Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Nal Damyanti
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नल-दमयन्ती
पौराहत काशीनाथ जल
.a2020
कलता हरिमन शेड नामिह प्रेम मे
पण्डित काशीनाथ जैन
द्वारा मुहिनी
ॐ
न
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20 COM नलदमयन्ती प्रकाशक वृहद् (वडगञ्द्रीय श्रीपूज्य जैनाचार्य चन्द्रसिंहसूरीश्वर शिम्य पण्डित काशीनाथ जैन कलकत्ता २०१६रिसन रोट के "मरसिंह प्रेस में मैनेजर पण्डित द्वाशीनाथ जैन द्वारा मुद्रित। प्रथमवार १०००) सन् १९२४ (मूल्य) प्रकाशकने इस पुस्तकका सर्वाधिकार स्वाधीन रखा है।
BIKANE प्रस्तावना भारतवर्षमें नल-दमयन्ती' की कथा घर-घर प्रसिद्ध है। यह कया स्त्री और पुरुष दोनोंहीके लिये अनेक अमूल्य उपदेशोंसे भरी है। किस प्रकार जुएके दुर्व्यसनने नल जैसे गुणवान् राजा- का सत्यानाश कर दिया, यह देखकर भला किसकी आँखें नहीं खुल जायेंगी और कौन नहीं दुर्व्यसनोंसे बचना चाहेगा? पकही अवगुण कभी कभी सारे गुणों पर पानी फेर देता है, यह बात गलके चरित्रसे स्पष्ट मालूम हो जाती है। इसी तरह एमयन्तीका चरित्र भी प्रत्येक नारीके लिये उज्ज्वल भादर्शका काम देता है। किस प्रकार राजा को रानी होफर भी पतिके ऊपर विपत्ति ना पड़ने पर एमयन्तीने हँसते- हँसते दुख-कष्टोंका पहाड अपने सिरपर उठा लिया, यह देख कौन नारी शिक्षा नहीं ग्रहण करेगी? जो ग्रहण करेगी, वह उसीकी तरह लाख दुख यातना उठाकर भी अन्तमें सुष पायेगी और जो नहीं प्रहण करेगी, वह अपना लोक और पर लोक दोनोंही बिगाडेगी। 1 हिन्दी जैन साहित्यकी सरल और सचित्र उत्तमोत्तम पुस्तकें . ट है .. सजिल्द अजिल्द। आदिनाथ-चरित्र ४) शान्तिनाथ-चरित्र ४) अध्यात्म अनुभव योगप्रकाश द्रज्यानुभव रताकर स्याद्वाद अनुभव रत्नाकर ३॥) सती चन्दननाला नलदमयन्ती सदन सेठ कयवन्ना सेठ रतिसार कुमार शुकराजकुमार छपरहा है ज्योतिषसार मिलनेका पता-पण्डित काशीनाथ जैन मुद्रक, प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता २०१ हरिसन रोठ, कलकत्ता ।
Jenecapoor comgaupane 0000000000000000000000000000 Pos9000000000DOOGODAE DOOOGarimmerCORD OSTEORONARIES pan परम पूजनीया विदुषी साची शिरोमणि श्रीमती सुपर्गा श्रीजी (मोहन श्रीजी) RAHA
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समर्पण जिनके उपदेशामत द्वारा अनेकानेक जैन एव अजैन नारियों का उद्धार हुआ है, जिन्होंने मारवाड और दक्षिण जैसे विषम प्रदेशमें विचरण करके अनेकानेक अबोध आत्माओंको धर्मोपदेश प्रदान किया है, जिनसे हमें हिन्दी जैन साहित्य के विकाश करने को प्रोत्साहन प्राप्त होने की पूर्ण श्राशा है, उन्हीं जैन समाज वन्दनीया, परोपकार परायणा, सत्वावरोधिवा, गाभिर्यादिगुण समन्विता, श्रीमती साध्वी शिगेमणि, विदुषी सुवर्ण श्रीजी (सोहन श्रीजी) के कर- कमलों में यह मेरी लघु पुस्तिका सानुनय समर्पण करता हूँ। भवटीय काशीनाथ जेन . ।
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वृहद् खरतर गच्छीया साध्वी शिरोमणि श्रीमती सुवर्णश्रीजी का संक्षिप्त जीवन परिचय प्रसिद्ध नीतिकार भर्तृहरि ने क्याही ठीक लिखा है, कि "परिवर्तिनि ससारे मृत को वा न जायते ? मनात येन यातेन याति वश समुन्नतिम् ॥" अर्थात्-इस परिवर्तनशील ससारमें कौर नहीं मरता और जन्म लेता ? पर जन्म लेना उसीका सार्थक है, जिसके जन्म लेनेसे उसका कुल और जाती उन्नतिको पाप्त हो। घात बहुतही ठीक है । जिसने संसारमें जन्म ग्रहणकर अपने कुल, अपनी जाति, अपने समाज और अपने देशकी उन्नति नहीं की, यह जन्मा या मरा, इसकी चिन्ता संमार नहीं करता, उस- का जीना-मरना, दोनों बराबर हैं। इसके विपरीत, जिनके द्वारा किसी जाति, समाज वा देशका उपकार साधित होता है, मरकर भी अपनी कीर्त्तिके द्वारा संसारमें अमर हो जाते है- + । .
- ( २ ) नास्ति तेषा यश.काये जरामरण भयम्। उनके यश-रूपी शरी. रको मुद्धापा या कृत्युका भय नहीं होता। ऐसेही कुलके दीपक, जातिके गौरव और देशके भूषण-स्वरूप मनुष्योंका इस संसारमें जन्म लेना सार्थक है। सर्व साधारण भी इनके आदर्श जीवनका अनुकरण कर अपनेको उन्नत बना सकते हैं, क्योंकि आदर्श पुरुषोंके जीवन दूसरोके लिये बड़े भारी मार्ग-प्रदर्शक का काम देते हैं। प्रसिद्ध अङ्करेज-कवि लौंग फ़ेलोने लिखा है - "Lives of great mon all remind us, We can make our lives sublime And departing leave behind us, Foot prints on the sands 'of time" अर्थात्-~~महत् पुरुषोंके जीवन हमें इस बातकी याद दिला देते हैं, कि हम भी अपना जीवन उच्च बना सकते हैं। और समारसे विदा होते समय बालुका-भूमिपर अपने पद- चिन्ह बोड जा सकते हैं , अर्थात् हम भी ऐसे ही हो जा सकते हैं, कि हमारे जीवनसे इस जीवन-रूपी मरु-भूमिमें सफर करते हुए लोग हमारे पट चिन्हों का अनुसरण करें। वास्तवमें ऐसेही आदर्श-भूत मनुष्योंसे इस ससारकी शोभा है। आज हम जिनका जीवन परिचय पाठकों को दिया चाहते हैं, उनका जीवन भी वैसाही आदर्श है। इनके जीवनसे भी हम लोगोंको बहुत कुछ शिक्षा मिलती है।
भारतवर्षके दक्षिण में "अहमदनगर" नामका एक बहुतही प्रसिद्ध नगर है। इसमें ओसवाल-जातिवालोंकी अच्छी बस्ती है। इसी जातिके भूयण-स्वरूप श्रीमान् सेठ योगीदासजी बोहरा नामके एक बडेही व्यापार-कुशल सजन वहाँ रहते थे। मापमें अनेक गुण थे, जिनके कारण अपनी जाति और नगरमे उनकी बडी प्रतिष्ठा धी। उनकी धर्म-पत्नीका नाम श्रीमती दुर्गादेवी था। वे बटोही सञ्चरित्रा, धर्म-परायणा, उदार और आदर्श पतिव्रता थीं। इन्हीं देवोजीके गर्भसे सम्बत् १६२७ की ज्येष्ठ कृष्णा द्वादशीये दिन हमारी चरित्र-नायिकाने जन्म ग्रहण किया वालिकाका अद्भुत रूप-लावण्य देखकरही माता-पिताने उसका नाम "सुन्दग्वाई रवा। सुन्दरबाई फेवल रूपमें ही सुन्दर नहीं थी, बल्कि उसमे गुण भी बहुतसे थे । वचपनसेही घह बडी उदार और उच्च-भावापन्न थी। विद्या लाभ करनेकी ओर भी उसकी बचपनसेही रुचि और प्रवृत्ति थी। कुमारावस्थामें ही सुन्दर- याईने अच्छी शिक्षा प्राप्त करली ओर खूध विद्याध्ययन कर लिया। इस तरहकी अल्प अवस्थामें इतनी योग्यता शायदही कोई लडकी प्राप्त कर सकती हो। जय सुन्दरवाई की अवस्था प्राय १९ वर्षकी हुई, तब आपकी माता, आपका विवाह करनेको इच्छासे, आपको लेकर जोधपुर रियासतके 'पीपाड' नामक स्थानमें चली आयी। पीपाटमें भी इन लोगोंके घर-द्वार थे। यहीं आने पर पहले पहल सुन्दरयाई. फो साधु-साध्वियोंके समागमका संयोग प्राप्त हुआ। उसी समय धैराग्य-पूर्ण देशनाए सुन सुनकर सुन्दरवाईका चित्त संसारसे विरक्त होने लगा, परन्तु कर्मान्तरायसे अभी आपको गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना था, इस लिये संसार त्याग करनेका अवसर नहीं मिला। सम्बत् ११३८ की माघ शुक्ला तृतीयाके दिन नागोर-निवासी श्रीमान् प्रतापचन्द्रजी भण्डारी (जो इस समय बम्बईमें विरा- जमान हैं) के साथ आपका शुभ विवाह हुआ। वृहत्-खरतर-गच्छ-सम्प्रदायके श्रीमान १००८ श्री सुखसागर जी महाराजके समुदायको जगत्-विख्यात, शान्त-मूत्ति, गम्भीरता आदि गुणोंसे अलकृत श्रीमती पुण्यश्रीजी सं० १९४५ में नागोर पधारी। वहाँके अनेकानेक श्रावक और श्राविकाएँ उनका उपदेश श्रवण करनेके लिये उनके पास नित्य आने लगी। एक दिन श्रीमतीजीने अपनी देशनामें कहा,- "देखो, यह जीव अकेलाही इस ससारमें आया है और यहाँ से अकेलाही जायेगा। माता, पिता, भ्राता, पति, पत्नी और अन्यान्य कुटुम्यी पक्षीकी भांति आकर इकट्ठे हो गये हैं। जैसे रातको बहुतसे पक्षी एक साथ बैठे रहते हैं और सवेरा होतेही जहाँक तहाँ उड जाते हैं, वैसेही एक दिन ये कुटुम्बी भी अपनेसे अलग हो जाते हैं। अपना-अपना समय पूराकर सभी एक-एक करके चले जायेंगे। इसलिये मोहके जालमेन फैसकर जीवको मात्म साधनके काममें लगाना चाहिये इस तरहकी वैराग्यमयीयातें सुनते-सुनते सुम्दवाई का हृदय वैराग्य-रससे परिपूर्ण हो गया। एक तो लडकपनसे ही उनके हृदयमें वैराग्यकी लहरें हिल्लोरें मार रही थीं, अयक श्रीमती पुण्यश्री जी की मधुर देशनाने सीनेमें सुहागेकासा काम किया। आपका चैराग्यमाव बहुतही पुष्ट हो गया ।आपने उसी समय गुरु- णीजी महाराजले दीक्षा ग्रहण करने का अपना विचार प्रकट किया। यह सुनकर श्रीपुण्यश्रीजी महाराजने कहा,-"देखो, दीक्षा लेकर संसारकी कठिन खलाको तोड देना, कोई साधारण कार्य नहीं है अभी तुम्हारी अवस्था केवल अठारह वर्षकी है। अभी तो तुम गृहस्थाश्रममेंही रहो और धर्मध्यान करती हुई पुण्य- मय जीवन व्यतीत करो। इसके बाद समय आनेपर साध्वी- धर्मको अंगीकार कर लेना।" यह सुनकर श्रीमती सुन्दरयाईने कहा,-"महाराज। इस शरीरका कोई ठिकाना नहीं है ? अभी है, अभी नहीं हैं। इस लिये शुभकार्यमें कदापि विलास नहीं करना चाहिये। ऐसे ऐसे कार्यों में तो जहांतक शीघ्रता की जाये, वही अच्छा है। अब आप कृपाकर मुझे शोधही इस ससार बन्धनले घुडा देने की कृपा करें" इसी प्रकार जर सुन्दरयाईने यात आमह करना आरम्भ किया, तब इनका हार्दिक वैराग्य-भाव देखकर श्री गुरुणीजोंने कहा,-"अच्छा, यदि तुम्हारी दीक्षा लेनेकी इच्छा ऐसीही प्रयल है, तो पहले अपने घरवालोले इसके लिये आशा मांग लो।" "यासि पहुविनानि"-अर्थात् अच्छे कामोंमें यढे-यदे विन आते ही हैं। पहले तो लोगोंने हमारी चरित्र-गायिका दीक्षा . प्रहण करने में बडी-बडी अडचने डाली , परन्तु अन्तमें सबको राजी करके उन्होंने सवत् १६४६ की मार्गशीर्ष शुक्ला पञ्चमी युध- वारके दिन प्रात.काल ८ बजे गृहस्थधर्मको छोडकर गुरुणीजी से दीक्षा ले ली। उसी दिन से भगवान् महावीर स्वामीके बत- लाये हुए सत्यमार्ग को ग्रहण कर वे आत्म-कल्याणका साधन करने लगी। दीक्षा लेनेपर आपका नाम सुवर्णश्री' हो गया और तबसे आप इसी शुम नामले प्रसिद्ध हैं। दीक्षा लेनेपर पञ्चमहावतोंका पूर्णतया पालन करना और ज्ञान ध्यानमे लवलीन रहना ही साधु-साध्वियोंका मुख्य कर्तव्य है। जो अपने इस फर्त्तव्यका पालन नही कर सकता, वह अपना ही कल्याण नहीं कर सकता। जब वह अपनाही कल्याण नहीं कर सकता, तब दूसरोंका कल्याण क्या ख़ाक करेगा? तो और भी कठिन कार्य है। भगवान महावीर स्वामीके इन्ही उप- देशोंका स्मरण कर, वेसदा-सर्वदा शान-ध्यानमें हो अपना समय बिताने लगीं। ज्ञान बढ़ने के साथ-ही-साथ आपको ध्यान-शकि भी क्रमश इतनी बढ़ गयी, कि इस समय दिन-रातके २४ घटों मेंसे १४ घरे आपके व्यानावस्थामही व्यतीत होते हैं। अधिक क्या कहा जाये, इतनाही कहना काफी होगा, कि मापमें आत्मिक ध्यान करनेकी अपूर्व शक्ति विद्यमान है। जबसे आपने दीक्षा ली है, तवसे आजतक अनेक प्रकारको तपस्याएँ कर चुकी हैं और यथाशक्ति अब भी करती ही जाती हैं। जहांतफ हमें ज्ञात हुआ है, आप अट्ठाई, नवपदजीकी बोली और वीसस्थानक तप यह , - करनेके साथ-साथ कठिनसिद्धि-तपका भी आराधन कर चुकी हैं। उपचासोंकी तो कोई गिनती ही नहीं है। आप एक हो समय में लगातार नौ, दस, ग्यारह, सत्रह, उन्नीस और इकोस उपवास तक कर चुकी हैं। श्री १००८ श्री पुण्यश्रीजी महाराजकी शिष्यमण्डलीमें, जिसमें प्राय सवासौसाध्वियों विद्यमान हैं, इस समय आपही सयमें प्रधान हैं। स०१६७६ मिति फाल्गुन सुदी १० के दिन जयपुर-नगरमें प्रज्य गुरुणीजी साहब श्री पुण्यश्री जी महाराजका स्वर्गवाल हो जानेके बादसे समस्त शिष्य-समुदायका सारा भार आपके हो ऊपर आ पड़ा है। आप बडी ही शान्त-स्वभावा और गम्भीर प्रकृति है। साथ ही आपमें यह एक विशेष गुण है, कि दुःखी और दीन मनुष्यों पर बडी दया रखती हैं। ऐसे लोगोंके चित्तको उपदेश द्वारा सन्तोष और धैर्य देते हुए यथाशक्ति सय भौतिसे उनकी सहायता करती हैं। आपका यह पूर्ण विश्वास है, कि योंही व्यर्थ हजारो लाखों रुपये खर्च कर देनेसे जैन जातिका उद्धार कदापि न होगा। उद्धार तभी होगा, जय हम लोग अपने दीन दरिद, निस्सहाय और निगवलम्र भाइयों और बहनों को अवलम्बन प्रदान करते हुए उनकी सब प्रकारसे सहायता करना मोहेंगे। आपके आचार और विचार यडेही ऊँचे दर्जेके हैं। यहाँपर हमारे पास इतना स्थान नही, कि हम आपकी समस्त गुणावली का सविस्तार वर्णन कर स, हमारी इच्छा है कि, फिर किप्ती ) दूसरे प्रथमें आपका सारा सुविस्तृत जोवन पाठकों को प्रदशि करेंगे। आपने स० १६८० का वातुर्मास मागरेमही किया था उस अवसरपर आपने एक बहुतही अच्छा और महत्त्व-पूर्ण का किया। आगरेसे थोड़ी दूरपर सौरीपुरजी नामका पक तीर्थ-स्था है। इसी स्थानपर अपने वाईसवें तीर्थङ्कर श्रीनेमिनाथ स्वामीक च्यवन और जन्म- कल्याणक हो चुका है । आज अपने लोगोंक असावधानता और आलस्यसे वहाँकी ऐसी शोचनीय दशा है रही थी, कि यदि थोडेदिन और उसको ओर ध्यान नहीं दिय जाना, तो तीर्थ-विच्छेद होनेमें कोई सन्देह नहीं था। कुछ सम पहले इस तीर्थके उद्धारके लिये ग्वालियरके सेंट नथमलजी गुले जछाने बडी चेष्टा की थी कुछ काम कर भी लिया था , दुर्भाग्यवश उनका कारचार विगड गया, इसलिये वे इस महत कार्यको पूरा नहीं कर सके। "सुवर्णश्री" महाराजने इस तीर्थके जीर्णोद्धार के लिये कल कत्तेके श्रीमान् लक्ष्मीचन्दजी पारेखकी धर्मपत्नी श्रीमती पानबा को उपदेश देयार इस कार्यके लिये उत्साहित किया इसके लिये तैयार हो गयीं और कई हजार रुपये देनेका वचन दिया। फिर महाराजने आगरा सघसे इसके विषय में कहा यहाँका श्रीसघ भी तन, मन, धनसे सहायता करनेके लिये तैयार हो गया। अब जीर्णोद्धारका कार्य बडी मुस्तैदीसे हो रहा है आशा है, कि यागामी वैशाख-मासतक यह कार्य अवश्य ही सम्पन्न हो जायेगा। प.
(६ । - अच्छे लोगोंका हाथ लग जानेपर सभी काम बन जाते है श्रीजीका इधर ध्यान आकर्षित होतही इस तीर्थका रूप बन जाने की पूरी सम्भावना हो गयी। अब इसके जीर्णोद्धारमें कोई सन्देह नहीं है। आशा है, कि आप इसी तरए लोकोपकारके कार्य करने के लिये अभी कुछ दिन और इस धराधामपर विद्यमान रहेंगी और अपने दर्शनों, उपदेशों और उपकारक कार्यों से हमारा सदैव कल्याण करती रहेंगी। शेपमें हम अपने मित्र वायू जवाहिरलालजी लोढा को सहर्ष साधुवाद देते हैं, जिन्होंने हमारो प्रातःस्मरणीया सोहन श्रीजा फा सक्षिप्त जीवन परीचय ज्ञातपर हमें कृतज्ञ किया है २०१ हरिसन रोड, आपका } कलकत्ता। काशीनाथ जैन।
015 आभार इल पुस्तिकाके प्रकाशन में, श्रीमती साध्वीजी लालश्रीजी के सदुपदेश द्वारा जोधपुर निवासी सेठजी छगनराजजी भणशालीकी स्वर्गीय धर्मपत्नी श्रीमती आशाबाई के स्मरणार्थ रु० १००) की आ- र्थिक सहायता मिली है, एतदर्थ हम साध्वीजी लालश्रीजी के पूर्ण आभारी हैं। आशा है, साध्वीजी इस तरह ज्ञान प्रचारके काममें सदैव उपदेश प्रदान कर उत्तरोत्तर और पुस्तकोंके लिये भी आर्थिक सहायता प्रदान करवाकर हमारे उत्साह को बढ़ाती रहेंगी। प्रापका-काशीनाथ जैन inex XXXX नल-दमयन्ती 5:202tkeepe पहला परिच्छेद इस पुण्य-भूमि भारतवर्षके कोमल-प्रदेशमें इन्द्रको प्रमawn गवती नगरीमे भी कहीं अधिक सुहावनी, सुस्त- 'समृद्धि-शालिनी और नाना प्रकारको मनोहर अहा- लिकाओंसे सुशोभित कोसला नामकी एक परम रमणीय नगरी थी। वहाँ सम्पूर्ण वैरी बन्दको पराजित कर सर्वत्र अपनी विनय- पताका फहरानेवाले, न्याय और नीतिमें पूर्ण निष्ठा रखनेवाले, प्रजापालनमें सदा-सब तरहसे-तत्पररहनेवाले निषधनामक एक राजा राज्य करते थे। राजा निषध बडेही दयालु, धर्मामा, न्यायो और सदाचारी थे। वे अपनी प्रजाको पुत्रके समान मानते थे और उसका दुख-दर्द दूर करनेके लिये सदा तैयार रहते थे। उनके राज्य में प्रजाको रोग, शोक, अकाल और 4 नल-दमयन्ती . महामारी प्रादिका कभी नामना नहीं करना पड़ता था। राज्य के कर्मचारियों पर स्वयं राजाका ऐसा अद्भुश रहता था, कि वे कभी प्रजापर अत्याचार 'नहीं करने पाते थे। जहाँ राजा प्रजाकी ओरसे कान में तेल डाले पड़े रहते हैं और अपने कर्मचारियोकी ही कही हुई बाताको सच समझा करते हैं, वहाँ कर्मचारी अपनेको प्रजाका सेवक नहीं, बल्कि सोलह आने मालिक समझने लगते हैं और मनमाने ढङ्ग से मजाको लूटते-खसोटते तथा मारते-कूटते है। परन्तु निषधकेसे सुच- तर राजाके यहाँ ऐसोधिधिली नहीं होने पाती थी, क्योकि वे स्वयं अपनी प्रजाके अभाव-अभियोग तथा आवश्यकताओं पर ध्यान दिया करते थे और किसीकी मनमानी घरजानी करने- का अवसर हाथ नहीं लगने देते थे। इस प्रकारका प्रजाप्रिय नृपति प्राप्तकर, कोसन्न देशको प्रजा अपने भाग्यको.. बारम्बार वेडाई'करती और हरतरहके मुख भोग रही थी। जैसा गजा- वैसी प्रजा-यह पुरानी कहावत इसी राज्यमें सच्ची साबित हो गयी थी। जैसे धर्मात्मा और न्यायी,यहाँके राजा थे, वैसे ही धर्मामा, विवेकी और निरन्तर'न्यायमें निष्ठा रखनेवाले मनुष्य भी उस राज्यमें बसते थे। साराश यह कि राजासे सारी प्रजा सन्तुष्ट रहती थी और राजाको भी अपनी प्रजाको ओरसे कोई'खुटका ( सन्देहा) नहीं थी। पूर्व-पुण्य प्रभावसे राजानिषधको दो पुत्र प्राप्त हुए थे। बडेका नाम नन और छोटेका कूबर था। दोनोही राज- पहला परिच्छेद कुमार शील, सौन्दर्य, बुद्धि और प्रतिभा बढे चढे थे । क्रमश. गुरुक निकट रहकर, दोनों राजकुमारीने राजकुमारोंके योग्य शिक्षा प्राप्त की और सब कलाओं में प्रवीण हो गये। दिन बीतते देर नहीं लगती। राजकुमारोंने धीरे-धीरे बालकपन और किशोरावस्था पारकर यौवनमें पैर रखा। एक दिन राजा निषध अपनी राजसभामें बैठे हुए राज- कार्यका निरीक्षण कर रहे थे इसी समय विदर्भ-देशक राजा भीमका भेजा हुआ दूत वहां आ पहुँचा और राजाको विधि- वत् प्रणाम कर, हाथ जोडे हुए कहने लगा, "हे महाराज ! विदर्भ-देशमें कुण्डिनपुर नामक एक नगर है। उसमें भीमरथ नामके राजा रहते है। उनके एक बडीही सुन्दरी और गुणवती कन्या है। उसके रुप लावगयको चारों ओर प्रशंसा फैली हुई है। उस सौन्दर्यका शब्दो हारा वर्णनं नहीं हो सकता-वह आँखों देखनेकी ही चीज़ है। उसका वह अनुपम लावण्य देखेकर आँखोंपर अमृतसा बरस जाता है। शायद विधाताके हाथोंकी वैसी कारीगरी कभी नहीं प्रकट हुई, जैसी उसने उस राजकुमारीके बनाने में रवचं की है। महाराज मै अधिक क्या कई इस 'राजकन्याको सी सुन्दरी शायद हो'इस पृथ्वीपर कभी देखने में आयी हो। उसका नाम भी बडाही सुन्दर है। लोग उसे दमयन्ती कहते हैं। जैसे सब जलाशयोंको छोडकर इंस मानसरोवरके पास ही आ रहते है, वैसेही समस्त उत्तम गुण बिना बुलाये दम- .
