Adarsh Library, Jaipur

Meri Kahani

Priyandana Usha · 2011/03

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मेरी प्रिय कहानियां /उषा नियंवदा

मेरी पहली कहानी 'लालचूनर' थी,
उसके बाद की तीन साल की अवधि में
मैंने तमाम कहानियां लिखीं...
मेरी कहानियों के पीछे एक वीज
जरूर होता है--एक विचार, एक इमेज,
एक अनुभव या अनुभूति का।...
चैलेंज मुझे उत्साहित करते हैं, डेड लाइन्स
मुझे प्रेरित करती हैं। मेरी प्रिय कहानियां
वे हैं जोकि एक फ्लैश में जन्मी
और मैंने उन्हें लिख डाला!
सृजन-क्रिया मेरे अन्दर,
मन में बराबर चलती रहती है
जव मैं कहती हूं कि मैं आजकल
कुछ नहीं लिख रही हूं तो शायद मैं झूठ
बोलती हूं। हर दिन इस इन्तजार में गुजरता है
कि न जाने कब, क्या मन को यों छू ले
कि एक नई कहानी की.शुरुग्रात हो जाए

मेरी कहानियाँ

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भूमिका तब तक इंडियाना मै गर्मियां मा मुकी थीं। कैम्पस के मामने पाकर मैंने तभी सक से मिला पकेट फाड़ा-'नई महानिया' की प्रतियां थीं। मात सित से रेरित अंशों को घोलकर नजर डालते ही मुझे एक मटका-सा लगा । 'वापसी' पर एक पर्चा, परिषर्षा साइग्रेरी के सामने अपनी प्रिय बेंच पर बैठकर मैंने ये पृष्ठ पर राते। 'मूजीन ओ'नोल पर जो सेप पतास के लिए लिखना पा, उसे भूसकर मैं बहुत र तक उस घर पर बैठी रही-मुछ परिचित, कुछ अपरिचित नाम मन में डूबते. उतराते रहे। गुरु, प्रकापाचंद्र गुप्त, उपेन्द्रनाप अरक, 'निर्गुण', जिनकी कहानिया मैंने स्कूली आयु मै उसी पाय से पड़ी थी, जिस पाय से मैंने शरत्चंद्र का सेवन को पाट सता था। नया नाम था नामवर सिंह काउरा ममय जिनामा हुई, यह पम्जन है कौन ? और उन्हीं, मिले-जुले भायों के बीच, पहले सहन एक बहुत असेपन की अनुभूति हो गई, में दोपहर तक इधर-उधर भटरती रही, मन मे गुनती है कि अचानक यह जो सब हार-विमाग मा से मेरे ऊपर आ पड़ा है, उगाया करूं ? कपर से पानी का सा दबाव एंट गया तो समझट में मोने में कुछ पमरते कषों के बीच यह भावना रोए रह गई, कि इतनी दूर पाकर अपने संदर्भ में स्टार भी, म लेपन और हिंदी और भारत से पुरी हुई हूं। कि हिन्दी ही मेरी भाता है में यदि मुछ वर्षव्हाइस' मासे सिया जाएगा, तोहिन्दी में हो। मुड़कर देयने पर यह सग बहुत ही महत्वपूर्ण लगता है । उग मास. पूरे वर्ष मने अंग्रेजी मे लिया पा, महानिर्या, कविताएं, एक उपन्यास के पार अध्यापन प्रोफेसर, सहपाटी और मित्रों ने प्रशंमा पी पी मोर मागे जिसने पो रमाया पा। ममेरिता में जिन मारतीयों गे भेंट हुई पी, गर अंग्रेजी में लिख रहे थे, प०के० रामानुजन्, पी० साल, पानपद राजन। मुझे मगठा पा कि अंग्रेजी में गाड़ी चल सकती है, पर एक अनाम भावना मुझे बार-बार रोकती थी। उस दिन के बाद मेरे मन में दुविधा न रही। वह गर्मियां मैंने 'राइटर्स वर्कशाप' में विताई लिखने के साथ-साथ भारती से गप्पें लगाते हुए-वांस बूर्जेली के साथ कोल्ड कॉर्फ पीते हुए अपनी पसंद के लेखकों पर बातें करते हुए। मेरे निश्चय को उन्होंने स्वीकार कर लिया और हिन्दी में ही लिखने को उत्साहित किया। वर्कशाप छोड़ने के बाद मैंने भी यह बात स्वीकार कर ली कि लिखना मेरे जीवन का एक बहुत है अभिन्न भाग है, मेरे लिए बहुत ही आवश्यक है. इससे पहले मैंने लिखा था, पर अपने को लेखिका नहीं माना था । लिखना अकेले क्षणों का दिवास्वप्न, या फैटेर्स संसार की उपज था, बहुत कुछ मायनों में अब भी है, परन्तु अब वह एक 'कांशर एफर्ट' है । और शायद इसीलिए दुःखदायी भी। कहानियां, मुझे जब से याद है, मैंने गढ़ीं, कहीं और बाद में लिखीं। मेरै पहली कहानी जो 'सरिता' में छपी वह 'लाल चूनर' थी। उसके बाद की तीन साल की अवधि में मैंने तमाम कहानियां लिखीं तभी अपने लिखे गए के प्रति ती असंतोप उभरा, ऐसा जान पड़ा कि ऐसी कहानी लिखने में कोई चैलेंज नहीं है। इलाहावाद छोड़कर मैं दिल्ली आई और लेडी श्रीराम कालेज में उत्साह से अंग्रेजी पढ़ाना शुरू किया। 'छुट्टी का दिन' उन्हीं दिनों लिखी गई। बहुत दिनों बाद उसे अव पढ़ने पर मेरे मन में छोटे शहर के अकेलेपन और एक निरुद्देश्य मटकन का वही स्वाद ताजा हो आया जिसके दौरान मैंने यह कहानी लिखी थी। 'जिन्दगी और गुलाब के फूल' भी उन्हीं दिनों लिखी गई, और भी कई कहानियां, 'पूर्ति', 'मोहबंध', जो मध्यम वर्ग की, पढ़ी-लिखी स्त्रियों के इंटरपर्सनल संबंधों की कहानियां हैं। 'जिन्दगी और गुलाब के फूल' संग्रह की कहानियों के बाद एक बार फिर भावभूमि वदली, अनुभवों और अनुभूतियों का धरातल वदला-'कोई नहीं', 'झूठा दर्पण', 'एक कोई दूसरा' और 'पचपन खम्भे, लाल दीवारें' उन दिनों की उपज हैं । उन वर्षों की अंतिम कहानी 'वापसी' है। उसी वर्ष में फुलब्राइट पर अमरीकी साहित्य का अध्ययन करने अमेरिका माई, और इंडियाना विश्वविद्यालय में पोस्ट डॉक्टोरल काम शुरू किया । उस पहले वर्ष अमेरिका में मैंने बहुत कुछ नया जिया, नया परिवंश, नई पुस्तकें, नये विचार। रामानुजन ने अमेरिकी कवियों और - मेयकों से परिचय कराया-उसकी फिनिश मंगेतर ने स्कनेविया का द्वार धोला। एक ही सप्ताह में सत्यजित राय और इंगमार रीमान की फिल्में देखना मुझे सहज लगने लगा। उस वर्ष की पहली कहानी 'वनवास' है, जोकि एक संकुचित दायरे में रहने वाली भारतीय स्त्री के सांस्कृतिक संघर्ष की कहानी है। मेरी कहानियों के पीछे एक वीज जरूर होता है, एक विचार, एक इमेज, एक अनुभव या अनुभूति का। मैं यह दावा नही करती कि मेरे मारे पात्र एकदम बल्पित हैं, साथ ही कोई भी, ययापं जीवन से पूरी तरह, वैसा ही पृष्ठों में नहीं आ पाया है, रोफिकिसी व्यक्ति विशेप को लेकर उसे पहचाने जाने वाले रूप में रणना मुचुछ कवमरा बोरओछा-सा लगता है। यह जरूर है कि कभी-अभी कोई दृश्य, एक चेहरा या किमीका कहा गया वाक्य मेरी सृजनात्मक प्रत्रिया को ऐगे छू देता है कि एक पहानी अनायास अपने-आप गुप जाती है। प्रायः परित्रों का बीज जीवन से माता है, परन्तु कहानी शुरू करते हुए मेरे मन में जो इमेज होती है, यत करते तय एक- दम बदल जाती है। क्योकि बहुत बार मैं स्वयं यह नहीं जानती कि लियते गमय स्मृति या अनुभव का कौन-मा दरयाजा योल फोन याहर या सड़ा होगा। हाँ, शारीरिक विशेषताएं, यातचीत का ढग, और पृष्ठभूमि में निस्संकोच यपार्थ जीवन से मेती हूं। मे भी मेरी मांध कमरे की तरह स्मृति पर दृश्य उतारती रहती है, और कभी-कभी भूली हुई बात महानी में यों आ जाती है कि मुझे अपने अंदर के सहज फैटेलोगिंग सिस्टम पर आश्चर्य होता है। शायद इस प्रकार की स्मृति में कारण ही परिचित मुझे उनपर सिधन का मारोप लगाते हैं। ० ने मुझे लिग-तुम तो 'पचपन यंभ सिंधकर चलती बनी, यहाँ सव मेरे जीवन में नील को दूर रहे हैं, तर मुग्ने हंमी आ गई। पर-गह और मारियों का रंग, नोकरानी का नाम मैंने १० से पर लिया था, परन्तु गुपमा और नीत पाल्पनिक थे। जिस कहानी में श., पलित गारोरिस गरेया में, भरने अगली आवरण में, मेरे मननान में ही आ गई, उसमे उसने अपने को पहचाना नहीं है। इसी प्रकार वापसी' सिपने हुए मेरे मन में वन दोष पधने, माराम पे। धान में स्टेगन के पाम की पिताई गई गर्मियों की हियोनीमार, और वह प्रोडकोर से पति, जिन्होंने गामें मेरी मां काम करनेदयों से 'कलसनेस' और लापरवाही का रोना रोते हुए बिताई थीं। वह कहानी बहुत जल्दी और हड़बड़ी में लिखी गई थी। मैंने 'आकाशवाणी', प्रयाग और ग्नई कहानियां' दोनों को एक-एक कहानी का वचन दे दिया था, पर जैसी मेरी आदत है, टालमटोल करते हुए दिन निकल गए और जव श्रीमती शांति मेहरोत्रा के एक- एक दिन में तीन-तीन तकाजे आने लगे, तव 'पंनिक' में आकर मैंने डेढ़ दिन में वह कहानी लिख डाली । लिखने के वाद केवल थोड़ा-सा ही संशोधन किया गया-छपने पर, 'गजाधर वावू' के सबसे बड़े पुत्र ने मुझसे पूछा : "यह स्टेशन की सेटिंग और यह 'स्टोरी आइडिया' तुम्हें सूझा कैसे ?" तो भी मैं चुप रहकर मुस्कराने के अतिरिक्त कुछ और उत्तर न दे सकी । जव वह पत्रिका पढ़ रहा था तब मुझे लग रहा था कि किसी भी क्षण वह प्रति फेंक देगा और रोष से कमरा छोड़कर चला जाएगा। शायद उस कहानी ने उसे कहीं छुआ, पर वह अपने को या अपने पिता को पहचान नहीं सका, शायद इसलिए भी कि उन दोनों के पारस्परिक सम्बन्धों ने कहानी के आइडिया को ट्रिगर भर किया था, कहानी उसकी या उसके पिता की न थी। चजेन्ज मुझे उत्साहित करते हैं, डेडलाइन्स मुझे प्रेरित करती हैं, 'मेरी प्रिय कहानियां' वे हैं जोकि एक फ्लश में जन्मी, और मैंने एक या दो दिन में उन्हें लिख डाला । शायद वह कहानियां वरसों कहीं दवी पड़ी रहती हैं और सम्पादकों के चाबुक फटकारने पर, जव में हड़बड़ी में यह सोचने लगती हूं कि क्या लिखू, तव मैं पाती हूं कि मुझे दूर तक नहीं खोजना पड़ता। बहुत कुछ 'वापसी की ही परि- स्थितियों में लिखी गई कहानी 'सुरंग' है, और वातावरण वचपन की उन्हीं . स्मृतियों से प्रेरित; स्टेशन, रेलगाड़ियों, सिगनलों के पार क्षितिज, इन सबने एक कैनवस दिया, जिसपर 'मां', 'अरुणा' और 'बेबी' तीन कटे हुए प्राणी अपने आप, अपनी कहानी लिए हुए उतर आए। 'ट्रिप' मैंने डेनमार्क में लिखी थी, 'कितना बड़ा झूठ' डेनमार्क से लौटते ही। ये दोनों कहानियां एक बड़ी ही सचाई के मूड में लिखी गई, इस मायने में कि मात्मकथात्मक न होते हुए भी, मैं ऐसे पात्रों से परिचित थी, वह सब भी एक- दूसरे से परिचित थे। 'यदि ऐसा होता, तो ऐसे होता' लेकर मैंने घटनाएं और चरित्र गढ़ डाले थे। एक परिचिता ने इतना-भरकहा था, "तुम्हें पता,'-'ने '-' से शादी कर ली है।" और उसी क्षण, वह कहानी मेरे मन में सम्पूर्ण रूप से, . . - ६ माति से अंत तक उतर आई और उसे मने सिप भी जाता। 'कही की इंट, कहीं का रोग' सेफरहानी गूंयना यतरे से पानी नहीं है। कृष्ण रेहली के रिटों की प्रदर्शनी में मैंने अपनी पड़ोसिन का परिषप उनमे करावे हुए पहा, "यह मेरी मित्र हैं, स्वयं पित्रमार है. इनके पति सन है।" वाण के पाम गाड़ी मेरो एर अमरीगरी छात्रा नटराट भाव से बोल पड़ी, रेडियो ने कहा, बीप, बीर।" और उसके माप मेरे मभी पात्रम्हाका मारकर हंस परे। तब में एक अजीप-मी स्थिति में पड़ गई। 'सम्बन्य' के मर्जन गरी प्रेरणा मुझे पड़ोगी सटर से अवश्य मिली थी, परन्तु उसे पड़ोसिनोकरी सममाऊं, क्योकि यह मो मागंगा पी कि यह नहीं बुध और न समापूरी कहानी को ही मप मान में। परन्तु यह पहला अवगर पा जब मैं रंगे हापों पकड़ी गई। एक या दो सिटिंग में लियी गई कहानियों के विपरीत ये भी कहानियां है जिन्हें परने में सम्मा ममय मग जाता है। मानसिक रूप से सम्बन्ध' और "प्रतिध्वनियां' एक ही से मूड में मिमी गई है । एकदम अमेले और बाहरीपन को धनुमति में । पर सम्बन्धमा मारिया आने और पूरा होने में दो साल का अंतर है। इसी तरह 'मनियो' और 'टूटे हुए मे मुझे बहुत समय लग गया था। पहले पहल में मरिमन गाड़ी में भाई पी। बर्फ से जमीह, ग गोन पर या होकर एर बन्धु ने दूसरी पार एक यहीगी इमारत को दिखाते हुए बताया था कि वह विसामिन प्रदेश पागनगना मोर मस्तान है । ग रात, उनके पट में अतिपियों से घिरे होने पर भी, मबाहर पेशे में सिर धुनती हुई हवा का अकेला स्वर मुनती रही यो। पारों में जब यस एपदम रूगे मोर नंगे हो पाते हैं. शीतको बोर मेट सेज हा धंगे ही हाहाकार करती हुई उठती है, और पहने जाड़ों में मैंने 'टूटे हुए नियने नई गार प्रयत्न किया, पर उन पराम्पर मेरेर मोलसर मिना कि में एरभार एक परिधिा से मिलने गई। एंर बांगे दौडिने पुराने मरान मे बह रहा करते थे, गलियारा पुए से गला पा, मोर उसमे महमा, भुनी हपार और जीरे की महा स्यामीप से बीई पो। 'मासरा विचार मुझे वही मे बापा-और तब बहानी मागे पड़ी। दीति', 'पोस्ती में यरूपर,'सरन्य' महानियों को पृष्ठभूमि विनि से प्रभावित है. पात्र यहाँ न होरहीं भी होसरते है. कनसस में पा मोर. । - पा में, पर कटेपन की भावना हर जगह, वैसी ही है। मेरे लिए, चाहे पात्र देश में रहते हों, या भारत के किसी छोटे शहर में; चाहे वह समाज द्वारा थोपा पा सुपमा का अकेलापन हो या अपने-आप ग्रहण किया हुआ राधिका का जनवीपन, प्रामाणिक हैं और लेखन के उपयुक्त । मेरे विचार में, विदेशी वाता. बरण ने इस अकेलेपन और अजनवीपन को मुखर किया है, वैसे मैं स्वयं एव. बहुत 'प्राइवेट परसन' हूं, और गहरे मित्र बनाने में मुझे समय लगता है, शायद मेरे पात्रों के अकेलेपन में, मेरी इस दृष्टि और प्रवृत्ति का प्रभाव आ जाता है। एक बार लिखकर मैं ऐसे चुक जाती हूं कि फिर उसे छूने का मन नहीं करता। सृजनात्मक ज्वार में लिखी गई कहानियों को मैंने कम ही रिटच किया है । वहुत- सी कहानियों की मेरे पास प्रतिलिपि तक नहीं है। कहानी लिखे जाने से छपने तक के व्यवधान में मैं उससे इतनी दूर चली जाती हूं कि कभी-कभी प्रकाशित कहानी को पढ़कर मुझे आश्चर्य होता है कि वह मुझसे ही लिखी गई है। सृजनक्रिया मेरे अन्दर, मन में, वरावर चलती रहती है, उसकी अभिव्यक्ति चाहे क्लास में दिए गए लेक्चर में हो, या लम्बे पत्रों या नोटबुक में । जव मैं कहती हूं कि मैं आजकल कुछ नहीं लिख रही हूं तो शायद मैं झूठ बोलती हूं। हर दिन इस इन्तजार में गुजरता है कि न जाने कब, क्या मन को यों छू ले कि एक नई कहानी या उपन्यास की शुरुआत हो जाए। . . -उषा प्रियम्वा ७ जनवरी, १६७४ मैडिसन, विस्कांसिन

रितना बड़ा मूठ
पिपलनी हुई
वापसी
YE
७३
गुटान
मोहबन्ध
१७
एटीमा दिन
जिन्दगी और कुमार के फूल १२५

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कितना बड़ा यहत सवेरे, बहुत जल्दी उठकर वह पीधे का दरवारा ग्रोलकर हमीर पर बैठ गई । विरतर की गरमाई से निकलकर पसे में बैटने से एकबारगी ही पूरी 'देह में शैएं उठ पाए । बाद में वह ताजी, सोपी हवा पोड़ी-गी अच्छी मगी। पौधे पाग का सम्या-घोडा मैदान था, वहां रविवार को मरके पुटबाल गेमते पे, भासपास के पनटों के सम्मिलित गोपे में, और पड़ोसिन के प्लाट में गूये पौधों के बीच एक महत कंघे पोथै पर यहा-सा गूरजमुखी का पूरा दीप पापा। धमका महसपमुष मूरज की भोर था। रिन ने सारी बापत से पीठ मोर बहिं हामी, एकाएक उसने पाहा कि यह पोवार रो पड़े, येसे ही बसे पति की अर्थी उठते हुए देय गप:विधवा रो उहती है. पर इस समय उसने दांत पराकर भीष मिए, और पीपे यक्षों, फूलों और पाग को देयती रही । दृश्य रह-रहकर धसा जाता। बल ही किरन एट्टी के बाद मोटोपी, गई महीने की पड़ी के बाद सरोदारा, उरमाहिन । पिटते पन्द्रह दिनों में रोड कई बार पर मौटने की सोपार युग हो मैती पी। भौर पर की याद करते समय दुसी, मेर या दोषारों सायराम महीं माता ।मने गम प्सान कर लिया पा। सीमरे पहर पांपेगी, माफियों को समर कैप गे मेने पनि चले गए हगि, इसलिए पर घासी होगा, जाते ही वह भाग को फोन परेगी। ऐमा ही किया, पति मोट पका, 'नीता और मीनागोमने गा रहा। कागरी उम पुर्णगोमगार एक सोने में फाये हुए यह फोन की मोर श, मरे रंग के फोन पर जम माई एस पी परत पर मान गया, पर मगर मिलाते संगिहो भाई पी। तोमरोहोरिंग पर फोन उपर उठा लिया गया मोर एकअपरानी-मी, माती को भागार ने रहा, "मिरमासमेत योग रहो..."

१४ मेरी प्रिय कहानियां कहा, "मैं - अचकचाकर किरन ने पूछा, "कौन ?" "ओह, तुम हो किरन !" फोन पर खिलखिलाकर हंसते हुए उसने कहा, हूं वारिया, मैक्स और मैंने विवाह कर लिया है । तुम कब आई ?" किरन ने कहा, "वारिया, मैं फिर बात करूंगी, बच्चे अभी खाना मांग रहे हैं।" फिर कुछ सोचकर जोड़ा, "मेरी ओर से मैक्स को वधाई दे देना।" तुरन्त उसे पूरी तरह आभास नहीं हुआ कि सचमुच कैसा लग रहा है । पहली अनुभूति केवल गहरी निराशा की थी, मैक्स के स्पर्श से वंचित रह जाने की, तीन-चार दिन से देह जैसे तप रही थी, यात्रा-भर बैठी-बैठी वह उन आनेवाले फुछ घंटों के साथ के बारे में ही सोचती रही और होंठों के कोने वार-बार मुस- कराहट से कांप उठते और जैसे-जैसे घर पास आता जाता, वह और भी उत्कंठित होती जाती। किरन की देह अव कांपने लगी थी, वहां सोफे पर लेटते हुए कई बातें मन में एकसाथ उठी और दव गई। सन्तुष्ट होने पर मैक्स की आंखों में कैसा उजलापन आ जाता है, अव वह मैक्स को कभी छुएगी तक नहीं, और वारिया उससे, किरन से, दसेक साल छोटी तो होगी ही-किरन की अव आंखें भर आई, हिन्दुस्तानी औरत रोने के अलावा कर ही क्या सकती है ! वह न तो जाकर वारिया के बाल ही जड़ से उखाड़ सकती है, न मैक्स की लात, जूतों या गालीगलौज से खबर ले सकती है मैक्स ने छुट्टी-भर केवल दो पत्र लिखे थे, कोई नई बात नहीं लिखी थी, इधर- उधर का हाल, कोन कहां है, किरन अच्छी होगी, और फिर चुप्पी। किरन को तभी समझ जाना चाहिए था। पर कैसे समझती ! विश्वास जो था । . - वाहर का दरवाजा खुला और नीता और लीना अन्दर घुस आई, लीना छोटी होने के कारण अभी भी मां से लिपटती है, नीता अलग खड़ी मुसकराती रही, मां के अपनी मोर माने की प्रतीक्षा में-किरन ने नीता के सिर पर हाथ रखकर पूछा, "कैसा रहा कैम्प ? तैरना सीखा? घर पर पापा को तंग तो नहीं किया? लीना ने लड़ाई तो नहीं की?" नीता मुसकराती रही। लीना ने पूछा, "हमारे लिए क्या लाई मम्मी ?"

रितना बड़ा र १५ "तुम्हारे कमरे मे पलंग पर रखा है। मोर तुम्हारे लिए भी है नीता!" बच्चों के माने-अपने समरों में दौर जाने पर फिरल पुणगों को पति के साप अप्रैली हुई। दोनों यटंधी कोने में राते हुए विश्वरने उमे होगे मालि. गन में मे लिपा बोर किरन ने बिना कुछ पहें विश्व के कंधे पर मापाटिरा दिया। एक छोटे-गे आमू ने बाहर आना पाहा, पर किरन ने माने नहीं दिया। मग होते हुए उगने पहा, "मापन लिए भी एक प्रेजेंट है।" विश्य हंसा, किरन हमेगा उसके लिए यूटी फ्री कौनियार पौ एर योगन माती है। विश्व की उरूर बात पोटी हैं। किरन का गूगा हुआ मुंह देवार पहा, "पक गई होगी। भार बार पाना बनाने की जरूरत नहीं है। बाहर पा मेंगे।" हिरन मंठ गई, यिपियों के पदरा मार जरूर यदतने हैं, सापट लिना मंसा हो गया है और कोमियग गमलों में रितना मुग्गा रहे है । ममता है कि सफाई करने बानेवामी मोरल पानी देना भूम गई है। - किरन उटी और अपने कमरे में पती गई, पनंग पर मेट गई योर बार उगने आगों पर रणनी। मुरमा जाने दोनोमियम को, नहीं, किरन पी रोर, यह को उमीनीयायमपी, विग्य, नवनीता और देवलीना... "मम्मी, हम भादमीम में में ?" "पापा हमें थाने के लिए बाहर मे जा रहे है । यमी मारमचीम मेने भूप मही रहेगी।" फिरन ने रहा। "पोड़ी-गी, मग दो पम्मए ।" "यन्टा,मेसो।" विप मे डार पंपोर एए महा, "माड़ी मे मीर माना मम । भर मो सारु समीर नहीं है। गावर मेना पारका पा।" "मार जाकर महाए । समीर निपाने देती है।" किरन ने उरो परा । उठकर पानी अममारी योनी मोर एर पुनी पनीर निमार गिरी पररा दी। सानिए मेगा गुमा मनमार्ग में रहती है। जारर फिर मेटम गिरह पा? तुम पर नही मोगी ?" शिने पूछा। "होगग वामी मारी है। मुमती महो।"पिल नेहा और रगती १६ मेरी प्रिय कहानिया - - ओर पीठ कर ली। कुछ देर बाद नीता हाथ में पानी का गिलास और अनासिन की शीशी लेकर मआई, "मम्मी, पापाने कहा है कि तुम्हें सिरदर्द है, और मैं तुम्हें गोलियां लाकर दूं।" किरन ने दो गोलियां निगलकर कहा, "थेंक यू नीता!" पर नीता गई नहीं। "तुम कौन-सी साड़ी पहनोगी मम्मी ?" "क्यों, जो पहने हूं, वह अच्छी नहीं है ?" "अच्छी तो है ," नीता ने बड़ी गम्भीरता से निरीक्षण करते हुए कहा, "मगर दूसरी पहनो तो ताजगी महसूस करोगी।" किरन ने उठकर कहा, "अच्छा, मैं दूसरी पहने ले रही हूं। ज़रा जाकर देखो, लीना कहीं बहुत ज्यादा आइसक्रीम न खा ले।" किरन ने सफेद लेस की साड़ी पहन ली। जाकर ड्रेसिंग टेबिल के आगे बैठ गई । ठीक है, वह ढल गई है। हथेली पर लोशन उंडेलते हुए उसने सोचा, फिर थोड़ा-सा आगे झुककर उंगलियों से चेहरे पर लगाने लगी, माथे पर बालों की सीमा तक, कानों पर, गर्दन पर नीचे तक जहां ब्लाउज़ का गला आरम्भ होता है। फिर फाउण्डेशन, फिर बेहद हल्की रूज, पलकों पर माई-लाईनर से लकीरें डाली, भौंहों को संवारा। कानों की लवों पर ईव सेंट लारे का सेंट, बालों का जूड़ा, फिर हेयर स्प्रे, कानों में बुन्दे, दायें हाथ में सोने की चूड़ियों से मिलाकर फांच की सफेद चूड़ियां, चप्पलें... विश्व कपड़े पहनता हुमा उसे कमरे में इधर-से-उधर जाते हुए, तैयार होते हुए देखता रहा। उसकी आंखों में हलका-सा जो गर्व उतर आया था, वह किरन । - से न छिपा रहा। मैं क्या सदा तुम्हारे जीवन की परिधि से वाहर रहूंगा? पतझर का एक हल्का उण, चमकता, रंगभरा मध्याह्न। बहुत दिनों बाद मिले थे, कई घंटों के साथ के बाद तुष्ट होकर पास-पास लेटे थे. किरन ने कहा, "परिधि पर तो नहीं हो। विश्व से तो बांध दी गई थी।"

शितना बड़ा मुट
फिर कुछ देर गुप हो अपने में पूरा गई। हपते के बाद हतो मंग को दूर गे देगना
और समराबारपंण महसूम करना । महीनों पर महीने, माम के बाद मान, और
एक दिन वह क्षण था हो गया।
"अमी संपार हुई जा रही हूं।"विप को एपटक पानी और सारते हुए
किरन मे पहा।
"कोई जल्दी नहीं है।" विश्व ने कहा।
किरन कमरे के बीचोबीच असमंजस में परीपरी रहो। विम के बाहर
पले जाने पर उगने हपहाते हुए फोन नम्बर मिसाग, पर उधर मे जा
वारिया ने कहा, मिगेर मासयेल, तो किरन ने बिना पूण्रदरिगीवर रण दिला
और कमरे से बाहर निरल पाई।
नीता मोर मीना बाहर संपार पीपी।
"नई गाड़ी है या मम्मी ?" मीना ने पूछा।
"याद नहीं है. पिएनी गार पारा न्यूगर से माए ?" मीता ने शापन में
"पटने पर मेरे लिए छोटी-गी मारीना दोगी मम्मी " मीना ने पूछा।
"मामी की गाड़ियो कभी नही पटती।" नीताने पहा । दरवागा बन्द
ये मोग मीटर में बार बैठ गए। मौटने पर पुल दिन मेगा मजीव-जीव-गा
ममता है । टगार, घूममरा, पोतर।
"बापरा' में प?" पि मे पूछा।
पीदिनी मीट पर नीता मोर मोना यूगो मा. " 'मागरा' में मिटा
पाठी मिमती है. सन्देग, पाल्मे।"
"हो"किरन ने रहा।
'मागरायमामिा परिचित.मए मोने, “अहिए मामोगी. मोट
माईमा? मणी गीति पहिए, स्यापिरगार"
फिर पुषसरहा, "मीनारामपेन्द्र माना।"
गोप में 'मागरापी दीवारों पर नया, गुणे रंग बानो
पा, पन मे एप सही पानुग मर हुए थे. मानिए!

१८ मेरी प्रिय कहानियां पाटिशन। "काफी चेन्ज कर दिया आपने।" किरन ने कहा। "मेहरवानी है भाभीजी, इस बार छोटे भाई और उसकी वाइफ को भी बुला लिया है। भाई एकाउण्ट रखता है।" फिर पुकारकर कहा, "रवि इधर माना ; प्रोफेसर साहब से मिलो।" रवि केश-काण्उटर छोड़कर आया, परिचय हुमा । कुछ देर इधर-उधर की वातें हुई और फिर लौट गया। विश्व सवकी पसन्द जानता है, बच्चे कवाव खाएंगे, उसे लम्बकरी पसन्द है। किरन हमेशा वही खाती है, खोया-मटर, दही-बड़े, आलू के परांठे । थोड़ा-बहुत हेर-फेर चाहे जो हो जाए, जैसे कभी चने मंगा लिए तो कभी परांठे की जगह नान ले ली। शिथिल उंगलियों में मेन्यू पकड़े किरन ने छपे हुए हरफों पर नजर दौड़ाई। "वही," उसने कहा। मेज़पोश पर कुछ धब्वे हैं, टेपरिकार्डर पर सहगल का एक बहुत पुराना गीत चालू है । पास की मेज़ पर एक भारतीय परिवार बैठा हुआ है, पहले कभी नहीं. देखा। स्त्री नीली औरंगावादी साड़ी पहने हुए है और शायद कुछ अटपटा-सा महसूस कर रही है। पर किरन के केश-विन्यास और कपड़ों को एकटक घूरती रही। विश्व वड़ा सन्तुष्ट दीख रहा है। 'आगरा' में भोजन करने के वाद अक्सर ऐसा भाव मुंह पर आ जाता है । "बहुत खा लिया।"उसने कहा। नीता और लीना बहुत एकाग्र होकर मीठी डिश खा रही हैं, उनकी कटोरियों की सेवई बड़ी तेजी से कम होती जा रही हैं। चम्मच से कटोरी एकदम साफ करते हुए लीना ने कहा, "आह ।" "कसी पेटु है !" नीता ने किरन से कहा। "क्यों बेटी, कुछ और खाओगी?" विश्व ने लीना से पूछा । लीना ने पहले मां को देखा, फिर वहिन को, फिर सिर हिलाकर कहा- "हां, आइसक्रीम।" नीता खिलखिलाकर हंस पड़ी। लीना झेंप गई। "नहीं और कुछ नहीं,” उसने कहा । एकाएक उसकी मांखें डबडवा नाई। - - शिलना बाट १९ . किरन ने अपनी माई यहि से उसे घेर लिया मौर विष गेमहा, "भार मंगा- एए, हम मय पाएंगे। नीता भी।" धुली फे लिए मुछ इंतजार करना पड़ा। नया टैप पत रहा पा, मोगभारी तादाद में आने लगे, और याहर सड़क पर संकटों रंगीन यत्तिा मिमिमा उठी। किरन दायें हाप की उंगती से भेउपौर पर अदृश्य सकीरें घीपती रही, दारिया की उम्र क्या होगी, स्यादा से ज्यादा सेईगा फिर मारिया थारर यो हो गई, नाटे कद की दुबली-पतली, पोहो-मी यार्टिफिशल सगनेवाली मसी। सम्बे पुने हए पाल, आधे आगे, माधे पीठ पर, यही-बड़ी माय, दो वर्षों में मंग की असिस्टेंट पी। "लो सीना, आ गई पुल्पी । संमसकर पाना।"रित ने महा। सीना मुमकराने सगो, कितनी चमकदार, रितनी सुन्दर ओह मापीपी! "पुल्फी अच्छी है।" विश्व ने कहा । किरन ने एक पम्मच से घोटी-सी पपी, हो और आधी से घिरमीना को प्लेट में डाल दी। अब सन्नाटापा। लीना और नीता पपई मानकर, महारर, टेमिपिरत पर अपनी पसंद का मो देप शुकने के बाद, अपने-अपने कमरों में पसी गई की। उनके जाने के बाद विश्व ने टेसीविजन बंद कर दिया और मोन्यासको मोल पोलने लगा। किरन रसोई में भवेयुपे पतन धोने लगी। बाद में हाप पाउमप मोचन मततीहईमाई, और विश्व को मोतल पोसते हुए देयने पगी। सावधानी से दो गिलासों में भतार एक गिलाम से पराएपिस में पहा, "वेलकम बैंक रानी!" "पंक यूनिग!"किरन ने उसर दिया। उम सन्नाटे में, पास-पास यंठं ये छोटे-छोटे पूट मत रहे. पुरयार, सतुष्ट, ए-मरे में रमे हुए बाद पति पानी पी तरह । फिर फिरल ने कहा, "मुना ही होगा, मगम ने पारिमा से मारगी है।" "हो,"शिर ने रहा, "विभाग के मोगों ने मिनारगिहै। हनीमून के लिए मंतिको गए थे, गायद अभी भी वहीं हों।" यह रोग मे पाइप उसटकर मारने मार लिने, "म १८ मेरी प्रिय कहानियां । पाटिशन । "काफी चेन्ज कर दिया आपने।" किरन ने कहा। "मेहरवानी है भाभीजी, इस वार छोटे भाई और उसकी वाइफ को भी बुला लिया है। भाई एकाउण्ट रखता है।" फिर पुकारकर कहा, "रवि इधर आना; प्रोफेसर साहब से मिलो।" रवि केश-काण्उटर छोड़कर आया, परिचय हुआ। कुछ देर इधर-उधर की बातें हुई और फिर लौट गया। विश्व सवकी पसन्द जानता है, वच्चे कवाव खाएंगे, उसे लम्बकरी पसन्द है। किरन हमेशा वही खाती है, खोया-मटर, दही-बड़े, आलू के परांठे । थोड़ा-बहुत हेर-फेर चाहे जो हो जाए, जैसे कभी चने मंगा लिए तो कभी परांठे की जगह नान ले ली। शिथिल उंगलियों में मेन्यू पकड़े किरन ने छपे हुए हरफों पर नजर दौड़ाई। "वही," उसने कहा। मेजपोश पर कुछ धब्वे हैं, टेपरिकार्डर पर सहगल का एक बहुत पुराना गीत चालू है । पास की मेज़ पर एक भारतीय परिवार बैठा हुआ है, पहले कभी नहीं देखा। स्त्री नीली औरंगावादी साड़ी पहने हुए है और शायद कुछ अटपटा-सा महसूस कर रही है। पर किरन के केश-विन्यास और कपड़ों को एकटक घूरती रही। विश्व बड़ा सन्तुष्ट दीख रहा है। 'आगरा' में भोजन करने के वाद अक्सर ऐसा भाव मुंह पर आ जाता है । "वहुत खा लिया।"उसने कहा। नीता और लीना बहुत एकाग्र होकर मीठी डिश खा रही हैं, उनकी कटोरियों की सेवई बड़ी तेजी से कम होती जा रही हैं। चम्मच से कटोरी एकदम साफ करते हुए लीना ने कहा, "आह ।" "कसी पेटू है !" नीता ने किरन से कहा । "क्यों बेटी, कुछ और खाओगी?" विश्व ने लीना से पूछा। लीना ने पहले मां को देखा, फिर वहिन को, फिर सिर हिलाकर कहा- "हां, नाइसक्रीम।" नीता खिलखिलाकर हंस पड़ी। लीना झेंप गई। "नहीं और कुछ नहीं," उसने कहा । एकाएक उसकी मांखें डवडवा आई।

कितना बड़ा मूठ १६ किरन ने अपनी बाई याह से उसे घेर लिया और विश्व से कहा, "आप मंगा- दए, हम मब गाएंगे। नीता भी।" कुल्ली के लिए कुछ इंतजार करना पड़ा। नया टेप चल रहा था, मोग काफी मादाद में भाने लगे, और बाहर सड़क पर मंकों रंगीन यत्तियां झिलमिला उठीं। किरन दायें हाथ की उंगली से मेजपारा पर अदृश्य लकीरें घोचती रही, पारिया की उन क्या होगी, पयादा से ज्यादा तेईस । फिर यारिया पाकर पड़ी हो गई, नाटे मदमी दुबली-पतली, थोडी-मी आर्टिफिशल मगनेवाली लड़की। मम्बे से हुए पाल, आधे मागे, माये पीठ पर, बड़ी-बड़ी आयें, दो वर्षों से मैक्स पी असिस्टेंट पी। "लो सीना, मा गई पुल्मी । संमलकर याना।" किरन ने कहा। सीना मुमकराने सगी, कितनी धमकदार, कितनी सुन्दर आये हैं महको की ! "पुल्फी अच्छी है ।" विश्व ने कहा । किरन ने एक पम्मच से पोड़ी-सी पयो, हा-और माधी से अधिक सीना कोमेट मेदास दी। अब सन्नाटा पा। सीना और नीता पपड़े बदलकर, महाकर, टेलिविजन पर माती पगंद का शो देय पुराने के बाद, अपने-अपने कमरों में चली गई थी। उनी जाने के बाद विशव ने टेलीविजन बद कर दिया और कोन्याक की बोतल गोपने मगा। "हिरन रमोई में अगषे यांन घोने लगी। बाद में हाय पाएर, हैलोसन मनतीमाई, और विश्व को मोतस पोसते हुए देयने लगी। सावधानी से दो गिलासों में सफर एक गिलास से पाहाते हुए विश्य ने पहा, "वेनरम र रानी!" "पूनिग!"किरन ने उत्तर दिया। समानाटे में, पाम-पाग बैठे ये छोटे-छोटे पूट मते रहे. पुपचाप, बहुत संतुष्ट, एक-दूसरे में रमेहए भागं पति-पत्नी की तरह । फिर रिल ने पहा, "गुना ही होगा, मंगम ने वारिया से गादी कर मो है।' ort;"पि ने पहा, "विभाग के लोगों ने मिलकर प्रेसेंट दिया है। हनीमून लिए मंश्मिको गए थे, गायर अनी भी वहीं हो।" यह ऐप मे पाइप उमटार राय मारने लगा। किरन ने रहा, "इस बार

२० मेरी प्रिय कहानियां
ठण्ड जल्दी आ गई।"
"हां। और?" विश्व ने किरन का गिलास उठाते हुए पूछा।
"नहीं।" उसने कहा, वह अपनी जगह पर बैठी-वठी विश्व की ओर देखती
रही। फिर एकाएक ही उठकर उसने विश्व का हाथ पकड़ लिया और मंद स्वर
में कहा, "आइए, अब विस्तर पर चलें।"

टूटे हुए इस रात नींद नहीं काटी। बिस्तर पर नेटा हुनाई। दाई न.. का छोटा-सा कारा,मोलहवीं मंजिन पर। बाहर की और एक खिड़की खोल देने पर लामा नान्द्रों मटी, मिनमिनानी, बनी, सद, रंगीन इदिनकर आलोक कमरे में छा जादा है। हर दो मिनट पर पड़यडाती हुई इनेक्ट्रिक ट्रेन पुल पर मे निकल जाती है और मई और में नीचे निरंतर बनती हुई दैनिक का रख दव जादा है। मैं उठकर दिहली के नाम आ गया हूं। हवा ठंडी है. दोनों दोहे कोने पर बांध मैं या मुक्कर दाहर देखने लगा हूं। दूर दनियों के पार बंधेरेरा एक बट्टा-मा घना है, में प्रानदाई हिदह द्रव बन्धकार निन्चन नहीं, वहां तहरे हर क्षा वा-याकर नट मे टकरा रही है, उमद किनारे बैठकर मने जन पर चंद्रोदर देखा था, का यह बात की ही संध्या थी ? महानगरी का कोलाहल, भाग-दौड़ पीछे छूट पृशोपी; मिशिगन मागर की और में रह-रहकर ठंडी हवा के झोके ना हे ये; मेरी दाहिनी दाह है. रोम रह-रहकर सुढे हो जाते। कुछ दूर ऊंचाई पर वीगि दिलो का एक वृक्ष कामा खड़ा था। दहल पर रेटी थी। पर लाए, कुछ लापरवाही में। माही का किनारा नारे के कार्य गंदा हो गया था। फिर भी, टमने रेठ व मिट्टी से उसे अलग करने की मेटा नीति पर समने अपना कोट विछा लिया था और उसके बालों ने ग्राम रिमाय व बाई सांप को थोडा-मा ढक लिया था; वह एकटक भाकाश हीदी। अनाथ मेरे बट्टन निकट या गया। नायूनों पर मटियालो पालिश शिदिल नगलियां । वह लेटी थी, मौन, बनताई-मो और मान्दागर या, पीछे शिकागो नगर २२ मेरी प्रिय कहानियां आज उसने कितनी बातें की थीं। वह वोलती कम है। उसकी भाव-भंगिमा उसके विचारों को कभी-कभी प्रकट कर देती है। अधिकतर वह अपने को एक मौन रहस्य में लिपटा रखना चाहती है। पर आज मुझे लग रहा था कि आज उसका बोलना चुकेगा नहीं, उसके अंदर का कोई अवरुद्ध द्वार खुल गया था । मैं कुछ आश्चर्य से उसकी वार्ते सुनता रहा । उसमें कहानीकार की सी सहज प्रवहमानता है। कई बार सोचा कि उससे कहूं, पर उसकी विद्रूपता-भरी हंसी सहन न होगी। मुझे यह भी डर था कि वह चुप हो जाएगी और फिर चुपचाप पड़ी-पड़ी उस खुले, धूप-भरे, नीले आकाश को ताकने लगेगी, और मैं उसकी आत्मीयता और निकटता के घेरे से निकाला जाकर एक बार फिर अपने को अपरिचित-सा महसुस करने लगूंगा। "क्या सोचती हो, तव ?” मैंने पूछा। अपने को क्रिया-कलापों से अचानक हटाकर आत्मलीन हो जाना उसके लिए बहुत साधारण है । "कुछ नहीं । कुछ भी नहीं। मन तव खाली पात्र-सा हो जाता है। एक ऐसा पात्र जिसके तल में एक बड़ा-सा छेद हो और एक बूंद पानी भी न टिक सके । कुछ भी न करने, कुछ भी न सोचने की ऐसी स्थिति में मैं एक ऐसी शील-सी वन नाती हूं जिसमें कहीं नन्ही-सी हिलोर भी नहीं उठती, जो कांच की तरह जमी हुई, निश्चल, सूने आकाश के नीचे विखरी पड़ी हो।" वालू भीगती जा रही थी! पानी के ऊपर आकाश दहकता लाल हो आया था। वह कोट विधाकर उसपर लेटी हुई थी, स्थिर, निश्चल, झील-सी। आकाश स्वच्छ था, कहीं वादल का एक टुकड़ा भी नहीं। बैठे-बैठे मेरे पैर सो गए थे। चाहता था कि मैं भी रेत पर लेट जाऊं उसके समीप, साहस नहीं हुना । अगर इतना दब्बू न होता तो ठीक रहता। स्मार्टनेस से ही काम बनता है। मैं अपनी सीमाएं जान रहा था : भारत की एक कंजरवेटिव युनिवर्सिटी का छात्र, कभी 'स्माट सेट' का अंग नहीं रहा, अंग्रेजी नहीं बोली, कॉफी हाउस में नहीं बैठा, रोमाण्टिक साहित्य नहीं पढ़ा। भाषा-विज्ञान का छात्र हूं-रूखा नीरस विषय । वह एक प्रमुख प्रोफेसर की पत्नी है--कटे हुए बाल, ऊंची एड़ी के सैण्डिल, स्मार्ट; कार चलाती है, गर्मी में सेल करती है। मेरे जाने के कुछ ही दिन बाद उससे परिचय हुमा था, हम दोनों एक ही - - टूटे हुए २३ जाति के हैं, एक ही शहर के, एक भापा-भापी। तब वह कितनी प्रसन्न हुई थी। मुझे माए थोड़े ही दिन हुए थे। आठवी स्ट्रीट पर एक फ्लैट में टिका हुआ था। एक साथी और पा । सस्ता मकान था, पुराना, गन्दा, पर और कोई उपाय म या, साल-भर के कांटेक्ट पर हस्ताक्षर कर चुका था। बाकी सभी किरायेदार भारतीय थे, दो पाकिस्तानी। सारे दिन होग, नारियल के तेल और विविध मसालों की गन्ध गलियारों में मंडराया करती थी! एक दिन लाइब्रेरी से लौटकर देखता हूं कि घर के भागे उसकी गाड़ी खड़ी है। लाल रंग की स्पोर्ट्स फार। घबरा गया, सोफे पर सोता था और जाने से पहले सारे कपड़े इधर-उधर बिखेर गया था। पहली प्रतिक्रिया हुई भाग खड़े होने की, पर मन कड़ा कर अन्दर गया। वह सोफे पर बैठी थी। मेरे कपड़े वहा नहीं थे, पास में ऊपर वाली मिसेज नायक बैठी थी, मिसेज़ नायक के पति उसके पति के असिस्टैण्ट थे। वह चाय पी रही थी, उसके हाथ मे जो चाय का प्याला था, वह साबुन का डिब्बा खरीदने पर मुफ्त मिला था, मैचिंग प्लेट अभी नहीं थी। वह मुझे देखकर बोलो : "इतनी-इतनी देर लाइब्रेरी में बैठे रहते हो, एक वार जो बीमार पड़े तो फिर पनप नहीं पाओगे।" मैने उत्तर में कुछ नहीं कहा, किताबें मेज पर रखकर कुर्सी छोचकर बैठ गया। "तुम्हे खाने पर कई दिन से बुलाना चाहती थी। इस शनिवार को श्रा सकोगे ?" "सिर्फ इमीलिए इतनी तकलीफ की ?" मैंने कहा। पहली बार लगा कि उसके यहां बैठने से कमरे का सारा शेवीपन फोकस में आ गया है। अंगूर की वेलों वाले छापे का हरा वालपेपर, धूल-मरे प्लास्टिक के पदें, ढीला-ढाला सोफा । वह उठ खड़ी हुई, प्याले को मेज पर रखती हुई बोली : "तो शनिवार को में लेने आऊंगी।" "नहीं, नहीं, मैं स्वयं मा जाऊगा।" "स्वयं नहीं आ सकोगे । काफी दूर घर है, रास्ता मो आसान "टैक्सी से..." मैंने कहा । ..

