Bharti Bhawan Library Allahabad
Laghu Sidhantkaumudi
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॥श्रीः॥ हरिदास-संस्कृत-ग्रन्थमाला, श्रीवरदराजाचार्यविरचिता लघुसिद्धान्तकौमुदी क 'इन्दुमती संस्कृत-हिन्दीटीझोपेता 'लङ्गानुशासनमाणपाठ-व्याकरणाडिलक्षण-विद्यार्थिशिक्षासूत्र-गूढाशुद्धि प्रदर्शन-शब्दरूपावली-धातुरूपावली-अनुवादोपयोगिधात्वर्थ- भावार्थप्रयोगसूची-सूत्रसूची-धातुसूची-वाराणस्यादि- परीक्षाप्रश्नपत्रैश्च विभूषिता। टीकाकार:- पण्डित श्रीरामचन्द्र झा व्याकरणाचार्यः सम्पादक VisitarN पण्डित श्रीशोभितमित्रः व्याकरणाचार्य: सबा संस्कृत सीरिज आफिस, वाराणसी-१ भारतमें आज अपनी-अपनी प्रान्तीय भाषाओंको राजभाषा बनाने में जो लोग व्यस्त हो रहे हैं, उसका एकमात्र निदान हिन्दी (प्रादेशिक भाषा ) का राष्ट्रभाष होना ही है। निष्पक्षभावसे विचार किया जाय तो उत्तर प्रदेश या पश्चिम विहारकै कुछ ही अंशको छोड़कर बंगाल, मिथिला, गुजरात, महाराष्ट्र आदि प्रदेशको राष्ट्रभाषा हिन्दीसे जितनी कठिनाईकी संभावना है उतनी संस्कृतसे नहीं, क्योंकि बैंगला, मैथिली, मराठी, गुजराती भाषाओंमें प्रतिशत नब्बे संस्कृत शब्दोंका ही प्रयोग होता है तथा हिन्दीको भी धन-धाम और सौन्दर्य संस्कृतसे ही मिल रहा है । ऐसी स्थितिमें भारतको राष्ट्रभाषा यदि संस्कृत होती तो भारतमाताकी तरह गीर्वाणवाणी भगवती सुरभारतीके मुख में शताब्दियोंसे लगा हुआ ताला टूट जाता और एक स्वरसे सम्पूर्ण भारत उस राष्ट्रभाषाका अभिनन्दन करने लगता। किसी भी देशकी राष्ट्रभाषा तभी जीवित रह सकती है जब कि वह उस देशको मातृभाषामें परिणत हो जाय । आचार्य वरदराजविरचित प्रस्तुत ग्रन्थ संस्कृत भाषाका भास्कर है। बह ग्रंथ यदि भारतकी प्रत्येक शिक्षा संस्थानों में अनिवार्यरूपसे पढ़ाया जाय तो अल्प समयमें ही इस प्रन्थके आलोकमें नवनिर्मित स्वतन्त्र भारतमें पुनः महाराज भोजका युग उदित हो जायगा । कथानक इस प्रकार है-किसी समय एक ब्राह्मणको इन्धनके भारसे अतिश्रान्त होते हुए देख महाराज भोजने पूछा- 'भूरिभारभराक्रान्तस्तव स्कन्धो न बाधति ?' ब्राह्मण ने उत्तर दिया- 'न तथा बाधते राजन् ! यथा 'बाधति' बाधते ।।' व्याकरण व्याक्रियन्ते = व्युत्पाद्यन्ते शब्दा अनेनेति-शब्दज्ञानजनक । जिससे साधु शब्दका ज्ञान हो उसीका नाम व्याकरण है। व्य रम महाभाष्यकारने 'शब्दानुशासन' रखा है ( अनुशिष्यन्ते विच्य कथ्यन्ते साधु शब्दा अनेनेत्यनुशासनं । याख्यानादिस्वरूपं शास्त्रम्) । संस्कृतवाङमयमें ३ , कम शिक्षा प्राण तु वेदस्य हचिक्तिः पढ़ेः ।। प्रस्तावना शास्त्रका स्थान सबसे ऊँचा है, क्योंकि व्याकरण शास्त्र ज्ञानके विना वेदार्थ या स्कृति, पुराण, इतिहास, काव्य, कोश आदि किसी भी शालान्तरका ज्ञान हो ही नहीं कता । कहा भी है-- यो वेद वेदबदनं सड़नं हि सस्या ब्राह्मचाः स वेदमपि वेद किमन्यशास्त्रम् । यस्मादतः प्रथममेतद्धीत्य विहान भवति श्रवणेऽधिकारी !! (भास्कराचार्य) शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष इन घडों में व्याकरण वेदका मुखरूप प्रधान अङ्ग है, जैसा कहा है--- मुखं व्याकरण तस्य ज्योतिष नेत्रमुच्यते बहुना, 'ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः पडो वेदोऽध्येयो ज्ञेय' इस भागमोक्त वचन का उद्धरण देते हुए भगवान पतञ्जलि ने कहा है- 'षट्स्वङ्गेषु प्रधान व्याकरणं, प्रधाने च कृतो यनः फलवान् भवति । इत्यादि उक्तिसे भी सिद्ध होता है कि संस्कृतसाहित्य मात्रके लिये मुख्यतः व्याकरणशास्त्रका ज्ञान सर्वप्रथम नितान्त श्रावश्यक है। man व्याकरणका प्रथम प्रवक्ता व्याकरणवाड्मयमें ऐन्द्र तन्त्र सबसे पुराना है। बृहस्पतिने सर्वप्रथम एक हजार वर्ष निरन्तर भगवान् इन्द्रको प्रतिपदपाठ द्वारा शब्दोपदेश किया था, जैसा कि महाभाष्यमें लिखा है- 'बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दानां शब्द- पणं प्रोवाच बोपदेवने भी निम्न आठ शाब्दिकोंमें सबसे पहले इन्द्रका ही नाम लिया है। इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नाऽऽपिशली शाकटायनः । पाणिन्यमरजैनेन्द्राः जयन्त्यष्टादिशाब्दिकाः ।। InHIMAHAR प्रस्तावना होना बिहार प्रदेश क्योंकि शब्द पाणिनीय व्याकरण- संस्कृतवाङ्मयके व्याकरणोंमें सम्प्रति पाणिनीय व्याकरण ही एकमात्र सांगो- पांग उपलब्ध होता है। इसकी सुन्दर और सुबुद्ध रचनाकी प्रशंसा विश्वका प्रत्येक विद्वान मुक्तकण्ठसे करता है। यह प्राचीन आर्ष वाङ्मयकी निधि है और भारत की अनुपम देन है। विश्व में अभीतक किसी भी भाषाका व्याकरण इतना सरल और सुपरिष्कृत नहीं बन सका है। यह व्याकरण 'त्रिमुनिव्याकरण' नामसे प्रसिद्ध है और इन त्रिमुनियोंमें पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि यथाक्रम हुए हैं। (१) महामुनि पाणिनि पाणिनिकी अष्टाध्यायीमें 'श्रवण' और 'यवन' शब्दोंको देखकर पाणिनिको कोई बुद्धसे और कोई यवनसे उत्तरवर्ती मानते हैं। इसका समुचित समाधान व्याकरण शास्त्रके मनोनीत इतिहासकार युधिष्ठिर मीमांसकने अपने इतिहास (पृ० १३६) में किया है । मीमांसकजीने महामुनि पाणिनिको विक्रमसे लगभग २८०० सौ वर्ष प्राचीन सिद्ध किया है। गणतन्त्रमहोदधिमें 'शालातुरो नाम ग्रामः सोऽभि- जनोऽस्यास्तीति शालातुरीयः, तत्र भवान् पाणिनिः' इस व्युत्पत्तिसे शाला- तुर नामक ग्राम पाणिनिका जन्मस्थान लिखा है-जो अधुना पाकिस्तानमें 'लाहौर' नामसे प्रसिद्ध है। पाणिनिके पिताका नाम महर्षि पाणि और माताका नाम दाक्षी था। भगवान् पतञ्जलिने भी लिखा है--'दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः' पाणिनिके गुरुका नाम 'उपवर्षाचार्य- था जो नन्दराजके राज्यकालमें नालन्दा विश्वविद्यालय' (बिहार) के सुप्रसिद्ध आचार्य कहे जाते थे। पाणिनिने अपनी घोर तपस्यासे आशुतोष भगवान् शङ्करको प्रसन्न कर उनके उपदेश और आदेशरे गुरुके आश्रम (बिहार) में ही अष्टाध्यायी, सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणप लिङ्गानुशासन आदि की रचना की थी। प्राचार्योंने कहा भी है- येनाक्षरसमानायमधिगम्य महेश्वरात् । कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ।। (२) महामुनि कात्यायन कात्यायन और पाणिनि दोनों समकालिक सतीर्थ्य थे । पूर्वाचार्योंने कात्याय * कोई इतिहासकार इन्हें 'वर्षाचार्य' भी कहते हैं। - प्रस्तावना महर्षि याज्ञवल्क्यका अात्मज माना है। उनके मतसे स्मृतिकार और वार्तिककार ोनों एक ही कात्यायन हैं। 'प्रियतद्धिता दाक्षिणात्याः' इस महाभाष्यसे सिद्ध होता है कि कात्यायन दाक्षिणात्य थे। पर उसकी पुष्टि निम्नरीतिसे स्कन्दपुराणके चिनका समन्वय करनेपर ही हो सकती है। मदपुराणमें लिखा है-'मिथिलाके ब्रह्मर्षि याज्ञवल्क्यका एक आश्रम (पीठ) आनएजरात) प्रदेशमें भी था। संभव है उसी प्रकार महामुनि कात्यायनका भी कोई म महाराष्ट्र प्रदेशमें रहा होगा और वहींपर उनका समय व्यतीत होनेोकमें वे दाक्षिणात्येन व्यवहृत हो गये होंगे। आर्तिककारोंमें महामुनि कात्यायन सबसे श्रेष्ठ हुए। उनके वार्तिक निन्न वार्तिक- गोंसे सर्वथा पूर्ण हैं- उक्ताऽनुक्तदुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्तते । तं ग्रन्थं वार्तिकं प्राहुर्बातिकज्ञा मनीषिणः ॥ कात्यायनका वार्तिकपाठ पाणिनिव्याकरणका एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अङ्ग है। सके बिना पाणिनीय व्याकरण अपूर्ण ही रह जाता और यही कारण है कि अब आणिनीय व्याकरणके आलोकमें अन्य कोई भी व्याकरण पनप नहीं सका है। महामुनि कात्यायनका ही दूसरा नाम 'वररुचि' हैं। ये स्मृतिकार और चार्तिककार ही नहीं, अपितु महाकवि भी थे। इनके 'स्वर्गारोहण' नामक काव्यकी प्रशंसा अनेक प्रन्योंमें की गयी है, जैसा कि लिखा है- यः स्वर्गारोहणं कृत्वा स्वर्गमानीतवान् भुवि । काव्येन रुचिरेणैव ख्यातो वररुचिः कविः ।। न केवलं व्याकरणं पुपोष दाक्षीसुतस्येरितवार्तिकर्यः । काव्येऽपि भूयोऽनुचकार तं वै कात्यायनोऽसौ कविकर्मदक्षः ।। (३) शेषावतार भगवान् पतञ्जलि शेषावतार भगवान् पतञ्जलिका महाभाष्य व्याकरणका सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है । सभी वैयाकरण इसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं। वस्तुतः यह ग्रंथ न केवल व्याकरणशास्त्रका ही प्रामाणिक ग्रंथ है, अपितु समस्त संस्कृत- वाङ्मयका श्राकर-ग्रंथ है । भर्तृहरिने अपने वाक्यपदीयमें लिखा है- Hymnty me वि विद्वान् : ity और स प्रसिद्ध यू कोई बु शास्त्र किया प्राचीन जनो. कृतेऽथ पतञ्जलिना गुरुणा तीर्थदर्शिना । सर्वेषां न्यायबीजानी महाभाष्ये निबन्धने । भगवान् पतञ्जलिने मनोवाकायदोषनिरसनार्थ पातञ्जलयोगसूत्र, पाणि महाभाष्य और चरकसंहिता-इन तीनों ग्रंथों की रचना की, जैसा कि चार अपनी महाभाष्यको टीकाके मङ्गलाचरणमें लिखा योगेन चित्तस्य पदेन वाचा मलं शरीरस्य च वैद्यक योऽपाकरोतं प्रबरं मुलीना पतञ्जलि प्राञ्जलिरानतोसिस भगवान् पतञ्जलिके विरनिन्न इतिवृत्त प्रसिद्ध है- आचार्योंका कहना है कि पाणिनि और कात्यायन दोनों उपवर्षाचाधामक एक ही गुरुके शिष्य थे। अध्ययनके समय कात्यायनकी प्रखर बुद्धिके मने बहुधा पाणिनिको हतप्रभ हो जाना पड़ता था। अतः पाणिनि तीर्थराज प्रयाने अक्षयवटके नीचे-जहाँ सुनकादि ऋभिगण तप कर रहे थे, वहीं जाकर और तपस्या करने लगे। कुछ दिनोंके पश्चात् उन लोगोंकी विकट तपश्चर्याले प्रसन्न होत श्राशुतोष भगवान शंकरने ताण्डव नृत्य करते हुए उन लोगों को दर्शन दिवा श्री १४ बार अपना डमरू बजाकर उन तपस्वियोंका अभीष्टसिद्ध किया, जैसा कि नन्दिकेश्वरविरचित काशिकामें लिखा है- नृत्तावलाने नटराजराजो नाद ढका नव पञ्चधारन् उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्श शिवसूत्रजालन् !! पाणिनिको उसी डमरूके शब्दोंसे चतुर्दश माहेश्वरसूत्र उपलब्ध हुए और उन्हीं सूत्रोंके आधारपर पाणिनिने सुबद्ध अष्टाध्यायीकी रचना की, जिसे देखकर कात्यायन चकित हो उठे और तत्क्षण ही उन्होंने अष्टाध्यायीमें दोष निकालनेकी प्रतिज्ञा कर ली। भगवान् महेश्वरकी तपश्चर्यासे उन्होंने भी अष्टाध्यायीके अतुक्त- दुरुक्त-पुनरुत्तादि दोषोंके उद्धरणस्वरूप पाणिनीय व्याकरणपर वार्तिकका एक विशाल ग्रंथ ही रच डाला। पाणिनिको कात्यायनका यह द्वेष असह्य हो उठा। उन्होंने आवेशमें आकर कात्यायनको तत्क्षण दिवङ्गत हो जानेका शाप दे दिया । कात्यायन भी इसे न सह सके। उन्होंने भी तमककर प्राचार्य पाणिनिको सूर्योदय से पहले सिंहद्वारा असित हो जानेका महाशाप दे दिया। फलस्वरूप दोनों प्राचार्य 'लाह नाम पाणि विश्व घोर गुरुके प्रस्तावना ६ बोल उठा-'अहो! तुम तो पाणिनीय वैयाकरण जान पड़ते हो, क्या तुम्हें पातञ्जलमहाभाष्य पढ़नेकी इच्छा है ?' यह सुन पण्डित चन्द्रगुप्त अतिप्रसन्न हुआ और प्रासन लगाकर उस वृक्षके नीचे बैठ गया। तदनन्तर वह ब्रह्मपिशाच वट- पत्रके अपर अपने नखाग्रसे महाभाष्य लिख-लिखकर गिराने लगा और चन्द्रगुप्त उसे बटोरने लगा। इतने में एक बकरी आई और इधर-उधर बिखरे हुए कुछ वटपत्रोंको खा गयी। इसीलिए महाभाष्यमें यत्र-तत्र 'अजाभक्षितमेतत्' ऐसा लिखा है । महाकवि श्रीहर्षने भी महाभाष्यके विषयमें निम्न पद्य गाया है- परिखावलयच्छलेन या न परेषां ग्रहणस्य गोचरा । 'फणिभाषितभाष्यफक्किका' विषमा कुण्डलनामवापिता ॥ अष्टाध्यायीके व्याख्याकार 80702 पाणिनीय अष्टाध्यायीके ऊपर प्राचार्य कुणि; श्राचार्य व्याडि आदि कतिपय प्राचीनाचार्योंने भिन्न-भिन्न प्रकारकी टीका आदिकी रचना की है, परन्तु 'त्रिमु- निव्याकरणम्' सिद्ध हो जानेके पश्चात् सर्वप्रथम महापण्डित जयादित्य और वामनने वि० सं० ६५०-७०० के मध्य 'काशिकावृत्ति' लिखी। परन्तु उससे बालकोंको व्याकरणका परिज्ञान सरलतया नहीं हो पाता था, अतः वि० सं० १४०० में आठों व्याकरणके ज्ञाता पं० रामचन्द्राचार्यने 'प्रक्रियाकौमुदी' की रचना की। किन्तु उसमें भी अष्टाध्यायीके समस्त सूत्रोंका सन्निवेश नहीं था। इस न्यूनताको पूर्ण करनेके लिये वि० सं० १५१०-१५७५ के मध्यवर्ती म. म. भट्टीजिदीक्षितने सम्पूर्ण अष्टाध्यायीके सहित उणादिसूत्र, फिटसूत्र, लिङ्गानुशासन, गणपाठ और धातुपाठसे सर्वाङ्गपूर्ण 'सिद्धान्तकौमुदी' नामक ग्रन्थ रचा । इसकी सुललित और सुबद्ध रचनाशैलीको देखकर समस्त आर्यावर्त मुग्ध हो उठा और कुछ लोग इस ग्रन्थकी स्तुति निम्नरीतिसे करने लगे- कौमुदी यदि नायाति वृथा भाष्ये परिश्रमः । कौमुदी यदि चायाति वृथा भाष्ये परिश्रमः ।। आचार्य वरदराज प्राचार्य वरदराज दाक्षिणात्य ब्राह्मण थे। उनके पूज्य पिता दुर्गातनय और गुरु महामहोपाध्याय श्री भोजिदीक्षित थे। श्राचार्य वरदराजने अध्ययनके पश्चात् प्रस्तावना १० अपने गुरुकी आज्ञासे सिद्धान्तकौमुदीके पथप्रदर्शक 'लघुसिद्धान्तकौमुदी' नामक मनोनीत ग्रन्धकी रचना की। बरदराजका यह प्रथम प्रयास प्रारंभिक छात्रोंके लिये संस्कृतका सबसे उत्तम सोपान सिद्ध हुआ। इसकी जितनी प्रशंसा की जाय थोड़ी होगी। स्वतन्त्र राष्ट्र यदि संस्कृतका स्तर ऊँचा करना चाहता है तो उसे वरदराजकी सर्वप्रथम स्तुति करनी होगी। संस्कृत व्याकरणका त्वरित और पूर्ण ज्ञान कराने में वरदराजकी लघुसिद्धान्तकौमुदीके समान कोई भी अन्य प्रन्थ वर्तमान संस्कृत-संसारमें उपलब्ध नहीं होता और न हो सकता है। यह अनुभूत सत्य है। लघुकौमुदीकी रचनाके पश्चात् वि० सं० १६५० में प्राचार्य वरदराज अपने गुरुकी सिद्धान्तकौमुदी'को लघुरूपमें संकलित कर मध्यकौमुदी के भी सफल अन्धकार हुए। प्राचार्यकी यह द्वितीय कृति भी स्तुत्य है ('मध्यकौमुदी की समीक्षा 'इन्दुमती टीका सहित मध्यकौमुदीकी प्रस्तावना में देखिये)। इस संस्करणके सुसम्पाइन में मुझे अपने अनेक मित्रों, प्राचार्यों तथा उनके सम्पादित जिन ग्रंथोंसे सहायता मिली है उनमें प्राचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्त- शिरोमणिजीका नाम सर्वोपरि है । अतः मैं उन सबका कृतज्ञ होते हुए सिद्धान्त- शिरोमणिजीका सबसे अधिक कृतज्ञ हूँ। इसके परिशिष्ट प्रकरणको सुसज्जित करनेमें मित्रचर व्या० न्या. श्राचार्य, लब्धस्वर्णपदक, दरभशास्य राजकीय प्रथम धौतप्रतिष्ठ श्री पं० शोभित मिश्रजीका अधिक हाथ रहा है अतः उनके प्रति आभार प्रदर्शित करना भी मेरा पावन कर्तव्य है। प्रस्तुत टीका, नोट्स, परिशिष्ट आदिके विषयमें गुण-दोषोंकी विवेचना करना मैं पाठक तथा प्राचार्योंके ऊपर ही छोड़ता हूँ। क्षीर-नीर-विवेकी पाठक स्वयं इसका अनुभव करेंगे तथा आचार्य गण अपनी आशीर्वादात्मक सम्मतियाँ प्रदान कर मुझे अनुगृहीत करेंगे। विनीत 'इन्दुमती' स्मृतिदिवस श्रा शु० एकादशी सं० २००९ विषयसूची ००७ ३८ १६६ १८८ 03. १. पञ्चसन्धयः २. षड्लिङ्गानि ३. अव्ययप्रकरणम् ४. भ्वादिचुरायन्तदशगणी ५. ण्यन्तादिलकारार्थान्तप्रकरणम् ६. कृत्यप्रकरणम् ७. कृदन्तप्रकरणम् ८. कारकप्रकरणम् ९. समासप्रकरणम् १०. तद्धितप्रकरणम् ११. स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् परिशिष्टसूची १. संक्षिप्तलिङ्गानुशासनम् २. गणपाठः ३. व्याकरणादिलक्षणम् ४. विद्यार्थिशिक्षासूत्रम् ५. गूढाशुद्धिप्रदर्शनम् ६. शब्दरूपावलिः ७. धातुरूपावलिः ८. अनुवादोपयोगिधात्वर्थाः ९. भाषार्थ-प्रयोगसूची १०. अष्टाध्यायी-सूत्रसूची ११. धातु-सूची १२. वाराणसी-परीक्षाप्रश्नपत्राणि १३. पञ्जाब-परीक्षाप्रश्नपत्राणि १४. बिहार-परीक्षाप्रश्नपत्राणि ... २६० . 000 , यो च , , , शिवसूत्र-प्रत्याहार स्यादेको अणवटैः, षेण द्वौ, त्रय इह कणमैश्च ! चत्वारश्च चयाभ्यां, पञ्च रेफेण, शलाभ्यां षट् ।। अक- अ, इ, उ, ऋ, ल । एच-ए, ओ, ऐ, औ। अच्-अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ, ऐ, औ। ऐच-ऐ, औ। अण-अ, इ, उ। खय---ख, , छ, ठ, थ, च,टत, अद-अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ, ऐ, कपा औ, ह, य, व, र। खर-ख, फ, छ, ठ, थ, च,ट, त, क, अण-अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल। ङम-ङ, ण, न! अम्-अ, इ, उ, ऋड, ल, ए, ओ, ऐ, चय--च, ट, त, क, प। औ,ह,य,ब, र, ल, अ,म,ङ,ण, न! चर-च, ट, त, क, प, श, ष, स। अल-अ, इ, उ, ऋ, ल, ए, ओ, ऐ, छव-छ, ठ, थ, च, ट, त। औ, ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, जश-ज, ब, ग, ड, द । पा, न, काभ, घ, ढ,घ, ज, ब, झय-क, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, ग, ड, दाल, फछ,ठ, थाच, द,ख,फाछ,ठ,थ, च,टात काप। ट, ताक, प, श, ष, स,है। अश-अ, इ, उ, ऋ, ल, ए, ओ, ऐ, भा, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, औ, ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ड, द, ख, फछ, ठ,थ, चाट, त, क, प, श, ष, स । ण, न, काम, घ, ङ, ध, ज, व, ग, ड,द। झल-झ, भ, घ, ड, ध, ज, ब, ग, इक-इ, उ, ऋ, ल। ड, द,ख, फ, छ, ठ, थ,च,ट, इच्-इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ, ऐ, औ। त, क, प, श, ष, स, हा इण-इ, उ, ऋ, लू, ए, ओ, ऐ, औ, मश-म, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द। ह, य, व, र, ल। झष-म, भ, घ, ङ, ध। उक-उ, , ल । बर-ब, ग, ड, द। एक-ए, ओ। भष-भ, घ, ड, ध।
मङ, नाच. कमाघ, ढ, ध, ख, फछ,ठ, थ, चातक, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ छ, ठ, प, श, , स, ह। A २ . बलव, र, ल, ञ, म, ङ, ण, नाक, थाचट, तक,प अ-य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, स, घाटघज, ब, बरड,द, . . काभ खफा छ,ठ, थ, चटर त, , यण-य, व, र, ल। क, प, श, ष, सह वश-च, र, ल, ञ, म, ङ, ण, नाम, यम् य, व, र, ल, , म, ङ, ण, न। यय-य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, ७ मामाघ,ढ, ध,ज,ब, ग,ड,द, A ख, फ, छ,ठ,थ, च,ट,त, काप। यर-यावर, ल, जाम, ङ, ण, न, मामाघ, ढ, ध, ज, ब, ग, भ,घढ, घ,ज, ब, ग, ड, दे। शर-श, ष, स। शल--श, प, स, ह । हल-ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, गड,द, ख, फ, छ, ठ,यच, ट, त, क, प, श, ष, स, है। हश है, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, मामा कढ, ध, ज, ब, ग,द। ७ ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, . ट, ताक, प, श, ष, स। रल-र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भाघाट,ध, ज, बाबा, स्वरोंका अष्टादशभेदज्ञापक चक्र-- NIWarudasia अइउऋल अ इ उ ऋ ए ओ ऐ औ अ इ उऋलए ओए औ ह्रस्वभेद दीर्घभेद प्लुतभेद १ ह्रस्व उदात्तानुनासिक ७ दीर्घ उदात्तानुनासिक १३प्लुत उदात्तानुनासिक उदात्ताननुनासिक उदात्ताननुनासिक १४ , उदात्ताननुनासिक ३ " अनुदात्तानुनासिक ९ " अनुदात्तानुनासिक १५ " अनुदात्तानुनासिक » अनुदात्ताननुनासिक १० अनुदात्ताननुनासिक १६ , अनुदात्ताननुनासिक ५ स्वरितानुनासिक ११, स्वरितानुनासिक स्वरितानुनासिक ६ स्वरिताननुनासिक १२, स्वरिताननुनासिक १८ " स्वरिताननुनासिक २ ८ " " २ लघुसिद्धान्त कौमुदी अइउण् १ । ऋलक २ । एओङ । ऐऔच ४ । हयवरट् ५। लण्६ । बमङणनम् ७ । भमा घढध । जबगडदश १० / खफछठथच- उत्तव११ / कृपय १२ । शषसर १३ । हल १४ । इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसंज्ञाऽर्थानि । एषामन्त्या इतः। हकारादि- प्वकार उच्चारणार्थः । लण्मध्वे वित्संज्ञकः। Higher .. 'ल' मध्येत्विति (ई०४०)–'लण्' सूत्रे लकारोत्तरवर्तिनोऽकारस्येत्सं- ज्ञकत्वादेव 'र' प्रत्याहारस्य सिद्धिर्भवति । अत एव 'तवल्कारः' इत्यत्र 'उरण रपरः' इत्यनेन लपरत्वं सिद्धम् । Dattle अइउण-इन्हीं चतुर्दश (१४) सूत्रोंके आधार पर महर्षि पाणिनिने समस्त व्याकरणकी सभी बातें सरलरूपेण संक्षेप में कही हैं। इति माहेश्वराणि-ये चतुर्दश माहेश्वर सूत्र अण् , अक् 'अच् इत्यादि संज्ञा (प्रत्याहार) सिद्धिके लिए हैं। (आचार्य पाणिनिने भगवान् शंकरका अतिशय प्रिय डमरुके शब्दोंसे इन सूत्रोंको उपलब्ध किया था।) नोट:-आचार्य पाणिनि और कात्यायन दोनों पाटलिपुत्र (पटना) के महाप्राज्ञ श्री प० (उप)वर्षाचार्यजीके शिष्य थे। सतीर्थ होने के कारण दोनों में परस्पर शाश्वतिक विरोध रहता था। एकदा कात्यायनसे परास्त होकर पाणिनि तीर्थराज प्रयागमें अक्षयवटके नीचे जहाँ सनकादि ऋषि गण तप कर रहे थे वहीं जाकर घोर तपस्या करने लगे। अनन्तर उन तपस्वियोंकी विकट तपश्चर्यासे प्रसन्न होकर एक दिन आशुतोष भगवान् शङ्करने ताण्डव नृत्य करते हुए उन लोगोंको दर्शन दिया और १४ बार अपना डमरु बजाकर तपस्वियोंका अमीष्ट सिद्ध किया । जैसा कि नन्दिकेश्वर बिरचित 'काशिका' में लिखा हैं:- 'नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद डकां नव-पञ्चवारम् । उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्श शिवसूत्रजालम् ॥ एषाम्-यह प्रतिज्ञा वाक्य है। इन चतुर्दश सूत्रोंके अन्तिम वर्ण (ण , क आदि) इत्संशावाले हैं-वक्ष्यमाण 'हलन्त्यम्' सूत्रसे इनकी इत्संज्ञा हो जाती है । हकारादि-इका- रादि वर्गों में संमिलित जो अकार है वह केवल वर्णोच्चारण करनेके लिये है-इत्संशाके लिये नहीं। लणमध्ये-'लण' सूत्रके मध्यमें (लकारोत्तरवती) जो अकार है वह इत्संचक है- उच्चारण मात्रके लिये नहीं । क्योंकि उससे र प्रत्याहारकी सिद्धि होती है। संज । Jalsunita RAN | नोट:--जो जो प्रश्न जिन जिन वर्षों में आये हैं उन उन वर्षों (ईस्वियों) की संख्या का उल्लेख संस्कृत टीकामें सर्वत्र कोष्ठकमें कर दिया गया है।
संज्ञाप्र०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। ३ अइ. हलन्त्यम् ११३॥३॥ उपदेशेऽन्त्यं हलित्स्यात् । उपदेश आद्यो- चारणम् । सूत्रेष्वदृष्टं पदं सूत्रान्तरादनुवर्तनीयं सर्वत्र । अदर्शनं लोपः १११।६० ॥ प्रसक्तस्याऽदर्शनं लोपसंझं स्यात् ॥ तस्य लोपः ११३१६॥ तस्येतो लोपः स्यात् । णादयोऽणाद्यर्थाः । आदिरन्त्येन सहेता १।१।७१ ।। अन्त्येनेता सहित श्रादिमध्यगानां स्वस्य च संज्ञा स्यात् । यथा-'श्रण्'-इति उवर्णानां संज्ञा । एवमच्-हल-अलित्यादयः। ऊकालोऽज्झस्वदीर्घप्लुतः १। आदिरन्त्येन सहेता (ई० ४८,५१)-'आदिः-अन्त्येन-सह-इता' इति सूत्रविभागः। अत्र सूत्रे आद्यन्तशब्दाभ्यां मध्यगा आक्षिप्यन्ते, स्वं रूपम्' इति पूर्वसूत्रात् 'स्वम्' इत्यनुवर्तते । ततश्च 'अन्त्येन इता सह उच्चार्यमाणः आदिः (अण अच् , इत्यादिरूपः) मध्यगानां स्वस्य च प्रत्याहारसंज्ञेति सूत्रार्थो लभ्यते । उदाह- रणं यथा-'अ इ उ ण्' इति सूत्रघटकः 'अण्' इति । अत्र अन्त्येसंज्ञकवर्णः 'ण' इति, तेन सह उच्चार्यमाणः श्रादिवर्णः 'अ-' इति, स ( अ-ण्) मध्यगानाम् (इ, उ, इत्यनयोः) स्वस्य ('अ' इत्यस्य) च बोधको भवति । एवमन्यत्राप्यूह्यम् । 'ऊकालोझस्वदीर्घप्लुतः' (ई० ४८)-ननु हलामर्धमात्रिकत्वेन वा काल इव हलन्त्यम्-उपदेश अवस्था में जो अन्त्य हल ( व्यञ्जन वर्ण) उनकी इत्संशा हो। उपदेश आयोच्चारणम्-आद्य (प्रथम) उच्चारणको 'उपदेश' कहते हैं। नोट:-व्याकरण शास्त्रके प्रवर्तक पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि मुनिका जो आद्योच्चारण है उसीका नाम 'उपदेश' है। कहा भी है।:- धातु-सूत्र-गणोणादि-वाक्य-लिङ्गानुशासनम् । आगमनत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीर्तिताः॥ सूत्रेष्वदृष्टम्-सूत्रोंमें जो पद नहीं दिखलाई पड़े उसका दूसरे सूत्रोंसे अनुवर्तन (अध्याहार ) कर लेना चाहिये। अदर्शनम्-प्रसक्त (शास्त्रतः वा अर्थतः विद्यमान- प्राप्तोच्चारण) का जो अदर्शन (श्रवणाभाव) वह लोपसंशक होता है-उस अभावको लोप कहते हैं। तस्य लोप:-जिसकी इत्संशा होती है उसका लोप हो जाता है। आदिरन्त्येन-अन्त्य इत्संज्ञक वर्णके साथ उच्चारित आदिवर्ण अपने तथा मध्यवती चौँका भी बोधक हो। नोट:-'अ उ ' सूत्रघटक 'अण्' प्रत्याहार में अन्त्य इत्संशक 'ण' के सहित उच्चारित आदिवर्ण हुआ 'अ-ण । वह 'अ- अपने वीचके इ, उ, का तथा अपना अर्थात् 'अ' का भी बोधक हुआ (एवम् अन्यत्रापि)। अण इति-यथा 'अण्' प्रत्याहार अ, इ, उ वर्गों की संज्ञा ( बोधक) है इसी प्रकार अच् , हल आदि प्रत्याहारों को भी जानना चाहिये । उकालो-उकाल, ऊकाल, उकाल ANTRIKAawuTOUMMAN लघुसिद्धान्तकौमुदी त्लवर्णस्य चाऽप्रत्ययः १११। ६६॥ प्रतीयते-विधीयते-इति प्रत्ययः । अवि. धीयमानोऽणुदिच्च सवर्णस्य संज्ञा स्यात् । अत्रैवाऽण परेण णकारेण । कु-चु-दु- तु- एते उदितः। तदेवम्-अ इत्यष्टादशानां संज्ञा। तथेकारोकारौं। ऋकार- स्त्रिंशतः। एवम्-लु कारोऽपि । एचो द्वादशानाम् । अनुनासिकाननुनासिकभेदेन यवला द्विधा । तेनाऽनुनासिकास्ते द्वयोर्द्वयोस्संज्ञा ॥ परः सन्निकर्षः संहिता १।४।१०६ ॥ वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहितासंज्ञः स्यात् । हलोऽनन्तराः संयोगः श११७ ॥ अभिरव्यवहिता हलः संयोगसंज्ञाः स्युः॥ सुप्तिङन्तं पदम् १।४।१४॥ सुबन्तं तिङन्तं च पदसंज्ञं स्यात् ।। * इति संज्ञाप्रकरणम् * PCGTOR ANSAANJAMIN संहितालक्षणं-'स्वभावसिद्धार्धमात्रातिरिक्तकालव्यवायेन शुन्यत्वं संहितात्वम् । इति 'इन्दुमती' टीकायां संज्ञाप्रकरणम् । IHAR अणुदित्सवर्णस्य-( ई० ४२, ४५)-जो विधान किया जाय वह प्रत्यय और तद्भिन्न अप्रत्यय कहलाता है। एवं च सूत्रार्थ यह हुआ कि जिसका विधान न किया गया हो ऐसा अण् ( प्रत्याहार) और उदित् (कु चुटु तु पु) अपने सवर्णके बोधक हों। फल यह हुआ कि 'अस्य चौ' सूत्रमें ह्रस्व अकारसे दीर्घ आकारका भी ग्रहण हुआ और उससे 'गाझी भवति में 'गङ्गा' के आकारका ईत्वविधान सफल हुआ। अत्राण-केवल इसी ( अणुदित ) सूत्रमें 'अण्' प्रत्याहार पर ( 'लण' सूत्रस्थ ) णकारसे समझना चाहिये। तथा च हरिकारिका- परेणैवेणग्रहाः सर्वे पूर्वेणैवाणग्रहा मताः । ऋतेऽणुदित्सवर्णस्येत्येतदेकं परेण तु ॥ कुचु-'कु चु तु पु' ये उदित् कहलाते हैं। तदेवं-तस्मात् इस प्रकार यथा 'अ' अष्टादश (१८) की संज्ञाबोधक है तथा इंकार, उकार भी अष्टादशकी संशाबोधक हैं। ऋकार (लकारके सवर्ण होनेसे) तीसकी संज्ञाबोधक है। एवं लकार भी (ऋके सवर्ण होनेसे) तीसकी संज्ञाबोधक है और एच (ए ओ ऐ और) छस्व न होनेसे बारहकी संज्ञाबोधक है। अनुनासिक-अनुनासिक और अननुनासिक भेदसे 'य व ल' दो-दो प्रकार के होते हैं। इसलिये अनुनासिक 'य व ल' अनुनासिक, निरनुनासिक दोनोंकी संज्ञाबोधक है। पर: सनिकर्षः-वों की अत्यन्त सन्निधि की संहिता संज्ञा है। हलोऽनन्तरा:-'अच' वर्ण व्यवधानसे रहित व्यञ्जन वर्णों की संयोगसंज्ञा होती है । सुप्तिङन्तम्-सुबन्त और तिङन्तको पदसंज्ञा होती है। इस प्रकार 'इन्दुमती' हिन्दी टीकामें संज्ञाप्रकरण समाप्त हुआ। -- SAMPA পথ অমিতা। इको यणचि ६११७७।। इकः स्थाने यण स्यादचि संहितायां विषये । 'सुधी उपास्यः' इति स्थिते । तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य १।१।६६ ॥ सप्तमीनिर्देशेन विधीयमानं कार्य वर्णान्तरेणाऽव्यवहितस्य पूर्वस्यः बोध्यम् । स्थानेऽन्तरतमः ११११५०॥ प्रसङ्गे सति सदृशतम आदेशः स्यात् । सुध्य् उपास्य इति जाते। अनचि चु.४४७॥ अचः परस्य यरो द्वे वा स्तो, न त्वचि । इति धकारस्य द्वित्वम् । मलां जश् झशि ८ । ४ । ५३ ।। स्पष्टम् । इति पूर्वधकारस्य दकारः । संयोगान्तस्य लोपः ८।२।२३।। संयोगान्तं यत्पदं तदन्तस्य लोपः स्यात् । अलोऽन्त्यस्य १।११५२।। षष्ठीनिर्निष्टोऽन्त्यस्याऽल दादेशः स्यात् । इति यलोपे प्राप्ते।यणः प्रतिषेधो वाच्यः सुद्धचपास्यः। मद्ध्वरिः । धात्रंशः। लाकृतिः । सुध्युपास्यः (ई० ३७)-'सुधी उपास्यः' इति स्थिते 'तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य' इति' 'स्थानेन्तरतमः' इति च परिभाषाद्वयसहकारेण ईकारस्य यणि कृते 'अनचि । इको-'इक' के स्थानमें 'यण' आदेश हो 'अच' परे रहने पर-संहिताके विषय में । नोट:-संहितासर्वत्र नित्य होती है। केवल वाक्य में वक्ताकीहच्छापर रहती है। उक्तंच- संहितैकपदे नित्या नित्या धातूपसर्गयोः। नित्यासमासे वाक्ये तु साविवक्षामपेक्षते॥ (क) 'इ' के बाद ह भिन्न स्वर वर्ण रहने पर इके स्थान में 'यू' होता है। (ख) 'उ' के बाद उभिन्न स्वर वर्ण रहने पर उके स्थान में 'व' होता है। (ग) 'ऋ के बाद ऋभिन्न स्वर वर्ण रहने पर ऋके स्थानमें रेफ होता है और वह पर वर्णसे युक्त हो जाता है। (घ) 'ल' के बाद लुभिन्न स्वर वर्ण रहने पर लके स्थानमें 'ल' हो जाता है ! तस्मिन्निति-सप्तम्यन्त पदका उच्चारण करके विधीयमान जो कार्य वह वर्णान्तरसे अव्यवहित पूर्वके स्थानमें हों । स्थाने-प्रसंग रहने पर सदृशतम आदेश हो-अर्थात् एक स्थानीके स्थानपर एक ही साथ कई आदेशोंकी प्राप्ति होने पर उनमें जो सबसे अधिक स्थानीके सदृश हो वही आदेश हो । अनचि च-अच्से परे यरको विकल्पले द्वित्व हो । परन्तु उसी यरसे पर यदि अच् भी रहे तो द्वित्व नहीं हो। झलांजश्-झलों के स्थानमें जश् आदेश हो झश् परे रहने पर । संयोगान्तस्य-जिस पद के अन्तमें संयोग (संयुक्त अक्षर ) हो उसके अन्त्य अक्षरका लोप हो। अलोऽन्त्यस्य-बष्ठीनिर्देशेन विधीयमान जो कार्य वह अन्त्य 'अल' के स्थान में हो-अर्थात् षष्ठयन्तका निर्देशकर जहाँ (जिस उदाहरणमें) आदेशका विधान किया गया हो वहाँ अन्त्यवर्णको आदेश हो । यणः -'संयोगान्तस्य लोपः' PatroitusselIAPHYSIOTHONIRALANATIONACHAR १० लघुसिद्धान्तकौमुदी एचोऽयवायावः६।१।। एचः क्रमादय् अच् श्राय् आव् एते स्युरचि । यथासंख्यमनुदेशः समानाम् ॥३॥१०॥ समसम्बन्धी विधिर्यथासङ्ख्यं स्यात् । हरये । विष्णवे । नायकः । पावकः ॥ वान्तो यि प्रत्यये ६१११७६ || यकारादौ प्रत्यये परे श्रोदौतोरव श्राव एतौ स्तः। गव्यम् । नाव्यम् । अध्वपरिमाणे च | गव्यूतिः । अदेङ्गुणः १११।२।। अत् एङ च गुणसंज्ञः स्यात् । तपर- स्तत्कालस्य श११७०॥ तः परो यस्मात्स च तात्परचोच्चार्यमाणः समकालस्यैव संज्ञा स्यात् । आद्गुणः ६१८७॥ अवर्णादचि परे पूर्वपरयोरेको गुण आदेशः च' इत्यनेन धकारस्य द्वित्वे 'सुध्ध् य उपास्यः' इति जाते 'झलां जश् झशि' इति पूर्वधकारस्य दकारे 'संयोगान्तस्य लोपः' इति यलोपे प्राप्ते 'यणः प्रतिषेधो वाच्यः' इति वार्तिकेन निषेधे 'सुट्युपास्यः' इति । द्वित्वाभावपचे 'सुध्युपास्यः' इति । गव्यम् (ई० ५२५५)-(गोशब्दात् 'गोपयसोयत्' इति विकारार्थे यत्प्रत्यये कृते) 'गो यम्' इति स्थिते 'वान्तो यि प्रत्यये' इति श्रीकारस्य अवादेशे गव्यम्' इति । गव्यूतिः ( ई० ३८, ४३, ४८)-(गव्यूतिः स्त्री कोशयुगम्' इत्यमरः) 'गो यूतिः' इति स्थिते 'अध्वपरिमाणे च' इति वार्तिकेन यूतिशब्दे परे मार्गपरिमा- रोऽर्थे गम्यमाने गोशब्दस्य ओकारस्य स्थाने अवादेशे 'गव्यूतिः' इति । इस सूत्रका यह वार्तिक है, अतः इसका अर्थ यह होता है कि-संयोगान्त पदके अन्तिम वर्ण यणके लोपका प्रतिषेध कहना चाहिये--अर्थात् उसका लोप नहीं हो। एचो-एचके परे अच् रहे तो एचके स्थानमें यथाक्रमसे अय् , अव् , आय् , आव आदेश हों। यथासंख्य-समसंबन्धी विधि यथासंख्येन हो। नोट:-स्थानी और आदेशकी समान संख्या होने पर आदेशकी प्रवृत्ति यथाक्रमसे अर्थात् प्रथमको प्रथम, द्वितीयको द्वितीय, तृतीयको तृतीय इस प्रकारसे होती है। वान्तो-यकारादि प्रत्ययके परे 'ओत-औत्' को वान्त ( अब, आव ) आदेश हो । अध्व-अध्व (मार्ग) के परिमाण ( नाप) वाच्य हो तो गोशब्दको यूति शब्दके परे वान्त आदेश हो । अदेड-हस्व अकार औ ए-ओकी गुणसंज्ञा हो। तत्परः-तकार रहे परमें जिसके अथवा तकारसे परमें जो रहे, वह अपने समकालकी संज्ञाबोधक हो। नोट:-सूत्रमें 'तपर' से 'तः परो यस्मात् तपरः' और 'तात् परः तपरः ये दो अर्थ निकलते हैं। दोनों का उदाहरण 'अदेहुण.' सूत्र में अत्-ऐ है । यहाँ अकारसे पर तकार है अतः हस्व 'अ की तथा तकारसे पर 'एड' है। अतः 'एङ्' से 'ए-ओ' मात्र की गुण- संशा होती है। आद्गुण :--अवर्ण से परे अच हो तो पूर्व-परके स्थानमें एक गुण आदेश हो।
अच्सन्धिः] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। ११ स्यात् । उपेन्द्रः । गङ्गोदकम् ॥ उपदेशेऽजनुनासिक इत् श३२२॥ उपदेशेऽनुना- सिकोऽजित्सद्भः स्यात् । प्रतिज्ञानुनासिक्याः पाणिनीयाः । लणसूत्रस्थाऽवर्णेन सहोच्चार्यमाणो रेफो रलयोः संज्ञा ॥ उरण रपरः शश५शा 'ऋ' इति त्रिंशतः सज्ञेत्युक्तम् । तत्थाने योऽण् स रपरः सन्नेव प्रवर्तते । कृष्णद्धिः । तवल्कारः । लोपः शाकल्यस्य ८३।१६।। अवर्णपूर्वयोः पदान्तयोर्यवयोर्लोपो वाऽशि परे । पूर्वत्रासिद्धम् बा२।२॥ सपादसप्ताध्यायी प्रति त्रिपाद्यसिद्धा, त्रिपाद्यामपि पूर्व प्रति परं शास्त्रमसिद्धं स्यात् । हर इह । हरयिह । विष्ण इह । विष्णविह। उपेन्द्रः (ई० ५०)-'उप इन्द्रः' इतिस्थिते श्राद्गुणः' इति गुणे 'उपेन्द्रः' इति । कृष्णर्द्धि: ( ई० ३६, ४०, ४७, ५२, ५४ )-कृष्ण ऋद्धिः' इत्यवस्थायाम 'ऋकारस्य गुणवृद्धी अरारावेवेति भाष्योक्त्या 'श्राद्गुणः' इत्यनेन अकारऋकारयोः स्थाने गुणे अकारे कृते 'उरण रपरः' इत्यनेन रपरत्वे 'कृष्णद्धिः' इति । हर इह ( ई० ३२, ३३, ४१ )-'हरे इह' इत्यवस्थायाम् ‘एचोऽय- वायावः' इत्यनेन एकारस्य अयादेशे 'लोपः शाकल्यस्य' इति विभाषया यलोपे 'हर इह' इति स्थिते 'आद्गुणः' इति गुणे प्राप्ते 'पूर्वत्राऽसिद्धम्' इत्यनेन यलोप- स्याऽसिद्धत्वाद् गुणाभावे 'हर इह' इति । यलोपाभावे 'हरयिह' इति च । उपदेशे-उपदेशावस्थामें अनुनासिक-विशिष्ट जो अच वह इत्संज्ञक हो । प्रतिज्ञा-- पाणिनिके कहे हुए वर्णीका अनुनासिक होना उनकी प्रतिज्ञा (सूत्रनिर्देश) से जानना चाहिये। नोट:-'सु'का उकार और 'सुप्'का पकार अनुनासिक है, इसका निश्चय 'प्रत्ययः परश्च' 'बहुषु बहुवचनम्', इत्यादि स्थलों में प्रथमैकवचनान्त और सप्तम्येकवचनान्त पद- निर्देश से होता है। लणसूत्रस्थ-'लण' सूत्रस्थ जो अवर्ण, तत्सहित उच्चार्यमाण जो रेफ वह र-लकी संशाबोधक हो। नोट:-हकारादिष्वकार उच्चारणार्थः, लण्मध्ये त्वित्संज्ञकः, ऐसा कहा जा चुका अतः हयवरटु सूत्रके 'र' तथा 'लण' सूत्रके लकारोत्तर 'अ' को लेकर +अ = 'र' प्रत्या- हार बनता है। यह भी अणादि प्रत्याहारके समान ही अपने मध्य वर्ण लकारका तथा अपना भी बोयक है। इसीलिये आगेके सूत्रमें रपरसे लपर भी किया जायगा। उरण-(तीस प्रकारके संज्ञाप्रकरणोक्त) ऋल के स्थानमें जायमान जो अण् (आदेश) वह यथासंख्येन रपर और लपर होकर ही प्रवृत्त हो। लोप:--अवर्णपूर्वक पदान्त यकार और वकार का लोप हो, विकल्प से, अश् के परे। पूर्वत्रा-सपादसप्ताध्यायीस्थ सूत्र ( शास्त्र) के प्रति त्रिपादीस्थ सूत्र असिद्ध हो और त्रिपादीमें भी पूर्वके प्रति पर सूत्र असिद्ध हो। नोट:-प्रथमसे अष्टम अध्यायके प्रथम पाद तक सपादसप्ताध्यायी और अष्टमः अध्यायके द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ पाद मात्र त्रिपादी है।
। .. १२ लघुसिद्धान्तकौमुदी वृद्धिरादैच शश।। श्रादैच्च वृद्धिसज्ञः स्यात् । वृद्धिरेचि ६॥ १८॥ श्रादेचि परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् । गुणापवादः । कृष्णैकत्वम् । गङ्गौधः। देवैश्वर्यम् । कृष्णोत्कण्ठयम् । एत्येधत्यूठसु ६।१।८६ ।। अवर्णादेजाद्योरेत्येवत्योरूठि च परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् । उपैति । उपैधते । प्रष्टौहः । एजाद्योः किम् ? उपेतः । मा भवान्प्रेदिधत् । अक्षादूहिन्यामुपसंख्यानम् | अक्षौहिणी सेना । प्रादूहो- डोढयेषैष्येषु । प्रौहः । प्रौढः । प्रौढिः । प्रैषः। प्रैष्यः । ऋते च तृतीयास- मासे । सुखेन ऋतः सुखार्तः । तृतीयेति किम् ? परमतः । *प्र-वत्सतर-कम्ब- ल-वसना-ण-दशानामृणे । प्रार्णम् । वत्सतराणम्-इत्यादि ॥ उपसर्गाः क्रियायोगे १।४।५।। प्रादयः क्रियायोगे उपसर्गसंज्ञाः स्युः। प्र परा अप सम् अनु अव निस् निर् दुस् दुर् वि आङ् नि अधि अपि अति सु उत् अभि प्रति परि उप एते प्रादयः । भूवादयो धातवः १२३।१।। क्रियावाचिनो भ्वादयो धातुसंज्ञाः प्रार्णम् ( ई० ३८)-'प्र ऋणम्' इत्यवस्थायाम् 'आद्गुणः' इति गुणे प्राप्ते तं प्रबाध्य 'प्रवत्सतरकम्बलवसनार्णदशानामृणे' इति वृद्धौ ‘उरण रपरः' इति तस्य रपरत्वे 'प्राणम्' इति। भूवादयः (ई०५१)-भूश्च वाश्च भूवौ । श्रादिश्च श्रादिश्च'ादी। भूवौ आदी येषान्तै भूवादयः' इत्येकं पदम् , 'धातवः' इत्यपरम् । क्रियावाचिनो भ्वादयो वृद्धिरादेच-आत् (आ), ऐच (ऐ औ) की वृद्धिसंज्ञा हो। वृद्धि-अवर्णसे परे 'एच' हो तो पूर्व-परके स्थान में वृद्धिरूप एक आदेश हो। गुणा-यह सूत्र गुणका अपवादक नोट:-जहाँ जहाँ वृद्धि की प्राप्ति होती है बहाँ २ 'आद्गुणः' की भी प्राप्ति होती है। ऐसी स्थिति में यदि गुण हो जाय तो वृद्धिविधान व्यर्थ हो जायगा-गुणविधान तो 'उपेन्द्रः' में चरितार्थ है । अतः गुणका अपवाद 'वृद्धिरेचि' हुआ-'निरवकाशो विधिरपवादः । एत्ये-अवर्णसे एजादि इण् धातु ( एति), एध धातु (एधते) और ऊठ परे हो तो पूर्व-परके स्थानमें वृद्धिरूप एक आदेश हो । अक्षा-अक्षशब्दावयव अवर्णसे पर ऊहिनीशब्दावयव 'अच' हो तो पूर्व-परके स्थानमें वृद्धिरूप एकादेश हो । (यह गुणका अपवादक है) प्रादू-प्रशब्दावयव अवर्णसे पर ऊह, ऊड, टि, एष, एष्य- शब्दावयव अच परमें हो तो पूर्व-परके स्थानमें वृद्धिरूप एकादेश हो। (यह गुण और पररूपका बाधक है ) ऋते च-अवर्णसे पर ऋतशब्दावयव अच हो तो पूर्व-परके स्थानमें वृद्धिरूप एक आदेश हो-तृतीया समासमें । (यह गुणका बाधक है) प्रवत्सत- प्रशब्दावयव, वत्सतरशब्दावयव, कम्बलशब्दावयव, वसनशब्दावयव, ऋणशब्दावयव, दशनशब्दावयव-अवर्णसे पर ऋणशब्दावयव अच हो तो पूर्व-परके स्थानमें वृद्धिरूप एकादेश हो। ( यह गुणका बाधक है) उपसर्गाः-क्रियाके योगमें प्रादिवी उपसर्गसंज्ञा हो। (प्रादि २२ हैं ) भूवादय -क्रियावाचक भू आदिकी धातुसंशा हो। है ।
असा अच्सन्धिः] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। स्युः । उपसर्गाहति धातौ ६।१।६१ ॥ अवर्णान्तादुपसर्गाकारादौ धातौ परे बुद्धिरेकादेशः स्यात् । प्रार्छति । एडि पररूपम् | ११६४॥ श्रादुपसर्गादेडादौ धातौ पररूपमेकादेशः स्यात् । प्रेजते । उपोषति । अचोऽन्त्यादि टि शश६४॥ अचां मध्ये योऽन्त्यः स श्रादिर्यस्य तसिंज्ञं स्यात् । *शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम् । तच्च टेः। शकन्धुः। कर्कन्धुः। मनीषा। आकृतिगणोऽयम् । मार्तण्डः । ओमाङोश्च शशा प्रोमि प्राङि चाऽत्परे पररूपमेकादेशः स्यात्। धातुसंज्ञाः स्युः' इति सूत्रार्थः । उदाहरणं तु 'प्रार्छति' इति । अत्र 'ऋच्छति'इत्य- स्यानेन धातुसंज्ञात्वेन 'उपसर्गाहति धातौ' इति वृद्धिर्भवति । प्रार्छति ( ई० ४१, ४८, ५३, ५६ )-'प्र ऋच्छति' इत्यवस्थायाम 'उपसर्गाः क्रियायोगे' इत्यनेन 'प्र' इत्यस्योपसर्गसंज्ञायाम् 'भूवादयो धातवः' इत्यनेन 'ऋच्छति' इत्यस्य धातुसंज्ञायां च सत्यां 'उपसर्गाति धातौ' इति पूर्व- परयोः स्थाने वृद्धौ ‘उरण रपरः' इति रपरत्वे च कृते 'पार्च्छति' इति । प्रेजते (ई० ५१)-'प्र एजते' इति स्थिते 'उपसर्गाः क्रियायोगे' इति '' इत्यस्योपसर्गसंज्ञायाम् ‘एङिपररूपम्' इति पूर्वपरयोःस्थाने पररूपैकादेशे 'प्रेजते' इति! शकन्धुः (ई० ४२)-'शक अन्धुः' इत्यवस्थायाम् 'अकः सवर्णे दीर्घः' इत्यनेन दीर्चे प्राप्ते तं प्रबाध्य 'शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्' इति वार्तिकेन पर- रूपे कृते उक्तं रूपं सिद्धम् । (अत्र तच्च पररूपं टेटिसंज्ञकस्य, भवति । टिसंज्ञा च 'अचोऽन्त्यादि टि' इत्यनेन ककारोत्तरवर्ति-अकारस्य भवतीति बोध्यम् ) उपसर्गाति-अवर्णान्त उपसर्गसे ऋकारादि धात्ववयव अच पर में हो तो पूर्व-पर के स्थान में वृद्धिरूप एकादेश हो । एडि-अवर्णान्त उपसर्गसे एङादि धात्ववयव अच् पर हो तो पूर्व- पर के स्थान में पररूप एकादेश हो। नोट:-पररूप होनेपर पूर्व वर्णका पर वर्णके समान रूप हो, याने पूर्व वर्ण (अ) का दर्शनाभाव हो जाय । अचो-अचों के मध्य में जो अन्त्य अच यह है आदिमें जिसके उस समुदायको टिसंशा हो। नोट:-शक x अन्धुः' यहाँ पर 'शक' में जो ककारोत्तरवती अकार है वह किसीके आदिमें नहीं है। इसलिये व्यपदेशिवद्भावसे यहाँ 'अ' की टिसंज्ञा होगी। परन्तु 'मनस् ४ ईषा' यहाँ पर 'मनस्' में जो नकारोत्तरवर्ती 'अ' है, वह 'स्' के आदिमें है। अतः यहाँ 'अस' की ष्टिसंज्ञा होगी। शकन्ध्वा-शकन्धवादि गणपठित शब्दोंकी सिद्धिके लिये पूर्व-परके स्थानमें पररूप एकादेश हो, और वह पररूप टिको हो। ओमा-अवर्णसे पर ओम् या 'आ' हो तो ee । । लघुसिद्धान्तकौमुदी शिवायोनमः । शिव-एहि । अन्तादिवञ्च शशा योऽयमेकादेशः स पूर्वस्या- न्तवत्परस्यादिवत्स्यात्। शिवेहि। अकः सवर्णे दीर्घः ६०१०।। अकः सवर्णेऽचि परे पूर्वपरयोर्दीर्घ एकादेशः स्यात् । दैत्यारिः । श्रीशः। विष्णूदयः । होतृकारः । एङः पदान्तादति ६।२ १०६।। पदान्तादेकोऽति परे पूर्वरूपमेकादेशः स्यात् । हरेऽव । विष्णोऽव । सर्वत्र विभाषा गोः ६१११२२॥ लोके वेदे चैन्न्तस्य गोरति जा प्रकृतिभावः स्यात् पदान्ते । गो अग्रम् । गोऽयम् । एउन्तस्य किम् ? चित्रग्व- अम् । पदान्ते किम् ? गोः। अनेकाल शित्सर्वस्य १२११५५।। अनेकालय श्रादे- शः शिदादेशश्च स सर्वस्य षष्ठीनिर्दिष्टस्य स्थाने स्यात् ॥-इति प्राप्ते डिच्च शश५३|| दिनेकालप्यन्त्यस्यैव स्यात् अवङ्। स्फोटायनस्य ६।११ १२३ ।। पदान्ते एङन्तस्य गोरवङ् वा स्यादचि । गवायम् । गोऽयम् । पदान्ते किम् ? शिवेहि (ई० ३०, ३२, ३५, ३९, ४३, ४५, ४९, ५५)-शिव श्रा इहि' इत्यवस्थायां 'धातूपसर्गयोः कार्यमन्तरङ्गम्' इत्यन्तरङ्गत्वात् सवर्णदीर्घस्याऽ- सिद्धत्वेन पूर्वम् ‘ा इह' इत्यत्र 'आद्गुणः' इत्यनेन गुणे 'शिव एहि' इति स्थिते 'अन्तादिवच' इत्यनेन अन्तवद्भावमादाय 'ओमाडोश्च' इत्यनेन पररूपे 'शिवेहि' इति सिद्धम् । गवायम्, गो अग्रम् , गोऽयम् ( ई० ३३, ३४, ३७, ३९, ४१, ४३, ४५, ४७, ५०, ५३)-'गो अग्रम्' इति स्थिते 'एचोऽयचायावः' इति अवादेशः प्राप्तः तं प्रबाध्य 'सर्वत्र विभाषा गोः' इति प्रकृतिभावः प्राप्तः तमपि परत्वात् प्रबाध्य 'अवङ स्फोटायनस्य इति अग्रमित्येतद्धटकाऽकारे परे पदान्त विद्यमानस्य एङ- न्तस्य 'गो' इत्यस्य अवडादेशः प्राप्तः, स च अवडादेशः कुत्र स्यादिति प्रश्ने अवङः अनेकाल्त्वात् 'अनेकाल्शित् सर्वस्य' इत्यनेन सर्वादेशे प्राप्ते 'डिच्च' इत्यनेन डिदादेशस्य अनेकाल्त्वेऽपि अन्त्यादेश इति गोशब्दे गकारोत्तरवर्तिनः प्रोकारस्य अवडादेशे डकारस्येत्संज्ञायां लोपे च कृते 'गव अग्रम्' इति जाते पूर्व-परके स्थानों पररूप एक आदेश हो। अन्ता-जो यह एकादेश है वह पूर्व पदके अन्त जैसा और पर पदके आदि जैसा हो। अका-'अक्' से पर सवर्ण 'अच। रहे तो पूर्व-परके स्थानमें सवर्णदीर्घ एक आदेश हो। एडः-पदान्त 'ए' से पर अत् रहे तो पूर्वरूप एक आदेश हो । सर्वत्र-लोक या वेदमें (सर्वत्र ) 'गो' शब्दको 'अत्' के परे विकल्पसे प्रकृतिभाव हो । अनेकाल-अनेकाल आदेश और शित् आदेश सम्पूर्ण स्थानीके स्थान में हो । डिच्च-डित् आदेश यदि अनेकाल भी हो तो अन्त्यके स्थानमें ही हो। अवङ-पदान्तमें एडन्त गोशब्दको अच के परे विकल्पसे अव आदेश हो। - । अच्सन्धिः] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। गवि ॥ इन्द्रे च ६१।१२४।। गोरवङ् स्यादिन्द्रे । गवेन्द्रः॥ दूराद्भूते च ८:२ ८४|| दूरात्सम्बोधने वाक्यस्य टेः प्लुतो वा स्यात् ॥ प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् ६३१११२।। एतेऽचि प्रकृत्या स्युः । आगच्छ कृष्ण अत्र गौश्वरति ॥ ईदूदेद्वि- वचनं प्रगृह्यम् ११११११।। ईदूदेदन्तं द्विवचनं प्रगृह्यं स्यात् । हरी एतौ । विष्णू इमौ । गङ्गे अमू ॥ अदसो मात् शश१२।। अस्मात्परावीदूतौ प्रगृह्यौ स्तः । अमी ईशाः । रामकृष्णावमू आसाते । मात्किम् ? अमुकेऽत्र । चादयोऽसत्त्वे ११४।५७॥ 'अकः सवर्णे दीर्घः' इत्यनेन सवर्णदीर्घ 'गवायम्' इति । अवादेशाभावपक्षे 'सर्वत्र विभाषा गोः' इत्यनेन प्रकृतिभावे 'गो अग्रम्' इति । प्रकृतिभावाभावपक्षे 'एङः पदान्तादति' इति पररूपे 'गोऽयम्' इति च सिद्धम् । आगच्छ कृष्ण३ अत्र गौश्वरति (ई० ४५)-अत्र वाक्ये 'कृष्ण अत्र' इति स्थिते सवर्णदीर्घ प्रबाध्य 'दूराद्भूते च' इति टिसंज्ञकस्य णकारोत्तरवर्त्यकारस्य प्लुतसंज्ञायां 'प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्' इत्यनेन प्रकृतिभावे रूपं सिद्धम् । अमी ईशाः (ई० ३४ )-'अमी ईशाः' इति दशायां सवर्णदीर्घ प्रबाध्य "अदसो मात्' इति अदश्शब्दसम्बन्धिमकारात्परस्य ईकरस्य प्रगृह्यसंज्ञायां 'प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्' इति प्रकृतिभावे 'अमी ईशाः' इति सिद्धम् । अमुकेऽत्र ( ई० ३९)-'अदसो मात्' इति सूत्रे 'मात्' ग्रहणाऽभावे "अदस्'शब्दात् 'अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक् टेः' इत्यनेन अकचि अनुबन्धलोपे 'अद कस्' इति, तस्माजसि अत्वे पररूपे जशः श्यादेशे 'आद्गुणः' इत्यनेन गुणे उत्वे मत्वे च कृते 'अमुके' इति सिद्धस्य 'अत्र'शब्देन योगे एकारस्य प्रगृह्यत्वं स्यात् । ननु 'अदसो मात्' इति सूत्रेण ईदूतोरेव प्रगृह्यत्वविधानाभ्युपगमेन अकृतेऽपि माद्ग्रहणे नोक्तदोषः इति चेन्न, एकसमासोपात्तानामीददेतां मध्ये ईदूतो- ईयोरनुवृत्तौ एतोप्यनुवृत्तिप्रसको माद्ग्रहणादेतोऽनुवृत्तिः प्रतिबद्धा, माद्वहणाऽभावे तु बाधकाऽभावादेतोऽप्यनुवृत्तिः स्यादिति दिक। इन्द्रे-गो शब्दको अवङ् आदेश हो इन्द्र शब्दके परे । दूरात-दूरसे सम्बोधनविषयक जो वाक्य, तद्वाक्यावयव जो 'टि' वह विकल्पसे प्लुतसंज्ञक हो। प्लुत--प्लुतसंज्ञक और प्रगृह्यसंशकको प्रकृतिभाव हो, अच्के परे । ईदू-ईदन्त, ऊदन्त और एदन्त द्विवचनकी प्रगृह्य संशा हो । अदसो. -अदस् शब्द संबन्धी मबारसे पर ई-ऊर को प्रगृह्यसंज्ञा हो। बादय:--अद्रव्यार्थवाची ( 'लिङ्गसंख्यान्वयिल द्रव्यत्वं, तन्निवाची' अर्थात् अव्यय- लघुसिद्धान्तकौमुदी अद्रव्यार्थाश्चादयो निपाताः स्युः ॥ प्रादयः शाम! एतेऽपि तथा स्युः ॥निपात एकाजनाङ् शराठा एकोऽच् निपात श्राजवर्जः प्रगृह्यः स्यात् । इ इन्द्रः। उ उमेशः । वाक्यस्मरणयोरङित् । प्रा एवं नु मन्यसे ? श्रा एवं किल तत् । अन्यत्र ङित् । ईषदुष्णम्-श्रोष्णम् ॥ ओत् ११११।। श्रोदन्तो निपातः प्रगृह्यः स्यात् । अहो ईशाः ॥ सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे १११ १६॥ सम्बुद्धिनिमि- त्तक श्रोकारो वा प्रगृह्योऽवैदिके इतौ परे । विष्णो इति। विष्ण इति । विष्णविति ।। उ उमेशः (ई०३६,५६)-'उ उमेशः' इत्यवस्थायां पूर्वस्य उकारस्य 'चादयोऽ- सत्त्वे इत्यनेन निपातसंज्ञायां निपात एकाजनाङ्' इति प्रगृह्यसंज्ञायां प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्' इति प्रकृतिभावे "उ उमेशः' इति । विष्णो इति (ई० ३१, ३८, ४६, ४९ ५४, ५७ )-'विष्णो इति' इत्यव- स्थायाम् ‘एचोऽयवायावः' इति अवादेशे प्राप्ते तम्प्रबाध्य 'सम्बुद्धौ शाकल्यस्येता- वनार्षे' इति विभाषया प्रगृह्यसंज्ञायां 'प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्' इत्यनेन प्रकृति- भावे 'विष्णो इति' इति । प्रगृह्यत्वाऽभावपक्षे 'एचोऽयवायावः' इत्यनेन अवादेशे 'लोपः शाकल्यस्य' इति वैकल्पिके वकारस्य लोपे 'विष्ण इति' इति स्थिते 'पूर्व- त्राऽसिद्धम्' इत्यनेन वलोपशास्त्रस्य-लोपः शाकल्यस्ये त्यस्य असिद्धत्वात् 'पा- द्गुणः' इत्यनेन गुणाऽभावे 'विष्ण इति' इति । वलोपाऽभावपक्षे विष्णविति' इति वाची) चादि (च वा ह आदि ) की निपात संज्ञा हो । प्रादयः-अद्रव्यार्थक प्रादिकी भी निपातसंज्ञा हो । निपात (ई०२०)-'आ' वर्जित एकाच निपातकी प्रगृह्यसंज्ञा हो । अर्थात् आङ् रहित एक स्वरमात्र अव्ययकी सन्धि नहीं हो। 'वाक्यस्मरणयोरडित्'-भाष्यपठित श्लोकवार्तिक का पूर्णरूप इस प्रकारका है-'ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाभिविधौ च यः । एतमातंडितं विद्याद् वाक्यस्मरणयोरडित् ॥ ईषत् अर्थमें, क्रियाके योगमें, मर्यादामें और अभिविधि अर्थमें जो 'आ' उसे ङित् ( आधटक-आ) जानना और वाक्य तथा स्मरण अर्थ में जो 'आ' उसे अङित् ( केवल आ) जानना । यही इसका अर्थ है। नोट:-ईषत् ( अत्यल्प ) अर्थमें-आ+उष्णम् = ओष्णम् (किञ्चित् गर्म)। क्रिया के योगमें-आ+ इहि = एहि (एहाँ आओ)। मर्यादा ( सीमा ) अर्थमें-आx अम्बुधेः = आम्बुधः (समुद्रपर्यन्त)। अभिविधि (मर्यादाका प्रभेद व्याप्ति) अर्थमें आ+एक- देशात् = ऐकदेशात् ( एकदेशव्यापकर )। ओत्-ओदन्त निपातकी प्रगृह्यसंज्ञा हो। सम्बुद्धौ-संबुद्धिनिमित्तक ओकारकी विकल्पसे प्रगृह्यसंज्ञा हो, अवैदिक 'इति' शब्दके परे।
पुनः गुणस्याप्रसंगे 'ब्रह्म ऋषिः' इति । ह्रस्वाऽभाव अच्सन्धिः] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। मय उसो वो वा1३1३३॥ मयः परस्य उजो वो वा स्यादचि। किन्तु- तम् । किम् उत्तम् । इकोऽसवर्ण शाकल्यस्य स्वश्च ६१२१२७।। पदान्ता इको हस्वा वा स्युरसवर्णेऽचि परें। स्वविधिसामर्थ्याच स्वरसन्धिः। चक्रि अत्र । चक्रवत्र । पदान्ता इति किम् ? गौयौँ । अचो रहाभ्यां । ८।४।४६॥ अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्य यरो द्वे वा स्तः। गौय्यौँ । न समासे । वाप्यश्वः । किम्युक्तम् ( ई० ३४, ४० )-'किसु उक्तम्' इति दशायां 'मय उजो वो वा' इत्यनेन मकारात्परस्य उन उकारस्य वकारादेशे 'किम्बुक्तम्' इति । वकाराs- भावपक्षे 'निपात एकाजनाङ्' इत्यनेन प्रगृह्यसंज्ञायां ‘प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्' इत्यनेन प्रकृतिभावे 'किमु उक्तम्' इति च सिद्धं भवति । चक्रि अत्र ( ई० २७, ४८, ५० )-'चक्री अत्र' इति स्थिते 'इको यणचि' इति यणि प्राप्ते तं प्रबाध्य 'इकोऽसवर्ण शाकल्यस्य स्वच' इति विकल्पेन ह्रस्वे कृते ह्रस्वविधिसामर्थ्यात् पुनः यणोऽप्राप्त्या 'चक्रि अत्र' इति । ह्रस्वाऽभावे यणि 'चक्रयत्र' इति च सिद्धं भवति । ब्रह्मर्षिः (ई० २९, ४७, ५१)-'ब्रह्मा ऋषिः' इति दशायाम् 'आद्गुणः' इत्यनेन गुणे प्राप्ते तम्प्रबाध्य 'ऋत्यकः' इति पाक्षिके ह्रस्वे कृते ह्रस्वविधिसामर्थ्यात् 'उरण रपरः' इति रपरत्वे 'ब्रह्मर्षिः' इति च सिद्धम् । पदान्ता इति किम्-'इकोऽसवर्णे' इति सूत्रे 'पदान्ते'त्येतस्यानुवृत्त्यभावे 'गौय्यौँ' इत्यत्र 'गौरी औ' इति स्थिते यणं प्रबाध्य हृत्वसमुच्चितप्रकृतिभावापत्तिः स्यादिति तन्निवारणाय ‘पदान्ते'त्येतस्यानुवृत्तिरावश्यकीति । वाप्यश्वः-वाप्यामश्वः वाप्यश्वः ( वापीनिष्ठाऽधिकरणतानिरूपिताऽऽधेयतावा- नश्वः, इति शाब्दबोधः) 'वापी अश्वः' इति स्थिते 'इकोऽसवर्णे-' इति हस्वसमु- च्चितप्रकृतिभावे प्राप्ते 'न समासे' इति निषेधे यणि तत्सिद्धिः। , मय-मय से पर 'उ' के उकारको 'व' आदेश हो-अचके परे, विकल्पसे । इको-पदान्त 'इक्' को अच्के परे युगपत् हस्व और प्रकृतिभाव हो, विकला। अचो--'अच्' से पर जो रेफ, हकार उससे पर जो 'चर्' उसको द्वित्व हो, सन्दपसे ! न समा-समासमें पदान्त इक्को हस्व और प्रकृतिभाव कुछ भी नहीं हो। २ल० म लघुसिद्धान्त कौमुदी ऋत्यकः६१११२८॥ ऋति परे पदान्ता अकः प्राग्वद्वा । ब्रह्म ऋषिः ब्रह्मर्षिः। पदान्ताः किम् ? पार्छत् । * इत्यच्सन्धिप्रकरणम् * अथ हल्सन्धिप्रकरणम् । स्तोःश्वनाश्वः८४१४०॥ सकारतवर्गयोः शकारचवर्गाभ्यां योगे शकार- चवर्गों स्तः । रामशेते । रामश्चिनोति । सच्चित् । शार्जिञ्जय । शात् ८४|४४|| आर्च्छत ( ई० २१)-'ऋत्यकः' इति सूत्रे ‘पदान्ताः' इत्यस्याऽननुवृत्तौ 'श्रा ऋच्छन्' इति दशायाम् 'आटश्चेति प्राप्तवृद्धि प्रबाध्य ह्रस्वत्वमापद्येत तन्मा- भूदित्येतदर्थं 'पदान्ताः' इति । तेनात्र 'श्राटश्चेति वृद्धौ सत्यां रपरत्वे कृते 'श्रार्छत्' इति सिद्धचति । X swimesma सूत्रनिर्देशपूर्वकं सन्धि कुरुत- पितृ ऋणम् । शुभ्र+ऋषिः । सुखस्य+औपयिकम् । अव+एति । उप+ ऋच्छत् । प्र+ओषति । गोपाल+एहि । इन्दुमती+उवाच । मृदु+ओदनः। मातृ+ इच्छा। ल+आनय । ने+अनम् । कस्मै+इदम् । भोअनम् । भौ+इष्यति । ते+ आगताः। चन्द्रशेखर:+अस्मि । गो+अक्षः। आगच्छ सखे+अत्र क्रीडेमः। वटू+ उच्छलतः । अमू+अश्नीतः । अहो, इदम् । उ+ उद्धवः । सूत्रनिर्देशपूर्वकं विच्छेदं कुरुत- गुरूहः । महारः। महौचित्यम् । अवैधते । उपार्णोति । प्रेषयति । अवेहि । अत्यौ- दरिकः । तन्वङ्गी । प्रशास्त्रूलन् । लानय । इति इन्दुमती टीकायामचसन्धिप्रकरणम् । । ऋत्य-'ऋत् परमें हो तो पदान्त 'अक्' को हस्व और प्रकृतिभाव विकल्पसे हो। इस प्रकार 'इन्दुमती'टीकामें अच्सन्धिप्रकरण समाप्त हुआ। स्तोःशु-सकार-तवर्गके स्थानमें शकार अथवा चवर्गके (पूर्व या परमें ) योग रहने पर सकारके स्थान में शकार और तवर्गके स्थानमें चवर्ग हो। नोट:-यहाँ स्थानी और आदेशमें यथासंख्य अपेक्षित नहीं है-ऐसा होने पर आयेका 'शात् सूत्र ही व्यर्थ हो जायगा (ष्टुत्वमें भी ऐसा समझना चाहिये) शातू-शकारसे पर । हल्सन्धिः] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १६ शात्परस्य तवर्गस्य चुत्वं न स्यात् । विश्नः । प्रश्नः । ष्टुना ष्टुः ८।४।४१॥ स्तोः "टुना योगेष्टुः स्यात् । रामष्षष्ठः । रामष्टीकते । पेष्टा । तटीका । चक्रिण्डौकसे । न पदान्ताट्टोरनाम् ८।४।४३॥ पदान्तावर्गात्परस्याऽनामः स्तोः टुर्न स्यात् । षट् सन्तः। षट् ते । पदान्तारिकम् ? ईट्टे । टोः किम् ? सर्पिष्टमम् । *अनाम्न- वतिनगरीणामिति वाच्यम् । षण्णाम् । षण्णवतिः। षण्णगर्य्यः। तोः षि ८४|४३॥ तवर्गस्य षकारे परे न टुत्वम् । सन्षष्ठः । झलां जशोऽन्ते ८।२।३६।। पदान्ते झलां जशः स्युः। वागीशः । योऽनुनासिकेऽनुनासिको वा४।४५॥ यरः पदान्तस्यानुनासिके परेऽनुनासिको वा स्यात् । एतन्मुरारिः । एतमुरारिः । *प्रत्यये भाषायां नित्यम् । तन्मात्रम् । चिन्मयम् । तोलि सा४६०॥ तवर्गस्य सर्पिष्टमम् ( ई० २२, ३९, ४३ )-सर्पिष् तमम् , इत्यवस्थायां 'टुना टु' इति तकारस्य टुत्वेन टकारे 'सर्पिष्टमम्' इति । 'न पदान्ताटोरनाम्' इति ष्टुत्वनिषेधस्तु न भवति, वर्गात्परत्वाऽभावात् । न च षकारस्य "झलां जशोऽन्त' इति जश्त्वेन डकारे सति तकारल्य टवापरत्वात् टुत्वनिषेधः ल्यादेवेति वाच्यम् । "हस्वात्तादौ तद्धिते' इति विहितस्य षत्वस्याऽसिद्धवेन जश्त्वाभावात् । मूले तु 'न पदान्ताटोरनाम्' इति सूत्रस्य प्रत्युदाहरणमेतत् । तत्र हि टोह- गाऽभावे 'सर्पिष्टमम्' इत्यत्राऽपि टुत्वनिषेधः स्यादिति टोर्ग्रहणमावश्यकमिति तात्पर्यम् । एतन्मुरारिः (ई० ४१,४७,५०,५३)-एष चासौ मुरारिः ‘एतन्मुरारिः । “एतद् मुरारिः' इति स्थिते 'यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा' इत्यनेन दकारस्य अनुनासिके नकारे कृते 'एतन्मुरारिः' इति । अनुनासिकाऽभावरक्षे 'एतमुरारिः' इति च भवति । चिन्मयम् (ई० ३०,४५,५६)-'चिद् मयम्' इति दशायां 'प्रत्यये भाषायां तवर्गके स्थानमें श्चुत्व (चवर्ग) नहीं हो। ष्टुना-सकार तवर्गके स्थानमें धकार-टवर्गका (पूर्व या परमें) योग रहने पर सकारके स्थानमें षकार और तवर्गके स्थानमें स्वर्ग आदेश हो। न पदान्ता-पदान्त टवर्गसे पर नाम् ( अवयव )भिन्न सकार और तवर्गके स्थानमें 'टुत्व (धकार-टवर्ग) नहीं हो । अनाम्न-दान्त टवर्गसे पर नाम् , नवति, नगरी-भिन्न सकार-तवर्गको टुत्व नहीं हो-ऐसा कहना चाहिए। तोः षि-तवर्गको पकारके परे टुत्व नहीं हो। (उदाहरण-वसन्तात् षट्पदाः तुष्यन्ति ) झलां-पदान्त झलके स्थानमें जश् आदेश हो। यरो-पदान्त यरको अनुनासिक आदेश हो, विकल्पसे । प्रत्यये-अनु- नासिकादि प्रत्यय परमें रहने पर भाषा ( लोक प्रयोग) में पदान्त यके स्थानमें नित्य अनुनासिक आदेश हो । तोर्लि-तवर्गको लकारके परे परसवर्ण हो । (तत् ४ लयः = तल्लयः) ।
लघुसिद्धान्तकौमुदी लकारे परे परसवर्णः स्यात् । तल्लयः । विद्वाल्लिखति । लकारस्याऽनुनासिको लकारः। उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य सा४।६। उदः परयोः स्थास्तम्भोः पूर्वसवर्ण स्यात् । तस्मादित्युत्तरस्य १११।६०॥ पञ्चमीनिर्देशेन क्रियमाणं कार्य वर्णान्तरे- णाऽव्यवहितस्य परस्य ज्ञेयम् । आदेः परस्य ११११५४।। परस्य यद्विहितं तत्त स्थादेर्बोध्यम् । इति सस्य थः । भरो झरि सवर्णे ८४।६।। हलः परस्य झरो लोपो वा स्यात् सवर्णे झरि । खरिच८४१५५ ।। खरि परे मला चरः स्युः । इत्युदो दस्य तः । उत्थानम् । उत्तम्भनम् । झयो होऽन्यतरस्याम् ८।४।६२॥ झयः परस्य हस्य वा पूर्वसवर्णः स्यात् । नादस्य घोषस्य संवारस्य महाप्राणस्य नित्यम्' इति 'मयट' प्रत्यये परे दकारस्य नित्यमनुनासिके नकारे चिन्मय' इति । विद्वाल्लिखति ( ई० ५१ )-'विद्वान् लिखति' इत्यवस्थायां 'तोलि' इत्यनेन परसवर्णे कृते विद्वॉल्लिखति' इति सिद्धम् । उत्थानम् (ई० ३१, ३७, ४०, ४८, ५१, ५३, ५५, ५७)-'उद् स्था- नम्' इति दशायाम् 'उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य' इति सूत्रेण 'तस्मादित्युत्तरस्येति परिभाषया (वर्णान्तराऽव्यवहितस्य 'स्था' इत्यस्य स्थाने) पूर्वसवर्णे प्राप्ते 'आदेः परस्येति सूत्रबलात् ('स्था' इत्यस्यादिभूतस्य सकारस्य स्थाने) अघोषमहा- प्राणप्रयत्नसाम्यात् तादृशे थकारे पूर्वसवणे कृते 'उद् थ् थानम्' इति जाते 'झरी झरि सवर्णे' इति (द कारोत्तरवर्तिथ कारस्य) विकल्पेन लोपे खरि च' इति DSCARSETD Nan नोट:--परसवर्ण करने से नकारके स्थान में विशेषता यही होती है कि तत्सवणी अनुनासिकविशिष्ट लकार आदेश होता है। यथा-विद्वान् +लिखति विद्वालँ लिखति । उदः-'उद्' से पर स्था और स्तम्भके स्थान में पूर्वसवर्ण आदेश हो। तस्मा (ई० ३९)-पञ्चम्यन्त पद का उच्चारण कर जिस कार्यका विधान किया गया हो वह कार्य उस पञ्चम्यन्तसे बोधित वर्णान्तर (अन्य वर्ण) से अव्यवहित पर वर्णके स्थान में हो। अर्थात् निमित्त और स्थानीके बीच में अन्य वर्णको नहीं आना चाहिये । नोट:-'उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य' इस सूत्रमें 'उदः' इस पञ्चम्यन्त पदका उच्चारण करके पूर्वसवर्ण आदेशका विधान किया गया है। अतः यह सूत्र 'उद्' तथा 'स्था' और 'स्तम्भ' के बीचमें जब अन्य कोई वर्ण नहीं होगा तब ही पूर्वसवर्ण कर सकेगा। (ऊपर संस्कृत टीका देखें) आदे:-परके स्थान में विधीयमान (कहा गया) जो कार्य वह परके आदि वर्णके स्थानमें हो-ऐसा समझना चाहिये । इरो झरि-हल्से पर झा लोप हो, सवर्ण झर्के परे विकल्पसे । खरि च-खर् परमें हो तो झल्के स्थानमें चर् आदेश हो । झयो हो-झर्से पर जो हकार उसको पूर्वसवर्ण हो, विकल्पसे । - amarpan । हल्सन्धिः] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। २१ ताहशो वर्गचतुर्थः । वाग्धरिः । वारहरिः। शश्लोऽटि ८४।६।। पदान्ताज्मयः परस्य शस्य छो वा स्यादटि । तद् शिव इत्यत्र दस्य श्वत्वेन जकारे कृते खरि चेति जकारस्य चकारः । तच्शिवः । तच्छिवः । छत्वममीति वाच्यम् । तच्छ्लोकेन । मोऽनुस्वारः ८।३ ॥ २३॥ मान्तस्य पदस्याऽनुस्वारः स्यादलि। हरिं वन्दे । नश्चाऽपदान्तस्य फलिया२४|| नस्य मस्य चाऽपदान्तस्य मल्यनुस्वारः स्यात् । यशांसि । श्रास्यते। मलि किम् ? मन्यसे । अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः चर्चे 'उत्थानम्' इति । लोपाभावपक्षे 'उत्थ्थानम्' इति । विकल्पपक्षे 'खरि चेति चर्वन्तु न, चत्वं प्रति थकारस्याऽसिद्धत्वात् । वाग्धरिः (ई० २८, ४२, ४६, ५२ )-'वाक् हरिः' इति स्थिते 'झलां जशोऽन्ते' इति जश्त्वे कृते 'झयो होऽन्यतरस्याम्' इति पूर्वसवर्णविधौ गकारस्य पूर्वनिमित्तत्वात् तत्सवर्णेषु क-ख-ग-ध-ङ' इत्येतेषु पञ्चस्वपि प्राप्तेषु घोषवतो नादवतो महाप्राणस्य संवृतकण्ठस्य हस्य स्थाने ताशे चकारे जाते 'वाग्धरिः' इति । पूर्वसवर्णाऽभावपक्षे 'वारहरिः' इति । तच्छिवः (ई० ४०,४१,४३,४९,५४ )-'तद् शिवः' इत्यवस्थायां 'स्तोः- चुना श्चुः', इत्यनेन दकारस्य श्चुत्ने जकारे कृते खरिच' इत्यनेन जकारस्य चन चकारे 'तच् शिवः' इति जाते 'शश्छोऽटि' इत्यनेन (भयन्तःपातिनश्चका- रात्परस्य ) शस्य (अप्रत्याहारान्तःपातिनि शकारोत्तरवर्तिनीकारे परे ) छत्वे "तच्छिवः' इति । छत्वाभावे तु 'तच्शिवः' इति । तच्छलोकेन ( ई० २१, ३४, ४५ )-'तद् श्लोकेन' इत्यवस्थायां 'स्तोः चुना श्चुः' इत्यनेन दस्य श्चुत्वेन जकारे कृते 'खरि च' इति चर्चेन चकारे 'छत्वममीति वाच्यम्' इति शस्य छत्वे 'तच्छ्लोकेन' इति । नोट:-नाद, घोष, संवार और महाप्राण-प्रयत्नवान् जो हकार उसके स्थानमें तादृश प्रयत्नवान् चतुर्थ वर्ण आदेश हो। शश्छोऽटि-पदान्त झय्से पर शकारके स्थानमें छकार आदेश हो, विकल्पसे, अटके पर। नोट:-शकारके पूर्व तवर्ग होनेपर तवर्गको श्चुत्व होकर ही शकारको छकार हो । छत्वममीति--पदान्त झयसे पर शकारके स्थानमें छकार हो, विकल्पसे, अम्के परे । मोऽनु--मान्त पदके स्थानमें अनुस्वार हो, हलके परे। नश्वा-अपदान्त नकार--मकारके स्थानमें अनुस्वार हो, झलके परे । अनुस्वारस्य-अपदान्त अनुस्वारके स्थानमें परसवर्ण आदेश हो, ययके परे। , ७ । । । । २२ लघुसिद्धान्तकौमुदी ८४१५८ || स्पष्टम् । (अनुस्वारस्य ययि परे परसवर्णः स्यात् ) शान्तः । वा. पदान्तस्य ना४५६ पदान्तस्याऽनुस्वारस्य ययि परे परसवर्णो वा स्यात् । त्वङ्क- रोषि । त्वं करोषि । मो राजि समः कौ८।३।२५॥ विबन्ते राजतौ परे समो मस्य म एव स्यात् । सन्नाट । हे मपरे वा ८२२६|| मपरे हकारे परे मस्य मो वा स्यात् । किम् ालयति । किं ह्यलयति । श्यवलपरे यवला वा । कि त्यः । किं त्यः। किव हलयति । किं हलयति । किलँ ह्रादयति । किं ह्लादयति । नपरे नः८।३।२७ ।। नपरे हकारे परे मस्य नो वा स्यात् । किन् नुते । किं हुते । आद्यन्तौ दकितौ ११११४६॥ टिकितौ यस्योत्तौ तस्य क्रमादाद्यन्तावयवौ स्तः । पट्त्सन्तः, षट्सन्तः । णोः कुक्टुक् शरि ८।३।२८॥ कारणकारयोः कुक्टु- कावागमौ वा स्तः शरि। *चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् । प्राषष्ठः । प्राङक्षष्ठः । प्रापष्टः । सुगठ्क्षष्ठः । सुगण्टषष्ठः । सुगण्षष्टः । असि घटत्सन्तः ( ई० ४८)-'षड् सन्तः' इति दशायां 'डः सि धुट्' इत्यनेन ('श्राद्यन्तौ दकितौ' इति सूत्रसहकारात् डकारात्परस्य) सस्यादौ धुटि अनुबन्धलोपे 'षध सन्तः' इति स्थिते 'सरि च' इत्यनेन धकारस्य चर्वे कृते पुनरनेन डकारस्य चवें टकारे रूपं सिद्धम् । धुडभावपक्षे डकारस्य चत्वे 'षट्सन्तः' इति च भवति । सुगषष्ठः ( ई० ४० )-'सुगण षष्ठः' इत्यवस्थायां 'णोः कुक्टुक् शरि' इति णकारस्य टुकागमे ('आद्यन्तौ दकिती' इत्यनेन अन्तावयवे जाते अनुबन्ध लोपे 'सुगण्ट षष्ठः' इति स्थिते) 'चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम्" नोट :--पदके मध्यमें स्थित अनुस्वार के बाद जिस वर्गका वर्ण रहता है, अनुस्वारके स्थानमें उसी वर्ग का पञ्चम वर्ण हो जाता है। वा पदा-पदान्त अनुस्वारके स्थानमें विकल्पसे परसवर्ण आदेश हो, यय्के परे । मो राजि-विवन्त राज धातुके परे सम् के मकारके स्थानमें मकार ही आदेश हो- अनुस्वार नहीं हो। हे मपरे-मकारपरक हकारके परे मकारके स्थानमें मकार ही हो, विकल्पसे । यवलपरे-य-व-ल परक हकार के परे मकार के स्थानमें यथाक्रमले अनुना- सिकविशिष्ट य व लँ आदेश हों, विकल्पसे, (पक्षे अनुस्वारः)। नपरे न:-नकारपरक हकारके परे मकार के स्थानमें नकार आदेश हो, विकल्पसे । (पक्षे अनुस्वारः) आद्यन्ती जिसके स्थानमें टित् आगम कहा गया हो वह टित् उसके आद्यावयव (पूर्व) में और कित् अन्त्यावयव (पर) में हो। पोः-कार-णकारको कुक्-टुक्का आगम हो, विकल्पसे, शरके परे। चयो-चय (वर्गके प्रथम अक्षर ) के स्थान में द्वितीय अक्षर हो 'पौष्कर सादि' आचार्यके मतसे- अर्थात् विकल्पसे । ः सि-डकार से पर हल्सन्धिः] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १०. धुट्नाश२६/डात्परस्य सस्य धुड् वा स्यात् । नश्वा३३ना नान्तात्परस्य सल्य धुड् वा स्यात् । सन्त्सः सन्सः। शि तुका३३१शा पदान्तस्य नस्य शे परे तुग् वा स्यात् । सञ्छम्भुः। सञ्च्छम्भुः । सञ्च्शम्भुः। सशम्भुः । डमो ह्रस्वादचि मुण् नित्यम् ३२ह्रस्वात्परो यो उम् तदन्तं यत्पदं तस्मात्परस्थाऽची नित्यं उमुडागमः स्यात् । प्रत्यङात्मा । सुगण्णीशः। सन्नच्युतः । समः सुटि बा३शश समो रुः स्यात् सुटि । अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा सारा अत्र रुप्रकरणे रोः इति वार्तिकेन टकारस्य ठकारे 'सुगणपष्टः' इति । द्वितीयाक्षराभावे 'सुगण्ट्पष्टः' इति, टुकागमाभावे 'सुगषष्ठः' इति च भवति । सञ्च्छम्भुः (ई० ३०, ३९, ४०, ४७, ५०)-'सन् शम्भुः' इत्यव- स्थायां 'शि तुक्' इत्यनेन ('श्राद्यन्तौ टकितौ' इति सूत्रसहकारात् शकारे परे पदान्तस्य नस्याऽन्तावयवे) तुकि अनुबन्धलोपे 'सन् त् शम्भुः' इति दशायां 'शश्छो- ऽटि' इत्यनेन शम्भुघटकस्य शस्य छत्वे 'सन् त् छम्भुः' इति जाते ‘स्तोः श्चुना श्रुः इत्यनेन तकारस्य श्चुत्वेन चकारे 'सन् च् छम्भुः' इति स्थिते पुनः 'स्तोः श्चुना थुः' इति चकारयोगात् नकारस्य श्चुत्वेन अकारे 'झरो झरि सवर्ण' इति चलोपे 'सञ्छम्भुः' इति प्रथमं रूपम् , चलोपाभावपक्षे 'सञ्च्छम्भुः' इति द्वितीयं रूपम् छत्वाऽभावपक्षे 'सञ्चशम्भुः' इति तृतीयं रूपम् , तुगभावपक्षे तु 'सन् शम्भुः' इति स्थिते नस्य श्चुत्वेन प्रकारे 'सञ् शम्भुः' इति चतुर्थं रूपं सिद्धम् । तदुक्तम्- 'अछौ अचछा अचशा अशाविति चतुष्टयम् । रूपाणामिह तुक-छत्वचलोपानां विकल्पनात् ॥' सकारके स्थानमें धुटका आगम हो, विकल्पसे । नव-नान्त पदसे पर सकारको धुट. का आगम ( सकारसे पूर्व) हो, विकल्पसे । शि तुक-पदान्त नकारको शकारके परे तुक का आगम (नकारसे आगे) हो, विकल्पसें । डमो-हस्व जो उम् , तदन्त जो पद, उससे पर जो अच् उसको नित्य ङमुट का आगम (अचके बाद ) हो। नोट:-दीर्घ स्वरके बाद 'महानात्मा' इत्यादि स्थलमें कहीं भी मुटका आगम नहीं होता, पर ह्रस्व स्वरके बाद भी कचित् मुडमाव देखा जाता है (वह गलत है) जैसे- सन् + आदि सनादि, सन् + इष्यते = सनिष्यते इत्यादि । सुप्तिङ्न अन्तम् =सुप्ति- अन्तम् । इको यण+अचि = 'इको यणचि' यहाँ तो आपत्वात् डमुडभाव समझना चाहिये। समः-सम्के मकारके स्थानमें रु आदेश हो सुटके परे। अत्रानु-इस रुप्रकरण । २४ लघुसिद्धान्तकौमुदी पूर्वस्यानुनासिको वा स्यात् । अनुनासिकात्परोऽनुस्वारः ८1३1४ | अनुनासिक विहाय रोः पूर्वस्मात्परोऽनुस्वारागमः स्यात् । खरवसानयोर्विसर्जनीयः ८३॥१५॥ खरि अवसाने च पदान्तस्य रेफस्य विसर्गः स्यात् । सम्पुकानां सो वक्तव्यः । सँस्स्कर्ता । संस्कर्ता । पुमः खय्यम्परेचा३।६। अम्परे खयि पुमो रुः स्यात् । पुँस्कोकिलः । स्कोकिलः । नश्छव्यप्रशान् ८।३।७। अम्परे छवि नान्तस्य संस्स्कर्ता ( ई० ३९, ५४, ५६ )-('सम् कर्ता' इति स्थिते 'सम्परिभ्यां करोती भूषणे' इति सूत्रेण सुटि अनुबन्धलोपे) 'सम् स्कर्ता' इति दशायां 'समः सुटि' इति सूत्रेण (सुट्सम्बन्धिनि सकारे परे) समो मस्य रुत्वे अनुबन्धलोपे 'स- स्कर्ता' इति स्थिते 'अत्राऽनुनासिकः पूर्वस्य तु वा' इति रोः पूर्वमनुनासिके 'सँ- र स्कर्ता' इति दशायां 'खरवसानयोविसर्जनीयः' इत्यनेन रेफस्य विसर्गे कृते 'विस- जनीयस्य सः' इति विसर्जनीयस्य सत्वे प्राप्त तं प्रबाध्य 'वा शरि' इति विसर्जनी- यस्य विसर्जनीये प्राप्ते तमपि प्रबाध्य 'सम्पुकानां सो वक्तव्यः' इति वार्तिकेन विस- र्गस्य सत्वे 'सँस्स्कर्ता' इति । अनुनासिकाऽभावपक्षे तु 'अनुनासिकात्परोऽनुस्वारः' इत्यनेन अनुस्वारे कृते 'संस्कता' इति । पुस्कोकिलः (ई० ३३, ४२, ४७, ५० )-'पुम् कोकिलः' इति दशायां 'पुमः खय्यम्परे' इत्यनेन पुमो मस्य रत्वे अनुबन्धलोरे 'अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु चा' इति सूत्रेण अनुनासिके 'पुर कोकिलः' इति स्थिते 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः' इति .. (ससजुषो रुः से विहित 'रु' को छोड़कर ) 'ह' से पूर्व वर्ण को अनुनासिक आदेश हो, विकल्पसे । अनुना-अनुनासिकको छोड़कर रुसे पूर्व वर्ग के परे अनुस्वारका आगम हो। खर-अवसानमें रेफ हो अथवा पदान्त रेफके बाद खर् (वर्गके प्रथम-द्वितीय अक्षर तथा श ष स का) कोई भी वर्ण हो तो रेफके स्थानमें विसर्ग हो। संपुकानां-सम्-पुम्- कान् , इनके विसर्गके स्थानमें सकार ही हो-ऐसा कहना चाहिये। नोट:-सँस्स्कर्ता-संस्स्कर्ता-कृधातुके पद परमें होनेसे 'सम्' उपसर्गके बाद 'सम्प- रिभ्यां करौती भूपणे' इस सूत्रसे सुट होकर 'सन् स्कर्ता' ऐसा बनता है; तदुपरान्त उस सुटके परे सम्के मकारको रुत्व और सकारको अनुनासिक अथवा अनुस्वार तथा रुत्वके रेफ को विसर्ग होकर सत्व हो जाता है। पुम:-अम्परक खय् परमें होनेसे पुम्के स्थानमें रु आदेश हो। नोट:-संभावना रहने पर कहीं श्रुत्व और कहीं ष्टुत्व भी होता है। यथा--पुम् + चरित्रम् = पुश्चरित्रम् । पुम् + टीका = पुष्टीका । नश्छ-अम्परक छन् परमें होने पर हल्सन्धिः] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। पदस्य रुः स्यात् , न तु प्रशानशब्दस्य । विसर्जनीयस्य सः॥३॥३४॥ खरि विसर्जनीयस्य सः स्यात् । चक्रि स्त्रायस्व । चक्रिनायस्व । अप्रशान् किम् ? प्रशान् तनोति । पदान्तस्येति किम् ? हन्ति । नून् पे ८॥ ३॥ १०॥ नृनित्यस्य रुः स्यादा पकारे परे । कुम्वोः ४क पौ च ८३।३७।। कवर्गे पवर्गे च परे विसर्गस्य क पौ स्तः। चाद्विसर्गः । न पाहि । नः पाहि । नृपाहि । नः पाहि । नृन् पाहि । तस्य परमानेडितम् श२॥ द्विरुक्तस्य परं रूपमामेडितं स्यात् । कानानेडिते रेफस्य विसर्गे 'कुप्चोः क पौ च' इत्यनेन जिह्वामूलीये प्राप्ते तम्प्रबाध्य 'सम्पुकानां सो वक्तव्यः' इति वार्तिकेन विसर्गस्य सत्वे 'पुस्कोकिलः' इति । अनुनासिकाभाव- पक्षे 'अनुनासिकात्परोऽनुस्वारः' इत्यनुस्वारे कृते 'पुरकोकिलः' इति । चक्रिस्खायस्व ( ई० २४, २९, ३० )-'चनिन् त्रायस्व' इत्यवस्थायां 'नश्छव्यप्रशान्' इति सूत्रेण नस्य रुत्वे अनुबन्धलोपे 'अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा' इत्यनेन अनुनासिके 'चकिर त्रायल्व' इति जाते 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः' इत्यनेन रेफस्य विसर्गे 'विसर्जनीयस्य सः' इत्यनेन विसर्गस्य सत्वे 'चस्त्रिायस्व' इति । अनुनासिकाऽभावपक्षे 'अनुनासिकात्परोऽनुस्वारः' इत्यनुस्वारे 'चर्किस्त्रायस्व' इति। नुन् पाहि ( ई० २०, २९, ४८)-'नृन् पाहि' इत्यवस्थायां 'नन् पें' इति नृनो नस्य रुत्वे अनुबन्धलोपे 'अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा' इति अनुनासिके 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः' इति रेफस्य विसर्ग कृते विसर्जनीयस्य सः' इत्यनेन . विसर्गस्य सत्वे प्राप्ते तम्प्रबाध्य 'कुप्वोः क पौ च' इत्युपध्मानीये कृते 'नृपाहि' इति । अनुनासिकाभावपक्षे 'अनुनासिकात्परोऽनुस्वारः' इत्यनेन अनुस्वारे 'न पाहि' इति, उपाध्मानीयाभावपक्षे रुत्वानुनासिकविसर्गेषु कृतेषु 'न: पाहि' इति, अनुनासिकाभावपक्षे अनुस्वारे कृते 'नृ पाहि' इति, रुत्वाभावपक्षे तु 'नून् पाहि' इति पञ्च रूपाणि भवन्ति ।। प्रशान् भिन्न नान्त पदके स्थानमें रु आदेश हो । विसर्ज-खर् परमें होने पर विसर्गके स्थानमें स् आदेश हो । नन्पे-नृन्के नकारके स्थानमें रु हो पकारके परे, विकल्पसे । कुप्वोः--कवर्ग-पवर्गके परे विसर्गके स्थानमें क्रमसे जिह्वामूलीय, उपध्मानीय अथवा चका- रात् विसर्ग ही हो। (कवर्ग परका उदाहरण ककरोति, कः करोति)। तस्य-जो दो -बार कहा गया हो उसके द्वितीय भागोक्तको आनंडित संज्ञा हो । काना-कानूके नकारके स्थानमें रु आदेश हो, आम्रोडितसंज्ञकके परे ।
लघुसिद्धान्तकौमुदी मा३१२॥ कानकारस्य रुः स्यादानेडिते परे । काँस्कान् । कांस्कान् । के च ६॥ २७३।। हस्वस्य छे परे तुगागमः स्यात् । शिवच्छाया। पदान्ताद्वा६शक्षा दीर्धात्पदान्ताच्छे परे तुग वा स्यात् । लक्ष्मीच्छाया। लक्ष्मीछाया। * इति हल्सन्धिप्रकरणम् * MODIGXSTOR कांस्कान् ( ई० २२, ४५)-'कान् कान्' इति दशायां 'तस्य परमानेडितम्' इत्यनेन परस्य 'कान्' इत्यस्यानेडितसंज्ञायां 'कानानेडिते' इत्यनेन आमेडितसंज्ञके परे पूर्वस्य 'कान्' इत्यस्य नकारस्य रुत्वे अनुबन्धलोपे 'अत्राऽनुनासिकः पूर्वस्य तु वा' इत्यनेन अनुनासिके 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः' इत्यनेन रेफस्य विसर्गे 'सम्मु- सानां सो वक्तव्यः' इत्यनेन विसर्गस्य सत्वे 'काँस्कान्' इति । अनुनासिकाभावपक्षे तु 'अनुनासिकात्परोऽनुस्वारः' इत्यनुस्वारे 'कांस्कान्' इति । शिवच्छाया ( ई० २५,५१,५२,५७ )-'शिव छाया' इति दशायां 'छे च' इति वकारोत्तरवर्त्यकारस्य तुकि अनुबन्धलोपे 'शिव त् छाया' इति जाते 'झलां जशोन्ते' इति तस्य जश्त्वेन दकारे 'स्तोः श्चुना श्चुः' इत्यनेन दस्य श्चुत्वेन जकारे 'खरि च' इति जस्य चर्खे 'शिवच्छाया' इति । इति 'इन्दुमती'टीकायां हल्सन्धिप्रकरणम् । छे च-हस्व वर्णको तुगागम ( हस्व वर्णके बाद ) हो छकारके परे । नोट:-तुक होनेपर तकारको जश्त्व दकार और दकारको श्चुत्व जकार होनेपर चर्व चकार हो जाता है। पदान्ताद्वा-पदान्त दीर्घको तुगागम हो, छकारके परे, विकल्पसे । सन्धि करो:-तपस्+चिनोति । त्रयस्+ षट्पदाः । षट् + दर्शनम् । सम्पत् + हर्षः । उद्+ स्थापयति । एतद् + लीला। अ+ नामकः । दिव्यम् + सरः। नृन् + हितम् । कथं + कृतम् । इदं+चित्रम् । केशान् + छिनत्ति । धनवान् + स्वपिति । अप्रशावान् + शत्रुः । नृन्+ पालय । सम्+स्वीकृतम् । पुम्+छविः। हसन्+आगतः। त्वत्-+श्वशुरः। आ+छाद्यम् । विच्छेद करो:-पयरशीतम् । महाण्डामरः। अब्माजनम् । तद्धेयम् । उत्तम्भते । ग्रन्थाल लाति । ध्वंस्यते । क्षन्तव्यम् । मधुरगायति । भास्वश्चिन्द्रः। विद्वान्सहते। शिशून्छा- ययति । नः प्रतिकरोति । (श्चमत्कारः । एकस्मिन्नहनि । यावच्छक्यम् । वृक्षच्छाया। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें हल्सन्धिप्रकरण समाप्त हुआ। 'oom अथ विसर्गसन्धिप्रकरणम् । विसर्जनीयस्य सः२३|| खरि विसर्जनीयस्य सः स्यात् । विष्णुस्त्राता। वा शरि८/३/३६|| शरि विसर्गस्य विसर्गो वा स्यात् । हरिः शेते । हरिश्शेते। ससजुषो रुः८/२॥६६॥ पदान्तस्य सस्य, सजुष्शब्दस्य च रुः स्यात् । अतो रोरप्लुतादप्लुते ६।१।११३।। अप्लुतादतः परस्य रोहः स्यादप्लुतेऽति । शिवोऽ- Wः । हशि च ॥१११४॥ अप्लुतादतः परस्य रोरुः स्याद्धशि । शिवो वन्द्यः । । शिवोऽय॑ः ( ई० ३७, ४८, ५०, ५५)-'शिवस् अर्व्यः' इत्यवस्थायां 'ससजुषो रुः' इति रुत्वे 'अतो रोरप्लुतादप्लुते' इति रोरुत्वे 'शिव उ अर्च्य' इति जाते 'आद्गुणः' इति गुणे 'एङः पदान्तादति' इति पूर्वरूपे शिवोऽर्यः' इति । News Pune विसर्जनी-विसर्गके स्थान में सकार आदेश हो, खके परे । नोट:-विसर्ग दो प्रकार का होता है-सजात और रजात । (क) शब्द, विभक्ति ( सुप्-तिङ्) अथवा प्रत्यय सम्बन्धी सकारके स्थानमें रेफ होकर जो विसर्ग होता है उसे 'सजात' विसर्ग कहते हैं। यथा-(१) शब्द-निस्=निः । दुस् : दुः। शनैस् = शनैः। उच्चैस्= उच्चैः । नौचैस् = नीचैः। (२) विभक्ति-रामस् = रामः । इविस्म्हविः। पठावस-पठावः । (३) प्रत्यय-एकशस्-एकशः । बहुशत-बहुशः । (कहीं मूर्धन्य धकारके स्थानमें भी रेफ होकर विसर्ग होता है। यथा-सजुषसजूः)। (ख) स्वाभाविक अथवा ऋकार स्थानिक रेफके स्थानमें जो विसर्ग होता है। उसे रजात विसर्ग कहते हैं । यथा-(१) स्वाभाविक-स्वर स्वः । अन्तर् =अन्तः। प्रातर् प्रातः । पुनर् = पुनः। निर्-निः । दुर्-दुः। गिरगी। पूर् = पूः। धूर् = धूः । (२) ऋकारस्थानिक-मातर मातः । पितर्-पितः । भ्रातर-भ्रातः । दुहितर दुहितः । जामातर् =जामातः । ज्ञातर =ज्ञातः। (कहीं नकारके स्थानमें भी रेफ होकर विसर्ग होता है। यथा-अहन् = अहः)। वा शरि-शर' के परे विसर्गके स्थानमें विसर्ग आदेश हो, विकल्पसे । ससजुषो- पदान्त सकार और सजुष् शब्दके धकारके स्थानमें 'रु' आदेश हो। अतो-अप्लुत 'अत्? से पर रुसम्बन्धी रेफके स्थानमें 'उत्व हो, अप्लुत अक्के परे। नोट:-रुत्व-उत्त्व होनेपर पूर्व अकार और उकार मिलके गुण 'ओ' हो जाता है और तदनन्तर एडः पदान्तादति' से पर अकारका पूर्वरूप हो जाता है। हशि च-अप्लुत 'अत् से पर रसम्बन्धी रेफके स्थानमें 'उत्त्व हो, हश् ( वर्गका तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम वर्ण और “य व र ल') परमें रहने से। m- लघुसिद्धान्तकौमुदी भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि मा३।१७।। एतत्पूर्वस्य रोर्यादेशः स्यादशि । देवा इह । देवायिह । भोस् भगोस् अघोस् इति सान्ता निपाताः। तेषां रोर्यत्वे कृते- हलि सर्वेषाम् । ३।२२।। भो-भगो-अधो-अपूर्वस्य यस्य लोपः स्यालि। भो देवाः । भगो नमस्ते । अघो याहि । रोऽसुपि ८।२। ६६ ।। अह्नो रेफादेशः स्यान तु सुपि । अहरहः । श्रहर्गणः । रोरि८३१४।। रेफस्य रेफे परे लोपः स्यात् । द्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः ६।३।११।। ढरेफयोर्लोपनिमित्तयोः पूर्वस्याऽणो दीर्घः स्यात् । पुना रमते। हरी रम्यः। शम्भू राजते। अणः किम् ? तृढः । बृढः । देवा इह (ई० ३३,३४,३८,४५,५६)-'देवास् इह' इति दशायां 'ससजुषो कः' इति सस्य रुत्वे 'भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि' इत्यनेन रोर्यादेशे 'लोपः शाकल्यस्य' इति यलोपे 'देवा इह' इति, यलोपाऽभावपक्षे 'देवायिह' इति । भो देवाः (ई० ३१,४३,४६ )-'भोस् देवाः' इति दशायां 'ससजुषो रु' इति सस्य रुत्वे 'भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि' इति रोर्यादेशे 'हलि सर्वेषाम्' इति बलोपे 'भो देवाः' इति । एवमेव-अघो याहि (ई० ५१,५२) इति । शम्भू राजते (ई० ३६,३८,५४,५६)-'शम्भुस् राजते' इति स्थिते 'सस- जुषो रुः' इति रुत्वे रो रि' इति रलोपे 'ठूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः' इति दीर्धे 'शम्भू राजते' इति । एवं 'हरी राजते (ई० ४६ ) इत्यपि । तृढः (ई० २४, ४२)-'ड्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः' इति सूत्रे अण्ग्रहणाऽभावे ( 'ढरेफयोर्लोपनिमित्तयोः पूर्वस्य दीर्घः' इत्यर्थे तृधातोनिष्ठायां तप्रत्यये अनुबन्धलोपे) 'तृह त' इति स्थिते हो ढः' इत्यनेन हस्य ढत्वे "भषस्तथो|ऽध:' इत्यनेन तकारस्य धत्वे 'टुना टुः' इति धस्य ष्टुत्वेन ढकारे 'तृड् ढ' इति स्थिते 'ढो हे लोपः' इत्यनेन पूर्वस्य ढस्य लोपे 'हलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः' इति ढलोपनिमित्ते ढकारे परे पूर्वस्य ऋकारस्य दीर्घापत्तिः स्यात् । तस्मात् सूत्रेऽण्ग्रहणमावश्यकम् । भोभगो-भो, भगो, अघो और अवर्णपूर्वक रुसम्बन्धी रेफके स्थानमें यत्व हो, अशके परे । हलि-भो, भगो, अघो और अवर्णपूर्वक यकारका लोग हो, हल्के परे-सभीके मतसे अर्थात् नित्य ही। नोट:-'ह' के परे अवर्णपूर्वक यकारका लोप होने पर पुनः दूसरी सन्धि नहीं होती। रोऽसुपि-अहन् शब्दके नकारके स्थानमें रेफ आदेश हो, किन्तु सुप् (सप्तमीबहु- बचन ) के परे नहीं हो। रो रि-रेफका लोप हो रेफके परे। लोपे-ढकारलोप और ७ विसर्गसन्धिः] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। मनस् रथ इत्यत्र रुत्वे कृते हशि चेत्युत्त्वे रो रीति लोपे च प्राप्ते । विप्रतिषेधे पर कार्यम् श४।२। तुल्यबलविरोधे परं कार्य स्यात् । इति लोपे प्राप्ते । पूर्वत्राऽसिद्ध- मिति रो रीत्यस्याऽसिद्धत्वादुत्त्वमेव । मनोरथः। एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनस- मासे हलि ६।१११३२] अककारयोरेतत्तदोर्यः सुस्तस्य लोपः स्याद्धलि न तु नस- मासे । एष विष्णुः । स शम्भुः । अकोः किम् ? एषको रुद्रः । अनसमासे किम् ? असः शिवः । हलि किम् ? एषोऽत्र । सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम् ६१११३४! स इत्यस्य सोर्लोपः स्यादचि पादश्चेल्लोपे सत्येव पूर्येत। सेमामविढि प्रभृतिम् । सैष दाशरथी रामः । इति विसर्गसन्धिः । कृते त्वगग्रहण तत्सामर्थ्यात् पूर्वणकारेणैवाऽणप्रत्याहारग्रहणाद् दीर्घाप्रवृत्त्या कृद- न्तत्वात् सौ सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'तृढः' इति निष्पन्नम् । मनोरथः (ई० ३२, ३९, ४१, ४३, ४७, ४९, ५१, ५२, ५५)-'मनस्य रथः' इत्यवस्थायां ससजुषो रु' इति सस्य रुत्वे 'हशि च' इत्यनेन रोरुत्त्वे प्राप्त रो रि' इत्यनेन रेफस्य लोपे च प्राप्त विप्रतिषेधे परं कार्यम्' इत्यनेन तुल्यबलविरोधे सति परत्वात् 'रो रि' इति लोपे प्राप्ते 'पूर्वत्राऽसिद्धम्' इत्यधिकार- सूत्रेण सपादसताध्यायीस्थ 'हशि चेति सूत्रदृष्टया त्रैपादिकस्य रो रीति सूत्रस्याऽ- सिद्धत्वात् 'हशि चेत्यनेन रोसत्त्वे 'आद्गुणः' इत्यनेन गुणे 'मनोरथः' इति । स शम्भुः (ई० ३१, ४६, ५० )-'सस् शम्भुः' इति स्थित्वे रुत्वं प्रवाध्या 'एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनसमासे हलि' इति सूत्रेण सुलोपे 'स शम्भुः' इति । इति 'इन्दुमती' टीकायां विसर्गसन्धिप्रकरणम् । रेफलोपनिमित्तक जो ढकार, रेफ उनके परे पूर्व अणको दीर्घ हो। विप्रतिषेध-विप्रति- घेध (तुल्यबलविरोध) होनेपर परकार्य हो। नोट :-'परस्परलब्धावकाशयोरेकन लक्ष्ये समावेशस्तुल्यबलविरोधः।' अर्थात् अपने-अपने लक्ष्यों में चरितार्थ दो सूत्रों का ( क्वचित् ) एक लक्ष्य में समावेश होनेको 'तुल्य- बलविरोध' कहते हैं। एतत्तदो:-ककाररहित एतत् और तत् शब्दसम्बन्धी 'भु' का लोप हो, हलके परे । किन्तु 'न' समास में नहीं हो । सोऽचि-लोप होनेसे यदि पादकी पूर्ति होती हो तो अचके परे स ( तत् शब्द ) सम्बन्धी सुका लोप हो। सैष दाशरथी रामः ( ई० ५४)-सम्पूर्ण श्लोक इस प्रकार है: 'खैष दाशरथी रामः, सैष राजा युधिष्ठिरः। सैष कर्णो महास्यागी, सैष भीमो महाबलःu" ७ Haidhane अथ अजन्तपुल्लिङ्गप्रकरणम् । अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् १।२।४५ धातुं प्रत्ययं प्रत्ययान्तं च . वर्जयित्वाऽर्थवच्छब्दस्वरूपं प्रातिपदिकसंझं स्यात् । कृत्तद्धितसमासाश्च शरा४६॥ कृत्तद्धितान्तौ समासाश्च प्रातिपदिकसंज्ञाः स्युः। स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ले. अर्थवदिति-पत्र नवीनाः-'एतत्संज्ञाफलभूतविभक्तीतरसमभिव्याहारानपे- क्षया लोकेऽर्थविषयकबोधजनकत्वम्' अर्थवत्त्वमिति । प्राचीनास्तु 'लोकेऽर्थविषयक- बोधजनकत्वम्' अर्थवत्त्वमिति । कृत्तद्धितसूत्रे तु 'एकार्थीभावेन लौकिकप्रयोगे प्रसिद्धत्वमर्थवत्त्वमिति द्विविधमर्थवत्त्वं स्वीकुर्वन्तीति । धनम् , वनम् , इत्यादौ प्रतिवर्ण प्रातिपदिकसंज्ञावारणाय अर्थवदिति । 'अहन्' इत्यादौ प्रातिपदिकत्वेन नलो- पवारणाय अधातुरिति । 'अप्रत्यय' इत्यत्र प्रत्ययपदमावय॑ते तेन प्रत्ययं प्रत्ययान्तं च लभ्यते । प्रत्ययस्य पर्युदासात् 'हरिषु' इत्यादौ सोर्न प्रातिपदिकत्वम् । तदन्त- यह श्लोक 'अनुष्टुप् छन्दमें है। इसके प्रतिपादमें आठ-आठ अक्षर होते हैं । यहाँ पर यदि सुलोप नहीं होता तो 'सस्+एष' ऐसी स्थितिमें रुत्व-यव-यलोप होकर स एषः' ऐसा हो जाता और प्रत्येक पादमें एक अक्षर बढ़ जानेसे पादकी पूर्ति नहीं होती। (सुलोप होनेपर 'पूर्वत्राऽसिद्धम्' लगता नहीं, अतः वृद्धि होकर 'सैषः' बनता है)। शुद्ध करो:-जलामयः। केशवोर्ध्वम् । तदैवम् । स्वेरः। दिवोकसः । उपेति । प्रेषयति । रामैहि । उपरोक्तः। गवोद्यानम् । सखैहागच्छ । कव्यागच्छतः। अम्बततः । रामशेते। तत्छविः । अधिस्थाता । देवो षष्ठः। दिगेशः । ददत्यसति । महानात्मा। विषयान्नाह । जगत्नायकः। संचितः । यम्लोकम् । गच्छंचकोरः । मतिमाच्छन्तः। पुनित्रम् । वाच्छूरः। वाकमात्रेण । वृक्षछाया । रामोक्रुध्यति । मनोकामना। अहोगतः। सो रामः । एषो बालः । वालो चलति । प्रातो गमनम् । अझो इन्द्रः । एषो विष्णुः । इतो शत्रुः । मनो · सुखम् । देवाः हसन्ति । अन्तर्राष्ट्रियः । भ्राता रमय । इस प्रकार इन्दुमती टीका विसर्गसन्धि प्रकरण समाठ हुआ। -- - अर्थ-धातु प्रत्यय और प्रत्ययान्त भिन्न अर्थवान् शब्दस्वरूप प्रातिपदिक संशक हो । कृत्तद्धित-कृदन्त, तद्धितान्त और समासकी भी प्रातिपदिक संज्ञा हो। स्वौजस्-(इस सूत्रका अर्थ 'छ्याप्' सूत्रके साथ आगे देखें) अजन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। भ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङयोस्सुप् ४। ११ २।। ङ्यन्तादाबन्ताप्राति- पदिकाच्च परे स्वादयः प्रत्ययाः स्युः। सु औ जस् इति प्रथमा । श्रम् औट् शस् इति द्वितीया | टा भ्याम् भिस् इति तृतीया | डे भ्याम् भ्यस् इति चतुर्थी | उसि भ्याम् भ्यस् इति पञ्चमी। ङस् ओस् अाम् इति षष्ठी। कि ओस् सुप् इति सप्तमी । जया प्रातिपदिकात् ४॥ १११॥ प्रत्ययः ३॥ ११ ॥ परश्च ३।१।२।।-इत्यधिकृत्य । ङ्यन्तादाबन्तात्प्रातिपदिकाच परे स्वादयः प्रत्ययाः स्युः। सुपः ॥ ४॥ १०३।। सुपस्त्रीणि त्रीणि वचनान्येकश एकवचन-द्विवचन- बहुवचनसंज्ञानि स्युः । दूधेकयोर्द्विवचनैकवचने १।४।२२।। द्वित्वैकत्वयोरेते स्तः । विरामोऽवसानम् श४।११०॥ वर्णानामभावोऽवसानसंज्ञः स्यात् । रुत्व- विसौं । रामः । सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ श२।६४॥ एकविभक्तौ यानि पर्युदासादत्रैव हरिषु'इति समुदायस्य च न प्रातिपदिकत्वम् । नच 'अहन्' इत्यत्र प्रत्यय- लक्षणेन प्रत्ययान्तत्वादोषवारणसम्भवेन प्रकृतसूत्रेऽधातुरिति किमर्थमिति वाच्यम् ? नोट:-विभक्तिश्च' से सुप्-तिङ्की विभक्ति संज्ञा होती है। 'सुप्से प्रत्याहार लिया जायगा और वह प्रत्याहार इसी सूत्रके आदि वर्ण-'सुसे लेकर अन्तिम 'सुप'के 'प' तकसे बनता है। 'सुय्से सु, औ, जस् आदि इकोस (२१) विभक्तियाँ ली जाती हैं। सुमें उकारका 'उपदेशेऽजनुनासिक इत्' से, जस्में जकार और टामें टकारका 'चुटूते, औट में टकार और सुप्में पकारका हलन्त्यम्' से 'शस् में शकार तथा डे, असि, उत् और डिमें उकारका लशकतद्धिते'से इत्संज्ञा होकर 'तस्य लोपः' से लोप (श्रवणामाव) हो जाता है। याद रहे कि विभक्तियोंके अन्तिम सकार-मकारकी इत्संज्ञा इसलिये नहीं होती कि 'न विभक्तौ तुस्मा: ( आगे पृ० ३२ देखें)निषेध कर देगा। याप-प्रत्ययः-परश्च-ये तीनों सूत्र अधिकारसूत्र हैं । इन तीनोंका 'स्वौजस्’ सूत्र में अधिकार होकर ड्यन्त-आबन्त-प्रातिपदिकसे पर स्वादि प्रत्यय हो, ऐसा अर्थ होता है। नोट :-अधिकारसूत्रका लक्षण-'स्वदेशे वाक्यार्थशून्यत्वे सति परदेशे वाक्यार्थ- धोधजनकत्वम्' अर्थात् अपनी जगह पर स्वार्थबोध नहीं होकर अन्य सूत्रों के साथ अर्थबोध होना। सुपः-सुप् के जो तीन-तीन वचन वे प्रत्येक क्रमशः एकवचन-द्विवचन बहुवचन संशक हों। दयेकयो:-द्वित्वकी विवक्षामें द्विवचन और एकत्वको विवक्षामें एकवचन हो । विरामो-वर्णों का अभाव अवसानसंज्ञक हो। नोट:-जिस वर्णके आगे कोई दूसरा वर्ण नहीं हो वह अवसान वर्ण कहलाता है। सरूपाणाम्-एक (समान) विमतिमें जहाँ समान ही रूप देखे गये हों वहाँ , । । लघुसिद्धान्तकौमुदी सरूपाण्येव दृष्टानि तेषामेक एव शिष्यते । प्रथमयोः पूर्वसवर्णः ६।१ । १०२।। अकः प्रथमाद्वितीययोरचि पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेशः स्यात् । नादिचि श१०४।। आदिचि परे न पूर्वसवर्णदीर्घः । वृद्धिरेचि । रामौ। बहुषु बहुवचनम् १।४।२१।। बहुत्वविवक्षायां बहुवचनं स्यात् । चुटू १ ॥३॥ ७॥ प्रत्ययाचौ चुटू इतौ स्तः। विभक्तिश्च १।४।१०४॥ सुप्तिको विभक्तिसञौ स्तः। न विभक्ती तुस्माः१।३।४॥ विभक्तिस्थास्तवर्गसकारमकारा इतो न स्युः । इति नेत्त्वम् । रामाः। एकवचनं सम्बुद्धिः २।३।४।। सम्बोधने प्रथमाया एकवचनं सम्बुद्धि- सझं स्यात् । यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम् ११४|१३॥ यः प्रत्ययो यस्मात् क्रियते तदादिशब्दस्वरूपं तस्मिन् परेऽङ्गसझं स्यात् । एह्रस्वात्स- म्बुद्धेः ६ाश६।। एङन्ताद्व्स्वान्ताच्चाऽज्ञावल्लुप्यते सम्बुद्धश्चेत् । हे राम । हे रामौ । हे रामाः। अमि पूर्वः ६।१।१०७॥ अकोऽम्यचि पूर्वरूपमेनादेशः स्यात् । 'नङिसम्बुद्धयोः' इत्यत्र सम्बुद्धिग्रहणेन प्रत्ययलक्षणेन प्रत्ययान्तपर्युदासाभावज्ञापनात्। उनमेंसे एक ही शेष हो (बचे) और अन्यका लोप हो जाय । नोट:-इस सूत्रसे यह नियम सिद्ध होता है कि दो या बहुत अर्थ-बोध कराने में भी शब्दका एक ही बार उच्चारण होना चाहिये। 'एक' शब्दके आठ अर्थ होते हैं। कहा भी है: एकोऽन्यार्थे प्रधाने च प्रथमे केवले तथा । साधारणे समानेऽल्पे संख्यावाञ्च प्रयुज्यते।। प्रथमयो:--'असे प्रथमा और द्वितीया सम्बन्धी अच् परमें हो तो पूर्व-पर के स्थान में पूर्वसवर्णदीर्ष एकादेश हो। नादिचि-अवर्णते पर 'इच्' हो तो पूर्वसवर्णदीर्घ नहीं हो। बहुषु-बहुत्वकी विवक्षामें बहुवचन हो । चुटू-प्रत्ययके आदि चवर्ग और टवर्गकी इत्संज्ञा हो । विभकिश्व-सुप्-तिङ्की विभक्ति संज्ञा हो । नोट:-'सुप् से सुप् प्रत्याहार लिया जाता है। (दे० पृ० ३१) । तिङ् से-'तिम् तस् झि सिप् थस् थ मिप वस् मत् त आताम झ थास् आथाम् ध्वम् इड् वहि महिं' ये अठारह लिये जाते हैं ( भ्वादिप्रकरण देखें)। नविभक्ती-विभक्तिमें स्थित तवर्ग, सकार और मकारकी इरसंशा नहीं हो। एकवचन-सम्बोधनमें प्रथमाका एकवचन (सु) की सम्बुद्धि संज्ञा हो । यस्मात्-जो प्रत्यय जिस (शब्द) से विधान किया जाय तदादि (वह है आदिमें जिस समुदायके वह) शब्दस्वरूप उस प्रत्ययके परे अंगसंशक हो। एह-एङन्त और ह्रस्वान्त अगसे पर सम्बुध्यवयव हल्का लोप हो । अमि-अक्ते अम् सम्बन्धी अच् परमें रहने से पूर्व-परके स्थानमें पूर्वरूप एकादेश हो। - । अकु-अद-कवर्ग-पवर्ग-आङ- नुम् (और तुम्स्थानिक अनुस्वार)-इनसे व्यस्त (पृथक ऋकार, यकार अजन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। ३३ रामम् । रामौ । लशकतद्धिते १।३।८। तद्धितवर्जप्रत्ययाद्या लशकवर्गा इतः स्युः । तस्माच्छतो नः पुंसि ६।११०३। पूर्वसवर्णदीर्घात्परो यः शसः सस्तस्य नः स्यात्पुंसि । अकुप्यान्व्यवायेऽपि ८ ! ४१२ । अट् कवर्गः पवर्ग प्राङ् नुम्-एतैर्व्यस्तैथासम्भवं मिलितैश्च व्यवधानेऽपि रषाभ्यां परस्य नल्य णः स्यात्समानपदे । इति प्राप्ते । पदान्तस्य८।४।३७ / पदान्तस्य नस्य णत्वं न स्यात् । रामान् । टासिङसामिनात्स्याः ७१।१२। अदन्ताहादीनामिनादयः स्युः । गत्वम् । रामेण । सुपि च ७ ॥३॥ १०२ । यादौ सुप्यतोऽङ्गस्य दीर्घः स्यात् । रामाभ्याम् । अतो भिस ऐस् ७११ । ६ | अकारान्तादङ्गाद्भिस ऐस् स्यात् । अनेकाशित्सर्वस्य ! रामैः । यः ७ १ १ । १३ । अतोऽङ्गात्परस्य उादेशः स्यात् । स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ शश५६। श्रादेशः स्थानिवत्स्यान्न रामान् ( ई० ५०, ५२, ५७ )-रामशव्दाद् शसि 'लशक्वतद्धिते' इति शस्येत्संज्ञायां लोपे च कृते 'राम अस्' इति स्थिते 'प्रथमयोः पूर्वसवर्णः' इत्यनेन पूर्वसवर्णदीर्घ 'तस्माच्छसो नः पुंसि' इति सस्य नत्वे कृते 'अटकुप्वानुम्व्यवायेऽपि' इति गत्वे प्राप्ते 'पदान्तस्य' इति तनिषेधे शमान्' इति रूपं सिद्धम् । लश--तद्धितको छोड़कर प्रत्यय के आदि लकार, शकार और कवर्गकी इत्संज्ञा हो। तस्मा-पूर्वसवर्णदीर्घसे पर शस् सम्बन्धी सकार के स्थानमें नकार आदेश हो, पुंल्लिङ्गमें। पृथक ) व्यवधान रहनेपर अथवा यथासंभव मिलित (एकसे अधिक या सबसे भी) व्यवधान रहनेपर रेफ-पकारसे पर नकारको णत्व हो, समान ( एक) पदमें। पदान्त-पदान्त नकारको णकार नहीं हो। नोट:-णत्वविधायक और तन्निषेधक अनेक सूत्र हैं । पर उन सबोंके निष्कर्ष 'चुडतु- लशव्यवाये न यह भाष्यवार्तिक स्मरण रखने योग्य है ल तथा शर् ( श ष स ) वर्णते भिन्न एक, दो या अनेक वर्गों का व्यवधान रहने पर भी पदान्त भिन्न नकारके स्थान में णत्व हो। इतना याद रहनेपर 'वार्तिकेन' आदिमें णत्व- प्राप्तिकी शंका ही नहीं उठती। दाङसि-अदन्त अङ्गसे पर टा-उसि-उसके स्थानमें क्रमसे इन्-आव-स्य आदेश हो सुपि-यादि सुप्के परे अदन्त अङ्गको दीर्घ हो । अतो-अदन्त अगसे पर मिस्के स्थानमें ऐस् आदेश हो। डेयः-अदन्त अङ्गसे पर डेके स्थानमें “थ आदेश हो। स्थानि-आदेश स्थानिवत् (स्थानिधर्मवत्) हो, परन्तु स्थानिरूप जो अल् तदाश्रय ३ल० - " लघुसिद्धान्तकौमुदी तु स्थान्यलाश्रयविधौ । इति स्थानिवत्त्वात् सुपि चेति दीर्घः । रामाय । रामाभ्याम् । बहुवचने झल्येत् ७११०३। भलादौ बहुवचने सुप्यतोऽस्यै- कारः स्यात् । रामेभ्यः। सुपि किम् ? पचध्वम् । वाऽवसाने ८।४।५६। अवसाने मलां चरो वा स्युः। रामात् । रामाद् । रामाभ्याम् । रामेभ्यः। रामस्य । ओसि च ७।३।१०४ | श्रोसि परेऽतोऽङ्गस्यैकारः स्यात् । रामयोः। हस्वनद्यापो नुट ११५४ । ह्रस्वान्तान्नद्यन्तादाबन्ताच्चाङ्गात्परस्यामो नुडागमः स्यात् । नामि ६४.३ नामि परेऽजन्ताङ्गस्य दीर्घः स्यात् । रामाणाम् । रामे। रामयोः । सुपि एत्वे कृते । आदेशप्रत्यययोः ८।३१५६ ! इण्कवर्गाभ्यां परस्याऽपदान्तस्याऽऽदेशः प्रत्ययावयवश्च यः सकारस्तस्य मूर्धन्यादेशः स्यात् । ईषद्विवृतस्य सस्य तादृश एव षः । रामेषु । एवं कृष्णादयोऽप्यदन्ताः । सर्वादीनि सर्वनामानि १११।२७ । सर्वादीनि शब्दस्वरूपाणि सर्वनामसंज्ञानि स्युः। सर्व विश्व उभ उभय इतर डतम अन्य अन्यतर इतर त्वत् त्व नेम सम सिम । रामाय (ई० ४६,५१,५४ )-रामशब्दात् विभक्तो यः' इति देशे ('स्थानिवदादेशोऽनविधौ' इति स्थानिवद्भावेन सुप्त्वमादाय) सुपि च' इत्यनेन मकारोत्तरवर्तिनोऽकारस्य दीर्घ 'रामाय' इति सिद्धम् । रामाणाम् ( ई० ४७, ४९, ५३, ५४ )-रामशब्दात् श्रामि विभक्तो 'हस्वनद्यापो नुट्' इत्यनेन नुटि उकारटकारयोरित्संज्ञायां लोपे च विहिते राम नाम् इति जाते 'नामि' इति सूत्रेण दीर्घे 'अट्कुप्वानुम्व्यवायेऽपि' इति नस्य णत्वे 'रामाणाम्' इति सिद्धम् । विधि कर्तब्य में नहीं हो, (अर्थात् अलाश्रय विधि कर्तव्यमें स्थानिवद्भाव नहीं हो)। बहु-झलादि बडुवचन सुप्के परे अदन्त अङ्गके स्थानमें एत्व हो। वाऽव-अवसानमें विद्यमान झल्के स्थानमें चर् आदेश हो, विकल्पसे। ओसि-अदन्त अङ्गको एत्व हो, ओस्के परे । हस्व-हस्वान्त, नधन्त और आवन्त असे पर जो आम उसको नुटका आगम हो । नामि-अजन्त अङ्गको दीर्घ हो, नानके परे । आदेश-इण और कवर्गसे पर जो अपदान्त आदेशस्वरूप सकार और प्रत्ययावयव सकार उसके स्थान में मूर्धन्य (पकार) आदेश हो । सर्वा-सर्वादि गणपठित शब्द सर्वनामसंज्ञक हों। नोट:-सर्वादयश्च पञ्चत्रिंशत् (३५)-सर्व, विश्व, उभ, उभय, इतर. (प्रत्ययान्त, डतम (प्रत्ययान्त ) अन्य, अन्यतर, इतर, त्वत् , त्व, नेम (आधा), सम ( सभी), सिम (सभी), पूर्व, पर, अवर (पश्चिम), दक्षिण, उत्तर, अपर ( पश्चिम, आगे ), अधर, , अजन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। पूर्वपराऽवरदक्षिणोत्तराऽपराऽधराणि व्यवस्थायामसज्ञायाम् ! स्वमज्ञा- तिधनाख्यायाम् ! अन्तर बहिर्योगोपसंव्यानयोः । त्यद् तद् यद् एतद् इदम् अदस् एक द्वि युष्मद् अस्मद् भवतु किम् । जसः शी ७२ १७ । अदन्तात्स- नाम्नो जसः शी स्यात् । अनेकालत्वात्सर्वादेशः। सर्वे । सर्वनाम्नः स्मै ७१।१४ | अतः सर्वनाम्नी के इत्यस्य स्मै स्यात् । सर्वस्मै । अलिङयोः स्मास्मिनौ ७१११५ अतः सर्वनाम्न एतयोरेतौ स्तः । सर्वस्मात् । आमि सर्वनाम्नः सुट छ ११ ५२ / अवर्णान्तात्परस्यासर्वनाम्नो विहितस्याऽऽमः सुडा- गमः स्यात् । एत्वषत्वे । सर्वेषाम् । सर्वस्मिन् । शेषं रामवत् । एवं विश्वादयो- ऽप्यदन्ताः । उभशब्दो नित्यं द्विवचनान्तः। उभौ । उभाभ्याम् ३। उभयोः २। तस्येह पाठोऽकजर्थः । उभयशब्दस्य द्विवचनं नास्ति । उभयः । उभये । उभयम् । उभयान् । उभयेन । उभयैः। उभयस्मै । उभयेभ्यः । उभयस्मात् । MEDIAS सर्वेषाम् (ई० ४८,५०,५२,५४,५६)-सर्वशब्दात् श्रामि 'श्रामि सर्वनाम्नः सुट्' इति सुटि अनुबन्धलोपे 'बहुवचने झल्येत्' इत्यनेन (वकारोत्तरवर्तिनोs- कारस्य ) एत्वे 'श्रादेशप्रत्यययोः' इत्यनेन सस्य षत्वे 'सर्वेषाम्' इति सिद्धम् । १ (नीचे ), स्व ( आश्मा, आत्मीय), अन्तर (बाह्य, परिधानीय ), त्यद्, तद् , यत् , एतद् , इदम् , अदस् , एक, द्वि, युष्मद् , अस्मद् , भवतु, किम् । पूर्वपरा-पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर-इन सातोंकी व्यवस्था (नियमसे अवधि आकांक्षा) में और असंज्ञामें सर्वनाम संशा हो। स्वम-ज्ञाति (बान्धव) और धनवाचीसे भिन्न आत्मा-आत्मीयवाची अर्थ में 'स्व' शब्दकी सर्वनाम संज्ञा हो। अन्तरं-बहियोग (बाह्य) और उपसंव्यान (परिधानीय ) अर्थमें अन्तर' शब्दकी सर्व- नाम संज्ञा हो । जस:--अदन्न सर्वनामसे पर जस्के स्थानमें शी आदेश हो। नोट:-'शी' में शकार, इकार ये दो अल् हैं अतः अनेकाल० सूत्रसे (दे० पू० ३३) शी आदेश सम्पूर्ण जस्के स्थानमें होता है । सर्वना-अदन्त सर्वनामले पर के स्थान में स्मै आदेश हो । डलिङयो: अदन्त सर्वनामसे पर 'सि' और 'डि' के स्थानमें यथाप्राप्त स्मात् स्मिन् आदेश क्रमसे हो । आमि-अवर्णान्त अगसे पर सर्वनामसे विहित 'आम्' को सुडागम हो । उभशब्दो-'उम' शब्द दोका वाचक है इसलिये नित्य द्विवचनान्त है (एकवचन बहुवचनमें इसका प्रयोग नहीं होता)। तस्येह-उस 'उभ' शब्दका सर्वादिगणमें पाठ सिर्फ अकच् प्रत्ययकी सिद्धि के लिये है। [ सर्वनाम होनेसे 'उमको' में 'अव्ययसर्वनाम्ना' से (प्रास्वीय १ लघुसिद्धान्तकौमुदी उभयेभ्यः । उभयस्य । उभयेषाम् । उभयस्मिन् । उभयेषु । उतरडतमौ प्रत्ययौ । प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहण मिति तदन्ता प्राह्याः । तदन्ता प्राह्याः । नेम इत्यर्थे । सर्वपर्यायः तुल्यपर्यायस्तु न, यथासङ्ख्यमनुदेशः समानामिति ज्ञापकात् । पूर्वपराऽवरदक्षिणोत्तराऽपराऽधराणि व्यवस्थायामसज्ञायाम् १।१। ३४। एतेषां व्यवस्थायामसंज्ञायां सर्वनामसंज्ञा गणसूत्रात्सर्वत्र या प्राप्ता सा जसि वा स्यात् । पूर्वे । पूर्वाः। असंज्ञायां किम् ? उत्तराः कुरवः। स्वाभिधेया- पेक्षावधिनियमो व्यवस्था। व्यवस्थायां किम् ? दक्षिणा गाथकाः । कुशला इत्यर्थः । स्वमज्ञातिधनाख्यायाम् १||३५ ज्ञातिधनान्यवाचिनः स्वशब्दस्य या प्राप्ता सञ्ज्ञा सा जसि वा स्यात् । स्वे। स्वाः। आत्मीया अात्मान इति वा । ज्ञातिधनवाचिनस्तु-स्वाः । ज्ञातयोऽर्था वा । अन्तरं बहिर्योगोप- संव्यानयोः १११।३६ | बाह्ये परिधानीये चार्थेऽन्तरशब्दस्य या प्राप्ता सज्ञा सा जसि वा स्यात् । अन्तरे अन्तरा वा गृहाः । बाह्या इत्यर्थः। अन्तरे अन्तरा । । प्रकरण देखो) अकच होगा।] इतर-सर्वादिगणमें उतर-डतम प्रत्यय है-'प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम्' (प्रत्ययके ग्रहणमें तदन्तका ग्रहण हो) इस परिभाषासे तदन्तविधि होकर डतरान्त और डतमान्त लिए जाते हैं। नेस-सर्वादिगणमें अर्धपर्यायवाची 'नेम' शब्द है। समः-सर्वादि गणमें सर्वपर्यायवाची 'सम' शब्द है-तुल्यपर्यायवाची नहीं है। अतः एव 'यथानंख्य' सूत्र में तुल्यपर्यायवाची 'समानाम् पदमें सुट होकर समेषाम्' नहीं हुआ। पूर्वपरा-पूर्वादि सातोंको प्राप्त जो सर्वनामसंज्ञा वह व्यवस्था और असंज्ञा अर्थमें जस्के परे विकल्प हो। नोट:-पूर्वपराक सूत्रका निष्कृष्ट अर्थ यह है कि-नियमेन अवधिसापेक्षार्थ संज्ञाभिन्नार्थे ६ वर्तमानानां पूर्वादीनां (ससाना) जलि सर्वनामसंज्ञाविकल्पो न वन्यत्र' अर्थात् जहाँ पर वह इससे पूर्व है, पर है, अबर है, दक्षिण है, उत्तर है, अपर है या अधर है, इस प्रकार नियमसे अवधि की आकांक्षा हो वहाँपर और संज्ञासे भिन्न्द्र अर्थमें प्रयुक्त पूर्वादि शब्दोंकी जस्के परे सर्वनामसंज्ञा होती है। इसीलिए-दक्षिणा गाथकाः' (गाथकाः = गानेवाले, दक्षिणाः%Dकुशलाः-चतुर हैं) यहाँ दक्षिण शब्दका कुशल अर्थ है अतः अवधिकी आकांक्षा नहीं होनेसे सर्वनामसंज्ञा नहीं हुई। असंज्ञायाम् का प्रत्युदाहरण-'उत्तराः कुरवः' है। यहाँ उत्तर शब्द 'उत्तर कुरुदेश' की संज्ञा है, इसलिए सर्वनामसंशा नहीं हुई। स्वमज्ञा-ज्ञाति-धन वाचीसे भिन्न जो आत्मा-आत्मीयवाची 'स्व' शब्द उसकी गणसूत्रसे प्राप्त जो सर्वनामसंज्ञा वह जस्के परे विकल्पसे हो । अन्तरं-बाह्य और परिधानीय अर्थमें अन्तर शब्दको प्राप्त सर्वनामसंज्ञा जस्के परे विकल्पसे हो ।
अजन्तपु०.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। वा शाटकाः। परिधानीया इत्यर्थः । पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा ७ । १ । १६ ! एभ्यो असिड्योः स्मास्मिनौ वा स्तः। पूर्वस्मात् । पूर्वात् । पूर्वस्मिन् । पूर्वे । एवं परादीनाम् । शेषं सर्ववत् । प्रथमचरमतयाल्पार्धकतिपयनेमाश्च ११॥ ३३ । एते जति उक्तसञ्ज्ञा वा स्युः । प्रथमे। प्रथमाः। तयः प्रत्ययः । द्वितये। द्वितयाः। शेषं रामवत् । नेमे। नेमाः। शेषं सर्ववत् । तो यस्य डित्सु वा! द्वितीयस्मै । द्वितीयायेत्यादि । एवं तृतीयः । निर्जरः। जराया जरलन्यतरस्याम् ७१२१ १०१। जराशब्दस्य जरस् वा स्यादजादौ विभक्तौ । *पदाङ्गाधिकारे तस्य तदन्तस्य च । निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति । एकदेशविकृतमनन्यवदिति जर-शब्दस्य जरस् । निर्जरसौ। निर्जरस इत्यादि । पूर्वस्मात् (ई० ३६ )-सर्वादिगणपाठतात् पूर्वशब्दात् पञ्चम्येकवचनविव- झायां उसि 'पूर्वादिस्यो नवभ्यो वा' इत्यनेन सेः स्थाने स्मादित्यादेशे जश्त्वे चा 'पूर्वस्मात्' इति, 'चाभावपक्षे पूर्वस्मादिति । स्मादादेशाभावपक्षे तु पूर्व- शब्दात् असि 'टाङसिङसामिनात्स्याः' इति सेः स्थाने श्रादादेशे 'अकः सवर्णे दीर्घः' इति दी जश्त्वे चवं च कृते 'पूर्वात्' इति। चाभावपक्षे पूर्वादिति । निर्जरसौ(ई० ३२,५७)-निर्जरशब्दस्य प्रथमाद्विवचने द्वितीयाद्विवचने च "जराया जरसन्यतरस्याम्' इत्यनेन जरसादेशे उक्तं रूपं सिद्धम् । न च जराशब्दस्य पूर्वादिभ्यो-पूर्वादि नव शब्दोंसे पर 'डसि' और 'डि' के स्थानमें यथाक्रम स्मात्- स्मिन् आदेश हों, विकल्पसे। प्रथम-प्रथम, चरम, तयप्रत्ययान्त, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम शब्दोंकी सर्वनामसंचा हो, जस्के परे विकल्पसे। तीयस्य-तीयप्रत्ययान्तकी सर्वनामसंज्ञा हो, ङित् विभक्तिके परे विकल्पसे। जराया-'जरा' शब्दके स्थानमें 'जरस्' आदेश हो, अजादि विभक्तिके परे विकल्पसे। नोट:-सु, भ्याम् , भिस् , भ्यस् और सुप् विभक्तिको छोड़कर निर्जर शब्दको सर्वत्र जरसादेश विकल्पसे होता है पदाधि-पदाधिकार और अंगाधिकारसे जिसको जो कार्य विधान किया गया है, वह कार्य उसको तथा तदन्त (वह है अन्त में जिसके उस) को भी हो। नोट:-जरसादेश अंगाधिकार में विहित है अतः यह जरमादेश 'जरा' शब्दको और तदन्त ('निर्जर' शब्द ) को भी होता है। निर्दिश्य-निर्दिश्य मान ( सूत्रोच्चार्यमाण) को आदेश हो (षष्ठीप्रकृतिजन्यप्राथ- मिकोपस्थितिविषयताश्रयत्वं निर्दिश्यमानत्वम्)। एकदेश-'एकदेशावकृतमनन्यवत्' ३८ लघुसिद्धान्तकौमुदी पक्षे हलादौ च रामवत् । विश्वपाः । दीर्घाजसि च ६।१।१०५ | दीर्घाजसि इचि च परे प्रथमयोः पूर्वसवर्णदी? न स्यात् । विश्वपौ । विश्वपाः। हे विश्वनाः । विश्वपाम् । विश्वपौ । सुडनपुंसकस्य १।११४३! स्वादिपञ्चवचनानि सर्वनामस्थानसंज्ञानि स्युरक्लीबस्य । स्वादिष्वसर्वनामस्थाने ११४॥ १७ ॥ कप्प्रत्ययावधिषु स्वादिध्वसर्वनामस्थानेषु पूर्व पदं स्यात् । यचि भर १।४।१८। यकारादिष्वजादिषु च कप्प्रत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पूर्व भसंज्ञ स्यात् । आकडारादेका सज्ञा १।४।१। इत ऊर्ध्व 'कडाराः कर्मधारये' इत्यतः प्रागेकस्यकैव संज्ञा ज्ञेया। या पराऽनवकाशा ब। आतो धातोः६।४।१४०॥ आकारान्तो यो धातुस्तदन्तस्य भस्याङ्गस्य लोपः स्यात् । अलोऽन्त्यस्य । विधीयमानी जरसादेशः निर्जरशब्दे कथमिति वाच्यम् , जरसादेशस्य अङ्गाधिकार- स्थत्वेन ‘पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च' इति परिभाषया निर्जरशब्दस्यापि जरसादेशोचितत्वात् , नन्वेवमपि जराशब्दान्तस्य विधीयमानो जरसादेशः अनेका- ल्वात् निर्जरशब्दस्य कृत्स्नस्यैव स्यादिति चेन, निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति' इति परिभाषायाः जागरूकत्वात् । न चैवमपि निर्जरशब्दस्य जराशब्दान्तत्वं कथ. मिति वाच्यम् , 'एकदेशविकृतमनन्यवत्' इति परिभाषया अर्थात् 'छिन्ने पुच्छेऽपि श्वा श्वैच, न चाऽश्वो न च गर्दभः' इति न्यायेन निर्जरशब्देऽपि जराशब्दान्तत्वस्य भत्वात् । जरसादेशाभावपक्षे तु 'वृद्धिरेची ति वृद्धौ ‘निर्जरौं' इति बोध्यम् । ७ (परिभाषा)-अवयवके एकदेशके विकृत होने पर भी अवयवी अन्य नहीं कहाता । अतः प्रकृति में 'निर्जर' शब्दघटक 'जर' शब्दको भी जराशब्द मानकर जरसादेश हुआ। दीर्घा- दीर्घसे पर 'जस्' अथवा 'इच्' रहे तो पूर्वसवर्ण दीर्घ नहीं हो। सुडन-स्वादि पंचवचन (सु-औ-जस्-अम्-औद) की सर्वनामस्थानसंज्ञा हो, नपुंसकलिंगको छोड़कर । नोट:-याद रहे कि नपुंसकलिङ्गमें जस् और शस् स्थानिक 'शि' मात्रकी सर्वनाम स्थानसंशा होती है ('शि सर्वनामस्थानम्' अजन्तनपुंसकलिंग देखो)। स्वादिष्व-सु' प्रत्ययसे लेकर 'क' प्रत्यय पर्यन्त सर्वनामस्थानभिन्न प्रत्यय, परमें रहनेसे पूर्वकी पदसंज्ञा हो। यचि भम्-'सु' से लेकर 'कप्' प्रत्यय पर्यन्त जो यादि और अजादि असर्वनामस्थान प्रत्यय, उनके परे पूर्वकी भसंज्ञा हो । आकडारा-यहाँसे (प्रथम अध्यायके चतुर्थ पादसे लेकर आगे) 'कडाराः कर्मधारये ॥१॥२॥३८॥ सूत्रसे पूर्व तक एककी एक ही संज्ञा हो (जो अष्टाध्यायीके क्रमसे पर हो या अनवकाश हो)। आतो-अकारान्त जो । ।
अजन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। , विश्वपः । विश्वपा । विश्वपाभ्यामित्यादि । एवं शङ्खध्मादयः । धातोः किम् ? हाहान् । हरिः। हरी। जसि च ७।३.१०६ । ह्रस्वान्तस्याङ्गस्य गुणः स्याजसि । हरयः। हस्वस्य गुणः ७।३.१०८। हस्वस्य गुणः स्यात्सम्बुद्धौ । हे हरे। हरिम् । हरी । हरीन् । शेषो ध्यसखि श४।७ 'शेष' इति स्पष्टार्थम् । अनदीसंज्ञौ ह्रस्वौ याविदुतौ तदन्तं सखिवर्ज घिसझं स्यात् । आडो नाऽस्त्रियाम् ७३ १२०/ घेः परस्याडो ना स्यादस्त्रियाम् । श्राङिति टासज्ञा । हरिणा । हरिभ्याम् । हरिभिः । घेर्जिति ७।३।११११ घिसंज्ञकस्य डिति सुपि गुणः स्यात् । हरये । हरिभ्याम् । हरिभ्यः। उसिङसोश्च ६।१।११० । एडो उसिङसोरति परे पूर्वरूपमेकादेशः स्यात् । हरेः २॥ हर्योः २। हरीणाम् । अञ्च वेः ७।३।११६ । इदुद्भयामुत्तरस्य डेरौत् स्यात् , घेरन्तादेशश्चाऽकारः । विश्वपः (ई० ३२, ४२, ४६, ५१, ५४, ५५) विश्वपाशब्दाच्छसि विभक्तो ('लशकतद्धिते' इति शसः शकारस्येत्संज्ञायां लोपे च कृते) 'विश्वपा अस्' इति स्थिते ( 'सुडनपुंसकस्य' इत्यनेन 'सु-औ-जस्-श्रम्-श्रौट्' इति स्वादिपञ्च- बचनस्यैव सर्वनामस्थानसंज्ञाया विहितत्वात् शसो न सर्वनामस्थानसंज्ञा, तेन) 'स्वादिष्वसर्वनामस्थाने' इत्यनेन ( सर्वनामस्थानभिन्नस्वादिषु शसादिषु परेषु पूर्वस्य विश्वपाशब्दस्य) पदसंज्ञायां 'यचि भम्' इत्यनेन (सर्वनामस्थानभिन्नय- जादिषु स्वादिषु परेषु) भसंज्ञायां च प्राप्तायां (किमत्र विधेयम् इति शङ्कायाम् ) 'आकडारादेका संज्ञा' इत्यनेन एकैव संज्ञा भवतीति नियमात् परत्वादनवकाशत्वाच भसंज्ञायां सत्याम् ‘ातो धातोः' इत्यनेन पकारोत्तरवाकारस्य लोपे सकारस्य रुत्वे विसर्गे च 'विश्वपः' इति सिद्धम् । हरेः ( ई० ३३, ३८, ५३) हरिशब्दात् पंचम्येकवचने षष्ठयेकवचने च अनुबन्धलोपे सति हरि अस्' इति स्थिते, 'शेषो ध्यसखि' इत्यनेन घिसंज्ञायां 'धेर्डिति' इति गुणे 'उसिङसोश्च' इति पूर्वरूपे सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'हरेः' इति सिद्धम् । धातु, तदन्त जो मसज्ञक अङ्ग उसका लोप हो। जसि च-हस्वान्त अंगको गुण हो, जसके परे । हस्वस्य-हस्वान्त अगको गुण हो सम्बुद्ध 'सु' के परे। शेषो-नदीसंज्ञकसे भिन्न जो हस्व इकार-उकार, तदन्त जो सखि-भिन्न शब्द, वह घिसंशक हो (सूत्र में शेषग्रहण स्प- ष्टार्थ है ) । आडो-घिसंज्ञकसे पर 'आङ्' (टा विभक्ति) को 'ना' आदेश हो, स्त्रीलिंगको छोड़कर । घेर्डिति-धिसंज्ञकको गुण हो, ङित्-सुप् विभक्तिके परे । सि-एक्से पर असि-उस् सम्बन्धी अकारको पूर्वरूप एक आदेश हो । अच्च--हस्व इकार-उकारसे पर ।
MeremiNNA लघुसिद्धान्तकौमुदी हरौ। हरिषु । एवं कव्यादयः। अनङ् सौ ७१११६३। सख्युरङ्गस्याऽनङादेशः स्यादसम्बुद्धौ सौ। अलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा ११११६५। अन्त्यादलः पूर्वो वर्ण उपधासंज्ञः स्यात् । सर्वनामस्थाने वाऽसम्बुद्धौ ६.४१८ नान्तस्योपधाया दीर्घः स्यादसम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने । अपृक्त एकाल् प्रत्ययः शरा४११ एकाला- त्ययो यः सोऽपृक्तसञ्ज्ञः स्यात् । हल्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपुर हल ६।१।६८। हलन्तात्परं दीर्थो यो ड्यापौ तदन्ताच परं सुतिसीत्येतदपृक्तं हल्लुप्यते। नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य ८।२।७। प्रातिपदिकसंज्ञकं यत्पदं तदन्तस्य नस्य लोपः स्यात् । सखा । सख्युर सम्बुद्धौ ७११६२। सख्युरङ्गात्परं सम्बुद्धिवर्ज सर्वनामस्थानं णिद्वत्स्यात् । अचो मिणति ७२॥ ११५१ अजन्ताङ्गस्य वृद्धिः स्यात् अिति णिति च परे। सखायौ। सखायः । हे सखे। सखायम् । हरौ ( ई० ४५, ५२ ) हरिशब्दात् सप्तम्येकवचने डौं अनुबन्धलोपे 'शेषो ध्यसखि' इति घिसंज्ञायाम् 'अच्च घे.' इत्यनेन डेरोत्वे घिसंज्ञकस्य रेफोत्तर- चर्तिनः इकारस्य स्थाने प्रकारे च विहिते 'वृद्धिरेचि' इति वृद्धौ ‘हरौं' इति । सखा ( ई० ४०, ४३, ४६, ४९)-सखिशब्दात् सौ विभक्तो अनुवन्धलोपे 'सखि स्' इति स्थिते 'यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम्' इति अङ्गसंज्ञायाम् 'अनङ सौ' इत्यनेन 'ङिच्चेति सूत्रबलात् सखिशब्दघटकखकारोत्तरवर्तिनः इकारस्य अनङि अनुबन्धलोपे 'सखन् स्' इति दशायाम् 'अलोन्त्यात्पूर्व उपधा' इत्यनेन उपधासंज्ञायां 'सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौं' इति दीर्धे 'सखान् स्' इति दशायाम् 'अपृक्त एकाल्प्रत्ययः' इत्यनेन सस्य अपृक्तसंज्ञायाम् 'हल्याभ्यो दीर्घात्सुतिस्य- पृक्तं हल्' इत्यनेन सस्य लोपे 'नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य' इति नलोपे 'सखा' इति । 'जि' को औत् आदेश हो और घिसंज्ञकको अकारान्त आदेश हो। अनङ् सौ-सखिरूपी अंगको अनङ् आदेश हो, सम्बुद्धिभिन्न सुके परे। अलोन्त्यात्-अन्त्य अल्से पूर्व वर्णकी उपधासंज्ञा हो। सर्वनाम-नान्तकी उपधाको दीर्घ हो, सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थानके परे । अपृक्त-एक 'अल्' मात्ररूप जो प्रत्यय वह अपृक्तसंज्ञक हो। हल्या-हलन्तसे पर जो 'सु-ति-सि’ सम्बन्धी अपृक्तसंशक हल और दीर्घरूपी को-आप् तदन्तसे पर जो 'सु सम्बन्धी अपृक्तसंज्ञक हल् उसका लोप हो। न लोपः-प्रातिपदिकसंज्ञक जो पद, तदन्त जो नकार उसका लोप हो । सस्यु-सखिरूप अङ्गले पर जो सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान, वह णिद्वत् हो ( अर्थात् 'णित्' के परे जो वृद्धयादि कार्य होता है, वह उसके परे भी हो)। अचो- अजन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। - । सखायौ । सखीन् । सख्या । सख्ये । ख्यत्यात्परस्थ६ श११२ खितिशब्दाभ्यां स्वीतीशव्दास्यां कृतयणादेशाभ्यां परस्य उसिङसोरत उत्स्यात् । सख्युः २ औत् ७।३।११८ । इदुद्भया परस्य रौत्स्यात् । सख्यौ । शेषं हरिवत् । पतिः समास एव ११४।८। पतिशब्दः समास एव घिसज्ञः स्यात् । पत्ये। पत्यु: २। पत्यो । शेष हरिवत् । समासे तु भूपतये । कतिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । बहुगणवतुडति संख्या १।११२३ | एते संख्यासज्ञाः स्युः । उति च ११।२५ डत्यन्ता संख्या घट् सज्ञा स्यात् । षड्भ्यो लुक्ल ११ २२ षड्यः परयोर्जश्शसोलुक् स्यात् । प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः १॥ १॥ ६१ । लुक्स्लुलु शब्दैः कृतं प्रत्ययाऽदर्शनं क्रमात्तत्तत्संज्ञं स्यात् । प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् | ११ ६२ प्रत्यये लुप्तेऽपि तदाश्रितं कार्य स्यात् । इति जसि चेति गुरो प्राप्ते । न लुमता- सख्युः ( ई० २४)-सखिशब्दात् पञ्चभ्येकवचने षष्ट्येकवचने च विभक्ती अनुबन्धलोपे 'सखि अस्' इति दशायाम् 'इको यणचि' इति यणि 'ख्यत्यात्परस्क' इत्यनेन असोऽकारस्य उत्वे सकारस्य रुत्वे विसर्ग सल्युः इति पत्यौ (ई० ३५, ५.१.)- पतिशब्दात् विभक्तौ 'पतिः समास एवेति सूत्रेण निषेधादत्रासमासे घित्वाऽभावेन 'अच्च घेः' इत्यस्याऽप्राप्तया 'श्रौत्' इत्य- नेन डेरौत्वे 'इको यणचि' इति यणि 'पत्यौ' इति सिद्धम् । DESCAPIMLAIMERaveetaste अजन्त अङ्गको वृद्धि हो, 'मित्-णित् प्रत्ययके परे । ख्यत्यातू-कृत यणादेशक जो हस्व खि' शब्द, 'ति' शब्द और दीर्घ 'खो' शब्द 'ती' शब्द उससे पर जो सि-उत् सम्बन्धी अकार उसके स्थानमें उकार आदेश हो। औत् --हस्व इकार-उकारसे पर जि को और आदेश हो । पतिः समास-पति शब्द समास में ही घिसंज्ञक हो। अर्थात् केवल पति शब्द की घिसंज्ञा नहीं हो। बहुगण-बहु शब्द, गण शब्द तथा बतुप्रत्ययान्त, डतिप्रत्यया- न्तकी संख्यासंज्ञा हो नोट:-वतुप्रत्ययान्तसे 'यत्तदेतेभ्यः परिमाणे बतुप' इस सूत्रसे निष्पन्न 'यावत् आदि और डतिप्रत्ययान्त से 'किमः संख्यापरिमाणे डति च' इस सूत्रसे निष्पन्न 'कति' शब्द लिये जाते हैं ( कति शब्दका प्रयोग बहुवचन में ही होता है)। इति च-(पान्त-नान्त शब्दके समान ) डत्यन्त संख्यावाचक शब्द भी घटसंशक हो। षड्भ्यो-पटसंशकसे पर जस्- शस्का लुक् ( अदर्शन) हो । प्रत्ययस्य-'लुक्-श्लु-लुप्' शब्दसे किया हुआ हो जो प्रत्ययका अदर्शन वह 'लुक्-श्लु-लुप संशक हो। प्रत्यय--प्रत्ययका लोप होने पर भी प्रत्ययाश्रित कार्य हो । न लुमता--'लुक्लु-लुम्' शब्दसे प्रत्ययका लोग (अदर्शन) होने लघुसिद्धान्त कौमुदी ङ्गस्य श१।६३ । लुमता शब्देन लुप्ते तनिमित्तमङ्गकार्य न स्यात् । कति २॥ कतिभिः । कतिभ्यः २। कतीनाम् । कतिषु । युष्मदस्मत्षसंज्ञकास्त्रिषु सरूपाः । त्रिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । त्रयः । त्रीन् । त्रिभिः। त्रिभ्यः २॥ त्रेस्त्रयः १५३। त्रिशब्दस्य त्रयादेशः स्यादामि । त्रयाणाम् । त्रिषु । गौण- त्वेऽपि । प्रियत्रयाणाम् | त्यदादीनामः ७२१ १०२। एषामकारोऽन्तादेशः स्या- द्विभक्तौ । द्विपर्यान्तानामेवेष्टिः । द्वौ । द्वौ । द्वाभ्याम् । द्वाभ्याम् । द्वाभ्याम् । द्वयोः । द्वयोः । पाति लोकमिति पपी:-सूर्यः । दीर्घाजसि च श१०५॥ दीर्घा- ज्जसि इचि च परे न पूर्वसवर्णदीर्घः । पप्यौ ३ । पथ्यः । हे पपीः । पपीम् । पपीन् ! पप्या। पपीभ्याम् ३ । पपीभिः। पप्ये । पपीभ्यः २॥ पप्यः २। पप्योः । । । । कति (ई० २४, ३०)-कतिशब्दात् जसि शसि च विभक्तो 'बहुग- णक्तुडति संख्या' इति डत्यन्तत्वात् संख्यासंज्ञायां 'डति च' इति षट्संज्ञायां 'षड्- भ्यो लुक्' इति जश्शसोलुंकि, जसि 'प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्' इति प्रत्ययलक्ष- रोन 'जसि च' इति गुणे प्राप्ते 'न लुमताङ्गस्य' इति निषेधे 'कति' इति । त्रयाणाम् (ई० ४६)-त्रिशब्दादामि 'प्रेस्त्रयः' इति त्रयादेशे 'हस्वनद्यापो नुट' इति नुटि अनुबन्धलोपे 'नामि' इति दी 'अदकुप्वाङ' इति णत्वे 'त्रयाणाम् इति । गौणत्वेऽपि 'प्रियत्रयाणाम्' इति-अन्न 'गौणमुख्ययोर्मुख्य कार्यसम्प्रत्ययः' इति न्यायात् त्रिशब्दस्यान्यपदार्थे विशेषणत्वेन गौणत्वात् 'स्त्रयः' इति त्रयादेशो न ल्यादिति तु नाशंक्यम् , गौणमुख्यन्यायस्य पदकार्यविषयत्वात् । पर ( प्रत्यय लक्षणसे ) तदाश्रित अंगकार्य नहीं हो । युष्मदस्मद्-युष्मद्-अस्मद् और घट- संशक शब्दोंके तीनों लिङ्गों में समानरूप हो। त्रिशब्दो-त्रिशब्द बहुत्वसंख्याका वाचक है, अतः नित्य बहुवचनान्त है। नया-त्रिशब्दको त्रय आदेश हो, अमके परे। गौण. स्वेऽपि-अयं भावः, 'प्रियास्त्रयो यस्य' इस विग्रहमें-'इतरपदार्थनिष्ठविशेष्यतानिरूपि. तप्रकारताश्रयत्वं गौणत्व अथवा 'स्वान्तसमुदायपर्याप्तशक्तिनिरूपकार्थनिष्ठविशे- ध्यतानिरूपितप्रकारतावच्छेदकताप्रयोजकत्वम्' इस लक्षणसे प्रियविघटक 'त्रि'को गौण होनेपर भी 'गौणमुख्ययोमुख्य कार्यसम्प्रत्ययः' इस न्यायसे 'प्रियत्रयाणाम्' यहाँ पर निषेध नहीं हुआ क्योंकि इस न्यायकी प्रवृत्ति पदकार्य में ही होती है-ऐसा आचार्योंका सिद्धान्त है । त्यदा-ल्यदादिको अकारान्त आदेश हो, विभक्तिके परे। हिप-सर्वादिगणपठित जो त्यदादि है उनमें 'त्यद्' से लेकर 'द्वि' शब्दपर्यन्त ही 'त्यदादि से भाष्यकारको इष्ट है। दीर्घा -दीर्घसे पर 'जस्' और 'इच्' रहे. तो पूर्वसवर्णदीर्घ एक आदेश नहीं हो । HAalyanti TECH , । अजन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। दीर्घत्वान्न तुट् । पप्याम् । औ तु सवर्णदीर्घः, पपी । पप्योः। पपीषु । एवं वात- प्रम्यादयः । बढ्यः श्रेयस्यो यस्य स बहुश्रेयसी । यू स्व्याख्यौ नदी ११४।३। ईदन्तौ नित्यस्त्रीलिङ्गो नदीसंज्ञौ स्तः। प्रथमलिङ्गग्रहणं च । पूर्व स्त्र्याख्य- स्योपसर्जनत्वेऽपि नदीत्वं वक्तव्यमित्यर्थः। अम्बार्थनद्यो स्वः ७ ! ३ । १०७ । अम्वार्थानां नचन्तानाच ह्रस्वः स्यात्सम्बुद्धौ । हे बहुश्रेयसि । आपनद्याः ७/३११२ नद्यन्तात्परेषां डितामाडागमः स्यात् । आटश्चाश६० बाटोऽचि परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् । बहुश्रेयस्यै । बहुश्रेयस्याः २। बहुश्रेयसीनाम् । राम्नद्याम्नीभ्यः७।३.११६/ नद्यन्तादाबन्तान्नीशब्दाच्च परस्य डेराम् स्यात् । बहुश्रेयस्याम् । शेषं पपीवत् । अड्यन्तत्वान्न सुलोपः । अतिलक्ष्मीः । शेषं वहुश्रेयसीवत् । प्रधीः । अचि श्नुधातुभ्रुवां वोरियङवजै ६।४। ७७ । रनुप्रत्ययान्तस्येवोवर्णान्तस्य धातो— इत्यस्य चाऽङ्गस्येयकुवौ स्तोऽजादौ बहुश्रेयस्याः ( ई० ३७, ५५ )-बहुश्रेयसीशब्दात् पंचम्येकवचने असि अनु- बन्धलोपे 'बहुश्रेयसी अस्' इति स्थिते 'प्रथमलिङ्गग्रहणं च' इति वार्तिकेन नदीसंज्ञा- याम् । 'प्राण्नयाः' इत्याटि अनुबन्धलोपे 'अाटच' इति वृद्धौ ‘इको यणचि' इति यणि सकारख्या रत्वे विसर्गे 'बहुश्रेयस्याः' इति । बहुश्रेयप्तीनाम् (ई० ४६ )-बहुश्रेयसीशब्दादामि 'बहुश्रेयसी आम् इति स्थिते 'प्रथमलिङ्गग्रहणं च' इति वार्तिकेन नदीसंज्ञायां 'हस्वनद्यापो नुट् इति नरन्तत्वान्नुटि अनुबन्धलोपे 'नामि' इति दीर्चे 'बहुश्रेयसीनाम्' इति सिद्धम् । बहुश्रेयस्याम् ( ई० ४२, ४५, ५४, ५७ )-बहुश्रेयसीशब्दात् डिविभक्तौ अनुबन्धलोपे 'प्रथमलिङ्गग्रहणं च' इति वार्तिकेन नदीसंज्ञायां 'राम्नवास्नीभ्यः इत्यनेन डेरामि कृते स्थानिवद्भावेन ङित्वमादाय 'आग्नद्याः' इत्याटि अनु- बन्धलोपे 'बाटश्च' इति वृद्धौ ‘इको यणचि' इति यणि 'बहुश्रेयस्याम्' इति सिद्धम् । यूस्च्या-ईदन्त, ऊदन्त जोनित्य स्त्रीलिंग वह नदीसंज्ञक हो। प्रथम-जो शब्द पहले नित्य- स्त्रीलिग हो और बादमें समास आदि वृत्ति होने पर निन्यस्त्रीलिंगन भी रहे तो उसकी नदीसंज्ञा हो-ऐसा कहना चाहिये। अम्बा-अम्बा(माता)अर्थक शब्द और नद्यन्त शब्दको इस्व हो, संबुद्धिके परे । आग-नयन्तसे पर डिवचन (डित्प्रत्यय ) को 'आद' का आगम हो । आटश्च-'आट' से पर अच् हो तो पूर्व-पर के स्थानमें वृद्धिरूप एक आदेश हो । डेरा- नद्यन्त, आबन्त और 'नी' शब्दसे पर जो 'ङि' उसको आम आदेश हो । अचिश्नु'श्नु' प्रत्ययान्त और इवर्णान्त-उवर्णान्त जो धातु तथा 'भ्रू'रूप जो अंग-उनको इय, उवा । । लघुसिद्धान्तकौमुदी प्रत्यये परे । इति प्राप्ने । एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य ६४ ८२ धात्वक्यवसंयो- गपूर्वो न भवति य इवर्णस्तदन्तो यो धातुस्तदन्तस्यानेकाचोऽङ्गस्य यण स्थादजादौ प्रत्यये ! अध्यौ । प्रध्यः । प्रध्यम् । अध्यौ। प्रध्यः । प्रध्यि । शेषं पपीवट ! एवं प्रामणीः । छौ तु ग्रामण्याम् । अनेकाचः किम् ? नी । नियो। नियः । अमि शसि च परत्वादियङ । नियम् । राम् । नियाम् । असंयोगपूर्वल्य किम् ? सुश्रियो । यचक्रियो। तिश्च१.४।६० प्रादयः क्रियायोगे गतिसंज्ञाः स्युः । गतिकार केतरपूर्वपदस्य यण नेष्यते । शुद्धधियो। न भूसुधियोः ६।४८५ एतयोरचि सुपि राण्न स्यात् । सुधियो। सुधियः, इत्यादि। सुखमिच्छतीति सुखीः । सुती । सुख्यो २। सुत्यौ २। सुख्युः २ । सुत्युः २ । शेषं प्रधीवत् । शम्भुहरिवत् । एवं भान्यादयः । तृवत्क्रोष्टुः ७।१।६५क्रोष्टुशब्दस्तृजन्तवद्रूपं लभते असम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने परे। क्रोष्टुशब्दस्य स्थाने कोष्टशब्दः प्रयोजव्य इत्यर्थः । ऋतोडिसर्वनामस्थानयोः ७।२।११० ऋतोऽजस्य गुणः स्यात् औ सर्वनामस्थाने च परे । इति प्राप्ते। ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च ७ ११६४ प्रध्यम् ( ई० ३६)-प्रधीशब्दाद् अभि 'प्रधी अम्' इति स्थिते 'अमि पूर्वः' इति पूर्वरूपे प्राप्ते तं प्रबाध्य 'अचिश्नुधातुध्रुवां बोरियकुवौं' इति इयकि आप्ते तमपि प्रबाध्य 'एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य' इति यणि 'प्रध्यम्' इति । प्रध्यि (ई० ३८, ४५)-अधीशब्दात् ौ अनुबन्धलोपे सवर्णदीर्घ अबाध्य इयकि प्राप्ते तमपि प्रबाध्य ‘एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य' इति यणि 'प्रध्यि' इति ! प्रामण्याम् (ई० ४५)-'ग्रामं नयति = नियच्छति इति प्रामणोः' । तस्य सप्तम्येकवचने डी अनुबन्धलोये 'ग्रामणी इ' इति स्थिते 'डेराम्नद्यान्नीभ्यः' इत्यनेन नीशब्दात्परस्य डेरामि ‘एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य' इति यणि तत् सिद्धम् । SEARNER आदेश हो, अजादि प्रत्ययके परे। धरने-धात्ववयवसंयोग पूर्वमें न हो, ऐसा जो इवर्ण, तदन्त जो धातु, तदन्त जो अनेकाच अंग, उसको यण हो, अजादि प्रत्यय के परे। गति- प्रादि (प्र, परा आदि) की क्रियाके योगमें गतिसंज्ञा हो। गति-कारकसे इतर (भिन्न) पूर्वपदको यण् इष्ट नहीं है-ऐसा सूत्रकारका मत है। न भू-भू शब्द और सुधी शब्दको यण नहीं हो-अजादि 'सुम्' के परे । तृवत्-असंबुद्धि सर्वनामस्थानके परे क्रोष्टु शब्दको तृजन्तवत् रूप हो, अर्थात् क्रोष्टु शब्दके स्थानमें 'क्रोष्ट आदेश हो । ऋतो-ऋदन्त अङ्गको गुण हो, कि और सर्वनामस्थान विभक्तिके परे। ऋदुश-ऋदन्त तथा उशनस् , पुरुदं- । अजन्तयु इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। ४५ ऋदन्तानामुशनसादीनां चानङ् स्यादसम्बुद्धौ सौ । अप्तृन्तृच्स्वमुनष्तृनेष्टुत्वष्ट क्षन्तृहोपोप्रशास्तृणाम् ६|४|११|| अबादीनामुपधाया दीर्घोऽसम्बुद्धौ सर्वनाम- स्थाले । कोष्टा । कोष्टारी । ऋोष्टारः । क्रोष्ट्रन् । विभाषा तृतीयादिवचि ७११७॥ अजादिषु तृतीयादिषु क्रोष्टुवा तुज्वत् । क्रोष्ट्रा । क्रोष्ट्रे । ऋत उत् । ६१११११।। ऋतो सिङसोरति उदेकादेशः स्यात् । रपरः। रात्सस्यमा २४|| रेफात्संयो- गान्तस्य सस्यैव लोपो नान्यस्य । रस्य विसर्गः । क्रोष्टुः २। नुमचिरतज्व- द्भावेभ्यो नुट्पूर्वविप्रतिषेधेन ! क्रोष्ट्रनाम् । क्रोष्टरि । पक्षे हलादौ च शम्भु- वत् । हूहूः । हूह्रौ । हूह्वः । हूहूम्-इत्यादि । अतिचमूशब्दे तु नदीकार्य विशेषः । कोष्टा (ई० २१, ३०) क्रोष्टुशब्दात् सौ अनुबन्धलोपे 'तृवत्क्रोष्टुः' इति तृज्वद्भावे 'कोष्ट स्' इति दशायाम् 'ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः' इति गुणे प्राप्ते तम्प्र- बाध्य 'ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च' इत्यनङि एकदेशविकृतन्यायेन 'अप्तृन्तृच्स्वस- नप्तनेष्टुत्वष्टक्षत्तृहोतृपोतृप्रशातृणाम्' इति उपधादीधै 'हल्याभ्यो दीर्घात्सुति- स्पपृक्तं हल' इति सुलोपे 'नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य' इति नलोपे 'क्रोष्टा' इति । कोष्टुः (ई० ४१, ४३, ५१ )-क्रोष्टुशब्दात् सि अनुबन्धलोपे 'क्रोष्टु अस्' इति स्थिते 'विभाषा तृतीयादिवचि' इति तृज्वद्भावे कोष्ट अस्' इति जाते 'ऋत उत्' इति उत्वे एकादेशे रपर त्वे च कृते 'क्रोष्टस्' इति स्थिते रात्सस्य' इत्यनेन सलोपे 'खरवसानयोनिसर्जनीयः' इति रेफस्य विसगै 'कोष्टुः' इति । तृज्वभावाऽभावपचे 'शेषो ध्यसखि' इत्यनेन घिसंज्ञाय 'धेर्डिति' इति गुणे 'ङसिङसोच' इति पूर्वरूपे सस्य रुत्वे विसर्गे 'क्रोटोः' इति च सिद्धं भवति । सत् और अनेहस् शब्दोंको अनङ आदेश हो, सन्बुद्धि मिन्न 'तु' के परे । अस्तृन् -'अम् शब्द तथा तुन्-तृच् प्रत्ययान्त और स्वस-नप्त-नेष्ट-त्वष्ट-क्षत-होतु-पोत-प्रशास्तु-शब्दों की उपधाको दीर्घ हो, असम्बुद्धि सर्वनामस्थानके परे। विभाषा--क्रोष्टु शब्दको तृज्व- द्भाव ( क्रोष्टु आदेश ) हो, विकल्पसे, अजादि तृतीयादि (टा-डे-सि-ङस्-ओस्-आम्- डि) विभक्तिके परे। ऋत्-ऋदन्त अझसे सि-ङस् सम्बन्धी अकारके परे पूर्व-परके स्थानमें 'उत्' एकादेश हो। रासस्य-रेफसे पर यदि संयोगान्तका लोप हो तो सकारका ही हो-अन्यका नहीं । नुम-तुम् , अच्के परे रमाव और तृज्वहाबसे पहले पूर्वविप्रतिधे. धेन (प्र०२९ देखो) आम्को नुट् ही हो । नोट :-'क्रोष्ट्रनाम्' यहाँ पर नुट होनेसे अच्परत्वका नाश हो जाता, अतः तृज्व- द्भावकी पुनः प्राप्ति नहीं होती। एवं 'तिसृणाम्' और वारीणाम्' यहाँ पर भी नुट होनेसे ७ । लघुसिद्धान्तकौमुदी हे अतिचतु । अतिचम्वै । अतिचम्बाः २ । अतिचमूनाम् । खलपूः । ओः सुपिः ६.४८३॥ धात्वदायवसंयोगपूर्वो न भवति य उवर्णस्तदन्तो यो धातुस्तदन्तस्याऽ- नेकानोऽस्य यः स्यादचि सुपि । खलप्डौ । खलप्कः। एवं सुल्वादयः । स्वभूः । स्वभुवौ । स्वभुवः । वर्षाभूः । वर्षावश्च ६१४८४॥ अस्योवर्णस्य यण स्यादवि सुपि । वर्षाभ्वावित्यादि । इन्भूः। न्करपुनःपूर्वस्य भुवो यण् वक्तव्यः । इन्भ्वौ । एवं करभूः । धाता । हे धातः। पातारौ। धातारः। ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् । धातृणाम् । एवं नप्त्रादयः। नप्त्रादिग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमा- थम् । तेनेह न । पिता । पितरौ । पितरः । पितरम् । शेष धातृवत् । एवं जामा- त्रादयः। ना । नरौ। नृ च ६।४।६॥ 'नृ' इत्येतस्य नामि वा दीर्घः स्यात् । नृणाम् । नृणाम् । गोतो णित् ७।१।६०॥ श्रीकाराद्विहितं सर्वनामस्थानं णिव- पितरौ ( ई० ४७, ४९)-पितृशब्दात् श्रौविभक्तौ 'ऋतोडिसर्वनामस्था- नयोः' इत्यनेन गुणे रपरत्वे च कृते 'पितरौं' इति । अत्र व्युत्पत्तिपक्षे नप्त्रादि- ग्रहणस्य निमार्थत्वात् 'अप्तृन्निति दीर्घो न । अव्युत्पत्तिपक्षे तु अपतृन्तृजादिश्व- नन्तर्भावात् दीर्घशङ्कव नोदेतीति । नियमप्रकारस्त्वित्यम्-'अप्तृन्तृच्-' इति सूत्रे 'उणादयोऽव्युत्पन्नानि प्रातिपदि- कानि' इति पक्षे नत्रादीनां सप्तानां तृन्नन्तत्वात्तृजन्तत्वाच्च तृन्तृचाहणेनैव दीर्ये सिद्धे नत्रादिग्रहणं, "सिद्धे सत्यारभ्यमाणो विधिनियमाय भवतीति सिद्धान्तात् नियमार्थम्-'तृन्तृजन्तानां चेतर्हि नत्रादीनामेवेति। नियमेन च स्वेतरस्वजाती- यव्यावृत्तिः क्रियते, इति नप्त्रादीतरोणादिनिष्पन्नतुन्नन्ततृजन्तशब्दानां न दीर्घ इति । नृणाम् (ई० ४८)-नृशब्दात् श्रामि 'हस्वनद्यापो नुट्' इति नुटि अनुबन्धलोपे 'नामि' इति दीर्घ प्रबाध्य ' च' इति विभाषया दीर्चे 'ऋवर्णानस्य णत्वं वाच्यम्' - अच्परत्वका नाश हो जाता है अतः तिसृणाम्' में 'अचि र ऋतः' से रमाव और 'वारी- णाम् में एकोऽचि विभक्तौ से नुम् नहीं होते। ओः सुपि-धात्ववयवसंयोग पूर्वमें नहीं है ऐसा जो उवर्ण, तदन्त जो धातु, तदन्त जो अनेकाच् अङ्ग, उसको यण हो, अजादि सुप् विभक्तिके परे । वर्षा-वर्षाभू शब्दको यण हो, अजादि सुप् विभक्तिके परे। हन्-दृन्- कर-पुनर पूर्वक 'भू' को यण हो, अजादि सुप् विभक्ति के परे-ऐसा सूत्रकारको कहना चाहिये। ऋवर्णा-ऋवर्णसे पर नकारको गत्व हो-ऐसा कहना चाहिये । नृच-नृ' शब्दको दीर्घ हो, नाम्के परे, विकल्पसे । गोतो-ओकारसे विहित जो सर्वनामस्थान, वह । ASTRI अजन्तस्त्री.] INidravina इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। स्यात् । गौः। गावौ । गावः। औतोऽम्शसोः६॥ १३॥ ौकारादम्शसोरचि परे श्राकार एकादेशः स्यात् । गाम् । गाबौ । गाः । गवा । अवे । गोः इत्यादि रायो हलि ७१२१८५|| शब्दल्याकारोऽन्तादेशः स्याद्धलि विभक्तौ । राः । रायौ। रायः । राभ्यामित्यादि । ग्लोः । ग्लावौ । ग्लाः । ग्लोभ्यामित्यादि । !! इत्यजन्ताः पुंल्लिङ्गाः॥ 0 अथ अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरणम् । रमा । औङ आपः ७।१।१८॥ श्रावन्तादङ्गात्परस्यौङः शी स्यात् । औङित्यौकारविभक्तेः संज्ञा । रमे । रमाः । सम्बुद्धौ च ७।३। १०६ !! आप एड्हस्वादिति सम्बुद्धिलोपः। हे रमे। हे रमे । हे रमाः। रमाम् । रमे । रमाः । आङि चाऽऽपः ८।३।१०।। आङि श्रोसि च परे आब- न्तस्याऽङ्गस्य एकार: स्यात् । रमया । रमाभ्याम् । रमाभिः। याडापः ७३११३।। आपः परस्य द्विचनस्य याडागमः स्यात् । वृद्धिः । रमायै । रमाभ्याम् एकारः स्यात्सम्बुद्धौ। इति णत्वे 'नृणाम्' इति । दीर्घाऽभावपक्षे 'नृणाम्' इति । अत्र 'नामी ति दीर्घस्तु न सकृद्तौ यद्बाधितं तद्बाधितमेवेति सिद्धान्तात् । गाम् ( ई० ५२)-गोशब्दाद् अमि 'श्रौतोऽमशसोः' इति सूत्रेण गोशब्द- स्यौकारस्य विभक्तरकारस्य च आकारैकादेशे गाम्' इति । इति 'इन्दुमती' टीकायामजन्तपुंल्लिङ्गप्रकरणम् ॥ - णिद्वत् हो। औतो-ओकारसे पर अम्शस सम्बन्धी अच रहे तो पूर्व-परके स्थानमें आकार एक आदेश हो । रायो-' शब्दको आकारान्त आदेश हो, हलादि विभक्तिके परे । इस प्रकार इन्दुमती टीकामें अजन्तपुंल्लिङ्ग प्रकरण समाप्त हुआ। । औङ-आबन्त अगसे पर औङ् ( औकार विभक्ति) के स्थान में 'शी' आदेश हो सम्बु-आबन्त अङ्गको एकार आदेश हो, सम्बुद्धिके परे। अडि-आङ् और ओस्के परे 'आप' को एकार हो। याडापः--आबन्त अङ्गसे पर विद्वचनको याटका आगम हो। HTTATRISAR । लघुसिद्धान्तकौमुदी रमाभ्यः । रमायाः २ । रमयोः २ । रमाणाम् । रमायाम् । रमासु । एवं दुर्गाs. म्बिकादयः । सर्वनाम्नः स्याड्ढस्वञ्च ७।३।११४|| पाबन्तात्सर्वनाम्नः परस्य जितः : स्याट् स्यादापश्च ह्रस्वः । सर्वत्यै। सर्वस्याः २ । सर्वासाम् । सर्वस्याम् । शेष रमावत् । एवं विश्वादय आवन्ताः । विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ। १।२८। अत्र सर्वनामता वा स्यात् । उत्तरपूर्वस्यै। उत्तरपूर्वायै। तीयस्येति वा सर्चनामसंज्ञा । द्वितीयस्यै । द्वितीयायै । एवं तृतीया । अम्बार्थेति हस्वः । हे अम्ब । हे अक । हे अल्ल । जरा । जरसौ । जरे इत्यादि । पक्षे रमावत् । गोपा विश्वपावत् । मतीः । मत्या । डिति हस्वश्च ११ ४।६।। इयवस्थानौ स्त्रीशब्द- भिचौ नित्यत्रीलिङ्गाचीदूतौ ह्रस्वौ च इवोवौँ स्त्रियां वा नदीसंज्ञौ स्तो डिति । मत्यै । मतये । मत्याः । मत्याः । मतेः। मतेः। इदुद्भ्याम् ७ । ३ । ११७ ।। नदीसंज्ञकाभ्यामिदुद्भयां परस्य राम् स्यात् । मत्याम् । मतौ। शेषं हरिवत् । - रमायाः ( ई० २०, २५)-रमाशब्दात् ङसौ ङसि वा 'रमा अस्' इति स्थिते 'याडापः' इति याटि अनुबन्धलोपे 'अकः सवर्णे दीर्घः' इति दीर्घे सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'रमायाः' इति सिद्धम् । सर्वस्य (ई० २०, ३७,)-सर्वाशब्दात् विभक्तौ 'सर्वा ए' इति स्थिते 'याडापः' इति याटि प्राप्ते तं बाधित्वा 'सर्वनाम्नः स्याड्स्वश्च' इति स्याटि आपो ह्रस्वे च कृते अनुबन्धलोपे 'वृद्धिरेचि' इति वृद्धौ ‘सर्वस्यै' इति सिद्धम् । सर्वल्याम् (ई० ३१,३२)-सर्वाशब्दात् डिविभक्तौ 'राम्नद्याम्नीभ्यः' इति रामि स्थानिवद्भावेन जित्वमादाय 'सर्वनान्नः स्याड्स्वश्च' इति स्याटि श्रापो ह्रस्वे च कृते 'सर्वस्या श्राम्' इति स्थिते 'अकः सवर्णे दीर्घः' इति दीर्धे 'सर्वस्याम्' इति । जरसौ(ई० २०)-जराशब्दात् प्रथमाद्विवचने 'जरा औ' इति स्थिते 'जराया जरसन्यतरस्याम्' इति सूत्रेण जरसादेशे 'जरसौ इति । जरसादेशाभावपक्षे तु 'श्रोङ आपः' इत्यनेन औङः श्यादेशे 'श्राद्गुणः' इति गुणे 'जरे' इति भवति । सर्व-आवन्त सर्वनामसे पर डिवचनको याटका आगम हो और आप्' को हस्व हो। विभाषा-बहुन्नीहि समासमें दिग्वाचक शब्दों की सर्वनाम संज्ञा हो, विकल्पसे । डिति- इयत्-उबके स्थानी रहे, 'स्त्री' शब्दसे भिन्न रहे तथा नित्यस्त्रीलिङ्ग रहे, ऐसा जो दीर्घ - इंकार और ऊकार, उनकी नदीसंज्ञा हो, छितके परे विकल्पसे। और इस्व इवर्ण-उवर्णकी नदीसंज्ञा हो, ङित् के परे स्त्रीलिङ्गमें विकल्पसे । इदुद्-नदीसंशक हस्व इकार- Awaren.
