Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Gulistha (rajniti)
Front matter
गुलिस्ता।
धो बैठता है, वह अपने दिल की सव वातें कह डालता है।
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जिस तरह कुत्ते से खदेड़ी हुई दिल्ली, अपने बचने का कुछ
उपाय न देख कर, कुत्तेपरही उलट कर झपट्टा मारती है
और जिस तरह, मौका पड़ने पर, जब किसी मनुष्यको अपनी
जान बचाने का कोई उपाय नही सूझ पड़ता, तब उसका
हाथ ख़ाहमख़ाह तेज़ धार की तलवार पर पड़ता है, उसी
तरह जव मनुष्य की सब आशाएँ नष्ट हो जाती हैं, तब वह
निरीह होकर जो जी मे आता है, वही वकने लगता है
और इस तरह अपने दिल का गुवार निकालता है।"
बादशाह ने अपने नौकरी से पूछा,-"यह क्या कहता है ?"
एक द्यावान् वज़ीर ने जवाब दिया,-"महाराज! यह
कहता है कि जो मनुष्य अपने क्रोध को शान्त रखता है
और सब जीवो पर दया रखता है, ईश्वर उसे अपना
मित्र बना लेता है।" बादशाह को यह बात सुन कर दया
आई और उसने अभागे कैदी की जान बखूश दी। इतने
मे एक निर्दयी वज़ीर बोला,-"हमारे जैसे मर्तबे वाले
मनुष्य के लिये, बादशाह के सामने, झूठ बोलना ठीक नहीं
है। उस कैदी ने आप को मनमानी गालियां दी थी।"
उसकी बात सुन कर, बादशाह नाराज़ होकर बोला,
"मैं तुम्हारी इस बात से अपने पहले वज़ीर की झूठी वात
को जियादा पसन्द करता हूं, क्योकि वह बात भलाई
के इरादे से कही गई थी और तुमने जो कहा है, वह ।
पहला अध्याय। ३ बुराई के इरादे से। बुद्धिमानों का कथन है, कि जिस सच बात के सुनने से बुराई करने की इच्छा पैदा होती है, उससे वह झूठ वात लाख दर्जे अच्छी है, जिससे भलाई करने का उपदेश मिलत है। वादशाह लोग हमेशा दूसरों की सलाह से काम किया करते हैं, इसलिये जो लोग उन्हें बुराई करने की सलाह देते हैं, उन्हें धिक्कार है ! फ़रीदूं के महल की दीवार के ताक पर लिखा है:-"भाइयो ! यह संसार चार दिन का साथी है , यदि हमेशा के लिये अपना भला चाहो तो परमेश्वर मे लौ लगाओ। झूठी दुनिया की राजधानी पर विश्वास मत करो। देखो, तुम्हारे जैसे कितनों को इसने बनाया और विगाड़ दिया। जिस वक्त पवित्र प्राण निकलने लगते हैं, उस वक्त सिहासनपर प्राण- त्याग करने वाले बादशाह और ख़ाली ज़मीन पर मरने वाले एक भिखारी में क्या फ़र्क रहता है ?" शिक्षा-इस कहानी से हमें दो शिक्षाएं मिलती हैं-(१) दूसरे की मलाई या पराई जान बचाने के लिये, अगर झूठ भी बोलना पड़े तो कोई दोष नहीं है। वह सच खराव है, जिससे दूसरे की हानि हो या किसी की जान जाये। (२) यह संसार असार है। जगत् और उसके पदार्थों की माया-ममता मिथ्या है। इस जहान में कितने ही वाग लगे; फले, फूले मौर सूख गये। एक से एक बढ़कर राजा बादशाह हुए, जिन्होंने ससागरा पृथ्वी का राज्य किया , सारी दुनिया को एक नकेल में नाथ दिया , किन्तु माज उनका नामो-निशान नहीं है। जब तक इस कलेवर से प्राणों का प्रयाण नहीं होता, तब तक ही अमीरी-गरीयी अथवा छुटाई-बड़ाई प्रभृति भवस्थाएं मानी जाती हैं। मरने पर राव और रडू, बादशाह और फकीर एक हो जाते
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पहला अध्याय। कोषों में इधर-उधर घूम कर चारों ओर देख रही हैं। बादशाह ने ज्योतिषी और नजूमियों से इस स्वप्न का फल पूछा ; पर कोई कुछ भी न बता सका। तब एक फ़क़ीर ने सलाम करके कहा,-"उसका राज्य दूसरे लोग भोग रहे हैं, इसी से वह चारों ओर देख रहा है। ऐसे बहुतेरे नामवर लोग ज़मीन में गाड दिये गये है, जिन्होंने संसार में आकर कोई ऐसा काम नही किया, जिससे पृथ्वी पर उनका नाम रहे। लेकिन नौशेरवां जैसे महापुरुप को मरे यद्यपि एक ज़माना बीत गया, कब्र मे रक्खी हुई उसकी लाश गल कर मिट्टी में मिल गई, उसकी एक हड्डो का भी पता नहीं चलता; तथापि उसका पवित्र नाम, परोपकार की वजह से, अव तक संसार में जिन्दा है। इसलिये भाइयो! जब तक जियो नेकी करो और अपनी जिन्दगी से फ़ायदा उठाओ अर्थात् अमुक आदमी दुनिया में नहीं रहा इस आवाज के थाने के पहले नेकी कर जाओ। शिक्षा-इस किस्से से हमें परोपकार को शिक्षा मिलती है। उदारता, मजनता, धर्म निष्ठा यादि सद्गुण इप्स परोपकार के अन्तगत है। परापकार हो मनुष्य का परम धर्म है। परोपकारसेही जगत् मनुष्य को मरने के बाद भी याद किया करता है। इस दुनिया में, ऐसे-ऐसे राजा, बादशाह और शासक हो गये हैं, जिनको हांक से पृथ्वो कांपती थी, जिन्होंने ससार को अपनी छोटी उँगली पर मचा मारा धा; किन्तु उन्होंने कोई लोकोपकार का काम नहीं किया, इससे कोई उनका नाम भी नहीं लेता । इरान का बादशाह मौशेरवां, अपनी उदारता, न्यायप्रियता और परोपकारवृत्ति के लिये,
६
गुलिस्ताँ।
जगत् में खूब नामी हुश्रा। यद्यपि वह श्राज इस जगत् में नहीं है, उसके
बदनकी ख़ाक का भी पता नहीं है ; तथापि उसका नाम लोगों के मुंह पर
रहता है। वह मर कर भी अमर है। इसका कारण केवल "परोपकार"
है। मौत की गोदमें जाने से पहिले, मनुष्यमात्रको भरसक परोपकार करने
पर कमर बाँधे रहना चाहिये।
तीसरी कहानी।
ता गर्दै सुखन न गुफ्ता बाशद ।
एबो हुनरश नहुफ्ता बाशद ॥२॥
RDATION क वादशाहके कई वेटे थे। उनमे से सव तो लम्वे
कद
के और
खूबसूरत
थे; सिर्फ
एक बदसूरत
9 और छोटे कद का था। एक समय, बादशाह ने
अपने बदसूरत लड़के की ओर बड़ी घृणा की दृष्टि से देखा।
किसी आदमी की बुराई-मलाई उस समय तक मालूम नहीं होती, जब
तक कि वह वातचीत न करे ॥१॥
पहला अध्याय।
लड़का बड़ा अक्लमन्द था। वह अपने बापके मन की बात
ताड गया और वोला,-"पिता | छोटे कदका अक्लमन्द मनुष्य
लम्बे कदके वेवकूफ से अच्छा होता है। हरेक चीज़ की कदर
उसकी उंचाई के अनुसार नहीं की जाती। भेड़ पवित्र और
हाथी अपवित्र जानवर समझा जाता है। सिनाई पर्वत
पृथ्वी के और सब पहाड़ो से बहुत छोटा है; पर ईश्वर के
यहाँ उसकी पदवी और उसका मान सब से बढ़ कर है।
एक दिन एक दुवले-पतले अक्लमन्द आदमी ने किसी मोटे-
ताजे वेवकूफ से जो कहा था, क्या आपने उसे सुना है ? एक
अरबी घोडा, चाहे वह कितनाही दुबला हो, अस्तबल के
सारे गधों से अच्छा होता है।" इन बातोको सुनकर, बादशाह
हँसा और दवारी लोग लड़के की तारीफ करने लगे एवं
उसके भाइयों ने दिल में रज किया। जब तक आदमी नहीं
बोलता, तब तक उसके गुण-दोप प्रकट नहीं होते। हरेक
जङ्गल फो वीरान न समझना चाहिए , मुमकिन है कि,
उसमें कोई सिंह सो रहा हो। हमने सुना है, कि जब
एक जोरावर गनीम ने बादशाह पर चढ़ाई की और दोनों
तरफ की सेनाओं का मुकाबला हुआ, उस वक्त सबसे पहले
इसी नौजवान शाहजादे ने, शत्रुसेना के भीतर अपना घोडा
बढा कर शत्रु को ललकारा और फहा,-"मैं लडाई में पीट
दिखा कर भागनेवाला नहीं है, बल्कि से नहा कर
अपना सिर देनेवाला है। क्योंकि जो आदमी लटता है
१
खून
८
गुलिस्ता।
वह अपनी जान की बाजी लगाता है और जो भाग निकलता
है वह अपनी सेना का खून करा कर तमाशा देखता है।"
यह कह कर, उसने दुश्मन पर हमला किया और बड़े-
बड़े नामी सिपाहियो को मार कर गिरा दिया। इसके बाद,
वह अपने बाप के पास आया और ज़मीन चूम कर बोला,-
"आप मुझे बदसूरत देखकर, सुझसे नफरत करते थे;
परन्तु लड़ाई के मौके पर, मैं कैसी बहादुरी और कैसी शक्ति
से युद्ध करता हूँ, इसका आपने बिल्कुल विचार नहीं किया
था। एक पतली टांगो वाली घोड़ी जितना काम करती है,
उतना काम एक मोटे ताजे बैल से कभी नहीं हो सकता।
कहते हैं, कि दुश्मन की सेना असंख्य थी और शाहज़ादे की
तरफ बिल्कुल थोड़ीली फौज थी। उसमे से भी जब कुछ लोग
भागने लगे तब शाहजादे ने ललकार कर कहा,- 'यारो!
मरदो की तरह युद्ध करो, कि जिससे औरतो की पोशाकें न
पहननी पड़ें।” इस वचन से सिपाहियों की हिम्मत बढ़ी
और उन लोगों ने, बड़ी बहादुरी के साथ दुश्मनो पर आक्रमण
कर के, उसी दिन उन्हें जीत लिया। बादशाह ने शाहजादेका
सिर और उसकी आँखें चूम कर उसे छाती से लगाया और
दिन-दिन उसका प्रेम उसकी ओर बढ़ने लगा । अन्त में,
बादशाह ने उसको अपना उत्तराधिकारी बनाया।
कर, उसके भाई उससे जलने लगे और एक दिन उन्होने उसके
भोजन मे जहर मिला दिया। उसकी बहिन, खिड़की की
यह देख
पहला अध्याय
है
राह से, यह सव कारवाई देख रही थी। जैसेही शाहज़ादेने
खाने के लिए ग्रास उठाया, उसकी बहिन ने खिड़की का
किवाड खटखटाया। उसने इस इशारे को समझ कर, थालीसे
अपना हाथ झट खींच लिया और कहा,--"अगर अक्लमन्द लोग
इस तरह मार डाले जायेंगे, तो बेवकूफोंसे उनकी कमी पूरी
न हो सकेगी। यदि पृथ्वी से हुमा निर्मूल कर दिया जाता,
तोभी कोई उल्लू के साये में न जाता।” इस घटना की ख़बर
बादशाह तक पहुंची। उसने शाहजादे के सव भाइयोको
वुलवाया
और
उन लोगोको
ग्वूव बुरा-भला कहा। पीछे अपनी
बादशाहत के मुनासिव हिस्से करके
करके सवको बांट दिये,
कि जिस से भविष्य में किसी तरह का झगड़ा-तकरार न
हो सके।
देखा गया है, कि एक कम्बल पर दस फकीर सो सकते
है, पर एक बादशाहत मे दो वादशाह नहीं रह सकते। यदि
किसी फकीर के पास एक रोटी होती है, तो वह उसमेंसे आधी
आप खाता है और आधी गरीव को दे देता है।
किसी बादशाह के हाथ में एक देश-भर की बादशाहत होती
है तो भी वह एक और
एक और देशकी बादशाहत लेनेकी इच्छा
रखता है।
पर यदि
शिक्षा-इस विस्ते में यह दिखाया गया है, कि सुन्दरता मोर यः
होन-होलसे किसी का काम नहीं हो साता। मान गुरों से होता है।
।
१० गुलिस्ता बुद्धिमानी एव शूरवीरता का खूबसूरती और बदसूरती से कुछ सम्बन्ध नहीं है। पुरुष में गुणों की जितनी जरूरत है उतनी सुन्दरता और डील-डौल की श्रावश्यकता नही । दूसरे यह भी ध्यान रखने-योग्य बात है, कि एक राज्य में दो राजे नहीं रह सकते ; अगर रहेंगे तो बखेड़ा ज़रूर होगा। चौथी कहानी। अब गर आबे जिन्दगी बारद । हर्गिज़ अज़ शाखे बेद बर न खुरी ॥१॥ सी पहाड़ पर अरबी डाकुओं ने डेरा डालकर, कि काफिले वालों का रास्ता बन्द कर दिया था। इन हम लोगो के उत्पात से वहाँ के बाशिन्दों के नाकोंदम हो गया था। सुलतान की फौज ने भी इन लोगों से हार मान फूले-फले न बेत, यदपि सुधा बरपहिं जलद । मूरख-हृदय न चेत, जो गुरु मिले विरचि-सम || तुलसीदास।
पहला अध्याय।
११
ताजा
लो थी, क्योंकि ये लोग पहाड़ की चोटी पर के किले
को अपने कब्जे में करके और उसे अपना गढ़ बना कर
उसी में रहा करते थे। वादशाह के मन्त्रियो ने आपस
मे सलाह की, कि इस वला को किस तरह टालना
चाहिए , क्योंकि अगर ये लोग इसी तरह छोड़ दिये जायेंगे,
तो कुछ दिन बाद इन्हे दवाना मुश्किल हो जायगा।
लगा हुआ पेड़ एक आदमी की ताकत से उखड जाता है;
पर वही जव वढ़ता-बढ़ता जड पकड लेता है, तव चर्वी लगाने
से भी उस की जड नहीं उखडती। झरनेका मुँह सूई से
वन्द कर दिया जा सकता है, पर वही जब पूरे चश्मे का रूप
धारण कर लेता है, तब उसे हाथी भी नहीं रोक सकता।
अस्तु, उन लोगों ने वहाँ एक जासूस भेजने का निश्चय किया
और उससे कह दिया, कि जब डाकृ लोग किसी दूसरी जाति
पर हमला करने जाये और उन की जगह खाली हो जाय,
तब हमें खयर दे देना। इधर, थोडेसे चुने हुए सिपाहियोको
पहाड़ की दरी में छिपा रखा। शामके वक्त, जब टाक
लोग अपनी बढाई पर से लूटपाट का माल लेकर वापिस
भाये और अपनी लूटी हुई वीज़ों और हरवे-धियारों को
रख कर आराम करने लगे, तब, कोई एक पहर रात गये, पहले
दुश्मने नीद ने उन पर हमला किया। इसके बाद,
आधीरातके समय, छिपे हुए सिपाही झाडी से निकल पडे और
उन्होंने एक-एक करके सब डाकुओं की मुश्में पांच ली। सवेरा
१२ गुलिस्तां । होते हो, सब के सब दरबार में लाये गये और बादशाहने सबके प्राणदण्ड को आगा दे दी। उन डाकुओंके साथ एक छोटामा लड़का था। इस विचारेकी जवानी का फल भो अब तक न पका था। इसके गालोपर, वसन्त ऋतु के आदि में खिलने वाली गुलाब की कली की तरह, कोमलता झलक रही थी। एक बजीरने, बादशाह के तात का पाया चूम कर और पृथ्वी को प्रणाम करके, बादशाह से अर्ज को,-"महाराज! इस बालक ने अभी तक अपनी ज़िन्दगी के बगीचे का फल भी नहीं चक्खा और अपनी जवानी के मौसिम को फ़सल का सुख भी नहीं भोगा; इसलिए आप की मशहर मिहरवानी की वजह से में उम्मेद करता है, कि आप इस वालकको मृत्यु के मुंह में जाने से बचा कर, मुझे एहसानमन्द करेंगे।" वादशाह बडे समझदार थे, उन्हें यह वात पसन्द न आयी। उन्होने कहा,-"दूपित जड़ से कभी अच्छा छायादार वृक्ष उत्पन्न नहीं होता। नालायक को शिक्षा देना, गुम्बद पर अखरोट फेंकने के बराबर होता है; इससे सब को एकदम निर्मल कर देना ही बेहतर है; क्योकि सब आग बुझा कर एक चिन- गारी वाकी रहने देना या सांप को मार कर उसके बच्चे को वचा रखना, बुद्धिसानोंका काम नहीं है। बादल का पानी की जगह अमृत बरसाना मुमकिन हो सकता है; परन्तु वेत की डालियोसे कभी फल प्राप्त नहीं हो सकता। कमीने के
पहला अध्याय ।
अगर
इस
पीछे अपना समय नष्ट करना अच्छा नहीं। क्योंकि नरकुल मे
से कभी चीनी नहीं निकल सकती।" वज़ीर ने जाहिरा
इन बातों को पसन्द किया और इस उचित विचार के लिये
बादशाह की तारीफ़ करके कहा,-"ईश्वर आपको अमर
करे! आपने जो कहा वह विल्कुल ठीक है ।
यह बालक उन बदजातों की सङ्गति में कुछ दिन रहना,
तो यह भी उन्ही लोगो की तरह वदमाश और बदचलन
हो जाता।
पर आप के इस तावेदार को आशा है, कि अगर
यह अच्छे आदमियो की सङ्गति में रक्खा जायगा और
इसे अच्छी शिक्षा दो जायगी, तो के
ख्यालात
और
सिद्धान्त ऊंचे दर्जे के हो जायेंगे, क्योंकि यह अभी बच्चा
है। इसलिए इस का, उन बदमाशों की तरह, नीतिविरुद्ध
और द्वेषपूर्ण वदमिज़ाज होना नामुमकिन है। हदीस मे कहा
गया है, कि,-"जन्म लेने के समय सब का मिजाज
इस्लाम-धर्म से परिपूर्ण रहता है; केवल माता-पिता के
भेद के कारण कोई यहृदो, कोई ईसाई और कोई मजूली
हो जाता है। हज़रत नूहके लड़के ने टुष्टों की सद्गति की
इसलिये उनके घराने से पंग़म्बरी जाती रही।
के
साथियोंके फुत्तेने भले आदमियो की सुहवत की, इससे
वर आदमी बन गया।" वज़ीरने जब यह बात कही, तर
और भी कई एक दरवारी बादशाह से अर्ज फरने में उसके
साध ऐ गये। निदान बादशाहने उस दालक पी जान
फरफ
गुलिस्ता।
बखूश दी और कहा,-"यद्यपि मुझ तुम्हारी अर्ज़ पसन्द नही
है, तोभी मैं उसे मंजूर करता हूँ।
तुम लोग नही
जानते, कि जाल ने रुस्तम से क्या कहा था ?-अपने बैरी
को कमज़ोर और तुच्छ कभी मत समझो। हमने अक्सर
देखा है, कि सोते से पानी बिल्कुल थोड़ा-थोड़ा निकलता
है; लेकिन वही पीछे इतना बढ़ जाता है कि, उस मे माल से
लदे हुए बड़े-बड़े ऊँट बहने लगते हैं।" अलकिस्सा वज़ीर
ने उस लड़के को अपने घर ले जाकर बड़े नाज़ और ने-
मतसे पाला और उसको शिक्षा दी। उसकी तालीम के
लिए एक अच्छा उस्ताद मुकर्रर किया। जब वह अच्छी
तरह सवाल-जवाब करना और दरवार का ज़रूरी काम-काज
सीख गया और लोगों की नज़र में भला मॅचने लगा;
एक दिन वज़ीरने उस के आचार, व्यवहार और मिज़ाज के
वारे में बादशाह से कहा, कि उस लड़के पर अच्छी शिक्षा का
खूब असर हुआ है। आगे की मूर्खता अव उस के दिलसे
एकदम दूर हो गई है। वादशाहने इस बात पर हँस कर
कहा,-"भेड़िए का बच्चा यदि आदमियों के बीच मे पाला
जाय, तोभी वह भेड़ियाही रहेगा।"
इस घटना के दो
वरस वाद, उस लड़केने, वस्ती के कुछ नीच और लुच्चो के
साथ मिल कर, दांव पाने पर, वज़ीर और उसके दोनो
लड़को को जान से मार डाला एवं बहुतसा माल-असबाब
ले गया और अपने बाप की जगह खद सरदार
तब
पहला अध्याय ।
..
बनकर डाकेजनी करने लगा। वादशाह यह ख़बर पाकर
बढ़े दुखी हुए और बोले,-"निकम्मे लोहे से कोई अच्छी
तलवार कैसे बना सकता है ? अक्लमन्दो, सुनो! किसी
बदज़ात नालायकको नेक वनाना नामुमकिन है। मेह ऐसा
पक्षपात-हीन है कि, क्या बागीचा और क्या असर ज़मीन हर
जगह एकसा पानी बरसाता है, पर वागीचो मे लाला फलते
है और ऊसर मे घास उपजती है। ऊसर जमीन में कमी
सम्बुल नहीं उपजता ; इसलिए ऊसरमें बीज बोकर वर्वाद
न करो। बदमाशों पर दया करना, भले आदमियों को नुकसा-
न पहुंचाना है।"
शिक्षा-इस कहानीसे हमें ये नसीहतें मिलती है -
(१) शत्रु को दुयल देख कर लापरवाही न दिखानी चाहिए , जोर पकड
लेनेपर दुश्मन को परास्त करना यहुत मुश्किल हो जाता है,
शत्रु
को भूल कर भी बलवान् न होने देना चाहिए। (२)जा भयोग्य है,
जो नालायक है, जिसकी असलियत खराय है, उसे कसीही अच्छी शिक्षा
दो जाय, सोही भली सहपत में रक्सा जाय, वह हरगिज यच्चा न
होगा अर्थात् जैसे-का-तैसाही रहेगा। शिक्षा निस्सन्देह उत्तम चीज है,
परन्तु दुर्जनोको यह भी सजन नहीं बना सकी। (३) दुष्टो पर व्या
म परनी चाहिए, क्योकि इस पिस्ने पे वजीरने दुष्ट पर दया से
भरनी और सपने पेटो की जान गंवाई।
यत.
१६ गुलिस्तां । पाचवी कहानी। उस वालाये सरश जे होशमन्दी। मीताफ्त सितारये घुलन्दी॥१॥ ने अग लमश की ड्योढ़ीपर एक प्यादे का लड़का देखा। वह लड़का इतना बुद्धिमान् और समझ दार था, कि बयान नही किया जा सकता। मे उच्च श्रेणीकी योग्यता के चिह्न बचपनसेही नज़र आने लगे थे। वुद्धिमानी के मारे उसके सौभाग्य का सितारा उसके ललाट पर चमकता था। बहुत लिखने से क्या, थोड़े समय मे ही वह अपनी सुन्दरता और तीव्र बुद्धि के कारण, बादशाह का कृपापात्र "धन से बड़प्पन नहीं मिलता, किन्तु योग्यता से मिलता है। मनुष्य अक्लसे वड़ा समझा जाता है, न कि बड़ी अवस्था से।" उसके संगी-साथी उससे जलने लगे। उन्होंने, उसपर बेईमानीका झूठा इलाज़ाम लगा कर, उसको जान लेनेकी कोशिश की; पर वे सफलमनोरथ न हुए। जिसका सच्चा मित्र मिहर- बान हो, उसका शत्रु क्या कर सकता है ? बादशाहने उस लड़के से पूछा:-"ये लोग तुझसे क्यो शत्रुता रखते हैं ?" लड़के ने जवाब दिया:-"जगत्रक्षक! आप की छाया-तले बन गया। an होनहार बिरवान के होत चीकने पात ।
पहला अध्याय।
जब
आकर मैंने जलनेवालों के सिवा सवको राजी किया है।
तक मेरी भाग्य-लक्ष्मी मुझ से न रूठेगी, ये लोग कभी राजी
न होंगे। आप की दौलत और अकवाल सदा ऐसेही बने
रहें, मैं किसी को नाराज़ करना नहीं चाहता; किन्तु उन जलने-
वालों का क्या उपाय करूँ, जिन के दिल में बुराई-ही-बुराई
भरी रहती है
ऐ अभागे जलनेवाले! मर जा, क्योंकि तेरी बीमारी का
इलाज सिवा तेरी मौत के और नहीं है। द्रोही मनुष्य यही चाहता
है कि, भाग्यवानों पर आफत आवे। अगर दिन मे चमगीदड़
को न सूझे तो इस में सूरज का क्या दोष है ? सच बात तो
यह है, कि ऐसी हज़ार आँखों का अन्धा होना अच्छा, किन्तु
सूर्य की रोशनी का मारा जाना अच्छा नहीं।
शिक्षा--इस कहानी में यह दिखाया गया है.-(१) मनुष्य का मान
योग्यता और धुद्धिमानी से होता है, धन और बड़ी उम्र से किसी त मान
नहीं होता। (२) पराई उन्नति देखकर जलनेवाले पुरप पृथा जल कर अपनी
छाया को पाक करते हैं। अय तक मालिक मिहरवान है और सौभाग्य-सूय्य
के ग्रस्त होने का समय नहीं थाया है, तब तक घे उस के नाश करने की
जारों पोधिरों करके भी सफल-मनोरथ नहीं हो सकते। परन्तु जिन
स्वभायमें लग गया है, उनकी जान ले साथ ही यह जाता है । किमी
पोन्नति टेप पर न जलगाही पुद्धिमानी है।
-
यह रोग
।
२
१८ गुलिस्ता। छठी कहानी बा रअय्यत सुलह कुन व जे जंग खस्म एमन नशीं । जाँ कि शाहन्शाहे आदिल रा रअय्यत लश्कर (अ) स्त ॥१॥ हते हैं कि, ईरानके बादशाहों में एक ऐसा बाद- क शाह हुआ था, जो अपनी प्रजा के धन-माल को बार ज़बरदस्ती छीन लिया करता और उसपर जोर- जुल्म किया करता था । उस के बारम्बार अन्याय करने से लाचार होकर, लोग उसके राज्य को छोड़ कर अन्य राज्योंमे जा बसे। जब प्रजा राज्य छोड़ कर चली गई, तव राज्य की आमदनी घट गई, खजाना खाली हो गया और ज़ोरावर दुश्मनो ने वादशाह को चारो ओर से धर दबाया। जिसे अपने बुरे दिनो मे सहायता लेनी हो, उसे अपने अच्छे दिनो में सजनता से चलना चाहिए। अगर तुम अपने नौकर के साथ मिहरवानी का वर्ताव न करोगे तो वह चल देगा। मिहरवानी इस ढंग से करो, कि अनजान मनुष्य मी तुम्हारा आज्ञापालक सेवक बन जावे। एक दिन लोग उसके सामने "शाहनामे" से जहाक और प्रजा-पालक राजा प्रजा के साथ मेल करके शत्रु से लदना चाहिए । की प्रजा सेना के बरावर ही है।
पहला अध्याय।
१६
फरीदूं के राज्य के पतन का विषय पढ़ रहे थे। वज़ीर ने
बादशाहसे पूछा:-"फरीदूं के पास न धन था, न देश था और
न सेनाही थी, फिर उसे राज्य किस तरह मिला ?" बादशाह ने
उत्तर दिया,-"जिस तरह तुमने सुना है, कि लोग उस से मिल
गये और उनके वलसे उसने राज्य पाया।"
वजीर ने फिर कहा,-"जव आप यह जानते हैं, कि लोगो
के जमा करनेसेही राज्य बनता है, तब राज्य करने की इच्छा
रखकर भी उन्हें क्यों भगाते हैं? अपनी जान को जोखिम में
फंसा कर भी सेना को राजो रखना उचित है, क्योंकि सेनाही
राजा का बल है।" वादशाहने पूछा,-"सेना और प्रजा को
इकट्ठा करने के लिये क्या तदबीर करनी चाहिए ?" वज़ीर ने
जवाब दिया:-"बादशाह का इन्साफी होना जरूरी है, जिस से
लोग उस के पास भावें और साथ ही दयालु होना भी उचित
है कि, जिस से लोग उसकी शरणमे आकर सुख-शान्ति भोगें।
लेफिन आप में इनमे से एक भी गुण नहीं है। जिस तरह
भेडिया चरवाहे का फाम नही कर सकता, उसी तरह ज़ालिम
मनुप्य बादशाहत नही कर सकता। ज़ालिम बादशाह अपनी
वादशाहत की नींव को खोद-खोद कर पोली करता है।" वाद
शार वजीर फी नसीहत से चिढ़ गया। उसने वजीर के
राध-पांव बंधवाकर उसे जेल में भेज दिया। इस घटना
के
कुछ ही दिन पीछे, बादशाह के चचेरे भाइयोंने बगावत फी
और सेना तैयार करके अपने यापकी यादशाहत का दावा
२० गुलिस्ता। करने लगे। वे लोग जो उस के जुल्म से तङ्ग आ गये थे, शत्रुओं से मिल गये और उन्होंने उन्हें सहायता दी। नतीजा यह निकला, कि उस बादशाहके कब्जेसे राज्य निकल गया और उनके हाथ आ गया। जो बादशाह ग़रीबों पर जुल्म करता है, उसके दोस्त भी सुसीवतके दिन उसके जबरदस्त दुश्मन हो जाते हैं। अपनी रअय्यतके साथ अच्छा सलूक करो और अपने दुश्मनके हमले से बेखटके होकर बैठे रहो; क्योंकि इन्साफी वादशाह की रस- य्यतही उसकी फौज है। शिक्षा-इस कहानी का खुलासा यह है कि, जो राजा प्रजावत्सल और न्यायप्रिय होते हैं, अपनी प्रजाके दुःख को अपना दुःख भौर उसके मुखको अपना सुख समझते हैं, रात-दिन प्रना की भलाई की चिन्तामें ही लगे रहते हैं, उनका राज्य अटल रहता है। हमार-हजार बलशाली शत्रु भी उनकी ओर आँख उठा कर नहीं देख सकते , किन्तु जो राजा प्रजा को दुःख देते हैं, उस पर अत्याचार करते हैं, उसका धन-माल और जायदाद जबरदस्ती छीन लेते हैं, उन राजाओं से प्रजा अप्रसन्न हो जाती है। प्रजाके अप्र- सन्न रहने से राज्य की नींव ढीली हो जाती है। क्योंकि प्रजा से ही राजा का राज्य है, यदि प्रजा न हो तो राज्य कैसा? प्रजाको नाराज करके, जोर से राज्य करने वाले का राज्य, बादल की छाया या बालू की भीत के समान है।
पहला अध्याय। २१ सातवीं कहानी। ए ऐसेर तुरा नाने जवीं खश न नुमायद । माशूफ मनस्त ऑकि ब नजदीक तो जिश्तस्त ॥ 55 क बादशाह एक ईरानी गुलाम के साथ जहाज में बैठा हुआ था। उस गुलामने न तो पहिले का कभी समन्दरही देखा था न जल-यात्रा का कष्ट- ही अनुभव किया था। वह रोने-चिल्लाने लगा और उसका सारा शरीर कांपने लगा। लोगोंके बहुत-कुछ दम-दिलासा देने पर भी उसकी तसल्लो न हुई। बादशाह के आराममें चलल पड़ा। उसके शान्त करनेका कोई उपाय न निकला। एक तत्त्वज्ञानी मनुष्य भी उसी जहाज़ में बैठा हुआ था। कहा,-"यदि आना हो, तो मैं इसे चुप कर दूं।" बाद- शाहने कहा,-"घड़ी मिहरवानी होगी।" उस बुद्धिमानने जहाजबालो को हुक्म दिया कि, इसे समन्दर में डाल दो। उसने कई गोते खा लिये, तर लोगोंने उसके सिरके बाल पकड जहाज की तरफ़ खींच लिया और दोनों हाथो के बल पतवार से लटका दिया। घावश्यकता के ममयदी हर चीज को कदर होता है। भूत मी पर.पान रोते हैं। इसीरिये मेरा नाम तुझे मरा नही लगता है गई पापं न। उस ने कर उसे mim गुलिस्ता। जब वह पानी से बाहर आया, तब चुप-चाप अहाज़ के एक कोने में बैठ गया। बादशाह ने प्रसन्न होकर पूछा, कि यह किस तरह चुप हुआ। बुद्धिमान् ने उत्तर दिया,---"पहले न तो यह डूबनेके दुःखकोही समझता था और न जहाज़ में बैठने के सुखकोही जानता था। इसो भांति जिसने दुःख भोगा है, वही सुख की कदर जानता है। जिसका पेट भरा हुआ है, उसको जौकी रोटी अच्छी नहीं मालूम होती। जो दूसरेको कुरूपा मालूम होती है, वही मुझे मनोहर सुन्दरी मालूम होती है। स्वर्ग की अप्सराओं के लिए पाप-शोधक स्थान नरक है और नरक- वालोके लिये पाप-शोधक स्थान स्वर्ग है। जिसकी प्रेमिका बग़ल मे है और जो अपनी प्रेमिकाकी इन्तज़ारी में दरवाजे पर आँखें लगाये हुए है, उन दोनों में अन्तर है। शिक्षा-दुःख भोगनेसेही मुखको कदर मालूम होती है।
पहला अध्याय। आठवों कहानी । अज़ॉ कज तो तरसद वर्स ऐ हकीम । व गर बा चुनो सद वराई वजंग ॥१॥ गोने हुरमुजवादशाह से पूछा,-"आपने अपने वापके वजीरों में क्या दोष देखा, जो उनको कैद करनेका लो एवम दिया ?" उसने उत्तर दिया,--"मैंने उनमें कोई दोष नहीं देखा, किन्तु यह देखकर कि, वे मुझसे बात ही डरते हैं और मेरे पवन पर पूरा भरोसा नहीं करते, मुझे भय हुआ कि कहीं ऐसा न हो, कि वे लोग अपने बचावके लिए मुझटी मार टालने की चेष्टा फर-इसलिये मेंने महात्माओं की शिक्षाके अनुसार फाम किया है ।" महापुरुष कहते हैं, जो तुम से डरते है. तुम उनसे उरो, चाचा वैसे तो को तुम युद्ध में पराम पर सको। फ्या तृ नहीं जानता कि, बिल्ली जर निगश हो जाती है, तब अपने पक्षों से चीते की जां निकाल लेती है। साँप अपना सिर पत्थर से पुचले जानेके भयले चरवाहे फो फाटताहै। शिक्षा-त्रो गुम पर विश्वास न रखतें, मुमारी दातों को प्रदेश कोरपिसे देखते ते, तुम से भयभीत रहते हों, उन लोगों गण्यिाप मत करो। सो तुम से परतारे यससे मीटर - री सोर, मे धामिदोन सहा मेरा एना।
२४ गुलिस्तां । नवीं कहानी। रोज़गारम बशुद ब नादानी । मन न करदम शुमा हज़र ब कुनेद ॥१॥ रान का एक बादशाह बुढ़ापे में बीमार हो गया। उसके बचनेकी कोई आशा न रही। इसी समय एक सवार दरवाजे पर आया और यह खुशखबरी लाया,-"मैंने हुजूर के इक़बाल से फ़ला किला अपने कब्जे मे कर लिया है और शत्रु भी कैद कर लिये गये हैं। उस अञ्चल की सेना और प्रजा ने आपकी अधीनता स्वीकार कर ली है।" बादशाह ने यह ख़बर सुनकर ठण्डी सांस भरी और कहा,-"यह ख़बर मेरे लिये नहीं है, बल्कि मेरे शत्रुओ के लिए है, जो मेरे पीछे मेरे राज्यके मालिक होगे। मैंने अपना बहुमूल्य जीवन अपनी इच्छाओको पूरी करनेकी आशामें व्यर्थ किन्तु अब क्या होता है; क्योकि अब बीती हुई जिन्दगी के फिर लौटनेकी आशा नही है। इस समय मौत कृचका नक्कारा वजा रही है। ऐ आँखो ! तुम मेरे सिर से जुदी हो जाओ। हाथ, भुजा और हथेलियो! तुम सब परस्पर "मैंने अपना जीवन मूर्खता में काटा, मैं कर्त्तव्य- मैं कर्त्तव्य-पालन न कर सका- तुम मेरे जीवन मे शिघा लाभ करो, उसका अनुकरण मत करो।" गंवाया।
पहला अध्याय। विदाई लो। मेरे मनोरथो के शत्रु काल ने मुझे धर दबाया है। हे मित्रो! मेरा जीवन मूर्खता में बीता। मैंने अपना कर्तव्य पालन नहीं किया । मेरा अनुकरण कोई न करना।" शिक्षा-ससार में जिसे देखो वही किसी न किसी प्रकार की प्राशा और तृष्णा में गिरफ्तार है। कोई अपना राज्य बढ़ाना चाहता है, कोई अपना धन बढ़ाना चाहता है, कोई हाथी-घोड़े वा बग्घी की सवारी चाहता है, कोई राजदरबार में मान पाने की इच्छा रखता है। एक इच्छा पूरी होते न होते, दूसरी पैदा हो जाती है। इसी तरह भाशा और तृष्णा के फन्दे में फंसकर, मनुष्य अपने अमूल्य और दुष्प्राप्य जीवन को बर्बाद करता है । मनुष्य की इच्छाओंका अन्त नहीं होता, किन्तु उसके शरीर के अन्त होने का समय था जाता है। अन्तिम समयमें धन, राज्य, पदवी धौर कोई मनुष्यके साथ नहीं जाता, साथ जाता है केवल धर्म , अतः बुद्धिमान् को, व्यर्थ की इच्छाओंके फेरमें पड़कर, अपना अमूल्य जीवन व्यथ न गवाना चाहिए। किन्तु उसे सदा अपने कर्तव्य-धर्मके पालन करने में लगाना चाहिए। -
गुलिस्तां।
दसवीं कहानी।
क समय,
मैं
दरवेशो ग़नी बन्दये ई खाके दरन्द ।
आनॉ कि ग़नी तरन्द मुहताज तरन्द ॥१॥
दमश्क की बड़ी मसजिदमें, पैग़म्बर
ए औलिया यहिया की कब्र के सिरहाने बैठा था।
अरब का एक बादशाह, जो अन्याय के लिये प्रसिद्ध
था, वहाँ तीर्थ करने आया। उसने औलिया की पूजा और
उसका ध्यान करके निम्नलिखित बातें कहीं,—गरीब और अमीर
सव इस देहली के दास हैं और जो बहुतही धनवान् हैं उनकी
तृष्णा सबसे अधिक है।"
पीछे, उसने मेरी ओर देखा और कहा,-"फ़क़ीर लोग
ईश्वर के सच्चे और पक्के प्रेमी होते हैं। आप मेरे साथ ईश्वरसे
प्रार्थना कीजिए ; क्योंकि मुझे एक बलवान् शत्रु का भय है।"
मैंने जवाब दिया,-"निर्बलोंपर दया करो, तो बलवान् शत्रु
तुम्हें कष्ट न दे सकेंगे। निर्बल और निस्सहाय प्रजा को बाहु-
बल से दबाना अपराध है। जो गरीबोंसे मेलजोल नहीं रखता
उसे सदा भय रहता है , क्योंकि अगर किसी समय उसका पैर
अमीर गरीब सभी ज़रूरतें रखते हैं इसलिए दीन हैं-अमीरों की
जरूरतें भी ज़ियादा हैं. इसलिए नौरों की अपेक्षा वे दीन भी ज़ियादा ॥१॥
पहला अध्याय।
२७
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फिसल जावे, तो उसे कोई हाथ का सहारा न देगा। जो वदी
का वीज बोता और नेकी के फलकी आशा करता है, वह वृथा
अपने दिमाग को तकलीफ़ देता है और झूठे विचार बांधता
है। कानसे रूई निकाल ले और मानव-मात्रके प्रति न्याय
कर। अगर तू न्याय न करेगा, तो किसी न किसी दिन तुझे
उसका दण्ड भोगना पड़ेगा।
आदम के बच्चे एक दूसरे के अङ्ग
हैं और एकही तत्त्वसे
बने हैं। जबकि एक अङ्ग को तकलीफ़ होती है, तब दूसरे
को भी होती है। जो दूसरो की तकलीफ़ों को लापरवाही की
नज़रसे देखता है यानी दूसरों की तकलीफों से बेफिक्र रहता
है,वह "आदमी" कहलाने योग्य नहीं है।"
शिक्षा-मनुष्य
को मनुष्य-मात्र पर दया रखनी चाहिए। निर्दल,
निस्सहाय और निर्धनों पर भूल कर भी अत्याचार न करना चाहिए;
किन्तु दुनियोंके दुःख को अपने समान समझ, उनके दुःख दूर करने का
उपाय करना चाहिए। जो ग़रीबों पर जुल्म करता है, उसे मुसीबत के
दिन कोई सहायक नहीं मिलता। निश्चय है, कि बुराई करनेसे भला फल
नहीं मिलता। बदी करनेसे किसीको अच्छा फल न तो मिला और न
मिलेगाही। अतः मनुष्य-मात्र के प्रति दया और सहानुभूति दिखानाही
मनुष्य-मात्र का कत्तव्य है।
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२८ गुलिस्ता। ग्यारहवीं कहानी। -- ऐ जबर्दस्त जेरदस्त आजार । गर्म ताके बमानद बाजार ॥१॥ बचे कार आयदत जहाँदारी। मुरदनत वेह कि मर्दुमआजारी ॥२॥ ah क दफ़ा बग़दाद में एक ऐसा फ़कीर आया, जिसने कभी निष्फल प्रार्थना न की थी; अर्थात् वह जो प्रार्थना करता था, उसे ईश्वर मंजूर कर लेता था । ज्योंही हजाज यूसुफ़ को उसके आने की खबर लगी, उसने उस फ़क़ीर को बुलाया और कहा, "मेरे लिए ईश्वरसे दोआ मांगो।" उसने कहा,-'हे ईश्वर! इसे मार डाल।" हज्जाज ने पूछा,-"ईश्वर के लिए, यह किस प्रकार की प्रार्थना है ?" उसने उत्तर दिया:-'यह तेरे और सब मुसल्मानो के लिए, शुभकामना है। तू बलवान् होकर निर्बलों को सताता है। तेरा यह जुल्म कब तक कायम रहेगा ? बहुतही अच्छा हो, अगर तू मर जावे; क्योकि तू मनुष्यों पर अत्याचार करने बाला है। ऐ जबरदस्त, ऐ परपीड़क ! तू कब तक दूसरों को तकलीफ देगा ? तेरा धन-सम्पद् किस काम आयेगा? तू मनुष्य-परिक है, अतएव तू जितनी जल्दी मर जाय, अच्छा है। .
पहला अध्याय। २६ शिक्षा–साधुओंको स्पष्टवादी होना चाहिए। उन्हें चाटुकारितासे दूर रहना चाहिए। बारहवीं कहानी। MARDA.- वाँ कि ख्वावश बेहतर अज़ वेदारियस्त । आँ चुनाँ बद जिन्दगानी मुर्दा बेह ॥१॥ सी ज़ालिम बादशाह ने किसी धर्मपरायण मनुष्य कि से पूछा,-"मैं किस प्रकारकी उपासना करूँ, जिससे मुझे बहुतसा पुण्य हो ? उसने जवाब दिया,--"तुम दोपहरके समय सोया करो, क्योकि जितनी देर तुम सोते रहोगे, उतनी देर लोग तुम्हारे ज़ल्मसे बचे रहेंगे।" जब मैंने एक ज़ालिम-अत्याचारी को मध्याह्नकाल में सोते हुए देखा तो मैंने कहा, "वह अत्याचारी है, इससे उसका नींद के वशमें रहना अच्छा है। जिसके जागनेसे सोना अच्छा है, उसकी बुरी ज़िन्दगी से उसका मरना भला है।" जो अत्याचारी है उसका सोना जागने से अच्छा है। सच तो यह है। कि उसके जीवन से उसका मरण ही भच्छा है।
गुलिस्ताँ।
शिक्षा--अत्याचार जुल्म-- करना अच्छा नहीं है। अत्याचारी
का अत्याचार सदा स्थिर नहीं रहता। एक न-एक दिन अत्याचारी को
मौत अपने चुजल में फंसाही लेती है। अन्तमें, अत्याचारीके अत्याचार
की कहानी अथवा बदनामी रह जाती है। अत्याचार ईश्वर और
मनुष्य
सबके लिए अप्रिय है। इसलिए अत्याचारी का परिणाम बुराही
होता है।
तेरहवीं कहानी।
SA
अवलहे को रोजे रौशन शमा काफूरी निहद ।
जूदवीनी कश ब शब रोगन नमानद दर चिराग ॥१॥
ने एक बादशाह के विषय में सुना, जिसने तमाम
मैं रात ऐश व आराम में बिताई और जब उसे खूब
नशा चढ़ा तब कहने लगा,-"मैंने, अपने जीवन
मे, आज की भाँति सुख कभी नहीं पाया, क्योंकि इस समय
जो मूर्ख दिन-दहाड़ काफ़र की बच्ची जलाता है, उसको एक दिन ऐसा
भायेगा जो रातको जलाने के लिए तेल भी न मिलेगा। उसकी फिजूलखर्ची
एक दिन विषमय फल लायेगी ही ॥१॥
पहला अध्याय ।
३१
मुझे बुराई-भलाई का कुछ ध्यान नहीं है और न मुझे किसीसे
दुःख है।" एक नङ्ग फ़कीर ने जो बाहर सर्दीमे सो रहा था,
बादशाह की यह बात सुनी और कहा,-"ऐ बादशाह ! तेरे
समान बलवान् कोई नहीं है और तुझे किसी प्रकारका कष्ट
भी नही है; परन्तु क्या तेरा हम लोगोसे कुछ मी सम्बन्ध
नही है ?” बादशाह इस बातसे बहुत ही प्रसन्न हुआ और
एक हज़ार दीनारों का तोड़ा निकाल कर उससे कहा,-
'ऐ फ़कीर! पल्ला फैला।" उसने उत्तर दिया:-"जब मेरे
पास कपड़ा हो नहीं है, तब पल्ला कहाँसे लाऊँ ?"
बादशाह को फकीर की दोन दशा पर बहुत ही दया
आई और उसने रुपयोंके साथ एक कपड़ा भी उसके पास
भिजवा दिया। फ़कीर उस धन को थोड़े ही दिनों में उड़ा
कर फिर आगया। धर्मात्माओके हाथ में धन नही टिकता,
प्रेमो के दिल में सब नही रहता और चलनीमे पानी नही
ठहरता।
एक समय, जव बादशाह को उस फकीर का ध्यान भी न
था, किसी ने उसका ज़िक्र छेड़ा। वादशाह नाराज़ हुआ
उसकी तरफसे उसने अपना मुँह फेर लिया। ऐसेही मौके के
लिए अवलमन्दोंने कहा है, "बादशाहों के कोप से बचना
चाहिये, क्योंकि अक्सर बादशाहोंका ध्यान राज्यके ज़रूरो-
ज़रूरी मामलोमें उलझा रहता है। उस समय जो लोग उनके
ध्यानमें विघ्न-बाधा डालते हैं, उनसे बादशाह नाराज़ हो जाते
और
गुलिस्ताँ।
~~~~~
हैं। जो शखूस अच्छा मौका नहीं देखता, उसे बादशाह से
कुछ नहीं मिलता। जब मौका हाथ न आवे, तब बेहूदा
बातें करके अपना काम न बिगाड़ना चाहिए। बादशाह ने
कहा,- 'इस गुस्ताख और फिजूल-खर्च को निकाल दो।
इसने इतना धन बात-की-बात में फूंक दिया। बैतुलमालका
खजाना ग़रीबों को टुकड़े देने के लिये है, न कि शैतान के
भाइयोंकी दावतके लिए। जो मूर्ख दिन में कपूर की बत्ती
जलाता है, उसको चिराग़में जलाने के लिये रात के समय तेल
नहीं मिलता।" एक बुद्धिमान् मन्त्री ने कहा,-"बादशाह !
इस श्रेणी के लोगों की परवरिश के लिए कुछ रकम अलग
मुकर्रर कर दीजिए, जिससे ये लोग फिज़ लखर्ची न कर सकें।
परन्तु आपने नाराज़ होकर, इन लोगों से बिल्कुलही
सम्बन्ध न रखने की जो आज्ञा दी है, वह सच्ची उदारता के
सिद्धान्तोंके विरुद्ध है। किसी पर दयालु होकर, उसको आशा
दिलाना और फिर एकदम निराश करके मार डालना अच्छा
नहीं है। बादशाह लोगो को अपने पास आने नहीं देता;
किन्तु जबकि सखावतका दरवाज़ा खुल जाता है, तब वह
उसे ज़ोर से बन्द भी नही कर सकता। समन्दर के किनार
कोई प्यासा मुसाफिर नज़र नहीं आता। जहाँ मीठे पानीका
चश्मा होता है, वहीं मनुष्य, पशु, पक्षी और कीट-पतद्ग
जमा
हैं
शिक्षा-इस कहानी से हमें कई शिक्षाएँ मिानती है -
पहला अध्याय। ३३ मनुष्यको अपने ही सुख में न भूले रहना चाहिए। दीन-दुखियोंके दुःख की भी खबर रखनी चाहिए तथा मनका कष्ट निवारण करना चाहिए। (२) वादशाह या अमीरों से मौका देखकर बात करनी चाहिए। जो बिना मौका देखे मुंह से बात निकाल बैठते हैं, वे अपनी बात बोते और कुछ लाभ नहीं उठाते। (३) मनुष्य को समझ-बूझ कर खच करना चाहिए, जो फिजूल-खर्ची करते हैं वे दुःख पाते हैं। (४) दानका सिलसिला सदा जारी रखना चाहिए, कि यह वास्तविक दीन-दुखियों के काम आवे । चौदहवीं कहानी। चो दारन्द गज अज़ सिपाही दरेग । दरेग आयदश दस्त बुर्दन व तेग ॥१॥ BRANATE क बादशाह अपने राज्य की रक्षा की ओर बिल्- कुल ध्यान न देता था, यहां तक कि सेना-सामन्त- को वेतन आदि भी न देता था। सेना के सिपाहि- योंको इस प्रकारके व्यवहार से इतना कष्ट हुआ, कि जव एक ए जो लोग सिपाहियों की धन-द्वारा रक्षा नहीं करते; सिपाही भी तलवार द्वारा उनकी रक्षा नहीं करते ॥१॥ ३ 7.
बातका गुलिस्ता। शक्तिशाली शत्रुने बादशाहपर आक्रमण किया, तो सिपाहि- योने उसका सामना करनेसे इनकार कर दिया। सैनिकोकी तनख़्वाह रोक रखने से, वे लोग तलवारको हाथ लगाना नहीं चाहते। नौकरी छोड़कर बैठ जानेवाले सिपाहियो में से एक मेरा वड़ा मित्र था। मैंने उसे धिक्कार कर कहा-"एक सामान्य बातके कारण, अपने पुराने मालिकके अनेक वर्षों- के अनुग्रहको बिल्कुल भूल कर, विपदके विपदके समय, उसका साथ छोड़ देना, बहुतही नीचता, बदनामी और कृतघ्नताका काम है।" उसने उत्तर दिया,-"यदि आप इस पूरा-पूरा हाल सुनेंगे, तो मुझे दोषी न कहेंगे। मेरा घोड़ा दाने बिना मरने पर आगया था। उसके चारजामेका कपड़ा फटकर चिथड़ा हो गया था। इस हालतमें भी, शाह- जादे ने लोभके मारे सिपाहियों का वेतन रोक रक्खा था। फिर भला, वे लोग उसके लिए अपनी जान देनेको किस तरह तैयार हो सकते थे? वीर योद्धाओ को धन देकर सन्तुष्ट रखना चाहिए, कि जिससे काम पड़नेपर वे लोग दे सकें क्योंकि यदि वे आपके पाससे वेतन न पावेंगे, तो धन पानेकी आशा से, किसी दूसरे के पास जा रहेंगे । योद्धाओं का पेट भरा रहने से वे बड़ी धीरताके साथ युद्ध करते हैं। परन्तु यदि भूखे रहते हैं, तो उन्हें मजबूरन रणसे पीठ दिखाकर भागना । अपना सिर पड़ता है।" शिक्षा-राजा-बादशाहों को अपनी सेना के प्रेमिकों तथा नौकरों का
पहला अध्याय।
३५
वेतन बिमा होल-हुज्जत के, समय पर, दे देना चाहिए। सभी बड़े भादमियों
को, जिनके यहाँ मौकर रहते हों, फौरन उनकी तनख्वाह दे देनी चाहिए।
नौकर लोग जिससे वक्तपर तनख वाह पाते हैं, उसके काममें कोताही
नहीं करते और समय पर, अपने स्वामीके लिए, अपना सिर दे देने में
भी माना-कानी नहीं करते।
पन्द्रहवी कहानी।
आनॉ कि बकुजे आफियत बनशिस्तन्द ।
दन्दाने सगो दहाने मर्दुम वस्तन्द ॥१॥
AKANK सी वज़ीर की नौकरी छूट जाने पर, वह साधुओं-
कि के एक समाज में जा मिला। महात्माओं की
र सङ्गति से उसके हृदयमें बड़ी शान्ति उत्पन्न हुई।
कुछ दिन याद, बादशाह की कृपा-दृष्टि फिरी और उसने उसे
फिर काम करनेकी आज्ञा दी। परन्तु वज़ीरने यह आज्ञा
स्वीकार न की और कहा, 'काममें लगे रहनेकी अवस्थासे
-
ना
जो लोग एकान्त-वास करते हैं, उनको कोई हानि नहीं पहुंचाता ।
कनों के दाँत भौर भादमियों के मुंह उनके लिए बेकार हो जाते हैं ॥१॥
३६
गुलिस्ता।
पदच्युति की अवस्था अधिक सुखद है। जो लोग संसारकी
माया-ममता छोड़ कर, एकान्त में जाकर वास करते हैं, वे सब
प्रकारको चिन्ताओं और भयसे मुक्त रहते हैं एवं स्वतन्त्रता-
पूर्वक सुख भोगते हैं।' बादशाह ने कहा, "मुझे अपने
राज्यशासन के लिए तुम जैसे योग्य मनुष्य की बहुतही
आवश्यकता है।" वज़ीरने अपने मनमे कहा, कि मैं नौकरी
करना स्वीकार नहीं करता, इसीसे मैं योग्य व्यक्ति समझा
जाता हूँ। हुमाँ हड्डी खाकर अपना निर्वाह करता और
किसीको हानि नहीं पहुँचाता, इसीसे लोग उसका सब
पक्षियोंसे अधिक आदर करते हैं।
दृष्टान्त-लोगोने सियाह गोश से पूछा,-"तुम दासकी
तरह सिंहके साथ रहना क्यों पसन्द करते हो?" उसने
उत्तर दिया,-"इसका कारण यह है कि, मुझे उसके शिकार
का बचा-खुचा माल खानेको मिलता है। उसकी शरणमें
रहनेसे, उसके पराक्रमके प्रभाव से, शत्रु लोग मेरा कुछ अनिष्ट
नहीं कर सकते।" लोगोने पूछा,-"जब तुम उसकी शरण
मे रहते हो और कृतज्ञतापूर्वक उसके उपकार को स्वीकार
करते हो, तो फिर उसके बिल्कुल नज़दीक क्यों नहीं चले
जाते, कि जिससे वह तुम्हें, अपने और प्रधान नौकरोके साथ
मिलाकर, अपना प्रिय मन्त्री बना ले ?" उसने उत्तर
दिया,-"उसका मिज़ाज ऐसा कड़ा है, कि मैं उसके निकट
जानेमें अपना कल्याण नहीं समझता ।" यद्यपि अग्नि-पूजक
पहला अध्याय। - सौ वर्ष तक आगको जलाता रहे; तोभी, अगर वह दम-भर- के लिए भी उसमें गिर पड़े तो भस्म हो जाय। ऐसा अक्सर हुआ करता है, कि कभी तो मन्त्री राजासे धन-माल पाता है और कभी उसके हाथ अपना सिर गवाता है। ऋषियोंने कहा है, कि राजाओंके चञ्चल स्वभाव से सावधान रहो; क्योंकि वे लोग कभी तो प्रणाम करनेसे भी अप्रसन्न हो जाते हैं और कभी गालियां देनेसे भी सम्मान करते हैं। बुद्धिमान् लोग कह गये हैं, कि चालाको दरबारियों के लिए गुण है और महा- त्माओंके लिए दोष । मनुष्य को चाहिए, कि अपना चरित्र ठीक रक्खे और हंसी-दिल्लगी एवं खेल-तमाशा राज-कर्मचारियों के लिए छोड़ दे। शिक्षा-रान-सेवा करना और नङ्गी तलवार की धार पर चलना एकही बात है। राज-सेवासे मनुष्य बहुधा मालामाल हो जाता है सही ; किन्तु उसके चित्त में शान्ति नहीं रहती पार मौका पढ़ने पर उसे अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है। राज-सेवा की अपेक्षा एकान्त- वाप्स अच्छा है। उसमें खटका नहीं रहता। चिन्ता-फिक्र-भय उससे हजारों कोस दूर भागते हैं। राज-सेवा से जो सुख मिलता है, वह ऊपरी सुख है भार परिणाममें प्राणघातक है, किन्तु एकान्तवास का मुख वास्तविक सुख है। वह इस लोक और परलोक दोनों में चिरस्थायी है।
गुलिस्ता। सोलहवीं कहानी। मे के आसानी गुज़ीनद खुश्तन रा। जनों फर्ज़न्द ब गुजारद व सख्ती ॥१॥ रे एक मित्रने, कुसमय की शिकायत करते हुए, मुझसे कहा, कि मेरा कुटुम्ब बहुत बड़ा है और मेरे पास इतना धन-धान्य नहीं है कि, मैं उसका पालन कर सकू। मुझ से दरिद्रता का भार नहीं उठाया जाता। बहुधा, मेरे चित्तमें ऐसा आता है कि, मैं किसी दूसरे देशमें जाकर, 'देश चोरी और विदेश भिक्षा' के अनुसार, किसी तरह अपना जीवन निर्वाह करूँ । बहुतेरे लोग उपवास करके सो रहते हैं और कोई जानता भी नहीं ; बहुतेरे मर जाते हैं और कोई उनके लिए रोता तक नहीं। और फिर, मैं यह भी सोचता हूँ कि, मेरे पीछे मेरा बुरा चीतने वाले शत्रु मेरे चालचलन पर हँसेंगे और अपने कुटुम्ब का पालन-पोषण करने में असमर्थ होनेके कारण, मुझे नार्मद कहकर बदनाम करेंगे। और कहेंगे,--"देखो, निर्लज अभागा अपने आरामके लिए अपने बाल-बच्चोंको छोड़ कर भाग गया है। उसका अपना पेट भरने वाला और अपन साथियों को दु'य में टालने वाला आदमी कमी सुखी नहीं हो सकता। धिक्कार है उनको जो अपना जीवन में काटते है और अपने बच्चे भोर स्त्रीका ध्यान तक नदी करते ॥१॥ . सुख
पहला अध्याय ।
३६
कभी भला न होगा।" आप जानते हैं कि, मैं गणित-शास्त्र में
थोड़ा-बहुत दखल रखता हूं। यदि आपकी कृपा और चेष्टा-
से मुझे कोई काम मिल जाय, तो मेरा चित्त शान्त हो जायगा
और मैं जन्मभर आपका कृतज्ञ बना रहूँगा। मैंने कहा,-
"मित्रवर! दुःखका विषय है, कि राजाओं की नौकरीमें दो
बातें रहती हैं: -एक ओर तो जीविका की आशा और दूसरी
ओर जीवन गवाने का भय । इसलिए जीविका की आशासे
अपने जीवन को सङ्कट में डालना वुद्धिमानोके मतके विरुद्ध है।
दरिद्र के घर पर कोई कहने को नहीं आता कि, ज़मीन या
वाग़ीचेका महसूल दे या दुःख और सन्ताप सहन कर अथवा
दुनिया भर की बलाये अपने सिर पर उठा ले।" उसने उत्तर
दिया,-"यह वात मेरी अवस्था के साथ विल्कुल मेल नहीं
खाती। आपने मेरे प्रश्नका ठीक उत्तर नहीं दिया।
आपने यह कहावत नही सुनी कि, बेईमानों का हाथ हिलाव
करते समय कांपने लगता है। सदाचारसे ईश्वर प्रसन्न रहता
है। मैंने सीधे रास्तेसे चलनेवाले को कभी गुम होते नही
देखा। महात्माओंने कहा है कि, चार प्रकारके मनुष्य दूसरे
चार प्रकारके मनुष्योंसे बहुत डरते हैं। अत्याचारी मनुप्य
राजा से ; चोर पहरेदार से ; व्यभिचारी चुगलखोर से और
वेश्या दण्डनायक से। परन्तु जिस मनुष्यका हिसाव ठीक है,
उसको हिसाव जांचनेवाले का क्या डर है? जो पदच्युतिकी
दशामें शत्रुओंकी बुराई से बचना चाहो, तो पदाधिकारकी
क्या
.
