Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Chankya Neeti Darpan

Pandey, Shivdas · 2011/08

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२ पानातीविपण दोहा शिक्षक धर्म प्रसिप्ट यहि,पदि नर शाम विधाना कृत्य अकृत्यन शुभ अशुभ,जानप्त वर मतिमान ॥३॥ अर्थ-श्रेष्ठ ममुप्प पर्मोपदेशमें प्रसिद्ध इस प्रपको-पानसार परकर कार्य मकार्य सपा एम मशुम कार्यको जानता तदह संप्रवक्ष्यामि लोकानां हित काम्यया ॥ येन विज्ञान मात्रेण सर्व जत्वं प्रपद्यते ॥ ३॥ दोहा-रगन की हितकामना, हितकाहिहाँ मैं ताहि। प्रास होति सर्वज्ञता जानि यथा विधि जाहि ॥३॥ अर्प-उसमें ममुप्पोंकी हितकाममाके लिप करेगा, चिसके माननेसे सशता प्राप्त होती है। मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टत्रीमरणेनच ॥ दुःखितै संप्रयोगेण पडितोप्यवसीदति दोहा-पुरष शिष्यहि बोध दे,कार पोषण खक नारि । बुखिन सग व्यवहार कार, रुइत कष्ट सुविचार ॥४॥ r मावाटीकासशिवम् मर्य-पर्स शिप्प सपदेश मेसे, एए सीके पारन करनेसे, इलियोंके संग व्यवहार करमेसे, परितमी इसी होता है। दुष्टामार्याशठमित्रंमृत्यश्चोत्तरदायक ससचगृहेवासो मृत्युरेव न संशयः॥५ दोहा-पंधक तिय खल मित्रजन, उत्तर दायक दास। मरण नहीं संदेह यह, सर्प सहित गृह वास ॥५॥ मर्प-नएमी, सह मिम, सया उतर देनेवासा मोफर मोर सर्प सहित गृहमें निवास मृत्यही है, इसमें संदेर मही॥ ५ ॥ आपदर्थ धन रक्षेदारान रक्षेन्ड नेरपि ॥ मात्मानमततरक्षद्दारपिधनरपि। ६॥ दोहा-मापति हित रक्षहि पनहि,धनने मधिको नारि धन तिय ते अति रक्षही, सात्महि सदा विधारि ।। अर्प-विपचिरे समय लिये पनपी रमा परे, सीरी पनसे रसापरे सपा अपना निरंतर दारा तथा धनममी रता परे । ६॥

चाणक्यनीविलम् आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमंतश्च किमाण- दः॥कदाचिच्चलितालक्ष्मी सचितापि विनश्यति ॥७॥ दोहा-धनधानन कई विपति कह धन सचहु हितकछ। संचित पपक लक्ष्मी, होस कदाचित मष्ट ॥ ७ ॥ मर्प-मापसिके लिये पनकी रक्षा करनी चाहिये भी मतोकोमी स्पा भापति होती है हो, मालित पह ममी होवो एकम हुईमी मा होजाती या ७ यस्मिन्देशेनमन्मानो नत्तिर्नचबा- धव.॥ नचविद्यागमोप्यस्तिवासतत्रन कारयेत् ॥८॥ दोहा-नाहि भादर जिहि देश नाहि, मुजीविका नाहि विधा मागम महिं जितै, रहिये नाईि तहाँहि ॥ ८ ॥ वर्ष-विस देश में समान महीन सपजीविकास, पात पा की मासि भी नहीं है यहाँ निरास न करे॥८

५
मापाटीकासरियन
धनिकःश्रोत्रियोराजानदीवैद्यस्तुपञ्चमः
पश्यत्रनवियन तत्रदिवसंवसेत ॥९॥
दोहा-श्रुति विद्याषिद विप्र सरि, पनि तथा भरपाल।
जित म पप तित दिवस इक, नाहि काटिये काला९॥
अर्थ-अमषान, इति निए ग्रामण रामा, मदी, पैप, पर
पाप जहाँ नही हो एक दिन भी मरहे ॥९.
लोकयात्रामयलजादाक्षिण्यत्याग
शीलता॥ पश्चयत्र न विद्यते न कुर्य्या
त्तत्र सगतिम् ॥१०॥
दोहा-स्याग चतुरता भय शरम, माजीविका प्रसग ।
जिस न पच तिसकीजिये, नाहिं प्रीति कोढग ॥१०॥
मर्प-आमीविका, भय, रूमा, परता, त्यागीस्ता,
(पेपरमही नहीं हो संगीत न करे॥१०॥
.. जानीयात्प्रेषणेमृत्यान बांधवान्व्य-
सूनागमे । मित्रंचापत्तिकालेतु मार्याच
विभवक्षये ॥११॥

चाणक्यलादिनन
(सार) प्रेपन कारब मुख्यमम, पिपति भागमन
मौरीमापति मिन समय मोर पात खिय गम परसी बाही११
मर्प-कार्य के स्पि मेमने में मौररों की, उस के समय
में एमोकी, मापधि सपम में मित्रोंकी, या विमा के
माश होने में श्रीकी परीमारे १५
आवरेव्यसनेप्राप्तेदुर्मिक्षेशत्रुसंकटे ॥
राजदारेश्मशानेचयस्तिष्ठतिसबांधव.
(पार) मातरता दुख प्राप्ति समय दुर्मिमदार सूप जोई।
सेक्ट समप मसान ठाम मरे, विएत बापर सोई ।। १२ ।
मोगादिकों के समय मातुरता में, पफट के पास
होनेमें, मिस, पया आहारा संकट उपस्थित होने में
रामदार,कपा मसानमें जो सहायता दता है, वही १२५
योध्रुवाणिपरित्यज्यअध्रुवपरिशेवते ॥
घुदाणिस्गनश्"लिअध्रुवनष्ट गहि ॥
[पार । निश्रित स्पागि बनिमित सवन फरत महहि मो
साई । निम्पिस तास नशात मनिषित नाधवत ही पाई।१५॥
मर्य-जो निश्चित पदापोरो प्यागर अनिम्मित पदार्प
।