HOR - । । अजन्तस्त्री.] इन्दुमता टाकायापत। एवं बुद्ध्यादयः । त्रिचतुरोः स्त्रियां तिस-चतम ७/R1881 स्त्रीलिङ्गयोरेता- बादेशौ स्तो विभक्तौ । अचि र ऋतः ७१२११०० तिर' 'चतसृ' एतयो- ऋकारस्य रेफादेशः स्यादचि । गुणर्दी!त्वानामपवादः । तिनः । तिलः । तिसृभिः । तिसभ्यः । श्रामि नुट् । न तिसृचतस्कृ६।४।४। एतयोर्नामि दीर्थो न स्यात् । तिसृणाम् । तिसृषु । । । द्वे । द्वाभ्याम् । द्वाभ्याम् । द्वाभ्याम् । द्वयोः। द्वयोः । गौरी। गौयौँ । गौर्यः । हे गौरि । गौ-इत्यादि । एवं नद्यादयः । लक्ष्मीः। शेष उिति ह्रस्वश्च ( ई० ४७) अत्र ‘इयवस्थानौ स्त्रीशब्दभिन्नौ नित्यत्री- लिङ्गावीदूतौ ङिति नदीसंज्ञो वा स्तः' इत्यर्थक "जिति' इत्येकं वाक्यम् । 'हस्वाविवर्णो- वौँ किति स्त्रियां नदीसंज्ञौ वा स्तः' इत्यर्थकं 'हस्वच' इत्यपरं वाक्यम् । तत्र 'नेय- अवङ्स्थानावस्त्री' इत्यतोऽनुवृत्ताऽस्त्रीति तु इयङवस्थानावित्यादिप्रथमवाक्यविहित- नदीत्वस्यैव पर्युदासः, न तु ह्रस्वावित्यादिद्वितीयवाक्यविहितनदीत्वस्याऽपि, तत्स- म्बद्धत्यैवानुवृत्तेः। मत्याम् ( ई० ३१, ३५, ४१, ४६, ५०, ५१ ) मतिशब्दात् सप्त- म्येकवचने डिविभक्तौ डिति हस्वच' इति नदीसंज्ञायाम् इदुद्भयाम्' इति डेरामि कृते स्थानिवद्भावेन ङित्वमादाय 'आपनद्याः' इत्याडागमे अनुबन्धलोपे 'श्राटश्च' इति वृद्धौ 'इको यणचि' इति यणि 'मत्याम्' इति । नदीसंज्ञाऽभावे 'शेषो ध्यसखि' इति विसंज्ञा- याम् 'अञ्च घेः' इति डेरौत्वे धेरकारादेशे च कृते 'वृद्धिरेचि' इति वृद्धौ ‘मतौ' इति । तिस्रः ( ई० ३३, ४३, ५२)–त्रिशब्दाजासि अनुबन्धलोपे 'त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतस्' इति त्रिशब्दस्थाने 'तिस्' इत्यादेशे तिस अस्' इति स्थिते 'ऋतो जीति गुणे प्राप्ते तम्प्रबाध्य 'प्रथमयोः' इति पूर्वसवर्णदीचे प्राप्ते तमपि प्रबाध्य 'अचि र ऋतः' इति ऋकारस्य रेफादेशे सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'तिखः' इति । (एवं शसि विभक्तावपि तिस्रादेशे सति दीर्घ बाधित्वा रेफादेश रत्वे विसर्गे 'तिस्त्रः' इति) तिसृणाम् (ई० ४२,४६,५५)-त्रिशब्दस्य षष्ठीबहुवचने 'त्रि आम्' इति स्थिते 'त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ' इति त्रिशब्दस्य स्थाने तिसृ' इत्यादेशे 'नुमचिरतृज्व- उकारसे पर लि को 'आम्' आदेश हो । त्रिचतुरोः-स्त्रीलिंगमें वर्तमान 'त्रि' और 'चतुर' शब्दके स्थानमें क्रमते तिसूचतस आदेश हो, विभक्तिके परे। अचिर-तिस और चतसू शब्दके ऋकारके स्थानमें रेफ आदेश हो, अच् के परे। गुणदी-'वि' और 'जस्' विभक्तिमें 'ऋतो डि' से प्राप्त गुण और 'शस्' में प्रथमयोः पूर्वसवर्णः से प्राप्त दीर्घ एवं 'हसि-ङस्' में 'ऋत उत्' से प्राप्त उत्का रेफादेश बाधक है। न तिस-तिस-चतर शब्दको नाम्के परे दीर्घ नहीं हो। ४ल० Lea । me । लघुसिद्धान्तकौमुदी गौरीवत् । एवं तरीतन्त्र्यादयः । स्त्री। हे त्रित्रियाः६181 | श्रीशब्दस्थे- यङ स्यादजादौ प्रत्यये परे। स्त्रियो। स्त्रियः । वाऽम्शसोः ६।४।८०॥ अमि शसि च स्त्रिया इयङ् वा स्यात् । स्त्रियम् । स्त्रीम् । स्त्रियः । स्त्रीः स्त्रिया । स्त्रियै। स्त्रियाः २। परत्वान्नुट् । स्त्रीणाम् । स्त्रियाम् । स्त्रीषु । श्रीः। श्रियौ। श्रियः । नेयङवस्थानावत्री १।४।४। इयङवडोः स्थितियोस्तावीदूतौ नदीसंज्ञौ न स्तो न तु स्त्री। हे श्रीः। श्रियै, थिये। श्रियाः, श्रियः। वाऽऽमि १।४।५। इयवस्थानौ स्त्र्याख्यौ यू आमि वा नदीसंज्ञौ स्तो न तु स्त्री। श्रीणाम् , श्रियाम् । श्रियि, श्रियाम् । धेनुर्मतिवत् । खियाञ्च ७।१।६६। द्भावेभ्यो जुट् पूर्वविप्रतिषेधेन' इति बलात् 'अचि र ऋतः' इति प्राप्तं रेफादेशं बाधित्वा 'हस्वनद्यापो नुट्' इति नुटि अनुबन्धलोपे 'नामि' इति दीर्व प्राप्ते 'न तिसूचतस्' इति निषेधे 'ऋवर्गानस्य णत्वं वाच्यम्' इति णत्वे तिसृणाम् इति । स्त्रियम् ( ई० ३८, ४७, ४९)-स्त्रीशब्दाद् द्वितीयैकवचने अमि 'स्त्री अम्' इति स्थिते 'वाऽम्शसोः' इत्यनेन इयडि अनुबन्धलोये स्त्रियम्' इति । इयभावे 'अमि पूर्वः' इति पूर्वरूपे 'स्त्रीम्' इति च भवति । स्त्रीणाम् (ई० ४५)-स्त्रीशब्दाद् आमि 'यू स्त्र्याख्यौ नदी' इति नदीसंज्ञायां 'हवनद्यापो नुट्' इति नुटि अनुबन्धलोपे पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्तिरिति 'नामि' इत्यनेन दीर्धे 'अटकुप्वानुम्व्यवायेऽपि' इति णत्वे 'स्त्रीणाम्' इति । श्रियै-श्रीशब्दात् डेविभक्तौ अनुबन्धलोपे 'यू स्त्र्याख्यौ नदी' इति नदीसंज्ञायां प्राप्तायां 'नेयवस्थानावस्त्री' इति निषेधे कृते 'जिति ह्रस्वश्च' इति विकल्पेन नदी- संज्ञायाम् 'प्राण्नद्याः' इत्याटि 'पाटश्च' इति वृद्धौ ‘अविश्नुधातुभ्रुवो वोरियकुचने' इति इयङि अनुबन्धलोपे श्रिय' इति । नदीत्वाऽभावे इयडि श्रिये' इति भवति । श्रीणाम् (ई० २१, ३६ ) श्रीशब्दाद् आमि 'वामि' इत्यनेन नदीसंज्ञायां तरीतन्त्र्यादयः-'अची-तन्त्री-तरी-लक्ष्मी-धी-ही-श्रीणामुणादिषु । समस्त्रीलिङ्गशब्दानां न सुलोपः कदाचन ॥' स्त्रिया:-'स्त्री' शब्दको इय हो, अजादि प्रत्ययके परे। वाऽम्-अम् और शस् विभ- क्तिके परे 'स्त्री' शब्दको इयङ् आदेश हो, विकल्पसे । नेयक-इय उवके स्थानी जो दीर्घ ईत्-ऊत् उनकी नदीसंज्ञा नहीं हो, 'स्त्री' शब्दको छोड़कर। अर्थात् 'स्त्री' शब्दको निषेध नहीं हो । वाऽऽमि-हयङ्--उवङ् स्थानी तथा नित्य स्त्रीलिङ्ग जो दीर्घ ईत्-ऊत् उनकी नदीसंज्ञा हो, 'आम्' विभक्तिके परे, विकल्पसे-'स्त्री' शब्दको छोड़कर । स्त्रियां च-स्त्रीवाची 'क्रोष्टु' शब्द तृजन्त (कोष्ट शब्द) के सदृश रूपको प्राप्त करे । अर्थात् अजन्तन.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। स्त्रीवाची क्रोष्टुशब्दस्तृजन्तवद्रूपं लभते । ऋन्नेभ्यो जीप ४।११५। ऋद- न्तेभ्यो नान्तेभ्यश्च स्त्रियां डीप स्यात् । क्रोष्ट्री । गौरीवत् । भ्रू-श्रीवत् । स्वयंभूः- धुंवत् । न षट्स्वस्रादिभ्यः ४।१।१०। षट्सझकेभ्यः स्वस्त्रादिभ्यश्च डीप्- रापो न स्तः। स्वसा तिस्रश्चतस्त्रश्च ननान्दा दुहिता तथा। याता मातेति सप्तैते स्वनादय उदाहृताः । स्वसा । स्वसारौ । माता-पितृवत् । शसि मातृः । शौर्गोवत् । राः-पुंवत् । नौग्लोवत् । इत्यजन्ताः स्त्रीलिङ्गाः । अथाजन्तनपुंसकलिङ्गप्रकरणम् अतोऽम् ७।१।२४। अतोनात् क्लीबारस्वमोरम् । अमि पूर्वः । ज्ञानम् । एहस्वादिति हल्मात्रलोपः। हे ज्ञान ! नपुंसकाच ७।१ । १६ । क्ली- ब्वात्परस्यौडः शी स्यात् । भसंज्ञायाम् । यस्येति च ६।४ । १४८1 ईकारे तद्धिते च परे भत्येवर्णाऽवर्णयोर्लोपः स्यात् । इत्यल्लोपे प्राप्त । औङःश्यां । 'हस्वनयापो नुट्' इति नुटि अनुबन्धलोरे 'नामि' इति दी 'अट्कुप्वानुम्व्यवा- येऽपि' इति णत्वे 'श्रीणाम्' इति । नदीत्वाऽभावपचे इयडि 'श्रियाम्' इति । क्रोष्ट्री-क्रोटुशब्दात् स्त्रोत्वविवक्षायां 'स्त्रियां च' इति तृज्वद्भावे 'क्रोष्ट' इति जाते 'ऋन्नेभ्यो डीप्' इति डोपि 'क्रोष्ट ई' इति स्थिते यणि 'क्रोष्ट्री' शब्दो निष्पन्नः, तस्मात् सौ 'हल्याब्भ्यो दोर्षात्सुतिस्यपृक्तं हल्' इति सुलोपे 'क्रोष्ट्री' इति । इति 'इन्दुमती'टीकायामजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरणम् । मुंलिङ्गके समान स्त्रोलिंगमें भी ऋकारान्त बन जावे । ऋल्ने-ऋदन्त और नान्त शब्दोंसे “डोप्' प्रत्यय हो, स्त्रीलिङ्गमें । न षट्-घट्संचक और स्वस्त्रादि (स्वस-तिस-चतस-नना- दु-दुहित-यातृ-मातृ ) शब्दोंसे डोप् और टाप् प्रत्यय नहीं हों। इस प्रकार 'इन्दुमतो' टीकामें अजन्तस्त्रीलिङ्ग प्रकरण समास हुआ। अतोऽमू-भदन्त क्लीब (नपुंसक) अंगसे पर 'सु' और 'अम्' को 'अम्' आदेश हो। नपुं-क्लीब अंगसे पर 'औ' के स्थानमें 'शो' आदेश हो । यस्येति-मसंज्ञक इवर्ण और अवर्णका लोप हो, ईकार और तद्धितके परे। औङ:--'औस्थानिक 'शी' के परे भसंशक लघुसिद्धान्तकौमुदी प्रतिषेधो वाच्यः । ज्ञाने। जश्शसोः शिः ७।१।२०। क्लीबादनयोः शि: स्यात् । शि सर्वनामस्थानम् १।१।४२ | शि' इत्येतत् सर्वनामस्थान- संज्ञं स्यात् । नपुंसकस्य झलचः ७१ १/७२ | मलन्तस्याऽजन्तस्य च क्लीब- स्य नुम् स्यात् सर्वनामस्थाने । मिदचोऽन्त्यात्परः १११।४७ | अचां मध्ये योऽन्त्यस्तस्मात्परस्तस्यैवान्तावयचो मित्स्यात् । उपधादीर्घः। ज्ञानानि । पुनस्त- द्वत् । शेषं पुंवत् । एवं धनवनफलादयः। अड्डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः ७१२२५ एभ्यः क्लीवेभ्यः स्वमोरादेशः स्यात् । टेः ६।४।१४३.1 डिति भस्य टेलोपः स्यात् । कतरत् । कतरद् । कतरे । कतराणि । हे कतरत् । शेषं पुंवत् । एवं कृतमत् । इतरत् । अन्यत् । अन्यतरत् । अन्यतमस्य त्वन्यतममित्येव । एकतरात्प्रतिषेधो वक्तव्यः । एकतरम् । ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदि. कस्य १ । २ । ४७ | क्लीबे प्रातिपदिकस्याऽजन्तस्य ह्रस्वः स्यात् है. श्रीपं-ज्ञानवत् । स्वमोनपुंसकात् ७ ॥ १॥ ७३ । क्लीबादशात्परयोः स्वमोलुक् । - ज्ञानानि (ई० २०, ३२, ४९ )-ज्ञानशब्दात् जसि शसि च विभक्तौ 'ज- श्शसोः शिः' इति जश्शसोः स्थाने श्यादेशे 'शि सर्वनामस्थानम् इति 'शि' इत्यस्य सर्वनामस्थानसंज्ञायां 'नपुंसकस्य मलचः' इत्यनेन 'मिदचोन्त्यात्परः' इति सूत्रसह- कारात् अन्त्याज्रूपस्य नस्यान्त्यावयवीभूते नुमि अनुबन्धलोपे 'सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ' इति उपधादीर्घ 'ज्ञानानि' इति । कतरत्-कतरशब्दात् सौ अमादेशं प्रबाध्य 'अद्डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः' इति 'सोः' अडि अनुबन्धलोपे भसंज्ञायाम् 'टेः' इति टेलोपे चत्वे 'कतरत्' इति । । इवर्ण-अवर्णका लोप नहीं हो। जश्श-क्लीन अंगसे पर जस्-शस्के स्थानमें 'शि' आदेश हो। शि सर्व-'शि' की सर्वनामस्थानसंज्ञा हो। नपुं-झलन्त और अजन्त क्लीबको नुमागम हो, सर्वनामस्थान के परे । मिद-अचोंके मध्यमें अन्त्य जो 'अच्' उससे पर और उसीके अन्त्यावयव होकर मित( नुमादि कार्य हों। अद्-डतरादि पाँचों क्लीव से पर जो 'सु' और 'अम्' उसको 'अ' आदेश हो। नोट:-डतरादिमें डतर-डतमप्रत्ययान्त और अन्य, अन्यतर, इतर ये पाँच हैं। टे:-मसंज्ञक 'टि' का लोप हो, 'डित् के परे। एकत-क्लीबमें वर्तमान 'एकतर' शब्दसे पर 'सु' और 'अम्' को 'अद्ड आदेश नहीं हो-ऐसा कहना चाहिये। इस्वो-क्लीवमें वर्तमान अजन्त प्रातिपदिकको हस्व हो। स्वमो-क्लीव अगसे पर 'सुन प्रजन्तन poroong ५३ । इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। स्यात् । वारि। इकोऽचि विभक्तौ ७।१।७३ | इगन्तस्य क्लीवस्य नुम् स्यादचि विभक्तौ । बारिणी । वारीणि । न लुमतेत्यस्याऽनित्यत्वात्पक्षे सम्बुद्धिनि- मित्तो गुणः । हे वारे-हे वारि । घेर्जितीति गुणे प्राप्ते-वृद्धयौत्वतृवद्भावगुणे- भ्यो नुम् पूर्वविप्रतिषेधेन | वारिणे । वारिणः २। बारिणोः २। नुमचिरेति जुट् । वारीणाम् । वारिणि । हलादौ हरिवत् । अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनदात्तः ७.१ । ७५! एषामनङ स्यावादावचि स चोदात्तः। अल्लोपोऽनः ६।४। १३४ । अङ्गावयवोऽसर्वनामस्थानयजादिस्वादिपरो योऽन् तस्याऽकारस्य लोपः स्यात् । दध्ना । दध्ने । दध्नः २ । दध्नोः २। दध्नाम् । विभाषा डिश्योः ६।४।१३६ । अङ्गावयवोऽसर्वनामस्थानयजादिस्वादिपरो योऽन् तस्याऽकारस्य लोपो वा स्यात् डिश्योः परयोः। दधिन-दनि । शेषं बारिवत् । एवमस्थि- वारिणे (ई० २४,४१,४३)–वारिशब्दाच्चतुर्थ्येकवचने घिसंज्ञायां घेिित' इति अबाध्य 'वृद्धयोत्त्वतृज्वद्भावगुणेभ्यो नुम्पूर्वविप्रतिषेधेनेति नुमि णत्वे 'वारिणे' इति । वारीणाम् ( ई० ३३,४५,५४ )-वारिशब्दात् षष्ठीबहुवचने नुटं बाधित्वा "इकोऽचि विभक्तौ' इति नुमि प्राप्ते 'नुमचिरतृवद्भावेभ्यो नुट्पूर्वविप्रतिषेधेन' इति जुटि अनुबन्धलोपे 'नामि' इति दी 'अटकुप्वाङ्' इति णत्वे तत् सिद्धम् । दना (ई० ३०,३७,४३,४८,५०,५२,५३ )-दधिशब्दाद्याविभक्तौ 'अस्थि- दधिसक्थ्यक्षणामनङदात्तः' इत्यनङि अनुबन्धलोपे 'यचि भम्' इति भसंज्ञायाम् "अल्लोपोऽनः' इति अनोऽकारस्य लोपे 'दथ्ना' इति । दधिन (ई० ४०,४४,४६,५४ )-दधिशब्दात् सप्तम्येकवचने हिविभक्तको और 'अम्' का लुक् हो । इको-इगन्त क्लीबको नुमागम हो, अजादि विभक्तिके परे । वृद्धधौ-वृद्धि, औत्त्व, तृज्वद्भाव और गुणकी अपेक्षा पूर्वविप्रतिषेधेन 'तुम्' ही होता है । नोट:-'अतिसखीनि' में 'सख्युरसम्बुद्धौ' से णिवद्भावात् प्राप्त वृद्धिको, 'वारिणि में पित्वात् 'अञ्च घेः' से प्राप्त औत्वको, 'प्रियक्रोष्ट्रनि' में प्राप्त तृज्वद्भावको और “वारिणे- वारिणः' में 'वेडिंति से प्राप्त गुणको बाधकर नुम् होता है। यही इस वार्तिकका उदाहरण समझना चाहिये । अस्थि-अस्थि, दधि, सक्थि और अक्षि शब्दको उदात्त अन आदेश हो, टादि अजादि विभक्तिके परे । अल्लो-अङ्गावयव, असर्वनामस्थान यादि तथा अजादि स्वादि प्रत्यय परक 'अन्' के अकारका लोप हो । विभा-अङ्गावयव, असर्वनामस्थान यादि तथा अजादि-स्वादि प्रत्यय परक 'अन् के अकारका लोप हो, 'डि' और 'शो' के परे विकल्पसे। नोट:-यजादिमें 'य अच् आदि' ऐसा है । अर्थात् यादि और अजादि । ( यज आदि यजादि स्वादि ऐसा अर्थ करना गलत है)।
News । लघुसिद्धान्तकौमुदी सक्थ्यक्षि ॥ सुधि । सुधिनी । सुधीनि । हे सुधे-हे सुधि । तृतीयादिषु भाषित- पुंस्कं पुंवद्गालवस्य ७११।७४ । प्रवृत्तिनिमित्तैक्ये भाषितपुंस्कृमिगन्तं क्ली पुंवद्वा स्याहादावचि । सुधिया-सुधिनेत्यादि । मधु । मधुनी। मधूनि । हे मधो- हे मधु । सुलु । सुलुनी । सुलूनि । सुल्वा-सुलुनेत्यादि । धातृ । धातृणी। धा- तृणि । हे धातः-हे धातृ । धात्रा-धातॄणा । धातृणाम् । एवं ज्ञात्रादयः । एच इग्नस्वादेशे श११४८/ आदिश्यमानेषु ह्रस्वेषु एच इगेव स्यात् । प्रद्यु। प्रधुनी । प्रानि । प्रधूनेत्यादि । प्ररि । प्ररिणी । परीणि । परिणा । एकदेशवि- कृतमनन्यवत् । प्रराभ्याम् । परीणाम् । सुनु । सुनुनी। सुनूनि । सुनुनेत्यादि । इत्यजन्तनपुंसकलिङ्गप्रकरणम् । । । OF0500 अनुबन्धलोपे 'अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनङदात्तः' इत्यनङि अनुबन्धलोपे 'विभाषा डिश्योः' इति अनोऽकारस्य लोपे 'दधिन' इति । लोपाभावपचे 'दधनि' इति । सुधिया-'सुष्टु ध्यायति' इति विग्रहे 'तृतीयादिषु भाषितपुंस्कं पुंवद्वालवस्य" इति सुध्यातृत्वस्य शोभनज्ञानवत्त्वस्य वा प्रवृत्तिनिमित्तस्य पुंसि नपुंसके च समानत्वात् गुंबद्भावेन हस्व-नुमोरभावे इयङि 'सुधिया' इति । पक्षे ह्रस्वे नुमि 'सुधिना' इति । पराभ्याम् ( ई० २८,४६ )-प्रकृष्टः सः धनं यस्येति बहुव्रीहौ प्ररैशब्दस्य 'हस्वो नपुंसके' इति हस्वे प्राप्ते 'एच इग्ध्रस्वादेशे' इति ऐकारस्य इकारे 'परि' इति तस्मात् भ्यामि एकदेशविकृतन्यायेन ‘रायो हलि' इत्यात्वे 'प्रराभ्याम्' इति । इति 'इन्दुमती'टीकायामजन्तनपुंसकलिङ्गप्रकरणम् । तृत्ती-प्रवृत्तिनिमित्त एक होने पर जो भाषितपुंस्क इगन्त क्लीब, उसको पुंवद्भाव (पुल्लिङ्ग के समान कार्य)हो, टादि-अजादि विभक्तिके परे विकल्पसे । नोट:-भाषितः पुमान् येन प्रवृत्तिनिमित्तेन तद् भाषितपुंस्कम् । अर्थात् नपुंसके लिङ्गान्तरे च यस्य एकमेव वाच्यतावच्छेदकं तच्छब्दस्वरूपं भाषितपस्कशब्देन विवक्षितम् । मधुना-'मधु मद्ये पुष्परसे'-'मधुर्वसन्ते चैत्रे च' इति कोशात् 'मधु' शब्दत्यः भाषितपुंस्कत्वेऽपि पुन्नपंसकयोः मधुत्व-वसन्तत्वादिरूपप्रवृत्तिनिमित्तभेदात 'तृतीयादिग्विति' न पुंवत्त्वम् । एच-हस्वताविधान होने पर 'एच' के स्थानमें 'इक' ही हस्व हो। अर्थात 'ए-ऐ के स्थान में और 'ओ-और के स्थानमें 'उ' ही हस्व हो। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें अजन्तनपुंसकलिङ्ग प्रकरण समाठ हुआ। PAHARANASI मान । । । । 2. अथ हलन्तपुंल्लिङ्गप्रकरणम् पर ढः८/२/३१ | हस्य ढः स्याज्मलि पदान्ते च । लिट-लिड्। लिहौ । लिहः । लिहा। लिड्भ्याम् । लिटत्सु-लिट्सु । दादेर्धातोर्षः ।२। ३२ | उपदेशे दादेर्धातोहस्य घः स्याज्झलि पदान्ते च । एकाचो बशो भ भषन्तस्य स्ध्वोः ८।२। ३७ ! धात्ववयवस्यैकाचो मषन्तस्य बशो भए स्यात् से ध्वे पदान्ते च । धुक्-धुम् । दुहौ । दुहः । धुग्भ्याम् । धुक्षु । वा द्रहमुहष्णु- हष्णिहाम् ८।२।३३। एषां हस्य वा वः स्याज्मलि पदान्ते च । ध्रुक् ध्रुग् , ध्रुट , ध्रुड्। द्रुहौ । द्रुहः । ध्रुग्भ्याम्-ध्रुड्भ्याम् । ध्रुक्षु, ध्रुट्त्सु, ध्रुट्स । एवं-मुक् , मुग , मुट् , मुड इत्यादि । धात्वादेः षः सः ६श६४ धातोरादेः षस्य सः स्यात् । स्नुक् , स्नुग , स्नट् , स्नुड् । एवं-स्निक् , स्निग, स्निट् , स्निड् । विश्ववाट । विश्ववाड् । विश्ववाहो । विश्ववाहः । विश्ववाहम् । विश्ववाहौ। इग्यणः सम्प्रसारणम् १।१।४५। यणः स्थाने प्रयुज्यमानो य इक् स सम्प्र- सारणसंज्ञः स्यात् । वाह ऊठ ६४।१३२। भस्य वाहः सम्प्रसारणमूठ स्यात् । सम्प्रसारणाच्च ६१११०८ सम्प्रसारणादचि परे पूर्वरूपमेकादेशः स्यात् । एत्ये धत्यूठस्विति वृद्धिः । विश्वौहः, इत्यादि । चतुरनबुहोरामुदात्तः ७ | १ | ६८.! लिट्त्सु ( ई० २०, ३५)-लिहशब्दात्सुपि 'हो ढः' इत्यनेन हस्य ढत्वे 'झलां जशोऽन्ते' इत्यनेन ढस्य जश्त्वेन डकारे 'डः सि धुट' इति डस्य धुटि अनु- बन्धलोपे 'खरि च' इत्यनेन धस्य चर्चेन तकारे पुनः 'खरि च' इति डस्य चत्वेन टकारे 'लिटत्सु' इति । धुडभावपक्षे 'लिट्स' इति । विश्वौहः ( ई० ३२, ३९, ४२, ४५, ४७, ४९, ५३, ५५ )-विश्ववाह- शब्दाच्छसि अनुबन्धलोपे 'यचि भम् इत्यनेन भसंज्ञायां 'वाह ऊ' इत्यनेन 'इग्यणः हो ढा-हकारक स्थानमे ढकार आदेश हो, 'झल' के परे, पदान्तमें। दादे-उपदेश अवस्थामें दादिशातुसम्बन्धी हकारके स्थानमें धकार आदेश हो, 'झल' के परे, पदान्तमें। एकाचो-धात्ववयव जो झपन्त एकाच , तदवयव जो 'वश्' उसको भष्माव हो, सकार और 'ध्व' शब्दके परे, पदान्तमें । वा दु-द्रुह, मुह, गुड् और ष्णि धातुके इकारको धकार आदेश हो, विकल्पसे, 'झल' के परे, पदान्तमें। चावा-उपदेश अवस्थामें धातुके आदि षकारको सकार आदेश हो। इग्यण:-'यण' के स्थानमें प्रयुज्यमान जो 'इक्' वह सम्प्रसारणसंशक हो। चाह ऊट-भसंञ्चक 'वाह' को सम्प्रसारणसंञ्चक 'ऊठ' आदेश हो । सम्प्र-सम्प्रसारणसे 'अच्' परमें रहनेसे पूर्व परके स्थानमें पूर्वरूप एकादेश हो। चतु-'चतुर्!
। । लघुसिद्धान्तकौमुदी अनयोराम् स्यात्सर्वनामस्थाने परे। सावनडुहः ७१।०२। अस्य नुम् स्यात् सौ परे । अनड्वान् । अम् सम्बुद्धौ ७ | १ | ६६ | चतुरनडहोरम् स्यात् सम्बुद्धौ । हे अनड्वन् । हे अनड्वाही । हे अनड्वाहः । अनडुहः । अनडहा । वसुलंसुध्वं- स्वनडुहां दः ८२।७२। सान्तवस्वन्तस्य ख्रसादेश्व दः स्यात्पदान्ते । अनडुझ्या- मित्यादि। सान्तेति किम् ? विद्वान् । पदान्तेति किम् ? खस्तम् । चस्तम् । सहेः साडः सः८३५६। साड्पस्य सहेः सस्य मूर्धन्यादेशः स्यात् । तुराबाट तुराषाड् । तुरासाहौ। तुरासाहः । तुराषाड्भ्यामित्यादि । दिव औत् ७१८४ दिविति प्रातिपदिकस्यौत्स्यात्सौ परे । सुद्यौः । सुदिवौ । दिव उतू ६।१। १३१ दिवोऽन्तादेश उकारः स्यात् पदान्ते । सुयुभ्यामित्यादि । चत्वारः । चतुरः । चतुर्भिः । चतुर्व्यः २ । षट्चतुर्व्यश्व ७१।५५ षट्संज्ञकेभ्यश्चतुरश्च परस्याऽऽमो नुडागमः स्यात् । रषाभ्यां नो णः समानपदे ८।४।श रेफषकाराभ्यां परस्य नस्य णः स्यादेकपदे । अचो रहाभ्यां द्वे ८।४।४६ । अचः पराभ्यां रेफहका- राभ्या परस्य यरो द्वे वा स्तः। चतुर्णाम् । चतुर्णाम् । रोः सुपि ॥३॥ १६ ॥ सप्तमीबहुवचने रोरेव विसर्जनीयो नान्यरेफस्य । षत्वम् । षस्य द्वित्वे प्राप्ते । शरोड- सम्प्रसारणम्' इति बलात् वरूपस्य यणः स्थाने उकाररूपे सम्प्रसारणे 'सम्प्रसार- णाच' इति पूर्वरूपे 'एत्येधत्यूठसु' इति वृद्धौ सस्य रुत्वे विसर्गे 'विश्वौहः' इति । अनड्वान ( ई० ४१, ४८, ५१ )-अनडुशब्दात् प्रथमैकवचने 'चतुरनड्डहोरामुदात्तः' इत्यनेन श्रामि अनुबन्धलोपे 'सावनडुहः' इत्यनेन नुमि अनु- बन्धलोपे हल्ङयादिना सलोपे 'संयोगान्तस्य लोपः' इति हकारस्य लोपे तत्सिद्धिः। चतुर्णाम् (ई० ३७, ३८, ५०)-चतुर्शब्दादामि 'षट्चतुर्व्यश्च' इति नुटि और 'अनडुङ्' शब्दको 'आम्' का आगम हो, सर्वनामस्थानके परे । साव-'अनडुङ्! शब्दको 'तुम्' का आगम हो-'सु' के परे । अम्स-'चतुर्' और 'अनडुह' शब्दको 'अम्' का आगम हो, सम्बुद्धिके परे । वसुलं-सान्त जो वस्वन्त और संसादि (स्वस्-ध्वंस्- अनडुङ् ) उसको दकार आदेश हो, पदान्तौ । सहे:-'सा' रूप (बनजाने पर ) सहके सकारके स्थानमें मूर्धन्य षकार आदेश हो। दिव-'दिव्' प्रातिपदिकको 'औ* आदेश हो, 'सु' के परे । दिव उत्-'दिव् प्रातिपदिकको उकारान्त आदेश हो, पदान्तमें। षट्- षट्संज्ञक और 'चतुर्' शब्द से पर 'आम्' को 'नुट्' हो । रषा-रेफ और षकारसे पर नकारको णत्व (णकार) हो, समान पदमें । अचो-'अच्' से पर जो रेफ-हकार, उससे पर जो 'यर्' उसको द्वित्व हो, विकल्पसे । रोः सुपि-सप्तमी बहुवचन 'सुप्' विभक्तिके परे ।
'रुसम्बन्धी रेफके स्थानमें ही विसर्ग हो-अन्य रेफको नहीं। मो के परे। इदोऽय---'इदम्' सम्बन्धी 'इद् के स्थान में 'अया। हलन्तपु०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। चि-81। अचि परे शरो न द्वे स्तः । चतुर्थे । मोनो धातोः ८२६४ धातोमस्य नः स्यात् पदान्ते । प्रशान् । किमः कः ७२।१०३ किमः कः स्या- द्विभक्तौ । कः । की। के। कम् । को। कान् । इत्यादि । शेषं सर्ववत् । इदम्रो मः ७२।१०८। इदमो दस्य मः स्यात् सौ परे । त्यदायत्वापवादः । इदोऽय पुंसि ७।२।१११ । इदम इदोऽय् स्यात् सौ पुंसि । सोर्लोपः। अयम् । त्यदाद्यत्त्वे । अतो गुणे ६॥ ११६७ अपदान्तादतो गुणे परतः पररूपमे- कादेशः स्यात् । दश्च ७२।१०६॥ इदमो दस्य मः स्याद्विभक्तौ । इमौ । इमे । त्यदादेः सम्बोधनं नास्तीत्युत्सर्गः। अनाप्यकः ७।२।११२। अककारस्येदम इदोऽन् स्यादापि विभक्तौ । आबिति प्रत्याहारः। अनेन । हलि लोपः ७२।११३॥ अक- कारस्येदम इदो लोपः स्यादापि हलादौ । नाऽनर्थकेऽलोऽन्त्यविधिरनभ्यासविकारे । आद्यन्तवदेकस्मिन् श२।२१। एकस्मिन्क्रियमाणं कार्यमादाविवाऽन्त इव स्यात् । अनुबन्धलोपे 'रषाभ्याम्' इति णत्वे 'अचो रहाभ्यां द्वे' इति द्वित्वे तत्सिद्धिः । चतुषु ( ई० ४४ )-चतुर्शब्दात् सुपि रेफस्य विसर्गे प्राप्ते 'रोः सुपि' इति निषेधे षत्वे 'अचो रहास्यां द्वे' इति द्वित्वे प्राप्ते 'शरोऽचि' इति निषेधे तत्सिद्धिः । अयम् ( ई० ५१)-इदम्शब्दात् सौ अत्वं प्रबाध्य 'इदमो मः' इत्यनेन इदमो मस्य मत्वे 'इदोऽय् पुंसि' इतीद्भागस्य अयादेशे सलोपे 'अयम्' इति । मकारको नकार आदेश हो, पदान्तमें। किम:-'किम्' के स्थानमें 'क' आदेश हो, विम- क्तिके परे। इदमो-'इदम्'शब्दसम्बन्धी मकारके स्थानमें, मकार ही आदेश हो, 'सु' में। अतो-अपदान्त 'अत्' ( हस्व अकार ) से पर गुण (अ-ए ओ) को परे पूर्व-परके स्थानमें पररूप एकादेश हो। दश्व-'इदम्' शब्द संबन्धी दकारके स्थानमें मकार आदेश हो । (सुभिन्न ) विभक्तिके परे। अनाय-कार रहित जो इदम्' शब्द सम्बन्धी 'इ? उसको 'अन् । आदेश हो, आप ( तृतीयादि) विभक्तिके परे । हलि-ककार रहित 'इदम् शब्द सम्बन्धी 'इद्' का लोप हो, हलादि तृतीयादि विभक्तिके परे । नानर्थके-अभ्यासवि- कारको छोड़कर अनर्थकमें 'अलोन्त्य परिभाषा की प्रवृत्ति नहीं हो। आद्यन्त--एकस्मिन् अर्थात् असहायमें क्रियमाण जो कार्य वह आदि तथा अन्त की तरह हो । नोट:-तदादि और तदन्तको क्रियमाण जो कार्य वह तदादि और तदन्तकी तरह असहाय (एक) को भी हो ( यथा-'देवदत्तस्यैक एव पुत्रः, स एव ज्येष्ठः, स एव कनिष्ठः, स एव मध्यमः)। New .
लघुसिद्धान्तकौमुदी सुपि चेति दीर्घः । श्राभ्याम् । नेदमदसोरको ७१११११ अककारयोरिदमदसो- भिस ऐस् न स्यात् । एभिः। अस्मै। आभ्याम् । एभ्यः। श्रस्मात् । श्रा- भ्याम् । एभ्यः । अस्य । अनयोः । एषाम् । अस्मिन् । अनयोः । एषु। द्विती- याटौस्स्वेनः २।४।३४ा द्वितीयायां टोसोश्च परत इदमेतदोरेनादेशः स्यादन्वादेशे। किश्चित्कार्य विधातुमुपात्तस्य कार्यान्तरं विधातुं पुनरुपादानमन्वादेशः । यथा अनेन व्याकरणमधीतमेनं छन्दोऽध्यापयेति । अनयोः पवित्रं कुलमेनयोः प्रभूतं स्वमिति । एनम् । एनौ । एनान् । एनेन । एनयोः। एनयोः । राजा। न डिस- आभ्याम् ( ई० ४४ )-इदम् शब्दात् भ्यामि विभक्तौ अत्त्वे पररूपे 'इद- भ्याम् इति जाते 'हलि लोपः' इत्यनेन 'अलोन्त्यस्येति परिभाषया अन्त्यस्य दकारस्य लोपे प्राप्ते 'नानर्थकेऽलोन्त्यविधिरनभ्यासविकारे' इति परिभाषया अलो- न्त्यविध्यभावे इद्भागस्यैव लोपे 'आभ्याम्' इति स्थिते 'आद्यन्तवदेकस्मिन्' इत्ये- कस्मिन्नेवाऽकारे अन्तवद्भावेनादन्तत्वं मत्वा सुपि चेति दीर्घ 'श्राभ्याम्' इति । नेद-ककार रहित 'इदम्' और 'अदस्' शब्दसंबन्धी 'मिस्' को 'ऐस्' नहीं हो। नोट:-इदम्' शब्द पासमें स्थित किसी मनुष्य या वस्तुके लिये तथा एतत् शब्द अत्यन्त समीपवर्ती मनुष्य या वस्तु के लिये प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार दूर स्थित प्रत्यक्षके लिये 'अदम' शब्द और अप्रत्यक्षके लिये 'तत्' शब्दका प्रयोग होता है। कहा भी है- 'इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्तिन्येतदो रूपम् । असस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥' द्विती-'द्वितीया विभक्तिके परे तथा 'टा' और 'ओस्' विभक्तिके परे 'इदम् शब्द को एन आदेश हो, अन्यादेशमें। किंचित्-किसी कार्यके विधानके लिये जिसका उपादान किया गया हो, उसीका कार्या- न्तरविधानके लिये पुनः उपादान करना 'अन्वादेश' कहा जाता है । यतो-(१) अनेन 'व्याकरणमधीतम् , (२) एनं छन्दोऽध्यापय । अर्थात् इसने व्याकरण पढ़ लिया, इसे वेद पढ़ाइये । यहाँ पहले व्याकरणाध्ययन रूप कार्यका विधान किया गया था और पुनः उसीके . विषयमें वेद पढ़ाना रूप अन्य कार्यका उपादान किया जा रहा है। अतः दूसरे वाक्यमें 'अन्वादेश' है। इसलिये यहाँ 'एनम् का प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार (१) अनयोः पवित्रं कुलम् (२) एनयोः प्रभूतं स्वम्' यहाँ पहले वाक्यमें कुलकी पवित्रता का विधान करनेके हेतु ग्रहण किये हुए का दूसरे वाक्यमें धनकी अधिकताका विधानके लिये फिर उपादान होने के कारण 'अन्वादेश' हो जानेसे 'एन' आदेश हुआ।न डिनकारका लोप ।
हलन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। म्बुद्धयोः ।।८। नस्य लोपो न स्यान्डौ सम्बुद्धौ च । हे राजन् ! सावुत्त- श्पदे प्रतिषेधो वक्तव्यः । ब्रह्मनिष्ठः । राजानौ । राजानः। राज्ञः । नलोप:- सुप्स्वरसंज्ञातुग्विधिषु कृति ८।२।२। सुविधौ स्वरविधौ संज्ञाविधौ कृति तुश्विधौ च नलोपोऽसिद्धो नान्यत्र-राजाश्व इत्यादौ । इत्यसिद्धत्वादात्वमेवमैस्त्वञ्च न-राजभ्याम् , राजभिः । राजभ्यः । राशि-राजनि राजसु । यज्वा । यज्वानी।। यज्वानः । न संयोगाद्वमन्तात् ६।४।१३७ वकारमकारान्तसंयोगात्परस्याऽनोऽ- कारस्य लोपो न स्यात् । यज्वनः । यज्वना। यज्वभ्याम् । ब्रह्मणः। ब्रह्मणा इन्हन्पूषाऽर्यम्णां शौ ६ । ४ । १२ । एषां शावेवोपधाया दीर्घो नाऽन्यत्र । इति निषेधे प्राप्ते । सौ च ६।४।१३। इन्नादीनामुपधाया दीर्घः स्यादसम्बुद्धौ सौ परे । कृत्रहा । हे वृत्रहन् । एकाजुत्तरपदे णः ८४।१२। एकाजुत्तरपदं यस्य तस्मिन्स- मासे पूर्वपदस्थानिमित्तात्परस्य प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तिस्थस्य नस्य णः स्यात् । वृत्रहणौ । हो हन्तेष्णिन्नेषु ७।३।५४ निति णिति च प्रत्यये नकारे च परे है- न्तेहकारस्य कुत्वं स्यात् । वृत्रन्नः-इत्यादि । एवं शाझ्न् ि। यशस्विन् । अर्थमन् । राज्ञः (ई० ३३, ५६)-'राजन्' शब्दाच्छसि अनुबन्धलोपे 'राजन् अस्' इति स्थिते 'यचि भम्' इति भसंज्ञायाम् 'अल्लोपोऽनः' इति जकारोत्तरवर्त्यकारस्य लोपे 'स्तोः श्चुना श्चुः' इति नस्य श्चुत्वेन अकारे सस्य रुत्वे विसर्गे 'राज्ञः' इति । यज्वनः (ई० २०, २२)-'यज्वन्' शब्दाच्छसि विभक्तौ 'यचि भम् इत्यनेन भसंज्ञायाम् अल्लोपोऽनः' इत्यल्लोपे प्राप्ते न संयोगाद्वमन्तात् इति निषेधे सकारस्य रत्वे विसर्गे यज्वनः इति सिद्धम् । वृत्रन्नः ( ई० २१, २५, ३९, ५४ )-'वृत्रहन्' शब्दाच्छसि अनुबन्धलोपे नहीं हो कि और सम्बुद्धिके परे। डावु-उत्तरपदपरक 'वि' के परे नलोपका प्रतिषेध हो । अर्थात् 'न सिम्बुद्धयोः' यह निषेध नहीं लगे। नलोप-सुविधि, स्वरविधि, संज्ञा- विधि, और कृतप्रत्ययके परे तुग्विधि कर्त्तव्यमें नलोप असिद्ध हो, अन्यत्र (राजाश्व इत्यादि. स्थलमें) नहीं। न संयो-वकारान्त और मकारान्त संयोगसे पर 'अन्' के अकारका लोप नहीं हो। इन्हन्-इन् , हन् , पूषन् और अर्थमन्की उपधाको दीर्घ हो शि के परे ही अन्यत्र (दण्डिनी-वृत्रहणौ' इत्यादि स्थलमें) नहीं। सौच-इनादिको उपधाको दीर्घ होर मसंबुद्धि 'सु' के परे । एकाजु-एक 'अच्' है उत्तरपदमें जिस समासके ऐसा जो समास, उस समासमें पूर्वपदस्थ निमित्त (रेफ-षकार)से पर जो प्रातिपदिकान्त नकार, नुम्घटक नकार और विभक्तिस्थ नकार उसको णकार हो। हो हन्ते-मित्-णित् प्रत्ययके परे और 17 MACame । । - लघुसिद्धान्तकौमुदी पूषन् । मघवा बहुलम् ६४। १२८ मघवन्शब्दस्य वा तृ' इत्यन्तादेशः स्यात् । इत् । उगिदचा सर्वनामस्थानेऽधातोः ७११७०/ अधातोरगितो नलोपि- नोऽञ्चतेश्च नुमागमः स्यात्सर्वनामस्थाने परे । मघवान् । मघवन्तौ। मघवन्तः । हे मघवन् । मघवयाम् । तृत्वाऽभावे-मघवा । सुटि-राजवत् । श्वयुवमघोनाम- तद्धिते ६।४।१३३ अञ्चन्तानां भसंज्ञकानामेषामतद्धिते परे सम्प्रसारणं स्यात् । मघोनः । मघवभ्याम् । एवं श्वन् । युवन् । न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् ६।११ ३७/ सम्प्रसारणे परतः पूर्वस्य यणः सम्प्रसारणं न स्यात् । इति यकारस्य नेत्वम् । अत एव ज्ञापकादन्त्यस्य यणः पूर्व सम्प्रसारणम् । यूनः । यूना। युवभ्याम्- इत्यादि । अर्वा । हे अर्वन् । अर्वणनसावनमः ६॥ ४॥ १२७ नया रहितस्या- चित्यस्याऽङ्गस्य 'तृ' इत्यन्तादेशः स्यात् सौ । अर्वन्तौ । अर्वन्तः । अर्वद्भयामि- "यचि भम्' इति भसंज्ञायाम् 'अल्लोपोऽनः' इत्यनोऽकारस्य लोपे 'हो हन्तेणिन्नेषु' इत्यनेन नकारे परे हकारस्य कुत्वेन धकारे सत्य सत्वे विसर्गे 'वृत्रघ्नः' इति । मघवान् ( ई० २८, २९)-'मघवन्' शब्दात्सौ 'मघवा बहुलम्' इत्यनेन विभाषया 'तृ' इत्यन्तादेशे अनुबन्धलोपे 'उदिगचा सर्वनामस्थानेऽधातोः' इति नुमि उमि गते 'हल्ङयाभ्यः' इति सलोपे 'संयोगान्तस्य लोपः' इति तलोपे मचा बहुलम्' इति सूत्रस्थबहुलग्रहणात् संयोगान्तलोपस्याऽसिद्धत्वाभावेन नान्तस्योप- धायाः दीर्घे 'मघवान्' इति । तृत्वाऽभावे तु सुलोपे, दीर्धे नलोपे 'मघवा' इति । मघोनः (ई० २०, ४३, ४८, ५७)--'मघवन्' शब्दाच्छसि भसंज्ञायाम् श्वयुवमघोनामतद्धिते' इति सम्प्रसारणे 'सम्प्रसारणाच' इति पूर्वरूपे 'आद्गुणः' इति गुणे सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'मघोनः' इति तृत्वाऽभावे रूपं सिद्धम् । ४१,४६)-'युवन् अस्' इति स्थिते 'यचि भम् इति भसंज्ञायां श्वयुवमघोनामतद्धिते' इति वकारस्य सम्प्रसारणे 'सम्प्रसारणाच' इति पूर्वरूपे 'यु उन् अस्' इति दशायां यकारस्याऽपि सम्प्रसारणे प्राप्ते 'न सम्प्रसारणे सम्प्रसा- हणम्' इति निषेधे सवर्णदीर्घे सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'यूनः' इति । नकारके परे 'हन्' धातुके हकारको कुत्व हो । मधवा-'मघवन्' शब्दको 'त' अन्तादेश हो विकल्पसे । उगि-धातुभिन्न जो 'उगित्' और नलोपी जो 'अन्' धातु उसको नुम्का आगम हो, सर्वनामस्थानके परे। श्वयुच-अन्नन्त-भसंशक चन्-युवन्-मघवन्' रूप अङ्ग को संप्रसारण हो, तद्धितभिन्न प्रत्ययके परे। न सम्म-सम्प्रसारणके परे पूर्व 'यण' को सम्प्रसारण नहीं हो। अर्वण:-'न' रहित 'अर्वन्' शब्दको 'त' अन्तादेश हो, 'सुमिन यूनः (ई.
हलन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। ६३ त्यादि । पथिमथ्यभुक्षामात ७।११८२ एषामाकारोऽन्तादेशः स्यात् सौ परे । इतोऽत्सर्वनामस्थाने ७६ पथ्यादेरिकारस्याऽकारः स्यात्सर्वनामस्थाने परे । थो न्थः ७१ श८७ पथिमथोस्थस्य न्यादेशः स्यात् सर्वनामस्थाने परे । पन्थाः पन्थानौ । पन्थानः । भस्य टेर्लोपः ७।१।८। भसञ्जकस्य पथ्यादेष्टेर्लोपा स्यात् । पथः । पथा। पथिभ्याम् ॥ एवं मथिन् । ऋभुक्षिन् । ष्णान्ता षट् ॥ १॥ २४। षान्ता नान्ता च सङ्ख्या षट्संज्ञा स्यात् । पञ्चन्शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । पञ्च २ । पञ्चभिः । पञ्चभ्यः-पञ्चभ्यः । नुट् । नोपधायाः ६।४।७। नान्तस्योप- धाया दीर्घः स्यानामि परे। पञ्चानाम् । पञ्चसु । अष्टन आ विभक्तौ ७२।४। अष्टन आत्वं वा स्याद्धलादौ विभक्तौ । अष्टाभ्य औश् ७।१।२१ कृताऽऽकारा- दष्टनः परयोर्जश्शसोरोश् स्यात् । 'अष्टभ्य इति वक्तव्ये कृताऽऽत्त्वनिर्देशो जश्शसी- बिषये श्रात्वं ज्ञापयति । अष्टौ २ । अष्टाभिः । अष्टाभ्यः २॥ अष्टानाम् । अष्टासु पन्थाः (ई० ३३, ४३)-'पथिन्' शब्दात्सौ 'पथिमथ्यभुक्षामात्' इत्यात्वे 'इतोत्सर्वनामस्थाने' इति थकारोत्तरवर्तीकारस्याकारे 'थो न्थः' इत्यनेन थकारस्या न्यादेशे सवर्णदीर्घे सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'पन्थाः' इति । अष्टौ (ई० ३०, ४३, ५२)'अष्टन्' शब्दात् जसि शसि च विभक्तों 'अष्टन आ विभक्तो' इति नकारस्यात्वे सवर्णदीधै 'अष्टाभ्य औश्' इत्यौशि अनुबन्धलोपे 'वृद्धिरेचि' इति वृद्धौ ‘अष्टौ' इति । ननु हलादावात्वस्य विधानेन कथमत्र अजादावात्वमिति चेन्न, एकमात्रालाघवेन 'अष्टभ्य औश्' इति वक्तव्ये 'अष्टाभ्य' इति दीर्वोच्चारणं कचिदजादावपि 'अष्टना विभक्तो' इति सूत्रविहितमात्वं भवतीति ज्ञापनेनादोषात् । अष्टानाम् ( ई० ३१)--'अष्टन्' शब्दात् षष्ठीबहुवचने 'ष्णान्ता षट्' इति षट्संज्ञायां 'षट्चतुर्म्यश्च' इति नुटि अनुबन्धलोपे 'अष्टन आ विभक्तौ' इति पाक्षिके विभक्तिके परे। पथि-पथ्यादि (पथिन्-मथिन्-ऋमुक्षिन्) शब्दोंको आकारान्त आदेश हो, सु' के परे। इतोऽत-पथ्यादिके इकारको अकार आदेश हो, सर्वनामस्थानके परे। थो न्थ:--पथिन्-मथिन् शब्दोंके थकारको 'थ' आदेश हो, सर्वनामस्थानके परे । भल्य-मसंज्ञक पथ्यादिके 'टि' का लोप हो। णान्ता-पान्त-नान्त संख्यावाचक शब्द घट्संज्ञक हो । नोप-नान्तकी उपधाको दीर्घ हो, 'नाम्' के परे । अष्टन-अष्टन् शब्दको आत्व हो, हलादि विभक्तिके परे, विकल्पसे । अधा-कृताकारक "अष्टन्' शब्दसे पर 'जस्- ।
EKHARELIANCream । ६२ लघुसिद्धान्तकौमुदी श्रात्वाऽभावे-श्रष्ट, अष्ट इत्यादि पश्चवत् । ऋत्विग्दधृक्नन्दिगुष्णिगञ्चुयुजिक- ञ्चाश्च ३।२। ५६ | एभ्यः क्विन् स्यात् , अञ्चः सुप्युपपदे, युजिकञ्चोः केवलयोः । कुञ्चेर्नलोपाऽभावश्च निपात्यते । कनावितौ । कृदति ३११।१३। अत्र सन्निहिते - धात्वधिकारे तिभिन्नः प्रत्ययः कृत्संज्ञः स्यात् । वेरपृक्तस्य ६॥ १॥ ६७ अपृक्तस्य घस्य लोपः स्यात् । किन्प्रत्ययस्य कु. दारा क्विन्प्रत्ययो यस्मात्तस्य कवर्गोs- न्तादेशः स्यात् पदान्ते । अस्याऽसिद्धत्वाचोः कुरिति कुत्वम् । ऋविक्-ऋत्विम् । श्रात्वे सवर्णदीचे 'अष्टानाम्' इति । आत्वाऽभावेऽपि षट्संज्ञायां नुटि अनुबन्धलोपे नोपधायाः' इति दीर्चे नलोपे 'श्रष्टानाम् इति । ऋत्विक्-ऋतावुपपदे 'युज्' धातोः 'ऋत्विग्दधृक्' इत्यादिना क्विनि 'लशक- तद्धिते' इत्यनेन ककारस्य हलन्त्यम्' इत्यनेन नकारस्य च इत्संज्ञायां लोपेच कृते इकारस्योच्चारणार्थत्वेन तस्मिन् गते क्विनो वकारस्य 'अपृक्त एकालप्रत्ययः' इत्यपृक्तसंज्ञायां 'वेरपृक्तस्य' इत्यपृक्तसंज्ञकस्य वस्य च लोपे विनः सर्वाऽपहारे जाते 'वचिस्वपियजादीनां किति' इति सम्प्रसारणे 'सम्प्रसारणाच' इति पूर्वरूपे यणि प्रत्विज्' इति स्थिते 'कृदति' इति सूत्रेण कृत्संज्ञायां 'कृत्तद्धितसमासाच' इति कृदन्तत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञायां सौ अनुबन्धलोपे हल्ङ्यादिना सलोपे 'विन्प्रत्ययस्य कुः' इति जकारस्य कुत्वेन गकारे 'वाऽवसाने' इति तस्य चत्वैन ककारे 'ऋत्विक इति । -शस्' को 'और' आदेश हो। ऋत्विग्-'ऋत्' शब्दपूर्वक यज्-धातु, धृष्-धातु, सृज्- धातु, दिश्-धातु, उत्पूर्वक स्निह-धातु, अन्च्-धातु, युज् धातु, और क्रुन्-धातुओंसे 'क्विन् प्रत्यय हो। नोट:-'अन्' धातुसे सुबन्त उपपद रहने पर ही 'किन्' प्रत्यय होता है, 'युज्' और 'झुन्' धातुओंसे केवल अर्थात् उपपद रहित होने पर ही 'किन्' प्रत्यय होता है और "कुञ्च् धातु में 'किन्' प्रत्ययविधानके साथ २ सूत्रोक्त प्रकारसे 'अनदिताम्-' से प्राप्त नलोपामावका भी निपातन होता है। लक्षणं विनैव निपतति प्रवर्तते यत्तन्निपात- -नम्'-जो कार्य विना सूत्र नियमका होता है वह 'निपातन' कहा जाता है। कृदतिङ्-इस (संनिहित) धात्वधिकारमें तिङ्-भिन्न जो प्रत्यय वह कृत्संशक हो । नोट:-'धातोः इस सूत्रके अधिकारमें धातु से पर प्रत्ययों का विधान है। उनमें 'ति' प्रत्ययों को छोड़कर शेषको कृत्संज्ञा होतो है। फल यह हुआ कि 'किन्' प्रत्यय 'धातोः के अधिकारमें है। इसलिये इसकी कृत्संशा हुई और कृत्संशा होने पर कृदन्त होनेसे प्रातिपदिक- मंज्ञा होकर सु-आदि विमक्तिको उत्पत्ति हुई। वेर-अपृक्तसंज्ञक वकारका लोप हो। क्विन्प्रत्य-किन् प्रत्यय जिससे विधान किया जाय उसको कवर्गान्तादेश हो, पदान्तमें।
oras SHRESS । - । हलन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोयेता। ऋत्विजौ। ऋत्विजः । ऋत्विग्भ्याम् । युजेरसमाले ७।१।७१ | युजेः सर्व- नामस्थाने नुम् स्यादसमासे । सुलोपः । संयोगान्तलोपः । कुत्वेन नल्य कः । अनुस्वारपरसवर्णों । युञ्जौ । युञ्जः । युग्भ्याम् । चोः कुः दा२।३०। चवर्गस्य कवर्ग: स्याज्झलि पदान्ते च । सुयुक्-सुयुग् । सुयुजौ। सुयुग्भ्याम् । खन् । खौ। खन्भ्याम् । प्रश्वभ्रस्जसृजभृजयजराजभ्राजच्छशांषः ८२।३६॥ प्रश्चादीनां सप्तानां छशान्तयोश्च षकारोऽन्तादेशः स्यात् मलि पदान्ते च । जस्त्वच।। राट् , राड् । राजौ । राजः । राड्भ्याम् । एवं विभ्राट् । देवेट् । विश्वसुट् । परौ बजेः पः पदान्ते । परावुपपदे व्रजेः विप् स्याहीर्घश्च पदान्ते षत्वमपि । परित्राट् । परि- बाजौ । विश्वस्य वसुराटोः ६॥ ॥ १२८ विश्वशब्दस्य दीर्घोऽन्तादेशः स्याद्वसौ राटशब्दे च परे । विश्वाराट् , विश्वाराड् । विश्वराजौ। विश्वाराड्भ्याम् । स्कोः । संयोगाद्योरन्ते च ८।२।२६ पदान्ते झलि च परे यः संयोगस्तदायोः सकार- ककारयोर्लोपः स्यात् । मृट् । सस्य श्रुत्वेन शः। मलाजश् मशीति शस्य जः। भृजौ। भृड्भ्याम् । त्यदाद्यात्वं पररूपत्वं च। तदोः सः सावनन्त्ययोः ७।२।१०६॥ ज्यदादीनां तकारदकारयोरनन्त्ययोः सः स्यात्सौ । स्यः । त्यौ। त्ये । सः । तौ। ते । यः । यौ। ये । एषः । एतौ । एते। प्रथमयोरम् ७/१२८॥ युष्मद- युङ ( ई० २३ )-'युजिर् योगे' अस्माद्धातोः 'ऋत्विक्-' इत्यनेन किनि किनः सर्वापहारे कृदतिङ' इति कृत्संज्ञायां कृदन्तत्वात् सौ 'युजेरसमासे' इति नुमि हल्यादिना सलोपे संयोगान्तलोपे नस्य कुत्वेन उकारे 'युङ इति । विधाराद-विश्वोपपदात् राज्धातोः 'सत्सुद्विष्' इत्यादिसूत्रेण क्विपि विपः सर्वोपहारे 'विश्वराज्' इति, तस्मात् कृदन्तत्वात् सौ 'ब्रश्चभ्रस्ज' इत्यादिना जकारस्य षत्वे तस्य जश्त्वेन डकारे 'वाऽवसाने' इति डस्य चर्चे 'विश्वस्य वसुराटोः' इति विश्वशब्दस्य दीर्धे हल्ङ्यादिना सलोपे 'विश्वाराट्' इति । युजेर-युज् धातुको तुम्का आगम हो, सर्वनामस्थानके परे, असमासमें। चोः कु:-चव- र्गको कवर्ग आदेश हो, 'झल' के परे, पदान्तमें। अच-प्रश्व, अस्ज, सूज, मृज, यज, राज और भाज धातुओंको तथा छकारान्त और शकारान्तको षकारान्त आदेश हो, 'झल' के परे पदान्तमें । परौ-परि' उपपदक 'ब्रज' धातुसे श्विप् प्रत्यय हो और ( उपधा अकार को) दीर्घ हो तथा पदान्त षत्व भी हो । विश्वस्य-'विश्व' शब्दको दीर्य हो, 'वनु' और 'राट! शब्दके परे। स्को:--पदान्त-झल-परक संयोगादि 'सकार' और ककारका लोप हो। तदो:-त्यदादिके अनन्त्य तकार-दकारको सकार हो, 'तु के परे। प्रथ-युष्मद्-अस्मद्ध । 24 - - । -- ६४ लघुसिद्धान्तकौमुदी स्मद्भया परस्य के इत्येतस्य प्रथमाद्वितीययोश्चाऽमादेशः स्यात् । त्याहौ सौ ७ २६४/ अनयोर्मपर्यन्तस्य त्वाहावादेशौ स्तः सौ परे । शेष लोपः ७१२1801 आत्वयत्वनिमित्तेतरविभक्तो परतो युष्मदस्मदोरन्त्यस्य लोपः स्यात् । त्वम् । अहम् । युवावौ द्विवचने ७।२।१२ । द्वयोरुतौ युष्मदस्मदोर्मपर्यन्तस्य युवाचौ स्तो विभक्तौ । प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् ७।२।८८ औड्येतयोरात्वं लोके । युवाम् । आवाम् । यूयवयौ जसि ७/२। ६३ अनयोर्मपर्यन्तस्य यूयवयौ स्तो जसि । यूयम् । वयम् । त्वमावेकवचने ७।२।६७ एकस्योक्तौ युष्मदस्मदो- मपर्यन्तस्य त्वमौ स्तो विभक्तौ । द्वितीयायां च ७/२८७ अनयोरात्स्याद् द्वि- तीयायाम् । त्वाम् । माम् । शसोनः७।१।२६ | आभ्यां परस्य शसो नः स्यात् । अमोऽपवादः। श्रादेः परस्य । संयोगान्तलोपः। युष्मान् । अस्मान् । योऽचि खरा८६ अनयोर्यकारादेशः । स्यादनादेशेऽजादौ परतः । त्वया । मया। युष्मदस्मदोरनादेशे ७/२।८६ अनयोरात्स्यादनादेशे हलादौ विभक्तौ । युवा- भ्याम् । आवाभ्याम् । युष्माभिः । अस्माभिः। तुभ्यमयौ अयि ७१२। ६५ । अनयोर्मपर्यन्तस्य तुभ्यमह्यौ स्तो अयि । टिलोपः। तुभ्यम् । मह्यम् । भ्यसोड- त्वया ( ई० २५, ४०, ५०)-युष्मच्छब्दात्तृतीयैकवचने 'त्वमावेकवचने' इति मपर्यन्तस्य त्वादेशे पररूप 'योऽचि' इति दकारस्य यकारे 'त्वया' इति । शब्दसे पर 'के' और प्रथमा-द्वितीया विभक्तिको 'अम्' आदेश हो । स्वाहौ-युष्मद्-अस्मद् के मपर्यन्त भागको 'स्व' और 'अह आदेश हो, 'सु'के परे । शेषे-आत्व-यत्वके निमित्ते. तर विमक्तिक परे युष्मद्-अस्मद् शब्दोंकी 'टि' का लोप हो। युवावौ-द्वित्वार्थप्रतिपा- दक युष्मद्-अस्मद्के मपर्यन्त भागको 'युव' और 'आव' आदेश हो, विभक्तिके परे। प्रथमायाश्च-प्रथमाद्विवचनके परे युष्मद्-अस्मद् शब्दको आत्व हो, लोकौ । यूय-युष्मद् अस्मद् शब्दके मपर्यन्त भागको 'यूय' 'वय' आदेश हो, 'जस्' के परे । स्वमा-एकत्वार्थ- प्रतिपादक युष्मद्-अस्मद् शब्दके मपर्यन्त भागको 'व' 'म' आदेश हो, विभक्तिके परे। द्वितीया-युष्मद्-अस्मद्को आकारान्तादेश हो, द्वितीयाविमत्तिके परे । शसो-युष्मद्- अस्मद् शब्दसे पर 'शस्' के आदिको नकार आदेश हो । योऽचि-युष्मद्-अस्मद् शब्दको यकार आदेश हो, अनादेश (विना आदेश हुआ) अजादि विमक्तिक परे । युष्मद्-युष्मद्- अस्मद् शब्दके अंगको आकार आदेश हो, अनादेश हलादि विभक्तिके परे। तुभ्य-युष्मद्- अस्मद् शब्दके मपर्यन्तभागको 'तुभ्य' और 'मर' आदेश हो, विमत्तिके परे। भ्यसो-युष्मद्-अस्मद् शब्दसे पर 'भ्यस्' को 'भ्यम्' (वा अभ्यम् ) आदेश हो ।
हलन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। ६५ भ्यम् ७।१।३० ! आभ्यां परस्य भ्यसोऽभ्यम् इत्यादेशः स्यात् । युष्मभ्यम् । अस्मभ्यम् । एकवचनस्य च ७२३२ श्राभ्यां पञ्चभ्येकवचनस्य सेरत् स्यात् । त्वत् । मत् । पञ्चम्या अत् ७१३१ श्राभ्यां पञ्चम्या भ्यसोऽत्स्यात् । युष्मत् । अस्मत् । तवममौ असि ७१२।६६ | अनयोर्मपर्यन्तस्य तवममौ स्तो असि । युष्मदस्मद्भयां ङसोऽश्वाश२७ युष्मदस्मद्भयां परस्य उसोऽशादेशः स्यात् । तव । मम । युवयोः । आचयोः । साम आकम् ७/१३३/ आभ्यां परस्य साम आकम् स्यात् । युष्माकम् । अस्माकम् । त्वयि । मयि । युवयोः । श्रावयोः । युष्मासु । अस्मासु । युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोर्वान्नावौ माश२० पदात्परयोरसादादौ स्थितयोरनयोः षष्ठयादिविशिष्टयोर्वाम् नौ इत्यादेशौ स्तः। बहुवचनस्य वस्नसौ ८।१।२१। उक्तविधयोरनयोः षष्ठयादिवहुवचनान्तयोर्चनसो स्तः। तेमयावेकवचनस्य ८।१।२२। उक्तविधयोरनयोः षष्ठीचतुर्येकवचनान्त- । । युष्मभ्यम् ( ई० २४, ३६, ४३ )-युष्मच्छब्दाभ्यसि 'भ्यसो भ्यम्' इति भ्यसो भ्यमादेशे शेषे लोपः' इति दस्य लोपे 'युष्मभ्यम्' इति । 'भ्यसो भ्यम्' इत्यत्र 'भ्यसोऽभ्यम्' इति छेदे तु 'अतो गुणे' इति पररूपेण सिद्ध बोध्यम् । युष्माकम् (ई० ३१, ३२, ३७, ४३, ५३, ५५)-युष्मच्छब्दात् आमि 'युष्मद् आम्' इति स्थिते 'साम आकम्' इति प्रामि साम्त्वारोपेण आकमादेशे 'युष्मद् प्राकम्' इति स्थिते 'शेषे लोपः' इति दलोपे सवर्णदीर्धे 'युष्माकम्' इति । एकवचन-युष्मद्-अस्मदसे पर पञ्चमी-एकवचन (असि) को 'अत्' आदेश हो। पञ्चम्या:-युष्मद्-अस्मद्से परे पञ्चमीके भ्यस् को 'अत्' आदेश हो । तवममौ-युष्मद्- अस्मद् शब्दके मपर्यन्त भागको 'तव' और 'मम' आदेश हों ङस् के परे। युष्मद्- शुष्मद्-अस्मद्से पर 'उस्' को 'अश्' आदेश हो । साम-युष्मद्-अस्मदसे पर 'साम्' (सुट सहित आम् ) को 'आकम्' आदेश हो। युष्मदस्मदोः-पदसे पर अपादादिमें (श्लोक या ऋचाके चरणके आदिमें नहीं) स्थित जो षष्ठी-चतुर्थी-द्वितीयास्थ युष्मद्- अस्मद् शब्द उनको क्रमसे 'वाम् 'नौ' आदेश हों। नोट:-अग्रिम तीनों सूत्रोंसे बाध होनेके कारण केवल सभी विभक्तियों के द्विवचनमें ही इस सूत्रकी प्रवृत्ति होती है। बहुवचनस्य-पदसे पर अपादादिमें स्थित षष्ठयादि बहुवचनान्त युष्मद्-अस्मद् शब्दको क्रमसे 'वस्' 'नस्' आदेश हों। नोट:-सभी विभक्तियों के द्विवचनमें 'वाम्' 'न' और बहुवचनमें 'वस्' 'नस्' आदेश होते हैं। तेमयावेक-पदसे पर अपादादिमें स्थित षष्ठी-चतुर्येकवचनान्त युष्मद्- ५ल० लघुसिद्धान्तकौमुदी योस्ते मे एतौ स्तः। त्वामौ द्वितीयायाः८/११२३। द्वितीय कवचनान्तयोस्त्वा मा इत्यादेशौ स्तः। श्रीशस्त्वाऽवतु मापीह दत्तात्ते मेऽपि शर्म सः। स्वामी ते मेऽपि स हरिः, पातु वामपि नौ विभुः॥१॥ सुखं वां नौ ददात्वीशः पतिर्वामपि नौ हरिः । सोऽव्याद्वोनः शिवं वो नो दद्यात्सेव्योऽत्र वःसनः॥२॥ समानवाक्ये युष्मदस्मदादेशा वक्तव्याः। *एकतिङ वाक्यम् । तेनेह न-श्रोदनं पच तव भविष्यति । इह तु स्यादेव-शालीनां ते श्रीदनं दास्यामि । एते वानावादय आदेशा अनन्वादेशे वा वक्तव्याः । अन्वादेशे तु नित्यं स्युः। धाता ते भक्तोऽस्ति, धाता तव भक्तोऽस्ति वा । तस्मै ते नम इत्येव । सुपात्-सुपाद् । सुपादौ । पादः पत् ६।४।१३०। पाच्छन्दान्तं यदङ्ग में तदवयवस्य पाच्छब्दस्य पदादेशः स्यात् । सुपदः । सुपदा । सुपाद्भवाम् । अग्नि- । । ७ नौ । श्रीशस्त्वाऽवतु०-इह-संसारे, श्रीशः=नारायणः, त्वा-त्वाम् , मा-माम् , अपि = च, अवतु = पातु । स हरिः = पूर्वोक्तः नारायणः, ते = तुभ्यम् , मे-मा- म् , अपि = च, शर्म = सुखम् , दत्तात् = ददातु । स हरिम् पूर्वोक्तः नारायणः, ते तव, मे = मम, अपि - च, स्वामी = प्रभुः, अस्तीति शेषः । (सः)विभुः व्यापको नारायणः, वाम्-युवाम् , = आवाम् , पातु-रक्षतु । (सः) ईशः प्रभुः, वाम- युवाभ्याम् = आवाभ्याम् , सुखं = कल्याणम् , ददातु-दत्तात् । (सः) हरि:- नारायणः, वा = युवयोः, नौ = आवयोः, पतिः = प्रभुः, अस्तीति शेषः । सः हरिः, वः = युष्मान् , नः = अस्मान् , अव्यात् = रक्षेत् । सः = हरिः, वः = युष्मभ्यम् , नः अस्मभ्यम् , शिवं = कल्याणं, दद्यात् । अत्र = इह लोके, सः = हरिः, व युष्माकम् , नः- अस्माकम् , सेव्यः = श्राराध्यः, अस्तीति शेषः । अस्मद् शब्दको 'ते' 'मे' आदेश हों। स्वामौ-पदसे पर अपादादिमें स्थित युष्मद्-अस्मद् शब्द जय द्वितीयाका एकवचनान्त हो तब क्रमसे उनको त्वा 'मा' आदेश हो। समान- युष्मद्-अस्मद् शब्दको समान (एक) वाक्यमें ही अनुदात्त और पूर्वोक्त 'वाम्-नौ' आदि आदेश होते हैं। एक-एक तिघटित ही बाक्य होता है। एते-ये जो वाम् , नौ, वस , नस , आदि आदेश कहे गये हैं, वे अनन्वादेशमें विकल्पसे और अन्वादेशमें नित्य ही हों। पाद:-'पा' शब्दान्त जो मसंशक अंग तदवयव जो 'पा' शब्द उसको 'पद? , । हलन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता! मत्-अग्निमद् । अग्निमयौ । अग्निमथः । अनिदितां हल उपधायाः विति ६४ा२४ा हलन्तानामनिदितामझानामुपधाया नस्य लोपः स्यात् किति छिति च । नुम् । संयोगान्तस्य लोपः। नस्य कुत्वेन ङः । प्राङ् । प्राञ्चौ। प्रायः । अचः । ६।४।१३८ लुप्तनकारस्याञ्चतेर्भस्याऽकारस्य लोपः स्यात् । चौ६।४।१३८ । लुप्ताऽकारनकारेऽञ्चतौ परे पूर्वस्याऽणो दीर्घः स्यात् । प्राचः । प्राचा । प्रारभ्याम् । प्रत्यङ् । प्रत्यञ्चौ । प्रतीचः । प्रत्यग्भ्याम् । उदङ् । उदश्चौ । उद ईत् ६।४।१३६ उच्छब्दात्परस्य लुप्तनकारस्याऽञ्चतेर्भस्याऽकारस्य ईत् स्यात् । उदीचः । उदीचा । उदग्भ्याम् । समः समि६।३।१३। चप्रत्ययान्तेऽञ्चतौ परे समः सम्यादेशः स्यात् । सम्यक् । सम्यञ्चौ। समीचः । सम्यग्भ्याम् । सहस्य सध्रिः ६॥ ३॥ १५! -वप्रत्ययान्तेऽञ्चतौ परे सहस्य सध्यादेशः स्यात् । सध्रयङ् । तिरसस्तिर्य- लोपे ६।३।६४ । अलुप्ताकारेऽश्चतौ वप्रत्ययान्ते परे तिरसस्तिर्यादेशः स्यात् । तिर्य । तिर्यचौ । तिरश्वः । तिर्यग्भ्याम् । नाचेः पूजायाम् ६।४।३० पूजार्थस्याञ्चतेरुपधाया नस्य लोपो न स्यात् । प्राङ् । प्राञ्चौ । नलोपाऽभावादल्लोपो ज। प्राचः। प्राभ्याम् । प्राक्षु । एवं पूजार्थे प्रत्यादयः । क्रुङ । कुचौ । प्राचः (ई० ३५)-प्रपूर्वात् 'अञ्च'धातोः 'ऋत्विग्' इति क्विनि क्विनः सर्वा- पहारे 'अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति' इत्युपधानकारलोपे 'कृदतिङ्' इति क्विनः कृत्संज्ञकत्वात् कृदन्तत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञायां शसि 'प्र अच् अस्' इति स्थिते भसंज्ञा. याम् 'अचः' इत्यकारस्य लोपे 'चौ' इति दीर्घ सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'प्राचः' इति । उदीचः (ई० २१, ४३, ५३)-उत्पूर्वाद् 'अञ्च् धातोः 'ऋत्विगि'- त्यादिना किनि किनः सर्वापहारे 'अनिदितामि'त्युपधानकारस्य लोपे कृदतिङ्' इति किनः कृत्संज्ञकत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञायां शसि तकारस्य जश्त्वेन दकारे भसंज्ञायाम् 'उद ईत्' इत्यचोऽकारस्य ईत्वे सस्य रुत्वे विसर्गे 'उदीचः' इति । । । -आदेश हो । अनि-इलन्त अनिदिन अङ्गके उपधानकारका लोप हो कित्-छिन् प्रत्ययके परे । अचः -लुप्तनकारक 'अञ्च् धातुके भसंज्ञक अकारका लोप हो। चौ-लुसाकार नकारक 'अञ्च' धातुके परे पूर्व 'अण' को दो हो। उद-उद् शब्दसे पर लुप्तनकारक 'अञ्च' धातुसम्बधी भसंशक अकारको 'ई' आदेश हो । समः-'व' प्रत्ययान्त (क्विन् प्रत्ययान्त ) 'अञ्' धातुके परे 'सम' को 'समि' आदेश हो। सह-'व'प्रत्ययान्त 'अन्' धातुके परे 'सह' को 'सध्रि' आदेश हो। तिर-अलुप्ताकारक 'व' प्रत्ययान्त 'अन्' धातुके परे तिरस्' को तिरि आदेश हो । नाचे-पूजार्थक 'अञ्छ्' धातु के उपधासंबन्धी नकारका m लघुसिद्धान्तकौमुदी अभ्याम् । पयोमुक्-पयोमुग्। पयोमुचौ । पयोमुग्भ्याम् । उगित्त्वान्नुम् । सान्तमहतः संयोगस्य ६।४।१० सान्तसंयोगस्य महतश्च यो नकारस्तस्यो पधाया दीर्घः स्यादसम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने । महान् । महान्तौ। महान्तः । हे महन् । महद्भ्याम् । अत्वसंतस्य चाऽधातोः ६।४।१४। अत्यन्तस्योपधाया दीर्घो धातुभिन्नाऽसन्तस्य चाऽसम्बुद्धौ सौ परे । उगित्वान्नुम् । धीमान् । धीमन्तौ । धीमन्तः । हे धीमन् । शसादौ महद्वत् । भातर्डवतुः । डित्त्वसामर्थ्या- दमस्यापि टेर्लोपः। भवान् । भवन्तौ । भवन्तः। अनन्तस्य-भवन् । उभे अभ्यस्तम् ६।१।५। षाष्टद्वित्वप्रकरणे ये द्वे विहिते ते उभे समुदिते अभ्यस्तसंज्ञे स्तः । नाभ्यस्ताच्छतुः ७।११७८ अभ्यस्तात्परस्य शतुर्नुम् न स्यात् । ददत्- ददद् । ददतौ । ददतः । जक्षित्यादयः षट् ६॥ १६॥ षड् धातवोऽन्ये जक्षिदिक्ष सप्तम एते अभ्यस्तसञ्ज्ञाः स्युः । जक्षत्-जक्षद् । जक्षतौ । जक्षतः। एवं जाप्रत् । दरिद्रत् । शासत् । चकासत् । गुप्-गुब् । गुपौ । गुपः । गुब्भ्याम् । त्यदादिषु दशोऽनालोचने कञ्च ३।२।६०। त्यदादिषूपपदेष्वज्ञानार्थाद् दृशैः कनू स्याचात् छिन् । आ सर्वनाम्नः६।३।६१ । सर्वनाम्न आकारोऽन्तादेशः स्याद् हरदृशचतुषु । तादृक्-तादृग् । तादृशौ। तादृशः। तादृग्भ्याम् । बञ्चेति षः । । -- ताहक ( ई० ४४, ४५ ) तदुपदादृश्धातोः 'त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कञ्च' इति चकारात् किनि किनः सर्वोपहारे 'श्रा सर्वनाम्नः' इति तच्छब्दस्याकारान्तादेश सवर्णदीः 'कृदतिङ्' इति क्विनः कृत्संज्ञकत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञायां सौ हल्ब्यादिना लोप नहीं हो । सान्त-सान्त संयोगका और 'महत्' शब्दका जो नकार उसकी उपधाको दीर्घ हो, असम्बुद्धि सर्वनामस्थानके एरे। अत्व-अत्वन्तकी उपधाको और धातुभिन्न जो असन्त उसकी भी उपधाको दीर्घ हो, संबुद्धिभिन्न 'सु' के परे । उभे-षष्ठाध्याय के द्वित्वर- करणमें जो द्वित्व विधान किये गये हैं, वे (दोनों) द्वित्व समुदित (संमिलित) अभ्यस्ता संज्ञक हों। नाऽभ्यः-अभ्यस्तसंज्ञकसे पर 'शतृ' को नुम् नहीं हो। जक्षि-'जागृ आदि ( वक्ष्यमाण ) छै धातु और सातवां 'जक्ष' धातु अभ्यस्तसंज्ञक हो । नोट:-जक्षित्यादि ये हैं-'जवि जागृ दरिद्रा शास् दीधीङ वेवीङ् चकास्तथा। अभ्यस्तसंज्ञा विज्ञेया धातवो मुनिभाषिताः' इति । स्यदा-त्यदादि उपपद रहने पर अशानार्थक 'दृश' धातुसे 'कम्' प्रत्यय हो और चकारात् 'क्विन्' प्रत्यय भी हो। आ सर्व-सर्वनामसंज्ञक शब्दको आकारान्त आदेश हो, 'दृग् 'दृश् के परे और 'वतु" । BASETIMAR हलन्तपु.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। जश्त्वचत्वै । विद-विड् । विशौ । विशः । विड्भ्याम् । नशेवा ८१२१६३ । नशेः कवर्गोऽन्तादेशी वा स्यात् पदान्ते । नक्-नग, नट-नड्। नशौ। नशः । नग्भ्याम् , नड्भ्याम् । स्पृशोऽनुदके किन् ३।२।५८ अनुदके सुप्युपपदे स्पृशैः किन् स्यात् । घृतस्पृक्-घृतस्पृम् । वृतस्पृशौ । घृतस्पृशः। दधृक्-दधृग् । दधृषौ । दधृषः । दधृग्भ्याम् । रत्नमुट्-रत्नमुड्। रत्नमुषौ । रत्नमुड्भ्याम् । षट्, षड् । षड्भिः । 'षड्भ्यः २ । षण्णाम् । षट्सु । रुत्वं प्रति षत्वस्याऽसिद्धत्वात्ससजुषोरिति रुत्वम् । वोरुपधाया दीर्घ इकः ८२ ७६। रेफवान्तस्य धातोरुपधाया इको दीर्घः स्यात् पदान्ते । पिपठीः । पिपठिषौ । पिपठीाम् । नुम्बिसर्जनीयशर्यवायेऽपि ८३५८॥ एतैः प्रत्येकं व्यवधानेऽपि इण्कुभ्यां परस्य सस्य मूर्धन्यादेशः स्यात् । घटुत्वेन पूर्वस्य षः। पिपठीषु-पिपठीःषु । चिकीः। चिकीर्षों । चिकीयाम् । चिकीर्षु । विद्वान् । विद्वांसौ । हे विद्वन् । वसोः सम्प्रसारणम् ६।४।१३१ । वस्वन्तस्य भस्य सम्प्रसारणं स्यात् । विदुषः । वमुखस्विति दः । विद्वद्भ्याम् । सुलोपे किन्प्रत्ययस्य कुः' इत्यस्यासिद्धत्वात् 'त्रश्चनरूज' इति षत्वे षल्य जश्त्वेन डकारे 'विन्प्रत्ययस्य कुः' इति डस्य कुत्वेन गकारे तस्य चर्बेन ककारे 'ताहक्' इति। षण्णाम् (ई० ३१)-षष्शब्दात् श्रामि 'षट्चतुर्व्यश्च' इति नुटि अनुबन्धलोपे पस्य जश्त्वेन डकारे 'टुना ष्टुः' इति नस्य टुत्वेन णकारे 'प्रत्यये भाषायां नित्यम्' इत्यनेन डकारस्य च णत्वे 'षण्णाम्' इति । 'अत्र न पदान्ताटोरनाम्' इति टुत्वनिषे- वस्तु न 'अनाम्नवतिनगरीणामिति वाच्यम्' इति वार्तिकेन तनिषेधात् । विद्वान् ( ई० २१,४३ )-'विद्' धातोः लटः शतरि विदेः शतुर्वसुः' इति बस्वादेशे कृदन्तत्वात् सौ उगिदचाम्' इति नुमि 'सान्तमहतः' इति दीधै 'हलचा- उभ्यः' इति विभक्तिसकारस्य लोपे संयोगान्तलोपे 'विद्वान् इति । विदुषः ( ई० २०,४२,५०)-विद्वस्' शब्दाच्छसि अनुबन्धलोपे 'यवि भम्' इति भसंज्ञायाम् 'वसोः सम्प्रसारणम्' इति वस्य सम्प्रसारण 'सम्प्रसारणाच' इति पूर्वरूपे 'आदेशप्रत्यययोः' इति षत्वे सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'विदुषः' इति । प्रत्ययके परे। नशेा-'नश' धातु को कवर्गान्त आदेश हो, विकल्पसे, पदान्तमें। स्पृशो-'उदक' शब्द भिन्न सुबन्त उपपद रहने पर 'स्पृश्' धातुसे 'किन्' प्रत्यय हो । वोरु-रेफान्त और वान्त धातुको उपधाके 'इक्' को दीर्घ हो, पदान्तमें । नुम-नुम्, विस. र्जनोय, 'शर्' इनमें से प्रत्येकके व्यवधान होने पर भी इण, कवर्गले पर सकारको मूर्धन्य (षकार ) आदेश हो । वसो:--वस्वन्त मसंज्ञकको संप्रसारण हो। ।
। लघुसिद्धान्तकौमुदी पुंसोऽसुङ ११ । ८६ । सर्वनामस्थाने विवक्षिते पुंसोऽसुङ् स्यात् । पुमान् । हे पुमन् । पुमांसौ । पुंसः । पुम्भ्याम् । पुंसु । ऋदुशनेत्यनङ । उशना । उशनसौ। अस्य सम्बुद्धौ वाऽनङ्ग नलोपश्च वा वाच्यः । हे उशन, हे उशनन् , हे उशनः । उशनसौ । उशनोभ्याम् । उशनस्सु । अनेहाः। अनेहसौ । हे अनेहः ? वेधाः । वेधसौ । हे वेधः । वेधोभ्याम् । अदस औ सुलोपश्च ७ । २ । १०७ । अदस औकारोऽन्तादेशः स्यात् सौ परे, सुलोपश्च । तदोरिति सः । असौ। त्यदाय- त्वम् । पररूपत्वम् । वृद्धिः । अदसोऽसेटु दो मःमारा८० अदसोऽसान्तस्य दात्परस्य उदूतौ स्तो दस्य मश्च । आन्तरतम्याद्भवस्य उः, दीर्घस्य ऊः । अमू । जसः शी। गुणः । एत ईद्वहुवचने ८/२१८१ अदसो दात्परस्यैत ईदस्य च मो बह्वर्थोक्तौ। अमी। पूर्वत्राऽसिद्धमिति विभक्तिकार्य प्राक् , पश्चादुत्वमत्वे : अमुम् । अमू । अमून् । मुत्वे कृते घिसंज्ञायां नाभावः । नमुने ८१२॥३॥ नाभावे कर्तव्ये कृते च मुभावो नाऽसिद्धः। अमुना । अमूभ्याम् ३ । अमीभिः । पुमान् ( ई० ४१, ४३)-'पुस्'शब्दात् सौ अनुबन्धलोपे 'पुंसोऽसुरू इत्यसुङि अनुबन्धलोपे 'उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः' इति नुमि उमि गते 'सान्त- महतः संयोगस्य' इत्युपधादीर्घ सुलोपे 'संयोगान्तस्य लोपः' इति सलोपे 'पुमान्' इति । अमी (ई० २२,५६)-'अदस्' शब्दाजासि 'त्यदादीनामः' इत्यत्वे अतो गुणे इति पररूपे 'जसः शी' इति जसः श्यादेशे अनुबन्धलोपे 'श्राद्गुणः' इति गुणे 'एत ईबहुवचने' इति एकारस्य ईकारे दस्य मत्वे च कृते 'श्रमी' इति । अमुना (ई० ४७, ४९)-'अदस्'शब्दात्तृतीयैकवचने त्यदायत्वे पररूपे च कृते 'श्रदसोऽसेर्दादु दो मः' इति अकारस्य उत्वे दस्य च मत्वे 'अमु भा' इति जाते नाभावे कर्तव्ये 'न मुने' इत्यनेन मुत्वस्याऽसिद्धत्वाभावबोधनात् 'शेषो ध्यसखि' इति घिसंज्ञायाम् 'प्राडो नाऽस्त्रियाम्' इति 'श्रा' इत्यस्य नादेशे 'अमुना' इति । । ७ पुंसो-'पुंस्' को असुङ आदेश हो, सर्वनामस्थानके परे । अस्य-उशनस् शब्दको संबुद्धिके परे विकल्पसे अनङ् आदेश हो और नकारका लोप भी हो, विकल्पसे । अदस-'अदस्' शब्दको सुके परे औकारान्त आदेश हो और सुलोप भी हो ! अदस-असान्त अदसशब्दसम्बन्धी दकार से परको उत्-ऊत् (हस्वको हस्व, दीर्घ को दीर्घ) तथा दकारको मकार आदेश हो। एत-असान्त अदस्शब्दसम्बन्धी दकारसे पर एकारको ईत् हो तथा दकारको मकार आदेश हो, बह्वर्थमें । नमुने-'ना 28 हलन्तस्त्री.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। अमुष्मै । अमीभ्यः २ । श्रमुष्मात् । अमुष्य । अमुयोः २ । अमीषाम् । अमुध्मिन् । अमीषु। * इति हलन्तपुंल्लिङ्गप्रकरणम् * HAGarga Pos अथ हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरणम् नहो धः ८।२।३४ । नहो हस्य धः स्याज्मलि पदान्ते च । नहि-वृति-रि- वृषि-व्यधि-रुचि-सहि-तनिषु कौ ।। ३।११६ | क्विबन्तेषु परेषु पूर्वपदस्य दीर्घः स्यात् । उपानत् , उपानद् । उपानहौ । उपानत्सु । विवन्तत्वात्कुत्वेन घः । उष्णिक , उष्णिग् । उष्णिहौ । उप्णिग्भ्याम् । द्यौः। दिवो । दिवः। युभ्याम् । गी। गिरौ । गिरः । एवं पूः । चतस्रः। चतसृणाम् । का। के। काः। सर्वा- वत् । यः सौ ७।२।११०। इदमो दस्य यः स्यात् सौ। इयम् । त्यदायत्वम् । नचाऽत्र मुत्वस्याऽसिद्धत्वात् 'सुपि चेति दीर्घः कुतो नेति वाच्यम् , 'न मु ने' इत्य- नेन कृते च नाभावे मुत्वस्य नासिद्धत्वमित्यर्थस्यापि बोधनात् । इति 'इन्दुमती टीकायां हलन्तपुंल्लिङ्गप्रकरणम् । ॥ -of-C00- श- उपानत (ई० २१, ४८, ५० )-उपनह्यते इति विग्रहे उपपूर्वात् 'णह बन्धने' इत्यस्मात् णो नः' इति नत्वे ततः सम्पदादित्वात् कर्मणि विपि किपः सर्वापहारे 'नहितिवृषि' इति पूर्वपदस्य दीर्घ 'कृदतिङ्' इति हस्य धत्वे जश्त्वे प्रातिपदिकसंज्ञायां सौ 'हल्याभ्यः' इति सलोपे 'नहो धः' इति हस्य धत्वे जश्त्वे चत्वं 'उपानत्' इति । चाऽभावे 'उपानद्' इति । चतसृणाम् (ई० २३, ४४ )-'चतुर शब्दात् श्रामि त्रिचतुरोः इति 'चतसृ' आदेशे 'अचि र ऋतः' इति रेफादेश प्राप्ते 'नुमचिर' इति पूर्वविप्रतिषेधेन तं बाधित्वा नुटि अनुबन्धलोपे 'नामि' इति दोघे प्राप्ते 'न तिसृचतसृ' इति निषेधे 'ऋवर्णानस्य णत्वं वाच्यम्' इति णत्वे उक्तं रूपं सिद्धम् । भावकतव्य हो था कर भी लिया गया हो, तो भी 'मुभाव असिद्ध नहीं हो। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीका में हलन्तपुंल्लिङ्ग समाप्त हुआ। -%8500- नहो-'नह' धातुके हकारको धकार हो, झलके परे पदान्तमें। नहि-किबन्त नह, वृत् , वृष , व्यध् , रुच , सह और तन् धातुके परे पूर्व 'अणको दीर्घ हो । यःसौ-इदम् शब्दके दकारको यकार आदेश हो, 'सु' के परे स्त्रीलिङ्गमें।
। । २ लघुसिद्धान्तकौमुदी पररूपत्वम् । टाप् । दश्चेति मः । इमे। इमाः। इमाम् । श्रनया। हलि लोपः। श्राभ्याम् । आभिः । अस्यै। अस्याः२। अनयोः२। आसाम् । अस्याम् । आसु । त्यदायत्वम् । टाप् । स्या । त्ये । त्याः। एवं तद् , यद् , एतद् । वाक्, वाग् । वाचौ। वाग्भ्याम् । वाक्षु । अपशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । अप्तृन्चिति दीर्घः। श्रापः । अपः । अपो भि७४|४५/अपस्तकारः स्याद्भादौ प्रत्यये परे। अद्भिः। अद्भ्यः । अद्भ्यः । अपाम् । अप्सु । दिक् , दिग् । दिशौ। दिशः। दिग्भ्याम् । त्यदादिष्विति दृशैः किन्विधानादन्यत्रापि कुत्वम् । दृक् , दृग् । दृशौ। हरभ्याम् । त्विट् , स्विड् । त्विषो । विड्भ्याम् । ससजुषोरुरिति रुत्वम् । सजूः । सजुधौ । साम् । श्राशीः। आशिषौ । आशीर्थ्याम् । असौ। उत्वमत्वे । श्रमू । अमूः । अमुया। अमूभ्याम् ३ । अमूभिः । अमुष्यै। अमूभ्यः २ । अमु- व्याः। अमुयोः २। अमूषाम् । अमुष्याम् । अमूषु । इति हलन्तस्त्रीलिङ्गाः । । अनया (ई० ३८)-'इदम्' शब्दाद्याविभक्तौ त्यदाद्यत्वे पररूपत्वे टापि अनु- बन्धलोपे सवर्णदीधै 'इदा श्रा' इति जाते 'अनाप्यकः' इति इद्भागस्य अनादेशे 'श्राङि चापः' इति श्राबन्तस्यैकारे 'एचौऽयवायावः' इति अयादेशे 'अनया' इति । अद्भिः, अद्भथः (ई० २८, ४२, ५१, ५६)-'अप्'शब्दात् भिसि भ्यसि च 'अपो भिः' इति पस्य तकारे तस्य जश्त्वे सकारस्य रुत्वे विसर्गे तत्सिद्धिः। हक ( ई० ३६)-'दृश्' शब्दात् सौ हल्ङयादिना सलोपे 'श्चभ्रस्ज' इत्यनेन शस्य षत्वे तस्य जश्त्वेन डकारे 'त्यदादिषु शोऽनालोचने कञ्च' इति शेः किनो विधानादत्र विनोऽभावेऽपि 'किन्प्रत्ययस्य कुः' इति डकारस्य कुत्वेन गकारे तस्य चवेन ककारे 'हक इति । पक्षे 'ग्' इति । अमुष्य ( ई० २४,३७,४६,३९)-'अदस्'शब्दाच्चतुर्थंकवचने अत्वे पर- रूपत्वे टापि सवर्णदीर्घ च कृते 'अदा ए' इति स्थिते 'सर्वनान्नः स्याड्ड्स्वञ्च' इति के स्याडागमे श्रावन्ताङ्गस्य हस्वे च कृते 'वृद्धिरेचि' इति वृद्धौ ‘अदसोसेर्दादु दो मः' इत्युत्वे मत्वे च कृते 'आदेशप्रत्यययोः' इति षत्वे 'अमुष्य' इति सिद्धम् । इति 'इन्दुमती'टीकायां हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरणम् । -ORIGHLAON अपो-'अप' शब्दको तकारान्त आदेश हो मकारादि प्रत्ययके परे। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण समाप्त हुआ।
R granuare अथ हलन्तनपुंसकल्लिङ्गप्रकरणम् स्वमोर्चेक् ! दत्वम् । स्वनडुत् , स्वनडद् । स्वनडही। चतुरनडुहोरित्याम् । * वनड्वाहि । पुनस्तद्वत् । शेषं मुंवत् । वाः । वारी । वारि । वाया॑म् । चत्वारि । किम् । के । कानि । इदम् । इमे । इमानि । *अन्वादेशे नपुंसके वा एनड. क्तव्यः । एनत् । एने । एनानि । एनेन । एनयोः। अहः। “विभाषा डिश्योः । अह्नी, अहनी । अहानि । अहन दा२।६८ अहन्नित्यस्य सः स्यात् पदान्ते । अ- होभ्याम् । दण्डि । दण्डिनी । दण्डीनि । दण्डिना । दण्डिभ्याम् । सुपथि । टेर्लोपः । सुपथी । सुपन्थानि । ऊ, ऊर्ग । ऊर्जी । ऊन्जि । न-र-जानां संयोगः । तत् । ते । तानि । यत् । ये । यानि । एतत् । एते । एतानि । गवाक् , गवाग। गोची। चत्वारि (ई० ३०) चतुर्शब्दान्जसि शसि च विभक्तौ 'जश्शसोः शिः इति श्यादेशे 'शि सर्वनामस्थानम्' इति सर्वनामस्थानसंज्ञायां 'चतुरनड्डहोरामुदात्तः' इत्यामि अनुबन्धलोपे 'इको यणचि' इति यणि उक्तं रूपं जातम् । एनयोः (ई० ५१)-'इदम्'शब्दाद् श्रोसि विभक्तो 'अन्वादेशे नपुंसके एनद्वत्तव्यः' इति वार्तिकेन एनदादेश त्यदायत्वे पररूपत्वे च कृते 'श्रोसिच' इत्यनेन अदन्ताङ्गस्यैकारे अयादेशे सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'एनयोः' इति सिद्धम् । अहोभ्याम् ( ई० २५, ३७, ४१, ५० )-'अहन्'शब्दात् भ्यामि विभक्तो 'स्वादिध्वसर्वनामस्थाने' इति पदसंज्ञायाम् 'अहन्' इत्यनेन नस्य सत्वे 'हशि च' इत्युत्वे 'आद्गुणः' इति गुणे 'अहोभ्याम्' इति जातम् । गोचा (ई० ५१)-गामञ्चतीति विग्रहे किनि तस्य सर्वापहारे उपपदसमासे सुब्लुकि समासत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञायां टाविभक्तौ अनुबन्धलोपे 'गो अञ्च् आइति दशायाम् 'अनिदितां हल उपधायाः विङति' इति नलोपे 'यचि भम्' इति भसंज्ञायां सत्याम् 'अचः' इत्यनेन अचोऽकारस्य लोपे 'गोचा' इति । पूजायान्तु 'नाः पूजायाम्' इति नलोपनिषेधे सति 'अवस्फोटायनस्य' इत्यवङि सवर्णदीर्धे 'गवाञ्चा' इति । अवङभावपक्षे 'सर्वत्र विभाषा गोः' इति पाक्षिके प्रकृतिभावे 'गो अञ्चा' इति । प्रकृतिभावाभावपक्षे “एडः पदान्तादति' इति पूर्वरूपे 'गोऽञ्चा' इति बोध्यम्। गवाक्छब्दस्य रूपाणि लीबेऽर्चागतिभेदतः। असन्ध्यवपूर्वरूपैर्नवाधिकशतम्मतम् ।। अन्वा-अन्वादेशके विषय रहने पर नपुंसकलिङ्गमें 'इदम्' और 'एतद् शब्दको एनत्' आदेश हो । अहन्-'अहन्' शब्द (के नकार) को 'क' हो, पदान्तमें। ध्य- F ते । । शिः' इति श्यादेशे अनुबन्धलोपे सर्वनामस्थानसंज्ञायां 'नपुंसकस्य मलच लघुसिद्धान्तकौमुदी गवाश्चि । पुनस्तद्वत् । गौचा । गवाभ्याम् । शकृत् । शकृती। शकृन्ति । ददत् ।। ददती । वा नपुंसकस्य ७११७६/ अभ्यस्तात्परो यः शता तदन्तस्य क्लीवस्य वा नुम् स्यात् सर्वनामस्थाने परे । ददन्ति, ददति । तुदत् । आच्छीनद्योर्नुम् ७१ ८०/ अवर्णान्तादशात्परो यः शतुरवयवस्तदन्तस्य नुम् वा स्यात् , शी-नद्योः परतः। तुदन्ती, तुदती । तुदन्ति । शप-श्यनोनित्यम् ७८१॥ शप-श्यनोरा- स्परो यः शतुरवयवस्तदन्तस्य नित्यं नुम् स्यात् शी-नद्योः परतः । पचन्ती। पच- न्ति । दीव्यत् । दीव्यन्ती। दीव्यन्ति । धनुः । धनुषी । सान्तेति दीर्घः । नुम्बि- सर्जनीयेति षः। धनूंषि । धनुषा । धनुाम् । एवं चक्षुर्ह विरादयः । पयः। पयसी । पांसि । पयसा । पयोभ्याम् । सुपुम् । सुपुंसी। सुपुमांसि । श्रदः ।। विभक्तिकार्यम् । उत्वमत्वे । अमू । अमूनि । शेषं पुंवत् । इति हलन्तनपुंसकलिङ्गाः । स्वन्सुप्सुनवषड्भादौ षट्के स्थुस्त्रीणि जश्शसोः । चत्वारि शेषे दशके रूपाणीति विभावय ।। ददन्ति (ई० ४८)-'ददत्'शब्दाजासि 'जश्शसोः शिः' इति जसः श्यादेशे अनुबन्धलोपे 'शि सर्वनामस्थानम्' इति सर्वनामस्थानसंज्ञायां वा नपुंसकस्य' इति नुमि अनुबन्धलोपे नस्यानुस्वारे परसवर्णे 'ददन्ति' इति । पत्ते 'ददति' इति । दीव्यन्ती (ई० २१, ३८, ४२, ४९ )-दिव्धातोर्लटः शतरि, श्यनि 'हलि चेति दीर्चे 'दीव्यत्' इति । तस्मात् श्रौविभक्तौ औङः श्यादेशे अनुबन्धलोपे 'शपश्यनोनित्यम्' इति नुमि अनुबन्धलोपे नस्यानुस्वारे परसवणे 'दीव्यन्ती' इति । धनूंषि ( ई० ३५, ४५, ४७ )-'धनुष'शब्दाज्जसि शसि च 'जश्शसोः नुमि अनुबन्धलोपे 'सान्तमहतः संबोगस्य' इति सान्तसंयोगस्योपधायाः दोर्षे नस्यानुस्वारे 'नुम्बिसर्जनीयशळवायेऽपि' इति सस्य षत्वे 'धषि' इति सिद्धम् । इति 'इन्दुमती टीकायां हलन्तनपुंसकलिङ्गप्रकरणम् । वा न-अभ्यस्तसंज्ञकसे पर शतप्रत्ययान्त क्लोब अङ्गको नुमागम हो, विकल्पसे, सर्व- नामस्थानके परे । आच्छी-अवर्णान्तसे पर जो शतप्रत्ययावयव, तदन्त जो अङ्ग, उसको नुमागम हो, 'शी' और 'नदी के परे विकल्पसे । शप-शप-श्यन् संबन्धी अकारसे पर जो शतृप्रत्ययावयव, तदन्त जो अङ्ग, उसको नित्य नुमागम हो, "शी' और 'नदी के परे । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें हलन्तनपुंसकलिङ्ग समाप्त हुआ। TRENT २६ ते। PHYLENDAR । an জখSঙ্গখালু स्वरादिनिपातमव्ययम् शश ३७। स्वरादयो निपाताश्चाऽव्ययसंज्ञाः स्युः । ५ स्वर् । अन्तर् । प्रातर् । पुनर् । सनुतर । उच्चैस् ! नीचेस् । शनैस् । ऋधक् । ऋते । युगपत् । श्रारात् । पृथक् । ह्यस् । श्वस् । दिवा । रात्रौ । सायम् । चिरम् । मनाक् । ईषत् । जोषम् । तूष्णीम् । वहिस् । अवस् । अधस् । समया। निकषा। स्वयम् । वृथा। नतम् । नन् । हेतौ । इद्धा । श्रद्धा। सामि । वत् । ब्राह्मणवत् । क्षत्रियवत् । सना । सनत् । सनात् । उपधा। तिरस् । अन्तरा । अन्तरेण । ज्योक् । कम् । शम्। सहसा । विना । नाना। स्वस्ति । स्वधा । अलम् । वषट् । श्रौषट् । वौषट् । अन्यत् । अस्ति । उपांशु । क्षमा । विहायसा । दोषा । मृषा ! मिथ्या । मुधा । पुरा। मिथो । मिथस् । प्रायस् । मुहुस् । प्रवाहुकम् । प्रवा- । 'स्वरादिनिपातमव्ययम्' (ई० ५०)-स्वर् प्रादिर्येषां ते स्वरादयः, ते च । . स्वरा-स्वरादि और निपातकी अव्यय संज्ञा हो । स्वर् (स्वः)-स्वर्ग। अन्तर (अन्तः)-मध्य । प्रातर् (प्रातः)-प्रात:काल । पुनः-फिर । सनुतर् (सनुतः)- अन्तर्धान । उच्चैस् ( उच्चैः)-ऊर्ध्व भागमें। नीचैस् (नीचैः)-अधोभागमें । शनैस् (शनैः)-धीरे-धीरे । ऋषक-सचमुच । ऋते-विना। युगपत्-एकसाथ । आरात्-दूर या समीप में । पृथक्-भिन्न । यस् (ह्यः)-पूर्व दिन में। श्व:-पर दिनमें । दिवा-दिन । रात्रौ-रातमें । सायमू-संध्यामें। चिरन-विलम्ब । मनाक-थोड़ा। ईषत्-बहुत थोड़ा, किञ्चित् । जोषमू-काना-फूसी । तूष्णीम्-चुप । बहिस् (बहिः), अवस् (अवः) बाहर । अधर (अधः)-नीचे । समया, निकषा-समीप । स्वयम्-अपने ही। वृथा- व्यर्थ । नक्तम्-रात । न, ना-नहीं। हेतौ करण । इदा-प्रकाश्य । अद्धा-स्फुट । सानि- आधा । ब्राह्मणवत्-ब्राह्मणके समान । क्षत्रियवत-क्षत्रिय के समान । सना, सनत् सनात्-नित्य । उपधा-यूस, नजराना । तिरल् (तिरः)-टेढ़ा, पराभव । अन्तरा-मध्य विना । अन्तरेण-विना । ज्योक्-शीघ्र, संप्रति । कम्-जल, निन्दा, सुख । शम्-सुख, कल्याण । सहसा-अकस्मात् । विना-अभाव । नाना-अनेक । स्वस्ति-मंगल, शुभ । स्वाहा-देवह विनिमें। स्वधा-पितृहविनमें । अलम्-भूषण, पर्याप्त (बस), व्यर्थ वषट् , औषट् , वौषट्-देवहविर्दानमें । अन्यत्-और, दूसरा । अस्ति-सत्ता, विद्यमान ! उपांशु-गुप्त । हमा-माफ़ । विहायसा-आकाश । दोषा-रात्रि । मृषा, मिथ्या-असत्य, झूठ । मुधा-व्यर्थ ही, निष्प्रयोजन । पुरा-पहले। मिथो, मिथस् (मिथः)-परस्पर, एकान्त । प्रायस् (प्रायः)-संभव, हो सकता है। मुहुस् (मुहुः)-दार-बार । प्रबाहुः ति । ७६ लघुसिद्धान्तकौमुदी हिका] । पार्यहलम् । अभीक्ष्णम् । साकम् । सार्धम् । हिरुक् । धिक् । श्रथ । अम् । पाम् । प्रताम् । प्रशाम् । प्रतान् । मा। माङ् । प्राकृतिगणोऽयम् । च । बा । ह । अह । एव । एवम् । नूनम् । शश्वत् । युगपत् । भूयस् । कूपत् । कुवित् । नेत् । चेत् । वण । कच्चित् । यत्र। नह । हन्त । माकिः । माकिम् । नाकिः । नकिम् । माङ् । नञ् । यावत् । तावत् । त्वै । द्वै। वै। रै। श्रौषट् । । स्वाहा । तुम् । तथाहि । खलु । किल । अथो । अथ । सुष्ठु । स्म । श्रादह। उपसर्ग-विभक्ति-स्वरप्रतिरूपकाच! अवदत्तम् । अहंयुः । अस्ति- क्षीरा । अ। श्रा।इ।ई। उ । ऊ । ए। ऐ। श्री। श्री। पशु । शुकम् । यथा- कथाच । पाट । प्याट् । अङ्ग । है । हे । भोः । अये। छ । विषु । एकपदे । युत् । पौषट् । . - निपाताश्चेति समाहारद्वन्द्वः, अव्ययम् इति पृथक् पदम् । 'द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बध्यते' इति स्मरणात् 'स्वरादयो निपाताश्च अव्ययसंज्ञाः स्युः' इत्यर्थः । कम्-एक साथ, समान काल । आर्यहनन् -बलात्कार, जबरदस्ती। अभीदगम्-पुनः २, बार २ । साकल , साधन-साथ २ । नमस् (नमः)-नमस्कार, प्रणाम । हिरुक्-विना धिक्-धिकार, छी-छो। अथ-अनन्तर, और। (अथ किम्-और नहीं तो क्या ?)। अ-शीघ्र, थोड़ा, किञ्चित् । आन-हाँ, स्वीकार, मंजूर । प्रता-ग्लानि । प्रशान-स- भान । प्रतान्-विस्तार । मा, माइ-नहीं, अस्वीकार । च-पुनः, अथवा, और वा-अथवा। इ-प्रसिद्ध । अह-अदभुत, खेद । एव-अवश्य, हीं। एवम्-इस प्रकार । नूनम् -निश्चय, तर्क । शश्वत्-सदा, साथ २, पुनः २ । युगपत्-एक साथ । भूयस् (भूयः)-पुनः, प्रचुर, ढेरसा । कृपत् , खूपत्-प्रश्न, प्रशंसा । कुवित्-बहुत, प्रशंसा । नेत्-शंका । चेत-- चण-यदि । क्वचित-कहीं, कोई। यन्त्र-जहाँ। नह-प्रत्यारंभ । हन्त-हर्ष, विषाद। माकि माकिम , नाकि:-विना, वर्जन । नञ्-नहीं। यावत्-जब तक । स्वै, द्वै, वै-वितर्क है- दान, हीन संबोधन। श्रौषट् , वौषट् , स्वाहा-देवहविर्दान । अलम्-पर्याप्त । स्वधा, वषट्-पितृहविन । तुम-तुम । तथाहि-जैसे, इस प्रकार । खलु, किल-निश्चय । अध- अनन्तर । सुष्टु-अच्छा । स्म-भूतकाल । आदह-निन्दा । उपसर्ग-उपसर्ग प्रतिरूपक, विभक्त्यन्त प्रतिरूपक और स्वर प्रतिरूपक शब्दों का भी चादिगण में पाठ समझना चाहिये । (प्रतिरूपकका अर्थ है 'सदृश') अवदत्तम्-दिया । अहंयु-अहंकारी। अस्तिक्षीरा-दूधवाली। म-संबोधन । आ- वाक्य, स्मरण । इ-संबोधन, जुगुप्सा, विस्मय । ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ-संबोधन । पशु-सम्यक् । शुकम्-शीघ्र । यथाकथाच-जब-कमी। पाट् , प्याट् ,अंग, है, हे, भोः, अये-संबोधन । ध-हिंसा। विधु-अनेक । एकपदे-सहसा । युत्-निन्दा । आता । , २३ SEN - अव्ययप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। श्रातः । चादिरप्याकृतिगणः । तद्धितश्चाऽसर्वविभक्तिःशश३८ यस्मात् सर्वा विभक्तित्पद्यते स तद्धितान्तोऽव्ययं स्यात् । परिगणनं कर्त्तव्यम् । तसिलादयः प्राक् पाशपः । शस्प्रभृतयः प्राक् समासान्तेभ्यः। श्रम् । श्राम् । कृत्वोर्थाः। तसिवती । नानागौ । एतदन्तमप्यव्ययम् । कृन्मेजन्तः १०१ ३६ द्यो मान्त एजन्तश्च तदन्तमव्ययं स्यात् । स्मारं स्मारम् । जीवसे । पिबध्यै। क्त्वा-तोसुन्- कसुनः १११॥४०॥ एतदन्तमव्ययं स्यात् । कृत्वा । उदेतोः । विसृपः। अव्ययी- भावश्च शश४१श अव्ययीभावश्चाऽव्ययसंज्ञः स्यात् । अधिहरि । अव्यया- दाप्सुपः २।४।८२। अव्ययाद्विहितस्यापः सुपश्च लुक् स्यात् । तत्र शालायाम् । सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तव्ययम् ॥१॥ पर उदेतोः (ई० ४४,४६)-उत्पूर्वादिण्धातोः 'भावलक्षणे स्थेणकृअवदिचरि- हुतमिजनिभ्यस्तोसुन्' इति तोसुन् प्रत्ययेऽनुबन्धलोपे गुणे उपसर्गसम्बन्धिनस्तस्य जश्त्वे 'उदेतोस्' इत्यस्य तोसुन्प्रत्ययान्तत्वेन 'क्वातोसुन्कसुनः' इत्यनेन अव्यय- संज्ञायाम् 'अव्ययादाप्सुपः' इत्यनेन तस्माद्विहितस्य सो कि सकारस्य रुत्वे विसगै 'उदेतीः' इति सिद्धम् । . अत: इसलिये। तद्धि-जिससे सभी विभक्तियाँ उत्पन्न नहीं होती हों ऐसा जो तद्धितान्त वह भी अव्यय संज्ञक हो । अम्, आम्-स्वीकार । कृन्मे-कृत् जो मान्त और एजन्त तदन्तकी भी अव्ययसंशा हो। स्मारं स्मार-स्मरण कर करके। जीवसे-जीने के लिये। पिबध्ये-पीने के लिये। क्त्वातो-क्त्वा प्रत्ययान्त, तोसुन् प्रत्ययान्त और कसुन् प्रत्ययान्तकी भी अव्यय- संज्ञा हो । कृत्वा-करके । उदेतो:-उदय होकर । विसपः-लकर। अव्ययी-अव्ययीभाव समासकी अव्ययसंज्ञा हो। अधिहरि-हरिमें। अव्य-अव्यय से विहित 'आप' और 'सुप्' का लुक् हो । तन्न शालाया-उस घरमें। सशं-जिस शब्दका तीनों लिङ्गों में, सब विमक्तियों में और सब वचनों में समान्द रूप हो। कुछ भी न व्येति'-विकारको प्राप्त न करे, वह अव्यय कहलाता है लघुसिद्धान्तकौमुदी वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः । आपं चैव हलन्तानां यथा वाचा निशा दिशा॥२॥ वगाहः, अवगाहः । पिधानन् , अपिधानम् । * इति लघुसिद्धान्तकौमुद्यामव्ययप्रकरणम् * पिधानम् (ई० ४४,४६) अत्र 'भागुरि'नामकाचार्यमते अपीत्युपसर्गस्या- ऽकारस्य लोपे 'श्रव्ययादाप्सुपः' इति सुलोपे च कृते 'पिधानम्' इति सिद्धं भवति । इति 'इन्दुमती'टीकायां सुबन्तप्रकरणं समाप्तम् । वष्टि-मागुरि आचार्य 'अव 'अपि' उपसर्गके आदि अकारका लोप करते हैं। यथा- अव+गाहः = वगाहः । अपि-धानम् = विधानम् । आचार्यजी हलन्त शब्दोंसे लोलिंगमें -आप्' (टाप्) भी करते हैं। यथा-वाच्+आवाचा । निश् + आ = निशा ! दिश् + आदिशा। पाणिनि मुनिके मतसे अकारका लोपविधायक कोई सूत्र नहीं है, अतः अब- गाह और अपिधानम् ये भी रूप होते हैं। वगाहा, अवगाह: स्नान । वाचा-वाणी। निशा-रात्रि । दिशा-दिशा। पिधानम् , अपिधानम्-डकन । नोट:-(१) जातिवाचक शब्द, समूहार्थक शब्द और समष्टिबोधक शब्दोंकी यदि विमिन्नता दिखानी नहीं हो तो एकवचनमें ही प्रयोग होता है। यथा-वर्णानां ब्राह्मणः श्रेष्ठः, बलवती सेना, विद्वद्गगः आदि। एवं समाहार द्वन्द और द्विगु समाससे परिनिष्ठित शब्दों का भी एकवचन में ही प्रयोग होता है। यथा-पाणिपादम्, त्रिभुवनम् आदि । (२) अश्विनीकुमार तथा दम्पति, जम्पति शब्दोंका द्विवचनमें ही प्रयोग होता है। (३) दार, अक्षत, लाज, अशु और प्राण शब्द नित्य पुंलिङ्ग हैं और बहुवचनमें ही प्रयुक्त होते हैं। वर्षा तथा सिकता शब्द नित्य स्त्रीलिङ्ग हैं और बहुवचन में ही प्रयुक्त होते हैं। अस्मद् शब्द तथा आदर अर्थमें अन्य शब्द भी विकल्पले बहुवचनान्त प्रयुक्त होते हैं। (लिंगानुशासन प्रकरण देखें)। इस प्रकार 'इन्दुमती' टोकामें अव्ययप्रकरण समास हुआ। एवं अप्, २६ BEN. Shinde 993 अथ तिङन्ते स्वादिप्रकरणम् न। रि- हो । लट लिट् लुट् लट् लेट् लोट् लङ् लिङ लुङ् लुङ-एषु पञ्चमो लकारश्छ- न्दोमात्रगोचरः । लः कर्मणि च भावे चाऽकर्मकेभ्यः ३।४।६६ | लकाराः सकर्मकेभ्यः कर्मणि कर्तरि च स्युरकर्मकेभ्यो भावे कर्तरि च । वर्तमाने लट् नोट:-प्रयोगकालमें धातुके उत्तर जो 'तिङ' विभक्ति होती है, उस ति विमक्तिके योगसे जो पद निष्पन्न होता है वह 'तिङन्त' कहलाता है। लट्-कालका ज्ञान एवं विधि आदिका अर्थशान कराने के लिए धातु के बाद लडादि तिङ विमक्तियाँ दश प्रकार की होती हैं। इनमें 'लेट' का प्रयोग वेदमें ही देखा जाता है। ल:-सकर्मक धातुसे कर्म-कर्ता तथा अकर्मक धातुसे भाव और कर्ता में लकार हो। नोट:-१ कर्तृवाच्यमें कर्ता प्रथमान्त और कर्म द्वितीयान्त तथा क्रियाके पुरुष-वचन कर्ता के अनुसार प्रयुक्त होते हैं। यथा-'इन्दुमती पुष्पं चिनोति। एवं कर्मवाच्यमें कर्ता तृतीयान्त और कर्म प्रथमान्त तथा क्रिया के पुरुष-वचन कर्मके अनुसार होते हैं । यथा-- रामेण वेदाः पठ्यन्ते । एवं भाववाच्यमें कर्ता कर्मवाच्यवत् तृतीयान्त होता है पर कर्म नहीं होता तथा क्रिया सदैव प्रथमपुरुषकी एकवचनान्त ही होती है। यथा-'अस्माभिः स्थीयते । (भावकर्मप्रकरण देखें) तथाहि हरिकारिका:- प्रयोगकर्तृवाच्यस्य कर्तरि प्रथमा भवेत् । द्वितीयाकर्मणि, तथा क्रिया कर्तृपदान्दिता । प्रयोगे कर्मवाच्यस्य तृतीया स्यात्त कर्तरि कर्मणि प्रथमा चैव क्रिया कर्मानुसारिणी । कर्माभावः सदाभावे तृतीया चैव कर्तरि । प्रथमः पुरुषश्चैकवचनं च क्रियापदे॥ फल और व्यापार धातुके अर्थ होते हैं-पलव्यापारयोर्धात्वर्थः व्यापारका आश्रय कर्ता और फलका आश्रय कर्म होता है। जिसका फल और व्यापार भिन्न २ आश्रयमें हो उसे सक- मंक कहते हैं -फलष्यधिकरणब्यापारवाचकत्वं सकर्मकत्वम् । यथा-'देवदत्तः तण्डुलं पचति' यहाँ विक्लिति रूप फल तण्डुलमें और पाकरूप व्यापार देवदत्तमें है। अतः 'पच् धातुको सकर्मक समझना चाहिये। जिसका फल और व्यापार एक ही आश्रयमें हो उसे अकर्मक कहते हैं-फलसमानाधिकरणब्यापारवाचकत्वमकर्मकत्वम् । 'रामः शेते' यहाँ विश्राम रूप फल और चक्षुनिमीलनादि रूप व्यापार भी राममें है अत: 'शी धातु अकर्मक है। सामान्य नियम :-साकाँक्षित किया 'सकर्मक', यथा-पठति, खादति आदि आदि क्या पढ़ता है.? क्या खाता है ? एवं निराकाँक्षित किया 'अकर्मकर, यथा-जागता है, हँसता है, यहाँ क्या जागता है, क्या हँसता है, इत्यादि आकाँक्षा ही नहीं उठती। वर्त-वर्तमान क्रियावृत्ति धातुसे लट् लकार हो । नोट:-जिसमें क्रियाका प्रारम्भ हो उसे 'वर्तमान' कहते हैं। वर्तमानके सामीप्य रहने पर भूत और भविष्यत् कालमें भी 'लट' होता है । यथा-इदानीमेव आगच्छामि' (अमी आया हूँ)। 'अयमई गच्छामि' (मैं अभी जाऊँगा)। स्मर के योगसे भूतकाल में भी लट av " । साभ Com " Jee , T . उत्तम संचक हो। तान्ये-लब्ध (प्राप्त जा तीन तीन वे यथाक्रमसे प्रथम, मध्यम लघुसिद्धान्तकौमुदी ३।२।१२३। वर्तमानक्रियावृत्तेर्धातोर्लट् स्यात् । अटावितौ । उच्चारणसामल्लिस्य नेत्त्वम् । भू सत्तायाम् । कर्तृविवक्षायां भू ल् इति स्थिते-तिप्तस्-मि-सिप्- थस्-थ-मिब्वस-मस्-ताऽऽताञ्झ-थासाथां-व-मिड्-वहि महिङ् ३।४।७८ एतेऽष्टादश लादेशाः स्युः । लः परस्मैपदम् ११४६६/लादेशाः परस्मैपदसंज्ञाः स्युः । तमनावात्मनेपदम् ११४|१००। तङ प्रत्याहारः शानच्कानचौ चैतत्संज्ञाः स्युः । पूर्वसंज्ञाऽपवादः । अनुदात्तङित आत्मनेपदम् १ । ३ । १२ । अनुदात्तेतो वितश्च धातोरात्मनेपदं स्यात् । स्वरितचितः कत्रंभिप्राये क्रियाफले ११३७२। स्वरितेतो लितश्च धातोरात्मनेपदं स्यात्कर्तृगामिनि क्रियाफले । शेषात्कर्तरि पर- स्मैपदम् श३।७८) आत्मनेपदनिमित्तहीनाद्धातोः कर्तरि परस्मैपदं स्यात् । तिङ- स्त्रीणि त्रीणि प्रथममध्यमोत्तमाः१।४।१०१ तिङ् उभयोः पदयोस्त्रयस्त्रिकाः क्रमादेतत्संज्ञाः स्युः । तान्येकवचन द्विवचनबहुवचनान्येकशः१।४।१०२ ॥ लब्धप्रथमादिसंज्ञानि तिडस्त्रीणि त्रीणि वचनानि प्रत्येकमेकवचनादिसंज्ञानि स्युः युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः १।४।१०५] तिब्वाच्य- का प्रयोग होता है। यथा-'स पठतिस्म' ( उसन पढ़ा)। यावत्' के योगसे भविष्यत् कालमें भी 'लट' का प्रयोग होता है। यथा-'स यावन नागच्छति' (वह जब तक नहीं आवेगा) तितस्-लकारके स्थानमें तिबादि १८ आदेश हों। नोट:-इन अठारहों को 'तिङ' कहते हैं । आरंभके 'ति' से लेकर अन्तिम तक 'ति' प्रत्याहार बनता है। ल-लकारके स्थानमें तिबादि आदेशकी परस्मैपद' संज्ञा हो। तङा-'त प्रत्या- हार और शानच्-कानच ( प्रत्ययों) की आत्मनेपदसंज्ञा हो। नोट:-'ताताम्' के आदि तकारसे महिङ्क उकार पर्यन्त नवोंको 'त' कहते हैं । तक मी प्रत्याहार कहा जाता है। अनुदात्त-अनुदात्तेत् जो धातु और उपदेशावस्था में जो रितु , तदन्त जो धातु, उससे पर लकारके स्थानमें आत्मनेपद हो । स्वरित्-स्वरितेत् और डित् धातुसे आत्मने- पद हो-कर्तृगामी क्रियाफलमें । नोट:-जहाँ फलाकाँक्षा रहती है वहाँ यदि कर्ता फलभागी हो तो उभयपदी धातुले आत्मनेपद होता है और यदि फलभागी कोई दूसरा ( यजमान) हो तो परस्मैपदका प्रयोग होता है। अतः सङ्कल्प-वाक्यमें अपने लिये 'करिष्ये' और यजमानके लिये 'करिष्यामि' का प्रयोग किया जाता है। शेषा-आत्मनेपदके निमित्तसे हीन जो धातु, उससे कर्ता परस्मैपद हो। तिह- वे प्रत्येक एकवचन, द्विवचन, बहुवचन संञ्चक हो। युष्म-तिब्वाच्य कारकवाची जो १ भ्वादिप्र०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १६ May . कारकवाचिनि युष्मदि प्रयुज्यमानेऽप्रयुज्यमाने च मध्यमः स्यात् । अस्मद्युत्तमः १४।१०७ तथाभूतेऽस्मद्युत्तमः स्यात् । शेषे प्रथमः ११४।१०८ मध्यमोत्तमयो- रविषये प्रथमः स्यात् । भू-ति इति जाते । तिशित्सार्चधातुकम् ३॥ ४॥ ११३॥ तिङः शितश्च धात्वधिकारोक्ता एतत्संज्ञाः स्युः । कर्तरि शप् ३/१४६८। कर्थे सार्वधातुके परे धातोः शप् स्यात् । सावधातुकार्धधातुकयोः ७/३।८४] अनयोः परयोरिगन्ताङ्गस्य गुणः स्यात् । अवादेशः । भवति । भवतः । झोऽन्तः भवति (ई० ४३)-भूधातोः 'लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः' इति खले कपोतन्यायेन कर्तरि दशापि लकाराः प्राप्ताः, एषु केनाऽत्र भाव्यमित्याकाक्षायां 'वर्तमाने लट्' इति भूधातोर्वर्तमानक्रियावृत्तित्वविवक्षायां लटि अनुबन्धलोपे भूल' इति दशायां 'लस्य इत्यधिकृत्य 'तिप्तस्मिसिप्थस्थमिब्वस्मस्तातामथासाथान्ध्वमिड्वहि- महिङ' इत्येतेऽष्टादश लादेशाः प्राप्ताः ततश्च 'लः परस्मैपदम्' इत्यनेन अष्टादशाना- मप्येषां परस्मैपदसंज्ञा सम्प्राप्ता किन्तु 'तडानावात्मनेपदम् इत्यनेन तङ्प्रत्याहारान्तः- पातिनां नवानामात्मनेपदसंज्ञा सञ्जाता एवं सति तिबादयः परस्मैपदसंज्ञाः, तादयश्च आत्मनेपदसंज्ञा, एषां मध्यादत्र परस्मैपदसंझिनः श्राहोस्विद् आत्मने- पदसंज्ञिनः प्रत्ययाः स्युरिति सन्देहे 'शेषात्कर्तरि परस्मैपदम्' इत्यनेन भूधातोरात्म- नेपदनिमित्तहीनत्वात्कर्तरि परस्मैपदं प्राप्तं, ततः परस्मैपदसंज्ञिनां नवानां मध्यात्क- तमेन भाव्यमित्याकांक्षायाम् 'तिङस्त्रीणि त्रीणि प्रथममध्यमोत्तमाः' इत्यनेन क्रमात वाची जो युष्मद् शब्द वह प्रयुज्यमान हो अथवा अप्रयुज्यमान हो, तो भी धातुसे मध्यम पुरुष हो। अस्म-तिवाच्य कारकवाची जो अस्मद् शब्द वह प्रयुज्यमान हो अथवा अप्रयुज्यमान हो, तो भी धातुसे उत्तम पुरुष हो। शेषे-मध्यम और उत्तम पुरुष के अविषयमें प्रथम पुरुष हो। नोट:-विभक्तियों में ३ पुरुष होते हैं-प्रथम, मध्यम और उत्तम । क्रियाके साथ युष्मद् वा अस्मद् शब्दसे भिन्न शब्दोंके प्रयोग रहने पर प्रथम पुरुष, युष्मद् शब्दके प्रयोग रहने पर मध्यम पुरुष और अस्मद् शब्दके प्रयोग रहने पर उत्तम पुरुष होता है। तथा कर्ताका जो वचन रहे वही क्रियाका भी बचन होता है। यथा-(१) बालकः पठति । बालको पठतः । बालकाः पठन्ति । (२) त्वं पठति । युवां पठथः । यूयं पठथ । (३) अहं पठामि । आवां पठावः। वयं पठामः । तिङ्-धात्वविकारमें उक्त तिङ्-शित् प्रत्ययोंकी सार्वधातुक संज्ञा हो । कतरिकत्र- यंक सार्वधातुकके परे धातुसे 'श' प्रत्यय हो । सार्व-इगन्त अंगको गुण हो सार्वधातुक, आर्धधातुकके परे । शोऽन्त:-प्रत्ययावयव 'झ' के स्थानमें 'अन्त' भादेश हो। av " ' ++ - ऋमित्र । परोक्षार्थवृत्ति जो धातु उससे लिट् लकार हो। ६२ लघुसिद्धान्तकौमुदी ७१३ प्रत्ययावयवस्य मस्याऽन्तादेशः स्यात् । अतो गुरो । भवन्ति । भवति । विभा भवयः। भवथ । अतो दीघों यामि।३।१०अतोऽङ्गस्य दीर्घः स्थायआदी सार्वधातुके । भवामि । भवावः । भवासः । स भवति । तौ भवतः। ते भवन्ति । त्वं भवसि । युवां भवथः। यूयं भवथा। अहं भवामि । श्रावां भवावः। वयं भवामः । परोक्षे लिट् ३१२।११५ ! भूतानद्यतनपरोक्षार्थवृत्तेर्धातोलिट् । लस्य तिबादयः । परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः ३।४।२ लिटस्तिबादीनां नवानां णलादयो नव स्युः । भू अ इति स्थिते । सुवो बुग लुब्लिटोः ६४८८ भुवो युगागमः स्याल्लुब्लिटोरचि । लिटि धातोरनभ्यासस्य ६।१।। लिटि त्रयाणां त्रिकाणां प्रथममध्यमोत्तमसंज्ञासुजातासु च लब्धप्रथमादिसंज्ञानां तिङस्त्रयाणां बचनानां प्रत्येकमेकवचन द्विवचनबहुवचनसंज्ञासु अत्र प्रथमेन भाव्यम् , उत मध्यमेन आहोस्विद् उत्तमेन इत्याकांक्षायां शेषे प्रथमः' इति प्रथमपुरुषो भवितुं युक्तस्तथापि त्रीणि वचनानि, एचपि कतमेन भाव्यमित्याकांक्षायां 'द्वयेकचोर्द्विवचनैकवचने' इत्यनेनाऽत्र एकवचनस्य विवक्षायां प्रथमपुरुषे तिपि जाते अनुबन्धलोपे 'भूति' इति स्थिते 'तिशित्सार्वधातुकम्' इत्यनेन तिपः सार्वधातुकसंज्ञायां 'सार्वधातुकार्ध- धातुकयोः' इत्यनेन गुणे प्राप्ते 'भूसुबोस्तिङि' इत्यनेन गुणनिषेधे 'कर्तरि शप' इति शपि अनुबन्धलोपे 'भू 'अति' इति जाते 'तिशित्सार्वधातुकम्' इति शपोऽकारस्य सार्वधातुकसंज्ञायां 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' इति गुणे अवादेशे भवति' इति । अतो-अदन्त अङ्गको दीर्घ हो यज्ञादि सार्वधातुकके परे । परोहे भूत अनद्यतन और नोट:-अनद्यतन कालके दो भेद हैं-भूत और भविष्य । पूर्व दिनकी आधी रात ( १२ बजे ) तक जो क्रिया हुई हो वह भूत अनद्यतन और आगामी (आज) रातके बारह बजेके वाद जो क्रिया होनेवाली हो वह भविष्यत् अनद्यतन (लुट) की क्रिया कही जाती है। अतीताया रात्रेः पश्चार्धन आगामिन्याः पूर्वार्धेन च सहितो दिवसोऽद्यतनः, तद्धि- लोऽनयतनः । 'परोक्ष' उसको कहते हैं जिसमें वक्ताका प्रत्यक्ष नहीं हो। एवञ्च यह सिद्ध हुआ कि परोक्ष और 'अनयतन' भूत कालमें 'लिट'का प्रयोग हो। यथा-रामो बालिन जघान' । स्मरण रहे कि चित्तविक्षेपमें तथा किसी भी हालतमें स्वीकार नहीं करने पर प्रत्यक्ष ( उत्तम पुरुष ) में भी लिट का प्रयोग होता है। यथा-(१) 'सुप्तोऽहं किल विललाप' (२)'नाऽहं कलिङ्गां जगोम । (लकारार्थ देखें)। परस्मै-'लिट्' सन्बन्धी तिबादि नौ के स्थानमें पलादि नौ आदेश हो । भुवो-'भू' धातुको 'युक' का आगम हो, लुङ् और लिट संबन्धी अच्के परे । लिटि-लिट् के परे अचभ्यास ( द्वित्ववर्जित ) धात्ववयव प्रथम एकाचको द्वित्व हो और ( अजादि धातु रहे । । भ्वादिप्र० इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। ३ परेऽनस्यासधात्ववयवस्येकाचः प्रथमस्य द्वे स्तः। श्रादिभूतादचः परस्य तु द्विती- यस्य । भूव भू अ इति स्थिते । पूर्वोऽभ्यासः ६१४ अत्र ये है विहिते तयोः पूर्वोऽभ्याससंज्ञः स्यात् । हलादिः शेषः ७।४।६० अभ्यासस्थाऽऽदिहल शिष्यते, अन्ये हलो जुप्यन्ते । इति वलोपः । ह्रस्वः ७.४ । ५६ | अभ्यासस्याऽचो ह्रस्वः स्यात् । भवतेरः ७४/७३ भवतेरभ्यालोकारस्य अः स्याल्लिटि । अभ्याले चर्च बाठा५४! अभ्यासे झलां चरः स्युर्जशश्च । झशां जशः, खयां चर इति विवेकः । बभूव । बभूवतुः । बभूवुः । लिट् च ३।४। ११५ । लिडादेशस्तिडार्धधातुकसंज्ञः स्यात् । आर्धधातुकस्येडवलादेः ७।२।३५ वलादेरार्धधातुकत्येडागमः स्यात् । बभूविथ । बभूवथुः । बभूव २ । बभूविच । बभूविम । अनद्यतने लुट ३१३।१५ भविष्यत्यनद्यतनेऽर्थे धातोलृट् स्यात् । स्यतासी लुलुटोः ३:१॥३३॥ धातोः स्यता- सी एतो प्रत्ययौ स्तो लुलुगः परतः । शबाद्यपवादः । 'लु' इति लुङ्लुटोहणम् ।। बभूव-(ई० ३९,४२,५०,५४)-भूधातोः 'परोक्षे लिट' इति लिटि इकार- टकारयोरित्संज्ञायां लोपे च कृते 'भू ल' इति स्थिते 'तिप्तस्मि' इति लः स्थाने तिपि तत्स्थाने 'परस्मैपदानां गलतुसुस्थलथुसणल्वमाः' इति णलि अनुबन्धलोपे 'भू अ' इति दशायां नित्यत्वाद्गुणवृद्धी बाधित्वा 'भुचो वुग्लुब्लिटोः' इति भूधातो- बुंगागमे अनुबन्धलोपे 'भूव श्र' इति जाते 'लिटि धातोरनभ्यासस्य' इति भुवो द्वित्वे 'भूव भून् अ' इति दशायां 'पूर्वोऽभ्यासः' इति पूर्वस्य 'भुव्' इत्यस्य अभ्याससंज्ञायां 'हलादिः शेषः' इति वलोपे 'ह्रस्वः' इत्यनेन ह्रस्वे 'भु भूव अ' इति स्थिते 'भवतेरः' इत्यभ्यासोकारस्य प्रकारे 'अभ्यासे वर्च' इत्यभ्यासभस्य बकारे 'बभूव' इति सिद्धम्। बभूविथ ( ई० ४४, ५१)-भूधातोलिटि सिपि सिपस्थलादेशे 'प्रार्धधातु- तो) आदिभूत अच्से पर द्वितीय एकाचको द्वित्व हो । पूर्वो-पाष्ठद्वित्व-प्रकरणमें जो दो (द्वित्व ) विधान किये गये हैं, उनमें पूर्वकी अभ्याससंज्ञा हो। हलादि:-अभ्यासका आदि हल् शेष रहे (बच जाय) और अन्य हल्का लोप हो । हस्वः-अभ्यासके अच्को हस्व हो । भव-भू धातुके अभ्यासके उकारको अकार आदेश हो, लिटके परे । अभ्या- अभ्यासमें झल्के स्थानमें 'चर्' आदेश हो और 'जश्' आदेश भी हो। अर्थात् 'झ' के स्थानमें 'जश्' और 'खय्' के स्थानमें 'चर्' हो। लिट्-लिडादेश 'ति' को आर्धधातुक संज्ञा हो । आध-वलादि आर्धधातुकको 'इट' का आगम हो। अन-भविष्यत् अनद्यतन अर्थमें धातुसे 'लुट् लकार हो। ( यथा-श्वो गन्ताऽस्मि)। स्यता-धातुसे 'स्य' प्रत्यय और 'तासि' प्रत्यय हो-'ल' (ल्ट-लङ) और 'लुट' के परे ( यथाक्रमसे ) ।
लघुसिद्धान्तकौमुदी आर्धधातुकं शेषः ३।४।११४ । तिशिद्भयोऽन्यो धातोरिति विहितः प्रत्यय एतत्संज्ञः स्यात् । इट् ! लुटः प्रथमस्य डारौरसः २।४।८५ डा रौ रस् एते क्रमात्स्युः । डित्त्वसामर्थ्यादभस्यापिटेलोपः । भविता॥ तासस्त्योोपः ७४।५० तासेरस्तेश्च सस्य लोपः स्यात्सादौ प्रत्यये परे। रिच ७१४१५१ | रादौ प्रत्यये तथा। भवितारौ। भवितारः । भवितासि । भवितास्थः। भवितास्थ । भवि- तास्मि ! भवितास्वः । भवितास्मः ॥ लुट् शेषे च ३।३।१३ । भविष्यदर्थाद्धातो- लृट् स्यात् क्रियार्थायां क्रियायां सत्यामसत्यां वा । स्यः । इट् । भविष्यति । भविष्यतः। भविष्यन्ति । भविष्यसि । भविष्यथः । भविष्यथ । भविष्यामि । भविष्यावः । भविष्यामः ॥ लोट् च ३।३।१६२। विध्याद्यर्थेषु धातोर्लोट् स्यात् । आशिषि लिङ्लोटौ ३1३1 १७३ | आशिषि धातोर्लिङलोटौ स्तः । एरुः ३१४।८६। लोट इकारस्य उः स्यात् । भवतु ॥ तुह्योस्ताताशिष्यन्य तरस्याम् ७ १ १ १ ३५ | आशिषि तुह्योस्तातङ् वा स्यात् । परत्वात्सर्वादेशः। भवतात् ॥ लोटो लङ्वत् ३/४/८५लोटो लङ इव कार्य स्यात् । तेन तामा- दयः सलोपश्च ॥ तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः ३६४।१०१ ङितश्चतुर्णा तामादयः क्रमात्स्युः । भवताम् । भवन्तु ॥ सेयपिच्च ३।४।८७ | लोटः सेहिः स्यात् सोऽपिच्च ॥ अतो हेः ६४।१०५। अतः परस्य हेलु स्यात् । भव । भवतात् । कल्येड्वलादेः' इति थस्य इडागमे 'भुवो बुग् लुब्लिटोः' 'भुवो वुग् लुङ्लिटोः' इति भुवो वुगागमे द्वित्वे आध-तिक-शित से भिन्न (शेष ) जो बातोः' इस अधिकार में विहित प्रत्यय उसकी आर्धधातुकसंज्ञा हो। लुट:-'लुट् लकार संबन्धी प्रथम पुरुषके स्थान में क्रमसे डा, रौ, रस् आदेश हो। तास-तास् और अस्तिके सकारका लोप हो सादि प्रत्ययके परे । रिच-तास् और अस्तिके सकारका लोप हो रादि प्रत्ययके परे । लूट-भविष्यत् अर्थमें धातुसे 'लट लकार हो, चाहे क्रियार्थक क्रिया रहे या न रहे । नोट:--एक क्रिया यदि दूसरी क्रियाके लिये हो रही हो तो उस क्रियाको 'क्रियार्थक क्रिया' कहते हैं । यथा-'पठितुं गच्छति' इति-पठिष्यति'। लोट-विध्यादि अर्थमें धातुसे लोट लकार हो। आशि-आशीर्वाद अर्थमें धातुसे लिङ और लोट लकार हों। पुरु--लोट संबन्धी इकारको उकार हो। तुह्यो-आशीर्वाद अर्थमें 'तु' और 'हि' के स्थान में विकल्पसे तातङ् आदेश हो । लोटो-लोट के स्थान में लड़के समान कार्य ( तामादि आदेश और वस्-नस्के सकारका लोप) हो। तस्थ-ङित् लकार सम्बन्धी तसादि (तस्-थस्-थ-मिप) के स्थानमें तामादि (ताम्-तम्-त-अम्) आदेश हों। सेद्य-लोट् संबन्धी 'सि'के स्थानमें 'हि' आदेश हो-वह 'अपित्' हो । अतो-अदन्त अङ्ग । 10 । ॥ . स्वादिप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। भवतम् । भवत । मेनिः ३।४/८६ लोटो मेनिः स्यात् । आडुत्तमस्य पिच्च ३।४/६२। लोडुत्तमस्याऽऽट् स्यात्स पिच्च । हिन्योरुत्वं न, इकारोच्चारणसामयात् । ते प्राग्धातोः १ | ४१८० ते = गत्युपसर्गसंज्ञका धातोः प्रागेव प्रयोक्तव्याः । आनि लोट ८।४।१६। उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य लोडादेशस्याऽऽनीत्यस्य नस्य णः स्यात् । प्रभवाणि । ॐ दुरः षत्वणत्वयोरुपसर्गत्वप्रतिषेधो वक्तव्यः । दुःस्थितिः । दुर्भवानि । ॐ अन्तशब्दस्याऽतिविधिणत्वेषूपसर्गत्वं वाच्यम् । अन्तर्भवाणि । नित्यं डित् ३।४।६६ | सकारान्तस्य डिदुत्तमस्य नित्यं लोपः स्यात् । अलोऽन्त्यस्येति सलोपः । भवाव । भवाम । अनद्यतने लड३।२।१११ अभ्याससंज्ञायां हलादिः शेषः' इति वलोपे 'हस्वः'इत्यनेन अभ्यासस्य ह्रस्वे 'भवतेरः' इत्यभ्यासस्योकारस्य प्रकारे 'अभ्यासे चर्च' इति भस्य बत्वे 'बभूविथ' इति । से पर 'हि' का लुक् हो। मेनिः-लोट सम्बन्धी 'मि' के स्थानमें 'नि' आदेश हो। आहु-लोट् लकार सम्बन्धी उत्तम पुरुषको 'आद' का आगम हो और वह आट पित हो । तेमा-गतिसंज्ञक और उपसर्गसंज्ञक पूर्वोक्त प्रादिका धातुसे पहले प्रयोग करना चाहिये । आनि-उपसर्गस्थ निमित्त (रेफ-धकार) से पर लोटके स्थानमें हुए 'आनि' के नकारको णकार हो। नोट:-प्रमवाणि, प्रगिगदति, इत्यादि स्थलों में उपसर्गके साथ समास नहीं होने पर भी संहिता नित्य रहती है। तदुक्तम्- 'संहितैकपदे नित्या, नित्या धातूपसर्गयोः। नित्या समासे, वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ॥ धात्वर्थ बाधते कश्चित्कश्चित्तमनुवर्तते । विशिनष्टि तमेवाऽर्थमुपसर्गगतिस्विधा । एक पदमें धातु और उपसर्गकी तथा समासमें संहिता नित्य होती है। केवल वाक्यमें वक्ताकी इच्छापर रहती है । ( यथा-'इन्दुमती उवाच' अथवा 'इन्दुमत्युवाच')॥१॥ कोई उपसर्ग धातुके मुख्यार्थको बाधकर नवीन अर्थका बोध कराता है, कोई धात्वर्थका ही अनुवर्तन करता है और कोई विशेषण होकर उसी धात्वर्थको और भी स्फुटित कर देता है। इस प्रकार उपसर्गकी गति तीन प्रकारकी होती है। उक्तञ्च- उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यन्न नीयते । प्रहारा-ऽऽहार-संहार-विहार परिहारवत् ॥ विविध उपसर्गके बलसे धात्वर्थ भी विवध अर्थमें परिवर्तित होता है । ( परिशिष्ट देखो) दुरः-धत्व और णत्वके विषय में 'दुर्' को उपसर्गत्व का प्रतिषेध कहना चाहिये ( उपसर्ग- संञ्चा नहीं हो)। अन्तः- आविधि, 'कि'विधि और ‘णत्व'विधिक विषयमें अन्तर् शब्दको भी उपसर्ग कहना चाहिये। नित्यं-हित् लकार सम्बन्धी सकारान्त उत्तम पुरुषके सकारका नित्य लोप हो । अन-अनद्यतन भूतार्थवृत्ति धातुसे 'ल' लकार हो । ANDABA ।
