Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Chintan Ki Dhawal Dharayen
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चिन्तन की धवल धाराएं
ज्ञान-विज्ञान और अनुभव के अनमोल सूत्रो की पिटारी
-~-मुनि घमचन्द 'पीयूष'
CHINTAN KI DHAWAL DHARAYEN
MUNI DHARMACHAND PEEYUSH
[PROSE}
--
प्रवा
सस्करण
मूल्म
गतिमान प्रकाशन
1237 राम्ना प्रजाघर, जयपुर - 302003
1992
पचास प्रय
मज ना प्रिटस, जयपुर - 302 003
M
स्वकीयम्-१ पाचाय शुभचन्द्र ने अपने महान् मयं ज्ञानामय में लिखा है- "प्रबोधाय विवेकाप, हिताय, प्रशमाय, सम्यक तत्वोपदेशाय, सतो मुक्ति प्रवतते ।" सत्पुरुषो को सूक्तियां-प्रयोध, विवेक, हित, प्रशम मोर सम्यकतत्त्व के उपदेश-दान हेतु प्रवर्तित होती हैं । वस्तुत गागर में सागर को उक्ति को साकार बनाती हुई वे चितन की धवल धाराए, सुर सरिता की तरह धरातल पर अवतरित होती हैं और जन अन के जीवन को पावन बनाती हैं। उन वाक्यावलियों में जीवन को मोड देने वाली महान् शक्ति निहित होती है । कौन नहीं जानता कि "कुकर्मों से अजित पाप का हिस्सा कौन बटायेगा ? ऋषियो के इस एक प्रश्न मूलक सूक्त पर रत्नाकर डार का जीवन क्रम बदल गया और क्रोप- पध को साधारण सी घटना ने उनके हृदय मे काव्य धारा प्रवाहित कर दी। फलत पे बन गये सस्कृत के आदि कवि महर्षि वाल्मीकि । सिंगाजी जप मध्यप्रदेश के निमार मण्डल में स्थित भामगढ़ के रावजी की हा ले पा रहे , तब "मनुवा ! तू पापणाने जाण रे' भजन के सुमधुर तुलना प्रधान सूक्त न कण-कोटर से हृदय मन्दिर मे पेठकर उनके जीवन को बदल दिया, फलत नौकरी से इस्तीफा देनर से बन गये निमाड के प्रसिद्ध सत सिंगाजी, जो आज निमार की जनता र कण्ठहार बने हुए हैं, जिनके रचे हुए ममन घर पर गामे जाते हैं। अनुभव पद एक वृद्ध के कपन-"भागो मत सामना करो" पर काशी के राजपप पर बन्दरों से डरकर भागते हुए विवेकानद रुक गये [ सात सो देखते ही देखते बदर दुम दबाकर भाग गये, फलत, उहें जीवन को बदल देने वाला प्रेरणासूत्र मिल गया कि कठिनाइयो का सामना करने से ये स्वय भाग जाती हैं। तरुण तीथराम के मन में अतिवाद चलता था कि- 'सन्यासी धन या गृहस्थी? इस अतद्वद में कई दिन बीत गये। एक दिन वे नित्य की तरह गगा स्नान को जा रहे थे कि-महतरानी ने यहा-'एक तरफ चलो।' इस एक वचन पर तत्क्षण तीथराम के जीवन में नया मोड मा । गया। कान पकड़ते हुए वे बोले-मा । तुमने ठीक कहा ह-भब मैं एक तरफ ही चलूगा यानी सयासी वनूगा । सप में किसी किसी सूक्ति मे जीवन को मोड देने की अद्भुत क्षमता रहती है। समय समय पर चिनन मनन व अध्ययन से उत्पन्न विचारो को शब्दो का जामा पहनाने का मैंने छोटा सा प्रयास किया तो बन गई वितन की धवल धाराए' नामक कृति जिसम जीवन शोधक सूक्तिमा अभियक्तिया, परिभाषाए भोर तुलनाए प्रस्तुत की गई हैं । शब्दो का यह उत्तरीय, कितना मापक या सनसनी पैदा करने वाला बन सका है इसका तो सुविा पाठक ही निणय कर सकेंगे। युग प्रधान पापाय श्री तुलसी के कृपा प्रसाद स्वरूप इस कृति से सुधी पाठक कुछ प्राप्त कर सकेंगे इसी शुभाशया के साथ -पीयूष सवत् २०३५, मिगसर पूर्णिमा लुधियाना (पजाब) । आठ ] स्वकीयम्-२ सवज्ञ सवदर्शी नीथंकरो की सवकल्याणी वाणी, अल्पाक्षरी परन्तु अपभरी होती है । वेदो के प्रकाण्ड पडित और पाच मो शिष्यो के गुरु व भान मद भरे इद्रभूति गौतम की- 'आत्मा है या नही ? शका का सहज समाधान महाश्रमण महावीर ने द द द के उच्चारण मे दे दिया तया-- गणधर गौतम की 'कि तत्त?' जिज्ञासा के समाधान में उच्चरित-"उप्प ने इवा विगमेहवा घुवेहवा'-त्रिपदी ने पतुदश पूर्वो की अपार ज्ञानराशि का भक्षय भण्डार प्रदान कर दिया। घमण महावीर के पश्चादवर्ती आत्मज्ञ, समता साधक आचार्यों व श्रमणों ने उसी परम्परा का अनुगमन करते हुए अपनी प्रगल्भ प्रतिभा व प्रजागरित प्रशा से गागर में सागर की उक्ति के अनुरूप अपने अनुभवो का सूत्रात्मक शैली मे बहुत ही संक्षेप में प्रस्तुत किया है। जो सरल नही बडा कष्ट साध्य होता है । शेक्सपियर ने भी कहा है- 'सक्षेप ही प्रतिमा और युद्धिमत्ता की आत्मा है । बाइबल इस मम को यू भभिव्यक्ति दी है- अपने भावों को सक्षेप में व्यक्त करो" क्योकि, तुम जितना अधिक बोलोगे, लोग उतना ही कम पार रखेंगे जितना सक्षेप मे कहोगे, उतना ही तुम्हे लाभ होगा।" ---फिनलेन "विसी राष्ट्र की पूण विद्वता उसको लोकोक्तियो मे प्रदशित होती ह जो अस्य त सक्षिप्त होते हुए भी सारगर्मित होती हैं।' -विलियम पेन [नो] माज का व्यस्त मानव 'पोट एण्ड स्वीट' को पाहता है। दौड धूप य व्यस्ततामरी जिन्दगी में वह चाहता है कि किमी पुस्तक को खोला, पाच दस मिनट पहा और जीवन में परितृप्तिदायक पीयूष को पा लिया, बस ! फिर अपने कम क्षेत्र में लग गया । इस भावना को लक्ष्य में रखकर मैंने कुछ सूक्तों का समयन किया है। बहना चाहिये-महापुरुषों के पनुभव घमन के फूल फूल से मकर द लेकर मधु सचय करने का लघु प्रयल किया है, जिसका माम दिया है.-"चितन की धवल धाराए।" जिसका प्रथम सस्करण सन् १९६० में प्रकाशित हुआ था। वर्षों से अनुपलब्ध पुस्तक के दूसरे सस्करण के प्रकाशन के प्रसग पर शताधिक सूक्तिया, परिभाषाए व तुला मौर जोड़ दी गई हैं। विश्व ज्योति, अमृत पुरुष परमोपकारी आचार्य श्री तुलसी सुयोग्य उत्तराधिकारी-योग मनीपी, जैन योग के पुनरुद्धारक, सवगम्य प्रेक्षाध्यान प्रणाली के प्रणेता युवाचाय श्री महाप्रज्ञ के परमपावन चरणों में पुन -पुन प्रणत हू जिहोंने मुझ जैसे प्रति मल्पज्ञ लेखक को इस साधारण सौ कृति पर प्राथमिकी लिखकर जिस कृपा पीयूष की वर्षा को है वह एक शिष्य के प्रति कृपा निधि गुरु का वात्सल्य प्रसाद है, कृतज्ञता नही। अदा के साथ भक्त कवि के शन्दो मे हृदय मुखर हो उठता है- तय पावो मम हरये, मम हाय तव पापेलोनम । तिष्ठतु जिनेगा ! सावद्यावनिर्वाणसप्राप्ति ।" अमृतपुरुष आचाय श्री तुलसी व प्रेक्षापुरुष युवापार्य श्री महाप्रज्ञ रुपा प्रसाद से सपान इस पीयूप-घटरूप कृति से मुविज्ञ पाठक परितृप्ति का मनुभम करेंगे इसी मगन मागसा + साय, विजयादशमी, दो अक्टूबर, १९८७ -मुनि धर्मचद पीपष' एपप ममम, सिंगपुर के । स]
चिन्तन की धवल धाराए
सूक्तियाँ
अभिव्यक्तिया ५१ से १२०
परिभाषाए १२१ से १२७
मैने पड़ा मैंने सोचा १२८ मे १८४
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सूक्तियाँ १ २ ३ महामानव महापुरुषो की महानता को कैसे मापा जा सकता है क्योकि असीम को ससीम से मापना व असक्ष्य को सस्य से तोलना कसे सम्भव हो सकता है ? महामानव वह होता है, जो दूसरो के लिए दीपक की भाति विल- तिल कर जलता है नारियल के पानी की भाति पलता है, हिमखण्डो की भांति गलता है और सन्त प्रवाही नियरो की भाति परहिताथ अविरल बहता है। जो उजडी हुई बस्तियों को बमान मे नि स्वाथ भाव से अपना योगदान करता है, वह होता है महामानव और जा अकारण ही बसी हुई बस्तियो को उजाडने मे अपनी शक्ति लगाता है, वह होता है 'दानव । मलिन व दागल वस्त्र को स्वच्छ जल ही शुद्ध बना सकता है तेजोपुञ्ज सूय ही अवनी तल को अवलोक्ति कर सकता है पारस ही लोहे का सोना बना सकता है तपा हुआ साधक ही दुराचारी को सदाचारी बना सकता है। आकाश की सर मुक्ताकाश में उड़ने वाली प्लेन ही करा सकती है चलने वाली कार ही औरो को चला सकती है मादर्शों पर जी जान से चलने वाला साधा ही ससार को प्रादर्शों पर चला सकता है । ६ इस धरा से जितना दान लेते हैं उसका शतांश सहस्राश या लक्षाश भी प्रति-दान के लिए सुरक्षित रख सबै तो उच्च स्थान ४ ५ H २/चि तन की धवल धाराए ८ ९ पाने में कोई कठिनाई नहीं अपितु गौरवास्पद पद पाना निश्चित है। अपने अतराल मे अमृतोपम मधुर जल को सुरक्षित रखने वाला श्रीफल कितना उच्च स्थान व पद पाता है यह किसी से भी छपा नहीं है। च दन सूख जाता है पर उसकी शीतलता बनी रहती है फूल कुम्हला जाता है पर इत्र के रूप मे उसको सुरभि बनी रहती है मिट्टी का पुतता मिट्टी में मिल जाता है, पर उसका चमक्ता हुआ व्यक्तित्व अमर बना रहता है। जो आता है वह नि सदेह जाता भी है यह एक सवथा अबाधित सनातन तथ्य है किन्तु जो मरके भी अमर बना रहता है (मिट्टी म मिल करके भी धरती के कण कण मे रमा रहता है), वही है महामानव वही है पुरुषोत्तम और वही है युग पुरुष । वही सच्चा जीवन है-जिसमे फूलो सी महक है फलो सी मधुरता है वक्षो सी शीतलता है पानी सी तरलता व स्वच्छता है स्वण-सी चमक है और हीरे सी दमक है । वह बेकार जीवन है-जिसमे कूडा-ककट, गदगी कशता बबरता, के नृशमता वासना स्वाथपरता, धना धता व व्यसनाभिभूतना अतिरिक्त कुछ नहीं है। उस वेकार जीवन से जल पादप व पशुओ का जीवन कई गुणा अधिन अच्छा है-जो अमृत सा जीवन मधुर फल सुटर फूल व शीतल छाया तथा जीवन-पोषक दुग्धादिक का अमर वरदान दे जाता है। महान बनने के लिए बहुत बहुत तपना पडता है खपना पड़ता है चोटा को सहना पडता है एव क्चन की तरह काया को दहना पहता है। १० ११ १२ सूक्तियाँ/३ १४ १५ १६ १७ तपने से ही मानव में निखार आता है तपन से ही सोने म चमक आती है हिना घिसने से ही रग लाती है। इस धरा पर सन्तजन समता सवधम सद्भाव एव सदाचार प्रचार हेतु जम लेते हैं और मानवीय एकता क्यनी करणी म समानता तथा वाणी, विचार, चिन्तन व कार्यों म गम्भीरता ला1 को शवध्वनि क ते हुए (हिदायत दते हुए) धराधाम से विदा लेते हैं। समय को रेत पर आदमी के चरण-चिन्ह बनत हैं और मिट जाते हैं । महापुरुष वे होते हैं जिनके चरण-चिह काल रूपी पत्थर पर गुदे घरणो की तरह अमिट होत हैं । मिश्री को चाहे जिधर से जिस किमी ढग से तोड कर खाया जाए मिठास ही मिलेगी। गधा किमी वे भले के लिए नही रेक्ता वह उसकी अपनी आदतन लाचारी है । दुजन किसी को महामानव बनाने के लिए कुछ नही क ता, परतु उसको दुष्टता भरे कारनामा को समता से महने के कारण महामानव स्वय चमक जाता है, यह सच है । दुजन, सज्जनों के सुयश को धूमिल करन वा वैसे ही असफल प्रयास करते हैं, जस बरसात के दिनो में सूरज को वादल रह रहकर ढक लिया करत हैं धूप खिलन (निक्लने। लगती है कि अधेरा छा जाता है कि तु अन्त मे उनको पराजित होना ही पड़ता है । अपराधी से घणा करना शतान का काम है माफी 'ना मानव का और सुधार करना देवता का । जो मनुष्य दढतापूर्वक सत्य शोलादि धों का आचरण करता है आने वाले कष्टो (कठिनाइयो) का धैयपूवक सामना करता है अशजनो द्वारा कृत अपमान की गरल घूट को हंसते हंसते पी लेता है वहीं अन्त मे विजयी होता है । १९ २०
४/चितन की धवल धाराए
२१ पडवी मीठो अनुभूतियो का गरलपान करने वाला, शिवशकर वन
जाता है उछल कूद करने वाला नही।
अशक्य शक्य
२२ सहस्रो सरिताए आ मधरा को शस्य श्यामला नहीं बना सक्ती,
परतु समता सुरसरी को लघु धारा उस भूमि को उवरा बना
सकती है।
२३
२४
२५
सहया घनघोर घटाए आत्म चातक को प्यास को नही बुझा सकती
परतु आभ्यतर तप की एक छोटी सी बदरी उस मात्म चातक की
प्यास को मिटा (बुझा) सकती है ।
सहसा अविरल सुधा धाराए धग धगती कापाग्नि की लपटो को
शात नहीं कर सक्ती परतु मधुर वाणी के विखरे सुधा कण पल
मे उस अग्नि का शात कर सकते हैं ।
सहस्रो सौरभ युक्त सुमन भो आत्म उपवन को सुरभित नहीं बना
सक्ते पर तु भात्म सयम रूपी सुमन उसे तत्काल सुरभित बना
सक्ता हैं।
सहस्रो पके और मोठे सहकार (आम) एक क्षण भर के लिए भी
तृप्ति नही २ मक्ते परनु आत्म मन का हाहघय रूप महकार सदा
सदा के लिए अनुपम तृप्ति प्रदान कर सकता है।
सहस्रा स्नेहिल दीप श्रेणिया एक मन मदिर का नही जगमगा सक्ती,
परतु जान की छोटी सी चिनगारी (ज्योति शिक्षा) उस तिमिराछन
मन मदिर को जगमगा सकती है ।
सहस्रो नागदमनिया (पगिया) चचल मन (कालिया नाग) का
दमन नही कर सक्ती परतु गोविद (इद्रिय विजयी) की मस्त
वासुरी (प्रेरक कृति का स्वाध्याय) एक दिन में उसका दमन पर
सकती है।
२८
सूक्तियाँ/५ सहस्रा तीसे अकुश एक मन मातग की मदाघता हा नही कर सकते पर तु विवेक का अकुश चुटको बजाने भर मे उनका मत्तपन दूर कर सक्ता है। सहस्रा संग्राम सिंह सेनापतियो का संय बल या अणुआयुध आम- शत्रमा का नाम शेष नही पूरै सक्ते पर हा शात्मचिंतन अत्मावलोकन के अकाटय आयुध आत्मा...के-स-पाअत कर सकते हैं। ३३ वदुष्यपूण सहस्रो सूक्तिया जीवन धरा म सुधा-धारा नहीं बना सक्ती परन्तु छोटी छोटी सरस कृतिया जीवन धरा मे ऐसी सुधा धारा बहा जाती हैं कि वे सुखाये भी नहीं सूखती। वाग विलासमयी सहसो उक्तिया जीवन धरा में जो परिवतन नहीं ला लक्ती वह परिवतन सन्त-मुखानिमृत सहज सूक्ति (वाणी) ला सकती है । सहस्रो राकट लोकाग्र भाग तक नहीं पहुचा सकते, परन्तु ध्यान या राकेट लोकाग्र भाग तक पहुचा सकता है। सत्सग से प्राप्त प्रात्मानन्द की तुलना म अलावय वा राज्य भी कुछ मूल्य नहीं रखता। सत्सग आशुतोष शिव के वरदान दान के समान सफलता का सद्यपथ प्रस्तोता मोर मोहा धकार को दूर करने वाला दिनमणि के समान होता है। सत्सग स लागो क हृदय पवन की तरह पवित्र, जल के समान निमल तथा गुलाब के फूल के समान मनमोहक बन जाते हैं । कुल मिलाकर व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक चुम्बकीय चमत्कार उत्पन हो जाता है। जा सुमन सुगध दन है उह भला बदबू कब सुहाती है ? जो राजहस मुक्ता चुगते हैं, उहे मला गदगो कब भाती है ? जो सात २४
६/चितन की धवल धाराए
सद्भाव और विराग का पराग लुटात हैं वह भला सकोण और
सरागता से दूषित वातावरण कब प्रिय लगता है ?
सतो का उपदेश बरसात का पानी एव सुमनी या सौरभ (सुवास) जो
ले सकता है, उसी के हात हैं।
प्राचार-विचार
३८ आदश और व्यवहार का दिवा आचार और विचार का तालमल
आदमी को आदम बना देता है।
युद्ध करने के शक्तिशाली पुरुषाथ के प्रभाव म धमकती-पलपलाती
हुई तीखी तलवार विजय प्रदान करने में सक्षम नहीं हो सकती।
आचरण किंवा योग साधना के अभाव में कोरा ज्ञान अभीष्ट फल
प्रदायी नहीं बन सकता।
महापुम्पो को महानता इसी में है कि वे कथनी करनी को धनी गहरी
खाई को पाटकर वाणी और कम का रिश्ता जोड देते हैं।
श्राचरण कठिन
प्राणी मात्र को समस्त क्रियायें सुख के लिए होती है पर तु याद रह
पदाथ-परक सुख सुख नही असुख है । सच्चा सुख पदाय निरपेक्ष
होता है जो स्व नियत्रण स्व सयम से मिलता है।
४२ गदगी म वास करने वालो से घृणा करना मलिन वस्त्र वालो को
दखबर नाक भीह सिकोडना अधकार मे अखडाने व ठोकर धाने
वाला का उपहास करना बहुत मासान होता है लेकिन आत्मदष्टा
वनकर अपना गदापन मैलापन व अधिकार मिटाना बहुत-बहुत
याठिन हो नही कठिनतम होता है।
४३ किमी को आवारा व गवार बहना जितना यासान है उतना ही
कठिन है अपना आवारापन व गवारूपन मिटाना ।
सूक्तिया किसी समाज को 'समज' (मनुष्येत्तर प्राणियो का यानि पशुआ का समूह) कहना जितना आसान है, उतना ही कठिन है अपने समाज को समाज बनाना। ४५ ४॥ किसी पार्टी (दल) पर भ्रष्टाचार या देशद्रोह का आरोप लगाना जितना आसान है उतना ही कठिन है अपनी पार्टी या दल का भ्रष्टाचार व देशद्रोहीपन मिटाना । टढी मेढी राहो से शिखर पर घढना जितना कष्टसाध्य होता है उससे लाखो गुणा अधिक कण्टकाकीण व कठिनता से भरा होता है, आदर्शों की राह पर चलना परतु इसी म पथिक के साहस व शाय मी परीक्षा होती है। गले फाड फाड पर और चिल्ला चिल्ला कर माता का बघारत रहना पर आचरण नही करा कायरता का प्रतीक है। सव धम सद्भाव सादगी एव बाझिल आडम्बरी स रहित क्थनी करनी की समानता का जनता पर अमिट प्रभाव पड़ता है। किसी भी दण को महानता व शक्ति का स्रोत होता है उस दशक नागरिको का चरित्र । किसी भी राष्ट्र की रीढ उस दश की जनता का पवित्र आचरण ही होता है। राष्ट्र की सही तस्वीर उसका क्षेत्रफल नही, चरित्र होता है । व्यक्तियो मे निमित राष्ट्र के कार्यों मे सजीवता, वाणी म ओज चेहरे पर चमन एव विचाराम उज्ज्वरता उज्ज्वल चरिश के ही सुफल है। कोई भी राष्ट्र शास्त्र-बल शस्त्र-बल या सेना-बल से विजयो नहीं बनता विजयी बनता है देशवासिया को नसो म बहन वाले देश प्रेम, स्वाय त्याग, उज्ज्वल-चरित्र एवं क्त्तव्य निष्ठा से। राष्ट्र या व्यक्ति जोवन मे सोत्तम वस्तु है मानव का चरित्र । चरित्र क अभाव म स्मृति हास व सम्पूण नाश हो जाता है। .
दचि तन को धवल धाराए ५२ किसी भी राष्ट्र में सास्पृतिक गौरव को जीवित रयने के लिए प्राण वायु बनाता है---आत्म सयम । राष्ट्रीय चरित्र के अघोगामी ढलाव का मूल कारण होता है--सयम का अभाव । सयम राष्ट्रोत्थान के साथ आत्मा के प्रभ्युदय का श्रेष्ठतम माग भी है। प्रत्येक प्रभुसत्ता सम्पन्न राष्ट्र के सर्वागीण अभ्युदय के लिए अपना सविधान व अपनी राष्ट्रभाषा की तरह सयम प्रधान कतव्य से अनुप्राणित शिक्षाप्रणाली की नितात आवश्यकता रहती है । अणुव्रत आ दोलन सब धर्मों का निचोड है। यह तग साम्प्रदायिक दष्टिकाण ये पजे से व्यक्ति का छुड़ाकर मानवता की ओर उन्मुख करता है। व्यक्ति । नतिम चरित्र को ऊचा उठाकर राष्ट्र की आतरिक शक्ति को बल देता है । स्मत बता का अथ-स्वच्छ पता नही है, स्व नियत्रण ६ मर्याता पालन है। परिथम, सूझ बूय, उदारता समता व करुणा जैसे सद्गुण हो व्यक्ति का मफ्लता प्रदान करते है। सलिल स लबालब भरा हुआ सरोवर खिले हुए कमलो के सोदय सौरभ से ही आक्पण का केन्द्र बनता है। विद्या धन और रूप सम्पन्न मानव भी शील व सदाचार से हो सवप्रिय व आक्षक बनता है शीतल समीर तीण तोर जीवित शरीर प्राणवान पयोधर सुरभित सुमन व उनम भरे उपवन जैसी सौम्यता लक्ष्य वेधता प्राणवत्ता नयनाभिरामता व मन मोहकता सदाचारी के विचारो में ही माती है। ५७ सूक्तिया/९ ६० ६१ आजकल लोग मन (गुण) का नहीं तन (सो दय) का मूल्याकन करते हैं, यानि तलवार का नहीं म्यान का मोल करते है। उत्तम घर-घगो के सुशिक्षित तरुण जब अभक्ष्य भक्षण, शराब पान वेश्यागमन जसे जघय कृत्यो को ओर कदम बढ़ाते हुए देखे जाते हैं तब सहता मुह से निकल पड़ता है कि कोयल कौआ और हस बगुला बनने की कामना क्यो करते है। सरिता विनारो की सीमा में बहती हुई पूजा पाती है लेकिन जब वह किनारो को तोडकर विप्लव मचाने लगती है तो उसके समीप कोई नहीं आता। सयमित मर्यादित व नियमित जीवन ही अचना सम्मान पाता है तो अमयमित व अमर्यादित जीवन घृणा और तिरस्कार । मानस रोग के सम्यक निदान व उचित उपचार के अभाव में हो आज लाखों लाखो प्रतिभाए महान लाभकारी जड़ी बूटिया की तरह अपनी शक्ति के अभाव मे बकार हो रही हैं। सावधान ! मानसिक दासता बढती हुई कतव्य विमुखता स्वाथ वत्ति स्वच्छ दता, स्वेच्छाचारिता एव भ्रष्टाचार रूपी भस्मासुर हमारे इस युवा लोकतत्र का गला घोटने की फिराक में है। वोट की तलवार से प्राप्त सत्ता के सहारे विलास सुविधाओ का मधा धुध उपयोग बीते हुए साम्राज्यवादी युग को यौवन प्रदान करता है जो एक न एक दिन उपभोगकर्ता को ले डूबता है । सत-वाणी स पुरुषो को क्डवी शिना एवं क्षणिक चुभन पैदा करती हुई प्रतीत होती है, परन्तु तत्वत वह कण्टव से कण्टक का उद्धार करने जैसी प्रक्रिया है।
१०/चितन को धवल धाराए ६७ आचार निष्ठ सतो साधको की वाणी का असर अमोघ होता है । खेतो मे पडा पानी क्या कभी निष्फल गया सत वाणी पौ फटन पर प्राची मे फलती हुई उदीयमान सूर्य रश्मियों की तरह निराशा में आशा का संचार करती है और घने कुहर में अभिनव प्रकाश बिखेरती है । सत-वाणी महकने गमकते फूलो की माला के समान मानव मानव को एक सूत्र में पिरोकर सद्भाव सौरभ का विकास करती है । जिस मिट-शाश्वत आनद का माग कालेजो, विश्वविद्यालयो मे नही मिलता, यह मिलता है अध्यात्म साधक सतो की वाणी में । ७० लालसा तब तक ७२ ७३ मन रूपी तालाव में जब तक कामना की तरगे बढती स्व (आत्मा) का दशन नहीं हो सकता । पद व यश का व्यामोह, विवेको का एस भवर जाल में फसा देता है कि जहा के भयावन मगर मच्छो के घातक प्रहार से सात्विक जीवन एक्दम खत्म हो जाता है । एक लालसा अनेक लालसाओ की जननी बनती है, मनेक बडवाइयो को एक वट ही तो जम दता है एक के मूलोच्छेद के बिना अनेकों मा मूलोच्छेद गगन कुसुमवत् असम्भव है । अधकतै अगारो का शय्या पर क्या कभी सुख की नीद आ सकती है ? धाय धाय धधकती तृष्णा को ज्वाला मे क्या कभी शाति मिल सकती है? खटमल भरे खाट पर क्या अभी मीठी नीद आ सकती है ? नश्वर धन-परिवार वाले सयोग वियोग भरे ससार में प्राप्ति हो सकती है? क्या कमी सूक्तिया/११ इस मायामय सपार म पग-पग पर फिसलन है, वहाव है भूल- भुलया है अत ओ मजिल के राही ! समलकर कर चलना, फिसल मत जाना, बहक मत जाता, भूल भुलैया मे मत फस जाना । ७६ गेंद का कोई जितने वेग से दीवार पर फैकता है, उनने ही वेग से वह पुन उसी के पास लौट जाती है यही स्थिति धन, पद ओर सत्ता की है जिननी नि स्पृहता से उसको छोडा जाएगा उतनी ही तीव्रता मे वे परित्याग करने वाले के पास पुन लोट पाएगा। पवित्रता स्वच्छ दपण म ही स्पष्ट प्रतिबिम्ब पडता है । स्वच्छ हृदय मे ही स्व (आत्मा) का दशन होता है। ध्यान लीन साधक को वसा ही परमानद प्राप्त होता है जसे जल से लबालब भरे तालाब मे सजीव मछली को छोड़ देने पर उस मिला करता है। सूई क सूम छद में धागा सूक्ष्मतम बनार हो प्रवश कर पाता है, विकार-मुक्त मन ही समाधिस्थ हो सकता है । खोलते पानी में प्रतिविम्ब नही बनता पानी पर खीची गई लकीरें नहीं टिकती क्रोधाविष्ट चचत मानस मे आत्मज्ञान की झलक दप्टिगत नहीं हो पाती। मन को मोती की तरह उज्ज्वल रथा, चुरि निमल-स्फटिक जैसा स्वच्छ दिल गगा जल के समान पवित्र चित्त मुख मे अमृत तुल्य मोठे शब्द और मधुर व्यवहार आदमी को सब कुछ प्रदान कर ८१ ८२ सहन सुषमा वहा टिंक्ती है जहा गन्दगी नहीं होती। आत्म-साक्षा स्वार वहा होता है जहां मन मला नहीं होता।
१२/चिन्तन की धवल धाराए ८४ . ८७ पेट साफ होता है तो राग नहीं पनपते, शरीर स्वस्थ रहता है । मन साफ होता है तो पाप नहीं पलने आत्मा स्वच्छ रहती है । अत्य त मलिन बस्त्र को उजला बनाने के लिये और प्रत्यन्त काल बतन को माजने के लिए काफी रगडना पड़ता है। मन मे घने जमे हुए कुसस्कारो का दूर करने और स्वच्छ सवारा वा लाने के लिए मन को भावित करना पड़ता है। हीरे के मारन व उबारने की तरह मन मे बाधने व मुक्त करने की दोनो शक्तिया हैं । ८६ आकाश जसा स्वच्छ घटा जैसा क्षमाशील निझर जैसा निमल काटे और पत्थर भरे माग मे नदी के समान प्रसन्न तथा सागर जैसा गभीर जीवन ही सर्वोच्च जीवन होता है। परिस्थितियो की डोर मन पतङ्ग को हिलाये तो हिलने दो कोई चिता की बात नही परन्तु ध्यान इतना रहे कि स्वय मजग नियामक बने रहो। कोयला पानी से नही आग से रक्ताभ या सफेद होता है वसे ही अशुद्ध हृदय तीथ स्थान से नही ज्ञानाग्नि से पवित्र होता है । मन बाग है, तुम वनमाली हा यदि सत्सकल्प और सदविचार के बीज बोकोगे तो बगीचा गुलजार होगा प्रच्छे फल फूल मिलेंगे और यदि असद् विचार के जहरीले या कटीले बीज बोवोगे तो बगीचा दुख-दायी कटीली कैद बन जायेगा। मन हलवाई की दुकान है तुम हलवाई हो, यदि शुद्ध चीज बनाओग तो धन, यश, इज्जत प्रतिष्ठा मिलेगी और यदि अशुद्ध सामान बरतोग ता अपयश व बेइज्जती मिलेगी। गुरु व बालक: ९१ बालकों के सुकोमल हृदय गीली मिट्टी के ढेर के समान सवमा ८८ ८९ ९० सूक्तिया/१३ निराकार होते हैं उह गुर-कुम्भकार जैसा बाहे वैसा रूप प्रदान कर सकते हैं। ९२ बालको के हृदय सवथा श्वेत कपडो के समान होते हैं उसे जैसा चाहो, जिस रग मे चाहो, उसी रग मे रगा जा सकता है। ९३ राष्ट्र की सच्ची सम्पत्ति (धरोहर) बालक है। यदि वे सस्कार सम्पन्न बन जात हैं तो देश का भविष्य सुधर जाता है क्योकि वे ही आगे चलकर राष्ट्र के कणधार बनते हैं । पुरुषार्थ ९४ एक पतली क्षीणघारा अपनी शक्ति को बढाती हुई महानदी बनकर मार्गावरोधक अकाट्य शिला खण्डो के कठोर हृदय को चीरती हुई अपने पायल के धुघरुओ को झनझनाती हुई एक न एक दिन प्रियतम- पारावार से अवश्य जा मिलती है। श्रेष्ठ उद्देश्य की पूर्ति के लिए सवताभावेन समर्पित होकर भीषण आधियो और तेज तूफानों का सामना करत हुए सुपथ मे बढने वाले और माग में आने वाली बाधाओ के सीने को चीर देने वाले कमवीर, रणवीर प्रणवीर या धमवीर विश्व इतिहास में अपने अमिट चरण- चिह्न छोड जाते हैं नव-नव उ मेप लेने वाला गतिशील पानी जिन्दा दिल होता है तो गत मे पडा सहने वाला बूढा दिल । आवश्यक नया मोड लेने वाला समाज जिन्दा होता है तो गलत रूढ़ियों के भार से युको कमर वाला समाज मुरदार । बेकाम का जीवन बेकार है, पुरुषाय हो से जीवन निखरता है, पुरु- साथियो के चेहरे तेजस्वी व चमकते रहते है और मालसियों के मुरदार से बने रहते हैं। ९५ १४/चितन को धवल धाराए १०० श्रम ही सनातन ब्रह्म है यदि श्रम का फ्रम चालू रहे तो भ्रम बादल अवश्य फटेंगे व झलहलता ब्रह्म का सूय अवश्य चमक उठेगा। ९९ हमे नहरें नही निझर या नदी बनकर स्वय के लिये माग बनाना है । वतमान शिक्षा प्रणाली से प्राप्त अध्ययन के साथ थम व सयम का योग हो जाये तो जीवन स्वावलम्बी (आत्मनिभर) बन सकता है । १०१ जवानी व बुढापा, तेज शौय व पुरुषार्थ सापेक्ष है अवस्था सापेक्ष नही, जवान सियार सियार ही रहता है तो बूढा वनराज वन राज ही। १०२ आदमी गिर गिरकर उठता है और उठता उठता गिर भी जाता है तथापि उद्यमशील को अपने प्रयत्न मे शिथिल नहीं होना चाहिए । अटल सत्य है नि उदयानुगामिनी अस्तगति है अस्त होना ही पूर्व भूमिका है। १०. दुनिया उगते चढते सूरज को नमस्कार करती है, मस्त होते हुए को नहीं। १०४ ब्राह्मण की भारम निभर के लिए ससार स्वग है तो परमुखापेक्षी के लिए नरम । सिद्धान्तत लोग प्रथम श्रेणी मे माना पसन्द करेंगे परतु वे आचरण म प्राय परमुखापेक्षी बन रहे हैं भोर परमुखापेक्षी अधे तरह आग में जलकर नष्ट होते ही हैं । १.५ परमुखापेक्षी हीन भावना को मिटाइए क्योंकि दूसरों की अगुली पबह कर पलने को दुवल मनोवत्ति सवनाश की वह खतरनाक भूमिरा है जहां से गिरे हुए मनुष्य की हड्डी पसली तक पूर-चूर हो जाती है। बारम-सपम सतोप मोर निस्वाष सात्विक पुरपार्य प्रगति-पप से प्राणवान पापेम है।
सूक्तियो/१५ १०७ बूद बूद से घडा भरता है, कण कण मे मरूस्थल बनता है छोटे- छोटे वीजो से विशाल वट वृक्ष जम लेते है। छोटी छोटी कोपलें बढकर छाया और फूल फ्ल दने वाले महावक्ष का रूप धारण कर लेती हैं। सच है-महान कार्यों का आरम्भ छोट छोटे सत्प्रयासो से ही होता है १०८ अगारा मा के सामीप्य से वचित होते ही बुझ जाता है, राख का ढेर बनकर रह जाता है आदमी अपनी चेतना या आदमियत से फ्टकर जिदा लाश के सिवा कुछ नही रह जाता। दुख का अवरोध १०९ पिंजर मे आबद्ध कोयल की मधुर कुहुक को या मैना की मीठी हूक को लोह की अगलाए नहीं रोक सकती तो फिर दुख की काली घटाए इसान की प्रगति का कैसे रोक सकती हैं ? ११० बासुरी के मोटे मोटे छेद कण प्रिय ध्वनि सितारो के तारोवा खिंचाव सुरीली स्वर लहरियो को गुजित करने में असहायक नही होते हैं तो फिर अभाव और तनाव (दुख) प्रगति में बाधक कैसे हो सकते हैं? १११ तवे पर अदलने बदलने से रोटो अच्छी तरह सिक जाती है, परि- स्थितियो की परिवतना (अदला बदली) से आदमी पक जाता है । ११. आपदामो रूपी समुद्री तूफानी लहरों से मनुष्य को अडिग घट्टान की तरह होकर जूझते रहना चाहिए । ११३ जमीन का हर टुकडा अनगिनत बार बस चुका है और अनगिनत बार हो उजह धुवा है । हर मरघट पुन बस्ती का जामा पहनकर दुल्हा बन जाता है, तो हर बस्ती मरघट का फन मोटकर चिर. निद्रा मी अन त गोद में विलीन हो जाती है।
१६/चिन्तन को धवल धाराए धम ११४ निमलता के अपूव हेत -धम यो वग सघप का हथियार बनाना अ तमनोमालिय व छुपी हुई प्रदेषाग्नि का पूण प्रतीक है । ११. घम हमारे जीवन को गारने सवारन, सजोने एव पवित्र बनाने वाला परम-पवित्र तत्त्व है। ११६ सत्य सादगी सेवा एव समत्व सदाचार मौध (महल) के चार आधार स्तम्भ हैं । इनकी मजबूती सौध को मजबूती है । ११७ धम को आराधना का सुफल और पाप का कटफल दुनिया के रगमच पर स्पष्ट दिखाई देता है। ११८ धम (अहिंमा प्रेम सत्य क्षमा सरलता एव सतोप) की साधना से व्यक्ति समति सदविचार और सदाचारवान बनकर सुयश प्राप्त करता है तो अधम (छल, अपच, कपट क्रोध कलह) मे रमण करने वाला व्यक्ति कुबुद्धि कुविचार कदाग्रह और कुत्सित व्यसनो वा दास बनकर अपयश दुख व अशान्ति को प्राप्त करता है । ११९ प्रलकार है धर्मावतारों का जीवन जो भूले भटके भुलक्कड प्राणियो को अपने जीवन मे दिशा निर्देश पाने के लिये कुतुबनुमा का काम करता है। १२० विभिन्न सम्प्रदायो की विभिन्न उपासना पद्धतियो के बायजून विशुद्ध धम के स्वरूप मे कोई भेद नही होता। क्या दीपक चिराग मोम बती, बल्ब आदि को विभिन्न ज्योतियो के बावजूद प्रकाश मे कोई अतर होता है ? १२१ साम्प्रदायिक अभिनिवश ईर्ष्या अह वश आदमी वया नहीं कर देठता! स्वग व नरक के दश्य इसी लोर म स्नेहिल व कष्टपूण वातावरण मे स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं । १२२ सूक्तियां/१७ १२३ हनुमान के हृदय में राम की तरह सत्य घम मानव मानव के हृदय में रमा रहना चाहिए। १२४ प्रेम और वात्सल्य की गगा बहाने में ही व्यक्तिगत और पारिवारिक प्रसन्नता निहित है। १२५ अनुशासन, सयम, सदाचार एव शिष्ट व्यवहार जीवन के अनमोल अलकार हैं। १२६ धम मानव जीवन का सास है, प्राण है, शृ गार है । तप १२७ तप के सर्वोत्तम प्रकार है नम्रता, निरभिमानता एव सहिष्णुता । १२८ सहनशीलता (सहिष्णुता क्षमा) जब स्वरसगमी बन जाती है तभी तपस्या में निखार आता है। १२९ तप, जप, और मोन से व्यक्तित्व का विकास मनोबल व आत्म गुणो का सवधन होता है उपदेशदान की क्षमता व वाणी की प्रभावक्ता बढती है और मात्मा मे परम शाति की उपलब्धि होती है। मौत १३. धरती की श्यामल साडी को रिसान की दाती एक ही झटके मे उतारकर फेंक देती है मौत का एक ही झटका प्राणी को अनन्त की गोद मे सुला देता है। कुर्सी की चोरी १११ यह युग अजीब विचित्रता लिए हुए है, इसम राटी, कपडे, स्वण व जवाहरात की ही नहीं, कुर्सी की भी चोरी होती है वह भी सफेद- पोश पपडे पहनकर सभ्य तरोने से। कच्चे कान काचे कान का मादमी, पर पालित यत्र के समान होता है वह
१८/चितन की धवल धाराए
विसी के मुह से सुनी सुनाई पात को विना सोचे-समझे आख मीच
पर मान लेता है। किसी के कहने पर वि तेरा कान कोमा ले
उडा हैवह भाग खडा होता है कौए के पीछे।
जमाखोरी
१३३
धना घता से प्रसूत जमाखोरी दैनिक उपयोग की वस्तुओं को भी
बाजार से गधे के सीग की भाति गायब कर देती है।
सयोग वियोग
१३४ सरिता के तेज प्रवाह या पवन के प्रचण्ड वेग से रेत के टोबे बनते
बिखरते रहते हैं । इस विशाल सृष्टि में बालयोग से पारिवारिक
जनो का सयोग वियोग होता रहता है।
१३५ मान दमय हू शरीर गलनशील विध्वस धर्मा है-यह चितन ही
मुमुक्षु का सच्चा सबल होता है उसके बल पर वह आतध्यान को
छोडकर घमध्यान में लीन बनता हुआ श्रेयोभागी बन सकता है ।
कपायाग्नि
१३६ अतरग मे जब तक कषायाग्नि धधकती रहेगी तब तक वातानुकूलित
(एअर कण्डीशड) मकान में भी शान्ति अमभव है।
१३७ महापुरुपो ने समाज को समुद्र बनाना चाहा था ताकि वह सूख
पाए परन्तु आज का मानव-समाज मेढक भरा पोखर बन कर रह
गया है। इस पर भी तुर्रा यह कि दल-दल भरा यह पोखर स्वयं को
गगा घोषित करने लगा है ।
न
स्व-प्रशसा
१३८
स्व प्रशसा और चापलूसी एक ऐसी शहद लिपटी तलवार है, जिससे
सूक्तिया/१९ नयी उम्र में ही नही पुराने चतुर राजनीतिज्ञ तथा धर्माचाय तक भी उसको मिठास युक्त धार से अपने आप को क्षत विक्षत बनाते हुए नजर आते है। १३९ नीव का पत्थर बनकर स्वतत्रता संग्राम में काम करने वाले अनगिन देशभक्तो ने अपने उत्सग का प्रदशन कब, क्यिा है ? १४० अपनी प्रशसा फला म आम मिठाईया मे क्लाकद चरपरे पदार्थों मे बीकानेर के भुजिया जैसी लगती है प्रशसा एक ऐसी छूत की बीमारी है जो फ्लू या मलेरिया की तरह अपनी गिरफ्त (पक्ड) में लेकर आदमी को निचोड कर रख देती है। प्रशसा दम की तरह दम निकाल देने वाली और टी बी की तरह व्यक्ति की जीवन-शक्ति को चूस लेने वाली महा पिशाचिनी है महामारी है । उपदेश नही सुहाता ११ पित्त दोष के रोगी को मिधी भी कडवी लगती है दुराचारी को हर भला उपदेश काटे जसा चुभता है । १४२ शशि की उज्जवल धवल चादी या दही सो ज्योत्सना से सारा ससार पुलक्ति हो उठता है परन्तु पकज और मधुप के भाग्यावाश म रात भर मशाति के बादल मडरायें तो क्या यह चन्द्र वा दोष है ? व्यय भार क्यो ढोए? १॥ अपने आपको चिन्ता को छोडकर गाड़ी के नीचे चलने वाल श्वान की तरह पराई चिता का भार व्यथ म ही प्रोडकर अपने आपको बोझिल बनाये रखना क्या विद्वत्ता को विडवना नहीं होगी। छोटा पर उपयोगी १४. गान्त, सरल व मधुर निशर पा कई गुणा पधिर महत्व है बारे पर्वीले जलनिधि से २०/चिन्तन की धवल धाराए १४६ १४५ महत्व सख्या का नही शुद्धता का है । पोडा सा शोधित पारा शरीर को पुष्ट कर देता है बूढे को जवान बना देता है। बावने चन्दन की चुटकी बावन मन तेल को शीतल बदन का तेल बना देती है। जाति नहीं गुण देखो यह सच है कि सुदर कमल की जडे क्दम (कीचड) में जमी रहती है गुलाब के फूल की जीवनदायिनी डाली फाटो से घिरी रहती है और शीतल चदन के वक्ष, सापो से लिपटे रहते हैं। ऐसा होते हुए भी क्या उनका मूल्य कम हो जाता है ? कुल मम्प्रदाय एवं परिपाश्व को न देखते हुए व्यक्ति के व्यक्तित्व को आफ्ना सीखना चाहिये। १४७ वया मच्छे आदमी के हाथ में कमल होता है और बुरे प्रादमी के सीग पूछ ? नहीं उनकी पहचान होती है, गुण अवगुण से शोल कुशील से। १४८ गगा मे मिलकर गदे नाले का पानी भी पवित्र हो जाता है सद्गुण गगा में गोते लगाने वाला मनुष्य निष्कलक व पवित्र बन जाता है । १४९ उमरते हुए व्यक्तित्व मे लिंग जाति या सम्प्रदाय का रोडा जितना घातक है, उससे भी कई गुणा विस्फाटक है उनका सहारा लेकर किसी को बढ़ावा देना। परोपकार १५० फल पूलो सदा वृक्ष अपने विसजनधर्मा स्वभाव के अनुरूप सवजन हित में पके और मीठे फलों को निस्वाय बाटता रहता है तो हर वप उसमें वैसे ही नये फल-फूल उग आते हैं। १५१ परोपकार रहित मानव दीवार पर सगी देजान तस्वीर से पदार कुछ नहीं। मावर पदार्थों में अनश्वर मानन्द की खोज वसी ही है पेसी नमर में मिठास तपा पानी में दूध या मायन को होती है ।
14 सूक्तियो/२१ १५ महापुरुषो ने हमारे हाथो मे मजिल तक पहुचने के लिए दीपक दिया था, मगर स्वाध मानव अपने को ही प्रकाशित करने के लोभ वश उसे अपने दामन में दवा कर बैठ गया, नतीजा यह हुमा कि-दामन तो जला हो, घर भी सुलग गया । पुण्य-पाप १५३ पुण्य का जब उदय होता है तो आदमी दूज के बाद की भाति बढता चला जाता है पढते-बढत एक दिन विश्व में वह पूर्णमासी ला देता है किन्तु जब पाप का उदय होता है तो वही मादमी एकम के चाद की तरह घटने लगता है, घटते घटते एक दिन अमावस ला देता है। १५४ जब गीदड की मौत आती है, तो वह जगल को छोड़ कर गाव की सरफ भागता है। जब आदमी के बुरे दिन आते हैं तब उसे उल्टा सूझने लगता है। बोलने की बीमारी १५५ कुछ लोगो को बोलने की ऐसी बीमारी हो जाती है कि बोलना शुरू करने पर बालते ही रहते हैं, उनकी जवान बन्द ही नहीं होती। सुवचन १५६ वचन मे विलक्षण शक्ति है यदि हम उसका सही उपयोग कर सकें तो। १५७ मिष्ठ मित भाषी तथा मौनावलम्बी को कभी पीडित या अनुतप्त नहीं होना पड़ता। १५८ विम आदमी को कल्पना मोर अनुभव से मनुप्राणित ऐसी बात बोलनी चाहिए कि पत्पर में मी प्राण का संचार हो जाए। १५९ शब्द न इट है न मशाल, अयोग्य प्रयोक्ता के हार्यों (कप्ठो) में ये इट-पत्थर बन जाते हैं तो सुयोग्य प्रमोक्ता के कण्ठो मे मशाल ।
२१/चितन को धवल धाराए १६० नफरत, द्वेष, ईया, अधिवप ये पारण जहाँ शब्द इंट-पत्पर बन पर ऐसी मार करते हैं कि उनके सामने एटमीवम भी शायद कम वापत रपते हों, वहा वे प्रेम, मत्री, रामाय और जनहितकारी गगाजल मे स्नातक बनकर निकलते हैं तो धरा को चमन और पर को रोशन बना देते हैं जिनके प्रकाश में युगों-युगों तक लोग राह पाते रहते है। १६१ मुक्ताहार मानय पण्ठ का सच्चा यामरण (असली अलकरण) नहीं सच्चा आमरण है-मूक्त-गूक्तियो या फण्ठा-हार । प्रान्तरिक प्रतिमा १६२ केवल शक्षणिक योग्यता ही मनुष्य को आगे नहीं बढातो, आगे बढाती है उसको आन्तरिक प्रतिभा । उमति का इच्छुक हर व्यक्ति अपनी प्रात्मा को सुनढ बनाए यही अपेक्षा है । १६३ जिमे चित्तन-मनन करना नहीं आता उसके लिए शास्त्र का क्या उपयोग ? क्या बधे के लिए पाईने का कोई उपयोग है ? १६४ प्रज्ञावान यह है, जो त्याज्य व ग्राह्य का विवेक रखता है। प्रात्मा १६५ गुलाब के फूल की महा का तथा अनेक कार्य सम्पादित करने वाली विद्युत शक्ति वा-अनुभव हो किया जा सकता है उसे देखा नहीं जा सकता वैसे ही आत्मा के अस्तित्व का भी मात्र अनुभव ही किया जा सकता है। १६६ दूध मे से निकला हुआ धी कभी द्घ भाव को प्राप्त नहीं होता वसे ही पुद्गलो से सवथा मुक्त प्रात्मा पुन किसी भी काल मे पुद्गल मयुक्ता नहीं होती। १६७ जितना बड़ा कक्ष होता है दीपक का प्रकाश उतने ही कक्ष में फल जाता है इसी प्रकार असख्य प्रदेशात्मक आत्मा जितना शरीर . m सूक्तिया/२३ प्राप्त करता है, उतने में ही समाहित लोग रहगीता है । जोवन दशन १६८ जिदगी से कोई गिला न हो, पछताने की कोई गु जाइश न हो बस । यह मेरी समझ में इसान का सही जीवन दर्शन है । प्रेम १६९ हस मुख वच्चो और खिलते फूलो के समान हसमुख व मिलनसार व्यक्ति सवा स्नेह-सत्कार प्राप्त करता है । १५० हर शस्त्र को हर बडे शस्त्र का तथा हर शक्ति को हर महाशक्ति का भय रहता है, वे एक दूसरे के सामने शक्तिहीन हो जाते हैं जबकि मिठास को हर मिठास का, प्रेम को हर प्रेम का बल मिलता है, सहारा मिलता है। क्षमा १७१ दोबतनो का आपस में टकरा जाना अस्वाभाविक नही है, दो व्यक्तियो म अनबन हो जाना कोई अजीब या बडो बात नहीं है बडी बात है-उस अनवन को खत्म कर देना। १७२ सहिष्णुता सेवा सम्मान दान स्वाथ-त्याग और ममता रूप पांच सकारात्मक नूण सभस्त अशाति रोग का नाश कर देता है, उसका सेवन स्वास्थ्यदायर हाता है । १७३ पाच आधारों (शान दशन, चरित्र, तप, बोय) के पाच सवादी चाय केद्रा (मानवेन्द्र दशन द्र,आनदकेद्र, जिसके द्रव स्वास्थ्य पे) का आराधक साधर साधना के क्षेत्र में सफलता का वरण परता है। लापरवाही १४ साधारण सी लापरवाही से यात पावतगड या तिल का ता बन जाता है।
