Adarsh Library, Jaipur

Lazzaharan

Mitra Vimal · 2011/03

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লতা-গুহ

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लज्जाहरण
लज्जा-हरण
विमल मित्र
लिमलमन

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कहानी लिखने बैठते हो, पहले मैं कहानी का अन्त सोच लेता हूं। जब तक में अन्त नहीं सोच लेता, मेरे लिए कहानी लिखना मुश्किल हो जाता है । सोचते-सोचते जब मैं कहानी के अन्त तक पहुंच जाता हूं. यानी जहां मैं परिणति के शेप विन्दु से टकराता हूं, वहां से उल्टे पाव वापस लौटना शुरू करता हूं। ऐसे ही, पोछे चलते-चलते जब बिल्कुल शुरुमात में प्रा पहुंचता हूं, तब जाकर लिखने की नौबत भाती है। लेकिन इस तरह स्थिति पोर जटिल हो पाती है। कहानी जहां खत्म होती है, यानी जहां सारे चरित्र अपनी चरम परिणति पर जा पहुंचते हैं, उस समापन के बारे अगर पहले से ही बता दिया जाए तो मुमकिन है कि पाठकों को अच्छा न लगे । और जो बात किसीको अच्छी न लगे उसको लिखने से कोई फायदा नहीं है। पाठक और लेखक के पारस्परिक सहयोग में ही लेखन की मार्थकता है। खैर, कहानी लिखते हुए ये चर्चाएं बिल्कुल अवान्तर हैं, लेकिन फिर भी मैं यह सब लिखने को विवश हूं। इसकी वजह है मेरा दोस्त--तापस ! इस तापस को लेकर वाकई कोई कहानी लिखी जाए या नहीं, यही मेरी असली समस्या है, क्योंकि कहानी जहां खत्म होगी, उसपर क्या कोई विश्वास कर पाएगा? विश्वास-मविश्वास का प्रश्न तो खैर है ही, इसके अलावा सम्भव- असम्भव का मवाल भी उठता है । यह सवाल जितना पाठकों की तरफ से उठता है, उतना ही लेखक की तरफ से भी। मैंने तापस से बहुत बार कहा है, "तुम शराब छोड़ दो तापस, यह जहर तुम्हारी जान ले लेगा।"

तापस ने जवाब दिया है, "देख, तू अगर भात खाने से मान जाऊंगा, लेकिन शराब! बस, यही मैं नहीं छोड़ सकता, गजब है ! यूं मैं सैकड़ों लोगों को शराब पीते देख चुका हूं। ऐसे भी लोग देखे हैं जो शराब के नगे में धुत होकर सड़कों पर उल्टे पड़े रहते हैं । वहुत-से लोगों को शराब मिलाकर भात खाते भी देख चुका हूं। एक हाथ में शराब का गिलास और दूसरे हाथ में भात का कोर ! ऐसे भी लोग हैं, शराब के विना जिनका खाना तक हजम नहीं हो पाता। यह सब मैं बचपन से ही देखता पा रहा हूं। लेकिन सच तो यह है कि इनके प्रति मुझे कभी किसी तरह की घृणा या संकोच नहीं हुआ। ऐसे सैकड़ों लोगों ने मेरी जान-पहचान है, उनचे मेरी परम घनिष्टता शोर प्यार का रिश्ता है। अगर मैं उनसे दो-एक दिन भी न मिलूं, तो मन कहीं से वेहद खाली-खाली लगता है । लेकिन तापस की तो वात ही निराली है। एक दिन मैने ही पूछा था, "यह शराब पीना तुझे किसने सिखाया ?" तापस ने हंसकर जवाब दिया, "यह भी भला कोई सीखने की चीज है ? ऐसे ही एक दिन चखकर देखी थी। उस दिन रात को वदिया नींद पाई। बस, अगले दिन फिर चढ़ा ली, उसके अगले दिन फिर..." "उसके बाद...?" "उसके बाद तो मुझे देख ही रहा है।" "लेकिन तेरी ही तरह और लोगों ने भी तो पीना शुरू किया था, फिर भला तु ही उन रावको पछाड़कर आगे कैसे निकल गया ?" तापन को जब शराब की लत नहीं लगी थी, वह विल्कुल सहज स्वाभाविक और निश्छल-सरल इन्सान था। उस जैसा इन्सान मिलन मुश्किल था । हम सब उसके अति सरल स्वभाव की वजह से ही प्यार करते थे। मेरे यहां वह अक्सर पड़ने के लिए आया करता कभी गणित, कभी अंग्रेजी, कभी हिस्ट्री। दरअसल वह सब वि ६ मे कच्चा था। खर, लिसने पहने में उसके कमजोर रह जाने को सास वजह भी थी। मैंने दुनिया में यह अजीव दस्तूर देखा है कि जिन घर पर दरिद्रता की छाया पड़ी हो, वहां मानो हर मामले में ही अकाल छा जाता है। वहा बुद्धि की दरिद्रता भी मानो अपरिहार्य स्थिति की तरह स्पष्ट हो उठती है। दरिद्रता का यही सबसे बड़ा अभिशाप है। इसीलिए, मैंने देखा है, जो गरीब हैं, वह चाहकर भी भारीफ नहीं वन पाते । कोई इन्हें शरीफ वनने ही नहीं देता, क्योकि अगर वे सच- भुच शरीफ बन गए तो उन्हें रुपयों के मोल पर खरीदने में असुविधा होगी। दरअसल अमीरों की सारी समस्या सिर्फ उन्ही लोगो को लेकर है जो सचमुच शरीफ हैं । उनको मवसे बड़ी परेशानी यही है कि वे लोग ऐसे लोगों से कोई बुरा काम नहीं करवा पाते । तापस को पढाते हुए अक्सर मेरा भी दिमाग गर्म हो जाता था, "तुझसे कुच्छ नहीं होगा, तापस ! तेरे सिर में सांड़ का गोवर भरा हुप्रा है।" वैसे मेरी नाराजगी की सास वजह भी दी। कोई महन-सी बात प्रातिर कितनी बार समझाई जा सकती है ? इन्सान के धीरज की भी तो एक सीमा होती है। लेकिन तापम ने मेरी नाराजगी का कभी बुरा नहीं माना । शायद उसे सुद भी अपनी बुद्धि पर भरोसा नहीं था, इसीलिए वह मेरी बात से एकबारगी सहमत हो जाता था, मैं जो-जो कहता था, वह सिर झुकाकर चुपचाप सुन लेता था। कभी-कभार एकाध जवाब भी दे देता था, "देख, यार, तू मुझे इतना हाटा मत कर ! अरे, मबकी बुद्धि क्या एक बराबर होती है "तब तू लिखना-पढ़ना छोड़ दे..." इससे अधिक कुछ कहने का कभी साहस नहीं हुआ। भगर कही मेरी बातें मुनकर वह भाय-भाय रोने लगे ! बस इसी डर से ज्यादा कुछ कहने की कभी हिम्मत नहीं पड़ी। वैसे उस हाटने-डपटने के बाद सुद मुझे भी वेहद तकलीफ होती थी। ?"

. मुझे हर वार अफसोस होता था कि उसे मैंने इतना बुरा-भला क्यों कह डाला । आखिर उसका क्या कसूर ? हर कोई अगर तेज बुद्धिवाला होता, तो फिर कहना ही क्या था। अगर ऐसा सम्भव होता तो दुनिया के बड़े-छोटे लोगों में कहीं कोई अन्तर ही नहीं होता। हर आदमी अगर एक जैसा होता तो यह संसार युद्ध का अखाड़ा बन जाता। हर कोई यही चाहता कि वह राजा बन जाए। उस वक्त प्रजा बनने के लिए कोई तैयार नहीं होता। हालांकि ये सव आजकल की बातें नहीं हैं। आज के ज़माने में तो ये सब सोचना भी अन्याय है। मेरी भी यही राय है । वर्तमान समाज- तन्त्र और साम्यवाद के युग में छोटे-बड़े सभी लोगों को समदृष्टि से देखना हो उचित है । लेकिन उन दिनों ये बातें मेरी बुद्धि के बाहर थीं। वैसे ये बातें मुझे किसीने सिखाई भी नहीं। उन दिनों हम सिर्फ इतना ही जानते थे-'पढ़ोगे-लिखोगे तो होगे नवाब ।' अपने अभि- भावकों की तरह हम भी यह कविता दोहराया करते थे। लेकिन यह 'कितना बड़ा झूठ है-इस सच को जितने मर्मान्तक भाव से मैंने. इस उम्र में प्राकर जाना है, उतना पहले कभी जान पाना नामुमकिन था। खैर, उन दिनों तो खुद तापस का भी यही ख्याल था कि वह सभी लोगों से छोटा है। लेकिन अपने छोटे होने के गौरव को अहंकार का मुखौटा पहनाकर उसने कभी कहीं नहले पर दहला जड़ने की कोशिश नहीं की। उसने समझ लिया था कि उसने इस दुनिया में छोटा होकर ही जन्म लिया है, अतः अव उसे जिन्दगी-भर छोटेपन का अगौरव ढोते हुए ही जीना होगा। उसके लिए अन्य कोई गति भी नहीं है। अपनी क्षुद्रता को लेकर वह कभी परेशान भी नहीं हुआ । उसका यही गुण उसके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत बन गया था। लेकिन कमाल है ! एक दिन वही तापस इतना बड़ा आदमी बन गया। उसके पास इतना पैसा हो गया कि वह हम सवको पछाड़क आगे निकल गया। जिस आदमी को हम लोगों ने हमेशा सबसे छो माना, हठात् वह एक दिन हम सबको यूं मात दे जाएगा, इसकी लोगों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

इसीलिए सोचता हूं, इतना यहा होना भी शायद मच्छा नहीं होता। छोटे होने के प्रगौरय से बडे होने की गौरयहीनता कितनी अधिक मर्मान्तक है, उन दिनों शायद मैं कल्पना भी नहीं कर समता पा । लेकिन ये सब बातें बाद में होती रहेगी। पहले शुरू की ही मार कहूं- यही तापस एक दिन बिस्कुल प्रपानक हम रायके मोष से तापसा हो गया। बंधा-बंधाया माधय छोडकर लापता हो जाने के पीछे पाहे जितनी भी बही हताशा क्यो न रही हो, उससे भी बड़ी यारा, गो गन को पुभ गई -वह था दुस्साहस । यूं जानबूझपर भनिदिमतता गगुर में भाखिर कौन छलांग लगा सकता है ? ऐमा फोग है, जो गू गिराधित होकर अपने को नि:शेप करने को तैयार हो जाएगा? गुरू-शुरू मे हम लोगों ने इस बारे में माफी आप-पता की। माधारण तौर पर तापस के मा-याप, भाई-पहल भी थोड़ा-यास पर. उपर पता लगाते रहे । बंगे हम सपका यही ग्यास था कि एक दिन वह जरूर लौट पाएगा। पौटना ही होगा। याफी रामनियारी लोग जो करते हैं, यही तापस भी करेगा। अभी यह झीप पाकर धमा गया है, लेकिन ठोकार साफर एक न एक दिन उगे लौटना ही होगा। और लोगों की बात अलग है ! ये लोग पाहे जगे भी हों, मिगी गरिमी हिल्ले में लग ही जाते हैं और इस कोशिश में या तो र जगावर सई हो जाते हैं या फिर विल्कुल ही डब जाते है । रोपिन तापम दम किस्म का इन्मान ही नहीं था। वह बेहद मय्याग, प्रालगी और कम्मी बुद्धिवाला इन्सान पा। उम जमा आदमी क्या बाहर जाकर की टिक सपना था? उन दिनों हम मभी की यही राय थी। हम लोगों का प्यार पाकि वह एक न एक दिन जहर लौट पाएगा और इसी तरह छोर होमर मता फिरेगा। हम लोग उसपर दुदारा रांव जमाएंगे मदद मागने के लिए वह रिदमार-पिदं चक्कर मगाया करमा! लेकिन उस दिन के बाद जाने कितना पानी ला, जाने कितना समय महासमय से मिलकर एकाकार हो उठा, किन तापस लौटकर नहीं आया। हम लोग तापस को लगभग भूल ही के थे। वैसे भी हमें क्या गरज पड़ी थी कि हम हर किसीको याद रखते फिरें ? किसीके होने न होने से क्या फर्क पड़ता है ? आज इस व्यस्तता के युग में सिर्फ एक ही सम्बन्ध असली है, ज़रूरत का सम्बन्ध ! ज़रूरत ही हमें एक-दूसरे के करीव खींच लाती है और जरूरत खत्म होते ही हम एक-दूसरे को दूर धकेल देते हैं। लेकिन प्रीति ! प्रेम ! मुहब्बत ! स्नेह ! ममता ! ये तमाम शब्द महज़ डिक्शनरी तक ही सीमित हैं । व्यावहारिक जगत में शायद अव इनका कोई अस्तित्व नहीं है । अाजकल चारों तरफ प्रतिस्पर्धा की वेहिसाब धूम है। हम सबमें कौन किसको कुहनियांकर आगे निकल जाने में कामयाब होता है, बस, हम इसी अफरा-तफरी में दौड़ रहे हैं। खैर, ये सब बातें इतनी वार दुहराई जा जा चुकी हैं कि मैं नये सिरे से कुछ न भी कहूं तो भी चलेगा, क्योंकि इन सबसे फायदा कोई नहीं होता । एक तरफ शान्ति पर लम्बे-लम्वे भाषण, दूसरी तरफ खूना-खूनी ! इन दोनों के बीच कभी कोई समझौता नहीं हो सकता, इसीलिए ये बातें मेरी जुबान से वरवस निकल गईं। लेकिन हमारा जीवन तब भी चलता रहेगा। दरअसल ज़िन्दगी कभी नहीं रुकती, इसीलिए हम चलते रहने को विवश हैं । शायद इसी- लिए तापस भी निरुद्देश्य के अथाह सागर में एक दिन गुम होकर भी निरन्तर आगे 'और आगे बढ़ता गया। वैसे भी, कौन किसीके बारे में बेकार का सिर-दर्द मोल लेता है ? लेकिन जिस वक्त हम सब जीवन से जूझते हुए क्लान्त-क्षुब्ध और क्षत-विक्षत होकर कराह रहे थे, ठीक उन्हीं दिनों तापस से मेरी दुवारा मुठभेड़ हो गई। मैं तो तापस को पहचान ही नहीं पाया । तापस भी मुझे नहीं पहचान सका। मैं वम्बई जा रहा था । कम्पार्टमेन्ट के एक वर्थ पर अपना साम लगाकर, मैं इत्मीनान से बैठ गया। अन्य तीन यात्रियों में से अभी कोई नहीं पहुंचा था। वे लोग भी मेरे ही सहयात्री थे। बाहर दरवा पर तमाम यात्रियों के नामों की चिट झूल रही थी। मैंने उसपर : नजर डालने की जरूरत नहीं महसूस की। मैंने रात का खाना-पीना निवटाकर ही ट्रेन पकड़ी थी। मेरा इरार था, ट्रेन पर मवार होते ही मैं लम्बी तान लूंगा । रात को सोऊंगा। सुबह ही पास खोलू गा। क्लकत्ता महानगर में रहते हुए मेरी नीद में सैकड़ों व्याघात पड़ हैं। रात में भी मोने में काफी देर हो जाती है और सवेरे भी मुह-अधेरै । उटना पड़ता है। अतिशय काम की वजह से बिल्कुल सुबह-सुबह उ जाता हुं । प्रतिस्पर्धा के इस ज़माने में यह कम्बस्न नीद भी हमारे लि महज उपद्रव-भर है । अगर नीद की जरूरत न होती तो बहुत सारा का निपट जाता। वर्तमान युग ने हमारे लिए जैसे विलास-व्यमन के मामान जुटा हैं वैसे ही हमारी जिन्दगी भी हमे निचोडकर, एकबारगी नि.शेप कर दें पर प्रामादा रहती है। जब तक वह हमारे टुकड़े-टुकडे नही कर डालेग हमारा पीछा नहीं छोड़ेगी। कुछ देर में वाको तीनों मुसाफिर भी आ पहुंचे । अजीबोगरी चेहरे । अलग-अलग पहनावे । सब अपनी-अपनी सीट पर सामान लगा कर इत्मीनान में बैठ गए। किसीको किसीसे वार्तालाप की जरूरत नहीं पड़ी। लेकिन उनमे से एक व्यक्ति ने अपना सामान जैसे-तैसे रखक मेरी ओर देखते हुए कहा, "प्रापसे एक अनुरोध कर सकता हूं?" "कहिए ! मेरा स्याल या शायद ये सज्जन बीमारी का बहाना बनाकर मुझ ऊपरवाले फर्श पर जाने का आग्रह करेंगे । क्योकि दुनिया में कम-प्रक्लं की सचमुच कोई कमी नहीं है। पिछले दिनो मुझे इसका अच्छा-खास अनुभव हो चुका था। लेकिन ऐमा कुछ भी नहीं हुप्रा । वे साहब इतने अविवेकी नह थे। उन्होंने कहा, "मैं जरा डाइनिंग कार की तरफ जा रहा था। प्रार भी चलेंगे?" " मिला, जाने कितना समय महासमय से मिलकर एकाकार हो उठा, लेकिन तापस लौटकर नहीं पाया । हम लोग तापस को लगभग भूल ही चुके थे। वैसे भी हमें क्या गरज पड़ी थी कि हम हर किसीको याद रखते फिरें ? किसीके होने न होने से क्या फर्क पड़ता है ? पाज इस व्यस्तता के युग में सिर्फ एक ही सम्बन्ध असली है, जरूरत का सम्बन्ध ! ज़रूरत ही हमें एक-दूसरे के करीव खींच लाती है और जरूरत खत्म होते ही हम एक-दूसरे को दूर धकेल देते हैं। लेकिन प्रीति ! प्रेम ! मुहब्बत ! स्नेह ! ममता ! ये तमाम शब्द महज़ डिक्शनरी तक ही सीमित हैं । व्यावहारिक जगत में शायद अव इनका कोई अस्तित्व नहीं है। आजकल चारों तरफ प्रतिस्पर्धा की वेहिसाव धूम धूम है। हम सबमें कौन किसको कुहनियांकर आगे निकल जाने में कामयाब होता है, बस, हम इसी अफरा-तफरी में दौड़ रहे हैं। खैर, ये सब बातें इतनी बार दुहराई जा चुकी हैं कि मैं नये सिरे से कुछ न भी कहूं तो भी चलेगा, क्योंकि इन सबसे फायदा कोई नहीं होता । एक तरफ शान्ति पर लम्बे-लम्वे भापण, दूसरी तरफ खूना-खूनी ! इन दोनों के बीच कभी कोई समझौता नहीं हो सकता, इसीलिए ये बातें मेरी जुवान से बरबस निकल गई। लेकिन हमारा जीवन तब भी चलता रहेगा। दरअसल ज़िन्दा कभी नहीं रुकती, इसीलिए हम चलते रहने को विवश हैं । शायद इस लिए तापस भी निरुद्देश्य के अथाह सागर में एक दिन गुम होकर निरन्तर आगे और आगे बढ़ता गया । वैसे भी, कौन किसीके वारे बेकार का सिर-दर्द मोल लेता है ? लेकिन जिस वक्त हम सब जी से जूझते हुए क्लान्त-क्षुब्ध और क्षत-विक्षत होकर कराह रहे थे, उन्हीं दिनों तापस से मेरी दुवारा मुठभेड़ हो गई । मैं तो तापस को पहचान ही नहीं पाया। तापस भी मुर पहचान सका। मैं बम्बई जा रहा था । कम्पार्टमेन्ट के एक वर्थ पर अपना लगाकर, मैं इत्मीनान से बैठ गया । अन्य तीन यात्रियों में से - १०

कोई नहीं पहुंचा था। वे लोग भी मेरे ही सहयात्री थे। बाहर दरवार
पर तमाम यात्रियों के नामों की विट झूल रही थी। मैंने उसपर में
नजर डालने की ज़रूरत नहीं महमूस की।
मैंने रात का खाना-पीना निवदाकर ही ट्रेन पकड़ी थी। मेरा इस
या, ट्रेन पर सवार होते ही मैं लम्वी तान लूंगा। रात को सोलार
सुबह ही प्रांख खोलूगा।
कलकत्ता महानगर में रहते हुए मेरी नीद मे संकड़ो पास
हैं। रात में भी मोने में काफी देर हो जाती है और सबेरे भी मुहर
उटना पड़ता है। अतिशय काम की वजह से बिल्कुल सुहहर
जाता है । प्रतिस्पर्धा के इस जमाने में यह कम्बस्त नीद मोहन
महज उपद्रव-भर है। अगर नीद की जरूरत न होती तो गर
निपट जाता।
दर्तमान युग ने हमारे लिए जैसे विलास-व्यसन के
हैं वैसे ही हमारी जिन्दगी भी हमे निचोडकर, एक्का
पर मामादा रहती है । जब तक वह हमारे टुकडे-दुर्ग'
हमारा पीछा नहीं छोड़ेगी।
कुछ देर में वाकी तीनों मुसाफिर भी
चेहरे । अलग-अलग पहनावे । सब अपनी
कर इत्मीनान मे बैठ गए। किसीको किसी
पडी। लेकिन उनमे से एक व्यक्ति ने -
मेरी और देखते हुए कहा, "प्रापसे एक
"कहिए!'
मेरा स्याल था शायद ये सज्जन
ऊपरवाले फर्श पर जाने का प्राम्ह करने।
को सचमुच कोई कमी नहीं है। कि
मनुभव हो चुका था।
लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं दु ।
थे। उन्होंने कहा, "मैं जरा हाइलि.
भी चलेंगे?"
"

"जी नहीं। मैंने घर पर ही डिनर ले लिया था.." उनकी सवालिया निगाह अन्य यात्रियों की तरफ मुड़ गई । उन्होंने उनसे भी वही सवाल किया। लेकिन कोई भी डाइनिंग कार की तरफ जाने को राजी नहीं हुआ। आखिर हारकर मेरी तरफ दुवारा मुड़कर पूछा, "मैं ज़रा डाइनिंग कार तक जा रहा हूं। अगले स्टॉपेज पर लोट आऊंगा । मेहरबानी करके क्या आप दरवाजा खोल देंगे?" मैं पल-भर को दुविधा में पड़ गया। पूछा, "आपको क्या वहुत देर लगेगी ?" "कुछ कह नहीं सकता। हो सकता है, थोड़ी-सी देर हो जाए ।" "मैं आखिर कर भी क्या सकता था? मैंने सोचा था, ट्रेन में सवार होते ही लम्बी तानकर सोऊंगा, लेकिन अब यह नामुमकिन दीखता था। मैंने एक वार डिब्बे के अन्य यात्रियों की तरफ निगाह डाली। वे लोग निर्विकार थे। सभी लोग एक-दूसरे से अपरिचित थे। ऐसी स्थिति में किसीको भी शराफत निभाने की गरज नहीं थी। लेकिन साधारण शराफत भी तो कोई चीज होती है ? आजकल कोई उतना-सा भी नहीं निभाता । शायद इसीलिए चारों तरफ इतनी अशान्ति मची हुई है। लेकिन मैं जिस युग की चर्चा कर रहा हूं, उन दिनों हम लोग इतने अमानुप नहीं हुए थे। उन दिनों चरित्र-वल नामक वस्तु का घोड़ा-बहुत नामोनिशान वत्र रहा था। "कोई बात नहीं। आप हो आइए । मैं जागता रहूंगा। वे महोदय मुझे धन्यवाद देकर डिब्बे से नीचे उतर गए । मैंने सि हाने की वत्ती जला ली और अपने सामने एक किताव खोल ली। अब तक कम्पार्टमेन्ट के अन्य दोनों यात्री सर्राटे भरने लगे उनकी तरफ गहरी निस्तब्धता छा गई । नींद तो मुझे भी पा रही पलकें वोझिल हो पाई थी। काश, में भी निश्चिन्त होकर सो पार लेकिन कोई उपाय नहीं था। वे महाराय अगर लौटकर घडाम दरवाजा पीटते रहे और हम सब गहरी नींद में सो गए ते वत होगी। मुमकिन है, ट्रेन भी छूट जाए। अत: न चाहते हुए भी हुमा था। मैंने कहा, १२ काफी देर हो गई। अभी तक उनका कोई अता-पता नहीं था। मैंने अन्दाज लगाया, रात काफी जा चुकी है। घड़ी पर नजर डाली । रात के साढे दस बज रहे थे। लेकिन इतनी देर तक तो डाइनिग रूम भी खुला नहीं रहता । तब खैर, काफी देर बाद वे लोट पाए । दरवाजे पर हल्की-सी ठुक-छुक होते ही मैंने उठकर दरवाजा खोल दिया । उन्होंने मुझे दुवारा धन्यवाद दिया और अपनी सीट पर जाकर लेट रहे। उन्होंने कोई बातचीत नहीं की । उस ममय वे बातें करने लायक स्थिति में भी नहीं थे। मुझे लगा, उनके मुंह से तेज ह्विस्की की गन्ध पा रही है । मैं सोच में पड़ गया। डाइनिंग कार में तो शराब की बिक्री निपिद्ध हो चुकी है। फिर उनके लिए शराब किसने जुटाई ? इसके अलावा, अगर ये महापय, हमारे डिब्बे में ही शराब चढ़ाने बैठ जाते तो इसमे हम लोगों को क्या आपत्ति हो सकती थी? वर, उनकी मर्जी ! कहावत है न-जो खाए चीनी, जुटाए चिन्ता- मणि । अतः इममें इतना परेशान होने की क्या बात है? मैंने भी बत्ती बुझाकर करवट बदली मोर गहरी नीद मे खो गया। ट्रेन बेहद तेज गति से अपने गन्तव्य की मोर दौड़ती चली जा रही थी। । दुनिया में बहुत-से ऐसे लोग हैं जो सुद अपने को ही नहीं पहचानते । यह भी ध्र व सत्य है कि जो लोग खुद अपने को ही नहीं पहचानते, उनके लिए दूसरो को पहचानना नामुमकिन है । तापस भी शायद उन्हीं लोगों में से था। वह भी अपने को कभी नही पहचान पाया। हम लोगों ने सोचा था, वह चाहे जहां भी चला जाए, प्रादमी की पहचान कर पाना, उसके वश के बाहर की बात है। लेकिन तापस को दोबारा देखकर मुझे पहली बार महमास हुपा कि हम सब कितना गलत सोचते थे।

कई दिनों बाद तापस ने ही बात छेड़ी थी, अगर मैं घरम कला होता तो शायद यह सब सम्भव नहीं था। न मैं अपने को पहचान ना, न पोरों को।" मैं उसकी बात सुनकर अवाक् रह गया । शायद कुछ लोग चिड़िया- बुनमुन की तरह होते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने स्वयं तो कभी घर-गृहस्थी नहीं बसाई लेकिन दुनिया के सम्बन्ध में जितनी जानकारी उन्हें थी, क्या किसी घोर संसारी व्यक्ति के लिए सम्भव थी? चिड़िया का बच्चा जब अंडे के भीतर रहता है, तव उसे चेतना तो रहती है, लेकिन वह अपने को पहचान नहीं पाता । अपनी सही पहचान रमे तब होती है, जब वह अंडे का छिलका फोड़कर बाहर निकलता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस बहुत कम उम्र में अंडा फोड़कर बाहर निकल श्राए थे । दुनिया में ऐसे लोग ज्यादा होते हैं, जिन्हें अपने इर्द-गिर्द का प्रावरण तोड़ने में ही सारी उम्र बीत जाती है। लोग जो स्कूल-कालेज- विश्वविद्यालयों में पढ़ते लिखते हैं-वह इसी यावरण को तोड़ने के लिए। लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि विश्वविद्यालय की सीमा-रेवा लांघकर घर-परिवार, पुत्र-कलय से भरे-पूरे जीवन में वह फटा हुआ प्रावरण जैसे फिर से जुड़ जाता है । ऐसी स्थिति में मनुष्य अपने-सापको तो भूल ही जाता है, दूसरों के बारे में भी उसकी पहचान धुंधला जाती है। प्रामतौर पर हम सभी लोगों के जीवन की यही ट्रेजेडी है । हम जैसे मामूली लोग अक्सर इसी ट्रेजेडी के साथ जन्म लेते हैं, और इसी ट्रेजडी को झेलते हुए दम तोड़ देते हैं । लेकिन मैंने एकमात्र तापस को ही इसका अपवाद देखा। कहना चाहिए कि वह अपने ढंग का पहला अपवाद था। सुबह जब नींद खुली तो देखा, कम्पार्टमेंट के बाकी यात्री बहुत पहले ही जाग चुके हैं । सिर्फ एक महानुभाव उस वक्त भी गहरी नींद में खोए हुए थे। मेरा इशारा उन्हीं महानुभाव की पोर है जो पिछली रात टाइनिंग-कार की तरफ गए थे। वे अभी तक सो रहे थे। ट्रेन यथारीति अपनी गति से आगे बढ़ती रही। बीच में जहां-ज १४ रखना निर्धारित था, रुक भी रही थी। हम लोग अपनी-अपनी रचि के अनुमार मुबह का नाश्ता निवटाकर निश्चिन्त हो चुके थे। उसके बाद हम लोगों के लिए कोई काम यापी= नहीं था। वैसे भी, मादमी को ट्रेन मे माखिर काम भी क्या रहता है ? चस, चुपचाप कोई किताब पढना या टुकुर-टुकुर खिड़की से बाहर तारना। काफी देर बाद उन महाशय की नीट टूटो और वे अपनी बर्थ से नीचे उतर पाए । नचि उतरते ही वे दाढी बनाने का सामान और तौलिया वगैरह लेकर सीधे बाथरूम में जा घुसे । बाथरूम से भी पोड़ी देर बाद ययारीति बाहर निकल पाए । जब वे बाथरूम से बाहर निकले तो एकदम स्मार्ट साहब बन चुके थे । वह मेरी बगल में पाकर बैठ गए। मैंने अखबार तहाकर एक किनारे रख दिया। उन्होने अखबार की तरफ देखते हुए मुझमे पूछा, "मैं प्रापका यह प्रखबार देख सकता हूं?" मैंने सिर हिलाकर सहमति जता दी। उन्होंने सरमरी निगाह से अखबार के सारे पन्ने उलट-पलट डाले और मुझे अखबार वापस करते हुए कहा, "कुच्छ खबर नहीं है." उसके बाद, जैसे कुछ करने को न हो, ऐसी हताश मगिमा में वे चुपचाप बैठे रहे और ट्रेन के झोकों के साथ झूलने लगे । हम सब बाकी तीनों यात्री अभी तक एक-दूसरे से अपरिचित थे। किसीकी भापस में जान-पहचान नहीं हुई थी। हालाकि कई घंटों से हम लोग एक ही कम्पार्ट- मेंट में सफर कर रहे थे और हमने एक ही जगह रात विताई यो, फिर भी किमीने किसी से कोई सास बातचीत नहीं की। वाकई यह बेहद अजीब स्थिति थी। वैसे, कमोवेश सभी लोगों को, कभी न कभी ऐसी स्थिति का सामना करना पडा होगा । खासकर वे लोग, जो ट्रेन से अक्सर सफर करते हैं। हां, प्लेन में उतनी अमुविधा नहीं होती; क्योंकि वहां तो पड़ने के लिए विभिन्न भाषाओं की अनेकानेक पत्र-पत्रिकामो, फिल्मी किताबों का इन्त. जाम रहता है।

मेरी बगलवाले सज्जन से जसे अब चुप नहीं रहा गया। उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए अचानक सवाल किया, "आप कहां तक जाएंगे ?" मैं समझ गया। इतनी देर से तुप वैठे-बैठे वे शायद ऊब ही उठे थे। मैंने जवाब दिया, "वम्बई।" मैं फिर चुप ही रहा । वैसे उचित यह था कि पलटकर मैं भी उनसे उनको गन्तव्य के बारे में सवाल करता; लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने ही वातों का सिलसिला कायम रखने की गरज से कहा, "मैं भी..." वस, यहीं तक ! लेकिन उन्होंने तब भी पीछा नहीं छोड़ा। पूछा, "आप क्या कलकत्ते में ही रहते हैं ?" "जी हां! उन्होंने दुवारा सवाल किया, "कलकत्ते शहर में या सबर्ब (बाहरी हिस्सा) में ?" यानी ये जनाब यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि मैं अमीर लक्ष्मीपति हूं या गरीव ! अव ये सव इशारे हर कोई समझने लगा है। मैंने नादान बनते हुए अपना पता-ठिकाना बता दिया । मेरा उत्तर सुनते ही वे उछल पड़े । मानो मुझे पहचान लिया हो। मैंने पूछा, "तुम तापस हो न?" "यानी, तूने मुझे पहचान लिया ?" "तेरी तो बिल्कुल कायापलट हो गई है ! पहले तो मैं तुझे पहचान ही नहीं पाया । इतने दिनों तक तू कहां था ? हम लोग तुझे खोजते- खोजते हैरान थे।" मेरी निगाहें अपलक भाव से उसका चेहरा टटोलती रहीं। हां, वह तापस ही था हम लोगों के साथ पढ़नेवाला, लेकिन प्रतियोगिता में हर वार मात खाकर हर पल सिर झुकाकर चलनेवाला। उसमें इतना रद्दोबदल आखिर कैसे सम्भव हो पाया ? तापस का तौर-तरीका, कपड़ा-लत्ता, चाल-चलन--सब-कुछ जाने कैसा बदला-बदला-सा लग रहा था। !

उमका सूटकेम, होल्डाल, विस्तर-तकिया, सिगरेट पीने का ढंग, ये की लटें-सबकुछ कितना बदल गया या ! मेरी निगाहों में माता सवाल सायद उसने पढ़ लिया मा 1 पूण, ऐसे क्या देख रहा है ?" "तुझे..." "हां-हां, देख ले । मुझे अच्छी तरह देख ले ! जी भरकर देख..." "हां यार, वही तो देख रहा हूं..." "लेकिन तू चाहे मुझे हद्धार बार देख ले, मेरे बारे में तुझे कुछ भी ता नहीं चल पाएगा । सिर्फ प्रादमी के बाहरी रूप से, भीतर का हाल जानना मुश्किल है । बचपन में तुम लोगों ने मेरा सिर्फ बाहरी रूप ही पा था, इसीलिए तुम लोगों ने मुझे निरा बेवकूफ मान लिया। तुम गोगों का ख्याल था कि जैसे में कुछ समझना ही नहीं। लेकिन दरमस्ल ही तुम लोगों को हमेशा बेवकूफ बनाता रहा ! मैं सोचा करता था, (म लोग कितने जड-मूर्स हो मेरा असली रूप नही पहचान पाए।" मैंने प्रवाक् होकर पूछा, "मच्छा ! ऐसी बात थी ? तू भी हम लोगो को बेवकूफ समझता था ?" "हां । और नहीं तो क्या | मैं तुमलोगो को जान सपाकर पड़ते. लखते, परीक्षा के दिनों में रात-रात भर रटते हुए देखता था। तुमलोग गोचते थे कि मिर्फ मन लगाकर पढ़ने-लिखने भर से ही शायद जीवन बड़ा हुमा जा सकता है या प्रात:स्मरणीय हुमा जा सकता है, लेकिन ऐसे हजारों लोगों को देख चुका था, जिन्होंने एक प्रक्षर भी लिसाई- ढ़ाई नहीं की थी। वे लोग लासो-लाखो रुपये कमा रहे थे और पाव र पाव जमाए हुए बड़े माराम से दिन बिता रहे थे। मनगिनत लोग इसरो के सिर नारियल तोड़कर महापुरुष यन बैठे थे और समाज के सरमौर बने हुए गद्दी संभाल रहे थे। तुम लोग जय लम्बी-चौड़ी बातें कया करते थे, मेरी निगाह बरबस हो उनपर जा टिकती भी। मैं होचता या, तुम लोग कितने बोडम हो ! उन लोगो की तरफ तुम लोगों की निगाह कभी गई ही नही । तुम लोग महज किताबों में लिखे हए, कोरे-नीरस प्रादर्शो को कंठस्थ करके समझते थे कि वही एकमात्र - सली सच है ! हालांकि मैं तुम लोगों की बातों का कोई जवाब ता था, लेकिन मन ही मन में इस फैसले पर पहुंच गया था कि तुम लोग जो कुछ कर रहे हो, सब झूठ और बोगस है !" मैं विस्मय-विमुग्ध भाव से उसकी बातें सुनता रहा। मेरे ज्ञान- चक्षु जैसे खुलते जा रहे थे। मैं सोच रहा था, तापस यह सब क्या कह रहा है ? जो कुछ तापस कहता गया, "इसीलिए एक दिन मैं घर से निकल पड़ा। तुम लोगों से बिना कुछ कहे-सुने एक रात में खाली हाथ ही अनिर्दिष्ट राह का राही बन गया । वैसे मैं यह जानता था कि तुम लोगों की तरह घर बैठे-बैठे, सुयोग्य पुत्र की तरह मां-बाप की आज्ञा मानकर चलते हुए, मैं भूखों नहीं मरूंगा। लेकिन दुनिया में क्या सिर्फ अपने को भूखों मरने से बचाए रखना ही सब कुछ है ? उससे भी बड़ी चीज़ की तरफ हमारी नज़र क्यों नहीं जाती ?" "उसके वाद ?" "उसके बाद, मैं हूं, वह तो तू देख ही रहा है।" "नहीं, मुझे और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। मैं तो सिर्फ इतना भर देख रहा हूं कि तू बाहर से विल्कुल बदल गया है।" तापस मेरी वात के उत्तर में एकवारगी चुप ही रहा । अचानक वह एक काण्ड कर बैठा । सीट के नीचे तापस का एक ट्रंक और एक सूटकेस पड़ा था। उसने सूटकेस खिसकाकर ट्रंक को खींचकर बाहर निकाला और ट्रंक का ताला खोलकर बाकी दोनों यात्रियों की तरफ पीठ करके ढक्कन उठाया। ट्रंक का ढक्कन उठाते ही मैं चौंक पड़ा। भीतर ठठ की ठठ नो की गड्डियां ! अगल-बगल, बीच में, ऊपर-नीचे, सब तरफ नोटों सजी-सजाई गड्डियां ! मैंने एक साथ इतने सारे नोट कभी नहीं थे। मुझे लगा, जैसे नोटों का पहाड़ लग गया है। वहां पांच-दस ह की गड्डियां नहीं, सब सौ और हजार के नोटों की गडि ची! मुझे अपनी ओर ताकते हुए देखकर तापस ने पूछा, "देखा ! - - तापम ने फौरन ट्रंक का ढक्कन गिरा दिया। उसमें ताला लगाकर और सीट के नीचे धकेलकर, वह इत्मीनान से अपनी सीट पर पा पठा। उसने एक नई सिगरेट जला ली और धुमां उगलते हुए पूछा, "देख लिया न! अव तो तू समझ गया न कि मैं क्या बन गया हूं?" "यह मव क्या तेरे अपने रुपये हैं ?" "हा, अपने नहीं तो क्या गैरो के हैं !" "इतना सारा स्पया! तेरे पास कैसे प्राया?" तापस ने धोमी प्राधाज में कहा, "यह सब तो ब्लक के रुपये है। वैसे नौकरी करके भी इतने रुपये कमाये जा सकते हैं ! लेकिन जो मैं करता हूं. उसमें सिर्फ इतने रुपये ही नहीं बनते। तू मेरे बचपन का यार ठहरा, इसीलिए तुझे सब बता दिया । अभी तो और भी रपये पाएंगे । लगता है. इसका कही अन्त नहीं है, रे !" मैंने दुवारा पूछा, "लेकिन इत्ते सारे रुपये पाए वहां से, रे?" "बताऊंगा । सब बताऊंगा। लेकिन पहले नू वता कि कहीं जा रहा- है ? किसी काम से जा रहा है ?" मैंने अपना सारा हाल कह सुनाया। तापस मेरी वात गौर से सुनता रहा । अन्त में उसने अपनी राय जाहिर की, "तुम लोगो ने जो इतनी पढ़ाई-लिखाई की, उसका अन्त में बस यही फल निकला? लेकिन मुझे देख ! तुझमे तो मेरा कुछ भी छुपा नहीं है । और लोगों के भागे मैं चाहे जितनी डोगें हो, लेकिन तेरे सामने झूठ नहीं बोलूगा। दरअसल, मादमी जो कुछ भी करता है वह महज रुपया कमाने के लिए ही करता है ! जो इन्जीनियरिंग पत्ता है उसकी यही कोशिश रहती है कि इम्तिहान पास करके उसे मोटी तनखाहवाली नौकरी मिल जाए । जो डाक्टरी पड़ रहा है, वह भी ऐस' ही कुछ मोचता है । जो राजनीति करता है, वह सोचता है कि कैसे वह जनता का सेवक वनकर इलेक्शन में खड़ा हो यार वोटो के दम पर ढेर ढेर रुपयों का मालिक बने । असल में स्कूल-कालेज को कितावों में चाहे जो लिखा हो, लेकिन उनका प्रमनी उद्देश्य रपया ही है। इसलिए, मेरे A दोस्त, अगर रुपया ही असली चीज़ है, तो मैं भी तो आखिर रुपया ही कमा रहा हूं और, सिर्फ तुम लोगों की ही बात नहीं, हिन्दुस्तान में बहुतों से बढ़-चढ़कर रोजगार कर रहा हूं।" अब मुझसे चुप नहीं रहा गया। मैंने पूछा, "सो कैसे ?" "अरे भाई, मैं वही बात तो तुझे बताने जा रहा हूं। पहले यह वता, तू वम्बई जाकर किस होटल में ठहरेगा? होटल में ठहरेगा या किसीके . घर पर?" "होटल में ! मैं वरावर होटल में ही ठहरता हूं। आफिस खर्चा देता ही है।" "लेकिन इस बार तू होटल में क्यों ठहरेगा? मेरे पास अपना फ्लैट है। सिर्फ वम्बई ही नहीं, हिन्दुस्तान के हर शहर में मेरा निजी फ्लैट है। मद्रास, महाबलीपुरम्, गोवा, यू० पी०, मध्यप्रदेश, श्रीरंगम्, बैंगलोर, केरल, कोचीन वगैरह के तमाम शहरों में ! यहां तक कि माउण्ट-आबू और उससे भी आगे द्वारका तक !" "क्यों ? इतने सारे शहरों में तूने फ्लैट क्यों ले रखे हैं ?" "विज़नेस ! व्यवसाय !! कारोवार !!! कारोवार के सिलसिले में मुझे हिन्दुस्तान के प्रायः सभी स्टेटों में घूमना पड़ता है न! अगर हर जगह मैं होटल में ठहरूं तो अनगिनत पालतू-फालतू लोगों से मुलाकात होने की सम्भावना है ! इसीलिए हर जगह मैंने पक्का वन्दोवस्त कर रखा है।" "ये सब तेरे खरीदे हुए पलट हैं ?" "हां । कहीं-कहीं किराए के फ्लैट भी हैं ! उनके किराए के लिए महीने-महीने हजारों-हजारों रुपये गिनने पड़ते हैं ! जवकि साल-भर में शायद एक वार भी उन फ्लैटों में ठहरने की नौबत नहीं आती। आम- तौर से मैं प्लेन में ही सफर करता हूं। इसमें वक्त की भी बचत है और मेहनत भी कम लगती है । मुमकिन है, अव तू यह जानना चाहे कि मेरे लिए वक्त अगर इतना ही कीमती है, तो आज मैं ट्रेन के फर्स्ट क्लास में क्यों सफर कर रहा हूं ? ट्रेन में सफर करने की वजह तो मैं तुझे दिखा ही चुका हूं। इसी ट्रंक की वजह से ! इतने रुपये लेकर प्लेन में २० फिर करने में खतरा या ! मैं जिस धन्ये में हूं, उसमें मुसीवत प्रा सकती है।" उसकी बातें सुनते हुए मेरा कौतूहल क्रमश बढ़ता गया। तापस प्रासिर ऐसा कौन-सा धन्धा करता है ? धन्धा तो, पैर, वहुत-से लोग करते हैं । नेकिन उन्हें तो हिन्दुस्तान के ममूचे शहरो में यू फ्लैट रखने की जरूरत ही पड़ती । कहां दम्बई, यहा महाबलीपुरम्, कहां श्रीरंगम् और कहा राउण्ट-पावू ! यहां तक कि हिन्दुस्तान को बिल्कुल अाखिरी मरहद पर मोखापोर्ट द्वारका तक तापस की गतिविधियां फैली हुई हैं ! "तू माउण्ट-आबू क्या करने जाता है ?" "वही-विजनेस । सरे यार, कारोबार की देखरेख करने के मतावा झे और कोई काम नहीं है। इसी कारोबार के सिलसिले में मुझे धरती, नाकाश-पाताल तक का चक्कर लगाना पड़ता है।..." उमने थोड़ा ठहरकर अपनी वात फिर शुरू की, “सो इस बार मैं झे होटल में नहीं ठहरने दूगा । तुझे मेरे पलट में ही ठहरना होगा। i तुझं छोडनेवाला नहीं हूं..." इराके बाद वह हमारे तनाम यार-दोस्तो के बारे में पूछताछ करना रहा। कौन किस स्थिति में है, क्या कर रहा है, वगैरह-वगैरह । हालांकि हाल-चाल सुनकर उसके मन में किसी तरह का उत्साह नहीं गा। उसके चेहरे के हाव-भाव से यह साफ जाहिर था कि हर कोई उसके गगे हार गया । उमे कोई नहीं हरा पाया । दोस्तों का हाल सुनकर उसने फिर अपनी बात दोहराई, "मय देत r! उन दिनों तुम सब मुझे देखकर हंसते थे । तुग तोग सोचते थे, रा कुछ नहीं होगा। क्यों, यही सोचते थे न ?" मैंने स्वीकार किया कि हमारा सोचना गलत था। "नहीं, दरहास्त इगमे सिर्फ तुम लोगों की ही गलती नहीं थी । सारी निया ही गलत थी। दुनिया में गायद किसीने भी यह नहीं सोचा था कमान के जमाने में सारे प्रादर्श यूं बदल जाएंगे। ये भगवान-दगवान ।