। लघुसिद्धान्तकौमुदी अनद्यतनभूतार्थवृत्तेर्धातोर्लङ स्यात् । लुङ्लङ्लङदवडुदात्तः ६।४।७१ । एथ्य- अस्थाऽडागमः स्यात् स चोदात्तः । इतश्च ३।४।१००डितो लक्ष्य परस्मैपद- वि निकारान्तं यत्तदन्तस्य लोप: स्यात् । अभवत् । अभवताम् । अभवन् । अभवः । अभवतम् ! अभवत । अभवम् । अभवाव । अभवाम । विधिनिमन्त्रणामन्त्र- णाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिङ ३ ॥ ३॥ १६१ । एष्वर्थेषु धातोलिङ् स्यात् । यासुट परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च ३। ४१ १३० । लिङः परस्मैपदानां यासुडागमः स्यात्स चोदात्तो ञ्छि । लिजः सलोपोऽनन्त्यस्य ७१२१७६ | सार्वधातुकलि- ओऽनन्त्यस्य सस्य लोपः स्यात् । इति प्राप्ते । अतो येयः ७।२१८०|अतः परस्य सार्वधातुकावयवस्य यास् इत्यस्य इय् स्यात् । गुणः । लोपो व्योर्वलि ६।१ । ६६ । वकारयकारयोर्लोपः स्याद्वलि । भवेत् । भवेताम् । झर्जुस ३।४।१०८ | लिङो झेर्जुस् स्यात् । भवेयुः । भवेः । भवेतम् । भवेत । भवेयम् । भवेव । भवेम । लिङाशिषि ३ । ४ ! ११६ । आशिषि लिङस्तिङार्धधातुकसंज्ञः भवेत् (ई०४१,४६,५६)-भूधातोः विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थ- नेषु लिङ्' इति लिङि तत्स्थाने 'तिप्तस्मि०' इत्यादिसूत्रेण तिपि अनुबन्धलोपे 'भूति' लुङ्-लुङ, ल, लङ् के परे अङ्ग को 'अट्' का आगम हो तथा वह उदात्त हो। इतव-छित लकार सम्बन्धी जो इकारान्त परस्मैपद, उसके अन्त (हकार)का लोप हो। विधि-विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, संप्रश्न और प्रार्थना अर्थों में धातुसे 'लिका लकार हो। नोट:-विध्यादि अर्थों में 'लोट' का भी विधान हो चुका है। अब यहाँ दोनोंका स्पष्टी- करण इस प्रकार है--विधिः = प्रेरणम् , भृत्यादे निकृष्टस्य प्रवर्तनम् । जैसे-भवान् वस्त्रं क्षालयतु क्षालयेद्वा। निमन्त्रणं = नियोगकरणम् , आवश्यके श्राद्धभोजनादौ दौहित्रादेः प्रवर्तनम् । जैसे-इह मातामहश्राद्धे दौहित्रादयो भवन्तः भुजताम् वा भुञ्जीरन् । आम- न्त्रण कामचारानुज्ञा । जैसे-मत्पुत्रोत्सवे भवान् आगच्छतु, आगच्छेद्दा । अधीष्ट सत्कार पूर्वको व्यापारः। जैसे-मदात्मजं भवान् अध्यापयतु अध्यापयेद्वा। सम्प्रश्नः-- सम्प्रधारणम् । जैसे-किं मोः व्याकरणं भवान् अधीयीत । प्रार्थनं = याच्आ। यथा-भवान् में फलं ददातु दद्याद्वा । यासु-लिङ् लकार सम्बन्धी परस्मैपद को 'यासुट' का आगम हो और वह खित हो । लिङ:-सार्वधातुक लिङ् (विधिलिङ) संबन्धी अनन्तसकार का लोप हो । अतो- 'अ' से पर सावधातुकावयव 'यास्' को 'इय्' आदेश हो । लोपो-यकार और वकारका लोप हो, वलके परे । झेर्जु-लिङ लकार सम्बन्धी झि' के स्थान में 'जुम्' हो । लिङा-आशीर्वाद अर्थमें लिादेश, 'तिङ' को आर्धधातुकसंज्ञा हो । . - an । । भ्वादिप्र०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। स्यात् । किदाशिषि ३।४। १०४ । आशिषि लिडो यासुट् कित्स्यात् । 'स्कोः संयोगाद्योरिति सलोपः। विडति चशश गिरिकन्डिनिमित्ते इग्लक्षणे गुण- वृद्धी न स्तः। भूयात् । भूयास्ताम् । भूयासुः। भूयाः। भूयास्तम् । भूयास्त । भूयासम् । भूयास्व । भूयास्म । लुङ्३ ।२।११०। भूतार्थवृत्तेर्धातोर्लुङ स्यात् । माडि लुङ्३ । ३ । १७४ | माङयुपपदे धातोर्लुङ् स्यात् । सर्वलकारापवादः । स्मोत्तरे लड च ३। ३११७६ । स्मोत्तरे माडि लङ स्याचाल्लुङ् । चिल लुङि ३।१।४३। धातोश्च्लिप्रत्ययः स्याल्लुङि । शबाद्यपवादः । चलेः सिच ३२४४) च्लेः सिजादेशः स्यात् । इचावितौ । गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मपदेषु २।४/७७| एभ्यः सिचो लुक् स्यात् । गापाविहेणादेशपिबती गृह्यते । भूसुवोस्तिङि ७ | ३.८८ भू सू एतयोः सार्वधातुके तिङि परे गुणो न स्यात् । - इति स्थिते तिपः सार्वधातुकसंज्ञायां शपि अनुबन्धलोपे 'भू अति' इति स्थिते शित्वात् सार्वधातुकसंज्ञायां 'सार्वधातुकार्धधातु कयोः' इति गुणे अवादेशे 'भवति' इति जाते 'इतश्च' इतीकारलोपे ‘यासुट परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च' इति यासुटि अनुबन्ध- लोपे 'लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य' इति प्रबाध्य 'अतो येयः' इति यासः इयादेशे 'भव इय् त्' इति जाते 'श्राद्गुणः' इति गुणे 'लोपो व्योर्वलि' इति यलोपे 'भवेत्' इति भूयास्ताम् ( ई० ३१, ४५ )-भूधातोः 'आशिषि लिङलोटौ' इति लिङि तत्स्थाने 'तिप्तजिम' इत्यादिना तसि 'तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः' इति तसस्तामा- देशे 'लिडाशिषि' इत्यार्धधातुकत्वात् शपोऽभावे 'भू ताम्' इति दशायां 'यासुट पर- स्मैपदेषुदात्तो डिच्च' इति यासुटि अनुबन्धलोपे 'सुट् तिथोः' इति सुटि अनुबन्ध- लोपे 'भू यास् स् ताम्' इति स्थिते 'किदाशिषि' इति कित्त्वात् गुणनिषेधे 'स्कोः संयोगाद्योरन्ते च' इति यासुटः सस्य लोपे 'भूयास्ताम्' इति । किदा-आशीर्वाद अर्थमें लिछ सम्बन्धी यासुद कित् हो। विङ-गित् , कित् और डिन निमित्तक इग्लक्षण गुण-वृद्धि नहीं हो। लुङ्-भूतार्थवृत्ति धातुसे लुङ् लकार हो। माडि-'मा' उपपद रहने पर धातुसे लुङ् लकार हो। स्मो-स्म' उत्तर (परक) 'मा उपपद रहते धातुसे लङ और लुङ लकार हों। च्छि-धातुसे 'लिप्रत्यय हो, लुके परे । च्ले:-च्लिके स्थान में 'सिच्' आदेश हो । गाति-इणादेश 'गा' धातु, 'स्था' धातु 'धुत्संशक' धातु, एवं 'पा' और 'भू' धातुओंसे पर जो सिच् उसका लुक् हो, परस्मै- पदके परे। भूसु-'भू' तथा 'सू' धातुओंको गुण नहीं हो, सार्वधातुक तिङ्क परे । , Heau लघुसिद्धान्तकौमुदी न 1 । . अभूत। अभूताम् । अभूवन् । अभूः । भूतम् । अभूत । अभवम् अभूव । अभूम । न माङयोगे ६४।७४| अडाटौ न स्तः। मा भवान् भूत् । मा स्म भवत् । मा स्म भूत् । लिनिमित्ते लुङ क्रियातिपत्तौ ३।३। १३६ । हेतुहेतुमद्भावादि लिनिमित्तं, तत्र भविष्यत्यर्थे लङ् स्यात् , प्रियाया अनिष्पत्ती गम्यमानायाम् । अभविष्यत् । अभविष्यताम् । अभविष्यन् । अभविष्यः । अभविष्यतम् । अभविष्यत । अभविष्यम् । अभविष्याव । अभविष्याम । 'सुवृ- टिश्चेदभविष्यत्तदा सुभिक्षमभविष्यत्' इत्यादि ज्ञेयम् । अत सातत्यगमने । अतति । अत आदेः७।४/७०| अभ्यासस्यादेरतो दीर्घः स्यात् । श्रात । आततुः। आतुः। आतिथ। आतथुः। श्रात । श्रात। आतिव। आतिम । अतिता । अतिष्यति । अततु । आडजादीनाम् ६।४। ७२ अजादेरङ्गस्याऽऽट् स्यात् लुङ्लङलुक्षु । श्रातत् । अतेत् । अत्यात् । अत्यास्ताम् । लुङि सिचि इडागमे कृते । अस्तिसिचोऽपृक्ते ७३॥ ६६ विद्यमानात् सिचोऽस्तेश्च परस्या- ऽपृक्तस्य हल ईडागमः स्यात् । इट ईटि |२|२८ । इटः परस्य सस्य लोपः । । । .. अभूत (ई० ३०, ३२, ४३, ५५)-भूधातोः 'लु' इति सूत्रेण लुङि तत्स्थाने 'तिप्तस्मि०' इत्यादिना तिपि अनुबन्धलोपे 'लुङ्लङलुवहदात्तः' इत्य- डागमे अनुबन्धलोपे 'इतश्च' इतीकारलोपे 'च्लि लुङि' इति च्लो 'च्लेः सिच्' इति सिचि 'गातिस्थाधुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु' इति सिचो लुकि 'भूसुवोस्तिङि' इति गुणनिषेधे 'अभूत्' इति सिद्धम् । अभूवन ( ई० ३७, ३८, ४८, ५७ )-भूधातो कि तत्स्थाने झो अडागमे अनुबन्धलोपे सिचि 'गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु' इति सिचो लुकि मस्याऽन्तादेशे 'इतश्च' इतीकारलोपे 'भुवो वुग्लुङ्लिटोः' इति वुगागमे अनुबन्ध- लोपे 'संयोगान्तस्य लोपः' इति तलोपे 'अभूवन्' इति । न मा-मा' के योग अङ्गको 'अट या 'आट' का आगम नहीं हो। लिनि-भविष्यत् अर्थ में विद्यमान धातुसे हेतुहेतुमद्भावादि अर्थमें 'लक' लकार हो क्रियाकी भनिष्पत्ति यदि गम्यमान रहे । भत-अभ्यासके आदि अत् (हस्व अकार ) को दीर्घ हो । आडजा- अजादि अङ्गको आटका आगम हो, लुछ, लङ, लड़के परे । अस्ति-विद्यमान 'सिच्' से पर और 'अस्' धातुसे पर अपृक्त 'हल' को ईट्का आगम हो । इट -'इट्' से पर भ्वादिप्र०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। 8 स्यादीटि परे। *सिज्लोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः । आतीत् । आतिष्टाम् । सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च ३।४।१०६ । सिचोऽभ्यस्ताद्विदेश्च परस्य उित्सम्बन्धिनो मेर्जुस् स्यात् । आतिषुः । श्रातीः । आतिष्टम् । श्रातिष्ट । आतिषम् । प्रातिष्व । आतिष्म । प्रातिष्यत् । षिध गत्याम् । स्वं लघु १।४।१०। ह्रस्वं लघुसझं स्यात् । संयोगे गुरु १।४।११ । संयोगे परे ह्रस्वं गुरु- सझं स्यात् दीर्घञ्च ११४।१२। दीर्घञ्च गुरुसझं स्यात् । पुगन्तलघूपधस्य च ७।३।८६। पुगन्तस्य लघूपधस्य चाऽङ्गस्येको गुणः स्यात् सार्वधातुकार्धधातुकयोः । धात्वादेरिति सः । सेधति । षत्वम् । सिषेध । असंयोगाल्लिकित् ११२१५ असंयोगात्परोऽपिल्लिट कित् स्यात् । सिविधतुः। सिषिधुः । सिषेधिय । सिषिधथुः । सिषिध । सिषेध । सिषिधिय । सिषिधिम । सेधिता । सेधिष्यति । सेधतु । असेधत् । सेधेत् । सिध्यात् । असेधीत् । असेधिष्यत् । एवम्-चिती संज्ञाने। शुच शोके । गद् व्यक्तायां वाचि । गदति । नेर्गदनदपतपदधुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवप- तिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु च ८।४ । १७ । उपसर्गस्थानिमित्तात्परस्य नेर्नस्य णः स्याद्गदादिषु परेषु । प्रणिगदति । कुहोश्चः ७।४। ६२ । अभ्यासकव- गहकारयोश्चवर्गादेशः स्यात् । अत उपधायाः ७|१|११६ । उपधाया अतो आतीत् ( ई० २१, ४७, ५३)-अत्धातोर्तुङि तिपि अनुबन्धलोपे 'इतश्व' इतीकारलोपे 'चिल लुङि' इति च्लो 'लेः सिच्' इति सिचि इचि गते 'आडजा- दीनाम्' इत्याटि 'श्राटश्च' इति वृद्धौ सिचः सकारस्य 'आर्धधातुकस्येवलादेः' इतीटि तिपः तकारस्य 'अस्तिसिचोऽपृक्ते' इति ईटि अनुबन्धलोपे 'इट ईटि' इति सलोपे सिज्लोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः' इति वार्तिकेन सिज्लोपस्य असिद्धत्वाऽभा- वेन सवर्णदीधै 'आतीत्' इति । 'सिच्' सम्बन्धी सकारका लोप हो, 'ईट' के परे । सिज्-'सिच्' से पर, 'अभ्यस्तसंज्ञक' से पर तथा 'विद्' धातुसे पर डिस्' लकार संबन्धी 'झि' को 'जुस आदेश हो । हस्वं- हस्व वर्ण लघुसंज्ञक हो। संयो-संयुक्त वर्ण परमें रहे तो हस्व वर्ण भी गुरुसंज्ञक हो। दीर्घ-दीर्घ वर्णकी गुरुसंशा हो । पुगन्त-पुगन्त और लघूपध जो अङ्ग तदवयव 'इक' को गुण हो, सार्वधातुक प्रत्ययके परे । असंयो-असंयोगसे पर अपित् 'लिट 'कित्' हो। नेर्गद-उपसर्गस्थनिमित्त (रेफ षकार ) से पर नि' के नकारको णकार हो, गद-नदादि धातुके परे । कुहो-अभ्यास सम्बन्धी कवर्ग और हकार को चवर्ग आदेश हो । अत-उपधासम्बन्धी 'अत्' को वृद्धि हो, । । शि । लघुसिद्धान्तकौमुदी वृद्धिः स्यात् जिति णिति च प्रत्यये परे । जगाद । जगदतुः। जगदुः । जगदिय । जगदथुः । जगद । णलुन्तमो वा ७११।६१ ! उत्तमो गल् वा मित्स्यात् । जगाद-जगद। जगदिच । जगदिमा गदिता। गदिष्यति । अगदत् । गदेत् । गद्यात् । अतो हलादेलघोः ७।२।७। हलादेलघोर- कारस्य इडादौ परस्मैपदे सिचि वृद्धिर्वा स्यात् । अगादीत्-अगदीत् । अगदिष्यत् । णद अव्यक्ते शब्द। णो नः ६।१ । ६५ । धातोरादेर्णस्य नः स्यात् । णोपदेशास्त्वननाटिनाथनाध्नन्दनक्कनृनृतः । उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य ८।४।१४। उपसर्गस्यानिमित्तात्परस्य णोपदेशस्य धातोर्नस्य णः स्यात् समासे असमासे च । प्रणदति । प्रणिनदति। नदति। ननाद । अत एकहरुमध्येऽनादेशादेलिटि ६।४।१२० । लिनिमित्तादेशादिकं न भवति यदङ्ग तदवयवस्याऽसंयुक्तहलमध्यस्थस्याऽकारस्य एकारः स्यादभ्यासलोपश्च किति जगाद, (ई० २५,५२)-गद्धातोलिटि तत्स्थाने तिपि 'परस्मैपदानाम्०' इति तिपो गलि लिटि धातोरनभ्यासस्य इति द्वित्वे 'पूर्वोऽभ्यासः' इति अभ्यासत्वे अनुबन्धलोपे 'हलादिः शेषः' इति दकारस्य लोपे 'कुहोश्चुः' इति अभ्यासगकारस्य जकारे 'श्रत उपधायाः' इति वृद्धौ ‘जगाद' इति । उत्तमपुरुषे तु 'णलुत्तमो वा' इत्यनेन णलः पाक्षिकत्वे णित्वे सति 'जगाद' 'जगद' इति रूपद्वयं भवतीति । अगादीत् ( ई० २२, ५०)-गद्धातोर्लुङस्तिपि 'इतश्च' इतीकारलोपे 'लुङ्- लङ्' इत्यडागमे 'चिल लुङि' इति च्लौ च्ले सिचि 'आर्धधातुकस्येवलादेः' इत्यनेन सस्य इटि 'अस्तिसिचोऽपृक्ते' इत्यनेन तकारस्य ईडागमे 'इट ईटि' इति सलोये 'सिज्लोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः' इति सिज्लोपस्याऽसिद्धत्वाभावेन सवर्णदीचे 'श्रतो हलादेलघोः' इति वृद्धौ ‘अगादीत्' इति । वृद्धयभावे 'अगदीत्' इति । 'जित , णित्' प्रत्ययके परे।णल-उत्तम पुरुष सम्बन्धी 'गल' को णिवद्भाव हो, विकल्पसे। अतो-हलादि सम्बन्धी लघु अकारको विकल्पसे वृद्धि हो, इडादि परस्मैपदपरक 'सिच' के परे। णो न:-धातुके आदि णकारको नकार हो। उपस-उपसर्गस्थ निमित्त (रेफ- पकार) से पर णोपदेश' धातुके नकारको णकार हो, असमासमें और (अपि शब्दात् ) समासमें भी। नोट:-नर्द, नाटि, नाथ, नाथ् , नन्द, नक, नू, नृत्-इन धातुओंसे अन्य जो नकारादि धातु वे जोपदेश हैं। (उत्पत्ति अवस्थामें उनके आदिमें णकार ही था)। अत-'लिट' निमित्तक आदेश नहीं हुआ हो, ऐसा जो 'अङ्ग' तदवयव जो असंयुक्त AASHRAICH 'Big । । भ्वादिप्रा इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता! ६१ लिटि । नेदतुः। नेदुः । थलि च सेटि ६४.१२१ प्रागुक्तं स्यात् । नेदिय । नेदथुः। नेद । ननाद-ननद । नेदिव । नेदिम । नदिता । नदिध्यति नदतु । अनदत् । नदेत् । नद्यात् । अनादीत्-अनदीत् । अनदिध्यत् । टुनदि समृद्धौ । आदिबिटुडवः १॥ ३॥ श उपदेशे धातोराया एते इतः स्युः । इदितो नुम् धातोः ७/११ ५८। इदितो धातोर्नुमागमः स्यात् । नन्दति । ननन्द । नन्दिता। नन्दिष्यति । नन्दतु । अनन्दत् । नन्देत् । नन्द्यात् । अनन्दीत् । अनन्दिष्यत् । अर्च पूजायाम् । अर्चति । तस्मान्नुड् द्विहलः ७४/७१३ द्विहलो धातोर्दी/भूतादकारात्परस्य नुट् स्यात् । आनर्च । आनर्चतुः। अर्चिता। अर्चिष्यति । अर्चतु । आर्चत् । अर्चेत् । अया॑त् । आर्चीत् । आर्चिव्यत् । ब्रज गतौ । ब्रजति । क्वाज । ब्रजिता । ब्रजिष्यति । ब्रजतु । अवजत् । ब्रजेत् । व्रज्यात् । वदव्रजहलन्तस्याचः ७२।३। वदेर्बजेहलन्तस्य चाऽङ्गस्या- ऽचः स्थाने वृद्धिः स्यात्सिचि परस्मैपदेषु । अवाजीत् । अवजिष्यत् । कटे वर्षाऽऽवरणयोः। कटति । चकाट। चकटतुः । कटिता । कटिष्यति । कटतु । अकटत् । कटेत् । कट्यात् । चन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् ७/ २॥ ५॥ हमयान्तस्य क्षणादेर्ण्यन्तस्य श्वयतेरेदितश्च वृद्धिर्न स्यादिडादौ सिचि । अकटीत् । नेदतुः (ई० ४३ ) णद्धातोलिटस्तसि 'णो नः' इति धातोर्णस्य नत्वे तसोऽ- तुसादेशे द्वित्वे अभ्याससंज्ञायां हलादिः शेषः' इत्यन्त्यहलो लोपे, 'अत एकह- लमध्येऽनादेशादेलिटि' इति एत्त्वेऽभ्यासलोपे सस्य रुत्वे विसर्गे 'नेदतुः' इति । आनर्च ( ई० ५१, ५५ )-अधातोलिटस्तिपि तिपो णलि द्वित्वे अभ्यास- संज्ञायां 'हलादिः शेषः' इति हलो लोपे 'अत आदेः' इत्यनेन अभ्यासाकारस्य दीर्चे 'तस्मान्नुड् द्विहलः' इति जुट्यनुबन्धलोपे 'आनर्च' इति । अकटीत् (ई० ४३,५४,५७)-कटधातो ङि तिपि इतश्च' इतीकारलोप लङ्लङ' इत्यडागमे मध्ये च्लौ तस्य सिचि 'आर्धधातुकस्येवलादेः' इति इटि 'अस्तिसिचोs- ल SUNARIES हलमध्यस्थ अकार, उसको एत्त्व हो और अभ्यासका लोप हो, कित्-लिट के परे। थलि- सेट् ( इट् सहित ) 'थल' के परे भी पूर्वोक्त प्रकारका एत्व हो । आदि-उपदेशावस्था में धातुके आदिमें वर्तमान 'जि-टु-डु' की इत्संज्ञा हो। इदितो-'इदित्' धातुको 'नुम्' का आगम हो । तस्मा-विहल थातुको दीर्धीभूत अकारसे पर, नुटका आगम हो (लिट में)। वद-वद्, व्रज और हलन्त धातुके 'अच्' को वृद्धि हो, परस्मैपदपरक 'सि' के परे। ह्मयन्त-हकारान्त, मकारान्त और यकारान्त धातु तथा क्षण-वस्-जागृ धातु और ण्यन्त Are : ईया ६२ लघुसिद्धान्तकौमुदी अकटिष्यत् । गुपू रक्षणे । गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः ३२११२८। एभ्य पायप्रत्ययः स्यात्स्वार्थे । सनाद्यन्ता धातवः ३११/३२ सनादयः कमेणि- उन्ताः प्रत्यया अन्ते येषां ते धातुसंज्ञकाः स्युः। धातुत्वाल्लडादयः । गोपायति । आयादय आर्धधातुके बा३।१।३१ : आर्धधातुकविवक्षायामायादयो वा स्युः । * कास्यनेकाच आम् वक्तव्यो लिटि । श्रास्कासोराम्विधानान्मस्य नेत्त्वम् । अतो लोपः ६।४।४८ श्रार्धधातुकोपदेशे यदकारान्तं तस्याऽकारस्य लोपः स्यादार्धधातुके । आमः २४|१| आमः परस्य लक् स्यात् । कृ चानुप्रयुज्यते लिटि ३।११४०। आमन्ताल्लिट्पराः कृभ्वस्तयोऽनुप्रयुज्यन्ते । तेषां द्वित्वादि । उरत् ७४।६६ अभ्यासवर्णस्याऽत्स्यात्प्रत्यये परे । रपरः । हलादिः शेषः । वृद्धिः । गोपायाश्च कार । द्वित्वात्परत्वाद्यणि प्राप्ते-द्विवचनेऽचि पृक्त' इत्यनेन तस्य ईटि च जाते 'श्रतो हलादेलघोः' इति वृद्धौ प्राप्तायां 'मयन्त- क्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम्' इति तनिषेधे 'इट ईटिं' इति सिचः सस्य लोये सिज्लो- पस्य सिद्धत्वात् सवर्णदोघे 'अक्टोत्' इति । गोपायाञ्चकार (ई० ३२,३४, ४३,५६)-गुप्धातोः 'आयादय आर्धधातुके वा' इति विकल्पेन पायप्रत्यये 'पुगन्तलघूपधस्य च'-इति गुणे 'सनाद्यन्ता धातवः' इति धातुसंज्ञायां लिटि 'कास्यनेकाच पाम् वक्तव्यः' इत्याम्प्रत्यये कृते आमो मकारस्येत्संज्ञायां लोपे च प्राप्ते लिटि पास्कासोराम्विधानान्मकारस्येत्त्वाभावेन लोपा- भावे 'गोपाय अाम् लिट' इति स्थिते 'अतो लोपः' इत्यल्लोपे 'श्रामः' इति लिटो लुकि लिटः कृत्वात्प्रत्ययलक्षणेन गोपायामित्यस्य कृदन्तत्वात्प्रातिपदिकत्वेन सुबु. धातु एवं श्चि धातुके 'अच्’ को वृद्धि हो, परस्मैपदपरक 'सिच् के परे। गुपू-'गुप्-धूप- विच्छ-पण-पन्' धातुओंसे 'आय' प्रत्यय हो, स्वार्थमें । सना-सन् से लेकर 'कमेणिक सूत्रसे विहित 'लिङ' पर्यन्त ( द्वादश ) प्रत्ययान्तों की धातुसंज्ञा हो । नोट:-सन् , क्यच् , काम्यच् , क्या , क्यम् , आचारार्थक किम् , णिच् , यङ, आया-आर्धधातुककी विवक्षामें आय-ईया-णिक-प्रत्यय हों, विकल्पसे । कास्य- 'कास्' धातु और 'अनेकाच्' धातुओंसे 'आम्' प्रत्यय हों, 'लिट' के परे। अतो. आर्थधातुकके उपदेशकाल में जो अदन्त, उसके अकारका लोप हो, आर्धधातुकके परे। आमः-'आम्' से पर 'लिट' का लुक् हो। कृञ्चा-आमन्तसे पर लिट 'परक 'कृका 'भू' 'अस' धातुओंका अनुप्रयोग हो। उरत-अभ्याससम्बन्धी ऋवर्णको 'अत्' आदेश हो, प्रत्ययके परे । द्विर्व-द्वित्वनिमित्त 'अच्' के परे अजादेश नहीं हो, यदि द्वित्व hinine । भवादिन] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १।१ १ ५६ | द्वित्वनिमित्तेऽचि परे अच आदेशो न स्याद्वित्वे कर्तव्ये । गोपा- याञ्चक्रतुः । एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् ७१२। १० । उपदेशे यो धातुरेकाजनु- दात्तश्च ततः परस्यार्धधातुकस्येन स्यात् । उदृदन्तैौति रुक्ष्णुशीङ्स्नुनुक्षुश्वि- डीश्रिभिः । वृवृभ्यां च विनैकाचोऽजन्तेषु निहताः स्मृताः । कान्तेषु शक्लेकः। चान्तेषु-पच्-मुच्-रिच्-वच्-विच्-सिचः षट् । छान्तेषु- प्रच्छेकः । जान्तेषु-त्यज्-निजिर्-भज्-भञ्ज-भुज्-भ्रस्ज-मज-यज्-युज-रुज् रज्-विजिर्-स्वज-सज-सृजः पञ्चदश । दान्तेषु-अद्-क्षुद्-खिद्-छिद्-तुद- नुद्-पद्य-भिद्-विद्यतिर्विनद्-विन्द्-शद्-सद्-स्विद्य-स्कन्द्-हृदः षोडश । धान्तेषु-क्रुध्-क्षुध्-बुध्-बन्ध्-युध-रुध्-राध्-व्य-शुध्-साध-सिध्या एकादश। नान्तेषु-मन्यहनौ द्वौ। पान्तेषु-आप-छुप-क्षिप-तप-तिप्-तृप्य-दृप्य-लिप्- लुप्-वप्-शप्-स्वप्-सृपस्त्रयोदश । भान्तेषु-यम-रभ-लभस्त्रयः । मान्तेषु गम्-नम्-यम्-रमश्चत्वारः । शान्तेषु-कृश्-दंश्-दिश्-दृश्-मृश्-रिश्-रुश्- लिश-विश्-स्पृशो दश। पान्तेषु-कृष्-त्विष्-तुष्-द्विष्-दुष्-पुष्य-पिष्-विष्- शिष्-शुष्-श्लिष्या एकादश । सान्तेषु-घस्-वसती द्वौ। हान्तेषु-दुह्-दिह- दु-नह्-मि-रुह्-लिङ्-वहोष्टौ । अनुदात्ता हलन्तेषु धातवस्थ्यधिक शतम् (१०३)। गोपायाश्चकर्थ । गोपायाश्चक्रथुः । गोपायाञ्चक । गोपायाश्च- कार-गोपायाञ्चकर । गोपायाञ्चकृव । गोपायाश्चकृम । गोपायाम्बभूव । गोपा- यामास । जुगोप । जुगुपतुः । जुगुपुः । स्वरतिसूतिसूयतिधूनूदितो वा ७।२। त्पत्तौ 'कृन्मेजन्तः' इति अव्ययत्वात् 'अव्ययादापसुपः' इति तस्यापि लुकि गोपाया- मित्यवशिष्टे 'कृश्चानुप्रयुज्यते लिटि' इति लिटपरककृतोऽनुप्रयोगे लिटस्तिपि तिपो गलि लिटि धातोरनभ्यासस्य' इति कृमो द्वित्वेऽभ्याससंज्ञायाम् 'उरत्' इत्यभ्या- सऋवर्णस्य प्रकारे रपरे च कृते 'हलादिः शेषः' इति रलोपे 'कुहोश्चुः इत्यनेन । । कर्तव्य रहे । एकाच-उपदेशावस्था एकाच अनुदात्त जो धातु, उससे पर आर्धधातुकको इट नहीं हो। उदृ-दीर्घ ऊकारान्त और दीर्घ ऋकारान्त धातु, यु धातु तथा रु, णु, शील, स्नु, नु, क्षु, श्वि, डी, श्रि, वृङ, वृञ् धातु-से भिन्न जो एकाच और अजन्त धातु, वे 'अनुदात्त' हैं। अनुदा-हलन्त धातुओं में एक सौ तीन धातु अनुदात्त हैं। स्वरति--स्वरत्यादि धातु और उदित् धातुओंसे पर वलादि आर्धधातुकको हट्का आगम हो, विकल्पसे। ।
। ४५। स्वरत्यादेखदितश्च परस्य वलादेश लघुसिद्धान्तकौमुदी चि जुगोप्थ । गोपायिता-गोपिता-गोता । गोपायिष्यति-गोपिध्यति-गोपचति । गोपायतु । गोपायत् । गोपाय्यात्-गुप्यात् । अगोपायीत् । लेटि७२।४४| ।। इडादौ सिचि हलन्तस्य वृद्धिर्न स्यात् । श्रगोपीत् । अगौप्सीत् । भलो झलि ८१२/२६ । मलः परस्य सस्य लोपः स्याज्मलि। अगौताम् । अगौपसुः । अगोप्सीः। अगौतम् । अगौप्त । अगौप्सम् । अगौपस्व । अगौप्स्म । अगोपा- यिष्यत्-गोपिष्यत्-अगोप्स्यत् । क्षि क्षये। क्षयति । चिक्षाय । चिक्षियतुः । चिक्षियुः । 'एकाच' इतीनिषेधे प्राप्ते कृतृभूवृस्तुद्रुश्रुवो लिटि ७/२१ १३॥ क्रादिभ्य एव लिट इण्न स्यादन्यस्मादनिटोऽपि स्यात् । अचस्तास्वत्यल्यनिटी नित्य ७।२ । ६१ । उपदेशेऽजन्तो यो धातुस्तासौ नित्यानिट ततस्थल इण्न स्यात् । उपदेशेऽत्वतः ७।२।६२। उपदेशेऽकारवतस्तासौ नित्यानिटः परस्य थल अभ्यासककारस्य चुत्वेन चकारे मस्यानुस्वारे परसवर्णे 'चन्चो णिति' इति वृद्धौ रपरत्वे च कृते 'गोपायाञ्चकार' इति पायप्रत्ययाभावे 'जुगोप' इति भवति । अगोपीत् ( ई० २१, २८, ४५, ४९)-गुप्धातोरायप्रत्ययाऽभावपक्षे लुङि तिपि 'इतश्च' इतीकारलोपे अडागमे च्लो च्लेः सिचि 'स्वरतिसूतिसूयतिधूभूदितो वा' इति विभाषया सस्य इटि 'अस्तिसिचोऽपृक्ते' इति तस्य ईटि 'इट ईटि' इति सलोपे सवर्णदीर्चे, 'वदवजहलन्तस्याचः' इति वृद्धौ प्राप्तायां 'नेटि' इति निषेधे 'पुगन्तलघूप- धस्य च' इति गुणै 'अगोपीत्' इति । इडभावपक्षे 'बदबजेति वृद्धौ ‘अगोप्सीत्' इति । अगौप्ताम् ( ई० ४४, ४६)-गुप्धातोर्नुङि तसि तसस्तामादेशे 'लुङलङि'- त्यडागमे मध्ये च्लौ तस्य सिचि ‘वदव्रजहलन्तस्याचः' इति वृद्धौ ‘स्वरतिसूतीति इडभावपक्षे 'झलो झलि' इति सलोपे 'अगौताम्' इति । नोट:-स्वरत्यादिसे 'स्व शब्दोपतापयो'-वादि, 'प्राणिगर्भविमोचने'-अदादि, 'धक प्राणिप्रसवे'-दिवादि और 'धृञ् कम्पने-स्वादि तथा 'दूज कम्पने'-क्रयादि का भी ग्रहण समझना चाहिये। नेटि-इडादि 'सिच् के परे हलन्त लक्षण (वदव्रजहलन्तस्याचः से ) वृद्धि नहीं हो। झलो-'झल' से पर (सिच सम्बन्धी ) सकारका लोप हो 'झल' के परे । कृष्ट-- आदि धातुओंसे पर ही लिट को इट नहीं हो, पर क्रादिसे अन्य धातुओंके लिट को चाहे वह अनिट भी क्यों न हो, इट होगा ही। अचः-उपदेशावस्था में अजन्त जो धातु वह यदि 'तासि' प्रत्ययके परे नित्य अनिट हो तो उससे पर 'थल'को इट नहीं हो। उपदे-उपदेशमें अकार- वान् जो धातु वह यदि तासि प्रत्ययके परे नित्य अनिट हो तो उससे पर थलको इट नहीं हो।
। । । स्वादिप्र] इन्दुमती-टीकाद्धयोपेता। ६५ इण् न स्यात् । ऋतो भारद्वाजस्य ७।२।६३ तासौ नित्याऽनिट ऋदन्तादेव थलो नेट भारद्वाजस्य मतेन । तेनाऽन्यस्य स्यादेव । अयमन्त्र सङ्ग्रहः- अजन्तोऽकारवान्वा यस्तास्यनिट थलि वेडयम् । ऋदन्त ईडङ नित्याऽनिद क्राचन्यो लिटि सेज सवेत् । चिक्षयिथ-चिक्षेथ । चिक्षियथुः । चिक्षिय। चिक्षाय-चिक्षय । चिक्षियिव । चिक्षियिम । क्षेता। क्षेष्यति । क्षयतु । अक्षयत् । क्षयेत् । अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः ७ । ४ । २५ । अजन्तास्य दीर्घः स्याद्यादौ प्रत्यये परे न तु कृत्सार्वधातु कयोः। क्षीयात् । सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु ७ १२ ! १ ! इगन्ताङ्गस्य वृद्धिः स्यात् परस्मैपदपरे सिचि । अझैषीत् । अक्षेष्यत् । तप सन्तापे । तपति । तताप । तेपतुः। तेषुः । तेपिथ-ततप्थ । तेपिच । तेपिम । तमा। तप्स्यति । तपतु । अतपत् । तपेत् । तप्यात् । अताप्सीत् । अताप्ताम् । अतप्स्यत् । क्रमु पादचिक्षेपे। वा भ्राश- भलाशभ्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलषः ३।१।७०एभ्यः श्यन्वा स्यात् कर्बर्थे सार्वधातुके परे । पक्षे शप् । क्रमः परस्मैपदेषु७ १३ । ३६ । कमेर्दीर्घः स्यात् चिक्षेथ (ई० ४४ )-क्षिधातोलिटि तत्स्थाने सिपि सिपो थलादेशे लिटि धातोरनभ्यासस्य'इति द्वित्वे अभ्यासादिकार्ये 'ऋतो भारद्वाजल्य इति भारद्वाजमते इटि 'सार्वधातुक' इति गुणे अयादेशे 'चिक्षयिथ' इति । इडभावपक्षे गुरणे चिक्षेथ' इति । अझैषीत् ( ई० ४३, ५१ )-क्षिधातोर्तुङि तिपि 'लुङ्लङ्' इत्यडागमे तिप इकारलोपे मध्ये च्लौ तस्य सिचि 'अस्ति सिचोऽपृक्ते' इति ईटि सिचि वृद्धिः परस्मै- पदेषु' इति वृद्धौ षत्वे 'अक्षैषीत्' इति । ऋतो भारद्वाजस्य-तासि' प्रत्ययके परे नित्य अनिट जो ऋदन्त धातु उससे पर ही 'थल' को 'हट नहीं हो, भारद्वाजके मतसे ( अर्थात् विकल्पसे)। अजन्तो--अज- न्त ( या-पा-वा आदि) अथवा अकारवान् ( पवादि)'तासि' प्रत्ययके परे नित्य अनिट जो धातु उसको 'थल' में विकल्पसे 'इट' होता है। तथा तासि' प्रत्ययके परे नित्य अनिट जो ऋदन्त धातु वह 'थल' में नित्याऽनिट (इट का नित्य निषेध) होता है। और कृ-सु-भृ आदि आठ धातुओंसे भिन्न जो अनिट धातु, वह 'लिट' में सेट ही होता है। अकृत्-अजन्त अङ्गको दीर्घ हो, यकारादि प्रत्ययके परे, परन्तु यकारादि 'कृ' और सार्वधातुकके परे दीर्घ नहीं हो । सिचि-हगन्त अङ्गको वृद्धि हो, परस्मैपद 'सिच' के परे। चा प्राश-प्राश्, भ्लाश् , भ्रम, कम् , क्लम् , त्रस् , त्रुट् और लप धातुओंसे 'श्यन्' प्रत्यय हो, कर्थक सार्वधातुकके परे, विकल्पसे । क्रमः-'क्रम' धातुको दीर्घ हो, परस्मैपद । ।
६६ लघुसिद्धान्तकौमुदी परस्मैपदे शिति । काम्यति-क्रामति । चक्राम । क्रमिता । क्रमिष्यति । क्राम्यतु- कामतु। अक्राम्यत्-अक्रामत् । काम्येत्-कामेत् । म्यात् । अक्रमीत् । अक्र- मिष्यत । पा पाने । पा-घ्रा-धमा-स्था-म्ना-दाण-दृश्यति-सर्ति-शद-सदां पिब जिघ्र धम-तिष्ठ-मन-यच्छ पश्य-च्छ धौशीय-सीदाः ७३७८।। पादीनां पिबादयः स्युरित्संज्ञकशकारादौ प्रत्यये परे । पिबादेशोऽदन्तस्तेन च गुणः । पिब- ति ! आत औ णलः ७११३४! आदन्तादातोर्णल औकारादेशः स्यात् । पपौ। आतो लोप इटि च ६।४।६४ ॥ अजाद्योरार्धधातुकयोः क्ङिदिटोः परयोरातो लोपः स्यात् । पपतुः । पपुः । पपिथ-पपाथ । पपथुः। पप। पपौ। पपिव । पपिम । पाता । पास्यति । पिबतु । अपिबत् । पिबेत् । एलिडि६।४।६७/ घुसंज्ञकानां मास्थादीनां च एवं स्यादार्धधातुके किति लिङि । पेयात् । गातिस्थेति सिचो लुक् । अपात् । अपाताम् । आत: ३।४।११० सिज्लुकि श्रादन्तादेव मेर्जुस् स्यात् । उस्यपदान्तात् ६।१ । ६६। अपदान्तादकारादुसि परे पररूपमेकादेशः स्यात् । अपुः । अपास्यत् । ग्लै हर्षक्षये। ग्लायति । अपुः (ई० ४३ )-पाधातोर्मुकि तत्स्थाने झौ 'लुङ्लङ' इत्यडागमे अनुब- न्धलोपे मध्ये च्लौ तस्य सिचि इचि गते 'गातिस्थाधुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु' इति सिचो लुकि 'अपा झि' इति स्थिते 'आतः' इति नियमात् मेर्जुसि अनुबन्ध- लोपे 'उस्यपदान्तात्' इति पररूपे सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'अपुः' इति सिद्धम् । 'शिव' के परे। पानाध्मास्था-इत्संज्ञक शकारादि प्रत्ययके परे 'पा' आदि धातु. ओंको यथाक्रम पिबादि आदेश हों। (अर्थात् पाको पिब, श्राको जिव्र, ध्माको धम, स्थाको तिष्ठ, म्नाको मन, दाणको यच्छ, दृशको पश्य, ऋको ऋच्छ, सुको धौ, शदको शीय और सदको सीद आदेश हो ) आत औ-आदन्त धातुसे पर 'णल' को औकार आदेश हो। आतो-अनादि कित्-ङित् आर्धधातुक और 'इट' के परे अकारका लोप हो । एलि-घुसं- ज्ञक धातु तथा मा माने, छा गतिनिवृत्ती, गै शब्दे, पा पाने, ओहाकू त्यागे और पोऽन्तकर्मणि धातु सम्बन्धी अकारको एरव हो, आर्धधातुक कित्-लिङ के परे। नोट:-घुसंज्ञकसे 'दाधाध्वदाप्' से विहित 'घुसंज्ञक' अर्थात् डुदान दाने, दाण् दाने, दो अवखण्डने, देङ् रक्षणे, डुधाज धारणपोषणयोः और धेट पाने का तथा मास्थादिसे माङ माने, छा गतिनिवृत्तौ, गै शब्दे, पा पाने, ओहान त्यागे और षो अन्तकर्मणि-इन धातुओका ही ग्रहण करना चाहिये। आतः-'सिच का लुक' होने पर आदन्त धातुसे पर ही 'झि' को 'जुस्' हो। उस्य-अपदान्त अवर्णसे पर 'उसू' के परे-पूर्व-परके स्थानमें पररूप एक आदेश हो। . " वादिप्र०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। । ढ आदेच उपदेशेऽशिति ६।१॥४५॥ उपदेशे एजन्तस्य धातोरात्त्वं स्यान तु शिति । जग्लौ । ग्लाता । ग्लास्यति । ग्लायतु । अग्लायत् । ग्लायेत् । वाऽन्यस्य - संयोगादेः ६४।६८|| घुमास्थादेरन्यस्य संयोगादेर्धातोरात एत्त्वं वा स्यादाधा- तुके किति लिङि । ग्लेयात्-ग्लायात् । यमरमनमातां सक् च ७२|७३॥ एषां सक् स्यादेभ्यः सिच इट् स्यात्परस्मैपदेषु । अग्लासीत् । अग्लास्यत् । कौटिल्ये । हरति । ऋतश्च संयोगादेर्गुणः ७४।१०॥ ऋदन्तस्य संयोगादेरङ्गस्य गुणः स्याल्लिटि । उपधाया वृद्धिः । जह्वार । जह्वरतुः । जह्वरुः । जह्वर्थ । जहरथुः । जहर । जहार-जहर । जरिव । जह्वरिम । हर्ता । ऋद्धनोः स्ये ७/२१७०।। ऋतो हन्तेश्च स्यस्येत् स्यात् । हरिष्यति । हरतु । अह्वरत् । हरेत् । गुणोतिसंयोगाद्योः ७।४ । २६ | अतः संयोगादेरृदन्तस्य च गुणः स्याद्यकि यादावार्धधातुके लिङि च । हर्यात् । अवार्षीत् । अरिष्यत् । श्रु श्रवणै । श्रुवः शृ च ३ । १।७४ | श्रुवः इत्यादेशः स्यात् श्नुप्रत्ययश्च । शृणोति । अग्लासीत् ( ई० २८)-ग्लैधातो ङि तिपि अनुबन्धलोपे 'लुङ्लङ्' इत्य- डागमे अनुबन्धलोपे 'इतव' इति तिप इकारलोपे 'आदेच उपदेशेऽशिति' इत्यात्वे मध्ये च्लौ तस्य सिचि इचि गते 'यमरमनमातां सक् च' इति सकि सिचः सकार- स्य इटि च कृते अनुबन्धलोपे 'अस्तिसिचोऽपृक्ते' इति अपृक्तसंज्ञकल्य तस्य ईटि अनुबन्धलोपे 'इट ईटि' इति सिचः सकारस्य लोपे 'सिज्लोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः' इति सिज्लोपस्य सिद्धत्वात् सवर्णदीर्घ 'अग्लासीत्' इति । ह्वर्यात् (ई० ३१,५१,५३)-हृ धातोराशीलिंङि तिपि अनुबन्धलोपे यासुटि उटि गते यासुटः कित्वात् 'किङति चेति 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' इति प्राप्तगुणनिषेधे 'गुणोतिसंयोगाद्योः' इति गुणे "स्कोः संयोगाद्यौरन्ते च' इति सलोपे 'हात्' इति । भादेच-उपदेशमें एजन्त धातुको आव हो, 'शित मित्रके परे। वान्यस्थ-धु-मा- स्थादि धातुओंसे मिन्न संयोगादि आदन्त धातुओंके आकारको विकल्पसे एत्व हो, आई- धातुक कित् लिङ्क परे । यम-यम् , रम् , नम् और आदन्त धातुको 'सक्' हो तथा (एक ही साथ ) उससे पर जो 'सिच्' उसको इडागम हो, परस्मैपदके परे। ऋतश्च- ऋदन्त संयोगादि अङ्गको गुण हो, लिट्के परे । ऋद्ध-'ऋदन्त' धातु तथा 'हन्' धातुसे पर 'स्य' को इट हो । गुणो-'ऋ' धातु और संयोगादि 'ऋदन्त' जो धातु उसको गुण हो 'या' के परे तथा यादि. आर्धधातुक 'लिङ' के परे । श्रुवः शृ-'च' को 'भू' आदेश हो PRAHARI । । । । । । । । लघुसिद्धान्तकौमुदी सार्वधातुकमपित् ११ २।४ अपित्सार्वधातुकं द्वित् स्यात् । शृणुतः । हुश्नुवोः सार्वधातुके ६।४।८७ जुहोतेः श्नुप्रत्ययान्तस्यानेकाचोऽङ्गस्य वाऽसंयोगपूर्वो- वर्णस्य यण स्यादजादौ सार्वधातुके । ध्वन्ति । ऋणोषि । शृणुथः । शृणुथ । शृणोमि । लोपश्चास्यान्यतरस्यां म्बोः ६।४। १०७१ असंयोगपूर्वस्य प्रत्ययो. कारस्य लोपो वा स्यात् म्योः परयोः । शृण्वः-शृणुवः। शृण्मः-शृणुमः । शुश्राव शुश्रुवतुः । शुश्रुवुः । शुश्रोथ । शुश्रुवथुः । शुश्रुव । शुश्राव-शुश्रव । शुश्रुव । शुश्रुम । नीता । श्रोष्यति । शृणोतु-शृणुतात् । शृणुताम् । शृण्वन्तु । उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात् ६ । ४ । १०६। असंयोगपूर्वो यः प्रत्ययोकारस्तदन्तादङ्गा- त्परस्य हेर्लुक् स्यात् । शृणु-शृणुतात् । शृणुतम् । शृणुत । गुणाऽवादेशौ । शृणवानि । शृणवाव । शृणवाम । अशृणोत् । अशृणुताम् । अशृण्वन् । अशृणोः । अशृणुतम् । शृणुत। शृणवम् । अशृण्व-अशृणुव । अशृण्म-अशृणुम शृणुयात् । शृणुयाताम् । शृणुयुः। शृणुयाः। शृणुयातम् । शृणुयात। शृणुयाम् । शृणुयाव । शृणुयाम । श्रूयात् । अश्रौषीत् । अश्रोष्यत् ॥ गम्लु गतौ ॥ इषुगमियमा छः ७।३। ७७ । एषां छः स्यात्-शिति । गच्छति । जगाम । गमहनजनखनघसां लोपः क्डित्यनङि ६।४।६८ | एषामुपधाया लोपः स्यादजादौ विकति न त्वङि । जग्मतुः । जग्मुः। जगमिथ-जगन्ध । जग्मथुः । शृण्मः ( ई० ४४)-श्रुधातोर्लटि तत्स्थाने 'तिप्तस्मि' इत्यादिना मसि 'श्रुवः शू च' इति श्रुवः 'शू' इत्यादेशे चकारात् 'श्नु'प्रत्यये च कृते शकारस्येत्संज्ञायां लोपे व विहिते शित्वात् सार्वधातुकत्वे 'सार्वधातुकमपित्' इति श्नोडित्वे 'क्किति च' इति गुणनिषेधे 'शू नु मस्' इति स्थिते णत्वे 'लोपश्चास्यान्यतरस्यांम्बोः' इति उकारलोपे सस्य रुत्वे विसर्गे 'शृण्मः' इति । लोपाऽभावे 'शृणुमः' इति च सिद्धं रूपं भवति । जग्मतुः (ई० २५,३०,५५)-गम्धातोलिटि तसि तसोऽतुसादेशे 'लिटि धातोर- नभ्यासस्य' इति द्वित्वे पूर्वोऽभ्यासः' इत्यभ्याससंज्ञायां 'हलादिःशेषः' इति अभ्यासम- तथा तत्सन्नियोगेन 'इनु' प्रत्यय भी हो, कर्थक सार्वधातुकके परे । सार्व-अपित्' सार्व- धातुक डिवत हो । हुश्नु-हु' धातु तथा इनुप्रत्ययान्त जो अनेकाच् 'अङ्ग' तदवयव जो असंयोगपूर्वक उवर्ण, उसको 'यण' हो, अनादि सार्वधातुकके परे । लोपश्चा-असंयोग- पूर्वक प्रत्ययके उकारका लोप हो, मकार और वकारके परे विकल्पसे । उतश्च-असंयोग पूर्वक प्रत्यय संबन्धी उकारसे पर, 'हि' का लुक् हो । इषु-इष् , गम् भौर यम्' धातुओंको छकारान्त आदेश हो, शित्प्रत्ययके परे । गमहन-मादि धातुओंकी उपधाका लोप हो, ।
६६ भ्वादिष.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। जग्म । जगाम-जगम । जग्मिव । जग्मिम । गन्ता । गमेरिट परस्मैपदेषु ७.२१५८ / गमेः परस्य सादेरार्धधातुकस्येट् स्यात् परस्मैपदेषु । गमिष्यति । गच्छतु । अगच्छत् । गच्छेत् । गम्यात् । पुषादिद्युतालुदितः परस्मैपदेषु ३।११ ५५ | श्यन्विकरणपुषादेर्युतादेनुदितश्च परस्य च्लेर स्यात् परस्मैपदेषु । अगमत् । अगमिष्यत् । इति परस्मैपदिनः । अथात्मनेपदिनः । एष वृद्धौ । टित आत्मनेपदानां टेरे३।४।७६ टितो लस्यात्मनेपदानां टेरेत्वं यात् । एधते । आतो कितः७ ७।२।८१! अतः परस्य बितामाकारस्य इय् स्यात् । एघेते । एधन्ते । थासः से ३।४।८०टितो लस्य थासः से स्यात् । एधसे । एघेथे । एधध्वे । अतो गुणै। एधे । एधावहे । एधामहे । इजादेश्व गुरुमतोऽनृच्छः ३ । ११३६ | इजादियों धातुर्गुरुमान्-ऋच्छत्यन्यस्तत श्राम् स्याल्लिटि । आम्प्रत्ययवत्कृषोऽनुप्रयोगस्य ६३। श्राम्प्रत्ययो यस्मादित्य- तद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः। आम्प्रकृत्या तुल्यमनुप्रयुज्यमानात् नोऽप्यात्मनेपदं स्यात् । लिटस्तझयोरेशिरेच् ३।४।८१ । लिडादेशयोस्तझयोरेश् इरेजित्येता- कारस्य लोपे 'कुहोश्चः' इति गस्य कुत्वेन जकारे 'गमहनजनखन घसां लोपः विङत्यनङि' इत्युपधालोपे सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'जग्मतुः' इति । अगमत् (ई० २१, ४३, ४८, ५२ )-गमधातो डि तिपि 'लुङ्लङ इत्यडागमे 'इतश्चेति तिप इकारलोये 'च्लि लुङि' इति च्लौ तस्य सिचि प्राप्ते तं अबाध्य 'पुषादिद्युताय॒दितः परस्मैपदेषु' इति च्लेरडादेशे 'अगमत्' इति । ७ अजादि कित्-डित् प्रत्ययके परे। किन्तु 'अ' के परे नहीं हो। गमे-गम्' धातुसे पर सादि आर्धधातुकको इटका आगम हो, परस्मैपदके परे। पुषा-श्यन् विकरण पुषादि, धुतादि तथा लदित् धातुओंसे पर चिल' को 'अ' आदेश हो, परस्मैपदके परे। टित- टित् लकारसंबन्धी आत्मनेपदकी 'टि' को एत्व हो। भातो-'अत्' से पर 'लित संबन्धी आकारको 'इय् हो । थास:-टित् लकार सम्बन्धी 'थास्' के स्थानमें से आदेश हो। इजा-ऋच्छ धातुसे भिन्न इजादि और गुरुमान् धातुसे 'आम्' प्रत्यय हो, लिट' के परे । आम्म-आम्प्रकृतिके तुल्य अनुप्रयुज्यमान 'कृञ्' धातुसे भी आत्मनेपद हो। लिटा-लिडादेश 'त' और 'झ' के स्थानमें (यथाक्रम ) 'एश्' और 'इरेच' आदेश हों।
। । लघुसिद्धान्तकौमुदी वादेशौ स्तः । एधाञ्चके । एधाञ्चकाते। एधाश्चक्रिरे । एजाञ्चकृषे। एधाञ्चकाथे। इणः पीध्वंलुब्लिटां धोऽङ्गात् ८१३७८ इण्णन्तादशात्परेषां षीध्वंलुलिटी धस्य ढः स्यात् । एधाञ्चकृट्वे । एधाञ्चके। एधाश्च कृवहे । एधाञ्चकृमहे । एधाम्ब- भूव । एधामास । एधिता । एधितारौ। एधितारः। एधितासे । एधितासाथे। धि च ८।२।२५ । धादौ प्रत्यये परे सस्य लोपः स्यात् । एधिताध्वे । ह एति ७/४/५२ तासस्त्योः सस्य हः स्यादेति परे । एधिताहे। एधितास्वहे । एधितास्महे । एघिण्यते । एधिष्यते । एधिष्यन्ते । एधिष्यसे। एधिष्येथे । एधिष्यध्वे । एधिष्ये । एधिष्यावहे । एधिष्यामहे । आमेतः३|४|१०| लोट एकारस्य श्राम् स्यात् । एधताम् । एघेताम् । एधन्ताम् । सवाभ्यां वाऽमौ ३१४|११ । सवाभ्यां परस्य लोडेतः क्रमाद्वाऽमौ स्तः। एधस्व । एघेथाम् । एधाञ्चके ( ई० २०, ३२, ३९, ४३)-एध्धातोलिटि 'इजादेश्च गुरुमतोऽ- नृच्छः' इत्यामि 'श्रामः' इति लिटो लुकि 'एथ् श्राम्' इति स्थिते 'कृञ्चानुप्रयु: ज्यते लिटि' इति लिट्परककृतोऽनुप्रयोगे 'एध् श्राम् व लिट्' इति जाते 'श्राम्प्रत्य- यवत्कृतोऽनुप्रयोगस्य' इत्यात्मनेपदत्वात् लिटः स्थाने तप्रत्यये 'लिटस्तमयोरेशि- रेच्' इत्यनेन तस्यैशादेशे 'एधाम् कृ ए' इति स्थिते द्वित्वे प्राप्ते तं परत्वाद्- बाधित्वा यणि प्राप्ते तं द्विवचनेऽचि' इति निषेधे पुनः प्रसङ्गविज्ञानात् 'लिटि धातोरनभ्यासस्य' इति द्वित्वे अभ्याससंज्ञायाम् 'उरत्' इत्यभ्यासऋवर्णस्य अत्वे रपरत्वे हलादिशेषे 'कुहोचु' इति चुत्वे 'असंयोगालिकित्' इति कित्वेन गुणनिषेधे यणि मकारस्यानुस्वारे परसवर्णे 'एधाञ्च' इति । एधाञ्चकृषे ( ई० ४४, ४६ )- एध्धातोलिटि 'इजादेश्व गुरुमतोऽनृच्छः' इत्यामि 'श्रामः' इति लिटो लकि 'एध आम्' इति स्थिते 'कृश्चानुप्रयुज्यते लिटिं इति लिट् परककृतोऽनुप्रयोगे 'एध् ाम् कृ लिट्' इति जाते लिटः स्थाने थासि द्वित्वे अभ्यासादिकार्ये 'एधाम च कृथास्' इति भूते 'थासः से इत्यनेन 'से' इत्यादेशे 'एका- च उपदेशेऽनुदात्तात्' इति इटो निषेधे षत्वे मस्यानुस्वारे परसवर्णे 'एधाश्चकृष' इति । हणा-इण्णन्त अङ्गसे पर पीध्वं और लुङ्-लिट संबन्धी धकार को ढकार आदेश हो। घि च-यादि प्रत्ययके परे सकारका लोप हो । ह एति-'तास' और 'अस्ति' के सकारको हकार आदेश हो 'एति के परे । आमे-लोट् लकार सम्बन्धी एकारको 'आम्' आदेश हो। सवा-सकार और वकारसे पर लोट सम्बन्धी एकार को ( यथाक्रम) 'व' और 'अन् FEATSARDINARIC AIRMANENARENA । स्वादिप्र०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। एधध्वम् । एत ऐ ३।४।१३। लोडुत्तमस्य एत ऐ स्यात् । एधै। एधावहै । एधामहै । प्राटश्च । ऐधत । ऐघेताम् । ऐधन्त । ऐषयाः। ऐघेथाम् । ऐधध्वम् । ऐधे । ऐधावहि । ऐधामहि । लिङः सीयुट्३।४।१०२।। लिङादेशानां सीयुडा- गमः स्यादात्मनेपदे । सलोपः । एधेत । एधेयाताम् । झस्य रन् ३।४।१०५। लिङो मस्य रन् स्यात् । एधेरन् । एधेथाः। एधेयाथाम् । एधेध्वम् । इटोऽत् ३।४।१०६। लिङादेशस्य इटोऽत्स्यात् । एधेय । एघेवहि । एधेमहि । सुद तिथोः ३।४।१०७ लिङस्तकारथकारयोः सुट स्यात् । यलोपः । आर्धधातुकत्वात्सलोपी ज। एधिषीष्ट । एधिषीयास्ताम् । एधिषीरन् । एधिषीष्टाः । एधिषीयास्थाम् । 'एधिषीध्वम् । एधिषीय । एधिषीचहि । एधिषीमहि ॥ ऐधिष्ट । ऐधिषाताम् । आत्मनेपदेष्वनतः ७ | ११५। अनकारात्परस्यात्मनेपदेषु झस्य अदित्यादेशः स्यात् । ऐधिषत । ऐधिष्ठाः। ऐधिषाथाम् । ऐधिवम् । ऐधिषि । ऐधिष्वहि । ऐधिष्महि ॥ ऐधिष्यत । ऐधिष्येताम् । ऐधिष्यन्त । ऐधिष्यथाः । ऐधिष्येथाम् । ऐधिष्यध्वम् । ऐधिष्ये । ऐधिष्यावहि । ऐधिष्यामहि । कमु कान्तौ । कमेणिक ३।।३०। कमेणिक स्यात्स्वार्थे । जित्त्वात्तङ् । कामयते । अयामन्ता- ऐधिष्ट ( ई०२८,४९ )--एध्धातो ङि तत्स्थाने प्रथमपुरुषैकवचने ते 'बाड- जादीनाम्' इत्याटि अनुबन्धलोपे 'श्राटश्च इति वृद्धौ ‘ऐध् त' इति स्थिते मध्ये च्लो तस्य सिचि इचि गते सिवः अर्धधातुकत्वात् 'प्रार्धधातुकस्येवलादेः' इति इटि 'ऐधिस्त' इति दशायाम् 'आदेशप्रत्यययोः' इति षत्वे टुत्वे 'ऐधिष्ट' इति । आदेश हो। एत ऐ-लोट् लकार संबन्धी उत्तम पुरुषके एकारको ऐकार आदेश हो । लिङ:-लिङादेशको सीयुट का आगम हो, आत्मनेपदमें । शस्य-लिङ् लकार सम्बन्धी 'झ' को 'रन्' आदेश हो। इटोऽत--लिङादेश 'इट' के स्थान में अत्' आदेश हो । सुट्-'लिङ' लकार सम्बन्धी तकार-थकारको 'सुट' का आगम हो । आत्मने-अनकारसे पर आत्मनेपदसम्बन्धी 'झ' को 'अत्' आदेश हो। कमेणि-'कमु' धातुसे 'णिका प्रत्यय हो, स्वार्थ में । अया-आम् , अन्त, आलु, आय्य, इत्तु और इष्णु के परे ‘णि' को अय आदेश हो। नोट:-आम्-'कारयामास । अन्त-मण्डयन्तो मण्डयन्तः (तृभूवहि० इस उणादिसूत्र से 'झच' और 'झोन्तः से अन्तादेश)। आलु-स्पृहयालुः' ('स्पृहिग्रहिपति०' इस सूत्रसे 'आलुच) आय्य-स्पृहयाय्यः' 'श्रुदक्षिस्पृहिग्रहिभ्यः' इस उणादिसूत्रसे 'आय्य')। इनु-स्तनयित्नुः ( स्तनिहृषि- पुषि०' इस उणादि सूत्रसे 'इत्नुच')। इष्णु-वीरुधः पारयिष्णवः' ('णेश्छन्दसि' से १०२ लघुसिद्धान्तकौमुदी ल्वाय्येल्विष्णुषु ६४।५५ श्राम् अन्त बालु प्राय्य इल इष्णु-एषु णेरयादेश- स्यात् । कामयाञ्चके । अायादय इति णि वा। चकमे। चकमाते। चकमिरे । चमिषे। चकमाथे। चकमिध्वे । चकमे । चकमिवहे । चकमिमहे । कामयिता। कामयितासे। कमिता। कामयिष्यते। कमिष्यते। कामयताम् । अकामयत । कामयेत । कामयिषीष्ट । विभापेटः ८।३। ७६ | इणः परो य इट् ततः परेषा घीध्वंलुलिटां धस्य वा ढः स्यात् । कामविषीदवम्-कामयिषीध्वम् । कमिषीष्ट । कमिषीध्वम् । णिभिद्रुभ्यः कर्तरि चङ्३ । १ । ४८ | ण्यन्तात् श्रयादिभ्यश्च च्लेश्वङ् स्यात् कत्रथै लुङि परे। 'अ कामि अत' इति स्थिते-णेरनिटि ६।४।५१ | अनिडादावार्धधातुके परे णैर्लोपः स्यात् । णौ चङ थपधाया हस्वः ७४|११ चपरे णौ यदगं तस्योपधाया हस्वः स्यात् । चङि६।१।११। चडि परेऽनभ्यासधात्ववयवस्यैकाचः प्रथमस्य द्वे स्तोऽजादेस्तु द्वितीयस्य । सन्वल्लघुनि चपरेऽनग्लोपे ७।४। ६३ । चपरे णौ यदङ्गं तस्य योऽभ्यासो लघुपरस्तस्यः सनीव कार्य स्याण्णावग्लोपेऽसति । सन्यतः ७१४/७६ | अभ्यासस्याऽत इत् स्यात् सनि । दीर्घो लघोः ७१४६४। लघोरभ्यासस्य दीर्घः स्यात् सन्वद्भाव. विषये । अचीकमत । णिडभावपक्षे-*कमेश्च्लेश्च वाच्यः । अचकमत । अचीकमत (ई०३७,४३,४५,४८,५५)-कम्धातोः 'कमेणिङ' इति णिडि अनुबन्धलोपे 'श्रत उपधायाः' इति वृद्धौ ‘कामि' इति भूते 'सनाद्यन्ता धातवः' इति धातुत्वाल्लुङि तत्स्थाने प्रथमपुरुषैकवचने तादेशे 'लुङलङ' इत्यडागमे अनुब- न्धलोपे 'च्लि लुङि' इति च्लौ 'णिश्रिद्रुसुभ्यः कर्तरि चङ' इति च्लेश्वङि अनुब- न्धलोपे 'अकामि अत' इति स्थिते 'शेरनिटि' इति णिलोपे 'णौ चङयुपधाया हस्वः' 'हष्णुच्')--इस प्रकार उदाहरण समझना चाहिये। विभा-इण्से पर जो उससे पर जो पीध्वं या लुक.लिट सम्बन्धी धकार उसको ढकार हो, विकल्प से। णिधि- ण्यन्त धातु तथा 'श्रि-द्रु-सु' धातुओंसे पर 'च्लि' को 'चङ' आदेश हो, कर्थक 'लु' के परे। गेर-अनिडादि आर्धधातुकके परे 'णि' का लोप हो। गौ-'चङ'परक जो 'णि' तत्परक जो 'अङ्ग उसकी उपधाको हस्व हो । चङि-'चङ् परमें रहने पर अभ्यासमिन्न धातुके प्रथमावयव एकाच को द्वित्व होता है और अनादिके द्वितीय एकाचको द्वित्व होता है । सन्व-'च' पेरक जो 'णि' तत्परक जो 'अङ्ग' तदवयक जो लघुपरक अभ्यास उसको सन्वद्भाव हो-'णि' के परे यदि 'अक्' का लोप नहीं हुआ हो तो। सन्य-अभ्यास सम्बन्धी 'अत' को 'इत्व' हो, 'सन्? के परे। दी|-अभ्या- सावयव लघुको दीर्घ हो, सन्वद्भावके विषयमें। कमे:-'कम्' थातु सम्बन्धी 'च्लि' को MARRES Haranainitaliate भ्वादिन] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। अकामयिष्यत-अकामिष्यत । अय गतौ । अयते । उपसर्गस्याऽयतौ ८।२।१६। अतिपरस्योपसर्गस्य यो रेफस्तस्य लत्वं स्यात् । प्लायते । पलायते । दयायासश्च ३।१।३७ । दय् अय् श्रास् एभ्य आम् स्याल्लिटि । अयाञ्चक्रे । अयिता। अयिष्यते । अयताम् । आयत । अयेत । अयिषीष्ट । विभाषेटः । श्रयिषीढ्वम्-अयिषीध्वम् । आयिष्ट । आयित्वम्-श्रायिध्वम् । प्रायिष्यत । द्युत दीप्तौ । द्योतते । द्युतिस्वाप्योः सम्प्रसारणम् ७।४।६७। अनयोरभ्यासस्य संप्रसारणं स्यात् । दिद्युते । युद्भयो लुङि । ३॥ ६१] द्युतादिभ्यो लुङः परस्मैपदं वा स्यात् । पुषादीत्यङ् । अद्युतत्-अद्योतिष्ट । अद्योतिष्यत । एवम्-श्विता वर्णे। बिमिदा स्नेहने । निविदा स्नेहनमोचनयोः । मोहनयोरित्येके । बिक्ष्विदा चेत्येके । रुच दीप्तावभिप्रीतौ च । घुट परिवर्त्तने । शुभ दीप्तौ । क्षुभ सञ्चलने । णभ तुम हिंसायाम् । संसु भ्रंसु अवलंसने । ध्वंसु गतौ च । नम्भु विश्वासे । वृतु वर्त्तने । वर्तते । ववृते । वर्तिता । वृद्भथः स्यसनोः । ३।१२वृतादिभ्यः पञ्चभ्यः परस्मैपदं वा स्यात्स्य सनि च । न वृद्भ-यश्चतुर्व्यः इति प्रत्ययलक्षणेन णैश्चपरत्वादुपधाया ह्रस्वत्वे 'चङि' इति द्वित्वे 'पूर्वोऽभ्यास' इत्यभ्याससंज्ञायाम् 'हलादिः शेषः' इत्यभ्याससम्बन्धिनो मस्य लोपे 'कुहोश्चः' इत्य- भ्यासकवर्गस्य चुत्वे 'अचकमत' इटि भूते 'सन्वल्लधुनि चङ्परेऽनग्लोपे' इति सन्व- द्भावे 'सन्यतः' इत्यभ्यासस्य इत्वे 'दीर्घो लघोः' इति दीधै 'अचीकमत' इति । अद्युतत् (ई० ४२,४३,५६)-द्युत्धातो डि तत्स्थाने प्रथमपुरुषैकवचनविव- क्षायां 'युद्भयो लुङि' इति विभाषया परस्मैपदसंज्ञकतिपि अनुबन्धलोपे 'लुङ्लङ इत्यडागमे अनुबन्धलोपे 'च्लि लुङि' इति च्लौ 'पुषादिद्युतालुदितः परस्मैपदेषु' इति च्लेरङि अनुबन्धलोपे 'अद्युत् अति' इति स्थिते 'इतश्च' इति तिप इकारलोपे कित्वात् गुणनिषेधे 'अद्युतत्' इति पक्षे 'अद्योतिष्ट' इति । 'चङ् हो-ऐसा कहना चाहिये । उपस-अय-धातुपरक उपसर्ग सम्बन्धी रेफको लत्व हो। दया-दय-अय और आस् धातुओंसे 'आम्' प्रत्यय हो 'लिट' के परे । युति-'द्युत्' धातु और णिजन्त 'स्वप्' के अभ्यासको सम्प्रसारण हो । शुद्भयो-धुतादिसे परस्मैपद हो, लुङ् के परे विकल्पसे । वृदयः-वृतादि (वृतु-वृधु-शृधु-स्यन्दू-कृपू) पाँच धातुओंसे परस्मैपद हो, 'स्य' तथा 'सन्' के परे, विकल्पसे । न धु-वृतादि चार धातुओंसे पर सादि आर्धधातुकको 'इट' नहीं हो, 'त' और 'आन्' के अभावमें ।
। । । । १०४ लघुसिद्धान्तकौमुदी ७ १२१ ५६ | वृतुवृधुZधुस्यन्दूभ्यः सकारादेरार्धधातुकस्येण न स्यात् तानयोर- भावे। वयति-वर्तिष्यते । वर्तताम् । अवर्तत । वर्तेत । वर्तिषीष्ट । अवतिष्ट । अवय॑त-श्रवर्तिष्यत । दद दाने । ददते। न शसदवादिगुणानाम् ६।४।१२६॥ शसेर्ददेवकारादीनां गुणशब्देन विहितश्च योऽकारस्तस्य एत्वाभ्यासलोपौ न स्तः । दददे। दददाते । दददिरे । ददिता। ददिप्यते । ददताम् । अददत । ददेत । ददिषीष्ट । अददिष्ट । अददिष्यत । त्रपूष् लज्जायाम् । त्रपते। तृफलभजत्रपश्च ६।४।१२२ । एषामत एत्वमभ्यासलोपश्च स्यात् किति लिटि सेटि थलि च । त्रे । ब्रापिता-त्रप्ता । त्रपिष्यते-त्रप्स्यते । त्रपताम् । अत्रपत । त्रपेत । त्रपिषीष्ट- त्रप्सीष्ट । अत्रपिष्ट-अत्रप्त । अत्रपिष्यत-अत्रपल्यत । इत्यात्मनेपदिनः । प्रथोमयपदिनः श्रिञ् सेवायाम् । श्रयति-श्रयते । शिवाय-शिश्रिये । श्रयितासे । श्रयिष्यते । श्रयतु-श्रयताम् । अश्रयत्-श्रश्रयत । श्रयेत्-श्रयेत । श्रीयात्- श्रयिषीष्ट । चङ् । अशिनियत्-अशिश्रियत। अश्रयिष्यत्-अश्रयिष्यत । भृज भरणे । भरति-भरते । बभार । बभ्रतुः। बभ्रुः । बभर्थ । बभूव । बभ्रम । 'बभ्रे । बषे । भर्तासि-भर्तासे । भरिष्यति-भरिष्यते । भरतु भरताम् । अभरत्-अभरत । भरेत्-भरेत । रिङ शयग्लिक्षु ७।४।२८ शे यकि यादा- वार्धधातुके लिङि च ऋतो रिङादेशः स्यात् । रीङि प्रकृते रिविधानसामर्थ्या- वस्यति (ई० ४३,५३,५७)-वृत्धातोटि 'वृद्भ्यः स्यसनोः' इति विभा- पया परस्मैपदे तिपि अनुबन्धलोपे 'स्यतासीलुलुटोः' इति स्यप्रत्यये स्यस्यार्धधातु- कत्वे 'प्रार्धधातुकस्येवलादेः' इति इटि प्राप्ते 'न वृद्भयश्चतुर्व्यः' इति निषेधे 'पुग- न्तलघूपधस्य च' इति गुणे रपरे ' वयंति' इति । पक्षे 'वर्तिष्यते' इति । अशिश्रियत्-श्रिधातो ङि तिपि अडागमे अनुवन्धलोपे 'च्लि लुङि' इति च्लो 'णिधिसभ्यः कर्तरि चङ' इति च्लेश्वङि अनुबन्धलोपे 'चङि' इति द्वित्वे अभ्या- ससंज्ञायां 'हलादिः शेषः' इति अभ्याससम्बन्धिनो रेफस्य लोपे 'अचि श्नुधातुध्रुवा प्वोरियङवडौं' इति इयङि 'इतश्च' इति तिप इकारलोपे 'अशिश्रियत्' इति । न शस्-शस् , दद् तथा वकारादि धातुओं को एवं गुण शब्दसे विहित अकारको एत्वा- भ्यास लोप नहीं हो। तृफ-'त-फल-भज-त्रप' इन धातुओंको एत्वाभ्यासलोप हो, कित्-लिट् सेट् थल्के परे । रिङ्-शकार, यक एवं थकारादि आर्धधातुक लिङ् परमें हो तो ऋकारको रिउ आदेश हो।
स्वादिप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। वी? न । भ्रियात् । उश्च१।२।१२। अवर्णात्परौ मलादी लिसिचौ किती स्तस्तङि । ऋषीष्ट । भृषीयास्ताम् । भृषीरन् । अभार्षीत् । अभार्टीम् । अभाएः। अभार्षीः। श्रभार्टम् । अभार्ट। अभार्षम् । अभागे । अभाम। हस्वादशात् ८/२।२७ । सिची लोपः स्याज्मलि। अमृत । अभृषाताम् । अभरिष्यत्-अमरिष्यत । हज हरणे । हरति-हरते। जहार । जहे। जहर्थ । जाहिव । जहिम । जहिषे । हर्तासि-हर्तासे । हरिष्यति-हरिष्यते । हरतु-हरताम् । अहरत्-अहरत । हरेत्-हरेत । ह्रियात् । हृषीष्ट । हृषीयास्ताम् । अहार्षीत्- अहृत । अहरिष्यत्-अहरिष्यत । वृञ् धारणे। धरति-धरते । णिज प्रापणे । नयति-नयते । डुपचष् पाके । पचति-पचते। पपाच । पेचिथ-पपक्थ । पक्ता- सि-पक्तासे । मज सेवायाम् । भजति-भजते । बभाज-भेजे । भक्तासि-भक्तासे । भक्ष्यति-भक्ष्यते। अभाक्षीत्-अभक्त । अभक्षाताम् । यज देवपूजासङ्गतिकरण- दानेषु । यजति-यजते । लिटयभ्यासस्योभयेषाम् ६।१।१७। बच्यादीनां प्रह्यादीनां चाऽभ्यासस्य सम्प्रसारणं स्यालिटि । इयाज । वचिस्वपियजादीनां जहार ( ई० २५)-हृधातोलिटि तिपि तिपो गलि द्वित्वे अभ्यासत्वे 'उरत्' इत्यभ्यासवर्णल्य अत्वे रपरत्वे 'हलादिः शेषः' इत्यभ्यासरेफस्य लोपे 'कुहोः' इति अभ्याससम्बन्धिनो हस्य चुत्वे 'अभ्यासे चर्च इति मस्य जश्त्वे 'जह अ' इति स्थिते 'अयोणिति' इति वृद्धौ रपरत्वे 'जहार' इति सिद्धम् । अमाक्षीत् (ई० ४३)-भज्धातो ङि तिपि अडागमेन्टलौ सिचि इचि गते सिचः सस्यार्धधातुकत्वादिटि प्राप्त एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्' इति तनिषेधे 'इतश्च इति तिप इकारलोपे तकारस्यात्तत्वात् 'अस्तिसिचोऽपृक्ते' इत्यनेन ईटि 'वदब्रज- हलन्तस्याचः' इति वृद्धौ जकारस्य कुत्वे चर्वे षत्वे 'अभाक्षीत्' इति । इयाज (ई०४१)-'यज्' धातोलिटि तिपि णलि अनुबन्धलोपे 'लिटि धातो- उश्च-ऋवर्णले पर जो झलादि लिङ' और आत्मनेपदपरक झलादि 'सिच्' वह कित हो । हस्वा-हस्वान्त अङ्गसे पर 'सिच्' का लोप हो, 'झल' के परे । लिटर- बच्यादि और ग्रह्यादि धातुओंके अभ्यासको संप्रसारण हो, 'लिट् के परे । नोट:-वच्यादिसे वचि, स्वपि और यजादि नवों का एवं ग्रहादिसे प्रहि-ज्या- वयि-व्यधि-व्यष्टि-विचति-वृश्चति-पृच्छति-भृज्यति' का ग्रहण समझना चाहिए । यजादि 'यजिर्वपिर्वहिश्चैव बसि-वेञ्-व्येञ् इत्यपि । हेज-वदी-श्वयतिश्चैव यजाद्या स्युरिमे नवः । इति । वचि-वचि-स्वपि और यजादि को संप्रसारण हो, 'कित्' के परे। जव यथा- लघुसिद्धान्तकौमुदी किति६।१।१५। बचिस्वप्योर्यजादीनां च सम्प्रसारणं स्यात् किति । ईजतुः । ईजुः । इयजिथ-इयछ । ईजे । यष्टा । षढोः कः सि||४२ षस्य ढस्य च कः स्यात्सकारे परे । यक्ष्यति यक्ष्यते। इज्यात्-यक्षीष्ट । श्रयाक्षीत-अयष्ट । वह प्रापणे । वहति-वहते। उवाह । उहतुः । ऊहुः । उचहिथ । झषस्तथो?ऽधः ८।२।४० मषः परयोस्तथोर्धः स्यान तु दधातेः । ढोढे लोपः८।३॥ १३॥ ढस्य लोपः स्याड्ढे परे । सहिवहोरोदवर्णस्य ६।३॥ ११२ अनयोरवर्णस्य श्रोत्स्याड्ढलोपे । उबौढ । ऊहे । वोढा । वक्ष्यति । अवाक्षीत् । अवोढाम् । अवा- क्षुः । अवाक्षीः । अवोढम् । अवोढ । अवाक्षम् । अवाक्ष्व । अवाक्ष्म । अवोट । अवक्षाताम् । अवक्षत । अवोढाः । अवक्षाथाम् । अबोवम् । अवक्षि। अवक्ष्व- हि । अवक्ष्महि । इति तिङन्ते भ्वादयः। रनभ्यासस्य इति द्वित्वे अभ्यासत्वे 'हलादिः शेषः' इत्यनेन अभ्यासयकारस्य लोपे 'लिट्यभ्यासस्योभयेषाम्' इति अभ्यासयकारस्य सम्प्रसारगन इकारे 'सम्प्रसारणाच' इति पूर्वरूपे 'श्रत उपधायाः' इति वृद्धौ ‘इयाज' इति । उवोढ (ई० २२,४३)-वधातोलिटि सिपि थलि अनुबन्धलोपे द्वित्वे अभ्या- ससंज्ञायां लिट्यभ्यासस्योभयेषाम्' इति अभ्यासवकारस्य सम्प्रसारणे 'सम्प्रसार- गाच' इति पूर्वरूपे 'हलादिः शेषः' इति अभ्याससम्बन्धिहकारस्य लोपे हो ढः' इति हस्य ढत्वे 'झषस्तथो|ऽधः' इति थस्य धत्वे 'टुना ष्टुः' इति धस्य ष्टुत्वेन ढत्वे 'ढो हूँ लोपः' इति ढलोपे 'सहिवहोरोदवर्णस्य' इत्यकारस्य ओत्वे 'उचोढ' इति । आवाक्षीत् (ई० ४३, ४६)-वधातोर्तुङि तिपि अडागमे अनुबन्धलोपे च्लो सिचि इचि गते 'इतश्च' इति तिप इकारलोपे 'अस्तिसिचोऽपृक्ते' इति ईटि 'वदव्रज- हलन्तस्याचः' इति वृद्धौ ‘हो ढः' इति हस्य डत्वे 'षढोः कः सि' इति ढस्य कत्वे सिचः सस्य षत्वे 'अवाक्षीत' इति रूपं भवति । आत्मनेपदे 'अवोढ' इति । इति 'इन्दुमती'टोकायां भ्वादिप्रकरणम् । बढोः-५ और ढ को क हो, सकार के परे । षस्तथो:-'झ' से पर 'त' और 'थ' को 'ध' हो, परन्तु 'दधाति' को नहीं हो। ढोढे लोपः-ढकारका लोप हो, डकारके परे। सहि-'सह' और 'वह' धातुके अवर्णको 'ओत्' हो, ढलोप होने पर । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें भ्वादिप्रकरण समाज हुआ।
। । । । অখ অাবলু अद भक्षणे । अदिप्रभृतिभ्यः शपः २।४।७२। एभ्यः परस्य शपो लुक् स्यात् । अत्ति । अत्तः। अदन्ति । अत्सि। अत्थः। अत्थ । अनि । अदः । अद्मः । लिट्यन्यतरस्याम् |४|४० अदौ घरलु वा स्याल्लिटि । जघास । उपधा- लोपः । शासिवसिघसीनां च ३।६० इणकुभ्यां परस्यैषां सस्य षः स्यात् । घस्य चर्वम् । जक्षतुः । जक्षुः । जघसिथ। जक्षथुः । जक्ष जघास जघस। जक्षिव । जक्षिम । श्राद । श्रादतुः । आदुः । इडत्यत्तिव्ययतीनाम् ७/२। ६६ अद् ऋ व्ये एभ्यस्थलो नित्यमिट् स्यात् । आदिथ । अत्ता । अत्स्यति । अत्तु-अत्तात् । अत्ताम् । अदन्तु । हुमल्भ्यो हेधिः ६।४। १०११ होझलन्तेभ्यश्च हेधिः स्यात् । अद्धि-अत्तात् । अत्तम् । अत्त । अदानि । अदाव । अदाम । अदः सर्वेषाम् ७/ ३२१००अदःपरस्याऽपृक्तसार्वधातुकस्य अट् स्यात्सर्वमतेन । श्रादत् । श्रात्ताम् । आदन् । प्रादः । आत्तम्। आत्त । आदम्। आह । आमा अद्यात् । अद्याताम्। अद्युः । अद्यात् । अद्यास्ताम् । अद्यासुः । लुङ्सनोर्घस्लु २।४।३७) अदो घरलू जघास ( ई० ३२,४१) अद्धातोलिटि तिपि णलि अनुबन्धलोपे 'लिटय- न्यतरस्याम्' इति अदो 'घर' आदेशे अनुबन्धलोपे 'घस् अ' इति स्थिते 'लिटि. धातोरनभ्यासस्य इति द्वित्वे अभ्याससंज्ञायां हलादिःशेषः' इति अभ्याससकारस्य लोपे 'कुहोश्चुः' इति धस्य मत्वे 'अभ्यासे चर्च' इति मस्य जत्वे 'अत उपधायाः' इति धकाराकारस्थ वृद्धौ ‘जवास' इति, घस्लादेशाऽभावपक्षे 'श्राद' इति भवति । जक्षतुः (ई० ३०, ४३)-अद्धातोलिटि तसि तसोऽतुसि 'लिटयन्य- तरस्याम्' इति श्रदो 'घरल' श्रादेशे अनुबन्धलोपे द्वित्वे अभ्याससंज्ञायां हला- दिशेषे 'कुहोश्चुः' इति घस्य मत्वे 'अभ्यासे चर्च' इति झस्य जत्वे 'गमहनजनख- नघ सालोपः क्ङित्यनङि' इति उपधाऽकारस्य लोपे 'खरिच' इति घस्य चर्वे 'शासिवसिघसीनां च' इति सस्य षत्वे अतुसः सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'जक्षतुः इति । अदिप्रतिभ्यः-अदादि गणपठित धातुओंसे पर 'श' का लुक् (लोप) हो। लिथ-'अद्' को 'घस्ल' आदेश हो, 'लिट' के परे, विकल्पसे । शासि-इण-कवर्गसे पर 'शास्' 'वस्' और 'घस्' धातुसंबन्धी सकारको धकार आदेश हो। इडत्य-अद, ऋ और व्ये धातुओंसे पर थलको नित्य इटका आगम हो । हुश-'हु' धातु और झलन्त धातुओंसे पर 'हि' को 'वि' आदेश हो। अद:-'अद्र धातुसे पर अपृक्त सार्वधातुकको 'अट्' का आगम हो, सभी आचार्योंके मतसे । लुड़-'अद्' धातुको 'घर' आदेश हो, और । । । । १०८ लघुसिद्धान्तकौमुदी स्याल्लुङि सनि च । लुदित्वादङ । अवसत् । प्रात्स्यत् । हन हिंसागत्यो। हन्ति। अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि विङति ६।४।३७/ अनुनासिकान्तानामेषां बनतेश्च लोपः स्याज्मलादौ किति डिति परे। यमिरमि. नमिगमिहनिमन्यतयोऽनुदात्तोपदेशाः। तनु क्षणु क्षिणु ऋणु तृणु घृणु वनु मनु तनोत्यादयः । हतः । नन्ति । हंसि । हथः । हथ । हन्मि । हन्वः । हन्मः । जघान । जनतुः । जघ्नुः । अभ्यासाच ७/३॥ ५५ | अभ्यासात्परस्य हन्तेहस्य कुत्वं स्यात् । जघनिथ-जघन्थ । जनथुः। जन । जघान-जधन । जन्निव । जनिम । हन्ता। हनिष्यति । हन्तु-हतात् । हताम् । नन्तु । हन्तेजः ६।४॥ ३६॥ हन्ते- र्जादेशः स्याद्धौ परे । असिद्धवन्त्राभात् ६।४।२२। इत ऊर्ध्वमापादसमाप्तेराभी- यम् । समानाश्रये तस्मिन्कर्तव्ये तदसिद्धं स्यात् । इति जस्याऽसिद्धत्वान्न हेच॑क् । जहि-हतात् । हतम् । हत । हनानि । हनाव। हनाम । अहन् । अहताम् । अनन् । अन् । अहतम्। अहत । अहनम्। अहन्व। अहन्म। हन्यात् । हन्याताम् । हन्युः । आर्धधातुके २।४। ३५ । इत्यधिकृत्य । हनो वध लिडि २।४।४२। लुङिच २।४।४३ हनो वधादेशः स्याल्लिङि लुङि च । वधादेशोऽ. दन्तः । आर्धधातुके इति विषयसप्तमी तेन प्रार्धधातुकोपदेशेऽकारान्तत्वादतो जघनिथ (ई० २९, ३५)-हन्धातोलिटः सिपि थलि द्वित्वे अभ्याससंज्ञायां 'हलादिः शेषः' इत्यभ्यासनकारस्य लोपे 'कुहोचः' इति चुत्वेन हस्य झत्वे 'अभ्यासे वर्च' इति मस्य जत्वे भारद्वाजनियमादिड्विकल्पे 'अभ्यासाच' इति हस्य कुत्वेन धत्वे 'जघनिथ' इति । इडभावे 'जघन्थ' इति । जहि (ई० २२,२८,३९,५७) हन्धातोर्लोटि तत्स्थाने सिपि अनुबन्धलोपे सार्वधातुकसंज्ञायां शपि 'अदिप्रभृतिभ्यः शपः' इति शपो लुकि 'सद्यपिच्च' इति सिपः हो 'हन हि' इति जाते 'हन्तेजः' इति हनः स्थाने जादेशे 'जहिं' इति । अत्र जादेशे कृते हे क् तु न भवति, 'असिद्धवदत्राभात्' इति जादेशस्यासिद्धत्वात् । "सन्' के परे । अनु-अनुनासिकान्त जा अनुदात्तोपदेश और तनोत्यादि (तनु विस्तारे आदि) धातु तथा वन्'धातु, इनके अनुनासिकका लोप हो, झलादि कित ङित्के परे। अभ्या-अभ्यास से पर हिन्' धातुके हकारको कुत्व हो। हन्ते-'हन्' धातु को 'ज' आदेश हो 'हि'के परे । असि- समानाश्रय 'आभीय कार्य कर्तव्य हो तो कृतसमानाश्रय आभीयशास्त्र असिद्ध हो। ( इस सूत्रसे लेकर षष्ठाध्यायके चतुर्थ पादको समाप्ति पर्यन्त 'आमीय' कहलाता है ) आध-यह अधिकारसूत्र है । हनो वध लिङि, लुङि च-हुन् धातुको 'वध' आदेश हो, लिङ और अदादिप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १०६.. - । । । । -- लोपः । वध्यात् । वध्यास्ताम् । श्रादेशस्यानेकाच्त्वादेकाच इतीनिषेधा भावादिट् । अतो हलादेरिति वृद्धौ प्राप्तायाम्-अचः परस्मिन् पूर्वविधों १।१।१७ | परनिमित्तोऽजादेशः स्थानिवत्स्यात् स्थानिभूतादचः पूर्वत्वेन दृष्टस्य विधौ कर्तव्ये । इत्यस्लोपस्य स्थानिवत्त्वेनोपधात्वाऽभावान वृद्धि:--अवधीत् । अहनिष्यत्। यु मिश्रणाऽमिश्रणयोः । उतो वृद्धिलुकि हलि ७।६। ८६ ! लुग्विषये उतो वृद्धिः स्यात् पिति हलादौ सार्वधातुके, नत्वभ्यस्तस्य । यौति । युतः । युवन्ति । यौषि । युथः । युथ । यौमि । टुवः। युभः। युवाव । यविता । यविष्यति । यौतु । युतात् । अयौत् । अयुताम् । अयुवन् । युयात् । इह उतो वृद्धिन, भाष्ये पिच्च डिन, डिच्च पिन्नेति व्याख्यानात् । युयाताम् । युयुः। यूयात् । यूयास्ताम् । यूयासुः। अयावीत् । अयविष्यत् । या प्रापणे। याति । यातः। यान्ति । ययौ । याता। यास्यति । यातु । अयात् । अयातात् । लङः शाकटाय. नस्यैव ३।४।१११ । श्रादन्तात्परस्य लडो झेर्जुस् वा स्यात् । अयुः । अयान् । यायात् । यायाताम् । यायुः । यायात् । यायास्ताम् । यायासुः। अयासीत् । अयास्यत् । वा गतिगन्धनयोः।भा दीप्तौ । णा शौचे। श्रापाके । द्रा कुत्सायां, गतौ । सा भक्षणे । रा दाने । ला श्रादाने । दाप लवने । पा रक्षणे । ख्या प्रक- अवधीत् ( ई० ४८) हन्धातोर्तुङि 'लुङि च' इति हनो वधादेशे लुङ स्थाने तिपि 'लुङ्लङ्' इत्यडागमे अनुबन्धलोपे 'इतश्च' इति तिप इकारलोपे 'चिल. लुङि' इति च्लो 'च्लेः सिच्' इति सिचि इचि गते 'आर्धधातुकस्येड्वलादेः' इति इटि 'अतो लोपः' इति वधाकारस्य लोपे 'अस्तिसिचोऽपृक्ते' इति अपृक्ततकारस्य ईटि 'इट ईटि' इति सलोपे 'सिज्लोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः' इति सिज्लोपस्य सिद्धत्वात् सवर्णदीर्घ 'अवधीत्' इति । अयुः (ई०५६)-याधातोर्लङि तत्स्थाने मो सार्वधातुकसंज्ञायां शपि 'अदि- प्रभृतिभ्यः शपः' इति शपो लुकि 'लुङ्लङ्' इत्यडागमे 'लङः शाकटायनस्यैव' इति झे सि 'उस्यपदान्तात्' इति पररूपे सस्य रुत्वे विसर्गे 'अयुः' इति । जुसोऽभाके मस्यान्तादेशे इकारलोपे तलोपे च कृते सवर्णदीर्घ 'श्रयान्' इति । लुछ्के परे । अच:-परनिमित्तक अजादेश स्थानिवत हो, स्थानिभूत अच से पूर्वत्वेन दृष्टको यदि विधि (कार्य) कर्त्तव्य हो । उतो-लुक्के विषय में (हस्व ) उकारको वृद्धि हो, हला- दि पित् सार्वधातुकके परे-अभ्यस्तसंज्ञक धातुको छोड़कर । लड:-आदन्त धातुसे पर AMARCHANNERE MARATHmarare लघुसिद्धान्तकौमुदी यने । अयं सार्वधातुक एवं प्रयोक्तव्यः । विद ज्ञाने । विदो लटोबा २।४।३। वेत्तेलटः परस्मैपदानां णलादयो वा स्युः । वेद । विदतुः। विदुः । वेत्थ । विदथुः । विद । वेद । विद्व । विद्य। पचे-वेति । वित्तः। विदन्ति । उपविदजागृभ्योऽ- न्यतरस्याम् ३।११३८ । एभ्यो लिटि श्राम्वा स्यात् । विदेरदन्तत्वप्रतिज्ञानादामि न गुणः । विदाञ्चकार-विवेद । वेदिता। वेदिष्यति । विदाकुर्वन्त्वित्यन्यतर- स्याम् ३३११४११ वेत्तेर्लोटि आम, गुणाऽभावो, लोटो लुक् लोडन्तकरोत्यनुप्रयोगश्च वा निपात्यते। पुरुषवचने न विवक्षिते। तनादिकृभ्य उः ३११ | ७६ । तनादेः कृअश्व उप्रत्ययः स्यात् । शपोऽपवादः। विदाङ्करोतु । अत उत्सा- विदाञ्चकार (ई० ४८)-विद्धातोलिटि "उषविदजागृभ्योऽन्यतरस्याम्' इत्यामि अामः आर्धधातुकत्वेऽपि विदेरदन्तत्वप्रतिज्ञानात् लघूपधगुणाऽभावे 'श्राम:' इति लिटो लकि 'कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि' इति लिटपरकोऽनुप्रयोगे विदाम् कृ लिट्' इति स्थिते लिटः स्थाने तिपि तिपो गलि द्वित्वे अभ्याससंज्ञायाम् 'उरत्' इत्यत्वे रपरत्वे 'हलादिः शेषः' इति अस्यास रेफस्य लोपे 'कुहोश्चुः' इति अभ्यासक- कारस्य चुत्वेन चकारे 'अयोजिणति' इति वृद्धौ रपरत्वे मकारस्य अनुस्वारे परसवर्णे च कृते 'विदाञ्चकार' इति । श्रामोऽभावपक्षे विवेद' इति । विदाङ्करोतु ( ई० ३३, ४५)-विद्धातोर्लोटि 'विदाकुर्वन्त्वित्यन्यतरस्याम्' इति आमि गुणाऽभावे लोटो लुकि लोटपरककृमोऽनुप्रयोगे च निपातिते 'विदाम् कृ लोट्' इति स्थिते लोटः स्थाने तिपि तिपः सार्वधातुकत्वात् शापि प्राप्ते तम्प्रबाध्य 'तनादि कृभ्य उः' इत्युत्वे 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' इति गुरी रपरत्वे च विहिते तिपो निमित्तमादाय पुनः उकारस्य गुणे एरुः' इति तिप इकारस्य उत्वे मस्या- नुस्वारे परसवणे च कृते 'विदाकरोतु' इति । तातङि पक्षे 'अत उत्सार्वधातुके' इति ककाराकारस्य उत्वे 'विदाङ्कुरुतात्' इति । पक्षे 'वेत्तु' इति । 'ल' संबन्धी 'झि' को जुस् हो विकल्पसे । विदो-विद' धातुसे पर 'ल' सम्बन्धी पर. स्मैपदको णलादि आदेश हो, विकल्पसे । उप-उप, विद् और जागृ धातुओंसे 'आम्' प्रत्यय हो, 'लिट' के परे, विकल्पसे । विदां-'लोट' के परे-विद' धातुसे 'आम्' गुणका अभाव और 'लोट' का लुक् एवं लोडन्त कृधातुका अनुपयोग निपातन हो, विकल्पसे । तना-तनादिगण-पठित धातु और 'कृ' धातुसे 'उ' प्रत्यय हो, कर्थक सार्वधातुकके परे। बत-उप्रत्ययान्त कृञ् धातुके 'अ' को 'उत्' आदेश हो, सार्वधातुक किन-किनके - । । 'अदादिप्र] इन्दुसती-टीकाद्वचोपेता। र्वधातुके ६४|११० उप्रत्ययान्तस्य कृोऽकारस्य उत्स्यात्सार्वधातुके ङिति । विदाङ्कुरुतात् । विदाङ्कुरुताम् । विदाङ्कुर्वन्तु । विदाङ्गुरु । विदाङ्करवाणि । अवेत् । अवित्ताम् । अविदुः । दश्च नारा७५ धातोर्दस्य पदान्तस्य सिपि परे रुर्वा स्यात् । अवेः-अवेत् । विद्यात् । विद्याताम् । विद्युः । विद्यात् । विद्यास्ताम् । अवेदीत् । अवेदिष्यत् । अस् भुवि । अस्ति । श्नसोरल्लोपः ६।४।११११ श्नस्याऽस्तेवा- तो लोपः स्यात्सार्वधातुके क्विति । स्तः। सन्ति । असि । स्थः । स्थ । अस्मि । स्वः । स्मः । उपसर्गप्रादुामस्तिर्यच्परः ८३८७ ! उपसर्गेणः प्रादुसश्वाऽस्तेः सस्य षः स्याद्यकारेऽचि च परे। निष्यात् । प्रनिषन्ति । प्रादुःषन्ति । यच्परः किम् ? अभिस्तः । अस्तेर्भूः २ ४ । ५२ । अस्तेर्भू इत्यादेशः स्यादार्धधातुके । बभूव । भविता। भविष्यति । अस्तु-स्तात् । स्ताम् । सन्तु । ध्वसोरेद्धाव- भ्यासलोपश्च ६।४।११६ | घोरस्तेश्च एत्वं स्याद्धौ परे अभ्यासलोपश्च । एत्व- स्यासिद्धत्वाद्धेधिः। श्नसोरित्यल्लोपः । तातङ्पक्षे एत्वं न, परेण तातडा बाधात् । एधि-स्तात् । स्तम् । स्त। असानि । असाव । असाम । आसीत् । आस्ताम् । आसन् । स्यात् । स्याताम् । स्युः । भूयात् । अभूत् । श्रभविष्यत् । इण गतौ । 'एति । इतः । इणो यण् ६।४।८१ । इणो यण स्यादजादौ प्रत्यये परे । यन्ति । अभ्यासस्याऽसवणे ६४७८ अभ्यासस्य इव!वर्णयोरियजुवी स्तोऽसवर्गेऽचि । निष्यात्-'नि' उपसर्गात् 'अस्' धातोलिङि तिपि यासुटि 'श्नसोरल्लोपः इत्यल्लोपे 'उपसर्गप्रादुर्ध्यामस्तिर्यच्परः' इति धातोः सस्य षत्वे 'इतश्च' इति तिप इकारलोपे 'स्कोः संयोगाचोरन्ते च' इति सलोपे 'निष्यात्' इति । एधि (ई० ५६) अस्धातोर्लोटि सिपि सिपो हेरादेशे 'चसोरेद्धावभ्यास- लोपश्च' इति सस्य एत्त्वे एत्वस्याऽसिद्धत्वात् 'हुमल्भ्यो हेर्द्धिः' इति हेधौ ‘श्नसोर- ल्लोपः' इत्यल्लोपे 'एधि' इति । तातपक्षे परेण तातडा बाधादेत्वाऽभावे 'स्तात्' इति भवति । परे । दश्व-धातुके पदान्त दकारको 'रुत्व' हो, सिप के परे, विकल्पसे। श्लो-श्नम् प्रत्यय और 'अस्' धातुके अकारका लोप हो, सार्वधातुक किन-जिनके परे । उपस - उपसर्ग संबन्धी 'इण्' से पर और 'प्रादुस्' (सान्त अव्यय ) से पर 'अस्' धातु के सकारको षकार हो, यकार और अच्के परे । अस्ते-'अस्' धातुको 'भू' आदेश हो, आर्धधातुक के परे । श्वसो-बुसंशक धातु और भस्' धातुको एत्व' और अभ्यासका लोप हो, 'हि' के परे । इणो-दृण धातुको यण हो, अजादि प्रत्यय के परे। अभ्या-अभ्यास सम्बन्धी स्वर्ण-उवर्णको । -- , लघुसिद्धान्तकौमुदी इयाय । दीर्घ इणः किति ७१४। ६६ । इणोऽभ्यासस्य दीर्घः स्याकिति लिटि । ईयतुः । ईयुः । इययिथ-इयेथ । एता । एष्यति । एतु । ऐत् । ऐताम् । आयन् । इयात् । ईयात् । एतेर्लिङि ७४|२४| उपसर्गात्परस्य इणोऽणो ह्रस्वः स्यादार्थ- धातुके क्रिति लिङि । निरियात् । उभयत आश्रयणे नान्तादिवत् । अभीयात् । अणः किम् ? समेयात् । इणो गा लुङि २।४।४५ । इणो गादेशः स्याल्लुङि । गातिस्थेति सिचो लुक् । अगात् । ऐप्यत् । अथ श्रात्मनेपदिनः। शीङ स्वप्ने । शीङः सार्वधातुके गुणः ७।४।२१। शीडो गुणः स्यात्सार्व- धातुके । विङति चेत्यस्यापवादः । शेते । शयाते । शीडो रुट ७१।६। शीङ परस्य झादेशस्याऽतो रुडागमः स्यात् । शेरते। शेषे। शयाथे। शेध्वे । शये। शेवहे । शेमहे । शिश्ये । शिश्याते । शिश्यिरे। शयिता । शयिष्यते । शेताम् । शया- ताम् । श्रशेत । अशयाताम् । अशेरत । शयीत । शयीयाताम् । शयीरन् । शयिषीष्ट । अशयिष्ट । अशयिष्यत । इङ अध्ययने । इङिकावध्युपसर्गतो न व्यभिचरतः । अधीते । अधीयाते। अधीयते । गालिटि २।४।४६ | इडी गाङ स्याल्लिटि । अधिजगे । अधिजगाते । अघिजगिरे । अध्येता। ईयतुः-इण्धातोलिटि तसि तसोऽतुसि द्वित्वे अभ्यासत्वे 'इणो यण्' इति यणि दीर्घ इणः किति' इत्यभ्यासस्य दीर्ये रुत्वे विसर्गे 'ईयतुः' इति । अशयिष्ट ( ई० ३७, ४६)-शोधातोलुङि अात्मनेपदे ते 'लुङलङ' इत्य- डागमे च्लौ च्लेः सिचि इचि गते 'आर्धधातुकस्येवलादेः' इति इटि 'सार्वधातु- कार्धधातुकयोः' इति गुणे अयादेशे सिचः सस्य षत्वे ष्टुत्वे 'अशयिष्ट' इति । अधिजगे ( १९४२)-अधिपूर्वक इङ'धातोलिटि 'गाङ् लिटि' इति इडो गागदेशे लिटः स्थाने ते तस्य एशि द्वित्वे अभ्याससंज्ञायां हस्चे 'कुहोश्चुः' इति चुत्वे 'श्रातो लोप इटि च' इत्यालोपे 'अधिजगे' इति । श्यङ्-उवङ् आदेश हो, असवर्ण 'अच' के परे। दीर्घ-'इ' धातुके अभ्यासको दीर्घ हो, कित लिटके परे। एतेलि-उपसर्गसे पर 'इण्' धातुके 'अण' को हत्व हो, आर्धधातुक किन-लिङके परे। उभय-उभयतः आश्रयणमें अन्तादिवद्भाव नहीं हो। इणो-'इ' को 'गा' आदेश हो लुङ के परे । शीङ:--'शीङ' धातुको गुण हो, सार्वधातुकके परे । शीठो-शोर से पर झ देश 'अत्'को 'रुट'का आगम हो। गा-हक को गाड बादेश हो 'लिट' के परे ।
अदादिप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। । And । अध्येष्यते। अधीताम् । अधीयाताम् । अधीयताम् । अधीन । अधीयाथाम् । अधीध्वम् । अध्ययै । अध्ययावहै । अध्ययामहै। अध्येत । अध्यैयाताम् । अध्ययत अध्यथाः । अध्येयाथाम् । अध्यध्वम् । अध्यैयि । अध्यैवहि । अध्येमहि । श्रधी- यीत । अधीमीयाताम् । अधीयीरन् । अध्येषीष्ट । विभाषा लुङ्लुङगेः २।४।५० इडो गाङ् वा स्यात् । गाङ्कुटादिभ्योऽणिन्छित् १२ ११ गाडादेशात्कुटादि- भ्यश्च परेऽब्णितः प्रत्यया ङितः स्युः। घुमास्थागापाजहातिसां हलि ६४/६६! एषामात ईत्स्याद्धलादौ विडत्यार्धधातुके। अध्यगीष्ट-अध्यष्ट । अध्यगीष्यत-- अध्येष्यत । इत्यात्मनेपदिनः । अथोमयपदिनः । दुह प्रपूरणे। दोधि । दुग्धः ।. दुहन्ति । धौक्षि। दुग्धे । दुहाते। दुहते । धुने। दुहाथे । दुग्ध्वे । दुहे । दुहृहे । दुह्महे । दुदोह-दुदुहे । दोग्धासि- दोग्धाले घोदयति-धोक्ष्यते। दोग्धु-दुधात् । दुरधाम् । दुहन्तु । दौग्धि- दुग्धात् । दुग्धम् । दुग्ध । दोहानि । दोहाव । दोहाम । दुग्धाम् । दुहाताम् । दुहताम् । धुक्ष्य । दुहाथाम् । धुरध्वम् । दोहै । दोहावहै । दोहामहै । अधीक् । अधुरधाम् । अदुहन् । अदोहम् । अदुग्ध । अदुहाताम् । अदुहत । अधुरध्वम् । अध्यगीष्ट ( ई० ४०, ५० )-अधिपूर्वकादिधातो ङि तप्रत्यये विभाषा लुब्लुङोः' इति इको गाडादेशे 'लुक् लब्' इत्यडागमे च्लो चलेः सिचि इचि गते 'गाङ्कुटादिभ्योऽठिणन्ङित्' इति सिचो डित्वे 'घुमास्थागापाजहातिसां हलि' इति श्राकारस्य ईत्वे यणि षत्वे टुत्वे 'अध्यगीष्ट' इति । 'गाडोऽभावे 'अध्यैष्ट' इति । दुग्धः (ई० ५२) दुधातोर्लटि तत्स्थाने तसि सार्चधातुकसंज्ञायां शापि श्रादि- प्रभृतिभ्यः शयः' इति शपो लुकि 'दादेर्धातीर्घः' इति हस्य घत्वे 'भषस्तथो|ऽधः' इति तस्य धत्वे 'झलां जश् झशि' इति घस्य जश्त्वेन गत्वे तसः अपित्वेन ङित्वात् 'क्ङिति चेति गुणनिषेधे सस्य स्त्वे विसर्गे 'दुग्धः' इति । अधोक् दुश्चातोर्लङस्तिपि अनुबन्धलोपे शपो लुकि अङ्गस्याडागमे 'पुग- न्तलघूपधस्य च' इति गुणे 'इतश्च' इति तिप इकारलोपे 'हलङयाभ्यः' इति -- । । विभाषा 'रङ' को 'गाङ् आदेश हो, लुङ्-लके परे, विकल्पसे । गाङ्-'' स्थानिक 'गा' और कुटादिसे पर जित्-णित् से भिन्न प्रत्यय 'डित्' हो । घुमा-धुसंज्ञक धातु तथा मा, स्था, गा, पा, हा और 'यो' धातुके आकारको 'ईत्व हो, हलादि कित्-डित् आई- SCENGAJENDMINORITERSNETICERLASSHRIMALI । । te लघुसिद्धान्तकौमुदी दुयात-दुहीत । लिङ्सिचावात्मनेपदेषु शश१११ इक्समीपाद्धलः परौ मलादी लिसिन्चौ कितौ स्तस्तङि । धुक्षीष्ट । शल इगुपधादनिटः क्सः श४५ इगुपधी यः शलन्तस्तस्मादनिटश्च्ले क्सादेशः स्यात् । अधुक्षत् । लुग्या दुहदिहलिहगु- हामात्मनेपदे दन्त्ये ७।३।७३॥ एषां क्सस्य लुग्वा स्याइन्त्ये तङि । अदुग्ध- अधुशत । क्सस्याचि ७३२७२ अजादौ तङि क्सस्य लोपः स्यात् । अधुक्षाताम् । अधुक्षन्त । अदुग्धाः-अधुक्षथाः। अधुनाथाम् । अधुरध्वम्-अधुक्षध्वम् । अधुक्षि । अदुलहि-अधुक्षावहि । अधुक्षामहि । अधोक्ष्यत । एवं-दिह उपचये । लिह आस्वादने। लेढि । लोढः । लिहन्ति । लेक्षि । ली। लिहाते। लिहते । लिने । लिहाथे । लीवे । लिलेह-लिलिहे । लेडासि-लेडासे । लेक्ष्यति-लेक्ष्यते । लेड-लोढात् । लोढाम् । लिहन्तु । लीढि । लेहानि । लोढाम् । अलेट-अलेड् श्रलिक्षत् । अलीढ-अलिक्षत । अलेक्ष्यत् । अलेक्ष्यत । (वन)व्यक्तायां वाचि । तलोपे 'अदोह' इति जाते 'दादेर्धातोः' इति हत्य घत्वे 'एकाचो वशो भए मष- न्तस्य रूध्वोः' इति दस्य धत्वे घस्य जश्त्वे तस्य चर्बेन ककारे 'अधोक्' इति । धुदीष्ट ( ई० २४ )-दुधातोराशीलिङि तत्स्थाने ते 'लिङः सीयुट्' इति सीयुटि अनुबन्धलोपे 'लिसिचावात्मनेपदेषु' इति कित्त्वाद् गुणाऽभावे 'लोपो व्योबलि' इति यलोपे 'दादेर्धातोः' इति हस्य चत्वे 'एकाचो वशो' इति भष्भावेन दस्य धत्वे वस्य जश्त्वे चत्वे 'प्रादेशप्रत्यययोः' इति सस्य षत्वे 'धुक्षीत' इति 'सुट् तिथो', इति सुटि अनुबन्धलोपे सस्य ष्टुत्वे च कृते "धुक्षीष्ट । अधुक्षत् ( ई० २८)-दुधातो कि तिपि अडागमे मध्ये च्लौ तस्य 'शल इगुपधादनिटः क्सः' इति क्सादेशे 'इतश्च' इति इकारलोपे 'दादेर्धातोः' इति हस्य घत्वे 'एकाचो वशः' इति दस्य धत्चे घस्य जश्त्वे वर्वे सस्य षत्वे 'अधुक्षत्' इति । अधुक्षाताम् ( ई० ३१)-दुधातो ङि आतामि अडागमे लौ तस्य क्सादेश 'क्सस्याचि' इत्यनेन 'अलोन्त्यस्येति सहकारात् सल्याकारस्य लोपे 'दादेर्धातीर्घः' इति हस्य घत्वे 'एकाचः' इत्यनेन दस्य भष्मावेन धत्वे 'खरि च' इत्यनेन घस्य चर्खे सस्य षत्वे 'अधुक्षाताम्' इति । धातुकके परे । लिङ्सिचा-इक समीप हल्से पर झलादि लिङ और आत्मनेपद परक झलादि सिच, कित हो । शल-इगुपध शलन्त धातुसे पर अनिट् 'च्लि' को 'क्त' आदेश हो। लुम्वा-दुहादि धातुसे पर क्स' का 'लुक्' हो, दन्त्य तड़के परे विकल्पसे । क्सस्याचि-'क्स' ( क्सके 'अ') का लोप हो, अनादि 'त' के परे ।
। । See अदादिप्र०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। ब्रुवः पञ्चानामादित आहो ब्रुवः ३।४।८४] ब्रुवो लटस्तिबादीनां पञ्चानां णला- दयः पञ्च वा स्युर्बुवश्चाऽऽहादेशः । श्राह । श्राहतुः । पाहुः । आहस्थः दा३३५ आहस्थकारादेशः स्यात् झलि परे । चलम् । श्रात्य । श्राहथुः । ब्रुव ईट ७३।१३। ब्रुवः परस्य हलादेः पित ईट् स्यात् । ब्रवीति । ब्रूतः । ब्रुवन्ति । ब्रूते । ब्रुवाते । ब्रुवते। ब्रुवो वचिः २।४।५३ आर्धधातुके । उवाच । ऊचतुः । ऊचुः । उचिथ उवक्थ । ऊचे । वक्ता । वक्तासि-बत्तासे। बक्ष्यति-वक्ष्यते । ब्रवीतु- ब्रूतात् । व्रताम् । ब्रुवन्तु । ग्रूहि । ब्राणि । बृताम् । अवै । अब्रवीत् । अब्रूत । ब्रूयात् । ब्रवीत । उच्यात् । वक्षीष्ट । अस्यतिवक्तिख्यातिभ्योऽङ्३१ ११ ५२ ! एभ्यश्च्लेरङ स्यात् । वच उम् ७।४।२०। बच उमागमः स्यादडि परे । अवोचत्-अवोचत । अवक्ष्यत्-श्रवक्ष्यत । (१० सू०) चर्करीतञ्च। चर्करीत- मिति यड्लुगन्तस्य सज्ञा, तददादौ बोध्यम् । अर्गुञ् आच्छादने । ऊोते. विभाषा ७।३।६01 अर्णोतेर्वा वृद्धिः स्याद्धलादौ पिति सार्थधातुके ! ऊर्जाति-ऊर्णोति ! ऊर्णतः । ऊर्जुवन्ति । ऊर्गुते । ऊहुंचाते । ऊर्णवते । ऊोते- आह-ब्रूधातोर्लटि तिषि शापि शपो लुकि 'ब्रुवः पञ्चानामादित श्राहो ब्रुवः' इति तिपो णलि ब्रुवः श्राहादेशे च कृते अनुबन्धलोये 'आह' इति सिद्धम् । उवचिथ-धातोलिटः सिपि सिपस्थलादेशे 'ब्रुवो वचिः' इति ब्रुवो वचा- देशे द्वित्वे अभ्याससंज्ञायां हलादिशेषे 'लिटयभ्यासस्योभयेषाम्' इत्यभ्यासस्य सम्प्रसारणै पूर्वरूपे भारद्वाजनियमाद् विभाषया इटि 'उवचिथ' इति । इडभावपक्ष 'चोः कुः' इति कुत्वे 'उचक्थ' इति । अवोचत् (ई० २७,४३,५४)-ब्रुवो लुङि तिपि अडागमे 'चिल लुखि' इति च्लो 'अस्यतिवक्तिख्यातिभ्योऽङ' इति च्लेरङि 'ब्रुवो वचिः' इति वचादेशे 'इतश्च' इति तिप इकारलोपे 'वच उम्' इति उमि 'आद्गुणः' इति गुणे 'अवोचत्' इति । नुवः-'ब' धातुसे पर लट्लकार संबन्धी तिबादि पाँचको गलादि आदेश हो, विकल्पसे और '' को 'आह' आदेश भी हो। आह:-'आ'को थकारान्त आदेश हो, 'झलके परे । ब्रुव-व' धातुसे पर हलादि 'पित्'को 'ईट'का आगम हो । ब्रुवो-'व' को वचादेश हो, आर्धधातुकके परे । अस्यति-अस् , वच् और ख्या धातुओंसे पर ब्लिको अआदेश हो। वच-बच्को उम्का आगम हो, अङ् प्रत्ययके परे । चर्क-'चर्करीतम्' इस यगन्त धातुओं को भी अदादिमें समझना । जो-ऊणु धातुको वृद्धि हो, हलादि पित् सार्व- धातुकके परे, विकल्पसे । ऊो-ऊणु' धातुको आम्' नहीं हो, 'लिट् के परे । ।
१ e । , लघुसिद्धान्तकौमुदी राग्नेति वाच्यम् । नन्द्राः संयोगादयः । श्रचः पराः संयोगादयो नदर दिर्न भवन्ति । मुशब्दस्य द्वित्वम् ! उर्णनाच । ऊर्जुनुवतुः । अर्जुनुः ।' विभा. धोः ११२१३. इडादिप्रत्ययो वा डिस्यात् । अणुनुविथ-ऊर्णनविथ । ऊर्ण- विता-जर्णचिता। अणुविध्यति-ऊर्गविष्यति । जौतु-ऊर्णोतु । अर्णवानि । ऊर्ण गुणोऽयुक्त ७३।६११ अर्णोतेर्गुणः स्यादपृत्त हलादौ पिति । सार्वधातुके । वृद्धया- वादः । प्रौर्णोत् । और्णोः । ऊर्गुयात् । ऊर्णयाः । ऊर्गुबीत् । अयात् । ऊर्गुविषीष्ट नुशब्दस्य-अत्र धातौ 'नु' शब्द एक 'गु' इति श्रूयते । तदुक्तं-नकार- जावनुस्वारपञ्चमो झलि धातुपु । सकारजश्शकारक्षे पावर्गस्तवर्गजः' इति । प्रायमर्थः-धात्ववयवझलि परे कुत्रचिद् अनुस्वारः कुत्रचित पञ्चमो वर्णः ( ग् न म्) दृश्यते, तो द्वावपि न कारजौ (यथा-संसु, भंसु, ध्वंसु, इत्यादिषु अनु- स्वारः । अङ्क, अञ्च, लुण्ठ, मन्थ, तुम्फ, इत्यादिषु पञ्चमो वर्णश्च) चकारे परे यः शकारः दृश्यते स श्रुत्वनिष्पन्नः सकारजः (यथा श्रोत्रश्चू , इत्यादी) रेफषकाराम्या परः यः टवर्गः दृश्यते स णत्वष्टुत्वनिष्पन्नः तवर्गजः ( यथा 'ऊर्गु, ष्टा, इत्यादौ ): ऊणुनाव-ऊर्णधातोलिटस्तिपि तिपो गलि 'ऊर्णोतेराम्नेति वाच्यम्' इति निषेधे 'अजादेद्वितीयस्य' इति 'गु' शब्दस्य द्वित्वे प्राप्ते 'नन्द्राः संयोगादयः' इति रेफस्य द्वित्वाऽभावे णत्वस्याऽसिद्धत्वात् 'नु' शब्दस्य द्वित्वे 'रषाभ्यां नी : समानपदे' इति प्रथमनकारस्य णत्वे 'अचोऽणिति इति वृद्धौ, श्रावि 'ऊणुनाव इति । ऊणुविषीष्ट ( ई० २१ )-ऊर्जुधातोराशीलिङस्तप्रत्यये सीयुटि लोपो व्योर्व- लि' इति यलोपे 'श्रावातुकस्येवलादेः' इति इ टि 'विभाषीर्णोः' इति इटो ङि- त्वाऽभावपक्षे गुणे अवादेशे 'सुतियोः' इति तस्य सुटि षत्व ष्टुत्वे 'ऊर्णविषीष्ट' इति । इटो कित्वाद् गुणाऽभावपक्षे ऊवडि 'ऊर्णविषीष्ट' इति । और्णावीत्-ऊर्जुधातोर्जुङस्तिपि अनुबन्धलोपे 'आडजादीनाम्' इत्याटि 'प्राटच' इति वृद्धौ मध्ये च्लौ च्लेः सिचि इचि गते 'इतश्च' इति तिप इकारलोपे 'आर्धधातुकस्येड्दलादेः' इति सिचः सस्य इटि 'अस्तिसिचोऽपृक्ते' इति अपृक्त- संज्ञकस्य तस्य ईटि अनुबन्धलोपे 'इट ईटि' इति सलोपे विभाषीणोंः' इति इटो नन्द्रा:-'अचसे पर संयोगादि नकार, दकार और रेफको द्वित्व नहीं हो। विभा-'ऊर्जु धातुसे पर इडादि प्रत्यय 'ङित्' हो, विकल्पसे । गुणो-'ऊणु' धातुको गुण हो, अपृत्तसंचक हलादि 'पित्' सार्वधातुकके परे ।
जुहोत्यादिन] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। ऊर्णविधी । ऊोतेत्रिभाषा ७.२१६। इडादौ सिचि परस्मैपदे परे वा वृद्धिः स्यात् । पक्षे गुणः । नोर्णावीत-ौणुकीत्-और्गवीत् । अौर्णाविष्टाम्-और्णविष्टाम्- शौर्णविष्टाम् । शौर्णाविष्ट-प्रौणुविष्ट-और्णविष्ट। औणुविष्यत् । नौविष्यत् । औणुविष्यत-और्णविष्यत ॥ इत्यदादिप्रकरणम् ॥ । अथ जुहोत्यादिप्रकरणम् हु दानादनयोः । जुहोत्यादिभ्यः श्लुः २।४।७५ । एभ्यः परस्य शपः : स्यात् । श्लो ६।११०। धातीद्वै स्तः। जुहोति । जुहुतः। अभ्यस्तात् ७।११४। अभ्यस्तात्परस्य झस्यात्स्यात् । हुश्नुवोरिति यण् । जुह्वति । भीही. हुवां श्लुवच ३।१।३६ / एभ्यो लिट्याम्वा स्यादामि श्लाविव कार्य च । जुहवा- चकार-जुहाव । होता । होष्यति । जुहोतु-जुहुतात् । जुहुताम् । जुतु । जुहुधि । । DAMRIEARNE डित्वाद् गुणाऽभावे उचङि अनुबन्धलोपे सवर्णदीचे 'औMवीत्' इति । डिवाs- भावपक्षे गुणं बाधित्वा 'जर्णोतेर्विभाषा' इति विभाषया वृद्धौ आचादेशे 'पौर्णाचीत्' इति । वृद्धयभावपक्षे 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' इति गुणे अवादेशे और्णवीत्' इति । इति 'इन्दुमती' टीकायामदादिप्रकरणम् । जुहवाञ्चकार-हुधातोलिटि 'भीह्रीभृहुचां श्लुबच्च' इति लिटः पाक्षिके आमि श्लुवावे च विहिते द्वित्वे अभ्यासत्वे चुत्वेन इस्य मत्वे 'अभ्यासे चर्च' इति मस्य जत्वे गुणेऽवादेशे 'श्रामः' इति लिटो लुकि 'कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि' इति लिट्- परककृतोऽनुग्नयोगे लिटस्तिपो णलि द्वित्वे अभ्यासत्वे 'उरत्' इत्यत्वे रपरत्वे हलादिशेषे 'कुहोश्चः' इति चुत्वे 'अचोणिति' इति वृद्धौ रपरत्वे मस्यानुस्वारे परसवर्णे 'जुहवाञ्चकार' इति । अामोऽभावपक्षे 'जुहाव' इति । ऊों-ऊणु धातुको बृद्धि हो, इडादि परस्मैपद परक 'सिच' के परे, विकल्पस । इसप्रकार 'इन्दुमती' टीका में अदादिप्रकरण समाप्त हुआ। जुहो-जुहोत्यादि गणपठित धातुओं से विहित 'शप'का 'इलु' (लोप) हो । श्लो-धातु को द्वित्व हो 'इलु'के परे (श्लुके विषयमें)। सीही-भी, ही, 9 और 'हु' धातुसे 'लिट के परे विकल्पसे 'आम्' प्रत्यय हो और 'आम्' के परे, 'लु' की तरह द्वित्वादि कार्य भी हो। । १ Apan AL ana विभयाञ्चकार---बिभाय। भेता लघुसिद्धान्तकौमुदी जुहनानि । अजुहोत् । अजहुताम् । जुसि च ७।३।८३ । इगन्ताङ्गस्य गुण स्यादजादौ जुसि । अजुहवुः । जुहुयात् । हूयात् । अहौषीत् । अहोष्यत् (भिभी भये । विभेति । भियोऽन्यतरस्यान ६.४।११५इकारो वा स्यालादौ विति भेष्यति । बिभेतु । बिभितात्-विभीतात्। अबिभेत् । बिभीयात्-बिभियात् । भीयात् । अभैषीत् । अमेष्यत् । ही लजायाम् । जिहेति । जिह्रीतः । जिहियति जिहयाञ्चकार । जिहाय । हेता। हव्यति। जिलेतु। अजिहेत् । जिहीयात् । हीयात् । अहषीत् । अहेष्यत् । पृ पालनपूरणयोः । अर्तिपिपयोश्च ७/४१५७ अभ्यासस्य इकारोऽन्तादेशः स्यात् श्लौ । पिपर्ति । उदोष्ठयपूर्वस्य १२१०२। अङ्गावयचौष्टयपूय ऋत् तदन्तस्याङ्गस्य उत् स्यात् । हलि च८/२/७७ रेफ- वान्तस्य धातोरुपधाया इको दीर्घः स्याद्धलि । पिपूर्तः । पिपुरति । पपार , शृदृप्रां हस्यो वा ७१४|१२॥ एषां लिटि ह्रस्वो वा स्यात् । पातुः । ऋच्छत्यृताम् ७।४।११तौदादिकनच्छेधातोतां च गुणः स्यालिटि । पपरतुः । पपरुः । बिभितात् ( ई० ३३)-भियो लोटि तियि अनुबन्धलो शपि 'जुहोत्यादिभ्यः श्लुः' इति शपः श्लुत्वे 'श्लौं' इति द्वित्वे अभ्याससंज्ञायां 'हस्वः' इत्यभ्यासस्य हरके 'अभ्यासे चर्च' इति अभ्यासभकारस्य बत्वे 'एस' इति तिप इकारस्य उल्टो तातङि अनुबन्धलोपे 'भियोऽन्यतरस्याम्' इत्यनेन ईकारस्य इकारे 'विभितात्' इति विकल्पपने विभीतात्' इति । तातडभावपक्षे गुणे 'बिभेतु' इति । पिपूर्तः (ई० २४,५४)-पृधातोर्लटस्तसि सार्वधातुकसंज्ञायां शपि शपः श्लो 'श्लौ' इति द्वित्वे अभ्याससंज्ञायाम् 'अतिपिपयोश्च' इति अभ्यासस्य इकारान्तादेशे रपरत्वे हलाविशेषे 'पि पृ तस्' इति स्थिते 'उदोष्ठयपूर्वस्य' इति उत्वे रपरत्वे 'हलि च' इति धातोरुपधायाः दीर्घ सस्य रुत्वे विसर्गे 'पिपूर्तः' इति सिद्धम् । पप्रतुः ( ई० ४०,४८)-पृधातोलिटस्तसि तसोऽतुसि 'लिटि धातोरनभ्या- जुसि-इगन्त अंगको गुण हो 'अजादि जुस के परे । भियो-'भी' धातुको 'इत्व'हो, हलादि किन-गित सार्वधातुकके परे, विकल्पसे । अति-अति पदे ऋ धातु और पिपर्ति पदे 'पृ धातुके अभ्यासको 'इत्त्व' हो, 'श्लु के बिषयमें । उदोष्ठय-अङ्गावयव ओष्ठय पूर्वक ऋदन्त अंगको 'उत्' आदेश हो । हलि-रेफान्त और वान्त धातु संबन्धी उपधा 'हक्'को दीर्घ हो 'हल्'के परे। शूद-'शू-दृ-पू' धातुको हस्व हो, कित्-लिट्के परे, विकल्पसे । ऋच्छ- तुदादिके 'ऋच्छ' धातु, 'ऋ' धातु और दीर्घ ऋकारान्त धातुको गुण हो, लिट् के परे ।
। जुहोत्यादिप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। Dent ११६ गर वृतो वा ७१ २। ३८वृकृष्भ्यामृदन्ताच्चैटो दीर्थो वा स्याच तु लिटि । परीता- परिता । परीष्यति-परिष्यति । पिपर्तु । अपिपः । श्रपिपूर्ताम् । अपिपरुः । पिपू- यात् । पूर्यात् । अपारीत् । सिचिच परस्मैपदेषु ७।२।४० अनेटो न दीर्घः । अपारिष्टाम् । अपरीष्यत्-अपरिष्यत् ॥ ओहाक् त्यागे । जहाति । जहातेश्च ६।४।११६ । इत्स्याद्वा हलादौ विति सार्वधातुके । जहितः । ई हल्यघोः ६! ४|११३॥ श्नाभ्यस्तयोरात ईत् स्यात् सार्वधातुके किङति हलि नतु घोः । जहीतः। भाभ्यस्तयोरातः ६।४।११२ । अनयोरातो लोप: स्यात् विडति सार्वधातुके जहति । जहौ। हाता । हास्यति । जहातु-जहितात-जहीतात् । आ च हौ६। ४।११७ । जहातेही परे पा स्याचादिदीतौ । जहाहि-जहिहि-जहीहि । अजहात् । अजहुः । लोपो यि ६४।११८ जहातेरालोपः स्याद्यादौ सार्वधातुके। जयात् । एलिङि । हेयात् । अहासीत् । अहास्यत् । अथात्मनेपादिनः । माङ माने शब्द च ॥ भृामित् ७१४७६ | भृञ् माङ् श्रोहाङ् एषां सस्य' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे ह्रस्वे अत्वे रपरत्वे अभ्यासलोपे 'शृदृप्रां ह्रस्वो वा' इति वैकल्पिके ह्रस्वे यणि सस्य रुत्वे विसर्गे 'पातुः' इति । हस्वाऽभावपचे 'ऋच्छत्यताम्' इति गुणे रपरे च विहिते 'पपरतुः' इति । जहाहि ( ई० २७,३७,४३,५५)-'मोहाक् त्यागे' अस्माद्धातोर्लोटः स्थाने सिपि सह्यपिच्च' इति सिपः स्थाने 'हिं' इत्यादेशे सार्चधातुकसंज्ञायां शपि शपः श्लौ श्लो' इति द्वित्वे अभ्याससंज्ञायां 'हस्वः' इत्यभ्यासस्याचो हस्वे 'कुहीश्चुः' इति अभ्यासहकारस्य कुत्वेन मत्वे 'अभ्यासे चर्च इति फस्य जत्वे 'पाच हौ' इति श्रात्वपक्षे 'जहाहि' इति, इत्वपक्षे 'जहिहि' इति, ईत्वपक्षे 'जहीहि' इति । वृतो. 'वृ धातु, 'वृञ्' धातु और दीर्घ ऋदन्त धातुसे पर 'इट'को दीर्थ हो, विकल्पसे, पर 'लिट'के परे नहीं हो। सिचि-परस्मैपद 'सि'के परे 'वृतो वा' से विहित 'इट'का दोष नहीं हो । जहा--'हा' धातुको 'इत्त्व' हो, हलादि "कित्-डित' के परे, विकल्पसे । इंह-श्ना' प्रत्यय और अभ्यस्तसंज्ञक आकारको 'ईत्व' हो, हलादि कित्-डित्' सार्व. धातुकके परे। भाग्य:-इना प्रत्यय और अभ्यस्तसंज्ञक धातुके आकारका लोप हो, कित डित् सार्वधातुकके परे। आ च-'हा' ( ओडाक् ) धातुको 'आत्व' हो, चकारात् इत्व' और ईत्त्व' भी हो । लोपो-'हा' धातुके आकारका लोप हो, यकारादि सार्वधातुकके परे । भृक्षा-'भृन, माङ् और ओहाङ् धातु सम्बन्धी अभ्यासको 'इत्त्व' हो, 'इलु'के विषयमें। and- । लघुसिद्धान्तकौमुदी त्रयाणामभ्यासस्य इत् स्यात् श्लौ । मिमीते। मिमाते। मिमते। ममे। माता। मास्यते । मिमीताम् । अमिमीत । मिमीत । मासीष्ट । अमास्त। अमात्यत । ओहाङ्गतौ । जिहीते । जिहाते । जिहते । जहे । हाता। हास्यते । जिहीताम् । अजिहीत । जिहीत । हासीष्ट ! अहास्त । अहास्यत । श्रयोभयपदिनः। डुसुधारणपोषणयोः । बिभर्ति । बिभृतः। विभ्रति । बिभृते । विधाते। बिभ्रते। बिभराध कार-बमार। बमर्थ । बभूव । बिभराञ्चके-बभ्रे । भासि- भाते। भरिष्यति-भरिष्यते । बिभर्तु । विभराणि । विभृताम् । अबिभः । अबिभृताम् । अबिभरुः । अविकृत । बिभृयात्-बिश्रीत। श्रियात्-भृषीष्ट । प्रभाति-अमृत । अभरिष्यत्-अभरिष्यत ! जुदा दाने । ददाति । दत्तः । ददति। दत्ते। ददाते। ददतें। ददौ-ददे । दातासि-दातासे । दास्यति । दास्यते । ददातु । दाधा बदायू ११ १२० दारूपा धारूपाश्च धातवो संज्ञकाः मिमीते-(ई० ३९ ) 'माङ्' धातोल्टस्ते टेरेत्वे सार्वधातुकसंज्ञायां शपि शपः श्लो द्वित्वे अभ्यासादिकार्ये 'भृक्षामित्' इति अभ्यासस्य इत्वे हल्यघोः' इति धातोराकारस्य ईत्वे 'मिमौते' इति । बिभ्रति ( ई० ४३)-भृधातोर्लटः मो सार्वधातुकसंज्ञायां शपि शपः श्लो द्वित्वे अभ्यासत्वे 'भृञामित्' इति अभ्यासस्य इत्वे रपरत्वे हलादिः शेषः' इति अभ्यास रेफस्य लोपे 'अभ्यासे चर्च' इति अभ्यासभकारस्य बत्वे 'उभे अभ्यस्तम्' इति अभ्यस्तसंज्ञायाम् 'अदभ्यस्तात्' इति मस्य अति यणि 'बिप्रति' इति । भ्रियात् (ई० ४४, ४७)-भृधातोराशीलिङि तिपि इपावितौ यासुटि उटि गते 'सकोः संयोगाद्योरन्ते च' इति सलोपे ' रिशयग्लिक्षु' इति ऋकारस्य रिङादेशे 'रिङ' विधानसामर्थ्यात् 'अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः' इति दीर्घाऽभावे 'भ्रियात्' इति । भृषीष्ट (ई० ४३)-'डभृञ् इति धातोरात्मनेपदे आशीलिङस्ते 'लिङः सीयुट् इति सीयुटि उटि गते 'लोपो व्योर्वलि' इति यलोपे 'सुट् तिथोः' इति सुटि उटि गते भृ सी स् त' इति स्थिते 'एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्' इति इनिषेधे 'उच' इति कित्वाद् गुणाऽभावे सकारस्य षत्वे ष्टुत्वे 'भृषीष्ट' इति सिद्धम् । दावा-'दा' रूप तथा 'धा' रूप धातुओं की घुसंशा हो, 'दाप्' 'दैप्' को छोड़कर ।
- जुहोत्यादिप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १२१ स्युपदेपौ विना । वसोरित्यत्त्वम् । देहि । दत्तम् । अददात्-प्रदत्त । दद्यात्- ददीत । देयात्-दासीष्ट । अदात् । अदाताम् । अदुः। स्थाध्वोरिच श२॥१७॥ अनयोरिदन्तादेशः स्यात् सिच कित्स्यादात्मनेपदे। अदित । अदास्यत्-अदास्यत । डुधाधारणपोषणयोः । दधाति । दधस्तथोश्च दारा३८ द्विरुक्तस्य मषन्तस्य धानो बशो भष स्यात्तथोः ध्वीश्च परतः। धत्तः । दधति । दधासि । धत्थः । धत्थ । थत्ते । दधाते। दधते । धत्से। धद्ध्वे । ध्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च । धेहि । अदधात् । अधत्त । दध्यात् । दधीत । धेयात् ।धासीष्ट । अधात् । अधित । अधास्यत् । अधास्यत। णिजिर शौचपोषणयोः । इर इत्संज्ञा वाच्या। णिजां त्रयाणां गुणः श्लौ ७४/७५ णिज्विविषामभ्यासस्य गुणः स्यात् श्लौ। नेने- क्ति। निक्तः। नेनिजति। नेनिक्ते। निनेज। निनिजे। नेता। नेक्ष्यति । नेक्ष्यते । नेनेक्तु । नेनिग्धि । नाऽभ्यस्तस्याऽचि पिति सार्वधातुके ७३२८७ अभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातु के लघूपधगुणो न स्यात् । नेनिजानि । नेनि- क्ताम् । अनेनेक । अनेनिक्ताम् । अनेनिजुः । अनेनिजम् । अनेनिक्त । नेनिज्यात् । . देहि ( ई० ४७, ५०)-दाधातोर्लोटः स्थाने सिपि तस्य हो 'दाधाध्वदाप्' इति संज्ञायां शपः श्लौ द्वित्वे अभ्यासत्वे ह्रस्वत्वे च कृते चिसोरेद्धावभ्यासलो- पश्च' इति एत्वेऽभ्यासलोपे च कृते 'देहि' इति सिद्धम् । अदित (ई० ३४)-दाधातोरात्मनेपदे लुङस्तादेशे अडागमे अनुबन्धलोपे च्लो च्लेः सिचि इचि गते 'दाधाबदाप्' इति घुसंज्ञायां 'स्थानोरिच्च' इति इदन्तादेशे सिचः कित्वे च कृते कित्त्वाद्गुणाभावे 'हस्वादनात्' इति सिचःसस्य लोपे 'अदित'इति। धेहि ( ई० ५१ )-धाञ्धातोर्लोटः सिपि 'सेयपिच्च' इति सेहित्वे सार्वधातुकसंज्ञायां शपि शपः श्लौ श्लो' इति द्वित्वे अभ्याससंज्ञायां 'हस्वः' इत्यभ्यासाकारस्य ह्रस्वे 'दाधावदाप्' इति धुत्वे 'ध्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च' इति एत्वे अभ्यासलोये च कृते 'धेहि' इति सिद्धम् । नेनिजानि (ई० ४१, ४९, ५६)-णिजिर् शौचपोषणयोः' इत्यस्माद्धातोर्लोटि - स्था-'स्था' धातु और घुसंज्ञक धातुको इदन्तादेश हो और धातुसे पर जो सिच' वह 'कित्! हो आत्मनेपदके परे । दधस्त-द्विरुक्त (कृतद्वित्व) झपन्त 'धाञ्' धातुके 'बश्' को भष्भाव हो, तकार, थकार, सकार और 'ध्व'के परे । इर-'इर्' की इत्संज्ञा कहनी चाहिये । निजा- निज, विज और विष् धातुके अभ्यासको 'गुण' हो, श्लुके विषयमें । नाभ्य-अभ्यस्तसंशक लघुसिद्धान्तकौमुदी नेनिजीत । निज्यात् । निक्षीष्ट । इरितो वा३।११५७ । इरितो धातोश्च्लेर वा स्यात्परस्मैपदेषु । अनिजत् । अनैक्षीत् । अनित । अनेदयत् । अनेक्ष्यत । ॥ इति जुहोत्यादयः॥ খ শিক্ষিকা दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु । दिवा- दिभ्यः श्यन् ३/११६६ ! एभ्यः श्यन् स्यात्कर्थे सार्वधातुके परे। शपोऽप- बादः । हलि चेति दीर्घः । दीव्यति। दिदेव । देविता । देविष्यति । दीव्यतु । अदीव्यत् । दीव्येत् । दीव्यात् । अदेवीत् । अदेविष्यत् । एवं षिवु तन्तुसन्ताने । नृती गात्रविक्षेपे । नृत्यति । ननत । नर्तिता । सेऽलिचि कृततच्छृतदनृतः ७।२।५७ । एभ्यः परस्य सिज्मिनस्य सादेरार्धधातुकस्येड्दा स्यात् । नर्तिष्यति- नय॑ति । नृत्यतु । अनृत्यत् । नृत्येत् । नृत्यात् । अनीत् । अनतिष्यत्-अनस्य- Heta 'इर इत्संज्ञा वाच्या' इति वार्तिकेन इर इत्संज्ञायां लोपे च कृते णो नः' इति धातोर्णस्य नत्वे 'निज लोट्' इति स्थिते लोटः स्थाने मिपि 'मेनिः' इति मेयादेश सार्वधातुकसंज्ञायां शपि शपः श्लौ 'श्लौ' इति द्वित्वे अभ्याससंज्ञायां हलादिशेधे 'पाडुत्तमस्य पिच्च' इत्याटि अनुबन्धलोपे 'निजां त्रयाणां गुणः श्लो' इत्यभ्यासस्य गुणे 'नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके' इति गुणनिषेधे 'नेनिजानि' इति । इति 'इन्दुमती' टोकायां जुहोत्यादिप्रकरणम् । नर्तिष्यति, नस्य॑ति (ई० २१,३३)-नृत्धातोटस्तिपि 'स्यतासी लुलु- टोः' इति स्यप्रत्यये सेऽसिचि इति इटि 'पुगन्तलघूपधस्य च' इति गुणे रपरत्वे सस्य षत्वे 'नतिष्यति' इति । इडभावे 'नयंति' इति । धातुको 'लघूपध' गुण नहीं हो, अजादि 'पित्' सार्वधातुकके परे। इरितो वा-हरित्संज्ञक धातुसे पर ब्लिको अङ्ग हो, परस्मैपदके परे विकल्पसे। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीका में जुहोत्यादिप्रकरण समाप्त हुआ। 00%2000 दिवा-दिवादिगणपठित धातुओं से 'श्यन्' प्रत्यय हो, कर्थक सार्वधातुकके परे। सेऽसि-कृत-चूत-द-तृद-नृत धातुओं से पर 'सिच्' भिन्न सकारादि आर्धधातुकको दिवादिप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। त् । त्रसी उद्वेगे | वा भ्राशेति श्यन्वा । त्रस्यति-त्रसति । तत्रास । वा जुनमु- त्रसामू ६।४।१२४ । एषां किति लिटि सेटि थलि च एत्वाभ्यासलोपौ वा स्तः । वेसतुः-तत्रसतुः। त्रेसिथ-तत्रसिथ । त्रसिता। शो तनूकरणे। ओतः श्यनि ७३१ ६१ | लोपः स्यात् । श्यनि । श्यति । श्यतः । श्यन्ति । शशौ । शशनुः । शाता । शास्यति । विभाषा घ्राधेटशाच्छासः २।४) ७६। एभ्यः सिचो लुग्या ! स्यात् परस्मैपदे परे। अशाताम् । अशुः । इट्सको। अशासीत् । अशा- सिष्टाम् । छो छेदने । छयति । षोऽन्तकर्मणि । स्यति । ससौ । सेयात् । असात् । प्रसासीत् । दो अवखण्डने । यति । ददौ । देयात् । अदात् । व्यध ताडने ३ अहिज्यावयिष्यधिवष्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां विडति ६।१।१६। एषो. सम्प्रसारणं स्याकिति डिति च। विष्यति विव्याध । विविधतुः । विविधुः । विव्यधिय-विव्गद्ध । व्यद्धा। व्यत्स्यति। विध्येत् । विध्यात् । अव्यात्सीत् । पुष्टौ । पुष्यति । पुपोष । युपोषिय । पोष्टा । पोक्ष्यति । पुषादीत्यङ् । अपुषत् । शुष शोषणे। शुष्यति । शुशोष। अशुषत् । णश अदर्शने। नश्यति । ननाश । नेशतुः । रधादिभ्यश्च ७३।४५१ र नश् तृप् हप् दुह् मुह ष्णुह प्णिह् एभ्यो वलाद्यार्ध- धातुकस्य वेट् । नेशिथ । मस्जिनशोभोलि ७१।६०। नुम् । स्यात् । ननंष्ठ । ससौ (ई० २८)--'षोऽन्तकर्मणि' इत्यस्माद्धातोलिटि धात्वादेः षः स' इति षस्य सत्त्वे लिटस्तिपितिपो गलि 'आदेच उपदेशेऽशिति' इत्यात्वे 'लिटि धातोरन- भ्यासस्य' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे हस्ते 'बात औ णलः' इत्यौत्वे वृद्धौ ‘ससौं' इति । ननंष्ठ-'णश् अदर्शने' इत्यस्माद्धातोलिटः सिपि सिपस्थलि ‘णो नः' इति धातोर्णस्य नत्वे 'लिटि धातोरिति द्वित्वे अभ्यासत्वे हलादिशेषे 'रधादिभ्यश्च' इति इटि थलि च सेटि' इति एत्वे अभ्यासलोपे च कृते. 'नेशिथ' इति इडभावपते, 'इट' का आगम हो, विकल्पसे । वा जु-, भ्रम् और त्रस् धातुको एत्वाभ्यासलोप हो, कित-लिट और सेट्थलके परे, विकल्पसे । ओता-ओकारका लोप हो, 'श्यन्'के परे । विभाषा-'ब्रा' धातु, 'धेट' धातु, 'शो' धातु, 'छो' धातुओंसे पर सिच्का लुक् हो, परस्मै पदके परे, विकल्पसे । अहिज्या-ग्रह, ज्या, व्यध , वष्टि, विच् , ब्रश्च, प्रच्छ और अस्ज धातुओंको सम्प्रसारण हो, कित् , ङित् के परे। रधादि-रथादि धातुओंसे बलादि आर्थ- धातुकको हट हो, विकल्पसे । मस्जि-मस्जि और नश् धातुको नुम हो, 'झल' के परे। .
