Sanmati Library, Jaipur
Ath Anantvrat Katha
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' श्रीमदनंतदेवताप्रीत्यर्थः यथाज्ञानेन . यथामिलितोपचारद्रव्यत्यानावाहनादिषोडशोपचास COM द बीगणेशाय नमः ॥ अथ अनन्तपूजाविधिः-प्रीतनयादिके स्नात्वा नित्यकर्म संगोप्य च ॥ अनन्त हदये कृत्वाशुचिस्तंत्र समाहितः।। अत्रणकलश चैव वस्त्रयुग्मेन वेष्टितम् । मुष्टिमात्रश्च दर्मेस्त फणिरोजें च कारयेत् ।। स्थापयेत्कलशस्यान जगदाधार मव्ययम् । प्राधियेदनन्तं च तस्मिन्बी विशेषतः ॥ गोचर्ममात्र मालिप्य गोमयेन विचक्षणः । तन्मध्ये स्थंडिल कृत्वा पद्ममष्टदल लिखेत् तस्योपरि न्यसेत्कुंभचुतपलय संयुतम् । प्राणायाम ततः कृत्वा तिथ्यादि परिकीर्तयेत् ॥ मम संकट बस्य क्षेमस्थैर्यायुरारोग्य चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थ: ममावस्तिस्यचिर्यमाणस्य व्रतस्य संपूर्णफलावा प्यर्थ करिष्ये ॥ तदत्वेनासनादि- कलशाराधनं करिष्ये ।। कलशस्य ॥ सर्वसमुद्रा०॥ सितासिते. ॥ कलशे वरुण संपूज्य ॥ ततः शंख घंटा व पूजयेत् ॥ अपवित्रः पविगा पूजादव्याणि आत्मानं च प्रोक्षयेत् ॥यमुनापीञ्च पूजयेताश्रीमद तवतांगत्वेन श्रीयमुनापजन पीठपूजनं च एक- तन्त्रमा करिष्ये ॥ तथयो । पोशोपचार : पंचोपचारेवा पूजयेता। पीठे शेष संस्थाप्य अनन्तंस्पृष्ट्वा 5 - विनियोगः कार्यः । स यथा ॥ अस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठामंत्रस्य । ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऋषयः ।। - अंग्य जुःसामाणि छदासि परा प्राणशक्तिर्देवता, आंबीज, हीशक्तिः, क्लीकीलक, श्रीमदनंतस्य प्राणप्रतिष्ठापनेविनियोगः ॥ ॐ 'ग्राहीक्रौं यर लवंशपसंहलंक्षमा क्रौंहीआधीमद तस्य प्राण इह प्राणः ॥ ॐ आंही आं जीव इह स्थितः॥ ॐ याही श्रांसद्रियाणि वाड्मनस्त्वक्चक्षुःश्रोत्रजिह्वा प्राणवाक्याणिपादपायपस्थानि इहागत्य सुखविरं तिष्ठतु स्वाहा । असुनीते चत्वाखिाक० गर्भा- धानादिसंस्कारादिसिद्धयर्थं पंचदशप्रणवावृत्ति करिष्ये ।।ॐ रक्तभोधिः परानमः ॥ अथानन्त पूजा ॥ ततस्तु मूलमंत्रण नमस्कृत्य जनार्दनम् ॥ नवाप्रपल्लवाभासं पिंगंधूः 'श्मश्रु लोचनम् ॥ पीतांबरधरं देवं शंखचक्रगदाधरम् | अलंकृतं समुद्रस्थ विस्वरूपों विचितयेत् ॥ध्यायामि ॥ आंगच्छा- नंत देवेश तेजोराशेजगत्पते । इमों मैया कृतां पूजां गृहाणं पुरुषोत्तम ।। सहसशीर्षी आवाहनं० ।। विष्टर धेहि गोविंद गोवर्धनधर प्रभो । अनंत दीयते यन्में रत्नसिंहासने विश । पुरुष आसनः।। यथाव सर्वदेवाना मिंद्रादीनां च रक्षसि तिथी माँ पालयानंत त्वदीयं शरणागतम् । एतावा० पाद्यं०॥
नितानतरूपोऽसि मया दत्त 'फलं जलम् ॥ कायेन मनसा वाचा गृहाणार्थ नमोऽस्तुते ॥ त्रिपादू अध्ध गंगोदकं समानीत हमकुंभेन योजितम् ।। आचम्यता हषीकेश प्रसीद पुरुषोत्तम। तस्मादि० आचमन ।। अनंतगणरूपाय विश्वरूपधराय ची िनमो माहाल्यदेवाय अनंताय नमो नमः ॥ यत्पुरु० स्नान ततः पंचामृतस्नानम् ।। सुस्भेस्तु:समुत्पन्न देवानामपि दुर्लभम् ।। पयो ददामि देवेश स्ना- नाथ प्रतिगृह्यताम् । आप्यायः पयः ॥ चन्द्रमडलसंकाशं सर्व देवप्रियं हि यत् ।। दषि ददामि देवेश स्नानार्थ प्रतिगृह्यताम् ।। दधिक्राणो० दधिस्नान आज्य सुराणामाहार अज्यिं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ।। आज्यं पवित्रं परम स्नानार्थे प्रतिगृह्यताम्॥धृतमिति घृतस्नान ॥ सौषधिसमुत्पन्न पीयूष सदृशं म- धु स्नानाथ ते मयादत्तं गृहाण परमेश्वर। मधुवाता० मधुः । इक्षुदंडात्समुद्भतांशकरां मधुगं शुभा- म् ॥ स्नानार्थ ते मया दत्तं गृहाण परमेश्वर । सादुःपवस्व शकर।। शुद्धोदकस्नानं० ॥ नाम- मंत्र: पंचोपचारैः संपूज्य । पुरुषसूक्त नाभिषेक । तप्तकांचनवम कौशेयं च सुनिर्मितम् ।। वस्त्र गृहीण देवेश लक्ष्मीयुक्त नमोऽस्तु तेति यज्ञ वस्त्र ॥ वस्त्रानंतरमाचमनीयं ॥ दामोदर नमस्तेऽ.
स्तु त्राहि मां भवसागरात् ॥ ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण पुरुषोत्तम।। यज्ञोपवीतं ।। तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत चंदनंगा अक्षताश्च सुरक्षा अक्षतान ॥ माल्यादीनि सुगंधीनिष्तस्मादश्वा०पुष्पं० ॥ अथ ग्रन्थि: पूजा ॥ श्रियै नमः मोहिन्यै पद्मिन्यै० महाबलाये अजाय मङ्गलाय • वरदाय शुभाय । जयायै विजयायै० जयंत्यै पापनाशिन्य विश्वरूपायै सर्वमंगलाय नमः । इति ग्रन्थिपूजा ।। दशांगं गुग्गुलोद्भतं चंदनागसंयुतम् ॥ सर्वेषामुत्तमं धूपं गृहाण सुरपूजितम् ।। यत्पुरुष० धू॥ आज्यं च वतिसंयुक्त वहिना योजितं मया ॥ दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापह ॥ ब्राह्मणोस्य दीपं० ॥ अन्नं चतुर्विध खाद पयोदधि घृतं तथा । नानांव्यंजनशोभायं नैवेद्य प्रतिगृह्यताम् ॥ चन्द्र मा मनसा. नैवेद्यम् ।। नैवेद्यमध्ये पानीयं० ॥ उत्तरापोशनार्थ ते दमि तोयं सुवासितम् । गृहोणं प्रमुखो भत्ता अंनंताय नमो नमः ॥ उत्तरापोशंनं० ॥ मुखप्रक्षालनं०.। हस्तप्रक्षालनं० ॥ करों दर्तनकं देव मयादत्तं हि भक्तितः ॥ वारंचन्द्रप्रभ दिव्यं गृहाण जगदीश्वर ॥करोदर्तन० इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव ॥ तेन मे सुफलावाप्तिर्भवेजन्मनिजन्मनि । नारिकेलफलं. ॥ पूगीफलं मह- ।
लें
आये
॥
३॥
किसी
समयं
गांधारीक
४
से शोभित ।। २ ॥ मोती जड़ी हुई स्वर्ग के समान, बड़ी भारी यज्ञशाला बनाई आर उस यज्ञ के
ीत नानारत्नोपशोभिताम् ॥ २॥ मुक्ताफलंसमाकीणी
महेन्द्रालयसनिभाम॥यज्ञार्थंभूपतीन्सर्वान्समानीय प्रय.