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गुलिस्ता। अवस्था में समझ-बूझ कर काम करो। भाइयो ! जो अपना चालचलन ठीक रखोगे, तो तुम्हें किसीका भी भय न रहेगा। देखो, धोबीके हाथ से पत्थर पर पछाँटेजानेका भय मैले कपड़ेकोही रहता है, साफ को नहीं । जो हर तरफ से साफ है, उसे किसी का भय नहीं।" मैंने उत्तर दिया,-"तुम्हारी दशाके साथ उस लोमड़ी का किस्सा खूब ठीक मिलता है, जिसको किसीने जी छोड़ कर भागी जाती देखकर पूछा, कि तुम्हारे ऊपर क्या आफत आई है, जो तुम इतनी भयभीत हो रही हो। उसने उत्तर दिया,-"मैंने सुना है कि, लोग ऊंट- को बेगारमें पकड़ते हैं।" उसने कहा,-'अरी मूर्खा ! ऊँटके साथ तेरा क्या सम्बन्ध ? तेरी और उसकी क्या बराबरी ?' उसने उत्तर दिया, 'चुप रहो! इन सब बातोंसे कुछ काम नहीं ; क्योंकि यदि कोई दुष्ट, मुझको फंसानेके इरादे से, मुझे भी ऊँट ही कह दे और मैं भी बेगारमे फंस जाऊँ, तो कौन मेरी खोज करेगा और मेरी ओर से वकालत करके मुझे छुड़ावेगा?' सम्भव है, इराकसे जहरमुहरा लाते-लाते साँप का काटा हुआ मनुष्य मर जावे। यद्यपि तुममे इतनी योग्यता और सचाई है ; लेकिन तोभी तुमसे जलनेवाले घात के स्थानमे और तुम्हारे शत्रु कोनेमें बैठे हैं। अगर वे लोग तुम्हारे अच्छे स्वभावको खराव सावित कर दें, बादशाह तुमसे तुम उसके क्रोधानलमें पड़ जाओ ; तो तुम्हारे पक्षमे कौन बोल सकेगा? यदि तुम अपनी इच्छाओं नाराज़ हो जाय और
पहला अध्याय।
४१
को त्याग दो और उच्च पद पानेके विवारों को छोड़ दो; तो
बहुतही अच्छा हो। क्योंकि महात्मा लोगोंने कहा
है:-"समुद्र में असंख्य अच्छी-अच्छी चीजें हैं ; लेकिन जो तुम
कुशल चाहो तो उन्हें किनारे से तलाश करो।" मेरा मित्र
वात सुनकर वहुतही नाराज़ हुआ। मेरी ओर क्रोध से देखने
लगा और रुखाई से कहने लगा:-"इसमें बुद्धिमानी, सफलता
समझदारी और तेज़फ़हमी की क्या बात है ? ऋषियोने कहा
है, कि मित्र कारागार जेल में काम आते हैं। * आनन्दके
दिनोंमें तो शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। जो लोग सम्पत्ति के दिनोंमे
अपना प्रेम और भ्रातृभाव दिखाते हैं, उनको अपना मित्र
मत समझो।
मैं तो उसे अपना मित्र समझता हूँ, जो आफत
के
समय मेरा
हाथ पकड़ता
है।"
मैंने देखा कि उसका दिल घवरा गया है और वह मेरी
सलाहसे यह समझता है, कि मैं उसे सहायता देना नही
चाहता। इसलिये मैं मालगुजारीके हाकिम के पास गया ।
उससे मेरी पहले की दोस्ती थी, इस लिए मैंने उससे सारा हाल
कहा। नतीजा यह निकला कि, उसने मेरे कहनेसे
मेरे दोस्तको एक साधारण सी नौकरी दे दी। थोड़ेही समयमे
उसके आचरण की योग्यता लोगोंकी नज़र में समा गई।
उसके इन्तजाम की तारीफ होने लगी। उसके दिन फिरे ।
उसकी पदवृद्धि की गयी। उसकी तकदीर का सितारा इतना
* राजद्वारे श्मशाने च यः तिष्ठति स दान्धवः ।
और सङ्कट
४२ गुलिस्ता। . ऊंचा चढ़ा, कि उसकी समस्त इच्छायें पूर्ण हो गई और वह बादशाहका कृपा-पात्र बन गया। लोग चारों ओरसे उस की तारीफ़ करने लगे और बड़े-बड़े आदमियोंमें उसका मान- सम्मान बढ़ गया। मुझे उसकी सौभाग्य-सम्पन्न अवस्था देख कर बहुतही प्रसन्नता हुई। मैंने उससे कहा:-"यार! काम- काज से घबराना मत, मनमें कभी दुःखी न होना; क्योंकि अमृत अँधेरे ही रहता है। ऐ मुसीबत में फंसे हुए भाई ! घबरा मत ; क्योंकि ईश्वर दयालु है। तकदीर की चञ्चल- ता पर रञ्ज न कर, क्योंकि धैर्य-सब-बहुत कड़वा होता है, किन्तु उसका फल मीठा होता है।" इसी मौके पर, दैवयोगसे, मैं अपने मित्रों के साथ मक्केकी यात्रा को चला गया। जब हम यात्रा से लौटे आ रहे थे, तब वह दो दिन का रस्ता चलकर मुझ से मिलने आया। उस समय वह फ़कीरोंकेसे कपड़े पहिने हुए बड़े सङ्कट में था। मैंने उससे ऐसी दशा हो जानेका कारण पूछा। उसने जवाव दिया,-"आपने मुझ से जैसा कहा हुआ । कुछ लोगोंने मुझसे जलकर, मुझ पर झूठे इलज़ाम लगाये। बादशाहने जांच होने तक की आज्ञा न दी। मेरे पुराने मेल-मुलाक़ातियों और मित्रोंने अपनी पुरानी मित्रता भुला दी और मेरी सफाई के लिये अपने होंठ तक न खोले। जब कोई ईश्वरेच्छा से नीचे गिरता है, तो तमाम दुनिया उसका सिर रौंदने लग जाती है। जब मनुष्य के अच्छे दिन " था, ठीक वैसाही
पहला अध्याय।
४३
होते हैं, तब लोग छाती पर हाथ धरकर उसकी तारीफ़
करने लगते हैं। सारांश यह है, कि मैं अबतक दुःख और
क्लेशोंसे दवा हुआ था। इसी सप्ताह, जव तीर्थयात्रियोके
सकुशल तीर्थ करके फिर आने की ख़बर मिली, मैं कारागारसे
छोडा गया हूँ ; किन्तु मेरी पैतृक सम्पत्ति सरकारने जब्त कर
ली है।" मैंने उत्तर दिया--"तुमने उस समय मेरी वात न
मानी। मैंने तुमसे पहलेही कहा था, कि वादशाहोंकी नौ-
करी दरियाई सफर की भांति लाभदायक होती है, परन्तु
खतरे से खाली नहीं होती । सफर में या तो धन हाथ आता
है या लहरोंमे जीवन गँवाना होता है। दरियाई सौदागर या
तो दोनों हाथों में सोना भर कर किनारे आता है या समन्दर
की लहरें उसे किसी न किसी दिन मृतक-अवस्थामें किनारे
पर फेंक देती हैं।" मैंने उसके अन्दरूनी घाव को नोचकर
बढाना या उसपर नमक छिडकना मुनासिब नहीं समझा :
इसलिए नीची लिखी हुई पंक्तियां कह कर मन में सन्तोष कर
लिया,-"तुम नहीं जानते, कि लोगों का उपदेश न मानने
से तुम्हें बेड़ियाँ पहननी पड़ेंगी। अगर तुममें विच्छू के
उडकी चोट सहने की हिम्मत न हो, तो उसके बिलमें अंगुली
न डालो।"
शक्षा-इस हामी से हमें यह गिना मिलती है, कि मनप्य को
अपने सच्चे और हितचिन्तक मिग्री-सलाह ज़रूर माननी चाहिए।
मपनी पासनामों को कम करने, धोड़े से सखमें हो मन्तोष मानना
४४
गुलिस्तां ।
चाहिए। बादशाही नौकरी समझ-बूझकर करनी चाहिए और बाइशाहकी
कृपा को चिरस्थायी न समझना चाहिये ; क्योंकि बादशाही दरबारमें
चुगलखोरों का बढ़ा ज़ोर रहता है और राजा लोग कामोंके कच्चे होते
h
सत्रहवीं कहानी।
मैं
सगो दर्बान चो याफतन्द गरीब ।
ई गिरेवॉनश गीरद ऑ दामन ॥१॥
SHEETE कुछ ऐसे आदमियोंकी सङ्गतिमें बैठा-उठा करता
था, जिनका चाल-चलन ज़ाहिरा बहुत अच्छा
मालूम होता था। एक समृद्धिशाली पुरुष उन
लोगोंपर बहुतही श्रद्धा रखता था। उसने उनके भरण-पोषण
के लिए कुछ वृत्ति नियत कर दी थी; परन्तु उनमें से एक मनु-
ज्यने कुछ ऐसा काम किया जो फ़क़ीरोंकी चालके विरुद्ध था,
इसलिए उस समृद्धिशाली पुरुषकी श्रद्धा उन
लोगों पर न
रही ; उन लोगोंकी वृत्तिमें बाधा पड़ गई। मैं किसी उपाय
से उनकी वृत्ति—जीविका-फिर जारी कराना चाहता था ।
3B
in
गरीन कारईस के घर गुज़ारा नहीं। वहाँ उसको दो शत्रुओं स मुकावला
करना पड़ता है। एक द्वारपाल से और दूसरे-कुत्ते से। इसलिए वहाँ
बिना किसी वसोले के जाना उचित नहीं ॥१॥
पहला अध्याय।
इसी इरादेसे, मैं उस अमीरकी खिदमत मे गया, परन्तु उसके
दरवानने मेरा अपमान किया और मुझे उसके पास तक न
जाने दिया। मैंने इस कहावतके अनुसार, उसकी वातका कुरा
न माना कि, "जो कोई किसी मीर, वज़ीर या वादशाह के
पास विना वसीलेके जाता है, तो दरवान लोग उसे गरीब
समझ कर उसका गला पकड़ते हैं और कुत्ते दामन पकड़
कर खींचते हैं।" जव उस अमीरके प्रधान कर्मचारियोंको मेरा
हाल मालूम हुआ ; तो वे लोग मुझे बड़े आदर-सम्मान से
अन्दर ले गये और मुझे अच्छे स्थान पर विठाया। परन्तु मैने
बड़ी दीनता के साथ नीचे बैठकर कहा, "मुझे क्षमा कीजिए,
मैं नीचे दर्जेका आदमी हूं, मुझे नौकरोंकीही श्रेणी में
बैठने दीजिये।" अमीर ने कहा,-"आप यह क्या करते
हैं ? अगर आप मेरे सिर और आंखों पर बैठो, तोभी
मुझे इनकार नहीं। आप प्रोति करने योग्य हैं।" खैर, मैं
वैठ गया और अनेक प्रकारकी बातचीत हो जानेके बाद,
जब मेरे मित्र का ज़िक आया तो मैंने पूछा,-"हुजूर
ने ऐसा क्या दोष देखा, जिससे हुजूर को तावेदारसे इतनी
घृणा हो गई? फेवल ईश्वरही ऐसा दयाशील और
महत्व-पूर्ण है, कि जो दोप देखकर भी, किसी की रोजी वन्द
नहीं करता।" उस अमीरको मेरी बात भली मालूम
हुई और उसने मेरे मित्र की वृत्ति-जीविका-फिरसे जारी
कर दी और जो कुछ बाकी था, वह भी चुका देनेकी माना
४६ गुलिस्ताँ। देदी। मैंने उसकी उदारता की प्रशंसा की और अपनी कृत- ज्ञता प्रकट की तथा अपनी गुस्ताखीके लिए माफ़ी मांगी, चलने के समय मैंने यह कहा कि, "मकाका मन्दिर लोगोंको मनोवाञ्छित फल देता है, इसीलिए अनेक लोग वहाँ जाते हैं। अतः आपको भी हमारे जैसे लोगोकी अड़ियल प्रार्थना- पर ध्यान देना चाहिये। जिस वृक्षमें फल नहीं होता, उस पर कोई पत्थर नही मारता।" शिक्षा-इस कहानीसे हमें यह शिक्षा मिलती है, कि हमें अपराधी और निरपराधी सब पर दया-दृष्टि रखनी चाहिए। जिस तरह चन्द्रमा राजा-तपस्वी, अपराधी-निरपराध और चाण्डाल सबके घरों में अपनी चाँदनी छिटकाता है ; सूर्य बुरे-भले सपके घरोंमें उजियाला करता है; उसी तरह हमें भी अपराधी-निरपराध दीन-दुखियों पर दया प्रकाश करनी चाहिए। शैख सादी ने स्वयं कह दिया है, कि विश्वम्भर अपने विश्व के खुरे-भले सब जीवों को जीविका पहुंचाता है ।
पहला अध्याय।
४७
अठारहवीं कहानी।
अगर गञ्ज कुनी वर आमयाँ वश ।
रसद हर कदखुदाए रा विरजे ॥१॥
चरा न सितानी अज हर यक जवे सीम ।
कि गिर्द आयद तुरा हर रोज गजे ॥२॥
Hettes सी राजकुमारको, पिताके मरने पर, वहुतसा धन
कि मिला। उसने उदारताका हाथ खोल दिया और
अपनी प्रजा तथा सेनाको बेशुमार इनाम-इकराम
दिया।
अगर तुम
अगर की बनी हुई तश्तरीसे सुगन्ध नहीं निकलती, उस
आग पर रक्खो तो अम्बर की महक आने लगे।
बड़प्पन चाहो तो दानी वनो ; क्योंकि बिना दाना छितराये
अन्न पैदा नहीं होता। दरवारियोंमें से एक ने अविवार-पूर्वक
उपदेशके ढंग से कहा,-"भूतपूर्व राजाओंने इस खज़ानेको
बडी मिहनत से जमा किया है और किसी जरूरत के वक्त
लिए इकट्ठा करके रक्खा है। अत. आप अपनी दानशीलता,
अपना सजाना लुटाकर भी माप किमी का मना नहीं कर सकते।
ऐसा करनेसे किसी का भी उपकार न होगा। किसी के पास एक दाने में
अधिक नही मारेगा ; किन्तु पदि तू अपनी प्रगसे एक एक दाना मी रोज
लेगा तो निरपरी तेरा खजाना भर नागा ॥१॥२॥
४८
गुलिस्ता।
उदारता को रोकिये ; क्योंकि आपके आगे दरिद आता है और
पीछे दुश्मन लगे हुए हैं। आपको इस तरह ज़रूरत के समय
काम आनेवाले धनको खो देना मुनासिब नहीं। अगर आप
अपने ख़जानेमे से सब लोगोंको एक-एक दाना भी देने लगें, तो
प्रत्येक कुटुम्ब के एक मनुष्य के हिस्से में एक-एक दानेसे
अधिक न आवेगा। आप हर मनुष्य से एक-एक दाना चांदी
का क्यों नहीं लेते, जिससे आप के लिए गेज़ एक ख़ज़ाना
तय्यार हो जावे ?" यह बात राजकुमारके स्वभावके विरुद्ध
थी। वह इस बात से चिढ़ गया और कहने लगा,-"उस
नित्य, अनादि, अनन्त, सर्वशक्तिमान ईश्वरने मुझे इन जाति-
योंका राजा इस ग़रज़से बनाया है, कि मैं आप सुख भोगूं और
दान करूं। मैं ख़ज़ाने का पहरा देने के लिये सन्तरी नहीं हूँ।
कारूँ, जिसके पास चालोस कोठे धनसे भरे हुए थे, नाश
हो गया; किन्तु नोशेरवाँ मर कर भी नही मरा ।
अपना यश अमर कर गया।"
शिक्षा-इस कहानीसे हमें यह नसीहत मिलती है, कि धनको
सञ्चित रखना उचित नहीं। मनुष्य को चाहिए कि, धन को अपने मुख
और पराये सुखके लिए खर्च करे। 'कारूँ के पास बहुतसा धन था; पर
उसने दीन-दुखियोंको अपना धन दान न किया, इसलिए उसका कोई
नाम भी नहीं लेता; किन्तु नौशेरवा दानी था; उसे मरे हज़ारों घर्ष
बीत गये, किन्तु वह श्रान मरकर भी अमर है।
वह
पहला अध्याय। ४६ उन्नीसवीं कहानी। क अगर ज़ वागे रअय्यत मलिक सुरद सेवे । बर आवरन्द गुलामाने ओ दरख्त अज वेख ॥१॥ हते हैं, कि नौशेरवाँ किसो समय शिकार को गया था। जब वह शिकार मे मारे हुए जानवरों को पकवाने लगा, तो पास नमक न निकला। पास के गाँव मे नमक लानेके लिए नौकर भेजा गया। बादशाह ने हुक्म दिया कि, नमक का दाम दे दिया जावे जिससे बिना दाम दिये चीज लेनेकी चाल न वल जाये और गाँव ऊजड न हो। लोगोंने कहा,-"इस तुच्छ चीज़ से क्या हानि होगी?" वादशाह ने जवाब दिया,-"जल्म ससार में जरा-जरा करकेही पैदा हुआ था, जिसे प्रत्येक नवागन्तुक ने बढाया है, जिससे वह इस दर्जे तक बढ़ गया है। अगर बादशाह किसी किसान के बागीचेसे एक सेव खाता है, तो उसके नौकर-चाकर वृक्षोंको समूलही उखाड लेने राजा को अपनी प्रजा के मालकी रक्षा करनी चाहिये। अकार, उसके चारा का एक सेव भी उसे न लेना चाहिए। ऐसा करनेसे राग के नोकर-चाकर सो प्रजा के पाग को उजाद टालेंगे। उनको मो राजाका सारा चाहिए, फिर वे कर्तव्याकर्मव्यान्य होकर प्रजा के धन को लूटने मे भागा- है। -- पीज नही करते ॥१॥ ४ गुलिस्ताँ। अगर बादशाह पांच अण्डे ज़बरदस्ती छीन लेनेका हुक्म देता है, तो उसके सिपाही हज़ारो पक्षी छीन लेते हैं। अन्यायी- अत्याचारी नही रहता, किन्तु दुनिया का शाप उस पर हमेशा बना रहता है।" शिक्षा-इस कहानीसे हमें कदम-कदम पर न्यायपरायणता अथवा इन्साफ से चलनेकी नसीहत मिलती है। हाकिमों को चाहिए कि, भोप न्याय से चले और अपने अधीन लोगों को भी उसी रास्ते पर चलावे । बुद्धिमान लोग न्याय-मार्गसे एक कदम भी इधर-उधर नहीं होते। नौशे- रवा को मरे हज़ारों बरस बीत गये ; किन्तु वह अपनी इनसाफ़-पसन्दी और न्यायपरायणताके लिए श्राज मर कर भी नी रहा है । बीसवीं कहानी। मिसकीन खर अगचे वेतमीजस्त ।। चूं बार हमी बुरद अज़ीज़स्त ॥१॥ ने सुना है, कि किसी तहसीलदार ने राजा का सन्दूक भरनेके लिए प्रजाके घर उजड़ कर दिये। उसने महात्माओ के इस बचन दिया--जो मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य का दिल राजी गधा रेशक चेदा जानवर है, मगर हमारा बोझ दोता है, इसलिए हम मतलर यह कि माको "काम" पारा॥१॥ पर ध्यान न
पहला अध्याय।
५१
बेचारा गधा,
करने के लिए ईश्वर को नाराज़ करता है, ईश्वर उसी
मनुष्यको उसके नाश करनेका अस्त्र बना देता है। दुःखित
हृदय की आहसे जितना धुंआ निकलता है, उतना सदाव
नामक झाडी की आगसे भी नही निकलता। लोग कहते
हैं, कि शेर जानवरो का बादशाह है और गधा सबसे नोचे
दर्जेका जानवर है ; परन्तु महात्माओं की राय मे, बोझ ढोने
वाला गधा मनुष्य-नाशक सिंह से भला है
मूर्ख होने पर भी, बोझा ढोनेके लिए कीमती है। परिश्रमी
बैल और गधा उन मनुष्योंसे अच्छे हैं, जो दूसरोंको तकलीफ
पहुँचाया करते हैं।
बादशाहने उसकी बदवलनी की बात सुनकर, उसे शूली
देकर मार डालने का हुक्म दिया,-"जबतक तुम प्रजा का
मन हाथमे करनेका उद्योग न करोगे, तब तक तुम बादशाह
को प्रसन्न न कर सकोगे।" अगर तुम ईश्वरकी उदारता चाहते
हो, तो तुम उसकी सृष्टिके सङ्ग भलाई करो।
एक मनुष्य
जिस पर उसने ज़ल्म किया था, उस को शूली मिलते समय
उधर से निकला और कहने लगा, -- "मन्त्रित्व की शक्ति और
उच्च पदवीवाला मनुष्य, लोगोको कष्ट देकर, उनका धन हजम
नहीं कर सकता। अगर तुम कड़ी हड्डी खाओगे, तो वह
नाभिमें जाकर अटकेगी और पेट को फाड़ डालेगी।"
शिक्षा-इस कहानीसे यह शिक्षा मिलती है, कि मनुष्य को उच्चपदस्थ
होकर अपने भाइयों पर अत्याचार न करना चाहिए। मनुष्यों पर नरम,
--
५२
गुलिस्ता।
करनेवालेसे ईश्वर सखत नाराज होता है, अन्तमें पाप का घड़ा फूटता
है और मनुष्य अपने किये हुए दुष्कर्मों का फल भवश्य पाता है
मनुष्यको अपनी उन्नत अवस्था में ऐसा काम करना चाहिए, जिससे
लोग उसकी अवनत अवस्था में उसे प्रेम-दृष्टि से देखे , दिनके पाद रात
और रातके बाद दिन होता है । जो समय आज है वह कल न रहेगा।
जो भाज उच्चपद पर है, सम्भव है कि एक दिन वह पदच्युत हो जाये। महा-
कवि कालिदास कहते है,-
"नीचर्गच्छत्युपरि च दशा चकनेमिक्रमेण ।"
।
WHAT
पहला अध्याय।
५३
इक्कीसवीं कहानी।
.
हरके वा फोलादे बाजू पंजा कर्द ।
साअदे मिस्कीने खुदरा रंजा कर्द ॥१॥
ग एक किस्सा कहते हैं, किसी ज़ालिमने एक
लो
महात्मा के सिरपर पत्थर फेंका। महात्मामें
उससे बदला लेनेकी सामर्थ्य न थी इसवास्ते
उसने उस पत्थरको अपने पास रख लिया। देवयोगसे, एक
समय वादशाह उस अत्याचारीसे नाराज़ हो गया और उसे
गढे में डाल देनेका हुक्म दिया। उस समय वह फ़क़ीर वहाँ
आया और उसने उस ज़ालिमका सिर उसी पत्थरसे चूर-चूर
कर दिया , इसपर उस जालिमने कहा,-"तू कौन है, और
तूने यह पत्थर मेरे सिर पर क्यो फेक कर मारा है ?" फ़कीर
ने जवाब दिया-
"मैं अमुक मनुष्य हूँ, और यह वही पत्थर है जो तुमने
अमुक दिन मेरे सिर पर फैककर मारा था।" ज़ालिमने कहा,
-"अव तक तुम कहाँ थे ?” फ़क़ीरने जवाब दिया,-"मैं
तुम्हारे पदसे डरता था, लेकिन अब तुम्हें खड़े मे देखकर,
M
,
लोहे के पजे से पक्षा करनेवाला आदमी अपनी कलाईको ही तोड़
लेता है॥१॥
५४
गुलिस्तां
तुमसे बदला लेनेका अच्छा मौका समझता है। नालायक
आदमी जव उच्च-पदारूढ़ हो, तब बुद्धिमान् उसकी इज्जत
करनेमेही अपनी बुद्धिमानी समझते हैं। जबकि तुम्हारे
नाखून चीरनेके लिये काफ़ी तेज़ न हो, तब दूसरोसे झगडा
फरना बुद्धिमानी नही है। जो फौलादी पक्षे से पचा लड़ाता
है, वह अपनीही कलाई को चोट पहुंचाता है, चाहे वह चाँदीकी-
ही क्यों न हो। उस समय तक प्रतीक्षा करो, जब तक किस्मत
उसके हाथ न वाँध दे; समय पर, तुम अपने मित्रोके प्रसन्न
करनेके लिए उसका भेजा निकाल सकते हो।
शिक्षा-इस कहानो से हमें यह नसीहत मिलती है, कि जबतक
हमारा शत्रु बलवान हो, तबतक हमें उससे हरगिज न उलझना चाहिए।
बल्कि उसका आदर-सम्मान करना चाहिए। जब हम उसे बलहीन देखें,
तद इससे अपना बदला ले । बलवान् शत्रु से भिड़मा बुद्धिमानी के
विपरीत है।
पहला अध्याय।
५५
बाईसवी कहानी।
जेरे पायत गर बिदानी हाले मोर ।
हम चो हाले तस्त जेरे पाये पील ॥ १॥
सी बादशाहको ऐसा
भयङ्कर
रोग था,
जिसका यहाँ
कि वर्णन करना उचित नहीं है। कई यूनानी हकी-
मोंने मिलकर यह राय ठहराई, कि एक खास
तरह के आदमी के पित्त के सिवाय इस बीमारीका और इलाज
नहीं है। बादशाहने इस तरह के आदमी की तलाश करनेका
हुक्म दिया। लोगोंने एक किसान के लड़के में वह सब गुण
मौजूद पाये। बादशाहने उस लड़के के मा-बाप को बुलवाया
और उन्हें बहुतसा इनाम देकर राजी कर लिया। काजी ने
यह फैसला किया, कि बादशाहको वीमारी से आराम करने
के लिये, एक रिआया का खून बहाना न्यायसङ्गत है।
जल्लादने उसके मारने की तय्यारी की; तब वह बालक आकाश
की ओर देखकर हँसा। बादशाहने उस बालक से पूछा,
जव
-
तुम्हारे पाँवके नीचे दवी चोटी का वही हाल होता है, जो याद तुम
हाथी के पाव के नीचे दब जाओ तो तुम्हारा हो। दूसरे के दुःख
की
अपने दुःख से तुलना किये विना, हम उसकी प्रकृत अवस्था का ज्ञान प्राप्त
नहीं कर सकते ॥१॥
गुलिस्ताँ।
"इस अवस्थामे ऐसी क्या बात हुई जिससे तुझे खुशी हुई ?"
उसने जवाब दिया-"बालक मा-बापके प्रेम पर निर्भर रहते
हैं ; मुक़दमो का समावेश काज़ी करता है ; न्याय की आशा
बादशाहसे की जाती है। मेरे माता-पिताकी मति थोथे सांसा-
रिक विचारोंसे भ्रष्ट हो गई है, कि वे मेरा खून बहाने पर
राजी हो गये हैं। काजी ने मुझे प्राणदण्ड की आज्ञा देदी
है और बादशाह, अपनी स्वास्थ्यरक्षा के लिये, मेरी मृत्युपर
राजी हो गया है। ऐसी दशामे, मैं अब ईश्वर के सिवाय
किसकी शरण जाऊँ ?” बादशाह इस बातको सुनकर बहुतही
दुःखी हुआ और आँखोंमें आँसू भर कर बोला- "निर्दोष
मनुष्य का खून बहानेकी अपेक्षा मेराही मर जाना अच्छा
है।" बादशाहने उस बालक का सिर और आँखे चूम कर,
गले से लगाया और उसको बहुतसा इनाम देकर छोड़ दिया।
लोग कहते हैं, कि बादशाह उसी सप्ताह रोगमुक्त हो गया।
इस किस्से से ठीक मेल खाता हुआ एक पद मुझे याद पड़ता
है, जो एक फीलवान-महावत-ने, नील नदीके किनारे पर,
सुनाया था,- "अगर तुम्हें अपने पैरके नीचे दबी हुई चोटी
की अवस्था ज्ञात न हो ; तो तुमको समझना चाहिए कि,
चींटी की वैसीही हालत है जैसी हाथीके पैर के नीचे दबने
पर तुम्हारी हो।"
शिक्षा-इस कहानीसे हमें यह नसीहत मिलती है, कि हमें सत्र
जीपों को अपने समान समझना चाहिए। दूसरोंकों कष्ट पहुँचाते समय
पहला अध्याय। इस बातका ख़याल रखना चाहिए, कि यदि हमें कोई ऐसा ही कष्ट दे तो हमें कसा दुःख होगा। तेईसवीं कहानी। उ हर्चे रवद वर सरम चूं तो पसन्दी रखास्त । बन्दह चे दावा कुनद हुक्म ख़ुदावन्दे रास्त ॥१॥ BANANE मरुलैस के गु लामोंमें से एक गुलाम भाग गया। एक आदमी उसके पकड़ने के लिए भेजा गया। बना वह उसे ले आया। गुलाम की वज़ीर से दुश्मनी थी। वज़ीरने, इस ग़रज़से कि और गुलाम ऐसा अपराध न करें, उसे प्राणदण्ड की आज्ञा दे दी। गु लामने उमरुलै- सको साष्टाङ्ग दण्डवत् की और कहा-"आप जो कुछ करें, वही न्यायसङ्गत है , मालिक की दण्डाज्ञाके सामने गुलाम का क्या उज्र चल सकता है ? लेकिन यह देखकर, कि मैंने आपके घरमें परवरिश पाई है, मैं नहीं चाहता कि कयामतके दिन मेरे खूनका अपराध आप पर लगाया जावे। आप जो कुछ हुक्म देते हैं वह न्यायसंगतही है न्यायसंगतही है। मालिक को आशा के सामने सेवक का उजू नहीं चल सकता ॥१॥ अगर आप
गुलिस्ता।
-~-~-
-
ने
गुलाम की जान लेनेकाही मन्सूवा ठान लिया है, तो मुझे
न्यायके अनुसार मारिये; ताकि कयामत के दिन आपको
झिड़कियाँ न सहनी पड़े।" बादशाहने पूछा-"मुझे यत
काम किस तरह करना चाहिये?" उसने जवाब दिया- 'मुझे
वज़ीर को मार डालने की आज्ञा दीजिये, पीछे उसके एवज में
मुझे भग्वा डालिये ; तव आपका मुझे मरवाना न्यायानुसार
होगा।" बादशाह हंसा और उसने वज़ीरसे पूछा कि, तेरी
राय मे अब क्या करना चाहिये? वजीरने उत्तर दिया --
"जगत्रक्षक! अपने पिता के समाधि मन्दिर की पूजा
समझ कर, इस दुष्ट को छोड दीजिये कि, जिससे मेरी जान
आफतमे न फंसे।
अपराध मेगही है, क्योकि मैंने महात्माओ
के इस वचन का ग्वयाल नहीं किया----अगर कोई शरास मिट्टी
के देले फेंकनेवाले के साथ लडता है, तो अपनी मर्पता से
अपनेही सिग्को तोड़ता है; जब तुम अपने शत्रु पर गोली
चलाओ, नव उसके निशान से भी बचने का पयाल ग्क्गो।"
-
.
पहला अध्याय।
चाबीसवीं
कहानी।
सुलह वा दुश्मन अगर स्वाही हर गह कि तुरा।
दर कफ़ा ऐब कुनद दर नज़रश तहसीं कुन ॥१॥
जनके एक वादशाह के यहाँ, एक बडा नेक और
जू मिलनसार वजीर था। वह लोगोंके सामने होने
पर उनसे सभ्यताका बर्ताव करता और उनकी
अनुपस्थितिमें उनकी प्रशंसा किया करता था। दैवात्, उसके
किसी काम से वादशाह नाराज़ हो गया। उसने बुरा-भला
कहकर, उसे दण्ड देनेकी आज्ञा दी। राज-कर्मचारियोंने
उसके पहले उपकारका खयाल करके, इस अवस्थामें, उसके
प्रति कृतज्ञता प्रकाश करनाही अपना धर्म समझा। इसलिए
जवतक वह उनके पास कैद रहा, तब तक उन लोगोंने उसके
साथ बडी सभ्यता और नम्रताका व्यवहार किया। न तो उस
के साथ सख्तीही की और न किसी को गाली-गलौज देने
दिया। "अगर तुम अपने दुश्मनसे मेल रखना चाहते हो, तो
दुश्मन जब कभी पीठ-पीछे तुम्हारी निन्दा करे, तो तुम बदलेमे
उसके मुंहके सामने उसकी प्रशसा करो। यदि किसी अप-
दुश्मन को खुश रखनेकी सबसे बड़ी युक्ति यह है, कि जन जन वह तेरी
परोक्षमें मेरी दुराई करे तभी-तभी त उसके प्रलपमें उसकी प्रशंसा कर ॥१॥
६० गुलिस्ता। पा गया . तो हम हम उसके B कारी मनुष्य के कड़वे वचनो को रोकना चाहो, तो उसके मुंहसे बात निकलनेके पहलेही उसका मुंह मीठा कर दो।" वह बादशाहके लगाये हुए कुछ अभियोंगोंसे तो रिहाई किन्तु कुछ शेष अभियोंगोंके लिये जेल भोगता रहा। किसी पड़ौसके राजाने उसके पास गुप्त रीतिसे यह समाचार भेजा----"उस तरफ के बादशाह गुणोंकी कदर करना नही जानते ; इसीसे तुम्हारा अपमान किया गया है। अगर ऐसा गुणी मनुष्य हमलोगोकी शरणमे आजाय, गुणोके कारणसे उसका पूरा-पूरा सम्मान करें और भरसक उसको सन्तुष्ट रखनेकी चेष्टा करे। अस्तु ; अगर तुम यहाँ आ जाओ, तो राज्यके शासनकर्त्ता तुम्हें देखकर अपने तई सम्मानित समझे। ये लोग बड़ी अधीरतासे पत्रोत्तर की बाट देखते हैं।" वज़ीर चिट्ठीका मज़मून समझ गया। उसने अपनी उपस्थित विपत्ति पर विचार करके, उसी पत्रकी पीठ पर, अपनी समझके माफिक, छोटासा जवाब लिख कर भेज दिया। बादशाह के किसी सहवर को यह बात मालूम गयी। उसने बादशाहको सूचना दी और कहा-"जिसको आपने कैदकी सज़ा दी है, वह पड़ोसी राजासे पत्र-व्यवहार करता है।" वादशाह नाराज हुआ और इस मामले की जांच होनेकी आज्ञा दी। लोगोने पत्र लेजानेवालेको पकड़ लिया और उस पत्रको पढ़ा, जिसकी पीठपर यह लिखा हुआ था- "जितनी तारीफ की गयी है उसके लायक यह ताबेदार हो पहला अध्याय। ६१ ६ . नहीं है। जो कुछ आप लोगोने लिखा है, वह स्वीकार करना मेरे लिये असम्भव है, क्योंकि उसके नामी-गिरामी घरमे मेरी परवरिश हुई है। उसके विचारोमें जरासा फ़र्क होनेसे, मैं उसके प्रति अकृतज्ञ नहीं हो सकता। क्योंकि कहावत है- जिसने तुम्हारा बराबर उपकार किया, यदि उससे जीवन में तुम्हारी एक बुराई भी हो जाय तो उसे क्षमा करो।" बाद- शाहने उसकी भक्ति की प्रशंसा की और उसे खिलअत तथा इनाम-इकराम दिया। पीछे उससे माफ़ी मांगते हुए कहा- "मुझसे गलती हुई, जो मैंने तुम जैसे निर्दोष को कष्ट दिया।" वज़ीरने जवाब दिया-"हुजूर! यह तावेदार आपको इस मामले में दोषी नही समझता, क्योंकि विधाता- कोही मुझे विपद्मे फंसाना मजूर था। यह भी अच्छा हुआ, कि यह कष्ट इस तावेदारको एक ऐसे पुरुप द्वारा प्राप्त हुआ, जो चिरकालसे मेरे ऊपर अपनी कृपा और मिहरवानी रखता था।" अगर आदमी तुझे दुःख दे, रंज मत कर ; क्योकि सुख दुःख देना मनुष्यके हाथकी बात नहीं है। इस वातको याद रख, कि मित्र और शत्रु से बुरे-भले बर्तावका कराने- वाला केवल ईश्वरही है क्योंकि वही दोनोके दिलोपर हुकू- मत रखनेवाला है। यद्यपि तीर कमानसे छूटता है ; तथापि जो वुद्धिमान हैं वे तीरन्दाज़की ओरही देखते हैं। शिक्षा-इस कहानीसे हमें दो नसीहतें मिलती है,- १) हमारे और कारण ६२ गुलिस्ताँ ऊपर उपकार करनेवाला यदि कभी हमारी ज़िन्दगी में एकाध दफा हमसे अप्रसन्न हो जाय और हमारे मिरपराध होनेपर भी हमारे साथ बदी करे ; तो हमें उसकी जरासी नाराजी के सबब, उसके पहले उपकारों को भूल न जाना चाहिए और उसके साथ भूलकर भी बुराई न करनी चाहिए । एक अपकार के कारण पिछले सैकड़ों उपकारोंको भूल नाना ओछे श्रादमी का काम है। (२) अगर कोई मनुष्य हमें दुःख दे, तो हमें यह न समझना चाहिए कि, यह दुख हमें अमुक मनुष्य के हुमा है ; बल्कि यह समझना चाहिए कि, दुःख और मुख देना मनुष्य को सामर्थ्य के बाहर है। दुख और सुख देनेवाला ईश्वरही है। शत्रु और मित्र सब तरह के मनुष्योंके दिलों का नेता या रहनुमा केवल ईश्वरही है। वह जैसा चाहता है वैसाही कराता है। मनुष्य किसी को मुख और दुःख नहीं दे सकता। हमारे एक हिन्दू कवि ने बहुतही ठीक कहा है- "को मुख को दुख देत है, देत करम झकझोर ; उलझे-मुलझे पापही, ध्वजा पवन के जोर ।" अर्थात् न कोई किसी को दुःख देता है और न कोई किसी को मुखही देता है; जिस तरह ध्वना हवा के ज़ोरसे पापही उलझती और सुलझता है, उसी तरह मनुष्य अपने पूर्वकृत कर्मों के फल-स्वरूप दुःख और सुख पाता है - + ।
पहला अध्याय॥
पच्चीसवीं
कहानी।
दो वाम्दाद गर आयद कसे बखिदमते शाह ।
सोम हरआईना दरखे कुनद लुत्फ़ निगाह ॥१॥
रब देशके किसी बादशाहने अपने वज़ीरोको किसी
शखस की तनख़्वाह दूनी कर देनेका हुक्म दिया।
क्योकि वह शख़्स बराबर हाज़िर रहता था
और सदा अपना कर्तव्य
था ; जबकि दूसरे
दरबारी फ़िजूलखर्च, अय्याश और अपने काम की
बेपरवाई करनेवाले थे। एक चतुर मनुष्य ने यह बात सुन
कर कहा, कि ईश्वरीय दबारमे भी इसी तरह उच्च पद दिये
पालन करता
तरफ़ से
जाते हैं।
अगर कोई मनुष्य दो दिन तक सावधानी से वादशाहकी
खिदमत करता है, तो वह तीसरे दिन अवश्यही कृपापात्र
हो जाता है। सच्चे उपासको के दिलमें पक्का विश्वास रहता
है, कि हम ईश्वरकी देहली से विना पुरस्कार पाये न लौटेंगे
आज्ञा-पालन करनेसे मनुष्य बड़ा होता है, किन्तु आज्ञा-पालन
बादशाहों की सेवा में एक वार जाकर ही निराश मत हो जाभो।
यदि तुम दो बार भी उनके पास से खाली लौट आओ, तोभी तीसरी बार
नाओ। उनकी दया-दृष्टि ज़रूर उस बार तुम पर पड़ेगी ॥ १॥
६४ गुलिस्ता। न करनेसे निकाला जाता है। जो सत्पुरुष होता है, वह अपना मस्तक आज्ञा-पालन की देहली पर रखता है। शिक्षा-इस कहानीसे हमें यह नसोहत मिलती है, कि जिस हालत में, हम किसी की नौकरी करे, हमें अपने मालिक की खिदमत दिलो- जान से करनी चाहिये। उसको सेवा में किसी भाँति की भी त्रुटि करमा नुचित है। मसल मशहूर है, कि जो सेवा करेगा वही मेवा पायेगा, यानी सेवा करनेवालेको उसको मिहनत का एवज़ अवश्य मिलता है। जिस हालत में कि हम अमीर हों, हमारे अधीन थोड़े या बहुत नौकर-चाकर हों, हमें अच्छा काम करनेवाले और बुरा करनेवाले सबको ध्यान में रखना चाहिये। जो नमकहलाल, मिहनती और भाज्ञानुसार चलनेवाले हों उनका वेतन बढ़ाना चाहिए या उन्हें पुरस्कार देना चाहिए। अगर अच्छा काम करनेवाले नौकरों को पुरस्कार न दिया जायगा या उनकी वेतनवृद्धि न को जायगी, तो उनका दिल टूट जायगा। ईश्वर भी जैसी जिसकी चाकरी होती है उसको वैसा फल देता है। .
पहला अध्याय। ६५ छब्बीसवीं कहानी । एक वहम वर मकुन ता तवानी दिले। कि आहे जहान वहम वर कुनद ॥१॥ ग एक ज़ालिम की कहानी कहते हैं, जो गरीबों लो से ज़बरदस्ती लकड़ियाँ खरीदा करता और अमी- CEO रों को रों को थोड़े दामों में दिया करता था। न्यायप्रिय मनुष्य ने उधर से निकलते हुए कहा,-"तुम सॉप के समान हो, जो जिसे देखता है उसे ही काटता है या उल्लूके समान हो, जो जहाँ वैठता है वहीं खोदता है। यद्यपि तुम अपने अन्यायके लिए हमलोगोंसे विना दण्ड पाये बव जा सकते हो; किन्तु ईश्वरकी नज़र से तुम्हारा अन्याय छिपा नहीं रह सकता; क्योकि ईश्वर के आगे कोई गुप्त भेद अप्रकट नहीं रह सकता। इस दुनियाके वाशिन्दोको मत सताओ; ऐसा काम करो, जिससे लोगोंकी आहे परमे- श्वर तक न पहुँचें। ज़ालिम उसकी बातें सुनकर नाराज हुआ और उसने उसकी ओरसे मुंह फेर लिया। एक दिन रातके समय, उसके बावरचीख़ानेसे उसके लकड़ियोंके गोदा- लग गयी। जहाँ तक हो, किसी के मन को मत दुखाओ। याद रखो, गरीव का माह से संसार उलट-पुलट हो सकता है ॥१॥ ५ । । नमे आग उलका तमाम माल-असवाव जल गुलिस्ताँ। गया । उसका गुदगुदा बिछौना राख का ढेर वन गया। दैवयोगसे, वही न्यायप्रिय मनुष्य उधर से निकला और उसने उसे अपने मित्रोंसे यह कहते हुए सुना-"मैं नहीं जानता कि, यह आग मेरे घरपर कहाँसे पड़ी।” उस न्याय- प्रिय ने उत्तर दिया-"गरीबोके दिलोंके धुएंसे।" दुखी लोगोकी हायसे सावधान रहो; क्योकि अन्दरूनी घाव आख़िरकार फूटेगा। किसी एक दिलको भी अत्यन्त दुःखी मत करो, क्योकि एक आहमें भी दुनियाके उलट देने की शक्ति है। कैखु सरोके ताज पर निम्नलिखित लेख लिखा हुआ था-"न मालूम मेरे मरनेके बाद, कितनी मुद्दत तक, और कितनी उम्रो तक, लोग मेरी कबके ऊपरसे गुज़रते रहेंगे ? यह बादशाहत हाथो-हाथ मुझे मिली और उसी तरह दूसरोके हाथोमे जायगी।" शिक्षा-इस कहानीसे हमें यह नसीहत मिलती है, कि हमें ग़रीब और दीन-दुःखियों को भूल कर भी म सताना चाहिए; गरीयोंक सतानेवालोंका अन्तिम परिणाम बहुतही बुरा होता है। हमारे यहां भी किसी कविने इस कहानीके उपदेशसे मिलती-जुलतीही वात कही है,-"दुर्बलको न सताइये, वाकी मोटी हाय ; मुई खालकी सांस बों सार भसम ह जाय।" अर्थात् गरीबको न सताना चाहिए, गरीब की हाय बुरी होती है , जिस तरह मरी हुई खाल (धोंकनी) की सांस से लोहा भस्म हो जाता है ; उसी भांति ग़रीब की हाय से जबरदस्त जालिम .
पहला अध्याय। ६७ गरीब की माह ईश्वर तक का भो सत्यानाश हो जाता है। क्योंकि बहुतही जल्द पहुँचती है। सत्ताईसवी कहानी। -AA- कस नयामोख्त इल्मे अज़ मन । फि मरा आकवत निशाना न कर्द ॥१॥ NARY क शख्स कुश्तीके हुनरमे अत्यन्त बढ़ गया था। वह इस फ़नके तीन सौ साठ अच्छे-अच्छे दांव- पेव जानता था और हर दिन कोई-न-कोई नई बात दिखाया करता था ; लेकिन अपने शागिर्दोमेंसे एक सुन्दर जवान पर सच्चा प्रेम रखनेके कारण, उसके हमें अपने सौ उनसठ दांव-पेच सिखा दिये थे और शाज मित्र है, अपने निज के लिए छिपा रखा था। वहताय, प्रत. परम मित्र माजकल के मित्र जरा- मुझ से जिस-जिस ने वाण-विघा सीखी को अपने मित्र का कुछ उसने मुझो पर वाण सीधा किया । हा कृनानता प्रपमा यख पना कर अपने -- ६८ गुलिस्ता। कुश्तीके फ़नमे इतना बढ़ गया कि, कोई उसका सामना न कर सकता था। एक दिन वह वादशाहके सामने शेखी-मारने और कहने लगा, कि मैं अपने उस्तादको, केवल उनकी उम्रकी अधिकता के लिहाज़ से और यह समझ कर कि, वह मेरे शिक्षक हैं, अपनेसे ऊंचा रहने देता हूँ। वास्तव में मैं-उनसे बलमे कम नहीं हूँ और दांव-पेचमें तो उनके बरावरही हूँ। वाद- शाहको उस जवानकी यह आचरण-हीनता अच्छी न लगी उसने उन दोनों के गुणों की परीक्षा करने की आज्ञा दी। इस कामके लिये एक लम्बा-चौड़ा स्थान ठीक किया गया। राज्य के मन्त्री और दूसरे अमीर-उसरा जमा हुए। वह जवान, मस्त हाथी की तरह झूमता हुआ, इस तरह अखाड में दाखिल हुआ, कि अगर उसके सामने उस समय लोहे का पहाड़ भी आता, तो वह उसे भी जड़से उखाड़ फेंकता। उस्ताद को यह मालूम था, कि जवानमे मुझसे अधिक बल है; इसलिए उसने उसपर वही दांव चलाया, जो उसने सताना.लिए छिपा रक्खा था। जवान इस दॉव का काट न भी किसी कविन उस्ताद ने उसे अपने दोनों हाथों पर ज़मीन से है,-"दुर्बलको न संत अपने सिरसे ऊँचा ले जाकर ज़मीन पर सार भसम ह जाय।" लोग वाह-वाह करने लगे! बादशाहने हाय बुरी होती है , जिस ते और रुपया इनाम मे देनेका हुक्म दिया लोहा भस्म हो जाता है; उस पपने उपकारीके साथ मुकाबला करने J पहला अध्याय। और अपनी चेष्टा में सफल न होने के कारण, बुरा-भला कहा और धिक्कारा! जवान ने कहा- ऐ वादशाह ! मेरे उस्ताद ने मुझ पर बल या निपुणता से फ़तह नही पाई है ; किन्तु कुश्ती के एक छोटे से पेच से मुझे शिकस्त दी है। यह सामान्य पेच उन्होंने मुझ से छिपा रक्खा था और मुझे नहीं सिखाया था।" उस्ताद ने कहा- उस पेच को आज के जैसे मौके के लिएही ववा रक्खा था। क्योंकि महात्माओ ने कहा है-'अपने मित्र के हाथों मे इतने मत हो जाओ, कि अगर वह कभी शत्रु हो जाय तो तुम्हारा अनिष्ट कर सके।' क्या तुमने उस शख्स की यात नही सुनी, जो अपने शिप्य द्वारा अपमानित लाञ्छित हुआ था ? या तो जगत् में कभी कृतज्ञता थी ही नही या इस ज़माने में कोई कृतज्ञता से काम नहीं लेता। ऐसा कोई आदमी नही है, कि जिसको मैंने तीर- : न्दाज़ी सिखाई हो और अन्त में उसने मुझी पर निशाना न लगाया हो।" शिक्षा-इस कहानीसे हमें यह शिक्षा मिलती है, कि हमें अपने मित्र के काबू में बिल्कुलही न हो जाना चाहिए। जो प्राज मित्र है, सम्भव है कि, वही किसी दिन हमारा शन्न हो जाय, अतः परम मित्र से भी अपना गुप्त भेद छिपा रखना चाहिए। भाजकन के मित्र जरा- जराती बातों पर पत्रु हो जाते हैं और यदि उनको अपने मित्र का कुछ के भो भो मालम होता है, तो उमो गुप्त भेद को भपमा मल बना कर भरने गुलिस्ताँ। मित्र के अनिष्ट-साधन का उद्योग किया करते हैं। दूसरे, भाज-कल के जलवायु की तासीरही ऐसी हो गई है कि, जिसे कुछ गुण सिखाया जाता है, वह अपने सिखानेवाले की कृतज्ञता को तो स्वीकार नहीं करता,- वरन उससे बढ़ जाने या बराबरी करने का दावा करता है। श्राज-कल के शिष्योंमें कृतज्ञता का नामोनिशान भी नहीं होता। जिसे भूकना सिखाया जाता है वही काट खाने को दौड़ता है। अतः चतुर मनुष्यों को साव- वानी से चलना चाहिए। अट्ठाईसवीं कहानी। - फर्के शाही व बन्दगी वर्खास्त । चूं कजाये नविश्ता आमद पेश ॥२॥ क एकान्तवासी फ़कीर किसी जङ्गल के कोने में रहता था। वादशाह उधर होकर निकला। एकान्तवास सन्तोप की राजधानी है। इसलिए फ़कीर ने वादशाह को देखकर न तो मस्तक उठाया और न मृत्यु के आने पर या मरजाने पर अमौरी-गरीबी का फर्क मिट जाता है॥१॥ ए 4:4 पहला अध्याय। किसी तरह का शिष्टाचारही दिखाया। बादशाह को अपने ऊँचे दर्जे का ख़याल हो गया, इसलिए उसने चिढ़ कर कहा-"ऐसे चिथड-पोश फ़क़ीर जङ्गली जानवरो के समान होते हैं।" वादशाह के वज़ीर ने फ़क़ीर से कहा,-"इस दुनिया का बादशाह जब तुम्हारे पास होकर निकला, तब तुमने उसका आदर-सम्मान क्यों न किया ? आदर-सम्मान नो आदर-सम्मान, तुमने उसका साधारण शिष्टाचार भी न किया।" फ़क़ीर ने जवाब दिया,-"दुनिया के बादशाह से कह दो, कि वह अपनी खुशामद की उम्मेद् उसी शख्स से करे, जो उससे कुछ उपकार चाहता है और उससे यह भी कह दो, कि बादशाह अपनी प्रजा की रक्षाके लिए है, न कि प्रजा बादशाह की सेवाके लिये। भेड़ें गड़रियेके लिए नहीं होती, किन्तु गड़रिया भेड़ों की खिदमत के लिए होता है। आज तुम किसी को आनन्द-चैन करते और किसी को सन्तप्त- हृदय से मिहनत-मजदूरी करते हुए देखते हो , लेकिन चन्द रोजमेंही घमण्डियों का दिमाग़ मिट्टी में मिल जायगा। जिस समय किस्मत का कौल पूरा हो जाता है, उस वक्त मालिक और नौकर मे भेद नहीं रहता। अगर कोई गावस कत्र खोदे, तो वह यह न कह सकेगा, कि यह अमीर है और वह ग़रीव है।" फकीर की बात का बादशाह पर पब असर हुआ। उसने पूछा, कि तुम क्या चाहते हो? फकीर ने जवाब दिया- 'मैं केवल यही चाहता है, कि मुझे
-
गुलिस्ता।
फिर कभी ऐसी तकलीफ न दी जावे।" वादशाहने कहा--
"मुझे कुछ उत्तम उपदेश दीजिये।" फ़क़ीरने उत्तर दिया,
जब तुम अपनी शक्ति का उपयोग करो, तब इस वातका
ख़याल रक्खो, कि धन और राज्य एक के पास से दूसरे के पास
चले जाते हैं।"
शिक्षा- कहानी से यह शिक्षा मिलती है, कि
धनवान्
और
शक्तिमान् पुरुषको अभिमान न करना चाहिए और ग़रीब लोगों को नफरत
की नजरसे न देखना चाहिए। क्योंकि इस दुनियाकी छुटाई-बड़ाई इसी
समय तक है, जब तक कि प्राण नहीं निकलते । मरने पर श्मशान में सभी
समान हो जाते हैं। श्मशान-भूमि में राजा-प्रजा, अमीर-गरीब, दाता-
भिखारी सब की खाक एक हो जाती है। वहाँ उचाई-निचाई कुछ नही
रहती, इसलिए इस बिजलीकीसी चमक के समान चञ्चल जीवन और
धन-ऐश्वर्य पर अभिमान करना वृथा है।
-
पहला अध्याय।
उन्तीसवीं कहानी।
Pाशा
CROREOS
गर न वूदे उमेद राहतो रञ्ज ।
पाये दर्वेश वर फलक वूदे ॥१॥
क वजीर मिश्र देश के जुलनून के पास गया और
उससे आशीर्वाद मांग कर कहा,-मै रात-दिन
Doord बादशाह
की खिदमत में लगा रहता है, क्योंकि
मैं उससे कुछ उपकार की आशा करता हूं, अतः उसके भयसे
डरता रहता है। जुलनून ने रोकर कहा-"तुम बादशाह
के भय से उसकी जितनी सेवा करते हो, अगर तुम उतनीही
सेवा ईश्वर की करते, तो तुम्हारी गिनती प्रकृत साधुओमे हो
जाती।"
अगर इनाम और सजा की आशा न होती, तो फ़कीर
का कदम देवलोक मे पहुँच जाता , और वजोर जितना वादशाह
से डरता है, अगर उतना ईश्वर से डरता, तो स्वर्गीय दूत हो
जाता।
- इस कहानीसे यह नसीहत मिलती हैं, कि मनुष्य को
ईश्वरवे सिवा किमी न ठरना चाहिए। मनुष्य जितना मनुष्य से डरता
संन्यासी को यदि वासना न रहे, तो सब से बड़ी ऊँचाई (आस्मान)
भी उसके पदतल के नीचेदी हो जाता है। सुसन्दु.ख-रूप दन्द मे र
गने पर जीव मुक्त हो जाता है ॥१॥
७४
गुलिस्ता।
है, अगर उतनाही ईश्वर से डरे, तो उससे कभी बुरा काम न हो और
वह स्वर्ग का देवता हो जाय ।
कहानी।
तीसवीं
**
दौराने बका चो बादे सहरा बुगुज़िश्त ।
तलखी व खुशी व ज़िश्तो ज़ेवा बुगुज़िश्त ॥१॥
ए
का बीज
क बादशाहने किसी निर्दोष मनुष्य के प्राण-वधकी
आज्ञा दी। उसने कहा,--"ऐ बादशाह ! आप
मा अपना क्रोध मुझ पर उतार कर अपने कष्ट का
चीज न बोइये।" बादशाह
पूछा-"मैं कष्ट
किस तरह बोता हूँ?" उसने जवाब दिया, "मेरे कष्टका
अन्त तो क्षण-भर मे हो जायगा ; परन्तु उसका पाप तुम्हारे
सिर पर सदा बना रहेगा। जीवनका समय जङ्गलकी वायु
को भाँति गुजर जायगा। कटुता, मधुरता, कुरूपता
और
जिन्दगी भी हवा के झोंके की तरह गुज़र जाती है; उस समय
कटुता-मधुरता, भच्छा-बुरा सभी का खात्मा हो जाता है ॥१॥
पहला अध्याय।
७५
NAM
सुन्दरता आदि सब का अन्त हो जायगा। अत्याचारी सम-
झता है, कि वह हमपर अत्याचार करता है, लेकिन उसका
अत्याचार हमसे गुजर कर उसी की गरदन पर रह जाता
है।" यह उपदेश वादशाहके हकमें मुफीद हुआ। उसने
उसकी जान बख्श दी और उससे माफी मांगी।
शिक्षा-निरपराध पुरुषोंको दण्ड देना अपने पापको दण्ड देना
है , क्योंकि एक-न-एक दिन उसके लिए हमें फिसी गुरुतर विपत्तिमें
फेसना पड़ताही है। कृम्मका फल भोगना पढ़ताही है।
इकत्तीसवीं कहानी।
खिलाफे राय सुलतॉ राय जुस्तन ।
वखूने खश वाशद दस्त शुस्तन ॥१॥
शेरवां के मन्त्री जलरी-ज़रूरी राजकीय विषयों पर
नौ सलाह कर रहे थे। प्रत्येक मनुष्य ने अपनी-अपनी
SACRE समझ के अनुसार उत्तम सलाह दी। इसी भांनि
याटशार ने भी अपनी राय दी। वुजरचेमेहरने बादशाह की
राला का सम्मति क प्रतिकूल अपनी नम्माप्त प्रकट करना-मनी
पून में अपने हाथ धोने की चेष्टा करना ॥१॥
७६
गुलिस्तां ।
राय पसन्द को। दूसरे मन्त्रियों ने बुजरचेमेहर से एकान्त
में पूछा, कि आपने इतने बुद्धिमानो के मुकाबले मे बादशाह
की रायही क्यो पसन्द की ? उसने उत्तर दिया-"कोई
नही जानता कि, क्या होगा प्रत्येक
मनुष्य को राय
ईश्वर पर निर्भर है। कौन जानता है, कि मेरी राय
का फल अच्छा होगा अथवा बुरा, इसलिए बादशाह
की रायकाही समर्थन करना अच्छा है।
अगर बुरी घटना
घटेगी, तो मैं आज्ञापालन का आश्रय लेकर अपने तई झिड़-
कियो से बचा सक्तगा। जो लोग बादशाहके विचार से अपना
विचार भिन्न रखने को चेष्टा करते हैं, वे अपने हो खू नमें हाथ
धोते हैं। अगर बादशाह दिनको रात कहे, तो बुद्धिमान को
चाहिए कि वह यह कहे-देखिये, वह चाँद और सप्तर्षि
मण्डल है।"
शिक्षा—यह कहानी हमें परले सिरे का भाज्ञापालन करना सिखाती
है। कुछ राजा बादशाहोंपर हो मुनहसिर नहीं है । हम लोग जिसकी
अधीनता-मातहती-में हों, हमें अपने उस अफसर या मालिक को
हाँ-में-हाँ मिलानी शचित है। मालिक या अफसर के विरुद्ध बात कहने
से सिवा हानि के लाभ किसी हालत में भी नहीं हो सकता। जो अपने
अफसर या स्वामी की हाँ-में-हाँ मिलाते हैं, उन्ही की राय का समर्थन
करते है, वे सदा-सर्वदा भानन्द करते हैं और उन्हें कभी शोक सन्तप्त
होना नहीं पड़ता।
पहला अध्याय।
बत्तीसवीं कहानी।
अगर रास्त मोख्वाही अज़ मन शुनो।
जहादीदा विसियार गोयद दरोग ॥१॥
क फरेबी अपनी जटाओंको लपेट कर, अपने तई
ए अली की सन्तान बताता हुआ, हिजाज़के यात्रियों
के दल के साथ नगर मे दाखिल हुआ। उसने
अपने तई मक्काका यात्री बताया और एक मरसिया बादशाह
के सामने पेश किया. जिसे वह अपना बनाया हुआ कहता था।
एक दरबारी ने, जो उसी साल यात्रा करके लौटा था, कहा-
"मैंने इसे ईदुलजुहा पर बसरे मे देखा था, फिर यह हाजी
किस तरह हो सकता है ?" एक और दरवारी कहने
लगा--"इसका बाप ईसाई और वह मलातिया में रहता
है, यह पवित्र वंशीय कैसे हो सकता है ?" उन लोगोने उस
के पदों को "दीवाने अनवरी" मे से हूँढ़ निकला। बादशाह
ने हुक्म दिया, कि इसे दण्ड देकर बाहर निकलवा दो और
इससे यह पूछो, कि तू इतना झूठ क्यों बोला। उसने
जवाब दिया- "हे पृथ्वीनाथ ! मैं एक बात और कहूँगा,
यदि वह बात सच न हो, तो आप जो दण्ड देंगे मेरे लिये
यह बात सच है कि, बहुदशी पुरुषही बहुत झूठ बोला करते हैं।
मूर्ख भादमी का झूठ भी मामूलीही होता है ॥ १ ॥
७८
गुलिस्ताँ।
वही ठीक होगा।" बादशाह ने पूछा-"वह क्या बात है ?"
उसने जवाब दिया-"अगर कोई दूध-दही बेचने वाला आपके
पास छाछ लाता है, तो उसमें दो हिस्सा पानी और एक
हिस्सा दही रहता है। अतएव यदि इस गुलाम ने कोई
बात अविवेकता से कही हो तो नाराज़ न हूजिये ; क्योंकि
मुसाफ़िर अनेक झूठ बोला करते हैं।' बादशाह ने कहा-
"इसने अपनी ज़िन्दगी मे इससे अधिक सच्ची बात नहीं कही
है; अतः यह जो कुछ मांगता है इसे वही दिया जाय ।"
शिक्षा-इस कहानीका सार-मम्म यही है, कि जो जहाँदीदा अर्थात्
ससार देखा हुभा मनुष्य होता है, वह बहुत कुछ मक्कारी भार चालाकी
भी कर सकता है, पर यह कोई अनुकरणीय गुण नहीं।
तेतीसवीं कहानी।
हते हैं, कि एक वज़ीर अपनेसे नोचे दर्जे के लोगो
क पर बहुत मिहरवानी रखता था और प्रत्येक मनुष्य
को सुख देनेकी चेष्टा किया करता था। एक समय
जव वादशाह उससे नाराज हो गया, तो सब लोगोने मिलकर
उसके छुड़ाने की चेष्टा की और जिन लोगोकी मातहतीमे वह
पहला अध्याय।
कैद किया गया था, उन सब लोगोंने उसे बिल्कुल तकलीफ़ न
होने दी। दूसरे अमीर-उमरा ने बादशाह के सामने उसके
गुणों की प्रशंसा की। परिणाम यह हुआ, कि बादशाह ने
उसका अपराध क्षमा कर दिया। एक नेक आदमी को जब
इस घटना का हाल मालूम हुआ, तो उसने कहा-"अपने
मित्रों के प्रसन्न करने के लिये अपने बाप-दादे का बागीचा
वेच दो। अपने शुभचिन्तक की रसोई तैयार होने के लिये,
अपने घर का समान-आरायश भी जला देना उचित है। बुरे
आदमी के साथ भी भलाई ही करनी चाहिये; क्योंकि एक
टुकड़ा रोटी देकर कुत्ते का मुंह बन्द कर देनाही सव से
अच्छा है।"
शिक्षा-इस कहानीसे हमें यह शिक्षा मिलती है, कि हमें प्रत्येक मनुष्य
के साथ भाजा बत्ताव करना चाहिये। भलोंके साथ मलाई का व्यवहार
करना तो ठीकही है, किन्तु दुष्ट, बदकार और नीचों के साथ भी भलाई.
करनेमेंही अपनी भलाई है।
गुलिस्तां। -- चौंतीसवीं कहानी। fic वले मर्द ऑक्सस्त अज़रूये तहकीक । के ५ खश्म आयदश वातिल न गोयद ॥१॥ Sसैनरशीद के लडको मे से एक लडका, मोग लाल-पीला होकर, अपने बाप के पास गया। ९० उससे शिकायत की, कि अमुक अफसर ने पुष मेरी माँके विषय मे चुरी-बुरी बातें कही ।। हाने । मन्नियोसे पूछा, कि पेले अपराधकी सज़ा क्या होनी नागि एक ने कहा; उग्ने जानले गग्वा भाटिये : दूसरे में : उसकी जीभ कटवा लीजिये ; तीसरे में कहा, कि उमर माना कीजिये और अपने गय मनिकासा नीति में माता--"मेरे प्यारे पुत्र! उन अमा कर दो। अगर गम जमा करने योग्य मानमिक र नती है, नाम भी गो मारो गाली दे लो । किन वाले को गंगा म नाका साया तो पार Ti| हिमानी का गरम Tam TTT; Tit 77 gayong tay;75.7 Territ fE ARTrl f" 2 . गा । . + - .
पहला अध्याय। ८१ nam नहीं निकालता; एक दुष्ट ने किसीको गालियां दी। उसने गालियां सह ली और कहा कि, यह होनहार जवान है। हम में क्या-क्या दोष हैं, इस बात को जितना हम जानते हैं उतना दूसरा नहीं जान सकता शिक्षा-क्रोध के समय मन को वश में रखना चाहिये। पैतीसवीं कहानी। , कारे दरवेश मुस्तमन्द वरार । कि तुरा नजि कारहा वाशद ॥१॥ कुछ भले आदमियों के साथ नाव पर बैठा था उसी समय हम लोगो के पास ही एक जहाज़ गाना डूवा और दो भाई भेवर के बीच में पड़ गये। एक साथी ने सल्लाहसे कहा कि, 'यदि तुम इन दोनों भाइयो की जान बचाओ तो मैं तुम्हें एक सौ दीनार इनाम दूं।" मल्लाहने आकर एकको तो बचा लिया, परन्तु दूनग मर गया । जरूरतमन्दोंको जरूरतें पूरी कर, प्रासिर नी जरूरने रखता है ।।१।। ६
गुलिस्ता।
मल्लाह हँसकर
समय जव
सै
जङ्गल
मैंने कहा-"सच पूछिये तो उसकी ज़िन्दगी ही नहीं थी।
इसी से वह पानी से पीछे निकाला गया।"
बोला-'आपका कहना सच है, परन्तु दूसरे मनुष्य के सम्बन्ध
मे, मै कुछ औरही कहना चाहता
था। क्योंकि एक
मे चलता-चलता थक गया, तव उसने
मुझे अपने ऊँटपर चढ़ा लिया और दूसरे मनुष्यने मुझे
बचपन मे कोड़ों से मारा था।" मैंने उत्तर दिया,-"सचमुच
ईश्वर वड़ा न्यायी है, इसी से जो दूसरे का भला करता है,
उसे भलाई की प्राप्ति होती है और जो दूसरे के साथ बुराई
करता है उसे बुराईही मिलती है।"
शिक्षा-जैसा करना वैसा भरना।
छत्तीसवी कहानी।
RER
बदस्त आहके तफ्ता कर्दन ख़मीर ।
बे अज़ दस्त वर सीना पेशे अमीर ॥१॥
भाई थे, उनमे से एक बादशाहकी नौकरी करता
मिहनत-मजदूरी
करके अपनी
जीविका उपार्जन किया करता था। एक दफा
अमीर भाईने अपने ग़रीव भाई से कहा-"तुम वादशाह
अमीरोंके उन सेवकों से जो सदा उनके सामने हाथ बाँधे खड़े रहते
वे मजदूर अच्छे हैं जिनके हाथ चूने में सने रहते हैं।
था और दूसरा
दो
मतलव मजदूरों
से है ॥१॥
" पहला अध्याय। की नौकरी क्यो नही करते, कि जिससे इतनी मिहनत और तकलीफो से छुटकारा पाजाओ ?" उसने जवाब दिया,-"तुम कुछ काम क्यो नही करते, जो गुलामी से छुटकारा पाजाओ ." महात्माओं ने कहा है, कि मिहनत से कमा कर रोटी खाना और आराम से बैठना अच्छा है, किन्तु सोने का कमरवन्द पहन कर ताबेदारी के लिये खड़ा रहना अच्छा नही । अमीर की सेवा मे हाथोको छाती पर रक्खे रहने की अपेक्षा उनसे चूना-बरी तैय्यार करने का काम लेना अच्छा है। यह अमूल्य जीवन इन्हीं वातोकी चिन्तामोमें चीता जाता है, कि गर्मी के मौसम मे क्या खाऊँगा और जाड़े मे क्या पहनू गा। हे नीच पेट! एकही रोटी मे सन्तोष करले, कि जिससे तुझे गुलामी में पीठ न झुकानी पड़े। शिक्षा-इस कहानी का सारांश यह है, कि आजादी से रहना और मोटा-झोंटा खाना अच्छा है ; किन्तु गुलामी की जन्जीरों में जकड़े रहकर सोना लादना अच्छा नहीं है। स्वतन्त्रतापूर्वक परिश्रम करके रोटी कमाना और पर्णकुटीमें रहना अच्छा, किन्तु पराई तावेदारी करके महल में रहना और सब तरह ऐश-आराम करना भला नही है। सोनेके पिंजरेमें कैद होकर मोती चुगनेवाली चिड़ियासे, जङ्गलमें श्राजादोसे घूम- फिरकर अपनी जीविका उपाज्जन करनेवाली चिड़िया हजार दर्जे मच्छी है। श्रीमान् पण्डित महावीरप्रसाद जी द्विवेदी ( भू० पू० सरस्वती-सम्पादक) अपनी सेवावृत्तिविगहया में लिखते हैं- चाहे कुटी अति घने वनमें बनावे, चाहे विना नमक कुत्सित अन्न खावे । .. A - गुलिस्ता। चाहे कमी नर नये पट भी न पावे, सेवा प्रभो, पर न तू पर की करावे ।। सैंतीसवीं कहानी। -- अगर बिमुद अदू जाये शादमानी नेस्त । कि जिन्दगानिये मा नीज जाविदानी नेस्त ॥१॥ का यी नौशेरवां के पास कोई यह समाचार लाया, ज्या: कि ईश्वरकी कृपासे आपका अमुक शत्रु मर * गया। बादशाहने पूछा-"क्या तुमने यह सुना है, कि परमेश्वर किसी उपायसे मेरी जान बचा सकेगा? मेरे शत्रुकी मृत्युसे मुझे खुशी नही हो सकती, क्योकि स्वयं मेराही जीवन अनन्त नहीं है अर्थात् किसी-न-किसी दिन मुझे भी सरनाही होगा।" शिक्षा-दूसरे की मृत्यु पर चाहे वह शत्रु ही हो-हर्प मनाना बुरा है। दुश्मनके मरनेकी खुशी मत कर, शाखेर त स्वयं भी अमर नहीं है ||१||
पहला अध्याय
८५
Ve
अड़तीसवीं
कहानी।
चो कारे वे फिजले मन वर आयद ।
मरा दरवै सुख़न गुफ़्तन न शायद ॥१॥
सरा के दरबार मे, कुछ बुद्धिमान् लोग किसी
कि विषय पर तर्क-वितर्क कर रहे थे। उस समय
वुजरचेमेहर चुपचाप बैठा हुआ था। लोगोंने
पूछा, कि इस वाद-विवाद में आप क्यों नही बोले? उसने
उत्तर दिया-"मन्त्री हकीमों के सदृश होते हैं और हकीम
लोग केवल वीमारोकोही दवा दिया करते हैं ; अतः जब मैं
देखता हूँ, कि आप लोगो की सम्मति न्याययुक्त है, तब मैं
उसमे अपनी राय घुसेड़ना बुद्धिमानी के विपरीत समझता
हूँ। जब कोई काम बिना मेरे हस्तक्षेप कियेही अच्छी तरह
होता है, तब उस समय कुछ कहना मैं अनुचित समझता
हूँ; किन्तु यदि मैं किसी अन्धे मनुष्य को कुएँ की तरफ
जाते देखू और उस समय कुछ न बोलू , तो मैं दोषी हो
सकता है।"
शिक्षा-जरूरत के समय तो बोलना अच्छा है। मौका या बिना
जरूरत योलनेसे मौन रहना बहुत अच्छा है। क्हा हे-
"मौन सर्वार्थ साधनम् ।"
विना वोलेही यदि मेरा काम हो जाय तो मुझे फिजूल वात पनाने की
क्या जरूरत है ॥२॥
८६ गुलिस्ता उन्तालीसवी कहानी। ०:*... कीमियागर ब गुस्सा मादह ओ रंज । अबलह अन्दर ख़राबा याफ्ता गज ॥ १ ॥ hw E रुनुर्रशीद ने मिश्र देश को फतह करके कहा- उस बागी के सुकाबले में जो मिश्र का राज्य अपने हाथ में होने से घमण्ड करता था और कहता था कि, मैं ईश्वर हूँ। मैं इस वादशाहत को अपने नीचे-से- नीचे गु लासको दे दूंगा।” उसके पास ख़जीव नामक एक महामूर्ख मिश्रनिवासी गुलाम रहता था। उसने वह वादशाहत उसी को दे दी। लोग कहते हैं, इस शखस की विद्या और वुद्धि इतनी अधिक थी, कि जब मिश्री किसानोंने इसके पास नालिश की, कि हम लोगोंने नील नदीके किनारे जो सई बोई थी, वह अकाल-वृष्टिकी वजहसे नष्ट हो गयी है ; तब उनकी वात सुनकर उसने कहा कि, तुम लोगोको ऊन वोना चाहिए । यह सुनकर एक विचारवान् मनुष्य बोला -"यदि मानही पर धन-दौलत की वृद्धि का मदार होता, तो मृतं की तरह में रसायन-शास्त्री गुम्मा चाकर मर गया और वरुफ ने खर सदर खजाना पा लिया। इससे यही मालूम होता है कि विद्या-दि मे उनना काम नहीं निकल ना जितना प्रारम्ध से। माग्यं फलति मर्यम।
पहला अध्याय ।
८७
किसीको कष्ट न उठाना पड़ता ; किन्तु ईश्वर एक सूखेको
इतना धन-धान्य प्रदान करता है, जिस से सैकडो बुद्धिमानों
को आश्चर्य होता है !" दौलत हुकूमत का मिलना बुद्धि-
मानी पर मुनहसिर नहीं है ; विना ईश्वरकी सहायता के ये
चातें नहीं मिल सकती। संसारमें प्रायः यह देखा जाता
है, कि मूखौंका मान और बुद्धिमानो का अपमान होता है।
रसायन तय्यार करनेवाला दुःख और सुसीबत मे सरा और
एक मूर्ख ने खण्डहर मे ख़ज़ानो पाया।
शिक्षा-इस कहानी का सारमर्म यही है, कि धन-दौलत और ऐश्वयं
का मिलना अक्ल पर मुनहसिर नहीं है । कर्म-फल या ईश्वर-कृपासेही ये चीजे
मिलती हैं। देखते हैं, कि हज़ारों पण्डित, अक्ल के पुतले, जूतियां चिटवाते
फिरते हैं, उन्हें कोई दमड़ी को भी नही पूछता, किन्तु महामूर्ख अलके
दुश्मन मौज उढ़ाते हैं और बडे बड़े वद्धिमान उनकी देहली की धूल साफ
करते हैं।
१०
।
विध कर दिया। जय
गुलिस्ता।
हरगिज़ मत करो। मनुष्य यद्यपि प्यासा ही क्यों न हो, किन्तु वह दुर्गन्ध-
युक्त सांसवाले के झूठे और मीठे पानी को नहीं पीयेगा। जबकि नारगी
कीचड़ में गिर पड़ी है, तो वह फिर बादशाहके हाथ में नहीं दी जा सकती।
प्यासे मनुष्य का दिल उस पानो पर कैसे चलेगा जो पीप टपकते हुए होठों
से
छूया गया है?