लघुसिद्धान्तकौमुदी नेनिजीत । निज्यात् । निक्षीष्ट । इरितो वा ३.११५७ । इरितो धातोश्च्लेरड बा अन्यात्परस्मैपदेषु । अनिजत् । अनैक्षीत् । अनित। अनेक्ष्यत् । अनेक्ष्यत । ॥ इति जुहोत्यादयः॥ । । ভাগ দ্বিান্ধি दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारशुतिस्तुतिमोदमदस्वप्न कान्तिगतिषु । दिवा- दिभ्यः श्यन् ३।११६६ । एभ्यः श्यन् स्यात्क-थै सार्वधातुके परे। शपोऽप- वादः । हलि चेति दीर्घः। दीव्यति। दिदेव । देविता। देविष्यति । दीव्यतु । अदीव्यत् । दीव्येत् । दीव्यात् । अदेवीत् । अदेविष्यत् । एवं षिवु तन्तुसन्ताने । नृती गात्रविक्षेपे । नृत्यति । ननत । नर्तिता । सेऽलिचि कृतवृतच्छृदृदन्तः ७।२।५७ । एभ्यः परस्य सिज्मिनस्य सादरार्धधातुकल्येड्वा स्यात् । नर्तिव्यति-- नय॑ति । नृत्यतु । अनृत्यत् । नृत्येत् । नृत्यात् । अनीत् । अनतिष्यत्-अनस्य- 'इर इत्संज्ञा वाच्या' इति वार्तिकेन र इत्संज्ञायां लोपे च कृते णो नः' इति धातोर्णस्य नत्वे 'निज लोट्' इति स्थिते लोटः स्थाने मिपि 'मेनिः' इति मेन्यादेश सार्वधातुकसंज्ञायां शपि शपः श्लौ 'श्लौ' इति द्वित्वे अभ्याससंज्ञायां हलादिशेधे 'आहुत्तमस्य पिच्च' इत्याटि अनुबन्धलोपे 'निजां त्रयाणां गुणः श्लौ' इत्यभ्यासस्य गुणे 'नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके' इति गुणनिषेधे 'नेनिजानि' इति । इति 'इन्दुमती' टोकायर्या जुहोत्यादिप्रकरणम् । । नर्तिष्यति, नय॑ति (ई० २१,३३)-नृत्धातोलटस्तिपि 'स्यतासी लुलु. टोः' इति स्यप्रत्यये सेऽसिचि इति इटि 'पुगन्तलघूपधस्य च' इति गुणे रपरत्के सस्य षत्वे नितिष्यति' इति । इडभावे 'नय॑ति' इति । धातुको 'लघूपध' गुण नहीं हो, अजादि 'पित्' सार्वधातुकके परे । इरितो वा-इरित्संज्ञक धातुसे पर च्लिको अङ् हो, परस्मैपदके परे विकल्पसे । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें जुहोत्यादिप्रकरण समाप्त हुआ। दिवा-दिवादिगणपठित धातुओं से 'श्यन्' प्रत्यय हो, कर्थक सार्वधातुकके परे। सेऽसि-कृत-चूत मृद-तृद-नृत धातुओं से पर 'सिच्' भिन्न सकारादि आर्धधातुकको दिवादिप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १२३ त् । त्रसी उद्वेगे । वा भाशेति श्यन्वा । त्रस्यति-त्रसति । तत्रास । वा भ्रम त्रसाम्६१४|१२४/ एषां किति लिटि सेटि थलि च एत्वाभ्यासलोपौ वा स्तः त्रेसतुः-तत्रसतुः । सिथ-तत्रसिथ । त्रसिता। शो तनूकरो। ओतः श्यनि ७३६१ लोपः स्यात् । श्यनि । श्यति । श्यतः । श्यन्ति । शशौ । शशतुः । शाता । शास्यति । विभाषा प्रावेदशाच्छासः २।४। ७८! एभ्यः सिचो लुग्वा ! स्यात् परस्मैपदे परे। अशाताम् । अशुः । इट्सकौ । अशासीत् । अशा- सिष्टाम् । छो छेदने । छचति । षोऽन्तकर्मणि । स्यति । ससौ । सेयात् । असात् । असासीत् । दो अवखण्डने । यति । ददौ । देयात् । अदात् । व्यध ताडने ३ अहिल्यावयिव्यधिवष्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिसृज्जतीनां विङति ६११६। एषो सम्प्रसारणं स्याकिति डिति च। विध्यति। विव्याध । विविधतुः । विविधुः । विव्यघिय-विगद्ध । व्यद्धा। व्यत्स्यति । विध्येत् । विध्यात् । अव्यात्सीत् । पुष्टौ । पुष्यति । पुपोष । पुपोषिय । पोष्टा । पोक्ष्यति । पुषादीत्यङ् । अपुषत् । शुष शोषणे। शुष्यति । शुशोष। अशुषत् । णश श्रदर्शने। नश्यति । ननाश । नेशतुः । रधादिभ्यश्च ७३।४५१ र नश् तृप् हप् दुह् मुह ष्णुह् प्णिह् एभ्यो वलाद्यार्ध- धातुकस्य वेट् । नेशिथ । मस्जिनशोमलि ७१ । ६० । नुम् । स्यात् । ननंष्ठ । । । ससौ (ई० २८)-'षोऽन्तकर्मणि' इत्यस्माद्धातोलिटि 'धात्वादेः षः स' इति षस्य सत्वे लिटस्तिपितिपो णलि 'आदेच उपदेशेऽशिति' इत्यात्वे 'लिटि धातोरन- भ्यासस्य' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे हस्ते 'श्रात नौ णलः' इत्यौत्वे वृद्धौ ‘ससौ' इति । ननंष्ठ-'णश् अदर्शने' इत्यस्माद्धातोलिटः सिपि सिपस्थलि ‘णो नः' इति धातोर्णस्य नत्वे 'लिटि धातोरिति द्वित्वे अभ्यासत्व हलादिशेये 'रधादिभ्यश्च' इति इटि 'थलि च सेटिं' इति एत्वे अभ्यासलोपे च कृते 'नेशिथ' इति इडभावपने, , 'इट' का आगम हो, विकल्पसे । वा ज-, भ्रम् और त्रस् धातुको एत्वाभ्यासलोप हो, कित्-लिट और सेट्थलके परे, विकल्पसे । ओतः-ओकारका लोप हो, 'श्यन्'के परे। विभाषा-'ब्रा' धातु, 'धेट्' धातु, 'शो' धातु, 'छो' धातुओंसे पर सिचका लुक् हो, परस्मै. पदके परे, विकल्पसे । अहिज्या-ग्रह, ज्या, व्यथ् , वष्टि, विच , व्रश्च , प्रच्छ और भ्रस्ज धातुओंको सम्प्रसारण हो, कित् , ङित् के परे। रधादि-रधादि धातुओंसे बलादि आर्ध- धातुकको इट हो, विकल्पसे । मस्जि-मस्जि और नश् धातुको नुम हो, 'झल' के परे। " १२४ लघुसिद्धान्तकौमुदी नेशिवनेश्व। शिम-नेश्मा । नशिता-नटा। नशिष्यति-नक्षयति । नश्यतु । अनश्यत् । नश्येत् । नश्यात् । पानशत् । नाथाऽऽत्मनेपदिनः। पूड प्राणिप्रसवै । सूयते । सुषुवे । कादिनियमादिट् । सुषुविषे । सुषुविवहे । सुघुविमहे । सविता-सोता । दूङ परितापे । दूयते । दीङ क्षये । दीयते । दीडो युडचि विकति ६४।६३। दीङः परस्याऽजादेः क्ति आर्धधातुकस्य युट् स्यात् । ग्युटावुबब्यणोः सिद्धौ वक्तव्यौ । दिदीये । मीनातिमिनोतिदीड ल्यपि च ६॥ १॥ ५० ॥ एषामात्वं स्याल्ल्यपि, चादशित्येग्निमित्ते । दाता । दास्यति । *स्थाध्वोरित्त्वे दीडः प्रतिषेधः । अदास्त । डीङ् विहायसा गतौ । डीयते । डिडथे। इयिता । पीङ्पाने । पीयते । येता । अपेष्ट । मामाने । मायते । अमे। जनी प्रादुर्भावे । ज्ञाजनोर्जा ७ । ३ । ७६ | अनयो देशः स्याच्छिति । जायते । जज्ञे । जनिता। जनिष्यते । दीपजनबुधपूरितायिष्यायिभ्योऽन्यतर- स्याम् ३२१२६१। एभ्यश्च्लेश्विग् वा स्यादेकवचने तशब्दे परे (चिणो लुक्६ । ४|१०४॥ चिणः परस्य तशब्दस्य लुक् स्यात् । जनिवघ्योश्च ७।३॥ ३५॥ अन- 'मस्जिनशोमलि' इति नुमि 'बश्वभ्रस्ज' इति षत्वे ष्टुत्वे नस्यानुस्वारे 'ननष्ठ' इति । दिदीये (ई० ३४)-'दीङ धातोलिटि आत्मनेपदे ते लिटि धातोरिति द्वित्वे अभ्यासत्वे 'हस्वः' इति हस्वे "लिटस्तमयोरेशिरेच्' इति तस्य एशि दीडो युद्धचि विति' इत्यसिद्धत्वात् 'एरने काचः' इति परत्वाद् यणि प्राप्ते 'वुग्युटावुवयणोः सिद्धौ वक्तव्यो' इति वार्तिके नासिद्धत्वाऽभावात् युटि 'दिदीये' इति । अदास्त (ई० ३४,४५,५३)-'दी धातो ङि आत्मनेपदे ते अडागमे च्लो चले सिचि 'मीनातिमिनोतिदीडो ल्यपिच' इत्यनेन आत्वे 'दाधावदाप्' इति घुसंज्ञायां दीडो-'दी' धातुसे पर अजादि कित्-ङित् आर्धधातुकको 'युद्ध' का आगम हो । बुग्यु-उव और यण कर्त्तव्य में वुक् तथा युट का आगम सिद्ध हो रहे ( असिद्ध न हो)। मीनाति-मीनाति ( मी हिंसायाम् ), मिनोति (डुमि प्रक्षेपणे ) और 'दी' धातुको आत्व हो, 'त्या'के परे। चकारात्-एजनिमित्तक अशित् प्रत्ययके विषय में । स्थाध्वो:- "स्थानोरिच्च' सूत्रसे विहित इत्व 'दी' धातुको नहीं हो। ज्ञाज-'ज्ञा' धातु और 'जन् धातुको 'जा' आदेश हो, शित् प्रत्ययके परे। दीप-दीपादि धातुओंसे पर 'चिल' को चिण' आदेश हो, एकवचन 'त' शब्द के परे, विकल्पसे । चिणो-'चिण्से पर 'त' शब्दका लुक् ( लोप ) हो । जनि-'जन' और 'वध'की उपधाको वृद्धि नहीं हो, 'चिण'के परे और .
दिवादिन] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। योरुपधाया वृद्धिर्न स्याचिणि णिति किति च । अजनि-अजनिष्ट । दीपी दीप्तौ। दीप्यते । दिदीपे । अदीपि-अदीपिष्ट । पद गतौ । पद्यते । पेदे। पत्ता । पत्सीष्ट चिण ते पदः शश६०। पदश्च्लेश्विण स्यात्तशब्दे परे । अपादि । श्रपत्साताम् । आपत्सत । विद सत्तायाम् । विद्यते । वेत्ता । शावित्त । बुध श्रवगमने । बुध्यते । बोद्धा । भोत्स्यते । भुत्सीष्ट । अबोधि-अबुद्ध । अभुत्साताम् । युध सम्प्रहारे । युयुधे । योद्धा । अयुद्ध । मृज विसर्गे । सृज्यते । ससृजे । ससृजिषे । सृजिशो- मल्यमकिति ६१५८ अनयोरमागमः स्याज्मलादावकिति । स्रष्टा । स्रक्ष्यते । सूक्षीष्ट । असृष्ट । अस्पृक्षाताम् । अथोमयपदिनः । मृष तितिक्षायाम् । मृष्यति-पृष्यते । ममर्ष । ममार्षिय । ममृषिधे । मर्षि- तासि । मर्षितासे । मर्षिष्यति-मर्षिष्यते । णह बन्धने । नयति । नह्यते । ननाइ । नेहिथ-ननद्ध । नेहे । नद्धा । नत्स्यति । अनात्सीत् -अानद्ध । ॥ इति दिवादिप्रकरणम् ॥ 'स्थानोरिच' इति इत्वे प्राप्त स्थानोरित्वे दीङः प्रतिषेधः' इति तनिषेधे अदास्त इति । अजनि-(ई० ४१, ५५)-'जनधातोर्मुस्तादेशे अडागमे च्लो 'दीपज- नबुधपूरितायिप्यायिभ्योऽन्यतरस्याम्' इति विभाषया च्लेश्चिणि 'शत उपधायाः' इति वृद्धौ प्राप्तायां 'जनिवध्योश्च' इति निषेधे चिणो लुक' इति तलोपे 'जनि' इति चिणोऽभावपक्षे च्लेः सिचि इटि षत्वे ष्टत्वे 'अजनिष्ट' इति । अपादि (ई० ३७,४२, ५०)-'पद् गतौ' इति धातोर्लुङस्तादेशे अटि अनु- बन्धलोपे लौ 'चिण ते पदः' इति च्लेश्चिणि अनुबन्धलोपे 'चिणोलुक्' इति चिण: परस्य तशब्दस्य लुकि 'अत उपधायाः' इति वृद्धौ ‘अपादि' इति सिद्धम् । असृष्ट-(ई० २७)-'सृज् विसर्गे' अस्माद्धातोर्लुङस्तादेशे 'लुङ्लङ' इत्य- डागमे अनुबन्धलोपे च्लौ च्लेः सिचि अनुबन्धलोपे 'लिङ्सिचावात्मनेपदेषु' इति । सिचः कित्वाद्गुणाऽभावे 'मृजिशोमल्यमकिति' इत्यस्याप्यप्राप्ते 'भलो झलि' इति सिचः सस्य लोपे 'प्रश्वभ्रस्जसृजमृज' इति षत्वे ष्टुत्वे 'असृष्ट' इति सिद्धम् । मित्-णित-कितके परे । चिण-पद्' धातुसे पर 'फिल'को 'चिण आदेश हो, एकवचन 'त' शब्दके परे । सृजि-सृज और दृश् धातुको अम्का आगम हो, झलादि अकिल के परे। इति 'इन्दुमती' टीकायां दिवादिप्रकरणम् । - Tagrat । । Kathman ঙ্গ মিয়া पुल अभिषवे । स्त्रादिभ्यः श्नुः ३।१।७३ | स्वादिभ्यः श्नुः स्यात्वत्रण सार्वधातुके परे । शपोऽपवादः । सुनौति सुनुतः । हुश्नुवोरिति यण् । सुन्ध- न्ति । सुन्धः-सुनुवः । सुनुते । सुन्वाते । सुन्वते । सुन्वहे सुनुवहे । सुषाव । सुषुवे । सोता। सुनु । सुनवानि । सुनवै । सुनुयात् । स्यात् । स्तसुधूभ्यः परस्मै पदे ७२|७२। एभ्यस्सिच इट् स्यात्परस्मैपदेषु । असावीत् । असोष्ट । चिब चयने । चिनोति । चिनुते । विभाषा ७/३/५८ | अभ्यासापरस्य कुत्वं वा स्यात्सनि लिटि च । चिकाय-चिचाय । चिक्ये-चिच्ये । अचैषीत् । अचेष्ट । स्तृञ् श्राच्छादने । स्तृणोति । स्तृणुते । शपूर्वाः खयः ७।४।६११ अभ्यासस्य शापूर्वाः खयः शिष्यन्तेऽन्ये हलो सुप्यन्ते । तस्तार । तस्तरतुः । तस्तरे। गुणो- तीति गुणः । स्तर्यात् । ऋतश्च संयोगादेः ७।२।४३। ऋदन्तासंयोगादेः परयो लिसिचोरिड्वा स्यात्तङि । स्तरिषीष्ट, स्तृषीष्ट । अस्तरिष्ट-प्रस्तुत । धू कम्पने । धुनोति । धुनुते । दुधाच । स्वस्तीति वेट । दुधविथ-दुधोथ । नधकः असावीत् ( ई० ४५,५०)-'घुम्' धातोर्मुङि लुङस्तिपि तिप इकारलोपे 'धात्दादेः ष सः' इति सत्वे 'लुङ्ला' इत्यडागमे लो ब्ले: सिचि स्तुसधूभ्यः परस्मैपदेषु' इति सिचः सस्य इटि 'अस्तिमिचोऽपृक्ते' इत्यनेन तिपस्तकारस्य ईटि 'इट ईटि' इति सलोपे 'सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु' इति वृद्धौ सवर्णदीर्षे 'असावीत्' इति । आत्मनेपदे गुण षत्वे ष्टुत्वे 'असोष्ट' इति । अचैषीत् (ई० ५२) चिधातोर्मुछि तिपि अडागमे तिप इकारलोपे लौ च्ले: सिचि सस्य इटि प्राप्ते 'एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्' इति निषेधे 'अस्तिसिचोऽपृक्त इति तस्य ईटि 'सिचि वृद्धिः' इति वृद्धौ सस्य षत्वे 'अवैषीत्' इति । दुधविथ (ई० ३७)-धू धातोलिटः सिपि थलि लिटि धातोः' इति द्वित्वे अभ्यासादिकार्ये 'दु धू थ' इति स्थिते 'स्वरतिसूति' इति चेटि 'सार्वधातुका- धातुकयोः' इति गुणै अवादेशे 'दुधविथ' इति । इडभावे गुणे 'दुधौथ इति । स्वादि-स्वादि-गणपठित धातुभोसे 'इनु' प्रत्यय हो, कर्थक सार्वधातुकके परे। स्तुसु-स्तु-सु-धू इन धातुओं से पर 'सिच्' को इट् हो, परस्मैपदके परे । दिमा--- अभ्याससे पर 'चि' धातु संबन्धी चकारको कुत्व हो, सन् और लिट के परे, विकल्पते । शर्पा-अभ्यासके शर् पूर्वक खयका शेष हो और अन्य हल्का लोप हो । ऋतश्च-- संयोगादि ऋदन्त धातुसे पर 'वि' और 'सिच'को इडागम को, 'त'के परे, विकल्पसे ।
तुदादिन] इन्दुमती टीकाहयोपेता। १२७ किति ७।२।११श्रिज एकाच उगन्ताच गिरिकतीरिण न स्यात् । परमपि स्वरत्या- दिविकल्पं बाधित्वा पुरस्तात्प्रतिषेधकाण्डारम्भसामादनेन निषेधे प्राप्ते कादिनि- यमानित्यमिद । दुधुविच । दुधुवे । अधावीत् । अधविष्ट-अधोष्ट | अधविष्यत्- माधोष्यत् । अधविष्यताम्-अधोष्यताम् । अधविष्यत-अधोष्यत ॥ ॥ इति स्वादिप्रकरणम् ॥ अथ तुदादिप्रकरणम् अथोभयपदिनः। तुद व्यथने । तुदादिभ्यः शः ३११ ७७तुदादिभ्यः शः स्यात्कथै सार्व- धातुके परे । शपोऽपवादः । तुदति । तुदते । तुतोद । तुतौदिया । तुतुदे। तोत्ता। अतौत्सीत् । अतुत्त। गुद प्रेरणे । नुइति । चुदते । नुनोद । नोत्ता । भ्रस्ज पाकै । अहिज्येति सम्प्रसारणम् । सस्य धुत्वेन शः । शस्य जश्त्वेन जः । भृजति । शृज्जते । भ्रस्जो रोपधयो रमन्यतरस्याम् ६।४।४७ भ्रजे रेफस्योपधायाश्च स्थाने रमागमो वा स्यादार्धधातुके। मित्वादन्त्यादचः परः । स्थानषष्ठीनिर्देशा- द्रोपधयोनिवृत्तिः । बभर्ज । बभर्जतुः । वर्जिय-वभ: । बभ्रन्ज । बभ्रज्जतुः । । अधावीत् (ई० ४६,४९)-'धूम्' धातौटुंङि लुस्थाने तिपि अडागमे तिष इकारलोपे च्लौ च्लेः सिचि ‘स्तुसुधूभ्यः परस्मैपदे' इति सिचः परत्वानित्यमिटि 'अस्तिसिचोऽपृक्त' इति तकारस्य ईटि 'इट ईटि' इति सलोपे 'सिचि वृद्धिः' इति वृद्धी आवादेशे सवर्णदोघे 'अधावीत्' इति । श्रात्मनेपदे तु लुङस्तादेशे अडागमे च्लौ च्ले सिचि स्वरत्यादिना विभाषया इटि गुणे अवादेश सिचः सस्य षत्वे ष्टुत्वे च कृते 'श्रधविष्ट' इति । इडभाचे 'अधोष्ट' इति । इति 'इन्दुमती'टीकायां स्वादिप्रकरणम् । -అంగం बभर्जिथ (ई० ३१ )-भ्रस्जधातोलिटि सिपि थलि लिटि धातो: श्रयुक-श्रि और एकाच उगन्त धातुओंसे पर गित्-कित् प्रत्ययको श्ट्र का आगम नहीं हो। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीका में स्वादिप्रकरण समाप्त हुआ। 60-800 तुदा-तुदादि गणपठित धातुओंसे 'श' प्रत्यय हो । अस्जो-ज' धातु के रेफ और APORN १२ लघुसिद्धान्तकौमुदी बभ्राज्जिय। कोरिति सलोपः । श्चेतिषः । बभ्रष्ट । बभर्जे-वत्रज्जे । भष्टी- भ्रष्टा । भदयति-प्रक्ष्यति । किजति रमागर्म बाधित्वा सम्प्रसारणं पूर्वविप्रति- धेन । भृज्ज्यात् । भृज्ज्यास्ताम् । भृज्ज्यासः । भीष्ट-भ्रक्षोष्ट । अभाीत्- अनाक्षीत् । अभट । भ्रष्ट। कृषविलेखने । कृषति । कृषते । बकर्ष । चणे अनुदात्तस्य चर्दुपयस्यान्यतरस्याम् ६।११५६/ उपदेशेऽनुदात्तो य ऋदुपधस्त- स्थाऽम्चा स्याज्मलादावकिति । कष्टा-कष्ट । कृक्षीष्ट । *स्पृशमशकषतृपहपा चले लिज्मा वाच्यः ! अकाक्षीत् अकाीत-अकृक्षत् । अकृष्ट । प्रकृक्षाताम् । अकृक्षत । क्सपो-अक्षत । आकृक्षातान् । अकृक्षन्त । मिल सङ्गमे । मिलति- मिलते । मिमेल । मेलिता । अमेलीत् । मुन्च्ल मोचने । शे मुचादीना ७ ॥१॥ इति द्वित्वे अभ्यासावे हलादिशेष अभ्यासभकारस्य बकारे 'नल्जी रोपध. योरमन्यतरस्याम्' इति रेफस्योपधाभूतस्य सकारस्य च स्थाने रमि प्राप्ते 'मिदचो. नत्यात्परः' इत्यन्त्याची भकारान्तर्गताऽकारात्परस्यैव रमागमे स्थानषष्ठीनिर्देशात रेफस्योपधाभुतस्य च निवृत्तौ 'एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्' इति इनिषेधे भारद्वाज- नियमाद् विकल्पेन इटि 'बिभाजिथ' इति । इडभावे द्वित्वादिकार्ये रमि रोपधयोश्च निवृत्तौ 'ब्रश्चभ्रस्ज' इति जस्य पत्वे टुत्वे 'वभष्ट' इति । रमभावपक्षे-'द्वित्वादिकार्ये कृते भारद्वाजनियमाद् विकल्पेनेटि सस्य श्चुत्वेन शत्वे सस्य जत्वे "बभ्रजिथ" इति रमभावे इडभावे च पते पूर्ववद् द्वित्वादिकार्थे 'स्कोः' इति सलोये 'बश्वप्रस्ज' इति जस्य षत्वे टुत्वे 'बभ्रष्ठ' इति । भृज्यात् ( ई० ४४,४५)-भ्रज्धातोराशीलिङि तिपि तिप इकारलोपे यासुटि 'भ्रस्जोरोपधयोः' इति रमागमं बाधित्वा पूर्वविप्रतिषेधेन पूर्व कित्त्वात् 'अहिज्या' इति सम्प्रसारणे पूर्वरूपे 'स्कोः' इति सकारस्य लोपे धातोस्सकारस्य श्रुत्वेन शकारे 'मलां जश् माशि' इति शस्य जत्वे 'भृज्ज्यात्' इति । ऋष्टा ( ई० २१, ५०) कृष्धातोर्चुटि तिपि तासिप्रत्यये तिपो डादेशे डित्व- सामर्थ्यांदभस्यापि टेर्लोपे 'अनुदात्तस्य' इति अमागमे यणि ष्टुत्वे 'कष्टा' इति । श्रमोऽभावे 'पुगन्त' इति गुणे ष्टुत्वे 'की' इति । उपधाके स्थान में 'रम्'का आगम हो, आर्धधातुकके परे, विकल्पसे । क्डिति-कित्-चित्र आर्धधातुकके परे रमागमको बाधकर पूर्वविप्रतिषेधेन सम्प्रसारण ही हो । अनुदा--उपदेशा- वस्थामें जो अनुदात्त ऋदुपध धातु, उसको अम् का आगम हो, कित भिन्न झलादिके परे । स्पृश-स्पृश्, मृश्, कृष्, तृप्, दृप् धातुओंसे पर च्छिको सिच् हो, विकल्पसे । शे मु- तुदादिन] V.IN.SAUTH इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। nar । । ५६ / मुच्-लिप्-विद्-लुप्-सिच्-कृत्-खिद्-पिशां नुम् स्यात् शे परे। मुञ्चति । मुञ्चते । मोक्ता । मोक्ता। मुच्यात्। मुक्षीष्ट । अमुचत् । अमुक्त। अमुक्षाताम् । लुप्त छेदने । लुम्पत्ति । लुम्पते । लोप्ता । अालुपत् । अलुप्त । विद्ल लाभे । विदन्ति । विन्दते। विवेद-वि विदे । व्याघ्रभूतिमते सेट् । वेदिता। भाष्यमतेऽनिट् । परि- वेत्ता । पिच क्षरण । सिञ्चति । सिञ्चते । लिपिसिचिह्नश्च ३।११५३ | एभ्य- श्च्लेरङ् स्यात् । असिचत् । आत्मनेपदेध्वन्यतरस्याम् ३।११५४। लिपिसिचिह्नः परस्य च्लेरङ वा ( स्यात् तडि । असिचत्, असिक्त । लिय उपदेहे । उपदेही वृद्धिः । लिम्पति । लिम्पते । लेप्ता । अलिपत् । अलिपत । अलिप्त । श्रथ परस्मैपदिनः। कृती छेदने। कृन्तति । चकर्त। कर्तिता। कतिष्यति-कस्यति । अक- तीत् । खिद परिघाते । खिन्दति । चिखेद । खेत्ता। पिश अवयवे। पिशति । पेशिता । ओख्रश्चूछेदने। वृश्चति । चत्रश्च । वश्चिथ, वज्रष्ठ । ब्रश्चिता-ब्रष्टा । प्रश्चिष्यति-वक्ष्यति । वृश्च्यात् । अवश्चीत्-श्रव्राक्षीत् । व्यच व्याजीकरणे। विचति । विव्याच । विचिचतुः । व्यचिता । व्यचिष्यति । विच्यात् । अव्य- चीत्-श्रव्याचीत् । व्यचेः कुटादित्वमनसीति तु नेह प्रवर्तते, अनसीति पर्युदा- सेन कृन्मात्रविषयत्वात् । उछि उञ्छे । उञ्छति । 'उञ्छः कणश श्रादानं कणिशाद्यर्जनं शिलम्' इति यादवः । ऋच्छ गतीन्द्रियप्रलयमूर्तिभावेषु । ऋच्छ- असिचत् (ई० ३१, ४९, ५७)-'षिच क्षरणे' अस्माद्धातोलुङि प्रथमपुरुषैक- बचने परस्मैपदे लुङस्तिपि अनुबन्धलोपे 'इतश्च' इति इकारलोपे 'धारचादेः षः सः' इति षस्य सत्वे 'लुङलङ्' इत्यडागमे अनुबन्धलोपे च्लो 'लिपिसिचिह्वश्च' इति च्लेरजि अनुबन्धलोपे डिवाद्गुणाऽभावे 'असिचत्' इति । व्यचेः कुटादित्वमिति-अयम्भावः 'व्यचेः कुटादित्वमनसि' इति व्यच्- धातोः कुटादित्वात् 'गाकुटादिभ्योऽजिणन्त्'ि इत्यनेन तासादे द्विद्भावे तस्मिन् परे व्यचो यकारस्य 'अहिज्ये त्यनेन सम्प्रसारणे लुटि 'विचिते'त्यादिः कथन्नेति चेन, अनसीति पर्युदासेन अस्भिन्नाऽस्सदृशस्य कृत्वेनैव तत्र ग्रहणात् । तथाच अस्भिन्नकृत्प्रत्यये परे एव तत्प्रवृत्तिरिति भावः । मुचादि धातुको नुमागम हो, 'श' प्रत्ययके परे । लिपि-लिप्, सिच् और वे धातुसे पर च्लिको अङ्ग हो । आत्मने-आत्मनेपदके परे लिप, सिच और हृञ् धातुसे पर च्लिको - -- । लघुसिद्धान्तकौमुदी ति । ऋच्छत्यतामिति गुणः । द्विहल्ग्रहणस्याऽनेकहलुपलक्षणत्वान्नुट् । श्रापर्छ । भानछेतुः । नच्छिता । उज्झ उत्सर्गे । उज्झति । लुम बिमोहने । लुभति । तोषसहलुभरुषरिषः ७ ॥ २ ॥ ४८। इच्छत्यादेः परस्य तारार्धधातुकल्येड्वा स्यात् । लोभिता-लोब्धा । लोमिष्यति । त तृप तृम्फ तृप्तौ । तृपति । ततर्प । तर्षि- ता। अतीत् । तृम्फति । शे तृम्फादीनां नुम्बाच्यः । श्रादिशब्दः प्रकारे । तेन येऽत्र नकारानुषक्तास्ते तृम्फादयः। ततृम्फ । तृपयात् । मृड पृड सुखने । मृडति । पृडति । शुन गतौ। शुनति । इषु इच्छायाम् । इच्छति । एषिता- एष्टा । ऐषिष्यति । इष्यात् । ऐषीत् । कुट कौटिल्ये । गाङ्कुटादीति ङित्त्वम् । चुकुटिय । चुकोट चुकुट । कुटिता । पुट संश्लेषणे । पुटति । पुटिता । स्फुट विक- सने । स्फुटति । स्फुटिता। स्फुर स्फुल सञ्चलने। स्फुरति । स्फुलति । स्फुरतिस्फुल- त्योनिनिविभ्यः ८३७६ षत्वं वा स्यात् । निःस्फुरति-निःष्फुरति । ए स्तवने । परिणतगुणोदयः । नुवति । नुनाव । नुविता । टुमस्जो शुद्धौ । मज्जति । ममज ! ममजिथ । मस्जिनशोरिति नुम् । मस्जेरन्त्यात्पूर्वो नुम्बाच्यः । संयोगादि- लोपः। समक्य । मला। मध्यति । अमाक्षीत् । श्रमाताम् । श्रमा- आनच्छ ( ई० ४० )-ऋच्छ्वातोटिस्तिपि गलि लिटि धातो रिति द्वित्वे अभ्याससंज्ञायाम् 'उरत्' इत्यभ्यासवर्णस्य अत्त्वे रपरत्वे 'हलादिः शेषः' इत्य- भ्यासरेफस्यच्छख्य च लोपे 'श्रत प्रादेः' इति दीर्घ 'तस्मान्नुड्डिहलाः' इति द्विहल- प्रहणस्याऽनेकहलुपलक्षणत्वान्नुटि 'ऋच्छ त्यताम्' इति गुणे रपरे 'भानछे' इति । तृम्फति---'तृम्फ' धातुरुपदेशे 'तृन्फ्' इति । तस्माल्लटि तिपि 'तुदादिभ्यः शः' इति शपं प्रबाध्य शप्रत्यये शस्याऽपित्त्वेन 'सार्वधातुकमपित्' इति ङित्त्वे 'नानि- दिताम्' इति नलोपे 'शे तृम्फादीनां नुम्वाच्यः' इति वार्तिकेन नुमि अनुबन्धलोपे श्रानुस्वारे परसवर्णे 'तृम्फति' इति । ममक्थ ( ई० ३१, ४६ )-- मज्धातोलिटि सिपि थलि अनुबन्धलोपे 'लिटि धातोरनभ्यासस्य इति द्वित्वे अभ्यासत्वे हलादिः शेषः इति हलादिः शेषे 'म मरज थ' इति भूते 'स्तोः श्चुना श्चुः' इति सस्य श्चुत्वेन शत्वे मला जश अक हो विकल्पसे । तीषसह-इए, सह , लुभ , रुष और रिष धातुओंसे पर तादि आर्धधातुकको विकल्पसे इट् हो। शे तृ-तृम्फादि धातुओंको नुमागम हो, 'श' प्रत्ययके परे । स्फुर-निर , नि और वि उपसर्गसे पर 'स्फुर' और 'स्फुल' धातुके सकारको पत्न हो, विकल्पसे । मस्जे--'मस्ज' धातुके अन्त्य ( जकार) से पूर्व नुम् हो । patsina ॥ - । तुदादिन] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १३१ अक्षुः । रुजो भङ्गे । रुजति । रोक्का । रोक्ष्यति । परीक्षीत् । भुजो कौटिल्ये । राजिवत् । विश प्रवेशने । विशति । मुश अामर्शने। भामर्शनं स्पर्शः। अनु- दात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम् । अनाक्षीत्-अमाीत्-अमृक्षत् । षद्ल विशरणगत्यवसादनेषु । सीदतीत्यादि । शद्लु शातने । शदेशिशतः २३.६०॥ शिद्भाविनोऽस्मात्तङानौ स्तः । शीयते । शीयताम् । अशीयत । शीयेत । शशाद । शत्ता । शत्स्यति । अशदत् । अशत्स्यत् । कृ विक्षेपे । ऋत इद्धातोः ७१।१००॥ ऋदन्तस्य धातोरङ्गस्य इत्स्यात् । किरति । चकार । चकरतुः। चकरः। करीना- करिता । कीर्यात् । किरतौ लवने श१४०।। उपात्किरतेः सुट् स्याच्छेदने । उप- स्किरति । अडभ्यासव्यवायेऽपि सुटकात् पूर्व इति वक्तव्यम् । उपास्किरत् । मशि' इति शस्य जश्त्वेन जत्वे 'ऋतो भारद्वाजस्य इति विभाषया इटि "ममज्जिय' इति । इडभावे तु 'मस्जिनशोमलि' इति सूत्रेण 'मस्जेरन्त्यात्पूर्वो नुम्बाच्यः' इति बार्तिकबलात् सकारात् परे नुमि स्कोः' इति सलोपे 'चोः कुः' इति जस्य कुत्वेन गत्वे 'खरि च' इति गस्य कत्वे नत्यानुस्वारे परसवर्णे 'ममथ' इति । अम्राक्षीत् ( ई० २०, ३१)—पृशधातो ङि लुङस्तिपि अटि च्लो 'स्पृश- मृशकृष' इति वार्तिकेन च्ले सिचि 'अनुदात्तस्य चर्दुपधल्यान्यत रस्याम्' इति विभा- षया श्रामि कारस्य यणि 'इतश्च' इति तिप इकारलोपे 'प्रश्चनरुज' इति शस्य षत्वे 'वदवजहलन्तस्याचः' इति वृद्धौ ‘षढोः कः सि' इति षस्य कत्वे सिचः सस्य पत्वे 'अस्तिसिचोऽपृक्ते' इति अपृक्तसंज्ञकस्य तस्य ईटि 'अम्राक्षीत्' इति । अमोऽभावे उक्तसूत्रेण च्ले सिचि ईटि 'वदबजेति वृद्धौ रपरत्वे 'वश्चेति षत्वे कत्वे सिचः सस्य च षत्वे 'अमाीत्' इति । सिजभावे तु 'शल इगुपधादनिटः क्स' इति च्ले: क्सादेशे 'वश्वेति षत्वे कत्वे सिचः सस्य च षत्वे कित्त्वावृद्धयभावे 'अमृक्षत्' इति । उपस्किरति (ई० २०,२१,४८) उपोपसर्गात् धातोर्लटि तिपि शे अनु- बन्धलोपे 'ऋत इद्धातोः' इति इत्वे रपरत्वे च कृते 'उप किरति' इति स्थिते 'किरती लवने' इति सुटि उटावितौ टित्वादाद्यावयवे 'उपस्किरति' इति । उपास्किरत् ( ई० ३७)-उपोपसर्गात् कृधातोर्लङस्तिपि शे 'लुङ्लङ' इत्य- डागमे तिप इकारलोपे 'ऋत इद्धातोः' इति इत्वे रपरत्वे 'अडभ्यासव्यवायेऽपि' 'सट शदेः शित:-शिद्भावी 'शद्' धातुसे 'तङ' और 'आन' हो । ऋत-(दीर्व) ऋदन्त धातुके अङ्ग (ऋ) को 'हत्त्व' हो । किरतौ--'उप' उपसर्गसे 'कृ' धातुको सुडागम हो, छेदन अर्थ में । अडभ्यासव्य-'अट्' और 'अभ्यास' के व्यवधानमें भी 'उप' से पर 'कृ' धातुको , ANDALATANAMAMATA लघुसिद्धान्तकौमुदी उपचस्कार । हिंसायां प्रतेश्च ६॥ १॥ १४१ ॥ उपात्ततेश्च किरते. सुट् स्याद्धि- सायाम्। उपस्किरति । प्रतिस्किरति । गनिगरणे । अचि विभाषा ८२॥२१॥ गिरते रेफस्य लो वा स्यादजादौ प्रत्यये । गिरति-गिलति । जगार-जगाल । जग. रिथ-जगलिथ । गरीता-गरिता । गलीता-गलिता। प्रच्छ शीघसायाम् । अहि ज्येति सम्प्रसारणम् । पृच्छति । प्रपच्छ । पप्रच्छतुः । पप्रच्छुः । प्रष्टा । प्रक्ष्यति । अप्राक्षीत् । मृङ प्राणत्यागे । म्रियतेलुंलिङोश्च ११३। ६११ लुब्लिकोः शितश्च प्रकृतिभूतान्मृडस्तङ् नान्यत्र । रिङ । इयङ् । म्रियते । ममार । मर्ता । मरि. ध्यति । मृषीष्ट । अमृत । पृङ व्यायामे । प्रायेणाऽयं व्यापूर्वः । व्याप्रियते । व्यापप्रे । व्यापप्राते । व्यापरिष्यते । व्यापृत । व्यापृषाताम् । जुषी प्रीतिसेव- नयोः । जुषते । जुजुषे । ओविजी भयचलनयोः। प्रायेणायमुत्पूर्वः । उद्विजते । विज इद् १।२। ६२ । विजः पर इडादिप्रत्ययो विद्वत्स्यात् । उद्विजिता । इति तुदादिप्रकरणम् ॥ MASTRANGE कात्पूर्वः इति बक्तव्यम्' इति ककारात्पूर्व सुटि सवर्णदीधै 'उपास्किरत्' इति । अप्राक्षीत् ( ई० ४५,५१)-'प्रच्छ्धातोर्तुलि प्रथमपुरुषैकवचने लुङस्तिपि 'लुङलङ' इत्यडागमे अनुबन्धलोपे 'इतच' इति तिप इकारलोपे लौ च्लेः सिचि इचि गते 'वश्वनस्जमृजमृजयजराजभ्राजश्छशा षः' इटि छस्य षत्वे 'पढीः कः सि?' इति षस्य कत्वे 'अस्तिसिचोऽपृत्ते' इति तस्य ईटि 'बदबजे ति वृद्धौ 'अप्राक्षीत् इति । उद्विजिता ( ई० २५, ३०, ४१) उत्पूर्वात् ओविजी भयचलनयोः इत्य- स्माद्धातोर्लुटि लुटस्तादेशे तासि प्रत्यये इडागमे तिपो डादेशे डित्त्वसामर्थ्यादभस्याफि टेलोपे 'विज इट्' इति ङित्त्वाद् गुणाऽभावे 'उद्विजिता' इति सिद्धम् । इति 'इन्दुमती' टीकायां तुदादिप्रकरणम् । सुट हो और वह 'सुट' ककारसे पूर्व हो-ऐसा कहना चाहिये । हिंसा-'उप' तथा 'प्रति उपसर्गसे पर 'कृ' धातुको 'सुद्' हो, हिंसा अर्थमें । अचि-गृ धातुके रेफको 'लव' हो, श्रजादि प्रत्ययके परे, विकल्पसे । नियते-लुङ, लिङ और 'शित्' प्रत्ययके प्रकृतिभूत 'मृङ' धातुसे ही 'त' तथा 'आन' ( आत्मनेपद) हो-अन्यत्र नहीं। विज इट-विज्' धातुसे पर इडादि प्रत्यय 'डिद्वत्' हो। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें तुदादिप्रकरण समाप्त हुआ।
H । অঙ্খ থাম্বিয়া तत्रीभयपदिनः रुधादिभ्यः श्नम् ३।१।७८ | शपोऽपवादः । रुणद्धि । श्नसोरल्लोपः अन्धः । सन्धन्ति । रुणत्सि । रुन्धः । रुन्ध । रुणधिम। रुन्धवः । रुन्धमः । रुन्धे झन्धाते । सन्धते । रुन्त्से । रुन्धाथे । सन्ध्ने । हन्धे । सन्धवहे । सन्ध्महे । सरोध- करुधे । रोद्धासि-रोद्धासे । रोत्स्यति-रोत्स्यते। रुणझु-रुन्धात् । रुन्धाम् । रुन्ध न्तु । सन्धि । रुणधानि । रुणधाव । झणधाम । रुन्धाम् । रुन्धाताम् । सन्धताम् हन्त्स्व । रुणधै। रुणधावहै । रुणधामहै। श्ररुणत्-अरुणद् । अरुन्धाम् । अरु न्धन् । अरुण:-अरुणत्-अरुणद् । अरुन्ध । अरुन्धाताम् । अरुन्धत । अरुन्धाः सन्ध्यात्-रुन्धीत । रुध्यात्-रुत्सीष्ट । अरुषत्-श्ररौत्सीत् । अरुद्ध । अझत्साताम् अरुत्सत । अरोत्स्यत्-अरोत्स्यत । भिदिर विदारणे । छिदिर द्वैधीकरणे । युजिर योगे । रिचिर विरेचने । रिणक्ति-रिङन्ते । रिरेच । रेक्ता । रेक्ष्यति। अरिणक अरिचत्-अरैक्षीत् । अरिक्त । विचिर पृथग्भाचे । विनक्ति-विक्ते । क्षुदिर सम्पेषणे । क्षुणत्ति-चन्ते । क्षोत्ता । अक्षुदत्-अक्षौत्सीत्-अक्षुत्त । उबृदिर दीप्ति देवनयोः। मृणत्ति-कृन्ते । चच्छर्द । सेऽसिचीति बेट् । चच्छृदिधे-बच्छ्रुत्से । छर्दिष्यति-छत्य॑ति । अच्छृदत्-अच्छर्दीत् । अच्छर्दिष्ट । अच्छर्दिष्यत् । उत्त दिर् हिंसानादरयोः । तृणत्ति-तृन्ते । श्रथ परस्मैपदिनः। कृती बेष्टने । कृणत्ति । तृह हिसि हिंसायाम् । तृणह इम् ७३।६२। तृहः रुन्धः ( ई० ४६)-रुध्यातोल्टस्तसि शपभपजाद्य श्नमि ‘श्नसोरल्लोपः' इति श्नमो नकारान्तर्गताकारस्य लोपे 'भषस्तथोोऽधः' इति तसस्तकारस्य धत्वे "मरो भरि सवर्णे' इति धातोर्धस्य लोपे सस्य रुत्वे विसर्गे 'सन्धः' इति । तृणेढि (ई० ३७, ४१, ४७ )-'तृह् हिंसायाम्' इत्यस्माद्धातोर्लटस्तिपि शपमपवाद्य श्नमि अनुबन्धलोपे प्रवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम्' इति श्नमो नस्य णत्वे 'तृण ति' इति स्थिते 'तृणह इम्' इति इमि अनुबन्धलोपे 'तृण इ ह ति' इति दशा- याम् आद्गुणः' इति गुरो हो ढा' इति हस्य ढवे 'भषस्तथो?ऽधः' इति तिपस्तकारस्थ रुधादि-रुधादि गणपठित धातुओं से 'इनम्' प्रत्यय हो, कर्थक सावधातुकके परे तृणः --'तृह' धातुसे 'रनम्' करने पर इमागम हो, हलादि 'पित्के परे ।
NARDANA MINGE09 ALLPANDHय গুখ লাগিয়া तन्त्रीमयपदिनः । तनु विस्तारे । तनादिकृस्य : ३१ । ७६ | तनादेः अञ्च उप्रत्ययः स्यात्कथं सार्चधातुके परे । शपोऽपत्रादः । तनोति-तनुते । ततान-तेने । तनितासि-तनितासे । तनिष्यति-तनिष्यते । तनोतु-तनुताम् । अतनोत-- नुत । तनुयात-तन्वीत । तन्यात्-तनिषीष्ट । श्रतानीत्-अतनीत् । तनादिभ्य- स्तथासोः २।४।७६/ तनादेः सिचो वा लुक् स्यात्तथासोः । अतत-अतनिष्ट । अतथा:-अतनिष्टाः । अतनिध्यत्-अतनिष्यत । घणु दाने । सनीति- सनुते । ये विभाषा ६४,४३ जनसनखनामात्त्वं चा स्याद्यादौ किति । सायात-सन्यात् । जनसनखना सझलोः ६॥४२एषामाकारोऽन्तादेशः स्यात् सनि फलादौ विङति । असात--असनिष्ट । असाथाः-असनिष्ठाः। क्षणु हिंसायाम् । क्षणोति- अतानीत् ( ई० ४६)-'तनु विस्तारे' अस्माद्धातोलुङि तिपि लुङ्लङ इत्य- डागमे तिप इकारलोपे लौ च्ले: सिचि सस्य इटि अस्तिसिचोऽपृक्ते' इति तस्य च ईटि 'इट ईटि' इति सलोपे सवर्णदी 'अती हलादेर्लघोः' इति बृद्धौ ‘श्रतानीत्' इति वृध्यभावे 'अतनीत्' इति । आत्मनेपदे तु-लुङः स्थाने तादेशे अडागमे अनुबन्ध- लोपे च्लो ठले सिचि तनादिभ्यस्तथासोः' इति विभाषया सिची लुकि अनुदात्तो- पदेश इत्यनुनासिकनकारस्य लोपे 'श्रतत' इति । सिज्लोपाभाव सिचः सकारस्य इटि षत्वे ष्टुत्वे 'अतनिष्ट' इति । असात ( ई० २२)-उकारेत्संज्ञक 'षणु दाने' इत्यस्माद्धातो डि 'धात्वादेः धः सः' इति सत्वे निमित्ताऽपाये इति परिभाषया णत्वस्यापि निवृत्तौ लुङस्तादेशे अटि च्लो च्ले सिचि 'तनादिभ्यस्तथासोः' इति सिची लोपे 'जनसनखनां समलोः' इत्यनेन 'अलोन्त्यस्येति सहकारेण नस्यात्वे सवर्णदीचे 'असात' इति । तनादि-तनादिगण पठित धातु और कृष धातुसे 'उ' प्रत्यय हो, कर्थक सार्वधातुकके परे। नोट:-तनादि कहनेसे 'कृ' धातुका भी ग्रहण होता ही फिर 'कृ' का पृथक् उपा- दान क्यों किया गया, इससे सिद्ध होता है कि 'गणकार्यमनित्यम् --गणकार्य अनित्य है। तना-तनादिसे पर 'सिच'का लुक ( लोप) हो 'त' और 'थास' के परे, विकल्पसे । येविभा-जन , सन् और खन् धातुको आत्त्व हो, यकराादि कित्-लित् के परे, विकल्पसे । जनसन-जन् । सन् और खन् धातुको अकारान्त आदेश हो, झलादि 'सन्' और झलादि randu HamaateREPARAPareECAMESELEME करिष्यति-करिष्यते । करोतु । कुरुताम् । अकरोत्-अकुरुत । ये चार तनादिन] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता क्षणुते । हायन्तेति न वृद्धिः। अक्षणीत-अक्षत-अक्षणिष्ट । अक्षथा:-अक्षणिष्टाः क्षिणु च । उप्रत्यये लघूपधस्य गुणो वा । क्षेणोति-क्षिणोति। क्षेणिता। अक्षणीत्- अक्षित-अक्षेणिष्ट । तृणु अदने । तृणोति-तर्णोति । तृणुते-तणुते । डुकृञ् करणे । करोति । अत उत्सार्वधातुके क्षा४।११० उप्रत्ययान्तस्य कृषोऽकारस्य उः स्यात् । कुरुतः । न भकुर्छराम् = | २! ७६/ रेफवान्तस्य भस्य कुर्छरोश्वोपधाया दी? न स्यात् । कुर्वन्ति । नित्यं करोतेः ६।४।१० करोतेः प्रत्ययोकारस्य नित्यं लोपः स्यान्म्वोः परयोः । कुर्वः। कुर्मः । कुरुते । वकार-चक्रे । कर्तासि । कर्तासे । कृज उलोपः स्याद्यादौ प्रत्यये। कुर्यात्-कुर्वीत । क्रियात्-कृषीष्ट । अका- पत्-िअकृत । अकरिष्यत्-श्राकरिष्यत । सम्परिभ्यां करोती भूषणे ६।१ । १३७ । समायेच.६।१। १३८ । सम्परिपूर्वस्य करोतेः सुट् स्यात् भूषणे सङ्घात बार्थे । संस्करोति । अलङ्करोतीत्यर्थः । संस्कुर्वन्ति । सङ्घीभवन्ती- कुर्वन्ति (ई० ३८, ४५, ४८, ५२ )--'डुकृञ् करणे' इत्यस्माद्धातोर्लटि तत्स्थाने को मस्य अन्तादेशे शएं प्रवाध्य 'तनादिकुभ्यः उ.' इत्युप्रत्यये 'कृ उ अन्ति' इति जाते 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' इति गुणे रपरत्वे 'क रु अन्ति' इति भूते 'अत उत्सार्वधातुके' इति कृओऽकारस्य उत्त्वे 'इको यणचि' इत्युप्रत्ययसम्बन्धिन उकारस्य यणि 'हलि च' इति प्राप्ते 'न भकुछुराम्' इति निषेधे 'कुर्वन्ति' इति । कुर्वीत ( ई० ३६ )-कृञ्धातोविधिलिङि लिङः स्थाने आत्मनेपदतादेशे शपं प्रबाध्य 'तनादिभ्य उः' इत्युप्रत्यये गुणे रपरत्वे 'करु त' इति स्थिते 'प्रत उत्सार्वधातुके' इति उत्त्वे "लिङः सीयुट्' इति सीयुटि उटि गते 'लोपो व्योलि' इति यलोपे 'लिङः सलोप' इति सलोपे यणि 'कुर्वीत'। अकार्षीत् (ई० ५१)-कृधातोर्लुस्तिपि 'लुङ्लङ' इत्यडागमे अनुबन्ध- लोपे 'इतश्च' इति तिप इकारलो च्लौ च्लेः सिचि इचि गते सस्यार्धधातुकत्वादिटि प्राप्ते 'एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्' इति निषेधे 'अस्तिसिचोऽपृक्ते' इति तस्य ईटि 'सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु' इति वृद्धौ षत्वे 'अकार्षीत्' इति । कित्-ङित् प्रत्ययके परे । अत -उ प्रत्ययान्त कृ धातुके अकारको उकार हो, कित-लित सार्वधातुकके परे । न भकु-रेफान्त वान्त भसंशक और 'कुर, छुर'की उपधाको दीर्घ नहीं हो। नित्यं-'कृ' धातुके प्रत्ययसम्बन्धी उकारका लोप हो, मकार-वकारादि प्रत्ययके परे। ये च-कृञ् धातुके उकारका लोप हो, यकारादि प्रत्ययके परे । संपरि-सम्' और .. m १३८ लघुसिद्धान्तकौमुदी त्यर्थः । सम्पूर्वस्य क्वचिदभूषणेऽपि सुट "संस्कृतं भक्षा' इति ज्ञापनात् । उपात्प्रतियत्नवैकृतवाक्याच्याहारेषु च ६।१।१३६ । उपात्कृत्रः सुद स्थादेवर्थेषु, चात्मागुक्तयोरर्थयोः । प्रतियत्नो गुणाऽऽधानम् । विकृतमेव वैकृत-विकारः । वाक्याध्याहारः-श्राकाक्षितैकदेशपूरणम् । उपस्कृता कन्या । उपस्कृता ब्राह्मणाः । एधोदकस्योपस्कुरुते । उपस्कृतं भुङ्क्ते । उपस्कृतं ब्रूते । वनु याचने । वनुते । बचने । मनु अवबोधने । मनुते । मेने । मनिता। मनिध्यते । मनुताम् । श्रमनुत । मन्धीत । मनिषीष्ट । अमत-अमनिष्ट । श्रमनिष्यत । ॥ इति तनादिप्रकरणम् ॥ - শুঙ্গ গান্তি (डुक्री द्रव्यविनिमये। प्रथादिभ्यः श्ना ३१११। एभ्यः श्ना स्यात्कर्थे सार्वधातु के परे । शपोऽपवादः । क्रीणाति । ईहल्यघोः । ऋीणीतः। श्नाभ्य- स्तयोरातः । क्रीणन्ति । कोणासि । क्रीणीथः। झीणीय । क्रीणामि । क्रीणीवः । कीणीमः । कोणीते । क्रोणाते । क्रीणते। वीणीषे । क्रीणाथे। कीणीचे । क्रीरो कीणीवहे । क्रीणीमहे । चिनाय । चिक्रियतुः। चिक्रियुः । चिनायिथ-चिन्नेथ । चिकिये। क्रेता। क्रेभ्यति ध्यते। मीणातु-कीणीतात् । वीणाताम् । अक्रोणात्- अत्रीणीत । क्रीणीयात्-प्रीणीत । क्रीयात्-ऋषीष्ट । अकषीत्-अष्ट। अकेष्यत्- अक्रेप्यत । प्रीव तर्पणे कान्तौ च । प्रीणाति-प्रोणीते । श्री पाके । श्रीणाति- उपस्कृतं ब्रूते (ई० २१) अत्र 'उपात्प्रतियत्ने ति सूत्रेण वाक्याध्याहारार्थे सुट् । वाक्याध्याहारेण ब्रूते इत्यर्थः । 'एधोदकस्योपस्कुरुते' इत्यत्र तु प्रतियस्नेर्थे सुड् भवति । प्रतियत्नः = गुणाधानमिति मूले स्पष्टम् । इति 'इन्दुमती'टीकायां तनादिप्रकरणम् । 'परि' पूर्वक 'कृ' धातुको 'लुट' हो, भूषण और संघात अर्थमें । उपात्-'उप' उपसर्गसे पर 'कृ' धातुको 'सुट' हो, प्रतियत्नादि अर्थ में, चकारात् भूषण और संघात अर्थमें । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीका में तनादिप्रकरण समास हुआ। ऋयादि-ऋयादिगणपठित धातुओंसे 'इना' प्रत्यय हो, कर्थक सार्वधातुकके परे ।
- se ऋयादिप्र०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १३६ श्रीणीते । सीज हिंसायाम् । हिनुमीना ८।४।१५। उपसर्गस्थानिमित्तात्परस्यै- तयोर्नस्य णः स्यात् । प्रमीणाति-प्रमीणीते । मीनातीत्यात्वम् । ममौ । मिम्यतुः । ममिथ-ममाथ । मिथ्ये । माता । मास्यति-भास्यते । मीयात्-मासीष्ट । अमासीत् । अमास्त । षिय बन्धने । सिनाति। सिनीते। सिषाय-सिध्ये । सेता। स्व. आप्लवने। स्तन्मु-स्तुन्भु-स्कन्भु-स्कुन्भु-स्कुल्यः श्नुन्ध १३शश एभ्यः श्नुः स्यातू , चात् शना । स्कुनीति-स्कुनाति । स्कुनुते स्कुनीते। चुल्काव । चुस्कुवे । स्कोता। अरूकौषीत्-अरकोष्ट । स्तनस्वादयश्चत्वारः सौत्राः । सर्व रोधनार्थाः परस्मैपदिनः । हलः शन्तः शानज्झौ ३११८३॥ हलः परस्य श्नः शानजादेशः याद्धौ परे । स्तभान । जु-स्तन्भु-शुचु-लुचु-युचु-ग्लुचु- ग्लुक्चु-श्विभ्यश्च ३३१।५८ एभ्यश्च्लेरङ वा स्यात् । स्तन्भेः ८ ! ३ १६७ ॥ स्तन्भः सौत्रस्य सस्य षः स्यात् । व्यष्टभत्-अस्तम्भीत् । युष बन्धने । प्रमीणीते (ई० ३७)-प्रोपसर्गात् 'मी हिंसायाम्' इति धातोर्लटि तत्स्थाने श्रात्मनेपदे तप्रत्यये टेरेत्वे शपं प्रबाध्य कथादिभ्यः श्ना' इति श्नाप्रत्यये अनु- बन्धलोपे 'हिनुमीना' इत्यनेन णत्वे 'ई हल्योः' इति ईत्त्वे 'प्रमीणीते' इति जातम् । स्तभान (ई० २९, ३०, ३५, ५१)-उकारेत्संज्ञक-रोधनार्थक-स्तन्म- धातुः सौत्रः । तरमाल्लोटि तत्स्थाने लिपि सिपः सार्वधातुकत्वात् शपि प्राप्ते तमपनाद्य 'स्तन्मुस्तुन्भु--' इत्यादिसूत्रेण चकारात् श्नाप्रत्यये अनुबन्धलोये सेह्या- देशे स्तन्म ना हि' इति स्थिते 'हलः श्नः शानज्मो' इति नाशब्दस्य शानजादेशे अनुबन्धलोपे शित्त्वात्सार्वधातुकत्वेन 'सार्वधातुकमपित्' इति ङित्त्वे सति 'अनि- दिताम्-' इति धातोर्नस्य लोपे 'अतो हेः' इति हेलुकि स्तभान' इति जातम् । व्यष्टभत् ( ई० ३३, ४९)-चिपूर्वकात् 'स्तन्म' धातोलुङि तिपि अडागमे अनुबन्धलोपे तिप इकारलोपे चलौ च्ले सिचि प्राप्ते तम्प्रबाध्य 'जस्तन्भु चु- इत्यादिना अङि अनुबन्धलोपे 'विन स्तन्म अत्' इति जाते यणि 'अनिदिताम्-' हिनुमीना-उपसर्गस्थ निमित्त ( रेफ षकार ) से पर हिनु और मीनाके नकारको णकार हो । स्तन्मुस्तन्भ्वादि धातुओंसे 'इनु' प्रत्यय हो, चकारात्-श्ना' प्रत्यय भी हो । हला--'हल' से पर इना' के स्थानमें 'शानच् आदेश हो, 'हि' के परे। जस्तन्भु-ज' आदि धातुओं से पर 'फिल' को 'अडा आदेश हो, विकल्पसे । स्तन्मे:-सूत्रपठित स्तन्म धातुके सकारको षकार हो।
। लघुसिद्धान्तकौमुदी युनाति-युनीते। योता ॥ क्नू शब्दे । क्नूनाति । क्नूनीते। क्नविता ॥ दूज हिंसायाम् । दूणाति - द्रूगीते ॥ ६ विदारणे । कृणाति-वृणीते ॥ पूज् पचने । वादीनां स्वः ७३८० पू लू स्तृा कृञ् धू-शु-पृवृभू-मृ दृ----- ऋ-गृ-ज्या-री-ली-ब्ली-प्लीनां चतुर्विंशतः शिति ह्रस्वः स्यात् । पुनाति पुनीते ! पविता । लू छेदने । लुनाति-लुनीते । स्तृञ् आच्छादने । स्तृणाति । शपूर्वाः खयः । तस्तार । तस्तरतुः । तस्तरुः । तस्तरे। स्तरीता-स्तरिता । स्तृणीयात् । स्तृणीत । स्तीर्यात् । लिङ्लिचोरात्मनेपदेषु ७।२।४२ । वृवृञ्भ्यामृदन्ताच्च परयोलिसिचोरिड्वा स्यात्तङि । न लिङि ७/२॥ ३६ । वृत इटो लिङि न दीर्घः । स्तरिषीष्ट । उश्चेति कित्वम् । स्तीषर्षीष्ट । सिंचि च परस्मैपदेषु । श्रस्तारीत् । अस्तारिष्टाम् । अस्तारिषुः। अस्तरीष्ट-अस्तरिष्ट-अस्ती: । कृञ् हिंसायाम् । कृणाति-कृणीते । चकार-बकरे । वृञ् बरणे । वृणाति-वृणीते ! वधार-ववरे । बरिता-वरीता । उदोष्ठयेत्युत्त्वम् । वुर्यात् । वरिषीष्ट-चूर्षीष्ट । अवारीत् । अवा- रिष्टाम् । अवरिष्ट-अधरीष्ट-अचूट । धूम कम्पने । धुनाति-धुनीते । धविता-धोता । इति नलोपे स्तन्भेः' इति सस्य षत्वे ष्टुत्वे 'व्यष्टभत्' इति । अङोऽभावे च्लेः सिचि इचि गते 'वि अस्तन्भ् स् त' इति स्थिते यणि सस्य इटि 'अस्तिसिचोऽपृक्तो' इति तस्य च ईटि अनुबन्धलोपे 'इट ईटि' इति सलोपे सवर्णदीर्घ स्तन्भैः' इति सस्य षत्वे ष्टुत्वे नस्यानुस्वारे परसवर्णे 'व्यष्टम्भीत्' इति च भवति । मूले तु अङभावे 'अस्तम्भीत्' इत्युक्तम् । अत्र 'स्तन्भेः' इति षत्वन्तु न उपसर्गादिणः परस्थैव स्तन्भेः सस्य षः स्यादित्यर्थात् । स्तरिषीष्ट (ई० ५६)-स्तृधातोराशीलिङि लिङः स्थाने आत्मनेपदे तप्रत्यये 'लिङः सीयुट्' इति सीयुटि उटावितौ 'लोपो व्योवलि' इति यलोपे 'स्तृसी त' इति स्थिते 'सुत्तिथोः' इति सुटि उटि गते 'लिसिचावात्मनेपदेषु' इति विभाषया इटि अनुबन्धलोपे 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' इति गुणे रपरत्वे 'स्तरि सी स्त' इति जाते 'वृतो वा' इति इटो दीर्घ प्राप्ते 'न लिङि' इति निषेधे उभयोः सकारयोः षत्वे तृत्वे 'स्तरिषीष्ट' इति जातम् । इडभावे तु 'उच' इति कित्वाद् गुणाभावे नत इद्धातोः' इति इत्त्वे रपरत्वे 'हलि च' इति दीर्धे 'स्तीर्षीष्ट' इति । अन्यत्कार्य तु पूर्चवदेव बोध्यम् । प्वादी-पूजादि धातुओंको हस्व हो, 'शित्' प्रत्ययकै परे । लिङ्-वृङ, वृज और ऋदन्त धातुओंसे पर लिङ, सिच् को इटका आगम हो त? परे विकल्पसे । न लिङि-वृङ, वृन क्रयादिन] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। अधावीत् । अधविष्ट-अधोष्ट । ग्रह उपादने । गृह्णाति । गृह्णीते । जग्राह । जगृहे ! अहोऽलिटि दीर्घः ७/२। ३७ एकाचो प्रहेविहितस्येटो दीर्थो न तु लिटि । ग्रही- ता। गृह्णातु । हलः श्नः शानज्माविति श्न: शानजादेशः। गृहाण | गृह्यात् । प्रहीषीष्ट । म यन्तेतिन वृद्धिः । अनहीत् । अग्रहीष्टाम् । अग्रहीष्ट । अग्रही- घाताम् ॥ अथ परस्मैपदिनः। कुष निष्कर्षे। कुष्णाति । कोषिता। अश-भोजने । अश्नाति । आश अशिता। अशिष्यति । अश्नातु । अशान । मुष स्तेये। मोषिता । मुषाण । ज्ञा अवबोधने । जज्ञो। अथाऽऽत्मनेपदिनः । वृङ सम्भक्तौ । वृणीते। ववे । वरिता-वरीता । अवरीष्ट-अवरिष्ट-अवृत । ॥ इति क्रयादिप्रकरणम् ॥ Prem Raate POSEROAPRIMAR ग्रहीता (ई० ४२, ५०, ५७)--ग्रवातो टि तिपि तासिप्रत्यये तिपो डादेशे अनुबन्धलोपे डित्त्वसामर्थ्यादभस्यापि टेलोपे 'आर्धधातुकस्येड्वलादेः' इति इटि अनुबन्धलोपे 'ग्रहोऽलिटि' इति इटो दीर्घ 'प्रहीता' इति । गृहाण (ई० २३, ३५, ३६, ४१, ५२, ५३)-ग्रधातोर्लोटि मध्यमपुरुषैक- वचने सिपि अनुबन्धलोपे 'सेयपिच्छ' इति सेादेशे शपमपवाद्य 'क्रयादिभ्यः श्ना' इति श्नाप्रत्यये अनुबन्धलोपे शित्त्वात्सार्वधातुकत्वे 'सार्वधातुकमपित्' इति ङित्त्वे 'अहिज्येति सम्प्रसारणे पूर्वरूपे 'हलः श्नः शानज्मो' इति श्नः शानजादेशे शस्ये- त्संज्ञायां लोपे च विहिते नस्य णत्वे 'श्रतो हेः' इति हेलुकि 'गृहाण' इति जातम् । इति 'इन्दुमती'टीकायां क्रयादिप्रकरणम् । और ऋदन्त धातुओंके इटको दीर्घ नहीं हो, लिके परे । ग्रहोलिटि-एकाच 'ग्रह धातुसे विहित 'इट' को दीर्घ हो, 'लिट में छोड़कर । अश्नाति-'शात्' इस सूत्रसे यहां श्चुत्वका निषेध होता है । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीका में क्रयादिप्रकरण समाप्त हुआ। - ना Ve । অন্ধ হলাম 7 स्वतन्त्रः कर्ता ११।४५ क्रियायां स्वातन्त्र्येण विवक्षितोऽर्थः कर्ता स्यात् । तत्प्रयोजको हेतुश्च । ४। ५५! कर्तुः प्रयोजको हेतुसंशः कर्तृसंज्ञश्च स्यात् । हेतु- मति च ३३११२६।। प्रयोजकव्यापार प्रेषणादौ वाच्ये धातोर्णिच "स्यात् । भवन्तं प्रेरयति-भावयति । ओः पुयएज्यपरे ७४.८० सनि परे यदङ्ग तदवयवाभ्या- सोकारस्य इत्स्यात् पवनयाजकारेव्ववर्णपने परतः। श्रबीभवत् । ष्ठा गतिनि- वृत्तौ । अतिहीब्लीरीक्तूयीक्ष्माययातां पुणौ । ३।३६ स्थापयति । तिष्ठ- तेरित ७४।५ उपधाया इदादेशः स्याच्चङ परे णौ। अतिष्ठिपत् । घट चेष्टा- अबीभवत् ( ई० ४६, ५२, ५४, ५७ )-भूधातोः 'हेतुमति च" इति हेत्वर्थे णिचि णिच्यच आदेशो न द्वित्वे कर्तव्ये' इति निषेधात् पूर्व वृद्धयभावे धातुत्वाल्लुङस्तिपि अनुबन्धलोपे तिप इकार लोपे च कृते 'लुङलब्' इत्यटि च्लो 'णिश्रिद्गुसुभ्यः कर्तरि चङ्' इति उल्लेश्वङि अनुबन्धलोपे 'गैरनिटि' इति णिलोपे 'चाहि' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे ह्रस्वे 'अभ्यासे चर्च' इति जश्त्वे 'श्र बुभु अत्' इति दशायां प्रत्ययलक्षणेन वृद्धौ श्रावादेशे ‘णौ चड्युपधाया हस्वः' इत्युपधाया हस्के 'सन्चल्लघुनि चङपरेऽग्नलोपे' इति सन्बद्भावे 'श्रोः पुयण्ज्यपरे इत्यभ्यासोकार- स्य इत्वे 'दी? लघोः' इति दीर्घ उक्तं रूपं सिद्धम् । अतिष्टिपत् ( ई० ४४,४५,४८,५६ )-'ठा गतिनिवृत्तौ' इति धातुः, अन्न 'धात्वादेः षः सः' इति घस्य सत्वे ष्टुत्वनिवृत्तौ 'स्था' इति । तस्मात् हेतुमति च' इति णिचि 'अर्तिहीन्लीरीक्नूयीचमाय्यातां पुरु णौ' इति पुकि उकि गते धातुत्वा- ल्लुङस्तिपि अटि अनुबन्धलोपे तिप इकारलोपे च कृते च्लो 'णिश्रिनुनुभ्यः' इतिः च्लेवकि णिच्यच आदेशो न द्वित्वे कर्तव्ये' इति निषेधात् इत्वाऽपेक्षया पूर्व द्वित्त्वे अभ्यासत्वे 'शपूर्वाः खयः' इति सलोपे अभ्यासहस्व 'अभ्यासे चर्च' इति चत्वे स्वतन्त्र-क्रियामें स्वातन्त्र्येण विवक्षित जो अर्थ वह कर्तृसंशक हो । (कारक देखें) तत्प्रयोकर्ताका प्रयोजक हेतु संज्ञक और 'क'संशक हो। हेतु-प्रयोजकका प्रेर गादि व्यापार वाच्य रहने पर धातुसे 'णिच' प्रत्यय हो । ओः पु-सन्' परक जो अंग, तदवयव जो अभ्यासावयव उकार, उसको इत्त्व हो, अवर्णपरक पवर्ग, यण और जकारके परे । भर्ति-, ही, ली, री, नूयी, दमायी और आदन्त धातुको 'पुक' का आगम हो, 'fण' के परे । तिह-'स्था' धातुकी उपधाको 'इत्त्व' हो, चपरक 'णि' के परे ।
J इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। थाम् । मितां इस्वः ६.४ १२ घटादीनां झपादीनां चौपधाया हरवः स्याण्णौ । घटयति । वप ज्ञाने ज्ञापने च । ज्ञपयति । अजिज्ञपत् । ॥ इति ण्यन्तप्रकरणम् ॥ अथ सन्नन्तप्रकरणम् धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायांवा ३११७। इषिकर्मण इषिणैक- कर्तृकाद्धातोः सन्प्रत्ययो वा स्यादिच्छायाम् । पठ व्यक्तायां वाचि । सन्यडोः 'श्रत स्थाप् इ अत्' इति स्थिते 'णी चड्युपधाया हस्वः' इत्युपधाहस्व और- निटि' इति णिलोपे 'सन्वल्लघुनि चपरेऽनग्लोपे' इति सन्वद्भावे 'सन्यतः' इति इत्ने षत्वे ष्टुत्वे तिष्ठतेरित्' इतीत्वे 'अतिष्ठिपत्' इति सिद्धम् । अजिज्ञपत् ( ई० २४ ) ज्ञपधातोः हेत्वर्थे णिचि धातुत्वाल्लुङस्तिपि अटि अनुबन्धलोपे तिय इकारलोपे च्लो च्लेश्वङि 'चलि' इति द्वित्वे अभ्यासकार्ये उपधावृद्धौ हस्वे णिलोपे सन्वद्भावे 'सन्यतः' इतीत्वे 'अजिज्ञपत्' इति जातम् । इति 'इन्दुमती'टीकायां ण्यन्तप्रकरणम् । धातोः-इच्छासमानकर्तृकत्वे सति इच्छाकर्मीभूतो यो व्यापारः तद्वाचकाइ धातोः इच्छायां सन् वा स्यादिति फलितार्थः । भाषार्थ:- :-इष् धातुका जो कर्म तद्बोधक और इष् धातुके समानकर्तृक अर्थात् मिता--घटादि और ज्ञपादि धातुओंकी उपधाको हस्व हो, णिके परे। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें ण्यन्तप्रकरण समाठ हुआ। सन्यो:-सन्नन्त तथा यन्त धातुके प्रथम एकाचको और अजादि भातुके द्वितीय एकाचको द्वित्व हो। नोट:-शैषिक प्रत्ययान्तले पुनः सरूप शैधिक प्रत्यय नहीं ही और भत्वीय-मतु- पादि, प्रात्ययान्तसे भी सरूप मत्वर्थीय प्रत्यय नहीं हो तथा सन्नन्तसे पुनः सन् प्रत्यय नहीं हो। कहा भी है:- शाधिकान् मतुबर्थीयाच्छैषिको मतुर्थिकः । सरूपः प्रत्ययो नेष्टः, समन्तान सनिष्यते ॥ PERHOSHANE लघुसिद्धान्तकौमुदी ६।१६। सन्नन्तस्य यन्तस्य च धातोरनभ्यासस्य प्रथमस्येकाचो द्वे स्तोऽजादेस्तु द्वितीयस्य । सन्यतः। पठितुमिच्छति पिपठिषति । कर्मणः किम् ? गलनेनेच्छति । समानकर्तृकात् किम् ? शिष्याः पठन्त्वितीच्छति शुरुः । वा प्रहणाद्वाक्यमपि । लुङ्सनोर्घस्ल । सः स्वार्धधातुके ७।४।४६ । सस्य तः स्यात्सादावार्धधातुके । अत्तुमिच्छति जिघत्सति । 'एकाच' इति नेट । अज्झनगमां सनि ६।४। १६ । अजन्तानां हन्तेरजादेशःश्च दी? भलादौ सनि । इको मल शरा! इगन्ता- मा सी वृत्त धाई "णि 'चा इष् धातुका जो कर्ता वही कर्ता हो जिसका ऐसे धातुसे इच्छा अर्थमें सन् प्रत्यय हो, विकल्पसे । जैसे रामः पठितुमिच्छति-पिपठिषति'। यहाँ इष् धातुका कर्ता राम है और वही राम पठ् धातु ( पठितुम् ) का भी कर्ता है तथा इष् धातुका पठ् धातु (पठितुम् ) कर्म भी है इसलिये पठ् धातु से सन् प्रत्यय हुआ। पिपठिषति (ई० ३२, ३८, ४२ )-पठ्धातोरिच्छार्थे 'धातोः कर्मणः समा- नकर्तृकादिच्छायां वा' इति सनि इटि अनुबन्धलोपे 'सन्योः' इति द्वित्वे अभ्या- सत्वे हलादिशेषे 'सन्यतः' इतीत्वे पत्वे 'सनाद्यन्ता धातवः' इति धातुत्वाल्लटि तिपि शपि अनुबन्धलोपे 'श्रतो गुणे' इति पररूपे उक्तं रूपं सिद्धम् । (१ पिपठिषति २ पिपठिषाञ्चकार २ पिपठिषिता ४ पिपठिषिष्यति ।) जिघत्सति (ई० ३४, ३६, ४४, ४६, ५४, ५६ )-अत्तमिच्छतीत्यर्थे 'अद्' धातोः 'धातोः कर्मणः-' इति सनि 'लुङ्सनोर्घस्लू' इति अदो घस्लादेशे अनु- बन्धलोपे 'एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्' इति इटो निषेधे 'सन्यडोः' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे 'हलादिः शेषः' इत्यभ्याससकारस्य लोपे 'कुहोश्चु:' इत्यभ्यास- घकारस्य झत्वे 'अभ्यासे चर्च' इति मस्य जत्वे 'सन्यतः' इत्यभ्यासाकारस्य इत्वे 'सः स्यार्धधातुके' इति सस्य तकारे 'सनाद्यन्ता धातवः' इति धातुत्वाल्लटि तिपि शपि अनुबन्धलोपे 'अतो गुणे' इति पररूपे उक्तं रूपं निष्पन्नम् । |shal सः स्या-सकारको तकार आदेश हो, सादि आर्धधातुकके परे । अश-अजन्त धातु तथा 'इन्' धातु और अजादि (इण्-इकू इङ्) धातुके स्थानमें आदिष्ट 'गम्' को दीर्घ हो, झलादि सन्' के परे । इको-गन्त धातुसे पर झलादि सन् कित् हो । परे ] विप्रहे कृधातोः 'धातोः कर्मण:-' इति सनि अनुबन्धला “धत्वे 'सनाद्यन्ता धातवः' इति धातुत्वाल्लटि तिपि यङन्तप्र० इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। ज्मलादिः सन् कित् स्यात् । ब्रहत इद्धातोः । कर्तुमिच्छति चिकीर्षति । सनि प्रह- -गुहोश्च ७।२।१२ग्रहेणुहेरुगन्ताच सन इम् न स्यात् । चुभूषति । ॥ इति सचन्तप्रकरणम् ॥ अथ यङन्तप्रकरणम् धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् ३।१।२२। पौनःपुन्ये भृशार्थे च द्योत्ये धातोरेकाचो हलादेर्यङ् स्यात् । गुणो यङ्लुकोः ७४/८२। अभ्यासस्य गुणो यङि यलुकि च परतः। विदन्तत्वादात्मनेपदम् । पुनःपुनरतिशयेन या भवति बोभूयते । बोभूयाश्चके । अबोभूयिष्ट । नित्यं कौटिल्ये गतौ ।। २३ चिकीर्षति-( ई० ३१, ३३, ४५, ४८, ५०, ५७ )-कर्तुमिच्छतीति त्तात्' इतीनिषेधे 'अज्मनगमां सनि' इति दीधै 'इको झल्' इति कित्वाद्गुणाभावे ऋत इद्धातोः' इति इत्वे रपरत्वे 'किस' इति स्थिते 'सन्योः' इति द्वित्वे अभ्या- सत्वे 'हलादिः शेषः' इत्यभ्यासरेफस्य लोपे 'कुहोश्चः' इति चुत्वे 'हलि च'इति दीर्धे बुभूपति ( ई० ३०, ३५, ४१, ४७, ४९, ५१, ५५)-भूधातोः इच्छार्थे सनि 'सनि ग्रहगुहोश्च' इति इनिषेधे 'इको झल' इति कित्त्वाद्गुणाऽभावे 'सन्योः' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे 'हस्वः' इत्यभ्यासोकारस्य हवे 'अभ्यासे चर्च' इति अभ्यासभकारस्य बत्वे षत्वे लटि तिपि शपि पररूपे 'बुभूषति' इति । इति इन्दुमती टीकायां सन्नन्तप्रकरणम् । , CO-- बोभूयते (ई० ३२, ४८)-पुनःपुनः अतिशयेन वा भवतीति विग्रहे -भूधातोः 'धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमनिहारे यङ्' इति यति सन्योः' इति सनि-ग्रह , गुह और उगन्त धातुओंसे पर 'सन्' को 'इट' नहीं हो। इस प्रकार 'इन्दुमती टीकामें सन्नन्तप्रकरण समाप्त हुआ। धातो:-पौनःपुन्य (बार-बार) और भृशार्थ ( अत्यधिकता) द्योत्य होनेपर हलादि, एकाच धातुसे 'यङ्' प्रत्यय हो । गुणो-अभ्यासको गुण हो, 'या के परें और यङलुकूके विषयमें । नित्यंगत्यर्थक धातुसे कोटिल्य ( बक्रगति) अर्थमें ही 'या' प्रत्यय हो किन्तु ARNE मायामामालनमा लघुसिद्धान्तकौमुदी गत्यर्थात्कौटिल्य एक या स्यान तु क्रियासमभिहारे । दीर्घोऽकितः ७४ाशी अकित्तोऽभ्यासस्य दीर्वः स्याबड्यङ्लुकोः । कुटिलं व्रजति वानज्यते । यस्य हलः ६४४॥ यस्येति संघातग्रहणम् । हलः परस्य यशब्दस्य लोपः स्यादार्धधातुके । श्रादेः परस्य । अतो लोपः । वावजाचक्रे । वात्रजिता । रीगृदुपधस्य च ७१४१. १० | ऋदुपधस्य धातोरभ्यासस्य रीगागमो यङ्यङलुकोः । वरीवृत्यते। वरीवृता- श्चके । घरीवर्तिता । क्षुम्नादिष च ८४.३६णत्वं न । नरीनृत्यते । जरीगृह्यते । ॥ इति यङन्तप्रकरणम् ।। तत्प मति प्रेरय सोक वृत्ती MahaNREE "णिधि इति द्वित्वे अभ्यासत्वे ह्रस्वे 'गुणो यङलुकोः' इत्यभ्यासोकारस्य गुणे सनाद्यन्ता धातवः' इति धातुत्वाल्लटि डिवादात्मनेपदें तप्रत्यये शपि पररूपे टेरेत्वे उक्तं रूपं सिद्धम् । वाव्रज्यते (ई० ४७, ५२)-व्रज्धातोः नित्यं कौटिल्ये गतौ' इति यजि 'सन्योः' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे हलादिशेषे 'दीर्घोऽकिता' इत्यभ्यासस्य दी 'सनाचन्ताः' इति धातुत्वाल्लटि तप्रत्यये शपि पररूपे टेरेत्वे उक्तं रूपं जातम् । वरीवृताञ्चके ( ई० २७)-वृत्धातोर्यङि द्वित्वादिकार्थे 'रीगृदुपधस्य च'इति अभ्यासस्य रीगागमे धातुत्वाल्लिटि अनेकाच्वादाम्प्रत्यये 'श्रादेः परस्य' इति सहा कारात् 'यस्य हलः' इति यलोपे 'श्रतो लोपः' इत्यल्लोपे 'श्रामः' इति लिटो लुकि लिट्परककृनोऽनुप्रयोगे लिटः स्थाने तप्रत्यये तस्य एशि कृयो द्वित्वे अभ्यासकार्य मास्यानस्वारे परसवर्णे 'यणि' उक्तं रूपं सिद्धम् । नॅरीनृत्यते (ई० ४६, ४९)-पुनःपुनरतिशयेन वा नृत्यतीति विग्रहे यडि 'सन्योः' इति द्वित्वे अभ्यासकार्ये 'रीयदुपधस्य च' इति रीगागमे धातुत्वा- बटस्तप्रत्यये एत्ने शपि पररूपे 'क्षुम्नादिषु च' इति णत्वनिषेधे तत्सिद्धिः। इति इन्दुमती'टीकायां यङन्तप्रकरणम् । "धार इति गादि क्रिमाके समभिहार (पौन:पुन्य या भृशार्थ) में नहीं हो। दीर्घो-अकित् अभ्यासको दीर्घ हो, यड्के परे और यड्लुक्कै विषयमें । यस्य-हल्से पर 'य' शब्दका लोप हो आर्धधातुको परे । रीगृ-ऋदुपध धातुके अभ्यासको रीक' का आगम हो, या और यह लुक्के विषयमै । शुभ्ना-भुनादिगण पठित धातुओंके नकारको णकार हो । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें यङन्तप्रकरण समाप्त हुआ।
प्रतिपि णलि अनुबन्धलोपे गुणेऽवार অর্থ অস্ব यडोऽचि च २।४।७४बडोऽचि प्रत्यये लुक् स्यात् । चकारात्तं विनाऽपि कचित् । अनैमित्तिकोऽयमन्तरङ्गत्वादादौ भवति । प्रत्ययलक्षरोन यडन्तत्वाद्- द्वित्वम् । अभ्यासकार्यम् । धातुत्वालडादयः । शेषात्करोति परस्मैपदम् । चर्करीतं चेत्यदादौ पाठाच्छपो लुक् । यलो वा ७३६४ा यङ्लुगन्तात्परस्य हलादेः पितः सार्वधातुकस्येड् वा स्यात् । भूसुवोरिति गुणनिषेधो यङ्लुकि भाषायां न 'बोभूतु तेतिक्ते' इति छन्दसि निपातनात् । बोभवीति-बोभोति । बोभूतः। श्रदभ्य- स्तात् । बोभुवति । बोभवाञ्चकार । बोमवामास । बोभविता। बोभविष्यति । चोभवीतु-बोभोतु-बोभूतात् । बोभूताम् । बोभुवतु । बोभूहि। बीभवानि । अबो- बोभवीति (ई० ४४, ५० )-भूधातोर्यङि 'यडोऽचि च' इति द्वित्वापेक्षया 'आदौ यको लकि ततः प्रत्ययलक्षणेन यजन्तत्वाद् 'सन्यकोः' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे 'गुणो यङ्लुकोः' इत्यभ्यासोकारस्य गुणे 'अभ्यासे चर्च' इत्यभ्यासभकारस्य बकारे 'चोभू' इति, तस्माद्धातुत्वाल्लटि तिपि शपि 'चर्करीतच' इति यङलुगन्तस्यादादौ पाठाच्छपो लकि 'यडी वा' इति पाक्षिके ईडागमे अनुबन्धलोपे 'बोभूतु तेतिक्ते' इति छन्दसि निपातनात् 'भुसुवास्तिङि' इति गुणनिषेधस्य यङलुकि भाषायामप्रवृत्या गुणेऽवादेशे 'बोभवीति' इति । ईडभावपचे गुणे 'बोभोति' इति भवति । बोभवाञ्चकार (ई० ३७, ४५ )-भूधातोर्यङि 'यडोऽचि च' इति यो लकि अत्ययलक्षणेन यजन्तत्वात् 'सन्योः' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे 'गुणो यङलुको' इत्यभ्यासस्य गुणे 'अभ्यासे चर्च' इति भस्य बत्वे धातुत्वाल्लिटि 'कास्यनेकाच श्राम्वक्तव्यः' इत्यामि 'आमः' इति लिटो लुकि लिट्परककृतोऽनुप्रयोगे लिटः स्थाने श्चुः' इति चुत्वे 'अचो किणति' इति वृद्धौ मस्यानुस्वारे परसवर्णे तत्सिद्धम् । योऽचि च---'यह' का लुक् (लोप) हो, 'अच्' प्रत्ययके परे। चकारात् 'अच प्रत्ययके बिना भी कहीं लुक् हो । बडो चा-यङन्तसे पर हलादि पित्' सार्वधातुकको 'ईद' का आगम हो, विकल्पसे । नोट:-१-रित निर्देश, २-शा निर्देश, ३-अनुवन्धनिर्देश, ४-गणनिर्देश और ५-एकाच निर्देशसे जो कार्य निर्दिष्ट हुए हैं। वे पाँचो कार्य यलुकमें नहीं हों। कदा भी है- Shampawar लघुसिद्धान्तकौमुदी भवी-बीभीत् । प्रवीभूताम् । मनोभवुः । बोभूयात् । बोभूयाता । बोभूयुः । बोभूयात् । बोभूयास्ताम् । बोभूयासुः । गातिस्थेति सिची लक् । यो वेतीट्पचे गुणं बाधित्वा नित्यत्वाद्रुक् ! अयोभूवीत्-अबोभोत् । अबोभूताम् । अबोभूवुः । अवोभविध्यत। ।। इति यालगन्तप्रकरणम् ॥ AMBER मति वृत्ती Sta इति धातु 'णि ও স্বাস্থ্য सुप आत्मनः क्यच् ३३शमा इषिकर्मण एपितुः सम्बन्धिनः सुबन्तादिच्छा- यामर्थे क्यच् प्रत्ययो वा स्यात् । सुपो धातुप्रातिपदिकयोः २।४/७२। एतयोर- वयवस्य सुपो लुन् । क्यचि च ७४॥ ३३॥ अवर्णस्य ईत्स्यात् । आत्मनः पुत्रमि- च्छति पुत्रीयति । नः क्ये ११ ४॥ १५॥ क्यचि क्यलि च नान्तमेच पदं नाऽन्यत् । अबोभूवीत् , अबोभोत ( ई० १४, ३९)-भुधातोर्यछि यो लुकि प्रत्ययलक्षणेन यङन्तत्वात् 'सन्योः' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे 'गुणो यङलकोः' इत्यभ्यासगुणे जश्त्वे धातुत्वाल्लुङस्तिपि इकारलोपे अदि अनुबन्धलोपे च्लो चले.. सिचि गातिस्थेति सिम्बो लुकि 'यको वा' इति ईटि गुणं बाधित्वा नित्यत्वाद् बुकि 'अबोभूवीत्' इति ईडभावपक्षे 'अच्परत्वाऽभावाद् वुगभावे गुणे' 'अबोभोत्' इति । इति 'इन्दुमती' टीकायां यङलगन्तप्रकरणम् । 'पुत्रीयति (ई० ४४, ४९ ५५) आत्मनः पुत्रमिच्छतीति विग्रहे 'पुत्र 'रितपा, शपाऽनुबन्धेन निर्दिष्टं, यद्गुणेन च । यत्रैकाग्रहणं चैत्र, पञ्चैतानि न यलुकि' ।। इसप्रकार 'इन्दुमती' टीकामें थङ्लुगन्तप्रकरण समाप्त हुआ। इति 'धार च्लेव सुप्-'इध्' धातुका कर्म और 'इच्छा करनेवाले' कर्ताके संबन्धिवाचक सुदन्तसे इच्छा अर्थमें 'क्यच' प्रत्यय हो, विकल्पसे। नोट:--'देवदत्तः आत्मनः पुत्र मिच्छति पुत्रीयति' यहाँ पुत्र इष धातुका कर्म है और इच्छा करनेवाला देवदत्तका संबन्धी भी है, अतः तद्वाचक सुबन्तसे क्यच हुआ। सुपो-धात्ववयव और प्रातिपदिकावयव 'सुप्' का लुक् ( लोप ) हो । क्यचि-अवर्ण को 'ईत्' हो क्यचके परे । ना क्ये-क्यच्-क्यके परे नान्त शब्दकी ही पदसंशा हो-अन्यकी नहीं। परे । णि Evenemend इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। SHARASHTRA नलोपः। राजीयति । नान्तमेवेति किम् ? वाच्यति । हलि च । गीति । पूर्यति । धातोरित्येक । नेह-दिवमिच्छति दिव्यति। क्यस्य विभाषा६।४।५० हल: परयो क्यच्क्यडोर्लोपी वाऽऽर्धधातुके । आदेः परस्य । अती लोपः। तस्य स्था- निवत्त्वाल्लघूपधगुणो न । समिधिता । समिध्यिता । काम्यञ्च ३१ ११६। उक्तविषये काम्यच् स्यात् । पुत्रमात्मन इच्छति पुत्रकाम्यति । पुत्रकाम्यिता। उपमानादा- चारे ३३१०१० उपमानाकर्मणः सुबन्तादाचारेऽर्थे क्यच् । पुत्रमिवाचरति पुत्री- यति छात्रम् । विष्णूयति द्विजम् । *सर्वशातिपदिकेभ्यः किव्वा वक्तव्यः । अतो गुणे । कृष्ण इवाचरति कृष्णति । स्व इवाचरति स्वति । सस्वौ। अनुना. सिकस्य किमलोः किङति ६४|१५| अनुनासिकान्तस्योपधाया दीर्घः स्यात्को मलादी चकिति । इदमिवाचरति इदामति । राजेच राजानति । पन्था इव पथी. अम्' इति सुबन्तात् 'सुप त्रात्मनः क्यच्' इति क्याचि अनुबन्धलोपे 'सनाचन्ता धातवः' इति 'पुत्र अम् य' इत्यस्य धातुसंज्ञायां 'सुपो धातुप्रातिपदिकयोः' इति अमो लुकि 'क्यचि च' इति अकारस्य ईत्वे 'पुत्रीय' इति तस्माद्धातुत्वालटि तिपि शापि पररूपे 'पुत्रीयति' इति निष्पन्नम् । राजीयति ( ई० ३१,५१,५२,५७ )-'राजानमिच्छति' इति विग्रहे द्वितीया न्तात् राजञ्छब्दादिच्छार्थे क्यचि धातुत्वात् सुपो लुकि 'न क्येः' इति सूत्रेण 'राजन्' इत्यस्य पदत्वात् 'न लोपःप्रातिपदिकान्तस्य' इति नलोपे 'क्यचिव इती- त्वे 'राजीय” इति, तस्माद्धातुत्वालटि शपि तिपि पररूपे 'राजीयति' इति । समिधिता (ई० ४५, ५६) समिधमिच्छतीति विग्रहे द्वितीयान्ता समिध् शब्दात् क्यचि धातुत्वात्सुब्लुकि 'नः क्ये' इति नान्तस्यैव पदत्वनियमात् पदत्वा- भावेन जश्त्वाभावे धातुत्वाल्लुटि । लुटस्तिबादिकार्ये 'समिध्य ता' इति दशायाम् इटि 'क्यस्य विभाषा' इति यलोपे 'अतो लोपः' इत्यल्लोपे अल्लोपस्य स्थानि- वत्वाद् लघूपधगुणाऽभाव 'समिधिता' इति । यलोपाभावपक्ष 'समिध्यिता' इति । "इदामति (ई० ४१,४६,५४ )--'इदमिवाचरति' इति विग्रहे 'सर्वप्रातिपदि- , क्यस्य--'हल' से पर क्यच्-क्यका लोप हो, आर्धधालुकके परे, विकल्पसे । काम्यच्च-उक्त ( सुप आत्मनः क्यच् ) के विषय में (ही) 'काम्य' प्रत्यय हो । उपमानादाचारे---उपमानवाचक कर्मसंज्ञक सुबन्तसे आचार अर्थमें 'क्यच्' प्रत्यय हो। सर्वप्राति--समी प्रातिपदिकोंसे 'कि' प्रत्यय हो, आचार अर्थमें, विकल्पसे । भनु-अनुनासिकान्तकी उपधाको दीर्घ हो, किप और झलादिकित्-डित के परे ।
लघुसिद्धान्तकौमुदी भवीत्-शाबोभोत् । अवोभूताम् । अबोभवुः । बोभूयात् । बोभूयाताम् । बोभूयुः । बोभूयात् । बोभूयास्ताम् । बोभूयासुः। गातिस्थेति सिची लुक् । यो वेतीट्पने गुणं बाधित्वा नित्यत्वाद्रुक् । श्रवोभूवीत्-अबोभोत् । श्रबोभूताम् । अवोभूवुः । वोभविष्यत् । ॥ इति यङलगन्तप्रकरणम् ॥ मति प्रेरय वृत्ती InHMAIMIMARY নি धातुर "णिशि 'चडि इति। सन्य অঙ্গ লাকৰ খাদ্য सुप आत्मनः क्यच् ३।१।८ इषिकर्मण एपितुः सम्बन्धिनः सुबन्तादिच्छा- यामर्थे क्यच् प्रत्ययो वा स्यात् । सुपो धातुप्रातिपदिकयोः २।४/७२॥ एतयोर- वयवस्य सुपो लुक् । क्यचि चा ७/४॥ ३३॥ अवर्णस्य ईत्स्यात् । आत्मनः पुत्रमि- च्छति पुत्रीयति । नः क्ये ११ ४॥ १५॥ क्यचि क्याङि च नान्तमेव पदं नाऽन्यत् । अबोसूवीत् , अबोमोत् ( ई० २४, ३९.)--भुधातोर्यछि यो लुकि प्रत्ययलक्षणेन यङन्तत्वात् 'सन्योः' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे 'गुणो यङलकोः इत्यभ्यासगुणे जश्त्वे धातुत्वाल्लुङस्तिपि इकारलोपे अटि अनबन्धलोपे चलौ चले सिचि गातिस्थेति सिचो लुकि 'यडी वा' इति ईटि गुणं बाधित्वा नित्यत्वाद् बुकि 'अवोभूवीत्' इति ईडभावपक्षे 'अच्परत्वाऽभावाद् बुगभावे गुणे 'अनोभोत्' इति । इति 'इन्दुमती' टीकायां यङलुगन्तप्रकरणम् । "पुत्रीयति (ई० ४४, ४९ ५५) श्रात्मनः पुत्रमिच्छतीति विग्रहे 'पुत्र 'श्तिपा, शपाउनुबन्धेन निर्दिष्, यदणेन च । यन्त्रका ग्रहणं चैव, पञ्चैतानि न यङ्लुकि' ।। इसप्रकार 'इन्दुमती' टीकामें यलुगन्तप्रकरण समाप्त हुआ। रलेश्व सुप्-'इष्' धातुका कर्म और 'इच्छा करनेवाले' कर्ताके संबन्धिवाचक सुबन्तसे इच्छा अर्थ में 'क्यच' प्रत्यय हो, विकल्पसे । नोटा--'देवदत्तः आत्मनः पुत्र मिच्छति पुत्रीयति' यहाँ पुत्र इष धातुका कर्म है और इच्छा करनेवाला देवदत्तका संबन्धी भी है, अतः तद्वाचक सुबन्त से क्यच हुआ। सुपो-धात्ववयव और प्रातिपदिकावयव 'सुप्' का लुक् ( लोप) हो। क्यचि-अवर्ण को ईत्' हो क्यचके परे । नः क्ये-क्यच-क्यके परे नान्त शब्दकी ही पदसंज्ञा हो-अन्यकी नहीं। 1 णादि तदवय 'णि THANE SHREE REPTRAINAHATEEne श्रात्मनेपदा०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। समस्तृतीयायुक्तात ॥३॥५४ा रथेन सञ्चरते । दाणश्च सा चेचतुथ्यर्थे ।३।४५॥ सम्पूर्वाहाणस्तृतीयान्तेन युक्तादुक्तं स्यात् , तृतीया चेन्चतुर्थ्यर्थे । दास्या संयच्छता कामी। पूर्ववत्सनः १२३॥६२। सनः पूर्वो यो धातुस्तेन तुल्यं सचन्तादप्यात्मन्ने पदं स्यात् । एदिधिषते । हलन्ताञ्च ११२।१०/ इक्समीपाल: परो भलादिः सन् कित्स्यात् । निविविक्षते । गन्धनाऽवक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनो- पयोगेषु कृनः शश३२। गन्धन--सूचनम् । उत्कुरुते । सूचयतीत्यर्थः । अव- क्षेपणं-भर्सनम् । श्येनो वर्तिकामुत्कुरुते । म यतीत्यर्थः । हरिमुपकुरुते हैं। सेवले इत्यर्थः। परदारान्प्रकुरुते। तेषु सहसा प्रवर्तते। एधोदकस्योपस्कुरुते ।। समस्तु-(सकर्मकादिति निवृत्तम् ) सम्पूर्वात् तृतीयान्तसमभिव्याहृतात् चर धातोरात्मनेपदं स्यात् । दास्या संयच्छते कामी-अत्र 'अशिष्टव्यवहारे दाणः प्रयोगे चतुर्थ्यर्थे तृतीया इति वार्तिकेन दास्या' इत्यत्र चतुर्थ्यर्थे तृतीया । ततश्च दास्येति तृतीयान्तयुक्ता- सम्पूर्वका दाण्धातोः 'दाणश्च सा चेच्चतुर्थ्यर्थे' इत्यात्मनेपदे लडादिकार्ये तसिद्धिः । एदिधिषते ( ई० २२) एध्धातोः सनि इटि द्वित्वे अभ्यासत्वे जश्त्वे षत्वे "एदिधिष' इति सन्नन्तस्य धातुसंज्ञायां लटि 'पूर्ववत्सनः' इत्यनेन सन्प्रकृतेरेधधातो- रात्मनेपदित्वात्तत्प्रकृतिकसन्नन्तादप्यात्मनेपदे लटस्तप्रत्यये शपि पररूपे टेरेत्व 'एदि- विषते' इति सिद्धम् । निविविक्षते-निपूर्वकाद् विश्वातोः सनि 'हलन्ताञ्च' इति सनः कि- त्वाद्गुणाऽभावे 'सन्योः' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे हलादिशेषे 'नश्चेति षत्वे षस्य कत्वे सनः सस्य षत्वे 'निविविक्ष' इति सन्नन्तस्य धातुसंज्ञायां 'पूर्ववत्सनः' इत्या- त्मनेपदे लटस्तप्रत्यये शपि पररूपे टेरेत्वे उक्तं रूपं सिद्धम् । एघोंदकस्योपस्कुरुते (ई० ३०,५१)-अन्न 'गन्धनाऽवक्षेपण' इति सूत्रेण प्रतियत्नेऽर्थे आत्मनेपदं भवतीति । प्रतियत्नः = गुणाधानम् । 'अबोदधौद्मप्रश्रथहिम- ७ समस्तु-तृतीयान्तसे युक्त 'सम् उपसर्गक 'चर' आत्मनेपद धातुसे हो।। दाणश्व-तृतीयान्तसे युक्त सम् उपसर्गक 'दाण' धातुसे आत्मनेपद हो, वह तृतीया यदि चतुर्थीके अर्थ में रहे । पूर्ववत्-सन्से पूर्व ( सन्प्रकृतिभूत ) जो धातु उसीके समान सन्नन्तसे भी आत्मनेपद हो । हलन्ता-इक्समीप हलसे पर झलादि सन् कित हो । गन्धनावक्षेपण-गन्ध नादि ARTHAMNATION लघुसिद्धान्तकौमुदी नति । कष्टाय ऋमणे ३३०१४ चतुर्थ्यन्तात्कष्टशब्दादुत्साहेऽर्थे क्यङ् स्यात् । कष्टाय क्रमते कष्टायते । पापं कर्तुमुत्सहत इत्यर्थः । शब्दवैरकलहानकएवमे- घेभ्यः करणे ३.१ १७ एभ्यः कर्मभ्यः करोत्यर्थे क्यङ् स्यात् । शब्दं करोति शब्दायते । (ग. सू.) तत्करोति तदाचष्टे-इति णिच् । प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवञ्च । प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे णिच् स्यात् , इठे यथा-प्रातिपदिकस्य पुंव- द्भाव-रभाव-टिलोप-विन्मतु-ब्लोपयणादिलोप-प्रस्थस्फाचादेश-भसंज्ञास्तवण्णा- वपि स्युः । इत्यल्लोपः । घटं करोत्याचष्टे वा घटयति । इति नामधातुप्रकरणम् । WITYSHEE वृत्ती ravasanauRELAreamyatarraase NHERImmose इति धातुर "णिधि इति। "सन्च 'धात्व इति। केभ्यः-' इति विपि तस्य लोपे धातुत्वाल्लटस्तिपि शपि 'अनुनासिकस्य विमलोः विति' इति दीर्घ 'इदामति' इति । राजानति (ई० २१, ४०)-राजा-इन- प्राचरतीति विग्रहे 'सर्वप्रातिपदिकेभ्यः' इति क्विपि किाः सर्वापहारे धातुत्वाल्लट- स्तिपि शपि अनुनासिकस्य-' इति दी तत्सिद्धम् । कष्टायते ( ई० ४८, ५० )-'कष्टाय क्रमते' इति चिप्रहे चतुर्थ्यन्तात् कष्टश- ब्दात् कष्टाय नमणे' इति क्यङि धातुत्वात् सुपो लुकि कित्वादात्मनेपदे लटः स्थाने तप्रत्यये टेरेत्वे शपि पररूपे 'अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः' इति दी तसिद्धिः। घटयति-घट करोत्याचष्टे वेति विद्महे घटशब्दात् 'प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच' इति णिचि इष्ठवावाहिलोपे च जाते तस्य स्थानिवद्भावादुपधा- वृद्धधभावे धातुत्वाल्लटि तिपि शपि गुणे अयादेशे व कृते 'चटयति' इति । कष्टाय--चतुर्थ्यन्त कष्ट' शब्दसे क्या प्रत्यय हो, उत्साह अर्थमें । शब्दवर-की- भूत-शब्द, वैर, आदि शब्दोंसे 'करोति' अर्थमें क्या प्रत्यय हो । प्रातिपदिक-(सभी) प्रातिपदिकसे धात्वर्थमें 'णिच् प्रत्यय हो, विकल्पसे और 'इष्ठन्' प्रत्ययके परे यथा पुंवझाव, रभाव, टिलोप, विन् तथा मतुप् लोप, यगादि लोप, प्र-स्थ-स्फ-आदि आदेश और भसंशा कार्य होते हैं, तथा इस णिच् के परे भी हों। नोट :---ऍवद्भावादिका उदाहरण-घुनद्धाव-पट्वीमाचष्टे पटयति । रमाद-दुई करोति द्रढयति । टिलोप-पटुमाचष्टे पटयति । विन्लोप-स्रग्विणमाचष्ट स्त्रजयति । मतुब्लोप-श्रीमन्तं करोति आययति । यणादिलोप-स्थूलमाचष्टे स्थवयति । दूरं करोति द्रवयति । प्रादेश-प्रियमाचष्टे प्रापयति । स्थादेश-स्थिरं करोति स्थापयति । स्फादेशा-स्फिरमाचष्टे स्कावयति । असंज्ञा-पट्वीमाचष्टे पटयति । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें नामधातुप्रकरण समास हुआ। PANCARNEARCH 0 णादि तदव्य अथ कण्डवादिप्रकरणम् कण्ड्वादिभ्यो यक् ३११।२७ । एभ्यो धातुभ्यो नित्यं यक् स्यात्स्वार्थे । कण्डू गात्रविघर्षो । कण्डूयति । कण्डूयत-इत्यादि । ॥ इति कण्ड्वादिप्रकरणम् ॥ LambaMaNAALI ASIAMENT अथात्मनेपदप्रकरणम् । कर्तरि कर्मव्यतिहारे ११३।१४! क्रियाविनिमये द्योत्ये कर्तर्यात्मनेपदम् । व्यतिलुनीते। अन्यस्य योग्यं लवनमन्यः करोतीत्यर्थः। न गतिहिंसार्थेभ्यः श३।११ व्यतिगच्छन्ति । व्यतिघ्नन्ति । नेविंशः ११३।१७ निविशते । न गति-क्रियाविनिमये द्योत्ये गत्यर्थेभ्यो हिंसार्थेभ्यश्च धातुभ्य आत्मनेपदं न स्यादित्यर्थः व्यतिन्नन्ति (ई० ३०)-वि+अति = व्यति-पूर्वाद् हन्धातोः 'कर्तरि कर्म- व्यतिहारे' इति क्रियाविनिमयेऽर्थे श्रात्मनेपदे प्राप्त न गतिहिंसार्थेभ्यः' इति निषेधे लडादिकार्ये विहिते तत्सिद्धिः । निविशते (ई० ४७, ४९, ५० ५५)-निपूर्वकाद् विशधातोरात्मनेपदं स्यादि- त्यर्थक 'नेर्विशः' इति श्रात्मनेपदे लडादिकार्ये तत्सिद्धिः। कण्ड्वादि-कण्ड्वादिगणपठित धातुओंसे नित्य यक् प्रत्यय हो, स्वार्थमें । नोट :-'कण्डूयते में 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' से प्राप्त गुणका किति च से विधेयके लिये 'यक्' में कित्वका उपादान किया गया है, अतः कित्वनिर्देशात् कण्डवादि धातु है। एवं 'कण्डू में दीर्घका उपादान किया गया है, अतः कण्ड्वादि प्रातिपदिक भी है। अन्यथा यदि कण्डवादि धातु ही होता तो हस्व पाठ करनेपर भी 'या' प्रत्ययके परे ‘अकृत्सार्वधा- शुकयो से दीर्घ होकर 'कण्डूयते' प्रयोग बनता हो, दीर्घ निर्देश करना अनर्थक था। सूत्रकी वृत्तिमें 'धातुभ्यः' ऐसा कहा गया है अतः स्मरण रखना चाहिये कि कण्ड्वादि धातुसे हो यक हो, प्रातिपदिकसे नहीं। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें कण्ड्वादिप्रकरण समाप्त हुआ। कतरि-क्रियाका विनिमय (अदल-बदल) अर्थ द्योत्य हो तो धातुसे आत्मनेपद हो, • काम । न गतिगत्यर्थक और हिंसार्थक धातुओंसे 'क्रियाविनिमय' अर्थ में आत्मनेपद नहीं हो । नेर्वि-नि' उपसर्गक 'विश' धातुसे आत्मनेपद हो । परिव्यये--परि, वि और ।
लघुसिद्धान्तकौमुदी नति । कष्टाय क्रमणे ३११४॥ चतुर्थ्यन्तात्कष्टशब्दादुत्साहेऽर्थे क्यङ् स्यात् । कष्टाय नमते कष्टायते । पापं कर्तुमुत्सहत इत्यर्थः । शब्दवैरकलहाभ्रकएवमे. धेभ्यः करणे ३।।१७। एभ्यः कर्मभ्यः करोत्यर्थे क्यङ् स्यात् । शब्दं करोति शब्दायते । (ग. सू.) तत्करोति तदाचष्टे-इति णिच् । प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच्च । प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे णिच् स्यात् , इष्ठे यथा-प्रातिपदिकस्य पुंव- द्भाव-रभाच-टिलोप-विन्मतु-लोपयणादिलोप-प्रस्थस्फाचादेश-भसंज्ञास्तवण्णा- बपि स्युः । इत्यल्लोपः। वटं करोत्याचष्टे वा घटयति । इति नामधातुप्रकरणम् । मति प्रेरय सोक POETRNAPDRABINETRICompensatta MAHArmmamPORN RORarCOM धातुर इति। 'सन्व 'धात्व इति। लुड चलेश्व केभ्यः' इति क्विपि तस्य लोपे धातुत्वाल्लटस्तिपि शपि 'अनुनासिकस्य विमलोः विति' इति दीधै 'इदामति' इति । राजानति ( ई० २१, ४०)-राजा-इव- आचरतीति विद्महे सर्वप्रातिपदिकेभ्यः' इति किपि विषः सर्वापहारे धातुत्वालट. स्तिपि शपि प्रतुनासिकस्य-' इति दी तत्सिद्धम् । कष्टायते ( ई० ४८, ५०)-'कष्टाय क्रमते' इति विप्रहे चतुर्थ्यन्तात् कष्टश- ब्दात् ‘कष्टाय क्रमणे' इति क्यङि धातुत्वात् सुपो लुकि जित्वादात्मनेपदे लटः स्थाने तप्रत्यये टेरेत्वे शपि पररूपे 'अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः' इति दीर्घ तसिद्धिः । घटयति-घट करोत्याचष्टे चेति विद्महे घटशब्दात् 'प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच' इति णिचि इष्ठवद्भावाहिलोपे च जाते तस्य स्थानिवद्भावादुपधा- वृद्धथभावे धातुत्वाल्लटि तिपि शपि गुणे अयादेशे च कृते 'घटयति' इति । कष्टाय-चतुर्थ्यन्त कष्ट' शब्दसे क्या प्रत्यय हो, उत्साह अर्थम । शब्दबर-की- भूत-शब्द, वैर, आदि शब्दोंसे 'करोति' अर्थमें क्या प्रत्यय हो । प्रातिपदिक -(सभी) प्रातिपदिकसे धात्वर्थ में 'णिच् प्रत्यय हो, विकल्पसे और 'इष्ठन्' प्रत्ययके परे यथा पुंबद्भाव, रभाव, टिलोप, विन् तथा भतुप् लोप, यगादि लोप, प्र-स्थ-स्फ-आदि आदेश और मसंज्ञा कार्य होते हैं, तथा इस 'णिच'के परे भी हों। नोट :--मुंबद्भावादिका उदाहरण-घुबद्भाव-पट्वीमाचष्टे पटयति । रभाव-दुई करोति द्रढयति । टिलोप-पटुमाचष्टे पटयति । विन्लोप-स्रग्विणमाचष्टे स्रजयति । मतुब्लोप-श्रीमन्तं करोति श्राययति । यणादिलोप-स्थूलमाचष्टे स्थवयति । दूरं करोति द्रवयति । प्रादेश-प्रियमाचष्टे प्रापयति । स्थादेश-स्थिरं करोति स्थापयति । स्फादेश-स्फिरमाचष्टे स्फावयति । भसंज्ञा-पट्वीमाचष्टे पटयति । इस प्रकार 'इन्दुमती टीकामें नामधातुप्रकरण समास हुआ। CREASONRACTION " .. णादि तद्वय ‘णि अथ कण्डवादिप्रकरणम् कण्ड्वादिभ्यो यक् ३।१।२७ । एभ्यो धातुभ्यो नित्यं यक् स्यात्स्वार्थे । कण्डू गात्रविघर्षणे । कण्डूयति । कण्डूयत-इत्यादि । ॥ इति कण्ड्वादिप्रकरणम् ॥ HOM RRIOMAAVAT अथात्मनेपदप्रकरणम् । कर्तरि कर्मव्यतिहारे ११३।१४। क्रियाविनिमये द्योत्ये कर्तर्यात्मनेपदम् । व्यतिलुनीते। अन्यस्य योग्यं लवनमन्यः करोतीत्यर्थः। न गतिहिंसार्थभ्यः शश१५२ व्यतिगच्छन्ति । व्यतिघ्नन्ति । नेविंशः ११३।१७ निविशते । न गति-क्रियाविनिमये द्योत्ये गत्यर्थेभ्यो हिंसार्थेभ्यश्च धातुभ्य आत्मनेपदं नस्यादित्यर्थः। व्यतिघ्नन्ति (ई० ३०)-वि+अति = व्यति-पूर्वाद् हन्धातोः 'कर्तरि कर्म- ज्यतिहारे' इति क्रियाविनिमयेऽर्थे प्रात्मनेपदे प्राप्त न गतिहिंसार्थेभ्यः' इति निषेधे लडादिकायें विहिते तत्सिद्धिः। निविशते (ई० ४७, ४९, ५० ५५)-निपूर्वकाद् विशधातोरात्मनेपदं स्यादि- त्यर्थक 'नेविंशः' इति श्रात्मनेपदे लडादिकार्य तत्सिद्धिः । कण्ड्वादि-कण्ड्वादिगणपठित धातुओंसे नित्य यक् प्रत्यय हो, स्वार्थमें । नोट:-'कण्डूयते में 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' से प्राप्त गुणका 'इकिति च' से निषेयके लिये 'यक्' में कित्वका उपादान किया गया है, अतः कित्वनिर्देशात् कण्डवादि धातु है। एवं 'कण्डू में दीर्घका उपादान किया गया है, अतः कण्ड्वादि प्रातिपदिक भी है। अन्यथा यदि कण्ड्वादि धातु ही होता तो हस्व पाठ करनेपर भी 'यक्' प्रत्ययके परे ‘अकृत्सार्वधा- तुकयो से दीर्घ होकर 'कण्डूयते' प्रयोग बनता हो, दीर्घ निर्देश करना अनर्थक था। सूत्रकी बृत्तिमै 'धातुभ्यः ऐसा कहा गया है अतः स्मरण रखना चाहिये कि कण्ड्वादि धातुसे हो यक हो, प्रातिपदिकसे नहीं। इस प्रकार 'इन्दुमती टीकामें कण्ड्वादिप्रकरण समाप्त हुआ। , . कतरि-क्रियाका विनिमय (अदल-बदल) अर्थ घोल्य हो तो धातुसे आत्मनेपद हो, काम । न गतिगत्यर्थक और हिंसार्थक धातुओंसे 'क्रियाविनिमय' अर्थमें आत्मनेपद नहीं हो । नेर्वि-नि उपसर्गक 'विश' धातुसे आत्मनेपद हो । परिव्यये--परिवि और - AAPAN RAREERAEPHRAM ANSapaswani मति प्रेर तेरि দুনি धातु लघुसिद्धान्तकौमुदी परिव्यवेभ्यः क्रियः शा१मा परिकीणीत । विक्रीणीते । अवक्रीणीते। विपराभ्यां जेः श२१ विजयते । पराजयते । समवप्रविस्यः स्थः शश। सन्तिष्ठते । अवतिष्ठते । प्रतिष्ठते । वितिष्ठते। अपह्नवे ज्ञः शश४४ शतमपजानीते । अपल- पतीत्यर्थः। अकर्मकाच १।३।४५ ! सर्पिषो जानीते। सर्पिषोपायेन प्रवर्तते इत्यर्थः। उदश्चरः सकर्मकात् श३२५३। धर्ममुच्चरते। उल्लंघय गच्छतीत्यर्थः । परिव्यवेभ्य:----परिचि अव एभ्यः परस्मात् क्रीब्धातोरात्मनेपदं स्यात् । विपराभ्या-वि परा आभ्यां परस्मात् जिधातोरात्मनेपदं स्यात् । समव-सम् अव प्रवि एभ्यः परस्मात् स्थाधातोरात्मनेपदं स्यात् । अपह्नवे :--अपह्नवः = अपलापः, तवृत्ताधातोरात्मनेपदं स्यात् । विजयते ( ई० ५३, ५४ ) "वियराभ्यां जेः' इत्यात्मनेपदमन । उदश्चरः-उत्पूर्वात् सकर्मकात् चरधातोरात्मनेपदं स्यात् । अब उपसर्गक 'क्री धातुसे आत्मनेपद हो । विपरा-वि और परा उपसर्गक 'जि' धातुसे मात्मनेपद हो । समब-'लम्' 'अब 'प्र' अथवा 'वि' उपसर्गसे पर स्था' धातुले आत्म- नेपद हो। अपह-ज्ञा' धातुसे आत्मनेपद हो, अपहब ( अपलाप) अर्थमें । अकर्म- अकर्मक ( सोपसर्गकसे भी) 'स्था' धातुसे आत्मनेपद हो । नोट :--'धातोरान्तरे वृत्तेर्धात्वर्थेनोपसंग्रहात् । प्रसिद्धरविवक्षातः कर्मणोऽकर्मिका क्रिया । यहाँ पर प्रत्येक वाक्यका अर्थ इस प्रकार है-(१) सकर्मक धातु यदि अर्थान्तर (अकर्मक क्रियारूप अर्थान्तर) को कहने लगे तो वह अकर्मक हो जाती है। यथा 'भारं वइति = प्रापयति' यहाँ प्रापणार्थक 'वह' धातु सकर्मक है, परन्तु यही अर्थान्तर (स्यदन्ते रूप अर्थमें वृत्ति (प्रवृत्ति) होकर कहीं अकर्मक होती है । यथा 'नदी वहति = स्यन्दते (प्रनवति) (२) यदि कर्मका धात्वर्थसे उपसंग्रह हो जाय तो धातु अकर्मक हो जातो है। यथा 'जीवति 'नृत्यतिर यहाँ 'जीव' का प्राणधारण करना और नृत्' का अङ्गविक्षेप करना अर्थ है। परन्तु दोनों जगह प्राणधारण और अङ्गविक्षेप रूप कर्मका धात्वर्थमें ही अन्तर्भाव हो जाता है । अत: ये दोनों धातु सकर्मक नहीं होते। (३) कहीं प्रसिद्ध कई रहने पर भी धातु अकर्मक हो जाती है । यथा 'मैघो वर्षति' (अर्थात् मेघो जलं वर्षति) यहाँ पर जलरूप कर्म प्रसिद्ध है, परन्तु धातु अकर्मक कही जाती है । (४) कर्मकी अवि- वक्षा करने पर भी धातु अकर्मक हो जाती है, यथा हितान यः संशृणुते स किंप्रभुः, (हितात पुरुषाल यः न संशृणुते - स्वहितं न मन्यते, स किंप्रमुः, कुत्सित इत्यर्थः) यहाँ स्वहित रूप कर्मकी अविवक्षा करने पर धातु अकर्मक हो जाती है । ( ७९ पृ० भी देखें) उदश्वरा-'उत्' उपसर्गसे पर सकर्मक 'चर' धातुसे आत्मनेपद हो । इति 'धात इति ल्लुङ चलेश णादि तदवर परे। 'णि प्रात्मनेपदप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। समस्तृतीयायुक्तात २३६५४ा रथेन सञ्चरते । दाणश्च सा चेञ्चतुयर्थे १२३॥५५॥ सम्पूर्वाहाणस्तृतीयान्तेन युक्तादुक्तं स्यात् , तृतीया चेच्चतुर्थ्यर्थे । दास्या संयच्छते कामी। पूर्ववत्सनः श३६२। सनः पूर्वो यो धातुस्तेन तुल्यं समन्तादप्यात्मने पदं स्यात् । एदिधिषते । हलन्ताच श२।१०। इक्समीपाडलः परो मालादिः सन् कित्स्यात् । निविविक्षते । गन्धनाऽवक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनो- पयोगेषु कृषः १२३॥३२॥ गन्धन-सूचनम् । उत्कुरुते । सूचयतीत्यर्थः । अव- क्षेपणं-भर्सनम् । श्येनो वर्तिकामुत्कुरुते । भर्सयतीत्यर्थः । हरिमुपकुरुते । सेवते इत्यर्थः। परदारान्प्रकुरुते । तेषु सहसा प्रवर्तते । एधोदकस्योपस्कुरुते । समस्तु-(सकर्मकादिति निवृत्तम् ) सम्पूर्वात् तृतीयान्तसमभिव्याहृतात् चर धातोरात्मनेपदं स्यात् । दास्या संयच्छते कामी-अत्र 'अशिष्टव्यवहारे दाणः प्रयोगे चतुर्थ्यर्थे तृतीया” इति बार्तिकेन 'दाल्या' इत्यत्र चतुर्थ्यर्थे तृतीया । ततश्च दास्येति तृतीयान्तयुक्ता- त्सम्पूर्वकाद् दाण्धातोः 'दाणश्च सा चेचतुर्थ्यर्थ' इत्यात्मनेपदे लडादिकार्य तत्सिद्धिः । एदिधिषते ( ई० २२) एध्धातोः सनि इटि द्वित्वे अभ्यासत्वे जरत्वे षत्वे 'एदिधिष' इति सन्नन्तस्य धातुसंज्ञायां लटि 'पूर्ववत्सनः' इत्यनेन सन्प्रकृतेरेधधातो- रात्मनेपदित्वात्तत्प्रकृतिकसचन्तादप्यात्मनेपदे लटस्तप्रत्यये शपि पररूपे टेरेत्वे 'एदि- विषते' इति सिद्धम् । निविविक्षते-निपूर्वकाद् विश्वातोः सनि 'हलन्ताच्च' इति सनः कि- त्वाद्गुणाऽभावे 'सन्योः' इति द्वित्वे अभ्यासत्वे हलादिशेषे 'ब्रश्चेति षत्वे पस्य कत्वे सनः सस्य षत्वे 'निविविक्ष' इति सन्नन्तस्य धातुसंज्ञायां 'पूर्ववत्सनः' इत्या- त्मनेपदे लदस्तप्रत्यये शपि पररूपे टेरेत्वे उक्तं रूपं सिद्धम् । एधोदकस्योपस्कुरुते (ई० ३०,५१)-अत्र 'गन्धनाऽवक्षेपण' इति सूत्रेण प्रतियत्नेऽर्थे श्रात्मनेपदं भवतीति । प्रतियत्नः = गुणाधानम् । अवोदधौद्मप्रश्रथहिम- समस्तृ--तृतीयान्तसे युक्त 'सम्' उपसर्गक 'चर' आत्मनेपद धातुसे हो। दाणव-तृतीयान्तसे युक्त सम्' उपसर्गक 'दाण धातुसे आत्मनेपद हो, वह तृतीया यदि चतुर्थीके अर्थ में रहे। पूर्ववत्-सन्से पूर्व ( सन्प्रकृतिभूत ) जो धातु उसीके समान सन्नन्तसे भी आत्मनेपद हो । हलन्ता--इसमीप हलसे पर झलादि सन् कित, हो । गन्धनावक्षेपण-गन्धनादि ranti लधुलिखान्तकौमुदी गुणमाधत्ते । कथाः कुरुते । प्रकथयतीत्यर्थः । शतं प्रकुरुते । धार्थ विनियुक्ते । एच किम् ? कटं करोति । सुजोऽनाने शशक्षा श्रोदनं भुङ्क्ते । अनवने किम् ! नहीं भुनक्ति। ॥ इत्यात्मनेपदप्रकरणम् ॥ শুদg qহলথ अनुपराभ्यां कृमः ११३१७६/ अनुपराभ्यां कृषः कर्तृगे च फले गन्धनादौ न्य परस्मैपदं स्यात् । अनुकरोति । पराकरोति । अभिप्रत्यतिभ्यःक्षिपः १३॥ बाक्षिप प्रेरणे । स्वरितेत् । अभिक्षिपति । प्रादहः शश११ प्रवहति । परे- भ्रषः १२३०८२। परिमृषति । व्यापरिस्थो रमः ११३८३। रमु क्रीडायाम् । विरमति । उपाञ्च १।३।८४ | यज्ञदत्तमुपरमति । उपरमयतीत्यर्थः । अन्तर्भावित- ण्यर्थोऽयम् । ॥ इति परस्मैपदप्रकरणम् ॥ नथाः' इति सूत्रे निपातितः एधशब्दोऽदन्तः । एधश्च उदकं चेति एधोदकं तस्य एधोदकस्य उपस्कुरुते, गुणमाधत्ते इत्यर्थः । इति टीकायामात्मनेपदप्रकरणम् । si MARA GAR " f 'स अभिप्रति-अभि प्रति अति इत्येवं पूर्वात् क्षिपः परस्मैपदं स्यात् । प्रावहः-अपूर्वाद् बहतेः परस्मैपदं स्यात् । परेम॒षः-परिपूर्वाद् मृषतेः परस्मैपदं स्यात् । व्या-विश्राङ परि इत्येवं पूर्वाद रमतेः परस्मैपदं स्यात् । उपाच-उपपूर्वाद् रमतेः परस्मैपदं स्यात् । इति परस्मैपदप्रकरणम् । इरि अर्थो में 'कृ' धातुसे आत्मनेपद हो । भुजो-(रुधादि पृ० १३५ देखो)। अनुपराभ्यो-'अनु' और 'परा' उपसर्गसे पर 'कृ' धातुसे परस्मैपद हो कर्तृगा- मी क्रियाफल में तथा गन्धनादि अर्थमें भी। अभिप्रत्यतिभ्यः---अभि, प्रति और अति उपसर्गसे पर क्षिप् धातुसे परस्मैपद हो । प्राबह:-'प्र' उपसर्गसे पर 'वह धातुसे परस्मै- पद हो । परेम॒षः-'परि' उपसर्गक 'मृष' धातुसे परस्मैपद हो । व्यापरिभ्यो-वि, भाद और परि उपसर्गसे पर रम्' धातुसे परस्मैपद हो। उपाच-'उप' उपसर्गसे पर 'रम्' धातुसे परस्मैपद हो। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें परस्मैपदप्रकरण समाप्त हुआ। णा पर भाविता (३० २०,३०,४१)-भूधातो व लुटि भावकर्मणोः' इत्यात्मने তা শাসকা भाषकर्मणोः १२३।१३। आचे कर्मणि च धातोः लस्यात्मनेपदम् । सार्वधातुके यक् २०६७ धातोर्यक् भावकर्मवाचिनि सार्वधातुके । भावः-क्रिया । सा छ भावार्थकलकारेणानूयते । युष्मदस्मद्भया सामानाधिकरण्याभावात्प्रथमः पुरुषः । तिवाच्यक्रियाया अद्रव्यरूपत्वे द्वित्वाद्यप्रतीतेन द्विवचनादि, किं त्वेकवचनमेवो- त्सर्गतः । त्वया मया अन्यैश्च भूयते । बभूवे । स्यसिच्सीयुटतासिषु भावकर्म: णोरुपदेशेऽज्झनग्रहशां वा चिण्व दिट् च ६४।६। उपदेशे योऽच तदन्तानां हनादीनां च चिणीवाऽजकार्य वा स्यात्स्यादिषु भावकर्मणार्गम्यमानयोः स्यादीना- मिडागमश्च । चिण्वद्भावपक्षेऽयमिट । चिण्वभावावृद्धिः । भाविता-भविता । भूयते (ई० ४९)-भूधातोर्भावे लटि 'भावकर्मणोः' इत्यात्मनेपदै लटस्तप्रत्ययो टेरेत्वे 'सार्वधातुके यक्' इति यकि कित्वाद्गुणाभाचे भूयते' इति । . पदे लुटस्तप्रत्यये तासि डादेशे 'डित्वसामादभस्यापि टेर्लोपे 'स्यसिच' इति विण्वद्भावे इटि च कृते चिचड़ावादू वृद्धौ श्रावादेशे भाविता इति।चिण्वदभावपक्षे इटि भावकर्मणो:-भाववाच्य और कर्मवाच्य में लकारके स्थानमें आत्मनेपद हो। सार्वधातुके-भाववाची और कर्मवाची सार्वधातुक के परे धातुसे 'यक' प्रत्यय हो। नोट ---भाव क्रियाको कहते हैं। वह भावार्थक लकारसे अनूदित होता है। भावमें प्रत्यय करने पर ति के साथ युष्मद्-अस्मद् शब्द एकार्थवाचक नहीं होते, अतः धातुसे. प्रथम पुरुष ही होता है। (कर्ता में प्रत्यय करनेपर ति और युष्मद्-अमळू शब्द कर्ता रूप एकार्थक वाचक होते हैं, अतः धातुसे मध्यम-उत्तम पुरुष होते हैं। पृ० ८१ देखों) तिर्थ क्रियाके द्रव्यरूप न होनेसे द्वित्व, बहुत्व संख्याकी प्रतीति नहीं होती इसलिये द्विवचन, बहुवचन नहीं होते, किन्तु स्वाभाविक एकवचन ही होता है। भावमें प्रत्यय होनेपर कर्ता अनुक्त होनेसे कर्तासे तृतीया विभक्ति होती है । जैसे-त्वं भवसि' इस अर्थमें त्वया भूयते। इत्यादि (पु० ७९ देखो)। स्यसिच-उपदेशावस्थामें जो अच् , तदन्त जो धातु, उसको तथा हन् , ग्रह और दृश् धातुओंको 'णिच' के परे जो २ अंङ्ग कार्य होते हैं वे कार्य स्य, सिच् , सीयुट् और तासको परे भाव तथा कर्मका अर्थ गम्यमान रहने पर विकल्पसे हों, एवं स्य, सिच, सीयुट और तासको चिण्वद्भावपक्षमें इटका आगम भी हो।
akam । जाता है। यथा-"अनूभूयते आनन्द रचैत्रेण? इत्यादि। यहां अनुपूर्वक भूधातु अनुम- लघुसिद्धान्तकौमुदी भाविष्यते-भविष्यते । भूयताम् । अभूयत । भाविषीष्ट-भविषीष्ट । चिण भाव- कर्मणोः शश६६ च्लेश्चिण स्याद्भावकर्मवाचिनि तशब्दे परे । अभावि । प्रभावि- ध्यत-भविष्यत । अकर्मकोऽप्युपसर्गवशात्सकर्मकः । अनुभूयते श्रानन्दश्चैत्रेण गुणे अवादेशे भवितेति । ण्यन्तात् 'भावि' इत्यस्मात् कर्मणि प्रत्ययेऽपि भाविता' इति भवति । तत्र चिण्वद्धावे इति च कृते तस्याभीयत्वेनासिद्धत्वाणिलोप इति विशेषः । अनविण्यद्भावपले इटि गुणे अयादेश 'भावयिता' इति बोध्यम् । भाविषीष्ट ( ई० २०)-भूधातो वे आशीलिङि 'भावकर्मणोः' इत्यात्मने- पदवाल्लिङस्तप्रत्यये सीयुटि सुन तिथोः' इति सुटि 'लोपो व्योर्वलि' इति यलोपे 'स्यसिच' इति चिण्वद्भावे इटि च कृते वृद्धौ आवादेशे उभयोः सकारयोः षत्वे ष्टुत्वे भाविषीष्ट' इति । चिण्वद्भावे तु 'भविषीष्ट' इति । अभावि-भूधातोर्भावे लुङि 'भावकर्मणोः' इत्यात्मनेपदे लुङस्तप्रत्यये अटि च्लो 'चिण भावकर्मणोः' इति उल्लेश्चिणि वृद्धौ भावादेशे 'चिणो लुक्' इति तलोपः । चिणभाव-दिल' के स्थानमें चिण आदेश हो, भाव और कर्मवाची शब्दके परे। अकर्मकोप्युपसर्गवशासकर्मका-अकर्मक धातु भी उपसर्गवशात् सकर्मक हो N वार्थक होनेसे सकर्मक हो गया और उससे कर्ममें भी प्रत्यय सिद्ध हुआ। कर्म उक्त होने पर कर्मसे प्रथमा और कर्ता अनुक्त होनेपर कांसे तृतीया विभक्ति होती है। एवं कर्मके एक- वचन रहनेपर क्रिया प्रथम पुरुषके एकवचन द्विवचन रहनेपर द्विवचन और बहुवचन रहने पर बहुवचन होती है। केवल युष्मद् कर्म रहनेपर मध्यम पुरुषकी और अस्मद् कर्म रहने पर उत्तम पुरुषकी क्रिया होती है। यथा-चैत्रेण आनन्दः अनुभूयते, चैत्रेण आनन्दौ अतुभूयेते, चैत्रेण आनन्दाः अनुभूयन्ते । एवं चैत्रेण त्वम् अनुभूयसे, चैत्रेण युवाम् अनुभूयेथे, चैत्रेण यूयम् अनुभूयध्वे । चैत्रेण अहम् अनुभूये, चैत्रेण आवाम् अनुभूयावहे, चैत्रेण वयम् अनुभूयामहे । ( इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना) नोट:-अकर्मक धातु भी ण्यन्त होनेपर सकर्मक हो जाता है और सकर्मक होनेपर उससे कर्ममें भी प्रत्यय होने लगता है तथा कर्मानुसार क्रिया होती है। यथा कर्ता में रामः भवति कृष्णः तं प्रेरयति इति कृष्णः रामं भावयति । कर्म में----कृष्णेन रामः भाव्यते, रामौ भात्येते, रामाः भाव्यते । एवं-कृष्णेन-वं माव्यसे, युवां मान्थे, यूर्य भाव्यध्वे । अई भाव्ये, आवाम् माव्यावहे, वयम् आव्यामहे । द्विकर्मक धातुओंके किस कर्ममें लकार होगा इसको व्यवस्था निम्न है:-- 'गौणे कर्मणि दुसादेः प्रधाने नीहाण्वहाम् ।।
। आवकर्मन] इन्दुमती टीकाद्वयोपेता। त्वया मया च । अनुभूयेते । अनुभूयन्ते । त्वमनुभूयसे । अहमनुभूये। अन्वभावि ! अन्वभाविषाताम्-अन्नमविषाताम् । णिलोपः । भाव्यते। भावयाञ्चके। भाव- याबचमचे। भानयामासे । चियदिद। आभीयत्वेनाऽसिद्धत्वाणिलोपः । भानि- ता। भावयिता । भाविष्यते-भावयिष्यते। अभाव्यत। भाव्येत। आविषीष्ट-भाव- थिषीष्ट । अभावि । अभाविधाताम्-अभावयिषाताम् । बुभूष्यते। बुभूषाञ्चक्रे ! बुभूषिता । बुभूषिष्यते । बोभूथ्यते । बोभूयते । अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः । स्तूयते विष्णुः । स्ताविता-स्तोता। स्ताविष्यते-स्तोष्यते । अस्तावि । अस्ताविषाताम्- अस्तोषाताम् । ऋ गतौ । गुणोऽीति गुणः। श्रर्यते। स्मृ स्मरणे । स्मर्यते । सस्मरे । उपदेशग्रहणाचिण्वदिट् । आरिता-अर्ता । स्मारिता-स्मर्ता । अनिदिता- मिति नलोपः। सस्यते । इदितस्तु नन्धते । सम्प्रसारणम्-इज्यते । तनोतेर्यकि अस्तावि ( ई० ३८, ४०)-'टु' इत्यत्र षस्य सत्त्वे ष्टुत्वनिवृत्तौ 'स्तु इति । तस्मात् कर्मणि लङि 'भावकर्मणोः इत्यात्मनेपदत्त्वाल्लुङस्तप्रत्यये अटि च्लौ "विण भावकर्मणोः' इति च्लेश्चिगि वृद्धौ पावादेशे विणो लुक्' इति तस्य लुकि 'अस्तावि' इति । आरिता (ई० ४५ )----धातोः कर्मणि लटि 'भाचकर्मणोः' इत्यात्मनेपद- स्वाल्लुटः स्थाने तप्रत्यये तासि 'स्यसिच्' इति चिण्वदिटि चिण्वद्भावाद् 'श्रचो ब्णिति' इति वृद्धौ रपरत्वे तस्य डादेशे डिवादभस्यापि टेलोपे 'आरिता' इति । इज्यते (ई० ३१) यजधातोः कर्मणि लटि 'भावकर्मणोः' इत्यात्मनेपदे- बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया । प्रयोज्यकर्मपयन्येषां ण्यन्तानां लादयोः मताः ।। अर्थात् दुह्, याच् , पच् , दण्ड रुधि, प्रच्छि, चि, ब्रू, शासु, जि, मन्थ मुव् इन धातुओं के ( अकथितञ्चेति सूत्रविहित ) गौणकर्ममें लकारहोता है। ( इसलिये गौण कर्मसे ही प्रथमा विभक्ति होती है, यथा 'गोदुलते पयः । नी, ह, कृषु तथा वह धातुओंके (अकथितञ्च से भिन्न सूत्रविहित ) प्रधान कर्ममें लकार होता है, ( इस लिये प्रधान कर्मसे प्रथमा विभक्ति होती है) यथा अजाग्राम नीयते । बुद्धयर्थक, भक्षार्थक और शब्द- कर्मक धातुओंके (गतिबुद्धि' सूत्रर्विहित गौण या तदतिरिक्त सूत्रविहित प्रधान) दोनों कर्मों में स्वेच्छासे लकार होता है-(इसलिये प्रधानाऽप्रधान उमय कर्मोसे प्रथमा विभक्ति होती है) यथा 'बोध्यते माणवकं धर्मः, माणवको धर्मम्' इति वा । अन्येषां-पूर्वोक्तोंसे अन्य अर्थात् ण्यन्त जो-गत्यर्थक, अकर्मक तथा 'हकोरन्यतरस्यान्' इस सूत्रोपात्त कृञ्ज धातुओंके प्रयोज्य कर्ममें लकार होता है (अतः प्रयोज्य कर्मसे प्रथमा विभक्ति होती है) यथा मासमास्यते मागवकः, हार्यते कार्यते ना भृत्यः कटं देवदान । बनोतेयंकि-'तन्' धातुको अकारान्त आदेश हो, यक्के परे, विकल्पसे । 'सपर , लघुसिद्धान्तकौमुदी ४४४तनोतर्थकि श्राकारोऽन्तादेशो वा स्यात् । तायतै-तन्यते । तपोऽनुताये चाश६॥ तपश्च्लेश्चिण न स्यात् कर्मकर्तर्यनुतापे च। अन्वतप्त पापेन । घुमा- स्थेतीत्त्वम् । दीयते । धीयते । ददे। आतो युक् चिण्कृतोः ७३॥३३श्राद- न्तानां युगागमः स्याञ्चिणि किंगति कृति च । दायिता-दाता । दायिषीष्ट-दासीष्ट । श्रदायिषाताम् । भज्यते । मल्लेश्च चिणि ६४।३३। नलोपो वा स्यात् । श्रभाजि- अभजि । लभ्यते । विभाषा चिण्णमुलोः ७१११६६ । लभेर्नुमागमो वा स्यात् ।' लम्भि-अलामि। ॥ इति भावकर्मप्रकरणम् ॥ . लटस्तप्रत्यये टेरेत्ने यकि 'वनिस्वाप' इति सम्प्रसारणे पूर्वरूपे 'इज्यते' इति । अन्वतप्त----‘अनु' पूर्वात् तप्धातोः कर्मणि लुङस्तप्रत्यय अटि यणि 'ब्ली 'चिण भावकर्मणोः' इति च्लेश्चिणि प्राप्ते 'तपोऽनुतापे च' इति तनिषेधे च्ले सिचि 'मलो झलि' इति सलोपे 'अन्वतन्त, पापेन इति । पापेनेति कर्तरि तृतीया। ननु अनुपूर्नस्य तपेः पश्चात्तापार्थकत्वे असंगतिः, नहि पापस्य सूर्यादिवत्तपनशक्तिरस्ति, शोकार्थकत्वे तु अकर्मकत्वापत्या कर्मणि लकार एव नेति चेन्न, अनुपूर्वकस्या तधातोः उपसर्गवशात् अभिहननार्थके प्रवर्तमानत्वेन सकर्मकत्वस्य जागरूकत्वात् । अभाजि (ई० ४६, ४७, ५०, ५५)-भन्ज्धातोः कर्मणि आत्मनेपदे लुब्स्तप्रत्यये अटि फलौ 'चिण भावकर्मणोः' इति च्लेश्चिणि 'भजेश्च चिणि' इति पाक्षिके नलोपे 'अत उपधायाः' इति वृद्धौ ‘चिणो लुक्' इति तलोपे 'अभाजि' इति! अलम्भि ( ई० २२, ३९, ४८) लभ्धातोः कर्मणि आत्मनेपदे लुरुस्त प्रत्यये अटि च्लो 'चिण भावकर्मणोः' इति च्लेश्चिणि 'चिणो लुक्' इति तलोफे 'विभाषा चण्णमुलीः' इति जुमि अनुस्वारे परसवर्णे 'अलम्भि' इति । धातुसे पर चिल' को णिच नहीं हो, कर्म-कर्ता और अनुताप अर्थमें। आतो-आदन्त धातुको 'थुक्का आगम हो, चिणके परे और जित्-णित-कृतके परे । मलेश्व-'मञ्च' धातुके नकारका लोप हो, 'णिच'के परे, विकल्पसे। विभाषा-'लभ' थातुको नुम् हो, णिच् और शमुलके परे, विकल्पसे। नोट:-कर्तृवाच्यमें कृदन्तकी क्रियाकर्ताका विशेषण और कर्म वाच्यमें कर्मका विशेषण होती है और भाववाच्यमें नपुंसकलिंगका एकवचनान्त होती है। यथा कर्तृवाच्य- *स अस्मान् उक्तवान् । कर्मवाच्य-'तेन वयं उता। भाववाच्य-'तेन उक्तम्। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें भावकमनकरण समाप्त हुआ।
अध कर्मकर्तृप्रकरणम् यदा कमव कर्तृत्वेन विवक्षितं तदा सकर्मकाणामप्यकर्मकत्वात्कर्तरि भावे च - लकारः । कर्मवत्कर्मणा तुल्यक्रियः ३१११८७ । कर्मस्थया क्रियया तुल्यक्रिया कर्ता कर्मवत्स्यात् । कार्यातिदेशोऽयम् । तेन यगात्मनेपदचिचिण्वदिटः स्युः । पच्यते फलम् । भियते काष्ठम् । अपाचि । अमेदि । भावे-भिद्यते काष्ठेन । ॥ इति कर्मकर्तृप्रकरणम् ॥ BREENERALLAnotSEURE SurAIRTE पच्यते फलम् ( ई० ४५, ५०)-गोपालः फलं पचतीत्यत्र गोपालस्य कर्तृ- त्वेन अविवक्षायां फलरूपस्य कर्मण एच कर्तृत्वेन विचक्षायां 'पच्' धातौरकर्मकत्वात् कर्तरि लटि लटा कर्तुरुक्तत्वात् प्रथमायां 'कर्मवत्कर्मणा तुल्यक्रियः' इति फलस्य कर्तुः कर्मवद्भावात् 'भावकर्मणोः' इत्यात्मनेपदे लटस्तप्रत्यये टेरेत्वे 'सार्वधातुके य इति यकि मुच्यते फलम्' इति सिद्धम् । भिद्यते काधन (ई० २१, ५१, ५३) रथकारः काष्ठं भिनतीत्यत्र रथकारल्य कर्तृत्वेन अविवक्षायो काष्ठरूपस्य कर्मण एव कर्तृत्वेन विवक्षायां सिद्' धातोरकर्म- कत्वात् कर्तरि लटि लटा कर्तुरुक्तत्वात् प्रथमायां 'कर्मवत्कर्मणा तुल्यक्रियः' इति काष्ठस्य कर्तुः कर्मवद्भावात् 'भावकर्नणोः' इत्यात्मनेपदे लटः स्थाने तप्रत्यये टेरेत्वे 'सार्वधातुके यक्' इति यकि 'भिद्यते काष्ठम्' इति जातम् । ( भावे तु काष्ठस्य कर्तुरनुक्तत्वात्तत्र तृतीयायां 'भियते काछेन' इति भवति) सदा-जब कर्मकी ही कर्तृत्वेन विवक्षा की जाय तब सकर्मक धातु भी अकर्मक हो जाते हैं और उनसे भाव तथा कर्ता में लकार होता है। कर्मवल्कर्म-कर्मस्था ( कर्ममें वर्तमान ) जो क्रिया, उसके समान ही क्रिया है जिसकी ऐसा जो कर्ता, वह कर्मवत् हो, इससे यगादि होते हैं। (जहां कर्ममें क्रियाकृत विलक्षणता दिखाई पड़े वहां कर्मस्था क्रिया होती है। जैसे पके ओदनमें।) नोट-कर्म ही यदि कर्ता हो, अर्थात् क्रियाका कतृत्व यदि कर्म में आरोपित हो तो 'कर्म कर्ता हो जाता है और कर्मकर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है-अन्य कर्म पद नहीं रहता तथा क्रियाका रूप कर्मवाच्यकी क्रियाके तुल्य होता है। यथा-'काष्ठं भिद्यते स्वयमेव कार्य करने के समय जो 'कर्मकारक' कर्ताके सुखकर निजगुणोंसे स्वयं ही सिद्ध होता है, उसे 'कर्मकर्ता' कहते हैं। कहा भी है:- क्रियमाणं तु यत् कर्म स्वयमेव प्रसिध्यति । सुकरैः स्वैर्गुणैः कर्तुः 'कर्मकर्तेति तद्विदुः॥ इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें कर्मकर्तृप्रकरण समाप्त हुआ। ११ ल० Peo স্বাস্থ্য अभिज्ञावचने लुट् ३२२१११२। स्मृतिबोधिन्युपपदे भूतानवतने धातोल । लोऽपवादः । वस निवासे । स्मरसि कृष्ण ! गोकुले वत्स्यामः । एवं "बुध्यसे 'चेतयसे' इत्यादिप्रयोगेऽपि । न यदि २२।११३। यद्योगे उक्तं न। अभिजाना- सि कृष्ण ! यद्वने अभुमहि ? । लट् स्मे ३।२।११८ लिटोऽपवादः । यजति स्म युधिष्ठिरः। वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा ३।३।१३११ वर्तमाने ये प्रत्यया उक्तास्ते वर्तमानसामीप्ये भूते भविष्यति च वा स्युः। कदाऽऽगतोऽसि ? श्रयमा- गच्छामि, यमागमं वा । कदा गमिष्यसि । एष गच्छामि, गमिष्यामि वा । हेतुहेतुमतोर्लिङ ३।३। १५६ । हेतुहेतुमतोर्लिङ वा स्यात् । कृष्णं नमेच्चत्सुखं यायात् । कृष्णं नस्यति चेत्सुखं यास्यति । भविष्यत्येवेष्यते। नेह-हन्तीति मा श स्मरसि कृष्ण! गोकुले वत्स्यामः ( ई० ३५, ५१)-स्मरसीत्युपपदात् 'बस्' धातोर्भूतानद्यतने लङि प्राप्ते तम्प्रबाध्य 'अभिज्ञावचने लुट्' इति लुटि तत्स्थाने मसि 'स्यतासी लुलुटोः' इति स्यप्रत्यये 'सः स्यार्धधातुके' इति सस्य तकारे 'अतो दीर्थो यनि' इति दीर्घे सस्य तत्वे विसर्ग तत्सिद्धिः। यजति स्म युधिष्ठिरः (ई० ४६, ५०, ५२, ५४, ५६)-अत्र 'स्म' शब्दो भूतकालद्योतकः। ततश्च यज्धातोः लिटि प्राप्ते तम्प्रबाध्य 'लट् स्म' इति स्मयोगे लटि तिपि शपि तत्सिद्धिः । कदा गमिष्यसि ! एष गच्छामि (ई० ४५ )-कदा गमिष्यसीति प्रश्ने एष गच्छामीत्युत्तरम् । अत्र भूधातोः भविष्यति लुटि प्राप्ते तम्प्रबाध्य 'वर्तमानसा- मीप्ये वर्तमानबद्वा' इति वर्तमानवद्भावाद् लटि तत्स्थाने मिपि शपि 'इषुगमि- पा वि कर्मक अभिशावचने --स्मृतिबोधक पद उपपद रहने पर भूत-अनद्यतन अर्थमें धातुसे 'लट लकार हो। न यदि-स्मृतिबोधक पद उपपद रहने पर 'यत्' के योगमें 'लट्' नहीं हो। लट् स्मे-'स्म' के योगमें धातुसे 'लिट्' का अपवाद लट् लकार हो । वर्तमानलामीथे वर्तमान कालमें जो प्रत्यय कहे गये हैं, वे वर्तमानके समीप भूत और वर्तमानके समीप भविष्यत् कालमें भी हों, विकल्पसे । हेतुहेतु-हेतुहेतुमद्भाव (कार्यकारणभाव ) गम्यमान हो तो भविष्यत् कालमें लिङ्ग लकार हो, विकल्पसे ।
, स्युः। व्यालीयरः३।१।६६ धातोरेते प्रत्ययाः स्युः । एषित- कृत्या ] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। पलायते। विधिनिमन्त्रणैति लिङ। विधिः प्रेरणं भृत्यादेनिकृष्टस्य प्रवर्तनम् । बजेत । निमन्त्रण-नियोगकरणम् , अावश्यक श्राद्धभोजनादौ दौहित्रादेः प्रवर्त- जम् । इह भुजीत । आमन्त्रणं कामचारानुज्ञा । इहाऽऽसीत । अधीष्टं सत्कार- पूर्वको व्यापारः । पुत्रमध्यापयेद् भवान् । सम्प्रश्नः सम्प्रधारणम् । किं भी वेदम- यीयीय उत तर्कम् ? प्रार्थनं याच्या। भो भोजनं लभेय । एवं लोट् । ॥ इति लकारार्थप्रकरणम् ॥ অথ স্কুল জুগ্ধতালু धातोः ३! १९६१। श्रा तृतीयाध्यायसमाप्तेर्ये प्रत्ययास्ते धातोः परे स्युः । कृदतिलिति कृत्संज्ञा । वाऽसरूपोऽस्त्रियाम् ३॥ ११६४। अस्मिन्धात्वधिकारेऽसरू- पोऽपवादप्रत्यय उत्सर्गस्य बाधको वा स्यात् , स्यधिकारोक्तं विना । कृत्याः ३१६५ ण्वुल्तृचावित्यतः प्राक् कृत्यसंज्ञाः स्युः । कर्तरि कृत् ३।४।६७ कृत्- प्रत्ययः कर्तरि स्यात् । इति प्राप्ते-तयोरेव कृत्यकखालाः ३।४/७०! एते भाव- व्यम् , एधनीयं त्वया । भावे औत्सर्गिकमेकवचनं लीनत्वं च । चेतव्यश्चयनीयो अमां छः' इति छत्वे तुकि श्चुत्वे 'अतो दा? यजि' इति दी तत्सिद्धिः । इति श्रीरामचन्द्रमा व्याकरणाचार्यविरचितायां 'इन्दुमती' टीकायां तिङन्तप्रकरणम् समाप्तम् । एधितव्यम् (ई० ४३ )-एधातोः 'कर्तरि कृत्' इति सूत्रं प्रबाध्य विधिनिमन्त्रण - (पृ० ८६ देखें) इस प्रकार 'इन्दुमती' टीका में लकारार्थप्रकरण समाप्त हुआ। धातोः-(यह अधिकार सूत्र है ) तृतीय अध्यायको समाप्ति पर्यन्त जो (वक्ष्यमाण तब्यदादि ) प्रत्यय हैं, वे धातुसे परमें हों। वासरूपो-हस धात्वधिकार में असरूप जो अपवाद प्रत्यय, वह उत्सर्गका बाधक हो विकल्पसे, स्यविकारोक्त (प्रत्ययों) को छोड़कर। कृत्याः-वुलत चौ' सूत्रसे पूर्व उक्त प्रत्यय कृ-संज्ञक हों । कर्तरि-कृत्प्रत्यय कर्ता हो । तयोरेव-कृत्य प्रत्यय, क्त प्रत्यय और खलर्थ प्रत्यय भाव और कर्ममें ही हों। सध्यत्तव्या-व्यन् प्रत्यय, तव्य प्रत्यय और अनीयर् प्रत्यय धातुसे ही हों (भाव कर्ममें)। " বলুবিল্লাল্টীয়ুবী वा धर्मस्त्वया । केलिमार उपसंख्यानम् ! पचेलिमा भाषाः । पक्तव्या इत्यर्थः । भिदेलिमाः सरलाः । भेत्तव्या इत्यर्थः । कर्मणि प्रत्ययः । कृत्यल्युटो बहुल चिरान्तिः कचिदन्तिः कचिद्विभाषा कचिदन्यदेक। विविधान्न बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधं बाहुलकं वदन्ति ॥ १ ॥ स्नात्यनेनेति स्नानीयं चूर्णम् । दीयतेऽस्मै दानीयो विप्रः । अचो यह ३१ श६७ अजन्ताद्धातोर्यत् स्यात् । चेयम् । ईधति ६४॥ ३५॥ यति परे भारत ईस्यात् । देयम् । ग्लेयम् । पोरदुपधात् ३११।६८) पदर्गान्ताददुपधाद्यत्स्यात् ? ण्यतोऽपवादः । शप्यम् । लभ्यम् । एतिस्तुशास्बृजुषः क्या३।१११०६/ एभ्यः 'तयोरेच कृत्यक्तखलाः' इति नियमाद्भावे 'तव्यत्तत्र्यानीयरः' इति तव्यप्रत्यय 'श्रार्धधातुकल्येड्वलादेः' इति इटि ‘एधितव्य' इति स्थिते 'कृत्तद्धितसमासाश्च' इति प्रातिपदिकसंज्ञायां सौ 'भावे श्रौत्सर्गिकं क्लीवत्वम्' इति क्लोवत्वात् सोरमि पूर्वह 'एधितव्यम्' इति सिंद्धम् । चेयम्-चेतुं योग्यं चेयम् । 'चिधातोः 'अची यत्' इति यत्प्रत्यये प्रार्धधातुकं शेषः' इति तस्यार्धधातुकत्वे गुणे कृदन्तत्वात् सौ सौरमि पूर्वरूपे तत्सिद्धिः । देयम् (ई० ३३)-दातुं योग्यं-देयम् । दाधातोः 'अचो यत्' इति यत्प्रत्यये 'ईद्यति' इति धातोराकारस्य ईकारे गुणे कृदन्तत्वात्सौ अमि पूर्वरूपे तत्सिद्धिः। शप्यम् (ई० २९) शप्तुं योग्यं-शप्यम् ‘शप् श्राक्रोशे' इत्यस्माद्धातोः 'पौर- दुपधात्' इति यत्प्रत्यये सोरमि पूर्वरूपे तत्सिद्धिः । इत्यः (ई० २९)-एतुं योग्यः- इत्यः । इण् धातोः 'एतिस्तुशास्बृजुषः क्यप्' इति कर्मणि क्यपि 'हस्वस्थ पिति कृति तुक्' इति तुकि कित्वाद्गुणाऽभावे विभक्तिकार्ये 'इत्यः' इति । केलिमर-धातुसे केलिभर प्रत्यय हो (भाव, कर्ममें) कृत्यल्युटो-कृत्य प्रत्यय और ल्युट् प्रत्यय बहुल प्रकार (निम्न चार प्रकार ) से हों। कचित् प्रवृत्तिः-कहीं अप्रासमें भी प्राप्त हो जाना, कहीं प्राप्तमें भी अप्राप्त होना, कहीं विकल्पसे प्राप्त होना और कहीं इन तीनोंसे मी मिन्न अर्थात् विकल्पमें भी नित्य ही प्राप्त हो जाना। ( यथा 'अवङ्स्फोटा- यनस्य'-'गवाक्षः') इस प्रकार अनेक तरह से सूत्रोंका विधान समझ कर उनके चार भेद कहे गये हैं। अचो यत्-अजन्त धातुसे यत् प्रत्यय हो। ईति-आत्' को 'ई' हो, यत् के परे । पोरदु-पवर्गान्त अदुपध धातुसे यत् प्रत्यय हो । ( ण्यत्' का यह अपवादक है)। एतिस्तु-'इ' आदि धातुओंसे 'क्यप् प्रत्यय हो । ..