ও মিখ নিয়া 'पानिवार को, मणे ।" उगने माहा: "यार राना।" उसने अपना पर और पली गई। उरी परवाची तमा परभागार में पापरा भागार गार्गी पर गा। मिशेल नायगा अय गी बठी भी और काफी प्रगापित-गीसग राहीली। गाल तो गाद उराग और उरामा पतिमा रहन-सहन ग बारे में बता रही थी। दो वर्ष उनहोंने शादररामगे फणीवन गाग में घर परीक्षामही प्रोफेसर रागा गुरट अपोर्ट गार पाते। पर ये गापारण प्रोपोरार नहीं, यदि छ यों जन गोत्रमा भी गिसो गितीको भागय होगा। पत्नी का पहच प्रगान पर उगे लानता भी पूध धे राग्री है। वियागे. बाद एगा रान्तान गी, जिगणी पायद गृत्यु हो गई, रायगे दोनों गहा नहीं थे, उगगः बारे में, गागी गोलि ही गया । गिगेज नागमागे पीछाएमा अन्दर बागपी गमगरे में गया। गेरी रागी पीगे उसगी पारपाई पर मारीने गे सीईनी। तौलिये, रात गपो, मैले गिमापावाला समिया, रोग उपदामा परवस... गाी मेरे जीवन ा गया था जोकि उस मागे अनायास ल गया . था। गैरे गा में गुरु पुगो-गा गा गामेरी गजबूरियां या पी पीला गार रही भी । जति गा मामा भाग पर भेज देता था, गहा गांणी, गांव में पर, गिया गोग्ग माता, गाण में पदसा गाई। फिर अपने परोपको आया । गगरा तो साफ रग रामराा भा, रात नापो और गिलागा, गोलिये नियमित कारोघो जाएं सो माग-रो-पग माग दिपंगे। गुगाह से ही जी पूल सफाईगी। गगान-मालिका से धीगग गलीनर गार गाणं साफ गिया; पण निसाय उठागार पल पोली और पांच बजे पागले पाहतगार सयार हो गया। घरा बाजार प्रयण में गाई भी निगाट गा नहीं, गिा नहीं, नहीं भाग भी नहीं होता, मागी-भी पाहगार पोरटर पा लेता है, आगरा संगीत, फिर, गापण, जीवन की गोलाहल-गरी गदी पारों भोर या जसमे धीमोगीमयमा कार में सपरनी-मा एमाग्र, अपने गो तटरण राणा - - टूटे हुए २५ से भी होगा, ढाई साल में डॉक्टरेट लेकर लोटना ही है, क्योंकि घर है. मां है, वाह-योग्य बहन है और मन पर एक चेहरे को धूमिल छाप भी है । उसका नाम शिवाला है। पढ़ रही है, साथ में मेरे लोटने को प्रतीक्षा भी कर रही है। अभी म्बन्ध में केवल इतना ही है। मध्यवित्त पिता की पुत्री, मेरी मा को पुत्रवधू के प में ग्राह्य है। शशिवाला के बारे में सोचना चाहता हूं। कुछ समय पहले एक सम्बन्धी की रात में गया था, वहीं उसे देखा था। जो बीच मे पड़े थे उन्होंने कहा, देख लो ड़की, वधू के पास जो नीली साड़ी पहने बैठी है, वही है । शायद उसे भी जता त्या गया होगा; मुझसे दृष्टि मिलने पर वह नजाकर थोड़ा-सा मुड़ गई थी। धारण रूप-रंग, दो चोटियां, नीली प्रिण्ट की साड़ी ! उसका लजाना न्या लगा । शशिबाला, तुमसे इतना ही परिचय है। तुम ध्यानरत होकर अध्ययन र रही हो, मैं अपना कमरा साफ कर रहा हूं, क्योंकि वह लेने आएगी। पर वह अन्दर नहीं आई। यह वजने से काफी देर बाद उसकी गाड़ी सड़क र दौखी, वाहर ही से हॉर्न बजाकर उसने बुलाया। में जिस तेजी से बाहर झपटा, ससे शायद वागची को आश्चर्य हुआ हो। उतनी नीची गाड़ी के अन्दर घुसने में रोटी-मी दिक्कत हुई। मेरे कुण्डली-सी मारकर बैठने पर वह थोड़ा-सा हंसी, ही चलने पर साड़ी से पैर खुल गए, देखता हूं वह नंगे पैरो है। अपना आश्चर्य पा लेता हूं। वह हल्के-से बादामी रंग की साड़ी पहने है। चेहरे में कोई अन्तर नहीं, कन्धी तक बाल, प्रसाधनहीन मुख । सड़क पहियों के नीचे फिमलती जाती है, पहल कंम्पस पीछे छूटता है, फिर शहर । "अच्छी तरह हो ?" वह पूछती है। स्वर में ढेर सा बडप्पन आ गया है। "हां।" मैं कहता हूं : "और आप ?" "मुझे 'तुम' क्यो नहीं कहते ? मैं तो तुम्हें 'आप' नही कहती। मैं बहुत बड़ी हूं, इसलिए क्या ?" कहकर वह अपनी बात पर स्वयं हंसती है। वह देखने से बीस-इक्कीस की लगती है, इसमे अधिक तो दिलकुल भी नहीं। वह आयुहीन है, पचास वर्ष की होने पर भी ऐमी ही लगेगी, हलकी-फुलकी, चपल, युवा। "मय कोई मुझे टीटी कहते हैं । तंत्री त्रिपाठी नाम का संक्षिप्त रूप । साहि- त्यिक रुचि की मां की देन है। घर आ गया है, अंधेरा हो जाने के कारण साफ नहीं दीखता । टोटी उतर- - मेरी प्रिय कहानियां र खड़ी है, मेरी प्रतीक्षा में । मुझे उतरने में देर लगती है, टीटी के नंगे पैरों पर थरों का स्पर्श मुझे पीड़ा-सी दे रहा है। दरवाजा खुलता है; लम्बे गौरवर्ण यह पुरुष उसके पति होंगे। परिचय राती है। वह मेरा कोट ले लेते हैं, और जब तक वह उसे टांगते हैं, मैं अनिश्चित-सा गलियारे में खड़ा रहता हूं। वह दाहिनी ओर के एक दरवाजे में लुप्त हो गई है। प्रोफेसर मुझे बैठक में ले आते हैं। सोफे पर आदर से बैठाकर स्वयं पास बैठते हैं, और मृदु स्वर में मेरा हाल-चाल पूछते हैं। मिसेज़ नायक मुझे उनके बारे में भी बता चुकी है। वह दक्षिण प्रदेश के हैं, प्रख्यात वैज्ञानिक, जब भी भारत जाना चाहते हैं, उन्हें यहां अधिक सुविधाओं की व्यवस्था कर रोक लिया जाता है । फिर टीटी भारत नहीं लौटना चाहती। प्रोफे- सर कृष्णमूर्ति ने धीरे-धीरे मुझसे मेरी पढ़ाई-लिखाई, घर-वार, छात्रवृत्ति आदि के बारे में पूछ लिया है। "आप परिवार को साथ नहीं लाए ?" वह पूछते हैं। उनका मुख वैसा ही शान्त और निरुद्विग्न है। "लाना चाहता था पर आर्थिक समस्याओं के कारण सम्भव नहीं हुआ।" में उत्तर देता हूं। झूठ नहीं है, सम्भव होता तो शशिवाला को साथ लाता, विवाह करने के बाद । कम-से-कम घर का काम-धन्धा तो न करना पड़ता। कुछ देर में टीटी कमरे में आती है, पति को सम्बोधित कर कहती है : "ह कुछ पीने-वीने को नहीं देंगे क्या ?" प्रोफेसर तुरन्त उठ खड़े होते हैं, द्वार की ओर बढ़ते हुए पूछते हैं : " लेंगे आप?" मैं टीटी की ओर देखता हूं, प्रश्नसूचक दृष्टि से। "शेरी दीजिए इसे । प्रारम्भ हो।" शराब का नाम सुनकर मैं तुरन्त कहता हूं : "नहीं, मैं शराव नहीं पीता। और ले लूंगा, फूटजूस ।" प्रोफेसर बहुत थोड़ा-सा मुस्कराते हैं, उनके ओंठ खिचकर रह जाते टीटी एक ओर झुकती हुई हंस रही है : "इस घर में तुम्हें फूटजूस नहीं मि जो दिया जाएगा, पीना पड़ेगा।" .

टूटे हुए २७ अब वह नन्ही सी बच्ची लगती है, मुझे चिढाते हुए उस दुष्टता-भरी मुद्रा में। प्रोफेसर लाकर ग्लास मुझे भी देते हैं । पेय का स्वाद बुरा नहीं है । कमरे में हम तीनों अब मौन हैं। प्रोफेसर जैसे उस मौन में अन्तर्मुधी हो डूब गए हैं, टीटी दूसरे सोफे को पौठ से गाल सटाए हुए अघलेटी-सी है, एक माह फैलाए हुए। उंगली में एक हीरे की अंगूठी है। मैं सीधा-सतर बैठा हूं, कोई आरामदेह पोजीशन नहीं है, पर मैं डरता हूं कि इस अनजान पेय से कही नशा न आ जाए; इसलिए धीरे-धीरे चखता हूं। क्या कोई नहीं बोलेगा? देख रहा हूँ कि टीटी ने अपना ग्लास छुआ तक नहीं है, प्रोफेसर वैसे ही बैठे हैं, दीवार की ओर ताकते हुए, कमरे में कहीं कोई शब्द नहीं। जैसे मैं किसी निर्जन वन मे मटक आया हूं। मुझे भूख लग रही है। सहसा वह उठकर बैठ जाती है और वेग से कमरे के बाहर चली जाती है। कमरे में यदि वह ग्लास न होता तो यह न लगता कि वहां कभी टीटी मी मी । कमरे के कोने-कोने में जो पोल लम्प है, उसके तीनों बल्ब जल रहे हैं। तीनों के 'शेड' भिन्न रंग के हैं, यह पहली बार ही मेरी दृष्टि में पड़ता है। आमने- सामने दो सोफे हैं, दो-तीन तरह की कुसियां: किसी सुन्दर पेड़ की आपस में गुंथी हुई शाखाओं को काटकर मेज-सी बनाई गई है, जिसके ऊपर पारदर्शी कांच है. जिससे वे गुपी हुई शाखाएं स्पष्ट दिखाई देती हैं। मैं सोच उठता हूं कि ऐसी विचित्र शाखाएं पहले कभी नही देखीं। पारदर्शी कांच पर छोटा-सा स्माल के जितना नैपकिन रखा है; और एक गिलास, जिसे विना मोठों से लगाए टीटी उठ गई है। मेरे शरीर में अचानक ही ढेर-सी थकान मर उठती है । मैं भोजन कर, शीघ्र लौट जाने को आकुल हो उठता हूं। प्रोफेसर जैसे ऊंध गए हों। याहर शायद तेज हवा चलनी प्रारम्भ हो गई होगी। कमरे के गहरे, गाढे मौन के बाहर सीत्कार करती हुई पेड़ो की शाखाएं हैं; वह स्वर जैसे दूर तक फैलता जा रहा है। मुझे लगने लगा कि मैं एक मतीन्द्रिय, मायावी जगत का एक पात्र हूं। कमरा, उसका फर्नीचर, यहा तक कि अपना ग्लास हाथ में पकड़े बैठे प्रोफेसर, सभी मुझे बड़े दर, घुधले और अयथार्थ से लगने लगे। केवल तेज हवा का स्वर यथार्थ था -- २८ मेरी प्रिय कहानियां और हर नया झोंका जो शाखाओं को झकझोरता हुआ दूर तक चला जा रहा था, उसकी आवाज़ निरन्तर मेरे कानों में तेज होती चली जा रही थी। तभी टीटी दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई और बोली : "भोजन मेज़ पर लग गया है ! प्रोफेसर जिस सहजता से उठकर खड़े हो गए, उससे मुझे लगा कि वह शायद पूरे समय सजग रहे होंगे। मेरे ग्लास मेज़ पर रखने की खट शायद सभीको इतनी तेज़ लगी होगी... टीटी की आंखें एक बहुत छोटे पल को मुझपर रुकी, फिर वह आगे-आगे चली, मुझे राह-सी दिखाती हुई। भोजन करते हुए, कुछ बात करना अपेक्षित है, इसलिए मैंने उस मेज़ के वारे में पूछ लिया। टीटी खिलखिलाकर हंस पड़ी, देर तक हंसती रही, मैं कुछ झेंप-सा आया और मुझे लगा कि मुझसे अनजान में ही कुछ अशोभनीय वात हो.गई है। उघर टीटी थी कि हंसते-हंसते मेज़ पर औंघो-सी हो आई थी । सहसा उसकी हंसी बहुत अस्वाभाविक-सी लगने लगी और मैं जान न सका कि वास्तव में वह हंस रही है या वह हंसी एक प्रकार की दुःख-भरी, हिचकियों वाले रुदन में बदल गई है। प्रोफेसर कुर्सी पीछे खिसकाकर उठ खड़े हुए और टीटी के कंधों पर भार देकर उठाते हुए उन्होंने उसे पुकारा। मैं उस समय टीटी का मुख देखकर स्तब्ध हो आया, वह एकदम चुप हो आई थी, पलके आंखों पर झुक आई थीं और होंठों पर कुछ ऐसी असह्य यातना का सा भाव था जैसे किसीने उसकी पीठ में छुरा भोंक दिया हो। प्रोफेसर ने उसे उठाकर खड़ा कर दिया और फिर उसे दाहिने हाथ से सहारा देकर द्वार की ओर बढ़ते हुए उन्होंने मुझसे कहा : "हमें कुछ देर के लिए क्षमा कीजिएगा।" मैं पत्थर-सा हो माया, उनके कंधे पर झूलते टीटी के मुख को एकटक ताकता हुमा । अव उसका मुख नहीं दीखता, वालों ने आगे गिरकर उसे ढक लिया है। कमरे में मैं अकेला हूं। तीनों प्लेटों में अभी भी भोजन है, मेरी भूख एकाएक मिट गई है। कुछ देर में प्रोफेसर लौट आए हैं। अपनी जगह वैठकर वह मुझसे कहते हैं : "पके होने पर वह कभी-कभी इसी प्रकार उत्तेजित हो जाती है। आप चितित न - .

हो । साइए, आप रक क्यों गए?" "पर आपकी पत्नी ?" मैं पूछता हूं। "उसे मैंने सोने की दवा दे दी है।" मोजन के बाद प्रोफेसर ने मेरे वापस लौटने के लिए टैक्सी भुला दी। उन्हे अत्यन्त धन्यवाद देकर में जब लौटने लगा तब भी मेरे जार गहन अवसाद जम गया था जोकि प्रोफेसर के घर से अपने घर तक लम्बी ड्राइव के राद भी रम रविवार की शाम । सुबह जल्दी ही उठकर घर से निकल गया था। जैसे अपने कमरे में अब रहा न जा सकेगा। सारा दिन लाइबरी विताकर, संध्या सो थका हुआ लौट रहा हूं। मन में ढेर सा संतोष है, काफी काम कर लेने का। साय ही एक अव्यक्त-सी उदासी भो, जो सप्ताहांतो को अक्सर मन पर हा पातो है। तब शिवाला की याद करने का प्रयत्न करता हूं. पर घेहरा जमे मानन- पटल से एकदम पुंछ गया है, शेप है नीली साडी की घुघली-सी माद । सब से पानी निकालकर दरवाजा खोलता हू। गलियारे में बाते हुए ही पी में भुनी हुई अदरक की सुगन्ध नाक में भर जाती है। मैं अपने कमरे का दरवारा ठेनकर खोलता हूँ और वही विठककर खड़ा रह जाता हूँ। सोफे पर टीटी लेटी है, माहट सुनकर उसने शायद ग्रीवा मोड़कर दाया की तरफ देखा है, मुझे वहा पाकर भी वह हड़बड़ाकर उठो नहीं है। सहज भाव से सेटे-लेटे कहती है : "भास्कर, आ गए तुम ?" मैं झुककर प्रोफाम नीचे रस देता हूं। दाहिनी बांह मोड़कर उसने सिर के नीचे रख ली है, दापो यहि नीचे भूत रही है, साड़ी हलके से बादामी रंग की है, जिसको सिल्क टेशित नम के प्रसार में झिलमिला रही है। में खड़ा हूं. एकाएक अपने ही घर मे बजनदी-सा महमूम करता हुआ। "बाप"तुम कब आई ?" "दोपहर को आ गई थी," अब वह उहकर बंटती है । बाल मारपीधे इकट्ठा कर बांध लिए गए हैं। पहली बार उसका चिकना, उपड़ा हुआ माथा देव रहा हूँ। "तुम थे नहीं। सारा घर खाली पड़ा था। मैं किताव पड़ने लगी, उसी मन मराप्रिय कहानियां गौर हर नया झोंका जो शाखाओं को झकझोरता हुआ दूर तक चला जा रहा था, उसको आवाज निरन्तर मेरे कानों में तेज होती चली जा रही थी। तभी टीटी दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई और बोली : "भोजन मेज पर लग गया है।" प्रोफेसर जिस सहजता से उठकर खड़े हो गए, उससे मुझे लगा कि वह शायद पूरे समय सजग रहे होंगे। मेरे ग्लास मेज पर रखने की खट शायद सभीको इतनी तेज़ लगी होगी... टीटी की आंखें एक बहुत छोटे पल को मुझपर रुकी, फिर वह आगे-आगे चली, मुझे राह-सी दिखाती हुई। भोजन करते हुए, कुछ बात करना अपेक्षित है, इसलिए मैंने उस मेज के बारे में पूछ लिया। टीटी खिलखिलाकर हंस पड़ी, देर तक हंसती रही, मैं कुछ झेंप-सा आया और मुझे लगा कि मुझसे अनजान में ही कुछ अशोभनीय वात हो. गई है। उधर टीटी थी कि हंसते-हंसते मेज़ पर औंधौ-सी हो आई थी। सहसा उसकी हंसी बहुत अस्वाभाविक-सी लगने लगी और मैं जान न सका कि वास्तव में वह हंस रही है या वह हंसी एक प्रकार की दुःख-भरी, हिचकियों वाले रुदन में बदल । प्रोफेसर कुर्सी पीछे खिसकाकर उठखड़े हुए और टीटी के कंधों पर भार देकर उठाते हुए उन्होंने उसे पुकारा । मैं उस समय टीटी का मुख देखकर स्तब्ध हो माया, वह एकदम चुप हो आई थी, पलकें आंखों पर झुक आई थीं और होठों पर कुछ ऐसी असह्य यातना का सा भाव था जैसे किसीने उसकी पीठ में छुरा भोंक दिया हो। प्रोफेसर ने उसे उठाकर खड़ा कर दिया और फिर उसे दाहिने हाथ से सहारा देकर द्वार की ओर बढ़ते हुए उन्होंने मुझसे कहा : "हमें कुछ देर के लिए क्षमा कीजिएगा।" में पत्थर-सा हो माया, उनके कंधे पर सूलते टीटी के मुख को एबाटक ताकता या । अब उसका मुष नहीं दीखता, बालों ने.आगे गिरफर उसे ढक लिया है। मरे में मैं अकेला हूं। तीनों प्लेटों में अभी भी भोजन है, मेरी भूख एकाएक मिट ई है। कुछ देर में प्रोफेसर लौट आए हैं। अपनी जगह बैठकर वह मुझसे कहते हैं : पके होने पर वह कभी-कभी इसी प्रकार उत्तेजित हो जाती है। आप चितित न * हों। खाइए, माप नक क्यों गए?" "पर आपकी पत्नी ?" मैं पूछता हूं। "उसे मैंने सोने की दवा दे दी है।" भोजन के बाद प्रोफेसर ने मेरे वापस लौटने के लिए टैक्सी बुला दी। उन्हें अत्यन्त धन्यवाद देकर मैं जब लौटने लगा तब भी मेरे ऊपर गहन अवसाद जम गया था जोकि प्रोफेसर के घर से अपने घर तक लम्बी ड्राइव के बाद भी कम न हुआ। रविवार की शाम । सुबह जल्दी ही उठकर घर से निकल गया था । जैसे अपने कमरे में अब रहा न जा सकेगा। सारा दिन लाइब्रेरी में विताकर, संध्या को थका हुआ लौट रहा हू । मन मे ढेर-सा संतोप है, काफी काम कर लेने का । साथ ही एक अव्यक्त-सी उदासी भी, जो सप्ताहांतों को अक्सर मन पर छा जाती है। तब शशिवाला की याद करने का प्रयत्न करता हूं, पर चेहरा जैसे मानस- पटल से एकदम पुछ गया है, शेष है नीली साड़ी को धुंधली-सी याद । जेब से चाभी निकालकर दरवाजा खोलता हूं। गलियारे मे आते हुए ही घी मै भुनी हुई अदरक की सुगन्ध नाक में भर जाती है। मैं अपने कमरे का दरवाजा ठेलकर खोलता हूं और यही ठिठककर खड़ा रह जाता हूँ। सोफे पर टीटी लेटी है, बाहट सुनकर उसने शायद ग्रीवा मोड़कर दरवाजे की तरफ देखा है, मुझे वहां पाकर भी वह हड़बड़ाकर उठी नहीं है। सहज भाव से लेटे-लेटे कहती है : "भास्कर, आ गए तुम ?" मैं झुककर श्रीफकेस नीचे रख देता हूं। दाहिनी बांह मोड़कर उसने सिर के नीचे रख ली है, वामी बांह नीचे झूल रही है, साडी हलके-से बादामी रंग की है, जिसकी सिल्क टेबिल लम्प के प्रकाश मे झिलमिला रही है। मैं खड़ा हूं, एकाएक अपने ही घर मे अजनधी-सा महसूस करता हुआ। "आप"तुम कब आई ?" "दोपहर को मा गई पो," अब वह उठकर बैठती है। बाल आज पीछे इकट्ठा कर बांध लिए गए हैं। पहली बार उसका चिकना, उपड़ा हुमा माया देख रहा हूं। "तुम ये नहीं । सारा घर खाली पड़ा था। मैं किताब पढ़ने लगी, उसीमें मन . .

३० मेरी प्रिय कहानियां . रम गया।" उसने मेरे आगे किताब झुलाई । "कुछ चाय वगैरह पिएंगी?" "नहीं, अव जाऊंगी। प्रोफेसर माने वाले होंगे।" वह उठकर खड़ी होती है, और हाथों से साड़ी की सलवटें ठीक करती है। फिर किताव मेज़ पर डाल देती है, और पर्स उठाकर चलने को तैयार दीखती है। मैं उससे रुकने को नहीं कह पाता। हमारी रसोई बहुत छोटी है, गंदी भी। जमीन का फर्श उघड़ चुका है, कई तकाज़ों पर भी मकान-मालिक ने कुछ नहीं किया । वर्तन कालिख-पुते हैं, प्लेटें एक भी मैच नहीं करतीं। वह चलते-चलते रुक जाती है : "क्या कल तुम बहुत घबरा गए थे ?" "नहीं तो।" मैं उत्तर देता हूं। "गलती शायद मेरी थी।" मैं कहकर प्रति- क्रिया के लिए उसकी ओर देखता रहता हूं। मैं जानता हूं कि उस वेतुकी मेज़ के वारे में अब भी मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई है। उसका स्पर्श मेरे हाथों पर पक्षी के पंखों की भांति हलका व उड़ता हुआ है। "गलती, भास्कर, किसीकी नहीं है।" उसका मुख अन्धकार में है। और फिर वह चली गई है। मैं पुस्तक उठाकर देखता हूं, भाषा-विज्ञान की एक रसहीन व्याख्या है, उसे आलमारी में रखते हुए मैं पाता हूं कि संध्या की वह उदासी किसी और ही अव्यक्त, गहन भावना में बदल गई है में बैठकर वागची की प्रतीक्षा करता हूं। रविवार के दिन भोजन बनाने की बारी उसकी है। "आज क्या वह फिर आई थी?" बागची अन्दर घुसते ही पूछता है । "कोन ?" "वह प्रसिद्ध गणितज्ञ की प्रसिद्ध पत्नी।" बागची की टोन मुझें खटकती है; पर मैं चुप रहता हूं। "शी इज ईविल भारकर," वागची खूटी पर कोट टांग रहा है। "मुझे उत्ते देखकर ऐसीझुरझुरी हो आती है जैसे कि कब्रिस्तान में अकेले गुज़रते वक्त लगता है। उससे दूर रहना ही अच्छा।" "आप मेरे निजी मामलों में दखल क्यों देते हैं ?" मैं कहता हूं। वागची एक व्हाका लगाता है । “समय तुम्हें स्वयं सवक सिखा देगा।" कहता हुमा वह रसोई में चला जाता है । ।

टूटे हुए ३१ कुछ देर बाद नायक एक प्याला शक्कर मांगने आता है। "तुम्हारी गुरपत्नी आजकल हमारे साथी पर बहुत दयालु है ।" बागची कहता है । मैं कमरे में बैठा सुन रहा हूं। मुझे वागवी से चिढ-सी हो रही है। अपना उपहास सहन नहीं होता। "अभी नये हैं न ! आसमान में रह रहे हैं । धीरे-धीरे पता चलेगा।" नायक कुछ परेशान-सा हो माया है । बागची जान-बूझकर उसे शक्कर देने ने देरी कर रहा है। "मास्कर को उनके बारे में कुछ तो बताओ, नायक।" उसकी बात अनसुनी-सी कर नायक कहता है : "शक्कर देना हो तो दो। वकार की बात में क्यों पड़ते हो?" वागची फिर हंसता है। नायक के जाने पर मैं यथासाध्य कड़े स्वर में बागची को जता देता हूं कि मैं उसके बारे में कुछ भी नहीं सुनना चाहता। अगली सुबह वागची ने मुझे घर खाली कर देने को कहा। फ्लंट उसीके नाम था। मुझे न जाने क्यों न ही सा मिला, और मैं सोत्साह नया कमरा ढूंढने में जुट गया। सूचना नायक को भी मिली होगी, वह यह जानकर हड़बड़ाता हुआ आगची को ढूंढने निकल गया। दूसरे दिन सुबह बागची ने कहा कि उसने इरादा बदल दिया है और मैं पूर्ववत् रह सकता हूं। वह टीटी के प्रति कहे गए शब्दों के बारे मे क्षमा चाहता है। "पर क्या वे बातें सच थी?" मैं अपने मांस मे आत्मपीड़ा की सुइयां-सी मोता हुआ पूछता हूं। "मुझे क्या मालूम?" वागची असहाय माव से कन्धो को झटका दे बाहर चला जाता है। मिसेज़ नायक से पूरी बात पता चलती है । विवाह के बाद से टीटी बीमार ही रहती है । बीमारी का किसीको पता नहीं; डिप्रेशन जब आते हैं तो वह हफ्तों पर से बाहर नहीं निकलती, बोलती-चालती नहीं। कितने अरसे बाद उन्होंने रोटी को मुझसे मंत्री होते देखी है। भारत में जाकर नायक का अच्छी नौकरी गना प्रोफेसर कृष्णमूर्ति पर बड़ा निमंर है, और बागची अमी भी नायक का ऋणी है। यदि प्रोफेसर को पता चलता कि मुझे टीटी के कारण घर छोडना पड़ा. है तो वह नायक पर क्रोधित नहीं होते क्या ? .

२ मेरी प्रिय कहानियां - अपने किस स्वार्थ से मिसेज नायक मुझे यह बता रही है इसे समझने में मुझे र न लगी। . सिनेमा हॉल में पास बैठी टीटी के चेहरे की सिलवट देखता हूं। वह मेरे और प्रोफेसर के बीच में बैठी है, थोड़ा-सा मागे को झुकी हुई, दत्तचित्त, एकाग्र । हम लोग नाटक देखने साथ आए हैं । मेरा ध्यान बार-बार भटक जाता है। उन दोनों फो घर न आना पड़े इसलिए मैं थियेटर में मिलने को तैयार हो गया था। जब मैं पहुंचा तो वे दोनों लॉबी में खड़े हुए थे। टीटी प्रोफेसर से लम्बाई में इतनी छोटी है, यह बात उसी समय मेरे ध्यान में आई। उसका चेहरा कुछ भिन्न लग रहा था, शायद दूसरी तरह से वांधे गए बालों के कारण; आंखें शान्त, और ओंठ एक बहुत मूक्ष्म-सी मुस्कान लिए हुए। ऐसी दूरी और ठण्डेपन से उसने मेरे अभि . वादन का उत्तर दिया जैसे कि मुझे जानती ही न हो। वह एकदम सफेद सिल्का की साड़ी पहने थी, पूरी साड़ी पर चांदी की छोटी-छोटी बूटियां कढ़ी हुई थीं, और जब यह मुड़ी तो मैंने एक हलके-से झटके से पाया कि उसकी ब्लाउज का गला पीछे से इतना गुला था कि उसके दाहिने कन्धे की उभरी हड्डी तक अनावृत थी! नाटक के दौरान प्रोफेसर का बायां हाथ अक्सर उसकी पीठ को छूने लगत और हर बार वह उसी तरह बैठी-बैठी उनके हाथ को हटा देती। नाटक समाप्त होने पर हम तीनों थियेटर हॉल में खड़े थे। टीटी ने प्रोग्रा से मुंह पर हवा करते हुए कहा : "मेरा गला प्यास से सूख रहा है। कहीं बैठ कुछ पेय लेने को समय होगा आपके पास?" उसका प्रश्न पति से था। प्रोफेसर ने मेरी ओर देखा ! फिर कहा : "क्यों न हम सीधे घर चलें! अ पास रेस्त्रां तो सब ठसाठस गरे होंगे।" "पर? पर मैं सारे दिन तो घर में थी। मैं घर नहीं जाना चाहती।" प्रोफेसर विना कुछ कहे उसकी ओर देखते रहे । मै वहां अत्यन्त अस्वरि अनुभव करता खड़ा था। मौन के उस अन्तराल का लाभ उठाते हुए "मैं अब विदा लेना चाहता हूं।" "ऐसी जल्दी पया है ?" टीटी ने कहा । पूरी संध्या के बाद उसने पहल मुझे नम्बोधित कर गाही थी, "वताइए, क्या तय किया आपने ?" - टूटे हुए ३३ "मैं तो अब भी कहता हूं कि घर चलो। मुझे अपना कुछ काम भी समाप्त करना है।" "अगर आप घर ही जाना चाहते हैं तो हम आपको घर उतार देंगे, और फिर मैं इसे लेकर चली जाऊंगी।" प्रोफेसर की आंखों में जो भाव आ गया था, उसे मै झेल न सका। "मुझे तो अब जाना है। कल के लिए बहुत पढाई इकट्ठी हो गई है ।" मैंने कहा। टीटी ने मुझे सीधी, अनझिप आंखो से ताका । "जैसी तुम्हारी इच्छा।" वह बोली । मैं उसके सामने अपने को अत्यन्त अक्षम बौना-सा अनुभव कर उठा, जैसे कि मैं वादे से पीछे हट गया होऊ। "चलो, तुम्हें घर छोड़ते जाएंगे।" प्रोफेसर ने कहा। उनकी कार देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। बड़ी-सी पुरानी शेवरले थी। आगे तीनों बैठ सकते थे। टीटी अचानक ही अनमनी हो आई है, इसे में स्पष्ट देख रहा था। अपने घर के आगे उतरकर मैंने जब उन दोनो को एक सुखद संध्या के लिए धन्यवाद दिया तो उत्तर मे प्रोफेसर मुस्कराए, पर वह उसी तरह मुह फुलाए, रुप्ट, बैठी रही। काफी दिनों तक उसे नहीं देखा । गर्मी के लम्बे-लम्बे दिन बीत गए और चारों ओर पतझर छा गया, सारे दिन हवा चलती और सडको पर पत्ते लोटते- फिरते, पूरे वातावरण में एक ऐसा-सा भाव या कि हरेक धूप-भरा दिन जो गया सो गया, इसी कारण तेज हवा के वावजूद भी झील में सफेद पाल वाली नावे तिरती रहती, शनिवार को विद्यार्थी-यूनियन का बड़ा प्रागण खचाखच भर जाता अपराह्न को संगीत-विभाग के छात्र जॉज सेशन प्रस्तुत करते और श्रोता रंगीन भेजों पर कोहनियां टिकाए मिलवॉकी को मशहूर बीयर पीते, और उस संगीत हंसी, कोलाहल, युवा अंगों को रगड़ के बीच पत्तिया लगातार शरती रहती। मैं प्रायः एक कोने में बैठा हुआ सब कुछ देखता रहता। जिस शनिवार को मेरी टीटी से भेंट हुई, मैं वागची के साय वैठा था। वह वीयर पी रहा था. मेरी चाय का प्याला न जाने कब का समाप्त हो गया था। हमारी भेज .

३४ मेरी प्रिय कहानियां से काफी दूर, अलग-सी थी। "भास्कर।" मेरे कन्धे को धीरे से उसके हाथ ने छुआ। मैंने मुड़कर उसे देखा। फिर वागची को। दोनों का परिचय कराया। वागची के. निमन्त्रण पर वह कुर्सी खींचकर बैठ गई। वागची के पूछने पर कि वह क्या पिएगी, उसने उत्तर दिया : "कुछ भी।" हमें अकेला छोड़कर वह चला गया । औरों की तरह टीटी ने मेज पर कोह- नियां टिका लीं। उसके बाल आगे को गिरकर गालों पर छा गए थे। "कुछ उदास-से दीखते हो भास्कर?" उसके स्वर में बड़ी मात्मीयता थी। "नहीं तो।" मैंने अचकचाकर कहा। "यह पतझर का मौसम है ही ऐसा।" उसने धीरे से कहा । हम दोनों ने एक- दूसरे को कुछ पल देखा, फिर मैं आंखें बचाकर झील की ओर देखने लगा। वागची एक टू में चाय के तीन प्याले ले आया। फीकी, वेस्वाद, गुनगुनी चाय । वागची का व्यवहार देखकर मुझे आश्चर्य हुआ, शिष्टता की मूर्ति बन गया था वह । उजली धूप सहसा ही लोप हो गई। संगीत समाप्त होने पर अधिकांश लोग चले गए, और तभी कभी वागची भी। हम दोनों अभी भी बैठे हैं, विना कुछ बोले । अब वह झील की ओर देख रही है, उसका चेहरा मावशून्य है, उसकी आंखों में एक दूरी। "झील के उस पार क्या है ?" उसके चौंक आने पर मुझे लगता है कि मेरे मुख से हमेशा ही वेतुके प्रश्न निकलते हैं । "झील के पार ? हवाई अड्डा, मैडिकल कालेज, और बच्चों का एक अस्प- ताल।" "मैं कभी उस पार नहीं गया हूं।" "एक दिन तुम्हें ले चलूगी।" फिर वह कांपती है, जैसे ठण्डी हो आई हो। "सुनो भास्कर, तुम दो दिन के लिए शिकागो चलोगे? प्रोफेसर एक कान्फरेन्स में जा रहे हैं।" "मुझे समय..." "पर, कल तो रविवार है। सिर्फ सोमवार को क्लास मिस होगा।" फिर वह थोड़ा-सा हंस देती है। "मुझे प्रोफेसर के पेपर में कोई रुचि नहीं है। तुम टूटे हुए ३५ चलोगे तो तुम्हें शहर घुमाने में दो दिन बीत जाएंगे।" मैं उत्तर नहीं देता । अशिष्ट नहीं होना चाह्वा, पर साय ही वागची की बातें मन मे सालने लगी हैं। रात को प्रोफेसर का फोन पाता है : "तन्त्री ने कहा कि तुम शिकागो जाना चाहते हो। हम लोग छह बजे सुबह रवाना होंगे। तव तक तैयार हो सकोगे?" अगली सुबह छह बजने से पहले ही मैं पूरी तरह तैयार हूं। शिकागो! उन 'पामर हाउस' में उतारकर प्रोफेसर मुझे धाई० एम० सी० ए० ले जाते हैं । सोलहवीं मंजिल पर कमरा मिलता है। उन्हें धन्यवाद देकर मैं लिफ्ट लेकर ऊपर जाता हूँ। कमरा अच्छा है, साफ-सुथरा। अपना वंग मेज़पर रखकर मैं खिड़की मे वाहर देखता हूं, ठीक सामने कोकाकोला का बड़ा-सा बोर्ड है, उसके नीचे घड़ी. समय बता रही है। सारे दिन में अकेला ही इधर-उधर भटकता रहता हूं। न जाने क्यो उसके सामने नहीं पड़ना चाहता । कोलाहल-भरी महा- नगरी में मुझे अपने नितान्त अकेलेपन का बोध है। काफी देर म्यूजियम में विताता हूं, भूख लगने पर एक संण्डविच खा लेता हूं। कमी-कमी मन मे जिज्ञासा उठती है कि क्या वह मुझे लेकर परेशान हो रही होगी। वह मेरे साथ-साथ घूमना चाहती थी । सन्ध्या को जव लौटता हूं तो न चाहते हुए भी एक बार पूछ लेता हूं कि मेरे लिए कोई सन्देश तो नही । यह जानकर कि कोई सन्देश नही, मन एक नामहीन उदासी से वोझिल हो उठता है । सन्ध्या वाई० एम० सी० ए० के थियेटर में डनी के को एक पुरानी फिल्म देखकर विताता हूं। और सोचता हूं कि अगले वर्ष यदि छात्रवृत्ति में वृद्धि हो गई तो शशिबाला को बुला लूगा। अगली सुबह टेलीफोन को घण्टी से नीद टूटती है । उसे दो-तीन बार बजने देता हूं, फिर उठाकर बड़े इत्मीनान से उत्तर देता हूं। टीटी ही है। पिछले दिन गुम रहने के बारे मे कोई बात वह नहीं कहती, दत बजे 'पामर हाउस' के लाउन्ज में मिलने को कहती है । उसका स्वर यह जनादेश है कि यह प्रार्थना नहीं, आज्ञा है। मैं दस बजे 'पामर हाउस' के लाउन्ज में हूं। थोड़ी-सी ३६ मेरी प्रिय कहानियां करता-सा, भूरे रंग के अपने ढीले कनी सूट में, यह जानता हुआ कि भारत में सिलाया हुआ यह सूट यहां की सुसंस्कृत भीड़ में कैसा असंगत लग रहा है। पहले प्रोफेसर दिखाई देते हैं, बाद में वह । पास आने पर देखता हूं कि वह और दिनों की अपेक्षा अधिक वनी-संवरी लग रही है। उसने ग्रे रंग की साड़ी पहन रक्खी है, ऊपर कोट, कोट में फर कॉलर है। प्रोफेसर अभिवादन का उत्तर हंसकर देते हैं। "कहां-कहां का प्रोग्राम है ?" वह पूछते हैं । मेरे कुछ कहने से पहले ही वह वोल पड़ती है : “पहले हम 'म्यूजियम ऑफ माडर्न आर्ट' जाएंगे, फिर थोड़ी-सी शापिंग करनी है।" "अच्छा; अच्छा।" कहकर वह टीटी की पीठ थपथपा देते हैं ! जाते-जाते मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि प्रोफेसर उसी जगह खड़े हम दोनों को ताक रहे हैं ! मैं आधुनिक चित्रकला के बारे में कुछ भी नहीं जानता; चुपचाप कैटेलोग हाथ में लिए उसके पीछे-पीछे एक कमरे से दूसरे कमरे में घूमता हूं। टीटी प्रसन्न है, उसकी आंखें चमक रही हैं, यह स्पष्ट देख रहा हूं। "तुम ऊब गए होगे।" वह लंच की मेज़ पर कहती है । "नहीं। सब कुछ मेरे लिए बहुत शिक्षाप्रद है।" मैं कहता हूं। इस समय भी मैं टमाटर और पनीर का सैण्डविच खा रहा हूं, और देख रहा हूं कि कमी-कमी वाल हिलने से टीटी के कानों के कर्णफूल झलक जाते हैं। "क्या यह सिल्क है ?" मैं पूछता हूं उसके हाथ साड़ी की सलवटें ठीक करते हुए ठहर जाते हैं। साड़ी में एक भी सलवट नहीं है, पर जब उसके हाथ चंचल हो उठते हैं तो अदृश्य सलवटें मिटाने लगते हैं। "हां, रा सिल्क । तुम्हें मालूम नहीं क्या?" "नहीं । स्त्रियों और उनके बारे में कम ही जानता हूं।" "सचमुच ?" वह मुझपर हंस रही है, मैं यह समझ रहा हूं। "मुझपर हंस रही हो?" "नहीं, नहीं। क्या तुम बुरा मान गए ?" लंच की मेज़ पर एक फूलदान है, जिसमें एक लम्बी-सी टहनी में लाल गुलाब है। फूल लगता असली है पर उसमें गन्ध नहीं। वह प्लास्टिक का है। ।