स्नतः॥३॥गांधारीतनयोराजा एकदा नृपनंदनः॥दुर्योधन
इतिख्यातः समागत्य मखालयम्॥४॥ दृष्टादुर्योधनस्तत्र
प्रांगणं जलसन्निभम्॥ऊव कृत्वा तु वस्त्राणितत्र गच्छन्
का लड़का राजो धृतराष्ट्र का पुत्र जो दुर्योधन नाम से विख्यात था, वह उस यज्ञशाला
श्राकर ॥ ४ ॥ स्थल में जल की प्रतिभा देखकर वस्त्र , को ऊँचा कर उस जगह
दिव्यं नोगवल्यादयुतम् ।। करेणसमायुक्त तांबूलं प्रतिगृह्यताम् ।। तांबूलंस. ॥ हिरण्यगर्भति दक्षिणां स० ॥ यानिकानिच पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि तानिविनश्यति प्रदक्षिणपदेपदे ।। नाभ्याआसी. प्रदक्षिणाम् ॥ नमस्ते भगवन्भूयो नमस्ते धरणीधर ।। नमस्ते सर्वनागेन्द्र नमस्ते मधुसूदन । समस्या० नमस्कार : नमस्ते देवदेवेश नमस्ते गरुडध्वज ॥ नमस्ते कमलाकांत ह्य. नंताय नमो नमः । यज्ञेनय० मंत्रपुष्पं० ॥ अथ दोरकप्रार्थना ॥ अनन्ताय नमस्तुभ्यं सहस्रशि- रसे नमः ॥ नमोऽस्तु पद्मनाभाय नांगानां पतये नमः अनन्तः कामदः श्रीमाननन्तोमे प्रयच्छतु ।। अनंतो दोररूपेण पुत्रपौत्रान्प्रवर्धतु ॥ इतिः सम्प्रार्थ ॥ अथ दोरकुबन्धनमन्त्रः ॥ अनंतसं- सारमहासमुद्र मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव ॥ अनंतरूपी विनियोजयस्व ातंतसूत्राय नमो नमोस्त ॥ इति वचा || अंथ जीर्णदोरकविसर्जनमंत्र ॥ नमः . सर्वहितानन्तजगदानन्दकारक ।। जीर्णदारममु देव विसजे हैं त्वदाज्ञया ॥ इति विसर्जयेत् ॥ अथ वोयनमंत्रः ॥ गृहाणेदं द्विश्रेष्ठ वा यनें दक्षिणायुतम् ।। त्वत्प्रसादादहं देवं मुव्येयं कर्मबन्धनात् ।। प्रतिगृह नदिजश्रेष्ठ अनन्तफल- -- धीरे धीरे चलने लंगा ॥ ४ ॥,यह देख कर द्रौपदी श्रादि श्रेष्ठ, स्त्रियां मुसक्याने लेंगी धार वह दुर्योधन श्रागे नाकर पानी का जमीन जान कर उस पानी में गिर पड़ा। यह देख सम्पूर्ण शनैःशनैः॥५॥ स्मितवक्त्राश्च तं दृष्ट्वा द्रौपद्यादिवरांगनाः॥ दुर्योधनस्ततोगच्छन् जलमध्येपपातह ॥६॥पुनः स.नृपा- श्चैव ऋषयश्च तपोधनाः ॥ उपहासं च चक्रुरता द्रौपद्यादि- सुलोचनाः॥७॥ महाराजाधिराजोऽसौ महाक्रोधपरायणः॥ राजा। लोग और तप ही है धन जिनका ऐसेः ऋषि लोग हँसने लगे और सुन्दर हैं नेत्र- जिनके ऐसी द्रौपदी श्रादिक स्त्रियां भी हसने लगीं ।। ७। यह देख कर राजाओं का राजा - wm INK , दुर्योधन अत्यन्त कोधित हो कर अपने. मामा शकुनी के, साथ अपने राज्य में जाने के लिये १० उद्यत' हुआ॥८॥ उस समय शकुनी अत्यन्त मधुर वचन बोलता भया कि हे राजन ! श्रागे कार्य करने के विचार से भाप इस अत्यन्त क्रोधका त्याग करो॥अपने घर चलने का हे राजेन्द्र विनिर्गत्य स्वकंराष्ट्रमातुलेनावृतो नृपः॥८॥तस्मिन् काले शकुनिःप्रोवाच मधुरवचः।{चराजन्महारोषपुरतःका- र्यगौरवात् ॥९॥ गैतुमुत्तिष्ठ राजेन्द्र सत्रात्स्वसदनं प्रति॥ तथेत्युक्त्वा महाराजः समागत्यमखालयात्॥१०॥निरग- यज्ञशाला से उठिये । तव ऐसा ही-संही, ऐसा कह कर यज्ञशाला से राजा दुर्योधन अपने घर श्राता भया ।।१०।। और संपूर्ण राजा लोग भी यज्ञ से अपने अपने राज्य में जाते भये तदनंतर दुर्योधन राजाओं के साथ हस्तिनापुर में आकर ।। ११ ॥ पंडु राजा के श्रेष्ठ पुत्र युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन श्रादिको बुलाया, उसके बाद अपने राज्य में प्राप्त होकर जया खेलने लगा ।।१२।। च्छन्नृपाःसर्वे त्यक्त्वायज्ञं स्वराष्ट्रकम॥दुर्योधनोराजाभिश्च समागत्य गजाह्वयम् ॥११॥आनीय पांडुपुत्रांस्तान्धर्मभी- मार्जुनान् वरान॥ द्यूतारम्भमकुरुते स्वं राज्यं प्राप्तवाँस्ततः॥ |१२॥छूतेनैवजिता:सर्वेपांडवावीतकल्मषाः।ततोरण्यांतरे उस जुए में नहीं है पाप जिनमें ऐसे पांडवों का संपूर्ण धन और राज्यादिक जोत लिया। तदनन्तर भाईयों के सहिन युधिष्ठिर महाराज बड़ी विस्त को प्रासहो जंगलों के बीच में वनवरजो भिल्लादिक हैं - उनके समान, रहते भये ।।शा पाण्डवों के इस समाचारको सुनकर श्रीकृष्णजी युधिष्ठिर केही गये -॥ १४ ॥ सूतजी शौनकादिक ऋषियों से कहते हैं कि वह पाराव लोग दुःख से अंत्यन्त दुर्बल गत्वा वर्तते वनचारिणः॥ १३॥ ततो वृत्तांतमापन्नो भ्रातृ- भिःसह पांडवम्॥युधिष्ठिरं धृष्टमनाः कृष्णोऽगाजगदीश्वरः ॥१४॥सूत उवाच॥अरण्येवर्तमानास्ते पांडवादुःखकर्शिता॥ कृष्णं दृष्ट्वामहात्मानं मणिपत्य यथाक्रमम्॥१५॥युधिष्ठिर बन में रहते हुए महात्मा श्रीकृष्ण महागज को देखकर कमसे पूजनादिक प्रणाम करके ।। १५ ।। रानायुधिष्ठिर बोले, हे.