कृत्यप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। क्यप् स्यात् । हस्वस्य पिति कृति तुक ६।११७११ इत्यः । स्तुत्यः । शासु अनु. शिष्टौ । शास इदङहलोः ६४.३४। शास उपधाया इत्स्यादङि हलादौ विति । शिष्यः । वृत्यः । श्रात्यः । जुष्यः । मुजेविभाषा ६।१।११३ ! वृजेः क्यच्चा स्यात् । मृज्यः । ऋहलोर्ण्यत् ३ । १ । १२४] ऋवर्णान्ताद्धलन्ताच्च धातोर्ण्यत् । कार्यम् । हार्यम् । धार्यम् । चजोः कुघिणण्यतोः ७३।१२। चजोः कुत्वं स्याद्धि- ति ण्यति च परे । मृजेवृद्धिः ७१२ ! ११४। मृजेरिको वृद्धिः स्यात्सार्वधातुकार्य- भातुकयोः । मार्यः । भोज्यं भदये ७२६६/ भोग्यमन्यत् । ।। इति कृत्यप्रकरणम् ॥ . Dounter शिष्यः (ई० ३३,४७,४९)-शासितुं योग्यः-शिष्यः। शास्धातोः 'एतिस्तु- शास्वटजुषः क्यप्' इति कर्मणि क्यपि 'शास इदङ्हलोः' इत्युपधाया इत्वे 'शासि- बसिबसीनां च' इति सस्य षत्वे विभक्तिकार्ये 'शिष्यः' इति । वृत्यः ( ई० २६)-चरितुं योग्यः-वृत्यः। वृधातोः 'एतिस्तुशास्-' इति क्यपि 'हस्वस्य पिति कृति तुक इति तुकि विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः । आइत्यः ( ई० ३५)-प्रादत्तुं योग्यः-आइत्यः । 'आ' उपसर्गक दृधातोः “एतिस्तुशास्-' इति क्यपि 'हस्वस्य' इति तुक्रि विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः । मायः ( ई० २१, २४, २७)-मार्जितुं योग्यः-सृज्यः, मार्यः । स्मृज्धातोः 'मृजेविभाषा' इति विकल्पेन क्यपि कित्वाद्गुणाऽभावे विभक्तिकार्य 'मृज्यः' इति । क्यपोऽभावे 'ऋहलोर्ण्यत्' इति ण्यति "चजोः कु घिण्ण्यतोः' इति जस्य कुत्वे 'भृजे. वृद्धिः' इति वृद्धौ रपरत्वे विभक्तिकार्य 'मायः' इति च सिद्धं भवति । इति 'इन्दुमती'टीकायां कृत्यप्रकरणम् । .. हस्वस्य-हस्व को तुक हो, पित् और कृत् प्रत्ययके परे । शास-शास्' धातुकी उपधाको इत्व हो, 'अ' के परे और हलादि कित्-ङित् प्रत्ययके परे । मुजेर्वि-'मृज्' धातुसे क्यप' हो, विकल्पसे । ऋहलो-ऋवर्णान्त और हलन्त थातुसे ‘ण्यत्' प्रत्यय हो । 'चजोः कु-चकार-जकारको कुत्व हो, घित् और ण्यित् प्रत्ययके परे। मृजेवृद्धिः----मृधातुके इक्को वृद्धि हो, सार्वधातुक और आर्धधातुकके परे । भोज्यं-भक्ष्य अर्थ में 'मोज्य' निपातन हो। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें कृत्यप्रकरण समाप्त हुआ। 6800 RANTEE অঞ্জ রুকু লক্সস্তা एबुल्तृचौ ३१ १३ १३३६ धातोरेती स्तः। कर्तरि कृदिति कर्थे । युवोरना कौ ७शश 'यु' 'वु' एतयोरनाको स्तः । कारकः । कर्ता । नन्दिअहिपचादि- भ्यो ल्युणिन्यवः३॥ १ ॥ १३४ । नन्द्यादेयुः, अत्यादेणिनिः पचादेरच् स्यात् । नन्दयतीति नन्दनः । जनमर्दयतीति जनार्दनः । लवणः । श्राही । स्थायी । मन्त्री । पचादिराकृतिगणः । इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः ३११ । १३५ | एभ्यः कः स्यात् । बुधः । कृशः । ज्ञः । प्रियः । किरः । आतश्योपसर्गे ३।१११३६॥ प्रज्ञः । सुग्लः । गेहे कः३।१।१४४गेहे कर्तरि ग्रहः कः स्यात् । गृहम् । कर्मण्यण ३।२।१ । कर्मण्युपपदे धातोरण प्रत्ययः स्यात् । कुम्भं करोतीति कुम्भकारः । आतोऽनुपसर्गे कः ३॥ २॥ ३॥ श्रादन्ताद्धातोरनुपसर्गात्कर्मण्युपपदे । कः स्यात् । अणोऽपवादः। आती लोप इटि च । गोदः। धनदः। कम्बलदः । श्रानुपसर्गः .. .. जनार्दनः-जनमर्दयतीति विग्रहे 'अर्द हिंसायाम्' इति धातोः णिचि 'नन्दि- अहि-' इति ल्युप्रत्यये 'युवोरनाको' इति योरनादेशे णिलोपे 'कर्तृकर्मणोः कृति' इति जनमिति कर्मणि षष्ठीविभक्तो षष्ठीसमासे सुब्लुकि 'एकदेशविकृतमनन्यवत्' इति: प्रातिपदिकत्वात् सौ रुत्वे विसर्ग 'जनार्दनः' इति सिद्धम् । लवणः ( ई० ५१ ) लुनातीति-लक्षणः । 'लू छेदने' धातोः 'नन्दिनहि इति ल्युप्रत्यये 'युवोरनाको' इति योरनादेशे गुणे श्रवादेशे निपातनात् णत्वे विभ- क्तिकार्य तत्सिद्धिः । प्रज्ञः ( ई० ० २९) प्रकर्षण जानातीति-प्रज्ञः । गृहम् ( ई० २६ ) गृह्णाति धान्यादिकमिति-गृहम् । प्रधातोः 'गेहे का इति कप्रत्यये 'ग्रहिज्येति सम्प्रसारण पूर्वरूपे स्वादिकायें 'गृहम्' इति । कुम्भकारः (ई० ४२,५५)-कुम्भं करोतीति विग्रहे 'तत्रोपपदं सप्तमीस्थम्' इति कुम्भशब्दस्योपपदसंज्ञायां सत्यां कुम्भोपपदात् कृधातोः “कर्मण्यण' इत्यणि एबुल्तृचौ-धातुसे ण्वुल और तृच् प्रत्यय हों, कर्ता । युवोरनाकौ-अनुनासिक 'यु' और 'बु' को क्रमसे 'अन' 'अक' आदेश हो । नन्दिग्राहि-नन्यादिसे 'ल्यु' ग्रह्यादिसे 'णिनि' और पचादिसे 'अन्' प्रत्यय हो । इगुपध-इगुपध धातु तथा ज्ञा, प्री और क धातुओंसे 'क' प्रत्यय हो । आतश्वोपसर्ग-उपसर्ग उपपदक आदन्त धातुसे 'क' प्रत्यय हो। मोहे-गेह कर्ता रहने पर ग्रह धातुसे कप्रत्यय हो। कर्मण्यण-कर्म उपपद रहनेपर धातुसे अण् प्रत्यय हो । आतो-कर्म उपपद रहने पर पूर्वकृदन्तप्र०] इन्दुमती-टीकाद्वयोघेता। १६७ किम् ? गौसन्दायः। *मूलविभुजादिभ्यः कः । मूलानि विभुजति मूलविभुजो रथः । प्राकृतिगणोऽयम् । महोघः । कुनः । चरेष्ठः ३।२।१६। अधिकरण उपपदे। कुरुचरः। भिक्षासेनादायेषु च ३।२।१७ भिक्षाचरः। सेनाचरः। श्रादायेति ल्यबन्तम्। श्रादायचरः। कृयो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु ३।२।२०॥ एषु द्योत्येषु करोतेष्टः स्यात्। अतः कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्णीष्वनव्ययस्य ८।३।४६॥ श्रादुत्तरस्यानव्य- यस्य विसर्गस्य समासे नित्यं सादेशः स्यात्करोत्यादिषु परेषु । यशस्करी विद्या । श्राद्धकरी । बचनकरः । एजेः खश ३।२।२८। ण्यन्तादेजेः खश् स्यात् । अरुद्धि- षदजन्तस्य मुम्६।३।६७ अरुषो द्विषतोऽजन्तस्य च मुमागमः स्याखिदन्ते परे, न त्वव्ययस्य । शित्त्वाच्छबादिः । जनमेजयतीति जनमेजयः। प्रियवशे बदः 'अचो मिति' इति वृद्धौ परे 'कर्तृकर्मणोः कृति' इति कर्मणि षष्ठयां 'गति- कारके ति परिभाषया सुवुत्पत्तेः प्रागेच 'कुम्भ अस् कार' इत्यलौकिकविग्रहे 'उपपद- मतिब्' इति समासे सुब्लुकि एकदेशविकृतत्यानन्यत्वात् प्रातिपदिकत्वेन सौ सस्य रुत्वे विसर्गे 'कुम्भकारः' इति । यशस्करी ( ई० ४६ )-विद्यायाः यशोहेतुत्वात् यशः करोतीति विग्रहे धातोः 'कृयो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु' इति टप्रत्यये गुखौ रपरे 'कर्तृकर्मणोः कृति' इति कर्मणि षष्ठयां गतिकारके ति सुबुत्पत्तेः प्रागेव 'यशस् असू कर' इति स्थिते 'उपपदमतिङ्' इति समासे सुब्लुकि सस्य रुत्वे विसर्गे 'यशः कर' इति स्थिते 'श्रतः कृकमि-' इति विसर्गस्य सत्वे स्त्रीत्वविवक्षायां 'टिड्ढाणम्--' इति कीपि 'यस्येति च' इत्यलोपे उयन्तत्वात् सौ हल्ङयादिना सुलोपे उक्तं रूपं सिद्धम् । जनमेजयः (ई० ४७,५१,५४)-जनमेजयतीति विप्रहे ण्यन्तादेज्धातोः 'एजे: खश्' इति खशि अनुबन्धलोपे शित्त्वात् सार्वधातुकसंज्ञायां शापि गुणे अयादेश अनुपसर्गक आदन्त धातु से 'क' प्रत्यय हो । मूलविभुजा--मूलविभुजादिसे 'क'प्रत्यय हो। चरेष्टः-अधिकरण उपपदक 'चर्' धातुसे 'ट' प्रत्यय हो । भिक्षासेना-मिक्षा, सेना और आदाय कर्मोपपदक 'धातुसे 'ट' प्रत्यय हो । कृमो हेतु-कर्मोपपदक 'कृ' धातुसे 'ट' प्रत्यय हो, हेत्वादि अर्थ गम्यमान रहने पर । अतः कृ कमि-अत्' से पर अनव्यय- सम्बन्धी विसर्गके स्थानमें सत्व हो, कृ, कमि, कंसादि उत्तर पदके परे, समासमें । एजेः खर-कर्मोपपदक ण्यन्त 'एज्' धातुसे 'खश्' प्रत्यय हो। अरुषि-अरुष , द्विषत् और अजन्तको मुगागम हो, खिदन्त पदके परे-अव्ययको छोड़कर । प्रियवशे:-'प्रिय' और 'वश' कर्मोपपदक 'वद्' धातुसे 'खच् प्रत्यय हो । .
eNarurpoarneturernampawan romamarpattarahmHOARMIRatane ত্তিাক্ষী खच् ३।२।३८ प्रियंवदः । वशंवदः । अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ३१ २। ७६! भनिन् कनिष् बनि बिच् एते प्रत्यया धातोः स्युः । जेडशि कृति ७१२।८ शादेः कृत इण् न स्यात् । शृ हिलायाम् । सुशर्मा । प्रातरित्वा । विबलोरनुनासिक- स्थाऽऽत् ६॥ ४॥ ४११ अनुनासिकल्याऽऽत्ल्यात् । विजायते इति विजावा । ओण अमन्यने । भावाचा विच्छ । हम रिष हिंसायाम् । रोट् । रेट् । सुगया । किए च २२१७६। अयमपि दृश्यते । उखासत् । पर्णध्वत् । बाहट् ! सुप्यजातौ णिनि- स्ताच्छील्ये २२७८ अजात्यर्थे सुपि धातोनिनिस्ताच्छील्ये वोत्ये । उष्णभोजी। मनः॥२८श सुपि मन्यतेणिनिः स्यात् । दर्शनीयमानी । आत्ममाने खश्च ३१२।८३। स्वकर्मके भनने वर्तमानान्मन्यतेः सुपि खश्' स्यात् , वाणिनिः । पूर्वरूपे कर्मणि षष्ठयां 'जन श्रम एजय' इत्यलौकिकविग्रहे सुबुत्पत्तेः प्रागेव उप- पदसमासे सुब्लुकि 'भारुषि' इति मुमि विभक्तिकायें उक्तं रूपं सिद्धम् । वशंवदः (ई० २१, ५२)-शं वदतीति वित्रहे विद्धातोः प्रियवशे' इति खचि कर्तृकर्मणोः कृतिः' इति कर्मषष्ठयां गतिकारे ति सुबुत्पत्तेः प्रागेव समास मुब्लकि 'अरुषि' इति मुनि भत्यानुस्वारे विभक्तिकार्य तत् सिद्धम् । सुशर्मा (ई० ३८,५७)-सुलु शृणातीति विग्रहे सुपूर्वकात् धातोः 'अन्येभ्यो- ऽपि दृश्यन्ते' इति मनिन्प्रत्यये अनुबन्धलोपे गुण रपरत्वे 'नेड्वशि कृति' इतीण- निषेधे कृदन्तत्वात् सौ दीर्वे सुलोपे नलोपे 'सुशर्मा' इति निष्पन्नम् । विजावा ( ई० २६ ) विजायत इति-विजावा । विपूर्वात् 'जनी प्रादुर्भावे' इति धातोः शान्येभ्योऽपि दृश्यन्ते' इति वनिपि विड्वनौः' इत्यात्वे सवर्णदी 'विजावन्' इति तस्मात् कृदन्तत्वात् सौ दीर्घ सुलोपे नलोपे 'विजावा' इति । उष्णभोजी (ई० ५०)-उष्णं भुते तच्छीलः इति विग्रहे उष्णोपपदाद् भुज्धातोः 'सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये' इति णिनिप्रत्यये लघूपधगुरो' कर्मणि षष्ठया- मुपपदसमासे कृदन्तत्वात् सौ 'सौ च इति दीर्वे सुलोपे नलोपे तसिद्धिः । अन्येभ्यो-आकारान्त धातुसे भिन्न धातुसे भी मनिन् , कनिम्, वनिप् और विच हों नेवशि-वशादि कृत्प्रत्ययको इट नहीं हो । बिड्वनो-अनुनासिकको भात् हो, विद् और वन्के परे । चिप च-सामान्यतया सभी धातुओंसे किप् प्रत्यय हो (ऐसा देखा जाता है)। सुप्याजाती-अजात्यर्थक सुबन्त उपपद रहनेपर धातुसे 'णिनि' प्रत्यय हो, ताच्छील्य अर्थमें । मन:-सुबन्त उपपदक (दिवादिस्थ) 'मन्' धातुसे 'णिनि' प्रत्यय हो। मारममाने-सुबन्त उपपदक स्वकर्मक मनन अर्थमें वर्तमान (दिवादिस्थ ) भन्' धातुसे SA पूर्वकृदन्तप्र०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। पण्डितमात्मानं मन्यते पण्डितम्मन्यः । पण्डितमानी । खित्यनव्ययस्य ६६६। खिदन्तै परे पूर्वपदस्य ह्रस्वः । ततो मुम् । कालिम्मन्या। करणे यजः ३२२८॥ करणे उपपदे भूतार्थे यजेणिनिः स्यात्कर्तरि । सोमेनेष्टवान् सोमयाजी। अग्निष्टो- मयाजी । दशेः कनिप् । २१ ६४! कर्मणि भूते । पारं दृष्टवान् पारदृश्वा । राज- नि युधि कृत्रः ३ २ ६५] कलिप्स्यात् । युधिरन्त वितण्यर्थः। राजानं योधि- तवान राजयुध्दा । राजकृत्वा । सहे च ३१२१६६ । कर्मणीति निवृत्तम् । सह योधितवान् सहयुध्वा । सहकृत्वा । सप्तम्या जनेर्डः ३॥ २॥ ६७ । तत्पुरुषे कृति बहुलम् ६।३ । १४ । हेरलुक् । सरसिजम् । सरोजम् । उपसर्गे च संज्ञायाम् पण्डितम्सन्यः ( ई० २७, ४९)-पण्डितमात्मानं मन्यते इति विअहे मन्धातोः 'आत्ममाने खच' इति खशि शित्त्वात् सार्वधातुकसंज्ञायां शपि प्राप्त प्रवाध्य 'दिवादियः श्यन्' इति श्यनि पररूपे कर्मषष्ठयामुपपदसमासे 'अरुषिद- जन्तस्य मुम्' इति मुभि विभक्तिकार्ये उक्तं रूपं जातम् । णिनिपने 'पण्डितमानी' कालिम्मृन्या ( ई० २४ )-कालीमात्मानं मन्यते इति विग्रहे 'आत्ममाने खश्च' इति खशि श्यनि पररूपे कर्मषष्ठयामुषपदसमासे सुब्लुकि 'खित्यनव्ययस्य' इति ह्रस्वे 'अरुषि-' इति मुमि अजन्तत्वेन स्त्रीत्वाष्टापि विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः । सोमयाजी (ई० ५१) सोमेन इष्टवानिति विग्रहे सोमोपपदात् यज्धातोः 'करो यजः' इति णिनिप्रत्यये उपधावृद्धौ उपपदसमासे सुब्लुकि कृदन्तत्वात् सौ दीर्चे सुलोपे नलोपे उन्तं रूपं सिद्धम् । सरसिजम् (ई० २३, ३६)--सरसि जातमिति विग्रहे सप्तम्यन्तसरश्शब्दो- पपदाजनधातोः सप्तम्यां जनेः' इति डप्रत्यये डिवाहिलोपे उपपदसमासत्वात् सप्तम्याः लुकि प्राप्ते 'तत्पुरुषे कृति बहुलम्' इति तनिषेधे कृदन्तत्वात् सौ सोरभि पूर्वरूपे 'सरसिजम्' इति । लुकि तु रुत्वे गुणै 'सरोजम्' इति भवति । 'खश' प्रत्यय और चकारात् णिनि' प्रत्यय भी हो। खित्यन-खिदन्त उत्तर पदके परे अध्ययसे भिन्न पूर्व पदको हस्व हो। करणे यजः-करण (संशक सुबन्त ) उपपदक 'यज' धातुसे भूतकालमें 'णिनि' प्रत्यय हो, कर्ता में। दृशे क्रनिप्-कर्मोपपदक 'दृश्' धातुसे भूतकालमें 'कनिप्' प्रत्यय हो । राजनि-कर्मसंज्ञक 'राजन्' शब्द उपपदक 'युष्' तथा 'कृ' धातुसे 'कनिप' प्रत्यय हो। सहे छ-'सह' शब्दोपपदक 'युध्' और 'कृम्' धातुसे 'कनिष्' प्रत्यय हो । लसन्या-सप्तम्यन्त उपपदक 'जन्' धातु से 'ड' प्रत्यय हो। तत्पुरुष-तत्पुरुष समासमें कृदन्त उत्तरपदपरक 'डि' विभक्तिका अलुक् हो, बहुलता (विकल्प) से। उपसर्गच-उपसर्ग उपपदक 'जन्' धातुसे 'ड' प्रत्यय हो संज्ञा में । - , आ -- । लघुसिद्धान्तकौमुदी ARIEE'प्रजा स्यात्सन्तजौ जने' । तक्तवतू निष्ठा ११ ११ २६॥ एतौ निष्ठासंज्ञी स्तः । निष्ठा २२।१०२। भूतार्थवृत्तेर्धातोनिष्ठा स्यात् । तत्र तयोरेवेति भावकर्मणोः 'रकम । कर्तरि वृदिति कर्तरि तवतुः । उकाविती । स्नातं मया । स्तुतस्त्वया विष्णुः । विश्वं कृतवान् विष्णुः । रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः ८।२।४२। रदाभ्यां परस्य निष्ठातस्य नः स्यात् निष्ठापेक्षया पूर्वस्य धातोर्दस्य च। श्र हिंसा- याम् । ऋत इत् । रपरः । गत्वम् । शीर्णः । भिन्नः । छिन्नः। संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः ८।२।४३ । निष्ठातस्य नः स्यात् । द्राणः। ग्लानः । ल्वादिभ्यः सारा४४। एकविंशतेनादिभ्यः प्राग्वत् । लूनः । ज्या धातुः । अहिज्येति संप्रसा- रणम् । हलः ६४ा। अशावयवाद्धलः परं यत्संप्रसारणं तदन्तस्य दीर्घः। जीनः । ओदितश्च पा२।४५। भुजो-भुग्नः । टुओश्वि-उच्छूनः। शुषः कः दा२।५१ भिन्नः ( ई० ३२, ४८, ५०, ५२.)-अमेदि इति भिन्नः। भिद्धातोः कर्मणि 'निष्ठा' इति क्तप्रत्यये कित्त्वाद्गुणाभावे 'रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः' इति निष्ठातकारस्य भिदो दकारस्य च नत्वे विभक्तिकार्य तसिद्धिः। भुनः ( ई० ३१, ३४, ३५)-'भुजो कौटिल्ये' इति धातोः भावे 'निष्ठा' इति क्तप्रत्यये नत्वस्याऽसिद्धत्वात् पूर्व 'चोः कुः' इति जस्य कुत्वे ततः 'भोदितश्च' इति निष्ठातस्य नत्वे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः। उच्छूनः ( ई० २९, ४५) उदश्वत् इति उच्छूनः। उत्पूर्वकात् 'टुओश्वि गतिवृद्धयोः' इति धातोः "निष्ठा' इति क्तप्रत्यये 'वचिस्वपियजादीनां किति' इति सम्प्रसारण पूर्वरूपे 'श्वीदितो निष्ठायाम्' इतीनिषेधे 'हला' इति दीर्धे 'मोदितच' इति निष्ठातकारस्य नत्वे श्चुत्वे छत्वे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः। तक्तवतू-'क्त' और 'क्तवतु' की निष्ठासंञ्चा हो। निष्ठा-भूतार्थवृत्ति धातुसे निष्ठा (क्त और क्तवतु ) प्रत्यय हो। रदाभ्या-रेफ-दकारसे पर निष्ठासंबन्धी तकारको नकार आदेश हो और निष्ठासे पूर्व जो धातुसंबन्धी तकार उसको भी नकार आदेश हो । संयोगा-यण्वान् जो संयोगादि आकारान्त धातु, उससे पर निष्ठासंबन्धी तकार को नकार आदेश हो। वादिभ्यः--एकविंशति (२१) स्वादि धातुओंसे पर निष्ठासंबन्धी तकारको नकार आदेश हो। हला-अंगावयव इलसे पर जो सम्प्रसारण, तदन्त जो अंग, उसको दीर्घ हो। ओदितश्च-ओदित धातुसे पर निष्ठाके तकारको नकार आदेश हो ।
पूर्वकृदन्तप्र०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। निष्ठातस्य कः । शुष्कः । पचो वः दा२।५२१ पक्कः । क्षये । क्षायो मः ८ा। ५३। क्षामः । निष्ठायां सेटि ६४।५२। गोपः । भावितः । भावितवान् । यह हिंसायाम् । दृढः स्थूलबलयोः ७।२।२०। स्थूले बलवति च निपात्यते। दधा- तेहिः ७४|४२| तादौ किति । हितम् । दो दद्घोः ७४|४|| घुसंज्ञकस्य 'दा' इत्यस्य 'द' स्यात् तादौ किति । चत्वम् । दत्तः। लिटः कानज्वा २२२१०६१ कसुश्च ३२।१०७! लिटः कानच् कसुश्च वा स्तः । तखानावात्मनेपदम् । चक्राणः । म्वोश्च ।।६५ मान्तस्य धातोर्नत्वं म्वोः परतः। जगन्वान् । लटः शतृशान- चावप्रथमासमानाधिकरणे ३१२ । १२४ । अप्रथमान्तेन समानाधिकरणे लट शुष्कः ( ई० ४७, ५१, ५५)-अशुषत् इति शुष्कः। 'शुष् शोषणे' धातो. कर्तरि क्ते 'शुषः कः' इति निष्ठातस्य कत्वे विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः । क्षामः ( ई० ३३ )-अक्षासीत् इतिक्षामः । वैधातोः 'श्रादेच उपदेशेऽशिति इत्यात्वे 'क्षायो मः' इति निष्ठातस्य मत्वे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । भावितः (ई० २६, ३४)-देवदत्तः यज्ञदत्तम् अबीभवत् , देवदत्तेन यज्ञदत्तः अभावि-इत्यर्थे 'भावितः' इति । भावयतेः 'निष्ठा' इति कर्मणि क्तप्रत्यय इटि निष्ठायां सेटिं' इति गेलोपे विभक्तिकार्य 'भावितः' इति । हितम् (ई० २५, ३८)-अधायि-इति 'हितम् । धाधातोः क्तप्रत्यये 'दधा- तेहिः' इति ह्यादेशे विभक्तिकार्ये 'हितम्' इति । चक्राणः (ई० २६)-चके इति 'चक्राणः' । कृधातोलिटि 'लिटः कानज्वा' इति लिटः कानचि द्वित्वे अभ्यासत्वे 'उरत्' इत्यत्वे रपरत्वे हलादिशेषे यणि चुत्वो 'रषाभ्याम्-' इति णत्वे विभक्तिकार्य 'चक्राणः' इति । लटः शतृशानचौ-परस्मैपदे शतप्रत्ययः, आत्मनेपदे शानच्प्रत्ययः इत्येवाः द्योतयितुमत्र वृत्तौ 'वा' इत्युक्तं नतु विभाषार्थ वेत्यवसेयम् । शुषः कः-'शुष' धातुसे पर निष्ठाके तकारको ककार आदेश हो । पचोवा:- पच् धातुसे पर निष्ठाके तकारको वकार आदेश हो । क्षायो म:--'क्ष' धातुसे पर निष्ठासंबन्धी तकार को मकार आदेश हो । निष्ठाया-सेट निष्ठाके परे 'णि' का लोप हो। दृढः-स्थूल और बलवान् अर्थमें 'दृढ' निपातन हो। दधा-धा' धातुको 'हि' आदेश हो, तादि कित प्रत्ययके परे । दो दद्धोः-घुसंज्ञक 'दा' धातुको 'दद्' आदेश हो, तादि कित प्रत्ययके परे । लिटः कानज् वा । क्वसुश्च-लिट् के स्थानमें 'कानच्' और 'कसु" आदेश हों, विकल्पसे । स्वोश्व-मान्त धातुके मकारको नकार हो, मकार और वकारके परे। लटः शतृ-लटके स्थानमें शतु और शानच् आदेश हों, अप्रथमा-समानाधिकरणमें ३ , Rara বোস্থগ্রিলীৰ্জী एतौ वा स्तः । शवादिः । पचन्तं चैत्रं पश्य । आने मुक्छ।२।२अदन्ताऽङ्ग न्य मुगागमः स्यादाने परे । पञ्चमानं चैत्रं पश्य । लडित्यनुवर्तमाने पुनर्लग्रहणा- स्मथमासामानाधिकरण्येऽपि क्वचित् । सन् द्विजः । विदेः शतुर्वसुः ७११३६॥ वेत्तेः परस्य शतुर्वसुरादेशी पा। विदन् । विद्वान् । तौ सत् ३।२।१२७ तौ शत्शा. नची सत्संज्ञौ स्तः। लुटः सदा ३।३।१४ | लुटः शतृशानचौ वा स्तः। व्यवस्थितविभाषेयम् । तेनाऽप्रथमासामानाधिकरण्ये प्रत्ययोत्तरपदयोः सम्बोधने लक्षणहेत्योश्च नित्यम् । करिष्यन्तं करिष्यमाणं पश्य । आ क्वेस्तच्छील- तद्धर्मतत्साधुकारिषु ३।२।१३४ ! क्विपमभिव्याप्य वक्ष्यमाणाः प्रत्ययास्तच्छी- लादिषु कर्तृषु बोध्याः। तृन् ३२ । १३५ । कर्ता कटान् । जल्प-मिक्ष- पचन्तं पचमानं जा चैत्रं पश्य-पच्धातोर्लटि 'लटः शतशानचावप्रथमास- मानाधिकरणे' इति लटो लः स्थाने शतृप्रत्यये शित्त्वात् सार्वधातुकसंज्ञायां शपि पर- रूपे कृदन्तत्वात्प्रातिपदिकसंज्ञायां द्वितीय कवचने अमि उगित्वान्नुमि नस्यानुस्वारे परसवर्ण पचन्तम्' इति । शानचि पक्षे तु 'बाने मुक्' इति मुकि 'पचमानम्' इति ? सन् द्विजः ( ई० ४६ )-'वर्तमाने लट्' इत्यतो लडित्यनुवर्तमाने 'लटः शतृशानचा विति सूत्रे पुनर्लङ्ग्रहणात् प्रथमासमानाधिकरणेऽपि क्वचित् शतृशान- चौविधानात् 'अस् धातोर्लटः शतृप्रत्यये शपो लुकि "श्नसोरल्लोपः' इत्यल्लोपे प्रातिपदिकत्वात् सौ नुमि सुलोपे संयोगान्तलोपे ‘सन्' इति । विद्वान , विदन् ( ई० २८, ५१)-वेत्तीति विग्रहे विद्धातोः शतरि तत्स्था- ने 'विदेः शतुर्वसुः' इति विभाषया वस्वादेशे 'विद्वस्' इति, तस्मात् कृदन्तात् सौ उगित्वान्नुमि ‘सान्तमहतः' इत्युपधादीर्घ हल्ङयादिना सुलोपे 'संयोगा- न्तलोपे च कृते 'विद्वान्' इति । वस्वादेशाभावे लटः शतरि शपि शपो लुकि 'विदत्' इति, तस्मात् सौ नुमि सुलोपे 'संयोगान्तस्य लोपः' इति तलोपे 'विदन्' इति । कटान्-कटान् करोति तच्छील इति विग्रहे कृधातोः 'तृन्' इति तृन्- प्रत्यये गुणे रपरत्वे सौ 'दुशनस्-' इत्यनङि उपधादीधैं सुलोपे नलोपे रूपं सिद्धम्। आने मुक्-अंगावयव अत्को 'मुक्' का आगम हो, 'आन' के परे । विदेः शतुः-'विद्' धातुसे पर 'शतृ' के स्थानमें 'वसु' आदेश हो, विकल्पसे । तौ सत्-शतृ और शानच् 'सत्' संशक हो । लूट: सद्वा-लूटकै स्थानमें शतृ और शानच् विकल्पसे हों। मा क्वे-वक्ष्यमाण 'श्राजमास' सूत्रसे विहित 'विप्' को व्याप्त करके (वहाँ तक) जो प्रत्यय कहे गये हैं, वे तच्छी लादि कर्ता अर्थ में हो। तृन-धातुसे 'तृन्' प्रत्यय हो, कती पूर्वकृदन्तप्र०] इन्दुमती-टीकाहयोपेता। 4 . SURESHTATEvaents कुट्ट-तुएटवृद्धः पाका ३।२।१५५ षः प्रत्ययस्य १३.६ प्रत्ययस्यादिः पर- इत्संज्ञः स्यात् । जल्पाकः । भिक्षाकः । कुटाकः । लुण्टाकः ३ बराकः । बराकी ३ सनाशंसमिक्ष उ. ३१२ ! १६८ | चिकीर्षुः । प्राशंसुः । भिक्षुः । भ्राज-मास- धुर्विद्युतोजि-पृ-जु-प्रावस्तुवः विप्। २! १७७ । चित्राट् । भाः । रालोप ६॥ ४॥ २१॥ रेफाच्छोलोपः क्वौ मलादौ विङति । धूः। विद्युत् । ऊ । पूः । दृशिप्रहणस्यापकर्षाज्जवतेर्दीर्घः । जूः । प्रावस्तुत् । किब्वचिप्रक्छयायतस्तु- कटगुजुश्रीणां दीर्घोऽसम्प्रसारणञ्च ! वक्तीति वाक् ! च्छोः शुडनुनासिके च ६४१६/ सतुकस्य छस्य बस्य व क्रमात् “श्' 'ऊ' इत्यादेशौ स्तोऽनुनासिके को भलादौ च विति । पृच्छतीति प्राट् । आयतं स्तौतीति आयतस्तूः । कटं प्रवते कटः । जुरुक्तः । श्रयति हरिं श्रीः । दानी-शास-यु-युज-स्तु-तुद-सि-सिच----- मिह-पत-दश-नहः करणे ३१ २१ १८२! दाबादेः ष्ट्रन् स्यात्करणेऽर्थे । दात्यनेन दात्रम् । नेत्रम् । ति तु-त्र-तथ-सि-सु-सर-क-सेषु च ७२६ एषां दशानां कृत्प्र- जल्पाकः ( ई० ४८,५४ )-जल्पतीति विग्रहे जल्पधातोः जल्पभिक्षकुटल्लुण्ट- बुङः पाकन्' इति पाकनि 'पः प्रत्ययस्य' इति प्रत्ययस्यादिषकारस्येत्संज्ञायां लोपेच कृते सौ रुत्वे विसर्गे तत्सिद्धिः। चिकीः-सचन्तात् चिकीर्षधातोः “सनाशंसभिक्ष उ' इति उप्रत्यये तस्यार्धधातुकत्वात् अतो लोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । प्राट्-पृच्छतीति 'प्राट् । प्रच्छ्धातोः 'क्विव्वचि' इति विपि दीधै सम्प्रसार- णाभावे च विहिते विपो लुकि 'च्वोः शूडनुनासिके च' इति छस्य शादेशे सौ हल- उयादिना सलोपे 'बच्चभ्रस्ज-' इति षत्वे षस्य जश्त्वे चत्वे 'प्राट्' इति । तच्छीलादि अर्थमें। जल्पभिष-जल्पादि धातुओं से 'धाकन्' प्रत्यय हो, तच्छीलादि अर्थ में । षः प्रत्यय-प्रत्ययके आदि षकारकी इत्संज्ञा हो । सनाशल-सन् (सन्नन्त), आशंस और भिक्षु धातुसे 'उ' प्रत्यय हो, तच्छीलादि अर्थमें । आजभाल-भाज् , भास् , धुर्वि, धुत् , अजि, पु, जु, ग्राव, स्तु-इन धातुओंसे 'क्विप्' प्रत्यय हो, तच्छीलादि अर्थमें । रालोप:-रेफसे पर छकार तथा वकारका लोप हो, विपके परे और झलादि कित्- डित के परे । विवञ्चचि-वचादि धातुओंसे 'विप्' प्रत्यय हो, अचको दीर्घ हो तथा संप्र. सारणका अभाव हो। छोः शू-तुक्-विशिष्ट छकार तथा वकारको क्रमसे श तथा ऊठ आदेश हो, क्विकै परे और झलादि कित् ङित्के परे । दास्नीशस-दाप, नी, शस् , यु:- युज, स्तु, दुद् , सि, सिच , मिङ् , पत् , दश और नहु धातुसे करण अर्थमें 'ष्ट्रन्' प्रत्यय हो । तितुन्नतथ-ति, तु, त्र, त, थ, सि, सु, सर, क और स इन दों कृत्प्रत्ययोंको इट , " Bihar लघुसिद्धान्तकौमुदी स्ययानामिण न । शस्त्रम् । योत्रम् । योक्त्रम् । स्तोत्रम् । तोत्रमू । सैनम् । सेक्त्रम् । मेड्रम् । पत्रम् । दंष्ट्रा। नदी। अति-लू-धू-सू-खन-सह-चर-इनः ३२।१८४ अादिभ्यः ष्ट्रन् स्यात्करणेऽर्थे । अरित्रम् । लवित्रम् । धवित्रम् । स. विनम् । खनित्रम् । सहित्रम् । चरित्रम् । पुवः सज्ञायाम् श२।१८ करणे पुत्र 'इन् स्यात् संज्ञायाम् । पवित्रम् ॥ इति पूर्वकृदन्तप्रकरणम् ॥ wasnasaluramay लवित्रम् (ई० ४९)-लुनात्यनेनेति विग्रहे 'लू छेदने' इति धातोः 'अर्ति- लूधूसूखनसहचर इत्रः' इति करणेऽर्थे इत्रप्रत्यये गुरोऽवादेशे स्वादिकार्ये तसिद्धिः। खनित्रम् ( ई० २६) खनत्यनेनेति विग्रहे 'अतिलूधू-' इति करणेऽर्थे इत्र- प्रत्यये विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः । एवं चरत्यनेनेति 'चरित्रम्' ( ई० २५)। इति 'इन्दुमती'टीकायां पूर्वकृदन्तप्रकरणम् । नहीं हो । अतिलू, लू, धू, सू, खन् , सह और चर् धातुओंसे 'इत्र' प्रत्यय हो, करणमें । पुक संज्ञायां--पूड और पूज धातुले करणमें 'इन्त्र' प्रत्यय हो, संशामें । नोट:-कृत्' प्रत्यय क्रिया या धातुके अन्तमें प्रयुक्त होते हैं और उनके योगसे बने शब्द 'कृदन्त' कहलाते हैं । (कृदन्तके निम्न मुख्य पाँच प्रत्ययों पर ध्यान दें।) (१)तव्य-अनीयर-इनके प्रयोगमें कांसे तृतीया अथवा षष्ठी विभक्ति होती हैं। सकर्मक धातुसे ये प्रत्यय होनेपर तीनों लिङ्ग और तीनों वचनों में होते हैं, और अकर्मक धातु से होनेपर केवलन पुंसक लिङ्ग और एकवचन में ही प्रयुक्त होते हैं । यथा---'तेन पाठ पठि तव्यः । 'तेन आलितव्यम् । स्वयेदं कर्तव्यम्, करणीयं वा। प्रायः विधिः अर्थमें ही इसका प्रयोग होता है। (२)क-'क्त' प्रत्यय भूतकालमें होता है और 'क्त' प्रत्ययान्त क्रियाके साथ कर्तासे तृतीया और कर्मसे प्रथमा विभक्ति होती है तथा कर्म के लिङ्ग के अनुसार हो तप्रत्ययान्त पदका लिङ्ग होता है । जैसे:-तेन माला निर्मिता। मया फलं भक्षितम्। अकर्मक धातुसे 'क्त' प्रत्यय प्रायः नपुंसक लिङ्गमें होता है । (मया हसितम्)। कुछ धातुएँ ऐसी भी हैं जिनसे 'क्त' प्रत्यय कर्तामें भी होता है। जैसे-गत्यर्थक, अकर्मक, श्लिष, शीख, स्था, आस, बस, जन, रुह और ज धातु । कमी २ 'क'प्रत्ययान्त शब्द विशेषण रूपसे भी प्रयुक्त होता है । यथा-'वनं गतो रामः। (३) कवतु-'क्तवतु' प्रत्यय भी भूतकालमें होता है, परन्तु यह कर्ता में ही होता है और कर्तृवाच्यके अनुसार कर्ता और कर्मसे विभक्तियां भी होती है। जैसे-'अहं पुस्तकं पठितवान् । 'तौ पुस्तकं पठितवन्तौ। मन्य स्युः। केचिदचिहिता अप्यूह्याः। अथोणादिप्रकरणम् कृ-वा-पा-जि-मि-स्वदि-साध्य-शूभ्य उण १ | करोतीति कारः । पातीति आयुः। पायुर्गुदम् । जायुरौषधम् । मायुः पित्तम् । स्वादुः । सानोति परकार्य- मिति साधुः । श्राशु शीघ्रम् । उणादयो बहुलम् ३।३।१॥ एते वर्तमाने संज्ञायां संज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च ततः परे । कार्याद्विद्यादनूबन्धमेतच्छास्त्रमुणादिषु ।। ॥ इत्युणादिप्रकरणम् ॥ । । कृवापाजि-डुकृञ् करणे, वा गतिगन्धनयोः, पा पाने, जि अभिभवे, डुमिञ् प्रक्षेपणे, स्वद् प्रास्वादने, साध् संसिद्धौ, अशू व्याप्ती, इत्येतेभ्यः धातुभ्यः उप- प्रत्ययः स्यात् कर्थे । सूत्रमिदं शाकटायनप्रणीतं नतु पाणिनिना प्रोक्षामिति ध्येयम् । वायु:-चाधातोः 'कृवापाजी'त्युणि 'आतो युक् चिण्कृतीः' इति युकि कृदन्त- त्वात् सौ सस्य रुत्वे विसर्गे 'वायुः' इति । संज्ञासु-'उणादयो बहुलम्' इत्युक्त्वा 'केचिदविहिताप्यूयाः' इत्युक्तं भूले. (क्त्वा)-जब एक क्रियाके बाद दूसरी क्रिया की जाती है तब प्रथम क्रियासे 'कृत्वा' प्रत्यय किया जाता है और क्त्वा-प्रत्ययान्त क्रिया अव्ययरूपसे प्रयुक्त होती हैं तथा कर्म आदि मुख्य (द्वितीय) क्रियाके समान ही होते हैं। यथा-'शनून जित्वा निवर्तते रामः क्त्वा'-प्रत्ययान्त क्रियाके पूर्व यदि कोई उपसर्ग रखा जाय तो क्त्वा' के स्थान पर 'य' हो जाता है । जैसे:-विजित्य, निहत्या, आदि । ५) तुमुन्---( उत्तर कृदन्त देखो) जब एक क्रिया करने के लिये दूसरी क्रिया की जाती है, तब प्रथम क्रियाले 'तुसुन्' प्रत्यय होता है और वह अव्यय हो जाता है। 'तुमुन्' प्रत्ययान्त क्रियाके कर्मादि भी मुख्य क्रियाके समान ही होते हैं परन्तु कतईका संबन्ध मुख्य क्रियासे ही होता है। जैसे-इन्द्रियाणि जेतुमुपक्रमते । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीका पूर्वकृदन्तप्रकरण समाक्ष हुआ। 800-- " , कृवापाजि-कू, वा, पा, जि, मि, स्वद, साध और अश धातुओंसे अण् प्रत्यय हो। उणादयो-धातुसे वर्तमान कालमें और संज्ञामें उणादि प्रत्यय हो, बहुरू प्रकारले । संज्ञासु-संज्ञा (डित्यादि शब्दों) में धातु की कल्पना करनी चाहिये और फिर उसके RIGARAMPARANAMEANIN भविष्यत्यर्थ धातोरेती स्तः। मान्तत्वाव्ययत्वम् । कृष्णं द्रष्ट याति । कृष्ण अधोतरकृदन्तप्रकरणम् तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम् ३. ३। १० क्रियार्थायां क्रियायामुपपदे ३॥ वि. दर्शको याति । कालसमयवेलासु तुमुन् ३ । ३ । १६७ । कालार्थेषूपपदेषु तुमुन् स्यात् । कालः समयो वेला वा भोक्तुम् । भावे ३।३।१८। सिद्धावस्थापन्ने थात्वर्थे वाच्ये धातोर्धम् । पाकः। अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् ३ । ३। १६ । तदेव प्रतिपादयति-संज्ञास्विति । संज्ञासु-संज्ञाशब्देषु (डित्थ-डवित्थादिषु) धातुरू- पाणि ऊह्यानि, ततः परं प्रत्ययाश्च ऊहनीयाः = कल्पनीयाः, प्रत्ययेष्वपि गुणवृद्धयमा- वादिकार्य दृष्ट्वा अनूबन्धम् = मित्-णित्-किडिदित्याद्यनुबन्धं विद्यात् कल्पयेत् , एतत् = एतावदेव, उणादिषु, शास्त्रम् = अनुशासनमस्तीत्यर्थः । उदाहरणं यथा- 'ऋफिड्डः' इति । अत्र ऋधातुः प्रकृतिः, तस्मात् फिड्डः प्रत्ययः, ततो गुणाऽभावद- र्शनात् प्रत्ययस्य कित्त्वमूत्यते । नहीं इति 'इन्दुमती'टीकायामुणादिप्रकरणम् । meena करण Dow ही हा द्रष्टुम् , दर्शकः (ई० २०,४४)-दृश्धातोः 'तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थी- याम्' इति तुमुनि अनुबन्धलोपे ‘सृजिशोर्मल्यमकिति' इति अमि अश् तुम्' इति स्थिते यणि 'ब्रश्चभ्रस्ज-' इति षत्वे ष्टुत्वे 'कृन्मेजन्तः' इत्यव्ययत्वात् सुब्लुकि 'द्रष्टुम्' इति । दृशो वुलि वोरकि गुणे रपरत्वे विभक्तिकार्ये 'दर्शकः' इति । पाकः ( ई० २५ )-पचधातोः 'भावे' इति पनि अनुबन्धलोपे उपधावृद्धौ 'चजोः कुपिण्ण्यतोः' इति चस्य कुत्वे विभक्तिकार्ये 'पाकः' इति । प्रत्ययकी कल्पना करनी चाहिये तथा प्रयोगगुणाभाव अथवा वृद्धि आदि कार्योको देखकर प्रत्ययोंसे अनुबन्ध (कित् , ङित् , णित् , मित् आदि) की कल्पना भी करनी चाहिये-यही उणादिमें विशेषता कही गई है। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीका में उणादिप्रकरण समास हुआ। तृतीय धातुसे भी हैं। प्रयुक्त ( तुमुन्धुलौ-क्रियार्थक क्रिया उपपद रहने पर भविष्यत् अर्थमें धातुसे 'तुमुन्' और 'तुल' प्रत्यय हो । कालसमय-काल, समय और वेला उपपद रहने पर धातुसे 'तुमुन्' प्रत्यय हो। भावे-सिद्धावस्थापन्न धात्वर्थ वाच्य हो तो धातुसे 'घ' प्रत्यय हो। अकर्तरि च-कर्तृभिन्न कारक अर्थमें धातुसे 'घ' प्रत्यय हो, संशामें । और।
MEANIMAR HERE HOAmuredund laws उत्तरकृदन्तन.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। कर्तृभिन्न कारके घम स्यात् । धनि च मावकरणयोः६।४।२७ रजेनलोपः रस्यात् । रागः । अनयोः किम् ? रज्यत्यस्मिमिति रङ्गः । निवास-चिति-शरीरो- पसमाधानेवादेच कः ३।२४१॥ एषु चिनोतर्घ आदेश्च ककारः। उपसमा- पानं राशीकरणम् । निकायः । कायः । गोमायनिकायः । एरच३।३।५६। इच- अन्तिादच् । वयः । जयः । ऋदोरप ३ । ३१ ५७ / अवर्णान्तादुवर्णान्ताच्चऽप् । करः । गरः । यवः । लवः। स्तवः । पवः। घार्थे कविधानम् । प्रल्थः । वेन्नः। डिवतः वित्रः ३३८८ क्त्रेम नित्या ४।४।२० वित्रप्रत्ययान्तान्म- ल्यानिवृत्तेऽर्थे । पाकेन निर्वृत्तं पवित्रमम् । डुवप-उत्रिमम् । टिवतोऽथुच् ३८६। ट्वितोऽथुच् स्याद्भावे । टुवेट कम्पने । वेपथुः । यजयाचयतविच्छ- पच्छरक्षो न ३३६० यज्ञः । याच्या। यत्नः । विश्नः । प्रश्नः । रक्ष्णः । विपो नन् ३२३६११ स्वप्नः । उपसर्गे घोः कि शश६२ प्रधिः। उपधिः । लियां क्तिन् ३२३६४! स्त्रीलिङ्गे भावे क्तिन् स्यात् । घोऽपवादः । कृतिः । स्तुतिः रागः ( ई० २१, ४१) रब्धातोः 'अकर्तरि च कारके संज्ञायाम्' इति घनि अनुबन्धलोपे 'घमि च भावकरणयोः' इति रजेनेलोपे 'चजोः कु घिण्ण्यतोः इति उपधावृद्धौ विभक्तिकाय 'रागः' इति । चयः (ई० ४८, ५०)-चिधातोः 'एरच्' इत्यचि अनुबन्धलोपे शुणे अया- शे विभक्तिकार्ये 'चयः' इति (चीयतेऽसौ चयः)। लवः (ई० ४९)-लूधातोः 'ऋदोरप् इत्यपि गुणे अवादेशे 'लवः' इति । उत्रिमम् ( ई० ३६)-बापेन निवृत्तम् 'उप्निमम्'। 'डवप बीजसन्ताने त्यस्माद्धातोः 'डिवतः त्रिः' इति कत्रो 'क्नेमम्नित्यम्' इति निवृत्तेर्थे मपि अनुव- धनि च --र' धातुके नकारका लोप हो, पञ् प्रत्ययके पर-भाव और करण में । निवास-निवासादि अर्थमें 'चि धातुसे 'घ' प्रत्यय हो और धातुके आदि कारको ककार भी हो। एरच-इवान्त धातुसे 'अच् प्रत्यय हो । ऋदोप--ऋवर्णान्त और उवर्णान्त धातुले अप् प्रत्यय हो। घार्थे--अर्थमें 'क' प्रत्यय हो हिवतः चित्र:-'' संशक धातुसे 'वित्र' प्रत्यय हो, भावमै । कनेर्मस्-'किन' प्रत्ययान्तसे तद्धित संज्ञक 'म' प्रत्यय हो, निवृत्त अर्थ । टिवतोऽथु च-टिवत' धातुसे 'अथुच्' प्रत्यय हो, भावमें । यजयाच-यज्, याच , यत् , विच्छ, प्रच्छ और रक्ष धातुसे 'ना' प्रत्यय हो । स्वपो नमू-स्वम् धातुसे नन् प्रत्यय हो। उपसगे--उपसर्ग उपपदक संज्ञक धातुसे कि प्रत्यय हो। स्त्रिया किन-माव --- - TARAMITAMARHI स्त्रः । ऊ । मूः। इच्छा३।३।१०१ । एषेनिपातोऽयम् । अप्रत्ययात् २३॥ लघुसिद्धान्तकौमुदी ल्यादिभ्यः क्तिनिष्टावद्वाच्यः । तेन नत्वम् । कीर्णिः । गीर्णिः । लूनिः । धूनिः । पूनिः । सम्पदादिभ्यः किम् । सम्पत् । विपत् । अापत् । क्तिनपी- व्यते । सम्पत्तिः । विपत्तिः । आपत्तिः। अतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च ३॥ ३६७। एते निपात्यन्ते । ज्वरत्वरस्त्रिव्यविमवामुपधायाश्च ६४।२०। एषामुप- धावकारयोग्ठ स्यादनुनासिके को मिलादौ विति । अतः क्विप् । जूः। तूः। C ANAM ल नई र , व १०२ । प्रत्ययान्तेभ्यो धातुभ्यः स्त्रियामकारः प्रत्ययः स्यात् । चिकीर्षा । पुत्र- काम्या । गुरोश्च हल: ३।३।१०३। गुरुमतो हलन्तास्त्रियामकारः प्रत्ययः स्यात् । न्धलोपे 'वचिस्वपि-' इति सन्प्रसारण पूर्वरूपे विभक्तिकार्ये उक्तं रूपं सिद्धम् । कोणि:-कधातोः 'स्त्रियां क्तिन्' इति क्तिनि अनुबन्धलोपे 'ऋत इद्धातोः' इतीत्वे रपरत्वे 'हलि चेति दीधै 'ऋल्वादिभ्यः क्तिनिष्ठावद्वाच्यः' इति निष्ठावद्भावात् तस्य नत्वे णत्वे विभक्तिकार्य 'कीर्णिः' इति । ऊतियूति-एते स्त्रियां क्तिन्नन्ताः निपात्यन्ते, इत्यर्थः। तथाहि-'अव रक्षणे' इति धातोः क्तिनि तस्य निपातनादुदात्तत्वे 'ज्वरत्वर-' इत्यकारवकारयोरूठि 'ऊतिः' इति युधातोर्जुधातोर्वा क्तिनि निपातनाद्दीघे यूतिः, जूतिरिति च । 'षोऽन्तकर्मणि' इत्य- स्मात् क्तिनि 'धात्वादेः' इति सत्वे 'आदेच उपदेशेऽशिति' इत्यात्वे 'यतिस्यति'-इती- त्वे प्राप्ते निपातनात्तदभावे सातिरिति । अथवा सन्धातोः क्तिनि 'जनसन-' इत्या- त्वम् । अत्र क्तिन उदात्तत्वं निपात्यते। हनः क्तिनि नकारस्य निपातनादित्त्वे 'श्रा- द्गुणः' इति गुणे हेतिरिति । अथवा हिधातोः क्तिनि निपातनाद्गुणः । ण्यन्तकृत. धातोः ‘ण्यासश्रन्थो युच्' इति युचं प्रबाध्य निपातनात् क्तिनि इत्वे रपरत्वे दीर्घ *झरो फरि' इति तलोपे कीर्तिरिति । चिकीर्षा ( ई० ४२, ४६, ५४ )-कृधातोः सनि द्वित्वादिके चिकीर्ष इत्यस्य और कर्तभिन्न कारक अर्थमें धातुसे 'क्तिन्' प्रत्यय हो, स्त्रीलिङ्गमें। ऋरवा-'ऋ' धातु तथा त्वादि धातुओंसे पर जो 'तिन्। वह निष्ठावद् हो । सम्पदा-सम्पदादि धातुओंसे स्त्रीलिंगभावमें 'कि' प्रत्यय हो। क्तिनपीष्यते-सम्पदादिसे 'क्तिन् प्रत्यय भी हो। ऊतियूति-ऊति, यूति, जूति, साति, हेति, कीर्ति-इन शब्दोंका निपातन हो। ज्वरस्वर-ज्वर, त्वर, सिव, अव और मव धातुओंकी उपधा और वकारको ऊठ हो, क्विम् के परे और झलादि अनुनासिकादि प्रत्ययके परे । इच्छा-'इ' धातुसे 'इच्छा' यह निपा- तन हो । अप्रत्ययात्-प्रत्ययान्तसे 'भ' प्रत्यय हो, स्त्रोलिंगमें । गुरोश्च-गुरुमान हलन्त -- दे a । । BAAwamiwand द्धिः' इति वृद्धो 'चजी उत्तरकृदन्तप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १७६ ईहा ! ण्यासश्रन्थो युच ३।३ । १०७ अकारस्यापवादः । कारणा ! हारणा । नपुंसके भावे क्तः ३।३।११४। ल्युट च ३३१११॥ हसितम्। हसनम् । पुंसि संज्ञायां यः प्रायेण ३।३।११८ छादेर्वेऽद्वथुपसर्गस्थ ६४।६६ द्विप्रमृत्युपसर्गही. जस्य छादेहस्वो घे परे। दन्ताश्छायन्तेऽनेन दन्तच्छदः। श्राकुर्वन्त्यस्मिन्नित्याकरः अवे तस्त्रोर्घञ् ३ १३ । १२० अवतारः कूपादेः । अवस्तारो जवनिका । हलश्च ३२३१२१| हलन्तान् । घापवादः । रमन्ते योगिनोऽस्मिन्निति रामः। अपमृज्य- तेऽनेन व्याध्यादिरित्यपामार्गः । ईषदुःसुपु कृच्छ्राकृच्छार्थेषु खल ३।३। १२६ । करणाधिकरणयोरिति निवृत्तम् । एषु दुःखसुखार्थेषूपदेषु खल् । तयोरेवेति भावे कर्मणि च । कृच्छे-दुष्करः कटो भवता । अकृच्छ -ईषत्करः । सुकरः । आतो युच् ३।३ । १२८ । खलोऽपवादः । ईषत्पानः सोमो भवता । दुष्पानः । सुपानः । अलङ्घल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा ३१ ४. १८ प्रतिषेधार्थयोरलत धातुत्वेन तस्मात् प्रत्ययात्' इत्यप्रत्यये 'अतो लोपः' इति सनोऽकारलोपे कृदन्तत्वात्प्रातिपदिकत्वेन स्त्रीत्वे टापि सवर्णदीर्घ सुलोपे उकं रूपं सिद्धम् । अपामार्गः ( ई० ३१, ५२ )-अपपूर्वान्मृग्धातोः 'हलच' इति पनि 'मृजे. दुष्करः ( ई० ४५ )--दुस्पूर्वात् कृञ्धातोः 'ईषद्दुस्सुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल्' इति खलि अनुबन्धलोपे गुणे रपरे 'इदुदुपधस्य चाप्रत्ययस्य' इति सस्य षः । सुपानः ( ई० ३३,५३ )- सुष्टु पीयते इति सुपानः । सुपूर्वकात् पाधातोः 'ईष- दुस्सुषु-' इति प्राप्त स्खलं प्रबाध्य 'आतो युच्' इति युचि योरनादेशे सवर्णदीर्घः । धातुसे स्त्रीलिङ्गमें 'अ' प्रत्यय हो । ण्यासश्रन्थ-ण्यन्त धातु 'आस्' धातु और 'श्रन्थ'धातु से 'युच' प्रत्यय हो, स्त्रोलिङ्ग और भावमें । नपुंसके-धातु से 'क्त' प्रत्यय हो, नपुंसकमें और भावमें । युट् च-धातुसे 'ल्युट्' प्रत्यय भी हो, नपुंसक और भावमें । पुंसि संज्ञायां--पुलिङ्गमें संशामें धातुसे प्रायः 'व' प्रत्यय हो, करण और अधिकरण अर्थ में । छादेर्धे-द्विप्रभृति उपसर्गहीन अङ्गावयव 'छाद्' को उपधाको ह्रस्व हो, 'घ' के परे । अवे तृस्रोधञ्-अवपूर्वक 'त' और 'स्तृ' धातुसे प्रायः '' प्रत्यय हो, पुंलिङ्ग और संशामें । हलेश्व-करण और अधिकरण अर्थमें हलन्त धातुसे 'घ' प्रत्यय हो, पल्लिङ्ग और -संज्ञामें । ईषद्द्यासुषु-दुःखार्थक तथा सुखार्थक ईषदादि उपपद रहनेपर धातुसे 'खल' प्रत्यय हो, भाव और कर्ममें । आतो युच्-दुःखार्थक और सुखार्थक ईषदादि उपपद रहने पर आदन्त धातुसे 'युच्' प्रत्यय दो (यह 'खल' का अपवादक है)। अलंखल्लो:--प्रतिवे- ७ ।
SAMPAIRCRAILEEKE.Mat.SAHARLA f .4 HOM ल लघुसिद्धान्तकौमुदी ल्योरुपपदयोः क्त्वा स्यात् । प्राचां ग्रहणं पूजार्थम् । अमेवाव्ययेनेति नियमानीप दसमासः । दो दद्वोः। अलं दत्त्वा धुमास्थेतीत्वम् । पीत्वा खलु । अलङ्घल्वो किम् ? मा कार्षीत् । प्रतिषेधयोः किम् ? अलङ्कारः । समानकर्तृकयोः पूर्व- काले ३१२११ समानकर्तृकयोर्धात्वर्थयोः पूर्वकाले विद्यमानाद्धातोः क्त्वा स्यात् । भुक्त्वा ब्रजति । द्वित्वमतन्त्रम् । भुक्त्वा पीत्वा व्रजति । न क्त्वा सेट् ११२। १८ । सेट् क्त्वा किन्न स्यात् । शयित्वा । सेट् किम् ? कृत्वा । रलो व्युपधाद्ध- लादेः संश्चश।२६। इव वोपधाद्धलादे रलन्तात्परौ क्त्वासनौ सेटौ चा किती स्तः । युतित्वा- द्यौतित्वा । लिखित्वा-लेखित्वा । व्युपधात्किम् ? वर्तित्वा । रल: किम् ? सेवित्वा । हलादेः किम् ? एषित्वा । सेट् किम् ? भुक्त्वा । उदितो का ७२।५६। उदितः परस्य क्त्व इड् वा स्यात् । शमित्वा-शान्त्वा । देवित्वा-धूत्वा । शयित्वा (ई० ३३)-शोधातोः “समानकर्तृकयोः पूर्वकाले' इति क्त्वाप्रत्यय इटि अनुबन्धलोपे 'न क्त्वा सेट्' इति कित्वनिषेधाद् गुणोऽयादेश कृदन्तत्वात प्रातिपदिकसंज्ञायां सौ 'क्त्वातोसुन्कसुनः' इत्यव्ययत्वात् सुब्लुकि तसिद्धिः । धुतिया ( ई० २८, ३८) द्युत्धातोः क्त्वाप्रत्यये इटि अनुबन्धलीये न क्त्वा सेट' इति कित्वनिषेवं प्रबाध्य रलो व्युपधाद्धलादेः संश्च' इति पाक्षिककित्वाइ गुणनिषेधे कृदन्तत्वात् सौ 'क्त्वातोसुन् -' इत्यव्ययत्वात् सुब्लुकि तत्सिद्धिः । शमित्वा (ई० २७)--शम्धातोः क्त्वाप्रत्यये अनुबन्धलोपे 'उदितो वा इति विभाषया इटि 'क्त्वातोसुन्-' इत्यव्ययत्वात् सुब्लुकि 'शमित्वा इति । इडभावपक्षे 'अनुनासिकस्य' इत्यात्वे अनुस्वारे परसवर्णे 'शान्त्वा' इति । देवित्वा (ई० २९,४६ )-दिव्धातोः क्त्वाप्रत्यये 'उदितो वा' इति पाक्षिके. इटि लघूपधगुणे सौ 'क्त्वातोसुन्-' इत्यव्ययत्वात् सुब्लुकि 'देवित्वा' इति । "इडभाने 'च्छौः शूडनुनासिके च' इत्यूठि अनुबन्धलोपे यणि 'यूत्वा' इति । धार्थक 'अलम्' तथा 'खलु' उपपदक धातुसे 'क्त्वा' प्रत्यय हो, भावमें । (यहाँ सूत्रमें प्राचा' अहण विल्पार्थक नहीं है, प्रत्युत पूजार्थक है)। समानकर्तृकयोः-समानकतृक धात्वर्थो में पूर्वकालिक क्रियावाची धातुसे 'क्त्वा' प्रत्यय हो, भावमें । न क्वा-'इट' सहित 'क्वा' 'कित्' नहीं हो। रलोब्युपधातू-इवर्णो वर्णोपध हलादि रलन्त धातुओंसे पर सेट 'क्त्वा' और 'सन्" कित हो विकल्पसे । उदितो-उदित धातुसे पर क्त्वा' को इट हो, विकल्पसे । ब च त a दे उत्तरकृदन्तप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १८१ दधातेहिः, हित्वा । जहातेश्च वित्व ७।४।४३ । हित्वा । हाउस्तु-हात्वा । समासेऽनपूर्वक्त्वो ल्यप् ७।१३७। अव्ययपूर्वपदेऽनङ्समासे क्त्वो ल्यबादेशः स्यात् । तुक् । प्रकृत्य । अनन् किम् ? अकृत्वा । आमीक्ष्ण्ये णमुल च शहा२२ भाभीक्ष्ण्ये पूर्वविषये णमुल स्यात् क्त्वा च । नित्यवीप्सयोः बाशा पाभीक्ष्ण्ये घोत्ये वीप्सायां च पदस्य द्वित्वं स्यात् । भाभीक्ष्ण्यं तिङन्तेष्वव्ययसंज्ञककृदन्तेषु च । स्मारं-स्मारं नमति शिवम् । स्मृत्वा-स्मृत्वा । पाय-पायम् । भोज-भोजम् । श्राव-श्रावम् । अन्यथैवंकथमित्थंसु सिद्धाप्रयोगश्चेत् ३।४।२७ । एधु को हित्वा (ई० ३५,४९,५६,५८)-धाधातोः 'समानकर्तृकयोः-' इति क्त्वा- प्रत्यये अनुबन्धलोपे 'दधातेहिः' इति धास्थाने 'हि' इत्यादेशे प्रातिपदिकत्वात अव्ययत्वात् सुब्लुकि 'हित्वा' इति । 'श्रोहाक् त्यागे' इत्यस्य क्त्वायां तु 'जहा. तेश्च' इत्यनेन हित्वं बोध्यम् । 'श्रोहाङ्गतौ इति धातोः क्त्वायां तु 'हात्वा' इति भवति । चत्र 'जहातेश्च' इति हित्वं तु न, सूने जहातेरिति निर्देशात् । अन्यथा तत्र भृक्षामित्' इतीत्वे 'जिहीतश्चेति सूत्रस्वरूपापत्तेः। प्रकृत्य ( ई० २३, ३२ )-प्रपूर्वात् कृधातोः 'समानकर्तृकयो:-' इति कत्वाप्रत्यये 'समासेऽनपूर्वे क्त्वो ल्यप्' इति ल्यपि अनुबन्धलोपे 'हस्वस्य पिति कृति तुक्' इति तुकि सौ 'क्त्वातोसुन्-' इत्यव्ययत्वात् सुब्लुकि तत्सिद्धिः । स्सारं स्मारम् ( ई० ४३)-स्मृधातोः 'अाभीक्ष्ण्ये णमुल् च इति णमुलि अनुबन्धलोपे 'अची णिति' इति वृद्धौ रपरत्वे 'नित्यवीप्सयोः' इति द्वित्वे कृदन्त- त्वात् सौ 'कृन्मेजन्तः' इति मान्तत्वाव्ययसंज्ञायां सुब्लुकि प्रथममकारस्यानुस्वारे "स्मारं स्मारम्' इति । स्मृत्वा स्मृत्वा इत्यर्थः । पायं पायम् (ई० ५०)-पाधातोः 'भाभीक्ष्ण्ये णमुल च' इति णमुलि अनु- बन्धलोपे 'मातो युक् चिकृतोः' इति युकि 'नित्यवीप्सयोः' इति द्वित्वे मान्त- खादव्ययत्वेन सुब्लुकि प्रथममकारस्यानुस्वारे तसिद्धिः । (पीत्वा पीत्वा इत्यर्थः)। जहातेश्व---'हा' (ओहाक) धातुको 'हि' आदेश हो, 'क्त्वा' प्रत्ययके परे । समासे-अव्ययपूर्वपदक 'अनन् समासमें क्त्वा' के स्थानमें 'ल्यप आदेश हो । आभीचण्ये-पौनःपुन्य अर्थ घोत्य हो तो धातुसे 'एबुल' और 'कृत्वा' प्रत्यय हो । नित्यवीप्लयोः-पौन:पुन्य और वीप्सा अर्थ घोत्य होने पर पदको द्वित्व हो। अन्यथैवं अन्यथा, एवम् , कथम् या इत्थम् अव्यय उपपदक 'कृ' धातुसे 'णमुल' लघुसिद्धान्तकौमुदी णमुल स्यात्सिद्धोऽप्रयोगोऽस्य एवंभूतश्चेत् कृञ् । व्यर्थत्वालायोगानह इत्यर्थः । अन्यथाकारम् । एचङ्कारम् । कथकारम् । इत्थकारं भुङ्क्ते । सिद्धति किम् ? शिरो-- ऽन्यथा कृत्वा भुङ्क्ते । ॥ इत्युत्तरकृदन्तप्रकरणम् अथ कारकप्रकरणम् प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा २।२४६। नियतोपस्थिति- कः प्रातिपदिकार्थः । मात्रशब्दस्य प्रत्येकं योगः। प्रातिपदिकार्थमात्रे लिङ्गमात्रा- द्याधिक्ये परिमाणमात्रै सङ्ख्यामात्रे च प्रथमा स्यात् । प्रातिपदिकार्थमात्रे-उच्चैः ।। कृष्णाः । श्रीः । ज्ञानम् । लिङ्गमाने-तटः, तटी, तटम् । परिमाणमात्रे- द्रोणो व्रीहिः । बचनं सङ्ख्या । एकः । द्वौ । बहवः । सम्बोधने च २।३१४७ । प्रथमा स्यात् । हे राम । * इति प्रथमा* 'अन्यथाकारम् (ई० ३७,४५,५४) अन्यथेत्यस्य प्रयोगे कृधातोः 'अन्यथैव- कथमित्थंसु सिद्धाप्रयोगश्चेत्' इति णमुलि अनुबन्धलोपे 'अची ब्णिति' इति बृद्धौ रपरत्वे प्रातिपदिकत्वात् सौ मान्तत्वेन अव्ययत्वात् सुब्लुकि 'अन्यथाकारम्' इति ! इति 'इन्दुमती'टीकायाभुत्तरकृदन्तप्रकरणम् । रा . नी प्रातिपदिकार्थति-पदम्पदमिति प्रतिपदम् , प्रतिपदे भवं प्रातिपदिकम् तस्यार्थः प्रातिपदिकार्थः । स च लिङ्गं च परिमाणं च बचनं चेति प्रातिपदिकार्थ- लिङ्गपरिमाणवचनानि । तान्येव प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमानं तस्मिन् । 'द्वन्द्वादी द्वन्द्वमध्ये द्वन्द्वान्ते च श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बद्धयते' इति भाष्योक्त्या द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणमात्रपदस्य प्रत्येकमन्वयात् प्रातिपदिकार्थमात्र इत्याद्यर्थः सम्पद्यते। नियतोपस्थितिकः इति-नियता-व्यापिका, उपस्थितिर्यस्य स नियतीपस्थितिकः । यस्मिन् प्रातिपदिके उच्चारिते सति यस्यार्थस्य नियमेनोपस्थितिःस नियतोपस्थितिकः । प्रत्यय हो, यदि वह 'कन ' धातु व्यर्थ होने से प्रयोगानह हो रहा हो तो। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें उत्तरकृदन्त प्रकरण समाप्त हुआ। तु १ म माति:-प्रातिपदिकार्थमात्र, लिङ्ग मात्रकी अधिकतामें परिमाणमात्रमें प्रथम विमक्ति हो । सम्बो--सम्बोधन में प्रथमा विभन्ति हो।
कारका] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १८३ कर्तुरीप्सिततमं कर्म ११ ४।४६ ! कर्तुः क्रियया प्राप्तुमिष्टतम कारकं कर्म- संज्ञं स्यात् । कर्मणि द्वितीया २।३।२। अनुक्ते कर्मणि द्वितीया स्यात् । हरि भजति । अभिहिते तु कर्मादौ प्रथमा-हरिः सेव्यते । लक्ष्म्या सेवितः । अकथि- तञ्च शाश अपादानादिविशेषैरविवक्षितं कारकं कर्मसंझं स्यात् । दुह्याचपदण्डधिच्छिचिनूशासुजिमथमुषाम् । कर्मयुक स्यादकथितं तथा स्थान्नीकृष्वहाम् ।।१।। गां दोग्धि पयः । बलिं याचते वसुधाम् । अविनीतं विनयं याचते । तण्डुलानोदनं पचति । गर्गान् शतं दण्डयति । व्रजमवरुणद्धि गाम् । माणवक पन्थानं पृच्छति । वृक्षमवचिनोति फलानि । माणवकं धर्म ब्रूते शास्ति वा । शतं जयति देवदत्तम् । सुधां क्षीरनिधि मथ्नाति । देवदत्तं शतं मुष्णाति । प्राममजा कर्तुरीप्सिततमं कर्म ( ई० २०, ४१) कारके इत्यनुवर्तते तच्च प्रथमया विपरिणम्यते । कर्तुरिति 'क्तस्य च वर्तमाने' इति कर्तरि षष्ठी। आप्तुमिष्यमाणमी- दिसतम् , अतिशयेनेप्सितमीपिसततमम् । धातूपात्तव्यापाराश्रयः कर्ता । केनाप्तु- मित्याकाङ्क्षायां कर्तृविशेषणीभूतव्यापारेरणेत्याल्लभ्यते। ततश्च-कर्तुः क्रियया आप्तुभिष्टतमं कारकं कर्मसंज्ञं स्यादिति मूलोकार्थः सम्पद्यते । हरि भजति (ई० ३२, ५५)- अत्र भजनक्रियया सम्बन्धुं देवदत्तादिकर्तुरत्य- न्ते च्छाविषयीभूलस्य हरेः 'कर्तुरीप्सिततमं कर्म' इत्यनेन कर्मत्वात् 'कर्मणि द्वितीया' इत्यनेन द्वितीया भवति । "हरिः सेव्यते' इत्यत्र तु 'षेत्र सेवने' इत्यस्मात् कर्मणि तली विधानात् तडा कर्मणो हरेरुक्तत्वात् प्रथमैव भवति न तु द्वितीया । गां दोग्धि पयः (ई० २२, ४३ )--- 'गीः दोरिध पयः' इति विग्रहे 'गोः' अपादानत्वाऽविवक्षया कर्मत्वविवक्षायाम् 'अकथितं च' इति कर्मसंज्ञायां 'कर्मणि द्वितीया' इति द्वितीयायां कृतायां गां दोग्धि पयः' इति भवति । RSAMPUTERasdae करीप्सित-कर्ताको क्रियाद्वारा प्राप्त करने में जो इष्टतम हो बह कारकसंज्ञक होकर कर्मसंशक हो। कर्मणि-अनुक्त कर्ममें द्वितीया हो। आकथितं च-अपनादि विशेषसे अविवक्षित जो कारक वह कर्मसंज्ञक हो। दुह्याच - १. दुह प्रपूरणे, टुया याच्माम् , ३. हुपच पाके, ४. दण्ड दण्डनिपातने, ५. रुधिर आवरणे, ६. प्रच्छ शीक्षायाम् , ७. चित्र चयने, ८. ब्रूज व्यक्तायां वाचि, ९. शासु अनुशिष्टौ, १० जि अभिभवे, ११. मन्थ विलोडने, १२. मुष स्तेये, १३. णी प्रापणे १४. हृन हरणे, १५. कृष विलेखने, १६. प्रापणे-इन धातुओंके कर्मके साथ जो युक्त हो वही 'अकथित कम होता है। . " है 02 नि 2530 AUDIO ma ल लघुसिद्धान्तकौमुदी नयति हरति कर्षति वहति वा । अर्थनिबन्धनेयं संज्ञा। बलिं भिक्षते वसुधाम् । माणवकं धर्म भाषते अभिवत्ते वक्तीत्यादि । * इति द्वितीया * स्वतन्त्रः कर्ता ११४।५४ क्रियाया स्वातन्त्र्येण विवक्षितोऽर्थः कर्ता स्यात् । अर्थनिबन्धनेयम्-अर्थाश्रितेत्यर्थः । दुहादिपरिगणितधातूनामर्थो शृथते नतु दुहादयो धातच एवेति । तथा च दुहाद्यर्थकधात्वन्तरसंयोगेऽपि द्विकर्मकत्वं लभ्यते इति बोध्यम् । बलिं भिक्षते वसुधाम ( ई० ४५, ५१ )--'अकथितं चेति सूत्रे 'अर्थनि- बन्धनेयं संज्ञा' इति कैयटादिभिर्व्याख्यातत्वेन याचनार्थक ‘मिश्' धातुयोगेऽप्यत्र बलेरपादानत्वाऽविवक्षया कर्मत्वविवक्षायां कर्मत्वाद् द्वितीया भवति । स्वतन्त्र:-क्रिया (कार्य) में स्वतन्त्रतासे विवक्षित अर्थ (विषय, मनुष्य या पदार्थ) कर्तृसंजक होता है। अर्थात् उसे कर्ता कहते हैं। नोट:-क्रियाका जो साक्षात् जनक हो, उसे कारक कहते हैं (साक्षात्-क्रियाज- नकत्वं कारकत्वन)कारक छ होते हैं- कर्ता कर्म च करणं च सम्प्रदान तथैव च । अपादानाधिकरणं च इत्याहुः कारकाणि षट् ॥' १, क्रियासम्पादन के विषयमें जो स्वतन्त्र (प्रधान) भावसे विवश्चित रहता हैं उसे कर्ता कहते हैं ('क्रियासम्पादकः कर्ता') कता से प्रथमा विभक्ति होती है। 'भवेद्विभक्तिः प्रथमा कर्तृवाच्यस्थ कर्तरि। सम्बुद्धौ नाममात्रे च कर्मवाच्यस्थ कर्मणि ॥ क्वचिदव्यययोगे च प्रथमा कथ्यते बुधैः।' २. संज्ञाके जिस रूप पर क्रियाके व्यापार का फल पड़ता है, उसे कर्म कहते हैं (कर्तृ- वृत्तिव्यापारप्रयोज्यफलवत्वप्रकारकेच्छानिरूपितविषयताश्रयत्वं कर्मत्वम्) कर्मसे द्वितीया विभक्ति होती है। ३. जो क्रियाके व्यापार में कर्ताका सहायक हो अर्थात् क्रियासिद्धिमें जो अत्यन्त उपका- रक हो उसे 'करण' कहते हैं । करणसे तृतीया विभक्ति होती है। ४. (क) जिसको स्वसत्त्व-निवृत्तिपूर्वक कोई वस्तु दी जावे उसे 'सम्प्रदान' कहते हैं। सम्प्रदानमें चतुर्थी विभक्ति होती है। (अत एव दानवाक्यके अन्त में न मम' का उपादान करना असंगत है-व्यर्थ है।) (ख) जिसकी आकांक्षासे कोई कार्य किया जावे अर्थात् जो क्रियाकी प्रवृत्तिका फल हो उसे भी सम्प्रदान कहते हैं । (जैसे:-मुक्तये हरि भजति) ५. परस्पर वियुक्त होनेवाले पदार्थों में जो स्थिर हो अर्थात् जिससे विश्लेष (विभाग) अथवा दूर गमन सम्पन्न हो, उसे 'अपादान' कहते हैं । अपादानमें पंचमी विमक्ति होती है कि । । Naina कारकप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। साधकतम करणम् १।४।४२ । क्रियासिद्धौ प्रकृष्टोपकारक करणसंशं स्यात् । कर्तृकरणयोस्तृतीया २।३।१८ अनभिहिते कर्तरि करणे च तृतीया स्यात् । रामेण बारोन हतो वाली। * इति तृतीया * कर्मणा यमभिप्रेति स सम्प्रदानम् १।४।३२। दानस्य कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानसंज्ञः स्यात् । चतुर्थी सम्प्रदाने २।३।१३। सम्प्रदाने चतुर्थी स्यात् । : रामेण बाणेन हतो बाली-रामकर्तृकबाणकरणकहननाश्रयो बालीति शाब्दबोधः । अत्र रामो बारोन वालिनं जघान इति विग्रहे हन्धातोः कर्मणि तप्रत्यये कर्मण उत्तत्वात् तत्र प्रथमा। हननक्रियायां रामस्य स्वातन्त्र्यविवक्षया 'स्वतन्त्रः कर्ते'ति कत्तु संज्ञा । बाणस्य च हननक्रियायामत्यन्तोपकारकत्वात् 'साध- कतम करणम्' इत्यनेन करणसंज्ञा । ततश्वोभयत्र कर्तृकरणयोरनुक्तत्वात् 'कर्तृकरण- मोस्तृतीया' इत्यनेन तृतीयायां सत्यामुकं रूपं सिद्धम् । कर्मणेति (ई० २०, २८, ४४ )-दानक्रियाकर्मणा कर्ता यमभिति सम्बध्नाति सम्बन्धुमीप्सति वा तत्कार कं सम्प्रदानसंज्ञकमित्यर्थः। सम्यकप्रदीयते- ऽस्मै तत्सम्प्रदानम्। 'स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकपरस्वत्वोत्पत्त्यनुकूलव्यापारः दाधात्वर्थः । अत एव 'रजकस्य वस्त्रं ददाति' इत्यत्र 'रजकाय वस्त्रं ददाति' इति न भवति । ६. क्रियाके आश्रयभूत कर्ता और कर्म जिसमें अवस्थान करें उसे 'अधिकरण' कहते हैं। अधिकरणमें सप्तमी विभक्ति होती है साधकतमं-क्रियाकी सिद्धि में जो अत्यन्त उपकारक हो, वह करणसंशक हो । कर्तृकरणयो:-अनुक्त कर्ता और करणमें तृतीया हो। नोट :-'हेतु' और 'करण' के लक्षणों में किशित वैषम्य है। तथादि:-'दुष्य-गुण- " क्रियात्मककार्यनयनिरूपित- निर्यापार सध्यापारवृत्ति च यत्तद्धेतुत्वम्' और 'क्रिया- जनकमात्रवृत्तिव्यापारवति च यत् तत् करणत्वम्। 'दण्डेन घट: यहां पर जो दण्डरूप हेतु है उसमें व्यापार तो है पर क्रियाजनकत्वका अभाव है। अतः वह करण नहीं हुआ । एवं 'पुण्येन दृष्टो हरिः' यहाँ पर जो पुण्य रूप हेतु है, उसमें हरिदर्शनजनकत्वरूप क्रियाजनकता है, परन्तु वह व्यापारवान नहीं है। अतः वह भी करण नहीं हो सका। 'तृतीया करणे चैव कर्मवाच्यस्य कर्तरि । सहाथश्च तथा हेतौ प्रकृत्यादिभ्य एव च। ऊनार्थारणार्थश्च सदृशाथैस्तथैव च । अङ्गिनो विकृतियन तृतीयास्यात्तदङ्गतः ॥' कर्मणा-दानके कर्मसे जिसको सम्बन्धित करना इष्ट हो, वह सम्प्रदानसंशक होता है। चतुर्थी- अनुक्त संप्रदानमें चतुर्थी हो। , SANSAR a वि व १८६ लघुसिद्धान्तकौमुदी विप्राय गां ददाति । नमः स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाचा २।३।१६। एभियोंगे चतुर्थी । हरये नमः । प्रजाभ्यः स्वस्ति । अग्नये स्वाहा । पितृभ्यः स्वधा । अलमिति पर्याप्त्यर्थग्रहणम् । तेन दैत्येभ्यो हरिरलं प्रभुः समर्थः :शक्त इत्यादि । *इति चतुर्थी ध्रुवमपायेऽपादानम् १।४।२४। श्रपायो-विश्लेषस्तस्मिन्साध्ये यध्रुवम् अवधिभूतं कारकं तदपादानं स्यात् । अपादाने पञ्चमी २।३ । २८ | अपादाने पश्चमी स्यात् । आमादायाति । धावतोऽश्वात्पततीत्यादि। * इति पञ्चमी * षष्ठी शेष २।३।५०। कारकप्रातिपदिकार्थव्यतिरिक्तः स्वस्वामिभावादिः सम्बन्धः शेषस्तत्र पष्ठी । राज्ञः पुरुषः। कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठयेव । सतां गतम् । सर्पिषो जानीते। मातुः स्मरति । एधो दकस्योपस्कुरुते । भजे शम्मीश्चरणयोः। * इति षष्ठी * विप्राय गां ददाति (ई० ३९, ४८)-अत्र रामादिः कर्ता दानस्थ कर्मणा गवा विप्नं सम्बन्धुमिच्छतीति 'कर्मणा यमभिप्रैति-' सूत्रेण विप्रस्य सम्नदानसंज्ञायां 'चतुर्थी सम्प्रदाने' इति चतुर्थी भवति । प्रामादायाति ( ई० २४,५८) राम इति शेषः । अत्र रामविभागावधिामः इति 'ध्रुवमपाये' इति तस्य अपादानसंज्ञायाम् 'अपादाने पञ्चमी' इति पञ्चमी । (प्रकृतधात्वर्थानाश्रयत्वे सति तज्जन्यविभागाश्रयत्वं ध्रुवत्वम् । अपादानत्वन्तु- 'विभागजनकव्यापारानाश्रयत्वे सति विभागाश्रयत्वम्' इति) मातुः स्मरति (ई० २२, ४०, ४६ )-'मातरं स्मरति' इत्यर्थे कर्मत्वाऽवि- वक्षायां शेषत्वविवक्षया 'शेषे षष्ठी' इति षष्ठी भवति । नद कर r तु नमास्वस्ति-नमः, स्वस्ति आदिके योगमें चत िहो। नोट:-'सम्प्रदाने चतुर्थी स्यात् तादों च क्रियायुत्ते । रुच्यर्थानां प्रीयमाणे नमोयोग च सा भवेत् ॥ ध्रुवमपाये--अपाय ( विश्लेष विभाग ) में जो अवधिभूत (स्थिर ) रहे, उसकी अपादान संशा हो । अपादाने पञ्चमी-अपादानमें पञ्चमी विभक्ति हो। नोट:-'अपादाने ल्यबर्थे च योगे पूर्वादिभिस्तथा । उत्कर्षे पञ्चमी शेया हेत्वर्थे तु विभाषया ॥ ऋते विनादिभिर्योगे पञ्चमी च स्मृता बुधैः । षष्ठी शेषे-कारक और प्रातिपदिकार्थसे भिन्न स्वस्वामिभावादि (जन्यजनकमावादि) सम्बन्ध शेष हाता है, उस शेष षष्ठी हो। नोट :-'षष्ठी भवति सम्बन्धे कृदन्ते कर्तृकर्मणोः । तृतीया स्यात् तथा षष्ठी. कृस्यानां कर्तृकारके ॥ तुल्यायोगे षष्ठी स्यात् तृतीया च विभाषया ।।
कारका] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १८ आधारोऽधिकरणम् १४४५ कर्तृकर्मद्वारा तनिष्ठक्रियाया आधारः कार- कमधिकरणं स्यात् । सप्तम्यधिकरणे च २।३।३६। अधिकरणे सप्तमी स्यात् , चकारादूरान्तिकार्थेभ्यः । औपश्लेषिको वैषयिकोऽभिव्यापकश्चेत्याधारस्त्रिधा। कटे श्रास्ते । स्थाल्यां पचति । मोक्षे इच्छास्ति । सर्वस्मिन्नात्मास्ति । वनस्य दूरे अन्तिके वा। * इति सप्तमी * ॥ इति कारकप्रकरणम् ॥ MARA कर्मणि द्वितीया' इत्यादिसूत्रेषु द्वितीयादिविधिषु हि कर्मकर्तृकरणसम्प्रदानाऽपा दानाधिकरणकारकाण्यनुकान्तानि,प्रथमाविधौ प्रातिपदिकार्थोऽनुक्रान्तः,एतेभ्योऽन्यः स्वस्वामिभावादिसम्बन्धः 'शेषः', तत्र षष्ठी स्यादिति शेषे षष्ठीति सूत्रस्यार्थः । कटे आस्ते ( ई० ४७, ४९)-अत्र कर्ता रामादिस्तनिष्ठास्तिक्रियायाः परम्परयाऽऽधारस्य कटस्य 'आधारोऽधिकरणम्' इत्यनेन अधिकरणसंज्ञायां सप्तम्य- धिकरणे इत्यनेन सप्तमी भवति । 'अाधारोऽधिकरणमिति सूत्रे 'औपश्लेषिको वैषयिकोऽभिव्यापकश्चेत्याधार- स्त्रिधा । उप-समीपे, श्लेषः = सम्बन्धः, 'उपश्लेषः' तत्कृतमीपश्लेषिकम् । अस्यो. दाहरणं 'कटे प्रास्ते' इति । विषये भवो 'वैषयिका' अस्योदाहरणं 'मोक्ष इच्छास्ति' इति । अत्र कर्तृभूतेच्छागतां सत्ता क्रियां प्रति मोक्षस्य विषयतासम्बन्धपुरस्कारेण इच्छाद्वाराऽऽधारत्वादधिकरणम् । अभि-सर्वतोभावेन, व्याप्नोतीति अभिव्यापकः यः आंधारः सर्वमभिव्याप्नोति सः अभिव्यापक इत्युच्यते । अस्योदाहरणं 'सर्वस्मिः मात्मास्ति'(ई०४४)सर्वस्मिन्नभिव्याप्य अात्मा वर्तत इत्यर्थः । अत्र श्रात्मरूपकर्तृगता सत्ता क्रियां प्रति कृत्स्नव्याप्ति पुरस्कृत्य आत्मद्वारा सत्ताधारत्वात् सर्वस्याधिकरणत्वम् । भाधारोऽधिकरणम्-कर्ता और कर्मके द्वारा जो कतृ कर्मनिष्ठ क्रियाका आधार वह कारकसंशक होकर अधिकरणसंशक हो । सप्तम्यधिकरणे-अनुक्त अधिकरणमें सप्तमी हो। नोट:--'आधारे च तथा भावे विभक्तिः सप्तमी भवेत् । अनादरे च निर्धारे षष्ठी स्यात् सप्तमी तथा॥' छै कारकों के उदाहरण एक साथ निम्न इलोकमें देखें- 'रामो राजमणिः सदा विजयते राम रमेशं भजे । रामेणाभिहिता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः॥ रामानास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् । रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम! मासुद्धर ॥' इति 'इन्दुमती'टीकायां कारकप्रकरणम् ।
কাশ্ম জয়ন্ত অস্ত্রসূ तत्रादौ केवलसमासः। समासः पञ्चधा । तत्र सनसनं समासः । स च विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्तः केवल- समासः प्रथमः ॥१॥ प्रायेण पूर्वपदार्थप्रधानोऽव्ययीभावो द्वितीयः ॥२॥ प्रायेणोत्तरपदार्थप्रधानस्तत्पुरुषस्तृतीयः । तत्पुरुषभेदः कर्मधारयः । कर्मधारय- भेदो द्विगुः ॥ ३ ॥ प्रायेणान्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिचतुर्थः ॥ ४ ॥ प्रायेणोभय. पदार्थप्रधानो द्वन्द्वः पञ्चमः ॥ ५ ॥ समर्थः पदविधिः १११११ पदसम्बन्धी यो a ल . १)विशेषेति-विशेषाश्च ताः संज्ञा विशेषसंज्ञा, अव्ययीभावादयस्ताभि- विनिर्मुक्तः विशेषसंज्ञाविनिर्मुकः । अव्ययीभावादिविशेषसंज्ञारहितः केवलसमास इत्य- र्थः । (२) प्रायेण पूर्वपदार्थेति-पूर्वचाऽसौ पदार्थश्व पूर्वपदार्थः, स प्रधानो यस्मिन् स पूर्वपदार्थप्रधानः । यस्मिन् समासे पूर्वपदार्थस्य प्राधान्यं सोऽव्ययीभाव. संज्ञक इत्यर्थः । सूपप्रति = उन्मत्तगङ्गमित्याचव्ययीभावेऽपि सूपोन्मत्तयोः पूर्वपदार्थ- योरप्राधान्यात्प्रसक्तव्यभिचारनिवृत्यर्थमुक्तलक्षणे प्रायेणेति पदम् । (३) प्राये- णोत्तरेति-उत्तरपदार्थः प्रधानो यस्मिन् स उत्तरपदार्थप्रधानः । यस्मिन् समासे उत्तरपदार्थस्य प्राधान्यं स तत्पुरुषसंज्ञक इत्यर्थः । अतिमालादौ अतिक्रमणकर्तृत्वरू- पपूर्वपदार्थस्यैव प्राधान्येन मालादिरूपोत्तरपदार्थस्याऽप्राधान्यादुक्तलक्षण प्राप्तव्यभि- चारनिवृत्तये प्रायेणेति । (४) प्रायेणान्यपदार्थेति-अन्यपदार्थः प्रधानो यस्मिन् सोऽन्यपदार्थप्रधानः । यस्मिन् समासेऽन्यपदार्थस्य वर्तिपदार्थातिरिक्तस्य प्राधान्यं स बहुव्रीहिसंज्ञक इत्यर्थः। बहुबोहावपि 'द्वित्रा' इत्यादावन्यपदार्थस्याप्राधान्यात प्राये- णेत्युक्तम् । (५) प्रायेणोभयपदार्जेति-उभयः पदार्थः प्राधानो यस्मिन् स उभयप. समासः पञ्चधा -समास पाँच प्रकार के होते है.--१. केवलसमास, २. अव्ययामाद समात, ३. तत्पुरुष समास, ४. बहुव्रीहि समास और ५. द्वन्द्व समास । नोट:--'एकार्थवाचकतां प्राप्तो भिन्नार्थकाऽनेकपदसमूहः समासः।' दो या अधिक पदोंके एकपदीकरणको समास कहते हैं। विशेष-विशेषसंशाविनिर्मुक्तः अर्थात् तत्पुरुष, अव्ययीभावादि विशेषसंशारहित को “केवल समास' कहते हैं । यथा-पूर्व भूता-भूतपूर्वः। समर्थः पदविधिः--पदसंबन्धी जो विधि वह समर्थाश्रित छ। सामध्ये द्विविधम् । व्यपेक्षारूपम्, एकार्थीभावरूपञ्चतत्र 'स्वार्थपर्यवसायिनां केबलस०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १८६ विधिः स समर्थाधितो बोध्यः। प्राकडारात्समासः२।१३। 'कडाराः कर्म धारये' इत्यतः प्राक् 'समास' इत्यधिक्रियते । सह सुपा २११।४। सुप् सुपा सह वा समस्यते । समासत्वात्प्रातिपदिकत्वेन सुपो लुक् । परार्थाभिधानं वृत्तिः कृत्तद्धितसमासैकशेषसनाद्यन्तधातुरूपाः पञ्च वृत्तयः । वृत्त्यर्थाऽवबोधकं वाक्यं विग्रहः । स च लौकिकोऽलौकिकश्चेति द्विधा । तत्र पूर्वं भूत इति लौकिकः । पूर्व अम् भूत सु इत्यलौकिकः । भूतपूर्वः । भूतपूर्व चरडिति निर्देशात्पूर्वनि- पातः । इवेन समासो विभक्त्यलोपश्च । वागर्थों इव वागर्थाविव । ॥ इति केवलसमासः।। SAKHIRAKAIRANTERATRI दार्थप्रधानः । यस्मिन् समासे उभयपदार्थस्य प्राधान्यं स द्वन्द्वसंज्ञक इत्यर्थः । पाणि- पादमित्यादिद्वन्द्वेऽपि उभयपदार्थस्याऽप्राधान्यात् प्रायेणेत्युक्तम् । भूतपूर्वः (ई० ४४)-पूर्व भूतः 'भूतपूर्वः' । 'पूर्व अम् भूत सु' इत्यलौकि- कविग्रहे 'सह सुपा' इति समासे 'कृत्तद्धितसमासाच' इति समासत्वात् प्रातिपदिक- संज्ञायां 'सुपो धातुप्रातिपदिकयोः' इति सुव्लुकि 'पूर्वभूत' इति जाते 'प्रथमा- निदिष्टं समास उपसर्जनम्' इति पूर्व-भूतशब्दयोरुभयोरप्युपसर्जनसंज्ञायाम् 'उपस- र्जनं पूर्वम्' इति विनिगमकाऽभावादुभयोरपि पूर्वनिपाते प्राले 'भूतपूर्वे चरट्' इति निर्देशात् भूतशब्दस्य पूर्वनिपाते एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिकत्वात् सौ रुत्वो विसर्गे तत्सिद्धिः। इति 'इन्दुमती'टीकायां केवल समासः । पदानाम् आकाङ्क्षादिवशात्परस्परसम्बन्धरूपा व्यपेक्षा। सा च राज्ञः पुरुषः इत्यादि वाक्ये एवं। 'स्वार्थपर्यवसायिनां पदानां विशेषणविशेष्यभावावगाोकोपस्थितिजा जकत्वमेकार्थीभावस्वम् ।' तच्च राजपुरुषः' इत्यादिवृत्तावेव ! प्राकडारात्-'कडाराः कर्मधारये' इस सूत्र से पूर्व समास' यह अधिकार है। संह सुपा-(समर्थ) सुबन्तका सुबन्न के ला में समास हो, विकल्पसे । वृत्यर्थावबोधक वाक्यं विग्रहः ‘कृत्तद्धितसमासैकशेषलनाधन्तधातुरूपपञ्चवृत्तीना अर्थावबोधक वाक्यं विग्रहः' इति पयम् । इवेन समासो-'इव' शक के साथ समास , विभक्तिका लोग नहीं हो इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें केवल समासप्रकरण समाप्त हुआ।
গুথায়ী শহর ? अव्ययीभावः २१शश अधिकारोऽयं प्राक् तत्पुरुषात् । अध्ययं विभक्तिस- मीपसमृद्धिव्यचर्थाभावाऽत्ययाऽसम्प्रतिशब्दप्रादुर्भावपश्चाद्यथाऽनुपूज्ये- योगपद्य सादृश्यसम्पत्तिसाकल्याऽन्तवचनेषु २।१।६। विभक्त्यर्थादिषु वर्त- मानमव्ययं सुबन्तेन सह नित्यं समस्यते सोऽव्ययीभावः । प्रायेणाऽविग्रहो नित्य- समासः. प्रायेणाऽस्वपदविग्रही वा। विभक्तो-'हरि कि अधि' इति स्थिते। प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् ।२।४३१ समासशास्त्रे प्रथमानिर्दिष्टमुप- सर्जनसंज्ञं स्यात् । उपसर्जनं पूर्वम् २।२।३० सभासे उपसर्जनं प्राक्प्रयोज्यम् । इत्यधेः प्राक् प्रयोगः । सुपो लुक् । एकदेशविकृतस्याऽनन्यत्वात्प्रातिपदिकसंज्ञायां स्वाधुत्पत्तिः । अव्ययीभावश्चेत्यव्ययत्वात्सुपो लुक् । अधिहरि । अव्ययीभावश्च अधिहरि ( ई० ३२, ४५, ५३ ) हरौ इति 'अधिहरि' । हरि कि श्रधि इति स्थिते 'छाव्ययम्-' इति सूत्रेण अव्ययीभावसमासे समासविधायकसूत्रेऽव्यसमिति प्रथमान्तपदनिर्दिष्टस्य 'अधी'त्यल्य 'प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम्' इत्यनेन लंप- अध्ययीभावः तत्पुरुष समाससे पूर्व अव्ययीभावका अधिकार है। (अव्ययीभाव- समास-विधायक सूत्रसे अव्ययीभाव संज्ञा भी समासके साथ साथ होगी) नोट:--अध्ययीभाव समास-निष्पन्न शब्द नपंसकलिङ्ग ही होता है और उसके उत्तर पंचमी विभक्तिको छोड़कर सभी स्वादि विभक्तियोंके स्थानमें अम्' हो जाता है। केवल अकारान्त शब्दके उत्तर तृतीया और सप्तमीके स्थानमें विकल्पसे 'अम्' होगा। यथा:-अदि- गोपं कृष्णः । अधिगोपं कृष्णं । अधिगोपम् , अधिगोपेन वा कृष्णेन । अधिगोपं कृष्णाय । अधिगोपात कृष्णात् । अधिगोपं कृष्णस्य । अधिगोपम् , अधिगोपे वा कृष्णे। अव्ययं विभक्ति-विभक्त्यर्थादिमें वर्तमान जो अव्यय, वह समर्थ सुबन्त के साथ नित्य समस्त हो। (यही अव्ययीभाव कहलाता है) प्रथमानिर्दिष्टं-समासशास्समें प्रथमा निर्दिष्टको उपसर्जन संज्ञा हो। नोट:-समासशास्त्र याने समासविधायक सूत्र, उस सूत्रघटक जो प्रथमान्त पद, तन्नि- दिष्ट समस्यमान जो 'प्रथमान्त' छो, उसकी उपसर्जन संज्ञा हो । उदाहरण देखें-'अधिहरिए । यहाँ समासशाला हुआ 'अव्ययं विभक्ति' यह शास्त्र (सूत्र), इस सूत्रघटक प्रथमान्त पद हुआ 'अव्ययं' यह पद, इससे निर्दिष्ट हुआ 'अधि' इसलिये अधिकी उपसर्जनसंशा होती ई-हरिकी नहीं। उपसर्जनं पूर्वम्-समासमें उपसर्जनका पूर्व प्रयोग हो । अध्ययीभावन-अव्ययी- अदन्तादव्ययीभावात्सपो न लुक, तस्य पञ्चमी चिना अमादेश ल्या अव्ययीभावस०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १६१ २।४।१८ आयं नपुंसकं स्यात् । नाऽव्ययीभावादतोऽस्त्वपञ्चन्याः २।४८३ पातीति गोपास्तस्मिन्नित्यधिगोपम् । तृतीयासप्तम्योबहुलम् २।४।८४ा अदन्ताद- व्ययीभावात्तृतीयासप्तम्योबहुलमम्भावः स्यात् । अधिगोपम् , अधिगोपेन, अधि- गोपे वा । कृष्णस्य समीपम् उपकृष्णम् । मद्राणां समृद्धिः सुमद्रम् । यवनाना व्यद्धिदुर्यवनम् । मक्षिकाणामभावो निर्मक्षिकम् । हिमस्यात्ययोऽतिहिमम् । निद्रा सम्प्रति न युज्यत इत्यतिनिद्रम् । हरिशब्दस्य प्रकाश इतिहरि । विष्णोः पश्चा. सर्जनसंज्ञायाम् 'उपसर्जनं पूर्वम्' इति तस्य पूर्वनिपाते 'अधि हरि डि' इति जाते समासत्वात् प्रातिपदिकत्वे 'सुपो धातुः' इति सुब्लुकि एकदेशविकृतन्यायेन समु. दायात सौ 'अव्ययीभावश्च' इत्यव्ययत्वात् सो कि 'अधिहरि' इति । अधिगोपस् (ई० ५१)-गां पातीति 'गोपाः तस्मिन्नित्यधिगोपम् । 'गोपा कि अधि' इति स्थिते 'अव्ययम्-' इति समासे 'प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम्' इति 'श्रधी' त्यस्योपसर्जनसंज्ञायाम् 'उपसर्जनं पूर्वम्' इति तस्य पूर्वनिपाते समास- त्वात्प्रातिपदिकत्वेन सुपो लुकि 'अव्ययीभावश्च' इत्यनेन नपुंसकसंज्ञायाम् 'हस्वी नपुंसके प्रातिपदिकस्य इति 'गोपा' इत्यस्य हस्वत्वे 'अधिगीप' इति स्थिते एकदेशविकृतन्यायेन समुदायेन समासत्वात् सौ अव्ययत्वात् सोलुकि प्राप्ते 'नाऽव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः' इति तनिषेधे सोरमि पूर्वरूपे तसिद्धिः । उपकृष्णम ( ई० २१, २५, ४७ )-कृष्णस्य समीपमुपकृष्णम् । 'कृष्णा ङस् उप' इत्यलौकिकविप्रहे 'श्रव्ययम् -' इति सूत्रेण सामीप्यार्थवाचक 'उप'- शब्देन सह समासे 'प्रथमानिर्दिष्टम्-' इति 'उप' इत्यस्योपसर्जनसंज्ञायाम् 'उपसर्जन पूर्वम्' इति तस्य पूर्वप्रयोगे समासत्वात्प्रातिपदिकत्वेन सुपो लुकि समुदायात् ट्राविभक्तौ 'तृतीयासप्तम्योबहुलम्' इत्यमादेशे पूर्वरूपे 'उपकृष्णम्' इति । श्रमा- देशाऽभावपक्षे इनादेशे गुणे 'उपकृष्णेन' इति । प्रथमाविभक्तावपि 'अव्ययीभावधे'- त्यव्ययत्वात् सुब्लुकि प्राप्ते 'नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः' इति तनिषेधे सोरमि पूर्वरूपे 'उपकृष्णम्' इति, सप्तमीविभक्तौ तु 'उपकृष्णम्-उपकृष्णे' इति बोध्यम् । .. भाव समास नपुंसकलिङ्ग हो। नाभ्ययी-अदन्त अव्ययीभावसे पर 'सुप्' का लुक नहीं हो, किन्तु पञ्चमीविभक्ति को छोड़कर अन्य सभी विभक्तियों को अम्' आदेश हो जाय । तृतीया-अदन्त अव्ययीभावसे पर तृतीया और सप्तमीको बहुलप्रकार (विकल्प ) से अम् SH. . लघुसिद्धान्तकौमुदी दनुविष्णु । योग्यताचीप्सापदार्थानतिवृत्तिसादृश्यानि-यथार्थाः। रूपस्य योग्यम- नुरूपम् । अर्थमर्थं प्रति प्रत्यर्थम् । शक्तिमनतिक्रम्य यथाशक्ति । अव्ययीभावे चाडकाले६।३१८॥ सहस्य सः स्यादव्ययीभावे न तु काले । हरेः सादृश्य सहरि । ज्येष्ठस्यानुपूयेणेत्यनुज्येष्ठम् । चक्रेण युगपत् सचक्रम् । सदृशः सख्या ससखि । क्षत्राणां सम्पत्तिः सक्षत्रम् । तृणमप्यपरित्यज्य सतृणमतिः अग्नित्रन्थ- पर्यन्तमधीते साऽमि । नदीभिश्च २ । १ । २० । नदीभिः सह संख्या समस्यते । समाहारे चायमिष्यते ! पञ्चगङ्गम् । द्वियमुनम् । तद्धिताः ४१ ११७६। प्रा- पञ्चमसमातेरधिकारोऽयम् । अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः ।। ४।१०७ शरदा- दिभ्यष्टच स्यात्समासान्तोऽव्ययीभावे । शरदः समीपमुपशरदम् । प्रतिविपाशम् "पंचम गोपं अधिग सहरि (ई० ३८) हरेः सादृश्यं सहरि । 'हरि उस् सह' इति विग्रहे सा- दृश्यार्थक 'सह' इत्यव्ययेन सह 'अव्ययम्-' इति सूत्रेण समासे सहेत्यस्योपसर्जन- संज्ञायां पूर्वनिपाते समासत्वात्प्रातिपदिकत्वेन सुपो लुकि 'अव्ययीभाने चाकाले इति सहस्य सादेशे समुदायात् सौ 'श्रव्ययीभावश्च'त्यव्ययत्वात् सुब्लुकि तत्सिद्धिः । पञ्चगङ्गम् (ई० २३,३९,४९,५८)-'पञ्चानां गङ्गानां समाहारः' इति लौकिक- विग्रहः । अत्र 'पञ्चन् अाम् गङ्गा आम्' इत्यलौकिकविग्रहे 'समाहारे चायमिष्यते' इति वार्तिकबलात् 'नदीभिश्च' इति समासे सुब्लुकि 'नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य'इति नलोपे 'एकविभक्ति चापूर्वनिपाते' इति 'गङ्गा' इत्यस्योपसर्जनत्वाद् ‘गोत्रियोरुपस- र्जनस्य' इति ह्रस्वे समुदायात् सौ 'अव्ययीभावश्च'त्यव्ययत्वात् सोलुकि प्राप्ते 'नाव्य- यीभावात्-' इति तन्निषेधे सोरमि पूर्वरूपे तत्सिद्धिः । तृतीयाविभक्तौ तु 'तृतीयास- सम्योः-' इति अमादेशे पूर्वरूपे 'पञ्चगङ्गम्' इति । पक्षे इनादेशे गुणे 'पञ्चगङ्गेन' इति । सप्तमीविभक्ती तु पश्चगङ्गम्-पञ्चगङ्गे इति रूपद्वयं भवति । रुपशरदम् ( ई० ४८,५०)-'शरद् डस् उप' इत्यलौकिकविग्रहे सामीप्या- र्थक 'उप' इत्यव्ययेन सह 'अव्ययम्-' इति सूत्रेण समासे 'श्रव्ययीभावे शरत्प्रभृ. तिभ्यः' इति रचि अनुबन्धलोपे उपेत्यस्योपसर्जनसंज्ञायां पूर्वनिपाते समासत्वात् प्रा- भाव (अम् आदेश) हो । अव्ययीभावे-अव्ययीभाव समास में सह को 'स' आदेश हो, कालवाचकको छोड़कर । नदीभिन्न--नदीवाचक सुबन्तके साथ संख्यावाचक समर्थ सुबन्त समस्त हो, विकल्पसे । समाहारे-नदीवाचकका यह समास समाहारमें ही इष्ट है। तद्धिता:--पञ्चभ अध्यायकी समाप्ति पर्यन्त यह अधिकार है। अव्ययीभावे शरत्----सर- समस्त निर्दिष्ट न दिष्ट स यहाँस हुजा तत्पुरुषप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। ग) जराया जरस् च । उपजरसमित्यादि । अनश्च ॥४|१०८) अनन्ताह व्ययीभावाच् स्यात् । नस्तद्धिते ६।४।१४४ । नान्तस्य भस्य टेपिस्तद्धिते । उपराजम् । अध्यात्मम् । नपुंसकादन्यतरस्याम् ॥४|१०६ भवन्तं यत् क्लीवं तदन्तादव्ययीभावाहज्वा स्यात् । उपचर्मम् । उपचर्म । झयः ।४।११श मय- न्तादव्ययीभावादृज्वा स्यात् । उपसमिधम् । उपसमित् । ॥ इत्यव्ययीभावसमासः ॥ . अथ तत्पुरुषसमास: तत्पुरुषः २।१।२२। अधिकारोऽयं प्राग्वहुव्रीहेः। द्विगुश्च राश२३॥ द्विगुरपि तिपदिकत्वेन सुपो लुकि समुदायात सौ अव्ययत्वात् सुब्लुकि प्राप्ते 'नाव्ययीभा- वात्-' इति तनिषेधे सोरमि पूर्वरूपे उक्तं रूपं जातम् । अध्यात्मम् ( ई० ४०, ४६ )----'आत्मन् डि अधि' इत्यलौकिकविग्रहे 'श्रव्य यम्-' इति समासे 'प्रथमानिर्दिष्टम्-' इत्यधीत्यस्योपसर्जनसंज्ञायाम् 'उपसर्जनं पूर्वम्' इति पूर्वप्रयोगे समासत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञायां सुपो लुकि यणि अध्यात्मन्' इति स्थिते 'अनश्च' इति दचि भत्वात् 'नस्तद्धिते' इति टिलोपे समुदायात सौ अव्ययत्वात् सब्लुकि प्राप्ते 'नाव्ययीभावात्' इति तनिषेधे सोरमि पूर्वरूपे तत्सिद्धम् । इति 'इन्दुमती'टोकायामव्ययीभावप्रकरणम् । , दादिसे समासान्त 'टच' प्रत्यय हो, अव्ययीभावमें । जराया-'जरा' शब्दको 'जरस्' आदेश हो और चकारात् 'टच' प्रत्यय भी हो, अव्ययीभावमें । अनश्च-अन्नन्त अव्ययी- भावसे समासान्त 'टच' प्रत्यय हो । नस्तद्धिते-नान्त भसंज्ञक 'टि' का लोप हो, तद्धित के परे। नपुंसकादन्य-अन्नन्त जो क्लीब, तदन्त जो अव्ययीभाव, उससे समासान्त 'टच्? प्रत्यय हो, विकल्पसे । झयः-झयन्त अव्ययीभावसे समासान्त 'टच' प्रत्यय हो, विकल्पसे । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें अव्ययीभावप्रकरण समाप्त हुआ। तत्पुरुषः--बहुव्रीहिके पूर्व तत्पुरुषका अधिकार है। नोट:-तत्पुरुषमें जितने समास विधायक सूत्र हैं, उन सबोंसे समासके साथ-साथ तत्पुरुषसंज्ञा भी होगी। द्विगुश्व-द्विगु समास भी तत्पुरुषसंज्ञक हो । नोट-तत्पुरु षका भेद 'कर्मधारय और कर्मधारयका भेद द्विगु समास कहलाता है। १३ ल० Vasurkanina "समासप्रत्ययविधी प्रा लघुसिद्धान्तकौमुदी तत्पुरुषसंज्ञका स्यात् । द्वितीया श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः शिरा द्वितीयान्तं श्रितादिप्रकृतिकैः सुबन्तैः सह वा समस्यते, स च तत्पुरुषः। कृष्ण श्रितः कृष्णश्रित इत्यादि । तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन रा१२३० तृती- यान्तं तृतीयान्तार्थकृतगुणवचनेनाऽर्थेन च सह वा प्राग्वत् । शङ्खलया खण्डः शङ्खलाखण्डः । धान्येनाऽर्थों धान्यार्थः । तत्कृतेति किम् ? अक्षणा काणः । कर्तृकरणे कृता बहुलम् २ । १ । ३२ । कर्तरि करणे च तृतीया कृदन्तेन बहुलं प्राग्वत् । हरिणा बातो हरित्रातः। नखैभिन्नो नखभिन्नः। कृग्रहणे गतिकार. कपूर्वस्यापि ग्रहणम् | नखनिर्भिन्नः। चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितः २।१।३६। चतुर्थ्यन्तार्थाय यत् यद्वाचिना, अर्थादिभिश्च चतुर्थ्यन्तं वा प्राग्वत् । कृष्णश्रितः-'कृष्ण श्रम् श्रित सु' इत्यलौकिकविप्रहे 'द्वितीया श्रिते'ति समासे सुब्लुकि समासशास्त्रघटक द्वितीयेति प्रथमान्तपदनिर्दिष्ट 'कृष्णौ'त्यस्योप- सर्जनसंज्ञायां पूर्वनिपाते एकदेशविकृतन्यायेन समुदायात् सौ रुत्वे विसर्गे तसिद्धिः । नखनिर्भिन्नः ( ई० २०, २२)-'नख भिस निर्भिन्न सु' इति विग्रहे (तत्पुरुष) जिस समासमें समस्त पदका अन्तिम खण्ड प्रधान हो और सभी खण्ड संबोधन तथा प्रथमाको छोड़कर अन्य किसी भी कारकको विमत्तिका अर्थ लेकर परस्पर सम्बद्ध हों, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे-शोकाकुलः। मधुरमिश्रः आदि । (कर्मधारय) जिस तत्पुरुष समासमें विशेष्य-विशेषण या उपमान-उपमेयके समानाधिकरण गं (विशेष्य-विशेषणभावापन्न ) का बोध हो, उसे कर्मधारय समास कहते हैं । (इसमें उत्तर पदका अर्थ प्रधान रहता है ) जैसे-दीर्घाकारः। घनश्यामः आदि । कर्मधारय समासमें दोनों पदों में सम्बन्धको व्यक्त करनेवाले शब्दके लुप्त रहनेपर वह समास 'मध्यमपदलोपी समास' कहलाता है। जैसे-'पर्णनिर्मिता शाला पर्णशाला' 'शाकप्रियः पार्थिवः शाकपार्थिव:' आदि। द्विगु-सामासिक शब्दका पूर्व पद संख्यावाचक होनेसे वह समास द्विगु समास कहलाता है। यह समास अधिकतर समाहार अर्थमें और एकवच- नान्त नपुसकलिंग होता है। इसके बहुतसे समस्त पद अनियमितरूपसे बनते हैं। जैसे- त्रिलोकी। पञ्चगवम् , आदि । द्वितीयाश्रिता-द्वितीयान्त पद,श्रितादि प्रकृतिक सुबन्तके साथ समस्त हो, विकल्पसे। तृतीयान्त-तृतीयान्त पद, तृतीयान्तार्थकृत गुणवचनके साथ और अर्थ शब्दके साथ समस्त हो, विकल्पसे । कर्तृकरणे-कुर्ता और करणमें जो तृतीया, वह कृदन्तके साथ बहुल प्रकार से समस्त हो। ऋग्रहणे-कृतग्रहणमें गतिकारकपूर्वका मी अङ्ग हो । चतुर्थी-चतु. - । ७ य . तत्पुरुषस.] इन्दुमती टीकाद्वयोपेता। भूपाय दार यूपदारु । तदर्थेन प्रकृतिविकृतिभाव एवेष्टः । तेनेह नरन्ध- नाय स्थाली । अर्थेन नित्यसमासो विशेष्यलिङ्गता चेति वक्तव्यम् । द्विजार्थः सूपः। द्विजार्थी यवागूः । द्विजार्थ पयः। भूतबलिः । गोहितम् । गौसुखम् । गोरक्षितम् । पञ्चमी भयेन राश३७ चौराद्भयं चोरभयम् । स्तो- कान्तिकदूरार्थकृच्छाणि क्तेन २१ ११ ३६ | पञ्चम्याः स्तोकादिभ्यः ६।३।२। अलुगुत्तरपदे । स्तोकान्मुक्तः। अन्तिकादागतः । अभ्याशादागतः । दूरदागतः । कृच्छ्रादागतः । षष्ठी २।२।८ षष्ठयन्तं सुबन्तेन प्राग्वत् । राजपुरुषः । पूर्वापरा- धरोत्तरमेकदेशिनकाधिकरणे २ । २।१ । अवयविना सह पूर्वादयः समस्यन्ते एकत्वसंख्याविशिष्टश्चेदवयवी । षष्ठीसमासापवादः । पूर्वकायः। अपरकायः । एकाधिकरणे किम् ? पूर्वश्छात्राणाम् । अर्ध नपुंसकम् २१ २२ २। समांशवाच्यर्थ- कृदन्तत्वाऽभावात् समासाप्राप्तौ 'कृद्ग्रहणे गतिकारकपूर्वस्यापि ग्रहणम्' इति परिमा- पाबलात् 'कर्तृकरणे' इति समासे सुब्लुकि समुदायात सौ रुत्वे विसर्गे तत्सिद्धम् । यूपदारु (ई० ३६)-'यूप के दारु सु' इत्यलौकिकविप्रहे 'चतुर्थी तदर्थार्थ'- इति विभाषया समासे सुब्लुकि समुदायात् सौ 'परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पु रुषयोः' इत्यस्य जागरूकत्वेन नपुंसकत्वात् सोलुंकि तत्सिद्धम् । राजपुरुषः ( ई० ३२, ४८, ५५ )-राज्ञः पुरुषः राजपुरुषः । 'राजन् छस् पुरुष सु' इत्यलौकिकविप्रहे 'षष्ठी' इति समासे सुब्लकि अन्तर्वतिविभक्ति माश्रित्य पदत्वाबलोपे समुदायात् सौ रुत्वे विसर्गे तनिष्पन्नम् । यन्तार्थके लिये जो है, तद्वाचक जो समर्थ सुबन्त उसके साथ और अर्थादि प्रकृतिक समर्थ सुबन्तके साथ चतुर्थ्यन्त समस्त हो, विकल्पसे । नोट:-'यूपाय दारु यूपदारु' यहाँ पर 'धूपाय यह चतुर्यन्त है, इसका अर्थ हुआ "यूप' इसके लिये जो ( दार) है, तवाचक समर्थ सुवन्त हुआ 'दारु सु' इसके साथ चतु- यन्त 'यूपाय' का समास होता है । अर्थेन-अर्थ शब्दके साथ चतुर्थ्यन्तका नित्य समास हो और विशेष्यलिंगता भी हो। पञ्चमी भयेन-भयप्रकृतिक समर्थ सुबन्तके साथ पञ्चम्यन्त समस्त हो, विकल्पसे । स्तोकान्तिक-तान्त प्रकृतिक समर्थ सुबन्त के साथ स्तोकादि समस्त हो, विकल्पसे। पञ्चम्या:-स्तोकादिसे पर पञ्चमीका अलुक् हो, उत्तरपदके परे । षष्ठीसमर्थ सुबन्तके साथ षष्ठयन्तका समास हो। पूर्वपरा-यदि एकत्व संख्याविशिष्ट अवयवी हो तो, अवयववाची के साथ पूर्वादि समर्थ सुबन्त समस्त हो, विकल्पसे । सई नपुंसक-समांश.
al राघुसिद्धान्तकौमुदी शब्दी नित्यं क्लीबे, स प्राग्वत् । अर्ध पिप्पल्याः अर्धपिप्पली । सप्तमी शौएड. श४०/ सप्तम्यन्तं शौण्डादिभिः प्राग्वत् । अक्षेषु शौण्डः नक्षशौण्डः, इत्यादि । द्वितीया-तृतीयेत्यादियोगविभागादन्यत्रापि तृतीयादि-विभक्तीनां प्रयोगवशात्स- मासो ज्ञेयः । दिक्संख्ये संज्ञायाम् २१ ११ ५०१ संज्ञायामेवेति नियमार्थ सूत्रम् ।। पूर्वेषुकामशमी। सप्तर्षयः । तेनेह न-उत्तरा वृक्षाः । पञ्च ब्राह्मणाः । तद्धि- तार्थोत्तरपदसमाहारे च २१ १ ५१ । तद्धितार्थे विषये उत्तरपदे च परतः समा- हारे च वाच्ये दिक्सङ्खये प्राग्वत् । पूर्वस्यां शालायां भवः। पूर्वा शाला इति समासे जाते-सर्वनाम्नो वृत्तिमाने पुंवद्भावः । दिक्पूर्वपदादसंज्ञायां बः ४।२।१०७) अस्माद्भवाद्यर्थे अः स्यादसंज्ञायाम् । तद्धितेष्वचामादेः ७।२।११७ निति णिति च तद्धितेप्वचामादेरची वृद्धिः स्यात् । यस्येति च । पौर्वशालः । पञ्च अर्धपिप्पली ( ई० ५२)-'अर्ध सु पिप्पली स्' इत्यलौकिकविप्रहे 'अध नपुंसकम्' इति समासे समासशास्त्रघटकप्रथमान्तपदनिर्दिष्ट 'अर्ध सु' इत्यस्य उपस- जनसंज्ञायां पूर्वनिपाते सुब्लकि समुदायात् सौ विभक्तिकार्ये उक्तं रूपं सिद्धम् । अन्न पिप्पलीशब्दस्य नियतविभक्तिकरवेऽपि 'एकविभक्तावषष्ठयन्तवचनम् इतितः निषेधादुपसर्जनत्वाऽभावाद् ह्रस्वो नेति तत्त्वविदः । पूर्वेषुकामशमी-पूर्वश्चासौ इघुकामशमी पूर्वेषुकामशमी । देशविशेषस्य संज्ञे- यम् । 'दिकसंख्ये संज्ञायाम्' इत्यनेनान समासः । न च 'विशेषणं विशेष्येण बहुलम् इत्येव सिद्धे किमर्थमिदमिति वाच्यम् 'संज्ञायामेवेति' नियमार्थ तस्यावश्यकत्वात् । पौर्वशालः ( ई० ४१, ४५, ५०)-पूर्वस्यां शालायां भवः इति लौकिक- विग्रहे 'पूर्वा डि शाला डि' इति स्थिते 'तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च' इति समासे सुब्लुकि 'सर्वनाम्नी वृत्तिमात्रे घुबद्भावः' इति पूर्वाशब्दस्य पुंवत्वे 'दिक्पूर्वपदाद- संज्ञायां नः' इति अप्रत्यये 'यस्येति च' इत्याकारलोपे 'तद्धितेप्वचामादेः' इत्यादि- वृद्धौ समुदायात सौ विभक्तिकार्य तत्सिद्धम् । वाची नित्य नपुंसक अर्ध शब्द, समर्थ सुबन्तके साथ समस्त हो, विकल्पसे । सप्तमी शौण्डै:-शौण्डादि प्रकृतिक समर्थ सुबन्तके साथ सप्तम्यन्त समस्त हो, विकल्पसे । दिक्संख्ये-दिग्वाची और संख्यावाचीका संज्ञामें ही समानाधिकरण समर्थ सुबन्तके साथ समास हो, विकल्पसे । तद्धितार्थी-तद्धितार्थके विषयमें उत्तर पदके परे और समाहार वाच्यमें दिग्याचक और संख्यावाचकका समास हो, विकल्पसे। सर्वनाम्नो-सर्वनामको वृत्ति- मात्रमें धुंवद्भाव हो । दिक्पूर्वपदा-दिक्पूर्वपदक ( समास ) से भवादि अर्थो में 'अ' प्रत्यय हो, असंज्ञा । तद्धिते-अचों के मध्य में भादि अन्चको वृद्धि हो, मित-णित्-तद्धित प्रत्यय नि शि Rey क Purama तत्पुरुषस०] इन्दुमती-टीकाद्धयोपेता। गावो धनं यस्येति त्रिपदे बहुव्रीही द्वन्द्वतत्पुरुषयोरुत्तरपदे नित्यसमासव- चनम् । गोरितद्धितलुकि ५१४।६। गोऽन्तात्तत्पुरुषाच् स्यात् समासान्तो, न तु तद्धितलुकि । पञ्चगवधनः । तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः १ ।२। ४२॥ संख्यापूर्वो द्विगुः २।११ ५२। तद्धितार्थत्यत्रोक्तस्त्रिविधः संख्यापूर्वो द्विगुसंज्ञः स्यात् । द्विगुरेकवचनम् ।४।१। द्विग्वर्थः समाहार एकवत्स्यात् । स नपुंसकम् २।४। १७ । समाहारे द्विगुर्द्वन्द्वश्च नपुंसकं स्यात् । पञ्चानां गवां समाहारः पञ्चगवम् । विशेषणं विशेष्येण बहुलम् २ | ११ ५७ । भेदकं समानाधिकरणेन पञ्चगवधनः ( ई० २२,२६,५६ )-पञ्च गावो धनं यस्य स 'पञ्चगवधनः' अत्र 'पञ्चन् जस् गो जस् धन सु' इति त्रिपदे बहुव्रीहौ अचान्तर- 'पञ्चन्-गोश- ब्दयोः' 'तद्धितार्थेति विभाषया समासे प्राप्ते 'द्वन्द्वतत्पुरुषयोरुत्तरपदे नित्यसमास- वचनम्' इति नित्ये समासे सुब्लुकि अन्तर्तिनी विभक्तिमाश्रित्य पदत्वात् पञ्चन्- शब्दस्य नस्य लोपे 'पञ्चगो' इत्यस्मात् 'गोरतद्धितलकि' इति टचि अनुबन्धलोपे अवादेश 'पञ्चगव' इति बहुब्रोहाववान्तरे 'तत्पुरुषे' जाते बहुव्रीहिसमासस्यापि आति. पदिकत्वात् सुलोपे समुदायात् सौ रुत्वे विसर्गे ‘पञ्चगवधनः' इति । पञ्चगवम् ( ई० २७,३३,३४,४९)---'पञ्चन् भाम् गो भाम्' इति विग्रहे 'तद्धितार्थ-' इति समासे सुब्लुकि अन्तर्वर्तिनी विभक्तिमाश्रित्य पदत्वान्चलोपे 'गोरतद्धितलुकि' इति टचि अनुबन्धलोपे अवादेशे 'संख्यापूर्वो द्विगुः' इति द्विगुसंज्ञायां 'द्विगुरेकवचनम्' इत्येकवद्भावे समुदायात् सौ ‘स नपुंसकम्' इति नपुंसकत्वात् सोरमि पर्वरूपे उक्तं रूपं सिद्धम् । के परे। द्वन्द्वतत्पु-समासचरमावयव उत्तरपदके परे अवान्तर द्वन्द और तत्पुरुषको नित्य ही समास होता है। गौरतद्धित-गोन्त तत्पुरुषसे समासान्त 'टच' प्रत्यय हो, परन्तु तद्धित. लुक में नहीं हो। तत्पुरुषः-समानाधिकरण (एकाधिकरण ) तत्पुरुष कर्मधारय संशक हो । संख्यापूर्वो-'तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च' इस सूत्रसे विहित संख्यापूर्वकका समास द्विगुसंज्ञक हो । द्विगुरेकवचनम् -द्विग्वर्थ समाहार एकवत हो। स नपुंसक-तमा- हार में द्विगु और द्वन्द्व नपुंसकलिङ्ग हो । विशेषणं-विशेषण और विशेष्य, समानाधिकरण समर्थ सुबन्तके साथ बहुलप्रकारसे समस्त हो। नोट:-'भेद्यं विशेष्यमित्याहुर्भेदकं तु विशेषणम् । प्रधानं तु विशेष्यं स्यादप्रधानं विशेषणम् ॥' पदार्थे स्वार्थनिर्पक्षादप्रधानं विशेषणम् । विशेष्यं तु प्रधानं स्यात्स्वार्थस्यैव समर्पणात् ॥' .