टूटे हुए ३७ "तुम्हें उस रात की याद है, जर तुमने मेज के बारे में पूछा था। यह पेड़ की शाखाएं नहीं हैं । मैंने आधुनिक शिल्प नाम का कोसं लिया था, उसमें मैंने वह बनाया था, वह काष्ठ का है, अपनी उस कलाकृति को मैंने नाम दिया पा--"मातृत्व ।" में टीटी की आंखें बचा रहा हूं, उसकी ओर देखना नहीं चाहता, वह आगे झुक आई है, और उसके दर्प-भरे चेहरे पर ऐसा भाव मैंने कम देखा है, जैसे मैं चोट खाया वालक हूं जिसे वह लोलीपोप देकर बहलाना चाहती है। "मास्कर, मेरे बारे में लोगों ने तुमसे काफी कुछ कहा होगा?" "नही," मैं सिर हिलाते हुए कहता हूं। "कुछ नही? मेरे और प्रोफेसर के बारे में, औरों के बारे में..." "नहीं तन्त्री," मुझे उसे टीटी कहकर पुकारने में झिझक-सी होती है, "मुझसे किसीने कुछ नहीं कहा।" एक वेट्रेस आकर हमारे कॉफी के प्यालों में ताजी कॉफी डाल गई। "तुम्हारे मुंह से अपना नाम सुनकर न जाने कैसा लगता है !" उसने प्लास्टिक के गुलाब को फूलदान से निकाल लिया और उंगलियों पर गोल-गोल पुमाने लगी । “प्रोफेमर मेरे अध्यापक थे।" उसने कहा : “पहले वर्ष जब मैं यहां आई थी तो प्रोफेसर की ही छात्रा थी। प्रोफेमर ने ही हंसी-हंसी मे मेरा नया नामकरण कर दिया था। अब तो यह, टीटी, मुझसे ऐसा जुट गया है कि बहुत-से लोगों को मेरा असली नाम याद ही नहीं रहता।" . । "भारकर! "तुम्हें यहा कसा लगता है ? मित्र बने हैं ? कभी किसी लहकी को 'डेट' करते हो?" इतने सारे प्रश्नों का इकट्ठा उत्तर नहीं दिया जा सकता। किमका उत्तर पहले दूं, यह सोच रहा हूं। वेट्रेस आकर विल मुझे दे गई है । मैं हो चुकाता हूं, टीटी आग्रह नहीं कुरती। मिशिगन ऐवेन्यू पर आकर हम पाते हैं कि धूप हलकी पड़ गई है, स्वच्छ है और दूर बायों और जल झिलमिला रहा है। हम दोनों, वि ३८ मेरी प्रिय कहानियां । उसी ओर चल पड़े हैं। दूर-दूर तक रेत विखरी है, वालुकाकण धूप में चमक रहे हैं । टीटी वहां बैठना चाहती है, मैं अपना रूमाल निकालूं इससे पहले ही वह अपना कोट नीचे डालकर उसपर बैठ जाती है। थोड़ी दूर हटकर कुछ बच्चे खेल रहे हैं और उनकी माताएं आपस में बातें कर रही हैं। बच्चे दौड़ते हुए विलकुल पास आ जाते हैं, और फिर, खेल में ही मग्न वापस भाग जाते हैं, लाल रंग की कमीज़ पहने हुए केवल एक बच्चा कोतूहल से टीटी को देखता खड़ा रह जाता है। वह हाथ बढ़ाकर उसे बुला रही है, पर वह हंसकर अन्य साथियों के पास भाग जाता है, टीटो का,हाथ कुछ देर तक वैसे ही फैला रहता है, आह्वान की मुद्रा में। फिर वह लेट जाती है और आकाश की ओर ताकने लगती है । लेटे- लेटे वह न जाने कितनीवातें करती है, ज्यादातर अपने बचपन की, अपने पिता की, गर्मियों में पहाड़ जाने की स्मृतियां, प्रोफेसर के साथ विविध यात्राएं, और कभी- कभी पेट के बल होकर, कुहनियों पर भार देकर बालों को धीरे-धीरे झुलाती हुई वह वोलती है, कभी दाहिनी करवट लेती है, कभी बायीं, और मैं पास बैठा सब कुछ चुपचाप सुनता हूं, उसके चेहरे पर दौड़ते विविध भावों को नोट करता और देखता हूं उसकी वेचेनी, लेक मिशिगन की वेगवती लहरों की तरह। फिर वह चुप हो आती है । देर तक कुछ नहीं कहती। मैं बैठा-बैठा थक गया हूं; पर वापस चलने को नहीं कहना चाहता, क्योंकि मेरे तन्द्रिल मन पर एक असीम सुख का जाल-सा छाता जा रहा है। वहीं बैठे-बैठे मैंने सूर्यास्त देखा था और फिर पूर्व में चन्द्रोदय । रेत धीरे-धीरे मोस में ठण्डी होने लगी थी, और आकाश चमकते तारों से भर उठा था। पीछे मुड़कर देखने पर शिकागो नगर की सारी इमारतें सहस्रों चमकती बत्तियों से दिप उठी थीं। अचानक ही उसने कहा: "कब से मूर्ति की तरह वैठे हो, थक नहीं गए होगे?" शायद हाथ बढ़ाकर मेरी बांह को अपनी ओर खींचने में उसे अधिक प्रयत्न न करना पड़ा होगा। अगली सुबह, कान्फरेंस की समाप्ति पर जव प्रोफेसर मुझे वापस ले चलने के लिए बाए, तो मैं विना किसी झिझक व अपराव-भावना के उनके सामने हो सका, अपने उस व्यवहार पर मुझे स्वयं ही आश्चर्य हुआ! वह वीच की सीट पर बैठी रही सुस्य, संयत । मोठों पर हल्की-सी मुस्कान । प्रोफेसर लौटते समय चुप रहे, । - टूटे हुए ३६ और टीटी के निकट बैठा हुआ मैं, सामने सड़क पर दृष्टि गडाए हुए भी उसकी पिस्थिति से पूरा सजग रहा । मेरी जीभ की नोक पर उसकी त्वचा का खारापन , और मुझे लगातार लग रहा था कि उसके बाल मेरे मुख पर छाए हुए हैं। सुगन्धित, तेलहीन रेशमी वाल । मुझे घर के आगे उतारकर, मेरे धन्यवाद को प्रोफेसर ने हंसकर ग्रहण किया। उसने चतते समय एक बार मुझे देखा । लम्बी, भरपूर दृष्टि। वे दोनों चले गए। दो दिन की निरन्तर वर्षा में पतझर के इन्द्रधनुषी रंग घुल गए हैं । घिरे- 'घरे स्याह बादल हटते नहीं, धुंधली-सी पानी की दीवार ने झोल के नीलेपन को डंक लिया है, सड़क पर चलने से भीगी पत्तियां परों के नीचे आती हैं, और पेड़ों की नग्न, कुरूप शायामओ के बीच गुजरती हुई हवा धीरे-धीरे कराहती है। कैम्पस के चारों ओर भीड़ कभी कम नहीं होती। रंगीन छाते, रंगीन स्कार्फ, रंगीन स्कटं.. मैं इन सबके बीच एकदम अकेला हो आया हूं। समय धीरे-धीरे एक अनजान प्रतीक्षा में रेंगता है। दो दिनों के बाद एकाएक सोचता हूं कि इसकी क्या गारण्टी है कि वह दुबारा मुझसे मिलना चाहेगी । यह आवेग क्षणिक मी तो हो सकता है । तब अपनी सारी असमयंताएं मन मे सालने लगती हैं । वर्षा के धुंधलेपन में कमरा और भी 'शंबी' लगता है । मैं सोफे पर लेट जाता हूं, और विविध स्वरो को सुनता रहता हूं, मेरे संकोचशील, दब्बू मस्तिष्क मे अनेक अजीब-असम्भव प्लान बनते हैं, और मिट जाते हैं। अगले दिन वर्षा थम गई है और फोकी-फीको धूप शहर पर छा गई है । मेरा आज कोई क्लास नहीं है, सारे दिन घर में रहकर पढ़ने का इरादा है । साथ ही, फोन बनने की प्रतीक्षा भी। ग्यारह बजे तक मकान में सन्नाटा हो जाता है। पुरुप काम पर चले जाते हैं, कैप्टेन अहमद की पली मिसेज़ नायक बच्चो को लेकर बाजार । मैने बालमारी से पुस्तके निकालकर मेज पर रख दी है। बाहर घण्टी बजती है । उठकर द्वार खोलने जाते हुए मैं जान लेता हूं कि वही होगी। वह घण्टी बजाकर कार में जा बैठी है, और व्हील पर बांह टिकाए प्रतीक्षा कर रही है। मैं बिना कोई प्रश्न पूछे पास जाकर खड़ा हो जाता हूं, वह ककर उस और का दरवाजा खोल देती है।

- मेरी प्रिय कहानियां उसमें कोई अन्तर नहीं दीखता, उसको मुख शान्त और निरुद्वेग है, बाल न्धे तक, वायें कन्धे पर साड़ी, उसी रंग का स्वेटर। "प्रोफेसर को शिकागो से आकर ज्वर हो गया था।" वह कहती है। "अब कैसे हैं ?" "ठीक हैं । आज कालेज गए हैं।" मैं उससे पूछना चाहता हूं कि हम कहां चल रहे हैं, क्योंकि मैं उसका नकट्य पाने को आकुल होता हुआ भी, उसके घर जाने को प्रस्तुत नहीं हूं। वह चुप है। मोटर, मकान, सड़कें दुकानें पीछे छोड़ती हुई चली जा रही है । कुछ देर में हम शहर के बाहर आ गए हैं। अब सड़क के दोनों ओर टीले हैं, और हरियाली है । एक लाल छत वाले फार्म के सामने वह कार रोक देती है। "मामओ।" वह उतरते हुए कहती है। "यह किसका फार्म है!?" मैं पूछता हूं। एकाएक इतनी ठण्ड हो गई है। इसका अनुमान वाहर आने पर ही होता है। "धवरा गए हो क्या ?" "नहीं, घवराऊंगा क्यों ?" कहते हुए मेरे अन्दर अपने पर एक नय विश्वास और अदम्य साहस भर उठता है। वह दरवाजा खोलती है; हम लो किचेन में हैं, बड़ी-बड़ी खिड़कियों पर लाल चेक के पर्दे हैं, वैसाही मेज़पोश भी स्टोव के ऊपर, दीवार पर चमकते, स्वच्छ तांवे के बर्तन टंगे हुए हैं। टी नल खोलकर केतली में पानी भरते हुए कहती है : यह फार्म इलेन का है । मेरी नीग्रो नौकरानी है । सप्ताह में एक बार आकर पूरे घर की सफाई करती बाज वह वहां गई हुई है। स्टोव जलाकर टीटी कुर्सी पर आकर बैठ गई। उसने दोनों हाथ लाल पोश के ऊपर रख लिए हैं। "इलेन बहुत भली है। वह मेरी नौकरानी नहीं, मित्र है। मुझे कभ आश्चर्य होता है कि इस शहर में केवल इलेन ही मेरे इतने निकट है। इसे समझती है।" थोड़ी देर में पानी उबलने लगता है। टीटी दो प्यालों में कॉफी उसने मेरा प्याला भी मेज़ पर रख दिया है। हम दोनों चुपचाप अप कॉफी पीते हैं। टीटी, जैसा कि प्रायः उसके साथ होता है, फिर अपने टूटे हुए ४५ है ओर झुकी हुई उसकी पलकें देखकर मेरा मन उसके मौन को भंग करने को नहीं होता। बाहर हलकी-हलकी धूप बिखरी है। पास ही कभी-कभी कोई गाय रंमा उडती है, उसके बतिसित सन्नाटा है। स्टोव के पास विजली की घड़ी, विना यावाजकिए, समय बता रही है। मेरे हाथ से चम्मच छूटकर नीचे जा गिरता है, और हम दोनों एकमाय उठाने नीचे झुकते हैं, और एक-दूसरे से आंखें मिलते ही, चम्मच बिना उठाए सीधे हो जाते हैं। कॉफी का प्याता छोड़, वह उठ खड़ी हुई है और रसोई के द्वार पर जाकर ठिठक गई है। फिर वह ग्रीवा मोड़कर मुझे देखती है। मैं अपनी कुर्सी पीये घिसकाकर खड़ा हो जाता हूँ। और तय, उस दिन के बाद, मेरे दिन शुक्रवार को प्रतीक्षा में पटते हैं, जोकि इलेन की सफाई करने का दिन है, जबकि वह सारे दिन घर से बाहर रहती है, और जिम दिन मेरा एक भी मनास नहीं होता। एक शुक्रवार से दूसरे मुक्र तक का मनराल में विचित्र उत्कण्ठा से काटता हूं, स्वप्नलोन व्यक्ति की तरह क्रिया- आलाप में मग्न । तव बागची के प्रश्नों का उत्तर मी देता हूं. क्लाम में जाता हूं. और यह सब करते हुए मेरे असीम सुख की, गहन तुष्टि को मन्द-मन्द आंच वलती रहनी है, और उसीसे लिपटी एक अननुभूत खालीपन, गन्यता की भावना भी। ऐमा मब, सीधी लीक पर चलती हुई जिन्दगी मे मैंने कभी अनुभव नहीं किया था। मेरा जो दिन माली था, वही दिन इलेन का सफाई करने का भी था, इस बात के संयोग का जब मैंने टीटी से उल्लेख किया तो वह हंस दो। "पहले इलेन मंगलवार को याती थी ।" उसने कहा: "पर तुम उस दिन बिजी होने हो, इसलिए मैंने इलेन का दिन बदल दिया।" "उमने आपत्ति नहीं की?" "वह आपत्ति क्या करेगी? वह जानती है।" "क्या वह हमारे बारे में जानती है ?" मेरे स्वर में अचम्भा या। "वह तुम्हें नहीं जानती। पर मेरी कोई बात उसमे छिपी नहीं है । उमने मेरे चेहरे के भाव पर लिए होंगे। "क्या तुम मुझे लेकर लज्जित हो, मास्कर?" वह पूछती है। में सहसा उर नहीं दे पाता । उन छोटे-से चौकोर कमरे की मेरी प्रिय कहानियां हर अपराह्न की धूप चमक रही है। पर मोटे पर्दो के कारण कमरे में संघरा- पर ऐसा गहरा अंधेरा नहीं जिसमें कि हम दोनों एक-दूसरे को न देख सकें। शय्या पर पीठ के बल लेटी है, बहुत हलके गुलाबी रंग की चादर से वह अपने ढके हुए है, ग्रीवा तक । तकिये पर उसके बाल विखर गए हैं, उसकी आंखें अब न्त, तोपपूर्ण नहीं दीखतीं, वे एकाएक बेचैन हो आई हैं ! वह धीरे-धीरे मेरी बांह छूती है । "नहीं तन्त्री, मैं लज्जित नहीं हूं। पर कभी-कभी व्याकुल अवश्य हो उठता है । तुम्हें प्रोफेसर की तरह सुख-सुविधा नहीं दे पाऊंगा।" वह मेरी बांह पर से अपना हाथ हटा लेती है। मेरे पास यह जानने का कोई साधन नहीं है कि वह क्या सोच रही है। कुछ सोच भी रही है ? कुछ देर बाद वह कहती है : "अब हमें वापस चलना चाहिए।" मैं जान रहा हूं कि एक लघु पल में ही वह मुझसे दूर चली गई है, जहां मैं उसे छू भी नहीं सकता, पकड़ नहीं पाता । और मैं उदासहो माया हूं। उसकी साड़ी अब तक नीचे फर्श पर पड़ी हुई थी, वैगनी रेशम के एक ढेर की तरह । वह मेरी ओर पीठ कर वस्त्र बदल रही है, मैं जानता हूं कि वह अब स्नानागार में जाकर वाल संवारेगी, मोठों पर मोतिया रंग की लिपस्टिक लगाएगी । उसका प्रसाधन- हीन-सा चेहरा, कुशलतापूर्वक किए गए प्रसाधनों के कारण है, यह जानकर मुझे अपने ऊपर हंसी भी आई थी, और अचम्भा भी हुआ था। जव तक वह स्नानागार में रहती है, मैं विस्तर ठीक कर देता हूं। मैं नहीं चाहता कि इलेन आकर हमारी उपस्थिति का कोई चिह्न पाए। पर मैं जानता हूँ कि इलेन जानती है, तभी तो हर वार विस्तर पर धुली और लैवेण्डर की गन्ध सुवासित चादरें होती हैं, स्नानागार में साफ तौलिये। लौटते हुए हम दोनों ही चुप रहते हैं। वह मुझे घर तक नहीं लाती, ज्याद तर वस स्टैण्ड पर छोड़ देती है। इस बीच मोसम बदल गया है और घरों की छतों पर, वृक्षों की टहनियों सड़कों और पेवमेण्टों पर बर्फ जमी हुई दिखाई देती है। मैं भारी कपड़ों से हुमा हूं। बस अभी नहीं आई है ; क्योंकि कुछ लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं। "शायद में अगले सप्ताह कहीं चली जाऊं।" वह जाने से पहले कहती है में उसकी ओर देखता रह जाता हूं। नाज बेहद ठण्ड है, दूर फैक्टरी .

. टूटे हुए ४३ तीन चिमनियों से नीला घुआं निकल रहा है और वह कार नही उठता, चिमनियों के आसपास ही मंडरा रहा है। सड़क की बत्तियां धुंधली-सी लगती हैं, और जैसे दिन के तीन बजे ही रात-सी हो आई है। दूर बस आती हुई दिखाई देती है। वह चली गई है । उसकी नीची-सी कार को एक बड़ी-सी ट्रक ढक लेती है, और मैं उसे नहीं देख पाता। दो-तीन दिन बाद प्रोफेसर से बुक स्टोर में भेंट होती है। यह मुस्कराते हैं और उनके आग्रह पर मैं कैफेटेरिया में जाकर एक कप कॉफी पीने का निमंत्रण स्वीकार कर लेता हूं। अपना ओवरकोट उतारते हुए मैं सोचता हूं कि यदि प्रोफेसर हमारी आरमी. यता की बात जान जाएं तो उनके इस शिष्ट, सधे चेहरे पर क्या भाव आएंगे। चाहते हुए भी प्रोफेसर के प्रति मैं अनुदार नहीं हो पाता, उनकी विद्वत्ता का मैं आदर करता हूं, उनकी आयु तक पहुंचकर भी मैं उनकी तरह प्रतिष्ठित नहीं हो पाऊंगा, इसका बोध मुझे है । मैं अत्यन्त साधारण हूं, देखने-सुनने, पढने-लिखने, हरेक बात में। पर इस समय में उनके प्रति बहुत सम-भाव अनुमव कर रहा हूं। उसके कारण। और जैसे मेरे विचारो के उत्तर में उन्होंने पूछ लिया कि इधर मैं टीटी से मिला हूं या नहीं। झूठ बोलना मुझे अच्छा नहीं लगता । फिर भी कहना पड़ता है कि कुछ दिन पहले, बहुत थोड़ी देर को उससे भेंट हुई थी। और, कहते हो मेरे सारे शरीर मे उसके अंगों का स्पर्श व्याप जाता है, और मेरी दाहिनी बांह पर रोएं भरभरा उठते हैं। "मैं उसे लेकर आजकल बहुत चितित हूं।" वह एकटक मुझे देख रहे हैं, "उसका आचरण बहुत यस्वाभाविक होता जा रहा है । लम्बी चुप्पियां, उदासी के लम्बे-लम्बे दौर । उसे अपने को व्यस्त रखना चाहिए, पर उसका हर चीज़ से मन ऊब-सा गया है।" में थोड़ा-सा 'अनईजी' हो गया हूं। प्रोफेसर मुझसे यह सब क्यों कह रहे हैं ? पर मैं सुनता रहता हूं। कैफेटेरिया के बाहर नीली झील सफेद वर्फ से ढकी हा है. उसके ऊपर घुध-सी छाई रहती है, उसपर की कोई चीज नहीं दीखती।

मेरी प्रिय कहानियां । "भास्कर, तुमने टीटी में कोई परिवर्तन नहीं देखा ?" "उन्हें निकट से जानने का मुझे अवसर नहीं मिला।" मैं कहता हूं, और चता हूं कि वह सचमुच मेरे लिए अपरिचिता है, मैं उसके बारे में अवश्य जानता पर वह क्या सोचती है, सप्ताह के अन्य दिनों में कहां जाती है, क्या करती है, सका मुझे कोई ज्ञान नहीं है। "जाड़ों में वह हमेशा डिप्रेस्ड रहने लगती है। उसके डाक्टर का कहना है क उसे कहीं गर्म, धूप वाले प्रदेश में चला जाना चाहिए। जैसे फ्लोरिडा।" "क्या वह जाएंगी?" "बहुत सम्भव है इसी सप्ताह।" उसके बाद मैं कुछ नहीं कहता। प्रोफेसर के मुख की ओर भी नहीं देख पाता। मुझे भय है कि मैंने मसावधानी से उनके ऊपर यह प्रकट हो जाने दिया है कि उसके कहीं चले जाने की सम्भावना से मैं थोड़ा-सा घबरा गया हूं। जाने से पहले केवल एक बार मेंट होती है। बहुत थोड़ी देर को । अपने घर के आगे एक पुरानी-सी मोटर से एक नीग्रो औरत को उतरते देख जान लेता हूं, कि यही इलेन होगी। वह मुझे साथ ले जाने को आई है। हम उसके घर नहीं जाते, दिन में मूर्ति-दम्पती का घर भिन्न-सा लगता है। वह गलियारे में खड़ी है, हमें देखते ही कहती है, "इलेन, बड़ी देर लगा दी !" "मुझे दुःख है मिसेज़ मूर्ति ।" इलेन कहती हुई अन्दर चली जाती है। "भास्कर," वह मेरे निकट आ जाती है। वह हलके पीले रंग की रोव पह है जो भूमि तक आती है, पारदर्शी नायलोन की, पर इतनी परतें कि कोई अं नहीं दीखता। वह उद्विग्न-सी है, वह मुझे अपने कमरे में ले आती है। और पलंग के पा ताने रक्खी कुर्सी की ओर बैठने का संकेत करती है। पलंग काफी बड़ा है, उस सफेद और सुनहरे रंग का पलंगपोश विछा है, ऊपर झालरदार चंदोवा है । न फर्श पर दो सूटकेस गुले पड़े हैं। "मुझे रात तक पंकिंग कर लेनी है।" मैं चुप हूं और उसके कमरे को देख रहा हूं जिसकी साज-सज्जा सचमुच टूटे हुए ४५ युवत है, जिसकी यव्यवस्था में भी टीटी सजती है। मेरे मन में रह-रहकर का वह छोटा-सा अतिथि-रूम उमर माता है, जहां मैंने सम्पूर्णता से टोटी को पा। पर जहां हर चीज पुरानी, कम दाम की थी और जहां से हर वार र आने पर मेरे मुह का स्वाद कुछ कड़वा-सा हो आता या क्योकि उन कुछ भीय घंटों में भी मेरे मन में अपनी असमर्थता का भाव चिपटा रहता था। : मेरा अपना, बलग छोटा-सा भी फ्लंट होता तो उसकी नौकरानी के घर में जने की आवश्यकता न पड़ती। टीटी का कमरा, उसके कपड़े, उसकी चीजें, सबके बीच में नितांत अकेला बैठा था, और थोड़ा-सा आहत मी, यदि वह हती तो जाने को मना कर सकती थी। वह इतनी स्वतंत्र है, शायद वह स्वयं निा चाहती हो। अपने को आश्वस्त करने के लिए कहता हूं, "निश्चय ही यह अंत नहीं है, कुछ सप्ताहों के तुम्हारे चले जाने से कुछ नहीं बदलता।" "मैं अभी तैयार हुई जाती हूं, तुम यहीं ठहरो।" वह पलंग पर से कुछ कपड़े उठा लेती है और कमरे से संलग्न एक द्वार खोलकर अन्दर चली गई है। जब वह बाहर आती है तो बहुत-कुछ पहले-जैसी लगती है, प्रकृतिस्थ संयत । एक छोटी- सी मुस्कान में मुझे सम्मिलित करते हुए वह इलेन को पुकारती है। "हम लोग कुछ देर को जा रहे हैं। क्या तुम ये कपड़े पैक कर दोगी?" इलेन यह सुनकर चौंक सी गई । मेरी ओर देखते हुए वह स्वीकृति मे सर हिलाती है। "क्या हम इलेन के घर जा रहे हैं ?" मैं पूछता हूं। "नहीं वेवी, उतना समय नहीं है।" वह कहती है। "फिर? "तुम बहुत निरपंक सवाल पूछते हो।" उसने अपनी तर्जनी मेरे मोठो पर रख दी है। यात्रा लम्बी है, कुछ देर में मैं समझ जाता है कि हम झील के उस पार न रहे हैं । मैं बहुत कुछ कहना चाहता हूं और हर क्षण के बाद मेरी आकुलता बहत जा रही है। "क्या तुम्हारा जाना आवश्यक है ?" करते हैं।"

पिघलती हुई बर्फ
"कौन रोया?"
"कोई नहीं।"
"कोई रोया था।"
"कोई नहीं रोया।"
"वीरू! बीस! बीरू!"
"इस तरह चीखते क्यों हो? वीरू अब कहां?"
"वीरू कहां है ?"
"वीरू तो मर चुका।"
"वीरू ?"
"वीरू नहीं है। वीरूतीन साल पहले मर चुका
"मर गया?"
"हां-याद नहीं है, वह मांधी-पानी वाली रात, बर्फ पर रक्त के दाग, लाल
कोचई।"
"और सुधीरा ? कहां हो सुधीरा ? सामने आओ, तुम्हें एक बार देखना
चाहता हूं सुधीरा ।"
अक्षय ने चौंककर आंखें खोली। कुछ देर निश्चल लेटा रहा, कैसा विचित्र
स्वप्न था। कमरे में अभी भी जैसे सुधीरा की आवाज घूम रही थी। पर यह
वदरंगे वॉलपेपर वाला कमरा नहीं है, बाहर थर्ड स्ट्रीट की ट्रैफिक भी नहीं, घर
शुक्लाजी का है, बरामदे के उस पार शुक्लाजी का शयन-कक्ष है, उनकी पत्नी, भोर
गुड्डो । नहीं, यह थर्ड स्ट्रीट पर अक्षय का पुराना कमरा नहीं है। खिड़की खोलने
पर कोने पर अभी-अभी मुड़ती सुधीरा नहीं दिखाई देगी। फिर दरवाजा नहीं
खुलेगा और हंसती, उल्लसित सुधीरा माकर खड़ी नहीं होगी। कभी नहीं। अब
फभी, फनी, कभी नहीं। वहां वापस लौटने पर भी नहीं। थर्ड स्ट्रीट के कमरे में

पिमलती हुई बर्फ ४६ खिड़की खोलकर खड़े रहने पर भी नहीं। पूरी जिन्दगी पड़े रहने पर भी नहीं। पागलों की तरह सुधीरा का नाम पुकारते हुए सड़क पर भागने पर भी नहीं । कमी नहीं । अब कमी नहीं। अब सुबह होने वाली है। अक्षय उठकर चारपाई पर बैठ गया है। रात के प्रथम पहर में देखा गया स्वप्न अब धूमिल पड़ गया है। सिर में थोड़ा-थोड़ा दर्द है। हायों से माया थामकर अक्षय याद करने की चेष्टा करता है। सुधीरा कमरे में आई थी, कुछ कह रही थी, शायद बीरू के बारे में। वोरू यव कहां? वीरू तो तीन साल हुए मर चुका। अक्षय बहुत देर, उसी तरह, हायों में माषा यामे बैठा रहा । वाई कनपटी पर एक नस दुखती रही। यह दोश, यह यकान, अब और नहीं, और नहीं। सुधीय, पया अन्त में तुम ही जीतोगी? क्या बीरू के बदले मुझे लेकर ही तुम्हारी आवाज धूप होगी? अक्षय ने बड़ी पेप्टा से अपने को इन विचारों से अलग किया। उसने चप्पलों में पैर डाले और उन्हें अनिच्छा से घसीटता हुआ उठा और कॉफी परको. लेटर का प्लग लगा दिया। पुरानी आदत शीघ्र नहीं छूटती। भाभी, मिमेज शुक्ला, कॉफी व पानी रात को ही रख जाती हैं । अक्षय उस छोटी-मी खिड़की के किवाड़ के सहारे खड़ा हो बाहर देखने लगा। रात फिर पानी बरसा था। इस ममय हवा ठण्डी है और रात में फूले हुए पुष्पों की मुगन्ध से वोझिल । कुछ देर में पूरी तरह उजाला होगा। एक नया दिन प्रारम्भ होगा । अक्षय तैयार होकर, शान्त, स्वस्थ- चित्त कालेज जाएगा और पूरे दिन अपने को व्यस्त रखेगा। क्लास में पढ़ाएगा, हाजिरी लेगा, स्टाफ रूम में लौटकर कॉफी पिएगा । और शायद बाज नई रात को पक्षय आत्महत्या कर ले और फल जगह-जगह छोटे-छोटे ममूहों में खड़े होकर उसके साथी, विद्यार्थी उसकी मृत्यु पर सेद प्रकट करें। शायद छवि रोए। कॉफी तैयार है । अक्षय मुडकर कांच के ढक्कन में कॉफी का रंग देवता है। अभी कुछ और गादी होने दो। यह सिरदर्द, यह नया दिन, अपने को ढकेल-हवेल. कर काम करवाना और सबके सम्मुख संयत चेहरा प्रस्तुत करने का श्रम । उजाला होने के साथ ही महरी आती दिखाई देती है। वह अनाहार के कारण मूखी हुई, कढ़े हाथों वाली; उसको कमी हुई साडी पुटनों में ऊपर है और उन सुले हुए काले परों में कहीं कुछ सेन्मुयस नहीं। उमरे कुण्डी घड़काने मे पहले ही दरवाजा गल जाता है। महरो पार - .

५० मेरी प्रिय कहानियां
दूधवाला।
फिर गुड्डी का रोना।
कमरे में ताज़ी कॉफी की महक मंडराती है।
गुलमेहंदी की पंखुड़ियां कीचड़ में गिरी हुई हैं।
लाल कीचड़! रक्त के दाग !
स्वप्न में कोन रोया था?
बस करो सुधीरा, क्या एक पल चैन नहीं लेने दोगी?
सुबह का नाश्ता । नहाई-धोई भाभी टोस्ट सेंक रही हैं । गुड्डी अपने चम्मच
को बार-बार प्लेट पर मार रही है। फिर वह अक्षय से पूछती है : "चाचाजी
मेरी तस्वीर लेंगे?"
"हां गुड्डो, अगर धूप निकलेगी तो लेंगे!
"कौन सा मेक है कैमरा?" शुक्लाजी ने पूछा ।
"याशिका।"
थोड़ा-सा मुस्कराओ सुधीरा ! अक्षय, तुम कुछ पास आमो। बस, अ
ठीक । वीरू तस्वीर खींच रहा है । सुधीरा अक्षय की आंखों में देखकर धीरे-धी
दुष्टतापूर्वक हंसती है । वीरू अव नहीं है । कैमरा वीरू का है।
"चाचाजी, आज धूप निकलेगी?'
"हां, गुड्डो।"
"मेरी तस्वीर लेंगे?"
"एक वात कितनी बार पूछोगी गुड्डी ?" भाभी कहती हैं, "चाचाजी
तंग नहीं करते रानी।"
गुड्डी की आंखें उजली हैं, उनमें काली पुतलियां हैं, पुतलियों में अक्ष
अपना प्रतिविम्ब देखा । अक्षय उस प्रतिविम्ब को कुछ देर देखता है ।
!
,
हत्यारा!
कभी धूप, कभी वर्पा । एक हाथ में छाता और दूसरे में कितायें लिए
कीचड़ से वचता हुआ सड़क पर चल रहा है। इस समय भी मस्तिष्क -
आंखें दृष्टिहीन। सड़क, धब्बे, कीचड़, मटमैला आकाश, पास से गु

पिपलती हुई बर्फ ५१ व्यक्तियों के कपड़ों से पसीने की ममक । एक यही जिन्दगी,मही जिन्दगी, बोंठ मिचे हए, मस्तिक विचारहीन । एक धम्बा, दुनिया की लम्बी, सपाट सड़क पर केवल एक घन्वा । अक्षय आखें कई बार पकाकर देखता है। नही अक्षय, यह गलत है। अक्षय ने अपने आपसे बातें करने की आदत सीख ली थी। गलत है, प्रत्येक प्राणी को जीना है, अपने अन्दर राग, द्वैप दोप, अपराध, इनका बोझ लिए भी जीना है. मोरों के मार्ग मुस्कराना है। पर यह सोम लेने का प्रोसेस कितना मुश्किल, कितना दुश्वार। अदाय में आसपास सड़क पर माने जाने वाले व्यक्तियो को देखा । क्या इनमें से कोई, हर समय, उसकी तरह अपने से इन्द्र करता रहता है ? क्या उसकी तरह कोई विक्षिप्त है. जोकि एक शब्द के पास दूसरा शब्द रखकर, पंक्तियां, पृष्ठ, पोपे न लिख पाने के कारण धीरे-धीरे टूटकर, विखरता जा रहा है ? धोखेबाज ! कर तक अपने को धोखा दोगे? असली गोठ सुधीरा है। मुधीरा ही है वह बड़ा-सा हिमखण्ड, जो हृदय के स्थान पर आकर जम गया है। सुधीरा है जो हाट करती है, जागते, सोते । मुधीरा--मुझे निष्कृति दो, मुझे और मत टॉचर करो। अक्षय के लेखक प्रोफेमर ने कहा या~-'यह मेण्टन ब्लाक गहरे इमोगनत शाक के कारण है । तुम वापस इण्डिया लौट जाओ। वहाँ जाकर इस क्राइसिस से से मुक्ति पाओगे!' आषाढ़ की वर्षा में भीगता हुआ अक्षय शुक्लाजो के पर पहुंचा। "तुम ! यवर भी नहीं दी!" शुक्लाजी ने उत्साह-मरी बाहो में उसे भीच लिया और भाभी, हंसती हुई, आंचल सिर पर खीचती बाहर निकल आई। "हाय, कितने दुबले हो गए हैं ! और लोग तो विदेश से यूव मोटे होके आते हैं ! बीमार ये मया?" "नही भाभी," अक्षय ने कहा । भाभी के उजले माये पर दमकती लाल बिन्दी, चेहरे पर बसीम स्नेह और अथुप्रोग्ज्वल आये । अक्षय को लगा कि जिस अतीत को पीछे छोड़ आया है, उससे उबरकर, फिर से जी मकेगा। यहां स्नेह और करणा है, जल-भरे मैप और सुगन्ध-चोझिल पवन, अपनी मिट्टी, अपना देश ? शुक्लाजोगे यह नया पर उसको अनुपस्थिति मे बनवा लिया था। मेहमान कमरे में अक्षय का सामान रख लिया गया और गुडी सन्दूक एलने के लालच में ५२ मेरी प्रिय कहानियां आस-पास चक्कर काटने लगी। अक्षय ने चलते-चलते न्यूयार्क में गुड्डी के लिए एक गुड़िया और भाभी के लिए नायलोन जार्जेंट की दो साड़ियां ले ली थीं। अपनी इस व्यावहारिकता पर उसे अव प्रसन्नता हुई। जव वह नहा-धोकर बाहर आया तब तक भाभी ने तमाम चीजें बना ली "सारे पकवान एक ही दिन में खिला देंगी क्या?" उसने पूछा। भाभी मुस्करा दी। "भई, तुम खूब हो। दो साल से हमें एक चिट्ठी भी नहीं डाली। कुछ पता ही नहीं चला कि तुम कहां हो, क्या कर रहे हो ?" शुक्लाजी ने कहा । "एक जगह टिककर बैठा ही नहीं। इधर से उधर भटकता रहा।" "तीन साल में तो पी-एच०डी० कर सकते थे।" "हां, कर तो सकता था पर एकाएक मन उचट गया," अक्षय ने कहा। भाभी ने कहा : "हम तो सोच रहे थे कि माप वहां से शादी करके लौटेंगे, पर आप तो जैसे अकेले गए थे वैसे ही वापस आ गए। क्या हुआ उस लड़की का? पटी नहीं ?" अक्षय एकाएक कुछ कह न सका। फिर उसने सायास हंसते हुए कहा : "कुछ ऐसा ही समझ लो।" उसे अपने पर आश्चर्य हुमा कि उसने ऐसा एक पल के लिए भी क्यों सोचा कि इंडिया लौटकर सव बदल जाएगा। मुझमें कुछ नहीं बदलेगा। कुछ नहीं । कुछ नहीं । सुधीरा हाण्ट करेगी। मामओ सुधीरा, आओ। फिर अक्षय शुक्लाजी के साथ ही युनिवर्सिटी गया। तीन साल बाद, मचा- नका, विना पी-एच० डी० की डिग्री लिए अक्षय के लोटने से सभी को बड़ा आश्चर्य हुना । पुछेक ने फब्तियां कसी, कुछ लोगों ने अक्षय के प्रथम उपन्यास पर बधाई दी। "अब कुछ लिख रहे हो?" "नहीं।" "तुम्हारी पुस्तफ की तो बहुत प्रशंसा हुई।" भावा, तीन साल पहले यही लोग थे, हंसी-मज़ाक, सलाह-मशविरे के साथी थे। बाज? कोई नहीं। केवल अकेलापन, नितांत अकेलापन। अक्षय परिचित इमारतों के आस-पास चक्कर लगाता है । जामुन के पेड़ की पत्तियों से ढेर सारी विधतती हुई बर्फ ५३ पानी की बूंदें उसके ऊपर आ गिरती है चारों ओर बड़ी-बड़ी घास उगी हुई है। यहां सीधी सपाट घरती है, ऊंची-नीची पहाड़ियों के बीच कैम्पस की इमारत नही, बर्फ नही, लेक का किनारा भी नहीं। एक मतान्दो पहले खड़ी की गई इमा. रते हैं, रंग-बिरंगी साड़ियों के आंचल, वर्षा में भोग-मोगकर काले पड़कर पैहों में तने और हरे बांसों को लचीली फुनगियों । अक्षय पर लौट आता है। गुड्डी अपनी नई गुडिया से खेल रही है । भाभी रसोई में हैं । अन्दर से उनके बर्तन पटकाने की आवाज आती है। और फिर धीरे-धीरे पूरा दिन बीतता है। संध्या को कुछ और लोग मिलने आते हैं, फिर वर्षा की रात का संधिमारा, फिर रात मेदको का सम्मिलित स्वर, कभी-कभी बादल गरजते हैं। कमरे की दीवारें सफेद, मूनी हैं । अक्षय धारपाई पर लेटकर नीद आने को प्रतीक्षा करता है। हर पन्द्रह मिनट पर पट्टी बजती है, पर नीद नहीं आती। सुबह फॉफी, गुड्डी को लगातार बातें, फिर क्लास में जाने की तैयारी । क्लास में लेक्चर देते हुए अक्षय एक क्षण को रुका। इस समय जो पढ़ा रहा हूं, क्या वह अत्यन्त आवश्यक है ? यदि मैं किताब बन्द कर दूं, तो इन बातों के मान में कुछ कमो होगो ?' पर वह रुका नहीं, पढ़ाता रहा । क्लास के बाद लाइब्रेरी में चला गया,. एक पुरानी अमरीकी पत्रिका निकालकर अपनी पुस्तक का रिव्यू पढ़ा। केवल एक पुस्तक, केवल एक प्यार-~और उसके बाद कुछ नहीं । अव कमी कुछ नहीं। न यार, न पुस्तक। ब्रिलिएण्ट छात्र, न अध्यापकः । एक धमा। लाल फीचड़। दूसरा पलास प्रारम्भ होने में आधे घण्टे की देर थी। अक्षय स्टाफ रूम में लोट आया। बातचीत के दायरे से अलग, शुक्लाजी के पास बैठी एक युवती को देखकर हल्का-सा धोका और फिर उसने छवि को पहचान लिया। "इन्हें जानते हो अक्षय ?" पुक्लाजी ने पूछा। "हां कुछ साल पहले पड़ा भी चुका हूं।" अक्षय ने कहा और पापाकि अरने पहचाने जाने पर छवि थोडा-सा विस्मित हुई। उन शर्मालो बांधोंवाली जाना और इस पूर्ण युवती में बहुत अन्तर आ गया है। सुन्दर वह तव भी नहीं थी, अब लम्बे-पतले चेहरे पर गाम्भीयं को छाप है, अपने आपको स्वीकार कर लेने की शान्ति और सहजता । ममय को छवि से ईया हुई।