प्रभो ! भायों सहित हमको यह अत्यन्त दुःख प्राप्त भया हैं, इस दुःख रूपी, सागर से कैसे छूटेंगे सो कहिये ।। १६॥ कोन से उत्तम देवता का पूजन करें जिसमें राज्य पावे अथवा कौन सा व्रत करें जिससे राज्य मिले; हमाग हित तो श्राप ही के प्रसाद से उवाच ॥ अहं दुःखीह संजातो भातृभिः परिवारितः॥ कथं मुक्तिर्वदास्माकमनंतादुःखसागरात्॥१६॥क देवं पूजाये- ष्यामिर,ज्यं प्राप्स्याम्यनुत्तमम्॥ अथवा किंवतंकृत्वा त्वत्प- सादाद्भवेद्धितम् ॥१७॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ अनंतवतमस्त्ये- कं तिथावस्यामनुत्तमम् ॥ सर्वपापहनृणां स्त्रीणां चैव युधि होगा ।। ७ ऐसा सुन. श्रीकृष्ण महाराज, बोले.. किं. हेयुधिष्ठिर ! पुरुषों के और. त्रिों के AM- RAM अ. सम्पूर्ण, पापको वाला शान करने अत्यन्त उत्तम, एक, अनन्त ब्रतः है. ॥ १८ ॥ सो भाद्रपद मार्स के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी का होता है, उसत अनुष्ठान मात्र से सम्पूर्ण पापों का ठिर॥१८॥शुक्लपक्षे चतुर्दश्यांमासि भाद्रपदे भवेत्॥तस्या- नुष्टानमात्रेण सर्वपापंव्यपोहति ॥१९॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ कृष्ण कोयमनंतेतिप्रोच्यते यस्त्वयाविभो॥किंशेषनागा- होस्विदनंतस्तक्षकःस्मृतः ॥२०॥ परमात्माथवानंत उताहो नाश होता है ॥ १६ ॥ ऐसा सुनकर गजा युधिष्ठिर बोले कि हे वासदेव ! आपने जो अनन्त व्रत कहा, सो क्या शेषनाग का है या अनन्त करके तक्षक का व्रत है ।। २०॥ अथवा अनन्त ऐसे परब्रह्म परमात्मा जो है उनका यह व्रत है। हे केशव : यह अनन्त व्रत किस देवता का है , । NAL . सो सत्य २,कहिये ।।.२१॥ ऐसा सुनकर श्रीकृष्ण महाराज बोले हधर्म राज ! अनन्त हमारा ही नाम है, उसे हमाराही स्वरूप जानो, सूर्यः आदिक जितने महात्मा हैं, सो आर कालादिक ब्रह्मगीयते॥ कएषोऽनंतसंज्ञोवै तथ्यमे ब्रूहि केशव ॥२१॥क- ष्ण उवाच॥अनंत इत्यहं पार्थममरूपंनिबोधताआदित्यादि ग्रहात्मासौ यःकाल इति पठयते ॥२२॥ कलाकाष्ठामुहूर्तादि दिवारात्रिशरीरवान्॥ पक्षमासर्तुवर्षाणियुगकालव्यवस्थया जो कहा जाता है सो सब हमही को जानो ॥ १२ ॥और कला,काष्ठा, मुहूर्त आदिक दिवस, रात्रि यह सब शरीखान हैं और पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष, युग और कालांदिक की व्यवस्था सब हमी , को जानो ॥ २३ ॥ यह जो कालादिक हमने कहा है सो अनन्त इस नाम से प्रसिद्ध है वही हम पृथ्वी को भार उतारने को कृष्ण इस नास से उत्पन्न भये हैं ।। २४ ॥ दानवों का नाश २३॥योयंकालोमयाख्यातःसोऽनंत इतिकीर्त्यते।सोहंकृष्णो वतीर्णोत्र भूभारोत्तारणाय च ॥२४॥ दानवानांवधार्थायवसु- देवकुलोद्भवम्॥मांविद्धिसततंपार्थ साधूनां पालनायच॥२५॥ अनादिमध्यनिधनं कृष्णं विष्णुं हरिंशिवम ॥ वैकुंठभास्कर करने के और साधुओं की रक्षा करने, को वसुदेव के कुल में उत्पन्न निरन्तर हमको जानो ॥ २५ ॥ नहीं है आदि, अन्त, मध्यः जिनका ऐसे कृष्ण, विष्णु, शिव, बैकुंठ, सर्य चन्द्र सर्वत्र 1 40 प.च्याप्त ईश्वर हमको जाना:।। २६ ॥ हे युधिष्ठिर..! नहीं उत्तम. जिसमें ऐसा विश्वरूप योगी लेगों से धान किया गया. वह सम्पूर्ण अन्त नाम करके हमी हैं जिसमें चौदहो सोमं सर्वव्यापिनमीश्वरम्॥२६॥विश्वरूपं महाबाहो योगि- ध्येयमनुत्तमम्॥सर्वरूपमनन्तं चयस्मिन्निन्द्राश्चतुर्दशा२! वसवो द्वादशादित्यारद्राएकादशास्मृताः॥ सप्तर्षयःसमुद्रा- श्च पर्वताः सरितो द्रुमाः ॥ २८ ॥ नक्षत्राणि दिशोभूमिः इन्द्र ॥ ७॥ आठ बस, बारहो. श्रादित्य, ग्यारहो रु सात ऋषि, साता समुद्र और वृक्षादिक करके सहित सम्पूर्ण पर्वत हमी का जाना २८॥ ॥ और सत्ताइसौ. नक्षत्र, दशो दिशा पृथ्वी ८ ।। ३३ वह शीला नामकी त्यात सुशील कया पिता के पक्ष में बदती भई, फिर उसकी माता काल ज्वर के दाह से दुःखी हो 'के ॥ ३४ ॥ नदी के जल में प्राण त्याग कर वह पतिव्रता स्वर्ग को कर नाम्नीसुशीलासावधते पितृवेश्मान॥माताचतस्याःकाले- न ज्वरदाहेन पीडिता॥३४॥ विनष्टासानदीतोये ययौ स्वर्ग पतिव्रता ॥ सुमंतुस्तुततोन्यांवै धर्मपुंसःसुतांपुनः ॥ ३५॥ उपयमे विधानने दुःशीलानाम नामतः ॥ दुःशीलांकर्कशां चली गई । तदनन्तर उस सुत नामक ब्राहण ने पिर धर्म नामक ब्राह्मण : की दुःशीला नाम की कन्या से विधिवत् विवाह किया। वह कया नाम के सदृश: अत्यन्त हुष्ट स्वभाव कर्कश वचन बोलनेवली बड़ी प्रचंड : रही ॥ ३५ ॥ ३६॥ और. वह शीला नाम की कन्या पिता घर में गृहकार्य करने में बड़ी चतुर होती भई वह आंगन में, वाहर के दरवाजे के उपर, चंडीनित्यकलहकारिणीम्॥