नल-दमयन्ती . 2 यन्तीके पास चले आये हैं। राजकुमारी विवाह योग्य हो गयी है, इसलिये राजा उसके योग्य वरकी खोज में है, परन्तु प्राजतक उसके समान शील, सौन्दर्य और गुणोंसे भरा-पूरा कोई वर नहीं मिला। इसीलिये राजाने वयवर रचाया है और उसमें पधारनेके लिये सब देशोंके राजा-राजकुमारों के पास निमंत्रण भिजवाया है। मैं भी उसके लिये आपको निमन्त्रण देने आया है। अतएव श्राप कृपाकर अपने दोनों राजकुमारोंके साथ वहाँ पधारें और हमारे राजाको कृतार्थ करें, यही मैरी प्रार्थना है।" दूतको यह बात सुन, राजाने सादर राजा भीमरथका निमन्त्रण स्वीकार किया और उस दूतका भलीभाँति आदर- सत्कार किया। जाते समय उस दूतको मुंहमांगा इनाम भी रामाकी ओरसे दिया गया। इसके बाद राजा विदर्भ-देश जानकी तैयारी करने लगे। उनके साथ जाने के लिये बहुत बडी सेना मज्जित हुई। एक दिन शुभ मुहर्तमें अपने सब सैनिकों और सेवकोंके साथ राजा निषध, अपने दोनों राजकुमारीको संग लिये, दक्षिण दिशाको ओर चल पड़े। क्रमशः महीनों को यात्रा कर, स्थान-स्थान पर विश्राम करते हुए वे लोग कुण्डिनपुरमें आ पहुँचे। विदर्भ-देशके राजाने इन लोगों की बडी प्रीति और भक्तिके साथ स्वागत करते हुए केलि-वनमें ले जाकर पधराया। उसी समय स्वयवरके निमित्त अन्यान्य. देशोक जो राजागण वहाँ आये, उनलोगोकोभी विदर्भ-नरेशने [ पहला परिच्छेद बडे आदरके साथ अलग-अलग स्थानों में ठहराया। देश- देशके भिन्न-भिन्न रूप-रङ्गवाले मनुष्यों के आगमनसे कुरिहन- पुग्में खासी चहल-पहल हो गयी। जगह-जगह खेल-तमाशे और नाच गानका रङ्ग जम गया। भिन्न-भिन्न राजाओके रंग बिरंगे डेरे-खीमे गड गये-उन पर रंग-विरंगी पताकाएँ फहराने लगीं। कुण्डिनपुरके झुण्ड-के-झुण्ड मनोग कर उन डेरे-तम्बुओंको देखने लगे। सबकी अपेक्षा निषध देश- के ही राजाका सुन्दर डेरा लोगों को बहुत ही पसन्द पाया। उस डेरेके भीतर झाँक कर लोगों ने जब राजकुमार 'नलको देखा, तब तो उनकी सुन्दरताने सबकी आँखों में चकाचौंधसी लगा दी। सब लोग उस कामदेवके समान सुन्दर रूपवाले नलको देखकर कहने लगे,-"बस यही राजकुमार दमयन्तीके योग्य वर है। अच्छा हो, यदि राजा भीमरथ, सबको छोड कर इसके साथ दमयन्तीका विवाह कर दें। । नियत समय पर सब लोग स्वयंवर-मण्डपमें पा विराजे। सभी राजा-राजकुमार बडे ठाट-बाटसे भडकीली पोशाकें यहने बैठे हुए थे। कोसल-नरेश भी अपने दोनों पुत्रों के साथ मणि-रत्न जटित सिहासन पर बैठे हुए नक्षत्रों के बीच शोभित होनेवाले चन्द्रमाकी भांति शोभा पा रहे थे। सबके बीच में गजकुमार नल सहसरश्मि सूर्यके समान सबकी ज्योतिको मन्द करते हुए विराजमान थे। उनका तेज देखकर सबकी अखेिं झिप जाती थी। न मालूम क्यों, सबके दिलमें रह-रह 'नल-दमयन्ती १२ 1 सूर्यकासा प्रकाश फैल जानेसे वह जो मनुष्यकासा आकार दिखाई दे रहा है, वह क्या है ?" दमयन्तीने कहा,-"खामी। वे बालनाचारी हैं। उन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियोंको जीत लिया है। प्राणनाथ ! इस जंगलके रहनेवाले हाथी, इन मुनिवरको पर्वत समझाकर, इन- के शरीरमें अपनी पीठ घिसा करते थे, इसीलिये इनका ध्यान टूट गया है। इतनेमें हाथियोंको गलपट्टोसे घूते हुए मदलज- के नोभसे भौरे पा-आकर मुनिको दुःख दे रहे हैं, इसीसे वे बडे लेशमें हैं।" यह सुन, राजकुमार नल अपना रथ मुनिके पास ले आये। तदनन्तर उसपरसे नीचे उतरकर दोनों स्त्री-पुरुषने उन्हें प्रणाम किया। भौरों के उत्पातको देख, उन्हें मुनिको दशापर तरस आ गया। मुनिने अपने भानसे यह बात जाम ली। तदनन्तर भौरोंके उपद्रवोंको शान्तकर मुनिने कहा, है दम्पती । सुनो-धर्म कोई नयी वस्तु नहीं है, जिसके विषय में उपदेश करनेको आवश्यकता हो। धर्म सारे समारमें प्रसिद्ध और पुरातन वस्तु है। मनुष्य-मानको इसका सेवंदा आचरण करना चाहिये। (नलकी ओर देखकर ) हे राजकुमार नल। तुम्हारी स्त्री दमयन्ती, पूर्वजन्ममें, चौबीसों तीर्थङ्गरोंको स्मरण कर नाना प्रकारके तप, दान आदि शुभलत्य कर चुकी हैं, इसीलिये इसे इस जन्म में सूर्यको ज्योतिको भी मन्द करनेवाली ललाट-ज्योति प्राप्त हुई है। तुमने भी पिछले जनमें उत्त- WO...08.800sG Les Gura ----OG... Anand 1 900Cssis#R यह उन, राजकुमार नल अपना रथ मुनिके पास ले पाये। तदनन्तर उसपरसे नीचे उतरकर दोनों स्त्री-पुरपने उन्हे प्रणाम किया। (पृष्ठ १२.) /
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पहला परिच्छेद , मोत्तम तप, दान आदि धर्मके कार्य किये हैं, इसीलिये तुम्हें टमयन्तो पत्नी रूपमें प्राप्त हुई है। इसके बाद आगे आने- वाले भवों में भी तुम्हें सदा सुख-शान्ति प्राप्त होती रहेगी।" मुनिको यह बात सुन, दोनों वर वधू बडे प्रसन्न हुए और रथपर सवार हो पागे चले। इसी प्रकार भागे चलते-चलते वे अपनी राजधानीके पास पहुंचे। वहाँ एक सुन्दर- सुहावनी फुलवारी देख, नलको बडा आनन्द हुमा और उन्होंने अपनी नव-विवाहिता पत्रीसे कहा,-*प्यारी । पब यहीसे तुम हमारी राजधानीको सुन्दर रचना देखो। यह फुलवारी हमें बतला रही है, कि हमारी राजधानी अब बहुत ही निकट है, उसकी बाहरी-भीतरी सुन्दरता देखनेके लिये तैयार हो जाओ। इस- लिये प्राणप्यारी । तुम्हारी ससुराल अब बहुत पास आ गयो है-उसकी सुन्दरता देखने के लिये अपनी पाँखें बिछाये रहो। उसमें जगह-जगह पर सुहावने सरोवर, वन, उप- वन तथा स्त्रियोंके विहार करने के लिये रमणीय वापियाँ बनी हुई हैं। इसके बाद ज्यों-ज्यों नल अपनी राजधानीके पास पहुँचने लगे, त्यों-त्यों बीच में पडनेवाले स्थानोंको अपनी प्यारी पत्री दमयन्तीको दिखलाने और उनका परिचय देने लगे। दम- यन्ती भी उन स्थानों को भली भाँति देखती-भालती हुई चलने लगी। इसी तरह दोनों प्रिया-प्रियतमने बड़े आनन्दसे रास्ता किया और अपनी राजधानीके बिलकुल पास भा गये। ५ नल-दमयन्ती १४ उस दिन बडे ही शुभ मुहर्तमें निषध राजाने, 'सब वरा- तियों और नव-विवाहित वर-वधू के साथ, नगरमें प्रवेश किया। उस समय ऐसा मालूम हुआ, मानों देवराज इन्द्र, युइमै विजय प्राप्त कर, अमरपुरी में प्रवेश कर रहे हों। आगे-आगे वर-वधू और पीछे-पीछे सब स्वजनो तथा सेवक-सैनिकों के साथ राजा नगरके भित्र-भिन्न राजपथोसे होकर जाने लगे। उस पर मुन्दर नगरको ऊंची-ऊँचो अट्टालिकाओं को देखकर दमयन्ती- को बडा ही हर्ष हुआ, उस समय तो उसके पानन्दकी कोई सीमाही न रही, जब उसने उस परम रमणीय और विशाल राजमन्दिरमें प्रवेश किया। राजमहलमें वर-वधूका प्रवेश हो जानेके'बाट सब लोग जहाँ-तहाँ चले गये। नगरभरमें जगह- जगह आनन्दके वधावे बजने प्रारम्भ हो गये। 'सारी नगरीने आनन्दमयी मूर्ति धारण कर लो। राजकुमार नलने दमयन्तीको सी सुन्दरी, सुशीला, सदा- चारिणी और विनयको मूर्त्तिके समान पत्नी पाकर अपने भाग्यको बार-बार प्रशसा की और उनके समान सब गुणोकी खान स्वामी पाकर दमयन्तोने भी अनमिल जोडी मिलानेवाले विधाताको बार-बार धन्यवाद दिया। नगरके लोग और लुगाइयाँ भी नल और दमयन्तीको यह समान जोडी देखें, सौ-सौ मुंहमे हर्ष प्रकट करने लगीं। इधर नये विवाहित जीवनके अनिन्द और प्रीतिमें लीन होकर नल और दमयन्ती- को भी संसारको सुधि भूल गयो। वे कभी तो मनोहर पर्वतके - - - पहला परिच्छेद उपर क्रीडाके निमित्त दले जाते, कभी सुन्दर सुहावने वनमें जाकर तरह-तरहसे दिल बहलाते, कभी फुलवारियोंमें मौज- वहार लूटते, कभी जल-क्रीडामें दिन बिताते, कभी बागीचेमें नाकर पुष्पक्रीडा करते,-फूल तोड-तोड कर' एक दूसरे पर उछालते अथवा उनके हार बनाकर एक दूसरेको पहनाते या मुकुट बनाकर एक दूसरेके मिरपर रख देते। इसी प्रकार वे दम्पती भिन्न-भिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न प्रकारसे सुख भोग करते हुए समय बिताने लगे। उनका यह प्रानन्द, यह मुख सौभाग्य यह प्रीति-विलास, यह रङ्ग तरङ्ग देख, माता पिताके हर्ष और आनन्दको सीमा न रही। सुखके दिनोंका यह स्वभाव है, कि वे इवाके परोपर उडते चले जाते हैं-उनके बीतते देर नहीं लगती। नल' और टम- यन्तोके विवाहके बाद कितनेही वर्षइम पानन्दके साथ व्यतीत हो गये, कि कुछ मालूम ही नहीं पडो, कि ये दिन किधरसे आये और किधर चले गये। । " 71 - ।
दूसरा परिच्छेद y बन्धु-विरोध सी तरह कितने ही वर्ष बीत गये। दिन, महीना इ. वर्ष करते करते- कई वर्षों का समय निकल गया । 9 धीरे-धीरे निषध-राजाका बुढापा पा, पहुँचा। उनको इन्द्रियों शिथिल होने लगौ-मस्तिष्क दिन-दिन दुर्बल होने लगा।, राजकार्यसे उन्हें घृणा,पौर विरक्ति होने लगी। उन्होंने सोचा, कि अब अपनेको इस झंझटमें रखना ठीक नहीं। अब मेरी अवस्था राज्य करनेकी नहीं-धर्माचरण करनेको है। क्रमश यह विचार हट होता चला गया और उन्होंने मन्त्रियों को सलाहसे एक दिन अच्छा मुहर्त देख, राजकुमार नलको सिंहासन पर बैठा दिया और कूबरको युवराजको पदवी प्रदानको । इस प्रकार अपने राज्यको यथो- चित व्यवस्था करनेके बाद राजा निषध, चारित्र ग्रहण कर, वनमें तपस्या करने चले गये। पिताके वनमें चले जानेके बादसे राजा नलने अपने राज्यका रथ इस प्रकार कुशलता, चतुरता, नीतिघ्रता और दुसरा परिच्छेद - - . प्रजाप्रियताके साथ चलाना प्रारम्भ किया, कि उनकी चारी भोर प्रशंसा होने लगी। उनके यथा तेज और प्रतापको दिन- दिन हहिहोने लगी प्रजा उनसे सदा प्रसन्न रहने लगी। जैसे गरमौके दिन बीतनपर वर्षा -ऋतुके नये-नये मेघोंको देख कर सब लोगोंको आनन्द होता है, वैसे ही बूटे राजाके बाद से मवीन राजाको पाकर सब प्रजाजन आनन्दित हो उठे। जैसे पानीके भारसे भके हुए बादलोंको देखकर लोगों- को बडी प्रसनता होती है, वैसे ही राजा नल, दिन-दिन लक्ष्मीकी अधिकतासे शोभा पाने लगे और अपने समस्त प्रिय- अनों और पुरजनोंको अधिकाधिक आनन्द देने लगे। अपने प्रतापरूपी अग्निमें शत्रुओंको स्त्रियोंके मोतोके हारोंको भस्म करके, मानों उसी भस्म राजा नलने अपने महलोंपर सफेदी करवायी थी। जैसे कल्पाम्सकालको अम्नि समुद्रमें डूब जाती है, वैसे ही शवोंकी लक्ष्मी नलके खड्गरूपी जलमें डूब गयी। जैसे सूर्य सारे संसारमें अपनी किरणोंका प्रकाश फैला देता है, वैसे ही राजा नलने अपनी सत्ता पृथ्वोके प्राधे भाग पर बैठा दी। जैसे सब देवता इन्द्रकी अधीनता स्वीकार किये बैठे हैं, वैसे ही क्रमशः सब राजाओंने राजा नेलको अपना अधिपति मान लिया। इस प्रकार राजा नलने पिताके समयसे अपने राज्यको कहीं अधिक उवति कर डाली और सर्व-सम्पत्ति सम्पन होकर सानन्द राज्य करना भारम्भ किया । घर उनके भाई कूवरके मनमें डाहको माग धीरे-धीरे । २ निल-दमयन्ती है , सुलग रही थी। वे यदा राजा नलकी।बुराई करनेकी ताकम लगे रहते थे। राना नलको हरएक वासमें वे बुराई दूँ ठा करते थे। क्या शिकारमें, या भोजनमें, क्या राजकाजमें, क्या 'राजनीतिमें, क्या कोड़ा-कौतुकमें सभी कामोमें वे नन्नेका छिद्रान्वेषण करनेको हो तैयार रहते थे। कूबरको यह कुवा- 'सना और ईर्षा राजा नलसे छिपी हुई नहीं थी। वे अच्छी तरष्ट पहचान, गये थे, कि मेरे भाईके मनम मैरै प्रति डाह पैदा हो गया है और मेरा इस सिंहासनपर बैठना, इसे फूटी आँखों भी नहीं सुहाता। परन्तु वे ऊपरसे यह बात प्रकट "नहीं होने देते थे और पहलेको होगभांति अपने छोटे भाईके साथ नेहमय व्यवहार करसे थे । , पर भाईकी यह ' मरलता 'भो कूबरको अच्छी नहीं लगती थी। इसी ताकमें थे, कि कैसे इस राज्यको हडप कर जाऊँ । एक दिनको बात है, कि राजा नल, दिल बद्दलानेको लिये अपने भाई कूबरके साथ जुधाखेनने बैठे। समयके प्रभा- वसे उस दिन राजा नलके पासे बराबर उलटे पडते चले गये, हर बाजी में , कूबरकी-ही जीत होती चली गयी। क्रमशः राजा नल, जुएमें नगर, ग्राम, क्षेत्र और अन्यान्य सम्पत्तियाँ हारते चले गये। इस प्रकार कृष्णपक्षको चन्द्रकलाको भौति नलको सम्पत्ति लगातार क्षीण होती चली गयी। परंतु इस हारसे भी सन्नने हिम्मत नहीं हारी-वे और भी जोशके साथ जुआ खेलने लगे। धीरे-धीरे राजा,नल अपना यथा सर्वस्व + - - . । + - - - दूसरा परिच्छेद 45 हार बैठे। इसी समय दमयन्तीने वहाँ आकर- कहा,- "नाथ! आप यह क्या कर रहे है ? आपको ऐसा करना कदापि उचित नहीं है। ,जुभाका खेल कोई अच्छा मनो- विनोद नहीं है। महाराज ।, आपकेसे -अष्टपुरुष ही यदि ऐसा आचरण करेंगे, तो, फिर और लोगोंको क्या बात है ? उन्हें फिर कौन उपदेश देगा ? यद्यपि आपको जुएका बहुत पुराना शौक है, तथापि -आजका खेल , तो और दिनोंको अपेक्षा कुछ और ही दंगका दिखन्नाई देता है, मुझे तो,ऐसा मालूम पडता है, कि इसका कोई बुरा परिणाम होनेवाला है। यह तो साफ़ हो अशुभ-सूचक मालूम पडता है, कि आपको बाजी हर दांवमें मात होती चली जाती है। -अब भी. पॉसे फेंक-फाँक कर अलग हो जाइये। अब दाँवपर लगने योग्य आपके पास रहही क्या गया है, जो,अब भी जोक- की तरह खेलसे चिपके हुए है। अब तो आप अपना सर्वस्व हार चुके । इसलिये, चुपचाप युवराज कूवरको, राज्य-सौंप कर कहीं चले चलिये, नहीं तो वेडन्नतीके साथ इस राज्यसे निकाल कर बाहर कर दिये जायेंगे। दैवयोगसे जो होना था, वह तो हो ही गया, अब अधिक-अपमान सहन करनेका क्या काम है जो हो गया, उसी पर सन्तोष कीजिये-श्रव राज्य वापिस मिलनेको प्राशा से फिर पाले फेकनेको इच्छा न कीजिये।" इस प्रकार-दमयन्तीने नलको बहुतेरा समझाया-बुझाया, पर उन्होंने उसकी एक न सुनी, तब दमयन्तीने अन्यान्य . . ?