मापटीमासविस् की सेवा करता है, उसका निषित पदार्प माप होजातारे मोर मानिर्मित तो मी १५ वरयेत्कुलजाप्राज्ञोविरूपामपिकन्य- काम् ॥ रूपशीलांननीचस्य विवाहः सदृशेकुले ॥१४॥ दोहा-रूपहीम कन्या धेरै, शुभ कुल की मतिमान । रूपवती नहिं नीधी, समफुल ध्याह विधाम ॥१४॥ मर्ष-पुद्धिमान मन मण्ठे कुराफी कुरूप फम्पाको भी पाह के, पर मीप की रूपमती कम्या नहीं ( क्योंकि ) विवाह समान कुरू में होना चाहिये। १४॥ नखीनांशत्रपाणीनां नदीना शृद्धि णां तथा ॥ विश्वासोनेवकर्त्तव्यः स्त्री- गजकुलेषुच ।। १५॥ दोहा-नखी सरित नारी तया, अरु धारक हथियार । नहीं उचित विश्वास कृत, श्रृंगी वंश मुवार ॥ १५ ॥ मर्प-मसबागे, नदियो, पींगवालों, प्रसारियों, सिपों रामफलयासों पा विश्वास न करे। १५॥

८
पामविनम
विषादप्यमृतग्रामि मध्यादपिचका-
चनम ॥ नीचादप्युत्तमाविद्याखारनंदु-
कुलादपि ॥१६॥
दोहा-अमिय गरळ सम अशुषि पक,चन अति म
मिराम । विचाळीजै मीच सों,नीर्ष वश पर बामा १६॥
मर्प-विप से मी ममता मपवित्र स्पान से भी धवणी
भी से मी संचम विपा, मीच कुरुधे भी उधम श्री रत्न
प्रण करना चाहिये ॥१६॥
आहारो द्विगुण स्त्रीणांलज्जा चार्षि-
चतुर्गुणा ।। साहसं षड्गुणञ्चैव काम-
भ्वाष्टगुण स्मृत ॥१७॥
दोहा-मारिम भोजन द्विगुण मरु,लमा चौगुन होत।
साइस पट गुण अरु मवम, मठगुण होत उदोता १०॥
मर्द-सियों का महार दिएण, मार सजा पर्वगण होती..
है यामाहस पटान, भार काम मरान कहा
॥ इति मंयमोऽध्यायः ॥१॥

मापाटीकासपिक्स भप दिसीयोऽध्यायः -अमृत साहस माया मुर्खत्वमतिलोम- ता ॥ अशौचत्वनिर्दयत्वंस्त्रीणांदोषाः स्वभावजाः॥१॥ दोहा-असत मूर्ख मति कोम अति,साइस निरदयमाव छक मशुद्धता मारिणन, मंगल दोष स्वमाव ॥३॥ मर्प-असत्य साहस, मामा, महता, सपा बात काममा मएरवा निर्दपसा श्री के स्वाभाषप्रदोष ॥१॥ मोज्य भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्व- रांगनाविभवो दानशक्तिश्च नाल्पस्य तपस फलम् ॥२॥ दोहा-असप्त शुभगतिय अरु विभव,शक्तिसुमोजन मीहि दाम शक्ति भरु शक्कि रति,लघु तप को फल माहिर।। मपन्स मोम्पपदामि भोजनसरी पछि ती प्रसंगी पाम मेए स्त्री विमर मोर दानयति भरूप सप का फल नहीं २०२ पानापनीतिवनम यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानु गामिनी॥ विभवे यश्च सतुष्टस्तस्य स्वर्गइहैवाहि ॥३॥ दोहा-जासु नारि अनुगामिनी तथा पुत्र यश आहि । वैमन म जो सुखित, इत निश्चय सुरपुर ताहि ॥२॥ मर्प-मिसका पुत्रवशमें भी मनसो मौर को निभा में सेवा, ससे पहौदी निधय स्वर्ग ते पुत्राये पितर्मक्ता स पितायस्तुपो- षक ॥तन्मित्रंयत्रविश्वास सा भार्या- यत्रनितिः॥४॥ दोहा-जो पितु मक्त सुपुत्र सो जो पोषक पितु तीन । यही मित्र विश्वास जित, सो तियसुखदा जीम ॥ ४॥ मर्प-भो पिताके भकरे, यही पुष है, मोर मो पोषक , वही पिता, पौ विश्वाप रे,पही मित्र, जिससे परम वसरोपी मापी॥