२४/चितन को धवल धाराए
१
न्याय की विजय
१७५ इतिहास बार बार दुहगता है कि विप्लव मघा देने वाले आततायो
असुर अत म अपनी मौत मर मिटते हैं। देवी सम्पदा के गुणो से
मलत मानव भीषणतम अघड मोर तूफानों में भी अडिग रहकर
अत में विजयी बनते हैं। राम को दसग्रीव पर महान विजय इसका
जीवत प्रमाण है।
सूक्त-सूक्तिज
मानव जीवन
मानव जम स्वण मोती और हीरो के चमचमाते ताज से भी ज्यादा
मूल्यवान है।
२ मानव जाम परिजात का पेड़ है जिसके फूल मनचाही गध दे
सकते हैं।
३ मानव ज म एक ऐसा कल्प वक्ष है, जिसके नीचे बैठकर विसी सद्
असद कल्पना को प्राकार दिया जा सकता है ।
मानव जीवन दुधारी धार है जिसके शत्रु नाश या स्व विनाश दोनो
किये जा सकते है।
मानव ज म कोहिनूर है तो विषय सुख कौडियो के समान हैं, उनके
लिये उसे हार देना महा-मूखता है।
जीवन उसी का धय है, जो अगरबत्ती सम महकता है और मोमबत्ती
सम प्रकाश बिखेर जाता है।
चुनाव
एक माग है-काटो का और दूसरा है-फूलों का । दायित्व है हम
पर चुनाव का। सोच समझकर चुनाव करें। जीवन भरण्य का
सुखपूर पार कर जाए । यही होगी मीर नीर की हस वृत्ति ।
४
५
६
१
सूक्तिया/२५ २ ३ ससार है रगोन रात, होती है तम और चादनी को बरसात, चुनाव करने में चूक गये तो घात ही घात । ससार है मधु लिपटी तलवार, बडी तीखी है जिसकी धार, चुनाव करने में धोखा खा गये, तो है हार ही हार । ससार है विष ओर अमृत की रगीन फिल्म, जगमगाहट में चुधिया न जाए इल्म, चूक गये तो हा जावेगा जुल्म । ४ चैत य एक समान १ काली पोली धोली, लाल आदि विभिन्न रंगो को गायो का दूध सफेद ही होता है, प्राणियो के विभिन्न रग, वण व प्रजातियों के बावजूद चैतन्य सब 'समान होता है। सम्प्रदाय की सीमा से ऊपर उठकर बात मानवता के प्राण हेतु अमृत कण बिखेरना ही चैत य को उपासना है । २ नश्वरता १ २ क्या नश्वर पदार्थों में अनश्वर सुख की खोज, भूसे के एकछत्र ढेर मे से गेहू के दाने बीनने जैसा काय नहीं है ? क्या यह सुनिश्चित नहीं है कि सब कुछ छोडकर अज्ञात प्रदेश मे पांव रखना होगा ? क्या मौत (काल) के एकछत्र शासन से कोई वष सकता है ? सयोग वियोग से जुडा हुआ है तब फिर छाती कूटकर विलाप करना ३ बे मायने है। कुश की नोक पर टिका ओस कण पलक झपकते ही गिर जाता है। चलता फिरता आदमी काल के एक झोके म पो पान की तरह धराशायी हो जाता है।
२६/चितन को धवल धाराए ५ ६ मुश की नोक पर टिके पानी को गिरने म समय नहीं लगता दुष्ट विनश्वर मानव जीवन को नष्ट होने में भी समय नहीं लगता। जीवन की क्या गारटी ? अच्छे खासे भले आदमी भी किसी न किसा वहाने अकाल मौत के मुह में जाते हुए देखे जाते हैं। सच मे जीवन नश्वर है। धन १ २ ससार का सवस्व खरीदने मे मक्षम धन जीवन की श्रेष्ठता और मन की शान्ति खरीदने मे वीना व दरिद्र होता है । यही कारण है कि शान्तिवादियो की दृष्टि मे धन तुच्छ समझा जाता है व पाप का मूल। भाई यदि बहन से झगडा करता है तो मा-बाप कहते हैं-क्यो लडता है बहन से ? यह तो कुछ दिन की मेहमान है फिर अपने घर जायेगी यह चिडिया चहक फुदक कर उड़ जायेगी, इससे लहना बेमाने है । सम्पत्ति का भी यही हाल है यह बहन भी जाने वाली है फिर उसके लिए भाई भाई में विग्रह क्यो। ससार मायाजाल है घन मिट्टी के समान है-यह आज के आदमी को एक मुह बोली मास्या है बडी निस्पृहता प्रदशक भाषा है किन्तु उसकी वास्तविक प्रास्था धन बटोरने मे है फिर धन की प्राप्ति चोरी डकती, रिश्वत दश द्रोह या क्सिी हथकडे से क्यो न हो? युग मे विद्वान ईमानदार या सच्चे इसान का सम्मान नहीं होता सम्मान होता है काले धन का । काला धन कमाने वाले हेठी निगाह से नही देखे जाते भपितु मद गिने जाते हैं-यही है राष्ट्रीय चरित्रहीनता को जह। पीली धातु कनक क्नक के (धतूर ) समान हानिकारक व ३ ४ आज के सूक्तिया/२७ जीवन घातक है। पीली धातु के कारण जीवन विनाश की एक नही, अनेक घटनाए घटती रहती हैं, फिर भी ससार का क्नक के प्रति मोहभग नहीं होना, यह एक प्राश्चर्य है। १ २ कामनाए नहरी जल वितरिकाओं का लेवल विगहने पर दल दल बन जाता है, किंवा पानी न बहने से मिट्टी का भराव बढ जाता है, जो जबदस्त राष्ट्रीय क्षति का कारण बनता है । मुद्रा का भी एक जगह जमाव ममता को बढाकर सामुदायिक क्षति का जबदस्त हेतु बनता है । आदमी को मनोकायिक अदम्य लालसाए, सुरसा का मुख बन रही हैं। फलत मनतिक तरीके प्रतिदिन द्रोपदी के चीर जैसा विकराल रूप धारण करते जाते हैं। अनश्वर आत्मा को नजर अदाज कर नश्वर पदार्थों में बाण खोजने. वाला व्यक्ति, शुतुरमुग के समान रेत मे अपना सिर छिपाकर स्वय को ठग रहा है। असन्तोष मुरमा का मुख है जो मन की शान्ति को लील जाता है। अनियन्त्रित कामनायें भादमी को भयकर विपदाओ की भट्टी में फेंक ३ ५ देती हैं। माज का मादमी सवारिया को दौड और स्कूटर कारों को होड में सरपट भागा जा रहा है चूकि तृष्णा दिन दूनी-रात, चौगुनी बढती जा रही है। ७ प्रतिक्षण उठने वाली लालसाए, वर्षा में बास की तरह बढ़ती ही पली जाती हैं । बास वर्षा ऋतु म बडी तेजी से पाच स तीस सेंटीमीटर तक प्रतिदिन बढते देखे गये हैं परतु लालसाए अमाप्य माप से बढती देखी जाती हैं।
२८/चिन्तन की धवल धाराए
८
९
१०
शरीर में जितने रोम होते हैं उनसे भी अधिक होती हैं आदमी को
प्रबल इच्छाए।
सो की घड़ी का कोई दुकानदार सौ में नहीं बेचता, सौ से कम कीमत
की घडी ही सौ मे मिलती है । कामना रखकर साधना करने वाला
साधना से कम हो पाता है और नुकसान ही उठाता है ।
महानदियो पर बाध बनते हैं किन्तु प्रवधमान इच्छामो लालसाओ
पर बाध बाधना सरल नहीं है। मानव इतिहास मे आज तक
जितने युद्ध हुए होंगे, उतने युद्ध मन की इच्छा भूमि में चले हैं और
पल रहे हैं।
माकाशीय पानी एक्दम निमल होता है धरा पर उसका अवतरण
उसे गदला बना देता है । आकाश निमल होता है, रजा का स्पश
उसे समल बना देता है । वस्त्र स्वच्छ होता है सस्पश उसे मलिन
(काला) बना देता है। नभीय आकाश प्रखण्ड होता है, ममत्व उस
अखण्डाकाश को खण्ड-खण्ड बना देता है। मन चचल व मलिन नहीं
होता, इच्छाए उद्दाम लालसाए कमनीय कल्पनायें उसे चचल घ
मलिन बना देती हैं।
११
पारस व पत्थर
१
पारस होता तो है परन्तु पत्थरों की तरह पारस या देर नहीं होता
अमृत मिल तो सकता है परन्तु थारे पानी के अथाह सागर की तरह
नहीं मिलता ईमानदार होता तो है परतु बेईमानो को अन्तहीन
पतार की तरह सबवे सब ईमानदार नहीं हो सरते ।
मूल प्रहार
१ पया विसरगमन के लिए मां फोर मनाया जीमबाट मेना पर्याल
है ? बया नार नहीं रहेगी ना जुराम नहीं होगी।
सूक्तियां/२९ २ ३ क्या इद्रियों का उमूलन विकारों का रक्षा कवच हो सकता है ? क्या मकान जला देने से चोरी नही होगी ? पमा स्वारमानुशासन के अभाव में परानुशासन कारगर हो सकता है ? क्या गारण्टी है कि पोडा पास से पारी नहीं करेगा और रखवाला खेत नहीं घरेगा? स्वाध्याय २ . सरस किताबो का स्वाध्याय जीवन को सरस बना देता है। हम पुस्तक-पोट नही पुष्प परागग्राही मधुप बनें। मादमी के बनने बिगड़ने में भोजन व पय पदाय का प्रभाग भी कम नहीं होता। जिस प्रकार अपौष्टिक भोजन य घटपटे पदार्थों का माहार शारीरिक भूप मिटाने तया रसनेन्द्रिय को परिसृप्त करने के साप विविध व्याधियो को जम देता है उसी प्रकार विकृत साहित्य (पौत साहित्य) का अध्ययन भी मानसिक भूख मिटाने के साथ विकारो को जन्म देता है । व्यक्ति जसा साहित्य पढ़ता है वैसा ही बन जाता है। घटिया व बाजारू साहित्य लोकरजक भले ही हो, परन्तु मानव साहित्य का भला नहीं कर सकता। साहित्य गाय के दूध के समान मानव मन को पुष्ट, निमल मधुर, सुसस्कारी तथा परहितरत बना देता है। सच मे मानव जीवन को सबसे बड़ी पजी है--सुसस्कार । ६ समय १ २ सावधान ! समय के पख लगे हुए हैं वह हर क्षण उडा जा रहा है। सावधान ! वक्त तेजी से गुजर रहा है। परने का अवसर चूष ३०/चितन की धवल धाराए ३ ४ १ प्रात काल को रमणीय बेला, प्राणवायु को बहार व उपहार लेकर उपस्थित होती है वह हतभागी है, जो इसका लाभ नहीं उठाता । धूलि को मुट्ठी में भरकर एक स्थान से दूसरे स्थाग पर प्रक्षेप करते रहने से वह कम से कम होती जाती है, उसी प्रकार मानव की उम्न प्रतिदिन कम से कम होती जाती है । मृत्यु और जीवन मृत्यु से आदमी डरता है जीवन को अच्छा मानता है, आखिर मृत्यु भौर जीवन हैं क्या ? समाधान में दो शब्द काफी होगे- अनुत्साह है-मृत्यु और उत्साह है-जीवन । बात नहीं आचरण १ आदर्शों की बातें सबको बहुत सुहाती है परन्तु बात जब जीवन में उन प्रादर्शों को ढालने पर पचती है तो खण्ड खण्ड होकर बिखर जाती है या बरफ के समान पानी बनकर बह जाती है । यह एक पटल सच्चाई है कि बातें ब्रह्मज्ञान को अवश्य होती हैं परन्तु आचरण का अकाल ही नजर आता है। स्वाथ भरे युग मे आदश पर चलने का साहस बिल्ली के गले में घटी बाधने जैसा कठिन काम है। कम रहित कोरी सूनी मागों (यह चाहिये वह चाहिए) को सिदर से भरने का स्वप्न दिवा-स्वप्न मात्र है श्लथ व निर्जीव देह को सजाने सवारने का असफल प्रयास मात्र है। व्यक्तित्व के निर्मापक व्यक्तित्व के निर्मापक होते हैं माता के सस्कार घर परिवार र पास-पडौस का वातावरण तथा सद साहित्य । जैसे हम भोजन-पानी व हवा के बिना जी नही सक्ते, वसे ही २ ३ २ १ .
सूक्तिया/३१ सद्विचार सदाचार, स्वाध्याय व सद सकल्प के बिना सात्विक बन नहीं सकते। व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति के सद्-असद् विचार निर्णायक भूमिका ३ निभाते हैं। मर्यादा महोत्सव १ २ ३ मारवाड की शुष्क धरा पर पुष्कलायत मेघ ने (प्राचाय भिक्षु ने) ज्ञान, दशन, चारित्र की ऐसी त्रिवेणी प्रवाहित की कि जिसका निमज्जन-कुमस्नान लाखो लाखों मुमुक्ष जनो का पाप-ताप सताप हर रहा है, उहें भय व मृत्यु से मुक्त रहा है। वह मृत्युञ्जय कुभस्नान जीवन का अनिवचनीय आनद प्रदान करता है। पानी सूख जाने पर तालाब में दरार पड़ती है, सम्प्रदाय दल में मर्यादा, चतयोपासना और धम या त्याग भावना का जल सूख जाता है तब उनमे भेद पड जाता है । सीमा मे रहो असीम को जानो, सीमा में रहकर असीम का अवतरण क्रो यही है सदेश मर्यादा-महोत्सव का । केद्र मे शाश्वत रहे व परिधि मे परिवतन, खुल जाते हैं विकास के मायाम नूतन होता है सतयुग का प्रवतन और अभीष्ट परिगमन । वही काम करता है मर्यादा महोत्सव का आयोजन बढता जाता है दिन दुगना रात चौगुना आकपण, पुलक रहा है धरती का कण कण, प्रफुल्लित है जनता जनादन अनत काल तक मनाया जाता रहे यह दिन यही है अत करण का अनुचिन्तन । अनुशासन ऐसा पीयूप है जो मूच्छित मानस को पुनरुज्जीवित निपघहीन मर्यादाहीन और वजनाहीन समाज समाज न रहकर समज (पशु समूह) बन जाता है । ४ करता है। ६ ३२/चितन की धवल धाराए १ १ हाल से अनुर्वा धत व अनुप्राणित फूल महक्ता है, वही डाल से टूटकर मिट्टी में मिल जाता है। होर से बंधी हुई पतग, मुक्ताकाश में उडती है, जनाकषण का कद्र बिदु बनती है । डोर से कटी पतग गत मे जा गिरती है, उसे लूटने आने वालो के हाथो ही उसकी धज्जिया उडती देखी जाती हैं । मोतियो की माला का तार टूट जाता है तो वह बिखर जाती है । मर्यादा टूट जाती है तो व्यक्तित्व बिखर जाता है । मकान की मरम्मत पुताई सफाई न कीजिए तो वह एक दिन टूट जाता है समाज-सघ की देखरेख हुए बिना वह निखर जाता है। प्रेक्षा प्रेक्षाध्यान एक ऐसा पुष्कलावत मेघ के पवित्र जल का स्नान है जिससे शारीरिक दीप्ति के साथ चैतसिक निमलता प्राप्त होती है । प्रेक्षाध्यान एक ऐसा दिव्य सगीत है जिससे न केवल बाह्य इद्रिया परितृप्त होती हैं, अपितु चेतना प्रफुल्लित हो उठती है। प्रेक्षाध्यान एक अनुपम वरदान है, जिससे बाहरी सौम्यता के साथ आन्तरिक सौदय निखर उठता है । प्रेक्षाध्यान एक अद्भुत रसायन है जो खोये हुए यौवन को पुन प्राप्ति के साथ अनत तारुण्य प्रदान करता है। प्राणी प्राणवायु के बिना निष्प्राण तथा पानी के बिना नि शब्द व निश्चेष्ट बन जाता है। घ्यान साधना के बिना साधक निस्तेज व निर्वीय हो जाता हैं। ३ बुद्धिमान और प्रनावान के द्वद्ध-युद्ध म जयमाला प्रज्ञावान के गले को ही सुशोभित करती है। परम पुरुषाय व प्रेक्षाध्यान द्वारा परम निमलता स्वय प्राप्त करें और मोरो को निमलता प्राप्त कराने में सहभागी बनें। २ ४ सूक्तिया/३३ ५ जान, दर्शन, परिन तप और वीर्याचार रूप पचाचार अनुशीलन से शुद्धात्मस्वरूप की प्राप्ति होती है। प्रेक्षाध्यान साधना में पचाचारो रे पाच सबादी तय केन्द्र व्याख्यात हैं। यथा--ज्ञान केन्द्र (ज्ञान) बुदि-शक्ति का, दशन केन्द्र मतदृष्टि व परिवतन का आनद- केद्र चरित्र निमलता के पोषण का तेजसके द्र-तेज स्विता, साहस व मनाबल का तथा स्वास्थ के द्र-सृजनात्मक शक्ति का सवादी केद्र है। इन पाच केन्द्रो का अभ्यासी साधक, पचावार की आराधना करता है और साधना के क्षेत्र में सफलता का वरण करता है। ६ मच्छर उत्पन्न होते हैं-~गदगो कीचड भरे स्थलो मे अभिव्यक्त प्रकट होते हैं-रात के अधेरे में। आवग उत्पन्न होते है -- इमोशनल- एरिया मे, अभिव्यक्त होते हैं- नाभि पर । जिस प्रकार गदगी- कीचड भरे स्थान को स्वच्छ-परिष्कृत कर लिया जाता है रात को उजाले से भर दिया जाता है तो मच्छरो के पातक व दुष्प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है, इसी प्रकार साधक भावेग प्रकट होने के स्थल संजस द्र-को ध्यान से निष्णिय करता है भावेग उत्पत्ति स्थल-ज्योति केन्द्र पर-ध्यान कर जड को उखाड़ देता है। परिष्कृत करने के इस उभयमुखी सु प्रयत्न स विस्फोट के खतरे से स्वय को बचा लेता है। ध्यान रहे-केवल अभिव्यक्ति स्थल का शोधन अभीष्ट परिणाम न देकर खतरनाक हो सकता है प्रत दो तर्फा प्रपन ही साधक को सफल बनाता है । रेह पोर मात्मा देह रूप कोयसे में आत्मा रूप होरा छुपा पडा है, देह विध्वसन धर्मा, विकारी है और आत्मा भविध्वसन स्वाभावो अविकारी व परम . -- ३२/चितन को धवल धाराए ५ १ १० १ हाल से अनुबधित व अनुप्राणित फूल महकता है, वही डाल से टूटकर मिट्टी में मिल जाता है। डोर से बंधी हुई पतग, मुक्ताकाश में उडती है, जनाकषण का केद्र बिदु बनती है। डोर से कटी पतग गत में जा गिरती है, उसे लूटने आने वालो के हाथो ही उसकी धज्जिया उडती देखी जाती हैं। मोतियो की माला का तार टूट जाता है तो वह बिखर जाती है । मर्यादा टूट जाती है तो व्यक्तित्व बिखर जाता है । मकान की मरम्मत-पुताई सफाई न कीजिए तो वह एक दिन टूट जाता है समाज-सघ की देखरेख हुए बिना वह निखर जाता है । प्रेक्षा प्रेक्षाध्यान एक ऐसा पुष्कलावत मेघ के पवित्र जल का स्नान है जिससे शारीरिक दीप्ति के साथ चैतसिक निमलता प्राप्त होती है । प्रेक्षाध्यान एक ऐसा दिव्य सगीत है जिससे न केवल बाह्य इन्द्रिया परितृप्त होती हैं, अपितु चेतना प्रफुल्लित हो उठती है। प्रेक्षाध्यान एक अनुपम वरदान है जिससे बाहरी सौम्यता के साथ आन्तरिक सौत्य निखर उठता है । प्रेक्षाध्यान एक अदभुत रसायन है जो खोये हुए यौवन को पुन प्राप्ति के साथ अनत तारुण्य प्रदान करता है। प्राणी प्राणवायु के विना निष्प्राण तथा पानी के बिना नि शब्द व निश्चेष्ट बन जाता है। ध्यान साधना के बिना साधक निस्तेज व निर्वीय हो जाता हैं। बुद्धिमान और प्रनावान के द्वद्ध-युद्ध में जयमाला प्रज्ञावान के गले को ही सुशोभित करती है। परम पुरुषाय व प्रेक्षाध्यान द्वारा परम निमलता स्वय प्राप्त करें और औरों को निमलता प्राप्त कराने में सहभागी गर्ने । २ - 7 सूक्तिया/३३ ५ ज्ञान, दशन, चरित्र तप और वीर्याचार रूप पचाचार के अनुशीलन से शुद्धात्मस्वरूप की प्राप्ति होती है। प्रेक्षाध्यान साधना मे पचाचारो के पाच समादी चैत य-केद्र व्याख्यात हैं। यथा--ज्ञान के द्र (ज्ञान) बुद्धि-शक्ति का, दशन केन्द्र अन्तदृष्टि व परिवनन का आनन्द- केद्र चरित्र निमलता के पोपण का, तेजसके द्र-तेज स्विता, साहस व मनोबल का तथा स्वास्थ केद्र-सृजनात्मक शक्ति का सवादी केन्द्र है। इन पाच केद्रो का अभ्यासी साधक, पचाचार की आराधना करता है और साधना के क्षेत्र में सफलता का वरण करता है। । मच्छर उत्पन्न होते हैं-गदगी कीचड भरे स्थलो मे अभिव्यक्त प्रकट होते हैं- रात के अधेरे मे । आवेग उत्पन्न होते है - इमोशनल एरिया मे, अभिव्यक्त होते हैं- नाभि पर । जिस प्रकार गदगी कीचड भरे स्थान को स्वच्छ-परिष्कृत कर लिया जाता है रात को उजाले से भर दिया जाता है तो मच्छरो के पातक व दुष्प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है इसी प्रकार साधक मावेग प्रकट होने के स्थल सैजस के द्र-को ध्यान से निष्क्रिय करता है, आवेग उत्पत्ति स्थल-ज्योति केद्र पर-ध्यान कर जड को उखाड देता है । परिष्कृत करने के इम उभयमुखी सु प्रयत्न विस्फोट के खतरे से स्वयं को बचा लेता है। ध्यान रहे-वैवल अभिव्यक्ति स्थल का शोधन अभीष्ट परिणाम न देकर खतरनाक हो सकता है, मत दो तर्फा प्रयत्न ही साधक को सफल बनाता है । रेह और प्रात्मा देह रूप कोयले मे आरमा रूप हीरा छुपा पडा है, देह विध्वसन धर्मा विकारी है और आत्मा प्रविध्वसन स्वाभावी अधिकारी व परम
३४/चिन्तन की धवल धाराए
२
परछाई पर चलाया गया शस्त्र, व्यक्ति के मूल अग पर प्रहार नही
करता। जल से भरे घट में चद्र का प्रतिबिम्ब पडता है, घट के
उलट दिये जाने पर प्रतिबिम्ब ता नष्ट हो जाता है लेकिन मूल चद्रमा
प्रनष्ट नहीं होता । झोपडी पर आकाश का अस्तित्व अवश्य है, झोपडी
के गिरा दिये जाने पर झोपडी का आकार नष्ट हो जाता है, कि तु
आकाश का मूल स्वरूप ज्यो का त्यो अविकृत रहता है। इसी प्रकार
शरीर के विष्ट हो जाने पर भी शरीराकार प्रतीत होने वाली
शाश्वत आत्मा सदा अविनाशी रहती है ।
३
देही देह मे रहते हुए भी विदेह भाव मे रमण करे तो महाविदेह (क्षेत्र)
बन सकता है।
मा बाप सुधरे
मा वाप स्वय सस्कार सदाचार व सदष्यवहार से दूर रहे ओर चाहें
कि वालक सस्वारी सदाचारी व सदय्यवहारी वने यह चाह वैसी
चाह है जैसे प्याज खाकर कोई कस्तुरी की सुगध लेना चाहता हो ।
१
प्रज्ञान
१
दक्षिण मुख व्यक्ति दपण मे उत्तर मुख विया हुआ और दाया भाग
बाया भाग प्रतिभासित हाता है। अनानाच्छन्न ज्ञान में ससार ठीक
वैसे ही उल्टा प्रतिमापित होता है ।
मित्रता
दो सच्चे मित्रों को प्रगाढ़ मित्रता को न दुख की आग मला सकती
है न स्याप का पानी बहा करता है न परिस्थिति की धूप
१
सकती है।
सूक्तिया/३५ २ दूध की बोतल गिरते ही सारा दूध जमीन पर फैल जाता है वह इक्ट्ठा करने पर भी काम का नही रहता । काच का बतन हाथ से गिरकर चूर चूर हो जाता है, वह फिर न जुड़ सकता है न काम का रहता है। वाणी को ठेस लगत हो मित्र टूट जाता है, टूटा दिल विप ही उगलता है । पत्ता सूखकर खत्म हो जाता है और कचरा ही बढाता है। ये नन्हे-नन्ह १ नहै नह भोरे बदरे, अपने सहज सात्विक माधुय से सूरज की घण्डता का मनमोहकता म बदल दते है । नन्ही नही जल बूदे धरती माता के फटे हुए अनेक टूक दिल को साध दती हैं कक्शता को मृदुता में बदल कर, धरती का शस्य श्यामला और हरितबसना वना देती हैं। नह नह वीज अपने अस्तित्व को धरती की गोद मे विलीन पर अपनी प्रदश्यमान शक्ति प्राचुय से विशालकाय दरख्त वनकर धरती की नग्नता को ढकने हुए मनमोहक दृश्य उपस्थित करते हैं । न हे नह फूल अपनी अमर सौरभ भूतल को सुरक्षित करते हैं और कुम्हलाने पर भी अमर सौरभ छोड जाते हैं । नहे नह फल स्वयम से समुपाजित रस की सात्विषता परासते हुए 'परोपक्राय सता विभूतय कहावत को चरिताय करते है वैसे ही नह न हे नियमो को अपने में समेटे हुए अणुव्रत व्यक्ति, समाज ब राष्ट्र का स्वस्थ निर्माण करत हैं। सच्चाई १ सच्चाई को कहने सुनने और जीवन व्यवहार मे ताने के लिए बहुत बडा कलेजा चाहिये। यह एक शाश्वत सत्य है कि सच्चाई का उपासक पाखण्डी अवसर वादी और चमचा नहीं बन सकता है । .
३६/चिन्तन की धवल धाराए मन को साघो १ उपासना के समय मन घायल शेर के समान आक्रामक बन जाता है परनु जरा साहस करके आगे बढ जाओ, वह सकस के शेर की तरह आज्ञाकारी बन जायेगा। ३ एक हजार दिन तक निरतर दौडकर चपलतम घोडा जितना फासला तय करता है, उससे लक्ष गुणा फासला मन पलक झपकते ही पार कर लेता है। कहा जाता है-एक सकण्ड में प्रकाश की गति एक लाख मस्सी हजार तीन सौ मील है तो मन की अस्सी खरब मील । अनवरतवाही विचारधारा सतत् प्रवाही जलधारा के समान है । उसे जलागार बनाकर लाभ उठाया जा सकता है अन्यथा वह अन त जल राशि सागर में खो जाती है नि सत्व हो जाती है । मझिये या सगमरमरी फश जैसा है -चि तन जितनी घुटाई उतनी चमक। मोगासक्ति जिस प्रकार मिठी चीज की गध पाकर चीटिया जमा हो जाती हैं उसी प्रकार सुदर रूप पर भोगासक्त प्राणी खिंच जाते हैं । जिस प्रकार शक्कर लोलुपो को रात रात भर शक्कर के सपने माते रहते हैं वे स्वप्न की दुनिया मे लघु शिशु के समान हाय उठाकर नाचते-कूदते रहते हैं उसी प्रकार रूपा (भोगा) सक्त प्राणी अपनी प्रिय रूपसी प्रतिमा के स्वप्न देखते रहते हैं और मकट वे समान चचल चालें चलते रहते हैं। रूप रुग्ण रहीश (मशजन्तु) रूप रेगिस्तान में जीवन आनद की तलाश मे मटकते भोले मृग बसी स्थिति में होता है । जिसे यौवन धूप रूपसी चमकती रेत शीतल-सुधा-सुरसरी प्रतीत होती है । चारा ! १ २ सूक्तिया/३७ . १ इस मरीचिका में अपना सवस्व गवा देता है सवथा अतृप्त रहकर ही अमार ससार से विदा हो जाता है। कर्म अपना-अपना जाज्वल्यमान लोहे ने राते धोखते हुए कहा--परमात्मन् अजब तेरी कुदरत, अजब तेरा खेल कि छुछ दर के सिर पर घमेली का तेल' --यह क्या कुदरत की रचना ? नरम कुण्ड मे परितप्त होकर असह्य Tक वेदना भोगी, पण की अनर चोटें खाइ फिर भी मानव के अप प्रयोग ने 'अयश' नाम रखकर यश और श्री हीन बना दिया १ १ भय का चूहा हमेशा कलेजे को कुरेदता रहता है, भय का कीटाणु मानव मस्तिष्क को खोखला बनाता रहता है भय का शैतान नाका चने चबाता रहता है आखिर भय कहते किसे हैं ? एक शब्द म हूं तो मानसिक दुबलता का नाम है--भय । स्याद्वाद स्यादवाद को सशयवाद कहना भ्रम होण शुद्ध अयद्योतक शब्द की आत्मा का हनन करना होगा । वस्तु को अनेक दृष्टिपो से परखना ही अनेकात दष्टि है, भनेक दृष्टियों से प्रतिपादन करता स्यादवाद है । एकात दृष्टिकोण से शब्द-स्वण सत्य को सौटी पर नहीं वसा जाता । उदाहरणाय सग्राम वेदर्दी का अखाडा है तो उसम हमदर्दी का नजारा भी देखने को मिलता है । सजीव शरीर से देखा जाता है तो सुना सूघा, खाया और हला पला मी जाता है। बस ! सक्षिप्त मे यही है प्रभु महावीर पी भनेकान्त दृष्टि । यायाधर सत नदी म बहने वाला निमन जल सोने के समान पवित्र होता है, यायावर निस्पृह सत का जीवन, निलिप्त व निमल होता है । १ ३८/चिन्तन की धवल धाराए महामानव का आभामण्डल १ सूय को चमचमाती किरणो का विकीरण गदगी को जलाकर स्वस्थ जीवन प्रदान करता है, महामानवा का महिमा मण्डित माभामण्डल कुत्सित जीवन को अत्येष्ठी कर श्रेष्ठ जीवन प्रदान करता है। २ उसकी सिंह गजना के सामने बड़े से बड़े लोग बिल्ली बन जाते हैं थर्रा उठते हैं, जिसके चारित्रिक पक्ष या आचार की ओर कोई अगुली नहीं उठा सकता है। विरोध में मुस्कराने वाले महापुरुष १ समता साधक महापुरुषा को पाचन शक्ति कबूतर के समान प्रचण्ड होती है, वे मान-अपमान के क्कर पत्थरो को भी हजम पर जाते हैं । विरोध को विनोद मानबर काटा पर गुलाब के फूल की तरह मुस्कराते रहते हैं। वाले नागा से लिपटा हुमा चदन, उनकी पुफारो में भी अपनी शीतलता नहीं छोडना। आपदाओ को आग म तपर खरा उतरने वाला व्यक्तित्व कुन्दन बनपर घमा उठता है। मौन सा मना व्यक्तित्व है जो समय के भवरी गोले पर रसा-तल मन पहचवर एप-सा बना रहा हो ? उद्देश्य के प्रति समर्पित व वर मिटने का तयार भ्यक्ति सब कुछ पा २ २ ५ सता है। मानसिक र प्राट मरता है कि वह सक्रमण क्षेत्र में है सरमण समय म सवाधिक सावधानी अपतित है । १ मत मारो मिटान लिए नहीं निधारने के लिए आते हैं यदि भार म धंप वार साहम साप झेलने की रामता हा हा रायपी सूक्तिया/३९ २ ३ की सघन आंच में तपकर जा स्वण की भाति निखर उठता है वह अमर इतिहास का अमर शिल्पकार बन जाता है। सषष की चोट पड़ने पर काच की नाई टूटने वालो का इतिहास नहीं बनता, इतिहास बनता है-अटूर हीरो का । सरप से जूझने में जो हथियार डाल देता है, उस कायर का इतिहास नहीं बनता, इतिहास बनता है अमर शहीदो का। संघप को आग म तिनको के ढेर की भाति भस्म होने वालो का इतिहास नही बनता इतिहास बनता है-फौलादी तीरो का। सघष की चट्टान को तोडकर जो राजमाग बना लेता है, वह नवरत्न वसुधरा के नाम को उजागर करता है। संघष की कड़ी धूप, जीवन यश की खेती को लहलहा देती है । सघष का घूमता चक्का विद्युत का पैदा कर जीवन को जगमगा ५ ६ सषप के झझावत में सुमेरु की भाति अडाल व्यक्ति प्रा इतिहास बनता है। काटे की चुभन मे फूल की भाति मुस्कराने वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व महर उठता है। सघप की वजरारी घटाए उमहती, परसती और उछलती जलधार बहा ले जाती हैं, किन्तु जिस वृक्ष को ज. मजबूत हाती हैं यह फलता फूलता रहता है उसके सुहावने मनभावने व मोहन जीवन से प्रेरणा प्राप्त करो और सुसस्कारी समाज का महल पडा परने मे नींव के पत्थर बनो। में जगत को परियम बनाम पुरुषार्थ १ परिश्रम अतुमुप ब्रह्मा व चतुभुज बिष्ण है, जो पशुमुखी विकास के घार घोल देता है और सर्वागीण समृद्धि को बनाये रपता है ।
४०/चितन को धवल धाराए
२ परिश्रम (प्रयत्न) पारसमणी है जो अपने पावन स्पश से दारिद्र यलोह
को समृद्धि व चमक्ते-दमकते स्वण में परिवर्तित कर देता है ।
३ स्वय पर विजय पाना शानदार विजय है और स्वय से स्वय हो परास्त
हो जाना शमनाक पराजय है।
जितनी मेहनत कर नरव पथ का निर्माण किया जाता है, उससे
आधी मेहनत से ही स्वग सोपान का निर्माण हो सकता है।
समूह में रहकर एकात के आनद का अनुभव करो और सत् पुरुषाथ
से पा लो-सच्चिदान द स्वरूप को।
पुरुषाथ अभाव की माग मै झुलमते रेगिस्तान को नन्दनवन म
परिवर्तित कर देता है । नरक को स्वग में बदल देता है । मसाध्य
प्रतीत होने वाले काम को साध्य बना देता है। भले समय लगे-
अग्रेजी कहावत है-"राम एक दिन में नहीं बस गया।
पुरुपाथ पुरुप को पुरुषोत्तम जन को सज्जन, महाजन और जनवद्य
बना देता है।
अतीत से सीख व प्रेरणा लो, वतमान को सवारा और अनागत को
समालो।
सृजनशील व्यक्तित्व मधु पाता है मीठे फल चखता है। ऋषि ने
सुदर गीत गाया--सूय सदा चलता रहता है। कभी आलस्य नही
करता अत चरवति चरवति चलते रहो चलते रहो।
स्वार्थ
स्वाथ को देह पर काफी चर्वी चढ चुकी है अब उसे बहुत तेजी से
भगाने की जरूरत है।
२ क्सिी ख्यातनामा नेता के नाम की माला दिन-रात अपने लोग
नेता की आड (आग) में अपनी रोटी सेक रहे होते हैं।
९
૧
सूक्तियों/४१ १ १ कृत्रितमता धधकता अगारा ऊष्मा देता है प्रकाश नही। प्रोढा हुमा वैराग्य प्रदशन होता है दृष्टि-प्रदाता दशन नही । बुरे विचार सिर पर सवार होकर बोलते हैं, उनको छिपाया नहीं जा सकता और न कट परिणामो से बचा जा सकता है। सकल्प आदमी को युवा बनाती है--सकल्प की रसायन । २ सकल्प एक अगारा (आग का शोला) जो बडे बडे बोहड वनो को कुछ ही क्षणो मे स्वाहा कर सकता है। सकल्प वह प्रचण्ड स्त्रोत है जो चट्टान को चूर-चूर कर अपना पथ बना लेता है । सकल्प एक तूफान है, जिसके प्रचण्ड रूप को कोई नहीं रोक सकता स्वगगा सोने की सडकें और हीरे मोती के भवन और कुछ नहीं मानव मन के पावन विचार (सकल्प) ही हैं । व्यक्ति का उत्थान पतन सकल्पो पर निभर होता है। कुमा खोदने वाला क्रमश नीचे से नीचे उतरता चला जाता है तो भव्य भवन या देवप्रासाद का निर्माण करने वाला ऊपर से ऊपर चढता चला जाता है। ३ ४ ५ साधकका सत्सकल्प १ अबसे मेरे जीवन का नव प्रभात प्रारम्भ हो रहा है, अतीत के जीण शीण व कुण्ठाग्रस्त विचार निस्तेज हो रहे हैं। अब मेरे लिए सवथा अशक्य प्रतीत होने वाला काम शक्य बनता जा रहा है। जीवन मे अघटित घटने जा रहा है। मेरे भीतर विद्यमान परम शक्ति का जागरण हो रहा है। सब मोर से ममता भाव का शीतल मलयानिल बह रहा है। प्रसन्नता व सात्विकता बरस रही है । रोम- रोम प्रसन्नता व सात्विकता से सराबोर हो रहा है। परम मागल्य का ४२/षि तन की धवल धाराएं प्रादुर्भाव हो रहा है। सफलता चरण चूमो लगी है । शाति पाव पखारने लगी है । आत्मविश्वास वा प्रखूट स्रोत पूट चला है । अनादि अन त काल से पला मा रहा म प्रवाह परम पुरुषाथ से अब सूखने लगा है, किंवा कर्मों का कज चुक्न लगा है । मैं सिद्ध, बुद्ध और मुक्त होने जा रहा है। प्राचरण १, समाज सुधार का वाड मय कागजो पर नही जीवन की सवेदनशील चमडी पर लिखना है। २ नेता का परित्र यदि दपण के समान निमल होता है तो अनुगामी को अपने मन को मलिनता का स्वत धाभास हो जाता है। ३ मानवताहीन मतिमान मानव ऊची दुकान है जिसके पक्वान फीके हैं। दूध है मानवता, दूध की थैली या बोतल के समान है मानव, उसकी कीमत दूध स है, सुदरता से नही। बढिया पर्नीचर से सज्जित दुकान, विनय मामग्री के अभाव म न दुकानदार को लाभ पहुँचाती है न ग्राहको को। रत्न जटित स्वर्णा लकारो से अलकृत मानव देही मानवता के अभाव मे न मालिक के लिए हितकर होती है न इष्ट मित्रो के लिए। समय के साथ चलो समय के साथ न चलने वाले धूरे पर फेक दिये जाते हैं । २ रूढ जजर परम्परा का बहिष्कार पुराने सडे गले खून बहिष्कार है। वह प्रागे बढ़ता है प्रतिभावान स्वावलम्बी सुमहत्वाकाक्षी व्यक्ति ही आगे बढता है । दृढ निश्चय अपूर्व कायक्षमता, प्रज्ञा व निडरता जसे गुण जिसमे हो, वह हर क्षेत्र मे बाजी मार जाता है। १ का २ सूक्तिया/४३ १ नम्रता स्वण में नगीन जडे जाते हैं, क्यो ? क्यो का समाधान सीधा सा है कि उसमें लचक है, नम्रता है। नम्रता के कारण हीरे जहा सोना लाखों का मूल्य पा लेता है। कठोर लोहा होरे को स्थान नहीं दे पाता तो लाखो का मूल्य कभी भी नहीं पा सकता । बिनम्न बनने का तात्पथ है--स्वर्ण बनना । उसम उत्तम क्षमा यादि दस धर्मों के जगमगाते हीरे जडे जाते हैं तो वह लाखो का ही नहीं अपितु अमूल्य बन जाता है । बासों पर फूल उग आते हैं, तब उनकी उम्र समाप्त हो जाती है। परमोपयोगी ज्ञान पर अह का फून उगने पर उस तथाकथित ज्ञानी का विनाश निकट आ जाता है। शिक्षा १ माज की शिक्षा प्रणाली ने इतना भूसा एकत्र कर दिया है कि गेहू बीनना कठिन काम हो गया है । २ शरीर में प्राण के समान जीवन में शिक्षा, शोध और साधना का महत्व है। त्याग १ अह आग्रह, विघटनकारी चिन्तन का त्याग ही सच्चा त्याग है। संगठन व विघटन १ विजली के दातार निगेटिव व पोजीटिव वा मधुर मिलन मकान को प्रकाशित कर देता है । पखा, हीटर, रेडियो प्रादि का प्राणवान बना देता है। पृथक्करण सबको निष्प्राण बना देता है। यह है मिलन और बिछुडन की सुपरणिति और दुष्परिणिति । २ तृणो का विघटन घर का कचरे से भर देता है और उनका संगठन बिखरे हुए कचरे को साफ परवे घर को स्वग बना देता है । धागो का विद्रोह उनके ही अस्तित्व को मिटा देता है और सदोह (समूह) ४चिन्तन को धवल धाराएं मजबूत रस्सी का रूप लेकर बलशाली गजेन्द्र को वाघ देने में सफल हो जाग है । तप्त घरतो पर गिरती हुई भाकाश की बूदों का पृथककरण उनकी ही सास को सोख लेता है और समूहीकरण उसके अस्तित्व को उजागर करता हुआ धरती को शस्यश्यामला बना देता है। व्यक्ति व्यक्ति की स्नेहिल एकता उनको सवक्ति सम्पन्न बना देती है तो फूट विनाश के गत मे धकेल देती है। अन्धानुकरण व्यसन और फशन दिनो दिन बढ़ रहे हैं जिनके पीछे लाम अलाभ फा कोई चिंता नही । भेडिया घसाण का सर्वहारा तत्र चल १ रहा है। २ ३ अत्याधुनिकता के चक्कर में नकलची जमाना पिसा जा रहा है । छिछालेदर कुरूढियो को तोडने वालो की नही पानने वालो की करो। दूध का जला १ दुजनो से उत्पीडित व्यक्ति साधु पुरुषों में भी सशक रहता है । संघ है-दूध का जला व्यक्ति छाछ को भी फूक कर पीता है। चापलूसी १ पथाय स्थिति स आख मोचकर चापलूसों से पिरा नेता दुनिया से सवथा षटकर मात्र अपनी खोल मे बद हो जाता है। हिंसा व शांति हिंसा और शांति की जग में मतत विजय शाति की होती है। मुंह बाये पडो हिंसा शक्तियों को कुचालों को विफल करने के लिए समम मा गया है कि शांति के जागरूम प्रहरी एक हो जायें। 1 २ M सूक्तियाँ/४५ व्यक्तित्व १ व्यक्ति अमर नहीं रहता, इतिहास विधायक व्यक्तित्व मात्मा की तरह अकाट्य, मद्यप, अभेदप, अदाह्य मोर अमर होता है । गोली से भौतिक शरीर को छलनी किया जा सकता है, यशोमय २ शरीर को नहीं। ३ व्यक्तित्व यह है जो काली घटा की तरह देखते ही देखते मच पर छा जाए और छोड नाए हरी भरी खुशियाली । वह व्यक्तित्व व्यक्तित्व नहीं जो क्षणिक आतिशबाजी के समान फट फट कर मिट जाए, विलीन हो जाए और छोड जाए वदवू । घास फूस की आग की भाति भभक्कर बुझने वाला व्यक्तित्व व क्त त्व इतिहास नहीं बना पाता, इतिहास बनाता है अमर ज्योति के समान अमर व्यक्तित्व और अमिट कर्तृत्व । आंखों से छलकते निश्चल स्नेह, शालीन व्यवहार और वाणी के सयत प्रयोग से उभरा व्यक्तित्व विसे नही मोह लेता ? ५ नेता १ कुशल नाविय तूफान मे भी दक्षता से नाव खेता हुआ समुद्र पार पहुच जाता है । कुशल अनुशास्ता उफान व तूफान से स्थय को तथा अपने द्वारा अनुशासित धम, सघ या दल को बचाता हुमा अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचा देता है। परिमित ताप में नीबू को कुछ मिनट रहने दिया जाये तो वह सतरे की तरह मोठा हो जाता है, उसम द्राक्ष शकरा पा हो जाती है परतुं अधिक देर तक सेवा या उबाला जाये तो वह कहुवा हो जाता है । तरपारियो मे जो श्वेतसार रहता है वह इसी प्रकार सेंकने पर हा शारा में परिणत हो जाता है। गुरु या अभिभावको मा मीठा व उपयुक्त अनुशासन साधक जीवन को मीठा व स्तुलित बना देता है। अधिक कठोर अनुशासन प्रतिद्वा की कड़वाहट पैदा कर देता है।