निल-दमयन्ती . - सुलग रही थी। वे यदा राजा नलको बुराई करनेको ताकमें लगे रहते थे। राजा नलकी हरएक बातमें वे बुराई हुँदा करते थे। क्या शिकारमें, क्या भोजनमें, क्या राजकाजमें, क्या राजनीतिमें, या कोडा-कौतुक-सभी कामोमें वि नलका छिद्रान्वेषण करनकोसी तैयार रहते थे। कूबरको यह कुवा- सना और ईर्षा राजा नलसे छिपी हुई नहीं थी। वै! अच्छी तर पहचान गये धे, कि मेरे भाईके मनमें मेरे प्रति डाह पैदा हो गया है और मेरा इस सिंहासनपर बैठना, इसे फूटी आँखों भी नहीं सुहाता। परन्तु वे ऊपरसे यह बात प्रकट नहीं होने देते थे और पहलेकी ही भांति ' अपने छोटे भाईके "साथ नेहमय व्यवहार करते थे। पर भाईको यहः मरलता भो,कूबरको अच्छी नहीं लगती थी। वे इसी ताकमें थे, कि कैसे इस राज्यको हडप कर जाज। एक दिनकी बात है, कि राजा नल, दिल बहलाने के लिये अपने भाई कूवरके साथ जुमा खेलने बैठे। समयके प्रभा- वसे उस दिन राजा नलके पाँसे बराबर उलटे पड़ते चले गये, हर बातीम कूबरको ही जीत होती चली गयी। - क्रमशः राजा नल, जुएमें नगर, ग्राम, क्षेत्र और अन्यान्य सम्पत्तियाँ हारते चले गये। इस प्रकार कृष्णपक्षको,चन्द्रकलाको भौति नलको सम्पत्ति लगातार.क्षीण, होती चली गयी।, परंतु इस हारसे भी सन्नने हिम्मत नहीं हारी-वे और भी जोशके साथ शुभा खेलने लगे। धीरे-धीरे राजा नल अपना यथा:सर्वस्व है -- - F -- , दूसरा-परिच्छेद - । - हार बैठे।-, इसी समय-दमयन्तीने वहाँ आकर कहा,- "नाथ ! आप यह क्या कर रहे है ? आपको ऐसा करना कदापि उचित नहीं है। जुआका खेल कोई अच्छा मनो- विनोद नहीं है। महाराज । आपकेसे अष्ट पुरुष हो, यदि ऐसा आचरण करेंगे, तो, फिर और लोगों को क्या बात है ? उन्हें फिर कौन उपदेश देगा ?, यद्यपि आपको जुएका बहुत पुराना शौक है, तथापि, -आजका खेल, तो और दिनोंकी अपेक्षा कुछ और ही ढंगका दिखनाई देता है। मुझे तो,ऐसा मालूम पडता है, कि इसका कोई बुरा परिणाम होनेवाला है,। यह तो साफ़ हो आशभ-सूचक मालूम पडता है, कि आपको बाजी हर दाँवमें -सात होती चली जाती है। भी पासे ,फेंक-फाँक कर:-अलग हो जाये। अब दाँवपर लगने योग्य आपके पास रहही क्या गया है, जो अब भी जोक- की तरह खेलसे-चिपके हुए हैं ? अब तो आप अपना सर्वस्त्र हार चुके । इसलिये चुपचाप युवराज कूवरको राज्य सौंप कर कहीं चले चलिये, नही तो बेइज्जतीके साथ इस राज्यसे निकाल कर बाहर कर दिये जायेंगे । दैवयोगमे जो होना था, वह तो 'हो हो गया, अम अधिक-अपमान सहन करनेका क्या काम है ? जो हो गया, उसी पर सन्तोप कीजिये-अब राज्य वापिस मिलनेको-प्राशा से फिर पांसे फेकनेकी इच्छा न कीजिये।" इस प्रकार-दमयन्तीने नलको बहुतेरा समझाया-बुझाया, पर उन्होंने- उसकी एक न सुनी, तब दमयन्तीने अन्यान्य अब नल-दमयन्ती २० । अच्छे-अच्छे लोगोंसे भी राजाको बहुत कुछ कालवार्या, परन्त 'जएका भूत सिर पर सवार होनेके कारण नलने उन लोगोंकी बातें भी अनसुनी कर दी और फिर उत्साहके साथ खेलने लगे। विधाता जब प्रतिकूल हो जाते है, तब मनुष्यको बुद्धिका दि- वाला निकल जाता है। यही हाल राजा नलका भी हुआ। उन्हें किसीका हितोपदेश अच्छा नहीं लगा। वे जुआ खेलते ही चले गये। जैसे प्रातःकाल होते ही चन्द्रमा चाँदनीक साथ-साथ समस्त नक्षत्रोंको भी खो देता है, वैसे ही राजानल अपनी प्राणप्यारीपत्नी और सब मन्त्रो-पारिषदोको भी हार बैठे। शरीर परके वस्त्र और आभूषण भी दांव पर लग गये। इनके पास अब अपना कुछ भी नहीं रहा। 'अबके कूबरने तेवर बदले और पैशाचिक आनन्दसे प्रफुलित होते हुए नलसे कहा, "भाई साहब! अब आप शीघ्र ही इस नगरको छोडकरजहों जी चाहे चले जाइये। पिताके दिये हुए राज्यको आपने इतने दिन भली भाँति भोगा, अबके मेरी बारी है। मैंने आपसे सब कुछ शुएम जीत लिया। यह मेरे बापका धन नहीं, मेरा निजका उपार्जित धन है। इसमें आपका कोई हिस्सा नहीं, इसलिये आप अब यहाँसे शीघ्र ही चले जाइये, जिससे मुझे राज्यको बागडोर अपने हाथ में ले लेनेका मौका मिले।" । कूजरको यह बात सुन राना नलने झुंझलाते हुए कहा- "कूबर तुम इतना घमंड क्यों करते हो ?राज्यापालेना कोई बडी बात नहीं है। जिसको भुजाओं में बल है, वह अनायास i २१ दूसरा परिच्छेद राजलक्ष्मीको प्राप्त कर सकता है। मुझे अपने हाथ से निकल कर तुम्हारे हाथमें राज्य चले जानेका तनिक भी दुःख , नहीं है। मैं अभी यह नगर छोड़ देता है। तुम रहनेको कहते, तो भी में यहाँ नहीं रहता।" यह कह, राजा नल केवल एक धोती पहने हुए वहाँसे चल निकले। उनके पीछे-पीछे दमयन्ती भी चली। यह देख, कूबरने कहा, "सुन्दरी ! मला तुम कहां जा रही हो? तुम्हें तो मैंने जीत लिया है। इसलिये तुम कदापि नलके पोछ- पोछे नहीं जान पाओगी। तुम्हारा-उनका अब कोई सम्बन्ध महौं है। साथ जानेकी बात तो दूर रहे, तुम्हें अब उनका स्मरण करना या मुँह देखना भी मुहाल हो जायेगा।" देवरके ऐसे कठोर वचन, राज्य-नाशसे भी न घबरानेवाली दमयन्तीका हृदय विदीर्ण हो गया और उसकी प्रखिोसे अविरल अश्रुधारा बह चली। यह,देख, सब लोग, जो इस बन्धु-विरोधका तमाशा बडी देरमे चुपचाप देख और नलकी मूर्खता पर तरस खा रहे थे, बोल उठे,-"युवराज'कूबर ! यह आप अच्छा नहीं कर रहे हैं। इससे आपको कदापि भलाई नही होगी। जैसे सिंहके पीछे-पोछ लाती हुई सिहनीको रोकने वाला शृगाल मारा जाता है, वैसे ही राजा नलके पीछे- पीके जाती हुई दमयन्तीको रोक कर आप भी अपनी मौत को पास बुला रहे हैं। बड़े भाईको स्त्री माताके समान है। उन्हें रोक कर प्रापको कौनसा लाभ होगा। आपके लिये यदी . . -- नल-दमयन्ती. २२ T - - उचित है, कि दमयन्ती देवीको प्रणामकर उन्हें नखर्के साथ हो रथ पर बैठाकर यहॉसि भेज दें। ऐसा नहीं करने से आपकी बड़ी बदनामी होगी। यदि आप हमारा यह कहना नहीं मानेंगे, तो आपकी बडी दुर्गति होगी।" - } । जब सब लोगोंने इस प्रकार दृढ़ताके साथ कूबरको फट- कारी, तब उन्होंने दमयन्तीको रधमें बैठाकर नलके साथ ही जानेको कह दिया । दमयतीको थपर संवार देख, राजा नलने कहा,-"कूबर'। मुझे तुम्हारे रथसे कोई प्रयोजन नहीं है।" कूबरने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। तब राजा नल दमयन्ती की आगे कर, आप उसके पीछे-पो दन्न चलने लगे। नलके चले जानेपर कूबरने बड़े जोरसे दुन्दुलि बनवायौं । उमे सुनते ही सारी नगरके लोग हाहाकार कर उठे और कूबरको धिकार देने लगे। राजा नलकैसे प्रजाप्रिय राजाकोखीकर प्रजा मानो अनाथ हो गयो । 'कबरका स्वभाव बालकपन से ही जैस उग्र था और युवराजकै हैसियतसे ही उन्होंने प्रजाके साथ जिस तरह केडाई- के साथ वर्ताव किया था। उससे सभी लोगडर गये, कि अबके कूबरके राजत्व कालमें हमारा कल्याण नहीं होगा। यह अव- यही हम लोगों को पीस डालेंगे। पर समय पाकर भवस्थाम भेद होनेपर मनुष्यको स्वभाव बहुत कुछ बदल जाता है, इसी आशा पर'मजा'चुपचाप मन मारे रह गयो । उसने कूबरके तुरंत पाये हुए अधिकारको उलट नेकों कोई प्रयत्न नहीं किया। ।
तीसरा परिच्छेद। वियोग . 509ह मय एकसाँ कभी नहीं रहता।जो कभी फूलोंकी मेज स पर सोते हुए कष्ट अनुभव करता है, उमेही समय 260 एक दिन काँटों सकडोंकी सेजपर सुला देता है। जिनमिरों पर किसी दिन मुकुटमणिकी ज्योति जगमगाती है, उन्होंपर एक दिन रास्तेको धुल उन्ह-उड कर पडा कारती है। जिन्हें सदा सेव-नासपाती खानेको मिलती है, उन्हें एक दिन वनस्पति भी मुहाल हो जाती है। इसीसे किसीने कहा है, कि-"किसीकी बनी रही है, किसकी बनी रहेगी। }, राजा नल और रानी दमयन्ती भी आज उसी तरह सम. यके फेर में पडकर-जङ्गल पहाडोंकी खाक छान रहे हैं। अनेक नगर, ग्राम, नदी, पहाड पार करवे जगलोंको गैर कर रहे हैं। जिन्हें मेजसे उठकर दो पग चलना भी पहाड मालूम पडता था-आज वे कितनी बडी मंजिल मार चुके है, यह उनके चेहरे पर हवाईयाँ उडतीहुई देखकर ही अनुमानमें पा जाता है। उनके वह कुसुमसे कोमल शरीर और वह ववसो कठिन नल-दमयन्ती ! . ! विपत्ति देख, मनुष्यों की तो बात ही क्या है, पशु-पक्षियोंके भी कलेजे फटने लगते थे । जब कभी वे लोग घूमते-फिरत हुए किसी वस्तीमें पहुँच जाते, तब उन्हें पहचान कर लोग अनायास कह उठते थे,-"हाय ! विधाताका यह कैसा कठोर विधान है कैसी विकट विडम्बना है। राजा नल, जो इस भरतखण्डके आधे भू-भागके अधीश्वर थे, इस दशाको प्राप्त ही रहे हैं, इससे बढकर दुःखकी बात और क्या होगी? निर्दयी देव ! इन्होंने तुम्हारा क्या बिगाडा था, जो तुमने इनकी ऐसी दशा कर दी ? यदि यही हालत करनी थी, तो फिर पहले इतना ऐखयं इन्हें क्यों दिया था? पहले सम्पत्तिके सबसे ऊँचे शिखरपर चढाकर, पीछे विपत्तिको गहरी खाई में डाल देना यह तुम्हारा धीर अन्याय है। शापके भयसे जिस रानी दमयन्तीको सूर्य भी स्पर्श नहीं करता था, वह बेचारी आज यह विकट रास्ता कैसे ते करती होगी ? श्रीह। धिक्कार है कूबरको जिसने अपने भाई और भाभीको इस तरह वनवास दे दिया। उसका कभी भला न होगा। उससे भला कितने दिन राज्य चलाया जायेगा ?" इसी प्रकार दमयन्तीका सूखा हुमा चेहरा, थकी हुई देह और फटे-पुराने वस्त्र देखकर पुर-नारियों कह उठती थी, "हाय ! हाय ।। रानी दमयन्तीका यह हाल । शोक !! जब राजा नल जैसे प्रतापी पुरुषको स्त्रीको ऐसी दुर्दशा हुई, तब अन्यान्य साधारण नारियोंकी क्या बात है? भला इस संसारमें J २५ तीसरा परिच्छेद . ~ ऐसा कौन है, जो कभी विपत्तिमें न पठा हो ? 'सबै दिन नाहि बराबर जात' इसी तरहजहाँ कहींके लोग उन्हें पहचान जाते, उनके मैं इसे हाहाकार, शोक और सहानुभूतिसे भरे हुए शब्द निकल ही पडते थे।, कहीं-कहींके लोग तो धन, धान्य, . हाथी, घोडा तथा अन्यान्य आवश्यक सामग्रियों लिये हुए उनके सामने पाते और वह भेंट स्वीकार कर भली भाँति किसी स्थानपर टिके रहनेकी सलाह देते थे , पर 'नल, उनको यह भेंट स्ली- कार कर लेनेको तैयार नहीं होते थे। वे कहने लगते,- "प्यारे भाइयो । पहले भले हो तुम मेरी प्रजा थे, पर अब मेरा तुम्हाराभाईचारका नाता है, क्योंकि यह राज्य अब मेरे छोटे भाई कूबरका है। इसलिये अब मुझे तुम्हारी भेंट लेने- का कोई अधिकार नहीं है। आपको इस भेटमे मुझे यह मालूम कर बडा हर्ष हुआ, कि आपलोग मुझपर इतना प्रेम रखते हैं, पर मैं इस भेटको किसी प्रकार स्वीकार नहीं कर सकता । इसके सिवा मैं धनिय है-अपने भुज-बलसे उपा- जित वस्तुको ही अपने व्यवहारमें लाना मेरा धर्म है। इस समय यदि मैं आपको ये चीजें ले लूँगा, तो यह भिक्षा ही कहलायेगी, इसलिये में इन्हें सादर वापिस किये देता है- आपलोग मुझे क्षमा, करेंगे।" इसी प्रकार सबको मीठे-मीठे वचनोंसे सन्तुष्ट कर वे आगे चल देते थे। बेचारे पुरुषगण, उनको बारें मुन, निरुत्तर हो, -- २४ नल-दमयन्ती . . विपत्ति देख, मनुष्योंकी तो बात ही क्या है, पशु-पक्षियोंके भी कलेजे फटने लगते थे । जब कभी वे लोग धूमते-फिरत हुए किसी बस्तीमें पहुँच जाते, तब उन्हें पहचान कर लोग अनायास कह उठते थे,-"हाय विधाताका यह कैसा कठोर विधान है-कैसी विकट विडम्बना है। राजा नल, जो इस भरतखण्डके आधे भू-भागके अधीश्वर थे, इस दशाको प्राप्त हो रहे हैं, इससे बढकर दुःखकी बात और क्या होगी ? निर्दयो देव ! इन्होंने तुम्हारा क्या बिगाहा था, जो तुमने इनकी ऐसी दया कर दी.यदि यही हालत करनी थी, तो फिर पहले इतना ऐश्वर्य इन्हें क्यों दिया था? पहले सम्पत्तिके सबसे ऊँचे शिखरपर चढ़ाकर, पीछे विपत्तिकी गहरी खाई में डाल देना यह तुम्हारा घोर अन्याय है। शापके भयसे जिस-रानी दमयन्तीको सूर्य भी स्पर्श नहीं करता था, वह बेचारी आज यह विकट रास्ता कैसे से करती होगी ? ओह ! धिक्कार है कूबरको जिसने अपने भाई और भाभीको इस तरह वनवास दे दिया। उसका कभी भला न होगा। उससे भला कितन दिन राज्य चलाया जायेगा !" इसी प्रकार दमयन्तीका सूखा हुआ चेहरा, थकी हुई दे और फटे-पुराने वस्त्र देखकर पुर-नारियों कह उठती थी, "हाय ! हाय ।। रानी दमयन्तीका यह हाल, शोक !! जम राजा नल जैसे प्रतापी पुरुषको स्त्रीको ऐसी दुर्दशा दुई, त भन्यान्य साधारण नारियोंकी क्या बात है? भला इस संसार Y , -- कहलायेगी, इसलिये मैं इन्हें सादर वापिस किये *- तीसरा परिच्छेद ऐसा कौन है, जो कभी विपत्तिमें न पडा हो? 'सबै दिन नादि बराबर जात इसीवरहजहाँ कहींके लोग उन्हें पहचान जाते, उनके मुंहसे हाहाकार, शोक और सहानुभूतिसे भरे हुए शब्द निकमती पडते थे। कही-कहीके लोग तो धन, धान्य, हाथी, घोड़ा सथा- अन्यान्य आवश्यक सामग्रियाँ लिये हुए उनके सामने पाते और वह भेंट स्वीकार कर भली भाँति किसी स्थानपर टिके रहने की सलाह देते थे , पर 'नल, उनकी यह भेंट स्त्री- कार कर लेनको तैयार नहीं होते थे। वे कहने लगी,- "प्यारे भाइयो । पहले भन्ने हो तुम मेरी प्रजा थे, पर अब भंग तुम्हाराभाईचारका नाता है, क्योंकि यह राज्य प्रय भर छोटे भाई कूबरका है। इसलिये अब मुझे तुम्हारी भेंट मेम- का कोई अधिकार नहीं है। आपको इस भेटमे समय मालूम कर बडा हर्ष हुआ, कि आपलोग मुझपर TRIT, प्रेम रखते है , पर मैं इस भेटको किसी प्रकार स्वीकार भी कर सकता । इसके सिवा मै क्षत्रिय इँ अपने भुज में प्रा जित वस्तुको ही अपने व्यवहारमें लाना मेरा धर्म है। समय यदि मैं आपकी ये चीजें ले लें गा, तो या भिमादी - पापलोग मुझे क्षमा करेंगे। इसी प्रकार सबको मीठे-मीठे वचनौसे सारा धनि चल देते थे। बेचारे पुरुषगण, उनको वारेस भितर - ५ नल-दमयन्ती, २८ . - शोक भूल गये हैं। तभी तो वे ऐसे उत्साहके साथ पैर बढाते हुए चले जा रहे है, मानों उनके भागे-आगे चतुर. गिणी सेना चल रही हो।। सच है, जो बल पतिव्रता नारी- में है, वह लाखों चतुरङ्गिणी सेनाओं में भी नहीं हो सकता । जब उनके आंग-भागे स्वय लक्ष्मी स्वरूपिणी दमयन्ती: चल रही है, तब उन्हें रोग, शोक, चिन्ता, दुःख और कष्ट क्यों व्यापने लगे ? स्त्रियोंको स्वामीको विपमें कैसा बत्तीय करना चाहिये इसका उदाहरण रानी दमयन्तीने अपने अनु. करणीय चरित्रसे भली भाँति प्रकट कर दिखाया है।" इसी प्रकार जहाँ-जहाँसे होकर वे दोनों जाने लगते, वहाँ वहाँके लोग उनके दुःखमें सहानुभूति प्रकट करते हुए इसी तरहके उदार विचार प्रकट करने लगते थे। इसी. तरह चलते-चलते वे लोग एक धन जङ्गल में पहुंच गये । उस समय थकी हुई दमयंतीके मुखड़े पर. पसोनेको - बूंदें मोतीको तरह चमकने लगौं। यह देख, नलने सरल भावसे अपने वस्नसे उसका पसीना पोंछ दिया इसी तरह चलते-चलते वह एक जगहथकावट और प्याससे व्याकुल होकर बैठ रही । तब राजा नल. पासके हो एक जलाशयसे पत्तोंकी दोनी बनाकर, उसमें जल भर लाये और दमयतीको,हाथ-मुँह धोकर जन्न - २६ तीसरा परिच्छेद "नाथ। पाप मेरे गुरु, पूज्य और स्वामी है। आप ऐसा काम कदापि न करें ।। कहाँ तो मुझे भापकी सेवा करनी चाहिये, कहाँ पाप हो मेरी सेवा करनेके लिये तैयार है . भाप मेरी सेवा करेंगे, इससे मुझे बडा पाप लगेगा।" दमयंतीकी इन विनय भरी बातोंको सुनकर नल मन मारे रह गये और दोनों पति-पत्रिने थोडी देर वहीं विधाम किया। इसी तरह नब कभी दमयन्तीको भूख लग जाती, तब वे वनमें जाकर उत्तम और खादिष्ट फल, टूटकर ले पाते और दमयन्तीको खिलाते थे। इसी तरह उस वनमें उन्होंने नाना प्रकारके कष्ट उठाते हुए भी पास-पास रहनेके कारण किसी प्रकारका कष्ट नहीं अनुभव किया । क्रमश. सन्ध्याके बाद भयावनी रात्रि आ पहुची। दोनों प्रिया-मिय- तमने वहीं पसीकी शय्या पर शयन किया। दूसरे दिन सवेरे ही उठकर वे फिर आगे बढे और उस वन- को पार कर एक दूसरे वनमें घुसे। यह जङ्गल पहलेवाले जङ्गल- से कही अधिक धना और भयावना था। इसमें वक्षोंको ऐसी सधन श्रेणी थी, कि दिनको भी सूर्यको किरणें उसमें नहीं घुसने पाती थी। और बड़े विकराल विषधर सोका समूह फन फैलाये काट खानेको तैयार दिखलाई देता था इसी समय पूर्व दिशामें सूर्य उदय हो भाया पौर प्रकाश दिखलाई देने लगा। उसी पल्प प्रकाशके . और दमयन्ती उस मालकी राह पार करने लगे।
२४ । "नल-दमयन्ती पर प्राणेश्वर होकर भी उसे छोडकर भागाजाने को तैयार है। हा विधावा । तुम्हारा हेदय इतना कठोर है। तुम इतने 'निर्दय हो? सच पूछो, तो तुमापूरे जड हो। तुम्हारे हृदयमें दया, माया, प्रेम और सहानुभूतिका लेशमात्र भी नहीं है।" । “इस प्रकार विधाताको दोषे-देकर नलने वनदेवताओंको सम्बोधन कर कहा,-"हें वनदेवो मेरी एक बिनती सुनो। विधाता तो निष्ठुर हो हो रहे हैं, पर तुम लोग भी उन्हींको तरह निर्दयान हो जामा मेरी प्राणप्यारी'दमयन्ती पर दया करना । सदा ऐसी ही चेष्टा करना, जिससे दमयन्तीको दुःख होने पाये। जब यह सवेरे सोकर उठे तो इसे घरकी रास्ता बतला देना, जिसमें यह व्यर्थ ही इधर-उधर न भटकतीफिरे ।" यह कहते हुए राजा नल उठ खडे हुए और फिर-फिर कर पछिकी ओर देखते हुऐ आगे निकल चलें। थोड़ी ही देरमें वे उस जङ्गलके बाहर हो गये; परंतरत हो उनके जीमैं कुछ खु-' टका हुआ और वे फिर लौट आये। उन्होंने सोचा, "मैं तो उसे छोडकर चला जा रहा है, पर इस जङ्गलमें बडे भयानक जीवईिसक जन्तु रहते हैं। दमयन्तीकी जान ले लें,तो पाचर्य नहीं। इसलिये उसे इस तरह रातमें अकेली शेडकर जाना ठीक नहीं। जब तक वह सोयो रहे,तब तक मुझे किसी नती-कुञ्जमें छिपकर बैठ रहना चाहिये और उसकी हिंसक जीव-जन्तुसि रक्षा करनी चाहिये । इसके बाद जब प्रातः काल यह सोकर उठेगी, तब जिस रास्ते नाना चाहे, चली जायेगी।
Jovene Boween snoestern Disorderwet-ti ortra tratak- यह कहते हुए राजा नल उठ स्थटे हुए और फिर-दिर का पीले श्री भोर देतो हुए भागे शिकल पाने । (पृष्ठ ३४)
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३५ तीसरा परिच्छेद - छ 4- यही सोचकर राजा नल एक लता-कुंजमें पाकर बैठ गये । इसी समय दमयन्तीको देखकर फिर उन्होंने सोचा,-"ओह! महान् आचर्य है। मेरे जिस अन्तःपुरमें सूर्यको भी पहुंच नही थी, वहाँ अपने जीवनका बहुत बड़ा भाग बिता देने- वाली दमयन्तीको इस प्रकार वनमें अकेली छोडकर भागजाने- को इच्छा करनेवाला पापी नल अब तक इस महापापको अग्नि में जलकर भस्म क्यों नहीं हुआ? इसी तरह दमयन्तीको-देख-देख कर नलके मनमें नाना प्रकारके विचार उठते रहे। इसी तरह सोच विचारमें उन्होंने सारी रात जागते ही बिता दी । क्रमश रात बीत गयी, सवेरा -हुआ। पूर्व दिशामें सूर्य निकल आया । पृथ्वीका वह सधन अन्धकार दूर हो गया , परन्तु नलके हृदय में न ज्ञान-सूर्यका उदय हुआ, न उनका, अज्ञानान्धकार ही मिटा । मानों सूर्यो- दयके भयमे सब स्थानोंसे भाग कर उनके हृदय में ही अन्धकार- ने अड्डा जमा लिया। वे दमयन्तीको वहीं मोयी हुई छोडकर एक ओर चल दिये। वेचारी दमयन्ती अपने प्राणाधारसे बि- छुड गयो और 'सोया सो खोया' वाली कहावतके अनुसार उसने सोकर अपना सबसे बडा अमूल्य रत्न खो दिया । उस समय तक दमयन्ती घोर निद्रामें पडी सो रही थी। उसे सूर्योदय होनेका कुछ भी ज्ञान नहीं । .