. गैरह शब्द किसी दिन इतने खोखले सावित होंगे, इसकी किसीने कल्पना भी नहीं की थी। सच पूछो तो, इस भूल को सबसे पहले मैंने ही पकड़ा था।" मैंने पूछा, "तूने ! सो कैसे ?" "मुझे इस गलती के बारे में तब पता चला, जब मैं घर की चहार- दीवारी से बाहर निकल आया। सच, अगर मैं घर से बाहर न निकला होता, तो मुझे भी इस भूल का पता नहीं चलता।" मैंने दरियाफ्त किया, "घर से निकलकर तू कहां गया था ?" "लखनऊ। लेकिन ये सब बातें यहां बैठकर नहीं की जा सकतीं।" उसने बाकी दोनों यात्रियों की तरफ इशारा करके कहा, "शुक्र है, वे लोग बंगला नहीं समझते। इसीलिए तुझसे वतियाता रहा। इन लोगों को हमारी बातों का एक अक्षर भी समझ नहीं पाया होगा। अच्छा, अव बम्बई पहुंचकर, आराम से अपने फ्लैट में बैठकर तुझसे वातें होंगी।" इतना कहकर तापस ने एक और सिगरेट सुलगा ली। लम्बा सफर ! ट्रेन बीच-बीच में किसी स्टेशन पर ठहर जाती थी, फिर दुबारा चल पड़ती थी। वहुत दिनों बाद हम दोनों दोस्त मिले थे, सो पिछली बातों में ही सारा वक्त कट गया। इतनी लम्बी यात्रा, और पूरी रात और दिन के बाद फिर एक समूची रात ! अगले दिन दोपहर को अपना गन्तव्य पानेवाला था। दरअसल इस कहानी का जो हिस्सा मैंने बयान किया, वह न तो इस घटना की शुरुग्रात है, न अन्त । यह न अन्त । यह तो महज़ बीच का थोड़ा-सा अंश-भर है ! यूं इसे अंश कहना भी ठीक नहीं-यह तो भग्नांश है । तापस पर कोई कहानी लिखना इसलिए भी मुश्किल है, क्यों उससे मेरा चरित्रगत विरोध है। तापस को समझने के लिए, उसके जीवन-दर्शन को महसूस करने लिए, अपने को भी तापस की ही मनःस्थिति तक उठाना जरूरी है। उस स्थिति को 'उठाने' के बजाय 'गिराना' कहा जाए, तो भी कोई अपराध नहीं होगा, क्योंकि भले-बुरे का मानदण्ड इतनी जल्दी और इतनी बार बदल जाता है कि किसी बात पर भरोसा नहीं है . २२ अपने को ही लगता है, मैं जिसे भला मानकर, उमपर विश्वास करता हूं, उसके सचमुच भले होने का मेरे पास क्या प्रमाण है ! जिने मैं बुरा समझता था, आज वही समाज को वाहवाही लूट रहा है । सबका सिरमौर बना हुआ है। इसलिए मैं इस फैसले पर पहुंचा हूं कि हम भले-बुरे का विचार तभी करने बैठते हैं जब हमारे पास उसे साबित करने का कोई ठोस तर्क नहीं होता । इसके अलावा इस दुनिया में क्या सचमुच ऐमा कोई विचा- रक है, जो सही-सही विचार करता हो? मुझे ऐमा विचारक कही नहीं । दिखा। खर, भले-बुरे का विचार करना समाजशास्त्रियों के जिम्मे है। मैं तो रसिकों के लिए कहानी लिखता हूं। अतः मेरे लिए पाठक हो भसनी विचारक हैं । अगर यह कहानी उन्हें पसन्द या जाए, तो मेरी सारी मेहनत और रात-रात भर जागना सचमुच सार्थक हो जाए। सुना है, तापस की जिन्दगी लखनऊ से ही शुरू हुई थी। कलकत्ते से बिना टिकट सफर करते हुए तापस जब लखनऊ स्टेशन पर उतरा, उस वक्त भूख के मारे उसके पेट में चूहे कूद रहे थे । न उसकी जेब में फूटी कौड़ी थी, न दारीर में दम । तापस अपनी कहानी सुनाने लगा : उस दिन अगर मैं सड़क के किनारे दम तोड़ देता तो शायद तमाम झमेलों से छुट्टी मिल जाती । लेकिन विधि का विधान तो कुछ और था। दरमसल हमारा जन्मदाता वैहद परिहास-रमिक देवता है। उसे इन्सान से परिहास करने में बडा मजा माता है । हैरत की बात यह थी कि उसे दिल्लगी करने की सूझी और वह मुझ जैसे गरीब से मजाक कर बैठा । जब मैं रास्ते पर सड़ा-खड़ा इम सोच में पड़ा था कि प्रव किघर जाऊं, क्या करूं, क्या साऊं-उस समय सूरज देवता मेरे सिर पर एक सौ वीस डिग्री तापमान बरसा रहे थे, जिसे कहते हैं लू । रास्ते में इक्के- दुक्के लोग। उस समय सिर्फ एक ही चिन्ता थी कि इम ववत मैं किसे पकड़, कौन मुझे प्राश्रय देगा ! इन्मान जव मुसीबत में होता है, तो उसे भले-बुरे का ज्ञान नहीं ना, यह मैंने कितावों में पढ़ा था। सच पूछो तो एकमात्र गरीव दमी ही स्वभाव से मस्तमौला होता है। उसके पास सहेजने या खोने । कुछ भी नहीं है। उन दिनों मेरी भी यही स्थिति थी। अगर कहीं आने को मिल जाता था तो वाह-वाह, वर्ना भूखों मरने में भी कोई नुकसान नहीं था। वैसे मुझे यह मौका भी नहीं मिला था कि अपने नुकसान के लिए किसीसे शिकायत कर सकू। अचानक एक हादसा हुआ । मेरे सामने से ही एक महिला गुजरी, जो शायद अपनी गाड़ी पर घर लौट रही थी। उसकी गाड़ी विल्कुल मेरे सामने पाकर रुक गई। ड्राइवर गाड़ी रोककर नीचे उतरा और मेरे हाथ पर चार पैसे रखकर वापस जाने लगा। मैंने गाड़ी में बैठी हुई महिला की तरफ एक नज़र देखा। गोरा- चिट्टा रंग ! पके हुए वाल ! बुढ़ापे की वजह से चेहरे पर झुर्रियां ! मेरी तरफ पैसे फेंककर ड्राइवर दुवारा अपनी सीट पर जा बैठा और गाड़ी स्टार्ट करके आगे बढ़ा । चार पैसों की भीख पाकर मेरे आत्मसम्मान को जैसे चोट लगी। सिर्फ चार पैसे ! जो आदमी गाड़ी चढ़कर घूमता है, उससे सिर्फ चार पसे का दान पाकर मेरे आत्मबोध को जैसे गहरा धक्का लगा। मैंने झटपट आगे बढ़कर वे पैसे गाड़ी के अन्दर उछाल दिए । दुवारा अपनी जगह पर आ खड़ा हुआ। मेरा ख्याल था, गाड़ी स्टार्ट हो चुकी है, अतः आगे बढ़ जाएगी। लेकिन नहीं, गाड़ी दुवारा रुक गई । इस बार वह महिला स्वयं गाड़ी से उतरकर मेरे करीब पाई। पूछा, "क्यों बेटा, गुस्सा हो गए क्या ?" मैं चकित रह गया ! जाने कहां का मैं ! मेरी खुशी या नाराज़र्ग से इन्हें क्या फर्क पड़ता है ? गरीबों के राग-विराग से आखिर मोटर विहारियों का क्या प्राता-जाता है ? महिला ने दुबारा कहा, "देखो, पइसा लछमी होत है । लछमी कहीं अइसे फेंका जात है ? लछमी गुस्सा हुइ जइहैं।" मैंने कहा, "भला इन चार पैसों से मेरा क्या बनेगा? अापके २४ ढेर-ढेर रूपये हैं, सो मापने चार पैसे फेंक दिए । प्रापको देते हुए संकोच नही हुआ, लेकिन में ठहरा गरीव प्रादमी। मुझे लेते हुए शर्म प्रात है। अब मैं चाहे भूखो मर जाऊं, लेकिन प्रापके इन पंसो को हरगिल हाथ नहीं लगाऊंगा।" महिला मेरी बात सुनकर माश्चयं में पड़ गई। मानो ऐसी बात जीवन में कभी नहीं सुनी । कहा, "अच्छा, हम एक ठो सइया दें तो लं लोगे?" जाने मुझे क्या हो गया था! मैंने झटके से कहा, "नही ।" महिला का प्राश्चर्य और बढ़ गया । पूछा, "एक रुपझ्या देइबो तब भी नहीं लेइहो ?" मैंने कहा, "मैं परमो से भूखा मर रहा हूं। एक रुपये से मेरा क्या बनेगा ?" महिला ने अपनी जिन्दगी में शायद ऐमा भिखारी नहीं देखा था। 'पूछा, "तोहार पर कहां है ?" "बंगला देश । कलकत्ते में..." महिला ने दुवारा पूण, "इहां का करने पाए हो? इहां तुम्हार कउन-काउन है ?" मैंने कहा, "कोई नहीं ! मैं यहां काम को ततारा में पाया हूं।" महिला ने दरियाप्त किया, "लेकिन, तुम फाउन काम जानत हो ?" मैंने जवाब दिया, "कोई भी काम मिले, में कर लूंगा । साने पहनने 'भोर रहने के बदले में राज्य काम करूंगा।" महिला ने पल-भर को मोषकर पूछा, "मच्छा, तुम मेरी कोठी में काम करोगे?" "साना मिले तो जरूर काम करूंगा।" "ठीक है, चलो, मेरे साय।" मने कोई यापत्ति नहीं की ! मैं उनके साथ गाड़ी में बैठ गया । तापस अपनी कहानी सुनाता रहा- १५ । वन्धु, मेरी बात अरव के किस्से-कहानियों की तरह अजीबोगरीव लग रही होगी ! लेकिन ज़िन्दगी में कव क्या घटनेवाला है, यह वात शायद विधातापुरुप भी नहीं जानता। मेरी तरह जाने कितने लोग अपने- अपने घरों से भाग खड़े होते हैं। उन्हें भी दर-दर हाथ फैलाना पड़ता । उसके बाद एक दिन उसी रास्ते पर उनकी थकी-हारी लाश मिलती है । उसके बाद म्युनिसिपैलिटी की मुर्दा-गाड़ी पाती है, उन्हें लादकर ले जाती है और फूंक-तापकर उनका नामोनिशान तक मिटा दिया जाता है ! लेकिन मेरे ही साथ ऐसा क्यूं हुआ ? मैं ही अपनी जन्मकुंडली में कौन-सा गुरु-वृहस्पति लेकर पैदा हुआ था ? खैर, मैं जिस कोठी में पहुंचा वह राजप्रासाद से भी बढ़-चढ़कर थी। उस बुढ़िया के कई लड़के थे। सभी की काफी उम्र हो चुकी थी। मां का लाया हुआ आदमी-उसे भला कोई कुछ कह सकता था ! लड़के मां की आज्ञा को गुरु-प्राजा मानते थे। इसके अलावा कोठी में इतने सारे नौकर-चाकर थे कि उनमें एक और व्यक्ति के बढ़ने-घटने को लेकर कोई भला क्यों सिर-दर्द मोल लेने जाएगा! जैसे वे लोग काम करते थे, मैं भी उसी तरह काम करने के लिए लाया गया था। लेकिन एक दिन, दो दिन, तीन दिन गुज़र गए । मुझपर किसी तरह का कोई काम नहीं सौंपा गया । न किसीने कोई काम ही सौंपा, न निकम्मे पड़े रहने के लिए डांटा ही। हालांकि ठीक खाने के वक्त मैं हाज़िर हो जाता था और सबसे पहले खाने बैठ जाता था। उनके यहां का खाना शुद्ध शाकाहारी था। कोठी में मछली लाना सख्त वजित था ! खैर, मुझे भी कोई एतराज़ नहीं था। मुफ्त में रहने-खाने का इन्तज़ाम हो जाए तो मुझे और क्या चाहिए था ? एक दिन कोठी के बड़े मालिक ने मेरे ज़िम्मे एक काम सौंपा। वैसे काम भी क्या था ! वाबू लोगों ने शहर से बाहर एक बगीचा खरीदा था। उसे वगीचा नहीं, वगान-बाड़ी कहना ही उचित होगा। वावा-प्रादम के ज़माने के वाग-बगीचों की डिजाइन पर सजा हुआ - २६ बंगला। हालांकि वगला बिल्कुल जर्जर स्थिति में था, लेकिन बगीचे के पेड वगैरह अब भी फल-फूल रहे थे। यहां प्राम के पेड ही अधिक थे। बगीचे की देख-भाल के लिए किमी आदमी की जरूरत थी। कोठी के अन्यान्य नौकर-चाकर दूसरे-दूसरे कामो में लगे हुए थे। एकमात्र मेरे जिम्मे ही कोई काम नहीं था। अतः बड़े बाबू ने मुझे वही भेज दिया। शहर से कई मील दूर ! चारो तरफ गाव पीर कतार-दर-कतार माम के पेड । मुझे वही रहना था । अपने खाने के लिए दाल-भात मैं खुद ही बना लेता था और दिन-रात उस बगीचे की पहरेदारी करता था। तनसा थी तीस रपये ! आजकल तीस रुपये में कुछ नहीं होता, लेकिन उन दिनों यह रकम बहुत होती थी। उन दिनो सस्ती का जमाना था। इसके अलावा गांव होने की वजह से पैसे देकर कोई चीज खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। सिर्फ नमक और सरसों के तेल की खरीदारी के लिए पमों की जरूरत पड़ती थी। चावल-दाल बाबू लोगो के खेत से आ जाता था मौर तर-तरकारी अपने बगीचे में ही काफी हो जाते थे। वहा खेती करने और मिट्टी फोड़ने के लिए अलग प्रादमी थे। वे लोग पेड-पौधो और खेतों की देखभाल करते थे। मैं सिर्फ बंगले की रखवाली करता था। चारों तरफ नीला-नीला माकाश मौर हरे-भरे पेड़ो का समारोह ! वहा कलकत्ता या बम्बई जैसा शहरीपन नहीं मिलता था। पंछियों का कलरव सुनते हुए प्राराम से नीद टूटती थी। मैं उठकर कुएं से पानी सोचकर प्रेम से नहाता था और उसके बाद सुले प्राकारा के नीचे लोट लगाता था। वे तमाम दिन कितनी ऐदा से बीते, तुमसे पया बताऊं, बन्यु ! माजकल मैं लखपति नहीं करोड़पति बन गया हूं। एयर कंडीशंड कमरे में मोता हूँ ! मेरा हुक्म बजा लाने के लिए हर वक्त ददाय मौजूद रहता है। वावर्ची हैं । मैं उनके ही हाथ का पकाया हुमा खाना खाता हूं। मब तो, दोस्त, मैं अपने जूते भी अपने हाथों से नहीं पहनता ! लेकिन फिर भी मुझ जैसा प्रादमी भी यही सोचता है कि इन दिनों के बजाय वे पिछले ।

दिन ही वेहतर थे। हालांकि उन दिनों मुझे सिर्फ तीस रुपल्ली मिलते थे, लेकिन उन दिनों तीस रुपये कमाकर जो सुख मिलता था, आज तीन लाख कमाकर भी उस तरह का सुख नहीं महसूस कर पाता, वन्धु ! इसे मेरे सृष्टिकर्ता का विराट परिहास ही कहना चाहिए। वहीं एक अद्भुत कांड हो गया और उस अद्भुत कांड की वजह से ही आज मैं इतना अमीर बन पाया-इतने-इतने रुपयों का मालिक - अच्छा, चलो, सारा किस्सा तुम्हारे सामने खोलकर ही कहूं- उस लम्बे-चौड़े बगीचे के एक कोने में आम का एक पेड़ था। उसे काट डाला गया था। दो मजूर किस्म के लोग उस जगह को साफ कर रहे थे। मिट्टी खोदकर जब वह पेड़ की जड़ें उखाड़ रहे थे, उनको कुदाल किसी पत्थर से टकरा गई। उसी समय खट् से एक आवाज़ हुई । वे लोग सकते में आ गए। अरे, यहां पत्थर कहां से पाया ? जव मिट्टी खोदकर उसे बाहर निकाला गया तो पता चला कि वह पत्यड़ का टुकड़ा नहीं, पूरी मूर्ति है ! ठाकुर जी की मूर्ति की तरह ! पूरी मूर्ति कीचड़-कांटो और धूल में लिपटी हुई ! लेकिन मजदूरों को यह पहचानने में कोई दिक्कत नहीं हुई कि वह किसी ठाकुर जी की ही मूर्ति है ! ठाकुर जी की उस टूटी-फूटी मूर्ति के प्रति उनकी कोई खास श्रद्धा नहीं उमड़ी। शायद इसीलिए वे लोग उसे एक कोने में फेंककर दुवारा अपने काम में लग गए। जो पेड़ काटा गया था, वह काफी विशाल था। उस पेड़ की कीमत लगभग चार सौ रुपये लगाई गई थी। जिस आदमी ने उस पेड़ का ठेका लिया था, शायद उसे भी उस मिट्टी या पत्थर की मूर्ति में खास दिलचस्पी नहीं थी। कटे हुए पेड़ खरीद-खरीदकर उन्हें लकड़ियों के व्यापारियों के हाथ वेच देना ही उसका मुख्य पेशा था। शाम होते ही वगीचे के सामने एक लारी पाकर रुकी। पेड़ के तनों

को लम्बा-लम्बा काटकर लारी पर लाद दिया गया मोर लोग अपना-
अपना काम खत्म करके वापस लौट गए।
उमी दिन रात को मूसलाधार बारिश हुई। ऐसी भीषण वारिंग,
जिसने दो दिनों तक रकने का नाम ही नहीं लिया ।
बरसात होते ही, बगीचे में माली का काम काफी बढ़ जाता था।
घरमातं की वजह से दो-तीन दिन काम ज़रूर बन्द रहा, लेकिन बारिश
थमते ही सब-के-मय जी-जान से दुवारा काम में जुट गए । बरसात के पहले
मुसी मिट्टी पर एक बार हल चलाकर छोड़ दिया जाता था और परमात
को बाद गोती मिट्टी पर दुबारा हल फेरा जाता था। उसके बाद बुवाई
का काम।
मैं मुबह मे ही उनके काम-काज की चौकमी में लग जाता था।
दोपहर को जब वे लोग अपना काम-काज रोककर प्राराम करते थे, उस
वक्त में भी अपनी झोपड़ी में प्राकर कुछ सा-पी लेता था।
उस दिन शाम को जब मैं मजदूरों के काम का हिसाब-किताब करके
अपनी झोपड़ी की तरफ पा रहा था, काफी अंधेरा हो चुका था।
अचानक मेरी निगाह उन तीन-चार मजदूरी पर पड़ी जो प्रौरे में
उम मूर्ति को उठाकर बाहर की तरफ ले जा रहे थे।
मैंने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया, "इसे कहा ले जा रहे हैं?
उन लोगो से कोई जवाब देते नही बना । वे लोग भारी
तरह एक-दूसरे का मुह निहारने लगे।
मैंने दुवारा पूछा, "तुम लोग किसके हुक्म में इस
रहे ये ?"
वे लोग उस समय भी हकला रहे थे, मानो पर
गए हों।
मैंने उस मूर्ति को अपनी झोपड़ी में रख दें या
लोग मेरी बात टाल नहीं सकते ।कारी दर
नाम पर सिर्फ एक पल्लेदार दरवाजा और न्दन
लोग जिस कोठी में ठहरते थे, मेरी गंगा
थी। यूपूरे साल उस कोठी में बारा पट्टयः

कोठरी और सामने का बरामदा मेरे अख्तियार में था। मैंने मजदूरों को वह मूर्ति अपनी कोठरी में रख पाने का हुक्म दिया। पकड़े जाने की वजह से वे लोग यूं ही सहम गए थे। लेकिन, मुझसे कोई सजा न पाकर, उन्होंने जैसे राहत की सांस ली और विना चूं-चपड़ किए, तेज कदमों से भाग खड़े हुए। मेरे मन में जाने कैसा सन्देह जाग उठा। मेरा ख्याल था, उनके पीछे जरूर किसी दूसरे आदमी का हाथ है। वैसे उसे मूर्ति नहीं, पत्थर का टूटा-फूटा टुकड़ा ही कहना चाहिए । इसमें उनकी क्या दिलचस्पी हो सकती थी? इसे वे लोग क्यों ले जा रहे थे ? कहां ले जा रहे थे ? मैंने मन ही मन तय किया कि बगीचे के मालिक के आते ही मैं उन्हें सारी घटना सुना दूंगा। लेकिन मेरे मालिक कब और किस वक्त आ धमकेंगे, इसका कोई ठीक-ठिकाना नहीं था। कभी तो तीन-तीन महीने विल्कुल पाते ही नहीं थे और कभी महीने में दो-दो वार हाज़िर हो जाते थे। अपने बन्धु- वान्धव, यार-दोस्तों के साथ आ धमकते थे और दिन-भर मौज-मज़ा करके शाम को गाड़ी हांकते हुए वापस लौट जाते थे। मैं ही वावू लोगों के लिए रोटी और कवाव तैयार कर देता था। मालिक लोग मुझे नौकर के अलावा और कुछ नहीं समझते थे। उनका ख्याल था, मैं किसी अनपढ़ किसान खेतिहर का बेटा हूं, यानी जितने दिनों तक मैं वावू लोगों का कर्मचारी था, उन लोगों ने मुझे कभी इन्सान समझा ही नहीं । वे लोग शराब की बोतलें अपने साथ ही लेकर आते थे। मैं उनका खाना जुटा देता था। सामान खरीदने के लिए वे लोग मुझे रुपये दे देते थे। खर्च के बाद, जो रुपया वच रहता था, मेरे लौटाने पर भी वे लोग वापस नहीं लेते थे। वे रुपये वख्शीश के तौर पर मेरे हाथ पर रख दिया करते थे। मैं भी उन रुपयों से अपनी जेब गर्म करता था। वावू लोगों के जाते ही मैं पुनः वही वगान-बाड़ी का मालिक बन जाता 'था। महीने में सिर्फ एक बार अपनी तनखा के हिसाब-किताव के लिए मैं शहर की तरफ जाता था। वही तीस रुपल्ली। वहां जाते अपने ।

साथ मैं बगीचे की थोड़ी-बहुत साग-सब्जी और फल-मूल भी ले जाता था। केला, पपीता, पालक-साग, लौकी, कुम्हता-यानी वीच में जितना चुछ होता था, थोड़ा-बहुत में बालू की कोठी में दे पाता था। इसके अलावा गांव में साग-सब्जी, फल-मूल की वित्री से जो रुपये मिलते थे, उसका भी पाई-पाई हिसाब दे पाता था। मेरे हायों की साग-सरकारी देखकर वह बुढ़िया गद्गद् हो जाती थी। विधवा मौरत ! बेहद धर्मभीरु ! उसके पति ने अपने हाथों से यह बगान-बाड़ी बनवाई थी। अब बेटे और नाती-पोते उसका सुख भोग रहे थे। मसल में सुख-भौग भी नही, पुरखों की जामदार दोनों हाथो से लुटा रहे थे। मुझमे पहले जो प्रादमी यहा काम करता था, वह न तो फल-फूल पहुंचाता था, न रुपये-पैसों का ही हिसाव देता था। माल में सिर्फ एक बार माम, 'जामुन, कटहल, सफेदा वेचकर नाममात्र के रुपये उनके हाथ पर रख देता था और बाकी अपनी जेब में डाल लेता था। इसीलिए बुडिया ने प्राग- बबूला होकर उसे खदेड़ दिया और उसकी जगह उस सिंहासन पर मुझे ला बिठाया। खर, बन्धु, उन दिनो मैं भी कुछ और ही तरह का जीव था। जैसे तुम लोग हो, वैमा ही। उन दिनों में भी भगवान, परलोक, स्वर्ग-नर्क में विश्वास करता था। सच पूछो तो उन दिनों में तुम लोगों की तरह बिल्कुल अनाडी या। और इसी तरह मेरे दिन कटते जा रहे थे। उन्ही दिनो एक बेहद रईस प्रादमी में मेरी मुठभेड हो गई। उमे रईस भादमी इमलिए कह रहा हूं, क्योकि रईम हुए बिना उसके जैसा चेहरा मोहरा पाना नामुमकिन है । एक नाम मेरे बगीचे के सामने एक जीप प्राकर की। वह मादमी अकेला नहीं था। यूभी, अकेले-अकेले दरवार लगाने में किसी तरह का माभिजात्य भाव हरगिज नहीं टपकता। ३१ . । सचमुच रईस होते हैं, उनके साथ ढेर-सारे लाव-लश्कर, अर्दली- गरह जरूर रहते हैं ! वे महाशय सीचे मेरे पास आकर खड़े हो गए। उस वक्त मैं रसोई की तैयारी में था। उन महाशय ने मेरे पास आकर तीघे यही सवाल किया, "इस बगीचे का केयर-टेकर कौन है ?" "मैं ! आपको क्या काम है ?" वह महोदय इतनी ग्रासानी से पकड़ाई में आनेवाले नहीं थे । दर- असल, जब कोई मन ही मन मतलव गांठ रहा होता है तो ऊपर से . आलतू-फालतू बातें करके, अपने स्वार्थ को ढंके रखता है। किसी चोर- दरवाजे से ही असली बात छेड़ता है, और अपना मतलव पूरा करने में सफल हो पाता है । दुनिया का यही ग्राम नियम है- उन्होंने पूछा, "आप वंगाली हैं ?" "जी हां!" वे सज्जन अभी तक उसी तरह खड़े थे। मैं भी उसी तरह अपनी रसोई में व्यस्त था। मेरा ध्यान तो इस तरफ लगा था कि कहीं कुछ 5 न जाए। कोठरी के कोने में मेरी खटिया टंगी हुई थी। उसकी रफ इशारा करके उन्होंने पूछा, "क्या इसपर मैं वैठ सकता हूं?" "वैठिए न !" यह कहकर मैं खटिया विछाकर उसकी धूल झाइ उन सज्जन ने खटिया पर बैठते हुए कहा, "बंगालियों की मैं के तारीफ करता हूं। ये लोग खासे बुद्धिमान होते हैं। सच पूछो तो लियों ने ही फिरंगियों को हिन्दुस्तान से खदेडकर काला पानी भेज नि नेताजी तो महान वहादुर थे..." मैं समझ गया, यह सव महज डोंगवाजी है। ये जनाव असल पर धीरे-धीरे पाएंगे। उन्होंने भात की हांड़ी पर निगाहें गड़ाकर पूछा, "पाप अप शायद खुद पकाते हैं ?" फिर खुद ही अपनी भूल सुधारते "वैसे अपना खाना खुद ही पकाना चाहिए, केयर-टेकर जी ! ३ भी अच्छी रहती है और खाकर परम तृप्ति नी मिलती है । oul

फा खाना खाने के मैकड़ों खतरे हैं ।"कुछ दिनों बाद सारी देखभाल
घरी रह जाती है।"
मैंने कहा, "देखिए, मैं गरीब भादमी हूं। सिर्फ तीस रुपये तनखा
मिलती है। रसोइया रखने की मुझमे प्रोकात कहा है ?"
वे सज्जन समझ गए। उन्होंने कहा, "विल्कुल ! चिल्नुल !! यह
तो आपने ठीक कहा
उन्होंने थोडा ठहरकर दुबारा कहा, "लेकिन कुछ भी कहिए, प्रापके
बाबू लोग आपको बहुत कम तनखा देते हैं। तीम रुपयो से क्या होता
है भता? पापका काम चल जाता है ?"
मैंने स्वीकार किया कि इतने से काम नहीं चलता।
अचानक उनकी नजर उस पत्थर की मूर्ति पर जा पड़ी। मैंने उनके
चेहरे की तरफ गौर से देखा। वे एकदम उस मूर्ति को घूर रहे थे ।
उन्होंने सवाल किया, "अरे"वह क्या है, केयर टेकर जी ?"
"यू ही, एक पत्थर की मूति!"
"पत्यर की भूति ? भाप इसका क्या करते हैं ?"
"कुछ भी नहीं। वगान की मिट्टी के नीचे दबी पड़ी थी। पेड़
काटते हुए मिल गई।"
"लेकिन मापने इसे क्यो रस छोड़ा है ?"
"यूही । मालिक की चीज़ मालिक को ही सौंप दूंगा।"
"क्यों, मालिक लोग इसका क्या करेंगे?"
"कुछ भी नहीं करेंगे। लेकिन मैं ठहरा मालिक का चाकर । मालिक
की चीच मालिक को लोटा देना मेरा फर्ज है।"
वे सज्जन उठ खड़े हुए, "अच्छा, एक बार जरा इसे अच्छी तरह
देख लू।"
इतना कहकर वे जूते उतारकर कोठरी के अन्दर घुस पाए।
उन्होंने मूर्ति के करीब जाकर वह गौर से निहारते हुए कहा, "यह तो
गणेश जी की मूर्ति है।"
"हां, ऐसा ही लगता है।"
"मेरी बहुत दिनों की साध है, कि मैं अपनी दुकान में गणेशत्री को

मूर्ति प्रतिष्ठित करूं। लेकिन मुझे कोई अच्छी मूर्ति ही नहीं मिल रही।" "आपको अगर यह मूर्ति पसन्द हो तो मुझसे वताइए। मैं अपने मालिक से पूछ देखूगा। अगर वह मान गए तो मैं यह मूर्ति आपको दे दूंगा।" मैंने पल-भर कुछ सोचकर फिर कहा, "नहीं तो आप एक काम और कर सकते हैं । मुझसे पता ले जाइए और मेरे मालिक से खुद ही मुला- कात कर लीजिए । वैसे मेरे मालिक काफी भले आदमी हैं।" वे सज्जन हंस पड़े। मैंने पूछा, "क्यों ? हंस क्यों रहे हैं ? अापको भरोसा नहीं हो रहा ?" वे सज्जन मेरी बात पर खिलखिलाकर हंस पड़े। उन्होंने कहा, "दरअसल अभी आप बहुत कच्ची उम्र में हैं, इसीलिए ऐसी वात कर रहे हैं । अरे, जब आप मौजूद हैं तो मैं आपके मालिकों से मिलने क्यों जाऊंगा ? असली मालिक तो आप ही हैं। मैं आपके मालिक को नहीं पहचानता। मैं तो बस आपको ही पहचानता हूं। मुझे तो आपसे ही बात करनी है..." मैं समझ गया, यह आदमी काफी घाघ है। नम्बरी शैतान ! लेकिन मैंने अपने मनोभाव छुपाते हुए कहा, "कहिए, आप क्या चाहते हैं ?" "पाप अभी कह रहे थे कि आपको सिर्फ तीस रुपये मिलते हैं। तीस रुपये में प्रापका काम चल जाता है ? और फिर, तीस रुपये में आप जैसा भलामानस भला कहीं मिलता है ? साफ-साफ कहूं...? अगर अापके मालिक प्राप जैसे भलेमानस को सिर्फ तीस रुपल्ली के बदले इतना- इतना खटाते हैं, तो आपको अगर कुछ अतिरिक्त रुपयों की आमदनी हो जाए तो क्या हर्ज है ? मान लीजिए, तीस रुपये अगर मैं आपको दे दूं? तो इन तीस रुपयों से आप अपने लिए कुछ नये कपड़े खरीद सकते हैं, और शायद मेरा भी कुछ भला हो जाएगा..." "इससे आपका क्या भला होगा ?" "क्यों, मुझे गणेशजी की मूर्ति जो मिल जाएगी।" - - ३४ "लेकिन पाप गणेशजी को यह मूर्ति लेकर क्या करेंगे? याचार रो सर्फ पांच रुपये में प्राप इससे बेहतर और सूबसूरत भूति खरीद सकते "हां, खरीद तो मरता हूं। लेकिन जब लोगों के मुंह से यह चर्चा नुनी कि मापके बगीचे में गणेशजी की एक प्राचीन मूर्ति मिली, तो मैं उसे देखने की उस्तुक हो उठा। मरे भइया, पुरानी और नई मूर्ति क्या परावर है ? मान लीजिए, पुराने जमाने में यह मूर्ति किसी मन्दिर में प्रतिष्टित रही हो ! जाने कितने लोगो ने इस मूर्ति की पूजा-अर्यना की होगी। मेरा मतलब है, इस मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा तो कब की हो चुकी है। इसकी मर्यादा ही मलग है । इसीलिए मुझे यह मूर्ति पसन्द मा गई मेरे दिमाग में एक बात सेल गई। मैंने नोचा, जव यह मूर्ति इम मादमी को इतनी पसन्द प्रा गई है, तो वह इमे खरीदे विना नहीं मानेगा। मैंने मूति की कीमत जरा वहा दी। तीस रूपये तो इस मादमी के लिए कुछ भी नही होगे । जव जीप में पाया है तो जरूर कोई बड़ा पादमी होगा। मैं मन ही मन हिसाब लगाने लगा कि इस मादमी से मुझे कितना मांगना चाहिए । ठीक है; पचास रुपया मांगूगा।"लेकिन अगर में पचास की जगह सौ रुपये मांगू तो?... सो, यार, मेरे मन में लोभ जाग उठा । अचानक किसी घटना-चक्र में वह मूर्ति यूं ही पड़ी मिल गई थी। इससे मुझे अच्छी-सामी यामदनी हो जाएगी, इसका तो मुझे अन्दाज भी नहीं था। मुमकिन है, ये रुप दिलाने में खुद भगवान ही सहाय हुए हों। मैं भगवान को चाहे मानता होऊ या न मानता होऊं, लेकिन इसके पोधे विसी अदृश्य शक्ति का हाय जरूर है, उस दिन यह विश्वास करते हुए मुझे अच्छा हो लगा था, दोस्त। मैंने कहा, "अगर माप दो सौ रुपया देने को तैयार हों तो मैं वह मूर्ति मापको दे सकता हूं।" मैंने कीमत जरा बदा-घडाकर ही बताई थी। मेरा स्वाल पा कि मोल-तोल के वाद मामला सौ रुपये में पट जाएगा। लेकिन वे सज्जन फौरन राजी हो गए। उन्होंने अपनी जेब से दस- दस के वीस नोट निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिए । मैं अवाक् रह गया। वैसे मुझे मन ही मन अफसोस होने लगा था। मैंने जल्दबाजी में सिर्फ दो सौ रुपये ही क्यों मांगे? उनसे चार सौ रुपये तो मांग ही सकता था। मैं अपनी वेवकूफी पर रह-रहकर पछता रहा था। लेकिन अब तो तीर हाथ से छूट चुका था। उसे लौटा लाने का कोई उपाय नहीं था। वह सज्जन रुपये चुकाकर गणेश की मूर्ति उठवाकर चल दिए। उनके साथ और भी कई लोग थे। उन लोगों ने ही मूर्ति उठाकर जीप में रखी। जीप चल पड़ी और कुछ पलों में ही अदृश्य हो गई। काफी देर तक हाथ में रुपये लिए हुए मैं गुमसुम खड़ा रहा। मैं सचमुच चक्कर में पड़ गया था कि यह क्या हुआ ? वह आदमी उस टूटी-फूटी-सी मूर्ति के लिए मुझे इतने सारे रुपये क्यों थमा गया ? आखिर उस मूर्ति में ऐसी क्या खासियत थी, जिसके लिए इतना ऊंचा दाम उस गया ? जिन्दगी में, इससे पहले, कभी इतने सारे रुपये एक साथ नहीं मि थे, बन्यु ! उन दिनों मेरी तनखा सिर्फ तीस रुपये थी। उस वक्त सौ रुपये मेरे लिए बहुत बड़ी रकम थी। मेरी छ: महीने की तनखा भी अधिक । उस वक्त मेरे मन में एक तीखी चाह जाग उठी । कारा, वगान मिट्टी खोदते-खोदते एक और मूर्ति मिल जाए, मुझे दो सौ रुपयों अतिरिक्त प्रामदनी और हो जाए। उस दिन से मैं वगीचे के काम-काज की कड़ी निगरानी करने ल अब मैं कभी-कभार खुद भी कुदाल लेकर मजदूरों के साथ मिट्टी में लग जाता था। एक दिन अचानक ही बगीचे के मालिक आ धमके। मुझे खोदते देखकर वे वेहद खुश हुए।

मालिक ने मुझने दरियाफ्त किया, "अरे, तुम खुद मिट्टी खोदने में क्यों लगे हो ?" "प्रसल में ये लोग ठीक तरह खोदना नहीं जानते । मो में उन्हे दिखा रहा था ।" मालिकों पर मेरी वात का गहरा असर पड़ा । उन्होंने वापस जाकर मेरी तनखा में पांच रुपये और बड़ा दिए मोर अगले महीने के पहले सप्ताह मे, जब मैं तर तरकारी, फल-फूल लेकर कोठी मे पहुचा तो बूटी मालकिन ने मेरी खूब खातिर की। मैंने यह भी महसूस किया कि इस वार मेरा साने-पीने का इन्तज्ञाम पहले से बेहतर था। मुझसे पहले जो आदमी उनके यहा नौकरी करता था, उसके कामों की तुलना में मेरी मान-मर्यादा दस गुना अधिक बद्ध गई थी। उनकी नज़र में में सन्, निष्पाप और साधु कर्मचारी सावित हो चुका था। मेरी ईमानदारी उनका विश्वास जीतने में सफल हो गई थी। यह बात मेरे भावी जीवन में काफी काम माई। धीरे-धीरे मैं गानिर चौर, बेईमान और शंतान बनने की दिशा में अग्रसर हो उठा। इसके बाद ही एक पोर हादसा हुग्रा । मेरी जिन्दगी की यह चिर-स्मरणीय घटना है। उस दिन दोपहर को मैं लेटा हुमा था। खाना-पीना निवटाकर थोडी देर पाराम करना जैसे मेरी रोज़ की प्रादत बनती जा रही थी। अचानक अपना नाम पुकारे जाने पर मेरी तन्द्रा टूटी तो सामने एक साहब पर निगाह जा पडी। अंग्रेज साहब ! मजीवोगरीय हुलिया! साघु-मंन्यासियों-सा चेहरा ! सर पर लम्बे लम्बे बाल ! गैस्या रंग का खद्दर का पायजामा ! यह भी जगह-जगह से फटा हुमा! बदन पर एक नई वनियाइन । मैंने अन्दाज लगाया कि साहब जरूर कोई पागल मादमी है । मैंने सवाल किया, दगोचे में क्यों चले पाए ? देखो, यहां भीख-वीस मिलने से रही। मालिक लोग यहां नहीं रहते।" उस पादमी ने हिम्मत नहीं हारी। मेरे बिल्कुल करीव ही उमीन ३७