४६/चिनन को धवल धाराएं वाचालता अधिक वाचाल काम कम करता है। अधिक पत्रवान वृक्ष फल कम १ देता है । ४ २ यह एक अटल सत्य है कि गजने वाले बादल बरसत नही, बरसने वाले गजते नही मूक काम करने वाले बोलते नही और बोलने वाले काम करते नहीं। ३ वाचालता सध्या का लाल क्षितिज है जिसके पौधे है--गहराता गदराता घना अधकार । कायक्षम मूक्ता प्रात काल का पावन प्रभात है जिसके पीछे है-प्रकाश प्रकाश और प्रकाश की प्रवधमान परम्परा वाचालता मद्रास की वर्षा कालीन झिरमिर वर्षा है जिसके मागे पीछे है--उमस, कीचड गदगी और गदे नालो की उछलती दुगध । मूक कायशीलता वर्णाटक को मूसलाधार वर्षा है जिसके प्रागे पोछे है-शीतल घयार, सडको को स्वच्छता और नयनाभिराम हरीतिमा । बालक और समाज प्रकृति वाटिका का सुदरतम उपहार है-मानव शिशु । उपहार वरदान भी बन सकता है और अभिशाप भी । वरदान या मिशाप बनाना घर, परिवार समाज भोर राष्ट्र पर निभर करता है । बच्च भनछपी किताव छपने जा रहे पृष्ठ हैं उन पर क्या छापना है यह अभिभावको को देखना है । बच्चे अनछपे वस्त्र मण्ड है उन पर सा रग और डिजाइन करना है यह समाज को देखना है। बालर पवन के समान हात हैं । पवन पवन है । न वह सुगधित होती है और न दुगधित । पूल या सडे गले पदाप उसे सुगधित या दुग पित बनाते हैं। १ २ ३ सुवचन मसख्य-मसख्य मानवो में से कोई एक नररत्न पुरुषोतम अवतार लेता है । जिसकी शीतल छाया में मानवता को प्राण मिलता है दुराचार- दुगुण म्प दानव दलन और सदाचार सदविचार और शुभ चितन रूप सज्जन सम्मान को जीधन मिलता है। गीतोपदेष्टा समत्वयोग और अनासक्त कम के उदगाता श्री कृष्ण वासुदेव ऐसे ही पुरुषोत्तम थे, जिनकी उमग दिव्यता, गहन-गरिमा, जनप्रियता, एव भव्यता अपने आप मे अद्भुत अनुपम व द्वितीय थी। १ भाई बहिन के पवित्र प्रेम व रक्षा का अभेद्य कवच लिए रक्षाब धन राषी के कच्चे धागे, अपने मे विराट विश्वास समेटे हुए है। इतिहास साक्षी है--विरोधी विधर्मी व्यक्ति भी राखी के पवित्र धागो के सामने नत मस्तक हो गये। सवस्व होमकर भी रक्षा के दायित्व को निभाते रहे। दायित्व प्रवरण प्राणवान व्यक्तित्व के स्वर निझर फूट पडे कि- प्राकर हमको कसम दे गई राखी किसी बहन की देंगे अपना शीष न देंगे, मिट्टी मगर वतन की। जाल में फसी पानी से बाहर निकाली गई मछलिया तडफडाकर मर जाती है अपने बुने हुए कोये मे बद रेशम के कोडे को झोडा समाप्त हो जाती है, तालाब को कीचड मे फ्सा बूढा हाथी अधमरा होकर छटपटाता है वैसे हो स्नेह जाल में फमा हुमा मनुष्य अपने ही विये कर्मों का उपभोक्ता काम की कोच मे फ्सा कामी प्राणी तडफ-तहफ कर नष्ट हो जाता है और खो जाता है--ससार के बीयावान मानन में । जाज्वल्यमान व्यक्तित्व दीप को न प्रलय कर समुद्र हो लील सकता है ने महाप्रलय की हवाए बुझा सकती हैं न विजय अमोघ शक्ति जसा अकाटय गस्त्र निष्प्राण कर सकता है। साम्य भाव (समता) सुरसरिता का वह सलित है जो अन करण को स्वच्छ, शीतल व शाति सुधा से सराबोर बनाये रखता है । न पाय ४०/चितन को धवल धाराएँ के ताप से तप्त होने देता है और न विकारो को गन्दगी से प्रदूषित हो । आग में सोना शुद्ध होता है रत्न कवल धुलकर मल मुक्त बनती है, आत्मा ध्यान की भाष में तपकर कुन्दन प्रोर भुलकर कम मुक्त बनती है। श्वास प्रेक्षा सजग पहरेदार आदमी मा अप्रशिक्षित मन, लावारिश धमशाला बनता जा रहा है चूकि सजग प्रहरी विवेक दम तोह रहा है चोर बेईमान शरावी, कबाबी या जानवर कोई भी माये, ठहरे या मन आये जब चला जाये रोक टोक करे तो कोन करे । धडल्ले से प्राते अशुद्ध विचारो पर रोक लगाये तो कौन लगाये ? निनानवें प्रतिशत लोग हिल स्टशन माथेरान के इवको वाइट जसे होते हैं उनका अपना कुछ नहीं होता है खाली पहाड है या सूक्ष्म तरग रिपिटेशन सेण्टर है, चिल्लाने पर चिल्लाहट और मत्रोच्चार पर मत्रोच्चारण प्रति ध्वनित होता है। श्वास प्रेक्षा सजग पहरेदार है जो व्यथ कचरे को आने नहीं देता है । अनन्त शक्ति सम्पन्न मात्मा किसी के हाथ का खिलौना नही पूर्ण स्वतन और भाग्य विधाता है यदि प्रेक्षाध्यान साधना से ज्ञावा द्रष्टा भाव का विकास कर प्रतिक्रिया का जीवन जीना छोड दे तो। बीज को वक्ष बनने की सम्भावित समावनायें समुचित खाद पानी और धूप (रोशनी) मिलने पर साकार हो उठती है, मानव शिशु म बोलने पलने आदि की समस्त शक्तिया सत बनने की क्षमता प्राणवान हो सकती है उपयुक्त परिवेश मिल सके पर मे कपरा फैरने वाले भादमी से आदमी सगड पडता है समझ की कितनी विडम्मना है-दिमाग में बचरा भरने वाले व्यक्ति या पील साहित्य को सिर मित्र मानकर आदमी स्वागत करता है। बहुत साफ है इस युग म जाने अनजाने एक दूसरे के दिमाग मे बघरा ठूसा जा रहा है A सूक्तियाँ/४९ मजे की बात तो यह है कि मूच्छित व्यक्ति को पता ही नही चलता कि वह गया ले रहा है? जिस प्रकार चौ रास्ते पर खडा व्यक्ति सरपट भागती कारो को तटस्थ होकर देवता है, सरिता तट पर या फाल्स के किनारे बैठा व्यक्ति सर सर सरकती सरिता या सलिल राशि का निहारता है, अनन्त आकाश तले बैठा मादमी, उमुक्त उडान भरते पक्षियो की कतार को या गगन विहारी बादलो को विभिन्न मुद्राओ को देखता है उसी प्रकार मन के धरा गगन में उठत उछलते विचारो की साधक प्रेक्षा करता है, न उनके साथ कोई छेडछाड करता है न मकावट डालता है उ मुक्त छोड देता है, उडने बहने देता है, तटस्थ प्रेक्षक बनता है तब दिखाई पड़ता है विचार अलग है, वह अलग है, तर होता है अनुपम शाति का अवतरण । पिता-ममस्या या विचारो से घिरा वह हो सकता है परन्तु चिन्ता- समस्या या विचार वह नहीं है । इस बोध के होते ही विचारो के प्राण टूटने शुरू हो जाते हैं । विचार निष्प्राण होने लगते हैं। साधक समझे कि विचार उसके हैं इस चितन से विचारो को जीवन मिलता है। विवादग्रस्त व्यक्ति वह भी उठता है कि ये मेरे विचार है, इससे स्पष्ट है-जैसे मेरा शरीर अलग है, में अलग है, उसी प्रकार मेरे विचार भी अलग हैं-भिन्न हैं । खूबसूरत फूल सुन्दरतम पुखरिया औरो की भूलो, बम-कचरा जैसी फालतू बातो और भपने अह पुष्टि की तकरीरों को भुला देना, बढिया स्मरण शक्ति बढ़ाने का कारगर उपाय है । धन वैभव, सत्ता शरीर वसे ही क्षण विनश्वर है, जैसे वृक्षा का पक्का पत्ता/हवा के एक मोके मै वह धराशयी हो जाता है। मृत्यु शाश्वत सत्य हैं जिसने दिव्य दृष्टि से इस शाश्वत सत्य का अकन किया वह सब क्लेश मुक्त हो गया। स्वाप से उपरत हो, नोति निष्ठ बन गया। इस सच्चाई का साक्षात्कार हो पविकार बनने का मार्ग है प 'अनित्यानुप्रेगा का पनु. चितन बहुत ही महत्वपूर्ण है।'
५०/चितन की धवल धाराएं व्यक्ति, परिवार समाज और राष्ट्र का जीवन धम से सचालित होता है तो व्यक्ति स्वस्थ परिवार सुखी, समाज प्रसन्न प्रौर सम्मन्न राष्ट्र का निर्माण हो सकता है। धम, श्वास के समान अपरिहाय तत्व है। अ ध क्रिया काण्ड का नाम धम नहीं । धम का अर्थ है-मैत्री, समानता स्वतत्रता पोर स्वनियत्रण। महकते फूलो से गुजरने वाली हवा, सुगध और गदगी के ढेर से गुजरने वाली हवा दुगंध वाटती है । उत्तम साहित्य का पठन जीवन को बढ़िया और बाजारू साहित्य का पठन घटिया बनाता है। इतिहास पुरुषों के चमक्ते दमकते जीवन व सिद्धातो का स्वाध्याय स्व अपने आपके अध्ययन निरीक्षण परिमाजन और यशोमय जीवन जीन का माग प्रशस्त करता है। आचार-विचार और व्यवहार सरल होता है तो जिन्दगानी का गरल तरल हो वह जाता है । शहद को एक बूद जो हा सिफ एक बूद, अनगिन मवित्रयो को आकर्षित कर सकती है, तेल का एक घडा नहीं कर सकता । मृदु व्यवहार का मिठास प्रादमी के दिल को खीच लेता है। परायों को अपना बना देता है। मादमी को आदमी से मौर सम्प्रदाय को सम्प्रदाय से अलग रिये रहता है पूर्वाग्रह राह केतु शनि से भी ज्यादा खतरनाक ग्रह है पूर्वाग्रह । दोस्ती के हरे भरे मन भाव ने बाग को माग की आग जलाकर खाक पर देती है। इच्छाए नाखून की तरह बढ़ती जाती हैं। स्वस्थ जीवन (स्वास्थ्य) महत्ते गमकते खूब सूरत फूल की भांति है, प्यार प्रसन्नता सहिष्णुता सदभावना स्थत ता, समता उसकी सुदरतम पहिया है उनमे से एक भी पछुडी को तोडना स्वस्थ जीवन की यूवमूरती को नष्ट कर देना है।
अभिव्यक्तियाँ १ २ जन-जन का सम्मान किचन कीट पतगो की भाति जीवन जीने से नही मिलता वह ता सुमना को भाति सौरभ छोड जाने से, वृक्षों की भाति सब कुछ सहकर अमृत फल प्रदान कर जाने से या महा- पुरुषो की भाति अमिट पद चि ह ससार में सदा सदा के लिए छोड नने से मिला करता है। सातजन- परोपकाराय वतिनद्य सूक्त के अनुरूप नित्य निरतर धम की अलख जगाते हुए मायावर जीवन जीते हैं । व न कभी रुकते हैं न थकते हैं। जन जन म अमृत बांटने के लिए उनके चरण सदा गतिमान रहते हैं। सातजन-'परोपकाराय फलति वृक्षा -पद्य के अनुरूप अध्ययन तपस्या और जाप ध्यान द्वारा जो मात्मान द रूप अमृत फल प्राप्त करते हैं, उहवे स्वय सब कुछ सहकर बिना किसी प्रतिफल की कामना के घरती-पुत्रो म बाटते रहते है । सातजन- परोपकाराय च वाग्विाहा के अनुरूप अहेतुको कृपा दप्टिवश सवजन कल्याण के लिए अमूल्य आत्मनान को सुश वष्टि करते रहते हैं। अगरबत्ती अपने जीवन काल में तिल तिल कर जलती रहती है और सुवास लुटाती रहती है। वह मात भी होती है तो पारिपाश्व के वायुमण्डल को परिशुद्ध करके ही शात होती है। श्रेष्ठतम अगर बत्तियो को धुए के रूप में उठने वाली महक तो जड वस्त्रो तक को ५२ 'चितन को धवल धाराएं सुवासित कर देती है। ठीक इसी प्रकार सात जन, भपने जीवन काल में तो सयम का सुवास लुटाते ही हैं, कि तु जब देह मुक्त भी होते हैं तो अनेक नौसिखिये साथी-साधको को सुवासित कर जाते हैं। उनको उज्जवल धवल साधना जर हृदय साधको के हृदयो को भी चिरकाल तक सुवासित करती रहती है। हठयोगी योगासनो को भी चिर सनातन परम्परा का इतिहास मादि नाथ शिवजी से जोड़ते हैं । उनके मतव्य के अनुसार योग के प्रणेता स्वय शिव हैं । पुराण ग्रथो मे वर्णन उपलब्ध होता है कि एक समय अत्य त निजन वन प्रदेश में शिव पावती को ८ लाख आसन बत लाते हुए योग का उपदेश कर रहे थे तब सौभाग्य से जल की एक मछली ने भी उस उपदेश को सुन लिया । यह जानकर शिव ने मछली पर महती कृपा करके उस नरदेह प्रदान कर दिया। बस ! वही 'योगी मत्स्येद्रनाय' भने । क्या यह पौराणिक प्रसग 'क्षणमिव सज्जन सगतिरेका, भवति भवाणवतरणे नोका' सूक्त को सजीव नहीं बना देता है ? आगम त्रिपिटक और गोतारूप त्रिवेणी का अमृत है कि-मात्मा में अन शक्ति विवा विराट शक्ति विद्यमान है। यदि वह पुरुषाथ को प्रवल करके अपनी विराट शक्ति को जगा लेता है तो उसरे लिए अप्राप्य या असभाध्य कुछ भी नहीं है। प्रबल पुरुषाय के सामने सारे ससार को एक ईश्वर क्तृत्ववादियों के अनुसार स्वय भगवान को भी अपना परता है। शायर ने कहा भी है- 'पदीको तर इतना कि हर तबधीर के पहले। परा यरे से बुरा पूछ बता तेरी रमा गया है ? जन सितावानुसार हर आत्मा मे परमात्मा बनने की क्षमता है । वह अप्राट परमात्मा हो। महा भी है-सकरी में भाति हिपो है मौर मनुष्य में परमारमा । वेदात दान भी इसी भाषा में अभिव्यक्तियाँ/५३ बोलता है--आत्मा । तू क्षुद्र नहीं, महान है तुच्छ नहीं विराट है। भारत की विचार परम्परा जन जीवन मे विराटता का प्राणवान सदेश लेकर चलती रही है। बालक कृष्ण द्वारा माता यशोदा का, शिशु राम द्वारा माता कौशल्या को तथा गीता में श्री कृष्ण द्वारा अजुन को दिखाए गए विराट् रूप का जो वणन मिलता है उसमा तात्पम यही है कि प्रत्येक मनुष्य भपने आप में एक विराट् चेतना लिए हुए घूमता है। हर पिण्ड म ब्रह्माण्ड यानी सम्पूण शक्तियो का वास है । आवश्यकता केवल इस बात की है कि मनुष्य अपनी सोई हुई शक्ति को जागृत भर कर ले। मात्म शक्ति का अवबोध होने पर मानव के लिए कुछ भी दुस्साध्य जंसा रहता नहीं है जैसा कि~महावीर हनुमान ने धीराम से कहा क्या आसमान के तारो को तोडकर ला दू? बाद के टुकडे टुकडे करके इन कदमो पर योछावर कर दू ? समुद्र में आग लगा दू या लका सहित त्रिकूट पवत हो उलट दू ? राह के रोडा की पर वाह नहीं करते हुए सीता माता को लाकर हाजिर कर दू ? क्याकि मैं अपने लक्ष्य के प्रति दृढ प्रतिज्ञ हू अपनी जान अपनी हथेली म रखकर खेलता हू । परतु यह कहा तभी था, जब उह अपनी विस्मृत मात्मशक्ति का भवबोध हो गया था। मनुष्य मे पशुत्व मनुष्यत्व व देवत्व के भाव पाये जाते हैं। उक्त भावो के माधार पर मनुष्य की तीन श्रेणिया बन जाती है, जब पशुत्व उभरा हुआ होता है तब वह अपने हिताहित को न सोचकर केवल प्रेय-ऐद्रिय जय वतमान सुखो के पीछे पागल बनकर दोडता है जब मनुष्यत्व कमरता है, तब वह हर प्रिया के परिणाम को सोचता हुआ श्रेय वायों में प्रवृत्त होता है, जब देवत्व उभरता है तव वह इतना मात्विक बन जाता हैं कि-भपनी सात्त्विक्ता के सौरभ से समस्त संसार को सुरभित करने लगता है। हर आदमी की ६ ५४/चितन को धवल धाराएं पशुत्व से ऊपर उठकर, देवत्व तक पहुंचने के लिए अपने भीतर सोय हुए मनुष्यत्व को अवश्य जगाना चाहिए । मानव ! तू मानव शरीर में सूय या शुक्र जैसा उज्जवल नक्षत्र बनने के लिए माया था कि तु अपनी घिनौनी करतूतो से तू सावित होने लगा हैं-एक पुच्छल तारा, जो अपनी आग म स्वय तो भस्म होता ही है दशको के लिए भी अपशकुन बन जाता है। भ्रमर लघु कीट को उठाकर अपने स्थान पर जा रखता है और उसके चारा और भू भू शब्द करने लगता है। ऐसी परिस्थिति में लघुकीट भ्रमर के भय से उसके रूप का ध्यान एव भू भूश का स्मरण करता हुमा भौंरा बनकर वहा उड जाता है । इसी प्रकार विभावो के अधीन परतमात्मा, परमात्मा का चितन करता हुआ, परमात्मा स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। ९ १० सप द्वारा काटे हुए (दष्ट) अग को तत्मण काट देने से अन्य अगों म विप नही फलता और प्राण रक्षा हो जाती है, ठोर इसी प्रकार पाप के विचारा को उत्पन्न होते ही तत्काल निकाल फैक्ना आवश्यक होता है। यदि वे कुछ क्षण भी टिक गये तो उनका जहर सम्पूर्ण शरीर मे व्याप जायेगा, फिर निविप होना बहुत कठिन ही नहीं होगा अपितु जीवन का भी नि सदेह खतरा हो जायेगा। राख की ढेरी स आवत भीतर मे जाज्वल्यमान अगारे पर से फूक मारकर यदि राख को उड़ा दिया जाए तो वह ज्वाला और महा ज्वाला बनकर विश्व को भस्म करने की और भोजन पकावर जीवन पोवाण देने की क्षमता रखती है इसी प्रकार ज्योतिष्मान आत्मा पर समागत आबरणो को तप, त्याग जप, ध्यान की कूक से परे कर दिया जाए तो देदीप्यमान बनी आत्मा समस्त विकारो को नष्ट घर स्वस्वरूप को क्षण म पा लेने की क्षमता रखती है । R अभिव्यक्तिमा ५५ नमक को एक डली सागर की थाह लेने चली, सतह का पता पाने मचल उठी कितु वह पुन लौट कर नहीं आई। आती भी कैस' क्योकि वह अपने नश्वर नाम रूप को मिटाकर सागर जो बन गई थी। इसी प्रकार सत्सग तथा स्वाध्याय में गात लगाने वाला गोता पोर जीव उन सद्विचारो में घुलकर अपनी खुदी ख्वाहिशो को मिटा देता है और मालिक को जात में (मशगूल) होकर इतना ऊचा दर्जा पा लेता है कि वह स्वय जिन-महत् बन जाता है । १२ पारस के स्पश से लोहा सोना बन जाता है, फिर वह कीचड कूडे कमरे, मिट्टी में या कही भी क्यो न रहे, साना ही रहता है, लोहा नही बनता, न उसे वाट (जग) ही लगता है। इसी प्रकार सद्गुरु के सपक से कुदन यानी अनासक्त बने हुए साधक विषय वासना में पुन कभी नहीं फसते. भोगासक्त नहीं बनते। फिर चाहे व परिवार, वन आश्रम में या चाहे जहा रह, उनको आसक्ति का दाग नहीं लगता। १३ सूखे काठ पर खडे व्यक्ति पर बिजली के तार छू जाने पर भी कोई असर नहीं होता, ठीक इसी प्रकार इद्रिय जय विषय प्राप्त हो जाने पर अनासक्त योगाभ्यासी को विचार नहीं छू पाता, फलत वह विनाश से बच जाता है। १४ विश्व के रग मच पर प्रत्यक्षदर्शी, परोक्षदर्शी एव पारदर्शी दृष्टि में धनी व्यक्ति पाये जाते हैं । वहा प्रत्यक्षदर्शी वैवल वतमान-सी- इन्द्रिय जय सुखलाम पौर परोमदर्शी पल्पना-लोक को उठाने मरते हुए स्वर्गीय सुख लाभ पर दृष्टि टिकाय रखते हैं एव विराम लगा देते हैं वहा पारदर्शी यषाय से हस्तगत करते हुए नश्वर सुष के विरामो को पार करके अक्षण आत्मानन्द को पार ही विराम सेते हैं।
५६/चिन्तन को धवल धाराए १५ जैसे जुमा कधे पर रखे हुए और भार ढोते हुए बस का भी हरी हरी पास पर मुह मारने का मन हो जाता है, वैसे ही मापदाआ और सयोग वियोग के काटों से घिरे हुए मानव का मन भी भौतिक प्रलो भनो और इन्द्रियों के विषयो पर हठात् मापित हो जाता है। १६ इन्द्रिय सुख क्षणिक है -उसका बत कष्टमय है-जवधि अतीन्द्रिय सुख शाश्वत है। अत मनुष्य को इद्रिय सुख के बदले अतीन्द्रिय सुख के लिए प्रयास करना चाहिए चूकि मानव शरीर विश्व को अनुपम कृति है और अतीन्द्रिय सुख प्राप्ति पा एक मात्र साधन है। १७ इद्रिय विषयो मे सुख आनद चाहने वाले प्रज्ञजन अधेरे में भटक रहे हैं धूल में लट्ठ मार रहे हैं मरुमरीपिका में पानी तलाश रहे हैं, पानी या दपण में प्रतिविम्बित हार को झपट रहे हैं, झोपडी मे खोई हुई सूई को नगरपरिषद (म्यूनिसिपल स्ट्रीट) की साइट के नीचे खोग रहे है परतु जो जहा नही है वह वहा मिले तो कसे मिले " १८ खारे पानी के मागर मे शहद की एक बोतल डाल देने से क्या सभीष्ट परिणाम मा सकता है ? विकार, ईर्ष्या जलन से लबालब भरे जीवन मे निष्प्राण क्रिया काण्ड दमान भरी उपासना, ऐरण की चोरी के बाद सूई का दान क्या कुछ परिणाम ला सकता है ? 'अनतिक आचरण, स्वास्थ्य के कट्टर शत्रु हैं। भले ही यह विषय अभी और कसौटी पर कसना बाको हो परतु है सव प्रकारेण तथ्यपूण । तन मन का धनिष्ट सबंध निश्चय पूर्वक सिद्ध हो चुका है। अप राधियो के रक्त व पसीने की यत्रो द्वारा परीक्षा करके 'प्रयोगशालाओं मे वैज्ञानिको ने सिद्ध कर दिया है। एक वैज्ञानिक ने प्रयोग करके लिखा है-बद कमरे मे रहे हुए मनुष्यो के मनोगत ईर्ष्या वासना, अभिव्यक्तियों/५७ पश्चाताप, क्रोध, चिन्ता व शात भावो का पता पसीने से चल जाता है। दिन के उजाले की तरह यह बात स्पष्ट हो गई है कि- -मन को विकृति का प्रभाव तन पर तत्काल पडता है। पश्चिम के एक प्रसिद्ध शरीर शास्त्री ने कहा है- ईर्ष्या, वर व निराशा की तीव्रानुभूति से पट, फेफहा व मूत्राशय मे गम्भीर रोग हो जाते हैं, जो जीवन तक को लील जाते हैं। इस तरह घमशास्त्र, आयुर्वेद व वैज्ञानिक प्रयोग तन मन के अविच्छिन्न सवध के विषय मे बहुत हद तक एक मत हो जाते हैं। . शरीर की चिकित्सा करने लिए नित्य नये चिकित्सालय खोले जा रह हैं परन्तु मशा तात्मा की चिक्त्सिा के लिए क्या कोई चिकित्सा लय खोलने के लिए सोचा जा रहा है ? यदि नही तो भाजही सोचना प्रारम्भ कर दें । क्याकि यह एक ध्र व सत्य है कि उसका चिकित्सक आपको स्वय ही बनना है। २१ मकान व दुकान की गदगो (मलिनता) को दूर करने के लिए तथा हर वस्तु को स्वच्छ बनाने के लिए दीपमालिका जैस लौकिक पदों की सृष्टि हुई है तो मन मदिर को स्वच्छ बनाने के लिए 'पयुषण जसे आध्यात्मिक पर्यो को सृष्टि इसी कारण सब धर्मों में हुई है। वैसे पाप भरी इस दुनिया मे आज शरीर व कपडो की तरह मन को सदा स्वच्छ रखना (करना) मावश्या हो गया है । तथापि पव के दिनों में तो कम से कम साल भर व मनोमालिय को दूर करना परमावश्यक हो हो जाता है । माध्यात्मिक पर्वो की शृखला मे पयुपण या दसला. क्षणिक पप विशेषत सवत्सरी का जैन धर्म में सर्वोपरि महत्व है । २२ वढ निश्चयो, अपने सुदृढ़ व आरितनीय जन हितकारी निश्चय से कर विचलित होता है ? काली छतरियो के भयकर प्रदशन से मेघ- वषण पब कता है?
५८/चितन की धवल धाराएं घरा को गोद को सूनी करने के लिए प्रतिदिन हजारा कुटालें चलती है परतु धरा की गोत कब सूनी होती है ? लाखा पक्षी अपनी तीखी चोच मारते हैं और पानी का शोपण करते हैं । परतु सततवाहिनी सरिता का प्रवाह क्व सूखता है ? हजारो फूल बडी बेरहमी से प्रतिदिन बीन लिये जाते हैं परन्तु डालिया कव सूनी होती हैं । २३ मनमीत । आगे से आगे बढते हो चलो, उजाला हो जाएगा। पायो को गतिशीलता क साथ जोगी की उलझी जटा की तरह बहुत उलझी हुई कठिनाइयो की गुत्थिया स्वत सुलझ जाएगी। याद रखो, गति शीलता ही जीवन है रुकावट मौत ! बहता पानी स्वच्छ रहता है, पोखर मे रुका पानी सडर बदबू फैलाता है। वह स्व पर को हानि, केवल हानि पहुचाता हुआ अपनी मौन मर मिटता है । मानव यति अपने अतर में सोई हुई शक्तियो को जागृत कर लेता है ता एसी कौनसी दुविधा है, जिससे वह उभर नहीं सकता ? ऐसी कौनसी विपदा है, जिसका वह मुकाबला नही कर सकता ! ऐसी कोनमी उलझन है जिसे वह सुलझा नही सकता ? ऐसा कौनसा बोझ है जिसे वह उठा नही सक्ता मोर ऐसा कौनसा ध्येय (साध्य) है जिसे वह पा नहीं सकता ? २५ पर आत्मविश्वासी धुन के धनी महामानव + मजबूत चरण क्रूर श्वापदाकुल यातनाओ रूपी वटवाकीण बीहड वन में भी राजमाग का निर्माण कर लेते हैं। सच ही कहा है- घुन के पक्क कमठ मानव जिस पप पर बढ जात हैं । एक बार तो रोरव को भी स्वग बना दिखलाते है ॥ उधम साहस धैय बल, बुद्धि एव परामम सम्पन्न व्यक्तित्व के समक्ष देव भी पुटने टेक देते हैं जो उक्त गुणा से समलवत होकर आगे बढ़ने अभिव्यक्तिया/५९ कृत सकल्प है, उसका तूफान भी बाल बाका नही कर सकता है। जिस प्रकार ज्योतिर्मान दीपक के जलते हो गहनतम अधकार अपनी मौत मर मिटता है, उसी प्रकार बाधाओ को चीरकर बढन वाले गतिमान तेजस्वी मनुष्य के सामने असफलता समाप्त हो जाती है । गतिमान के लिए हर कठिन मजिल तय कर लेना क्या कठिन है ? छोटा सा निझर पहाडो की ऊबह खाबड भूमि में गति करता हुआ महानदी का रूप लेकर एक न एक दिन महासागर में परिणत हो हो जाता है। समस्त अवरोधो को चीरकर ना साधक सीना तानकर अध्यात्म क्षेत्र में आगे बढता जाता है वह निश्चय ही एक दिन आत्म-साक्षात्कार करने में विवा बीतगग बनने में समक्ष हो हो जाता है। २७ साहस मयम समता, क्षमा सहिष्णुता और दढ आत्मविश्वास जिसके पास है उसके शब्दकोप म पीछे हटना निराश होना जसा शब्द ही नही होता है। धम क्षेत्र के उज्जवल नक्षत्र भगवान महावीर अपने भाप में एक ऐसी अद्वितीय मिसाल है जिसर समक्ष कोई भी मिसाल विश्व इतिहास मे ढूढने पर भी उपलब्ध नहीं होती। २८ पवन पुत्र हनुमान के महाशीय से प्रभावित होकर के ही महासती सीता ने आशीर्वाद भरी मुद्रा मे कहा था 'यदि कही राम मन्दिर होगा तो राम दुलारा भी होगा, सीता लक्ष्मण के साथ साथ वह हनुमत प्यारा भी होगा।' जिस प्रकार हनुमान ने रावण हरी भरी वाटिका का नष्ट कर दिया था उसी प्रकार अनार या नपाय रूप रावण की मनोहर लगने वाली वाटिका को प्रवल पुरपार्थी बनकर नष्ट करना और साधना सीता का वरदान प्राप्त करना है। जल के ठहराव मे बदबू पैदा होती है, ताजा जल म नही । ढियों व ६०/चिन्तन को धवल धाराएं अभयाक्षर जमाव मे जडता की सहाघ पैदा होती है, विवेक परिवतनशीलता मे नही । ३० बदलना ही सृष्टि का नरतरिक क्रम है। प्रथम प्रमाण स्वरूप अयन और ऋतुमओ के परिवतन से होने वाले यूयताप के परिवतन की तरह बदलना मनुष्य का स्वभाव है। समम पाकर विचार, आचार व व्यवहार प्राय बदल जाते हैं और बदलना भी चाहिए। ३१ विभिन्न दृष्टियो मे समानता का आरोपण हितकर नहीं होता कि तु सव धम-सद्भाव का सूत्र हितकर होता है, क्योकि सभी तत्त्वो मे समानता का आग्रह मिथ्यात्व का पोषक होने से जहा घातक है वहा पथाथ को हृदयगम करने वाला दूसरा सूत्र सत्योद्दीपक एव मैत्री का प्रसारक होने से आत्मपोषक है। ३२ वणमाला के आधाक्षर तथा मध्याक्षर 'म से समुत्पन्न अह अर्थात् मैं को जानो। उसे न जानने पर अन्य सभी पदार्थों की विज्ञता क्या मूल्य रखती है । ३३ धरती बीज-वर्षा धूप खाद समय एवं किसान के परिश्रम के सुनियो जन यानि सम्यग् योग से फल, साग धाय किंवा सपूण इष्ट वस्तुओ की प्राप्तिस्वरूप सुफल की उपलब्धि होती है। ठीक इसी प्रकार योगाद्धयमनियम भासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान के सम्यक अनुष्ठान से समाधि रूप किंवा परम आत्मज्ञान रूप सुफल को प्राप्ति होती है। ३४ माज का मनुष्य बातूनी बनकर बोलता बहुत है कि तु करता कुछ मही है। उसकी बातों की तीव्रता द्रोपदी के चीर की तरह फलती जा रही है जिसका न कही ओर है न छोर, बोलने की रफ्तार पवन पुष हनुमान की रफ्तार बहुत तेज होती जा रही है किन्तु हाथ पांव पलाने की यानि काम करने की रफ्तार कछवे जसी मपर भी अभिव्यक्तियों/६१ या अजगर जैसी धोमी होती जा रही है। नहीं नही, वस्तुत उसमें कोई रफ्तार ही नहीं रही है। क्योकि उसको केवल पानी विलीने से मक्खन निकल आने का झूठा (मिथ्या) भ्रम जो हो गया है ! रेत को पेलकर तेल प्राप्त करने का पीलिया जो हो गया है । बस ! वही उसके स्वास्थ्य को गिरा रहा है । ३५ शिव सहिता में कहा गया है- येन ज्ञातमिद सव ज्ञात भवति निश्चितम् । तस्मि परिश्रम काय , किम यच्छास्त्र भाषितम् - जिसके ज्ञान होने से सबका सुनिश्चित ज्ञान हो जाता है उसे हो जानने के लिए सबको प्रयत्न करना चाहिये अय परिश्रम व्यय है। ऐसे निश्चित ज्ञान के होने का प्रत्यक्ष शास्त्र-योग शास्त्र ही है। प्रत उसे ही जानने समझने व क्रियावित करने का प्रयत्न करना चाहिए । ३६ योग साधना में मधिकारी कोन हो सकते हैं ? प्रश्न के समाधान में योग के प्रसिद्ध पाचाय श्री धेरण्डाचाय कहते हैं-"शठ, छली, कपटी दुवल शिश्नोदरपरायण-कामी भोगी ढोगी, पाखण्डी, वेषधारी योग के अधिकारी नही होते हैं । १ विद्याध्ययनरत २ जितेन्द्रिय, ३ शान्तचित्त, ४ सत्यवादी, ५ गुरु सेवा-परायण, ६ मातृ पितृ भक्त, ७ यथोक्त विधि से कम करने वाले, ८ शुद्ध- पवित्र, ९ स्वधम परायण (कतव्यनिष्ठ) १. सरल स्वभावी- ऋजु एव पच्छीलवान व्यक्ति ही योग साधना करने सुयोग्य भधिकारी हो सकते हैं। जल को पनियनित भाप कुछ भी करने में अक्षम होती है जबकि वही नियंत्रित होकर बड़े से बड़ा काय करती है। अस्थिर मन (षचल मन) व्यक्ति कोई भी कार्य सम्पादित करने में सदा अक्षम रहता है, जबकि एकागमन (स्थिरमन जिसे 'चित्त' रहते है। विलक्षण काय सम्पादित करने में सक्षम होता है मत मन को पोसने ३७ ६२/चितन को धवल धाराएं को जरुरत नहीं। जरूरत है उसे साधने की। उसे साधने का सुगम माग है-योग पौर उस योग से ही शरीर एव मन की सारी शक्तियां विकसित होती हैं । ३८ लोहार जैसे एक जगह पर छेनी को मजबूती से रखार हपौडे की चोट करता हुआ चला जाता है, वह नहीं सोचता कि कितनी चोटा से वह लोहा कटेगा, परतु इतना निश्चय जानता है कि वह कटेगा अवश्य । ठीक इमी प्रकार 'ग्रजपा की छेनी बनाकर आप भी निर वर अभ्यास (चोट) करते चले जालो नि सनेह मैदान आपके हाथ में होगा। महा ।!। कितनी अतुलनीय है विश्वमाय महिमा प्रय योग की महनीय महिमा । जिसके प्रथम पाठ-पोगासन व प्राणायाम का सविधि अभ्यास प्रारम्भ करते ही साघम की बत्तिया अन्तमुखी होन लगती हैं । राग-द्वेपात्मक प्रवृत्तियां स्वत विलीन होने लगती हैं । अगात पलात, अस्थिर मन शात व सुस्थिर होने लगता है एव एगो मे सासओ अप्पा गाण दसण सजुओ। सेसा म बाहिरा भावा सव्वे सजोम लक्षणा को विमता प्रगाढ होने लगती है पलत ज्योतिमय आन दमय निजात्म स्वरूप का अनुभव प्रत्यक्ष होने लगता है। योगासन व प्राणायाम के साथ परिमित सात्त्विक आहार और ब्रह्मचय स्वस्थ जीवन के मूलाधार हैं। व्यसन मद्य मास घूम्रपान व अब्रह्मचय रोगो के मूल कारण हैं चूकि उनसे धातुए क्षीण हो जाती हैं। जिसस वात पित्त कफ कुपित हो जाते हैं और कुपित त्रिदोष भनेक रोगो को जम देते हैं। मानस मे वणित मानस रागो की पृष्ठभूमि मे शायद यही निगूढ तथ्य है। रोगो से जजर तन मन का रुग्ण बना देता है। उस रुग्ण मन म काम क्रोध आदि, मानस रोग अतिशीघ्र जम लेते हैं। 1 अभिव्यक्तिया/६३ ४१ ऋपियो ने कहा है-धातुओ से बना शरीर मन के अधीन है । उसके श्रीण हो जाने से धातुए क्षीण हो जाती हैं, अत हर क्षण चित्त की रक्षा करो। स्वस्थ चित्त में सुबुद्धि प्रस्फुटित होती है, जिसमे रोगा मे जूझने की शक्ति क्षमता होती है । दीर्घायु तक निरोग बने रहने का यही रहस्य है । एक बीज, जिसे चाहे कव मे दफ्ना (दबा) दिया जाये तब भी वह अपनी प्राण शक्ति के बल पर मुस्करा उठता है। धरती उसे सह लाती है जल सिंचन जीवन हवा प्यार दुलार और सूय शक्ति देता है, जिससे बढता हुआ बोज इतना दृढ हो जाता है कि एक दिन । गजराज भी उसे उखाडने म असमय हो जाता है। बीज की वृद्धि का आधार क्या है ? क्या धरती जल, हवा, सूय ? क्या उन्हाने उसे उठाया ? नही, उसे उठाने वाली है उसकी अपनी प्राणशक्ति । यदि वह न होती तो धरती उसे दफना देती, हवा उखाड फैकती, जन उसे गला देता, सूय उसे भुट्टे की तरह भून डालता । प्राणशक्ति की विद्यमानता में समस्त शक्तिया अनुकूल बन जाती हैं, वरना प्रतिकूल । इसलिए अपनी प्राणशक्ति को उग इये । फिर दुनिया की काई भी ताकत कुछ नहीं बिगाड सक्ती। ४३ राष्ट्रसघ के सदस्य देशो में से पाच छ देशो को 'वीटो पावर प्राप्त है भले ही वे उसका सदुपयोग करें या दुरुपयोग । मनुष्य मात्र को पाच इन्द्रिया और मन की अद्भुत ताक्त प्राप्त है भले ही वे उनका चाहे जसा उपयोग करें परतु समपदारी उनका सदुपयोग करने में है दुरुपयोग करने में नहीं । ४४ पर्जी और पागल दोनो ही कपटे को काटते हैं । काटने वाला दर्जी विवेकशील तथा सोने में दक्ष होता है । दर्जी के एक हाय ने कैची रहती है तो दूसरे हाय मे धागेयुक्त मूई । वह क्वल काटता ही नहीं है, बड़े प्यार मे सोता भी है। पागत भी काटता है परन्तु ६४/चितन की धवल धाराए बेतरतीब काटता है। फलत कपडा पतरण (छि दी छिदी) बनकर अनुपयोगी हो जाता है, क्योकि वह विवेकहीन एव चैत पाय होता है। समय पर घनश्याम घटायें मासमान में घिर आई तो सारा संसार पुलक उठा, मनमयूर थिरक उठे लेकिन वे ही भोली भाली घटायें सम्मान पाने के लिए बावली होकर असमय में छा गई तो सबके चेहरे कुम्हला गये, सबके सब तिरस्कार-भरी नजरो से उसे घूरने लगे। 'क्षिति जल पावक गगन समोरा, पचरचित यह अधम शरीरा पद के अनुरूप पाच तत्वों के मेल से मानव देह का निर्माण होता है । दूध शक्कर घृत दही और मधु के मेल से पचामृत बनता है और पाच के मेल से 'पचमेल मिठाई बनती है, वसे ही अहिंसा, सत्य अस्तेय ब्रह्मचय व अपरिग्रह के मेल से पूण सयमो जीवन सघता है। जो पप धातु की मूर्ति के समान पवित्र और कल्याणकारी होकर पप परमेश्वर के रूप में परिणत हो जाता है । ४७ नदी के उत्स तक पहुचने वाला ही लघुकाय निझर का मूल्य ओक सक्ता हैं, जगल की मजिल का गही हो जगल में उपेक्षित खडे वक्षों का महत्व माप सकता हैं, नीव के पत्थर के समान उपेक्षित काय कर्ताओं के ठोस काम का मूल्याकन अतद्रष्टा ही कर सकता है। उफनती हुई बरसाती नदियो का उफान क्षणिक होता है, चूकि उनके पोछे कोई ठोस जीवनदानी नहीं होता जबकि सतत वाहिनी शांत सरितामों का प्रवाह नरतरिक होता है कि उनके पीछे ठोस जीवन पानी निसर होते हैं। ४९ बरसाती मेंढ़को की तरह मस्याओ या दलों का निर्माण बहे शोर शराब के साथ आये दिन होता रहता है पर तु जीवनदानी ठोस ४८ T अभिव्यक्तियाँ/६५ कायक्र्ताओं और प्राणवान काय के अभाव म उनका देखते ही देखते नाम शेष हो जाता है । मजबूत चट्टान की तरह ठोस भूमिका पर खडी सस्थायें, बडे ठाठ और उत्साह से रजत स्वण व हीरक जयन्तिया मनाती हुई देखी जाती हैं । ५. किसी भी पवित्र काप के शुभारम्भ में समिति आदि का गठन प्रथम परण वियास मात्र होता है। उसकी सर्वागीण सफलता के लिए पदाधिकारियो व हितच्छ सहायकों की काय मे सतत सलग्नता व जागरूकता हर तूफान (प्रतिकूलता) में मेरु सो अडोलता त्याग और बलिदान की भारी अपेक्षा होती है । ५१ यह सच है कि-किसी भी धार्मिक, सामाजिक या राजनतिक सस्था व सघ के प्रणेता या शोषस्थ नेताओ के गहन चिंतन से प्रसूत मर्यादा निर्णीत सीमा या स्वीकृत सविधान का पालन ही उन उन सस्थाओ- सपों का जीवन होता है। सविधान के सम्यग् पालन पर ही सस्था फ्लती फूलती है । सस्था या सघ के बड़े से बड़े सदस्य की भी अनु शासनहीनता, मनमानी करने की उच्छ खल प्रवत्ति या किसी को गिराने की मावना, सस्था या सघ को ले डूबती है। उस प्रवृत्ति पर करारा प्रहार नहीं होता है तो तानाशाही स्वरूप पनपने लगता है, जो कतई उचित नहीं होता। पर तु सर्वाधिक आश्चय तो तब होता है जब गणनायब स्वय अपने प्रणेता या पूर्ववर्ती नेताओ द्वारा प्रदत्त स्वस्थ मर्यादाओ सीमामो का सरेमाम उल्लघन करता है और वह अपने अनुयायियो से अपेक्षा रखता है कि वे उन मर्यादाओं का अक्षुण्ण पालन करें। यह चिंतन ठीक वैसा ही है जैसा कि घुड सवार स्वय एक दिशा में भागता है और यह अपने घोडे को किसी अ य दिशा में भगाना चाहता है । ५२ हरे भरे विशाल वृक्ष को धनी गहरी जड़ें और गहरी फैलकर जीवन- प्रदा पृथ्वी से अमृत रस खीचती हैं और अपने अभिन्न अगी पक्ष से - --- - ६६/चितन की धवल धाराएं दूर बहुत दूर के प्रत्येक अवयव को मातृ ममता से पोचती हैं, साथ हो वक्ष को बड़ी मजबूती से जकडे रखती है, जिससे सेज हवा के झोंके व तूफान वक्ष का कुछ नहीं बिगाट सर्ने। इस जीवनदायिनी उपरार के प्रति वक्ष के कृतज्ञ पत्ते फूल और फल नई सूरज की नई किरणे फूटने के साथ आभार प्रकट करते हुए नतमस्तक हो जाते हैं। हर नई कोपलें जडो को प्रणाम करती हैं। इतना सम्मान प्रदान करने पर भी गव भार से विरक्त वे जहें प्रदशन नहीं करती चूकि उनका विश्वास काम म है नाम मे नही । भगवान महावीर ने कहा- 'अपराधी भी सुधर सकता है, अत उससे धृणा मत करो। ऐसा कहा हो नहीं अपितु महाकर नर- हत्यारे अजुनमाली तथा रोहिणेय पोर को हिंसक (दया-क्षमा समतावान) बनाया और अपने धम सध में दीक्षित करके दिगभ्रात ससार के सामने एक प्रशस्त उदाहरण प्रस्तुत किया। ५४ हर इसान यही शिकायत करता रहता है कि-'उसके साथ कोई मलाई नही बरतता, जबकि यह तो सबक साथ मलाई बरतता है वह किसी को भी धोखा नही देता जबकि उसको सब धोखा देते हैं, कि तु यह रोना सरासर गलत है। यदि वह दिलोजान से स्वार्थी एकदम ऊपर उठकर पराया भला चाहता है तो सभी उसका भला चाहेंग पदि ऐसा नहीं होता है तो उसे एकदम मुडकर सोचना चाहिए कि कहीं उसकी भलाई म ही कमी है। ५५ ऐसा भी एक युग था जब व्यक्ति अकेला था, गिरि गुहा हो उसका मकान था। राजा-प्रजा, स्वामी सेवक या पारिवारिक सम्बध विक- सित नही हुये थे। उनकी इच्छाए अत्यल्प व लालसाए नगण्य पी तब न अपराध था न दण्ड ने उमाद था न विधान । लेकिन जब से यमाज व्यवस्था का सूत्रपात व विकास हुमा तब से लालसाए भावना अभिव्यक्तियों/६७ बढी, इच्छाए बढी, आपाधापी बढी तो छोना-झपटी, लूट-पाट जसे अपराध बढे। फ्लत सात्त्विक विचार प्रधान मनन-शील मानव मस्तिष्क से मानवहित म मर्यादामो का निर्माण हुआ और दण्ड विधान भी। वे मर्यादाए मनुष्य को पशु जगत से ऊपर उठाने वाली एक अतीव सशक्त रडी बन गई जिनकी उपयागिता आज भी असदिग्ध है। ५६ यदि बल खाती हुई अपक्व मारता यो रोग या मोडा नही जाता है तो वे बहुत शीघ्र ही 'लत बन जाती हैं और उनके बाद उनका छूटना कठिनतम हो जाता है । वहा भी है 'धागो का बना रस्मा हो तो उसका टूटना मुश्किल । जो आदत पड गई पक्की तो उसका छूटना मुश्किल ।" तप जैन शासन प्रमावना व भेद-विज्ञान (मात्मा अलग है और देह भलग) या प्रवल हेतु है । जिसन देह को नश्वरता व आत्मा की अनश्वरता को समझा है, वही उग्र तप कर सकता है । तप भोरो का प्रेरणा प्रदान करने का तथा स्वास्थ्य लाम का भी अमोघ साधन है किंतु मावश्यस्ता होती है-तप व अन तर ऊनोदरी व रसना के स्वाद विजय को। - - ५८ टूटे हुवो को जोडरर एस करने वालो को और जुड़े हुवो को तोड पर दो करने वालो को स्थान व मान सूई व कैची जैसा मिलता है सूई का स्थान उत्तमाङ्ग की शात पगडी है, तो कैची का स्थान उपे क्षित जमी है। विभिन्न वेप भूषा और संस्कृतियो के ईट सीमेट लोहा-लक्कड के मनुदान से अनुसिंचित राष्ट्र स्पी गाय अट्टालिका को तोड़ने के जघय कृत्य मे सलग्न व्यक्ति निपट गवार मजदूर होते हैं तो ईट से ईट । ।
६/चितन की धवल धाराएं जोडकर उसे मजबूत बनाने में उन्नत काम में प्रयत्न रत व्यक्ति चतुर, पलाकार कारीगर होते हैं। ६० कोई भी रिला टूटता है तो पहले उसके कगूरे टूटते हैं, फिर बुज टूटते हैं और फिर दिवारो को भी वारी आ ही जाती है-पदि विधराव होने लगता है तो वह सब कुछ ले ही बैठता है। ६१ मुझे आश्चय होता है-आज का सनस्त मानव अविभक्त मानवता या परमशांति प्रदायक राजमाग को छोडकर विभाजनकारी प्रवत्तियों के कटकाकोण बीहड वन गुमराहियों में न जाने क्यों भटकता है ? ६२ हवा का तेज झोंका अकेले पक्ष को उखाड़ फेंकता है परतु संगठित वक्ष को साथ साथ बहे होकर एक दूसरे को शक्ति देते हैं उसे वह उधाह नही सक्ता ये वही शान से बचे रहते हैं क्योंकि एकता में ही शक्ति है। ६३ तिनको का विघटन घर को कचरे से भर देता है जब कि उमका सगठन घर को स्वग जैसा साफ सुथरा बना देता है । धागों का विद्रोह धागों को ही कमजोर बना देता है जबकि उनका सदोह मजबूत रस्से का रूप लेकर मदो मत गजेन्द्र को बाधने मे समय धन जाता है। पानी की चूदो का पृथक्करण उनके ही प्राणों को सोख लेता है जबकि उनका एकीकरण भूमि को हरित वसना' बना देता है। इसी प्रकार व्यक्ति व्यक्ति की एकता सवशक्ति सम्पन्नता प्रदान कर देती है, जबकि फ्ट विनाश के गत में ढकेल देती है। रावण और कोरवों का सवनाश फूट की कट-कहानी का स्पष्ट प्रार इतिहास है । रण वुशल राजपूतों का पतन विघटन के कटुपरिणामों का परिचायक मध्य युग का सजीव इतिहास है। भीषण दद की द्रावक कहानी को अपने आपल में समेटे हुए भारत माता के अनेकों भासू (टुक्डे) फूट के अद्यतन इतिहास के दुखद भध्याय है। धार्मिक अभिव्यक्तिया/६९ सम्प्रदायो का फूट परस्ती परक इतिहास भी उनसे कोई कम घिनौना ६४ आश्चय होता है कि फूट के कट परिणामो को बहुत बड़ी मात्रा में भुगत लेने के बाद भी, भारतीय जनमानस आज भी उन भीषण परिणामो से कुछ भी नहीं सीख रहा है। अपितु नित नई विघटन कारी प्रवत्तियों को भाषा, प्रात, दल, वण आदि के नाम पर जम देता रहा है। पर तु बारूद के ढेर पर खडे हुए मनुष्य को अतिशीघ्र अब निणय लेना है कि उसे निर्माण प्रिय है या ध्वस ? खुशहाल होना अभिष्ट है या तिल तिल कर मर मिटना ? ६५ आकाश मे शब्द गूज रहा है--मिलावट, मिलावट, मिलावट । मिटामा मिलावट का, डडा लेकर पीछे पड जामो मिलावट के, कर दो मुह काला मिलावट का । कि तु मिलावट सब जगह बुरी नही होती है सजातीय तत्वो को मिलावट और भी निखार ला देती है। कौन नहीं जानता कि-मिट्टी के कण कण मिलकर ईटें बनती हैं ईटो का सघन जाल बिछ जाता है तो दीवारें खडी हो जाती हैं, दीवारी से बना मकान जीवन धन, स्वास्थ्य व परिवार का सरक्षक होता है। अक्षरो की मिलावट से शब्द बनते हैं, शब्दो के घनत्व से वाक्य और वाक्यो की विशाल परम्परा से बहे मे बडे निवध तया शास्त्र प्रय बनते हैं। ६६ नि सग वृक्ष ममता मुक्त महामुनि को सरह अपने समस्त पत्तो को बिना किसी ममत्व नधन के त्याग देता है । वैसे ही साधक को समस्त पारिवारिक सम्बध, शरीर स्नेह एव वभव बघन से स्वयं को मुक्त कर लेना चाहिए। ६७ ससार स्वार्थी है, कौन किसका है ? बेटे पति और परिवार के सबध नश्वर हैं, सब कुछ माया जाल या स्वप्न ख्याल के समान है इसलिए ७०/चिन्तन की धवल धाराएं किसी पर राग (मोहा-द्वेप न करके समभाव में लीन रहना ही कल्याण का माग है। शारीरिक मानसिक वेदना से पीडित और अघोर बने व्यक्ति के लिये उक्त प्रभु वचनामृत का पान, बीमारी में दवा या नदी में नाव के समान एक मात्र सहारा होता है । ६८ शरीर नश्वर है और प्रात्मा अनश्वर । इष्ट देह को या सदेह बात्मा को होता है विशुद्धात्मा को नही। देह भिन्न है आत्मा भिन है । श्रमण भगवान महावीर स्वामी गजसुकुमाल, खधक अगगार जसे परमवीर पुरुपो ने जिस समभाव से कष्ट सहे हैं, उनके आदर्श जीवन हमारे सामने हैं । समागत कष्टो का वीरतापूर्वक सामना करना ही वीरवृत्ति का काम है । वस्तुत समभाव से कष्ट सहने स अपार कम निजरा होती है । कष्ट प्रतीव अल्पकाल का ह फिर भानद ही मानद है। चूकि -- मैंने तप त्याग व सयम से अपनी आत्मा को भावित किया है दुलभ मानव जीवन का यथाशक्ति सार निकाला है। अत समय के वेदना काल में ऐसा विशुद्ध चिंतन हाता है एक मात्म विजयी वीर योद्वा का। 'छाया मिसेण कालो।' शास्त्रकार कहते हैं- शरीर के साथ छाया को तरह काल सदा साथ पलता है। काल (मोत) एक अटल सच्चाई ह। वह प्रत्येक के सिर पर भूत की तरह सवार रहता है। वह कर किस निमित्त स आ जाता ह कोई पता नहीं है। उसके हाथों के मजबूत पजो को पक्ड से पाज तक न कोई बच सका है और न भविष्य म काई वच सकेगा, यह एक प्र व सरय है फिर भी मज्ञानी मनुष्य दोष काल की आशा लगाये रखता है। वह यह नहीं सोवता दि मैं क्व चला जाऊगा, यह सयोग वियोग का हेतु पर बन जाएगा पोई पता नहीं है क्योकि सयोग एक न एक दिन वियोग का हेतु बनता ही है । यह इस ससार की शाश्वत रीति ह-एर घर परिवार म ही नहीं, किसी न पिसी रूप म वियोग दुघ प्राय सबको सेतना अभिव्यक्तिया/७१ पडता है। उससे ससार को, शरीर की, सयोग की एव समस्त पदायों की अनित्यता का ज्ञान करते हुए मुमुक्षु व्यक्ति को अनासक्ति आर मोहत्याग को प्रेरणा लेकर धम जागृति का अलख जगाना चाहिए । धम ध्यान ही सुख-शाति व आत्महित का हेतु होता है, जो चीज चली जाती है, उसके लिए आतध्यान करना अशाति, विपाद व कम- बन्धन की वृद्धि का हतु होता है। उसका उपचार तो 'सच्चा ज्ञान है। यह बात बावन तोले पाव रत्ती सही है। ७० अभिमन्यु तरुण, तन्दुरुस्त, सुदर वीर और नवविवाहित था, भला क्या उसके मरने की आयु या स्थिति थो? महाभारत युद्ध के सचा लक श्रीकृष्ण स्वय उसके सरक्षक व मामा थे, स्वय उसके पिता अजुन महान योदा थे। पर क्या वे अभिम यु को बचा सके ? सच है, काल के सामने किसी का तनिक भी बल नही चलता। ७१ युग वाणी वडी विचित्र है जो उल्ट' पाव चलती है दाने भुनवाने आने वाला लडका दाने भूनने वाले से कहता है पहले मुझे भून दो (दानो को या उसे ?) होटल के बाहर लिखा था यहा पर आदमियो के खाने का अच्छा प्रबध है (आदमी को या भोजन को ?)) मा-बेटे। खाना खा-लो। बेटा-पिताब पढकर खाऊगा (किसान या खाने को ?) पार्टी मे कप कम हो जान से एक उतावला व्यक्ति कहता है मुझे गिलास मे डाल दो (चाय को या उसको ?) उसी उलटी युग बाणी के साचे में ढला हुआ आदमी कहता है कि मैं रहा हो रहा है जबकि वस्तु सत्य यह है कि यथाप मे उसकी उम्र घटती है, बढती नहीं।