लघुसिद्धान्तकौमुदी भेद्येन बहुलं प्राग्वत् । नीलमुत्पलं नीलोत्पलम् । बहुलग्रहणात्क्वचिचित्यम्-कृष्णा सर्पः । कचिच-रामो जामदग्न्यः । उपमानानि सामान्यवचनैः २१११५५ धन इव श्यामो धनश्यामः । शाकपार्थिवादीनां सिद्धये उत्तरपदलोपस्यो- पसंख्यानम् । शाकप्रियः पार्थिवः शाकपार्थिवः । देवपूजको ब्राह्मणो देवब्राह्मणः । नम् ।२।६। नन सपा सह समस्यते । नलोपो नत्रः ६।३।७३। नो मस्याः लोप उत्तरपदें । न ब्राह्मणः-अब्राह्मणः । तस्मान्नुडचि ६३।७४] लुप्तनकाराचा उत्तरपदस्याजादेर्नुडागभः स्यात् । अनश्वः । नैकधेत्यादौ तु 'न'शब्देन सह" सुप्सुपेति समासः । कुगदिप्रादयः २ । २ । १८ । एते समर्थेन नित्यं समस्यन्ते कुत्सितः पुरुषः कुपुरुषः । अर्यादिच्चिडाचश्च १।४।६१ । ऊर्यादयश्व्यन्ता डाजन्ताश्च क्रियायोगे गतिसंज्ञाः स्युः । ऊरीकृत्य । शुक्षीकृत्य। पटपटाकृत्य । सुपुरुषः । प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया। प्रगत श्राचार्यः-प्राचार्यः। अत्या- दयः क्रान्ताद्यर्थ द्वितीयया । प्रतिक्रान्ती मालामिति विग्रहे-एकविभक्तिः चाऽपूर्वनिपाते १।२। ४४ । विग्रहे यन्नियतविभक्तिकं तदुपसर्जनसंझं स्याश्च तु तस्य पूर्वनिपातः । गोखियोरुपसर्जनस्य १।२।४८ । उपसर्जनं यो गोशब्दः, स्त्रीप्रत्ययान्तञ्च तदन्तस्य प्रातिपदिकस्य हरुवः स्यात् । अतिमालः । अवा- अनश्वः (ई० २४, २८) न अश्वः अनश्वः । 'अश्व सुन' इत्यलौकिकविग्रहे. 'ना' इति सूत्रेण समासे समासविधायकशास्त्रघटकप्रथमान्तपदनिर्दिष्ट 'न' इत्यस्यो- पसर्जनसंज्ञायां पूनिपाते सुब्लुकि 'नलोपो ननः' इति नलोपे 'अ अश्व' इति स्थित 'तस्मान्नुडचि' इति नुटि अनुबन्धलोपे समुदायात् सौ रुत्वे विसर्गे तत्सिद्धम् । अतिमालः ( ई० ४२, ५८ )-मालामतिकान्तः अतिमालः। 'माला अम् उपमा-उपमानवाची जो सुबन्त, वह समानाधिकरण सामान्यधर्मवाचक समर्थः सुबन्तके साथ समस्त हो । शाक-शाकपार्थिवादिको सिद्धिके लिये उत्तर पदका लोप हो। ना -'न' का समर्थ सुबन्तके साथ समास हो, विकल्पसे । नलोपो.-'नम्' के नकारका लोप हो, उत्तर पदके परे । तस्मान्नुडचि-लुप्तनकारके 'न' से पर अजादि उत्तर पदको नु हो । कुगति-कु, गति और प्रादिका समर्थ सुबन्तके साथ नित्य समास हो। ऊर्यादि-ऊरी आदि शब्दकी तथा व्यन्त और डाजन्तकी क्रियाके योगमें गतिसंशा हो। प्रादयो-गताद्यर्थमें प्रादिका प्रथमान्तके साथ नित्य समास हो। अत्यादयः-क्रान्ता- अर्थमें अत्यादिका द्वितीयान्त के साथ नित्य समास हो। एकविभक्ति-विग्रहमें जो नियत विभक्त्यन्त है, उसकी उपसर्जन संज्ञा हो, परन्तु पूर्वनिपात नहीं हो । गोखियो-उपसर्जना । NOKNOR है INE BATHLETISHED तत्पुरुषस.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। १६६. दयः क्रुष्टाद्यर्थे तृतीयया । अवष्टः कोकिलया-अवकोकिलः। पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुर्था । परिग्लानोऽध्ययनाय-पर्यध्ययनः । निरादयः क्रान्ता- द्यर्थे पञ्चम्या। निष्कान्तः कौशाम्व्याः निष्कौशाम्बिः। तत्रोपपदं सप्तमी- स्थम् ३१२६२। सप्तम्यन्ते पदे कर्मणीत्यादौ वाच्यत्वेन स्थितं यत्कुम्भादि, तद्वा- चकं पदमुपपदसंज्ञं स्यात् । उपपदमतिङ२१२।१६ । उपपदं सुबन्तं समर्थन नित्यं समस्यते । अतिअन्तश्चायं समासः। कुम्भं करोतीति कुम्भकारः । प्रति किम् ? मा भवान् भूत् । माडिलुङिति सप्तमीनिर्देशान्माखुपपदम् । गतिकारकोपप- दानां कृद्भिः सह समासवचनं प्राक् सुबुत्पत्तेः । व्याघ्री । अश्वकीती। कच्छ- अति' इति विग्रहे 'श्रत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया' इति समासे समासशास्त्रघटक- प्रथमान्तपदनिर्दिष्ट 'अती'त्यस्योपसर्जनसंज्ञायां पूर्वनिपाते सुब्लुकि 'एकविभक्तिचा- पूर्वनिपाते' इति नियतविभक्तिकस्य मालेत्यस्योपसर्जनसंज्ञायां 'गोत्रियोरुपसर्जनस्य' इति हस्वे समुदायात् सौ रुत्वे विसर्गे 'अतिमालः' इति । कुम्भकारः ( ई० २१, ४२)-कुम्भं करोतीत्यर्थे 'कर्मण्यण' इत्यणि 'कुम्भ अस् कृ अण्' इत्यलौकिकविग्रहे 'श्रचो णिति' इति वृद्धौ 'तत्रोपपदं सप्तमीस्थम्' इति कुम्भशब्दस्योपपदसंज्ञायाम् 'उपपदमतिङ् इति समासे सुपो लुकि 'कुम्भकार' इति भूते समासत्वात् सौ रुत्वे विसर्गे उक्तं रूपं सिद्धम् । व्याघ्री (ई० ५०)-विशेषेण श्रासमन्ताजिघ्रतीति व्याघ्री। विश्राङ् पूर्वक 'घ्रा' धातोः 'श्रातश्वीपसर्गे कः' इति कप्रत्यये 'श्राती लोप इटिच' इत्यालोपे 'गतिश्च' इति गतिसंज्ञायां 'गतिकारकोपपदानाम्-' इति परिभाषया सुबुत्पत्तेः प्राक् घ्रशब्देन श्राः 'कुगतिप्रादयः' इति समासे ततः श्राघ्रशब्देन वेर्गतिसमासे यणि 'व्याघ्र' इति तस्मात् स्त्रीत्वविवक्षायां “जातेरस्त्रीविषयादयोपधात्' इति डीषि भत्वा- दलीये विभक्तिकार्ये 'व्याघ्री' इति । जो गोशब्द और स्त्री प्रत्ययान्त, तदन्त प्रातिपदिकको ह्रस्व हो। अवादयः-कुष्टाधर्थमें तृतीयान्तके साथ अवादिका नित्य समास हो। पर्यादयो-लानाधर्थ में चतुर्थ्यन्तके साथ नित्य समास हो । निरादयः पर्यादिका क्रान्ताधर्थमें पञ्चम्यन्त के साथ निरादिका नित्यसमास हो। तत्रोपपदं-सप्तम्यन्त 'कमणि' इत्यादि पदों में वाच्यत्वेन स्थित (पदोंका वाच्य ) जो कुम्मादि, तद्वाचक जो पद (कुम्भ-आदि), उसकी उपपदसंशाहो (और उपपदसंज्ञा होने पर ही वषयमाण अणादि प्रत्यय हों)। उपपदमतिङ् -उपपद सुबन्तका तिङन्तभिन्न समर्थक साथ नित्य समास हो। गतिकारकोप-गति, कारक और उपपद संशक का सुबुत्पत्तिसे पूर्व ही कृदन्तके lewana २०० लघुसिद्धान्तकौमुदी पीत्यादि । तत्पुरुषस्याङ्गुले संख्याव्ययादेः५१४।८६। सङ्ख चाव्ययादेरङ्गुल्य- न्तस्य समासान्तोऽच् स्यात् । द्वे प्राङ्गुली प्रमाणमस्य द्वयङ्गुलम् । निर्गतमङ्गुलियो निरकुलम् । अहः सबैकदेशसव यातपुण्याच रात्रेः श४|८७एभ्यो रानेरच् स्याश्चात्सङ्ख्याव्ययादेः। अहम्रहणं द्वन्द्वार्थम् । रात्राहाहाः पुंसि २।४।२६ | एतदन्तौ द्वन्द्वतत्पुरुषौ पुंस्येव । श्रहश्च रात्रिश्च-अहोरात्रः। सर्वरात्रः। सङ्ख्या- तरात्रः । *संख्यापूर्व रात्रं क्लीबम् । द्विरात्रम् । त्रिरात्रम् । राजाहः सखिम्याच ॥४६॥ एतदन्तात्तत्पुरुषाच् स्यात् । परमराजः । आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः६३२४६ महत नाकारोऽन्तादेशः स्यात्समानाधिकरणो उत्तरपदे जातीये च परे । महाराजः । प्रकारवचने जातीयर | महाप्रकारो महा- जातीयः। द्वयष्टनः संख्यायामबहुव्रीह्यशीत्योः ६।३।४७ श्रात्स्यात् । द्वौ च दश च द्वादश । अष्टाविंशतिः। त्रेस्त्रयः६।३१४८। त्रयोदश । त्रयोविंशतिः। अहोरानः ( ई० ३८ )-अहश्च रात्रिश्च अहोरात्रः। 'अहन् सु रात्रि सु' इति विप्र द्वन्द्वसमासे सुब्लुकि 'अहः सबैकदेश-' इत्यचि भत्वात् 'यस्येति च' इतीकारलोपे 'परवल्लिङ्गम्-' इति बाधित्वा 'रात्राहाहाः पुंसि' इति पुंस्त्वे 'रूपरात्रि- रथन्तरेषु रुत्वं वाच्यम्' इति नस्य रुत्वे उत्वे गुणे विभक्त्यादिकार्ये उक्तं रूपं सिद्धम् । परमराजः ( ई० २५, २९, ३०, ३५, ४७, ४९ )-परमश्वासौ राजा पं परमराजः । 'परम सु राजन् सु' इत्यलौकिकविग्रहे 'सन्महत्परमोत्तमोत्कृष्टाः पूज्यमानैः' इति समासे सुब्लुकि राजाहः सखिभ्यष्टच्' इति टचि भसंज्ञायां 'नस्तद्धिते' गो इति टिलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धम् । महाराजः (ई० २७,५०,५७)-महाश्वासौ राजा महाराजः । 'महत् सु राजन् सु' इत्यलौकिकविप्रहे 'सन्महत्-' इति समासे सुब्लुकि 'राजाहःसखिभ्यष्टच' इति साथ समास हो । तत्पुरुषल्या-संख्यादि और अव्ययादि अङ्गुल्यन्त तत्पुरुषसे समासान्त "अच् प्रत्यय हो । अहःसर्वैकदेश-अहरादि और संख्याव्ययादि पूर्वपदक रात्रि शब्दान्त ई तत्पुरुषसे समासान्त 'अच् प्रत्यय हो। रानाहाहा:---रात्र, अह और अहः शब्दान्त जो द्वन्द्व और तत्पुरुष वह पलिङ्गमें ही हो । संख्यापूर्व-संख्यापूर्वक 'रात्र' शब्द नपंसक हो । राजाह:-राजन् शब्दान्त और अहन् शब्दान्त तत्पुरुषसे समासान्त 'टच' प्रत्यय हो। आन्महतः-समानाधिकरण उत्तरपदमें या जातीयर प्रत्यय परमें हो तो महत् शब्दको आकारान्त आदेश हो । दुबष्टन:-द्वि और भष्टन् शब्दको प्रात्व हो, संख्याक परे, परन्तु बहुव्रीहिमें और अशीतिके परे आव नहीं हो। वेस्खयः-'त्रि' शब्दको 'यस आदेश हो य तत्पुरुषस०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। त्रयस्त्रिंशत् । परवल्लिङ्ग द्वन्द्ववत्पुरुषयोः २।३।२६ । एतयोः परपदस्येव लिई स्यात् । कुक्कुटमयूर्याविमे । मयूरी-कुक्कुटाविमौ । अर्धपिप्पली। द्विगुप्राप्ता- पन्नालम्पूर्वगतिसमासेषु प्रतिषेधो वाच्यः । पञ्चसु कपालेषु संस्कृतः-पञ्च- कपालः पुरोडाशः । प्राप्ताऽऽपन्ने च द्वितीयया ।।४। प्राप्तापन्ने च द्वितीयया समस्येते, श्रकारचानयोरन्तादेशः । प्राप्तो जीविकां प्राप्तजीविकः । श्रावनजी- विकः । अलं कुमाय-अलङ्कुमारिः । अत एव ज्ञापकात्समासः । निष्कौशाम्बः । अर्धर्चाः पुंसि च २।४। ३११ अर्धर्चादयः शब्दाः पुंसि क्लीवे च स्युः । अर्धर्चः । अर्धर्चम् । एवं ध्वज-तीर्थ-शरीर-मण्डप-यूप-देहा-ऽङ्कुश-पात्र--सूत्रादयः । सामान्ये नपुंसकम् । मृदु पचति । प्रातः कमनीयम् । ॥ इति तत्पुरुषसमासप्रकरणम् ॥ रचि भत्वात् 'नस्तद्धिते' इति टिलोपे 'भान्महतः' इत्यात्वे विभक्तिकार्येतत्सिद्धम् । अर्धपिप्पली ( ई० ३७, ५२ )-अर्ध पिप्पल्याः अपिप्पली। 'अर्ध सु पिप्पली ङस्' इत्यलौकिकविग्रहे 'अर्ध नपुंसकम् इति समासे सुब्लुकि 'परवल्लिङ्गम्' इति समुदायस्य स्त्रीत्वे विभक्तिकार्य उक्तं रूपं सिद्धम् । अलकुमारिः ( ई० २६)–'कुमारी के अलम्' इति विग्रहे 'द्विगुप्राप्तापन-' इति ज्ञापकात् समासे परपदलिङ्गत्वनिषेधे च कृते 'एकविभक्ति चापूर्वनिपाते' इत्यु- पसर्जनसंज्ञायां 'गोस्त्रियोः' इति ह्रस्वे विभक्तिकार्ये तत्सिद्धम् । इति 'इन्दुमती'टीकायां तत्पुरुषसमासप्रकरणम् संख्याके परे, किन्तु बहुब्राहिमें और अशोतके परे नहा हो । परवलिङ्ग-द्वन्द्व और तत्पुरुष पर पदकी तरह ही लिङ्ग हो । हिगुमाता-द्विगु समास और प्राप्त, आपन्न तथा अलम् पूर्वक समास और गतिसमासको पर पदकी तरह लिङ्ग नहीं हो। प्राधाप-प्राप्त और आपन्न शब्दोंका द्वितीयान्तके साथ समास हो। अचम्अर्द्ध- चादि गणपठित शब्द पुलिङ्ग और नपुंसक लिङ्गमें हो। नोट:-सामान्यमें नपुंसक हो । अर्थात् किसी लिङ्गविशेषको विवक्षा नहीं करके केवल लिझसामान्यकी ही विवक्षा हो तो नपुसकलिङ्ग हो। इस प्रकार इन्दुमती टीका में तत्पुरुषसमास प्रकरण समास हुआ।
Sala ६ খ গুলীছিলাম शेषो बहुव्रीहिः २।२१ २३॥ अधिकारोऽयम् प्रान्द्वन्द्वात् । अनेकमन्यपदार्थ रारा२४। अनेक प्रथमान्तमन्यस्य पदस्यार्थे वर्तमान वा समस्यते स बहुव्रीहिः । सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ २१२१३५॥ सप्तम्यन्तं विशेषणं च बहुव्रीही पूर्व स्यात् । श्रत एव ज्ञापकाव्यधिकरणपदी बहुव्रीहिः । हलदन्तात्सप्तम्याः संज्ञायाम ६३६) हलन्ताददन्ताच सप्तम्या अलुक् । कण्ठेकालः । प्राप्तमुदकं यं स प्राप्तीदको आमः । ऊढरथोऽनड्वान् । उपहृतपशू रुद्रः । उद्धृतोदना स्थाली । पीताम्बरो हरिः। वीरपुरुषको प्रामः प्रादिभ्यो धातुजस्य वाच्यो बा चोत्तरपदलोपः। कएठेकाल:-कण्ठे कालो यस्येति विग्रहे 'सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ' इति झापकात् समासे सप्तम्यन्तस्य 'कण्ठे' इत्यस्य पूर्वनिपाते च 'हलदन्तात् सप्तम्या: इति सप्तम्याः अलुकि सुपो लुकि समुदायात सौ रुत्वे निसर्गे तसिद्धिः। -: शेषो बहुव्रीहिःद्वन्द्व समाससे पूर्व बहुमोहिका अधिकार है। नोट:-बहुव्रीहि समासमें जितने समासविधायक सूत्र हैं, सभीसे समासके साथ ही साथ बहुव्रीहिसंशा भी होगी। अनेकमन्य-अन्य पदार्थमें वर्तमान जो अनेक प्रथमान्त वे (परस्पर) समस्त हो, विकल्पसे और वह समास बहुव्रीहि संशक हो। नोट:-जिन समस्त शब्दों में किसीकी प्रधानता न हो, प्रत्युत समस्त शब्दसे कोई विशेष अर्थ प्रतिमासित हो जाय, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। जैसे-पीताम्बर, पीला अंबर जिसका (विष्णु भगवान् )। चन्द्रमुखी-चंद्र-सा मुख हो, जिसका (सुंदरी स्त्री) इत्यादि । बहुव्रीहि समाससे निष्पन्न विशेषणमें विशेषणसूचक प्रत्यय प्रायः नहीं रहता। जैसे-'निर्धन' और 'निरपराध' जिसका अर्थ 'निर्धनी' और 'निरपराधी' हो जाता है। शब्दान्तरकी विशेषणता या विशेष अर्थ नहीं होने पर बहुव्रीहि समासके शब्द यत्र तत्र कर्म- धारय व द्विगु समासमें परिणत हो जाते हैं । जैसे-पीताम्बर यहाँ पीलावा ऐसा अर्थ होने पर (पीतं च तद् अंबर) कर्मधारय समास होता है। एवं 'चतुर्भुज का अर्थ 'विष्णु' न होकर 'चार भुजायें ऐसा अर्थ होने पर (चतुर्णी भुजानां समाहार) द्विगु समास नि सप्तमी-सप्तम्यन्त तथा विशेषणका बहुव्रीहिमें पूर्व निपात हो । हल-संशामें हलन्त और भदन्तसे पर सप्तमीका अलुक हो । प्रादि--प्रादिसे पर जो धातुज (पतितादि), तत्प्रकृतिभूत जो प्रथमान्त, तदन्त जो प्रपतितादि पद,उनका पदान्तरके साथ समास हो, और पतितादि MEDIENT समान रूप हो, समानाधिकरण स्त्रीलिंग उत्त बाहुनी हिस इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। अपतितपर्णः । अपर्णः । नमोऽस्त्यर्थानां वाच्यो वा चोत्तर पदलोपः। अविद्यमानपुत्रः । अपुत्रः। खियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ समानाधिकरणे चियामपूरणीप्रियादिषु ६॥ ३॥ ३४॥ भाषितपुंस्कात्-अनू-ऊोऽभावोऽस्यामिति बहुव्रीहिः । निपातनात्पञ्चम्या अलुक् , षष्ठयाश्च लुक् । तुल्ये प्रवृत्तिनिमित्त यदुक्तपुंस्कं तस्मात्पर उडोऽभावो यत्र तथाभूतस्य स्त्रीवाचकशब्दस्य पुंवाचकस्येन रूयं स्यात् , समानाधिकरणे स्त्रीलिङ्गे उत्तरपदे न तु पूरण्यां प्रियादौ च परतः । गोस्त्रियोरिति ह्रस्वः । चित्रगुः । रूपबद्भार्यः। अनूङ् किम् ? वामोरूभार्यः । पूरण्यान्तु-अपूरणीप्रमाण्योः ५।४।११६ । पूरणार्थप्रत्ययान्तं यत्स्त्रीलिङ्गं तदन्तात्रमाण्यन्ताच्च बहुव्रीहेरप्स्यात् । कल्याणी पञ्चमी यासां रात्रीणी ता:- कल्याणीपञ्चमा रात्रयः। स्त्री प्रमाणी यस्य स-स्त्रीप्रमाणः। अप्रियादिषु किम् ? कल्याणीप्रिय इत्यादि । बहुब्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात्पच् ५। ४ ! ११३ ! अपर्ण:-प्रकृष्टं पतितं प्रपतितम् । 'प्रादयो गतायथै इति समासः । प्रपतित पर्ण यस्मादिति विग्रहे 'प्रादिभ्यो धातुजस्य- इति वार्तिकेन समासे प्रपतितेति पूर्वपदे धातुजस्य उत्तरपदस्य लोपे च विहिते विभक्तिकार्य तत्सिद्धम् । चित्रगुः-(६० २९, ३० ३२, ३४, ४१, ४७, ५०, ५१, ५२, ५८)- चित्रा गावो यस्येति लौकिकविग्रहे 'चित्रा जस् गो जस्' इत्यलौकिकविश्रहे 'अनेक- मन्यपदार्थ' इति समासे सुपो लुकि 'स्त्रियाः पुंचत्-' इति 'चित्रा'शब्दस्य गुंबद्भा- बाहापो निवृत्तौ 'एकविभक्ति चापूर्वनिपाते' इति गौशब्दस्योपसर्जनत्वाद् 'गोस्त्रियो- रुपसर्जनस्य' इति गौशब्दस्योकारस्य ह्रस्वे समुदायात् सौ रुत्वे विसर्गेतत् सिद्धम् । कल्याणीपञ्चमाः (ई० ५६ )--पञ्चानां पूरणीति विग्रहे 'तस्य पूरणे डट' इति पश्चन्शब्दात् डटि 'नान्तादसंख्यादेर्मट्' इति डटो मटि नलोपे टित्वात् डीकि लोपे पञ्चमीति । ततः 'कल्याणी सु पश्चमी सु' इति विग्रहे समासे सुपो लुकि पञ्चमीशब्दस्य पूरणप्रत्ययान्तत्वेन तस्मिन् परे स्त्रियाः ध्रुवतू-' इति पुंबद्भावाऽप्राप्ती उत्तर पदका विकल्पसे लोप हो । नमो-नयू से परे अस्त्यर्थक सुबन्तोंका बहुव्रीहि समास हो, और उत्तरपदस्थ अस्त्यर्थक शब्दोंका विकल्पसे लोप हो। खियाः पुंवत्-मापित- स्कसे पर ऊ प्रत्ययका अभाव है जिसमें, ऐसा जो स्त्रीवाचक शब्द, उसका पुवाचक के प्रियादिके परे यह पुवद्भाव नहीं हो। अपूरणी--पूरणार्थ प्रत्ययान्त जो स्त्रीलिंग, तदन्न बहुव्रीहिसे और प्रमाण्यन्त बहुव्रीहिसे समासान्त 'भप्' प्रत्यय हो । बहुव्रीहौ-स्वाङ्गवाची , anMARRIERESEASE लघुसिद्धान्तकौमुदी स्वागचाचिसक्थ्यक्ष्यन्ताबहुव्रीहेः पच् स्यात् । दीर्घसक्थः। जलजाक्षी । स्वाङ्गा- किम् ? दीर्धसक्थि शकटम् । स्थूलाक्षा वेणुयष्टिः । अक्षणोऽदर्शनादिति वक्ष्यमाणो- ऽच् । द्वित्रिभ्यां व मूर्ध्नः ॥ ४॥ ११५॥ आभ्यां मूनः षः स्याबहुव्रीहौ । द्विमूर्थः त्रिमूर्धः । अन्तर्बहिन्यां च लोग्नः श४।११७ । प्राभ्यां लोम्नोऽस्याबहुमोहौ। अन्तर्लोमः । बहिर्लोमः । पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः ॥ ४॥ १३८ हस्त्यादि- जर्जितादुपमानात्परस्य पादशब्दस्य लोपः स्याबहुव्रीहौ । व्याघ्रत्येव पादावस्य- व्याघ्रपात् । अहस्त्यादिभ्यः किम् ? हस्तिपादः । कुसूलपादः । संख्यासुपूर्वस्य ५४|१४०/ पादस्य लोपः स्यात्समासान्तो बहुव्रीहौ । द्विपात् । सुपात् । उद्विभ्यां काकुदस्थ ५। ४ । १४८ | लोपः स्यात् । उत्काकुत् । विकाकुत् । पूर्णाद्विभाषा २४.१४६/ पूर्णकाकुन् । पूर्णकाकुदः । सुहृदुहृदौ मित्राऽमित्रयोः ।४।१५०/ सुदुा हृदयस्य हृद्भावो निपात्यते। सुहृत्-मित्रम् । दुहृद्-अमित्रः। उर:- प्रभृतिभ्यः कप ५१४|१५११ सोऽपदादौ ८।३। ३८ पाशकल्पककाम्येषु परेषु विसर्गस्य सः । कस्कादिषु च । ३।४८ एविण उत्तरस्य विसर्गस्य षोऽन्यस्य 'अप्पूरणीप्रमाण्योः' इत्यपि भत्वात् 'यस्येति च' इत्तीकारलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः। द्विमूर्धः ( ई० ४८ )-दौ मूर्धानी यस्येति विग्रहे बहुव्रीहिसमासे सुयो लुकि द्वित्रिभ्यां षः मूनः' इति षप्रत्यये भत्वात् 'नस्तद्धिते' इति टिलोपे विभक्तिकार्य तसिद्धिः । एवं 'त्रिमूर्धः' ( ई० ३४, ५७ ) इत्यपि । - . सक्थ्यन्त और भक्ष्यन्त बहुव्रीहिसे समासान्त पच्' प्रत्यय हो। द्वित्रिभ्यां--'द्वि-त्रि-शब्दसे पर 'मूर्धन्' शब्इसे 'घ' प्रत्यय हो, बहुव्रीहिमें । अन्तर्बहि-'अन्तर् और बहिस्' शब्दसे पर लोमन् शब्दसे 'अप' प्रत्यय हो। पादस्य-हत्यादिभिन्न उपमानवाचोसे पर पाद- शब्दान्त (समासान्त प्रत्यय) का लोप हो, बहुव्रीहिमें । संख्या-'संख्या' और 'सु'पूर्वक माद शब्दका समासान्त (प्रत्यय ) लोप हो, बहुबोहिमें। उद्विभ्यां-'उत्' और 'वि' उपसर्गसे पर 'काकुद' शब्दका समासान्त लोप हो, बहुव्रीहि में । पूर्गाद्विभाषा-'पूर्ण शब्दसे पर 'काकुइ' शब्दका समासान्त लोप विकल्पसे हो, बहुव्रीहि में । सुहृदुहृदौ-'मित्र' और 'अमित्र' अर्थमें 'सुहृ' और 'दुई ।' यह क्रमसे निरातन हो, अर्थात् 'सु' तथा 'दुर्' से पर हृदयको हृद्भाव निपातन हो । उसप्रतिभ्यः --उरमभू- त्यन्त बहुब्रोहिसे समासान्त 'क' प्रत्यय हो। सोऽपदादौ-पाश, कल्प, क या काम्य प्रत्ययके परे विसर्जनीयको स आदेश हो । करकादिषु-स्कादिगणपठित जो शब्द उनमें इसे उत्तर जो विसर्ग उसके स्थानमें पत्व हो और अन्यत्र ( इणसे अनुत्तर विसर्गके स्थानों द्वन्द्वस] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। तु सः । इति सः । व्यूढोरस्कः । इणः षः ८।३।३६॥ इण उत्तरस्य विसर्गस्य पर स्यात्-पाश कल्पककाम्येषु परेघु । प्रियसर्पिष्कः। निष्ठा २।३।३६ | निष्टान्त बहुव्रीही पूर्व स्यात् युक्तयोगः। शेषाद्विभाषा श४१५४ अनुक्कसमासान्ताद्वहु- वीहेः कव्वा । महायशस्कः । महायशाः। ॥ इति बहुव्रीहिसमासप्रकरणम् ॥ अथ द्वन्द्वसमासप्रकरण चार्थे द्वन्द्वः ।।२९ अनेक सुबन्तं चाऽर्थे वर्तमानं वा समस्यते स द्वन्द्वः । समुच्चयाऽन्वाचयेतरेतरयोगसमाहाराश्चार्थाः । तत्र ईश्वरं गुरुं च भजस्वेति परस्पर- निरपेक्षस्याऽनेकस्यैकस्मिन्नन्वयः समुच्चयः । भिक्षामट गां चानयेत्यन्यतरस्याऽऽनु- पणिकत्वेनान्वयोऽन्वाचयः। अनयोरसामर्थ्यात्समासोन। धवखदिरौ छिन्धीति मिलितानामन्वय इतरेतरयोगः। संज्ञापरिभाषमिति समूहः-समाहारः। राज- महायशस्कः ( ई० २४,५८)-महद्यशो यस्येति विग्रहे 'अनेकमन्यपदार्थे इति समासे सुपो लुकि शेषाद्विभाषा' इति कपि 'मान्महत:-' इत्यात्वे सस्य रुत्व विसर्गे 'सोऽपदादी' इति विसर्गस्य सत्वे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः। कपोऽभावपक्षे तु 'अत्वसन्तस्य चाऽधातोः' इति दीर्धे 'महायशाः' इति भवति । इति 'इन्दुमती टीकायां बहुव्रीहिप्रकरणम् । सत्व हो । इणः षः-पाश, कल्प, क तथा काम्य प्रत्ययके परे इणसे पर विसर्गको धत्व हो। निष्ठा-बहुव्रीहि समासमें निष्ठान्त शब्दका पूर्व निपात हो। शेषाद्विभाषा-अनुक्त समासान्त शेषाधिकारस्थ बहुव्रीहिसे समासान्त 'क' प्रत्यय हो, विकल्पसे । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें बहुव्रीहिप्रकरण समाप्त हुआ। चाथै द्वन्द्वः-चार्थ (इतरेतरयोग और समाहार अर्थ ) में वर्तमान अनेक समर्थ सुबन्तका समास हो, विकल्पसे और वह समास इन्दसंज्ञक हो। नोट:-जिस समासमें सभी पद प्रधान हों और उनके बीचका योजक अव्यय (च) लुप्त रहे, उसे द्वन्द्व समास कहते हैं। राजदन्तादिषु-राजदन्तादिमें पूर्वप्रयोगाईका पर प्रयोग हो ।
लघुसिद्धान्तकौमुदी दन्तादिषु परम् २१२॥ ३१ एव पूर्वप्रयोगाह परं स्यात् । दन्तानां राजानी राजदन्ताः। ॐधर्मादिष्वनियमः । अर्थधर्मों ! धर्मार्थावित्यादि । द्वन्द्वे चि २।२।३२। द्वन्द्वे घिसंज्ञं पूर्व स्यात् । हरिश्च हरश्च हरिहरौ। अजायदन्तम् २१२॥ ३३ । द्वन्द्वे पूर्व स्यात् । ईशकृष्णौ । अल्पाच्तरम् २ । २।३४ | शिवकेशवौ । पिता मात्रा ११२/७० मात्रा सहोतो पिता वा शिष्यते । माता च पिता च पितरौ । मातापितरौ खा । द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् २।४।२। एषां द्वन्द्व हरिहरौ (ई० ५०) 'हरि सु हर सु' इति विग्रहे 'चार्थे द्वन्द्वः' इति समासे सु. ब्लुकि 'द्वन्द्वे घि' इति घिसंज्ञकस्य हरिशब्दस्य पूर्वनिपाते समुदायादौ बुद्धौ तत्सिद्धिः । शिवकेशवौ (ई० ४७, ४९) शिवश्च केशवश्चेति विग्रहे 'चार्थे द्वन्द्वः' इति समासे सुजुकि 'अल्पान्तरम्' इति शिवशब्दस्य पूर्वनिपाते विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः । पितरौ ( ई० २३,४८)---माता च पिता चेति लौकिकविप्रहे 'मातृ स पित सु' इत्यलौकिकविप्रहे 'चार्थे द्वन्द्वः' इति समासे सुब्लकि 'पिता मात्रा' इति पाक्षिक पितृशब्दस्यकशेषे (मातृशब्दस्य लोपे) प्रातिपदिकत्वाद् औ 'तो कि-' इति शुरणे रपरत्वे 'पितरौं' इति । ,एकरोषाऽभावे 'मातापितरौ' इति। अत्र 'चाथै द्वन्द्वः' इति समासे सुब्लुकि कृते 'पितुर्दशगुणा माता गौरवेणातिरिच्यते' इति स्मृत्या धर्मादि-धर्मादिमें पूर्व निपातका कोई नियम नहीं है। द्वन्द्वे-इन्दमें घिसंशकका पूर्व निपात हो। अजायन्तम्-अजादि जो अदन्त, उसका द्वन्द्वमें पूर्व निपात हो। अल्पान्तरम्-द्वन्दमें अल्प 'अच्' का पूर्व प्रयोग (निपात) हो । नोट :-(१) समाक्षर (तुल्यसंख्यक अक्षरवाले) ऋतु तथा नक्षत्रवाचक शब्दका द्वन्द्व में आनुपूर्वी ( यथाक्रम ) से पूर्व प्रयोग हो। (हेमन्त-शिशिर-वसन्ताः) (२) मधु (हस्व) अक्षरवाले पदका द्वन्द्व में पूर्व प्रयोग हो। (कुशकाशम् ) (३)-अभ्यहित (पूज्य) का द्वन्दमें पूर्व प्रयोग हो। (४)-ब्राह्मणादि वर्णीका द्वन्द्वमें आनुपूर्वी (यथाक्रम) से यू प्रयोग हो । (५) द्वन्द्वमें बड़े माईका पूर्व प्रयोग हो। पिता मात्रा--मातृशब्द के साथ कहा गया पितृशब्द' विकल्पसे शेष रहे। इन्दुश्च प्राणि---प्राण्यंग, तूर्याङ्ग और सेनांगा वाची द्वन्द्व एकवत् हो। नोट :-(१) प्राणिसे भिन्न जातिवाचियों का द्वन्द्र एकवत् हो। (धानानकुति) (२)-ग्रामवर्ज मिन्नलिङ्गक देशवाची और नदीवाचीका द्वन्द्व एकवत् हो। (कुस्कुरु- क्षेत्रम् । गङ्गाशोणम् ) (३) क्षुद्र जन्तुओंका द्वन्द्व एकवत् । (४)-जिनका ( परस्पर) -सदासे हो स्वाभाविक वैर है, उनका इन्द्र एकवत् हो । ( महिनकुलम् ) म समासान्तप्र०] इन्दुमती टीकाद्वयोपेता। एकचत् । पाणिपादम् । मार्दशिकवणविकम् । रथिकाऽधारोहम् । द्वन्द्वाउचुदषहा- न्तात्समाहारे ५।४।१०६॥ चवर्गान्तादृषहान्ताच द्वन्द्वाच् स्यात्समाहारे । वाक् व त्वक् च वाक्त्वचम् । त्वक्सजम् । शमोदषदम् । वाक्त्विषम् । छत्रोपानहम् । समाहारे किम् ? प्रावृटशरदौ । ॥ इति द्वन्द्वसमासप्रकरणम् ॥ है ? अथ समासान्तप्रकरणम् ऋक्पूरब्धः पथामानक्षे १४/७४/ 'अ-अन' इतिच्छेदः । ऋगायन्तस्थ समासस्य अप्रत्ययोऽन्तावयवः स्यादने या धूस्तदन्तस्य तु न । अर्धर्वः । विष्णु- पुरम् । विमलापं सरः । राजधुरा । अक्षे तु-अधूः। दृढयूरक्षः। सखिपथः । रम्यपयो देशः । अक्षणोऽदर्शनात् ५।४.७६। अचक्षुः पर्यायादयोऽच् स्यात्समा- सान्तः । गवामशीव गवाक्षः। उपसर्गादध्वनः ५१४८ प्रगतोऽश्वान प्रायो मातुरभ्यर्हितत्वात् 'अभ्यर्हितं चेति पूर्वनिपाते 'पानङ् ऋतो द्वन्द्वे' इति मातृ- शब्दस्य आनादेशे अनुबन्धलोपे नलोपे च कृते 'मातापित' इति भूते तस्माद् गौ नतोङि-' इति गुणे रपरत्वे तत्सिद्धिः। इति 'इन्दुमती टीकायां द्वन्द्वप्रकरणम् । OFFodara अर्चः (ई० ३७) ऋवोऽर्धमिति विप्रहे 'अर्ध नपुंसकम्' इति समासे 'अर्थ'- शब्दस्योपसर्जनसंज्ञायां पूर्वनिपाते सुब्लुकि 'ऋक्पूरब्धू-' इति अप्रत्यये गुणे परत्वे "अर्धाः पुंसि च' इति पुंस्त्वे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । गवाक्षः (ई० ४४)-गवामक्षीब गवाक्षः। षष्ठीसमासे सुब्लुकि 'श्रक्ष्णोड- दर्शनात्' इत्यचि भत्वादिलोपे अवङि सवर्णदीर्धे विभक्तिकार्य तसिद्धिः । द्वन्द्वाच्चुद-चत्रर्गान्त, दकारान्त, षकारान्त और इकारान्त द्वन्दसे समासान्त 'टच प्रत्यय हो, समाचारमें। इस प्रकार 'इन्दुमती टीकामें इन्द्रप्रकरण समाप्त हुना। शाक्पूरब्धः-- ऋगाधन्त समासका अन्तावयव 'अ' प्रत्यय हो। परन्तु अक्षके पूरी- बाचक जो धूः शब्द, तदन्त समासमें 'अ' प्रत्यय नहीं हो। अपणोदश-चक्षुपर्याय भिन्न अभिशब्दान्त समाससे समासान्त अच् प्रत्यय हो । उपसचिन:---उपसर्ग पर लघुसिद्धान्तकौमुदी रथः । न पूजनात् ५।४।५६/ पूजनार्थात्परेभ्यः समासान्ता न स्युः । सुराजा है। अतिराजा। ॥ इति समासान्ताः ॥ * इति समासप्रकरणम् * ও সন্ধি तत्रादौ साधारणमत्ययप्रकरणम् समर्थानां प्रथमाद्वा४।१।२। इदं पदत्रयमधिक्रियते 'प्राग्दिश' इति यावत् । अश्वपत्यादिभ्यश्च ४।१।८४ । एभ्योऽण् स्यात्प्राग्दीव्यतीयेष्वर्थेषु । अश्वपतेरपत्यादि, श्राश्वपतम् । गाणपतम्। दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्यः ४ाशदित्यादिभ्यः पत्युत्तरपदाच प्राग्दीव्यतीयेष्वर्थेषुः ण्यः स्यात् । अणोऽप- सुराजा ( ई० ४२) सु= शोभनो राजेति विग्रहे 'कुगतिप्रादयः' इति समासे: सुब्लुकि 'न पूजनात्' इति टचो निषेधे स्वादिकार्ये तत्सिद्धिः । इति 'इन्दुमती'टीकायां समासान्तप्रकरणम् । आश्वपतम् ( ई० २९)-अश्वपतेरपत्यम् , अश्वपतिना निवृत्तम् , अश्वपते-- रिदमिति वा विप्रहे 'अश्वपत्यादिभ्यश्च' इत्यणि अनुबन्धलोपे प्रातिपदिकत्वात् (१)सुपो. लुकि 'तद्धितेष्वचामादेः' इत्यादिवृद्धौ ‘यचि भम्' इति भत्वात् 'यस्येति च' इतीका- रलोपे तद्धितान्तत्वात् सौ सोरमि पूर्वरूपे तत्सिद्धिः (एवं गणपतेरपत्यादि गाणपतम्) अध्वन् शब्दान्तसे अच् प्रत्यय हो। न पूजनात्-पूजनार्थक शब्दसे पर जो ( राजादि) शब्द, तदन्तसे समासान्त प्रत्यय नहीं हो। इस प्रकार 'इन्दुमती'टीकामें समासान्तप्रकरण समाप्त हुआ। समर्थानी-प्राग्दिशो विभक्तिः' इस सूत्र पर्यन्त 'समर्थानां, प्रथमात, वा', इन तीनों पदोंका अधिकार है । अश्वपत्यादि-अश्वपत्यादिसे 'अण' प्रत्यय हो, प्राग्दीव्यतीय (अपत्य, देवता, भव, जात आदि ) अर्थोंमें, विकल्पसे। दित्यदित्या--दित्यादि और पत्युत्तरपदसे (१) सुबन्तात्तद्धितोत्पत्तिरिति पक्षे तद्धितान्तत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञायां सुब्लुग्भवति । प्रातिपदिकात् तद्धितीत्पत्तिरिति पक्षे तु न सुब्लुक आवश्यकतेति सर्वत्र बोध्यम् ।
तद्धितन.] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। बादः । दितेरपत्यं दैत्यः । अदितेरादित्यस्य वा हलो यसां अमिलोपः ४६४ हलः परस्य यमो लोप: स्याद्वा यमि। इति लोपः। श्रादित्यः। प्राजापत्यः देवाद्यमौ । दैव्यम् । दैवम् । बहिषष्टिलोपो यञ्च ! बाह्यः । ईकक् च । किति च ७२|११८ किति तद्धिते चाऽचामादेरचो वृद्धिः स्यात् । बाहीक गोरजादिप्रसङ्गे यत् । गोरपत्यादि गव्यम् । उत्सादिभ्योऽञ् ४।१।८६ शौरसः । इत्यपत्यादिविकारान्तार्थसाधारणप्रत्ययप्रकरणम् ॥ १॥ . दैत्यः (ई० २४ )-दितेरपत्यमिति विग्रहे दितिशब्दात् 'दित्यदित्यादित्य- पत्युत्तरपदाण्यः' इति ण्यप्रत्यये आदिवृद्धौ इलोपे विभक्तिकार्य तसिद्धिः । आदित्यः (ई० २९)-अदितेरपत्यमिति विप्रहे अदितिशब्दात ‘हित्यदि- त्यादित्यपत्युत्तरपदाण्ण्यः' इति ध्यप्रत्यये आदिवृद्धौ इलोणे विभक्तिकार्य तसिद्धिः यद्वा आदित्यस्थापत्यमिति विद्महे श्रादित्यशब्दात् ण्यप्रत्यये प्रादिवृद्धौ ‘यस्येति चेत्यलोपे हलो यमा यमि लोपः' इति यलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । देव्यम् ( ई० ४४) देवस्थापत्यादीति विग्रहः ! बाहीकः ( ई० ३५)-बहिर्भवः इति विग्रहः । औत्सः (ई० ३६)-उत्सस्यापत्यादीति विग्रहः । इति 'इन्दुमती' टीकायां साधारण प्रत्ययप्रकरणम् । ण्य' प्रत्यय हो, प्राग्दीव्यतीय अर्थोमें, विकल्पसे । हलो यमाह से पर यम्का लोप हो, यमके परे, विकल्पसे । देवाघज-देव शब्दसे 'य' और 'अ' प्रत्यय हों, प्राग्दीव्यतीय अर्थों में, विकल्पसे । बहिषाष्टि-बहिष शब्दसे 'या' प्रत्यय और बहिषकी टि का लोप भी हो, प्राग्दीव्यतीय अर्थोंमें विकल्पसे । ईकक च--- बहिच् शब्दसे ईका प्रत्यय भी हो। विति --अचोंके मध्यम आदि अचको वृद्धि हो, कित् तद्धितके परे । गोरजादि-गो शब्दसे अजादि प्रत्ययके प्रसङ्ग में 'यत् प्रत्यय हो, प्राग्दीव्यतीय अर्थोंमें । उत्सादिभ्यो--उत्सादिसे 'अञ्' प्रत्यय हो, प्रारदीव्यतीय अर्थो में । इस प्रकार 'इन्दुमती'टीका अपत्यादिविकारान्तार्थ साधारण प्रत्यय समाप्त हुआ। १४ल० mes জুন ত্বত্যাখাতা खीपुंसाभ्यां नब्जनौ भवनात् ४ । १।८७ | धान्यानां भवने' इत्यतः प्रागर्थेषु स्त्रीपुंसाभ्यां क्रमासस्नो स्तः । स्त्रैणः । पौस्नः । तस्याऽपत्यम् ४ाश १२ | षष्ठयन्तात्कृतसन्धेः समर्थादपत्येऽर्थे उक्ता पक्ष्यमाणाश्च प्रत्यया वा स्युः । ओर्गुणः ६।४। १४६। उवर्णान्तस्य भस्य गुणस्तद्धिते । उपगोरपत्यम्-श्रौपगवः । आश्वपतः। दैत्यः । श्रौत्सः। स्त्रैणः । पौस्नः। अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् ४|१११६२। अपत्यत्वेन विवक्षितं पौत्रादि गोत्रसंझं स्यात् । एको गोत्रे ४०६३ गोत्रे एक एवाऽपत्यप्रत्ययः स्यात् । उपगोर्गोत्रापत्यमौपगवः। गर्गादिभ्यो यज ४|१|१०५ | गोत्रापत्ये । गर्गस्य गोत्रापत्यं गायः। वात्स्यः। यत्रयोश्च स्त्रैणः-स्त्रीषु आसक्तः, स्त्रीषु भवः, स्त्रीणां समूहः, स्त्रिया अपत्यम् , इत्या- द्यर्थे 'स्त्रीपुंसाभ्याम्-' इति न प्रत्यये अनुबन्धलोपे 'तद्धितेष्वचामादेः' इत्यादिवृद्धौ णत्वे विभक्तिकार्ये तसिद्धिः। एवं पुंसोऽपत्यमित्यादिविग्रहे स्नअप्रत्यये आदिवृद्धी संयोगान्तलोपे विभक्तिकार्ये 'पौरुनः' (ई० २१)। औपगवः (ई० २८, ३२, ५३ )-उपगोरपत्यमिति विद्महे उपगुशब्दात 'तस्यापत्यम्' इत्यणि अनुबन्धलोपे 'तद्धितेवचामादेः' इत्यादिवृद्धौ ‘श्रीपगु अ' इति स्थिते 'अचो णिति' इति वृद्धि बाधित्वा 'पोर्गुणः' इति गुणे अवादेशे विभक्तिकार्ये 'श्रौपगवः' इति । उपगोर्गोत्रापत्यमिति विग्रहे तु उपगुशब्दादणि निष्पन्नाद् 'औपगव' शब्दात् 'अत इञ्' इति इजि प्राप्ते ‘एको गोत्रे' इति सूत्रनियमात् उपगुशब्दादणेव, नतु अणि कृते अणन्तात्तस्मात् पुनरिअपीति बोध्यम् । गायः (ई० ४७, ५०, ५१, ५५)-गर्गस्य गोत्रापत्यमिति विद्महे गर्गशब्दात् 'गर्गादिभ्यो यज' इति याल आदिवृद्धौ भत्वात् 'यस्येति च इत्यलोपे विभक्ति स्त्रीपुंसा-'धान्यानां भवने क्षेत्रे' इससे पूर्व अर्थो में सो शब्दसे नञ् प्रत्यय और पुम्स् शब्दसे स्ना प्रत्यय हो, विकल्पसे । तस्यापत्यम्---षष्ठयन्त कृतसन्धि समर्थ सुबन्तसे अपत्य अर्थ में उक्त ( अण-य-ना-स्ना भादि) प्रत्यय तथा वक्ष्यमाण (हादि) प्रत्यय हो, विकल्पसे । ओर्गुणः--उवर्णान्त भसंशकको गुण हो, तद्धितके परे । अपत्यं पौत्र-अपत्यत्वेन विवक्षित जो पौत्र, प्रपौत्रादि, वे गोत्रसंशक हो । शुको गोने-गोत्रमें एक ही प्रत्यय हो। अर्थात् गोत्रमें-पुत्रका पुत्र, उसका पुत्र इत्यादि परम्परासे अनेक अपत्य प्रत्यय नहीं होते हैं । गर्गादिभ्यो-षष्ठयन्त गर्गादि समर्धसे यन प्रत्यय हो, गोत्रापत्य अर्थ में । यसोच-यजन्त और अजन्तका अवयव जो f -- "अपत्याधि०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। २११ - २।४।६४! गोत्रे यद्यअन्तमजन्तं च तदवयवयोरेतयो क् स्यात्तत्कृते बहुत्वे, न तु स्त्रियाम् । गर्गाः । वत्साः । जीवति तु वंश्ये युवा ४|११ १६३ । वंश्ये पित्रादौ जीवति पौत्रादेर्यदपत्यं चतुर्थादि तयुवसंज्ञमेव स्थात् । गोत्राचून्यस्त्रियाम् ४) श६४। यून्यपत्ये गोत्रप्रत्ययान्तादेव प्रत्ययः स्यात् । स्त्रियां तु न युवसंज्ञा । यबिनोश्च ४।। १०११ गोत्रे यो यजिजौ तदन्तात्मक स्यात् । आयनेयोनी- थियः फढखछयां प्रत्ययादीनाम् ७ १।२। प्रत्ययादेः फस्य-प्रायन् , ढस्य---- एय् , खस्य-ईन् , छस्य-ईय् , धस्य-इय्-एते स्युः । गर्गस्य युवापत्यं गाायणः दाक्षायणः । अत इज ४|१५अपत्येऽर्थे । दाक्षिः । बाह्वादिभ्यश्च ४ा ११६६ जाहविः । श्रोडुलोमिः । लोम्नोऽपत्येषु बहुजकारो बक्तव्यः । उडुलोमाः । प्राकृतिगगोऽयम् । अवृज्यानन्तर्य बिहादिभ्योऽ४। १ । १०४ । एभ्योऽञ् गोत्रे, ये त्वत्रानृषयस्तेभ्योऽपत्येऽन्यत्र तु गोत्रे। बिदस्य गोत्रं बैदः । बैदौ । बिदाः । पुत्रस्यापत्यं पौत्रः । पौत्रौ । पौत्राः। एवं दौहिनादयः । शिवादिभ्योऽण कार्ये गार्यः' इति । बहुत्वे तु गर्गस्य गोत्रापत्यानि इति विग्रहे यमि आदिवृद्धौ 'यत्रयोश्च' इति यमो लुकि निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः' इति परिभाषया यानिमित्तवृद्धचभावे विभक्तिकार्ये 'गः' (ई० ३० ) इति भवति । गायोयण:-मार्गस्य गोत्रापत्यं गार्यः, गार्यस्य अपत्यं गर्गस्य चुनापत्वं गाायणः । अत्र 'जीवति तु बंश्ये युवा' इति युत्रसंज्ञायां 'यमित्रोच' इति यजन्तात् फकि 'आयनेयोनीयिय:-' इति फस्य प्रायन्नादेशे नत्वात् 'यल्येति च' इत्यलोपे गत्वे विभक्तिकायें 'गाायणः' इति । । । इस घञ्' और 'अ' उसका लुक् हो, गोत्र प्रत्ययकृत बहुत रहनेपर । परन्तु स्त्रीलिङ्गमें लुक नहीं हो। जीवति तु-वंशमें पिता आदिके जीवित रहने पर पौत्र आदिका अपत्य जो चतुर्थ (प्रपौत्र ) आदि, उसकी युवसंञ्चा ही हो--गोत्रसंज्ञा नहीं हो । गोत्राबून्य--युवा अपत्य विवक्षित होनेपर गोत्रप्रत्ययान्तसे ही प्रत्यय हो। और सोलिङ्गमें युवसंशा नहीं हो। धनिजोश्च-गोत्र में जो यज और तदन्तसे फक् प्रत्यय हो । आयनेयी--प्रत्ययके आदिभूत 'फ' आदिको यथाक्रमसे आयन् आदि आदेश हो । अत इन--अदन्त प्रातिपदिक से इञ् प्रत्यय हो, अपत्य अर्थ में । बालादिश्याश्व-बाहादिले इन प्रत्यय हो, अपत्य अर्थमें । होस्नोऽपत्वे-लोमन् शब्दसे बहुत्वविशिष्ट अपत्य अर्थमें अकार प्रत्यय हो। अनुष्यानन्तर्ये-विदादि गणपठिन ऋषियोंसे गोत्र अर्थमें और ऋषिमिन्नोंसे अपत्य अर्थ में अन प्रत्यय हो । शिवादिभ्यो-शिवादिसे अण् प्रत्यय हो, अपत्य अर्थमें ।
है २१२ लघुसिद्धान्तकौमुदी ४२११४। अपत्ये । शैवः । गाङ्गः । ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च ४।१।११४६ ऋषिश्य:-वासिष्ठः । वैश्वामित्रः ! अन्धकेभ्य:---- वाफल्कः । वृष्णिभ्यः- बासुदेवः । कुरुभ्यः-नाकुलः । साहदेवः । मातुरुत्संख्यासम्भद्रपूर्वायाः ४॥ १॥ ११॥ संख्यादिपूर्वल्य मातुशब्दस्योदादेशः स्यादणप्रत्ययश्च । द्वैमातुरः । पाण्मातुरः । सांभातुरः । भाद्रमातुः । स्त्रीभ्यो ढक ४ाश१२० स्त्रीप्रत्ययान्तेभ्यो डक वैनतेयः । कन्यायाः कनीन च ४।१।११६/ चादण। कानीनो व्यासः कर्णश्च । राजश्वशुराधत् ।। १ । १३७ । राज्ञो जातावेवेति वाच्यम् । ये चाऽभावकर्मणोः ६४।१६८। यादौ तद्धितै परेऽन् प्रकृत्या स्यान्चतु भावकर्मणोः । राजन्यः । जातावेवेति किम् ? । अन् ६।४।१६७/ चन् प्रकृत्या स्यादणि परे । राजनः । श्वशुर्यः । क्षत्राद्धः४॥ १११३८ क्षत्रियः । जातावित्येव । क्षात्रिरन्यत्र । द्वैमातुरः ( ई० ४०, ४२) द्वयोर्मात्रोरपत्यमिति विग्रहे "तद्धिताति समासे सुब्लुकि 'मातुरुत्संख्यासंभद्रपूर्वायाः' इति द्विमातृशब्दादणि ऋकारस्थ उदा. देशे च रपरत्वे आदिवृद्धौ विभक्तिकार्य तसिद्धिः । पाण्मातुः ( ई० २९, ३४,) वण्णां मातृणामपत्यमिति विभहे 'तद्धिता- बैंति समासे सुब्लुकि धस्य जश्त्वेन डकारे तस्य 'यरोऽनुनासिके-' इति णत्वे षण्मा तृशब्दात् 'भातुरुत्संख्येति अणि उत्वे रपरत्वे आदिवृद्धौ विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । वैनतेयः (ई० ४९,५१,५७) विनता नाम गरुडमाता, तस्याः अपत्यमितिः विग्रहे 'श्रीभ्यो ढक्' इति ढकि 'आयनेयी' इति ढस्य एयादेशे भत्वात् 'यस्येति च' इत्याकारलोपे "किति च' इत्यादिवृद्धौ विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः । राजन्यः ( ई० २५, ३३, ४६, ५१) क्षस्त्रियात् क्षत्रियायां स्वभार्याया- मुत्पनो राजन्यः। अत्र 'राजश्वशुरायत्' इत्यनेन राजञ्छब्दात् जातौ यत्प्रत्यये 'ये चाभावकर्मणोः' इति प्रकृतिभावाहिलोपाऽभावे विभक्तिकार्य 'राजन्यः' इति । ऋष्यन्धक-ऋष्यादिसे अण् प्रत्यय हो, अपत्य अर्थमें । मातुरुत्--संख्यादिपूर्वक मातृ शब्दको उत् आदेश हो, और अण् प्रत्यय भी हो। स्त्रीभ्यो ढक-सोप्रत्ययान्तसे ढक अत्यावा हो, अपत्य अर्थमें। कन्याया:-कन्या शब्दको कनीन आदेश हो और चकाराव अण् प्रत्यय भी हो, अपत्य अर्थमें । राजश्वशु-राजन् शब्द और श्वशुर शब्दसे यत् प्रत्यय हो, अपत्य अर्थमें । राज्ञो जाता--जातिवाच्य होने पर ही राजन् शब्दसे यत् प्रत्यय हो। ये चाभाव-यकारादि तद्धितके परे 'अन्' प्रकृतिवत् हो, किन्तु भाव और कर्मार्थक प्रत्ययके परे नहीं हो । अन् -अण् प्रत्ययके परे अन् प्रकृतिवत् हो । क्षत्राद्ध-क्षत्र शब्दसे - १२ | है . अपत्याधि०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। "रेवत्यादिभ्यष्ठक ४ १४६ । ठस्येकः ७३५० ! अशात्परस्य ठस्येकादेशः स्यात् । रैवतिकः ! जनपदशब्दारक्षत्रियादम् ४।१।१६८ । जनपदक्षत्रियवा- न्चकाच्छब्दादम् स्यादपत्ये । पाञ्चालः । क्षत्रियसमानशब्दाज्जनपदातस्य राजन्यपत्यवत् । पञ्चालानां राजा पाञ्चालः । ॐ पूरोरण बक्तव्यः । पौरवः * पाण्डोडर्थण । पाण्ड्यः । कुरुनादिभ्यो एयः ४ । १ । १७२ | कौरव्यः । नैषध्यः । ते तद्राजाः ४|१११७४| अनादयस्तद्राजसंज्ञाः स्युः। तद्राजस्य बहुषु तेनेवाऽस्त्रियाम् ॥ ४॥ ६२ । बहुप्वर्थेषु तद्राजस्य लुक् , तदर्थकृते बहुत्वे, न तु स्त्रियाम् । इक्ष्वाकवः । पञ्चालाः-इत्यादि । कम्बोजाल्लुक ६।१।१७५ । अस्मात्तद्राजस्य लुक् । कम्बोजः। कम्बोजौ । कम्बोजादिभ्य इति वक्तव्यम् । चौलः । शकः । केरलः । यवनः ॥ इत्यपत्याधिकारप्रकरणम् ॥ PATIAMRUTARITAARATHIANTERNATATHAKALINSANNTRE जातिमात्राऽभावे तु राज्ञोऽपत्यमिति विप्रहे 'तस्याऽपत्यम्' इत्यणि 'अन्' इति प्रक- तिभावे विभक्तिकायें राजनः' इति । इति 'इन्दुमती टीकायामपत्याधिकारः " 'घ' प्रत्यय हो, अपत्य अर्थम-समुदायसे जाति यदि गम्यमान रहे । रेवत्यादिश्च--रेव- त्यादिसे 'ठक' प्रत्यय हो, अपत्य अर्थमें । ठस्येका -अगले पर 3' को 'इक' आदेश हो। जनपद-जनपद (देश) बाचक 'जनपद' शब्दके समान जो क्षत्रियवाचक शब्द, उससे अञ प्रत्यय हो, अपत्य अर्थ में । ('पञ्चाल' देशका तथा राजाका भी नाम है) क्षत्रियसमान... क्षत्रिय समान वाचक जो जनपद शब्द, उससे राजामें अपत्यवत् अस्यय हो । पुरोरण-पुरु शब्दसे अण् प्रत्यय हो, अपत्य अर्थमें । पाण्डोडर्थण--पाण्डुसे डथण प्रत्यय हो, अपत्य अर्थमें । कुरुनादिभ्यो-जनपद और शत्रियवाची कुरु शब्द तथा नकारादि शब्दोंसे ण्य प्रत्यय हो, अपत्य अर्थमें । ते तद्राजा-'जनपदशब्दात् क्षत्रियाद । इत्यादि सूत्रोंसे विहित अआदि प्रत्ययकी नद्राज संशा हो । तदाजस्थ-बहुत्व अर्थमें तद्राज संशक प्रत्ययका स्त्रीलिङ्गसे मिन्नमें लुक् हो, यदि तद्राज प्रत्ययार्थ कृत बहुत्व रहे । कम्बोजा-कम्बोजसे पर तद्राज संज्ञक प्रत्ययका लुक हो । कम्बोजादिभ्यः--पूर्वोक्त सूत्रमें कम्बोजादिसे पर तद्राजसंशक प्रत्ययका लुक हो. -ऐसा कहना चाहिये। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें अपत्याधिकार समाप्त हुआ Awamine SARAN সুস্থ ৰাষ্ট্ৰীক্ষug तेन रक्तं रागात् ४ाश अण् स्यात् । रज्यतेऽनेनेति रागः । कषायेण रक्त वस्त्रं काषायम् । नक्षत्रेण युक्तः कालः ४ा।३। अण् स्यात् । तिध्यपुध्ययो- नक्षत्राऽणि यलोप इति वाच्यम् । पुष्येण युक्तं पौषम् अहः । लुबविशेष ४।२।४। पूर्वेण विहितस्य लुप् स्यात् , षष्टिदण्डात्मकस्य कालस्याऽवान्तरविशेष- श्चेन्न गम्यते । अद्य पथ्यः । दृष्टं साम ४२१७) तेनेत्येव । वसिष्ठेन दृष्टं वासिष्ठ साम । वामदेवाड्ड्यड्ड्यौ ४ । २ ! ६ वामदेवेन दृष्टं साम-वामदेव्यम् । परि- वृतो रथः ४।२।१०। अस्मिन्नर्थेऽण प्रत्ययो भवति । वस्त्रेण परिवृतो वास्त्रों रथः । तत्रोद्धृतममत्रेभ्यः ४।२।१४शरावे उद्धृतः शाराव नोदनः । संस्कृत भक्षाः ४॥ २॥ १६ । सप्तम्यन्तादण् स्यात्संस्कृतेऽर्थे । यत्संस्कृतं भक्षाश्चेत्ते स्युः ।। शारावः (ई. ३१, ३४)-शरावे उद्धृतः इति विग्रहे शरावशब्दात 'तत्रोद्धृतममन्त्रेभ्यः' इत्यणि आदिवृद्धौ भत्वादलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । तेन रक्तं = तेनेति तृतीयासमर्थाद् रागविशेषवाधिनः शब्दाद् रक्तमित्येतस्मि. नर्थे ( यथाविहित) अण्प्रत्ययो भवति । नक्षत्रेण-तृतीयासमर्थाद् नक्षत्र विशेषवाचिनः शब्दाइ युक्त इत्येतस्मिन्नर्थेऽपनत्ययो भवति, योऽसौ युक्तः, कालश्चेत स भवति । दृष्टं-तृतीयासमर्थाद् दृष्टं सामेत्येतस्मिन्नर्थेऽणप्रत्ययो भवति, यद् दृष्ट साम चेत्तद् भवति । वामदेवा-वामदेवशब्दात् तृतीयासमर्थाद् दृष्टं सामेत्येतस्मि- नर्थे व्यत् व्य इत्येत्तौ प्रत्ययो भवतः। परिवृतो- तृतीयासमर्थाद परिवृत इत्येतस्मिः तेन र-राग (रङ्ग) वाचक तृतीयान्तसे अण प्रत्यय हो, 'रक्त' अर्थ में। नक्षत्रेण युक्तः-नक्षत्रविशेषयुक्त चन्द्रवाचक तृतीयान्त पुण्यादि शब्दोंसे युक्त अर्थमें यथाविहित अणादि प्राग्दीव्यतीय प्रत्यय हो, जो युक्त हो वह यदि काल रहे तो। तिष्यपुष्य-तिष्य और पुष्यके यकारका लोप हो, नक्षत्रसंबन्धी अण्के परे। लुबविशेषे-'नक्षत्रेण युक्तः कालः' इससे विहित प्रत्ययका लुप् हो, यदि षष्टिदण्डा- त्मक ( २४ घंटा) कालका कोई अवान्तर (काल) विशेष गम्यमान नहीं होता रहे। दृष्टं साम---तृतीयान्तसे दुष्ट अर्थ में अणादि प्रारदीव्यतीय प्रत्यय हो, जो दुष्ट है वह यदि साम रहे तो । वामदेवा-वामदेव शब्दसे ड्यत् और ड्य प्रत्यय हो, दुष्ट साम अर्थमें परिवतो-तृतीयान्तसे परिवृत अर्थमें प्राग्दीव्यतीय अणादि प्रत्यय हो, जो परिवृत है वह यदि रथ रहे तो । तत्रोद्धत-पानवाची सप्तम्यन्तसे यथाविहित अणादि प्रत्यय हो, उधृत अर्थमे । संस्कृतं मचा-सप्तम्यन्तसे अा प्रत्यय हो, संस्कृत अर्थमें, जो संस्कृत हो, बाट Ediv TE रक्ताद्यर्थकप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। भ्राष्ट्रेषु संस्कृता श्राष्ट्रा यवाः । साऽस्य देवता ४।२।२४ । इन्द्रो देवताऽस्येति ऐन्द्रं हविः । पाशुपतम् । वार्हस्पत्यम् । शुक्राद्धन् ४।२।२६॥ शुक्रियम् । सोमा- व्यण् ४।२।३०। सौम्यम् । वाय्वृतुपित्रुषसो यत् ४।२।३१। बायव्यम् । ऋत- व्यम् । रीऋतः ७।४।२७। अवधकारे असार्वधातुके यकारे चौ च परे ऋदन्ता. शस्य रीडादेशः । यस्येति च । पित्र्यम् । उषस्यम् । पितृव्यमातुलमातामहपि- तामहाः ४॥२॥ ३६॥ एते निपात्यन्ते । पितुर्धाता पितृव्यः। मातुर्धाता मातुलः । भातुः पिता मातामहः । पितुः पिता पितामहः । तस्य समूहः४। २।३७ का- कानां समूहः काकम् । भिक्षादिभ्योऽण ४।२।३८ भिक्षाणां समूहो भैक्षम् । पाशुपतम् ( ई० २३, ४७ )-पशुपतिर्देवताऽस्येति विग्रहे पशुपतिशब्दात 'सास्य देवता' इत्यणि वृद्धौ भत्वादिलोपे विभक्ति कार्ये तत्सिद्धिः । पित्र्यम् ( ई० ३८, ५७ )-पितरो देवतास्येति विग्रहे 'वावृतुपित्रुषसो यत्' इति यति 'रोङ् ऋतः' इति ऋतो रीङि भत्वादीकारलोपे विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः। बर्थेऽण प्रत्ययो भवति, योऽसौ परिवृतो रथश्चेत् स भवति । साऽस्य-सेति प्रथमा- समर्थादस्येति षष्टयर्थेऽण प्रत्ययो भवति, यत् प्रथमासमर्थ देवता चेत् सा भवति । यागसम्प्रदानं देवता देयस्य पुरोडाशादेः स्वामिनी, तस्मिाभिधेये प्रत्ययः) शुक्राद्-शुक्रशब्दात् सास्य देवतेत्यस्मिन्नर्थे धन् प्रत्ययो भवति । सोमाट ट्यग-सोम. शब्दात् ट्यण्प्रत्ययो भवति, सास्य देवतेत्येतस्मिन् विषये। वारवृतु-वायवादिभ्यः शब्देभ्यो यत् प्रत्ययो भवति, सास्थदेवतेत्येतस्मिन् विषये। पितृव्य---पितृमातृभ्यां भातयभिधेये व्यत् हुलच इत्येतौ प्रत्ययौ निपात्येते-पितृव्यः । मातुलः । ताभ्या- मेव पितयभिधेये डामहच प्रत्ययो निपात्थते पितामहः । मातामहः । (ताभ्यामेष मातयभिधेये षिच निपात्यते--पितुर्माता, पितामही । मातुर्माता, मातामही!) तस्य- तस्येति षष्ठीसमर्थात् समूह इत्यर्थेऽपप्रत्ययो भवति । भिक्षादिभ्य: -भिडे स्येवमादिभ्यः शब्देभ्योऽण्प्रत्ययो भवति, तस्य समूह इत्येतस्मिन् विषये। , यदि 'भक्षु' रहे तो । सास्य देवता-षष्ठयर्थमें देवतावाचक प्रथमान्तसे अणादि प्रत्यय हो। शुक्रा-'अस्य अर्थ में देवतावाचक शुक्र शब्दसे धन प्रत्यय हो। सोमा-“अस्य अर्थमें देवतावाचक सोमशब्दसे ट्यण् प्रत्यय हो । बायवृतु-'अस्य अर्थमें देवतावाचक प्रथमान्त वायु आदि शब्दसे यत् प्रत्यय हो । रीवृतः-ऋदन्त अंगको री आदेश हो कृद्भिन्न यकार और असार्धधातुक यकारके परे तथा च्चि प्रत्ययके परे । पितृव्य-पितृव्य, मातुल, मातामह और पितामह शब्द निपातन हो । तस्य समूहः-समूह अर्थ में यथाविहित प्राग्दीव्यतीय अणादि प्रत्यय हो। मिक्षादिभ्यो-भिक्षादिसे समूह अर्थमें अण् प्रत्यय हो ।
। लघुसिद्धान्तकौमुदी गर्भिणीनां समूहो गार्मिणम् । इह 'भस्याऽढे तद्धिते' इति पुंवद्भावे कृते । इनण्या- नपत्ये ६४।१६४ अनपत्यार्थऽणि परे इन् प्रकृत्या स्यात् । तेन वस्तद्धिते' इति टिलोपो न । युक्तीनां समूहो यौवनम् । यौवतम् । प्रामजनबन्धुभ्यस्तल ४।२। ४३ । 'तलन्त खियाम्' । प्रामता ! जनता । बन्धुता । * गजसहाभ्यां चेति वक्तव्यम् । गजता । सहायता । *अह्नः खः ऋतौ । अहीनः । अचित्तहस्ति धेनोष्ठक ४।२।४७। इसुजुक्तान्तारकः ७।३।५१। इस्उउक्तान्तात्परस्य ठस्य कः। साक्तुकम् । हास्तिकम् । धैनुकम् । तद्धीते तद्वेद ४।२।५६ । न वाभ्यां यौवतम् (ई० ३३)-युवतीनां समूहः इत्यर्थे 'यूनस्तिः' इति तिप्रत्ययनिष्प- चाद् युवतिशब्दात् 'भिक्षादिभ्योऽण्' इत्यणि आदिवृद्धौ ‘भस्याढे तद्धिते' इति पुंबद्भावात्तिप्रत्ययनिवृत्तौ 'अन' इति प्रकृतिभावात् टिलोपाभावे विभक्तिकार्ये 'यौव- नम्' इति । युधातोः शतृप्रत्यये उवङि, 'उगितश्चेति डीपि 'युवती' इति तस्मात् अनुदात्तादेरज्' इत्यजि आदिवृद्धौ ‘भस्याढे' इति पुंवद्भावेन छीपो निवृत्तौ विभ- क्तिकार्ये 'यौवतम्' इति भवति । जनता (ई०. ४२)-जनानां समूह इति विग्रहे जनशब्दात् 'ग्रामजनबन्धु- भ्यस्तल्' इति तत्प्रत्यये 'तलन्तं स्त्रियाम्' इति स्त्रीत्वाहापि विभक्तिकार्ये तत्सिद्धम् । (एवं बन्धूनां समूहः 'बन्धुता' (ई० २६ ) इत्यपि बोध्यम् ) हास्तिकम (ई० ४५, ५८)-हस्तिनां समूहः इति विग्रहे 'अचित्तहस्तिधेनोष्ठक्' Com आमजल-प्रामादिभ्यस्तलप्रत्ययो भवति, तस्य समूहेऽर्थे । ग्रामाणां प्रामता । अचित्त-अचित्तार्थेभ्यो हस्तिधेनुशब्दाभ्यां च ठकप्रत्ययो भवति, समूहे. ऽर्थे । सक्तूनां समूहः, सातुकम् । तदधीते-तदिति द्वितीयासमादधीते वेद इत्ये. तयोरर्थयोरणप्रत्ययो भवति । इनण्यनपत्ये -अनपत्यार्थक अण् प्रत्ययके परे 'इन्' प्रकृतिवत रहे। ग्रामजन-ग्राम, जन और नन्धु शब्दसे समूह अर्थमें तल् प्रत्यय हो। तलन्त-तलन्तशब्द स्त्रीलिंगमें हो । गजलहाया-गज और सहाय शब्दसे मी समूह अर्थमें तल प्रत्यय हो--ऐसा कहना चाहिये। अहःख:---ऋतु अर्थमें अहन् शब्दसे ख प्रत्यय हो । अचित-अचित्त ( अप्राणी) वाचक, शब्द हस्तिन् शब्द और धेनु शब्दसे ठक् प्रत्यय हो, समूहाथमें । इसुसु-सन्त, उसन्त, उगन्त और तान्तसे पर '' को 'क' आदेश हो। तदधीते-द्वितीयान्तसे 'अधीते' और 'वेद' अर्थ में स्पणादि- प्रत्यय हो । न यवाभ्यां--पदान्त यकार, वकारसे पर 'अच्' को वृद्धि नहीं हो, किन्तु ] चातुरर्थिका इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। पदान्ताभ्यां पूर्वी तु ताभ्यामैच्७।३।३। पदान्ताभ्यां यकारवकाराभ्यां परस्याची न वृद्धिः किं तु ताभ्यां पूर्वी क्रमादैजावागमौ स्तः । व्याकरणमधीते वेद वा वैया- करणः । क्रमादिभ्यो वुन् ४१२ । ६१ । क्रमकः । पदकः । शिक्षकः । मीमांसकः । ॥ इति रक्ताद्यर्थकप्रकरणम् ॥ CANON अथ चातुरर्थिकप्रकरणम् तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नानि ४२।६७। उदुम्बराः सन्त्यस्मिन्देशे औदु. म्बरो देशः । तेन निवृत्तम् ४ । २ । ६८ ! कुशाम्बेन निर्वृत्ता नगरी कौशाम्बो । इति उकि ठस्येक इति ठस्य इकादेशे किति च' इत्यादिवृद्धी टिलोपे विभक्तिकार्य तत् सिद्धम् । हस्तिनीनां समूहः इत्यर्थे तु 'भस्याटे' इति पुंवद्भावेन सिद्धं बोध्यम् । वैयाकरणः (ई० २८, ३२, ४१, ४९)-व्याकरणमधीते वेद वेत्यर्थे 'तद- थीते तद्वेद' इत्यनेन व्याकरणशब्दादणि भत्वादलोपे व्याकरण अ' इति स्थिते "न स्वाभ्याम्' इति यकारात्पूर्वमैजागमे विभक्तिकार्य तसिद्धिः । इति 'इन्दुमती'टीकायां रक्ताद्यर्थप्रकरणम् । HAMAGIDOS औदुम्बरो देशः (ई० ५०)-अत्र उदुम्बरशब्दात् 'तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नाम्नि' इत्यणि शादिवृद्धौ भत्वादलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः। क्रमादि-क्रम । इत्येवमादिभ्यः शब्देभ्यो बुन्प्रत्ययो भवति, तदधीते तद्धे. देत्यस्मिन् विषये। तदस्मिन्नस्ति-अस्मिन्निति सप्तम्यर्थे तदिति प्रथमोच्चारितात प्रथमासमाद यथाविहितम्) अप्रत्ययो भवति, प्रत्ययान्तेन प्रकृतिनामके देशे गम्ये चेतू । नेति तृतीयासमर्थानितमित्येतस्मिनथै अणप्रत्ययो भवति. देशे नामधेये । दादिसे ड्मतुप् प्रत्यय हो चारों अथाम । झया झयन्तसे पर मतुपके मकारको वकार लघुसिद्धान्तकौमुदी तस्य निवासः ४।२।६६/ शिबीनां निवासी देशः शैवः। अदूरभवश्व ४२१७० विदिशाया अदूरभचं नगरं वैदिशम् । जनपदे लुप् ४।२।१ । जनपदे वाच्य चातुरर्थिकस्य लुप् । लुपि युक्तवद्व्यक्तिवचने ११२। ५११ लुपि सति प्रकृतिव- शिवचने स्तः। पचालानां निवासी जनपदः पश्चालाः । कुरवः । अङ्गाः । बङ्गाः। कलिङ्गाः । वरणादिभ्यश्च ४।२।२ | अजनपदार्थ आरम्भः । चरणानामदूरभवं नगरं वरणाः । कुमुदनडवेतसेभ्योड्मतुप्४।२।८७ झयः ८।२।१० मयन्ता- न्मतोर्मस्य वः। कुमुद्वान् । नड्वान् । मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः मारा मवर्णाऽवर्णान्तान्मवर्णावोंपधाच्च यवादिवर्जितात्परस्य मतोमस्य वः। वेतस्चान् । नडशादाड्ड्धलच्४।२।८८ नड्वलः । शाद्वलः । शिखाया वलच ४२NEEशिखावलः । ॥ इति चातुरर्थिकप्रकरणम् ॥ नड्वल (ई५ ४८)-नडाः सन्ति यस्मिन् इति विग्रहे 'नडशादाड्ड्वलच्' इति ड्वलांच डित्वाहिलोपे विभक्तिकार्ये तत्सिद्धम् । एवं शादा (घासाः) सन्ति यस्मिन् स शाद्वलः । शिखाऽस्त्यस्मिन् इति शिखाचलः (मयूरः )। गम्यमाने । तस्य-पछीसमर्थानिवास इत्येतस्मिन्नर्थे अण्प्रत्ययो भवति, देशनाम- धेये गम्यमाने। अदूर-षष्ठीसमर्थाददूरभव इत्येतस्मिन्नर्थे अप्रत्ययो भवति । जनपदे-तदस्मिन्नस्तीत्यारभ्य 'अदूरभवश्चेति सूत्रपर्यन्तं यश्चातुरर्थिकः प्रस्थयः तस्य लुक् स्थात् जनपदेऽभिधेये। ग्रामसमुदायो जनपदः । वरणादि----वरण इत्येव- मादिभ्य उत्पन्नस्य चातुरथिकस्य प्रत्ययस्य लुम्भवति। कुमुद--कुमुद नड वेतस- इत्येतेभ्यः शब्देभ्यो ड्मनुप् प्रत्ययो भवति, चातुरर्थिकः । तस्य निवास:-यन्त से निवास' अर्थमें यथाविहित अणादि प्रत्यय हो, यदि प्रत्य. यान्त किसी देशकी संज्ञा रहे । अदूर-षष्ठयन्तसै 'अदूरमव' अर्थमें यथाविहित अणादि. प्रत्यय हो, यदि वह प्रत्ययान्त किसी देशको संज्ञा रहे। जनपदे-जनपद वाच्य रहे तो चातुरर्थिक प्रत्ययका लुप् ( लोप ) हो । लुपि युक्त-लुप् होने पर प्रकृतिकी तरह ही लिंग और बचन हो। वरणादिभ्य:-वरणादिसे पर चातुरर्थिक प्रत्ययका लुप् हो । कुमुद-कुमु । क श्रादेश हो । मादुपधाया-~यवादि वर्जित मवर्णान्त, अवर्णान्त और भवर्णोपध, अवर्णोपधसे पर मतुपके मकारको वकार आदेश हो । नडशादा-नड और शादसे ड्वलच प्रत्यय हो, चारों अथामें । शिखाया-शिखा शब्दसे बलच प्रत्यय हो, चारों अर्थों में। इति 'इन्दुमती'टीकायां चातुरर्थिकप्रकरणम् । cases । अथ शैषिकप्रकरणम् शेषे ४।२।१२। अपत्यादिचतुरर्थ्यन्तादन्योऽर्थः शेषस्तत्राणादयः स्युः . चक्षुषा गृह्यते चाक्षुषं रूपम् । श्रावणः शब्दः । औपनिषदः पुरुषः । दृषदि पिष्टा. दार्षदा सक्तवः । चतुर्भिरुह्यं चातुरं शकटम् । चतुर्दश्यां दृश्यते चातुर्दशं रक्षः । 'तस्य विकारः' इत्यतः प्राक् शेषाधिकारः । राष्ट्राऽवारपाराद्धखौ ४ । २ । ६३ । आभ्यां क्रमाद्धखौ स्तः शेषे । राष्ट्रे जातादिः राष्ट्रियः । अवारपारीणः । अवा. रपाराद्विगृहीतादपि विपरीताच्चेति वक्तव्यम् । अवारीणः । पारीणः । पारा- वारीणः । इह प्रकृतिविशेषाद्धादयष्टयुटयुलन्ताः प्रत्यया उच्यन्ते तेषां जातादयोऽ- विशेषाः समर्थविभक्तयश्च वक्ष्यन्ते । ग्रामाद्यखौ ४|२|१४| प्राम्यः . मामीणः । नद्यादिभ्यो ढक ४१२।१७ | नादेयम् । माहेयम् । वाराणसेयम् है राष्ट्रियः (ई० ३३,५०,५५)-'राष्ट्राऽवारपाराशखौ' इति घप्रत्यये घल्य इया- देशे भत्वाद् 'यस्येति च' इत्यकारलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । पारावारीणः (ई० २९)-'राष्ट्राऽवारपाराद्घखौ' इति सूत्रस्थ 'श्रवारपा- राद्विगृहीतादपि, विपरीताच्चेति वक्तव्यम्' इति चार्तिकस्याऽयमर्थः-विग्रहीतात्- पृथग्भूतात्, , अवारशब्दात् पारशब्दाच, च-पुनः, विपरीतात्-पारावारशब्दादपि खप्रत्ययो वक्तव्यः। ततश्च श्रवारे जातः 'अचारीण',पारे जातः 'पारीण', पारावारे जातः पारावारीणः' इति रूपत्रयं सिद्धं भवति । अत्र खस्य ईनादेशः भत्वादलोपः नस्य णत्वमिति विशेषः। 'अवारपारोणः' इति तु चतुर्थं रूपं बोध्यम् । MANOHAN आमा-मामशब्दाध खन इत्येतौ भवतः। ग्रामे भवः, ग्राम्यः । नधा--नदी इत्येवमादिभ्यो ढक । नद्या भवः, नादेयन् । शेष-अपत्यादि चतुरर्थ्यन्त अर्थों से भिन्न जो शेष ( जात, भव, आगत, गृह्यते, डि आदि) अर्थ, उन अर्थोंमें तत्तत् प्रकृतियोंसे पूर्वोक्त अणादि प्रत्यय और वक्ष्यमाण धादि, प्रत्यय हो । राष्ट्राबार-राष्ट्र शब्दसे 'ध और अवारपार शब्दसे 'ख' प्रत्यय हो, शेष (जातादि) अर्थों में । अवारपारा-'विगृहीत और विपरीत अर्थात् अबार शब्दसे, पार शब्दसे और पारावार शब्दसे भी पूर्वोक्त 'ख' प्रत्यय हो-ऐसा कहना चाहिये। प्रामचखो-ग्राम शब्दसे 'य' और 'खम प्रत्यय हो, जातादि अर्थों में। नधादिभ्यो-नद्यादिसे ढक् प्रत्यय हो, शेष ( जातादि) अर्थो में ।
लघुसिद्धान्तकौमुदी तस्य निवासः ४।२।६६/ शिबीनां निवासो देशः शैवः । अदूरभवञ्च ४।२।७०॥ विदिशाया अदूरभवं नगरं वैदिशम् । जनपदे लुप् ४१२८१। अनपदे बाच्या चातुरर्थिकस्य लुप् । लुपि युक्तवव्यक्तिवचने ११ २१ ५१ लुपि सति प्रकृतिव- शिवचने स्तः। पश्चालानां निवासी जनपदः पञ्चालाः । कुरवः । अज्ञाः। बङ्गाः । कलिङ्गाः । वरणादिभ्यश्च ४१२१८२ जनपदार्थ प्रारम्भः । वरणानामदूरभवं नगरं वरणाः । कुमुदनडवेतसेभ्योड्मतुप ४।२।८७ भयः ८।२।१०। मयन्ता- न्मतोमस्य वः। कुमुद्वान् । नड्वान् । मादुपधायाश्च मतो?ऽयवादिभ्यः माह मवर्णाऽवर्णान्तान्मवर्णावर्णोपधाच्च यवादिवर्जितात्परस्य मतोर्मस्य वः । वेतस्वान् । नडशादाड्ड्वलच ४ारामा नड्वलः । शाद्वलः । शिखाया वलच शिखावलः । ॥ इति चातुरर्थिकप्रकरणम् ।। नवलः (ई.४८)-नडाः सन्ति यस्मिन् इति विग्रहे 'नडशादाड्ड्वलच्' इति ड्वलाच डिवाहिलोपे विभक्तिकार्ये तत्सिद्धम् । एवं शादा (घासाः) सन्ति यस्मिन् स शाबलः । शिखाऽस्त्यस्मिन् इति शिखावलः (मयूरः)। गम्यमाने । तस्य-पछीसमर्थानिवास इत्येतस्मिन्नर्थे अप्रत्ययो भवति, देशनाम- धेये गम्यमाने। अदूर-षष्टीसमर्थाददूरभव इत्येतस्मिन्नर्थे अणप्रत्ययो भवति । जनपदे-तस्मिन्नस्तीत्यारभ्य 'अदूरभवश्चेति खूनपर्यन्तं यश्चातुर्थिका प्रत्ययः तस्थ लुक स्यात् जनपदेऽभिधेये । ग्रामसमुदायो जनपदः । वरणादि-चरण इत्येव- मादिभ्य उत्पन्नस्य चातुरथिकस्य प्रत्ययस्थ लुब्भवति। कुमुद कुमुद नड वेतस- इत्येतेभ्यः शब्देभ्यो ड्मनुप् प्रत्ययो भवति, चातुरर्थिकः । सत्य निवासा-षष्ठयन्त से निवास' अर्थमें यथाविहित अणादि प्रत्यय हों, यदि प्रत्य- यान्त किसी देशकी संज्ञा रहे । अदूर---षष्ठयन्तसे 'अदूरमव' अर्थ, यथाविहित भणादि. प्रत्यय हो, यदि वह प्रत्ययान्त किसी देशको संचा रहे। जनपदे- जनपद वाच्य रहे तो चातुरर्थिक प्रत्ययका लुपू ( लोप) हो । लुपि युक्त-लुप् होनेपर प्रकृतिकी तरह ही लिंगा और वचन हो । चरणादिभ्यः-वरणादिसे पर चातुरर्थिक प्रत्ययका लुप् हो । कुमुदकुमु- दादिसे ड्मतुप् प्रत्यय हो चारों अर्थो में । झया-झयन्तसे पर मतुपके मकारको वकार आदेश हो । मादुपधाया--यवादि वर्जित मवर्णान्त, अवर्णान्तः और मवर्णोपध, अवर्णोपधले पर मतुपके मकारको वकार आदेश हो । नडशादा-नड और शादसे ड्वलच प्रत्यय हो, चारों अथामें । शिखाया-शिखा शब्दसे क्लच प्रत्यय हो, चारों अर्थों में। इति 'इन्दुमती'टीकायां चातुरर्थिकप्रकरणम् ।
अथ शैषिकप्रकरणम् शेषे ४॥ २॥ ६२ अपत्यादिचतुरर्यन्तादन्योऽर्थः शेषस्तत्राऽणादयः स्युः ।। चक्षुषा गृह्यते चाक्षुषं रूपम् । श्रावणः शब्दः। औपनिषदः पुरुषः । दृषदि पिष्ट हार्षदा सक्तवः । चतुर्मिरुह्यं चातुरं शक्टम् । चतुर्दश्यां दृश्यते चातुर्दशं रक्षः। 'तस्य विकारः' इत्यतः प्राक् शेषाधिकारः । राष्ट्राऽवारपाराद्धखौ ४।२।६३ ॥ आभ्यां क्रमाद्धखौ स्तः शेषे। राष्ट्रे जातादिः राष्ट्रियः । अवारपारीणः । अवा- रपाराद्विगृहीतादपि विपरीताच्चेति वक्तव्यम् । अवारीणः । पारीणः । पारा- वारीणः । इह प्रकृतिविशेषाद्धादयष्टयुटयुलन्ताः प्रत्यया उच्यन्ते तेषां जातादयोऽ- र्थविशेषाः समर्थविभक्तयश्च वक्ष्यन्ते । प्रामाद्यखबौ ४।२।६४ | प्राम्यः । प्रामीणः । नद्यादिभ्यो ढक ४ । २ ! ६७ ! नादेयम् । माहेयम् । वाराणसेयम् । राष्ट्रियः (ई० ३३,५०,५५)- 'राष्ट्राऽवारपाराद्धखो' इति धप्रत्यये घस्य इया- देशे भत्वाद् 'यस्येति च' इत्यकारलोपे विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः पारावारीणः (ई० २९)-'राष्ट्राऽवारपाराद्धखो' इति सूत्रस्थ 'श्रवारपा- राद्विगृहीतादपि, विपरीताच्चेति वक्तव्यम्' इति चार्तिकस्याऽयमर्थः-विग्रहीतात् पृथग्भूतात् , अवारशब्दात् पारशब्दाच्च, च-पुनः, विपरीतात्-पारावारशब्दादपि खप्रत्ययो वतव्यः। ततश्च वारे जातः 'अचारीणः',पारे जातः 'पारीणा', पारावारे जातः 'पारावारीणः' इति रूपत्रयं सिद्धं भवति । अत्र खस्य ईनादेशः भत्वादलोपः नस्य णत्वमिति विशेषः । 'श्रवारपारोणः' इति तु चतुर्थ रूपं बोध्यम् । प्रामा-आमशब्दाध खन इत्येतौ भवतः। ग्रामे भवः, ग्राम्यः। नया-नदी इत्येवमादिभ्यो हक । नद्या भवः, नादेयम् । शेषे-अपत्यादि चतुरर्थ्यन्त अर्थो से भिन्न जो शेष (जात, भव, आगत, गृह्यते, कि आदि) अर्थ, उन अर्थोंमें तत्तत् प्रकृतियोंसे पूर्वोक्त अणादि प्रत्यय और वक्ष्यमाण धादि प्रत्यय हो । राष्ट्रावार-राष्ट्र शब्दसे 'घ' और अवारपार शब्दसे 'ख' प्रत्यय हो, शेष (जातादि) अर्थों में । अवारपारा-'विगृहीत और विपरीत अर्थात् अबार शब्दसे, पार शब्दसे और पारावार शब्दसे भी पूर्वोक्त 'ख' प्रत्यय हो-ऐसा कहना चाहिये। ग्रामघाखो-ग्राम शब्दसे 'य' और 'खम ' प्रत्यय हो, जातादि अर्थो में । नधादिभ्यो-नद्यादिसे ढक् प्रत्यय हो, शेष ( जातादि) अर्थोमें । ।
. Hin लघुसिद्धान्तकौमुदी इक्षिणापश्चात्पुरलस्त्यक ४।२। दाक्षिणात्यः । पाश्चात्त्यः । पौरस्त्यः । चुधा - विगपागुन प्रतीचो यत् ४।२।१०११ दिव्यम् । प्राच्यम् । अपाच्यम् । उदीच्यम् । प्रतीच्यम् । अव्ययात्त्यप ४! २१ १०४ अमेहक्वतसित्रेभ्य एव । अमात्यः । इहत्यः । क्वत्यः । ततस्त्यः । तत्रत्यः । अत्यन्ने ध्रुव इति वक्तव्यम् । नित्यः । की वृद्धिर्यस्याचागादिल्लवृद्धम् १२११७३। यस्य समुदायल्याऽचां मध्ये श्रादिवृद्धि - स्तवृद्धसंशं स्यात् । त्यदादीनि च ११७४ | वृद्धसंज्ञानि स्युः । वृद्धाच्छ: ४।२।११४। शालीयः । मालीयः । तदीयः। ॐानामधेयस्य वृद्धसंज्ञा वक्त व्या! देवदत्तीयः । देवदत्तः । गहादिभ्यश्च ४ २१ १३८/ गहीयः । युददम ਜ਼ੋਰ दोरन्यतरस्यां खञ्च ४।३। ११ वाच्छः । पक्षेऽण् । युवयोर्युष्माकं वाऽयं युष्म- दीयः । अस्मदीयः । तस्मिन्नणि च युष्माकाऽस्माको ४।३।२। युष्मदस्मदोरे- तावादेशो स्तः खव्यणि च । यौष्माकीणः । श्रास्माकीनः । यौमाकः । शालीयः (ई० २३,२७,४०)-शालायां भवः इति विग्रहे 'वृद्धिर्यस्याचा यहि आदिस्तद् वृद्धम्' इति शालाशब्दस्य वृद्धसंज्ञायाम् वृद्धाच्छः' इति छप्रत्यये छस्य ईयादेश मेवादाकारस्य लोपे विभक्तिकार्ये 'शालीयः' इति । युष्मदीयः (ई० २१,५३) युक्योर्युष्माकं वाऽयमिति विनहे'युष्मदस्मदोरन्य. तरस्यां खञ्च' इति युष्मच्छब्दात् छप्रत्यये छस्य ईयादेशे विभक्तिकार्य तसिद्धिः । दक्षिणा-दक्षिणा पश्चात् पुरस् इत्येतेभ्यस्त्यप्रत्ययो भवति । दक्षिणस्या माति भवः, निवसति, जातो वा दाक्षिणात्यः । धुप्राग-दिव प्राच् अपाच उदच् प्रत्यच् इत्येतेभ्यो यत्प्रत्ययो भवति । दिवि भवं, दिव्यम् । वृद्धा-वृद्धाप्रातिपदिकाच्छ। प्रत्ययो भवति । शालायां मका दक्षिणापश्चात् दाक्षणा, पश्चात् ओर पुरस् शब्दोस त्या प्रत्यय हो, जातादि अर्थों में। धुप्रा--विव, प्राञ्च, अपाञ्च, उदयू और प्रत्यञ्च शब्दोंसे यत् प्रत्यय हो, जातादि अर्थों में ! अध्यया--अव्ययसे त्या प्रत्यय हो, जाताबर्थों में । अमेह --अमा, ह, क तसि, अ-इन अव्ययोंसे ही त्यप् प्रत्यय हो। स्यब्ने(व-नि' रूप अव्ययसे त्यप् प्रत्यय हो, दादि ध्रुव अर्थमें । वृद्रियस्य-जिस समुदायके अचोंके मध्य में आदि अच् वृद्धिस्वरूप हो, वह आदेश सनुदाय वृद्धिसंशक होता है। त्यदादीनि-त्यदादिकी 'वृद्ध' संशा हो। वृद्धार: वृद्ध पर मर से छ प्रत्यय हो, जातादि अर्थों में । वा नाम--नामधेयको वृद्धसंचा हो विकल्पसे । गहादिभ्यः--यथासंभव देशवाची गहादिसे छ प्रत्यय हो, जातादि अर्थमें युष्मदस्मदो-युष्मद्-अस्मद् शब्दोंसे खच् और 'छ' प्रत्यय हो, विकल्पसे । (विकल्प पक्षमें अण् होगा) तस्मिन्नणि-ख प्रत्यय और अण प्रत्ययके परे युन्म- १ है शैषिका] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। २२१ । आरमाकः । तवकममकावेकवचने ४।३।३एकार्थवाचिनोर्युष्मदस्मदोस्तवकम्- भको स्तः खजि अणि च । तावकीनः । तावकः । मामकीनः । मामकः । छेतु-- प्रत्ययोत्तरपदयोश्च ७ । २।६८ | मपर्यन्तयोरेकार्थवाचिनोस्त्वमौ स्तः प्रत्यव्ये उत्तरपदे च परतः । त्वदीयः । मदीयः । त्वत्पुत्रः । मत्पुत्रः । मध्यान्म: ४।३। मध्यमः । कालाठ्ठा।११कालवाचिभ्यटन स्यात् । कालिकम् । मासिकन्न । सांवत्सरिकम् । अव्ययानां भमात्रे दिलोपः । सायम्प्रातिकः । पौनापुनिकः । प्रावृष एण्यः ४।३।१७। प्रावृषेण्यः। साञ्चिरम्प्राह प्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलो तुट् च ४३२२३। सायमित्यादिभ्यश्चतुर्योऽव्ययेभ्यश्च कालवाचिभ्यष्टयुटयुलौ स्त- स्तयोस्तुट् च । सायन्तनम् । चिरन्तनम् । प्राण-प्रग- अनयोरेदन्तत्वं निपात्यते । प्रातनम् । प्रगेतनम् । दोषातनम् । तत्र जातः ४।३।२५ सप्तमीसमर्थाजात # इत्यर्थेऽणादयो चादयश्च स्युः। मुध्ने जातः सौन्नः । उत्से जात श्रौत्सः। राष्ट्रे जातो राष्ट्रियः । अवारपारे जातः-अवारपारीणः-इत्यादि । प्रावृष ४.३२६ त्वदीयः ( ई० ४७)-तब अयमिति विग्रहे थुमच्छब्दात 'युष्मदस्मदोः' इति चकाराच्छप्रत्यये छस्य ईयादेशे 'प्रत्ययोत्तरपदयोश्च' इति युष्मदो मपर्यन्तस्य -स्वादेशे 'स्व श्रद् ईय' इति जाते 'श्रतो गुणे' इति पररूपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः। शालीयः। गहीयः-गहे (देशविशेष) भवः । त्वदीयः, मदीय:- तवाऽयम् । ममाऽ. यम। उत्तरपदे-तव पुत्रः, स्वत्पुत्रः। मध्यमः-मध्ये भवः। कालिकम-काले भवम् । सायंप्रातिकः-सायं प्रातर्भवति । पौनःपुनिकः-पुनः पुनर्भवति । प्रा. क्षेण्यः-प्रावृषि (वर्षासु) मनः । सायन्तनम्-'यो अन्तकमणि' इति धातोर्वजि सायंशब्दो दिवसावसाने रूढः। तस्मात् ट्युठयुलौ, तथोरनादेशे,तुट, प्रकृतेर्मान्तरवं निपात्यते। प्राले तनम् -मालः सोढोऽश्य । प्रगेतनम् -- प्रगच्छुतीलि प्रगः, तस्मिन्न अस्मद् शब्दको 'युष्माक' और 'अस्माक' आदेश हो । तवक-एकार्थवाची युष्मद्-अस्मद् शब्दको 'तवक 'ममक' आदेश हो खञ् और अण् प्रत्यय के परे । प्रत्ययोत्तर-प्रत्ययके परे और उत्तरपदके परे एकार्थवाची युष्मद्-अस्मद् शब्दके मपर्यन्त भागको 'त्व' 'म' आदेश हो। मध्यात्म-मध्य शब्दसे 'म' प्रत्यय हो, जातादि अर्थों में। कालाठ्ठा ---कालवा- चकसे ठन प्रत्यय हो,जातादि अर्थों में। अव्ययानांमसंज्ञक अध्ययकी 'टि का लोप... प्रावृष-कालवृत्ति प्राकृट् शब्दसे एण्य प्रत्यय हो, जातादि अर्थो में। सायंचिर-सायम्, र चिरम् , प्राल, प्रगे और कालवाची अव्ययोंसे ट्यु और ट्युल प्रत्यय हो तथा तुटका आगम भी हो । तन्न जात:-सप्तम्यन्त समर्थसे जात अर्थमें अणादि प्रत्यय और वादि प्रत्यय हो । प्रावृष:-प्रावृष शब्दसे ठप प्रत्यय हो, जात अर्थ में।
स वि लि । लघुसिद्धान्तकौमुदी एण्यापवादः । प्राषिकः । प्रायभवः ४॥ ३॥ ३६॥ तत्रेत्येव । जुम्ने प्रायेण बाहु- ल्येन-भवति स्रोन्नः । संभूते ४ । ३१ ४१ । सुध्ने सम्भवति स्रौघ्नः । कोशाङ- डञ् ४।३।४२। कौशेयं वस्त्रम् । तत्र भवः ४ । ३.५३ । स्वघ्ने भवः सौन्नः। श्रौत्सः । राष्ट्रियः । दिगादिभ्यो यत् ४. ३१ ५४ | दिश्यम् । वर्म्यम् । शरीराव- यवाच्च ४।३।५५॥ दन्त्यम् । कण्ठयम् । अध्यात्मादेष्टबिष्यते । अध्यात्म भवम्-आध्यात्मिकम् । अनुशतिकादीनां च ७३॥ २०॥ एषामुभयपदवृद्धिजिति गणिति किति च। आधिदैविकम् । प्राधिभौतिकम् । ऐहलौकिकम् । पारलौ- किकम् । प्राकृतिगणोऽयम् । जिह्वामूलाङ्गुलेश्छः ४ । ३ । ६२ । जिह्वामूलीयम् । अङ्गुलीयम् । वर्गान्ताच ४।३६६३१ कवर्गीयम् । तत आगतः ।। ३।७४ा चुना- दागतः सौन्नः । ठगायस्थानेवाः ४।३।७५ शुल्कशालाया श्रागतः शौल्कशा- लिकः । विद्यायोनिसम्बन्धेभ्यो वुन् । ३।७७ औपाध्यायकः । पैतामहकः । आधिदैविकार (ई० ४९ ) देवेष्चित्यधिदेवम् , अधिदेवे भवमाधिदैविकम् । अधिदेवशब्दात् 'अध्यात्मादेष्ठमिष्यते' इति वार्तिकेन ठजि ठस्येकादेशे 'अनुशति- जादीनां च' इत्युभवपदवृद्धौ भत्वादलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । बेत MISRASHEKSHARMAHETREETAILOPawrewar यरि जातः । दोषातनम् -'दोषा' इत्याकारान्तमव्ययं रात्रौ । कौशेयम् ---कोशे सम्भवति । कृमिविशेषकोशस्य विकारः (रेशमी बन)। दिश्यम्-दिशि भवम् । दन्त्यम् - इन्ते भवम् । आधिदैविकन्-देवेश्वित्यधिदेवन, तत्र भवम् । ऐहलौकिकम्-इह- लोके भवम् । औपाध्यायकः-उपाध्यायादागतः। ध्रुव प्रायभव:-प्रायमब अर्थ में सप्तम्यन्तसे यथाविहित अणादि और धादि प्रत्यय हों। सम्भूते-संभूत अर्थमें सप्तम्यन्तसे अणादि और धादि प्रत्यय हो। कोशा-सप्तम्यन्त कोश शब्दसे संभूत (संभव ) अर्थमें ढम प्रत्यय हो। तत्र भवा-सप्तम्यन्तसे भावार्थमें अणादि प्रत्यय और धादि प्रत्यय हों। दिगादि-दिगादि सप्तम्यन्तसे यत् प्रत्यय हो, मवार्थमें । शरीरा-शरीरावयववाची सप्तम्यन्तसे यत् प्रत्यय हो, भवार्थमें। अनुशति-अनुशतिकादिके उमय पदको वृद्धि हो, डिन ,णित और कित्क परे । जिह्वा-सप्तम्यन्त जिह्वामूल और अङ्गुलि शब्दसे 'छ'प्रत्यय छो, मव अर्थमें। वर्गान्ता-सप्तम्यन्त वर्गान्त शब्दसे 'छ' प्रत्यय हो, भव अर्थम । तत आगता-पञ्चम्यन्तसे आगत अर्थ में यथाविहित अणादि प्रत्यय और धादि प्रत्यय हो । ठगाय-आयस्थान (चुंगी-चौकी) वाची पञ्चम्यन्तसे ठक् प्रत्यय हो, आगत अर्थमें। विद्यायोनि-विद्या और योनिसंबन्धवाची सप्तभ्यन्तसे बुम् प्रत्यय हो, आगत अर्थमें। . विव शैषिका०] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। २२ हेतुमनुष्येभ्योऽन्यतरस्या रूप्यः ४।३८१| समादागतं समप्यम् । विषमरूप्यम् पक्षे-गहादित्वाच्छः । समीयम् । विषमोयम् । देवदत्तरूप्यम् । देवदत्तम् । सयट च ६४.३८२। सममयम् । देवदत्तमयम् । प्रभवति ४३८३। हिमवतः प्रभवति हैम- वती गङ्गा । तद्गच्छति पथिदूतयोः ४ ! ३.८५ खुध्ने गच्छति खोज्नः पन्था इतो वा । अभिनिष्कामति द्वारम् ४ । ३।८६ । चुन्नमभिनिष्क्रामति खोज्न कान्यकुब्जद्वारम् । अधिकृत्य कृते अन्थे ४।३।७। शारीरकमधिकृत्य कृतो अन्यः शारीरकीयः । सोऽस्य निवासः ४।३।८६ | सघ्नो निवासोऽस्य सौनः । पैतामहकः (ई० २६)--पितामहादागतः इति विग्रहे पितामहशब्दात् 'विद्या- प्रमवति-प्रभवतीत्यर्थ पचयन्ताद्यथाविहितमणादयो धादया प्रत्ययाः स्युः। प्रभवः प्रथमप्रकाशः) तद्गच्छति-गच्छत्तीत्यर्थे द्वितीयान्ताद् अगादयो धादयश्च प्रत्ययाः स्युः, सस -चेद्गन्ता पन्था दूतो का। साभिनिष्कामति-अधिनिष्कामतीत्यर्थ द्वितीयान्ताद अणादयो बादयश्च स्युः, बत्तदभिनिष्क्रामति द्वारं खेड्भवति । अधिकृत्य-अधिकृत्या कृतो अन्य इत्यर्थे द्वितीयान्ताद् अणादयोः पादयश्च प्रत्ययाः स्युः, सोऽन्य-'स' इति प्रथामा- तास्येति षष्ठयर्थे अणादयः प्रत्ययाः स्युः, यः प्रथमान्तार्थः स निवासश्चेत् (यत्र सम्प्रत्युष्यते स निवासः)। हेतुमनु-हेतु और मनुष्यवाचकसे रूप्य प्रत्यय हो, आगत अर्थमें, विकल्पते। मयट -हेतुवाचक और मनुष्यवाचक पञ्चम्यन्त से मयट प्रत्यय हो, आगत अर्थमें । प्रभवति-प्रभवति' अर्थ में पञ्चम्यन्तसे यथाविहित अणादि प्रत्यय और धादि प्रत्यय हो। तगच्छति-द्वितीयान्तले गच्छति अर्थम यथाविहित अणादि प्रत्यय और पादि प्रत्यय हों, जो जाता है, वह यदि मार्ग या दूत हो तो। अभिनिष्का-द्वितीयान्तसे अभिनिष्क्रामति अर्थमें यथाविहित अगादि और पादि प्रत्यय हो, जो अभिनिष्क्रामति ( उस ओर निकलता है), वह यदि द्वार हो तो। अधिकृत्य-द्वितीयान्तसे 'अधिकृत्य कृतो ग्रन्थः' इस अर्थमें यथाविहित अगादि और पादि प्रत्यय हों। सोऽस्या--प्रथमान्तसे अस्य निवासः इस अर्थमें यथाविहित अगादि और धादि प्रत्यय हो। लेग प्रोकर-तृतीयान्तसे प्रोक्त अर्थमें यथाविहिन अगादि और वादि प्रत्यय हो।
२२४ लघुसिद्धान्त कौमुदी तेन प्रोक्तम् ४।३।१०११ पाणिनिना प्रोक्तं पाणिनीयम् । तस्येदम् ४।३।१२० उपगोरिदम्-औषगवम् । ॥ इति शैधिकाः ।। वि शि दा वेत अथ विकारार्थकप्रकरणम् तस्य विकारः ४३२१३४॥ अश्मनो विकारे टिलोपो वक्तव्यः । अश्म- नौ विकारः श्राश्मः। भास्मनः। मार्तिकः । अवयवे च प्राण्योषधिवृक्षेभ्यः ४।३ । १३५ । चाद्विकारे । मयूरस्याऽवयवो विकारो वा मायूरः। मौर्व काण्ड भस्म वा । पैप्पलम् । मयड्तयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः ४।३१ १४३ । प्रकृतिमात्रान्मयड् वा स्यात विकारावयवयोः । अश्ममयम् । शाश्मनम् । अभक्ष्ये- योनिसम्बन्धेभ्यो वु' इति बुनि बुओऽकादेशे आदिवृद्धौ भत्वादलोपे विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः। इति 'इन्दुमती'टीकायां शैषिकप्रकरणम् । SANndamdar RAISRANCHHAmwapn- AN . आश्मनम् ( ई० ४० )---कल्माषांघ्रिनाम कश्चिद् राजा, तत्पत्न्या वशिष्ठे- नोत्पादितः 'अश्मका' इति शास्त्रे प्रसिद्धः । तस्मात् अश्मन् शब्दात् स्वार्थ कप्रत्ययः । तदमाचे अश्मेत्यपि नाम । तस्य विकारो अवयवो वेत्यर्थे "अश्मन् तेन-प्रोक्ताऽर्थे तृतीयान्ताद् अणादयो घादयश्च प्रत्ययाः स्युः । (प्रथमः प्रकाशितं प्रोक्तम्)। तस्येदम्-इदमित्यर्थे षष्ठयन्तादणादयो धादयश्च प्रत्ययाः स्युः। तस्य-विकार इत्यर्थे षष्टयन्तादणादयः साधारणा, वक्ष्यमाणाश्च वैशेषिका यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः । अवयवे-षष्ठयन्तेभ्यः प्राण्योषधिवृक्षवाचकशब्देभ्यः अव. यवे विकारे च अणादयः उक्ताः वश्यमाणाश्च प्रत्ययाः यथाविहितं स्युः (अन्येभ्य- स्तु विकारमात्रे इत्यर्थः)। मौर्यम्-मूर्वा ओषधिविशेषः तस्या अवयवो विकास तस्येदम-यन्त से “इदम्' इस अर्थमें यथाविहित अणादि और घादि प्रत्यय हो इस प्रकार 'इन्दुमती टीका शैषिक प्रकरण समाप्त हुआ। For _ Fip तस्य विकार--षष्ठयन्तसे विकार अर्थमें अणादि प्रत्यय हो । अश्मनो-अश्मन् इब्दकी 'टि का लोप हो, विकारार्थक प्रत्ययके परे। अवयवे-प्राणी, भोषधि और वृक्ष- वाचीसे अवयव और विकार अर्थमें तथा इनसे अतिरिक्त अर्थवाचीसे केवल विकार अर्थ मणादि प्रत्यय हो। ( यह अधिकारसूत्र है)। भपट-भक्ष्य और आच्छादन वात्र्यसे ठगधिकारप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। त्यादि किम् ? मौद्गः सूपः । कार्पासम् , , आच्छादनम् । नित्यं वृद्धशरादिभ्यः ४/३१ १४४ । आम्रमयम् । शरमयम् । गोच्च पुरीये ४॥३॥ १४५ | गोः पुरी गोमयम् । गोपयसोर्यत् ४।३।१६०/ गव्यम् । पयस्यम् । *इति विकारार्थका इति प्रारदीव्यतीयाः) তত্ত্বগ মির্জাজাল प्राग्वहतेष्ठक ४।४।१ । तद्वहतीत्यतः प्राक् ठगधिक्रियते । तेन दीव्यति खनति जयति जितम् ४।४।२१ अर्दीव्यति खनति जयति जितो वा प्राक्षिकः । शब्दात् 'मयबैतयोआषायामभक्ष्याच्छादनयोः' इति मयटि नलोपे विभक्ति- कार्य "अश्ममयम् इति । भयडभावे 'तस्य विकारः' इत्यणि 'अन्' इति प्रकृति- भावाहिलोपाऽभावे आदिवृद्धौ विभक्तिकार्ये 'पाश्मनम्' इति । नच विकारार्थकत्वे 'अश्मनोविकारे टिलोपो वक्तव्यः' इति चार्तिक्षेन टिलोपः कुतो नेति वाच्यम्, पाषा- णवाचकत्वेन प्रसिद्धस्याश्मन् शब्दस्यैव तत्र प्रहणात् । (पाषाणवामा काद् श्रश्मन्- शब्दात्तु विकारार्थे अणि टिलोपे आदिवृद्धौ विभक्तिकाय 'आश्मः' इति भवति )। गोमयम्-(ई० ३२)-गोः पुरीषम्-गोमयम् । गोशब्दात् 'गोश्च पुरी' इति मयटि विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । .. वा । आम्रमयम्-आत्रस्य विकारोऽवयवो वा । गोपय-गोशब्दात् पयःशब्दाच यत्प्रत्ययो भवति विकारेऽवयवे चार्थे । तेन दीव्यति-तृतीयान्तात् 'दीव्यति सनति, जयति, जितम्' इत्येतेष्वर्थेषु भिन्न प्रकृतिमान् ( सर्वप्रकृतिक ) षष्ठथन्तसे भाषा (लोक) में मयट् प्रत्यय हो विकार और अवयव अर्थमें, विकल्पसे। नित्यं-वृद्ध और शरादिसे नित्य ही मयट् प्रत्यय हो, विकार और अवयव अर्थमें। गोश्च-गोशब्दप्रकृतिक षष्ठयन्तसे मयट प्रत्यय हो पुरीष अर्थमें । गोपय-गो और पयस् प्रकृतिक षष्ठ यन्तसे यत् प्रत्यय हो, विकारादि अर्थमें । इस प्रकार 'इन्दुमती'टीका विकारार्थकप्रकरण समाप्त हुआ। प्राग्वहते-'तद्वहति रथयुग' इस सूत्र तक ठकका अधिकार है। तेन दीव्यति--तृती- ।
विभाग দ্রাক্ষী संस्कृतना४ाश धना संस्कृतं दाधिकम् । मारीचिकम् । तरति ४।४।५ तेने- त्येव । उपेन तरति भौपिछः । चरति ४|४|मा तृतीयान्तादच्छति भक्षयती- त्यालाष्टक स्यात् । हस्तिना चरति हास्तिकः । दना वरति दाधिकः । संसृष्टे ४ । हार मना संसूट दाधिकम् । उपचति ४।४।३२ बदराण्युञ्छति बादरिकः । रक्षति ४ ४॥ ३३॥ समाज र अति सामाजिकः । शब्द?रं करोति ४॥ ४॥ ३४॥ शब्दं करोति शाब्दिकः। दर्दरं करोति दा१रिकः । धर्म चरति ४।४।४१ । बार्मिकः । अवमोचति बत्ताव्यम् । शिल्पम् ४।४१ ५५! मृदङ्गवादनं शिल्प- माय मालिकः । प्रहरणाम ! तदस्येत्येव । असि प्रहरणमस्य श्रासिकः । मारीचिकन (ई० २०)-मरीचेन संस्कृतमित्यर्थे 'संस्कृतम्' इति ठकि ठस्य हादेशे किति छ' इत्यादिवृद्धौ भत्वादलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धम् । धार्मिकः (६० ५०, ५८)----धर्म चरति धानिकः' । धर्मशब्दात् 'धर्म चरति' इति ठन्ति ठर येकादेशी किति चेत्यादिवृद्धौ अत्वादलोपे जिभक्तिकार्ये तत्सिद्धम् । ठक हात । संस्कृता--तृतीयान्तात् लका स्यात् संस्कृतमित्यर्थ । तरति-वरतीत्यर्थे तृतीयान्तात् ट ल्यात् । संसृष्टे---- पृष्ठनिमत्यर्थे तृतीयान्तात् ठक स्यात् । उच्छति---उछातीत्यर्थे द्वितीयान्तात् ठक् स्यात् । (भूम्यां निपतितस्य धान्यादेः पक्ष आदानमः रक्षति रहतीत्य द्वितीयान्तात् ठक स्यात् । शब्द--करोतीत्यर्थे द्वितीयान्तात् शब्दशब्दात् दईरशब्दाच्च ठक् स्यात् । धर्मम्-- घरतीत्यर्थ धर्मशब्दात् उकात्ययो भवति । शिल्पमतदस्य शिल्पमिस्र्थे प्रथमान्तात् ठक स्यात् । (क्रियासु कौशल शिल्पम् ।) प्रहरणम् --प्रहरणवाचिनः प्रथमान्तात्तस्येत्यर्थे उक् स्यात् । बान्तसे दोव्यतीत्यादि अर्थोंमें उक् प्रत्यय हो । संस्कृतम्-तृतीयान्तसे संस्कृत अर्थ में ठक प्रत्यय हो । तरति-तृतीयान्तसे तरति अर्थ में ठक् प्रत्यय हो । चरति--तृतीयान्तसे चरति अर्थ ठक् प्रत्यय हो । संसृष्टे--तृतीयान्तसे संसृष्ट अर्थमें ठक् प्रत्यय हो । उति-द्विती- यान्तसे उन्धति अर्थमें ठक् प्रत्यय हो । रक्षति-द्वितीयान्तसे रक्षति अर्थमें ठक् प्रत्यय हो । शब्द-शब्द और दर्दुर प्रकृतिक द्वितीयान्तसे करोति अर्थमें ठक् प्रत्यय हो । धर्म चरति-धर्म प्रकृतिक द्वितीयान्तले चरति अर्थमें ठक् प्रत्यय हो। अधर्मा-अधर्म प्रकतिक द्वितीयान्तसे भी चरति अर्थमें ठक् प्रत्यय हो-ऐसा कहना चाहिये । शिल्पमू--'अस्य शिल्पम्' इस अर्थ में प्रथमान्तले ठक् प्रत्यय हो। प्रहरणं--'अस्य .
प्रारिधतीयत्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। आनुष्कः । शीलम् ४।४।६१श अपूपमक्षणं शीलमस्य आपूपिकः । निकटे वलति ४/७३। नैकटिको भिक्षुकः । ॥ इति ठगधिकारः ॥ alaKENNEL ও মাথা प्राग्घितावत् ४ा ४१ ७५॥ तस्मै हितमित्यतः प्राग यदधिक्रियते । तद्वहति स्थ युगप्रासङ्गम् ४।४।७६। रथं वहति रथ्यः। युग्यः। प्रासङ्गन्यः ।धुरोयड्ढकौ४|४| ७७ हलि चेति दीर्चे प्राप्ते-न भकुर्छराम्बा२।७६/ रेफवान्तस्य सस्य कुछुरोचोपधाया धानुष्कः ( ई० २०)-धनुः प्रहरणमस्येत्यर्थे 'प्रहरणम्' इति ठकि 'इसुसु- - ‘कान्तात्कः' इति उस्य कादेशो कित्वादादिवृद्धौ विभत्तिकाय तत्सिद्धिः । नकटिकः ( ई० ४० )---निकटे वसतीति विग्रहे निकटे वसति' इति सूत्रेण उकि ठल्य इकादेश किति अति वृद्धो मत्वादलोपे विभक्तिकार्य तसिद्धिः । यल्य शास्त्रतो निकटबासस्तत्रायं विधिः । श्रारण्यकेन भिक्षु णा प्रामात् क्रोशे वस्त- ज्यमिति शास्त्रम् । युग्यः (ई० २०)--युगं बहतीति विग्रहे 'तद्वहतिरथयुगप्रासनम्' इति युग- शब्दात् यत्प्रत्यये भत्वादलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धम् । शीलम्...--अस्येत्यर्थ शीलवाचिनः प्रथमान्तात् ठक स्यात् । निकटे-बसतीत्यर्थ सप्त- অন্য লিজা ত ালু। तहति-रथादि वहतीत्यर्थे द्वितीयान्तेभयो रथ-युग-प्रासजशब्देश्यो यत्प्रत्ययः स्यात् । धुरो-धुर्शब्दाद् द्वितीयान्ताद् वहतीत्यर्थे यत् , ढक च स्यात् । धुरं प्रहरणम्' इस अर्थमें प्रथमान्तसे ठक् प्रत्यय हो । शीलभू-प्रथमान्तसे 'अस्य शीलम्' अर्थ सें ठक् प्रत्यय हो । निकटे-निकट प्रकृतिक सप्तम्यन्तसे वसति अर्थ ठक् प्रत्यय हो । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीका ठगधिकारप्रकरण समास हुआ। प्राषितात् -'तस्मै हितम्' इस सूत्र तक 'यत्' का अधिकार है। तहति-रथादि प्रकृतिक द्वितीयान्तसे वहति अर्थमें यत् प्रत्यय हो । धुरो यड्ढकौ-धुर प्रकृतिक द्वितीयान्त से वहति अर्थमें यत् प्रपत्र और ढक् प्रत्यय हो । ज सकुछ-मसंग prior लघुसिद्धान्तकौमुदी इको दी? न स्यात् । धुर्सः । धौरेयः । नौवयोधर्मविषमूलमूलसीतातुलाश्य- स्तायतुल्यप्राप्यवध्याऽऽनाम्यनमसमितसंमितेषु ४।४।१२। नाचा तार्यं नाव्यं, जलम् । वयसा तुल्यो बयस्यः। धर्मेण प्राप्यं धर्म्यम् । विषेण वृध्यो विष्यः । मूलेन श्रानाम्यं मूल्यम् । मूलेन समो मूल्यः । सीतया समितं सीत्य क्षेत्रम् । तुलया संमित तुल्यम् । तत्र साधुः ४४/६८ श्राग्रे साधुः-अप्रयः । सामसु साधुः सामन्यः । ये चामावकर्मणोरिति प्रकृतिभावः। कर्मण्यः। शरण्यः। सभाया यः ४४१०५ सभ्यः । इति यतोऽवधिः । इति प्राश्वितीया:* Respera শুঙ্খ হলখিকাক্সক্ষা प्राक्क्रीताच्छः ॥ १॥ १॥ तेन क्रीतमित्यतः प्राक् छोऽधिक्रियते । उगवा- धौरेयः ( ई० २६) धुरं यहत्तीति विग्रहे धुर शब्दात 'धुरो यड्ढको' इति ढकि किति चेत्यादिवृद्धौ ढस्य एयादेश विभक्तिकार्य तत्सिद्धम् । नाव्यम् ( ई० ५०)-नावा तार्यमिति विग्रह 'नौवयोधर्म-' इत्यादिसूत्रे यत्प्रत्यये 'चान्तो यि प्रत्यये' इत्यानादेशे विभक्तिकार्ये तत् सिद्धन् । शरण्या ( ई० ४८) शरणे साधुरिति विश्हे शरणशब्दात् 'तत्र साधुः' इति यत्वात्यये भत्वादलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । वहतीति धुर्यः (अश्वादिस्कन्दवाह्यप्रदेशो युगावयवो 'धूः' ) नौवयोधर्म:-नौ, वयस् , धर्म, विष, मूल, भूल, सीता, तुला एभ्योऽष्टभ्यः (तृतीयान्तेभ्यः) क्रमात तार्थे, तुल्ये, प्राप्ये, बध्ये, आनाम्ये, समे, समिते, सस्मिते चाथै यत् स्यात् । (इह तार्यादियोगे यथासंभवं करणे कर्तरि हेतौ तुल्यायोगे च तृतीया संभवात् 'तृती- यान्तेभ्यः' इत्यर्थाद्गम्यते।) तत्र-साधुरित्यर्थे सक्षम्यन्तात् यत् स्यात् । समाया-साधुरित्यर्थे सप्तम्यन्तात् सभाशब्दात् यः स्यात् । (नतु यत्)। , , शकको तथा कुर् , छुर्के उपधाभूत इको दीर्घ नहीं हो । नौवयो-नावादिप्रकृतिक. तृतीयान्तसे तार्यादि अर्थोंमें यत् प्रत्यय हो। तन्न साधु-सक्षम्यन्तसे साधु अर्थमें यत प्रत्यय हो । सभाया:-सभाप्रकृतिक सप्तम्यन्तसे साधु अर्थमें 'य' प्रत्यय हो । इस प्रकार 'इन्दुमती' टीका में प्राम्वितीय प्रकरण समाप्त हुआ। । gopi प्राक्क्रीतात्-'तेन क्रीतम्' इस सूत्र तक 'छ' का अधिकार है। उगवा-उवर्णान्तले अधिकारप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। २६ दिभ्यो यत् ५ ! ११२ । प्राक्क्रीतादित्येव । उवर्णान्तावादिभ्यश्च यत् स्यात् । उल्यापवादः । शङ्कवे हितं शङ्कव्यं दारु । गव्यम् । नाभि मंच नभ्योऽक्षः। जन्यमजनम् । तस्मै हितम् ५।११५ वत्लेभ्यो हितो वत्सीयो गोधुन् । शरीरा- वयवायत् ५॥१६दन्त्यम् । कण्ठयम् । नस्थम् । आत्मन्विन्धजनभोगोत्तरप- दात्खः १६ आत्माध्वानी खे६।४।१६। एतौ खे प्रकृत्या स्तः । प्रात्मने हितम् प्रात्मनीनम् । विश्वजनीनम् । मातृभोगीणः । इति छयतोः पूर्णोऽवधिः ( इति प्राक्क्रीतीयाः) । ক্লথ লাঙ্কাকে प्राग्वतेष्टा ५॥ ११८ तेन तुल्यमिति बतिं वक्ष्यति ततः प्राक् अधिक्रि- नभ्यम्-नामये हितमिति विप्रहे नाभिशब्दात् 'उगवादिभ्यो बत्' इति यत्प्रत्यये नाभेनभादेशै भत्वात् 'यस्येति च इतीकारलोपे विभक्तिकाय नभ्यमजनमिति। मातृलोगीणः (ई० ४०) मातुर्भोगः शरीरं तस्मै हितमिति विद्महे मातृभोगशब्दात् 'आत्मविश्वजनभौगोत्तरपदात् खः' इति खात्यये खस्य ईनादेशे भत्वादलोपे 'कुमति च' इति णत्वे विभक्तिकाय तत्सिद्धिः। तस्मै-हितमित्यर्थे चतुथ्यंन्ताद् यथाविहित छादिप्रत्ययाः स्युः। शरीरा- शरीरावयव विशेषवाचकाच्चतुयन्ताद्धितमित्यर्थ यत् स्यात् । दन्तेभ्यो हित 'दन्त्यम् नासिकाय हितं 'नस्यम् आत्मन्-आत्मन् , विश्वजन, भोगोत्तरपद एभ्यश्चतुयन्तेभ्यो हितमित्यर्थे खः स्यात् । एतौ खे प्रकृत्या स्त:----तेन 'आत्महीनम्' इत्यादौ टिलोपोन। और गवादिसे यत् प्रत्यय हो हितादि अर्थों में । नामि-नामि शब्दसे यत् प्रत्यय हो और नामिको नम आदेश हो । तस्मै हित--चतुर्थ्यन्तसे हित अर्थमें यथाविहित पूर्वोक्त और बक्ष्यमाण प्रत्यय हो। शरीरावयव-शरीरावयववाची चतुर्थ्यन्तसे हित अर्थमें यत् प्रत्यय ड्डो । आत्मन्---आत्मादि प्रकृतिक चतुर्थ्यन्तसे हित अर्थ में ख प्रत्यय हो। आत्मावानी--'ख' प्रत्ययके परे आत्मन् और अध्वन् प्रकृतिवत् रहें। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें छयतोरधिकार प्रकरण समान हुआ। भाग्वते.---'तेन तुल्यं क्रिया चेद् वत्तिः' इस सूत्र तक 'ठज का अधिकार है।
विभाग REATMELATESORRESTHAIRTHD.SMAINAASHIRDINdcrease, लघुसिद्धान्तकौमुदी यते । तेन क्रीतम् ॥ १ ॥ ३७ ! सप्तत्या शीतं साप्ततिकम् । प्रास्थिकम् । सर्वभूः मिथिवीभ्यामणौ शश ४१॥ तस्येश्वरः ५.११ ४२१ सर्वभूमिपृथिवीभ्यामण- औरतः । अनुशतिकादीनां ! सर्वभूमेरीश्वरः सार्वभौमः ! पार्थिवः । पतिविंशतिनिशचत्वारिंशत्पञ्चाशत्पष्टिसप्तत्वशीतिनवतिशतम् ॥१५६ एते रूढिशब्दा निपात्यन्ते । तदहति । श६३ लब्धं योग्यो भवतीत्यर्थे द्विती यान्तावादयः स्युः। श्वेतच्छत्रमर्हति श्वैतच्छत्रिकः । दण्डादिभ्यो यत् ५१ ६६। एभ्यो यत्स्यात् । दण्ड्यः । अयः । वध्यः । तेन निवृत्तम् ५ ! ११७६ ! पाला निर्वृत्तम् आह्निकम् । ॥ इति ठजोऽवधिः ( इति प्राग्वतीयाः)॥ अथ भावकर्माचर्थककरणन तेन तुल्य क्रिया चेहतिः ५ ॥ १ ॥ ११५ ! ब्राह्मणेन तुल्यं ब्राह्मणवदधीते । सार्वभौमः ( ई० ४९) सर्वभूमिशब्दात् 'तल्येश्वरः' इत्यर्थे 'सर्वभूमि' इत्याणि 'अनुशतिकादीनां च' इत्युभयपदवृद्धौ भत्वादिलोपे विभक्तिकायें तत्सिद्धिः । तेन क्रीतम् ---तृतीयान्तात् क्रीसाथै उजादयः स्युः। निपात्यन्त-तदर्थपरिमाण- मित्यः इति शेषः। पक्ति:-पञ्चाक्षरा पञ्चपदा पन्तिः । पञ्चनशब्दस्य शिलोपा, तिप्रत्ययः, चोः कुः इति कुस्खाम् । विंशतिः (२०)-द्वौ दशती परिमाणमस्थ संध- स्येति 'विंशतिः । शतिप्रत्ययः, अकुत्तेर्चिनुभावः, अनुस्वारश्च । (अन्न संघग्रहणमनु- वर्तते । तथा च गवां विंशतिरिति भवति। संघसंधिनोस्तादात्याविवक्षायां 'विंशतिवः' इति भवति । स्वभावादेकवचनं स्त्रीत्वं च ।) एवं त्रिंशदादावपि । (विंशत्याद्याः सदैकत्वे संख्या संख्येयसंख्ययोः' इति, 'तासु चाऽऽनवतेः (९०) स्त्रियः इति चामरः) । तेन निवृत्तम्---तृतीयान्तानिवृत्तमित्यर्थे ठन स्यात् । तेन तुल्य-तृतीयासमर्थात् तुल्यमित्यर्थ वतिप्रत्ययो भवति, यत्तुल्यं तत् क्रिया तेन क्रीतम्-तृतीयान्तसे क्रीत अर्थ में यथाविहित ठक् , ठम आदि आहीय प्रत्यय हो। सर्वभूमि-तस्येश्वर:-सर्वभूमि और पृथिवीप्रकृतिक षष्ठयन्तसे अण् और अज प्रत्यय हों, ईश्वर अर्थमें । अनुशति-अनुशतिकादि-गणपठित शब्दोंके उभयपदकी वृद्धि हो । पंक्तिविं--पंक्ति, विशति आदि दश रूढि शब्द निपातन हो । तदहति--द्वितीयान्तले अहेति अर्थमें ठन प्रत्यय हो । दण्डादिभ्यः दण्डादि प्रकतिक द्वितीयान्तसे यत् प्रत्यय हो, अर्हति अमें । तेन नितम्-कालवाची तृतीयान्तसे निवृत्त अर्थमें ठन प्रत्यय हो। इस प्रकार 'इन्दुमती'टीकामें ठअधिकारप्रकरण समाप्त हुआ। were are तेन तुल्यं-तृतीयान्तसे तुल्य अर्थमें वति प्रत्यय हो, जो तुल्य हो, वह यदि क्रिया , भावकर्माधर्थ इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। क्रिया चेदिति किम् ? गुणतुल्ये मा भूत् । पुत्रेण तुल्यः स्थूलः । तत्र तस्येव ५।१।११६ | मथुरायामिव मधुराबत सध्ने प्राकारः । चैत्रस्येव चैत्रचन्मत्रस्य गावः तस्य भावस्त्यातलो शरा११६ । प्रकृतिजन्यबोधे शकारी भावः । गोमांची गोत्वम् । गोता । स्वान्तं लीवल । चत्वातू ५। ११ १२० । 'ब्रह्मणहत्य इत्यता प्राक् त्वतलावधिक्रियते । अपधादैः सह समावेशार्थमिदम् । चनारी नन्- स्नडम्यामपि समावेशार्थः । लिया भावः स्त्रैणम् । स्त्रीत्वम् । स्त्रीता । पोल्नम् । पुनस्यन् । धुस्ता । वृथ्वादिस्य इमनिया ५१ १ १२२। बावचनमणादिसमावेशा- र्थम् । र ऋतो हलादेलघोः ६।४ । १६१ । हलादेलयात्राकारस्य रः स्यादिष्ठे. मेयल्स परतः । शुमृद्धशश परिदृढानामेव रत्नन् । २.६१४। १५५ । भक्ष्य टेर्लोपः स्यादिष्टेमेयल्सु । पृथीभीवः प्रथिमा ! इगलाच लघुपूर्वात् -~-'तस्य भावरूत्वतलौं' इति प्राप्तौ तं अबाध्य 'काशाभ्यो ननयो भवनात्' इति नजि अनुबन्धलो शादिशुद्धौणत्वे विभक्तिकार्य तल्लिक्षिः । प्रथिना (ई० ३७)पृथोर्भावः 'प्रथिमा' । पृथुशब्दात् पृथ्वादिभ्यः इम- निज्वा' इति विश्वल्पेन इमनिचात्यये चकारस्टोत्संज्ञायां लोये च विहित इकारस्यो- चारणार्थत्वेन 'पृथु इमन्' इति स्थिते र ती हलादेर्लयोः' इति कारस्य रकारा- देशे उकारस्थ गुणं बाधित्वा टेः' इति टिलो प्रातिपदिकसंज्ञायां सौ सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ' इति दीधैं सुलोपे नलोपे 'प्रषिमा' इति, इमनिजमावे इन्ताख लघु- praxisax0p-AuTtretmntARTARARIE चेत् सहभ्यन्तात् पश्यन्ताच बाथै तिः स्यात् । तस्य--पष्टपसार भाव इत्यर्थे स्वतलो स्तः । प्रकृतिजन्वबोधे---स्वतत्प्रत्ययौ यत उत्पत्ोते तस्मात् प्रतिभूत- স্থা ভাবি ঐ জালাল অনু জাতি নিপূন্যতা ও লগ্নহিত भावशब्देन विवक्षितमित्यर्थः । पृथ्वादिभ्य -पृथ्वादिस्यः पछयन्त भयो भावे pas रहे तो। तत्र तस्व--सप्तम्यन्त और षष्ठयन्त हवार्थमें वति प्रत्यच हो। तस्य भावः-पष्ठ्यन्त से भाव अर्थमें ल्व और तल प्रत्यय हो । स्वान्तं क्लीब-'स्व' प्रत्ययान्त शब्द नपुंसकलिंग होते हैं। आ च-'ब्रह्मणस्त्व' इस सूत्र तक 'स्व' और 'तल्' का अधिकार है। पृथ्वादिभ्या--पृथ्वादि प्रकृतिक षष्ठयन्तसे भाव अर्थमें 'इमनिच' प्रत्यय हो, विकल्पसे । र ऋतो-इलादि लघु ऋकारको 'र' आदेश हो, इष्ठन् , इमनिच और ईयमुन् प्रत्ययके परे। पृथुसू-पृथ्वादि शब्दों के ही ऋकारको रभाव हो । टे:-मसंज्ञक 'टि' का लोप हो, इष्टनादि प्रत्ययके परे। इसन्ताच्च---लघुपूर्वक इगन्त षष्ठयन्तसे भाव.