शिक्षा-घृणित चीज़ के सहवास से बच्छी चीज भी बुरी बन
जाती है।
न्या को एक
इकतालीसवों कहानी
और नीचे का
-- थी, कि ससरा
ई हमः हेचस्त → मी गुजरद ।
उसकी वग़लो
से देखते तो, यही
बख्तो तख्तो अम्रो नहीं व गीरोदार
है और कोई न
गोने सिकन्दर से पूछा-"आपने
तक का देश कैसे विजय किया?
बादशाह हो गये हैं, वह दौलत में
और लेनाकी संख्यामे आप से बढ़ कर थे,
ऐसा विजय-लाभ नहीं किया।' उसने ज
स मनुष्य का
AA
धनावना था, कि
वग़लमेसे, ईश्वर
धूपमे रक्पी हुई
वैवकी ने, मस्ती के
धन-सम्पद्, प्रामा-निपंध, धर-पकड़ बीत जाने जति र
नाओ ॥१॥
पहला अध्याय।
मैंने ईश्वर की सहायता से किसी राज्य पर विजय प्राप्त की,
तो मैंने प्रजाओं पर अत्याचार न किया और उनके वादशाहों
की सदा तारीफ की। जो लोग बड़ों की निन्दा करते हैं,
उन्हें बुद्धिमान् लोग बुद्धिमान् नहीं समझते। नीचे लिखी
हुई तमाम चीजें जवकि गुजर जाती हैं, हेच हैं,-दौलत और
बादशाहत, आज्ञा और निषेध, युद्ध और विजय। जो लोग
संसार में अच्छा नाम कमा कर मरे हैं, उनका नाम बदनाम
न करो; जिससे बदले मे तुम्हारा नाम भी अमर हो जाय ।"
शिक्षा-जीती हुई जातियो की मानरक्षा करनेसे ही राज्य को स्वयं
है। उनकी निन्दा करने से या उनको कष्ट देनेसे, वे बहुन दिनों
राज्यमें रहना पसन्द नहीं करती।
जवाब दिया-
वत नहीं सुनी
किसी निर्मल
करो, कि वह
अगर कोई भी
अकेला बन्द
खयाल रवी
बादशाह इस
को मैं तुम्हारी
कहूँ उसने
कर दीजिये , क्य
नहीं है।
hitinin
शिक्षा-बो गर्न
दूसरा अध्याय । k->>rePoe+ साधुओं की नीति। = पहली कहानी। 400 वर नदानी के दर निहानश चस्ति । मुहतसिब रा दरून ख़ानह चे कार ॥ १ ॥ सी मनुष्य ने एक योगी से पूछा-"जिस भक्त को कि लोग गालियाँ देते हैं, उसे तुम कैसा समझते हो ?” उसने उत्तर दिया कि, हमारे देखने में तो उसमे कोई बाहरी दोष नहीं है, परन्तु उसके अन्दर क्या है सो हम नहीं जानते। यदि तुम्हें कोई ऐसा धर्माभ्यासी जब तुझे भीतरी हाल मालूम नहीं है अर्थात् बाहरी किसी बात से उस का कोई दोष दिखाई नहीं देता, तब उसको बुरा समझने की कोई जरूरत नहा । घरकी भीतरी बातों से किसी का क्या सम्बन्ध है ?
पहला अध्याय। ६३ मिले, कि जिसके भीतरका हाल तुम्हें न मालूम हो, तो उसे सच्चा धर्मात्मा और सत्पुरुप समझो। मैजिष्ट्रट को घरके भीतरी भाग से क्या सरोकार है ? शिक्षा-घकारण दूसरेके लिए दुरी राय कायम करनेसे कोई फायदा नहीं। दूसरी कहानी। १५.55AMSIS मन नगोयम के ताअतम बपजीर । कलमे अफू वर गुनाहम कश ॥ १ ॥ ने एक फकीर को देखा कि, वह मक्के के मन्दिरकी देहली पर माथा रस्खे रो-रो कर यह कह रहा था kesears "हे क्षमावान् दयालु परमेश्वर ! आप जानते हो. कि एक शानी और अन्यायी-पापी-मनुष्य से क्या हो सकता हे कि, जो वह आपके अर्पण फरे। मेरे दूपणोंके लिए मुझे समा प्रदान कीजिए . क्योकि मैने जो कुछ धर्मका काम मेरा यह दावा नहीं है कि मैंने तेरी नेवादी-लि जोर रोना चाहिए । भेरी तो पए प्रार्थना । कि त मेरे पापा । मेरा कोई अधिकार नही, दल्लिन .. 11 ६४ गुलिस्ता। मैं किया है, मैं उसके बदले का बिल्कुल हकदार नही हूँ। पापी लोग अपने पापके लिए पश्चात्ताप करते हैं। जो लोग परमे- श्वर को जानते हैं, उनसे यदि उपासनामे किसी प्रकार का दोष हो जाता है, तो उसके लिए वे उससे माफ़ी मांगते हैं। "भक्त लोग अपनी भक्तिके पुरस्कार के प्रत्याशी रहते हैं और सौदागर लोग अपने मालका मूल्य चाहते है। परन्तु सेवक हूँ, मैं आज्ञाकारिता नहीं वरन् आशा लाया हूँ और व्यापार करने नहीं वरन् भिक्षा मांगने आया हूँ। तू अपनी योग्यताके अनुसार मुझसे व्यवहार कर, मेरी तपस्या के अनु- सार मुझसे बर्ताव न कर। मेरा मुँह और सिर तेरी देहली पर है, तू चाहे माफ़ कर, और चाहे कत्ल कर, आज्ञा करना तावेदार का काम नही है। तू जो आज्ञा करेगा मैं वही करूँगा।" कावे के द्वार पर मैंने तपस्वीको देखा। वह चिल्ला-चिल्ला कर रोता हुआ कह रहा था-"मै तुझसे यह प्रार्थना नहीं करता, कि तू मेरी सेवा को ग्रहण कर , यह चाहता हूँ कि तू मेरे पापो पर क्षमा की कलम चला दे।" शिक्षा-'क्षमा बहन को चाहिए, छोटन का अपराध ।' मनरेज़ी में भी एक कहावत है-To err is human, to forgive is disane में दूसरा अध्याय । ६५ 4. तीसरी कहानी ::०::- - रूये वर खाक इज्ज मी गोयम । हर सहर गह के बाद मी आयद ॥१॥ ऐ के हरगिज़ फ़रामुश्त न कुनम । हेचत अज बन्दा याद मी प्रायद ॥ ब्दुल कादिर गीलानी मक्केके मन्दिरके द्वार के सामने, ककड़ो पर सिर रखकर, यह कह रहा था,-'हे परमेश्वर! मेरे गुनाहो को माफ कर, लेकिन, यदि तू मेरी सजा करे तो मुझे आकरत के समय अन्धा करके उठा लेना कि, जिससे पुण्यात्मा लोगोके सामने । मुझे शर्मिन्दा न होना पड़े।" 'रोज़ प्रात कालके समय जब मैं दुर्बलता के कारण पृथ्वी- पर मुँह रख कर औंधा पड़ जाता हूँ और ध्यान में सतके होता है तो मै यही कहता हूँ कि हे ईश्वर ! मैं तुम्हें कभी न भूलेगा। क्या आप मेरा स्याल करेंगे?" 1- "दर !तरा नुने उम समय भी ध्यान रहना तिम स्नप टीदा फे में और आदमी नींद का मानन्द लेते हैं। पर यह तो नाशि, मेरा किसी माय प्यानभाता है ?
गुलिस्ताँ। चौथी कहानी हर के ऐबे दीगरॉ पेशे तो आवुर्दो शमुर्द । बेगुमा ऐवे तो पेशे दीगरॉ ख्याहद बुरद ॥ BY क चोर किसी धार्मिक मनुष्य के घरमे घुसा, किन्तु बहुत खोज-ढूंढ़ करने पर जब उसे कुछ सुन मिला, तव वह बहुत दुःखी हुआ। उस भले आदमीने उसकी यह अवस्था देखकर, अपने बिस्तरेमेसे कम्बल निकाल कर उसके रास्तेमे, जिधर से वह जानेवाला था, फेंक दिया, कि जिससे वह निराश न हो जाय। हमने सुना है, कि जो असल धर्मात्मा होता है, वह अपने दुश्मनका भी दिल नहीं दुखाता। तू जो कि सर्वदा अपने मित्रोसे झगडा. नकरार किया करता है, उस पदको कैसे पा सकता है ? धर्मात्मा लोग मुंह के सामने और पीठ-पीछे एक ही प्रकारका ग्जेत रयते है। वे लोग बैसे नहीं होते, कि जो तुम्हारे पीट- पोछे तुम्हारी निन्दा करते हैं, परन्तु मुंह के सामने तुम्हारे जिमग्ने को तैयार रहते है तुम्हारे सामने बकरी में उम्र की गई करने वाले मे त यद आगा मा म कि, नग , गने प्रगमा पारगा। आग की मेरे मामन गई का , मामा पोगा। - - दूसरा अध्याय। ६७ बच्चे की तरह नम्र रहते हैं और तुम्हारे पीछे मनुष्याहारी भेड़िये की तरह हो जाते हैं। जो कोई तुमसे तुम्हारे पड़ौसी के दोष वर्णन करता है, वह तुम्हारा दोष भी अवश्य दूसरोके सामने प्रकट करेगा। शिक्षा—साधु पुरुषों का स्वभाव होता है, कि वे अपने दुश्मनों का भी दिल नहीं दुखाते । वे लोग आगे-पीछे समान प्रेम रखते है। लेकिन दुष्ट • लोग सामने तो चिकनी-चुपड़ी बातें बनाया करते हैं, हर तरह अपना प्रेम- भाव दिखाते हैं, किन्तु पीठ-पीछे बुराइयाँ किया करते हैं। बहुत से भोले- भाले लोग उनकी निन्दाओं पर विश्वाप्त कर लेते हैं, और यह समझने लगते हैं कि यह अमुक मनुष्य की निन्दा करता है किन्तु हमारी निन्दा न करेगा। लेकिन उनको खूब ख़याल रखना चाहिए, कि जो मनुष्य भौर की वुराई तुम्हारे सामने करता है, वह तुम्हारी बुराई भी दूसरे के सामने अवश्य करेगा, क्योंकि दुर्जनोंका तो स्वभाव ही ऐसा होता है। । .. ជ , E ६८ गुलिस्ताँ। पांचवीं कहानी। कु चो अज कॉमे यके वेदानशी कर्द । न केहरा मजिलत मानद न मेहरा ।। RAM छ मुसाफिर परस्पर छ मुसाफिर परस्पर के दुःख सुख के भागी होकर KH एक साथ सफर कर रहे थे। मैंने उन लोगोसे Sasबन्छ कहा कि मुझे भी अपने साथ ले लो, पर उन लोगोने इनकार कर दिया। तब मैं बोला, कि परोपकारी धर्मात्माओका यह काम नही है कि वह ग़रीबों से मुँह फेर ले और उन्हें ऐसी सङ्गत से वंचित रक्खें। मैं उतनी शक्ति स्वयं प्राप्त करना जानता हूँ, कि जिससे मैं एक काम- काजी दोश्त वनूं न कि लोगोका विघ्नकारी। यद्यपि मैं किसी जानवर पर सवार नही हूँ, किन्तु तोभी मैं आप लोगोका बोझा ढो ले चलूंगा। उनमें से एकने कहा,-'जो बात तुमने सुनी है, उससे दुखी मत होना , क्योकि थोड़ी- ही देर हुई एक चोर दरवेश के रूपमें हमलोगोंकी मण्डली मे घुस आया था। कोई कैसे जान सकता है कि किसके जामे के नीचे क्या है। लिखनेवालाही जानता है कि पत्र में क्या लिखा है। अव मैं अपनी कहानी की तरफ लौटता हूँ, दरवेश की हालत जातिका कोई व्यक्ति भी यदि गलती करता है तो उस जाति के छोटे बड़े सभी आदमियों की अप्रतिष्ठा हो जाती है उनकी बुराई होती है । सब जगह दूसरा अध्याय । ह , . पसन्द की जाती है, इसलिए लोगोंने उसकी पवित्रता के सम्बन्धमें बिल्कुल शङ्का न की और उसे अपने समाज में आने दिया। धर्मका बाहरी भाग दरवेशों की पोशाक होता है। मनुष्य की सूरत के लिए यही काफी है। अपना कार्य- कलाप अच्छा रखो, फिर जैसा चाहो, वैसा कपड़ा पहनो, चाहो सिर पर ताज रखो, चाहो कन्धे पर निशान उठाये फिरो, क्योकि गाढ़ा कपड़ा पहन लेनेसेही कोई ईश्वर-भक्त नही बन जाता। साटिनकी पोशाक पहिनो और सच्चे धर्मात्मा वनो। सांसारिक लालसा और वासनाओंके परित्याग करने सेही मनुष्य पवित्र आत्मा बन सकता है , केवल कपड़े बदलने से कुछ नहीं होता। युद्धमें मनुष्यत्व की ज़रूरत होती है हिजड़े के वकतर किस कामका ? संक्षिप्त हाल यह है, कि एक दिन हमलोगोंने अन्धेरा होनेतक सफ़र किया और रात हम एक किलेके नीचे सो गये। वह निर्दय चोर, स्नान करने का बहाना करके, अपने एक मित्र का लोटा ले गया और उसके बाद चोरी की तलाश मे निकल गया। इस आदमी को देखो, कि जिसने साधुओ की पोशाक से अपना बदन ढांक कर काबेके परदे को गधे की झूल बनाया। दरवेशो की नज़र से बाहर होतेही उसने, एक बुर्ज पर चढ़ कर, गहनो का डिब्बा चुराया। सवेरा होते-होते, यह काले हृदय वाला हतभागा बहुत दूर निकल गया और सवेरे इसके दोस्त वेवारोंको (जिनको वह सोता छोड़ गया था) १०० गुलिस्ता। .. लोगोने किलेमे लेजाकर कैदखानेमे बन्द कर दिया। उस दिन से हम लोगो ने अपनी मण्डली के न बढ़ाने और उदासीन बनकर जीवन निर्वाह करने का इरादा कर लिया है, क्योंकि निज्जन स्थानमेही शान्ति निवास करती है। जव किसी वंश का एक मनुष्य कोई मूर्खता का काम करता है तो फिर छोटे-बड़े में कोई प्रभेद नहीं रह जाता, सबके सब अप- मानित होते हैं। क्या तुमने यह नही सुना, कि चरागाह का एकही वैल गांव के सारे वैलो को दूपित कर देता है।" मेंने उत्तर दिया-"उस प्रभावान् परमेश्वर को धन्यवाद है ! यद्यपि उन लोगोने मुझे अपने समाजसे अलग कर दिया है ; तथापि धर्मात्मा लोग जो सुख भोगते हैं, मैं भी उन सुखोंसे वञ्चित नहीं हूँ। क्योंकि मुझको इस कहानी से ऐसी शिक्षा मिल गई है, कि जो हमारे जैसे आचार-व्यवहार के मनुष्य को बाक़ीके जीवन-भर उपदेश देनेका काम करेगी।" समाज के एक उद्दण्ड मनुष्य की वजह से अनेक ज्ञानियों का दिल दुखता है। यदि तुम किसी हौज को गुलाब- जलसे भर दो और उसमे एक कुत्ता गिर पड़े तो उससे वह अपवित्र हो जायगा। शिक्षा-आजकल भी ऐसे ढौंगी साधु बहुत मिलते हैं, जो वास्तवमें साधु नहीं हैं, किन्तु उन्हों ने अपना ऊपरी पहनावा और ढंग ऐसा धना रखा है, जिससे लोग उन्हें असली साधु समझे। ऐसे बनावटी साधु भोले- भाले लोगों पर अपना हाथ खूब फेरते हैं। इस कहानी का यह नतलब है, - दूसरा अध्याय। १०१ कि सच्चे साधुत्रों को अपना आचरण साधुओंकासा रखना चाहिए, सांसा- रिक विषय-वासनाशों से दूर रहना चाहिए। जिसे विषय-वासना नही सताती, जिसे किसी चीजको इच्छा नही रहती, जिसने तृष्णा को त्याग दिया है, वही सच्चा साध है। वह इच्छानुसार मलमल, नैनसुख और मख़मल के वस्त्र पहनने पर भी निर्दोष साधु कहा जा सकता है, किन्तु जो लोग गेरुए या और किस्म के कपड़े पहनते हैं, चिथड़ोंसे शरीर ढाँकते हैं, राख- धूल से शरीर रँगते हैं, किन्तु विषय-वासनाको नहीं त्यागते, तृष्या से पीछा नहीं छुट्टा सकते, वे साधु-वेशधारी होनेपर भी साधु नही कहे जा सकते । उनको ठग भौर मक्कार कहना चाहिये। ऐसे ढोंगी साधु सच्चे साधुओं को भी बदनाम करते हैं। इनकी वजह से असली और नकली साधुओं का पह- चानना मुश्किल हो जाता है। जिस तरह एक मछली सारे तालाबको गन्दा कर देती है, उसी तरह दौंगी या नकली साध सारे साध-समाज को बदनाम करते हैं।
१०२
गुलिस्तां।
छठी कहानी।
तर्सम न रसी बकाबा ऐ एराबी
की रह के तू मीरवी ब तुर्किस्तानस्त ॥
सी बादशाह ने एक फ़कीर को भोज के अवसर
कि
पर निमन्त्रित किया। फ़कीर आकर पत्तल पर
BED बैठा और उसको जितना कम खानेकी आदत थी,
उससे भी अधिक कम खाने लगा और जब ईश्वर की
प्रार्थना करने को खड़ा हुआ तो रोज़ से और ज्यादा देरतक
ठहरा, कि जिससे लोग उसकी ईश्वर-निष्ठा की प्रशंसा करें।
ऐ अरब ! मै समझता हूँ कि तू काबे तक न पहुंचेगा। क्योंकि
जो रास्ता तूने पकड़ा है वह तुर्किस्तान का है। जब वह घर
पहुंचा तो उसने आज्ञा दी कि थाली परोसो मै खाऊँगा।
उसका बड़ा बेटा समझदार था, उसने कहा-"पिताजी !
आप राजाके यहाँ भोज मे गये थे, क्या वहाँ आपने कुछ नहीं
खाया ?" उसने जवाब दिया-"किसी उद्देश्य से मैंने उसकी
उपस्थितिमें कुछ नहीं खाया।" पुत्र ने कहा-"चारम्बार
ऐ अरब, तू कावा कमी न पहुँचेगा, क्योंकि तू ने जो रास्ता पकड़ा है,
वद कावेका नहीं तुर्किस्तान का ह । विपरीत पथ पर चलने से सिद्धि की
प्राप्ति कनी सम्भव नहीं।
.
दूसरा अध्याय। १०३ ईश्वर की प्रार्थना कीजिये ; क्योंकि आपने ऐसा कोई कर्म नहीं किया, जिससे आपका उद्देश्य सिद्ध होगा।" तू अपने गुणोंको हथेली पर रखता है और दोषो को बग़ल में छिपाता है। अरे घमण्डी हतभागे! तू दुर्दिनमे अपने कुद्रव्य से क्या ख़रीदने की उम्मेद रख सकता है। शिक्षा-इस कहानीका सारमर्म यह है, कि जो लोग मनुष्योंमें प्रतिष्ठा लाभ करनेके लिए, अपने तई पुजानेके लिये, साधु-महात्माओंका- सा ढौंग करते हैं; किन्तु लोगों की नजर से बाहर होकर असाधुओंकासा काम करते हैं, वे अच्छा काम नहीं करते। वे भूल करते है। इस राह पर चलनेसे वे ईश्वर की राइको छोड़ते हैं और कुराह पर चलते हैं। अन्तमें, ऐसे बनावटी साधुनों का परिणम खोटा होगा उन्हे ईश्वर-दशन हरगिज न होगा।
१०४ गुलिस्ताँ। सातवीं कहानी। न बीनद मुद्दई जुज़ ख़श्तन रा के दारद पर्दये पिन्दार दरपेश ॥१॥ गरत चश्मे खुदा बीनी ब बख्शद । न बीनी हेच कस आजिज़तर अज़ खेश ॥ १ ॥ झे याद है, कि मैं बाल्यावस्थामे बड़ा धार्मिक था। मु उन दिनो मैं रातहीमें उठता था और अपनी पूजा और व्रत आदि भी ठीक-ठीक समय पर किया करता था। एक रात को, मैं कुरानकी पुस्तक को छाती से लगाये हुए, समस्त रात अपने पिताके सामने बैठा रहा। मैने रात-भर ज़रा आंख भी न मूदी, परन्तु आस-पास के सब लोग सो गये थे। मैने अपने पितासे कहा-"ये लोग मुर्दे की तरह ऐसे सो गये हैं कि इनमे से एक भी मनुष्य इबादत के लिए सिर नही उठाता।" उसने उत्तर दिया-"बेटा! इस प्रकार लोगो का अपराध ढूंढ-ढूंढ़ कर निकालने से तो अच्छा था कि तुम भी सो जाते।" अहङ्कारियों की मूर्ख आदमी अहंकार के वशवी होकर अपने के सिवा दूसरों के दुःख दर्द को विल्कुल नहीं देखते, दूसरों के गुणों को भी नहीं जान पाते, यदि उनमें ईश्वर को देखने की शक्ति होती तो अपने को ही सबसे अधिक नीचा समझते । । -
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दूसरा अध्याय।
१०५
आँखों पर अहङ्कार का पर्दा पड़ा रहता है ; इसलिए वे अपने
सिवा दूसरे को कुछ नहीं समझते। यदि उनके नेत्रोंमे
परमेश्वर को देखने की शक्ति होती, तो वे किसी को अपनी
अपेक्षा शक्तिहीन न देखते।
शिक्षा-इस कहानी का सारांश यह है, कि जो सच्चे साधु है, जो
भभिमान.रहित हैं, वे दूसरों में दोष नहीं हूँ ढ़ते, किन्तु जो अभिमानी हैं, उनकी
दृष्टि दुसरों के दोष दूं ढ़ने में हो रहती है। अभिमानी मनुष्य अपने तई
जगत् में सबसे बड़ा, सबसे गुणवान् और दोषहीन समझता है , किन्तु सच्चा
महात्मा वही है, जिसे जरा भी अभिमान नही है। जिसमें अभिमान है,
उसमें सब दोष हैं। अभिमान त्यागे बिना मनुष्य ईश्वर तक कभी नहीं
पहुच सकता। किसीने कहा है-
है तजस्सुस शर्त यॉ मिलने को क्या मिलता नहीं ।
है खुदी इनसान में जब तक खुदा मिलता नहीं।
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१०६ गुलिस्ता। आठवीं कहानी। संसा DAGOGO ए शख़सम बचश्मे आल्मियाँ खूब मनज़रस्त । वज खुबसे बातनम सरे खिजलत फ़गन्दःपेश ॥१॥ क समाज मे, समाजका प्रत्येक मनुष्य एक धार्मिक मनुष्य की प्रशंसा कर रहा था। उस धर्मात्मा ने लिर उठाकर कहा-"सुझमें क्या गुण और क्या अवगुण है, सो मैंही जानता हूँ। तुम लोग मुझे केवल ऊपर से देखकर , मेरे अच्छे कामों की प्रशंसा करते हो; परन्तु मेरे भीतर क्या है सो तुम्हें नहीं मालूम ।" "आदमी मेरी बाहरी सूरत देखकर मुझे नेक समझते हैं, परन्तु अपने भीतरकी नीचता के कारण, मैं शर्मसे सिर झुका लेता हूँ। मनुष्य मोर की, उसके सुन्दर पङ्खोकी वजह से प्रशंसा करते हैं; पर वह अपने कुरूप पैरोके लिए लजित रहता है।" शिक्षा-इस कहानी का सारांश यही है, कि अपने गुणदोपों को जितनी अच्छी तरह हम खुद जानते हैं उतनी शाच्छी तरह अन्य लोग नहीं जान सकते। मनुष्य को चाहिए कि अपने दोपों पर नज़र रक्खे और उन्हें छोडने की कोशिश करे। मेरे बाहरी ठाट से लोग मुझे नेक समझते है, परन्तु अपनी भीतरी नीचता के कारण मैं अपना शिर नीचे झुकाये हुए हूँ।
दूसरा अध्याय। १०७ नवीं और दशवीं कहानी। अगर दवेश बर हाले वमॉदी । सरे दस्त अज़ दो आलम बरफिशादी॥ वनान पर्वतका एक धाम्मिक मनुष्य, जिसकी ईश्वर- लि भक्ति की अलौकिक कार्यावली अरब-भरमें प्रसिद्ध थी, द्मश्क की बड़ी मसजिद मे प्रविष्ट होकर, कुएँ के हौज़के किनारे हाथ-पैर धो रहा था, कि इतनेमें उसका पैर फिसला और वह पानी मे गिर पड़ा और फिर बड़ी कठिनता से उसके बाहर निकला। जव लोग पूजा-पाठसे निवृत्त हुए, तब उसके एक साथीने कहा कि मेरे मनमे एक शङ्का है वह आपको दूर करनी होगी। शैख़ने कहा कि-"क्या शङ्का है ?" उसने उत्तर दिया,--"मुझे याद आता है कि आप अफ्रिका के समुद्र में पानी पर चलते थे, परन्तु पैर विलकुल नहीं भोगता था; लेकिन आज मैं देखता हूँ कि आप केवल एक पुरसे-भर पानीमें गिरकर मरनेकी हालत को पहुच गये थे, इसका क्या कारण है ?" वह बहुत देरतक ध्यानमें मान रहा और फिर ऊपर देखकर बोला-"क्या तुमने नहीं सुना कि संसार के सय्यद सुहम्मद मुस्तफाने (६५ यदि फकीर सदा एकसी हालत में तो दोनों जहा सामने गर्द होते। आपका रहता .
१०८ गुलिस्ताँ। उसको शान्ति और सुख दे !) कहा था कि ईश्वर ने एक समय सुन ऐसी शक्ति दी थी, कि जो किसी देव-दूत और ईश्वरके भेजे हुए पृथ्वीके पैग़म्बरो को भी मयस्सर नहीं हुई थी, परन्तु उसने यह कहने का दावा नहीं किया, कि ऐसी घटना हमेशा होती है और यह भी नही कहा कि जिवरईल और मेकाईल मे वैसीही शक्ति नही थी । एक समय हफ़सा । और जैनब को भी वैसीही शक्ति दी गई थी। महात्माओ की दृष्टि में प्रकाश और अन्धकार दोनो हैं। वे जिसको चाहे उसे प्रकट कर दें और जिसे चाहें उसे गुप्त रक्खें। तूही अपना मुँह दिखाता और फिर उसे छिपा लेता है। अपने गुणोको बढ़ाता हुआ, तू हमारी वासनाओकी वृद्धि करता है। तुझे प्रत्यक्ष देखकर मै रास्ता भूल जाता हूँ। कभी अग्नि-शिखा उद्दीप्त होती है और कभी जल-सिञ्चन द्वारा निवृत्त हो जाती है , उसी कारण भी तो तू मुझे प्रचण्ड अग्नि-शिखा में देखता है और कभी जल-तरङ्गोंमे डूबा हुआ पाता है।" एक मनुष्य का लड़का खो गया था । ( याकूब से मत- लब है) किसीने उससे कहा- "अरे भद्र-वंशज, बुद्धिमान बूढे, जब तूने सूदूर मिश्रमे उसके जानेकी गन्ध पाई, तब फिर कनआन के कुऍमें क्यों न देख सका?" उसने उत्तर * जिबरईल और मेकाईल दो फरिश्तों या ईश्वर-दूतों के नाम हैं + इफ़सा और जेनव दो पैगम्बरों के नाम हैं । .
दूसरा अध्याय। १०६ दिया, “हमलोगोंकी हालत चमकती हुई बिजली की तरह है, जो कभी झलकती और कभी लुप्त हो जाती है। कभी तो हम चौथे स्वर्ग में बैठे रहते हैं और कभी अपने पैर की पीठ भी नहीं। देख सकते (अर्थात् पाताल को चले जाते हैं) यदि फ़कीर सर्वदा एकही अवस्था मे रहने पाता ; तो वह दोनों जहान की आकांक्षा से निवृत्त हो जाता।" ग्यारहवीं कहानी। फ़हमे सुख़न गर न कुनद मुस्तमा । कूवते तबा अज़ मुतकल्लिम मजोय ॥ १ ॥ फुसहते मैदां इरादत बयार । तावज़नद मर्दे सुखनगोये गोय ॥२॥ के लबक की बड़ी मसजिद में, मैं एक समाज के लोगों- ब को उपदेश देनेके ढंगसे वक्त ता दे रहा था । उस समाज के लोग ऐसे शुष्क और मुर्दा-दिल थे, कि इस लोकमे रहकर परलोक की राह अवलम्बन करनेमे बिल- कुल असमर्थ थे ( अर्थात् संसार का कार्य करते हुए, परलोक जब सुनने वाले में समझने की योग्यता नहीं होती तब कहने वाले की पातका उस पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। पहले समझने की योग्यता पैदा फरो, फिर तुम कहने वाले की बात से लाभ उठा सकोगे ।
गुलिस्ता। , को पहुँचने का उपाय निरीक्षण करने में अशक्त थे) मैंने देखा कि मेरे उपदेशका उनपर कुछ असर न हुआ और मेरी ईश्वर-भक्ति-रूपी अगिन ने उनके हृदय-रूपी हरे जङ्गलको प्रज्वलित न किया। मै उन जङ्गली जानवरोको उपदेश देता- देता और अन्धोको आईना दिखाता-दिखाता परेशान हो गया परन्तु उद्देश्य सिद्ध न हुआ। बात-चीत की अविच्छन्न शृङ्खला इतनी बढ़ी, कि कुरान के इस पदका वर्णन आया:-"हम अपनी गर्दन के नस की अपेक्षा भी उसके निकट रहते हैं।" मेरा वाद् यहां तक बढ़ा कि मैंने कहा-"मेरा मित्र स्वयं मेरी अपेक्षा भी मेरे निकट है ; परन्तु आश्चर्य यह है कि, मैं उससे दूर हूँ। मैं क्या करूँ और किस से कहूं, क्योकि वह मेरी गोद मे है पर मैं उससे जुदा हूँ ? में उसकी बात-चीतके मद से मतवाला हो गया है और प्याले की दवाइयाँ ( दारू) मेरे हाथ में है।" इसी समय उस मण्डली के निकट से एक मनुष्य गुज़रा। वह मेरे अन्तिम शब्दो .से ऐसा उत्साहित हो गया ओर इतनी ताकीद के साथ नसीहत करने लगा, कि सब लोग वाह-वाह करने लगे और उत्साहजनक आनन्द मे संयुक्त हो गया मैंने कहा-भगवन् ! जो लोग तुझ से बहुत दूरी पर हैं, वे तुझे जानते हैं, पर जो लोग तुन को नहीं जानते वे निकट होने पर भी तुझ से दूर है।" जब सुननेवाला बात को समझता नही, तब वक्ता के * कुरान मुमतमानों का वर्म-ग्रन्य है। समाज एक अत्यन्त B .
दूसरा अध्याय। उपदेश का ज़रा भी असर नहीं होता। प्रथम सीखनेकी इच्छा को बढ़ाओ, कि जिससे वक्ता अपनी वक्त ता को अच्छी तरह कह सके और तुम पर असर डाल सके। शिक्षा-इस कहानी का सारांश यही है, कि ईश्वर हर दम मनुष्य के पास है । जो उसे अपने पास छोड़कर, दूसरी जगह खोजते फिरते हैं वे अज्ञानी हैं। जो लोग ईश्वर को जानते है वे उसके नजदीक हैं , किन्तुजो उसे नहीं जानते, वे टप्सके नजदीक रहने पर भी उससे दूर है। दूसरी बात यह है, कि नसीहत देनेवाले की नसीहत का असर तभी हो सकता है जक कि सननेवाले ध्यानपूर्वक सुने ; अगर सुननेवाले ध्यान न दें तो वक्ताका बोलना व्यर्थ है। बारहवीं कहानी। सुशस्त जेरे मुगलिॉ वराहे वादिया खुफ्त । शवे रहील वले तकें जॉ बवायद गुफ्त ॥ १ ॥ क रातको, मक्केके वीरान जङ्गल मे, नींद के मारे हिलने-डोलने की शक्लेि रहित होकर, मै ज़मीन EDO पर लिर रख कर लेट गया और मैंने जे रोकने वालेसे कहा कि मुन्ने छेडना मत । जव ऊँट मारे ५ सफरमें फूल वाले पैदके नीचे मापक के किनारे, सोना स्किन अच्छा है पर उसने जान जाने का भी पर है। ए t गुलिस्ता। के बोझा नही उठाता तव वेचारे मनुष्य के पैर कहाँ तक आगे चलेगे। जब मोटे-ताजे मनुष्य का शरीर दुर्बल हो रहा तव सम्भव है, कि वह थकावट से मर जाय।" उसने जवाब दिया-भाई आगे मझा है और पीछे चोर हैं, आगे बढ़ चलो तो बच जाओ और यदि सोओगे तो मरोगे।" अकेसिया के पेड़ के नीचे, जङ्गल की सड़क पर, कूच की रात में सोना बहुनही लुखद है ; परन्तु यह खूब समझ लो कि वह सोना नहीं ; जानका खोना है। शिक्षा-वही थाराम अच्छा है, जिसका परिणाम अच्छा हो। तेरहवीं कहानी। को देखा। "नोके व मुसीवते गिरफ़्तारम न वमासीयते ।" मुद्र के किनारे मैंने एक धार्मिक मनुष्य स उसके शरीर मे चीतेके पळे का घाव था, जो भी किसी दवासे आराम न हो सका था। इस कष्ट- पर्ण अवस्था में वह बहुत काल तक रहा परन्तु सर्वदा ईश्वर तो धन्यवाद देता रहता था। किसीने पूछा कि तुम किसलिये विवाद दिया करते हो ? उसने कहा-"मैं इस वातके लिए पास होने में नाग पंमा रहना अता है।
दूसरा अध्याय। " धन्यवाद दिया करता हूँ कि में मुसोवतमें गिरफ्तार हूँ न कि पापमें। अगर वह प्यारा मित्र-ईश्वर-मेरे मार डालने का भी हुक्म दे, तो मैं अपनी जान जाने से कुछ भी भयातुर न हे गा; लेकिन उससे पूछूगा कि हे दीनबन्धो ! इस दासने क्या अपराध किया है, जिससे आप अप्रसन्न हो गये हैं। यही खयाल मेरे रक्ष का सवत्र है।' शिक्षा. -इस कहानी का फकीर ईश्वर को अपना प्रिय मित्र मान कर कहता है, कि ईश्वर मुझे चाहे जितनी तकलीफें दे, मुझे मरवा ढाले; किन्तु मैं अपनी जानके लिए सफ भी न करूंगा, जान जानेसे मुझे कुछ दुःख महोगा। लेकिन अगर वह प्यारा मित्र-ईश्वर-मुझसे रूठ जाय, नाराज़ हो जाय, तो मुझे अत्यन्त दुःख होगा। सारांश यह है कि, इस कहानी का फकीर ईश्वर की प्रसन्नता को अपनी जानसे भी बढ़ कर समझता है । 1 ८ ११४ गुलिस्ता। चौदहवीं कहानी चूं फ़रोमानी बसख्ती तन ब इज्ज़ अन्दर मदह । दुश्मनारा पोस्त बर कन दोस्तॉरा पोस्तीन ॥१॥ क फ़कीर ज़रूरत पड़ने पर एक दोस्त के घरसे ए कम्बल चुरा लाया। विचारक ने उसके हाथ काटने का हुक्म दिया। कम्बल के मालिक ने बीचमें पड़ कर कहा कि, मैं इसे दोषमुक्त करता हूँ। विचारक ने कहा कि, हम तुम्हारे बीचमे पड़ने पर भी न्यायानुसार दण्ड दिये बिना न रहेंगे। उसने कहा- आपका कहना उचित है, किन्तु जो मनुष्य धर्मार्थ अलग की हुई चीज़ चुराता है, उसे अंग काटने की सज़ा नहीं दी जा सकती। क्योकि न तो फ़क़ीरही किसी चीज़का मालिक होता है और न कोई फ़कीरकाही मालिक होता है। फ़कीर के पास जो कुछ होता है वह मुहताजोके हो लिये होता हैं।” विचारक ने उसे छोड़ दिया और कहा-"क्या संसार मे तुझे और जगह न मिली, जो तूने ऐसे मित्र के यहांहो चोरी की ?” उसने जवाव दिया-"ऐ मेरे मालिक, क्या तुमने नही सुना । विपत्ति के समय हाय-पर-हाथ रखकर निराश होकर मत वैठ जा- दुश्मनो की खाल और दोस्तोंके कपडे तक उतार ले ।
दूसरा अध्याय। कि, अपने दोस्तों के घर वुहारो, किन्तु अपने दुश्मनो के दर- वाजे मत खटखटाओ। जब तुम पर आफ़त आवे तब निराश मत हो , अपने दुश्मनों की खाल उधेड़ो और अपने मित्रों की कुरती उतार लो।" -::०::- पन्द्रहवीं कहानी। हर सू दवद ऑकस जे दरे खेश वरानद । वॉरा कि वख्यानद बदरे कस न दवानद ॥१॥ सी बादशाह ने एक महात्मा से पूछा-"क्या तुम कि । कभी मेरा भी स्याल करते हो ?” उसने उत्तर दिया--'हां, उस समय जब मैं ईश्वर को भूल जाता हूँ।" जिसे ईश्वर अपने दरवाजे से भगा देता है, वह जगह-जगह मारा-मारा फिरता है. लेकिन जिसे अपने पास बुला लेता है, उसे किसी के द्वार पर जाना नहीं पड़ता। शिक्षा-जो मनुष्य ईधर-प्रेममें लोन रहते हैं, जो घर के मिया स्वर जिम्को अपने दाग्से भगा देते हैं पर पर-पर टुकदे मागना फिरता है, परन्तु जिसे पर अपने पास मुना रेने ₹ उसे किनीने द्वार पर जाने की जरूरत नहीं रहती।
६ ११६ गुलिस्ताँ। और किसी का प्राश्रय नहीं पकड़ते; जिन पर ईश्वर की कृपा होती है, वे जगत् में किसी सम्राट या राजा-महाराजा किसीसे भी भय नहीं खाते। ईश्वर-भक्तों को मनुष्यके प्राध्य की कुछ ज़रूरतही नहीं होती। जो ईश्वर- प्रेमी नहीं हैं, जिनका सबा-भरोसा ईश्दर पर नहीं है, वे, ईश्वर के प्यारे न होनेके कारण, ससारी मनुष्यों से डरते और उनका धामय टटोलते हैं। ईश्वर के प्यारे को न तो किसीसे डरही लगता और न किसी चीज़ की इच्छा ही होती है, अतएव उसे संसारी श्रादमियों से क्या प्रयोजन ? .
दूसरा अध्याय। ११७ सोलहवीं कहानी। medies दलक़त वचेकार आयद व तसवीहो मुरका । खुदरा जे अमलहाये निकोहीदा वरीदार ॥१॥ हाजत व कुलाह वीं दाश्तनत नेस्त । दर्वेशसिफ़त वाशो कुलाहे ततरी दार ॥२॥ SHO सी महात्मा ने स्वप्न में एक राजा को स्वर्ग में और कि एक तपस्वी को नरक मे देखा। उसने पूछा- "इसका क्या कारण है कि, राजा तो ऊँचा चढ़ा और तपस्वी नीचे गिरा; क्योंकि प्रायः इसकी उल्टी वातही देखी जाती है। लोगोंने जवाब दिया--"राजा महात्माओं से प्रेम रखता था, इससे उसे स्वर्ग मिला और तपस्वी राजाओ की सङ्गति करता था, इससे वह नरकमें डाला गया।" मोटे- झोंटे और ढीले-ढाले फुरते; माला और थेगड़ीदार कपड़ों से क्या फायदा ? बुरे कर्मों यचो, तो फिर पत्तोंकी टोपी की क्या जरूरत ? तपस्वियोंकेसे गुण रख फार भले ही तातारी मुझट पदन लो-कोई हानि नहीं । शिक्षा-इस कहानी का पार मर्म यह है कि जो मनुष्य पE मात्र जो गापुरे फर्न करता है, पर चारो ठाट साधुओं-नेसा करे. व RETRE | सोनमा गुनमा हाले पनि राजा का पान तोगी, सनि नदी ।
११८ गुलिस्ता। ईश्वरसे प्रेम रखता है, उसके सिवा दुसरेको शरण नहीं जाता, सदा परोप- कार में लगा रहता है, अपनो काया को नित्य और क्षणमगुर समझ कर अभिमान नहीं रखता, वह चाहे जैसा वेरा रखने पर भी सच्चा योगी है। जिस मनुष्य में उपरोक्त गुण तो नहीं है, किन्तु वह पत्तोंसे बदन ढांकता है, शरीर में खाक रमाता है. कोपीन वांधता है या हजारों थेगड़ियों के कपड़े पहनता है, वह योगी नहीं, किन्तु योगी का स्वांग भरनेवाला है। विष्णु और शङ्कर तक श्रृङ्गार शतक । अगर आप उन मुनिमोहनी कामिनियों के सम्बन्धमें जानना चाहते हैं, जिन्होंने मनुष्य क्या-ब्रह्मा, को अपना गुलाम बना रखा हैं, तो आप हमारे यहांका 'शृङ्गार- शतक” देखिये । नौजवानो के देखने की चीज़ है। जो रसिक हैं, मनचले हैं, शोकीन हैं, इसे ज़रूर देखें। इसमे भी वैराग्य- शतक की तरह मूल श्लोक हैं, हिन्दी-अनुवाद हैं, लम्बी चौड़ी टीका और अगरेजी अनुवाद है। ढाई दर्जन मनोमोहक नेत्र- रक्षक चित्र हैं। मूल्य सजिल्द का ३॥) ।
दूसरा अध्याय।
११९
सत्रहवीं कहानी।
न वा शुतर वा सवारम न चो उशतर जेरवारम ।
न खुदावन्दे रअय्यत न गुलाम शहरयारम ॥ १ ॥
गमे मौजूदो परेशानी
परेशानी मादूम नदारम ।
नफ़से मीज़नम आसूदह ो उने मीगुजारम ॥२॥
क पैदल यात्री, नङ्गे सिर और नङ्गे पांवों, कूफेसे
आकर मक जानेवाले यात्रियोंके साथ हो लिया ।
HREE वह वड़ो खुशी से राह चलता और कहता-'न
तो मैं ऊँट पर सवार है और न खच्चर की तरह वोझाही
लादे हुए हूँ। में न तो किसी का मालिक हैं और न किसी
बादशाह का गुलाम हैं। न मुझे भूत से सरोकार है और न
वर्तमान से। मैं स्वच्छन्दतापूर्वक सांस लेता हूँ और सुखसे
जीवन व्यतीत करता हूँ। ऊँट पर चढ़े हुए एक मनुष्यने
उससे कहा-"ऐ फकोर ! तू कहाँ जा रहा है ? जा लौट
जा, नहीं तो कष्टके मारे मर जायगा।" फकीर ने उस
सपारकी वात पर ध्यान न दिया और चलता-चलता जङ्गलमें
न मो में गोटे पर नवार-न ऊंट की तरह दोने में लदा हुआ।
7 frमी या मालिक न किमी का सेवक । मैं गले-पिदले नागदों को
छोर पर नगपूर्वक सांस लेता मोर नौज में अपना जीवन व्यतीत
धरता ॥१.२॥
११८ गुलिस्ता। ईश्वरसे प्रेम रखता है, उसके सिवा दुसरेकी शरण नहीं जाता, सदा परोप- कार में लगा रहता है, अपनो काया को नित्य और क्षणभङ्गुर समझ कर अभिमान नही रखता, वह चाहे जैसा वेरा रखने पर भी सच्चा योगी है। में उपरोक्त गुण तो नहीं है, किन्तु वह पत्तोसे बदन ढांकता है, शरीर में खाक रमाता है. कोपीन बांधता है या हजारों थेढ़ियों के कपड़े पहनता है, वह योगी नहीं, किन्तु योगी का स्वांग भरनेवाला है। जिस मनुष्य श्रृङ्गार शतक । अगर आप उन मुनिमोहनी कामिनियों के सम्बन्धमे जानना चाहते हैं, जिन्होंने मनुष्य क्या-ब्रह्मा, विष्णु और शङ्कर तक को अपना गुलाम बना रखा हैं, तो आप हमारे यहांका शृङ्गार- शतक” देखिये । नौजवानों के देखने की चीज़ है। जो रसिक हैं, मनचले हैं, शोकीन हैं, इसे ज़रूर देखें। इसमे भी वैराग्य- शतक की तरह मूल श्लोक हैं, हिन्दी-अनुवाद हैं, लम्बी चौड़ी टीका और अङ्गरेज़ी अनुवाद है। ढाई दर्जन मनोमोहक नेत्र- रजक चित्र हैं। मूल्य सजिल्द का ३||) दूसरा अध्याय। ११९ सत्रहवीं कहानी। न वा शुतर वा सवारम न चो उशतर जेरवारम । न खुदावन्दे रअय्यत न गुलाम शहरयारम ॥ १ ॥ ग़मे मौजूदो परेशानी मादूम नदारम । नफ़से मीज़नम आसूदह ओ उने मीगुज़ारम ॥२॥ क पैदल यात्री, नङ्ग सिर और नङ्ग पांवों, कूफेसे आकर मक जानेवाले यात्रियोंके साथ हो लिया। PREM वह बड़ो खुशी से राह चलता और कहता-'न तो मैं ऊँट पर सवार हूँ और न खच्चर की तरह वोझाही लादे हुए हूँ। मैं न तो किसी का मालिक हूँ और न किसी वादशाह का गुलाम हूँ। न मुझे भूत से सरोकार है और न वर्तमान से। मैं स्वच्छन्दतापूर्वक सांस लेता हूँ और सुखसे जीवन व्यतीत करता हूँ। ऊँट पर चढ़े हुए एक मनुष्यने उससे कहा-'ऐ फकीर ! तू कहाँ जा रहा है ? जा लौट जा, नहीं तो कष्टके मारे मर जायगा।" फकीर ने उस सवारकी बात पर ध्यान न दिया और चलता-चलता जङ्गलमे न तो मैं घोड़े पर सवार हूँ-न ऊँट की तरह वोझे से लदा हुआ है। न किसी का मालिक हूं न किसी का सेवक । मैं अगले-पिछले झगड़ों को छोड़ कर सुखपूर्वक सास लेता हूँ मौर मौज में अपना जीवन व्यतीत करता हूं ॥ १-२॥
१२०
गुलिस्ता।
दाखिल हो गया। जब हम लोग नखलये महमूद नामक
स्थान पर पहुंचे ; तो उस धनी के दिन पूरे हो गये और
वह मर गया। फकीर उस मरनेवाले के तकिये के पास बैठ
कर कहने लगा--"मैं कष्ट सहकर भी यहाँ तक जीता-जागता
चला आया और तुम साँडनी पर सवार रहकर भी मर
गये।"
एक मनुष्य किसी बीमार की बग़ल मे रात भर रोया और
सवेरे मर गया, लेकिन बीमार भला-चङ्गा हो गया ।
ऐ
मित्र! अनेक तेज़ घोड़े गिरकर मर गये, किन्तु लँगड़ा
गधा मञ्जिले मकसूद तक जीता हुआ पहुंच गया। अनेक
बार ऐसा हुआ है कि, हट्टे-कट्टे तन्दुरुस्त लोग कालके गाल
में समा गये और घायल लोग अच्छे हो गये।
शिक्षा-इस कहानी का सारांश यह है कि, जब मनुष्यके दिन पूरे हो
जाते हैं, तब वह माता है। ऐसा नहीं हो सकता कि, कष्ट सहने वाले, दुबले-
पतले और रोगग्रस्त लोग तो पहले मर जायें और सुख-चैन से जीवन यायन
करनेवाले मोटे-ताजे
तन्दुरुस्त
लोग
बहुत दिन तक जियें और पीछे मरें।
मृत्यु मोटे-ताज और दुबले-पतले एव रोगी-निरोगी को नहीं देखती, जिसका
समय पूरा हुथा देखती है, उसे ही अपने में हमें रन जाती है।
दूसरा अध्याय । १२१ अठारहवीं कहानी। बन्दा खुदाये खेश ख्वानद । बायद के बजुज खुदा नदानद ॥ १ ॥ कि सी बादशाहने एक फ़क़ीर को बुलाया। फ़कीर ने मनमें सोचा कि, अगर मैं कोई ऐसी दवा खाले VEEE जिससे कमजोर हो जाऊँ तो बादशाह मेरी तारीफ़ करेगा। कहते हैं, उसने प्राणघातक विष खा लिया और मर गया। वह मनुष्य जो मुझे पिस्ते की तरह फूला हुआ मालूम होता था, उस पर प्याज़ की तरह तह-पर-तह थीं। वह फ़क़ीर जो संसार की तरफ़ देखता है, मक्केकी तरफ पीठ करके उपासना करता है। जो अपने तई ईश्वरका सेवक कहता है, उसे उचित है कि, वह ईश्वर के सिवा और किसी को न जाने । शिक्षा-इस कहानी का सारांश यह है, कि सच्चे फकीर को दुनिया और दुनिया की निन्दा-स्तुति से क्या मतलब ? जो ईश्वर का सेवक हो, उसे केवल ईश्वरसेही मतलब रखना चाहिये। जो अपनेको ईश्वरका भक्त समझता है, उसे चाहिए कि वह ईश्वर के सिवा और किसी से सम्बन्ध न रक्खे ।
१२२ गुलिस्तां । उन्नीसवीं कहानी। यू बरोजगारे सलामत शिकस्तगा दरयाब । के जब ख़ातिरे मिस्की बला बगरदानद ॥१॥ चो सायलज़ तो बजारी तलब कुनद चीजे । बिदह वगर्ना सितमगर बज़ोर बसतानद ॥२॥ REME नान देशमे, लुटेरोंने एक सुसाफ़िरों के झुण्ड पर हमला किया और बहुतसा माल-असबाब लूट लिया। व्यौपारी लोग बहुत कुछ रोये-पीटे और ईव्वर तथा पैग़म्बर से बिनतो की, किन्तु कुछ फल न हुआ। जबकि नोच डाकू फ़तह पा जाते हैं, तब वे मुसाफिरोंके रोने- पीटनेको क्या पर्वाह करते हैं ? उन मुसाफ़िरो में लुकमान हकीम भी थे। उन लोगोंने लुकमान से कहा,- 'आप ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे ये लुटेरे लूटके मालमें से कुछ हिस्सा लौटा दें; क्योंकि इतना धन गॅवा देना बड़े दुःखकी बात है।" लुकमान ने जवाब दिया-"उन लोगोंको ज्ञानोपदेश करना वृथा है। जिस लोहेको जङ्गने खा लिया है, उसे तुम पालिश करके साफ नहीं कर सकते। दीन-दुखियोकी सहायता करनेसे श्राफत टलती है। जो दुखियोंको दान नहीं देते, उनका धन अत्याचारी उनसे जबरदस्ता छीन लेते हैं। स्याह-दिलको नसी-
दूसरा अध्याय।
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हत देने से क्या फायदा ? लोहे की मेख पत्थर में नहीं घुसती ।
अपनी सुख-सम्पद की अवस्था में उनकी सहायता करो, जो
तङ्गहाल और दुखी हैं, क्योंकि
दीन-दुःखियोंकी ख़ातिर
करनेसे तुम्हारी बला टल जायगी। भिखारी तुम से आकर
कुछ मांगे तो उसे दे दो; अन्यथा जालिम- अत्याचारी-
तुमसे तुम्हारा माल ज़बरदस्ती छीन लेगा।"
शिक्षा-इस कहानीसे हमें ये शिक्षाएँ मिलती हैं, कि जो हिये के अन्धे
हैं, जिनका दिल मैला है, उन पर किसीको नसीहत काम नहीं कर सकती।
मनुष्य को चाहिए कि, अच्छे दिनों में अपने धन-मालको दुखियों के
दुःख दूर करने के काम में लगावे, जिससे उसका इस लोक यौर परलोकमें
भला हो। अगर वह अपना धन परोपकारमें खर्च न करेगा, याचकों की
इच्छा पूर्ण न करेगा और यदि जबरदस्त उसका मोल जबरदस्ती छीन लेगा,
तो
वह उस समय रोने-पछताने के सिवा क्या करेगा ? लिखा है,
दानो भोगो नाशस्तिस्रो गतयः भवन्ति वित्तस्य ।
यो न ददाति न भुड्क्ते तस्य तृतयिा गतिर्भवति ।।
१२४ गुलिस्ता। बीसवीं कहानी। न गोयन्द अज़ सरे बाजीचा हर्फे । कज़ॉ पन्दे नगीरद साहबे होश ॥१॥ व गर सद बाबे हिकमत पेशे नादाँ । वख्वानन्द आयदश बाज़ीचह दरगाश ॥२॥ सीने लुकमान हकीम से पूछा--"आपने अद्व- तमीज़ किससे सीखा ?" उसने जवाब दिया- "बेअदबोसे। क्योकि मैने उन लोगोमें जो कुछ बुरी बात देखी, उससे परहेज़ किया। अकूलमन्द आदमी लोगोंके खेलसे भी शिक्षा लाभ करता है, किन्तु मूर्ख, हिक- मत-तत्वज्ञान--के सौ अध्याय सुनकर भी, खेल और मूर्ख- ताही सीखता है।" शिक्षा-इस कहानीका सारांश यह है कि, अक्लमन्द खेल-कूद से भी अक्ल सीख सकता है, किन्तु मूर्ख फिलासोफी-हिकमत-पट कर भो मुर्ख- ताही सीखता है । सच है- अन्तःसारविहीनानामुपदेशो न जायते । - बुद्धिमान् खेल से भी शिक्षा प्राप्त कर लेता है। मूर्ख नादमी नर्क- शाख के सौ अध्याय सुन लेनेपर भी खेल और मूर्खताही मीखता है।
दूसरा अध्याय। १२५ इक्कीसवीं कहानी। C अन्दरूँ अज़ तुआम खाली दार । ता दरो नूर मार्फत वीनी ॥१॥ तही अज़ हिकमते वइल्लते ऑ के पुरी अज़ तुाम ता वीनी ॥२॥ हते हैं कि, एक साधु एक रातमें दस सेर भोजन कर करता और सवेरा होनेके पहले ही सारे कुरानका एक महात्मा ने यह बात सुनकर कहा---"अगर मनुष्य आधी रोटी खाता और सो तो अच्छा होता। अगर मनुष्य पेट को भोजनसे खाली रक्ने, तो उसे ईश्वरीय ज्ञानकी रोशनी नज़र आने लगे। जो नाक तक भोजन से भरे रहते हैं, वे अक्लसे ख़ाली हैं।" शिक्षा -इस कहानी का सारांश यह है कि, जो टूठप्त कर खाना खाते हैं, उन को ईश्वर तक पहुंचनेका माग दिखाई नहीं देता , किन्तु जो अल्पभोजी होते हैं, उन्हें ईश्वरीय ज्ञान जल्द होता है। जो हलका भोजन करते हैं, वेही संसारमें अच्छे-अच्छे काम कर सकते हैं ; अत्यधिक खानेवाले पाठ कर डालता । जाता तो अन्न के कीड़े हैं। यदि मनुष्य कम भोजन करे, तो उसको ईश्वरीय ज्योति के दर्शन हों। नो नाक तक भोजन से भरे रहते हैं, वे बुद्धि से खाली होते हैं।
१२६ गुलिस्ताँ। बाईसवीं कहानी। ए . बउन तोबा तवाँ रुस्तन अज़ अजावे खुदाय । हनोज़ मी नतवॉ अज जुवाने मर्दुम रुस्त ॥१॥ क मनुष्य कुकर्मी था। उस पर ईश्वरकी कृपा हुई तो वह महात्माओ की संगतिमे पड़ गया। उनके या आशीर्वाद और उनकी संगति से उसके कुकर्म छूट गये और वह सुकर्म करने लगा। उसकी इन्द्रियाँ उसके अधीन हो गयी और वह इच्छारहित हो गया। वह पहले कुकर्मी था, इससे लोगो को जब उसकी याद आती, तब वे उसकी निन्दा किया करते ; किन्तु उसके धर्म- काय्ये और ईश्वर-भक्तिकी कोई भी प्रशंसा न करता। मनुष्य अपने कुकर्म और पापो के लिये पश्चात्ताप करनेसे ईश्वर के कोपसे बच सकता है, किन्तु वह आदमियोकी जुबानोसे नहीं बच सकता। जब वह लोगोकी गालियाँ और निन्दा सहता-सहता थक गया, तब उसने रो-पीट कर सारा हाल अपनी मण्डली के मुखिया को सुनाया। शैखने कहा--"तू इस ईश्वरीय आशीर्बादके लिए कैसे कृतज्ञता प्रकट कर सकता है कि, लोग तुझे जैसा जानते हैं, उससे तू पापोंसे तोवा करके तू इश्वरीय दण्डसे वच जाय, पर मनुष्यों की तेज जुबान से नहीं बच सकता। . ।
दूसरा अध्याय ।
१२७
अच्छा है।" तुम इस बातको कितनी बार कहोगे कि, मेर
शत्रु और मुझसे जलनेवाले मुझमे दोष हूँ ढ-ढ़कर निकालते
हैं, कभी वे मेरा खून करनेको तैयार होते हैं और कभी मेरी
बुराई चाहते हैं। तुम सचमुच अच्छे बने रहो, यदि जगत्,
तुमको चुरा कहे तो कहने दो। उससे तुम्हारी क्या हानि
है ? यह बात अच्छी नहीं है, कि तुम असलमे बुरे हो और
दुनिया तुम्हें अच्छा समझे। मेरी ओर देखो, कि लोग मुझे
कामिल समझते हैं और सभी मेरी प्रशंसा करते हैं, लेकिन मैं
कामिल नही हूँ, बल्कि बुरा हूँ। दुनिया मुझे जैसा समझती
है, अगर मैं वैसाही कर्म करता, तो मैं
सचमुब ईश्वर-भक्त और
धर्मात्मा होता।
"सच बात यह है, कि मैं अपने पड़ोसियो से अपने
तई छिपाता हूँ, किन्तु ईश्वर मेरे गुप्त और प्रकट सब
कामोको जानता है। लोग मेरे ऐव-दोषोंको न जान सके,
इसलिये मैं दरवाजा बन्द कर लेता हूँ; लेकिन सर्वव्यापी
और सर्वज्ञ ईश्वर मेरे गुप्त और प्रकट सभी कामोंकी देखता
है , तव द्वार बन्द करनेसे क्या लाभ हो सकता हैं ?"
-इस कहानी का खुलासा मतलब यह है, कि मनुष्य को सदा
सजनता और धर्मके मार्गपर चलना चाहिए। लोगो को निन्दा शोर स्तुति
की पर्वा न करनी चाहिए। अगर मनुष्य अच्छे कर्म करे, श्रच्छ रास्तपर चले
और लाग उसकी निन्दा करें तो क्या हानि ? मनुष्य मनुष्यके गुप्त हाल नहीं
नहीं जान सकता है, किन्तु ईश्वरसे कुछ भी भेद नहीं छिप सकता। अगर
२८ गुलिस्ता। मनुष्य किवाड़ बन्द फरफे बुरे काम करे और लोगों पर अपने ऐब ज़ाहिर न होने दे, तो लोग उसको भला कहेंगे; पर उनके भला कहनेसे क्या लाम होगा ? क्योंकि ईश्वर तो हजार कोठरियोंके भीतर भी मनुष्य के बुरे-भले कर्मों को देखता है। जगत् में उस सर्वव्यापी परमात्माकी दृष्टि से कोई नहीं अतः बुरे कर्म करते समय मनुष्यको एकान्त-से-एकान्त, बिल्कुल जनहीन स्थानमें भी ऐसा हरगिज न समझना चाहिए कि, यह मेरे कामों का देखनेवाला कोई नहीं है ; परमेश्वर जीव के साथ हर जगह है। इसलिये मनुष्य को सदा उससे डरकर बुरे काम न करने चाहिए और हमेशा उसी की प्रसन्नता को प्रधान से भी प्रधान समझना चाहिए। मनुष्यके निन्दावाद और प्रशसावाद भो लाभ-हानि नहीं हो सकती। से कुछ वैराग्य शतक । यह संसार सुपने की माया के समान है। मृत्युने जन्म को, बुढ़ापेने जवानी को, कुढ़ने वालों ने गुणों को तथा चञ्च- लता ने धनैश्वर्य को ग्रस रखा है। इस ज़िन्दगीमे सुख ज़रा भी नहीं है। अगर सुख कहीं है तो "वैराग्य” में है। अगर आप सच्ची सुख-शान्ति चाहते हैं, अगर जीवन-मरण के झंझट से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो आप हमारे यहाँका छपा हुआ भर्तृहरि महाराज का "वैराग्यशतक" देखिये। इसमें ५३३ सफे हैं। मूल श्लोक हैं। हिन्दी-अनुवाद है । विस्तृत टीका है, अगरेज़ी अनुवाद भी है। मनोमोहक ३८ हाफटोन चित्र हैं। ऐसा वैराग्यशतक २००० वर्षमें कहीं नहीं छपा । मूल्य सजिल्द का ५) -- लेईसवीं कहानी। बर्बत बुबद कै - उसने जवाब दिया-"तुम उसे अपनी नेकी से दूसरा अध्याय। १२६ चो आहंग मुस्तकीम । अज़ दस्त मुतरिब खुरद गोशमाल ॥१॥ ने एक पूज्य शैख़से रोकर कहा, कि अमुक मनुष्य मुझ पर व्यभिचार का झूठा दोष लगाता है। शरमिन्दा करो। यदि तुम अपना चालचलन अच्छा रक्खोगे, तो कोई बुराई चाहनेवाला तुम पर दोष न लगा सकेगा। अगर चीनकी आवाज़ ठीक हो, तो उसे साज़िन्दे के सुधार की जरूरत न हो।” शिक्षा-इस कहानी का खुलासा यह है, कि अगर हम अपना याचरण-चाल-चलन-अच्छा रक्खेंगे, तो हमारे शत्रु भोंको हमारी निन्दा करनेका मौका हरगिज न मिलगा। अन्तमें, वे हमारी नेकियाँ देखकर लज्जित हो जायेंगे और झूठी बुराई करना छोड़ देगे। सारगी ठीक हो तो फिर उसे वजानेवालेसे कान (खूटी) मिलवाने नहीं पड़ते।
१३० गुलिस्ता। चौबीसवीं कहानी। K-Paper चो हरसाअत अज तो वजाये रवद दिल । वतनहाई अन्दर सफाई न वीनी ॥१॥ वरत मालो जाहस्तो ज़र ओ तिजारत । चो दिल वा खुदायस्त खिलवत नशीनी ॥२॥ PENS गोने दमशक के शैखो से पूछा, कि सूफ़ियोके पन्थ लो का क्या हाल है? उसने जवाब दिया-"अब ले अहं पहले दुनियामे उनकी एक जमाअत थी। वे लोग उस समय प्रकट मे तो दुःखी थे, परन्तु भीतर ले सन्तुष्ट थे; लेकिन अब वह एक कौम--जाति है, जो प्रकट मे तो सन्तुष्ट है किन्तु अन्दर से असन्तुष्ट है।" जवकि तुम्हारा मन एक स्थान मे स्थिर नहीं रहता है, यानी जगह-जगह भटकता है, तब तुम्हे एकान्त स्थान में भी शान्ति और सन्तोष नहीं हो सकता । धन-माल, ज़मीन- जायदाद, कीमती असबाव और मर्तबा होते हुए भी; अगर अगर दिल गिरफ्तार है मखमसों में, तो खिलवत भी बाज़ार से कम नहीं है। मगर जिसके दिल को है यकई हासिल, तो वह अंजुमन में भी खिलवतनशी है। ।
दूसरा अध्याय। १३१ तुम्हारा दिल ईश्वर में अटका रहे, तो तुम एकान्तवासी संन्यासी हो। शिक्षा- इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है, कि मनुष्य को अपना मम वश में करके उसकी चन्चलता मिटानी वाहिए। मनकी स्थिरता से ही सुख-शान्ति मिलती है। मगर मन स्थिर न हो, तो एकान्तवासी होनेसे भी कुछ लाभ न होगा। अगर मनुष्य धन-दौलत रक्खें, खेती और वाणिज्य-ज्योपार प्रादि दुनियाके सारे कर्म करे; किन्तु अपने मनको इन सब झझटोंसे अलग रखकर एक मात्र ईश्वर में लौ लगाये रहे, तो वह दुनिया के काम करता हुआ, दुनिया में रह कर भी, एकान्तवासी योगी है। जो दिखाने को एकान्त-वास करता है, किन्तु भीतर से ससारी झझटों में फैला रहता है, वह योगी नही बल्कि ढोंगी है। -
१३२,
गुलिस्तां ।
पच्चीसवीं कहानी।
जव
गुफ़्तम ई शर्ते आदमीयत नेस्त ।
मुर्ग तसवीह वॉ व मन खामोश ॥
झे याद है कि एक समय मैंने रातभर मुसाफ़िरों
मु के साथ सफ़र किया और सवेरे एक जङ्गल के
किनारे सो गया।
एक उन्मत्त मनुष्य, जो हम
लोगो के साथ सफ़र कर रहा था, रोने लगा और जङ्खल की
तरफ़ चल दिया। उसने दम-भर भी आराम न किया।
दिन निकला, तब मैंने उससे पूछा कि क्या मामला था ?
उसने जवाब दिया-"मैंने वृक्षोपर वुलवुलों को, पहाड़ों पर
तीतरो को, पानी मे मैंडकों को और अन्यान्य जानवरों को
जङ्गल मे चिल्लाते और शोकपूर्ण क्रन्दन करते हुए सुना। मुझे
ख़याल हुआ, कि जब सब जीव ईश्वरका गुणगान कर रहे
हैं, तब मनुष्य को अपने कर्त्तव्य-कर्म को भूलकर पड़े-पड़े
सोना उचित नही है ।" कल पिछली रातको सबेरा होते-
होते एक चिड़िया का रोना सुनकर मेरे होश-हवास खता
हो गये, शक्ति और धैर्याने जवाब दे दिया, जव मेरे एक सच्चे
प्रात:काल के समय चिड़ियाँ चहचहा कर ईश्वरका गुणगान करती
-उस समय यदि कोई मनुष्य ईश्वराराधना न करे तो कैसी शर्मकी
बात है !