७२/चितन को धवल धाराएँ ७२ सुख और शाति न घर मे है, न जगत मे, न पवत-कदरामो मे है, न पवत मालामो के गगन चुम्बी शिखरो पर । न नदी नद के तट पर है, न समुद्र के निजन किनारो पर । न अकेले में है, न परिवार मै । न जीने मे है, न मरने में। वह है स्वय को बदलने में । अर्थात् पारिवारिक व सामुदायिक जीवन मे परिवार या समुदाय के मनु रूप स्वयं को ढाल लेने मे है । क्योकि सामुदायिक जीवन मे सामजस्य बिठाने को, सहिष्णु वन कर जीने की बहुत बडी मावश्यक्ता रहती है। वह सहिष्णुता स्वय को मोड देने से यानि स्वय पर स्वय का मनुशासन करने से प्राप्त होती है । ७३ रोटी खाने वाले व्यक्ति को क्या कहना पडता है कि-रोटी माँ ! मेरी भूख मिटाना। पानी पीने वाले महानुभाव को क्या बोलना पडता है कि-पानी देव । मेरी प्यास बुझाना । सूय-रश्मियों के सेवन करने वाले को क्या निवेदन करना पडता है कि-सूपनारायण ! मुझे गर्मी प्रदान करना। इसी प्रकार भगवान या धम की उपासना करने वाले पुयात्मा को क्या निवेदन करना पड़ता है कि मुझे अमुक-अमुक पदाथ प्रदान करना। ७४ प्रविनीत पुत्र परिवार तथा स्वायपरायण वधु-बाघवों से दुखी पने गृह जीवन म, सुखानुभूति करने वा 'ममर रसायन व्यास ये इस प्रलोक म प्राप्त होता है 'स्वाथ पतिपत्यथ-मात्मीयानीद्रियाप्यपि हित ग्यतीत्य वत ते, मास्या मित्राप्त-यप? स्वाय सिद्धि के लिए जब पपनी इन्द्रियो भो अहितर काप ररने का सत्पर हा जाती हैं सब फिर मित्रो या विश्वसनीय वाघु- मार्यों पर क्या विश्वास दिया जाये ! इसी पलोर के अनुवाद स्वरूप सन तुलसी पर दहा है - अभिव्यक्तियों/७३ श्रवण, नयन, मस, नासिका, कर नही परत कहो। तुलसी दास सुतन पं, आश्चय कौन भयो । ७५ ७६ उच्च विद्या पढने का या शास्त्रा का गहनतम अध्ययन करने का प्रमुख उद्देश्य होता है कि-हममे सहिष्णुता, समता, मात्मानुशासन, एक दूसरे को समझकर मेल-मिलाप कर सकने की क्षमता तथा विपरीत परिस्थितियो म सतुलन बनाए रखने की शक्ति का विकास हो एव हमारे कतव्यो दायित्वों का सम्यक बोध होकर उनमे तत्परता. पूर्वक चलने को योग्यता अजित हो । छात्र अपनी सभ्यता, संस्कृति, दशन तथा महापुरुषो के जीवन का ज्ञान अवश्य करें। जिनके पास शानदार पूर्वजो के सिवा कुछ नहीं है, वे "आलु छाप आदमी हैं जो पूर्वजो के आदर्शों से सवथा कट जाते हैं वे डोर से कटी पतग के समान पतनशील हो जाते हैं, अत पूवजो से प्रेरणा लेते हुए प्राचीन व अवाचीन पद्धतियों को हसमनीषा रखते हुए विवेकपूर्वक अपनाना चाहिए भाव भाषा व पहनावे का न अधानुकरण करना चाहिए और न दुराग्रह हो । भयकर सिरदद से पीडित व्यक्ति बाम की मालिश करके विधाम करता है तो बात समझ म मा सरती है। स्वास्थ्य लाभ का यह तरीफा ठोक हो सकता है, परतु पोहा से कराहता हुमा यदि कोई दर्दी भीत से टकराता है तो उसका यह भीत से सिर फोड लेने की बेवकूफी भरा तरीका, उपचार का सही तरीका नहीं हो सकता। इसी प्रकार छात्र अपनी मांगें शातिपूर्वक प्रस्तुत करें, यानि सत्या- प्रह का स्वस्थ माग अपनायें, यह बात समझ में आ सकती हैं परन्तु जनगण माय सत्याग्रह का राजमाग छोडकर छात्र कानून व्यवस्था का गला घोटकर जन-जीवन को ठप्प पर दे, १६ बात समझ म आने वाली नहीं है । दुराग्रह मा हिंसा का मार्ग देश हित में तो क्या, स्वय ७४/चिन्तन को धवल धाराएं ७८ ७९ मा मे छात्र जगत के हित म भी नहीं होता। देश के आशा केद्र छात्रा से अणुप्रत आह्वान करता है कि वे तोड फोड मूलक हिंसात्मक प्रवृत्ति में भाग न लें। युवका ! यदि आपको पत्पर मारना ही है तो किसी चीज पर नही अपनी उदात्त कामनामो वासनाओं के मारो। आवाज उठाना ही है तो रिश्वत खोरी चोरबाजारी आदि के विरुद्ध उठामो भोर ताकत माजमाओ। मोर्चा लगाना ही है तो देश मे फली हुई उस राष्ट्रीय परित्रहीनता के विरुद्ध लगामो। दूसरे के दाव पर मत खेलो औरों के चढाने पर सूली पर मत घढो, अपनी चाल चलो। यदि लहना ही है तो कुव्यसनो और कुविचारो से लडो जिस से राष्ट्र समाज तथा अपने जीवन में निखार आए । ब्रह्मा की सृजन शक्ति, विष्णु की पालन क्षमता तथा शिवशकर को सहारकता छिपी है । देश के नव निर्माण व पुनरुत्थान में मातामो का अमूल्य योग दान होता है । शिवा को छत्रपति शिवाजी बनाने का येय माता जीजाबाई का हो जाता है। बच्चा की सर्वाधिक महत्व पूण पाठशाला मा और परिवार को गोद है जहा स उह सस्तार मिलते हैं। "मतव प्रथमो गुरु का गौरवशाली पद मातृ जाति को प्राप्त होता है । वतमान में माताए अपने प्राचीन गौरव के अनुरूप अपने जीवन को स्वस्थ सात्त्विक व सयमित बनाकर बच्चो मे सुसस्कार डालने का पुनीत काय करें तो राष्ट्र का सम्यक नव निर्माण हो सकता है। माता के विचारो व व्यवहारो का गभस्थ शिशु पर गहरा प्रभाव पडता है । मनोविज्ञान के अनुसार मां की कोख में ही समस्त कोमल या कठोर भावनामो का विकास शिशु कर लेता है। उस समय के पजित सस्कार माजीवन अमिट रहते हैं। वे ही जीवन में विकसित ८० ८१ अभिव्यक्तिमा ७५ होते रहते हैं, क्यापि शिशु के लिए सर्वाधिक नैरटय मा का ही होता है। जीव विनान की दृष्टि से मा के गर्भ मे शिशु आता है, मा उसे धारण करती है तथा नौ मास तब अपने रक्त से पोषण करती है इसलिए शारीरिक दष्टि से शिशु के निकटतम कोई है तो मा ही है। १२ गृहस्थाश्रम सेवा, सदाचार, सहिष्णुता सहृदयता एप सयम की पाठशाला है। उसमे सर्वाधिक अको से उत्तीण गृहलक्ष्मी जीवन सायो को घमसहाया-सहचरी उभय कुल की मयादा ५ कीति का सरक्षण तथा सवद्धन करने वाली नारी ही घर व ससार को स्वग बना सकती है। ६३ माज का 'मनोविज्ञान स्पष्ट कर चुका है कि जम के बाद ५ साल तक के शिशु मे जो सस्कार निर्मित हो जाते है, वे ही उसके जीवन की अमूल्य पाती होती हैं फिर उनमें भले ही कुछ परिवतन या ह्रास हो सकता है पर मूलाधार वही रहता है। इसी तरह प्राथमिक या माध्यमिक शाला के शिक्षण में प्रदत्त सस्कार भी अमिट होते हैं अत शिक्षक को अपने पद के दायित्व निर्वाह की क्षमता अजित करनी चाहिए। ८४ 'शिक्षक शब्द स्वय में विराट अप लिए हुए ह । शिक्षक इन तीन अक्षरों का मथ हाता ह शि शिष्टता, क्ष-क्षमता, वकतव्य निष्ठा, अर्थात् शिष्ट, सक्षम या क्षमावान तथा कर्तव्य निष्ठ सज्जन ही वस्तुन शिक्षक कहलाने का भधिकारी है । ऐस शिक्षक को सम्मान 'स्वय मिलता है। उसको सम्मान व सुविधा को याचना करनी नही पडती। सम्मान चाहने या मागने से मिलता भी कहा है ? वह तो योग्यता से स्वय मिलता है। ८५ गम्भीर अध्ययन, सुदढ चरित्र, असाम्प्रदायिक भावना, गुणवानो के प्रति सम्मान व सेवा भावना, शिक्षा के मावश्या गुण हैं। उन गुणो - .
७६/चिन्तन की धवल धाराएँ का धनी शिक्षक ही भावी राष्ट्र के कणधार-बालकों का जीवन निर्माण करने का सराहनीय काय कर सकता है। ८६ विश्व के विशाल जलागार 'भाखडा नागल ने पजाब की काया को पलट दिया है । आधुनिक युग में सिंचाई और बिजली (जो प्रगति के मूलाधार हैं, उनके बिना न उद्योग धधे कल कारखाने पल सकते हैं न द्रुतगति से विकास ही हो सकता है) पजाब को सुलभता से उपलब्ध हैं । उस उपलन्धि मे भाखडा नागल का बहुत बडा हाप ह। पजाब की उपजाऊ जमीन उसके पानी द्वारा जीवन लेकर मन्न महार बनी हुई है। इसलिए वह पजाव का प्राण है जोवन है सब कुछ है। वैसे ही सद्गुरु देव, अध्यात्म जगत् के महानतम जलागार होते हैं। शिष्यो को हृदय भूमि, जो सद्विचार और सदाचार रूपी फलो से फलित और पुष्पों से पुष्पित होती ह उसमे सद्गुरु देव का बहुत बड़ा हाय होता है। सदगुरु देव पाध्यात्मिक ज्ञान प्रकाश के विद्युत गृह (Power House) हैं । जैसे अधेरे में डूबा हुआ सारा नगर एक बटन दवाते ही जगमगा उठता है, वैसे ही सदगुरु देव का अतकरण को छू लेने वाला एक ही ज्ञानमयी प्रवचन हजार-हजार, लाख लाख, श्रद्धालुओं के हृदय मदिरों को कमी नहीं बुझने माले झान-दीपों के प्रकाश से रोशन कर देता है । करेगा भी क्यों नहीं ? वस्तुत गुरु की परिभाषा ही होती है-मधेरे को दूर कर देने वाला । 'गुरु गीता का श्लोक भी है "गुकार-स्त्वधवार स्यादुगर स्तनिरोधर । अधार विनाशिस्वाद गुरुरित्यभिधीयते ॥ जो पानी बाग को बुझाता है वही पाज आग को भड़काने लगा अभिव्यक्तिपा/७७ है। जो सजीवनी भूछित को सजीदगी प्रदान करती है वही पाज महामूहित बनाने लगी है । भो माता बन्चो का स्नेह से लालन पालन करती है, वही माज सुरसा बन कर निगलने जा रही है । जो धर्मगुरु सीधा सरल एव सत्य से मनुप्राणित माग बताते हैं वे ही आज कलियुगी स्वाथ से प्रेरित होकर गुमराह करने लगे हैं । लगता है 'पानी में भाग ' की उक्ति चरिताथ हो रही है। ईसा ने कहा है- सूई की नोक से हाथी निकल सकता है, पर धनिको को स्वग नहीं मिल सकता' । इस सूक्त को पलट कर यू भी कह सकते हैं-धम रक्षा के रग विरगे, मन लुभावने पर्दे के पीछे साम्प्रदा यिक तनाव अपने विचारो से मतैक्य न रखने वाले धम गुरुयो के प्रति घृणा का भीषण विष वमन तथा भोले भाले धम प्राण लोगो के मस्तिष्क में असद भावना से परिपूर्ण वातावरण का निर्माण करने वाले तपाकथित धम के ठेकेदार-आकामो को कतई स्वग नहीं मिल सकता। धम को छोडकर सम्प्रदाय सवधन के लिए भागना पदाथ निरपेक्ष आनद को नजर अदान करके पदाथ सापेक्ष सुख के पीछे मधी दौड लगाना घेसा ही उल्टा गोरख धधा है जैसा बैलगाड़ी के पीछे बल बांधने का होता है । उसे घमीटते रहने पर भी बलगाडी चलती नही, यात्रा होती नही. आदमी परेशान होता है परतु मूल को भूल को सुधारे विना परेशानी अदृश्य हो तो कसे हा ? भारत का श्रद्धाशील जन मानस अत्यन्त भावुक घम प्रेमी तथा धमत्कार प्रिय है, फलत बीसवी शताब्दी में इस वैज्ञानिक युग में भी चामत्कारिक प्रवचनकार वपन सिद्ध तथा स्वण सिद्धिधर आदि लुभावने माकषक विशेषणों को छाया में बहुत आसानी से उसे छला मोर ठगा जा सकता है । गम्मीर तात्विक तथा धार्मिक प्रवचन ७८/चिन्तन की धवल धाराएं की आड मे बहे बडे व्यापारियों एव बुद्धिजीवियों से भी एक ही दिन में सैकडो, हजारों लापो रुपये ऐंठे जा सकते हैं अनेक स्थलों पर ऐंठे भी गए हैं। आज भगवन्नाम-कीतन तथा वेप की छाया में शाा व प्रवचन सरे आम विस्ते हैं। प्रवचन जीवन निर्माण के लिए नही व्यापार के लिए होते हैं । साघु या भक्तों का 'याना पहने हुए कतिपय धन के भूसे भेडिये, धमप्राण जनता को भाववता भरी पद्धा पा दुरुपयोग कर भारा को धार्मिक संस्कृति पा अहित कर रहे हैं। प्रोपेगण्डा के इस युग मे वढा चढाकर प्रोपेगण्डा करने वालों के चने भो बिक जाते हैं जबकि न दालने वाले सज्जन पुरुषों के अगर भी पडे पडे सड जाते हैं। किन्तु जमी भासमा को एक कर देने वाले प्रोपेगण्डा के अन तर जव वास्तविक भूखे भेडियो के नग्न रूप सामने आते हैं तब बरबस 'शायर का शेर' स्मृति मे तर जाता है- 'बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का। जो चीरा तो कतरा ए खून निफ्ला ।। घम व संस्कृति प्रेमियों को यदि ऐसे लूट खसाट के युग में धम व सस्कृति की सेवा करना है तो सही तत्त्व को समझना होगा। सच्चे झूठे को परखना होगा । साधु योगी या ढोगी को जानना होगा । जब तक ऐसा नहीं होगा तब सक “भेडिया घसाण' पाली कहावत 'चरिताथ होती रहेगी। जिससे देश, धम व संस्कृति का जो ह्रास हुआ है वह होता ही रहेगा, उसे रोका न जा सकेगा। नट की तरह पाट अदा करने वाले वक्ता श्रोता लाखा करोहों हैं किंतु उनका कहना सुनना ऊपर भूमि में बीज बोने की तरह निष्फल होता है । समय और धम उही वक्ता प्रोतापो का साथक हाता है जो जीवन म उतार कर कहते हैं और सुनकर जीवन में उतारते हैं । मानस के सका काण्ड में राम ने रावण से द्वद युद्ध करने से पहले महा-विश्व मै गुलाप, माम एवं कटहल के समान तीन प्रकार के पुरुप ९२ - अभिव्यक्तियों/७९ होते हैं । गुलाब फूल माम फल व फूल तथा कटहल मात्र फ्ल देते हैं, इसी प्रकार एम पुरुष कहते हैं, दूसरे कहते र करते भी हैं, तीसरे वेवस करते हैं बहते नही । वुद्ध धम्मपद मे सुगधरहित पुष्पो की उपमा मनुष्य के उन पाब्दो को दी है, जो केवल बोले ही जाते हैं उन पर काम नहीं किया जाता । आदमी को बटहल या माम के समान बनना चाहिये । मानय ! तुम लकडी का टुकडा नहीं, नाव बनो । दिशाहीन लकडी के टुकडे के भाग्य में इधर उधर धक्के खाना या किसी गत मे मिट्टी के ढेर के नीचे दबकर मिट्टी बन जाना लिखा होता है। जबकि नाव स्वय तैरती है और अपने आश्रय मे आने वाले शक्ति हीन लोगों को तारती है तो उसका धमक्ता हुमा अस्तित्व सदा बना रहता है । साधक । फिसलन लिए हुए इस संसार की सकडी पगडण्डो पर समल-सभल कर और फूक फूक कर पाय रखना, वरना देख लेना इस अग्नि परीक्षा मे जीरो ही नहीं मिलेगा अपितु हड्डी पसली तर चूर-चूर हो जाएगी। मो साधक ! तुम्ह हो क्या गया है ? तुम लोक-प्रशसा के पीछे इतने मावले क्यों होत जा रहे हो ? लोक कल्याण के श्रुति मधुर नाम पर न जाने क्या-क्या बवेले बहे परत जा रहे हो ? जन-जागरण की अलख जगाने की तह म, लोकप्रिय बनने को आठ प्रहरी रामधुन क्यो सगा रहे हा ' मनभावने नारो वाली मगुलामक्ति को माह में भोले भाले भन्छ मछलियो पर जाल क्या फला रह हो ? बतामो तो सही, गृह त्याग और भक्तों की ममता भरी मोड में क्या तुक है ? याद रखो-तुम्हारे अप-तप मान प्रवचन, जनपल्याणकारी ध्यता व वाणी को मधुरिमा को लोकपणा का भयकर विषधर लोल रहा है। "रात भर चले रहे वही के यही 'मांघो पोमे पाडा (कुत्ता) खामे मुहावरे मुखर रहे हैं। क्या इमीलिए तुमने घर- ८०/पितन की घवल धाराएं परिवार और वैभव को छोडा था? क्या यही था ध्येय साधक जीवन स्वीकार करने का ? क्या यही था दोघशान-साधना का साध्य ? क्या यही या अतिम आराध्य जरा आत्म चिन्तन करो, मोटो जीवन धारा को तोडो गहनतम कारा के बधन को, छोड दो लोक श्लाघा के साधारण काष्ठ को, ले लो कोमती चदन को । कानो को बद करके सुन लो, आत्मा के करुणा दन को और हृदयासन पर विठालो पूण नि स्पृही साधक तथा आत्मज्ञान के महम्य मणि त्रिशलानदन को। १७ ९८ नदी “मैं पन' को (अपने नाम रूप भिन्न मस्तित्व को) मिटा करके ही 'परमात्मा (शुद्ध चैतन्य) मे प्रतिष्ठित होती है। मैं और परमात्मा दो का सह निवास पूर्व और पश्चिम की तरह या एक म्यान में दो तलवारो घ एक गुफा में दो शेरों के सह प्रवास के समान सवथा असम्भव है। कहा भी है- "जब मैं तब 'हरि' हैं नही, जब हरि तब 'मैं' नाय । प्रेम गली अति साकरी, रहिमन द न समाय ।। नदी तभी तफ उफनती है, तटो को तोडती है और नाना प्रकार के विप्लव मचाती है जब तक वह अथाह सागर की गोद में समाधि नहीं ले लेती। अध्यात्म के परम शत्रु- अह के घुमाव पर साधक के बढ़ते परण लहवहा जाते हैं। गति में अवरोध पैदा हो जाता है भटम आने की सम्भावनाए प्रबल हो उठती हैं मनो दूध मे काजो को पद बूदों क समान अह का थोडा सा मश भी अध्यात्म साधना को छिन्न भिन्न करके रख देता है । लम्वे उपवास दोष मौन अनवरत ध्यान । बाह्य पदार्थों का उत्सग अह की विद्यमानता मे सफल नहीं हो सकता । सर्वविदित है कि स्तम्म राम अवियल, मेक सम मप्रसम्म अभिव्यक्तियों/01 - खडे राजर्षि बाहुबली के हृदयकोण मे स्थित तीखा अह सवज्ञत्वलाभ में रोडा बना रहा। एका त सेवी, प्रशात वन विहारी, पौराणिक पहर्षि के तीक्षण अह ने ब्रह्मा द्वारा मुमुक्षु साधको के नामों की विहित तालिका में उनके नाम को समाविष्ट नहीं होने दिया । गुरु नानकदेव जी ने बडा मार्मिक दोहा कहा है-- "तीरथ त अरु दान कर, मन मे करे गुमान । 'नानक' निष्फल जात है, ज्यो कुजर का स्नान ।' नगर का गदला नाला अपने सहोत्पन्न मह को गगा में विलीन करके ही स्नातक बनता है। काली घटाए अपने वैभव के अह को मिट्टी में उद्धेल करके ही जग- जीवन अन्न को प्रदान करती हैं और जगद्धात्री मलकरण से अलकृत होती है। बीज भूगम मे अह को विलीन करके अपने में छपी हुई (निहित) विशाल वट वृक्ष (ब्रह्माण्ड) की शक्ति को प्रकट करता है मोर हजारो का माश्रय दाता बनता है । भई के मुलायम अणु अपने अस्तित्व के अह को मिटा करके हो सुदर दुकूल का आकार पाते है। स्याही को टिकिया अपने मह को पानी में घोल करके हो स्वर्णाक्षरो मैं मकित होकर अमर बनती है । वास्तव में महान बनने की प्रक्रिया मोर सिदि की उपलब्धि मह के विसजन मे ही निहित है। सागर ने सभा बुलाई, नदियो का जमाव होने लगा, गम्भीर गजना मे सागर ने कहा-सारी नदियां प्रतिषष अमूल्य भेंट लेकर आती हैं किन्तु वेत्रवती ! तू कुछ भी क्यों नहीं लाती है ? उस समय बेत्रवती ने षौंका देने वाला यात्म निवेदन प्रस्तुत किया-प्रियवर । १०.
-२/चि तन को धवल धाराएं १०१ मेरे दोनों बोर वैत के वृक्ष खडे हैं जिनकी देही में यथेष्ट व विवेक पूण लचर है जो मेरे खूखार रूप बाढ के सामने झुककर अपनी नम्रता से मेरे तेज को निस्तेज बनाकर रख देत हैं भौर मेरे वेग के निकल जाने के बाद मुझे अगूठा दिखाते हुए पूर्ववत अठखेलियाँ करने लगते हैं। इन मेरी बहनो सरिताओ के तट पर पकडकर सनकर खडे रहने वाले वृक्ष हैं जो शुक्ना तथा सहसा समागत उस आकस्मिक विपनि के साथ शाति समझोता करना नही जानते हैं अत वे गिरत टूटते और सरिताओ के प्रवाह मे बेसुध से बनकर शापये श्री चरणो मे अपने अस्तित्व को सदा सदा के लिए विलीन करने के लिए चले आते हैं । झुकने और अकडने के जीवन प्रद तथा जीवन नाशक परिणाम पर यह पौराणिक सवाद सुदर प्रकाश डालत हुआ दिशा निर्देश करता है । अपार पारावार अपनी उत्ताल तरगा से दूर दूर तक अपना पचस्व जमाने की धुन मे उच्छालें ले रहा था, 'एकाह नायो मे सम वज्रघोष का डिडिम नाद कर रहा था। बिना रुकावट अपने पूरे पुरुषाथ के साथ प्रभुत्व विस्तार की धुन मे था । रत्नाकर, इस पर विभूषण के पद से समलकृत वह अपने श्वेत कण मुत्ता को मुक्तहस्त से लुटा रहा था। काली कलूटो कालिमा को अ तर मे छिपाकर हिम जसो श्वेतिमा का प्रदशन करके श्वेत बनने का अह भरा दम भर रहा था। दुनिया चाहे समल बनाये पर मैं तो अमल का अमल ही हूँ कहता हुमा कूडे को तट को ओर फक रहा था ऐसा अहमरा क्रातिकारी प्रदशन कर रहा था सागर । वह प्रथम क्षण में फैल रहा था धरागण में और उछल रहा था गगनागन में मजब भाग्य का फेर, दूसरे ही क्षण मे देखा गया कि वह विधि के विधानानुसार एक दम उलटे पर लौट रहा था, अपनी कृत्रिम माया को रामेट रहा था, स्वेच्छा से लौट रहा हू-कहता जा रहा था .
अभिव्यक्तियों/८३ -- और मुड मुड पर पीछे याक रहा था पर क्रमश उसका तेज, ववस्व, प्रभुत्व व योवन का उमाद घटता जा रहा था। अत मे खामोश होकर छबडी मे शात नाग की भाति गहरे गर्त मे कुण्डली मारकर सिमट गया वह । जब एक टक्टको से यह सब कुछ देखा तो मुझे तरस आ गई उसकी अहपोषण व प्रदशन की प्रवृत्ति पर ०२ चमकते हुए ये नभ के सितारे रजनी की माग में सिंदूर भरते हुए ये रजनी के अलवार, प्रमा के तम में लडखडाते बलात राही के ये साकेतिक चरण चिह्न, निराशा मे आशा केन्द्र अपनी भरी पूरी जवानी में अपने चारो ओर बिखरी आभा वैभव पर खिलखिला रहे थे और मुस्करा रहे थे कालिख पोत अमा की काली सूरत को देखकर पालिमा की विवशता व प्रभावहीनता पर अपना मस्तक घमण्ड से ऊचा कर जगमगा रहे थे। प्रनत काल तक एक ही रूप में बने रहने को परिकल्पना अपने आप मे समट एव अपने एकाधि- पस्य का सुनहरा स्वप्न देखने मे लीन बने हुए थे पर समय ने पलटा खाया, चूकि परिवतनशील सष्टि का क्रम ऐसा ही है। एक के साम्राज्य का अन्त होता है तो दूसर का साम्राज्य जमता है । सबल निबल को दवाता है। उसके अधिकार को छीनकर अपना अधिकार चलाता है । सृष्टि के अटल नियमानुसार देखा गया है कि क्षितिज मे अशुमाली को ज्योत्स्ना प्रसरने लगी और सितारो की ज्योत्स्ना ढलन लगी। ममा को कालिमा हटने लगी और प्राची की अरुणता बढने लगी। विवश व्यक्तियों को विवशता पर अकडकर मुस्कराने वाले सितारो का मुह लटव गया । उनका ससार गगन की अनन्तता में सिमट गया, रजनी को माग का सिंदूर सूख गया, रजनी ने अपना सतीत्व धम निमाया। सच है, अहकार का साम्राज्य विसे नही निगलता ? यही प्रक्रिया है मन्छ-गलागल की।
८४/षि तन को धवल धाराएँ १०३ अपनी अनगिनत पतों के गम में उतार-चढाव के इतिवृत्त को अन गिनत वर्षों से अपने आप में समेटे हुए तपापूत योगी के समान हप व शोक दोनो मे समरस परिपाश्व मे प्रवाहित हो रहे प्रपातों के बिगुजन म आत्म विभोर बने हुए जीवनदायी काष्ठ भण्डार को अपने पातर म निरहार वत्ति से सुरक्षित रखे हुए स्वस्थ, शान्त और आत्मविभोर बनाने वाले प्राकृतिक सौन्दय, सुपमा एव मन मोहिनी छवि का परित आवेष्ठित क्यि हुए कुछ विशाल शिलाखण्ड दृष्टिगत हुए जो युग युगातरो से तपतपाते, धूप हवा व बौछार की यातना सहते भयकर तूफान व अधड के थपेडो का आलिंगन करते आ रहे हैं फिर भी उसमे स्फटिक को स्वच्छता घवलिमा एव तरुण तपस्या पर मेरा मन मुग्ध हो चला पर जब दूसरी ओर मैंने मुडकर देखा तो श्रेणीबद्ध पाषाण खण्ड दीखे, जिन्होने मुक्तता से स यास लेते हुए महालयों में महती ममता के बधन मे प्राबद्ध होकर किसी समय मे गव, सम्मान और प्रतिष्ठा को गले लगाकर गर्वानुभूति की थी, जि होने एक दिन प्रथम दशन मे ही मानव मन को मुग्ध किया पा कोटि कोटि उत्सवो मे मधुर विगुजन सुने थे कोटि कोटि शुभ स्वप्नो की सृष्टि मे सैर को पी, देव रमणियो-सी सुदर रमणियों के सुकोमल चरण-स्पश से गौरवा नुभूति की थी ससोरम सुमनों को कण्ठ माला पहनी पो एप जिनका इतिहास गव के साथ इतिहास के स्वणिम पृष्ठो मे चमका था पर दुर्दैवोदय कहिये या सम्मान का मतिरेक या विधि को विडवना कह लीजिये कि वे ही पापाण खण्ड आत उदास निराश, हताश एव मतप्राय से बने हुए नाश के दिन गिनते हुए अपवित्र भस्वच्छ एव म्लान से नजर पड़े।
अभिव्यक्तियों/-५ पवत मालामो मे प्रवाम परते समय दोनो दृश्यो का जायजा लेने पर गम्भीर विचारो मे डुबकी लगाते हुए मैंने यह नवनीत पाया वि जो क्षणिक तोपदायिनी उपाधियो एव मानपत्रो से स्वयं को कृताथ समझते हैं व ममता के बंधन मे आबद्ध होते हैं, एक दिन व अवश्य प्लानता व अपवित्रता की बाढ मे लुढक जाते हैं। १०४ जैसे यथाथ में चलता तो भादमो है पर कहता है 'गांव आ गया', इस जनोक्ति से वह आने का श्रेय देता है गाव को। कलव्य परायण व्यक्ति स्वय कनव्य करता है, पर श्रेय देता है अपने आराध्य को। १०५ भगवान भास्कर नई आत्मा लेकर प्राची को गोद मे अवतरित हुए। उनको उज्ज्वल धवल किरणे प्रसरने लगी, तमसावृत्त गिरिक दरामा मे भी रोशनी फैलने लगी। पृथ्वी के कण-कण मे नूतन शक्ति का संचार होने लगा। उस अमृत वेला मे स्वावलम्बी पथिक उपयोगी मावश्यक सामान (जिसमें उसका सारा संसार था) को अपने कधो पर रखकर नई उमग नये उत्साह के साथ मजिल को पाने के लिए निकल पडा। पप की दूरी के मापक पत्थर, एक एक करके पीछे रहने लगे। गावो खेतो के अभाव मे निजन वन की नीरवता व गहनता बढने लगी। पहाडी चट्टानो की टक्कर से उत्पन्न नदियो व नालो के खूधार रव वन की भीषणता को शत सहस्र गुणित करन लगे । तीक्ष्ण शूले और नुकीले पत्थर पावो में चुभकर पथिक के रक्त का चूस कर वीरता दिखाने लगे। धुन का पक्का कमयोगी पथिक उन विपरीत परिस्थितियों में भी रुका नहीं झुका नहीं यका नहीं अपितु लक्षगुणित जोश के साथ मजिल की ओर बढ़ता ही जा रहा था। पथिक की पावन ध्येयनिष्ठा का परिणाम यह हुमा कि वह दुरूह मजिन भी पथिक के पाव पखारने लगी और अपने आचल के फूलो से उसकी भारती उतारने ५६/चितन की धवल धाराए । - । गम लगी। मजिल को पाकर पथिय मुस्कराने लगा और अपने श्रम साध्य अभीष्ट फल का श्रेय, मजिल को ही समर्पित करते हुए एक छोटे वाक्य (मजिल आ गई गाव मा गया) मे विनम्र भारतीय संस्कृति (जो औरो को श्रेयभागी व्यक्त करके मानव को विनम्र बनाये रखने का उत्तम पाठ पढाती है) का मर्मोदघाटन करने लगा। १०६ जब सूत मे गाठ पड़ जाती है, तब उसे सुलझाने का तरीका होता है सूत का बार बार ढोल देते जाना, जिससे बहुत उलझा सूत भी सुलझ जाता है । उलझी समस्या सुलझाने का तरीका भी यही है । ढोल देते जाओ और सुलयाते जाओ। शक्ति बरतने से सूत सूट जाता है वसे ही मापसी सम्बन्ध सख्त व्यवहार से टूट जाते हैं । यदि उहें तोडना नही जोडना है तो असीम धैय को अपेक्षा है । १०७ बरसात होने पर सारी वनराजि प्रफुल्लित हो जाती है सुगध कने लगती है, परन्तु जहा मैला दवा होता है वहा (अवकर) से सख्त बदबू माने लगती है उसी प्रकार सतो की दिव्यवाणी पर भत्ता क मन-मयूर नाच उठत हैं, कि तु दुष्ट हृदय नवासे की तरह कुम्हला जात हैं। कुम्हला ही नही जात उनमे से आलोचना की बू पान लगती है। १०८ जुगाली किए बिना पशुओ का खाना नही पचता निंदा किए बिना निदकों का भोजन नहीं पचता। १०९ जिस प्रकार कवि को कविता किए बिना गायव का गाय विना लेखक का लिसे बिना, व्याख्यानी को व्याख्यान दिये बिना स्वाध्यायी ध्यानी को स्वाध्याय घ्यान धिना, कसाई का जीव मारे बिना तपा घोयी को वस्त्र धाए बिना चैन नही पडता, उसी प्रकार गुणग्राही को गुण ग्रहण किए बिना और निदर का निंदा रिए विना धन नही पडता।
अभिव्यक्तियाँ/७ ११० केवल सास लत रहने का नाम जीवन नहीं है, निर्जीव लोहार की धोनी भी तो सास लेती है। सत्य सादगी, सयम, सेवा, सत्सकल्प आदि यादों के पालन का नाम ही जीवन है । जीवन त्याग म है, मोग मे नहीं प्रेम में है, घणा म नहीं, सदाचार म ह दुरावार में नहीं। १११ प्राणी मात्र व दुख दद से हृदय फटा जाता है तार-तार या छलनी छलनी हा जाता है, जबदस्त अवसाद स भर जाता है कहने वाला तथापित दयालु व्यक्ति मिलावट करते और दहेज मागत समय उस गम का भूल क्यो जाता है ? ११२ रिश्वत, मिलावट, कालाबाजारी, मुनाफाखारी तथा जमाखोरी जस राष्ट्रघातक वाय राष्ट्रीय चरित्र हीनता के जीवत प्रमाण हैं। ११३ मानव की घणा दुगुण से नहीं अथ व्यय से है। यदि ऐसा न होता तो मिलावट, रिश्वत जसे ममानवीय कृत्य नहीं पनपने . मिलावटी माल खरीदत व रिश्वत देत समय जो घणा हाती है वह मिलावट करते या रिश्वत लेते समय समाप्त हो जाती है। इस विधातव प्रवत्ति को समाप्त करने मे ही व्यक्ति समाज व राष्ट्र का हित है। ११४ स्युदा मा बदा खुदा के घर-मस्जिन में जाकर जोर जोर से खुदा को पावाज देता है मितु आश्चय तब होता है जब वही बदा जमीन के एक छोट से टुक्डे के लिये खुदा के प्यारे बदे के खून का दरिया बहाने मे भी तनिक सकोच नहीं करता। भगवान के मन्दिर मे आख मोचर प्राणी मात्र म आत्मवत् भावना की आवाज बुलद करके अचना का दीप प्रज्ज्वलित करने वाला व्यक्ति जब किसी अन्य अचनाशील के प्राण का अपहरण करता है तब मस्तक ठनक उठता ह, रोगटे खडे हो जाते है ।
८८/चिन्तन की धवल धाराएं ११५ लेनिन जब 'वाशिंगटन पोस्ट' में काम करते थे तब उन्होंने वेतन वृद्धि के लिए आवेदन पत्र दिया था। यदि उनके प्रति उस समय सहानुभूतिपूण दृष्टिकोण अपनाया जाता मर्याद उनको उचित वेतन वृद्धि कर दी जाती तो शायद ससार मे साम्यवाद का जम हो न होता। आकार मे यह घटना भले ही छोटी हो पर प्रतिक्रिया को दृष्टि से बहुत बडी बन गई। कभी कभी छोटी छोटी घटनाए और निमित्त आमूल परिवतन कारक क्रातियो के जमदाता बन जाते हैं। कौन नहीं जानता कि महादेव की प्रतिमा पर चूहे को पढते देखकर बालक मूलशकर के मन में एक विचार क्राति ने जम लिया मोर वही विचार आय समाज के प्रवतन का मुख्य हेतु वन गया। १११ एक वृद्धा से एक बार मैंने पूछा-माजी । गीता, महाभारत, रामायण जैसे प्र थो का वाचन (स्वाध्याय) किया करती हो क्या ? सरलात्मा वृद्धा ने कहा-मेरे जसी निरक्षर, विना पढी लिखी बहनें उहे कसे पद सकती है ? हम तो मात्र इतना जानती हैं कि किसी का बुरा नही करना, किसी के बारे म बुरा चिन्तन भी नही करना, किसी को बुरी निगाह से नही देखना, गाली नहीं देना, लडना नही । यदि किसी का मन अपने कठोर व्यवहार व वचन से दुखे तो तरक्षण उससे माफी मांग लेना। यदि कोई अपना बुरा करे तो भी नहवे पूंट पीपर उस व्यक्ति को माफ कर देना और परम शांति वतमयता भगवान का नाम लेना, आदि । काश ! आज के तथाकथित पढ़े लिखे साक्षर तरुण घम के इस जीवन्त स्वरूप को समझकर तदरूप जीवन बना लेते तो- "सारा विपरिताश्चेत् राक्षसा भवति वाली उक्ति साकार नही हो पाती।
अभिव्यक्तियो/९ ११७ सत्य धर्म के माग पर चलकर मपनो पेठ प्रतीत जमाने के लिए व्यक्ति को कष्ट कांटो पर चलना पडता है, बहुत-बहुत खपना व तपना पडता है। उस प्रतिम्रोसगामी परिस्थिति में अनेक लोग घबरा जाते हैं, परन्तु वे क्यो नही सोचते कि पान पैदा करने वाले किसान, पकाने पाते पाचक (रसोइये) और भोजन करने वाले भक्षक को क्या निरन्तर कष्ट उठाना नहीं पड़ता है ? पुत्र को तरुण व योग्य बनाने में मा बाप या अभिभावको को क्या खपना तपना व सहिष्णु बनना नहीं पड़ता है ? ११८ द का अतिरेक दद नही रहकर दवा बन जाता है । जिस प्रकार सूप की किरणों से छनवर जल को बूदें सतरग इद्रधनुप में परिणत हो जाती हैं उसी प्रकार संघर्षों की आच में पिघलता हुआ दद धातुओ के बतनो की तरह एक दिन सुन्दर सुडौल आकार ले लेता है इसलिए दद (दुख) से विचलित मत बनो बल्कि हितकर अतिथि मानकर उसका अभिन दन करो आरती उतारो। ऐसा रहने वाले को लोग-बाग शायद सिरफिरा कहेगे, परतु तथ्य हमेशा विचित्र होता है। कौन नहीं जानता है कि धरती के गभ मे दबा बीज अधकार, नमी कोडो, सडाघ सर्दी गर्मी प्रतिवप्टि तुफान आदि से जूझता हुआ नह से अकुर और अकुर से एक दिन सशक्त वृक्ष बन जाता है । धुध की प्रगाढ परतो वो चीर करके ही सूय रश्मिया धरती देवी के कदमो को चूमने में सफल होती है। भूख से पीडित रोता विलखता शिशु ही माता का अमृतमय दूध पाने में समय होता है । दूध चादी के पिण्ड की तरह जमकर समुद्र मथन की तरह आलोडित विलोडित होकर तथा आच मे तप करके ही मूल्यवान और पोषक घी (घृत अमृत) बनता है। इसलिए कहा गया है-- -~दद का मत्सना भरा तिरस्कार नही मभिपक परा उसे मङ्गलमय प्रभात ९०/चिन्तन को धवल धाराए या दूज के चांद से पूर्व रात्रि के अधवार के समान समझो, जो एक दिन दद दद न रहकर दवा बन जाएगा। सभी जानते हैं-~-लुढकते पत्थरो पर काई नही जमती पषण होने से धातुए जग नहीं पकडती। ११९ वक्ष अपने अस्तित्व को विस्तार देता है मौरो को लाभ पहुचाने के लिए । वह जितना बढता है उतना हो औरो को लाभ पहुंचाता है। पक्षी उस पर घोसला बनाकर रहते हैं पथिक उसकी छाया में बैठकर थकान मिटात है। पते और फल पशुओ और मनुष्यो को क्षुधाग्नि को बुझाते हैं और खाद बनकर घरती को उवरा शक्ति को बढात हैं, फूल वायुमण्डल को सौरभ से भर देते हैं कि बहुनावृक्षों की शुद्ध हवा मानव समूह को प्राणवायु प्रदान करती है । कहना चाहिए-वृक्षो का सम्पूण अस्तित्व दूसरो के लिए ठीक इसी प्रकार महापुरुषो के जीवन वृक्ष का कण कण पूर्णतया पर हिताय होता है, उनकी प्रगति औरो को मिटाने के लिए नहीं, बसाने के लिए होती है उनका विद्याध्ययन व पुरुषाथ मानन को सयम की प्राणवाय प्रदान करने हेतु होता है। १२० गौ सूखा व करवा घास खा करके भी सर्वोत्तम पोषक पदाथ- दुग्ध वै अमृतम् प्रदान करती है उसी प्रकार महापुरुष गरल धूट पी करके या रूखा-सूखा पा करके भी कल्याणकारी अनुभव रूप अमृत प्रदान करके आत्मा को पोषण देत है जबकि वहा आदमी उस बड़े वृक्ष के समान होता है, जिसकी छाया मे बोने से कुछ नहीं उगता या उगे हुए वृक्ष पोषण के अभाव म मर जात हैं क्योकि वह वहा वृक्ष घरती क सारे पोषण को स्वय ही घट पर जाता है। यही है महापुरुष व बड़े आदमी मे मातर । महापुरुष यानि परम हितकारी बहुत बडा यादमी यानि बहुत बड़ा स्वार्थी । १२१ राजा महाराजामों के विशेषाधिकारों की समाप्ति साय देश में नपा पा प्रारम्भ हो गया, किन्तु पतिपय लोगों के स्थान पर बहुत अभिव्यक्तियों/९१ से लोगो का राजसी वैभव भरा जीवन बन जाता है तो देश की साधारण जनता का कोई लाभ नहीं हो सकता। यदि वतमान के नेता व प्रशासकगण सादगी सयम व सदाचार को जीवन में प्राथमिक स्थान देकर नया कीर्तिमान स्थापित करें, तभी देश का अभीष्ट नव निर्माण हो सकता है एव रामराज्य की कल्पना मूतरूप ले सकती है। हालाकि कोई भी धमशास्त्र, समाजशास्त्र या नीति- शास्त्र या दलीय सविधान आडम्बरपूण बोझिल जीवन जीने का आदेश नहीं देता है। अणुव्रत 'सादा जीवन उच्च विचार' के अनुरूप चलने का राजमाग प्रस्तुत करता है। १२२ अमरिका के सुविख्यात कृषि वज्ञानिक वाशिंगटन काबर अत्यन्त सादगो प्रिय व्यक्ति थे। शासन द्वारा प्रायोजित वैज्ञानिक समारोह में एक बार श्री काबर प्रामत्रित थे। समय पर जब व साधारण वेष भूषा में जाने लगे तो उनके मित्र ने उनसे कहा--कावर ! तुम सरकार द्वारा निमत्रित किए गए हो अत कपडे ता अच्छे पहन ली। अपनी मस्ती मे मस्त काबर ने तपाक स कहा-मिन- वर ! यदि सरकार का तडक भडक या भड़कीले वस्त्रो की पावश्यकता है तो एक सन्दूक में बढिया कपडे रखकर समारोह में भेज दो और यदि उसे वैज्ञानिक की जरूरत है तो पोषाक या नही मरा सम्मान करना चाहिए। काबर दे इस एक वारय मे विश्व की उच्चतम सस्कृति का प्राणतत्व Simple living and high thinking सुदरता स मभिव्यक्त हो गया है । १२३ सिफारिश, खुशामद और रिश्वत के इस युग मे कोई नहीं पूछता कि-व्यक्ति मे माग्यता कितनी है, पाण्डित्य कितना है बुद्धि कितनी तीक्ष्ण है चि तन कितना सूक्ष्म है आचार-व्यवहार शोल-स्वभाव बसा है ? अधिकाश यही पूछते देखे जाते हैं-तुम किसकी भवन पालिसी में सिद्ध हस्त हो, यानी किस नता को खुशामद मे व्यस्त या ९२/चि तन को धवल धाराएं मस्त हा ! किस पहुंचे हुए नेता की सिफारिश का प्रमाण पत्र लेकर प्रस्तुत हो। खुशामद तथा सिफारिश के बावजूद सुस्त तो नहीं हो न ? कलियुग के भगवान-पैसो से जे. चुस्त हैं या नहीं ? रिश्वत देने के लिए लाए हो या नही ? यदि लाये हो तो पोबारा है प्रयया दफ्तर के चक्कर काटते रहो और भले ही खून पसीना एक करते रहो, परिणाम कुछ नहीं निकलेगा। १२४ चरित्र के क्षेत्र में व्याप्त सकट का समय रहते हुए यदि सही हल नहीं निकाला गया तो सारा ढाचा ही अराजकता को घट्टान से टकराकर चकनाचूर हो जाएगा। क्योकि, मथ का शैतान लोगो के दिमाग को बड़ी बेरहमी से मथ रहा है। नैतिक अभ्युदय के लिए अथ के उस बाह्य (नाग) पाश की जकड से उसे मुक्त करना आव श्यक है। १२५ राष्ट्र का सच्चा नागरिफ वह होता है, जिसमे सुमन मे सौरभ को तरह राष्ट्रीयता परिव्याप्त होती है। राष्ट्रीयता भात जाति कोम भापा प्रात के कल्पित क्षुद्र विचारो से परे अखण्ड मानवता में विश्वास भ्रातृत्व सादगी सयम तथा आत्म निय त्रण के विकास में गतिशील पाचार व्यवहार । १२६ राष्ट्र क्या है ? राष्ट्रवासियों का शरीर मन एव मात्मा ही राष्ट्र है ? यदि वे दुबल हाते हैं तो राष्ट्र दुवल होता है और यदि वे सबल होते हैं तो राष्ट्र सबल होता है। शरीर-सयम, शुद्ध पौष्टिक माहार और व्यायाम से मन- सद् विचार, सत्साल्प व सदाचार से तपा पारमा-पदा प्रायना जप, ध्यान एव स्व स्वरूप वितन से स्वस्थ पवित्र, सबल व परिपुष्ट बनते हैं। १२७ राष्ट्र-रक्षा के बिना घम व सस्कृति के सरक्षण की कल्पना आकाश समवत् निराधार है। देही देह से ही विदेह बनने की साधना पर .