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पूछा, हाय लोटा लिया करूंगा और खोज-खबर ले जाया करूंगा! मो० के०! साहब का हाव-भाव देखकर जाने क्यों मेरे मन में अजीव-सा सन्देह जाग उठा । जाने यह मादमी भन्त में रुपये भी देगा या नहीं? मैंने "रुपये ? रुपये कितने दोगे?" साहब ने कहा, "रुपये की चिन्ता मत करो। मूलचंद ने तुम्हें नो दिया है. मैं उसका डवल दूगा।" "देस लो । इधर मैं मूलचंद को साली दू और उधर तुम भी लापता हो जामो, तो इस कार के चक्कर में मेरे रपये मारे जाएंगे। कही ऐसा तो नही होगा ?" साहब ने कहा, "अगर तुम्हें इतना ही डर लग रहा है तो मैं तुम्हें कुछ एडवान्स दिए जाता हूं।" कहते हुए उसने पेण्ट के हिप-पाकेट से छेक नोट निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिए । मैंने उन नोटों को अच्छी तरह गिनकर देखा । दम-दस के दस नोट ! कुल मिलाकर सौ रुपये ! साहब मेरी प्रांखों का भाव पढ़ रहा या । उसने मेरा हौसला बढाते इए कहा, "यह मत समझ रोना कि ये पूरे स्पये हैं। यह तो मिर्फ डवान्स-भर है । अपनी चीज मिलते ही तुम्हे मोर रपये दूंगा।" मैं समझ गया, मुझे लालच दिया जा रहा है । खैर, किसीके लालच ने से मेरा क्या नुकसान होता है ? मेरा एक पैसा-भर भी नुक्सान नहीं! अगर मैं माल नहीं दे पाया तो हो सकता है, और रुपये न मिलें। परे, बहुत होगा तो एडवान्स के रुपये वापस करने होंगे, वस्म् ! मतः मैंने कहा, "ठीक है।" "प्रच्छा, तो मैं चलूं । बॉय-वॉय !" साहब हाथ उठाकर पांचों उंगलियां हिलाते हुए बगान से बाहर नकल गया। में योडी देर किंकर्तव्यविमूड-सा चुपचाप बैठा रहा। रे दिमाग में जमीन-असमान की बातें चक्कर लगाने लगी। नगले दिन से मैं बगीचे की राई-रत्ती जमीन छानने में व्यस्त हो गया । ३६ काश! एक मूर्ति निकल पाए। कम से कम एक मूर्ति । अगर एक भी मूर्ति मिल जाए तो हाथ में ढेर सारे रुपये आ जाएंगे। मैं कुदाल उठाकर जी-जान से मिट्टी खोदने में जुट गया। जहां कोई जरूरत नहीं थी, वहां भी खोद डाला। जहां बड़े-बड़े पेड़ खड़े थे, उसकी जड़ें भी खोद डालीं। मिट्टी खोदते-खोदते मैं हैरान हो गया। अन्त में मैंने एक मजदूर तय किया। एक रुपये रोजाना का मजदूर। उसे उसी दिन से मिट्टी खोदने में लगा दिया। मैंने उसे काफी गहरे तक खोद डालने का आदेश दिया। मैं खुद उसके साथ छाया की तरह लगा रहा । बीच-बीच में कुदाल उठाकर खुद भी गड्ढा खोदने में जुट जाता था। उस दिन मूसलाधार बारिश हुई थी। वरसात के दिनों में बारिश का पानी बगान से होकर बहता हुआ पासवाली नदी में जा मिलता था या फिर किसी दूसरे के बगीचे की तरफ वह जाता था। लेकिन निट्टी खोदने की वजह से बगीचे की खेती-बाड़ी, पेड़-पौधे काफी गदरा उठे। अचानक एक दिन वगान के मालिक आ पहुंचे। खैर, मेरे मालिक तो हमेशा यूं ही अचानक पा घमकते थे। उन्होंने पूछा, "इतनी सारी मिट्टी क्यों खोद डाली ?" मैंने कहा, "ताकि जमीन की फसल अच्छी हो और पेड़ में वढ़िया फल लगें।" मालिक मेरी बात सुनकर गद्गद हो गए । मैं कितना योग्य माली हूं, इसका प्रमाण पाकर वे लोग मुझपर इस कदर मेहरबान हो गए कि फोरन पांच रुपये नकद वल्लीन दे डाली। मालिक तो खैर उसी दिन लौट गए लेकिन मेरा मिट्टी खोदना वन्द नहीं हुआ। लेकिन, काफी खोदने के बाद भी वैसी एक भी मूर्ति नहीं मिली। मैं अपनी कोठरी में लेटा-लेटा भगवान से मनाया करता था कि हे भगवान! बस एक मूर्ति और दिला दो तो मेरे हाथ में कुछ रुपये आ जाएं।

कुछ दिनों बाद अचानक साहब फिर मा टपका । उसके साथ एक मेम. साहब भी थी। मेमसाहब के कपड़े लत्ते भी साहब की तरह थे । मला कुर्ता ! मस्त-व्यस्त से बाल ! पांवों में सस्ते दामोंवाली एक जोड़ी रबड़ की चप्पल ! लेकिन उसका चेहरा बेहद मोहक था। साहय ने पूछा, "क्या हुआ ? कुछ जुगाड़ हुमा ?" "नहीं । देख लो, साहब, कितनी सारी मिट्टी खोद डाली। मिट्टी खोद-खोदकर सारा वगान छलनी कर डाला लेकिन इतनी कोशिशों के वाद भी कुच्छ नहीं मिला।" मुझे डर था कि साहब शायद अपने रपये वापस मांगेगा। लेकिन साहब ने कहा, "सोजी-और खोजो "हां, तुम्हे अगर भौर रुपयों की जरूरत हो तो वतामो।" "माप तो समझते ही हैं, रुपये की ज़रूरत किसे नहीं होती ? रुपया तो सभी चाहते हैं..." साहब ने फौरन पंण्ट की पिछली जेब से कुछेक नोट निकालकर मेरी तरफ बढाते हुए कहा, "लो, रख लो। एक सौ रपये और देता मैंने हाथ फैलाकर रुपये समेट लिए । लेकिन मन ही मन कही डर भी लगा-मैंने रुपये ले तो लिए ! लेकिन अगर ये रुपये न चुका पाया तो? मेरी निगाहें उनके चेहरे पर जा टिकी । साहब और मेमसाहब के चेहरे पर कोई विकार नहीं था। उनके चेहरे-मोहरे या कपड़े-तते से यह कतई जाहिर नही होता था कि उनके पास इतने रुपये हैं । जब तक किसीके पास ढेर-ढेर रुपये न हों, इस तरह सौ-दो सौ रुपये बांटना नामुमकिन है। उन दिनों मेरी यही धारणा थी, वन्धु ! हां, मव में जरूर बदल गया हूं । अव में भी समझ चुका हूं कि रुपये के बारे में अगर रंचमात्र भी दुविधा रह गई, तो स्पये कभी नही पाते । रुपया ऐमी चीच है कि हाय में माने के बाद उसे कभी अस्वीकार नहीं करना चाहिए। हा रुपये को कभी 'मा' नही करना चाहिए । वात दरमसल यह है कि वर्ना हम - रुपयों से डरता है, उससे रुपया भी डरता है। जो आदमी पाने की खुद कोशिश नहीं करता, रुपया भी उसके पास आने के श नहीं करता । उन दिनों, भला, ऐसा कौन था, जो मुझे ये स देता! खैर, रुपये जैसी चीज़ के मामले में कुछ सीखने की ज़रूरत भी हों पड़ती। जव हाथ में रुपये आते हैं तो आदमी खुद-ब-खुद सीख लेत । जैसे वाहरी आघातों से आत्मरक्षा हमारा कर्तव्य है, उसी तर रुपया भी अपनी प्रात्मरक्षा से परिचित है । रुपया खुद ही इन्सान को आत्मरक्षा के तरीके बता देता है। यह रुपया ही आदमी को सीख देता है-देखो, हमें बैंक में जमा कर दो! हमें उड़ानो मत, भी: तुम्हारा नामोनिशान मिटा देंगे। खैर, उस दिन साहव रुपये फेंककर चला गया। लेकिन, मैंने बताया न, उन दिनों में काफी अनाड़ी था, अतः मेरी जान अजीब श्राफत में . फंस गई। उस दिन से मेरी आंखों की नींद, मन की चैन हराम हो गई। इतने सारे रुपये मैं आखिर चुकाऊंगा कैसे ? अगर मैं साहव को कोई मूर्ति न दे पाया तो? साहब ने कहा, "मूर्ति तुम्हें ज़रूर मिलेगी ! तुम इतने परेशान क्यों होते हो ?" मैंने जवाब दिया, "क्या पता ! सब कुछ किस्मत की बात है। असल में वह मूर्ति मेरी किस्मत में थी, इसीलिए अचानक पड़ी मिल गई. दो सौ रुपये ! उस समय मैं नकद दो सौ रुपये का मालिक था हालांकि मुझे उसके लिए करना कुछ भी नहीं पड़ता था। यह मुमकिन है कि मुझे जी-तोड़ मेहनत करते देखकर, साहब ने ये रुपये मुझे यू पकड़ा दिए हों। साहव के चले जाने के बाद कुछ देर तक मुझे कुछ नहीं सूझ इस तरह हाथ में आए हुए रुपये अन्त में क्या यू ही वापस चले जा लक्ष्मी अगर खुद न आई होती तो अलग वात थी। लेकिन एक ४२ पाकर अगर हाथों से फिसल जाए तो मादमी भाग्यहीन समझा जाता है । अतः अब मैं कतई निश्चिन्त होकर बैठनेवाला नहीं था। प्रव चाहे जैसे भी हो-चाहे मिट्टी खोदकर हो या फिर किसी और तरीके से मुझे एक न एक मूर्ति का इन्तजाम करना ही होगा। इसी बीच मूलचन्द एक दिन मुझसे मिलने दुवारा आ धमका । उसने पूछा, "क्यों केयर-टेकर जी, फिर किसी मूर्ति का पता-वता चला?" मैंने छूटते ही कहा, "नही, मूलचन्दजी, अब मैं आपको मूर्ति नहीं दूंगा । आपने मुझे बहुत बुरी तरह ठग लिया ।" मूलचन्द मेरा रस देखकर बुरी तरह सकपका गया। उसने पूछा, "क्यों ? मैंने क्या किया ? मैंने तो तुम्हे रुपये दिए ही थे।" "हा:-दिए तो थे, लेकिन बहुत कम रुपये दिए थे । असल में मापने मुझे चकमा दिया है।" "अरे ! कौन कहता है कि मैंने तुम्हे चकमा दिया ? किसीने जरूर मेरे खिलाफ तुमसे कुछ जड दिया है।" मैंने इससे अधिक खुलना उचित नही समझा। मैंने सिर्फ इतना कहा, "जी नहीं। उस वार जो हुमा, सो हुमा। अब मैं उतने कम दाम में माल नहीं दूंगा।" मूलचन्द ने कहा, "तो तुम्हें कितना चाहिए? बतामो न !" "मुझे पांच सौ रुपये चाहिए।" "पांच सौ रुपये !" मूलचन्द चौंक उठा, "पांच सौ तो बहुत होते हैं ! देखो, अगर पहले जैसी बढिया मूति दे सको तो मैं तुम्हे तीन सौ रुपये तक दे सकता हूं।" "जी नही ! नामुमकिन ! मैं पांच सौ रुपये लूगा । उससे एक पैसा कम नहीं लूंगा." हैरत है ! मूलचन्द फौरन राजी हो गया। उसने कहा, "ठीक है। अभी से ही मोल-भाव करने से क्या फायदा? पहले मैं चीज़ तो देखू, उसके बाद दर-दस्तूर किया जाएगा." मूलचन्द यह कहकर चला गया।

सारा मामला समझकर मेरे तो जैसे ज्ञान-चक्षु खुल गए ता था कि इन टूटी-फूटी मूर्तियों के इतने ऊंचे दाम लगाए जाते हैं ? हले से पता होता तो भला इस कदर धोखा खाता ! खैर, इसके बाद मैं जी-जान से जुट गया । मालिक के बगीचे का चप्पा-चप्पा छानकर हार गया और यह मैं अच्छी तरह समझ गया कि उनके बगीचे में अब किसी नई मूर्ति की प्राशा वेकार है। इसीलिए कुछ दिनों से मैं शाम का काम-काज निवटा- कर बाहर निकल पड़ता। यूउस गांव को बहुत छोटा भी नहीं कहा जा सकता था। पता चला कि किसी ज़माने में यहां अच्छा-खासा शहर था। लोगों की जुबानी जो कुछ सुना, उससे यही अन्दाज लगाया कि यह जगह काफी पुरानी है । कहते हैं, पांच सौ या हजार वर्ष पहले यह गांव लखनऊ शहर से भी बड़ा था। यहां हिन्दू राजा राज्य करते थे। उन दिनों इस जगह का नाम था विम्बवती। अब वही अपभ्रंश रूप में या कहलाने लगा है। हिन्दू राजाओं के ज़माने में हिन्दुस्तान के चारों .फ से गुणी-ज्ञानी, पंडित लोग विभिन्न कारणों से बेतिया आया करते । उन दिनों राजे-रजवाड़े काफी धार्मिक होते थे। वे लोग अपने राज्यकाल में काफी दान-पुण्य भी कर गए थे। मन्दिर, धर्मशाला, सराय, मठ, चतुष्पाठी वगैरह वनवा गए थे। बनारस, श्रीक्षेत्र, नालन्दा वगैरह से विद्यार्थी लोग आया करते थे। यहां के राजा ही उनके रहने-खाने व यथोचित प्रवन्ध करते थे। ब्राह्मण-विद्वानों का यहां खास सम्मान हो था। उस सम्मान के लोभ में यहां प्रागत मेहमानों की संख्या कम बढ़ने लगी। अत्याचार के भय से दिल्ली, आगरा के ब्राह्मणों ने भी आश्रय लिया। यहां धर्मच्युत होने का भी कोई भय नहीं था । यथे सम्मान के अलावा खास-खास व्यक्तियों को उपहार में जमीन-जायदा दी जाती थी । वंशानुक्रम परम्परा से उन लोगों ने यहीं धर्म चर्चा पाठन और पूजा-अर्चन का कार्य अपना लिया। कुछ दिनों बाद उत्तर से वाढ़ की एक हहराती हुई लहर समू भारत को निगल गई । हिन्दू राजे-महाराजे यवन-आक्रमण के हा जित हुए और अपनी जान बचाने के लिए देश छोड़कर भाग ४४ लेकिन उनके सामन्तों और प्राश्रितो पर भयंकर माफत ग्रा पड़ी। उन लोगो को तो भागने का भी मौका नहीं मिला। जो लोग चेतिया में पड़े रह गए, उनमें से कुछ लोगों ने प्रात्महत्या कर ली और अधिकतर लोगो ने अपना धर्म वदत डाला। खर, ये सब इतिहास की बातें हैं । में जिन्दगी के मामले में इतिहास के बड़े उठाकर कोई परेशानी मोल नहीं लेना चाहता। वैसे भी, प्रगर मैं वुद्धि लगाने को राजी होता तो शायद माज कुछ और होता। तुम लोगो की तरह मैं भी लिखना-पढ़ना सीखकर किसी व्यापारिक फर्म में चाकरी करता। मैं भी किमी तरह मर-खपकर सिर्फ दो-तीन हजार रुपल्ली महीने में ही सन्तोप कर लेता । लेकिन क्या उतने से मेरा पेट भर जाता ? अाज मेरा जो स्टैंडर्ड है वह होवा? अरे, तीन हजार रुपये तो मेरे घर का खुदरा खर्च है ! खर, छोड़ यार, हा तो मैं तुझे इतिहास का किस्सा सुना रहा था। अगर मुझे मूर्तियों की जरूरत न होती"तो मुझे इम इतिहास-ज्ञान से कोई वास्ता नहीं था। लेकिन जब इतने लोगों के मुह से एक ही बात बार-बार सुनी, तो मैंने फौरन भन्दाज लगा लिया कि इस गाव मे काफी भूतिया मिल सकती हैं। वही के लोगों ने बताया कि सैकड़ों साल पहले यहां एक भयंकर भूकम्प प्राया था। उस भूकम्प में समूचा गांव ही तहस-नहस हो गया या। उन दिनों यहां मुसलमानों का राज्य या । भूकम्प वजह स एक मोर तो मन्दिर मठ वगैरह ध्वंस हो गए, दूसरी तरफ मुसलमान नवाब- बादशाहो के नवनिर्मित राजमहल मौर मस्जिद वगैरह भी टूट-फूटकर साक में मिल गए। युगो के अन्तराल बाद उसी प्राचीन ध्वंसस्तूपी पर फिर एक नये जनपद ने जन्म लिया। नई-नई बस्तियां बस गई। एक बार फिर नये सिर से पेड़-पौधे, बाग-बगीचे लहलहा उठे । इन्सानो के भावागमन के साथ ही साथ यहां बाजार, व्यवसाय, लेन-देन का सिलसिला दुबारा शुरू हो गया। उन्हीं दिनो मेरे मालिक के पुरखों ने वेतिया में यह बंगला खरीदा ४५ उनका इरादा था कि वे कभी-कभार यहां आकर आराम किय । शहर से दूर आकर दुनिया भर के झंझट-झमेलों को कम से कम क दिनों के लिए तो भूल सकेंगे। उसके बाद जो होना चाहिए था वही हुआ । धीरे-धीरे उनका मान ना विल्कुल बन्द हो गया। लखनऊ इतना बड़ा शहर ! उसे छोड़कर ई यहां क्यों आएगा? अरे, शहर में जो मौजा-मज़ा है, यहां उसका शतांश भी क्या सम्भव है ? इसीलिए मालिक लोगों ने यहां एक माली रख दिया और इस तरह अपनी सम्पत्ति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाते रहे। वैसे, वहां क्या है, क्या नहीं है-उन लोगों ने तो इस खोज-खबर की ज़िम्मेदारी से भी मुक्ति पा ली थी। इसी घटना-चक्र में मैं इस बंगले का केयर-टेकर नियुक्त किया गया। एक दिन मैं घूमते-घूमते गांव के विल्कुल अन्तिम छोर तक जा पहुंचा। पास ही कहीं-से कांसे के घण्टों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। मैं समझ गया कि आस-पास ही कहीं मन्दिर होगा। मैं पैदल ही वहां तक पहुंच गया । एक जीर्ण-शीर्ण मन्दिर । वहां एक पुरोहित जी खड़े-खड़े पूजा कर रहे थे। पुरोहित जी काफी बूढ़े लग रहे थे। दूसरा आदमी उनकी बगल में खड़ा-खड़ा शंख वजा रहा था। एक और आदमी घण्टा और एक अन्य करताल वजा रहा था । पुरोहित जी के अलावा वाकी लोग काफी कम उम्र के जान पड़े । मन्दिर के प्रांगण में जो लोग आरती देख रहे वे लोग भक्ति-भाव से हाथ जोड़े खड़े थे। उन लोगों की देखा-देखी मैं भी हाथ जोड़कर आरती देखता रह पूजा समाप्त होते ही सबने ज़मीन पर सिर टेककर प्रणाम किया। लोगों की तरह मैंने भी जमीन पर माथा टेक दिया। जब मैंने सिर उठाकर देखा तो ज्यादातर लोग वहां से जा चु आखिर एक आदमी ने मुझसे पूछ ही लिया, "आपको तो यहां कभी नहीं देखा। आपकी तारीफ ?" ४६ वह प्रादमी हिन्दी बोल रहा था । मैंने अपना पूरा परिचय दे डाला। उस मादमी ने मेरी भापा सुनकर पूछा, "ग्राप सायद बंगाली हैं ?" मेरी भाषा मुनकर उसको कौतूहल हो पाया । उमने मेरे प्रति जरा सम्मान दिसाते हुए कहा, "वीच-बीच में इधर पा जाया करो, बाबूजी! मन्दिर पाच सौ बरस पुराना है । इहां जव हिन्दू राजा लोग घे, तव उनका टम में ही ई मन्दिर बना रहा । लेकिन अब स्पया-पइमा के अभाव मे मन्दिर का ठीक तरह मरम्मत भी नहीं हो पा रहा है । हमही लोग, कउनौ तरह, वस, पूजा-पारती निभाए जाय रहे हैं।" मौका देखकर मैंने एक काम कर डाला। अपने पुतें की जेब से एक रुपये का नोट निकालकर पूजा की थाली में लापरवाही में डाल दिया । उम आदमी की निगाहों में यह बात छुपी नहीं रही। उस आदमी के अलावा और भी दो-चार लोगो की निगाहें उस तरफ उठ गई । गायद वे लोग पाश्चर्य में पड़ गए थे। पूरा एक रुपया चढा देना उनके लिए अचम्भे की बात थी । दो-एक पैसे चहानेवाले भक्त तो सभी थे । इसके अलावा वे लोग ठहरे गांव के वाशिन्दे ! प्रायः सभी गरीब थे । विचारे गरीब किसान-सेतिहर चडावे में इससे अधिक देते भी महां से ? बहुत हुमा तो वे लोग कभी-कभार पेड़ के फल-मून भी चढा जाते थे। अब पुजारी जी ने भी कहा, "जब भी फुरसत हो, इधर चले आना, वाबूजी ! यह जगह बहुत दूर तो नहीं है ।" "हां-हा, जरूर पाऊंगा।" उमी दिन मैंने इतना ही कहकर विदा ली । लेकिन मन ही मन भयंकर लोभ जाग उठा। लौटते हुए मैंने उन मूर्तियो को ओर भरपूर नजर से देखा। उस मन्दिर में मुरुष रूप से शिव की मूति ही प्रतिष्ठित थी । समूची मूर्ति काले संगमरमर के पत्थरों से गढी हुई। तगभग चार हाथ लम्बी। अगल-बगल दो अन्य मूर्तिया। गणेश मोर पार्वती की। वे दोनों भी संगमरमर-निर्मित थी। मुझे वहां जाते हुए कई दिन हो गए थे। एक दिन मैंने सुना कि उम -- मन्दिर में और भी दो-एक मूर्तियां थीं। किसीको भी नहीं मालूम था कि वे सब किन-किन देवी-देवताओं की थीं। उनके लिए वेदियां भी बनी हुई थीं। मैंने पूछा, "इन जगहों की मूर्तियां कहां गई ?" पुरोहित जी ने बताया, "सुनने में आता है कि बहुत सालों पहले यहां एक भूकम्प प्राया था। उसी धक्के में पुराना मन्दिर महराकर गिर पड़ा। उस समय गांववाले गांव छोड़कर भाग गये थे। यहां की पूजा भी बन्द हो गई थी। खैर, उस समय हमारा जन्म भी नहीं हुआ था।" यह किस्सा सुनकर मेरे मन में कौतूहल जाग उठा । मैंने फौरन जानना चाहा, "उसके बाद क्या हुआ ?" "और क्या होता? हमने उस भूकम्प की कहानी भर सुनी है, अपनी प्रांखों से किसीने नहीं देखा । सुना है, उसी भूकम्प की वजह से भयानक बाढ़ भी आ गई थी। नदी की धार अपने साथ घर-मकान, गाय-बछड़े सब कुछ वहा ले गई थी। उस वक्त यह मन्दिर भी नदी में डूब गया था। कुछ दिनों बाद, जब पानी घटा, तब पता चला कि काफी लोगों की जाने गई हैं, बहुत सारे मकान ढह गए, खेतों की फसलें वर्वाद हो गई। इसके अलावा मन्दिर की कई मूर्तियां भी लापता हो गई। "काफी दिनों बाद जव गांव के लोग अपनी-अपनी जगह वापस लौट' पाए, तो दुवारा नये सिरे से घर-मकान बन गए। धीरे-धीरे जब लोगों की स्थिति ज़रा सुधरी तो मन्दिर की मरम्मत पर हाथ लगाया गया। खोई हुई मूर्तियों की भी खोज की गई। जो मिलीं, उनकी पुनः प्रतिष्ठा की गई। जो नहीं मिली, यह समझ लिया गया कि मिट्टी के नीचे दब गई। अब उनका उद्धार कभी सम्भव नहीं।" खैर, यह सब भी काफी पहले की घटना है। बहुत दिनों पहले की । जब ये लोग पैदा भी नहीं हुए थे अब मैंने उन लोगों से जी खोलकर मिलना शुरू कर दिया था। हालांकि मेरा मन उसी गणेशजी की मूर्ति में ही अटका हुआ था।

इसी बीच साहब और मेमसाहब मेरे यहां एक और चार रागा गए। पहले भी वह कई बार पाकर मुझने दरियाफ्त कर गए थे, "क्या हुमा, कुछ मिला?" । मैंने कहा, "लगता है जल्दी ही कुछ मिलनेवाला है।" साह्य को जैमे योडी पाशा बंधी। उसने मेरो मोर सिगरेट बढाने हुए कहा, "लो, पोमो ! सिगरेट पीनो।" मैं बेहिचक सिगरेट के कश लगाने लगा। प्राखिर क्यों न लगाता? बिना दाम-कौडी खर्च किए सिगरेट तो करा अगर गराब भी मिलती तो मैं चढा जाता। हालाकि अब मैं सिर्फ अपने ही पंमों को शराब पीता हूं। प्रव गराव पोते हुए मुझे सास बुरा नहीं लगता, क्योंकि अब मेरे पास इतना-इतना स्स्या है कि अगर मैं इने सराय मे न उडाऊं तो इतने रुपयों का पाखिर मैं करूंगा भी क्या ? अब तो मुझे साने के लिए दाल- भात-रोटी न भी मिले तो मैं काम चला लूगा। लेकिन दाराव मुझे हर हाल में चाहिए। अभी-अभी मैंने तुझे दिखाया न, मेरे मूटकेस में कितनी सारी बोतलें भरी हैं। लेकिन तुम लोगो ने जो मुझे इतने दिनो कोई तरह नहीं दी थी, यह बात मुझे माज भी चुभती है। कभी मैं तुम सबकी निगाह में कितना छोटा या, यह बात में पाज भी नही मुला पाया। उन दिनो तुम लोग मुझसे नफरत करते थे। शायद इसीलिए माज में तुम सबको मात देकर शान से सिर उठाए सड़ा हो सका हूं। शायद ऐसा ही होता है । सारे संसार का शायद यही नियम है ! इसीलिए, बन्धु, मैं तुम सबका कृतज्ञ हूं। तुम लोग बचपन में अगर मुझे प्यार देते, मैरी तारीफें करते, तो शायद मैं भी तुम लोगों की तरह हमेशा के लिए बौना ही हो जाता। पहले मुझे मन ही मन तुम सबके प्रति गहरा क्षोभ था। मेरा स्याल था, तुम लोग बेहद ईयालु पौर हीन भावना से ग्रस्त हो। प्रहंकारी भी हो, इसीलिए मेरा मना नहीं चाहते। लेकिन पर बात उल्टी हो गई है। मब मैं सोचता हूं कि यह भाग्य की यात यी कि तुम लोग अपने को बड़ा मानकर मुझे हमेशा सोटा माचित करने की कोशिश में लगे रहे। तभी बाज मैं इतना बड़ा बन सका। वर्ना मैं भी तुम लोगों की तरह बौना ही रह जाता । मैं भी दो-तीन हजार रुपयों की नौकरी के बल पर समूची दुनिया को सिर पर उठा लेता। नुझे एक बात और कहनी है-तुम लोग जिन्दगी की नाप-जोख महज़ रुपयों से ही करते हो न ! अच्छा, चलो, तुम्हीं बताओ, तुम लोग ऐसा करते हो या नहीं ? रुपया ही तुम लोगों के लिए सब कुछ है न ? रुपयों से ही तो तुम लोग छोटे-बड़ों का विचार करते हो? वचपन में जब तुम लोगों की लन्तरानियां सुना करता था, तो मन ही मन सोचा करता था, ये लोग आखिर क्या हैं ? सब के सब महज भिखारी ! जिसके पास बेशुमार दौलत है, तुम तब उसे देवता मानकर पूजने लगते हो। वैसे भिखमंगों में भी स्तर-भेद होता है। मतलब, गरीब भिखारी; मध्यवित्त भिखारी; अमीर भिखारी। कुछ भिलमंगे सिर्फ चावल और पैसों की भीख मांगते हैं और कुछ लोग परमिट व लाइसेंस के लिए हाथ फैलाते हैं । उन दिनों तुम लोगों को इन बातों का ज्ञान नहीं था, लेकिन मैं सब समकता था। ये सब फर्क मैंने अपनी आंखों से देखा है। मैंने गौर किया, हमारी क्लास में ही जो अमीर लड़के थे, सबके सब उनकी खुशामद में लगे रहते थे । दरअसल तुम लोग उनकी सूरत-शक्ल पर नहीं मरते थे बल्कि उनके अमीर बापों की प्रथाह दौलत की वजह से उनके तलुए सहलाते थे। यह सच है कि वे लोग तुम्हें अपना रुपया उठाकर नहीं दे देते थे, लोग ही उनसे रुपये पाने या भरपेट खाने की उम्मीद करते थे। तुम लोग तो महज इस गर्व में फूले नहीं समाते थे कि ऐसे-ऐसे अमीरों से तुम लोगों की मेल-मुलाकात है । तुम लोग तो उनके इर्द-गिर्द चक्कर लगाकर ही खुशी से अभिभूत हो उठते थे। उन लोगों के रुपयों की खुशबू ही तुम सबको परम-मधुर लगती थी। यानी तुम लोग रुपयों के इस कदर लालची थे। हां, यार, यह सब मैं चुपचाप देखता-सुनता रहता था। मैं बेहद गरीव प्रादमी का बेटा था। तुम सभी जानते थे न तुम तुम लोगों कि मेरे वाप के पास फूटी कौड़ी भी नहीं है। जिमके वाप के पाम दौलत न हो; वह लिखने-पढ़ने में होगियार हो या गवार; वरावर है। हां, मैंने देखा है, जिन्दगी में मिर्फ दही तरक्की कर पाते हैं जिनके बाप के पाम बेशुमार दौलत हो । जो लोग मिर्फ लिखने-पढने में होशियार हैं, वे लोग जीवन की लड़ाई में बग किसी तरह टिके हुए हैं। बस, इतना भर ही ! लेकिन दुनिया में सिर्फ पार टिकाकर खड़े होना कोई नहीं चाहता। कहने को तो यहा दिपकली भी टिकी हुई है और वाघ भी। तुम लोगों ने हमेशा वाघ की तरह पर जमाने की कोशिश की। का ख्याल था, बाघ की तरह जिन्दा रहने के लिए पिता का वैक-बैलेंस तगड़ा होना चाहिए । शायद तुम लोग सोचते थे, पिता को दौलत न हो तो मिक्षा की हजारो दिग्रियों के वावजूद छिपकली बने रहने के अलावा पौर कोई गति नहीं है, और तुम लोग जिन्दगी-मर छिपकली ही बने रहे । चूंकि तुम लोगों ने सुद बाघ बनने की उम्मीद छोड़ दी थी, पत उन बाघों से ही मेल-जोल बढाकर अपने को भी वाय नावित करने की कोशिश करते रहे। लेकिन, भइया, मैं तो हमेशा से ही छिपकली था। मेरे मा-याप, चाचा, ताऊ-मेरे चौदही पुरत महज छिपकली के वंशा थे। लेकिन इस सच को स्वीकार करने में मुझे तुम लोगों की तरह गर्म नहीं पाती थी। मैं तो बेहद गौरव के साथ अपने परिचय की घोषणा करना चाहता था। तुम लोगों ने मुझे हमेशा यही सोस दी कि इन्मान महज छिपकली के अलावा और कुछ नहीं है। लेकिन दुनियावालो के मामने अपने को बाध के रूप में प्रचारित करना बेहद जरूरी है। अपने पल्ने एक कोड़ी भी न हो, लेकिन अमीर बनने का ढोग जरूरी है। जबकि एक जून साना भी नमीब न हो, तव भी पान साकर मुर रगाए हुए, भरपेट खाने का ढोग रचना ज़रूरी है। तुम लोग रामझने थे यही दुनिया की रीति है । तुम लोग ही कहा करते थे कि जो पाने गुग के साथ कदम मिलाकर नहीं चलेगा, वह उसके तेज पाप में सते. जर्जर पत्त की तरह यह जाएगा।

दरअसल, यहीं मेरा तुम सबसे विरोध था। मेरा स्वभाव कुछ और था और तुम लोग थे मुझसे बिल्कुल विपरीत । मेरा कहना था, "मैं युग के साथ कदम मिलाकर क्यों चलू ? युग ही हमारे कदम से कदम मिलाकर चलेगा।" तुम लोग कहते थे, "तब तू युग के तेज बहाव में डूब जाएगा।" हालांकि मैं तुम लोगों की बात का कोई उत्तर नहीं देता था, लेकिन मन ही मन फैसला कर चुका था कि अगर मैं डूब भी जाऊं तो भी मंजूर है । कम से कम मेरा आदर्श तो बच जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि प्रादर्श बड़ा है या पैर जमाकर टिके रहना? हम लोग अक्सर इस टिके रहने के सन्दर्भ में ही गलती कर बैठते हैं । तुम लोग पैर जमाने के लिए दौलत को ही सबसे बड़ा मानते हो। चांदी के चंद सिक्कों के लिए नकली को असली कहने में भी तुम लोगों को कोई एतराज नहीं है। तुम लोग जिन्दगी में सिर्फ एक ही चीज़ को पहचानते हो-वह है रुपया ! सिर्फ तुम ही क्यों, दुनिया के तमाम लोग इसी नशे के दीवाने वन बैठे हैं। लेकिन मेरा स्वभाव बचपन से ही तुम सबसे अलग था। मेरे कपड़े-लत्ते भी तुम लोगों की तरह न वेशकीमती थे, न उजले-धुले । ऐसा भी नहीं था कि मैं चाहता तो वैसे कपड़े-लत्ते खरीद नहीं सकता था। लेकिन मेरे मन में वैसी कोई इच्छा हो नहीं जागी। अच्छा, क्या यह ज़रूरी है कि इन्सान को सिर्फ उसके कपड़े-लत्ते . से ही परखा जाए? इसका मतलब तो यह हुआ कि अगर किसी वन्दर को कीमती सूट पहना दिया जाए तो तुम सब उसके आगे भी भक्ति-भाव से सिर झुकाने लगोगे? हां, तुम लोगों के तौर-तरीके देखकर मुझे खुद अपने से भी नफरत होने लगी थी। मैंने फैसला कर लिया, जब इस युग में पैदा हुआ हूं तो जमाने के साथ कदम मिलाकर चलूंग। आज से मैं भी तुम लोगों की तरह दौलत की ही पूजा करूंगा। औरों की तरह मैं भी भगवान के पंडों की . ५२ खातिर करूंगा और यह दिसा दूगा कि मैं तुम लोगों को और और तरीको से भी हरा सकता हूं 1 हां, मैं तुम लोगों के आगे यह मावित कर दूगा कि दुनिया मे अगर रुपया ही असली चीज़ है, तो उसे भी हामिल करना कोई मुस्किल काम नहीं है। दुनिया में और कोई न सही, लेकिन तुम लोग मानी दुनिया के निन्यानवे प्रतिशत लोग तो मुझे शावामी देंगे। अतः मेरे भाई, मैं भी उमी दिन से साधना में जुट गया । मुना है, भगर साधना सच्ची हो तो एक न एक दिन इन्सान जरूर तरसको फरता C अगर मुझे तुम लोग जैसे यार-दोस्त न मिले होते, तो शायद मैं किसी और साधना में मन लगाता, लेकिन तुम लोगों की वजह से मन वही साधना शुरू कर दी। उस साधना में मेरी हार हुई है या जीत, यह तू खुद ही समझ गया होगा। । मैंने दुवारा बात शुरू की, "अब तुम असली घटना बतायो न ! मुझे तुम्हारे भाषण में कोई दिलचस्पी नहीं है।" तापस ने एक और सिगरेट मुलगा ली, और सिगरेट का एक लम्बा कश छोड़ते हुए कहा, "तू जिसे भापण समझ रहा है. दरअसल यह भाषण नहीं है। रे ! इसे यभिज्ञता करते हैं। मैंने अपनी जिन्दगी में जो अनुभव बटोरे हैं। उनके सारे निचोड़ के रूप में ये बातें तुझे बता रहा हूँ, दोस्त ! मैंने अच्छा किया या बुग, यह भी मन ही मन तौलता रहा हूं। हा, यह बात मुझे चुभती रही है कि मैं क्या बनना चाहता था और क्या बन गया? लेकिन इसके लिए प्राखिर कौन लोग जिम्मेवार हैं ? "हालाकि, ये बातें मुझे हर वक्त नही कुरेदती क्योकि इतना कुछ याद करने के लिए मेरे पास ,वस्त कहां है ? प्रादमी के पास मे-जैसे रपया बढ़ता जाता है उसके काम का वक्त धीरे-धीरे कम होता जाता है । उसके बाद उसका सारा पक्त पालतू-फालतू कामो मे ही तबाह ५३ . । होने लगता है। अत: अव मेरा भी अधिकांश समय फालतू कामों में ही वर्वाद होता है, दोस्त ।" मैंने पूछा, "फालतू काम का मतलव ?" तापस ने बताया- फालतू काम का मतलब है वही चिट्ठी-पत्री! इन्कम टैक्स ! लोगों से मेल-मुलाकात ! अरे भाई, जैसे ही तुम्हारे पास धन पाएगा, लोग तुम्हारे पास दौड़े पाएंगे। तुमसे जान-पहचान उनके लिए परम गौरव की वात होगी। तुम उनसे दो-चार बातें करके, हेल-मेल वढ़ाकर उन्हें धन्य- धन्य कर दोगे। लेकिन इसमें तुम्हारा काफी सारा वक्त नष्ट हो जाएगा। इसीलिए मैं इन्हें विल्कुल फालतू काम मानता हूं । अमीर बनने के बाद तुम्हें दुनिया भर के लोगों के शादी-ब्याह, अन्नप्रासन, श्राद्ध में शामिल होना होगा। उनके साथ फोटो भी खिंचवानी होगी। यह सव फालतू काम नहीं तो और क्या है ? लेकिन दोस्त, अपने बिछाए हुए जाल में अद मैं खुद ही फंस गया हूं। एक दिन था.जब मैं खुद ही बेशुमार दौलत कमाने के सपने देखता था, ताकि अमीर बनकर मैं तुम सबके सर पर सवार हो सकू । अब जब मैं सचमुत्र रईस वन गया हूं तो और अधिक रुपये कमाना मेरे लिए मुश्किल हो गया है । अब तो कोई मुझे रुपये कमाने की फुरसत ही नहीं देता। अब तो हर कोई मुझले मेल-मिलाप वढ़ाकर मेरे साथ डिनर- लंच खाने को उतावला है। सभी लोग मुझे अपने यहां खाने की दावत देना चाहते हैं। बस एक ही चीज़ मुझे कोई नहीं देता-वह है समय । मैं इस समय को लेकर ही महा-समस्या में पड़ गया हूं.. खैर, छोड़ो! तुम्हें असली घटना सुनाऊ । उन दिन भी मैं यथारीति विम्बवती यानी वेतिया घूमने गया था । वहां जाकर देखा काफी लोगों की भीड़ जमा है। उस दिन शायद समूचा गांव ही वहां उमड़ पाया था। और दिनों तो इस वक्त तक देव-पूजा शुरू हो जाती थी। भारती भी शुरू हो जाती थी। लेकिन उस दिन सब बन्द था। पता चला मन्दिर में चोरी हो गई है। ५४ मैं पचरज में पड़ गया । मैंने पूछा, "क्या चीज चोरी गई है ?" पुरोहित जी की प्रांखों से धार-धार मांसू बह रहे थे। उन्होंने पहा, "यहां पाकर देखो, क्या हुआ है ?" वे मुझे मन्दिर के अन्दर लिवा ले गए। मैंने देखा मन्दिर के कोने में संघ लगाई गई थी। उस सेंघ से अन्दर घुसकर कोई मन्दिर को दो मूर्तिया चुरा ले गया था। मैंने देखा शिव के अगल-बगलवाली मूर्तियां गायब थीं। यानी गणेश और पार्वती की मूर्ति ! जिस जगह वे मूतिया प्रस्थापित थी वहां की ईंटें तक टूटी पड़ी थी। जाहिर था कि जिसने भी चोरी की थी, वह शातिर चोर था। मैंने पूछा, "लेकिन यह चोरी हुई किस वक्त ? कल तो घनघोर बारिम हो रही थी..." बेतिया गाव के ही किसी निवासी की तरफ से उत्तर मिला, "हां, इसी बारिश की वजह से ही तो हम लोग बाहर नहीं निकले । हम सब अपने-अपने घरों का दरवाजा अन्दर से बन्द करके सो गए थे। इसी बीच चोर ने कय मेंघ काटी, पता ही नहीं चला।" हां, वाकई बरसात की तेज बूदों के शोर मे भला और कोई आवाज सुनाई दे सकती थी? मैंने पूछा, "फिर क्या हुमा ? तुम लोगों को पता ने चला ?" सबने एक स्वर में कहा, "उसके बाद की घटना के बारे में हम लोगों को कुछ नहीं मालूम । असल मे बरसात के दिनो में हमारा काम बहुत वढ जाता है। हम लोगो का पपादातर वक्त खेत-खलिहानो में ही बीतता है । हम लोग भी पांच बजे ही मपने-अपने खेतो में पहुच जाते हैं मौर पर लौटते-लोटते प्रायः शाम हो जाती है। हम लोग खापीकर फौरन सोने चले जाते हैं । विल्कुल मुर्दो की तरह सोते हैं । घर का मारा काम मा बहन-बीवियों के जिम्मे है । सो, हम लोगों को चोरों के बारे में कैसे पता चलता?" बर, मैं क्या कर सकता था? मेरे लिए कहने को भी क्या था? वस, मेरी मां यं छतछला पाई कि अब रोई तब रोई।

मैंने दरियाप्त किया, "पाप लोगों ने पुलिस में सूचना दी है ?" सवने कहा, "जी हां, हम लोगों ने पुलिस में सूचना दे दी। पुलिस आई भी थी। रिपोर्ट-विपोर्ट लिखकर ले गई है..." मैंने कहा, "पुलिस का कोई विश्वास नहीं। उन्हें तो बीच-बीच में खोंचा मारना ज़रूरी है, तब जाकर वे काम करते हैं। वर्ना रिपोर्ट ज्यों की त्यों पड़ी रहेगी। भई, गरीबों के लिए पुलिस भी नहीं होती मेरी बात पर लोगों को अक्षरशः विश्वास हो गया। किसीने कोई प्रतिवाद नहीं किया । सब आपस में श्रागामी कार्यक्रम के बारे में सलाह- मशविरा करने लगे। मन्दिर की छत पर ही सभा बैठी। गांव के सभी लोग वहां इकट्ठे हुए। वाकई, यह घटना नजरअन्दाज़ करने लायक थी भी नहीं। आखिर कुछ न कुछ तो करना ही था। लेकिन कोई भी यह नहीं बता पाया कि क्या करना होगा। जो घटना घटी है, उसका प्रतिकार क्या होगा ? हां, एक उपाय हो सकता था। अबसे मन्दिर पर पहरा विठा दिया , , जाय । पुरोहित जी के रहने-सहने का इन्तज़ाम भी मन्दिर के आस-पास ही कर दिया जाए। गांववाले ही उनके लिए घर बनवा देंगे। अगर मन्दिर के पास-पास लोगों की घनी आवादी हो तो मन्दिर से मूर्तियां चोरी जाने का डर नहीं रहता। लेकिन घर-द्वार बनाने के लिए रुपये की भी तो ज़रूरत पड़ती ? मैंने कहा, "हम सभी भक्त मिल-जुलकर चन्दा उठाएंगे। जनता के रुपयों से पुरोहित जी का घर बनेगा। चलो, सवसे पहले मैं ही अपनी तरफ से सौ रुपये देता हूं..." लोग मेरी अगाध भक्ति देखकर चकित रह गए । यह बात अधिकांश लोगों की कल्पना के बाहर थी कि मैं अपनी जेब से एकदम से सौ रुपये निकालकर दे सकता हूं व्यक्ति देखकर उनकी जुबान ही नहीं खुल पाई। मेरी तरफ वे लोग मुंह बाए देखते रहे। मेरी देखा-देखी कई और लोगों ने भी चन्दा देने का वादा पिया। किसीने पांच रुपये दिए, किसीने एक रपया। किसीने माठ ही माना। सबने अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार चन्दा देने का वादा किया। मैंने कहा, "हां, पहले भगवान ! उसके बाद रुपया-पैसा!" मेरी बातों पर शायद तुझे हंसी पा रही होगी। लेकिन यह सबक तो मैंने तुम्ही लोगों से सीखा था । अव में कोई मोर ही मादमी बन गया पा। उन दिनो में रुपये को ही जिन्दगी में मर्वाधिक महत्त्व दे बैठा था। मैंने बीच में ही टोककर पूछा, "यानी अब तू भगवान को नहीं मानता?" तापस ने कहा, "वत् ! भगवान और कुछ नही इन्नान के मन को महम कल्पना है, रे ! दुनिया में आज भी जो हम लोग भगवान का नाम बचाए हुए हैं, वह गरीबो की प्रांतो मे घून झोकने के लिए है। वैसे मैं यह भी जानता हूं कि दुनिया मे मुझसे कहा गयाज और कोई नहीं हैं।" "तू व्गवाज़ है ?' "क्यों, मैं ठगवाज नहीं हूं? तू यह क्या कह रहा है ? अगर मैं ठगवाज न होता, तो इतना बडा अमीर कैसे बन पाता? अरे भाई, माजकल सीधी राह से कोई भला अमीर वन मकता है ?" में खामोश हो गया। लेकिन थोडी देर बाद मैंने दुबारा पूछा, "हां, तो उसके बाद क्या हुप्रा ?" तापस ने कहा, "अगले दिन मैं अपने वादे के अनुसार उनके हाथ "पर सौ रुपये का एक और नोट रस पाया।" "यानी पत्थर की मूर्तियों के लिए तूने सचमुच सौ रुपये दे डाले ?" "देता कैसे नहीं ? मैंने उन्हें मौ रुपये देने का वादा जो दिया था।" "उन दिनो ठाकुर-देवतानों पर तेरी सचमुच इतनी भक्ति थी ?" "मरे, धत् ! मैंने रपये क्या अपनी जेब से दिए थे ? मुझे वह अंग्रेज साह्य दो सौ रुपये एडवान्स नही दे गया था?" .