हैं
दूसरा अध्याय। १३३ मित्रने मेरी आवाज़ सुनी, तो वह बोला कि मुझे विश्वास नहीं था, कि तुम एक चिड़िया का गाना सुनकर इस तरह बदहवास हो जाओगे। मैंने जवाब दिया-"यह वात मानव- जातिके नियमोंके विरुद्ध है, कि एक चिड़िया तो ईश्वर का गुण गावे और मैं मौन साधे रहूं।" शिक्षा--इस कहानी का सारांश यह है, कि मनुष्य को बड़े सवेरे उठकर ईश्वर का गुणानुवाद करना चाहिये । जब पशु-पक्षी तक, चार घड़ीके तड़के उठकर, ईश्वर की स्तुति करते है तब, मनुष्य का उस समय चारपाई तोड़ना अनुचित है। -:०:*- छब्बीसवीं कहानी। न बुलवुल बर गुलश तसबीह खानेस्त । के हर खारे बतसवीहश जुबानेस्त । क समय मैं, कुछ नेक-मिजाज जवानोंके साथ, ए हिजाज़ को जा रहा था। वे नव-युवक मेरे दिली SHASIT दोस्त और मेरे हर घड़ी के साथी थे। वे लोग, आनन्द में मग्न होकर, अक्सर, धर्म-सम्बन्धी शेरे कहने लगते 06.COM EVEALES सिर्फ बुलबुल ही उसके ( वनाये ) फूलके लिए नहीं चहचहाती है, किन्तु उसकी प्ररामा के लिए हर काटा जुवान रखता है -- १३४ गुलिस्ताँ। थे। उसी जमाअतमे एक भक्त था। वह फ़कीरोंकी चाल को बुरी समझता था, क्योकि वह उनके कष्टको न जानता था। चलते-चलते हमलोग नखीले नवी हिलाल के ताड- वृक्षोंके एक कुञ्जके पास पहुंचे। वहाँ एक काले रङ्गका छोकरा अरबी मुहल्लेसे निकला। वह ऐसी तानसे गाने लगा, कि उड़ते हुए पक्षी ठहर गये। मैंने देखा, कि उस भक्त का ऊँट नाचने लगा और अपने सवारको नीचे गिरा कर जङ्गल को चल दिया। मैंने कहा- ऐ भक्त ! उन तानोंको सुन कर पशु-पक्षी तक खुश हो गये, पर तुझ पर उनका बिल्कुल असर न हुआ! क्या तुझे मालूम है, कि सवेरेके बुलबुल मुझसे क्या कहा ? तू किस किस्म का मनुष्य है, जो प्रेमर्स अनजान है ? अरवी गीत सुन कर ऊँट मोहित हो गया । अगर तुझे कुछ आनन्द न आया हो, तो तू जानवर है। मैदानों में आँधियां चलकर सनोवरके दरख्तोंका सिर नीचा कर देत हैं, परन्तु पत्थर पर उनका कुछ असर नहीं होता। हर चीज़ जिले तुम देख रहे हो, ईश्वरका गुणगान करती है। इस विषय को समझदारों का दिल खूब जानता है। केवल चुलवुल ही उसके फलके लिये उसकी स्तुति नहीं करती 'किन्तु उसकी तारीफ़ के लिये हर काँटे मे जुवान है ।" शिक्षा-इस कहानीका यही सारांश है, कि दुनिया में पशुपक्षी, की पतग श्रादि सभी अपने सिरजनहार और पालनहार ईश्वर के तब मनुष्य को, जोकि सब जीवों में प्रधान है, उस कर्ता के गुणानुवाद करने गुण गाते है --
दूलरा अध्याय ।
१३५
से हरगिज न चकना चाहिये। मनुष्य का प्रधान कर्त्तव्य-धम्म है, कि वह
हर घड़ी ईश्वर को
वन्दना
में ध्यान रखें।
सत्ताईसवीं कहानी।
शगूफा गाह शगुफ्तस्तो गाहखोशीदह ।
दरख़्त वक्त विरहनस्तो वक्त पोशदिह ।।
ली वादशाह के कोई वारिस-उत्तराधिकारी न
कि जव उसका अन्तिम समय निकट आया, तव
उसने अपने वसीयतनामे में यह लिखवाया, कि
मेरे मरने के बाद सवेरे हो जो मनुष्य नगर के फाटक पर
पहले-पहल आवे, उसीके सिर पर राज-मुकुट रखना और
उसी को राज्य का शासन-भार सौंप देना ।
राजा के प्रधान मन्त्री और अमीर-उमरा सव दरवाजे पर
जाकर खडे हो गये। दैवयोग से पहले-पहल एक भिखारी
संसार परिवर्तनशील है। फूल कभी मुर्भाता है, कभी खिलता है।
पृक्षके पत्ते कभी गिर जाते हैं और कभी दरे-भरे पत्तोंसे उसकी शोमा
होती है।
१३६
गुलिस्तां ।
के
उन
नगर-द्वार मे घुसा। इस भिखारी की सारी ज़िन्दगी रोटियो
के टुकड़े उठाते और थेगड़ी लगाते बीती थी। राजा
मन्त्रियो और दरबारियोने, राजाके वसीयतनामे के अनुसार,
उसी भिखारी को राज्य और खजाना सौंप दिया। कुछ दिन
तक उस भिक्षुक ने राज-काज चलाया। पीछे कुछ मन्त्री और
दरबारी लोगो ने उसकी आज्ञा पालन करने से मुंह मोड़
लिया। आस-पास के राजा लोग उसके शत्रु हो गये।
लोगोने सेना लेकर उस पर चढ़ाई की। उसकी फ़ौज और
रिआया ने हार खाई। बहुत कहनेसे क्या, उसका कुछ देश
उसके हाथ से निकल गया।
दरवेश इन घटनाओ से अत्यन्त पीड़ित और मर्माहत
हुआ।
इस वीच मे उसके एक पुराने मित्र से उसकी मुला-
कात हुई। यह शख्स उसका कङ्गाली का मित्र था। इन्हीं
दिनो वह एक सफ़र से वापस आया था। उसे ऐसे उच्च
पदपर देखकर उसने कहा-"सर्वशक्तिमान् और महिमान्वित
ईश्वरको धन्यवाद है, कि तुम्हारे भाग्य ने तुम्हें सहायता दी ।
काँटेदार झाड़ी से गुलाव निकला। तुम्हारे पैर से कांटा
निकल गया और तुम इस दर्जे को पहुँचे। सचमुच दुःख
के बाद सुख आया। पुष्प-कली कभी खिलती है और कभी
मुआ जाती है। वृक्ष कभी पत्रहीन हो जाता है और कभी
पत्तो से ढक जाता है।" उसने जवाब दिया-"भाई ! यह
समय बधाई देनेका नही है, किन्तु मेरे साथ मिल कर शोक
दूसरा अध्याय। १३७ करनेका है। जब तुम मुझ से पिछली बार मिले थे, तब मुझे खाली रोटीकी ही फ़िक्र करनी पड़ती थी। अव मुझे दुनिया- भर की चिन्ता करनी पड़ती है। जब दिन अच्छे होते हैं, तब मुझे संसारी भोग-विलासो मे लिप्त होना पड़ता है और जब बुरे दिन आते हैं, तब मुझे कष्ट भोगने पड़ते हैं। संसारी झगडों से बढ़कर और कोई आफ़त नही है, क्योकि वे सुख और दुःख दोनों के समय हृदय को पीड़ित करते हैं।" अगर तुन्हे धन की अभिलापा हो तो सन्तोष की खोज करो, क्योंकि वह अमूल्य धन है। अगर कोई धनाड्य पुरुष तुम्हारी गोदमें रुपये डाल दे, तो तुम उसके कृतज्ञ मत हो. क्योंकि मेंने महात्माओं को ऐसा कहते सुना है, कि धनवानो के दान से निर्धनों का लन्तोष अच्छा है। अगर बहराम लोगों में बांटने के लिये एक गोरखर भूने, तो चीटी के लिये टिडी की टाँग के वरावर भी न होगा। शिक्षा-गरीब और निधन लोग राजो-महाराजों और अमीर-उमरा को देख कर मन में दुःखित हुआ करते और कहते है, कि वे लोग स्वर्गका थानन्द भोग रहे हैं, परन्तु वास्तव में यह बात नहीं है। जो जितने धनी हैं, जो जितने उच्च पद पर है, वे उतने ही थधिक चिन्ताग्रस्त यौर दुःखी है। प्रकट में, वे लोग सुखी जान पड़ते है, परन्तु उनकी भीतरी दशा यहुत हो दुःख भोर कष्टपूर्ण है। उनके ऊपर बड़ी-बड़ी जिम्मेदारी और चिन्ताएं सवार है। बड़े लोगोंको रातके समय भो मुख को नींद नहीं याती, परन्तु साधारए लोग उनकी अन्दरूनी बातो को नही ज्ञान
१३८
गुलिस्ताँ।
सकते; इसीसे वे उनकी बाहरी दशा देख कर उन्हें सुखी समझते हैं।
जिसके पास पहनने को कपड़े नहीं है, कल के खाने को अन्न नहीं है, उस
मनुष्य में अगर सन्तोप' है, तो वह सच्चा सुनिया है। सन्तोप का दर्जा
सब धनों से ऊँचा है। जो लमुद्र पर्यन्त पृथ्वीका पालन करते है, जिनके,
पास लाखों फौजें और अरव-खरबको सम्पदा है, उनके पास अगर 'सन्तोप'
नहीं है, तो वे निस्सन्देह दुःखी धार निर्धन है ।
अट्ठाईसवीं कहानी।
था।
सी मनुष्य का एक मित्र दीवान के पद पर मुकर्रर
एक मुद्दत से वह अपने दीवान-मित्रसे न
- मिला था। किसीने कहा-"अमुक मनुष्य से
मिले तुम्हें बहुत दिन हो
गये।" उसने जवाब दिया-"मैं
उससे मुलाकात करना ही नहीं चाहता।" उसी स्थान पर
दीवान का एक आदमी भी उपस्थित था। उसने कहा
'आपके मित्र से ऐसा क्या अपराध हुआ, जो आप उससे
मिलना भी नहीं चाहते ?"
उसने जवाब दिया-कोई
अपराध नही हुआ, किन्तु दीवान से मुलाकात करने का
समय तब आवे, जब वह अपनी नौकरी से अलग कर दिया
जावे। लोग जव हुकूमत और बड़े पदोपर होते हैं, तव
अपने नित्रों से परहेज़ करते हैं, किन्तु जब वे पदच्युत होते
दूसरा अव्याय। १३६ और मुसीबत में फंसते हैं, तब वे अपने दिलके दुःख मित्रो से कहते हैं। शिक्षा-इस कहानी में जो बात कही गपी है वह अधिकांश लोगों पर ठीक उतरती है। उच्च पद पाकर लोग अपने गरीब मित्रों और सम्ध- न्धियों से मिलने में अपना अपमान और बेइज्जती समझते हैं, मगर यह वात उच्च हृदयके मनुष्यों के योग्य नहीं है। जो उदारहृदय हैं, जो महात्मा है, उच्च पदासीन होकर अपने निर्धन मित्रों की जी-जान और धन-द्रव्य से महायता करते और उनके आदर-सम्मान में किसी प्रकार की त्रुटि नही करते हैं।
१४०
गुलिस्तां ।
उन्तीसवीं कहानी।
अगर खेरतन रा मलामत कुनी।
मलामत नवायद शुनदिन जेकस ।।
बूहरैरा हर रोज़ मुहम्मद मुस्तफा 'साहब
अ दर्शन करने जाया करते थे। पैग़म्बर साहब ने
कहा---"अबूहरैरा! तुम रोज़-रोज़ न आया करो।
इस तरह रोज़ आने से प्रेम बढ़ जाना सम्भव है। लोगोने
महात्मा से कहा, कि हमलोगो का सूर्य से बड़ा उपकार होता
है, लेकिन हमने किसीको उसके लिये प्रेमपूर्ण वचन कहते
नही सुना। उसने जवाब दिया- "इसका कारण यह है, कि
वह रोज-रोज दिखाई देता है। जाड़े मे जब वह छिपा रहता
है, तब लोग उसको चाहने लगते हैं।"
किसीसे मिलने-जुलनेमे कोई हानि नही है, लेकिन
बारम्बार मिलना-जुलना ठीक नही है कि जिसले किसीको
यह कहना पड़े- "बल, अधिक न आया करो।" अगर तुम
अपने तई दुरुस्त रक्खोगे तो किसीको तुम्हारी मलामत करने
की ज़रूरत न होगी।
यदि तू अपनो निन्दा स्वयं करता रहेगा अर्थात् अपने ऐवों पर नजर
रक्खेगा, तो दूमरों को तेरी निन्दा करनेका अवसर न मिलेगा।
1
दूसरा अध्याय। १४१ शिक्षा-किसी के मकान पर वारम्बार हरगिज न जाना चाहिए । जो वार-बार पराये घर जाया करते है, उनका अपमान और अनादर होता है। एपने हितू मित्र प्रादिके घर भी काम पड़ने पर ही जाना चाहिए। वाज-वाज लोग, जो निठल्ले और निकम्मे होते हैं, इधर-उधर जाते फिरते हैं। हमने भनेक बार घरके मालिकों को उकता कर यह कहते सना है, कि इस वक्त माफ कीजिए, कुछ एकान्त का काम है। ऐसी वात सुनकर उनका मुंह छोटासा हो जाता है, पर अनेक मुखों को दो-चार घारमें भी शिक्षा नहीं मिलती। किसी मीतिज्ञने व व कहा है- अतिपरिचयादवज्ञा अतिगमनादनादरो भवति ।
१४२ गुलिस्ता। ॥ द तीसवी कहानी। e-6-- पाये दर जञ्जीर पेशे दोस्तॉ। वहके वा वेगानगा दर वोस्ता मश्क मे, मैं अपने मित्रों की सङ्गति से विरक्त होकर, यरूसलीम (कुदस ) के जङ्गल मे चला गया और वहाँ पशुओके साथ रहने लगा। कुछ समय वाद फेक लोगोने मुझे कैद कर लिया और त्रिपोलीमें कुछ यहूदियो के साथ मिट्टी खोदने के लिए एक खड्डे पर नियुक्त कर दिया। परन्तु अलप्पोका एक प्रसिद्ध पुरुप, जिससे पहले मेरी मित्रता थी, उसी राहसे निकला। उसने मुझे पहचान लिया। उसने पूछा-"तुम यहाँ कैसे आये और किस तरह अपना गुजारा करते हो ?" मैने जवाब दिया-"मेरे दिलमे इस वातका विचार आया, कि केवल एक ईश्वर पर निर्भर रहना अच्छा है। बस, मैं अपने इसी विचारानुसार मनुष्योसे दूर रहनेके लिए जङ्गल और पहाड़ोमे चला गया। आज- कल मुझे मनुष्यो से भी बदतर अभागोके साथ लाचार होकर काम करना पड़ता है। इस वातका अनुमान आप स्वयंही - अपरिचित मनुष्यों के साथ बागमें रहनेसे मित्रोंके साथ वेड़ियाँ पहन कर रहना अच्छा है।
दूसरा अध्याय। १४३ शुरु किये। कर सकते हैं, कि इस वक्त मेरी कैसी हालत होगी। अजनबो लोगोंके साथ वागीचेमें रहनेकी अपेक्षा, मित्रोंके सङ्ग बेड़ियाँ पहन कर रहना अच्छा है।" उसे मेरो हालत पर तसे आया। उसने फक लोगोको दश दीनार देकर मुझे छुड़ा लिया और अपने साथ अलप्पो ले गया। उसके एक कन्या थी। उसने उसकी शादी मेरे लाथ कर दी और दहेज़ मे एक सौ दीनार दिये। कुछ समय बाद, मेरो वीवीने अपने जौहर दिखाने उसका स्वभाव बहुतही दुरा था। वह बात- वातमें झगड़ा करने, गाली-गलौज देने और हठ करने पर उतारू रहती थी उसने मेरे सुखका नाश कर दिया। लोगोंने ठोक ही कहा है-"अच्छे आदमी के घरमे बुरो त्रा का होना, उसके लिये इसी लोकमें नरक है। खराब औरतो को संगतिसे वयो। हे ईश्वर! हमे इस अनि-परीक्षासे दवा।' एक रोज़ उस खोने मुझे गाली-गलोज देकर कहा-सा तू वही नहीं है, जिसे नेरे पिताने फेकोको दस दीनार देकर छुडाया था ?" मैंने जवाब दिया-"हाँ, उन्होंने दस दानार देकर मुझे छुडाया था, किन्तु सौ दीनारोमे तेरे हाथ लोप दिया।" मैने सुना है, कि किसो वडे आदमीने एक भेटको भौटने फे दांतो ओर पओ से बचाया और दूसरो रातको उसके गले पर छुरी चला दो। मरनेवालो भेडने उस मनुष्य पर टोपा- रोपण करते हुए यहा-"तुमने मुझे भेटियेके नुडलोले पचास १४४ गुलिस्ताँ। किन्तु अन्तमें तुमने मेरे साथ उसी भेडियाकासा वरताव किया।" शिक्षा-इस कहानीका सारांश यह है,कि भले भादमियों के साथ वनमें रहना भी अच्छा, किन्तु दुष्ट लोगोंके साथ स्वर्ग में भी रहना अच्छा नहीं। महाराज भर्तृहरि ने कहा है- वरं पर्वतदुर्गेषु प्रान्तं वनचरैः सह । न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि ।। इकत्तीसवीं कहानी। ऐ गिरफ्तारे पाये बन्दे अयाल । दिगर आज़ादगी मबन्द ख़याल ॥१॥ ग़मे फअज़न्दो नानो जामो क़त । बाजत आरद जे सेर दर मलकूत ॥२॥ JP सी बादशाहने एक फ़क़ीरसे, जिसके बालक और कि स्त्री भी थी, पूछा, कि तुम अपना अमूल्य समय ला किस तरह बिताते हो ? फ़क़ीरने जवाब दिया- "रात-भर तो मैं ईश्वरोपासना में लगा रहता हूँ और सवेरा ऐ औलादकी मुहब्बतमें गिरफ्तार रहनेवाले, तू किसी तरह भी वन्धन- मुक्त नहीं हो सकता । सन्तान, रोटी, कपड़ा तथा जीविका की चिन्ता तुझे स्वर्गकी चिन्तनासे रोकती है।
दूसरा अध्याय। १४५ होतेही ईश्वर के सामने अपनी प्रतिज्ञाओं एवं प्रार्थनाओको कहता हूँ। दिन-भर अपना खर्च जुटाने की चिन्ता में रहता हूँ।" वादशाहने आज्ञा दी कि, इसे इसका दैनिक आहार दिया जाय, जिससे इसके दिलमें बाल-बच्चोके भरण-पोपणकी चिन्ता न रहे। ओ तू! जो कुटुम्बके पालन-पोपण करनेकी चिन्ताओंके वन्धन में फैला हुआ है, वन्धनमुक्त होनेकी आशा न कर। बच्चों और रोटी-कपड़े तथा जीविका का दुःख तुझे अदृश्य जगत्-स्वर्गकी चिन्तना करनेमें असमर्थ करता है। समस्त दिन मैं यही चिन्ता करता हूँ कि, गत हो और में ईश्वरोपासना में लगूं । रात होने पर, जब मै उपासना फरने लगता है, तब यह फिक्र सिर पर सवार होती है कि, कल सवेरे में बच्चोंके खाने के लिये कहाँ से लाऊँगा। शिक्षा-उम कहानीका सलामा यह है, कि मनुष्य एटुम्म-परिवार के भरण-पोपण की फिझमें ही मारा जीवन व्यतीन पर देता है। रोज मूल्य- पर-सूय उदय होते हैं, दिन-पर-दिन उर घटती जाती है , शिन्तु मनुष्यसी या चिन्ता सभी उना पीछा नहीं पहनी। नतीजा य: निरन्ता दे, कि मनुष्य नहीं चिन्तायों में लिप्त रहर रारा जीवन वर्ष गधा घेता है। एन 7 मिन्तायोरे मारे, गनो उमेरामा पोरन पाहातो पापना सरदारा, यदि मनुष, १८ ची मिनाया दोर पर स्तर पराराधनमें नोर हो जाये। जितनालियो पदा रिया है, उसे पता चपनी माई मष्टिनार-मोपर दीपिका न होगो बारहोगो . उसी परम पिता को हिला टोर। पिता परनेसे पानी ला। उसका विपन्ना। ५६ बरगे ।
१४६
गुलिस्तां।
सारी सृष्टि का पालन करता है। मनप्य को तो उस विश्वम्भरका ही ध्यान
लगाना चाहिए।
बत्तीसवीं कहानी।
ता मरा हस्त दीगरम वायद ।
गर न ख्वानन्द जाहिदम शायद ।।
मस्कस के किसी फ़क़ीरने, अनेक वर्षों तक जङ्गल
मे रहकर और दरख्तो को पत्तियाँ खाकर जीवन
व्यतीत किया । उस देशका बादशाह एक दिन
उलके दर्शनार्थं गया। उसने फकीरसे कहा- "मेरी राय मे,
अगर शहरमेंही एक ऐसा स्थान बना दिया जाय,
भी सुभीते के साथ ईश्वरोपासना कर सकें । आपके वहाँ
द
तो आप
आप और
जो सामान पास रखते हुए भी दूसरों से याचना करता है, वह फ़कीर
नहीं है।
दूसरा अध्याय ।
१४७
नगर
रहनेसे यह लाभ होगा कि, अन्यान्य लोग भी आपकी सङ्गति
से फायदा उठावेगे और आपके सत्कर्मोको देखकर शिक्षा
लाभ करेंगे।” फ़कीरने बादशाह की बात स्वीकार न की।
तव राजमन्त्रियोंने कहा-"बादशाहके राजी करनेके लिए
यह बात बहुत ज़रूरी है, कि आप थोड़े दिनों के लिए
अपना डेरा-डण्डा शहरमें ले चलें और देखें, कि वह स्थान
कसा है। यदि लोगोंकी सङ्गति से आपको अपना अमूल्य
समय वृथा नाश होता दीखे, तो फिर आपकी जैसी इच्छा हो
आप वैसाही कीजियेगा। लोग कहते हैं, कि वह फ़क़ीर
आ गया। बादशाहने उसकी अभ्यर्थना के लिए
महलसे सम्बन्ध रखनेवाला वाग़ीचाही खाली करा दिया।
यह स्थान बहुत ही सुखदायी और तबीयत खुश करनेवाला
था। लाल-लाल गुलाबके फूल सुन्दरी ललनाओंके कपोलों
को बराबरी करते थे। सम्बुल माशूकोंकी जुल्फोकी तरह
शोभायमान था। यद्यपि वह समय गभीर शीतकाल का
था, तथापि फलोंमे नवजात शिशु की तरह ताजापन था !
वृक्षोंकी शाखाओं में सुर्व फूल लटक रहे थे, जो हरियाली के
बीचमे अनिके समान मालूम होते थे। बादशाहने शीघ्र ही
एका सुन्दरी दासी उसके पास भेज दी। उसका नये चांदका-
मा चेहरा योगियोंके चित्तको चुरा लेता था।
है. कि. पर ऐली मनोमोहिनी थो कि, उसे देखकर बडे-बड़े
योगी-यनियोकी भी इन्द्रियाँ चञ्चल हो 'जाती थी। उसके
मतलर यर
१४८
गुलिस्ता।
साथ एक अतीव सुन्दरी दासी भी रहती थी। उसे प्यासे
मनुष्य घेरे हुए खड़े हैं, लेकिन वह हाथमें प्याला रखनेवाला
जल नहीं पिलाता। जिस तरह जलन्धर रोग से पीड़ित
मनुष्य उफ़रात नदीको देखकर संतुष्ट नही होता, उसी तरह
उसे देखने से मन नहीं भरता।
वह फ़क़ीर अव खूब मजेदार चीजें खाने लगा। भाँति-
भांति की अच्छी-अच्छी पोशाकें पहनने लगा।
नाना प्रकार
के फूलों और अन्यान्य सुगन्धित द्रव्योका आनन्द लूटने लगा
तथा कुँवारी स्त्रियों और उनकी सहेलियोकी सुहबत का
सुख उपभोग करने लगा। महात्माओने कहा है-"सुन्दरी
युवती की जुल्फे विचारशक्ति के पैरों की बेड़ी और अक्लको
चिड़िया का फन्दा है। तुम्हारी सेवा में मैंने अपना हृदय,
अपना धर्म और अपनी विचारशक्ति खो दी है। सच वात
तो यह है, कि मैं अक्लकी चिड़िया हूँ और तुम फन्दे हो।"
संक्षेप में, उसके सुखों का अधःपतन होने लगा। किसी ने
कहा है-"जब कोई वकील, शिक्षक, शिष्य, वक्ता या महात्मा
संसारी विषय-भोगोमे फंस जाता है, तब उसकी दशा उस
मक्खोके समान हो जाती है, जिस के पैर मधुमें लिपट जाते
हैं।"
एक दिन बादशाह के दिल में उस फ़कीर से मिलनेकी
इच्छा हुई। उसने जाकर देखा, कि फकीरका तो रङ्ग-रूप
ही बदल गया है। वह खूब मोटा-ताज़ा हो गया हैं और
दूसरा अध्याय।
१४६
उसके शरीर का रङ्ग गुलाब के लमान झलक मारता है। वह
रेशमी तकिये के सहारे लेटा हुआ है और एक परीकीसी
सूरत का छोकग हाथमे मोरछल लिये हुए उसके पीछे खडा
हुआ है। बादशाह फकीरको सुखमें देखकर बहुत प्रसन्न
हुआ, लेकिन और लोग तरह-तरह की बातें करने लगे।
अन्तमे, जब वात-चीत समाप्त हुई; तब बादशाहने कहा-
"दुनिया में, मुझे दो प्रकार के लोग भले लगते हैं :-एक तो
विद्वान् और दूसरा एकान्तवाली संन्यासी।" उस मौके पर
वहाँ एक रडा पानी और अनुभवी मन्त्री मौजूद था। उसने
कहा-'मराराज! परोपकारका नियम पर फहता है कि,
आप उन दोनों का उपकार फरें। विद्वान् को धन दें,
जिससे उसे देखकर दूसरे लोग भी विद्या नी और विरक्तों-
संसार-त्यागियों को कुछ भी न दें, जिनने उनकी विरत्ति
चनी गरे। फकीरों को दिरम और दीनारोकी जनरत नहीं
होती। जर उन्हें धन मिलता है, तर घेउने देने के लिये
दूसरे फीगेको तलाश करते हैं। जिनका म्यभार उत्तम
हैं, जिनका दिन एयर में लगाएमा है. जो यर पं. नाम
पर निकाली हुई रोटी नहीं पाता और टूपरेनुपाई पं. लिये
भोग ही मागता, वही पन या महात्मा है। लन्द्रग
गारीफे रायको गुती दिना फोरोज़ पी अंगटी और
उपशे पानोसी निा पागर ममरोके ही सुन्दर मारन
होती। पीर पही है, जो धार्मिक और पानी हो, चाहे
१५० गुलिस्ता। वह पवित्र रोटी और भिक्षा के टुकड़े न खाता हो। सुन्दर रूप-लावण्य-सम्पन्न स्त्री बिना रङ्ग और गहनोंके ही मन मोहित कर लेती है। जबकि मेरे पास कोई अपनी चीज़ हो, यदि उस लमय भी मैं पराये माल पर दिल ललचाऊँ, तो अगर आप मुझो महात्मा न कहें तो भूल शायद आपकी न होगी। शिक्षा -इस कहानी का यही सारांश है, कि जिन्होंने संसार से वैराग्य ले लिया है, उन्होंने सब प्रकारको आशातृष्णामोंको तिलाञ्जलि दे दी है, उन्हें फिर ससारी विषय-वासनामों में हरगिज़ न फंसना चाहिए। जो सच्चे योगी-सन्सासी हैं, वे धन-द्रव्य और विषय-भोगोंकी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखते। जिस भाँति सुन्दरी नारी गहने और जेवरोंकी मुहताज नहीं होती, वह बिना जेवरोंके ही मनुष्यों का मन मोहित कर लेती है, उसी तरह मसार-त्यागी वैरागियोंको सांसारिक भोग-सामग्रियोंकी भावश्यकता नहीं होती। वे अपने वैराग्यसेही जातकी आँखोंमें सूर्यकी भाँति तपते हुए मालूम होते हैं। जो सच्चा फकीर है, उसे धन-दौलत और ऐश-भाराम से क्या मतलब है?
GAD एक सहीन मामला चल रहा था। उसने यह
दुसरा अध्याय।
तेतीसवीं कहानी।
जाहिद के दिरन गिरण्तो दीनार ।
जाहिद तर अजो यके बदन्त पार ।।
फुछ ऊपर की कहानीमें कहा गया है, उसका उदा-
एरण इस कहानी में मिलेगा। किसी बादशाह का
मिन्नत मानी, कि जो मैल मामले में सफलता प्राप्त करूँगा, तो
'तना धन फशोरों और महान्माओं को याँढूंगा। जब वादगार
को अपने फाममें सफलता हुई, तर उसने अपनी मानी हुई मिन्नत
पूरी पारना जरूरी समझा । उसने अपने एक पापात्र नीकर फो
पुलाया
और उसके हाथमे दीनारों से भी भर्ग तुई एक धली
देचार फाहा फि, से फापीगेको चांट दो। फलं नि पर
नौपार पटा उजिमान, और ननदार था।
पर सारे दिन
चारों जोर आमा-फिरा पीर जब नाया-समय लौट पर आरा,
होमोपी तो पामारी जागे नदी और पारा कि मुझे
फोई फर्गरम मित! पायगारले परा--"पार पया दात हे?
नगरमी पीरो पर मो में वहां जानना ।।"
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१५२ गुलिस्ताँ। उसने जवाब दिया-'हे जगत्-रक्षक ! जो फकीर हैं वे धन नहीं लेते और जो धन लेना चाहते हैं वे फकीर नहीं हैं। बादशाहने हँसकर अपने दरवारियोंसे कहा- मैं इस फिरके के लोगो- ईश्वर-पूजको-पर इतनी कृपा रखता हूँ, लेकिन यह गुस्ताख उन परसे मेरी श्रद्धा हटाया चाहता है। न्याय इसकी ओर है। अगर फकीर दिरम और दीनारको लेना स्वीकार करे, तो तुम्हें फकीर के लिए और जगह खोज करनी चाहिये।" शिक्षा-इस कहानीका सारांश यह है, कि जो फकोर हैं, वे धनको हाथ नही लगाते और जो धनकी चाहना रखते है या उसे ग्रहण करते हैं, वे फकीर नहीं हैं। -
दूसरा अध्याय।
१५३
चौंतीसवीं कहानी।
-------
नान अज वराये कुज इबादत गिरफ़्ता अन्द ।
साहवंदिला न कुइबादत वराय नान ।।
गोंने किसी बुद्धिमान से पूछा कि, आप ईश्वरके नाम
ला पर निकाली हुई रोटी को कसी समझते हैं ? उसने
र जवाब दिया-"अगर लोग रले अपने चित्तको शान्त
फरने और ईश्वर-भजन की वृद्धि फरने के लिए लें, तो उनका
यह काम न्यायसङ्गत है। अगर उनकी इला एक मात्र रोटी-
परदी र जोर किसी बातपर न रहे, तो ऐली गेटी लेना अनुचित
है। महात्मा लोग एकान्तमास का आनन्द भोग लिपी
रोटी पाते। वे रोटी पाने लिये उपासना-गामें नहीं घुलो।
१५४ गुलिस्ता। पैंतीसवीं कहानी। स कोफ्ता बर सफ़रये मन गो मबाश । कोफ़्तारा नाने तही कोफ़्ता अस्त ॥ क फकीर ऐसे स्थानपर आया, जिस घरका मालिक आतिथ्य-सत्कारका बड़ा प्रेमी था। उस मण्डली में बड़े-बड़े बुद्धिमान् और सुवक्ता थे, जो रसिक लोगोकी तरह आपस में हंसी-मज़ाक कर रहे थे। फकीर जङ्गल में सफर करता-करता थक गया था और उसने कुछ खाया भी न था। उन लोगोंमेंसे एकने हंसकर फकीर से कहा, कि आप भी कोई बात कहिए। फ़क़ीरने जवाब दिया- "मुझमें और लोगोंकी भांति रसिकता और वाक्पटुता नहीं है; अतएव मैं आशा करता हूँ, कि आप मेरी एक बात सुन- करही सन्तुष्ट हो जायेंगे। वे सबके सब उसके पीछे पड़ गये और उससे बारम्बार कहने लगे, कि कुछ कहिए। फकीरने कहा-"मैं भूखा हूँ। भोजन से भरी हुई थाली देखकर मेरी भूख इस भांति उत्तेजित हो जाती है, जिस भांति जनाना भूखे आदर्मी के लिए भुने हुए मांस की ज़रूरत नहीं; उसके लिए रूखी रोटी ही सब से अधिक स्वादिष्ट गिजा है।
--------------------
इसरा अध्याय।
१५५
-
न परोसा जार,
नानागार देखकर नवयुवक उत्तेजित हो जाता है। फकीर
की बात सुनकर सबके सब चुप हो गये और उसके लिए
भोजन परोसनेका हुक्म दिया गया। घरके मालिक ने
कादा-"महाशय ! जग और सत्र फीजिए; मेरा नौकर
मान तय्यार पर रहा है।" फ़कीरने सिर उटाफर कहा-
"फर टीजिए, फि मेरी थाली में मार
ययाफि क्षुधानुर मनुष्य के लिए फोगे गेटोही स्वादिष्ट
भोजन।"
शिक्षा पानीका पदी मारांत, दि घर पर গগির
फो पहले मोजा परागा पाहिए। भूपये मनुष्य को ईमो दिगोदामोर
पोपाल परी नहीं लगती, पेट मरने परली गे पानसमा यसो
मतपय पी हीरोती। उसे पी पी रोटीशीर
ति।
१५६
गुलिस्ता।
छत्तसिवीं कहानी।
गर गदा पेशरवे लश्करे इस्लाम बुवद ।
काफ़िर अज़ बीमे तवक्कह वरवद ता दरे चीन ॥
सी शागिर्दने अपने उस्ताद से कहा, कि बेहूदे
कि मुलाक़ातियो से सुभो बड़ी तकलीफ़ होती है। वे
लोग मेरे अमूल्य लमय को वृथा नष्ट करते हैं
आप मुझे उनसे छुटकारा पाने की तरकीब बतलाइये।
उस्ताद ने कहा- "अगर तुम्हें उनमें से किसी एक से भी
मिलने की आवश्यकता न हो, तो जो धनहीन हैं उन्हें
धन दो और जो धनवान हैं उनसे धन मांगो।
मुसल्मानी सेना का सेनानायक भिखमङ्गा होता, तो नास्तिक
लोग, उसके कुछ मांगने के भयसे, चीन को भाग जाते ।
अगर
मुसलमानी सेना का अध्यच यदि भीख मांगता, तो काफिर लोग भीख
देने के भयसे चीनको भाग जाते ।
दूसरा अध्याय।
१५७
सैंतीसवीं
और अड़तीसवीं कहानी।
ए
बातिलस्त आचे मुद्दई गोयद ।
खुफ़्तारा खुफ्ता कै कुनद बेदार ।।
मर्द बायद के गीरद अन्दर गोश ।
वर नविश्तस्त पन्द वर दीवार |
क पण्डित ने अपने बाप से कहा-"वक्ताओं की
वकृता का सुझपर कुछ भी असर नहीं होता,
asia क्योंकि वे लोग जो उपदेश देते हैं, आप स्वयं
उनके अनुसार नही चलते। वे दूसरों को संसार से विरक्त
होनेका उपदेश देते हैं, किन्तु आप दौलत और माल जमा
करते हैं। बुद्धिमान, जो आप उस काम को किये बिनाही
दूसरों को उपदेश देता है, उसकी बात का असर दूसरों पर
नहीं पड़ता। बुद्धिमान वही है, जो पाप-कर्मों से बचता
है। वह बुद्धिमान नहीं है, जो दूसरो को भलाई सिखाता है,
किन्तु आप बुराई करता है। वह बुद्धिमान् जो आप राह
भूलकर इन्द्रियों के विषय-सुख भोगने में लिप्त रहता है,
यह वात झूठी हैं, कि सोया हुआ मनुष्य दूसरे सोते हुए को नहीं जगा
सकता । मनुष्य को चाहिए, कि दीवार पर भी यदि कोई अच्छी बात लिखी
हो तो उसे भी ग्रहण कर ले।
१५८ गुलिस्ता। दूसरों को अच्छी राह पर कैसे चला सकता है ?" पिताने उत्तर दिया--"पुत्र! तुम्हें इस अभिमान-भरी कल्पना के आधार पर उपदेशको के उपदेशो पर अश्रद्धा प्रकट करना और विद्वानो पर दोष लगाना उचित नही है। यदि तुम निर्दोष शिक्षक की खोज करते हो; तो तुम उस अन्धे की भांति शिक्षाके लाभोसे वञ्चित हो, जिसने एक रातकी कीचड़ में गिरकर पुकार मचाई–मुसलमानो! चिराग़ लाकर मुझे रास्ता दिखाओ।' उस समय एक गुस्ताख़ औरत बोल उठी-'जब तुम चिराग़कोही नहीं देख सकते, तब तुम्हें चिराग़ क्या दिखला सकेगा? इसके सिवा, शिक्षक-मण्डली व्यापारीकी दूकानके समान है, जहाँ से तुम रुपये चुकाये विना माल उठाकर ले नहीं जा सकते; उसी तरह जबकि तुम उपदेशक के पास अच्छे इरादे से न जाओ, तब तुम्हें वहाँ जानेसे कोई लाभ न होगा। विद्वान् लोग चाहे आप अपने उपदेशानुसार न चलें; किन्तु तुम उनका उपदेश खूब ध्यान देकर सुनो। यिरोधियोका यह कहना, कि जो स्वयं सोता है, वह दूसरो को कैसे जगा सकता है, बिल्कुल बेजड़ है। मनुष्यको चाहिए, कि वह दीवार पर लिखा हुआ उप- देश देखकर, उससे भी शिक्षा ग्रहण करे।" शिक्षा-इस कहानी का यह मतलब है, कि बुद्धिमान मनुष्य हर जगहसे कुछ न कुछ सोख सकता है। उपदेशक स्वयं उपदेशानुसार चलता है या नही, इससे कुछ मतलब नहीं। उसका उपदेश चित्त लगाकर सुनने दूसरा अध्याय। १५६ से मनुष्यको कुछ न कुछ लाभ अवश्य हो सकता है, बुद्धिमान् वही है, जो खेल से भो नयी बात सीख लेते हैं और दीवार पर लिखे हुए उपदेश से भी शिक्षा लाम करते हैं। एक फकीर अपना मठ और महात्माधोंकी सगति छोड़कर किसी महा- विद्यालय का सदस्य हो गया। मैंने पूछा-"क्योंजी! विद्वान् मौर धार्मिक बनने में क्या प्रभेद है, जो श्रापमें, अपना समाज छाड़कर, अन्य समाजमें मिलने की प्रवृत्ति हुई? उसने कहा--"फकीर जल-प्रवाह से केवल अपनाही कम्बल बचाता है, किन्तु विद्वान् दूसरोंको भी डूबनेसे बचाता है।' शिक्षा-इस कहानी का सारांश यही है, कि विद्वान् महात्माओं से भी बड़ा होता है, क्योंकि वह हजारों-लाखों को अपने उपदेशामृतसे सीधे रास्ते पर लाता और उन्हे कुव्यसनों में पढ़नेसे बचाता है।
-- १६० गुलिस्ता। उन्तालीसवीं कहानी वै राह एक साधु मताबऐ पारसा रू अज़ गुनहगार । बवख्शायन्दगी दर नज़र कुन ॥१॥ अगर मन नाजवॉमरदम वकिरदार । तो वरमन च जवॉमरदॉ गुज़र कुन ॥२॥ क आदमी बेख़बर सड़क पर सो रहा था। उसी से निकला। वह उसकी शरावी- व कीसी हालत देखकर नाक-भौं चढ़ाने लगा। उस जवान ने अपना सिर उठाकर कहा-"जब तुम्हें कोई असावधान-माफ़िल-मनुष्य मिले, तब उस पर दया करो और जब तुम्हें कोई पापी मिल जाय, तब उसके पापों को छिपाओ और उस पर रहम करो। तू जो मेरी नादानी देखकर मुझ से नफरत करता है; अच्छा होता, यदि तू मुझ पर दया करता। हे साधु! पापी को देखकर मुंह न फैर, वरन उस पर दया कर। यदि मेरा आचरण असभ्य हो तो पर्वा न कर ; किन्तु तू स्वयं मेरे साथ सभ्यता का बर्ताव कर।" . ऐ गक्त ! पापी को देख कर तुझे घिन या नफ़रत न करनी चाहिए । चाहिए उस पर दया करनी । यदि में काम करनेमें असमर्थ हूं, तोभी तुझे सामर्थ्यवानों की तरह मुझ से व्यवहार करना चाहिए ।
दूसरा अध्याय। शिक्षा-ऐसे लोग बहुत कम देने जाते है, जो पापियोंके पाप-कर्म पर पर्दा डालें और उन पर दया-दृष्टि रखकर उन्हें सुधारने का यत्न करें। ऐसे लोग बहुत हैं, जो पापियों को देखकर हंसते है और जहाँ जाते हैं, वहीं उनकी निन्दा करते हैं। इस कहानीसे हमें यह नसीहत मिलती है, कि जब हम मुझे, असभ्य, बदतमीज़ और कुत्सित राह पर चलनेवालोंको देखें, तब उनपर सिहरबानी करें और यथा-सामथ्र्य उनको सुधारें। - चालीसवीं कहानी। *>>elfge+ दर्याये फिरावॉ न शवद तीरह वसंग आरिफ़ के वरजद तुनकावस्त हनोज़ ॥१॥ F- झोंका एक दल एक फकीरसे वाद-विवाद करने आया और ऊटपटांग बातें कहने लगा। फकीर को यह वात बुरी लगी। उसने अपने मन्त्रदाता गुरुके पास जाकर सारा रोना रोया। उसने उत्तर नदी एक पत्थर से गदली नहीं हो सकती , फकीर जो तकलीफों से घबराता है मोछा पानी है। ११ गुलिस्तां । दिया-"बेटा! फ़क़ीरों की पोशाक सत्रको पोशाक है। जो मनुष्य इस पोशाक को पहनता है, किन्तु कष्ट को नही सह सकता, वह इस वेश का दुश्मन है और इसका अधिकारी नही है। बड़ी भारी नदी एक पत्थर से गदली नही हो सकती। फ़कीर जो कष्टो से दुःखी होता है, छिछला पानी है। यदि कोई मुसीबत आ पड़े, तो उसे बर्दाश्त करो। दूसरोको क्षमा करनेसे तुम्हें भी क्षमा मिलेगी। हे भाई! अन्तमे हमे मिट्टीमें मिलना पड़ेगा; इसलिए हमे चाहिए, कि हम ख़ाक होनेसे पहले अपने तई ख़ाक बना डालें . शिक्षा-इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है, कि हमें अपनी देह पर भूलकर भी अभिमान न करना चाहिये । इस देह को क्षण-भङ्गुर और मिट्टी में मिल जानेवाली समझना चाहिए। यह बात बहुतही ठीक है, कि यह हमारी देह, जिसको हम खूब सजाते-संवारते है, मिट्टीसे बनी है और एक दिन निश्चयही मिट्टी में मिल जायगी। इस मिट्टी की बनी हुई और मिट्टी में मिलनेवाली देह पर अभिमान करना और अपने तई बड़ा समझना अक्ल मन्दी नही है। जब हमें इस बातका निश्चय है, कि यह देह एक दिन मिट्टी होगी, तब हमें उचित है कि, हम इसे पहलेसेही मिट्टी वेना लें। देह को मिट्टो करने का यह मतलब नहीं है, कि हम अपने स्वास्थ्य को नाथ करके या और किसी तरह कायाको हानि पहुँचा कर ख़राब कर लें, किन्तु यह मतलब है कि हम ऐसे नम्र और शान्त हो जाये जैसी मिट्टी या खाक है। मिट्टी पर जगत् पैर रखता और उसे खूदता है, मगर वह चूं तक नहीं करती। हम लोगोंमें भी वैसीही सहनशीलता होनी चाहिए कि, अपने तई .
पहला अध्याय सदा नन्न और विनोत बनाये रक्खे और किसीके कटु या अप्रिय वचन सुन- कर बुरा न माने । इकतालीसवीं कहानी। हर्के बेहूदा गर्दन अफराजद । खेश्तन रा वर्गदन अन्दाजद ॥ १ ॥ ह किस्सा ध्यान देकर सुनिये। बग़दाद नगर मे, य निशान और पर्दे में झगड़ा हुआ। निशान ने सड़क की धूल से घृणा करके और चलने ले थक कर कहा - "तुम और हम दोनों एकही पाठशालाके निकले हुए हैं और दोनोही चादशाह की कचहरी में नौकरी करते जो कोई श्यपनी गर्दन ऊंची करता है, वही मुह के बल गिरता है। मतलब यह है कि-न गणस्याग्रतो गच्छेत् ।
१६४ गुलिस्ताँ। हैं। सुझे कामके. मारे कभी दम मारने की फुर्सत नहो मिलती। मुझे बारहों महीने घूमना पड़ता है। तुम्हें लड़ाई पर जाने की थकावट, किले पर छापा मारने के ख़तरे, जङ्गल की विपत्ति और धूल-मिट्टी में पड़ने का अनुभव नहीं है। साहस के कामोमें मेरा कदम तुमसे आगे है, फिर भी न जाते क्यो तुम्हारा दर्जा सुझसे ऊँचा है ? तुम जुही-चमेली के समान सुगन्धि देनेवाली चन्द्रसुखी कन्याओ और सुन्दर-सुन्दर नवयुवको के बीच मे अपना समय बिताते हो। मुझे मज- दूर हाथोसे ले चलते हैं और मैं बँधे हुए पैरोंसे सफ़र करता हूँ। मेरा सिर मारे हवाके घबरा जाता है।" पर्दैने जवाब 'दिया-"तुम्हारा सिर आस्मान मे रहता है और मेरा सिर देहली पर रहता है। जो कोई मूर्खता से अपनी गर्दन ऊँची रखता है, वह अपने तई जान-बूझकर विपत्तिमें फसाता है।" शिक्षा-जो ऊँचा चढ़ता है, वह अवश्यही नीचे गिरता हैं। मतलम यह है, कि सिर नीचा रहता है। अतः मनुष्य को भी घमण्ड न करना चाहिए। गरूरका सदा भूलकर दूसरा अध्याय। १६५ बयालीसवीं कहानी। । बनी आदम सरश्त अज खाक दारन्द । अगर खाकी न बाशद आदमी नेस्त ॥ १ ॥ SEYY क महात्मा ने एक पहलवानको देखा। पहलवान क्रोध के मारे लाल हो रहा था और उसके मुंहसे भाग निकल रहे थे। उसकी यह हालत देखकर महात्मा ने किसी से उसका कारण पूछा। जवाब मिला कि, उसे किसीने गालियां दी हैं। महात्माने यह बात सुनकर कहा-'यह अधम जो वारह मनका पत्थर उठा लेता है, एक बात बर्दाश्त करने को ताक़त नही रखता! ऐ दुर्बल- हृदय मनुष्य ! तू अपने बल और साहसका मिथ्या घमंड छोड दे। तेरे जैसे मर्द और औरतमें क्या फ़र्क है ? अगर हो सके, तो मोठा बोलने में अपनी शक्ति दिखा । दूसरे आदमी के मुंह पर चूसा मारना शहजोरी नहीं है। जो शख्स हाथीका माथा फाड़ सकता है, अगर उसमें आदमीयत नहीं है, तो वह मर्द नहीं है। आदम को औलाद नर्म मिट्टीसे बनो है। अगर तुझ मे नम्रता नहीं है, तो तू आदमी नहीं है।" मनुष्य खाक से बना है, यदि उसमें 'खाकसारी' (नम्रता ) नहीं है तो फिर वह आदमी नहीं है। ।
१६६ गुलिस्तां। - शिक्षा-इस कहानीसे यह नसीहत मिलती है, कि बलवान मनुष्य को दुर्बलोंपर जोर-माजमाई न करनी चाहिए। वही सच्चा बलवान्, जोरावर एवं साहसी है, जिसने अपनी इन्द्रियोंको अपने अधीन कर लिया है। जो शखस अपनी इन्द्रियोंको भी अपने अधीन नहीं रख सकता, वह शारीरिक बल में बलवान होनेपर भी बलवान् नहीं है। जो नम्र है, जो शान्त है, जो सहनशील है, वही मर्द है । जो पहलवान दस-बीस मनका पत्थर आसानी से उठा सकता है। अपनी छातीपर हाथी चढ़ा सकता है , सिह को बिना हथियार मार सकता है, युद्ध में हजारों योद्धाओंको धराशायी कर सस्ता है , अगर उसमें नम्रता और सहनशीलता न हो, तो वह बलवान वीर्यवान् और साहसी नही कहलाया जा सकता। मनुष्य जब नर्म मिट्टी से बना है; तब उसे मिट्टी की भांति ही नर्म और सहिष्णु होना उचित है।
दूसरा अध्याय। १६७ तेंतालीसवीं कहानी। हज़ार खेश के बेगाना अज खुदा बाशद । फिदाये यक तने बेगाना काशना बाशद ॥१॥ GST सी ने एक विद्वान् से उसके भाई सूफियोंके आच- किरणके विषयमें पूछा। उसने जवाब दिया,-"वे मित्रोकी इच्छा पूर्ण करने की अपेक्षा अपनी इच्छा पूर्ण करना पसन्द करते हैं, यही उनमें कमीना- पन है। हकीमोंने कहा है, कि वह भाई जो अपनी ही फिक्र रक्खे न तो भाई है और न अपना है। सफरमें तुम ठहरो और तुम्हारा साथी चलनेको जल्दी करे, तो उसे अपना साथी मत समझो। जो तुम से प्रेम नही रखता, उसपर तुम भी प्रम मत रखो। रिश्तेदारों में धार्मिकता और ईश्वर-निष्ठा न हो, तो उनसे रिश्ता तोड देनाही भला है।" मुझे याद है, कि विपक्षी ने उपरोक्त वातपर आपत्ति की और कहा कि, कुरान में ईश्वर ने रिश्तेदारोंसे रिश्ता तोड़- नेकी मनाही की है और दूसरोंकी अपेक्षा रिश्तेदारोंके साथ- ही दोस्ती रखने का हुक्म दिया है। तुमने जो ऊपर कहा है, वह कुरान की विधि के विरुद्ध है। मैने जवाब दिया- ईश्वर को न जानने वाले हजार परिचित व्यक्ति ईश्वरश एक अपरिचित व्यक्ति पर न्योजवर हैं। -
१६८
गुलिस्ता।
"तुम ग़लती करते हो। मेरी बात कुरान के अनुकूल है।
ईश्वरने कहा है अगर तेरे माता-पिता इस बातकी कोशिश
करें, कि तू अपने साथ उनको भी शरीक कर ले, जिनकी
तुझे ख़बर नहीं है, तो उनकी बात न मान ।
पहचाननेवाले एक अपरिचित पर ईश्वर को न जानने वाले
हज़ार रिश्तेदार निछावर हैं।"
शिक्षा-समान गुण-धर्मवाले मनुष्योंसेही मित्रता करनी चाहिये।
ईश्वर को
चवालीसवीं कहानी।
खए वद दर तवीअते के नशिस्त ।
न रवद जुज़ बवक़्ते मर्ग अज़ दस्त ।।
525 गदाद में एक प्रसन्न-चित्त बूढ़ा था। उसने अपन
ब लड़की की शादी एक मोचीके साथ कर दी। उस
PS कठोर हृद्य ने उस लड़की के होठ इस तरह काट
लिये, कि उनसे खून निकल आया। सवेरे बापने
अपनी
युरी आदत पड़ जाने पर मृत्यु तक वह नहीं छूटती है।
Andhta... दूसरा अध्याय। १६९ जब लड़की का यह हाल देखकर अपने दामाद से जाकर कहा- "ऐ नीच! तेरे दांत किस तरह के हैं, जो तूने उसके होठोको चमडे की तरह चबा डाला? मैं मज़ाक नहीं करता। तू दिल्लगी को छोड़ और कायदे के माफ़िक आनन्द कर। किसी मे बुरी आदत पड़ जाती है, तब वह मरणकाल तक नहीं छूटती।" शिक्षा-इस कहानीका यही सार है, जिसका जो स्वभाव पड़ गया है वह उसके जीके साथ जाता है। पेंतालीसवीं कहानी। ज़िश्त वाशद दवीकित्रो देवा । के बुवद बर अरूसे नाज़ेवा ॥१॥ सी वकील के एक कुरूपा कन्या थी। वह व्याहने- कि योग्य हो गयी योग्य हो गयी थी। वकीलने अपनी कन्या के दहेज में बहुतसा धन-माल और अन्यान्य बहुमूल्य सामान देने की प्रतिज्ञा की ; परन्तु कोई भी उस कन्या के .. अच्छे कपड़े बदसूरती को दूर नहीं कर सकते।
१७०
गुलिस्तां ।
साथ शादी करने पर राज़ी न हुआ। बदसूरत दुलहिन को
ज़री और कमलाब शोभा नहीं देते। बहुत बात बढ़ानेसे क्या,
उसने लावार होकर उस कन्या का व्याह एक अन्धे मनुष्य के
साथ कर दिया। कहते हैं, कि उसी साल लङ्कासे एक ऐसा
हकीम आया, जो अन्धोकी आँखें ठीक कर सकता था। लोगों
ने उस कन्याके पितासे कहा, कि तुम दामाद की आँखें ठोक
क्यो नही करा लेते ? उसने कहा-"मुझे इस बातका भय
है कि ज्योही उसे सूझने लगेगा, त्योंही वह अपनी बीबी को
छोड़ देगा। कुरूपा स्त्रीके पतिका अन्धा रहना ही अच्छा है।
महाकवि माघने ठीक कहा है, सर्वः स्वार्थ समीहते ।
दूसरा अध्याय। १७२ १ - छियालीसवीं कहानी। ऐ दरूनत बिरहना अज तकवा । कज़ बरूँ जामये रिया दारी ॥१॥ पर्दये हफ्त रग दर वगुजार । तो के दर खाना बोरिया दारी ॥२॥ RSS ई वादशाह फकीरोको बहुतही नफरत । नज़रसे को देखता था। एक फकीर को यह बात मालूम हुई, तो उसने वादशाहसे कहा-- 'आप खाली बाहरी शान-शौक़त में हमसे चढ़े -बढ़े हो , परन्तु जिन्दगी का सुख जितना हमलोगोंको मिलता है, उतना आपको नहीं मिलता। मरनेके समय हम और तुम बराबर हो जायेंगे। ईश्वर के सामने पहुँचने पर हमारी दशा तुमसे अच्छी हो जायगी। यद्यपि अनेक राज्यो का विजेता बादशाह स्वतन्त्र प्रमुत्व का सुख भोगे और फकीर रोटी का भी सुहताज हो; तथापि मृत्यु के समय दोनोंही कफन के सिवाय कुछ साथ न ले जायँगे। इन दुनिया को छोड़कर दूसरी दुनियामें जाने और आनन्द करने के लिए चादशाही से फकीरी अच्छी है। फकीरों जो बाएर से धर्म का ठाट दिखाता है, पर अन्दर से दुष्ट है, वह उम मूर्ख मनुष्य के सदृश है जिसने बोरिया विछे हुए मकान के दरवाजे पर सात रंग का परदा छोदा है।
१७२ गुलिस्ता। की पेशाकें थेगड़ीदार और सिर मुंड़ा हुआ रहता है , लेकिन सच बात तो यह है, कि उनका हृदय सजीव होता है और इनकी इन्द्रियाँ मरी हुई होती हैं। "वह मनुष्य नहीं है, जो मनुष्योके साथ मूर्खता से दावा करे और जो कोई उसके विरुद्ध काम करे, तो उससे झगडा करनेको तय्यार हो। अगर पहाड़ परसे पत्थर की चको गिरे और वह मनुष्य जो उस पत्थर की राह से हट जावे, ईश्वर में विश्वास रखनेवाला नहीं हैं। फकीरका कर्तव्य है, कि वह ईश्वर से पुकार करे, उसीके गुण गावे, उसके आज्ञानुसार चले, उसकी उपासना करे, भिखारियो को भिक्षा दे, सन्तुष्ट रहे, अपनी वासनाओं को त्याग दे और इस बातका विश्वास रक्खे कि, ईश्वर एक है। जिसमे उपरोक्त गुण मौजूद हो, वह बढ़िया-बढ़िया कपड़े पहनने पर भी असली साधु है। इसके विपरीत निकम्मा बकवादी जो ईश्वरोपासना नहीं करता, जो अपनी इन्द्रियों के अधीन है, जो इन्द्रियोकी विषय- वासना पूरी करने में दिनको रात करता है, सोनेसे दिनको रात बना देता है, जो कुछ पाता वही खा जाता है और जो कुछ जु यान पर आता है वही कह बैठता है, कुराह पर चलने वाला है,चाहे वह कम्बलके सिवा और कुछ भी पास न रखता हो; 'ओ न! जो अन्दर से परहेज़गार नहीं है, किन्तु जाहिर में दिखाने के लिये मन की पोशाक पहनता है, वोरिया बिहे दुग मकान के आगे मान रन का पर्दा न टाल।"
दूसरा अध्याय। १७३ शिक्षा-इस कहानी का खुलासा यह है, कि बादशाहोंसे फकीरों का दर्ना ऊँचा है, क्योंकि फकीरों को जीवनका जो सच्चा सुख और शान्ति मिलती है, यह वादशाहों को नहीं मिलती। दूसरे मरनेके समय वादशाह और फकीर एक समान हो जाते हैं और दोनों ही यहां से सिवा कफन के और कुछ साथ नहीं ले जाते । जब ईश्वर के सामने उनका न्याय होता है, तब फकीर तो निष्पाप रहने और ईश्वर से प्रेम रखने और उसीकी उपासना करने के कारण ऊँचे पदपर पहुँचता है और वादशाह नीचे गिराया जाता है; क्योंकि जीवन-भर वह राज्य की मझटों में फंसा रह कर कमी शान्त चित्तसे ईश्वरका भजन नहीं कर सका था तथा अनेक स्थानों में बड़े-बड़े पाप कर बैठा था। फकीरको दोनों दुनियाोंमें सुख-शान्ति मिलती है। जबतक जीता है, तबतक इच्छारहित हो जानेसे शान्तिसे जीवन विताता है और मरनेपर स्वर्गमें जाता है। लेकिन यह सब मुख उसी फकीरको मिलते हैं जो वास्तव में फ़कीरोंकेसे गुण रखता है। जो दिखलानेको फकीरोंकी सी पोशाक पहनते हैं, किन्तु अन्दर से ईश्वरभक्तिते कोरे हैं, जिनको इन्द्रियां उनके अधीन नहीं हैं और जिन्होंने इच्छा को नहीं छोड़ा है, वह फकीर नहीं बल्कि मफार थोर फरेबी हैं।
१७४ गुलिस्ताँ। सैंतालीसवी कहानी। थे। बदबख्त कसे के सर बताबद । जी दर के दरे दिगर नयाबद ॥१॥ ASS ने कुछ ताज़ा गुलाबके फूलोंके गुलदस्ते देखे, जो एक गुम्बद पर घास के साथ बँधे हुए मैंने कहा--"कौनसी घास है जो इस भाँति गुलाब के साथ रह सकती है ?" घास ने रोकर कहा--"चुप रहो, परोपकारी अपने साथी को नही भूलते। यद्यपि मुझमे सुन्द- रता, रज और सुगन्ध आदि कुछ भी नहीं है, तोभी क्या मैं ईश्वर के वाग़ की घास नही हूँ? मैं उस परमेश्वर की सेविका है, उसी की कृपा से प्राचीन कालसे मेरा प्रतिपालन होता है। मुझ मे चाहे गुण हो अथवा न हों; तथापि मैं ईश्वर से दया की आशा रखती है। यद्यपि मैं किसी योग्य नही हूँ और मेरे पास कोई ज़रिया भी नही हैं, जिससे मैं अपनी सेवा उसे जताऊँ , लेकिन वह अपने सेवक की, अन्यान्य अवलम्बोसे हीन हाने पर भी, सहायता करनेमे समर्थ है। यह कायदा है, कि मालिक अपने पुराने ग़लामोको गलामाले छोड देते हैं । हे ईश्वर ! तूने इस जगत्को अपनो सृष्टिस गयर के द्वार में गिर एटाता है, उस सभागे के लिए संमार के म द्वार चन्द दागने दें। + दूसरा अध्याय। १७५ सुशोभित कर दिया है। अपने इस पुराने नौकर को स्वत- न्त्रता दे। ऐ सादी! परितोप के मन्दिर की राह पकड़ । मनुष्यो ! धर्ममार्ग पर चलो। जो मनुष्य इस द्वार से सिर हटाता है, वह अभागा है, क्योंकि उसे दूसरा द्वार नही मिलेगा।" शिक्षा-इस कहानी का यह सारांश है कि, इस जगत् में जो कुछ है वह सब ईश्वर का बनाया हुभा है। वह अपने सेवकों को खूब सम्हाल रखता और इन्हें सहायता देता है। मनुष्य को चाहिए, कि ईश्वरकी सेवामें कोताही न करे और सदा नेकी और परोपकार में चित्त रक्खे । मनुष्य के लिए. इंग्चर-दर्शन का यही सबसे अच्छा द्वार है।
१७६ गुलिस्ता। NA अड़तालीसवीं कहानी। ज़काते माल वदर कुन के फ़जलए रज़रा । चो वागवॉ बबुर्द वेश्तर दिहद अंगूर ॥१॥ सीने एक अक लमन्दसे पूछा कि, सखावत और कि जवांमर्दी इन दोनोमें से कौन अच्छी है। अक्ल- 5 मन्दने कहा-"जिसमे सखावत है, उसे जवा- मर्दी की ज़रूरत नहीं। वहराम गोरकी समाधि पर लिखा हुआ था-'दाली हाथ बलवान् भुजाओंसे अच्छे हैं। हातिसे. ताई अब नहीं है, लेकिन उसका बड़ा नाम अनन्तकाल तक प्रसिद्ध रहेगा। अपने धनका दसवाँ हिस्ला दान कर दिया करो, क्योकि जब किसान अङ्ग रके वृक्षोको बढ़ी हुई डालि- योंको काटकर फेंक देता है, तब उनमें और भी अधिक अङ्गर उत्पन्न होते हैं।" शिक्षा-इस कहानी में परोपकार या दानकी प्रशला की गई है। हाति- मेताई बढ़ाही परोपकारी पुरुष था। उसके परोपकारोंकी बातें पढ़कर मनुष्य , दान करने से धन घटता नहीं-वढता है। अंगूरों की शाखाएँ काटने से और ज्यादा अगूर आते हैं। दान से धन तो वदताही है और चित्त की शुद्धि नफे में हो जाती है ।
दूसरा अध्याय।
हेरतमें या जाता है। हातिम मर गया, किन्तु उसका नाम, उसकी परो-
पकारवृत्ति के कारण प्राजतक लोगों की जुबान पर है और भनन्त समय तक
इसी भांति रहेगा। अतः मनुष्य को सदा परोपकार में चित्त रखना चाहिये।
ईश्वरने यह मनुष्य-देह परोपकारके लिएहो रची है
*
S
।
१२
तीसरा अध्याय। how सन्तोष का महत्त्व 232cke पहली कहानी। 7 iii.] - 1 । - ܪܙܶ 1. Etaju ... hi, ... -- A.. . H: TE ग ? १ . A . प M . , . १ , - 4 तीसरा अध्याय। १७९ maana नी नहीं है। लुकमान ने एकान्त-वासमें सन्तोप धारण या था। जिसके दिलमे सन्तोष नहीं है उसमें तत्त्वज्ञान- इकमत-नहीं है। शिक्षा-इस कहानी का साराश यह है, कि जगत्में "सन्तोप" ही सबसे बड़ा धन है। जिसमें सन्तोष नहीं है, वह मारीसे भारी धनी होने पर भी, निधन है। जिसके हृदय में असन्ताप नहीं है, वही सदा सुखी है। लाख, फरोढ़ और भरव-खरब की सम्पदा होने पर भी जो सन्तोष-हीन है वा परम दुःखी है । सन्तोपो मनुष्यही सच्चा सुख भोग करता है। । दूसरी कहानी। - मन ओं मोरम के दर पायम विमालन्द । न जंबरम के अज़ नेशम विनालन्द ॥१॥ VE श्र देशमे किसी अमीर के दो लड़के थे। उनमेसे एफने इत्म सीखा और दूसरेने दौलत जमा की Nird पहला अपने समय का सबसे भारी विद्वान हुआ और दूलग मिश्र का बादशाह हुना। धनवान् भाई अपने उन चोटी मतान : जो पाद नरे रोटी जानी है, मिन व दर्य नदी, जिरेतालीने लोग रोने हैं।
--- गुलिस्ता। १८० विद्वान् भाई को नफरत की नज़र से देखता और कहता- "देखो! मैं वादशाह होगया और तुम उसी कंगाली की हालत में पड़े हो।" उसने जवाब दिया-"भाई! मुझे ईश्वर का कृतज्ञ होना चाहिए, क्योंकि मुझे पैग़म्बरों की मीरास-अल-मिली और तुमने फरऊन और हामान का भाग-मिश्रका राज्य-पाया। मैं वह चीटी है, जिसे लोग पैर तले रौंदते हैं, लेकिन वह बर नहीं है, जिसकी लोग शिकायत किया करते हैं। मनुष्योंपर अत्याचार-जुल्म- करने का कोई ज़रिया मेरे पास नहीं है, ईश्वर की इस कृपा के लिए मैं उसे किस तरह धन्यवाद हूँ ?" शिक्षा-इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है, कि मनुष्य को हर हालत में खुश रहना चाहिए। सन्तोप-वृत्ति धारण करने से मनुष्य सदा मुली रहता है और दुःख-क्लेश आदि उससे हजारो कोस दूर रहते है। का तीसरा अध्याय । १८१ तीसरी कहानी। लि बनाने खुश्क कनाअत कुनीमो जामये दल्क । के रज मेहनते खुद बह के वार मिनते खल्क ॥१॥ ने सुना है कि एक फ़कीर दरिदता के मारे बहुतही में दु.खी था , और थेगडियो पर थेगड़ियाँ लिया करता था; किन्तु अपने मनको धीरज देनेके लिए नीचे लिखा हुआ पद कहा करता था-"मैं सूखी रोटी और गुदडीसेही सन्तुष्ट हूँ; क्योकि मनुष्य की कृतज्ञताका भार उठानेकी अपेझा, अपनी आवश्यकताओं का भार अपने- हो सिर लेना अच्छा है।" फिली ने उससे कहा, कि अमुक मनुष्य इस नगरमे बडा हो उदारचित्त और परोपकारी है। वद सदा साधुओं को सहायता देना चाहता। ओर एमेगा प्रत्येक मनुष्य को सुखी फरने के लिए तयार रहता है। उसके रोने गुप, तुम राध पाय धरे करने से हो? उसने जवाब दिया--अपनी आवश्यकताओ का भार उनसे निरपर डालने की अपेक्षा. रिना उन मोजो ना जाना सत्कार। जरा है, कि फिली 'न गुममा मारगर उसो र सपने माना। मनुमान १८२ गुलिस्ता। अमीरको कपड़ों के लिए निवेदन-पत्र लिखने को अपेक्षा, थेगड़ी पर थेगड़ी लगाकर सन्तुष्ट रहना अच्छा है।" सच बात तो यह है, कि अपने पड़ोसी की मदद से स्वर्ग में प्रवेश करना, नरककी यातनाओं के बराबर है। शिक्षा-इस कहानी का खुलासा यह है, कि मनुष्य को चाहिए कि अपनी यावश्यकताओं को पूरी करने का भार दूसरोंके सिर पर न टाले ; श्राप जिस अवस्था में हो उसी में सन्तुष्ट रहे। लोगोंसे मांग-मांगकर अच्छे-अच्छे वस्त्र पहनने और स्वादिष्ट भोजन करने की अपेक्षा, निराहार रहना और रास्ते के पड़े हुए चिथड़े लपेट लेना अच्छा है।
तीसरा अध्याय। १८३ चौथी कहानी। *Misce सुखन ऑगह कुनद हकीम आगाज । या सर अंगुश्त सूये लुक्मा दराज ॥१॥ के जे नागुफ़्तनश खलल जायद । या जे ना खुरदनश बजॉ श्रायद ॥२॥ SSC रानके वादशाहोंमें से एक ने एक सुचतुर हकीम को मुस्तफाके पास भेजा। वह कई चरम तक PAGEम अरव में रहा ; किन्तु कोई भी उसके हुनर की आज़मायश फरने न आया और न किसी ने उससे कोई दवा- ही मांगी। एक दिन वह पैगम्बरोंके बादशाह के पास गया और दुःखी होकर कहने लगा लोगोंने मुझे आपके लाथि- फरने भेजा था किन्तु आजतक मुझे किसी ने भी न पूछा इससे जिस सेवाके लिए मैं भेजा गया था, उसके पारने का मैंने मौका न पारा ।" मुहम्मद ने जवाय दिया-"न लोगोंमें यह रीति है, कि जस्तक यह भूलने योकी दवा-दार .. सीम उETRोगा कि बिना उम्कदोर ने शनि रोनी पायो भोजन खादा रनारवा दिन न मापा नापन गरोसे माउ दो सपा और ऐसेही कमर पर मदो नने पोभावना परती।
।
समय
१८४
गुलिस्ता।
खूब व्याकुल नहीं होते, तबतक हरगिज़ भोजन नहीं करते
और जब ख़ासी भूख रहती है, तभी भोजन करने से हाथ
खीच लेते हैं।" हकीम ने जवाब दिया-"स्वास्थ्य-सुख
भोगनेका यही तरीका है।" पीछे वह हकीम पैग़म्बरको
सलाम करके वहाँसे चलता बना। हकीम उसी
बोलता है जब कि उसके न बोलनेसे हानि होती है । खाना
अयधिक खाया जाता हो या निराहार रहनेसे मृत्यु होती
हो; ऐसे समय में उसका बोलना कि ऐसा भोजन करना
स्वास्थ्य के लिए हितकारी है, निस्सन्देह बुद्धिमानी है।
शिक्षा-इस कहानी का यह सारांश है, जो लोग खूब भून लगने
पर खाते हैं और कुछ भूख बाकी रहनेपर ही भोजन करना छोड़ देते हैं अर्थात्
अल्प पाहारसेही सन्तुष्ट हो जाते हैं, उन्हें वैद्य-हकीमोंकी ज़रूरत नहीं
होती। खूब भूख लगनेपर भोजन करना और कुछ भृस बाकी रखना
स्वास्थ्यके लिये अच्छा है।
- - तीसरा अध्याय। १८५ पाँचवीं कहानी। NSGER ली मनुष्य ते बहुत सी प्रतिज्ञाएँ की और पीछे वे कि सब मा कर दी। एक बुजुर्गने उससे कहा- SAEE में जानता हूँ, कि तुम अधिक सानेका अभ्यास करते हो और तुम्हारी भूख रोकनेकी प्रवृत्ति चालले भी कम- जोर है। जिस भाँति तुम क्षुधा प्रान्त करने, उसले जीर टूट सकती है। एक दिन ऐसा आवेगा कि तुम्हारी यह बादपरहेजी तुम्हें तकलीफ टेगी।" किसीने एक भेटियेका जब पर बड़ा हो गया , तब उसने अपने मालिफकोटी चीर-फाडकर टुकड़े-टुकडे कर टाला । बचा पाला था। शिक्षा-म यहानीया सारांश यह है, रिजो मनुष्य गाम ता पंट भरनेयोती ना पाप समझते हैं, जियो धमार पम्य पान हो रहती, जो भाग अपील है, उनको पर कभी पाना नहीं माना तल दाने पोमार हो जाम रे, तर म चोदाती पोनर दि तापार होर है। मनुष्य को शामिलाही मन्नुस्ट भोर कर गे मोर भयो कोकोपि र निमोसयधिशान भाम भारतमितने बार भारत होने पर पोई दुरी स्मात ही माही IPL करना।
गुलिस्ता।
A
समय
खाना
खूब व्याकुल नहीं होते, तबतक हरगिज भोजन नहीं करते
और जब ख़ासी भूख रहती है, तभी भोजन करने से हाथ
खीच लेते हैं।" हकीम ने जवाब दिया-"स्वास्थ्य-सुख
भोगनेका यही तरीका है।" पोछे वह हकीम पंग़म्बरको
सलाम करके वहाँसे चलता बना। हकीम उसी
बोलता है जब कि उसके न बोलनेसे हानि होती है ।
अत्यधिक खाया जाता हो या निराहार रहनेसे मृत्यु होती
हो; ऐसे समय मे उसका बोलना कि ऐसा भोजन करना
स्वास्थ्य के लिए हितकारी है, निस्सन्देह बुद्धिमानी है।
शिक्षा-इस कहानी का यह सारांश है, जो लोग खूब भून लगने
पर खाते हैं और कुछ भूख बाकी रहनेपर ही भोजन करना छोड़ देते है अर्थात्
अल्प आहारसेही सन्तुष्ट हो जाते हैं, उन्हे वैद्य-हकीमोंकी जरूरत नही
होती। खूब भूख लगनेपर भोजन करना और कुछ भूख बाकी रखना
स्वास्थ्यके लिये अच्छा है।
तीसरा अध्याय । पाँचवीं कहानी। R LATESTS सी मनुष्य ने बहुत सी प्रतिज्ञाएँ की और पीछे वे कि सब भङ्ग कर दी। एक बुजुर्गने एक वुजुर्गने उससे कहा- ENERध मैं जानता हूँ, कि तुम अधिक खानेका अभ्यास करते हो और तुम्हारी भूख रोकनेकी प्रवृत्ति बालसे भी कम- जोर है। जिस भांति तुम क्षुधा शान्त करते हो, उससे ज़जीर टूट सकती है। एक दिन ऐसा आवेगा कि तुम्हारी यह बदपरहेजी तुम्हें तकलीफ देगी।" किसीने एक भेड़ियेका जब वह बड़ा हो गया ; तब उसने अपने मालिककोही चीर-फाडकर टुकड़े-टुकडे कर डाला । वच्चा पाला था। शिक्षा इस कहानीका सारांश यह है, कि जो मनुष्य नाक तक पंट भरनेकोही अपना कर्तव्य समझते हैं, जिनकी धुन हर समय खानेमेंही रहती है, जो भूख के अधीन होते हैं, उनको जब कभी खाना नहीं मिलता या अत्यधिक खानेसे बीमार हो जाते हैं, तब इप्स चोलेकोही छोड़ने के लिये लाचार होते हैं। मनुष्य को चाहिए कि थल्पाहारसेही सन्तुष्ट और प्रसन्न रहे भौर भूखको रोकनेकी शक्ति रक्खे ; जिससे उसे अत्यधिक खाने अथवा भोजन न मिलने के कारण प्राण न खोने पढ़ें। जो अपने पोछे बुरी शरते लगा देते हैं, भन्तमें उनकी धुरी यादतेंही उनका नाव कर देती हैं।
१८६ गुलिस्ता। छठी कहानी। खुर्दन बराये जीस्तन व ज़िक्र कर्दनस्त । तो मौतर्किद के जीस्तन अज़ बड़े खुर्दनस्त ॥१॥ LES देशीर बाबकान के इतिहासमे लिखा है, कि उसने 18 एक अरबी हकीमसे पूछा कि दिन-भरमे कितना ब भोजन करना चाहिए। उसने जवाब दिया कि एक सौ दिरम भर भोजन काफी है। बादशाह ने कहा- "इतने अल्प भोजन से कितनी ताक़त आवेगी ?" हकीम ने कहा,-"इतना भोजन तुम्हें सम्हालने के लिये काफी है और जो इससे अधिक खाओगे तो तुम्हें भोजनको सम्हालना होगा अथवा उसे लिये-लिये फिरना होगा। हम लोग जीवित रहने और ईश्वर का गुणानुवाद करनेके लिए खाते हैं। तुम्हारा यह विश्वास है, कि लोग खानेके लिए जीते हैं।" शिक्षा-इस कहानी का यह सारांश है, कि मनुष्यको अल्पाहार पर सन्तोष रखकर इतना खाना चाहिए, जितना खानेसे यह काया ठहरी रहे। प्रत्यधिक खानेसे मनुष्यको स्वास्थ्यसुख नहीं मिल सकता। मनुष्य जिन्दा रहन और भगवान् का भजन करने के लिए स्नाता है न कि खानेके लिए भोजन सिर्फ जिन्दा रहनेके लिए और ईश्वर-मजन करने के लिए किया जाता है पर तृ मूर्स, पाने के लिए जिन्दगी को समझता है।
तीसरा अध्याय। १८७ जिन्दा रहता है। मतलब यह है, कि मनुष्यों को थोड़े से भोजनपर ही सत्र करना अच्छा है। सातवीं कहानी। चौ कम ख़ुदन तवींअत शुद कसेरा । चौ सख्ती पेशश आयद सहस गरिद ॥१॥ वगर तनपरवरस्त अन्दर फराखी। चौ तंगी बीनद अज सख्ती वारद ॥२॥ 4 रासान के दो फ़कोरोंमें खूब गाढ़ी दोस्ती होगयी खु थी। वे साथ-साथ सफर करते थे। उनमें से एक जा दुर्बल और दूसरा हट्टा-कट्टा था। जो दुर्बल था, वह दो दिनतक उपवास करता और जो हृष्ट-पुष्ट था, वह अल्पाहार करनेवाला आसानीसे तकलीफोंको सहन कर लेता है। पर जिसने सिवाय शरीर पालनेके और कुछ कियाही नहीं, उस पर यदि सख्ती की जाती है तो वह मरही जाता है।
गुलिस्ता।
दिनमे तीन बार खाता । दैवयोग से ऐसा हुआ, कि वे
दोनों जासूस समझे जाकर, नगर के फाटक पर गिरफ्तार
कर लिये गये और एकही कोठरीमें कैद कर दिये गये। जिस
कोठरीमें वे दोनो कैद किये गये, उसका द्वार भी मिट्टी से
बन्द कर दिया गया। पन्द्रह दिन पोछे मालूम हुआ, कि वे
दोनों निर्दोषही कैद किये गये हैं। इसलिए द्वार खोलकर
वाहर निकाले गये। उनमें से जो मोटा-ताजा था वह तो मरा
हुआ मिला और जो दुबला-पतला था, वह ज़िन्दा मिला ।
इस घटना से लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। इस पर एक
हकीमने कहा, कि यदि मोटा मनुष्य जीता रहता
और
दुवला सर जाता तो और भी अधिक आश्चर्य की बात होती,
क्योकि वह शख्स जो बहुत खानेवाला था उपवास नही कर
सकता था, जो मनुष्य दुर्वल था, वह उपवासोंका अभ्यासी था
और अपनी काया को वशमे रख सकता था; इसीसे वह बच
गया। जो मनुष्य थोड़ा खानेका आदी होता है, वह सुखसे
सङ्कट सह लेता है; लेकिन जो सुख के दिनोमें नाक तक
लूंस-ठूस कर खाता है, उसे दुःखके दिनोमें अपनी खोटी
आदतने डूबकर मरना पडता है।
शिक्षा-इस कहानी का सारांश यह है, को भी अधिक
खानेकी पादत न ढालनी चाहिए। अधिक खानेवाले, खाना न मिलने या
कम खाना मिलनेसे, मर जाते है , किन्तु जो मुखको अपने सिर पर नहीं
खेलने देते, अपनी काया को अपने अधीन रखते है, थोड़ेसे भोजनमे हो
-
मनुष्य
भूलकर
तीसरा अध्याय। १८६ सन्तुष्ट रहते हैं, वे कुछ दिन भोजन न मिलने या थोड़ा भोजन करनेसे दुःख और मृत्यु के अधीन नहीं होते। तात्पर्य यह है, कि जो थोड़े मेंही सन्तुष्ट रहते हैं, उन्हें ससारी यातनाएं नहीं सता सकती। आठवीं कहानी। SAUR बा के दर वजूद तुअामस्त ऐशे नफ्स । रज श्रावरद तुग्राम के वेश अज कदर वुवद ॥१॥ सी अक्लमन्दने अपने पुत्र को उपदेश दिया कि कि अधिक न खाया करो, क्योंकि अत्यधिक खानेले SEE रोग होता है। पुरने उत्तर दिया--"पिताजी ! भूख मनुप्य को मार डालती है। क्या आपने महात्माओं की कहावत नहीं सुनी, कि भूख के कष्ट सहने की अपेक्षा निस्सन्देह भोजन से प्राण रक्षा होती है पर ज्यादा खानेसे शनि भी पहुच जाती है। असपद भूल देखकरही भोजन करना चाहिए।
१६०
गुलिस्ता।
.