अभिव्यक्तियों/९३ सकता है, इस दृष्टि से नश्वर देह के बहुमूल्यत्व को भी कोई समझ दार आदमी नकार नहीं सकता है। तब फिर राष्ट्रवासियों के सर्वा. ङ्गीण विकास के लिए, राष्ट्र भूखण्ड के सवतत्र व सुरक्षित हाने के अति महत्व को भी कोई विक्की कैसे नकार सकता है " १२८ महान भारत की संस्कृति, सभ्यता, शालीनता का इतिहास महान है, अत हीनभाव का त्याग करके विस्मृत आत्म शक्ति को जगाना मावश्यक है। १२९ जिस तरह नाइलोन, लिपस्टिक सिगरेट आदि के विशापनो को आक्षक बनाने के लिए आधुनिक साज सज्जा में भारतीय देव वियो के चित्र तेजी से निकल रहे हैं, जिनके विरोध में कही कोई आवाज नही उठ रही है जबकि श्रद्धा प्राण भारत को आध्यात्मिक सस्कृति के साथ यह जुले आम बिलवाड हो रहा है । उसे अतिशीन रोकना चाहिए। १३० विज्ञान ने प्रगति के अनेको आयाम खोज दिये हैं । बड़े-बड़े जलागार (डेम), नहरो का जाल सिंचाई की सुविधा, यातायात के साधनो की सुलभता, हर क्षेत्र में आत्म निभरता को मोर दूतगति से बढते चरण लडाकू विमान और सहारक शस्त्रास्तों का निर्माण, शिक्षा में क्षेत्र में प्रगति के आकडे वस्तुत समसनी पैदा कर देते हैं। आज उन सबको देखकर लगता है कि असम्भव जैसा कुछ भी नहीं रह गया । आज रा मानव आकाश में पक्षियो की तरह उड सकता है. असल सागर में मीन की भाति तैर सकता है दूर, बहुत दूर पर अवस्थित (रहे हुए) पात्मीय जनो से, अपने सामने बैठे हुए व्यक्ति को भाति बात कर सकता है। पदलोक की यात्रा का केवल यधुर स्वप्न हो नहीं देखता अपितु पद्रमा पर निवास करने के लिए उतावला हो रहा है। इतनी अनिर्वचनीय असाधारण प्रगति के ९४/चितन की धवल धाराए । 1 वायजूद लगता है कि उसमे कोई बुनियादी तत्व लुप्त है, जिससे भौतिक समृद्धि का बढता पदम अशक्त व क्ला त होकर किसी एक अजीब सी अत शूयता से लडखडा रहा है। वह शून्यता है- अध्यात्म की। क्योकि एक पाव की प्रगति से पथिक अभीष्ट मजिल तक नही पहुच सक्ता ! मजिल को पाने के लिए दोनो पावो का एक दिशा मे बढना अति आवश्यक है। सोने मे सुगध की तरह भौतिक प्रगति के साथ साथ आध्यात्मिक प्रगति होने पर ही प्रभीष्ट परिणाम मा सकता है। १२१ बचपन के चिताहीन नशो को जवानी छीन लेती है मदमाती जवानी के मजेदार नशो को बेदद बुढापा छीन लेता है । बुढापे के जान हीन मरे खुरे नशो को बेरहम मौत छीन लेती है। छीना झपटीपरस्त इस परिवतनशील पृथ्वी पर हमारा अपना कुछ नहीं है। ये सब नाशवान नशे जिह हम अपना मानते हैं हमसे छिनते ही चले जायेंगे । उम हालत में समझदार वही होता है, जो समय रहते चिर-सत्य का अनुगमन कर लेता है । १३२ शरीर मोटर यात्र मकान या घोसले के समान है तो आत्मा डाईवर, सचालक मालिक और पक्षी के समान है। १३३ तुम शरीर इद्रिया और मन नही-अपितु चत यरूप हो, क्योकि शरीर बुटापे म जजर हो जाता है नेत्रादि इद्रिया क्षीण हो जाती हैं मन सुखी दुखी होता है पर तु तुम न जजर होते हो न क्षीण होते हा और न सखी दुषी। तुम एजजर अक्षीण व आकाश की तरह अलेप हो। १३४ जीवन के तीन प्रकार होते हैं। प्रथम होता है-- सर्वोत्तम दूसरा- 'मध्यम और तीसरा होता है- अधम । सर्वोत्तम जीवन सुमधुर स्वास्थ्यप्रद 'अगूर जैसा होता है जो भीतर और बाहर एक समान अभिव्यक्तियों/९५ सुकोमल व मधुर ही मधुर होता है। मध्यम जीवन 'नारियल' जैसा होता है, जो बाहर से रूखा सूखा पर तु अतर मधुर होता है । जप य जीवन 'बेर" जैसा होता है जो बाह्य मे सुकोमल और अतर में कठोर होता है। (घ) अगूर जसे पुरुषात्तम का अत करण छल प्रपच से मुक्त माधुय से सराबोर सौजन्य से छलाछल परिपूर्ण होता है और उसका बाहरी व्यवहार भी सभ्यता, शिष्टता, शालीनता से मनुप्राणित मिलता है जो अपने और पराये हित मे सलग्न रहता है। अगर तुल्य जीवन सर्वोत्तम जीवन हाता है । (ग) नारियल जैसे, हित शिक्षा प्रदायक सज्जन का भले ही बाहरी व्यवहार थोडा रूखा खुरदरा लगता है परन्तु उसका अत करण सदा परहित मे ही लगता रहता है। ऐसा जीवन भी काफी हद तक स्पृहणीय य वाछनीय है। (घ) बेर जसे निम्न कोटि के पुरुप का बाहरी व्यवहार बडा कोमल, मधुर व मनमोहर होता है, परतु उसका अत करण भत्यन्त कठोर गाठो भरा होता है जो पदापि स्पृहणीय नही होता। हो तो जीवन अगूर जैसा हो अयथा नारियल जैसा तो हो ही गितु बेर बसा ता कदापि न हो। १३५ मैंने नीम से जिनासु भावना से पूटा-मो राजमाग को मान ! पयिष के प्राण ! तुम तुच्छ स्वार्य से ऊपर उठे हुए हो विनिमय यो कामना से मोडे हुए हो परोपकार को साकार प्रतिमूर्ति हो तुम अपने पते, पल पूल, गलियां, दहनियो, हान और जहो मे ही पा अपने कण षण में अनन्त गुणों को समटे हुए हो तुम्हारे स्परा से रोग मुक्त बना हुमा पदन, प्राति रे पण बम में नया र सपार ९६/चिन्तन को धवल धाराए कर देता है तथा अपने परिपाश्व के वातावरण को स्वच्छ बना देता है। मो अमूल्य गुणरत्न निधे ! इतने गुण व हित को अपने आप मे समेटे हुए होने पर भी तुम्हारे मे इतना पड़वापन गयो ? क्या यह अखरे बिना रहेगा ? क्या यह उपेक्षा के भावो को जम नही देया ? सहृदय नीम ने सुरभित पराग विखेरत हुए कहा- सवगुणसम्पन्नता मे सभवत अभिमान शैतान की विजयपतारा फहरा जाये । मेरा मन गव से भर जाए जो कि मुझे क्तई इष्ट नहीं है। इसके सिवा अतर बुरा मुह मीठा' इस तथ्य से मैं केवल कड़वेपन को कही अधिक उत्तम मानता हूँ बशर्ते कि वह अहितकर न हो, मत मेरा निर्णीत तथ्य है-चाहे कदुवा रहू पर परहितकारी बना रहू । १३५ जगमगाते दीपक से मैंने पूछा-तू प्रकाश देकर के भी आखों को हानि नही पहुंचाता है, जबकि आधुनिक लाइटें प्रकाश देकर जकात के रूप मे आखो की ज्योति को हर लेती हैं फलत बच्चे एवं नौजवानो के नेत्र, उपनेत्र से आवरिद हो जाते हैं, इसका हाद क्या है ? सस्मित दीपक ने कहा-मैं अधकार का आहार करते ही तत्काल आत्मग्लानि एव घृणा के साथ उसका धमन कर देता हू, मत महित की सम्भावना नहीं रहती जबकि शान से जगमगाती हुई ये लाइटें केवल अधिकार को पीती हैं कि तु उसका वमन नहीं करती अत ये ज्योतिमय होते हुए भी नेत्र ज्योति के लिए लाभ दायक नहीं होती। १३७ फफोला अपने मतर मे अशुद्ध रक्त व पोप को छिपाये रहता है । विचारे भले आदमी को आराम खान पान, शयन तथा शान्ति से क्षण भर भी बात नहीं करने देता है आराम के आस्पद (स्थान) को आह राम का आस्पद बना देता है । मन के राम को दर-दर का अभिव्यक्तियो/९७ भिखारी बना देता है। उसे खाने को गम गम हलुवा भी दें तो भी वह जड अपने चिरपालित दुष्ट स्वभाव के कारण टस से मस नहीं होता, फिर हारकर भल आदमी को भी सुतीक्ष्ण शस्त्र की शरण लेनी पड़ती है। निमम शस्त्र वे दिल मे दया मया कहा ? वह तो तत्काल उस फफोले का मुह छेद डालता है। उस शल्य क्रिया के फलस्वरूप उसको भतर उमत्तता फूट पडता है और उसकी प्राणघातक दुगध से प्रकृति के कण कण का दम तक घुटने लगता है फिर भी उसे शान्ति कहा! वह अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक तत्रस्थ वातावरण को विषाक्त बनाता हुमा, सडाध पैदा करता हुआ, विषम समस्या भरी नारकीय सृष्टि का सजन करता रहता है पाश । इस धरा में दुष्ट स्वभावी फफोले के प्रिया कलापो या मामाज्य न रहे तो यही मसार स्वग बन जाये । १८ हर आदमी सोचता और कहता है-उसका पडोसी आध्यात्मिक्ता का बडा भारी गम भरता है, पर तु वह भौतिकता पर जान देता है नि स्वाथ होने का दावा करता है, पर तु स्वाथ पर मरता है ब्रह्मचारी होन को पवित्र घोषणा करता है पर तु वासना का दास बना हुआ है नम्रता का प्रदशन करता है पर तु घमण्ड मे चूर है, हस की चाल चतता है परन्तु क्त्तव्य बगुले का है । मोर की तरह मीठा बोलता है पर साप को बिना चवाय और बिना कारे ही निगल जाता है कितु वह भूल क्यों जाता है कि- वह सा है ? सुधार पडौसी का नही उसे अपना करना है। १३९ अतर मे चिरकाल से परिव्याप्त अनल्प अ धकार को दूर करो, सत्य स्वय प्रतिभासित होने लगेगा। पानी मे समागत मिट्टी को दूर करो, पानी प्रपनी सहज निर्मलता के साथ नितर आएगा। यह मत सोचो ९८/चिन्तन की धवल धाराए कि-अन तकाल मे अपना एक छत्र शासन चलाने वाला दढता से कुण्डली मारकर बठा हुआ धनातम या पानी का भारी गदलापन मेरे इस छोट से जीवन के छोट से प्रयास से, वसे दूर हो सकता है ? क्या कभी नहीं सुना दया कि पवतो की अतवर्ती गहरी कदराओ में हजारो वर्षों से कुण्डली मारकर जमा हुआ डरावना अधवार, जिसे चुनौती दने का साहस शायद न तारो मे या, न चाद म न सूय म छोटे से दीपक वे अल्प प्रकाश की एक किरण के प्रथम चरण में ही वह अपनी मौत से मर मिटता है ? फिटकरी के छोटे से ढेले से हजारा गैलन पानी कमे साफ स्वच्छ हो जाता ह ' गहरी चट्टान के कमे बहता हुआ अमृत सागर, एक ही धमाके से चट्टान को फोडकर नीचे हस्तगत हो जाता है ? उत्तर होगा- १४० १७ जनवरी १९७५ की रात को लगभग सवा दो बजे मैंने एक स्वप्न देखा जो यथाथ वे बहुत निकट है। बिहार से उडीसा की धरती पर अविरल बहने वाली शख नदी (जिस पर बने मदरिया वाघ का अथाह गलागार हिलोरे ले रहा है) जो योडी आगे चलकर इस्पात नगर राउरकेला के निक्ट वेदव्यास म कोमल एव जमी से प्रसूत सरस्वती के साथ मिलकर ग्राह्मणी नदी को जम देती है । मैंने स्वप्न मे देखा कि-बाध के उस पार जाने क लिए एक सकरी सी पगडडी बनी हुई है, जिस पर चलना खङ्ग की धार पर चलने जमा है । मैं, मेरे साथी सहार सतो व श्रद्धालु श्रावको सहित सपाटे में पार हो रहा हूँ । अब उस नदी (जिसे हमन बिहार व उडीसा म पुन आते समय पार किया था) के बहाव मे बहुत दवाव देने वाला घुरनो से ऊपर तक का पानी खतरनाक प्रतीत हो रहा था परतु मैं आगे निकला हुआ बहुत करीब पहुंच गया हूँ। अब कुछ ही दाणो का वाम है इतने मे ही नींद खुल गई । में मानद विभोर हो उठा। उस
अभिव्यक्तिया/९९
समय भगवान का परम पावन वह प्रवचन मेरी स्मृति में उतरने
लगा कि-
तिषणोहुसि अण्णव मह,
fr
पुण
चिटठसि तीर मागा
मभितुर पार गमित्तए ममय गोयम!
मा पमायए।
--उत्तराध्ययन १०-३७
सयम की साधना उस सकरी पगडडी से क्या कम है । कठिन परि
स्थितियो का दबाव पानी के दबाव से क्या क्म है ? ऐसा साचता
हुमा मैं उठ बैठा और जप मे सलग्न हा गया ।
एक माच १९८५ के दिन तुगभद्रा पावर हाउस को देखा जलागार
से आने वाले पानी के दवाव से पम्पे बडे जोरा से चलते हुए म पन
करते हैं फलत बिजली उत्पन्न होती है उत्पादित विद्युत को शक्ति-
शाली चुम्बक बीच लत हैं और पदोलम्म से उसका सवत्र वितरण
हो जाता है।
मुझे लगा, अणुप्रेक्षा का मयन विद्युत प्राणधारा पो उत्पन्न करता है
उस अजित प्राणधारा का पूरे शरीर म प्रवाहित पर हम अपने आप
मो आलोषित कर सकत हैं।
तुगभद्रा बांध (टी बी डेम) तथा नक्शा का अवलोकन करते हुए
लगभग दस बजे बैठ गस्ट हाऊस पर पहुंचे। दिन म श्रावक
सम्मेलन को सम्बोधित किया। पम्पादशन टावर पर रात का ध्यान
कर नीचे गेस्ट हाऊस के कमर म लाह 4 पाट (पल्यप) पर मैं सो
गया । नेट की मच्छर दानी का एक र पत्या व दरवाजे बाघ
दिया। रानको ३ बजे परीव उठा कायारसग रिया पुनसान
ये समय पर जय गरीर हिलता तो पत्थर व दरवाजा पम्पित ५
ध्यनित होते। उस समय चिन्तन में नमा प्रमाग उतरा लिविश्व के
ad
१००/चितन की धवल धाराए महानतम दाशनिक युवाचायश्री महाप्रजजी ने अपनी अनुभव पूत वाणी मे कितने बडे सत्य को उजागर कर दिया है कि काया स्थिर वचन व मन भी स्थिर काया रचल वचन व मन भी चचल, मबसे पहले हमे कापोत्सग को साधना है यदि वह सघ गया तो वचन गुप्ति व मन गुप्ति भी सध जाएगी। १४१ प्रात छ पैतोस का समय ठिठुरती हुई धरती, सोने को पार करता हुमा शीतल समोर सुनसान बीयावान वातावरण- मैंने कहा- शायद सूरज भी ठण्डी से डरकर मालसी बन गया लगता है। में कहकर भीतर गया और पुन कुछ क्षणो के बाद माकर देखता हू तो सूय उन्नत ग्रीव बनकर सामने खडा हुआ सुनहरी किरणें बिखेर रहा है-मैंने सोचा, शक्ति सम्पन पुरुपरत्न अपना अपमान तिरस्कार भरा अनादर कब सह सकता है ? १४२ ओ पेड ! तानाशाह शासक की तरह बेरोक टोक तूफानी हवा बह रही है तुम्हें बेमतलब छेड रही है और समता साधम की मुद्रा म खडे हुए तुम्हारे गाव मे पम्पन पदा कर रही है एक हो तुम, जा वीतराग से बन कर टगर मगर देख रहे हो। इसने बेतहाशा बहाय को विरोधी सनिको के रूप मे महकर रोरते क्यो नही हो ? अपनी टहनियो रूपी हटरी से इस ठोक पीटकर सीधा क्यो नहीं कर देते हो ? जिससे यह एक्दम निरपुश हवा भपनी क्रूरता भरी काली करतूतो पर पुनर्विचार करे और इस तरह किसी इ साफपरम व पार रामन व्यक्तित्व को कुचल डालने का अप य अपराध पुन न करे। दार भर रुक कर जोर का अट्टाहास करते हुए पेड ने कहा-मुझे अपने मून पर विश्वास है और विश्वास है स्वय को रक्षा पर सपने पो मतुम क्षमता पर । साथ ही व्यक्ति की स्वतता व प्रकृति को अभिव्यक्तियाँ/१०१ नियामक्ता पर भी पूरा भरोसा है वह व्यक्ति स्वातन्य का इस तरह दुरुपयोग करने वाले को कभी नहीं बख्शेगी। हमारी बातें हो रही थी कि मैंने देखा-झझावातो से आहत पेड पुन पूण स्वस्थ हो कर बड़ी शान से तन पर खड़ा है और दूसरो के अस्तित्व को खत्म करने की जिद्द पर तुली हुई उस तूफानी हवा का अस्तित्व मिट गया है, सिमट गया है उसका निरकुश तथा मनमौजी मस्तानापन । सच है औरो को कुचलने वाला अत में अपनी मौत मर मिटता है तथा स्वय की रक्षा करने में सक्षम सहिष्णु व्यक्तित्व, जन-जन का आदर पाता हुआ अपनी शान म चिरकाल तक बना रहता है। . १४३ महापुरुषो को तजस्विता को चाहे कोई असहिष्णु व्यक्ति लाख चुनौती दे, उनकी मूरत पर कालिख पोतन की कोई चाहे लाख कोशिश करे परन्तु उनकी तेजस्विता घट नही सक्ती अपितु शत सहस्र लक्ष- गुणित बढ़ जाती है। क्या कभी बादल पाद को मिटा सकते हैं शायर ने ठीक रहा है "सज्जनो के शीश पर सबट रहगे कितने दिन ? चाद को घेरे हुए बादल रहगे कितने दिन' सोने को आग म जलाने का वाहे कोई वच भूख मितना भी भगीरप प्रयल करे पर क्या सोना कमी भाग मे जलता है ? उसकी चमक मिटती है ? शेर कितना माकूल है आग मे जल जाय सोना पर चमक जाती नहीं। सिंहनी मर जाती पर घास को घाती नहीं।' चाहे कोई मज्ञ इस को मूरत (गध-ख्याति) को धूमिल करने की कितनी भी कोशिश करे परतु उसके सप्राण कण कण की महक कर मिटती है ? अनुभूत तथ्य है- १०२/चिन्तन की धवन धाराएं । १४४ "इस बी महक मिट्टी में मिलकर भी जाती नहीं । तोह भी डालो तो हीरे की चमक जाती नही ।। चाहे कोई सूय के प्रभा मण्डल को धूलि धूसरित करने का कितना भी प्रयत्न करे, पर उसके प्रभामण्डल को ससार की कोई भी नाकत रोक नही सक्ती । कवि ने राणा प्रताप के मुख से कहलवाया है-- "पोथल ! ये खिमता बादल री, जो रोके सूर उगाली ने । सिंधारी हाथल सह लेवे, बा फूख मिली कद स्याली ने ।।' उपरोक्त पक्तियो का निष्क्ष है-दानव कभी फल पूल नही सकते । पुराणो का नवनीत है कि- देव दानवो का, अर्थात् देवी पौर आसुरी सम्पदा का युद्ध सदा से चलता पा रहा है परन्तु देवी सम्पदा से मासुरी सम्पदा सदा पराजित हाती रही है। राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे, तो रावण भादश प्रतिनायक । वाल्मीकि रामायण के आदश प्रतिनायक रावण का चेहरा अनेक युगोर अनेकानेक कवियो की भाषा भूमि की लम्बी यात्रा करता हुमा, जाने कब से किन्तु प्राज खलनायक के रूप में प्रस्तुत हो रहा है । रावण का असल रूप क्या था आज भी शोध का विषय है। परन्तु प्रचलित जन धारणा के अनुसार रावण अयाय, असत्य एव दुराचार का प्रतीक तया राम याय, सत्य एव सदाचार के मूत रूप माने जाते हैं। विजयादशमी का विजयोत्सव अयाय पर पाय की असत्य पर सत्य की तथा दुराचार पर सदाचार की विजय का चिर प्रतीक है जिसकी स्मृति रावण दहन के प म प्रति वष की जाती है । रावण के पुतले जलाने वाले शायद भूल जाते हैं महर्षि वाल्माकि के उस बथन को जिसे लका से अयोध्या आत वक्त स्वय राम से उहाने कहा या। उनका कहना था कि- माया के इस विशाल न १४५ अभिव्यक्तिया/१० सागर में शरीर लका है जिसमे बैठा हुआ महनार रूप रावण डका बजा रहा है स्वाथ मेघनाद है आलस्य कुम्भकरण है जो अहकार रूप रावण का साथ दे रहे है । हे भगवान ! जब आप अपने कृपा के वाण से उनका वध करेंगे, तभी भू भार हरण हो सकेगा।' तात्पय हुआ कि अह, स्वाथ व आलस्य का त्याग होना ही वास्तविक भू भार का हरण है, जो प्रत्येक को करना है। घमण्ड का रूप धनमानस मे उच्छ पलता उद्दण्डता के रूप में, आलस्य अक्मण्यता कतव्यहीनता से भरा हुमा, स्वाथ पद सता धन आदि स पुष्ट बना हुआ दितो दिन और घरोघर बढता जा रहा है फिर कैसा पुतलो का दहन ? लगता है स्वय रावण भी जनता की इस विमूढता पर हस रहा होगा । आज हमे प्रचलित प्रतीको के सूक्ष्म सता को समझना चाहिए । अन्यथा प्रावित दश भाय जाति और आय सभ्यता का विकास किसी भी हालत मे नही हो सकगा। १४६ उडीसा प्रान्नीय राजपथ नम्बर दस पर हम लोग चल रहे थे । सडक के धुमावदार टेढेपन व कारण, हमारा मुख एक ही दिन ब बिहार म पूर्व ईशान उत्तर, वायव्य और पश्चिम दिशा में हाता रहा । सडक 4 टेढेपन पर मरे मुख से सहसा निकल पडा-सडक ! तुम्हारी चाल सप की तरह कुटिल क्यों है ? हम जसे पदयात्रियो का तुम्हारी यह पुटिल चाल बहुत खलती है। क्या तुम सोधी और एक्दम सीधी नहीं हो सकती हो जिससे पथि अपने गतव्य को शीघ्रता स प्राप्त मरलें और उस समय व शक्ति का अपव्यय न हो। मुपे आभास मिला कि-मरे इस प्रश्न-परख लम्बे वक्तव्य पर सहा मरे पावो से लिपटवर मुस्करा दती है और सप को तरह रल खाती हुई कुछ बोल उठती है। मैंने फान लगा पर गौर से सुनना थाहा तो मुझे प्रतीत हुआ, वह अपनी अव्यक्त वाणी म बहन गम्भीर रहस्य १.४/चितन को धवल धाराएं समझाती है, कि-मुने ! इसमे क्या पाश्चय है, अतमन के काले तो सदा कुटिल चाल ही चलते हैं। कितना सच था और कितना वास्तविक या उसका कहना ! १४७ १० जनवरी १९७४ की प्रात काल का समय था, राजगागपुर (उडीसा) स्टेशन के ठीक सामने वाली घमशाला के दक्षिणाभिमुखी खुली छत पर बैठे हुए हम वस्त्र पक्षालन कर रहे थे। रेलगाडियों का माना नाना बराबर चालू था। इतने मे चोखती हुई हावडा एक्सप्रेस ने सहसा हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। मैं बोल उठा-प्रो हो । गाडी के डिब्बे धुएं से कितने काले हो रहे हैं । "तमी तो रेल यात्रा करते समय कपडे एकदम काले हो जात हैं मुनि श्री फतहन द जी 'पकज ने मेरे स्वर मे स्वर मिलाते हुए उपरोक्त वाक्य कहा। इजन से निकलने वाले गहरे धुएं के बादलो ने पुन मेरा ध्यान आकृष्ट किया तो मरे मुख से सहसा निकल पड़ा-जो बाहर से भी काला है अतर से भी काला है, जिसका आहार भी काले कोयलो का है, वह औरो को काला नहीं करेगा तो क्या करेगा ? १४८ मछली सदैव जल म वास करती है और गाम थल म, मछली का गगा स्नान हर क्षण होता है, गाय का कमी-कभी फिर भी स्मा कारण है कि गाय को माता के समान सम्माननीय पद प्राप्त होता है, मछली को नही ? धारण दिन के उजाले की तरह बिलकुल स्पष्ट व सवगम्य है कि सात्त्विकता को प्रतीक गाय का हृदय मछली को अपेक्षा अधिक पवित्र व शुद्ध होता है वस्तुत हृदय को पवित्रता ही महत्ता प्रदान करती है रग रूप या जल स्नान नहीं । १४९ उपवन के आंचल में अनतानत रग विरग फूल खिलत हैं मानो वे नई साजगी, नई स्फूर्ति और नई उमगो भरा प्राकृतिक अछूट भण्डार अभिव्यक्तिया/१०५ सृष्टि के सामने प्रस्तुत करते हैं। उन सुमनों के सौरभ पर भोगी भ्रमर भ्रामरी प्राणायाम में खोये हुए से मडरात हैं तो कही योगा राधक योगी उस सतत प्रवाहिनी स्वस्थ और शात सुमनो व सौरभ को सात्त्विक सजीवनी साबित करन म तुले हुए हैं । एम पुष्पनिकुञ्ज मे विहार करते हुए मैंने देखा- सुघड वनमाली के हाथो स गू थो हुई प्राणवान फूला की मालायें कही नेताओ की गल हार बनकर मुस्करा रही हैं तो कहा सुकोमल कर कमलो से केशाभरण बनाई जा रही हैं तो कही श्रद्धालु सज्जन श्रद्धास्पद के पावन चरणो मे समर्पित करने के लिये सुमनो को चुनने में जुटे हुए है तो कही भ्रमर आरती उतारने में सलग्न है, मैं सुमनो के भाग्य पर मुग्ध था किन्तु मैंने ज्या ही थाडा झुककर जमी पर झाका ता मैं स्तब्ध रह गया पतित व सुगधहीन पुष्प निममता से पैरो तले रोंदे जा रहे हैं। पर भर मैंने सिर को खुज लाया तो तत्व दशन मिला-पतित व गुणहीन कब सम्मान पाता है ? शाश्वत सत्य है कि पतित सदा अवहेलित ही होता है। १५० स्वणभूम की पद यात्रा करते समय एक अव्यक्त ध्वनि काना से टकराई- सोने ने सोना हराम कर दिया है। युगीन परिस्थितिया का नारा बुलद हुआ, पर हाय ! अज ता का नारा बुलन्द हो रहा है। जो सोना एक दिन धनिक का शृगार व भूमे का आधार गिना जाता था, वही आज विष गिना जाने लगा है। जिस माने की टिक्यिा से ब्लैक क धन को हजम किया जाता था, जिस सोने के चूण से रिश्वत में मिली हुई भेंटो को पिछले माग से उस पार किया जाता था, जिस साने के इजेक्शना स उभरते हुए रोगो का तत्क्षण दबाया जाता था जिस सोने के बहुमूल्य आभूषणो की चकाचौंध से गरीनो पर रोव जमाया जाता था जिस सोने की काली छाया में धन पापो को पाला जाता मे "आराम हराम सोना हराम १०६/चितन की धवल धाराएं " था एव पापकारी कृत्यो पर आवरण डाला जाता या हाय ! आज वही साना 'साप छछदर पी लोसोक्ति को सफल सिद्ध करने में तुला हुआ है शायद इसीलिए वषि के स्वर यू फूट निक्ले है "सोना ! तू तो बडा कुपातर तुने हमको टवार किया। तू तो सोये वही नीद मे हमको चौकीदार किया १५१ जिस राष्ट्र, समाज या घम सघ का नेता, अगुवा या अनुशास्ता यदि छाटे गरीब पर तु अद्धाशील ईमानदार अनुगामियो को तथा ठोस कमठ पायर्तामा को अपनी झूठी ठसन दिखाने के लिए ध्यय मे सोचता रहता है, तो एक दिन उसके अनुगामियो मे असताप या दावानल भडक उठना है। उन निर्दोष लोगो की माहों से प्रोद्दीप्त हुमा यह दावानल शासक के शासन को क्षण भर मे ले डूबता हैं । जिस नेता के इद गिद चापलसा नो पांदी हैं और ईमानदारो को काला पानी है चुल्लू भर पानी में डूब मरने योग्य उस नेता का शासन घरगराकर टूट जाता है, बुरी मौत मर मिटता है । भूमे भेडिय जसी शाम पी भूघ और यथाय से आप मिचौनी करने वाले नेता को हूप विना नीष मकान यी मजिल बनाने के लिया स्वप्न की तरह एक ही तूफान म एसो धराशायी होती है कि उसके ममये पा भी पता नही चलता। जानना दी। दुयियो से दद म सहभागी बनता है उनके गों की यहानी प्रेम म सुनता है और अपने पत्तथ्य का यषाय म सम्यक पालन परता है राही 'याय देता है यही स्वगा (सोपप्रियता पा) अधिकारी बनता है। उसका समतापरव स्वर-पयो द्वारा बनवारा को मापा प्रदान गरन पर बिना किसी भाग शिम या दुपर निपत राम के उदात्त स्वर की तरह होता है। जिसमे राम रहते अभिव्यक्तियाँ/१०७ हम स्वय विचारा करते थे थोडा सा समय बनो में दें। तम जानेंगे हम दुख क्या हैं, जब जीवन दुखी जनो मे दें। वतमान नेता अगुवा या अनुशास्ता यदि इम अपरिवतनीय और अपरिहाय शाश्वत तथ्य को आत्मसात कर लेते हैं तो निसदह उनका शासन जन श्रद्धा का भाजन बनकर, पुण्यभाग बन सकता है तथा चिरस्थायी हाकर अमन कायम करने में कामयाब हो सकता है। १५२ भीनी भीनी मधुर परिमल वाले मनलुभावने बिखरे हुए रंग बिरगे फूल हरी हरी दूधमयो हरी चादर भोढ हुए हरे भरे जवन, सह अस्तित्व सिद्धात व साकार रूप धने गहरे दरख्त, जाति भेद के घिनौने घृणित रोग से अछूती प्रेमालाप में डूबी हुई सी सटी हुई सी दालिया शत शत प्राकारा को अपने में समेट हुए छुडमुई- सी पत्तिया मधुर फलो के निकुञ्ज शैल शिखरो से झरने वाले कल कल निनादी निझर एवं उनके तल मे मनोहर दपण-सी पील की छवि सब मिलकर प्राकृतिक सुषमा का अपूर्व प्राकृतिक उपहार, नवजीवन एव नवस्फूति का सजन करता है शान्त भोर पानद- दायक वहा का जलवायु क्लात को शात बनाता है, प्रकृति की मन लुभावनी छवि मे मन मयूर नाच उठता है एसे देवरमण को साकार प्रतिकृति के गुणगान में गल तान कवि, प्रकृति चित्रण मे खाया खाया सा रह जाता है । भमर अपनी तान म मस्त नजर आते हैं कोयलें अपनी स्वरलहरी मे कुहक उठती हैं, पर काश ! अव्यक्त पर स्पष्ट जीवनदानी पानी के जीवनात्सग का मूल्य आका गया हाता पेड पौधो का मन मोहक मरुत जहा स्वतन्त्र और प्रकाश पर्याप्त मात्रा में विखरे रहते हैं आगन जोर भव्य भित्तियों मे मुख मण्डल प्रतिबिंबित होता है, ऐसा नव निर्मित भव्य भवन किसवे मन को नही लुभाता, पर तु नीव के पत्थर को कत्त व्य- शक्ति का भी काश ! मूल्य आका गया होता करता है धूप .