- 1. ५४ मेरी प्रिय कहानियां उसने छवि को और निकट से . देखा। नहीं, छवि सुन्दर नहीं । उसमें न वाचालता है, न किसी प्रकार की रेस्टलेसनेस । काले पाड़ की सफेद साड़ी पहने है, में सादे बाल हैं, पीछे जूड़ा, कोई प्रसाधन नहीं। उसे एकटक देखती है और हाथ चाय का प्याला थामे है। लौटते समय शुक्लाजी छवि की बात करते रहे। तब तक अक्षय मनमना हो आया। उसे अव इधर-उधर की चर्चा में रस नहीं माता। छवि है, छवि उपध्याय, बस अक्षय को और नहीं सुनना । छवि है, तो हुआ करे--पेड़ हैं, पत्तियां हैं, आकाश है। अक्षय ने अपने को समेटकर, सिकोड़कर, जैसे एक दायरे में बन्द कर लिया। शुक्लाजी कहते गए, छवि क्लास में प्रथम आई थी, उसकी नियुक्ति कराने में प्रोफेसर सागर को बड़ा विरोध सहना पड़ा। बड़े-बड़े चर्चे हुए। पर पिछले दो वों से किसीको कुछ कहने का अवसर नहीं मिला। छवि बड़ी इण्टेलिजेण्ट लड़की है। छात्रों में भी उसका वड़ा सम्मान है शुक्लाजी के चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान दौड़ गई। उन्होंने कहा : "और भाई, विभाग में कोई लेडी रहे तो अच्छा रहता है । टोनिंग अप हो जाती है। लोग कायदे से रहते हैं और भद्दे हंसी-मज़ाक नहीं करते। जव से छवि को टी क्लब का इन्चार्ज बता दिया है, खूब बढ़िया चाय मिलती है । सव लोग ठीक समय पर चन्दा दे देते हैं।" कितना बोलते हैं शुक्लाजी, अक्षय ने सोचा और उनकी ओर से मुंह फेर लिया। दीवार पर सीलन का बड़ा-सा धन्वा उभर आया । पानी ने गुलमेहंदी के पेड़ों को बेदर्दी से तोड़ दिया और फूलों की लाल व बैंगनी पंखुड़ियां घास पर बिखर गई। लगातार पानी की झड़ी ने अक्षय की नजं को और भी झकझोर दिया था। पिछले कई दिन से लगातार विलाइजर व स्लीपिंग पिल्स ले रहा था। अब पानी कुछ देर को रुका, तो अक्षय वाहर के बरामदे में कुर्सीखींचकर जा बैठा ।मन्दरभाभी शायद अंगीठी जला रही थीं । कागज़ जलने की भीगी-सी महक वरामदे में घूमने लगी । पाम के गमलों पर छत से लगातार बूंदें टपक रही थीं। अक्षय आंखें लगा- कर पान की पत्तियों पर बूंदों का गिरकर विखरना देखने लगा। तभी छवि सामने भाकर खड़ी हो गई । उस धुंधली मेघाच्छादित सांझ में उसकी साड़ी का - पिघलती हुई बर्फ ५५ पटक पीला रंग अक्षय के मन को अनायास ही मुहाना लग उठा । छवि का चेहरा कोमल, उज्ज्वल लग रहा था। इस समय माथे पर कुमकुम की बड़ी-सी चिन्दी थी और पीछे, जूड़े में, कदम्ब का एक फूल । छघि एक पल को ठिठकी, फिर उसे नमस्कार करती हुई अन्दर चली गई। अक्षय के नेत्र फिर इस प्रतीक्षामै छत की ओर उठ गए कि अगली बूंद कर टपकेगी। सामने सड़क धुलो धुलो धमक रही थी। कुछ देर में अंधेरा होने पर पानी-मरे गड़ों में कागज़ की नावें छोडकर पड़ोमी बच्चे अपने-अपने घर चले जाएंगे। अक्षय उठकर नीचे सड़क पर उतर आया। घरों में एक-एक कर वत्तिया जल उठी। हल्की, मद्धिम वत्तियां । अक्षय ने पैर से कागज की एक नाव को कुचल दिया और फिर दूसरी नाव को और फिर तीसरी नाव को भी! एक बच्चा जो अभी तक इन नावों को तैरा रहा था, पर जाते-जाते रुक गया और स्थिर खड़ा हो अक्षय को देखने लगा । अक्षय ने हंसना पाहा, पर वह बच्चा मुडकर चला गया। अक्षय ने एकाएक पाया कि छवि लोटकर सड़क के किनारे-किनारे चली जा रही है, उमने अपनी साड़ी कीचड़ से बचने के लिए आगे से पोड़ी-सी उठा सी है। 'इण्टेलिजेण्ट मिस उपाध्याय'-शुक्लाजी की बात याद कर अक्षय ने कुछ विद्रूप से सोचा-'पूर्ण मुवती, पर अकेलो मिस उपाध्याय' । ऐसा सोचने पर फिर उसे स्वयं अपने पर ग्लानि हो उठी। और अब रात है । अक्षय के आगे टाइपराइटर है और उसमें लगा सादा, कोरा पेज । अक्षय कुछ लिखने की चेष्टा कर रहा है। देर तक निश्चल बैठे रहने के बाद उसकी उंगलियां बार-बार टाइपराइटर पर लियती हैं—सुधीरा, मुधीरा, सुधीरा यक्षय ने एक लम्बी सास छोड़ी। फुर्सी से पीछे टिककर बैठ गया और उसकी उंगलियो ने आंखो को ढक लिया। अब रात है, कही कोई सन्द नहीं, अब वह अपने हृदय की इस गाठ मो मोलकर सुधीरा के बारे में सोचेगा। सबसे पहले सुधीरा की हसी, फिर उसकी वाचालता, फिर उसकी सहन निश्ठता। "मुझे कुछ और बताओ अक्षय । मुझे अपने साप से घलोगे न ? मैं वाया के पर भी जाऊंगी। मुझे बचपन में ही उन्होंने अपने घर का पता याद करवा दिया या।" मुधीरा तोते की तरह दोहराती है, "रामलावन, पोस्ट यागियर १६ मेरी प्रिय कहानियां जिला वस्ती।" अक्षय हंसता है, "वहां पर अब क्या पामोगी ? तुम्हें कोई जानेगा में नहीं।" "खण्डहर तो होंगे। मैं वहां जाकर अपने वावा का घर देगी ! उनका वाग- बगीचा और नहर के पास के खेत । मेरा बचपन वावा से भारत के बारे में तरह- तरह की कहानियां सुनने में वीता।" सुधीरा के वावा छोटी उम्र में ट्रिनीडाड में बस गए थे। सुधीरा की मां का नाम था कैलासी, पिता व्यापारी थे। अकेली वेटी को उन्होंने इंगलैण्ड में पढ़ाया था। कई साल बाद लौटने पर सुधीरा ने पाया कि वह, मां कैलासी की भाषा भूल गई है । कैलासी ने हिन्दी छोड़कर कुछ और बोलना नहीं सीखा था। अक्षय को यह सुनकर अजीव-सा लगा । सुधीरा का चेहरा भारतीय था, रंग- ढंग पाश्चात्य । कटे हुए वाल और नीचे गले की ब्लाउज, कमर को हल्का-सा झटका देते हुए चलने का अन्दाज । कभी-कभी वह साड़ी भी पहनती थी, पर साड़ पहनने पर उसकी अभारतीयता और भी प्रखर हो जाती थी। अक्षय के साथ भारत जाने के उल्लेख से सुधीरा की आंखें दीप्त हो जातं थीं । "कभी किसी छुट्टी में मेरे साथ ट्रिनीडाड चलना अक्षय-मदर तुमसे. मिल कर बड़ी खुश होंगी।" अक्षय को ट्रिनीडाड जाकर सुधीरा के परिवार से मिलने की जिज्ञासा व रही। वह छुट्टी कभी नहीं आई। अक्षय की आंखों के आगे धब्वे तैरने लगते और उन धब्बों में सुधीरा का चेहरा खो जाता है । पर सुधीरा की मांखें उसे ओर से ताकती हैं । उसका पीछा करती हैं । शून्य, रिक्त आंखें, जिनमें न हंस न शिकायत-खुली हुई वे आंखें अक्षय को ऐसे ताकती हैं जैने उसका ३ अस्पताल की सूनी, सफेद दीवार हो। मेज पर चाय का एक खाली प्याला, कुछ विनाखुली चिट्ठियां, कुछ पनि कुछ फूल । घण्टा समाप्त होने में कुछ ही समय था और अक्षय स्टाफ अकेला था। उसने दोनों हाथों की उंगलियां एक-दूसरे में फंसा लों और आदी-बेड़ी धारियों को देखने लगा। कोरिडोर से कुछ लड़कियां हंसती हुई पिघलती हुई बर्फ ५७ गई। अक्षय ने सुबह उठकर टाइपराइटर से कागज निकालकर, मोड़कर, रही की टोकरी में फेंक दिया था। उसपर तीन बार सुधीरा का नाम लिखा था। नही सुधीरा, मैं तुम्हे प्यार नहीं करता। नहीं मुधीरा, मै अब कभी कुछ नही लिख पाऊंगा। नही सुधीरा, अव में वह 'मैं' नही हूं। मैं कोई और हूं, जिसे मैं स्वयं स्वीकार नहीं कर पाता। पर्दा हटाकर छवि अन्दर आई। शायद यह सीधी घर से आ रही थी। तभी उसका प्रसाधनहीन मुख भी यहा ताजा लग रहा था। वह अक्षय को देखकर थोड़ा- सा झिझकी, फिर पास बाकर बैठ गई। लोगों से घिरे रहने में सुरक्षा की भावना होती है । निरर्थक बातचीत, आपस की थालोचना-प्रत्यालोचना, जैसे पते धनकर विचार और भावनामो को ढंके रहती है, अक्षम ने सोचा। पर इम समय छवि सामने थी और अक्षय अपने चेहरे पर तुरन्त एक मुस्कराहट का मोल नहीं पढ़ा पाया। छबि उसे कुछ देर तक देखती रही, फिर वोली, "आपको यहां सब कुछ बड़ा शबी और ढीला-ढाला लग . रहा होगा।" 'कुछ विशेष नही ।" अक्षय ने उत्तर दिया। "आपको यहां के लोगों के बर्ताव से शुन्ध न होना चाहिए। यहां कोई किसीको पढ़ते नहीं देख सकता । सब एक-दूसरे की जड़ काटने में जुटे रहते अक्षय छवि को देखता रह गया । अक्षय को सम्बोधित कर कुछ कहने का यह पहला अवसर था। यह शायद छवि ने भी महसूस किया । वह चुप हो गई। उस समय छवि के घेहरे पर जो भाव दौड़ गया, उसे देय अक्षय को लगा कि शर्मीली आंखों वाली यह छात्रा अभी भी योई नहीं है। छवि कदाचित् अक्षम को ओर देयता पा झेंप गई। उस झेंप को मिटाने के लिए वह उठ पड़ी हुई और वाहर बैठे पपरासी को दो प्यासे अच्छी चाय बनाकर लाने का आदेश देने एकटक अपनी सगी। फिर उसने मुड़कर कहा : "में अभी तक आपको पुस्तक नहीं पढ़ पाई हूं। यहा न युगस्टोर में है, न साइवरी में 1 कुछ और लिख रहे हैं ?" "मेरे अमरीकी लेखक मित्र का कहना है कि हर मनुष्य विदेशी भाषा . . मेरी प्रिय कहानियां ल लिख सकता है। और लोग उसे उसी कौतूहल से पढ़ते हैं जैसे कि लोग कस देखने जाते हैं।" छवि के चेहरे पर प्रश्न-भरा भाव देखकर अक्षय ने मुस्कराकर आगे जोड़ा लेखक में नहीं हूं छवि । वह एक पुस्तक फ्रीक समझ लो।" "फिर भी मैं पढ़ना चाहूंगी।" "मेरे पास कुछ प्रतियां पड़ी हैं, उनमें से एक ले लो।" अक्षय ने उठकर अपना लॉकर खोला और एक प्रति निकालकर छवि के आगे मेज़ पर रख दी। छवि ने मुस्कराकर धन्यवाद दिया और पुस्तक उठाकर पहला पृष्ठ खोला । उसकी आंखें कुछ समय एक पंक्ति पर टिकी रहीं। अक्षय जानता था कि छवि उस समर्पण को पढ़ रही है.---"सुधीरा को।" फिर पृष्ठ पलट दिया गया। छवि ने पुस्तक बन्द कर दी और कहा : "इसे यहां पढ़ना नहीं प्रारम्भ करूंगी। घर जाकर चैन से पढ़गी।" घण्टा कुछ मिनट पहले बज चुका था। कुछ लोग एकसाथ ही अन्दर आए। छवि और अक्षय को पास बैठा देख कुछ मुस्कराये, कुछ चुप रहे । शायद छवि ने यह जाना, वह पुस्तक पकड़े हुए उठ गई। कुछ दिन बाद अक्षय ने यह नोटिस किया कि छवि अपनी क्लास प्रारम्भ होने से काफी पहले आ जाती है। अक्षय उस समय खाली होता है । छवि आकर दो प्याले चाय बनवाती है और फिर दोनों उस कृत्रिम सन्नाटे में बैठकर चाय पीते हैं । दोनों ही प्रायः चुप रहते हैं । पुस्तक पाने के बाद छवि ने उसका उल्लेख नहीं किया, न अक्षय ने ही उसकी प्रतिक्रिया पूछी। अक्षय ने पाया कि छवि स्वयं जितन मौन रखती है, उसके नेत्र उतने ही मुखर हैं। अक्षय को लगा कि वह नेत्र उस कुछ वैशिष्ट्य पाते हैं, जैसे अक्षय को देखना, उन्हें अच्छा लगता है । अचानक वह जगमगा उठते हैं और अनायास ही लजा जाते है । छवि शान्त बैठी रहती उसके ओंठ निस्पन्द रहते हैं, पर वे नेत्र पुकार-पुकारकर अक्षय को कुछ जता चाहते हैं । ऐसे अवसरों पर अक्षय ने अपने को बहुत असहाय पाया और फिर उ दो क्लासों के बीच में स्टाफ रूम में जाना छोड़ दिया। एक दिन, दो दिन । दिन छवि सन्ध्या को शुक्लाजी के.घर आई । मामी ने चाय बनाकर अक्षय बुलाया । और तब छवि ने पुस्तक लौटाते हुए कहा : "मैं साहित्य की छात्रा हूं पर आपकी पुस्तक ने मुझे बहुत विचलित किया।"

पिघलती हुई बर्फ ५८ "तुम्हारे इस रिमाकं को मैं प्रशंसा के रूप में लेता हूँ। पर यह लोटा क्यों रही हो? यह तो तुम्हारी प्रति है।" "सच !" छवि की आँखें मधुर विस्मय से भर उठीं। अक्षय को उस समय गुड्डी और छवि की आयु मे कोई अन्तर नहीं लगा। वह निरुद्देश्य ही सोच उठा कि यह छवि को छोड़कर उसके बारे में कुछ भी नही जानता । छवि के अन्य भाई- वहन हैं, कभी उसने उल्लेख नहीं किया, पर लाड़ली अकेली बेटी-मा भी भाचरण छपि का न था। इस समय, सांझ के धुंधलके में, भाभी के कमरे के आत्मीय वाता वरण में बैठकर चाय पीते हुए अक्षय को अपनी उपस्थिति स्वयं असह्य, असंगत लगने लगी। उसने अपने इन विचारों को जकडकर वाघ दिया और वह छवि को देखने लगा । एयि कुछ उदास हो आई थी, कुछ खो-सी गई थी। "अरे तुम दोनों तो एकदम चुप हो गए।" मामी ने उस लम्बी चुप्पी को तोड़ा। "यह वर्षा का सीजन ही ऐसा है, बहुत डिप्रेसिंग।" अक्षय ने कहा । "और फिर यहा की लम्बी, पाली शामे । न कुछ पीने को, न दिल बहलाने को । अक्षप बाबू, आपके लिए दवा योजनी पड़ेगी, कुछ रंगीन, कुछ चटपटी।" अक्षय ने पाया, मामी की इस बात पर छवि के ओंठ थोडा-सा हिलकर रह गए। फिर उसने मसय को देखा, पर असम को तोलती-मी दृष्टि अपने पर पा यह लजा गई। "हा अक्षय बाबू, दवा योजनी पड़ेगी। अगर साय में मेरे लिए देवरानी से आते तो मेरा सिरदर्द कम होता। अब उसे योजने में कितनी दिक्कत उठानी पड़ेगी मुमे, यह बताओ तो?" मिसेज शुक्ला को इस बात पर न छवि ने कुछ कहा, न अक्षय ने। भाभी में दोनों को यारी-बारी से देखा, फिर चाय छानने लगी। उन दोनों के चेहरे प्रेमियों के से नहीं थे, दो मित्रों के भी नहीं । वे अपने अन्तर-तल की गहराइयो डूब गए ये । अाय के लिए भाभी, छवि, यह चाय पीने की प्रिया छापा-मात्र रह गई और वह पाप का प्याला पकड़े बंटा रह गया। "और चाय ?" मामी ने पूछा। "नहीं।" प्याला रय अक्षय उठ खडा हुआ और उन दोनी मे थामा ले, अपने कमरे में चला गया। उसने अपने रेकार्ड प्लेयर पर वेथोवेन की एक मिम्फनीक रेका सगा दिया और पारपाई पर आड़ा होकर लेट गया। अक्षर ५८ मेरी प्रिय कहानियां नॉवेल लिख सकता है। और लोग उसे उसी कौतूहल से पढ़ते हैं जैसे कि लोग सरकस देखने जाते हैं।" छवि के चेहरे पर प्रश्न-भरा भाव देखकर अक्षय ने मुस्कराकर आगे जोड़ा: "लेखक मैं नहीं हूं छवि । वह एक पुस्तक फ्रीक समझ लो।" "फिर भी मैं पढ़ना चाहूंगी।" "मेरे पास कुछ प्रतियां पड़ी हैं, उनमें से एक ले लो।" अक्षय ने उठकर अपना लॉकर खोला और एक प्रति निकालकर छवि के आगे मेज़ पर रख दी। छवि ने मुस्कराकर धन्यवाद दिया और पुस्तक उठाकर पहला पृष्ठ खोला। उसकी आंखें कुछ समय एक पंक्ति पर टिकी रहीं। अक्षय जानता था कि छवि उस समर्पण को पढ़ रही है-"सुधीरा को।" फिर पृष्ठ पलट दिया गया । छवि ने पुस्तक बन्द कर दी और कहा : "इसे यहां पढ़ना नहीं प्रारम्भ करूंगी। घर जाकर चैन से पढ़गी।" घण्टा कुछ मिनट पहले बज चुका था। कुछ लोग एकसाथ ही अन्दर आए । छवि और अक्षय को पास बैठा देख कुछ मुस्कराये, कुछ चुप रहे । शायद छवि ने यह जाना, वह पुस्तक पकड़े हुए उठ गई। कुछ दिन बाद अक्षय ने यह नोटिस किया कि छवि अपनी क्लास प्रारम्भ होने से काफी पहले आ जाती है। अक्षय उस समय खाली होता है । छवि भाकर दो प्याले चाय बनवाती है और फिर दोनों उस कृत्रिम सन्नाटे में बैठकर चाय पीते । दोनों ही प्रायः चुप रहते हैं । पुस्तक पाने के वाद छवि ने उसका उल्लेख नहीं किया, न अक्षय ने ही उसकी प्रतिक्रिया पूछी। अक्षय ने पाया कि छवि स्वयं जितना मौन रखती है, उसके नेत्र उतने ही मुखर हैं। अक्षय को लगा कि वह नेत्र उसमें कुछ वैशिष्ट्य पाते हैं, जैसे अक्षय को देखना, उन्हें अच्छा लगता है । अचानक ही वह जगमगा उठते हैं और अनायास ही लजा जाते है । छवि शान्त वैठी रहती है, उसके ओंठ निस्पन्द रहते हैं, पर वे नेत्र पुकार-पुकारकर अक्षय को कुछ जताना चाहते हैं । ऐसे अवसरों पर अक्षय ने अपने को बहुत असहाय पाया और फिर उसने दो क्लासों के बीच में स्टाफ रूम में जाना छोड़ दिया। एक दिन, दो दिन । तीसरे दिन छवि सन्ध्या को शुक्लाजी के घर आई । भाभी ने चाय बनाकर अक्षय को युलाया । और तब छवि ने पुस्तक लौटाते हुए कहा : "मैं साहित्य की छात्रा नहीं हूं पर बापकी पुस्तक ने मुझे बहुत विचलित किया।" - पिघलती हुई बर्फ ५६ "तुम्हारे इस रिमाकं को मैं प्रशंसा के रूप में लेता हूँ। पर यह लौटा क्यों रही हो? यह तो तुम्हारी प्रति है।" "सच !" छवि की मां मधुर विस्मय से भर उठी। अक्षय को उस समय गुड्डी और छवि की आयु में कोई अन्तर नहीं लगा। वह निरुद्देश्य ही सोच उठा कि यह छवि को छोड़कर उसके बारे में कुछ भी नही जानता। छवि के अन्य भाई- बहन हैं, कभी उसने उल्लेख नहीं किया, पर लाड़ली अकेली वेटीमा भी नाचरण छवि का न या। इस समय, सांझ के धुंधलके में, भाभी के कमरे के आत्मीय वाता- वरण में बैठकर चाय पीते हुए अक्षय को अपनी उपस्थिति स्वयं असह्य, असंगत लगने लगी। उसने अपने इन विचारों को जकड़कर बांध दिया और वह छवि को देखने लगा । छवि कुछ उदास हो आई थी, कुछ खो-सी गई थी। "अरे--तुम दोनों तो एकदम चुप हो गए।" मामी ने उस लम्बी चुप्पी को तोड़ा। "यह वर्षा का सीजन ही ऐसा है, बहुत हिप्रेसिंग।" अक्षय ने कहा। "और फिर यहा की लम्बी, पाली शामें । न कुछ पीने को, न दिल बहलाने को । अक्षय यावू, आपके लिए दवा खोजनी पड़ेगी, कुछ रंगीन, कुछ चटपटी।" अक्षय ने पाया, मामी की इस बात पर छवि के ओंठ पोड़ा-सा हिलकर रह गए। फिर उसने अक्षय को देखा, पर अक्षय की तोलती-सी दृष्टि अपने पर पा वह लजा गई। "हा अक्षय बाबू, दवा बोजनी पड़ेगी। अगर साय में मेरे लिए देवरानी ले भाते तो मेरा सिरददं कम होता। अब उसे खोजने में कितनी दिक्कत उठानी पड़ेगी मुगे, यह बताओ तो?" मिसेज शुक्ला को इस बात पर न छवि ने कुछ कहा, न अक्षय ने । भाभी ने दोनों को बारी-बारी से देवा, फिर चाय छानने लगी। उन दोनों के चेहरे दो प्रेमियों के से नहीं थे, दो मित्रों के भी नहीं । वे अपने अन्तर-तल की गहराइयो में डूब गए पे । अक्षय के लिए भाभी, छवि, यह चाय पीने की क्रिया छाया-मात्र रह गई और वह चाय का प्याला पकड़े बैठा रह गया। "और घाय?"भाभी ने "नहीं।" प्याला रख अक्षय उठ खडा हुआ और उन दोनो से आना ले, अपने कमरे में पता गया। उमने अपने रेकार्ड प्लेयर पर वैयोवेन की एक मिम्फनीका रेकार्ड लगा दिया और चारपाई पर आड़ा होकर लेट गया। अक्षय अपने साय पूछा।

६० मेरी प्रिय कहानियां पाश्चात्य क्लासिकल संगीत के चालीस रेकार्ड लाया था। रेकार्ड के कवसं पर सुधीरा की हस्तलिपि में अपना नाम देखकर अभी भी आहत होने की क्षमता वाकी थी। वे लम्बे दिन जो रेफाडों के कैटेलाग देखते हुए काटे गए थे, जो शामें नये खरीदे हुए रेकार्ड सुनते हुए बीती थीं, थर्डस्ट्रीट के बदरंगे वॉलपेपर वाले कमरे में संगीत के स्वर गूंजते थे और अक्षय सुधीरा के मुख पर भावविभोर एकटक ताकता था। कन्सर्टस, आपेरा, बैले-एकाएक अक्षयको सव अच्छा लगने लगा। कसी हुई काली ड्रेस और लम्बी, पतली हील वाले जूतों में सुधीरा बहुत माकर्षक लगती थी। कभी-कभी रात को फोन बजता था। टाइपराटर छोड़कर फोन तक पाने से पहले ही अक्षय सुधीरा के स्वर को सुनने की उत्कण्ठा से भर उठता था। "अभी भी टाइप कर रहे हो ? टाइप फॉर ए ब्रेक । पास के अपार्टमेण्ट में लिजावेथ पार्टी दे रही है। छह वीयर लेते आना, काफी होंगी।" रात के अंधेरे में पहाड़ी सड़कों की ऊंची-नीची उतराइयों पर सावधानी से ड्राइव करता हुआ अक्षय तव सुधीरा के बारे में ही सोचता था। एक ऐसी ही पार्टी में उसका परिचय वीरू से हुआ। सुधीरा गिटार बजाकर जिप्सी गीत गा रही थी और वीरू अलग दीवार के सहारे उफताया-सा खड़ा था। अक्षय ने जाना, वीरू भी ट्रिनीडाड से आया भारतीय है । उसको शिक्षा सुधीरा के साथ ही इंगलैण्ड में हुई और दोनों के परिवार एक-दूसरे से परिचित हैं। "आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई है। मैं कुछ दिन हुए ट्रिनीडाड से लोटा । मिन्समस की छुट्टी में घर गया था। सुधीरा को फादर ने आपका उल्लेख किया था," धीरू ने कहा। मुधीरा का गीत समाप्त होने पर दोनों ने तालियां बजाई। वह गिटार रख- कर उनके पास आ खड़ी हुई, "तो तुम दोनों एक-दूसरे से परिचित हो गए । अक्षय, बोल और मेरी पुरानी पहचान है । सेण्ट जेम्स में हम लोग साथ ही बड़े हुए, देखो, मदर ने यह सोने की चूड़ियां भेजी हैं।" वह अपने हाथ की चूड़ियां हिलाने लगी। मुधीरा को कोई प्यार कैसे न फरे! अक्षय ने सोचा, बालिका और पूर्ण ।

पिपलती हुई बर्फ ६१ मुवती-ऐसा सम्मिश्रण था उसमें। सुधीरा वीरू से मित्रों, यात्मीयों के बारे में पूछती रही और रह-रहकर पूड़िया हिलाती रही। कुछ देर में वीरू ने जाने के लिए आज्ञा मांगी और टैक्सी का नम्बर पूछा। "तुम्हारी कार क्या हुई ?" सुधीरा ने पूछा। "मैंने नई जर्मन कार का माडंर दिया है। लाल कनवर्टिबल कारमनगिया ! आने में कुछ समय लगेगा।" "मैं भी जाने का इरादा कर रहा हूं। कहां रहते हैं आप? आपको घर तक पहुंचा दूंगा।" अक्षय ने कहा। बोलने धन्यवाद देकर यह ऑफर स्वीकार कर लिया। "तुम साथ आओगी सुधीरा ?" अक्षय ने पूछा, "नया चेप्टर दिखाना चाहता था।" "अक्षय आजकल एक उपन्यास लिख रहा है ।" सुधीरा ने बीरू को बताया । "कल आऊंगी अक्षय'। पार्टी के बाद सफाई में सहायता करने का वचन दे पुकी हूं।" अक्षय को कुछ बुरा-सा लगा और कदाचित् इसीलिए वह बीरू के साथ होते हुए भी रास्ते-मर चुप रहा। अगली दोपहर जब सुधीरा गुलावी छपी हुई साड़ी पहने, आकर द्वार पर खड़ी हो गई तो अक्षय पिछली रात की आहत पीड़ा भूल गया । सुधीरा अक्षय के लिए लंच तैयार करने लगी और अक्षय किचेन में कुर्सी पर बैठकर अपना लिखा अध्याय पढ़कर सुनाने लगा। शाम को वीरू का फोन आया। उसने रात्रि के भोजन के लिए सुधीराव अक्षय को आमन्त्रित किया। सुधीरा को कपड़े बदलने के लिए अदाय घर वापस ले गया और भोजन के दौरान अक्षय ने एकाएक महसूस किया, बोरू अच्छा है, बोरू मला है, कम वोलता है और उसकी कम्पनी बोरिंग नहीं है । सुधीरा रह-रहकर हंसती थी और उसके बुन्दे धीरे-धीरे हिलते थे । जब कमी उसके शरीर का कोई अंग अश्य से छू जाता तो वह उसके सामीप्य को गरमाई से अभिभूत हो उठता। 'मुधोरा मेरी है, पूर्ण रूप से मेरी है। सुधीरा की दीप्त काली आंखों में भी अक्षय ने अपनी ही भावनाएं प्रतिविम्बित होते पाई। फिर लम्बे दिन । मक्षय दिन-रात अपनी पुस्तक समाप्त करने में जुटा था। शन्दों के बाद शन्द गुपते चले जाते थे ६२ मेरी प्रिय कहानियां और उपन्यास के पात्र बड़े पुराने परिचित, हर क्षण के साथी बन गए । सुधीरा उन दिनों अत्यन्त धीर, सहिष्णु हो गई थी। कभी-कभी आकर अक्षय का कमरा ठीक कर जाती, कभी खाने के लिए कुछ लाकर किचन में रख जाती । 'सुधीरा को' उपन्यास की समाप्ति पर अक्षय ने समर्पण लिखा था । एक नये उपन्यास की रूप- रेखा जमने लगी थी। वह उपन्यास कभी नहीं लिखा गया। "अक्षय बाबू।" भाभी ने कमरे के बाहर से कहा। "हां।" अक्षय ने उत्तर दिया। वेथोवेन की सिम्फनी अन्त पर थी। और भाभी ने अन्दर आकर कहा : "हाय राम, मेरे तो कान फट गए ! जाने तुम्हें क्या अच्छा लगता है इस संगीत में ?" अक्षय ने रेकार्ड प्लेयर बन्द कर दिया । "एक टेढ़ा काम तुम्हें संभालना है," भाभी ने कहा। "क्यों, क्या बात है ?" "हम लोग आज सिनेमा जाना चाहते हैं, सेकेण्ड शो में। ये तो सुनते ही मना कर देंगे । सो तुम्हें साथ चलना पड़ेगा।" अक्षय एकाएक कुछ कह न सका। पर सेकेण्ड शो में सिनेमा हाल की भीड़ का सामना करने का विचार उसे प्रिय न लगा । "हम लोग कौन ?" "छवि मोर में।" अक्षय को लगा कि उसके द्वार के बाहर भी कोई है, जो अधीर प्रतीक्षा से उसका उत्तर सुन रहा है। फिर भी उसने कहा : "मामी, हिन्दी फिल्म तो मैं, देखता नहीं।" भाभी चुप रह गई। अक्षय जैसे दीवार के पार भी दो उत्सुक माखों का म्लान हो माना देख सका। उसने आगे कहा : "पर तुम्हारी खातिर चला चलूंगा।" 'भाभी प्रसन्न हो गई। अक्षय जा रहा है, यह सुन अनिमन्त्रित शुक्लाजी भी जाने को तैयार हो गए। गुड्डी ने सिनेमा हाल में शोर न मचाने का वचन दिया। भाभी ने व्यवस्था की, छवि को घर जाकर पिताजी से कहना है इसलिए अनय उसे लेकर पहले चला जाए। शुक्लाजी भाभी को लेकर सीधे सिनेमा हाल पहुंचेंगे। अक्षय ने छवि की प्रतिक्रिया जानने के लिए उसकी ओर देखा, पर वह पिघलती हुई बर्फ ६३ चुप रही । अक्षय तयार होने के लिए कमरे में चला आया। सफेद कमीज और हलके में ईकरान की पतनून पहनकर वालों में कंघा फेरते हुए उसने अपने को एक पल निश्चल खड़े होकर देसा। उसका चेहरा इस समय गम्भीर था, आखें गहरी और प्रच्छन्न । न चाहते हुए भी उसे वह लम्बे, सुनहरे पताक्षर के दोपहर याद आ गए, जो उसने सुधीरा के साप विताए थे। सुधीरा का शरीर भी उन दोपहरो की भांति उष्ण और स्वणिम था, उसकी उंगलियां धीरे-धीरे अक्षय के चेहरे को छूती थी और हवते मूरज की रोशनी बदरंगे वालपेपर वाले कमरे में भर जाती थी। अक्षय का चेहरा तव शान्त दीखता था। सुधीरा के जाने के बाद अक्षय टाइपराइटर पोलकर बैठ जाता था और उंगलियां उसपर तेजी से दौड़ती पों। उसके मन में गहरी शान्ति रहती थी और अगले दोपहर के लिए सास साप- कर प्रतीक्षा। अक्षय को अपनी पुस्तक के जैकेट पर अपना चित्र माद आया, युवा, सेन्सेटिव, गम्भीर । इम समय दर्पण में प्रतिविम्व कहीं अधिक प्रौढ़ व उदाम लग रहा था। अक्षय तैयार होकर बाहर आया और छवि चलने के लिए उठ रही दुई। मामी गुड्डी के बाल संवार रही थीं। उनसे विदा लेकर दोनों सहक पर आ गए। अब अक्षय चुप था और छवि भी। वार्तालाप प्रारम्भ करने को कोई भी उत्सुक नपा। कहीं यह मोन उमको नाराजी न लगे, यह सोच अक्षय ने कहा : "मान गापद पानी न परसे!" "मुझे वर्षा यच्छी लगती थी, पर इस बार न जाने क्यों जब गई हूँ." एधि - ने कहा। "पानी बरस भी तो लगातार रहा है," अक्षय ने कहा और फिर मुम्कराने लगा।छवि के प्रश्न-भरे नेत्र उमकी भोर उठे और प्रश्न ओठों पर कर रह गया। वह दूसरी ओर देधने लगी और यह छोटा-मा पल अक्षय को यहा प्यारा लगा। छवि संकोचशील है, अपने इन इनहिबिशन्म से बाहर निकलना चाहती है, पर उसकी चैप्टा में इतना बल नहीं है कि उन्हें लाप सके। और इमी साप जुड़ा हुआ एक और विचार नाया, एवि मुझे लाइक करती है। उसने पाग चलती छवि को देया, लपेटी हुई साडी मैं भी उसका पूर्व यौवन और उन रेखाओं को कमनीयता छिपी नहीं यो । बसय ने जाना कि उसकी तर ।

। ६४ मेरी प्रिय कहानियां अत्यन्त कोमल, स्निग्ध और उष्ण होगी। छवि का चेहरा लम्बा था, आंखें शान्त, पर ओंठ अजन्ता के चित्रों की भांति भरे हुए थे। छवि सुन्दर नहीं है, पर उसमें अपना एक विशिष्ट चार्म है, अक्षय ने सोचा। और कई वर्ष बाद एकाएक अक्षय ने अपने अन्दर एक इच्छा को जागते पाया। एक उष्ण, स्वर्णिम शरीर को बांहों में जकड़ने की तीव्र इच्छा। अक्षय को एकटक अपनी ओर देखते पाकर छवि ने ग्रीवा मोड़कर उसे देखा और मुस्करा दी। उन शान्त और विश्वासपूर्ण आंखों के आगे अक्षय एक क्षण पहले के विचारों पर अत्यन्त लज्जित हो आया, पर छवि की हलकी मुस्कराहट वह सेतु थी जिसके सहारे वह उवरकर सुस्थ हो सका। छवि एक दोमंजिले मकान के आगे रुककर फाटक खोलने लगी। अक्षय उसके साथ अन्दर आया। 'माप कुछ देर बैठेंगे ? पिताजी इस समय पूजाघर में होंगे। मैं जल्दी ही माऊंगी।" छवि कहकर क्षिप्र गति से अन्दर चली गई। घर के अन्दर जैसा सन्नाटा था, उससे अक्षय ने सहसा जाना कि पिता को छोड़कर छवि के परिवार में और कोई नहीं है। बैठक में एक सोफा व तीन-चार कुर्सियां थीं, बीच में एक गोल मेज । दीवारें सफेद और सूनी, कहीं एक भी चित्र नहीं। दरवाजों पर भूरे रंग के पर्दे थे, जिनसे कमरा और भी उदास लग रहा था। छवि घर की सज्जा में रुचि क्यों नहीं लेती, अक्षय ने सोचा, यदि दीवार पर एक चित्र हो और मैचिंग पर्दे और एक स्टैण्डर्ड लैम्प, तो कमरा कहीं अधिक अच्छा लगे । पर शायद छवि का ध्यान इस ओर नहीं गया है। और तभी छवि माकर द्वार पर खड़ी हो गई। उसने इस बीच में वाल संचारकार छपी हुई साड़ी पहन ली थी। एक हाथ किवाड़ पर टिकाए वह निश्चल खड़ी हो अक्षय को सीधी दृष्टि से ताकने लगी। "मैंने नौकर को रिक्शा लाने के लिए भेजा है, तब तक आप कुछ पिएंगे ? चाय, कॉफी?" "नहीं छवि, धन्यवाद।" छवि आकर एक कुर्सी पर बैठ गई और उसकी उंगलियां बटुए की डोरी सेवेलने लगीं। "इस साड़ी को मैंने तुम्हें पहले पर्ने नहीं देखा है । तुम्हें सूट करती है ।" छवि के चेहरे पर मन्द मुस्कान की आभा झरने लगी। ।

. पिघलती हुई बर्फ ६५ "मिसेज शुक्ला ने यह साड़ी मुझे दी थी, मुझे अच्छी लगी थी।" 'ओs 'अक्षय ने जान लिया कि यह साड़ी उसीको नाई हुई है। वह हंमने लगा। "अच्छर धरि, तुम्हें पेंटिंग में रघि है ?" "मैंने कभी उधर ध्यान नहीं दिया।" "मेरे पास कुछ पेंटिंग्स के प्रिंट है। अगर तुम चाहो तो एक ले सकती हो," अक्षय ने कहा । छवि की आखें विस्मय से भर उठौं। फिर उसने सोचते हुए कहा: "हूँ? अच्छा में किसी दिन बाकर देगी।" थाहर रिक्शा रुका और छवि उठ खड़ी हुई, "चलिए, रिक्शा मा गया।" अक्षय को लगा, छवि उसके मौन और विरक्ति की आदी हो गई है। पर उमके द्वारा अपनी प्रशंसा सुन, समझ नहीं पाती कि क्या करे। विशे पर छवि सिमटकर बैठ गई, जैसे उसने सहसा जाना हो किरिव जंसी सवारी पर बैठकर औपचारिकता निमाना सम्भव नहीं। सड़क के गई से हिचकोला पाकर जब अक्षय का शरीर उससे छ जाता तो वह कोने सिमटने लगती । अदाय उसको हर चेष्टा को बारीकी से देख रहा था, उसे पहा हंसी आई, फिर पुरुष के अयाचित स्परं पर साजयन्ती-सा सिमट गाना उस मन को बड़ा प्यारा लगा। "छवि, तुम्हें मालूम है कि भारतीय स्विप विदेश में बहुत सुन्दर मान जाती है ?" "असर!"रवि ने माश्चर्य में भरकर पूधा। "हो. मेरे एक मित्र ने पूरी गर्मी दिल्ली में गुली नाही को देरते हुए कार्ट थी। उसका कहना था कि तेहरान से लेकर टोकियो तक की यात्रा में भारती स्त्रिया ही सुन्दरता में अग्रिम पों।" "और आपको, पाश्चात्य मुतियो कसी सगी?" पति ने पूछा। "जम तक पता नहीं था, तब तक उनके मुनहरे बाल अन्ये सगने थे। ५ कुछ महीने के बाद मानम हाकि प्रायः वह मुनहरा रंग, हेपर हार की कुम मानपी।" छयि हंसने लगी, "आपने यहां भारतीय फिल्म तोकग ही देयोगे wet-मसिल से दो। पर यूरोलोद पिल्मे रहत देवनार:

मेरी प्रिय कहानियां लियन और स्वीडिश । वहां बहुत ही डेयरिंग प्रयोग किए जा रहे हैं, जबकि अभी भी वही आंसू-भरे गीत गा रहे हैं।" "वस-अव आप भी औरों की तरह वात करने लगे।" अक्षय हंसने लगा, "हमारी फिल्में अफ्रीका व मिडिल ईस्ट में बहुत पॉपुलर है।" "देखिए, आप माए हैं तो फिल्म को बहुत बुरा-भला न कहिएगा। नहीं तो मिसेज़ शुक्ला को अच्छा न लगेगा।" अक्षय ने छवि की उल्लसित, तरल, कोमल दृष्टि से अभिभूत होकर कहा, "मैं वचन देता हूं।" और एक बार फिर छवि के काले चिकने वाल, रोली की बड़ी-सी विन्दी और निस्पन्द पंखुड़ियों से ओंठ देखते हुए वह स्वयं अपनी कामना के तीन वेग से आशंकित हो उठा। शुक्लाजी वहां पहले ही पहुंच गए थे। रिक्शेवाले को पैसे देकर अक्षय उनके पास ना गया। गुड्डी गोल-गोल आंखों से पोस्टर देख रही थी और भाभी छवि से बातें करने में व्यस्त हो गई थीं। अक्षय अपने पाइप में तम्बाकू भरने लगा, छवि कभी-कभी उसकी ओर देख लेती और उस दृष्टि में अव दूरी नहीं थी। पहले शो की समाप्ति पर अक्षय को छोड़कर वे लोग अन्दर गए। गुड्डी भाभी और छवि के बीच बैठकर पोटैटोचिप्स खाने लगी । अक्षयपाइप बुझाकर जब तक बन्दर आया, तब तक न्यूज़ रील प्रारम्भ हो चुकी थी। एक किनारे छवि के पास कुर्सी खाली थी। अक्षय उसपर बैठ गया । कुछ देर बाद उसने बायीं वांह छवि का कन्धा घेर लिया और छवि विना प्रतिवाद किए उसकी ओर झ आई। अक्षय काफी रात गए घर लौटा । अन्दर बरामदे में कुर्सी पर बैठी भाभी देखकर वह चौंक गया। "तुम अभी तक सोई नहीं।" "नींद नहीं आई। सोचा कि गुड्डी के फ्रॉक में बटन टांक लूं।" "मुझे छवि के फादर ने रोक लिया," अक्षय ने सहज स्वर में कहा, इटरेस्टिंग हैं।"

पिपलती हुई बर्फ "वाय इण्टरेस्टिग हैं।" भाभी बोली, "चीयो को मुद्रानुदाकर मार डाला बेटी जवान हो गई है, पर उसकी शादी की चिन्ता नहीं । शाम को पूजापर निकलते हैं और वोतल लेकर बैठ जाते हैं।" "बहुत आग्रह कर रहे थे। परमैने मना कर दिया । कुछ पुरा-सा मान गए भाभी ने पूछा : "पर वहां, अमरीका मे तो पीते होगे तुम?" "पर यह अमरीफा तो नहीं है मामी। फिर मैंने सोचा कि शायद मेरा फ पीना छवि को अच्छा न लगे।" भाभी ने हाप रोक दिए। फॉक को गोद में पड़ा रह्न देकर उन्होंने कुछ हिक कते स्वर में पूछा "असय बाबू, अच्छा तुम्हें छवि केसो लगती है ?" अक्षय असमंजस में पहकर चुप रह गया । उसे घर से निकलकर द्वारत विदा देने आई छवि की मुखमुद्रा याद आई। एक बार कांपकर फिर अपन बांहों में निश्चल हो पाना और उसके गोले, कोमल अनछुए होंठ। और इसके साथ ही एक और प्रतिच्छाया, सुधीरा! भाभी ने उसके छोटे-मे मौन को लांघकर कहा : "सुन्दर तो वह नहीं है, पर उसका शिष्ट, भन्न स्वभाव तुमसे छिपा नहीं है। प्यार के लिए तरसती रहती है ।बा माई मादीक अलग हो गया है । कभी पूछता भी नहीं। और तुम भी अव नार्मल सरीके जिन्दगी बिताओ, साल परसाल निकलते जा रहे हैं।" "मुझे घर से निकालना चाहती हो मामी ?" "नही अक्षय वाचू," भाभी गम्भीर हो आई, "तुम जब से सौटे हो, मुर हर समय तुम्हारी चिन्ता लगी रहती है । तुम पहले से बहुत ज्यादा बदल गए हो जसे तुम्हारे अन्दर कही कुछ बही वेचनी, तिलमिलाहट है "तुम घण्टों कमरा का किए पड़े रहकर रेकार्ड मुना करते हो। कई-कई दिन निकल जाते हैं और तुर मुंह नहीं बोलते। मैं चुपचाप देखती हूं और मन में मोचती हूं कि ऐमा क्या जो तुम्हें साल रहा है? तुमने जब वहां से चिट्ठी लियो कि एक साली गादी करने वाले हो, तो हम दोनो को वही एगी हुई। पर फिर कई सात वीर गए और तुमने एक पंक्ति भी नहीं लिखी। फिर एक दिन विना मूवना दिए लो बाए।" माय के मन में दुःख उभडने लगा। दाग, मामी ने यह राव इन बातों रेदनों के लिए न चुनी होती। कितने, स्निने समय के बाद पार काम के का ६८ मेरी प्रिय कहानियां पर-गाढ़ा-गाढा जमा हुमा अकेलापन कुछ कम हुआ था। पर भाभी ने विना जाने फिर अतीत के गहरे, काले, अन्तहीन आवर्त में ढकेल दिया है क्या उससे कभी निष्कृति न होगी? बरामदे के चारों ओर मंधेरा है। कहीं कोई शब्द नहीं। वरामदे में प्रकाश का एक दायरा है, जिसमें भाभी बैठी हैं, उनकी गोद में गुड्डी की फ्रॉक पड़ी हुई है। मामी यकी-सी हैं पर उनकी आंखों में आत्मीयता है। अक्षय पास की कुर्सी पर बैठ गया और अंधेरे में कुछ खोजने लगा। फिर उसने मुड़कर, धीर, प्रतीक्षित भाभी को देखा। "उस लड़की ने आखिरी समय पर अपना विचार बदल दिया। उसने कहा कि वह किसी और से विवाह करना चाहती है। उस दूसरे को वह बचपन से से जानती थी।" सांप की तरह से अंधेरा वल खाने लगता है। उस आघात का दर्द मिट चुका है, फिर भी अक्षय कुछ मोर न कह सका। "और छवि ?" भाभी ने हलके से पूछा। "छवि मुझे अच्छा लगती है । शायद तुम ठीक कहती हो । अपने अन्दर की इन उलझनों को भूलकर मुझे नामल तरीके से जिन्दगी बितानी चाहिए। शादी कर गृहस्थ बनूं और टेक्स्ट बुक लिखना प्रारम्भ करूं ।" पर भाभी प्रसन्न होकर मुस्कराती नहीं, जैसे उनके हर्ष में कोई दरार पड़ गई हो। अक्षय प्रिण्ट्स देखता है, पता नहीं छवि को कौन-सा पसन्द माएगा। फिर भी अगली शाम को वह तीन-चार प्रिण्ट्स लेकर छवि के घर गया। दरवाजा छवि ने खोला और उसे देख वह जिस प्रकार लजा गई उससे अक्षय ने जान लिया कि उसकी स्वीकृति भाभी ने छवि तक पहुंचा दी है। "मआइए," कहकर छवि ने दरवाजा पूरा खोल दिया, "पिताजी अभी-अभी पूजा पर बैठे हैं, कुछ समय लगेगा।" "तुम्हारे लिए प्रिण्ट्र लाया हूं," अक्षय ने कहा। छवि ने बैठक को बिजली जला दी और अक्षय ने प्रिण्ट्स कुछ तिरछे कर सोफे के सहारे टिका दिए । कुछ दूर खड़े होफर, उन्हें देखते हुए छवि ने कहा : "मैं तो पेंटिंग्स के बारे में कुछ भी नहीं जानती।" "तुम्हें जो सबसे अच्छा लगे, वह चुन लो।" अन्त में छवि ने ब्राकका जोसी - पिपलती हुई बर्फ ६६ स्वप धुना। उससे अक्षय को बहुत बारचमं हुआ। "मुझे इसमें से ग्रे और नावों कानू अन्छा लग रहा है," छवि ने कहा । अक्षय वहाँ अधिक देर तरन एका । वह अन्य प्रिंट्स भी छवि के पाम छोड़ आया । उसके अन्दर फिर एक बेचनी जाग उठी थी। फिर वा वीत गई और नीले आकार में सफेद बादल तैरने लगे। इस बीच में अक्षय छवि को बहुत कम देख पाया। यह अक्षय के सामने पड़ने से बचती-सी मालूम होती थी। अक्षय ने अपने को कभी-कभी उसके साथ विताए जाने वाले भविष्य के बारे में सोचता पाया । तव छवि जानी-पहचानी स्त्री लगने की जगह एक अनजान छाया-मात्र रह जाती थी। यदि घर की देखभाल अच्छी तरह करेगी, इसमें अक्षय को संशय नपा, पर अपने अन्दर की जो उद्विग्नता है उसे छवि का साहचर्य कहाँ तक दूर कर पाएगा! पर तब तक अक्षय अपने को पूरी तरह कमिट कर चुका था, और अब अपने निश्चय से पीछे हटकर छवि को बापात पहुंचाने का साहस उसमें न या। भाभी ने अपने को छोटे-छोटे कामों में उलझा लिया था। विवाह की वारीय नवम्बर में निकली थी। भामी इस गुभ कार्य को टालना नहीं चाहती थी। शुक्लाजी ने दूसरी मंजिल बनवानी प्रारम्भ कर दी थी और ऊपर का प्लेट तैयार होने पर पहला ऑफर अक्षय को मिलेगा, यह बात उन्होंने साफ कर दो थी। कभी-कमी वह अक्षय से राय लेते , आलमारी कहाँ बने, बिक्रिया कैसी हो ? सारे दिन-रात मजदूर पट-पट किया करते और ईटों का पूरा नीचे मरा करता। अक्षय के चारों ओर गतिविधि पी, पर वह इसके बीच मधूता घड़ा था। भाभी ने शादी की बात फैलाई नहीं थी, इसलिए इसकी पर्चा कहीं न पी। अक्षय दिन में कॉलेज बाठा और मामें अकेले व्हलते हुए पिता देता । प्रायः यह टहलता हुँमा दूर निकल जाता और अपने शरीर को शिपिल छोड़ देता। उस समय वह सायास मपने मस्तिष्क में कोई विचारं न उख्ने देता। उसको यात्मविध्वंसक प्रवृत्ति कम होती जा रही थी, पर उसकी जगह जमा मंपित्यहा रहा पा वह भदायको स्वयं स्वपन लगता।