* - चौथा पारच्छेद . नलका गुप्त-वास मयन्सीको छोडकर आगे जानेपर नलको एक और बड़ा भारी जङ्गल मिला। उस जंगलमें एक बडा 5 ऊँचा पर्वत भी था। उस पर्वतके वृक्षों में दाग्नि लगी हुई थी, जिसकी ज्वाला चारों ओर फैल रही थी। देखते- ही-देखते सारा जङ्गल दावाग्निसे धधक उठा। जीव-जन्तु, जल-जलकर मरने लगे। उनके प्राण विदीर्ण करनेवाले हाहा- कार और क्रन्दन-खरको सुनकर नलकी छाती फटने लगी। इसी समय उनके कानों में मनुष्यको सी आवाज़ सुनाई दी। यह सुनते ही वे उस शब्दको सोधपर लपके हुए चले गये। पहले तो वे निश्चय नहीं कर सके, कि यह आवाज़ कहाँसे आ रही है, पर पीछे जब उन्होंने चुपचाप खडे हो, कान लगाकर सुना, तो फिर उसी आवाज़में यह कातर-ध्वनि पुन' सुनाई दी,-"हे ईताकु-कुलके भूषण राजा नल ! तुम इसासंसारके दोन-दुखियोंके रक्षक हो-दोन-बन्धु कहलाते हो। मैं इस दावाग्निमें नला जा रहा है-मुझे पा करके बचालो मेरी ३६ चौथा परिच्छेद अभीसे ससारसे विरत हो जानका नाम न लो। जब तुम्हारे व्रत भङ्गीकार करने का समय मा जायेगा, सब मैं स्वयं आकर तमो कह जाऊंगा। मैं उन्हें यह श्रीफल और यह सन्दूकची दिये जाता है। इन दोनों चीज़ोंकी सदा-सब तरहसे-रक्षा जब तुम्हें अपना पूर्वरूप धारण करनेकी इच्छा हो, सब इस श्रीफलको तोडकर इसमें जो दिव्य वस्त्र निकलें, उन्हें पहन लेना। बस तुम पहलेकेसे होजानोगे। फिर इस सन्दूकचीमसे हार, मोती, अंगूठी प्रादि उत्तमोत्तम अलद्वार निकाल कर पहन लेना।" यह कह, वे दोनों चीजें नलके हवाले करते हुए उन्होंने फिर कहा, “बेटा । तुम व्यर्थ में क्यों भटक रहे हो! तुम जहाँ, कहो, वहीं में तुम्हीं पहुंचा दूंगा। यह सुन, नलने उनसे सुसमारपुर आनेको इच्छा प्रकट को। बस उसी समय उस दिव्य पुरुषने उन्हें उस नगरके फाटकपरनाकर उतार दिया। ज्योंही राजाने नगरकी पोर मुँह फेय,, त्योंही नगरके भीतरसे बहुत बडे कोलाहलकी अनि सुनाई दी। -मानों मैकडों, हजारों लोग एकही साथ "दौडो-दौडो-भागो-भागों को प्रावाज़ लगा रहे हों और सारे नगरमें भगदड मची हो, ऐसा मालूम पडा। इतने में हाथी- वोडों और बहुतसे मनुष्योंके दौरधूप करनेकी पावाल भी कानों में पड़ी । - यह सब मुनकर नलने सोचा- भाई! --यह हैलोम भागो-भागो और दौड़ो-दौड़ोको मुकार - नलदमयन्ती . - -- तेरी जातिका सहज स्वभाव है, कि जो तुम्हें दूध पिलाता है, उसे ही तुम लोग काट खाते हो।" यह कहते ही कहते उस भयकर विषधरके विषके प्रभावसे राजा नल कोल-भीलोंकी तरह एकदम काले हो गये और खींचे हुए धनुषको तरह झुक गये उनकी पीठ पर कूबड़ निकल पाया। अपने शरीरको ऐसी हालत हुई देख, नलको अपने जीवनसे ही वैराग्य हो गया और उन्होंने सब कुछ छोडकर धर्म करनेकी हो। मनमें ठान ली। इसी समय जिस मागने उन्हें डंसा था, उसने अपना नाग-रूप त्या गकर, दिव्य मूर्ति धारण कर लिया और नलके सामने प्राकर कहा,-- वेटा नल ! तुम अपने मनमें किस लिये दुःख पा रहे हो? सर्पने तुम्हारी जैसी भलाई की है, वैसी और कौन कर सकता है ? मैं तुम्हारा पिता निषध है। पूर्व जन्म में व्रत अङ्गीकार कर, दुष्कर तप करते हुए: पन्त, अन थन ग्रहण कर मैं ब्रह्म नामक पाँचवें देवलोकमें जाकर देवता हो गया। वहाँ अवधिज्ञाससे तुम्हारे जुएके दुर्व्यसनका हास जानकर मैं नागका रूप धारणकर यहाँ,भायात्रा था। अभी तुमने जो कुछ चमत्कार देखा है, वह सब मेरी मायाके प्रभाव मे ही उत्पन्न हुआ था। तुम यह कदापि नही सोचमा, कि मैंने तुम्हारा पिता होते हुए भी तुम्हें ऐसा कुरूप क्यों बना दिया। इस बदले हुए-रूपमें तुम्हें कोई न पहचान सकेगा और तुम्हें शत्रु पोका जरा भी भय नरहेगा। ममी तुम्हें इस संसारके बहुत कुछ मुख भोगने बाकी है, इसलिये तुम । प चौथा परिच्छेद अभीसे संसारम-विरत हो जानेका नाम न लो । “जब तुम्हारे व्रत अङ्गीकार करने का समय पा जायेगा, तब मैं स्वयं पाकर तुमसे कह जाऊँगा। मैं तुम्हें यह श्रीफल और यह सन्दूकची दिये जाता है। इन दोनों चीजों को सदा-सब तरहसे रक्षा करना। जब तुम्हें अपना पूर्वरूप धारण करनेकी इच्छा हो, तब इस बीफलको तोडकर इसमें से जो दिव्य वस्त्र निकलें, उन्हें,पहन लेना। बस तुम पहलेकेसे होजागोगे। फिर इस सन्दूकचौमसे हार, मोती, अंगूठी आदि उत्तमोत्तम अलङ्कार निकाल कर पहन लेना।" यह कह, वे दोनों चीजें नलके हवाले करते हुए उन्होंने फिर कहा,-"बेटा । तुम व्यर्थ जङ्गल- में क्यों भटक रहे हो! तुम जहाँ कहो, वहीं मैं तुम्हीं पहुंचा दूंगा।" यह सुन, नलने उनसे सुसमारपुर जानकी इच्छा प्रकट की। बस उसी समय उस दिव्य पुरुषने उन्हें उस नगरके फाटकपर लाकर उतार दिया।, व्योंही राजाने नगरको पोर मुँह फेरा, त्योंही नगरके भीतरसे बहुत बड़े कोलाहलकी भनि सुनाई दी। मानों सैकडों हजारों लोग एकही भाथ "दौड़ा-दौडो-भागो-भागो' की भावान लगा रहे हों और सारे नगरमें भगदड मची हो, ऐसा मालूम पहा। इतने में हाथी. घोडों और, बहुतसे मनुष्चोंके दौडधूप करनेकी पावाल भी कानों में पडी। यहासब सुनकर नलने सोचा- भाई!-या, मामला क्या है? लोम भागो-भागो और दौडो दौड़ोकी पुकार A , . । ।
- . नल-दमयन्ती का क्यों मचा रहे हैं। 'इस नगरमें इस समय कौनसा उपद्रव आरी है?" . वे ऐसा सोच ही रहे थे, कि इसी समय पर्वतके समाम ऊँचा हाथी, साक्षात् क्रोधको सो मूर्ति बनाये, दोनों कनपटियोंये, मद गिराता, झूमता-मामता पा पाता दिखाई दिया। उस हाथीका वेग पवनकी तरह किसीके रोके नहीं रुकता था।। रास्तेमें जो मठ, मन्दिर, मकान, खेत, बाग और बगीचे भादि मिलते थे, उन्हें वह अपने पर्वतकेसे भारी शरीरकी टकरसे ढोता चलता था। लोग पीछेसे उसे भाले वर्थियोंसे गोदते, पोलवान बड़े-बड़े अद्भुश लेकर उसके शरीरमें गोद देते , पर वह किसीके रोकनेसे रुकनेवाला नहीं था। वह सबकी दूर भगाता हुआ अपनी इच्छाके अनुसार प्रागे बढता चला जाता था। इसी समय नलने उस हाथोके पीछे-पीछे प्राते हुए राजा दधिपर्णको देखा। हाथीको ईम तरह मतवाला होकर नगर का ध्वंस करते देख, राजा दैधिपर्णने हाथ उठाकर ऊँचे स्वरसे कहा,-"भाइयो । जो'कोई इस मतवाले हाथीका मद उतार कर वशमें ले आयेगा, उसे मैं अपनी समस्त सम्पत्ति दान कर दूंगा।" यह सुनते ही राजा नल उसे पकाने के लिये बड़े जोरसे दौड़े। यह देख, सब लोग बड़े जोर-जोरसे कहने लगे,- “करे भी कूबड़े । 'तू कहां चला जा रहा है। भाग, जल्दी भाग-कहीं तू पागल तो नहीं हो गया है?" यह कह, लोगोंने उन्हें ऐसा दुस्साहसिक कर्म करनेसे भी - चौथा परिच्छेद - हाधीपर पंजा मारनेके लिये दौड पडता है, वैसेही राजा नल भी उस हाथीपर चढ़ दौड़े। सबसे पहले उन्होंने लाठी तान कर उस हाथोसे कहा, "अरे ! क्या तू पागल हो गया है ? इस तरह स्त्रियों और बच्चोंको दुःख देनेसे तुम क्या लाभ होगा? जरा मेरे सामने तो, मैं तेरे स्वागत-सत्कारके लिये खडाहूँ।" यह सुनते ही वह हाथी नलपर टूट पड़ा। यह देखते ही नलने एक पत्थर उठाकर घोरसे उस हाथोकीसूटपर दे मारा। इसके बाद कभी। इधर, कभी उधर, कभी सामने, कभी 'बाँके- तिवें घुमाते हुए उन्होंने उस हाथीको खब हैरान किया। कभी-कभी तो लोगोंको यह आशङ्का होने लगती थी, कि भब- के उस हाथीने नलको धर दबाया, पर जब उन्होंने देखा, कि रोजा नल हर बार उस हाथोको धोखा देकर साफ बचकर । निकल पाते हैं, तब उन्हें बडा पायर्य हुआ । इस प्रकार घंटों- की दौड़-धूपके मारे हाथी हैरान हो गया पौर घबर्राया हुआ घर-सधर भागने लगा। नलने एक बार अपना वस्त्र' उस हाथोकी ओर फेंका, पर ज्योंही यह हाथी उस वस्त्रको पकड- नेके लिये लपका, त्योहोनलने उसे अपनी ओर खींच लिया। दूसरी बार वे जमीनपर लम्बे पड गये ; पर ज्योंही हाथीने उन्हें डसे उठाकर उछाल फेंकना चाहा, त्योंही उठकर भागे और हाथी उनके पीछे-पीछे दौडते दौडते हैरान हो गया, पर वे उसके फन्दे में न पाये। तीसरी बार फिर नलने अपना वसायीकी और फेंका और उसने ज्योंही अपनी"मूह उसे र - नल-दमयन्ती रच क्यों मचा रहे हैं? इस नगरमें इस समय कौनसा उपद्र जारी है 'वे ऐसा सोच ही रहे थे, कि इसी समय पर्वतके समान ऊँ हाथी, साक्षात् क्रोधको सो मूर्ति बनाये, दोनों कनपट्टियों मद गिराता, झूमता-मामता मा पाता दिखाई दिया। हाथीका वेग पवनकी तरह किसीके रोक नहीं रुकवा था रास्ते में जो मठ, मन्दिर, मकान, खेत, बाग और बगीचे पा मिलते थे, उन्हें वह अपने पर्वतकेसे भारी शरीरको रबर टोता चलता था। लोग पीछे उसे भाले वर्थियोंसे गोद पीलवान् बड़े-बड़े अडुश लेकर उसके शरीरम गोद देते , वह किसीके रोकने रकनवाला नहीं था। वह सबको भगाता हुआ अपनी इच्छाके अनुसार भागे बढ़ता चला जार था। इसी समय नलने उस हाथोके पीछे-पौके पाते हुए राज दधिपर्णको देखा। हाथोको इस तरह मतवाला होकर नग का ध्वंस करते देख, राजा दधिपर्णने हाथ उठाकर ऊँचे खर कहा,-"भाइयो जो कोई इस मतवाले हाथोका मंद उता कर वशमें ले पायेगा, उसे मैं अपनी समस्त सम्पत्ति दान के दूंगा। यह सुनते ही राजा नल उसे पकाने के लिये बडे जोर दौडे। यह देख, सब लोग बड़े शोर-लोरसे कहने लगे, “करे'ओ कूबड़े । तू कहाँ चला जा रहा है'? भाग, जल्द भाग-कहीं तू पागल तो नहीं हो गया है ?" यह कह, लोगोन उन्हें ऐसा दुस्साहसिक कर्म करनेसे रोका, तो भी जैसे सिंह - भावीपर पंजा मारनेके सिवेटौड़ पड़ता है, वही राजा नलं भी इस योपर पडदौडे। सबसे पहले उन्होंने नाठी तानं कर इस हायमेवरा-भरे! क्या तू पागल हो गया है? इस तरह स्त्रियों औरषज्ञोकी दुरवदनसे तुमने क्या लाभ होगा। परामिरे सामने तोपा,मेंतरे स्वागत-सत्कारके लिये खडाइ। यह सुनते ही वह हाथो नलपर टूट पड़ा। यह देखते ही मलने एक पत्थर उठाकर घोरसे उस इसके बाद कमी घर, कभी उधर, कमी सामने, कमी बाँक कभी-कभी तोन्नोगौको यह प्रायडाहोने लगती थी, कि पब- निकन्द पाते हैं, तब उन्हें वडा पाराय हुपा । इस प्रकार घंटी- को दौड़-धूपके मारे हाथी हेरान हो गया और घबराया हुषा घर-उधर भागने लगा। नलने एक बार अपना वज उस हाथोकी ओर फेंका, पर ज्यौही वह हाथी उस वनको पकर- के लिये लपका, त्योंही नलने उसे अपनी पोर खींच लिया। दूसरी बार वे जमीनपर लम्बे पड गये, पर वोही झायोने उनले उठाकर उछान फेंकना चाहा, त्योंही धठकर भागे और हाथी उनके पीछे-पीछे दौडने दौडते पर दे उसके फन्दमें न पाये। तीसरी बार फिर वाधीकी ओर फेंका और उसने ज्योती चौधो परिच्छेद. हायोको खब हायोको टपर दे मारा। तिथे समाते हुए उमने उस ईरान किया के उस हाथीने नसको धर दवाया, पर जब उन्होंने देखा, कि কৰা সৰ পৰ ৰাৰ অন্ত ইন্ধ কাধ ৰবন্ধৰ 1 गया, नल-दमयन्ती . " पकडने के लिये बढायो, त्योहो वै. उकलकर उसकी गरदन पर सवार हो गये।, इसी समय पीछेसे पाका राजाके नौव- रोंने उनके -हाथमें अंकुश। और- बन्धन पकडा दिये। अलुशकी लगातार मारसे नलने उस थके हुए हावीको और भी हैरान कर डाला और उसके पैरोंमें, बन्धन डाल दिया। नलकी यह वीरता और चतुरता देख, लोग अचम्भे में आ गये और परस्पर कहने लगे,-"यह कूबडा तो कोई मायावी देवता मालूस पडता , है। इसने इस मतवाले हाथीको देखते-देखते अपने वश कर लिया।" --- - तदनन्तर उसी हाथीपर बैठे हुए राजा नल राजमइसके पास भा पहुंचे। उन्हें इस प्रकार उम हाथीको बकरकी तरह व, लाते,देख, प्रसन्न होकर खिड़की पर बैठे हुए राजान एक उत्तमोत्तम रन्वोंको माला उनके गले में पहना टी । या देख, सब प्रजावर्ग उन्हें धन्यवाद देने लगे और बार-बार करते नलके विजय-गर्वको - सौगुना बढ़ाने लगे। इसके बाद उन्होंने उस हाथोको पोलखाने में लाकर बाँध दिया और तब राजा दधिपर्षसे मिलने के लिये राजदरबार में पाये । उम, समय राजाने बडो प्रसयताके साथ उन्हें उत्तमोत्तम वसालाहर इनाममें दिये और उनका पूर्ण पादर-सत्कार करते हुए उन्हें सदाके लिये अपने पास रख लिया। दूसरे दिन, राजदरवार में सब दरबारियों के साथ-साथ वह बड़ा भी पाकर बैठ रहा । उस समय राजा इधिपने -- - चौथा परिच्छेद उससे कहा,- भाई! तुम कौन हो? तम्हारा माम क्या है ? तुम्हारो जन्मभूमि कहाँ है? तुम्हारे भाई-बंधु कहाँ है और उनके नाम क्या है. मैं तुम्हारी मज-विद्या देखकर चकित हो गया है। क्या तुम इसके - सिवा और कोई विद्या भी जामते हो?" Tr, . * यह सुन, कूबडेने कहा,-"महाराम । मेरो जन्मभूमि कोसलापुरी में है। मेरे परिवारके सब लोग- वहीं रहते हैं। मैं राजा मतको रसोइया। राजाने सुझायोग्य पात्र मानकर वय सब विद्याएँ मुझे सिखला दोघौं । राजा नल पाक-मामें परम प्रवीण हैं। मैं भी उन्हीं की अपाये सब तरहके उत्तम पाक बनाना सीख गया है। हम दोनों के समान पाक-याजमें निपुण मनुल इस संसारमें तीसरा नहीं हाराजा मन्त, अपने भाई कूवर के साथ शुधा खेलने में अपनी सारी सम्पत्ति हार बैठे और अपनी खौको साथ लिये हुए वनमें चले गये । शायद वे मर गये हों, तो कोई पाचर्य नहीं। नलके अहममें चले जाने और कुवरको किसी कलाम प्रवीव न होनक कारब मैंन उनका पार्षय छोड़ दिया और घूमता-फिरता 'यहां पा पहुंचा।" गनल राजाके मरनेवी बात बड़े मुंह सुनकर राजा दपियो बडा भोक पा! वे रोने लगे। इसके बाद उन्होंने मान-विीि अनुसार राजा ननको समय प्रेत- 4 विधाएं दीं। TS पासके किसीमलाशयमें हाथ-पैरथा मुँह धोने गये होंगे, पाया खरसे गूंज रहे हैं। इतने में अकस्मात् एक हाथी वहाँ पाया गिर पड़ी। इसी समय दमयन्तीको नीद, खुल गयी और वह व्याकुल होकर चारों ओर चकित नेवासे देखने लगी। चले गये हैं।, यह देख, उसने भय और घबराहटके साथ न लगा, तब हारकर हथेली पर सिर रखे हुई शोकपूर्ण स्वरम कहने लगी-हाय ! आज देव सोलहो पाने मेरे प्रतिकूल मतवाले हाथो आदि जानवरोंये भरे हुए , इस जालमें मी खामौ मुझे अकेली छोडकर चल दिये। नहीं, नहीं, कदापि मुझे छोडकर अन्यत्र नहीं जा सकते। वे पवन नल-दमयन्ती होनेके बाद दमयन्तीका क्या हाल हुआ, यह मैं नहीं जानता। इसलिये कपाकर मुझे वह सब 'समाचार सुना दो।' यह सुन, उस ब्राणने कहा, कूबड़े ! सुनो। अब गजा नल दमयन्तीको छोड़कर चले गये, तब सवेरा हो चुका था, पर उस समय तक दमयन्तीको नींद नहीं टूटी थी। उसी समय दमयन्तीने सुपना देखा, कि वह फलके भारसे झुके हुए एक प्रामके पेड़पर फल तोडकर खानकी इच्छासे घड़ी हुई है। उस पेड़पर मोर बैठे शोर कर रहे हैं और भौंर मधुर और उस पेडको जड़ से उखाड डाला, जिसमें वह अमीनपर उसने देखा, कि उसके, स्वामी उसे , छोड़कर न जाने कहा उन्हें चारों ओर ढूँढना शुरू किया, पर जब कही उनका पता हो गया । महा भयानक सर्प, शृगाल, सिंह, व्याघ्र, भालू - - " -- . और चौथा परिच्छेद साल निघृणानामलज्जाना, नि सत्वानां दुरात्मना, पी. नलचैव धुरीणत्व, सुप्तां तत्याजयत्प्रियाम् ॥ १॥ सुतामेकाकिनी-स्निग्धा, विश्वस्ता दयितां सतीम् । गत किं न वने त्यक्त-काम एव स भस्मसात् ॥२॥" अर्थात्-इस संसार में जितने निर्दय, निर्लज्ज और उदय-हीन दुष्टत्मा है, उन सबका नल शिरोमणि है। क्योंकि उसने अपनी सोयी हुई स्त्रीको अकेली छोड दिया था । हायर ! जिस समय उस दुष्टने उस प्रेममयी, विश्वासमयी और सती सी- को अकेली सोती छोड कर भागने का विचारा, उसी समय बेहें जलकर खाक क्यों नहीं हो गया। उस ब्राह्मणके मुँहमे ऐसी बात सुनकर नलको पाँखों में भासू भर पाये और उन्होंने गढ़द कण्ठसे उस ब्राह्मणसे कहा, “ोह । कैसा पायर्य है । तुम्हारा स्वर तो बडा ही मधुर र और तुम्हारी बातोंसे करुणा टपकी पडती है, जिससे मैरी आँखों में आंसू भर पाये हैं।'तुम कपाकर यह बतलायो, 'कि तुम कौन हो और कहाँसे आये हो ? नलको ऐसौ दुर्बुडिको बात तुमने कहाँ सुनी? • “बा बनाने में चतुर ब्राह्मणने कहा, "मैं कुण्डिनपुरसे चला आ रहा हूँ। वहीं मैंने 'नलको इस” मूर्खताको बाते सुनी है।" कूबरने कहा, "दमयन्तीको छोडकर राजा, मलके भाग बाने तकवी कथा तो में भी सुन चुका हा पर पतिके वियोग - . " १६ मल-दमयन्ती । - -- होनेके बाद दमयन्तीका क्या हाल हुआ, यह मैंनही जानता। इसलिये रुपाकर मुझे वह सब समाचार सुना दी।" यह सुन, उस ब्राह्मणने कहा, हे कूबड़े । सुनो। जब : गजा नल दमयन्तीको छोड़कर चले गये, तबसवेरा हो चुका था, पर उस समय तक दमयन्तीको नींद नहीं टूटी थी। उसी समय दमयन्तीने सुपना देखा, कि वह फलके भारसे झुके हुए एक प्रामके पेड़पर फेल तोडकर खानकी इच्छासे चढ़ी हुई है। उस पेडपर मोर बेठे शोर कर रहे है और भौंरे मधुर खरसे गूंज रहे हैं। इतनेमें अकस्मात् एक हाथी वहाँ पाया और उस पेडको जड़से उखाड़ डाला, जिसमे, वह ज़मीनपर गिर पड़ी। इसी समय दमयन्तीकी नींद खुल गयी और वह व्याकुल होकर चारों ओर, चकित नेतोंसे देखने लगी। उसने देखा, कि उसके स्वामी उसे छोरकर न जाने कहाँ चले गये हैं। यह देख, उसने भय और घबराहटके साथ चन्हें चारों ओर ढूँढना शुरू किया, पर जब कहीं-उनका पता न लगा, तब हारकर हथेली पर सिर रखे हुई शोकपूर्ण स्वरमै कहने लगी-हाय ! प्राज देव सोलहो पाने मेरे प्रतिकूल हो गया। महा भयानक सर्प, शृगाल, सिंह, व्याघ्र, भालू और मतवाले हाथो आदि जानवरोंये भरे हुए इस जगलमें मेरे स्वामी मुझे अकेली छोडकर चस दिये। नहीं, नहीं, वे कदापि मुझे शेडकर अन्यत्र नहीं जा सकते। वे प्रवाही पासके किसीजनाशयमें हाथ-पैरया में धोने गये होंगे, अथवा ।
चौथापरिच्छेद ? मेरे लिये जलनाने चले गये होंगे. हो सकता है, वहीं किसी विद्याधरीने उन्हें बातों में फंसा रखा हो, अथवा मुझे छकानेके लिये दिशगीसे 'जान-बूझ कर देर कर रहे हो । खैर, उठकर देखू तो सही, कि वे कहाँ अटके हुए हैं। यही सोचकर वह फिर उठी और चारों दिशाओं में उन्हें देंटने लगी, परन्तु उसे मल कहीं दिखाई न दिये। तब तो वह घोर निराशाके मारे ज़ोर-लोग्से रोने लगी। वह कहने लगी,-हा नाथ । हास्वामिन् । ही राजन् ! तुम कहाँ चले गये जल्दी चले भाभो । तुम्हारे वियोगमें मेरा हृदय टुकडे-टुकडे हुा जाता है। बहुत दिलगी अच्छी नहीं होती। कहीं हँसी-ही-दिलगी- में मेरे प्राण न निकल जायें। तुम्हारी दिलगीमें मेरी मौत हो रखी है। चिडियोंकी जान जाये और लडकोंका तमाया हो- ईस कहावतको पूरा न करो। इस प्रकार नाना प्रकारके दोन वचनोको कहती हुई, दमयन्ती चारों ओर रोती फिरी । अबके उसे अपने खपको बात याद आयो। उसने सोचा, कि सचमुच मैं इक्षसे ही नहीं, एकदमः आसमानसे नीचे गिर पंडी । मेरी यह विपत्ति'पाकासे पातालमें गिर पडनेके ही समाम है। अब मेरे प्राणपति इस'जीवनमें मुझे नहीं मिलेंगे। यह बात मनमें आते ही दमयन्ती भूच्छित होकर भूमिमें पही। बड़ी देर बाद मूळ टूटने पर वह फिर रदय-विदारक रोदनकरने लगी। वह कहने लगी,- हामीमहाराज! मैं क्या बोझ 1 H + -- R Meriti- HIT JHNA Hari -- Break हा नापा स्वामिन् । राजन् जल्दी चान पात्रो। तुम कहाँ चले गये, (पृष्ट ४७) चौथा परिच्छेद % मेरे लिये जल लाने चले गये होंगे। हो सकता है, वही किसी विधाधेरीमे उन्हें बातोंमें फंसा रखा हो, अथवा मुझे छकानेके लिये दिलगीसे जान-बूझ कर देर कर रहे हों। खैर, उठकर देखू तो सही, कि वे कहाँ अटके हुए हैं। यही सोचकर वह फिर उठो और चारों दिशाओं में उन्हें ढूँढने लगी, परन्तु । उसे मल कहीं दिखाई न दिये। तब तो वह घोर निराशाके मारे ज़ोर-जोरसे रोने लगी। वह कहने लगी, हा नाथ । हा स्वामिन् ! हा राजन् ! तुम कहाँ चले गये। जल्दी चिले आभी। सुम्हारे वियोगमें मेरा हृदय टुकड़े-टुकेंडे हुओं जाता है। बहुत दिल्लगी अच्छी नहीं होती। कहीं हँसी-ही-दिल्लंगो- में मेरे प्राण न निकल जायें। तुम्हारी दिलंगौम मेरी मौत हो रखी है। चिडियोंकी जान जाये और लडकोंका तमाशा हो- इस कहावतको पूरा न करो। इस प्रकार नाना प्रकारके टीन वचनोको कहती हुई, दमयन्ती चारों ओर रीती फिरी । अबके उसे अपने खप्रकी बात याद आयी। उसने सोचा, कि सचमुच मै वृक्षसे ही मही, 'एकदम पासमानसे नीचे गिर पडी मेरी यह विपत्ति आकाश पातालमें गिर पडनेके ही समान है। अब मेरे प्राणपति इस जीवनमें मुझे नहीं मिलेंगे। यह बात मनमें पाते ही दमयन्ती भूच्छित होकर भूमिमें गिर यही । बडी देर बाद मूळ टूटने पर वह फिर करणापूर्ण स्वरमें उदय विदारकरोदन करने लगी। वह कहने लगी,- "हे नाथा हे स्वामी महाराज! मैं क्या तुम्हारे सिरपर बोझ लादेहुए नल-दमयन्ती थी, जो तुम इस प्रकार घोर वनमें मुझे छोड गये-विवेकी पुरुषोंका यह काम नहीं है, कि पाँच भाइयों के सामने जिसकी बाँह पकड़े, उसे यो जङ्गलमें भटकती छोड दे। हे निषधेय। मुझे इस तरह परित्याग कर देने में तुम्हारा कोई अपराध नहीं है। सब अपराध मेरे खोटे भाग्यका है। जब मेरा दैवही सब तरहसे मेरे प्रतिकूल है, तब तुम क्या करते । मेरा भाग्य खोटा नहीं होता, तो तुम्हारे मनमें ऐसी दुर्बुद्धि ,क्योंकर उत्पन्न होती? इसी तरह विलाप करती हुई दमयन्ती चारों ओर जङ्गलमें भटकने लगी। इसी समय उसकी दृष्टि वस्त्रपर खूनके अक्षरों में लिखे हुए राजा नलके पत्रपर पडी। उस लिखावटको पढ़कर दमयन्ती बड़ी प्रसन्न हुई। उसने सोचा, कि इस पत्रद्वारा मेरे स्वामीने मुझे पीहर या ससुराल चले नानेकी आज्ञा दी है। वह जो सामने बडका पेड दिखाई देता है, उसीकी बगलसे मेरे पिताके यहाँ जानेका रास्ता गया है। बस अब मुझे पिताकेही यहां चला जाना उचित है, क्योंकि पति-विरहिणी स्त्रियोको वापके ही घर में रहना चाहिये । बिना पतिके ससुरालमें रहनेसे पद-पद पर तिरस्कार और लान्छना सहनी पडती है। यह सोचकर दमयन्तीने अपने पिताके नगरः को राह ली। बेचारी अकेली सुकुमार नारी उस जगलमें चलती हुई पद-पद पर ठोकरें खाने लगी। रह-रहकर उसके पैरों में कुश-काँटे गहने लगे। उस बार पतिके साथ जङ्गलमें भाते समय पतिका मुखचन्द्र देख-देख कर यह इन कष्टोंको . ।