१.८/चितन की धवल धाराए तृपित आये एक्टर जिन लहलहाते सेतो की हरियाली पर सहमा कि जाती हैं जिस हरियाली म नयनो या प्राण मिलते हैं पके हुए खेतो वो क्या अदने क्या धनवान क्या साक्षर, यया निरक्षर, क्या मजदूर क्या मालिक क्या चमचारी क्या पदाधिकारी, सभी लुभाये नयनो म निहारत हैं पर तु कृषिकार की अनय थम शक्ति या काश । मूल्य मांगा गया हाता फटे दो दिल वस्त्रो को और कटिंग दिए हुए कपडा को सुदक्षता और सुचारुता से जोड़ने वाली सुई की सु दर सिलाई पर विस मानव का मन मत्र मुग्ध नही होता ! परतु स-सूत्र सूई के सूत्र का काश । मूल्य प्रारा गया होता हम देखते हैं सुनते हैं सुंषत हैं रस लेत है छूते हैं एव भून भविष्य वतमान के अनुभवो को एक सूत्र म पिरो कर याद रखत है पर तु जिनक बिना सब कुछ खाक सब कुछ ना कुछ उस चत यमय आत्मस्वरूप का काश । मूल्य आना गया हाता १५३ पश्चिमी उडीसा + प्रमुख सास्कृतिक नगर सबलपुर (जो एशिया मे सर्वाधिर लम्ब और जग प्रख्यात हीराकुड वाध के कारण प्रसिद्ध है) के उपनगर सेतराजपुर मे अवस्थित पजाबी जैन वधुआ के जैन भवन से सम्बलपुर की मारवाडी घमशाला के लिए हमन प्रस्थान किया। बिहार माग को मैंने गौर से देखा, अनुभव किया और मैं चरित रह गया कि-माग गोलाकार परिक्रमा में प्राय चारो दिशाओ और चारो विदिशाओ को स्पश हो गया। मैंने सोचा-क्या सच में दुनिया गोल है या है कोई कल्पित दायरा ? १५४ वसत पूर्णिमा का चद्र अनावरित अन (नभ) म उज्ज्वल धवल ज्यात्स्ना बिखेर रहा था। दही सम श्वेत रजत मडित धरातल पर स्वच्छ तथा मथर समीर मठखेलियां कर रहा था। वसत राज अपने अभिव्यक्तिया/१०९ कायकाल को सम्पन करवे कायमुक्त होने की धुन मे तथा समाधिस्थ होने की लय मे थे। उस सुखद समय में मैं शात व एकात स्थल की सात्विकता मे अपने इष्ट का स्मरण करके सारे लगा कि-सम्मु- खीर विशाल बट वक्ष ने सहसा अपनी शाखा प्रशाखाओ के रूप मे एक रेखाचित्र प्रस्तुत करने हुए मुझे म त्र मुग्ध कर दिया। उस रेखाचित्र में हल्दीघाटी के ऐतिहासिक रण में स्वामी भक्त घेतक पर सवार हिदू कुल सूय महाराणा प्रताप यमन सना पर यम की भाति लपकते हुए जा रहे हा ऐसा प्रतीत हो रहा था। विधि निर्मित उस सवाङ्ग सु दर और अपने आप में परिपूण उस स्वाभाविक चित्र के अवलोकन मे मै खो गया । कुछ ही क्षणो के पश्चात् ऊपरी धरातल पर मुक्ताकाश की छाया मे नजर पसार कर वट वृक्ष को देखा तो मैं आश्चय म दूब गया, क्यांकि उसका बह वृत्रिम रूप अदृश्य था और वह भपने असल रूप मे खडा था। प्रकृति की मनात रहस्यात्मक जटिल भाषा वा मैंने गौर से पढ़ा तो पाया, मनुष्य के चिंतन का सकीण घरातल जहा वृत्रिम रूप प्रस्तुत करता है वहा किसी भी पूर्वाग्रह से असबद्ध चितन का उच्च धरातल यथातथ्य रूप को निपार कर रख देता है। १५५ एक बार दक्षिणाचल के एक उन्नत पवत की चोटी पर खडे होकर मैंने दष्टिपात किया तो पाया कि-भूमितल पर स्थिर पौधे वक्ष, लतायें सपा गृह प्रेणिया एकाकार सौ प्रतीत हो रही हैं मानी भिन्नता अपनी मौत पर मिटी है। कुछ समय पश्चाद पहाट से नौधे उतरा तो दृश्य सवधा विपरीत या । उन पौधों, वृक्षा लताओ तथा गृह धणियो का अलगाव स्पष्ट प्रतीत ही नहीं हान लगा मल्लि उनकी पृथक्ता को पाटना सवथा असमय प्रतीत होने लगा।
११०/चितन की धवल धाराएं एक क्षण में चितन ने उद्बोधन दिया कि यह सब धरातल का चमत्वार है। साधना के उच्च धरातल पर अदि साम्य भाव के सर्वोच्च शिखर पर पहुचा हुआ साधक, "वसुधव धुम्बकम् का स्वर मुखर करता है तो राग-द्वेप के धरातल पर स्थित व्यक्ति विषमता भेद व मलगाय को स्पष्टता में उलझा हुआ अनेक सम स्याओ को जम देता रहता है। १५६ शारदीया पूर्णिमा को अगली रात को ब्रह्म वेला म जन भवन केसिंगा (उडीसा) के उपरी तन मुले पर कल्पनीय स्थान में बैठकर मैं शारदीय पूण चन्द्रमा पर त्राटक परत हुए प्राणायाम का अपूध आनद ले रहा था। पौ फटने का समय था, सहसा मने देखा-ऊपरी धरातल पर (आकाश मे) प्रवस्थित शीतल सुधा सावी शशि सुधा बरसा रहा था ता निम्न धरातल पर (सामने की सडर पर) दो मट्टिया आग उगल रही थी। मै चितन मग्न होकर सोचने लगा, यह क्या आसमान म पमृत बरस रहा है और धरातल पर अगारे ? चितन मथन से नवनीत मिला कि-जो उच्च अध्यात्म के घरातल पर खडा रहता है वह सदा अग जग को पीयूष पान ही कराता है किससे अज्ञात तथ्य है कि - प्रलयकारी फुफकार भारते हुए एव इस करके जहर उगलते हुए विषधर-चण्डकौशिव पर महिमा मय महाप्रभु महावीर सुधा की वर्षा करते हैं और उसे सदा सदा के लिए निविष बना देते हैं । सच है जो स्वय सुधामय होत हैं वे हो औरो को सुधासिक्त कर सकते हैं। जो व्यक्ति भौतिकवाद के निम्न धरातल पर खड़े होते है, वे राग द्वेष की, विषय वासना को भाग उगलते रहते हैं और उस आग से वे स्वय जलते हैं और औरो को जलाते रहत है इसलिए प्रत्येक मुमुक्षु का कतव्य है कि वह उच्चतम अध्यात्म के धरातल पर खडा होता हुआ स्वय अमृत मय बनकर औरो को शीतलता से मभिसिक्त करने म अग्रसर होता रहे और विश्व की आखो मे अमृत घोलता रहे ।
अभिव्यक्तियाँ/१११ १५७ देव अभिलषित नर जीवन में किसी से पगडा दुश्मनी या मनमुटाव का न हाना सर्वोत्तम बात है। लम्बे जीवन पथ मे कही किसी से टकराव हो जाये (जो हाना बहुत सहज है) तो पानी या बालू की रेखा के समान तत्क्षण या कुछ समय बाद उस टकराव को सहृदयता म बदल देना 'उत्तम बात है । कुछ लम्बे समय नव मन मुटाव टिका रह जाने के बावजूद धार्मिक पों के दिनो मे वर्षाकाल में भूमि की रेखा के समान, उस सौहा द्रता के वातावरण में बदल देना मध्यम बात है। साप नेवले के झगडे की भाति या पत्थर की रेखा के समान सदा मदा के लिए वैमनस्य या मनमुटाव का अमिट हो जाना अधमाधम वात' है। वीतराग हृदय सर्वोत्तम बात का धनी होता है मुमुक्षु हृदय सर्वो तम बात का धनी बनने का प्रयास करता है यदि मानवीय दुबलतावश वैसा न बन सके तो उत्तम व मध्यम जरूर बनता है। पतनशील पतितात्मा अधमाधम बान के भवर मे फस वर नर-देह को खो देता है। १५८ पच्चे फोटे का ऑपरेशन बहुत जलन-बहुन दद पदा करता है। कभी कभी यह भारी भयकर रूप ले लेता है । फोडे या मोतियाबिंद के पकने पर ही आपरेशन ठीक रहता है । कच्चे आम (केरी) के तोडने पर उसका अमचूर हो सकता है आमरस नही आमरस तो तभी अच्छा होता है, जब आम पक जाते हैं । १५९ द्रव्य ध्रव (शाश्वत) है पर्याय अध्रव (अशाश्वत) । यद्यपि परिवतनशील पुद्गल पुद्गल हो रहता है तथापि उसके पर्यायो के परिवतन की आश्चयजनए पृखला प्रत्यक्षदर्शी के मन में विभिन्न कौतूहल (आश्चय) उत्पन कर देती है। सरोवर की पाल पर सघन num ११२/चिन्तन की धवल धाराएं तह की छाया में बैठकर एक बार मैंने चितन के क्षणाम देखा- काली स्याह मिट्टी पर हरा हरा गनलुभावना मस्त घास उगा हुआ है, यह आखो को यहा सुहावना लगता है उमे गौओ का समूह (प्रज) बड़ी मस्ती से चर रहा है। शाम का गौए घर जाती है ग्वाले दूध दुहते हैं, तो उसे दूध धौला मिलता है जिस गरम करके मिश्री मिलावर आदमी पीता है तो वही दूध लाल रक्त म परिणत हो जाता है । अवशेष दूध को जमा देने पर घर मीठा बट्टेदार दही बन जाता है, उस विधिवत् विलौन पर उसका कुछ भाग 'तक शत्रस्य दुलभम् सव रोग हर तक्रम् (छाछ) जसा स्वास्थ्यवधक पय पदाथ बन जाता है तो कुछ भाग, मवखन तथा मक्खन से धत के रूप में परिणत हो जाता है । उस घी से चतुर हलवाई अनेक रग रूप माकार व स्वाद की मिठाइया बना देता है, जिनके दशन मात्र से दशक के मुह मे लार टपक आती है जि है लोग बड़े चाव से तारीफ करते हुए स्वाद ले लेकर खाते हैं । उपभुक्त उस आहार का कृछ अश रस-रक्तादि धातुपो में परिणत हो जाता है तो कुछ नि सार भाग मल मूत्रादिक के रूप मे शरीर से बाहर निकल जाता है जो खाद के रूप में खेतो की मिट्टी से मिल जाता है वे अण ही रूपातरित होकर कपास, धान आदि विभिन रग आकार व उपभोग में आने वाली वस्तुओ म परिणत हो जाते हैं इस प्रकार पुदगलो के पर्याय-परिवतन की लम्बी शृखला मागे से भाग बढती ही चली जाती है, जो न कमी समाप्त हुई है और न होगी ही। ऐसी स्थिति मे मन के अनुकूल प्रतिकूल पुदगलो के सयाग चियाग म सम रहने को साधना से स्वय वो राग द्वेष से अलिप्त बनाये रखना, यही है- आत्मनान, और यही है-सम्पूण वाङमय या साधना का नवनीत । १६० उडीसा के साखी गोपाल क्षेत्र में विशेषतया नारियल बहुतायत से होते हैं। प्रथम एक्दम कच्चे नारियल म पानी ही पानी रहता है अभिव्यक्तियो/११॥ गिरी बहुत ही झीनी अर्थात् नाम मात्र की ही रहती है, जिसे डाम और डोसा (उडिया) मे पइड कहते हैं वह छिलके से खूब सटी रहती है। दूसरे हरे नारियल में गिरी मोटी होती है और पानी बहुत थोडा मा होता है। तीसरे एकदम सूखे नारियल में गिरी का गोला छिलके से अलग थलग रहता है । नारियल का गोला गोला चिपका रहता है, जबकि सूखा गोला अदर में रहते हुए भी एक्दम अलग थलग रहता है। वस्त्र या शरीर पर तेल को चिकनाहट लगी होती है तो हवा के साय रजकण चिपक जाते हैं चिकनाहट न हो तो लगे हुए रजकण एक ही झटके मे छिटक जाते हैं। गीला गोबर या मिट्टी का गीला लेशदार गोला, फैकते ही भीत से चिपक जाता है। पर सूखा कण्डा या मिट्टी का गोला विपकता नही है । स्नेह मुक्त वस्त्र या सूखे गोले की तरह जो साधक हाता है, वह ससार में रहता हुआ भी निलिप्त रहता है जबकि स्ने हार साधक गीले गोले की तरह चिपक जाता है । अनासक्त साधक का अपना एक विचित्र लोक होता है वह सबके साथ रहता हुआ भी अकेला रहता है। उसका अपना कोई न होने पर भी वह सबका होता हैं और सब उसके होते हैं। वह सोया हुमा भी जागृत रहता है । वह चलता हुमा भी सदा स्थिर व मचल रहता है । वह सर कुछ करता हुआ भी बधन मुक्त रहता है। १५१ प्रेम, परम और धम, इन तीनो शब्दो मे रेफ (र कार) है। प्रेम में र प के पग में पग हुआ है। परम में र' प और म मक्षरों से घिरा हुआ है । घम में 'र म के सिर की रेखा से भी ऊपर है । ठीक इसी प्रकार ससार में तीन तरह के मनुष्य होते हैं। एक प्रकार के वे, जो आसक्ति के पांवो में पड़े रहते हैं। दूसरे वे, पो माया से ।
११४/चितन को धवल धाराएं अर्थात् मोह पाश घिरे हुए भी अन्तर भाव से पृथक रहते हैं। तीसरे प्रकार के वे (ज्ञानी व निलिप्त साधप) होते हैं जो घम के र की तरह माया के सिर पर चढ़कर अर्याद उससे ऊपर उठ जाते हैं। १६२ जब तक शरीर है, तम तक शरीरोत्पन सम्बध रहेंगे ही। साधना का लक्ष्य होता है, ममत्व को हटा लेना क्योकि ममत्व हटे बिना आत्म-साक्षात्कार होता ही नहीं है । राग भाव आत्मा का प्रगाढ बधन मे बाघ देता है, प्रगति पथ को अवरुद्ध कर देता है साधना पथ पर बांटा जितना बाधक है फूल भी उतना ही नहीं अपितु उस भी कई गुणा अधिक बाधक होता है। प्रत्येक व्यक्ति काटे से बचने का प्रयत्न करता है। यदि भूल से भी उसका आचल उलझ जाता है तो वह छुडाने का प्रयत्न करता है । पर तु शरीर को विद्ध करने के अतिरिक्त काटा पोर पधिक क्या बिगाड़ सकता है ? किन्तु फूल कोमल कमनीय व कात होने से सहज ही में मनुष्य को बाघ लेता है उसमे वस्त्र नही मन उलझ जाता है। वह शरीर को नहीं बीधता मन को घायल कर देता है । जग जाहिर है रि--नलिनी की आसक्ति में मासक्त भौंरा उसे छेदकर बाहर नहीं आ सकता और विनाशकारी परिणाम भोगता है। रात्रिगमिष्यति' श्लोक का भाव है कि कमल के मधुकोश मे मस्ती से बठा हुआ भ्रमर, रात भर स्वय को झूठा आश्वासन इस प्रकार देसा रहा-रात चली जायेगी प्रभात होगा सूर्योन्य होने पर कमल की पखुडिया खिलेंगी ही बस मैं फुर से उड जाऊगा। इतने ही मे मदो मत्त हाथो बाता है वह भ्रमर समेत उस कमल को सूड से तोडकर निगल जाता है। यदि भ्रमर चाहता तो कमल को छोडकर उड सकता था परतु कमल राग ने उसको विनष्ट कर डाला। इष्ट-अनिष्ट मे सम रहना ही साधना है। ममनोश में अरुष्ट तथा मनोश मे अनासक्त रह कर साधक अपने ध्येय की भोर निरतर 4.J - अबाध गति से अग्रसर होता रहता है यही है उसकी जीवन-मुक्ति पौर यही है शाश्यत शाति का एक मात्र सवमा य प्रशस्त माग नाव पानी मे ही डूवती तैरती है । तरने की स्थिति में नाव पानी के ऊपर होती है जबकि दूवन की स्थिति मे पानी नाव में होता है। यदि छिद्र मागों से नाव व भीतर पानी भरने लगता है तो वह पानी वे उस बोझ से डूब जाती है । तरती नौका के समान जा साधक विषय-पाय से ऊपर रहता है यदि किसी क्षण विषय पाय रूप जल भरने लगता है तो तत्क्षण उसे उलीच कर बाहर फक देता है । उसको जीवन नौका भले ही शन शने ही सही पर तु तरती हुई एक न एक दिन परले पार पहुच जाती है, पर तु आस्रव के प्रचण्ड छिद्रो से विषय-क्पाय का जल जिनके हृदय रूप नावा मे भरता रहता है मौर उसे उलीचने का वे प्रयत भी नहीं करते हैं तो उनकी जीवन नौका एक न एक दिन ससार मागर को अतल गहराई म सच ही मे जल समाधि ले लेती है। १६४ जगमगाता हुआ दीपक सारे घर को प्रकाश देता है मगर वह घर तम तक ही प्रज्ज्वलित रहता है जब तक तज हवा का झाका नही लगता। हवा का तेज पौंका लगते ही वह क्षण भर म बुझ जाता है फिर चाहे वह तेल और बत्ती स क्तिना ही परिपूण क्यो न हो। इसी तरह सुदढ भेद-विज्ञान के अभाव मे प्रथम श्रेणी वे साधक का मन प्राब्द, रस, गध, रूप एव स्पर्शानिक क तीन झोके से बहक जाता है, फिर चाहे वेद वेदात, माम, त्रिपिटक का शब्द ज्ञान रूपी तेल तथा जड क्रिया रूपी बत्ती से वह कितना ही परिपूण (भरा हुआ) क्यो न हो। चूल्हे की अग्नि पर वायु का प्रभाव नहीं पड़ता पर धारा उसे बुझा देती है। इसी प्रकार द्वितीय श्रेणी वे Marw- ११६/चिन्तन की धवल धाराएं मन पर इन्द्रियज य सुख भोगो के झोंको का कोई असर नहीं होता, उनमे उसका मन सुस्थिर रहता है, पर तु मान-सम्मान का पानी उस भी बुझा देता है (ले देवता है)। वादलो को गोद में कभी बिजली चमकती है और कभी विलीन हो जाती है इसी तरह यातायात मन वाला साधक कभी विवेक की बातें करता है तो कभी काम क्रोध व मान सम्मान में बहक जाता है । समुद्र स्थित बडवानल स्वयं तो वुझता ही नही और कहा जाता है कि अपने तेज प्रभाव से प्रलय पयन्त समुद्र का भी मर्यादा मे गधे रखता हैं। इसी प्रकार सुदढ भेद विज्ञानी महामाधक, माया ममतामयी ससार सागर में रहता हुआ भी, स्वय ता उससे अलिप्त रहता ही है साथ ही अनेका श्रद्धावान जिज्ञासुओ को भी जड चेतन के ज्ञान योग के बल से निलिप्त बनाये रखता है। जैसे--महा आकाश में कितन हो शस्त्र चलें तो भी वह अनाहत (असग) रहता है ठीक इसी तरह ज्ञान सम्पन्न साधक का अत परण, मनिष्ट सयोग, इप्ट वियाग की तीक्ष्ण धारामों में भी अनाहत [असग] रहता है। प्रज्जवलित पग्नि की उठती हुई भीषण ज्वालाओ की उष्णता या लपटें आकाश को छू नहीं पाती है, आकाश पे बादल गरज कर बरसते हैं कि तु आकाश गोला नहीं होता है। आकाश बादलों की छिन्न भिन्नता से भले ही विभिन्न रूपों में दीखता रहे अर्थात् बादलो वी तोड जोड से वह नगर, वन पवत आदि रूपो मे प्रतीत होता रहे परतु निमलाकाश उन सब से सवषा अछूता तथा प्रलिप्त रहता है । ठीक इसी तरह परिपक्व अवस्था वाला साधर मन, बुद्धि इद्रियादिव की विद्यमानता में भी विकास और वासना से सदा सवदा पृथक रहता है। १६५ हसते चिलते फूल पुसान पदा करते हैं। महस्ते गमाते बगीचे नया जीवन देते हैं। हरी-हरो दुर्वा का मघमती दुनूस माद अभिव्यक्तियो/११७ 1 धरती नयनाभिराम लगती है। तोतली भाषा बोलते हुए मानव शिशु मन को मोह लेते हैं। प्रश्न उपस्थित हाता है-क्यो ? इस 'क्यो का एक मात्र उत्तर होगा कि फूलो मे सहज सुगध है, बगीचे में सहज स्वास्थ्यप्रद शीतलता है, दुर्वा मे सहज मृदुता है बालक म सहज सरलता है । जहा अकृत्रिम सुरभि शीतलता, मृदुता [मादव] एवं ऋजुता होती है वहा सहज आकपण, सहज सौम्यता, सहज शीतलता ना हो जाती है । सम, दम, मादव और प्राजव न केवल मोक्ष के सिंह द्वार है अपितु लोक व्यवहार भोर सहजीवन के अमूल्य बलकार भी हैं। १६६ सुख पदाथ मे नही, सतोप मे है । सन्तोष की सहोदरी है- सादगी। व्यक्तित्व का निखार तडक भडक से नही सद्व्यवहार से होता है । परिधान या शृगार-प्रसाधनो की होड अथवा दूसरो की देखा देखी [नरल] करते हुए परिवार का सुख लुटा देना समझदारी नहीं है । क्योंकि सामथ्य से अधिक व्यय करन का परिणाम पति पत्नी में कहा-सुनी के रूप में सामने आता है । परिवार कलह की प्राग म झुलसने लगता है। प्राधि व्याधिकारक मानसिक तनाव बढने लगते हैं । सुखमय जीवन का मूल है--सादगी, लालसा का विसजन नरल करने की मधी दौड का त्याग । १६७ माज जागतिक परिस्थिति विषम बनती जा रही है । हथियारों की बढती होड से शाति हरिण हो रही है। असुरक्षा भय तथा सदेह पा वातावरण गदरा रहा है। परमाणु हथियारो का बढता सग्रह खतरनाक होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में अध्यात्म का पाठ जगत को पढना ही पडेगा। उसके बिना विश्व मैत्री भी सम्भव नही होगी। अध्यात्म का भय ही है-स्वाथ के ऊपर परमाय को प्रथम स्थान । 'स्व के साथ पर के अस्तित्व का सच्चे हृदय से स्वीकार ।
११०/चिन्तन की धवल धाराएं १६८ माज के नौजवान सुख के भ्रम मे जीवन घातक व्यसनो को पालते जा रहे हैं। पर वे भूल करते हैं-सुख व्यसन सेवन मे नही सयम म है। सयम सधता है-चैत य केद्रो पर ध्यान करके अपना रासा यनिक परिवतन करने से तदथ प्रेक्षा ध्यान का प्रशस्त माग प्रस्तुत है। १६९ पूर्वाचार्यों ने बडी सूझ बूझ व परिश्रम से व्यसन वासना मुक्त स्वस्थ समाज की रचना की थी जिसे पाकर हम सुखी और प्रसन्न हैं । उमे बनाये रखना आवश्यक है । तदथ पर दीवारो पर अश्लील या विचारो को प्रदूषित करने वाले चित्र न रखे जाए और न ऐसी वीडियो फिल्म आदि को देखा जाये । यदि घर को सजाना सवारना ही है ता उत्तम म प्रेरक वाक्य दीवारो पर लिखे जा सकते हैं। जिनसे परिवार को धार्मिक सस्कार मिलें और जीवन मूल्य जाग सके। १७. भीषण सूखे + बाद अमृत वर्षा करने आकाश में बादल घिर आत हैं गडगडाहट के साथ पानी की झडी लगती है और जब वह घण्टो दिनो नही टूटती तय ठण्डी बयार बहने लगती हैं। तव सी तपता, सूखी व फटी-क्टी धरती बफ सी शीतल हो जाती है हरियाए पास से नयनाभिराम लगने लगती है । दूध मियो के समान मिल जाती है, ताल तलये उफन आत हैं खेतो की हरियाली खुशहाली जन गण मन मे पुलकन भर देती है। यह होता है वर्षा के शुभ आगमन का परिणाम। पयुषण महापब एसा ही पुक्तावत मघ बनकर प्रति वप आता है। आठ दिनो तक लगातार समता साधरो द्वारा जिनवाणी की पीयूष वर्षा हाती है तब तप्त तवे जसे सतप्त मन बोध की ऊष्मा शान्त हो जाती है पर वो दागल पावरको व्यक्ति उतार पंरता अभिव्यक्तियाँ/११९ १७१ है और उज्ज्वल चादर ओढ लेता है, उसका फटा-बटा और ट्रक टूक मन हरा भरा हो जाता है । पयु पण से निष्पन्न फसल मन को परितृप्ति प्रदान करती है। यह होता है पवित्र पयुषण वे आग मन का सुपरिणाम । दस प्रकार के धमण धर्मों में प्रथम है --उत्तम क्षमा। धम के चार द्वारों में प्रथम द्वार है- -क्षमा । क्षमा जीवन का ओज है, तेज और है-तपस्वी जीवन का अलकरण । क्षमा पीयूप का पान क्षमा देने और लेने वालो को पीयूप पगा नवजीवन प्रदान करता है । क्षमा पुष्पलावन को पवित्र धारा से क्टुता का विष घुल जाता है । जीवन एक सागर के समान है। उसमे विष व अमृत दोनो है । दुव्यवहार कडवी वात व चुभते वतन को मथनी से जब जब सागर मथन होता है तब-तब घनीभूत भीतर का उपविष उभर. कर बाहर आ जाता है और आदमी जहरीले जतु से भी अधिक आक्रामक बन जाता है। उस समय क्षमा मैत्री का गारुडी मत्र ही उस जतु के विप को निस्तज कर सकता है । तीर्थंकरों द्वारा प्रदत्त पयु पण महापद व विलक्षण क्षमावाणी दिवस गारुडी मत्र बनकर सामने आते हैं और साल भर के जहरी कलुष भावो का विष उतार जाते हैं। यह है चमत्कार सवत्सरी का, प्रतिक्रमण का व खमतखामण का । खमतखामण (क्षमा के आदान प्रदान) का यह पव अनूठा व गा खोलने वाला पव है, क्योकि चेतना के एक एक तार को झकृत कर देना हो खमतखामणा है। जिसका अथ ही है-मन के सफल पाप- सतापो को धोकर पूर्णतया हलकेपन का अनुभव करना, जख्मो के हर निशान को मिटा देना मोर गुलशन म मंत्री की बहार ला-देना। १७२ हरड बेहरदा तथा भावला-किंवा उन से निष्पन्न त्रिफला कफ, पित्त और धात को शान्त करते हैं, यानि तीन प्रकार के रोगों को १२०/चितन को धवल धाराएं नष्ट करते हैं। इसी प्रकार आत्मा में रहे हुए मिध्यात्व मशान और मोह रूप तीन रोगो को औषधि है-रलत्रप-सम्यग ज्ञान, सम्यग् दशन एव सम्यग्चारित्र । पिसी ने कितना ठीक लिखा है कि- "मिथ्यात्व रोग हरति प्रकाम । सद्दशम, मान मपाकरोति । अज्ञानक, मोह हज चरित्र । हन्तीति पक्ति प्रमु धीतराग ॥ -सम्यग् दशन मिथ्यात्व रोग को, सम्यग् शान अज्ञान को तथा सम्यग् चारित्र-मोह रोग को नष्ट करता है, ऐसा वीतराग पुरुषो ने प्रतिपादित किया है। अनादिकालीन इन रोगो से मुक्ति पाने को इच्छा रखने वाले मुमुक्षु जन रत्नत्रय रूप औषध का सेवन करें पोर सदा सदा के लिए स्वस्थ बन जायें। [M
परिभाषाएँ
१
२
३
४
जीवन-मनोहर दृश्यो का रग मष और काली कलूटी मृत्यु को पूर्व
भूमिका।
जीवन-डाल से टूटने वाला पुष्प है। कुछ ही क्षणो मे उह जान
वाला कपूर है।
जीवन-ढलता सूय है, जो अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है।
जि बगी-कुछ समय तक प्रकाश दे सकने वाली मोमबसी है । कुछ
फाल तक सुवास प्रदान कर सकने वाली अगरबत्ती है।
जिवगी--एक रगीन चित्रो भरा नाटक है और मौत है उस नाटक
का दुखात या सुखान्त पटाक्षेप ।
मानव शरीर- रक्त मास मज्जा मादि से बना रद्दी का टोक्रा
नही अपितु एक कम-क्षेत्र है।
नवजात शिशु-विशाल वर-वृक्ष के अस्तित्व को अपने में समेट
हुए एक बीज है । तरुण-बीजो का जनक एक वट-वृक्ष है । दोनो
में न कोई बडा (ज्यादा) है, न कोई छोटा (कम) क्योकि बीज
क बिना वट वृक्ष तथा वट वक्ष के विना बीज का आविर्भाव नहीं
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होता।
पात्र-अपान - उवरा और ऊमर भूमि है । काली मिट्टी को सीधने पर
इष्टफल मिलता है बजर भूमि मे खून-पसीना एक करक यथाविधि
सोचने पर भी फल नही मिलता।
पाप का पालन पोपण (लालन पालन)-साप को दूध पिलाने जैसा
भूल भरा काय है, जो अपने प्रकृति प्रदत्त स्वभाव के अनुरूप एक
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१२२/चितन की धवल धाराए १२ १३ १४ १५ मारकर जीवन नाश या किंवा सवनाश पा टैक्स लेकर ही दम लेता है। पाप-देव मंदिर की पवित्र भूमि म मलासजन करने का विचार । पुण्य-दिव्यवाणी या विचारों द्वारा उस विचार का विसजन । भोग लालसा-ढालू भूमि पर आसन बिछाना और रिम झिम रिम झिम वर्षा मे उसका भोग पर भारी हो जाना। मनुताप-आसन के भोगे हुये किनारों को हवा और धूप मे सुखाना। मासक्ति-प्रेमिका की याद मे उसको सूरत प्रेमालाप या कार्यों से मन का चिपटे रहना। धराग्य -मन पर लगे मल को ज्ञान रूपी गगा धारा में मल मन कर धोना। मन- देवालय का ध्वज है जो हवा का निमित्त पाकर चचल बनता है पोर तूफान आने पर पत्ते की तरह बहुत अधिक कांपने लगता है। मन-विविध साग भरने वाला एक बहुरूपिया या नये नये रग धारण करने वाला अनूठा गिरगिट । आशा-ठिठुरे हुए व्यक्ति क लिये घाम (धूप), थके हारे के लिए विधाम और साधक के लिए आत्मा राम है । विद्या-ऐसा अक्षय कोष जिसे पाने वाले मालामाल हो जाते हैं परतु देने वाले दरिद्र नहीं होते। ईमानदारी-घर म शाति-केद्र, व्यापार मे ख्याति केद्र राष्ट्र में शक्ति केन्द्र और जनमानस म विश्वास केद्र है। ध्यान-फिटकरी का घोल है, जो पानी में आई हुई मिट्टी को अलग करके पानी को निमल बना देता है । १६ १५ १९ २० २१ परिभाषाएं/१२३ २२ २५ २६ स्वाध्याय-आम (आम) वक्षो का सघन निकूज है, जिसको छाया त्रिताप से एव कच्ची वेरियो का सलाद (पना) विकारो को लू से बचाता है भौर पक्ने आमों का रस, पूण तृप्ति प्रदान करता है। घ्यक्तित्व-अमूल्य हस्ताक्षर है शक्तिशाली माक्षर है और है- सगीत का मधुर स्वर । पसा---गुनाहा का आवरण अथवा रक्षा कवच और किसी के दिल को जीतने का मकअप से मनमोहक बना खूबसूरत चेहरा । परिवार-एक एसा चौराहा जहा पारो मोर स आवर पारिवारिक जन मिलते है हंसते खेलते हैं खाते पोत हैं और बिछुड़ जाते हैं किन्तु अपनी कडवी मीठी यादें छोड़ जाते हैं । फलाशा --कल्पवृक्ष से दाल-रोटी मागने और अमृत से पांव धोने जसी सर्वाधिक मूखता भरी क्षुद्रता है। मृत्यु--नये जीवन का आशा भरा पैगाम है। आवाशी जल कण (चलते फिरत तरुण) सरिताओ की तरुणाई की सुहाग बिदिया हैं। पारिवारिक जन उन सरिताप्रो के बनते बिगडते घाट हैं । जीवन मे आने वाली प्रतिकूलतायें काट पत्थरो के तुल्य हैं। पुरुषार्थी तरुण, उह तोडते काटते हुए, आखिर अपार जलराशि भरे सागर (मृत्यु की गोद) मे समा जाते हैं विलीन हो जाते हैं। बादल-एक पानी की टकी है जहा उसका मुह खुल जाता है वहा को घरती हरा दुकूल पहनकर दुल्हन बन जाती है। युवाशक्ति-विज्ञान प्रदत्त अणुशक्ति है, जो सहार करने में भी सक्षम है और निर्माण करने मे भी। सज्जन का वचन-वान-पानी का बुलबुला नही अत तक मविरल २७ २८ ३१ ११४/चिन्तन की धवल धाराएँ बहता हुआ हिमालय का निझर है जो कभी सूखता नही (मुकरता नही)। ३२ फलियुगी गुरु-शिष्यो का अगूठा काटने के लिए कमर कस कर पिल पडने वाले मल्ल हैं तो शिष्य उहे अगूठा दिखाते हुए आक्रोश से होठो को काटकर डसने दौडन वाले काले नाग तब फिर जमाने को कोसना बेमानी है। ३३ रूढ़ि- बार बार ठोकर खाने पर भी अज्ञात मोहवश उससे लिपटे (विपके) रहना। ३४ पीडित-ठगाया अपढ चितन शूय निष्प्राण चित्त जिसको दीवार के सहारे लटकाया जाता है। चितन शूम व्यक्ति का नाजायज लाभ उठाते हुए रस सम्पन्न गन्ने की तरह उसे निचोडा ही जाता है । ३५ कोरी बातें-नीले सागर की छाती पर दौडती भागती वागज की नावें । उनकी उपलब्धिया हैं फेनिल पानी पर खीची गई लकीरें, जिनके पीछे आकार प्रत्यावार कुछ नही रह पाता। ३६ मोट मे आवमी को तलाश-दिखावटी मानवाकृतियो की भारी भीड से अट हुए सदर बाजार मे भर दोपहरी के तपते सूय प्रखर प्रकाश म हाथ मे जलता हुमा दीपक लेकर भागा जा रहा था एक यूनानी दाशनिक । लोग बाग उसे बावला कहते थे परन्तु वह खोज रहा था नराकृतियो की भीड म आदमी को। ३७ एक घेष्ठ शासक-कुशल कुम्हार की तरह होता है, जो ऊपर से टप टप पीटता है रितु भीतर से दुखतो हुए रग पर हाथ रखपर सहलाता भी है। २८ अनुशास्सा का हितकारी कठोर अनुशासन-वर्षा बरसने से पहले ही
परिभाषाए/१२५
उमस भरी दोपहरी है जिसकी सध्या परम सुहावनी होती है और
परिणाम हरी भरी धरती के रूप में मिलता है।
३९ चेहरा-एक पण है जो मनोभावो को साफ-साफ कह देता है ।
चेहरा-एक ऐसी भित्ति है जिस पर मन के विचार टेढो मेढी रेखाए
पोचकर विकृत या मुघड पित्र बना देते हैं।
चेहरा-एक ऐमी खुली किताब है जिसके पृष्ठा को कोई भी पढ़ा
लिखा समझदार बखूबी पढ सकता है ।
चेहरा-एक नेल तिपि या अज्ञात भाषा की लिपि हैं, जिसे पढ
लेना हर पिसी के वश की बात नही है ।
कतव्यपरायणता-एक ऐसे कुशल कारीगर की कैची है, जो कम
कोमती या वेशकीमती वस्त्र को समान गिनती है काटती भी है तो
ऐसे कि-जिससे उसकी उपयागिता में चार चाद लग जाते हैं।
४१ सूई-समता को मूर्ति मानवीय एकता से लिए सूई बनना जरूरी
है वह अत्य त मुलायम व अत्य त खुरदर अत्यत मोटे व मत्य त
बारीक वस्त्र को समान रूप में जोड़ती है ।
४२ जीयन याना-पहाडी रास्ते का पथ अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियो
के ऊबड़ खाबड पहाडो माग में से जोवन यात्री को गुजरना
होता है।
४३
समता का साधक-एक ऐसा धागा जो नये पुराने कटे फटे वस्त्री
के छोटे बडे छिद्रो मै से समान भाव से गुजरता है ।
घटन-प्रत्येक खुले भाग को समुचित ढग से ऐसे फिट करता
(बोधता) है कि वह सुन्दर दीखने लगता है।
बटन-चतुर व्यवस्थापक । जीवन को व्यवस्थित बनाने के लिए
बटन जैसा बनना चाहिए ।
१२६/चितन की धवल धाराएँ ४८ ४५ अनासक्त साधक-प्लास्टिक का कोट है जो पानी मे भीगते रहने पर भी, पानी की आद्रता से अलिप्त रहता है। प्रचण्ड फषायी का क्रिया काण्ड--विप वीज को जीवन देते हुए टहनियो और पत्तो को नष्ट करने का असफल प्रयत्न है जिसका परिणाम शू य क सिवा कुछ नहीं आता। विधि विज्ञान-दूध दोहने की प्रक्रिया है जिसका यथार्थवेत्ता ही दूध से लाभावित होता है उसके प्रभाव मे मोटी मोटी लकडियो से गाय के थन को पीटने स दूध प्राप्त नहीं होता। उच्छ खल~-वह नर पशु जिसे बाधा जाता है । मरखनी गाय के ही परो में लोमने बाधे जाते है। सज्जन-समागत कष्ट रूप मैल को घा देने वाला साबुन, मन का वह उजला साबुन भले ही ऊपर मे रगोन (काला पीला) दीखता हो परतु शरीर या वस्त्र पर लगाने से सफेती ही प्रदान करता है। प्यार-स्नेहानुराग एक ऐसा मोठा स्लो पायजन है जो न सुख से जीने दता है न मरने देता है । प्यार-प्यार (कामानुराग) एक ऐसा घना गहरा कोचड है जिसमे मादमी जितना उतरता जाएगा उनना ही फसता चला जाएगा। ५१ सम्पादक-एक ऐसा दर्जी, जिसकी कलम सूई की तरह जिस जिस टुकडे (रचना) को जहा चाहे वहा जाड दे और बैंची की तरह जिस किसी तथ्य को (समाचार-को) चाहे जैम तोड मरोड द यानी काट-छाट दे। ५२ सुदरता-एक ऐमा गाद जो अपने आवषण (चेप) से जिस विसी कागज (आदमी) का जहां चाहे वहा चेप दे यानि उसक पावो को थाम दे। ५०
परिभाषाएँ/१२७
ससार-एक ऐसी स्वप्निल फिल्म, जो आख व द होने के बाद कुछ
नहीं।
ससार--एक ऐसा नि स्मार याथा बादल, गजन-जन और आडम्बर
भरा भारी प्रदशन, परतु प्रदशन के नाम पर निराशा का दशन ।
५४ सोदय-डाल पर मुस्कराता फूल, जो देखते-रेखते ही मुरझा
जाता है।
५५ यौवन-उमत्त बरसाती नदी का प्रबल वेग, जो कुछ ही क्षणो म
ढल जाता है।
५६ घमण्डी का सत्ता मव-भोर का तारा जो सदा अस्तो मुख
होता है।
२७ मनुष्य-मिट्टी का ढेला या तीक्ष्ण काटा नही, विराट विश्व के गले
का पुष्प हार है।
५८ शब्द जाल-सच्चाई को ढकेलने वाला काला विज्ञान ।
कपाय-हृदय की सात्विक विभूतियो के रस को एक्दम चूस लेने
५९
वाली डायन ।
मैने पढा मैने सोचा १ मैंने पढा-आधुनिक विज्ञान का यह एक सवमाय निष्कप है कि सारे के सारे आकाशीय ग्रह, नक्षत्र तारे यहां तक कि चन्द्र भी सूय से ही प्रकाश प्राप्त करते हैं और दुनिया को आलोक प्रदान करते हैं। मैंने चिन्तन किया-मन, बुद्धि और इन्द्रिया सब आत्मा से ही प्रकाश प्राप्त करती हैं और उस प्रकाश की अद्भुत शक्ति से दुनिया को चमत्कृत करती हैं। मैंने पढ़ा- अमेरिका के पेलोमार पवत पर सत्रह फुट व्यास की एक ऐसी दूरबीन है जिससे १८०० (अठारह हजार) मील की दूरी पर जल रही मोमहत्ती की लौ देखी जा सकती है। २ मैंने अनुभव क्यिा-अठारह हजार क्या लाखों मील की दूरी पर अवस्थित ग्रह नक्षत्रो को अपनी इन खुली आँखो को दूरबीन से मादमी देख सकता है। दूर बहुत दूर के यक्ति के यश की सौ से कुढ़ सकता है, पर तु अपने निपटतम हो को नही स्वय अपनी लो तप को देख नहीं पाता, यह अजीव विडम्बना है । मैंने पढ़ा-मावाशीय समस्त ग्रह-नक्षत्र भोर तारा समूह मे शुक्र तारा सर्वाधिक तेजस्वी होता है । समूचे ज्योतिष पत्र में महत्वपूर्ण स्थान है। शुक्र ा प्रराश अत्य त निमल, स्वच्छ एव तेजोमय होता है इसी हेतु स दहाती सज्जन शुक्र को 'डाटा चांद रहते हैं। शुत्र सुख-समृद्धि और प्रेम या प्रतीक है । पुराण गित शुकमा मैंने पढा मैंने सोचा/१२९ - Y मैंने पढा- दत्य गुरु-शुभाचाय, शासन बल से नही, प्रेम से करते हैं। भारतीय ज्योतिष का मतव्य है कि जिसके केद्र में शुक्र होता है, वह बहुत प्रेमिल-स्नेहिल हृदयवाला फाटो को साफ करके सवत्र प्रेम पुष्प खिलाने वाला होता है। मैंने चितन किया-यदि मानव मानवीय संस्कृति का तेजस्वी शुक्र- ग्रह बन जाये अपने सौम्य ज्ञान प्रकाश व स्नेहिल व्यवहार से सब के के मनो को आकर्षित कर ले और हृदय केद्र मे विश्व ब धुत्व भावो को स्थापित कर ले तो वह सद्गुण पुष्प पराग लुटाने वाला मानवीय धरातल का देव बन जाये। -विश्व का सबसे भारी चुम्बक रूस में है जिसका वजन ४० ३२ टन है। मैंने अनुभव किया--एक सात्विक साधनाशील साधक की मुद्रा में इतना चुम्बकीय भाषण होना है कि जिसका न वजन हो सकता है न माप । क्योकि वह अमाप्य और अतुलनीय होता है। मैंने पढ़ा-केकडा रेंगने वाला साधारण सा जन्तु होता है कि तु कुछ बडे केकडों के अगले पजो मे इतनी शक्ति होती है कि वे एक ही झटके मे मनुष्य का हाथ उखाड सकते हैं, या नारियल के ठोस खोल का पीसकर चूग कर सकते हैं । मैने अनुभव किया-साधारण से दीखने वाले हाड मास के पुतले इस आदमी में वह शक्ति विद्यमान है कि वह ध्यान की कठिन साधना द्वारा, एक ही झटके मे कम अरियो को एकदम पराभूत कर सकता है। मैने पढा-'ह्वेल मछली ससार के जीवधारियो में सबसे बड़ी सबसे सबल व सशक्त होती है । दनिक हिंदुस्तान २७---८७ के भनुसार वल्ड वाइल्ड लाइफ एण्ड इण्डिया के हाल ही के एक "यूज- है - ६ १३०/चितन की धवल धाराएँ लेटर में विश्व के सबसे बड़े इस जानवर के बारे में तथ्यों का उदघाटन इस प्रकार किया गया है कि-एक पूर्ण विकसित नीली हल मछली की लम्बाई किसी दस मजिली इमारत की ऊचाई के बराबर तथा उसका हृदय सुप्रसिद्ध जमनकार 'वोल्कस वैगन' के बराबर होता है । पजाब केसरी ६-८-७८ के अक में 'माश्वर्यजनक कि तु सत्य शोषक से चित्र छपा है लिखा है-यह चित्र किसी विमान, समुद्री जहाज या विशाल भवन का नहीं, बल्कि हल मछली का है। यह टक्कर मारकर समुद्रो में चलने वाले जहाजों को उलट कर रख देती है । अब तक जो सबसे बडी ह्वेल मछली ससार में पाई गई वह १९३१ मे फाफलंड दीप में पाई गई। इसकी लम्बाई १०० फुट से अधिक थी और वजन १९५ टन । इस मछली के नवजात शिशु का वजन आठ हजार पोण्ड होता है और इसमें दस पौण्ड प्रति घण्टा की दर से वृद्धि होती है। शिशु प्रतिदिन एक सौ गलन दूध पीता है। किन्तु दुर्भाग्य से हल का जवा इसना छोटा होता है कि-उसमे हिरिग मछली उलझ जाए तो वह उसको श्वास नली वो बद करके उसका अत कर देती है। मैंने अनुभव किया-मानव की सवलता हम से भी वही, बहुत वही होती है पर तु दुर्भावना रूपी हिरिग-मछली उसका पूर्णत' विनाश पर डालती है । दुर्भावना से प्रस्त मानव समूमत मिट जाता है। मैंने पढ़ा-३१ पोण्ड शहद जमा करने के लिए मधुमविसपो पृथ्वी की परित्रमा से दुगुनी दूरी की उड़ान भरती हैं। मैंने अनुभव दिया-गभीरतम तत्व ज्ञान के मधुकोप को हस्तगत करने के लिए जिज्ञासु साधक को बने शास्त्रों और गुरुमों की परिक्रमा या परण-वदना परनी पड़ती है।
मैंने पढा मैंने सोचा/१३१ ८ ९ मैने पढ़ा-साप, सूघने का काम नाक से नहीं वग्न अपनी जीभ से करता है। मैने अनुभव किया-अचक्षुदशन को परिभाषा के अतगत सभी इन्द्रियो से देखा सुना जा सकन का आगमी वणन कितना मौलिक है। मैंने पढ़ा- 'उहाला म खाये कादा कदी न होये मादा -मालय के ग्रामीण अचल म प्रचलित कहावत विज्ञान की कसौटी पर उतनी ही खरी उतरती है। आयुर्वेद मे प्याज के अनक औषधीय गुणो का वणन है । कादा या प्याज नियमित भोजन के साथ लेने से अनेक रोगों की सभावना कम हो जाती है। प्रतिदिन कच्चा प्याज नमक के साय लेते रहने से उदर शूल म लाभ होता। कच्चे प्याज पेशाब को जलन को शात करते हैं। मिर्गी और हिस्टीरिया में प्याज का अक सुघाया जाता हैं । कच्चे प्याज का रस बर या अय कोट दश की जलन को शात करता है। अजीण, पीलिया भोर तिल्ली बढ जाने की अवस्था मे जामुन के मिरखे साथ इसको गम करके देना लाभदायक बताया जाता है। इसमे पाई जाने वाली तीखी गध एक गधयुक्त पदाथ के कारण हाती है । इस एलाईल प्रोपाइलडाई सलफाईड कहते हैं । यही पदाय इसके अनेक गुणो और लाभो का एक प्रमुख कारण है । यद्यपि इसकी गध उत्तेजक्ता मोर अनन्त कायिक्ता स्वय सिद्ध है तथापि इसके औषधीय गुणो को यो नकारा नही जा सक्ता जसे लू लगने पर इमे खिलाया जाता है, यहा तक कि खाकर या जेब मे रखकर बाहर जाने पर लू नहीं लगती। १० मन पढा-पानी पीकर या वाहर निकलने से लू लगने का डर नहीं रहता। मैंने अनुमघ क्यिा-गुरु-वचनामृत या शास्त्र वाणी का अमृतपान परके या ॐ का उच्चारण करता हुमा कोई व्यक्ति कहा भी चला जाये, परतु उसे विषय-वासना को लू लगने का हर नहीं रहना । w- --- me १३२/चि तन को धवल धाराएँ ११ मैंने पढा-उडते समय छाया निधि पक्षी की छाया जिस पर पडती है, वह सम्राट बन जाता है । मैंने अनुभव किया-गुरु को अनुग्रह भरी निगाहे जिस पर गिरती हैं वह अपना खुद का सम्राट बन जाता है। १२ मैंने पढ़ा-अपने बच्चो को समुद्र के किनारे छोडकर मादा क्रौंच दूर देश में भोजन लेने चली जाती है वहा वह आकाश की और देखकर बार बार अपने बच्चो का स्मरण करती है, मानसिक भाव सप्रेषण से दूरवर्ती बच्चों को पोषण मिलता रहता है । मैंने अनुमव क्यिा-गुरु की वात्सल्य भरी भावनाए पोर स्ने हिल स्मृतिया दूरस्थ शिष्प को ज्ञान दशन चारित्र का पोषण प्रदान करती रहती है। १३ मैने पढ़ा-छाछ विशेषत गाय की छाछ को प्रतिदिन नियमित रूप से सेवन किया जाय तो न बुढापा आता है और न रोग सताते हैं । छाछ मे सधव नमक, काली मिच, काला जीरा काली मघ मिला कर ली जावे तो पाचन शक्ति मे कभी विगाड नहीं होता। आयुर्वेद बोलता है- 'भोजनान्ते पिवेत्तकम ।' मैंने अनुभव किया-सा था की विशेषत चरित्र प्रधान ग्रयो की स्वाध्याय सुधा का नित्य सेवन किया जाये तो न विचारों में एलयता आती है और न काम क्रोध के रोग हो उत्पन्न होते हैं। यदि उनम भजन, कीतन स्तवन मुक्तक, कविता आदि का योग करके स्वाध्याय किया जाए तो मन की भाग दौड शात हो सकती है। जो मन पाचन को विगाडता है यानी पठित ज्ञान को आत्मसात नही होने देता वैसा भी न हो। १४ मैंने पढ़ा-प्राकृतिक चिकित्सा विशेषशो का अभिमत है कि वर्षा शुरू होते ही यदि दो तीन सप्ताह तक नित्य प्रात या किसी समय तुलसी ।
मैंने पढ़ा मैन साचा/१३३ की ४-६ पत्तिया चबा कर खाई जाए या प्रात ठण्डे जल मे नीबू का रस तथा गाम को तुलसी को चाय पी जाए तो मलेरिया हरगिज नहीं होता । जुकाम सर्दी खासी आदि से होने वाले ज्वर और बरसात में होने वाली प्राय सभी बीमारियो से छुटकारा भी मिल सकता है। सरजार्हा वडवुड ने २९ अप्रैल १९०४ के टाइम्स में लिखा था कि-बम्बई में जब विक्टोरिया गाहन और मलबट अजायबघर बन रहे थे तो वहा काम करने वाले, मलेरिया बुखार से परेशान हो गये थे, तब एक पादमी को राय में तुलसी का बगीचा लगाया गया । फलस्वरूप वहा मच्छर और मलेरिया दोनो ही खत्म हो गये । लदन के इपीरियल इस्टीट्यूट के डा० माल्डिंग और डा. पेलो ने यह साबित किया है कि तुलसी के अदर एक ऐसा उडनशील तेल होता है जो हवा में मिलकर मलेरिया बुखार फैलाने वाले जतुओ का खत्म कर देता है । १७०७ मे इपोरियल मलरिया काफस ने इस बात की पुष्टि की है कि काली तुलसी (आयुर्वेद को खाजी द्वारा सिद्ध हुआ है कि श्वेतपण की अपेक्षा श्यामपण को तुलसी श्रेष्ठ है) के सेवन से मलेरिया का प्रभाव कम होता हैं । मैंने अनुमय किया-मध्यात्म तत्त्व विशेषनो के अभिमत में कि प्रति दिन प्रात पञ्च परमेश्वर का हृदयग्राही जप और सुबह शाम प्राथना का अमृत पान किया जाए तो कष्टप्रद विघ्न बाधामो या किसी भी प्रकार की समस्याओं से सवथा बचा जा सकता है। दुश्चितन, दुविचार दुराचार का ज्वर उतर जाता है । १५ मैंने पढ़ा-प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञों का अभिमत है कि-माद्रव मास में प्रतिदिन यदि एक ताजा खीरा सवेर सवेरे ही खाया जाए तो पित्त तथा सम्पूर्ण वप मे खाए गये तेल और मसालों की गर्मी शांत हो जाती है।
१३४/चिन्तन को धवल धाराए मैंने अनुमय किया--अध्यात्म तत्त्व विशेषज्ञो के अभिमत म कि भाद्रव मास में आने वाले धार्मिक पर्वो को विशेषत सांवत्सरिक महापव का यदि मनसा, वाचा, कमणा विशुद्धतम होकर मना लिया जाता है तो वप भर में ज्ञात मनात मे हुई भूलो की उत्तापक गर्मी या कपायाग्नि की महाज्यालाए सवथा शात हो जाती हैं। १६ मैंने पढा-प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञो का अभिमत कि-विटामिन 'सो' प्रधान और अत्यन्त हितकारी फल नीबू पित्त नाशक, वायु तथा रक्त वा शोधन करता है, यानी रक्त के विकारो को दूर करता है पाचन क्रिया को सहायता देता है । शहद व गम जल के साथ पिया गया नींबू का रस थोडी थोडी मात्रा में कफ को ढीला करता है। मैंने अनुमय किया-अध्यात्म तत्त्व विशेपज्ञो के अभिमत मे कि मात्म पापक तत्त्व से भरपूर स्वाध्याय, त्रिताप (आधि दैविक आधि भौतक व आध्यात्मिक) को दूर करता है। तत्त्व शान क पाचन में सहायता देता है तथा पूर्व सचित कममल को धीरे धीरे क्षीण करता है। १७ मैंने पढा-प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञो का अभिमत कि-महान गुणकारी पक्के नारियल फल की गिरी कुछ देर से पचती है परतु पेट को साफ करती है मुह की स्वच्छता के साथ चबा चबा कर खाने से दातो को मजबूत बनाती है तथा कच्चे नारियल का पानी हल्का, ठडा, खून से खटाई को दूर करने वाला पाचन शक्ति से बढ़ाने वाला पित्त नाशक रक्त शोधक और पौष्टिक होता है । मैंने अनुभव क्यिा-अध्यात्म तत्त्व विशेषज्ञो का अभिमत कि सद् गुरुदेव की चुभती सी प्रतीत होने वाली हितकर शिक्षा हृदय में कुछ देर से ही उतर पाती है, परतु उतर जाने के बाद आत्मा एकदम स्वच्छ हो जाता है । वाणी के स्वर मधुर बन जाते हैं तपा मैंने पढा मैंने सोचा/१३५ सुगुरु का हितकर अनुशासन शिष्य को हलका व शान्त बनाकर रक्त गत उत्तेजना को दूर करने वाला, गहनतम तत्वो को पचा सक्ने की शक्ति प्रदान करने वाला, चचलतानाशक, वृत्तिशोधक तथा आत्मगुणो को पुष्ट करने वाला होता है । १८ मने पढा-प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञो का अभिमत कि विटामिन ए, बी सी, से भरपूर बहुत लाभदायक फल सतरे का उपयोग, स्वस्थ तथा रुग्ण दोनो ही अवस्थाओ मे किया जा सकता है। मीठे सतरे का रस बुखार दमा और निमोनिया में भी दिया जाता है, उपवास के दिनो म सतरे के रस से बहुत सहारा मिलता है साथ ही बहुत लाम भी होता है। मने अनुभव किया-अध्यात्म तत्त्व विशेषज्ञो के अभिमत मे कि- मात्मगुणवधिनी शक्ति से भरपूर खाद्य सपम, सयमी तथा असयमी दोनों ही अवस्थाओ में किया जा सकता है और किया जाना चाहिये। उससे अधिकाश शारीरिक व मानसिक रोगो व तनावो को दूर भगाया जा सकता है तथा विशुद्ध सयम की साधना में सहयोग प्राप्त किया जा सकता है। १९ मने पढ़ा-प्राकृतिर चिकित्सा विशेषज्ञो का अभिमत कि-यद्यपि माम फलो का राजा माना जाता है तथापि यह सत्य हैं कि खटटे आम से पाचन बिगरता है, खून विकृत होता है पर तु यदि पक्के माम वर्षा के पानी से अच्छी तरह घुल जाए तो बिना भिगोय ही अथवा तीन चार घण्टे तक पानी में भिगोकर खाये जा सकते हैं। माम के बाद दुग्ध पान जरूरी ही नहीं ममृत है यदि एक समय का भोजन आम दूध ही रहे तो क्या कहना । मने अनुभव किया-अध्यात्म तत्त्व विशेषनो दे अभिमत में निभान अत्यन्त महत्त्वपूण है परन्तु प्रपक्व ज्ञान नम्रता को नष्ट कर देता १३६/चिन्तन को धवल धाराए 7 है या विकृत कर देता है। परतु यदि वह ज्ञान आरम ज्ञानवान् अनुभवी गुरुपों को अमृत वाणी से प्राप्लावित हो जाता है या आप्लावित कर लिया जाता है तो समादरणीय हो जाता है उसके साय आचरण वा रसास्वादन करना बहुत जरूरी ही नहीं, अत्यन अपेक्षित है। यदि दोनो की सहावस्थिति हो जाए तो आनद का क्या कहना! २० मैने पढा-सोते समय आम खार ऊपर से दूध ले लिया जाये तो शीघ्र ही गहरी नीद आ जाती हैं। मैने अनुभव किया-सोत समय शुभचितन रूप माम के ऊपर भगवन्नाम जप रूप पय पान कर लिया जाये तो गहरी आत्म शाति प्राप्त होती है। २९ मैंने पढ़ा-~गभवती महिलाए यदि गभ के दिनों में निरतर आम का प्रयोग करें तो सु दर स तान की प्राप्ति होती है । मैंने अनुभव किया-गभकाल मे यदि नारिया सत्साहित्य या सद चिन्तन करें तो निश्चित ही सस्कारवान स तान की प्राप्ति होती है। २२ मैंने पढ़ा-रेगिस्तान का जहाज-ऊट, समय पर भरी हुई लगभग पानी को शरीरस्थ पैलियो से महिनो काम चला लेता है यानि स्वय को बचा लेता है। मैंने अनुभव किया-मापदाओं को आग में झुलसता हुमा पाधक समय-समय पर मजित अध्यात्म ज्ञानामृत से काम चला लेता है । यानि आतध्यानाग्नि के ताप स स्वय को बचा लेता है २३ मैंने पढ़ा-मत्त गजेद्र जब गर्मी को सह नही सकता है, तब यह अपने ही पेट मे स्थित पानी को सूड द्वारा निकालकर अपने शरीर पर छिडकता है, वह जल बहुत स्वच्छ व ग घरहित होता है । ८००के - , मैंने पढा सोचा/१३७ मैंने अनुभव किया-ठीक उसी प्रकार ससार-ताप से सतप्त सम्यक दशन का धनी-पात्मज्ञानी अपने ही अतर मे रहे हुए ज्ञानामृत से स्वय को सीचकर अपने मापको एकदम बचा लेता है यानि कषायो द्दीप्ति के भीषण निमित्त पाकर भी स्वम का शोतल बनाये रखता है। मैंने पढ़ा-घडी मे चावी भरकर वजन लेने पर घडी का वजन बढ जाता है। मैंने अनुभव किया-वैराग्यपूण प्रवचन सुनने के बाद विचार क्षण भर के लिए ही सही अवश्य वजनी बन जाते हैं । २५१ मैंने पढा-चावलो मे पिसा हुमा नमक मिलाकर रखने से उनमे कोडे पैदा नही हाते। मैंने अनुभव किया-प्रत्यक उपभोग्य पदार्थों में सीमा (मर्यादा) का नमक रख दिया जाये तो कलह वैमनस्य झगडे एव लूट खसोट के कीडे पैदा नहीं होते। २६ मैंने पढ़ा-इस अनत ब्रह्माण्ड में असख्य नीहारिकाए, तारक और ग्रह उपग्रह भ्रमणरत हैं किन्तु वे अपनी कक्षा के अनतिक्रमण के कारण परस्पर कोई किसी से टकराते नहीं। मने अनुभव किया-इस भूमण्डल के अनेक राष्ट्र, यदि अतर्राष्ट्रीय नैतिक मूल्यो का उल्लघन न करें, मनेक जाति कोम, सम्प्रदायो के लोग, समभाव का प्रतिक्रम करके एक दूसरे को कुचलने का प्रयत्न न करें तो परस्पर मे टकराने का प्रसग ही क्यों आए ? परस्पर में • टकराने के दुखद प्रसग स्वत्व विस्तार तथा पर के अस्तित्व को मिटाने की या विश्व पर छा जाने की उद्दाम लालसा के ही कारण प्रस्तुत होते हैं। २५ मैंने पढ़ा-एक टन लोहे में यदि पूरी तरह जग लग जाये तो उसका वजन तीन गुणा बढ़ जाता है। । - १३०/चितन की घवल धाराएं मने अनुभव क्यिा-आत्मा पर लगा आसक्ति का जग मात्मा को तीन गुणा ही नही कई गुणा बोझिल बनाकर भवसागर में डुबो देता है। २८ मैने पढा–सहस्रो सम्वत्सरो से खुले आकाश में स्थित दिल्ली के लोह स्तम्भ -कुतुबमीनार पर वर्षा से भीगने पर भी जग नही चढता। कारण, लोह से सल्फर व फासफोरस नामक तत्व निकाल दिये गये हैं। मने अनुभव किया-चित्त की धातु मे से मसद् विचार, असद् चितन व असद आचरण का तत्व निकल जाये तो आत्म साक्षात्कार में बाधक चचलता का जग नही चढता। तब फिर चल चित्त की उपज अपराध कलह कदाग्रह ईया-द्वेष असूया मत्सर को अवकाश ही कहा रहेगा। २९ मैने पढा-नए सेये गए रेशम के कोडे इतने छोटे होते हैं कि एक पौड वजन मे 7 लाख आ जाते हैं । मात्र छ सप्ताह में ही उनका वजन, बढकर 9500 पौंड हो जाता है । यह प्रगति उनके वजन का नो. लाख पचास हजार प्रतिशत है। पर तु इस प्रगति से क्या नाम ? बेचारे वे स्व निर्मित खोखलो (घरो) मे ही जबडकर मर जाते हैं। मने अनुभव किया-धन लोलुप लोग बाग, चरित्र को ताक पर रपकर रातो रात धनवान बन जाते हैं। परतु उस सम्पत्ति का सदुपयोग कर सकने की क्षमता के अभाव में वे रेशम के कीडों के समान नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं उनकी वह जमा पूजी जिसका ये सदुपयोग नहीं कर पाते, सालचियों द्वारा हपिया ली जाती है। ३. मने पढा-पजाब केसरी २८-८-१९७७ के अक में फि सोवियत वनानिकों के मतव्य में फूलों की सुगध दमा प्रमुख भनेक रोगों के उपचार में सहायम हो सकती है । सोवियत सवाद समिति ए. एन.
