास से पीड़ित मैं नगर-देश छोड़कर भा. "
देवी-इन्द्राणी ने सात फल दिए कि मा पुन या रा.
किरमत का खिलाड़ी / १७५ यो, गरिह तो यहां नहीं और इन छहों में एक भी राजा नबनने के योग्य नहीं है । नब क्या मैं उत्तराधिकारी के प्रभाव में दीक्षा नहीं ले पाऊंगा?" राजा नी पोला पर मरहम-मा लगाते हुए मंत्री फूल- सिंह ने माहा- "राजन् ! जैसा काम नचाते है, वैसा ही नाचना पड़ता । प्रापनी धामिकता में यचापि कोई कमी नहीं है। फिर भी अपने मन में अपने ही पुत्र गजसिंह के प्रति गनुभाव रहा । संभव । प्रापथे. इस दुव्र्यवहार के पीछे भी गजमिह की कुछ भलाई विपी हो । अब पचनाने में गया होगा? प्रागे की . - ने ही दिन बीत रहे कि पर दिन सूचनों ने राजा नामजपा को गूगना दी कि किसी बड़े राजा ने प्राक्रमण की इच्छा से हमारे नगर के समीप विशाल सेना के साथ पढ़ाय वाला है। गुनते ही भूचित हो गया राजा जामजसा । गमियों ने उसे होग में लिया तो बड़े कातर स्वर में बोला "गनियों ! अब तुम्ही बताधो, क्या गार में ? हमारे पाग पर्याप्त मना भी नहीं है । पर मेरा परिप भी पक गया है।ह गय ममय की बात कि एक समय यह भी था, अब पन में मैने एक प्रमुर को अपने पास में शिया था । लकिन भाज एक राजा का सामना करने की शक्ति मुनमें नहीं है। गिव ने नमन को स्पर में पहा- "मो तोरी। महाभारत अंगे पुल को जीतने वाले
अर्जुन वन मार्ग में गोपियों को रक्षा नहीं करते।
उनके रहते भीलों ने गोपियां लूट ली थी। तभी महान
वत चली आती है-
समय-समय का फेर है, समय वहा बनवान ।
नीलन लूटी गोपिका, यहि अर्जुन यहि पार ॥
राजा ने पुनः कहा-
"तुमने भी मेरी बात का समर्थन भर लिया।
क्या होगा ? कुछ ऐसा उपाय बताओ कि इस माम?
को टाला जा सके।"
एक अन्य सचिव ने व्यंग्य में कहा----
"राजन् ! क्षमा गरें । महारानी बगनमाला, योग
प्रादि अपनी छहों रानियों में कहें कि अपने रंग
को युद्ध में भेजें । इन छहो राजपुगों में जो युद्ध में
करके विजयी होगा, उसे ही पाप माण्डवगः मारा ?
येंगे, ऐसी घोपणा भी पार कर दीजिये।"
सच्ची बात बड़ी बड़वी होती है। राम मा.
यह व्यंग्य चुरा लगा। मन-ही-मन कुट्ट गगा राजा
क्या ? कुछों ने गजसिंह की प्रगंमा करी में
बहुत बुरा लगा। इतने पर भी गर्मागत
कर
वर अब भी उभर प्राता था। शोधकोपी
जशा ने मंत्री सिंह ने कहा-
"मंत्रिवर ! पहले तुम्हारी बार नहीं
ताया। पत्र पुनः पछताना नही ना.