अधिक साकर मरना अच्छा है?" पिताने उत्तर दिया-
"परिमित आहार करो; क्योकि ईश्वरने कहा है- "खाओ
पियो सही, लेकिन हद से ज़ियादा नहीं।" यानी न तो
इतना ज़ियादा खाओ कि खाया हुआ मुंह से निकल पड़े
और न इतना कम खाओ कि दुर्वलता के कारण मृत्यु हो
जाय। यद्यपि भोजन से जीवन-रक्षा होती है ; किन्तु जब
वह हदसे ज़ियादा खाया जाता है, तब हानि करता है।
अगर बिना इच्छाके गुलकन्द भो खाओगे तो वह भी नुकसान
करेगा। यदि उपवास के वाद सूखी रोटी भी खाओगे, तो
वह गुलकन्द का मज़ा देगी।"
शिक्षा-इस कहानीसे यह शिक्षा मिलती है, कि मनुष्य को एक
हद मुकरर तक भोजन करना चाहिए। इतना न खाना चाहिए जिससे
अजीर्ण, वमन धादि रोग होकर कष्ट पाना पड़े या विसूचिका वगैरः हो
जानेसे प्राणही त्याग करने पड़े। जो अत्यधिक खाते हैं या बिल्कुल कम
खाते हैं वे दोनोंही मर जाते हैं, लेकिन जो नियमित आहार करते हैं, वे
मुखपूर्वक जीवन-मुख भोगते हैं।
तीसरा अध्याय।
१६१
नवीं कहानी।
जव
सीने एक रोगी से पूछा कि तुम्हारा दिल क्या
कि चाहता है ? उसने जवाब दिया-"यह चाहता
न है कि मेरा दिल किसी चीज़ को न चाहे।
कि आमाशय-मेदा-भरा होता है और पेटमे दर्द होता है.
उस समय कोई अच्छी दवा भी फ़ायदा नहीं करती।
शिक्षा -इस कहानी में भी अधिक न खानेकी सलाह दी गयो है। भरे
पटमें विमा भूख लगने के थाहार करनेसे मनुष्य की मृत्यु हो जाती है।
ऐसे समयमें कोई-कोई समय किस प्रकार की औषधि मी कुछ फायदा नहीं
करती; तब भोजन क्या फायदा करेगा?
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१६२ गुलिस्तां। दसवीं कहानी। . तर्के ऐहसान ख्वाजा ओलातर । के ऐहतमाल जफ़ाये वव्यावान ॥१॥ वतमन्नाये गोश्त मुर्दन वह । के तकाजाये जिश्त कस्सावान ॥२॥ SEARNEARS सीत नामक नगरके एक कसाई का सूफ़ियो पर व कुछ कर्ज़ चढ़ गया था। वह रोज़ उन लोगोंसे तक़ाज़ा करता और अनेक प्रकारसे गाली-गलौज देता। सूफी लोग उसकी गालियोंसे बहुतही दुःखी होते परन्तु सबके सिवा उनके पास और इलाज न था। उनके भाईबन्दोमें से एक सत्पुरुषने कहा-"कसाई को रुपया देनेका वादा करके राज़ो करनेकी अपेक्षा, भूखको भोजन का वचन देकर सन्तुष्ट करना आसान है। बड़े आदमी की कृपा को आशा त्याग देना अच्छा ; किन्तु उसके दरवाल की बुरी-भलो बाते सहना अच्छा नहीं। कसाईके तकाजे सहनेकी अपेक्षा मांस खानेकी इच्छा को लिए हुए मर जाना अच्छा है।" दरबानकी पुरी-भलो बातें सुननेसे तो वहा से मिलनेवाली चीज़का ख्याल छोड़ देनाही अच्छा है। कसाई के तकाजेंसेि मांस खानेकी इच्छा को पिना पूरा कियेही मर जाना अच्छा है।
तोसरा अध्याय। १९३ शिक्षा-इस कहानीसे यह नसीहत मिलती है, कि मनुष्य को चाहिए कि अपने पास कुछ हो तो खाले ; यदि न हो सो कर्ज लेकर न खावे । कज लेकर खाने धौर तकाजे पर तकाजे सहने की अपेक्षा भृखों मर जाना अच्छा है। नीच लोगों से मांगकर थानन्द करने की अपेक्षा सरना लाख दर्जे पच्छा है। . ग्यारहवीं कहानी। अगर हिनजल ग्युरी अज दस्त खुशरूए । रह अज शीरीनी दस्ते तुर्शरूर ॥१॥ क शूरवीर पुरप तातारियोंके नाथ युद्ध रस्ता ए हुआ सम्वत जखमी हो गया। किनीने पाहा-- Read "फलां सौदागरके नोगदारू है। अगर तुम उससे मांगो तो शायद वह तुम्हें थोडीसी दे दे।' यह - दुरके आपसे मिठाई पाने में करे। मन तरसे न्द्रलर का करवा फार साना मा। १३ . १६४ गुलिस्ताँ। सौदागर अपनी कसीके लिए मशहर था। उस योद्धाने कहा, "अगर मै उससे नोशदारू मागू; तो मालूम नहीं वह देगा या न देगा। अगर वह दे भी दे; तोभी इस बातका सन्देह है कि वह आराम करे और न भी करे। ऐसे आदमी से मांगना हर तरह प्राण-घातक विष है।" किसी मनुष्य की खुशामद-वरामद करके जो चीज़ मांगी जाती हैं, उससे कायाको लाभ होता है; किन्तु आत्माको हानि पहुँचती है। अकूलमन्दो ने कहा है-"अगर अमृत नेकनामी के बदलेमे बिकता, तो बुद्धिमान् उसे हरगिज़ न ख़रीदते। मान-सहित मरना, अपमान-सहित जीनेसे अच्छा है। दुष्टके हाथ की मिठाई खानेकी अपेक्षा, सजन के हाथ से इन्द्रायण का फल खाना अच्छा है। शिक्षा-इस कहानीसे यह शिक्षा मिलती है, कि मनुष्य को अपनी आवश्यक्तायोके पूरी करनेके लिए लोगोंके सामने रिरियाना, गिड़गिड़ाना और अपना मान खोना अच्छा नहीं है। मान खोने और अपमानित होने से मरना बहुत अच्छा है । जिसके मनमें सन्तोष और सब है, उसका मान- मग कभी नही होता, किन्तु जो असन्तोषी है, उसे पदपद पर अपमानित और लान्छित होना पढ़ता है। , तीसरा अध्याय । १६५ बारहवीं कहानी। ॥ नानम अफजूदो आ वरूयम कास्त । वेनवाई वह अज मज़िल्लते ख्वास्त ॥१॥ क विद्वान् के सिरपर एक बड़े भारी कुटुम्बके भर- णपोपण का भार था , किन्तु उसकी रोजी थोड़ी थी। उसने एक बड़े आदमी के सामने, जो उसे चाहता था, अपना रोना रोया। बड़े आदमी को उसका रोना न भाया। उसने यह बात साहसी मनुष्य के अयोग्य समझी। जवकि तुम अपने भाग्यसे असन्तुष्ट हो तो अपने प्यारेसे प्यारे मित्रके पास न जाओ; अन्यथा तुम उसको प्रस- न्नता को शोकमे बदल दोगे। जव तुम किसी को अपने दुखकी कहानी सुनाओ; तब अपने चेहरेको प्रसन्न और सजीव रक्खो। हंसमुख आदमी अपनी कोशिशोंमे कभी नाकामयाब नहीं होता। कहते हैं, कि उस बड़े आदमोने उसकी रोजी तो अवश्य बढा दी , किन्तु उसका कर दिया। कुछ याद उसने उसके प्रेम की कमी देखफर कहा- मान कम १ समय यदि रोजी पानेसे इजत पटनी हो तो वसी रोग गरीदी भाता है।
१६६ गुलिस्तां । रहना "विपद् के समय का प्राप्त किया हुआ भोजन बुरा होता है; चूल्हेपर देगचो तो चढ़ी रहती है किन्तु प्रतिष्ठा घट जाती है। उसने मेरी रोजी बढ़ा दी, किन्तु इज्ज़त घटा दी। मांग- नेके अपमान सहनेकी अपेक्षा, जीविका-विहीन अच्छा है।" शिक्षा-इस कहानीका यह सारांश है, कि मनुप्य को भूखे मरकर भी मान-भग काना अच्छा नहीं है। बुद्धिमान् को चाहिये कि उपवास करसे, फिन्तु पेट भरने के लिए अपना मान न खोये । जो सन्तोपी है, घे अपना मान-भा नहीं कराते , किन्तु जिनके दिल में सन्तोप नहीं है वे अपमान सहकर भी पेटके लिए जने-जनेने सामने अपने दुःख का रोना रोते हैं। सन्तापी और मानी पुरुष एस फाके करने पर भी, असन्तोषी धौर अप- मान र माया-मलाई उढ़ानेवालेसे अच्छा है।
तीसरा अध्याय। १६७ तेरहवीं कहानी। -- ܟܝ ས अगर उसे ܢ PO १ स मबर हाजत वनज़दीके तुरशरूए । के अज खूये बदश फ़दा गदीं ॥१॥ क फ़कीर बहुत ही तगहाल था। किसीने कहा- ए "अमुक मनुष्य के पास अपार धन है। तुम्हारा हाल मालूम हो जाय तो वह तुम्हारी आवश्यकताएँ मिटानेमें विलम्ब न करे।" उसने कहा- "मैं तुम्हें ले चलूंगा।" पीछे उसने फकीरका हाथ पकड़ कर अमीरके घरका रास्ता दिखा दिया। फकीरने जाकर देखा, कि एक मनुष्य बैठा है, जिसका एक होठ लटक रहा है और उसका मिजाज वड़ा कड़ा है। फकीरने यह हाल देखकर, कुछ भी न कहा और उल्टे पैरों लौट आया। दूसरे आदमी ने फ़कोरसे पूछा कि आपने क्या किया ? फ़कीर ने जवाब दिया-"मैंने उसकी बखशिश उसकी शकल को वखश दी।” दुष्ट स्वभाववालेके सामने अभावोंका रोना न रोओ ; क्योंकि उसके बुरे स्वभावके कारण तुम्हें दुःखित होना पड़ेगा। अगर तुम अपने दिलका दुःख किसी मनुष्यके दुष्ट स्वभाववाले के सामने अपनी आवश्यकताओंको कहनेसे दुःखके सिवा तुम्हें और कुछ न मिलेगा। > १६८ गुलिस्तां । सामने कहो; तो ऐसे के सामने कहो कि जिसके प्रसन्न-मुख को देखने से तुम्हें निश्चय हो जाय कि वह अवश्य देगा। शिक्षा-इस कहानीसे यह नसीहत मिलती है, कि मनुष्य को किसीसे कुछ भी न मांगना चाहिए। यदि मांगनाही हो तो हंसमुख, शीलवान् और सजन पुरुप से मांगना चाहिए, जिसके पास याचना करनेसे याशा पूरी होने का भरोसा हो। दुप्ट-स्वभाव मनुष्य से मांगना अच्छा नहीं है। क्योंकि वह देता तो कुछ नहीं, उल्टा मान और लेलेता है। चौदहवीं कहानी। न खुरद शेर नाम खरदये सग। गर बसाती वीरद अन्दर गार ॥१॥ क माट दमकन्दिग्यिामें ऐसा सपा पटा, कि न्टोगों की हिम्मत एकदम छूट गयी। आकाश का DIREपृथिनी की बोरसे बन्द होगया और पृथिवी. निवामियों का हाकार आम्मान न पचा । यया पण. क्या र - TE: माग, पर या काना तीसरा अध्याय। १६६ पक्षी, क्या मछली और क्या कीड़ा-मकोड़ा, ऐसा कोई जान- दार पृथ्वी पर न रहा, जिसकी पुकार आस्मान तक न गयी हो। इस बातका आश्चर्य है, खलकतके दिलके धुएं से बादल न बन गया और आंखोंके आंसुओंसे मेह न बरसा । उसी साल एक हीजड़ा जिसका वयान करना सभ्यताके विरुद्ध है, विशेष कर बुजुर्गोंके सामने उसका जिक्र करना तमीज़दार आदमी का काम नही है ; लेकिन उसका ज़िक्र छोड़ देना भी अनु- चित है ; क्योंकि ऐसा करनेसे लोग समझेगे कि कहानी कहने वालेको हालही मालूम न था, अतः मैं अपनी बात को संक्षेप से कहूँगा। थोड़ीसी बातसे लोग बहुतसी वात का विचार कर लेते हैं। थोड़ीसी बाननी से गौन भरका हाल मालूम हो जाता है। अगर कोई तातारी उस हीजड़े को मार डालता तो कोई उस तातारीसे खूनका बदला लेने की इच्छा न करता। कब तक वह बग़दादके पुलके माफ़िक रहेगा, जिसके नीचे पानी बहता है और ऊपर आदमी चलते हैं? वह हीजड़ा, जिसका मैंने कुछ जिक्र किया हैं, उस समय बहुतही धनवान् था। वह निर्धनोंको सोना-चांदी बांटा करता और क्टोहियोंको भोजन कराया करता था। फकोरोंको मण्डलीने बहुतही तङ्ग होकर, उससे अतिथि होनेकी इच्छा की और मुझसे सलाह मांगी। मैंने उनका मन इस बात से फेर दिया और कहा-"शेर भूखके मारे एक
२००
गुलिस्ता।
.
६
मांदमेंही मर जाय लेकिन वह कुत्ते का जूटा हरगिज़ न
खायगा। इसलिए इस समय भूख की तकलीफ़ोंको बर्दाश्त
कर लो और किसी नीच कम्बख्तके पास जाकर भीख न
मांगो। यदि कोई अधर्मी आदमी धन-बल में फ़रीदूं की
बराबरी करे ; तोभी उसे तुच्छही समझना चाहिए। मूर्खके
ऊपर रेशमी छीट और वढ़िया सनिया कपड़ा दीवार पर
सुवर्ण और लाजवर्दके समान है।"
शिक्षा-इस कहानी का यह सारांश है, कि मनुष्यपर केसीही विपद
क्यों न पड़े , लेकिन वह सबको हाथ से न जाने दे। परले सिरेकी तगीमें
भी जिस-तिसके सामने हाथ प्रोटकर अपना मान न गवावे । सिह मांदमें
भूख से प्राण त्याग कर देना अच्छा समझता है, किन्तु कुत्ते का जूठा खाना
अच्छा नहीं समझता।
।
तीसरा अध्याय । २०१ पन्द्रहवीं कहानी। ----- हर के नान अज़ अमले खेश खुरद । मिन्नते हातमे ताई न बुरद ।। गोंने हातिमताईसे पूछा, कि आपने दुनिया में लो अपने से ज़ियादह उदार-हृदय मनुष्य कभी सुना MARPETER या देखा है। उसने जवाब दिया-"एक दिन, चालीस ऊँटोंका बलिदान करके, एक अरबी सरदारके साथ एक जङ्गल के किनारे गया। वहां मैंने एक मजदूरको देखा, जिसने लकड़ियो की एक भारी गठरी बाँध रक्खी थी। मैंने उससे कहा-"तुम हातिमके यहाँ क्यों नही जाते, जहाँ सैकड़ो आदमी भोजन पाया करते हैं ? उसने जवाब दिया- 'जो शख्स अपनी मेहनत की कमाई हुई रोटी खाता है, वह हातिमका एहसानमन्द होना कभी न चाहेगा। मैंने उस आदमी को अपनेसे अधिक उदार और ऊँचे दिलका समझा।" शिक्षा-इस कहानीसे यष्ठ शिक्षा मिलती है, कि मनुष्यको हमेशा अपने पसीनेकी कमाई हुई रोटी खानी चाहिये। जो लोग अपने परिश्रम और मेहनत-मजदूरी से कमाकर मोटी-झोंटी और रूखी-सूखी रोटी खाते हैं, जो आदमी महनतम कमाकर रोटो खाता है वह हातिमका एहसान- मन्द होना नहीं चाहता।
२०२ तोसरा अध्याय। वे सचमुच उच्च-हृदय हैं। जो लोग दूसरोंके सिर पड़ कर मावा, मलाई थोर "अन्यान्य पटरस व्यञ्जन उढ़ाते हैं, वे नीच-हृदय और कमीने हैं। सोलहवीं कहानी। Das गुरबये मिस्की अगर पर दाश्ते । तुम कंजश्कज़ जहाँ बरदाश्ते ॥१॥ गम्बर मूसाने एक ऐसा फ़क़ीर देखा जो वस्त्र- हीन होनेके कारण वालूमें छिपा हुआ था। फ़कीर ने कहा- ऐ मूसा! ईश्वर से प्रार्थना कर, कि वह मुझे जीविका दे: क्योंकि मैं मुसीबत से मरता मूसाने ईश्वर से प्रार्थना की और ईश्वरने उस फ़कीरको सहायता देनी स्वीकार की। कुछ दिन बाद मूसा ईश्वरोपासना करके लौटा, तब उसने . यदि बिल्ली के पर होते तो वह ससारमें चिड़ियोंका नाम भी न छोड़ती।
तीसरा अध्याय।
२०३
देखा कि वही फ़क़ीर गिरफ्तार हो गया है और उसकी
चारों ओर आदमियोंकी भीड़ जमा है। मूसाने उसका हाल
पूछा तो किसीने जवाब दिया,-"इसने शराव पीकर एक
मनुष्यको मार डाला है। अब लोग बदला लेंगे।" अगर
वेचारी बिल्लीके पल होते, तो वह संसारमें किसी भी विडिया-
का अण्डा न छोड़ती। अगर कोई नीच मनुष्य शक्तिसम्पन्न
हो जाय , तो वह गुस्ताख़ी करेगा और कमज़ोरोंके हाथ
भरोड़ेगा।
मूसा ने सृष्टिकर्ता की बुद्धिमानी स्वीकार की और अपनी
ढिठाईके लिए कुरान का निम्नलिखित पद पढ़कर माफी
मांगी-"अगर ईश्वर अपने सेवकों के लिए अपना भण्डार
खोल दे तो सचमुच वे लोग पृथ्वी पर हंगामा मचा दें।" ऐ
घमण्डी आदमी! तूने अपने तई वरवादीमें डालनेके लिए क्या
किया है ? अच्छा हुआ, कि चींटीमें उड़नेकी शक्ति न हुई !
जब मनुष्य ऊँचे दर्जे पर पहुँच जाता है और उसके पास
धन-दौलत हो जाती है, तब वह सिर पर धौल चलाता है-
क्या यह किसी ऋषिका वचन नहीं है ? चींटीके पड्स न हुए
यह अच्छा हुआ। हमारे स्वर्गीय पिता-ईश्वर-के पा
बहुतसा शहद है ; किन्तु उसका बेटा गमे मिज़ाज है। वह
जो तुम्हें धनवान नहीं बनाता, तुम्हारी अपेक्षा इस बातको
भली भांति जानता है, कि तुम्हारे हक में क्या अच्छा और
क्या बुरा है।
an
२०४ गुलिस्तां । .." शिक्षा - इस कहानी का यह सारांश है, कि ईश्वर अपनी सृष्टिमें जिसके लिए जो कुछ उचित समझता है, उसके लिए वही करता है। उसके कामोंमें नहीं होती। मनुष्य को दुःन-मुख, सम्पद-विपद् हर अवस्थामें प्रसन्न और सन्तुष्ट रहना चाहिए। ईश्वर गंजेको नाखून और चीटीको पल नहीं देता। भूल सत्रहवीं कहानी। Moleeta दर बियाबाने खुश्क व रेगे रवॉ । तिश्नारा दर दहा चे दुर चे सदफ ॥१॥ मर्द बे तोशा के उफ़ताद जे पाय । बर कमरवन्द ओ चे जर चे खिजफ ॥२॥ M ने देखा कि एक अरब बसरे के जौहरियों के बीच बैठा हुआ यह कह रहा था-'एक दफ़ा जङ्गलमें RECENS मैं रास्ता भूल गया। उस समय मेरे पास खाने- पीने का सामान भी चुक गया। मैंने अपने लिए जगत् से मैं झुलसते हुए गर्म रेतके मंदानमें प्यासे मुसाफिर के मुंहमें मोती या साणी व्यर्थ है । जब कि खाने-पीने की चीजों के बिना मनुष्य थक के गिर जाता है, उस समय उसके कमरवन्द में चाहे सोना हो या ठीकरी सभी बेकार है।
तीसरा यध्याय।
२०५
गया-गुज़रा समझ लिया ; किन्तु उसी समय सुझे एक मोति-
योंसे भरी हुई थैली पड़ी मिली। मैंने उसमें भुने हुए गेहूँ
समझ कर मनमें बड़ा आनन्द माना और जब उसे खोलकर
देखा तो
उसमें मोती निकले। उस समय में कैसा दुःखी
हुआ, यह बात में कमी न भूलूंगा।"
झुलसते हुए गर्म बालू के जंगल में, प्यासे सुसाफिर के
मुंह में मोती या सीपी व्यर्थ है। जवकि खाने-पीने सामान
से रहित मनुष्य थक जाता है; तप उसके कमरदन्द में चाहे
सोना हो चाहे ठीकरियाँ, सब व्यर्थ है।
शिक्षा-जिस समय जिस चोजकी जरूरत होती है, उस समय ससीसे
काम निकलता है उससे बड़ी-बड़ी कीमतवाली चौक ते नहीं।
२०४ गुलिस्तां। शिक्षा- इस कहानी का यह सारांश है, कि ईश्वर अपनी सृष्टिमें जिसके लिए जो कुछ उचित समझता है, उसके लिए वही करता है। उसके कामोमें भूल नहीं होती। मनुष्य को दुःख-मुख, सम्पद-विपद् हर अवस्थामें प्रसन्न और सन्तुष्ट रहना चाहिए। ईश्वर गजेको नाखून और चींटीको पड्ड नहीं देता। सत्रहवीं कहानी। ल दर बियाबाने खुश्क व रेगे रवॉ। तिश्नारा दर दहाँ चे दुर चे सदफ ॥१॥ मर्द वे तोशा के उफ़ताद जे पाय । वर कमरवन्द ओ चे जर चे खिजफ ॥२॥ ने देखा कि एक अरब बसरे के जौहरियों के बीच बैठा हुआ यह कह रहा था--"एक दफा जङ्गलमे मैं रास्ता भूल गया। उस समय मेरे पास खाने. पीने का सामान भी चुक गया। मैंने अपने लिए जगत् से मैं झुलसते हुए गर्म रेतके मैदानमे प्यासे मुसाफिर के मुंहमें मोती या सणि व्यर्थ है। जव कि खाने-पीने की चीजों के बिना मनुष्य थक के गिर जाता है, उस समय उसके कमरवन्द में चाहे सोना हो या ठीकरी सभी मेकार है।
तीसरा अध्याय।
२०५
गया-गुज़रा समझ लिया ; किन्तु उसी समय मुझे एक मोति-
योंसे भरी हुई थैली पड़ी मिली। मैंने उसमें भुने हुए गेहूँ
समझ कर मनमें बड़ा आनन्द माना और जब उसे खोलकर
देखा तो उसमें मोती निकले। उस समय मैं कैसा दुःखी
हुआ, यह बात मैं कभी न भूलूंगा।"
झुलसते हुए गर्म बालू के जंगल में, प्यासे सुसाफिर के
मुंह में मोती या सीपी व्यर्थ है। जबकि खाने-पीने के सामान
से रहित मनुष्य थक जाता है, तब उसके कमरचन्द में वाहे
सोना हो चाहे ठीकरियां, सव व्यर्थ है।
शिक्षा-जिस समय जिस चीजकी जरूरत होती है, उस समय मसीसे
काम निकलता है-उससे बड़ी-चढ़ी कीमतवाली शेज से नहीं।
२०६ गुलिस्तां। अठारहवीं कहानी। दर बियावॉ फकीर सोख्ता रा। शलगमे पुख्ता वह के नुकरये खाम् ॥१॥ S05 क अरव एक जङ्गल में प्यास से दुःखी होकर कह रहा था-"मैं चाहता हूँ, कि मृत्युसे पहले मेरी यह आकांक्षा पूरी होवे, नदी की लहरे मेरे घुटनों से टक्कर मारे और मैं अपने मशकको पानी से ए भरलू।" इसी तरह एक बड़े जङ्गल मे एक पथिक अपनी राह भूल गया था। उसमें न तो बल था और न कुछ खाने-पीने का सामानही उसके पास था। केवल चन्द दिरम उसके कमर-वन्दमें बच रहे थे। वह बहुत दिनोतक जङ्गल में भट- कता फिरा; लेकिन उसे रास्ता न मिला। अन्तमें, वह खाने- पीने बिना मरगया। कुछ मनुष्य वहाँ जा पहुचे। उन्होने देखा कि दिरम उसके सामने पड़े हैं और ज़मीनपर यह शब्द लिखे हुए हैं—“ यदि आहार-विहीन मनुष्य के पास सोना हो तो वह उसके कुछ काम नहीं आता। रेतीले जङ्गल में, सूर्य रेतीले जगल में भूखे फकीर के लिए कच्ची चादी या उबला हुआ शल- जम-दोनों में-कौन प्रिय-हितकर है ?
तीसरा अध्याय। २०७ से तपते हुए बेचारे हतभागे मनुष्य को, उवाला हुआ एक शलजम शुद्ध चांदी से कही ज़ियादह कीमती है।" शिक्षा-उपरोक्त दोनों कहानियों का सारांश है, कि निसे जिस वस्तुकी श्रावश्यकता होती है, उसे वही चीज़ मिलनेसे सन्तोष होता है। प्यासे की पानी और भूखे को भाजनसे ही तृप्ति होती है । भूखे मनुष्य की भूख-प्यास धन द्व्यसे नहीं दवती। । उन्नीसवीं कहानी। HD मुर्गे बिरियाँ बचश्म मर्दुम सेर । कमतरज़ बर्ग तरी बरख्वानस्त ॥१॥ वॉ केरा दस्तगाहो कुदरत नेस्त । शलगमे पुरुता मुर्ग विरियानस्त ॥२॥ ने भाग्य के उलट-फेरो और ईश्वर की व्यवस्थाकी एक वार के सिवा कभी शिकायत नहीं की। एक के बार, मेरे पैरोंमें जूते नही थे और जूते ख़रीदनेको दाम भी मेरे पास नही थे ; उसी समय मैंने बड़वड़ाहट की थी। मैं दुःखित हृदय से कृफा की मसजिद में दाखिल हुआ । पेट भरे हुए आदमी को भुना हुआ मुर्ग साग-पात से भी कम अच्छा लगता है किन्तु जो दीनं है अतएव भूखे हैं, उनके लिए उबला हुआ शल- जम भी भुने हुए मुर्ग के वरावर है ।
२०८
गुलिस्ताँ।
वहाँ मैंने एक ऐसा आदमी देखा, जिसके पांचही न थे। मैंने
ईश्वरकी कृपाके लिए उसकी स्तुति की और धन्यवाद दिया
एवं जूतो के अभाव को सन्तोष से सहन कर लिया। पेट
सरे हुए मनुष्यकी निगाहसे भुना हुआ मुर्ग सागपात से भी
कम जचता है, लेकिन जिसे भोजन नहीं मिला है, उसे भुना
हुआ शलजम भी भुने हुए मुर्ग के समान मालूम होता है।
शिक्षा-मनुष्य को चाहिए कि
को चाहिए कि वह जिम अवस्था में हो, उसी में
खश रहे। अपने तई दुःखी देखकर अथवा अपने प्रभावोंको देखकर मनमें
दुःखी न हो। ससारमें एकसे एक बढ़ कर दुखिया पड़े हैं ; उनकी तरफ नज़र
डालनेसे यही मालूम होता है, कि हम उनसे अच्छी हालत में हैं। ईश्वरने
जिसके लिए जो कुछ दे रखा है या जिसे जिम हालतमें रख छोड़ा है, उसके
लिये वही सबसे उत्तम है। तात्पर्य यह है,
कि
मनुष्य
जिस अवस्थामें हो,
उसी में सन्तुष्ट रहे और ईश्वरको उसकी दयाके लिये धन्यवाद देता रहे
मनका दुःख दबाने के लिये सन्तोषसे पढ़कर थोर उपाय नहीं । इष्टों के
शान्त करने के लिये सन्तोष ही शव्यर्थ महौषध है।
.
1
तीसरा अध्याय । २०६ ए बीसवीं कहानी। --- जेकद्र शौकते सुलतॉ नगश्त चीजे कम । अज़ इल्तफ़ात बमेहमॉसराय देहकाने ॥१॥ कुलाह गोशये देहका बाफ्ताब रसीद । के साया बरसरश अन्दारूत चूँ तो सुलताने ॥२॥ क बादशाह जाड़ेके मौसम में अपने कुछ अमीर- उमरा के साथ शिकार खेलने गया। शिकार में, उसे एक ऐसे स्थान पर रात हो गयी जो नगर से बहुत दूर था। एक किसान की झोंपड़ी देखकर वादशाहने कहा-"चलो आज रात को वहीं चल रहे, जिसमे सर्दी से दुःख न पाना पड़े।" एक दरबारी ने जवाब दिया- "बादशाहको एक नीच किसानकी झोंपड़ी में आश्रय लेना अनुचित है। हम लोग इसी स्थान पर तम्बू तान लेंगे और आग सुलगा लेंगे।" उस किसान को जव यह हाल मालूम हुआ; तव वह यथासामर्थ्य भोजन बनाकर वादशाह के पास ले गया। भोजन बादशाह के सामने रख दिया और पृथ्वी चूमकर बोला- "सुलतान के उच्च पदमें इस शिष्टता से कोई कमी न होगी; किसान के यहां भोजन कर लेने से राजा की पदवी या शोना नहीं घटती, किन्तु दीन किसान की टोपीका कोना सूर्य तक पहुंच जाता है। क्योंकि उस पर बादशाह की छाया दो गई। १५
२१०
गुलिस्ताँ।
लेकिन ये सज्जन किसान की नीची अवस्था को ऊँची होने
देना नही चाहते।" बादशाहको किसान की बात अच्छी
लगी और उसने वह रात किसानके झोपड़े में ही विताई ।
सबेरे बादशाह ने किसानको कपड़े और रुपये दिये।
मैने सुना, कि वह वादशाह की रकाव के साथ-साथ कुछ
कुछ कदमो तक गया और बोला- आपने जो इस किसान की
छतके नीचे भोजन करने की शिष्टता दिखाई, उससे आपकी
पदवी और शोभा तो न घटी; किन्तु इस दीन किसान की
टोपी का कोना सूर्यातक ऊंचा होगया , क्योकि उसके सिर
पर आप जैसे बादशाहकी छाया पड़ी।
शिक्षा-बड़ों को चाहिए, कि अपनेसे नीचे दर्जे के लोगोंको नीची
नज़र से न देखे । छोटों को मान देने और उन्हें ऊंचा करनेसे बड़े छोटे नहीं
होजाते ; किन्तु उनका बड़प्पन और भी बढ़ जाता है।
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तीसरा अध्याय। इक्कीसवीं कहानी। काल बलताफ़त चौ वरनयायद कार । सर बह बेहुरमती कशद नाचार ॥१॥ हर के बर खेस्तन नवख्शायद । गर न बख्शद वरो कसे शायद ॥ २ ॥ ग एक कहानी कहा करते हैं, कि किसी भयंकर लो- योगीके पास बहुतसा धन था। किसी बादशाह ने उससे कहा-"मालूम होता है कि आप बडे धनी हैं। चूंकि मुझे इस समय रुपयों की सख़ त जरूरत है, इस लिये अगर आप अपने धनमें से थोड़ा भी मुझे कर्ज देकर मेरी सहायता करें, तो जब ख़ज़ानेमें खू व रुपया होजायगा तव मै सब रुपया आपको चुका दूंगा।" योगीने कहा, "मैं भिक्षुक हूँ। मैंने एक-एक दाना जमा करके रुपया इकट्ठा किया है। आप जैसे पृथ्वीपतिको मुझसे रुपया लेना शोभा नही देता।" वादशाह बोला,-"आप इस बात का दुख न कीजिए। मैं आपका धन तातारियो को दे डालूंगा। वित्र वस्तुएँ अपवित्र लोगोकेही योग्य होती है। लोग कहते जब सज्जनता से काम नहीं चलता तव मजबूरन सखती से काम लेना पढ़ता है। यदि राजी से कोई नहीं देता है, सब राजालोग उस से जबर्दस्ती ले लेते है। अप-
२१२
गुलिस्तां।
है, कि गोबर से दीवार साफ़ नहीं होती। मैं कहता हूँ,
मुझे गोबर मैले छेदों के बन्द करनेके लिए चाहिये। अगर
किसी ईसाईके कुएँ का जल अपवित्र हो और उससे एक
यहूदी की लाश धोई जाय तो क्या होगा?"
मैंने सुना कि उस योगीने बादशाही हुकुम का अनादर
किया और तर्क-वितर्क एवं धृष्टता की; अतः बादशाह ने
हुक्म दिया कि इसका माल इससे ज़बरदस्ती छीन लिया
जव कोई काम मिठाईसे नहीं निकलता तब कड़ा-
ईसेही काम लिया जाता है। यदि कोई राज़ी से न दे, तो
उससे ज़ोरसे ले लेनाही उचित है।
शिक्षा-इस कहानी का यह सारांश है, कि अगर वह योगी थोडासा
सब करके अपने धनमें से कुछ हिस्लादे देता, तो उसका सारा माल-मता
ज़ोरसे न छीना जाता। सन्तोपरहित होने के कारण उसे सबसे हाथ धोना
जाय।
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पड़ा।
तीसरा अध्याय। २१३ बाईसवीं कहानी। ܠܐ p3 गुफ्त चश्मे तंगे दुनियादार रा। या कनात पुर कुनद या खाके गोर ॥१॥ SANA ने एक सौदागर को देखा, जिसके पास सौदा- मैं गरी मालसे लदे हुए डेढ़ सौ ऊंट, पचास गुलाम बनाया और नौकर-चाकर थे । एक रातको, कीश द्वीपमें, उसने मुझे अपने कमरेमें भोज दिया। रात-भर उसकी वेव- कूफी की बातें चलती रहीं। वह कहता था-"तुरकिस्तान में मेरा अमुक माल है और हिन्दुस्तान मे फलां असवाव है। यह फलां जमीन का किवाला है। यह अमुक दस्तावेज़ है। अमुक उसमें जामिन है।" कभी यों कहता,-"सिकन्दरिये की जल-वायु सुखद है , अतः मेरा वहाँ जानेका इरादा है।" कभी कहता,-"नहीं, मैं वहाँ न जाऊँगा, क्यांकि भूमध्य- सागर बड़ा प्रचण्ड है। ऐसादी! मैंने एक और सफ़र का विवार किया है। जब वह पूरा हो जायगा तव में वाणिज्य को छोडकर शेष जीवन एकान्त में बिताऊँगा। मैंने सुना है, कि चीनसे गन्धक की दर ऊंची हैं; अतएव में वहाँ गन्धक ले जाऊँगा। वहां से वोनो मिट्टी के बरतन यूनान है an सासारिक भादनी की तंग नजर या तो सन्तोषमेही भरती है या का की मिदासेदी।
२१४
गुलिस्ताँ।
---
मैं
व्या-
को चालान करूँगा। यूनान से ज़रोके कपड़े हिन्दुस्तान
भेजूंगा। अलप्पो के कांच के वरतन यमन भेजूंगा और वहां
से धारीदार कपड़ा लेकर ईरान जाऊँगा। उसके बाद
पार छोड़कर अपनी दुकानमेही बैठा रहूंगा।" उसने ये मूर्खता
की बातें यहांतक कहीं, कि अन्तमे जब कुछ कहने को न
रह गया तव थककर बोला--"ऐ सादी! तुमने भी जो कुछ
देखा सुना हो, उसे कहो।” मैंने जवाब दिया-"क्या तुमने
नहीं सुना है, कि एक समय एक सर्दार गोरके रेतीले जङ्गल
मे
सफर करता हुआ अपने ऊँटसे नीचे गिर पड़ा? उसने
कहा कि दुनियावी आदमी की ललचीली आँखें या तो
सन्तोष से सन्तुष्ट होती हैं या क़ब्र की मिट्टी से सन्तुष्ट
होती हैं।"
शिक्षा-मनुष्य को चाहिए, कि दुनिया-भरके मन्सूबे न बांधे,
तृष्णा को त्यागे और सदा सन्तोष रखे। जो दुनियाभरके मनुसूये बाँधते
है, रात-दिन असन्तोष के जाल में फंसे रहते हैं, उनका जीवन वृथा खराब
होता है। अन्तमें मरने पर तो सन्तोष करनाही पढ़ता है।
तीसरा अध्याय ।
२१५
तेईसवीं कहानी।
मैं
दस्ते तजरों चे सुद बन्दये महताजरा ।
वक्ते दोश्रा वर खुदा वक्ते करम दर बगल ||१||
ने सुना, कि एक अमीर अपनी कजूसी के लिए
उसी तरह मशहर था, जिस तरह हातिम अपनी
MINS सखावतके लिये। उसकी बाहरी सूरत पर धनका
रूप छिटका पड़ता था , किन्तु उसके स्वभावमें ऐसी नीचता
समा गई थो, कि वह किसी को एक रोटी भी न देता
था। वह पैग़म्बर अबूहरेरा की दिल्ली को भी एक टुकड़ा
न देता और असहावे कहफ के कुत्तेको भी एक हड्डी तक न
डालता। किसी ने भी उसके द्वार को
खुला
को विछा न देखा। कोई फ़क़ोर सुगन्धि के सिवा उसके खाने-
पीने के सामानों की बात भी न जानता था और किसी पक्षी ने
उसके दस्तरख्वान से गिरा हुआ दाना न चुगा था।
मैंने सुना, कि वह अपने तई फरऊन समझता हुआ, बड़े
गर्व के साथ, जहाज़ पर चढ़कर, भूमध्य-लागर होकर, मिश्र
देश को जा रहा था। अकस्मात् प्रतिकूल वायु ने झोंका
मारा। उत्तरीय वायु तो जहाजोंके अनुहाल होतीही नहीं।
और दस्तरख्वान
लोहाय प्रार्थना के ममय ईशर की भोर उठाये जाते हैं और किनी की
सापता के समय पाल में छिपा लिये जाते हैं. किस फान के
६
,
२१६
गुलिस्ता।
उसने अपने हाथ-पैर उठाये और वृथा चिल्लाया। ईश्वर ने कहा
है-"जब जहाज़के ऊपर चढ़ो तब ईश्वर की प्रार्थना करो।
जो हाथ प्रार्थनाके समय फैले रहते हैं और जब किसी अनु-
ग्रह की आवश्यकता होती है, तब बग़लों में दबा लिये जाते हैं,
उन हाथों को ज़रूरत के समय ऊँचे उठाकर रोने-पीटने से क्या
लाभ होगा ?" दूसरोंको सोना-चांदी देकर सुखी करो और
उससे तुम आप भी लाभ उठाओ। यह समझलो, कि यदि
तुम इस इमारतमें सोने और चांदी के ईटे लगाओगे; तो
वह चिरकाल तक ठहरी रहेगी।
कहते हैं, कि मिश्र में उसके आत्मीयस्वजन अति दद्धि
अवस्था मे थे । वे लोग उसके बचे हुए धन से धनवान् होगये ।
उसके मरजाने पर, उन लोगो ने पुराने कपड़े फाड़ फेंके और
रेशम तथा कमख़ाव के कपड़े बनवाये। मैंने देखा, कि उनमें
से एक आदमी खूब तेज़ घोड़े पर सवार था और एक देव-दूत
के
समान सुन्दर पुरुष उसके पीछे दौड़ रहा था। मैंने कहा
''अफ़सोस ! अगर वह मृतक पुरुष अपने जातिवालों और
आत्मीयों में लौट आता
तो उसके उत्तराधिकारियो को उस
की सम्पत्ति वापिस देने में उसके मरने के दुःख से भी अधिक
उस मनुष्य से पहले मेरी मित्रता थी। इसी से
मैंने उसकी आस्तीन खीचकर कहा-ऐ प्रसन्नमुख भले
आदमी ! जिस धनको भूतपूर्व अधिकारी ने वृथा जमा किया
था, उसे तू भोग।"
..
दु.ख होता।
तीसरा अध्याय। २१७ शिक्षा-जो धन द्वारा न भोग भोगते हैं न दूसरों की ज़रूरतें पूरी करते हैं, उनके धन का नाश हो जाता है और दूसरे भादमी उनके जमा किये धन को बड़ी वेदर्दीसे खर्च करते हैं। चौबीसवीं कहानी एक सय्याद न हर बार शिकारे ववरद । वाशद के यके रोज़ पिलगश वदरद ॥१॥ क ज़ोरावर मछलो किसी कमज़ोर मछुए के जाल ए में फंस गई। मछुआ उसे थाम न सका। मछली - उसके हाथ से जाल खींचकर भाग गई। लडका नदी से जाल लाने गया। पानी की बाढ़ आई और उसे वहा लेगई। अब तक जाल सदा मछलियोंको फँसाता था; किन्तु इस बार मछली भाग गयी और जाल को ले गयी। दूसरे मनुए को उसकी हानि पर दुख हुआ। उसने उसे बुरी- भली बातें सुनाई और कहा कि ऐसी मछली जाल में फंसी पाकर त उसे थाम न सका! उसने जवाब दिया-"अफसोस ! शिकारी सदा शिकार को ले जाता हो यर वात नहीं-कभी शिकार भी शिकारी को पार गरता है। Prernmove २१८ गुलिस्तां। भाई, मैं क्या कर सकता था ? मेरा दिन खराव था और मछली की उम्रका एक दिन बाको था। भाग्य विना मछुआ दजला नदी मे मछली नहीं पकड़ता और विना समय आये मछली सूखी ज़मीन पर नही मरती। शिक्षा—इस कहानी का यही सारांश है, कि बिना भाग्य रोजी नहीं मिलती और बिना समय श्राये कोई नहीं मरता । पच्चीसवीं कहानी। चौ प्रायद जपै दुश्मने जासितॉ । ब बन्दद अजल पाये मर्दै दवा ॥१॥ दरान्दम के दुश्मन पयापय रसद । कमाने कयानी न बायद कशीद ॥२॥ क बे-हाथ-पांव वाले ने हज़ार पाँव वाले को मार डाला । एक महात्मा उधर से निकला। उसने यह हाल देखकर कहा-'हे ईश्वर ! इस कनखजूरे के हजार पाँव थे; लेकिन जब मृत्यु आ पहुची, तब वह बे-हाथ- जब मौत का समय आजाता है, तब तेज भागने वाले के पैरों को गी मृत्यु वाध देती है। जब दुश्मन आ दबाता है, तब कयानी की कमान भी नहीं खिचती। ए तोसरा अध्याय। २१६ ; पांववाले से भी न वव सका। जब जान का दुश्मन आ पहुँचता है ; तब तेज़ भागनेवाले के पैरों को भी मृत्यु बांध देती है। जव दुश्मन पीठपर आ :पहुँचता है , तब कियानी ( अरब की प्रसिद्ध कमान ) भी नहीं खिंचती । शिक्षा-इस कहानी का सारांश यह है, कि काल आ जाने पर महा बनवान् जीव भी जरा से कारण से मरजाता है। समय पूरा होजाने पर कोई बच नहीं सकता। छब्बीसवीं कहानी। ETD 17 शरीफ गर मुतजोफ शवद ख्याल मवन्द । के पायगाह बुलन्दश जईफ बाहद शुद ॥१॥ ने एक मोटा-ताज़ा अहमक देखा। वह बढिया कपडे पहने और मिश्री सनिया कपडे का साफा के सिर पर चाँधे ओर अरची घोडे पर सवार था। किसी ने पहा-'ऐ लादी! इस नृप जानवर के शरीर पर "A । ' रसादानी सापनी ददि बालचमन फस र तिहारको उसकी रदीपोवन न मनना चाहि ।
२१८ गुलिस्ता। भाई, मैं क्या कर सकता था ? मेरा दिन ख़राव था और मछली की उम्रका एक दिन बाकी था। भाग्य विना मछुआ दजला नदी मे मछली नहीं पकड़ता और विना समय आये मछली सूखी ज़मीन पर नही मरती। शिक्षा—इस कहानी का यही सारांश है, कि बिना भाग्य रोजी नहीं मिलती और विना समय पाये कोई नहीं मरता । पच्चीसवीं कहानी। चौ अायद ज़पै दुश्मने जांसितॉ । ब बन्दद अजल पाये मर्दै दवा ॥१॥ दरान्दम के दुश्मन पयापय रसद । कमाने कयानी न बायद कशीद ॥२॥ Pos क बे-हाथ-पांव वाले ने हज़ार पाँव वाले को मार डाला । एक महात्मा उधर से निकला। उसने यह Luxei हाल देखकर कहा- हे ईश्वर ! इस कनखजूरे के हज़ार पाँव थे; लेकिन जब मृत्यु आ पहुची, तब वह बे-हाथ- जब मौत का समय आजाता है, तब तेज भागने वाले के पैरों को भी मृत्यु वाध देती है। जब दुश्मन आ दवाता है, तब कयानी की कमान भी नहीं खिचती।
तोसरा अध्याय। २१६ जव पांववाले से भी न बच सका। जान का दुश्मन आ पहुँचता है, तब तेज भागनेवाले के पैरों को भी मृत्यु बांध देती है। जव दुश्मन पीठपर आ :पहुँचता है तब कियानी (अरव की प्रसिद्ध कमान ) भी नहीं खिंचती। शिक्षा-इस कहानी का सारांश यह है, कि काल था जाने पर महा बसवान जीव भी जरा से कारण से मरजाता है। समय पूरा होजाने पर कोई बच नहीं सकता। छब्बीसवीं कहानी। शरीफ गर मुतजोफ शवद ख्याल मवन्द । के पायगाह वुलन्दश जईफ रजाहद शुद ॥१॥ एक मोटा-ताजा अहमक देखा। वह बढ़िया फपटे पहने और मिश्री सनिया कपडे का लाफा मन्स सिर पर बांधे ओर अग्बी घोडे पर सवार था। किसी ने परा-ऐसाठी ! इस नृप जानवर के शरीर पर - दामादमी ददिर में पंसबर टरिगद वादोन मनना चाहिए। 41411 -NAw
२२०
गुलिस्ताँ।
ऐसी सुन्दर पोशाक आपकी नज़र मे कैसी लगती है ?"
मैंने कहा-"यह सोने के पानी से लिखे हुए दूपितलेख के
समान मालूम होती है। सच पूछो तो यह मनुष्योंमे भेड़िये
की
सूरत
और
आवाज़ वाला गधा है।"
यह जानवर अपनी पोशाक; पगड़ो और बाहरी सूरत एवं
अपने माल, जायदाद तथा शारीरिक वल के सिवा और वातों
में मनुष्यके समान नहीं है। अगर कोई भद्रवंशज मनुष्य
दरिद्र हो जाय तो यह न समझना चाहिये कि उसकी पदवी
घटगई है ; किन्तु यदि कोई यहूदी चांदी की चौखटमें सोने
की मेखें ठोके ; तोभी उसे भद्र न समझना चाहिये।
शिक्षा-उच्चवश्वज मनुष्य यदि निर्धन हो जावे तोभी उसकी भद्रता
चली नहीं जाती और जो नीचकुल का भादमी धनी हो जावे तो वह
उच्चवंशज नहीं हो जाता।
ar
CS
तोसरा अध्याय । २२१ सत्ताईसवीं कहानी। दस्ते दराज़ अज पये यक हब्बा सीम । वह के ववुर्रन्द वदानगी दवेमा ॥१॥ क चोर ने किसी फ़कीर से कहा-"क्या तुम्हें चांदी एके दाने के लिये हरेक कम्बख्त का स के सामने Sax हाथ पसारने में लाज नही आती ?” फ़कीर ने जवाब दिया-'डेढ़ दमड़ी चुराकर हाथ कटाने की निस्चत रत्ती भर चांदी के लिये हाथ पसारना अच्छा है।" टेद रत्ती चॉदी चुरा कर दाध कटाने का निरवत रत्तीभर चांदी के लिए हाथ पसारना अच्छा है। ++ 4 २२२ गुलिस्ताँ। अठाईसवीं कहानी। हुनरवर चो बख़्तश न बाशद बकाम । बजाये रवद कश नदानन्द नाम ॥१॥ हते हैं, कि एक पहलवान दुर्दैव के कारण अत्यन्त क दरिद्र हो गया था। वह जीविका-विहीन और भूख से दुखी होकर अपने बाप के पास जाकर रोने लगा। उसने कहा-"पिता! यदि आज्ञा हो, तो मै सफर करने जाऊँ । देखू, शायद अपनी भुजाओं के बलसे अपनी वासनाएँ पूरी कर सकूँ। गुण और हुनर जब तक दिखाये नहीं जाते, तब तक उनको कदर नही होती। अगर को लोग आग पर रखते हैं और कस्तूरी को मलते हैं।" बाप ने कहा- "बेटा! इन कठिन विचारों को अपने सिर से निकाल दो। सब के पाँव को सलामतो के दामन मे खीच लो । अक्लमन्दोंने कहा है-शारीरिक चेष्टाओं से धन नहीं मिलता। अपने अभावों के दूर करने का इलाज अपनी वासनाओं-इच्छाओ को घटा देना है। कोई भी धन का पल्ला ज़ोर से नहीं पकड जब भाग्य अनुकूल नहीं होता, तव हुनरमन्द जहां जाता है, उसे कोई पूछता-या वह जातादो ऐसी जगह है, जहां उसका कोई नाम तक नदी नदीनना।
तीसरा अध्याय। २२३ अगर ६ ६ सकता। अन्धेकी आँखोंमें दवा लगाना बेफ़ायदा है। तुम्हारे सिरके हरेक वालमें दो-दो सौ हुनर हों, तो वे भी चुरा नसीब होनेसे कुछ काम न आयेगे। भाग्य-हीन पहल- वान क्या कर सकता है? क्योंकि भाग्यकी बांह बलकी वाहसे अच्छी है।" पुत्रने कहा-~-पिता! सफ़र करनेमे कितनेही फायदे हैं। सफ़र करनेसे दिल राज़ी होता है ; लाभ- दायक वस्तुएँ मिलती हैं, अद्भुत-अद्भुत चीजें देखने में आती हैं, अपूर्व-अपूर्व बातें सुनने में आती हैं; नये-नये नगर देखने में आते हैं , तरह-तरह के मनुष्योंसे बात-चीत होती है। मान की प्राप्ति होती है देश-देश की रोति-रवाज मालूम होती है ; धन मिलता है ; जीविका-उपार्जन का मार्ग हाथ आता है , हार्दिक सम्बन्ध जुड़ता है और संसार का अनुभव होता है। महात्माओं ने कहा है-ऐ मूर्ख! जबतक तू, अपनी दूकान और अपने घर को न छोड़ेगा, तबतक तू हर- गिज आदमी न होगा। जा, इस दुनिया को त्यागने से पहले इसकी सैर करले।" वापने कहा- वेटा । जो तुम कहते हो, वह ठीक है निस्सन्देह, सफर करनेसे बहुत लाभ हैं; लेकिन वह लाभ विशेष करके वार श्रेणीके लोगोंके लिये होते हैं।" प्रथम तो वह व्यापारी सफ़र से फ़ायदे उठा सकता है, जिसके पास धन दौलत, सुन्दर-सुन्दर गुलाम और लौंड़ियाँ तथा कामकाजी नौकर चाकर हो । वह हर रोज़ एक शहर- २२४ गुलिस्तां। में और हर रात एक मुकाममे गुजार सकता है और क्षण- क्षणमें वित्त-विनोदकारी स्थानोंमें चित्त-विनोद कर सकता है। बड़ा आदमी चाहे पहाड़ पर जाय, चाहे वयावा जङ्गल में जाय, कहीं अजनवी नहीं है। वह जहाँ जाता है, वहीं तम्बू गाड़कर अपना वास-स्थान बना लेता हैं लेकिन जिसके पास जीवनके सुख का सामान नहीं हैं और अपने निर्वाह करने का भी वसीला नहीं है, वह अजनबी है। उसकी जन्म-भूमिके लोग भी उसे नहीं जानते। "दूसरे, विद्वान् को सफ़रसे लाभ होते हैं। वह अपने मीठे वचनों, अपूर्व वाशक्ति और ज्ञानभाण्डारके कारण जहाँ जाता है, वहीं उसका आदर-मान और स्वागत होता ज्ञानी मनुष्य शुद्ध सुवर्ण के समान है ; वह जहाँ जाता है, वही लोग उसके प्रभाव और गुण को जान जाते हैं। धनवान् पुरुष का मूर्ख लड़का चमड़े की थैलीके समान है, जो किसी निर्दिष्ट नगर से रुपया लाने और लेजानेके काममें आती है ; परन्तु विदेश में उसे कोई मुफ़्त भी नहीं पूछता । "तीसरे, खूबसूरत आदमी को सफरसे लाभ होते हैं; क्योंकि भले आदमियों का दिल उसपर आया रहता है। वे उसकी सङ्गति की बड़ी कदर करते हैं और उसकी सेवा करने में अपना मान समझते हैं। कहावत चली आती है-'तनिक सी सुन्दरता विपुल धनसे श्रेष्ठ है। सुन्दर मनुष्य घायल के लिये मरहम है और तालेसे बन्द दरवाजे के लिये चावी तोसरा अध्याय। २२५ है । खूबसूरत आदमी जहाँ जाता है, वहीं उसका आदर- मान होने लगता है।" "चौथे, मीठा-गानेवाला-जो अपने गलेसे दाऊदकी तरह वहते हुए पानी की चाल बन्द कर देता है, उड़ती हुई चिड़िया का उड़ना बन्द कर देता है, अपने हुनर के बल से मनुष्योंके हृदयको अपने वशमें कर लेता है-सफ़र से फ़ायदा उठाता है। धर्मात्मा लोग ऐसे आदमी की संगति की इच्छा रखते हैं। सुन्दर रूपसे मीठी आवाज़ अच्छी होती है, क्योंकि रूपसे तो खाली इन्द्रियोंकोही सुख होता है; किन्तु मीठी आवाज़से तो प्राणोंमे सजीवता आ जाती है।" "पांचवें, कारीगर सफ़रसे फ़ायदा उठाता है ; क्योकि वह अपनी मेहनत से अपनी जीविका उपार्जन कर लेता है । अक्लमन्दोंने कहा है -'अगर कोई कारीगर अपना देश छोड़- कर परदेशमें जाय तो उसे किसी तरह की तकलीफ़ न होगी किन्तु यदि नीमरज़ का बादशाह अपने राज्य से बाहर जाय तो उसे भूखा सोना पड़ेगा।' मैंने जो वातें ऊपर कही हैं वे. ही सफर में दिल बहलानेवाली और आराम देनेवाली हैं। जिनमें वे बातें नहीं हैं, वे लोग दुनिया में व्यर्थ की आशाएँ करते हैं। ऐसोंका न तो कोई नामही लेता है और न कोई उनका चिन्हही देखता है। जिस कबूतर को अपना घोंसला देखना बदा नहीं होता हैं, कज़ा उसे दाने और जालके पास पहुँचा देती है।" १५ . -
२२६
गुलिस्ता।
ar
n
पुत्रने कहा-'हे पिता! मैं ऋषियोकी एक और कहा-
वत का विरोध किस तरह कर सकता हूँ। वह कहावत यह
है-'जीवन की आवश्यक चीजें सबको दी जाती हैं, किन्तु
उनके प्राप्त करनेके लिये उद्योग की आवश्यकता होती है।
चाहे हमारे भाग्यमें विपत्तिही बदी हो; तो भी हमे उस
मार्ग से बचना चाहिए जिसमे होकर वह अन्दर प्रवेश करती
है। हमे इस बात का निश्चय है, कि हमारा दैनिक भोजन
अवश्य मिलेगा; तथापि उसे घरसे बाहर जाकर तलाश कर
लाना हमारा कर्त्तव्य है । यद्यपि मृत्यु-समय आये बिना
कोई मर सही सकता तथापि अजगरके मुंहमें जाना उचित
नही है।' इस वक्त मे क्रोधोन्मत्त हाथीका सामना करनेकी
शक्ति रखता हूँ और भयङ्कर सिंहले लड़ाई कर सकता हूँ।
इन बातोके सिवा मेरा सफ़र करनेका इरादा इस मतलब
है, कि मुझसे अब दरिद्रता भोगी नहीं जाती। जब मनुष्य
अपने मान और पदसे हीन हो जाता है, तब उसे किसीसे
वास्ता नहीं रहता। वह जगत्का नागरिक हो जाता है।
धनवान् रात होनेपर अपने महलमे चला जाता है। फ़कीर
को जिस जगह रात हो जाती है, वही जगह उसकी सराय
हो जाती है।" यह कहकर उसने पिता से आज्ञा और आशी-
र्वाद लेकर प्रस्थान कर दिया। चलने के वक्त लोगोंने उसे यह
कहने सुना-'वह शिल्पी जिसका भाग्य अनुकूल नहीं होता,
ऐसी जगह जाता है जहाँ कोई उसका नाम भी नही जानता।"
तीसरा अध्याय। २२७ सफ़र करता-करता वह एक नदीके किनारे पहुँचा। उस नदीके जलका ज़ोर इतना तेज़ था कि उसके वेगसे पत्थर आपस में टकराते थे और मीलोंतक आवाज सुनाई पड़ती थी। वह नदी बड़ीही भयावनी थी। उसमें जल-जीव भी कुशलपूर्वक नही रह सकते थे। उसकी छोटीसे छोटी लहर चक्कीके पाटको किनारेसे उठा फेंकने की शक्ति रखती थी। उसने कुछ आदमियोको घाट पर बैठे देखा । उन सबके पास कुछ न कुछ धन था, वे सब रास्ते के लिये अपनी-अपनी गठ- रियां बांध रहे थे। इस जवान के पास एक पैसा भी न था। इसने सबसे पैसे मांगे , पर किसी ने कुछ भी न दिया। लोगों ने कहा-"तुम यहाँ किसीपर ज़ोर-जुल्म नही कर सकते। अगर तुम्हारे पास रुपया है, तो ज़ोर-ज़बरदस्ती करने की कोई ज़रूरत नहीं है।" असभ्य मांझी उसकी हंसी करने लगा - 'जब तुम्हारे पास रुपया नहीं है, तब तुम ज़ोरसे नदी पार नही कर सकते। दश आदमियो की ताक़त किस काम की? एक आदमी का रुपया निकालो।" उस जवानको मल्लाह की तानेज़नी बुरी लगी। उसने मल्लाहसे बदला लेना चाहा, किन्तु उस समय नाव खुल गयो थी। उसने मल्लाहसे पुकार कर कहा-'अगर तुम मेरे शरीर का यह कपड़ा लेनेपर राजी हो : तो मैं इसे विना मूल्य देनेको राजी हू । मल्लाह लोभ न सभाल सका और नावको लौटा लाया। लोभ चालाक और मकारोंकी आँखें सी देता है। लोभ ही मछलियों और पक्षि- -- ।
२२८ गुलिस्तां। यों को जालमे फंसाता है। ज्योंही उस जवान के हाथ में नाविक की दाढ़ी और गलावन्द आये ; त्योंही उसने नाविक को अपनी ओर घसीट लिया और उसे वेतरह पीटा-पटका, उसका एक साथी उसकी सहायता के लिये नावसे बाहर आया; लेकिन उसकी भी ख़बर बुरी तरह ली गयी। दोनों मल्लाहों ने लाचार होकर उस जवानको शान्त करनाही मुना- सिब समझा और उससे नावका भाड़ा न लेनेका वादा करके सेल कर लिया। जब तुम लड़ाई देखो, तब शान्त हो जाओ, क्योंकि शान्त स्वभाव झगड़ेका द्वार बन्द कर देता है। मेहर- चानी की तुलना वदमिज़ाजी के साथ करो, तेज़ तलवार नर्म रेशम को न काटेगी। मीठी बातों और नम्रतासे तुम हाथीको भी बालके सहारे से मन-चाही जगह ले जा सकते हो। मल्लाहोंने कपट-पूर्ण भाव से उसके मुंह-हाथ चूमकर उसे नावमें बिठा लिया। जब वे नदी के बीच मे खड़े हुए यूनानी स्तम्भके पास पहुँचे; तव मल्लाहने पुकार कर कहा-'नाव ख़तरे में है। तुममें जो सबसे अधिक बलवान् और साहसी हो वह इस स्तम्भ पर चढ़ जावे और नावका रस्सा पकड़ ले तो हम नाव को बचा लें।" उस जवानने अपने वलके गर्वमें भूलकर पीड़ित शत्रुके दिल की वात पर कुछ गौर न किया । कहावत प्रसिद्ध है- तुम पहले किसीको सता कर, पीछे उसपर सौ-सौ मेहरबानियां करो तो मनमें यह ख़याल मत करो, कि वह पहली चातका . अगर
तोसरा अध्याय।
२२६
.