मैंने पढा मैंने सोचा/१३९ मने अनुभव पो. द्वारा सद्य प्रदत सूचना के अनुसार दुशान्वे स्थित अस्पताल में दमा मादि की चिकित्सा उक्त उपचार द्वारा की जा रही है। प्रयोग शाला के अनुस धानो से ज्ञात हुआ है कि-पौधो के वाप्पशील तत्व, रोगमूलक जीवाणुआ को मार देते है । पुष्पो की सुगध का पौधो पर भी रोगनाशक प्रभाव पड़ता है। किया-सयम-सहिष्णुता सादगी सतोष सरलता के सुमनो को सुवास मानव मन के काम क्रोध, अहकार, लोभ दम्भ प्रमुख आत्मघातक रोगा के विनाश मे सहायक सिद्ध होती है। इन सुमनो ने धारक सज्जनो के मन मस्तिष्क पूण स्वस्थ रहते है । यह सोलह आना सत्य तथ्य है । ३१ मने पढा - जिस प्रकार धीमी आच में पकाने से दूध पर मलाई जम जाती है, उसी प्रकार अनाज के ऊपर चोकर मलाई के रूप में सूखकर जम जाता है, जिस प्रकार मलाई निकाल देने पर दूध में घी की शक्ति कम हो जाती है । आटे से चोकर चावल से माड, सब्जी मे छिलका निवाल फैक्ने से उनके विटामिन, जो शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्व हैं कम हो जाते हैं । मने अनुभव किया-ठीक उसी प्रकार सहिष्णुता प्रमुख मानवीय गुणो से रहित मारव, मानव समाज के हित साधन मे अनुपयुक्त हो जाता है। ३२ मने पढा-तपेदिन से पीडित को जाच के बाद उचित परामश कर डाक्टर महोदय पूर्ण स्वस्थ होने का नुस्खा 'अमुक टीका प्रतिदिन ओर अमुक गोली हर रोज नाश्ता करने के बाद , लिख देते हैं। रोगी बाअदब उसे अपने बटुवे में रख लेता है । रोज सुबह- सुबह उठनर, बडे प्रेम भरे लहजे में- टीका हर रोज मोर अमुक गोली हर रोज नाश्ता करने के बाद '-का पाठ एक सौ एक ममुक १४०/चिन्तन की धवल धाराएं मार कर लेता है, परतु न टोका लगवाता है और न ही गोली खाता है, ऐसी स्थिति में वह पाठ कना उसे घुल घुल कर मरने से बचा सकता है ? मने अनुभव किया--पवित्र धम प्रपो में श्रेष्ठ मनुष्य बनने के सीधे सरल नुस्खे दिये गये होते हैं पर तु उन पर अमल न करके दुहराने मात्र से क्या भविष्य सवर या सुधर सकता है ? ३३ मैने पढ़ा-प्राणलेवा भवर और भीषण चट्टानो से दूर बहुत दूर रहने की चेतावनी देना मात्र कत्तम्य धम होता है-लाइट हाऊस का। यदि कोई जहाज अपनी हठधर्मिता या अक्डाई दिखाता हुआ भवर मे फमता है या चट्टानो से टकराता है तो जल समाधि लेकर या टकराकर चूर चूर उसी को होना पडता है । लाईट हाऊस का अपना कुछ नहीं बिगडता, परतु उसे अफसोस अवश्य होता है कि-- जहाज ने हठधर्मिता से काम न लिया होता तो वह नष्ट नहीं होता। भने अनुमर किया-ससार सागर के यात्री नर-नारियों को सतजन सजग करते हैं कि भव्यात्माओ ! अमुक अमुक काय न करो अयथा तुम्हारी शाति खत्म हो जायेगी, परतु यदि कोई नही मानते हैं और अगाति के प्राणलेवा गहरे गत में फस जाते हैं या अह को घट्टानो से टकराते हैं तो उसे रोप नही अफसोस अवश्य होता है कि वे यदि शास्त्रवाणी की नि स्वाथ चेतावनी को मान लेत तो दुखी नही होते । ३४ मने पढ़ा-उबलते हुए दूध मे चम्मच डाल देने से उफान आना बद हो जाता है । मने अनुभव किया--उबलते व विष उगलते हुए व्यक्ति के सामने मौन का आलबन ले लिया जाए तो उसका उफान शात हा जाता मैंने पढा मैंने सोचा/१४१ ३५ मैने पढ़ा-आधा गिलास पानी मे यदि एक मुट्ठी नमक डाल दिया जाए तो पानी का स्तर नीचा हो जाता है। मने अनुभव किया-मित्रता के महाशल से सतत प्रवाही प्रेम निझर के पानी से लबालब भरी हृदय झोल के स्तर को एक छोटा सा कटुवचन घटा ही नहीं देता कई बार तो एकदम सुखा देता हैं। साथ ही कटु बोलने वाले के जीवन स्तर को नीचा कर देता है। ३६ मने पढा-सप की दाढ में प्राणघातक विष होता है तो सप के तलबे मे धीरे धीरे जमा होने वाली एक टिकिया भी होती है जिसे बडे यत्न से प्राप्त किया जाता है इसी टिकियानुमा 'जहरमोहरा को सप दश के स्थान पर लगाने से सारा जहर खिच जाता है रोगी ठीक हो जाता है । जहर खिच जाने पर टिकिया को पानी से धोकर सुरक्षित रख लिया जाता है । कालबेलियों के मुखिया का दावा है- जहर खीचने के बाद जहरमोहरा को दूध मे डालने पर जहर के अश को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। मने अनुभव किया-मनुष्य की जीभ मे जहा प्राणहारी विष होता है वहा उस विष के प्रभाव को निस्तेज करने वाला औषधस्वरूप अमृत भी होता है । मानव को विवेकशीलता इसमे है कि वह अमृत का प्रयोग करे और जहर से भी अधिक पीडाकारक व आत्मगुण नाराक-कुवचन-अपशब्द-यग्य-ममभेदी ताने आदि के विष को निस्तेज करें। ३७ मन पढा -पुदीना लोग व बडी इलायची को पकाकर पीने से उल्टी तथा दस्त मे आराम होता है । मने अनुभव किया स्वाध्याय ध्यान और जाप के अमृतमय घोल को पीने से गाली कठोर वचन अपशब्द एव मम की बात कहने की कष्टकारक बीमारी मे लाभ होता है ।
१४२/चिन्तन को धवल धाराएँ (11205- वावर ३८ मैंने पढा-घाव पर नारियल के तेल को चुपडफर पिसी हुई मेहदी छिडक्ते रहने से घाव शीघ्र भर जाता है। मने अनुभव किया-पीडाकार किसी चुभती बात घाव पर सहृदयता का स्नेह चुपडकर शीतल व मधुर शम्ग की बौछार करते रहने से बना हुमा मार्मिक घाव अतिशीघ्र भर जाता है। ३९ मने पढा-ऐरोप्लेन को कणभेनी आवाज व भारी आडम्बर, भारी गजन-तजन और भारी चमक दमक के साथ आने वाली घटायें कुछ ही क्षणो मे मन ताकाश में क्षीण व विलीन हो जाती हैं। मने अनुभव किया-राजनतिक क्षेत्र में उभरने वाले सितारो नेताओ को बुल द आवाजें और घटाआ के समान गजन तजन करने वाली घटनाए कुछ ही क्षण! म विलीन और क्षीण हो जाती हैं फिर कसा आडम्बर ? कैसा गजन-तजन ? वैसी चमक-दमक ? ४० मने पढा-'युग धम (रायपुर) ११ जून १.७३ वे अक म कि लोहे से लोहा कटने की पुरानी कहावत को मनुष्य के पुरुषाथ व चितन शील मस्तिष्क से सचालित प्रयत्न ने बहुत पीछे ढकेल दिया है। अब पानी लोहे को काट सकता है। पानी ? जी हा! जिस पानी का सफल प्रयोग क सास (अमरिका) की एक वस्तु निर्माता कम्पनी ने लोहे प्लास्टर बोड रवड प्लाईवुड का काटने के लिये किया है। पोलीमरे नामक रासायनिक मिश्रण पानी में मिलाकर उसे ३४०. किलोग्राम तक दवाव देकर १/४० से मी व्यास को छेद वाली नीलम (धातु) की बनी टोटो से गुजारा जाता है । ७५० मीटर प्रति सैकेंड की रफ्तार से निकलने वाले पानी की वह धार सुई से भी तेज होती है। उस धार से धातु को विना झटका पहुचाए नरमई तेजी और मनचाहे ढग से काटा जा अक्ता है । आवश्यकतानुसार चालू व बद कर सकने वाला यह उपकरण धातु कटाई क अय साधनों से सर्वोत्तम सिद्ध हुआ है।
मैंने पढा मैंने सोचा/१४३ मने अनुमय क्यिा-इस समाचार ने सिद्ध कर दिया कि मानव क्या नहीं कर सकता है ? यदि वह चाहे तो अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार से इस धरा को स्वग बना सकना है । कठोर हृदयों को मोम बनाकर पिघला सकता है और उहे मनचाहे ढाचे मे डालकर भव्य मूर्तिया बना सस्ता है। ४१ मंने पढ़ा-विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञो का कथन कि-एक चूहे को यदि खाद्यान्न गोदाम में एक साल के लिए स्वतत्र धूमने को छोड़ दिया जाए तो वह तगभग ६० पौण्ड अन्न खा जाएगा और इससे कहीं अधिक अपने मलमूत्र से बर्बाद कर देगा। चूहो की सहारक क्षमता इतनी प्रबल है कि दुनिया मे अब तक लडी सारी लडाइयो में मारे गए लोगो से कही ज्यादा लोग उनके द्वारा फैलाई गई महामारियों से काल कवलित हो चुके हैं। मने अनुभव दिया--एक विवेक विकल तरुण को वैभव भरे घर या समृद्ध समाज मे एक साल के लिए स्वतत्र घूमने को छोड़ दिया जाए तो वह हजारो रुपये व्यसनो मे पानी की तरह बहा दगा और उद्दाम थासना, व्यसन मातक प्रादि से वायुमण्डल को दूपित बनाकर समूचे घर व समाज को बर्बाद कर देगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मासिक पत्रिका वल्ड हैल्थ के अनुसार चूहे तेजी से अपनी नस्ल में वृद्धि करते हैं । एक जोडी चूहा तीन साल में दो करोड चूहो की फौज खडी कर सकता है। हर नवजात चूहिया तीसरे चौथे माह गम धारण करने लगती है । गभकाल होता है १८ स ४२ दिन । एक भोसत मादा चूहा एक वष मे सात या छ बार बच्चे देती है और हर बार में लगभग दस बारह बच्चे तक पैदा करती है। कई जातियों में ता २२ तक भी। खैरियत यही है कि सभी जीवित नहीं रहते।
१४४/चितन की धवल धाराएं वासना के वे विवेक विकल दास, अपने साथी-सगियों को बहुत तीव्र वाढ ला देते हैं उनको बिरादरी के मेम्बर उतनी ही तीव्रता से बढकर आतक मपाते हुए देखे जाते हैं उन चूहो से समाज कसे मुक्त हो, यह चिन्तनीय प्रश्न है । - दक्षिण पूर्व एशियाई देश चूहो की लगभग २०० जातियों के कारण प्रतिवप लगभग तीन फरोह तीस लाख टन खाद्यान्न का नुकसान उठाते हैं । 'वल्ड हेल्थ' पत्रिका ने जानकारी देते हुए कहा है-विश्व भर मे चूहों की लगभग १७०० जातियों के बारे में जानकारी है उनके फसल का पांचवा भाग सो अनाज की कटाई से पूर्व ही खा लिया जाता है या बर्बाद कर दिया जाता है। जिससे देश के प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन चार चपाती मुहैया की जा सकती है । भ्यसन (शराब, बीडी सिगरेट चरस, गाजा आदि) वासनाओ की न जाने कितनी जातिया है जिनके कारण देश, पारित्रिक पतन के साथ प्रतिवप करोडो भरबो रुपयो की हानि उठाता है। -मन् १९७८के पजाब केसरी नामक दनिक में पठित जानकारी के अनुसार उदाहरण के तौर पर अकेले पजाब प्रात में ही एक वप में लगभग २२५ करोड रुपयो का शराब पिया जाता है यदि इसे छोड दिया जाए तो एक दो साल में एशिया का सबसे बडा ४८ फुट ऊचा, मिट्टी से बनने वाला एक एक पनी बाध (जिसकी मनु मानित लागत २२४ करोड रुपये है) का निर्माण किया जा सकता है जिससे बर्बादी के स्थान पर खुशहाली को लाया जा सकता है । मन पढ़ा-कमरों मे सजे हुए बारहसीगो के जो सीग देखे जाते हैं उहें प्राप्त करते समय यदि कही घोहे से बारहसीगे का कच्चा सीग टूट जाए तो उसका रक्त बहना शुरू हो जाता है और वह रक्त
मैंने पढा मैंने सोचा/१४५
तब तक बहता है जब तक शरीर का सारा रक्त समाप्त न हो
जाए। और इस तरह वेचारे को मृत्यु हो जाती है।
मैने अनुभव किया-घर घर के नौनिहाल उनीयमान युवको का
कुसगति के कारण, असमय में कच्चे शुक्र का पात होने पर उनकी
बुद्धि विद्या स्मरण शक्ति चितन आदि का ह्रास होने लगता है ।
और वह हास तब तक होता ही रहता है जब तक वे जीवित
रहते हैं । अन्त मे असमय में ही वे काल कवलित हो जाते हैं।
४३ मने पढ़ा-चूहो के बिल को खोदने पर पाया जाता है कि उनमें
हर प्रकार के मनाजो के अलग अलग ढेर लगे मिलते हैं, लगता है
कि-जैसे पसारी की दुवान लगो हो । क्या मजाल कि गेहू का एक
भी दाना ज्वार के ढेर में मिल जाये।
मैंने अनुभव किपा-परम पुरुषार्थी विवेभी मनुष्य घर में रहता
हुआ और आरम्भ-परिग्रह के कार्यों को परता हुआ मी
अघम और अधम मे धम का मेल नहीं होने देता। यही उसका
सम्यग् दशन है।
४४ मैने पढा-
-नई कोपलो
फूला फला के स्वागत मे नाचने कूदने
वाले, नवीनता प्रेमी टहनिया भोर तने, उन पुरानी जडो (जिनने
जमी से रस खीच कर वृक्ष को जीवन दिया और जीवन्त वृक्षो से
फूलो फलो को विकसित होने का अवसर दिया) की अवमानना
फरने मे तुल गये हैं।
मैंने अनुभव क्यिा-~आधुनिकता की अधी दौड मे आज की
पीढी के तरुण तरुणिया जीवन को सरस बनाने वाली उन पुरानी
श्रेष्ठतम बाता को नकारने पर तुन गए हैं जिनके नकार का परि-
णाम है-सवनाश या खण्डित बोध ।
धम मे
१४६/चितन की धवल धागएँ -- ४५ मैंने पढा-लोमडी अपने रहने की गुफा कभी नहीं बनाती, वह विज्जू जो एक स्वच्छता व सफाई पमद जीव होता है तथा अपने बिल को साफ सुथरा रखता है, उसके बिल में उसकी अनुपस्थिति मे गन्गी तथा सडा मास डाल देती है। बिज्जू रोज गेत हा तर सफाई करता रहे प्रत वह खीझकर आखिर उस बित को छोड़ देता है । फलत लोमडी उसमे मजे से अपना आसन जमा लेती है कि तु वह स्वच्छता नही ला पाती। मैने अनुमय किया-ठीक उसी प्रकार दुजन हमेशा दूसरो के दामन पर कीचड़ उछाल कर या उनके घरोको अपवित्र बनाकर अपना घर बनाने की साचता है या नि दा करके पद पाने को तत्पर रहता है पर तु वह सज्जन जैसी आब नहीं ला पाता । ४६ मैंने पढा-प्रझोका का वह ककर हिरण जा भारतीय हिरण जसा होते हुए भी कुत्ते की तरह भौंकता है अत इस बाकिंग डियर (भौंकने वाला हिरण) भी कहते है, इसकी सबसे बडो विशेषता यह है कि इसकी जीभ घटती बढती है। कभी कभी यह अपनी जीभ का इतनी बढा लता है कि-सारा चेहरा ही जीभ से ढक जाता हैं । मैंने अनुभव, रिया-लबार हर क्षण भौकता रहता है वह स्वाथ वश अपनी जीभ को छोटा-बडा बनाता हुआ अर्थात्-कभी खामोश तो कभी झूठो प्रशसा वा पुल बाघना हुआ अपने व्यक्तित्व को ढाप लेता है, तिरोहित कर लेता है । मैंने पढा--नवभारत टाइम्स १६७१९७७ के यक मे कि-सेमी सेमी कापस एनाबाडियम नामक पौधा जिसे दक्षिण मे थेनकोटाई मारम और उत्तर में वीवा पेड के नाम से जाना जाता है भारत के कई भागो मे उपलब्ध है जैसे दक्षिण में विशेषकर नदी तट पर बहुलता से मिलने के साथ हिमालय की तराई तथा पश्चिम-तट के -- 1 ४७ - मैंने पढ़ा मैंने सोचा/१४७ . -- साथ भी मिलता है। देश भर के धोबी, निशान बनाने वाली स्याही मे इसके फल को गिरी का उपयोग करते है। इसके फल की गिरी से निर्मित एक नयी औषधि मा सर जस असाध्य रोग के इलाज में सफलता के साथ प्रयोग किया गया है । इसका हिदी मे भिलावा और सस्कृत मे 'भिल्लातक नाम है। आयुर्वेद में इसका विस्तार से वणन है । पोलियो, कुष्ट ब घ्यत्व दमा जैसे अनेक प्रकार के कठिन रोगो पर उसका प्राचीन काल से आज तक वद्य सफलता पूर्वक प्रयोग करते आये हैं। वा ऋतु मे उत्तरी भारत के ज्वार या बाजरा के खेतो मे स्वत (सहज) उग पाने वाला 'झोझरू नामा पौधा (बू टी) जो अधिकतम तीन फुट त बढता है तभी उस पर सफेत ज्वार के दानो के सामान फूल लग आते हैं जो उसके बीज होते हैं। यह बू टी आदमी के बाहु को जड मे-बगल के अन्दर निकलेने वाली खकारी (फाडा-- जो कभी कभी एक के बाद एक करके सात सात को शृखला में निकल जाते है और रागी का भारी परेशानी में डाल देते है । जिस से शहरी लाग हर बार आपरेशन कराकर छुटकारा पाते हैं) की छूम तर औषधि है । खकारी (फाडे) स पीड़ित रोगी यदि अपनी बगल वाले हाथ से (यहा तक वि---दूरस्थ रागी का नाम लेकर उसके पीडित' बगल वाली भुजा वो जानकर अपगी उसी तरफ को भुजा से) उसे उखाड फै। तो वह तत्क्षण पीडा मुक्त हो जाता है। इतना ही नही भविष्य म उसको गल मे शृखलाबद्ध फोडे निक लने भी रूक जाते हैं। मैंने अनुभव किया--बूटियों का यह चमत्कारिक वणन, पातजल योग दशन के स्पप्ट मत कि- औषधिया भी बड़ी सिद्धिदायक होती है ' तथा 'अधिस्य मणि मम्मोपधीनाम् प्रमाव' यो स्पष्टता से सिद्ध करता है रितु योजकस्तत्र दुलभ अक्ति 4 अनुरूप १४०/चितन की धवल धाराएं अनुस धान पूवक ज्ञान के अभाव मे वे काम की बूटियां, बेकार के घास की तरह निष्फल चली जाती हैं । हजारों प्राणियो के वध से सप्राप्त अभक्ष्य पदार्थों से बनी दवाओ के बिना थके यशोगान करने वाले और उनके प्रभाव के दीवाने लोग क्या सात्त्विकता की ओर अग्रमर होंगे? --भारत मे बहुतायत से पाये जाने वाले तुलसी के पौधे न केवल लोगो को धार्मिक अवधारणा मे पवित्र हैं अपितु आयुर्वेद वे दष्टिकोण से सेहत के लिए बहुत महत्वपूण भी हैं । गमलो में लगे तुलसी का स्पश कर या गध से शुद्ध हुए वायु मे दुगघ को नष्ट करने का विलक्षण गुण तथा रोगों के कीटाणुओ को मारने की अदभुत क्षमता होती है । पदमोत्तर पुराणानुमार तुलसी के पौधे वाला घर तीथसम पवित्र होता है । उस घर मे यमदूत व प्राणनाशक व्याधिया तथा सप आदि नही आते । मैंने अनुभव क्यिा-जिसके मन मदिर मे वीतराग-भगवान विराजमान हैं वह मन तीथमम पवित्र होता है। उसमे पीडा व सताप प्रदायी यमदूत मनोविकार और काम कपाय के जहरीले नाग नही माते ४८ मैंने पढ़ा-तुलसी को पीस पर पडे मे छान कर उसके रस को सोने से पूर्व बटन पर मलने से मच्छर पास नही माते चन की नीद आती है। मैने अनुभव किया-वीतराग-भगवान के उपदेश घोट छान पर मन पर लेप कर लेने से दुवचन व दुर्विधार रूपी मच्छर नहीं काटते और मन प्रसन्न रहता है। ४९ मैंने पढ़ा-तुलसी पत्तो का पर्व पीने से शरीर की बढ़ी हुई मादी गर्न शन पटने लगती है । - मैंने पढ़ा मैंने सोचा/१४९ मैंने अनुभव किया--वीतराग-भगवान के वचन -अक का पान, आत्मा पर चढी विकारो को यादी का शन शन कम कर देता है। ५० मैंने पढ़ा-स्वाद में तीखी, हृदय के लिए बलप्रद, भूखवधक, वायु, कफ, खासी हिचकी कुष्ठ (कोढ) मूत्रकृच्छ रक्त विकार, हिस्टीरिया व बुखार नाशक तुलसी मे जितने रोग निरोधक तत्व हैं, उतने अन्य किसी भी पौधे या जडी बूटी मे नही हैं । नकसीर में तुलसी का रस नाक में डालने व सू घने मे, उसे हल्का गुनगुना कर या रस मे कपूर मिलाकर दो दो बूदे कान में डालने से व रस कपूर के मिश्रण को माथे पर लेप करने से मद गति से ही सही पर शन शने दाद, खाज खुजली मे ही नहीं, कोढ जसे भयकर रोग में तुलसी व नीम्बू वे रस के लेप से, दत पीडा मे तुलसी पत्तो व पिसी काली मिच की लुगदी बनाकर दातो के नीचे दबाने, नाक, कान सिरदद, दाद आदि रोगो मे तथा द त पीडा में लाभ होता है । काली मिच व सुलसी की पत्तियो को पीसकर मुनक्के म रखकर पाने स पाखों की ज्योति बढनी है। रक्त शोधन के लिए तुलसी का साग (पत्ते, जडें, फूल आदि) चूण प्रात और साय ताजे जल से लेन स (यदि चूण उपलब्ध न हो सके ता ताजी पत्तिया, एक बार मे ४-५) लेने से रक्त शुद्धि होती है। चेहरे पर तुलसी के पत्तों का रस तथा दाग धबो पर नीम्बू रस के साथ इसका रस मलन स चेहरा निखर उठता है । विषले कोडे-मकोड काटे स्थल पर तुलसी का रस मलने से या जले अवयव पर नारियल तेल में रस मिलाकर लगाने स विष का प्रभाव व जलन नष्ट हो जाती है । तुलसी के सूखे पोसेपत्तो के धूण मे जीरा बेतगिरी का चूण व काले नमक को बराबर मात्रा मिला मिश्रण (चूण) दही या छाछ के साथ सेवन करने से पाव व मरोड को बीमारियों में विशेष लाभ होता है। तुलसी रस मै पोग सा सेंधा नमक नाक में टपकाने से भूळ दूर हो जाती है।
१५०/चितन की धवल धाराएं मैंने अनुभव क्यिा-वीतराग-भगवान के शिक्षा सुधारस से प्रत्येक इन्द्रियो के विकार---रोगो में लाभ होता है, यानि चिर स्वस्थता प्राप्त होती है ज्ञान ज्योति बढ़ती है और मन के विचारो रा मशोधन होता है। ५१ मैंने पढा-ईश्वरीय अनुग्रह स्वरूपा सर्वोत्तम वनस्पति है -तुलसी । धार्मिक दृष्टि से ही महत्व को नही, औषधि के रूप में भी अत्यधिक गुणकारी है-तुलसी। भगवान विष्णु को प्रिय होने से विष्णुप्रिया, उत्तमरसा होने से 'सु-रसा' हर गाव में सुप्राप्या होन स--- व सुलभा, बहुत मजरी आने से बहुमजरी', पेट दर गठियादि व्याधियो का नाश करने से 'शूलहनी प्रमुख विधि साथ नामो से प्रगति-तुलसी की इस जगत को उपलब्धि, एक ईश्वरीय किंवा नैसर्गिक अनुग्रह है। 'ग्राम्या तुलसी तीखी, पडवी-घाडी सी कसली सुगन्धित और रुचि बढ़ाने वाली हैं आयुर्वेदानुसार यह बात कफ नाशक विषम्न रक्त विकार, कोड चम रोग मूत्रकृच्छ, पसली दद आदि व्याधि विनाशक हैं । हिंदू शास्त्रों में तुलसी का अपार गुणगान किया गया है। अकेले परम पराण में तुलसी के रोग व कीटाणु नाशक गुणो का वर्णन मालकारिक रूप में स्थाओ के माध्यम स विस्तार पूवा दिया गया हैं । श्लोक उपलब्ध है-- तुलसी कानन घेव, गृहे यस्वावतिष्ठते । तद गृह होयवत्तत्र, नापतियम-किचरा 1 जिस घर में तुलसी का पौधा होता है वह पर सोय रे समान पवित्र होना है। वरा घर म मातर राग रूपी यमदुत महो पात ।
मैंने पढा मैंने सोचा/१५१ 1 तुलसी-गधमादाय यत्र गच्छति मारुत । दिशोदश पुनात्याशु भूत ग्रामाश्चतुविधान ।। वायु के माध्यम से तुलसी-गध जिन जिन दिशामा मे पहुँचती है। उन-उन दिशामो में प्रवास करने वाले प्राणी व स्थान शुद्ध हो जात हैं । तुलसी गन्ध से क्षुद्र जीव जतु कोडे मकाडे यहा तक कि सप भी दूर रहते हैं यह तथ्य प्रयाग सिद्ध है। आयुर्वेदानुसार- (१) नित्य पाच सात तुलसी पत्ता के सेवन करते रहने स राग दूर रहते हैं बल बुद्धि, स्फूर्ति व स्वास्थ्य का समुचित विकाम होता है । पाचन शक्ति अच्छी रहती है और राग निराधक क्षमता बढती है। (२) तुलसी की माला धारण करना, रोगो से रक्षा करती है। (३) तुलसी पत्तो मे जल का अमल शुद्ध करने की निराली क्षमता है, इसलिए पूजा जल मे तुलसी पत्र डालन की परम्परा है। पीन के पानो मे या बतन मे तुलसी पत्र दालने से पानी शुद्ध रहता है। छाया मे सूखे पत्तो का वजन यदि 1 किलो हो तो उसमें 200 ग्राम दास धीनी ३०० ग्राम तेज पत्ते ब्रह्मो बूटी ३०० याम वनफ्शा ५० ग्राम सौफ ५०० ग्राम इलायची ३०० ग्राम लाल च दन ५०० ग्राम काली मिव 10 म यह कुल वजन २२' ० ग्राम हुआ। इन सबको फूटरर साफ बनीं में भरकर रखने का विधान है। चाय बनाते समय १ चम्मच यह मिषण मिला दना, प्याले चायक लिए पर्याप्त होता है । तुलसा की यह चाय राग नाशक ' स्वास्थ्य वधक् एव स्फुर्तिदायक मानी गई है । मैने चितन क्यिा तो पाया -सुदैवोदय से सौभाग्य) मिला आचायश्री फा तुलसी नाम सर्वोतम गुरुमात्र है। पति सरल सवग्राह्य मय सुलभ और माधि व्याधि उपाय विनाशक तथा समाधि प्रदायक - - १५२/चिन्तन की धवन धाराएं परम नाम है । युग प्रधान आचायत्री तुलसी का अणुव्रत, प्रेम ध्यान व जीवन विज्ञान मानव मन की मलीनता को मिटाने वाल नित्याचरणीय अनुदान है। भारत ज्योति आचायश्री तुलसी विविध आयामी साहित्य रस का पान स्वास्थ्य व स्फूर्तिदाय अमृत रस पान है । सदा सवदा विशेषत मरण काल में लिया गय तुलसी नाम परम कल्याणकारी होता है। ५२ मैंने पढा-भारत का भाल-हिमालय, जहा जड़ी बूटियों का अक्षय भण्डार है, वहा विश्व के सुदरतम पेड पौधो और विरल पशु पक्षियों का रमणीक उपवन भी है । तावामी भूरे रंग सीगविहीन और घने बाल वाला विशुद्ध शाकाहारी यहा एक बहुत ही सुन्दर जानवर होता है - कस्तुरी मृग, जो हिम पशु होने से गम स्थानो मे नही रह सकता। गगोत्री के ऊपर गोमुख में (जो गगा नदी का स्रोत माना जाता है जिसकी समुद्र तल से १३००० फुट ऊचाई है) तथा केदारनाथ क्षेत्र में इसके झुण्ड देखने को मिलते हैं। किंतु अकेले रहना इसे अधिक पसद है । यह इतना चुस्त होता है कि थोडी सी आहट पाते ही चौकन्ना होकर पलक झपकते ही चौकडिया भर माखो से मोझल हो जाता हैं। इसकी नाभि के पास केरी की शक्ल या नारगी के कद को एक गाठ-किंवा थली लगभग डेढ से दो इच लम्बी बद डिबियानुमा लटकती होती है (जिसका मुह नाभि के पास होने से उसमे बादामी या बाक्लेटी रग का तरल पदाथ इक्टठा होता है।) जिसम इलायची के दानो का भाकार लिए कस्तूरी होती है । प्रतएव पहाडी लोग इसे 'कस्तुरा कहते हैं । पक जाने पर पस्तूरी का रग रक्त जसा हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानो जमा हुआ रक्त हो । एक वस्तुरी मृग से करीब करीब एक तोला कस्तुरी को गांठ निकलती है। जगत की उमदा चीज कस्तुरी (कीमती पोषध) दुनिया बाजारो मे बही कीमत - मैंने पढा मैंने सोचा/१५३ (सोने से चार गुना) पर-प्रदाज है विश्व में सालाना ९४ करोड रुपयों की बिकती है। यह भारत, तिब्बत आदि मे औषधियो मे बहुत काम आती है भकेला जापान ही दवाओ के लिये १४० किलोग्राम कस्तूरी आयातित करता है। यूरोप मे इत्र आदि के लिये हर साल ४० किलोग्राम खच होती है । इसको सुगध इतनी तेज (तीव) व असह्य होती है वि सात आठ फुट दूर से उस तरफ का सास खीचने से या अतिमात्रा में सूध लेने से नकसीर फूट पडती है । कस्तूरा से कस्तूरी पाने के दो उपाय हैं ~या तो शिकारी बदूक की गोली से शिकार करके कस्तुरा की नाभि (गाठ) निकाल लेते है (एक किलोग्राम तरी इकट्ठी करने के लिए कोई ९०० मृगो को जान गवानी पडती है। शिकारी दूर से नर मादा को पहबान नही पाते अत बदक का शिकार दोनो बन जाते हैं । अक्सर मारे जाने वालो मे चार में तीन मादाए निकलती हैं । नवभारत बम्बई ४ अक्टूबर, १९ ५ के अनुसार नर कस्तूरे का शिकार उसके अडकोश मे सचित कस्तुरी के लिये किया जाता है । उसको ताजा पस्तूरी भूरे रंग की चिकनी व थोडी पतली होती है । वस्तूरे को मार कस्तुरी की थैली खोलकर इस निकाल लेते हैं और सुखाकर दानेदार चूण बना लेते हैं।) या वे बहुत धूम फिर कर उसके गमनागमन । रास्ता मालूम पर लेते हैं । क्योंकि उसकी विष्ठा से भी वस्तुरी की सुगध आती है, जिससे शिकारी उसके विश्राम स्थल का पता लगा लेते हैं। रस्तुरी मृग के आगे के पाव की हड्डी मे जोड न होने से वह बिना किसी सहारे के बैठ नहीं सकता, इस कमजोरी का लाम उठाते हुए चालाक शिकारी बठने के ठिकाने का पता लगाकर उसके सहारे को उखाद कर वहा एक कमजोर सरदी लगा देते हैं और उसके पीछे एक गडढा खोद दते हैं। परतूरा जब उसका सहारा लेकर बैठने साता है कि शिकारी री पाल का शिकार १५४/चितन को धवल धाराए होकर गडढे में गिर जाता है और फिर वह उठ नहीं पाता । दूसरे दिन प्रसन शिकारी वहा आकर तेज धार के चाकू में कस्तूरे की नाभि को चीरकर कस्तुरी की गाठ निकाल कर उस छोड़ देते हैं । कंदमुक्त कस्तूरा दद की चिता न करता हुआ चाकडी भरता हुमा दूर निकल जाता है। मैंने अनुभव किया-अनायास व सहज हो मे प्राप्त सम्पत्ति भी जय इस प्रकार पीडित, प्रपीडित, बदी और सतप्त बना सकती है तो सम्पत्ति और सत्ता की गाठ के साथ-साठ गाठ रखने वालो का क्या हाल हो सकता है ? प्रश्न बहुत ही मानवीय और ठडे दिमाग से विचारणीय है परतु यह एक कालिम सत्य है किस्तुरे मृग की तरह नि स्पृह साधक अपनी उस गाठ (धन सत्ता परिवार पत्नी पुत्र शरीर) को लुटा (खो) पर भी उसकी परवाह नही करते अपनेपन म मस्त बने रहते हैं जिससे वे चिन्ता, शोक और भय से सदा सयदा मुक्त रहते हैं। ५३ एक पौराणिक गाथा के अनुसार देवताओ के वैद्य अप्रिवनी कुमारा से जब धरती पुत्रो ने अपने स्वास्थ्य व सौदय की अभिवद्धि पौर सरक्षा के लिए सर्वोत्तम वस्तु की मागणा को तब तीन हजार वप पूव दवताओ के चिकित्सक अश्विनी कुमारों ने भूला वासियो पर अनुकम्पा करो रूप रग को बगिया में बहार ला दने वाला वसत सुदरता व स्वच्छता का प्रतीक, सदिय वदि का सर्वोत्तम उपकरण तथा शरद ऋतु का अमृतोपम प्राकृतिक उपहार प्रत्यक्ष उपयोगी पल-आवला प्रदान किया। प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने बीमारी से बचाने , सर्वोत्तम प्राकृतिक बोषध-आंवले को खोज निकाला । उनमे अनुमार प्रावला एक विशिष्ट रखापन है। माधुनिक द्रव्य सत्ववेत्ता भी स्वीकार करते हैं नि मैंन पढा मैंने सोचा/१५५ आयुर्वेद के इस औषधि रत्न मे बहुत बडे दिव्य गुण हैं। प्राकृतिक विटामिन सी क जितने भी ज्ञात साधन है उन सब में प्रावला सबसे अधिक समृद्ध है । मावले मे सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला विटामिन सी शरीर के ततुओ को नई शक्ति देता है, बुढापे भी प्रक्रिया को धीमा करता है रोग की प्रतिरोधक शक्ति पैदा कर खासी जुकाम जैसी बीमारियो से बचाता है। विटामिन सी की कमी होने पर मानव शरीर की हडिडया कमजोर हो जाती हैं। पाहोने लगता है। दात ढोले पड़ने लगते हैं। मसूढे क्षति ग्रस्त होकर पायरिया राग उत्पन्न करते हैं। मास क्षमा x पाचन शक्ति स्मरण शक्ति नेत्र ज्योति एव बाली की जीवन शक्ति व कालिमा बधक रक्त शुद्धि कारक, अतिशीघ्र बल ओज प्रदायक विटामिन सी प्रधान पावले की गरिमा महिमा और महत्ता की प्रतिपादक एक पुरातन व प्रसिद्ध कहावत है कि- 'आवले का खाया और बडो वा कहा वाद म मीठा लगता है दुनिया में कोई ऐसा फल नही जो खाते ममय कडवा, कसैला मोर बट्टा लगे किन्तु कुछ ही देर बाद जीभ माधुय का अनुभव करने लगे। - ५४ कहा जाता है-नि संतान शत वर्षीय महर्षि च्यवन को धमपली स्वग सिधार गई और बूढे व जजरकाय च्यवन के सिर पर भी मौत महराने लगी तब आयुर्वे के ममज्ञ च्यवन ने एक महत्वपूण मनु सधान करके च्यवनप्राश अवलेह, दूसरे शब्दो म प्रावले की घटनी (जिसमे अय अनेक चीजें भले पडती हो कि तु प्रधानता आवले की ही है) का आविष्कार कर डाला और सवप्रथम उसका प्रयोग अपने ऊपर ही किया। उनके इस सर्वश्रेष्ठ प्रयोग व उपयोग से उनका माया कम हो गया। चेहरा निखर उठा, बुढापे को परे धकेलकर
१.६/चिन्वन को धवल धाराएं
जवानी
पुन
लौट आई। नई शादी हुई व्यवन का वश फूला-मला,
यह सब था आवले प्रधान च्यवनप्राश का कमाल (चमत्तार)!