week
किरमत का खिलाड़ी | १७७ । उन्होंगे, गो गारगा । तुम्ही कोई उपाय बताना।' महामात्य मंत्री पाल सिंह ने कहा- "राजन् ! प्राप विचित् भी न घबरायें। अभी साकार मय बातों का पता लगाता हूँ। प्राचिर यह भी तो गाने जिगह प्राप्रामक राजा चाला गया है ?" यो राजा को प्राश्वासन देकार मंत्री फूलसिंह, प्राशामक रामा पाग गया । या राजा पर कोई नहीं, गनिह ही पा। मंत्री गनिह से मिना । गर्जागर ने सम्मान मे माय गीको चंदन किया पोर योना---- "सात ! प्राप तो मेरे पितृव्य मे ममान । प्रापने ही गरी रक्षा मी थी। चरका, मंग पिता तो मुझे, मारना ही चाहता था । अब गगे पारने मुझे या बनामो नि मेरी माना पं.मी।। मंत्री बोला- "गात मार ! तुम्हारी माता गुमलन । पुष- नियोग ना दुःप को तुग प्रव उगले मिनारही दूर नागेन ।' "फुमार ! गदि मुझे पिता तुल्य माना हो तो मेरी बातें भी गानो । सपने पिता से तुरे यारी सभी बातें रे स्वप्न की मून जायो । मह भी नोमोजो विजन द्वारा तुम्हारा देश-निशान सारे हित में होता। यदि ऐमा म होता तो तुम पार रामों मामी और पनि पनियों में पति ने पत्र पिता का पूरा सामान यो। पुरानी बातोंगी पर्चा भी मारना ।" " une " १७८ / किस्मत का खिलाड़ी . - गजसिंह ने आश्वासन दिया- "जैसा पाप कहेंगे, वैसा ही करूगा । प्राधिर मेरे पिता ही हैं।" फिर मंत्री राजा जामजशा के पास नोटार हर्ष संवाद सुनाया-- "राजन् ! सब चिन्ता त्यागो। यह तो मार गजसिंह हो पाया है। उसके प्रताप का वर्णन कर सकता हूँ ? उसके स्वागत की तैयारियां " राजा जामजशा की आंखों में हासु सस फिर तो बड़ी धूम-धाम से गजसिंह का नगर प्रदेश गजसिंह ने मात-विमाता सभी के चरण धुए। for छुए। उस दिन पुण्यात्मा गसिंह ने ग्राने भार स्पर्श किया तो वे सब दृष्टियान, सुन्दर और ET गए। अब इस राजपरिवार में वर या समान सातों भाई एक हो गए । छहों रानियों ने पटरानी anxi क्षमा मांगी। अब वह राजभवन के अन्तःपुर दोन गजसिंह के सिर पर हाथ फेरते हुए पटरानी शादी के आंसू बहाये । पांचों पुत्र व वधुओं गी नमन पुर गूंजने लगा। मारवगढ़ में ऐसा हपंसागर उमड़ा शब्दों में करना कठिन होगा । कुछ दिन : माण्डवगढ़ में एक मानी मानायं प्राचार- देगना सुननं गए । राजा जामशा में पानी
दिस्त कर मिलायो | १७९
माहित दीक्षा अंगीकार गारली। माण्डवगन का राजा दना
। गजगिः । अपने यहां भाइयों को मुख-गम्मान घोर पार
परो हुए गनिह पांचों राज्यों का प्रबन्ध करने लगा। इन
। पड़ी राजव्यवस्था में यह अपने भाइयों ना महयोग भी
निता था।
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कानानार में ननिह महाराज की पांचों शानियों में
- पुत्र को जन्म दिया। नगर पाकर पाबा रामकुमार
युवाए । विद्या पारंगत भी बने पानों। पांचों गा विचार
भी हो गया । ममय पर गरगरीतना दाता मा । मजमिह
पठी गांगता पजापानन भार हा मा ।
एमी चीर माण्डवगतमाचा घमघोष पाउन
माप को धगण धे। राजा गजनित मुनि की गला दुगने
गत । मुनि ने मोती घटलता पर अमृा भरी वेगना
दी। गजमिह ये तो मान लगा । उन गांचा, पूर्व म
समोर कारण मी व पाया घोर म मामा के
पारण पार पानी मिला । तो प्रय भीमें
राज्य विपास, पब सोही गय का मुभ भी करना
पाहिए जो मेरे मनु ने लिया और लिा में भी मिला।
अब तो मंगमगा ! पति ने अपना दी
राजिनो गुनासा को गवकी गवार में बोली-
"तो धारो ? हमारे समा'
हम भी पपामामों पर पानी मनभरनामो
गंभा में भी धाप पी।"
।
१८० / किस्मत का खिलाड़ी
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"यह तो और भी अच्छी बात है।"
सहमति दी। फिर उसने पांचों पुगों को राजमार :
विराट नगर का राज्य सुघड़दे के पुत्र को दिया।
पुरपाठान का चम्पकमाला के पुरा को, पोनपुरका
के पुत्र को, धारापुरी का फूलद के पुय को प्री मार
का राज्य रत्नदे के पुत्र को दिया । उगो मोर
माता-पिता का दीक्षा महोत्सव कराया। रही बारि
संयम पथ का सहारा लिया ।
पांचों राजपुत्र अपनी-अपनी प्रजा का पालन कर
करने लगे। इधर समय पाकर राजपि गमि कोर
साध्वियों-चम्पकमाला, फूलदे, गुगडदे, देवदार
ने शरीर त्याग कर परमपद प्राप्त किया।
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