"तूने क्या उन्हीं रुपयों में से सौ रुपये निकालकर दे दिए ?" "मैं क्यों देने लगा ? अगले दिन साहब ने मुझे उन दोनों मूर्तियों के लिए साढ़े पांच हजार रुपये नकद दिए थे।" "इसका मतलव ?" मैं चौंक उठा, "यानी तूने ही मन्दिर में सेंधं लगाकर मूर्तियां चुराई थीं।" तापस ने ठहाका लगाते हुए कहा-- देखता हूं, तेरी बुद्धि मोटी की मोटी ही रह गई। हां, मैंने ही तो वे मूर्तियां चुराई थीं। पिछली रात मूसलाधार बारिश हुई थी न ! मैंने मन ही मन सोचा, ये अच्छा मौका है। मुमकिन है ऐसा सुनहला मौका शायद फिर कभी हाथ न लगे । अतः मैं उसी रात फावड़ा लेकर निकल पड़ा। उस मन्दिर का चप्पा-चप्पा मेरा जाना-पहचाना था। मैंने यह भी पता लगा लिया था कि मन्दिर का कौन-सा हिस्सा कमजोर है। इसके पहले मैं ही हर रात आरती के समय भीतर की ईंटें हिला-डुलाकर खिसका प्राता था । मैं चुपचाप बालू-विहीन दीवारों को खुरच-खुरचकर वहां की इंटों को धसका देता था। मैं तो वहां की गंथाई तक हिला पाया था । मन्दिर की उस खास जगह को मैंने बर्तन-बासन, गुप्त-दान के बक्स- वगैरह से ढंक दिया था। उसके आगे लकड़ी का एक सन्दूक भी लगा पाया था ताकि वह जगह पूरी तरह ढंकी रहे । ऐसी हालत में मूर्तियां चुराना मेरे लिए कोई मुश्किल काम नहीं था। अगले दिन शाम होते न होते साहब भी आ पहुंचा। उस दिन भी मेमसाहब उसके साथ आई थी। साहव ने पूछा, "क्यों, बदर ? कोई सुराग मिला?" "हां, मिला है।" साहब खिल गया, "क्या सच ? कुछ पता चला है ? क्या मिला ?" "दो मूर्तियां मिली हैं। एक पार्वती की मूर्ति, दूसरी गणेश की।" साहब एकदम से उछल पड़ा, "कहां है ?" "पाओ, प्रायो, तुम लोग अन्दर तो प्रायो।" .

में उन दोनों को अन्दर लिवा लाया । मेरी कोठरी काफी छोटी थी। सिर्फ एक मादमी के रहने लायक जगह । लेकिन उसके पास ही थोटी-मी साली जगह भी थी, जहा में रसोई बनाता था। उसे चारों तरफ मे घर कर मैंने वहां एक कमरा बना लिया था। मैंने मूर्तियां कुछ इस ढंग से रखी थी ताकि उन्हें बाहर से कोई न देस पाए। उस जगह रसोई की लकड़ियां रखी रहती थी। उन दोनों मूर्तियों को मैंने वही लकडी से ढंक दिया था । वाहर से देखकर लगता था, मानो वहां लकड़ी का गोदाम हो । भीतर से दो मूर्तिया निकल पाई। वे दोनों मूर्तिया देखकर साहब और मेमसाहब को पाखें सुशी से चमक उठी। वे दोनो मूतियो पर यूं हाथ फेरने लगे, मानो उन्हें प्यार कर रहे हों। साहब ने पूछा, "कहां से मिली ?" "वगान खोदते-खोदते तो मैं तंग मा गया था..." मेमसाहब भी अवाक् हो उठी। उन्होंने पूछा, "ये भूतिया श्या इसो बाग से मिली है ?" "हा, चीं तो बगान में ही, लेकिन काफी सोदा-सादी के बाद जाकर मिली हैं । मिट्टी खोदते-सोदते मेरा तो अंग-अंग दर्द करने लगा है।" साहब ने भी सहमति जताई कि बदन दर्द करना तो स्वाभाविक है। वे समझ गए कि इस काम के लिए मुझे सच ही यहुत परेशान होना उन्होने पूछा, "प्रव वतामो, कितना लोगे ?" मैं मुश्किल में पड़ गया। कितना मांगा जाए ? मैंने कहा, "मूलचन्द जो भी मेरे यहां चक्कर लगा गए हैं।" मूतचन्द का नाम सुनते ही साहब का चेहरा गम्भोर हो उठा। मचानक वह मूलचन्द को अंग्रेजी मे ऐसी-ऐसो गालिया देने लगा, जिन्हें सुनकर दाम से कान लाल हो उठे। उसने छूटते ही पूछा, "कुछ एडवान्स भी दे गया है ?" मैं झूठ बोल गया, "नहीं ।"

मैंने कहा, मेरी बात सुनकर साहव और विफर गया। मुझे समझ नहीं आया कि साहब का गुस्सा मुझ पर है या मूलचन्द पर । लेकिन मैं तो साहव और मूलचन्द दोनों ने ही एडवान्स ले चुका था । वैसे एक ही चीज के लिए दो-दो लोगों से एडवान्स लेना जुर्म है । "मैं एडवान्स लेना नहीं चाहता था लेकिन मूलचन्द जबर- दस्ती मेरे आगे रुपये फेंककर चला गया।" मेमसाहब ने पूछा, "कितना रुपया दे गया है ?" इस बार भी मैं फिर झूठ बोल गया । हां, एक जमाना था, तुम लोगों की बातचीत, तौर-तरीका देख- सुनकर मुझे बेहद कोफ्त होती थी। तुम लोगों की बातों में मैंने कभी उत्साह नहीं दिखाया । मैं तुम लोगों के विचारों से भी कभी सहमत नहीं हुआ। लेकिन आज में स्वीकार करता हूं कि शायद तुम लोग ही ठीक थे और मैं गलत था। हां, जब सारी दुनिया तुम्हारे साथ है, तो दल त्यागकर यूं अकेले-अकेले तकलीफ सहना सचमुत्र बेमतलव है । मैंने बताया, "मूलचन्द जी, मुझे एक हजार रुपया एडवान्म दे गए साहब का हाथ फौरन जेव में चला गया। उसने कहा, "हां, मैंने तुम्हें सिर्फ दो सौ रुपये ही एडवान्स दिए थे, लेकिन लो, आज पूरे पांच हजार रुपये दे रहा हूं। यानी उन दोनों मूर्तियों की पाई-पाई कीमत चुका रहा हूं।" यह कहकर उसने सौ-सौ के पूरे पचास नोट गिन दिए । मेरे मुंह से एकबारगी निकल गया, "पांच हजार !" साहब ने बीच में ही बात काटकर कहा, "हां ! पहले मेरी बात तो मुनो । ये रुपये अच्छी तरह गिन तो लो।" मैं वे रुपये फिर से गिनने लगा। पूरे पांच हजार रुपये ये । मेरी उंगलियां कांप रही थीं। साहव की नजरों से भी वायद यह बात छिपी नहीं थी। उसने कहा, "लायो, तुम्हारे सामने ही रुपये दुवारा गिन में मन ही मन विस्मित था, इतने सारे रुपये! इतने सारे रुपये दूं।" ६० कर मातिर में करूंगा क्या? इन्हें कहां रखूगा ? मेरे पास तो मिर्फ एक मूटकेस-भर का धासरा-भरोसा है । माहब ने छूटते ही कहा, "क्या सोच रहे हो ? कम दाम मिले हैं ?" मैंने वेवकूफ की तरह सिर हिला दिया, " हां-" साहब का हाय फौरन जेव मे चला गया। उमने कुछ और नोट निकालकर सामने रख दिए, "ठीक है। ये लो पाच सौ रुपये पौर रखो..." मैंने हाध बढाकर वे रुपये भी समेट लिए। सच कहूं, उस वक्त में मापे में नहीं था । मेरे दोनो कान मनझना रहे थे। साहब ने कहा, "ठीक है। अभी ये मूर्तियां अपने पास ही रहने दो। मैं बाद में प्राकर ले जाऊंगा..." लेकिन मेमसाहब शायद किसी दुविधा में पड़ी थी। उसने कहा, "लेकिन वह बगर' मूलचन्द अगर कही दुबारा मा धमके और ज्यादा रुपयों का लालच दिखाकर मूर्तिया लेकर चम्पत हो जाए, तब क्या होगा?" साहब ने कहा, "हां, यह बात भी है। सचमुच ये मूर्तिमा प्रब यहां छोड़ी नही जा सकती । ठीक है, मैं यहीं रुक जाता हूं । ऐसा करो, तुम चली जानो पोर रात को जीप ले पाना और मुझे ले जाना ।" यह बात मेमसाहब को जंच गई। वह चली गई मोर साहब मेरे साय ही रह गया। कुछ देर बाद उसने अपने कन्धे से वंग उतारकर उसमें से गाजे की एक चिलम निकाली। मैं गाजे की चिलम देखकर भौंचक्का रह गया। मुझे घबराहट होने लगी कि साहब खुशी के मारे कही यही बैठकर गांजे की दमन लगाने लगे। उसके बाद ही साहब एक और कांड कर बैठा। उसने अपनी जेव से एक बोतल निकालकर कहा, “पापो हम लोग 'मेलिब्रेट करें। उठो, एक गिलास ले मानो।" १. एक अमेरिकन स्तंग जिसका अर्थ 'हरामखोर' या 'ठग' होता है।

साहब ने गिलास भरकर मेरी ओर खिसका दिया, "लो, पिनो !" दोस्त, इससे पहले मैंने कभी शराव नहीं चखी थी; यह तो तुम लोग भी जानते हो। तुम लोग तो कभी-कभार चोरी-छुपे एकाच चूंट चढ़ा भी लेते थे। उस समय मुझसे भी पीने की जिद करते थे ? तुम लोगों का कहना था, शराब पिए बिना माडर्न होना असम्भव है। जो लोग दकियानूस होते हैं, वही शराव को हाथ लगाना पाप समझते हैं । उन दिनों में तुम लोगों की बातों का सख्त विरोध करता था ! लेकिन उस दिन दुविधाग्रस्त होते हुए भी, शराब का गिलास उठा ही लिया। वैसे पीने के पहले मन ही मन काफी डर भी लग रहा था। मुझे यही डर था कि नशे में लड़खड़ाकर कहीं गिर न पड़। कहीं उल्टी न कर लेकिन, माई डियर, शराब पीकर मेरे दिल को बड़ी राहत मिली। मैंने पहली बार महसूस किया कि दुनिया में जीना कितना सुखद है ! समूची धरती मानो स्वर्ग लगने लगी। स्वर्ग को कभी मैंने अपनी प्रांखों से नहीं देखा। स्वर्ग के बारे में केवल कल्पना-भर की थी। मुझे लगा, शराब पीकर मैं सशरीर उसी स्वर्गलोक में पहुंच गया हूं। साहब ने पूछा, "और थोड़ी-सी लोगे ?" मैंने कहा, "लामो, दो ! गिलास भर दो, साहब ! मुझे तुम्हारी यह चीज़ बहुत पसन्द आई है।" इसके बाद साहव ढालता गया और मैं पोता गया। मुझे याद नहीं रहा कि मैं कितने गिलास चढ़ा चुका हूं। उसके बाद जाने कव धुत्त सो गया; इसका भी होश नहीं रहा। जब नींद टूटी तो चारों तरफ अंधेरा छा चुका था । शायद काफी रात हो गई थी। मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा। होश आते ही; सबसे पहले मुझे अपने साढ़े पांच हजार रुपयों का ख्याल आया ! कहीं वह रुपये लेकर तो चम्पत नहीं हो गया? नहीं ! मैंने अपनी जेब टटोलकर देखा। बंडल में बंधे हुए रुपये बिल्कुल ठीक-ठीक थे, यानी गुम नहीं हुए थे। ।

मेरी निगाह साहब पर ठहर गई। वह बिल्कुल फिट वायू बना
गाजे की दम वगाए जा रहा था। उस वक्त उसे अपने पास-पाम की
दुनिया को कोई खबर नहीं थी।
मुझे जमा हुप्रा देखकर साहब ने पूछा, "बयो ! नोद पूरी हुई ?"
कहा, "हा"मेमसाहब यहा हैं ? प्रभी तक प्राई नहीं ?"
साव ने कहा, "नहीं, अभी उसके प्राने का समय नहीं हुआ। जरा
और रात होने पर प्राएगी।"
ऐसाही हुमा । रात क्रमा: गहरी हो आई। साहब गिलाम पर
गिलास चटाता रहा। बीच-बीच में गाजे की दम भी लगाता रहा ।
मैंने पूछा, "तुम्हे भूख नही लगो, साहब ?"
"हां, लेकिन पाने को तो कुछ भी नहीं है । क्या खाऊ ?"
"अगर तुम कहो तो खिचही बना दू !"
"पिचड़ी ? हो:-खिचडी"इज वेरी गुड--"
उस वक्त मेरे पान चावल-दाल, पाल, नमक, तेल सभी कुछ मौजूद
था। मैंने खिचडी चढ़ा दी। खिचड़ी पकते-पस्ते करीब आधी रात हो
भाई। उसी वक्त मेमसाहब भी एक जीप लिए हुए हाजिर हुई।
खिचड़ी बिल्कुल तैयार थी। माहब और मेमसाहब ने मिलकर
मूर्तियों को गाडी में चडाया, फिर मेरी तरफ मुड़ कर कहा, "अच्छा, तो
फिर हम चलें!"
"क्यों, विचढी नहीं सामोरे ?"
"फिर कभी पाकर खा लेंगे। माज रहने दो।"
उन्होंने जीप में बंटने में पहले मुझसे कहा, "हां, एक बात और है,
इन बीच मगर मूनचन्द पाए तो टमसे इस बारे में कुछ न कहना, बदर!
और हां, फिर कोई मूर्ति मिले तो मुझे ही देना । दोगे न?"
माह्य उचन्द का स्थान पाते ही शायद महम गया था।
मैंने "मेरे लिए न तुम गर हो, न मूलचन्द ! जो मुकचे
दाम देगा, मैं उमं ही दूंगा।"
साहब ने कहा, "अच्छा, ठीक है । मूलचन्द तुम्हें जिसने कार देगा,
मैं मका यल दूंगा। अच्छा, में फिर माझंगा । तुम जरा भरने यगोत्र
-

में फिर तलाश शुरू करो।" इतना कहकर वे लोग जीप में बैठकर चले गए। तापस ने अपनी बातों का सिलसिला जारी रखा- समझे, भइया, उसी दिन मैंने ज़िन्दगी में पहली बार शराव चखी थी और पहली बार हज़ारों-हजार रुपयों का मालिक बना था। वे रुपये मैंने अपनी कोठरी में जमीन खोदकर गाड़ दिए। मैं मन ही मन यह सोच-सोचकर परम निश्चिन्त हो गया कि अव रुपयों के अभाव में कभी तकलीफ नहीं सहनी होगी। एक बार तो मन हुआ अब नौकरी को भी लात मार दूं । इस नौकरी में रहते हुए, पास में रुपया-पैसा होने के बावजूद अच्छे कपड़े-लत्ते, जूते पहनने को मुहताज वना रहूंगा। पांच हजार रुपयों का मालिक होने के वावजूद मुझे वगीचे में मालीगिरी ही करनी होगी। बगीचे में कुदाल चलाकर मिट्टी खोदनी होगी, सर पर तरकारियों की टोकरी उठाए, शहर में मालिकों के घर पहुंचना होगा। उनके लिए तो मैं तीस रुपल्ली के नौकर के अलावा और कुछ भी नहीं था ! मैं मन ही मन उधेड़बुन में पड़ा हुआ था। कभी-कभार वेतिया गांव के भी चक्कर लगा पाता था। वहां मन्दिर के मरम्मत का काम शुरू हो गया था । अगर मैं वहां जाना एकदम से बन्द कर देता तो शायद उन्हें मुझपर शक हो जाता । अपने को बड़ा बनाने के लिए, जो बड़े नहीं हैं, उन्हें हाथ में रखना बेहद जरूरी है। हर बड़ा आदमी इस शिक्षा को गांठ बांधकर चलता है। अत: मैं भी इससे पूरा-पूरा फायदा क्यों न उठाता? लेकिन सच वात तो यह थी कि मूलचन्द पोर साहब ने ही मुझे वह राह दिखाई थी, वर्ना जिन्दगी-भर शायद मैं तीस रुपल्ली का माली ही बना रहता। मैंने पूछा, तापस ने बताया- "फिर क्या हुआ ?" ६४ ल-४ उसके बाद मेरी महत्त्वाकांक्षाएं बढती गर्द; मेरे दोस ! सान की जिन्दगी में महत्त्वाकाक्षा ही उसकी मबसे वही दोस्त भी है पोर शत्रु भो। महत्त्वाकांक्षा न हो तो प्रादमी पपनी तरक्की की तरफ से लापरवाह हो जाता है और मगर व्यक्ति की तरको न हो तो समप्टि की उन्नति असम्भव है । लेकिन यह बुरी इसलिए है कि इन्मान के तमाम रोग-शोक, प्रशान्ति, अन्याय और अत्याचार के मूल में यही महत्त्वा- कांक्षा रहती है । दरअमल महत्त्वाकांक्षा ही छोटे प्रादमी को यहा बनने के लिए निरन्तर दौड़ाती रहती है। मैं तो हमेशा में ही छोटा प्रादमी पा। उस दिन से बडा बनने के लिए, यानी अधिक से अधिक रुपमा कमाने की कोगिग में जी-जान में जुट गया। तीस रुपल्ली को नौकरी करता था न, इमोलिए मुझे तीस करोड़ का मालिक बनने की धुन सवार हो गई। इस धुन के पीछे भी वही महत्त्वाकाक्षा है । क्या बनाऊ, इस महत्त्वा- कांक्षा ने ही मेरा मर्वनाश कर डाला, हिमर ! मैं तापस की बातें सुनकर भवान रह गया, "सर्वनाश ? तू इमै सर्वनाश क्यों कह रहा है ?" तापस ने जवाय दिया, "हां, भाई, बेशुमार दौलत हो मेरे लिए सर्वनाश का परवाना पाई..." "सो कैसे?" "हां, हो सकता है, तुम लोग इसे सर्वनाश न मानो, क्योंकि तुम लोगों की जिन्दगी में रुपया ही सबसे बड़ी सम्पत्ति है । लेकिन मैं इमे मर्वनाश ही मानता हूं। हां, मैंने रुपया जरूर पाहा था, लेषिन में सब कहता हूं, इ-त-ना रपया नहीं चाहा था। मसल में रम्मा की वजह से ही मेरा सर्वनाश हुमा ।" मेरा अचरज बढ़ता जा रहा था, "रम्भा ? मतलय? यह रम्भा कौन थी? रम्मा क्या किसीका नाम था?" -हो, एक भारत का नाम ! घटना-क्रम में मुझ जैसा इन्मान भी एक दिन किसी लड़की की जिन्दगी से जुड़ गया। हालांकि तुम लोग भी जानते हो कि इस तरह की कोई दुर्वलता मेरे मन में कभी नहीं थी। " लेकिन ये सब बातें बाद में होंगी। पहले मैं अपनी नई ज़िन्दगी की शुरुवात के बारे में बता दूं। जिस दिन मेरी पॉकेट में पांच हजार रुपये आ गए, मैंने समझ लिया कि रुपया जैसी चीज़ दुनिया की मिट्टी में कदम-कदम पर बिखरी पड़ी है । आदमी को सिर्फ बटोरना आना चाहिए । इसके अलावा और किसी चीज़ की जरूरत नहीं है। उस वार भी यथारीति मैं वगीचे के फल-सब्जियां लेकर लखनऊ पहुंचा। खैर, हर बार ही ये चीजें लेकर मैं मालिक को सलाम ठोंकने पहुंच जाता था। वह बुढ़िया धार्मिक स्वभाव की औरत थी। हर दिन नियम से गोमती. स्नान करने जाती थी और घर लौटकर दिन-भर पूजा-पाठ और तुलसीदास की रामचरितमानस का पाठ सुनते रहना उसका रोज़ का नेम था। वह मुझे वेहद प्यार करती थी। खासकर दर-तरकारी ले जाने की वजह से वह मुझे बेहद चाहती थी। मालिकों का भी यही ख्याल था कि मैं ईमानदार आदमी हूं। बंगाली था तो क्या हुआ ? मेरे मालिकों का कहना था कि.मैं आम बंगालियों से अलग हूं लेकिन मेरे मन में उस वक्त एम्बिशन यानी महत्त्वाकांक्षा का जहर प्रवेश कर चुका था, इसका उन्हें सुराग तक नहीं मिला। प्रत: उनके घर के दरवाजे मेरे लिए हमेशा खुले हुए कोठी के रसोइया को यह खास हुक्म था कि मैं खाने में जो-जो चाहूं, मुझे वही परोसा जाय । हालांकि मांस-मछली उस कोठी में निपिद्ध था; लेकिन दूध-दही की कोई कमी नहीं थी। मैं जी भरकर दूध-दही पर हाथ साफ करता था । महाराज से कहने-भर की देर होती थी। वह मेरे लिए लोटा भरकर लस्सी तयार कर देता था। यू भी महीने में सिर्फ एक बार ही तो वहां जाता था । सुवह पहुंचता था और वह दिन और रात वहां बिताकर अगले दिन पौ फटने के पहले ही मैं गांव के लिए रवाना हो जाता था। लेकिन उस बार एक कांड हो गया। मैं उस दिन भी यथारीति सुबह के वक्त पहुंचा और भाईजी को तर-तरकारी सौंपते हुए, उनके पैर । थे।

छूकर प्रणाम किया। उसके बाद नहाना-साना निपटाकर शहर घूमने निकत गया। शाम के शो में एक फिल्म भी देख डाली। रात को घर लोटकर सो गया। सुबह पौ फटने के पहले मुझे जाग जाना चाहिए था, क्योकि भोर-भोर ही मुझे ट्रेन पकड़नी थी। लेकिन उस दिन मैं ऐमी गहरी नीद सोया कि सुबह होने का पता ही नहीं चला। जब नींद टूटी तो भौर के करीब पाच बज चुके थे। उस समय तक दिन को हलचल शुरू हो चुकी थी । कोठी में अजव- सा कोहराम मचा हुपा था। उसी शोर-गुल में मेरी भी नीद टूट गई। पता चला पूजा-घर से नटराज की अष्टधातुवाली मूर्ति चोरी हो गई मैं भौचक्का रह गया। कोठी में जितने महाराज, नौकर-दाई थे, सब अपना-अपना काम छोडकर वहां इकट्ठा ये। सबके चेहरे पर विस्मय. कौतूहल भोर भय को छाप थी। कोठी को इतनी पुरानी मूति ! दादे- परदादों के जमाने से उस पुस्तैनी मूर्ति की पूजा होती पा रही है । मिर्फ पूजा ही नहीं, कहते हैं इस कोठी की तमाम सम्पत्ति और ऐश्वयं उमी गृह-देवता की कृपा का फल था। कोठी के मालिक सुबह नहा-धोकर सबसे पहले इसी देवता की पूजा मे बैठते थे और पूरे एक घण्टे तक पूजा करते थे। तब तक मूर्ति को गेवा-मारती के लिए पुरोहित जी भी पहुंच जाते थे। पूजा का सामान जुटाने के लिए वहां पहले से ही प्रादमी तैनात रहते थे। इतनी सारी व्यवस्था-वन्दोवस्त के बावजूद मोर इतने इतने लोगों के होते हुए भी यह मूर्ति कोन चुरा ले गया ? प्राखिर यह चोरी किस वक्त हुई ? हर किसीके मन में यही प्रश्न घुमह रहा था। मैं भी वही सड़ा या। मेरे मन में भी वही प्रश्न शोर मचा रहा था। माताजी ने मुझसे पूछा, "तुम तो रोज सबेरे ही उठकर चले जाते हो, भइया ! मान यहीं थे-तुमको भी पता नहीं चला ?" मैंने बेहद निरीहता से जवाब दिया, "हुजूर, मुझे कल रात सिनेमा देखकर लौटने में काफी रात हो गई थी, सो पककर सो गया। मुबह नीद ही नहीं टूटी। वैसे कोई धमाका सुनता तो मेरो नीद जहर टूट जाती।"

हां, यह वात तो सच थी। कोठी में इतने सारे लोग! कौन कहां सोता है, कौन कव आ-जा रहा है, इसका भी तो कोई ठीक-ठिकाना नहीं 1 इतनी बड़ी कोठी में इस सवकी खोज-खवर रखना भी सम्भव नहीं था। पुलिस में खबर दी गई। पुलिस आई, सवकी रिपोर्ट लेकर वापस लौट गई। मैं वहां रहकर क्या करता ! मैंने भी विदा ली। यह मेरा तीन नम्बर केस था। पहले की तरह इस केस में भी वे- कसूर खलास हो गया । पहला केस-गणेश की मूर्ति । दूसरा केस- पार्वती और गणेश की मूर्ति और उसके वाद नटराज की मूर्ति । दरअसल चोरी करते हुए जिस चीज़ की सबसे अधिक ज़रूरत है, वह है संयम । वड़ा साधु या बड़ा चोर बनने के लिए संयम ज़रूरी है । उस साहव ने मुझे इस बारे में सावधान कर दिया था। मुझमें वह संयम था, इसीलिए मैं सीधे अपनी नौकरी पर लौट आया। मैंने आते समय किसीसे मुलाकात तक नहीं की, रास्ते में भी किसीसे कोई वातचीत नहीं की। क्या पता, पुलिस को कहीं मुझपर ही चोरी का शक न हो जाए । उस घटना के बाद मुझे और किसी मूर्ति की तलाश नहीं थी। हां, वीच-बीच में वेतिया जाकर नई मूर्ति तैयार कराने के बारे में ताकीद करवाता था। अगले महीने की पहली तारीख को जब मैं मालिक की कोठी में पहुंचा तो खबर मिली कि कोठी के दरवान को छह महीने की जेल हो गई है। ! मैंने महाराज से ही दरियाफ्त किया, "दरवान को क्यों जेल जाना पड़ा, महाराज ! कहीं उसीने तो चोरी नहीं की थी ?" महाराज ने जवाव दिया, "हां भइया, वह दरवान वाहर से तो विल्कुल सीधा-सादा और भलेमानस जान पड़ता था, लेकिन अन्दर ही अन्दर नम्वरी शैतान था..." मैंने दुवारा पूछा, "अच्छा, यह चोरी उसीने की थी। इसका कोई દર सबूत भी मिला था ?" महाराज ने कहा, "मरे, सबूत न मिला होता तो क्या वैकार ही उसे जेल भेज दिया जाता? अरे, मइया, यह महाराज चोरी चोरी गाने फा दम जो लगाया करता था। मैंने अपनी मासों से उसे गाजा चढ़ाते देखा है..." "हा, तव तो वह बेटा जरूर चोर होगा । गजेड़ी यादमी सभी मला नहीं हो सकता।" खैर, जब सारा मामला निबट गया और अपराधी भी गिरफ्तार कर लिया गया तो एक रात साहव प्रौर मेमसाहब दुबारा मेरे बगीचे में भा धमके। मैं मपनी कोठरी में सरटैि भर रहा था। उनकी पावाज सुनकर बाहर पाते ही साहब ने फुसफुमाकर कहा, "चुप ! बात मत करो । बत्ती भी बुझी रहने दो..." यह कहकर वे दोनो मेरी कोठरी में घुस पाए और अन्दर से सिट- किनी लगा ली। उन्होंने कोठरी के अन्दर घुसकर कहा, "हां--प्रब बत्ती जलामो।" मैंने बत्ती जला दी । साहब ने अपनी जेब से गड्डी-गड्डी नोट निकालकर मुझे देते हुए कहा, "ये लो । दस हजार रुपये हैं !" दस हजार रुपये ! मैं चौंक उठा । साहब ने कहा, "यं रपये अच्छी तरह गिन लो। अब तक तो तुम्हारे पास बहुत सारे रुपये हो गए होगे । लेकिन भव सुम्हारा यहा रहना नहीं चलेगा.. "क्यों ?" "हां, अव तो हम लोगों का भी यहां रहना असम्भव है। लोगों को पता चल गया । इसके पीछे मूलचन्द का हाथ है।" में जैसे आसमान से गिरा, "मूलचन्द ! मूलचन्द को यह बात से " मालूम हुई ?" 'इतने दिनों नहीं जानता था, लेकिन अब जान गया है । ममल में इस धन्धे में अब उसको बसी मामदनी नही रही । शुरू-शुरू में वही हम लोगों को माल सप्लाई करता था। लेकिन मय नहीं कर पा रहा ६६ इन दिनों उसे रुपयों की कड़की है, इसीलिए वह भूखा खटमल हो रहा है। अब वह ज़रूर पुलिस को खवर करेगा। नटराज की मूर्ति चोरी जाने के वाद, जिस वक्त वहां हंगामा मचा था, मूलचन्द मन ही मन तुमसे बुरी तरह जल उठा था।" "लेकिन उस जुर्म के लिए तो दूसरा आदमी पकड़ा गया था और उसे जेल भी हो चुकी है।" साहव ने कहा, "बाहरी लोग जो जानते हैं, वही ठीक है, लेकिन मूलचन्द तो इसी धन्धे का आदमी है न ! उसको पक्का विश्वास है कि इसके पीछे तुम्हारा ही हाथ है। अब अगर वह पुलिस में खवर दे दे तो मुमकिन है, तुम्हारी कोठरी की तलाशी ली जाए। अगर तुम्हारी कोठरी से पुलिस को हजारों-हजार रुपये हाथ लो, तो वह तुम्हें ही पकड़ेगी। इससे बेहतर है तुम यहां से फौरन चल दो..." मैंने पूछा, "और मेरी यह नौकरी?" साहब ने कहा, "तीस रुपये की नौकरी के लिए तुम्हें इतनी चिन्ता है ? तुम्हारे पास जो बुद्धि और प्रतिभा है, उसके लिए तीस रुपये तनखा देकर तुम्हारे मालिक तो तुम्हें एक्सप्लॉयट कर रहे हैं । तुम्हें तो असल में तीस हजार रुपये मिलने चाहिए।" "तीस हजार रुपये ? लेकिन इतने रुपये मुझे कौन देगा?" साहब ने मेरे सीने पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "मैं दूंगा हां, मुझे याद है, उस दिन मैं साहव की बात सुनकर एकबारगी चौंक उठा था। तीस हजार रुपया महीना ? यह तो किसी अरवी उपन्यास जैसी घटना लगती है। मैंने पूछा, "तुम मुझे इतने रुपये कहां से दोगे ? और भला क्यों दोगे?" साहब कहा, "अरे भाई, वह रुपया मैं नहीं दूंगा। देखना, तुम खुद ही उतने रुपये कमानोगे।" मैंने दुवारा पूछा, "मुझे काम क्या करना होगा ?" "क्यों ? जो काम अभी कर रहे हो, वही काम ।" "लेकिन यहां तो मुझे और किसी मूर्ति का सुराग नहीं मिला। - ! जितनी मूर्तियां थी, वह तो मैं तुम्हें दे हो चुका हूँ। अब वो मेरे पास एक भी नहीं है-" "मरे है ! बहुत मारा है ! इंडिया इतना विशाल मुल्क है ! इतना प्राचीन देश ! इतना पुराना ट्रेडीशन ! अरे, यहां कितनी-रितनी मूर्तिया हैं ! येहिसाव ! उनका हिसाब किसीको नहीं मालूम ?" उस रात मैं साहब के पास बैठा-बैठा उनकी बातें सुनता रहा। साहब ने उस दिन मेरी भावों में जमे नशा भर दिया । मेरा लालच बढा दिया और मेरी जिन्दगी की समूची धारा एकवारगी बदल दी। मैंने पूछा, "अब मुझे क्या करना होगा ?" "तुम यह नौकरी छोड़ दो और मेरे साथ चलो।" मैंने चकित होकर जानना चाहा, "कहाँ ?" "यह हम वाद में बताएंगे!" इतनी देर बाद मेमसाहब ने पहली बार मुंह खोला, "हांहां, चलो न, प्रदर ! अभी, इसी वक्त चलो। लो, तैयार हो लो। रात में ही चल देना बेहतर है ताकि कोई देख न सके।" मैं तैयार हो गया। वैसे भी तैयारहोने में मुझे वक्त कितना लगता? सम्पत्ति के नाम पर मेरे पास कुल मिलाकर महज दो अदद कुर्ता-धोती। वही लेकर निकल पड़ा । घुप्प-अंधेरी रात ! निस्तब्ध परिवेग! हमारी जीप वगीचे के सामोश पेड़-पौधों को छाया में रेंगती हुई पागे पढ गई। मेरा वह घर पोछे छूट गया, जिसकी एकान्त कोठरी में मेरे नि.संग जीवन के बहुत सारे छोटे-मोटे सामान विसरे पड़े थे। बनान-बंगला सूना हो गया । मुसीयत के दिनों की परम शुभाकांक्षिणो अपनी उन माश्रयदात्री के प्रति मैंने उस दिन चरम विश्वासघात किया था। तापस अपनी कहानी सुनाते-सुनाते अचानक चुप हो गया । ट्रेन की गति तेजतर हो उठी थी। इस बीच जाने कितने स्टेशन ?" आए-गए, कितने स्टेशन पीछे छूट गए । जाने कितने यात्री चढ़े और उतरे। हम लोगों को जैसे कुछ भी होश नहीं था। इस बीच हम लोग डाइनिंग-कार तक जाकर खाना-पीना भी निवटा आए । अव सोने की वारी थी। मैंने पूछा, "उसके बाद क्या हुआ "रुक न ! सारी रात वत्ती जलाकर यूवातें करने में दूसरे यात्रियों को आपत्ति हो सकती है ? ऐसा कर न । चल, हम लोग नागपुर में ही उतर जाएं।" नागपुर शाम को ही आनेवाला था लेकिन ट्रेन काफी लेट चल रही थी। मैंने कहा, "लेकिन कल तक मुझे बम्बई पहुंचना ही होगा, बन्धु दपतर का काम है..." तापत ने कहा, "अरे भई, कल सुबह तक तुझे बम्बई पहुंचा दूं तो चलेगा न ! नागपुर से हम लोग प्लेन पकड़ लेंगे। आज रात-भर हम लोग किसी होटल में ठहर जाएंगे... और तापस ने सचमुच यही किया। उसने गोण्दिया स्टेशन पर उतरकर जाने किसे टेलिग्राम किया था नागपुर स्टेशन पर उतरते ही अपने स्वागत का लम्बा-चौड़ा इन्तज़ाम देखा । पांच-सात आदमी हमारी अभ्यर्थना के लिए स्टेशन पर पहले से ही हाजिर थे । उन लोगों ने ही मेरा बक्सा-विस्तर गाड़ी में रखवा दिया। हम लोगों को कुछ भी नहीं करना पड़ा। हां, तापस का रोब-दाव तो अपनी आंखों ही देख रहा था। हर किसीने तापस को सलाम ठोंक-ठोंककर वेकार ही हाथ दर्द कर डाले। तापस ने उनकी तरफ नज़र भी नहीं डाली । वह पूरे मनोयोग से मुझसे वतियाता हुआ आगे बढ़ा और कुछ ही मिनट में किसी होटल के सामन ले जाकर खड़ा कर दिया। उसके बाद शाही-खातिरदारी! मिनट-मिनट पर लोग पा-पाकर यह पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि हमारी सेवा में कहीं कोई त्रुटि तो नहीं रह गई। मैं सारा मामला देखकर एकबारगी भौंचक्का रह गया । ! ७२ हमारे नहाने-साने तक तापम येतहाशा पोता रहा । मैंने गौर किया, तापस के पास-पास चमचो की कमी नहीं है । सभी तापस फी मुसाहिरी में व्यस्त थे । सब ऐसे गद्गद हो रहे थे, मानो उनी मुसाहियो मगर तापस को खुश कर दे, तो उनका महोभाग्य होगा। उनमें से एक व्यक्ति ने हिम्मत करके मुझसे मकेते में पूछ ही लिया, "सर! आप क्या रायमाहय के पुराने दोस्त हैं ?" “जी हा ! क्यो ?" उस प्रादमी ने कहा, "हम लोगों का यही ख्याल था कि रायसाहब का कोई दोस्त नहीं है, इसीमे पूछ लिया । असल में मिस्टर राय बेहद कडे सिद्धान्तों के प्रादमी हैं।" "क्यों, मिस्टर राय का कोई दोस्त नहीं है ?" "नहीं, सर ! इसीलिए पापको देखकर हम गय बेहद अचरज में पड़ गए हैं । देखिए न", इतनी दौलत के मालिक हैं, लेकिन भोगने- वाला कोई नही है..." "अच्छा ? मुझमे तो उसको अचानक मुलाकात हो गई"काफी मालों बाद । इसीलिए वह मुझे अपने साय यहाँ सीच लाया । दरगल मैं तो बम्बई जा रहा था ।" वह आदमी इतनी देर बाद शायद मेरी उपस्थिति की मगली वजह जान-समझकर निश्चिन्त हुमा । उसने कहा, "मापगे इतना कुछ पूछ डाला, पाप कुछ प्रन्यया न लें, सर ! रायसाहय मुनेंगे तो नाराज होगे । रोकिन उन्हें जितना देता हूं, मेरा कौतूहल पडता जा रहा है, सर !" उमकी यातें मुनकर मेरे मन में भी कौतूहल जाग उठा । मैंने पूछा, "वो भला?" यह प्रादमी कोई उत्तर न दे पाने की वजह में गंगीपर में पट गया। उमे जैसे कोई उत्तर ही नहीं मूना पड़ा। मैंने यहा, "हां, हां, कहिए न ! मैं यहां के मिस्टर राय के बारे में पुष्ट नहीं जानता । माप डरिए नहीं, मैं उममे कुछ नहीं कहूंगा। प्राप हिए..."