बदला लेना भूल जायगा। तुम जख्मसे खींचकर तीर निकाल
सकते हो, लेकिन ज़ोर जुल्म की बात हृदयमें सदा
खटकती रहती है। यकताश ने खिलताश को क्याही
अच्छी नसीहत दी थी,-"यदि तुमने शत्रु को पीड़ा पहुँचाई
है तो अपने तई रक्षित न समझो। जब कि तुमने दूसरेके
दिलपर चोट पहुँचाई है तब अपने तई कष्टरहित न समझो।
किलेकी दीवारपर पत्थर न फेंको; सम्भव है, किले की दीवार
से कोई पत्थर तुमपर भी फेंका जाय।" ज्योंही जवान बाँहमें
रस्सा लपेट उस स्तम्भ की चोटी पर पहुँचा; त्योंही मल्लाहने
झटका देकर उसके हाथसे रस्सा खींच लिया और नावको
आगे बढ़ा ले गया। जवान हक्का-बक्कासा होगया। दो दिन
तक उसने बड़ा कष्ट पाया। तीसरे दिन निद्राने उसे अपने
वशमें करके नदीमें गिरा दिया। एक दिन रात हो जानेपर
वह किनारे पहुँचा। उस समय उसमें थोड़ीही जान वाक़ी
थी। उसने वृक्षोंकी पत्तियां और घासकी जड़ें खाकर गुजारा
किया और कुछ बल सञ्चय हो जाने पर जङ्गल का रास्ता
लिया। भूख-प्याससे दुःखी होकर वह एक कुएँ पर पहुँचा,
वहाँ पहुँचकर, उसने देखा कि कुएँ की चारों तरफ बहुतसे
लोग जमा हैं और पैसे दे-दे कर पानी पी रहे हैं। उस जवान
के पास पैसा था नही। उसने जलके लिये सबसे विनती
की ; परन्तु किसीने उसकी प्रार्थना स्वीकार न की। अन्तमें
उस जवानने ज़ोरसे जल पीनेकी चेष्टा की; किन्तु कुछ फल
।
२३०
गुलिस्ता।
था।
न हुआ। उसने उनमेंसे कितनोंको पटका-पछाड़ा
और
पीटा। शेषमें, उन लोगोंने उस जवान को अपने काबूमें कर
लिया और निर्दयता से मारते-मारते घायल कर दिया ।
हाथीमें बल और साहसके होते हुए भी मच्छरोका झुण्ड
उसे हैरान कर देता है। छोटी-छोटी चीटियां मौका पाने
से भयङ्कर सिंह की भी खाल उधेड़ लेती हैं। वह जवान
बीमार और घायल होकर एक क़ाफ़िलेके साथ हो लिया और
खाने-पीनेके अभावके कारण उसीके साथ चलता रहा। सन्ध्या
समय वे एक ऐसे स्थानपर पहुंचे जहाँ चोरोंका बहुत ज़ोर
उस जवानने काफिलेवालों को भयसे थर-थर कांपते
हुए और क्षण-क्षण मृत्यु की प्रत्याशा करते हुए देखकर उनसे
कहा--"डरो मत ! मैं अकेला पचास आदमियोंका सामना
करूँगा और अन्यान्य लोग मेरी मदद करेंगे।" लोगों में
उसके शेखो मारनेसे हिम्मत आगयी। उसके साथ रहने मे
सब कोई प्रसन्नता प्रकट करने लगे। उन्होंने उसे खानेको
भोजन और पीनेको जल दिया । जवानको भूख बहुतही
तेज लगी थी ; इसलिए उसने इतना खालिया कि सांस लेने
को भी जगह न रही। वह टन्ना कर सो गया। काफिले में
एक अनुभवी बूढ़ा था। उसने कहा-"कौन जाने यह चोरों
काही भाई-बन्धु हो।
हम लोग इसके भरोसे रहकर अवश्य
ही लुट जावेंगे। अतः इसे सोता हुआ छोड़कर चल दो।"
सबने बूढे की सलाह ठीक समझी।
अपना-अपना असवाव
तीसरा अध्याय ।
२३१
बांधकर चल दिये। खूब दिन चढ़ने पर जवान उठा। उसने
वहाँ किसी को न देखा। रास्ता ढूंढा तो
वह
भी न मिला।
निराश-उदास होकर वह वहीं ज़मीन पर पड़ गया और
कहने लगा कि, मुसाफ़िर का दोस्त मुसाफिरही होता है।
जिसे मुसाफ़िरीके कष्टों का अनुभव नहीं होता, उससे मुसा.
फिर को बड़ा कष्ट पहुंचता है। वह ये बातें कहही रहा
था कि इतनेमें एक शाहज़ादा, जिसने शिकारके पीछे दौड़ते-
दौड़ते अपने नौकरोंको पीछे छोड़ दिया था, दैवात् उसी
स्थान पर आगया। उसने जवानकी उपरोक्त बातें सुन लीं।
जवान का चेहरा उसे अच्छा मालूम हुआ। उसे सङ्कटमें
देखकर पूछा-"तुम कहां से आते हो? तुम्हारे आनेका
क्या कारण है ?” जवानने अपनी सारी कहानी संक्षेपमे
कह सुनाई। शाहजादेको उसपर दया आयी। उसने उसे
कुछ कपड़े और रुपये देकर अपने एक विश्वासी नौकरके साथ
कर दिया और कह दिया कि इस जवानको इसके नगर तक
सकुशल पहुँचा दो ।
जव वह जवान अपने घर पहुँचा,
तव उसका वाप उसे सकुशल लौटा हुआ देखकर अत्यन्त
प्रसन्न हुआ। रातके समय, जवानने नावकी घटना, मल्ला-
होंको दगाबाज़ी, कुएँ पर गांववालोंकी जबरदस्ती और
काफिलेवालोंको सोता हुआ छोड़कर चले जानेकी वाते अपने
वापसे कहीं। वापने कहा-"बेटा ! मैंने तुझसे जानेके
समय नहीं कहा था, कि बलवान् किन्तु धनहीन आदमीका
-
-
२३२
गुलिस्ता।
हाथ बँधा रहता है और उसके पाँव सिंहके पजेके समान
होने पर भी टूटे रहते हैं ? एक धनहीन मल्लने खूध कहा
है-सुवर्ण का एक दाना पच्चीस सेर ताक़तसे अच्छा होता
है ।" लड़केने कहा-"पिताजी ! सब बात तो यह है,
कि कष्ट भोगे बिना धन हाथ नही आता। अपनेको ख़तरेमें
डाले विना दुश्मन पर फ़तह नही मिलती , बीज बोये बिना
खत्ती-खलियान नहीं भर सकते ।
"आप देखते नहीं, कि मैं थोड़ासा कष्ट भोगकर कितना
धन ले आया हूँ। डङ्ककी पीड़ा सहनेसे कितना मधु-भण्डार
मुझे मिला है ? यद्यपि हम लोग जो कुछ हमारे भाग्यमें
लिखा है उससे अधिक नहीं भोग सकते; तथापि हमे उसके
प्राप्त करनेसे त्रुटि न करनी चाहिए। अगर गोताखोर मगर
के जबड़ोंसे डरने लगे तो उन्हे बहुमूल्य मोती न मिले।
चक्कीके नीचेका पाट नहीं चलता; इसीसे वह बहुत भारी
होता है। भूखे शेरको मांदमे क्या खाना नसीब हो सकता
है ? जो बाज़ उड़ नहीं सकता, क्या वह शिकार पकड़
सकता है ? अगर तुम घरमेंही बैठे हुए आहार की प्रतीक्षा
किया करो; तो तुम्हारे हाथ मछली की तरह पतले पड़
जायेंगे।" बापने कहा-"बेटा! इस बार ईश्वरने तुम्हारा
साथ दिया और सौभाग्यने तुम्हारी रक्षा की ; इसीसे तुम
कांटोंमेंसे गुलाव तोड़ लाये और अपने पैरोसे काटे निकाल
सके। दैवयोगसे, एक वड़ा आदमी तुम्हें मिल गया। उसने
M
तोसरा अध्याय।
२३३
ww
तुमपर दया की और तुम्हे धन देकर धनवान् बना दिया ।
तुम्हारी टूटी अवस्था सुधार दी। परन्तु ऐसे उदाहरण बहुत
कम मिलते हैं। मनुष्य को चाहिये, कि आश्चर्यमयी
बातोंकी प्रत्याशा न करे। शिकारीको हर दिन शिकार नहीं
मिलता । सम्भव है, कि किसी दिन शिकारी भी शेरका
शिकार हो जाय । ईरान के एक बादशाह के साथ भी
ऐसेही घटना घटी थी। बादशाहके पास बहुमूल्य रत्नोंसे
जड़ी हुई एक अंगूठी थी। वह अपने सहवरोंके साथ एक
दफ़ा मुसल्लाए शीराज़की सैरको गया। उसने हुक्म दिया,
कि इस अंगूठीको अजूरके गुम्बद पर लगा दो। साथियोंने
वादशाहके आज्ञानुसार काम कर दिया । पीछे बादशाहने
डौंडी पिटवा दी, कि जो कोई शख्स इस अंगूठीके घेरेके
अन्दर होकर तीर पार कर देगा, उसे यह अंगूठी मिल
जायगी। उस समय बादशाहके साथ ही कोई चार सौ
अनुभवी तीरन्दाज़ थे। उन सबका निशाना
एक लड़का मठकी छतपर खेल रहा था और अपने तीर चला
रहा था । प्रात.कालकी हवा लगनेसे, उसका एक तीर
अंगूठी के भीतर होकर निकल गया। उसे अँगूठीके सिवा
और भी बहुतसी कीमती चीजें मिलीं। इसके बाद लड़केने
अपनी तीर-कमान जला डाली। लोगोंने उससे ऐसा करने
का कारण पूछा। लड़केने कहा-"मैंने अपनी तीर-कमान
इसलिए जला दी, कि मेरी यह प्रसिद्धि चिरकाल तक वनी
चूक गया।
२३४
गुलिस्ता।
रहे । सम्भव है, कि बड़े तीरन्दाजको सफलता प्राप्त न हो
और एक अनाड़ी लड़का, भूलसे, अपना तीर निशाने पर
भार दे।"
मैंने देखा, कि एक फ़कीर संसार-त्यागी होकर गुफामें
रहता था। वह राजा-बादशाहोंकी भी कुछ परवा न करता
था। जो भिखारी हो जाता है, उसे जन्म-भर अभावही
रहता है। लोभ छोड़ दो और बादशाहकी तरह राज्य
करो ; क्योंकि सन्तोषी मनुष्यकी गरदन सदा ऊँची रहती
है। उस देशके किसी बादशाहने सूचित किया, कि मैं उस
'फकीरकी दयालुता और परोपकारिताके कारण आशा करता
हूं कि वह मेरे यहाँ भोजन करना स्वीकार करेगा। फ़की-
रने यह न्योता, पैग़म्बरको प्रथाके अनुसार होनेके कारण,
स्वीकार कर लिया।
एक दूसरे समय, जब बादशाह उससे
मिलने गया ; तो उसने उठकर बादशाहको गलेसे लगाया
और उसपर अनुग्रह किया।
जब बादशाह चला गया, तब उस फ़क़ीरके साथियोंमेंसे
'एकने उससे कहा-'बादशाहके प्रति ऐसा शिष्टाचार
दिखाना नियमविरुद्ध है। कहिए, आपने ऐसा वर्ताव किस
लिये किया ?” उसने जवाब दिया--"क्या तुमने यह कहा-
चत नहीं सुनी है-जिसका खाना उसका मान करना।'
कान सारी उम्र ढोल, नफ़ीरी और सारङ्गीकी आवाज़ विना
रह सकता है, नेत्र बाग़-बगीचोंके आनन्द चिना रह सकते
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तीसरा अध्याय। २३५ हैं, गुलाव और नसरीन विना गन्ध तेज़ हो सकते हैं, पड्ढोंसे भरा हुआ तकिया न होने पर, सिरके नीचे पत्थर रख लेनेसे नींद आ सकती है, लेकिन इस नीच पेटको, जबकि आंतें गनगनाहट करने लगती हैं, किसी चीज़से सन्तोष नहीं होता। शिक्षा-इस कहानीसे अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं। तकदीर तदबीर के पुराने झगड़े को शेखसादीने इस कहानी में निबटानेकी चेष्टा की है। उनकी रायमें तकदीरही बढ़ी चीज है। बिना तकदीरकी सहायताफे तद- बीर कैसी बढ़िया क्यों न हो-फन पैदा नहीं कर सकती। इस विपयमें उर्दू के किसी कविने क्या खूब कहा है सब काम अपने करना तक़दीर के हवाले । नजदीक आकिलोंके तदबीर है तो यह है॥ का -- - न ܫܫ चौथा अध्याय। *--- चुप रहनेसे लाभ। पहली कहानी। नूरे गेती फरोज़ चश्मये हूर। ज़िश्त बाशद बचश्म मूशिके कूर ॥१॥ ने अपने एक मित्रसे कहा- मैंने मौन-व्रत धारण करनेकी प्रतिज्ञा की है, क्योकि बात-चीत करने से प्राय. बुराई और भलाई दोनों हुआ करती हैं और दुश्मनकी नज़र हमेशा बुराई परही रहती है।" उसने संसारमें प्रकाशको फैलानेवाला रोशनोका चश्मा सूर्य छछून्दरका दृष्टिमें धुधला मालूम होता है। भत्तहरि भी कहते हैं पत्र नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम् ?
चौथा अध्याय।
२३७
जवाब दिया-भाई ! जो भलाई पर नज़र नहीं डालता,
वही सबसे अच्छा दुश्मन है। दुश्मनकी नज़रमें भलाई सबसे
बड़ा दोष है। सादी, सचमुच गुलाबका फूल है; किन्तु
दुश्मनकी नज़रमें कांटा मालूम होता है। दुश्मन अगर नेक
आदमीके पास होकर भी निकलता है, तो उसपर ढोंगो होने
का दोष लगाये बिना नहीं रहता। जगत्में प्रकाश फैलाने
वाला, रोशनीका चश्मा, सूरज छछू दर की नज़रमें धुंधला
मालूम होता है।
शिक्षा-धूतं श्रादमी भले भादमियोंमें अकारण बुराइयाँ देखते हैं।
उनका स्वभावही ऐसा है-इसमें उनका भी क्या दोष ?
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1
२३८ गुलिस्ताँ। दूसरी कहानी मगो अन्दहे खेश बा दुश्मनॉ । के लाहोल गोयन्द शादी कुनॉ ॥१॥ सी व्यौपारोको एक हज़ार दीनारोका घाटा हुआ। कि उसने अपने पुत्रसे कहा-"तुम यह बात किसी से न कहना।" पुत्रने कहा-पिता! आपकी यही आज्ञा है, तो मैं किसी से न कहूँगा। लेकिन कृपा करके यह तो बताइए, कि इस बातको छिपानेसे क्या लाभ होगा ?" उसने कहा-"न कहनेसे हमे दो आपदाएँ तो न भोगनी पड़ेगी:-एक घाटा और दूसरा पड़ोसियोंका ताना ।" अपने दुःखकी बात अपने बैरियोसे न कहो। क्योकि वे लोग कहेंगे-"भगवान् दुःख दूर करें और उसी वक्त तुम्हारा दुःख देखकर मनमें सुखी होगे।" वञ्चनं चापमानञ्च मतिमान प्रकाशयेत् । शत्रुओंसे अपने दुःखकी वात मत कहो, वे प्रकाशमें तो तुम्हारे साथ सहानुभूति दिखायेंगे और मनमें तुम्हारी अवस्थापर खुश होंगे।
चौथा अध्याय । २३६ तीसरी कहानी। खू व न गुफ्ता न दारद कसे वातो कार । वलेकिन चोगुफ्ती दलीलस बयार ॥१॥ क बुद्धिमान् नवयुवक, जिसने विद्या और धर्म- कार्यो में उन्नति की थी, विद्वानो के समाज asia में बैठकर मुँह से कुछ भी न बोलता था । एक दफा उसके वापने उससे कहा-"ऐ पुत्र! तुम जो कुछ जानते हो, उसके विषय मे कभी क्यों नही बोलते ?" उसने जवाब दिया, "मैं इस बात से डरता हूँ, कि वे मुझसे कोई ऐसी वात न पूछ बैठे, जिसे मैं न जानता हूँ और उसके कारण मुझे लजित होना पड़े।" "क्या आपने उस सूफीकी बात नही सुनी, जो अपनी खड़ाऊँओ में कीलें ठोक रहा था। कीलें ठोकते देखकर, एक हाकिम ने उसकी आस्तीन पकड़ ली और उससे कहा- 'चलो, मेरे घोड़े के पैरोंमें नाल वांध दो।' जब तुम चुप रहोगे, तब कोई तुमसे कुछ सरोकार न रक्खेगा और जब तुम बोलोगे तव तुम्हें सबूत लेकर तय्यार रहना पड़ेगा।" शिक्षा-"कम वालना अदा है हर यान पर नहीं।' जब तुम चुप रहोगे तब कोई तुम से कुछ न कहेगा । जद वोलोगे तय हर समय प्रमाण सहित तन को तप्य र रहना पदेगा।
२४० गुलिस्ताँ। ए चौथी कहानी। sonte ऑकस के वकुरान खवर जूनरही । आनस्त जवावश के जवावश न दिही ॥१॥ क मनुष्य अपनी विद्याके लिए प्रसिद्ध था। देव- योगसे, उसके साथ एक नास्तिक का वादविवाद होगया। जब उस विद्वान् ने वहस करनेसे कुछ फल होता न देखा, तो उसने चुपचाप अपनी राह ली। किसीने कहा-"यह क्या बात है, कि तुम ज्ञान और विद्यावुद्धिमे इतने चढ़-बढ़ होने पर भी इस नास्तिक का सामना नहीं कर सकते ?” उसने कहा-'मैने कुरान, पैग़म्बर की बातें, और पूर्वपुरुषोंके उपदेश पढ़े-सुने हैं। वह न तो इन बातो को सुनेगा और न इनपर विश्वास करेगा; फिर मैं उसके मुंहसे ईश्वर-निन्दा क्यों सुनू? जिसे कुरान और कथाओपर विश्वास न हो, उसे कुछ भी जवाब न देनाही ठीक जवाब है।" शिक्षा-मुों से वाद या वितण्डावाद करके कोई फल नहीं होता। वे तुम्हारी बात माने गे नहीं। अकारण तुम्हारा समय नष्ट कर देगे। परस्परागत जिसे कुरान और पौराणिक कथाओं पर विश्वास न हो, उसे 'जवान न देना' ही ठीक जवाव है। .
चौथा अध्याय । २४१ पाँचवीं कहानी। यकेरा जिश्तखये दाद दुश्नाम । तहम्मुल कर्द व गुफ्त ऐ नेकफर्जाम ॥१॥ बतरजानम के ख्वाही गुफ्त आनी । के दानम ऐवे मन चूं मन नदानी । NARE लीनूसने एक मूर्खको किसी बुद्धिमान् की गर्दन जा पकड कर अपमानित करते देखकर कहा-'अगर यह मनुष्य सचमुच बुद्धिमान होता ; तो इस मूर्खके साथ इसका झगड़ा न होता। दो बुद्धिमानोंके बीच में झगडा-बखेड़ा नहीं होता और बुद्धिमान् आदमी मूर्खके साथ झगड़ा नहीं करता। अगर मूर्ख आदमी अपने जङ्ग- लीपन के कारण कड़वी बात कहता है; तो वुद्धिमान् उसे मीठा जवाब दे देता है। दो बुद्धिमान् एक वाल को भी नहीं तोड़ते ; किन्तु दो मूर्ख एक जञ्जीरको भी तोड़ डालते हैं।" शिक्षा-धुद्धिमान् को चाहिए कि वह मुर्खकी चातका जवाब न दे। जाब देनेसे झगड़ा बढ़ता है, घटता नहीं और मूर्खके साथ झगड़ा करना पजाते खुद मुलता है। किसी मूर्ख भादमीने किसी भद्र पुरुप को भुग कहा। उसने सुनकर वझे पैसे कहा-भाई, मैं जैसा कि तुन करते हो, उससे भी बुराई । म जितना पुरा , उसको तुमसे पधिक मैं जानता हूँ। १६ २४२ गुलिस्ता। छठी कहानी। 동 an सुखन गर्ने दिलवन्दो शीरी वुवद । सज़ावारे तसदीको तहसीं बुवद ।।?॥ चो यकवार गुफ़्ती मगो वाज़ पस । हलवा चो यकवार खुरदन्दो बस ॥२॥ हवाने वायल अपनी बोलने की शक्ति के लिए वे. स जोड़ समझो जाते थे ; क्योकि जब वे वक्तृता देते म तो साल भरतक बरावर बोलने पर भी एक शब्दको दुबारा न कहते और जब कभी उसी बातके कहने का मौका आपड़ता ; तो उस बातको दूसरी तरह पर समझा देते। दरबारियो में यह गुण होता है। कोई बात कितनीही मधुर, मनोहर और प्रशसा-योग्य हो ; उसे जब तुमने एक बार कह दिया है तो उसे फिर मत कहो । जबकि तुमने एकबार हलवा खा लिया है, तो वही काफ़ी है। शिक्षा-किसी बातको चाहे वह कितनी अच्छी हो, वेमौके और बार-बार मत कहो। मौका पावरही बोलो और क्म बोलो। an । बात कैसीही माठी और प्यारी हो, एक बार कहना चाहिए। एक बार हलवा खानाही काफी है।
चौथा अध्याय। २४३ सातवीं कहानी। ५ खदावन्दे तदबीर फरहंगो होश । न गोयद सुखन ता नवीनद समोश ॥१॥ ने एक अक्लमन्द को कहते सुना है, कि अपनी में मूर्खता को, सिवा उसके जो वात खतम होने के से पहलेही बोलता है और जो दूसरे के बोलते हुए ही बोलता है और कोई स्वीकार नहीं करता। बुद्धिमानो ! वात-चीत का आदि भी होता है और अन्त भी। एक चातके वीचमें दूसरी वात घुसेड़ कर गड़बड़ न फैलाओ। वुद्धिमान् , समझदार और धर्म जानने वाले लोग, जवतक दूसरा बोलने वाला चुप नही हो जाता, कुछ नहीं बोलते। शिक्षा-जिस तरह तुम्हारी वात काट कर बोलने वाला तुम्हे बुरा मालूम होता है, इसी तरह तुम दूसरेको मालूम होगे। बोलने में पर मावधान रहो। . - . । सुमिनार भौर विचारगील पुरए जब तक दूसरा पोसता रहता भनी दात शुरू नहीं करते।
२४६ गुलिस्ता। दसवीं कहानी। *APoort उमेदवार बुवद आदमी बखैर कसॉ । मरा बखैरे तो उम्मेद नेस्त बद मरसॉ ॥१॥ क कवि किसी सरदार के पास गया और उसको प्रशंसा में कविताएँ कहने लगा। डाकूराजने RO आज्ञा दी, कि उसके कपड़े उतार कर उसे गाँवसे निकाल दो। कुत्ते उसके पीछे लग गये। उसने पत्थर उठाने चाहे, किन्तु वे ज़मीन मे जमे हुए थे। कविने दुःखी होकर कहा-"ये लोग कैसे नीच हैं, जो अपने कुत्तोको तो खुला छोड़ देते हैं और पत्थरोंको बाँध रखते हैं।" सरदारने खिड़की से उसकी बात सुनी और हँस कर कहा-"ऐ अक्लमन्द ! मुझसे कुछ इनाम मांग।" कविने जवाब दिया-"अगर आप राजी हैं तो मैं अपनी पोशाक ही वापिस मांगता हूं। मनुष्य धर्मात्माओं से ही आशा करता है। आपकी ओर से मुझे कुछ आशा नहीं है आप केवल मुझे दुःख न दीजिए। आपने मुझे चले जानेकी आज्ञा दे दी। आपकी इस नेकीसे ही मैं सन्तुष्ट हूं।" डाकू-सरदार को उसपर दया आई। उसने उसके कपड़े वापिस दिला दिये और उसके साथ एक ऊनी चुगा और कुछ दिम भी उसे दिलवाये । धारमाओंसेही श्रादमी को नेकी का उम्मेद करना चाहिये । 7 चौथा अध्याय । २४७ शिक्षा-वार और डाकुओं से दया और सहृदयता की श्राशा मत रक्खो। ग्यारहवीं कहानी। तो वर औजे फलक चे दानी चीस्त । के न दानी के दर सराये तो कीस्त ॥१॥ SE क ज्योतिपी अपने घरमें घुसा । उसने अपनी स्त्रीके नए पास एक अपरचित मनुष्य को वैठा देखा। उसने का अपरिचित मनुष्यको गाली-गलौज़ दी और इतनी कडी बातें कहीं कि बखेड़ा होगया। एक बुद्धिमान्ने कहा -"तुम्हें आसमानी बातोंके विषय मे क्या मालूम, जव तुम यही नहीं कह सकते कि तुम्हारे घरमें कौन है ?" शिक्षा-अनेक धूत अपने को ज्योतिषी बताकर लोगोंको धोखा देते हैं-उनमे पचने का प्रयत्न करना चाहिए। जो ज्योतिषी मरने परको दातको नहीं जानता, वह भासमानकी सात किस तरह जानेगा?
२४८ गुलिस्ता। बारहवीं कहानी। को दुश्मने शोख चश्म बेबाक । ता ऐबे मरा बमन नुमायद ॥१॥ ए क उपदेशक की आवाज़ बहुत ही खराब थी; परन्तु वह अपने मनमें समझता था कि मेरी आ- वाज़ बहुत मीठी है; अतः वह व्यर्थ चिल्लाता फिरता था । जङ्गली कव्वे की काँव-काँव उसके गीत अथवा भजन की गठड़ी थी। कु रानका नीचे लिखा हुआ पद उसीके वास्ते कहा गया था-"गधेकी आवाज़ वास्तवमें सबसे ख़रार आवाज़ है।" जब यह उपदेशक-गधा रैकता था, तव फारिस नगर निवासी उसके पदकी प्रतिष्ठा के कारण कष्ट सह लेते थे और उसे हैरान करना अनुचित सम- एक पड़ोसी उपदेशक, जो उससे भीतर ही भीतर कुढ़ता था, उसके पास गया और बोला-"मैंने एक स्वप्न देखा सम्भव है कि उसका फल अच्छा हो !” उसने पूछा,- "आपने क्या देखा ?” उसने जवाब दिया, मैंने देखा कि "आप की आवाज़ मीठी है और लोग आपके उपदेश सुनकर शान्ति लाभ करते हैं।” उस उपदेशक ने इस विषयमें जरा गौर कांपने लगता था। झते थे। Tho तेज़ नजर दुश्मन कहाँ है, जो मेरे दोष मुझे दिखाता है ? " f - चौथा अध्याय । २४६ करके कहा,-"आपने कैसा अच्छा सुपना देखा है, जिससे मेरा यह दोष प्रकट होगया, कि मेरी आवाज़ सुहावनी नही है और लोग मेरे उपदेश देनेसे दुःख पाते हैं। मैंने प्रतिज्ञा करली है, कि भविष्यमें, मैं धीमी आवाज़ से पढ़ा करूँगा । मेरी मित्र-मण्डली मेरे हकमें हानिकारक है, क्योंकि वह मेरे दोयोको भी अच्छा ही समझती है। मेरे दोष उसे गुण मालूम होते हैं और मेरा काँटा उसे गुलाव और चमेली मालूम होता है। कहाँ है गुस्ताख दुश्मन, जो अपनो तेज़ नजरसे मेरे दोष दिखावे ?" शिक्षा-इस कहानीसे हमें शिक्षाएं मिलती हैं-(१) सची वान भी अच्छे ढंगसे कहनी चाहिए जिससे किसोके चित्तको पीड़ा न पहुँचे (२) स्पष्टवादिता के लिए हमें अपने शत्रुकी भी कद्र करनी चाहिए ।
२५० गुलिस्ता। तेरहवीं कहानी। वतेशा कस न खराशद जरूये खारा गिल । चुना के बॉग दुरश्ते तो मीखराशद दिल ॥१॥ क मनुष्य संजारिया की मसजिदमे, बिना कुछ लिये, अजा दिया करता था। उसकी आवाज ऐसी बुरी थी, कि जो सुनता, वही नाक-भौं च- ढ़ाता। मसजिद का मालिक एक अमीर आदमी था। वह बड़ा दयालु था। वह इसे दुःख देना न चाहता था। उसने कहा-“बच्चा! इस मसजिद मे कई पुराने मुअज्जिन हैं जो पांच पांच दीनार मासिक पाते हैं। मैं तुम्हें दश दीनार देता हूँ। तुम दूसरी जगह चले जाओ।" वह अमोर की वातपर राजी होकर चला गया। कुछ समय बाद वह फिर उसी अमीर के पास आया और बोला- "ऐ मालिक ! आपने मुझे दस दीनार देकर और दूसरी जगह भेजकर मेरी बड़ी हानि की; क्योंकि जहाँ मैं गया, वहाँ के लोग मुझे बीस दीनार देकर दूसरी जगह जाने को कहते हैं, पर मैंने उनकी बात मजूर नही की ।" अमीरने हंसकर कहा-"देखो, बीस दीनारमें भी वहाँसे जानेको राजी न होना। सम्भव है, कि वे लोग तेरी बेसुरी भावाज़ मेरे दिलको इस बुरी तरह से जलती हैं, जिस- तरह कोई पत्थरपर लगी हुई मिट्टीको नमूले से खुरचता हो ।
चौथा अध्याय । तुम्हें पचास दीनार देनेपर राजी हो जायें। तेरी वेसुरी आवाज़ जिस तरह आत्माको छीलती है, ऊस तरह कोई शख स पत्थर पर लगी हुई मिट्टीको वसूले से नहीं खुर्च सकता।" शिक्षा-जिनका गला अच्छा नहीं, उन्हें कभी भूलकर भी गायन द्वारा दूसरों को कष्ट न पहुँचाना चाहिए। - चौदहवीं कहानी। ए गर तो कुरा वदी नमत रवानी । ववरी रौनके मुसलमानी ॥१॥ क भद्दी आवाज़ वाला आदमी कुरान पढ़ रहा था । एक धर्मात्मा आदमी उस ओरसे निकला। उसने उससे पूछा-"तुम कितनी तनख वाह पाते हो ?" पढ़नेवाले ने जवाय दिया-"कुछ भी नहीं।" उसने कहा.-"फिर तुम इतना कष्ट क्यों उठाने हो?” उसने कहा 'मैं ईश्वर की राह पर पढ़ता हूँ।" धर्मात्माने उत्तर दिया ईश्वर के लिए मत पढ़ो। अगर तुम इस ढंग से कुरान पढोगे तो मुसलमानी मज़हब की महिमा का -- नाश कर दोगे।" यदि रस रहमे तुमने पुरान पटा तो मुसलमानी धर्मकी महिमा नष्ट समतो।
पाँचवाँ अध्याय। प्रेम और यौवन । पहली कहानी। - ::- हर के सुलतॉ मुरीदे ओ बाशद । गर हमा वद कुनद निको वाशद ॥१॥ । गोने हसन मन्दी से पूछा-'यह क्या बात है कि लो सुलतान महमूद अनेक सुन्दर-सुन्दर गुलामो के FIERE होते हुए भी केवल अयाजकोही चाहता है; अया- जकी सूरत में कोई असाधारण वात नही है; जबकि अन्यान्य गुलाम रूप-लावण्य मे उससे बहुत कुछ बढ़चढ़ कर हैं ?" उसने उत्तर दिया-"जिसका असर दिलपर होता है, वही दृष्टि मे सुन्दर मालूम होता है। जिसपर सुलतान का प्रेम जिसपर बादशाहका प्रेम होता है, उसमें कितनेही दुर्गुण हो वह सब को भलाही प्रतीत होता है। H - पांचवां अध्याय। २५३ । अगर हो, वह चाहे जैसे बुरे काम करे तथापि सुन्दरही मालूम होगा। जिसे बादशाह नहीं चाहता, उसे घरका कोई आदमी प्यार नहीं करता। जो किसी को बुरी नज़रसे देखता है, उसे यूसुफ़ की खू वसूरती भी बदसूरतीसो मालूम होती है। वह भूत को भी चाहकी नज़रसे देखे ; तो वह भी उसको नजरमें फ़रिश्तासा मालूम होगा।" -इस कहानीका यह सारांश हे, कि निसकी नज़र में जो चढ़ जाता है. उसको वही अच्छा लगता है । दूसरी कहानी। -- गुलाम आवकश वायद व खिश्तज़न । बुवद वन्दये नाज़नीं मुश्तेजन ॥१॥ हते हैं, कि किसी बड़े आदमीके पास एक बहुतही क सुन्दर गुलाम था, जिसे वह बहुतहो चाहता था । उसने अपने मित्रोमेले एफसे कहा-"कसे अफ़सोसकी बात है. कि ऐसा सुन्दर गुलाम असभ्य और गुस्ताख हो!” उसने उत्तर दिया- भाई ! जब तुम दोस्ती 4 गुरान से पदो काम लेना चाहिए, सो उसका है। इसे लाद पार एसर कर देना अच्छा नहीं।
गुलिस्ता। करो तब आज्ञापालनकी आशा न करो, क्योकि प्रेमी और प्रेमिकामे स्वामी और दासीका सम्बन्ध नहीं रह सकता। जबकि स्वामी अपनी सुन्दरी दासोके साथ हँसता और खेलता है ; तब क्या आश्चर्य है, जो वह अपनी बारीमे कुछ चोचले. वाज़ी करे और वह उसके नाज़ोनखरे गुलामकी तरह बर्दाश्त करे। गुलामको पानी लाने और ईटे बनानेके काममें लगाना चाहिए। वह जोकि खूब छक जाता है, गुस्ताख हो जाता है।" शिक्षा-नौकर को मुंह न लगाना चाहिए, क्योकि प्रेम करने और मुंह लगानेसे नौकर शाख हो जाता है। जब मालिक और नौकरमें प्रेम हा जाता है, तब नौकर नौकर नहीं रहता। तीसरी कहानी। हदीसे इश्कजॉ बुत्ताल मेनोश । के दरसख्ती कुनद यारी फरामोश ॥१॥ क बड़ा प्रेमी और मिलनसार लड़का था। खू बसूरत लड़कीसे उसकी सगाई हो गयी थी। SAREE सुना है, कि जब वे दोनो जहाज़पर समन्दरमे सफ़र कर रहे थे, तब दोना एक जल-भवरमे गिर पड़े। जव मल्लाह उनसे प्रेमकी कहानी मत सुनो, जो विपद्के समय अपने मित्रको छोड़ देते हैं। -
पांचवां अध्याय।
२५५
उस जवानका हाथ पकड़ कर उसे बचाने लगे, तब उसने
उस दुःखमें बड़े जोरसे चिल्लाकर, लहरोंके वीचसे अपना
हाथ निकाल कर, अपनी माशूकाकी तरफ़ किया और बोला
'मुझे छोड़ दो और मेरी माशूकाका हाथ पकड़ो।" इस बात
पर दुनिया भरने उसकी प्रशंसा की। उसने मरते समय
कहा-"उन वेवफ़ाओंसे प्रेमकी
कहानी मत सीखो, जो
आफतके समय अपनी माशूकाको भूल जाते हैं।" इस तरह
उन दोनो प्रेमियोंकी जीवन-लीला समाप्त हो गयी। अनु-
भवी लोगोंकी बातें सुनो और उनसे शिक्षा लाभ करो। प्रेम
के रास्तोंसे सादी वैसाही परिचित है, जैसा अरवी भापासे
बगदाद। जिसको तुम पसन्द करो, उसी माशूकासे दिल
लगाओ। ससारकी अन्य वस्तुओंको ओरसे नेत्र-हीन बन
जाओ। अगर इस समय लैला और मजनूँ होते ; तो
इस किताबसे प्रेमकी कहानी सीखते हैं
इस अध्यायमें ऐसे-ऐसे किस्से हैं, जिनसे सथिता मिलनेके पजाय
गिज्ञा मिलती है। इस अध्यायकी प्रेमरससे पगी कहानियां लड़कों और
गपयुवकों को मार्गमें ले जानेवाली है, इसमें थप मात्र भी सन्देह नहीं
है। देरते हैं, कि मौलवियोंकि ममतगोमें पढ़ने वाले लड़के ऐमी-प्रेमी
पुस्तक पटनेनेही चरित्रहीन और अव्याय-तयोयन हो जाते हैं। माटो
मालकी गुलिस्तां मान रन है। रिन्नु उनका या अध्याय इस देशीर
उपयोगी नहीं।मोसे हमने तीन हिस्से (पहला, दुमा चार दहीम)
गुलिस्ता।
देकर शेष अठारह अश्लील किस्से छोड़ दिये हैं। इस अध्यायके सिवा
और किसी अध्यायमें हमने एक भी कहानी नहीं छोड़ी है। सादी जैसे
मीतिज्ञने, समझमें नही आता, अपनी नीति पुस्तकमें इस अध्यायको क्यों
अवतारणाकी। फूल और कांटेका योग इसेही कहते हैं।
+
छठा अध्याय । --- दुबैलता और वृद्धावस्था। पहली कहानी। चू मुखव्वत शुद ऐतदाले मिज़ाज । न अजीमत असर कुनद न इलाज ॥१॥ 1853 मशककी मसजिदमें, मैं एक विद्वान्के साथ तर्क-वितर्क कर रहा था । इतनेमें एक जवान आदमीने फाटकके भीतर घुसकर कहा-"क्या आप लोगोंमें कोई फारसी जाननेवाला है " लोगोंने मुझे पतराया। मैंने पूछा---"क्या मामला हे?" उसने उवाच रिया--"एक डेढ़ लो वर्षका बूढ़ा नृत्युको यन्त्रणाओमें फंस है। पर फारसी जुबानमे कुछ कहता है, जो हमलोगों ११ सरिक मरा रा हो जाती है, नर दया पार दुआ किमी पापा नारी राता। १७ - २५८ गुलिस्ता। की समझमे नहीं आता। अगर आप मेहरवानी करके वहाँ तक चलनेकी तकलीफ उठावें : तो आपको आपके परिश्रमका पुरस्कार मिल जायगा। शायद वह अपनी जायदाद किसीके नाम पर लिख जाना चाहता है।" जब मैं उसके तकियेके पास पहुँचा, तव उसने कहा-"मुझे आशा थी, कि मैं अपने जीवनके बाकी दिन आरामसे बिताऊँगा; लेकिन मुझे सांस लेना कठिन हो गया हैं। अफसोस है, कि मैंने इस विचित्र- जीवनके दस्तरख्वानपर थोड़ाहीसा खाया और लोगोने कहा इतना ही बहुत हैं।" मैने अरवीमे दमश्कके लोगोंको उसकी वात-चीतका मतलब समझा दिया । उनको इस बातसे आश्चर्य हुआ, कि वह इतनी अवस्थाको पहुँचनेपर भी सांसा- रिक जीवनके लिये दुःखी होता है। मैंने उससे पूछा कि आपकी तबीयत कैसी है। उसने जवाब दिया-"मैं क्या कह सकता हूँ? क्या आप उसके दुःखको नहीं जानते, जिसने अपना एक दांत मुंहसे निकाल लिया हो ? ख्याल फरो, उसकी क्या दशा होगी, जिसके अमूल्य शरीरसे जीव निकल रहा होगा ।" मैंने कहा- आप अपने चित्तसे मृत्युका ग्याल दूर कीजिए और कुछ भय न कीजिए। हकीमोंने कहा है- यदि शरीरकी दशा एकदम साथ हो; तोभी हमें शरीर तीन्थिना पर विश्वास न करना चाहिए और यदि भयानक योगामी नोभी मरने का निश्चय न कर लेना चाहिए।' अगर आप गाना दें तो किसी हकीमको बुलाऊँ । वह
छठा अध्याय।
२५६
आपको कुछ दवा देगा।
सम्भव है कि आप उससे आरोग्य
लाभ करें।" उसने जवाब दिया-'अफसोस! मकानकी
नींव ढीली पड़ गयी और मालिक मकान अपना कमरा
सजाना चाहता है। चतुर हकीम जव बूढेको खप्परकी भांति
फूटा हुआ देखता है, तब दोनो हाथोको मलने लगता है।
वीमार जिस समय दर्दके मारे रो रहा था, उस समय एक
बुढ़िया उसके पैरोंमें चन्दनका उबटन मल रही थी।
मनुष्यका स्वास्थ्य एकदम नष्ट हो जाता है, तव दवाइयो और
तावीजोंसे कुछ भी लाभ नही होता।"
शिक्षा--मनुष्य चाहे जितनी उम्र तक क्यों न जियें, विपयभोगकी
सामग्रियोंको चाहें जितना क्यों न भोगें, मरणका समय मजदीक मानेपर
उनको विषय भोगोंको भोगनेको इच्छा कम नहीं होती और जब मृत्यु
बाल निकट या जाता है, तब मनुष्य किसी प्रकारची दपा-दारु से नहीं वर
जव
.
सकता।
-
गुलिस्तां । २५८ की समझमे नहीं आता। अगर आप मेहरबानी करके वहाँ तक चलनेकी तकलीफ उठावे; तो आपको आपके परिश्रमका पुरस्कार मिल जायगा। शायद वह अपनी जायदाद किसीके नाम पर लिख जाना चाहता है। जब मैं उसके तकियेके पास पहुँचा, तब उसने कहा-"मुझे आशा थी, कि मैं अपने जीवनके बाकी दिन आरामसे बिताऊँगा; लेकिन मुझे सांस लेना कठिन हो गया हैं। अफसोस है, कि मैंने इस विचित्र- जीवनके दस्तरख्वानपर थोड़ाहीसा खाया और लोगोंने कहा इतना ही बहुत हैं।” मैंने अरबीमें दमश्कके लोगोको उसकी बात-चीतका मतलब समझा दिया । उनको इस बातसे आश्चर्य हुआ, कि वह इतनी अवस्थाको पहुँचनेपर भी सांसा- रिक जीवनके लिये दुःखी होता है। मैंने उससे पूछा कि आपकी तबीयत कैसी है। उसने जवाब दिया-"मैं क्या कह सकता हूँ? क्या आप उसके दुःखको नहीं जानते, जिसने अपना एक दांत मुंहसे निकाल लिया हो? ख्याल करो, उसकी क्या दशा होगी, जिसके अमूल्य शरीरसे जीव निकल रहा होगा ।" मैंने कहा-"आप अपने चित्तसे मृत्युका ख्याल दूर कीजिए और कुछ भय न कीजिए। हकीमोंने कहा है-यदि शरीरकी दशा एकदम स्वस्थ हो; तोभी हमे शरीर की स्थिरता पर विश्वास न करना चाहिए और यदि भयानक बीमारी भी हो तोभी मरनेका निश्चय न कर लेना चाहिए।' अगर आप आज्ञा दे तो किसी हकीमको वुलाऊँ । वह
छठा अध्याय।
२५६
आपको कुछ दवा देगा। सम्भव है कि आप उससे आरोग्य
लाभ करें।" उसने जवाब दिया-"अफसोस! मकानकी
नींव ढीली पड़ गयी और मालिक मकान अपना कमरा
सजाना चाहता है। चतुर हकीम जब बूढ़ेको खप्परकी भांति
फूटा हुआ देखता है, तब दोनों हाथोंको मलने लगता है।
वीमार जिस समय दर्दके मारे रो रहा था, उस समय एक
बुढ़िया उसके पैरोंमें चन्दनका उबटन मल रही थी।
मनुष्यका स्वास्थ्य एकदम नष्ट हो जाता है, तव दवाइयो और
तावीज़ोंसे कुछ भी लाभ नही होता।"
शिक्षा--मनुष्य चाहे जितनी उम्र तक क्यों न जियें, विषयभोगकी
सामग्रियोंको चाहे जितना क्यों न भोगे, मरणका समय नजदीक मानेपर
उनको विषय-भोगोंको भोगनेको इच्छा कम नहीं होती और जब मृत्यु
काल निकट पा जाता है, तब मनुष्य किप्ती प्रकारकी दवा-दारू से नहीं व
सकता।
Homwww
२६० गुलिस्ताँ। . दूसरी कहानी। ए वातो मरा सोख्तन अन्दर अजाव । वह के शुदन वादिगरे दर बहिश्त ॥१॥ क बूढ़ा आदमी अपनी कहानी यों कहने लगा- "मैंने एक युवती कन्यासे-विवाह करके अपने कमरेको फूलोसे खूब सजाया। मैं उसके पास एकान्तमें बैठा रहता और अपना दिल और अपनी आँखें उसी पर लगाये रहता। उस कन्याकी लज्जा दूर करने और अपने से हिलानेके लिये मैंने कई लम्बी-लम्बी रातें, विना नींद लिये, हंसी-मज़ाक़में बिता दी। बिता दी। एक रातको मैंने उससे कहा-"तुम्हारी तकदीर बहुत अच्छी है जो तुम्हें बूढ़े आदमी की सुहबत मिली, जो पक्के विचार रखता है और जिसने ज़माना देखा है तथा जिसने किस्मतके उलट-फेरे देखे हैं, जो समाजके नियम जानता है, जिसने अपने मित्र-धर्मका पालन किया है ; जो प्रेम, शीलवान् , प्रसन्नचित्त और वार्ता- लाप करने योग्य है । मैं तुम्हें अपनी प्रेमिका बनाने की भरशक चेष्टा करूँगा। यदि तुम मुझसे बुरा बर्ताव । जिससे तबीयत मिली होती है, उसके साथ नरक में जाना भी अच्छा है और जिससे तवीयतको लगाव नहीं, उसके साथ स्वर्गमें जाना भी अच्छा नहीं।
छठा अध्याय।
२६१
.
करोगी, तोभी मैं तुमसे अप्रसन्न न हूँगा। यदि तोते की
भांति चीनी ही तुम्हारे खानेकी चीज होगी; तो मैं अपने
सुखमय जीवनको तुम्हारे ही प्रतिपालन में खर्च करूँगा।
तुम्हारा वदमिज़ाज, नासमझ, गॅवार युवकसे पाला नहीं पड़ा
जो क्षण-क्षणमें अपने इरादे बदलता है, हर रातको नयी
जगह में सोता है और हरदिन नयी दोस्ती पैदा करता हैं।
जवान आदमी दिलचस्प और खूबसूरत होते हैं
; परन्तु
उनकी मुहब्बत कायम नहीं रहती। उनसे वफा की उम्मेद
न करो, जो वुलबुल की सी आँखों से कभी इस गुलाब की
माडी पर और कभी उस गुलाव की झाडीपर गाते फिरते
हैं। बूढ़े लोग जवानी की नादानी और चञ्चलता मे अपना
समय नहीं बिताते ; किन्तु दानाई और नेकचलनी मे अपना
वक्त लगाते हैं। अपनी अपेक्षा अच्छा आदमी ढूढो, जो
पा जाओ तो अपने तई भाग्यवान् समझो। क्योकि अगर
के साथ रहोगे ; तो तुम अपने जीवन में
उन्नति न कर सकोगे।" उसने कहा- "मैंने इसी तरह अनेक
बातें कहीं और मनमे समझा कि मैंने उसके दिलपर फतह
पाली है , इतने हीमें उलने, हृदय की तली से लद आह
खीच कर, जवाब दिया-'आपने जितनी अच्छी-अच्छी बातें
पही हैं, उन सवका मेरे विवार को तराज पर उतना वज़न
नहीं है, जितना कि उस एक वाक्य का जो मैंने अपने दाईले
सुना था अगर तुम किसी जवान औरत के पहलू में तीर
अपने समान मनुष्य
गुलिस्ता। क्या, लगाओ, तो उसे उस तीरसे इतना दुःख न होगा, जितना बूढे की सुहवत से।" उसने कहा-"बहुत बात बढ़ाने से हम दोनों आपस में राजी न हुए. और मनमें भेद होने के कारण दोनो अलग-अलग होगये।" कानूनी मीयाद पूरी होजाने पर,उसने एक तेज़मिजाज, बदचलन और कङ्गाल जवानके साथ विवाह कर लिया। नतीजा यह निकला, कि उसे मारपीट और दरिद्रताके दुःख भोगने पडे : तिसपर भी उसने अपने भाग्यकी सराहना की और कहा-"ईश्वर को धन्यवाद है, कि मैं नरक-यातना से चच गयी और मुझे चिरस्थायी सुख मिला। मैं तुम्हारे नखरों को बरदाश्त कर लूंगी, क्योंकि तुम खूबसूरत हो। तुम्हारे साथ नरकमे जलना अच्छा, पर बूढ़े के साथ स्वर्ग मे रहना अच्छा नहीं। खूबसूरत आदमी के मुंहसे निकली हुई प्याज की खुशबू भी अच्छी मालूम होती है लेकिन बदसूरत आदमीके हाथके गुलाब के फूल भी उतनी अच्छी नही मालूम होती।" . की खुशबू शिक्षा-बूढ़े को जवान स्त्री बहुत प्यारी मालूम होती है लेकिन जवान स्त्रीको बूढ़ा किसी तरह पसन्द नहीं पाता। बुढ़ापे में जो शादी करते हैं, उनकी बदनामी ही होते देखी जाती है। बूढ़ा आदमी सभी को बुरा मालूम होता है। जिसमें स्त्रियाँ तो यौवन, और की हो चाहने वाली होती हैं । रूप लावण्य छठा अध्याय। २६३ तीसरी कहानी। दि तो बजाये पिदर चे करदी खैर । ता हुमॉ चश्मदारी अज़ पिसरत ॥१॥ MLA यावक़ में, मैं एक अमीर बूढ़े आदमी का मिहमान था। उसके एक सुन्दर पुत्र था। एक रात उसने का कहा-"सारी उम्रमें सिवाय इस लड़के के मेरे और बच्चा न हुआ। इस स्थान के पास एक पवित्र वृक्ष है। लोग उसके पास अपनी अर्जियां देने जाते हैं। कितनी ही रातों, मैंने इस वृक्ष के नीचे ईश्वर की विनती की ; तब मुझे यह पुत्र प्राप्त हुआ।" मैंने सुना कि लड़का धीरे-धीरे अपने मित्रों से कह रहा था-"यदि मुझे वृक्षका पता मालूम हो जाय तो बड़ा आनन्द हो। उसके नीचे बैठ कर, मैं अपने पिताकी मृत्युके लिए ईश्वर से विनती करूं।" पिता अपने पुत्रकी बुद्धिमानी पर प्रसन्न हो रहा था, लेकिन लड़का अपने बाप की निर्वलता और वृद्धावस्था से घृणा करता था। पहुंत दिन हुए, तुम अपने पिता की स्त्र देखने नहीं गये जो अपने पितासे भप्तिपूर्वक व्यवहार नहीं करते, उन्हें अपने पुत्रोसे पद भाशा नदी रसना चाहिए कि वे उनकी सेवा करेंगे। A २६४ गुलिस्तां। तुमने अपने माता-पिताको क्या भक्ति दिखाई है, जो तुम अपने पुत्रसे आज्ञापालन की आशा करते हो?" शिक्षा-सा तुम्हारा दूसरोकेि साथ व्यवहार है, दूसरोंसे भी अपने लिए वैसे ही व्यवहार की प्राशा रक्खो, उमसे अच्छे व्यवहार की नहीं। चौथी कहानी। تيم अस्पे ताज़ी दोतक रवद वशिताव । उश्तर आहिस्ता मीरवद शवोरोज़ ॥१॥ क दफ़ा भरपूर जवानी मे, मैंने लम्बा सफ़र किया ए और रात के समय थक कर एक पहाड़ की तलहटी मे आराम किया। एक दुर्बल बूढ़ा आदमी काफिले के पीछे आया । उसने कहा-"तुम क्यो सोते हो? उठो, यह आराम करनेकी जगह नहीं है ।" मैंने उससे कहा-"मैं अपने पैरोंको विना काममे लाये आगे कैसे चल सकता हूँ ?” उसने जवाब दिया-"क्या तुमने यह कहावत नही सुनी है, कि दौड़कर चलने और थक जाने की अपेक्षा अरबी घोड़ा २-४ कोस दौड लगा सकता है पर ऊँट धीमी चालसे रात-दिन चला करता है । A छठा अध्याय। आगे बढ़ना और ठहर जाना अच्छा है ?" तू जो अपने मुकाम पर पहुंचना चाहता है जल्दी न कर। मेरी नसीहत सुन और सत्र करना सीख। अरवी घोड़ा पूरी तेज़ी से दो- चार दौड़ें लगा सकता है, लेकिन ऊँट धीरे-धीरे दिन और रात सफर करता है। शिक्षा-उसी काम मे उनति होती है, जो चाहे कम हो पर हो नियमपूर्वक । - - पाँचवीं कहानी। मूये वतलवीस सियाहकर्दा गीर । रास्त न ख्वाहद शुदन ई पुश्तकूज ॥१॥ मारी प्रसन्नमण्डली मे, एक प्रसन्नवदन युवक था। रख उसके दिलमे किसी तरह न घुस सकता था। और हँसी उसका मुंह न बन्द होने देती थी। उसले मेरी मुलाकात हुए बहुत दिन हो गये थे। कुछ रोज़ पाद. मैंने उसे पीरी और बच्चे सहित देखा। उसका हसना hc 3 सो पार कारे करके तु लोगोयो धोखा नहीं दे म्फानोसेरी मसी समर मेरे हलाको माफ दता रही है-उसया क्या इलाज नने सोचा है?
२६६
गुलिस्तां ।
खिलकना चन्द हो गया था और उसकी सूरत बहुत कुछ
बदल गई थी। मैंने उससे पूछा कि क्या हाल है। उसने
जवाव दिया-"मैंने बच्चोंका वाप हो जाने पर, बच्चोकासा
खेल छोड़ दिया।" जब तुम वृद्ध हो जाओ, तब छिछोरपनको
छोड़ दो और जवानो के साथ हंसी-सज़ाक़ करना बन्द कर
दो। बूढ़े हो जानेपर, जवानीकीसी जिन्दादिली की आशा
न करो ; क्योकि नदी फिर अपने निकास की ओर नहीं
लौटती। जबकि अनाज का खेत काटने लायक हो जाता
है, तब वह हवामे इतने ज़ोर से नहीं
हिलता, जितना कि
वह हरा रहने के समय हिलता था। जवानी का समय वीत
गया है। अफ़सोस ! वे दिन जो दिलको जिन्दा करते
थे, कहाँ गये! शेरने अपने पजे का बल गंवा दिया है और
मैं बूढ़े तेन्दुए की तरह ज़रासी पनीरसेही राज़ी रहता
हूँ। । एक बुढ़िया ने अपने बाल रङ्ग। मैंने उससे कहा-
ऐ मेरी छोटी बूढी माँ ! तुमने अपने बाल तो काले कर लिये
हैं; लेकिन तुम अपनी झुकी हुई कमर को सीधी नही कर
सकती।"
शिक्षा-अवस्थानुकूलही सब बातें शोभा देती हैं।
छठा अध्याय। छठी कहानी। ए गर ज अहद खुर्दियत याद अामदी। के वेचारा वूदी दर आगोश मन ॥१॥ नकरदी दरी रोज वर मन जफ़ा । के तू शेर मरदी व मन पीर जन ॥२॥ क दिन जवानी की नादानी के कारण, मैं अपनी मां से तेजी से वोला। मेरी बातसे माँ का दिल SRIES दुःखी हुआ। दुःखी हुआ। वह एक कोने में बैठ कर रोने और कहने लगी-"क्या तुम उन सव कष्टोंको भूल गये, जो तुमने मुझे यवपन में दिये थे ? भूल जाने के कारणसेही, तुम मुझ से ऐसा चुरा व्यवहार करते हो।" उस बूढी ने जब अपने बेटेको शेरके वशमें करने योग्य और हाथीके समान चल्यान् देखा, तब उसने फ्याही अच्छी बात कही-"अगर तुम्हें अपने बचपन का समय याद होता, जवकि तुम बसी की हालत में मेरी गोदमे पड़े रहते थे, तो तुम मुझसे ऐसा फटा वर्ताव न करने। अब तुममें शेरकोली ताकत है और यूढी औरत हूँ।" शिक्षा-माता के पुत्र पर अप्पयामाम है। जो पुत्र माता को कष्ट देते यसपाय मारकी जीव है । जान लटयो । यदि तुझे अपना दचपन याद होना मो तू मेरे ऊपर पररा पार न करता । रम समर त दसी की हालत में मेरी गोदने काटा था। पर मदत शेर और * दम टी।
२६८ गुलिस्ताँ। ANAN सातवीं कहानी। ए ܙܦ व दीनारे चो खर दर गिल वमानन्द । दर अलहमदे वस्वाही सद बवानन्द ॥१॥ EAST क धनवान् क स का बेटा बीमार था। उसके मित्रने कहा,-"या तो तुम कुरान का आदिसे अन्त तक पाठ करवाओ या बलिदान दो ; जिससे ईश्वर तुम्हारे बेटेको आराम कर दे।" उस कङ्ग्स थोड़ी देर तक विचार कर कहा-"कुरान पढ़ना अच्छा है, क्योकि वह पासही है, लेकिन भेड़ो का झुण्ड दूर है।" एक साधूने यह बात सुनकर कहा-"वह कुरानका पढ़ना इस लिए पसन्द करता है, कि उसके शब्द उसको जीभ की अनीपर हैं, लेकिन रुपया उसके दिलके अन्दर है। अफसोस ! अगर कोई धर्मका काम खैरातके साथ होता है तो लोग दलदलमें फंसे हुए गधेकी तरह रह जाते है , लेकिन यदि केवल कुरान के पहले अध्यायके पाठ करनेकी आवश्यकता होती है तो वे उसके सौ पाठ कर डालते हैं।" शिक्षा-धर्म के जिस काममें पैसा खर्च न हो, उसे लोग बड़े चावसे करते है, पर जहाँ पैसे का प्रश्न उठता है वहां उनका मुंह सूख जाता है । --- कंजूस श्रादमी दान करते समय कीचड़ में गधेकी तरह किंकर्तव्य - विमूढ हो जाता है पर किसी स्तोत्रके पाठके लिए वह तय्यार रहता रा 1
दूसरा अध्याय ।
२६६
आठवीं कहानी।
**
PRESE गोंने एक बूढ़ेसे पूछा-"तुम शादी क्यों नहीं
लो
करते ?” उसने जवाब दिया-"मुझे बूढी औरत
DERI पसन्द नहीं है।" लोगोंने कहा-"तुम्हारे पास
तो माल है, तुम जवान औरतसे शादी कर सकते हो।" उसने
जवाब दिया-"जब मैं बूढ़ा होकर बूढ़ी औरत को पसन्द
नहीं करता ; तब मैं किस तरह आशा कर सकता है कि
जवान औरत मुझसे मुहब्बत करेगी ?"
शिक्षा-यहो यात अच्छी हे जिसे हम अच्छी समझते हैं। जब यह
नियम है तब यह भी नियम होना चाहिए कि वही वात बुरी है जो दुःखद है,
चाहे दूसरे के लिएही हो।
.
गुलिस्ता। नवीं कहानी। तुरा के दस्त वलरजद गुहर चे दानी सुफ्त ॥१॥ ने सुना है, कि एक दुर्बल बूढ़ेने बुद्धिके नाश होनेके कारण विवाह करनेका विचार किया। P36 उसने गौहर नामकी खूबसूरत लड़की से, जो रत्नों के डब्बो की भाँति लोगो को नज़र से छिपा कर रक्खी गयी थी, शादी की। विवाह-कार्य बड़ो ख बी और ठाटबाट से पूरी किया गया। थोड़े दिन वादही उसने अपने मित्रों से शिकायत करनी शुरू की कि उस गुस्ताख लड़की ने मेरे कुल का नाम डुबो दिया है। उन दोनो मे ऐसा झगड़ा उठ खड़ा हुआ, कि अन्तमे वह मामला पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट काजी के सामने पहुंचा। यह हाल देखकर सादीने कहा-"इस मामलेमे लड़की का कोई दोष नहीं है। तुम कांपते हुए हाथो से मोतीमे छेद किस तरह कर सकते हो?" शिक्षा-क्या खब, मणिकाञ्चन संयोगही ठीक है। "तू कांपते हुए हाथोंसे मोतीको नहीं छेद सकता।"
सातवाँ अध्याय। शिक्षाका फल । पहली कहानी। ख़रे ईसा गरश ब मक्का बरन्द । चू बयायद हनोज़ ख़र बाशद ॥१॥ सी वज़ीरके एक मूर्ख लड़का था। उसने उसे कि शिक्षा दिलाने की इच्छा से एक पण्डित के पास भेजा। उसे आशा थी कि शिक्षासे उसकी योग्यता बढ़ जायगी। कुछ दिन शिक्षा देनेपर, जव कुछ फल न हुआ, तव पण्डित ने उसके पास यह ख़बर भेजी-"तुम्हारे पुत्रमें बिल्कुल योग्यता नही है। उसने मुझे करीब-करोव हैरान कर दिया है। जब ईश्वर योग्यता देता है, तब शिक्षा का फल होता है। जो लोहा अच्छा नही होता, वह पालिश -- ईसाका गधा मक्का जाकर भी गधाही रहता है।
२७२
गुलिस्ता।
करनेसे भी अच्छा नही हो सकता। कुत्तेको सात नदियों में
स्नान न कराओ; क्योंकि वह जब भाग जायगा तो और भी
मैला हो जायगा।
अगर वह गधा जो ईसा मसीह को ले
गया था, मक्के को लाया जाता तो लौटने पर वह गधेका गधा
ही रहता।
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
दूसरी कहानी।
an
.
EASEAR क विद्वान् अपने पुत्रोको इस भाँति उपदेश दे
रहा था-"मेरे प्यारे बच्चे! ज्ञान प्राप्त करो,
SUESTRA क्योंकि सांसारिक धन-दौलत और मिलकियत
का कुछ भरोसा नहीं है; ओहदा तुम्हारे खास मुल्क के
सिवा और जगह किसी काम न आवेगा सफ़र
मे
दौलतके खो जानेका भय रहता है ; सम्भव है कि या तो चोर
उसे
चुरा
ले जायें अथवा धनका मालिक उसे धीरे-धीरे खा
डाले। लेकिन 'ज्ञान' रूप धन कभी नष्ट न होनेवाला झरना
अगर शिक्षित मनुष्य धनवान् न हो, तो उसे दुःखी न
होना चाहिये, क्योंकि 'ज्ञान' स्वयं धन है। विद्वान् जहाँ
जहां जाता है, उसका वहीं आदर होता है, और वह सर्वोच्च
,
सातवां अध्याय।
२७३
स्थान पर बैठता है, किन्तु मूर्ख को सिर्फ थोडासा स्थान
मिलता है और वह मुसीबत उठाता है। हुकूमत करनेके
वाद, हुक्म माननेके लिए लाचार किये जानेसे बड़ा कष्ट होता
है। जो सदा से लाड़-प्यार में रहा है, वह दुनिया का कड़ा
बर्ताव सहन नहीं कर सकता।"
एक समय दद्मश्क में गदर हो गया। लोगोंने अपने
घर छोड़ दिये। किसी किसानके बुद्धिमान लड़के वादशाह
के वज़ीर हो गये और वज़ीर के मूर्ख लड़के ऐसी हीनावस्था
को पहुँच गये कि गली-गली में भीख मांगने लगे।
तुम्हें वापकी बपौती की दरकार हो, तो, अपने बापका इल्म
हासिल करो; क्योंकि बाप की दौलत तो दस दिनमेंही स्वर्च
हो जा सकती है।
शिक्षा -सब धनोंकी अपेक्षा विद्याधनही अष्ट है-श्रतएव सापको
प्राप्त करनेके लिए प्राण-पणसे चेष्टा करनी चाहिए।
अगर
.
सा
सरदा
हाँ,
स
१८
२७४ गुलिस्ता। तीसरी कहानी। तब उसने . चोबे तररा चुनॉके ख्वाही पेच । न शवद खुश्क जुज़ व आतिश रास्त ॥१॥ क विद्वान् किसी राजा के लड़के को पढ़ाया करता ए था। वह उस राज-पुत्रको निर्दयता से पीटता और उसके साथ बहुतही सख्ती से पेश आता था। लड़के से जब ऐसा कड़ा बर्ताव न सहा गया अपने वापसे शिकायत की और अपने कपड़े उतार कर चोटके निशान दिखाये। राजा के दिलमें दुःख हुआ। उसने शिक्षक को बुलाया और कहा-"तुम मेरे लड़केके साथ ऐसी निर्द- यता का बर्ताव करते हो, जैसा मेरी प्रजाओके लड़कोंके साथ भी नहीं करते। इसका क्या सबब है?" शिक्षक ने उत्तर दिया-"योग्यता के साथ बात-चीत करना और वित्त प्रसन्न करने वाला नम्र स्वभाव रखना, साधारणतया सभी मनुष्योमें होना चाहिए ; परन्तु राजाओंमे इसकी विशेष आवश्यकता है ; क्योकि राजा लोग जो कुछ करते या कहते है, वह प्रत्येक मनुष्य की ज़बान पर रहता है ; किन्तु साधारण मनुष्यो की वाते और उनके कार्य इतने महत्त्व के नहीं होते। अगर an गीली लकड़ीको जितना चाहे मोड़ सकते हो- सूखीको नहीं । सूखी हुई लकडीको झुकाने के लिए भागमें देनेकी जरूरत पड़ती है । --
सातवां अध्याय ।
२७५
कोई फ़कीर एक सौ अनुचित काम भी करे ; तो उसके साथी
उनमेंसे एक पर भी ध्यान न देंगे; लेकिन अगर राजा एक
भी अनुचित काम करे, तो उसकी चर्चा अनेक राज्योंमें फैल
जायगी। अतः राज-पुत्रों का चरित्र-गठन करने में नीच
लोगों की अपेक्षा उनपर अधिक परिश्रम का भार डालना
और उन्हें अधिक कष्ट देना ज़रूरी है। जिसे बचपनमें सत्
चरित्र की शिक्षा नहीं मिलती, उसमें बड़े होनेपर कोई अच्छा
गुण नहीं होता। हरी लकड़ी को जितना चाहो उतना मोड़
सकते हो, पर सूख जाने पर वह सीधी नही हो सकती।
यह बात सत्य है, कि नाजुक डालियों को मनुष्य बट सकता
है; किन्तु सूखी लकड़ी को सीधी करनेकी कोशिश करना
व्यर्थ है।" राजाने शिक्षकके भले उपदेश और उसके व्याख्यान
देनेके ढंगको पसन्द करके उसे खिलअत और इनाम दिया
एवं उसकी पदवृद्धि की।
शिक्षा-शिक्षक का अदब करना जरूरी है यही बात इस कहानीसे
निकलती है। किन्तु आज-कल मारपीट कर पढ़ानेका सिद्धान्त दूषित समझा
जाता है। शिक्षकों का वह गुण अनुकरणीय नहीं।
--
Sir.