३६॥सापिशीलापितुर्गेहे गृहा- चन परावभौ ॥ कुडयस्तंभबाहिरदेहलीतोरणादिषु॥३७॥ वर्णकैश्चित्रमकरोत्रीलपीतसितासितैः ॥ स्वस्तिकैःशंख- पद्मश्च भावयंती पुनःपुनः ॥ ३८ ॥ ततःकालेबहुगते कौं- देहली के ऊपर स्वस्तिक, शंख, कमल, नीले, पाले, सफेद, काले अनेक प्रकार के वित्रों को लिख लिख कर देखा करती थी॥ ३७॥३८॥ इसके अनन्तर इसी तरह बहुत दिन 4 भ० ११ बीतने पर कौमार अवस्या में प्राप्तः पिता के घरमें मंगल को देनेवाली वह शाला बड़ी होती भई ॥ ॥ ३९ ॥ उसको देखकर पिता चिंता. करने लगा कि यह कन्या पृथ्वी में किस गुणवान वर मारवशवर्तिनी॥एवंसावर्धतेशीलापितृवेश्मनि मंगला ॥३६॥ तांदृष्ट्वा चिन्तयामास वराननुगुणानुभुवि ॥ कस्मैदेयामया कन्या विचाति सुदुःखितः।४०एतस्मिन्नेवकालेतुमुनिर्वेद- विदांवरः॥ कन्यार्थीचागतः श्रीमान् कौंडिन्यो मुनिसत्तमः ॥ ४१ ॥ उवाच रूपसंपन्नां त्वदीयां तनयांवृणे॥ पिता ददौ को दें ऐसा विचार कर दुःखी होता भया ।। १० ॥ उसी समय मुनियों में उत्तम, वेद और वेदाग को जाननेवाले कौण्डिन्य नाम मुनि कन्या के लिये आते भये ॥४१॥ और वह बोले कि , - - मैं तुम्हारी यण' करके युक्त कन्या से विवाह करना चाहता हूं। ऐसा सुन के कन्या के पिता ने शुभ दिन में ब्राह्मणोंमें इन्द्र तुल्य कौण्डिन्यमुनि को कन्या देता भया ॥४२॥ श्रीकृष्णाचन्द्र कहते. द्विजेन्द्रीय कौण्डिन्याय, शुभोदने ॥४२॥ गृहोक्त विधिना पार्थ विवाह मकरोत्तदा ॥ मंगलाचारनिर्घोषं तत्र कवीत योषितः ॥४३॥ ब्राह्मणाः स्वतिवचनं जय घोषंच वंदिनः ॥ निवोढाहिकंसर्व प्रोक्तवान् कर्कशां हैं कि हे धर्मराज ! वेद की विधि से उसका विवाह कर दिया । तिस समय वहां पर स्त्रियां मंगल गीत गाने लगीं ॥ ४३ ॥ और ब्राह्मण लोग स्वस्तिवचन पढ़ने लगे, बंदीनन स्तुति गान - करने लगे। इस प्रकार विवाह करके वह सुमंत ब्राह्मण अपनी कर्कशास्त्रीसे बोलता भया ।। ४४॥ कि दामाद के संतोष के लिये कुछ द्रव्यादिक दहेज में देना चाहिये। ऐसा सुनकर वह कर्कशा, क. १२ द्विजः॥ ४४॥ सुमंतुरुवाच ॥ किंचिदायादिकंदेयं जामातु: पारितोषिकम् ।तच्छुत्वाकर्कशाकुर्दा प्रोत्सार्यगृहमंडनम४५ पेटकेसुस्थिरंबध्वा स्वगृहं गम्यतामिति ॥ उवाचवित्तंनवा- स्ति गृहेपश्य यदिस्थितम्॥४६॥तत्श्रुत्वा विमन पार्थ संय- कोध कर घर की शोभा बिगाड़ कर ।। १५ । सम्पूर्ण द्रव्यादिक पेटी में अच्छी तरह बंद करके दामाद से बोली कि आप अपने घर जाइये हमारे घर कुछ भी द्रव्य नहीं है जो विश्वास न हो तो देख लीजिये ।। ४६ ॥ श्रीकृष्णाजी.कहते हैं कि ह: पार्थ.! ऐसा. 'सुन वह मुनि १२ - उदास होकर तब भोजन से बचा हुथा अन्नादिक' राहखर्च देता भया ।।:४७ || कौडिन्य तात्मा मुनिस्तदा ॥ भोज्यावशिष्टेचूर्णेन.पाथेयंच चकारसा ॥४७॥ कौडिन्यापि विवादैनां पथिगच्छन् शनैः शनैः ।। शीलां सुमंतोरादायनवोढांगोरथेनहि॥४८॥ददर्शयमुनापु- एयां तामुत्तीर्यतटेरथम् ॥ संस्थाप्यावश्यकंकर्तुंगंत:शिष्या- नियुज्यवै॥४॥मध्याह्ने भोज्यवेलायां समुत्तीर्य सरितटे ॥ मुनि भी नवोदासमन्त की कन्या शीला को वैलगाडी पर वैग कर धीरे २ मार्गः चलने लगे ॥ १८ ॥ जाते जाते पुण्यदायक नमुनानदी को देखकर उसके किनारे रथ को खड़ा कर । 4.
१३ शिष्य को देख के आप कौण्डिन्यमुनि स्नान-संध्यादिक श्रावश्यक कार्य करने को गये ॥ ४१ || मध्यान्ह के समय भोजन का समय जानकर स्थ से उत्तर नदी के किनारे उस शीला ददर्शशीलासा स्त्रीणां समहं रक्तवाससाम् ॥५०॥ चतुर्द- श्यामर्चयन्तंभक्त्यादेवं जनार्दनम् ॥उपगम्यशनैःशीलाप- प्रच्छस्त्री कदंबकम् ॥५१॥आर्याःकिमतन्मेत किन्नाम- व्रत मीदृशम् । ताऊचुर्योषितस्तांतु शीलां शीलविभूषणाम ने लाल वस्त्र पहने हुए स्त्रियों के झुण्डको देखा ॥ ५० ॥ उन स्त्रियों के समूह को चतुर्दशी में श्रीजनार्दन भगवान् का पूजन करते हुए देख उसके पास जा उन स्त्रियों से वह शीला धीर से पूछने लगी ॥५१॥ कि हे स्त्रियों ! यह क्या करती है।'? इस प्रकार के - व्रत का क्या नाम है ? ऐसा सुन शीलही है श्रृंगार जिसका ऐसी उस शीला से वे स्त्रियाँ बोली कि ॥ १२॥ यह अनंत का व्रत है अनंत भगवान ही को पूजते हैं। ऐसा सुन वह शीला ॥५२॥ अनन्तव्रतमेतद्धि ब्रतेनन्तस्तु पूज्यते॥ साब्रवीदह- मप्येतत्करिष्ये व्रतमुत्तम् ॥ ५३ ॥ विधानंकीदृशं तत्र किं दानं कोत्रपूज्यते॥५४॥ स्त्रियऊचुः॥शीले सदनप्रस्थस्य पु- नाम्ना संस्कृतस्य च ॥ अर्धविप्राय दातव्य मर्धमात्मनिभो- बोली कि मैं भी यह उत्तम व्रत करूंगी ॥५३॥ इस अनन्त व्रत की क्या विधि है और यहव्रत किस तरह का है, इस व्रत में क्या दान देना होता है, कौन देवता पूजे जाते हैं, सो हमसे कहो।।५४॥