मापाटकासमिक्स परोक्षेकार्यहतारंप्रत्यक्षेप्रियवादिनमा वर्जयेत्तादृशमित्रविषकुम्भपयोमुखम दोहा-कार्य मशावत पीठ पर, कह सम्मुख मृदु पात पय मुख विषघट सम हवय,तजिय मित्र इमि नाता५। मर्प-पीठ पीछे काम विगारमे वारे सामने मिए भाषी रेषे एस पर दूपके समान विप पट मिश्रको स्यामदे ॥ ५॥ नविश्वमेत्कुमित्रेच मित्रेचापिनविश्व- सेत् ॥ कदाचित्कुपित मित्रं सर्व गुळ प्रकाशयेत् ॥६॥ दोहा-करहि मरोस म मित्र खक,अरु न मित्र विश्वास- कुपित कदाचित मित्र सप,करहि रहस्य प्रकास ॥१॥ मर्प मित्रका विधासम ,मोर मित्रकामी सबै पा विपास म करे, कदापित पित मित्र सब एस रास्पों को प्रगट करदेसा॥१॥ मनसाचिंतित कार्य वाचा नैव प्रका- १२ मित करे aan पालमनीविवर्षमा शयेत् ॥मंत्रणरक्षयेद्द कार्येचापि नि- योजयेत् ॥७॥ दोहा-मन सकस्पित काममनि, वाणीसन उचार । राखि गुप्तशम मनसों, तिहि कृत महँ निरधार ॥७॥ मर्प-मनसे विचारे हए कार्य को पानी से प्रकाश म फरे से सम्मति एव क्षित से, मोर कार्य में भी मियो कष्ट च खलु मुर्खत्वं कष्टश्च खलु यौ- वनम् ॥ कष्टात्कष्टतरं चैव परंगेहेनि वासनम्॥८॥ दोहा-मूरखता निश्चय दुखद, यौवन वंय दुखरास । मरु निश्चय मुखतिर दुखद, पर भवास को वास ॥८॥ मर्य-निवयही मूर्सती दुसदापक , निश्चय युपपिस्प कर पापक भौर परायेण राना कष्टसे मी अति का ॥८॥ शैलेशैलेनमाणिक्य मौक्तिकनगजेगजे - मापाटीकासाश्वम् साधवोनहिंसर्वत्रचदनंनवनवने ॥९॥ दोहा-माणिक गिरि गिरि होत नहि, मुक्ता गज गज नौहिसाघु पुरुष सब ठौर माई, बम बन चंदन नाहिर मर्प-पस पर्वत मति माणिक्य नहीं होसे, दापी कापीमें मानहीं होते, साधुजन सर्वत्र महीं होते; मौर वन बन में पंदन नहीं होते ॥९॥ पुत्राश्च विविधै शीलैनियोज्या सत- त बुधै । नीतिज्ञा शीलसम्पन्ना भवति कुलपूजिता ॥१०॥ दोहा-सुतन शीळ युत पहुगुणन,युक्त कराई षुध कोग मीति विश युक्त शीक फुल होत सुपूजा योग ॥१०॥ अर्प-परितों को पुत्रको अनेक प्रकारकशीलवार लासे युककरना चाहिये पेमीतिये पाती शीव पर इसमें पूषित होते है१० मातारिपु पिताशत्रुर्वालोयननपा- पाणनीतिवर्षणम् ठ्यते॥सभामध्येनशोमतेहंसमध्येब- कोयथा॥११॥ दोहा-जमनी रिपु पितु शनुते,जिन सन पठत न बाल समा माहिं शोभत नहीं,जिमि पकमध्य मराळ ॥१॥ मर्य-जिनके द्वारा बासक नहीं पाया माठा, वामाचा रिपु वपा पिना गा रे, बहमासक सभामें योभा नहीं पाताईस के बीयब ११ ॥ लालनाबहवोदोषा.ताडनाहहवोगु- णा.॥ तस्मात्पुत्रचशिष्यच ताडयेन्नत लालयेत्॥१२॥ दोहा-काकन मई मति दोष बहु,सारन म. गुण माहिं सुत शिष्यन साडम करहु साते पाहिय नाहि ॥१२॥ पर्ष-प्यार करने से बहुत दोष तामा करने में महत से गुण है।विससे पुत्रको पौर निम्प को भी मारम की कासनम करे।। १२॥ श्लोकेनवातदनतदाक्षरेणवा ॥

मावाटीकासाश्वम् अवन्ध्यंदिवसकुर्यादानाध्ययनकर्म- मि ॥१३॥ दोहा-नक लोम्या म तिहि तिहि भाषे कर आषा दिवस सदैव वितावही, कारज पठन अवाम ।। १३ ॥ गर्य-एक लोककेवा पसके माये केवा उसके मायेक माये पेपरने के कार्य में निरंतर दिवस सितारे॥१५ कांतावियोग स्वजनापमानोरणस्य शेष कुनृपस्यसेवा॥दरिद्रभावोविषमा- समाचविनाग्निमेतेप्रदहतिकायम् ।१४। (द) सिप वियोग साप सेवा सरप्रभा खमम मप कार । दारिद्र गुरष भरि पर, वन करत अनस दिन र॥१४॥ सीका दिपोग; सरसि निरादर क्या पुर मे पा का ऐप रहना, ए राजापी सेवा पतिवा, मोर पोका समा पर विना ममि गरीर के महति ॥१v नदीतीरेचयेवृक्षा परगेहेपुकामिनी ॥

चामायनोविमर
मत्रहीनावराजान शीघ्रन्नश्यन्त्यस-
शयम् ॥१५॥
दोहा-सरितवीर जो तरु तथा, नारी मपर प्रवास ।
सचिव हीन तुप शीघ्र ही होत अशंसय नास ॥१५॥
पर्प-जो पम मदी के सीर, पावसरे घरमें सीमोर मंत्री
विहीन राबा मिदेर शीघ्र नहानावरे ॥१५ ।
बलविद्याचविप्राणां राज्ञां सैन्यम्बल-
न्तथा ॥ बलवित्तञ्चवैश्यानां शूद्राणा-
वकनिष्ठिका ॥१६॥
दोहा-सेमा पल नृपगम तथा, पिपा पळ महिदेव ।
पैश्यन को पर धन तथा, शुद्धनको पक सेव ॥१६॥
अर्प-ग्रामों का परिपा मोर राजामों पाप सेना
तपायोंका बरु इन मौर शवों का बस सेवा ॥१॥
निर्द्धनपुरुपवेश्याप्रजाममन्नृपन्त्यजेत
खगावीतफटसक्षम्मुक्त्वाचाम्यागतो
गृहम् ॥ १७॥