उस आदमी ने पूछा, “अच्छा, इस दुनिया में क्या उनका कोई नहीं - . "मैं पहले की बात बता सकता हूं। पहले जो उसके अपने लोग थे, वे सब अब मर चुके हैं । लेकिन यहां उसकी ज़िन्दगी में कौन-कौन है, भला यह मुझे कैसे और कहां से मालूम होगा ?" उस आदमी ने कहा, "नहीं, सर! यहां उनका कोई नहीं है। अगर कोई होता तो हम लोगों को जरूर मालूम होता।" "खैर, इसमें हैरान होने की क्या बात है ? दुनिया में कितने ही लोगों का शादी-ब्याह नहीं होता। ये लोग अपनी सारी जिन्दगी अकेले ही विता देते हैं । यह तो कोई नई बात नहीं है।" उस श्रादमी ने कहा, "नहीं, मेरा मतलब यह नहीं था। आप जानते हैं, राय साहब हमारे किसी देवी-देवता को नहीं मानते ? देवी- देवता के नाम पर कोई चन्दा मांगने आता है, तो वह आग-बबूला होकर जो-सो कांड कर बैठते हैं।" उन सज्जन ने तापस के सम्बन्ध में और भी बहुत-सी बातें बताई और मैं भी एकान होकर सुनता रहा। ये बातें तो तापस ने मुझे नहीं वताई थीं।--अगर कोई पाकर उनके सामने यूं ही हाथ फैला दे तो वे झट से सौ-दो सौ रुपये दे डालने हैं । "रुपये के अभाव में अगर कोई आदमी वेटी का व्याह नहीं कर पा रहा है तो इसकी सूचना मिलते ही साहब दान-खैरात करने में जरा भी नहीं हिचकते।'' लेकिन देवी-देवताओं पर वे भयंकर नाराज़ रहते हैं। मैंने पूछा, "क्यों ?" उस आदमी ने कहा, "यह मैं नहीं जानता। वस, देवी-देवता का नाम सुनते ही भड़क जाते हैं।" एक बार एक सज्जन उनसे शिव-मन्दिर की प्रतिष्ठा के लिए चन्दा मांगने आए। वह खुद भी काफी अमीर श्रादमी थे। पैसेवाले होने के साथ-साथ वह काफी धार्मिक और सात्विक किस्म के इन्सान थे। उनकी इच्छा थी कि नागपुर शिव-मन्दिर. वनवाएं । सच साहव के यहां आते ही वह होटल में हाजिर हुए। साहव ने उनसे पूछा, "आप कुछ कहना चाहते हैं ?" में एक "पारसे कुछ चरिटी मांगने माया हूं।" रायसाहब ने पूछा, "किस बात को रिटी? रेटो के माह के लिए?" "नहीं ! ये बात नहीं है..." "तो क्या बेटे की पढ़ाई के लिए ?" "नही, यह बात भी नहीं है।" "तो क्या कांग्रेस के लिए ?" उस सज्जन से अव नही रहा गया । उन्होंने कहा, "ना! मा । मैं किसी भी राजनैतिक पचड़े मे नहीं पड़ता । मुझे सहर के फुत-पोती में देखकर शायद आपने यही अनुमान लगाया हो। लेकिन मैं भला इन राम मामलो के लिए प्रापके पास क्यों माने सगा? पसल मे मैं माया । या... इतना कहकर वह अपने बैग से कुछेक काराज-पत्र निकालकर दिने नगा, "ये देखिए-चीफ मिनिस्टर, होम-मिनिस्टर इसके प्रलापा मध्य प्रदेश के गवर्नर-हर किसीने इस पावेदन-पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं । इसे पड़ते ही पाप मेरे माने का उद्देश्य समझ जाएगे।" यह कहकर उन्होंने एक पुस्तिका सामने रख दी । रायसाहब ने उसे उठाते हुए कहा, "देखिए, मेरे सामने उन लोगों की वार्ते मत कीजिए। उनकी तरह मेरे पास पर्याद करने के लिए वस्त नहीं है। मापको क्या चाहिए, सीधे-सीधे वही यह डालिए। पन्दा चाहिए न ?" "जी हां!" रायसाहब ने पाकेट से पाच सौ रपये निकालकर फहा, "ये लीजिए। इस वक्त मेरे पास समय नहीं है । सुवह यानी पो पटो ही प्लेन रो रवाना होना है। मैं कल जर्मनी जा रहा हूं। इससे पहले मुगे पहुरा सारे काम निपटाने हैं।" उन सज्जन ने पांच सौ रुपये जेब में रसकर उसकी रसीद बनाकर रायसाहब को पकड़ा दी। रसीद पर छपे हुए यस्तय्य को पढ़कर रायसाहव अचानक चौंक उठे-"सार्वजनिक शिव-मन्दिर ! लेकिन आपने तो मुझे यह बात बताई नहीं ? यह बात अगर पहले ही मालूम हो गई होती, तो मैं एक पैसा भी चन्दा नहीं देता । लाइए, मेरे रुपये वापस कीजिए । मुझे आपको रुपया नहीं देना है..." उन महाशय ने सकपकाकर कहा, "लेकिन, आप तो जानते हैं, यहां एक भी बढ़िया शिव-मन्दिर नहीं है । यहां के धर्मात्मा लोगों को कितनी असुविधा होते हैं ? मैं..." रायसाहब ने उनकी वात वीच में ही काटते हुए कहा, 'देखिए, ये शिव-गणेश, किशन वगैरह का नाम मेरे आगे मत दोहराइए । मैं ऐसी वातें बिल्कुल पसन्द नहीं करता। श्राप मेरे रुपये वापस कीजिए' आखिरकार उन सज्जन की जान तभी छूटी, जव उन्होंने रुपये लौटा दिए। मुझ ये कहानियां सुनते हुए मजा हो पा रहा था। खासकर तापस जो सुना था, ये कहानियां उससे जरा अलग थीं। खैर, यह भी मेरे लिए एक अजीवोगरीव अनुभव था। अभी तक जाने कहां तापस पड़ा था, जाने कहां मैं ! घटना-चक्र में जाने कैसे हम दोनों की मुलाकात हो गई और जाने कैसे हम दुवारा टकरा गए । किसी दिन जिस तापस को हमने साधारण-अति साधारण समझा था, वह कैसे इतने प्राचुर्य का मालिक बन गया, कैसे वह इतने सारे कर्मचारियों का कर्ता-धर्ता विधाता वन वैठाये तमाम बातें मेरे लिए बेहद आश्चर्य जनक थीं। वह सज्जन ज़रा ज्यादा ही वोल रहे थे, खैर इसमें मेरा ही फायदा था। लेकिन उन महाशय की बातों से यह वात विल्कुल स्पष्ट हो गई. कि तापस ने मुझसे जो कुछ कहा था, सव कुछ अक्षरशः सच था। तापस के पास सचमुच वेशुमार दौलत है, अगर वह विराट अमीर न होता तो इतनी ऊंची-ऊंची तनखा देकर इतने सारे लोगों को नौकरी पर कैसे रखता? वह भी सिर्फ एक शहर में नहीं, हिन्दुस्तान के तमाम बड़े-बड़े शहरों में !

उन महाराय ने अपना नाम पटवर्धन बताया था। मैंने पटवर्धन से कहा, "इसमें क्या फर्क पड़ता है, मिस्टर पटवर्धन !- सब लोग तो आखिर एक जैसे नहीं होते !" पटवर्धन ने जवाब दिया, "अच्छा, अगर ऐसा ही है, तो रायसाहब हर साल पिंगलीपट के मन्दिर में रुपया क्यों भेजते हैं ?" मैंने चकित होकर पूछा, "चिंगलीपट ? यह चिंगलीपट कहाँ है ?" "साउथ-इंडिया मे । अापने महाबलिपुरम् का नाम सुना है ?" "हां, सुना तो है, लेकिन वहा कभी गया नही हूं।" "उसी महाबलिपुरम् से करीब बारह मील दूर "चिंगलीपद हर साल क्या आप ही जाते हैं ?" "हा, हर साल में ही दो हजार रुपये लेकर चिंगलीपट जाता हूं- मुझे गयसाहब का बिल्कुल स्टैडिंग आर्डर है । वहा एक बूढे को रपये सौंपकर लौट पाता हूं।" मुझे इसमे किसो रहस्य का प्राभास मिला। मैंने पूछा, "क्यो दे प्राते हैं ?" "यह तो सर मुझे भी नहीं मालूम । चिगलीपट से बहुत अन्दर जाकर एक गांव पड़ता है। उस गांव के एक बूढे प्रादमी के हाय मैं रुपये ।" "हर बार क्या प्राप ही रुपया देने जाते हैं ?" "जी हां ! रायसाहब हर बार मुझे ही भेजते हैं।" हमारी बातो मे मचानक व्याघात पड़ा । कमरे मे तापस ने प्रावाज दी। मुझे भी कुछ नया सुनने को नहीं मिला। तापम को पटवर्धन के जरूरी बातें करनी थी। सिर्फ पटवर्धन ही नहीं, स्टाफ के तमाम लोग से वह काफी रात गए तक काम-काज की बातें करता रहा । मेरा कौतूहल बढ़ गया था । तापस ने ट्रेन में पाते शुरू के जीवन की कहानी सुनाई थी। उसके बाद नागपुर में कदम रमत ही, अचानक पटवर्धन से मुलाकात हो गई । उमकी जुबानी कुछ नई बातें मालूम हुई। लेकिन अब तक जितना कुछ देख-सुन चुका था, उससे यही भन्दा सौंप प्राता हूँ . अपने शुरू - ७७ ा कि वह चाहे कितना ही अमीर या और कुछ क्यों न वन उसकी जिन्दगी के साथ कोई न कोई रहस्य जरूर जुड़ा है। नागपुर में रात विताने के लिए जितनी देर ठहरा था, तापस से की कोई खास बातचीत नहीं हुई, क्योंकि मैं अपने कमरे में था और पस अपने कमरे में । मुमकिन है कामकाज की भीड़ में वह ठीक तरह तो भी न पाया हो । मैं थोड़ी देर के लिए सो गया था। किसीकी आवाज़ सुनकर जब मेरी नींद टूटी थी, तो मेरी निगाह खुद-ब-खुद घड़ी की तरफ चली गई थी। रात के तीन बज रहे थे । तापस खुद ही मुझे बुलाने पाया था-"चल, एयरपोर्ट चलना है।" रात का अाखिरी प्लेन । जो लोग उस प्लेन से जानेवाले थे, वे हमारे पहुंचने के बहुत पहले ही लाउन्ज़ में बैठकर प्रतीक्षा कर रहे थे । प्लेन छूटने की घोषणा सुनकर, वे लोग प्लेन की तरफ बढ़ने लगे। मैं तापस के साथ ही साथ चल रहा था। ने पूछा, "रात सो लिया था न?" "हां ! और तू?" "मुझे सोने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जिन्दगी के इन दस सालों में शायद ही कभी मैं सोया होऊं।" "अच्छा, न सोने से तेरी तवियत नहीं बिगड़ती ?" "जगे रहने का अब मुझे अभ्यास हो गया है । अव तकलीफ नहीं तापस होती..." उसके बाद हममें अधिक वातचीत नहीं हुई। हमारा प्लेन रवाना हे चुका था। करीब दो घण्टे बाद हम लोग बम्बई पहुंच गए थे। तापस ने कहा, "यहां तू मेरे पास ही ठहरेगा। तुझे कोई असुवि नहीं होगी। अभी तुझसे मुझे बहुत-सी बातें करनी हैं..." लेकिन बम्बई पहुंचकर हममें कोई खास बातचीत नहीं है हालांकि उसके जीवन की असली कहानी सुनने का आग्रह में दवा पा रहा था। सचमुच जीवन में हम सबने सिर्फ रुपया ही चाहा था । उठते वैठते रुपया, साते रुपया, सोते रुपया! आखिर रुपया कमाने है ७८ ही तो हम लोग लिखना-पहना सीखते हैं। बड़े बनने की कोशिश करते हैं ! हम लोगों के लिए बड़े होने का मतलब सिर्फ अमीर बनना है । हां, महान होना तो किसीने नहीं चाहा। फिर? फिर तापस ने ही क्या कमूर किया था? तापस के मकान का चक्कर लगाने के बाद मुझे पता चला-जिते बाहते हैं प्रचुर दौलत-तापस के पास भी प्रचुर दौलत है। प्लेन से उतरते ही गाडियों और लोगो का जैसे ताता लग गया। शायद उसने नागपुर से फोन पर ही अपने माने की खबर मिजवा दी थी। तापस का बंगला पाली हिल पर था। कमरे में कदम रखते हो तापम ने मुझसे कहा, "यहां ठहरने मे तुझे कोई परेशानी तो नहीं होगी?" मैंने निगाहे धुमाकर देखा, कमरे के साज-सरंजाम में नहीं कोई कंजूसी नहीं थी। एयर-कंडीशंड कमरा । मैंने खाने को मेज़ पर सूचना दी, "आज मुझे जरा कान पर निक- लना होगा, भाई।" तापस ने कहा, "तुझे मैं एक गाडी दे देता हूं । तू पद काहे निम्न सकता है । गाडी तेरी ही ड्यूटी में रहेगी..." "और तू?" "यहां मेरे पास तीन गाड़ियां हैं । मुझे कोई अनुदिनन्दन मैंने देखा तारस प्रमल में पायात-निर्यात का काम है. चहते हैं-इम्पोटं-एक्सपोर्ट! हालांकि वह क्या प्रारी है इसका पता नहीं चल सका, लेकिन उम दिन बन्द नियटाकर जब मैं उसके दरसर में दाखिल हुमा टोम- देखकर में हत्वाश्य रह गया । इतनं मारे नोर! इनमः स्टाफ! इनने दरबान-चपरासी, स्टेनो और मुझे लगा कि दास ने जो कुछ दद्वारा, भी भूल नहीं था। मुझे देखते ही तापम ने नाग कार र "तेरा काम हो गया ?" उसमें एक - मेरे काम में क्या असुविधा हो सकती थी ? मैं तो नौकरी करता हूं! नौकरी के दायित्व बेहद लिमिटेड यानी सीमित होते हैं । वेहद सीमित । सारा सिर-दर्द तो दफ्तर चलानेवाले मालिकों के जिम्मे है । मैं तो अपने दफ्तर का एक कर्मचारी-भर है और तापस अपने दफ्तर का खुदमुख्तार । अतः असली झंझट तो उसीके जिम्मे है। मैंने कहा, "तेरी बाकी कहानी तो सुन ही नहीं पाया। अन्त में तू लखनऊ छोड़कर चला आया था न ?" तापस ने कहा- हां, चला ही गया था। चले जाने के अलावा और कोई उपाय भी तो नहीं था । एक तरफ हजारों-हजार रुपयों का लोभ और दूसरी तरफ मूलचन्द का खौफ। अगर उस दिन मैं वहां से निकल न आता, तो वह मुझे मार डालता। सचमुच उन दिनों मूलचन्द को मेरी वजह से काफी नुकसान हो रहा था। दरअसल शुरू-शुरू में मूलचन्द ही साहब लोगों का एजेन्ट था। उन लोगों ने उसे ढेर-ढेर रुपये खिलाए थे। पिछले दिनों उसने उन लोगों पर यथारीति दवाव डालना शुरू कर दिया था। ये साहब लोग विदेश से पहली बार पाए थे। लखनऊ नये-नये पहुंचे थे। जब वे लोग इस देश में आए थे, उनके बदन पर मैले कुचैले कपड़े भर थे। हालांकि उनका पहनावा विल्कुल हिप्पियों की तरह था, लेकिन असल में वे लोग हिप्पी नहीं थे। उन्हीं दिनों जाने कैसे मूलचन्द के चक्कर में आ फंसे । शुरू-शुरू में मूलचन्द ने भी कोई खास दवाव नहीं डाला । लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि उन साहवों के पास अथाह रुपये हैं, वह माल देने में काफी होले-हवाले करने लगा। कभी माल देता भी था तो बदले में खूब दवाव डालकर मनमाने रुपये वसूल करता था। फिर मूलचन्द का दुस्साहस और अधिक बढ़ गया। ऐसा भी वक्त श्रा पहुंचा, जब वह बात-बात में पुलिस का डर भी दिखाने लगा। साहब लोग पुलिस से बुरी तरह डरते थे । उसके बाद जब उसे पता चला कि साहब लोग वावू लोगों के बंगले में माली से सीधे-सीधे माल खरीदते हैं तो उससे चुप नहीं रहा गया। इधर साहब लोग भी सहम गए थे । अतः उन्होंने मुझे लेकर चम्मत हो जाने की योजना बना डाली। खैर, मैंने भी देर नहीं की। मैं भी रुपयों को पोटली दवाकर उनके संग रातो-रात लखनऊ से नौ-दोनयारह हो गया। अगले दिन जय हम देहरादून पहुंचे, वहा के अखबारो मे पढ़ा कि वाग को डरा कोठी में किमी- ने प्राग लगा दी थी। सारी कोठी जलकर राख हो गई। साहब ने कहा, "देसा न, अगर तुम नहीं पाते तो तुम भी उस कोठी के साय जलकर खाक हो जाते..." साहब के साथ रहते-रहते, कुछ ही दिनों में उनसे मेरी सासी दोस्ती हो गई। कहां तो कलकत्ते में जिन्दगी शुरू हुई, और मन जाने कहा मा पहुंचा ! वैसे ही जाने कहा से ये लोग भा जुटे और मेरे साथी बन गए। मैंने महसूस किया साहव वेहद भलेमानस है। उस दिन से मैं उन्हें नाम लेकर पुकारने लगा था। जिस नाम से मेममाहव पुकारतो थी, उसी नाम से मैं भी बुलाने लगा। मेमसाहब उन्हें 'विली' पुकारती थीं, में भी 'विली' कहने लगा। विली यानी इच्छित-फ्रेण्ड । मैंने कहा, "विली, अगर कभी में पुलिस के हाथों पकड़ा गया तो याद रखो जमानत तुम्हें ही देनी होगी..." विली हंस देता था, "तुम इतना डरते क्यों हो? तना जान लो कि जब तक रुपया पास हो, किसीसे मी टरने की जरुरत नहीं है। दरअसल इस दुनिया में रुपया ही सब छ है । मुझे देयो, कितनी दूर में चलकर मैं इण्डिया प्रा पहुंचा हूं। क्यों ? महज रपयों के लिए। तुम भी पगर कभी पकड़े गए, तो यह रुपया ही तुम्हें छुड़ा लाएगा।" मुझे उसकी बातों पर कुछ-कुछ यकीन होने लगा। मैंने अपने मास. पाम निगाहें दौड़ाकर देखा-जिसके पास दौलत है, हर जगह मोरी सातिर है । मैं सोचा करता था, जब मेरे पाम भी धन हो जाएगा, तो लोग इसी तरह मेरी भी खातिर किया करेंगे। उस समय मेरे शरीर पर यह कही नहीं लिया होगा कि मैं चोर हूं। दुनिया में हर तरफ यही हो रहा है। भाज जो अपराधी प्रासामी है, वही कल विचारर बन जाता है। इसीलिए जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मुझे विश्वास होता गया कि तुम ।

- . लोगों का कहना ही ठीक था । मैं ही कहीं से गलत था । विली ने कुछ रातें देहरादून स्टेशन के प्लेटफार्म पर ही विताई, और मैं एक धर्मशाले में टिक गया। और खाना कहीं यहां-वहां खा-पी लेता था। कभी होटल में, कभी किसी रास्ते या फुटपाथ पर । जेव में अगर रुपये हों तो यहां-वहां खाने में भी अजीब-सा एड- वेन्चर है। आज तो कितना बढ़िया-बढ़िया खाना खाता हूं। महंगे-महंगे खाने पर जाने कितने-कितने रुपये खर्च हो जाते हैं। लेकिन उन दिनों रास्ते-फुटपाथों पर छुट-पुट खाकर जो सुख महसूस करता था, वह मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं, दोस्त ! लेकिन मुझ सचमुच अचम्भा होता था, तब जब विली के नाम अचानक कहां-कहां से और जाने कैसे-कैसे टेलिग्राम पहुंचते थे । विली भी जाने किस-किस के नाम टेलिग्राम भेजता था। लेकिन उन टेलिग्रामों की भाषा मेरी समझ में नहीं आती थी। उसमें कभी विली की सेहत की खबर होती थी,कभी किसी कुत्ते के मौत की सूचना होती थी। ये टेलिग्राम कभी कलकत्ते से बाते थे, कभी मद्रास और कभी दम्बई से । मैंने अनुमान लगाया कि विली की तरह असंख्य हिप्पी हिन्दुस्तान की मिट्टी पर विखरे हुए हैं। उनमें से हर कोई हर किसीसे सम्पर्क-सूत्र बनाए हुए है। वे लोग असल में वाहर से जितने बेहिसाबी और लापरवाह दिखते थे, वैसे थे नहीं। अगर वनियाइनचीथड़े-चीथड़े हो गई है, तो वही सही। जूते नहीं हैं, तो नंगे पांव ही चल रहे हैं--कोई परवाह नहीं है। लेकिन मेरे लिए यह सम्भव नहीं था। मेरे पहनने के लिए उन लोगों ने एक जोड़ी खूबसूरत जूते खरीद दिए थे। मैंने अच्छा-सा पंण्ट-शर्ट भी खरीदा था। कभी-कभी विली ही मुझे किसी अच्छे होटल में ठहर जाने का आदेश देता था। विली कहता था, "ज़रूरत हो तो बड़े-बड़े लोगों से भी मेल-मुला- कात करनी होगी। उन्हें खाने और शराब पीने की दावत भी देनी होगी। तभी तो उनकी जुवान से वार्ते उगलवा सकोगे।" मैंने पूछा, "अगर वे लोग पूछ बैठे कि मैं क्या काम करता हूं; तो क्या जवाब दूंगा।"

"तुम कहना कि तुम राइटर हो यानी कितायें लिखते हो। यही सबसे सुरक्षित धन्धा है। उसके बाद तुमसे कोई यह पूछने नहीं जाएगा कि तुमने कौन-कौन-सी किताबें लिखी हैं । मुझे ही देखो, मुभमे जब भी कोई पूछता है तो मैं अपने को जर्नलिस्ट बनाता है। अब में अमेरिका के किस प्रखबार का रिपोर्टर हू, यह जानने की उत्सुकता किम होगी। इन सब प्रोफेशन में सानो सून माफ होते हैं।" यहरहाल में भी योजनानुसार उन सब जगहों पर प्राने-जाने लगा। इंह ! राइटर ! दुनिया में जाने कितने हजारों-हजार लेखक भरे पड़े हैं, पौर हर कोई विख्यात लेखक हो, यह भी जहरी नहीं है। मैं भी एक प्रख्यातनामा रोखक बन गया । मानो में विश्व-परिदर्शन को निकला हू और प्लाट की तलाश में तरह-तरह के लोगों से मिलता-जुलता हूं या फिर विश्व-भ्रमण पर निकया है। लेकिन देहरादून में हमारा धन्धा ठीक तरह जमनहीं पाया। हां, मी बहाने दूसरों के रुपयों के बदौलत मेरा थोड़ा-बहुत देश-भ्रमण जरूर हो गया। विली ने कहा, "चलो, अब यहा और नहीं रहेंगे। अब मद्राग की सरफ चलें।" चलो, यही चलो । मेरा क्या जाता है ? मेरे पैने तो पर्व नहीं हो रहे थे ? न मेरा कोई नुकसान ही हो रहा था। इस प्रलावा, प्रौरी की तरह मुझे भागे-पीछे का भी कोई मोह नहीं था। यह बात विली को भी ज्ञात थी। वह जानता था कि मेरेन वीवी-बच्चे है, न घर-द्वार । मेरा कहीं, कुच्छ नही है ! दरअसल यही बात मेरी सबसे बड़ी सासियत बन गई। किमीके होने का अर्थ या बन्धन ! किसी तरह का बन्धन न होना ही माजाद मदं का लक्षण है । मैं भी बन्धन-मुक्त भाजाद पुरप पा । उन दिनों अगर मेरी मौत भी हो जाती तो बिली पर इसका कोई दोप-दायित्व नहीं होता। वे लोग मुझे यूँ हो लावारिस फेरकर सात ममुद्र तेरह नदी पार, अपने देश की तरफ चल देते। 1

खैर, ऐसे ही एक दिन हम लोग मद्रास जा पहुंचे। स्टेशन पर उतरने
के पहले ही मैं उन लोगों से अलग हो गया ।
विली ने कहा, "तुम्हें हम लोगों के साथ देखकर, लोगों को हम पर
भी सन्देह हो जाएगा
मैं मद्रास के एक मशहूर होटल में ठहर गया। लेकिन मुझे उनका
कोई अता-पता नहीं मालूम था।
खैर, मैं होटल में ठहर गया। अचानक एक दिन मेरे नाम एक
टेलिग्राम आ पहुंचा । लिखा था-'रेस-ग्राउण्ड के सामने मुझसे मुला-
कात करो।-विली...'
लेकिन मुझे तो वहां के रेस-ग्राउण्ड का पता भी नहीं मालूम था ।
खैर, पता-ठिकाना लेकर मैं उसी दिन रेस-ग्राउण्ड के गेट पर जाकर
खड़ा हो गया। अभी शाम नहीं हुई थी, लेकिन लोगों की भीड़ धीरे-
धीरे बढ़ने लगी थी।
अचानक अपनी पीठ पर किसीका स्पर्श पाते ही मैंने पीछे मुड़कर
देखा । मेरी निगाह एक अपरिचित व्यक्ति पर जा पड़ी।
उस आदमी ने पूछा, "आप विली को खोज रहे हैं ?"
"जी हां ! आप कौन हैं ?"
"प्रापका नाम टी० राय है न ?"
"जी हां !"
"तव आप मेरे साथ चलिए..."
मैं उस आदमी के पीछे-पीछे पल पड़ा। वह आदमी मुझे शहर के
किसी कोने में ले गया और सामने एक गली की तरफ इशारा करके
कहा, "आप अन्दर चले जाइए।"
सामनेवाले मकान की बगल से एक गली अन्दर की तरफ चली
गई थी। उस गली के बिल्कुल आखिरी छोर पर एक मकान दिखाई
दिया। मकान का दरवाजा खुला हुआ था। अचानक वहां विली वैठा
हुआ दिखाई दे गया और मेमसाहब मेज़ पर लेटी हुई थीं।
बिली ने मुझे देखते ही कहा, "देखो, मैंने यह मकान तीस रुपये
महीने किराए पर ले लिया है ।"
८४

मैंने एक बार निगाह घुमाकर पूरे कमरे को अच्छी तरह दया । कमरे में न तो कोई फर्नीचर था, न विस्तर। मिर्फ एक फटो पुरानी चटाई विछी हुई थी। उसीके कपर मेमसाहब मोई हुई थी। गजव है ! स्पया कमाने के लिए ये लोग कितनी तकलीफें झेल सकते हैं। यह अपनी प्रांखो से देखे बिना समझने का कोई उपाय नहीं है। अब तक मेरी धारणा थी कि हमारे देश में शायद सिर्फ मारवाड़ी लोग ही असली दु.ख-तकलीफें झेल सकते हैं । लेकिन अमल में ये लोग हो सच्चे मारवाड़ी हैं। मैं भी चटाई के एक किनारे जाकर बैठ गया । मैंने अपनी तरफ से पहला सवाल किया, "वह मादमी कोन है, जो मुझे यहां बुलाकर लाया है ?" विली ने बताया, "यह नरसिंहम है। इस नरसिंहम को मैंने ही जुटाया है । जाने क्यों मेरा मन कहता है कि उसके द्वारा हमारा बहुत- सा काम सिद्ध होगा।" "वह तुम्हें कहां मिला था ?" "यूं ही रास्ते पर घूमते-घामते मिल गया था। तुम्हारी तरह उसका भी कोई नहीं है।" मैंने दुवारा जानना चाहा, कौन-मा काम मिद्ध . . "उससे तुम्हारा होगा?" "वह यहां की भाषा जानता-समझता है, इसीलिए उमे ले लिया है । उससे मैंने अपने काम-काज के बारे में भी थोड़ा-बहुत जिक्र किया था । यह घर मुझे उसीने जुगाड दिया है." "मगर कही यह तुम्हारी सारी बात उजागर कर दें ?" "अरे, उसे मैंने मुट्ठी भर रपया खिलाया है। भविष्य में भार अधिक देने का वादा किया है। सो वह, रपये के लिए हमारा काम जरूर करेगा । सुनो, यहां लोग बेहद गरीब हैं। जिस देश के लोग गरीय होते हैं, वे लोग रुपये के लिए मब कुछ कर सकते हैं। प्ररे, भइया, रुपया तो उनके लिए भगवान है ! भगवान !" "वह हम लोगो की श्या सहायता करेगा ?" । ८५ "क्यों? हर तरह की सहायता करेगा । वह बता रहा था कि उसका घर जिंगलीपट में है। वहां के मन्दिर से वह हमारे लिए अनगिनत मूर्तियां चुराकर ला सकता है। शायद वहीं कहीं उसका अपना घर भी है। तुम उससे बातचीत करके सारी बातें तय कर लो। इस वक्त वह रास्ते पर खड़ा-खड़ा शायद तुम्हारी ही राह देख रहा है । मैं नहीं जाऊंगा। मुमकिन है मेरे बाहर निकालने पर, कोई मुझे देख ले। लोगों को हम पर सन्देह हो जाएगा। तुम्हारा जाना ही बेहतर है । तुम भी इण्डियन हो और वह भी। किसीको शक भी नहीं होगा- मैं उसकी बात सुनकर बाहर निकल आया। मैंने देखा नरसिंहम सच ही वाहर खड़ा मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मुझे अपनी ओर बढ़ते देखकर वह मेरी तरफ बढ़ पाया। मैंने पूछा, "तुम्हारा अपना घर भी क्या चिंगलीपट में है ?" "येस, सर !" नरसिंहम अतिशय विनम्र और शरीफ लगा। उसकी भापा शायद मेरी समझ में न आए, इसीलिए उसने मुझसे अंग्रेज़ी में ही बात शुरू की। मुझे उसने जो कुछ बताया उससे भी यही अन्दाज्ञा लगा कि वह हमारे लिए काफी सहायक सिद्ध होगा। चिंगलीपट से महाबलिपुरम् के बीच अनगिनत गांव थे। वहां छोटे-छोटे अनगिनत मन्दिर थे । वहां की ढेर-ढेर मूर्तियां लाकर वह हमें सौंप सकता था। अन्त में उसने कहा, "लेकिन इसके लिए मुझे रुपया चाहिए, हुजूर !" "हां, हां, रुपया भी मिलेगा ! जरूर मिलेगा ! रुपया विना भला तुम काम ही क्यों करोगे ? हां, तो तुम्हें कितना रुपया चाहिए ?" नरसिंहम की अपेक्षाएं वेहद मामूली थीं। उसने कहा, "पांच सौ रुपये।" "चलो, दे दूंगा । लेकिन देखो, यह बात कहीं खुल न जाए।" "नहीं, सर, अगर बात कहीं खुल गई तो आप लोगों के साथ-साथ मुझे भी जेल की हवा खानी होगी।" . - "हां। काफी समझ-बूझकर काम करना। वैसे तुम करते क्या हो?" "बुछ भी नहीं करता, सर! बिल्कुल वैगावाण्ड हूं! एकदम मावारा ! करीब पन्द्रह साल पहले मैं नौकरी की तलाम में गहर माया था। लेकिन कही काम नहीं मिला, सर! मैं बहोत गरीब भादमी हूं, सर । मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है, सर ! देखिए न, काये बिना मैं शादी तक नहीं कर पा रहा हूं।" "ठीक है ! ठीक है ! प्रच्छा वतामो, तुम हमें चिगलोपट कर ले चन रहे हो?" "जिम दिन सर का प्रार्डर होगा, उसी दिन चल दूगा । प्रगर प्राप कहें तो पभी चल दू।" "पहते एक बार वह जगह देख तो पाऊं कि कैसी है ?"-थोडी देर रुककर दुवारा पूछा, "वहा तुम्हारी किसी जान-पहचान है ? मैं वहा जाकर ठहरूंगा कहाँ ?" "पाप होटल में ठहर जाइएगा, सर ! मेरी चिन्ता छोड़ दीजिए। पन्द्रह माल हुए में गांव त्यागकर चला पाया था। इतने दिनों बाद शायद अब मुझे कोई पहचान भी नहीं पाएगा । संर. मुझे न पहचाने तो बेहतर है। मैं वहां भिखारी की तरह रह लुगा, ताकि लोगों को मुझ पर शक न हो..." "लेविन तुम मन्दिर के पंडित-पुरोहितों से बातचीत कर लोगे न?" था, लेकिन "वहां के एक पुरोहित की बेटी मे मेरा परिचय कौन जाने अब वह मिलेगी भी या नहीं। मुमकिन है भव तक उसका व्याह भी हो गया हो । पन्द्रह साल पहले की बात है न, सर!" "तुम्हें उसका नाम याद है ?" "जी हां, मर! उसका नाम रम्भा था। अगर वह मिल गई तो हमें कोई ममुविधा नहीं होगी। वह अभी भी वही है या शादी-ब्याह करके समुराल चली गई, यह तो वहां जाकर ही पता चलेगा..." "ठीक है । तुम सा-पी लो। में भी खाना-पीना निवटाकर तुम्हारे ८७ साथ निकल चलता हूं।" "खैर, सारा इन्तज़ाम यथावत् हो गया। मैंने नरसिंहम को पांच रुपये और थमा दिए । वह मुझे सलाम ठोंककर खाने चला गया । । - सुनो, भाई, यहां की जिन्दगी बेहद अजीबोगरीब है । तुम सव बंधी-बंधाई ज़िन्दगी जीते हुए, वेहद शान्त-शिष्ट भाव से सिर उठाकर चलने की कोशिश कर रहे थे । लेकिन देख लो, तुम लोग न तो चैन पा सके, न सिर उठाकर चल सके । वहुत हुआ तो हजार-दो हजार तनखा पाने लगे हो । लेकिन सच वतायो, बस, इतने से ही तुम्हारा दुःख-दर्द मिट जाता है ? सो अगर दुःख-दर्द ही नहीं मिटा तो हज़ार-दो हजार रुपये लेकर बेकार अपना हाथ क्यों काला करूं? जब लेना ही है, तो लाख-दो लाख लूंगा। इसके लिए अगर अपनी जान भी खोनी पड़े, तो भी मंजूर है । कम से कम ज़िन्दगी तो मनचाहे ढंग से जी लूंगा। दरअसल जिन्दगी जीना ही हर किसीका मकसद है। अगर यह सच है तो जिन्दगी जीने का एकमात्र साधन सिर्फ रुपया है। इसलिए मैंने रुपया कमाना ही अपने जीवन का चरम लक्ष्य बना लिया । खैर, नरसिंहम की बातें, जब मैंने विली को वताई तो विली ने कहा, "अपने साथ काफी रुपया ले जाना। वहां जाकर जाने कब कौन- सी आफत-विपत में फंस जामो, कहा नहीं जा सकता।" यह कहकर उसने मेरे हाथ पर दो हजार रुपये रख दिए । मैं रुपये लेकर अपने होटल में लौट आया। खाना-पीना निपटाकर, कमरे में ताला लगाकर मैं निकल पड़ा । नरसिंहम मेरे होटल के गेट के बाहर ही खड़ा था। मुझे देखकर वह आगे बढ़ पाया । मैंने पूछा, "क्यों, यहां से कैसे चलेंगे ?" "टैक्सी में तो बहुत रुपये लग जाएंगे, सर ! यहां से करीब पच्चीस- तीस माइल है । काफी रुपये चार्ज करेगा..." खर, अव चाहे जितना भी चार्ज करे, देना ही होगा। कम से कम वक्त तो बचेगा।" , ५८ टेक्सी ले ली गई। टैक्मी पर सवार होकर नरसिंहम मन ही मन गद्गद हो उठा। उसके हाव-भाव से यही जाहिर भा, मानो वह जिन्दगी में कभी टैक्सी पर नहीं चढ़ा। टेक्मी के अन्दर माराम मे पीठ टिकाकर बैठते ही उसने टैक्मी-ड्राइवर को उस जगह का पता-टिकाना बताकर चलने का निर्देश दिया। मैं मन ही मन सोच रहा था, नरसिंहम की हालत मेरी ही तरह है। वह मेरी जिन्दगी की नई शुरमात पो मार सिर्फ जिन्दगी को ही नहीं, जवानी को भी शुरुमात थी । उस उम्र में उत्साह और भविष्य दोनों ही बेहद तीन भाव से सजग हो उटते हैं। मामने जितनी दूर-दूर तक पाखें फैलाकर देखो, सिर्फ माशा और माशा..! हा, माशा बघती है कि सभी जितना है, उससे मोर अधिक रुपया होगा; मौर तरक्की होगी, मौर- और सुख बढ़ेगा। दरअसल हम सब जाने किस भपेक्षा में यू दौडले चले जाते हैं । सचमुच मैं आज भी उसका कोई भयं नहीं खोज पाया है। उम दिन से मेरी भी जो दौड शुरू हुई थी, आज भी ठीक उसी रफ्तार से दौड़ता जा रहा हूं, लेकिन, दोस्त, जिन्दगी का कोई सार्थक पर्थ प्राज तक मेरे हाय नहीं लगा। प्राखिर इतने रुपये में क्यों कमाता हूँ? किसके लिए कमाता हूं? कभी-कभी ये सारे सवाल मेरे दिमाग में ताव-- माक करते हैं, लेकिन फिर भी अपनी भाग-दौड़ नहीं रोक पा रहा हूँ। हम लोगों मपनी विगत कहानी मुनाते-मुनाने तापस अचानक चुप हो गया । जिस तापस को हम लोग सरल और प्रयोघ समझकर हमेगा उमकी उपेक्षा करते पाए थे, वह कभी इतना युद्धिमान सावित होगा, इसकी ने कल्पना भी नहीं की थी। गायद ऐसा ही होता है। घर की सीमामों से बाहर निकलकर इन्सान शायद इसी तरह अपने को पहचानना सीखता है। अपने को पूरी तरह पहचान लेने के बाद ही वह अपने मास-पास की दुनिया को समझ पाता है। तापम ने अपनी कहानी आगे बढ़ाते हुए कहा~-योडी देर बाद हम 'लोग जिंगलीपट जा पहुंचे। अपने घर से निकलकर इतनी दूर मात्रा करने का मेरा यह पहला मौका था । नरसिंहम ने टैक्सी से उतरते हुए कहा, "टैक्सी चढ़ने में बहुत मज़ा प्राता है, सर।" "मज़ा तो आता ही है वर्ना लोग क्या यूं ही इतने सारे रुपये खर्च करते हैं ?" "इसीलिए तो, सर, मेरा भी रुपया कमाने का मन करता है।" "ठीक है ! तुम्हें रुपया मिलेगा।..." "सर, पहले मैं जाकर देख पाऊं। यहां रम्भा है या नहीं।" नरसिंहम ने मुझे एक छोटे-से होटल में ठहरा दिया। होटल यानी वस, नाममात्र ही का होटल । टिन के छाजन के नीचे कुछेक कमरे और सामने की तरफ ढावा । तीस रुपये महीना किराया। कहां मद्रास का वह साहवी होटल और कहां यह सड़क का सस्ता-सा होटल । खैर, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मैं भी इत्मिनान से वहीं जम गया। नरसिंहम थोड़ी देर बाद ही लौट आया, "सर, रम्भा अभी नहीं " "चलो, अच्छा ही हुआ।" यह सूचना पाकर मैं ज़रा निश्चिन्त हो पाया। -- लेकिन नरसिंहम वहीं खड़ा रहा, शायद किसी दुविधा में पड़ा था। "क्यों, कुछ कहना चाहते हो ?" "सर, हम लोग अगर एक काम करें तो हमारे काम में सहूलियत हो जाएगी। अभी-अभी मुझे खबर मिली है, सर, कि रम्भा पर एक मुसीवत आ पड़ी है। अगर हम उससे अपना काम निकलवाना चाहते हैं, तो उसे उस मुसीवत से छुटकारा दिलाना होगा। आप उसका उद्धार करें, तो सारा काम बन जाएगा।" "कैसी मुसीवत ?" "अगर हम रम्भा को उस मुसीवत से छुटकारा दिलवा दें तो उसे हम जो-जो कहेंगे, वह करेगी। वह पुरोहित जी की इकलौती बेटी है। इस मन्दिर के पूजा-पाठ, काम-काज बराबर वही करती है। लोगों की तरफ से भी उसे मन्दिर में आने-जाने की छूट है। हर कोई उसपर विश्वास करता है।" "लेकिन उसपर मुसीबत कौन-सी मा पड़ी है ?" "वात यह है कि उसके बच्चा होनेवाला है। मेरा मतलब है रम्भा प्रिगनेन्ट है।" मुझे लगा नरसिंहम का मिर फिर गया है। विली ने यह कैसा प्रादमी मेरे साथ लगा दिया। वह भादमी वहीं से भी सौपा-मादा नहीं लगता। इन सब मामलों में मगर कही फंस गए तो अन्त में मून के जुमं मे गिरफ्तार कर लिए जाएंगे। सून के जुर्म से चोरी का जुर्म कई गुना बेहतर है। मैंने कहा, "भला उसके लिए हम लोग क्या कर सकते हैं ?" "रम्भा की तो गादी भी नहीं हुई है, सर! इपर वह कुंवारी है, उधर वह मा बननेवाली है."गाव में तो ववेला मच जाएगा ।" "अरे, जो प्रादमी असली अपराधी है, अगर वह रम्भा से विवाह कर ले, तो सारी मुसीवत अपने माप दूर हो जाएगी। वह भला मादमी कहां चम्पत हो गया?" "जी, अगर यह सम्भव होता तब तो खर कोई झमेला ही नहीं उठता । लेकिन अब तो वह प्रादमी ही रम्भा से व्याह करने को राजी नहीं है।" मैं अजीब मुसीबत में फंस गया। अगर मुझे इस माफत का जरा भी माभास होता तो उतनी दूर से चिंगलीपट माता ही नहीं। "मद इन मय झमेलों में तुम हमें क्यों फंसा रहे हो, नरसिंहन ? हम लोग इस तरह के केसो मे हाथ भी नहीं डालना चाहते । कार तुम तो फंमोगे हो, हमे भी फंमामोगे। ऐसा करो, तुम कोई और पार्टी देखो।" "पाप इतना डर क्यो रहे हैं, सर? एक बात बताइए, ऐसी पार्टी समुचे मद्रास-भर में प्रासिर कितनी मिलेंगो ? जितनी मूर्तिया इम लड़की को मदद में मिल सकती हैं, उतनी और कोई नहीं दिलवा सकता । रम्मा की तरह चालाक-चतुर लड़को मापको पूरे साउथ इण्डिया में एक भी नही ।