चीधा परिच्छेद । बात भी अपने मनमें नहीं पाने देती थी। प्रबके ये कष्ट उसे रह-रह कर पतिको याद दिलाते हुए दुगुना दुःख देने लगे। उसके पैर काँटोंसे छिद गये उनसे लहू बहने लगा। सार गरीर पर धूल छा गई। बिखरे हुए केश कन्धों पर झूलने लगे। इसी तरह वह चञ्चल-नयनी और पति-विरहि सोला, जो किसी दिन राजराजेश्वरकी पत्नी थी, एक साधारण भिला. रिनीकी भांति जंगली रास्तेको ते करने लगी। उस सती नारीको देख, सिंह, व्याघ्र, भालू और सर्प भादि हिंसक जीव- जन्तु दूर भागने लगे।
- पाँचवाँ परिच्छेद सती-प्रताप । तनो कथा सुनाकर वह ब्राह्मण,सुस्तानिके लिये थोड़ी देर चुप हो रहा । उसकी यह चुप्पी नलको बेतरह 64 खटकने लगी। उनका हृदय कौतूहलके मारे बल्लियों उछल रहा था और वे प्रत्येक क्षण यही सोच रहे थे, कि क्योंकर मैं शीघ्रातिशीघ्र इस ब्राह्मणके मुंइसे सारी कथा सुन लूँ । इसी लिये उसे चुप देख, उन्होंने बडी घबराहटके साथ कहा, "हे विप्र । शीघ्र कहो, इस प्रकार नलको ढूँढती और रोती बिलखती हुई दमयन्ती आखिरकार कहाँ जा पहुंची और उसे रास्तेमें किन-किन कठिनाइयोका सामना करना पडा ?" यह सुन, उस ब्राह्मणने फिर करना प्रारम्भ किया, "इस प्रकार उस जगलमें अकेली भटकती हुई दमयन्तीने सोचा, कि यदि इस समय कोई साथी मिल जाये, तो मैं उसके साथ-साथ इस गहन वनको पार कर अपने पिताके पास पहुँच जाऊँ । इसी समय उसने सामनेसे गाडी-घोड़ेके साथ बहुतसे आद. मियोंको भाते देखा। यह देख, उसे बडी प्रसन्नता हुई।
५१ पांचा परिच्छेद - इसी समय उस जन-समुदायमें डसा बनने लगा और लोग यह कह-कह कर चिल्लाने लगे कि जो कोई चोर-डाकू यहाँ छिपा हो, वह भाग जाये, हम लोग. यहाँ सैन्य-सहित आ पहुंचे हैं, पकडे जानेपर फिरखैरियत नहीं होगी।पर इस धमकीकी जरा भी परवा न कर, जङ्गलों में फिरनेवाले डाकुओंने उस वन- समूह पर धावा बोल ही दिया। यह देख, दमयतीने उन्हें बडे लोरसे ललकारा। उसको ललकार सुनते ही चोर वैसे हो.भाग गये, जैसे सिंहनीका- गर्जन सुन कर सारे मृग भाग सडे होते हैं। यह अद्भुत कौतुक देख, उन- वन-रक्षकोंने सोचा, कि यह तो हमारी कुलदेवी ही साचात् उतर-पडी है, तभी तो इन्होंने हमारी इन चोर-डाकुोंसे। इस प्रकार रक्षा की है। यही सोचकर वे लोग दमयतोके पास आकर उसे मायामाकर पूछने लगे,–“हे महिमामयो देवो। तुम कौन हो ? और अकेली इस वनमें किसलिये घूम रही हो ? यह सुना दमयन्तीने उन लोगोंको अपनी सारी रामकहानी सुना 1. एक वो,दमयन्तीने तुरत ही उन लोगोंको, चोर-डाकु- भोसे बचाया था, दूसरे,. उन्हें यह भी मालूम हो गया, कि- वह-राजा नलकेसे उदार- नरपतिकी पत्नी है। इसीनिये थे वही प्रसवताके साथ उसे अपने डेरे में ले गये और-उसे बड़े भादरमे नहला-धुलाकर खिलाया-पिलाया। इसके सिवा, उसके पाराम और जिन-जिन वस्तुओं की भावखकताः यो, उन्हें भी वे से साये और दमयन्ती को देवी की तरह पूजा - नल-दमयन्ती ५२ - । करने लगे। सब लोगोंने उसे माता या बहनकी तरह मानते हुए बडे पादरके साथ उसे अपने पास रखा। इसी तरह दिन बीतते-बीतते वर्षा ऋतु प्रा पहुंची। एक बार तीन दिनों तक लगातार दिन-रात मूसलधार पानी बरसता रहा। धीरे-धीरे सब रास्ते बन्द हो गये।। पानी और कीचडके मारे आदमियों का ही चलना मुश्किल हो गया, फिर घोड़े गाडीको तो बात ही क्या है ? यह देख दम- यतीने सोचा, कि अब तो ये लोग चौमासे भर यहीं रुके रहेंगे-इनके साथ रहकर मैं कदापि अपने पिताके घर न पहुँच सकूँगी। यही सोचकर वह एक दिन रातोरात चुप- चाप निकल भागो। जाते-जाते रास्तेमें एक जगह उसने काले पहाडके समान विकट और भयावने, मेघ और बिजली- का तिरस्कार करनेवाले शरीर और आँखों वाले, मनुथको इट्टियोंकी माला पहने हुए भयङ्कर राक्षसको विकराल मुँह बनाये खडा देखा। दमयन्ती को देखते ही उस राससने कहा,-"अरी । तू कहाँ चली जा रही है ? आ,मुझे बडी भूख लगी है। आज तुझे हो खाकर अपनी भूख वुझाऊँगा।" यह सुन, जरा भी घबराहटमें न पडकर दमयन्तीनेः उस दैत्व से कहा, "पहले तुम मेरी बातें सुन लो। इसके बाद जी सुम्हारे जीमें पाये करना। मैं भरहन्त परमामाको उपासना करने वाली मुझे मरनेका कोई डर नहीं है। पर तुम पारा मेरी एक बात सुन लो। मेरा मन सदा पवित्र रहा है' 1 ।
पांचवा परिच्छेद । भोर मैं निरन्तर पति-देवताके ही स्मरणमें रहती है। इस- लिये तुम्हारी भलाई इसी में है, कि तुम मुझ न कुभो। यदि तुम न मानोगे और ज़बरदस्ती मुझ सती पर-नारीका अङ्ग- स्पर्श करोगे, तो यहीं जल कर राख हो जाओगे।" यह सुनते ही उस राक्षसने कहा,-"देवी। मैं तुम्हारी बातें सुनकर बडा हो प्रसन्न हुआ, इसलिये बतलायो, कि मैं तुम्हारी कौनसी भलाई करूं।" राक्षसको यह बात सुन, दमयन्तीने कहा- “हे राक्षस । यदि तुम मेरे ऊपर प्रसब हो, तो कपाकर यह बतलाओ, कि मुझे फिर अपने प्यारे पतिदेवके दर्शन कब प्राप्त होंगे? यह सुनते ही अवधिनानसे इस भविष्यको बात- का विचार कर राक्षसने कहा,-"जिस दिन तुम्हारे पतिदेव तुम्हें छोडकर गये हैं, उस दिनसे ठीक बारह वर्ष बाद तुम्हारे पिताके घर पर ही तुम्हारे पति तुमसे पा मिलेंगे। इसलिये यदि तुम कहो, तो मैं अभी तुम्हें तुम्हारे पिताके घर पहुंचा हूँ। पतिके फिर दर्शन प्राप्त होंगे यह बात सुनकर दमयंतीके रोएँ रोएँ में प्रसन्नता छागयी। उसने कहा, "भाई तुम जैसे हितैषीके साथ पीहर जानेमें भला किसे मानन्द नहीं होगा? पर मैं तुम्हारे साथ यहाँ न जाकर किसी दूसरे आदमीके ही साथ चली जाऊंगी-तम, जहाँ जी चाहे, प्रानन्दसे नाभो । परमामा तुम्हारा मना करे। तुम्हारी धर्ममें सदा मति बनी रहे। -यह सुन, उस राक्षसने अपना दिग्ध स्वरूप प्रकट कर दमयन्तीको दिखलाया और एक और की राह नापी।
नल-दमयन्ती:- अब तो दमयंतीको इस बातका पूरा निश्चय हो गया, कि बारह वर्ष वाद ही उसके खामी उसमे पा मिलेंगे, इधर नहीं। इसलिये उसने रँगीले वस्त्र, ताम्बूल, नेत्राञ्जन, इतर फुलेल आदि शृंगारकी वस्तुओंका बारह वर्षके लिये परित्याग कर दिया। इस प्रकारका व्रत धारण कर वह भाग चली। जाते-जाते वह सुन्दर खादिष्ट फलोंसे लदे हुए वृक्षोंसे शोभित एक मनोहर गुफाके पास भा पहुंची। 'बरसांसके भयानक प्रकोपके मारे दमयन्तीने उसी गुफामें डेरा डाल दिया और भान्ति जिनेश्वरकी मिट्टीकी प्रतिमा बना, वृक्षों परसे आप-ही- भाप चू पडनेवाले फूलोंसे उसकी पूजा करनी प्रारम्भ को । वह प्रति दिन इसी प्रकार पूजा और ध्यानमें 'अपना समय बिताने लगी। धर्म और ध्यान-रूपी अमृत सागरमें भजन- रूपी मानकर आनन्दमें निमग्न रहनेवाली, चतुर्थादि तपका निरन्तर अनुष्ठान करनेवाग्नी,सक्षोंके फलोंकापारणा करनेवाली, एकान्तमें अपने पूर्व जन्मार्जित पापोंका स्मरण करनेवाली और पंचपरमेष्ठीके नमस्कार मन्त्रोंका निरन्तर'उच्चारण करनेवाली दमयन्ती उसी गुफामें पडो-पडी समय बिताने लगी। इधर वे वन रक्षक दमयन्तीको चारों ओर खोज करने लगे, कि वह एकाएक कहाँ गुम हो गयी? उन्हें इस बातको चिन्ता तरह सताने लगी, कि वह दु.ख में है, या सुखर्म । इसीलिये वे जी-जानसे उसकी खोज करने लगे। खोलत- खोजते उस गुफाके पास पहुँचकर उन्होंने जबदेवा, किदमयन्ती 13shr पाँचवा परिच्छेद वहाँ बैठो हुई 'प्रतिमा-पूजन कर रही है, तब उन्हें बडी प्रस. बता हुई। वे दमयन्तीके पास था, उसे प्रणाम कर चुप- चाप बैठ रहे। पूजा समाप्त होने पर दमयन्तो बडे पाटरके साथ उनसे बातें करने लगी। वनरक्षकोंने पूछा, “देवी । तुम किस देवताको पूजा कर रही हो?" दमयन्तीने कहा, “मैं सोलहवें तीर्थङ्कर श्रोशातिजिनकी * पूजा कर रही है।" इस प्रकार बडी देर तक उन लोगोमें वार्तालाप होता रहा। वातचौतकी आहट पाकर पासके आश्रममें रहनेवाले तापस- गए वहां आ पहुंचे। तदनंतर दमयन्तीने वन-रक्षकोंको अहिंसा आदि धर्मोको उपदेश दिया। उसे सुनकर वेबडे प्रसन्न हुए और दमयन्तीको अपना गुरु मानते हुए, अरहंत धर्म अङ्गीकारकर अपने-अपने घर चले गये। जाते-जाते वन-रक्षकोंके सरदारने कहा, कल्याणों। पहले मैरा नाम वसंत था। आज धर्मको सुगन्ध हारा तुमने मेरा वह नाम सार्थक कर दिया।" इसी ममय पाकाश मेघ गर्जन करने लगे। चारों टि- गांधीमें चञ्चल चपला चमकने लगो और मूसलधार पानी बरसने लगा। उस विकट वर्षाके कारण वही रहनेवाले तप- खियोको वही रहने में बहा कष्ट होने लगा। वे इसी घबराहट में पर गये, कि हम कहाँ जायें और क्या करें। ऋपियोंकी 1 हमारे यहाँसे श्री शान्ति-नाय परित्र मंगाकर सरल, सुन्दर सरस हिन्दीमापामें सोलहवे तीर्थकरके समस्त जन्मोंकी या परकर ज्ञान और धमका लाम उठाइये।
५६ नल-दमयन्ती यह व्याकुलता देख, दमयंतीने कहा, "हे तपखियो। जरा सो न घबरायो।" यह कह, उसने एक लकड़ी उठाकर एक कुण्डकी ओर इशारा करते हुए कहा,-'यदि मैं सती होऊ और कपट रहित होकर भक्तिके साथ प्ररहंतकी पूजा करती होऊँ, वो दृष्टिका सारा जल उसी कुण्डमें पड़े।' सतीका वचन सत्य निकला । सचमुच सब स्थानोंसे हटकर मेघ उसी कुण्ड- में पानी बरसाने लगे। दमयंतीकी यह महिमा देख, सारे सपखो अपने मनमें सोचने लगे,–“यह तो अद्भुत शक्तिशालिनी वन-टेवी मालूम पडती है। साथही दृष्टिको प्रबलताको मती- के वचन सुनते हो कम हो जाते देखकर वे अपने धर्मको प्रबल- साकी निन्दा करने लगे और दमयंतीके बतलाये अनुसार ही धर्मका आचरण करनेको तत्पर हुए। वन-रक्षकोंने उसी स्थान पर एक नगर बसाया और वहाँ जिन-चैत्य तैयार करवा कर उसमें श्रीशांतिनाथको मूर्ति स्थापित की। धर्मका खूब प्रचार हो गया। लोग मन लगाकर भक्ति पूर्वक जिनेवरको पूजा करने लगे। इसके प्रभावसे वहाँ रहने वाले पाँच सौ तपस्वियों- कों सम्यक्दृष्टि प्राप्त हुई। उसी समयसे उस नये नगरका नाम तापसपुर पड गया। इधर-उधरके इनारों प्रादमी वहाँ आकर बस गये। घोड़ेही दिनों में उस नगरमें नीच ऊँच सभी श्रेणीके लोग भर गये। वह नगर सब तरहको समृधियोंसे भरपूर गया। सब लोग अरहत-माषित धर्मका पालन करने लगे। एक दिनकी बात है, कि आधी रात समय पर्वतके शिखर ५७ पांचों परिच्छे - पर सूर्यको ज्योतिको भी लजित करनेवाली एक ज्योति दमयंती ने प्रकट होती देखी। सुरासुर आदि गगन-गामी देव, उस 'क्योतिको देख आवर्य में आकर पाकाशम; उड़ते दिखाई देन लगे। उम लोगोंके कोलाहलसे तापसपुरकी सारी प्रजा जर पड़ी और उस ज्योतिको देख कर बडी विस्मित हुई। उस कौतुकको देखनेके लिये सभी तपस्वी वनवासी और स्वयं दमयती भी वहाँ आ पहुँची। वहाँ पहुँचकर उन्होंने नवीन कोवल-भान प्राप्त करने वाले सिंहकसरी नामक मुनिका महा- ज्योतिर्मय स्वरूप देखा। उन्हें देख, सब लोग उन्हें प्रणाम कर उनके पास बैठ गये। श्रीयशोभद्र सूरि भी उन कैवलीको प्रणाम कर अति प्रसन्नचिससे उनके पास बैठ गये। उस समय सिहकेसरी मुनिने उन सब लोगोंको कर्म-मर्माविध धर्मका उपदेश करते हुए कहा- "हे भव्य जीवो। इस समारमें जीवन, यौवन, लक्ष्मी, वीनों चौ0 बडी ही चञ्चल हैं। यह सदा सब दिन एकसी नही रहती, इसलिये मोहमें पड़े हुए है प्राणियो। तुम इस उत्तम मनुष्य जन्मको व्यर्थ क्यों गा रहे हो ? इस मनुष्य-रूपी कल्प-राषका फल.मुक्ति है । उसको. प्राप्तिके लिये तुम्हें हर तरह तैयार हो जाना चाहिये और मृग-हणाका परित्याग करना चाहिये। इस प्रकार उपदेश देकर केवलीने वहाँ बैठे हुए, तपस्वियोंसे कहा, 'दमयंतीने तुम लोगोंसे जिस धर्मका पाचरण करनेको कहा है, वही सत्य धर्म है। सबके अनुसार दमयंतीको वाणी - .
4 परम पवित्र है। यह परम सतो है। यह कभी असत्य वचन मुंइसे नहीं निकाल सकती। इसलिये तुम लोग इसकी बातोपर पूर्णतयाँ विश्वास रखो, देखो इसने बात-की-बातमें चोर डाकुओंकी टूर भगा दिया, आकाशको दृष्टिको कुण्डमें सोमावड कर दिया और रीछ, व्यानि और मोटिसे भरे हुएँ इस जङ्गलमें पली निर्भय विचरण कर रही है। सतीके सतीत्वका यह प्रभाव देखकर, तुम्हें इसमें उचित शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये।" "केवलोकी यह पानट-दायिनो बात सुनकर तपखियोंके कुलपतिने कहीं,- हे महाराज। पाप मुझे माधुव्रतमें दीक्षित कर दीजिये। सिंहकेसरीने कहा,-"सर्व प्राचार्या में महा बुद्धिमान श्री- यशोंमद्रसूरि ही श्रेष्ट है, इसलिये ये ही तुम्हें श्रमणोंको वत ग्रहण करायेंगे। ये मेरे भी गुरु हैं।" कुलपतिने कहा, "हे भगवन् । अपने इस तरुण वयस- में प्रवन्या क्यो अङ्गीकार कर ली ? इस बात मुझे आश्चर्य 1 - यह सुन सिंहकेसरीन कहाँ, कोसली नीमक नगरीम नल नामके एक राजा थे।' उनको ही स्त्रीको नाम दमयन्ती है। इन दिनों वहाँ नानक छोटे भाई कूबर वहाँ राज्य कर रहे हैं। मैं उन्हींका पुत्र सिंहकेसरी है। शृगापुरीके राजा कसरीकी पुत्री के साथ विवाहकर में अपनी नगरीको घोर लोटा जा रहा था। इस समय इस पर्वतर्क शोभायमान शिखरोंकी ५६ पाँचवाँ परिच्छेद... देखकर मैं यहाँ विधाम करनेके लिये ठहर गयाँ। सौभाग्य- वय, मुझे गुरुवर श्रीयशोभट्र सूरीके दर्शन प्राप्त हुए। इन्होंने मुझे यह देशना सुनाई, कि यह संसार अनित्य है | मैंने इनसे पूछा, कि मैं कितने दिन संसारमैं जीऊँगा। उन्होंने कहा, कि तुम्हारी पायुके कैवल पाँच दिन शेष रह गये हैं। मृत्युकी घडी सिरपर पायो देख, मेरे चेहरेका रङ्ग फीका पड गया। इसी समय सारे मसारके जीवोंपर अत्यंत दया रखने वाले श्री ययोभद्र सूरिंने कहा, कि एक दिनके लिये व्रत ग्रहण करने से भी मनुष्य जन्म मरणके भयमे छूट जाता है, तुम्हारे तो अभीभायुक पांच दिन बाकी है, इसलिये तुम समस्त भेर्य और चिन्ताका स्याग कर व्रत ग्रहण कर लो। गुरुका यह बचन सुनते ही मैंने अपनी बन्धुमती नामक स्त्रीको परत्यिाग कर, गुरुसे पाँचों महाव्रत ग्रहण किये और गुरुसेवाम तत्पर रहते हुए इन्हींकी आभासे रस गिरी-शिखरपर निवासकर कायोत्सर्ग-ध्यान में लीन हो, समस्त घाती कमौका क्षयकर, लोकालोकको प्रकाशित करने वाला यह केवल-शान प्राप्त किया है। 'यह कह, वे फिर ध्यानमें लीन होरहे। तदनंतर मुनीखरने योग-निरोधकर, शेष प्रघाति कौका भी छेदन कर, परम पद ' प्राप्त कर लिया। उनके शरीरका पुण्यवान् देवतामोंने अग्नि संस्कार किया। कुलपति उनके आनानुसार गुरुवर श्रीयशो- भद्रो साधुओंके योग्यं पञ्च महाव्रत प्रेक्षण कर लिये। 'इसी समय दमयंतीने भी उनमें चारिख पहल करेंनेकी ६ नल-दमयन्ती प्रार्थना की । यह सुन, गुरुने कहा,-"तम,चारित्र ग्रहण करना चाहती हो, यह बड़ी अच्छी बात है। पर देवी ! अभी तुम्हें इस संसारके बहुत कुछ मुख भोगने बाकी है, इसलिये तुम्हें अभी दीक्षा नहीं लेनी चाहिये।" यह कह के दमयंतीको उसके पूर्व जन्मको कथा सुनाने लगे। उन्होंने कहा- "पूर्व जम्ममें राजा नल मम्मण नामक राजा थे। तुम्ही उनकी रानी धौं और तुम्हारा नाम वीरमती था। एक समय: की बात है, कि तुम दोनों सेना समेत शिकार खेलने गये। कुछ दूर जाने पर तुम्हें एक मुनि दिखाई दिये। उन्हें सामने मे पाते देख, तुम्हारी सेनाके सिपाहियोंने अपशकुन समझकर उन्हें पानेसे रोक दिया। बेचारे बडी देर तक वहीं खडे रहे । यह देख, तुम्हें दया आयो और तुमने पूछा, कि महाराज पाप कहा जा रहे है तुम्हारे इन विनय भरे बचनोंसे मुनिको सन्तोष तो अवश्य हुआ, पर तुम्हारे सैनिकों ने जो उन्हें बारह घण्टों एक रोक रखा, उसी दोषसे इस जन्म में तुम दोनों पति- पत्रिका बारह वर्षके लिये वियोग हुआ। बारह वर्ष पूरे होने पर तुम दोनोंका फिर मिलाप होगा और तुम्हारे समस्त नष्ट वैभव पुनः प्राप्त होंगे।" - इसी तरह, बासे करते हुए रात बीत गई। प्रातःकाल हो. आया सबके साथ गुरु यशोभट्रसूरि-भी तापसपुरमें आये। वहाँ आकर उन्होंने जिनेम्बरके मन्दिरको प्रतिष्ठा की और सम- स्तनगर वासियोंको शह देशनासुनाई । उसी गुफामें दमयन्तीने - ग्य ६१ पाँचवा परिच्छेद सात वर्ष विवा दिये। तदनन्तर एक दिन उस गुफाकै हार पर पाकर एक पुरुषने अमृतमयी वाणी में दमयन्सीसे कहा,- "हे भट्रे। मैंने तुम्हारे पतिको पासके ही एक स्थानमें देखा है। वह स्थान यहाँसे बहुत दूर नहीं है। मैं उन्हें पहचान लेना चाहता हूँ, पर दूसरा कोई मेरे साथ नहीं है, इसलिये लाचार है। यह कह, वह पुरुष वहाँसे तुरत पीछे लौट चला । उसको कानोंको आनन्द देने वाली बातें सुन, दमः यन्ती जल्दी-जल्दी पैर उठाती हुई उस गुफाके बाहर निकली और उस पुरुषके पीछे-पीछे दौडी। उसने लाख चिल्ला-चिलाकर पुकारा,पर वह पुरुष क्षणभर भी न ठहरो और झपाटेक साथ पागे बढता ही चला गया। इसी समय अन्धाधुन्ध चलती हुई दम- यंतीके पैरों में ठोकर लग गयी और वहज से उखडी हुई लता- की तरह भूमिमें गिर पडी।। इतनेमें वह पुरुष एकबारगी ससको दृष्टिक पर हो गया। थोड़ी देर बाद अपनेको सम्भाल करें दमयंती उठ बैठी और फिर गुफाकी भोरेलौटने लगी, पर रास्ता भूल जानेके कारण वह उस गुफा तक नहीं पहुंच सकी। इस प्रकार दोनों भोरसे निराश हो, वह बडी दुःखित हुई और उम घोर अङ्गालमें इधर उधर भटकने लगी। तब वह लाधार हो माहाकार करती हुई कहने लगी.--"हाय । दुर्देवने मुझे क्या- कवादुख नहीं दिखायेहादेव । तुम्हारा मैंने क्या बिगाहा है, जो तुम इस तरह मुझे पद-पद पर दुःख दे रहे हो ? न तो वह भादमी ही दिखाई देता है, न मेरी गुफा ही नतर पाती नल-दमयन्ती ".. है। श्रद, मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? इस घोर वन में अकेली भटकती हुई मुझ अबलाका क्या झल होगा ?, मेरी कौनसे गति होनी बाकी है। इस दुःखसे तो मर जाना ही अच्छा है प्राण ! तुम इस दुखसे भरे हुए तन-पोञ्जरको छोडकर उन क्यों नहीं जाते,जिससे तुम्ह, सुख तो मिले, इस प्रकार करुणा पूर्ण-वचन बोलती हुई दमयंती व्याकुल होकर रोने लगी। इसके बाद वह फिर चलने लगी, पर रह रहकर उसके पैर रुक जाते और वह पछाड,खाकर जमीन पर गिर पडती और फिर रोने लगती थी। वह इसी तरह घोर दुःखको अवस्था- में पडी हुई भटक रही थी,,कि इतने में, एक राक्षसोने, उसके पास आकर कहाभरी। कहाँ चली जा रही है, उहा, मैं तुझी अभी सफाचट किये,डालली.ई। उसकी यह-भय-दायनी बात सुन दमयंती डरके मारे थर-थर काँपने लगी; पर तरतही उसे ढाटस हो पाया और उसने बड़े जोरसे , कहा, यदि, सिवा नलके मेरे मन में कभी किसी पर पुरुषका ध्यान नहीं पाया हो, भरडत देवको मैं शुद्ध मनसे,मानती-होऊँ मेरे गुरु उत्तम साधु हो और जैन धर्म मेरीअविचल रतिःहो, तो इस राक्ष- सीके सारेमनोरथों पर अभी पाला पड जाये।' दमयंतौके-मुंहसे ये. वचन निकलसे ही उस राक्षसीकी सारी शक्तियाँ होम ही गयों और वह दमयतीको प्रणामकर, वॉस जान लेकर भाग। गयी। सच है, सतीके प्रसापकोसामने कोई नहीं ठहर सकता।
T HREYMETHNE-It: छठा परिच्छेद आश्रय-लाभ। ललने पूछा, हे विमा कहिये, इसके बाद क्या हुआ ? रानी दमयन्तीने उस घोर वनमें भटकती हुई और कौन-कौनसे दुःख उठाये, उस येचारीको क्या कही पात्रय,मिला या नहीं, ६२ नल-दमयन्ती ? है। अब,मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? इस घोर वनमें अकेली भटकती हुई, मुझ अबलाका क्या हाल होगा मेरी कौनसी गति होनी बाकी है ? इस दुःखसे तो, मर जाना ही अच्छा है। प्राण । तुम इस दुःखसे भरे हुए वन-पोझरेको छोडकर उड क्यों नहीं जाते,जिससे तुम्हें, सुख तो मिले," इस प्रकार,करुणा पूर्ण वचन बोलती हुई दमयंती व्याकुल होकर रोने लगी। इसके बाद; वह फिर चलने लगी, पर, रह-रहकर उसके पैर रुक जाते और वह पछाड,खाकर, जमीन पर गिर पड़ती और फिर, रोने लगती थी। वह इसी तरह घोर दुःखको अवस्था- में पड़ी हुई भटक रही थी, कि इततमें, एक राक्षसीने उसके पास आकर कहा, 'अरी, कहाँ चली जा रही है, ठहर, मैं तुम अभी सफाचट किये डालती है।'-उसकी यह-भय-दायनी बात सुन दमयंती डरके मारे थर-थर कांपने लगी; परन्तरतही उसे ढाटस हो पाया और उसने बडे ज़ोरसे कहा, 'यदि, सिवा नलके,मेरे मनमें कभी किसी पर पुरुषका ध्यान नहीं पाया हो भरहंत,देवको मैं शुद्ध मनसे,मानती होऊँ, मेरे गुरु उत्तम साधु हों और जैन धर्ममें मेरी अविचल रति हो, तो इस सच सीके सारेमनोरथों पर अभी पाला पड जाये।' दमयंतीके मुँहसे, ये. यचा निकानसे ही उस राक्षसोको सारी शक्तियां क्षीण हो गयी और वह दमयतोको, प्रणामकर वहासे जान लेकर भाग गयी। सच है, सतीके प्रतापके सामने कोई नहीं ठहर सकता, - - .