क्रमिक विभाग २३२ लघुसिद्धान्तकौमुदी ५११११३१॥ इगन्तालधुपूर्वात् प्रातिपदिकाद्भावेऽण् प्रत्ययः। पार्थवम् । म्रदिया। मार्दवम् । वर्णढादिभ्यः ध्याय च ५। १११२३ । चादिमनिन्छ । शौक्लयम् । शुधिमा । दाढर्थम् । ढिमा । गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च ५११२४ चाद्भावे । जडस्य भावः कर्म वा जाडयम् । भूटल्य भावः कर्म वा भौढयम् । प्राह्मण्यम् । प्राकृतिगणोऽयम् । सख्युर्थः ५ । १ । १२६ । सख्युर्भावः कर्म वा सख्यम् । कपिज्ञात्योर्दक शश १२७कापेयम् । ज्ञातेयम् । पत्यन्तपुरोहिता- दियो यक ॥२१२८/ सैनापत्यम् । पौरोहित्यम् । ॥ इति भावकर्माधर्थकप्रकरणम् ॥ PRASAINADIANBARDATAKia arrzOTELEASE । ও কলাঙ্গ জয়ে धान्यानां भवने क्षेत्रे खबश २ १ भवत्यस्मिन्निति भवनम् । मुद्रानां भवनं क्षेत्रं मौद्गीनम् । नीहिशाल्योर्डक ५।२।२। त्रैहेयम् । शालेयम् । पूर्वात्' इत्यणि आदिवृद्धौ रपरत्वे 'ओर्गुणः' इति गुणेऽवादेशे विभक्तिकार्ये पार्थचम्' इति । (त्वप्रत्यये 'पृथुत्वम्' इति । तल्प्रत्यये 'पृथुता' इति । ) ज्ञातेयम् (ई० २६)-ज्ञातर्भावः कर्म वेति विग्रहे ज्ञातिशब्दात् 'कपिज्ञात्यो- ईक्' इति ढकि अनुबन्धलोपे ढस्य एयादेशै भत्वादिलोपे विभक्तिकार्य तसिद्धिः निज वा स्यात् । गुणवचन-गुणोपसर्जनद्रव्यवाचिभ्यो ब्राह्मणादिभ्यश्च पचवन्तेभ्यो भावे कर्मणि च व्यञ् स्यात् । कपिज्ञा-कपि-ज्ञातिशब्दाभ्यां षष्ठयन्ताम्यां भाचे कर्मणि च उक् स्यात् । (कविः कर्स वा कापेयम्) धान्यानां-धान्यदाचिभ्यः पठयन्तेश्यो भवने क्षेत्रेऽर्थे खञ् स्यात् । व्रीहि-व्रीहि- कर्म अर्थमें अण प्रत्यय हो। वर्णहढा--वर्णवाची और दृढादि षष्ठयन्तसे भाव अर्थमें व्यञ् प्रत्यय और इमनिच् प्रत्यय भी हो । गुणवचन--गुणोपसर्जन द्रव्यवाची और ब्राह्मणादि प्रकृतिक षष्ठयन्तसे कर्म और भाव अर्थमें ध्यञ् प्रत्यय हो । सख्युर्यः-सखि शब्द प्रकृतिक षष्ठयन्तसे भाव और कर्म अर्थमें 'य' प्रत्यय हो । कपिज्ञात्यो-कपि और ज्ञातिरूप षष्ठचन्त प्रातिपदिकसे भाव और कर्म अर्थमें ढक् प्रत्यय हो । पत्यन्त-षष्ठयन्त पत्यन्त और पुरोहितादि शब्दोंसे यत् प्रत्यय हो, भाव और कर्ममें । (सेनापतेर्भावः सैनापत्यम्) इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें मावकर्माद्यर्थक प्रकरण समाध हुआ। MOOCO0 धान्यानां-धान्यवाची षष्ठयन्तसे 'भवनं क्षेत्रम्' इस अर्थमें खा प्रत्यय हो। बीहिशाल्यो:-व्रीहि-शालिप्रकृतिक षष्ठयन्तसे उक्त ( भवनं क्षेत्रम् ) अर्थमें ढक् । murterName 8 भवनाद्यर्थः] इन्दुमती-टीकाद्धयोपेता। २३३ हैयङ्गवीनं संज्ञायाम् ।।२३। योगोदोहशब्दस्य हियजुरादेशी विकारार्थे नवञ्च निपात्यते । दुयते इति दोहा-क्षौरम् । योगोदोहस्य विकारः-हैयाचीनं नवनी- तम् । तदस्य सञ्जातं तारकादिभ्य इतच १२।३६ तारकाः सञ्जाता श्रस्य तारकितं नमः । पण्डितः। श्राकृतिगणोऽयम् । प्रमाणे यसज्दन्नमात्रचः ५२१३७ । तदस्येत्यनुवर्तते । ऊरू प्रमाणमस्य अद्वयसम् । जरुदनम् । ऊरुमात्रम् । यत्तदेतेभ्यः परिमाणे बतुप ५॥ २॥ ३६॥ यत्परिमाणमस्य-यावान् । तावान् । एतावान् । किमिदम्भ्यां वो घः शरा४० श्राभ्यां बतुप् स्याद्वकारस्य पण्डित:-सदसद्विवेकिनी बुद्धिः = पण्डा, पण्डा = बुद्धिः, सजाताऽस्येति पण्डितः। पण्डाशब्दात इतचि भत्वादालोपे चिमक्तिकार्य तसिद्धिः। शब्दात् शालिशब्दाच षष्ठयन्ताद् भवने क्षेत्रेऽर्थे ठक् स्यात् । तदस्य--प्रथमान्तेभ्य. स्तारकादिभ्यः अस्य संजात मित्यर्थे इतच स्वात् । प्रमाणे--प्रथमान्तादस्य प्रमाण मित्या द्वयसाच, धनञ् , मात्रच इति त्रयस्ययाः स्युः। यत्तदेतेभ्यः-प्रथमान्तेभ्यो प्रत्यय हो हावीनं-नवनीत अर्थ में हैवनवीनम्' यह निपातन हो। नोट:-हैवनवीनम् में 'ह्योगोदोह' को 'हिया आदेश और 'ख' प्रत्ययका निपातन होता है सदस्य-तारकादि प्रकृतिक प्रथमान्तपदसे 'अस्य संजातम्' अर्थमें इतच प्रत्यय हो प्रमागे----प्रमाण अर्थमें वर्तमान प्रथमान्त पदसे धष्ठयर्थ से निर्दिष्ट प्रमेय अर्थमें वयसच , दल और मात्र प्रत्यय हो। नोट :-मात्रच् प्रत्यय प्रमाणा अर्थमें अर्थात् परिच्छेदक मात्रसे हो और 'दयसच्' तथा 'दन' प्रत्यय ऊर्ध्वमान या उन्मान अर्थमें ही हों। अर्वमानं किलोन्मानं परिमाणन्तु सर्वतः। आयामस्तु प्रमाणं स्यात् संख्या बाह्या तु सर्वतः ।। (१) 'ऊर्वमान' या "उन्मान ये दो नाम ऊँचाईसे जैसे तुकती पर सुवर्ण आदि नापनेका है। (२)जो सभी तरहसे याने पाबादिमें भर-भरकर अथवा सेर, पसेरी आदिसे तौलकर नापा जाय, उसे परिमाण कहते हैं । (३) आयाम = लम्बाई-चौड़ाई आदिका या लकड़ी आदिसे नदी, तालाब आदिमें जलादिका थाह लेकर भाप 'प्रमाण' कहलाता है। जैसे-एक हाथ, दो हाथ, एक लग्गी, दो लग्गी आदि। (४) इन सबसे संख्या (गिनती) भिन्न है। यत्तदेतेभ्यः-परिमाणोपाधिक यत् , तत् और एतत् शब्दोंसे अस्य अर्थमें वतुप् प्रत्यय हो । किमिदम्भ्यां-परिमाणोपाधिक किम् शब्द और इदम् शब्दसे दतुप् प्रत्यय हो और , , ऋमिक विभाग लघुसिद्धान्तकौमुदी धश्च । इदंकिमोरीश्की ६।३।१० ग्शवतुषु इदम ईश् किनः की स्यात् । कियान् । इयान् । ईदृक् , ईदृशाः। कीहक् , कीडशः । संख्या अबयदे तब ५।२१४२। पञ्च अवयवा अख्य पञ्चतयम् । द्विनियां तथस्याऽयच्या ५१२। ४३॥ द्वयम् । द्वितयम् । त्रयम् । नित्यम् । उभाबुदातो नित्यान् शा। ४४। उभशब्दात्तययोऽयच् स्यात्स चोदात्तः । उभयम् । तस्य पूरणे डट् ॥ २॥ ४८ एकादशानां पूरण एकादशः । नान्तादसंख्यादेमंद श२।४६! डटो भडाग- भः । पञ्चानां पूरणः पञ्चमः । नान्तारिकम् ? ति विशतेडिति ६।४।१४२ । विंशतेर्भस्य तिशब्दस्य लोपो जिति परे । विशः । असंख्यादेः किम् , एकादशः । षट्कतिकतिपयचतुरा धुन शा२।५११ एपां थुगागमः स्याड्डटिं। घण्णां पूरण: षष्ठः । कतिथः । कतिपयशव्हत्याऽसल्ल्यात्वेऽप्यत एव ज्ञापकाडट । कतिपयथः । इयान् इदं परिमाणमयेति विग्रहे किमिदमस्यां वो घः' इति चतुषि वन्द पत्धे च विहिते 'इदंकिमोरीशकी' इति इदना ईशादेशी अनुबन्धलाई यत्' इति दशा- यां वस्य इयादेश भत्वात् यस्येति च इतीकारलोले 'इयत्' इति । तस्मात् सौ उगि- त्वान्नुमि उपधादी तकारस्य संयोगान्तलोपे 'हल्ङयाभ्यः' इति सुलोधे 'इयान्' इति । विंशः (ई० २६ )-विंशतः पूरणः इति विप्रहे विंशतिशब्दात 'तस्य पूरणः इट्' इति उटि अनुबन्धलोपे भसंज्ञायां ति चिंशतेडिति' इति तिलोपे विश ' इति स्थिते 'असिद्धचदत्रामात्' इति तिलोपस्थाऽसिद्धत्वाद् “यस्येति चेति लोपल्याऽप्राप्त्या 'प्रतो गुरो' इति पररूपे विभक्तिकार्य विंशः' इति । Arcumar PAKIHSAANTIReepkartaaHATTERTREATREENAVRATRIE31 astrsmarmatuRAraramaEara यत्तदेतेभ्योऽस्य परिमाणमित्यर्थे चतुपस्थात् द्वित्रि-द्वियादिसंख्याका अवयवा अस्था. वयविनः इति विद्महे अश्यवान्तरलेख्यानाविप्रथमान्ताद अस्थावविन इत्यथै तया स्यात् । तस्य-पष्ठीसमर्थात् संख्यामात्तिनः प्रातिपदिकात, पूरण हत्या बतुपके बकारको धकार हो। इवं किमो-इदम् शब्दको इश्' आदेश और किम् शब्दको 'को आदेश हो, दृक, दृश् और वतु ( ) प्रत्ययके परे। संख्याया-अवयवमें वर्तमान' जो संख्या, तद्वाचक प्रथमान्त समर्थसे पछथर्थर्मे तयप् प्रत्यय हो । द्विन्निभ्यां-द्वि और त्रिसे पर तयपको अयच् आदेश हो, विकल्पसे । उभानुदात्तो---उभ शब्दसे पर तयपको नित्य ही अयच आदेश हो और वह अयच आधुदात्त हो । तस्य पूरणे --संख्येयार्थक संख्यावाची षष्ठयन्तसे पूरण ( अवयव ) अर्थमें 'डट' प्रत्यय हो। नान्तादसं-असंख्यादि जो नान्त संख्यावाची, उससे पर 'डट'को मटका आगम हो । तिर्विशते-मसंज्ञक विंशति शब्दके तिका लोप हो, डित् के परे । षट् कति-बट् आदिको थुक्का आगम हो, डटके परे ।
भवनाद्यर्थकः] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। २३५ चतुर्थः । द्वेस्तीयः५१२१५४! डटोऽपवादः । द्वयोः पूरणी द्वितीयः । न्नेः सम्प्र- सारणं च शरा५५ तृतीयः । श्रोत्रिश्चन्दोऽधीते १२१८४ श्रोत्रियः । * वेत्यनुवृत्तेः-छान्दसः । पूर्वादिनि: ५।२।८६। पूर्व कृतमनेन पूर्वी । सपूर्वाञ्च शरा८७) कृतपूर्वी । इष्टादिभ्यश्च रापमा इटमनेन इष्टी । अधीती। ।। इति भवनाचर्थकाः॥ maratRANCHKaDataaHNDERIA तृतीयः (ई० २८,५२) त्रयाणां पुरणः इति विग्रहे त्रिशब्दात् 'तस्य पूरणे डस्' इति सूत्रं प्रबाध्य 'वेः सम्प्रसारणं च' इति तीयप्रत्यये सम्प्रसारणे च विहिते विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः। श्रोत्रियः (ई० ३४) छन्दोऽधीते इति विग्रहे 'श्रौनियं श्छन्दोऽधीते' इति निपातनात् छन्दः शब्दात् घन्प्रत्यये छन्दःशब्दस्य श्रीनादेशोच विहिते घाट इयादेश भत्वादलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । कृतपूर्वी कृतं पूर्वमनेनेति निग्रहे 'सुप्क्षुयेति समासनिष्पाद कृतपूर्वशब्दात 'सपूर्वाञ्च' इतीनिप्रत्यये भत्वादलोये सी दीधैं सुलोये नलोपे कृतपूर्वी' इति । स्मिन्नर्थे डट् स्यात् । श्रोत्रियं--द्वितीयान्तात् छन्दाशब्दात अधीले इत्यर्थे धन प्रकृतेः श्रोत्रादेशश्च निपात्यते। सपूर्वाच्च-सात् प्रातिपदिकात् पूर्वशब्दान्तादन- नेत्यस्मिन्नथै इनिः स्यात् । वस्तीयः-'वि' शब्दप्रकृतिक षष्ठयन्तसे तीय प्रत्यय हो, पूरण अर्थमें । नेः सम्य-त्रि' शब्दप्रकृतिक पष्ठयन्तमें तीय प्रत्यय हो और 'त्रि को सम्प्रसारण भी हो, पूरण अर्थमें। श्रोत्रियं-'छन्दोऽधीते' इस अर्थमें 'श्रोत्रियन्' यह निपातन हो; ('भोनियन्' का नकार स्वरार्थ है) पूर्वादिनि:-'अनेन कृतम्' इस अर्थमें पूर्व शब्दसे इनि प्रत्यय हो। सपूर्वाच्च-सपूर्वक पूर्वान्त प्रातिपदिकसे 'अनेन कृतम्' इस अर्थमें इनि प्रत्यय हो। इष्टा--इष्टादिसे 'अनेन अर्थर्मे इनि प्रत्यय हो। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामें भवनाद्यर्थकप्रकरण समाज हुआ। More ARTA SMARTHAKURA MARATHI Rangeenagemeneasgyan gaye evyanie वायम तदस्यास्त्यस्मिन्निति भतु ।।२।६४] गावोऽस्याऽस्मिन् वा सन्ति गोमान् । तसौमत्वर्थ १२४१६ तान्तसान्तौ भसंज्ञौ स्तो मत्वर्थे प्रत्यये परे। गरुत्मान् । बसोः सम्प्रसारणम् । विदुष्मान् । ॐ गुणवचनेभ्यो मतुपो लुगिष्टः । शुक्लो गुणोऽस्यास्तीति शुक्लः परः । कृष्णः। प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम् ।। ६६ चूडालः । चूडावान् । प्राणिस्यात्किम् ? शिखावान् दीपः । प्राण्यङ्गादेव । नेह--मेधावान् । लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः शरा१०० लोमा- दिन्यः शः । लोमशः। लोमवान् । रोमशः। रोमवान् । पामादिभ्यो नः। पामनः । अङ्गात्कल्याणे। अङ्गना । (ग) लक्षाया अच ! लक्ष्मणः । पिच्छा- दिभ्य इलच। पिच्छिलः । पिच्छवान् । उरसिलः । उरस्वान् । दन्त उन्नत । गोमान् (ई० २९)-गोशब्दात् मतुपि अनुबन्धलोपे प्रातिपदिकात् सौ इगित्वान्नुनि 'अत्वसन्तल्ये ति दीर्चे सुलोपे संयोगान्तलोपे तत्सिद्धिः। तदस्यास्त्यस्मिन्-प्रथमासमर्थात अस्वति मध्यर्थे अस्मिन्निति सप्तस्यर्थे वा अतुपू स्यात् । प्राणिस्थात-आइन्तात् प्राणिस्थवाचिनः शब्दात् सत्वर्थ लच वास्थात्। लोमादिलोमादिभ्यः पामादिभ्यः पिच्छादिस्याश्च त्रिभ्यो मान्यो यथासंख्य शन, इलच, इत्येते प्रत्ययाः स्युः। दन्त लन्चत -दन्तशब्दातू उन्नतोपाधिकात् मत्वर्थ उरच .0 लदस्या----अस्त्यर्थोपाधिक प्रथमान्तसे अस्य और अस्मिन् अर्थी में मतुप् प्रत्यय हो। नोट :--'मतुप' के प्रकरण में निम्न इलोकवार्तिक स्मरण रखना चाहिये :- 'भूम-निन्दा-प्रशंसा नित्यमोगेऽतिशायने । संसर्गऽस्तिविवक्षायां भवन्ति सतुबादयः ॥' उदाहरणभूमा (बहुत्वम्)-गोमान् । निन्दा - ककुदावर्तिनी कन्या। प्रशंसा-रूप- वान् । नित्ययोग-क्षोरिणो वृक्षाः । अतिशायन (अतिशय)---उदरिणी कन्या। संसर्ग- दण्डो, छत्तो । अस्ति विवक्षामें-अस्तिमान् । तलो-तकारान्त और सकारान्तकी भसंज्ञा हो, मत्वीय प्रत्यय के परे । गुगवचने ---गुगाच क्रसे पर मतुपका लुक् हो । प्राणिस्था- प्राणिस्थ आदन्तसे मत्वर्थमें लच् प्रत्यय हो, विकल्पसे । लोमादि-मत्वर्थ, लोमादिसे 'श' प्रत्यय, पामादिसे 'न' प्रत्यय और पिच्छादिसे 'इलच्' प्रत्यय तथा मतुपू भी हो। अंगात् --- शब्दसे 'न' प्रत्यय हो, कल्याण अर्थमें । लाया--लक्ष्मी शब्दसे 'न' प्रत्यय हो और लक्ष्मीको अकारान्त आदेश भी हो। दन्त उन्नत --उन्नतोपाधिक दन्त , मत्वर्थीयः] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। २३७. उरच् ।।२।१०६! उन्नता दन्ताः सन्त्यस्य दन्तुरः । केशाद्वोऽन्यतरस्याम् ॥२॥ १०६/ केशवः । केशी । केशिका ! केशवान् । अन्येभ्योऽपि दृश्यते । मणिवः । अर्णसो लोपश्च । अर्णवः । अत इनिठनी ५ ॥२॥ ११५ ! दण्डी। दण्डिकः । ब्रीह्यादिभ्यश्च ५१२ । ११६ ! ब्रीही ! ब्रीहिकः । अस्मायामेघास्रजो विनिः ५॥ २॥ १२११ यशस्वी | यशस्वान् । मायावी । मेधावी । लम्वी! वाचो सिनिः १२१ १२४। वाग्मी । अर्श आदिभ्योऽच ५।२।१२७। अास्यस्य विद्यन्ते- अर्शसः। श्राकृतिगणोऽयम् । अहंशुभमोर्युस् श २। १४०। अहंयुः अहङ्कारवान् । शुभंयुस्तु शुभान्वितः। ॥ इति मत्वर्थीयाः ॥ RRAIMARIHARITAMBHARATLABDAurane दण्डी ( ई० ४२)-दण्डोऽस्यास्तीति विग्रहे दण्डशब्दात् 'प्रत इनिठनौ' इति इनिप्रत्यये भत्वात् 'यस्येति चेत्यकारलोये खौदी सुलोपे नलोपे 'दण्डी' इति । मेधावी (ई० २५, २९, ३५ )-मेधा अस्यास्तीति विग्रहे मेधाशब्दात् 'अस्मायामेधाजो चिनिः' इति विनिप्रत्यय प्रातिपदिकत्वात् सौ सौ च' इति दीर्चे सुलोपे नलोपे तत्सिद्धिः । सम्वी ( ई० ३०) सागस्यास्तीति विग्रह सजशब्दात् 'अस्मायेति विनि- प्रत्यये प्रातिपदिकातू सौ जस्य कुत्ने 'सोच' इति ही सुलोपे नलोपे तसिद्धिः शुभंयुः--(ई० ३९)-'शुभम्' इति मान्तमव्ययं शुभे वर्तते । तस्मात् शुभ- स्यात् । केशाद्वो-केशशब्दात् वा प्रत्ययः स्यात् मत्वर्थेऽन्यतरस्याम् । ब्रीह्मादि- ब्रीह्यादिभ्यः प्रातिपदिकम्यः इनिठनी स्तः सत्वर्थे । अस्माया- असन्तात् प्रातिपदिकात् माया-मेधा-स्त्रज्-इत्येतेभ्यश्च विनिः स्यात्व मत्वर्थ। शब्दसे मत्वर्थम उरच् प्रत्यय हो । केशाहो-केश शब्दसे 'व' प्रत्यय हो, विकल्पसे । पक्षमें इनि, ठन् और मतुप् प्रत्यय भी हों। अन्येभ्योऽपि अन्य (प्रकृत्यन्तर) से भी मत्वर्थमें 'व' प्रत्यय हो । अर्णसो-अर्णस शब्दसे 'व' प्रत्यय और अर्णस्के अन्त्य सकारका लोप हो। अत इनि-अदन्त प्रातिपदिकसे इनि और ठन् प्रत्यय हों और पक्ष में मतुप भी हो। बीहा-ब्रीह्यादिसे इनि, ठन् और अस्माया-असन्त प्रातिपदिकसे तथा मोया और मेधा, सज् शब्दोंसे विनि प्रत्यय हो" (और मतुप भी हो)। वाचो-वाच् शब्दसे चिमनि प्रत्यय हो । अर्श आ--अर्शस् आदि प्रातिपदिकसे अच प्रत्यय हो । अहंशुभे-अहम् और शुभम् से युस् प्रत्यय हो। इस प्रकार 'इन्दुमती टीकामें मत्वर्थीपप्रकरण समाज हुआ। मतुप्' भी हो।
AARTIGENERVA इत्यादेशो कृते तसिलन्तल्याऽव्ययत्वेन तद्धितान्तत्वादागतस्य सुपो सुब्लुकि 'अन्' इति एतदोऽनादेशे पदत्वाचलो अथ प्राग्दिशीयप्रकरणम् प्राग्दिशो विभक्तिः ॥३।११ दिक्शब्देभ्य' इत्यतः प्राग्वक्ष्यमाणाः प्रत्यया विभक्तिसंज्ञाः स्युः । किंसर्वनामबहुभ्योऽद्वयादिभ्यः ५ ।३।२। किमः सर्वनाम्नो बहुशब्दाच्चेति प्राचिदशोऽधिक्रियते । पञ्चम्यास्तसिल ५। ३.७ पञ्चम्यन्तेभ्यः किमादिभ्यस्तसिल्वा स्यात् । कुतिहोः ७१२।१०४ किमः कुः स्यात्तादौ च हादौ विभक्तौ परतः । कुतः । कस्मात् । इदम इश ५। ३।३। प्राग्दिशीये परे। इत्तः। अन् शशश एतदः प्राग्दिशीये । अनेकाल्त्वात्सर्वादेशः । अतः । अमुतः । माल्यास्तीति विग्रहे 'अहंशुभमोर्युस्' इति युसि 'सिति च' इति पदत्वात् मल्यानुस्वारे प्रातिपदिका सौ सोलौंपे सत्य रत्वे दिसणे 'शुभंयुः' इति । कुतः (ई० ३३) करमादिति कुतः। पञ्चम्यन्तात् किम्शब्दात् 'पञ्चम्या- दन्तासिल इति तसिल्प्रत्यये तद्धितान्तत्वात् प्रातिपदिकत्वेन सुब्लुकि 'कुतिहोः' इति लुकि सत्य रत्वे विसर्ग 'कुतः' इति सिद्धम् । पते कल्मादिति । अतः (ई० ३२)--पञ्चम्यन्तादेतच्छन्दात् 'पञ्चम्यास्तसिल' इति तसिलि सुब्लुकि सत्य सत्वे विसर्गे 'श्रतः' इति । पक्षे एतस्मादिति । KANTA प्राग्दिशो-'दिक्शब्देभ्यः सप्तमी- इस सूत्रसे पूर्व जो वक्ष्यमाण प्रत्यय है, वे विभक्ति संचक हो। किंसर्व---'दिक्शब्देभ्यः सप्तमी-' इस सूत्रसे पूर्व 'किम्-सर्वनामबहुभ्योऽद्वथादिभ्यः' यद अधिकार है। पञ्चम्यास्तलिल-पञ्चम्यन्त किम् आदिसे तसिल प्रत्यय हो, विकल्पसे । कु लिहो:-किमको कु आदेश हो, तादि और हादि विभक्ति के परे । इदम- इदम्को स्श आदेश हो, प्रारिदशीय प्रत्यय के परे । अन्-एतद्को अन् आदेश INENEHATIRED. .. mar सप्तम्या- प्राचिदशीयाः] इन्दुमती टीकाद्वयोपेता! यतः । ततः । बहुतः । द्वयादेस्तु-द्वाभ्याम् । पर्यभिभ्यां च ५। ३ । ६ आभ्यां खाल श६१०॥ कुन्न । यत्र । तत्र । बहुत्र । इदमोहः ।।११! त्रलोऽपवादः। इह । किमोऽत् ११२ वाहणमपकृप्यते । सप्तम्यन्ताहिकमोऽद्वा स्यात् । पक्ष त्रल् । काऽति ७१२१ १०५ किमः वादेशः स्यादति । क ! कुत्र । इतराभ्यो- ऽपि श्यन्ते ! ३१४! पाचनीसातमीतरविभक्त्यन्तादपि तसिलादयो दृश्यन्ते । शिप्रणा पदादियोग एव । स भवात् । ततो सवान् । तत्र भवान् । तं भव- न्तम् । ततो भवन्तम् । तत्र भयन्तम् । एवं दीर्घायुः । देवानां प्रियः। श्रायु: ध्मान् । सर्वकाल्यचिन्तदः काले दा ५ । ३ । १५ । सप्तम्यन्तेभ्यः कालार्थेभ्यः स्वार्थे दा स्यात् । सर्वस्य लोऽन्यतरस्यां दिशाशदी प्राग्दिशीये सर्वस्य सो वा स्यात् । सर्वस्मिन् काले-सदा । सर्वदा । एकदा । शान्यदा। कदा । यदा । तदा । काले कि ? सर्वत्र देश। इदमोहिन । ३।१६। 'सप्तम्यन्तात् काले' इत्येव ! एतौ स्योः ५ । ३।४ । इदम्शब्दस्य एत इत इत्यादेशौ स्तो रेफादौ धकारादीप प्राडिदशीये परे । अस्मिन्काले एतहि । काले किम् ? इह कदा--कस्मिन् काले कदा । सप्तरन्यन्तात् किशब्दात् सर्वकान्य-' इति दाप्रत्यये सुन्लुकि 'प्राग्दिशो विभक्तिः' इति विभक्तिसंज्ञायां 'किमः कः' इति कादेशे विभक्तिकार्य तसिद्धिः । UAE tantaran . - " हो, प्राग्दिशीय (विभक्तिसंशक) प्रत्यय के परे । पमिश्या-सर्व और उभयके अर्थ में वर्त- मान् परि और अभिसे तसिल प्रत्यय हो । ससम्माचल-सप्तम्यन्त हिमादिसे त्रल प्रत्यय हो, विकल्पसे । इहमो-सप्तम्यन्त इदम् शब्दसे 'ह' प्रत्यय हो, विकल्पते । किमोऽतू-सप्त- भ्यन्त किम् शब्दसे अत प्रत्यय हो, विकल्पसे । काति-किम्को 'क' आदेश हो, अत् प्रत्य- यके परे । इतराभ्यो-पञ्चमी, सप्तमी विभक्तिसे इतर जो प्रथमादि विभक्ति, तदन्तसे भी त्र, तसिल आदि प्रत्यय होते हैं । सबैकान्य-काल अर्थमें वर्तमान सप्तम्यन्त सर्व, एक, अन्य आदिसे 'दा' प्रत्यय हो, स्वार्थमें । सर्वस्य-सर्वको 'स' आदेश हो, विकल्पसे, दका. रापदि प्राग्दिशीय प्रत्ययके परे। इदमो--सप्तम्यन्त इदम् शब्दसे हिल प्रत्यय हो, काल अर्थमें विकल्पसे । एतेती- इदम्को एत सौर इत आदेश हो, रेफादि और थकारादि प्राग्दि- शीय प्रत्ययके परे । अनद्यतने-अनद्यतन कालवाची सप्तम्यन्त किम् सर्वनाम आदिसे हिल प्रत्यय हो, विकल्पसे। " ७ लघुसिद्धान्तकौमुदी तर्हि । तदा । एतदः ॥३२॥ एत' 'इल' एतौ स्तो रेफादौ थकारादौ च' आमिन्द- शीये । एतस्मिन्काले एतर्हि । भकारबचने थाल ५॥३॥ २३ । प्रकारवृत्तिभ्यः जिगादिभ्यस्थाल स्यात् स्वार्थे । तेन प्रकारेण-तथा । यथा । इदमस्थमुः ५। ইহা আলীsণাদ: 3ংহভীষ্টি আজ গলল মুনল বা হাই স্কুলগুরু । किमश्च श३२ केन प्रकारेण कथम् । ॥ इति प्रानिदशीयाः ॥ HTMYASHRENam ও মাৰিীত্ব अतिशायने तमविष्ठनो ५।३।५५ । अतिशयविशिष्टार्थवृत्तेः स्वार्थे एतौ स्तः । अयमेषामतिशयेन श्राव्यः-आख्यतमः । लघुतमः। लधिष्ठः । विडम्या ४३५६ तिङन्तादतिशये द्योत्ये तमप् स्यात् । तरक्षमपौ घः शश२२! एती घसंज्ञो स्तः। किमेतिडव्ययधादाम्बद्रव्यप्रकर्षे १४११ किम एदन्ताति- डोऽव्ययाच्च यो घस्तदन्तादामुः स्याच तु द्रव्यप्रकर्षे । किन्तमाम् । प्रालेतमाम् । तर्हि ( ई० ३३) सप्तम्यन्तात् 'तत् शब्दात 'अनद्यतने हिलन्यतरस्याम्' इति हिल्प्रत्यये अत्वे पररूपे प्रातिपदिकात् सौ अव्ययत्वात् सुब्लुकि तर्हि' इति । पने दाप्रत्यये सति तदा' इति भवति । एतद:-एतद् शब्दको एत-इत आदेश हों, रेफादि और थकारादि प्रत्ययके परे। प्रकार---प्रकारवृत्ति किमादि शब्दोंसे थाल् प्रत्यय हो, स्वार्थमें । इदमस्थमुः-प्रकारवृत्ति इदम् शब्दसे थमु प्रत्यय हो, स्वार्थमें । एतदोऽपि-प्रकार वृत्ति इदम् शब्दसे भी थमु प्रत्यय हो, स्वार्थमें । किमश्च-प्रकार वृत्ति किम् शब्दसे भी थम प्रत्यय हो, स्वार्थ में। इस प्रकार 'इन्दुमती' टीकामै प्राग्दिशीयप्रकरण समाश हुमा। अतिशायने-अतिशय अर्थमें विद्यमान प्रातिपदिकसे स्वार्थमें तमप् प्रत्यय और इन् प्रत्यय हो । तिढाच----अतिशय अर्थ द्योत्यमें तिङन्तसे तमप् प्रत्यय हो। तरक्षमपौ-तरप् और तमप् प्रत्ययकी घसंज्ञा हो। किमेतिङ-किम् शब्द और एदन्त प्रातिपदिक, तिङन्त तथा अव्ययसे पर जो घ, तदन्तसे 'आमु'प्रत्यय हो द्रव्यप्रकर्षसे भिन्न में।
प्रागिचीया:] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। २४१ RADHAMMARIJet पचतितमाम् । उच्चस्तनाम् । द्रव्यप्रकर्षे तु-उच्चस्तमस्तरः। द्विवचनवि- ज्योपयदे तरबीयसुनौ ५२३०५७। द्वयोरेकस्याऽतिशये विभक्तव्ये चोपपदे सुप्तिक- न्तादेतो स्तः। पूर्वयोरपवादः। श्रयमनयोरतिशयेन लधुर्लधुतरः । लघीयान् । उदीच्याः प्राच्येभ्यः पटुतराः । पटीग्रांसः । प्रशस्यस्य श्रः३।६० बास्य श्रादेशः स्यादजायोः परतः । प्रकृत्यैकाच ६ । ४ । १६३ । इष्ठादिष्वेकाच् प्रकृत्या स्यात् । श्रेष्ठः । श्रेयान् । ज्य च ॥३२६११. प्रशस्यस्य ज्यादेशः स्यादियष्ठेसोः । ज्येष्ठः । किन्तमाम्-अयमेषामतिशयेन किमिति विप्रहे किम्शब्दात् 'अतिशायने तमविष्टनी' इति तमपि 'तरप्तमपौ घः' इति तस्य घसंज्ञायां 'किमेत्तिव्ययघादाम्ब- द्रव्यप्रकर्षे' इति आमुप्रत्यये भत्वात् 'यस्येति च' इति मकारोत्तराकारस्य लोपे अव्ययसंज्ञायां विभक्तेलुकि तत्सिद्धिः । नधीयान्-अयमनयोरतिशयेन लघुरिति विग्रह 'द्विवचनविभज्योपपदे इति ईयमुनि भसंज्ञायां 'टेः' इति धकारोत्तरवर्युकारस्य लोपे 'लघीयस्'शब्दात सौ 'उगिदचाम्' इति नुमि 'सान्तमहतः' इति दीर्घे सुलोपे संयोगान्तलोपे तत्सिद्धिः । पटीयान् ( ई० ४६)-उदीच्यः प्राच्येभ्यः पटुतरः इति पटीयान् । पात्र पटुशब्दात् द्विवचनविभज्योपपदे' इतीयसुनि अनुबन्धलोपे भसंज्ञायां 'टेः' इति टिलोपे सौ उगित्वान्नुमि दीर्चे सुलोपे संयोगान्तलोपे तत्सिद्धिः । श्रेष्ठः-श्रयमेषामतिशयेन प्रशस्यः इति विग्रहे प्रशस्यशब्दात् “अतिशायने तमबिष्टनी' इति इष्टनि प्रत्यये अनुबन्धलोपे 'प्रशस्यस्य श्रः' इति श्रादेशे 'प्रकृत्येकाच्' इति प्रकृतिभावे 'टेः' इति टिलोपाभावे गुरी विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः। श्रेयान् ( ई० २६, ५६ )-अयमनयोरतिशयेन प्रशस्यः इति विप्रहे प्रशस्य- शब्दात् द्विवचनविभज्योपपदे इतीयसुनि अनुबन्धलोपे 'प्रशस्यस्य श्रः' इति श्रादेशे 'प्रकृत्येकाच्' इति प्रकृतिभावेन टिलोपाभावे गुणे प्रातिपदिकात् सौ उगित्वान्नुमि 'सान्तमहतः' इति दीधैं सुलोपे तत्सिद्धिः। ज्येष्ठः (ई० २६)-अयमेषामतिशयेन प्रशस्यः इति ज्येष्ठः । इष्टनि कृते 'ज्य च' इति ज्यादेशे प्रकृतिमावाहिलीपाऽभावे गुणे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । द्विवचन-द्वयथप्रातिपादक और विमतव्य (जिसका विभाग किया जाय, वह ) उपपन्द रहनेपर दो में से एकका अतिशय धोत्य हो तो, सुबन्त और तिङन्तसे तर प्रत्यय और ईयसुन् प्रत्यय हो। प्रशस्य--प्रशस्यको 'श्र' आदेश हो इष्ठन् और ईयसुन् प्रत्ययके परे प्रकृत्येकाच्--इष्ठन् , इमनिच् और ईयमुन् प्रत्यय के परे मसंज्ञक एकाच प्रकृतिवत् हो । ज्य च--प्रशस्यको 'ज्य' आदेश हो, इष्ठन् और ईयअन् प्रत्ययके परे । १६ ल० । PERAcistration । न तथा ईयसन् प्रत्ययके लघुसिद्धान्तकौमुदी ज्यादादीयसः ६४।१६०। प्रादेः परस्य । ज्यायान् । बहोर्लोपो भू च बहोः ६।४।१५८ बहोः परयोरिमेयसोलोपः स्यादहोश्च भूरादेशः। भूमा । भूयान् । इष्टस्थ यिट् च ६४:१५६। बहोः परस्य इष्टस्य लोपः स्यात् यिडागमश्च । भूयिष्ठः । विन्मतोलुंक ५।३। ६५ | विनो मतुपञ्च लुक् स्यादिष्ठेयसोः । अतिशयेन स्त्रग्वी सजिष्ठः । सजीयान् । अतिशयेन त्वग्वान्-त्वचिष्ठः । त्वचीयान् । ईषदसमाप्ती कल्पब्देश्यदेशीयरः ५।३। ६७ । ईषदूनी विद्वान्-विद्वत्कल्पः । विद्वद्देश्यः । विद्वद्देशीयः । पचतिकल्पम् । विभाषा सुपो बहुच पुरस्तात्त ५।३।६८। ईषद- समाप्तिविशिष्टेऽर्थे सुबन्ताद्वहुज्वा स्यात्स च प्रागेव न तु परतः । ईषदूनः पटु- बहुपटुः । पटुकल्पः । सुपः किम् ? यजतिकल्पम् । प्रागिवात्कः ५॥३॥ ७० ॥ इवे प्रतिकृतावित्यतः प्राकाधिकारः । अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक् टेः ५३.७११ ज्यायान् ( ई० ४१,४८,५०,५८)-द्वयोर्मध्येऽतिशयेन प्रशस्यः इति विग्रहे प्रशस्यशब्दात् द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ' इतीयसुनि अनुबन्धलोपे 'ज्य व' इति ज्यादेशे 'प्रकृत्यैकाच्' इति प्रकृतिभावाष्टिलोपाभावे 'ज्यादादीयसः' इत्यनेन "श्रादेः परस्येति सहकारात् प्रत्ययस्यादरीकारस्याऽऽकारादेशे सवर्णदीर्धे 'ज्यायस्'- शब्दात् सौ उगित्वान्नुमि उपधादी सुलोपे संयोगान्तलोपे तत्सिद्धिः । भूयिष्ठः (ई० ३७,४५५७)-'अतिशयेन बहु' इति विग्रहे 'अतिशायने तमबि- हनी' इतीष्ठनि 'इष्टस्य यिट् च' इति इष्टनः इकारलोपे यिटि च कृते टकारस्येत्संज्ञायां ज्यादा-शब्दात् परस्य ईयल: आत्' आदेशः स्यात् । ईषदसमाप्तौ-ईपद- समातिविशिष्टेऽथे वर्तमानात् सुबन्तात् तिङन्ताच एते प्रत्ययाः स्युः। अव्ययसर्व-अध्ययानां सर्वनाम्नां तिङन्तानां च टेः प्राक् अकच् स्यात् । ज्यादा-'ज्य से पर ईयस् को आकार आदेश हो । बहो-बहुसे पर इमनिच और ईयसन् प्रत्यय (के आदि) का लोप हो और बहुको 'भू' आदेश हो । इष्टस्य--बहुसे पर इष्टन् प्रत्यय ( के आदि) का लोप हो और बहुको 'भू' आदेश तथा ठन्को 'यिट' का घरे । ईपदसमाप्तौ--ईषत् असमाप्ति ( थोड़ी-सी कमी) अर्थमें वर्तमान प्रातिपदिकसे कल्प और देश्य तथा देशीयर प्रत्यय हों। विभाषा--ईषत् असमाप्ति अर्थमें वर्तमान सुबन्तसे बहुच प्रत्यय विकल्पसे हो और वह प्रकृतिसे पूर्व ही हो । प्रागिवास्क:-'इवे प्रतिकृती' इस सूत्रसे पूर्व तक 'क' प्रत्ययका अधिकार है । अव्यय--अव्यय, सर्वनामा और GANE इन्दुमती तुबन्तस्य टेरेव प्रागकच ।) इति वालिक युधमदस्मच्छामानविषायल भाष्य तथं. सन्चार्थिऋष.] -टीकाद्वयोपेता। काऽपवादः । तिश्चेत्यनुवर्तते । अज्ञाते ५।३।७३। कस्यायमचः-अश्वकः । उच्चकैः । नीचकैः । सर्वक। ओकारसकारभकारादौ सुपि सर्वनाम्नष्टेः प्रागकच् , युष्म- काभिः । युवकयोः । श्रीकारेत्यादि किम् ? त्वयका । कुत्सिते ॥ ३७४ा कुत्सि- तोऽश्वः-अश्वकः । किंयत्तदोनिर्धारणे द्वयोरेकस्य खतरच १३।६२। अनयोः कतरो वैष्णवः । यतरः । ततरः । वा बहुनां जातिपरिप्रश्ने डतमच ५।३२६३ जातिपरिप्रश्ने इति प्रत्याख्यातमाकरे । बहूनां मध्ये एकस्य निर्धारणे उतमज्या स्यात् । कतमो भवतां कठः । यतमः । ततमः । वाग्रहणमकजर्थम् । यकः । सकः । ॥ इति प्रागिवीयाः ॥ ও খাদ্ধা इवे प्रतिकृती ५३६६। कन्ल्यात् । अश्व इव प्रतिकृतिः-आश्चकः । सर्व- को "बहोर्लोपो भूच' इति बहोः स्थाने 'भू' इत्यादेश विभक्ति कार्य भूयिष्ठः' इति । ('ओकार सकार-भकारादौ सुपि सर्वनाम्नष्टेः प्रागक' अन्येषां तु सर्वनारना . बोदाहरणात् । अज्ञात-अज्ञातस्योपाधिकेऽर्थे वर्तमानात् प्रातिपदिकात् तिङन्ताच स्वार्थ यथाविहितं प्रत्यय: स्यात् । कुत्सिते-कुत्सितो निन्दितः, तस्मिन्नर्थ यथादि. हितं प्रत्ययः स्यात् । किंयत्तदो:-किम् , यत् , तत् इत्येतेस्था प्रातिपदि के यो द्वयो- रेकस्य निर्धारणे डतरच प्रत्यय: स्यात् । इवे प्रति-वार्थ वर्तमानात् प्रातिपदिकात् कन् स्यात् प्रतिकृतिभूते उपमेये। , ATHA तिङन्तकी'टि' से पूर्व ही अकच् प्रत्यय हो, प्रागिबीयादि अर्थों में । अज्ञात-अज्ञात अर्थमें वर्तमान सुबन्त और तिङन्तसे क, अकच आदि प्रत्यय हो स्वार्थमें। कुरिलते-- कुत्सित अर्थमें वर्तमान प्रातिपदिकसे स्वार्थ में यथाविहित कादि प्रत्यय हो। किंवदः- दो में से एकका निर्धारण (निश्चय) करना हो तो-किम् , यत और तत् शब्दोंसे डतरच प्रत्यय हो । वा बहूनां-बहुतों में एकका निर्धारण करना हो तो-किम् , यत् और तत् शब्दोंसे डतमच प्रत्यय हो, विकल्पसे । इस प्रकार 'इन्दुमती'टीका प्रागिवीय प्रकरण समास हुआ। २ इवे प्रति इवार्थमें वर्तमान प्रातिपदिकले स्वार्थमें कन् प्रत्यय हो-जो उपमेय रहे, वह यदि प्रतिकृति ( मूर्ति, तस्वीर आदि) रहे । सर्वप्राति-प्रातिपदिक मानसे स्वार्थ में लघुसिद्धान्तकौमुदी प्रातिपदिकेश्वः स्वार्थे कन् । श्रश्वकः । तत्प्रकृतवचने मयट ५ ॥ ४ ॥ २॥ प्राचुर्येण प्रस्तुतं प्रकृतं तस्य वचनं प्रतिपादनम् । भावे अधिकरण वा ल्युट् । भादो-प्रकृतम् अन्नम्-अन्नमयम् । अपूप-अयम् । द्वितीये तु-मयो यज्ञः । अपूपमयं पर्व । प्रज्ञादिभ्यश्च ५ । ४ । ३८ । अण स्यात् । प्रज्ञ एव प्राज्ञः । प्राज्ञी स्त्री । दैवतः। बान्धवः । बह्वल्पाच्छस्कारकादन्यतरस्याम् ५।४।४२॥ बहूनि ददाति बहुशः । अल्पशः । *आद्यादिभ्यस्तसेरुपसंख्यानम् । आदौ- आदितः । मध्यतः । अन्ततः ॥ पृष्ठतः । पार्श्वतः। श्राकृतिगणोऽयम् । स्वरेण स्वरतः । वर्णतः । कृभ्वस्तियोगे संपधकर्तरि च्विः ५।४ । ५०/ *अभूतत- द्वाब इति वक्तव्यम् । विकारात्मतां प्राप्नुवत्या प्रकृती वर्तमानाद्विकारशब्दा- स्वार्थे विर्वा स्यात्करोत्यादिभिर्योगे । अस्य च्वौ ७१४।३२॥ अवर्णस्य ईत्स्यात् च्ची । वेलोपे 'च्यन्तत्वादव्ययत्वम् । अकृष्णः कृष्णः संपद्यते तं करोति कृष्णी करोति । ब्रह्मीभवति । गङ्गीस्यात् । अव्ययस्य च्वावीत्वं नेति वाच्यम् । दोषाभूतमहः । दिवाभूता रात्रिः। विभाषा साति कास्न्ये ।।४।५२। विवि- - अपूपमयं पर्व (ई० २६)-पर्वणि प्रचुरा अपूपाः कार्याः इत्याद्यच्यमाना:- पूपाधिकरणं पर्वेत्यर्थः । अत्र अधिकरणेऽर्थे 'तत्प्रकृतिवचने मयट्' इति मयटि विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः। भावे तु 'प्रचुरोऽपूपः' अपूपमयम् इति विग्रहो बोध्यः । (मृदा विनिर्मिता प्रतिमा प्रतिकृतिः) तत्प्रकृर-प्राचुर्यविशेषणकं यद्धस्तु यस्मि च्यते तदधिकरणे भावे च वाच्ये ताशवस्तुवृत्तेः शब्दात् मयट् स्यादिति फलितार्थः। बह्वल्पार्थात-बहादल्पार्थाच्च कारकाभिधायिनः शब्दात् स्वार्थे शस्प्रत्ययो वा.. स्यात् । अभूततद्भावे-येन रूपेण प्रागभृतं यद् वस्तु तस्य तद्पप्राप्ती इत्यर्थः । कन् प्रत्यय हो । तलाकृत-प्राचुर्येण प्रस्तुत' अर्थमें वर्तमान प्रातिपदिकसे 'मयट् प्रत्यय हो। प्रज्ञादिभ्यः प्रज्ञादिसे स्वार्थमें अण प्रत्यय हो। बहल्पा बहर्थक और अल्पार्थक जो कारकाभिधायक शब्द, उससे शस् प्रत्यय हो, विकल्पसे । आधादिभ्यः-आधादिसे तसि प्रत्यय हो, विकल्पसे । भ्वस्ति-विकाररूपको. प्राप्त करनेवाली प्रकृति के अर्थमें वर्तमान विकारवाचक शब्दसे स्वार्थमें 'वि' प्रत्यय हो, कु, भू और अस् धातु के योगमें, विकल्पसे । अभूत्-अभूततद्भाव अर्थमें (अतद्रूपके तद्रूप होनेपर) ही च्चि प्रत्यय हो-ऐसा कहना चाहिये । अस्य चौ-अवर्णको ईत्व हो, च्चि प्रत्यय के परे । अध्ययस्य-च्चि प्रत्यय के परे अध्ययको ईत्व नहीं हो। विभाषा-साकल्य } स्वार्थिकप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। २४५ यये सातिर्वा स्यात्साकल्ये । सात्पदायोः ८।३११११ । सस्य षत्वं न स्यात् । कृत्स्नं शस्त्रमभिः संपचते-अनिताद्भवति । दधि सिञ्चति । च्चौ च ७।४।२६ च्चौ च परे पूर्वस्य दीर्घः स्यात् । अनीभवति । अव्यक्तानुकरणाद्वय जव- रार्धादनिती डाच् ५।४।५७। द्वयजेव श्रवरं = न्यून, न तु ततो न्यूनम् । अनेका- जिति यावत् । तादृशमधं यस्य तस्माडाच् स्यात् कृभ्वस्तिभियोगे । डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम् । इति डाचि विवक्षिते द्वित्वम् । नित्यमानेडिते डाचीति वक्तव्यम् । डाचपरं यदानेडितं तस्मिन्परे पूर्वपरयोः पररूपं स्यात् । इति तकार- पकारयोः पकारः । पटपटाकरोति । अव्यक्तानुकरणात् किम् ? ईषत्करोति । दूधज- बरार्धात्किम् ? श्रत्करोति । अवरेति किम् ? खरटखरटाकरोति । अनतो किम् ? पटिति करोति। ॥ इति स्यार्थिकाः ॥ * इति तद्धिताः * namaASAILANDrammERLANTARNER बहुशः (ई० ४)---बहूनि (बहुभ्यो चा) ददातीति विग्रहे बहुशब्दात् 'बह्वल्पार्थाच्छस्कारकादन्यतरस्याम्' इति स्वार्थे शसि प्रत्यये 'बहुशस्' इति, तस्मात् सौ अव्ययत्वात् सुब्लुकि सकारस्य रुत्वे विसर्गे 'बहुशः' इति । पटपटा करोति-( ई० २६, ३८)-'डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम्' इति बार्तिकेन डाचः प्रागेव “पटत् शब्दस्य द्वित्वे 'पटत् पटत्' इति दशायाम् 'अव्य- क्तानुकरणाद्--' इति डाचि अनुबन्धलोपे 'तस्य परमाम्रडितम्' इति परस्य 'पटत्'- शब्दस्यानेडितसंज्ञायां "नित्यमानेडिते डाचीति वक्तव्यम्' इति वार्तिकेन भत्वाष्टि- लोपे पररूपे अव्ययत्वात् सुब्लुकि उक्तं रूपं सिद्धम् । इति 'इन्दुमती'टीकायां तद्धितप्रकरणं समाप्तम् । अर्थ गम्यमान हो तोच्चिके विषय में साति प्रत्यय विकल्पसे हो। साप-पदके आदि सकारको तथा साति प्रत्ययके सकारको धत्व नहीं हो । चौच-च्चि प्रत्ययके पर पूर्वको दीर्घ हो । अव्यक्तानु-अव्यक्त (ध्वनि ) का अनुकरण अनेकाच्से डाच प्रत्यय हो, कृ-भू-अस् धातुके योगरें । डाचि-डाच् प्रत्ययकी विवक्षामें ही (डाच्से पूर्व) द्वित्व हो, तत्पश्चात् डाच प्रत्यय हो। निस्थमा-डाचपरक मात्रेडितके परे पूर्व और पर वर्ण- स्थानमें नित्य ही पररूप हो---ऐसा कहना चाहिये। इस प्रकार 'इन्दुमती टीका तद्वितप्रकरण समाप्त हुआ।
Nai গুম্বথ গুরুত্ব खियाम ४।१।३। अधिकारोऽयं समर्थानामिति यावत् । अजाधतष्टान ४४) अजादीनामकारान्तस्य च वाच्यं यत्स्त्रीत्वं तत्र द्योत्ये टाप्स्यात् । अजा। एडका । अश्वा । चटका । भूमिका । बाला । वत्सा । होडा । मन्दा । बिलाता। मेधा । गहा। सर्वा-इत्यादि । उगितश्च ४।०६। उगिदन्तात्प्रातिपदिकात्स्त्रियां डीप्स्यात् । भवन्ती। पबन्ती । टिड्ढाणा द्वयसमजमात्रच्तयपठकठञ्- ककरणः ४॥ १॥ १५ ॥ अनुपसर्जनं यहिदादि तदन्तं यददन्तं प्रातिपदिकं ततः स्त्रियां जीपस्यात् । कुरुचरी। नद-नदी। देवट-देवी। सौपर्णेयी। ऐन्द्री। औत्सी। ऊरुद्धयसी। ऊरुदन्नी । ऊरुमात्री। पञ्चतयी। श्राक्षिकी । प्रास्थिकी। लावणिकी । इत्वरी। नबस्नजीकक्युस्तरुणतलुनानामुपसंख्यानम् । स्त्रैणी । पोस्नी । शान्तिकी। याष्टिकी ! आन्यकरणी । तरुणी । तलुनी। याश्च ४|१११६ भवन्ती-भूधातोर्लटः शतरि शपि ऊकारस्य गुणेऽवादेशे 'भवत्'शब्दात् स्त्रीत्वविवक्षायाम् 'उगितश्च' इति ङीपि 'शपश्यनोनित्यम्' इति नुमि विभक्तिकार्य 'भवन्ती' इति । ( अनुबन्धलोपस्तु यथास्थले सर्वत्र कर्तव्यः) देवी (ई० ४४ )-'टिड्ढाणञ्' इति सूत्रे टित्वन्तु प्रातिपदिकस्य क्वचित् प्रत्ययकृतं, क्वचित् प्रकृतिकृतं भवति । तत्राद्यस्योदाहरणं 'कुरुचरीति'-कुरुषु चरतीत्यधिकरणे उपपदे 'चरेष्टः' इति कर्तरि टप्रत्यये उपपदसमासे सुब्लुकि 'कुरुचर' इति, तस्मात् स्त्रीत्वविवक्षायां टित्वात् डीपि भत्वाद् 'यस्येति च' इत्यलोपे विभक्तिकार्ये 'कुरुचरीति । द्वितीयस्योदाहरणं 'नट् नदी, देवट देवी, इति । पचादिषु नदट्-देवट इत्यनयोः टितः पाठात् स्वत एव टित्वमिति ताभ्यां ङीपि: भत्वादलोपे विभक्तिकार्ये 'नदी' 'देवी' इत्युभयं सिद्धं भवति । तृतीयोदाहरणन्तु घेष्टित्वात् “स्तनन्धयी इति कृदन्ते मृग्यम् । BAISINHAIshastram UpbmaaENTERTAINMETIRLINiutt स्त्रियाम्-'समर्थानां प्रथमावा' इस सूत्र पर्यन्त 'स्त्रियाम्? इस सूत्र का अधिकार है। अजाद्यतः-अजादि और अकारान्त वाच्य स्त्रीत्व द्योत्य होनेपर टापप्रत्यय हो। उगित्तश्च--उगिदन्त प्रातिपदिकसे कोप हो स्त्रीलिंगमें। डिड्ढाण-अनुपसर्जन जो टित् (ढ-अण-अञ्-आदि) तदन्त जो अदन्त प्रातिपदिक, उससे डीप हो, स्त्रीत्वद्योत्य रहने पर । नपस्नज-अनुपसर्जन जो नादि, तदन्त जो भदन्त प्रातिपदिक, उससे डीप हो, स्त्रीत्व द्योत्य रहने पर । यमय-यअन्त प्रातिपदिकस्से PARMPARANASIKARI स्त्रीप्रत्ययप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। यजन्तात् स्त्रियां बीप्स्यात् । अकारलोपे कृते । हलस्तद्धितख्य ६।४।१५० । हलः परस्य तद्धितयकारस्योपधाभूतस्य लोप ईति परे । गार्गी। प्राचां हफ तद्धितः ४।१।१७। यान्तात् इफो वा स्यात्स च तद्धितः । पिदौरादिभ्यश्च ४|११४१श षिद्भ्यो गौरादिभ्यश्च स्त्रियां डीप्स्यात् । गायिणी। नर्तकी । गौरी । अनडही । अनड्बाही । प्राकृतिगणोऽयम् । बर्यास प्रथमेश२०| प्रथमवयो- वाचिनोऽदन्तास्त्रियां जीप्स्यात् । कुमारी । द्विगोः ४|१२अदन्ताद्विगोम- प्स्यात् । त्रिलोकी । अजादित्वात्रिफला । व्यनीका सेना। वर्णादनुदात्तातोपधा- गार्गी (ई० २६,५८) गर्गस्थापत्यं स्त्रीति विग्रहे 'गर्गादिभ्यो यज' इति गर्ग- शब्दात् यनि आदिवृद्धौ भत्वादलोपे 'गार्य इति । तस्मात् स्त्रीत्वविवक्षायां 'यमन्च इति कीपि भवादलोपे 'हलस्तद्धितस्य' इति यलोपे विभक्त्यादिकार्य तसिद्धिः । गायोयणी-यमन्तात् गार्यशब्दात् 'प्राचां फ तद्धितः' इति एफप्रत्यये 'श्रायनेयी ति फस्यायनादेशे भत्वादलोपे णत्वे 'गाायण' इति । तस्मात् स्त्रीत्व विवक्षायां षिदौरादिभ्यश्च' इति डोषि भत्वादलोपे विभक्त्यादिकार्ये तत्सिद्धिः। वयसि प्रथमे-प्राणिनां कालकृताऽवस्थाविशेषो वयः। तच्च त्रिविधमित्येके- 'पिता रक्षति कौमारे भता रक्षति यौवने । पुत्रस्तु स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्य- मर्हति ॥ इति दर्शनात् । अत्र प्राञ्च:-'कौमारं पञ्चमान्दान्तं पोगण्डं दशमावधिः कैशोरमापञ्चदशाद्यौवनं तु ततः परम् ॥' इति । अपरे तु-'श्राद्ये वयसि नाधीत द्वितीये नार्जितं धनम् । तृतीये न तपस्तप्तं चतुर्थे किं करिष्यति ॥' इति दर्शनाद् बयांसि चत्वारीत्याहुः। कुमारी ( ई० २९,३०,४१,४७,४९) बाल्यवाचकात् कुमारशब्दात् स्त्री- त्वविवक्षायां 'वयसि प्रथमे' इति कीपि अनुबन्धलोपे भसंज्ञायां 'यस्येति च' इत्यलोपे प्रातिपदिकत्वात् सौ 'हल्ङयाभ्यः' इति सुलोपे तत्सिद्धिः। त्रिलोकी-त्रयाणां लोकानां समाहारः इति विग्रहे 'तद्धितार्थ' इति समासे डोप हो, स्त्रोलिङ्गमें । हलन्त-इलसे पर उपधाभूत तद्धित संबन्धी यकारका लोप हो, ईका- रके परे । प्राचाफ-यजन्त प्रातिपदिकसेफ' प्रत्यय हो, स्त्रीत्व थोत्यमें विकरुपसे, और बह 'फ' तद्धित संशक हो । पिगौरा-विदन्त और गौरादि गणपठित प्रातिपदिकसे की हो, स्त्रोत्व द्योत्यमें । वयसि-प्रथम वयोवाची अदन्त प्रातिपदिकसे कोप हो, स्त्रीलिङ्गमें । द्विगो:-अदन्त द्विगुसे छोप हो, स्त्रीलिङ्ग में । वर्णादनु-वर्णवाची जो अनुदात्तान्त तोपध, तदन्त जो अनुपसर्जन प्रातिपदिक, उससे डोप हो और त को न आदेश भी हो, विकल्पसे । - ७ N लघुसिद्धान्तकौमुदी तो नः४१३६ वर्णवाची योऽनुदात्तान्तस्तीपधस्तदन्तादनुपसर्जनात्प्रातिपदिकाद्वा ही , तकारस्य नकारादेशश्च । एनी । एता। रोहिणी । रोहिता । बोतो गुण- बचनात् ४ाश४४. उदन्ताद्गुणवाचिनो वा स्यात् । मृद्वी । मृदुः । बह्वादि- भ्यश्च ४॥ १॥ ४५ एभ्यो वा ङीष् स्यात् । बढी। बहुः । कृदिकारादक्तिनः । रात्रिः। रात्री । सर्वतोऽक्तिन्नर्थादित्येके । शकटी। शकटिः। पुयोगादाख्या- याम् ४॥ १।४८ / या पुमाख्या पुंयोगास्त्रियां वर्तते ततो छीष् । गोपस्य स्त्री गोपी। पालकान्तान्न । प्रत्ययस्थात्कात्पूर्वस्यात इदाप्यसुपः ७।३।४४| 'संख्यापूर्वी द्विगुः' इति द्विगुसंज्ञायाम् 'अकारान्तोत्तरपदो द्विगुः स्त्रियामिष्टः' इति स्त्रीत्वात् 'द्विगोः' इति कीपि भत्वादलोपे विभक्त्यादिकार्य तत्सिद्धिः। एनी ( ई० ३३,५०,५६ )-एतशब्दः श्वेतपर्यायः तस्मात् स्त्रीत्वविवक्षायां 'वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो नः', इति डीपि तकारस्य नकारे च कृते भत्वाद् “यस्येति च' इत्यलोपे विभक्तिकार्ये 'एनी' इति । पक्षे श्रदन्तत्वासापि 'एता' इत्येव । मृद्वी ( ई० ४८)-मृदुशब्दात् स्त्रीत्वविवक्षायां 'बोतो गुणवचनात्' इति बीपि यणि विभक्तिकार्य 'मृद्वी' इति । पचे "मृदुः' इति । अन्न सूत्रे गुणशब्देन 'सत्त्वे निविशतेऽपति पृथगजातिषु दृश्यते । श्राधेयश्चाऽक्रियाजश्च सोऽसत्त्वत्र- कृतिर्गुणः ॥' इति गृह्यते । सत्त्वं द्रव्यं समवायिकारणम् , तत्रैव निविशते समवैति यः स गुण इत्यस्य भाष्याशयः । द्रव्यमानसमवेत इति यावत् । रात्री-राधातोः ‘राशादिभ्यां त्रिप्' इत्युणादिसूत्रेण त्रिपि, 'कृतो य इकारस्त- दन्तात् प्रातिपदिकात् ङीष् वा स्यात्' इत्यर्थक 'कृदिकारादक्तिनः' इति बहाद्यन्त- गणसूत्रेण बीपि सवर्णदीचे विभक्तिकार्य 'रात्री' इति । पते रात्रिः' इत्यपि भवति । गोपी (ई० ३६,४२)-'गोपस्य स्त्री' इति विग्रहे 'पुंयोगादाख्यायाम्' इति बीषि अनुबन्धलोपे भसंज्ञायां “यस्येति च' इत्यकारलोपे प्रातिपदिकात् सौ हल्ङयाभ्या' इति सुलोपे 'गोपी' इति जातम् । वोतो. -उदन्त गुणवाची प्रातिपदिक्से स्त्रीलिङ्गमें डोष हो, विकल्पसे । बह्वादि-बह्वा- दिसे खीलिङ्गमें लोष हो, विकल्पसे । कृदिकारा-क्तिन्न-भिन्न कृत्संशक इकारान्त प्रातिप- दिकसे डोष हो विकल्पसे । सर्वतो-एकके (किन्ही आचार्यों ) के मतसे क्तिन्नर्थ-मिन्न कुव-अकृत् सभी इकारान्त प्रातिपदिकोंसे डोप हो ऐसा समझना चाहिये। पुंयोगा-जो पुंवाचक शब्द, पुंयोगसे स्त्रीलिङ्गमें प्रवृत्त हो, उससे डोप हो। पालका--पालकान्तसे छोष नहीं हो। प्रत्ययस्थात्-प्रत्ययस्थ ककारसे पूर्व अकारको स्त्रीप्रत्ययप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। । ENERAL प्रत्ययस्थात्कारपूर्वस्याऽकारस्येकारः स्यादापि, साप सुपः परो न चेत् । गोपा- लिका। अश्वपालिका | सचिंका। कारिका । अतः किम् ? नौका । प्रत्ययस्था- किम् ? शक्नोतीति शका । असुपः किम् ? बहुपरिधाजका नगरी। सूर्याs- देवतायां चाव्वाच्यः । सूर्यस्य स्त्री देवता सूर्या । देवतायां किम् ? सूर्याऽ- गस्त्ययोश्छे च ङ-यां च । यलोपः । सूरी, कुन्ती, मानुषीयम् ! इन्द्रवरु- णभवशवरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाचार्याणामानुक् ४|११४६एषामा- नुगागमः स्यात् जीप च । इन्द्रस्य स्त्री इन्द्राणी । वरुणानी। भवानी। शर्वाणी। रुद्राणी । मृडानी। हिमारण्ययोमहत्त्वे । महद्धिमं हिमानी। महदरण्यम्- अरण्यानी । *यवादोपे । दुष्टो यचो यवानी। यवनाल्लिप्याम् | यवनानां सर्विका-(चन्तादावन्तात्तद्धितोत्पत्तिर्यथा स्याद् उचाभ्यां प्राङ्मा भूत्' इति नियमस्य जागरूकत्वात् ) सर्वशब्दात स्त्रीत्वविवक्षायां टापि सवर्णदीर्धे 'सर्वा इति, ततः एकादेशस्य पूर्वान्तत्वेन अहणात् 'अव्ययसर्वनाम्नाम्-' इतिटः प्रागकचि ककारादकारस्योच्चारणार्थत्वेन दर्शनाऽभावे चकारस्य इत्संज्ञालोपयोः 'सर्वका' इति जाते 'प्रत्ययस्थात्-' इति ककारात् पूर्वस्य श्रत इत्वे विभक्तिकायें 'सर्विका' इति । सूर्यशब्दस्य स्त्रियां ( ई० २६, ४५)-सूर्यस्य स्त्री देवता इति विप्रहे सूर्य- शब्दात् 'सूर्या वतायां चाब्वाच्यः' इति चापि अनुबन्धलोपे सवर्णदीर्धे विभक्तिकार्ये 'सूर्या' इति । सूर्यस्य श्री मानुषीति विग्रहे तु 'घुयोगादाख्यायाम्' इति ङीषि भत्वा- दलोपे 'सूर्यागस्त्ययोश्छे च या च' इति यलोपे विभक्तिकार्ये 'सूरी' इति । इंद्राणी (ई० ३७, ४९, ५२ )--इन्द्रस्य स्त्रोति विग्रहे पुंयोगलक्षणे डीषि सिद्धेऽपि 'इन्द्रवरुण-' इत्यादिसूत्रेण ङीष्सन्नियोगेन आनुगागमे च जाते उका- रस्योच्चारणार्थत्वेन दर्शनाऽभावे ककारस्येत्संज्ञायां लोपे च कृते सवर्णदीर्घे णत्वे विभक्तिकार्य तत्सिद्धम् । इत्व हो, आपके परे-यदि वह 'आप' सुप्से पर न हो। सूर्या-देवता अर्थमें सूर्य शब्दसे पुंयोगमें चाप् प्रत्यय हो । सूर्याऽग-सूर्य और अगस्त्य शब्दके यकारका लोप हो, छ या ही प्रत्ययके परे। इन्द्रवरुण-इन्द्र आदि शब्दोंको आनुक्का आगम हो और साथ ही झोष भी हो । हिमारण्यो-हिम और भरण्य शब्दोंसे महत्त्व अर्थमें ही आनुक् और लो हो । यवादोषे-यव शब्दसे दोष अर्थमें हो आनुक् हो । यवनायवन शब्दसे लिपि अर्थमें ही आनुक् और लीष् हो ।
RuTMA २५० लघुसिद्धान्तकौमुदी लिपिर्यवनानी । मातुलोपाध्याययोरानुग्वा मातुलानी । मातुली। उपाध्या- यानी । उपाध्यायी। आचार्यादणत्वं च । श्रचार्यस्थ स्त्री प्राचार्यानी ।। अर्थक्षत्रिया यांचा स्वार्थे । अर्याणी । भार्या । क्षत्रियाणी । क्षत्रिया। क्रीतात्कर- णपूर्वात् ४॥ १॥ ५०क्रीतान्ताददन्तात्करणादेः स्त्रियां ङीष् स्यात् । वनक्रीती । क्वचिन्न । धनक्रीता: स्वाहाचोपसर्जनादसंयोगोपधात् ४११५४! असंयोगो- मातुलानी ( ई० २१)-मातुलस्य स्त्रीति विप्रहे मातुलशब्दात् 'पुंयोगा- दाख्यायाम्' इति कीषि 'मातुलोपाध्याययोरानुग्वा' इत्यानुकि अनुबन्धलोपे भत्वा- दलोपे वित्तिकार्ये तत्सिद्धम् । पक्षे 'मातुली' इति । अर्याणी (ई० ४५)-अर्यशब्दात् स्त्रीत्वविवक्षायाम् 'अर्यक्षत्रियाभ्यां वा स्वार्थे इति लीषि आनुकि च कृते भत्वादलोपे णत्वे विभक्तिकार्य 'अर्याणी' इति । पक्ष टापि 'श्री' इति । स्वामिनी वैश्या वेत्यर्थः । पुंयोगे अर्यस्य स्त्री 'श्रीं' इति । क्षत्रियाणी (ई० ३१,३४,४५ .)-क्षत्रियात् क्षत्रियायां (स्वभार्यायाम् ), उत्पन्ना स्त्रीति विग्रहे क्षत्रियशब्दात् 'अर्यक्षस्त्रियाभ्यां वा स्वार्थे' इति जीषि तत्सनियोगेन आनुकि भत्वादलोपे णत्वे विभक्तिकार्य क्षत्रियाणी' इति । पन्ने अदन्तवाद्यापि क्षत्रिया' इति । घुयोगे तु क्षत्रियस्य स्त्री 'क्षत्रियी' इति भवति । वस्त्रक्रीती (ई०५१,५३)-वस्त्रेण क्रीता या इति विग्रहे 'वस्त्र भिस् क्रीत' इति स्थिते 'गतिकारके ति सुबुत्पत्तेः प्रागेव समासे सुब्लुकि 'वस्त्रक्रीत' इत्यदन्तप्राति- पदिकात 'क्रीतात्करणपूर्वात् इति डीषि भत्वादलोपे विभक्तिकार्ये तत्सिद्धम् कचिन, 'धनकीता' (ई०२१)-(धनेन क्रीता या सेति विग्रहः ) 'कर्तृ- करणे कृता बहुलम्' इति बहुलग्रहणेन 'गतिकारके ति परिभाषायाः क्वचिदप्रवृत्यव- गमादिह सुबन्तेन समासः। तत्र च सुपः प्रागेवान्तरङ्गत्वाट्टापि ततः सुपि टाबन्त- प्रकृतिकसुबन्तेन (कृता सु इत्यनेन ) समासे सुब्लुकि धनकीताशब्दस्य अदन्त- त्वाऽभावान डोषित्यर्थः। मातुलो-भातुल और उपाध्याय शब्दसे आनुक् हो, विकल्पसे । आचार्या-आचाय शब्दसे पर आनुक्के नकारको णत्व न हो। अर्थक्षत्रि-अय और क्षत्रिय शब्दसे स्वार्थमें विकल्पसे आनुक और डोष हो । क्रीतात्-करणपूर्वक अदन्त कीतान्त प्रातिपदिकसे डीप हो। स्वाङ्गाच्चोप-असंयो- गोपध, उपसर्जन जो स्वागावाची, तदन्त अदन्त प्रातिपदिकसे डीप हो, विकल्पसे । नोट:-'स्वाङ्गाचोपसर्जनात०' इस सूत्र में स्वस्य = अवयवीभूतस्य, अङ्गं स्वाजम् , ऐसा BANTAR mpearane स्त्रीप्रत्ययत्र] इन्दुतमी-टीकाद्वयोपेता। २५१ पथमुपसर्जनं यत्स्वा तदन्ताददन्तान्डीया स्यात् । केशानतिकान्ता अतिकेशी । अतिकशा। चन्द्रमुखी। चन्द्रमुखा। असंयोगोपचारिकम् ? सुगुल्फा । उपस- A जनादिकम् ? सुशिखा । न मोडादिबलचः ४११६५६ । कोडादेवह्वचश्व स्वाङ्गाय डीए । कल्याणकोडा । श्राकृतिगणोऽयम् । सुजधना । नखमुखात्संज्ञायाम् अतिकेशी (ई० २२, ३८) -केशानतिकान्तेति विग्रहे समासनिध्पन्नादति- केशशब्दात् स्वाहाचोपसर्जनादसंयोगोपधात्' इति श्रीषि भत्वादलोपे विभक्तिकार्य तसिद्धिः । अत्रोपसर्जनन्तु एकविभक्ति चापूर्वनिपाते' इत्यनेन बोध्यम् । चन्द्रमुखी ( ई० २३, २६, ४८, ५०)-चन्द्र इच मुखं यस्याः इति विग्रहे समासनिष्पन्नात् 'चन्द्रमुख शब्दात् 'स्वाहाचोपसर्जनात्' इति डीधि भत्वादलोपे विभक्तिकार्ये तत्सिद्धम् । पक्षे 'चन्द्रमुखा' इति । कल्याणकोडा (ई० २३) कल्याणी कोडा यस्या इति जिनहे समासे 'स्त्रियाः स्वाङ्गका ग्रहण होगा तो 'सुमुखा शाला' यहाँ भी ली हो जायगा--मुखस्य शालाङ्गत्वात् । किंच 'सुकेशी रथ्या' में लीप नहीं होगा-- के शासाना रथ्याङ्गत्वाभावात् । तस्मात् अव्याप्ति- अतिव्याप्ति वारणके लिये उक्त सूममें त्रिविध स्वासों का ग्रहण किया गया है। वह निम्न है- (१) अनुवं मूर्तिमत्स्वाझं प्राणिस्थामविकारज-( न विद्यते द्रवो यस्य तद्, 'अद्रवम्') जो द्रववाचक नहीं हो । अतः सु - शोमनः, स्वेदधर्मजः-उदकप्रत्रवो यस्याः सा 'सुस्वेदा' यहाँ डोष नहीं हुआ। मूर्तिमत्-( स्पर्शवद द्रव्यपरिमाणं मूर्तिस्तद्वत् ) जो मूर्तिमान् हो। अतएव 'मुञ्चाना' में छीष नहीं हुआ । प्राणिस्थम्-(प्राणिनि = प्राणवति जन्ती, विद्यमानम् ) जो प्राणी में स्थित हो । अतः 'सुमुखा शाला' में डीध नहीं हुआ। अविकारजम्--(रोगादिविकाराऽजन्यम् ) जो विकारसे उत्पन्न नहीं हुआ हो। इसलिये सु- अधिकः, शोफः श्वयथुः यस्याः सा 'सुशोफा' में लीप नहीं हुआ। (२)अतस्वं तन्न दृष्टं च-(अतस्थं सम्प्रति अप्राणिस्थम् अपि च =किन्तु, तन्त्र प्राणिनि, दृष्टं दृश्यमान, यत्तदपि स्वामित्यर्थः) जो सम्प्रति प्राणीमें स्थित न भी हो किन्तु कभी भी प्राणीमें देखा गया हो। अतः सुकेशी सुकेशा बा रथ्या ( गली ) यहाँ बी सिद्ध हुआ ! क्योंकि गली में विखरा हुआ केश सम्प्रति प्राणिस्थ नहीं भी है किन्तु कभी तो वह केश प्राणिस्थ (प्राणीके मस्तकादिपर) देखा गया था। (३) तेन चेत्तत्तथायुतम्-(येनाऽङ्गेन प्राणिरूपं वस्तु यथायुतं, तेन तत्सदृशेन अङ्गेन, तद्-अप्राणिरूपं वस्तु, तथा प्राणिवत् , युतं - युक्तं, चेत् = स्यात् , तदपि (प्राणिनि दुष्टं स्वामित्यर्थः) प्राणीकी तरह ही अप्राणीमें स्थित हो। अत एव 'सुस्तनी सुस्तना वा प्रतिमा' (सुन्दर स्तनों वाली मूर्ति) यहाँ बी सिद्ध हुआ। न क्रोडादि-स्वांगवाचक जो क्रोडादि और बहुच , तदन्त प्रातिपदिकसे वीष नहीं हो । नखमुखात्-नख-मुखान्त . , का ERE .. Humanand RSSIONSKRIMARRIEROADwarurasacramRREARSAMNE दा लघुसिद्धान्तकौमुदी ४|११५८/ न लीम् । पूर्व पदारसंज्ञायामगः ८४।३। पूर्वपदस्थानिमित्तात्परस्य नल्य शः स्यात् संज्ञायां, न तु गकारव्यवधाने । शुर्पणखा ! गौरमुखा । संज्ञायां किम् ? साम्रमुखी कन्या। जातेरस्त्रीविषयादयोपधात ४।११६३। जातिवाचि यच च स्त्रियां नियतमयोपधं ततः स्त्रियां ली स्यात् । तटी। वृपली। कठो। वढची । जातेः किम् ? सुण्डा । अस्त्रीविषयात्किम् ? बलाका । अयोपधात्किम् ? क्षत्रिया। योपधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमनुष्यमत्स्यानामप्रतिषेधः । हयी । गवयी। पुंवत्-'इति पुंवत्वे निष्पन्नात् कल्याणक्रोडशब्दात् 'स्वाहाचोसर्जनात्-' इति बीषि प्राप्ते, 'नक्रोडादिबहवः' इति निषेधे अदन्तत्वाट्टापि सवर्णदीर्धे विभक्तिकार्ये तत्सिद्धिः। तटी (ई० ५२)-'तटं त्रिषु' इत्यमरः। जलसमोपप्रदेशः श्राकृतिविशेष- विशिष्टस्तटः । तस्माजातिवाचित्वादनियतस्त्रीलिङ्गत्वादयोपधात्तटशब्दात् 'जाते- रस्त्रीविषयादयोपधात्' इति डोषि भत्वादलोपे विभक्तिकार्ये तत्सिद्धम् । प्रातिपदिकसे सज्ञामें छाए नहीं हो । पूर्वपदात्--पूर्वपदस्थ निमित्त (रेफ-धकार ) से पर नकारको णकार हो, संज्ञामें, पर गकारके व्यवधान में नहीं हो । जातेरस्त्री-नित्य सीलिंगते भिन्न अयोपच जातिवाचीसे होष हो, स्त्रोलिंगमें । नोट-जातेरस्त्रीविषयादयोपधात्' इस सूत्र में निम्न त्रिविध जातिका ग्रहण होता है- (1) आकृतिग्रहणा जाति:'--आकृति ( स्वरूप ) देखनेसे ही जो जानी जा सके अर्थात अनुगतसंस्थान (अवयवसन्निवेशविशेष ) से ही जो अभिव्यंग्य हो सके, वह जाति कहलाती है। यथा-तटी' 'घटी आदि । (२) लिङ्गानां च न सर्वभाव सकृदाख्यातनिर्माह्या' ( असर्वलिंगत्वे सति एकस्यां व्यक्ती कथनाद व्यक्त्यन्तरे कथनं विनापि सुग्रहा-जातिरिति ) जिससे सब लिंग नहीं होते हों और एक व्यक्तिमें कहने पर अन्य व्यक्तियों में विना कहे ही जातिका ज्ञान हो सके-वह भी जाति कहलाती है। 'वृषलत्व' जातिके सिद्ध करने में प्रथम लक्षण साधक नहीं हो सका क्योंकि हस्ताद्यवयवसन्निवेश जैसा वृषल ( शूद्र) में है, वैसा ही ब्राह्मणादियों में भी देखा जाता है । अतः लिङ्गानां च इस द्वितीय लक्षण की आवश्यकता हुई। उदाहरण देखें "वृषली'। यहाँ एक ही व्यक्ति में 'वृषलत्व' का ज्ञान कराने पर उसके पुत्र, भाई आदिमें शान कराये विना ही वृषलत्व जाति सुग्रह हो जाती है। (३) गोत्रञ्च चरणैः सह' ( अपत्यप्रत्ययान्तः शाखाध्येतवाची च शब्दो जातिकार्य लमत इत्यर्थः) अपत्य प्रत्ययान्त शब्द, और शाखाध्येतृवाची जो शब्द, वह भी जातिकार्यको प्राप्त हो । उदाहरण है 'औपगवी' और 'कठी' । यहाँ अनुगतसंस्थानव्यङ्गाथ- स्वका अभाव है और उभयत्र सर्वलिङ्गता भी है। अतः ‘गोत्रं च' इस तृतीय लक्षणकी भी आवश्यकता हुई। योपध-योपथ ( जातिलक्षण कोष ) के प्रतिषेधमें हयादिका प्रतिषेध नहीं हो।
स्त्रीप्रत्ययप्र] इन्दुमती-टीकाद्वयोपेता। . UmaymADIMAananegame मुकयी। हलस्तद्विस्येति यलोवः । मनुषी। मत्स्यस्य अन्याम् । यलोपः। मत्सी ! इतो मनुष्यजातेः ४॥ ११ ३५। जीए । दाक्षी। ऊन्तः ४। ११ ६६॥ उद- न्तादयोषधान्मनुष्यजातिवाचिनः स्त्रियामूङ् स्याद् । कुरूः । अयोपधात् किम् ? अध्वर्युब्राह्मणी। पङ्गोश्च ४|११ ६८ पङ्खः । श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च । श्वश्रूः । उरूत्तरपदादौपम्ये ४|११६६। उपमानवाचि पूर्वपदमूरूत्तरपदं यत्प्रा- तिपदिकं तस्मादूङ् स्यात् । करभोकः । संहितशफलक्षणवामादेश्च ४|११७०१. अनौपम्याथ सूत्रम् । संहितोकः। शफोरूः । लक्षणोरूः । वामोरूः । शारि- वाद्यो जीन् ४।१७३। शारिवादेरो योऽकारस्तदन्ताच्च जातिवाचिनो ङीन् स्यात् । शारिची। वैदी। ब्राह्मणी । नृनरयोवृद्धिश्च । नारी । यूनस्तिः ४।११७७ मनुषी (ई०२२,३९)मनुष्यशब्दस्य योपधत्वेऽपि 'योपधप्रतिषेधे हथ- गवयमनुष्य-' इति वार्तिकबलात् 'जातेरस्त्रीति कीषि भत्वादलोपे हलस्तद्धितस्ये'. ति यलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः। मत्सी (ई०२४, ३३, ४६ )-मत्स्यशब्दस्य योपरत्वेऽपि 'योपधप्रतिषेधे हयगवयमनुष्य मत्स्य' इति वार्तिकबलात् 'जातेरस्त्रीति डोषि भत्वात् 'यस्येति च इत्यलोपे 'मत्स्यस्य ज्याम्' इति यलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः । श्वश्रूः ( ई० ४५, ४६, ४९)-श्वशुरस्य स्त्रीति विप्रहे पुंयोगलक्षणे डीणि प्राप्ते तमपवाय 'श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च' इति वार्तिकेन ऊङि तत्सन्नियोगेन रेफाद- कारस्य शकारादुकारस्य च लोपे विभक्तिकार्ये 'श्वश्रूः' इति । शाङ्गरवी (ई० ५२) शृङ्गरुशब्दादपत्येऽणि आदिबुद्धौ ‘ोर्गुणः' इति गुणेऽ- , maliA ugaaD -मत्स्य शब्दावयव यकारका लोप हो, डीके परे । इतो मनुष्यजातेः-इकारान्त मनुष्यजातिवाचीसे स्त्रीलिङ्गमें छीष हो । जड़तः-उकारान्त अयोपध मनुष्यजातिवाची से स्त्रीलिङ्ग में उल् प्रत्यय हो । पङ्गोश्च- पङ्गु शब्दसे स्त्रीलिङ्गमें ऊ प्रत्यय हो। श्वशुरस्य-श्वशुर शब्दके उकार और अकारका लोप तथा चकारात् ऊछ प्रत्यय भी हो, स्त्रीलिङ्गमें । ('पुंयोगादाख्यायाम्' सूत्रसे प्राप्त डोष. का अपवादक यह बार्तिक है) ऊरूत्तर-उपमानवाची पूर्वपदक जो ऊरूत्तरपदक प्रातिपदिक, उससे जल प्रत्यय हो, स्त्रीलिङ्गमें । संहितशफ-संहित, शफ, लक्षण और बाम आदि में हैं जिसके, ऐसा जो ऊरूत्तर पदपरक प्रातिपदिक उससे ऊङ् प्रत्यय हो, स्त्रीलिङ्गमें। शारिवा-शाङ्गरवादिसे और 'अ' का जो अकार, तदन्त जातिवाचक प्रातिपदिकसे छीन् प्रत्यय हो, स्त्रीलिङ्गमें। ननरयो:-नृ और नर शब्दसे छीन् प्रत्यय तथा नृ और . Mu- 1848 लघुसिद्धान्तकौमुदी युवनशब्दास्त्रियां तिः प्रत्ययः स्यात् । युवतिः । इति स्त्रीप्रत्यया: शास्त्रान्तरे प्रविष्टानां बालानां चोपकारिका। कृता वरदराजेन लघुसिद्धान्तकौमुदी ।। ॥ इति श्रीवरदराजाचार्यकृता लघुसिद्धान्तकौमुदी समाप्ता । REATRAPAR बादेशे 'शारिव' इति तस्मात् जातित्वान्टीषि प्राप्त तम्प्रबाध्य 'शारिवायत्रो डोन्' इति डीनि भत्वादलोपे विभक्तिकार्य तत्सिद्धिः। युवतिः (ई० २५, २९, ३०, ३२, ४७, ४८, ५०)-युवनशब्दात् स्त्रीत्व- विवक्षायां 'यूनस्तिः' इति तिप्रत्यये 'स्वादिष्विति पदत्वान्चलोपे विभक्तिकार्ये 'युवतिः' इति । 'युवती' इति दीर्धकारान्तोऽपि स्त्रियां वर्तते । तत्तु युधातोर्लटः शतरि शपो लुकि उवङि उगित्वात् बीपि 'युवती' इति । (यौति-पत्या सह श्रात्मानं मिश्रीकरोतीत्यर्थः।) इति 'इन्दुमती'टीकायां स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् । SKOS नरको वृद्धि भी हो, स्त्रीत्व थोत्यमें । यूनस्ति --अनुपसर्जन युवन् शब्दसे स्त्रीलिंगमें 'ति' प्रत्यय हो और बह तद्धितसंशक भी हो। शाखान्तरे- शालान्तर में प्रविष्ट होनेवाले बालकों का उपकार करनेवाली (पा व्याकरणका सरलतासे ज्ञान करानेवाली ) वरदराजाचार्य विरचित यइ लघुसिद्धान्तकौमुदी समाप्त हुई। चञ्चच्चन्द्रमरीचिचारुवदनी बिबोष्ठशान्तामणि- भतिज्ञानप्रसादिताशुगिरिजा संराजमानाऽवनीम् । तुच्छों स्वच्छमना निधाय हृदये पत्युः समक्ष मुदा तीर्थद्वारप्रयागदेवसरितस्तीरे वपुर्या जहौ । सेयं स्वर्गसुधागलन्मधुरतां मन्दं पिबन्तीत्यहो ! स्वीयोत्पत्तिसुकीर्तिपूतमिथिला सीतासमा धीमती । नाम्ना 'चेन्दुमती प्रसन्नवदना दिव्यप्रभावा चिरं लोकानामनुरक्षिनी विलसतु स्वर्गे सुधावर्षिणी ॥ इति 'दरभंगा मण्डलान्तर्गत तरौनी ग्रामवासि शाखार्थदिवाकर पण्डितराजश्रीजयदत्तझा: शर्मात्मजपण्डितश्रीमदनन्तलालझाशर्मसूनुना पण्डितश्रीरामचन्द्रझाव्याकरणा- चार्येण कृता 'इन्दुमती' नामक संस्कृत-हिन्दी टीका समाप्ता।
परिशिष्टम् (१) अथ संक्षिप्तलिङ्गानुशासनम् १. लिङ्गम् । २. स्त्री। अधिकारसूत्रे एते । ३. ऋकारान्ता मातृदुहितृस्वस्या- जनान्दरः। ऋकारान्ता एते पञ्चैव स्त्रीलिङ्गाः, स्वस्त्रादिपञ्चकस्यैव ही निषेधेन कत्री, इत्या. देलीपेकारान्तत्वात् । तिसूचतस्रोस्तु स्त्रियामादेशतया विधानेऽपि प्रकृत्योस्त्रिचतुरोइन्त. त्वाभावात् । १. अन्यूप्रत्ययान्तो धातुः । अनिप्रत्ययान्त ऊप्रत्ययान्तश्च धातुः स्त्रियां स्यात्। अवनिः । चमूः । ५. मिन्यन्तः । मिप्रत्ययान्तो निप्रत्ययान्तश्च धातुः स्त्रियां स्यात् । भूमिः ग्लानि । ६. किन्वन्तः । स्पष्टम् । कृतिः । इत्यादि । ७. ईकारान्तश्च । ईप्रत्ययान्तः स्त्री स्यात् । लक्ष्मीः । ८. ऊडावतश्च । कुरूः । विद्या । ९. यवन्तमेकाक्षरम् । श्रीः। भूः । १०. विंशत्यादिरानवतेः । इयं विंशतिः । त्रिंशत् । चत्वारिंशत् । पञ्चाशत् । षष्ठिः । सप्ततिः । अशीतिः । नवतिः। ११. तलन्तः । अयं स्त्रियां स्यात् । शुकुस्य भावः शुकना। ब्राह्मणस्य कर्म ब्राह्मणता । ग्रामस्य समूहो ग्रामता । देव एव देवना। १२. मानुनग्दि- गुषिणगुपानहः । एते स्त्रियां स्युः । इयं भाः इत्यादि । १३. शुष्कुलि-जि-कुश्यशनि- वर्ति चकुटि त्रुटि वलि-पञ्चयः । एतेऽपि स्त्रियां स्युः। श्वं शुष्कुलः। १४. अ सुमन- स्समा-सिकता वर्षाणां बहुत्वं छ । अवादीनां पञ्चानां स्त्रीत्वं स्वाद बहुत्वं च। आप इमा: । 'स्त्रियः सुमनसः पुष्पम् । 'सुमना मालती जातिः। देववाची तु (स्टोव । इति स्याधिकारः। १५ पुमान् । अधिकारोऽयम् । १६ धनवन्तः । पञ्-पाकः। त्यागः । अप्-करः । गरः। १७ घाजन्तश्च ध-विस्तरः। गोचरः। चयः । जयः। १८. नहास्तः । त्ययान्तः पुंसि स्यात् । यशः। यत्नः । १९. क्यन्तो दुः। किन्ययान्तो धुः पुंसि स्यात् । आधिः । निधिः । उदधिः । २०. देवासुरात्मस्वर्गगिरिसमुद्रनख केशदत्तस्तनभुजभण्ठ- खड्गशरपङ्काभिधानानि । एतानि पुंसि स्युः। देवाः सुराः । असुरा दैत्याः । आत्मा क्षेत्र स्वर्गो नाकः । गिरिः पर्वतः । समुद्रोऽब्धिः। न । नखः कररुहः। केशः कचः। दन्तो दशनः। स्तनः कुचः । भुजो दोः । कण्ठो गलः । खड्गः करवालः। शरो मार्गणः । पङ्कः कर्दमः । इत्यादि । २१. ऋतुपुरुषकपोलगुल्फमेघाभिधानानि । ऋतुरध्वरः । पुरुषो नरः। कपोलो गण्डः । गुल्फः प्रपदः । मेघो नीरदः । २२. उकारान्तः । अयं पुंसि स्थात् । प्रभुः । इक्षुः । २३. रुत्वन्तः । मेरुः । सेतुः । २४. कोपधः। कोपधोऽकारान्तः पुंसि स्यात् । स्तवकः । कल्कः २५. टोपधः । टोपधोऽकारान्तः पुंसि स्यात् । घटः । पटः । २६. णोपक्षः। णोपधो:- नम 1 seline | Na Shara . का KARAN ९. पुनपुंसकयो । अधिकारोऽयम् । ५४. वृत-भूत-मुस्त-हवेलितरावत पुस्तक लघुकौमुदी -परिशिष्टे कारान्तः पुंसि स्यात् । गुणः । गणः । पाषाणः। २७, थोपधः। रथः। २८. नोपयः । नोपधः । अदन्तः पुंसि । इनः । फेनः । २९. पपोषः। पकारोपधः अदन्तः पुंसि। यूपः। दीपः। सर्पः। ३०, भोपधः। स्तम्भः। कुम्भः। ३१. मोपधः। सोमः। भीमः । ३२. योपा। समयः। इयः । ३३. रोपधः। क्षुरः। अङ्कुरः। ३४. घोषधः । वृषः १. वृक्षः । ३५. सोपधः । वत्सः। वायसः । महानसः।३६.रश्मिदिवसाभिधानानि । एतानि पुंसि स्युः । रश्मिर्मयूखः। दिवसो घस्रः। इति पुंल्लिङ्गाधिकारः। ३७. नपुंसकम् । अधिकारोऽयम् । ३८. भावे ल्युडन्तः। हसनम् । ३९. चिष्ठा च । भाबे या निष्ठा तदन्तं क्लीबं स्यात् । हसितम् । गीतम् । ४०. स्वयौ तद्धितौ। शुक्लत्वम्- शौक्ल्यम्' । व्यः पित्त्वसामर्थ्यात्पक्षे स्त्रीत्वम् । चातुर्यम्-चातुरी । सामग्रथम्-सामग्री। इ मौचित्यम्-औचिती । ११. यद्यढग्यगजण्यञ्छाश्च भावकर्मणि । एतदन्तानि बलीवानि । स्तेयम् । सख्यम् । कापेयम् । अधिपत्यम् । औष्ट्रम् । द्वैहायनम् । पितापुत्रकम् । अच्छा- वाकीयम् । ४२. द्वन्द्वैकत्वम् । पाणिपादम् । १३ लोपधः । कुलम् । कूलम् । स्थलम् । ४४. शतादिः सङ्ख्या । शतम् । सहस्रम् । ४५. शतायुताः पुखि च । अयं शतः-इदं शलन् । इत्यादि । ४६. ब्रह्मन्पुंसि च । अयं ब्रह्मा-इदं ब्रह्म । ४७. असन्तो यचकः । यशः। मनः । तपः । ४८. ब्रान्तः । पत्नम् । छ्त्वम् । ४९. फलजातिः । फलजातिबाचिशब्दो नपुंसकं स्यात् । आमलकम् । आन्नम् । इति नपुंसकाधिकारः। ५० स्त्रीपुंसयोः । अधिकारोऽयम् । ५१. गो-मणि-यष्टि झुष्टि पाटलि-वस्ति- शाल्मलि-श्रुटि मसि-मरीचयः । इयमयं वा गौः। ५२. अपत्यार्थतद्धिते । औपगवः- औपगवी। इति स्त्रीपुंसाधिकारः। बुस्त लोहिताः । अयं धृतः-इदं घृतम् । ५५. गृह मेहन्देह पट्ट-पटहाष्टा पदाम्बुद- ककुदाधा इति पुनपुंसकाधिकार ५६. अवशिष्टलिङ्गम् । ५७. अव्ययं कतियुष्मदस्मदः । ५४. रुणान्तासङ्ख्या । शिष्टा परवत् । एकः पुरुषः । एका स्त्री । एकं कुलम् । ५९ गुणवचनं च। शुक्ल: पटः । शुक्ला पटी । शुक्लं वस्त्रम् । ६०. कृत्याश्च । ६१. करणाधिकरणयोल्युट् । ६२. सर्वा. दीनि सर्वनामानि । स्पष्टार्थेयं त्रिसूत्री । इति विशिष्टलिङ्गाधिकारः। इति संक्षिप्तलिंगानुशासनप्रकरणम् । ।
math 24 SPA (पृ० १९२) शरदादिः-शरद् विपाश अनस मनस् उपानह् अनडु दिव हिमवत् हिरुक् विद् सद् दिश दृश् विश चतुर त्यद् तद् यद् कियत् (जराया जरश्च) (प्रतिपरसमनुभ्योऽक्षणः ) पथिन् । इति शरदादिः। (पृ० १९६) शौण्डादि:-शौण्ड धूर्त कितव व्याड प्रवीण संवीत अन्तर माधि पटु पण्डित कुशल चपल निपुण इति शौण्डादिः ॥ (पृ० १९८) ऊर्यादिः-उरी ऊरी कन्थी ताली माताली वेताली धूली धूसी शकला संसकला ध्वंसकला भंसकला गुलगुधा सजूम सजुष फल फली चिल्लो आक्की अलोष्टी केवाली केवाली सेवासी पर्याली शेवाली वर्षाली इत्यूमशा वश्मसा मस्मसा श्रौषट् वौषट् वषट् स्वाहा स्वधा पापी प्रादुस् अत् आविस् एते ऊर्यादयः । (पृ० २०८) अश्वपत्यादिः-अश्वपति स्थानपति ज्ञानपति यज्ञपति बन्धुपति शतपति धनपति राष्ट्रपति कुलपति गृहपति पशुपति भाग्यपति धर्मपति धान्यपति सभापति प्राणपति क्षेत्रपत्ति इत्यश्वपत्यादिः । (पृ० २०९) उत्सादि:--उत्सा उदपान विकर निनद महानद महानाला महा. प्राण तरुण तलुन वष्कयाले धेनु पृथिवी पंक्ति जगती त्रिष्टुप् अनुष्टुप् जनपद भरत उशीनर ग्रीष्म पीलु कुण पृषदंश मल्लकीय स्थन्तर मध्यन्दिन वृहत् महत् सत्त्वत् कुरु पञ्चाल इन्द्रावसान उष्णीह ककुभ सुवर्ण देव ग्रीष्मादछन्दति । इत्युस्मादिः । (पृ० २१०) गर्गादि:-गर्ग, वत्स । वाजासे। संकृति अज ज्यानपात् विदभूत प्राचीनयोग । ( अगस्ति ) पुलस्ति चमस रेभ अग्निवेश शङ्ख शट शक एक धूम अवट मनस् धनञ्जय वृक्ष विश्वावसु जरमाण लोहित शंशित चक्षु वल्गु मण्डु गण्डु शक लिगुगुहलु मन्तु मक्षु आलिगु जिगीषु मनु तन्तु इत्यादि। (पृ० २११) बिदादि-बिद उर्व कश्यप कुशिक भरद्वाज उपमन्यु किलात किंदर्भ विश्वानर ऋष्टिषेण ऋतभाग हर्यश्व प्रियक आपस्तम्ब कूचवार शारद्वव शुनक धेनु गोपवन इत्यादि। (पृ० २११)शिवादिः-शिव प्रौष्ठ प्रौष्ठक चण्ड जम्भ भूरि दण्ड कुठार ककुम् (ककुभा) अनभिग्लान कोहित मुख सुख संधि मुनि ककुत्स्थ कहोड कोहड कहूय कहय रोध कपिझल (कुपिक्षल ) वतण्ड तृणकर्ण क्षीरहद जलहद परिल (पथिक) पिष्ट हैहय ( पार्षिक ) गोपिका कपिलिका जटिलिका इत्यादि। पृ०२१३) रेवत्यादिः-रेवती अश्वपाली मणिपाली द्वारपाली वृकपाली वृक- प्राह कर्णग्राह चामराह कवञ्चिन् वृकबन्धु । इति रेवस्थादिः। १७ ल० - MAHING २५ नोप का द शौक इ स्तेयम वाकीर २५८ लघुकौमुदी-परिशिष्टे पृ० २१५) मिक्षादि:-मिक्षा गर्भिणी क्षेत्र करीष अङ्गार चर्मिन् धार्मिन सहस्त्र युवति पदाति पद्धति अथर्वन् दक्षिणा भरत विषय श्रोत । इति भिक्षादिः। (पृ० २१७) क्रमादि:-क्रम पद शिक्षा मीमांसा । सामन् इति क्रमादिः । (पु०२१८) वरणादि:-वरणा शृङ्गी शाल्मलि शुण्डी शुयाण्डी तानपर्णी गोद आलिङ्गन्यायन जालपदी जम्बू पुष्कर चम्पा पम्पा वल्गु उज्जयिनी गया मथुरा तक्ष- शिला उरसा गोमती वलभी। इति वरणादिः । (पृ० २१८) यवादि:-यव दलिम ऊर्मि भूमि कृमि कुञ्चा वशा द्राक्षा धाक्षा भ्राज ( प्रजि ) ध्वजि निजि सिजि सजि हरित ककुत् मरुत् गरुत् इकु दु मधु । आकृतिगणोऽयं यवादिः। (पृ०२१९) नद्यादि:-नदी मही वाराणसी श्रावस्ती कौशाम्बी वनकौशाम्बी काशपरी काशफारी खादिरी पूर्वनगरी पाठा माया शत्व दार्वा सेतकी (वडवाया वृधे ) इति नधादिः। (पृ० २२०) गहादि:--ह अन्तस्थ सम विषम ( मध्यं मध्यंदिन चरणे) उत्तम मगध भूगर्भ पूर्वपक्ष अपरपक्ष अधमशाख समानग्राम शुक्रवृक्ष एकपलाश अवस्यन्दन कामप्रस्थ सौमिनि ब्याडि इत्यादि । आकृतिगणोऽयम् । इति हादिः । (१०२२२)दिगादि:-दिश वर्ग पूगा गण पक्ष धाय्य मित्रा मेधा अन्तर पथिन् रहस् अलीक उखा साक्षिन् देश आदि अन्त मुख जधन मेव यूथ (उदकात्संज्ञायाम्) ज्ञाय वंश वेश काल आकाश इति दिगादिः। (पृ० २२२) अनुशतिकादि:-अनुशतिक अङ्गारवेणु असिहत्य बध्योग पुष्करसत् कुरुकत उदकशुद्ध इहलोक सर्वपुरुष प्रयोग परखो राजपुरुषारण्यभि सूननड आकृति गणोऽयम् । इत्यनुशतिकादिः। (पृ० २२८) उगवादिः-गो हविस् अक्षर विष बर्हिः अष्टका स्खदा युग मेधा बुच ( नामिनभं च ) (शुनः संप्रसारणं वा च दीर्घत्वं तत्सन्नियोगेन चान्तोदात्तत्वम्) (ऊधसोऽनङ् च ) कूप खद दर खर असुर अध्वन् तर वेद बीज दास इति गवादिः । (पृ०२३०) दण्डादिः-दण्ड मुसल मधुपर्क कशा अर्थ मेघ मेधा सुवर्ण उदक वध युग गुहा भाग इस भङ्ग इति दण्डादिः। (०२३३) पृथ्वादि:--पृथु मृदु महत पटु तनु लघु बहु साधु आशु उरु गुरु बहुल खण्ड दण्ड चण्ड अकिंचन बाल वत्स होड पाक मन्दस्वादु हस्व दीर्घ प्रिय वृष ऋजु क्षिप्र क्षुद्र अणु । इति पृथ्वादिः । (पृ० २३२) दुढादि:--दृढ वृट परिवृढ ऋश कृश वक्र स्थिर देयांतलावमति- सनःशारदानाम् 'समो मतिमनसो जघन इत्यादिः । (पृ० २३३) तारकादिः-तारका पुष्प कर्णक मञ्जरी ऋजीष क्षण सून मूत्र नपुंसव औपग बुस्त ककुदा शिष्टा। दीनि ।
गणपाठ -- निष्क्रमण पुरीष उच्चार प्रचार विचार कुड्मल कण्टक मुसल मुकुल कुसुम कुतूहल स्तबक किसलय पल्लव खण्ड लेग निद्रा मुद्रा बुभुक्षा इत्यादि। (पृ० २३५) इष्टादिः-इष्टपूत उपासादित निगदित परिगदित परिवादित निक थित निषादित निपठित संकलित परिकलित संरक्षित परिरक्षित अर्जित गणित अक्ष कीर्ण आयुक्त गृहीत आम्रात श्रुत अधीत इत्यादि। (पृ० २३६) लोमादिः-लोमन् रोमन बघू हरि गिरि कर्क कपि मुनि तरु इति लोमादिः । पामादिः-पामन् वामन वेमन् हेमन् श्लेष्मन् कद् वलि सामन् उम्मन् कृमि । इति पामादिः । पिच्छादिः-पिच्छा उरस् धुवक ध्रुवक (जटाकालावटाक्षेपे) वर्ण उदक पङ्क प्रज्ञा इति पिच्छादिः । (पृ० २३७) बीह्यादि:-नीहि माया शाला शिखा माला मेखला केका अष्टका पताका चर्मन् कर्मन् वर्मन् दंष्ट्रा संज्ञा बडबा कुमारी नौ वीणा बलाका यखददी इति ब्रीह्यादिः। (पृ० २३७) अर्शादिः-मर्शस उरस् तुन्द चतुर पलिल जटा वटा बाटा सन अघ कर्दम अम्ल लवण अर्श लादिराकृतिगणः । (४० २४४) प्रचादिः--प्रज्ञ वणिज उशिज उणिज प्रत्यक्ष विदुर वेदन् गोडस् विद्या मनस् चिकीर्षत् चोर शत्रु योध चक्षुस् वसु एनस मरुत् क्रुञ्च सत्यत् दशाह बथस् असुर रक्षस् पिशाच अशनि कार्षापण देवता बन्धु इत्यादिः । (पृ०२४६)अजादिः-अजा एडका अश्वा चटका मूषिका बाला वत्सा होहापाका अन्दा विलाता पूर्वापहाणा उत्तरापहाणाला उष्णिहा देवविशा ज्येष्ठा कनिष्ठा सध्या मेति पुंयोगेऽपि कोकिला जातो, दंष्ट्रा एतेऽजादयः आकृतिगणोऽयम् । (पृ० २३७) गौरादिः--गौर मत्स्य मनुष्य शृङ्ग पिङ्गल हय गवय मुकच मृष्टय (पुट तूण) दुणु द्रोण हरिण कोकण ( काकण ) पटर उणक ( आमल) आमलक कुवत विम्ब बदर करक (कर्कर)तकार शर्कार पुष्कर शिषण्ड सालद शकण्ड सनन्द सुषमा सुषव अलिन्ड गडुल पाण्डश आढक आनन्द आश्वत्थ इत्यादिः । (पृ०२४८) बड्डादिः-बहु पद्धति भवति अङ्कति अंहति शकटि शक्ति शर.. शारिवारि राति राधि इत्यादिः, आकृतिगणोऽयम् । (पृ० २५३) कोडादिः-क्रोड नखखुर गोखा उखा शिखा बाल शफ शुक्र आकृ- तिगणोऽयम् , तेन भागगल घोण नाल भुज गुद कर इति क्रीडादिः । (पृ० २५३) शाङ्गरवादिः-शारिच कापटद गौगुलव ब्राह्मग वैद गौतम काम •ण्डलेय ब्राह्मणकृतेय आनिचेय आनिधेय आशोकेय वात्स्यायन नौञ्जायन कैकश कर काप्यकाव्य शैव्य एहि आश्वस्थ्य औदपान अराल चण्डाल बत्तण्ड भोगवत् गौरमा पशुता संज्ञायाम् नृनश्योवृद्धिश्च । पुत्र इति शारिवादिः । इति गणपाठः समाः । । ७ २५ दीप: का andee द भावे शौक औचि स्तेय वाकीर , परिशिष्ट (२) উত্মান্ধতছাতিঘর (१)व्याकरणम् व्याक्रियन्ते = शुत्पाद्यन्ते शब्दा अनेनेति-शब्दज्ञानजनकं व्याक रणम् , तच्च सूत्रम् । जिससे साधु शब्द का ज्ञान हो उसीका नाम व्याकरण है (व्याकरणका संक्षिप्त इतिवृत्त प्रस्तावनामें देखिये) (२) सूत्रलक्षणम् अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विश्वतो मुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ।। सूत्रोंके भेद-सज्ञा च परिभाषा च विधिनियम एव च । अतिदेशोऽधिकारश्च षड्विधं सूत्रलक्षणम् ॥ १. संज्ञासूत्रं यथा-वृद्धिरादैच , अदेङ्गुणः, इत्यादि । २. परिभाषासत्रम (कुव्यवस्थायां सुव्यवस्थासम्पादकं सूत्रम् ) यथा-श्रादेः परस्य, तस्मिन्नति निदिष्टे पूर्वस्य, इत्यादि । ३. चिधिसूत्रं यथा----इको यणचि, एचोऽयवायाचा, इत्यादि । ४. नियमसूत्रं यथा-कृत्तद्धितसमासाश्च, रात्सस्य, इत्यादि । ५. अतिदेशसत्रं यथा-स्थानिवदादेशोऽनलावधौ, तृज्वत्कोष्टुः, इत्यादि ६. अधिकारसूत्रं यथा-व्याप्प्रातिपदिकात , श्रार्धधातुके, इत्यादि । (सूत्रोंके प्रणेता महर्षि पाणिनि का इतिवृत्त प्रस्तावना में देखिये (३) वार्तिकलक्षणम् उक्ताऽनुक्तदुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्तते । तं ग्रन्थं वातिकं प्राहुतिकज्ञा मनीषिणः॥ ( वार्तिककार महामुनि कात्यायन का इतिवृत्त प्रस्तावनामें देखिये) (४) भाष्यलक्षणम् सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र वर्णैः सूत्रानुसारिभिः । स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाध्यं भाष्यविदो विदुः ।। महाभाष्य-प्रणेता भगवान् पतञ्जलिका इतिवृत्त प्रस्तावनामें पढ़िये (५) व्याख्यानलक्षणम् । पदच्छेदः पदार्थोक्तिविग्रहो वाक्ययोजना । आक्षेपश्च समाधान व्याख्यानं षड्विधं मतम् ।। (अष्टाध्यायीके व्याख्याकारों की समीक्षा प्रस्तावनामें पढ़िये) औपर बुस्त ककुद शिष्टा शुक्ला Com
विद्यार्थि-शिक्षासूत्रम्
छात्राणामुपकाराय हितमुपदिशाम्यहम् ।
येन जीवनमेतेषामुन्नतिप्रवणं भवेत् ॥ १॥
छात्रों के उपकारार्थ मैं कुछ हित बात बतलाता हूँ। जिससे उनका जीवन
उन्नतिशील हो ॥१॥
इन्द्रियाणि वशीकृत्य समाधाय मनस्तथा ।
प्रत्यहं प्रातरुत्थाय प्रभुं वन्देदतन्द्रितः ॥२॥
सबसे पहिले इन्द्रियोंको अपने वश में कर और मनको एकान बनाकर प्रति-
दिन सबेरे उठकर आलस्य छोड़कर ईश्वर की बन्दना करें ॥२॥
शौचस्नानादिकं कृत्वा सन्ध्याहवनमाचरेत् !
पूर्व पठितपाठानामावृत्ति नित्यशश्चरेत् ॥ ३॥
शौच, दन्तधापन, स्नान आदि शारीरिक पवित्रता सम्पादन कर सन्ध्या
(परमात्मचिन्तन) और हवन करें। तदुपरान्त पढ़े हुए पाठों का श्रावत न करें।
ततो गुरुमुखाद्ग्रन्थमाद्योपान्तं पठेन्मुदा।
शुरुशुश्रूषणं कृत्वा सततं पाठमभ्यसेत् ।। ४ ।।
तदनन्तर गुरुमुखसे अपने २ पाठों को पढ़े। बाद में गुरुकी यथोचित सेवा कर
निरन्तर पाठ का अभ्यास करें ॥४॥
परीक्षोत्तीर्णतार्थाऽपि योग्यता परमौचिती।
अर्जनीया सदा शिष्यैर्वा व्युत्पत्तिरन्ततः॥५॥
परीक्षामें सफलता प्राप्त्यर्थ उचित योग्यता प्राप्त करते हुये आन्तरिक
व्युत्पत्ति बढ़ाने की भी चेष्टा करें ॥ ५ ॥
व्युत्पत्तिमन्तरा जैव प्रतिपत्स्यात् कथंचन ।
अतो व्युत्पत्सुभिर्भाव्यं छानर्जिज्ञासुभिस्तथा ॥६॥
व्युत्पत्तिके विना कुछ भी पदार्थों का वास्तविक ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिये
विद्यार्थियों को व्युत्पत्ति की जिज्ञासा अवश्य रखनी चाहिये ॥ ६ ॥
समयस्य महामूल्यमज्ञात्वा य उपेक्षते ।
जीवनं तस्य व्यत्येति व्यर्थमेव न संशयः ॥७॥
जो विद्यार्थी समय की कीमत को नहीं जानकर (पढ़ने में) लापरवाही करता
है उसका जीवन निःसन्देह व्यर्थ ( कंटकाकीर्ण) हो जाता है ॥ ७ ॥
का वृक्षः पुंसि द मावे शौक्स औचि स्तेय बाकी इ विद्यार्थि-शिक्षासूत्रम् परीक्षा दातुकामो लेखशक्ति विवर्धयेत् । अल्पेनापि सुलेखेन परीक्षोत्तीर्यते ध्रुवम् ॥ ८॥ परीक्षा देनेवालोंको चाहिये कि लिखने की शक्तिको अच्छी तरह बड़ा क्योंकि थौड़ भी सुन्दर लेखोंसे निश्चितरूपेण परीक्षामें सफलता मिलती है ॥ ८॥ लेखशक्तिविहीनेन बहुअमयुताऽपि वा। परीक्षामुत्तरीतुं हा ! पार्यते न कथंचन ।।६।। उत्तम लेख करने में कमजोर छात्र अधिकसे अधिक मेहनत करने पर भी परोक्षा में सफलता प्राप्त नहीं करते ॥ ९ ॥ परीक्षाभवनं गत्वा मनश्वाञ्चल्यमुत्सृजेत् । निर्भीकतां समासाद्य शान्तचिन्तो भवेज्जनः ।।१०।। परीक्षाभवन में जाकर मनकी चञ्चलता को दूर कर हृदयसे भयको बिलकुल हटाकर प्रसन्नचित्त हो जाना चाहिये ॥ १० ॥ प्रश्नपत्रं गृहीत्वादौ प्रश्नान् सर्वान् निभाल्य च । उत्तरं विदितं सम्यगादौ लेख्यं सविस्तरम् ।। ११॥ पहले प्रश्नपत्र लेकर सब प्रश्नों को अच्छी तरह हृदयङ्गम करके सबसे पहिले जिस प्रश्न का उत्तर खूब उत्तम रूपसे श्राता हो उसीको लिखे ॥११॥ कालानुपातमाश्रित्य सारगर्भेण सत्वरम् । संक्षेपेणैव लेखेन प्रश्नानामुन्तरं लिखेत् ॥ १२ ॥ परीक्षा-समयके औसत को ध्यान में रखकर संक्षेपमें ही सारगर्भित लेखले अनिवार्य प्रश्नोंका उत्तर लिखना चाहिये ॥ १२ ॥ समयस्य समाप्नेः प्राक स्वासनं परिहाय च । केन्द्रान्न बहिर्गच्छेदनुतापोऽन्यथा भवेत् ॥ १३ ॥ समयके समाप्त होने से पहिले आसनको परित्याग कर परीक्षा भवन से बाहर नहीं निकालें, नहीं तो बड़ी हानि होगी ॥ १३ ॥ सिंहावलोकनन्यायात् शोधयेल्लिखितोत्तरम् । गच्छतः स्खलनन्यायात् जाता त्रुटिविनश्यति ॥ १४ ॥ अन्तमें लिखित उत्तरोंको आद्योपान्त एक निगाह डालकर संशोधित कर ले.. जिससे भ्रमवश लेखकी सारी भुलचूक दूर हो जायगी ॥ १४ ॥ नपुंस औपर ककुद ছি। शुक्ल RAUTER MHAN tant-IAYatra হাসিবুল 'पतिना रक्षिता सर्वा दाराभवति शोभना । सर्वा विधि गृहानां सा करोति मतिना मुदा ॥ १ ॥ कुन मिनास्तिद्रक्षिप्यामि "सखेरह विहिरवा सर्वकार्यानि "विभं दद्या बहुं धनम् ॥ २ ॥ प्रभुक्त्वा२१ रवं गृहेणाध आगतो सखिना सह । ५ ते गृह , १--पत्या, पतिशब्दस्य समासे एव घिसंज्ञत्वात् नामावो न भवति । २-रक्षिताः, दार- शब्दस्य 'दाराः पुंसि च भूम्नि एव' इति कोशात पुंलिङ्गत्वेन बहुवचनान्तत्वेन तविशेष- गानामपि पुंलिङ्गबहुवचनान्तत्वं युक्तम् , या विशेष्येषु दृश्यन्तै लिङ्गसंख्याविभक्तयः । प्रायस्ता एव कर्तव्याः समानाश्रयविशेषणे' इति नियमात् । ३-सर्वे, पुंल्लिङ्गदारविशेषणसर्व- शब्दस्यापि पुंल्लिात्वमेव । ४-भवन्ति, कर्तृवाच्ये क्रियायाः कर्तुरनुसारेणैव वचनव्यवस्थायाः सत्त्वात् । ५-शोभनाः, पूर्वोतनियमेन दारविशेषणशोभनस्यापि पुंल्लिङ्गबहुवचनान्तत्वेन भवितव्यम् । ६-सर्वम् , 'क्यन्तो दुः' इति लिङ्गानुशासनक्रमेण किप्रत्ययान्तविधिशब्दस्य पुल्लिङ्गत्वेन तद्विशेषणसर्वशब्दस्यापि पूर्वोक्तनियमानुसारेण पुंलिङ्गत्वं समुचितम् । 19--गृहाणाम् , अत्र 'अटकुप्वानुम्ध्यवायेऽपि' इति सूत्रेण ऋकार घटकरेफनिमित्तकं णत्वं युक्तम् । ८-ते, तच्छन्दस्य प्रक्रान्तपरामर्शकरवेन दारार्थबोधकतया पुंल्लिङ्गबहुवचनान्तत्वं समीचीनम् । ९-कुर्वन्ति, कर्तृवाच्ये क्रियायाः कर्बनुसारेणेव वचनव्यवस्थायाः सत्त्वेनात्र बहु- वचनान्तत्वमुचितम् । १०-मत्या, मतिशब्दस्य 'क्तिनन्तं नियामिति नियमेन स्त्रीलिङ्गत्वेन स्त्रियां नाभावनिषेधात् टाप्रत्ययस्य नादेशो न भवति । ११-तव, पादादौ स्थितत्वात् ते आदेशो न । १२ गृहम् , 'गृहाः पुंसि च भूमन्येव इति कोशात एकत्वे नपुंसकत्वमुचितम् । १३-मित्र ! अस्ति, सम्बोधनान्तत्वेन प्लुतत्वेन प्रकृतिभावात् सन्धिन। १४-द्रच्यामि, दृश्धातोरनिट्वेन इडागमो न। १५-सख्युः, सखिशब्दस्य धिसंज्ञानिषेधेन गुणादिकं न । १६-अहम् इल्परत्वाभावादनुस्वारो न । १७-विधाय, 'समासेऽनपूर्वे वरवोल्य- बिति' ल्यपि सति तकारादित्वाभावेन हि आदेशो न। १८-कार्याणि, रेफोत्तरत्वेन णत्वं युक्तम् । १९-विप्राय, दाधातुयोगे सम्प्रदानत्वेन चतुर्थी युक्ता । २०-बहु, धनशब्दस्य नपुं. सकत्वेन तविशेषणबहुशब्दस्यापि नपुंसकत्वम् । २१-प्रभुज्य, 'समासेऽनपूर्वे क्त्वो ल्यप् । २२-गृहात , अपाये पञ्चमी भवति । २३-आगतः, वा शरि' इति शरि परे विसों वा भवति । २४-सख्या, सखिशब्दस्य वित्वाभावेन नादेशोन। , १ २५६ नोप दीप ३२. १४ । का पुंसि गूढाशुद्धिप्रदर्शनम् । भ्रातर्वदीयमित्रोऽन्न नागतः केन हेतुना ॥ ३ ॥ त साकं गमिष्येऽहं नोचेत् प्रेमस्य बन्धने । मरिष्ये नात्र संदेहस्त्यजिष्यामि असुं निजम बर्मनानेन माच्छन्तः कमकुर्वन्ति ये नरः नमस्कृत्वा भुं यान्ति मरित्वा ते न संशयः ॥ ५ ॥ गुरुणा श्रुतिमधीते नाधीती शब्दानुशासनम् । न्यायशास्त्रमधीमन्तो लो बिभ्यन्ति केनचित् ॥६॥ ये नो ददन्ति२२ नो सुखते २३ पुनर्रमन्ति२४ योषितैः२५ । जाहित्या सर्व ते जान्ति जगतेऽस्मिन् विनिन्दितः ॥ ७ ॥ सन्धिस्त्वया न कर्तव्या२९ महती रितुणा सह । प्रायले ३१ विपत्ती धीरत्वं नो जहन्ति महजनाः फले इमेतिमधुरे३४ बाला जक्षन्ति " हर्षिताः३६ च अहोरात्रं रोदन्ति न कदाचनः नीचाऽपिथे नमस्यन्ति विष्णवे ४३ कुप्यन्ति नो नवा। प्राध्या ४ महत्बमाधास्ते चञ्चयन्ति "न सजनान् ॥ १० ॥ दा 33 भावे शौक औचि स्तेय वाकी इ द क्रीडन्ते 30-30 नपुंस " औपर १-भ्रातत्त्वदीयम् , 'विसर्जनीयस्य सः' इति खरि विसर्गस्य सत्वम् । २-भित्रम् , सखिपर्यायमित्र शब्दस्य नपुंसकत्वम् । ३-नागतम् , मित्र विशेषणत्वेन नपुंसकत्वम् । ४-त्वया, 'सड्युक्तेऽप्रधाने' इति तृतीया। ५-गमिष्यामि, गम्धातोः परस्मैपदित्वम् । ६-प्रेम्णः, प्रेमन्शब्दस्य नान्त- त्वेनादन्तत्वाभावात् स्यादेशो न । ७-अन्धनात्, हेती पञ्चमी। ८-मरिष्यामि, 'नियते- र्तुलितोश्च' इति लुङि लिङि शिति चात्मनेपदित्वेनात्र परस्मैपदित्वम् । ९-त्यक्ष्यामि, त्यज्धातोरनिट्वेनेडागमो न । १०-असून् , असुशब्दस्य 'पुंसि भूम्न्यसवः प्राणाः' इति कोशात् बहुवचनत्वम् । ११-निजान् , असुविशेषणत्वेनायापि बहुवचनान्तत्वम् । १२--वर्मना १३-कर्म । १४-नराः। १५-नमस्कृत्य । १६-मृत्वा । १७-गुरोः। १८-शब्दानुशासने। १९-अधीयानाः । २०-विभ्यति । २१-कस्माच्चित् । २२-ददति। २३-भुञ्जते। २४--पुनार- मन्ते । २५-योपिद्भिः। २६-हात्वा । २७-यान्ति । २८-जगति । २९-कर्तव्यः। ३०-महान् । ३१-प्राप्तायाम्।३२-जाति ३३-महाजनाः। ३४-इमे अतिमधुरे । ३५-जक्षति। ३६-हृष्टाः। ३७-क्रीडन्ति । ३८-चाहोरात्रः । ३९-अहोरात्रः । ४०-रुदन्ति । ४१-कदाचन । ४२-नीचा अपि । ४३-विष्णुम् । ४४-प्राप्य । ४५ वञ्चयन्ते । १ बुस्त शिष्टा शुक्ल --- न परिशिष्ट (३) शब्दरूपावलिः 'राम'शब्दस्य रूपाणि----- रामः, रामौ, रामाः। रामम्, रामो, रामान्। रामेण, रामाभ्याम, रामैः। रामाय, रामाभ्याम, रामेभ्यः । रामातू-रामाद , रामाभ्याम्, रामेभ्यः। समस्या, रामयोः, रामाणाम् । रामे, रामयोः, रामेषु । सम्बोधने-हे राम, हे रामौ, हे रामाः। 'निर्जर' शब्दस्य रूपाणि ( ई०४०, ५०)- निर्जरः, निर्जरलौ (निर्जरी ), निर्जरलः (निर्जशः)। निर्जरसन (निर्जरम्) निर्जरसी (निर्जरौ), निर्जरसः (निर्जरान्)। निर्जरखा(निर्जरेण), निर्जराभ्याम, निर्जरैः । निर्जरसे (निर्जराय), निर्जराभ्यान, निजरेभ्यः । निर्जरसः (निर्जरात्-द), ... निर्जराल्यान, निर्जरेभ्यः । निर्जरसः (निर्जरस्य), निर्जरलोः (निर्जरयोः ), निर्जरसा (निर्जराणास)। निर्जलि। (निर्जरे), निर्जरसोः (निर्जरयोः निजरे। निर्जर, है निर्जरसी (निर्जरी), हे मिर्जरसः (निर्जराः)। "सखि'शब्दस्या रूपाणि ( ई०३८,४१, ४३, ४७)- सखा, सखायौ, सखायः। सखायम ,सखायौ, साखीन् । सख्या, सखिभ्याम् , सखिभिः । सख्ये, सखिभ्याम, सखिभ्यः। सख्युः, सखिभ्यास, सखिभ्यः। सख्युः, सखयोः, सलीनाम् । सख्यौ, सज्योः, सखिषु । हे सखे, हे सखायौ, हे खखायः । 'क्रोष्ट' शब्दस्य रूपाणि- 'कोष्टा, कोष्टारो, क्रोष्टारः। कोष्टार, कोष्टारो, प्रोष्टून् । कोष्ट्रा-क्रोष्टुना, कोष्टुभ्याम् , कोष्टुभिः । क्रोष्टे-क्रोष्टवे, क्रोष्टुभ्याल, कोष्टुभ्यः । क्रोष्टुः-क्रोष्टोः, क्रोष्टुवाल, कोष्टुभ्यः । कोष्टुः-कोष्टोः, कोष्ट्रो:-कोट्टो, मोष्टूनान । कोष्टारि-कोष्टौ क्रोष्ट्रो: कोलोकोष्टुषु । हे झोष्टो, हे कोष्टारो, हे ऋोष्टारः । 'अतिवमूशब्दस्य रूपाणि ( ई०४०)- अतिचः, अतिचम्वी, अतिचम्वः । अतिचभूम, अतिचम्बौ, अतिचमून् । अतिचम्चा, अतिचमूभ्यान, अतिचमूभिः। अतिचम्ने, अलिचमूम्बान , अतिचमूभ्यः। अतिचम्वाः, अतिचमूभ्याम्, अतिचमूभ्यः। अतिचम्वाः, अतिचम्वोः,अतिवमूनाम्। अतिचम्वाम्, अतिचम्वोः, अतिचमूषु । हे अतिचमु, हे अतिचम्वौ, हे अतिचम्बः । 'पितृ'शब्दस्य रूपाणि (ई०४७)- पिता, पितरौ, पितरः। पितरम, पितरौ, पितॄन् । पित्रा, पितृभ्याम्, पितृभिः । पित्रे, पितृभ्याम्, पितृभ्यः । पितुः, पितृभ्याम, पितृभ्यः। पितुः, पित्रोः, पितृणाम् । पितरि, पित्रोः, पितृषु । हे पितः, हे पितरौ, हे पितरः। , an ७ Emausms HARYA ar २४ नीम दीपः " क भावे शौकत - ७ वाकी १ लघुकौमुदी--परिशिष्टे 'मति'शब्दस्य रूपाणि (ई०४२)---- माति, मती, मलया। मतिम , मती, मतीः। मत्या, मतिभ्याम् , मतिभिः ।। मौकातये, मतिभ्यान, मतिभ्यःमत्या मते, मतिभ्याम, मतिभ्यःमत्या मते, मत्योः, मतीनाम् । मस्यामती, मत्योः, मतिषु । हे मते, हे मती, हे मतयः। त्रिषु लिङ्गेषु द्वि-शब्दस्य रूपाणि (ई० ३८)-(द्विशब्दो नित्यं द्विवचनान्तः) धुंसिटी, द्वौ, द्वाभ्याम , द्वाभ्याम् , द्वाभ्याम् , द्वयोः, द्वयोः। स्त्रियाम्-वे, हे द्वाभ्याम् , द्वाभ्यास , द्वाभ्याम् , द्वयोः, द्वयोः। क्लीवे-द्वे, द्वे, द्वाभ्याम् , द्वाभ्याम् । द्वाभ्याम , द्वयोः, द्वयोः (त्यदादेः सम्बोधनञ्चास्ति)। গিন্তু लिङ्गेषु त्रिशब्दस्य रूपाणि (ई०३६)-(त्रिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः) पुंसि-त्रयः, नीन , निभिः, त्रिभ्यः, त्रिभ्यः, त्रयाणाम् , निषु । हे नयः। स्त्रियाम्- तित्रः, तिस्त्रः, तिसृभिः, तिसृभ्यः, तिलभ्यः, तिसृणाम् , तिसृषु । हे तिस्रः । कोबे- श्रीणि, त्रीणि, त्रिभिः त्रिभ्यः, निभ्यः, त्रयाणाम् , निघु। हे त्रीणि । 'इदम्' शब्दस्य त्रिषु लिङ्गेषु रूपाणि ( ई० २७, ४५)- पुल्लिङ्गे- अयम् , इमो, इमे । इमम् (एनम), इमौ (एनौ), इमान् (एनान्)। अनेन (एनेन), आभ्याम् , एभिः । अस्सै, आभ्याम् , एभ्यः। अस्मात् , आम्यान, एभ्यः । अस्य, अनयोः (एनयोः), पुषाम् । अस्मिन् , अनयोः एनयोः, एषु । स्त्रीलिओ-इयम् , इमे, इमाः। एमाम (एनाम् ), इमे (एने), इमाः (एना)। अनया (एनया), आभ्याम, आभिः । अस्य, आभ्याम् , आभ्यः । अस्याः, आभ्यान, आभ्यः । अस्याः, अनयोः (एनयोः), आसाम् । अस्याम् , अनयोः (एनयोः), आसु । नपुंसके-इदम् , इमे, इमानि । इदम (एनत्-द), (एने), इमानि (एनानि)। अनेन (एनेन), आभ्याम् , एभिः । अस्मै, आभ्याम् , एभ्यः । अस्मात् , आभ्याम् , एभ्यः। अस्थ, अनयोः (एनयोः), एषाम् । अस्मिन् , अनयोः (एनयोः), धुषु थिदादेः सम्बोधनं नास्ति। 'राजन्'शब्दस्य रूपाणि ( ई०४१)- হালা, তালানী, খাল। খালাল , হালালী,হাঃ। বালা, জয়া,খালজি। राज्ञे, राजभ्यान, राजभ्यः । राज्ञः, राजभ्याम् राजभ्यः । राज्ञः, राज्ञोः, राज्ञाम् ।। राजि-राजनि, राज्ञोः, राजसु । हे राजन् , हे राजानौ, हे राजानः । "मघवन् शब्दस्य रूपाणि (ई०४०,४६)- तृज्वदभावपक्षे-मघवान् , मघवन्ती, मधवन्तः। मधवन्तम्, मघवन्ती,मघवतः। मधवता, मघवयां, मघवद्भिः। मघवते, मघवद्भ्यां मघवद्भ्यः। मधवतः, मघवयां, मधवनयः। मधवतः, मधवतो, मघवताम् । मधवति, मघवतोः, मधवत्सु। हे मघवन् , हे मघवन्तौ, हे मघवन्तः। नपुंस औप MINFES शिष्ट शुक् a a . गोड (९)मोची-नावाची गोषी पाया गवाचि-गोअश्वि-गोचि (३)। शब्दरूपावलिः। २६७ तुज्वभावाऽभावपक्षे-मधवा, मघवानी, मघवानः । मधवानम् , मधवानी, मघोनः । मघोना, मघवन्या, मधवमिः। मघोने, मघवन्या, मघवस्यः । मधोना, मनवभ्यां मधवभ्यः। मघोना, मघोनो:, मघोनाम् । मघोनि, मघोनो, मघधसुहे मवचन , हे मघवानी, हे मघवानः। 'युष्मद्' शब्दस्य रूपाणि (ई० ३७, ४७) त्वम् , युवान ,यूयम् त्वाम् , युवाम् , युष्मान् । स्वया,युवाभ्याम, युष्माभिः। सुभ्यम् , युवाभ्याम् , युष्मभ्यम् । त्वत् , युवाभ्याम् ,युष्मत्। तब, युधयोः,युष्याकम, स्वयि, युवयोः, युष्मासु "अस्मद्'शब्दस्य रूपाणि (ई० ३६)---- अहम , आवाम् वयम्। मासू, आचा, अस्मान्। स्था, अवास्यास, अस्माभिः ।माम,आवाभ्याम्, अस्मभ्यन मन , आवाभ्याम् अस्मत् । मम,आवयोः अस्माकम् । मयि, आवयोः, अस्मासु। (युष्मदस्मदपटानकाखिषु लरूपाः 'अदस्'शब्दस्य त्रिषु लिङ्गेषु रूपाणि ( ई०४८) पुल्लिङ्ग- असो, अनू, अमी। अमुम् , अभू , अभून् । अमुना, अमूभ्याम् » भमीभिः। अमुल्सै, अमूभ्याम् , अमीभ्यः। अमुष्मात् , अमूभ्याम् , अभीभ्यः । अमुष्य, अमुयोः, अमीषाम् । अमुस्मिन् , अमुयोः, अमीषु । स्त्रीलिङ्ग-असो, अमू, असूः। अमूम् , अमू, अमूः। असुया, अमूल्याम् । सामूभिः । अमुष्य, अमूभ्याम् , अमूभ्यः । अमुध्याः, अमूभ्याम् । अमूभ्यः । अमुल्या अमुयोः, अमूषाम् । अमुष्याम्, अमुयोः, अभूषु । नपुंसके-अदः, अमू, अमूनि । पुनरपि तथैव, शेषं पुंबवत् । 'चतुर'शब्दस्य त्रिषु लिंगेष रूपाणि (ई० २७, ४७.)---- पुल्लिङ्ग- चत्वारः, चतुर, चतुर्भिः, चतुभ्यः, चतुर्व्यः, चतुर्णा , चतुर्थं, है- चत्वारः। स्त्रीलिङ्ग-चतवः, चतस्त्रः, चतसृभिः, चतसुभ्यः, चतसम्या, चत गाम , चतसृथु, हे चतस्रः। नपुंसके- चत्वारि, चत्वारि, चतुभिः, चतुः, चसुभ्यः चतुर्णा , चतुर्यु, हे चत्वारि । (चतुर्-शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः।) गवाक्छब्दस्य रूपाणि- गवाक्छब्दस्य रूपाणि क्लीबेऽर्चागतिभेदतः । असन्ध्यवर्वरूपैर्नवाधिकशतम्मतम् । मसुप्सु नवषड्मादौ पटके स्युस्त्रीणि जश्शसोः। चत्वादि शेषे दशके रूपाणीति विभावय ॥२॥ प्रथमाथां (१६)-गवाक्-गवार-गोल-गोअग-गोड-गोड , गवाड्-गोमा- द्वितीयायां (१६) पूर्ववत् । तृतीयायां (१६) गोचा गवाञ्चा-गोअञ्या गोऽञ्चा (४)। . D M tara गो: (४) बान्यानो भग्याम्भ्याम्, बावाभ्याम्-गोमडूक्यान- श्याम (६) । वाग्भ्य:-गोअभ्यः, योऽस्या, गवाझ्यः- २४ लघुकौमुदी-परिशिष्टे নঃস্বাভাযা--siথা, মাথা-- বীজু-ঘীজুয়া)। गवाग्भिः-गोअग्भिःभोऽम्भिः भवामिा-गोअभिः-गोऽभिः (6)। चतुर्थ्या (१६)-गोचेभावाञ्चे-धोम-बोच्चे ()। गवाक्ष्या-गोअग्ल्याम्-गोरभ्याम् । गवाझ्याम्-गोअझ्याम्-गोऽभ्याम् (६)। गवाग्भ्यः-गोअग्भ्यः-गोऽअभ्यः, गवाझ्या गोअझ्यः, गोऽभ्यः (६)। पञ्चभ्यां (१६)-गोचावाचः-गोमव:- दा गोऽभ्यः (६)। षष्ठयां (१२)-गोचा-गवाञ्चः--गोअञ्चः-गोऽञ्चः (४)। गोचो:-- गवाहो-गोअञ्चोः-गोऽयोः (8)। गोचाम्-गवाञ्चाम्मू-गोअनाम्-गोऽवाम (8)। सप्तभ्यां (१७)-गोचि-पावाञ्चि-गोअलि-गोचि (१)।गोचो-गवाञ्चोः गोअञ्चो: जोऽयोः (१)। गवाक्षु-गोअनु-गोऽनु, गवाक्षु-गोअछु-गोऽङछु, गवाधु- गोअघु-गोऽऽ (९)। (सर्व मिलित्वा १०९ रूपाणि भवन्ति ।) . saHAM भ HA Hawat ta . . ७ ७ । , १ १ धातुरूपावलिः भू सत्तायाम्- लर-भवति, भवतः, भवन्ति । भवसि, भवथः, अवथ । भवामि, भवावा, भवामः । लिट-बभूव, बभूवतुः, बभूवुः। बभूविथ, बभूवथुः, बभूव । बभूव, बभू- बिब, बभूमिम । लुट-सविता, भविमारी, भविवारः। भवितालि, भवितास्था, भवि- तास्थ । सवितालिम, भादितास्वः, भवितास्मः। लुट् - -भविष्यति, भविष्यता, भविष्य- अन्त । अविवालि, भविष्यथा, भविष्यथ । भविष्यामि, भविष्यावः। भविष्यामः । लोट- अचतु-सवतात, भवताम् , अवन्तु । सव-मवतात् ,भवत , भवत। सवानि, भवाव, भवाम लह-अभवत् , अभवता,अभवन् । अभवः अभवतम, अभवत। अभ. वम् , अभचाव, अभवाम । लिङ्-- भवेत् , भवेताम् , भवेयुः, । भवेः, भवेतम् , मवेत । अवेषाम् , भवेव, भवेम । आ० लिङ्-भूयात् भूयास्तास, भूयासुः। भूया, भूयास्तम्, भूयास्त भूयासम्, भूयास्व, भूधास्म । लुड्-अभूत, अभूताम, अभूवन् । अभू, अभूतम् , अभूत । अभूवन,अभूव, अभूम लङ्ग--अभविष्यत्, अमविष्यताम्, अभ- विष्यन् । अभविष्या, अभविष्यतम् , अभविष्यत । अभविष्यम् , अभविष्याच, अम- विष्याम। १ 3 , ta एध वृद्धौ- लट्-एधते, एधेते, एधन्ते। एधसे, एधेथे, एधध्वे । एथे, एधावहे, एधामहे । लिट--एधानके, एधानकाते, एवाञ्चक्रिरे एषाचकृषे, एधामकाथे, ७ , . धातुरूपावलिः २६६ एधाचावे, एधाश्चने, एधाकृवहे, एधाकृमहे । लुट ---- एधिता, एधि. तारी, एधितारः । एधितासे, एधितासाथै, एधितावे । एधिताहे, एधिता- स्वहे, एधितास्महे । स्ट- टुधिष्यते, एधिध्येते, एधियन्ते । शुधिष्यसे, एधित गयेथे, एधिष्यध्वे । एधिष्ये, एधिष्यावहे, एधिप्यामहे । लोट ---एक्षताम् , एधेताम, एधन्ताम् । एधस्व, एधेथाम , एधध्वम् । एथै, एधाव है, एधामहै। लङ्---ऐधता ऐधेताम् , ऐधन्त, ऐधथाः, ऐधेथान , ऐधध्वम् । ऐधे, ऐधावहि, ऐधामहि । लिक --- एधेत, एधेयाताम् , एधेरन् । एधेथाः, एधेगाथाम् , एधेध्वम् । एधेय, एधेबहि, एधे. महि । आ.लिक - एधिचीष्ट, एधिषीयारताम् , एधिषीरन् । एक्षिषीष्ठाः, एधिषीया- स्था , एक्षिषीध्वम् । एधिषीय, एधिषीवहि, एधिषीमहि । लुड-ऐधिष्ट, ऐधि- पाताम् , ऐधिषत। ऐधिष्ठाः, ऐधिपाथाम् , ऐधिध्वम् ऐधिवम् । एनिधि, ऐशिवहि, ऐधिष्महि । ल-ऐशिष्यत, ऐधिप्येताम , ऐधिष्यन्त । ऐधियथाः, ऐधिवष्येथाम् । ऐधिव्यध्वम् । ऐधिष्ये, ऐधिव्यावहि, ऐधिष्यामहि । विद ज्ञाने- लट-बेद, विदतुः, विदुः। बेस्थ, बिदथुः, विद । वेद, विद्व, विद्म ! अथवा-वेत्ति, वित्तः, विदन्ति । वेरिल, विस्था, विस्थ । वेशि, विदः, विद्यः । लिट-दिवेद, विधि- दतुः, विविदुः । विवेदिथ, विविदथुः, चिविद । विवेद, विविदिक, विविदिख । अथवा-~ विदांचकार, विदांचक्रतुः, बिदांचनः । विदांचकर्थ, विदचक्रथुः, विदांचा । विदा यकार विदांचकर, विदांचव, विदांचकुस । एवं विदाम्बभूबे यादि विदामासेत्यादि च लुट-वेदिता, बेदितारी, वेदिताः। वेदितालि, वेदितास्था, बेदितास्थ । वेदिताहिम, बेदितास्वा, वेदितास्मः । ल. -वेदिष्यति, बेदिष्यतः, वेदिप्यन्ति। वेदिप्यलि, बेदि- व्यथा, वेदिष्यथ । वेदिष्यामि, वेदिष्यावः, वेदिष्यामः। लोट -विदाकरोतु विदाङ- कत्तात् , विदारुताम् , विदाकुर्वन्तु । विदाङ्कुरु विदाङ्कुरुतात्, विदाङ्गुरुतम्, बिदाङ्क- रुत । विदाङ्करवाणि, विदाङ्करवाव, विदाङ्करवाम । अथवा-वेत्तु-वित्तात् , बित्ताम् विदन्तु । विद्धि-वित्तात्, वित्तम् , वित्त । वेदानि, वेदाव, बेदाम। लङ्-अवेत् , अवि. त्ताम, अविदुः। अवो-अवेत् , अवित्तम् ,अवित्त । अवेदन , अविद्व, अविझ । लिङ्- विद्यात् , विद्याताम् , विधुः। विद्याः, विधातम् , विद्यात । विद्याम् , विधाव, विद्याम। औ. लिङ्ग---विद्यात् , विद्यास्ताम्, विद्यासुः। विद्याः, विद्यास्तम्, विधास्त । विद्यासम, विद्यास्व, विद्यास्म । लुङ- अवेदीत् , अवेदिष्टाम् , अवेदिषुः । अवेदी:, अवेदिष्टा , अवेदिष्ट । भवेदिषम् , अवेदिष्ट, अवेदिष्म । लङ अवेदिष्यत् , अवेदिप्यताम् । अवेदिध्यन । अवेदिष्यः, अदिष्यतम् , अवेदिष्यत । अवेदिष्यम् , अवेदिष्याब, अवेदिण्याम। ब्रू व्यक्तायां वाचि- ल-भाह, आहतुः, आहुः । आत्थ, आहथुः, ब्रूथ । ब्रवीमि, मा, श्रूमः । , 9 - ७ - ५ BHACHA IRANP GENU , १ . . -जवाजवत: ऊचुः उवविथ उबक्थर उचथु ऊच लघुकौमुदी-परिशिष्टे अथवा अधीति, भूतः, ब्रुवन्ति । अवीषि, 5था, बेथ । बीमि, बुवा, भूमः उपच, अचिव, अचिम । लुट्-वक्षा, वक्तारी, वकारः । वक्तासि, बतास्था, वक्तास्थ। वत्कास्मि, वक्तास्वः, वक्तास्मः । रुट-वक्ष्यति, वदयतः, वयन्ति । वयसि, बच्यथः, वक्ष्यथ । वक्ष्यामि, वक्ष्याव:, वच्यामः । लोट-ब्रवीतु-ब्रूतात्, भृताम्, अन्तु । ब्रूहि-ब्रूतात्, बेगम, ब्रूत। ब्रबाणि, बवाव, अवाम । लङ्-अब्रवीत् , गो अत्ताम, अब्रवन् । अवयोः, अब्रूतम्, अब्रूत । अब्रयम्, अध, अब्रूम । लिङ ---- गोड वयात ,याताम्, ब्रूयुः। धाः, ब्रूयातम, ब्रूयात । ब्रूयाम्, ब्रूया, ब्रूयाम । आ लि-उच्यात्, उच्यास्तान, उच्यासुः। उच्याः, उच्यास्तम, उच्चारत । च्यालन, उच्याच, उच्यास्म । लुङ्--अवोचत् , अवोचताम, अवोचन् । अवोचा, अवोचतम, अबोचत । अवोचम्, अवोचाव, अवोचाम। लड-अवयत् , अवच्या- ताम् अवश्यन् । अवश्यः, अवश्यतम्, अवश्यत । अवश्यम्, अवषयाव, अवच्थाम। अथात्मनेपदरूपाणि लट -ब्रूते, ब्रुवाते, ब्रुवते । बूषे, ब्रुवाथे, अ॑ध्वे । बुधे, बहे, महे । लिट-कचे, ऊचाते, चिरे। ऊचिषे, ऊचाथे, अविध्वे । ऊचे, अचिवहे, अधिमहे । लुट-बक्का, धकारी, वकारः। वकासे, वकासाथे, वक्ताचे । वक्ताहे, वास्थहे, वक्तास्महे । लट्-वच्यते, वक्ष्येते, वच्यन्ते । वयसे, वयेथे, वयध्वे ।। वक्ष्ये, वक्ष्याबहे, वयामहे । लोट -बेनाम, बुवालाम, ब्रुवताम् । बेज्व, अनाथाम अध्वम् । अवै, प्रवावहै, बवामहै। ल-अब्रूत, अनुवाताम्, अब्रुवत । अबेथाः, अब्रुवाथाम्, अबुध्वम् । अत्रुवि, अबेयहि, अबेमहि । लिक-ब्रुवीत, ब्रुवीयातामा , झुवीरन् । ब्रुवीथाः, ब्रुवीयाथाम, ब्रुवीध्वम् । ब्रुवीय, ध्रुवीवहि, ब्रुवीमहि । आ.लिङ्- वक्षीष्ट, वक्षीयास्ताम्, वक्षीरन् । बक्षीष्टाः, वक्षीयास्थाम, वक्षीध्वम् । वक्षीय वत्ती- वहि, वक्षीमहि । लुज-अबोचत, अबोचेताम्, अवोचन्त । अवोचथाः, अबोचेथाम्, अवोचध्वम् । अबोचे, अवोचावहि, अवोचामहि । लङ-अवयत, अवच्येताम् , अ. वयन्त । अवश्यथाः, अवक्ष्येथाम, अवयध्वम् । अवये, अवक्ष्यावहि, अवक्ष्यामहि । अस् भुवि सत्तायाम्- अस्ति, स्ता, सन्ति । असि, स्था, स्थ। अस्मि, स्वः, स्मः । लिट् लुट् लटां बभूव- भविता-भविष्यति इत्यादीनि भूबद्रूपाणि । लोट्-अस्तु-स्तात् , स्ताम्, सन्तु । एधि- विष्य तात्, स्तम्, स्त । असानि, असाय, असाम । लङ-आसीत् , आस्ताम, आसन् । विषय भासी, मास्तम्, आस्त । आसम, आस्व, आस्म । लिङ-स्थात् , स्यातास, स्युः। त्या, स्यातम्, स्थात । स्थान, स्थाव, स्याम । आशीलिंछ -लुङ-लय भूयात् अभूत अभविष्यत् इत्यादीनि भूवद्रूपाणि । शक्ल शक्याथे- एकट-शक्नोति, शक्नुता, शक्नुवन्ति । शक्नोषि, शक्नुधः शक्नुथ । शक्नोमि . । - ७ । P १ , ७ । . धातुरूपावलिः । २११ शक्नुवः, शक्नुमः । लिट-शशाक, शेकतुः, योक शेकिथ शशक्थ, शेकथुर, शेक। शशाक शशक, शेकिव, शेकिन । लुट्शका, , शक्कारी, शक्कारः । शक्कासि, शक्तास्था, शकास्थ । शतालिम, शहारना, शाकास्मः। लट ----शचयति, शक्यतः, शचयन्ति । शयासि, शयथः, शस्यथ । शपयामि, शचयावा, शक्ष्यामः । लोट ---शक्नोतु-श- अनुतात्, शक्नुताम्, शक्नुवन्तु । शाक्नुहि शक्नुतात्, शक्नुतम, शक्नुत । शक्नवानि, शक्नवाव, शक्नवाम ! लङ - अशक्नोत् , अशक्नुताम, अशक्नुवन् । अशक्नोः, अश. अनुतम्, अशक्नुत । अशक्नवा, अशक्नुव, अशक्नुम । लिक --- शक्नुयात् , शक्नु याताम्, शाक्नुयुः। शक्नुयाः, शानुदासम्, शक्नुयात । शक्नुयाम, शक्नुयाव, शक्नुः याम। आ. लिङ-शक्यात् , शक्यास्ताम्, शक्यासुः। शक्या, शक्यास्तम्, शक्यास्त। शक्यासम्, शक्यास्व, शक्यास्म । लुङ- अशकतू , अशकताम् , अशकन् । अवाका अशकतम,अशकतो अशकम्, अशकाव, अशकाम ल-अशक्यत, अशयवान জাৱাৰ । আহা হা, হন। স্বল্প, শুভশ্বন, হাল कृञ् करणे-- लट -करोति, कुरुतः, कुर्वन्ति । करोषि, कुरुया, कुस्थ । करोमि, कुर्वः, कुर्मः। लेट-चकार, चक्रतुः, चक्षुः । चकर्थ, चक्रथुः, चक्र । चकार-चकर, चकृव, चक्रम । लुट-कर्ता, कर्तारी, कारः । कर्तासि, कास्था, कास्थ। कर्तास्मि, कर्तास्वर, कर्तास्मः । ट-करिष्यति, करिष्यतः, करिष्यन्ति । करिष्यसि, करिष्यथा, करिष्यथ । करिष्यामि, करिष्यावः, करिष्यामः । लोट-करोतु-कुरुतात् , कुछताम, कुर्वन्तु । कुरु-कुरुतात् , कुल्तस् , कुरुत। करवाणि, करवाय, करवाम | लड अकरोत् , अकुरुताम् , अकुर्वन् । अकरोः, अकुरुतम् , अकुरुत । अकरवम् , अकुर्व अकुर्म । लिल-कुर्यात् , कुर्याताम् , कुयुः । कुर्याः, कुर्यातम् , कुर्थात । कुर्यामा । कुर्याव, कुर्याम । आ० लिङ-कियात्, क्रियास्ताम्, क्रियासुः। क्रियाः, क्रियास्तम, क्रियास्त । क्रियासम्, क्रियास्व, क्रियास्म । लुल-अकार्षीत् , अकाम, अकार्षः । अकार्षीः , अकाष्टम् , अकार्ट । अकार्षम् , अकावं, अकामा छ --अकरिष्यत् , अकरिष्यताम्, अकरिष्यन् । अकरिष्यः, अकरिष्यतम् , अकरिष्यत । अकरिष्यम् । अकरिष्याव, अकरिष्याम । अथात्मनेपदरूपाणि लट-कुरुते, कुर्वात, कुर्वते । कुरुषे, कुर्वाथे, कुरुध्वे । कु, कुर्वहे, कुर्महे । लिट-च, चनाते, चन्किरे । चवथे, चना, चढ़वे । चक्रे, चकृवहे, चकमहे । लुट ----कर्ता, कर्तारौ, कारः । कर्तासे, कासाथै, कर्तावे।कर्ताह कास्वहे कास्महे। लटकरिष्यते, करिष्येते, करिष्यन्ताकरिष्यसे, करिष्येथे, करिष्यवे। करिष्ये, करिष्यावहे, करिष्यामहे । लोट-कुरुताम्, कुर्वाता कुर्वताम् । कुरुष्व, कुर्वाधा, कुरुध्वम् । करबै, करवावहै, करवामहै। लछ-अकुरुत, अकुर्वाताम् , अकृर्वत । अकुरुथा, अकुर्वाथाम , अकुरुध्वम् । अकुर्वि, अकुर्वहि, अकुर्महि । लिछ-कुर्वीत, कुर्वीयाताम्, कुरिन् । कु था, कुर्वीयाथाम, कुध्विम् । " .
स शि । गांड न गोड १ कोड -100 २७२ लघुकौमुदी-परिशिष्टे कुर्वीय, विहि कुर्वीमहि । आ० लिङ-कृषीष्ट, कृषीयास्ताम् , कृषीरन् । कृषीष्ठा, कृषीवास्थाम, कृषीढ्वम् । कृषीय, कृषीवहि, कृषीमहि । लुङ्---अकृत, अकृधातान अकृपत । अकृथाः, अकृषाथाम् , अकृवम् । अकृषि, अकृष्वहि, अकृष्महि । लङ्-- अकरिष्यत, अकरिष्येतान, अकरिष्यन्त । अकरिष्यथाः, अकरिष्येथान, अकरिष्य. श्वम् । अकरिष्ये, अकरिष्यावहि, अकरिष्यामहि । ण्यन्तभूधातुः- -भावयति, भावयतः, भावयन्ति । भावयसि, भावयथः, भावयथ । भाव- याभि, भावयावः, भावयासः । लिट-मावयाञ्चकारेत्यादि भावयाम्बभूवेत्यादि भावया- मासेत्यादि च । लुट -भावथिला, भावयितारी, भावयितारः । भावयिताति, भावयि. तास्था, भावधितास्थ । भावयितास्मि, भावयितास्वः, भावयितास्मः। लट -भाव- विष्यति, भाववियतः, भावयिष्यन्ति, भावविध्यालि, भावयिष्यथा, भावयिष्यथ । भावयिष्यामि, भावयिष्याव:, भावयिष्यामः। लोट-भावयतु-भावयतात् भावथ. ताम्, भावयन्तु । भावय-भावयतात्, भावयतम्, भावयत। भावयानि,भावयाव, भावयामः । लङ-अभावयत्, अभावयताम, अभावयन् । अभावयः, अभावयतन, अभावयत । अभावयम्, अभावयाव, अभावयाम । लिक-भावयेत् , माधयेताम, भावयेयुः। भावोः, भावयेतम, भावयेत भावयेयम्, भावयेव, भावयेम। आ.लिङ, भाव्यात, माब्यास्तान, माध्यासुः । भाव्याः, भाव्यास्तम, भाव्यास्त । माध्यासने, भाव्यवास्व, माव्यात्म लुक-अबीभवत् , अबीभवतास् , अवीभवन् । अबीभवः, अबीसवतम्, अवीमचल । अबीभवन,अबीभवान, अबीमवाम । लङ-अभावनि- ध्यत् , अभावयिष्यताम, अभावयिष्यन् । अमावयिष्यः, अमावयिष्यतम्ब, अभाव- यिष्यत । अभावयिष्यम्, अभावयिष्याव, अभावयिष्याम । सन्नन्तभूधातुः लट -बुभूपति, बुभूषतः, बुभूपन्ति । बुभूपसि, बुभूषथः, बुभूषथ । बुभूषामि, दुभूषावः, बुभूषामः । लिट-बुभूषाञ्चकारेत्यादि बुभूधाम्बभूवेत्यादि बुभषामासेत्यादि च । लुट -बुभूषिता, बुभूषितारो, बुभूषितारः। वुभूषितासि, बुभूषितास्थः,बुभूषितास्थ। बुभूषितास्मि, बुभूषितास्वः, बुभूषितास्मः। लुट -त्रुभूषिष्यति, बुभूषिष्यतः, बुभूषि. व्यन्ति । बुभूषिष्यसि, बुभूषिष्यथः, बुभूषिष्यथ । बुभूषिष्यामि, बुभूषिष्यावा, बुभूषिष्यामः । लोट-बुभूपतु-बुभूषतात् , बुभूषताम्, बुभूषन्तु । बुभूष-बुभूषतात्, बुमषतम्, बुभूषत । बुभूषाणि, बुभूषाव बुभूषाम । उङ-अबुभूषत्, अबुभूषताम, सबुभूषन् । अबुभूपः, अबुभूषतम्, अबुभूषत । अबुसूपम, अदुभूषाव, अबुभूपाम। लिइ-बुभूषेत् , बुभूषेताम् , बुभूषेयुः । बुभूषेः, बुभूषेतम्, बुभूषेत । बुभूषेयम् बुभूषेव, बुभूषेम । आ.लिङ -भूष्यात , बुभूयास्ताम्, बुझ्ष्यासुः । बुभूण्याः, बुभूप्यास्तम्, बुभूयास्त। बुभूयासम्, बुभूष्यास्च, बुभूष्यास्म ।लुङ-अवुभूषीत् , . -- भूब चित at AA १ ७ , " १ धातुरूपावलिः । अनुभूषिष्टाम् , अबुभूषिषुः । अनुभवीः, अबुभूषिष्टम्म , अनुभूषिष्ट। अबुभूषिषम् अनु. भूपिन, अबुभूषिष्म । ला--अबुभूषिध्यत् , अबुभूषिष्यताम , अनुभूषिष्यन् । अक्षु- भूधिया, अनुभूषिषयतम् अत्रुभूषिष्यत्व अनुभूषिष्य, अनुभूषिष्यावा, अबुभूषिष्याम अवतद्धि- लाट-बोभूयते, बोस्येते, बोभूदन्ते । बोभूय से, बोभूयेथे, चोभूयध्वे । बोभूये, बोभूयावहे, बोमयामहे । लिट्-शोभूयाञ्चके इत्यादि बोभूयाम्बभूवेल्यादि नोभूयामासेत्यादि च पूर्ववत । लुट-बोभूयिता, बोभूयितारो, बोभूयितारः । बोभूयितासे, बोभूषितासाथे, बोभूयिताध्वे । बोभूषिताहे, बोभूयितास्वहे, बोभूयितास्महे । लट्-बोभूमिप्यते, बोभूयिष्येते चोभूयिष्यन्ते बोभूमिप्यसे, बोभूयियेथे, बोभूयिष्यध्वे । बोभूयिष्ये, बोभूविण्याबहे, बोभूयिष्यामहे । लोट-बोभूयताम , बोभूयेता , बोभूयन्ताम् । बोभूयारब, बोसूचान, बोभू- यध्वम् । बोभूस, बोभूयावहै, सोनूयामहै। ला- अनोभूयत्त अबोभूयेताम अबोभूयन्त ! अबोभूयथाः अबोभूयेथाम् अधो- भूयनम् । अबोभूये अबोभूयायहि अबोभूयामहि । लिड-बोभूवेत, बोभूयेयाताम्, बोभूयेरन् । बोभूयेथाः, बोभूयेयाथान, बोभू. येध्वम् । बोसूयेश, बोभूयेवाह, बोभूयेमहि । आ० लिङ-बोभूयिषीष्ट, बोन्यूयिषीयास्ताम् , बोभूयिषीरन् । बोभूमिग्रीष्ठाः, बोअयिषीयास्थान , बोभूयिषीध्वं ब्वम् । बोभूविधीया, बोभूयिषीवहि । बोभ- यिषीमहि। लुङ---अबोभूमिष्ट अबोभूयिषाताम् अबोभूयिषत । अबोभूयिष्ठाः, अबोभूयिषा- थाम अबोभूमिध्वम् । अबोभूयिधि, अबोभूयिष्यहि, अबोभूविषमहि । ला--अबोभूयिष्यत, अबोभूमिप्येताम् , अबोभूयिष्यन्त । अबोभूयिष्यथाः, अबोभूयिष्येथाम् , अवोभूयिष्यध्वम् । अबोभूमिप्ये, अबोभूथियावहि, अनो- भूयिष्यामहि । भवतेर्यब्लुकि- लट-बोभवीति-बोभोति, बोभूना, बोमुवति । बोमवीषि-बोभोषि, बोभूयः, बोभूथ। बोभवी मि-बोभोमि, बोभूवः, बोभूमः । लिट्--बोभवाञ्चकारेत्यादि बोभवा म्बभूवेत्यादि बोमवामासे त्यादि च । लुट-बोमविता, बोभवितारो, बोभवितार बोभ- वितासि, बोमवितास्था, बोभवितास्था बोभवितास्मि, बोभवितास्वः, बोमवितास्मः। लूट-बोभविष्यति, बोअविष्यतः, बोभविष्यन्ति । बोभविष्यसि, बोभविष्यथः, बोभविष्यथ । बोभविष्यामि,बोअविष्याव:, बोभविष्यामः। लोट-बोभवीतु-बोभो- तु-बोभूतात , बोभूताम ,बोभुवतु।बोभूहि-बोभूतात् , बोभूतम् , बोभूत। बोभवानि, . स भारती-भर ৫৪ , लघुकौमुदी-परिशिष्टे বাঃ, এধিঃ ----জার্মীজী , তা হল , জীা। সলী विभाग কী-এমীফ, জানুন সন্ত্রাসূল স্ত্রী ও সলীমু, জালীলু। তি—ী- স্বা, স্থাৱা ঘgg। ঋতুয়া খাল দ্বারসুখ স্বীকাল, চুয়া স:. --শ্রীফ অসুখ , জীখাল, বার। খাব, খgwধ, স্বাগ্রাম। লুজ,-~-নাফী, সাকীব, অামা, অজী ! অনূভা:-সা, অস্বীকুল , অক্ষুন। তালীৰ , লাজু, অঞ্জলী ! ছক্ত,~-জলিখল, আর্নীৱিনা , জীবি। অল্পী- লিঃ, জলন্ত , বিজয় দ্বিঅল্প, দ্বীনা, ভীল- দ্বিয়ায় অর্থনী: কনলি হাসি -অন, খাল, থাল। স্বাক্ষ, ছাই, ছাগল । আৰুই, ব, ছাই। তি,-~-গী, ইস্কাট, হকি দ্বীক্ষিণ, ই ক্ষা, দীকি। হক, হাফি- অষ্ট, নীচিকা । -ক্ষ, হাঙ্গারী, যাঃ। জান্ধা, দুন্না, খাজা। ঘা জ্ঞা, গান্নাঘ, তাংলষ্ট। ব-দ্দশ্য, হার, হাজী। দুম্ব, জাই, গান ফাগ, স্থা, ঘকে। দীর --- স্বৰা , দাগনা , আদা। শুনা , ক্ষাখ। কাফ থাঃ কাৰখা, অস্থায়। জাহান, আঃ মাখা- ছি, ভাঙ্গা এমবি সিক্ত ছাশর, ক্ষমায়া , গলু। ফুল, কামলা- থা, কনু। হাজখ, হাতি, ফুলশ। আ, কিজ, ক্ষ্মীg, ঝান্ধীখা- না হয় জুলু? কাজী হাদীস্বার্থালু, হাজী। গ্রীজ, কীৰি, আলী ক!ি - ফাকি গান , হা হুল জঞ্জা, গুদাঙ্খা , ওয়াজ। অহি, অহয় ঘডি, ছন্দ। লু-হাগল, জাইনা , মহান। অহয়, জয়াঃ, জইফ, হাদ। স্থা, অাছি অজাম্বলছি। 5 ' ক সকল (४) असु क्षेपणे---- । nase है परिशिष्ट अनुवादोपयोगिधात्वर्थाः उपसर्गण धात्वर्थो बलाइन नीयते । शहाराहारसंहारविहारपरिहारबत् ॥ अश्वगतिपूजनयोः-- १ अञ्चति--जाता या पूजता है । अस्यति कता है। माजति ---उन्नत होता है। २ उपास्यति-दूर करता है। ३ पराञ्चलि--लोटता है । ३ मध्यस्थति--आरोप करता है न्यात ----नीचे जाता है। विन्यस्यति---स्थापित करता है। १५ प्रत्यञ्चति- -अवनति प्रा करता ५५ दयाति--सौंपता है। ६ उदञ्चति-ऊपर जाता है। ग्यास्यति---कंठस्थ करता ७ सहाञ्चति-साथ जाता है। ७ निरस्पति-हटाता है। अवाजति अधोमुख होता है। ८ व्युत्पत्ति-निकालता है ९ पर्युदति ---उधार लेता है। ९परास्यति-परास्त करता है। १० लमञ्चति-अच्छी तरह जाता या पूजता है।। १७ सबवास्यक्ति-उलटपलट करता है। तिरोचति टेढ़ा जाता है। ११ विपर्यस्यति-विपर्यास करता है। १२ खमस्यक्ति-संक्षिप्त करता है। अय गती-- अयते-जाता है। आप्लु व्याप्ती- आप्नोति-प्राप्त करता है। चलायते-भागता है। व्यास करता है। ३ पलायते- फैलता है। ४ उदयते--उदय होता है। १४ व्यय --खर्च करता है। ३ समाजोति- समाप्त करता है। समाप्त होता है। इनिरयते-निकलता है। अवाप्नोति-प्राप्त करता है। दुरयते --दुःखी होता है। ५ पर्यापणोति-- पर्याप्त करता है। उनिलयते-विलीन होता है। पर्याप्त होता है। ९दुलयते--काँपता है आसू उपवेशने- अर्थ उपयाच्याम्- आस्ते-बैठता है। २ उदास्ते-उदासीन होता है। १ अर्थयते--माँगता है। ३ उपास्ते--ध्यान करता है। -२ समर्थयते--अनुमोदन करता है। अध्यास्ते-रहता है। ३ अभ्यर्थयते-निवेदन करता है। ५सन्चास्ते-पीछे बैठता है। ४ प्रार्थयते-प्रार्थना करता है । ५ व्यर्थयतो----विफल करता है १ एति--जाता है। ६ अन्वर्थयते--अर्थानुकूल करता है। २त्येति-विश्वास करता है। marNSanwa २ व्याप्नोति- { MAHA इण् गतौ-- २७६ लघुकौमुदी-परिशिष्टे भारती-भा कमिकल HTS है । अत्यति नष्ट होता है। Pअम्बेति -पीछे मिलता है। ५ विपति-उलटा समझता है। ६ उपैति पास जाता था आता है। ७ अभ्योति-सामने आता ८ स्यस्यति उलट-पलट करता यावीतता है। ९व्येतिवर्च करता है। १० अवैति--जानता है। ११ अपैति-दूर होता है। १२ समवैति-सम्बद्ध होता है । १३ समन्वेति-समन्वय करता है। १४ अभिप्रेति---इष्ट करता है। १४ उदेति --उदित होता है। ईह चेष्टायाम्-- ईहते-चेष्टा करता है। २समीहते-चाहता है। ३निरीहते -नि:स्पृह होता है। ईक्ष दर्शने १ ईक्षते-देखता है। २ अपेक्षते-इञ्छा करता है। ३ उपेक्षते-लापरवाही करता है । ४ वीक्षते-देखता है। ५ प्रतीचते-प्रतीक्षा करता है। ६ परीक्षते-परीक्षा करता है। ७ निरीक्षते-निगरानी करता है। समीक्षते-विमर्श करता है। २ उत्प्रेक्षते-सम्भावना करता है। १० अन्वीक्षते-चिन्तन या मनन करता है। मजनूहते-शोधित करता है। ५ प्रत्यूहते-विघ्न डालता है। ६ व्यूहते---संगठित करता है। ७ दुरूहते कठिनाई से जानता है। (ड) कृञ् करणे- १ करोति करता है। २ अनुकरोति-नकल करता है। ३ अपकरोति-हानि करता है। ४ उत्करोति -उच्चारण करता है। ५ विकुर्वते-विकार प्राप्त करता है। ६ उपकुरुते-सेवन करता है। ७ अधिकुरुते-क्षमा या पराभव करता है। ८ तिरस्करोति-तिरस्कार करता है १निराकरोतिहटाता है। १० परिष्करोति-परिष्कृत करता है। ११ आविष्करोति-प्रकट करता है। १२ संस्करोति--संस्कार करता है। १३ उत्कुरुते-चुगली करता है १४ उदाकुरुते-झपटता है। १५ प्रकुरुते- जबर्दस्ती करता है। १६ उपस्कुरुते-दूसरे का गुण ग्रहण करता है। १७ अलङ्करोति-भूषण पहनता है। १८ उपकरोति-भलाई करता है। १९ प्रतिकरोति-प्रतिकार करता है। २० अपाकरोति-खण्डन करता है। २१ प्रत्युपकरोति-प्रत्युपकार करता है। ma ANUARHI क्रमु पादविक्षेपे- अह वितर्क- १ कामति-चलता है। २ क्रमते-उत्साह करता है। ३ उपक्रमते-- आरम्भ करता है। ४ प्रक्रमते- ५विक्रमते-आगे बढ़ता है। ६ पराक्रमते-अप्रतिहत होता है। MAHILA १ऊहते-विचार करना है। २ अपोहते-छोड़ना है। ३ उपोहते-सूक्ष्म विचार करता है। " ।
अनुवादोपयोगिधात्वर्थाः। १७ भाक्रमते-उदय लेता है। अतिक्रामति----उल्लंघन करता है। ९ परिकामति-प्रदक्षिण करता है। १० निक्रामति-निकलता है। ११ अपकामति हटता है। १२ संक्रामति-संक्रान्त होता है। १३ अनुक्रामति-अनुक्रम करता है। १४ आक्रामति---- ऊपर जाता है। गम्लु गतौ- auras १ बाच्छति-जाता है। २ आगच्छति-आता है। ३ लंगच्छते---संगत होता है। ४ निर्गच्छति--निकलता है। ५ अनुगचकृति-पीछे जाता है ६ अवगच्छति--जानता है । ७ अधिवच्छति-प्राप्त करता है। ८ अध्यागच्छति--सामने आता है। ९ प्रतिगच्छतिलौटता है। १० उद्गच्छति--स्वीकार करता है। ११ उद्गच्छति-ऊपर जाता है। १२ अपगच्छति-दूर हटता है। अह उपादाने- १ गृलाति-लेता है। २ आगृलाति--आग्रह करता है। ३ अनुगृलाति-कृपा करता है। ४ दुरागृह्णाति हठ करता है। ५ प्रतिगृलाति-दान लेता है। ६ विगृलाति-लड़ाई करता है। ७ निगृह्णाति-बन्दी करता है। ८ संगृह्णाति-कट्ठा करता है। ९ परिगृह्णाति-आसक्ति करता है। चर गतिभक्षणयो:- चरति-घूमता या खाता है। २ उच्चरते.----उल्लंघन करता है। ३ उच्चरति-ऊपर जाता है ४ विचरति-विचरण करता है। ५ आचरति-आचरण करता है। ६ परिचरति-सेवा करता है। ७ उपचरति-उपचार करता है। ८ अनुचरति--- अनुसरण करता है। ९ संचरते-भ्रमण करता है। १० दुराचरति---बुरा आचरण करता है ११ अतिचरति-अधिक गमन करता है। १२ व्यभिचरति-व्यभिचार करता है। १३ अपचरति-विपरीत करता है। चित्र चयने- १ चिनोति-चुनता २परिचिनोति--पहचानता है। ३ निचिनोति-हकट्ठा करता है। ४ उपचिनोति बढ़ाता है। ५ अपत्तिनोति-घटाता है। ६ संचिनोति-जमा करता है। ७ निश्चिनोति-निश्चय करता है। ८ समुच्चिनोति-अधिक करता है। ९ अन्वाधिनोति-आनुषङ्गि करता है। १० अवचिनोति-इकट्ठा करता है। ज्ञा अवबोधने-- १ जानाति-जानता है २ जानीते--प्रवृत्त होता है। ३ अपजानीले -छिपाता है। ४ प्रतिजानीते-प्रतिज्ञा करता है ५ अनुजानाति-अनुमति देता है ६ अभ्यनुजानाति स्वीकार करता है। ७प्रत्यभिजानाति-प्रत्यक्ष का स्मरण करता है। अभिजानाति-पहचानता है। Mereet Telper विभाग SPATHSAND करता है Samaste लघुकौमुदी परिशिष्टे ९ उपनामा ---- भारम्भ करता है। १० अपदिशति वहाना करता है। १०जानीते-देखता है । ११ प्रतिदिदिशातिनिधेयको बतलाता है २१अवजानाति --- अपमान करता है। (ड) धान धारणपोषणयो:- १२ विजानाति-निन्दा करता है। दधाति-धारण करता है। णीन आपसे २ विदधाति-करता है। १ नथति-ले जाता। ३ अनुखंदधाति-अनुसंधान ( खोज विनयति-विनय करता है। ३ विनयते-गिनताबा खर्च करता है। ४ अन्तर्धते-छिपता है । ४ अनुनयति मनाता है। ५ सिरोधन्ते--- ५ परिणयति-विवाह करता है। ६ अभिधत्ते-बोलता है। ६ निर्णयति-निर्णय करता है। ७ अवधते-ध्यान देता है। ७ अभिनयति-अभिनय करता है। ८ विधत्ते डाँकता है। ८ उपनयति-पासमें लाता है। ९ अपिधते ९पनयति हटाता है। १० संधत्ते-मेल करता है। १० आनयति लाता है। ११ परिधन्वे-पहनता है । ११ प्रणयति... अम करता १२ आम -स्थापित करता है। १२ उन्नयते-ऊपर ले जाता है। १३ निधत्ते रखता है। तृ प्लवनतरणयो:- १४ प्रणिधते-ध्यान करता है। तरलि-तैरता है। १५ प्रतिनिधत्ते--प्रतिनिधि करता है २ अवतरति-उतरता है। ३ वितरति देता है। ४ उत्तरति-जबाब देता १ पतति-गिरता है। ५संतरति-ऊपर तैरता है। २प्राणिपतति-प्रणाम करता है। दिश् अतिसर्जने- ३ निपतति -गिरता है। १ दिशति देता है ४ उत्पतति-उड़ता है २ आदिशति--आज्ञा देता है। ५ प्रपतति-गिरता है। ३ निर्दिशति-बतलाता है। ४ उदिशति-उद्देश करता है। १ पद्यते-जाता है। ५ उपदिशति-उपदेश करता है। २ उत्पद्यते युक्त होता है। ६ निदिशति-अनुमति देता है। ७ संदिशति-संदेश कहता है । ३ विपद्यते-मरता है। ८ व्यपदिशति-मुख्य व्यवहार करता है। ४ संपचते-सुखी होता है। ९ मतिदिशति-काल्पनिक व्यवहार ५ उपपद्यते--युक्त होता है। करता है। ६ आपश्यते-दोष लगता है। Maruwadi पल पतने DOHABAR wor CATISRO पद गती- । invanam अनुवादोपयोगिधात्वर्थाः। ७ अपाते...शारा जाता है। २ अभिधुमति-अभियोग करता है। नियनिभान होता है। उद्यनक्षि-उबोगबारता है। १ प्रतिपचते-आज्ञा माँगता है। ४ संयुनाति.....संयुक्त करता है । १० व्युत्पद्यते व्युत्पन्न होता है। ५ प्रतिशुभक्ति-स्पर्धा करता है। बन्ध बन्धने- ६ अनुशुनन्तिपूछता है १ बध्नाति-नौबता है। ७ पर्यनुयुनक्ति-प्रत्युत्तर देता है। २ प्रक्षनाति--प्रयन्य करता है। ८ उप पुनक्ति --उपयोग करता है इनिधनाति-रचता है। ९ विद्युन रिक-वियुत्ता करता है। ४ प्रतिबध्नाति रोक लगाता है १० नियुन ति-नियुक्त करता है। ५ सम्बध्नाति-जोड़ता है। रुह बीजजन्मनि- ६ उद्बध्नाति--फाँसी लगाता है । रोहति-जमता है। ७ निर्बजाति-प्रेम करता है। २ प्ररोहति---उत्पन्न होता है। भूसन्तायाम्- ३ अधिरोहलि-चढ़ता है। भवति...होता है। २ अनुभबतिअनुभव करता है। ५ अवरोहति-उतरता है। ३ अभिभवति इजाता है। ५ आरोहति-चढ़ता है। ४ पराभवति-पराभव करता है। ६ खरोहति-मिलता है। ५ परिभवति-तिरस्कार करता है ६ उन्नवाति उत्पन्न होता है। फुलपति-बोलला है। ७ आविर्भवति-प्रकट होता है। २विलपति--विलाप करता है। प्रलपति-बकवाद करता है। प्रादुर्भवति-- ४ आलपति-बोलता है। ९ सम्भवति-हो सकता है। ५ संलपति वार्तालाप करता है। १० तिरोभति-छिपता है। ६अलपति-छिपता है। ११ अन्तर्भवति. १२ प्रभवति समर्थ होता है। वद् व्यक्तायां वाचि- मनु अवबोधने १ वदति-बोलता है। १मन्यते-मानता है। २ अपवदते-छोड़ता है। २ अवमन्यते-तिरस्कार करता है ३ अपवदति-दूषित करता है। ३ अनुमन्यते---सलाह करता है। ४ अनुवदति-अनुवाद करता है। ४ संमन्यते -सम्मान करता है। ५ उपवदते-प्रार्थना करता है। ५ विमन्यते--उपेक्षा करता है। ६ विवदते-झगड़ता है। ६ अभिमन्यते--धमण्ड करता है। ७ संप्रबदन्ते-मिलकर बोलता है। युजिर योगे- ८ अनुवदते -तुल्य बोलता है। १ युनक्ति जोड़ता है। ९विप्रवदन्ते-विरुद्ध बोलता है। लपलपने- ENRI-RIN wuman । aloverHARIA HOMRAM যমুক্ষী-হিহিট प्रतिवदति- जबाव देता है। संबदलियात करता है। विभाग Rasti ६ पसरतिहटता है। ७ परिसरति--चूमता है। ८ संसरति-सम्बद्ध होता है। ९ उत्सरति अलग होता है। १० उपसरति पास जाता है। INSERIES । মু দুখী mrtmnave २प्रवर्तते--प्रवृत्त होता है। ३ निवर्तते .....लौटता है ४ परिवर्तते-घूमता है। ५ अनुवर्तते-पीछे चलता है। ६ निवर्तते---- शान्त होता है। ७ चलते-बुरा आचरण करता है। विवर्तते-बदलता है। २ आवर्तते-दुहुराता है। पद्ल विशरणगत्यासादले ---- सीदति-ठहरता या दुखी होता है । २अलीदति- प्रसन्न होता है। ३विषीदलिखिन्न होता है ५ वलीदति----थकता है। ६ पर्यवसीदति-समाप्त होता है। ७ उपसीदतिपास में बैठता है धातिनिवृत्तौ-- तिहति ठहरता है। २ प्रतिष्ठते-प्रस्थान करता है। ३ उपतिष्ठते-उपस्थान करता है। ४ उत्तिष्ठति-उठता है। ५ अनुतिष्ठति-करता है। ६संतिष्ठते-अच्छी तरह ठहरता है। ७ अवतिष्ठते-स्थिर होता है। १हरति-ले जाता है। २ अपहरति--चुराता है। ३ अनुहरति नकल करता है। ४ परिहरति छोड़ता है। ५ आहरति-लाता है। ६ ध्याहरति-बोलता है। ७ व्यावहाति-व्यवहार करता है। ८ अव्यवहरति खाता है ९ प्रहरतिमारता है। ५० सहरति नाश करता है ११ उपसंहरति-उपसंहार करता १२ विहरति-विहार करता है। १३ लगाहरति--इकट्ठा करता है । १४ उद्धरति-निकालता है। १८१ उपहति----उपहार देता है। उपाहपतिलाता है। १७ उदाहरति---उदाहरण देता है। ३८ प्रत्युदाहरतिदूसरा उदाहरण देता है क्षिप्र प्रेरणे- क्षिपति-फेकता है। २ निक्षिपति-नीचे फेकता है। सौंपता है। ३अधिपति-प्रक्षेप करता है। ४ आतिपति-दोष लगाता है। ५५ अधिक्षिपत्ति ६ संक्षिपति-छोटा करता है ७ उत्तपति-ऊपर फेकता है। ८अधिक्षिपति-नीचे फेकता है। ९विक्षिपति-विक्षिप्त होता है। JAMANASAN सू गतौ- SOHome amana सरति--जाता है। २ अनुसरति-अनुसरण करता है । ३ प्रलरति-फैलता है। ४ अभिसरति-निकलता है। ५ निसरति Sweta , अष्टौह-सिखाने के परिशिष्ट (५) भाषार्थ-अयोगलची अच्सन्धिः कहते हैं, (तस्य प्रष्ठौहः) प्रष्ठवाट का सुद्धधुपास्यः-विद्वानों के उपासनीय उपेतः---समीप आया हुआ, या प्राप्त हुआ मध्वरि:--'मधु' दैत्य के शत्रु (भगवान् विष्णु) मा भवान् प्रेदिधत्--आप अधिक न बढ़ाइए धास्त्रंशः ब्रह्मा का अंश अक्षौहिणी----सेनाविशेष लाकृति का?' यह स्वरूप । अथवा 'ल' के प्रौहा....अधिक तर्क या उत्तम तर्क करने वाला समान टेट्टी आकृति वाला प्रौद्धः-दक्ष, अधेड । प्रोटि:-प्रौढता हरयेरि के लिये प्रैण:-प्रेरणा । प्रेष्यः-नौकर विष्णवे-विष्णु के लिये सुखातः ....सुख से प्राप्त हुआ, सुखी नेता, प्रधान परमतः---परम प्राप्त, मुक्त पावकः पवित्रकर्ता या अग्नि मार्ण अधिक ऋण (कर्जा) गव्यम्---गौ का विकार दुग्ध, दधि, वल्लतराण... बबढ़े का ऋण कृत, गोमूत्र, गोवर आदि कामलार्णवकम्बल का ऋण नावर--नौका से तरने योग्य (जल) बसनार्णम्-वरह का ऋण गब्यूति:--दो कोस नाणा---एक ऋण को उतारने के लिये उपेन्द्र:-न्द्र के छोटे भाई (वामन भगवान्) लिया गया दूसरा नण गोदकम् गङ्गा का उदक (जल) दशाणः दश मिले जिस देश में हों ऐसा देश कृष्णाद्धि:-कृष्ण की समृद्धि प्राईति-अधिक चलता है हर इह हे हरि ! यहाँ तबलकार:-तेराहकार प्रेजते-अधिक काँपता है। उपोषति-जलाताहै। विष्ण इह-हे विष्णु ! वहाँ शकन्धुः----शक देश का कूप (कुआं) ककन्धु:-- दरी फल ( वेर) कृष्णकरदार कृष्ण की एकता मनीषा-बुद्धि । माण्ड: -सूर्य गङ्गौवा-गङ्गा का प्रवाह शिवायो नमः-शिव को नमस्कार है देवेश्वर्यम्-देवताओं का ऐश्वर्य शिवेहि-हे शिव ! आओ कुष्णोत्कण्ठयम्-कृष्ण में उत्कण्ठा दैत्याशि:-दैत्यों का शत्रु (विष्णु भगवान्) उपैति-पास आता है श्रीश:----लक्ष्मीपति (भगवान् विष्णु) उपैधते--समीप बढ़ता है विष्णूदा विष्णु का अभ्युदय में काष्ठ बाँध देते हैं ऐसे बछड़े को 'प्रष्टवाद' । हरेऽव-हे हरि ! रक्षा करो . gana लावुकौमुदी-परिशिष्टे ऋमिर निभा कृष्णा बैठे हैं गो अनसनी का अग्रभाग नाशिव--सत और ज्ञानस्वरूप चिनम्वप्रम-विचित्र गौएं हैं जिसके उस शाहिआय-हे शाई-धनुर्धारी भगवन् ! पुरुष का अग्रभाग । गोगो का आप की जय हो गया-गौ का अग्रभाग विश्न:-विचलना या गतिविशेष गनिमी में गजेन्द्र गोस्वामी प्रश्न:- पूछना आगच्छ कृष्ण मित्र गोश्चरति-हे कृष्ण ! रामपठ:--राम छठा आओ यहाँ गौ चरती है। रामष्टीकते-राम जाता है हरी एतौ-ये दोनों हरि है पेष्टा-पीसने वाला । तट्टीका-वह टीका विष्णू इमौ-ये दोनों विष्णु है चक्रिण्डौकसे-हे चक्रधारी ! तुम जाते हो गङ्गे अमू-ये दोनों गङ्गायें हैं पट् सन्तः छै सत्पुरुष अमी ईशा:-ये अधिपति हैं पट ते--- छै । ईहे स्तुति करता है रामकृष्णावस्तू आसाते-ये बलराम और सर्विस अत्युत्कृष्ट घृत घण्णा-छका अमुकेऽनये यहाँ है? षण्णवति:-छियानवे (९६) इइन्द्रः----ओह ! यह इन्द्र है ! घण्णार्थ:- जगरियाँ उमेश:- या यह महादेव है ? सन् षष्टः-ठा श्रेष्ठ है। वागीश:--तृहस्पति आ एवं नु मन्यसे- क्या तू ऐसा एतन्दुरारि यह मुरारि है मानता है ? तन्मान केवल बड़ी । चिन्मय-ज्ञानस्वरूप आ एवं किल तत्-हाँ वह बात ऐसी ही है तब्ब-उसमें लय-लीन होना ओषण ----कुछ गम विद्वालिखति-पण्डित लिखता है अहो ईशा:- अहो ये अधिपति हैं उत्थानमू-उठना, उन्नति विष्णो इतिहे निष्णु ! ऐसा उत्तम्मनम्-उठाना, उभारना किम्वुक्तम्-क्या कहा? वारघरि-जोलने में शेर चक्रि अत्र-विष्णु यहाँ है तच्छिवा-वह शिव है गौयौ दो गौरी ये हैं तच्छलोकेन-उस श्लोक से या उसकी कीर्ति से वाग्यवः नापी पर घोड़ा हरिं वन्दे हरि को मैं नमस्कार करता हूँ ब्रह्मर्षि:-ब्रह्म ऋषि, वसिष्ठ यशांसि बहुत से यश आच्छत्-चला गया आस्थते आक्रमण करेगा इत्यच्सन्धिः। -मानता है शान्तः-शान्त । अङ्कितः-चिह्नित अथ हल्सन्धिः। अतिः पूजित या गत । कुण्ठित:-रुका हुआ रामश्शेते-राम सोता है दान्त:-जितेन्द्रिय । गुम्फितः- गुथा हुआ रामचिनोति-राम चुनता है स्वरोषि-तुम करते हो मन्यते. Play attema भाषार्थ-प्रयोगसूची। सम्वत्सः वर्ष (संवत) भगोनमरते हे भगवन् ! तुमको नमस्कार है सम्बाद- चक्रवतीराजा अघो याहि अये ! जाओ कि ालयति.....या चलाता है? अहरहप्रतिदिन । अहर्गणादिनसमूह कि---काल क्या था ? पुना रमते-किर खेलता है। किं हलयति-न्या चलाता है ? हरी रस्म हरि रमणीय है किं हाति---या प्रसन्न करता है ? शम्भू राजते-शम्भु विराजता है किं हते-या छिपाता है ? अजः-तुमने बार बार लोम किया घटसन्तः- सज्जन तृड:-हिंसित । वृढः---उद्यत, तैयार हुआ प्राङ् षष्ठ:----छठा पूजित है मनोरथ:-इच्छा छठा अच्छा गणितज्ञ है एष बि:----यह विष्णु है सन्तः वह सत्पुरुष है स शम्भुः वह शम्भुहै लछम्मुः शम्भु सत्स्वरूप है एषको रुद्रः- यह रुद्र है प्रत्यड्डामा-अन्तरात्मा ( जीवात्मा) असः शिवः----वह शिव नहीं है। सुगपणीश: अच्छे गणितज्ञों का ईश एकोऽयह यहाँ है सन्नच्युतः-- अच्युत सरकारूप है खेमामविवि प्रतिम्इसे देने में संस्कर्ता-संस्कार करने वाला आप समर्थ हैं तो आप हमें इस {स्कोकिल:-नरकोकिल प्रभति प्रकृष्टधारणाको प्राप्त करावें चस्त्रिायव हे चक्रधारिन् ! रक्षा करो सैप दाशरथी शमः-वह यह दशरथ का प्रशान्तनोति-शान्तपुरुष विस्तार करता है हन्ति-मारता है इति विसर्गसन्धिः। नॅ:पाहि-मनुष्यों की रक्षा करो काँस्कान्-किन किन को अथाजन्तपुल्लिङ्गः । शिवच्छाया-शिव की छाया राम: राम । कृष्ण: कृष्ण लघमीच्छाया-लक्ष्मो की छाया या शोमा सी-सब । विश्वः-सब इति हलसन्धिः। उभौ-दोनों। उभयः-दो अवयववाला अथ विसर्गसन्धिः। अन्य:-दूसरा, अन्यतर:-दो में एक विष्णुस्वाता-विष्णु रक्षक है इतर:-हतर, स्वत्--अन्य हरिश्शेते-हरि सोता है रवा-मिन्न, नेमा-आधा शिवोऽय:-शिव पूजनीय है समा-सब, सिमः-सब शिवो वन्द्या-शिव वन्दनीय है पूर्व-पहला । परः-दूसरा देवा इह-देवता यहाँ अवर:-छोटा, दक्षिणा दक्षिण भो देवा! हे देवताओ! उत्तर:-उत्तर, अपर:-दूसरा, अधर-नीचा MIN पुन राम है .