"अच्छा, तो मुझे क्या करना होगा?" "सर, आप लोगों के पास तो रुपयों की कमी नहीं है। ढेर-ढेर रुपये हैं। आप उस महादेवन के साथ रम्भा का व्याह करवा दीजिए न ।" "यह महादेवन कौन है ?" "जिस आदमी ने रम्भा का सर्वनाश किया है।" "लेकिन महादेवन भला मेरी वात क्यों मानने लगा ?" "मानेगा सर, अलवत्त मानेगा। आपके कहने भर की देर है। वह रम्भा से ज़रूर व्याह कर लेगा।" मैं गहरी चिन्ता में पड़ गया। मैं न रम्भा को जानता हूं, न महा- देवन को । यह उनकी व्यक्तिगत समस्या है । मैं तो यहां किसी और काम से आया था। उन लोगों से मेरा क्या वास्ता? मेरी वात आखिर वे क्यों मानने लगे? अचानक नरसिंहम ने पूछा, "सर, मैं महादेवन को यहां बुला लाऊं? वह यहीं-कहीं पास में ही रहता है।" "वह करता क्या है ?" "करेगा क्या, सर? विल्कुल आवारा है। मेरी तरह वह भी सिर्फ आवारागर्दी करता है। उसके पास रुपया नहीं है, इसीलिए वह रम्भा से व्याह भी नहीं कर पा रहा है।" "और रम्भा ? वह क्या महादेवन से व्याह करने को राजी है ?" "भला वह क्यों नहीं राजी होगी, सर ! अगर उसका ब्याह नहीं हो पाया तो वह मारे शर्म के आत्महत्या कर लेगी।" "अच्छा, पहले तुम रम्भा को ही बुला लाओ। मैं सीधे-सीधे उससे ही वात कर देखू ।" उस वक्त मेरी जो मनःस्थिति थी, उसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते । इधर मैं रुपये के चक्कर में जाने किस सुदूर प्रदेश में टक्करें खा रहा था और उधर एक निपट अनजान औरत की पारिवारिक समस्या मिटाने की ज़िम्मेदारी भी मुझपर आ पड़ी थी। मुझे इन सब झमेलों में पड़ने की ज़रूरत ही क्या थी भला ? १२ भेजा। एक बार यह भी मन मे पाया कि माहब को टेलिग्राम देकर बुला लूं या फिर इम नरसिंहम को ही छुट्टी कर दूं। उसमें साफ-माफ कह दू कि तुमने कोई काम नहीं होगा। लेकिन काफी उधेड-चुन के बाद भी मैं कुछ तय नहीं कर पाया । अन्त में एक दिन रम्भा को ही अपने होटल में बुला' शुरू-शुरू मे मुझे यह शक भी हुआ था कि हो सकता है रम्भा नाम की कोई लडकी ही न हो । नमूची घटना नरसिंहम की मनगढन्त कहानी हो । सम्भव है वह हम लोगों को चकमा देकर कुछ रुपये ऐंटने को बोगिता में हो। लेकिन मेरा ख्याल गलत सावित हुप्रा । रम्भा को देखकर मैं चक्ति रह गया, दोस्त ! इस समाज में भी इतना रूप ? मैंने इस बात की कल्पना भी नहीं की थी। मेरे सामने वह लड़की थर-थर काप रही नरसिंहम ने कहा, "देखो, डरने की कोई बात नहीं । तुम साहब में अपनी सारी बात खोलकर कह दो। साहब जो कहेंगे वह तुम करोगी न? हमारा राज किसीके सामने खोलोगी तो नही ?" नरसिंहम अपनी भाषा में बातें कर रहा था। उसका एक भी राम मेरी समझ में नहीं पाया। उमने टूटी-फूटी अंग्रेजी में मुझे भी यपनी बातों का हवाला देते हुए कहा, "माप अंग्रेजी में ही बोलिए न, मर । रम्भा थोड़ी-बहुर अंग्रेजी भी समझ लेती है।" मैंने उन लड़की से पूछा, "तुम जानती हो, तुम्हें क्या काम करना है ? अपने काम के बारे में तुमने सारी बात समझ ली है न ?" रम्भा ने सिर हिला दिया कि वह समझ चुकी है। "तुम यह काम कर पामोगी ?" "हां, करूंगी।" "तुम हमें कितनी मूर्तियां दे सकती हो?" "प्रापको क्तिनी चाहिए? हमारे गांव में मन्दिरों की गिनती नह है। तमाम मन्दिरो में मूर्तिया भरी पड़ी हैं। मुन्दर-सुन्दर मूर्तियां नटराज की-मनन्त-शयन की ! मेरे बापू बड़े मन्दिर के पुजारी है इसीलिए यहां मुझे हर कोई पहचानता है। किसीको भी मुझपर शक नहीं होगा।" रम्भा और नरसिंहम अपनी ही जुवान में वातें कर रहे थे। नरसिंहम उसका अंग्रेज़ी-अनुवाद करके मुझे समझाता जा रहा था। रम्भा ने आखिरी सवाल किया, "एक-एक मूर्ति के लिए आप मुझे कितना देंगे ?" "तुम कितना चाहती हो?" "एक सौ रुपया।" "मिल जाएगा ।" "तो पहले सौ रुपया एडवान्स दीजिए।" मैंने देखा उस लड़की को रुपये का बुरी तरह लोभ है। मेरे मन में जाने कैसा सन्देह जाग उठा । जो आदमी शुरू-शुरू में ही रुपयों की रट लगाए हुए है, उसकी नीयत के बारे में शक होना स्वाभाविक भी था। "नहीं, एडवान्त रुपया नहीं दूंगा। तुम दाहिने हाथ से माल देना और बाएं हाथ से अपना रुपया ले लेना।" "नहीं, रुपया मुझे पहले चाहिए।" नरसिंहम वगल में ही खड़ा था। मैंने उससे कहा, "तुम यह कैसी पार्टी लाए हो, जो काम किए बिना ही रुपयों के लिए शोर मचाने लगी? रुपयों का इतना लोभ देखकर मुझे तो शक होने लगा है। यह लड़की मुझे भरोसे की नहीं लगी।" "नहीं, सर, ऐसी वात नहीं है । सचमुच इसे रुपयों की सख्त ज़रूरत है । असली किस्सा तो मैं आपको बता ही चुका हूं। रम्भा को उसी काम के लिए रुपयों की ज़रूरत है।" "तो यही वात वह मुझसे खोलकर क्यों नहीं कहती ?" नरसिंहम अपनी भापा में रम्भा से धाराप्रवाह रूप में जाने क्या- क्या कहता गया । उसकी बातें सुनकर रम्भा ने एक बार मेरी ओर देखा, लेकिन मुझसे निगाहें मिलते ही उसने नज़रें झुका ली और चुप ही रही। "तुम क्या कहना चाहती हो, मुझसे कहो।" "मुझे दो हजार रुपयों की जरूरत है।" १४ "क्यो" उसने उसी तरह निगाहें मुकाए हुए महा, "किमीको देना है।" "किने देना है, माफ-साफ बतायो, वर्ना में रुपया हरगिज नहीं दूगा।" "मैंने नरसिंहम को सब-कुछ बता दिया है। उसका नाम महादेवन है । महादेवन ने ही मेरा सर्वनाश किया है। उनका कहना है कि अगर उसे दो हजार रुपये मिलें, तो वह मुझने माह कर लेगा। दो हजार रुपये हों, तो वह एक घर किराए पर लेगा और मुझे व्याकर अपने घर ले जाएगा। इमलिए, इतने रपयो का जुगाड मुझे करना ही होगा, ययोंकि गरज मेरी है ? अगर उसने मुझने व्याह नहीं किया तो मेरे वापू मुझे घर में निकाल देंगे।" उसकी बातें सुनकर मैं वाकई चिन्तित हो उठा। वैसे मेरे मन में दुविधा भी थी कि कहीं वे दोनो मिलकर मुझे चकमा तो नहीं दे रहे हैं। उन दोनो को देखकर जाने क्यो मेरे मन में सन्देह जाग उठा था। शायद वे दोनों ही मुझने र बोल रहे थे। थोड़ी देर बाद मैंने नरसिंह्म से पूछा, "मच्चा, नरसिंहम, जरा तुम उसमें पूछो तो, उसे कितने महोने चढे हैं ?" नरसिंहम ने उससे पूछकर बवाया, "तीन महीने ..।" तीन महीना सुनकर मैं जरा निश्चिन्त हो पाया। यानी अभी कुछ वपत हाथ में है। इस बीच मामले की जांच-पताल की जा सकती मने रम्भा से कहा, "अच्छा, तुम प्रब जा सकती हो । मैं तुम्हें वाद में सवर करूंगा।" रम्भा चली गई। नरसिंहम फिसी फैसले की उम्मीद में मेरी मोर देखते हुए वही खड़ा रहा। मुझमे कोई उत्तर न पाकर सीने पूछा, "फिर मेरे लिए का हुक्म है, सर ?" "महादेवन यहां रहता है ? उसे तुम मेरे पाम ला सकते हो ?" "हां, सर ! उसे अभी हाजिर कर मकता हूं। मैं जाकर उसे अभी बुला लाता हूं।" इतना कहकर वह चला गया । मैं बैठा-बैठा गहरी चिन्ता में डूब गया। मुझे अन्दर ही अन्दर परे- शानी हो रही थी। यह कैसी मुसीबत में प्रा फंसा ? मैं क्यों फिजूल में इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी ले रहा हूं ? साहव से सलाह किए बिना, इन्हें मैं कोई आश्वासन भी कैसे दे सकता हूं? कहीं ऐसा न हो कि मैं किसी मुसीबत में पड़ जाऊं। उस दिन मैंने बहुत देर तक इन्तज़ार किया । नरसिंहम वापस नहीं लौटा । महादेवन भी नहीं आया । , उस दिन उनकी प्रतीक्षा करते-करते जव में ऊब गया, तो होटल से बाहर व्हलने निकल गया। चिंगलीपट काफी छोटा-सा शहर था। शहर के वीचोंबीच एक विशाल मन्दिर था । मन्दिर का गोपुरम् ही करीब चार- मंजिले मकान जितना ऊंचा था। अनगिनत लोग अन्दर आ-जा रहे थे। -- मेरा मन हुआ कि मैं भी एक वार अन्दर जाकर मूर्तियों पर एक सरसरी निगाह डाल पाऊं । लेकिन अगर कहीं किसीको मुझपर शक हो जाए ? यूं भी बंगाली होने की वजह से लोग मेरी तरफ घूर-घूरकर देख रहे थे । मन्दिर की मूर्तियां अगर चोरी हो गईं, तो पुलिस का शक मुझपर ही जाएगा। अत: मैंने मन्दिर में न जाना ही बेहतर समझा। होटल के मालिक ने मुझसे एक बार पूछा भी था, "आप करते क्या हैं, मिस्टर ?" "मैं टूरिस्ट हूं।" "टूरिस्ट तो खैर हैं, लेकिन काम क्या करते हैं ?" "मैं राइटर यानी लेखक हूं।" लेखक के पेशे के बारे में साहब ने ही मुझे बताया था कि परदेस में सबसे सुरक्षित उत्तर यही है । १६ ल-६ होटलवाले ने दुवारा सवाल किया, "पाप क्या मसवार के रिपोर्टर हैं ?" "हां-यही समझिए । लेकिन मैं कही नौकरी नहीं करता, यस, यही फर्क है ।" प्रखबार के रिपोर्टर और लेखक अलग-अलग किस्म के जीव हैं, यह फर्क समझने लायक बुद्धि उस होटलवाले में नहीं पी। इनीलिए मेरे पाते ही उसने जोर-शोर से सातिर शुरू की और तरह-तरह के पकवान सिलाकर मुझे तुम करने की कोशिश करने लगा। मुझपर उनकी साम कृपादृष्टि थी। लेकिन उन होटलवाले को यह नहीं मालूम था कि ये सब खाने मुझे ज़रा भी नहीं सुहाते । मुझे सुग कर मके, ऐमा रसोइया इन दुनिया में शायद पैदा ही नहीं हुआ। असल में साने-वाने के मामले में मेरी खास दिलचस्पी भी नहीं थी। मच बात तो यह थी, दोस्त, कि उन दिनो में सिर्फ नादराम या भका बन बैठा था। मैं पहलेवासा तापत नहीं रह गया था। यह तापन तो तभी बदल गया था जब उसने लखनऊ की कोठी छोड़ी थी। अब जो तापस था उसके मन में धन-दौलत, भोग-विलास और प्रतिष्ठा की चाह जाग उठी थी। और यह चाह कितनी तीखी थी, यह मेरे निवा और कोई नहीं जानता था। हालाकि दुनिया में मैं बिल्कुल अकेला था पोर अकेले आदमी की ज़रूरतें भी प्रासिर किडनी-मी होती हैं ? उनके लिए तो तीन गज जमीन भर ही काफी है। उनका काम चल जाता है। क्यो, चल जाता है न? लेकिन, छोडो, ये बातें... हां, तो उस शाम को जब मैं होटल लौटा तो नरसिंहम नहीं बैठा या। उनकी बगल एक और आदमी भी बैठा था। उसने उस आदमी का परिचय देते हुए कहा, "सर, यही है महादेवन ! आपने उसे बुला लाने को बहा या न?" मैंने महादेवन को अपने करीव याने का इशारा किया। उसकी हालव सचमुच बहुत सस्ता थी। यदन पर मली-मी शर्ट। फटी हुई सुंगी । यह डरते डरते मेरे पास आकर बैठ गया। ६७ मैंने पूछा, "तुम रम्भा नामक किसी लड़की को पहचानते हो ?" "हां, तर, पहचानता हूं।" "कितने दिनों से पहचानते हो?" "वपन से ही पहचानता हूं, सर ! वे लोग मेरे वगलवाले मकान में रहते थे।" "तुम जानते हो, तुमने उसे कहीं का नहीं छोड़ा है ?" महादेवन ने सिर झुकाकर कहा, "जानता हूं, सर !" "अब अपनी भूल सुधारने का कोई उपाय भी सोचा है ?" "मैं तो व्याह करने को तैयार हूं, सर! लेकिन आप ही बताइए, वीवी को खिलाऊंगा कहां से ? क्या मैं बीवी को खिलाऊंगा, क्या खुद खाऊंगा? मेरे पास तो एक पैसे का भी रोज़गार नहीं है..." मैंने पूछा, "कितने रुपये होने से तुम उससे व्याह कर सकते हो ?" "क्यों, सर, वे रुपये क्या आप देंगे ?" "मान लो, मैं ही दे दूं." महादेवन को सारी वात पहेली-सी जान पड़ी। उसने पूछा, "भला आप मुझे रुपये क्यों देंगे, सर ? इसमें आपका क्या स्वार्थ है ?" "हां, मेरा स्वार्थ है ! इस वक्त रम्भा मुसीबत में पड़ी है । अगर रम्भा को इस मुसीबत से छुड़ा लिया जाए, तो हमारा भी भला होगा। हम लोग जिस काम में लगे हैं, उसमें रम्भा जैसी लड़की की जरूरत है..." लेकिन मैंने यह स्पष्ट नहीं किया कि रम्भा हमारे किस काम आएगी। खैर, महादेवन ने मेरे चेहरे से ही अन्दाज लगा लिया कि मेरे पास काफी रुपया-पैसा है। उसने थोड़ा सोच-विचार कर कहा, "अगर मुझे पांच हजार मिल जाएं, तो मैं रम्भा ते व्याह कर सकता हूं, सर !" मैं उसकी बातें सुनकर ही समझ गया कि वह काफी शैतान आदमी है। हम लोगों की गरज देखकर वह भाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। . ९८ मैंने कहा, "ठीक है ! मैं जरा सोच दे। तुम्हें नरसिंहम से रावर भिजवा दूंगा । अव तुम जा सकते हो।" महादेवन के जाते ही मैंने नरसिंहम से कहा, "मुझे तो यह मादमी नम्बरी गंतान रागा।" नरसिंहम ने कहा, "संतान ही मही। लेक्नि अगर रुपये मिर जाएं तो वह अपनी बात जरूर पूरी करेगा, सर ! माप देख लीजिएगा, वह हमें धोखा नहीं देगा। सचमुच, उसे रुपयों की बेहद जरूरत है।" मुझे उसकी बातो पर यकीन नहीं पाया। नया बहुत गन्दी चीज है, मेरे दोस्त! अव यह कौन बता सकता था कि नरसिंहम सुद भी इसमें मिला हमा नहीं है । मैंने एक काम कर डाला । मैं उसी दिन चिगलीट में मद्रास रवाना हो गया । उधर विली मेरी प्रतीक्षा में दिन गिन रहा था। उमने मुझे देखते ही पूछा, "तुम्हारा काम कितना मागे वढा, दाबू?" मैंने सारा हाल विस्तार से कह सुनाया। सारी बात सुनने के बाद साहब ने राय दी, "ना। उस महादेवन के बच्चे को रपये हरगिज़ मत देना । मेरा मन कहता है, वह प्रादमी पीट है।" "लेकिन ऐसी हालत में रम्भा हमारे लिए काम नहीं करेगी।" साहब ने पूछा, "अच्छा, रम्भा कैसी लड़की है ? तुम्हें क्या लगता है। उससे हमारा कोई काम बनेगा?" "हां, रम्भा ही असली इन्मान है। साउथ इडिया में काम करने के लिए हमें उस जैसी ही किसी लड़की की जरूरत होगी।" "तव, चलो, एक वार मे भी चलकर उसे देख लू...' "हां, यही ठीक होगा।" मैंने सोचा अगर साहय एक नजर देव लेता है तो मेरी जिम्मेदारी काफी कुछ कम हो जाती है । में साहब भोर मेमसाहब को लेकर दुवारा लौट पाया । लेकिन इस वार चिंगलीपट के बजाय हम लोग महाबलिपुरम् के समुद्री तट पर एक दो मंजिले रेस्ट हाउस में ठहरे और में नरसिंहम को सवर देने चिगलोपट रवाना हो गया। वहां से चिंगलीपट ज्यादा दूर नही पा । नरसिरम गो ६६ - . भेजकर मैंने रम्भा को खुलवा लिया। साहव रम्भा को अच्छी तरह परख लेना चाहता था। इसीलिए काफी देर तक उससे सवाल-जवाव करता रहा । दरअसल वह उसे ठोंक- बजाकर देख लेना चाहता था कि वह लड़की हमारा काम कर पाएगी या नहीं। अन्त में उसने कहा, "अच्छा, अव तुम ज़रा वाहर जाकर बैठो। मैं थोड़ी देर में तुम्हें बुला लूंगा।" नरसिंहम ने रम्भा को ले जाकर बाहर वरामदे में विठा दिया। वहां कुर्सी-मेज़ बिछी हुई थी। वह और नरसिंहम बाहर प्रतीक्षा करने लगे। रम्भा के जाते ही मैंने साहब की राय जाननी चाही, "क्यों ? क्या ख्याल है ?" मेमसाहब ने कहा, "मुझे तो यह लड़की काफी काम की लगी। वह चेहरे से बेहद निष्पाप लगती है, और जिसका चेहरा-मोटरा और अांखें निष्पाप होती हैं, उसके द्वारा पाप-कर्म करना बेहद आसान होता है । तुम्हें भी हमने यही देखकर चुना था।" साहव ने कहा, "हां, यह लड़की हमारे बहुत काम आएगी।" कुछेक पल ठहरकर उसने किंचित मुस्कराकर कहा, "लेकिन एक बात है । मेरी राय में महादेवन को पांच हजार रुपया देना फालतू खर्च है। मेरे पास इससे बढ़िया प्रस्ताव है। ये पांच हजार रुपये तुम खुद ही क्यों नहीं ले लेते ?" मैंने अच कचाकर पूछा, "मैं ?" "हां वावू, तुम ! लेकिन पहले यह बतायो कि रम्भा तुम्हें पसन्द है ?" "मतलय...?" "मतलब, तुम खुद ही रम्भा से व्याह कर लो न ! मैं साहब का प्रस्ताव सुनकर विल्कुल पासमान से गिरा, "मैं व्याह कर लूं ? रम्भा से ? लेकिन उसके गर्भ में किसी और का वच्चा है है ?" "अरे, भाई, इसीलिए तो तुम्हें पांच हजार क्षति-पूर्ति के दे रहा १०० हूं। अगर मंजूर हो तो तुम्हें मैं पांच की जगह दस हजार रुपये भी दे सकता हूं।" दस हजार रुपये ! मेरे तन-बदन में जैसे झुरझुरी फैल गई। हालाकि अब ये बताना मुश्किल है कि रुपये की राशि सुनकर मैं हकबका गया था या रम्भा से ब्याह करने की बात सुनकर रोमाचित हो उठा था। दरमसल जिस लड़की की किस्मत में ढेर-ढेर दुःख होता है, शायद उसीकी जिन्दगी में ऐसी बुरी घड़ी पाती है । वर्ना आज तक न मैं कभी किसी लड़की के प्रेम मे पडा, न कभी किसीसे व्याह करने का ख्याल भाया। रम्भा के पाते ही साहब ने पूछा, "तुम क्या महादेवन से व्याह करने को राशी हो?" "हां, मुझे कोई एतराज नहीं है..." नरसिंहम साहब की बातो का अपनी भाषा में अनुवाद करके उसे सममाता गया। साहय ने कहा, "लेकिन देखो, महादेवन तो लोफर है । विल्कुल आवारा । अगर मैं उसे पांच हजार रुपये दे भी दूं तो वह ताड़ी पीकर उड़ा देगा। सामसाह तुम्हारे सिर मुसीवत मा पडेगी । तव तुम्हे सुद ही कमाना होगा । अपना पेट पालने के लिए मुमकिन है तुम्हे दूसरों के घर नौकरानी बनकर रहना पड़े।" रम्भा साहब की वातें सुनकर चुप ही रही। विती ने दुवारा गमझाया, "देखो, जिस पादमी ने तुम्हे एक बार तबाह किया है, वह दुबारा नहीं करेगा, इसका क्या भरोसा है ? मैं पूछता हूं उस जमे पादमी का तुमने भरोसा कैसे कर लिया ? क्या तुम अब भी उससे प्यार करती हो?" रम्भा ने कोई जवाब नहीं दिया। वह पूर्ववत् खामोश रही। रम्भा की तरफ से नरसिंहम ने जवाब दिया, "नहीं, सर, रम्भा ने मुझे सच-सच बता दिया है । यह महादेवन को बिल्कुल प्यार नहीं करती १०१ है, सर ! दरअसल वह मुझे ही प्यार करती है।" विली ने चौंककर पूछा, "तुम्हें ? रम्भा तुम्हें प्यार करती है ?" "हां, सर, रम्भा वचपन से ही मुझे प्यार करती है।" साहव, मेमसाहब और मैं हम तीनों ही महा मुश्किल में पड़ गए। अगर हमें मालूम होता कि ऐसी भी कोई स्थिति पा सकती है, तो हम पहले से ही कोई इन्तजाम कर रखते । अगर हमें इस बात का आभास हो जाता तो शुरू में ही नरसिंहम की छंटनी कर दी जाती। विली की निगाहें रम्भा के चेहरे पर पड़ गई, "नरसिंहम ने जो कुछ कहा, क्या वह सच है ?" रम्भा भी शायद उसकी बातों का प्राशय समझ गई थी। उसने कहा, "हां, सर, सच है।' "लेकिन अगर तुम सचमुच नरसिंहम को ही प्यार करती हो तो महादेवन का वच्चा तुम्हारे पेट में कैसे आया ?" कुछेक पलों के लिए रम्भा को जैसे कोई जवाव ही नहीं सूझ पड़ा। थोड़ी देर बाद उसने कहा, "महादेवन ने मुझको कहा था कि वह बहुत ऊंची तनखावाली नौकरी करता है, लेकिन उसने मुझसे झूठ बोला था।" "और नरसिंहम ? नरसिंहम भी तो महादेवन जैसा ही लोफर है । उससे व्याह करके क्या तुम सुखी होगी ?" रम्भा की आंखों से आंसू दुलक पाए । विली ने पूछा, "तुम रो क्यों रही हो ?" नरसिंहम ने कहा, "सर, यह मुझे बहोत प्यार करती है न, इसी- लिए इतना रो रही है। असल में यह खुशी के आंसू हैं।" "तुम चुप रहो।" विली ने नरसिंहम को चुप करा दिया। वह समझ गया कि नरसिंहम की उपस्थिति में रम्भा अपने मन की बात नहीं खोलेगी, अतः उसने नरसिंहम से कहा, "तुम ज़रा कमरे से बाहर जानो तो! चलो, वाहर निकलो।" नरसिंहम किसी तरह भी वाहर जाने को राजी नहीं हुआ। उसने . १०२ - कहा, "मैं क्यो बाहर जाऊ, सर? मैं ही तो रम्भा को यहां लाया हूं।" विली ने कहा, "हम लोग पहले रम्भा से सारी बात तय कर लें, तब तुम मा जाना । अभी बाहर जाप्रो..." नरसिंहम किसी भी तरह बाहर जाने को राजी नहीं हुआ। उसके हाव-भाव देखकर यही लगा, मानो वह सच ही बुरी तरह डर गया है। वैसे उसके डरने की सास कोई परह नही थी। उसे शायद यही भय या कि रम्भा कहीं उसके हाथ से फिसल न जाए । हम मजीद गोरखधन्धे में फस गए थे । जाने किस देश की एक मदद मनजान लड़की भोर एक मदद लड़के के गुपचुप प्यार के बीहड ताने-बाने में हम सब भी उलझते जा रहे थे। हम लोग गैर-कानूनी तरीके से रुपया कमाने के धन्धों में घूमते-भटकते रहते है। हमारी प्रामदनी के साथ दुनिया के सुदूर प्रदेशों के जाने कितने-कितने लोगो का भाग्य जुड़ा हुमा है । चुराई हुई एक-एक मूर्ति पर सत्तर-मस्सी लास रुपयों का वारा- न्यारा होता था। जहा इतने ढेर-ढेर रुपयों का कारोबार चलता हो वहाँ किसके पास इतना वक्त था कि वह किसी लड़के-लड़की के सस्ते प्रेम के पीछे सिर-दर्द मोल ले । हो सकता है, जिन्दगी में कभी बड़े बनने की नन्ही-सी उम्मीद रही हो, लेकिन वहा भादमी यानी दौलतमन्द बनने की लालसा मुझमे कभी नही जागी। यानी रुपये के जोर पर बड़े मादमी बनने की लालसा ! लेकिन उन दिनो परिस्थितियां कुछ ऐसी थी कि मैं क्रमशः किसी जाल में फंसता जा रहा था और रुपयो को ही भगवान मानने लगा था। सर रुपये के लिए ब्याह तो क्या शायद में मौत के कुएं में भी छलाग सगाने को प्रस्तुत था। विली ने पुहककर कहा, "जानो, निकलो वाहर..." नरसिंहम ने भी उसी तरह गिड़गिड़ाते हुए जवाब दिया, "नहीं, मैं वाहर नहीं जाऊंगा।" "वाहर नहीं जानोगे ? देखो, प्रगर तुम निकले तो मैं तुम्हें नौकरी से निकाल बाहर करूंगा।" "मगर माप नौकरी से निकाल देंगे तो मैं भी पुलिस के सामने 03 आपका सारा भेद खोल दूंगा।" "पुलिस के सामने तुम कौन-सा भेद खोलोगे, ज़रा सुनं तो !" "मैं पुलिस को बता दूंगा कि आप लोग स्मगलर हैं। मन्दिरों से मूर्तियां चुराकर विलायत भेजते हैं।" साहब और मेमसाहब और मैं हम तीनों ने यही महसूस किया कि नरसिंहम का दिमाग खराव हो गया है। हममें से किसीने भी यह नहीं सोचा था कि ऐसी मुसीबत में पड़ जाएंगे। साहव ने मेरी ओर देखा, यानी वह मेरी राय जानना चाहता था। लेकिन मैं क्या बोलता ? नरसिंहम के सामने मैं कह भी क्या सकता था? अचानक विली ने नरसिंहम से एक अजीव-सा सवाल किया, "अच्छा, तुम चाहते क्या हो ? रुपया ? रुपया लेकर क्या तुम सन्तुष्ट हो जानोगे ? कितने रुपये चाहिए तुम्हें ?" नरसिंहम ने कहा, "मुझे रुपये नहीं चाहिए।" "तब तुम आखिर चाहते क्या हो ? रम्भा से व्याह करना चाहते हो ?" "नहीं..." - "तब ? महादेवन से विवाह होने में तुम्हें कोई एतराज़ नहीं है। तुम खुद भी रम्भा से व्याह करने को राजी नहीं हो। ऐसे में रम्भा विचारी क्या करे ? इस मुसीवत से वह विचारी आखिर कहां जाए ?" इतनी देर बाद नरसिंहम ने अपने मन की बात खोलकर कही, "असल में, रम्भा अपनी विपत्ति के लिए खुद ज़िम्मेदार है, सर ! इसके लिए मैं कहीं से ज़िम्मेदार नहीं हूं। मैं तो इसे वताकर ही यहां से गया था कि मैं शहर जा रहा हूं। शहर से रुपये कमाकर लौटते ही व्याह कर लूगा । लेकिन फिर भी यह महादेवन के झांसे में क्यों भरमा गई ? महादेवन के साथ क्यों सोने गई ? अव जैसा पाप किया है, वैसा भोगे !" "लेकिन इससे व्याह करने में तुम्हें क्यों एतराज़ है ?" "एतराज़ इसलिए है कि इसके पेट में महादेवन की सन्तान पल १०४ विली ने कहा, 1 उमसे च्याह रही है। माप क्या सोचते हैं ? महादेवन का बेटा मुझे 'वापू' कहकर बुलाए और मैं सह लूंगा ?" "ठीक है । ठीक है । रुपये की वजह से हो तुम उसने व्याह नहीं कर पाए न? अगर मैं तुम्हें पाच हजार रुपये दे दूतब तो तुम्हें उमके बेटे का बाप बनने में कोई मापति नहीं होगी न ? नरसिंहम मानो किसी दुविधा में पड़ गया। कुछेक पल सोच-विचार कर उसने पूछा, "पाच हजार की जगह माप मुझे दस हजार रुपये नहीं दे सकते, सर ?" "ठीक है ! चलो, दस हजार ही दे दूंगा । प्रब तो तुम करने को राजी हो न?" "हां, सर, कर लूंगा!" अचानक रम्भा चीख उठी, "नहीं । मैं इससे ब्याह नहीं कहंगी।" रम्भा की बात सुनकर हम सब एकबारगी चकरा गए। हम सबकी भासे उसकी तरफ उट गई। उमकी मांसो के मामू मूख चुके थे । वह एकदम से तनकर खड़ी हो गई। उसने कहा, "मगर अब यह मुझे व्याहने को तैयार हो भी जाए सो भी मैं इससे व्याह नहीं करूंगी।" हम सब सस्ते में मा गए। विली ने पूछा, "क्यों, मय तुम इमसे व्याह क्यों नहीं करोगी?" "यह भूटा है । इसने मुझे घोसा दिया है। "परे, ये क्या बात हुई ? इसने तुम्हें कर धोखा दिया ? विचारा नरसिंहम ही तो इतना जोड-तोड़ पर रहा है कि किसी तरह महादेवन से ही तुम्हारा माह हो जाए। तुम दोनों मुखी होमां। नरसिंहम ही तो तुम्हे यहां से भागा। अगर नरसिंहम न होता तो हम लोगों से तुम्हारी जान-पहचान भी नही होती..." "लेकिन इसने मेरे साथ वईमानी की है." "बेईमानी ? कैसी बेईमानी ?" "हर जाकर यह एक छोकरी के पल्ले पड़ गया मोर उससे न्याह भी रचा लिया..."

विली ने नरसिंहम की तरफ देखकर पूछा, "क्या यह सच है ? क्या सच ही तुमने किसी दूसरी लड़की से व्याह कर लिया है ? " नरसिंहम ने कहा, "नहीं सर! ये बातें सरासर भूठ हैं। मैंने तो अभी तक व्याह नहीं किया। रम्भा के अलावा मैंने कभी किसीको प्यार' नहीं किया..." साहब विकट समस्या में उलझ गया । ये साहब और मेमसाहब सात समुन्दर तेरह नदी पार करके रुपया लूटने आए थे। किसको कितनी चोट लगती है, इस बात को लेकर उन्हें सिर खपाने की कोई गरज नहीं थी। वे लोग तो सिर्फ रुपया पहचानते थे। जब तक तुमसे उनका स्वार्थ-सिद्ध होता है वे तुम्हारी खातिर करेंगे, लेकिन जैसे ही तुम कम- जोर या असमर्थ सावित होगे, तुमने उनके सारे रिश्ते खत्म । तव तुम महज एक सिफर यानी शून्य-भर रह जानोगे। दुनिया में जो लोग सिर्फ रुपया चाहते हैं, शायद उनसे बढ़कर नादान और कोई नहीं है। अब मुझे ही लो, न ! जिन दिनों में तुम लोगों के साथ था, मुझे रुपये की कभी हाय-हाय नहीं हुई; इसीलिए तुम लोग मुझे निरा बुद्ध समझते थे ! अब मैं महसूस करता हूं कि दरअसल उन्हीं दिनों में अक्लमन्द था। लेकिन अब मैं सचमुच नादान और बेवकूफ बन गया हूं, क्योंकि अब मुझे सिर्फ रुपयों की रट लग चुकी । दरअसल इसके लिए अकेला मैं ही दोपी नहीं हूं। आज के जमाने में यह कमजोरी हर किसीमें है। और भला इसी युग को क्यों दोप दूं? यह कमजोरी तो हर युग के हर धादमी में रही है। इन्सान हमेशा से ही जमीन-जायदाद को लेकर आपस में कटता-मरता रहा है । जिन लोगों ने अर्थ को तुच्छ समझा है और परमार्थ को ही परम पदार्थ माना है, वे इन्सान के लिए सच्चे आदर्श के रूप में स्वीकृत और सम्मानित होते रहे हैं। जैसे-ईसा मसीह, बुद्ध, चैतन्य, साकेटीस, परमहंस । लेकिन मेरा इतना सौभाग्य कहां कि मैं उनकी तरह बन पाऊँ ? हालांकि आज मैं इतनी लम्बी-चौड़ी वातें इसीलिए कर पा रहा हूं, क्योंकि आज मैं भी पैसेवाला वन गया हूं। चूंकि मेरे पास रुपया है; One ? इसीलिए रपयो के बारे मे राय देने का मुझे हक है । लेकिन उन दिनों ? उन दिनो तो मैं चुपचाप तुम लोगों की बातें सुना करता था, और सोपा करता था, जब मेरे पास भी ढेर-ढेर रपये हो जाएंगे तो मैं भी कलकतं जाकर तुम सबको दिखाऊंगा। तुम लोग मुझे देखकर जल- भुन जामोगे। हा, मुझे यह सोच-सोचकर ही बहुत मजा पाता था। हर दफ्त में इन्ही स्यालो में इवा रहता था। तुम्ही वताप्नो, अगर मैं प्रपना धन-ऐश्वयं अपने प्रात्मीय-स्वजन पोर बन्धु-वान्धवो को ही नहीं दिसा पाया तो ऐश्वर्यवान होने का क्या सुख साहब ने नरसिंहम से कहा, "अच्छा, एक काम करो। तुम दोनों ही जरा वाहर और अकेले में बैठकर मापस में कोई फैसला कर डालो। उसके बाद मेरे पास माना"" साहब की बात सुनकर नरसिंहम और रम्भा दोनों ही बाहर चले गए। हम लोग अन्दर ही बैठे रहे। साहब ने मेरी और देखकर कहा, "तुम्हारा क्या ख्याल है ? यह लड़की नरसिंहम को प्यार करती है ?" मैंने जवाब दिया, "मेरी समझ में कुछ नहीं पा रहा है।" दिली की निगाहे मेमसाहब की तरफ घूम गई । उससे भी उसने वही सवाल किया, "तुम्हें क्या लगता है, डालिग?" मेमसाहब ने जवाय दिया, "ये इण्डियन लोग मद्भुत जात है, क्लिी।" "क्यों ? तुम इन्हे प्रद्भुत जात क्यों कह रही हो?" मेमसाहब ने कहा, "दरमसल वे लोग चाहते क्या है; यह वे खुद भी नही जानते । रम्भा मगर महादेवन को ही प्यार करती है तो रुपये क्यो माग रही है ? मोर प्रगर नरसिंहम को प्यार करती है तो उससे स्याह करने में उसे क्या एतराज है ? असल में वह लड़को मपने मन की बात स्तुद भी नहीं जानती..." मेमसाहब की तरह मुझे भी सारी घटना बिल्कुल पहेलो-सी लग रही थी। मैं भी तो मासिर इण्डियन हूं। मैं ही भला क्या अपने को जानता हूं? क्या मैं बता सकता हूं कि मैं क्या चाहता हूं ? हालांकि उन ? १०७ दिनों मेरा यही ख्याल था कि अगर मेरे पास ढेर-ढेर रुपये हो जाएं तो मैं सुखी हो जाऊंगा। उन दिनों में सोचता था कि जिस दिन मेरे पास अटूट दौलत हो जाएगी, मेरी सारी चाहत पूरी हो जाएगी। अमीर होकर शायद मैं सुखी हो जाऊंगा। लेकिन, दोस्त, उन दिनों में यह नहीं जानता था कि हमारी चाहत में भी मिलावट हो सकती है। खैर, मिलावट तो हर जगह थी, है और हमेशा रहेगी। हम लोग चावल-दाल, तेल में मिलावट को लेकर परेशान होते हैं । अखवारों में भी उस मिलावट के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर लिखा जाता है। लेकिन मन ? मन में भी तो मिलावट होती है। मन की चाहों में जो मिलावट होती है, उसके लिए हम कभी परेशान नहीं होते। हालांकि यह मिलावट इतनी खूबसूरत है कि इसका कहीं कोई जवाब नहीं है । चावल, दाल, तेल की मिलावट से तो फिर भी छुटकारा पाया जा सकता है, यानी हम कोशिश करें तो ये मिलावटें दूर भी कर सकते हैं, लेकिन मन की मिलावट ? उसे कैसे दूर करें? आखिर यह कैसे समझ में पाए कि हमारी कौन-सी चाहें असली हैं और कौन-सी नकली ? हां, मेरे मन में काफी मिलावट थी, वन्धु । मेरे भीतर असली और . नकली चाहें मिल-जुलकर एकाकार हो गई थीं। हां मैंने भी रुपया ही चाहा था। खैर, मेरी बात तो बिल्कुल अलग है । लेकिन मेरी तरह क्या रम्भा ने भी रुपयों को ही सबसे बड़ा मान लिया था ? हालांकि कुछ ही दिनों बाद, जब मैं रम्भा से थोड़ा-बहुत घनिष्ठ हो गया तो यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई थी कि यह किस किस्म की लड़की है। लेकिन ये सब तो बहुत वाद की बात है। आदमी को दूर से देखकर उसके बारे में जो राय कायम की जाती है, उसके करीव आने पर अक्सर समूची राय वदल जाती है। जैसे कैमरे में दूर की तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती है और करीव आने पर कुछ और । काफी देर बाद विली ने जुबान खोली, "वतानो, वायू, क्या किया - जाए ?" १०८ मैंने जवाब दिया, "प्रद मैं क्या बताऊं? नरनिहम को तो मैं पहचानता भी नहीं था। तुमने ही उसे जुटाया था। अब यह फैसला भी तुम्ही करो कि क्या करना है..." विती ने कहा, "मदान के रास्ते में नरसिंहम से अचानक ही परि- पर हसा या । देवने-सुनने में वह आदमी काफी प्रभादग्रस्त है। खर, भादमी अगर प्रभाव में न हो तो इस धन्धे में हाथ बंटाने ही क्यों जाएगा? उमौने बताया था कि यहां उसकी कापी जान-पहचान है।" मैंने कहा, "लेकिन असल में वह जुपाचौर है। तुम उसे नहीं पहचान पाए, माहब !" "क्यो ? उसे जुपाचोर क्यों कह रहे हो ?" "मुझे तो लगता है कि वह उस पतुरिया के बहाने कुछ रपये वसूल करना चाहता है।" विली ने कहा, "लेकिन यह भी तो सन्भव है कि उसने जो कुछ कहा, सब सच हो । जब वह उम छोकरी को यहा रखकर, नौकरी की सोज में महर गया, तब उसने सोचा होगा कि खूब मारे रुपये कमाकर वह अपने मुल्क लोट धाएगा और उस छोकरी मे शादी कर लेगा..." साहब समूची दुनिया घूमने के बाद हिन्दुस्तान माया था । उसका असली उद्देश्य रपया कमाना था। इसके अलावा वह और कुछ नहीं चाहता था। लेकिन वह जानता था कि ढेर-टेर रुपये कमाने के बाद भी, कभी-कभी मन के सवाल प्रादमी को उद्विग्न कर जाते हैं । साहब ने कहा, "प्रब क्या करना चाहिए, यतामो न?" "पहले तो यह देखना होगा कि वे दोनो क्या करते है ?" टीका उनी ममय बाहर किसीको मायाज मुनाई दी। शोर-गुल सुनसर हम तीनों भागकर बाहर पाए। नरसिंहम रम्भा का झोटा खींचते हुए उसे पीट रहा था। साहब ने दौड़कर नरसिंहम के दोनों हाय सकर पकड़ लिए। उससे पूछा, "यह क्या कर रहे हो ? इसे मार क्यों रहे हो ?" उस वक्त नरसिंहम गुस्से से फुफकार रहा था। उस मम्हालना मुस्किल था। नरसिंहम ने कहा, "यह मुझे गाली दे रही थी। मैं इसका । . खून कर डालूंगा।" सचमुच वेहद अजीव परिस्थिति थी। इस वीच तमाशबीनों की पूरी भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी। रम्भा नरसिंहम के हाथों मार खाकर, अांचल की ओट में विलख-विलखकर रो रही थी। साहब ने उसे ही सम्बोधित करके पूछा, "तुम रो क्यों रही हो?" "इसने मुझे इतना मारा है कि।" "लेकिन तुमने इसे गाली क्यों दी ?" रम्भा ने कहा, "गाली-गलौज भी पहले इसीने शुरू की थी।" अब किसने किसको पहले गालियां दी थीं, यह तय करना मुश्किल था; क्योंकि मारपीट के समय हममें से कोई भी वहां मौजूद नहीं था। साहब ने नरसिंहम को सम्बोधित करके पूछा, "पहले तुम्हींने इसे गालियां दी थीं न ?" नरसिंहम गुस्से से हांफ रहा था । उसने कहा, "इसकी इतनी बड़ी हिम्मत कि यह मुझे चरित्रहीन कह गई। और आप जानते हैं, मैंने इसके लिए क्या-क्या किया है ? एक ज़माना था जब यह दाने-दाने को तरसती थी। इसके बाप को मन्दिर के पूजा-पाठ से जो दूध मिलता था, उसमें उनको पेट चलाना मुश्किल हो रहा था। उन दिनों मैंने ही उन्हें रुपये-पैसे, कपड़े-लत्ते और चावल वगैरह से मदद करके, भूखों मरने से बचाया। मैंने अपनी पुश्तैनी ज़मीन तक वेच दी। उन पैसों से इनके लिए जमीन खरीद दी, मकान बनवा दिया, ताकि इन लोगों को किसी तरह सिर छुपाने की जगह मिल जाए। रम्भा के बाप ने ही मुझसे मिन्नतें की थीं कि मैं इससे व्याह कर लूं।" हम लोग भीड़ में खड़े-खड़े उनकी दास्तान सुन रहे थे। इतने सारे लोग जो उनकी मुहब्बत के किस्से सुन रहे हैं, इस बात को लेकर नरसिंहम या तमाशबीन दर्शकों के चेहरों पर शर्म या संकोच का कोई चिह्न नहीं था। लेकिन मैं शर्म से गड़ा जा रहा था। मैंने आसपास जमा हुए लोगों से बाहर जाने का अनुरोध किया। मेरी दुत्कार सुनकर वे लोग न चाहते हुए भी, एक-एक करके बाहर निकल गए । रम्भा और नरसिंहम ११० । को मन्दर बुलाकर मैंने कमरे का दरवाजा बन्द कर लिया। ज्वार तगमग गान्त हो चुका था। भव हम लोगों ने पहली बार रम्भा के चेहरे की तरफ गौर से देखा । मन्दिर के मामूली से पुरोहित की लड़की। समूची जिन्दगी दरिद्रता और प्रभाव में बिता दी। पिता की तनखा कुल मिलाकर सिर्फ पांच रपये महीने ! हां, भूले-भटके कभी-कभार कुछ ऊपरी दान-दक्षिणा मिल जाती थी। चलो, यह भी मान लिया कि पिता ठहरे पुजारी पादमी ! उनका काम महज पूषा-अर्चना करना था। शिव की पाराधना मे ही वे परम-तृप्ति पा लेते थे। गिव के चरणो में प्रात्मोत्सर्ग में ही उनकी परम-मुक्ति थी। लेकिन रम्भा! रम्भा का तो भविष्य था। उसकी अपनी निजी माशा-माकाक्षाएं थी। जबसे उमने होश संभाला वह मन्दिर देखती पा रही थी। उनके ऐश्वयं को चमक-दमक उमको पासो से छुपी नहीं थी । हां, उनकी भक्ति की और उसकी दृष्टि कभी नहीं गई । वह तो सिर्फ उनके जेवर, साजी, रूप-यौवन को निहारती रही। कभी-कभार वह भी अपने यापू से मुह खोलकर फर्माइश करती यो, "यापू, मुझे भी एक रेसामो साड़ी खरीद दो न !..." "रेशमी साही? क्यो, री? रेशमी साड़िया तो प्रमौर सोरतें पहनती हैं। हम लोग क्या प्रमीर है, बिटिया ?" उन दिनी रम्भा को सास अक्ल भी नहीं थी । वह फौरन सवाल करती थी, "तो तुम अमीर क्यों नहीं हुए, बापू ?" पिता हंसकर समझाने की कोशिश करता, "भगवान ने हमे जितना दिया है, हमें उसीम घुरा होना चाहिए, विटिया।" लेकिन रम्भा को इन तकों से नही समभाया जा सकता था। उसके मन में पाने और जीने की माकाक्षा क्रमशः तीखी होती गई । भासिर उनके पास भी ढेर-ढेर रुपये क्यो नहीं हैं ? प्रापिर वे लोग भी पक्के मरान में क्यों नही रहते ? मासिर वही क्यों फटी-पुरानी और गन्द माडी पहने ? दुनिया में सभी लोग जब ऐश-ग्राराम से रहते हैं, एक अकेली यही क्यों दुःस तकतीफ सहने को जन्मी है ?