- मेरी प्रिय कहानियां विवाह के एक सप्ताह पहले अक्षय बेतरह उद्विग्न हो उठा। कई रात से सोया न था और हर सुवह बेहद थका हुआ उठता। इतने वर्षों से वह जो बोझ अपने ऊपर लिए घूम रहा था, वह असहनीय लगने लगा। अक्षय ने जाना कि जो कुछ अव तक स्वयं स्वीकार न कर पाया, छवि से कह देना है। सब कुछ। हर डिटेल, हर बात । फिर निर्णय छवि का होगा। उस शाम वह छवि के घर पहुंचा। उसे देखकर आश्चर्य हुआ कि द्वार पर रंगीन बन्दनवार लटक रही थी। घर के अन्दर कुछ बातचीत, कुछ चहल-पहल का शोर था। नौकर ने उसे पहचानकर सलाम किया और अक्षय ने छवि से मिलने की इच्छा प्रकट की । वह अन्दर नहीं गया । बाहर खड़ा एक नीबू की पत्ती तोड़कर उंगलियों में मसलने लगा। कुछ देर में छवि वाहर आई। वह एक रंगीन, पर सादी साड़ी पहने थी। उसका चेहरा शान्त था और उसे देख अक्षय को बहुत बल मिला। "तुम्हें बहुत दिनों से नहीं देखा छवि । कैसी रहीं?" " "ठीक हूं । अन्दर आकर बैठे," उसने कहा। "कुछ दूर टहलने चल सकोगी? समय है ?" अक्षय ने पूछा। उसने एक लम पल को छवि को शिक्षकते पाया; फिर रवि ने कहा : "मैं शाल लेकर अभी आई शाल शायद विल्कुल नई थी । उसकी तहों पर गहरी लकीरें पड़ी हुई थीं। ए शाल ओढ़कर बाहर निकल आई। उसका चेहरा संयत था, पर अक्षय को ल कि जैसे वह कुछ घबरा उठी है। दोनों टहलते हुए कुछ दूर निकल आए । "मौसम अब काफी अच्छा हो गया है," अक्षय ने कहा। "जी हां।" फिर मौन । हवा में आनेवाली सर्दी का सन्देश था। छवि ने नीचे स शाल को कन्धे पर संभाल लिया। सड़क अव दूर जाकर सेतों में खो ग बरसाती नदी विल्कुल सूखी थी और अक्षय लकड़ी के पुल की रेलिंग से। यड़ा हो गया। छवि ने रूमाल से जगह थोड़ी-सी शादी और अक्षय की 3 कर बैठ गई। अक्षय कुछ तुरन्त कहने को उत्सुक न था और छवि की मुद्रा कि जने वह सारी रात, सारी जिंदगी, अक्षय की बात सुनने की प्रतीक्षा प्रस्तुत है । तव अक्षय को अपना यह माचरण बहुत नाटकीय लग: घर से छवि को जिस प्रकार घसीट लाया है, उसे देख मेहमानों ने क्या र फो पिपलती हुई बर्फ ७१ और सौटकर बि क्या उत्तर देगी! अपने इस आचरण का मान करते हुए अक्षय ने यहुत कोमस स्वर में पूछा : "पर में कौन-कोन आया है नि?" "मुरादाबाद से मुमा बच्ची को लेकर आई हैं। माईसाहब दो दिन बाद आएंगे।" "तुम प्रसन्न हो छवि ?" अक्षय ने छवि को अपनी ओर एकटक देराते पाया। यह कैसा प्रश्न है ? फिर उसने पूछा: "और आप ?" "मैं स्वयं नहीं जानता छवि । कभी-कभी बहुत घबरा उठता हूं। पर तुम पारा होती हो तो सारे संशय दूर हो जाते हैं ।" अक्षय ने अपने को बहता पाया और दूसरे दाण अपने फयन की सत्यता ने स्वयं उसे झकझोर दिया। उसने मुक- कर छवि का हाप अपने हाथ में ले लिया। उसकी उष्ण, पसीजी हुई-सी हथेली पामे हुए असम को अपने पर आश्चर्य हुआ कि छवि जय हरदम इतनी निकट पी तब उसे संशय क्यों होता रहा ? छपि का हाथ पकड़कर यह उस रात की स्मृति का सामना कर सकता था"उस शाम पहले वर्षा हुई थी और फिर ठण्ड पड़ने से हर जगह बर्फ जम गई थी। सड़क पर मोटरें फिसल रही थीं। और ऐसी रात मे बीर अक्षय को कार मांगने आया पाशम उसे मना करते-करते रक गया और घुपपाप मार को पायो उसे दे दो। शायद वीरू को पता नहीं था कि सुधीरा ने सब फुट अक्षय को बता दिया है, नहीं तो यह ऐगा सहजस्वाभाविक, मैत्रीपूर्ण व्यवहार न करता । बीरू के जाने के बाद अक्षय ने सुरन्त मुधीरा को फोन किया और रेगुलेटर मे एक हिक के लिए आमन्त्रित किया। सुधीरा ने कहा कि उसे हल्ला-सा कोल्ड है, उस रात यह रही नहीं जाएगी। बाम उसमें बाद कमरे मे म रक समा। कोट पहनकर रेगुलेटर पला गया और वियर पोते हुए टेसीविउन देग्रता रहा । रात का दोबजा था या तीन, दग- की उरे सुध नही । जब यह सर्दी मे पर मोटा तो कमरे में दो-तीन मित्र प्रतीक्षा कर रहे थे। अक्षय ने मस्तिक के कोहरे को भेदकर बात ग्रहण पी, कारमा एक्सीडेंट हो गया पा। बीरू को तरसाल मृत्यु हो गई और मुधीरा येतरह माहत हो गई थी। मुधोरा? उनके बाद प्रश्न, उत्तर, संवेदना,मित्रों का उसके प्रति योमस २ मेरी प्रिय कहानियां सुधीरा की मां कलासी का सब कुछ भूलकर धीरे-धीरे रोना। जिंदगी-भर के लिए अपाहिज हो गई सुधीरा-बोलती नहीं, सुनती नहीं, केवल खुली हुई, सूनी, रिक्त आंखें । फिर रात को चौंककर जाग जाना और सुधीरा की चीख, कैलासी का धीरे- धीरे रोना । बर्फ पर रक्त के दाग... "चलो छवि, अव चलें। अंधेरा हो रहा है।" उसने कहा । छबि उठ खड़ी हुई और दोनों पास-पास चलते हुए लोट पड़े । रंगीन वन्दनवार और नई इंटों का का चूरा । अक्षय जान रहा था कि वह छवि के साथ नई जिंदगी प्रारम्भ कर सकेगा और कुछ अंश तक सफल भी होगा। पर एक पीड़ा उसकी अपनी है, विल्कुल अपनी, और उस पीड़ा का स्रोत है यह बोध कि वह यदि चाहता तो वीरू को बचा सकता था, क्योंकि उसे मालूम था कि कार के ब्रेक ठीक नहीं थे।

वापसी . गजाधर वा नै कमरे में जमा सामान पर एक नजर दौड़ाई-दो बगस, डोलपी, मालटी-"यह दिन्या कसा है गर्नेगी?" उन्होंने पूछा । गनेशी बिस्तर बाधता हुआ, कुछ गवं, कुछ दुःय, कुछ सजा से बोला, "परवाली ने साप को बेसन के सह रप दिए हैं । महा, बाबूजी को पसन्द थे, अव कहो हम गरीब लोग आपकी कुछ यातिर कर पाएंगे।" पर जाने की खुशी में मी गजाधर वायू ने एक विपाद का अनुभव किया जैसे एक परिचित, स्नेही, मादरमय, सहज संसार से उनका नाता टूट रहा था। "कमी-कभी हम लोगों की भी यवर लेते रहिएगा।" गनेशी विस्तर में रस्सी बांधता हुआ बोला। "कमी मछ जरूरत हो तो लियना गर्नेगी। इस अगहन तक विटिया की शादी कर दो।" गनेशी ने अंगो के छोर से आंग पोंडी, "अब माप लोग राहारा न देंगे, तो कौन देगा! आप यहां रहते तो गादी मे कुछ हौसला रहता।" गजाधर बाबू घलने को तैयार बैठे थे। रेलवे क्वार्टर का वह पामरा, जिसमें उन्होंने कितने ही वर्ष बिताए थे, उनका सामानहट जाने से कुम्प और नग्न लग रहा था । बांगन मे रोपे पौदे भी जान-पहयान के सोग से गए थे, और जगह-जगह मिट्टी विसरी हुई थी। पर पत्नी, बाल-बच्चो के साथ रहने की कल्पना में यह विछोह एक पुल सहर की तरह उठकर विलीन हो गया। गजाघर वायू पग घे, बहुत सुग। पंतीस साल की नौकरी के बाद यह रिटा- पर होकर जा रहे थे। इन वर्षों में अधिकांगसमय उन्होंने अकेले रहकर काटा पा। उन अकेले धागो में उन्होंने इमो समय की कल्पना की थी, जर वह अपने परिवार ये साप रह सकेंगे। इसी बामा के महारे वह अपने अमाव का योग हो रहे थे। संसार की दृष्टि में उनका जीवन सफल रहा जा सकता था। उन्होंने * 1 ७४ मेरी प्रिय कहानियां मकान बनवा लिया था, बड़े लड़के अमर और लड़की कान्ति की शादियां कर दी थीं, दो बच्चे ऊंची कक्षाओं में पढ़ रहे थे। गजाधर बाबू नोकरी के कारण प्रायः छोटे स्टेशनों पर रहे, और उनके बच्चे और पत्नी शहर में, जिससे पढ़ाई में वाधा न हो। गजाधर वावू स्वभाव से बहुत स्नेही व्यक्ति थे और स्नेह के आकांक्षी मी । जब परिवार साथ था, ड्यूटी से लौटकर बच्चों से हंसते-बोलते, पत्ली से कुछ मनोविनोद करते-~-उन सबके चले जाने से उनके जीवन में गहन सूनापन भर उठा। खाली क्षणों में उनसे घर में टिका न जाता । कवि प्रकृति के न होने पर भी, उन्हें पत्नी को स्नेहपूर्ण बातें याद रहती। दोपहर में, गरमी होने पर भी, दो बजे तक आग जलाए रहती और उनके स्टेशन से वापस आने पर गरम-गरम रोटियां सेंकती-उनके खा चुकने और मना करने पर भी थोड़ा-सा कुछ और थाली में परोस देती, और बड़े प्यार से आग्रह करती। जव वह, थके-हारे बाहर से आते, तो उनका याहट पा वह रसोई के द्वार पर निकल आती, और उनकी सलज्ज आंखें मुसकरा उठतीं। गजाधर वावू को तब हर छोटी बात भी याद आती और वह उदास हो उठने 'अब कितने वर्षों बाद वह अवसर आया था जब वह फिर उसी स्नेह और मादर के मध्य रहने जा रहे थे। टोपी उतारकर गजाधर बाबू ने चारपाई पर रख दी, जूते खोलकर नीचे खिसका दिए, अन्दर से रह-रहकर कहकहों की आवाज़ आ रही थी, इतवार का दिन था और उनके सब बच्चे इकट्ठे होकर नाश्ता कर रहे थे। गजाधर बाबू के सूखे चेहरे पर स्निग्ध मुसकान आ गई। उसी तरह मुसकराते हुए, वह विना खांसे अन्दर चले आए। उन्होंने देखा कि नरेन्द्र कमर पर हाथ रखे शायद गत राय की फिल्म में देखे गए किसी नत्य की नकल कर रहा था, और बसन्ती हंस- हंसकर दुहरी हो रही थी। अमर की बहू को अपने तन-बदन, आंचल या बूंघट का कोई होश न था और वह उन्मुक्त रूप से हंस रही थी। गजाधर बाबू को देखते ही नरेन्द्र धप से बैठ गया और चाय का प्याला उठाकर मुंह से लगा लिया। बहू को होश आया और उसने झट से माथा ढक लिया, केवल वसन्ती का शरीर रह-रहकर हंसी दवाने के प्रयत्न में हिलता रहा। गजाधर बाबू ने मुस्कराते हुए उन लोगों को देखा। फिर कहा, "क्यों नरेन्द्र, वापसी ७१ या नकल हो रही हो?" "थुछ नहीं मानी।" नरेट ने मिटपिटाकर महा। गाधर वायू ने चाहा पाकि वह भी इम मनोविनोद में भाग मेते, पर उनी माने ही से मव कुण्ठित हो चुप हो गए, उसमे उनके मन में पोड़ी-सी दिनमा अन भाई । चटते हुए बोने, "वसंतो, पाय मुझे भी देना । तुम्हारी अम्मा की पूजा यमी पल रही है क्या ?" बसंती ने मां की कोठरी की और देया, "अनी माती ही होगी," और प्याले में उनके लिए पार मानने लगी। बहू गुपचाप पहले ही पनी गई थी, अब नरेश भी पाय का माघिरी घूट पोकर वह पा हुआ, केवल बगलो, पिता के लिहाज में, पौर में बैठी यो की राह देगने लगी। गजाधर बाबू ने एक पूट चाय पी, फिर कहा, "बिट्टो-पाय तो फीकी है।" "साइए, धोनी और बाल।" वमन्ती बोली। "रहने दो, तुम्हारी सम्मां जय आएंगी, तभी पी सूगा।" थोड़ी देर में उनकी पत्नी हाय में अभ्यं का सोटा लिए निकों और अगुर स्तुति कहते हुए तुलसी में डाल दिया। उन्हें देयते हो मगन्नी भी उठ गई। पन्नी ने आकर गजाधर बाबू को देगा और कहा, "अरे, आप अल बंद है-यह गद कहाँ गए ?" गजाधर वायू के मन में फांस-मी करस उठी, "अरने-अपने काम में लग गए हैं...याधिर बच्चे ही हैं।" पस्नी वाकर पौरे में बैठ गई. उन्होंने नाक-मो हार पारों ओर जूटे यतंगों को देया। फिर कहा, "सारे में जूठयतन पडे हैं । इस पर में धरम-रुग्म पुछ नहीं। पूजा करके मी चौके में प्रमो।" फिर उन्होंने नौकर को पुपारा, पर उत्तर न मिला तो एक बार मोर उच पर में, फिर पति की ओर देवार बोनों, "बहू ने भेजा होगा बाजार।" और एक सम्बो साग मैकर सुप हो रही। गजाधर या चटकर पाय और नाश्ते रा इन्तजार करते रहे। उन्हें बचा. माही गर्नेगी की याद आ गई। रोउ मुबह, पैसेंबर पाने में पहले वह गर्म-गमं पूरिया और जनेयो बनाना पागजाधर गायू जब तक उटकर मार होते, उनी लिए पलेरिया और पाय सागर रए देता था। पाय भी पितनी सदिया, तर ग्लाम में कार सामरी मबालब, परे दाई पम्मच चीनी, और पानी मसा पैमेजर मने ही रानीपुर मेट पहुंचे, मनेगी ने पाय पहुंचाने में कमी देर नहीं की। गया मनात किमी उससे कुछ महना पड़े। परनी का शिकायत-मरा स्वर मुन उनके विचारों में सामात पहुंचा रह ७४ मेरी प्रिय कहानियां मकान बनवा लिया था, बड़े लड़के अमर और लड़की कान्ति की शादियां कर दी थीं, दो बच्चे ऊंची कक्षामों में पढ़ रहे थे। गजाधर बाबू नौकरी के कारण प्रायः छोटे स्टेशनों पर रहे, और उनके बच्चे और पत्नी शहर में, जिससे पढ़ाई में बाधा न हो । गजाधर बाबू स्वभाव से बहुत स्नेही व्यक्ति थे और स्नेह के आकांक्षी भी। जब परिवार साथ था, ड्यूटी से लौटकर वच्चों से हंसते-बोलते, पत्नी से कुछ मनोविनोद करते-उन सबके चले जाने से उनके जीवन में गहन सूनापन भर उठा। खाली क्षणों में उनसे घर में टिका न जाता । कवि प्रकृति के न होने. पर भी, उन्हें पत्नी की स्नेहपूर्ण वातें याद रहतीं। दोपहर में, गरमी होने पर भी, दो बजे तक आग जलाए रहती और उनके स्टेशन से वापस आने पर गरम-गरम रोटियां सेंकती-उनके खा चुकने और मना करने पर भी थोड़ा-सा कुछ और थाली में परोस देती, और बड़े प्यार से आग्रह करती। जब वह, थके-हारे बाहर से आते, तो उनका माहट पा वह रसोई के द्वार पर निकल आती, और उनकी सलज्ज आंखें मुसकरा उठतीं। गजाधर बाबू को तब हर छोटी बात भी याद आती और वह उदास हो उठते. 'अव कितने वर्षों बाद वह अवसर आया था जब वह फिर उसी स्नेह और आदर के मध्य रहने जा रहे थे। टोपी उतारकर गजाधर बाबू ने चारपाई पर रख दी, जूते खोलकर नीचे खिसका दिए, अन्दर से रह-रहकर कहकहों की आवाज़ आ रही थी, इतवार का • दिन था और उनके सब बच्चे इकट्ठे होकर नाश्ता कर रहे थे । गजाधर वावू के सूखे चेहरे पर स्निग्ध मुसकान आ गई। उसी तरह मुसकराते हुए, वह बिना खांसे अन्दर चले आए। उन्होंने देखा कि नरेन्द्र कमर पर हाथ रखे शायद गत रात्रि की फिल्म में देखे गए किसी नृत्य की नकल कर रहा था, और वसन्ती हंस- हंसकर दुहरी हो रही थी। अमर की बहू को अपने तन-बदन, आंचल या धूंघट का कोई होश न था और वह उन्मुक्त रूप से हंस रही थी। गजाधर बाबू को देखते ही नरेन्द्र धप से वैठ गया और चाय का प्याला उठाकर मुंह से लगा लिया। बहू को होश आया और उसने झट से माथा ढक लिया, केवल बसन्ती का शरीर रह-रहकर हंसी दवाने के प्रयत्न में हिलता रहा। गजाधर बाबू ने मुस्कराते हुए उन लोगों को देखा । फिर कहा, "क्यों नरेन्द्र, ।

वापसी ७१ पया नफल हो रही पो?" "कुछ नहीं माबूजी।" नरेन्द्र ने मिटपिटाकर पहा । गजाधर बापू ने पाहा पा कि वह भी इस मनोविनोद में भाग लेते, पर उनके आते ही जैसे सब कुप्टिन हो चुप हो गए, उसमे उनके मन में थोड़ीमी चिन्नता उपर आई । बैठते हुए बोले, "वसंती, पाय मुझे भी देना । तुम्हारी अम्मां की पूजा यमी चल रही है क्या?" बसंती ने मा को कोठरी की ओर देपा, "अभी भावी हो होगी." और प्याले में उनके लिए पाय छानने लगी। यह गुपचाप पहने ही पली गई थी, अब नरेन्द्र भी पाप का आखिरी पूंट पीकर उठ पड़ा हुषा, मेवल बमन्नी, पिता के लिहाज में, पोके में बैठी मां को राह देयने लगी। गजाधर पाबू ने एक फूट पाय पी, फिर कहा, "चिट्टी-चाय तो फीकी है।" "साइए, चीनी और सात हूं।" बसन्ती बोली। "रहने दो, तुम्हारी अम्मां जव आएंगी, तभी पी सूंगा।" पोड़ी देर में उनकी पत्नी हाप में अध्यं का लोटा लिए निकली और अनुद स्तुति कहते हुए तुलसी में डाल दिया। उन्हें देयते ही यमन्ती भी उठ गई। पत्नी ने आकर गजाधर यापू को देखा और पहा, "अरे, आप अकेले घठे हैं—यह सब कहाँ गए ?" गजाधर बाबू के मन में फांस-सी करफ उठी, "अपने-अपने काम में लग गए हैं-आपिर बच्चे ही हैं।' परनी आकर चौके में बैठ गई—उन्होंने नाक-भौं चढ़ाकर पारों बोर जूठे बर्तनों को देगा । फिर पहा, "सारे में जूठे बर्तन पड़े हैं। इस पर में धरम-करम कुछ नही। पूजा फरफे सीधे पोरे में पुमो।" फिर उन्होंने नौकर को पुकारा, जर उसर न मिला तो एक बार और उच्च स्वर में, फिर पति की ओर देवकर बोली, "बहू ने भेना होगा बाजार।" और एक मम्बी सांस सेकर चुप हो रही । गगाधर या बठकर पाय और नाश्ते का इन्तजार करते रहे। उन्हें अचा- नक ही गनेशी की याद आ गई। रोज सुबह पैसेंजर आने से पहले यह गर्म-गर्म पूरियां और जनेवी बनाता पा । गजाधर बाबू जब तम उटगर संयार होते, उनके लिए जलेबिया और पाय साकर रय देता था। चाय भी पितनी वड़िया, भाव के ग्लास में कार तक मरी सयालय, पूरे दाई पम्मप पीनी, और गादी मलाई। पैसेंजर मते ही रानीपुर सेट पहुंचे, गनेशी ने चाय पहुंचाने में कमी देर नहीं की। क्या मजाल कि कभी उससे कुछ कहना पड़े। पत्नी का शिकायत-भरा स्वर सुन उनके विचारों में व्यापात पहुंचा । वह ७६ मेरी प्रिय कहानियां -- - - . कह रही थीं, सारा दिन इसी खिच-खिच में निकल जाता है। इसी गिरस्थी का धन्धा पीटते-पीटते उमर बीत गई । कोई जरा हाथ भी नहीं बंटाता। "बहू क्या किया करती हैं ?" गजाधर बाबू ने पूछा "पड़ी रहती हैं । वसंती को तो फिर कहो कि कॉलेज जाना होता है।" गजाधर बाबू ने जोश में आकर बसंती को आवाज दी। बसंती भाभी के कमरे से निकली तो गजाधर बाबू ने कहा, "वसन्ती, आज से शाम का खाना बनाने की जिम्मेवारी तुम पर है। सुबह का भोजन तुम्हारी भाभी बनाएंगी।" वसन्ती मुंह लटकाकर बोली, "बाबूजी, पढ़ना भी तो होता है ।" गजाधर बाबू ने बड़े प्यार से समझाया, "तुम सवेरे पढ़ लिया करो। तुम्हारी मां बूढ़ी हुई, उनके शरीर में अव वह शक्ति नहीं बची है। तुम हो, तुम्हारी भाभी हैं, दोनों को मिलकर काम में हाथ बंटाना चाहिए।" वसन्ती चुप रह गई। उसके जाने के बाद, उसकी मां ने धीरे से कहा, "पढ़ने का तो बहाना है। कभी जी नहीं लगता, लगे कैसे? शीला से ही फुरसत नहीं, बड़े-बड़े लड़के हैं उस घर में, हर वक्त वहां घुसा रहना, मुझे नहीं सुहाता । मना करूं तो सुनती नहीं।" नाश्ता कर, गजाधर बाबू बैठक में चले गए। घर छोटा था और ऐसी व्यवस्था हो चुकी थी कि उसमें गजाधर बाबू के रहने के लिए कोई स्थान न वचा था। जैसे किसी मेहमान के लिए कुछ अस्थायी प्रबन्ध कर दिया जाता है, उसी प्रकार बैठक में कुसियों को दीवार से सटाकर बीच में गजाधर बाबू के लिए पतली-सी चारपाई डाल दी गई थी-गजाधर बाबू उस कमरे में पड़े-पड़े, कभी-कभी. अनायास ही, इस अस्थायित्व का अनुभव करने लगते। उन्हें याद हो आती उन रेलगाड़ियों की, जो आती और थोड़ी देर रुककर किसी और लक्ष्य की ओर चली जाती। घर छोटा होने के कारण बैठक में ही अब अपना प्रबन्ध किया था। उनकी पत्नी के पास अन्दर एक छोटा कमरा अवश्य था, पर उसमें एक ओर अचारों के मर्तवान, दाल, चावल के कनस्टर और घी के डिब्बे से घिरा था--दूसरी ओर पुरानी रजाइयां, दरियों में लिपटी और रस्सी से बंधी रखी थीं, उसके पास एक बड़े से टीन के बक्स में घर-भर के गरम कपड़े थे। बीच में एक अलगनी बंधी थी, जिसपर प्रायः बसन्ती के कपड़े, लापरवाही से पड़े रहते थे । वह भरसक उस कमरे में नहीं जाते थे। घर का दूसरा कमरा अमर और उसकी बहू के पास था। - वापसी ७० सरा कमरा, जो सामने को बोर पा, बैठा था। गजाधर मापू के माने से पहले समें अमर की ससुराल से आया बेंत को सोने कृसियों का मेट पहापा, इसियों नीली गद्दियां और बहू के हायों के कड़े कगन थे। जब कभी उनकी पत्नी को कोई सम्बी शिकायत करनी होती, तो अपनी पटाई टक में राल पर जाती थीं। तो वह एक दिन घटाई सेफर बा गई। गजाधर यापू पर-गृहस्पी फी मातें ऐडी, वह घर का रवंया देय रहे । बहुत हलकेने न्होंने पहा कि अव हाप में पंसा कम रहेगा, कुछ पचं कम होना चाहिए। "गनी यचं तो वाजिब-वाजिब है, फिसका पेट काट ? यही गोर-गांठ करते- रते पूरी हो गई, न मन का पहना, न मोड़ा।" गगाधर बापू ने आहत, विस्मित दृष्टि से पत्नी को देखा। उनसे अपनी हैसि. त छिपीन पी। उनकी पत्नी संगो का अनुभव कर उसका उल्लेध करली, पह नामाविक था, लेकिन उनमें सहानुभूति का पूर्ण अमाव गजाधर बाबू को बहुत हटका । उनम यदि राय-बात की जाती कि प्रबन्ध कसे हो, तो उन्हें चिन्ता कम, तोप अधिक होता। लेकिन उनसे तो केवल शिकायत की जाती पीचंगे परिवार मर परेशानियों के लिए वही जिम्मेदार थे। "तुम्हें किस बात की कमी है अमर की मां-पर में बहू है, सहके बच्चे है, पर्फ रपये से ही मादमी अमीर नहीं होता।" गजाधर गावू ने कहा और पहने साथ ही अनुमय रिया, यह उनकी बातरिक अभिव्यक्ति पी ऐसी कि उनकी रनी नहीं राम मयतीं। "हो, बड़ा मुरा है न बहू से । आज रसोई करने गई है, यो क्या होता है," कहकर पत्नी ने आयें मूर्ती, और मो गई। गजाधर बाबू हुए परनी को देयते रह गए-पही पी क्या उनकी पत्नी जिसरे हापों के मन सर्म, जिसकी मुस्कान की याद में उन्होंने सम्पूर्ण जीवन बाट दिया था? न्हें लगा कि वह सावष्यमयी युवती जीवन की राह में रहीं पो गई और उसकी गह बाज जो स्त्री है, वह उनके मन मोर प्राणों के लिए नितांत अपरिचिता है। की नीद में एबी उनकी पत्नी का मारो-सा गरीर बहुत बेदौर और कम सग हा पा, पेहरा श्रीहीन और पापा । गमाघर या देर निरमा दृष्टि से ली को देयते रहे और फिर मेटार इतकी ओर तारने मगे। अन्दर कुछ गिरा और उनसरी परलीहरुबहाकर उठबंटी, "सोरिल्ली ने रा दिया गापर," और वह अंदर भागों, पोरी देर में सौटकर बाई.तो उन ७८ मेरी प्रिय कहानियां मुंह फूला हुआ था, "देखो बहू को, चौका खुला छोड़ आई, बिल्ली ने दाल के पतीली गिरा दी। सभी तो खाने को हैं, अब क्या खिलाऊंगी?" वह सांस लेने को रुकी और वोली, "एक तरकारी और चार परांठे बनाने में सारा डिब्बा र्घ उड़ेलकर रख दिया। जरा-सा दर्द नहीं है, कमाने वाला हाड़ तोड़े और यहां ची लुटें। मुझे तो मालूम था कि यह सब काम किसीके वस का नहीं है ?" गजाधर बाबू को लगा कि पत्नी कुछ और बोलेंगी तो उनके कान झनझन उठेगे । मोठ भींच, करवट लेकर उन्होंने पत्नी की मोर पीठ कर ली। - aw रात का भोजन बसंती ने जान-बूझकर ऐसा बनाया था कि कोर तक निगल न जा सके । गजाधर बावू चुपचाप खाकर उठ गए, पर नरेन्द्र थाली सरकाक उठ खड़ा हुआ और बोला, "मैं ऐसा खाना नहीं खा सकता।" वसन्ती तुनककर बोली, "तो न खाओ, कौन तुम्हारी खुशामद करता है।" "तुमसे खाना बनाने को कहा किसने था?" नरेन्द्र चिल्लाया। "बाबूजी ने।" "बाबूजी को वैठे-बैठे यही सूझता है।" बसन्ती को उठाकर मां ने नरेन्द्र को मनाया और अपने हाथ से कुछ बनाक 'खिलाया। गजाधर बाबू ने बाद में पत्नी से कहा, "इतनी बड़ी लड़की हो ग और उसे खाना बनाने तक का शऊर नहीं आया।" "अरे माता सब कुछ करना नहीं चाहती," पत्नी ने उत्तर दिया। अगली शाम मां को रसोई में देख कपड़े बदलकर बसन्ती बाहर आई तो बैठक से गजाधर बाबू ने टोक दिया, "कह जा रही हो? "पड़ोस में, शीला के घर।" बसन्ती ने कहा। "कोई जरूरत नहीं है, अन्दर जाकर पढ़ो।" गजाधर बाबू ने कड़े 'स्वर में पाहा । कुछ देर अनिश्चित खड़े रहकर बसन्ती अन्दर चली गई। गजाधर बाबू 'शाम को रोज टहलने चले जाते थे, लौटकर आए तो पत्नी ने कहा, "क्या कह दिया वसन्ती से ? शाम से मुंह लपेटे पड़ी है । खाना भी नहीं खाया।" गजाधर बाबू खिन्न हो आए । पत्नी की बात का उन्होंने कुछ उत्तर नहीं “दिया। उन्होंने मन में निश्चय कर लिया कि बसन्ती की शादी जल्दी ही कर देनी , बारमी ७६ . है। उस दिन के बाद बसन्ती पिता से पपी-रची रहने सगो। जाना होता तो पिछ. थाई से जासी । गजाधर पावू नै दो-एक दार पनी गे पूछा तो उत्तर मिला, "टी हुई है।" वापर यापू को और रोप हुआ। मड़की के इतने मिवार, जाने को रोक दिया तो पिता मे बोलेगी नहीं। फिर उनकी पत्नी ने ही गूपना दीशिअमर अलग रहने मी मोष रहा है। "पयों ?" गजाधर बाबू ने पकित होकर पूरा परली ने साफ-साफ उत्तर नहीं दिया। अमर और उसकी यहू की शिकायतें पहत पी। उनका कहना पा कि गजाधर यापू हमेगा बैठक में ही पो रहते हैं, कोई माने जाने वाला हो तोरही बैठाने की जगह नहीं। अमर को अब भी पह छोटा-गाममाते थे, और मोके मौके टोक देते थे।बहू को काम करला पाना पा और सारा अब-सर पूहापन पर ताने देती रहती थी । "हमारे माने के पहले भी कभी ऐसी बात हुई थी ?" गजाधर गाव ने पूछा। परनी ने गिर हिलाकर नामा कि नहीं। पहले अमर पर का मालिक बनकर रहता था यहू को कोई रोग- टोक न थी, अमर के दोस्तों का प्राय यहीं बसा जमा रहता था और अन्दर से माता-पायसवार होकर जाता रहता था । बमली को भी वही अच्छा लगता था। गजाधर बापू ने बहुत धीरे से कहा, "अमर मे कहो, जल्दबाजी की कोई जरूरत नहीं है।" अगले दिन यह मुबह पमकर पौटे तो उन्होंने पाया कि मंठा में उनकी पार. पाई नहीं है । मन्दर श्राफर पूछने पाले ही थे कि उनकी दृष्टि रमोई के अन्दर घंटी परली पर पड़ी। उन्होंने यह पहने को मह पोला कि यह कहां है; पर पूरा पाद कर घुप हो गए । पत्नी मी कोठरी में शरातो अपार, रजाइयों और जन- स्टरों के मध्य अपनी पारपाई सगी पाई। गजाधर बाबू ने पोट माग भोर कहीं टांगने को दीवार पर नजर दौराई। फिर उसे मोरार प्रगती के. पण पप गिगाकर, एक पिनार दाग दिया। छाए बिना ही अपनी चारपाई पर संट गए। कुछ भी हो, तन आपिरकार पूरा हो पा । गुबह-नाम कुछ दूर हमने भयम्प पले जाने पर पाते-आते पर उसने थे। गायर सबू को अपना यहा-सा, यूनाइमा वाटर पारया गया। निश्चिन्त जीवन, मुबह पगेंजर ट्रेन माने पर स्टेशन को पहल-पहन, चिरपरिचित पेहरे और पटरी पर रेत पहियों की पट्-गट, जो उनके लिए मधुर संगीत मी तरह था। तूफान और मेरी प्रिय कहानियां के इन्जनों की चिरधाड़ उनकी अकेली रातों की साथी थी। सेठ रामजीमल के मिल के कुछ लोगकभी-कभी पास आ वैठते, वही उनका दायरा था, वही उनके साथी। वह जीवन अब उन्हें एक खोई निधि-सा प्रतीत हुआ। उन्हें लगा कि वह ज़िन्दगी द्वारा ठगे गए हैं। उन्होंने जो कुछ चाहा, उसमें से उन्हें एक बूंद भी न मिली। लेटे हुए वह घर के अन्दर से आते विविध स्वरों को सुनते रहे । बहू और सास की छोटी-सी झड़प, बालटी पर खुले नल की आवाज, रसोई के बरतनों की खटपट और उसीमें दो गोरैयों का वार्तालाप-और अचानक ही उन्होंने निश्चय कर लिया कि अब घर की किसी बात में दखल न देंगे। यदि गृहस्वामी के लिए पूरे घर में एक चारपाई की जगह यहीं है, तो यहीं पड़े रहेंगे। अगर कहीं और डाल दी गई, तो वहां चले जाएंगे। यदि बच्चों के जीवन में उनके लिए कहीं स्थान नहीं, तो अपने ही घर में परदेशी की तरह पड़े रहेंगे और उस दिन के बाद सचमुच गजाधर वाबू कुछ नहीं बोले । नरेन्द्र मांगने आया तो बिना कारण पूछे. उसे रुपये दे दिए-बसन्ती काफी अंधेरा हो जाने के बाद भी पड़ोस में रही तो भी उन्होंने कुछ नहीं कहा पर उन्हें सबसे बड़ा गम यह था कि उनकी पत्नी ने भी उनमें कुछ परिवर्तन लक्ष्य नहीं किया। वह मन-ही-मन कितना भार ढो रहे हैं: इससे वह अनजान ही बनी रहीं। बल्कि उन्हें पति के घर के मामले में हस्तक्षेप न करने के कारण शान्ति ही थी। कभी-कभी कह भी उठतीं, "ठीक ही है, आप बीच में न पड़ा कीजिए, बच्चे बड़े हो गए हैं, हमारा जो कर्तव्य था, कर रहे हैं। पढ़ा रहे हैं, शादी कर देंगे।" गजाधर बाबू ने आहत दृष्टि से पत्नी को देखा। उन्होंने अनुभव किया कि वह पत्नी व बच्चों के लिए केवल धनोपार्जन के निमित्त मात्र हैं। जिस व्यक्ति के अस्तित्व से पत्नी मांग में सिन्दूर डालने की अधिकारिणी है, समाज में उसकी प्रतिष्ठा है, उसके सामने वह दो वक्त भोजन की थाली रख देने से सारे कर्तव्यों से छुट्टी पा जाती हैं। वह घी और चीनी के डिब्बों में इतनी रमी हुई हैं कि अव वही उनकी सम्पूर्ण दुनिया बन गई है । गजाधर बाबू उनके जीवन के केन्द्र नहीं हो सकते, उन्हें तो अब उनकी शादी के लिए भी उत्साह वुझ गया। किसी बात में हस्तक्षेप न करने के लिए निश्चय के बाद भी उनका अस्तित्व उस वातावरण का एक भाग न बन सका। उनकी उपस्थिति उस घर में ऐसी असंगत लगने लगी थी, जैसे सजी हुई बैठक में उनकी चारपाई थी। उनकी सारी खशी एक गहरी पापी उदामीनता में दब गई। इतने सब निश्चयों के बावजूद भी गजाधर बाबू एक लिवीप में दपन दे बैठे। परली स्वभावानुमार नौकर की गिरायत कर रही पी, "विना कामचोर है, नागर की हर घोर में पैसा बचाता है, याने बंटना है. तो माता ही पना जाता है ।" गजाधर बाबू को वरापर यह महमूम होता रहता पा कि उन पर का रहन-गहन और यचं उनकी हैसियत से नहीं रयाता है। पत्नी की बात सुनकर मगा कि नौकर का पचं बिलकुल बैगार है : छोटा-मोटापाम है. पर मैं सीन मदं है, कोई-न-कोई कर ही देगा। उन्होंने उमी दिन नोकर का हिमार कर दिया । अमर दफ्तर से आया तो नौकर को पुरारने लगा। बमर की यह बोली, "बाबूजी ने नौकर छुड़ा दिया है।" गयों?" "कहते हैं पर बहुत है।" यह वार्तालाप महत सोया-मा पा, पर जिम टोन में महू बोली, पगाधर भादू पोपटक गया। उग दिन जो मारी होने के कारण गणापर बाबू रहनने नहीं गए पे । मामस्म में, उटकर बप्ती भी नहीं जताईम बात से मेयर नरेन्द्र मासे गहने लगा, "मम्मा, तुम मायूजी मे पहनी क्यों नहीं? बेटे-विटाए पृछ नहीं तो मोरर ही एग दिया । अगर बापूजी यह गमा कि मैं साइपिम पर गेहू रय भाटा पिगाने जाऊंगा तो मुलगे यह नहीं होगा।" "हो अम्मा"-यगन्ती स्वर पा, "मैं कॉलर मी जाऊं और मोटकर पर में मार भी सगा, यह मेरे बम की बात नहीं है।" "भूरे यादमी है."अमर मुनमुनापा, "सुपपाप पोएँ। हर पोर में दयम सपी देते हैं !" पत्नी ने बड़े प्यंग्य से रहा, "मोर पुछ नहीं मूगा तो तुम्हारी पर माही धोके में भेज दिया। यह गई तो पन्द्रह दिन का रागन पाप दिन में बनार रप दिया।" यह पुष्पहै. इससे पहले वह पौने में पुग गई। कुछ देर में पानी कोठरी में आई और विजनी उनाई तो गायर गर्मो मेटे देय परी टि. पिटाई। गनापर धावू की मुरमुद्रा में पह उतरे भावोस बनुमान न समा गीं। वह गुर, अणि तकिए मेरे रहे।

८२ मेरी प्रिय कहानियां गजाधर वावूचिट्ठी हाथ में लिए अंदर आए और पत्नी को पुकारा । वह भीगे हाथ लिए निकली और आंचल से पोंछती हुई पास आ खड़ी हुई । गजाधर बाबू ने बिना किसी भूमिका के कहा, "मुझे सेठ रामजीमल की चीनी-मिल में नौकरी मिल गई है। खाली बैठे रहने से तो चार पैसे घर में आएं, वही अच्छा है। उन्होंने तो पहले ही कहा था, मैंने मना कर दिया था।" फिर कुछ रुककर, जैसे बुझी हुई आग में एक चिनगारी चमक उठे, उन्होंने धीमे स्वर में कहा, "मैंने सोचा था कि बरसों तुम सबसे अलग रहने के बाद, अवकाश पाकर परिवार के साथ रहूंगा। खैर, परसों जाना है। तुम भी चलोगी?" "मैं ?" पत्नी ने सकपकाकर कहा, "मैं चलूंगी तो यहां का क्या होगा? इतनी बड़ी गृहस्थी, फिर सयानी लड़की." बात बीच में काट गजाधर बाबू ने थके, हताश स्वर में कहा, "ठीक है, तुम यहीं रहो। मैंने तो ऐसे ही कहा था।" और गहरे मौन में डूब गए। नरेन्द्र ने बड़ी तत्परता से विस्तर वांधा और रिक्शा वुला लाया। गजाधर वाबू का टिन का बक्स और पतला-सा विस्तर उसपर रख दिया गया। नाश्ते के लिए लड्डू और मठरी की डलिया हाय में लिए गजाधर बाबू रिक्शे पर बैठ गए । एक दृष्टि उन्होंने अपने परिवार पर डाली और फिर दूसरी ओर देखने 'लगे और रिक्शा चल पड़ा । उनके जाने के वाद सब अन्दर लौट आए। वहू ने अमर से पूछा, "सिनेमा ले चलिएगा न?" वसन्ती ने उछलकर कहा, "भइया, हमें भी।" गजाधर बाबू की पत्नी सीधे चौके में चली गई। बची हुई मठरियों को कटोरदान में रखकर अपने कमरे में लाई और कनस्टरों के पास रख दिया, फिर वाहर आकर कहा, "अरे नरेन्द्र, वावूजी की चारपाई कमरे से निकाल दे। उसमें चलने तक की जगह नहीं है।"