एक ताजे आवले मे २० नारगी सतरे) के बरावर विटामिन सी
हाता है। विटामिन 'सी' के अनुपम भण्डार के साथ दूसरे सभी
विटामिन और धनिज पदार्थ भी भरपूर होते हैं। प्रोटीन कैल्सियम,
खनिज लवण कार्वोज वसा मादि आवश्यक तत्त्व भी इसमें बहुत
होते हैं । आयरन व कैल्शियम पधिर होन के कारण इसके सेवन से
आयु वदती है। वृद्धावस्था तक इन्द्रियों की दुखलता का अनुभर
नहीं होता, वह नेत्र व त्वचा के समस्त रोगों--प्रमेह, श्वास-पास
रक्त विकार, बवासीर, शोष, उदर राग, स्वरमा सपहली रित
ज्वर तथा हृदय रोगनाशर है। इसका चूण यत्त और मामार के
लिए बहुत गुणकारी है।
x
फलो म यही एकमात्र एसा फल है जिस चाहो तो ताबा सूखा ।
पकार प्रयोग करें। प्रत्यक्ष स्पिनि म हरा विटामिन सुरक्षित
रहते हैं । गम परने पराने या सुखाने पर अन्य वस्तुओं के गिटापिन
सो वाघोज का अधिश या पूरा भाग नष्ट हो जाता है कि
आंवलों का विटामिन 'सी अल्प मात्रा में ही नष्ट होता है। इससे
तीन कारण है-एक ओर म इतना थायोग होता है कि मर
हान पर भी काफी बाधान बच जाता है। दूसरा भावने को बगस
वाघोजी रक्षा रखी है - नष्ट नहीं होने देती। तीसरा मारने
म पुछ अप पदाप भी हैं जो पायोर सो को करते है।
पही इस इम्प को विशेषता है। सूर्य विने में भी गुणगारो तर
विद्यमान रहा है।
एक ममिमा ने अनुमार बारित गुम्ना नामी परमेरे
नीने भोजन करन से विशेष स्वास्थ्य माम होगहै। मगरण
मैंने पढा मैंने सोचा/१५७ - x x -इस तिथि को चन्द्र किरणों का अमृत आवलों को प्राप्त होता है। सभवत इसीलिए भारत में इस तिथि को अक्षय नवमी त्योहार के रूप में मनाने की परम्परा है। x आवलो के फूल शीतलतादायक व दस्तावर होते हैं । जडें व छाल क्सली होती हैं । नियमित रूप से बावला सेवन करने से स्वर सुरीला बन जाता है । आवला के फल, छाल और पत्तियो मे टेनिन प्रचुर मात्रा में मिलता है। मावले की पत्तिया पोर फल पशुओ को खिलाए जाते हैं। इही सब विशेषताओ के कारण इसे जीवन या अमृतफल कहा जाता है । X X अमृतफल आंवले का ताजा रस प्रतिदिन शहद के साथ खाने से नेत्र- ज्योति बढ़ती है और मोतियाबिद आदि रोगो मे काफी फायदा होता है । सूखा आवला या त्रिफला रात को मिट्टी के बतन मे भिगोकर रोज सुबह उसे छानकर आखें धोई जाए तो नेत्र ज्योति बढती है। मावले का चूण पानी धो या शहद में बराबर के अनु- पान में मिलाकर सायकाल या रात मे सेवन किया जाए तो सभी प्रकार के नेत्र रोगो का निवारण हो जाता है । आवला के चूण को ही शुद्ध शहद में मिलाकर खाने से वाक्पटुता और शरीर की काति बढती है । बुढापे के प्रभाव से बचने के लिये आवला के रस में शहद मिश्री और शुद्ध घी मिलाकर सेवन करने से शरीर मे चुस्ती और आमा बनी रहती है। x x x सूखे आवलो का पूण नित्य रात को पानी या शहद के साथ लेने से कब्ज, अपच व बवासीर मादि रोगो से राहत मिलती है। अविले के १५८/चितन की धवल धाराएं रस मे खाड व घी मिलाकर सेवन किया जाए तो गठिया व वायु रोग दूर होते हैं । पावले के रस में इतनी शक्ति होती है कि साप का जहर या कोई जहर इसके आगे टिक नही पाता, इसके पीन से विप का असर कम हो जाता है । लोहे के बतन म सूखे आवले भिगाकर अगले दिन उमम शिकायाई तथा अरीठे का चूण मिलाकर बाल घोने से चमकदार, लम्बे व काले होत है । x x x प्राचीन काल मे विला ऋपि मुनियो का विशेष आहार या । मामा सयम व इसक सवन स ११५ वष की आयु म भी ऋषि मुनि पूण शक्तिशाली बने रहते थे। इसी के प्रभाव से उनके बाल काले और नेत्र की ज्योति सामाय बनी रहती थी। च्यवनप्राश का शारिक अथ है-च्यवन ऋषि का आहार । भनेको जडी-बूटियो से तयार किये जाने वाले इस अवलेह मे सबसे महत्वपूर्ण होता है-ताजा आवला। इस तरह पाचनशक्ति स्मरणशक्ति नेत्र ज्योति एव वालो की जीवनी शक्ति व कालिमा वधक रक्त शुद्धिकारक प्रतिशीघ्र बल मोज प्रदायक विटामिन सी प्रधान आवले की गरिमा महिमा और महत्ता को प्रतिपादक एक पुगतन व प्रसिद्ध वहावत है कि 'मायले का खाया और वडों का कहा बाद मे मीठा लगता है दुनिया में ऐसा कोई फल नही जो खाते समय कडवा, कमला और खट्टा लगे, रितु कुछ ही देर बाद जीभ माधुय का अनुभव करने लगे। मने अनुभव किया--अशा त व अस्वस्थ मन धरती-पुत्रा को शाति व स्वस्थता लाभ की माग पर तीर्थकरी ने आवले से बढकर कीमती (बहुमूल्य) और उपयोगी आरम-सयम का पाठ प्रदान दिया। यह सप है कि-आत्म रायम पहले पहल बडा कडवा लगता है बसला
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१६०/चि तन की धवल धाराएँ । इसका ध्यान रखना चाहिए। जम के बाद भी माता के अच्छे प्राचार विचार व सरकार के साथ पिता, परिवार पोर परिपाश्व के स्वस्य वातावरण को अत्य त अपेक्षा रहती है। मन को पोपण प्रदान करने वाली खुराक के अभाव मे आज न मालूम कितने लाख बच्चों की नैतिक मौतें हो रही हैं। स्वस्थ वातावरण प्रदान करके उनका वह नतिक जीवन बचाया जा सकता है। सम्यग् ज्ञान रूप विटामिन की कमी से लाखों बच्चे प्रभावित हैं । उस कमी के कारण वे अपने जीवन में कभी और किसी भी क्षण मानवीय फत यो से आख मृद सकता है। ५६ मने पढ़ा-चाय की उवली पत्तिया रगहने से शीशा अधिक स्वच्छ होता है। मैंने अनुभव किया-आचरण की ऊर्जा से सम्पन्न व्यक्ति के ससग से मन का शीशा अधिक निमल हाता है। मैंने पढा-बहुतायत से (बहुत सख्या मे) निकली चोटियों पर भाटा छिडक दो वे चली जाएगी। मैंने अनुभव किया-बहुत उभरते विचारो को उमियो पर मद श्वास का प्रयोग वर लो, व विलुप्त हो जाएगी। मैंने पढ़ा-सरसों के तेल में पोडी अजवायन पीसकर मिला दो उसमे पागज के टुकडे मिगोकर घाट के पाये पर रख दो मच्छर भाग जायेंगे। मैने अनुभव पिया-मद स्थास के साथ शुभ सकल्प करते हुए मन को मावित कर इन्ठामों के उभरते विवों पर मल दो, लाभ के रतपायी कीटाणु भाग नाएंगे।
मैंने पढा मैंने सोचा/१६१ ५९ मैंने पढा-डेढ ग्राम अनार का सूखा छिलका और डेढ ग्राम मुलेठी के चूण का समिश्रण शहद के साथ सेवन करने से स्वप्न दोष का निवारण हो जाता है। मैंने मनुभय किया-नवकार महामत्र के एक एक पद को निर्धारित रगो मे रगर चतय केद्रो पर ध्यान करने से विकार भावना का उपशमन हो जाता है। ६. मैंने पढा-ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार-आश्विन पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) को चद्रमा पृथ्वी के अत्यात समीप रहता है अत ऐसी चमा की चादनी फिर बारह महीने तक कभी नही हो पाती। इस रात मे पदमा कुमोदिनी को खिलाकर पृथ्वी का मोह लेता है । इस पूण चद्रमा को पानी में हिंदू लोग ठडी की हुई अमृत सदश खीर का भगवान विष्णु को भोग लगाकर प्रसाद लेते हैं। वैद्य लोग इस खीर में दवा मिलाकर रोगियों को प्रदान करते हैं और उहे स्वस्थ बनाते हैं। मैने अनुभव किया-ध्यान काल मै चित्त जितना आत्मा के समीप आ जाता है, उतना फिर कभी नहीं आता अत ध्यान से होने वाली मात्म निमलता अनय होती है । उस निमलता में अभिस्नात वीतराग पुरुप, सरागियो का भी अपने समता-रस से मोह लेता है। उनकी शीतलीभूत भावधारा आधि व्याधि उपाधि रूप रोगो को मिटाकर समाधि प्रदान करती है। ६१ मैने पढा-मूलत पास भोजी स्वभाव से शात पौर सीधा गडा (जिसकी प्रजाति के जानवर विलुप्त होते जा रहे हैं) का अपनी कौमती बाल तया चादी से दस गुणा अधिक कीमती सोग (सीगो की अवध तस्करी होती है) के कारण मारा जाता है । गैडे के सोग - १६२/चितन की धवल धाराएं घरो को सजाने के लिए उपयोग में लाये जाते हैं। इसका चूण कामोद्दीपन की अचूक दवा है। मने अनुभव किया- कोमती वस्तुओ का धारक यानी परिंचन प्राणी गिरता और पीडित होता ही है अकिंचन नही । ६२ मैंने पढा-अरबियना-अरबो की सम्पनता का लालच, पैसों के मोहताज-हैदराबाद के निवासियो को बुरी तरह आवपित कर रहा है अभावग्रस्त लोग अपनी लडरियो को अरब के शेया के हाथ, दी हुई रकम से शेप जिन्दगी आराम से कटेगी, इस आशा के साथ वेष देते हैं पर तु वहा पहुचने के बाद अधिकाश लडकियों के साथ जो सलूक होता है उसको हकीकत सुनने से रोगटे खड़े हो जाते हैं । प्राय घरबी नौशे उह बम्बई ले जाकर तलाक देकर वहा से नो दो ग्यारह हो जाते हैं। मैंने अनुमव किया-धन लोलुपो और उनकी औलादों को प्राय यही दुदशा होती है। ६३ मैंने पढ़ा-नई दुनिया ४ जनवरी १९८१ के अक में प्रकाशित सनदकुमार श्रीमाली के सकलन में--मसार की विविध विचित्र ताओ मे से एक विचित्रता मो-तेमने जाति के लोगों का एन समुदाय है। उसका राजा बनना कांटों का ताज पहनना है । उस समुदाय के राजा बनने वाले व्यक्ति को स्पष्टतया ज्ञात होता है कि विस वष पिस मास या क्सि तारीख को उसे मरना है । इस जाति के राजा का अमिक बढे ठाठ-बाट से किया जाता है। जिस दिन । राजा को राजगद्दी पर बिठाया जाता है उसी दिन उसे समुद्र FONT से लाया हाता है. वहां पर उसको बांखो पर पट्टी बांध दो Prfin) मा पर मासे, हा जाTATFअपनी मनी को हार वह fri IS FREME TIT (3m frrify मैंने पढा मैंन सोचा/१६३ . . -- उसमे अधिक से अधिर ककड भरले। एक बार में जितने ककड, उसको मुट्ठी मे आते हैं उनको गिन लिया जाता है । जितने ककड उतने ही दिन का उसका जीवन होता है। अतिम दिन उसी ठाठ बाट से उसके जीवन को समाप्त कर दिया जाता है। एक प्याले में जहर दिया जाता है और उधर महल के बाहर पार व्यक्ति उसके मृत शरीर के लिए ताबूत लिए खडे होते हैं। वे चार व्यक्ति उसको करगाह तक ले जाते हैं। मैंने अनुमय किया-मानव शिशु का जम बडे ठाठ बाट और उल्लासपूण वातावरण में होता है पर तु अनादि अनत ससार सागर पद सास रूप कक्ड ही उसके हाथ होते हैं । ज्योही वे पूरे हो जाते हैं, त्योही उसका जीवन समाप्त हो जाता है। किंवा 'सयोग वियोग आधि-व्याधि व उपाधियो का विषपान उसकी जीवन लीला को समाप्त कर देता है। फिर चार आदमी उसे उठाकर ले जाते हैं और अग्नि को समर्पित कर मदा के लिए उसको मिट्टी में मिला दिया जाता है। ६४ मैंने पढ़ा-नवभारत, बम्बई ४/१०/१९८७ के अक मे कि पृथ्वी के महासागर विभिन्न प्रकार के तत्त्वों और खनिज द्रव्यो-मैगनीज निकल सोना, कोबाल्ट ताबा, लोहा आदि के विशाल खजाने के रूप में हैं। अगर समुद्री पानी का सारा सोना निकाल लिया जाय तो दुनिया के हर आदमी को एक एक टन से भी अधिक सोना मिल सकता है। । सोवियत सम के समुद्री मत्स्य उद्योग और सागर विज्ञान के अखिल सघीय अनुसंधान संस्थान के प्रोफेसर इल्या अजगोखिन का कहना है कि समुद्र में उपलब्ध तत्त्वो से भनेक दवाए बनाई जा सकती हैं । -- - १६४/चिन्तन की धवल धाराएँ हाल ही में सोवियत विशेषज्ञों ने समुद्री सुनहरी मछलियों मे टैट्रो डोटोसोन नामक तत्व प्राप्त करने की विधि निकाली है। यह रसायन बहुत महगा है और दमे की दवा बनाने के काम आता है । इसी प्रकार समुद्री जल मे उपलब्ध एक प्रकार की सेवार के रेशों से कपडे बनाये जा सकते हैं। दक्षिणी सागरी में हजारो मोल तक समुद्री स्पज फैले हुए हैं, जो प्रोटीन बसा और कार्बोहाईड्रेट की कभी न खत्म होने वाली खान है । मैंने अनुभव किया-आत्मा में शक्ति का अक्षय भडार छुपा पा है। यदि उस पा लिया जाये तो कोई भी प्राणी [व्यक्ति] दोन होन, अशात-क्लात न रहे और अनन्त ज्ञान दशन का अधिपति बन जाये। शारीरिक, मानसिक एव भावनात्मक रोगो को उपशमन करने की सम्पूण शक्ति और आत्मगुण-ज्ञान, दशन की कभी खत्म न होने बाली मनतता आत्मा में निहित है। ६५ मैंने पढ़ा-पृथ्वीतल मे अपार जलराशि प्रवाहित है, परन्तु फकह पत्थर मिट्टी और पट्टानो को तोडे बिना वह हस्तगत नहीं होती। मैने अनुभव किया -आरमा में प्रवाहित शात व निमल मानन्द र प्रक्षय जल के स्रोत को विषय विकार वासना, कुसस्कारों के बड परपर व घनीभूत पट्टानों को तोडे बिना प्राप्त नहीं दिया जा साता है। . मुख मसौदय ६६ मैने पढ़ा-अरीठा अपने सागों से धोने वाले में ददाता है चेहरे के सप रग को निखारने वाले उपटना में यह प्रयुक्त होता है। पामों को सजा सवारपर अमिट वैभव व अनुपम योन्यं प्रदान करता है। इतना ही नही, एस पिक्विन के समान प्राण ा करता है। मापुरंद में मरण सूपर पिहों को 'भरिए कहा गया है, उनसे उबारने और निर्णायक स्थिति का स्पष्टीकरण दिन के उजाले की तरह सम्मुख रख देने के कारण ही हिदी के अरीठे को सस्कृत मे साथक सज्ञा--'मरिष्टक है। क्योकि सन्निपात या धोर मूच्छविस्था से वह रोगी को उवार दता है। उसके झाग को ५-१० बूदें नाक में डालते ही मूच्छित रोगी सावधान होकर उठ बैठता है । यदि यह प्रयोग प्रभावक न हो सके तो समझिए वि रोगी के बचने की आशा नहीं है। आयुर्वेदिक औषधि शास्त्र मे-अरीठा एक श्रेष्ठ वमन कारक औषधि के रूप में प्रतिष्ठित है । विष के प्राणघातक पसर को विनष्ट करने मे वमन भी एक कारक व प्रधान उपाय है। इस मथ मे परीठे का विषनाशक गुण स्वय सिद्ध है। अरीठे को उबालने पर जव झाग निकलने लगें तब विसाक्रात व्यक्ति को पिलाने से सखिया भादि स्मावर विपो तया सर्प दश मा पागल कुत्ता आदि के जगम विषो के विकार, वमन द्वारा बाहर निकल जाते हैं। अरीठे का स्वरस या उसका गाढा घोल अति मात्रा मे पिलाते ही शरीरगत विष वमन द्वारा निकल जाते है । सप वश पर-पानी में घोटकर पिलाया गया ६ ग्राम परीठा आमा शय मे पहुचते ही रोगी को होश आ जाता है भौर तत्क्षण यमन हो जाती है। दो घण्टे बाद दूसरी मात्रा देने पर शरीर निर्विष हो जाता है। बिच्छ के विष पर-मरीठे की गिरी पीसकर तीन गुनै गुट मे मिलाकर तीन गोलिया बनाकर पाच पाप मिनट में एक ए गोली शीतल जल से लेने पर या अरीठे को जल म घिसकर दश स्थल पर लेप करने से और माखो मै बजन करने से या फ्ल के छिलने का धूण तम्बार सम चिलम मे रखकर धूम्रपान करने से भी बिच्छू का विष पतिशीघ्र उतर जाता है ।
१६६/चिन्तन को धवल धाराएं हिस्टीरिया व मिर्गी पर अरीठे के फल की गिरी को पानी में घिस कर दो-चार बूदे नाव में डालने व आखो मे आजने से हिस्टीरिया मृगी या अय किसी भी प्रकार की मूळ दूर हो जाती है । यदि पात्र नाक में जलन हो तो गाय का घी या मक्खन लगाने से वह शात हो जाती है। आधा शीशो-अरीठे के फल को एक-दो काली मिच के साथ घिस फर अथवा अरोठे के झाग बनाकर शिर शूल के दुसरी ओर की नाक में दो चार वूदें टपकाने से आधाशीशी मे तत्काल लाभ होता है। एक एक घट के अतर से दिन में तीन बार तीन दिन तक यह प्रयोग करना पड़ता है । मय प्रकार के शीश शूल मे भी आराम होता है। बत रोग–अरीटे के बीजो के कोयले में फिटकरी का फूला मिलाकर खूब बारीक पीस कर मजन करने से दातो का हिलना खून आना या भय दद दूर होकर दात स्वस्थ व सुदृढ बनते हैं । त्वचा रोगो मे-अरीठे को पीसकर लेप किया जाता है। श्वास रोग में छाती में जमे हुए कफ को निकाल फेकने के लिए इसका प्रयोग क्यिा जाता है। इत्यादि अनेक विध रोगो पर काम आता है-यह प्रक्षालनकारी अरीठा । मैने अनुभव क्यिा-आयुर्वेद में जो स्थान मरीठे का है, वही स्थान पाध्यात्मिय जगत में प्रतिक्रमण का है। वह शांत स्वस्थ एवं निविषावस्था मे (गलती के अभाव मे) पात्म गुण-शान दर्शन चारित्र और तप को अभिवृद्धि करता है प्रमादवश स्खलनाओं अकरणीय पाप प्रवृत्तियो द्वारा अजित आत्म गुण द्योतक विपो (माध्यात्मिय अरिष्टो) का वमन मरा कर व्यक्ति के सपम जीवन का बचाव करने की अपूर्व क्षमता रखता है। प्रतिक्रमण (या मैंने पढा मैंने सोचा/१६७ आराधना) को भाव क्रिया व्यक्ति को सम्पूणत निविष (नि शल्य) बना देती है। वृत दोषो का पात्म साक्षी से वमन मोर "इयाणि जो जमह पुद्यमकासी पमाण का घोप, साधक के सयम को चिर यौवन प्रदान करता है। ७ मैंने पढा-विध्य पवत की विस्तृत व विशद शैलमाला के उच्चतम ऋग अमरक्टक से प्रसूत पश्चिमाभिमुख होकर सतत प्रवाही नमदा मध्य प्रदेश की जीवन रेखा कही जाती है, जिसके आसपास की उपजाऊ जमीन सोना उगलती है । भारत की पाच महानदियो म से एव है। इसका प्रवाह रावी, व्यास व सतलुज के सम्मिलित प्रवाहो से अधिक है। यह म प्र गुजरात, महाराष्ट्र की सीमामा मे से गुजरती हुई खभात की खाड़ी में मिल जाती है। उसका जल जव समुद्र मे मिलता है तब अन्याय नद नदियों के समान धारा के प्रभाव के कारण मीठा व उसी के स्वाद का होता है, परन्तु कुछ दूर बाद समुद्र के खारे पानी में विलीन होकर मधुरत्व खो देता है। परतु यह आश्चय की बात है रि-जहा से नमदा का जल खारा हो जाता है, वहा से एक मील पश्चात् समुद्र में नीचे से पानी निकलता सा दिखता है, जो मीठा होता है, जो नर्मदा के 'सिधु कया होने का पुष्ट प्रमाण प्रदान करता है । कया पिता के कोड मे क्रीडा करती ही है । प्राय सरिताए सि घु-पत्नी हैं सिंषु कन्या नहीं हैं। मैने अनुभव किया--जम लेने वाले प्रत्येक बालक-बालिकाए निश्छलता का सहज माधुय लिए हुए जमते हैं कुरु (काय) क्षेत्र मे चल पडते हैं । नद नदिया तटवर्ती ग्राम-नगरा को अमृत से माप्लावित करती चलती है वैसे ही वे पारिवारिकजनो को स्नेहा सिक्त वरती जाती हैं, किन्तु जन सागर मे मिलने पर, उनम छल अपच, झूठ-दभ का पारापन आ जाता है, परतु विवेक गोल अपने । १६८/चितन की धवल धाराएं विवेक व साधना से अमृत का मधुर स्रोत प्रस्फुटित कर लेता है और जनसागर की काया के समान सम्माननीय स्थान प्राप्त कर लेता है। प्रसिद्धि है कि नमदा तट पर साधना जितनी शीघ्र फलवती होती है, उतनी अन्यत्र नही । विवेकशील सम्यग्ज्ञानी की साधना जितनी शीघ्र फलप्रद होती है उतनी मिथ्यादष्टि की नहीं। ६८ मैने पढ़ा--नवभारत, बम्बई १० अगस्त, १९८३ अक मे । तकरीबन सौ वगमोल मे फैली हुयो राजस्थान की प्रसिद्ध साभर झील भारी बरसात के कारण समुद्र सो प्रतीत होने लगी। बरसाती पानी की प्रचुरता से झील के किनारे पर पडी हुयो तैयार नमक की थप्पियो बह गई। इस प्रकार अस्सी हजार टन नमक पानी मे बह जाने से एक अनुमान के अनुसार एक करोड रुपये का नुकसान हो गया। वर्षा का मीठा पानी मति मात्रा मे एकत्रित हो जाने से चालू वप मे नमक नहीं बन सकेगा। देश भर मे नमक का जितना उत्पादन होता है उसका यहा मात्र तीन प्रतिशन ही उत्पादन होता है । परतु समुद्री नमक से साभर झील के बारे पानी से बन इस सामर नमक का अधिक महत्व है। यह उत्तरी भारत के अनेक प्रांतो में तथा नेपाल तक जाता है। पानी प्राणी जगत के लिये बहुत बहा प्राकृतिक वरदान है किंतु इस प्रकार साभर झोल के लिये फिलहाल तथा माळ पोडित क्षेत्रों के लिये प्रतिवप वह अभिशाप बन गया और बन जाता है। मैंने अनुभव पिया-इस प्रसग से आगम वाक्य- मासवा त परिसवा, जे परिसवा ते आसवा' -जो वपन के हेतु हैं व मुक्ति के और जो मुक्ति के हेतु होते हैं, वे घ धन से है बन जाते हैं- सत्यता अनुभव में उतर आती है।
मैंने पढा मैंने सोचा/१६९ ६९ मैंने पढा-क्षतिग्रस्त रिसते हुए तेल कूपो से फारस की खाडी का पानी प्रदूषित होता चला जा रहा है। यदि यही हालत बरकरार रही तो खाडी मे जलचरो का जीवन ही दूभर हो जायेगा। अनुमान है-ईरान और कुर्वत के बीच तीन नल कूपो से प्रतिदिन १२ सौ बैरल कच्चा तेल खाडी के पानी में मिल रहा है। इससे तटीय शहरो के खारे पानी को मीठा बनाने वाले यत्र भी बेकार हो सकते हैं । समुद्री साप और घिडिया मरती जा रही हैं। जो तेल दुनिया के लिए वरदान बना वह पर्यावरण के लिए अभिशाप बन गया है। मैने अनुभव किया-यह खबर और निष्क्ष जैन दशन के सिद्धात अनेका त को परिपुष्ट करते हैं कि प्रत्येक पदाथ में अस्ति नास्ति घम, दूसरे शब्गे मे हितकर और अहितकर धम, दोनो की सहाव- स्थिति (विद्यमानता) रहती है। कभी किसी विधेयक धम की तो कभी किसी सहारक धम को सक्रियता बढ जाती है। यानि को वरदान प्रतीत होता है वह कि ही परिस्थितियो में अभिशाप बन जाता है और जो मभिशाप प्रतीत होता है वह वरदान भी। सच में कोई भी पदाथ न एका तत हितकर होता है और न अहितकर हो, वस्तुत उसमे दोनो घम होते हैं, जो सापेक्ष होते हैं । मैंने पढा-पीपल वक्ष के स्वास्थ्यवधक गुण-हनुमान क मदिर में करीब पीपल का वृक्ष प्राय लगाया जाता है । हनुमान को यह प्यारा है। पत्ते व फल हनुमान चाव से खाते हैं कारण पत्तो में मौलिक तत्त्व होते हैं। कवि ने लिखा है- चिकने में चिकना पीपल का वटवा, दूसरा चिकना घी। वक्षो के पत्रो की अपेक्षा ये चमकीले होते हैं। उनमें फेट (चिकनाई) ज्यादा प्रमाण में होती है। यह घी जसे प्राणिज फेट से भी ज्यादा मौलिक है। अत पत्ते व फस शक्तिवधर टॉनिक के रूप में लिये जा सकते हैं। पत्तो में अच्छे दर्जे का १७०/चिन्तन की धवल धाराए फाईवर या रेशा होता है-जो आतो को गति देता है। प्राकृतिक चिकित्सा म अतएव उपवास मे पूर्व रोगी को पत्ता खिलाना मच्छा माना जाता है । पत्ते स्वादिष्ट भी होते हैं । अ य पदार्थों के साथ खाये जा सकते हैं। रासायनिक खाद या कीटनाशक दवाए इन पर ही छिडकी जाती, अत यह अच्छा आहार माना जाता है । पत्तो में फेट का परिमाण अधिक होने से यह मेटल पावर बढाने में मदद करते हैं । पीपल वृक्ष को सस्कृत में - अश्वत्थ कहा गया है । यह हाथी-गणपति को प्रिय है-हाथो बुद्धिमान प्राणी है पुराणों में ऐसी बहुत कहानिया प्रचलित हैं। एक जमाने में राजाओ का चुनाव हाथी की मदद से होता था। तीन दिन पूर्व से हाथी या हथिनी को पीपल के पत्तो पर रखा जाता था, फिर लाइन में खडे युवको की ओर ले जाया जाता था । सूड में पुष्प माला रखी जाती थी। वह बुद्धिमान के गले में माला डाल देता था, फिर वह राजा बन जाता था। इसलिय ब्रेन पावर बढ़ाने में पत्ते पच्छा काम कर सकते हैं। स्वाद कडवा या ये मजेदार नही होता बल्कि सात्त्विक हाता है । आतो या साफ करने में काफी मदद करत हैं । खून को साफ करने या वण को सुधारने में उपयोगी है। वजन कम करना/वढाना, चम रोग ब्लड कैसर, ब्लड प्रेशर, सिरदद आदि रोगों में अय उपचार के साथ ये पत्ते काफी सहकारी बनते हैं । पत्ते दिन में सूरज की रोशनी में व रात में आक्सीजन (प्राणवायु) का विकास करते हैं। प्रत पीपल की चीज उप योगिता की दृष्टि से मौलिक है । महगाई में आदमी बादाम पिस्ता दूध घी, नही पा सकते वे पत्ते खाकर लाभ उठा सकते हैं। मैंने अनुभव किया-सत्साहित्य का स्वाध्याय व्यक्ति को बौद्धिक विकास व मानसिक एकाग्रता बढाने में अनय सहयोगो बनता है। स्वाध्याय आत्म कल्याणेच्छक मुमुक्षु मात्माओ को बहा प्रिय होता ।
ܝܗ मैंने पढ़ा मैंने सोचा/१७१ है। वह विकार-वासना के भीषण रोगो का शमन करने में चतुर चिकित्सक का काम करता है । कम बुद्धि वाले लोग भी स्वाध्याय से प्राप्त सहज ज्ञान से लाभावित हो सकते हैं । ७१. मैंने पढा-बम्बई के जवेरी बाजार को गलीनुमा तग सडक पर यदि कोई नया आदमी निकल जाये तो भीड, गर्मी धूल और तरह- तरह की चिल्लपो से निश्चय ही उसका दम घुटने लगेगा और वह परेशान हो उठेगा। परेशानी के उस मालम मे घबराकर या ग्राहक बनकर यदि वह किसी दुकान में घुस जाये तो वहा के वातानुकूलित माहौल मे उसे न केवल कुछ देर के लिए मानसिक सतोप मोर नयी स्फूर्ति का अनुभव होगा, दुकान के अदर की जगमगाहट से उसकी आखें भी चुधिया जाएगी। यही तो खासियत है-बम्बई के जवेरी बाजार को बाहर से कुछ और भीतर से कुछ और। यहा की तग सडको व सकरी गलियो को दखकर कोई यह अ दाज भी नहीं लगा सकता कि पादी, सोने होरे पोर जवाहरात के आभूषणो की खरीद फरोख्त का यह सबसे बडा केद्र देश मे हो सकता है, पर तु इस सत्य पा नकार भी कोन सकता है कि पूरे भारत मे आभूषणो के कारोबार का मुख्य केद्र बम्बई है और उस जवरी बाजार के कारण हो यह सम्मान प्राप्त है । अब तो इसके अतिरिक्त ठाकुर द्वार गिरगाव व प्रापेरा हाउस ा जेसरोड, दादर, परेल, माटूगा तथा अय अनगिनत उपनगरो म भी आभूषणों की खरीद फरोख्त के मुख्य केद्र स्थापित हो गय व होते जा रहे हैं। भाभूषणो का पूरा व्यवसाय, तडक भडक भोर ग्लमर से भरपूर है । अधिक से अधिक ग्राहकों या पाकृष्ट करने के लिए सभी दुकानदार अपनी दुकानो को दुल्हन की तरह सजा-सवारकर रखत हैं । अधिकाश दुकानें वातानुकूलित है। दुकान के मदर की सजावट पारदर्शी १७२/चितन की धवल धाराए दपणो और तेज प्रकाश वाले बल्वो इस प्रकार की जाती है कि दुकान मे जितने भी आभूषण और होरे जवाहरात मौजूद हैं, सब पर ग्राहको की नजर पड़ सके । बम्बई में आभूषणो का बाजार बारह महोने गम रहता है। परन्तु दीपावली या विवाहो के सोजन मे यह गर्मी बहुत बढ़ जाती है । दीपावली को धन ऐश्वय का त्यौहार मानते हैं, अत अधिकतर लोग इस अवसर पर सामर्थ्यानुसार कुछ माभूषण अवश्य खरीदते हैं । इस प्रकार देश में जितने आभूपणो को सालभर म बिक्री होती है उसकी ६० प्रतिशत वित्री अकेले दीपावली के अवसर पर ही हो जाती है, और दीपावली के अवसर पर जितनी विक्री पूरे भारत में होती है, उसकी सगभग १० प्रतिशत वित्री पकेले बम्बई में होती है । मैने अनुमय किया–साधना या माग भी बाहर दमघोटू प्रतीत होता है परतु ससार को परेशानियों से ऊबकर या असली आनद का प्राहक बनकर यदि कोई भीतर म प्रवेश कर गय और एक बार भीतरी जगत् से साक्षामार हो जाय, फिर तो यह मानद माये कि बाहरी जगद में आने का मन हो न करे। सोना होरे व जयाहरात + माभूषणों से बटार कीमती पाभूपण है- अतरग गुणों का विकास । यह होता है-प्रेयाध्यान की साधना द्वारा । प्रेक्षा रे भनेर विध प्रयोग ऐसा भाषषम पदापरते हैं कि सहज ही व्यक्ति ग्राहर बनार भीतर म उतर पाता है। प्रेक्षा की उपयोगिता सदा ही है परन्तु मशान्ति पोर मानपिर तनार की स्थिति में वह और अधिक पढ़ पाती है । तनाव दूर करने के जितने साविक उपाय हैं उनमें परयधिर सहम व मूस्पयान उपाय है-प्रेक्षा का प्रेय-अप्रेयर बिना वम दृष्टामावरे विकास का। बहुत सकरा - मैंने पढ़ा मैंने सोचा/१७३ युगप्रधान आचाय श्री तुलसी के शब्दों मे--प्रेक्षाध्यान जीवन को पन्छी तरह से जीने की कला है । इसका प्रशिक्षण इसान को अच्छा इन्सान बनाने के लिए है। ७२ मैंने पढा-"गगा अब कितनी मैली शीषर के मन्तगत हिदुस्तान ८ अगस्त, १९८५ के अक में- गगा समूचे उतर भारत की जीवन रेखा है क्योकि पेयजल से लेकर खेत सीचने और कल-कारखाने चलाने के लिए गया व उसकी सहायक नदियो पानी पर वह बहुत कुछ निभर है । गगा का कछार उतर में हिमालय और दक्षिण में विंध्याचल के सुविस्तृत भू भाग यानि भारत की कुस भूमि के लगभग चौथाई भाग को समेटता है। पापियो का उद्धार करने तथा हर प्रकार की मलिनता धो डालने के लिए सदियो से जन विश्वास में सर्वोच्च स्थान प्राप्त गगा केद्रीय जल प्रदूषण मडल की रपट के अनुसार अब अपनी शुद्धि क्षमता खोती जा रही है। प्राकृतिक सुरक्षा की उसकी शक्ति युक्ती जा रही है। इस हास को रोकने के लिए खासकर छोटे बडे शहरो के पास ऊपर की धारा में समुचित उपाय करने को तत्काल आवश्यकता है। गगा तट पर बसे शहरो मे नदी का पानी किनारे से दस मीटर तक पीने के काबिल तो है ही नही नहाने के लायक भी नहीं रहा है। पिछले पाच वष में इस पानी मे रोगजनर कीटाणु करीब तीन गुने बढ गये हैं। रोगाणुओं और भारी धातुओ से सवरेज गगा का पानी बिहार के तोगों की सेहत के लिए बहुत बड़ा जोखिम बन चुका है। पटना विश्वविद्यालय के डा एन सो घोष मोर लोग स्वास्थ्य सस्थान रे ग सी बी शर्मा ने राज्य में गगा प्रदूषण का पांच -- १७४/चिन्तन की धवल धाराए 2 वष तक गहराई से अध्ययन किया उससे पता चला कि पानी में घुली भारी धातुओ का मनुष्यो पर अरसे से हो रहा असर बहुत चिन्ताजनक है। उससे अनेक बीमारिया'फल रही हैं। एक अन्य धातु कैडमियम के बारे मे वैज्ञानिको का कहना है कि इसकी अत्यल्प मात्रा भी यदि हर दिन लगातार शरीर मे पहुँचे तो गुरदे खराब हो जाते हैं। प्रदूषण बढाने में जिम्मेदार है-गगा में गिरने वाले गदे पानी के नाले नालिया उद्योगो का गदा जल, मनुष्यो मवेशियो व अन्य जीवों की लाशें और रोगजनक कीटाणु । उद्योगों से निकलने वाले कचरे और गदे जल ने तो पर्यावरण का सतुलन ही बिगाड कर रख दिया है। वाराणसी के आगे प्रवाह में प्रौद्योगिक अवशेषो का जहर इतना बढ़ गया है कि नदी के अधि- काश हिस्से में मछलिया खत्म हो चुकी हैं । यही हाल कानपुर का है। मोवामा पुल के पास तो प्रदूषण बहुन भयानक हो चुका है । बाटा वाजता कारखाना व मैकडोवेल डिस्टलरी कारखाना ही हर दिन लगभग ढाई लाख लिटर गदा पानी गगा में छोडते हैं। इस हिस्से में नदी का जहरीलापन आकन के लिए प्रयोग किय गये हैं। बाटा कारखाने के पास नदी में छोड़ी गई मछली ४. घटे में मर जाती हैं और मैकडोपल कारखाने के पास तो वह मात्र पाच घण्टे में ही दम तोड देती है। तेल शोधन कारखाने के अवशेष तो इतन अधिक हैं कि उनके कारण १९८० में मुगेर के पास गगा के पानी में माग लग गयी थी। हुगली का मुहाना । कलकत्ता के नगर विस्तार में ले हेढ सौ से ज्यादा कारखानो के अवशेपो के अलावा ३६१ छोटे बडे नालों से महानगर का गदा पानी भी हुगली मे हो गिरने से भीषण प्रदूषण - - मैंने पढा मैंने सोचा/१७५ युक्त बन गया है। एक समय हुगली नदी हिलसा मछली के प्रजनन का सबसे बडा क्षेत्र था, अब मछलिया नाम मात्र की रह गयी हैं । कारण स्पष्ट है।। प्रदूषण की भयानकता तथा गगा प्रदूषण पर पिछले २०-२५ वष मे अनेक शोध व अध्ययन हो चुके हैं। उनमें से बगैर किसी अपवाद के हर एक इसी निष्कर्ष पर पहुचा है कि- गदे नालो व औद्योगिक प्रवशेषो के कारण होने वाले प्रदूषण को तत्काल रोक्ना अत्यावश्यक है । पब इस दिशा में सघन प्रयासो की शुरूपात हो रही है । के द्रीय स्तर पर एक मडल और विभिन्न स्तरो पर अनेक निकायो के गठन की घोपणा की जा चुकी है। मैंने अनुभव किया-गगा अब कितनी मैली या मानव प्रव कितना मैला हो गया है । समूचे प्राणी जगत में मानव का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसको प्रज्ञा के पानी से समूघा जगत अभिसिंचित है । वह स्वय में अपने और अन्या के पाप मल धोने की अनुपम क्षमता रखता है, कि तु आज वह यौगलिक युग से सहज सप्राप्त स्वच्छता तथा तीथकरो ऋषि महषियो और धर्माचार्यों द्वारा प्रदत्त निमलता को खोता जा रहा है । आज मानव का चरित्र कुसग रूप कवरे, अत्यन्त लालसा रूप गदगी वासनोद्दीपक दृश्यों रूपको के दशन रूप गदा जल तथा प्रदूषित वातावरण के प्रदूषण से इतना प्रदूषित हो गया है कि तत्काल प्रदूषण को रोकना नितात आवश्यक हो . गया है। T इस प्रदूषण को भयानकता को भविष्य दप्टा प्राचाय श्री तुलसी ने बहुत पहले हो न केवल भांप लिया, अपितु प्रदूषण मुक्त समाज रचना के लिए अणुव्रत आंदोलन जैसा असाम्प्रदायिक कारगर अभियान भी दिया। भीतरी व्यक्तित्व का बदलाव होकर जीवन का JFIE PIRTH TRIf TOPPRPRIT AFEIT-IT IFTF PHFE Hal-- १७६/चिन्तन की धवल धाराएँ सहज अग अणुव्रत बन सके तदथ प्रेक्षाध्यान का पूर्ण वैज्ञानिक व सावजनीन प्रयोग प्रस्तुत किया। आज को शिक्षा प्रणाली, जो गलत नहीं अधूरी अवश्य है, उसे पूर्णता प्रदान करने के लिए जीवन विज्ञान जैसा अभिनव उपक्रम उपस्थित पिया। मेरे अभिमत में इस त्रिवेणी में स्नान करने वाला व्यक्ति प्रदूषण मुक्त स्वस्थ जीवन जो सकेगा। एक समापार है-- गगा जल फिर शुद्ध होगा" गगा को प्रदूषण मुक्त बनाना सच में भगीरथ काय है। किन्तु है वह बहुत जरूरी। मानव चरित्र, जो बहुत गिर चुका है, फिर से करा उठाना आज की सर्वोच्च प्राथमिक आवश्यकता है, वह हो गया तो प्रदूषण के आतरिक कारण मिट जायेंगे। उनके मिटे विना- चले रात भर रहें वहीं कहावत चरिताप होगी। सघ में अणुव्रत प्रेक्षाध्यान व जीयन विनान के प्रशिक्षण से ही मानव समाज स्वच्छ व स्वस्थ हो सकेगा एसा मेरा अनुभव है। ७३ मैंने देखा-१७ दिसम्बर १९७७ की रात को एक स्वप्न-पचमी समिति से निवृत्त होकर एक वीरान माग से मैं प्रवास स्थान पर आ रहा हूँ। दो आदिवासी भील तोसे भाले मौर तीर लेकर माग रोग कर खड़े हैं । उनके भयावने डरावने वाले मुखडे व कारनाम दिल को दहला रहे हैं। मैं आंखें मीचवर चितामणी पावनाय स्मरण में लग गया है। कुछ समय पश्चात् देखता हू कि-एक भील अपने शिरारी कुतो के साथ मनोरजनी लगई लडता हुआ माग म पां भूस ये देर मे दबता पा रहा है। दूसरा मौल शक्तिहीन बनकर दूर पा या है । मैं पाश्व नाम जपता हुमा उस माग से दबे पांव सकुशल पार हो जाता है । मौत की भयार पाटी को माघ जाता है । मैं मनुभव परवा रहा-पाश्व नाम पा प्रत्यक्ष चमरसार ।
मैंने पढा मैंने सोचा/१७७ मैंने सोचा-स्वप्न स्वप्न पा कितु जब मैं स्वप्न पर विचारता हू तो पाता हू कितने भोषण हैं-~वाम गोध रूप दो भील और कितने खतरनाक हैं उनके शिकारी कुत्ते--अह कपट, दम्म व लोभ । परन्तु भगवान या सदगुरु का नाम बीतन सच में ही क्वष का काम करता है। स्वाध्याय, जाप व ध्यान वह ढेर है, जिसमे दब कर काम- क्रोध के भील और उनके शिकारी कुत्ते निबल व किंचित्तर हो जाते हैं। ७४ मैंने देखा-माघ शुक्ला चतुदशी १३ २-६७ की पिछली रात लग- भग साढे चार को पीयूष बेला पीयूष प्रवाही प्राणवान पवन, शशि की सुधास्रावी सुर सरिता की शीतल धारा से सृष्टि का कण-कण मभिषिक्त, अनिमेप नेत्र शशि देशम ज्योति केद्र द्वारा गृहीत शशि की शुभ्र धवल धारा-पीनियल को झकृत करती हुई शीप दीवार तक प्रवाहित शाति शीतलता का अवतरण समता-क्षीर सिंधु का अवगाहन सहसा अनुप्रेक्षा मे पेक्षा का चश्मण आकाश में द्रुतगति से पाने वाले छोटे छोटे बादलो द्वारा एक एक कर अनेक रूपो का निमितकरण और देखते ही देखते एक के बाद एक का अन त आकाश में विलयन । मैंने अनुप्रेक्षा की-अनित्या प्रेक्षा + अनुचि तन काल मे सवप्रथम उभर आयी चद्रमा की परिधि मठीक नीचे अपने बालक को पीठ पर बिठाये मगराकृति तत्पश्चात् प्रमश श्वान तथा श्वान की पूछ से रॉकेट से निकलते धा जसो नम्बी धारा घोडा खरगोग भादि अनगिन आकृतियाँ। बीच बीच म विभिनाकार कारक बादल रूप राहू द्वारा चन्द्रमा का ग्रहण भोर विमोचन । अनावृत पदमा और मत में निरभ्र चद्रमा ।
१.८/चितन की धवल धाराएं प्रतिक्षण-मयकाय क्षीयमाणो त लक्ष्यते । मामकुभ (कच्चा पहा) इवाम्भस्थो विशोण सचिभाव्यते । देहे पञ्चत्व मापन देही कर्मानु गोऽवश । देहातर मनुप्राप्य प्राक्तन त्यजते वपु ॥ इन श्लोको के अनुचितन दपण मे उभर माये बादलों के विभिन्न रूपो की तरह कर्मावृत्त आत्मा के अन त अतीत के अनत रूप। एक- एक पर जीण शीण शरीरा का विगलन नित नूतन शरीरो का अस्तित्व मे आगमन और आत में निरन आशिसम निविचार ध्यान मे अननपूण चद्र सदश पूण अनावत, निमल भात्मा का कभी न विलीन होने वाला चिदानद रूप स्वरूप । ७५ मैंने देखा-~-बरसात के दिनो मे महासागर की तरह उफनती हुयी परसाती नदिया जल जलकार पर पूरे इलाके को लील लेती हैं कितु जिस तेजी से बाइ चढती है उसो तेजी से उतर भी जाती है तब ये सिमट सिकुडकर दुबली पतली धारामो में बदल जाती हैं या पूरी की पूरी सूख जाती है। यहा-वहा डबरो में भरा उनका जल मडता रहता है। मैंने अनुभव किया-थैमान तरौरों को अम्तियार पर आदमी जिस बाढ़ की तेजी से रातों रात धनवान बनता है उमो तेजी से उसके धन की बाइ पाप का पडा फूट जाने पर बुराईयो या व्यसनों की मार खाकर सतर भी जाती है । तब उसरा सिमटा सिकुडा, दुबला पतला व ला स्प वहा भद्दा प्रतीत होता है । उस क्रुर व अमानवीय कृत्यों की सहाध भर रह जाती है। मैने पदा-सुपाच्य खाद्य पदाय घजूर मा सवव्यापी उपयोग। इसे सहारा को रोटी पहा जाता है । मह काफी महत्वपूर्ण पोपर पदाप है। अपने भार का करीव ७० प्रतिशत ग्लूकोज तथा प्रारटोज मैंने पढा मैंने सोचा/१७९ के रूप में इसम प्राकृतिक शकरा है। इसका शकरा सुपाच्य होने से गने के शकरा से श्रेष्ठ होता है । खजूरो के चयन में पूण सावधानी रखनी चाहिए क्योकि चिपचिपा पदाथ होने से इसमें धूल कण आसानी से चिपक जाते हैं। मक्खियो से भी सक्रमण फैल जाने का डर रहता है। अत इसे पकवन्द खरीदने के बावजूद भी उपयोग काल में धो लेना श्रेष्ठ होता है । रूस के एक महान् वैनानिक मेचनिकाफ ने कहा था कि-खुले दिल स अगर खजूर का प्रयोग किया जाए तो यह रोगाणुओ पर नियंत्रण रखता है तथा आतो में स्वस्थ वक्गेरिया उत्पन्न करता है। वे शरीर में ऊर्जा की तुरत मापूर्ति करते हैं तथा टूट हुए सेलों की मरम्मत भी। सामा यत खजूरो को कच्चा खाया जाता है। उबाले दूध के साथ मिला देने से यह बहुत स्वादिष्ट बन जाता है । इसका पौष्टिक महत्त्व बढ़ जाता है ? बुखार के बाद स्वास्थ्य लाभ के दौरान यह पुष्टिकर पेय देना बहुत उपयुक्त होता है । सहारा ये धनी लोग इसके बीज को हटाकर उसमें मक्खन भर देते हैं और बड़े चाव से खाते हैं । घसा लेने का यह वैज्ञानिक तरीका है। सुपाच्य खाद्य पदाथ खजूर कब्ज में बहुत लाभकारी है क्योकि इसके रेशे आतो में सक्रियता उत्पन्न करत हैं । इसक क्षारीय तत्त्व भम्लता को कम करते हैं। इसके निकोटिन अम्ल त्वचा को भयवस्थाओं, आतो की गडबडियो, स्नायुभो सिरदद तथा अनिद्रा को ठीक करते हैं । अनेक बीमारियो में खजूर का उपयोग विभिन्न तरीरो से किया जाता है। खजूर को घिसकर पानी में मिलाकर पी जाने से शराव की उत्तेजना दूर हो जाती है । पिसे हुए बीजो से आपों का मलहम तैयार किया जाता है।
१८०/चितन की धवल धाराएं - फल के बीजो को भूनकर काफी की तरह का पेय पदाथ बनाया जा सकता है। उसे 'खजूर काफी" कहा जाता है । खजूर का मीठा रस भी तैयार किया जाता है। इसके अनेकानेक प्रयोग हैं और प्रयोगो के जानकर लोग काफी लाभ भी उठाते हैं। मैंने अनुभव किया--लोकोक्तिया मुहावरो का अपना सवव्यापी अनूठा मिठास है । सरस्वती के पुत्रप्रवचनकारों व साहित्यकारो के लिए मुहावरे सजीवन हैं। इनका भावनात्मक माधुय मन को मोह लेता है । पर इनके प्रयोग करने में पूण सावधानी बरतनी चाहिए । अनुभव के छकने से छान कर ही प्रयोग करना चाहिए अन्यथा उपहास्य पात्र जन आक्रोश मोर पोप भाजन बनना पडता है। अनुभवपूत मुहावरो का मनमोहा उच्चारण नीरसता के कीटाणुओं पर नियंत्रण रखता है। प्रवचन लेखन मे सरसता मरता है। टूटी फूटी स्खलित भाषा को मरम्मत कर उसको सशक्त बनाता है। सामायत बात बात मे मुहावरो का उपयोग होता है परतु प्रवचन qय के साथ उनका उपयोग बहुत ही कणप्रिय होकर कषित बात को प्राणवान बना देता है। जनता के मन में घर कर बसे-काम क्रोध, ईया जलन के भोषण रोगों को मिटा देने में मुहावरे सशक्त वध का काम करते हैं । जले दिलों पर ये मरहम का शातिप्रद शीतल लेप बनते हैं। जानकार लोग उपयुक्त जगहों पर मुहावरों का उपयोग कर जनप्रियता प्राप्त करते हैं। ७७ मैंने पढ़ा-नेशनल इस्टीटयूट बाफ युट्रीशन (राष्ट्रीय पौष्टिकता सस्थान) व वैनानियो का निध्वप है कि-खाने में पवे पर मैषी थाने मधुमेह रोग पर काबू पान में बहुत ही असरदार होत हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन को रिपोट के अनुसार विश्व मे हृदय रोग पौर व्रण सम्म यो मीमारियों के बाद मधुमेह तोपरी पाम बीमारी मैंने पढ़ा मैंने सोचा/१०१ है। विश्व में हर पाचवा व्यक्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में मधुमेह से पीडित है। वैज्ञानिको ने अध्ययन कर निष्कष निकाला कि-कढी, सूप, चपाती या डवल राटी जैसे रोजमर्रा के भोजन मे २५ से १०० ग्राम तक मैयी मिलाकर खाने से मधुमेह नियत्रित किया जा सकता है । संस्थान में अध्ययनरत डा आर डी शर्मा पौर उनके दल का निणय है कि-मैथीयुक्त भोजन लेने के बाद मधुमेह के रोगियों में खून का ग्लूकोज पेशाव मे धोनी और कोलेस्ट्राल स्तर काफी कम हो जाता है। रागी का 21 दिन तक १५ ग्राम मैथी दिए जाने से प्लाज्मा ग्लुकोज म उल्लेखनीय सुधार आया और इन्सुलिन स्तर काफी कम पाया गया। मैथी मे पाया जाने वाला ५० प्रतिशत तक फाईबर अश मधुमह होने के अवसर कम करता है । डा शर्मा का कथन है, चुवि मैथी मे प्रोटीन और लाइसाइन पर्याप्त मात्रा में होता है इसलिए यह भोजन में दालो का आदेश विकल्प भी है। मैसूर क क द्रीय खाद्य तपनीको अनुसधान संस्थान के वैज्ञानिको का कहना है कि मैथी मिले भोजन से यकृत मे पित्त निर्माण को उत्ते- जना मिलती है और वह कोलेस्ट्रोल को पिसीय अम्लो में भी बद लती हैं । मैंने अनुभव किया-विश्व के समस्त शास्त्र आत्म सयम को प्रेरणा प्रदान गरते है। मधुमह की बीमारी से भी बढ़कर भयकर पोहा- कारक बीमारी है असयम की। विश्व का बहुत बडा भाग इससे प्रत्यक्ष परोक्ष पीडित है और दुखी भी। उसका सरल सुगम उपाय है प्रात्म सयम । यद्यपि सयम का रास्ता कडा (पडवा) प्रतीत होता है पर मजिल है-मलयज के लेप क समान बड़ी ही सुख शाति प्रदायक। मन वाणी और काया के सयम के विविध प्रकार असयम जम बीमारियो बो नियत्रित करते हैं और अय गुणो का विकास पर परम स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते है। मने पड़ा-मायुर्वेद म जिस शहद को विस्तृत चर्श है, प्राचीन मिष की चित्र लिपियों मे जिय गुणकारी प्रभाव वर्णित हैं, वेद व ७६ " १८४/चितन को धवल धाराएं 7 खाली पेट शहद व नीबू रस गुनगुने पानी में लेने से वजन कम होता है । एक भाग शहद दो भाग नीबू रस मिला वालों की जड़ों मे सदा मलने से बाल झडने बद होते हैं। शहर की मक्खी के काटे स्थान पर या जले पर लगाने से आराम हाता है। गर्म पानी मे दो बडे चम्मच शहद में नीम्बू रस मिलार दिन मे तोन चार बार सेवन से सर्दी जुकाम बुखार, गले का बीमारियो ठीर होती है। बदहजमी व थकावट भी दूर होती है। मप्ताह भर एक गिलास पानी में नीबूरस व शहद मिलाकर दिन में दो बार लेने मे कब्ज मिट जाता है । पेट साफ रहता है । शहद पाटने से लगातार आने वाली हिचकी मिटती है। एक बड़ी इलायची को पीसकर एक चम्मच शहद में मिलाकर पीने से पेट दद मिट जाता है । इत्यादि अनेक लाभ होते हैं-शहद के सेवन से । मैने अनुभव क्यिा-अनुभव फूलो के मधुर रस व आचरण के पराग से परम पवित्र तीथकर वाणी के माधुय की महिमा अपरम्पार है- श्रीमज्जमयाचाय के शब्दो मे अपरिमेय मधुर होती है चक्रवर्ती की खीर और अनुपम मधुर होता है-क्षीर सागर का सुस्वादु सलिल कि तु इनमे भी सुमधुर होती है-सवकल्याणी तीथकर वाणी। न केवल वह प्रतिप्रिय होती है अपितु आत्मा के सत्य शिव सुदरम् रूप को निखारने वाली भी होती है । वह पाय विकार विभावरूप रोगो क कीगणुओ को तत्था नष्ट कर डालती ह। शहद से सहस्रो गुणा ही नहीं अन तगुणा हितकर आत्म स्वास्थ्यप्रदायी जिनवाणी का सदा सवदा स्वाध्याय करना या सुनना बडा ही उपयोगी होता ह । शाश्वत सत्य की उद्गात्री जिनवाणी चाहे जितनी पुरानी होने के बावजूद उसकी प्रियता व गुणवत्ता जैसे की तस बनी रहती है । अत आत्म स्वास्थ्येच्छुक जिनवाणी वा स्वाध्याय (सेवन) निरतर अवश्य करें। -
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