२७६
गुलिस्ता।
चौथा कहानी।
बर सरे लौह ओ नविश्तह बज़र ।
जौरे उस्ताद बह जे मेहरे पिदर ।।
ने अफ्रिका में एक पाठशालाका शिक्षक देखा।
IN उसकी सूरत घिनावनी और उसकी ज़बान कड़वी
धमा थी। वह मनुष्यता का वैरी था और नीचस्वभाव
और क्रोधी था। उसकी सूरत देखने से मुसलमानो की खुशी
हवा हो जाती थी और उसके कुरान पाठ करने से मनुष्यों का
मन विचलित हो उठता था। कुछ सुन्दर लड़के और कुछ
नाजुक कन्याएँ उसकी अत्याचारी-भुजाके अधीन थीं। वे
सब उसके सामने हंसने और बोलनेका साहस न करते थे।
क्योंकि वह कभी किसी के चाँदीसे वमकदार गालों को नोच
लेता और कभी किसीके बिल्लौर के समान सुन्दर टाँगों को काठ
में बन्द कर देता था।
बहुत किस्सा बढ़ाना ठीक नहीं। मैंने
सुना
है, कि जब
लोगोंको उसका यह हाल मालूम हुआ, तब उन्होंने उसे मार
हीट कर निकाल दिया। पाठशाला को एक अच्छे धार्मिक
वह वात सोनेके अक्षरों में लिखी जाने योग्य है कि मा-वापके लाइसे
शिक्षककी ताड़ना अच्छी है।
सातवां अध्याय ।
२७७
मनुष्य के सिपुर्द किया। वह बहुतही नम्र और सहनशील
था। वह लाचारी के सिवा कभी एक शब्द भी न बोलता
था। उसकी जु वान से कोई ऐसी बात न निकलती, जिससे
किसीको दुःख होता। लड़कोंके सिरसे पहले शिक्षक का
भय निकल गया। नये शिक्षक को देव-स्वभाव का आदमी
समझ कर, वे एक दूसरेसे लड़ने-झगड़ने लगे। उसकी
सहनशीलताका भरोसा करके उन्होंने पढ़ने-लिखने से ध्यान
हटा लिया। वे लोग अधिकांश समय खेल-कूदमें लगाने
लगे। और अपनी कापियाँ विना पूरी कियेही एक दूसरेके
सिरपर अपनी तख्तियाँ तोड़ने लगे । जब शिक्षक शिक्षा
देनेमें ढोला रहता है, तब लड़के वाज़ार मे जाकर कबड्डी
खेला करते हैं।
एक पखवारेके बाद, मैं मसजिद के फाटक के पास होकर
निकला और देखा कि लोगोंने उसी पुराने शिक्षक को उत्सा-
हित करके उसकी पुरानी जगह पर नियुक्त कर दिया है।
सच बात तो यह है कि मुझे बड़ी चिन्ता हुई और मैंने
ईश्वर को पुकार कर कहा-"लोंगोंने फ़रिश्तोंके लिए फिर
से दुवारा शैतान शिक्षक क्यों मुकर्रर किया है ?” एक अनु-
भवी बूढा आदमी मेरी बात सुनकर हंसा और कहने लगा-
"क्या तुमने यह वात नही सुनी ? एक राजाने अपने पुत्र
को पाठशाला मे भेजा और चांदी की तख्ती उसकी बग़लमें
दे दी। तस्तीपर सामनेही सुनहरी अक्षरोंमें यह लिखा
૨૭૮ गुलिस्तां। हुआ था-"वापके लाड-प्यार से उस्ताद की सख़्ती बेहतर।" शिक्षा-निस्सन्देह लाढ़-प्यारसे बच्चे बिगढ़ जाते हैं, पर मारने पीटने से भी लड़कों में अनेक दुर्गुण पैदा होते हुए देखे गये हैं। पाँचवीं कहानी। दरख्त अन्दर वहारा वरफ़िशानद । जमिस्तॉ लाजरम वेबर्ग मानद ॥१॥ क धार्मिक मनुष्य का पुत्र, चचाके मरनेपर उसके विपुल धनका अधिकारी होकर, बड़ाही खर्चीला ल और अय्याश हो गया। ऐसा कोई पापही न था जो उसने न किया हो और ऐसा कोई नशा न था जो उससे बचा हो। एक बार मैंने उससे उपदेशके तौर पर यह कहा- "पुत्र ! दौलत बहती हुई नदी के समान है और सुख चक्की के पाट की तरह घूमता है। बेहिसाब ख़र्च करना उसेही शोभा वसन्त ऋतु, जो दरख़्त फूलोंसे लदा रहता है, जामें उसपर एक पत्ता भी नहीं रहता ।
सातवां अध्याय। २७६ देता है, जिसको कुछ आमदनी हो। जबकि तुम्हारी आमदनी का ज़रिया न हो; तब खर्च करने में किफायतशआरी से काम लो। मल्लाह लोग एक गीत गाया करते हैं। उसका मत- लब यह है-अगर पहाड़ों पर पानी न बरसे, तो दजला नदीमें एक सालमेंही बालूही बालू होजाय । बुद्धिमानी और सच्चरित्रता से काम करो और भोगविलासको छोड़ो; क्योंकि जब तुम्हारा धन खर्च हो जायगा, तब तुम विपद् में फंसोगे और लजित होगे।" वह जवान गाने-बजाने और शराव- खोरीमें ऐसा भूला हुआ था, कि उसने मेरी नसीहत पर कान न दिया, किन्तु मेरी बातों के विरुद्ध यह कहा- भविष्य के भयसे, वर्तमान सुख-चैन में बाधा डालना महात्माओं के ज्ञानके विरुद्ध है। जिनके पास धन हो, वे दुःखकी आशा करके कष्ट क्यों सहें। ऐ मेरे मनोमोहन मित्र! कल क्या होगा, उसके लिए हमें आज दुःखित न होना चाहिए। उदारता के उच्चतम स्थानपर बैठा हूँ और मैंने दातारी से दोस्ती करली है, इससे मेरी दानशीलता की चर्चा सव लोगों की वात-चीत का मुख्य विषय है, तव मेरे लिए वैसा करना किस तरह मुनासिव है ?" जव कि मनुष्यने उदारता और दानशीलता में नाम कमा लिया है तब उसे अपनी थैलियोंका मुंह चन्द रखना शोभा नहीं देता ; जव कि गली-भरमें तुम्हारी नेक नामी फैल गई हो ; तव तुम अपना दरवाज़ा बन्द नहीं रख सकते। मैंने ।
२८० गुलिस्ताँ। HINA whhron. देखा कि उसे मेरा उपदेश नही भाया और मेरी गर्म सांसने उसके शीतल लोहेपर कुछ भी असर नहीं किया ; तब मैंने उसे उपदेश देनेसे अपना मुंह मोड़ लिया और उसका साथ छोड़कर निरापद स्थान में लौट आया। अक्लमन्दोने कहा है-"लोग तुम्हारी बाते सुनें या न सुनें इससे तुम्हारा कुछ भी सम्बन्ध नहीं है , लेकिन उपदेश देना तुम्हारा कर्तव्य है। अगर तुम जानो कि लोग तुम्हारी बातें न सुनेंगे तोभी जो अच्छा समझो वह अवश्य कहो। तुम शीघ्रही देखोगे, कि उस मूर्खका पैर काठमें बन्द है और वह हाथ मल-मलकर कहता है-अफसोस! मैंने अक्लमंद आदमीकी नसीहत पर ध्यान न दिया।" कुछ जैसा मैंने कहा था, वैसाही हुआ। वह चीथड़े लपेटे हुए रोटी के टुकड़े मांगता फिरता था। मुझे उसकी दुर्दशा देखकर बड़ा दुःख हुआ। मैंने उस फकीरके घावपर नमक मलना या उसे बुरी-भली बातें कहकर दुःखित करना ना-मुनासिब समझा। लेकिन मैंने अपने दिलमें कहा,-"दुराचारी लोग जब आनन्दमें मस्त रहते हैं, तब उन्हें कङ्गाली के दिनो का ख्याल नहीं आता । जो वृक्ष गरमी के मौलम में फलोंसे लदा-भरा रहता है, उसमे जाड़े के दिनो मे पत्तियाँ भी नहीं रहतीं।" शिक्षा-इस कहानी से यह नसीहत मिलती है, कि मनुष्य को सदा अपनी आमदनी देखकर खर्च करना चाहिए; जो देख-समझकर खर्च नहीं करते, समयके बाद, 4 - सातवाँ अध्याय। २८१ वे एक दिन महा दुःख भोगते हैं। अगर जमा किया हुधा धन हिमालय पर्वत के बराबर हो , तोभी वह बरावर खर्च करते रहने से एक दिन बिल्कुल चुक जायगा । जिप्स कुएँ में पानीका सोता न हो, अगर उससे हम जान निकालेही जाय तो वह एक दिन रीता हो जायगा। जिनके अस्सी की भामदनी और चौरासी का खर्च होता है, उनका एक न एक दिन दिवाला अवश्य निकलता है और जो बाप-दादे की दौलत को दिल खोलकर उड़ाते है और आप एक कौड़ी भी नहीं कमाते, वे एक दिन रोटी के टुकड़ों के लिए दर-दर मारे-मारे फिरते हैं। १ २८२ गुलिस्तां। ए छठी कहानी। Home गर्चे सीमो ज़र जे संग प्रायद हमी । दर हमा संग न बाशद जरोसीम ॥१॥ क दिन एक बादशाह ने अपने लड़के को एक 0 शिक्षक को सौंपकर कहा,-"यह आप का पुत्र है। इसे अपनेही पुत्र की तरह शिक्षा दीजिए।" शिक्षक ने एक वर्षतक उसके साथ मेहनत की, परन्तु फल कुछ न हुआ; लेकिन उसके खुद के लड़के विद्या और गुणोंमें परिपूर्ण हो गये। वादशाहने उसे डांटकर कहा-"तुमने अपना वादा तोड़ दिया और नमकहरामी का है। शिक्षक ने जवाब दिया-“ऐ वादशाह ! मैंने सबको एकही तरह शिक्षा दी थी किन्तु सबका जेहन एकसा नहीं था। यद्यपि सोना और चांदी दोनों पत्थरों में पाये जाते हैं; नथापि ये दोनों धातुएँ प्रत्येक पत्थर मे नहीं मिलती। अगस्त का तारा तमाम दुनिया पर चमकता है, किन्तु खुशबूदार चमडा यमनसेही आता है।" शिक्षा-इस हानी का यह मारांश है, कि योग्यता मभीमें नहीं काम किया मोने और चांदीकी गान कहीं परही होती है; हर एक पदाद पर गोना और चाँदी नदी मिलना।
सातवां अध्याय। २८३ होती। जिनमें स्वाभाविक योग्यता होती है, वही सब कुछ सीख सकते हैं। जिनमें स्वाभाविक बुद्धि नहीं होती, उनको विधा महीं आती। सातवीं कहानी। मेरा कुनोपिन्दारि ऐ नाचीज़ हिम्मत । के ख्वाहद करदनत रोजी फरामोश ॥१॥ P ने सुना है, कि एक विद्वान् बूढ़ा आदमी अपने मैं चेलोंमें से एकसे कह रहा था-"आदमी अपने o दिलको जितना सासारिक पदार्थों में फैलाता है। अगर उतना ईश्वरमे फंसावे तो वह देवताओं से भी बढ़ जब तुम गर्भ में थे, जब तुम्हारे हाथ-पांव भी नहीं बने थे, तब भी ईश्वर तुम्हें नहीं भूला। उसने तुममें जीव डाला और तुम्हें विवेचना-शक्ति, प्रकृति, बुद्धि, सुन्दरता, बोली और इन्द्रिय-सान दिया । उसने तुम्हारे हाथोंमें दस अंगुलियाँ और कन्धों पर दो भुजाएँ लगायीं। ऐ नालायक!क्या तू ऐ नाचीज हिन्मत! ऐसा मत नमम कि वर तेरी रोजी बन्द कर जावे। . देगा।
२८४ गुलिस्तां । समझता है कि वह तुझे तेरा दैनिक भोजन-रोजका खाना भी न देसा। शिक्षा-मनुष्य को अपने पेट के लिए कदापि न घबराना चाहिए। पैदा करनेवाले भगवान् सबकी खबर रखते हैं। वह कीड़ो को कम और हाथी को मन पहुंचाते हैं। मनमें समझना चाहिए कि जिसने चोंच दी है वह क्या चुग्गा न देगा। किसीने क्या खूब कहा है--"जब दाँत नहीं तव दूध दियो, अब दांत भये तो क्या अन्न न देहैं।" आठवीं कहानी। वा अजीजे नशिस्त रोजे चन्द । लाजरम हम चो ओ गिरामी शुद ॥१॥ ने एक अरव को देखा जो अपने बेटेसे यह कह रहा था-"ऐ मेरे बच्चे ! कयामत के दिन तुमसे टा. यह पूछा जायगा कि तुमने दुनिया में क्या किया; लेकिन यह कोई न पूछेगा कि तुमने किसके यहाँ जन्म में --- . योग्य पुरपर पाम कुली दिन बैठकर मनुष्य योग्य बन जाना सातवां अध्याय। २८५ . लिया। यानी वे लोग तुमसे तुम्हारे गुणोके विषयमे पूछेगे किन्तु तुम्हारे चाप विषयमें न पूछेगे। वह कपड़ा जो कावे पर ढका रहता है और जिसे लोग चूमते है रेशमी होने के कारण प्रसिद्ध नहीं है। उसने कुछ रोज़ एक आदरणीय पुरुष का सङ्ग किया है ; इसीसे वह उसी पुरुष की भांति हो गया है।" शिक्षा-इस कहानी का सारांश यह है, कि संसार में तुमोंका मान होता है, किन्तु वंशको कोई नहीं पूछता । नवी कहानी। है हर के बा अहले खुद वफ़ा न कुनद । न शवद दोस्त रूये दानिशमन्द ॥१॥ ॐ हात्माओं ने लिखा है, कि विच्छू अन्यान्य जीवोंकी म तरह पैदा नहीं होते। वे अपनी मा की अत- ड़ियों को खा जाते हैं। और पेट फाड कर जङ्गल को निकल भागते हैं। चिच्छू के विलमें चमड़ा पाया जाता जो मनुष्य आत्मीय जोंक साप अच्छा वर्ताव नहीं करता, उसे 'अच्छे पाती भित्र नमी बनाते। - २८६ गुलिस्ताँ। है वही इस बातके सबूतके लिये काफ़ी है। मैंने यह असा- धारण बात एक बुद्धिमान् से कही। उसने कहा- "इस बात का सच्चा प्रमाण मेरे दिलमे है। वह किसी तरह झूठा नहीं हो सकता । बचपनमे, वे अपने मा-बाप से ऐसा बर्ताव करते हैं इसीसे बड़े होनेपर लोग उनको इतना नहीं चाहते हैं। ( उनको देखते ही मार डालते हैं)। एक पिताने अपने पुत्र को उपदेश देते हुए कहा-'ऐ जवान, इस नसीहत को याद रख, कि जो शख्स अपने आदमियो का कृतज्ञ नहीं होता उसका भाग्य कभी नही चेतता।' किसीने एक बिच्छू से पूछा कि तुम जाड़े में बाहर क्यों नहीं निकलते ? उसने जवाब दिया—मै गरमी में क्या नाम पैदा करता हूँ, जो जाड़े मे बाहर निकलूं। शिक्षा-इस कहानी का सारांश यह है, कि मनुष्य को अपने जनक- जननी के प्रति कदापि प्रकृतज्ञ न होना चाहिये। जो अपने माता-पिताके कष्टोंको भूल जाते हैं, उनपर ज़ोर-जुल्म करते हैं, उन्हे तरह-तरह की पीड़ाएँ देते है, वे कभी सुखी नहीं होते। किन्तु जो माता-पिताके कृतज्ञ है, उनको हर तरह सुख देते है, वे सदा मुख भोगते हैं और लक्ष्मो भी उनका साथ देती है। मातापिता संसार में सबसे अधिक प्रतिष्ठा और मान पानेके अधि- कारी है वे जीवन्त देवता है।
सातवां अध्याय। २८७ दसवीं कहानी। - जनाने वारदार ऐ मर्द हुशियार । अगर वक्ते विलादत मार जायेंद ॥ अजॉ बेहतर के नज़दीके खिरदमन्द । के फ़र्ज़न्दाने नाहमवार जायेन्द ॥२॥ क साधु की स्त्री गर्भवती थी। बच्चा होने का दिन बिल्कुल नज़दीक आ गया था। साधु जिसके कि अब तक कोई पुत्र न हुआ था वोला,-"अगर सर्व- शक्तिमान ईश्वर मुझे पुत्र देगा तो मैं अपना सर्वस्व दान कर दूंगा; केवल धार्मिक पोशाक अपनी पीठ पर रक्खू गा।" ईश्वर की कृपासे उसकी स्त्रीके पुत्र पैदा हुआ; इससे वह बड़ा खुश हुआ और उसने अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार अपने मित्रो को भोज दिया। कुछ वर्ष वाद, जब मैं दमश्क की यात्रा से लौटा , तव उस साधुके घरकी तरफ़ होकर निकला और पूछा कि साधु का क्या हाल है। लोगोंने कहा कि वह नगरके जेलखानेमें कैद है। मैंने इसका कारण पूछा। लोगोंने कहा-"उसके पुत्रने शराब पीकर झगड़ा-फ़िसाद किया . । पुन जनने की अपेक्षा जननी यदि सर्प जने तो दुद्धिमान् उसको प्रश्न समाता।
.
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aut
सातवां अध्याय ।
२८६
समझ
करनेके उद्योग में लगा रहना है ।" उसने और कभी
कहा-"जिसमें यह बात नही होती, उसे विद्वान् पूर्णवयस्क
नहीं समझते। एक पानी के बूंदने चालीस दिनतक
पेटमें रहकर मनुष्य का रूप प्राप्त किया। लेकिन अगर
किसी वयस्क मनुष्य
में और सच्चरित्रता न हो, तो उसे
मनुष्य न कहना चाहिये। जवानी वह है जिसमे उदारता
और परोपकारिता हो। यह न समझो, कि स्थूल रूपका
नामही जवानी है। जवानीमे धर्मकी भी आवश्यकता है।
मनुष्य की मूर्ति महलके फाटकपर सिन्दूर और जंगाल से
बनायी जा सकती है। गुण, धर्म और परोपकारिता-हीन
मनुष्य में और दीवार के चित्रमे क्या फ़र्क है ? संसारी धन
प्राप्त करना बुद्धिमानी का काम नही है ; परन्तु पराये एक दिल
को भी मोहित कर लेना निस्सन्देह बुद्धिमानी है।"
शिक्षा-विया-बुद्धि होन मनुष्य महाराज भतृहरि के शब्दोंमें "पुच्छ
विपाणहीन" पशु है।
AN
गुलिस्ता।
२६०
बारहवीं कहानी।
बेचारा खार
मी खुरद
ए
हाजी तो नेस्ती शुतरस्त अज़ बराये श्रॉके ।
व बार मी बरद ||१||
क साल, मक्के को पैदल जाने वाले यात्रियों में
झगड़ा हुआ। मैं भी उन्हीं लोगों से था। वे लोग
एक दूसरे पर दोष लगा रहे थे। अन्तमें मैंने उन
का झगड़ा मिटा दिया। मैंने एक मनुष्य को घास के बिछौने
पर यह कहते सुना-"कैसे अचम्भे की बात है, कि शतरज
के खेल में हाथोदाँत के मोहरे शतरज के मैदान को पार
करके वज़ीर (फ़रज़ी ) बन जाते हैं, परन्तु मक्के के पैदल
यात्री तमाम जंगल पार करके पहले से भी बुरे हो गये हैं।
उस हाजीसे, जो अन्य जीवोंके चमड़े को चीरकर टुकड़े-टुकड़े
करता है, मेरी यह बात कह दो, कि तू वैसा सम्या यात्री
नही है जैसा कि ऊँट, जो भटकटैया-काँटे-खाता है और
बोझ ढोकर चलता है।"
शिक्षा-चाहे मक्के जानो, चाहे कावे दर्शन परो, जब तक तुम्हारा
दिल साफ न होगा, जबतक तुम्हारे दिलसे ईर्ष्या, द प और क्रोध वादि म
जिस हाजीमें दया आदि सद्गुण नहीं है उससे वह ऊँट अच्छा है जो
काटे खाकर बोझ ढोता है।
सातवां अध्याय ।
२६१
निकल जायेंगे, तबतक तुम्हारा उक्त पवित्र स्थानों में यात्रा करमा व्यथ है।
उसोकी तीर्थ यात्रा सफल है, जो ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, मत्सरता भादि को छोड़
देता है। लेकिन भाजकल ऐसे सच्चे यात्री बहुत कम हैं।
-
तेरहवीं कहानी।
++
क हिन्दुस्तानी दूसरोंको पटाखे बनाने लिखा
रहा था। एक बुद्धिमान आदमीने उससे कहा-
"यह खेल तुम्हारे लायक नहीं है ; क्योंकि तुम
सरकी फे बने हुए मकान में रहते
हो। जवतक तुम्हे यह
विश्वास न रोजाय कि बात बिलकुल टीफ है, तब तक न
पोलो और जिस प्रश्न का मन-वादा उत्तर मिलने की आशा
न हो, उसे मत पूछो।
२६२ गुलिस्ता। चौदहवीं कहानी। 16 बोरियाबाफ़ गर्चे वफ़न्दा अस्त । नबरन्दश वकार गाहे हरीर ॥१॥ RASIENE क छोटा आदमी आँखो के दर्दसे दुःखी होकर नए सालोत्री के पास गया और उससे आँखोमें दवा जाओ। । SERS लगाने के लिए कहा। सालोत्री ने उसकी आँखो में वही दवा लगादी जो वह चौपायो की आंखो मे लगाया करता था। आदमी अन्धा हो गया। उसने मैजिष्ट्रट के पास नालिश की। मैजिष्ट्रटने कहा-"निकल उसका कुछ अपराध नही है। अगर यह आदमी गधा न होता, तो सालोत्रीके पास न जाता।" इस कहानीका यह मतलब है, कि जो कोई नातजरुबेकार आदमी को भारी काम सौंपता है, वह पछताने के सिवा अक्लमन्दोकी नज़रमे बेवकूफ़ ठहरता है। होशियार और अक्लमन्द आदमी अयोग्य मनुष्य को भारी काम नही सौंपते। चटाई बनानेवाला यद्यपि बीननेवाला है ; तथापि वह रेशम के कारखानेमें मुकरर नहीं किया जाता। शिक्षा-इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है, कि जो आदमी जिस बोरिया विननेवाला भी विनना जानता है किन्तु उसे रेशम विननेका काम नहीं सौंपा जा सकता। -- सातवां अध्याय। २६३ कामको जानता हो, उसे उसी काममें लगाना चाहिये । जो खस अयोग्य भादमो के हाथमें बढ़ा काम सौंपते हैं, वे अन्तमें पछताते और अपनी लोग- साई कराते हैं। पन्द्रहवीं कहानी। उस ली बड़े आदमी का एक योग्य पुत्र मर गया। कि लोगोंने पूछा कि उसकी कुत्र पर क्या लिखवाना Prera चाहिये। बापने जवाब दिया,-"कुरान के पद इतने पवित्र फि ऐसे स्थानपर लिखवाये नहीं जा सकते . क्योंकि वा रेफ आद्मी के पैर पटते हैं और कुत्ते स्थान को अपचित करते है। अगर कुछ लिपवानाही जारी है तो या पद लिपवाना यधेष्ट रे - "अफ़सोस । जब कि शगमें हरियाली छाई हुई थी, तर मेरा दिल का गुश था! मित्र, पसन्न तु में धरधाना। उन सनर नुन्ने मेरो मिट्टीपर ररियाली फैली हुई मिलेगी।"
२९४ गुलिस्ता। सोलहवीं कहानी। ए बरबन्दा मगीर खश्म विसियार । जौरश मकुन व दिलश मयाजार ॥१॥ ओरा तो वदह दिरम खरीदी। आखिर न व कुदरत आफ़रीदी ॥२॥ क साधु किसी धनवान् के पास होकर निकला जो एक गुलाम के हाथ-पैर बांध कर उसे सज़ा MOD देता था। साधु ने कहा- "बेटा! ईश्वर ने तेरे जैसेही मनुष्य को तेरे अधीन किया और तुझे उसका मालिक बनाया है। इसके लिये ईश्वर को धन्यवाद दे और ज़ोर-ज़ल्म न कर। यह बात अच्छी न होगी, कि कल कयामतके दिन गुलाम तुझ से अच्छा हो और तुझे लजित होना पड़े।" अपने गुलाम पर अत्यन्त क्रोध न करो ; उसे तक. लीफ़ न दो और उसका दिल न दुखाओ। तूने उसे दस दीनारमे ख़रीदा है ; किन्तु तूने उसे पैदा नही किया है। तेरा यह घमण्ड, गुस्ताख़ी और गुस्सा कहांतक चलेगा ? तेरे ऊपर अपने ख़रीदे गलाम पर ( शुभ है कि यह नीच प्रथा प्रायः सब सभ्य देशोंसे उठ गई है ) जुल्म मत करो- उसका दिल मत दुखाओ-तुमने उसे दश दीनारों में खरीदा ज़रूर है पर उसे बनाया नहीं है। .
सातवां अध्याय।
२६५
तुझ से भी बड़ा मालिक है। अरसला और आगोश नामक
गुलामो के मालिक! अपने बडे मालिकको मत भूल ।
पैग़म्बर ने कहा है- विचार के दिन बड़ा भारी दुःख होगा,
जबकि नेक गुलाम स्वर्गमे पहुंचाया जायगा और बदमाश
मालिक नरक में डाला जायगा।" अपने गुलाम पर, जो
तुम्हारी आज्ञाके अधीन है, बेहद सखती और खामख़याली
मत करो। हिसाबके दिन तुमसे तुम्हारे कर्मों का हिसाव
लिया जायगा। उस दिन मालिकको हथकड़ियाँ पहने और
गुलामको छुटकारा पाया हुआ देखनेसे लजा आवेगी।
शिक्षा-इस कहानीका यह सारांश है कि अपने अधीन लोगों,
नौकरों और गलामापर अत्याचार न करना चाहिए। उनको अधिक कष्ट
देना अच्छा नहीं है। जो अपने अधीन लोगों पर जुल्म नहीं करते, उनसे
मच्या पांच करते है, उनको दु खिन नहीं करते, उनके दुख-सुखको अपने
दु ए-सुपके समान समझते हैं, वह सच्च सत्पुरुष हैं । ईश्वर उन्हीं से प्रसन्न
रहता है, मोर सन्तमें उन्हीं का भला होता है।
.
રદ્દ गुलिस्ता। सत्रहवीं कहानी। क साल, ए हम. जवा अगर्चे कवीवालो पीलतन वाशद । वजंगे दुश्मनश अज़ हौल विगसलद पैवन्द ॥१॥ मैं दमश्क के कुछ लोगों के साथ वलखसे चला। राहमे लुटेरोंका बड़ा ज़ोर था। जन लोगों के दलमे एक जवान आदमी था। वह बड़ा जबरदस्त तीरन्दाज़ और हर तरह के हरवे-हथियार चलाने में निपुण था । वह इतना बलवान था कि दस आदमी उसके धनुष को नहीं खींच सकते थे। पृथ्वी के बड़े-बड़े बलवान् भी उसकी पीठ को ज़मीन न दिखा सकते थे। किन्तु वह अमीर था और साये में पला था। उसने न ज़मानाही देखा था और न कभी सफ़रही किया था, न युद्ध के ढोलकी आवाजही उसके कानोंमें कभी पहुंची थी, न घुड़-सवारों की तलवारोंकी चमकही उसकी आँखोंने देखी थी, न वह कभी शत्रु द्वारा कैद किया गया था और न उसपर तीरोंकी वर्षाही हुई थी। वह और मैं दोनों एक साथ दौड़ रहे थे । हरेक दीवार जो उसकी राहमें आई, उसने ढाह दी और प्रत्येक वृक्ष जो उसकी नज़र बलवान् जवान आदमी भी लड़ाई में भयसे कांप उठता २६६ गुलिस्तां। सत्रहवीं कहानी। क साल, जवा अगर्चे कवीबालो पीलतन बाशद । बजंगे दुश्मनश अज़ हौल बिगसलद पैवन्द ॥१॥ मैं दमश्क के कुछ लोगों के साथ बलखसे ए चला। राहमे लुटेरोंका बड़ा ज़ोर था। हम- लोगों के दलमे एक जवान आदमी था। वह बड़ा जबरदस्त तीरन्दाज़ और हर तरह के हरब-हथियार चलाने मे निपुण था। वह इतना बलवान था कि दस आदमी उसके धनुष को नही खींच सकते थे। पृथ्वी के बड़े-बड़े बलवान् भी उसकी पीठ को ज़मीन न दिखा सकते थे। किन्तु वह अमीर था और साये मे पला था। उसने न ज़मानाही देखा था और न कभी सफ़रही किया था, न युद्ध के ढोलकी आवाजही उसके कानोंमे कभी पहुंची थी, न घुड़सवारों की तलवारोंकी चमकही उसकी आँखोने देखी थी, न वह कभी शत्रु द्वारा कैद किया गया था और न उसपर तीरोंकी वही हुई थी। वह और में दोनो एक साथ दौड़ रहे थे । हरेक दीवार जो उसकी राहमे आई, उसने ढाह दी और प्रत्येक वृक्ष जो उसकी नज़र वल्यान् जवान आदमी भी लडाईमें भयसे काप उठता
सातवाँ अध्याय।
२६७
तले आया, उसने जड़से उखाड़ लिया। वह शेखी मारता
और कहता था-"हाथी कहाँ है, जो तुम इस वीरके कन्धोंको
देयो ? शेर कहाँ है जो तुम इस वहादुर की उँगलियों
और हथेलियों की ताकत को देखो।" हम दोनो जब इस
अवस्थामें थे, दो हिन्दुस्थानियोंने चट्टानके पीछेसे हमे मार
डालनेके लिये अपने सिर उठाये। एक के हाथमें लाठी थी
और दूसरे फी वग़ल मे गोफ़न थी। मैंने उस जवानसे कहा
- "मो सकते हो ? अव अपना वल-पराक्रम दिखाओ।
दुश्मन अपनेही पांवोंसे कत्रमें आ रहा है। मैंने देखा, उसके
हायसे तीर-कमान गिर पड़े और उसके जोड़ कांपने लगे।
जो मनुष्य वफतर को छेद डालने वाले तीरसे वालको चीर
सफता है. वर युद्धफे दिन योद्धाका सामना नहीं कर सकता।
हमलोगों को अपना असवाय और अपने हथियार छोड़कर,
अपनी जान ले भागने के सिवा और कोई उपाय न था। किसी
परे फाममे अनुभवी आदमी को नियुक्त करो, जो
फाड़
साने
पाले शेरको मो फन्देमे फ्सा ले। जवान आदमी जिसकी
जानी में बल हो और जो हाथोके समान ताक़तवर हो,
दिन भपके मारे फॉपने लगेगा। जिलतरह विद्वान्
दमी मानतो मुरदमे की ताराह कर सकता है, उती नरह
जिप सदाई पा नुनय हे, वही युद्धमें अच्छा योग्यता
मिाता।
।
२६६ गुलिस्ता। सत्रहवीं कहानी। ए जवा अगर्चे कवीवालो पीलतन वाशद । वजंगे दुश्मनश अज़ हौल विगसलद पैवन्द ॥१॥ 999 क साल, क साल, मैं दमश्क के कुछ लोगों के साथ वलख़से चला। राहमे लुटेरोंका बड़ा ज़ोर था। हम- लोगों के दलमे एक जवान आदमी था। वह बड़ा ज़बरदस्त तीरन्दाज़ और हर तरह के हरवे-हथियार चलाने मे 'निपुण था । वह इतना बलवान था कि दस आदमी उसके धनुष को नही खींच सकते थे। पृथ्वी के बड़े-बड़े बलवान् भी उसकी पीठ को ज़मीन न दिखा सकते थे। किन्तु वह अमीर था और साये में पला था। उसने न ज़मानाही देखा था और न कभी सफ़रही किया था, न युद्ध के ढोलकी आवाज़ही उसके कानोंमें कभी पहुंची थी, न घुड़-सवारों की तलवारोंकी चमकही उसकी आँखोंने देखी थी, न वह कभी शत्रु द्वारा कैद किया गया था और न उसपर तीरोंकी वर्षाही हुई थी। वह और मैं दोनो एक साथ दौड़ रहे थे । हरेक दीवार जो उसकी राहमें आई, उसने ढाह दी और प्रत्येक वृक्ष जो उसकी नज़र बलवान् जवान आदमी भी लड़ाई में भयसे काप उठता
-
२६७
सातवाँ अध्याय ।
तले आया, उसने जड़से उखाड़ लिया। वह शेखी मारता
और
कहता था-"हाथी कहाँ है, जो तुम इस वीरके कन्धोको
देखो ? शेर कहाँ है जो तुम इस वहादुर की उँगलियों
और हथेलियों की ताकत को देखो।" हम दोनों जव इस
अवस्थामें थे, दो हिन्दुस्थानियोंने चट्टानके पीछेसे हमे मार
डालनेके लिये अपने सिर उठाये। एक के हाथमें लाठी थी
और दूसरे की बग़ल में गोफ़न थी। मैंने उस जवानसे कहा
"क्यों रुकते हो ? अव अपना बल-पराक्रम दिखाओ।
दुश्मन अपनेही पांवोंसे कबमें आ रहा है।" मैंने देखा, उसके
हाथसे तीर-कमान गिर पड़े और उसके जोड़ काँपने लगे।
जो मनुष्य बकतर को छेद डालने वाले तीरसे वालको चीर
सकता है. वह युद्धके दिन योद्धाका सामना नहीं कर सकता।
हमलोगो को अपना असबाब और अपने हथियार छोड़कर,
अपनी जान ले भागने के सिवा और कोई उपाय न था। किसी
वड़े काममें अनुभवी आदमी को नियुक्त करो, जो फाड़ खाने
वाले शेरको भी फन्देमे फंसा ले। जवान आदमी जिसकी
भुजाओं में बल हो और जो हाथीके समान ताकतवर हो,
लड़ाईके दिन भयके मारे कांपने लगेगा। जिसतरह विद्वान्
आदमी कानूनी मुकदमे की तशरीह कर सकता है, उसी तरह
जिसे लड़ाई का अनुभव है, वही युद्धमें अच्छी योग्यता
दिखा सकता है।
शिक्षा-हर काममें अनुभवी श्रादमीका मुकरर काना अच्छा है।
-
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२९८ गुलिस्ता। जिसने जो काम नही किया है या जिस कामको नहीं देखा है, वह उम कामको हरगिज़ नहीं कर सकता। हर काममें अनुभवी आदमी अच्छा होता है। इसलिये भारी कामों में अनुभवी भादमीको ही नियुक्त करना अच्छा है । जो अनजान, नातजस्कार प्रादमियोंके हाथों में भारी और जोखिमके काम सौंप देते हैं, वे पीछे पद्धताते और अपनी हँसी कराते हैं। अठारहवीं कहानी। बहमा हाल' असीरे केज बन्दी बजेहद । खुशतरश दॉ जे अमीरे के गिरफ्तार आयद ॥१॥ एक अमीर के लड़के को देखा, जो अपने बाप मैं की कब्र के पास बैठा हुआ एक फ़कीर के लड़के के साथ वादविवाद कर रहा था। वह कहता था- "मेरे पिताका स्मृति-स्तम्भ पत्थर का है और उस पर सुवर्णा- क्षरोमे नाम लिखा हुआ है। फ़र्श संगमर्मर का बना हुआ कैदसे छूटा हुआ आदमी उस बड़े आदमीसे अच्छा है जो कैदमें डाला गया है।
सातवां अध्याय । २६६ है और उसमें फीरोजी और भूरे रङ्गकी ईटें लगी हुई हैं। तुम्हारे बापकी कब क्या है ! दो ईटें जमा करके उनपर मुट्ठी भर मिट्टी डाल दी गई है ।” फ़कीरके लड़केने यह बात सुनकर कहा-"चुप रहो, तुम्हारे बापके इस भारी पत्थरके नीचेसे हिलनेके पहिलेही मेरा बाप स्वर्गमें पहुँच जायगा।" पैग़म्बरकी एक कहावत चली आती है-गरीक को मृत्यु सुखदायिनी है।" वह गधा जिसपर हलका भार होता है, आसानी से सफर करता है , इसी तरह वह फ़कोर जो कङ्गाल होता है, मृत्यु-द्वारमें आसानीसे घुस जाता है लेकिन जो सुख-चैन और ऐश-आराम मे जिन्दगी बिताता है, बड़े कष्टसे प्राण त्याग करता है। कैद से छुटकारा पाया हुआ कैदी, उस भले आदमी से अधिक सुखी है जो कैदमें डाला गया हो। शिक्षा-इस कहानी का यह सारांश है कि जो लोग गरीव होते हैं; जिनके हाथी, घोड़े महल-मकान और बड़ा परिवार नहीं होता, वे सहज में देह त्याग कर जाते है अर्थात उनको मृत्यु-समय भयकर कष्ट नहीं उठाना पढ़वा, किन्तु जो मालदार होते हैं, जिनके जमीन-जायदाद, महल-मकान, गाड़ी-घोड़ा और सुन्दरी स्त्रियां होती हैं, वे बड़े कष्टसे प्राण त्याग करते हैं। यही कारण था, कि पहले ज़माने के भारतवासी जवानी पार करतेही सव ऐश पाराम, राज-पाट छोड़कर वनवासी हो जाते थे और साधारण लोगोंको तरह जीवन बिताते थे, वोकि उन्हें मृत्यु-समय मोहके कारण भारी कष्ट न ~ गुलिस्ता। उठाने पड़ें। मतलब यह है, कि निष्पाप और निर्धन मनुष्य सुखसे मरता है। लेकिन पापी और धनवान बड़े-बड़े कष्ट सहकर देह छोड़ता है। हमारे यहां के राजायोंके विषय में लिखा है- योगेनान्ते तनुत्यजाम् । उन्नीसवीं कहानी। फ़रिश्ता खुये शवद आदमी बकम खुरदन । वगर खुरद चोबहायम बयोफ़ितद चोजमाद ॥१॥ 999 सी ने एक धार्मिक मनुष्य से इस परम्परागत जन- कि श्रुतिका अर्थ पूछा,-"मस्ती--काम--से बढ़कर न तुम्हारा दूसरा दुश्मन नही हैं जो तुम्हारे अन्दरही रहता है।" उसने जवाब दिया-'जिस दुश्मन के साथ तुम मेहरबानी का बर्ताव करोगे, वही तुम्हारा दोस्त हो जायगा लेकिन मस्ती या कामको जितना चाहोगे, वह उतनीही दुश्मनी बढ़ावेगा। उपवास करने से मनुष्य देवताओका स्थान कम खानेसे आदमीमें अच्छे गुण पदा हो जाते हैं, पर जो पशुओंकी तरह बहुतसा खाते हैं, वे पत्थर बन जाते हैं।
सातवां अध्याय । ३०१ प्राप्त कर सकता है । लेकिन जो पशुओं की भांति खाता है, वह निर्जीव पत्थरके समान हो जाता है। जिसे तुम खुश रक्खोगे वही तुम्हारे हुक्म पर चलेगा; लेकिन 'काम' प्यार करनेसे विद्रोहकारी हो जायगा। शिक्षा-स्त्री-इच्छा पैदा करनेवाली इन्द्रिय मनुष्य की बड़ी भारी बुराई करनेवाली है। इसको मनुष्य जितना प्यार करता है, वह उतनीही प्रबल होती और मनुष्य का अनिष्ट साधन करती है। इस इन्द्रिय परही कोई बात नही है, सभी इन्द्रियाँ स्वतन्त्र होनेसे मनुष्य का नाश कर देती हैं। अतः चतुर मनुष्य को चाहिए कि इन्द्रियोंको विशेष कर कामेन्द्रिय को, वधमें रक्खे । -- ३०२ गुलिस्ता। बीसवीं कहानी। दीदये अहलेतमा वनामते दुनिया । पुर नशवद हम चुनॉ के चाह ब शवनम ॥१॥ ने एक मण्डली में एक मनुष्य को वैठा हुआ मैं देखा । वह फ़क़ीरोंकीसी पोशाक पहने हुए 9999 था; किन्तु उसका स्वभाव फ़कीरों का जैसा न था। उसका इरादा गिलागुज़ारी करने का था; इसलिए उसने गिलागुज़ारी की किताब खोली और धनवानोंकी निन्दा करने लगा। उसकी बातचीत का आशय यह था-"फ़क़ीरों के पास धन नहीं है और अमीर लोग गरीव-परवर बनना नही चाहते। जो उदार-चित्त हैं, उनके पास धन नहीं है और दौलतमन्द दुनियादारोंमे सखावत-उदारता-नहीं है।" मैं धनवानों की उदारता का ऋणी हूं, अतः मुम्छे उसकी वह बात अच्छी न लगी। मैंने कहा-ऐ दोस्त! असीर लोग ग़रीबोंके लिए मालगुजारी, एकान्तवासी योगियों के लिये भाण्डार, यात्रियोंके लिये आशा, मुसाफिरोंके लिये धर्मभवन है। वे लोग दूसरोके सुखके लिए बोझ ढोनेवाले हैं। लोभी और लालची पुरुषकी आँख दुनियाकी चीजोसे मोससे कुएंकी तरह कभी नहीं भरती।
सातवां अध्याय। ३०३ -- अपने नौकर-चाकरों और अधीनो को साथ लेकर भोजन करते हैं। उनकी बाकी सखावत-उदारता—विधवाओं, वृद्धों, सम्बन्धियों और पड़ोसियो की सहायता में लगती है। धनवानों परही चढ़ावा चढ़ाने, प्रतिज्ञा पालन करने, आतिथ्य- सत्कार करने, दान और बलिदान करने, गुलामों को छोड़ने और पुरस्कार वगैरः देनेका भार रहता है। तुम सैकड़ों कष्ट उठा कर केवल अपना भजनही कर सकते हो, तुम उनलोगों के समान शक्तिशाली किस तरह हो सकते हो? धनवान् लोग नैतिक और धाम्मिक दोनो काम पूर्णता से करते हैं ; क्योंकि उनके पास धन होता है। धनसे वे दान करते हैं। उनके कपड़े साफ़, उनका यश निष्कलङ्क और उनका चित्त चिन्तारहित रहता है। आज्ञाकारिता का प्रभाव अच्छे भोजनमें और उपासना की सत्यता साफ़-सुथरी पोशाक मे देखी जाती है। भूखे मनुष्य मे ताक़त नहीं होती और खाली हाथसे दान नहीं होता। जिसके पैरमे बेड़िया है, वह किस तरह चल सकता है ? भूखे पेटसे दानकी क्या आशा की जा सकती है ? जो शख्स कलके लिए पहलेसे खाने-पीने का सामान नहीं जुटा सकता, वह रातको सुखसे नहीं सो सकता। चीटियां जाड़ेमें सुखपूर्वक गुजारा करनेके लिए गरमीके मौसममें, खानेका सामान इकट्ठा कर लेती है। जो दरिद्र हैं, उन्हें फुरसत नहीं मिलती और जो दुःखी है उन्हें सन्तोप नहीं होता। एक सन्ध्या की नमाज़ तक खड़ा रहता है, .
३०४ गुलिस्ताँ। दूसरा रातके खाने की चिन्ता में बैठा रहता है। इन दोनों की तुलना किस तरह की जा सकती है ! जिसके पास धन है, वह ईश्वरोपासन में लगा रहता है और जो तङ्गहाल है, उसका चित्त विचलित रहता है। धनवानों की ईश्वरोपासना अच्छी होती है, क्योंकि उनका चित्त शान्त रहता है। धन- वानोके पास खाने-पीनेका सब सामान मौजूद होता है; इस- लिये वे अपने मनको सब ओरसे हटाकर उपासना की ओर लगा सकते हैं। अरब लोग कहते हैं ईश्वर दुःखद कङ्गाली से मेरी रक्षा करे और जो मेरी इच्छा के अनुसार नहीं है, उस पड़ोसीसे मुझे बचावे। पैग़म्बर की परम्परागत जन-श्रुति है कि दरिद्रता का मुंह दोनो लोकमे काला है।" मेरे विरोधीने पूछा-"क्या तुमने नहीं सुना है कि पैग़म्वर ने कहा था कि दरिद्रताही मेरी शोभा है।" मैंने उत्तर दिया-"चुप रहो, पैग़म्बर का मतलब उन लोगोंसे है जो मानसिक दरिद्रता भोगते हैं और भाग्यवानों के अधीन रहते हैं, किन्तु उनसे नहीं है जो धार्मिक कपड़े पहन कर सैरातके टुकड़ो को वेचते हैं। ऐ ज़ोरसे बोलनेवाले खाली ढोल! कूच मे विना रसदके तेरा काम कैसे चलेगा? अगर तू मनुष्य है तो हज़ार दानों की माला फेरनेके बजाय अपने तई दुनिया के लोभ-लालच-से बचा। जो कङ्गाल है, उसे ईश्वर-निन्दा का भय है। धनहीन होनेकी वजह से तुम नलों को वस्त्र नहीं दे सकते और न कैदियो .को कैदसे सातवां अध्याय। ३०५ छुड़ा सकते हो। हमारे जैसे मनुष्य उस दर्जे पर कैसे पहुँच सकते हैं ? देनेवाले और लेनेवाले हाथ की तुलना किस तरह हो सकती है ? क्या तुम नहीं देखते कि ईश्वरने कुरानमे स्वर्ग-चासियों के सुख को हमारे सामने वर्णन किया है। आनन्ददाग़ के फल उन्हीं स्वर्गवासियोंके लिए हैं। जिन्हें रोजीका अभाव है, उन्हें ये सुख नहीं मिलते। चित्त की शान्ति के लिये बंधी हुई रोजी की ज़रूरत है। "प्यासोंके लिए सारी दुनिया में पानीही पानी दीखता है । जिधर नज़र डालोगे उधर ही देखोगे कि विपद्ग्रस्त या दुःखी लोगही दिल खोलकर अत्यन्त बुरे काम करते हैं; उन लोगोंको भविष्यत् में दण्ड भोगने का भय नहीं होता। वे लोग न्याय और अन्याय अथवा उचित-अनुचित को नहीं समझते। अगर किसी कुत्ते के सिरपर मिट्टी का ढेला फेंका जाता है, तो वह उसे हड्डी समझ कर प्रसन्न होता है। अगर दो भादमी अपने कन्धोंपर लाश ले जाते हैं, तो नीच लोग उसे खाने-पीने के समान से भरा हुआ थाल समझते हैं। किन्तु धनवान्, जिस पर ईश्वरकी दया-दृष्टि होती है, अन्याय- कार्य नहीं करता है। यद्यपि मैंने इस विषय पर पूरे तौरसे तर्क-वितर्क नहीं किया है और न अपनी दलील के पक्का करने के लिए कोई सबूतही दिया है ; तथापि मैं तुम्हारे न्यायपर क्या तुमने कभी बिना दरिद्रता में पड़े किसी साधु की मुश्के बंधी हुई या उसे जेल भोगते हुए . हो निर्भर करता हूँ।
०
act
३०६
गुलिस्ता।
देखा है ? क्या कोई बिना दरिद्रता के चोरी करता और
हाथ कटाता हुआ देखा गया है ? सिंह के समान निर्भय
मनुष्य दरिद्रताके कारण लोगोंके घरोमें सेंध लगाते हैं और
अन्तमे उनके पैरो में बेड़ियां पड़ती हैं। फ़कीर काम-वश
होकर और उसके रोकने में असमर्थ होकर प्राप-कर्म कर सकता
है। जिसके पास स्वर्ग की अप्सराएँ हैं,उसे अगमा की कन्याओंकी
क्या ज़रूरत है ? जिसके हाथोंमे मन-वाहे छुहारे रहते हैं
वह वृक्ष के गुच्छोपर पत्थर फेंकने का विचार भी नहीं करता।
"साधारणतया, दरिद्र लोगोमें पवित्रता का अभाव रहता
है। जो भूखे मरते हैं, वही रोटियाँ चुराते हैं । क्षुधातुर लैंडी
कुत्ता जब मांस पाता है, तब वह यह नही पूछता कि यह
सालेह के ऊँट का मांस है या दजाल के गधे का। बहुतसे
अच्छे स्वभाव के मनुष्योने दरिद्रता के वश में होकर अनेक
पाप-कर्म किये हैं और अपने नेक नामको बदनामी की हवा
के हवाले किया है। भूख की इच्छा रहने पर उपवास नही
हो सकता। दरिद्रता ईश्वर-भक्ति के हाथ से लगाम छीन
लेती है। जिस समय मैंने यह बात कही, उस समय उस
फ़क़ीर को धैर्य न रहा। उसने अपनी सारी वितण्डाशक्तिसे
मुझपर आक्रमण करके कहा-"तुमने उनकी इतनी अधिक
तारीफ़ की है और इस विषय को इतना बढ़ाकर कहा है, कि
लोग उसे दरिद्रताके जहर को उतारनेवाली दवा और ईश्वर के
भण्डार की कुञ्जी समझेंगे। धनवान् लोग घमण्डी, मग़कर,
सातवां अध्याय।
३०७
आत्मामिमानी, पापी और घृणा करने योग्य है । वे लोग
अपनी दौलत और दर्जेके नशेमे रहते हैं। वे गुस्ताख़ी बिना
बात नही करते और कङ्गालो को हिकारत की नज़र से देखते
हैं। वे विद्वानों को भिखारी कहते हैं और दरिद्रो की निन्दा
करते हैं। वे अपने धन और पदके अभिमान मे भूल कर अपने
तई बड़ा समझते हैं और सब को अपने से नीचा समझते
हैं। वे किसी पर दया-दृष्टि रखना अपना धर्म नही समझते ।
वे लोग महात्माओं के इस वचन को नहीं जानते कि जो
ईश्वर-निष्ठा मे कम है, वह धनमें बड़ा होनेपर भी असलमें
निर्धनही है। अगर कोई मूर्ख अपनी दौलत के कारण
किसी अक्लमन्द के साथ अभिमानपूर्वक वात-चीत करे, तो
उसे गधाही समझना चाहिये; चाहे वह अम्वर का वैलही
क्यो न हो।
मैंने कहा-"उन लोगोंको वुराई मत करो, क्योंकि वे
उदारता के घर हैं।" उसने जवाब दिया-"तुम्हारा कहना
ग़लत है, वे लोग तो रुपये के गुलाम हैं। अगर वे अगस्त
महीने के बादलों की तरह दान की वर्षा करें तो उनसे क्या
फ़ायदा ? जो रोशनी के चश्मे हैं किन्तु किसी पर रोशनी
नही डालते, उनसे क्या लाभ ? जो शक्ति के घोड़ेपर सवार
हैं लेकिन कुछ नहीं करते, उनका होना न होना वृथा है। धनी
ईश्वर को सेवा में एक पैंड भी नहीं चलते, बिना किसी को
हतर बनाये एक कौड़ी भी नहीं देते। वे धन संग्रह करनेके
३०८
गुलिस्ता।
लिए परिश्रम करते हैं, लोभवश उसकी रक्षा करते हैं,
और उसे त्याग करते समय दुःखी होते हैं। महात्माओं ने
कहा है-'सूम का धन पृथ्वी से उस समय निकलता है जब
वह खुद पृथ्वी मे जाता है। एक आदमी दुःख भोग कर
धन जमा करता है और दूसरा विना कष्ट पायेही उसे
लेजाता है।"
मैंने जवाब दिया-"तुम दौलतमन्दों की कासी के
विषय में, भिक्षुकता के कारण के सिवा और तरह, कुछ नहीं
जानते। जो लालच को त्याग देता है उसे सखी और सूममें
'कुछ अन्तर नहीं मालूम होता। सोनेकी परीक्षा कसौटी पर
होती है और महा कङ्ग स की जाँच फ़कीर द्वारा होती है।"
उसने कहा-"मैं लोगों से अपने अनुभव की बात कहता हूँ।
धनी लोग दरवाजे पर पहरा रखते हैं और ऐसे गॅवार और
कड़े आदमियोंको रखते हैं जो प्यारे से प्यारे मित्रको अन्दर
नहीं जाने देते। वे अच्छे-अच्छे आदमियों की गरदन में हाथ
डालकर कह देते हैं कि घरमें कोई नहीं है। वास्तवमें घे
सच कहते हैं। जिसमें बुद्धिमानी, उदारता, दूरदर्शिता और
विचार नही है, उसके विषय में यों कहना कि-घरमें कोई
नहीं है। बहुत हो ठोक है।" मैंने जवाब दिया- इसके
लिये वे क्षन्तव्य हैं; क्योंकि मांगनेवालोंके मांगने और फकी-
रोंके सवालों से उनकी जान दुःखी हो जाती है। ऐसा
ख्याल करना बुद्धिमानी के विपरीत है, कि अगर जङ्गलकी
सातवां अध्याय। ३०६ वालू के दाने मोती हो जाते तो फकीरोंको सन्तोष हो जाता। "जिस तरह ओससे कुआँ नही भरता, उसी तरह लालचो की आंख धनसे सन्तुष्ट नहीं होती। हातिम ताई जङ्गल का रहने वाला था। अगर वह शहरमें रहता होता, तो भिक्षुकों के मांगनेसे तङ्ग हो जाता। भिखारी उसके बदन के कपड़े तक फाड़ लेते।" उसने कहा-"मुझे उनकी हालतपर तर्स आता है ।" मैंने जवाब दिया-"यह बात नही है, क्योंकि तुम उनका धन देखकर कुढ़ते हो।" हम इस तरह वाद- विवाद कर रहे थे कि इसी बीचमे उसने शतरञ्जका प्यादर आगे बढ़ाया। मैने उसे मार लेने की चेष्टा की चेष्टा की। उसने मेरे वादशाह को शह दी, तो मैंने वज़ीरसे उसे छुड़ा लिया । अन्तमें उसकी थैली में एक भी सिक्का न रहा। इस तरह उसके झगड़े के तरकश के तमाम तीर ख़र्च हो गये। ख़बर दार, जब किसी ऐसे वकासे लड़ाई हो जिसने इधर-उधर से लवारी सोख ली है, तो उसके सामने अपनी ढाल न गिरा दो। धर्म पर चलो, ईश्वर की सेवा करो; क्योंकि चकवादी लोग द्वार परसे हथियार दिखाते हैं, लेकिन गढ़ीके भीतर कोई नहीं है। अन्तमें जब उसके पास कोई दलील न रही, तक वह निहायत गुस्सा होकर वे सिर पैर की बातें कहने लगा। मूखोकी यही रीति है, कि जब वे विपक्ष की दलीलो से घबरा जाते है, तर दगा-फिसाद करनेपर उतारू हो जाते ܙܝ ३१० गुलिस्तां। है। अज़र नामक मूर्ति बनानेघालेने भी ऐसाही किया था। जब वह अपने बेटे इवराहीम को दलीलोंसे कायल न कर सका, तब उससे झगड़ा करने लगा। ईश्वरने कहा है-"अगर सचमुच तू इस बात को न छोड़ेगा तो मैं तुझे पत्थर से मारूँगा।" उसने मुझे गाली दी। मैंने भी उससे कड़ी बात कही। उसने मेरे अझरखे का गला फाड़ दिया और मैंने उसकी दाढ़ी पकड़ कर खींच ली। हम दोनों एक दूसरे पर टूट रहे थे। लोग हमारे पीछे-पीछे दौड़ते और हमारे ढंगको देख कर हंसते थे। सारांश यह है, कि हम दोनों काजीके पास गये और स्वीकार किया कि वह जो न्याय करेगा हम दोनो को मञ्जूर होगा। जब काज़ीने हमारी सूरतें देखीं और हमारी बातें सुनी तो वह विचार- सागरमें गोते खाने लगा। बहुत कुछ सोच-विवार कर उसने अपना सिर ऊँचा उठाया और कहा-"अमीरोकी तारीफ़ करनेवाले ! मैं तुझे बतलाता हूँ कि कांटे बिना कोई गुलाब नहीं हैं। शराब के साथ नशा लगा हुआ है। छिपे हुए खजाने पर अज़दहे रहते हैं। जिस स्थान होते हैं, वहीं क्षुधातुर मगर रहते हैं। संसारी सुखोंके साथ मृत्यु का डङ्क है। स्वर्गीय रोशनी की राहें मकार शैतानने रोक रक्खी हैं। जिसे मित्रका सुख भोगना हो, वह दुश्मन के ज़ोर-ज़ल्मोंको बरदाश्त करे ; क्योंकि ख़ज़ाना और अज़- दहा, गुलाब और कांटा, रज और खुशी एक साथ बंधे हुए पर शाही मोती +--- सातवां अध्याय। ३११ हैं। क्या तुम नहीं देखते कि बाग़ में सुगन्धित वृक्ष भी है और सूखे हुए वृक्षोंके दूंठ भी। इसी तरह धनवानों में कृतज्ञ भी हैं और अकृतज्ञ भी। फ़क़ीरोमें भी कुछ ऐसे हैं जो सन्तोष करते हैं और कुछ ऐसे हैं जिन्हें सन्तोष नहीं है। अगर हरेक ओला मोती होता तो उनसे बाजार कौड़ियों की तरह भर जाता। वे धनवान् ईश्वरके प्यारे हैं, जिनका मिजाज फकीरोंकासा है , सबसे बड़ा धनवान् वह है जो गरीबोंका दुःख दूर करता है और सबसे अच्छा फकीर वह है जो अपने गुजारे के लिए अमीरोंके मुंहकी तरफ़ नहीं देखता। ईश्वर ने कहा है-"जो ईश्वरपर विश्वास करता है उसे दूसरे लोगो की सहायता की दरकार नहीं होती।" काज़ीने मुझे बुरा- भला कहकर फ़कीर से कहा-"तुमने कहा है कि बड़े आ- दमी कुकर्मों में अपना समय नष्ट करते हैं, ऐश-आराम में पस्त रहते हैं। तुम्हारा यह कहना सच है। ऐसे लोग श्वरके प्रति अकृतज्ञ हैं, वे रुपया जमा करते हैं, उसे आप भाते हैं परन्तु दूसरोंको नहीं देते। अगर संसार में सूखा पजावे या दुनिया जलमें ड्व जावे लो वे अपने धनमे मस्त रहर गरीबों के दुःखकी वात भी न पूछेगे और न ईश्वरसे ही भकरेंगे; उनका ख्याल ऐसा है, कि दूसरा मरे तो मरे, मैं तो न्दा है। हंसको जल-प्रलय से क्या भय ? जो औरतें ऊँट पाचार रहती हैं, वे अपनी काठीमे बैठी हुई चालूमें मरने वार कष्टका अनुमान नहीं कर सकतीं। नीव लोग
३१२
गुलिस्ता।
ar
जब अपने कम्बल सहित बच जाते हैं तब कहते हैं-"अगर
सारा संसार मर जाय तो हमे क्या ? चन्दा लोग इस किस्मके
हैं और कुछ ऐसे हैं जो अपनी उदारता का थाल बिछाकर
प्रसन्नचित्त से यश लूटनेके लिये खैरात करनेकी घोषणा कराते
हैं, ईश्वर से क्षमा मांगते है । इस लोक और परलोक के
सुखोको भोगते हैं।" जब क़ाज़ी की बात बहुत बढ़ गयी और
उसने हमारी आशासे बढ़ कर वक्त ता दी ; तो हमने उसकी
बात मान ली और एक दूसरे से माफ़ी मांगकर सुशीलता की
राह पकड़ी। हमने अपनाही दोष समझ कर एक दूसरेके
हाथ और मुंह चूमे। हमारा झगड़ा इस बातके साथ तय हो
गया- ऐ फ़क़ीर! संसार की गरदिश का रोना मत रो,
क्योंकि अगर तू इसी ख्यालमें मर जायगा तो दुःखी होगा।
ऐ अमीर आदमी! अगर तेरा हाथ और तेरा दिल तेरे कब्जेमे
है तो तू सुख भोग और दान कर ; जिससे तुझ पर इस जीवन
और भावी जीवनमें ईश्वर की मेहरबानी रहे।"
शिक्षा-धन अहंकार करनेके लिए नहीं, दान के लिये है। जलत
का जिससे निर्वाह होता है-वही धन है। नहीं तो मिट्टी काता
है। धनवानों की निन्दा नहीं करनी चाहिए। उन्हींकी कृपा-कट
गरीबोंके दुःख दूर होते हैं जो धनी गरीबों का ध्यान नहीं करते, वेर के
सामने पापी है।
से
अाठवाँ अध्याय।
(६१ नुस्ख)
१
माल ज़िन्दगी के आराम के वास्ते है; किन्तु ज़िन्दग
माल जमा करने के वास्ते नहीं है। मैंने एक बुद्धिमान
मनुष्यसे पूछा,-"कौन भाग्यवान् और कौन भाग्यहीन है ?"
उसने उत्तर दिया.-"जिसने खाया और बोया वही भाग्यवान्,
है, किन्तु जिसने भोगा नहीं लेकिन छोड़कर मरगया वह
भाग्यहीन है।" शख्सके लिये ईश्वर से दोआ मत मांगो,
जिसने ईश्वर-भक्ति या परोपकारका काम न किया, तमाम
उम्न रुपया जमा करनेमे बिता दी और उसको काममे भी न
लाया।
२
पंगम्बर मूसा ने कार्स को इस तरह उपदेश दिया-"तू
रोगोंके साथ उसी भांति भलाई कर, जिस भौति ईश्वरने तेरे
साथ भलाई की है।" काढूने उसको नसीहत पर कानन
३१२
गुलिस्ता।
१
जब अपने कम्बल सहित बच जाते हैं तब कहते हैं-"अगर
सारा संसार मर जाय तो हमे क्या ? चन्दा लोग इस किस्मके
हैं और कुछ ऐसे हैं जो अपनी उदारता का थाल बिछाकर
प्रसन्नचित्त से यश लूटनेके लिये खैरात करनेकी घोषणा कराते
हैं, ईश्वर से क्षमा मांगते है ; इस लोक और परलोक के
सुखोंको भोगते हैं।" जब क़ाज़ी की बात बहुत बढ़ गयी और
उसने हमारी आशासे बढ़ कर वक्त ता दी ; तो हमने उसकी
बात मान ली और एक दूसरे से माफ़ी मांगकर सुशीलता की
राह पकड़ी। हमने अपनाही दोष समझ कर एक दूसरेके
हाथ और मुंह चूमे। हमारा झगड़ा इस बातके साथ तय हो
गया-"ऐ फ़क़ीर! संसार की गरदिश का रोना मत रो,
क्योंकि अगर तू इसी ख्यालमे मर जायगा तो दुःखी होगा।
ऐ अमीर आदमी! अगर तेरा हाथ और तेरा दिल तेरे कब्जेमे
है तो तू सुख भोग और दान कर ; जिससे तुझ पर इस जीवन
और भावी जीवनमे ईश्वर की मेहरबानी रहे।"
शिक्षा-धन अहंकार करनेके लिए नहीं, दान के लिये है। जरूरत
गरीबों का जिससे निर्वाह होता है वही धन है नहीं तो मिट्टी काला
है। धनवानों की निन्दा नहीं करनी चाहिए। उन्हींकी कृपा-कट
ग़रीबोंके दुःख दूर होते हैं जो धनी ग़रीयों का ध्यान नहीं करते, वेर के
सामने पापी है।
से
अाठवाँ अध्याय।
(६१ नुस्ख)
१
माल ज़िन्दगी के आराम के वास्ते है, किन्तु ज़िन्दग
माल जमा करने के वास्ते नही है। मैंने एक बुद्धिमान
मनुष्यसे पूछा, “कौन भाग्यवान् और कौन भाग्यहीन है ?"
उसने उत्तर दिया:--"जिसने खाया और बोया वही भाग्यवान्
है, किन्तु जिसने भोगा नहीं लेकिन छोड़कर मरगया वह
भाग्यहीन है।" शख सके लिये ईश्वर से दोआ मत मांगो,
जिसने ईश्वर-भक्ति या परोपकारका काम न किया, तमाम
उम्र रुपया जमा करनेमें विता दी और उसको काममें भी न
लाया।
२
पैग़म्बर मूसा ने कारूँ को इस तरह उपदेश दिया-"तू,
लोगोंके साथ उसी भांति भलाई कर, जिस भाँति ईश्वरने तेरे
साथ भलाई की है। कारूंने उसको नसीहत पर कान न
.