- मूग दर्पण हरमोर अमृता ने दोनों रिता भूरे सागर में सपेटकर यांध दी। गेरी में गांठ भगाते हुए उमर हाम ठिठक गए और उसकी दृष्टि ग्राली कमरे को पार कर दूर देय उठी । मपन अशोक वृक्षों की टहनियो काप रही थी और हवा पर दो-एक पोते कनेर नीचे गिर जाते थे। माहर बैठा हुआ बाई सकसी भी पेटियों में, सधे हुए हापो से माधिरी कील ठोंक रहा पा । ममी भायर इन पेटियो को उम समरे मे रयवा दें, यहाँ फालतू सामान मरा हुआ है। धीरे-धीरे सीनन उनमें मिदनी जाएगी और बन्द किताबों के पृष्ठ भपने-आप पीने परते जाएंगे। उस कमरे में विगत वैभव के कितने ही प्रतीक थे। बाया महाप पाहोना, महफिन में विघ्ने पाली परिपा, रंगमहल के मार-फानूम, उगमे साय मादित्य वाटा स्टेयेतोप, और अय-अमृता को पितावें। अमृता नै कागज घोलकर एक बार फिर उन.शिताबों को उसटा-पालटा। पितनी ही कड़वी-मीठी स्मृतियां उनमे सम्बन्धित है। मियिया पा सारे पुशन, कापट, शट्टे कर उनपर बैठ जाना, पति और फनाकर रोटी पर सेटना और पिडकी के सोयरे परमर येम्नीमा मोरारी गोद में उसना-अब ये पटनाएं स्मृति में अंपित होकर रह जाएंगी। अवसान के दानों में ममता जप कभी यह पार करेगी तो उसे में पेहरे उतने ही यूमिन-में मगंगे गितना पूमिल मात्र कंबर का पेहरा है। पिछले कई दिनों मे उसने बार- भार पर की मुगाति याद करनी पाही है। पर वह पार में न बाफर अलग हो रही है, मात्र छाया। और ममका दिन। गुरद-गुबह ही मरममामा जी का फोन मापापा। हमकर होती पौ; "तुम्हारा होगाम करने जा रही हूं। परमो गाम के लिए तुम्हारे लिए पूतों के बाभूपन पनवाने हैं । इन लोगों ने यहाँ नई बहू को पहली रात फूलो के गहने ८४ मेरी प्रिय कहानियां पहनने का चलन है। अमृता ने रिसीवर रख दिया। उसे लग रहा था कि सत्यभामा किसी और की बात कर रही है। यह भीड़-भाड़ और चहल-पहल किसी और के निमित्त है। अमृता तो अलग-थलग है । वह तो स्मृतियों की गहराइयों में डूबकर रह गई है, संवेदनाओं की गोधूलि में भटक रही है." सत्यभामा जी ने पार्टी दी थी, कोई खास बात न थी, बस ऐसे ही, जिसमें ऊबे हुए पुरुषों ने बिज़नेस, ब्रिज और क्लब की बात की थी, सजी-संवरी स्त्रियों ने एक-दूसरे की साड़ियों के दाम भांपने की चेष्टा की थी, छिटपुट वातें और अनु- पस्थित लोगों की निन्दा की थी। अमृतां ममी के चलने की प्रतीक्षा में थी। सत्य- भामा जी ने आकर कहा, "यह कुंवर हैं मीतू-मेरे देवर लगते हैं।" अमृता ने विना किसी रुचि के कुंवर के नमस्कार का जवाब दे दिया। नये व्यक्तियों से परिचय उसे बड़ा ही उवाने वाला लगता था; और उतने ही उवाने वाले वे प्रारंभिक प्रश्न- अमृता को लगातार उद्यान की ओर देखते हुए कुंवर ने पूछा : "माप- गार्डे- निंग में रुचि रखती हैं ?" "जी नहीं !" उनसे भी कुछ अपेक्षित है, यह अनुभव कर अमृता ने पूछा : "आप ?" "थोड़ा बहुत," कुंवर ने उत्तर दिया। अमृता ने सोचा कि उसे बताए कि वह आजकल एक नई भाषा पढ़ रही है। पर यति के ध्यान से उसके अन्दर दीप- सा जल उठा। तभी ममी आईं। कुंवर को अमृता के पास खड़ा देख वह मुस्कराई। और रास्ते-भर कुछ सोच-सोचकर मुस्कराती रहीं। उसके बाद कई बार, कुंवर दिल्ली आया और हर बार सत्यभामा जीने अमृता को बुलाया, पर वह नहीं गई। और कल का दिन और उसके बाद का दिन और एक के बाद कितने ही दिन.. जीवन- कुंवर का चेहरा यदि स्पष्ट भी होता तो क्या होता-कुंवर को अच्छी तरह जानती होती तव भी उसके अन्दर यही डूबती-सी भावना होती। क्योंकि किताबों की पेटियों में कोलें ठुकती और विविया, यति, मीरा और वेम्बी सभी को छोड़ना पड़ता। मेउ-५ -- स्टा संग ५ पिनर रोडमी मोटी में इस गमर बड़ी पहल-पहल होगी। सिंग गाउन पहने, हाप में सिगरेट का टिन पकड़े, इन्तजाम कराते पूम रहे होंग। बल्मीमारा याती मोमी सपरिवार गुबह से ही या गई होगी और ममी रो उनकी पयपर प्रारम्भ हो गई होगी। उसो भीड़-भाड़ में गुन्दरनगर यासी युबा का दायर समन मे पनटं कर रहा होगा। सम्बन्धियों के मन में बड़ा उरगाह है यमुना के विवाह फा, और इस अवसर पर कई मरण मे यलग रहते ममी बोरी मी पढ़े हो गए हैं। दोनों को एक-दूसरे पर विश्वास नहीं, फिर भी रास पूषे विना काम नही पसता । ममोरी का अधिक से अधिक धन पचं करवाने पर तुनी हुई है। इसी के आनाकानी करने पर यह गानदान में हुई भन्यमादिरों का हवाला देने सगती हैं। सब सपने में व्यस्त हैं और रायमामा जी यय पिन्नी भी सरह दोनों परिवारों के बीच नाच रही हैं। विवाह में सहूलियत हो लिए संपर में परियार पाले भी दिल्ली या गए हैं और इसलिए सत्यमामात्री री पोजीगन बड़ी महत्वपूर्ण हो गई है। कुंबर उनका देवर, अमृता उनरे विडनेग पार्टनरी ममी । योप-बीच में ममी से भी गुगाम : "अरे पयराती मया हो, इराना मिलेगा अमृता को फिदेशने थानों की यायें पोधिया जाएंगी।" और अमृता को अपनी कॉटेज पार पाती है। यह जाड़े गोरा जति हलर पीने मेट समन सबको कॉपी देती पी, गियी. पाग बेटी मीरा अम्मी को पामे अमृता और यति को मौतुर-भरी मांगों से देयती हुई । पुगत रो तोड़-मरोड़कर पति सिर के नीचे सगारर सेटी पर पट पाता पा गरे पर माहर निसने रहते थे, और उमी तरह बो याराम से मेटे-मैटे पिनार पर अमृता मो मन्दों का उन्पारण और अयं बनाता जाता और यह पापी में नियती पाती । विधिया मौरा पाकर युर-बोल्फ गे रिता निरातरर भूमि पर पटरने "नहीं शिथिया," अमृता के मना करने पर वह दुष्टतापूर्वक हंगती और फिर मरपोरगीय सतोपोर मेज पर रण मनी प्लान्ट पातारपा गममा नीचे पा पिरता। "मोरा, तुम पिरिपारो जरा भी नहीं देय सगती? देयो कितना सतान परती है।" पति पीया और चर तर अमृता उठे यिरिया भागकर पियार पोलिसाती।

८६ मेरी प्रिय कहानियां अमृता ने उखड़ आए मनी-प्लाण्ट को फिर से मिट्टी में खोंसा और मेज़पोश विछाकर गमला रखा। अमृता कितनी नफासतपसन्द है। उसकी हर वस्तु अपने स्थान पर सजी रखी रहती। विविया के उत्पात से उसके मन में खीज्ञ अवश्य होती होगी, यह जानकर यति ने कहा : "इस लड़की ने न जाने किसकी विध्वंसात्मक प्रवृत्ति पाई है।" "तुम्हारी और किसकी ?" मीरा ने कुढ़कर कहा । "बस, बस।” अमृता ने बीच-बचाव किया और मीरा वेबी को ऊंचा-ऊंचा उछालने लगी। "पटक दो न जमीन, पर अगर इतना गुस्सा आ रहा है।" "क्या है यति ? चुप रहो न ! बच्ची है, शैतानी तो करेगी ही। उसमें मीरा पर क्यों बिगड़ रहे हो?" अमृता ने कहा। पर गृह-युद्ध का सूत्रपात हो जाता । आगे-आगे सोते वेम्बी को कन्धे से लगाए लम्वे कदम रखता हुआ यति और पीछे मुंह फुलाए मीरा। विमनस्क अमृता खिड़की से उन्हें जाते देखती और एक उसांस ले वापस लौट आती। ऐसे क्षणों में उसका मस्तिष्क और पीछे चला जाता-चार वर्ष पहले जब मीरा और यतीन्द्र का विवाह नहीं हुआ था। इस आयु में ममी और डैडी के अलग हो जाने से अमृता के दिल पर खरोंच-सी पड़ गई, अमृता का जब तक विवाह न होगा तब तक वे वैधानिक रूप से अलग न होंगे; यह निश्चय उन्होंने अमृता के कारण ही लिया था। उन दोनों में मतभेद तो सदा रहा, पर उनके अलग हो जाने की कल्पना उसने कभी न की थी। जवान डॉक्टर-पुत्र की मृत्यु के बाद से ममी टूट-सी गई थीं। डैडी अव भी आकर्षक थे और हमेशा चुनकर खूबसूरत सेक्रेटरी रखते थे। यह वात नहीं कि ममी में कोई दोष था; फिर भी और अमृता अपने को दोषी ठहराती। यदि वह न होती तोममी पहले ही डंडी से अलग हो जाती और जीवन के छिन्न सूत्रों को उसी प्रकार संवार लेतीं। अब तो उनका जीवन हर प्रकार से रिक्त हो गया था और अमृता के जीवन में अचानक दरार पड़ गई। उसने उसके विश्वास को तोड़ दिया। 1 झूठा दर्पण ६७ "अमृता, तुम शादी कर ली।" मीरा ने एक बार कहा था। "ऐसे सम्बन्धों पर मेरो आस्था नही रहो मीरा! विवाह यहुत कुछ मांगता है, मुशमें न कोई घाव बचा है, न अरमान। ऐसे ही रहती आई हूं-ऐसे ही रहूंगो । यब इस आयु में मुझसे दुल्हन नही बना जाएगा।" अमृता थोड़ा- सा हंसी। "अपने को ही देखो-क्या तुम्हारे वे पहले सुनहले स्वप्न बदरंग नहीं हो गए ! विबिया, बेम्बी, नई-नई परेशानियां, गिरता हुआ स्वास्थ्य और तुम्हारे ही शब्द में यति-सा कुतर्को पति ।" मीरा एक क्षण को चुप हो गई। "तू जिन्दगी एक झूठे दर्पण में देख रही है, अमृता । यह आवश्यक नहीं कि जो ममी और ठंडी में हुआ, वही मेरे साथ हो । मोर रहे मेरे स्वप्न, मेरा ही दोप था । मैंने जिन्दगी को बहुत रोमाण्टिक दृष्टि से देखा था। तुझे यति की तरह के व्यक्ति से विवाह करने की यावश्यकता नहीं। किसी ऐसे पुरुप से कर, जो तुझे धन-दौलत और प्रतिष्ठा दे सके। जैसे वह हैं, सत्यभामा के कुंवर।" "लोहे के उस कारखाने में मैं घुटकर मर जाऊंगी।" "धन-दौलत में कोई घुटकर नहीं मरता।" मीरा ने वेम्बी के कपड़े तह करते हुए कहा । अमृता ने बाहों से घुटने वाध लिए, और कहा: "सच बात तो यह है मीरा कि अगर मति-सा कोई पुरुष मुझे मिले तो मैं चट से शादी कर लूं।" मोरा ने रुककर देखा कि अमृता की बात में कितना परिहास है, पर उसके मुस से वह कुछ अन्दाज न लगा पाई। बात को परिहास के रूप में ही लेते हुए मीरा ने कहा : "बड़ी आई यति वाली। यति के साय चौवीसों घण्टे रहना पड़े तो पता चले।" मां से डांट खाकर विविया अमृता के पाम भागती है, उसकी गोद में दुवक जाती है। ईवनिंग क्लासेज से पका यति अमृता के कॉटेज में बन पाता है। दो कमरों के घर में हर जगह वेम्बो और विविया की वीज विखरी रहती है। पीछे बरामदे में येम्वी के मोगे महकते नेपकिन । गुसलखाने में बच्चों का बापटन । कमरे के कोने में बच्चों को परेम्वुलेटर । विना बाल संवारे, बिना कपड़े बदले, TV - ८८ मेरी प्रिय कहानियां मीरा किसी न किसी काम से व्यस्त रहती है । कहीं चलने के समय अस्सी रुपये की साड़ी के साथ मीरा छींट का विना आयरन किया हुआ ब्लाउज पहन लेगी। एक गाल पर पाउडर का धब्बा, विन्दी टेढ़ी मोर लिपस्टिक वेपरवाही से लगाए जाने के कारण ओंठों की प्राकृतिक रेखा के बाहर फैली हुई । यति के माथे पर शिकन पड़ जाएगी और उसके ओंठ मिच जाएंगे। अमृता भी यह सब देखती है। मीरा को टोकती भी है : "अरे अब मैं दो बच्चों की मां हुई । इन सब बातों की मुझे फुरसत नहीं है ।" मीरा का उत्तर होता है। अकारण मार खाई विबिया की बांहें जब उसके गले में होती हैं, यति जव थकी और सिनिकल बात करने लगता है तो अमृता को डर-सा लगता है। क्या मीरा नहीं समझती कि बिविया कभी वेम्बी को बड़ी बहन का स्नेह न दे सकेगी कि यति शायद कहीं भटक जाए-विविया को अमृता दुलार-पुचकार लेती है, पर यति किसी दिन अकस्मात् भटक जाएगा- दूर हो जाएगा-तव मीरा सीना पीट-पीटकर पुरुष जाति को बुरा-भला कहेगी, अपने वह सब त्याग गिनाएगी जोकि उसने यति के लिए किए थे। और विवाह के एक दिन पहले अमृता को कुछ वर्ष पहले की एक रात याद आ गई। वह मीरा के साथ रहती थी और मीरा की शादी नहीं हुई थी। मीरा के कमरे में यति का बड़ा-सा फोटो रक्खा था। सहज और हंसमुख प्रकृतिवाला यति, जिसकी आंखों में गरमाई थी और बोलने में अजीब-सी अलसता, लम्बा और दुबला, पर साथ ही अपूर्व शक्ति का परिचय देता-सा। रुकमन ने मीरा और अमृता की चारपाइयां खुले में बिछाई थीं। बिस्तर ओस से गीले थे। अमृता को मीरा के चेहरे का वह भाव नहीं भूलता । मीरा ने कहा : "हमने निश्चय कर लिया है कि हम इन्हीं छुट्टियों में विवाह कर लेंगे।" मुलायम तकिये में कोहनी गड़ाए लेटी अमृता मीरा को देखती रही। आंगन के पीछे दीवार की लता सफेद और लाल फूलों के भार से झुक गई थी, और उनकी सुगन्ध चारों ओर मंडरा रही थी। "यति का तो कोई भी नहीं। बड़ी बहन ने पाल-पोसकर बड़ा किया। मेरे पेयरेट्स यति को पसन्द नहीं करते। वे कहते हैं कि हमारी वैक-ग्राउण्ड भिन्न है। मैंने कभी रुपये की परवाह नहीं की, घर चलाना मुझे नहीं आता । फिर फादर कहते हैं कि विदेशी भाषाएं पढ़ाने वाले अध्यापक के लिए आगे क्या चान्स है ! असल में यति जब फ्रान्स से लौटा, तो विभाग में कोई जगह न थी। फ्रेंच पढ़ाने भूठा दर्पण ८९ की पोस्ट थी, ग्रेड एक ही पा, यति ने वही स्वीकार कर ली।मोरा के अहरे का सांवलापन चांदनी में धुलकर बड़ा लुभावना लगने लगा। ढीले बालों की चोटी का सिरा खोलते-ग्यते मीरा ने कहा: "मुझे तो अमृता, कभी-कभी बड़ा डर लगता है।" अमृता को लगा कि इम तरह बैठे-रठे वह थक गई। वह लेट गई और खुली बाहों पर चादर के भोगे टो- पन से रोएं उठ पाए। मोरा सो गई, पर अमृता देर तक जागती रही। यति, मौरा, हंटी और ममी -और वह कल्पना-मृति जो उसने बचपन से मंजोई थी। अचानक ही वह स्पष्ट हो गई और उन आंखों की गरमाई बढ़ो पहबानी-पहचानी-मी लगने लगी। अमृता को उपहार में क्या दिया जाए इसपर मीरा और यति में बहुत बहन हुई यो। विनिया के रिवन से खेलती अमृता ने उस वहस में कोई हिस्मा नहीं लिया। मीरा उसे प्रेशर कुकर देना चाहती थी पर यति का कहना था कि वह ऐसी अनरोमप्टिक चीज नहीं देने देगा। "यह लड़की स्वयं बड़ी अनरोमप्टिक है, नहीं तो जिसे केवल एक बार पार्टी में देखा, उससे विवाह करने को तैयार हो जाती? यही मोली बनती है, वही आशाकारिणी, जो हैंडी की इन्छा हो करें। हंडी किसी साधारण-से पुरुप से शादी ठहराते तब हम देखते कि यह कैसे करतो?" मोरा के मन में अमृता के प्रति बड़ा आक्रोश था। "अच्छा तो है, एकाध पंघा, साईकिल और अलमारी वर्गरा हमें भी मिल जाएगी।" यति ने हंसकर कहा, पर उसकी आंखों में खोयापन-सा था। कुछ परे- शानी, कुछ उलझन । अमृता ने एकाएक विवाह की स्वीकृति कसे दे दी ? यह वात पति और मीरा के लिए पहली-सी बन गई थी। और अमृता कुछ हतारा, कुछ खोई हुई-सी थी। उसे यही मलाल था कि यति भी उसके मन की गाठ नहीं पकड़ सका। कंबर से विवाह की स्वीकृति देकर उसने अपने को पूर्णरूप से अदृश्य पर छोड़ दिया था, और उसकी मन:स्थिति ऐसे प्राणी-सी थी जोकि अपनी नौका में धोरे-धीरे पानी आता देख रहा हो और फिर भी चुपचाप बैठा हो क्योकि उने यह अच्छी तरह पता है कि इससे लड़ना बेकार है। विवाह में क्या उपहार मिले

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झूठा दर्पण ६१ यति ।" उसकी उंगली में खारे आसू थे, यति के आंसू । "यति, तुम इतने बड़े, इतने क्षमतावान होकर ऐसा आचरण कर रहे हो ! अमृता समझ नहीं रही थी कि वह क्या कह रही थी। मगर विबिया होती तो उसे पुचकारकर, चुमकारकर मना लिया जाता । अमृता की दोनो हथेलियां यति के वालो पर टिकी थीं, और वह समझाते हुए उससे कुछ कहती जा रही थी। उसकी सांस गले में फंस रही थी और शरीर मे बड़ी विचित्र-सी बेकली समाई जा रही थी। यति थका-हारा-सा उठकर चल दिया। अमृता उसके पीछे-पीछे द्वार तक गई और फिर जाते हुए यति की लम्बी परछाई देखती रही। अगली शाम जब यति उसे पढ़ाने माया तो दोनों में से किसीने गत रात्रि का उल्लेख नही किया। पर दोनो ही एक अननुभूत संवेदना के साझीदार हो गए थे, और इसी कारण एक-दूसरे के पहले से कहीं अधिक निकट । । अमृता के कई पत्रों के जाने के बाद मीरा लोटी । अमृता उसे स्टेशन लेने गई थी । मीरा गई थी बड़े गर्व से, लोटी वह पराजिता-सी, बहुत विनीत और उदास । बिविया अमृता से लिपट गई और टैक्सी मे लौटते हुए अमृता सोचे हुए मत्संना के शब्दों में से कुछ न कह सकी। "यति, बडे खोए-खोए-से रहे ," अमृता ने कहा । मीरा चुप रही। उस रात बिविया अमृता के पास ही सो गई, और यति सदा को तरह, अमृता को फच पढाने नहीं आया। वह क्लासेज के बाद ही सिनेमा चला गया और लौटा तब तक देर हो गई थी, सोयी विधिया को गोद में लेकर अमृता पहुंचाने 'गई । कुछ गर्मी-सी होने के कारण सामने का द्वार खुला था। अन्दर कमरे में मीरा के सिरहाने टेवित लैम्प जल रहा था और मीरा की चारपाई पर यति बैठा था। अमृता पर्दे के पीछे ही ठिठककर रुक गई। रोशनी बैम्बी के कोट और मीरा के मुख पर पड़ रही थी। जैसे वह चांदनी-सी थी जिसमें मीरा के चेहरे का उदास सावलापन घुलकर निखर आया था। अपने शरीर का मार बायें हाथ पर टेक यति बैठा था और.दाहिने हाथ की उंगलियों से धीरे-धीरे कमी मीरा की मुलायम कभी उसका माथा, कभी मोठ छू रहा था।

६० मेरी प्रिय कहानियां कैसी साड़ियां खरीदी जाएं, क्या दिया जाए, यह उसने पूर्णरूप से लौरों पर छोड़ दिया था। उसके मन में एक छिपी हुई आशा थी कि शायद यति समशे। "ऐसे कब तक चलेगा?" अमृता ने यति से पूछा। "क्या," यति खिड़की के बाहर देख रहा था, मीरा बच्चों को लेकर अपने पिता के पास चली गई थी और अमृता को विविया की बहुत याद आ रही थी। "यही, तुम्हारी नाराजी ? जाकर मीरा को ले आगो न।" अमृता सेटी के एक किनारे बैठी थी। उसकी गोद में किताब खुली हुई थी और उसके अनुरोध- पूर्ण नेत्र यति पर थे। "मीरा क्यों नहीं समझती ?" "समझाया तो, पर वह तो हठीली है। नहीं मानती। तुम तो वैसे नहीं हो?" "हूं! बहुत हठीला हूं तुम नहीं जानती अमृता, पर मीरा ने मुझे छोड़ दिया है। मेरा विश्वास उठ गया है। मैं अब सोचने लगा हूं कि यदि मैं किसी गपड़, निर्धन लड़की से शादी करता तो सुखी रहता। उसके अन्दर वे इच्छाएं, हसरतें न होती जो मेरे धनाभाव से मीरा के अन्दर घुटकर मर गई।" "मीरा ने तुम्हारे लिए बहुत किया है, यति।" अमृता ने मृदु स्वर में कहा। यति ने झटके से खिड़की पर पर्दा डाल दिया, फिर उसने पास आकर हाथ से फिताब नीचे गिरा दी और नीचे बैठकर अपना मुख अमृता की गोद में छिपा लिया। अमृता स्तब्ध रह गई। उसकी भीत दृष्टि ने चारों ओर देखा। खिड़गियों पर पर्दे पड़े थे। द्वार बन्द था। कॉफी देकर रुकमन सोने चली गई थी। उस सन्नाटे में घास में झींगुरों का स्वर बहुत शोर मचाता-सा लगा। यति निश्चल बैठा था, उसके उड़ते हुए वालों की रेखा, उजली-सी गर्दन और गौ? कन्धे । अमृता की दृष्टि अचानक ही धुंधली हो पाई। यति का स्पर्ण पुरुप का न था, एक प्रेमी का भी नहीं, सांत्वना पाने की इच्छुक आहत विबिया का था, गिरकर रोते हुए वेम्बी का- "यति," अमृता ने कहा "उसने बड़ी मृदुता से दोनों हाथों से उसका मुख उठाया । उसकी उंगलियां भीगकर रह गई। 'यति रो रहा था। अमृता थरथराकर रह गई। "यति, यह गयों, यह क्यों - झूठा दर्पण ६१ पति ।" उसकी उंगली में खारे आंसू थे, यति के आंसू । "यति, तुम इतने बडे, इतने क्षमतावान होकर ऐमा याचरण कर रहे हो!" अमृता समझ नहीं रही थी कि वह क्या कह रही थी। अगर विविया होती तो उसे पुचकारकर, चुमकारकर मना लिया जाता । अमृता की दोनों हथेलियां यति के बालों पर टिकी थी, और वह समझाते हुए उससे कुछ कहती जा रही थी। उसकी सास गले मे फंस रही थी और शरीर मे बड़ी विचित्र-सी बेकली समाई जा रही थी। यति थका-हारा-मा उठकर चल दिया। अमृता उसके पीछे-पीछे द्वार तक गई और फिर जाते हुए यति की लम्बी परछाई देखती रही। अगली शाम जब यति उसे पढ़ाने आया तो दोनों में से किसीने गत रात्रि का उल्लेख नही किया। पर दोनों ही एक अननुभूत संवेदना के साझीदार हो गए थे, और इसी कारण एक-दूसरे के पहले से कहीं अधिक निकट। . अमृता के कई पत्रों के जाने के बाद मीरा लौटी। अमृता उसे स्टेशन लेने गई थी । मीरा गई थी बड़े गर्व से, लौटी वह पराजिता-सी, बहुत विनीत और उदास । शिविया अमृता से लिपट गई और टैक्सी में लौटते हुए अमृता सोचे हुए मत्संना के शब्दों में से कुछ भी न कह सकी। "पति, बड़े पोए-खोए-से रहे ," अमृता ने कहा । मीरा चुप रही। उम रात विविया अमृता के पास ही सो गई, और यति सदा की तरह, अमृता को फ्रेंच पढाने नहीं आया। वह क्लासेज के बाद ही सिनेमा चला गया और लौटा तब तक देर हो गई थी, सोयी विबिया को गोद में लेकर अमृता पहुंचाने गई । कुछ गर्मी-सी होने के कारण सामने का द्वार खुला था। अन्दर कमरे में मीरा के सिरहाने टेविल लैम्प जल रहा था और मीरा की चारपाई पर यति वैता था। अमृता पर्दे के पीछे ही ठिठककर एक गई। रोशनी बेम्बी के कोट और मीरा के मुख पर पड़ रही थी। जैसे वह चांदनी-सी थी जिसमें मौरा के चेहरे का उदास सांवलापन धुलकर निखर आया था। अपने शरीर का मार बायें हाथ पर टेक यति बैठा था और दाहिने हाथ की उंगलियों से धीरे-धीरे कमी मीरा को मुलायम लटें, कभी उसका माया, कमी ओठ छू रहा था।

६२ मेरी प्रिय कहानियां
ओफ ! विबिया कितनी मारी थी। अमृता उसे बाहों में था
उसे अपनी चारपाई पर सुला दिया और स्वयं सेटी पर लेट गई।
से चमकीले आसमान का एक टुकड़ा दिखाई दे रहा था, अमृत
गीली , कभी सूखी आंखों से ताकती अपनी जिंदगी का पैटनं बुनतं
।
अमृता तौलिये से भीगे वाल पोंछती स्नानागार से निकली
प्रतीक्षा कर रही थी, चंचल उत्फुल्लित ।
"आज कालेज नहीं जामोगी?" उसने पूछा।
"जाऊंगी, फोर्थ पीरियड है।" अमृता ने कहा । मीरा का उम
खोयेपन को और गाढ़ा कर रहा था।
"कहो, मेल हो गया ?" उसने तौलिये को झटका देते हुए पूछ
"अरे अमृता, क्या बताऊं कल तो यति बिलकुल...'
"नुप भी रहो मीरा, तुम तो सारी लाज-एएम घोलकर पी गई
अमृता एड़ियों पर भार दे मीरा की ओर पीठ कर घूम गई ।
"ओहो-तो तुम्हें क्यों लाज लग रही है ?"
मीरा खिलखिलाकर हंसी, वही पुरानी चार बरस पुरानी हंसी
से अपना मुख फिर पोंछ, अमृता ने मुड़कर मीरा को देखा, नई दुल
पर यही प्यार और सुहाग होता होगा । उसने हाथ फैलाकर अपनी
फिर मुट्ठी भींच ली। तौलिया फैलाते हुए उसने कुछ घुटे-से र
"तुम्हारी खुशी देखकर बड़ी ईर्ष्या होती है मीरा । इसीलिए मैंने डै
दिया है कि मुझे कुंवर से विवाह करने में कोई आपत्ति नहीं।",
अमृता सेटी के किनारे भाकर बैठ गई। उसके गीले बालों से
रह-रहकर टपक जातीं।
"पर तुम तो कुंवर को जानती भी नहीं।" मीरा ने
चुप रही, उसकी दृष्टि बड़े यत्न से सजाए गए अपने
अन्दर कछ टटने-सा लगा।

मूग दर्पण ". TETी तो मानी मो-जमाई को मही से नमारकर दूसरी । आत यह है मौरा कि मैं T Mait दूर पिला माहती है, रहर इरानम्हारे, हरेनोमी मारमा लाई।" मार्ने कानों में टपरते नान-बिन्दुओं पर पुष्टि नमाम रही। भार -जिर, घर मने मारी उहाकर पीसीधा ती तस महानि-स माह की वह सुगी, यह उल्लास होगा II मीरा में उसने हाय रख दिए और अटवाकर पूEel "Thभनुपरिति गमा बहा के चेहरे पर जो माम योath huyesत होकर पह अजिर उसने बहुत मृदुता से कहा : तुम पर मति गमिधा नई रसोई अमृता। मुझे हमेशा यत् सता रहा कि मत मुम्हे कुछ-मुरा भारना करता आया है। तुम्हारे सात र मन यही रनेस है। : ईयांनु नहीं हूं, अमृता गरो महसम कहती ही नही । पर तुम्हारे इस भार- सिक निश्चय से मैं ऐसी मा गई मोरबह गई। मेरे इस प्रश्न को भूल जाओ अमृता कोन जानता था कि हमेशा के सुस्त इंडो इस बार इतनी पुर्ती दिवाएंगे सब बातें तय हो गई। शादी की सारीय निकल आई। निमंत्रण-पन यंट गए औ अमृता अपने में ही ड्वी रही। उसने किसी चीज मे रपि न सी । कोटेज पहन छोड़कर चली आई थी। और डैडी के साथ रहने लगी, क्योकि यही सभी प्रका को मुविधा थी। मीरा अस्वस्थ थी और डॉक्टर ने इस बार उसे आरम्भ से ही बहुत सापधr रहने की चेतावनी दे दी थी। मति कभी-कभी दो-चार मिनट को भा जाता भी कभी अमृता से साथ चलने के लिए आग्रह भी करता । पर अमृता नहीं गई। या के नेत्रों की आकुलता उससे छिपी न पौ। यति के पूछने पर वह क्या र मेरी प्रिय कहानियां वह यति को कैसे समझा सकेगी कि कुंवर से विवाह करने के मूल में कौन-- रक घटना थी? दो-तीन दिन पहले यति प्रेशर-कुकर दे गया था। "विविया तुम्हारी बहुत याद करती है।" यति ने कहा। "मुझे भी उसकी बहुत याद आती है।" अमृता को एकाएक लगा कि वह विया की बात नहीं कर रहे हैं। "यह तो मीरा की ओर से है। मैं तुम्हारे लिए कुछ और दूंगा। ढूंढ़ रहा हूं।" अमृता चुप रही। उसके जाने के बाद ममी और वल्लीमारों वाली मौसी आकर इस बात पर विवाद करने लगी कि वारात के आगमन के समय अमृता को कौन-सा जोड़ा पहनाया जाए। -मुझसे दूल्हन नहीं बना जाएगा। अमृता ने चाहा कि चीखकर कह दे, पर अपने शब्दों की अनुगूंज से वह स्वयं चौंककर रह गई। बढ़ई पेटियां बन्द कर चुका था। और ठक-ठक की आवाज़ बन्द थी। केवल अशोक की शाखों की एक-दूसरे से रगड़ और आम के पेड़ पर के दो तोते पंख फड़- फड़ाते हुए उड़ गए। दीवानसिंह और मनोहर ने पेटियां ले जाकर अन्दर रख दी और ताला बन कर दिया। वह पसीना पोंछते हुए आए और बड़ी-सी काली चाबी उसे पक दी। "तुम दोनों अब किचनर रोड चले जाओ। मैं एक बजे तक आ जाऊंग अमृता ने कहा । फिर उसने कपड़े वदले और दोनों किताबें उठा लीं। उसने था कि यति की ये दोनों कितावें उसे लौटा देगी : अब इनका क्या प्रयोजन यति के साथ आखिरी बार चाय पिएगी और किचनर रोड लौट जाएगी अपने को कल वह अपने उन सम्बन्धियों की दया पर छोड़ देगी। हाथ में मेहंदी लगवा लेगी। मुख पर चन्दन-विन्दु, और उसके बाद फूलों के गहने लेगी। पर आज का दिन उसका अपना; सोचने के लिए, याद करने के मनाने के लिए। ।

मुठा दपंग ६५ अमृता ने रेस्त्रां में जाकर चारों योर यति को घोरते हुए देखा। यन्दरहलका- सा अंधेरा था और धूप से आने के कारण उसे सब कुछ स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहा था। बैंड पर नाच की एक पापुनर धुन बत्र रही थी योर सब बोर घुआं- युवा या। एक कोने की मेज पर से कोई उठा और रमकी ओर बढ़ने लगा। अमृता ने एक क्षण को समझा कि वह यति है। पर ध्यान में देखने पर पापा कि वह तो उने जानती भी नहीं। वह जव ठीक सामने बाकर पड़ा हो गया तो वह एक बापाव से कांपकर रह गई। कुंदर उसे देखकर मुस्कराया: "किमीको योन रही हैं यार?" "जी," बहुत पतले स्वर में अमृता ने कहा । उसने चारों और फिर देखा, पर यति कहीं न पा । समका बसमंजस भाकर कंवर ने रहा: "जब तक आप इनकार करें, तब तक एक प्याला चाय पी लीजिए।" अमृता कुछ मोच न सकी। जाकर बैठ गई। कुंवर शायद माँग कर रहा या क्योंकि उसके पास पूसी पर कई परेट रखे हुए थे। उसका पाला आपा साली था। "आप कॉफी लेंगी या चाय?" कुंवर ने बड़ी शिष्ट और औपचारिक रीति से पूछा। कुंवर को मैन्युकाई उठाते देव तमने वहा : "मैं कुछ खाऊंगी नहीं।" बामने मामने बैठे होने पर भी वह कुंवर को सीधी दृष्टि से न देख सकी। उमकी पीठ दरवाजे की ओरथी, पर सामने दीदार पर स्वच्छ दर्पण का एक लम्बा पनेल लगा या जिसमें उसे आने-जाने वालों का प्रतिविम्ब दिखाई दे रहा पा। कॉफी के छोटे-छोटे यूंट पीती हुई वह दपंग पर बांखें गड़ाए रही। पर उसकी चेतना मजग पी। कुंदर ययायंया, वास्तविक देव लो, अच्छी तरह देख लो।एर छोटा-मा विचार अमृता को उद्विग्न कर रहा था.। अभी समय है, कमी भी सुन वापस जा सकती हो, बपने कॉटेज में,जहां विदिया है, वेम्बी और मोरा- कुंदर ने यचानक ही मेज पर गिपित पड़े अमृता के हाय को अपनी बड़ी-सी हयेनी में दंक लिया। "आर बहुत चितित लग रही है ।" उमने बहेमन्द और कोमल स्वर में रहा। चौकी अमृता की दृष्टि उसकी आंखों से टकरा गई। उसने पहनी वार पंवर से .

- . ६६ मेरी प्रिय कहानियां भरपूर दृष्टि से देखा । कुंवर के चेहरे पर हलकी-सी मुस्कान थी, मुस्कान में आश्वासन और आंखों में गहरा धीरज । अमृता ने अनुभव किया कि उसके झुके हुए हाथ का स्पर्श उसे अनेक अनजाने संदेह दे रहा है । वह एक पुरुष का स्पर्श है, एक प्रेमी का भी-और वह अरुचि- कर, अप्रीतिकर भी नहीं... और तभी उसने सामने के दर्पण में देखा कि हाथों में एक पैकेट पकड़े यति उसे खोज रहा है। अमृता निश्चल बैठी यति के प्रतिविम्ब को ताकती रही। उसने चाहा कि वह अपना हाथ खींच ले, पर उसपर ऐसी जड़ता आ गई, वह हिल-डुल भी न सकी। और यति ने उसे देख लिया। देर तक वह वहीं खड़ा रहा । दर्पण में दोनों की आंखें मिली और अमृता ने अपना हाथ खींच, कॉफी का प्याला ओठों से लगा लिया। यति मुड़ा और बाहर चला गया। अमृता दर्पण को देखती रही, और कुंवर मौन बैठा उसे देखता रहा। अमृता ने एक लम्बी सांस ली : "अब चलू । डैडी लंच पर मेरा इन्तजार कर रहे होंगे।" कुंवर ने बिल चुकाकर अपने पैकेट उठा लिए । अमृता उठ खड़ी हुई। बैंड बन्द हो गया था और चारों ओर वातचीत का हलका-सा रव उठ रहा था। "यह पैकेट आपका है ?" कुंवर दोनों कितावों को उठाकर पूछ रहो था। "नहीं।" अमृता ने कहा और कुंवर के साथ बाहर निकल आई। ।

मोहबंध ऊपर कमरे में अंधेरा-सा हो गया । अचला नीचे चली थाई। नीनू के कमरे का दरवाजा बन्द था, पर नीचे दरार से प्रकाश वाहर या रहा पा । गैलरी में विछी मैटिग से उसके पैरों की आहट दर गई। जब यह बाहर वाई तो देया फि माग के पास, आराम कुरसी पर अघलेटा-सा, तिपाई पर फैलाकर पर हुए राजन सो रहा है। पास की कुरगी पर नीनू की पश्मीने की शाल सापरवाही मे पड़ी हुई थी। उसे हटाते हुए अचला घोरे से बैठ गई। उंगलियों में उंगलियां फंसाकर उमपर ठोड़ी टिका ली और सामने की दीवार देसने सगी। यह रंग की दीवार पर बड़ा-सा चाइनीज चित्र पा-युछ देर उसे देखा, नीली मौत के कार मुके हुए पड़े, नही हलका नीला, कहीं सफेद आकाश । सोते हुए राजन को देश अचला को अचानक नीनू के पत्र को कुछ पक्तियां याद मा गई । तब मीन धरना हनीमून मना रही थी, और उसने अचला को लिया था- "मैं बनती नहीं, अब तक मेरे जीवन में अनेक व्यक्ति थाए और उनमे पृष्ठ के लिए मैंने थोड़ा-बहुत अनुभव किया ही। पर राजन के लिए मेरे दिल में जो वृक्ष है, यह उन भावनामो से बहुत मिन्न और बहुत व्यापक योर गहरा है । म नगी गहराई में स्वयं ही डर जाती हूं। राजन के मामीप्य के बाद मेरे मन में वृष्ट कधी- टने लगता है कि काश, में यती योर वेदाग इन वादों में याठी-उन मदर पोर यमुन्दर चेहरों के प्रेत मुझे घेरा न करते। मैं सच रहती वचमा, मगर कोई दिन ऐमा आया, जबकि मन राजन की मांगों में बग्ने लिए प्यार न पाया, मग दिन मैं मर जाऊंगी-" अचलाने मह पत्र इतनी बार पढ़ा फिउगे मसर-यार पार हो गया। फिर उसके द्वार को कर हवा में उड़ा देने पर भी टगे मगता रहा कि ये यक्षा उमर दिल पर लीरों की तरह यमिट हो गए है। कोयलों पर राम की पर्ने पमती जा रही थी, कभी हवा पलटी धौर पर ९८ मेरी प्रिय कहानियां झुक झुककर एक-दूसरे को छूने लगते । राजन सो रहा था, उसके मुंह पर एक शिशु की तरह सारल्य था। दौड़ते हुए दो नंगे पैरों की आहट-और फिर अन्दर हॉल में नारंगी की आवाज़, "गाड़ी आ गई है, मेमसाव।" और दूर से नीलू का स्वर, "अच्छा ।" कुछ देर में नीलू अन्दर आई-अचला को देख हल्का-सा मुस्कराई । नीलू के अन्दर आते ही राजन ने आंखें खोल दी और उठकर बैठते हुए पूछा, "कहीं जा रही हो ?" नीलू के सेंट की सुवास से कमरा भर उठा। "तुम्हें बताया तो था डालिंग-आज मीनू देसाई के घर डिनर है । क्लब के वार्षिकोत्सव के लिए प्रोग्राम तय करना है।" "वताया होगा, याद नहीं। पर जाना क्या ज़रूरी है ? अचला जव से आई है तुम रोज़ कहीं न कहीं गायव रहती हो।" राजन के स्वर में तलखी थी। "अचला कोई,गैर थोड़े ही है । तुम्हें ऐतराज़ है, डियर ?" उसने अचला की ओर देखा । सदा की तरह नीलू छोटी बच्ची थी जिसे कोई कुछ देना अस्वीकार नहीं कर पाता। "नहीं नीलू, मैं जानती हूं कि तुम बहुत व्यस्त हो।" मोरपंखी नीले रंग की सिल्क की साड़ी के चौड़े ज़री बार्डर को गोरी उंगलियों से ठीक करती नीलू ने राजन को मनाते हुए कहा, "मैं जल्दी आने की कोशिश करूंगी। तुम अचला का ध्यान रखना, अच्छा जाती हैं।" पर राजन ने मुंह फेर लिया और नीचे गिरी हुई पत्रिका उठाकर देखने लगा। नीलू एक पल ठिठकी, फिर कमरे से निकल आई। अचला उसके साथ आई। नीलू ने विचारपूर्ण मुद्रा से कहा, "राजन को न जाने क्या हो गया है। यों ही नाराज़ होते रहते हैं। कितने दिन पहले से कह रखा था कि आज मुझे जाना है, अपना कुछ प्रोग्राम बना लेते। हफ्तों से क्लव नहीं गए हैं। जब से तुम आई हो। कभी उन्हें कहीं जाते देखा है ?" फिर प्यार से कहा, "तुम्हारा सिरदर्द अव कैसा है? अपने को ज्यादा मत थकाना।" अचला उसके कानों में पड़ी हुई लम्बी-लम्बी मोती की लड़ियों को देख रही थी। उसकी कल्पना दो कदम आगे बढ़ गई-मिस्टर देसाई की आंखों की हस- - ।