1
H
मात्रयीतिकासविचम्
दोहा-नूप असत त्यागत प्रमा, निर्धन वेश्यावाम ।
फळ विहीन तरु सगपती, मांगे भोजन धाम ॥ १७ ॥
मर्प-निर्पन पुरुषको मा प्रतिहीन साडो प्रथा
कोने मामा को पी गोमन किपेपरको सम्पागन
स्पाम देते हैं। १७॥
गृहीत्वादक्षिणांविप्रास्त्यजतियजमा-
नकम्॥प्राप्तविद्यागुरुशिष्यादग्धारण्य-
म्मृगास्तथा॥१८॥
दोहा-विघालहि के शिम्य गुरु, कामन दग्भ मृगान ।
स्यागिषेत द्विज वर्य गन दान देय यजमान ॥१८॥
मर्प-विमग्रम अक्षिणा प्ररण करके मजमानकी, वित
मात करफे पुरुको धिप्प Bपा दग्न इनको मृगा पाग
देवेरे ॥१८॥
दुराचारीदुरादृष्टिर्दुरावासीचदुर्जनः ॥
यन्मैत्रीक्रियतेपुम्भिनर शीघ्रविनश्य-
ति॥१९॥

१८
पानासमीक्षिपर
दोहा-थाळ निवासी दुष्ट मति, दुष्ट दृष्टि मघमौना
संग करत जो मित्रता, शीघ्र नशत मर तोन ॥१९॥
मर्यापारी, वृषि, भयोग्य स्थान में अपने काम
पूर्णन से वो पुम्स मित्रता करवा परीष मारोपा
वा १९॥
समानेशोभतेप्रीतीराशिसेवाचशोभते
वाणिज्यव्यवहारेपुस्त्रीदिव्याशोभतेर-
हे॥२०॥
दोहा-सोहन प्रीति समान मई, सोहन सेव नृपाळ ।
सुव्यवहार माँ पणिज अरु यह सोहत शमवाल २०
नर्प-प्रेम समान में धोभा पाताई, और राजा की सेवा
धोमा पाती है ।पपहार वाणिम्प में नया सदर सी घर में
शोभा पाती ।२०॥
।। इति द्वितीयोऽध्याय.॥२॥

मापारपिासारितम् ।। अथ तृतीयोऽध्यायः॥ कस्यदोष कुलेनास्तिव्याधिनाकेन- पीडिताः॥ व्यसनकेननप्राप्तं कस्यौ- रव्यनिरंतरम् ॥ १॥ दोहा-किहि फूल मई नाई दोपको,पीडितव्याधि न -साहि।काहि प्राप्त दुरण नाई मयो,किहिसुखरमोसदाहि' मर्प-किसके कल्यै दोष नहीं कौन म्याधि से पीरित नही है। रिसको रस मी प्राप्त हबा सभा किमको निरंतर हत पारे। आचार कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम् ॥ सम्म्रम स्नेहमाख्याति वपुराख्यातिमोजनम् ॥२॥ दोहा-कुळ प्रगटत शुम आधरण,मापण प्रगटत देश। प्रगटत प्रेमहि मोह भरु,मोजन प्रगटत पेश ॥२॥ प्रेप मापारण प्रगट करता मारण देशको मगर करता मोर सेमको मगर करता पारीर ओवन को प्रगद करता मुकुयोजयेत्कन्यांपुत्र विद्यासुयोजये- त॥ व्यसनेयोजयच्छमिष्ठधर्मेणयो- जयेत् ॥३॥ दोहा-कन्या शत कुल माँहि विवाद, सुतहि सुविधा देही मित्राई धर्म पथ मई कावै, सभाह मापति देही ३. मर्प-कम्पाको मछे इसमें पोजित करे पुषको तिपा एफ करेः शपु कोपएम पीमित कर मित्रको पर्मम सत्पर दुर्जनस्यचसर्पस्यवरंसर्पोनदुर्जनः सर्पोदशतिकालेखदुर्जनस्तुपदेपदे ४ दोहा-दुर्गम महँ अहि माहि महि, मनोकुटिळ मर माहि । सर्प समय पर हसत,पर दुर्जन पद पद मा६ि४ मर्प-दुर्यन में मोर पं वर्ष मा दुर्धन मही सर्व फिपी पमप में पाटवारे पर दम तो पद पद में ४॥

भाषाटीकासाहम एतदर्थंकुलीनानांनृपाःकुर्वन्तिसंग्रहम्।। आदिमध्यावसानेषुनत्यतिचतेनुपम दोहा-याही ते शुम कुळ मरन, सग्रह करत नपाळ । त्यागत नहिं नरपतिहि य, आदि मध्य इतिकाल।।५॥ मनसी लिये राजा मशीन पुरुपोंका संग्रह फरखे हैं (स्पीकि ये मादि मम्मतपा मंत में रामाको नहीं पागवत प्रलयेमिन्नमर्यादाभवतिकिलसागरा सागराभेदमिच्छातेप्रलयेपिनसाधवः दोहा-सागर सब मर्याद हत, प्रल्य माईि है जाहिं । उदधि मेष पाहत प्रल्य, पर सज्जन जन नाहिं ॥६॥ मर्प नियमही सागर प्रलपमें मित्र मपदि जाते। सागर प्रम्प में मर्यादा पम्पम की इच्छा करते हैं पर प्रजन नहीं॥६॥ मुर्खस्तुपरिहर्त्तव्य प्रत्यक्षोद्विपदःपशु मिद्यतेवाक्यशल्येनअदृशंकंटकयथा।