-- ३ ऐसा सुन कर वे स्त्रियां बोली कि हे'शीले ! उत्तमः अन्न का प्रस्थ' मात्र लेकर पुरुष वाचक मालपुआ ग्रादिक पकवान बनाकर, आधा ब्राह्मण को दें, आधा श्राप भोजन करे|॥ ५५ ॥ जनम्॥५५॥शक्त्याचदक्षिणांदद्या द्वित्तशाठ्यविवर्जितः कर्तव्यंच सरित्तीरे कथांश्रुत्वाहरेरिमाम्॥५६॥शेषं कुशमयं- कृत्वा वंशपात्रे निधायच ॥ स्नात्वानंतंसमभ्यय मण्डले गंधदीपकैः॥५७॥ पुष्पैधृपैश्चनैवेद्यै नानापक्कान्न संयुतैः । फिर शक्ति के अनुसार दक्षिणा देवे कंजूसपना न करे और यह व्रत नदी के तीर पर 'कर और. हरि भगवान् की 'कथा' सुने -॥ ५६ ॥ और कुशा'का शेषनागजी बनाय. बांस के पात्र ",१४ में रख फिर स्नान करोय मगडप के भीतर स्ख अनंत भगवान की विधिवत पूजन करे; चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और अनेक प्रकार की पुरुषवाचक मिगई सहित ॥ ५७ ।। उनके श्रागे तस्याग्रतोदृढंसूत्रंकुकुमाक्तंसुदोरकम्॥चतुर्दशग्रांथियुवामे करतले न्यसेत्॥५८॥धारणमंत्र:॥अनन्तसंसार महासमुद्र- मग्नं समभ्युद्धरवासुदेव ॥ अनंतरूपी विनियोजयस्व ह्यनंत- सूत्राय नमोनमस्ते॥५९॥ अनंतंचकरेबध्वा भोक्तव्यं स्वस्थ- धरे तथा बड़ा मजबूत सूत का डोरा केशर मे रंग के चौदहनथि देकर हाथ में बाधे ॥५८ पहले इतना स्मरण करे कि हे वासुदेव ! नहीं है अन्त जिसका ऐसे संसाररूपी महासमुद्र में डूबे हुए मेग अच्छी तरह उद्धार करो और अपने अनन्त रूप में लीन करो। हे सूत्ररूपी अनन्त भगवान PI अ० क० आपको वार २ प्रणाम है || ५६ ॥ ऐसा स्मरण कर सूत्ररूपी अनन्त भगवान को हाथ में बांध स्वस्थ चित्तहो भोजन करे ।। भोजन करने के बास्ते संसाररूपी अनन्त नारायण भगवान का १५ मानसैः॥ ध्यात्वा नारायणंदे मनंतं विश्वरूपिणम् ॥६०॥ भुक्त्वाचांतेबजेद्वेश्म भद्रे प्रोक्तं व्रतं तव ॥श्रीकृष्ण उवाच॥ एवमाकर्ण्य राजेंद्र प्रहृष्टेनांतरात्मना ॥६१॥ सापिचके व्रतं शीलाकरेबध्वा सुदोकरम् ॥ चतुर्दशग्रन्थियुतं वामेवाहौय- ध्यान कर अपने घर जाय । ह भदें ! यह व्रत तेरेसे कहा । श्रीकृष्ण महाराज जी युधिष्ठिर से बोले कि हे राजेन्द्र ! प्रसन्न वित्त से ऐसा ।। ६०॥ ६१ ॥ ब्रत विधान सुनकर वह शीला भी सुन्दर डोरे को हाथमें बांध व्रत करती भई । जैसा चौदह गांठदेकर बाए हाथमें बांधनाकहा है वैसा बांध फिर पाथेय ( राह खर्च ) जो रहा उसका आधा ब्राह्मण को दे बाकी श्राप खाया ।। ६२ ।। थोदितम् ॥ पाथेयमविप्राय दत्वामुक्त्वा स्वयंततः॥६२॥ पुनर्जगामसंहृष्टा गोरथेन स्वकंगृहम् ॥ भासहैवशुनकैःप्र- त्यय स्ततक्षणादभूत्॥६३॥ तेनानंतव्रतेनास्य बभौगोधन- संकुलम् ॥ गृहाश्रमंश्रियाजुष्टं धनधान्यसमन्वितम् ॥६४॥ फिर प्रसन्न वित होय पति के साथ बैलगाड़ी में बैठ अपने घरजातीभई। तभी से उसको स्वामी के साथही विश्वास होगया ॥६शा अनत ब्रत करके गोधन करके युक्त और धन, धान्यादिक से भरपूर ।
घर हो गया था वह सोने पिरोय माणिक्य और मोतियों के हारों से भूषित अतिथि पूजन से आकुलव्याकुलरम्यं सर्वदातिथिपूजनैः ॥ सापिमाणिक्य करू कांचीभि र्मुक्ताहारैर्विभूषिता ॥६५॥ देवांग वस्त्रसंछन्ना सा- वित्री प्रतिमाभवत् ॥ विचचारगृहेभर्तुः समीपे सुखरूपिणी ॥६६॥ कदाचिदुपविष्टाया दुष्टोबद्धः सुदोरकः ॥ शीलायाः हस्तमूलेतुभ तस्याद्विजन्मना ॥६७॥ किमिदं दोरकंशी- सर्वदा योकुल रहती थी ॥६५॥ वह सुख रूपी घर में पतिके साथ उत्तम वस्त्र पहिन सावित्री के समान शोभित होने लगी॥६६॥ किसीसमय उसके ब्राह्मण पतिने बैठी हुई शीलाके हाथमें बंधासुन्दर 7 डोरा देखा.॥ ६७ ॥ उसे के बोला कि हे शोले ! यह डेरा क्या मेरे रश करने को बांधा है इस सुंदर डोर की किस लिये बांधा है ? इसका कारण कहो।। ६८ ॥ ऐसा सुन वह शीला ले ममवश्याय कल्पितम् ॥धृतंसुदोरकं त्वेतत् किमर्थंहित- स्वतः ॥ ६८ ॥ यस्यप्रसादात्सकला धनधान्यादि संपदः ।। लभ्यतेमानवश्चापि सोनंतोयं मयाधृत ।। ६६॥शीलाया- स्तद्वचःश्रुत्वाभातेन द्विजन्मना॥श्रीमदान्धेनकौरव्य सा- बोली कि जिसके प्रसाद से संपूर्ण धन धान्य संपदा मनुष्य को मिलती है वही यह अनन्त हमने धारण किया है ।। ६६ ।। श्रीकृष्ण महाराज कहते हैं कि हे पांडपुत्र ! लक्ष्मी के मद से अंधा होकर वह ब्राह्मण शीला कापति उस शीला का वचन सुनकर ततव उसके डारे को जल्दी .