मोहबंध ६६ फूसी करते थे-"वह कौन है, यह सुन्दर युवती ?" वह मिसेज राजन हैं- "राजन एक लखपती मिल-मालिक का लड़का है। वह किसी महारानी की तरह लगती है।" ओठो को लालिमा, मोतियों की आव-दक्षिणी सिल्क की साड़ी से झलकती शरीर की कमनीय रेखाएं। कार चली गई। जाने के बाद भी अचला बाहर ही यही रही, हवा में ठण्डक थी, तारों में चमक-उसकी सांसों में नीलू की मुगन्ध थी--और उसका दिल बुझा हुआ-नकामना, न ईर्ष्या, न दर्द । लान के कोने में युकलिप्टस के दो बड़े. बड़े पेड़ अंधेरे मे मिर ऊचा किए खहे थे और दिन मे लाल दीखने वाले गुलाब काले पड़ गए थे । अचला का सिर फिर दुखने लगा और यह अन्दर वापस वा गई। गले में विना ओढ़े खड़े-खड़े उसके हाय ठण्डे हो गए थे, मुककर वह कोयलो के पारा बैठ गई। राजन कमरे में नहीं था-वह कब माया, अचला ने नहीं जाना, उस तो राजन की उपस्थिति का पता तब चला जब उसने नीलू की शाल अचला के कन्धे पर डाल दी । पश्मीने का नरम स्पर्श और गर्मी--वह चौंक पड़ी । पर जब राजन ने उसका चेहरा देखा तो पूछा, "क्या बात है ? सिर ददं अभी भी हो रहा है ?" अवलाने स्वीकृति में सिर हिलाया। "अपने कमरे में आराम करो। मैं नारंगो को भेजता हूं। सिर दवा देगी।" अचला माल उतारकर रसने लगी। राजन ने कहा-"मोदे रहो, कपर जाकर भेज देना।" नारंगी नीलू को आया की लड़की थी। अचला का सिर दवाते-दबाते वह बातें करती रही और अचला आस वन्द किए हूं-हां-' करती रही। उसे रह- रहकर यह खयाल बा रहा था कि इतने बड़े डाइनिंग रूम में राजन अकेले ही खाना खा रहा होगा। अचला को लगता है कि जीवन ऐसे ही बीत जाएगा~~और एक दिन मौत नी द्वार पर आ पड़ी होगी। इस अन्तिम क्षण अपनी जिन्दगी पर दृष्टि डालकर उसे लगेगा कि वह जैसे रोती-रोती आई थी, वैसे ही जा रही है। सूरो नामी, पुराने प्रेम-पत्रों के पीले पड़े कागज-सी कुछ स्मृतिया लिए हुए चली जाएगी। अचला के देखते-देखते ही मुजाता को शादी हुई, दो बच्चे हुए--और यह अवता . मेरी प्रिय काहानियां कहती रहती है-जिन्दगी बहुत छोटी है, बहुत मूल्यवान है. "भविष्य की ओर यो, नारी गी सृष्टि इसलिए नहीं हुई कि वह पुरुषों की समानता पार, लड़- यों को अर्थशास्त्र पढ़ाते-पढ़ाते काट दी जाए। सुजाता ने अचला के लिए एक योग्य पान गी ढूंढ़ रखा था, पर अचला को लगता है कि उसके दिल में जो कुछ भी था, गुग गया है --अब वह कुछ महसूस नहीं कर पाती-सांसें आती हैं, दिल धडगता है, पिन्दगी रागाप्त हो गई है। नीने पोर्च में फार रुपाने की भावापा आई। नीलू अब डिनर से लौटी थी। अचला ने अंधेरे में चमकती घड़ी की सूश्यों को देया, एक वजा था। उसके कमरे प मागे से दो जोड़ी पैर गुपार गए । नाराज होने के बावजूद भी शायद राजन अभी तफ नीचे बैठा नीलू का इन्तजार कर रहा था। अचला का मन छटपटाने लगा, किसीको इतना अनुराग, सुख और मान, गिसीके भाग्य में गुछ नहीं, रूप जीत जाए, प्यार हार जाए, उसने कम्बल खींच- पर अपना शरीर ढंग लिया। सोने की चूड़ियों के बीच पड़ी दो कांच की चूड़ियां खन्न रो बोली और बहुत दिनों पहले का एक सपना, एक याद दवे पांव उसकी आंखों के आगे भागर खड़ी हो गई। अचला को लगा कि नीलू उराके पास ही पलंग पर लेटी है। कमरे में अंधेरा है, दोनों जाग रही हैं, पर दोनों मौन हैं कमरे की खिड़की से बाहर इमली का पेड़ दिखाई दे रहा है और उसके पी गीरे-धीरे थका पांद अफेला आकाश गा रास्ता पार कर रहा है। अचला ने मुं आंचल दया रखा है-नीरव अक्षु उसकी कनपटियों से होकर तकिये पर गि रहे हैं-निःशब्द मान्दन से उसका शरीर कांप रहा है। नीलू ने कुछ देर बाहर भाकर गपड़े बदले हैं--पन्ने के रंग की हरी साड़ी का पल्ला अब भी कभी- हिल उठता है। और नीलू के तकिये के नीचे एक पत्र है-"मुझे इस बात खुशी है गि मुझे प्यार भी मिला तो तुम्हारी-सी सुन्दर लड़की का- देवेन्द्र की है, पर नीलू के लिए। अचला मीन रो रही है, नीलू नुप है। रोज तरह उराने लोटकर अचला रो शाम की अपने साथी की बातें नहीं की हैं अचला को मालूम था कि वह देवेन्द्र के साथ बाहर गई थी। देवेन्द्र ने राहसा अपला की बांह कसकर पकड़ ली और फहा, "वह मोहबंध १.१ अचला ? उधर देखो, तुम्हें देव कर रही हैं।" अचला ने हाथ हिलाकर, उत्तर में वेव करते हुए मुसकराकर कहा, "नीनू- मेरे ही कमरे में रहती हैं।" शहर में कुछ इंगलिश एक्टसं आए थे और वह उस रात दोक्सपियर का एक नाटक कर रहे थे। सदा की तरह अबला देवेन्द्र के साथ आई थी और नीनू अपने मित्र कुंवर इन्द्रजीत के साथ बिलकुल मागे रिजर्व सोट्स में बैठी थी। "तो यह हैं तुम्हारी नीनू!" देवेन्द्र ने प्रोग्राम से दृष्टि हटाकर एक बार फिर नीतू की ओर देखा। कटे हुए वालों के फैशन के बावजूद नी नीनू के बाल लम्बे ये--और इस समय उसने जूड़े में चादी का बड़ा-सा आभूषण लगा रखा था, जिसमें छोटे-छोटे घुपरू लटक रहे थे। वह चोकिंग पिंक रंग की साड़ी पर काली शाल ओड़े पी। इंटरवल में अचलाने देवेन्द्र का परिचय उसमे कराया। कुंवर इन्द्रजीत के पास मर्सीडीज कार थी, पर वह नाटे और भारी शरीर के थे। देवेन्द्र लम्बा या, दुबला-अब तक वह बराबर यूनिवसिटी में प्रथम आता रहा था, उसकी योसिस की काफी पर्चा हुई थी, अचला को नीनू पर भी गवं था, देवेन्द्र पर भी । इंटरवल खत्म होने के बाद जब लौटने लगे तो देवेन्द्र ने कहा, "अब तो मापसे मुलाकात होती रहेगी।" नीनू मुसकराई, "हां क्यों नहीं । अचला आपका जिक्र तो हर दफा करती थी, मगर माज यहां न मिलते तो शायद शादी में ही मिलते।" "किसकी शादी डियर ?" कुंवर इन्द्रजीत पूछ बैठे। "अचला की।" नीतू अचला की ओर देखकर शरारत से हसी। "वडीखराव है नीलू !" वापस अपनी सीट पर बैठकर अचला ने देवेन्द्र से पहा । पर देवेन्द्र ने कहा, "तुमने ऐसा पपो कहा नीलू? अभी तो मी निश्चय नहीं है।" नीलू अपने मुंह पर कोल्ड प्रीम लगाते हुए बोली, “यनो मत। जय मे देवेद को पूनिसिटी में नियुक्ति हो गई है, हवा में उड़ती रहती हो। मुझे बहुत अच्छे सगे तुम्हारे देवेन्द्र--तुम बहुत सुखी रहोगी।" "सच नीलू ? मुझे विश्वास नहीं होता। अभी तक उन्होंने कुछ भी नहीं कहा।" "पगली। साल-मर से रोज हाजिरी देते हैं-पंटों बातें करते हैं-सोना - १०२ मेरी प्रिय कहानियां यह सब केवल बौद्धिक मंत्री है !" नीलू ने अचला के दिल के कोनों में दुवकी. विभिन्न आशंकाओं को सुनने से इनकार कर दिया । पर अचला सोचती रही। विवाह में तो कोई बाधा थी नहीं, उसके अपने एक वृद्ध पिता थे, देवेन्द्र भी घर में सवसे लाड़ला था.। ऊपर से कुछ भी कहे, मगर अचला ने मन ही मन देवेन्द्र का घर सजाने की योजनाएं बना ली थीं, आगे जो थोड़ी-सी ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पड़ी थी, उसमें बाग लगाने का मन था, नील कांटे की बाड़, एक गोल घेरे में गुलाब, सामने की दीवार पर चढ़ती हुई कुबेराक्षी की लतर, और फाटक के इधर- उधर इन्द्रवेला के गुम्बज । वेले के कुछ पेड़, जिसके फूल वेणी में लगाए जा सकें उसने यह भी निश्चय कर लिया था कि अगर इन्हीं गर्मियों में देवेन्द्र विवाह करने को कहेगा तो वह फिर आगे फाइनल नहीं करेगी और वह जानती थी कि वह देवेन्द्र के साथ बहुत सुखी होगी। साल-मर पहले जब से लाइब्रेरी में देवेन्द्र से उसका परिचय हुआ था, करीब-करीब हर शाम देवेन्द्र ने उसके साथ विताई थी। अगर कभी आ न सका, तो फोन अवश्य किया। कहीं शहर से बाहर गया तो उसे बरावर पत्र लिखता रहा । चाहे वह देवेन्द्र के साथ किसी शानदार रेस्ट्रां में हो, या शाम के धुंधलके में यूनिवर्सिटी के पास निर्जन सड़कों पर टहलती हो, अचला की आंखें एक अलौकिक आन्तरिक उल्लास से दीप्त रहती थीं। उसे लगता कि नकट्य के इन क्षणों में उनपर इन्द्रधनुप के रंग बरसते हैं, तारक धूलि झरती रहती है और जो कुछ उसने पाया है, वह अत्यन्त सुकुमार और स्पृहणीय है। इसी तरह एक बार सिनेमा से लौटते हुए अचला ने कहा, "अगले हफ्ते एक बड़ी अच्छी फिल्म आ रही है । उपन्यास मैंने पढ़ रखा है, चलेंगे न ?" कुछ क्षण चुप रहकर देवेन्द्र ने कहा, "मुझे इघर बहुत काम है अचला। शायद अब मैं काफी दिनों तक बाहर न आ-जा सकूँ। और तुम्हें भी तो पढ़ना होगा।" अचला का एकदम फीका पड़ गया मुख देखकर उसने हलकी-सी मुस्कान हलकी-सी मुस्कान से कहा, "मैं महसूस करता हूं कि मैंने तुम्हारे मूल्यवान् समय का बहुत बड़ा हिस्सा वरवाद कर दिया। मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण तुम अपनी प्रथम श्रेणी खोओ। अभी कुछ महीने हैं..~ कसकर पढ़ लो।" अचला दांतों से मोठ काटती हुई चुप रही। उसे स्वयं याद आ रहा था कि वह पढ़ाई में कितनी पिछड़ गई है। "मैं तुमसे मिलता रहूंगा, मगर रोज़ नहीं। मुझे उम्मीद है कि तुम सम- । - - मोहबंध १०३ झोगी, अचला।" अचला अपने आंसुओं से लड़ रही थी। न जाने क्यों उसके आगे सहसा अंध. कार-सा हो गया था। उसने कहना चाहा कि वह प्रथम श्रेणी नहीं चाहती, पर साय ही उसे यह भी लग पाया कि देवेन्द्र यह नहीं समझेगा। पर उसके बाद उसने कितावों की गर्द झाड़ी, पढ़ने का टाइमटेबिल बनाया और अर्थशास्त्र की मोटी, नीरस कितावों में अपने को इवाना पाहा। पर असर उसका ध्यान भटक जाता और उन्मन हो पेन्सिल दांत से धमाती हुई वह बाहर देयने लगती। उसे शाम को भी पढ़ते देय नीनू ने कोई प्रश्न नहीं पूछा, इसपर कमी-कमी उसे आश्चर्य होता । नीनू हमेशा की तरह शाम को तैयार होकर बाहर जाती, पर कुवर इन्द्रजीत को कार कम हो दियाई देती। पत्ते झरते रहे, मूनी, उदास हवा निर्जन सड़कों पर भटकती रही, अचला का 'मुख पीला होता गया। उसका जीवन एक लम्बी प्रतीक्षा बन गया था-उस पद- पाप के लिए, जो मुनाई नही पड़ी; पत्र, जो नहीं आया; फोन, जिसकी घण्टी कभी उसके लिए नहीं बजी, और एक दिन पास के कमरे की गुजाता उसके पास माकर बैठ गई और धीरे से चोली, "आज देवेन्द्र का फोन आया था।" चौंककर अचला ने कहा, "कब ? मुझे क्यो नहीं बताया ?" "नीलू के लिए था।" अचला अविश्वास से सुजाता की ओर देखती रह गई। फिर कहा, "क्या तुम्हें पक्का मानूम है ?" सुजाता ने उसका चेहरा देखकर आप झुका लौं-फिर महा, "नहीं किसी और का होगा-मैंने फोन उठाया तो मुझे पहचानी-सी बावाज लगी, तो मैंने सोचा। मगर देवेन्द्र क्यों नीनू को फोन करेंगे ?" "यही तो मैं भी सोच रही थी।" उस रात नीनू लौटी तो अबला ने कहा, "नीतू, तुम्हें देवेन्द्र ने फोन किया पा?" जूड़े से कांटे निकालते नीलू के हाय स्थिर हो गए-"क्यों ?" ग्यों ही पूछा मैंने।" "नहीं तो," नीनू ने अचला की ओर नहीं देखा। "सुजाता को भ्रम हुआ होगा। मैं सारी शाम इसी उलझन में ही १०४ मेरी प्रिय कहानियां . तुम कहां गई थी ?" "कहीं नहीं -जरा-सा इधर-उधर।" नीलू तोलिया लेकर बाहर चली गई, और जव बहुत देर में आई तो अचला सो चुकी थी। कुछ दिन बाद अचला को कुछ डाक टिकटों की ज़रूरत पड़ी तो नीलू की मालमारी खोलकर उसने हमेशा की तरह टिकट ले लिए। जब लेटरपंड रख रही थी, तब एक लिफाफा उसके पैरों के पास आ गिरा । झुककर उठाते हुए उसने देवेन्द्र को लिपि पहचान ली। बिना कुछ सोचे हुए वह पढ़ने लगी-पहले उसे अपने पर विश्वास न हुमा और जब विश्वास हुआ तो कितनी ही छोटी-छोटी बातें, जो उसे परेशान करती रही थीं, एकाएक स्पष्ट हो गई-नीलू, सुजाता, देवेन्द्र''और मुझे प्यार भी मिला तो तुम्हारी-सी सुन्दर लड़की का' देवेन्द्र ने लिखा था। होस्टल के पीछे बांसों के पेड़ थे-उन्हींकी पीली, चुभोली पत्तियों पर अचला जाकर औंधी पड़ गई। हवा में बांस सरसराते रहे-एक अज्ञात पक्षी रह-रहकर बोल पड़ता, पर उसके उत्तर में कोई और आवाज नहीं आती। - . अचला को सुजाता ज़बर्दस्ती बाजार ले गई थी। लौटकर वह थकी हुई, कमरे के मागे की सीढ़ियों पर- खम्भे की आड़ में बैठ गई थी-तभी कमरे का पर्दा हिला, और देवेन्द्र तेजी से बाहर आया-उसका मुख देखकर अचला का दर्द फिर हरा हो आया। हलका-सा अंधेरा था, मगर फिर भी उसे लगा कि देवेन्द्र की आंखों में आंसू हैं । आंधी की तरह जब देवेन्द्र सीधा देखता हुमा उसके पास से गुजरा तो अचला के कंठ से रुंधी हुई पुकार निकली, 'देवेन' और उसने उठना चाहा~पर सुजाता ने कसकर उसकी बांह पकड़ ली और जबतक अचला ने अपने को छुड़ा पाया, तब तक देवेन्द्र गेट से बाहर जा चुका था। अचला की गोद में रखा और उठने से गिर गया ओवल्टीन का डिब्बा, हर सीढ़ी से टकराकर ठक-ठक करता हुआ नीचे आ गिरा। अचला की चीख निकलने से पहले ही सुजाता ने मुंह पर हाथ रख दिया और उसे अपने कमरे में जाकर लिटा दिया। उस दिन के बाद अचला ने देवेन्द्र को फिर नहीं देखा। डॉक्टर ने राय दी कि अचला को घर चला जाना चाहिए, क्योंकि वह नवंस - मोहबंध १०५ देकडाउन की सीमा पर थी। जिस सुबह वह जा रही थी, उससे एक रात पहले नीनू, मुजाता के कमरे में, यवला के पास विशकती हुई भाई थी। बिना कुछ कहे उमने अचला के पलंग को पट्टी पर सिर रख लिया और बच्चों की तरह रोने लगी। . "मेरा कुछ दोष नहीं या अचला~मेरी बात पर विश्वास करो..." टूटे शब्दों में वह कह पाई। अचलाये जाने के बाद भी नीनू उसे पत्र लियती रही। आगे उसने नहीं पढ़ा और अपने माता-पिता के साथ वह विदेश-भ्रमण को पली गई। अपला ने सरे वाद दूसरी युनिवसिटी से एम० ए० किया उसके पिता बहुत चाहते रहे कि उसका विवाह कर दें पर अचलाने नहीं माना। मब छह-सात साल बाद उसरा अपना छोटा-सा पर या, गुलाब भी ये और नील काटा भी। पर बेले के फूल बेणी में नहीं लगाए जाते थे, मिलते थे और झर जाते । अगली सुबह जब राजन नाश्ते के लिए नीचे आया तो नीनू नाश्ता घत्म कर कॉफी पी रही थी। उसने सफेद रंग को सिलकी साड़ी पहन रखी थी और गहरे नौले रंग का गाल ओडा हुया था। वह मुबह के फूलों-सी ताजी लग रही थी, टोस्ट पर जैम लगाते हुए राजन ने पूछा, "माज का क्या प्रोग्राम है ?" और पहले नीनू, फिर अचला की ओर देखा-अचला का मुंह कुम्हलाया हुआ था और उसकी बालों के नीचे कातीपरमाइयो थी। "आज किशनपुर जाना है।" नीनू ने अपराधी सो भुटा से कहा। "मो.-" राजन ने कहा, फिर अचला से कहा, "देखा न. हमारी नोल कितनी व्यस्त रहती है। कभी क्लव का डिनर है, कभी कल्याण-कार्य के लिए किसी पिछड़े गांव में जाना है, कभी विमेन्स लीग की मीटिंग है । अगर नौनू और इनकी तरह अकर्मण्य साथिने यह सब न करें तो देश का उदार कम "तुम समसने की कोशिश क्यो नहीं करते, राजन! में एक दायरे में बंधकर नहीं रह सकती," नीलू ने कहा। "तुम्हारा घर में रहना बायन है ?" राजन ने पूणास्थिति गम्भीर हो मेरी प्रिय कहानियां . - थी। नीलू ने राजन की रोषभरी मुद्रा को देखकर, कुछ फ़ोकी हंसी हंसते हुए बला से कहा, "यह चाहते हैं कि मैं घर में रहूं। कुत्ते पालूं, बाग देखू और पर- चर्चा करूं जैसे कि सब करते हैं। मुझसे नहीं होता। वेहद ऊब जाती हूं।" फिर उसकी नज़र घड़ी पर गई, उठती हुई बोली, "मैंने मिसेज़ कादिर को आठ बजे उनके घर से लेने को कहा था। आठ तो यहीं बज गए।" जाने से पहले उसने अनुनय-भरी दृष्टि राजन पर डालकर कहा, "कल से मैं कहीं नहीं जाऊंगी। सच । फिर घर में अचला भी तो है। तुम अकेले तो नहीं हो।" राजनं चुपचाप अपनी कॉफी पीने लगा, उसने नीलू की बात की उपेक्षा कर दी। एक क्षण खड़े रहने के बाद नीलू चली गई। कार स्टार्ट हुई और चली गई। डाइनिंग रूम में 'निस्तब्धता रही। फिर राजन ने पूछा, "अब सिरदर्द कैसा है ?" "सुबह तो कम रहता है। दोपहर को बढ़ जाता है।" अचला ने कहा। फिर मौन । फिर राजन बोला, "नीलू इतनी व्यस्त रहने लगी है कि मैं अकसर विलकुल अकेला रह जाता हूं। मुझे लगता ही नहीं कि घर में मेरी पत्नी भी है।" "आप भी क्लव चले जाया कीजिए," पिछली रात की बात याद कर अचल - ने कहा। "जब सोचता हूं कि लौटकर इसी अकेले घर में आना पड़ेगा तो कहीं जाने मन नहीं होता।" फिर कुछ रुककर पूछा, "अचला, क्या नीलू को मैंने स्वतन्त्रता दे रखी है ?" उस प्रश्न पर अचला ने कुछ मुसकराकर कहा, "नीलू को अगर आप व रखेंगे तो वह नीलू नहीं रहेगी।" "नहीं, दोष मेरा ही है । मैंने शुरू से ही उसे बहुत विगाड़ दिया । चाहा, दिया, कभी राह में नहीं आया। पर अब सोचता हूं कि मैंने है किया।" फिर अपने को ही समझाते हुए बोला, "मगर नीलू की इच् अवज्ञा करता भी तो कैसे? मैं सबल, समर्थ होने के मद में रहा और बनती हुई, जो चाहती करती गई।" राजन ने अचला की ओर देखा, उसके ओठ, विद्रूपमय मुस्कान आए। | मैं सिर्फ वह व्यक्ति हूं, जो उसे शान-शौकत में र से मोहबंध १०७ मेरा काम तो बस, उसके नाम आए लम्बे बिल चुकाना है । मैं उसके जीवन में गौण हो गया हूं।" "जहां तक नीलू का प्रश्न है, उसके आगे सभी गौण हो जाते हैं." अपना ने अचता की बात की ध्वनि से राजन चौका दोनों हाथों की उंगलियों को एक-दूसरे में फंसाकर, तीक्ष्ण दृष्टि से अपना को देखते हुए उसने कहा, "मुझे सब मालूम है और उसके लिए मैं नीलू को दोपी ठहराता हूं।" "शायद नीलू का दोष इतना न था, जितना"-~-अचला नाम लेने से पहने एक पल रुकी, "कि देवेन का।" "पर अचला। इस वक्त पह ही दूंगा क्योंकि यह बहुत दिनों से सोचता यापा हूँ-वह यह कि तुम क्यों हियोन्स को पानी मिस हैविशम की तरह जिन्दगी नष्ट कर रही हो। उसी अतीत में रहकर, स्मृतियों के पेरे में भटकती हुई देवेन्द्ररी दुर्वल मनुष्य के लिए इतना सब~यों ?" सोच में डूबी हुई अवला ने कहा, "क्योंकि दुर्बल तो मैं भी हूं। अपने दर्द से मोह-सा हो गया है।" उसकी उंगलियां धम्मच को निरद्देश्य पुमा-फिरा रही थीं। "यह बेकार बात है," राजन ने बड़ी ही स्पष्टवादिता से कहा । अचला ने चोको हुई आयें उठाई और बहुत धीरे से कहा, "और-मैं फिर थाहत नहीं होना चाहती। मुश डर लगता है।" चौकने की बारी राजन की थी, "डर लगता है ? पर सभी पुरष देवेन्ट नहीं होते । जरा सोचो, जीवन की लहर तुम्हारे पास से टकरा-टकराकर लोटी जा रही है और तुम किनारे पड़ी हो। तुम्हारे साथ समस्या यह है कि तुम सोचती बहुत हो। सोचो मत और सीधे, वेनिशक नदी में कूद जाओ।" "डूबने के लिए ?" "नहुंक। बचने के लिए। जियो तो पूरी तरह जियो, हर क्षण जियो।" "पर में तो निर्जीव हूं--पूरी तरह मृत।" धुप राजन अचला की ओर सीधी भविषल दृष्टि से देखने लगा। अगला के हाम एक असहाय मुद्रा में उठकर गिरे और उसने बहुत विवशता-भरे ढंग से कहा, १०८ मेरी प्रिय कहानियां "हां, सच......" - "तुम्हारे लिए देवेन्द्र उपयुक्त नहीं था । तुम्हें चाहिए एक ऐसा पुरुप, जो तुम्हें समझ सके, तुम्हारी कमजोरी को अपना बल दे। तुम्हारे शब्दों में, तुम्हें प्राणदान दे। जब तुम ऐसे व्यक्ति से मिलोगी, तो तुम अपने-आप उसे पहचान लोगी। तुम्हारे यह बदलते हुए मूड, सिरदर्द, सब यों, चुटकी बजाते हुए गायब हो जाएंगे। अच्छा, हटामो इन सब बातों को । आज पिकनिक पर चलोगी?" "पिकनिक पर?" चम्मच छोड़ अचकचाकर अचला ने पूछा। "हां, पिकनिक पर।" राजन अचला के अचानक यों पकड़े जाने पर मुसकरा उठा। "पिकनिक पर तो में बरसों से नहीं गई।" "तभी तो।" अचला कमरे में लोटी। राजन की बातों से उसे सहसा, जो धक्का-सा लगा था, उससे वह अभी सम्हल नहीं पा रही थी। राजन को वह कितना सीधा, भिन्न प्रकार का व्यक्ति समझे थी। राजन ने उसे इस तरह देखा-परखा है, इसपर उसे आश्चर्य था । उस मुसकराते बाह्य के पीछे इतना समझने वाला व्यक्ति है, उसकी इतनी सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि है ? उसने नई दृष्टि से, राजन की दृष्टि से, अपने को देखा उसे राजन की इस स्पष्टवादिता पर थोड़ा-सा रोष हो पाया। और उसी मन:- स्थिति में उसने कपड़ों की तह में दबी एक चटक रंग की साड़ी निकालकर पहन ली। बालों को बांधा, माथे पर गोल बड़ी-सी कुमकुम की विन्दी लगाई। आए कहीं के मिस हैविशम कहने वाले, जैसे सिर्फ उनकी नीलू खूबसूरत है । अचला एक क्षण रुक गई, कितना अपरिचित-सा लग रहा था उसका चेहरा-और उतने ही अचीन्हे थे रोष और राजन को गलत प्रमाणित कर देने के वह माव । राजन ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, कार में बैठने से पहले गुलाब की एक कली तोड़कर उसे पकड़ा दी। अचला देर तक उसे सूंघती रही और फिर बालों में लगा ली। न उसने पूछा, न राजन ने बताया कि वह कहां जा रहे हैं। तीव्र गति से जाती कार में अचला का मन उड़ने लगा। मन हो या कि फार चलती ही रहे, बाल उड़-उड़कर माथे पर आते जाएं, हवा गालों, गले को गुदगुदाती रहे, साड़ी का मांचल रह-रहकर फड़फड़ा जाए। उस क्षण अचला .

मोहबंध १.६ वर्षों की निद्रा के बाद धीरे-धीरे जागी, कुहासा भेदकर उसकी बाछल घेतना लोटी | उसे लगा कि उसका हर रोम फिर से सांसें लेने लगा है। वह जीवित है। उसने मुड़कर राजन को देखा। पहली बार देगा एक नये बोध से राजन का गोरा चेहरा; माथे से ऊपर संवारे गए बाल, उसको घनी भौहे. मामने मड़क को देखती सीधी आंखें-उसकी नाक, उसके ओठ, उसकी ठोढी में हलके से गड़े का मामास, उसकी कमीज का बढ़िया कालर, उसकी मेरून टाई, स्टीयरिंग व्हील पर ररो हाप, लम्बे गोल नाखून, उंगलियां बायीं फसाई में घड़ी, जिसकी सेकण्ड को मुई अचला में हृदय को गति के साथ आगे बढ़ रही थी। बहुत बरसो बाद अचला ने किसी पुरुष को इस तरह देखा। "इतने गौर से क्या देख रही हो, अचला?" राजन ने पूछ दिया। अचला हड़बड़ा गई, "आपके माथे पर यह दाग कसा है ?" "बचपन में गिर पड़ा था। बहुत शंतान था मैं ।" राजन ने बताया । कुतुब- मीनार के पास पहुंचकर राजन ने कार रोकी । एक छायादार वृक्ष के नीचे राजन ने सामान उतारकर रख दिया। छोटी-सी शतरंजी बिछाकर अपलाने याने का सामान लगा दिया । कई तरह के संण्डविच, फल, मेवे । पर्मस में गर्म कॉफी।या. पीकर राजन कुछ दूर टहलता हुआ निकल गया और सामान समेटकर एक किनारे रख अचला वही लेट गई, बांह का तकिया लगाकर । अघयुली आखों से नीला आकाश, कुतुब मीनार पर चढ़ते बच्चे देखती रही। पत्तों से छनकर पाती धूप उसके शरीर को हलका-हलका सेंक रही थी। अचला के मन की गाठी का कमाव ढीला होने लगा। उसने मानसिक कपाट बन्द कर लिए और उस क्षण कुछ भी न सोचना पाहा। कि इसी तरह हरी पास पर, लेटी रहे । मन सोए, पर इन्द्रिया जागे-आंखें देखती रहें आकाश का नीलापन, कुतुबमीनार की इंटो की लाली। बच्चों का शोर, सड़क से गुजरती मारी बसो की परं-परं कानों में पड़ती रहे। हाय दुखने सगा तो उसने बिना सोचे ही, पास में उतारकर रथ राजन का मोट सिर के नीचे लगा लिया। करवट ली, तो उसको सांसों में बरसों बाद पुरुष-गरीर की अपनी विशिष्ट गन्ध मर गई, तम्या, पसीने और बनाम हली-सी मुगन्ध, सूसी धरती पर पानी की पहली बौछार-सी चिर प्रिय, चिर नूतन । अवता को जैसे किसी भूले गीत को कड़ी याद आ गई। उसके आगे फिर देवेन्द्र आ पड़ा हुआ, वह मटके से उठ बैठी । राजन का कोट टोक से तह किया। बाल ठीक किए और - ११० मेरी प्रिय कहानियां । साड़ी की सलवटें मिटाने लगी । तब तक राजन भी मा गया। उसे तैयार देखकर पूछा, "वापस चलें?" "चलिए।" अचला उठ खड़ी हुई। दोनों के मध्य में सुखद मौन था, बिना कहे, विना जाने, दोनों के सम्बन्ध में कुछ परिवर्तन आ गया था। न राजन नीलू का पति मात्र रहा था, न अचला नीलू की मित्र । नीलू को वीच से हटा, दोनों एक-दूसरे को पहचान रहे थे। बदली फिर घिर माई । लगातार कई दिन से रह-रहकर ऐसे ही बादल बर- सते जा रहे थे, थोड़ी बूंदें पड़ जातीं। ठण्डक बढ़ जाती । थकी नीलू अपने कमरे में सो रही थी। अचला ने उसकी शाल उठाकर ओढ़ ली और बाहर चली आई। ठण्डी हवा के झोंके से पहले तो उसके रोएं खड़े हो गए, पर बाद में उसे वह स्पर्श वहुत प्रीतिकर लग उठा । हल्की-हल्की बूंदें पड़ रही थीं। अचला ने मुंह ऊपर किया-बूंदें कभी माथे, कभी आंखों पर आ-आकर गिरने लगीं। कहीं कुछ शब्द न था, केवल पत्ती की सरसराहट और अचला के अपने दिल की धड़कन । अचला ने कन्धों पर शाल कस ली-पर उसका मन हो रहा था कि यों ही खड़ी-खड़ी भीगती रहे- "अचला-" पीछे से राजन का कण्ठ सुन वह चौंकी । "क्या कर रही हो - अचला?" - "टहल रही हूं ।" "इस पानी में ? सर्दी लग जाएगी।" "आप भी तो बूंदों में खड़े हैं।" "मेरी वात कुछ और है।" "और क्या ?" "मैं पुरुष हूं। स्वस्थ और सवल ।" अचला मुसकराई, "बड़े स्वस्थ और सबल । मैं कौन कम हूं?". "वह तो मैं जानता हूं।" राजन के स्वर से चौंक अचला उसे अविश्वास से देखती रह गई, फिर वह मुड़ी और घर की ओर चलने लगी। "वस--इतने से ही डर गई । देख लिया तुम्हारा साहस' -राजन ने हंसकर मोहबंध १११ महा। अचला ने पाया, वातावरण का तनाव बचानक ही पम हो गया है। "चलॅन कर रहे हैं। चलिए, उस गम्भ तक चलेंगे।" "चलो।" हवा का वेग अचानक ही बढ़ गया। वचला की माल रा कोना बार-बार उड़ने लगा । उसफी धोती बार-बार परों में उलझने लगी। सड़क पर बंधेरा-सा पा, कभी-कभी कोई मोटर या टकमी निकल जाती। बिजली के खम्भे तक पहुंचते अचला थक गई। दिन में पेड़ के नीचे एक लडका साइकिलों की मरम्मत किया करता था। इस वक्त भी उसकी बॅच रखी थी और पेट के नीचे होने के कारण अपेक्षाकृत मूखी थी। अचला उसीपर बैठ गई। राजन ने उम बंच को दृढ रखने के लिए अपना पर उठाकर रख लिया। कुछ दूर खम्भे का प्रकाश अवता को भीगे मुंह पर पड़ रहा था। अचला अपना मुंह पोछने लगी। राजन ने देगा- उसके पीले गालो पर झुको पलकें और वरौनियों की वक्र पंक्ति, उसके चेहरे की आस्निग्धता। "एक बात कहूं, अचला?" "कहिए।" उसने आखें ऊपर कर राजन को देखा। "तुम्हे कभी किसीने बताया है कि तुम सुन्दर हो ?" अचला ने उसकी आखों में जो पाया उससे वह स्तब्ध, मौन रह गई। "तुम सुन्दर हो, अचला । बहुत सुन्दर।" राजन ने कहा। उसकी प्रतिध्वनि-सा एक दूसरा कष्ठ कह उठा, "नीनू, मुझे प्यार मी मिला तो तुम्हारी-सी सुन्दर लड़को का-" अचला ने ओठ भींच लिए। राजन ने एक बहुत सुन्दर क्षण के बाद को तोर दिया था। अचला राजन की आंघो के भाव पहचान रही है । घुलो पत्तियों से फिमल- कर दें उसपर टपक जाती हैं । अचला के मन में कुछ पकर काटने सगता है: पानी में भीगी चमकती सड़क, दूर-दूर तक कही कोई नहीं, सिर्फ वह और राजन --और तब नीनू ने जो कुछ भी उसके साप रिया, उसकी पीड़ा बचानक मिट गई। वह नीलू से बहुत बड़ी, बहुत ऊपर हो गई। यह मुक्त हो गई है उस शाप से, उस कचोट के बन्धन से, क्योकि राजन की बायों ने उससे कहा है कि वह मप मुच सुन्दर है।

११२ मेरी प्रिय कहानियां राजन की स्थिर, अचंचल दृष्टि से अचला की आंखें बंधकर रह गईं। पारि- जात पुष्पों-सी कोमल सुवासित बूंदें उसपर झरती रहीं। राजन की हथेलियां ठण्डी हैं, अचला का शरीर उस स्पर्श से थरथराने लगता है-उसकी झिझकती उंगलियां आगे बढ़कर उसके माथे का दाग छूती हैं । "अचला"-राजन का रुद्ध कण्ठ उसे पुकारता है। 'और मैंने सोचा था कि मैं मर चुकी हूं।' अचला के मन में यह विचार कौंध गया। अचानक ही जव राजन उसके इतना निकट था, उसके आगे दो आंसू-भरी आंखें आ गई । उसे लगा कि बांसों की चुभीली पत्तियों पर लेटकर कोई अभी- अभी रोया है, उसकी सिसकियां अव भी वातावरण में भटक रही हैं । असीम सुख के उस क्षण में भी अचला ने स्पष्ट रूप से अनुभव कर लिया है कि इस मोहबंध को तोड़कर उसे जाना ही है क्योंकि वे भीगी आंखें उसकी अपनी हैं।

छुट्टी का दिन पड़ोस के पलंट में छोटे बच्चे के चीयन्चीखकर रोने से मापा को नींद टूट गई। उसने अलसी पलकें मोलकर पड़ी देवी, पौने छः बरे थे। फिर उसे याद माया, आज तो छुट्टी का दिन है। उसने पैर फैला लिए । पनमें आंसों पर ढलक आने दी। वह रेशमी चादर का नरम चिकना सशं गालों पर महसूस करती हुई पड़ी रही । नींद की मीठी समारो अब भी उनपर छाई थी। एली हुई घिडकी से सवेरे की ठंडी हवा भा रही थी, पूरी तरह से जगी होने पर भी नीद को बहलाकर फिर बुलाना चाह रही थी। पर यह बच्चा या कि रोए ही जा रहा था। छोटा-सा कोमल गोरा-गोरा बच्चा ! गोल मुंह पर भवों की पतली मी सकारें, लम्बसम्ये रेशमी पलक । जव क्रोधित होकर रोता था तो गोल-गोल मामू गालों पर का फिम- लते थे और सारा काजल अपने साथ वहा ले जाते थे। छट्टी का दिन माया के लिए पहाड़-सा होता था, सप्ताह-मर जो काम टालती माती पी कि उन्हें यत्म करके भी इतना समय बच जाता था कि पोझ उठती थी। और जब भाई-बहनों के साथ घर पर रहती थी तो समझ भी न पानी पी कि हत- वार कर आया और कैसे पंय लगाकर उड़ गया। रोज की तरह याज भी चैती दरवाजे पर धरके देने सगी। तकिये में मंह गड़ाकर माया ने अनसुनी करने की चेष्टा की पर लगातार धयकों के साप पंती ने "बीबीजी" की पुरार लगानी शुरू कर दी तो माया ने टंगी सांस ली, चादर हटा- कर आयें मूंदे ही मूदे, उसने टटोनकर परस्लीपरों में डाले और दरवामी तरफ यही, अभ्यस्त उंगलियों ने घटयनी गिरा दी और सवेरे-सवेरे पतीका मुह न दीय जाए, इसलिए वापस मुडकर अपने विस्तर पर बा गिरी। उनमामन पंती को नरपूर डांट सगाने का हो रहा था, पर पलकों पर नमी मारीपन था। इसलिए यह पर हो रही। ती ने पहले नत योनकर वतन उमई नीचे हार दिए और गरण करती हुई शाह लगाने लगी।

"सोने . दूध मेरी प्रिंय कहानियां तव माया उठकर बैठी।हाथ फैलाकर अंगड़ाई ली, फिर ज़ोर से कहा, दिया न ? क्यों चैती?" धोती का पल्ला कमर में खोंसे झाड़ हाथ में लिए पर्दा हटाकर चैती ने दर्शन दए । कहा, "सोती काहे नहीं ?" और पर्दे के पीछे गायब हो गई। माया उठकर खिड़की के पास आई। इधर-उधर के फ्लैट्स में हलचल हो रही थी। एक तरफ दूधवाला अपनी बाल्टी में मला गन्दा हाथ वार-बार डालकर दूध नाप रहा था। हर बार नाप का वर्तन वाल्टी से टकराता और फिर लोटे में गिरने की आवाज़ के साथ दूध वाले का मोटा खरखराता कंठ कहता, चार- पांच-छः । माया ने गुसलखाने में जाकर वेसिन में नल खोल अपने हाथ उसके नीचे कर दिए । पानी की तेज़ और ठण्डी धार हाथों पर पड़ती रही। चौके से चैती की खट- पट सुनाई देती रही । माया ने गीत की एक कड़ी गुनगुनाने का प्रयत्न किया, पर आवाज़ बेसुरी हो गई। उसकी आंखें वेसिन के ऊपर लगे शीशे में अपना प्रतिविम्व देख रही थीं, सूना मुंह, सूनी आंखें । एक क्षण को उसे लगा कि यह प्रतिबिम्ब किसी और का है। वह स्वयं कैसे इतनी थकी, इतनी टूटी-सी हो सकती है। शीशे के अन्दर से वह अनजान-सी युवती, माया को, जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हो, ऐसे देखती रही, जब तक कि माया ने भीगे, असहाय, विवश हाथों से अपने वाल छूते हुए दृष्टि हटा न ली। उजले, सफेद बेसिन के किनारे पानी की बूंदे फिसल रही थीं। माया की आंखें उस एक बूंद पर टिक गईं, जिसे सूरज की पहल किरन ने इन्द्रधनुषी रंगों से सजा दिया था। वृंद हिली फिर चिकने वेसिन ' फिसलती हुई पानी की धारा में मिल गई। माया ने रुकी हुई लम्बी सांस बाहर आ जाने दी। फिर अपने पर जैसे क पा, दोनों हाथों से अंजुलियां भर-भर अपने मुंह पर ज़ोर से छींटे देने लगी। तरह पानी भरती और मुंह पर उछाल देती, विना कुछ सोचे, विना कुछ सोचने यल किए। फिर उसने नल बन्द कर दिया। तौलिया उठाई और उसके नरम नरम में अपना मुंह छिपा लिया। कुछ देर बाद उसने हाथ बढ़ाकर तौलिया स्टेप फेंक दी। तौलिया ज़मीन की ओर तेजी से गिरी, पर तभी खूटी में उसका फंस गया और वह झूलती रही, धीरे-धीरे वेवस-सी, पर माया ने उधर नहीं हीदिन १५ वह फिर पंजों पर जोर दे शीशे में शांकने लगी थी, एक अदम्य भागा मिए कि शायद इस बार वह झांकने वाली युवती पहले से मिल हो और यह मुछ मिन पी भी, आखें कुछ जरा-सी फैली थी परोनियों में, भौहों में पिपना गीतापापा, उजले कोयों में बड़ी-सी तरल पुतलियां, मोटो में कोमलता, माया के देश-देवत वह बिचे और पुल गए। उस छोटी-सी मुस्कान ने सारे पहरे पर एक नमनीय स्निग्धता ला दी। माथे को घेरे हुए जो बालो की पटेंपी, उनमे पुछ यूं उममी पी, माया ने गदंन मोड़ी तो कनपटी के पास एक यूद में उग रंग दियाई दिए, दर सारे रंग, चमकते हुए, झिलमिलाते हुए, तड़पते हुए, यहीं वह गिर गगाएंग डर से माया शीशे के आगे से हट आई। दरवाजा बोला और कमरे में भारर कुर्सी पर पर उठाकर बैठ गई। हाय गाल पर टिकाकर सोपा, और अब? चैती पास की मेज़ पर चाय पहले ही रय गई थी। रोजगी तरह मोटे, पांग, बेढंगे, कहीं गीले, कही कई, टोस्ट पे, रोज-रोज का गुनहरी धारी पाना मानुक प्याला या, वही कढ़ी हुई फोजी थी, जिमपर एक चिड़िया पंग धोयकर र पो तैयार थी। पर उड़ेगी नहीं, उड़ सकती भी कंगे पी? उगे दंगकर मायामा मन एक निरयंक याक्रोश से भर उठा था। उसका मन हुमा किपर से टोरर मारगर मैज़ उलटा दे और सारे वतन यनधनाकर जमीन पर जागिरें। पीनी बनी के टूटने की यावाज कितनी प्रिय होनी है ! पर मन में उगम्यमा यंतारा लगा और यह मोच कि बैंकार में नये मरीदने परेंगे, टमने मरने को रोक लिया और प्याले में पाप उदलने लगी। गरम चाय को गले से उतार यह फिर पिए पाग पाकरही हो गई। नीचे मड़क पी, कहीं-कहीं तारकोस हद जानेर बाराही मारेको थे। अगर किमी तांगे या पहिला उममें फंस जाता हो पावर कटारगर मायारा एक गाली दे उठना, यगर खिोपा पहिया होता तो मिसमा रपमाटर निगलने माँ कोकिंग करता मोर अगर तव मीन निवडामा मारिगोटा रना पड़ता । इस वाया गे उनके चेहरे रोप गे सार हो र अंगोद में माया पॉछतारिकतावासा,ौर मवाग्दिां मरीदनीमार से मिर हिनाते नारों में दूर हो पाती। मरक में टम पाएर नाद मी, पुगनी-मी, मिं मामा की गत पालकी, पराशर, बिमार एटिगोनम की पता छापा और पोटियारा निर्ग, ६ मेरी प्रिय कहानियां - - गहरे बैगनी रंग में फूलती हुई घनी बेगमवेलिया थी। अपने वैभव में लचकती, मती, वल खाती। जवहवा आती तो माया अपनी खिड़की से उनसे बैंगनी रंगके ल टूट-टूटकर उड़ते हुए देख सकती थी। उन तीन पंखुड़ियों के फूलों में कितना ग था, कितनी मृदुता, पर माया के दिल में वह एक धनी पीड़ा भर जाते थे। इस वक्त सूरज की किरणे वेगमवेलिया पर पड़ कर उसके रंग को और चटकीला बना रही थीं। सुबह की हवा से कभी-कभी कोई फूल नीचे भटककर आ गिरता था। माया उसमें डूवी हुई थी, रमी हुई थी, हाथ खिड़की पर टिके थे, आंखें सामने, उसने नहीं जाना कि कब चैती आई । जव पायदान के पास बैठकर उसने दो वार झाडू, ज़मीन पर पटकी तो उसने आंखें हटाईं। वह कल्पना और स्वप्न थे, यह कमरा, ये दीवारें, यह बन्धन, जीवन और सत्य । मालकिन का ध्यान अपनी ओर आकर्षित हुए देख चैती ने कहा, "खाएका का बनिहै ?" इतवार का दिन है, छुट्टी का दिन, आज तो कुछ विशेष खाना बनाना चाहिए, चैती को स्वामिनी का खोयापन अच्छा नहीं लगा। "न खावे का शौक न पहिरे का!" सिर हिलाते हुए उसने जो झाडू पटकी तो लाख की एक चूड़ी चट से टूट गई। उसके टुकड़े वीनते हुए चैती ने कहा, "का वनाई ?" "कुछ भी वना लो।" माया ने उदासीनता से कहा। "खिचरी डाल देई ?" व्यंग से चैती ने पूछा "अयं खिचड़ी. ..'वही बना दो।" माया ने कहा। तव चैती ने कहा, "ऐ बिटिया । तोहार अस परानी हम नाहीं देखा, न कब कछू खायें न बनवायें। हमहूं आदमी हन । हमरो मन है, हम खीर-पूरी खाद कहै देइत है । दूध हम ले लिया है।" चैती ढीठ हो गई, पर माया ने कुछ नहीं कहा । हटकर चली आई औरकपन की अलमारी खोली, कुछ रेशमी कपड़े धोने के लिए सप्ताह-भर से रक्खे थे, वाहर किया, और जाकर गरम पानी में सावुन घोलकर डाल दिए, अनमनी हो फ़िर आकर अपनी मेज़ पर बैठ गई । एक ओर कापियां रखी थीं। उनपर की गहरी परत थी। माया ने लाल पेंसिल उठा ली, धूल झाड़कर एक कापी खे गलतियों पर गहरे लाल निशान लगा दिए, पर मन उसमें भी नहीं लगा। + . मे एटी का दिन बढ़ाकर पास फी छोटी मेज पर से अपवार उठा लिया, पोला। अचानक ही वह कुर्सी सिप्तकाकर उठ पड़ी हुई, पड़ी पर नजर गाली तो पापा कि बड़ी आसानी से दस बजे को फिल्म देखी जा सरती है। पाकर फिर अलमारी खोली ।कुछ सोचकर एक साड़ी निकालकर पलंग पर रख दी और पार होने लगी । अभ्यस्त हाथों ने बाल ठीक किए । पाउडर लगाया । मुछ देर अपने को देखती रही और फिर लिपस्टिक उठाकर अपने ओंठ, यूप गहरे साल फर लिए। कपड़े बदले और चैती से कहा, "मैं सिनेमा जा रही हूं।" चेती ने पूछा, "क्व तक यइहो ?" "यही बारह-साढ़े बारह तक," और पर्स उठाकर बाहर आ गई। पुली खिड़की से हवा आई और अखबार के पृष्ट उड़कर फर्श पर जा गिरे, युसी मापी के पेज सरसराते रहे, मेजपोश का कोना हिलता गया। यौर हाल में बैठी माया को लगा कि जिस अकेलेपन से बचना चाहकर वह सिनेमा चली आई थी, उससे निकृति कहा हुई ? अमी उसकी नितान अले बैठकर सिनेमा देखने की आदत नही हुई थी, कुछ विचित्र और अटपटा-सा लग रहा था। इंटरवेल में उसने एक उड़ती-मी नजर से इधर-उधर देखा तो पाया कि कालिज की संस्कृत टीचर मिसेज भारद्वाज भी कुछ दूर पठी हैं, उन्होंने भी माया को देखा और हाय हिलाकर पास बुलाया । माया को उनका साहवयं विशेप प्रिय न पा पर यह सोचकर कि एक से दो भले, उठकर उनके पास चली गई। "अकेली हो हो ?" प्रश्न हुआ। मिसेज भारद्वाज को तीव्र दृष्टि माया पर थी। "जी।" "आज तो तुम पहबानी नही जा रही हो," कुछ घ्यंग्य से मिरोउ भारदार ने उत्तर मे माया ने मुस्करा-मर दिया। तभी एक वयस्य से सज्जन उसकी ओर देगते हुए पास आ गए। मिसेर भारद्वाज ने कहा, "यह मेरे पति हैं, मि० मादान। बार मिग महान "हमारे कालेज में हिन्दी पढ़ाती हैं।" मि० भारद्वाज ने नमस्कार किया और पामवाली सीट पर बैठ गए । कुछ वार्तालाप करने का प्रयास करते हुए पूछ दिरा, "अभी हो मआई हैं आप?"