२२
बागपतविपन
दोहा-शठहि त्यागियो चाहिये, पश द्विपाद प्रत्यक्ष ।
पचन शस्य इमि मेदही,जिमि कंटक पिम मक्ष ॥७॥
अर्प-पर्स को वो त्याग माही पाहिये [क्योंकि यह
मस्पा]]पद पध[एको पाणी रूपी फोटे
में इस प्रकार भेदवारे से बिमा मेनपारेको माला
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्म
वा.॥ विद्याहीना न शोमते निर्गंधा-
इव किंशुका॥८॥
दोहा-उत्तम कुछ समव पुरुष, गौर रूप महान ।
विषा दिन सोहत नहिं, टेस् पुष्प समान ॥८॥
मर्प-अप पोरन मपम, बोरुम्मे लत्पम पुरुष बिमा
पिधारे परहित रेसू पुष्पके समान प्रोभा नहीं पाते ॥८॥
कोकिलानांस्वरोरुपंत्रीणांरूपंपतिव्रत
विद्यारूपंकुरूपाणांक्षमारूपंतपस्विनां
दोहा-कोकिल कर शुम रूप स्वर पातिव्रत सिय रूप
विधा रूप रुपनर, क्षमा तपस्विन रूप ॥ ॥

मापाटीयसाहिवम्
२५
मर्च-मीरी पाणी-कोकिकामों फारूप पाक्षित्रत सिपों
का रूप रेसपों का दिपा म्प सपा तप सियोंका भम
सपो॥॥
त्यजेदेककुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलत्य-
जत् ॥ग्रामजनपदस्यार्थे आत्मार्थेप्ट-
थिवीं त्यजत् ॥ १०॥
दोहा-कुलहित त्यागहि एक मरु, कुल स्यागहि हित-
प्रामाप्राम देश हित लगि तजे,मात्महेतु जगधाम १०
मर्प-करके मर्प एक का त्याग करे, शाम के सिपे का
कास्पाग करे, देयके सिप प्राम का त्याग करे, भास्मा के
मर्प पपीका स्पाग करे ॥१०॥
उद्योगे नास्तिदारिद्रय जपतोनास्ति
पातकम् ॥ मौनेनकलहोनास्तिनास्ति-
जागरितेमयं ॥११॥
दोहा-किय उपोगदरिदना, जपते मय नाई आई।
महि मौन ते कलह मरु, जागम मई मय नाहि॥१॥

भर्प-सपोप करनेसे पारिख नहीं रावा, अपने से भर नही या मोन पने कम नहीं होती मागने वैभव नहीं पता॥१९॥ अतिरूपेणवैसीताअतिगणरावण. ॥ अतिदानालिबेहोशतिसर्वत्र वर्जयेत् दोहा-रावण माझे गर्व मृति, सिया हरन मति रूप । मति सब विशिवर्जिति बधे अतिहि दाम पनि भूप१२ मर्प-ममिक रूपके कारण वानकी हरी प्रो, भति गरी पण मारा गया, अत्यंत दामसे परिधि मपे। निम्बर मषि कहा मत्रपतिको कोहिमार समर्थानां किंदुरव्यवसायि- नांगकीविदेश. सविदयानां क. प्रियः प्रियवादिना ॥ १३॥ दोहा-को विदेश विपा घरम,काइ समरथनमार । व्य पसाथिन को दूर , भरि प्रिय भाषणहार || १३ ॥ मर्प-सामवान पुरुषोंको मषिक मारक्याम्पत्सा माटीकासापम् पिपोंको कौन [रुपान] दूरभण्डी रिपी पारियोंको रिक्श कहाँ है । मिप गादियोंफो कौन मनिपरे १५॥ एकेनापिमुटशेण पुष्पितेनसुगंधिना ॥ वामितंतहसर्व सुपुत्रेणकुलंयथा॥१४॥ दोहा-पुष्यवान तरु एक सन आकी सुखद सुवास । होत सुवासित वह सुषन,जिमिकुलसुतगुणरास॥१४॥ मर्प-फछे हमे समिधासे एक ही पास से वह पर पन वासित होता, असे पचम पुप्रो पुस ४॥ एकेनशुष्कटक्षेण दह्यमानेनवन्हिना।। दह्यतेतहसर्व कुपुत्रेणकुलंयथा ॥ १५॥ दोहा-पातपुष्प विम एकही, तरु सों जरत अंगार। खळात सन जिमिकुलतया, हो सवपन वह छार१५ अर्प-भमिस जम्ने हए एकही सूखे पृक्ष से यह सब बन गरमाताई, ये कुपुर कुरु ॥१९॥ एकेनापिसुपुत्रेण विद्यायुक्तनसाधुना।। आादितकुलसर्व यथाचद्रेणशर्वरी॥१६