- -- अ० का ७ से तोड़ डाला ।। ७० ॥ और कान अनन्त है ऐसा कहते और पपकर्म करते हुए उसमखने डोरा अग्नि की ज्वाला में गल दिया । ता शीला ब्याकुल होकर हाहाकार करती हुई दौड़ के क्षेत्रोटित स्तदा॥७॥कोनन्त इतिमूढेनजल्पतापापका- रिणीक्षिप्तोज्वालाकुलेवन्हौ हाहाकृत्वा प्रधावती॥७१॥ शीलागृहीत्वातत्सूत्रं क्षीरमध्ये समाक्षिपत् ॥ तेनकर्मविपा- केन स श्रीस्तस्य क्षयंगता ॥ ७२ गोधनं तस्करनति गृहं ॥ ७१ ॥ डोर को लेकर दूध में डाल दिया । उस पापकर्म से उसकी वह लक्ष्मी क्षय होने लगी ।। ७२ ॥ गों आदिक चोर चोराय ले गये, घर में आग लग गई, धन नष्ट होगया। जो १७ जस तरह से घर में पाया था वह उसी तरह फिर चला गया ।। ७३ ।। उसी तरह कुम्भ में भी कलह होने लगी, भाइयों में लड़ाई होने लगो, अनंत फेंकने के पाप से घरमें दरिद्र घुस गया दग्धंधनं गतम् ॥ यद्यथैवागतं गेहे तत्तथैवपुनर्गतम् ॥७३॥ स्वजनैःकलहोनित्यंबंधुभिस्ताडनं तथा ॥ अनन्ताक्षेपदोषे ण दारिद्यं पतितं गृहे ॥ ७४ ॥ नकश्चिद्वदतेलोके तनसद्धि युधिष्ठिर ॥ शरीरेणातिसंतप्तो मनसाप्यतिदुःखितः॥ ७॥ निवदपरमप्राप्तः कौडिन्यःप्राह तांप्रियाम॥ कौडन्य उवाच॥ ॥७॥श्रीकृष्ण जी कहते हैं किहे युधिष्ठिर! उसके साथसंसार में कोई बात कर, शरीर से अतिशय -- संतप्त रह और मनसे भी दुःखी रही कर ॥ ७ ॥ बड़े भारी दुःख को पाकर कौण्डिन्यमुनि उस शीला स्त्री से बोला कि है शीले ! मैं एकाएकी उत्पन्न भये शोक के कारण दःखी हो शलिममेदमुत्पन्नं सहसा शोककारणम् ॥ ७६॥ येनाति- दुःखितोस्माकं जातः सर्वधनक्षयः॥स्वजनैःकलहोगेहेनक- श्चिन्मां प्रभाषते॥७७॥ शरीरेनित्यसंतापः खेदश्चेतसि- दारुणः॥जानासिदुर्नय: कोत्र किंकृत्वा सुकृतं भवेत्॥७८॥ गया ॥७६ ॥ आर मेरा सम्पूर्ण धन नाश हो गया, . स्वजनों से कलह होता है और मुझसे. के ई बोखता नहीं है।।७७ ॥ शरीर में नित्यज्वरादिक ताप रहता है। वित्त मे बड़ो.भारी खेदहोता है क १ इसका क्या कारण ? जानता हा ताकहाकिसकारण समाग्य अच्छाहायगा। एसासुन कर शील ही है आभूषण जिसके ऐसे अन्दर स्वभाववाली वह शीला पति से. बाली.कि अनन्त प्रत्युवाचाथतंशीलामुशीलाशीलमंडना।प्रायोनंतकृताते- पपापसंभवजंफलम्॥७॥भविष्यतिमहाभाग तदर्थ यत्न माचर ॥ एवमुक्तः सविप्रर्षि जगाम मनसा हरिम् ॥ ८॥ निर्वेदं निर्जगामाथ कौंडिन्यःप्रगतीवनम् ॥ तपसेकृतसंकल्पो फेंकने के पाप से यह सब भया है।। ७९ ॥ और अब महाभाग ! उसके लिये उपाय करने से फिर सब हो 'जायगा। ऐसा उसके कहने से वह ब्रहऋषि मन से हरि भगवान केशर णमें गये ।। ८०॥ इसके अनन्तर वह कौण्डिन्यमुनि शांति को प्राप्त हो बन को जाते भये
।
क
श्र० और वह उत्तम ब्राह्मणा वायु भक्षण करके तप करने लगे ।। ८१ ।। उस परमेश्वर को मन से
ध्यान करते भये कि जिसके प्रसाद से निर्धन हो दुःख- प्राप्त भया उसको क्व देखेंगे ।। ८२ ।।
१.१
वायुभक्षोद्विजोत्तमः ॥८१॥मनसाध्यायमानंतं क्वद्रक्ष्या-
मिच तंविभुम् ॥ यस्यप्रसादात्संजात माक्षेपानिधनं गतम्
॥८२॥धनादिकं ममातीव सुखदुःख प्रदायकम् ॥ एवंसंचि
तयनसोथवभ्रामगहनेवने ॥ ८३॥तत्रापश्यन् महाचूतंपुष्पि
मेरे को अतिशय धनादिक-सुख दुःख देनेवाला 'ऐसा चितवन करते हुए गम्भीर बनामें फिरने
खगेः ।।.८३ ।। वहां पर बड़ा भारीफला फलाआम वृक्षदेखताभयावह वृक्ष कैसा है कि जिस पर पक्षो
।
॥ एक भी नहीं है और करोड़ों कीड़े लगे हैं ।। ८४ ॥ उस श्राम के वृक्ष से पूछता भया कि कहीं तंफलितंद्रुमम् ॥ वर्जितं पक्षिसंघातैः कीटकोटिसमावृतम् ॥८४ ॥ तमपृच्छद्विजोनंतःक्वचिदृष्टोमहाद्रुमः ।बहि- सौम्यममातीवदुःखेचेतसिवर्तते ॥८५॥ सोब्रवीद्भद्रनानंतः कचिद्दृष्टोमयाद्विज ॥ एवंनिराकृतस्तेनसंजगामाथ दु:खि तः ॥८६॥ क्वद्रक्ष्यामीतिगच्छन् स गां ददर्श सवत्सकाम् ॥ अनंत भगवान को देखा होय तो हे सौम्य ! कहो मेरे वित्तमें अतिशय दुःख है ।। ८५ ॥ यह सुन के वह आम का वृक्ष बोला कि हे ब्राह्मण मैं अनन्त नहीं देखा यह सुन वह दुखी हो चल ख दिया ॥८६॥ और अनंत भगवान् को कहां देखेंगे ऐसा विचार करता हुआ घूमने लगा इतने में बछवा सहितं गैया देखो जो बन के बीच में इधर उधर दाड रही थी। ८७ ।। (श्रीकृष्गा । अ० वनमध्येप्रधावंतीमितश्चेतश्चपांडव ॥८७॥ सोब्रवीद्धेनुके ब्रूहि यद्यनंतस्त्वयेक्षितः॥गौरुवाचाथ कौण्डिन्यंनानंतवेद्मय हंद्विज ॥८८॥ ततोबजन्ददर्शाग्रेवृषभंशावलेस्थितम् ॥ दृष्टापप्रच्छ गोस्वामीमनंतोवीक्षितस्त्वया ॥८६॥वृषभस्त महाराज कहते हैं कि) हे पांडव यह ब्राह्मण गैया से बोला कि जो तेने अनंत भगवान को देखा होय तो कहो-॥ इस के बाद गो बोली कि हे कौण्डिन्य ब्राह्मण मैं अनंत भगवान को नहीं जानती ॥ ८८ ॥ उसके बाद आगे जाकर घास' पर बैठे हुए वृषभ को देखकर उससे पूछता HI . भया कि. हे गौ के पति ! तुमने ' अनंत भगवान को देखा है ।। ८१ ॥ तब वह : वृषभ ऐसा बोला कि मैंने अनंत भगवान को नहीं देखा है उसके बाद आगे जाकर बड़ी सुन्दर दे। मुवाचेदनानंतोवीक्षितो मया ।ततोत्रजन्ददांग्रेरम्यपुष्क- रिणीद्वयम् ॥६॥अन्योन्यजलकल्लोलवीचिपर्यन्त संगत म्॥छन्नंकमलकल्लारैःकुमुदोत्पलमंडितम्॥ ६१ ॥ सेवितं भ्रमरैहंसैश्चक्रकारंडवैर्वकः॥ तेपिपृच्छद्विजोनंतोयुवाभ्यां पुष्करणी देखा ॥ १० ॥ उस गवली का जल इसमें से उसमें उसमें से इसमें आ जा रहा है। अनेक प्रकार से कल्लोल करता है और कमल, कल्होर, कुमुदिनी आदिक पत्तो से आच्छादित शोभायमान होरहा है॥ ११ ॥ भ्रमर, हंस, चकोर, वकुलादिकों से सेवित ऐसी २२ 14 अनंत भगवान्. भी प्रत्यक्ष होते. भये .॥ १७ ।। और वृद्धः: ब्राह्मण का रूप धारण कर यह बोले कि यहां आओ यह कहके उस कौडिन्य का दहिना हाथ पकड के, गुफा में ले गये णरूपेण इतएहीत्युवाचतम् ॥ प्रगृह्य दक्षिणेपाणौ गुहायां प्रविवेशतम्॥९८ातापुरी दर्शयामास दिव्यनारीनरैर्युताम् ॥ यस्यानिर्विष्टमात्मानं दिव्यसिंहासनेशुभे ॥६६॥ पार्श्वस्थ शंखचक्राब्जंगदागरुडशोभितम् ॥ दर्शयामास विप्राय वि ॥ १८ ॥ उस गुफा में कौंडिन्यमुनि एक शहर देखता भया जिसमें बडे स्वरूपवान स्त्री पुरुष विद्यमान हैं और शुभदायक दिव्य सिंहासन पर भगवान बैठे हैं ॥ १६॥ जिनके । २९ अगल, बगल.. शंख, चक्र, कमल, गदा, गरुई शोभायमान होय और कौस्तुभमणिः धारण किये वनमालादिक अनेक प्रकार के श्राभषणादिक धारण किये हुए विश्वरूप अनंत भगवान को वह कौडिन्यमुनिः देखता भया..॥ १०॥ १०१ ॥ अतिशय प्रकाशमान श्वरूपमनंतकम् ॥१००॥ विभूतिभेदैश्चानतैरनंतममितौज सम् ॥ कौस्तुभेन विराजतं वनमालाविभूषितम् ॥ १०१ ॥ तंदृष्टादेवदेवेशमनंतमपराजितम्॥वंद्यमानोज़गादोच्चैर्जय शब्दपुरःसरम्॥१०२॥पापोहंपापकर्माहं पापात्मा पापसंभ ऊपर कथनानुसार-स्वरूप" को देखकर उनके आगे ऊंचे स्वर से है प्रभो आपको जय होय ॥१०९॥ ऐसा कह और प्रणाम करके बोला कि हे नाथ हे .पुडरीकाक्ष हम पापरूप और ..