RE-RINHHHHHHEI छठा परिच्छेद आश्रय-लाभ। Paलने पूछा, “हे विप्न, कहिये, इसके बाद क्या हुआ ? रानी दमयन्तीने उस घोर वनमें भटकती हुई और 099 कौन-कौनसे दु.ख उठाये ? उस बेचारीको, क्या गति हुई। उसे कहीं भावय मिला या नहीं।' बाह्यगने कहा, "भाई। जब वह भयानक राक्षसी दमयन्ती- के सतीत्वसे शक्तिहीन होकर वहाँसे चली गई, तव दमयन्ती भी वहाँमे आगे बढ़ी। चलते-चलते उसे बडो.प्यास मालूम होने लगी, इसी समय दूर पर मृग-जन्न देखकर उसने सोचा, कि - वहाँ कोई, जलाशय है, पर ज्यों-ज्यों यह प्राग बढती गई, त्यो यह मृग-जन्न भी दूर भागता गया । इस प्रकार दौडती हॉफसी हुई वह जब एक दम हैरान हो, गई, तब आर्त होकर कहने.. लगी,-"यदि मैंने सच्चे मनसे-अपने गीन सतीत्वका पालन किया होगा और मेरी आमा एकवारगो शुद्ध और पवित्र होगी, तो अवश्य हो, अभी यहाँ जल उत्पत्र, हो जायेगा। यह, ६४ नल-दमयन्ती । . कह, उसने बड़े जोरसे पृथ्वी पर पैर पटका। उसका पाद प्रहार होते ही पृथ्वी फाडकर जल निकल पडाबडा मनोहर सरोवर सा पैदा हो गया। दमयन्तीने उसीका मधुर जल पानकर उसमें सान किया और अपनी थकावट तथा प्यास दूर को। थोडी देर तक उसी जलाशयके पास विश्राम कर, वह वहाँसे आगे बढी, परन्तु लगातार चलते रहने से उसके पैर काम नहीं देते घे, इसलिये वह हारकर एक बडके पेडको ठंटो छायामें बैठकर विश्राम करने लगी। इसी समय उस राहसे गुजरते हुए कुछ पथिकोंने उसके पास आकर पूछा, "देवी आप कौन है ? कहाँसे आयी हैं ? कहाँ जायेंगी? इस तर मनमारे, उदास मुँह किये, इस पेड़के नीचे क्यों बैठी हुई है आपका यह अलौकिक रूप देखकर तो यही मालूम होता कि, भाप इस वर्ट-वृक्षपर रहने वाली कोई देवी है। “उन लोगोंको यह बात सुन, दमयन्तीने कहा,-"भाइयो मैं देवी नहीं, तुम्हारी ही तरह हड्डी-चमडेको बनी ए मानवी है। मैं जातिको वणिक-कन्या। अपने स्वामी साथ-साथ पिता के घर चली जाती थी, कि रास्ते में मेरे स्वा मुझे छोडकर न जाने कहाँ चले गये। इसलिये भाइय सपाकर मुभी तापसंपुरको राह दिखना दो, तो बही दया हो पधिकोंने कहा, "यहाँसे पधिमकी और तापसपुर सूर्य भस्त हो रहा है, इसलिये हम आपको वहाँ तक प पान मसमर्थ हैं। यदि आपको कोई आपत्ति न हो,तोहर 4 1 ठा परिच्छेद - - माथ चन्तिये। जहाँ इमलोग रातको रहेंगे, वहीं आप भी सुखसे रात बितायेंगी।" सदनन्तर उन पधिकोंके सरदारने अपने साथियोंसे कहा- "भाइयो! यह कोई महा दुखिया स्त्री मालूम होती है। इसे अपने साथ ले चलना चाहिये।" यह कद, उसने दमयन्तीसे कहा, "वेटी। मैं तुम्हें अपनी वेटोके समान मानता है। इसलिये मेरे साथ चलने में आनाकानी न कगे।" यह कह, उसने दमयन्सोको सवारी पर बैठा लिया और अपने साथ ले जब वे लोग अचलपुरमें भा पहुँचे, तब दमयन्तीके कहनेसे उन्होंने उसे वहीं छोड दिया। थकी-मांदी दम. यन्तीने एक बावलीमें जाकर हाथ पैर धोये और जलपान किया। वहाँसे आकर वह फिर वहौं बैठ रही, जहाँ पधिको- ने उसे सवारीसे नीचे उतारा था। वहाँ बैठी बैठी वह यही सोचने लगी, कि अब में कहाँ जाऊं और क्या करूं? उसकी समझमें कुछ भी न पाया। इसी समय बहुतमी पुर- नारियाँ उस बावलौसे जल लाने के लिये जाती हुई दिखाई पहीं। वे आपसमें राजा ऋतुपर्ण और रानी चन्द्रयशाको बार-बार बहाई करती चली जाती थीं। पुर-नारियाँ दमयन्तीका यार भुवनमोहन-रूप देख, अचम्भेमें पा गयौं। उन्होंने पानी भर कर राजमहलमें लौटने पर रानी पन्द्रयगासे कहा-मा- रानी ! आज इस नगरमें एक पडत रूपवती युवती भायो । यह भकेली चुप-चाप बावलीके रास्तेमें बैठी हुई । उसका पर नल-दमयन्तो वह चन्द्रमासा मुख, कमलसे नेत्र,, अनारकेसे दाग- मृणालको सो वाहु और सुन्दर-सुडौल शरीर देख कर हम स्त्रियोंको भी मोह प्राप्त हुए बिना न रहा। ऐसा मालूम होता है, मानों वर्गमे साक्षात् 'लक्ष्मी ही उतर आयी है" एक बार तो उसे देखकर हमें यही भ्रम हुआ, कि कहीं (पाप को पुत्री) राजकुमारी चन्द्रवती हो तो यहाँ नहीं आयी।" यह अद्भुत बात सनते ही कौतूहलवश रानीने उन्हें तत्काल उस रूपवतीको राजमहल में ले जानेकी आज्ञा दी। रानीका हुक्म पाते ही वे सब दमयन्तीके पास पाकर कहने वा- "हे देवी । तुम्हें अपनी पुत्री मानकर यहाँके राजाको पटरानी चन्द्रयशा देवीने तुम्हें अपने पास बुलाया है। इसलिये तुम अभी हमारे साथ चली और उनमें अपना सेब हाल कह सुनाभो । यहाँ अकेलो क्यों बैठी हो?" यह सुन, दमयन्ती तुरत उठ खडी हुई और उम सियोंकि साथ चलकर थोड़ी ही देर में रानी चन्द्रयशाके पास आ पहुंची एक दूसरीको देखते ही वे, न जाने क्या सोचकर, शङ्का और सन्देहमें पड़ गयी। दमयन्तीको यह'शहा हुई, कि कहीं ये मेरी माता पुष्पदन्ताको बहन चन्द्रयशा होतो नही है। उधर चन्द्रयशाने सोचा, कि कहीं यह मेरो वहन मुमताको पुर्व दमयन्ती तो नहीं है। इस प्रकारका सन्देह मनमें उत्पन हुँ सहो, पर उसका भण्डाफोड नहीं दुनो। रानीने सोचा, वि यभैर्रा कोरा भ्रमही है, क्योंकि मेरी बहनको लडको त - छठा परिच्छेद । बडे मारो राजाके घर व्याही है, उसका ऐसा हाल कैसे होगा? तो भी रानीने दमयन्तीको पातेही गलेसे लगा लिया और दमयन्तीने उसके पैरों पर गिरकर प्रणाम किया। उसे प्रेमसे उठाते और दुबारा छातीसे लगाते हुए रानी चन्द्रदशाने कहा, "वटी। आजसे तू मेरी पुत्री चन्द्रवतीको सहेली बनकर यहींरह। तुम दोनों को मैं एक समान मानूंगी और तुम्हें कोई कष्ट न होने दूंगी। तुम मुझे अपनी रामकहानो कह सुनायो।" यह सुन, दमयन्तीने सच्ची बात छियाते हुए रानीसे भी पही बनावटी कथा कह सुनायो, जो उसने पथिकोंसे कहीथी इसके बाद उसने कहा,-"महारानी! आपकी भोरसे जो प्रति दिन दीन-दुखियोको सदाव्रत बँटता है, उसीका काम मुझे सौंप दीजिये मैं प्रतिदिन अपने हाथों दीन-दुखियोंको सदा- बस बाँटा करूंगी। रानी चन्द्रयथाने उसको यह बात सानन्द स्वीकार कर ली और उसे सदाव्रत बांटनेका हो काम सौंपा। उस दिनसे वह प्रतिदिन सदावत'बाँटने लगी। जहाँ दमयंतोका डेरा था, उसके पास हीराजपथ था। उसी रास्ते एक दिन कुछ राजकर्मचारी एक 'चोरको बाँधकर लिये जाते थे। ज्योंही उस चारको दृष्टि दमयन्तो, पर पडोत्याही वह बडी दीनताके साथ चिल्लाने लगा,-"देवी ! मेरी रक्षा झरी । रक्षा करो।" उसकी यह करणा-भरो वाणी सुनते हो दमयन्सोको उसपर दया आ गयौ । उसने चोरको बाँधकर ले- जाने वाले कर्मचारियोमे पूछा,-"भाइयो इस पादमीने कौनमा - ६८ नल-दमयन्ती अपराध किया है ? उन्होंने कहा,-"इसने राजकुमारी चन्द्रवती- के गहनेको सन्दुकची चुराई है, इसलिये हम लोग इसे वध्यभू मिमें मारने के लिये, लिये जाते हैं। दमयन्तीने कहा,-"तुम अभी इस चोरको छोड दो । जब राजा तुमसे पूछेगे, कि तुमने इसे क्यों नहीं मारा १ तब मैंही तुम्हारे तरफसे उन्हें जवाब दे हूँगी। यह सुनकर भी जब उन गजकर्मचारियोनि उस चोरको नहीं छोड़ा, तबदमयन्तीने कहा, "इस चोरके बन्धन अभी खुल जायें।" इतनी बात उसके मुंहसे निकलते ही उस चोरके बन्धन खुल गये पौर उसने निकल भागनेकी राह देखनी शुरू की, पर यह तमाशा देखकर इतने लोग वहाँ पाइको हुए, कि उसे भागनेकी राह नहीं मिली। राजाको भी इस बातका पता चला । वे भी अपने मन्त्रियों आदिके साथ वहाँ प्रा पहुँच पौर दमयन्तीमे कहने लगे,-"वटी! राजाओंका यह सनातन और शिष्टोंका पालन करें। यदि ऐसा नहीं किया जाये, तोदेशमें बेतरह उपद्रव और उत्यातजार हो जायें, दिन दहाडे चोरी-डकैती होने लगे, प्रजाका नाथ आये और राज्यको सारी व्यवस्था उलट जाये। राजा प्रजासे ३ धन करके रूप में लेता है, उसको प्रजाको रक्षामें हीखर्च करण उचित है। जो राजा ऐसा नहीं करता, उसे बडा पाप होता और उसका समस्त वैभव कुछ ही दिनोमें सुप्त हो जाता है इसलिये यदियह चोर छोड़ दिया जायेगा तो बडाभारी पन्या होगा और इससे लोग निडर होकर चोरी किया करेंगे।" धर्म है, कि दुष्टोंका दमन छठा परिच्छेद ? , दमयन्तीने कहा,-"महाराज । मै पापको बात, मानती है, पर जब यह मरीपाखोंके सामने भागया, तब मै इसे प्रका- ममें ही कैसे मरने दूंगी ? मेरा भईसधर्म पालन करना किस कामका, यदि मैंने इसे मुफ्त फाँसी पडने टिया या घातकके हाथों इसकी गरदन कटमे दी इस प्रकार बडी देर तक राजा और दमयन्तोमें बातें हुई, विपतमें राजाको दमयन्तोके आग्रहके सामने हार मान लेनी पडी और उस चोरको छोड देनेका हुक्म नारी करना पड़ा। सतियों और पतिव्रताओंकी बात बडे-बडे राजा-महाराजौको भी माननो पडतो है। छुटकारा पाने पर वह चोर पाकर दमयतोके पैरों पर गिर पडा और बोला,-"देवी ! भाज पापको कपासे मेरा नया जन्म हुआ। आपके इस दयामय व्यव- हारके कारण मैं पापको अपनी माताके ही समान मानता हूँ। यह कह व आनन्दित चित्तसे अपने घर चला गया और उस दिनसे वह प्रतिदिन पाकर दमयंतीको प्रणाम करने लगा। एक दिन दमयंतीने उससे पूछा,-"तुम कौन हो, यह मुझे ठीक-ठीक बतलाओ।" उसने कहा, "मैं सापसपुरके वसन्त नामक सार्थपतिका दास पिङ्गल हूँ । एक दिन मैं उनके यहाँमकुछ हीरे मोती चुराकर भाग पाया। मार्गमें मेरे अपर भी लुटेरे टूट पड़े और सब कुछ लूट ले गये । दुष्टोको जानको इमेश पाफ़त रहती है। यहाँसे भागा-भागा मैं यहां पाया और राजमहलमें नौकर बहाल हो गया। परसों में अकेला ही राजमइलमें घूम नल-दमयन्ती छ रहा था, दूसरा कोई वहां नहीं था । इसी समय एक जग मोती जडो सन्दूकची देखकर मेरे मुँहमें पानी भर आया भी मै उसे कौख-तले दबाये इये ले चला। इसी समय मुंह देखक भीतरका हाल जान लेने वाले राजाने मुझे देख लिया। उन्हों मुभी सिपाहियोंके सुपुर्द कर उन्हें मुझे मार डालनेका हु दे दिया। इसके बाद किसी तरह मैने आपको देखा। मैं आपने कपाकर मेरी जान बचायो । यह तो आपको मालूम ही है प्रापके इस उपकारको मैं कभी नहीं भूलू गो । मला प्रकार दया वर्षा करनेवाली देवीसे कोई कब उऋण हो सकता है कहीं कोई उस मेघ-मालाके उपकारसे भी मुक्त हुआ है, वर्षाकालमें जल बरसाकर संसार भरके जीवोंके लिये प्रवर प्रबन्ध कर देती है ? देवी। जिस समय आप तापसपरसे चुप चाप चली आयी, उस समय सार्थपतिको इतना शो हुश्रा, कि उन्होंने खाना-पीना छोड दिया। श्रीयशोभद्र सरि उन्हें और अन्यान्य लोगोंने धर्य देकर शान्त किया । सातवें दिन सार्थपतिनं भोजन किया । एक दिन सार्थपति सुवर्णरबादिककी मेंट लिये हुए की ला पुरोके कूवर राजासे मिलने गये। मेंट खोकार कर राजा उनका बडा पादर-सत्कार किया और उनका नाम वस योगेपर रखकर उन्हें छत्र, चामर और दण्डपादि राजधि दिये। इसके बाद कुछ दिन वहाँ रहकर वे तापसपुर सौ पाये और बडे पानन्दसे वहाका राज्य करने लगे। माता अवनखन कराकर मुनि अपने स्थानको चले गये। दमयती कार्योको देखकर उसको बडाई करते और उससे सदा प्रमन को धार्मिकता, दयालुता और सहदयताने थोड़े हीटिनों में बाँ- छठा परिच्छेद यह सब वैभव उन्हें, आपको ही कृपामे प्राप्त हुआ।श्व कपा कहिये, यह पिङ्गल चारित्र ग्रहण करने योग्य है या नहीं? सुनियोंने कहा,-"हां यह चारित्र ग्रहण करनेके लिये सर्वथा , कर पाप मुझे ऐमा उपटेश दें, जिससे मेरे सारे पाप कट * जाये।” यह मुन, दमयन्तीने कहा, “बहुत अच्छा। तुम पारित ग्रहण कर लो।" - दूसरे दिन वहां पर दो मुनि आये। उन्हें शुद्ध पत्र जल 'खिला-पिला कर दमयन्तीने उनसे पूछा,-"महाराज कपाकर . उपयुक्त पाव" , । नब पिङ्गलने उन मुनियोंसे चारित्र ग्रहण करनेको इच्छा भकट की और वे उसे जिनमन्दिरमें ले गये । वहीं उसे प्रवल्या वहीं रहने लगी। मार नगरके लोग उसके पासयंदायक - रहते थे। कोई उससे किसी तरह भसन्तुष्ट नहीं होता था। उस के सब लोगों को उसका हितैषी बना दिया। . - 29 सातवाँ परिच्छेद ফ্লুেওতে दमयंतीका दूसरा स्वयंवर हब्राह्मण फिर कहने लगा, "हे भाई दमयंतीकी करणाभरी कहानी सचमुच बडी विचित्र है। बेचारी गजाको लडकी और राजाकी स्त्री होकर भी ऐसे दुःख भोग रही है, कि देखनेवालोंको भी तरस पाता है। रानी धन्द्रयशाके पास रहते हुए कुछ ही दिन व्यतीत हुए थे, कि एकदिन कुण्डिनपुरसे (दमयन्तीके पोहरमे) एक ब्राह्मण उस नगरमें आया और राजासे मिलनेके बाद महारानीके पास पा उन्हें आशीर्वाद दे, उनके पास ही बैठ रहा। उसका उचित पादर- सत्कार कर रामोने उससे पूछा, "हे महाराज । मेरी बहन, विदर्भनरेशको पटरानी पुष्पदंता अच्छी तरह है न?" हरिमित्र नामक उस ब्राह्मणने कहा, "रानोजी । हमारे राजा और रानी तो अच्छी तरह है, परन्तु इस समय अपनी लडकी और दामादके वनवासी हो जानके कारण वे बड़ी चिंता- में हैं। उन दोनोंको टूटने के लिये जगह-जगह पादमी रवाना 4 साता परिच्छेद किये गये हैं, परन्तु अभी तक तो उनका कहीं पता नहीं लगा।" मार्णके मुंहसे राजा नल और रानी दमयन्तीके एकाएक वनवासी होनेका यहसमाचार सुनकर, रानी चन्द्रयशाको बडा दुख हुपा चौर वे नीचा सिर किये चुपचाप भाँसू बहाने लगीं। कुछ स्वस्थ होकर उन्होंने पूछा, "महाराज! भापने यह कैसासमा- चार सुनाया ? बैटोदमयंती पर एकाएक यई विपद कैसे पायो?" यह सुन, हरिमित्रने कहा, "वहा साप है सारी दुनिया उनका हाल जान गई और भापको अभी तक इसकी बिलकुन्न खबर ही नहीं है। राजा नल अपने भाई कूदरकेसाथ जुपाखेलने 'मैं अपना सारा राज-पाट हार गये और राजधानी छोड़कर बम- वासी हो गये।। बन जाकर उन्होंने दमयन्तीको भी अकेले छोड दिया और पाप न जाने कहाँ चले गये, पाजतक उन दोनोका कही पता नहीं हैं। लोग खोलते-खोजी हैरान ही गये, पर अभी तक इस बातका पता नहीं लगा, कि मल कहां गये और उनसे बिछड कर दमयंती कहाँ गयो भोर या हुई ? यह भी नहीं मालूम कि वह जीती है या मर गई!" “यहा सुनतेही रानीको मागों वम सा पा लगा और दे मूरित होकर भूमिमें गिर पड़ीं। बही-बड़ो मुश्किल मे दासियां इन्हें होश सायौं। तब रानीने घबराये हुए स्वरम, मडो भाकुलतासे पूछा--"माधष देवता । तब क्या' रस उन दोनोका कही पता लगेगा।" - ।
७६ मल दमयन्ती s । हरिमित्रने कहा,-रानोजो। यह मैं कैसे कहूँ? परन्तु अभीतक तो उनका कहीं पता-ठिकाना नहीं है। मैं भी राजा भीमरथका भेजा हुआ उन्हें हो इँटता चलता हूँ। म आने मै कितने जङ्गलों, पहाड़ों, गाँवों और नगरोंको धूल फांक पाया, .. पर कहीं उनका पता नहीं पाया। हाय । मेरा सारा परिश्रम व्यर्थ गया। यह सुन, रानी चन्द्रयशा और भी विलाप करने लगीं। यह खबर थोड़ी ही देरमें सारे राजमहलमें फैल गयी.और अहाँ- तहाँ सब लोग रोने लगे। साथ ही नलको दुर्बुद्धिको भी निन्दा जोरोंके साथ होने लगी। सारे राजमहलमें शोकका साम्राज्य छा गया । इतने में भोजनका समय हो गया । सब लोग खाने- पौनेके प्रबन्ध में लग गये। हरिमित्र भी वहाँसे उठकर धर्म- शालामें भोजन करने गया।" मै पहले कह चुका है, कि इन दिनों धर्मशालाका प्रबन्ध दमयंतोके ही हाथों में था। वही आये हुए अतिथियों को सदाव्रत दिया करती थो। धोंही वह हरिमित्रको भोजन देने प्रायो, त्योंही हरिमिवने उसे पहचान लिया और प्रसनताकमारे एकाएक बोल उठा,-"अहा। भाज कैसे प्रानन्दका दिन है, कि इतने दिनों के परिश्रमके बाद मैने तुम्हें देख लिया। सारे भूमण्डल में लोग तुम्हें ढूँढ़ते फिर रहे हैं, पर कहीं किसोको तुम्हारा पता नहीं लगा और मैंने आज सुम्हें पा लिया। मुझसे बढकर भाग्यवान पोर कौन होगा।" यह कह, वह ब्राह्मण सीधा रानी चन्द्रयशाके पास दौडा .