पाणानातिरपनर
दोहा-एकहि विघा सहित सुत,सज्जम सुमति उदार।
जिमि रजनी शासि सौ सकळ,मुक्ति होत परिवार १६
वर्ष-विपा से मुक पर एकही पुष से सब कह प्रसन
होताचे पंद्रमा से रात ॥ १५ ॥
किंजाबद्दमि पुत्रै.शोकसंतापकारके।
वरमेक कुलालबीयत्रविश्राम्यतेकुलं १७
दोहा-शोक क्लेश नायक अमित सुवम भयेका काम ।
जिहित कुल विभ्रामलह इक कुळ प्रियमाभिराम ।
मर्प-योक संतान देने वाले उत्पम हुए मास में पुषों से
क्यारे एकही कुसको सहारा देने वाला माई मिससे कुल
विमाम कोमात होता? । १७ ॥
लालयेत्पञ्चवर्षाणिदशवर्षाणिताडयत
प्राप्तेवपोडशेवपुत्रेमित्रत्वमाचरेत ॥
दोहा-सुत साइन दशवर्ष को,पंचवर्ष को प्यार । प्राप्त
वर्ष पटदश कराई, मीतसीरस व्यवहार ॥१८॥

२७ मापाटीकासाविम् मर्प-पाँच वर्ष पर्पत प्यार करे, वय वर्ष तक पारना दे मौर सोरहवें पप में प्राप्त होने पर पुन से मित्र के समान म्बासा करे ॥ १८॥ उपसर्गेऽन्यचक्रेचदुर्भिक्षेचमयावहै । अंसाधुजनसंपर्के य.पलायतिजीवति॥ दोहा-भयवायक वार्मक्ष अरु, संग असज्जन जौन अरि संझाम ठपसर्गम, मागत जीवत तोन ॥ १९॥ मर्प-उपद्रव होने पर पाके मारमण होनेपर मोर भयानक दुर्मिम में तपा हुरों की संगीत होने पर जो भाग भावारे पहीदीला॥१९॥ धर्मार्थकाममोक्षपुयस्यकोऽपिनविद्यते जन्मजन्मनिमत्यपु मरणतस्यकेवल।। दोहा-काम अर्थ गति घम मह, जाके एक नाहि । ताफर कयल मरण फल, जन्म योनि नर मोहि ॥२०॥ मर्प-मिनरे पर्म भर्य (सपा)प मोसमें एनभी नहा

पानापनीविपनर
शिशुम्पालयतेनित्यतथासज्जनसंगति
दोदा-मत्सी कुर्मी पक्षिणी, करत नित्य सुत प्यार ।
वर्शन पर्शन प्यान ते, सगति तथा उदार ॥२॥
मर्प-मण्डी, कपी, सपा पमिणी दर्शन मान सर्म
से नित्य मासक का पालन करती है, सही सम्जन संगति ॥
यावत्स्वस्थोद्ययंदेहो यावनमृत्युश्चदूर
त॥तावदात्महितकुर्यात्प्राणतिकिक
रिष्यति॥४॥
दोहा--मरम दूर जवळों तथा, अवलों देह मिरोग ।
मास्म हेत तमलों करहु, करहुक प्राण वियोग ॥४॥
मई-जब तक या निराग है भर तक मृत्यु दूर
तर तक आस्माका हित पर, माणक मत समय क्या
पोगा॥४॥
कामधेनुगुणाविद्या ह्यकालेफलदायि-
नी ॥ प्रवासेमातृसदृशी विद्या गुप्त
धन स्मृतम् ॥५॥

मापटीकासाविषम्
दोहा-विद्या गुणद अकालम, सुरभी देव समान
बेघहिं माप्यों गुप्त धन, परपुर मातु समान ॥ ५ ॥
भर्य-विपा काम पेतु के समान पुण करने वाली म
कालमें भी फसदापिनी, सपा प्रवास में माताके समान है,
इसी से] पिपाको गुप्त पन कहारे॥५॥
एकोपिगुणवानपुत्रो निर्गुणैश्च शते
वर॥ एकश्चंद्रस्तमोहंति न च तारा
सहस्रशः॥६॥
दोहा-निगुर्ण सहसन ते परम, एक सुपुत्र उवार।
एक पद तम नाशही, उडगन नहि हजार ॥६॥
पर्प-पफ भी प्रापान पुत्र निर्पण सेक से भी था
है। एक पत्रमा भपकार का नाश करतापरलोसारे महीं।
मुर्खश्चिरायुर्जातोऽपितस्माज्जातमृतो
वर.॥ मृत सचाल्पदुखाय यावज्जीव
जडोदहेत ॥७॥

पालीपिंग मर्थ राजा एक मादी मावा देते हैं, पंडित एक पारही करते हैं, कम्पा पे पफ पारही दी माती परतीम एकाएक भारही होते हैं ॥१५॥ एकाकिनातपोदाम्यां पठनगायनंत्रि मि.॥ चतुर्मिर्गमनक्षेत्रपञ्चमिहभीर णम् ॥ १२॥ दोहा-इफ ते सप इसंगपठन, पारि संग भलिबाट। कृषी पथ संग गान प्रय, बहु संग कर रण ठाट १२॥ मर्म- भले तप, दो जनोखे पाना, तीन नमोस गाना पार मादमियोंके संम पहना पचि मादमियोंके सहित खेती सपा बात भादमियो संग रण करना महा दोघा १२॥ साभार्यायाचूिर्दक्षा साभार्यायापति व्रता ॥ सामायापतिप्रीतासामार्या सत्यवादिनी ॥ १३॥ छद यही मारि जो दक्ष तथा शुषि पतिव्रत नारी । सरयवादिनी मारि जौन सो यह तिय जो पति मापाटीकासीपषम् मर्प-वही स्त्री रे, मा पवित्र है, सपा पतुर हे पीसी हैमो पतिवार वही सीओ सत्यवादिनी ॥ ५ अपुत्रस्यगृहशून्य दिश शून्यास्त्वां- धवा मुर्खस्यहृदयंशून्यसर्वशून्यादरि द्रता॥१४॥ [प्रारठा] रस मो दिय शूम्प, पुत्रहीन फर शुम्य प्रह विद्या मबंहि शून्य, दरिद्रता मई शूम्य सर ॥१४॥ अर्प-पुणदीन का ग्रह शुन्य है, बंधु बिहीनों पी विधाएं सूनी है। मूर्सा दिप शूम्प दे, तपा दरिद्रता पर्व शून्य (मात् दरिद्रता म सर्व शून्य दीसता है) ॥१४॥ अनभ्यासेविपशास्त्रनजीर्णमोजनविपं दरिद्रस्यविषंगोष्ठीबदस्यतरुणीविपम्।। दोहा-पिन अभ्यास सु शास्त्र विष समा हेतु विष टीन विष अजीर्ण महे असन विप, वृद्धहि नारि नवीन १५ मर्प-विना मम्पास से शाख विप है, मणि नेम मोम न पि ३, दरिद्र का समा दिप रे पद सो पापी रिपरे १५॥