। - पापकर्म करनेवाले हैं। हमारी आत्मा पापरूप है और पाप ही से : ऊत्पन्न भये हैं, रक्षा करो आप मेरे सम्पूर्ण: पापों के हरनेवाले हो ॥ १०३ ।। उस मुनि का वचन सुन अनंत २३ वः ॥ त्राहिमापुंडरीकाक्ष सर्वपापहरो भव ॥ १०३ ॥ तच्छु वानंतदेवेशःपाहसुस्निग्धया गिरा॥माभैश्त्ववहिविपेन्द्र य तेमनसि वर्तते ॥१०४॥कौडिन्य उवाच ॥ मयाभूत्यवलि तेनत्रोटितो नंतदोरकः । तेनपापविपाकेन भूतिर्मे प्रलयंगता देवजी बडे कोमल वचन से बोले कि हे विप्रेन्द्र ! दरो मत जो तुम्हारे मन में हो सो हो || १०१ ॥ ऐसा सुन कर कोडिन्यऋषि बोले कि हे प्रभों मैंने धन से उन्मत्त होय २३ ह अनंत का डोरा तोड़ डाला' उप पापकर्म से मेरा धन नष्ट हो गया ।।१०। घर में अपने मनुष्यों से क्लेश हो गया जिससे मुझ से कोई भी नहीं बोलता ! इसी तरह दुखी होंयं ॥ १०५॥ स्वजनैः कलहो गेहे न कश्चिन्मां प्रभाषते॥निर्वे दाद्गमिते रण्ये तवदर्शन कांक्षया॥१०६॥ कृपयादेवदेवे शत्वयात्मा संप्रदर्शितः ॥ तस्यपापस्यमशांति कारुण्याह तुमर्हसि ॥१०७॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ तच्छत्वानंतदेवेश आपके दर्शन की इच्छा करके जंगलों में फिरने लगा ॥ १०६ हे देव हैं देवेश! आपने कृपाकर अपना दर्शन दिया अब मेरे से उस पाप को-शांति. दया करके कहिये ।।.१०७ ॥ 1 २४ श्रीकृष्ण महाराज बोले, कि ह। युधिष्ठिर भक्ति से प्रसब किये गये देवता क्या नहीं देते अनंतदेव उत्तम बहिष्ण का वचन सुनकर बोले. ॥ १०॥ अनंत भंगवान कहते हैं कि ह. उवाच द्विजसत्तमम् ॥भक्त्यांसंतोषितोदेवैः किं नदद्याद्युधि ष्ठिरः ॥१०८॥ अनंत उवाच ॥ स्वगृहंगच्छ कौंडिन्य नोवि लबंकुलाहिज॥ चरानंतव्रतंभक्त्या नववर्षाणि पंचच॥१०॥ सर्वपापविशुद्धात्मा प्राप्स्यसे सिद्धिमत्तमाम।। पुत्रपौत्रान् स. कौंडिन्य ब्राह्मण तुम देरी मत करो अपने घर जावो और भक्ति से चौहदं वर्ण अनंत का व्रत करें ॥१०१ ॥ इससे सम्पूर्ण पापों से छूट कर-पुत्र पौत्र को उत्पन्न कर इच्छित. भोंगों को भोंग कर फिर उत्तम सिद्धि पावोगे ।। १६० ।। अंत में मेरा स्मरण करके मेरे को विना संदेह पाओगे और सम्पूर्ण लोगों के कल्याण के लिये तुमको बरदान देते हैं ॥ ११ ॥ मुत्पाद्य भुक्त्वाभोगान्यथेप्सित.न्॥११०॥अन्ते मत्स्मरणं प्राप्यमामुपैष्यस्यसंशयम् ॥ अन्यच्च तेवरंदा सर्वलोकोप- कारकम् ॥१११॥ इदमाख्यानकवरंशीलानंता व्रतादिकम्॥ करिष्यतिनरोयस्तुकुर्वनव्रतमिदंशुभम् ॥११२॥सोचिरात यह . शीला का अनंत ब्रतादिक श्रेष्ठ आख्यान, और कल्याग करनेवाला अनंतब्रत जो प्राणी सुना दिया करेगे ।। ११२ ॥ सो जल्दी पापा से छूट कर 'परमगति को प्रात होंगे' कल अ० अनंतदेव कहतते हैं कि हे ब्राह्मण जिस मार्ग से आये हो उसी मार्ग से जल्दी घर-को जाओ ॥ ११३ ।। ऐसा सुनके कौडिन्यमुनि बोले कि हे स्वामी हम कुछ पछत हैं सो कहिये । जंगल पापानमुक्तःप्राप्नोति परमांगतिम् ॥गच्छ विप्रगृहं शीघ्रंयथा येनागतोह्यसि ॥११३॥कौंडिन्य उवाच॥स्वामिन्पृच्छामि तेब्रूहि किंचित कौतूहलंमया॥अरण्येभूमतोदृष्ट तद्वदस्वज- गद्गुरो॥११४॥कश्चुतवृक्षकस्तत्र कागौःकोवृषभस्तथा। में धूमते हुए मैंने कुछ कौतुकः देखा हैं वह हे जगत के गुरु कहो ।। ११४ ॥ वह आम: का 'वृत कौन है, और वह गौ कौन थी, और वृषभ कौनः था, कमल, कुमुदिनी,' कल्हार आदि से सुशोभिते परम सुन्दर ।। ११५ ।। मैंने बड़े जंगल में दो पुष्करणी देखी है सो क्या थीं, वह गदहा कौन था, वह हाथी कौन था और वह उत्तम 'वृद्धब्राह्मण कौंन रहा ॥ ११६ ॥ कमलोत्पलकल्लारैःशोभितं सुमनोहरम् ॥११५॥मयादृष्टं महारणये किंतत्पुष्करणीद्वयम् ॥कः खरः कुंजरः कोसौ को सावृद्धो द्विजोत्तमः॥११६॥ अनंतउवाच॥ सचूतवृक्षोविप्रो सौविद्यावेदविशारदः ॥ विद्यानदत्ताशिष्यभ्यस्तेनासौतरुतां अनन्तदेव बोले कि वह आम का वृक्ष वेदविद्या का अच्छी तरह जाननेवाला ब्राह्मण था २६ उसने शिष्यों को विद्या नहीं दी इसलिए वृक्ष हुआ ॥ ११७ ॥ और जो गौं देखा था वह बीज । को खानेवाली पृथ्वी रही और जो घास पर बृषभ देखा था वह सत्यलोक में है स्थिति जिसकी गतः ॥११७॥ यागौवसुंधरादृष्ठा पूर्वसाबीजहारिणी ।। वृषो के धर्मस्त्वयादृष्टः शाद्वले सत्यमास्थितः ॥११८ ॥ धमाधर्म व्यवस्थांनतच्चपुष्करिणीद्वयम् ॥ ब्रह्मण्योकेचिदप्यास्ता भगिन्यौतं परस्परम् ॥ ११६ धर्माधर्मादियत्किंचित्तन्नि ऐसा वह धर्म था ॥ ११८ । और वह धर्म अधर्म का निर्णय नहीं करती थी वह पुष्करणी दोनों बहिन और ब्राह्मणी थीं ।। ११६ ।। और धर्म अधर्म आदि जो कुछ होय परस्पर दें और ले लेती २६. ॥ .