११८ मेरी प्रिय कहानियां । कुंठित हो माया ने कहा, "जी।" पली की मोर उन्मुख होकर पूछा, "चाय वगैरा कुछ मंगवाऊं?" "मंगवा लें। यह साड़ी बड़ी प्यारी है ! यहीं से ली है ?" मिसेज़ भारद्वाज ने पूछा। "मदर ने भेजी है।" "आपका घर यहां नहीं है ?" मि० भारद्वाज को जैसे कुछ बात करने का विषय मिला। "जी नहीं," और फिर कहा, "लखनऊ में है।" "वहां से आप यहां आई? इस छोटे शहर में ?" माया की मुस्कान अनजान में ही विषादपूर्ण हो गई । कहा, "यहां आसानी से नौकरी मिल गई।" "आपको कभी पहले नहीं देखा।" पति को धीरे-धीरे खुलते देख मिसेज़ भारद्वाज ने कुछ चेतावनी के से स्वर में कहा, "यह नई आई हैं इसी साल।" वेयरा के चाय ले आने से व्यवधान पड़ा। माया ने अभी एक बूंट ही चाय पी थी कि हाल की रोशनी बुझ गई । उसके उठने का उपक्रम करने पर मिसेज़ भारद्वाज ने वाह पर हाथ रखकर रोकते हुए कहा, "यहीं बैठी रहो न!" माया फिर वैठ गई, पर उसका मन हो रहा था कि वह मिस्टर और मिसेज़ भारद्वाज के बीच की सीट से उठ इधर मिसेज भारद्वाज के पास बैठ जाय पर यों उठ जाना अभद्रता होती। मि० भारद्वाज शालीनता से बैठे रहे। कभी भूल से भी उनकी कोहनी या कन्वा माया से नहीं छुमा, पर कुछ हंसी की बात पर उनका जोर से, खुलकर हंसना माया को खटक जाता था, आखिर ऐसा ठहाका कि हाल गूंज जाए, लगाने की क्या ज़रूरत? वीच में माया ने अपने को झिड़का भी, कि इस जरा-सी बात पर वह वेकार ही मन-ही-मन क्यों कुढ़ रही है। फिल्म अधिक लम्बी न थी। जब समाप्त हुई तो माया ने मानसिक यातना से छुटकारा पाया। शिष्टता के साथ, जितनी जल्दी उनसे छुट्टी ले सकती थी, लेकर माया अलग हुई, पर अभी उसका मन घर आने को न हुआ। सड़क के एक किनारे खड़े होकर कुछ देर सोचा कि और क्या किया जाए। ध्यान आया कि रिश्ते के एक भाई यहीं कहीं आसपास रहते हैं और माया के न आने का कई बार छुट्टी का दिन ११६ उलाहना दे चुके हैं। उनके पर आधा घंटा बिता आया जाए । पर्स में एक स्लिप पर उनका पता लिया था, उसे ढूंटकर निकाला। घर उनका आमानी से मिल गया। यांगों को बांधकर एक पेरा-गाधना दिया गया था। कुछ सूखे-सूरो टमाटर के पेड़ और कुछ गेंदे फूल रहे थे। मामा ने दरवाजे पर थपकी दी। कुछ देर में एक महिला अन्दर से मोकी, अन्दाज से सोच- कर कि यही भाभी होंगी, माया ने नमस्कार कर कहा, "चन्दन पाई पाहन ? मैं माया हूं।" भाभी उत्तर में मुसकराई और दरवाजा योलते हुए कहा, "आए।" कमरे में एक गन्दी-सी निवाड़ का पलंग पढ़ापा, पास ही चारपाई पी, जिम परविस्तर विछा था। एक गीली-सी गद्दी भी थी और मिरहाने छोटे बच्चे के कुछ कपड़े। "वैठिए।" माया पलंग को पट्टी पर बैठ गई. मामी की धोती मती भी और उसमे मे घो की तेज महक आ रही पी। "आपने मुझे पहचाना न होगा। पन्दन भाई साहब की पाची है न."वह मेरी बुआ लगती है।" सम्बन्ध जानकर भाभी ने कहा, "ओ बांदे वाली सासजी की आप मतीजी हैं !. इन्होने जिक्र तो किया था।" "कहाँ हैं भाई साह्य ?" माया ने पूटा। "आज इतवार है, घूमने चले गए हैं।" उत्तर मिला। "कब तक लौटेंगे?" फिर यह देय कि यह अगी राठी ही है, माया ने कहा, "आप भी तो बैठिए।" "चूल्हे पर तरकारी घड़ी है।" और उसका प्यान आते हो भाभी बोसी, "अभी दो मिनट मे आई।" बहकर कमरे से पली गई। माया उसी तरह पट्टी पर बैठो निरुद्देश्य इधर-उधर देखती रही। कमरे के बार बरामदा पा और गीत निस्ट शायद चौका, क्योंकि कढ़ाई में पली पलने की बाया साफ मुनाई रहो यो । फिर एक नाका हुआ, सायद पानी डाला गया और फिर हाप मेंदरी लिए मामी आई और कहा, "उठिए, इमे शिछा दूतो पाराम से बैटिए।" दरी मिटाते हुए कहा, "आज तो मापकी एट्री होगी, इतवार है।"

१२० मेरी प्रिय कहानियां - "जी।" "आपको तो खूब अच्छा लगता होगा।" प्रश्न सुन माया कुछ देर चुप रही, फिर कहा, "जी हां, लगता तो है । वैसे तो कालेज का ही काम रहता है। कभी-कमी.इधर-उधर चले गए, सिनेमा वगैरा। अव सिनेमा से ही आ रही थी, सोचा कि मिलते चलें।" बड़ी हसरत से भाभी ने कहा, "अकेले रहने में तो यह है ही, जो मन आया, कर लिया। शादी से पहले मुझे सिनेमा देखने का बड़ा चाव था, मेरे एक चाचा गेटकीपर थे, सब मुफ्त में देखते थे, पर अब तो साल-डेढ़ साल से कोई सिनेमा ही नहीं देखा । मुन्ना छोटा है, घर में कोई है नहीं। छोड़ें भी किसपर? कौन-सी फिल्म देखी आपने ?" माया ने फिल्म का नाम बताया। "अंग्रेजी की थी।" भाभी बड़ी सचाई से बोली, "भई हमें तो कुछ समझ में नहीं आती। दो-एक वार गए भी, पल्ले कुछ नहीं पड़ा," फिर रुककर मामी ने पूछा, "आप तो शायद वी० ए० होंगी ?" "जी नहीं, एम० ए०," आहिस्ता से माया ने कहा । भाभी ने एक लम्बी सांस ली, कुछ कहने को मुंह खोला, फिर रुक गई । वात बदलकर कहा, "खाना परस लाऊ, आपके लिए ?" "जी नहीं, नौकरांती ने बनाकर रखा होगा । अब मुझे चलना चाहिए।" "कुछ देर तो रुकिए।" भाभी के स्वर में कुछ विशेष आग्रह नहीं था। माया जैसे एकदम उकता गई। उठती हुई बोली, "अब चलू, भामी जी, कभी हमारी तरफ भी आइए।" "कहूंगी उनसे, लाना न लाना उनके हाथ है।" भाभी ने जल्दी से हाथ जोड़ दिए । वाहर निकलते हुए माया को लगा कि वह बेकार ही आई, भाभी को शायद काफी काम हो, पहुंचकर वाधा दी। घड़ी पर नजर डाली, सवा बारह बजे थे। कुछ-कुछ भूख भी लग आई थी। बांस का फाटक खोलकर बढ़ी ही थी कि चन्दन से भेंट हो गई। "अरे वाह, माया! किधर जा रही हो?" पकड़े जाने पर माया ने रुककर कहा, "घर जा रही हूं। आई थी, आप मिले ष्ठी का दिन १२१ ही नहीं।" "अब तो मिल गया। चलो, पलो, अन्दर चलो। अपनी भाभी से मिनी 1" "जी, भाई साहब, ममी माफी चाहती हूं। फिर आऊंगी।" पर यह नहीं माने योर चेतकल्लुफी से उसका हाथ पकड़ लिया और महा, "नहीं, विना साना पाए नहीं जा सकोगी।" माया ने हाथ छुड़ाने का प्रयत्न किया, पर पन्दन हाप पकड़े-पकड़े ही अन्दर तक ले गए और जोर से पुकारकर कहा, "सुनो, एक मेहमान आए हैं।" मामी घौके से बाहर बाई और देखा, फिर कहा, "मैंने तो पहले ही करने को कहा पा." फिर माया के मुख की ओर देवकर बोली, "हाथ तो छोड़ वैचारीका।" उसके कहने का ढंग ऐसा पाकि चन्दन ने तुरन्त उसका हाय छोड़ दिया, फिर कुछ अप- राधियों की तरह कहा, "खाने का इन्तजाम करो।" "हो रहा है।" रुसाई से कहकर यह पापस चली गई । पन्दन और माया ने स्पष्ट रूप से महसूस किया कि उसे प्रसन्नता नहीं हुई है। माया ने फिर कहा, "माई साहब, बेकार संघट होगा, मेरी नौकरानी इन्त. जार कर रही होगी।" "झंझट क्या? खाना ममी बना जा रहा है।" स्वर ऊंचा कर उन्होंने पत्नी को पुकारा, "सुनो, जरा जल्दी कर दो।" अन्दर से उत्तर आया, "कर रही हूं। पहले जरा मुन्ने को नहला दू।" तब माया जाकर उधर पड़ी हो गई, कहा, "भाभीजी, आपको परेशानी हो रही है, मैंने तो कहा था-" भाभी धूप में बैठकर बच्चे को नहलाने की तैयारी कर रही थी । मापा को भूध लगने लगी थी। जहां वह यही थी, वहीं से झांककर देया, पूल्हा पाली था। बच्चा चीख-चीयकर रोता रहा, मामी उसे साबुन लगाती रही। उसरे वेग से सग रहा था कि जैसे आज ही रगह-रगडकर बच्चे को गोरा कर देगी। माया टी. चंठी अपने को कोसती रही कि किम हग में उसने यहां आने को मोपाायाधिर- कार मामी ने बच्चे को पोंछर भापडे पहनाए और कपडे पहनाकर पानने में लिटा दिया और कहा, "वरा दही ला दीजिए, रायता बन जाएगा ।" "नहीं नहीं," माया ने जल्दी से पहा, "रायते की कोई जरूरत नहीं।" पर मामी ने नहीं सुना । पन्दन भाईमाहर दही सानेको भेर दिए गए, भाभी १२२ मेरी प्रिय कहानियां 1 ? चौके में जाकर खटर-पटर करने लगी। बच्चा रोता गया, माया ने उठकर उसे गोद में ले लिया। हिलाया, डुलाया, तो वह चुप हो गया। उसे कन्धे से लगाकर माया ने बरामदे में कई चक्कर लगाए, फिर देखा, वह सो गया था, धीरे से लिटाया तो फिर वह जग गया। उसके चीखने से पहले ही माया ने उसे फिर कन्धे से लगा लिया और टहलने लगी। घूमते-घूमते उसके पैर थक गए, कन्धा दुखने लगा पर भाईसाहब दही लेकर नहीं लौटे। भाभी रोटी बनाने का सारा आयोजन कर चूल्हे के पास चुपचाप बैठी थी । माया से कहा, "देखा, जहां जाते हैं वहीं के हो रहते हैं । दो कदम पर बाजार है।" फिर एकाएक उठती हुई वोली, "जानें कब तक आएंगे, मैं नहा लूं । माप कहें तो आपको खाना परस दूं।" "भाई साहब को आ जाने दीजिए।" माया ने कहा। भाभी उठकर मन्दर गई । गुसलखाना बन्द किया ही था कि भाईसाहव आ गए । प्रश्न-भरी दृष्टि से इधर-उधर देखा । माया ने अपने-आप ही कह दिया, "नहाने गई हैं।" "नहाने गई हैं ? यह नहाने का टाइम है, ? इनके सब काम उलटे होते हैं।" कहकर दही उन्होंने रख दिया और बाहर से कुण्डी खड़काई। भाभी चुप रही। माया ने बच्चे को पालने पर लिटा दिया। इस बार वह सोता ही रहा । वह थकी थी और भाईसाहब झुंझलाए, दो-एक बात कर दोनों चुप हो गए, और प्रतीक्षा करते रहे कि कब भाभी निकले। भाभी साफ-सुथरी धोती पहनकर बाहर आई, माथे पर बिन्दी लगाई। मांग से सिन्दूर छुआया । विना किसी जल्दी के धीरे-धीरे चौके में आकर बैठ गई। रायता बनाया। चूल्हा फूंका। फिर उसने पूछा, "कहां खाएंगे? चटाई विछा लें । वह रखी है कोने में।" माया ने चटाई विछा ली, सेंडिल उतार डाले, हाथ धोकर चौके में गई, और थालियां उठाकर बाहर ले आई। दाल एकदम ठण्डी और पतली थी। “रायते में काफी ज्यादा नमक | माया को बरबस चैती की बनाई नरम-नरम पूरियां और मेवे की खीर की याद आ गई । खाने के बाद कुछ देर वह और बैठी। जव भाभी स्वयं भी खा चुकी, तब वह विदा लेकर आई। चैती शायद इन्तजार करते-करते थककर चली गई थी। माया ने अपने पास की दूसरी चाभी से ताला खोला, घड़ी की सुइयां तीन पार कर चुकी थीं। कमरे ।

छुट्टीमा दिन १२३ को छोह में मयुर शीतलता पो। माया ने सेंडिल उतार दिए। पर्स मुर्गी पर गल दिया और पोकेको तरफ गई। याना सब दंका रवा पा! पूरियां, सूघी मदद दम आलू तथा गाढी मेवे की पोर । लगता था कि ती ने भी पापा नहीं था, कुपित हो भूयो ही पर चली गई थी। माया वहां से गुमतणने में गई । उसको माय जल रही थी। सोचा कि ठण्डे पानी से धो ले सब उसकी दृष्टि पड़ी उन कपड़ों पर, जिन्हें गरम पानी और सावुन में हुबाकर यह बिल्कुल भूल गई थी। उसने अपट- कर कपडे अलग-अलग उठा लिए। एक ब्लाउजका पीला और हरा रंग निसलकर दूसरी ब्लाउजो और सफेद सिल्क की साड़ी में लग गया था। दोप अपना ही पा, फिर भी न जाने क्यों उसे रोना आ गया। रेशमी म्लाउज के कच्चे निमन जाने पर नहीं, बल्कि अपनी जिन्दगी के पटनं पर, उसके पोपलेपन और सारहीनता पर। किसलिए वह घर-बार छोड़कर इतनी दूर माफर पड़ीपी, किसलिए यह सुबह से शाम तक कालेज में मगजपच्ची करती थी। इसलिए कि जिन्दगी के दिन एक-एक करके गुजरते जाएं और हर गुजरा हुआ दिन उमरे जीवन का घालीन और भी गहरा करता जाए और एक दिन वह सोचे कि इस जीवन में उमने या पाया, तो पता चले कि वह एक लम्बे अनन्त मास्पल की तरह था। माया ने ब्लाउज फिर उन्हीं कपड़ों में डाल दिया और पाकर बोधी हो पलंग पर पर गई। जव वह जगी सो कमरे में अंधेरा था। धूप न जाने कब की पिटको की राह चली गई। घड़ी की सुइयां अंधेरे में चमक रही थीं। रोते-रोते सो जाने मे उगमा सिर पुरी तरह ददं कर रहा था। इतवार की शाम को घेतो नही माती थी।माया ने उठकर पानी पिया और ममरे में बत्ती जला दी। मेज के पास जाकर दुर्मी पर बैठ गई। मेज पर कापी पली पड़ी थी। लाल पेंसिल के निशान पमा रहे थे। माया बहुत देर तक बंटी-बैठी चिड़की से बाहर देयती रही। यासामान में दो-एर तारे निकल पाए थे। पड़ोस में दूध वाला बाल्टी पटका रहा पा। दूप नारता हुया, मोटे-से एकरस स्वर में फह रहा था। दो-तीन' पार..." मीदियों पर ऊपर-नीचे आते-जाते जूतो की आवाज वा रही थी। गुसलयाने में कपड़े भीग रहे पे। पोके में ठण्डा ग्राना रणा हुआ पा बोर कनपटी के पास एक गिरा पुरी नाह दुप रही थी। धीरे-धीरे मासाश झाला हो गया। वारों से ज्योति में उसनता पा गई।

१२४ मेरी प्रिय कहानियां
आने-जाने वालों का रव थम गया, माया एक सांस लेकर उठी। बिजली बुझाकर
फिर पलंग पर लेट गई । उसे पता था कि नींद रात में बहुत देर से आएगी। फिर
भी आंखें बन्द कर ली।
कहीं घड़ी ने धीरे-धीरे आठ के घण्टे बजाना आरम्भ किया, माया ने करवट
बदली। अगला दिन, काम का दिन......

जिन्दगी और गुलाब के मुबोध काफी शाम को घर लोटा। दरवाजा पुला पा, मरामदे में ही रोपनी पी, और चौके में आग की लपटों का प्रकाश था। अपने कमरे में घुसते ही उसे वह धाली-वाली-सा सगा। दूसरे राम ही वह जान गया कि कमरे का कालीन निकाल दिया गया है और किनारे रखी हुई मेड भी नहीं है। मेर पर कागज के फूलों का जो गुलदस्ता रहता था, वह ए ऐसे कोण से विही पर रया था कि लगता पा, जैसे मेज हटाते या उसे यहां से ही रप दिया गया हो। उसने बहुत कोमलता से गुलदान उठा लिया। कार के पूल पे तो गया, गुलदान तो बहुत बढिमा कट ग्लास का था। पहले कमी-कमो शोमा अपने माग गुलाव सगा जाती पो, पर अब तो इधर, कई महीनों से यही बदरंग फूल पे और शायद यही रहेंगे। सुबोध ने फिर पिडको पर गुमपान रयते हुए सोपा, हो, यही रहेंगे, क्योकि शोमा की सगाई हो गई थी, और उसका माथी पति पिसी पन्छी नौकरी पर पा । सुबोध ने कोट उतारकर घूटी पर टांग दिया."आपिरसवर शोभा के पिता उसके लिए अपनी सहकी कुवारी बैठाए रखते ?:"गुरोध विकी के पार देख रहा था-यूल-मरी सांश, पर घेहरे, युगे हुए मन.. फिर वह मो के पास आया । मफी मां पौने में पूरहे के पास बैठी थी। पह यहीं पीढ़े पर बैठ गया। कुछ देर कोई नहीं बोला। मां ने दो-एक बार नगे देगा परूर, पर कुछ कहा नहीं, परपर की मूर्ति की तरह बैठी रहो, ऐसी मूनि मिमी केवल अधेि जीवित थीं। एकाएक सुबोध पूर बैठा, "अम्मा, मेरे कमरे का कालीन हो गया? 4 में डाला पा क्या?" बायें हाप से धोती का पल्ला सिरपरीपती मा बोली, "ता भरने कमरे में ले गई है। उसकी कुछ सहेलिया ओर गाने पर माएंगी।" सुवोध को अपने पर मारय माकि यह इतनी-सी बात पहले ही मरों ।

१२६ मेरी प्रिय कहानियां समझ गया ? उसकी सारी चीजें वृन्दा के कमरे में जा चुकी थीं, सबसे पहल पढ़ने की मेज़, फिर घड़ी, आरामकुर्सी और अव कालीन और छोटी मेज़ भी। पहले अपनी चीज़ वृन्दा के कमरे में सजी देख उसे कुछ अटपटा लगता था, पर अव वह अभ्यस्त हो गया था यद्यपि उसका पुरुष-हृदय घर में वृन्दा की सत्ता स्वीकार न कर पाता था। उसे अनमना हो आया देख मां ने कहा, "तुम्हारे इन्तज़ार में मैंने चाय भी नहीं पी । अव बना रही हूं, फिर कहीं चले मत जाना।" और पतीली का ढंकना उठाकर देखने लगी। सुवोध दोनों हाथों की उंगलियां एक-दूसरे में फंसाए बैठा रहा । उसके कन्धे 'झुक गए और उसके चेहरे पर विषाद और चिन्ता की रेखाएंगहरी हो गई। सशंक नेत्रों से मां उसे देखती रही। मन-ही-मन कई बातें सोची । कहने की, मौन का अन्तराल तोड़ने की, पर न जाने क्यों वाणी न दे सकी। उसकी आंखों के सामने ही सुवोध बदलता जा रहा था। इस समय उसके नेत्र मां पर अवश्य थे, पर वह उनसे हजारों मील दूर था। मौन रहकर जैसे वह अपने अन्दर अपने-आपसे लड़ रहा हो । काश, सुवोध फिर वही छोटा-सा लड़का हो जाता, जिसके त्रास वह अपने स्पर्श से दूर कर देती थी। पर सुबोध जैसे अब उसका बेटा नहीं था, वह एक अन- जान, गम्भीर, अपरिचित पुरुष हो गया था, जो दिन-भर भटका करता था, रात को आकर सो रहता था । सुख के दिन उसने भी जाने थे। अच्छी नौकरी थी, शोभा थी । अपने पुराने गहने तुड़ाकर मां ने कुछ नई चीजें बनवा ली थीं, और अब वे नये बुन्दे और वालियां, हार और कंगन बक्स में पड़े थे। शोभा की शादी होने वाली थी और सुवोध बदलता जा रहा था। दो धुंधली, जल-भरी आंखें दो उदास आंखों से मिलीं। उनमें एक मूक अनुनय थी। सुवोध ने मां के चेहरे को देखा और मुसकरा दिया-। शब्द निरर्थक थे, दोनों एक-दूसरे की गोपन व्यथा से परिचित थे। उनमें एक मूक समझौता था। मां ने इधर बहुत दिनों से सुबोध से नौकरी के विषय में नहीं पूछा था, और सुवोध भी अपने-आप यह प्रसंग न छेड़ना चाहता था। उसने कहा, "देखो, शायद पानी खोल गया।" मां चौंकी, दो वार जल्दी-जल्दी पलक झपकाए । फिर खड़ी होकर आलमारी से घायदानी उठाई। उसे गर्म पानी से धोया, बहुत सावधानी से चाय की पत्ती . - .

. रिन्दगो और गुलाब के न १२३ गाली और पानीला। फिर उसपर टीकोनी जगा दी। वह टीमोजी दुन्दा ने काठी थी और उसकी गादी को यागा में वरमों मां दवन में रो रहीं। परने रोज व्यवहार करना मां की पराजय थी। उसने वही पराजय पी मुबोध की, डो अपनी छोटी बहन की शादी नहीं कर पाया पाटोकोत्री पर एक गुलाब कापन बना था और मुबोध उन गुलाब के फूलों को याद कर रहा था, जोना टमरे कमरे में सजा जातो पी, उन बाली और बुन्दों को गांव हापा, जो गोमा मब नहीं पहनेगी... दूध गरम कर और प्पाला पोहकर मां ने मुवोध के बारे रए हो। मुगोश पीढ़े पर पालपी मारकर बैठ गया, और पाय छानने लगा। मां अपनी कोठरी में जाकर कुछ पटर-पटर कर रही पी। परार में हो एक तस्तरी में चांदी का वकं लगा हुआ सेब का मुरब्बा लाकर मां ने उसके सामने रख दिया और बड़े दुलार मे कहा, "घामो!" अपने विचार पौधे ठेलकर, कुछ मुम्त हो, हंमते हुए मुवोध ने कहा, "यरे अम्मा! बही धातिर कर रही हो! क्या यान है ?" मां ने स्नेह-कातर कंठ से कहा, "तुम कनी ठोक वक्त मे आते भी हो! रात को दस-ग्यारह बजे आए। ठण्डा-मूघाण लिया। मुबह देर मे उठे, दोपहर को फिर गायब । कब बनाऊं, कब ?" यह पर्या तो सुबोध की पहले भी पी। तव वृन्दा और मा दोनो उमक इन- जार में बैठी रहती थीं। वृन्दा हमेशा बार में याती थी। मुबोध की दिनचर्या के ही अनुसार घर के काम होते थे। पर तब बन्दा नौकरी नहीं करती पौ, नय मुबोध बेशरन था। अबयाना बन्दा की मुविधा के अनुमार बनता पा । मुबह जल्दी उटना होता था, इसलिए रात को जल्दी याकर सो जाती थी। अब मुबांध जब साडे आठ पर सोकर उस्ता तो बाधा याना बन चुपता था । अब नौ बजे वृन्दावा नेती, सो यह पाय पीता। पहने जब तक वह स्वयं मघवार न पढ़ लेना था, वृन्दा को अखबार छुने की हिम्मत न पहती पो. पांकि वह हमेगा पन्ने गलत तरह से लगा देती थी। अब उसे अपचार लेने बन्दा के कमरे में जाना पडता था और इसीलिए उसने पर कामयवार पहना छोड़ दिया था। जूठे बर्तन समेटते हुए मां ने कुछ कहना चाहा, पर १ गई। उसका असमजा भांपकर मुबोध ने पूछा, "क्या है? " २८ मेरी प्रिय कहानियां प्याला धोते हुए मंद स्वर में मां ने कहा, "घर में तरकारी कुछ नहीं है।" सुवोध ने उठकर कील पर टंगा मैला थैला उतार लिया। मां ने आंचल की ठ खोलकर मुड़ा-तुड़ा एक रुपये का नोट उसे थमा दिया और कहा, "ज़रा जल्दी आना! अभी सारी चीजे बनाने को पड़ी हैं।" सुवोध कोट पहने बिना ही वाज़ार चल दिया। यह पतलून वह काफी दिनों से पहन रहा था। कमीज़ के फटे हुए कफ और कालर काफी गन्दे थे, पर उसने परवाह नहीं की। पर दोनों हाथों से थैले का मुंह पकड़कर उसमें गन्दी तराजू से . मिट्टी-लगे आलू डलवाते हुए सुवोध को एक झटका-सा लगा। उसके पास ही किसी का पहाड़ी नौकर भाव पूछ रहा था। उसके चीकट बालों से माथे पर तेल वह रहा था, मुंह से बीड़ी का कड़वा धुआं निकल रहा था। वह भी थैला लिए था और तरकारी लेने आया था। सुबोध अचानक हो सोच उठा कि वह कहां से कहां आ पहुंचा है ! अपने अफसर की अपमानजनक बात सुनकर तो उसने अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए इस्तीफा दे दिया था, लेकिन अब कहां है वह आत्म- सम्मान ? छोटी बहन पर भार बनकर पड़ा हुआ है । उसे देखकर मां मन ही मन धुलती रहती है। जिन्दगी ने उसे भी गुलाब के फूल दिए थे, लेकिन उसने स्वयं ही उन्हें ठुकरा दिया और अव शोभा भी...... हाथ झाड़कर सुबोध ने पैसे दिए और चल पड़ा। इस सबके बावजूद उसके अन्दर एक तुष्टि का हल्का-सा मालोक था कि इस्तीफा देकर उसने ठीक ही किया। उसके जैसा स्वाभिमानी व्यक्ति अपमान का कड़वा धूंट कैसे पी लेता? स्वाभि- मान ? सुबोध के ओंठ एक कड़वी मुस्कान से खिच उठे। वाह रे स्वाभिमानी ! उसने अपने-आपसे कहा। उसे वे सब बातें स्पष्ट होकर फिर याद आ गई, वे बातें, जो रह-रहकर टीस उठती थीं। सुबोध स्मृति का एलवम खोलने लगा। हर चित्र स्पष्ट था। नौकरी छोड़कर वह कुछ महीने घर नहीं लौटा, वहीं दूसरी नौकरी खोजता रहा और जव लौटा तो उसने घर का चित्र ही वदला हुआ पाया। उसकी अनु- पस्थिति में वृन्दा ने उसकी मेज़ ले ली थी और उसके लौटने पर वृन्दा ने अवज्ञा • से कहा था, "दादा, माप क्या करेंगे मेज़ का ? मुझे काम पड़ेगा।" सुबोध कुछ तीखी-सी बात कहते-कहते रुक गया । कई साल में घिसट-घिसट- कर बी० ए० एल. टी० कर लेने और मास्टरनी बन जाने से ही जैसे वृन्दा का

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१३० मेरी प्रिय कहानियां । - . पूछा, "अम्मां, दादा घर में हैं ?" सुबोध सुनकर भी न उठा। मां का उत्तर सुन वृन्दा उसके कमरे के दरवाजे पर खड़ी होकर बोली, "दादा, तांगेवाले को रुपया भुनाकर बारह आने दे दो।" सुबोध ने चप्पलों में पैर डाले, उसके हाथ से रुपया लिया और बाहर आया। उसकी दृष्टि सामने खड़ी शोभा से मिल गई। उसके नमस्कार का संक्षिप्त उत्तर दे वह बाहर आ गया । नोट तुड़ाकर तांगे वाले को पैसे दिए और फिर अन्दर नहीं गया। पड़ोस में एक परिचित के घर बैठ गया, और शतरंज की बाजी देखने लगा। वहां बैठे-बैठे जब उसने मन में अन्दाज़ लगा लिया कि अब तक शोमा और निर्मला खाना खाकर चली गई.होंगी, तो वह घर आया। सड़क पर सन्नाटा हो गया था। बत्तियों के आस-पास धुंधले प्रकाश काधेरा था, और पानवाला, ग्राहकों की प्रतीक्षा में चुप और स्थिर बैठा था। वृन्दा ने झुंझलाकर कहा, "कहां चले गए थे, दादा? शोभा और निर्मला कब से घर जाने को बैठी हैं ! तुम्हें पहुंचाने जाना है।" "मुझे मालूम नहीं था," सुबोध ने कहा। "जैसे कभी शोभा को घर पहुंचाया नहीं है !" वृन्दा ने कहा। "तव," सुबोध ने सोचा, तव शोभा की सगाई कहीं और नहीं हुई थी, तब वह वेकार न था। शोभा उससे शरमाती थी, पर उसके गुलदान में फूल लगा जाती थी। मां नये गहने बनवा रही थीं, और वृन्दा अपने कमरे में बैठी-बैठी कुढ़ती थी, बदसूरत थी और उससे कोई शादी करने को राजी नहीं होता था... "अच्छा तो चलें," सुबोध ने शोमा की ओर नहीं देखा। पर शोभा बोल पड़ी, "हमें जल्दी नहीं है । आप खाना खा लीजिए।" मां ने कढ़ाई चूल्हे पर चढ़ा दी। वृन्दा निर्मला को लेकर अपने कमरे में चली गई। सुबोध बैठ गया और शोभा ने उसके आगे तिपाई रख दी । फिर उसने रेशामी साडी का आंचल कमर में खोंस लिया और थाली लाकर उसके सामने रख दी। सुवोध नीची नजर किए खाने लगा। चौके से बरामदे, बरामदे से चौके में बार-बार जाती हुई शोमा की साड़ी का वार्डर उसे दिखाई देता रहा, हरी साड़ी, जोगिया वार्डर, जिसपर मोर और तोते कढ़े हुए थे। कभी-कभी एडियां भी झलक उठतीं, उजली, चिकनी एड़ियां । सुबोध को लगता कि वह अतीत में पहुंच गया है। और क्योंकि बदसूरत .

जिन्दगी और पुनाव के पून गोमा यही है, वहीं जिससे कभी उसको प्यार को बातें नहीं हुई.पर जो मनापाय ही उमसे गरमाने लगी थी। मायद में पता चल गया था कि अगर पिया ने सुबोध से यातचीत शुरू कर दी है और शायद अब तक मासे भी हो पाती, अगर सुमोध को कोई दूगरी नौकरी मिल जाती, पा मगर मुरोग पहनी बन्सी नोकरी न छोड़ता" सुबोध ने थाना बन्द कर दिया। पानी पीकर हाप धोने उठा, तो गोमा पट से हाय धुलाने सगी । उसकी आंधों में विनय-मरी कातरता पी, उसके मुए पर वदासी, पर उसके बालों से सुबास मा रही थी। जब वह तांगा लेकर आया, तो शोमा मां के पास पर पी पी और मां उसके सिर पर हाप फेर रही थी। रास्ते-भर दोनों पुप रहे। सबसे पहले निर्मला 7 पर माया, उराग उतर जाने पर पोमा ने गोमू-भरे कंठ से पहा, "आर यहां पीछे आ जाइए न!" वह उतरकर पीछे ला गया, तब बोली, "TO बोसगे नहीं ?" "क्या कहूं?" सुबोध ने उसकी और मुहार उसे देखते हुए कहा। शोभा की ऑयें एनर रही थीं। पापकर महा, "मैंने सो रिसानी से परत महा!...फिर माघिर मैं क्या करती?" "मैं तो कुछ भी नहीं रह रहा हूं। इस बात को स्वीकार कर मोहिमें शिगी में फेलियर हूं, कम्पलीट फैलियर । १७ नहीं कर सका! रो मेरो जिन्दगी में मय प्लस्टाप लग गया है। अब ऐसे ही रहूंगा। तुम्हारे फादर ने टीमोनिया तुम सुसी होलोगी। प्यार से बसे एक और माग होती है. भूरा! यह माग धीरे- धीरे सब कुछ सील सेती है." "आप इतने विटरमयी हो गए है ?" "जिन्दगी नै हो मुझे पिटर बना दिया है,"फिर से लापकर त पाने से माहा, "अरे वो मिप मोटा से पतो, पर सो पौधेछूट गया।" मोमा उतरी। करण अनिषित-मो पड़ी रही। सुबोध के हाप य, पर फिर पी सोटमाए, "TET, शोभा।" "नमस्ते," शोभा ने पहा और वह अन्दर पसी गई। साने में घरेला गणेश सड़क पर पोडे गरी एकरम दापों के मनोमन रहा पर कभी-कभी सनिशाना पोस सवा और वह यांसी उमरा और मिजोर पाती भिंधेपोमो"मोर १३२ मेरी प्रिय कहानियां आखिरी सपने की भी मौत! सुबह उठकर सुवोध ने सबसे पहले बरामदे में बैठे धोबी को देखा। जितनी देर में उसके लिए चाय बनी, उसने अपने सारे गन्दे कपड़े इकट्ठे कर, उनका ढेर लगा दिया। आलमारी में सिर्फ एक साफ कमीज़ बची थी, पीठ पर फटी हुई। उसे ढकने के लिए सुबोध ने कोट पहन लिया। कोट को भी काफी दिनों से धोबी को देने का इरादा था, परन्तु अव जव तक धोवी कपड़े लाए, तब तक यही सही। चाय पीकर वह बाहर चला आया। कोट की जेबों की तलाशी करने पर उंगलियां एक इकन्नी से जा टकराईं। पानवाले की दुकान पर सिगरेट खरीदा और जलाकर एक गहरा कश खींचा, और दो-एक जगह रुककर वापस चला। रास्ते में उसे धोबी मिला, और उसने सुबोध को दुवारा सलाम किया। "कपड़े जरा जल्दी लाना, समझे ?" कुछ रोव से सुबोध ने कहा। "अच्छा बाबूजी," धोबी चला गया। कमरे में घुसते ही मैले कपड़ों का ढेर उसे वैसे ही दिखाई पड़ा, जैसाकि छोड़ गया था। उसने वहीं रुककर पुकारा, "अम्मां! मेरे कपड़े धुलने नहीं गए।" "पता नहीं, वेटा। वृन्दा दे रही थी, उससे कहा भी था कि तुम्हारे भी दे दे..." सुबोध को न जाने कहां का गुस्सा चढ़ आया। चीखकर वोला, "कितने दिनों से गन्दे कपड़े पहन रहा हूं! पन्द्रह दिन में नालायक धोबी आया, तो उसे भी कपड़े नहीं दिए गए । तुम मां-बेटी चाहती क्या हो? आज मैं बेकार हूं, तो मुझसे नौकरों-सा वर्ताव किया जाता है ! लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर !" मां त्रस्त हो उठी । जव सुबोध का कण्ठ-स्वर इतना ऊंचा हो गया कि बाहर तक आवाज़ जाने लगी, तो वह रो दी। उसने कुछ कहना चाहा, मगर सुवोध ने अवसर नहीं दिया। कहता गया, "मुझे मुफ्त का नौकर समझ लिया है ? पहले कभी तुमने मुझे यह सव काम करते देखा था ? फिर उसके कंठ की नकल करता हुआ बोला, "घर में तरकारी नहीं है ! वृन्दा की सहेलियां खाना खाएंगी। उधर हमारी वहन हैं कि हकूमत किया करती हैं ! अव मैं समझ गया हूं कि मेरी इस घर में क्या कद्र है। मैं आज ही चला जाऊंगा। तुम दोनों चैन से रहना।" ।

विमणी और पुवारपन १३१ पक्षानमा यह पर में बाहर का गया। मरनी टाट में गो मार पर मीन विष्पंगम प्रति जग उठी पो । उगरा मन पाह हा पाकिबोध भी गामने पर, उगे सहम-नहम कर गने। वह पसमा गया और उमो पुन में एर गादमिम गवार में पग गया। वह गिर पडा। उनके जार गाग्नि बाई और यह प्यति बनेकार । उगी मोहनियां पटरी गल मे त्रिी, और एर ती पीराई, सो उगरा ध्यान बंटा। यह गुण हसरायरामा हर उसने पापारि उम मारित ने उरी तारार नहीं थी, पर मार और माइकिन उटाते हुए कहा, "माई गाहर, जरा देयर पना कीजिए। पीट तो नहीं आई।" अगर यह सपना तो उस मूर मे भायर गुवोध पारगोट परने को जाम हो जाता। पर उगरी अप्रवामित दिनसमा मे गुरोध दिवाकर रह गया । जय सुबोध ने उटार पाने की कोशिश की, तो पाया कि बायो पर मरने सगा है। लगाताहमा वह पार की येंच पर मारर बंट गया। उगरी महिनी कोहनी से पून टपक रहा पा। यरामा भी हिलने में पैर में सीव पीड़ा होने सगती पी। उसने गंमानारपरप पर रण लिया और मैट गया। भाना मान पीडा हटाने के लिए वह प्रती को देगने मगा। उगरी अंग के पास ही गुलाब की पनी बैल थी, जिनमे हल्केवा पूत। यता जा रहा पा । उसने हिमना-मना भी पर पर दिया। पुदर स्पिर पर रहने में ६ में विराम हुमा, तो उसके मान फिर मवेरे पी पटना पर जित होगा। उमरा पर हिना और बीएर र मरर उसर पूरे या पैर में पाप्न हो गई । मबोध ने मोठ भीष लिए। आरोपी पूरथी पर मोरीय वीरे-धीरे गरम होगी राहीमी और पाएर उठा हुआ पाना उममी पोट में गा रहा था। पर यह हिलामा नहीं । मायें गेनार महक पो और दया, तो मचाने एका मानि, पोमवाने. उगी पियानरमी । पर गरम होता, तोहनी एरघराने सगती। परम भागीदन मे गे मनी-मा हो रहा था। यह पवमोगरा, ने पता महो। जय मागें गुमी. तो गुरागर पर पार पंचता रही थी। वह उटर, पासा कर पीटता भोर रंगहनामा GE काम पर मेट पर उमरर पर होगीसी पाई जा रही थी। पागा १३४ मेरी प्रिय कहानियां - - - - शीतल था, सुखदायी हवा में गुलाब के फूलों की सुवास थी, पर उसे चैन न था। उसे अचानक मां का ध्यान आ गया। शायद वह चिन्तित दरवाजे पर खड़ी हो, शायद वह उसके इन्तज़ार में भूखी हो । उसने एक लम्बी सांस ली और बांहें सिर के नीचे रख ली। दिन कितना लम्बा हो गया था कि वीत ही नहीं रहा था। जैसे एक युग के बाद आकाश में एक तारा चमका और फिर अनेक तारे चमक उठे । सुबोध धास से उठकर फिर बैंच पर लेट गया। उसके सिर में भारीपन था, मुंह में कड़वाहट, पैर में जैसे एक भारी पत्थर बंधा था। सारा दिन हो गया था, पर कोई खोजता हुआ नहीं आया। वृन्दा को तो पता था कि वह अक्सर पार्क में बैठा करता है। मगर उसे क्या फिक ? पार्क से लोग उठ-उठकर जाने लगे थे। बच्चे, उनकी आयाएं, स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए घूमने आनेवाले प्रौढ़, दो-दो चोटियां किए, हंस-हंसकर एक-दूसरे पर गिरती मुहल्ले की लड़कियां "पार्क शान्त हो गया। हरी घास पर बच गए मूंग- फली के छिलके, पुड़ियों के कागज़ के टुकड़े, तोड़े गए फूलों की मसली हुई पंखुड़ियां... तीन फाटक बन्द कर लेने के बाद चौकीदार सुवोध की बेंच के पास आकर खड़ा हो गया। "अव घर जाओ, बाबू, पार्क वन्द करने का टेम हो गया।" बिना कुछ कहे सुबोध उठ गया। दो-एक कदम लड़खड़ाया, फिर चलने लगा। हर वार जव बायां पैर रखता, तो दर्द होता। धीरे-धीरे लंगड़ा-लंगड़ाकर वह पार्क से बाहर निकल आया। दरवाजा खुला था। बरामदे में मद्धिम रोशनी थी। चौके में अंधेरा । वह अपने कमरे में आया। कोने में मैले कपड़ों का ढेर था। ढीली चारपाई, गन्दा विस्तर, तिपाई पर खाना ढंका हुभा रखा था। सुवोध चारपाई पर बैठ गया, और तिपाई खींचकर लालचियों की तरह जल्दी-जल्दी बड़े-बड़े कोर खाने लगा।

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Meri Kahani

Author
Priyandana Usha
Title
Meri Kahani
File name
Meri Kahani
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OCR done
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
144
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
History
DLI number
552064
Barcode
4990010032794.00
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