पानीविनम् त्यजेधर्मन्दयाहीनविद्याहीनंगुरुन्त्य- जेत त्यजेत्क्रोधमुखीम्मान्निःस्ने- हानबांधवांत्यजेत् ॥ १६ ॥ दोहा-दयारहित धर्महि तजाई, गुरु तज विधाहीन । सजै नारि रिसमुख तजै, घाँधव नेह विहीन ॥ १६ ॥ अर्थ-पसायीन धर्म का त्याग करें, विपासे हीन गुरूमा स्याग करे, कोष मुसी सी का स्पा झरे, सपा संदरदित की घों को त्याग रे॥ १६॥ अध्वाजगमनुष्याणांवाजिनांर्वधनज- रा॥ अर्मेथुनजरास्त्रीणावखाणामातपो जरा॥ १७॥ दोहा-अश्वन कह धन जरा, पथ जरा मर लोग । घनन हित आतपजरा, तिय गन जरा अभोग ॥१७॥ अर्थ-मनुष्यों का मार्गगमन मुटाया ,पाने पायुगमा अपना सिपोरा पुापा मेथुन न परना, तथा स्रों का मुापा भूप २०१७॥

मापटीकासाविषम्
काकालाकानिमित्राणि कोदेश कोव्य
यागमौ ॥ कस्याहकाचमेशक्तिरिति
चित्य मुहर्मुड ॥ १८॥
दोहा-कौन समय को मित्र को, में किमि पेश इमार
काम खर्ष का शक्ति मम, यह गुनु पाराई पार ॥१८॥
मर्य-समय फैसारे, मिष फोन है। देश केसाई, सपना
साम सर्प फिटमा हे, में किसका हूँ मेरी सामर्थ्य रितनी है,
इस प्रकार बारबार दिपार फरे ॥ १८ ॥
अग्निर्देवोदिजातीनांमुनीनांहदिदैवत-
म्॥प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्रसमद
शिनाम् ॥ १९॥
दोहा-द्विजगनक प्रमुभनकम,मुमिन हृदयमगवान
समदर्शिन हित ठाम सष, प्रतिमा हित मज्ञान॥१९॥
मर्प-हिमातियों (बामण क्षत्रिय मैश्यों) फेसिपे भनि
-देवता है, मुनियों के लिये पप में देवताहै, सल्प पुलियो
के लिये प्रतिमा, सपा समदर्शियों के लिये सर्वध ॥ १९॥
इति भी चाणक्य नीतो शिवदास पौडेप रुव मापा
ठीकापोऽध्यायः ॥ ४॥

१८ पाणक्यनीतिवनम् भय पक्षमाम्माप माग्म्मा पतिरेवगुरु स्त्रीणांसर्वस्याभ्यागतोगुरु' गुरुरग्निदिजातीनांवर्णानांब्राह्मणोगुरुः दोहा -गुरू मतिथि सपकर गुरू, विप्रवर्ण जम पार । अग्नि द्विजासिन गुरु तया, तियन गुरू मरतार ॥१॥ अर्प सियोका मती ही गुरु है सबका गुरु मतिपिके हिमातियों का गुरू ममि है, सपा सब वर्णफा पुरू मामण ॥१॥ यथाचतुमि कनकपरीक्ष्यतोनिघर्षण- च्छे दनतापताडनै ॥तथाचतुर्भिःपुरुप परीक्ष्यते त्यागेनशीलेनगुणेनकर्मणा। (पार) छेदि सापि पिसि र पारि विधि कनहिं पर स्पत जैस । वाम शीस गुण धर्म पारि विपि पुरुषम् परसत सेसे॥२॥ पर्प से घिसन ऐदने, तपाने, तपा तान करने इन पार उपायों स साना पहिचाना जाताहै, से दी दान श्रीसता गुण तपार्म इन पार पापों से पुरुष पहिपाना मासा २॥