सातवा परिच्छेद - हुपा चला गया और बड़े हर्षसे कह उठा,-"रानीजो। आपकी जय हो। हमारे मनोरथ पाज सफल हो गये। दमयन्सो तो भापके घरमें ही है। हरिमित्रको यह बात सुनते ही गनौक शोकात्रु प्रानन्दायुमें बदल गये पौर वेदौड़ी हुई धर्मशाला में दमयंतीके पास चली आयीं। वहांपाकर वे दमयन्तीको गलेसे लगाकरगद कण्ठसे कहने लगी,-"हाय ! मैं बडी अभागिन है,जो तुम इतने दिन मेरे ही घर रहीं और मै तुम्हें नहीं • पहचान सको। जितने दिन मैंने तुझे नहीं पहचाना उतने दिन मेरे जीवनके बडे दुर्दिन थे। बेटी! तुमने मुझे बडा धोखा दिया। माकी बहन माकी ही बराबर होती है। उसके प्रागे भला तुम्हें किस बातको लज्जा थी, जो तुम अपनेको 'पाज तक छिपाये रही ? खैर, बेटी। 'अब यह तो बतायो, राजा नलने तुमको परित्याग कर दिया है, पथवा तुमने ही उम- कोशेड दिया है। पतिव्रता स्त्रियाँ तो कदापि अपने स्वामीमे अलग नहीं होती, फिर तुम्हारे जैसी शीलवती और पतिव्रता स्त्रीका पतिको परित्याग करना तो एक वारगो पस- भव है। भला यतलाभो तो सही, तुम्हारा वह सहसांधक समान चमकता हुआ ललाट-तिनक क्या हुआ?" यह सुनतही दमयन्तीने पानी में अपनी अंगतियाँ डुबोकर सलाट पर कर दी जिससे उसी पण इसका ससाट-तिलक ऐसा चमक उठा कि उसकी चमकके भागे सबकी चमक पीवी पड गयो। तदनन्तर रानो चन्द्रवमा दमयंतीका हाथ पकड़े, नल-दमयन्तो उसे महलोंके अन्दर ले गयों और वहां उसे सुगन्धित और शीतलजलसे सान करा, उत्तम वस्त्र पहनाये। इसके सिवा रानी चन्द्रयशाने दमयंतीके लिये सब प्रकारको सुविधा-जनक व्यव- स्थायें करादौं। कुछ देर बाद रानी उसे लिये हुई राजाके पास आयीं और उनको दमयंतीका परिचय दिया । सुनकर राजाको जितना आनन्द हुआ, उससे कहीं अधिक दुःख उसको अवस्था देखकर हुआ। इसके बाद राजाके पूछने पर उसने अपनी पाद्यो पान्त समस्त कथा उन्हें सुमादी। सुनते-सुनसे राजाकी भांखों में पासूभर आये । बडी बडी मुश्किलोंसे अपने मनके वेगको रोक, रूमालसे अपने आँसू पोंछते हुए राजाने कहा, 'बेटी। इस संसारमें कर्मही सबसे बलवान है। इसौके वशमें इस संसार- का सब कुछ है। जगतमें सर्वत्र प्रकाश फैलाकर अन्धकारको दूर करनेवाले सूर्य भी सन्ध्याके समय प्रस्त हो जाते हैं। उनका यो प्रस्त और उदय होना ही कर्मके शुभाशुभ फलका उदा- हरणा प्रकट करता है।" इसी समय सन्ध्या हो आयो, चारों और अन्धेरा छा गया , पर दमयंती राजाके पास ही बैठी थो, इसलिये उसके ललाट- तेजसे वहाँ सूर्यको अपेक्षा भी अधिक प्रकाश फैल रहा था। उसके तेजसे समस्त सभामें दिनका सा प्रकाश फैला हुआ देखकर राजाको बहा पायर्य हुपा उन्होंने कहा, "मोह। यह बड़े भार्यकी बात है, कि रात होने पर भी यहाँ दिनकी तरह उमेसा हो रहा है। यह प्रकाश कहासे पा रहा है?" .
सातवा परिच्छेद - 1 'रानी चन्द्रयगाने कहा,-"महाराज ! यह प्रकाश दम- यतोके ललाटसे निकल रहा है। विदर्भ-राजकन्याके इस सलाट-भूषणकी लीला बडी विचित्र है। "रानीको यह बात सुन, राजाने पिताके समान प्यारसे उसके ललाटपर हाथ फेरा, जिससे तुरत ही सभाम पन्धकार छा गया, पर ज्योंही उन्होंने अपना हाथ इटा लिया, वोही फिर पहलेकी तरह वहाँ प्रकाश फैल गया। इसी समय पाकाश-मार्गसे एक देवता उस दरबारमें उतर पडे और दमयन्तीको प्रणाम कर कहने लगे,-“हे देवी! किसी समय मापने जिस पिङ्गल नामक चोरको मौतके महसे बचाकर - धर्म-शान दिया था, वह घूमता-फिरता फिर तापसपुरमें पहुँच गया। वहाँ वह एक दिन रातको कायोमर्ग-प्रतिमा किये हुए स्मशानमें पडा था। इसी समय उसने देखा कि एक जगह चिता मुलग रही है। क्रमशः उस चिताको : बाला उसके पास भाती मालूम पडी । परन्तु साधु-शिरोमणि पिङ्गन धर्म-ध्यानमें भटल बना रहा। थोड़ी देर में उस पिता की भागने उसे जला दिया और वह समाधिमरण करके देवता हो गया। मैं वही पिङ्गल है। यदि प्रापन मम उस समय यसुके मुंहसे नहीं बचा लिया होता, तो मेरो यह भवसा कैर होती, में देवता कसे होता? उलटे अबतक में किसी भरकमे आकर दुख भोग करता होता। परन्तु पापको अपासे मम दिय देवलोक मास उपा। इसलिये रे देवी! तुम्हारी । - - नल-दमयन्ती सदा जय हो।' यह कह, दमयन्ती पर सात करोड सुवर्ण मुद्राओंको दृष्टि कर, वह देवता तत्काल अन्तर्ध्यान हो गये अन्ति-धर्मका यह साक्षात् चमत्कार देखकर, राजा रतुपर्ण मन में बड़ा भारी आचर्य हुआ। इसके बाद दमयन्सीके पीहरसे जो हरिमित्र नामक ब्राह्मण वहां पाया था, उसने राजासे कहा,-" महाराज दमयन्ती आपके यहाँ बहुत दिनोंतक रह चुकी। इसलिये अब आप इसे अपने माता-पिताके पास जानकी मात्रा दे दें कारण, वे लोग इसके लापता हो जानेका हाल सुनकर बड़े हो दुःखसे दिन बिता रहे है। दिन-रात रोते-रोते इसकी माँ पगली हो रही है।" यह सुन, राजाने रानी चन्द्रयशाको सम्मति लेकर, दम- यन्तीको हरिमित्रके साथ पिताके घर जानेको आजा देन्दी साथ ही राजाने उसके संग जाने के लिये अपने बहुत सैनिकों- को भी हुक्म दे दिया। क्रमशः विहाँसे चल कर वे लोग कुछ दिनों बाद विदर्स-देशमें श्रा'पहुंचे। उनके शुभागमनका समाचार सुनकर, विदर्भराज भीमरथको बडा पानन्द हुमा और वे दौड़े हुए दमयन्तीको दिखने चले पाये। दमयंतीने रथसे नीचे उतर कर उन्हें प्रणाम किया और एक मुद्दत के बाद मिलनेके कारण दोनोंकी अखेिं भर पायीं। इसके बाद राजा भीमरथ बड़े से दमयंतीको अपने महलों में ले माये पौर उसे । रानीसे मिलाया। वर्षोंके वियोगके बाद इस TE- P । एक दिन सुसमारपुरसे राजा दधिपणका भेना हुमा एक सातवा परिच्छेद प्रकार पाकस्मिक संयोग होनेके कारण दोनों माँ बेटी बडी देरतक गले मिल-मिल कर रोती रही। अपनी पुत्रीको दुर्बलता और उसकी दुर्दशाको बातें याद करको रानी पुप्प- 'देता पौर भी व्याकुल हो-होकर रोने लगी। इसी प्रकार प्रेम- की फाँसमें वे दोनों बडी देरतक बँधी रही। तदनंतर राजाने सबका रोना-धोना बन्द करा, इस मिय-मिलनके उप- 'लक्षमें गुरु, और 'देवताको पूजाके लिये खुब धूमधाम और तैयारियों करानी शुरू की। सात दिन तक बडे ठाट-बाटसे विविध प्रकार की पूजायें और उत्सव आदि हुए । "इसके बाद राजाने दमयंतीसे, उसको विपत्तिका व्यौर- वार,हाल पूछा, जिसके उत्तरमें दमयंतीने सब कुछ ज्यों- का त्यों कह सुनाया। सब सुनकर राजाने 'कहा,-"बेटी! "तू कुछ भी चिता न कर। चुप-चाप यहां पडी हुई व्रत-दान "और जप वयमें मन लगाओ। मैं, जैसे होगा वैसे, नलका अवश्य ही पता लगाऊँगा।" यह कद, उसे ढाटस बँधा, राजाने हरिमित्रको दमयतोको यहाँ ले मानेके लिये पाँच सौगांव इनाममें दिये और उसमे यह भी कहा, कि यदि तुम इसी तरह नलका भी पता लगा लाभोगे, तो मैं तुम्हें अपना आधा राज्य दे डालूंगा।" 1 'दूत किसी कार्यके निमित्त राजा भीमरथके पास मा पहुंचा 'यातों ही बातमें नलकी चर्चा उससमक्ष उस जल-दमयन्ती । सदा जय हो।' यह काह, दमयन्ती पर सात करोड सुवर्गा- मुद्राओको दृष्टि कर, वह देवता तत्काल अन्सान हो गये अहन्त-धर्मका यह साक्षात् चमत्कार देखकर, राजा ऋतुपर्ण मनमें बड़ा भारी प्रापर्य हुआ। । इसके बाद दमयन्तीक पीहरसे जी-हरिमित्र नामक ब्राह्मण वहाँ भाया था, उसने राजासे कहा, "हे महाराज दमयन्ती आपके यहाँ बहुत दिनोंतक रह चुकी । इसलिये अब आप इसे अपने माता-पिताके पास जानकी आज्ञा ददें।। कारण, वे लोग इसके लापता हो जानेका हाल। सुनकर ही दुःखसे दिन बिता रहे हैं। दिन-रात रोते-रोते इसकी माँ पगली हो रही है।" यह सुन, राजाने रानी चन्द्रयथाको सम्पति लेकर, दम- यन्तीको इरिमित्रके साथ पिताके धर जानकी पाना देदी। साथ ही राजाने उसके संग जानके लिये अपने बहुत से सैनिकों- को भी हुक्म दे दिया। क्रमशः यहाँसे चल कर वे लोग कुछ 'दिनों बाद विदर्भ-देशमें आपहुंचे। उनके शुभागमनका समाचार सुनकर, विदर्भराज भीमरथको बड़ा आनन्द हुमा और वे दौड हुए दमयन्तीको देखने चले आये। दमयंतीने रथसे नीचे उतर कर उन्हें प्रणाम किया और एक मुद्दतके बाद मिलने के कारण दोनोंकी अखेिं भर आयीं। इसके बाद राजा भीमरथ बड़े हर्षसे दमयतीको अपने महलोंमें लि पाये पौर उसे रानौसे मिलाया। वर्षीक वियोगके बाद इस साता परिच्छेद । s प्रकार पाकस्मिक संयोग होने के कारण दोनों माँ बेटी बडी देरतक गले मिल-मिल कर रोती रहौं। अपनी पुत्रीको दुर्बलता और उसकी दुर्दशाको बातें याद करके रानी पुष्प- दता पौरभी व्याकुल हो-होकर रोने लगी। इसी प्रकार प्रेम- "की फांसमें वे दोनों बडी देरतक,बँधी रहीं। तदनंतर राजाने सबका रोना-धोना बन्द करा, इस प्रिय-मिलनके उप- लक्षमें गुरु और देवताको पूजाके लिये खूब धूमधाम और तियारियों करानी शुरू की। सात दिन तक बडे ठाट-बाटसे विविध प्रकार की पूजायें और उत्सव आदि हुए । इसके बाद राजाने दमयंतीसे उसको विपत्तिका ब्यौर- वार हाल पूछा, जिसके उत्तर में दमयंतीने सब कुछ ज्यों- का त्यो कह सुनायो। सब सुनकर राजाने कहा,-बेटी! तूं कुछ भी चिता न कर चुप-चाप यहाँ पडो हुई व्रत-दान और अप-वपमें मन लगायो। मैं, जैसे होगा वैसे, नलका 'अवश्य ही पता लगाऊँगा।" यह कह, उसे ढाढस बँधा ! राजाने हरिमिनको दमयतोको यहां ले पानेके लिये पांच सौगांव पनाममें दिये और उससे यह भी कहा कि यदि तुम इसी तरह नलका भी पता लगा लानोगे, तो मैं तुम्हें अपना आधारान्य दे डालूंगा!" एक दिन मुममारपुरसे राजा दधिपर्णका मेजा हुआ एक इस किसी कार्यके निमित्त राजा भीमरथके पास भा पहुँचा । बातों ही बातमें मलको पर्चा चल पडी। उस समय उस दूतने . . F .
नल-दमयन्ती ८. " राजामे कहा,-महाराज। इन दिनों महाराजा नलका पुराना रसोइया इमारे राजाके यहां नौकरी कर रहा है। वह सूर्यको किरणोंसे ही सब तरहके पाक तैयार कर लेता है। वह कहता है, कि मैंने यह विद्या स्वयं राजा नलसे ही सीखो है और उन्होंने और भी बहुतसी कलाएँ उसे सिखलायी है।" पास ही खडी-खडी दमयन्तीके कानों में भी दूतको यह वात पडी और आशाको एक पतली रेखा उसके हृदय में खिंच गयो। उससे भव दूर बैठा न रहा गया। वह उसी समय राजाके पास आकर कहने लगी,-"पिताजी! मेरे खामीक समान रसोई तो दुनियाँमें कोई दूसरा नहीं बना सकता। फिर यह दूत किस रसोइये की इतनी बडाई कर रहा है । वह कैसी रसोई बनाता है ? उस रसोइयेका रग-रूप कैसा है ? यह सब बातें आप भली भाँति जांच पूंछ लें। मेरा जी तो यही कहता है, कि खयं राजा नल हो वहाँ वेष बदले हुए रसोइयेका काम कर रहे हैं।" राजाको भी दमयन्तीको यह बात अँच गयो। उन्होंने उसी समय अपने एक नौकरको बुलाकर उसे सब बातें भलो भांति समझाते हुए मुसमारपुर भेज दिया। दमयसोने उसे थे दो शोक सिखला दिये पौर कहा, कि उसी रसोइयेके पास पहुंचकर तुम ये दोनों शोक सुनाना, यदि वे वेश बदसे हुए खयं राजा नल होंगे, नो अवश्य ही यह बात सुनते ही उनकी पांचोंमें सूिभर आयेंगे। कुछ दिनों बाद वह राज-सेवक सातवा परिच्छेद ७ यहाँ भाया और राजाके नये रसोइयेका पता लगाता हुआ एक बडे ही काले-कलूटे और तुम्हारी तरह कूबडे रसोइयेके पास पाकर सोचने लगा, कि भला राजा नल ऐसे ही थे ? 'या राजकुमारीका कोरा भ्रम ही है । भन्ना कहाँ सूर्य और । कहाँ जुगनू । कहाँ कामदेवको भी लज्जित करने वाले सुन्दर- खरूप राजा नल और कहीं यह काला-कलूटा कूबडा ' तो भी उसने प्राशाका अवलम्बन कर दमयन्तीके सिखलाये हुए वे दोनों शोक उस कुत्सित कुरूप रसोइयेको सुनाये। सुनते ही उसकी आँखों में आँसू भर पाये, पर उसने मुंहसे कुछ भी नहीं कहा, इसलिये वह लाचार होकर लौट गया। इस बार राजकुमारी दमयन्तीने फिर मुझे इस ओर भेजा है और मुझे भी वे ही दोनों लोक 'सुनानेको 'पाञा दी है। यही तो राजकुमारी दमयन्तीकी दु.ख कहानी है। प्रयागे उसके भाग्यमें क्या बदा है, यह कौन जानता है ?" उस ब्राह्मणके मुंहसे दमयन्तीको यह समस्त कथा' सुन- कर नल बडे ही आश्चर्यित, दुःखित और मानन्दित हुए। दुख, आश्चर्य और आनन्द-ये तीनों भाव क्रमसे उनके हृदय पर अधिकार करते रहे और इसीलिये कभी तो उनके चेहरे पर उदासी छा जाती, कभी प्राचर्यके मारे उनको स्वभावतः बडी-वडी पाखें और भी बडी हो जाती और कभी वर्षकी इलको शया उनकेविहरेपर झलकने लगती थी। सब सुनकर मलने कहाब्रामण देवता! तुमने मुझे ६ ।
नल दमयन्ती ८२ चित्र कथा सुनायी! अव पात्रो, मेरे डेरेपर चलकर अपनी चरण-रजसे मेरा स्थान पवित्र करो।" यह कह, वे उस ब्राह्मणको अपने स्थानपर ले गये और वहाँ उसका उचित आदर-सत्कार कर, अपनी बनायो दुई सुन्दर रसोई उसे खिलायी। इसके बाद जब वह ब्राह्मण लौट- कर जाने लगा, तब उन्होंने राजासे मिले हुए सब वस्त्रालहार भादि उस ब्राह्मणको दिये। वह सब सामान लिये हुए वई ब्राह्मण कुण्डिनपुरमें चला आया और उसने कूबड़ेसे जितनी बातें हुई थी, वह सब दमयन्तीसे कह सुनायौं। तदनन्तर उसने राजा और रानौसे भी अपने सुसमारपुर जाने और कूब- डेसे मिलनेको सारी बातें कह सुनायौं। साथ ही उसने उस कूबडेके हाथको जैसी सुन्दर-स्वादिष्ट रसोई' खायी थी, उसके अनुपम खादकी भी बार-बार प्रशंसा की। उसने कूबडेसे लाख मुहरें और उत्तमोत्तम वस्त्रालङ्कार बिदाईके समय पाये थे, यह बात भी उसने नहीं छिपायो। सब बातों के साथ उसने यह भी कह डाला कि मैने सुना है, कि उस कूबडेने एक ऐसे मतवाले हाथोको वश कर लिया था, जिसे कोई आदमी वशमें नहीं ला सका था और जोन नगर-भरको हैरान किये हुए था। साथही उसने यह बात भी उन लोगोंको बतलायो, कि उस कूबडे में बडे-बडे गुण है, इसीलिये वहकि राजाका वह परम कृपापात्र हो रहा है। विपके मुंहसे यह सब बातें सुन, दमयन्तीने कहा,-"पिताजी ! मैंने इन विप्रामहोदयको 2 साता परिच्छेद . . ध्यानसे सुनी हैं और उन्हीके आधारपर मैं यह कहनेका साहस करती हूँ, कि वे आपके दामादके सिवा दूसरे कोई व्यक्ति नहीं है। हो सकता है, कि किसी कारण उनकी पीठ पर कूबड निकल पाया हो। पाक-शास्त्र में ऐसी प्रवीणता और । दान करनेकी ऐसी उदारता उनके सिवा त्रिभुवनमें दूसरे किसी मनुष्यमें नहीं है। इसीलिये मैं कहती है, कि वे चाहे इस समय कूबडे भले ही हो गये हों, पर वे आपके जमाईके सिवा और कोई नहीं हैं। आप किसी तरह एक बार उनको यहां बुलवाइये, तो मैं उनकी चितवन और चान्न-ढालमेही पहचान लूगो, कि वे मेरे स्वामी है या नहीं।" राजा भीमरथने कहा- "अच्छा, वेटी तू घबरा मत। मैं उन्हें बुलानेकी चेष्टा करता हूँ। मैं तेरे लिये दुबारा स्वयवर रचानेकी घोषणा करके राजा दधिपर्णको निमन्त्रण भेजता है। यदि वे राजा नल ही होंगे, तो यह अद्भुत बात सुनतेही व्या- कुल होकर यहाँ चले पायेंगे , क्योंकि अपनी स्त्रीको भला कौन किसी दूसरेके पास जाने दे सकता है। उस बार स्वयंवरके अवसर पर राजा दधिपर्ण यहाँ आये हुए थे और उनकी यह हार्दिक अभिलाषा थी, कि तू उन्हें ही वर ले , पर जब तूने सबका तिरस्कारकर राजा नलके गले में वर-माला डाल दो,तब राआ दधिपर्णका भी बहुत ही छोटा हो गया। , इसलिये इस बार फिर स्वयंवर होनेको बाव पायेंगे। मैं अपने दूतमे शीघ्र ही ३ - वि. हुए यहाँ चले '८२ नल दमयन्ती H , + चित्र कथा सुनायो ! अब पात्रो, मेरे डेरेपर चलकर अपनी चरण-रजसे मेरा स्थान पवित्र करो।" यह कह, वे उस ब्रामणको अपने स्थानपर ले गये और वहाँ उसका उचित आदर-सत्कार कर, अपनी बनायी हुई सुन्दर रसोई उसे खिलायी। इसके बाद जब वह ब्राहण लौट- कर जाने लगा, तब उन्होंने राजासे मिले हुए सब वस्त्रालद्धार पादि उस ब्राह्मणको दे दिये। वह सब सामान लिये हुए वई ब्राह्मण कुण्डिनपुरमें चला आया और उसने कूबड़ेसे जितनी बातें हुई थी, वह सब दमयन्तीसे कह, सुनायीं। सदनन्तर उसने राजा और रानौसे भी अपने सुसमारपुर जाने और कूब- डेसे मिलनेको सारी बातें कह सुनायौं। साथ ही उसने उस कूबडेके हाथकी जैसी सुन्दर-स्वादिष्ट रसोई खायी थी, उसके अनुपम खाटको भी बार-बार प्रशसा की। उसने कूबड़ेसे लाख मुहरे और उत्तमोत्तम वस्त्रालद्वार बिदाईके समय पाये थे, यह बात भी उसने नहीं छिपायो। सब बातोंकि साथ उसने यह भी कह डाला, कि मैंने सुना है, कि.उस कूबड़ेने एक ऐसे मतवाने हाथोकी वशमें कर लिया था, जिसे कोई आदमी वशमैं नहीं ला सका था और जो नगर-भरको हैरान किये हुए था। साथ ही उसने यह बात भी उन लोगोंको बतलायो, कि उस कूबड़ेमें बडे-बडे गुण हैं, इसीलिये वहकि राजाका वह परम कृपापात्र हो रहा है। विपके मुंहसे यह सब बातें सुन, दमयन्तीने अपने पितासे कहा,-"पिताजी ! मैंने इन विप्र महोदयकी कुल बातें बडे 1॥ 11 - 4- - 1 सातवा परिच्छेद मन ध्यानसे सुनी और उन्हींके प्राधारपर मैं यह कहनेका साहस करती हूँ, कि वे आपके दामादके सिवा दूसरे कोई व्यक्ति नहीं है। हो सकता है, कि किसी कारण उनकी पीठ पर कूबड निकल पाया हो। पाक-शास्त्र में एसी प्रवीणता और दान करनेकी ऐसी उदारता उनके सिवा त्रिभुवनमें दूसरे किसी मनुष्य नहीं है। इसीलिये मैं कहती है, कि वे चाहे इस । । समय कूबडे भले ही हो गये हों, पर वे आपके जमाईके सिवा और कोई नहीं है। आप किसी तरह एक बार उनको यहाँ बुलवाइये, तो मैं उनकी चितवन और चाल-ढालसेही पहचान लूँगी, कि वे मेरे स्वामी हैं या नहीं। । राजा भीमरथने कहा,-अच्छा, बेटी । तू घबरा मत । मै उन्हें बुलानेकी चेष्टा करता हूँ। मैं तेरे लिये दुबारा ,स्वयंवर रचानको घोषणा करके राजा दधिपर्णको निमन्त्रण भेजता हूँ। 'यदि वे राजा नन्न ही होंगे, तो यह अद्भुत बात सुनतेही ब्या, कुल होकर यहाँ चले आयेंगे, क्योंकि अपनी स्त्रीको भला कौन किसी दूसरेके पास जाने दे सकता है ? :: उस बार स्वयवरके अवसर पर राजा दधिपर्ण यहाँ आये हुए थे और उनकी यह हार्दिक अभिलाषा थी, कि तू उन्हें ही वर ले , पर जब तूने सबका तिरस्कारकर राजा नलके गले में वर-माला डाल दो,तन राजा दंधिपर्णका जो बहुत ही छोटा हो गया। इसलिये इस बार फिर खयवर होनेकी बात सुनते ही वे दौडे हुए यहाँ चले पायेंगे। मैं अपने दूतमे उन्हें कहला भेजूंगा, कि शौना ही . । । - आठवॉ परिच्छेद -- ज -- पुनर्मिलन Re ब उम दूतको गये कई दिन हो गये और राजा दधि- पर्णने कुण्डिनपुर जानेके बारेमें चूं तक नही की। तब तो राजा नल बेतरह घबराये और उन्होंने एक दिन बातो-ही बातमें यह बात भी राजा दधिपर्णके मामने छेड दी। उनकी बातके उत्तरमें राजा दधिपर्णने कहा, "भाई। स्वयंवरको बहुत ही थोडे दिन रह गये है, इसलिये मेरा इतने कम समयमें वहाँ पहुँचना एकबारगी असम्भव है। इसीलिये मैं इस मामले में एकदम चुप हूँ और वहाँ जानेका विचार तक नहीं करता।" यह सुन, कूबड़े नलने कहा,-"महाराज । आप इस तरह हिन्मत क्यों हारते है ? मैं तो आपसे कही चुका है, कि इस ससारमें कोई ऐसी कला नही, जो मेरे खामी राजानलने मुझे नहीं मिखायो हो। फिर मेरे रहते हुए आप इतने नाउ श्रीट यो होते हैं मला मुझसा सेवक पास रहते हुए प्राप - , ८७ आठवा परिच्छेद - । . मा . संसारका कौनसा काम नहीं कर सकते। अभी दमयन्तीके स्वयंवरको छ. पहर बाकी है। यदि आप इतने समयके भीतर विदर्भ-राजनन्दिनीको देखना चाहते हो तो अभी एक तेज घोडी वालो रथ मैंगवाकर मेरे हवाले कीजिये। बस देखिये, में कल तडके ही आपको कुण्डिनपुरमें उतार देता है या नहीं। 'कुबड़ेको यह उत्साह-पूर्ण बात सुन, राजा दधिपर्ण बडे प्रसन्न होकर बोले,-"जामो, तुम मेरी अवशालामें जाकर अपनी पसन्दके मुताबिक घोड़े चुन लो और गाडीखानेमे -जा- कर एक अच्छासा रथ पसन्द कर लायो।" " यह सुनते ही राजा नलने एक 'सुन्दर और मजबूत रथ, । तथा दो उत्तम लक्षणेवाले घोडे पसन्द कर, बात-को-बातमें घोडौंको रथमें जोत कर, राजामे कहा,-'महाराज । अबदेर न कीजिये, शीघ्र ही सवार इजिये, रथ तैयार है।" : ip ।" यह सुनते हो 'राजा रथपर आ सवार हुए। कूबडेने घोडोको रास अपने हाथमें नी। इसके बाद दो चंवर डुला- नेवाले, एक छव उठानवाला और एक नौकर:-ये चार आदमी और उसी रथपर आ बैठे। सबके भली भांति भासन ग्रहण कर लेनेपर नलने बडी गोवतामे घोडोंको हाँक दिया। वे हवासे बातें करते हुए दौड चले । घोडोंको यह गति देख, राजा दधिपणं, बहेडी विस्मित हुए। उन्होंने सोचा,-"यह कूबड़ा बडे ही गलबका आदमी है। वह जिस कस्साको जानता है, उसे - - - 1 । अहुत तीव्र । * . .