। "उसके बाद ?" उसके बाद रम्भा की उम्र बढ़ती गई । चिंगलीपट के लोग भी क्रमशः और धनवान बन गए। धान, चावल की दरें भी बढ़ती गईं। देश में कपड़ों की नई-नई मशीनें बैठाई गई। उसके गांव के दर-दुकानों में खूबसूरत डिज़ाइनोंवाली रंगीन साड़ियों का अम्बर लगा रहता । मन्दिर में दर्शनार्थियों की संख्या भी क्रमशः बढ़ती गई। भगवान के चढ़ावे में भी वृद्धि हुई। पहले जहां कुल सौ-दो सौ रुपयों की आमदनी होती थी। अब पांच-पांच सौ रुपये आने लगे । लेकिन उसके बापू की तनखा जो पहले थी, वही अव भी रह गई, यानी कुल पांच रुपये । हां, भगवान के पुजारी को पाखिर रुपयों की ज़रूरत भी क्या है ? रम्भा उसी उम्र में खाना-बाना बनाने के मामले में अपना हाथ पक्का कर चुकी थी। उसके बापू तो हर समय अपने ठाकुर जी में ही मग्न रहते थे और वेटी दिन-भर घर सम्हालती थी। उसका सारा समय घर-गृहस्थी में ही बीतता था। उसका काम कभी खत्म होने को ही नहीं आता था। वैसे तो घर के नाम पर सिर्फ एक कोठरी ही थी, लेकिन इससे क्या हुआ ? दो मील दूर से पानी भी तो लाना पड़ता था। वह कीन लाता? उन्हीं दिनों उसकी मुलाकात नरसिंहम से हो गई। नरसिंहम से मिलकर रम्भा को जाने क्यों वेहद अच्छा-अच्छा लगता था। अब तो बहुत बार जब पानी की ज़रूरत नहीं भी होती थी, वह पानी लाने चल देती थी। नरसिंहम ने ही एक दिन उससे पूछा, "तुम इतनी दूर पानी लेने क्यों आती हो, जी ?" रम्भा ने कहा, "इतनी दूर आए विना पानी कहां मिलेगा ?" "क्यों, मन्दिर में ! तुम्हारे घर के पास जो मन्दिर है, वहां भी तो पानी है।" "अरे, मन्दिर के कुंड में तो सिर्फ पीने का पानी मिलता है । पीने के पानी के अलावा क्या और किसी काम के लिए पानी की जरूरत नहीं पड़ती ?" . - ११२ ल-७ इसी तरह उनका परिचय हुआ। दरअसल पानी का प्रसंग तो महज बहाना भर था, बाते करना ही मुख्य उद्देश्य था। उपलक्ष्य को प्रधान मानकर लक्ष्य-वस्तु की मोर हाय बढ़ाना सचमुच बड़ी वात है। नरसिंहम भी अपनी लक्ष्य-वस्तु तक पहुंचने के कौशल से भली-भांति परिचित था। लेकिन दुनिया का यह अकाट्य निमम है कि तुम्हारे मन में चाहे जितनी भी मान्तरिकता प्रौर मनुराग मरा हो, उसे गहरा करने के लिए एक और चीज को भी अपरिहार्य भोर मनिवार्य रूप से जरूरत पड़ती है। और वह है रुपया! नरसिंहम के जीवन में सयों का ही सर्वाधिक प्रभाव था। शुरू-शुरू में रपयो का प्रसंग चाहे न भी उठे, लेकिन एक-न-एक दिन प्रसंग निश्चित रूप से उठ खड़ा होता है। वैसे अनुराग अच्छी चीज है, शायद दुनिया की उत्तम चीजों में भी सर्वोत्तम ! लेक्नि अनु- राग भी माखिर दूसरों पर निर्भरशील है ! मनुराग को रोशनी निश्चित रूप से बुझ जाती है, मगर उसके पीछे स्पयो के तेल को ताकत न हो! मगर मैं मरने अनुराग का प्रमाण देना चाहता हूं तो मुझे कुछ न कुछ उपहार देना होगा । क्या उपहार दे सकता हूं? साडी! जेवर ! प्रौर ये सब खरीदने के लिए भाखिर स्पयो की ही जरूरत पड़ती है न ? इसीलिए नरसिंहम के दिमाग में भी रुपयों की बात घर कर गई। उसीने एक दिन प्रस्ताव रखा, "मैं शहर जाऊगा।" "शहर ? कौन-सा शहर ?" "मद्रास!" नरसिंहम ने वचन दिया कि वह शहर जाकर नौकरी करेगा। वहां से खूब सारी दौलत इकट्ठा करके वह लौट भाएगा मोर रम्भा से विवाह करेगा। उसे सुखी बनाएगा। उतने दिनों तक वह उसकी प्रतीक्षा करे। वने अमीर बनना कोई मुश्किल काम नहीं है, खासकर शहरी मै । वहां रुपये बितरे रहते हैं, बशर्ते प्रादमी अपनी बुद्धि सचं करके उन्हें वटोरला जानता हो। इस तरह पांच वर्ष पूर्व नरसिंहम रूपये कमाने शहर चला माया। ।

दरअसल उसे शहर नहीं, मगरमच्छ कहना चाहिए। मगरमच्छ की तरह यह शहर भी विशालकाय मुंह बाए रहता है। वैसे यह मगरमच्छ दिखाई नहीं देता। उसे छुआ भी नहीं जा सकता और वह किसीकी पकड़ाई में भी नहीं पाता । बाहर से देखो तो विराट-विराट रास्ते, विराट- विराट मकान, विराट-विराट फैक्टरी; लेकिन फिर भी यह मगरमच्छ जाने कैसे अपना खूखार चेहरा लोगों की निगाहों से छुपाए रखता है। उसकी तरफ किसीकी निगाह ही नहीं जाती। उसका वह भयंकर रूप देख न पाने की वजह से ही, यह शहर नितान्त अपना लगता है। ऐसा लगता है, मानो यह शहर वेहद उदार है। इसीलिए तो वह सबको बुलाता है-प्रायो, आमो, यहां चले आनो! मैं तुम्हें सुख, शान्ति, ऐश्वर्य, प्रानन्द-सब कुछ दूंगा। ये बातें गांव के भोले-भाले निवासियों को बहका-फुसलाकर शहर ले आती हैं । लेकिन कहां है वह सुख-शान्ति, ऐश्वर्य और यानन्द ! इस तरह शहर में गांव के लोगों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जाती है। शहर की हवा और जहरीली हो पाती है । इन्सान की नापा-धापी और दौड़-धूप में सिर्फ आकाश ही कलंकित होता है। उन्हीं दिनों नरसिंहम विली साहब से टकरा गया। विली और जेमी मेमसाहब पहले दिन स्टेशन में प्लेटफार्म पर उतरे, नरसिंहम उनके सामने आ खड़ा हुआ। "गुड मानिंग, सर!" "गुड मानिंग." "एनी सरविस, सर ? कोई सेवा ?--कोई होटल ? मुझे नरसिंहम चाहते हैं, सर!" यानी उन्हें किसी मदद की जरूरत है ? किसी होटल में ठहरने के इन्तजाम की जरूरत है ? साहब ठहरा हिप्पी पादमी ! उसके साथ कोई लाव-लश्कर भी नहीं पा। बिल्कुल मस्तमौला । अपने एक जोड़ी पैरों पर भरोसा करके उन लोगों ने समुन्दर पार किया था। गांव से चलकर हिन्दुस्तान पाए थे। उनके लिए होटल-वोटल विलास के सामान थे। वे लोग अपने - ।

मतलब का सौदा करके, दुबारा अपने देश लौट जाएंगे । अपना पेट भरले के लिए उन्हें किसी भी महारे की जरूरत नहीं थी। विली ने कहा, "सुनो, एक मकान ठीक कर मक्ते हो ? सिर्फ एक कमरा !" "हां, सर, घर तो है। मच्छा, पापको स्तिने रुपये तक का पर चाहिए और विस मुहल्ले में ?" पसन्द-नापसन्द के मामले में साहब को कोई खास दिलचस्पी नही थी। उनके सामने चुनाव को भी कोई गुंजाइश नहीं थी। किसी भी मुहल्ले में, किसी भी किराए पर, महज़ एक कमरे की जरूरत थी। यहां तक कि माहव को फर्नीचर तक की भी जरूरत नहीं थी। "लेकिन मार सोएंगे वहां, सर?" "क्यो ? जमीन पर। जैसे तुम इण्डियन लोग मोते हो।" नरसिंहम ने ही उस दिन साहब के लिए कमरे का इन्तजाम किया या । मगर उन दिन नरसिंहम न होता तो मद्रास पाकर भी साहब को माश्रय नहीं मिलता। उसके बाद धीरे-धीरे नरसिंहम से घनिष्टता होती गई । मे भी अपना साहब घनिष्ठता बढाने के पार्ट में पूर्ण पारंगत है । इसके अलाया दुनिया में रुपया ही सबसे बडी कला नहीं है। रुपये की बदौलत इन्सान को कैसे वश में किया जाता है, यह जानना भी एक कला है। यह कला हर किसीको नहीं पाती। जैसे रुपया कमाना पार्ट है, उसी तरह रुपये खिलाकर किसीसे अपना उल्लू सीधा करना, उससे भी बड़ी कला है। विली साहब अगर सचमुच कलाकार न होता तो इतने लोगो के होते हुए, अकेला वही इस काम के लिए हिन्दुस्तान क्यो माता? नरसिंहम वेहद गरीव, जरूरतमन्द और गंवई प्रादमी है, इतना जानने के लिए विली साहब को बुद्धि सर्च करने की भी जरूरत नहीं पड़ी। साहब ने नरसिंह्म के बारे में सब कुछ पता लगा लिया था। लेकिन उसके शहर माने के पीछे किसी छोकरी का किस्सा है, इसकी उसे सबर नहीं थी। साहब ने पूछा भी था, "गाव मे तुम्हारा और कौन-कौन है, ?" । नरसिंहम ?" नरसिंहम ने स्पष्ट जवाव दिया, "नहीं, सर, देश में मेरा कोई नहीं है। तीनों लोक में अपना कहने लायक कोई नहीं है।" "और व्याह ? तुमने व्याह भी नहीं किया ?" "व्याह करने लायक मेरे पास रुपया कहां है, सर? बीवी पालने से खर्चा भी तो लगता है। वह खर्चा कौन जुटाएगा साहब ने आश्वासन दिया, "अब तुम फिक्र न करो, नरसिंहम ! मैं तुम्हें रुपया दूंगा। मैं तुम्हें इतना-इतना रुपया दूंगा कि तुम एक नहीं दस-दस वीवियां पाल सकोगे।" "दस बीवियां !" नरसिंहम चकित रह गया। दस-दस वीवियां पालने के लिए तो बहुत सारे रुपयों की जरूरत होगी। नरसिंहम की तवियत हुई कि वह साहव की चरणधूलि लेकर माथे से लगा ले । लेकिन हिन्दू होकर आखिर म्लेच्छ की चरण-धूलि कैसे ले ? उसकी तो जाति ही भ्रष्ट हो जाएगी। उन दिनों भी रम्भा का नाम कभी उसकी जुबान पर नहीं आया। रम्भा उसकी निजी सम्पत्ति जो थी। उसके बारे में वह कभी किसीसे बात नहीं करता था। वह सिर्फ रुपये देखा करता था । भविष्य के सपने ! जाने वह दिन कब आएगा, जव वह रम्भा से व्याह करेगा। अपनी घर-गृहस्थी वसाकर निश्चिन्त होगा। वह सिर्फ सुखी होने के सपने में डुवा रहता था। अक्सर वह स्टेशन के पथरीले प्लेटफार्म पर लेटे-लेटे स्वर्ग जाने के सपने देखा करता था और सोचा करता था, रम्भा भी उसकी प्रतीक्षा में अांखें विछाए बैठी होगी। नरसिंहम बीच-बीच में साहब से तकादा कर बैठता था, "क्या हुआ, सर ! मुझे रुपया कव देंगे ?" "दूंगा । जल्दी ही दूंगा । इस वार लखनऊ से वापत आते ही तुम्हें रुपया देने का वन्दोवस्त करूंगा।" "लखनऊ?" "हां, एक बहुत जरूरी काम से मुझे लखनऊ जाना होगा।" । ११६ "वहां मापको क्या काम है सर? वह जगह तो मद्रास से बहुत दूर है ?-बिल्कुल उत्तरी भारत में..." "उत्तरी भारत हो या दक्षिणी भारत । काम के सिलमिले में मुझे तमाम जगहो पर जाना पड़ता है, माई ! काम हो तो जाऊंगा नहीं ?" सच ही तो। काम के लिए ही तो साहव और मेमसाहब दोनों सात समुन्दर पार करके यहा पाए थे। उन दिनो में लखनऊ में माली का काम करता था। साहब के लिए बीच-बीच में मुझने मुलाकात करते रहना भी जरूरी या और जैसे मुझसे मिलना जरूरी था, वैसे ही नरसिंहम से भी मिलते रहना जरूरी था। इसी तरह हिन्दुस्तान-भर में जाने कितने नरसिंहम, जाने कितने तापस साहब की खिद्मत में बिछे पडे थे । हां, मुझे सचमुच नहीं मालूम था कि हम सभी लोग हिन्दुस्तान के दुश्मन हैं। इंडिया के शत्रु जैसे बाहर विखरे हुए हैं, वैने ही अन्दर भी विखरे हुए हैं। मैं, यानी तापस, उन्हीं दुश्मनों में से एक है । मैं रपया बनाता रहा और लखपति बन गया। अब मैं वो० भाई० पी० हो गया हूँ"तरह तरह के कामो के सिलसिले में मुझे सरकारो आमन्त्रण मिलने लगे हैं। कोई भी व्यक्ति मुझमे मुलाकात करके धन्य-धन्य हो उठता है । मुमकिन है दो-एक सालों में मुझे पपभूषण भी मिल जाए, क्योकि में इंडिया का जानी दुश्मन जो हूं। इतना तो खैर तुम्हे भी मालूम होगा कि इंडिया का दुश्मन हुए विना, इंडिया में सम्मान नहीं मिलता । अतः मैं भी वही हूं। खैर, हां, तो मैं नरसिंहम के बारे में बता रहा था। लखनऊ से वापस लौटते ही नरसिंहम ने साहब के सामने फिर अपना सयाल दोहरा दिया, "क्यों साहब, मेरे लिए कुछ किया ?" "हां, हां, करूंगा ! करूंगा! इस बार उड़ीसा से वापस माते ही, तुम्हारे लिए कोई इन्तजाम करूंगा।" उन दिनों साहब ने मद्रास को ही अपना मुख्य केन्द्र बना लिया था 910 . क्योंकि अधिकांश मन्दिर मद्रास में ही थे । मद्रास को मुख्य केन्द्र बनाकर, वह सारी इण्डिया का चक्कर लगाता था। कभी बंगाल, कभी मद्रास, कभी उड़ीसा, कभी गुजरात ! भारतवर्ष बेहतरीन मन्दिरों और कला-. कृतियों का देश है और अमेरिका वनियों का देश है। भगवान ने वहां के लोगों को खास बुद्धि नहीं दी, लेकिन वेशुमार और वेहिसाब दौलत' दे डाली। उन रुपयों के दम पर ये लोग समूची दुनिया की विद्या-बुद्धि खरीद लेना चाहते हैं-तुम लोग चाहे जहां के हो, तुम लोगों के पास चाहे जितनी विद्या-बुद्धि हो, सव हमें बेच दो। हम तुम्हें रुपया देंगे। अपने रुपयों से हम तुम्हारा सव कुछ खरीद लेंगे। तुम्हारी विद्या-बुद्धि, संस्कृति-सब कुछ खरीदकर, राजा बनकर तुम लोगों के सिर पर सवार हो जाएंगे। तब तुम लोग हमें सलाम ठोंकना । कहना-'सलाम, सर- कार! सलाम !' लेकिन उस दिन नरसिंहम ने रुपयों की बात ही नहीं उठाई । उसने सिर्फ इतना ही कहा, "क्या हुया सर ? हमारे लिए कोई काम नहीं बताया ? आपने तो मुझे काम देने का वादा किया था।" साहब ने कहा, "दूंगा ! दूंगा ! काम भी दूंगा ! इतना घबड़ा क्यों रहे हो ? मैं रुपया तो तुम्हें दिए ही जा रहा हूं।" नरसिंहम ने हिचकिचाते हुए कहा, "कोई काम भी नहीं किया और तब भी रुपये लेता जा रहा हूं; यह वात मुझे अच्छी नहीं लगती, सर ! वेहतर हो, आप मुझे किसी काम के बदले में रुपये दें--" साहव ने पूछा, "तुम क्या कर सकते हो ? तुम्हें कौन-सा काम आता है ?" "सर, मैं ठहरा गरीव यादमी! मैं सव काम कर सकता "फिर भी सुनूं तो सही, तुम कौन-सा काम जानते हो ?" "सर, मैं खाना बना सकता हूं, झाड़ लगा सकता हूं, नारियल के पेड़ पर चढ़ सकता हूं, रिक्शा खींच सकता हूं और अगर मुझे मोटर चलाने की ट्रेनिंग मिल जाए तो वह भी चला सकता हूं। रुपये के लिए, मैं चोरी-डकैती भी कर सकता हूं।" "चोरी-डकैती !" साहव की अांखें नरसिंहम के चेहरे पर जा ! - " . ११८ टिकी । उसने सवाल किया, "तुम चोरी-डकंती कर सकोगे ?" "हां, सर ! करूंगा।" "इससे पहले कभी चोरी-डकती को है ?" इस सवाल पर नरसिंहम वा सारा उत्साह मानो वुझ गया । उनका चेहरा फूटे हुए गुब्बारे की तरह लटक गया, "नहीं, सर ! पहले तो कभी चोरी-डती नहीं की।" "देखो, अगर तुम चौरी-उकंती कर सको तो मैं तुम्हें बहुत सारे रुपये दे सकता हूं।" "चोरी-इवतो ?" नरसिंहम ने मानो अपने से ही सवाल किया। योड़ी देर सोच-विचार के बाद उसने जवाब दिया, "चलो, ठीक है ! मगर रपये मिलेंगे तो चोरी-इकती भी कर लूगा । हा, अव वताइए कि क्या पुराना होगा?" "लेकिन तुम्हें एक वादा करना होगा। हमारे बारे में तुम कभी, किसीके सामने जुबान नहीं सोलोगे। तुम क्या काम करते हो, यह भी नहीं बतामोगे।" "नहीं, सर, नहीं बताऊंगा।" "ठीक है ! तुम पपने भगवान का नाम लेकर कसम साम्रो । क्यो, तुम भगवान को मानते हो न?" "हां, सर, मानता हूं। मैं भगवान वेंकटेश्वर का नाम लेकर कमम खाता हूं, मैं किसीसे भी नहीं कहूंगा।" "मोर खुद कभी ममीरों जैसे कपडे-लत्ते नही पहनोगे ?" "नही । मैं वादा करता हूं, नही पहनूंगा।" "हाँ, मुझे ही देखो न ? मैं भी तो प्राखिर अमीर मादमी हूं। हम लोगों के पास मटूट दौलत है, लेकिन हमें देखकर क्या कोई समझ सकता है कि हम लोग बड़े प्रादमी हैं ? देख लो, हम कैसे रहते हैं ? देख रहे हो न? हम लोग फटी-पुरानी चप्पल और गर्ट पहनकर घूमते- फिरते हैं । प्रापिर क्यो? इसलिए कि अच्छे कपड़े-लते या जूते पहनने मे ही लोगों के मन में ईप्या जागेगी, समझे ! माया समझ में !" लेकिन उस दिन नरसिंहम की समझ में कुछ नहीं पाया । जिस प्रादमी ने दुनिया में किसीको सच्चे मन से प्यार किया हो, उसके सोचने- समझने की सारी शक्ति जैसे खत्म हो जाती है। प्यार करने के बाद वह निरा वेवकूफ सावित होता है । हैरत है, वन्धु ! उन दिनों मुझे इन सब बातों को बिल्कुल जानकारी नहीं थी। उन दिनों तो मेरे सिर पर वस यही धुन सवार थी कि मुझे बड़ा आदमी बनना है । जव मैं सचमुच बड़ा आदमी बन गया, तब इस नरसिंहम पर भी नजर पड़ी। उसी दिन मैंने पहली बार महसूस किया कि आखिर वह कौन-सी चीज़ है, जो रुपये-पैसे से भी बड़ी है। लेकिन यह सव तो बहुत वाद की बातें हैं । जो घटनाएं वाद में घटी, उन्हें कम से ही बताना वेहतर है । पहले मैं शुरू का किस्सा ही बयान करूं-जब हमारे जीवन में नरसिंहम ने पहली बार कदम रखा 'था। दरअसल हमारे साहब ने आदमी पहचानने में गलती नहीं की थी। जिस आदमी के पीछे इतने-इतने करोड़पतियों का बल हो, भला वे लोग किसी पालतू-फालतू आदमी को इंडिया क्यों भेजने लगे? उन लोगों ने ही तो इस काम के लिए विली साहब जैसे धुरन्धर घाघ आदमी को चुना था। खैर, विली साहब चाहे धुरन्धर घाघ हों या फालतू आदमी हो, मुझे तो वस, अपने अमीर बनने से मतलब था। साहब ने नरसिंहम के पेट से सारी बातें निकलवा कर बेहद धीर- गम्भीर लहजे में कहा, "काम विल्कुल आसान है।" इतना कहकर वह चुप हो गया। नरसिंहम के लिए अव धीरज रखना मुश्किल हो गया। उसने कहा, "बताइए न, सर, क्या काम है ? मैं किसीको नहीं बताऊंगा। आप जो कहेंगे, मैं वही करूंगा, सर! साहब ने अपनी आवाज़ को और धीमा करते हुए कहा, "काम है-मूर्ति चुराना ।" नरसिंहम ने विस्मित होकर पूछा, "मूर्ति चुराना ! मतलब ?" साहब ने कहा, "मतलब बहुत आसान है। चाहे जैसे भी हो, तुम - यहां के बड़े-बड़े मन्दिरी से मूर्तियां चुरा-चुराकर मुझे दोगे, उसके बदले में हम तुम्हें रुपये देंगे।" नरसिंहम डर गया। उसने कल्पना भी नहीं की थी कि रपये के लिए उसे ऐमा पाप-कर्म करना होगा । उसने कहा, "लेकिन "यह तो बहुत बड़ा पाप है, सर!" साहब ने कहा, "खर, पाप तो है ही। लेकिन रूपये कमाना भी तो बहुत मुश्किल काम है । फिर भला तुम रपये क्यो मागते हो ?" इतना कहकर साहब का चेहरा पोर गम्भीर हो गया। नरसिंहम साहब का गुर-गम्भीर चेहरा देखकर सहम गया । उमने कहा, "सर, माप मुझमे नाराज हो गए ?" साहब ने कहा, "क्यो ? नाराज नहीं होऊंगा ? तुम कहते हो, तुम्हे रपये की सख्त जरूरत है। तुमने यह भी कहा था कि में जो काम कहूंगा, सुम करने को तैयार हो। लेकिन भव तुम्हे डर लगता है तो माज से रपये मत मागना। इतने दिनों मैंने जो रपये तुम्हें दिए, मैं समझ लूंगा, फालतू खर्च हो गए। खैर, अब तुम जामो, मैं कोई और भादमी देस लूंगा।" नरसिंहम ने माहव को वेरुखो देखकर कहा, "नही, सर । मैं चोरी- डकती भी कर लूंगा। बताइए, मुझे कौन-कौन-सी मूर्तियां चुरानी होंगी?" इतनी देर बाद साहव दुवारा सहज हो माया, "सच कह रहे हो? तुम चोरी कर सकोगेन!" "हां, सर! जरूर कर सकूगा ।" "किसीसे कहोगे तो नहीं?" "नहीं, सर !" "देख लो, मगर किसीसे कुछ कहा तो नुकसान तुम्हारा ही होगा। मेरा कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। यहा के तमाम बड़े-बड़े जवरजंग प्रफमर हमारे गिरोह में शामिल है, हमारे मुनाफे में उनका भी हिस्सा है । मौर पुलिस ? पुलिस भी हमारे ही दल में शामिल है। सिर्फ तुम्हारी तरफ से ही आशंका होती है। अगर तुम किसीसे कुछ नहीं रहोगे, तो तुम्हारे लिए भी डरने की कोई बात नहीं है।" नरसिंहम ने सारी बातें सुनकर कहा, "ठीक है, सर! मैं तैयार हूं। बताइए क्या काम करना होगा ?" "तुम एक काम करो। परसों यानी मंगल को यहां मेरा एक आदमी आनेवाला है । वंगाली जेन्टलमैन ! तुम्हारी ही उम्र का होगा। मैंने तुम्हारे बारे में उससे सारी बातें कर ली हैं । उसे तुम्हारा नाम भी बता दिया है।" "उस वंगाली साहब का नाम क्या है ?" "उसका नाम है--तापस राय ।" नरसिंहम से मेरे परिचय की शुरुग्रात यहीं से हुई थी। जिसकी शुरुआत ही ऐसी विचित्र थी, उसका अन्त भी ऐसा अविश्व- सनीय होगा, उस दिन मैंने कल्पना भी नहीं की थी, वन्धु ! खैर, अब तक मैं तुम्हें अपने शुरू-शुरू के दिनों के किस्से सुना रहा था, लेकिन इसके बाद पानी सिर से बिल्कुल ऊपर चला गया। प्राओ, अब तुम्हें उसके बाद की घटनाएं सुनाता हूं- ''होटल के बाहर बहुत-से पालतू-फालतू लोगों की भीड़ जमा हो गई थी। साहब ने नरसिंहम से पूछा, "अब तुम मुझसे साफ-साफ बतानो कि तुम क्या चाहते हो ? तुम्हें रुपये चाहिए या रम्भा ?" नरसिंहम ने स्पप्ट स्वर में कहा, "मुझे रम्भा चाहिए, सर ! "रम्भा को चाहते तो हो, लेकिन व्याह के बाद उसे खिलायोगे " क्या ?" "जसे भी होगा मैं उसे खिलाऊंगा, सर ! मैं स्टेशन पर कुलीगिरी कर लूंगा।" नरसिंहम का जवाब सुनकर साहब रम्भा की तरफ मुड़ा, "अब तुम भी साफ-साफ वतायो कि तुम क्या चाहती हो? तुम्हें रुपये चाहिए या नरसिंहम ?" १२२ रम्मा ने स्पष्ट स्वर में कहा, "जिसके पास रुपये हों, में उसीको चाहती हूं, साह्य "लेकिन मान लो, अगर वह तुम्हें प्यार न करे ? वाद में तुम्हें छोड़कर चला जाए ?" "मटूट दौलत हो तो प्यार-मुहब्बत बिना भी चलेगा, साहव !" "तब ठीक है। तुम लोग अभी जामो। मैं तुम लोगो को फिर बुलाऊंगा।" माह्य की बात सुनकर वे दोनों कमरे से बाहर निकल गए। मैं साहब के पास ही पड़ा था। मा माहब मेरी तरफ मुडा, "वाबू, तुम खुद ही रम्भा से ब्याह कर लोन! "हां, हो, तुम ।" लेकिन मैं रम्भा री माह कैसे कर सकता या ? उस वक्त मेरी विशंकु बी-सी स्थिति थी। साहब की बात अगर मैं नही मानता तो मेरे लिए भामदनी की राह बन्द हो जाएगी, और अगर में समुन रुपये कमाना चाहता हूं, तो रम्भा से ब्याह करने के अलावा मेरी और कोई गति नहीं थी। लेफ्नि असली यात कुछ मौर यो। सवाल यह था कि रम्भा के गर्म में महादेवन को जो सन्तान पल रही है, उसके पितृत्व की जिम्मेदारी कौन लेगा? उमका पिता कौन बनेगा? जिन्दगी में जब मादर्शवाद को ही वडा मानता था, उन दिनो अगर साहब मुमते सवाल करता तो मुमकिन है मैं यही राय देता कि गुनाहगार को सजा मिलनी ही चाहिए। पुण्य की जय मोर पाप की पराजय ही तो मादर्शवाद है। मेक्नि, बन्धु, उन दिनों तो मुझपर तुम लोगों को तरह कैरियर बनाने की घुन सवार थी। तुम लोगों की तरह मैंने भी संकल्प लिया या कि जब इस दुनिया में मा हो गया हूं तो चाहे जैसे भी हो, मुझे अमीर बनना ही होगा। मैंने मन ही मन दृढ निश्चय कर लिया कि मैं १२३ इस दुनिया में हार जाने के लिए नहीं आया। मेरी जीत निश्चित है। मैं सवको लांघकर हर किसीके सिर पर सवार हो जाऊंगा। साहब ने मुझसे दुवारा पूछा, "क्या हुआ? क्या सोच रहे हो ? अरे, मामूली-सी बात है...! एक लड़की से व्याह करना है। उसके लिए इतना नागा-पीछा सोचने को क्या है ?" "लेकिन रम्भा जिस बच्चे की मां बनेगी, उसका क्या होगा?" "अब उसका क्या होना है ? उसका बेटा तुम्हें ही 'फादर' कहेगा।" साहब जितनी आसानी से कह गया, यह मामला उतना आसान नहीं था। दोस्त, किसी और का बच्चा खामख्वाह मुझे 'डैडी' कहकर वुलाए, भला मैं ही इसे क्यों बर्दाश्त करने लगा ? रुपये के लिए क्या अपने मन को भी पत्थर वना लेना होगा? मुझे चुप देखकर साहब ने पूछा, "तो तुम उससे व्याह नहीं करोगे ?" उस वक्त भी मैं यह तय नहीं कर पाया था कि उसे क्या उत्तर दूं ? मेरे माथे पर जैसे समूची पृथ्वी का बोझ आ पड़ा था। उस वक्त मैंने खुद अपने-आपसे ही सवाल किया कि मैं क्या करूं? यह सच है कि मुझे रुपयों की ज़रूरत है, लेकिन उसके लिए मुझे इतनी ऊंची कीमत चुकानी होगी ? बाहरवालों के सामने शान से सिर उठाकर जीने के लिए मुझे अपने ही विवेक के आगे सिर झुका देना होगा? उस वक्त किसीने मुझे सोचने-विचारने का समय भी नहीं दिया। साहब मेरी तरफ हैरतअंगेज़ आंखों से देखता रहा । "क्या हुआ ? तुम इतने सोच में क्यों पड़ गए हो, वावू ? देख लो, हम अमेरिकन लोग, तुम भारतीयों की तरह इतना कुछ सोचते-विचारते नहीं; इसीलिए हम दुनिया में हर किसीसे इतना आगे बढ़ पाए हैं। सभी हमारे अमेरिका में जाकर राहत की सांस लेते हैं। हमारी ही वजह से रूस तुम पर अपना जाल बिछाने में नाकामयाब हो गया है भाई, यह बात तो तुम्हें भी मालूम होगी कि हमारे पास रूस से भी अधिक दौलत है। अरे भाई, दुनिया में रुपया ही तो असली टॉनिक है। दुनिया में इन्सान के जितने भी रोग-शोक हैं, उसका एकमात्र इलाज रुपया है। तुम उस छोकरी से ब्याह कर लो। इसमें क्या हर्ज ।