॥ रही और वेदपाठ करनेवाले ब्राहणों कों और गरीब को नहीं दिया ।। १२० ।। भिक्षुक को "भिक्षा नहीं दीउस पापकर्म से उन दोनों का जल आपस में इधरे का उधर उधर का इधर होता वेदयतो मिथः॥विप्रायवेदविदुषेन दत्तं दुर्बलायवै ॥१२०॥ भिक्षादत्तानचार्थिभ्य स्तेनपापेन कर्मणा ॥ वीचीकल्लोल मालाभि गच्छतस्ते परस्परम्॥१२॥ खरःक्रोधस्तथादृष्टः कुञ्जरोमदउच्यते॥ ब्राह्मणोसावनंतोहं गुहासंसार गह्वरम् रहता है ।। १२१ ॥ और गदहा जो देखा सो क्रोध रहा और वह हाथीं जो रहा सो अभिमानरहावह ब्राह्मण जो रहा सोहम अनन्त हैं औरजो गुफा रहीरही सो कठिन संसारसागर रहा ।। १२२ ॥ अनन्तदेव म. २७ ऐसा कहकर उसी जगह अन्तरस्थान होगये यह सब स्वप्न समान देखकर फिर उस जगह से वह मुनि अपने घर आये ।। १२३ ।। चौदह वर्ष विधि से अनन्त व्रत करके जैसा अनन्तदेवजीने कहा रहावह १२२॥इत्युक्त्वादेवदेवश स्तत्रैवान्तरधीयत ॥ स्वप्नप्रायत तोदृष्ट्वा ततःस्वगृहमागतः॥ १२३ ॥कृत्वानंतव्रतं सम्यग- नववर्षाणिपंचच ॥ भुक्त्वासर्वमनंतेन यथोक्तं पांडुनंदन॥ १२४॥अंतेमत्स्मरणप्राप्य गतोनंतपुरे द्विजः । तथात्वम- पिराजर्षेकथांशृण्वन्' बतंकुरुं ॥१२५॥प्राप्स्यसे चिंतितंसर्व सब सुख भोग.कर ।। १२४ ॥ खिर अन्त में ब्राह्मण अनन्तदेव को स्मरण कर अनन्तलोक कोजाता भया इसी रंतह से राजर्षि तुम भी कया सुनो और व्रत करो. ॥ १२५ ॥ जिस २७ प्रकार ब्राह्मण को चौदह वर्ष में फल प्राप्त भया.तुमको भी उसी तरह अनन्तदेव के प्रसाद से सम्पूर्ण इञ्छित वस्तु मिलेगी.॥ १२६.। उसी तरह एकही वर्ष में कथा सुन व्रत करने मनंतस्य वचोयथा॥ यद्वचतुर्दशेवर्षे फलप्राप्तं द्विजन्मना । १२६ ॥ वर्षेकेनतदाप्नोति कृत्वोपाख्यानकं व्रतम् ॥ एतत्ते कथितंभप बतानामुत्तमं बतम् ॥१२७ ॥ यच्छुत्वासर्वपापे भ्यो मुच्यतेनात्रसंशयः ॥ तेपिपापविनिर्मुक्ता प्राप्स्यति चह- से फल प्राप्त होता है। हे राजन् । व्रतों में उत्तम व्रत मैन कहा ।। १२७॥ जिसको सुन के प्राणी सम्पूर्ण पापों से छूट जाते हैं इसमें सन्देह नहीं और फिर पाप से छूट कर हरि भगवान श्र० २८ के पद को प्राप्त होते हैं ।। १२८ ॥ हे कुरुकुल में उत्पन्नं राजा युधिष्ठिर ! जो शुद्ध सत्ववाले संसारसागर रूपी गुफा मे सुख से फिरने की इच्छा करता है वह. तीनों लोक के स्वामी अनन्त रेः पदम्॥१२८॥संसारगह्वरगहांसुसुखविहर्तु बांछति ये कुरु कर कुलोद्भवशुद्धसत्वाः ॥ संपुज्यच त्रिभुवनेशमनतदव बध्नति दक्षिणकरे वरदोरकं ते ॥१२९॥ इतिश्रीमदनंतब्रतपूजाकथा चसमाप्तम्॥श्रीमदनंतार्पणमस्तु॥श्रीराधाकृष्णाभ्यांनमः। .देव की विधिवतपूजन कर वह डोरा दक्षिण हाथ में बांधता है ।।.१२१ ।। इति श्रीमनातकथा पाशी निवासी माणिकराम शरिमज पं० मोतीराम आदिच्यशत भाषा टीका समाप्तः ॥ - २८- a - तैयार है! तैयार है !! ' तैयार है !!! लघुदर्पण-कर्मकाण्ड ग्रन्थ । जिस पुस्तक कीवर्षों से धुम मची हुई थी और माँगे भारही थीं वही लघुदर्पण पुस्तक अब सुन्दर स्वच्छ कागज पर छपकर तैयार होगई है। और धडाधड बिक रही है । इस कर्मकाण्ड के सम्पूर्ण विषयों का दर्पण ही समझिये जैसा नाम वैसा ही गुण । इसमें कर्मकाण्ड सम्बन्धी प्रायः सभी विषयों का बडी योग्यता के साथ विशद विवेचन किया गया है और उनकी पूरी बिधि लिखी गई है। इसके रच- यिता हे कर्मकाण्डी पं० जगन्नाथ मालवी । इसका संशोधन भी..काशीके प्रसिद्ध म० कर २१ धर्मशास्त्री पं० गोपाल शास्री मैने (व्याकरणाचार्य) और पं० अम्बिकाप्रसाद शर्मा व्याकरणाचार्य ने किया है। पुस्तक की छपाई में अशुद्धता का पूरा ध्यान रखा गया है। इस पुस्तक की पद्धति को काशी के प्रायः सब प्रसिद्ध पण्डितोंने (जिनके नाम आगे दिये गये हैं) स्वीकार कर इसकी प्रशंसा की है। अबतक इस विषयपर इससे अच्छी कोई पुस्तक नहीं निकली । मूल्य २॥). .. , , ४ संशोधक- ''पं० रामेश्वरदत्त शम्मी पाण्डेय । २५
पुस्तक मिलने का पता-
मैनेजर-भार्गव
पुस्तकालय,
गायघाट, बनारस सिटी।
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बाबू काशोप्रशाद भार्गव द्वारा-भार्गवभूषण मेल, विशोषन काशी में मुद्रित ।
中
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इति अनन्तत्रत कथा
भाषा टीका सहितः।
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