मल-दमयन्ती । -- वसुन्धरा अनेक रतौकी खान है। इसमें एक-से-एक बढकर नर-रत्न पड़े हुए हैं।" इधर राजा यही सब सोच रहे थे, उधर तौरकी तरह सनसनाते जाते हुए रथक, ऊपरसे राजा दधिपर्णका दुपट्टा नीचे गिर गया। यह बात राजा दधिप- र्णको तत्काल नहीं मालूम हुई। उन्होंने इस बातको सूचना कूधड को बड़ी देरसे दी। उनकी बात सुन, कूबड-वेशधारी नलने कहा, "महाराज ! आपका दुपट्टा जिस स्थानपर गिरा है, वह यहाँसे पञ्चीस योजन पीछे छूट गया। मैं इस समय घोड़ोंको बडी ही धीमी चालसे लिये जा रहा है, नहीं तो अबतक वह स्थान पचास योजन पीछे पड़ गया होता।" यह बात सुनकर राजा दधिपणं बड़े अचम्भे में पड़े। उन्होंने कहा, "भाई । तुम तो बड़े ही विचित्र सारथो मालूम पडते हो। तुम्हारी यह असाधारण अख-विद्या देखकर मैं विस्मित हो गया हूँ। मेरीतो यही इच्छा होती है, कि तुमसे यह विद्या सोख लूं। इसके बदले में मैं भी तुम्हें अपनी गणित- विद्या सिखला दूंगा। मुझे गणिव-विद्याका ऐसा अच्छा अभ्यास है,कि बात की बात में मैंहतारो-लाखों की गिनती बतला दे सकता है। वह जो सामने पीपलका पेड दिखाई देरहा है, उसपर कितने पत्ते और फल है, यह मैं अभी बतला दे सकता । पर इसकी परीक्षा करनेका भभी समय नहीं है, क्योंकि हमें शीघ्र ही कुण्डिनपुर पहुंचना है। वहाँसे लौटते समय में तुम्हें अपनी विद्याका चमत्कार दिखला दूंगा।" , र आठया परिच्छेद - - 'यह सुनते हो नलने कहा,-"महाराज ! मै इतनी सेजोसे रथ हाँके जा रहा है, तो भी पापको यह सन्देह बना ही हुआ है कि कहीं हम वहाँ दरसे तो नहीं पहुँचेंगे' यदि यह सन्देश पापके मममें हो, तो उसे अभी दिलसे निकाल बाहर कर दीजिये और यह कहिये, कि उस वृक्षपर कितने फल लगे हुए है।" राजाने झटपट उत्तर दिया. इस समय उस पेड पर अठारह इनार फल मौजूट हैं।' यह सुनते ही नलने कहा.-"महाराज । मै अभी आपकी गहनाको परीक्षा करके देखता हूँ,कि आपका कहना कहाँतक ठीक है।" यह कह, उन्होंने रथको रोक दिया और उस वृक्षके पास पा, उसकी जडके पासका धड पकड कर इस जोरसे उस पेटको हिलाया, कि उसपर जितने फल लगे हुये थे, वे सब हरहराकर नीचे गिर पड़े। इसके बाद जब उन्होंने उन फलोंकी गिनती की, तब राजाकी बतलाई हुई गिनती बिलकुल ठोक निकनी। एक भी फल कम या अधिक नहीं निकला। यह देखकर नलको बडा भारी आश्चर्य हुमा और वे राजाकी गणित-विधाका लोहा मान गये। मलने कहा, "महाराजा आपको इस अद गणित विद्याने मुझे अचम्भे में डाल दिया। सचमुच आप इस विद्याके पारगामी प्राचार्य । 'पाकर मुझे यह विद्या इसी समय सिखना दीजिये, तो मैं भी पापको अपनी पख-विद्या सिखुम्ना दूंगा । पाइये, अभी हमारा विद्या विनिमय हो जाये।" 1 नल-दमयन्ता -en७-.., HarekRi80090servD -0-00-orums GmayDoad 4959appORamond Ltd-Giram Diya mocare Moom--..-...-. रे छवाने याते करते हुए दौड चले । घोडोंकी यह अद्भुत तीव्र गति देय, राजा आठवां परिच्छेद • यह सुनते हो नलने कहा,-"महाराज मैं इतनी सेजोसे रथ इंकि जा रहा है, तो भी पापको यह सन्देह बना ही हुआ है कि कहीं हम वहाँ देर तो नहीं पहुंचेंगे। यदि यह सन्देह मापके मन में हो, तो उसे अभी दिलसे निकाल बाहर कर दीजिये और यह कहिये, कि उस वृक्षपर कितने फल लगे हुए हैं।" 'राजाने झटपट उत्तर दिया,- इस समय उस पेड पर अठारह हसार फल मौजूट हैं।" . यह सुनते ही नलने कहा.-"महाराज मै अभी आपको गणनाकी परीक्षा करके देखता हूँ कि आपका कहना कहाँतक ठीक है।" यह कह, उन्होंने रथको रोक दिया और उस वृक्षक पास पा, उसकी जडके पासका धड पकड कर इस जोरसे उस पेडको हिलाया, कि उसपर जितने फल लगे हुये थे, वे सब इरहराकर नीचे गिर पडे। इसके बाद जब उन्होंने उन फलोंकी गिनती की, तब राजाकी बतलाई हुई गिनती बिलकुल एक भी फल कम या अधिक नहीं निकला। यह देखकरनलको बडा भारी प्राश्चर्य हुपा और राजाको गणित-विद्याका लोहा मान गये। न 'नलने कहा,-"महाराज। भापको इस अद्भुद गणित विद्याने मुझे अचम्भे में डाल दिया। सचमुच भाप इस विद्याके पारगामी प्राचार्य है। "कपाकर मुझे यह विद्या इसी समय मिला दीजिये, तो मैं भी पापकों अपनी अख-विद्या सिखला दूंगा। आइये, भभी ठोक निकली। ५ नल-दमयन्ती ६४ - अवतक अन्यान्य राजा-राजकुमार भो अवश्य हो आये होते। राजा इसी सोच विचारमें पड़े हुए मन-ही-मन कुछ क्रोधित कुछ शक्ति और कुछ चकित हो रहे थे। इधर राजा भीमरथने जब दमयन्तीमें पाकर कूबड़ेका दिया हुमा उत्तर कह सुनाया, तब उसने कहा, "पिताजी। बस अब तो एक ही वातको परीक्षा करनी और बाकी है। पाप मुझे उस व्यक्तिक पास ले चलिये और उसको मेरी देह- का कोई अड्स स्पर्थ करनेकी प्राज्ञा दीजिये। ऐसा करने पर यदि आप-से-आप मेरे सारे प्रङ्ग सिहर उठे और. पुलका- वली छा जाये, तो आप समझ लेंगे, कि वह मेरे पतिके सिवा और कोई नहीं है।" • यह सुन, राजा भीमरथ दमयन्तीको लिये हुए पुन' वही श्रा पहुंचे, जहाँ राजा दधिपर्ण और कूबडे में इस अद्भुत स्वय- वरक ढोगको चर्चा ' छिडी हुई थी । वहाँ आते ही राजा भीमरथने गजा दधिपर्णसे कहा, कि आप कपाकर अपने इस अद्भुत सेवकको मेरी पुत्रीको दाहिनी भुजा अपनी अगलीमे स्पर्श करनेकी । आना दीजिये। राजा दधिपर्णने वैसा ही किया। उनकी आज्ञाके अनुसार कूबडेने दमयन्तीके दाहिने हाथको अपनी अंगुलीम छ दिया। छूते ही दमयन्तीके सारे + - (() . :०००००००००००००००००. 6.००००००००००००००००००..61 ko ar 304 "पाथ पय यधिक माहगे। भय थापको पहचान गयी। यय भला साप पति" (पृष्ठ ६४)
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आठवा परिच्छेद - यह कह, उसने कूबडेका हाथ बड़े जोरसे थाम लिया और बल-पूर्वक उसे पकड कर अपने साथ ले चलो। भव तो सबको इस बातका निश्चय हो गया, कि यह कूबडा और कोई नहीं, स्वयं राजा नन्न है। इस काली-कुसित और कूबडी काया अन्दर उन्ही निषध-नरेशको महान् प्रामा छिपी हुई है। यह देख, सब लोग मारे आनन्दके अधीर हो गये। राजा भीमरयके.आनन्दको तो कोई सीमा ही न रही। कन्या और जामाताके पुन एक साथ मिल जानेका समाचार पाकर दम- यन्तीकी माताको जो हप हुआ, वह वर्णनसे बाहर है। थोडी ही देर में यह शुभ सवाद सारे नगर में फैल गया। इसके बाद दमयन्ती अपने काले-कूपडे स्वामीको साथ लिये हुई ,अपने महलोंमें चली भायो । उसने उनके इस बदते हुए एणित रूपको देखकर तनिक भी उदासी या अप्रसन्नता नहीं प्रकट की, क्योंकि वह पतिव्रताओंको इस नीतिको भली भांति जानती थी, कि- "वृद्ध रोगवश जड धनहीना। अन्ध बधिर क्रोधी अति दीना ॥ ऐसेहु पतिकर किय अपमाना । नारि पाव यमपुर दुख नाना ॥" दमयंती सच्ची पतिव्रता थो । खामी रोगो हो, मोधी हो, दोन हो, दुखिया हो, अधा हो, बहरा हो, लंगडा हो, लूला हो, कुबरा हो, काना हो, पर वही हमारा सर्वस्व है र - । ܚܙ . - " > आठयों परिच्छेद राजा - 4 यह कह, उसने कूबड़ेका हाथ बड़े जोरसे थाम लिया और बल पूर्वक उसे पकड कर अपने साथ ले चलो। अब तो सबको इस बातका निश्चय हो गया, कि यह कूबडा और कोई नही, स्वयं राजा नल है। इस काली-कुत्सित और कूबडी काया" अन्दर उन्ही निषध-नरेशको महान् आमा छिपी हुई है। यह देख, सब लोग मारे अानन्दके अधीर हो गये। भीमरयके आनन्दको तो कोई सीमा ही न रही। कन्या और जामाताके पुन एक साथ मिल जानेका समाचार पाकर दम यन्तीकी माताको जो इर्ष हुआ, वह वर्णनसे बाहर है। थोडी ही देर में यह शुभ सवाद सारे नगरमे फैल गया।' इसके बाद दमयन्ती अपने काले-कूधडे स्वामीको साथ लिये हुई अपने महलों में चली आयौ । उसने उनके इस बदले हुए णित रूपको देखकर तनिक भी उदासी या अप्रसन्नता नहीं प्रकट की, क्योंकि वह पतिव्रताओंकी इस' नीतिको भली भांति जानती थी, कि-- । "वृद्ध रोगवश जड धनहीना। अग्ध बधिर क्रोधी अति दीना। ऐसेहु पतिकर किय अपमाना। नारि पाव यमपुर दुख नाना ॥" " दमयंतो सची पतिव्रता थी। स्वामी रोगो हो, क्रोधी हो, दोन हो, दुखिया हो, अधा हो, बहरा हो, लंगडा हो, मूला हो, कबरा हो, काना हो, पर वही इमारा सर्वख है। - । --
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आठवा परिच्छेद यह कह, उसने कूबडेका हाथ बड़े पोरसे थाम लिया और बल पूर्वक उसे पकड कर अपने साथ ले चलो। अब तो सबको इस बातका निश्चय हो गया, कि यह कूबडा और कोई नहीं, स्वयं राजा नल हैं। इस काली कुसित और कूबड़ी काया" अन्दर उन्हीं निषध-नरेशको महान् आत्मा छिपी हुई है। यह देख, सब लोग मारे आनन्दके अधीर हो गये। राजा भीमरपके पानन्दकी तो कोई सीमा ही न रही। कन्या और जामाताके पुन एक साथ मिल जानेका समाचार 'पाकर दम. यम्सोको माताको जो हर्ष हुआ, वह वर्णनसे बाहर है। थोड़ी ही देरमें यह शुभ मवाद सारे नगरमे फैल गया। इसके बाद दमयन्ती अपने काले-कूपडे स्वामीको साथ लिये,हुई अपने महलों में चलो भायो । उसने उनके इस बदले हुए एणित रूपको देखकर तनिक भी उदासी या अप्रसनता नहीं प्रकट की, क्योंकि वह पतिव्रताओंको इस नीतिको भली भांति जानती थी, कि- "वृद्ध रोगवश जड धनहीना। अग्ध पधिर क्रोधी अति दोना । ऐसे पतिकर किय अपमाना। नारि पाव यमपुर दुख नाना ॥" दमयतो सची पतिव्रता यो । खामी रोगी हो, सीधी हो, दोन हो, दुखिया हो, अधा हो, बहरा हो, संगडा हो, लम्ता हो, कबरा हो, काना हो, पर वही हमारा सर्वस 1 1 । - + - नल-दमयन्ती , है यही उसकी विमल धारणा थी । इसीलिये उसने नलके कुबडे-कुत्सित रूपमें भो अपने हृदयेश्वरके उसी राजराजेश्वर- रूपको देखा, जो सदा मोते-जागते, उठते-बैठते, घर-बाहर, सब समय और सब जगह उसकी आँखोंके सामने 'धूमता रहता था। एकानमें आते हो ओखमें प्राँसू ला, गहट, बचनसे दमय- न्तोने कहा, "नाथ । किस अपराधपर आपने दासोको इतने दिन वियोगका दण्ड दिया ? अपने जानते तो मैंने मन-वचन और कर्मसे को ऐसा अपराध नही किया था।" अब तो नलसे नहीं रहा गया । उनकी आँखें भी पिछली बातें याद कर भर आयीं। अपने किये हुए दमयंती- त्याग रूपी कुकर्मको यादकर उनका कलेजा मुँहको आने लगा। प्राणोंके परदे-परटेमें एक ही साथ सौ- सौ बिच्छू डंक मारने लगे। उन्होंने दमयन्तोको बावका कुछ भी उत्तर न दे, केवल अपनी आँखों में छाये हुए अशु-जलसे ही अपने मनोभावका उसे परिचय दे दिया और उसी समय नागके दिये हुए थीफल और सन्टूकचोसे वस्त्राभूषण निकाल- कर अगों में धारण कर लिये। उन वस्त्राभूषणको धारण करते हुए नलका रूप पूर्ववत् हो गया। वही रूप, वही यौवन, यही श्री फिर लौट आयो । मानों उस कूबडे-कुरूपको 'दमयन्ती देवीके दर्शनोंसे देवरव प्राप्त हो गया । नलका इस प्रकार रूप- परिवर्तन होते हो बारह वर्षीक विरइसे व्याकुल दमयन्ती 1 44 नल दमयन्तो. NO सपहार राजाकोभेट किये। उसने दमयन्तीको पहचानकर, उसके किये हुए पूर्व उपकारोंको सारण कर उसे भी बहुतसी चीजें भेटमें दीः -- "। तदनन्तर दमयन्तीने दृत भेजकर राजा ऋतुपर्ण, रानी चन्द्रायगा और राजकुमारी चन्द्रवतीको भी वहीं बुलवा लिया। वह वसन्त-श्रोशेखरको भी नहीं भूली। उसने उसे भी बुल- वाया।।। बडो धूमधामसे इन अतिथियोंका आदर-सत्कार किया गया । सब लोग एक महीने तक वहाँ रह गये और सार नगरमें इस मधुर मिलनको खुशीमें महीने भरतक भानन्द-उत्सव हुआ किये। देखते-देखते महीने भरका समय एक क्षणके समान व्यतीत हो गया । सच है खुशोक दिन बीतते देर नहीं लगती।
-- , 11 12 GANE Evere उपसंहार इक दिन राजा भीमरथ राजसभा में बैठे हुए थे। समस्त मन्त्री पारिषद और शूर-सामन्त भी अपने- अपने योग्य स्थानोंपर बैठे हुए थे। इसी समय आकाश-मार्गमे उतरकर एक देवता वहाँ'भा पहुँचा पौी उच्च स्वरसे कहने लगा,-"देवी दमयन्ती। याद करो, 'तुमने तापसपुरमें जिन'तपखियों के मुखियाको प्रतिबोध देकर शुभी- दय' करनेवाला चारित्र ग्रहण कराया 'था, मैं वही हूँ और उपतपके प्रभावसे सौधर्म-देवलोकमैं जा, अमृत श्रीकेसर 'नामक देवता हो गया है। तुमने मिथ्या धर्म छुडाकर मुझे अरि- इन्स परमामाके में प्रवृत्त कराया, इससे मुझे यह दिव्य फत प्राप्त हुआ है। इसलिये हे सती में तुम्हारा बडा सतन हैं और उदयसे तम्हें बार-बार धन्यवाद देता हूं।" यह कह, उस देवताने सात करोड़ मुहरोंकी 'हष्टिको और झटपट वामप्रस्थान किया। इसके बाद बसन्त श्री बल-दमयन्ती - ~ है -- शेखर, दधिपर्या, रतुपर्ण,भौमरथ और अन्यान्य राजा-महाराजों तथा मन्त्रा-सामंतोंने मिलकर नलका वहीं राज्याभिषेक किया। इसके बाद सभी सामंत,रामाभोंने अपने-अपने नग- से अपनी-अपनी सेनाएँ कुगिहनपुरमें बुलवा मँगवायौँ। ज्योतिषियों के बतलाये हुए शुभ मुहूर्तमें इन सब सेना- ओंके साथ राजा नलने कोसलापुरीको यात्रा को । क्रमश यह सारी सेना भयोध्याके वनों में भा पहुँची । इसी समय राजा यूबरको खबर मिलो, कि बहुत बडौ सेना निये हुए राजा नल यहाँ चढ़ आये हैं। यह खबर पाते ही कूबरके तो देवता कूच कर गये-भयके मारे उनके प्राण कांप गये । मेनाका यथास्थान , पडाव, डालकर राजा नलने एक दूतसे कूबरको कहला भेजा, कि यदि तुम इस बार जुआ खेलकर मुझे हरा दो, तो मेरी वर्तमान सम्पत्ति भी ,तुम्हारे हाथ, लग जायेगी, नहीं तो तुम्हें मेरी पहली सम्पत्ति वापिस कर देनी होगी। यह सन्देसा सुन, कूवरका प्राणभय दूर हो गया और वे फिर जुआ खेलने लिये गजा नलके पास आये। इस बार राजा दधिपर्णको सिखलायी हुई विचित्र गणित-विद्याके प्रभा- वसे राजा नलने कूबरसे सारी राज्य-सम्पत्ति छीन ली । मच • है, भाग्य सीधा पोनेपर बिगडी बात भी बन जाती है। पपमा नष्ट राज्य हाथ में पाकर राना नलने सारे राज्य में अपने नामको धोंडो फिरवा दो । साथ ही कूबरको, उसके । . 4 - ००००००००००००००००००००० ०.०७०००००००० - .. "यह चाहे भला हो या पुरा, पर है तो अपना सगा भाई ही, इसलिये मुझे इसे माफ कर देना ही उचित है।" (पृष्ठ १०१) मोठया परिच्छेद । पूर्वखत समस्त अपराधधमाकर, फिर पहले हीको-तरहा युव- राज बना दिया। उन्होंने सोचा,-"यह चाहे भला होया बुरा, पर है तो अपना सगा भाई ही, इसलिये मुझे इसे माफ कर देना ही उचित है। राजा मलको त्यह अद्भुत उदारता, दयालुता और क्षमा- भोलता देख, सब लोग उनकी बार-बार प्रशंसा करने लगे। कूबरको भी अपने पूर्ववत अविनयके लिये घोर पश्चात्ताप हुधा और वे रो-रोकर बार-बार उनसे क्षमा मांगने लगे। राजा नल औरादमयन्तीने उन्हें" पूरी तौरसे क्षमा प्रदान कर सन्तुष्ट कर दिया और सब लोगोंको इस बातको चेतावनी दे दो..कि, कोई कूबरको पुरानी बातोंकी चर्चा न चलाये। पतिप्राप्पा -दमयन्तीके, मतीत्व, और- पतिव्रतके प्रभावसे राजा नलका गया हुआ समस्त वैभव लौट आया,और वे फिर प्रबल प्रताप के साथ राज्य शासन करने लगे। देश-देशके राजा प्रोने भाकर उन्हें उत्तमोत्तम उपहार दिये और उनका कुशल समाचार पूछ, उनके बम-वास आदिको कथाएँ सुन, उनके पुन. भाग्योदय होनेपर-उन्हें बार-बार बधाई दी और हार्दिक पर्ष प्रकट किया क्रममे राजा नलको कितने ही बालबचे हुए और उन्होंने एहसाबमके सब सुख-मन्ती भांति भोग किये। इस प्रकार रामानसने इचार वर्ष तक प्राधे भरतसपर राज्य किया। , H ।
नल-दमयन्ती मल "इसके बाद एक दिन देवगतिको प्राप्त हुए निषध राजाक जीवने नीचे उतरनलके पासाबाकर कहा,-"हेराजन् । अब तुम्हारे राज्य भोगको अवधि पूरी होगयो।" देवताका यह वचन सुन, संसारसे वैरागे पाये हुए राजा नलने अपने बड़े पुत्र राजकुमार पुष्कल को गद्दी पर बैठा, जिन- 'सेनानामक आचार्यके चरणों में पाश्रय ग्रहण कर, चरित्र व्रत ग्रहण किया। तदनन्सर अन्त समयमें अनशन-व्रत धारण कर समाधि हारा मृत्यु प्राप्त कर नलका जिीव कुवेर नामका टेयता हुआ और दमयन्ती भी भरकर उनकी ही स्त्री हुई। क्रमशः वे दोनों काल पाकर मोक्षको प्राप्त हुए ।। पतिव्रतानों की ऐसी ही अद्भुत महिमा होती है। सतो नारीके सतीत्वके 'बलसे उसके स्वामीका कदापि अमल नहीं हो मकर्ता ।''जो नारी काय वचन-मनसे खामीकी ही पारी- धनामें दिन-रात लीन रहती है, उसका स्वामी घोर संकट समुद्रसे भी इंसते-हंसते पार हो जाता है। जो सती अटल पतिभक्ति और निरन्तर स्वामी सेवा करती हुई पुण्य-पवित्र जीवन व्यतीत करती है, वह अपने पुष्य-पतिव्रतसे इस मंसा- रमें समस्त वभय प्राप्त कर, परलोकमें भी सुखी होती है और जन्म-जन्म में अपने स्वामीका महयास प्राप्त करती है। दम- यन्ताक पाटर्गचरित्रमे यह बात स्पष्ट विदित हो जाती है, किम्लीके निये पत्ति-सेवा भ्वामी-पारण और केशभिति प - ॥ समाप्त ॥