ऋति awelina Para Com लघुकौमुदी-परिशिष्टे प्रात्मा और आत्मीय अन्मू-सर्प, कपि, वज़ और सूर्य अन्तर: बाहर या पहिननेका कपड़ा करभू:-हाथसे पैदा हुआ ( नख) पहला धाता-ब्रह्मा । नक्षा-दौहित्र चरमः अन्तिम । कतिपमा:-कई एक पिता-पिता ! जामाता-दामाद ।ना-मनुष्य द्वितीयः---दो अवयव वाला । अल्प: थोड़ा गौ:---गौ। रा:-धन । बलो. चन्द्रमा अर्धआधा। निर्जर:-देवता इत्यजन्तपुंल्लिङ्गः। विन्धपा:-विश्वका पालन करनेवाला (विष्णु) हामा शह बजानेवाला अथाजन्तस्त्रीलिङ्गः। हाहा:---देव, गन्धर्व रमा-लक्ष्मी हरि पापहर्ता ( अगवान् ) दुर्गा----दुर्गा । अम्बिका:-दुर्गा कविः--कविता करनेवाला। सखा-मित्र सर्वा-सब (स्त्री),विश्वा-सब (स्त्री) पतिः-पति या मालिक भूपति:---राजा उत्तर पूर्वा-ईशान कोण कति-कितने ? नया-तीन द्वितीया-दूसरी। तृतीया-तीसरी नियनिः-जिसको तीन प्यारे हैं वह अम्बामाता या दुगाँ। महा-माता द्वौ-दो ! पपी:-सूर्य। वातप्रमी:-मृग अच्छा-माता । जरा-वृद्धावस्था (बुढ़ापा) बहुश्रेयस्ली- बहुत कल्याण चाहनेवाली गोपा:-गोपी । मति:-बुद्धि स्त्रियोंवाला बुद्धि:-बुद्धि । तिख:-तीन (स्त्रियां) पुरुष अलिलक्षमी.....लामीको अतिक्रमण करने चतस्वः-चार (त्रियाँ) द्वे-दो (स्त्रियाँ )गौरी-पार्वती या गोरी स्त्री बाला, लक्ष्मी से श्रेष्ठ अधी:-प्रकृष्ट ध्यानवाला नदी-नदी। लक्ष्मी:--लक्ष्मी ग्रामणी:--मुखिया । नी:-ले जाने वाला तरी:-नौका । स्त्री-खो । श्रीः-लक्ष्मी धेनुः-नई विदाई गौ। भ्रू:-भ्रुकुटि सुश्री: सुन्दर श्रीवाला यबक्री:-- जौ खरीदने वाला स्वयंभूः-माया प्रकृति । शुद्धधी:--पवित्र बुद्धिबाला । सुधी-पण्डित स्वला यहिन । ननान्दा-ननद सुरली:-सुख चाहने वाला दुहिता-पुत्री सुती:-पुत्र चाहनेवाला । याता-देवरानी, जेठानी। माता-माता शम्भु-शिव । भानु:---सूर्य आकाश । रा:-धन । नौ-नौका कोष्टा-गीदड़। हहः-न्धर्व इत्यजन्तस्त्रीलिङ्गः। अतिच:--सेनाको अतिक्रमण करने वाला खलपूर-खलिहान को मार्जन करने वाला अथाजन्तनपुंसकलिङ्गः। सुल-अच्छा काटने वाला स्वभूः स्वयम्भू ब्रह्मा । वर्षाभूः-मेढक धनम-धन । वनम् -वन। फलमू-फल mutam भाषार्थ-प्रयोगसूची। motion - कर कतरत्-दो में कौन ? अयम्---यह (सनिकृष्ट) कतमत्- बहुतों या तीनों में कौन? इतरत्... इतर या दूसरा । अन्यत्-दूसरा ब्रह्मनिष्ठ:--ब्रह्म में निछावाला अन्यतरतुदी में एक यज्वा ----यज्ञ करनेवाला । ब्रह्मानहा. अन्यतमम् इन सब में एक वृत्रहा-इन्द्र एकतरम्-दोनों में एक शाही शास-धनुर्धारी (विष्णु) श्रीपमू-धनरक्षक यशस्वी-यश बाला द्वेको, त्रीणि तीन अर्यमा-सूर्य या देवविशेष वारि-जल पूषा-सूर्य । मघवान्-इन्द्र दधि----इही । अस्थि हड्डी था-कुत्ता। युवा-जवान, युवक सक्थि- ऊरु, मांसल जाँघ अर्धा-पोड़ा। पन्था--मार्ग, रास्ता अहि-आँख । सुधि ---बुद्धिमान् सन्धा:- दही मथने का दण्ड मधु-शहद, मदिरा ऋभुयाइन्द्र सुलु अच्छा काटनेवाला (शख) -पाँच । अष्टो-आठ धातृ--धारण या पोषण करनेवाला (कुल) ऋविक प्रविज करने वाला ज्ञातृ-शानी कुल युज-योगी । सुयुक-सुयोगी प्रधु-सुन्दर आकाशयुक्त (दिन ) खन्-लंगड़ा। रा-राजा अरि-धार्मिक (कुल) विभ्राट-बड़ा, अत्यन्त शौभा युक्त सुनु-सुन्दर नौका बाला (कुल) देवेट-देवपूजक । विश्वसृट-ब्रह्मा इत्यजन्तनपुंसकलिङ्गः । परिमाट-संन्यासी dam विश्वाराट-विश्वेश्वर भगवान् , सूर्य अथ हलन्तपुंल्लिङ्गः। भृट्-भूजने वाला । स्था-वह । सबह लिट्-चाटनेवाला । धुक्-दूहनेवाला या-जो, एषा-यह ( अत्यन्त निकट स्थित ध्रुक-द्रोह करनेवाला स्वरू-तू । अहम्-मैं मुक-मुग्ध या मोहित करनेवाला सुपात्-सुन्दर पैर वाला स्नुक-वमनकारी । स्निक-रनेह करनेवाला अग्निमत्-अग्निमन्धन करने वाला विश्ववाद-विश्वम्भर । अनड्वान-बैल प्राङ- भच्छा चलने वाला या पूज्य विद्धान्-शास्त्रज्ञ (पण्डित) प्रत्य-पीछे । उदङ-उत्तर खस्तम्-गिरा हुआ। ध्वस्तम्-नष्ट हुआ| सम्यक-ठीक चलने वाला तुराषाट-इन्द्र सध्या साथी, मित्र सुधौ सुन्दर आकाशवाला (दिवस) लियंड-टेढा चलने वाला पशु, पक्षी चत्वार:-चार क्रुड-कौञ्च पक्षी । पयोमुक्-मेघ प्रशान् शान्त । कौन ? महान-बड़ा । श्रीमान्-बुद्धिमान MORADIOR pan ६ CHAIN Kathmch लघुकौमुदी-परिशिष्टे नवा आप । भवन होता हुआ अथ हलन्तनपुंसकलिङ्गः। ददत् -देता हुआ स्बनडुत्-अच्छे बैलों वाला (कुल) अक्षत वाताब हँसता हुआ जल बत्वाविचार किया-क्या ? इदम्-यह द्वि शाह शासन करता हुआ एनसूयह । महा-दिन चकासात् दीप्त होता हुआ दण्डि-----ण्ड वाला (कुल) गुए-रक्षक । लाह-वैसा सुपशि-सुमार्ग वाला (वन) निद-बनियाँ । बक नष्ट होने वाला ऊ-तेज और बल । तत्-वह वृताकतस्पर्श करने वाला यतू----जो । एतत् यह दुकतिरस्कर्ता गचाक-गोपूजक, गौके पीछे जानेवाला रत्नसुदरत्ल का चोर । बाट छै शाकुतू मल (ट्टी) पिपठी:-पढ़ने की इच्छा वाला पा इदत देता हुआ चिकी:- करने की इच्छा वाला म तुदत्-दुःख देता हुआ बिहान पण्डित । पुमान्-.-पुरुष वचत-पाक करता (कुल) उशाना- शुक्राचार्य । अनेहा समय हीव्यत्-खेलता हुआ। धनु: धनुष धा:-ब्रह्मा । असो-वह (पुरुष) वर्ग:-आँख । हविः-इवि, घी शति हलन्तपुंल्लिङ्गः। वृथा दूध या जल सुपुस्...सुपुरुषों वाला (कुल)। अदः- यह इति हलन्तनपुंसकलिङ्गः। अथ हलन्तस्त्रीलिङ्गः। (अव्ययार्थ ७५ पृष्ठ में देखें) उपालतू जूना। अष्णिकपगड़ी या छन्द द्यो:-आकाश । गी:-वाणी अथ भ्वादयः। पूर-मुरी, नगरी । चतस्त्रः-चार मियाँ का-कौन स्त्री। इयम्-यह स्त्री सू-होना, अत-निरन्तर गमन विध--जाना, चिती-चेतना स्था वह स्त्री। सा-वह स्त्रो शुच-शोक करना, गद-स्पष्ट बोलना एपा--यह ली (अन्त्यन्त निकट में) चाक-वाणी । आप-जल णद-नाद करना, दुनदि- समृद्धि ३ दिक्-दिशा । दृक्-गाँख अर्च-पूजना, ब्रज-जाना स्विट- कान्ति । सजू-मित्र बरसना और ढकना आशो-आशीर्वाद । असौ-वह स्त्री गुपू-पालन करना, क्षि-नाश होना तप----संताप करना । क्रमु चलना इति हलन्तस्त्रीलिङ्गः। पा-पीना, ग्लै---ग्लानि इ-कुटिलता, श्रु-सुनना नि -2009 ति a * IMAt a HILAH - Jo -- भावार्थ-प्रयोगसूची। २८७ NAL Parentinum Mendan SANSAR , SHEthya Armaan , बालू-जाना (नमन), ए-वृद्धि, बढ़नाशीसोना, इ-पढ़ना कानुश करना दुह-~-दूहना, लिह-बढ़ना। लिह-चाटना धूत-दीप्त होना, शिवता-सफेद करना, अकोलना, ऊर्जु-हुकना जिमिदा-निविदा-चिकना होना इत्यदादयः॥ २॥ जिविदा पसीना आना और छोड़ना चमकाना वालगना, अथ जुहोत्यादयः। "पुर. घोटना, शुभ... शोभित होना होम करना, रवाना या लेना सुब्ध-शुब्ध होना, ण-सुभ-हिंसा करना जिभी डरना, ही-- लज्जित होना संसु------गिरवा ना नष्ट होना पालन करना, पूरा करना ध्वंसु-बलना, --विश्वास करना भोहाक: छोड़ना वृतु-पर्तना, दद-देना लाइ नापना, शब्द करना अपूर-लज्जिन होना ओहाइ-जाना शि... सेवा करना हुन... धारण करना, पालना, पोलन गलन करना भरना सुशान--- ना, खुधाजपा रण करना, पालन- महान् हुरना, चोराना पाषण करना धारण करना। णी mamले जाना हणाजिर अपच ---पकाना, मज -मजन करना शति जुहोत्यादयः ।।३॥ यज--पूजा करना, योग करना, दान देना बह-वहन करना हति स्वादयः ॥१॥ अथ दिवादयः। दि-खेलना, जय की इच्छा, लेनदेन का व्यवहार करना, चमकना, स्तुति अथ अदादयः। करना, प्रसन्न होना, मदमत्त होना, मद खाना, हन-----मारना, चलना सोना, इच्छा करना, जाना यु-मिलना या अलग होना बुषि-सीमा । नृती-नाचना या-पहुँचना, जाना असी प्रवराना, उद्विग्न होना वा-बहना, चुगली करना । भा चमकना शारे-छीलना, तेज करना छणा-स्नान करना, पवित्र होना हो काटना, छाँटना श्रा--रकाना । सिझाना।हा-निन्दित गमन जो----नाश करना दो-काटना ला-खाना, रा-देना यधमारना (वीधना) ला-लेना द्वाप-काटना, पा रक्षा करना पुष-पुष्ट करना ख्या--कहना, बिड़-जानना शुष--सूखना । णश-नष्ट रोना अस होना इण-जाना धूल उत्पन्न करना PREREIN BHAN KAHANE Popunga antee BHARATI Beeg ही । ग-निगलना लघुकौमुदी--परिशिष्टे दुखदुखी होना । दीक्षीण होना उजद-स्यागना । लुभाना डीआकाश में उडना तृप-तुमपा तृप्त होना पीना मानापना शुद्ध-पृडसुखी होना जनी-जन्मना प्रादुर्भाव जाना। इघुइच्छा करना बीपी-चमकना । पद-चलना कुर--कुटिलता करना विद-होना । दुध जानना पुट----मिलना, जोड़ना युध लड़ना स्कुट-खिलना, विकसित होना सृज-छोड़ना, त्यानना स्फुरफुल-फड़कना । --स्तुति करना भृक्षसहन करना ।णहबांधना टुमस्तो---नहाना, मज्जन इति दिवादयः ॥ ४॥ रुजो-तोड़ना, रोगी होना भुजो-टेढा होना । विश-प्रवेश करना मृश-स्पर्श करना अथ स्वादयः। पद्लु-विखरना, जाना, दुखी होना धु-स्नान कराना, सोमलता को शद्नु-छीलना । कृ-विखेरना कूटना, मच बनाना चिञ्-इकट्ठा करना (चुनना) प्रच्छ पूछना । मृङ- मरना स्तृ-ढकना । धूग-कापना पृडा----उद्योग करना इति स्वादयः॥ ५॥ जुषी--प्रीति तथा सेवा करना ओचिजी डरना, कांपना, उद्विग्न होना इति तुदादयः ॥ ६॥ अथ तुदादयः। तुद-कष्ट देना गुद-प्रेरणा करना । अरजभूनना अथ रुधादयः। कृष-जोना हाधिर-रोकना मिल-मिलना । सुब्ल-छोड़ना भिदिर-भेदन करना। छिदिर-तोड़ना लुप्ल-काटना । लोप करना युजिर-जोड़ना, रिचिर---रिक्त होना विद्नु-प्राप्त करना विचिर-पृथक् होना । क्षुदिर-पीसना पिच-सींचना । लिप-लोपना उच्छृदिर-चमकना, खेलना कृती-काटना। खिद--खिन्न होना उतृदिर--मारना, अनादर करना पिश-पीसना । ओवश्व-काटना कृती----काटना। तृह-हिसि---हिंसा करना व्यच-ठगना । उछिबीनना, चुनना उन्दी-भिगोना ऋच्छ-जाना । इन्द्रियों का शिथिल अञ्ज--प्रकट करना, चिकना करना, सुन्दर होना । जमना होना, जाना है । १ भाषार्थ-प्रयोगसूची। बृजमजन करना, स्वीकार करना इति ऋचादयः॥९॥ तकुचित होना जोविजी-भय करना, कांपना शिप-विशेषित करना पितृ-पीसना । भलो-तोड़ना भुज-पालना, खाना (जि)इन्धी-चमकना, दो को विद-विचार करना इति रुचादयः॥ ७॥ , अथ चुरादयः। चुर-चोरी करना, कथकहना राण-गिनना इति चुरादयः ॥ १० ॥ BAPTINE अथ ण्यन्तः। अथ तनादयः। भावयति होने के लिये प्रेरणा करता है तनु...विस्तार करना, फैलाना स्थापनति...ठहराता है पणु दान देना घव्यक्ति-चेष्टा कराता है क्षणु-क्षिण-मारना ज्ञापयति बताता है तृणुका खाना । हुकृ करना इति ण्यन्तः। वनुमाँगना । मनु---जानना इति तनादयः ॥ ८॥ अथ सन्नन्तः। पिपठिपति-पढ़ने की इच्छा करता अथ कन्यादयः। जिघत्सति खाना चाहता है हुकीञ्-अदल बदल करना, खरीदना,बेचना चिकीर्षति-करना चाहता है पीजतृप्त करना, इच्छा करना बुभूपति-होना चाहता है श्री-पकाना । मी-मारना इति सन्नन्तः। पिञ्--बाँधना । स्कुन-उछलना, उठाना स्तम्भु-स्तम्भु-स्कम्भु-कुन्भु-रोकना अथ यन्तः। यु-चाँपना । ऋज -शब्द करना बोभूयते -वारंवार या अच्छी तरह होता है दू-मारना । हम विदीर्ण करना वानज्यते--टेढ़ा चलता है पूज- पवित्र करना वरीवृत्यते---बार बार या अच्छी तरह लूज- काटना । स्तृजटकना होता है कृष-~मारना । वृष-वीकार करना नरीनृत्यते-बार वार ब अच्छी तरह नाचता है 'धून पाना। ग्रह-लेना जरीगृह्यते-बार वार वा अच्छी तरह कुष-निकालना, खुरचना ग्रहण करता है अश-खाना । मुष-चुराना इति यहन्तः । RANA HERE SOTRAICHIN लघुकौमुदी-परिशिष्टे F ht COMMENT Hindi अथ गडगन्तः । व्य हिमाच्छुल्लित..दूसरों के योगटा गमन को बोभनीतिबारंबार वा अच्छी तरह होता है दूसरे करते हैं इति' यलगन्तः। प्रतिन्ति अन्य के योग्य हनन को अन्य करते हैं ক্স গলদা: निविशत-प्रविष्ट होता है पुत्रीयति अपने लिए पुत्र चाहता परिक्रीणीते-खरीदता है राजीयति अपने लिए राजा चाहता है विक्रीणीले-बेचता है चाव्यतिनीति अपने लिए वाणी चाहता है अवक्रीणीते-खरीदता है पूर्वति-अपने लिए नगरी चाहता है विजयते-विजय पाता है, पराजयते हारताहै दिव्यति--अपने लिए स्वर्ग चाहता है सन्तिष्ठते-ठहरता है, समिध्यति अपने लिये समिधा (लकड़ी) अवतिष्ठते-ठहरता है, बैठता है चाहता है प्रतिष्ठते-जाता है, बैठता है पुत्रीयतिछात्र-छात्रको पुत्र की तरह चितिष्ठते-बैठता है मानता है शतमपजानीते-सौ रुपयों को छिपाता है पुत्रकाम्थति अपने लिये पुत्र चाहता है विष्णूयति द्विजम् --ब्राह्मण को विष्णु की सर्पिषो जानीते-धी से प्रवृत्त होता है तरह मानता है धर्ममुच्चरते. -धर्मको उल्लङ्घन करता है स्वति अपने समान वा धन की तरह रथेन सन्चरते-रथ से घूमता दास्या संयच्छते-दासी को देता है राजानति-राजा के समान मानता है एदिधिषते-बढ़ना चाहता है पथीनति मार्ग की तरह मानता है निविविक्षते-प्रविष्ट होना चाहता है कष्टायते-पाप करना चाहता है श्येनो वर्तिकामुरकुरुते-बाज चिड़िया पर शब्दायते-शब्द करता है झपटता है बटयति-धड़ा बनाता है उरकुरुते-चुगुली करता है इति नामधातुः। हरिमुपकुरुते-हरि की सेवा करता है परदारान् प्रकुरुते-पर स्त्री में सहमा प्रवृत्त अथ कण्ड्वादयः। होता है, बलात्कार करता है कपडूयति-खुजलाता है एधो दकस्योपस्कुरुते-काष्ठ जल का गुण इति कण्ड्वादयः। ग्रहण करता है कथाः प्रकुरुते-कथा कहता है अथात्मनेपदम् । शतं प्रकृस्ते-सौ रुपया धर्मार्थ लगाता है व्यतिलुनीते--अन्य के काटने योग्य को कटं करोति-चटाई बनाता है स्वयं काटता है मोदनं भुक्त-मात खाता है รใw मानता है। वि स वा At:- - आव्यते--मावित किया जाता है भाषार्थ-प्रयोगसूची। महिं भुनक्ति-पृथ्वी की रक्षा करता है अथ कर्मकर्तृ। इत्यात्मनेपदभू । पध्यते--कता है, भिद्यते-टूटता है इति कर्मकर्तृ । अथ परस्मैपदम् । अनुकरोलि -- नकल करता है अथ लकारार्थः। पराकरोति -- दूर करता है स्मारलि कृष्ण गोकुले वक्ष्यामः-हेकृष्ण ! अमिक्षिपति-कता है स्मरण करते हो कि हम लोग गोकुल प्रवहतिदहता है में रहते थे परिहपति--- सहन करता है अभिजानासि कृष्ण ?-यहनेऽसुज्ञमहि-हे विरमति-हटता है कृष्ण ! याद करते हो कि वनमें हम यज्ञदत्तमुपरमतिः न्यज्ञदत्त को हटाता है लोग खाया करते थे इति परस्मैपदम् । राजतिम युधिष्ठिः-युधिष्ठिरने यज्ञ किया कदागतोऽछि-कब आये हो ? अथ भावकर्म! अयमागच्छामि अयमागम वा-यह आ भूयते--हुअा जाता है. कनवामिष्यति-कब जाओगे? अनुभूयते - अनुभूत किया जाता है पुष गच्छामि गमिष्यति वा-यह (अमी) जा रहा हूँ जुभूष्यते-होने के लिये इच्छा की जाती है कृष्णं नमेच्चरसुखं याबात-यदि कृष्णको बोभूय्यते -वारवार हुआ जाता है नमस्कार करेगा तो सुखी होगा स्तूयते-स्तुति की जाती है कृष्णं नस्यति चेत्सुख-यास्यति-कृष्ण को अर्यते-प्राप्त किया जाता है नमस्कार करेगा तो सुख पायगा स्मयते -स्मृत किया जाता है हन्तीति पलायते-मारता है इसलिये स्वस्थते-गिरा जाता है मागता है नन्धते-आनन्दित हुआ जाता यजेत-यश करे । इह भुञ्जीत-यहाँ खावे -यज्ञ किया जाता है इहाऽऽसीत् भवान--(इच्छा हो तो आप तायते-विस्तृत किया जाता है यहाँ बैठिये अनुतप्यते-पश्चात्ताप किया जाता पुत्रमध्यापयेद्भवान्-आप मेरे पुत्र को दीयते-दिया जाता है पढ़ायेगा? "धीयते-धारण किया जाता है किं भो ? वेदमधीयीय, उत तर्कमू-कहिये भाज्यते-मजन किया जाता है क्या मैं वेद पढूया तर्क ? लभ्यते-प्राप्त किया जाता है भो! भोजनलभेय-माई ! भोजन प्राप्त करूंगा इति भावकर्म। इति लकारार्थः। ANAND 'इज्यते anta PO 40 f 02 -- । २६२ लघुकौमुदी-परिशिष्टे अथ कृत्यप्रक्रिया महोदः-गौ देनेवाला धनदा:-धन देनेवाला धितव्य बढ़ना चाहिये शुधनीयम् --बढ़ना चाहिये कम्बलदः -- कम्बल देनेवाला चैतव्या-चयनीयः-सञ्चय करना चाहिये मोसन्दासः ---गो देने वाला पचेलिमा:---- पकाने योग्य मूल विभुजः ---जड़को उखाड़नेवाला (रथ) भिदेलिमाः-भेदन करने योग्य महीधः, कुधः-पर्वत स्नानीयम्-साबुन ( उबटन) कुरुचर:-कुरु देश में घूमने वाला भिक्षाचर:-भिक्षुक। सेनाचर:-सैनिक- दानीयः-दान देने योग्य (ब्राह्मण) वेयर-चुनने योग्य । देयन-देने योग्य आदायवर-लेकर घूमनेवाला ग्लेयम्-ग्लानि के योग्य यशस्करी-यश देनेवाली (विद्या) शयम -शाप देने योग्य श्राद्धकर:-श्राद्ध करनेवाला लभ्यम् --पाने लायक । इत्या-जाने योग्य वचनकर आज्ञाकारी जनमेजय:-जनमेजय (राजा) स्तुस्थ:--स्तुति करने योग्य शिषधा-शिक्षा देने योग्य (छात्र) प्रियंवदा --- मीठा बोलनेवाला वृत्यः-वर्तने योग्य । आइत्यः-आदरणाई वशंवदः-आशाकारी जुष्य:-सेवनीय । मृज्य:-माफ करने योग्य पण्डितम्मन्यः,-पण्डितमानी-अपने को कार्यन-कर्तव्य । हार्यम्-हरणीय पण्डित माननेवाला धार्य-धारण के योग्य । माय:-शोधनीय सुशर्मा अच्छा मारने वाला ओजयसू-भोजन करने योग्य प्रातरित्वा-प्रातःकाल जानेवाला मोज्य-भोगने योग्य विजावा-जन्मनेवाला इति कृत्य प्रक्रिया अवावा-दूर करनेवाली (ब्राह्मणी) रोट् , रेट-हिंसक सुगण-गणित का अच्छा ज्ञाता अथ पूर्वकृदन्तम्। उखासत्-बटुए से गिरा हुआ कारका-करने वाला । कर्ता-कर्ता पर्णधवत्--पत्ते से गिरा हुआ नन्दन:-आनन्द करने वाला वाहभ्रट-घोड़े पर से गिरा हुआ ग्राही-ग्रहण करनेवाला । स्थायी--स्थिर उष्णभोजी-गर्म खाने वाला मन्त्री मन्त्री, सलाह देने वाला दर्शनीयमानी-अपनेको सुन्दर माननेवाला बुधः-पण्डित कालिम्मन्या-अपने को काली मानने कृशा-कृश । ज्ञा-जाननेवाला वाली प्रिया--प्यारा । किरा-बिखेरनेवाला सोमयाजी-सोम यज्ञ करनेवाला प्रज्ञा-पण्डित । सुग्ला-जल्दी घबड़ानेवाला | अग्निष्टोमयाजी-अग्निष्टोम यज्ञ करनेवाला बाहम-घर । वमकार-कुम्हार पारश्वा-पारदशी, पारङ्गत ।
THI भाषार्थ प्रयोगसूची METANA । आयतस्तू:- आयत की स्तुति करने वाला राजकृता-राजा बनाने वाला कटमः-चटाई बनानेवाला सह युवा--साथ युद्ध करने वाला श्रीः -- लक्ष्मी । दात्र--हँसिया सहकृत्या साथ करने वाला नेत्रम्-नेता, रस्ती, नेत्र शस्त्रम् -आयुध सरसिजम् , सरोजनकमल योत्रं-योक्त्रम् --जोता (जोत ) प्रजा-मन्तान या प्रजा। स्नातम्-स्नान किया। स्तोत्रम् -- स्तुति का साधन स्तुतः-स्तुत किया गया । कृतवान् किया तोत्रम् ... चाबुक । सेन्नम् - बाँधनेकी रस्सी शीर्णः-बिखरा गया । भिवः-भिन्न सेक्त्रम् -सेचन पात्र । मेच-लिङ्ग छिन्न:-काटा गया पत्न-वाहन, पत्ता द्वाणः टेढा मेढा किया गया। ग्लान:-उदास दंष्ट्रा-दाँत, नत्री-धर्मरज्जु लूनः-काटा गया । जीनः-वृद्ध । भुनः-टेढ़ा अरित्रम् -- नौका चलाने का दण्ड उच्छूनः-फूला हुआ लविनम्-काटने का साधन शुष्कः-सूखा हुआ ! पका-पकाया गया धावित्र-मृगचर्म निर्मित पंखा शामः-कृश । भावितः-पैदा किया गया सवित्रम् ---प्रसवसाधन, यन्त्रविशेष भावितवान् ---पैदा किया । दृढः-दृढ खनिनम् --खननसाधन ( खन्ता) हितम्-रखा हुआ। दत्ता-दिया साहित्रम् - सइन करनेका साधन चक्राण:-करनेघाला । जगन्वान् -जानेवाला चरित्रम् -- चरित्र । पवित्रम्-पवित्र पचन्तं-पचमानम्--पकाते हुए को इति पूर्वकृदन्तम् । सन् द्विजः-श्रेष्ठ ब्राह्मण । विदन्-विद्वान् करिष्यन्तं-करिष्यमाणम्-करनेवालेको अथोणादयः। को-करने वाला कारु:-शिल्पी, कारीगर । वायु:---वायु जल्पाक:-अधिक बोलनेवाला पीयु:-गुदा । जायुः--औषध भिक्षाका-भिक्षु । कुटाका--कूटनेवाला मायु:-पित्त । स्वादुः वादु । आशु-शोन लुण्टाका-लूटने वाला, (डाकू) इत्युणादयः। वराक:-बेचारा। वराकी-बेचारी चिकीर्षुः-करने की इच्छा वाला आशंसुः-आशाकरने वाला। मितुः-संन्यासी अथोत्तरकृदन्तम्। विभ्राट् --अधिक शोभनेवाला भा:-कान्ति । धूः-धुरी। विद्युत् -विजली दर्शकः -देखने के लिये ऊक-बल वा तेज । पू:--पुरी ओकुम्-खाने के लिये। पाक:--पाक जू:--रोगी, ज्वरी रायः --रङ्ग । र-रङ्गभूमि, स्टेज आवस्तुत्-पत्थर की स्तुति करने वाला निकाय:-संघात । काय:-शरीर पाट --प्रश्नकर्ता गोमयनिकाय:- गोबर की राशि इष्टुम् --देखने के लिये न ASHIAN लघुकौमुदी-परिशिष्टे Antartime शि .. ही --- जय-विजय। था: समूह मा कार्षीत् मत करो। अलङ्कारभूष कर:-करमा, या हाथ गिर निगलना, जहर मुक्त्वा-छोड़ कर । भुक्त्वा खाकर मिलना, जो काटला पीस्वा-पीकर । शायित्वा-सो कर स्तथास्तुति । एव: वित्रता कृत्वा-करके प्रस्थालेर भर। विक्षावित धुतिस्वा-योतित्वा-प्रकाशित होकर पवित्रसम्-पका हुआ। उपिन्नमम्-बोया हुआ लिखित्वा-लिखकर । वर्तित्वा--होकर वेपथु:-कम्पन । यज्ञ:-यश सेवित्वा-सेवा करके यातामांगना । यत: प्रयल एषित्वा-इच्छा करके। भुक्त्वा-खाकर विश्ना-चलना या बोलना शामित्वा-शान्त्वा-शान्तहोकर परन । रक्षण: रक्षा देविस्वा-यूरवा-खेलकर स्वप्न:-स्वप्न । प्रधिः-रथ की नेभि हित्वा धारण करके। हित्वा छोड़कर उपधिः-दम्म, ढोंग कृतिः-क्रिया प्रकस्य-प्रारम्भ करके । हात्वा-जाकर स्तुति:-तुति । कीर्णि:-विखेरना स्मारं स्मारम्-स्मरण कर करके लूनिः-काटना । धूनिः--कोपना स्मृत्वा स्मृत्वा स्मरण कर करके पूनिः- पवित्र करना । सम्पत्य सम्पत्ति पाथम्पायन--पी पी कर विपत् विपत्ति । आपत् आपत्ति मोजन्मोजम्-खा खा कर सम्पत्ति सम्पत्ति विपत्ति-विपत्ति श्रावंश्रावम्-सुन सुन कर जूर-ज्वरी, रोगी। तू: शीघ्रकारी अन्यथाकार दूसरी तरह चलने वाला। जा रक्षक एवङ्कारम-इसप्रकार । कथकारम-किसप्रकार मू-वाँधने वाला । इच्छा- इच्छा इत्थङ्कारमू इस प्रकार चिकीर्षा करने की इच्छा शिरोऽन्यथाकृत्वा भुङ्क्ते-शिरको टेढा पुत्रकाम्या-अपने लिये पुत्र की इच्छा करके भोजन करता है ईहा- चेष्टा । कारणा---यातना, तीन पीडा इत्युत्तरकृदन्तम्। हारणा-इराना । हसितम्---हंसना दन्तच्छद--ओष्ठ । आकर:-खान अथ कारक अवतार:-उतरता, उतार उच्च ऊँचा। नीचेचा अवस्तार: कनात, पर्दा । रामः-श्रीराम अपामार्ग:-औगा,चिडचिडा। दुश्करः कठिन कृष्ण:-कृष्ण । श्रीः-लक्ष्मी। ज्ञानम्-शान ईपत्करः-सुकर-सरल तटः, तटी, तटम्-नट, किनारा द्रोणो ब्रीहिः-द्रोण ( १० सेर) धान्य ईषत्पान:-सरलता से पेय एक:-एक । द्वौ-दो दुष्पानः-दुःख से पेय बहवः-बहुन से । हे राम हे राम! सुपान-सुखसे पेय । अलं दरवा-मत दो हरि भजति हरि को भजता है पीत्वा खल-मत पीओ हरिः सेव्यते-हरि की सेवा करता है RATUREN Kedariom क " Aai RS पूछता है भाषार्थ-प्रयोगसूची। लवया लेवित: लक्ष्मी से सेवित पितृभ्यः स्वधा-पितरों के लिये ( कव्या) गां दोन्धि पयः-नौ से दूध दुहता है दैत्येभ्यो हरिरलं प्रभुः दैत्यों के प्रतिाइरि बलिं याचते वसुधाम-बलि राजा से पृथ्वी पर्याप्त है मांगता है। ग्रामादायालि-ग्रामासे आता है तपदुलानोदनं पचति ... चावलों से भात धावतोऽश्वात्पतति दौड़ते हुए घोड़े से बनाता है गिरता है गर्यान् शतं दण्डयति----गर्गों को सौ रुपया राज्ञः पुरुषः-राजा का सिपाही दण्ड ( जुर्माना ) करता है सतां गतम्-सत्पुरुषों की चाल बजमवरुणद्धि गाम्-व्रज में गौ को रोकता है सर्पिषो जानीते-पी के उपायसे प्रवृत्त होता है माणवकं पन्थानं पृच्छति-लड़के से रास्ता मातुः स्मरति-माता को स्मरण करता है एधो दकस्योपस्कुरुते-लकड़ी जल में अपने वृक्षमवचिनोति फलानि--वृक्ष से फल गुणों को स्थापित करती है इकट्ठा करता है मजे शस्मोश्चरणयो:---शम्भु के चरणों को माणवकं-धर्म ब्रूते-शास्ति वा-बालक को मजता हूँ धर्मोपदेश देता है. कटे भारते-चटाई पर बैठा है शतं-जयति देवदत्तम्-देवदत्त से सौ स्थालयां पति बटुए में पकाता है (रुपया) जीतता है मोक्षे इक्षास्ति मोक्षविषयक इच्छा सुधां क्षीरनिधि मनाति-क्षीरसागर को सर्वस्मिन्त्रात्मास्ति-सब में आत्मा है मथकर अमृत निकालता है | वनस्थ दूरे अन्तिके वा-वन के दूर देवदत्तं शतं मुष्णाति-देवदत्त से सौ इति कारकः। प्राममजां नयति हरति कर्षति वा-ग्राम में बकरी को ले जाता है अथाव्ययीभाव समासः। बलि भिक्षते वसुधाम्-बलि से पृथ्वी भूतपूर्व:--पहिले हो चुका मांगता है वागर्थाविव-शब्द और अर्थ के समान माणवकं धर्म भाषते-बालक को धर्मोपदेश अधिहरि-इरि में, अधिगोपम्---गोप में उपकृष्णन् -कृष्ण के पास रामेण बाणेन हतो वाली-गमने वाण से 17मने बाण से सुमद्रम्म्-मद्र देश की समृद्धि बाली को मारा दुर्यवनम् ---यवनों ( यूनानियों ) की दुर्गति विप्राय गां ददाति ब्राह्मण को गौ देता है। निर्मक्षिकम्-मक्षिकाओं का अभाव हरये नमः-इरि को नमस्कार अतिहिमम्-हिम का नाश प्रजाभ्यः स्वस्ति-प्रजाओं को कल्याण हो अतिनिद्रम्- अब सोना उचित नहीं अन्नये स्वाहा-अग्नि के लिए (इवि) इति हरि-हरि शब्द का प्रकाश था समीप चुराता है கட்டியம் CHODNES करता है MARA लघुकौमुदी-परिशिष्टे मोहित anita अनुचि-विष्णु के पीछे भूतबलि: भूतों के लिए बलि के लिए हित सानुरूप स्वरूप के योग्य मत्वर्थ-- अर्थ अर्थ के प्रति गोमुखम्-गौवों के लिए सुखप्रद यथाशक्ति-शक्त्यनुसार गोशक्षितम् गौवों के लिए रखा हुआ सहरि-हरि का सादृश्य चोरभयम्---चोर से भय अनुज्येष्ठम् ज्येष्ठ के क्रम से स्तोकान्मुक्ता-थोड़े से छूटा सचक्रम् चक्र के साथ। सलखि-मित्रके सदृश अन्तिकादागत: समीप से आया सक्षन्नम्मात्रियों की बढतो अभ्याशादागतः- " स्वतृणमति--तृण सहित खाता है दूरादागत:-दूर से आया साचिन--अग्निग्रन्थपर्यन्त पढ़ता है कच्छ्रादागतः कष्ट से आया पश्चगाम् पाँच गङ्गाओं का समाहार राजपुरुषा-राजा का पुरुष (पुलिस) द्वियमुनम्-दो यमुनाओं का समाहार पूर्वकाय:-शरीर का अग्रभाग उपशरदम्-शरद् ऋतु के समीप मपरकाय:-- शरीर का पिछला भाग प्रतिविपाशम्-विपाश (व्यासा)नदी पर पूर्वश्छात्राणाम्-छात्रों में पहला उपजरसम्---बुढापे के समीप अपिप्पली--पिप्पली का आधा भाग उपराजम... राजा के समीप अक्षशौण्डा-जूआ खेलने में लम्पट अध्यात्मम्-आत्मा में पूर्वेषुकामशमी--पूर्व इपुकामशमी देश उपचर्मम्---चर्म के समीप सप्तर्षया-सात ऋषि उपसमिधमू-समिधा के समीप उत्तरा वृक्षा-उत्तर वृक्ष इत्यव्ययीभावसमासः । पञ्च ब्राह्मणा:-पाँच ब्राह्मण पौर्वशाल:महली शाला (हबेली) में अथ तत्पुरुषः। होने वाला कृष्णश्रिता-कृष्ण के आश्रित पञ्चरावधन:-पाँच गौ जिसका धन शलाखण्डा-सरौतासे किया हुआटुकड़ा है वह पुरुष धान्यार्थ:-धान्य से मतलब पञ्चगवम् पाँच गौ अषणा काण:- एक आंख से काना नीलोत्पलमू-नील कमल हरित्रात:--हरि से रक्षित कृष्णसपी सर्प की एक जाति नखभिन्न:-खों से फाड़ा गया रामो जामदग्न्यः-जमदग्नि के पुत्र यूपदारु-यज्ञस्तम्भ के लिए लकड़ी परशुरामजी रन्धनाथ स्थाली-रांधने के लिए हाँडी धनश्यामः-मेघ के समान श्याम द्विजार्थः सूपः-ब्राह्मण के लिए दाल शाकपार्थिवा-शाकप्रिय राजा द्विजार्था यवागू-ब्राह्मण के लिए लप्सी देवब्राह्मणः-देवपूजक ब्राह्मण, पूजारी द्विजार्थ पयः-ब्राह्मण के लिए दूध अब्राह्मण-ब्राह्मणेतर । अनवादहा F 51 दि five अतिमाल :umaNOR भाषार्थ प्रयोगसूची नेकया... अनेक प्रकार से अथ बहुव्रीहिः। कुपुरुषानिन्दित मनुष्य कण्ठेकाला-नीलकण्ठ (शिव) अरीकृत्य-स्वीकार करके प्राप्ठोदकः-जिसमें जल घुस गया है शुक्लीकृत्य---सफेद करके वह (ग्राम) पटपटाकृत्य-पट पट ऐसा शब्दपार के ऊढरथ:-रथ को जिसने वहन किया है सुपुरुष-सजन पुरुष (ऐसा बैल) प्राचार्य:--प्रधान आचार्य उपहृतपशु:-पशु जिसको भेट किया गया माला को अतिक्रमण है (ऐसा रुद्र) करने वाला उद्धतौदना-भात जिससे निकाल अवकोकिला-कोकिलाओं से कूजित लिया गया है (ऐसी बटुली) पर्यध्ययन:---पढ़ने से उदास पीताम्बर: पीला वस्त्र बाला (हरि) निष्कौशाम्बि:- कौशाम्बीसे निकला हुआ वीरपुरुषक:-वीर पुरुष वाला (गाँव) कुस्भकार:---कुम्हार । व्यावी-बाधिन अपर्ण:-गिरा हुआ पत्ता । अपुत्रः-पुत्ररहित अश्वक्रीती-बोड़े से खरीदी हुई चित्रगु.चित्र विचित्र गौओं वाला कच्छपी कछुवी रूपवनार्य:- रूपवती पत्नी वाला दुथडलम्-दो अंगुलि भर वामोरूमार्य:-जिसकी भार्या सुन्दर निर रङ्गुलम् अंगुलियों से निकला हुआ रूपवाली है अहोरात्रा-दिन रात । सर्वरान:-तारी रात कल्याणीपशमा:-माँचवीं कल्याण संख्यातरात्र:-गिनी हुई रात्रियाँ कारिणी है जिनमें द्विरानम्-दो रातें । त्रिरात्रम्---तीन रातें स्त्रीप्रमाणः-स्त्री को प्रमाण मानने वाला परमराजा-बड़ाराजामहाराजा-महाराज. कल्याणीप्रिय:-कल्याणकारिणी स्त्री महाजातीयः-महान् । द्वादश-बारह जिसकी प्यारी है अष्टाविंशतिः-अठाईस दीर्घसक्थ:--लम्बे अरु बाला कुक्कुटमयूर्यो कुक्कुट (मुर्गा) और मयूरी जलजाक्षी-कमलनयनी पश्चकपाल:--पाँच खप्परों में संस्कृत किया हुआ चरु दीर्घसक्थि लम्बा धुर वाला शकट आप्तजीविका-आपलजीविका-जिसको स्थूलाक्षा-मोटी आंखों ( पेरुओं) वाली जीविका लग गई है, वह लाठी अलंकुमारि-कुमारी के लायक द्विमूर्धः-दो सिर वाला अर्धर्वम्-ऋचा का आधा भाग त्रिमूर्धः-तीन सिर वाला मृदु पचति-मुलायम पकता है अन्तलोमः-जिसके भीतर वाल हों प्रातः कमनीयम्-मनोहर प्रभात बहिर्लोमा-जिसके बाहर बाल हो इति ऐसा कम्बल तत्पुरुषः। व्याघ्रपात ... व्याघ्र की तरह पैर वाला Raha मा ही 5 लघुकौमुदी-परिशिष्टे हस्तिमानः-हाथी के तरह पैर वाला स्ववस्त्रज त्वचा और माला ऋतुलपाद:---कोठी की तरह पैर वाला शनीषद शर्मा और पत्थर द्विषा-दो पैर बाला वाकिस्बधान वाणी और कान्ति सुपात्---सुन्दर पैर वाला छन्नोपानहम्..... छाता और जूना उस्काकुत् ---जिसका तालु ऊपर को प्राबृट् शरदौ----वर्ण और शरद इति द्वन्द्वः। विकाकुतू-जिसका ताल विकृत हो पूर्णकावदः --जितका तालु पूर्ण हो अथ समासान्तः। सुहृत्---मित्र । दुहत्-शत्रु अर्थ:----ऋचा का आधा ब्यूढोरस्क:-गठीले वक्षःस्थल वाला प्रिय सार्पिक:--अत का प्रिय विष्णुपुरम्म्-विष्णु का पुर विमलायम-निर्मल जल वाला (सरोवर) युच्कयोगःयोगी राजधुरा-राज्य का मार महायशस्कः-महान् यशस्वी अक्षधू:--अक्ष में लगी धुरी इति बहुव्रीहिः। धू:- दृढ धुरी सखिपथ:-मित्र का मार्ग रस्यपथा-रमणीय मार्ग वाला (देश) अथद्वन्द्वः। गवाक्षा-झरोखा, खिड़की ईश्वरं गुरुं च भजस्वधर और गुरु प्राध्या--रास्ते को प्राप्त हुआ (रथ) को मजी सुराजा---शोमन राजा धवखदिरौ छिन्धि-धव और खदिर को काटो अतिराजा--सुन्दर श्रेष्ठ राजा संज्ञापरिभाषम्--संज्ञा और परिभाषा इति समासान्तः राजदन्ता-प्रधान दाँत अर्थधौ-अर्थ और धर्म हरिहरौ--विष्णु और शिव अथ तद्धितः। ईशकृष्णौ--ब्रह्मा और कृष्ण आश्वपतम्-अश्वपति की सन्तानादि शिवकेशवी-महादेव और कृष्ण गाणपतमू-गणपति का अपत्य आदि पितरौ माता और पिता दैत्यः-दिति के पुत्र पाणिपादम्---हाथ और पैर आदित्या अदिति के अपत्य, व सूर्य मार्दङ्गिकवेणविकम्-मृदङ्ग बजाने वालों आदित्यः-आदित्य के पुत्र और वंशी बजाने बालों का समूह प्राजापत्यः---प्रजापति का पुत्र, आदि रथिकाश्वारोह-रथिक और घुड़सवारों देव्यम्, दैवम्-देवताका अपत्य आदि बाहाः, बाहीका बाहर होनेवाला वाक्स्वचम्-वाणी और त्वचा गव्यम्-गौ का अपत्य आदि रो का समूह भाषार्थ-प्रयोगसूची २६६. Largeta SING Pamsunee औरस:-उत्स का अपत्यादि तास्त्रिः अनिय का जात्यन्य पुत्र सबैण:--स्त्री का अपत्यादि धतिका रेवती का पुत्र पोस्न पुरुष का अपत्य आदि पश्याल देश के राजा का पुत्र औपरावा. उपगु का पुत्र पौरव:----पुरु का पुत्र गाग्थ:-गर्ग का गोत्रापत्य याण्डचदेशीय राजा का पुत्र बसका गोत्रापत्य कौरव्या कृरुका पुत्र ग: गर्ग गोत्र वाले नैषध्यः--निषध राजा का पुत्र वरना वत्स गोत्र वाले इयवाकवा-हवाकुगोत्रोत्पन्न गायिण:-गर्ग का युवापत्य पञ्चालदेशका राजा दाखाखणा दक्ष का युवापत्य कम्बोजा कम्बोजदेश का राजा चोल:-चोल देश का राजा अथापत्याधिकारः। -शक देशका राजा दात्ति:-दक्षका अपत्य । बाहविः-बाहुकापुत्र | केरल: केरल (मलयामलम्) देश का राजाः औडुलोमि:-उडुलोमा का अपत्य यवन (यूनान) देश का राजा बैदा--विद का गोत्रापत्य पौत्र:----पुत्र का अपत्य (पोता) शेवः शिव का पुत्र अथ रक्ताद्यर्थकाः। गाज-गङ्गा का पुत्र ( भीष्म ) कापायवोरुआ से रंगा हुआ वरून वासिष्ठः-वसिष्ठ का पुत्र पौष-पुष्य नक्षत्र वाला दिन वैश्वामित्र:-विश्वामित्र का पुत्र अद्य पुष्य:-आज पुष्य स्वाफलकावफलक का पुत्र (अकूर) चालिष्ठम्वसिष्ट से दृष्ट साम वासुदेवः-वसुदेव का पुत्र ( श्रीकृष्ण) वामदेव्यमू-वामदेव से दृष्ट साम नाकुल:- नकुल का पुत्र वास्त्रः- वस्त्र से ढंका हुआ (रथ) साहदेवः-सहदेव का पुत्र शराव-सकोरे में निकाला हुआ द्वैमातुर:-दो माताओं के पुत्र (गणेश) भ्राष्ट्र:-सुना हुआ पाण्मातुर:-छै माताओं के पुत्र (कार्तिकेय) ऐन्द्रम् इन्द्र देवता लम्बन्धी सांमातुर, मादमातुः-सती का पुत्र पाशुपतम् पशुपति देवता, वैनतेयः-विनता का पुत्र ( गरुङ) बार्हस्पत्यम्-बृहस्पतिदेवता, कानीना कुमारी कन्याका पुत्र (कर्ण वाव्यास) शुक्रियम् ---शुक्रदेवता राजन्य: क्षत्रिय वायव्यम् वायु देवता श्वशुर्य:-वशुर का पुत्र ( साला) ऋतव्यम्-ऋतु देवता राजन राजा का पुत्र पिश्यम्-पितृ देवता क्षस्त्रिया-क्षत्रिय जाति उषस्यम्---उपल देवता " DHE व watcase ३०० लघुकौमुदी-परिशिष्टे पितृव्या-चचा, काका वरणावरण देश के निकट होने वाला मातुलारामा कुमुहानकुमुद जिस देश में हो मातामहा-नाना नड्वान्-डंठल जिस देश में हो पितामहा-दादा वेतवान्वत जिस देश में अधिक हों काकमू-काकों का समूद बदला-नडप्राय देश भक्षम्-भिक्षाओं का समूह शाहला-वास वाला देश गाभिण-गर्मिणियों का समूह शिखावला-शिखावाला (मयूर) यौवन-युवतियों का समूह देश (भारत) ग्रामता-ग्रामोका समूह चाक्षुषम् चक्षुर्ग्राह्य (61) जनता-जनों का समूह अथ शैषिकाः। -बन्धुता-न्धुओं का समूह श्रावण:-श्रीन ग्राह्य (शब्द) गजता-हार्थियों का समूह औपनिषद:-उपनिषदों में कहा गया(आत्मा) सहायता-सहायकों का समूह दार्षदा:--पत्थर पर पीसे हुए (सत्तू) अहीन:-कई दिनों में होने वाला चातुरस् -४ बैलों के ले जाने योग्य (गाड़ी) • साक्तुकम्----सत्तुओं का समूह चातुर्दशा-चतुर्दशीको दिखाने वाला हास्तिकम् - हस्तियों का समूह राष्ट्रिया-राष्ट्र में होने वाला धेनुकम्--गायों का समूह अवारपारीणा, अवारीण, पारीणा, -चैयाकरण:--याकरण का पढने वाला पारावारीण:-आर पार जानेवाला, पारंगत या व्याकरण का जानकार ग्राम्यः, ग्रामीण:--ग्राम में होने वाला क्रमका क्रमपाठी नादेयम्-नदी में होने वाला पदका पदपाठी माहेयम्-मही में होने वाला शिक्षक-शिक्षापाठी वारापासेयम् काशी में होने वाला मीमांसक:--मीमांसा पढने वाला दाक्षिणात्यः दक्षिण में होने वाला पाश्चात्य:--पश्चिमी, विदेशी-अंगरेजादि अथ चातुरर्थिकाः। पौरस्स्य:--पूर्व में होने वाला औदुम्बर:-~गूलरवाला देश दिव्यम्---स्वर्ग में बहुत ही सुन्दर कौशाम्बी-कुशाम्ब की नगरी (प्रयाग) प्राच्यम्-पूर्व में होने वाला शैनः-शिबियों का निवास अपाच्या दक्षिण में होने वाला वैदिशभू-विदिशा नदी के समीर का नगर उदीच्यम्-उत्तर में होने वाला (भिलसा) प्रतीच्यम्---पश्चिम में होने वाला पञ्चाला--पचाल का देश (फरूखाबाद) अमात्यः-मन्त्री, साथी कुरवः कुरुओं का निवास देश (कुरुक्षेत्र) | इहत्या-यहाँ का । कत्या-कहाँ का कलिङ्गा:- कलिलों का निवास देश ततस्त्या-तन्नत्यः-वहाँ का । नित्यानित्य FE भाषार्थ-प्रयोगसूची। पारलौकिक nees शालीयः-घर में उत्पन्न दन्त्यम्-दातों में होने वाला (वर्ण) मालीय माला में उत्पन्न कण्डयन काण्ड में होने वाला (वर्ण) सदीय:----उसका आधास्मिक आत्मा में होने वाला देवदत्तीयः, देवदत्ता--देवदत्त का आधिदैविकम्---देवों में होने वाला गहीयः-गह देश में पैदा हुआ आधिभौतिक प्राणियों में होने वाला युष्मदीयः-आपका । अस्मदीयः-हमारा ऐहलौकिकम् ---इस लोक में होने वाला यौष्माकीण:-आपका परलोक में होने वाला आस्माकीन:-हमारा जिह्वामूलीयन-जिला के मूल में होने वाला यौष्माक:-आपका । भास्माक:-हमारा अङ्गुलीयम्-अंगूठी तावकीन:-तावक:-तेरा कवर्गायकवर्ग में होने वाला मामक्रीन:-मामक:---मेरा स्त्रोत:--मन देश से आया * स्वदीयः---तेरा । मदीय:- मेरा शौरकशालिक:--चुनी बर से प्राप्त स्वत्पुत्रः-तेरा पुत्र । मत्पुना मेरा पुत्र औपाध्यायक:---- उपाध्याय से प्राप्त मध्य में होने वाला पतामहक: पितामह से प्राप्त कालिकर--समय पर होने वाला समरूपण-लामीथतन से प्राप्त मासिकम् मास में होने वाला (वेतन) विषमीयम्-विषम से प्राप्त सांवत्सरिकम्-वर्ष में होनेवाला (श्राद्ध) देवदतरूप्यम् देवदत्त से प्राप्त सायपातिक: सायं प्रातः होने वाला समयम्-म से प्रास पौनापुनिका वारंवार होने वाला देवदत्तमयम्-देवदत्त से प्राप्त प्रानुषेण्या-वर्षा ऋतु में होने वाला हैमवती-हमालय से आगत (गंगा) सायन्तनम् -सायं होने वाला शारीरकीय:-शरीर व आत्मा संबन्धि चिरन्तनम्--पुराना वर्णन करने वाला अन्ध सौधनः-प्न देशवासी प्रातना--पूर्वाल में होने वाला अगेतनम-प्रातः कालिक पाणिनीयम् - पाणिनि से प्रोक्त (व्याकरण) दोषातनम्-रात्रि में होने वाला औपगवम्----3 गूसम्बन्धी वस्तु स्त्रौग्नः-जुध्न (आगरा) देश में होनेवाला औरला-झरने में हुआ अथ विकारार्थकाः। राष्ट्रियः --राज्य में हुआ पत्थर का विकार प्रावृषिक: वर्षा काल में होने वाला भस्म का विकार स्त्रोन्नः---सुध्न में प्रायः होने वाला मार्तिकः--मिट्टी का विकार कौशेष रेशमी वस्त्र मायूर:-मोर का अंग या विकार दिश्यम्-दिशा में होने वाला मौर्वम्--मूवा (ओषधि) की डण्डी या भस्म वयंमू-वर्ग में होने वाला पैपलमू-पिप्पली का विकार पितृ ENTROpe शैक्षर गारि प्राम -बन्ध अही हारि ३०२ लघुकौमुदी-परिशिष्टे अश्ममय-पत्थर का अवयव या विकार | वयस्थ समान अवस्था वाला (मित्र) मौदा-मूग का विकार वास्यम् ---धर्म से प्राप्त करने योग्य विषय:-विष से मारने योग्य भानमयसू-आम के अवयव का विकार कार्पासम्-कपास ( रुई ) का विकार मूल्यम्-मूल्य । मूल्य:--मूल के समान गोमयम्-गोबर सीत्यजीता हुआ खेत शरमयमशरविकार या अवयव तुल्य-तौला हुआ। अप्रथ:--अग्रणी गव्यम्-गौ का विकार-दूध आदि सामन्यः-सामवेद में निपुण अथ ठगाधिकारः। कर्मण्यः--कर्म में प्रवीण----कर्मठ शरण्य:---शरणागत रक्षक पयस्यम्-दूधका विकार मक्खन आदि सध्या:--सभासद आक्षिकः-पासों से खेलने वाला दाधिकम् -दही से संस्कृत माहीचिकम्मरीचों से संस्कृत अथ छयतोरधिकारः। औदुपिका-जहाज से पार जाने वाला शक्षव्यम्-खूटा बनाने की लबाड़ी हास्तिक:-हाथी का सवार गाव्यम्-गौ के लिये दाधिका-दही से खाने वाला नभ्या-चक्रनामिछिद्र का ( दण्डा) दाधिकम्-दही से मिला हुआ नभ्यम्-नाभिके छिद्र का ( अजन) बादरिका-बेर चुनने वाला वत्सीयः-बछड़ों का हितैषी सामाजिक-समाज का रक्षक दन्त्यम्-दाँतके हितकारी (मान) शाब्दिक:--शब्द करने वाला कण्यम्- माला, हार । नस्यम्-सूधनी दा१रिका--कुम्हार मात्मनीनम्-अपने अनुकूल धार्मिक:-धर्मात्मा । अधार्मिक:--अधर्मी विश्वजनीनम्सबके अनुकूल मार्दशिका-मृदङ्ग बजाने वाला मातृभोगीणः-माता के अनुकूल आसिक-तलवार रखने वाला धानुक:-धनुर्धारी अथ ठअधिकारः। आपूपिका-पूड़ी खाने वाला साप्ततिकम्-सत्तर से खरीदा गया नैकटिका-ग्रामके निकट रहनेवाला (भिक्षु) प्रास्थिकम-सेर (धान्य) से खरीदा हुआ सार्वभौमः-चक्रवर्ती। पार्थिवः-राजा अथ प्राग्घितीयाः। श्चतच्छत्रिका-सफेद छत्रधारी स्थ्य:--रथ का वहन करने वाला घोड़ा दण्ड्यः-दण्डनीय युग्य:-जुभा को उठाने वाला (बैल) अर्थ:-अयोग्य, पूजनीय प्रासङ्गन्धः--काष्ठविशेष में जुता वध्य:-वध के योग्य धुर्यः-धौरेयः-धुरी को उठाने वाला साहिक-एक दिन में तैयार हुआ नाग्यम्--नौका से तरने योग्य (जल) वैया है न पदव सीम औद् swaita पञ्च कर कहि भाषार्थ प्रयोगसूची। अथ मावकर्मार्थाः। एकादशग्यारहवा, पञ्चमः पाँचवाँ जाणवत ब्राह्मण के समान विंश:--मीमा पठा पुग्ने तुल्यः स्थूल:-पुत्र के समान मोटा कतिथ:--कतिपयथा:-कौनसा मथुरावतू - मथुरा के समान चतुर्थ:-चौथा द्वितीय: इमरा चैत्रध-पत्र की तरह । गोत्यम्-गोत्व जाति तृतीयः-तीसरा । श्रोत्रियः-वेदपाठी स्त्रैण -- स्लोवजाति । पौरन पुरुषार्थ पूर्वी-पहिले करने वाला प्रथिना-पार्थवम् मोटापन कृतपूर्वी-जिसने पहिले किया हो मार्दवम्---मृदुता इष्टी-जिसने यज्ञ किया हो शौकुयम्-शुक्किमा-शुक्लता अधीती-पढ़ा हुआ दाढी-ढिमा--दृढ़ता जाड्यम्-जडता----मूर्खता डौढयम् मूढता খ আঁকা। ब्राह्मण्य प्राह्मणता गोमान-गौ वाला । गरुत्मान् रुड सख्यम्-मित्रता विदुष्मान्---विद्वानों से शोभित कापेथम् कपिता चाचल्य शुक्: श्वेत (वन) कृष्ण:- काला (वस्त्र) ज्ञातेयम्-ज्ञातिकम चूडाल:--केश या मुकुट वाला सेनापत्यम् सेनापति का काम शिखावान्-चोटी वाला दीपक, मयूर पौरोहित्यम्---पुरोहिताई मेधावान् बुद्धिमान् लोमशः, रोमश:-बालों वाला अथ भवनाद्यर्थकाः। पासनः खुजली रोग वाला मौद्गीतम्-~-मूगका खेत अङ्गना-शोभन अगों बाली (सन्दरी) लबमाण: लक्ष्मीवान् खालेय साठी धान का खेत पिच्छिला-पिच्छ्वान्-चिकना हैयङ्गवीनम् ---मक्खन दन्तुर:---ऊँचे दाँतों वाला तारकितमू-ताराओं से शोभित (गगन) केशव-उत्तम केशों वाला पण्डित:-युद्धिमान मणिवः-नागविशेष । अर्णव:--समुद्र जरुद्वयलम-ऊरुदनस्करूमान्नम दण्डी, दण्डिकः-दण्डवाला व्रीहिः, ब्रीहिकः-धान्य वाला तावान-उतना, एतावान-इतना यशस्वी-कीर्तिमान कियान्-कितना, इयान्-इतना मायावी-माया वाला मेधावी बुद्धिमान 'पञ्चसय पाँचों का समूह ग्वी-माला पहिने हुए द्वयम्-द्वितयम्-दो वामी अच्छा बोलने वाला त्रयम्-वित्तयम्-तीन अर्शसा-नवासीर का रोगी उभयदोनों अहंयु:-अहवारी । शुभंयुः शुमान्वित हेयन GNOMera पान का खेत । abuses जांध तक ३० MM भ वि ए T लघुकौमुदी-परिशिष्टे अथ प्राग्दिशीयाः। स्वनिष्ठ:--अधिक कडी त्वचा वाला मौः कहाँ से । इत:... हाँ से अन्धका कोई घोड़ा अतः इसलिये । अमुत: उससे खजीयान् , सजिष्टः-बहुत मालाधारी खत:जिससे । सातः उससे विद्वत्कल्पः, विद्वेद्देशीयः, विद्वद्देश्य:- बहुत: बहुतों से विद्वान् के समान परित... चारों और से पचतिकल्पम्-असमाप्त पाक अभित: दोनों तरफ से बहुपटुः-थोड़ा चतुर , कुन्न कहाँ । यन्त्र जहाँ । तत्र वहाँ उच्चकैः-- अञ्चात ) ऊँचा बहुत: बहुत जगह । इह-यहाँ। क-कहाँ नीचकैः नीचा आ ततोमवान् , तन्त्रमनान-पूज्य सर्वकैः- दीर्घायुः-- दीर्घायु । देवानात्रियमूर्ख युष्मकाभि:---तुम सब ने मा आयुधमा चिरञ्जीवी युवकयोः--तुम दोनों का सक्षा, सर्वदा-सदा । अन्यदा-और समय स्वयका--तूने कक्षाका सादा जबातदातब अश्वक:--निन्दित घोड़ा एतहि अब कहिकम । यहि-जब कत३:--कौनसा यतर:--जौनसा बाद तथा उसी तरह । यथा--जिस तरह ततर:-तौनसा इस्थमस प्रकार | कथन किस प्रकार कतमः-कौनसा यतमः-जौनसा दार्दु ततमः-तौनसा अथ प्रागिवीयाः। यका जो । सका वह आयतन अत्यन्त धनी आरि लघुतमा, लघिष्ठ:-- अत्यन्त छोटा अथ स्वार्थिकाः। धानु' किन्तमामू-अतिशय प्रश्न अश्वक:-खिलौने का घोड़ा आपू मालतमासू-अतिशय पूर्वाह नैा पचतितमाम्-अतिशय पाक अश्वका-बोड़ा अन्नमय-अन्न जिसमें अधिक हो उच्चस्तमाम्--बहुत ऊँचापन अपूपमयम्-अधिक पूआ वाला उच्चस्तमः-अति ऊँचा (वृक्ष) अन्नमयः-अन्नप्रचुर ( यज्ञ) लघुतर, लघीयान-बहुत छोटा अपूपमयम्-अपूपबहुल युग्या पटुतराः, पटीयांसा-हुत पटु प्राज्ञः त्रुद्धिमान् प्रास श्रेष्ठः, श्रेयान्-अत्यन्त प्रशंसनीय प्राज्ञी-बुद्धिमती देवतः--देवता । बान्धवः---माई बन्धु भूमा, भूयान् , भूयिष्ठः-बहुत बहुशः बहुधा । अल्पश-थोड़ा २ दाधि SAMAR शानि धुर्यः- ज्येष्ठः, ज्यायान्-बड़ा, श्रेष्ठ भाषार्थ--प्रयोगसूची। मध्यम मीछे से arma যাহা ROM नङ्गा होने आदित:--आदि में भावली---- आप भवन्ती होती हुई अन्तत: अन्त में पचली...पकाती हुई दोव्यन्ती-खेलती हुई पाश्वत: गलसे कुरुवारी-कुरु देश में घूमने वाली स्वत:वर से नदी-नदो। देवी-देवी वर्ण से, अक्षर ले सौपर्णधोलुपी की कन्या कृष्णीकरोति...काला करता ऐन्द्री-पूर्वदिशा ब्रह्मीभवति---ब्रह्म होता है औरली -उत्सगोत्र में उत्पन्ना अनुयली-ऊदली-अहमानी-ऊरू दोषासुनय-रात की तरह ( दिन) प्रमाण (जल) वाली दिवाभूना--दिन की तरह (प्रकाशमान रात) पडलयी पाँच प्रमाण वाली अखिसालमाति-जलता है माक्षिकी पासा से खेलने वाली दधि सिञ्चति--रही सींचता है लावणिझी बाप बेचने वाली अनिमवति अग्नि हो रहा है नाही जैसी पटपटाकरोशि----पट करता है इत्वरी--बूमने बाली (कुलटा ) ईपरकशेति-गोड़ा करता है कोणी-लीसम्बन्धी श्ररकरोति--चत ऐसा शब्द करता है पाखा---पुरुष सम्बन्धी खटखराकोति-नरट २ करता है शाक्तीकी शक्तिशाल बाली पटिति करोति पटत् ऐसी अव्यक्त ध्वनि याष्टीकी-यष्टिवाली आयकरणी-एनी बनानेवाली (ओषधि ) इति तद्धिताः। तरूणी, तलुनी युवती गागींग गोत्रोत्पन्ना अथ स्त्रीप्रत्ययाः बगावयणी मार्ग गोत्रोत्पन्ना अजानकरी नर्तकी-लटी । गौरी--पार्वती एडका-मेडी अनदुही, अनड्बाही अधामोडी कुमारी कन्या चिड़ी त्रिलोकी-तीनों लोक का हो त्रिफला-इरड, बहेडा आमला लडकी ( १६ वर्ष तक की मानीका सेना जाला एना, एनी----चितकबरी भन्दा बालिका रोहिता, रोहिणी-लाल रङ्ग की विलाता-बाला (नवयौवना) वृद्धी, मृदुः-कोमलाङ्गी २० ल०. करता है Nagale any । HAR लघुकौमुदी-परिशिष्टे । f " हा बहुः, यही बहुत सुजघना सुन्दर जघन बाली शकटी, शकाटामाडी शूर्पणखा--- शूर्प के समान नख बाली बगोपी, बोपालिका-~-गोर की स्त्री । रावण की बहन) अश्वपालिका-घोड़े पालनेवाले की ली गौरमुखा----ौरवर्ण मुख बाली सर्विका ! कारिका-कारिका तात्रमुखी-~लाल मुख वाली (कन्या) सूर्या- सूर्य की स्त्री सटीतट-किनारा इन्द्राणी-इन्द्र की स्त्री वृधली-शूद्री वरुणानी-रुण की स्त्री कठी-काठगोत्रीत्पन्ना भवानी....पार्वती बहवृती-हुत ऋचायें पढ़ने वाली हिमानी---वर्क का समूह मुण्डा ---मुण्डित स्त्री अरण्यानी-मारी जङ्गल बलाका-बकप नौकातीका। क्षत्रिया---शत्रियाणी शका-ममर्था हयी घोड़ी बहुपरिव्राजिका-अधिक संन्यासी गवयी-गवय स्त्री (जङ्गली गाय) जिसमें हों ऐसी नगरी (काशी) मुकथी-ख चरी सूरी कुन्नी सत्सी- मछली थवानी-दुष्ट जौ दाक्षी क्षगोत्रोत्पन्ना श्री यवनानी-यूनानी लिपि कुकः कुरु की अपत्य स्त्री मातुलानी, मातुली मामी ब्राह्मणी उपाध्यायानी, उपाध्यायी-गुरु की स्त्री पङ्क:-पङ्गु स्त्री आचार्यानी--आचार्य की स्त्री पति की माता (सास) अर्याणी, आर्या-वैश्या स्त्री करमोह गोल लम्बी ऊरु वाली क्षत्रियाणी क्षत्रिया-क्षत्री स्त्री संहितोरू:-मिले हुए जंघा वाली वस्त्रक्रीती-वस्त्रों से खरीदी हुई लक्षणोरू: सुलक्षण जंघावाली धनकीता-धन से खरीदी हुई वामारू:-सुन्दर जंघावाली अनिकेशी, अतिकेशा बहुत केश वाली शाहरवी:-शृङ्गारु की पुत्री चन्द्रमुखी-चन्द्रमा की तरह मुख वाली बैदा-विदगोत्रोत्पन्ना स्त्री भगुल्फा--सुन्दर गुल्फ वाली ब्राह्मणी बाह्मण जाति की स्त्रो शिखा--चोटी नारी-त्री कल्याणकोडा कल्याण उर:स्थलवाली घोड़ी युवतिः-युवा स्त्री इति भाषार्थप्रयोगसूची। व Ataa अध्वर्यु:- milan मो ioe अष्टाध्यायीसूत्रसूची सूत्रम् अनङ सौ अतरि च अनुदात्तडिन अमि पूर्वः पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम् पृष्ठम् গ पृष्ठम् अत इनिठनौ २३७ अपो भि अकथितं च अत उपधायाः ९ अप्तृन्तच १७६ अत उत्सार्वधातु अनधनने लहा ८५ अप्पूरणीप्रमा २०३ अप्रत्ययात् अकः सवर्णे दीर्घः १४ अनद्यतने लुट ८३ १७८ ११०, १३७ अकर्मकाच्च अत एकहलमध्ये ९० अनद्यतने हिलन्य २३९ अभिज्ञावचने १६२ अभिनिष्काम २२३ अकृत्सार्वधातु अतिशायने तम २४० अनश अक्षयोऽर्शनात् २०७/ अतो गुणे अभिप्रत्यतिभ्यः१५६ अनाध्यकः अचस्ता स्वत्थल्य ९४ अभ्यासस्थास' १११ अनोदीों यजि ८२ अनिदितां हल ६७ अभ्यासाच अचित्तहस्ति २१६ १०८ श्रनो मिस ऐस ३३ अभ्यासे चर्च अचिरतः अनोऽम अनुदात्तस्य च १२८ अचि विमाषा १३२ अनी येयः अनुदातोपदेश १०८ अम्बार्थनधोई ४३ अचि श्नुधातु ४३ अनो रोरप्लुता २७ । अनुनासिकस्य १५१ अचोऽणिति अती लोपः १२ अनुनासिकात्परो२४ अम्सम्बुद्धी ५६ अचोऽन्त्यादि १३ अतो हलादेर्लंघोः९० अनुपराभ्यां १५६ अयामान्तावा १०१ अतो हे अनुशतिकादी २२२ अरुर्दिषदजन्त १६७ अचो रहाभ्यां द्वे १७ अतःकृकमिकस् ९६७ अनुस्वारस्य ययि २१ । अतिपिपत्योश्च ११८ अचः अत्रानुनासिकः २३ अनुष्यानन्तर्ये २११ | अनिलूधुसू अचः परस्मिन् १०९ अनेकमन्यपदा २०२ अतिहीब्लीरी १४४ अत्वमन्तस्य अनेकालिशत्सर्व १४ अर्थबदधातु अदभ्यस्तात अजाघदन्तम् २०६ अदर्शनं लोपः अन् २१२ अर्धर्चाः पुंसि २०१ अजाधतष्टाप २४६ अदस औ सुलो ७० अन्तरं बहियोगी ३६ अर्ध नपुंसकम् १९५ अज्झनगमा अदलो मात अन्तर्बहिभ्यां २०४ अर्बणनसावन ६० अज्ञाते २४३ अदसोऽसेर्दादु ७० अन्नादिवच्च अर्शआदिभ्यो २३७ अञ्चेः सिचि १३४ | अदिप्रभृतिभ्यः १०७ अन्यथैवंकथमि १८१ अलोऽन्त्यस्य अटकुप्वानुम् ३३ अदूरभवश्च अन्येभ्योपि दृ १६८ अलोन्त्यात्पूर्व ४० अभ्यास १३१ अपत्यं पौत्रम् २१० अलंखल्वोः प्र २७९ अणुदित्सवर्णस्य ७ अपसवे ज्ञः १५४ अल्पाच्तरम् २०६ ८८ अद्डतरादिभ्यः ५२ अपादाने पञ्च १८६ अल्लोपोऽनः मत इन २११ अधिकृत्य कृते २२३ | अपृक्त एकाल अवङ् स्फोटाय १४ अचो यत् अच्च धेः ३ अटेड गुणः अदः सर्वेषां अत आदेः लघुकौमुदी-परिशिष्टे- आच हो इतो मनुष्य al HD इदम इश इदमोमः दमोहः इदितो नुम् ९१ ३८ आर्धधातु के आतो युच মূল $ सूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् अवयवे च प्रा २२४ आच त्वात् २३२ आत्महतः स २०० इतश्च अवे स्तृशोधञ् १७९ आमीक्ष्ण्ये णमु१८१ इतोऽत्सर्वना अन्यातानुकर २४५ भाच्छीनधोः आमि सर्वना अव्ययीभावः १९० आश्च आमेतः १०० इदंकिमोरी २३४ अव्ययसर्वना २४२ आडजादीनाम् ८८ २३८ अव्ययात्यम् २२० आडुत्तमस्य आम्प्रत्ययवत २४० अव्ययादाप्सु मापनद्याः आयनेयोनीयि २११ अव्ययीभावश्च ७७ आत पाल: आयादय आध ९२ इदमोहिल २३९ अन्य योआवश्च १९० आतश्योपसर्गे १६६ आवातुक अव्ययीभावे चा १९ तो हिनः ९९ | आर्धधातुकास्ये. ८३ अव्ययीमावेशर १९२ आनने धातोः इदुद्याम् अव्ययं विभक्ति १९० आतोऽनुपसर्गे १६६ आशिषि लिङ् ८४ इदोऽय पुसि अश्वपत्यादिभ्य २०८ आतो युक् चि १६० आ सर्वनामः ६८ इनण्यनपत्ये २१६ अष्टन आ विभ६१ १७९ ११५ इन्द्रवरुणम अष्टाभ्य औश आतो लोप इटि ९६ इ इन्द्रे च असंयोगाल्लिट ८९ इकोऽचि विमा ५३ इन्हन्पूषार्य ५९. असिद्धवदत्रा १०८ आत्मनेपदेष्वन १२९ १४६ इरितो वा १२२ अस्तिलिचो आत्मनेपदेव १०१ इको यणचि इवे प्रतिकृतौ . २४३ : आत्मविश्व २२९ इकोऽसवणे १७ - इधुगमियमा अस्थिदधि आत्ममाने ख १६८ हान्ताच लघु २३१ इष्टादिभ्यश्च अस्मद्युत्तमः आत्मावानौ २२९ इगुपधशाग्री १६६ इष्टस्य यिदच २४२ अस्मायामेधा २३७ आदिरन्त्येन इग्यणः संप्र इसुसुक्तान्तात् २१६ २४४ आदिभिटुड ईच गणः अस्थतिवक्ति ११५ आहेच उपदे हजादेश्व गुरु ईदूदेदद्विवचनं १५ अहन् आदेशप्रत्यय ईजाति अहंशुमनोर्युस् २३७ आने पर स्थ इटोऽत ईपद्रसमा अहःसर्वेक २०० आद्गुणः इडत्यतिव्ययती१०७ । इषदुःमधु १७९ आद्यन्लवदेक इणो गा लुद्धि ११२ ई हल्यो आकडारादेका ३८ आद्यन्तौ कि २२ इणो यण १११ आक्वेस्तच्छील १७२ आधागे धिक १८७ इणःप: ૨૦ लगवादिभ्यो २२८ मादि चापः आनि लोद इणः बीलु १०० उगितश्च आको नालिया ३९ १७२ इतराभ्योऽपि २३९ । उगिदचा सर्व ६० इको झल अस्व च्चो ९७ ९९ al इट ईति आने सुक और आप Nagpur एलि पररूपम् १३ कण्ड्वःदिभ्यो १५३ १८० एजेः खश एतऐ उपसर्गे घोर किः१७७ अष्टाध्यायीसूत्रसूची। जूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् पउन उन्धकहात्तः एकाच उपदेशे ९३ औ २२६ उपविदजागृभ्यो११० एकाचो बशो उणादयो बहु उस्यपदानात् ९६ एकाजुत्तरपदे ५९ औतोडम्शसो उता प्रत्ययाइ ९८ पको मान्ने उतो वृद्धिलकि १०९ ऊकालोऽझाव उत्सादिभ्योऽन् २०९ उद ईत् ६७ ऊतियूनिजूति १७८ उदश्चर-सकर्म १५४ एक इस्वात्संबुद्धः३२ कन्यायाकनीन२१२ ऊरुत्तरपदादौ २५३ एच इनस्वादशे ५४ कपिज्ञात्योक २३२ उदास्थास्तम्भोः २० उदितो वा ऊोतेविभाषा ११७ एचोऽयवायायः १० कमेर्णि ऊणोंतेर्विभाषा ११५ उदोउयपूर्वस्य ११८ १६७ कम्बोजाल्लुक २१३ ऊयाँदिच्चिडा १९८ करणे यजः उद्विभ्यां काकु २०४ एत ई कर्तरि कर्मव्य १५३ उपदेशेऽजनु उपदेशेऽत्वतः ऋपूरब्धूः १६३ रतन्तदोसुलो . २९ उपपदमतिड् १९९ कच्छत्यताम् ११८ एतदः उपमानादाचारे १५१ ऋतउत् कर्तुरीमिततम १८३ एतिस्तुशास् १६४ उपमानानि सा १९८ ऋतश्च संयोगादेः१२६ एतेतौ रथोः २३९ कर्तृकरणयोस्तु १८५ कर्तृकरणकृता १९४ उपसर्गप्रादुाम१११ तश्च संयोगा ९७ एतेलिडि ११२ उपसर्गस्यायती १०३ महतो डिसर्व कर्मणा यमभि १८५ एत्येधत्यूठ उपसर्गादसमासे ९० तो भारद्वाज ९५ कर्मणि द्वितीया १८३ एरनेकाचोऽसंयो ४४ उपसर्गादध्वनः २०७ হিষ্মণ कर्मण्यण १६६ उपसर्गादृति धातौ१३ मुशनस्पुरु कर्मवत्कर्मणातु १६१ एलिखि उपसर्गाः क्रिया १२ ऋद्धनीः स्ये काष्टाय क्रमणे १५२ एरच उपसर्गे च सं १६९ ऋन्नेभ्यो डीप ५१ कस्कादिषु च २०४ ओ अध्यन्धकवृष्णि २१२ कानानेडिते २५ ऋइलोण्यत् १६५ ओतः इयनि १२३ काम्यच उपसजैन पूर्वन् १९० १५२ उपान्छ ऋ ओत् कालसमयवेलासु १७६ उपात्प्रतियल १३८ ऋत इद्धातोः १३१ ओदितश्च १७० काला उभादुदातो २३४ ऋदोरम् १७७ ओमाकोश्च कितिच २०९ उभे अभ्यस्तम् ६८ ए ओर्गुणः २१० । किदाशिषि उरण रपरः ओसिच २४० उरप्रभृतिभ्यः २०४ एकवचनं संबु ३२ ओःपुयण्ज्यपरे १४४ किमिदंझ्या ९२ । एकविभक्तिचा १९८ ओः सुपि ४६ किमेत्तिव्यय २४० कर्तरि कृत कर्तरि शम् किमश्च लघुकौमुदी-परिशिष्ट- २१ किमः कः काति चार्थे द्वन्द्वः चिणो लुक दि २३८ क्षायो मः चोः कु: घलेः सिच च्वौच खरि च २० सूत्रम् पृष्ठम् । सूत्रम् पृष्ठम् / सूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम् किमोऽत् २३९ क्रयादिभ्यःश्ना १३८ / गोत्राबून्यस्त्रि २११ चादयोऽसत्त्वे १५ कसुश्च १७१ गोपयसोर्यत् २२५ २०५ किरती लवने १३१ २३९ गोस्तद्धितल १९७ किंयत्तदोनिर्दा २४३ किन्प्रत्ययस्य ६२ गोश्च पुरीषे २२५ चिण ते पदः १२५ किंसर्वनामबहु २३८ किप च १६८ गोस्त्रियोरुप १९८ चिणगावकर्म १५८ कुगतिप्रादयः १९८ क्षत्राद्धः २१२ अहिज्यावयि १२३ चुत कुतिहोः १७१ / ग्रहोलिटि १४१ कुत्सिते २४३ | क्षुम्नादिषु च १४८ ग्रामजनबन्धु २१६ चौ ६७ कुप्वोः क पौ २५ | क्सस्याचि ११४ ग्रामाद्यखौ २१९ चिल लुखि कुमुदनडनेतसे २१८ कुरुनादिभ्यो २१३ खरवसानयो पनि च भाव १७७ २४५ कुहोश्चः घुमास्थागापा ११३ कृयो हेतुताच्छी १६७ खित्यनव्ययस्य १६९ | घेडिंति ३९ । छादेऽद्धथुपस १७९ कृञ्चानुप्रयुज्यते ९२ ख्यत्यात्परस्य ४१ ध्वसोरेद्धाव छे च २६ कृत्तद्धितसमासा ३० छवोः शूडतुना १७३ कुत्यल्युटो बहुलं १६४/ गतिश्च लमो हस्वादचि २३ कृत्याः १६३ । गन्धनावक्षेपण १५५ / सिङसोश्च जक्षित्यादयः कृदति गमहनजनखन उसिङयोः स्मा ३५ जनपदशब्दात २१३ कृन्मेजन्तः गमेरिट परस्मै ९९ टिच्च जनपदे लुपू २१८ कृस्वस्तियोगे २४४ गर्गादिभ्यो २१० त जनसनखना १३६ कृसभृवृस्तुद्रुसु ९४ गहादिभ्यश्च २२० प्रथमयोरम् ६३ जनिवध्योश्च १२४ केशाद्वोऽन्यतर २३७ ११३ राम्नद्यान्नीभ्यः ४३ जराया जरस कोशाड्ढ २२२ ११२ | पोः कुक्ढक् २२ जल्पमिक्षकुट्ट १७२ गातिस्थाधुपा ८७ ङथापप्राति तक्तवतू निष्ठा १७० गुणवचनना २३२ जशः शी क्नेर्मम् नित्यम् ७७ गुणोऽपृक्ते जश्शसोः शिः ५२ क्त्वातोसुन्कसु ७७ गुणो यङ्लुकोः १४७ चजोः कुधिष्ण्य१६५ । जहातेश्च क्यचिच १५० गुणोऽर्तिसंयो ९७ / चतुरनडुहो ५५ जहा तेश्च कित्व १८१ क्यस्य विमा १५१ गुपूधूपविच्छि ९२ चतुर्थी तदर्था १९४ जातेरस्त्रीविषया२५२ क्रमादिभ्यो १७८ चतुर्थी सम्म १८५ जिह्वामूलाङ्गुले २२२ क्रमः परस्मैप १६६ चरति २२६ जीवति तु वश्ये २११ २५० । गोतो णित ४६ चरेष्टः १६७ जुसि च डिति हस्वश्च गाङ्कुटादि गाङ् लिटि विवति च ८७ जसि च 400 7 मा IF २१७ - गुरोश्च हलः ९५ बोहे का क्रीतात्करण SHARPATHA यो नः স্যা সহ तत्पुरुषः समा १९७ / अष्टाध्यायोसूत्रसूची। खुनन् पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम् । सूत्रम् पृष्ठम् । सूत्रम् पृष्ठम् जुहोत्यादिभ्यः ११७ नद्राजस्य बहुपु२१३ तस्य विकार जस्तम्भुनचुम्लु १३९ णलुत्तमो वा तहति रथयुग २२७ तस्य समूह शाजनोज णियश्च १४२ तद्धितश्चासर्वधि ७७ तस्थापत्यम् २१० ज्य च णिनां त्रयाणां १२१ तद्धिताः तस्येदम् ज्यादादीयसः २४२ णिश्रिद्गुस्नुभ्यः १०२ तद्धितार्थोत्तरपद१९६ तान्येकवचन ज्वरत्वर स्त्रिव्य १७८ णेनिटि तद्धितेष्वचामा तासस्त्योर्लोपः ८४ तनादिकृश्य ११० तिहश्च २४० झयः १९३, २१८ जौ चल्युपधाया१०२ १३६ तिडस्त्रीणित्री झयोहोऽन्य ण्यासअन्यो युच्१७९ तनादिभ्यस्तथा ॥ तिशित्सार्व झरो झरिसवणे - ण्वुलतुचौ १६६ - तनोतेयं कि तितुत्रतसिसु १७३ तपरतत्कालस्य १० तिरिझसिप झलां जशोऽन्ते १९ तानावात्मने ८० तपोऽनुताधे च १६० तिप्यनस्तेः झलो झलि २२२ तपोरेव कृत्यक्त १६३ तिरसस्तियलो ६७ झषस्तथी तत्पुरुषस्याङ्गुले:२०० तरति २२६ ति विशत डिति २३४ झस्थ रन् तत्पुरुषे कृति १६९ तरप्तमपौ पः २४० तिष्ठतेरित १४४ झेर्जुस तत्पुरुषः १९३ | तबकममकावेक २२१ तापसहलुम झोन्तः तुदादिभ्यः शः १२७ तत्प्रकृतवचने २४४ तव्यत्तव्यानीय १६३ - तुभ्यमहो टाङसिमा तत्प्रयोजको १४४ तसौमत्वर्थ तुमुण्वुलो क्रिया१७६ टिड्डाणद्वय २४६ २२१ तस्थस्थमिपा तुल्यास्यप्रयल टित आत्मने तत्र तस्येव तस्माच्छसोन: ३३ तुह्मोस्तातड़ टे ५२,२३१ तबसवः २२२ तस्मादित्युत्तरस्य २० तृज्वत्क्रोष्टुः टिवतोऽथुच् १७७ तत्र साधुः २२८ तस्मान्नुडचि १९८ तृणह इम् ठ तत्रोद्धृतममन्ने २१४ ठगायस्थानेभ्यः २२२ तस्मान्नुदिहल:९१ तृतीया तत्क तत्रोपपद १९९ तस्मिन्नणि च २२० तृतीयादिषु मा ५४ ठस्येकः तदधीते तद्वेद २१६ तस्मिन्निति निदि ९ तृतीयासप्तम्यो १९१ ड तदर्हति २३० तस्मै हितम् २२९ १७२ तदस्मिन्नस्तीति २१७ तत्य निवास: २१८ तृफलमजनपश्च१०४ डिवतः ते तद्राजा 1: वित्रः तदस्य सजातं २३३ २१३ १७७ तस्य परमानंडितं २५ तदस्यास्त्यस्मि २३६ तस्य पूरणे डट् २३४ तेन क्रीतम् ढोढे लोपः तदोः सः साव ६३ तस्व मावस्त्ल २३१ तेन तुल्यक्रिया इलो पे पूर्वस्य २८ | तद्गच्छति पथि२२३ ३ तेन दीव्यति. १२५ डति च हःसि धुट maa तस्य लोपः azLKATAASwee लघुकौमुदी-परिशिष्टे- HEN ল দুজনার दिव औत तो सत ७० ६४ दीर्घ च धिच सूत्रम पृष्ठम् । सूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम् । सूत्रम् पृष्ठम् तेन निवृन्तं२१७,२३० दान्नीशसयुयु १७३ द्वित्रिभ्यां तय २३४ नपरे नः २२ तेन प्रोक्तम् २२४ दिक्पूर्वपदाद १९६ वित्रिभ्यां च मू २०४ नपुंसकस्य झलच:५२ तेन रक्तंरागात् २१४ दिवसंख्ये सं द्विवचनेऽचि नपुंसकाच ते प्राग्धातोः ८५ दिगादिभ्यो २२२ द्विवचनविभज्यो२४१ नपुसकादन्यत १९३ तेमयावेकव ६५दित्यदित्या द्वेस्तीयः २३५ नपुंसके भावे १७९ तोलि १९ दिव उत् द्वयष्टनः संख्या २०० २०८ दधेकयोद्विवचनै ३१ न भकुछगम्' १३७ १७२ दिवादिभ्यः १२२ न भूसुधियोः त्यदादिषु दृशौ ६८ दीडो युडचि १२४ धर्म चरति २२६ न माड्योगे त्यदादीनामः दीपजनबुध धातोरेकाचो १४७ नमुने त्यदादीनि च २२० दीर्घ इणः कि ११२ धातोः नमः स्वस्तिस्वा १८६ त्रिचतुरोः स्त्रि ४९ दीर्घाजसि च ३८ धातोः कर्मणः १४५ न यदि १६२ नेस्त्रयः ४२, २०० दीर्घोऽकितः धात्वादः षः सः ५५ न रखाम्या पदा २१६ त्रैः संप्रसारणं २३५ दीपों लघोः १०२ धान्यानां भवने २३२ नलिडि १४० त्वमावेकवच ८९ १०० न लुमताजस्य ४१ त्वामौ द्विती ६६ दूराद्धृते च १५ धुरो यड्ढको २२७ नलोपो नमः १९८ त्वाही सौ नलोपः प्रातिप ४० दृढः स्थूलबल १७१ ध्रुवमपायेऽपादा १८६ दृशेः क्वनिप् १६९ नलोपः सुपस्वर ५९ थलि ९१ दृष्टं साम न क्त्वा सेट १८० न विभक्तो दोदोः १७१ न क्रोडादिबढ २५१ न वृद्भ्यश्चतु १०३ थोन्थः ६१, बुतिस्वाप्योः १०३ नक्षत्रेण युक्तः २१४ न शसददवादि १०४ धुद्भयो लुछि नखमुखात्संज्ञा २५१ नशे दक्षिणापश्चा न गतिहिंसाथै १५३ नश्च धुप्रागपागुदकन २२० दण्डादिभ्यो २३० द्वन्द्वश्च प्राणितू २०६ न सिंबुद्धयोः ५८ नश्चापदान्तस्य २१ दधस्तथोश्च १२१ द्वन्द्वाञ्चुदषहा २०७ नम् तरछव्यप्रशान् २४ दधातेहिः १७१ द्वन्द्वे घि २०६ नडशादा २१८ नषटस्वस्रादिभ्यः ५१ दन्त उन्नत २३६ । द्विगुरेकवचनम् १९७ न तिसचतर ४९ न सम्प्रसारणे ६० दयायासश्च १०३ द्विगुश्च न संयोगाहम १११, ५७ । द्विगोः २४७ नद्यादिभ्यो हक २१९ नस्तद्धिते दाणश्चता १५५ द्वितीयाटौस्स्वे ५८ नन्दिग्रहिपचा १६६ नहिवृतिवृषिव्य ७१ दादेर्धातोः ५५ द्वितीयायां च ६४ / नन्द्राः संयोगा ११६ नहो धः दाधा ध्वदाप १२० । द्वितीयाभिताती १९४/ न पदान्ताडोर १९ । नाश्चेः पूजायां ६७ च सेटिं थासः से tur १९३ नदीभिश्च दश्च य शु अष्टाध्यायीसूत्रसूची। नित्वं वृद्धश ३१ प्रज्ञादिभ्यश्च ." সুস্থ पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठन् । सूत्रम् पृष्ठन् । सूत्रन् जादिचि २७१ पूर्वपदात्संज्ञा २५२ प्राणिस्थादातोल २३६ बान्तादनंख्या २३४ पन्चमी भयेन १९५ पूर्वपरावरदक्षि ३६ प्रातिपदिकार्थ १८२ नाल्यस्तस्या ६५ पूर्ववत्सनः प्रायः नारूयस्ताच्छ ६८ पञ्चम्यास्तसिल २३८ नाभि पञ्चन्याः स्तो १९५ पूर्वापराधरोत्तर १९५ प्रासापनेच नाव्ययीमावा १९१ पतिः समास पूर्वादिभ्यो नव ३७ प्रायभवः २२२ निकटे वसतिः २२७ पत्वन्तपुरोहि' २३२ पूर्वोभ्यासः प्रावृप एण्यः २२१ नित्यं करोतेः १३७ पथिमध्यभुक्षा ६१ पृथ्वादिभ्य इम २३१ प्रावृपष्ट २२१ नित्यं कौटिल्ये १४७ पदान्तस्य ३३ पोरदुपधात् प्रियवशे वदः १६७ नित्यं लितः ८५ पदान्ताद्वा २६ प्रकार वचने थाल २४० कुतप्रगृह्या अचि १५ नित्यवीप्सयोः १८१ परनल्लिज बन्द २०१ प्रकृत्यैकाच प्वादीनां हस्वः १४० प्रशादिभ्यश्च २४४ निपात एकाज परस्मैपदानां प्रत्ययलोपे प्रत्यय४१ बहुगणवतुडनि ३१ निवासचिति १७७ पर: सन्निकर्षः प्रत्ययः बहुवचने झल्येत् ३४ निष्ठा परिवृतो रथः २१४ प्रत्ययस्थात १७० परिव्य वेभ्यः प्रत्ययस्य लक् ४१ २०५ बहुवचनस्य वख ६५ निष्ठायां सेटि १७१ प्रत्ययोत्तरपदयो२२१ बहुव्रीहौसक्थ्य २०३ परेम॒षः १५६ नीचैरनुदात्तः परोक्षे लिट ८२ সমস্পন ২৩ बहुपु बहुवचनम् ३२ तुम्बिसर्जनीय ६९ बहोर्लोपो भूच२४२ पर्वभिभ्यां च २३९ प्रथमयोः पूर्वन ३२ पाघ्रामास्था प्रथमानिर्दिष्ट १९० बहल्पार्थाच्छस् २४४ पादस्य लोपो २०४ प्रथमायाश्च द्विव ६४ बह्वादिभ्यश्च पादः पत् प्रभवति ९४ २२३ बालादिभ्यश्च २११ नेड्वशि कृति १६८ पिता मात्रा प्रमाणे २०६ इयलजद२३३ अब इट नेदमदसोरकोः ५८ पितृव्यमातु २१५ प्रशस्यस्य ः २४१ नेयवस्थाना ५० पुगन्तलघूपध प्रदरणम् २२६ भुवः पश्चानामा नेर्गदनदपतपद ८९ पुमः खय्यम्परे २४ प्राक्क्रीताच्छः २२८ नेविंशः १५३ पुंयोगादाख्या २४८ प्राकडारात्समा १८९ माश्च चिणि १६० नोपधायाः पुवः संज्ञायाम् १७४ प्रागिवात्कः ૨૪૨ मवतर: नौवयोधर्मविध २२८ पुषादिद्युता भस्य टेलीपः पुंसि संज्ञायां १७९ प्रारवहतेष्ठक २२५ भावकर्मणोः १५७ प पुंसोऽसुङ् प्राग्छिताद्यत् २२७ भावे 'पोश्च २५३ पूर्णाद्विभाषा २०४ प्राग्दिशो दिन २३८ भिक्षादिभ्योऽण् २१५ पतिविंशति २३० | पूर्वत्रासिद्धम् ११ । प्राचाफ तद्धि २४७ भिक्षासेनादाये १३७ ब्रुवो वचिः ९९ प्राग्बतेछन् नः क्ये लघुकौमुदी-परिशिष्टे s २६ यः सौ भुजोऽनवने " यांच मम् " पृष्ठम् । सूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम मियोऽन्यतर ११८ मो राजिनमः २२ योऽचि ६४ लशकतद्धिते भीहोभृहुवां ११७ त्रिय तेलबलिको १३२ लिडाशिषि १३५ म्वोच १७१ लिङः सलोपो भुवो वुग्लुलि ८२ र तोहलादेल २३१ लिङः सीयुट १०१ भूवादयो धातवः १२ यकोऽन्त्रि च रक्षति लिहनिमित्त २२६ भूसुबोस्तिति यडो वा रदाभ्यां निष्ठा १७० लिसिचावा ११४ भृभामित् ३८ रधादिभ्यश्च लिङसिचोरा १४० १२३ भोज्यं भक्ष्ये १६५ लिटस्तझयोरे यजयाचयत रलो व्युपधाद्ध १८० ९९ १७७ भोमगोअघोअपू २८ लिटि धातोरन ८२ योश्च २१० रषाभ्यां नोण: ५६ भ्यसोऽभ्यम् ६४ लिट: कानज्वा १७१ যক্ষ্ম २४६ राजदन्तादिषु २०५ भ्रस्जोरोपधयोर १२७ यत्तदेतेभ्यः परि २३३ / राजनियुधि भ्राजमासधुर्वि १७३ लिख्यन्यतर १०७ यमरमनमाता ९७ राजश्वशुराधत् २१२ लिक्ष्यभ्यासस्यो १०५ यरोऽनुनासिके १९ राजाहः सखिभ्य २०० मघवा बहुलम् ६० लिपिसिचिवश्च १२९ यस्मात्प्रत्यय रात्राहाहाः पुंसि मध्यान्मः २२१ लुग्वा दुहदिह ११४ यस्य हलः रात्सस्य मनः १०८ यस्येति च रायो हलि मय उजो वो वा १७ याडापः ४७ रालोपः १७३ मय च २२३ यासुटपरस्मैप लुङ्लङलक्ष्व ८६ राष्ट्रावारपारा २१९ मयड्वैतयोर्भा २२४ युजेरसमासे लुङ्सनोधरा १०७ ६३ | रिशयग्लिङ् १०४ मस्जिनशोहलि १२३ लुटः प्रथमस्य युवावौ द्विवचने ६४ २१८:- युवोरनाको १६६ रीगृदुपधस्य १४८ मातुरुत्संख्यासं २१२ युष्मदस्मदोः ष ६५ लुबविशेषे २१४ रीनः लट: सहा १७२ मादुपधायाश्च २१८ युष्मदस्मदोरना ६४ रुधादिभ्यः श्नम् १३३ लद शेषेच १४५ युष्मदस्मदोरन्य २२० रेवत्यादिभ्यष्ठ २१३ मिदचोन्त्यात्परः ५२ युष्मद्युपपदे रोऽस २८ मीनातिमिनोति १२४ युष्मदस्मद्भया ६५ लोट च रोरि लोपश्चास्यान्य मुखनासिकावचनो ५, यूनस्तिः २५३ रोः सुपि लोपो यि ११९ मृजेर्विभाषा १६५ / यूयवयौ जसि ६४ वोरुपधाया दी ६९ लोपो च्योर्व मृजेवृद्धिः १६५ यूरच्याख्यौ नदी ४३ लोपः शाकल्य ११, १३७ लः शाकटायन१०९ लोमादिपामा २३६) मोऽनुस्वारः २१ ये चाभावकमै २१२ लटः शतृशान १७१ लः कर्मणि च मोनो धातोः ये विभाषा १६२ लः परस्मैपदम् ८० १६८ माठि लुड रिच 9 लुधियुक्तव मिता हस्वः लोटो लङ्वत् " येच ७९ लट् स्मे अष्टाध्यायीसूत्रसूची। विच उम् : शपश्यनोनि वर्तमाने लट् सूत्रम् पृष्ठन्सूत्रम् पृष्ठन् । सूत्रन् धम् सूत्रम् धूछन् १७९ विज इ १३२ बोती गुणवच २४८ शे मुचादीनां १२८. ल्वादिभ्यः १७० विड्वनोरनुना १६८ व्यापरिभ्यो . १५६ शोषात्कर्तरि पर ८० ११५ बिदाङनित्व ११० नशनजस ६३ शेषाद्विभाषा २०५: व विदेः शतुर्वनः १७२ ब्रीदिशाल्योढंक २३२ २१९ बचिस्वपियजा १०५ विदो लटो बा ११० ब्रीह्मादिभ्यश्च २३७ शेधे प्रथमः बदनजहलन्त विद्यायोनिसं २२२ शेधे लोपः वयसि प्रथमे २४७ विधिनिमन्त्र शदेः शितः शेषो ध्यसखि वरणादिभ्यश्च २१८ विन्मतोलुंक २४२ शेषो बहुव्रीहिः २०२ वर्गान्ताच २२२ विपराभ्यां जेः १५४ शब्ददर्दुर करो २२६ शसोरल्लोपः वर्णदृढादिभ्यः २३२ १२१ विप्रतिषेधे परं २९ वर्णादनुदात्ता २४७ शब्दवैरकलहा १५२ श्वान लोपः विभक्तिश्च से वर्तमानसामी १६२ ३२ शरीरावयवा २२९ नाभ्यस्तयोरा ११९ विभाषा प्राधेट १२३ शरीरावयवाच्च २२२ शुनः भूच वर्षाश्वश्व विभाषा डिश्योः ५३ / शरोऽचि श्रोत्रियंश्छन्दो २३५ विभाषा चिण्ण १६० । शपूर्वाः खयः १२६ श्रथुकः किति १२६ वसुत्रंसुध्वस्वन ५६ विमापाचे श्लो. ११७. वसोः संप्रसार ६९ शल इगुपधाद ११४ विभाषा तृतीया ४५ वाचो ग्मिनः २३७ शरछोटि श्वयुवमघोनाम ६० विभाषा दिक्ल ४८ शलोन प वाजनमुत्रसाम् १२३ विमाषा लुङ् .. ११३ घः प्रत्ययस्य १७३ शात् वा दुहमुहष्णुह ५५ विभाषा साति २४४ शारिवायत्रो २५३ षट्चतुर्थश्च वा नपुंसकस्य ७४ विभाषा सुपो २४२ शान्तो यि प्रत्यये १० शास इदह १६५ घट कतिकतिपय २३४ विभाषेट: शासिवसिघसी १०७ घड्भ्यो लुक् वान्यस्य संयो ९७ विभाषोः शिखाया वलच २१८ पढोः कासि १०६. वा पदान्तस्य २२ विरामोऽवसानम् ३१ २३ षष्ठी १९५ ५ वा बहूनां जा २४३ विशेषणं विशे १९७ २२६ षष्ठी शेषे १८६ वा नाशमलाश ९५ विश्वस्य वसुरा ६३ शिवादिभ्योऽण २११ पिगौरादिभ्यश्च २४७. वामदेवाच्यड २१४ | विसर्जनीयस्य २५२ शि सर्वनाम वामि ५२ टुना ष्टु: १९ वृद्धाच्छः २२० वाम् शसोः ५० ११२ ष्णान्ता षट वृद्धिरादैच १२ वावृतुपियुष २१५ वृद्धिरेचि शीङः सार्वधा बावसाने ३४ | वृद्धियस्या २२७ सख्युरसम्बुद्धौ ४० शरि वृद्रयः स्यस १०३ शुक्राद्धन् ૨૨૨ वासरूपोऽस्त्रि १६३ - बतो वा २१९ सत्यापपाशरूप १४२ वाह ऊठ ५५ । बेरपृक्तस्य ६२ / शुप्रां इस्वो ११८ स नपुंसकम् १९७. शि तुक शिल्पम् शोडो रुट २२० शीलम् सख्युः शुषः कः लघुकौमुदी-परिशिष्टे- स्त्रीभ्यो दक स १८९ । सोऽपदादौ सहस्य सध्रिः । -सूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम् सनाशंसमिक्ष १७३ सर्वकान्यकिय २३९ सृजिदृशोझल्य १२५ खियाः ५० खनाहान्तावात ९२ सवाभ्यां बामौ १०० सेऽतिचिकृत १२२ स्त्रियाः पुंबद्भा २०३ सनि ग्रहगुहोश्च१४७ ससजुषो रुः तेह्यपिच स्त्रोसाभ्यां २१ सन्योः १४५ सःस्वार्धधातुके १४६ सोचि लोपे चेत् २९ २१२ २०४ स्थाध्योरिच १२१ सन्बल्लघुनि ६७ सोमायण २१५ स्थानिवदादेशो ३३ सपूर्वाच्च २३५ सहिवहोरोदवर्ण१०६ । सोऽस्य निवासः२२३ स्थानेऽन्तरतमः ९१ सप्तमीविशेषणे २०२ सहे च १६९ सौच स्पृशोऽनुदके सप्तमी शौण्डैः १९६ सहेः साडः सः ५६ संख्याया अव २३४ स्फुरतिस्फुलत्यो१३० सप्तम्यधिकरणे १८७ सात्पदाद्योः २४५ / संख्यापूर्वो द्विगुः १९७ स्मोत्तरे ल च ८७ सप्तम्याहाल साधकतमं करण१८५ । संख्यासुपूर्वस्य २०४ स्थतासील्लुटोः ८३ सप्तम्यां जनेर्डः १६९ सान्तमहतः संपरिभ्यां करो १३७ । स्यसिसीयुट् १५७ समाया या २२८ साम आकम् संप्रसारणाच स्वतन्त्रः १४४ समर्थः पदविधिः १८८ सायंचिरंपाल २२१ संबुद्धौ शाकल्य १६ स्वपो नन् १७७ समर्थानां प्रथ २०८ सार्वधातुकमपि ९८ संबोधने च १८२ स्वमशातिधना ३६ समवाये च १३७ । सार्वधातुका ८१ | सन्भूते २२२ । स्वमोलेपुंसकात् ५२ समवप्रविभ्यः १५४ सार्वधातुके यक१५७ संयोगादेरातो १७० स्वरतिसूतिसूय ९३ समस्तृतीयायु १५५ सावनडुहः संयोगान्तस्य लोपः९ स्वरादिनिपात ७५ सास्य देवता २१५ । संयोगे गुरु ८९ स्वरितजितः समः सुटि ૨૨ सिचि च परस्मै११९ संसृष्ट २२६ स्वाहाचोपसर्ज २५० समानकर्तृकयोः१८० सिचि वृद्धिः पर ९५ संस्कृतम् स्वादिभ्यः नुः १२६ समासेऽनपूर्वे १८१ सिजभ्यस्तविदि ८९ संस्कृतं भक्षाः २१४ स्वादिष्वसर्वनाम ३८ समाहार: स्वरितः ४ सिपि धातोरा १३४ संहितशफलक्ष २५३ स्वौजसमौट् -सम्बुद्धौ च ४७ सुतियोः १०१ स्कोः संयोगायो ६३ ह सरूपाणामेकशेष ३१ सुडनपुंसकस्य ३८ ह एति १०० सर्वत्र विभाषा १४ सुप आत्मनः १५० स्तन्मुस्तुन्मुस्क १५ हनो वध लिङि १०८ सर्वनामस्थाने सुपि च स्तुसुधूभ्यः १२६ हन्तेजः सर्वनाम्नः स्मै ३५ सुपो धातुप्राति १५० स्तोकान्तिकदूरा१९५ हलन्त्यम् सर्वनाम्नः स्याङ् ४८ सुपः स्तोः चुना श्चुः १८ हलश्च १७९ -सर्वभूमिपृथिवी २३० सुप्तिङन्तं पदम् ८ स्त्रियाम् २४६ हलदन्तात्तप्त २०२ सर्वस्य सोऽन्य २३९ सुप्यजातौणिनि१६८ स्त्रियां च ५० -सर्वादीनि सर्व ३४ । सुहृदुहृदौ २०४ । त्रियां क्तिन् १७७ हलः श्नः शा १३९ समः समि ८० "
अष्टाध्यायीसूत्रसूची।
३१०.
सूत्रम्
पृष्ठम् सूत्रम् पृष्ठम् सूत्रम् पूछम् सूत्रन्
पृष्ठम्
हलस्तद्धितस्य २४७ हलो यमा यमि २०९ हेतुमति च
मचन्तक्षणधस ९१
हलादिः शेषः ८३ हल्ल्याभ्यो दी ४० हेतुमनुष्येभ्यो २२३
हस्वनद्यापो नुट् ३४
हाशि च
हेतुहेतुमा
हस्वस्य गुणः
हलि लोपः
हिनुमीना
हेम्परेवा
हस्वस्य पिति १६५
हस्वादात्
हलि सर्वेषाम् २८ हिसायां प्रतेश्च १३२
हयंगवीन सं २३३
हस्त्रो नपुंसके ५२
हुझल्भ्यो हेधिः १०७
हलोऽनन्तराः हुश्नुवोः सार्व ९८ हो हन्तेगिन्न
२७
हस्वो लघु
अष्टाध्यायीसूत्रसूची समाप्ता।
प्राप्तिस्थानम्
चौखम्बा संस्कृत सीरिज आफिस
पो० बाक्स नं०८, वाराणसी-१
. क १२४ १२५ : " अद भक्षणे जय गतौ ९४ अस् भुवि हण गती धुधारणे १३० धातु-सूची पृष्ठम् धातु पृष्ठम् धातुः पृष्ठमा अजू व्यक्तिम्रक्ष १३४ | कृञ् हिंसायाम् १४० | जुषी प्रीति- १३२ | दोश्चये अत सातत्यगमने ८८ बनून शब्द ज्ञप ज्ञाने १४५ दीपी दीप्तौ १०७ क्रमु पादविक्षेपे ९५ ज्ञा अवबोधने १४१ दुह प्रपूरणे १०३ दुक्रीज् द्रव्य- १३७ डीङ् विहा- १२४ दूङ् परितापे ५२४ अर्च पूजायाम् ९१ क्षणु हिंसायाम् १३६ णद भाषायाम् ९० हविदारणे १४० अश भोजने णभ हिंसायाम् १०३ | दो अवखण्डने १२३ क्षणु हिंसायाम् १३७ णश अदर्शने १२३ धुता दीप्तौ १०३ इङ अध्ययने ११२ क्षिप प्ररणे १५६ णह बन्धने १२५ द्रा कुत्सायां गतौ १०९ (जि) इन्धीदीप्तौ १३५ क्षुदिर् संपेषणे १३३ णिजिर शौच- १२१ णिजिर् शौच- १२१ (डु) धा धार-१२१ १११ / शुभ संचलने १०३ / जीज प्रापणे धूज कम्प- १२६,१४० इष इच्छायाम् १३० (ञ) दिवदास्नेह १०३ णुद प्ररणे १०५ उछि उच्छे १२९ / खिद दन्ये १२९ ण स्तवने ध्वंसु. अवन- १०३ उज्झ उत्सर्गे १३० ख्या प्रकथने १०९ तञ्चू संकोचने १३५ तञ्च संकोचने १३५ । (ङ) नदि समृद्धौ ९१ उन्दी क्लेदने १३४ गण संख्याने १४३ तनु विस्तारे १३६ नृती गात्रवि- १२२ ऊर्युज आच्छा ११५ गद व्यक्तायां ताप सन्तापे (ड) पचप पाके १०५ १५९ | गम्लु गतौ १२॥ पठ व्यक्तायां. १४५ ऋच्छ गतीन्द्रिय १२९ गुपू रक्षणे तुम हिंसायाम् १०३ पद गनौ १२५ एध वृद्धौ पा पाने कटे वर्षावरणयोः ९१ ग्रह उपादाने १४१ (उ) तृदिर हिंसा-१३३/ पा रक्षणे कण्हूज् गात्र १५३ ग्लं दुर्षक्षये पिश अवयवे १२९ कथ बाक्यप्रबन्धे१४२ घट चेष्टायाम् १४४ पिल्लू सचूर्णने १३५ १०१ घुट परिवर्तने १०३ | तृह हिंसायाम् १३३ पीकाने १२४ कुट कौटिल्ये १३० चिञ् चयने १२६ कुष निष्कर्षे १४१ चिती संज्ञाने ८९ बसी उद्वेगे त्रपूष लज्जायाम् १०४ पुट भाषार्थः १२३ १२३ (ड) कृञ् करणे १३७ चुर स्तेये १४२ कृती छेदने १२९ छिदिर द्वैधी १३३ डुदाञ् दाने १२० पृङ् व्यायामे १२२ कृती वेष्टने १३३ । ( वृदिर दीप्ति १३३ दाप लवने १०९ पृड सुखने कृष विलेखने १२८ छो छेदने १२३ दिवु क्रीडा- १२२ | पृपालनपूर- ११८ क विक्षेपे १३१ । जनी प्रादुर्भावे १२४ दिह उपचये ११४ / प्रच्छ शीप्सा १३२ तुद व्यथने गनिगरणे तृणु अदने १०९ तृप तृप्तो " कसु कान्तो दद दाने १०४ / पूष पवने लघुकौमुदी-परिशिष्टम् । पर घणा शौचे न " " " " शुच शोचे वृञ् भरणे १०३ / स्तृन पृष्ठम् धातुः पृष्ठम् धातुः पृष्टम् #ী নষ্ট वृष तितिक्षायां १२५ विद्लू लाभे ५२९ पृङप्राणिप्रसवे १२४ सा मक्षणे यज देवपूजा० २० विश प्रवेशने १३२ पो अन्तकर्मणि १२३ ध अवगमने १२ या प्रापणे १०९ दृभक्ती टा गतिनिवृत्ती १४४ 'बूज बक्तायां ११४ युमिश्रणामिश्र-१०९ वृतु वर्तने भज सेवायाम् १०५ युजिर योग १३३ वृज वरणे १४० (राज) बिदास्नेह १०३ मओ आमर्दने १३५ युञ्बन्धने व्यच्च व्याजी- १२९ सृज विसर्गे १२५ भा १०९ युध सप्रहारे १२५ न्य ताडने १२३ स्कमुषने १३९ भिदिर विदारणे १३३ रस क्रीडायाम् १५६ ब्रज गती ९१ | स्कुन आप्रवरणे (जि भी भये ११८ रादाने १०९ | शद्ल शातने १३१ स्कन्भु रोधने भुज पालना- १३५ रिचिर विरेचने १३३ शिल विशेषणे १३५ भुजो कौटिल्ये १३१ रुव दीप्तावभि-१३० शी स्वप्ने भूसत्तायाम् हजो भने स्तुज आच्छा-- १२६ १०४ रुधिर आवरणे १३३ शुन गती (ड) भृग् धार- १२० ला भादाने १०९ १२३ स्फुट विकसने १३० अंसु अनसने १०३ लिप उपदेहे १२९ कारज पाके १२७ लिह आस्वादने ११४ तनूकरणे १२३ स्फुर संचलने धापाक मनु अवबोधने १३८ लुप्लु छेदने १२९ (ट) मस्जो शुद्धौ १३०/ लुभ विमोहने १३० श्रिज् सेवायान् १०४ स्मृचिन्तायाम् १५९ ११९ लूज छेदने स्त्रंसु अवलंसने १०३ माने १२४ धनु याचने ९७ नम्भु विश्वासे (जि, मिदा स्ने-१०३ श्विता वणे १०३ हन मागत्योः१०८ मिल सङ्गभने १२८ वातिगन्ध- १०९ १३६ (ओ) हाक त्यागे ११९ मीज हिंसायाम् १३९ विधिर पृथरमा-१३३ पद्लू विशरण-१३१ " हा गतौ १२० मुस्लु मोक्षणे १२८ (ओ) विजी भय १३२ १४१ (ओ) विजी , १३५ पिज बन्धने १३९ हु दानाइनयोः ११७ प्राणत्यागे १३२ / विद शाने १३५ पिध गत्याम् ८९ हज हरणे मृड सुखने विद सत्तायाम् १२५ षिचु तन्तुसन्ता- १२२ ही लज्जायाम् ११८ मृश आमशने १३१ / विद विचारणे ११० धुन अभिषवे १२६ हट्ट कौटिल्ये धातुसूची समाप्ता शुभ दोप्तो शुष शोषणे 4 मानाने १४० श्रा पाके ও খবর, भाड " वह पारणे विच क्षरणे १२९ हिसि हिंसायाम् १३३ मुणस्तये ९७ धातुः अक्ष व्यक्ति अत सातत्य अद भक्षणे 'अय गती १ अर्च पूजाय अश भोजन अस् भुवि इङ अध्ययर ‘ান্য থাকাঃ प्रश्नपत्राणि १६४४ (प्रथमं पत्रम्) १ अथ स वर्णानां वामप्रथरणाः, अथवा, प्रत्याहार विधायकसूत्रस्थ पद. च्छेदो हिन्दीषायामश सोदाहरणं लेख्याः । २ धात्रंशः, कृष्णःि, बाश्वः, उत्थानल , सस्कर्ता, एपको बना, एषु यथे। च्छं चतुर्णा प्रयोगाणां सूत्रनिर्देशपूर्वकं सिद्धि दर्शयित्वा, हर इह, देवा इह, रामकृष्णावमू आलाते, इत्यत्र स्वरसन्धिः कथक्षेनि लिखता। ३ निर्जरसौ, कति, क्रोष्टूनाम् , चत्त स्मृणाम , सर्वस्यान, दधिन्न, एषु केऽपि चत्वारः प्रयोगाः साधु साधनीयाः । ४ (क) चतुर्यु, आभ्याम, यूनः, युष्माकम् , ताक् , समीचः, असुना, अमु. व्यास , धनधि, एषु, केऽपि चत्वारः प्रयोगाः साध्यन्ताम् । (ख) पति, पपी, शब्दयोडौं, नेमशब्दस्य जसि, तथा वारि, विद्वस् शब्दयोः सम्वुद्धौ रूपाणि लेख्यानि । अन्तरेण, निकषा, बत्तम, विना, एषु कमोरपि मोरव्ययोः प्रयोगो वाक्ये कर्तव्यः। ও দ্বখশিখ, দ্বিথ, জালগু, গুম, যা , অালী, যুদ্ভু শ্রী त्रयाणां साधन विधान पान्तेषु के धातबोऽनिट इति लेख्वन् । ७ (क) एधाञ्चकृपे, अन्नसत्, अवयत , भ्रियात् , अहुः, हृषीष्ट, अभाचीत्, एषु केषामपि चतुर्णा सिद्धिप्रकारो लेख्यः । (ख) गुप् यज्-, हु श्रुधातूनां लुङि प्रथमपुरुषैकवचने रूपाणि लेखनीयानि। ४ , ३ (त्रि) इन्ध इण गती उछि उन उज्न उन उन्दी कर ऊर्गुञ् ६ ७ ऋती एछ वृद्ध कटे वर्ष कण्डूज सन् १९४४ कसुक (द्वितीयं पत्रम्) १ अधोलिखितानां सूत्राणां हिन्दीसंस्कृतभाषयोर्यथेच्छमेकतरस्यां सोदा. हरण ससमन्वयमर्था लेख्याः। (१) अलिद्धवदन्नाभात्' (२) ओः पुराणज्यपरे (३) 'कर्मणा अममिति स सम्प्रदान २ दुधाम धातोलटि, दुकीज धातोलुङि रूपाणि लिखत । कृती সাসি। ३२१ ३ औणुविष्ट । भृज्ज्यात् । अतृणेट । अग्रहीत् । अञ्चकथत् ! एने सम्यक साधनीयाः। ४ अतिष्ठिपन । जिबरसति । बोभवीति । पुत्रीयति। रथेन सञ्चरते। एषु विग्रह प्रदर्शनपूर्वकं सूत्रोल्लेखनमुखेन विशेषकार्याणि प्रदर्शयत । ५ दानीयः । ग्लेयम् । दर्शकः । मोजम भोजन् । विग्रहप्रदर्शन पूर्वक साध- नीया इमे प्रयोगाः। ६ बलिं याचते वसुधाम् । सर्वस्मिनात्मास्ति । सूत्रलेखनेन्न विभक्त्यर्थाः प्रदर्शनीया। ७ भूतपूर्वः । पञ्चगवम् । चित्रगुः ३ गावाक्षः । विग्रहप्रदर्शनमुखेन समासदि. धायकानि प्रदर्श्य साधनीया इमे। देव्यम् । रैवतिकः । गोत्वम् । बहुशः। देवी ! मृडानी दाक्षी । एते विगृह्य प्रकृतिप्रत्ययांश्च प्रदर्य साधनीया १४ सन् १९४५ १(क) उदास, स्वरित, संहितालक्षणानि लिखित्वा शिवेहि, गवायम् चिन्मयम, देवा इह, तच्छलोकेन, काँस्कान् , एषु केचन या प्रयोगाः सूत्रप्रदर्शनपूर्वकं साधनीयाः । (ख) ओष्णम् इत्यत्र कथं सन्धिः ? एहि कृष्ण३ अन्न, इत्यत्र च कथं तदभावः इति लिखत। २(क)हरौ, बहुश्रेयस्याम: स्त्रीणा, वारीणाम, विश्वौहः, ताहक, अभूषाम, धषि, एषु कानपि षट् प्रयोगान् संसाध्य, अध्ययलक्षणं लिखत । (ख) ग्रामणी, अधी शब्दयोडौं, धातु, उशनस् , इदम शब्दानां सम्बोधने रूपाणि लेख्यानि । (क) भूयास्ताम, अचीकमत, बिदाङ्करोतु, अविभा, ज्च्यात् , शिण्ड्ढि, कुर्वन्ति, अजीगणत् , एषु यथेष्टं षण्णां सिद्धि दर्शयित्वा, प्वादीनू धातून नाममाह लिखत। (ख) गुपू, दीन, पुन्, प्रच्छ धातूना लुलि प्रथमपुरुषैकवचने रूपाणि लिखत। अतिष्ठिपत् , चिकीर्षति, बोमवाञ्चकार, समिधिता, सर्पिषो जानीते, आरिता, पच्यते फलम् , एष गच्छामि, एषु केषामपि चतुर्णा साधन विधाय, दानीयो विप्रः, उच्छून, दुष्करः, अन्यथाकारम् , एषां कृत्प्र- त्ययार्थप्रदर्शनमुखं सिद्धिदर्शनीया, कर्तृकर्मनिर्देशोऽपि कर्तव्य एव ५ (क) वलिं भिक्षते वसुधाम , अधिहरि, पौवंशाला, हास्तिकम् , भूयिष्ठा, श्वश्रूः, एते यथाकार्य संक्षेपेण दर्शनीयाः। २१ ल० , ७ ३ ३२२ लघुकौमुदी-परिशिष्टे (ख) अर्थ, सूर्य, युवन् , क्षत्रिय, शब्दानां स्त्रियां प्रथमैकवचने रूपाणि तत्तत्मत्ययाश्च लिखत। सन् १९४६ १ अ-श-वर्णयोर्बाह्याम्चन्त प्रयत्नान् लिखित्वा, 'अणुदिरसवर्णस्य चान- त्ययः' इति सूत्रस्य हिन्धामर्थं प्रयोजनञ्च लिखत । अथवा---'तुल्यास्यप्रयत्न सवर्णम्' "अणुदिल्सवर्णस्येति च सून्न कि कि अज व्यक्ति कार्य कुरुतः। अत सातत्य म ब अद भक्षणे अथ गतौ Max अर्च पूजाय अश भोजन अल भुवि इड अध्या ३। . इण गतौ २ विष्णो-इति, वाक-हरिः, भोस्-देवाः, हरिस्-राजते, सस्-शम्भुः, अन्न यथेष्टं त्रयाणां सिद्धिः कर्तव्या। ३ रामाय, विश्वपः, सखा, लिगामा , पराभ्याम् , यूनः, प्रतीचः, अमुच्ये, सुपुमांसि, एषु स्वेच्छया चातुरः प्रयोगान् संसाध्य, पिधानन् , उदेतोः, इत्यत्र किं किं कामिति लिखता। ४ त्रि, बहुश्रेयसी-शहदयोः आमि, मति, दधि, पिपठिष-शब्दानांडिविभक्ती, वह, तनु, शीङ्, धून-धातूनाञ्च लुङि प्रथमपुरुषकवचने रूपाणि लेख्यानि १० ५ भवेत् , एमाले, अगौप्ताम् , अमडक्या, सन्धः, अतस, अचकथत् , एषु प्रथेष्ट चतुर्णा सिद्धि प्रदश्य 'नेदेति समस्तसूत्रं लिखत ! ६ अबीभवन, जिघरसति, बहरीनृत्यते, इदामति, रथेन संचरते, अभाजि, यजति स्म युधिष्ठिरः, एषु केषामपि चतुर्णा साधनं कृत्वा यशस्करी, सन् द्विजः, चिकीर्षा, देषित्वा, एषांद्वयोरेच कृत्प्रत्ययार्थप्रदर्शनपूर्व सिद्धिकार्या १५ ७ मातुः स्मरति, अध्यात्मन, निकौशाम्बिः, राजन्यः, पटीयान, मत्सी, एषु विशेषकार्याणि विशेषसूनदर्शनीयानि । ८ हरित, यवन, श्वशुरु, आचार्य-शब्दानांद्वयोरेव कयोश्चित् स्त्रियांप्रथमैक- वचने रूपाणि लिखत। उछि उन उदाउत उन्दी व क , ऊर्गुन एछ वृद्ध कटेष कण्ट्रज 19 ५ सवर्णाऽनुनासिकसंज्ञाविधायके सूत्रे सार्थे लिखित्वा अ, ज, उ, ब-एषां वर्णानामुच्चारणस्थानानि लिखत। अथवा-प्रयत्नाः कति ? के च ते?ह, प, यवर्णानाम् आभ्यन्तर प्रयत्नान् स्पष्टं लिखता २ धास्त्रंशा, गव्य, हर दह, सुखाता, शिवार्यो नमः, आ एवं नु मन्यसे, सच्छम्भुः, सैपदाशरथी रामः-एषु पञ्च प्रयोगान् सूत्रोद्धरणपूर्वकं साधयत २५ रामाणाम् पूर्वस्मात् , सख्युः, झोष्टुः, मतो, श्रियाम् । मातृ-पुथु पञ्च प्रयोगान् सूत्रनिर्देशपूर्वकं साध्यत । विश्वौहः, एनयोः, अस्माकम् , विदुपः, अमुना, अद्धिा, तुदन्ती एषु पञ्च- प्रयोगान् सूत्रोपन्यासपूर्वकं साधयत । ३ कृष। कवि সপ্নগাড়ি। ३२३ अभूत् , जग्मतुः, एबालके, अनुत्त, अहि, अयोच--एषु रूपेषु यथेच्छ हे साधयत । ६ सखि, कति, पितृ शब्दानां लवैविभक्तिधु रूपाणि लिखित्वा, विश्ववाह-- शब्दस्य पुंलिङ्ग, चतुर बदस्य मलिश सर्वाणि पाणि लिखत । अथवा--स्त्री, चारि, युष्मद् , अहन्, धनुष--शब्हानां काणि लिखा। १७ विध-धालोलिटि, गुपधातोलङि सर्वाणि रूपाणि लिखत । ग ma . १ क्रमधातोलटि, श्रुधासो टि, इन्धातोलोटि, अणुञ् धातोलिटि रूपाणि लिखत। सन् १९४८ ३ (क)त- वर्णयोः स्थानं बाह्य प्रयत्नमाभ्यन्तरनयनं च लिखत (ख) आदिरन्स्येन लहेता, कुन्मेजन्तः, ईच यः, योऽछि म्य, लट्स्मे, ज्य च, एषु प्रयाणां सूत्राणां अर्थाखिखत । २ गड्यूतिः, साति, चयन, उत्थान , पटलल्ता, पाहि, शिवोऽ- घा एकेपाञ्चित्पञ्चानां रूपाणां सिद्धि कुखत । ३ सर्वेषाम् , नृणाम् , भस्यै, दाना, अनलान् , मघोनः, उपानत , ददान्ति एषु कानिचिरपञ्च रूपाणि, साधयत । ४ अभूवन , अगमत् , अची कमत, अवधीत , पप्रतुः, नर्तियत्ति, सुनोति, उपस्किरति, शिण्डि, कुर्वन्ति एषु पड्रूपाणि साध्य । र अतिष्ठिपत् , चिकीर्षति, बोभूयते, कष्टायते, विजयते, अनुकरोति, अलामि, चेयम, भिन्नः, जल्पाका, चयः, भोज भोजन, विनाय गां ददाति एषां मध्ये पञ्चसु प्रयोगेषु विशेषसूत्रैविशेषकार्याणि प्रदर्शयत । ६ उपशरदम् , राजपुरूषः, अर्धम् , द्विभूधः पितरी, दाक्षिः, नड्बला, आस्माकीनः, झारण्या, गृही, चन्द्रमुखी, युवतीः एमु कश्चित्पट प्रयोगान् - अदस्-शब्दस्य सर्वलिङ्गेषु रूपाणि प्रदर्य क्रीधातोरथ रूपाणि लिखत १० . ७ १ (क) सह-वर्णयोः स्थानं वानप्रयतमाभ्यन्तरप्रयत्नं च लिखत । (ख) तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्, अव्ययादाप्सुपः, मिता हस्था, बङो बा, न यदि, तरतमपौ पः, प्रज्ञादिभ्यश्च एषु त्रयाणां सूत्रामामालिंखत। २ गण्यम , शिवहि, विष्णो इति, तक्षयः, तच्छिवः, चमीच्छाया, मनोरथः, एषु केषाद्विपक्षानां रूपाणां सिद्धि शुरुत । ३ रामाणाम, रूखा, पितरौ, स्त्रिया , ज्ञानानि, विधीहः, अमुना, अमुथै, दीव्यन्ती---एषु कानिचित्पञ्च रूपाणि लाशयत । ३१ admastakinsurga ३२४ लघुकौमुदी-परिशिष्टे ७ ४ भवानि, भगोपीत् , एविष्ट, अबोचत् , नेनिजानि, आदीपि, अधावीत, असिन्चा , हिनस्ति, अतत, व्यष्टमत , गणय ति, एषु षडरूपाणि साधयत ५॥ ५ बुभूपति, नरीनृत्यते, पुन्नीयति, निविशते, अवहति, भूयते, शिष्यः, पण्डितमन्यः, लवित्रम् , पवः, हित्वा, कटे आस्ते एषां मध्ये षट्सु प्रयोगेषु विशेषसुर्विशेषकार्याणि प्रदर्शयत । ६ पञ्चगङ्गम् , पञ्चगवस , परमराजः, अन्तलोमः,शिवकेशची, वैनतेयः, वैया- करणः, आधिदैविकम् , सार्वभौमः, कुमारी, इन्द्राणी, श्वश्रुः, एषु कश्चित् षट् प्रयोगान् साधयत। ७ मघवन् शब्दस्य रूपाणि प्रदय यज-धातोरथ लुङि रूपाणि लिखत। १० १ अजव्यत्ति अद भक्षणे अथ गती अर्च ধুনা सन् १९५० अश मोज अस् भुवि इड अध्य इण गतो उछि ঙ্গুি ३ अच्छु ७ १ (क) च, य--वर्णयोः स्थानं, बायप्रयत्नमाभ्यन्तरप्रयत्नश्च लिखता। (ख) वान्तो वि प्रत्यये, स्वरादिनिपातमव्ययम् , भुजोऽनवने, हेतुमति च, नेविशा, ज्य च, सप्तम्यास्त्रल---एषु त्रयाणामेव सूत्राणां पदच्छेदन, अर्थान् , उदाहरणानि च लिखत। २ उपेन्द्रः, गवायम् , चक्रि अन्न, एतन्मुरारिः, पुस्कोकिला, सज छम्भुः, शिवोऽयः, स शम्भुः--एषु केषाचित् पञ्चानां रूपाणां सिद्धिं कुरुत । ३ रामान्, सर्वेषान, गाः, मत्या , दधना, चतुर्णाम, स्वया, विदुषः, उपानत्, अहोभ्यासू-एषु कानिचित् पञ्च रूपाणि साधयत । ४ बभूव, अगादीत् , पे, अध्यगीट, देहि, अपादि, असावीत, ऋष्टा, कुर्यात, ग्रहीता, कथयति, चिकीर्षति--एषु षरूपाणि साधयत । ५ बोभूयते, बोमवीति, कष्टायते, विरमति, अभाजि, पथ्यते फलम् , यज- तिस्म युधिष्ठिरः, कार्यम् , उष्णभोजी, मिनः, चयः, पायं पायम , अग्नये स्वाहा---एषु मध्ये घट्सु प्रयोगेषु विशेषखूर्विशेषकार्याणि प्रदर्शयत । ६ उपशरदम, पौर्वशालः, महाराजः, चित्रगुः, हरिहरौ, गायः, औदुम्बरो देशः, राष्ट्रियः, धार्मिक, नाव्यम्, एनी, चन्द्रमुखी, युवतिः--एषु कांश्चित् षट् प्रयोगान् साधयत । ७ निर्जरशब्दस्य चुरधातोः केचित् पञ्चलकारेषु च रूपाणि प्रदर्शयत । सन् १६५१ १ (क) लुवर्णस्य कति भेदाः ! पकारस्य च किं स्थानम् ! कश्च बाह्यप्रयत्नः ! १५ आदिरन्त्येन सहेता, भूवादयो धावतः, औतोऽशसो, आईधातु- कश्येड्वलादेः, विदेः शतुर्वसुः, राजश्वशुराधत्, एतेषु स्वेच्छया त्रयाणां पदविभागं अयं सोदाहरणमर्था लेख्याः । कण्डू प्रश्नपत्राणि २ देवैश्वर्यम , ब्रह्मऋषिः, उत्थानम् , सन्नच्युतः, शिवच्छाया, शिवोवन्धः, अघोयाहि, मनोरथा, अत्र केषाचितुर्णा सिद्धिम् विधाय प्र-एजते, अथवा विद्वान् + लिखति, अथवा विष्णुः त्राता, अन्न सन्धौ कि रूप- मिति सप्रमाणं लिख। ३ रामाय, विश्वपः, पस्यो, कोष्टुः, मत्याम् , अनड्वान् , अयम्, अझ्या, पुनयोः गोवा, एतेषु पञ्चव प्रयोगाः साधु साधनीयाः । ४ बभूविथ, आनर्च, अक्षेषीत् , ह्वात् , विभेति, धेहि, अप्रासीत् , अकृत, एतेषु पञ्चानां सम्यक् सिद्धिः कार्या ५ बुभूपति, राजोयति, एधोदकस्योपस्कुरुते, मिद्यते काष्ठम् , स्मरखि कृष्ण गोकुले वत्स्थाम, अन्न चतुर्यु विशेषकार्थविधायकस्तूनाध्येबोल्लेख्यानि । ६ चेयम् , लवणः, जनमेजया, सोमयाजी, शुष्का, वेपथुः, इस्था भुडके, एतेषु पञ्च प्रयोगाः साधनीयाः। ७ चलिं याचते वसुधाम् , हरये नमः, अधिगोपन्न, व्याघ्री, चित्रगुः, गाय:, वैनतेयः, नर्तकी, बवक्रीती, नारी, एतेषु पगण सिद्धि कार्या । ७ . सन् १६.५२ , " १ (क) वृद्धि-सवर्ण-गुरुसंज्ञासूत्राणि सार्थमुल्लिख्य वा प्रयत्नाल्लिख ? (ख) अकारस्य कति भेदाः ? के च ते? २ सुद्धथुपास्या, गव्यम् , हरेऽव, कृष्णःि, तहोका, वाग्धरिः, शिवच्छाया, अघोयाहि, अन्न केषाञ्चित् चतुर्णा सिद्धिं विधाय मनस् + स्थः इति साधय । ३ रामान् , सर्वेषाम, हरी, सख्युः, गाम, मतये, तिस्त्रः, दना, एभिः, अष्टौ, अन्न पचानां साधुत्वं विधाय अस्मच्छब्दस्य अथवा युष्मच्छब्दस्य सप्तसु विभक्तिषु रूपाणि लिख? ४ भविता, सिषेधिथ, जगद, अगमत् , दुग्धः, अचैषीत् , कुर्वन्ति, गृहाण, अन स्वेच्छया चतुर्णां सिद्धिं विधाय द्युतधातोटुंङि अथवा यज धातोलुटि रूपाणि लिख? ५ अबीभवत् , वानज्यते, राजीयति, रथेन सञ्चरते, अजतिस्म युधिष्ठिरस, अन्न प्रथममपरित्यज्य त्रयाणां साधुत्वं विधेयम् ? ६ 'स्यसिच्-' इत्यादि सूत्रं सम्पूर्णभुल्लिख्य 'प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुल- मिष्ठवच' इतिवचनस्थार्थोऽविकलो लेख्या? ७ वशंवदः, भिन्नः, अपामार्गः, वृक्षमवचिनोति फलानि, प्रजाभ्यः स्वस्ति, अर्द्धपिप्पली, चित्रगुः, वात्स्यः, कुमुद्वान् , युग्यः, तृतीयः, गौरी, इन्द्राणी, तटी, शारिवी-एतेषु स्वेच्छया षण्णां सिद्धिः कार्या ? ७ १ १ PASCARRICHYSIC लघुकौमुदी-परिशिष्टे ८ ७ अभू व्यति अद भक्षय अय गनौ जा अश भोर अस् भुचि . ७ ७ इण गतौ सन् १९५३ ३ सवर्णसंज्ञासूनं घिसंज्ञासूनच सार्थमुहिल या, अ, आ, वर्णधु कयो- रपि द्वयोः स्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नञ्च लिख? २ गोवा, प्रार्छति, गवार, एतन्मुरारिक, उत्थानम् , सन्नच्युतः, शिवो. वन्द्यः, स हरिः, हरीरम्या, एतेषु पञ्चानां साधुचं विधायकवी+आगतौ इत्यत्र सन्धौ कि रूपमिति संप्रमरणं लिख। ३ (क) रामाणाम, हरेः, विश्वपा, कोष्टरि, बध्ना, प्रधुनि, विश्वौहः, युष्मा- कम् , उदीचा, एतेषु चतुण्णां साधुत्वं विधेयम् । (ख) पत्याल्परस्य' 'डेराम्नद्याम्नीभ्यः' 'तदोः सः सावनन्त्ययोः' अदसोऽसे दुदोमः एषु पदच्छेदमुदाहरणञ्च प्रदश्य पितृशब्दस्य अथवा पथिनूशब्दस्य रूपाणि लिख । ४ भवितास्मा, भातीत् , हर्यात् , वयंति, उवाह, अधसत् , अदास्त, प्रष्टा, कुर्यात् , गृहाण, अजीगणत् , एतेषु पञ्चानां साधुत्वं विधाय गुपू अथवा कमु अथवा ऊणुज धातोलुङि रूपाणि लिह। ५ स्थापयति, जरीगृखते, राजानति, विजयते, मितेकाष्ठेन, कृष्णनमेच्चे. रसुखं यायात अन्न चतुर्णां साधुत्वं विधेषन् । ६ दयनीयः, कुरुचरः, छिन्नः, जयः, 'सुपानः, माणवक धर्म मापते, अधि हरि, द्विरानम्, औषगवः, अस्मदीयः, आपूपिका, वस्त्रक्रीती, एतेषु अण्णां साधुत्वं विधेयम् । सन् १६५४ १ उपधासंज्ञासूनं टिसंज्ञासूनच सार्थं सोदाहरणच प्रदय अ, ब, ह, श, वर्णधु केषाञ्चित् त्रयाणां स्थानानि प्रयत्नांश्च लिखन्तु । अथवा--कृष्णाद्धिः, प्रौहा, विष्णो इति, वागीशः, तच्छिवः, संस्कर्ता, शम्भूराजते, सैप दाशरथी रामः, एषु पञ्चानां सिद्धिः प्रदर्शनीया। २ रामाय, सर्वेषाम् , विश्वपः, बहुश्श्रेयस्याम् , वारीणाम् , वृन्ननः, अत्र बयाणां सिद्धिं विधाय प्रधीशब्दस्य दधिशब्दस्य वा प्रथमाद्वितीयाविभ. कयोः रूपाणि निर्दिशन्तु । बभूव, अकटीत् अवोचत् , पिपूर्तः, अपादि, गिलति, अतृणेट , अबी. भवत् अमीषु पञ्चानां साधुत्वं विधाय एध , गुप, अद् धातुषु एकस्य लिटि लङिच रूपाणि प्रतिपादयन्तु। ४ जिधरसति, इदामति, विजयते, विरमति, दायिता, यजतिश्म युधि ठिरः, अत्र केषाञ्चिपञ्चानां साधुत्वं विधीयताम् । ५ हत्या, जनमेजयः, ग्लाना, पक्का, जल्पाकः, यत्ना, उपधिः, चिकीर्षा, अन्यथाकारम् , अन्न पञ्चसु प्रयोगेषु विशेषसूत्राणि प्रदर्शनीयानि । उछि उ ভ ७ -कटे कण्हू ३५ Hai कृत कृष क प्रश्नपत्राणि! NA १ . 9 १ गव्यम् , शिवेहि, गवाक्षा, उत्थानम् , सन्नच्युतः, शिवोऽयः, मनोरथः, अमीषु पञ्चानां साधुत्वं विधाय इ, य, सवर्णधु त्रयाण स्थानानि प्रयत्नांश्च निर्दिशन्तु। २ रामाणाम् , विश्वपः, बहुश्रेयस्यै, तिसृणाम् , दधिन, विश्वौहा, युष्मा- कम् , पचन्ती, निसृपः--एषु पञ्चानां सिद्धिः प्रदर्शनीया। ६ भभूत् , आनर्च, जग्मतुः, अचीकमत , अवधीत् , जहीहि, अजनि, किरति, शिण्ड्दि, अचूचुरत् , अन्न पञ्चानां साधुत्वं प्रदय पिध् , गुप् , अज् धातुषु एकस्यालिटि लुङिच रूपाणि प्रदर्शयन्तु ! ४ घट्यत्ति, बुरुषति, वरीवृत्यते, पुन्नीयति, निधिशते, अभाजि, कार्यम् कुम्भकारः, शुष्कः, यज्ञ:एतेषु षट्सु विशेषसूत्राणि लेख्यानि । ५ हरि भजति, हरये नमः, राजपुरुष, शिवनाची, गाय, शुक्रियम् राष्ट्रियः, पौरोहित्थम् , दन्तुरः, विकल्पः, अजा, भवानी । अन्न घटसु विशेषसूत्राणि लिखन्तु। सन् १६५६ १ , औ, भ, ल, वर्णानां स्थानानि प्रथला बिलिख्य, अल्पत्याहार सूत्रनिर्देशपूर्वकं साधयत। २ पार्छति, इ इन्द्रः, चिन्मयलसंस्कर्ता, देवादह, शम्भूराजते, एषु चतुरः प्रयोगानर्थ लिर्देशपुरम संसाध्य, अतो शेरप्लुतादप्लुते इति सुनस्यार्थो लेख्यः। ३ सर्वेषाम , सख्यो, स्वसार, राज्ञः, सुपदः, अमो, अद्धिः, धपि अमीषु- पञ्चैव साधनीयाः। ४ भवेत् , गोपायाञ्चकार, शृणु, अद्युतत् , अयुः, एधि, नेनिजानि, लोमिता, स्तरिघीष्ट, एतेषु केबलं चतुरः प्रयोगान् तत्तद्विशेषसूत्रार्थो- स्लेखपूर्वकं साधयत। ५ अतिष्ठिपत् , जिघत्सति, समिषिता, धर्ममुच्चरते, दायिता, यजतिस्म युधिष्ठिरः, स्तुत्यः, जगन्वान् , धूनिः, हित्वा-एषु पञ्च प्रयोगाः साध्यताम्। ६ सर्पिषो जानीते, पञ्चगवधनः, कल्याणीपञ्चमा रात्रयः, स्वस्त्रजम् । रैचतिका, अस्मदीया, श्रेयान् , एनी, वृषली, एतेषां पञ्चानामेव साधु साधनं लिखत सन् १६५७ १ क, य, अर, वर्णानां स्थानानि प्रयत्नाश्च विलिख्या, अणुदित्सवर्णस्य चा- प्रत्ययः इति सूत्रस्य अर्थम् उदाहरणच. लिखत २० २० , sh लघुकौमुदी-परिशिष्टे सुखातः, विष्णो इति, उत्थानम् , शिरच्छाया, शिवोवन्धः, इमान् सं. साध्या, उमो ह्रस्वादचि डमुण नित्यम् इति सूत्रस्य सोदाहरणम् अर्थ प्रदर्शयत। ३ रामान्, निर्जरसौ, बहुश्रेयस्याम्, स्त्रीः, श्रीपन , मघोनः, युष्मत् , पिपठीः, इयम्, तुदन्ती, अमीषु पञ्च प्रयोगाः ससून साधनीयाः । ४ अभूवन् , अकटीत् , हरिष्यति, एधिषत, वतिष्यते, जहि, अदित, नेशिथ, असिचत्, कुर्यात् , ग्रहीता, अजीगणत्, एषु चतुरः प्रयोगान साधयत । २० ५ अबीभवत् , चिकीर्षति, राजानति, सर्पिषो जानीते, विरमति, तायते, इह भुञ्जीत, विशेषसूत्र निर्देशसहितं चतुरः प्रयोगान् लिखत । ६ सुशर्मा, सहकृत्वा, क्षामा, सुपानः, हरये नमः, उपराजम, घनश्यामः, महाराजः, त्रिमूर्धः, गवाक्षः, एतेषु पञ्चप्रयोगान् तत्तद्विशेषसूत्रार्थोल्लेख पुरस्सरं साधयत। ७ वैनतेयः, पिन्यम् , तावकीना, औपगवम् , दन्त्यम्, भूयिष्ठः, औत्सी, रुद्राणी, दाक्षी एषु पञ्चैव साध्याः। ७ अद भक्षणे अथ गती . २० अश भोज अस भुवि २० सन् १९५८ इण् गतौ उछि उ उन्दी ऊर्गु , १ तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्ण , परः सन्निकर्षः संहिता इति सूत्रद्वयस्य গুগী विलिख्य, आभ्यन्तरप्रयत्नस्य भेदान् लिखत । २ प्रष्टौहः, अमी ईशाः, सन्सः, इमान् सूत्रनिर्देशपूर्वकं संसाध्य, विप्रति- षेधे परं कार्यम्-इत्यस्य अर्थ प्रदर्शयत । ३ सर्वेषाम् , सख्युः, गाः, मत्यै, दध्ना, अनड्वान् , विश्वाराट् , अमी, अद्भिः, धनूषि-एषु स्वेच्छया पञ्चानां साधुत्वं विधाय युष्मत् शब्दस्य द्वितीयायां रूपाणि लिखत । ४ भवतात् , अगादीत् , अपुः, अचीकमत, अमृत, इयाय, और्णावीत , नेनिजानि, चिकाय, शीयते, आसीत् , स्तमान, कथय ति-एतेषु पञ्च प्रयोगान् साधयत । ५ जिघत्सति, वाव्रज्यते, पुत्रीयति-छान्नम् , विजयते, प्रव हति, अभाजि, यजति स्म युधिष्ठिरः-सप्तसु चतुरः एव प्रयोगान् लिखत । ६ शिष्यः, विजावा, भिक्षुः, स्वप्नः, हित्वा, गर्गान् शतं दण्डयति, प्रामा- दायाति, पन्चाङ्गम् , अतिमानः, आपन्नजीविका, चित्रगुः, सुहृत् , महायशस्कः, वाकवचम् , विग्रहप्रदर्शनपूर्वकं पहचैव प्रयोगा साध्याः ७ दाक्षिा, कौरव्या, हास्तिकम् , सौन्नः, धार्मिक, कृतपूर्वी, ज्यायान् , गार्गी, दाक्षी, बैदी-एषु पञ्च प्रयोगान् साधयत । , कटेब कण्डू १५ कृत ५ कृत प्रश्नपत्राणि , " पञ्चान्छ (पंजवा) विश्वविद्यालयमाझव्याकरणप्रश्ना: सन् १६४४ वागीशः, प्रत्यङाल्मा, पुनारमते, लामोच्चाया, सोना, अस्याः, तुर: अस्माकम्, राज्ञः, अद्भधः एतान् प्रयोगान् साधयत । २ गो, मात, वारि, अस्मद्, अप-एतेषां द्वितीयाबहुवचने रूपाणि लिखत । ३ अहीता, प्रभवाणि, जहि, अलिचत् , क्रीणीमः.....एते प्रयोगाः साध्यन्ताम् । २० ४ अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्, ते प्राग्धातोः, योगान्तस्य लोपः, अनद्यतने लड़ा---एतेषां सूत्राणामर्थ सोदाहरणे स्पष्टीकुरुत । (क) कृष्णश्रितः, पीताम्बरो हरिः, पितरो-एघु विग्रहं कृत्वा समासानां नामानि च लिखित्वा 'कुमारी' युवतिः इत्यन्न सूत्रोल्लेखपूर्वकं स्त्री- प्रत्ययौ निर्दिशत। ख) विप्राय गां ददाति, रामेण बाणेन हलो बाली, मातुः स्मरति हत्यन्त्र तत्तत्सूननिर्देशपूर्वक कारकविभक्ती: स्फुटीवस्य नितलिखिते रूपे साधनीय पाशुपतम् , प्रामीणः । सन् १९४५ १ 3 १ विश्वौहा, फलानि, गवेन्द्रः, वृनधनः, शाजिय, विद्वालिखति चक्रिना. यस्व, दधनि, श्रियान, वारिणी--एते प्रयोगाः साध्यन्ताम् । २ विद्वस्, राजन्, मुनि, पितृ, धनिन्-एतेषां षष्ठीबहुवचने रूपाणि लिखत ३ अगमत, अपुः, अद्धि, वेद, विध्यति---एतान् साधयत । ४ पा (पाने), रुध् , कृ (करणे),ग्रह, पा (रक्षणे), नश् विद (ज्ञाने), धा, हन् , हा (त्यागे)-एतेषां परस्मैपदे लोटि मध्यमपुरुषैकवचने रूपाणि दत्त (न तु सिद्धिः कार्या)। निम्नलिखितान्यशुद्धानि वाक्यानि कारकरीत्या तत्र तत्र कारणं अदृश्य शुद्धानि कुरुत- (क) माणवकात् पन्थानां पृच्छति । (ख) दैत्येषु हरिरलम, (शक्त इत्यर्थः)। ग) कृष्णेन खड्गात् कंसस्य शिरः छिन्नम्। (घ) प्रीतो राजा सैनिक ग्रामसमर्पयति । ६ निर्मक्षिकम् , पितरौ, घनश्यामः, वीरपुरुषको ग्रामः-इत्यन्न विग्रहं कृत्वा समालानां नाम निर्दिशत । ७ त्रिलोकी, मही, गोपी, सूर्या-अन्न सूत्रोल्लेखपुरस्सर स्त्रीप्रत्ययान् लिखय। ८ यशस्वी पटीयान-इति तद्धितरूपे साधनीये। १ नमें से तीन के अर्थ उदाहरण दो। लघुकौमुदी परिशिष्टे सन् १९४६ १ निम्नलिखितानिरूपाणि साधयत--- सर्वेशाम, राभ्याम् , सायुः, भूपतये, यूना, पञ्चानाम, शिवो बन्धः, तच्छिवा, सट्टीका, हरिश्शेते। २ इदम्र (स्त्रीलिङ्गे), उपार्नत , महत , अस्मद , वृत्रहन-एतेषां प्रथमैक- वचने रूपाणि लिखत (न तु सिद्धिः कार्या)। ३ बहि, पद्यते, गृहाण, क्राम्यति, पपीते प्रयोगाः साध्यन्ताम् । ४. ते प्राग्धातोः', 'अनथलने लङ' इत्येतोः सूत्रयोः सोदाहरणम्म अर्थ- स्फुटीकुरुत। ५ गल ग्रह, पा, जि, ज्ञा---एतेषां लुडि प्रथमपुरुषैकवचन्ने रूपाणि लिखत ६ निम्नलिखितानि वाक्यानि कारकरीत्या कारणप्रदर्शनपूर्वकं शुद्धानि कुरुत-- क) निधनं वस्त्रं देहि। (ख) वृक्षात् फलान्याविचिनोति । (ग) श्रीहरि नमः। (घ) रामः बाणा रावणं हतवान् । ७ स्त्रीप्रमाणः, ईशकृष्णौ, बडगुलयू , अतिनिद्रम्-इत्यन, विग्रहं कृत्वा समासाना नाम लिर्दिशत। ८ तत्र तत्र सूनस्य प्रत्ययस्य च निर्देशं कृत्वा निम्नलिखितां पुल्लिङ्गरूपाणां स्त्रीलिङ्गारूपाणि दत्ता-सूर्य, युवन आचार्य, श्वशुर । निम्नलिखितेषु तद्धितप्रत्ययान् सूत्रोल्लेखपूर्वकं निर्दिश त. वासिष्ठ, काकम् , गाग्यो, पौत्रः। सन् १९४८ १ थ, मह, क, ड के स्थान प्रयत्न लिखकर शाय, यर, इच् प्रत्याहार लिखो।। २ खरवसानयोर्विसर्जनीयः, हशि च, तो डिसर्वनामस्थान सो, हवो नपुं. सके प्रातिपदिकस्य, तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य- ३ शिवोऽर्थः, सन्नच्युतः, कृष्णादिः, बाग्धरिः हरेऽन्न । इन में से तीन की सिद्धि करके- हरीणाम, सर्वस्मिन् , रमायाम् , ज्ञानानि, लिटसु, इमे, पन्थानी, प्रायः एषः, इनमें से तीन की सिद्धि दो केवल विशेष सूत्रों से। ४ निन, एथ्, गद् हन् , दुह् , जिभो, ओहाक, शो, चिन , चुर, इनमें से किन्हीं पाँच के लुङव लिट् के प्रथम पुरुष के एकवचन में रूप लिखो। ५ बभूविथ, ऐधिवम् , अतथाः, क्रीणीयः, अरुणः, अभैरस्व, अतुत्त, अमृत, अधुषत् , इनमें से किन्हीं पाँच की सिद्धि दो विशेष सूत्रों से। M प्रश्नपत्राणि ६ अधिहरि, राजपुरुषा, पीताम्बरो हरिः, हरिहरौ। इनके विना तथा समालों के नाम दो। ७ कुमार, अज, कुरुचर, इन्द्र की स्त्री, गोप की ली। इनके स्त्रीप्रत्यय के रूप दो। ८ आश्वपतम् ,दाधिकम् , अग्रथा, स्त्रीधना, जनता। विग्रह तथा प्रकृति प्रत्यय लिलो ९ 'अकथितं च इस खून का अर्थ लिखकर रस्थपथो देशः, कुतः, पटपटाक- शेति, भूयिष्ठः, अधीती। इनकी सिद्धि करो। । सन् १६४६. 23 - । 9 अच, य.श, इनके प्रयत्न लिखकर स्वरित, अनुनासिक, सवर्ण, संहिता. और पद की परिभाषाएँ लिखो। २ अदलो मात्। एतचदोः सुलोपोऽकोरमा समाले हलि। औतो शालोः । वामशलोः। न सम्भसारणे सम्प्रसारणम् । इनमें से केवल चार सूत्रों के अर्थ लिखकर उदाहरण दो। ३ निम्नलिखित प्रयोगों में से अन्यतम तीन प्रयोग की सिद्धि केवल विशेष सूत्रों से करो:--पूर्वस्मिन् । सख्यौ । एभिः । अहोभ्याम् । ४ निम्नलिखित श्लोक की व्याख्या करो- सुखं वा नौ ददावीशः पतिर्वामपि नौ हरिः। सोऽव्याद्वो नः शिवं नो नो दद्यात् सेन्योऽत्र वासनः ॥ ५५ इनमें से केवल पाँच धातुओं के लूट और लुङ् में केवल मध्यम पुरुष में रूप लिखो.... गद् , अई, गुपू, भू, हुदा , हुक्कोस् । ६ 'ऋतो भारद्वाजस्य' इस सूत्रका अर्थ लिखकर निम्नलिखित श्लोक की व्याख्या को अजन्तोऽकारवान् वा यस्तास्यनिट थालि बेड्यम् । ऋदन्त ईदृ नित्यानिट लायन्यो लिधि लेड् भवेत् ॥ निम्नलिखित प्रयोगों में से केवल पाँच को विशेष सूत्रों से सिद्ध करो- शृणु, वत्स्यति, विदांकरोतु, आह, जायते, किरति । ८ (क) इनको शुद्ध करो:-- पितरं नमः। रामो देवं सरलम् । अश्वेन पतति। मोक्षाय इच्छास्ति । पुत्रं पुस्तकं ददाति। C १ ७ - HEALANDSHRELA Saneman अ व्यरि 'अद भक्षणे अथ गती अर्च अश भो अस् मुरि ३३२ लघुकौमुदी-परिशिष्टे (ख) इनसे स्त्रीवाचक शब्द बनाओ- आज, गौर, गोप, गोपालक, मनुष्य, अरण्य, यवन, मातुल, क्षत्रिय, हय । १० ९ सन्धि और लमास में क्या भेद होता है ? निम्नलिखित समस्त शब्दों में कौन-कौन से समास हैं ? विग्रह भी लिखो- खचक्रम् , पूर्वकायः दूरादागतः देवब्राह्मणः, अपुत्राः पाणिपादम् । १० निम्नलिखित शब्दों में कौन कौन से प्रत्यय किस किस शब्द से कौन- कौन से अर्थ में आए हैं? पाशुपतम् , राष्ट्रियः, सामाजिक, सभ्यः, ब्रह्ममवती। सन् १६५० ५ शिवेहि, पपणाम् , उत्थानम्, पटत् सन्तः, देवा इह, इनमें सन्धिच्छेद विशेष सूत्रों से सिद्ध करो। २ पूर्वन्नासिद्धस्, यचि भम् । ख्यत्यारपरस्य । न्नेभ्यो डीप । त्यदादीनाम:, इन सूत्रों के अर्थ लिखकर उदाहरण दो। ३ मत्यै, क्रोष्टुः, अस्टना, तव, विदुषा, इन प्रयोगों की सिद्धि विशेष सूत्रों से करो। ४ पा, एथ्, व्यथ् , भू , रुध , लूज, चुर् । इन धातुओं के लिट् और लुङ् में केवल उत्तम पुरुष के रूप लिखो। आतीत्, अधुक्षत् , एधि, कुरु, लुनीहि, बुभूषति, राजीयति इन प्रयोगों की विशेष सूत्रों से सिद्धि करो। ६ कारक का क्या अर्थ है ? वे कितने हैं ? उनमें से कर्म, करण, सम्प्रदान, अधिकरण के स्वरूप अपनी भाषा में लिखकर उदाहरण दो। ७ समास का क्या अर्थ है ?वे कितने हैं ? उनके नाम लिखकर अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुब्रीहि, द्वन्द्व का लक्षण अपनी भाषा में लिखकर उदाहरण दो १० ८ वाहीकः, दाक्षिः, पाण्डया, इहस्यः, तुण्यम् सूत्रनिर्देश करके किस अर्थ में क्या तद्धित प्रत्यय हुआ है लिखो। ९ त्रिलोकी, मृद्धी, सूर्या, युवतिः, हिमानी सूत्रनिर्देशपूर्वक इन प्रयोगों में स्त्री प्रत्यय लिखो। 'बिहार' प्रथमपरीक्षाप्रश्नपत्राणि १० इण गत उछि ऊर्गुज एध कण्ड 10 सन् १९४६ A_GA CHOTI 3 + एजते, शिव छाया, जगत् + लीला, कुर्वन् + इह, सिवस्+ अर्यः, पुनर् + रमते, तव+ऋद्धिः एषु सन्धिमानं प्रदर्शयत । २ रामाः, सख्युः, कोष्टूनाम्, देना, यूना, पुमान् , अमूनि एषु चतुर्णामेव प्रयोगाणां सून्न साधनं कुरुत।
ta " ३ पतित प्रयोगान् सूत्रनिहेशपूर्वकं साधयत । प्रश्नपत्राणि। ३ बभूव, जग्मतुः, देहि, अधावीत् , अतिष्ठिपत् एषु चीन प्रयोगान सूत्रैः ४ जिवत्सति, चावग्यते, पुत्रीयति, शब्दायते एषां विग्रहवाक्यानि प्रदर्य गम्, दा, प्रह, छिन्द्र धातूनां लोटि मध्यमपुरुषेकवचने रूपाणि प्रकटवात । १९ ५५ शिष्यः, गोदः, शुष्क, भुक्त्वा एषु प्रकृतिप्रत्ययान् प्रदर्य पाण्मातुरः बैयाकरणः अन्योरेकमेव पदं सूत्रैः साधयत । कारक-समालयोभैदानुदाहरणानि चचिलिख्य कृष्णस्य समीपन, ईश कृष्णश्च बहुधनं यस्य इति विग्रहे सिद्धरूपाणि लिखत ६ पठति, जागति, देहि, कुरू, पचामि, आभिः क्रियाभिः सहान्यानि पदानि योजयित्वा पृथक् पृथग्र वाक्यानि लेख्यानि । १ शिव-- एहि, गो आग्रनु, विष्णो इति, उद् स्थानम, पट बच्चतिः, देवास + इहें, मनस्+स्था, वाक् + हरिः, समस्का, सन् + शम्भु, एषु पन्चानी सन्धिमानं प्रदर्श्यत । २ सखा, पन्थाः, यूनः, मघोनः, निर्जरसौ, विश्वपः, सर्वस्यै, प्रतीचः, युष्मा- ३, पति, मति, क्रोष्टुशब्दानां चतुर्थीपञ्चमीसप्तम्येकवचने रूपाणि विलिख्या, श्रु, अस् वह धातूनां लोटि मध्यमपुरुषेकवचने रूपाणि लिखत। ४ अभूवन् , एधि, जहि गृहाण, अचीकमत, पिपठिषति, अध्यापयति, बान. ज्यते एच पञ्च प्रयोगान् विशेषसूननिर्देशपूर्वकं साधयत । ५ समासस्य किं लक्षणम्, कतिविधश्च समासः, तेषां प्रत्येकमुदाहरण सन् १६५० say ७ ३ ६ कुरुचर-इन्द्र ब्राह्मण-मनु -गोपालक-मातुल-युवन्-शब्देषु पञ्चानां स्त्री- प्रत्यये रूपाणि लिखत। अथवा दैत्यः, जनार्दनः, गायः, वैयाकरणः, शैवः, तावकीनः, जनमेजयः, पक्का, कुम्भकारः पचेलिमा, एषु पञ्चानां प्रकृतिप्रत्ययनिर्देशं कुरुत । सन् १९५१ ५ उद्+स्तम्भनर, तत् + शिवः, सुगण + ईशः, षट् + नाम, अमू* आसाते, पुम्+कोकिला, गो+अक्षः, चक्रिन + बायस्व, शिवस+बन्धः, सुख+ अखः एषु षण्णामेव सूत्रनिर्देशपूर्वकं सन्धिकार्य प्रदर्शयत ।
७ लघुकौमुदी-परिशिष्टे २ अनड्वान् , सख्युः, राज्ञः, सर्वेषाम् , तिरश्चः,युष्मान् , निर्जरसा, पन्थाः, यूनि, मत्याम, क्रोष्टुः, एषु घट प्रयोगान् सूत्रनिदेशपूर्वकं साधयत । ३ बभूव, आनर्च, जधान, आलन् , अगात् , हिन्धि, चिकीर्षति, राजीयति, बोभूयते, अजीगणत , एषु षट् प्रयोगान् सूत्रनिर्देशोपूर्वकं साधयत । ४ राजन-युवन्-सर्वा-शब्दानां षष्ठीविभक्तौ सर्वाणि रूपाणि विलिख्य पागम्-देश-धातूनां लुङि प्रथमपुरुषे लर्वाणि रूपाणि लिखत । ५ कारकस्य किं लक्षणम् ? कति कारकाणि ? तेषां प्रत्येकमुदाहरणं लिखत। क वैयाकरणः, मानकीना, आदित्यः, पचवान् , कुम्भकार,एषु प्रकृति- प्रत्ययविभागं प्रदर्शयत । सन् १९५२ , चतुर्दशशिवसूत्राणि सुस्पष्ट विलिन 'अच्'--'हश'-प्रत्याहारयोर्मध्ये चाके वर्णाः इति लिखत । Namasua 'लवर्णसंज्ञा'-अनुनासिकसंज्ञा'--'संयोगसंज्ञा-विधायकानि सूत्राणि विलिख्य तेषामा लेख्याः। २ क्षात्रंशः, नायकः, श्रीशः, एतन्मुरारिः उत्थानम् , वागीशः, लक्ष्मीच्छाया, शम्भू राजते, मनोरथ:-एषु षट् प्रयोगाः सूत्रनिर्देशपूर्वकं साध्यन्ताम् । १८ ३ 'रामेण, सर्वे, हरय, सखा, क्रोष्टुः, रमया, ज्ञानानि, दुधना, विश्चौहः, राज्ञः, पन्थाः, यूयम् , पचन्ती'-एषु सप्त प्रयोगान् ससून साधयत । ४ 'अभवत् , अब्राजीत् , अन्तः, अक्षीकमत, जघास, अद्धि, शेरते, जुहोति, जायते, गृहाण, घटयति, जिघत्सति, पुत्रीयति'-एषु षट् प्रयोगान् प्रधानसूत्र निर्देशपूर्वकं साधयत । सरिख-रमा-पथिन-वेधस्'-पयस्-शब्दानां पञ्चम्यां विस्तौ रूपाणि चिलिख्य अस्-स्था हन-ए'-धातूनां लटि, लोटि च मध्यमपुरुषैकवचने रूपाणि लिखता ६ कति समासः ? के च ते ? तेषां प्रत्येकमुदाहरणं लिखत । कुम्भकारः, हितम, पाकः, गाायणः,-पषु प्रकृतिप्रत्ययमानं प्रदर्शयत ।
प्रश्नपत्राणि। सन् १९५३ १ लघुकौमुद्याः 'मङ्गलाचरण श्लोकं सुस्पष्टं विलिख्य तस्यार्थो लिख्यताम् । १० प्रयत्नस्य भेदं विलिस्थ तेषां नामानि सुस्पष्ट लिखत । २ गङ्गौवा, प्राछति, गवेन्द्रः, गङ्गे अमू, लच्चित् , चिन्मयम् , संस्कर्ता, शिवोऽळ:, हरी रस्या-एषु पञ्चैव प्रयोगाः सूत्रनिर्देशपूर्वक ७ ३ रामस्य, सई, विश्वपः, सख्युः, क्रोष्टा, सर्वस्यै, वारिणी, यूनः, युष्मान् , वेधाः, इयम् , तुदन्ती--एष सह प्रयोगाः ससूत्रं साध्यन्ताम् । ४ भवन्ति, अभूत् , आतीत् , गोपाञ्चकार, शृणोति, जहि, अध्यगीष्ट, विपूर्तः, धेहि, चिकार, गृहाण, अबीभवत् , पुनीयति,पुषु पञ्च प्रयोगा एवं प्रधानखूत्रनिर्देशपूर्वकं साध्यन्ताम् । ५ हरियो दारि-राजन्-युष्मद्-भवत्---शब्दानां तृतीयायां सप्तम्यावा रूपाणि विलिख्य, सू, स्था, एधू, अस्, इन-धातून लोटि मध्यम- पुरुषैकवचने लडि प्रथमपुरुजैकवचने च रूपाणि लिखत । ६ सन्धिसमायोः को भेतुः ? सन्धेः समासस्य च प्रवानभेदानां नामानि लिखित्वा उदाहरणानि च लिप्यन्ताम् । अथवा-कारका, कृतवान् , करः, गायः, वैनतेयः, शालीमाः एतेष प्रकृतिप्रत्ययविभागमान्नं प्रदर्शयत । ७ ० . १ सन् १९५४ निम्नलिखितेषु पन्चानामेव सन्धिविच्छेदं कृत्वा सखूनं साधनप्रकार यह शुद्ध युपास्या नावाचा प्रश्ना, उस्थानस , सन्नच्युतः, मनोस्था १ ७ ३ तिम्नलिखितेषु पञ्च प्रयोगाः प्रधालसूनः साधनीया:- सखा, श्रियाम् , ध्वः, यूनः, विद्वान् , चतुर्यु, अस्माकम् । ३ अचीकमत, आहि, देहि, ऋष्टा, शिण्डि, अजनि, अतिष्टिपत् । --एषु पञ्च प्रयोगान् विशेषसूत्राणि लिखित्वा साधयत । १ (क) पति-पितृ-वेधस्-गुणिमू-वारि शब्दानां द्वितीयायां सप्तम्याञ्च रूपाणि लिखत। (ख) पा-कृ.दृश्यातूनां लटि, टि, लोटि च मध्यमपुरुषे रूपाणि কিয়ামু।
लघुकौमुदी-परिशिष्टे १५ वाच्यपरिवर्तन क्रियताम:- क) (३) अहं सुख अनुभवामि (२)स घटं करोति। (ख) शुद्ध क्रियताम:-(१) चिनगां ददाति । (२)बजे गामव रोधति । (३) मदनमहेशौ सुरेशो च धर्म रक्षतः । ६ (क) द्विगु कर्मधारययोः सोदाहरणं भेदं प्रदर्शयत । (ख) कर्तृकरणोर्लक्षणमुदाहरणं च लिखत । ७ आदाब, श्रुत्वा, दानम् , गतः, गौरवम , जनता, लौकिका, गोपी,एषु पञ्चानां प्रकृतिप्रत्ययौ विभजनीयौ। सन् १६५५ HISHNom - १ इकारबकारलकाराणामुच्चारणस्थानानि लिखित्वा संयोग पदप्रातिपदिक- मसंज्ञा-विधायकानि सूत्राणि लेख्यानि । इमो अन्न, श्रीx ईशः, जगद्x हिताय, सन् ४ अच्युतः, सस् शम्भु, एष सूत्रनिर्देशपुरस्लरं सन्धिः क्रियताम् । ३ नारीणाम् , गाः, श्रियै, ज्ञानानि, चत्वारः, अमुष्य; अद्भिः,-एषु कानपि चतुरः प्रयोगान् सूत्रनिर्देशपुरःसरं संसाध्य पपी-वारि-पथिन् युष्मच्छ ब्दानां द्वितीयकवचने षष्ठीबहुवचने च रूपाणि लिख्यन्ताम् । ४ भवति, कामयते, दोग्धि, अजुहवुः, अदीव्यत् , सन्धः, करोति, अजी- गणत,-एषु कानपि चतुरः प्रयोगान् संसाध्य एध् गम् दुह कृ धातून लङि मध्यमपुरुषैकवचने रूपाणि लेख्यानि । ५ भावयति, जिवत्सति, पुत्रीयति, स्तूयते, शिष्यः, मायः, कर्ता, पका, राम.---एषु चतुरः प्रयोगान् प्रकृतिप्रत्ययनिर्देशपूर्वकम् संसाध्य कति कारकाणि कानि च तानि इति विचार्य लिखत ६ वृत्तिभेदाः कियन्तः ? के च ते इति लिखित्वा राजपुरुषः, पीताम्वरः, -एषु विग्रहवाक्यं प्रदय गायः, वैयाकरणः, एतर्हि, अजा, इन्द्राणी, युवतिः -एष चतुर्णाम् प्रकृतिप्रत्ययौ विभजनीयौ (क) वाच्यपरिवर्तनं विधेयम्- (१) देवदत्तेन देवी स्तूयते । (२) अहं पन्नाणि लिखामि । (ख) शुद्धं कृत्वा लिख्यताम्-(१)अहं तन न लिखति, (२) मम सखेः सर्वैः बालिकाः पठति । (३) अस्यां देशे वीराः भवन्ति (४)मया पुस्तकानि पठ्यते । , ।
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