गुलिस्तां। दो दिया। पीछे जो कुछ नतीजा निकला वह तुम लोगोंने सुना ही है। जिसने धनसे परोपकार न किया, उसने धन संग्रह करनेके ख्यालमें अपनी भावी आशाओंपर भी पानी फेर दिया। अगर तू संसारी धनसे लाभ उठाना चाहता है, तो ईश्वरने जिस तरह तुझपर मेहरबानी की है तू भी मनुष्यो पर दया कर । अरब लोग कहते हैं-"दान करो, किन्तु ऐहसान मत रक्खो। निश्चय रक्खो, तुमको नफ़ा ज़रूर मिलेगा।" जहाँ परोपकार का वृक्ष जड़ पकड़ लेता है, वहीं से उसकी शाखे आस्मान तक पहुँचती हैं अगर तुम फल खानेकी उम्मीद रखते हो तो मेहरबानी के साथ दरख्त को लगाओ और उसकी जड़ पर आरा मत चलाओ। ईश्वर को धन्यवाद कि उसने तुम्हारे ऊपर मेहरबानी की और तुम्हें अपनी सखा- चत से वञ्चित न रक्खा। इस बात की शेखी न मारो, कि हम राजा के यहाँ चाकरी करते हैं, किन्तु ईश्वरको धन्यवाद दो कि उसने तुम्हें राजा की सेवा में नियुक्त किया है।" धन वही सार्थक है जिस से परोपकार किया जाय। जिस धन से मनुष्यों की भलाई न हो, उस धन का होनाही व्यर्थ है। इसमें सन्देह नहीं हैं, कि परोपकारका फल हाथों हाथ मिलता है। सत्पुरुषोंका सर्वस्व ही परोपकार के लिये होता है। परोपकार के लियेही वृक्षों में फल लगते हैं, परोपकार के लियेही नदियाँ बहती हैं, परोपकार के लियेही चन्द्र- का उदय-अस्त होता है, परोपकार के लियेही मेघ जल बरसाते हैं। सारारा यह है, कि संसार में परोपकार करनाही सबसे बड़ा धर्म है। -सूर्य
आठवां अध्याय।
३१५
३
-
दो शख्सोंने वृथा कष्ट उठाया और व्यर्थ उद्योग कियाः
एक तो वह जिसने धन जमा किया, किन्तु उसे भोगा नहीं ;
दूसरा वह जिसने अक्ल सीखी, मगर उसका अभ्यास न
किया। चाहे जितनी विद्या क्यों न पढ़ लो, अगर तुम उस
पर अमल नहीं करते तो तुम नादान हो। वह जानवर जिस
पर किताबें लदी हुई हैं, न तो विद्वान् है न बुद्धिमान् । उस
मूर्खको क्या ख़बर, कि उसके ऊपर किताबें लदी हैं या
ई धन।
४
विद्या धर्म-रक्षाके लिए है न कि धन जमा करनेके लिए
जिसने धन कमानेके लिये अपनी नामवरी और विद्या खर्च कर
दी, वह उसके समान है जिसने खलियान बनाया और उसे
बिल्कुल जला डाला।
मशा-
विद्वान् जो संयमी-परहेज़गार नहीं है अन्धा
लची है। वह दूसरोंको राह दिखाता है ; किन्तु उसे
आपको राह नहीं मिलती। जिसने अपनी उम्र चेखवरीसे
गॅवा दी, वह उसके माफ़िक है जिसने रुपया तो खर्च कर डाला
मगर कुछ चीज़ न ख़रीदी।
६
बादशाहतकी नामवरी
अक्लमन्दोंसे होती है और धर्म
2
३१६ गुलिस्तां । धर्मात्माओंसे पूर्णता प्राप्त करता है। अक्लमन्दोंको राज- दरवारमे नौकरी पानेकी जितनी ज़रूरत है, उससे वादशाहोंको अक्लमन्दोंकी अधिक ज़रूरत है। ऐ वादशाह ! ध्यान देकर मेरी नसीहत सुन, तेरे दफ़्तरमें इससे अधिक कीमती नसीहत नही है :-"अपना काम अक्लमन्दोंके सिपुर्द कर यद्यपि सरकारी काम करना अक्लमन्दोका काम नही है।" .. तीन चीजें, तीन चीज़ोके बिना, कायम नही रहती :-- दौलत बिना सौदागरी के, इल्म बिना बहसके और बादशाहत बिना दहशतके। दुष्टोपर दया करना, सजनोके ऊपर जुल्म करना है। ज़ालिमोंको माफ़ करना, सताये हुओंपर जुल्म करना है। अगर तुम कमीनोंके साथ मेल-जोल रक्खोगे और उनपर मेहरबानी करोगे, तो वे तुम्हारी हिमायत ते अपराध करेंगे और तुमको उनके अपराधोका हिस्सेदार बनना पड़ेगा। है , बादशाहोंकी दोस्ती और लड़कोकी मीठो-मीठी बातों पर भरोसा न करना चाहिए, क्योंकि बादशाहोंकी दोस्ती जरासे शकपर टूट जाती है और लड़कोंकी प्यारी-प्यारी बातें रातभरमें बदल जाती हैं। जिसके हज़ार चाहनेवाले हैं, उसे
आठवां अध्याय।
३१७
1
अपना दिल मत दो, अगर दो, तो जुदाईकी तकलीफ़
सहनेको तय्यार रहो।
१०
मित्रके सामने अपना सारा गुप्त भेद मत खोल दो; कौन
जाने वह कव तुम्हारा शत्रु हो जावे? इसी भांति शत्रु को भी
हर तरहकी तकलीफें मत दो , कौन जाने वह कभी तुम्हारा
मित्रही हो जावे? वह भेद जिसे तुम गुप्त रखना चाहते हो
किसीको भी मत बताओ, चाहे वह विश्वास-योग्यही क्यों न
हो। अपनी गुप्त बात जितनी अच्छी तरह तुम खुद छिपा
सकते हो दूसरा हरगिज़ न छिपा सकेगा। किसी की गुप्त
बातोंको एक शख्ससे कहना और उसे दूसरेसे कहनेकी मनाही
करनेसे एकदम चुप रहना भला है। ऐ भले आदमी! पानी
को निकासपरही रोक। जब वह नदीके रूपमें बहने लगेगा
तव तू उसे न रोक सकेगा। जो बात सब लोगोंके सामने
कहने लायक नहीं है, उसे पोशीदगीमें भी मत कह ।
११
अगर कोई निर्बल शत्रु तुम्हारे साथ मित्रता करे और
तुम्हारी आज्ञा अनुसार चले, तो तुमको समझना चाहिये कि
वह अपना बल बढ़ाना चाहता है। क्योंकि कहा है:-
"मित्रोंको सवाईपर भी विश्वास न करना चाहिए , तव शत्रु-
ओंकी लल्लो-चप्पोसे क्या भली उम्मीद की जा सकती है ?" जो
निवेल शत्रु को तुच्छ समझता है, वह उसके माफ़िक है जो
३१८ गुलिस्ता। आगकी छोटीसी चिनगारीकी परवा नही करता। अगर तुममें शक्ति है तो आगको आजही बुझा दो ; क्योकि जब वह प्रचण्ड रूप धारण करेगी, तब संसारको जला देगी। जब कि तुझमे शत्रु को वाणसे छेदनेकी शक्ति हो, तब तू उसको कमान खींचनेका मौका मत दे। दिल्लीश्वर महाराज पृथ्वीराज चौहान अगर इस नसीहत पर अमल करते और शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी को पकड़-पकड़ कर न छोड देते; तो वह क्यों बल संग्रह करने पाता और क्यों हिन्दुओं का राज्य नष्ट होकर मुसल्मानों का राज्य होता। दुश्मन को हरगिज़ बलहीन न समझना चाहिये। दो दुश्मनोके दरमियान अगर कुछ बात कहो; तो इस भांति कहो कि यदि वे आपसमें दोस्त भी हो जावें तोभी तुम्हें लजित न होना पड़े। दो मनुष्योंकी दुश्मनी आगके समान है और जो बाते बनाता है, वह आगमें ईधन डालता है। जब दो दुश्मन आपसमे सुलह कर लेते हैं तब वे दोनों ही चुगलखोरको बुरी नज़रसे देखते हैं। जो शखूस दो आद- मियोके बीचमे आग लगाता है, वह खुद अपने तई उसमें जलाता है। अपने मित्रोंसे इस तरह चुपचाप बात करो, कि तुम्हारे खू नके प्यासे शत्रु तुम्हारी बात न सुन लें। अगर दीवार के सामने भी कुछ बात कहो; तो होश रक्खो कि दीवारके पीछे कान न लग रहे हो।
आठवां अध्याय। ३१६ १३ जो मनुष्य अपने मित्रके शत्रुओंसे मित्रता करता है वह अपने मित्रको नुकसान पहुचाना चाहता है। ऐ बुद्धिमान् मनुष्य! तू उस मित्रसे हाथ धोले, जो तेरे शत्रुओंसे मेल- जोल रखता है। जब तुम्हें किसी कामके आरम्भ करनेके समय ऐसा सन्देह उठ खड़ा हो, कि इस कामको किस टॅगसे जारी करें, तव तुम्हें वह ढंग अखतियार करना चाहिये, जिससे तुम्हें नुकसान न पहुँचे। कोमल स्वभावके मनुष्यसे कड़ाईसे बातें न करो और वह शख्स जो तुमसे मेल रखना चाहता है, उससे लड़ाई-झगड़ा मत करो। १५ जब तक रुपया खर्च करनेसे काम निकल सके, तब तक जानको ख़तरे में न डालना चाहिये। जब हाथसे किसी तरह काम न निकले, तव तलवार खीचनाही मुनासिव है। वलहीन शत्रु पर या मत करो; क्योंकि यदि वह वल- वान् हो जायगा तो तुम्हें हरगिज़ न छोड़ेगा। जब तुम किसी दुश्मनको कमज़ोर देखो, तव अपनी मूछोंपर ताव मत दो, क्योंकि हर हड्डीमे गूदा और हर लिवासमें मर्द है। जो शख्स दुष्टको मार डालता है, वह दुनियाको उसकी दुष्ट- ३२० गुलिस्ता। ताओंसे बचाता है और अपने तई ईश्वरके कोपसे छुड़ाता क्षमा प्रशंसा-योग्य है; तथापि अत्याचारी ज़ालिम- के ज़ख़म पर मरहम न लगाओ। जो सांपकी जान बख. शता है, वह यह नही जानता, कि मैं आदमकी औलादको नुकसान पहुंचाता हूँ। शत्रुकी सलाहके माफ़िक काम मत करो, किन्तु उसकी बात अवश्य सुनो। शत्रु की सलाहके विरुद्ध काम करनाही बुद्धिमानी है। शत्रु जिस कामके करनेको कहे, वह काम मत करो। अगर तुम उसकी सलाहके माफ़िक काम करोगे, तो तुम्हें रज करना और पछताना पड़ेगा। अगर शत्रु तुम्हें तीरके समान सीधी राह भी दिखावे, तोभी तुम उस राहको छोड़ दो और दूसरी राह अख़तियार करो। १८ अधिक क्रोध करनेसे भय पैदा होता है और अधिक मेह- रबानीसे रौब नही रहता। न तो इतनी सखू ती करो कि लोग तुमसे नफ़रत करने लगे और न इतनी नरमी अखति- यार करो कि लोग तुम्हारे सिरपर चढ़े। सख्ती और नर्मी, उस ज़र्राहके माफ़िक काममें लानी चाहिये, जो पहले तो चीरा देता है किन्तु साथही मरहम भी लगाता है। बुद्धि- मान् आदमी:न तो अत्यधिक कड़ाईही करता है और न इतनी नर्मीही करता है कि उसकी कदरही घट जाय ।
आठवा अध्याय । ३२१ १ एक जवानने अपने पितासे कहा:--"आप बुद्धिमान हैं, अपने अनुभवसे मुझे कुछ उपदेश दीजिए।" उसने उत्तर दिया:-"सिधाई और भलमनसईसे काम ले , मगर इतनी सिधाई मत रख कि लोग भेड़ियेकेसे तेज़ दांतोंसे तेरा अपमान करें" १६ दो शख्स बादशाहत और मज़हबके दुश्मन हैं, निर्दय वादशाह और निरक्षर फ़कीर । ईश्वरकी आज्ञाको न पालने वाला बादशाह किसी मुल्कमें न होवे ! २० राजाको उचित है कि अपने शत्रुओं पर उतना क्रोध न करे कि जिससे मित्रोंके मनमें भी खटका हो जाय। क्रोधाग्नि पहले क्रोध करनेवालेके सिरपरही पड़ती है। पीछे शत्रु तक पहुँचे या न पहुँचे इसमे सन्देह है। ख़ाकसे बनी हुई आदमकी औलादको अभिमान, निष्ठुरता और मिथ्या वड़ाई से बचना चाहिये। तुममें इतना उत्ताप और हठ है कि मै नही जानता तुम आगसे बने हो या ख़ाकसे। बलकान देश में, मैंने एक फ़कीरको देखा। मैंने उससे कहा-'अपने उप- देशसे मेरी अज्ञताको दूर करो।" उसने जवाब दिया-"जा, खाककी तरह बर्दाश्त कर और जो कुछ तूने पढ़ा है उसे ख़ाक में द्वा दे।" मनुष्य को चाहिए कि क्रोध को परित्याग करे। क्रोध पहले क्रोध करने
३२२
गुलिस्तां।
वालेकाही नाश करता है। मनुष्य मिट्टी से बना हुआ है । उसे मिट्टी की
भाँति सहनशील होना चाहिए और अभिमान, हठ एवं निर्दयता को हृदय
में स्थान न देना चाहिए।
२१
दुष्ट मनुष्य सदा शत्रु के हाथमे गिरफ्तार है। वह चाहे
कहीं जावे, किन्तु अपनी सज़ाके चुङ्गलोसे रिहाई नहीं पा
सकता। अगर दुष्ट आदमी आफतसे बचनेके लिए आस्मान
पर भी चला जावे, तोभी अपनी दुष्टताके कारण आफ़तसे
नहीं बच सकता।
२२
..
जब शत्रु की सेनासे फूट देखो, तब खूब साहस करो
किन्तु यदि वे आपसमें मिले हुए हो तो तुम ख़बर्दार रहो।
जब तुम दुश्मनोंके दरमियान लड़ाई-झगड़ा देखो, तब चैनसे
दोस्तोंके पास जा बैठो ; किन्तु जब तुम उन्हें एक-दिल देखो
तब कमानपर चिल्ला चढ़ाओ और किलेकी दीवारोपर पत्थर
जमा करो।
२३
जब दुश्मनकी कोई चाल काम नहीं करती, तब वह
दोस्ती पैदा करता है; क्योंकि दोस्तीके बहानेसे, वह उन
सब कामोको कर सकता है, जिनको वह दुश्मनीकी हालतमे
--
न कर सका था।
आठवाँ अध्याय ।
३२३
२४
सांपके सिरको अपने दुश्मनके हाथसे कुचलो। ऐसा
करनेसे दो लाभोंमेंसे एक तो अवश्यही होगा। अगर
दुश्मन सांपको जीत ले तव तो तुमने साँपको मार लिया और
अगर सांप तुम्हारे दुश्मनको जीत ले तो तुमने अपने दुश्मन
से रिहाई पाई। युद्धके दिन, शत्रुको निर्बल देखकर निर्भय
मत रहो;
क्योकि जो जान पर खेलेगा, वह शेरका भेजा
भी निकाल लावेगा।
जब तुम्हे किसीको ऐसी ख़बर देनी हो, जो उसका (जिसे
ख़बर दी जाती है) दिल विगाड़े ; तव तुम्हें उचित है कि उसे
वह ख़बर मत दो। तुम चुप्पी साध जाओ। उस बुरी ख़बर
को वह किसी दूसरे शख़्ससेही सुन लेगा। ऐ बुलवुल !
मौसमेवहारकी खुश-ख़बरी ला। बुरी ख़बर उल्लूके लिए
छोड़ दे।
२६
किसी की चोरीकी बात बादशाहसे मत कहो; सिवा
उस हालतके, जवकि तुम्हे यह विश्वास हो कि वह तुम्हारी
वात पसन्द करेगा; अन्यथा तुम अपनेही नाशका सामान
करोगे। जव तुन्हें किसी कोई वात कहनी हो, तव पहले
यह निश्चय करो कि तुम्हारी वातका असर होगा या नहीं।
अगर असर होनेकी उम्मीद दीखे तो मु हसे वात निकालो।
ཁ༽
३२४ गुलिस्ताँ। २७ जो शख़्स खुद-पसन्द-घमण्डी-आदमीको नसीहत देता है, वह खुद नसीहतका सुहताज है। २८ दुश्मनके धोखेमे मत फँसो और खुशामदीकी लल्लो-चप्पो से फूलकर कुप्पा न हो जाओ। उसने बारीक जाल और इसने लालचका पल्ला फैलाया है। मूर्खको तारीफ़ अच्छी मालूम होती है। खवर रहो और खुशामदीकी बातें मत सुनो ; क्योंकि वह, अपनी थोडीसी पूंजी लगाकर तुमसे अधिक नफ़ेकी आशा करता है। अगर तुम एक दिन भी उस की इच्छा पूर्ण न करोगे, तो वह तुममें दो सौ ऐब-दोष- निकालेगा। २९ जब तक कोई शख़्स किसी वात करनेवालेके दोष नही पकड़ता तव तक उसकी वात दुरुस्त नही होती। मूर्खकी तारीफ और अपने विचार-बल पर निर्भर होकर अपनी बात की सुन्दरता पर घमण्ड मत करो। ३० हर शख्स अपनी अक्ल को कामिल और अपने बच्चेको ख बसूरत समझता है। एक यहूदी और एक मुसलमान, आपतमे, इस ढंगसे झगड़ रहे थे कि मुझे हंसी आ गई । मुसलमानने गुस्से में भरकर कहा:- अगर मेरा यह कौल आठवां अध्याय। ३२५ दुरुस्त न हो तो खुदा मुझे यहूदीकी मौत मारे?" यहूदीने कहा :-"मैं तौरेतकी क़सम खाता हूँ, अगर मेरी वात तेरी तरह झूठी हो तो मैं तेरी तरह मुसलमान हूँ।" अगर संसारमें अक्ल न होती, तो कोई अपने नादान होनेका गुमान भी न करता। ३१ दस आदमी एक थालीमें बैठकर खालेंगे; मगर दो कुत्ते एक मुर्दार-लाश-से सन्तुष्ट न होंगे। अगर लालची आदमीके हुक्ममे तमाम दुनिया भी हो तो भी वह भूखाही है ; किन्तु जो सन्तोपी है, वह एक रोटीसेही राज़ी रहता है। तङ्ग पेट, विना गोश्तके, एक रोटोसेही भर जाता है, किन्तु तङ्ग नज़र तमाम दुनियाकी दौलतसे सन्तुष्ट नहीं होती। मेरे पिताने, मरते समय, मुझे यह नसीहत दी :-"शहवत- मस्ती-आग है, उससे वचो। नरक की आगको तेज़ मत करो, क्योंकि तुम उस आगको सह न सकोगे। सन्तोप- रूपी नलसे वर्तमान आगकोही वुझा दो।" ३२ जो मनुष्य शक्ति-अधिकार-रहते हुए भलाई नहीं करता, उसे शक्ति-हीन-अधिकार-हीन होने पर दुख भोगना पड़ेगा। अत्याचारीसे बढ़कर अभागा और कोई नहीं है, क्योंकि विपद्के समय कोई उसका दोस्त नहीं होता। ३३
३२६
६
गुलिस्तां।
ज़िन्दगी एक सांसपर कायम है और सांसारिक जीवन दो
असत्ताओंके वीचमें है। वे जो दीनको दुनियाके लिए वेचते
हैं गधे हैं। वे यूसुफको बेचते हैं और बदले में कुछ नहीं
पाते। “ऐ आदमके पुत्रो! क्या मैंने तुम्हारे साथ कौल नहीं
किया था कि तुम शैतानकी पूजा न करो ? दुश्मनकी सलाह
से तुम अपने दोस्तका वादा तोड़ते हो। देखो, किससे तुम
जुदा हुए हो और किससे मिले हो।"
धर्मात्माओं पर शैतानका ज़ोर नहीं चलता और ग़रीबों
पर बादशाहकी प्रवलता नहीं होती। जो नमाज नहीं
पढ़ता, चाहे उसका मुँह रोजोंके मारे खुलाही रहता हो
किन्तु उसका भरोसा मत करो। जो ईश्वरोपासना नहीं
करता, उसे तेरे कर्जकी भी फिक्र नहीं रह सकती।
जिनके दिल में धर्म है, जो धर्म को ही सब कुछ समझते हैं, उन्हें पाप
की छूत नहीं लगती। जो ईश्वर-भजन नहीं करता, जो ईश्वर के प्रति
अकृतश है, उसका विश्वास न करना चाहिए।
३५
मैंने सुना है कि पूरवी देशोंमें चालीस सालमें चीनीका
एक वरतन बनाते हैं, लेकिन बग़दादमें एक दिनमेंही सौ
बरतन बना लेते हैं। इसीलिये उनकी कीमत कम होती
है। मुर्गीका बच्चा ज्योंही अण्डेसे बाहर निकलता है, त्योंही
आठवां अध्याय। ३२७ अपनी खुराककी तलाश करता है, किन्तु आदमीके बच्चे में वुद्धि और विवार नहीं होते। जो एकदम कोई चीज़ हो जाता है, वह पूर्णताको नहीं पहुँचता ; किन्तु जो धीरे-धीरे होता है, वह शक्ति और उत्तमतामें सबसे बढ़ जाता है। कांच सव जगह मिलता है, अतः उसका कुछ मोल नहीं है, किन्तु लाल कठिनतासे मिलता है इसलिये वह बहुमूल्य है। इस शिक्षा का यह साराश है कि जो चीज़ देर में तय्यार होती है और कठिनता से मिलती है, वह अच्छी ओर महँगी होती है, लेकिन जो चीज जल्द तय्यार होती है और हर जगह मिलती है वह कम-कदर और कम- कीमत होती है। ६ धैर्यसे काम बन जाते हैं, किन्तु जल्दबाज़ीसे विगड़ जाते हैं। मैंने एक जङ्गलमें अपनी आँखोंसे दो आदमी देखे । एक जल्द-जल्द चलता था और दूसरा धीरे-धीरे। धीरे-धीरे चलनेवाला तेज चलनेवालेसे पहिलेही अपनी मज़िल पर पहुँच गया। तेज़ घोड़ा मैदान दौड़ता-दौड़ता थक गया; जवकि ऊँट धीरे-धीरे चलाही गया। वनता। मूर्खके लिये 'मौन' से बढ़कर दूसरी अच्छी वीज़ नहीं है। अगर मूर्ख इस वातको जानता तो मूर्ख न अगर तुममे कोई खूबी और होशियारी नहीं है, तो अपनी जुवानको अपने दांतोंके भीतरही रक्खो। जवानही मनुष्य
३२८
गुलिस्ता।
होता है।
की बेइज्जती कराती है। अखरोट विना गुठलीके हल्का
एक अज्ञान मनुष्य, एक गधेको तालीम देनेमे
अपना सारा समय नष्ट किया करता था। किसीने कहा :
'ऐ नादान | तू किस लिये इतनी कोशिश करता है,
अज्ञानता पर तुझे धिक्कार है ! जानवर तो तुझसे बोलना न
सीखेंगे, किन्तु तू जानवरोसे चुप रहना सीख ।
उत्तर देनेसे पहले विचार नहीं करता, उसके मुंहसे ठीक
बात नही निकलती । या तो बुद्धिमानकी भांति अपने
शब्दोंको दुरुस्त करके बोलो अथवा जानवरोंकी भांति चुप्पी
साध लो।
"विभूषणं मौनमपारडतानाम् ।'
जो मनुष्य
,
जब कोई
यदि तुम दूसरोंको अपनी बुद्धिमानी दिखाने और वाहवाही
लूटनेकी ग़रज़से, अपनेसे अधिक बुद्धिमान से वादविवाद
करोगे तो उल्टो तुम्हारीही मूर्खता प्रकट होगी।
शख स तुम्हारी अपेक्षा अच्छी बात कहे और तुम खुद भी
उस बातको भली-भाँति जानो ; तब ऐतराज़ मत करो।
३६
जो बुरोकी संगति करता है, वह नेकी नहीं देखता।
अगर कोई फ़रिश्ता किसी देवकी संगति करे तो वह भय,
चोरी और धूर्तताही सीखेगा। तुम बुरोसे नेकी नही सीख
सकते। भेड़िया चमारका काम नही करता।
आठवां अध्याय। आदमियोंके छिपे हुए ऐव ज़ाहिर मत करो; क्योंकि उनकी बदनामी करनेसे तुम्हारी भी वेऐतवारी हो जायगी। ४१ जिसने इल्म पढ़ा किन्तु उसपर अमल न किया, वह उस मनुष्यके समान है जिसने जमीन तो जोती मगर वीज न वोया। -- जो शख स लड़ाई-झगड़ा करनेमे तेज है, काम करने में दुरुस्त नही हो सकता। चादरसे ढकी हुई सूरत बहुत सुन्दर मालूम हो सकती है, किन्तु चादर हटातेही नानी नजर आवेगी। ४३ अगर तमाम रातें कदरके लायक होती, तो कदर करने लायक रातें भी बेकदर हो जाती ; अगर हरेक पत्थर बद- खशांका लाल होता, तो लाल और पत्थरोका मोल एक समान होता। हरेक सुन्दर सूरतवालेका मिज़ाज भी अच्छा हो. यह कठिन बात है, क्योंकि भलाई दिलके अन्दर होती है न कि सूरतमें। तुम आदमीके तौर-तरीके देखकर, एक दिनमै यह जान सकते हो कि इसने कितना इल्म हासिल किया गुलिस्ताँ। । है अर्थात् यह कितना विद्वान् है ; मगर उसके दिलकी तरफ से निर्भय मत रहो और अपनी पहचानका घमण्ड न करो क्योकि मनुष्यकी दुष्टताका पता बरसोंमे लगता है। ४५ जो शलस बड़े लोगोंसे लड़ाई करता है वह स्वयं अपना खून वहाता है। जो अपने तई बड़ा ख़याल करता है, वह उसके समान है जो कनखियोंसे देखता है मगर दूना देखता है। अगर मेढ़ेके सिरके साथ खेल करोगे तो अपने सिरको जल्दही टूटा हुआ देखोगे । ४६ शेरके साथ पंजा लड़ाना और तलवार पर मुट्ठो मारना अक्लमन्दोका काम नही है। जबरदस्तके साथ ज़ोर-आज- माई और लड़ाई न करो। जब ज़बरदस्तका सामना हो जाय तब अपने हाथोंको बग़लोंके नीचे दबालो। ४७ जो कमज़ोर आदमी ज़बरदस्तके साथ लड़ाई या ज़ोर- आज़माई करता है वह अपने दुश्मनका दोस्त बनकर अपनी मौत आप बुलाता है। जो छायामें पला है, वह योद्धाओंके साथ युद्ध-भूमिमें कैसे जा सकता है ? जिसकी भुजाओंमे बल नहीं है, यदि वह लोहेकी कलाई वालेका सामना करे तो वह मुर्ख है।
आठवां अध्याय।
३३१
दुर्जन लोग सजनों को उसी तरह नही देख सकते,
जिस तरह बाजारू कुत्ते शिकारी कुत्ते को देख कर भौंकते
और गुर्राते हैं, मगर उसके पास जानेकी हिम्मत नही
करते।
an
जब कोई नीच मनुष्य गुणोंमे किसी दूसरेकी बराबरी
नहीं कर सकता
तब वह अपनी दुष्टताके कारण उसमें दोष
लगाने लगता है। नीच और पर-गुणद्वेषी मनुष्य गुणवान्की
निन्दा उसकी नामौजूदगीमेही करता है ; लेकिन जव सामना
हो जाता है, तब उसकी बोलती बन्द हो जाती है।
५०
जो पेट न होता तो चिड़िया चिड़ीमारके जालमें न
फंसती और चिड़ीमार भी अपना जाल न फैलाता। पेट
हाथोंकी हथकड़ी और पैरोंकी वेड़ी है। जो पेटका गलाम
है वह ईश्वरकी उपासना नहीं करता।
५१
बुद्धिमान् देरसे खाते हैं, धर्मात्मा आधे पेट भोजन करते
हैं, योगी लोग सिर्फ उतना खाते हैं, जितने से ज़िन्दगी
कायम रह सके, जवान लोग जो कुछ थालीमे होता है सव
खा जाते हैं, बूढोंके जव तक पसीना नहीं निकलता तवतक
खातेही रहते हैं, किन्तु कलन्दर इतने भुखमरेपनसे खाते हैं
३३२ गुलिस्तां । or कि पेटमे साँस चलने को भी जगह नहीं रहती और थालीमें एक टुकड़ा भी दूसरोकी जीविका को नहीं रहता। जो शल्स पेटका गुलाम होता है, उसे दो रात नींद नहीं आती एक रात तो पेटके बोझ के मारे और दूसरी रात भूख की फ़िक्र से। भूख से ज्यादा भोजन करना रोगों को न्यौता देकर बुलाना है । ५२ स्त्रियोंके साथ सलाह करनेसे बरबादी होती है और उपद्रवियो अथवा राजद्रोहियोके प्रति दातारी करने से अप- राध लगता है। जो चीते पर रहम करता है वह बकरियो पर जुल्म करता है। अगर तुम दुष्टो पर दया करते हो और उनकी हिमायत लेते हो; तो तुम भी उनके किये हुए पापोके अपराधी हो। बुद्धिमान् को चाहिए कि कभी ऐसा काम न करे जिस से राजा असन्तुष्ट हो । राजद्रोहियों को सहायता देना भी राजद्रोही होना है। राजा देशी हो या विदेशी, ईश्वर-तुल्य है; क्योंकि वह ईश्वर को आज्ञा से ही उस पद पर बैठा है, अतः राजा के विरुद्ध काम करना, ईश्वर के विरुद्ध काम करना राजद्रोही इस लोक और परलोक दोनों में सुख नहीं पाते । अगर पड़ोस में राजद्रोही हो तो वह पड़ोस स्याग देना चाहिए, अगर गाव में हो तो गांव त्याग देना चाहिए । उनको साहाय्य तो किसी दशा में भी न देना चाहिए। भारतवासियों को शैख सादी की यह अनमोल शिक्षा अपने हृदय-पट पर अतित कर लेनी चाहिए । . sho
आठवाँ अध्याय।
५३
जो कोई अपने दुश्मन को, अपने कावूमें पाकर भी, मार
नहीं डालता, वह खुद अपना दुश्मन है। अगर पत्थर हाथमे
हो और सांप पत्थर के तले हो; तो उस समय पशोपेश
करना और देर करना बेवकूफ़ी है। चीतेके तेज़ दांतों पर
रहम करना, भेड़ों पर जुल्म करना है। किन्तु दूसरे लोग
इस विचार के विरुद्ध हैं और कहते हैं कि कैदियोंके मार
डालने में विलम्व करना अच्छा है, क्योकि पीछे भी उनका
मारना या छोड़ना हाथमे है; क्योंकि यदि कोई विना
विचारे मार डाला जावे और पीछे कोई ऐसी वात निकल
आवे जिससे उसका मारडालना अनुचित जॅचे, तब वह
जिन्दा नहीं हो सकता । मार डालना आसान है, मगर
ज़िन्दा करना नामुमकिन-असम्भव है। तीरन्दाजका सत्र
करना अकूलमन्दी है, क्योंकि जो तीर कमानसे निकल जायगा
वह फिर लौटकर न आवेगा।
विवेकवुद्धि से जाँच कर सब काम करने चाहिए।
अगर कोई वुद्धिमान् मूखोंके साथ, किसी विषय पर
वादविवाद करे , तो उसे अपनी इज्जत की आशा त्याग देनी
चाहिए। अगर कोई मूर्ख किसी अक्लमन्द को हरा दे तो
आश्चर्य न करना चाहिए, क्योंकि मामूली पत्थर भी तो मोती
को तोड डालता है। जिस समय, एकही पिञ्जरेमें कोयल
न्य
३३४ गुलिस्ताँ। के साथ कव्वा हो, उस समय यदि कोयल न गावे तो आश्चर्य की क्या बात है ? यदि कोई हरामज़ादा किसी बुद्धिमान् पर जुल्म करे तो बुद्धिमान् को चाहिए कि कुपित और शोकात न हो। अगर एक निकम्मा पत्थर वेश-कीमत सोने के प्याले को तोड़ दे, तो पत्थर वेश-कीमत और सोना कम कीमत न हो जायगा। ५५ अगर कोई अक्लमन्द कमीनों की मण्डली में पड़कर, उन पर अपने उपदेश का असर न डाल सके अथवा उनका प्रशंसा- भाजन न बन सके तो इसमें आश्चर्य की कौन बात है ? बीनकी आवाज़ ढोल की आवाज़ को दबा नहीं सकती; किन्तु बद- बूदार लहसन अम्बरकी खु.शबू को परास्त कर देता है। मूर्ख को अपनी ऊँची आवाज़ का घमण्ड हुआ, क्योकि उसने गुस्ताख़ी से एक अक्लमन्द को घबरा दिया। कि हिजाज़ के बाजेकी आवाज़ नटके ढोल से दब जाती है। अगर एक रत्न कीचड़ में गिर पड़े तोभी वह वैसाही नफ़ीस बना रहता है और यदि गर्द आस्मान पर चढ़ जावे तोभी अपनी असली नीचता को नहीं छोड़ता। लियाकत बिना तालीम के और तालीम बिना लियाकत के बेकार है। शक्कर की कीमत गन्ने से नहीं है किन्तु उसकी अपनी खासियत से है। कस्तूरी वह है जो आप खुशबू दे, न कि अत्तारके कहने से । अक्लमन्द अत्तारके तबले-डब्बे के समान है, जो क्या नहीं जानते
आठवां अध्याय।
३३५
चुपचाप रहता है लेकिन गुण दिखाता है। मूर्ख नटके
ढोल के समान है जो शोर बहुत करता है, किन्तु भीतरसे
पोला है। अन्धोंके बीच मे सुन्दरी कन्या और काफ़िरोंके
घरमें कुरान की जो गति है वही गति बुद्धिमान् की मूों
६
५६
जिस दोस्तको तुम एक मुद्दत में अपने हाथ में लाये हो,
उससे एक दममें नाराज़ न हो जाओ। पत्थर जो बरसोमें लाल
हुआ है उसे एक क्षण में पत्थर से न तोड़ डालो।
५७
बुद्धि, ज्ञान-शक्ति के इस भांति अधीन है जिस भांति एक
सीधा-सादा पुरुष चालाक स्त्री के वश में। उस सुखदायी
घर के दरवाजे को बन्द कर दो जिसके अन्दर औरत की
आवाज़ गूंजती है।
बुद्धि विना बलके छल और कपट है और वल विना बुद्धिके
मूर्खता और पागलपन है। सबसे पहले विचार, उद्योग और
बुद्धिमानी की आवश्यकता है, इनके पीछे राज्य की। क्योंकि
मूखों के
हाथ मे
हुकूमत
और दौलत देना, स्वयं अपने
विरुद्ध हथियार देना है।
५६
वह उदार पुरुष जो खाता और दान करता है, उस धर्मात्मा
३३६
गुलिस्ताँ।
से अच्छा है जो निराहार रहता और सञ्चय करता है ।
जो पुरुष लोगों का प्रशंसापात्र होनेके लिए विषय-भोगो का
त्याग करता है, वह उचित को छोड़ कर अनुचित रीति से
विषय-वासना पूरी करता है। वह साधु जो ईश्वर-भजन के
लिए एकान्त-वास नहीं करता, वह विचारा धुंधले शीशे मे
क्या देखेगा ? थोड़ा-थोड़ा करके बहुत हो जाता है। और
बूंद-बूंद से नदी बन जाती है।
६०
अक्लमन्द आदमीको मामूली आदमी की गुस्ताख़ी और
लापरवाही दरगुज़र न करनी चाहिए ; क्योकि इससे दोनो
तरफ़ नुकसान पहुँचता है अवलमन्दका
रोब कम होता है
और मूर्खकी मूर्खता बढ़ती है। अगर तुम नीच मनुष्यके साथ
मेहरवानी और खुशी से वाते करोगे तो उसका घमण्ड और
हठ और भी बढ़ जायगा।
६१
पाप, किसी के भी द्वारा क्यो न किया जावे, घृणोत्पादक
है, लेकिन विद्वानो मे और भी ज़ियादा , क्योंकि विद्या शैतान
से युद्ध करने का शस्त्र है। अगर कोई हथियारवन्द आदमी
कैदमे पड़ जावे तो उसे बहुतही लजित होना पड़ेगा।
दुश्चरित्र मूर्ख दुश्चरित्र पण्डित से अच्छा है। क्योंकि मुर्खने
तो अन्धे होनेके कारण राह खोई, किन्तु पण्डित दो आँखोंके
होते हुए भी कुएं में गिर पड़ा।
।
आठवां अध्याय।
३३७
वह शख़्स जिसकी रोटी लोग उसके जीते जी नहीं खाते,
उसके मरने पर उसका नाम भी नहीं लेते। जब मिश्र देशमें
अकाल पड़ा तव यूसुफ ने भरे-पूरे भाण्डारसे कुछ न खाया ;
क्योंकि खानेसे उसे भूखोंके भूल जानेका अन्देशा था। वेवा
अंगूर चखती है न कि वाग़ का मालिक । जो सुख-सम्पदकी
अवस्थामें रहता है वह किस भांति जान सकता है कि भूखा
रहना कैसा होता है ? जो आप दुःखी है वही दुःखियों की
दशा जानता है। ऐ मनुष्य ! तू जो तेज़ घोड़े पर चढ़ा हुआ
है उस गधे का विचार कर जो कांटोंसे लदा हुआ कीचड़ में
फंसा हुआ है। अपने पड़ोसी फकीर से आग मत मांग,
क्योंकि उसकी चिमनी से जो कुछ निकलता है, वह उसके
दिलका धुआं है।
६३
अकाल और सूखे के समय किसी तङ्ग-हाल फकीरने यह
मत पूछो कि किस तरह गुज़र होती है, यदि पूछनाही हो
तो उस हालतमें पूछो जवकि तुम्हारा इरादा उसे जीविका
देकर उसके घाव पर मरहम लगानेका हो। जब तुम किसी
लदे हुए गधे को कीचड़में फंसा हुआ देखो, तब उस पर
रहम करो और किसी भांति उसके सिरपर होकर न निकलो।
अगर तुम आगे बढ़ो और पूछो कि कैसे गिरा ; तो कमर
बांधो और मर्दोके मानिन्द उसकी पूंछ पकड़ कर खींचो।
२२
३३८
गुलिस्तां।
६
६४
दो बातें असम्भव हैं,-एक तो भाग्य में लिखे से अधिक
खाना और दूसरे नियत समय से पहले मरना। होनहार,
हमारे हज़ारो वार रोने-पीटने या खुशामद और शिकायतें
करनेसे टल नहीं सकती। हवाके ख़ज़ाने के फ़रिश्ते को क्या
परवा, यदि एक वेवा बुढ़िया का चिराग़ बुझ जावे ।
६५
ऐ रोजी-जीविका–मांगनेवाले ! भरोसा रख, तू बैठ
कर खायगा और तू :जिसको मौतका बुलावा आगया है भाग
मत ; क्योकि भागकर तू अपनी जान बचा न सकेगा।
वैठा
रह या उद्योगकर, भगवान् तेरी रोज़ की रोटी अवश्य भेजेंगे।
तू शेर या चीतेके मुंहमे भी क्यों न चला जावे, यदि तेरे मरनेका
दिन न आया होगा तो वे भी तुझे हरगिज़ न खा सकेंगे।
जो तेरे भाग्यमे नही है वह तुझे न मिलेगा और जो तेरे
भाग्य मे है वह तुझे जहाँ तू होगा वहाँही मिल जायगा।
सुना है, कि सिकन्दर बड़ी मेहनत से अँधेरी दुनियामे गया;
किन्तु वहाँ पहुँच जाने पर भी अमृत न चख सका।
६७
मछुआ बिना रोज़ी के दजला ( नदी ) में मछली नहीं पकड़
सकता और मछली बिना मौतके खुश्की-स्थल-पर नहीं
मर सकती। लालची मनुष्य, जीविकाकी फिनमें तमाम दुनि-
आठवां अध्याय। ३३६ यामें दौड़ता फिरता है और मृत्यु उसकी एड़ियोंके पीछे-पीछे लगी घूमती है। ६८ द्वेषी मनुष्य निरपराध मनुष्योंसे शत्रुता रखता है। मैंने एक मूर्ख को एक प्रतिष्ठित मनुष्य का अपमान करते देखा। मैंने उससे कहा,-"महाशय ! अगर आप भाग्य-हीन हैं तो इसमें भाग्यवानों का क्या दोष है ?” जो तुमको देखकर जले तुम उसका बुरा मत चेतो; क्योंकि वह अभागा स्वयं आफ़त में फंसा हुआ है। जिसके पीछे ऐसा शत्रु (दूसरेको देखकर कुढ़नेवाला ) लग रहा है उसके साथ शत्रु ता करनेकी क्या आवश्यकता? श्रद्धाहीन विद्यार्थी निर्धन प्रेमी है ; अनजान यात्री पड्स- हीन पक्षी है ; अनभ्यस्त विद्वान् फल-हीन वृक्ष है. और विद्या- हीन साधु विना द्वार का घर है। अर्थात् ये सव असम्पूर्ण हैं' अतएव वेकार है। कुरान इस ग़रज़ से प्रकाशित किया गया था कि लोग । उससे अच्छी-अच्छी नसीहतें सीखें न कि इस मतलव से कि लोग उसका पाठ मात्र किया करें। निरक्षर योगी पैदल मुसा- फिर के समान है और सुस्त विद्वान् सोते हुए सवारके माफिक । है। वह पापी जो हाथ उठा कर ईश्वरसे आशीर्वाद मांगता ---
३४०
गुलिस्तां।
है उस साधु से अच्छा है जो अभिमान करता है। वह फौजी
अफसर जो शान्त, शील और मिलनसार है, उस कानून जानने
वाले से अच्छा है जो लोगों पर जुल्म करता है।
७१
वह विद्वान् जो शास्त्रों को पढ़कर उनके अनुसार नहीं
चलता उस वर्र के समान है जो डङ्क मारती है, किन्तु मधु
नहीं देती। कठोर और गॅवार वर्ष से कह दो,-'जब तू मधु
जहीं दे सकती तव डङ्क न मार ।'
जिस
पुरुष
में
पुरुषत्व नहीं है वह औरत है। जो साधु
लालची है वह वटमार-लुटेरा है। जिस मनुष्यने लोगों
की दृष्टि में पवित्र बनने के लिए सफेद कपड़े पहने हैं उसने
अपना ऐमालनामा ( कर्मखाता) काला किया है। हाथको
सांसारिक वस्तुओंसे रोकना चाहिए । आस्तीनोंके लम्बी अथवा
छोटी होनेसे क्या?
७३
दो मनुष्योंके दिलसे रञ्ज नहीं जाता; एक तो व्यापारी
जिसका जहाज़ समुद्रमें डूब गया है जौर दूसरा वह जिसका
वारिस-उत्तराधिकारी-कलन्दरों-धन-उड़ाऊ
लोगों के
साथ बैठा हुआ है। यद्यपि बादशाह की दी हुई खिलअत
कीमती होती है, किन्तु अपने मोटे-झोंटे और फटे-पुराने
कपड़े उससे कहीं बढ़कर होते हैं। यद्यपि बड़े आदमियोंका
In
आठवां अध्याय।
३४१
खाना-भोजन-मज़ेदार होता है, तथापि अपनी झोलीका
टुकड़ा उससे ज़ियादा सुस्वादु होता है। सिरका या साग-पात
जो अपनी मेहनत से जुटाया जाता है वह गांवके सर्दारके दिये
हुए भेड़के बच्चे और रोटीसे अच्छा होता है।
७४
जिस दवा पर भरोसा न हो वह दवा खाना और विना
देखी हुई राहपर, विना काफलेके, अकेले चलना, ये दोनों
बातें बुद्धिमानों की मति के विरुद्ध हैं।
७५
लोगों ने एक बड़े भारी विद्वान् से पूछा,-"आप
ऐसे
विद्वान् किस तरह हुए ?" उसने कहा :-"मैं जिस वातको
न जानता था उसको दर्यात करने में शर्म न करता था।"
अगर तुम चतुर वैद्य को नाड़ी दिखाओगे तो आराम होनेकी
माशा कर सकोगे। हर चीज़के विषय में जिसे तुम नहीं
जानते, पूछो ; क्योंकि पूछने की थोड़ीसी तकलीफ़ से तुम्हें
विद्या की प्रतिष्ठित राह मिल जायगी।
७६
जब तुम्हें इस बात का निश्चय हो कि अमुक वात मुझे
उचित समय पर आपही मालूम हो जायगो ; तब तुम उस
वातके जानने के लिए जल्दी मत करो।
अगर थोड़ा सत्र न
करोगे और जल्दबाज़ी करोगे तो तुम्हारी इज्ज़त और तुम्हारे
रोय में कमी आ जायगी। जब लुकमान ने देखा, कि दाऊदके
-
३४२
गुलिस्ता
हाथ में लोहा, करामात के वल से, मोम होगया ; तव उसने
यह समझकर कि मुझे यह भेद विना पूछेही मालूम हो
जायगा, उससे कुछ न पूछा।
सामाजिक योग्यताओं में यह बात ज़रूरी है, कि या तो
तुम घर-धन्धेमे लगो या एकान्तमें बैठकर ईश्वर-भजन करो।
जब किसी से कोई बात कहो तव पहले यह विचारो, कि
यह बात उसे रुचेगी या नही और उसका ध्यान मेरी ओर
है या नहीं।
अगर उसका ध्यान तुम्हारी तरफ़ हो तो उसके
मिज़ाज के माफिक बात कहो। जो बुद्धिमान् मजनूं के पास
बैठेगा, वह लैला के जिक्र के सिवा और बात न कहेगा।
अगर कोई आदमी ईश्वर-भजन करनेके लिए किसी
शराब की दुकान में जाय, तो लोग सिवा इस बातके कि वह
वहाँ शराब पीने गया था और कुछ न कहेंगे। इसी भाँति जो
मनुष्य दुष्टों की संगति करता है, चाहे वह दुष्टोंकेसे आचरण
न करे, तोभी लोग उसपर दुष्टोंकीसी चाल चलने का
दोष लगावेंगे। अगर तुम नादानों की सुहबत करोगे तो
तुम पर नादानी का कलङ्क लगेगा। मैंने एक अक्लमन्दसे
कहा कि मुझे कुछ नसीहत दो। उसने कहा,-"अगर तुम
विचारवान और बुद्धिमान् हो तो मूल्की संगति मत करो;
आठवां अध्याय ।
क्योंकि उनकी
सुहवत से
तुम
गधे हो जाओगे और अगर तुम
मूर्ख हो तो तुम्हारी अज्ञानता और भी बढ़ जायगी।"
७६
अगर किसी सीधे ऊँटकी मुहरी एक बालक के भी हाथमे
हो तो ऊँट उसे १०० कोस तक राजी-राज़ी लिये चला
जायगा। किन्तु अगर रास्तेमें एक ऐसा खन्दक आजावे
जिसमें जान जानेका भय हो और बालक अज्ञानतावश ऊँट
को उसी खन्दक पर ले जाना चाहे ; तो ऊँट उस समय वालक
के हाथसे मुहरी छुड़ा लेगा और उसकी आज्ञानुसार कदापि
न चलेगा, क्योंकि आफ़त के समय मेहरबानी करना बुरा है।
कहते हैं, कि मेहरवानीसे दुश्मन दोस्त नहीं होता; बल्कि
दुश्मनी और भी बढ़ाता है। जो मनुष्य तुम पर मेहरवानी
करे, उसके साथ नम्र रहो और जो इसके विरुद्ध आचरण करे
उसकी आँखोंमें
धूल
झोंको कठोर और सख्त-मिज़ाज
आदमी के साथ मेहरवानी और नरमी से बातचीत न करो
क्योंकि जङ्ग खाया हुआ लोहा घिसी हुई रेती से साफ़ नहीं
,
होता।
८०
जो शख स, अपनी बुद्धिमानी दिखाने के लिए, दूसरोंकी
वातोंके बीच में बोलता है, वह अपनी नादानी प्रकट करता है।
होशियार आदमी से जवतक कुछ पूछा न जाय तब तक वह
३४४
गुलिस्ताँ।
जवाब नहीं देता। बात चाहे जैसी साफ क्यों न हो, उसका
दावा करना कठिन है।
झूठ कहना जखम करना है, अगर घाव आराम भी हो
जाय तोभी निशान बना रहता है। यूसुफ़के भाई झूठ बोलने
में बदनाम हो गये थे जब वे सब बोले तब भी किसी ने
उनका विश्वास न किया। जिसको सच बोलने की आदत
है वह अगर कभी ग़लती से झूठ भी बोले; तथापि उसका
कु सूर माफ हो सकता है ; किन्तु वह शख्स जो सूंठ बोलने
के लिए प्रसिद्ध है, यदि सच भी बोले तोभी आप उसे झूठा
..
कहेंगे।
ar
८२
यह बात संशय-रहित है, कि सृष्टिमें मनुष्य सब जीवोंसे
ऊँचा और कुत्ता सबसे नीच जानवर है; लेकिन अकूलमन्द
कहते हैं, कि कृतज्ञता न माननेवाले आदमी से कृतज्ञता
स्वीकार करनेवाला कुत्ता अच्छा है। अगर कुत्तेको एक टुकड़ा
रोटीका दे दो और पीछे तुम उसके सौ पत्थर भी मारो,
तोभी वह रोटीके टुकड़े को न भूलेगा। यदि तुम एक
नीचको चिरकाल तक पालो, तोभी वह एक तुच्छसी बातपर
तुमसे लड़नेको मुस्तैद हो जायगा।
वह फकीर जिसका अन्त अच्छा है, उस वादशाहसे भला
आठवां अध्याय। ३४५ है, जिसका अन्त बुरा है। सुखसे दुःख भुगतना अच्छा है, किन्तु सुखके पीछे दुःख भोगना अच्छा नहीं है। आस्मान जमीन को वृष्टि से उपजाऊ बनाता है। किन्तु जमीन उसे बदले में धूल के सिवा कुछ नहीं देती। घड़ेमें जो कुछ होता है घड़ा उसीको टपका देता है। अगर तुम्हारी नज़र में मेरा स्वभाव अच्छा न जंचे तो तुम अपने स्वभाव की उत्तमता को न छोड़ो। सर्वशक्तिमान भगवान् पापी के पाप- कम्मों को देखते हैं किन्तु उसके पापको छिपाते हैं। परन्तु पड़ोसी देखता नहीं है बल्कि शोर करता है। भगवान् रक्षा करे ! अगर आदमी आदमी के गुप्त कामोंको जानता तो कोई किसो की दस्तन्दाजी से न वचता। ८५ सोना खानसे खोदकर निकाला जाता है, किन्तु सूम से उसकी जान खोदने से। कमीने लोग खर्च नही करते, किन्तु खवरदारी से जमा करते हैं। उन लोगोंका कहना है, कि खर्च कर देनेसे खर्च करने की उम्मेद अच्छी है। कमीनेको तुम एक दिन शत्रुओं के लिए रुपया छोड कर मरा हुआ देखोगे। ८६ जो निर्बलोंपर दया नहीं करता उसे बलवानोंके अत्या- चार सहने पडेंगे। ऐसा सदाही नहीं होता, कि बलवान्
४
गुलिस्तां।
को
भुजा
निर्बल
भुजा परास्त ही करती रहे। निर्बल का दिल
न दुखाओ; अन्यथा कोई तुमसे अधिक बलवान् तुमको
अवश्य नीचा दिखावेगा।
८७
एक फकीर अपनी ईश्वर-उपासना के समय कहा करता
था, "हे भगवन् ! बुरों पर दया करो, क्योंकि नेकोंपर दया
करके तुमने उन्हें नेक बनाया है !"
८८
अक्लमन्द झगड़ा देखकर दूर हट जाता है और जब शान्ति
देखता है तब लगार डाल देता है; क्योंकि झगड़े के समय
दूर रहने में कुशल है और शान्ति के समय बीच में रहने में
सुख है।
८६
बादशाह ज़ालिमों के दूर करनेके लिए, कोतवाल खून
करने वालोंकी खबरदारी के वास्ते और काज़ी चोरीके मुकदमे
सुनने के लिए है। दो ईमानदार आदमी अपनी नालिश
करने काजी के पास नहीं जाते। जो तुम्हें हक मालूम हो उसे
दे दो। झगड़े-तकरार के साथ देनेसे राजी से देना भला
है। यदि कोई मनुष्य राजीसे सरकारी टैक्स नहीं देगा
तो हाकिम के नौकर जोरसे लेलेंगे।
६०
बूढ़ी वेश्या सिवा फिर पाप न करनेकी प्रतिज्ञा के और
आठवां अध्याय। ३४७ क्या कर सकती है? पदच्युत कोतवाल मनुष्यों पर फिर जुल्म न करनेके इकरारके सिवा और क्या कर सकता है ? वह मनुष्य जो जवानीमें, एकान्तमें बैठकर ईश्वर मे चित्त लगाता है ईश्वरकी राह में शेर-मर्द है; क्योकि वृद्ध मनुष्य तो अपने कोनेसे सरक नहीं सकता। ६१ दो मनुष्य मरते समय अपने साथ शोक ले गये :-एक वह जिसने जमा किया, किन्तु भोगा नहीं ; दूसरा वह जिसने विद्या पढ़ी किन्तु उसे काममें न लाया। किसीने ऐसा कस विद्वान नहीं देखा, जिसके दोष दूँढ़ने की लोगोंने कोशिश न की हो। लेकिन अगर एक दातार मनुष्य में दो सौ ऐव भी हों तथापि उसकी दातारी उनको छिपा देती है। दाता का दोष इसी तरह छिप जाता है जिस तरह चन्द्र के किरण- जाल में उसका कलस्क। । -
नीति-वाटिका के कुछ टटके फूल।
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इल्म चन्दॉ कि वेश्तर ख़ानी ।
चू अमल नेस्त दर तो नादानी ॥१॥
न मुहक्किक बुवद न दानिशमन्द ।
चारपाये बरो किताबे चन्द ॥२॥
जो पढ़े-लिखे मनुष्य मूों जैसे कर्म करते हैं-वे पढ़े-
लिखे मूर्ख हैं। किसी पशु पर यदि कुछ पुस्तकें लाद दी जायें
तो क्या वह उनसे विद्वान् या बुद्धिमान बन सकता है ? कभी
नहीं।
हर कि परहेज़ो इल्मो जुह्द फरो.त ।
खिरमने गर्द कर्दो पाक बिसोख्त ॥३॥
जिसने अपनी विद्या को, धर्मको, निष्ठा को, सांसारिक
किसी लाभ के लिये बेच डाला उसने मानो बड़े कष्ट से पैदा
किये अन्नके ढेरमें स्वयं आग लगा दी।
पन्दे अगर बिशनवी ऐ बादशाह !
दर हमा दफ़्तर बेह श्रीं पन्द नेस्त ॥४॥
आठवां अध्याय। ३४६ जुज बख़िरद मन्द म फ़रमा अमल । गर्चे अमल कारे खिरदमन्द नेस्त ॥५॥ राजन् , मेरी वातको ध्यानपूर्वक सुनिए-ऐसी बात कहने वाला आपके यहां दूसरा नहीं। अपने सब काम बुद्धिमानों के हाथ में दे दीजिएगा, यद्यपि बुद्धिमान ऐसे काम करना पसन्द नहीं करते हैं। माशूक हज़ारदोस्त रा दिल न दिही । वर मेदिही आ दिल व जुदाई बिनहीं ॥६॥ जिसके .हज़ार दोस्त हैं उससे मित्रता मत करो-उसे अपना दिल मत दो-यदि देते हो तो विरहकी व्यथा वर्दाश्त करने के लिए तय्यार रहो। सुख़ने दर निहा न वायद गुप्त । कॉ सुख़न बरमला न शायद गुफ़्त ॥७॥ जिस बात को तुम सब के सामने कहने में हिचकते हो उसको किसी से एकान्त में भी मत कहो। दर सुखन वादोस्तॉ आहिस्ता वाश । ता नदारद दुश्मने खूखार गोश ॥८॥ पेश दीवारा चे गोई होश दार । ता न वाशद दर पसे दीवार गोश || तुम अपने मित्रों से भी इस तरह चुपचाप वात करो कि 1 1
३५०
गुलिस्ता।
तुम्हारे सू नके प्यासे दुश्मन तुम्हारी बात न सुन सकें । दीवार
से बात कहते समय भो तुम्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि
कही दीवार के पीछे कान न लग रहे हों।
विशो ऐ खिरदमन्द जॉ दोस्त दस्त ।
कि वा दुश्मनानत बुवद हमनशस्त ॥१०॥
जो तेरे दुश्मनों से मित्रता रखता है ऐसे अपने मित्र
से तू हाथ धोले।
चो दस्त अज हमा हीलते दरशिकस्त ।
हलालस्त बुर्दन व शमशेर दस्त ॥११॥
जब किसी तरहसे काम न निकले तव तलवार खीचना
उचित है।
पसन्दीदस्त बलशायश वलेकिन ।
मनह बर रेश खल्लाज़ार मरहम ॥१२॥
नदानस्त ऑके रहमत कर्द बर मार ।
के ऑ जुल्मस्त बर फ़र्ज़न्दे आदम ॥१३॥
क्षमा करना बहुत अच्छा है पर दुष्ट के घावो पर मरहम
लगाना कभी अच्छा नही। सांप की जान बचानेवाला यह
नही जानता कि वह आदम की सन्तति को हानि पहुँचा
रहा है।
जवाने वा पिदर गुफ्त ऐ खिरदमन्द ।
मरा तालीम दह पीराना यक पन्द ॥१४॥
आठवां अध्याय। ३५१ वगुप्ता नेकमदर्दी कुन न चन्दॉ। कि गरदद चीरा गुर्गे तेज़दन्दॉ॥१५॥ एक नव-युवकने अपने पिता से कहा--आप बुद्धिमान् और वृद्ध हैं, इस लिए मुझे कुछ उपदेश कीजिए। उसने कहा-भला वन, पर इतना सीधा मत वन कि लोग भेड़िये के से तेज़ दांतों से तेरा अपमान करने लगे। नशायद वनीआदमे पाक जाद । के दर सर कुनद किन तुन्दी ओ बाद ॥१६॥ तुरा वा चुनीं तुन्दियो सरकशी। न पिन्दारमज़ खाकी अज़ आतिशी ॥१७॥ ख़ाक से बनी आदम की सन्तान को अभिमान, कठोरता आदि से बचना चाहिए। तुम में इतनी सरकशी और तेजी है कि मैं नहीं समझता कि तुम ख़ाक से बने हो या आग से। बुलवुला ! मुजदये वहार वियार। ख़बरे वद ववूम वाजगुजार ॥१८॥ वुलबुल! तू वसन्त की बात कह - बुरी ख़बर उल्लू के लिए छोड़ दे। मशो गुर्रा वर हुस्ने गुफ्तारे खेश । ब तहसीने नादा व पिन्दारे खेश ॥१६॥ मूर्ख की तारीफ़ से और अपने मन से ही अपनी बात के सौन्दर्य पर घमण्ड न करना चाहिए। --
३५२
गुलिस्ताँ।
गर अज़ वसीते ज़मीं अक्ल मुनअदम गर्दद ।
वखुद गुमॉ न वरद हेच कस कि नादानम ॥२०॥
यदि संसार से बुद्धि लोप हो जाय तो कोई अपने को
मूर्ख समझने का सन्देह भी न करे ।
बद अख्तर तरज़ मरदुमाजार नेस्त ।
कि रोजे मुसीवत कसश यार नेस्त ॥२१॥
अत्याचारी से बढ़कर अभागा आदमी और कोई नहीं है,
क्योंकि विपद् के समय उसका कोई मित्र नहीं होता।
आबगीना हमा जा यावी अजा वेमहलस्त ।
लाल दुश्वार वदस्त आयद अज़ानस्त अज़ीज़ ॥२२॥
जानते हो कांच की कद्र क्यों नहीं है और लाल को क्यों
लोग अधिक चाहते हैं ? इसका कारण यह है कि पहला
हर जगह मिलता है और दूसरा कहीं-कहीं मिलता है और
कम मिलता है।
ख़रेरा अबलहे तालीम मेदाद ।
बरो बर सर्फ करदे सई दायम ॥२३॥
हकीमे गुफ़्तश ऐ नादॉ चे गोई।
दरीं सौदा बितर्स अज़ लोमे लायम ॥२४॥
नयामोजद बहायम अज़ तो गुफ्तार ।
तो खामोशी बयामोज़ अज़ बहायम ॥२५॥
आठवां अध्याय। ३५३ - मतलब कोई मूर्ख आदमी किसी गधे को शिक्षा देने में अपना सारा समय नष्ट किया करता था। यह देख कर किसी बुद्धिमान् आदमी ने उससे कहा-"ऐ मूर्ख तू किस लिये यह व्यर्थ श्रम कर रहा है। तेरी मूर्खता पर धिक्कार है। जानवर तुझ से कभी बोलना न सीखेंगे, किन्तु तू चाहे तो जानवरों से चुप रहना सीख सकता है।" गर संग हमा लाल बदख्शॉ बूदे । पस कीमते लालो सग यकसा बूदे ॥२६॥ यदि सभी पत्थर बदलशां के लाल होते तो लाल और पत्थरों का भाव (मूल्य ) भी एकही हो जाता । यह है कि लाल की कीमत इसी लिए है कि वह दुष्पाप्य है। पत्थर की तरह लाल भी जहां-तहां मिलने लगे तो फिर कौन उसके लिए लाखों रुपये खर्च करे। तवॉ शनाख्त बयक रोज़ दर शुमायले मर्द । के ता कुजाश रसदिस्त पायगाहे उलूम ॥२७॥ चले ज़ बातिनश ऐमन मबाशो गुर्रा मशो । कि खुसे नफ्स न गर्दद बसालहा मालूम ॥२८॥ किसी आदमी की विद्याबुद्धि का हाल तुम एक दिन में भलेही मालूम कर लो, पर उसके मानसिक दोषोंका पता तुम्हें वर्षों तक नहीं लग सकता। इस लिए किसी की विद्या आदि पर मोहित हो कर उसपर एक साथ विश्वास मत करो।
३५४ गुलिस्तां। 4. दवा लो जगो जोरावरी मकुन वा मस्त । पेशे सर पजा दर बगल नेह दस्त ॥२६॥ जवरदस्त के साथ लड़ाई मत ठानो। जवरदस्त के सा.' मने अपने हाथ वग़ल के नीचे कुनद हर आईना गीवत हसूद कोतहे दस्त । कि दर मुकाबला गुंगश बुवद जुबाने मिकाल ॥३०॥ नीच और ईर्पालु आदमी गुणवान् पुरुप की उसके पीछे निन्दा करता है, किन्तु सामने आते ही उसकी जुवान कुण्ठित हो जाती है। । असीर बन्द शिकमरा दोशन नगीरद वाव । शबे जे मेदये संगी शवे जे दिलतंगी ॥३१॥ जो आदमी पेटू है उसे दो राते नींद नहीं आती। एक रात तो पेट के बोझ के कारण और दूसरी रात भूख की चिन्ता से तरह्हम बर पिलंगे तेज़दन्दॉ। सितमगारी बुवद बर गोसिफ़न्दॉ ॥३२॥ जो चीते पर दया दिखाता है वह बकरियों पर जुल्म करता है। शर्ते अकलस्त तीर सब अन्दाज़ । के चो रफ़्तज़ कमॉ नयायद बाज़ ॥३३॥ विचार कर काम करना चाहिये। वीरन्दाज़ को धैर्य रक्त मोल आठवां अध्याय। ३५५ धारण करना उचित है। उसकी कमान से जो तीर निकल जायगा वह फिर वापिस नहीं आयेगा। संगे बदगौहर अगर कासये ज़री शिकनद । क़ीमते सग नयफ़ज़ायद व जर कम नशवद ॥३४॥ यदि एक बेकार पत्थर सोनेके मूल्यवान् प्याले को तोड़ दे तो पत्थर मूल्यवान् और सोना मूल्यहीन नहीं हो जायगा । आलिम अन्दर मयाने जाहिल रा। मस्ले गुफ़्तह अन्द सद्दीकॉ ॥३५।। शाहिदे दर मयाने कोरानस्त । मसहफ़े दरमयाने ज़िन्दीकॉ ॥३६ विद्वान् की मूों में वही दशा होती है जो किसी सुन्दरी की अन्धों में और धर्म-पुस्तककी नास्तिकों मे। सगे बचन्द साल शवद लाल पारए । ज़िन्हार ता बयक नफ़सश न शिकनी बसंग ॥३७॥ पत्थर सैंकड़ो वर्षों में कहीं लाल बन पाता है। उसे एक क्षण में पत्थर से नहीं तोड़ डालना चाहिये। अक्ल' दर दस्त नफ़स चुनॉ गिरफ्तारस्त । कि मर्द आजिज़े दर दस्त जन गज़ पर ॥३८॥ बुद्धि आत्मा के इस प्रकार अधीन है, जिस तरह कोई । भोला पुरुष किसी चालाक स्त्रीके वश में। , 4 ३५६ गुलिस्ता। बढ़ जाता है -- आविद कि न अज़ बहरे खुदा गोशानशीनद । बेचारा दर आईनये तारकि चे बीनद ॥३॥ जो साधु ईश्वर-भजनके लिये एकान्त-वास नहीं करता, उसका एकान्त-वास धुंधले शीशेकी तरह है, जिसमे कुछ दिखाई नहीं देता। चो बासिफला गोई बलुत्फो खुशी । फ़िजू गर्द वश कित्रो गर्दनकशी ॥४०॥ कमीना आदमी अच्छा व्यवहार करनेसे नहीं सम्हलता । ऐसा करनेसे उसका घमण्ड और जाहिले नादा परेशां रोजगार । बह जे दानिशमन्द नापरहेज़गार ॥४१॥ का बनाबीनाई अज़ राह प्रोफ्ताद । वीं दोचश्मश बूदो दर चाह ओफ़्ताद ॥४२॥ चरित्रहीन मूर्ख चरित्रहीन विद्वान् से अच्छा है, क्योंकि मूर्ख तो अन्धा होनेके कारण पथभ्रष्ट हुआ, पर विद्वान् दो आँखें रखते हुए भी कुएँ मे गिरा। ती आतिशज़ ख़ानये हमसायये दरवेश मखाह । कि आचे अज़ रोज़ने ओ मीगुज़रद दूदे दिलस्त ॥४३॥ अपने पड़ोसी भिक्षुक ले आग मत मांग, उसकी चिमनी जो धुआँ तू निकलता देखता है, वह लौकिक आगका नहीं उसके हृदयमें सुलगी हुई दुःखरूप आगका है। ME E . 1 - -- न 1 do-in- आठवां अध्याय । वर रवी दर दहाने शेरो पिलग । नखुरन्दत मगर बरोजे अजल ॥४॥ यदि तेरा मृत्यु-समय उपस्थित नही हुआ है, तो शेर या बीतेके मुंह में पहुँच कर भी तू जिन्दा रह सकता है। इला ता न ख़्वाही वलावर हसूद । के आ बख्तवर्गश्ता खुद दर बलास्त ॥४५॥ चे हाजत के वावी कुनी दुश्मनी । के वीरा चुनॉ दुश्मनन्दर कफ़ास्त ॥४६॥ जो दूसरे को देखकर जलता है उस पर जलनेकी जरूरत नहीं ; क्योंकि दाह-रूप शत्रु उसके पीछे लग रहा है। उससे त्रुता करनेकी हमें फिर क्या जरूरत है ? जम्बूर दरश्त बेमुरव्वत रा गो। बारे चो अस्ल न मेदिही नेश मज़न ॥४७॥ कठोर और बेवकूफ बर्र से कह दो कि जब तू शहद नहीं ती तो डक भी मत मार। ऐ बनामूस जामा कर्दा सफेद । बहर पिन्दारे खल्क नामा स्याह ॥४८॥ दस्त कोताह वायदज दुनिया । आस्ती खाह दराज खाह कोताह ॥४॥ जिसने लोगोंको धोखा देनेके लिए सफ़ेद कपड़े पहने हैं, सने अपना भाग्य काला किया है। सांसारिक विषयोंसे हाथ ३ ॥ मनी ३५८ गुलिस्तां । को रोकना चाहिये। आस्तीन छोटी हो या बड़ी-एकही बात है। सिरका अज दस्त रंज खेशो तरा। बेहतरज़ नान दह खुदायो बरह ॥५०॥ अपने परिश्रम से जुटाया हुआ सिरका और साग रोटी से अच्छा है जो ग्राम के सरदारने दी है। कसेकि लुत्फ़ कुनद बा तो ख़ाक पायश वाश । वगर खिलाफ़ कुनद दर दो चश्मशागन खाक ॥५१॥ सुखन बलुत्फो करम बा दरश्तखूये मगोय । कि जंगखुर्दा न गर्दद मगर बसोहाँ पाक ॥५२॥ जो तुम पर दया करे तुम अपने को उसके चरण की धूलि समझो और जो तुम्हारा अपकार करे उसकी आँखों मे खाक झोंक दो। धूर्त मनुष्य के साथ सभ्यता से बात-चीत भर मत करो, क्योंकि मोर्चा लगा हुआ लोहा रेती से साफ नहीं तो होता है। नह यके राकि आदत बुवद रास्ती। ख़ताये रबद दर गुजारन्द अज़ो ॥५३॥ वगर नामवर शुद बकौले दरोग । वगर रास्त बावर नदारन्द अजो ॥५४॥ जो सच बोलने के लिये प्रसिद्ध है उसका झूठ भी सच हो जाता और वह झूठ क्षम्य भी है, पर जो मनुष्य झूठ थाठवां अध्याय। ३५६ लने के लिए प्रसिद्ध है, वह यदि सव भो बोले तोभी झूठ | समझा जाता है। ग़मे कज़पेश शादमानी बरी। बह अज़ शादी किज़ पसश गमखुरी ॥५५॥ सुख से पहले दुःख पाना अच्छा है, बनिस्बत सुख के छ दुःख भोगने के। गरत खुये मन श्रामद ना सजावार । तो खूये नेके खेशज़ दस्त मगुज़ार ॥५॥ तुम्हें मेरा स्वभाव चाहे पसन्द न हो, पर तुम्हें अपने स्वभाव की भलाई न छोड़नी चाहिए। जवान गोशानशी शेरमर्दै राहे खुदास्त । कि पीर खुद न तवानद जे गोशये बरखास्त ॥५७॥ जवानी जिन्होंने एकान्त में ईश्वर-भजन किया है, सचे वक्त वेही हैं। बूढ़ा आदमी यदि एकान्तवास पर गर्व करे तो झूठा है; क्योंकि वह तो जहाँ पड़ा है वहाँ से सरकही नहीं सकता। चो हक मुआयनो दानी कि मी बबायद दाद । वलुत्फ़ बहकि वजंग श्रावरी व दिलतंगी ॥५८॥ खिराज अगर नगुजारद कसे वतेबे नफ़स । बकहर अज़ओ बसितानन्दो मर्द सरहंगी ॥५॥ जिसका प्राप्य पदार्थ है उसे प्रसन्तापूर्वक दे दो। झगड़े ३६० गुलिस्ता। m के साथ देने से प्रसन्नतापूर्वक देना भला है। जो सरकारी टका खुशी से नही देता उससे जबरदस्त जाता है। कस न वीनद बख़ीले फाजिल रा । कि न दर ऐब गुफ़्तनश कोशद ॥१०॥ दर करीमे दो सद गुनह दारद । करमश ऐबहा फ़रो पोशद ॥६॥ कंजूस आदमी कितनाही विद्वान् हो, लोग उसमे निकाले बिना नहीं छोड़ते, पर किसी उदार पुरुष मे यदि दो दोष भी हो तो भी उसको उदारता से वे ढके रहते हैं। 4 समाप्त 9. ब Carols
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