है। उसे न्याह कर तुम भी रुपये कमा सकोगे और मैं भी चार पैसे का रोजगार कर सकूगा।" "च्याह के बाद अगर वह लड़की हमारे काम को न निकली, तो...?" "मरे, यह ज़रूर काम पाएगी! मैं इन्सान की शक्ल देखकर पहचान लेता है।" "मगर उसने किसी सन्मान को जन्म दिया, तव...?" "उफ, इस बात को लेकर तुम इतने परेशान क्यों हो ? प्ररे, उसे खत्म करने में कितना वक्त लगेगा ? उसे जड़ से मिटा देंगे, बस्स् !" मैं चौंक उठा, "मार डालोगे ?" "क्यों, मारने में क्या हर्ज है ? रुपयों के लिए तुम एक मादमी को भी खत्म नहीं कर सकते ? तुम मछली-मुर्गों खाते हो, कवाब चमाते हो-बस वक्त क्या तुम्हें कोई मोह होता है ? नहीं न! इसको घजह यह है कि इन्हें खाकर तुम्हारी सेहत बनती है । सो जरूरत पड़ने पर एक दिन के बच्चे को खत्म करने में हर्ज भी क्या है ? और वह तो तुम्हारे अपने खून का बच्चा भी नहीं है। उसके लिए तुम्हें इतना दर्द क्यों ?" मेरा भारतीय मन उन दिनो भी पूरी तरह मरा नहीं था, भाई ! मैं साहब की बातों का कोई साफ-साफ जवाब नहीं दे पामा। हालाकि उस वक्त तक मैं बहुत सारे पाप कर चुका था, ढेरौं झूठ भी बोल चुका पा, बहुत-सी जगहों में पोखेबाजी भी कर चुका या। सच पूछो तो मैं पाप को पाप समझना भी भूल चुका था। मैंने सोच लिया था पाप-पुण्य फालतू बातें हैं । यह सब अपना धन्धा चलाने के लिए ठाकुर- पुरोहितों का विछापा हुमा बाल है । मैंने यह मान लिया था कि दुनिया में पाप-पुण्य कुछ भी नहीं है। यह सब महज फरेव है। वनों प्रांखों के सामने हो जाने कितने लोग मन्याय मोर पाप करते हैं, लेकिन वे लोग तो खासे माराम मे हैं। उनका तो कभी कोई पुरा नहीं हुमा। जाने - कितने मिनिस्टर चोरी करते हैं, घूस खाते हैं, लोगों को चमका देते हैं लेकिन इसके बावजूद वे सभामों में जाकर फूलों की मालाएं पहनते १२५ इस दुनिया में हार जाने के लिए नहीं आया। मेरी जीत निश्चित है। मैं सबको लांघकर हर किसीके सिर पर सवार हो जाऊंगा। साहव ने मुझसे दुवारा पूछा, "क्या हुआ ? क्या सोच रहे हो ? अरे, मामूली-सी बात है! एक लड़की से व्याह करना है; उसके लिए इतना आगा-पीछा सोचने को क्या है ?" "लेकिन रम्भा जिस बच्चे की मां बनेगी, उसका क्या होगा ?" "अव उसका क्या होना है ? उसका बेटा तुम्हें ही 'फादर' कहेगा।" साहब जितनी आसानी से कह गया, यह मामला उतना आसान नहीं था। दोस्त, किसी और का बच्चा खामख्वाह मुझे 'डैडी' कहकर वुलाए, भला मैं ही इसे क्यों बर्दाश्त करने लगा ? रुपये के लिए क्या अपने मन को भी पत्थर बना लेना होगा ? मुझे चुप देखकर साहव ने पूछा, "तो तुम उससे ब्याह नहीं करोगे?". उस वक्त भी मैं यह तय नहीं कर पाया था कि उसे क्या उत्तर दूं ? मेरे माथे पर जैसे समूची पृथ्वी का बोझ पा पड़ा था। उस वक्त मैंने खुद अपने-अापसे ही सवाल किया कि मैं क्या करूं? यह सच है कि मुझे रुपयों की जरूरत है, लेकिन उसके लिए मुझे इतनी ऊंची कीमत चुकानी होगी ? बाहरवालों के सामने शान से सिर उठाकर जीने के लिए मुझे अपने ही विवेक के आगे सिर झुका देना होगा? उस वक्त किसीने मुझे सोचने-विचारने का समय भी नहीं दिया । साहब मेरी तरफ हैरतअंगेज़ आंखों से देखता रहा। "क्या हुआ ? तुम इतने सोच में क्यों पड़ गए हो, चावू ? देख लो, हम अमेरिकन लोग, तुम भारतीयों की तरह इतना कुछ सोचते-विचारते नहीं; इसीलिए हम दुनिया में हर किसीसे इतना आगे बढ़ पाए हैं। सभी हमारे अमेरिका में जाकर राहत की सांस लेते हैं। हमारी ही वजह से रूस तुम पर अपना जाल बिछाने में नाकामयाब हो गया है । भाई, यह बात तो तुम्हें भी मालूम होगी कि हमारे पास रूस से भी अधिक दौलत है। अरे भाई, दुनिया में रुपया ही तो असली टॉनिक है। दुनिया में इन्सान के जितने भी रोग-शोक हैं, उसका एकमात्र इलाज रुपया है । तुम उस छोकरी से ब्याह कर लो। इसमें क्या । 974 है। उसे न्याह कर तुम भी रुपये कमा सकोगे मोर मैं भी चार पैसे का रोजगार कर सकूगा।" "व्याह के बाद अगर वह लड़की हमारे काम की न निकली, तो...?" "मरे, वह जरूर काम पाएगी! मैं इन्सान की शक्ल देखकर पहचान लेता हूं।" - "अगर उसने किसी सन्तान को जन्म दिया, तव...?" "उफ्, इस बात को लेकर तुम इतने परेशान क्यों हो? मरे, उसे खत्म करने में कितना वक्त लगेगा? उसे जड़ से मिटा देंगे, वस्स् !" मैं चौंक उठा, "मार डालोगे ?" "क्यों, मारने में क्या हजं है ? रुपयों के लिए तुम एक मादमी को भी खत्म नहीं कर सकते ? तुम मछली-मुर्गी खाते हो, कवाव चबाते हो-उस वक्त क्या तुम्हें कोई मोह होता है ? नहीं न ! इसकी वजह यह है कि इन्हें साकर तुम्हारी सेहत बनती है । सो जरूरत पड़ने पर एक दिन के बच्चे को खत्म करने में हर्ज भी क्या है ? भोर यह तो तुम्हारे अपने खून का बच्चा भी नहीं है। उसके लिए तुम्हे इतना दर्द क्यों ?" मेरा भारतीय मन उन दिनों भी पूरी तरह मरा नही था, भाई ! मैं साहब की बातों का कोई साफ-साफ जवाब नहीं दे पाया। हालाकि उस वक्त तक मैं बहुत सारे पाप कर चुका था, ढेरों था, बहुत-सी जगहों में धोसेवाजी भी कर चुका था। सच पूछो तो मैं पाप को पाप ममझना भी भूल चुका था। मैंने सोच लिया था पाप-पुण्य फालतू बातें हैं । यह सव अपना धन्धा चलाने के लिए ठाकुर- पुरोहितों का विछाया हुमा जाल है । मैंने यह मान लिया था कि दुनिया मे पाप-पुण्य कुछ भी नहीं है। यह सब महज फरेय है; वर्ना प्रांखो के सामने ही जाने कितने लोग मन्याय भोर पाप करते हैं, लेकिन वे लोग तो सासे माराम से हैं। उनका तो कभी कोई बुरा नही हुमा । जाने - कितने मिनिस्टर चोरी करते हैं, घूस साते हैं, लोगों को चमका देते है- लेकिन इसके बावजूद वे सभामों में जाकर फूलों की मालाएं पहनते भी घोल चुका 4-0vn. " उनके व्याख्यानों पर तालियां पिटती हैं। इसके विपरी | पुण्य किए हैं, हर दिन हरिद्वार में गंगा नहाकर गंगा-स्तोत्र का पाठ करते हैं, भगवान के नाम पर दान-पुण्य करते हुए मन्दिर-मन्दिर में पूजा-पाठ करते हैं, वे लोग आखिर कहां सुखी हैं ? यानी साहब की बात ही सच है ? साहब जैसे हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ गया। उसने कहा, कुछ बोलते क्यों नहीं? मेरी बात का जवाब दो।" "लेकिन मैं जो इतना जोखिम उठाऊंगा, उसके बदले में मुझे क्या मिलेगा ?" "तुम्हें रुपया मिलेगा।" "कितना?" "हजारों-हजार रुपए ! तुम जैसा काम दिखायोगे वैसे रुपये मिलेंगे।" मेरे मन में जाने कैसा कैसा सन्देह होने लगा। मैंने पूछा, "मान लो, अगर वैसा काम मैं न दिखा पाया ?" "क्यों ? क्यों नहीं दिखा सकोगे काम ? अपनी बीवी से समूचा काम वसूल लेना । तुम्हारी वीवी यह काम जरूर कर पाएगी।" "यह तुमने कैसे जाना?" "तुमसे पहले ही कह चुका हूं-मैं आदमी पहबानता हूं। मर्द श्री औरत-दोनों को पहचानता हूं। तुम बंगालियों में एक कहावत है कि मूंछे देखकर ही शिकारी विल्ली पहचान ली जाती है । हम लोग वही हैं । मैं हर किसीको पहली नज़र में ही पहचान लेता हूं। दरण तुम्हें भी मैंने ही पहचाना था..." "तुमने नहीं, साहब, मूलचन्द ने। मूलचन्द ने ही मुझे ठीक पह -- था..." साहब ने हंसकर कहा, "नहीं, मूलचन्द को मैंने ही भेजा था, परीक्षा लेने के लिए । मूलचन्द मेरा ही आदमी था।" मैं मानो अाकाश से गिरा, "अच्छा !" साहब ने जोर का व्हाका लगाते हुए कहा, "हां, जो लो १२६ चुरे स्वभाव के होते हैं, उनसे कोई युरा काम करा पाना मुरित है। इमीलिए किसीको एजेन्ट बनाने से पहले हम उने टोरबार देखने हैं कि वह भलामानस है या बुरा आदमी । मगर यह भलामानस विना तो उसे अपने दल में खीच लाने की कोशिश करते हैं । इमोरिमाना धन्धा चलाने के लिए हमे हमेशा ईमानदार मादमियों की बनामपटी है। दुनिया में जितने भी देईमानी के वान हैं, सब ईमानदार होने के हायों ही कराए जाते हैं। वे लोग ही हमारे पटं तारट पानी पहने शिकार होते हैं." अब मैं क्या कहता ? मैं चुपचाप उनकी बात सुनदाहा। साहब ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा, "र, घोडो। सर सारा वक्त यू ही वर्वाद हो गया । भव में प्रसनी काम में हर चाहता हूं। तुम चटपट उससे ब्याह कर डालो..." ठीक है, साहब ! तुम जो कहोगे, वही परंगा।" . तापम अपनी कहानी कहतेनहते चुर हो गया। मैंने ही उसे कुरेदते हुए पूछा, "उसके दादा उसके का? उसके बाद मैंने रम्ना में माटम वैसे व्याह के बारे में पहले कभी मैंने सोचा भी नहीं। ग्पया-पैसा कमाकर गृहस्थी बमाऊंगा; देटे-बेटि इसकी मैं भला कल्पना भी कैले कर भरताना मैं भाग्यवादी कभी वही था। हा, परमात भरोसा किया है। काम भरोन ही गया है । वमे काम भी सैकडों तरह के होते है- पचपन मे मिसाया गया था अपने मान- में बड़ा बनता है। लेकिन द मरा : मैंने पाप की राह हो भरना ली। लेकर इतना इतना परेशान होने की रट : फैसला उसके परिणाम पर निरवट-7 मैं भी बड़ा आदमी बन जाऊंगा, तो खूब दान-पुण्य किया करूंगा। गरीबों में जी खोलकर रुपये वांटूगा । पहले गरीबों का खून चूस-चूस कर बड़ा आदमी बनूगा । लेकिन जव सचमुच दौलतमन्द वन जाऊंगा, तो चुटकी भर रुपये छितराकर गरीबों के लिए फ्री-स्कूल, फ्री-अस्पताल खुलवा दूंगा । बस, इसी वहाने मेरे सातों खून माफ हो जाएंगे। लेकिन वन्यु, हर किसी मामले में तुम लोग ही मेरी राह का रोड़ा बन गए। तुम लोगों ने ही मुझे इतना भाग्यवादी बना दिया था कि... तुम लोग विश्वास नहीं करोगे, लेकिन यह सच है कि लाखों-करोड़ों रुपये कमाने के बावजूद आज भी मैं भाग्य पर विश्वास करता हूं। "क्यों ?" वही तो बताने जा रहा हूं। जाने तुम लोग अब भी भाग्य पर विश्वात्त करते हो या नहीं, लेकिन प्राज जहां मेरी किस्मत मुझे खींच लाई है, उसका हाल सुनोगे तो, मुमकिन है, तुम भी किस्मत को मानने लगो।" "तूने क्या सचमुच उस लड़की से व्याह कर लिया ?" "हां ! मैंने सचमुच ब्याह कर लिया, वर्ना वीस हजार रुपये कैसे हाय आते ? एक मामूली-सी लड़की से व्याह करने के एवज में अगर वीस हजार रुपये मिलते हों तो भला मैं मना भी क्यों करता? कहा न, उन दिनों मुझपर रुपये का लोभ सवार था।" "लेकिन वह बच्चा ? रम्भा तो किसी वेटे या बेटी की मां बनने- वाली थी न?" हां, उसी बात पर तो आ रहा हूं। वही बताने के लिए तो तुझे अपने साथ ले पाया हूं। जिन्दगी में इन्सान अगर कहीं से अधिक पा लेता है तो हरजाने में और किसी जगह उसे उतना ही अधिक चुकाना भी पड़ता है। तैमूरलंग तो काफी मशहूर व्यक्तित्व था न ? इतिहास में उसकी वीरता की कहानियां रची गई हैं। लेकिन उसे भी अपनी ख्याति के मूल्य-स्वरूप अपनी टांग खोनी पड़ी थी। दुनिया में जहां कहीं भी पाने की घटनाएं मिलती हैं अगर पता लगाने जामो तो : उनकी तुलना में खोने के हादसे निश्चित रूप से अधिक होंगे। अगर कोई व्यक्ति लाखों-करोड़ों रुपयों का मालिक है, तो या तो उसका इकलौता बेटा पागल होगा या इकलौती बेटी विषदा होगा यानी जरूरत से अधिक चाहने पर, बाजार-दर से अधिक कीमत भी चुकानी होगी। दुनिया के दोयर-बाजार का यही शाश्वत नियम है । एक वार वालोर में मैंने एक अद्भुत खूबसूरत प्रादमी को देखा था। कोई मदं इशाना सूप- सूरत हो सकता है, इसकी मैंने कल्पना नहीं की थी। मैंने उससे परि- घय जानना चाहा। वह मादनी विश्वविद्यालय की चार-चार डिग्रियों का मालिक था। किसी फार्म में विजनेम-एक्जिक्यूटिव था। उनकी तनखा भी मोटे तौर पर करीब पांच हजार रुपये जरूर होगी। मैंने उसके बारे में पोर अधिक जानना चाहा। इतने अपूर्व रूप-गुण के लिए क्या उसे कुछ भी कीमत नहीं चुकानी पड़ी ? क्या इसके लिए उसे कोई मोटा हरजाना नहीं देना पड़ा? मेरी खोज का विकुन उल्टा परिणाम निकला। जो भी मिला. उमके रूप-गुण यो प्रशंसा में पंचमुस था। इसके अलावा हर किमीकी जुबान पर उसकी मोटी तनखा की चर्चा भी पी। मेरा प्रारच उत्तरोत्तर बढ़ता गया। ऐसा तो नामुमकिन है । ऐसी घटना तो नितान्त मस्वाभाविक है। पामतौर से रूप-गुण पोर रुपयों में तो पंख लगे होते हैं; जो पंछी की तरह उड़-उड़कर चारों तरफ मात्मप्रचार करते हैं और अन्य लोगों के सामने अपने मौभाग्य का बखान करते नहीं पाते । लेकिन हरजाना! वह विल्कुल गुप्त रहता है। अगर हम ऊंची कीमत पर होरे का हार भी सरीदते हैं, तो मन होता है लाउडस्पीकर पर चीख-चीखकर दुनियावालों को उनकी कीमत वता माएं। अपने ऐश्वयं-प्रदर्शन से हम लोगों पर अपना रोब तो जमा हो सकते हैं । लेकिन इस हरजाने से मुक्त होने का कोई उपाय नहीं है । हरजाने को वात बेहद शर्मनाक होती है न, अतः उसे दुनिया की नजरों से छुपा लेना ही बेहतर है। माखिरकार मेरे सब का बांध टूट गया।

कन चाहे जैसी भी हो, मुझे उस खूबसूरत आदमी म का पता लगाना ही होगा। अपना सारा काम-काज छोड़कर इसी बात का पता लगाने हो गया। "फिर क्या हुआ? कुछ पता लगा ?" हां, लगा ! उसका पता लगा तो सही, लेकिन चिंगलीपट जाकर हां जाकर पता लगा कि उसने जो कुछ कहा था और उसके बारे में जो कुछ पता लगाया था, सव अक्षरशः सत्य था। उसने सिर्फ एक ही चात नहीं बताई थी; जो मैंने चिंगलीपट पहुंचकर जानी। मुझे पता चला कि वह किसी राजा की रखैल का लड़का है। खैर, छोड़ो ये वात! अन्त की बात अन्त में ही कहना बेहतर है । कहानी के प्रांखिर को हिस्सा अगर पहले वता दूं तो जिन्दगी का बहुत सारा सुख यू है निःशेष हो जाए। मान लो, मिल्टन को अगर पहले से ही ज्ञात है जाता कि वे अन्धे हो जाएंगे, तो वह इतनी लिखाई-पढ़ाई करते शाहजहां को अगर पहले से ही खवर हो जाती कि औरंगजेब उ बुढ़ापे में वन्दी बनाएगा, तो क्या वह दिल्ली के सिंहासन पर बैठने बंकिम चाटुा का नवकुमार अगर पहले ही जान लेता कि कपालकुंडला से व्याह करके इतना दुर्भोग होगा, तो भला वह व्याह करता? इसीलिए बन्धु, कभी-कभी मैं भी सोचता हूं कि उस दिन रुपये लोभ में आकर मैंने रम्भा से व्याह हो क्यों किया ? मैंने भी दुनिया रुपये को ही सबसे बड़ा क्यों मान लिया ? अब तक मैं वेहद उत्कंठा से तापस की कहानी सुन रहा था। मैंने सवाल किया, "फिर? उसके बाद ?" "दरअसल यह शादी ही मेरी जिन्दगी की सबसे बड़ी भू गई। आखिरकार वह रम्भा ही मेरे चरम सर्वनाश का कारण "सो कैसे? रम्भा ने क्या काम करने से इन्कार कर दिय । १३० १ ० नहीं ! काम तो खैर किया। प्राज जो मैं इतने इतने रुपयों का मालिक हूं, एक्सपोर्ट का इतना सम्बा-चौड़ा कारोवार चलाता हूं, यह मव रम्भा को ही वजह से सम्भव हुअा। हमारे पाह के बाद पूरे माउथ इण्डिया में घूम-घूमकर उसने हमारे लिए जाने कितने-कितने करोड़ों की मूर्तियां चुराई, उसका कोई ठिकाना नहीं है। इसके लिए उसके प्रति जितना मैं कृतज्ञ हूं, उतना ही हमारा साहब भी। बात यह है, मेरे दोस्त, कि रम्भा को सारी ताज-राम मैने ही हर ली थी। उसके बाद उसके मन में भी कोई दुश्चिन्ता नहीं रही। उसने जिन्दगी में पहली बार सुन्दर-सुन्दर साड़ी-कपड़ो और गहनो का मुह देखा था। जिन चीजों की उसने कभी कल्पना भी नही की थी, वही सत्र उसे अचानक मिल गया था। उसका भी अपना मकान बन गया, गाडी माई । अव वह भी परम सुगी थी। लेकिन मेरे मन में जाने क्यों अजीय- मो दुर्भावना समाई हुई थी। रम्भा ने अपने मां बनने के बारे मे मुझसे कभी कुछ नहीं कहा । व्याह के तीन महीने बाद, एक रात मैंने ही पूछा, "अच्छा, तुम मा बनने वाली थी न ? इस बारे में तो तुमने कभी कुछ नहीं बताया ! रम्भा खिलखिलाकर हंस पड़ी। "अरे, तुम हंस क्यों रही हो?" रम्भा ने मेरे सीने में मुंह गडाकर कहा, "वे सब झूठ-मूठ बातें थीं।" मेरे माथे पर मानो प्राकार टूट पड़ा। मैंने उसका चेहरा उठाते हुए पूछा, "झूठ-मूठ वान थी-मतलब ?" यह सब तो नरसिंहम को सिखाई-पढ़ाई बात थी। वही मुझे सिखाकर लाया था कि मैं भूठ-मूठ कह दूं कि मैं मां बननेवाली हूं, ताकि तुम लोगों से अधिक रपये वमूल करके हम दोनो भाषस में बाट लें।" यह कहकर वह दुवारा खिलखिला उठी। रम्भा की हंसी सुनकर मेरे सारे वदन में मुरझुरी फैल गई। मेरी तबियत हुई कि मैं उसी दम उसका खून कर डालूं। जाने कितने दिनों की, जाने कितनी माराक्षाएं उसने मटियामेट कर दी। उसने मुझे यू लया? लेकिन असल बात तो यह थी कि मुझसे कुछ भी नहीं हो सका। लोग उसी दिन तंजीर के मन्दिर से अष्टधातु के नटराज की एक त उड़ा लाए थे। उसकी कीमत लगभग तीस लाख रुपये थी। इसीलिए स वक्त भी मैं उसके प्रति कृतज्ञता महसूस कर रहा था। हां, मैं इतना रूर बता सकता हूं कि रम्भा की वजह से साहब को तो खर करोड़ों रुपयों का फायदा हुअा, साथ ही मुझे भी कम से कम कुछेक लाख रुपयों का मुनाफा तो हुग्रा ही। उन दिनों समाज में भी मेरी प्रचुर प्रतिष्ठा होने लगी थी। इस तरह साहब और मेमसाहब हिन्दुस्तान से करोड़ों रुपयों की वेशकीमती चीजें उड़ाकर अपने देश भाग खड़े हुए। जाते वक्त वे लोग मुझे भी बहुत सारा धन-दौलत दे गए थे। मैं भी लखपति आदमी बन गया। समाज का एक गण्यमान्य व्यक्ति ! इसी वीच मैंने दिल्ली जाकर अपने लिए इम्पोर्ट लाइसेन्स भी जुगाड़ लिया और यहां भी आफिस खोल लिया ! वस्त् ! अब मुझे कौन पकड़ सकता था ? उन दिनों एकमात्र रम्भा ही मेरे लिए शर्मनाक प्रसंग थी। मैं खुद उस संभ्रान्त समाज में शान से प्राता-जाता था लेकिन रम्भा के साथ वहां जाते हुए मुझे शर्म पाती थी। लोगों को कहीं ये शक न हो जाए . कि मुझ जैसे संभ्रान्त व्यक्ति ने ऐसी औरत से व्याह कैसे कर लिया ? इसीलिए मैं उसे अपने साथ लेकर कहीं भी नहीं जाता था। एक रात रम्भा ने ही सूचना दी कि वह मां बननेवाली है। चूंकि एक बार पहले भी वह. यह वात कहकर मुझे धोखा दे चुकी थी, अतः मैं दुवारा उसके चकमे मैं नहीं प्राना चाहता था। मैंने पूछ ही लिया, "क्यों, पिछली बार की तरह !" "नहीं जी, इस वार तो बिल्कुल सच्ची-सच्ची...?" उस समय रम्भा से मैंने बात नहीं बढ़ाई। मौका देखकर मैं दुवारा साउथ इण्डिया घुमाने ले गया। वह कोई मामूली-सा गांव था। तन्नौर के भीतर । एक छोट गांव। वहां बाहरी लोगों का आना-जाना बहुत कम था। १३२

रम्भा ने पूछा था, "यह मुझे फहाँ से पाए ?"
"यहां का डाक्टर काफी एक्गपटं है ! हर की कोई यात नहीं है..."
मैंने उसे एक छोटे-रो अस्पताल में भर्ती कर दिया । यहाँ के डायर
को मैंने अकेले में ले जाकर मोटा रपया देने या सोभ दिपाया। यह
डाक्टर बुरी तरह सहम गया। लेकिन मैंने गौर किया, यह बेहद गरीय
था। उसकी डाक्टरी या भी उतना रोय-दाब नही था।
डाक्टर ने मेरी यात सुनकर कहा, "नहीं, यह प्रगम्भव है।"
मैंने अपनी मुसीयत बताकर डाक्टर को समझाने की कोशिश की।
उससे अपने सर्वनाश की वात भी समझाकर फही!
लेकिन डाक्टर अपनी बात पर पटल रहा, "नहीं ! ऐमा समाव
नहीं है, सर!
"अच्छा, अगर मैं पापको पूरे एक हजार रूपये दू, तो ?"
"नही ! नामुमकिन ! मैं गैर-कानूनी काम नहीं कर सकता।"
"अगर पाच हजार रुपये दू?"
"नहीं ! कृपया मुझे रुपये का लोभ न दिसाएं।"
डाक्टर अपनी बात पर उसी तरह प्रचल-प्रटल रहा ।
"अगर तीन लाख रुपये दूं?"
मैंने गौर किया, मय डायटर के चेहरे का रंग जग बदलता जा रहा
पा। मैं समझ गया, रुपये की रानि सुनकर गायद यह राजी हो गया
है । रुपयों के जोर पर प्राखिर किन वा में नहीं दिया जा सकता ?
मोर में तो संर रपये वहाने को तैयार बैठा था।
मैंने कहा, "चाहे जितने रुपये लगे, रम्भा के बच्चे की मन्म करना
ही होगा।"
डाक्टर ने कहा, "लेकिन पाप काफी देर से प्राए, गर ! थोई दिन
पहले मा जाते तो हर की कोई बात नहीं थी! अब तो मां की रान
पर बतरा पा सकता है।"
"मरने दो उमे ! मुझे कोई एतराज नहीं है !"
डाक्टर मेरा मागय फौरन ममझ गया। रम्भा को यहां भी कर
मैं वम्बई चला पाया। वहां में मैं बीच-बीच में टायटर वीमेट

देता था और फोन पर ही सारी वस्तुस्थिति को खोज-खबर ले लेता धा। बहुत दिनों वाद अचानक डाक्टर ने ट्रंक-काल पर खवर दी, "फौरन चले आइए। मरीज़ चल वसा ।" खवर मिलते ही मैं वहां के लिए रवाना हो गया। वहां पहुंचकर मैंने देखा, डाक्टर की बात सच थी। रम्भा मर चुकी थी। यूं रम्भा मरी नहीं थी, कहना चाहिए, उसे मार डाला गया था। लेकिन उसकी सन्तान जिन्दा थी। रम्भा की सन्तान, बानी मेरी सन्तान । मुझे उस सन्तान की शक्ल से भी नफरत हो चुकी थी, वन्धु ! जिसे मैंने शुरू से ही नापसन्द किया, लेकिन अपनी ही गरज से उसे वीवी स्वीकार करना पड़ा, उसकी मौत के बाद मुझे उसकी सन्तान की शक्ल से भी विरक्ति हो चुकी थी। मैंने डाक्टर से कहा, "अब जवकि वह बच ही गया है, तो उसे मारने की कोई जरूरत नहीं है। उसे आप किसी आश्रम में भेजने का इन्तजाम कर दीजिए। इसके लिए जो खर्चा लगेगा मैं दे दूंगा। लेकिन हांss---मेरा नाम-धाम कोई न जान पाए." उस दिन मैं वत्स, इतना ही कहकर चला पाया था। उसके बाद मैंने उस लड़के की कभी खोज-खबर नहीं ली। सिर्फ हर महीने रुपये भेज देता था। लेकिन बन्धु, अब मेरी भी उम्र ढलने को आई । ढलती उम्र में प्रादमी की नजर भविष्य से अधिक अतीत की तरफ जा ठहरती है ! मैं भी जव अपने अतीत की ओर देखता हूं तो सिर्फ रम्भा याद आती है । उसने मरकर भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा, दोस्त ! इस बारे में मुझे कोई सन्देह नहीं रहा कि अब मैं चाहे जितने दिन भी जिन्दा रहूं, वह मुझे जलाया करेगी।... "पीर तेरा वह वेटा ?" "वह भी अब बड़ा हो गया था। मैं उसे तन्जीर से नागपुर ले आया और अपने ही दफ्तर में नौकरी दे दी। लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि मैं ही उसका पिता हूं। उसका ख्याल है, वह महाराष्ट्र का आदमी ।

है । प्राश्रम के लोगों ने उसका नाम भी मराठियों जैसा ही रम दिया था। "उस लड़के की जन्मकथा उस डाक्टर के अलावा और कितीको भी नहीं मालूम । उमे तो सिर्फ इतना भर मालूम है कि वह मराठी है पौर वचपन में ही उसके मा-बाप को मृत्यु हो चुकी है।" मैं चौंक उठा । मैंने उससे छूटते ही पूछा, “अच्छा, वतामो तो उसका नाम क्या है ?" "पटवर्धन !--उसे मव पटवर्धन के नाम में ही जानते-पहचानते हैं। अगर तू कभी नागपुर जाए तो उसे देखना । उजला, दूधिया रंग ! घुघराले बाल ! उसकी मा भी ठीक उसीको अविकल तस्वीर थी।" पटवर्धन ! मुझे नागपुर के उस नौजवान लड़के की याद हो माई। उसी पटवर्धन ने ही मुझने सवाल किया था-'अच्छा, आप तो रायसाहब के पुराने दोस्त हैं न ? क्या माप बता सकते हैं कि रायसाहय साउथ इंडिया के उस मन्दिर में हर साल रुपये क्यों भेजते हैं ? यू तो वे भगवान-वगवान का नाम तक सुनकर भागबबूला हो उठते हैं।' "उसके बाद क्या हुमा ?" मैंने तापस में पूछा। उसके बाद मौर क्या ? मर जो मैं हूं, वह तो तू देख हो रहा है ! अब मेरे पास बेशुमार दौलत मोर इपजत है। यहा किसीको भी नहीं मालूम कि मैं सूनी मर्डरर, चार या हत हूं। दरअसल दोस्त, जितना नुकसान मैंने इंडिया का किया है, उससे कहीं अधिक खुद अपना किया है । शायद तुझे लगेगा कि भला यह कौन-मा बड़ा नुकसान है ! तेरी राय में इस हादसे को मैं दिल से मुला दूं, वस्म्, सारा हिसा हो सरम ! हम हिन्दू लोग महादेव को भोलानाय भी कहते हैं न ! उन्होरी तरह शराब या भाग पोरर बम भोलेनाय बने रहो, वस्स् ! मेरा भी यही स्याल था, दोस्त ! इसीलिए मैंने भी शराब-भांग वगैरह का सेवन दारू कर दिया ! माहद ने ही मुझे इन सब नशामों की लत तगा दी थी। चरम, गाजा, चंडू, हशोग-मैं सब कुछ पीने लगा । लेकिन रम्भा को मुला पाना तो दूर की दात थी, जैसे-जैसे मेरा नशा बढ़ता गया, रम्भा की याद उतनी ही तीखो होती गई। सुना है, महादेव ने सती.

। -- वियोग में समूची दुनिया को तहस-नहस कर डाला था। इसीलि भोलानाथ का एक नाम नटराज भी है। उसी नटराज की जाने कितन कितनी मूर्तियां मैंने चुराई हैं। लेकिन कभी मैं भी अपनी पार्वती शोक में नटराज बन जाऊंगा, यह मैंने नहीं सोचा था। हां, अव नटराज की तरह ही ताण्डव-मुद्रा में नाच रहा हूं, दोस्त ! आज हिन्दुस्तान में हूं, मुमकिन है कल ही जापान के लिए रवाना हो जाऊ वहां से सीधे यू० के० पहुंच जाऊं और उसके फौरन बाद ही यू० एर ए० । जो लोग मेरे यहां काम करते हैं, वे सोचते हैं मैं रुपयों के हि समूची दुनिया छान रहा हूं। लेकिन वन्धु, मैं रुपयों के लिए नहीं, अर ही पाप और अभिशापों की वजह से दर-दर की खाक छान रहा हूं दरअसल यह मेरे राहु का चक्कर है | रम्भा मरने से पहले शायद : ही मन मुझे अभिशाप दे गई थी-'तुम अपनी ही सन्तान को स्वीक नहीं कर सके, उसी गुनाह की वजह से तुम्हें सारी जिन्दगी दर-दर । खाक छानते हुए दम तोड़ना होगा।' हाँ, दोस्त, अब मुझे उसकी सारी बातें याद आती हैं। वह कह थी, "अच्छा, मैंने ऐसा कौन-सा कसूर किया है जो तुम मुझे अप बीवी तक मानने को राजी नहीं हो ?" जवाब में मैं पूछता था, "लेकिन तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला था! रम्भा ने स्वयं स्वीकार किया था कि उसने रुपयों के लिए ही मुभ झूठ बोला था। "खर, जिन रुपयों की खातिर तुमने मुझसे झूठ बोला उन्हीं रुपयों से भर दिया है। अब तुम मेरी बीवी बनने को क्यों पार हो..?" खैर, ये सब तो महज़ बहस की बातें थीं। आदमी जब पागल जाता है, तो उसे तर्क-वितर्क की बातें कहां समझ में आती हैं ? रम के साथ भी वही हुआ था। असल बात यही थी कि उसका दिम ठिकाने नहीं था । वह बीवी और मां बनने के लिए सचमुच पागल उठी थी। उसने बहुत दिनों तक दरिद्रता से संघर्ष किया था। उस छुटकारा पाने के लिए उसने बहुत कुछ किया था। हम लोगों को धोर मने तुः था, - देवर उसने रपये ऐंठने की कोशिश को यो, साकि वह भी अमीर हो रुके। इसीलिए मुझसे व्याह के बाद जब उसके पास पैसा पाया, जर वह भी देर-ढेर गहने-कपड़ों की मानपिन बनी तब उसके मन में भी मोदी मोर मां बनने की साध जाग उठी। जो चीजें पाकर भारत मर जाती है-मम्पूर्ण हो जाती है, उसने भी वही पाना चाहा । लेकिन... अचानक तापम को बातो में व्याघात पहा । वहीं में ट्रंककाल प्राया पा। तारन फोन पर बहुत सारी बातें करने में व्यस्त हो गया । टेलो. फोन की बातचीत सरम करके, उनको निगाहें मेरी तरफ घूम गई, "मय शायद तुमने मुलाकात न हो, दोस्त, मैं प्राज रात के प्लेन से न्यूयार्क जा रहा हूं।" "मचानक न्यूयार्क ?" "हो, कही कुछ गड़बड़ हो गया है, मेरा जाना जरूरी है। लेकिन देय, तू यहां से जाना नहीं। मेरे हो मगान में रहना ! जितने दिन मन हो, रक जाना ! तुझे कोई प्रसुविधा नहीं होगी ! मैं सारा इन्तजाम र जाउंगा..." इसके बाद कोई सास वान नहीं हुई। तापस को समूची शाम तपारियों में ही बीत गई। उसके लिए दपतर में भी ढेर सारे काम पड़े पे। सारे काम-काज निबटाने के पहले देश छोड़कर जाना या उतनी भासान वात पी! झे याद है, तापस के चले जाने के बाद में भी अधिक दिनों तक उसके कान में नहीं रहा । दफ्तर का काम सत्म होने से पहले ही, मैं उसकी टिौ छोड़कर होटल में चला पाया । मुझे उमसे बहुत-से सवालों का तर भागना पा। मैं उसमे कुछ और बातें भी जानना चाहता था।

लेकिन अब कोई उपाय नहीं रह गया था। इन्सान के लिए बम्बई जाना क्या रोज-रोज़ सम्भव है ? रोजमर्रा के पापों की सजा काटते हुए, इन्सान की जिन्दगी खत्म हो जाती है। इसके बावजूद अगर कभी किसी बहाने कहीं जाने का मौका हाथ लग जाता है, तो उसे ही हम लोग बंधी-बंधाई लीक पर चलनेवाली ज़िन्दगी की ऊपरी आमदनी मान लेते हैं। लेकिन यह ऊपरी आमदनी क्या हर दिन किसीको नतीव होती है ? अचानक एक दिन फिर मेरे लिए बिल्कुल अयाचित भाव से ऊपरी प्रामदनी का संयोग आ पहुंचा। हालांकि ऐसा मीका काफी दिनों बाद मिला था। अपने दफ्तर की तरफ से जैसे ही मुझे साउथ इंडिया जाने का मौका हाथ लगा मैं उसे किसी भी शर्त पर छोड़ने को राजी नहीं हुआ । मन ही मन मैंने तय कर लिया कि इसी बहाने महाबलिपुरम् और चिंगलीपट भी घूम आऊंगा । तापस, रम्भा और नरसिंहम की उस लीला-भूमि के भी दर्शन कर पाऊंगा। जब हाथ का काम ज़रा हल्का हुआ तो मैं सीधे महाबलिपुरम जा पहुंचा । मैंने महावलिपुरम का वह होटल भी देख डाला, जहां तापस पहली बार ठहरा था, जहां रम्भा और नरसिंहम का झगड़ा हुआ था और जहां तापस के विली साहब ने उनके बीच मध्यस्थता की थी। वहां से लौटते हुए बस के एक यात्री ने मेरी तरफ गौर से देखते हुए अचानक सवाल किया, "सर, आपने मुझे पहचाना मेरी निगाहें काफी देर तक उसके चेहरे पर अटकी रहीं, लेकिन मुझे कुछ भी याद नहीं आया। मैंने पूछ ही लिया, "प्राप''कौन हैं, जरा वताइएगा!" "मैं पटवर्धन हूं, साहब! आपसे नागपुर में मुलाकात हुई थी। आप भूल गए ?" मुझे उसी पल सारी बातें याद हो आई । मैंने पूछा, "तापस कहां है ?" "साहव तो यू० ० के० में हैं।"

तुम्हारे साहब क्या जिन्दगी भर यूं ही धूमते "यू० के.... रहेंगे?" "हमारे साहब एक जगह कभी टिककर नहीं बैठ सकते । काफी चंचल और अस्थिर किस्म के इन्सान हैं !" "लेकिन माप इधर कहा ?" मैंने पूछा। "चिगलीपट !" चिगलीपट का नाम सुनते ही मैं सब समझ गया। "वहा क्या करने जा रहे हैं ?" "वही-आपको तो बताया ही था। साल में एक बार मुझे यहा रुपये देने पाना पडता है, सो उसी काम से पाया हूँ। यहा मन्दिर के प्रधान पुजारी के हाथों में स्पये सौंपकर मुझे माज को ही ट्रेन से नागपुर लौटना है । आप भी चलिए न, सर !" सर, मुझसे अनुरोध करना फिजूल था। मैं तो चलने के लिए तैयारही सहा था। मने छूटते ही कहा, "हा, हां, चतिए..." चिंगलीपट में मेरा यह पहला और अन्तिम प्रवास था । मन्दिर तक पहुंचने के लिए शहर से बाहर करीब दस मील अन्दर तक साइकिल- रिवी में जाना पड़ता था। लगभग दस बीघे के अहाते में एक माथम बना हुमा था। मागन मे मन्दिर बना हुआ था। मैने पूछा, "यह किसका मन्दिर है ?" "वेंकटेश्वर जी का!" विराट प्राथम । विराट प्रायोजन ! पाश्रम के अहाते मे फैली हुई छोटी-छोटी कुटियां ! माश्रमवामियों के रहने की जगह । उनके बीच- चीच मै नारियल के छोटे-छोटे अनगिनत पेड़ ! उन्हीकी वजह से समूचे प्रहाते में काफी धनी छाह! हम तोग घूम-फिर कर पूरी जगह का मुमायना करते हुए गए। पटवर्धन ने कहा, 'चलिए, प्रव मन्दिर में चला जाए वह मन्दिर सास बड़ा तो नहीं था लेकिन अद्भुत सुन्दर था ! काले मागे बढ़ ।

. गमरमर से निर्मित ! दक्षिण भारत की शैली पर बना हुआ चतुष्कोण मन्दिर ! मन्दिर के भीतर कदम रखते ही प्रधान पुजारी से भेंट हो गई । पटवर्धन ने उसे प्रणाम करके रुपये का वंडल थमा दिया। उस वंडल में कितने हज़ार रुपये थे, यह मेरे अन्दाज़ के बाहर की वात थी। सारा कुछ तापस का ही दिया हुआ था ! सव कुछ ! मुझे लगा इस आश्रम और प्रतिष्ठान के मूल में भी तापस ही है ! सब कुछ चुराई हुई मूर्तियों के रुपयों पर आश्रित ! अचानक मेरी निगाह किसी और जगह जाकर अटक गई । वेंकटेश्वर के चरणों में एक नारी-मूर्ति ! सफेद संगमरमर में तराशी हुई आदमकद मूर्ति ! मैंने जानना चाहा-यह किसकी मूर्ति है ? प्रधान पुजारी ने जवाब दिया, "यह भगवान वेंकटेश्वर की अनन्य भक्त शिष्या रम्भावाई की प्रतिमा है।" खैर, मैंने भी ऐसा ही कुछ अनुमान लगाया था। मुझे तापस की तरफ से अपनी करतूतों के लिए शायद ऐसे ही किसी प्रायश्चित की उम्मीद थी। लेकिन मुझे उसके प्रायश्चित का यह स्वरूप बेहद स्थूल जान पड़ा मैं लौटने की सोच रहा था । पटवर्धन भी मेरे साथ-साथ ही वाहर निक पाया। उसका भी यहां काम खत्म हो चुका था। पटवर्धन ने ही बात छेड़ी, "देखिए, सर, हमारे साहब मन्दिर, प्राध धर्म-इन सबकी चर्चा तक बर्दाश्त नहीं कर पाते, लेकिन इस मा के पीछे लाखों-लाख रुपये क्यों लुटा रहे हैं, समझ में नहीं माता ! पटवर्धन की बात का उत्तर देने के बजाय मैं उससे एक और कर बैठा। अनजाने में ही मेरे मन में एक अजब-सा सवाल जार था। मैंने पूछा, "वे कौन थे ?" पटवर्धन को जैसे समझ नहीं आया। उसने पलटकर पूछ किसकी बात पूछ रहे हैं, सर?" "अरे, वही, जिसे आप मन्दिर का प्रधान पुजारी बता र . . - १४० जिसके हाथ में मापने रुपये यमाए ये ?" "वे ? वे ही तो यहां के सर्वेसर्वा हैं ! जब यह मन्दिर बन रहा था, वे उसी समय से यहा हैं। आपने रम्भाबाई की भूति देखी थी न, सुना है, प्रधान पुजारी जी से उनकी जान-पहचान थी।" "लेकिन ये रम्भावाई कौन है ?" "यह मैं नहीं जानता सर ! उन्हे यहां के किसी व्यक्ति ने नहीं देखा । सुना है, प्रधान पुजारी जी ने ही अाखिरी वक्त में उनकी सेवा की थी और रम्भाबाई की मृत्यु के बाद वे भी मंन्यासी हो गए।" "मच्छा, उनका असली नाम क्या है ?" "मतलव ?" "मतलब संन्यासी होने के पहले उनका क्या नाम था? मैं उनके पूर्वाथम का नाम जानना चाहता हूं।" "दरमसल मुझे यहां के बारे में कुछ भी नहीं मालूम, सर ! मुझे तो मिर्फ मुनी-सुनाई बातें ही ज्ञात हैं। यहा के लोगो को जुवानी ही मुझे पता लगा कि प्रधान पुजारी जी ही वेंकटेश्वर जी के मन्दिर के प्रतिष्ठाता है। इस मन्दिर के निर्माण मे जितना रुपया खर्च हुना, सब हमारे साहब ने दिया है।" "लेकिन आपने मुझे उनका नाम नहीं बताया !" "सुना है उनका असली नाम नरसिंहम था." प्राज इतने दिनों बाद तापस के बारे में लिखते हुए बार-बार एक ही ख्याल पा रहा है ! सोचता हूं, तापस भोर उसकी इस अस्वाभाविक जिन्दगी के बारे में प्राखिर कौन-सी राय कायम की जाए? इसनी लम्बी- चौड़ी दुनिया में ने हजारों तरह लोग हैं, लेकिन मब इन्सान तो एक जमे नहीं होते ! कोई भला है, कोई बुरा है ! कोई न भला है, न दुरा, वस बीच-बीच का है । इन तमाम लोगों से ही संमार बना है। वैसे ही सरस्वती की वीणा में भी अनगिनत तार है-कोई तावे का, कोई लोहे का, कोई किसी अन्य धातु का ! ऐसा कोई नियम नहीं है कि दुनिया ! के तमाम लोगों को महान बनना ही होगा। जैसे वीणा के हर तार से उदात्त स्वर ही फूटें, यह जरूरी नहीं है-किसी तार से मद्धिम स्वर निकलेगा, किसीसे गम्भीर ? यानी सुर चाहे जैसा भी हो, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता; लेकिन शर्त यही है कि हर स्वर अपने ध्र व-लक्ष्य की ओर ही अभिमुख हो। अतः तापस भी महान नहीं बन पाया तो क्या हुआ ? दुनिया का हर इन्सान महान ही होता है, यह दावा कोई नहीं कर सकता । लेकिन महानता के प्रति मन में श्रद्धा-भक्ति व्यक्त करना भी तो एक तरह की महानता है ! तापस में क्या वह महानता नहीं है ? कौन जाने ! वर्ग वेंकटेश्वर के मन्दिर निर्माण के लिए लाखों-लाख रुपया दान क्यों देता? उसके बाद हर साल इतना-इतना रुपया क्यों भेजता? इसमें याखिर उसका कौन-सा स्वार्थ है ? अच्छा, नरसिंहम की पवित्र एकनिष्ठा में क्या उसे किसी महानतर के दर्शन हुए थे ? पटवर्धन की तरह मैं भी आज तक इसका उत्तर नहीं खोज पाया। मैंने सोच लिया है, तापस से अगर फिर कभी मुलाकात हुई, तो उससे . यह सवाल जरूर करूंगा। उससे पूछूगा कि इतना-इतना रुपया खर्च करके अाखिर वह किसकी लज्जा-हरण करना चाहता है ?-रम्भा की ? या नरसिंहम की ? या स्वयं अपनी ?

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Lazzaharan

Author
Mitra Vimal
Title
Lazzaharan
File name
Lazzaharan
Text
OCR done
Citation
1910
Published
2011/03
Publisher
Delhi, Kashmiri Gate Rajpal & Son's
Language
Sanskrit
Pages
148
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552169
Barcode
4990010032889.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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