L
प्रटीकासहिवम्
तावद्भयेषुभेतव्ययावद्भयमनागतम् ॥
आगततुभयदृष्ट्वाप्रहर्तव्यमशकया॥३॥
दोहा-जवलगमया न मय करहु, सवलग भयकी शक
मय आगम अवलोकि के, करहु, प्रहार निशक ॥ ३ ॥
अर्थ-सबसफ भपसे डरना पाहिये अब तक कि भय नहीं
माया । माप हए मपको देस पर निशंक होकर प्रहार परमा
पाहिपे ॥३॥
एकोदरसमुद्भूताएकनक्षत्रजातका ॥न-
भवतिसामा शीलैयथावदरिकण्टका४
दोहा-प्रगट उदर इक नरखत इक, शील न होत स
मान जैसे काँटे घेरके, सम नहिं लखहु प्रमान ॥४॥
अर्थ-परही पेटसे उत्पन्न हुए सपा एपही नक्षत्र में सत्पन
पीसमें समान नहीं हाते, जैस पर ये मॉटे॥४॥
निस्टहोनाधिकारीस्यान्नाकामोमण्ड-
नप्रिय ॥नाविदग्ध प्रियव्यात्स्पष्टव-
कानवश्वक.॥५॥

१.
पामापनीविपकर
दोहा-निस्पृह अधिकारी नहि, प्रिय मकाम श्रृंगार
सतिषादी पधकम माई, प्रिय खळ माषणहार ॥५॥
मर्प-निसहमपिकारी नहीं होता, कामना रहित शहर
मिप महीं होता, मूर्स प्रिय पचम नहीं करता, तथा स्पा पका
अंधक नहीं होता।५॥
मुर्खाणांपण्डितादृष्याअधनानामहाध
ना ॥ तुर्भगाणां च सुभगा कुलटाना
कुलांगना ॥६॥
सोरठा-अघमिन मति धनवान, विधवन कई कुळ ना
रिगम मूठन हित विहान,विधवन कुळ लिय द्वेष्य हैं।
भर्य-मों को परित देष योग्य होते है पनामों को महा
पनी [देप योग्य होते हैं। विमानों को सौभाग्यवती तथा
म्पमिचारिणियों को कुसखी॥६॥
आलस्योपगता विद्यापरहस्तगतधनं॥
अल्पवीजंहतक्षेत्रहर्तसैन्यमनायका
सोरठा-पर कर गत पन नास, सैन विमा सरदार इत
भारस विद्या नास, अल्प वीजते क्षेत्र कृषि ॥७॥

भाषाटकासादिवम्
मर्प-परामे हस्त में जाने सपन, तया मासस्प से विपा
नष्ट होती,योहवाम योन स खेत नए होता है। सपा सामि
रहित सेना नए होती है।
अभ्यासाहार्यतेविद्याकुलंशीलनधार्य
ते ॥गुणेनज्ञायतेत्वार्य कोपोनेत्रणगम्य
ते ॥८॥
दोहा-कुळ हो धारण शीलसे, नैनन क्रोध कखात ।
विद्या लह अभ्यास सन, गुण सन श्रेष्ट जनात ॥८
मर्प-अम्पास स विपा पारण की जाती है, धील से फुल
पारण दिया जाता, ए पुरुप गुण स माना जाता तपा
भोप मेप्रोसे जाना जाता ॥८॥
वित्तेनरक्ष्यतेधर्माविद्यायोगेनरक्ष्यते ॥
, मृदुनारक्ष्यतेमृप सस्त्रियारक्ष्यतेगृहए॥
दोहा-विद्या रक्षित योगसे, मृदु से रक्षमुयाह । धन
से रक्षित धर्म अरु, गृह रक्षति शुम घाल ॥९॥

१२ पाणपतीविपनम् मर्य-पर्म पन से रमित होता, विपा योगसे रसित होती है। राजा कोमलता से रक्षित होता है, तथा शुभ स्त्री से घर रमित होता॥९॥ अन्यथावेदपाण्डित्यशास्त्रमाचारमन्य था॥अन्यथायहदनशांतलोका क्लिश्यं तिचान्यथा॥१०॥ दोहा-पृथा शास्त्र आचार करि,यथा प्रगाट श्रुति अर्थ शात जनम कहि कपृया, नर दुख पावत व्यर्थ १० भर्पीद की परिठाई पपा प्रकाश परमे से, शाम को सपा भापार को पर्प फरने पे, तपा शौत को टु पन पहने वाले लोग पा रट मागते हैं॥१०॥ दारिद्रयनाशनंदानशीलंदुर्गतिनाशन। अज्ञाननाशिनीप्रज्ञामावनामयनाशि नी।।११।। दोहा-दुर्गति नाशक शीलअरु, इरत दरिददि दाम । मक्तिकरत भय नाश अरु, मति नाशक अझान ११॥

मावाटकासपिपम्
५३
मर्प-दान दरिद्रता का नाश करता है, धील दुर्गति का
नाश करता है। पुदि मवान का नाश करती है, सपा भकि
ममका नाश करतीरे॥१६॥
नास्तिकामसमो व्याधिर्नास्तिमोहस
मोरिपु नास्ति कोपसमो वान्ह नर्ना
स्ति ज्ञानात्परमुखम् ॥१२॥
दोहा-काम समान न व्याधि मरु, शत्रु म मोह समान
कोप समान न अनल अरु, सुख मशान घर मान १२
मर्प-कामके समान म्याधि नहीं है, मोह के समान भु
नहीं कोप के समान अमि नहीं है, कान 6 अधिक सुख
नही॥ १२॥
जन्ममृत्यूहियात्यको भुनक्त्येक शुमा
शुभम् ॥ नरकेपुपतत्येकएकोयातिपरां
गतिम् ॥१३॥
दोहा-जनम मरण इफहीळहत, एक लहत पर घाम ।
एकदि मोगत नरक इक मोग शुभाशुभ काम ॥१३॥

1 पाणवताविपणम् मर्प-निम्नयही मफेछा मम्म मृत्युको प्राप्त होता है, या मकेसाठी शुभा शम को मोगता है, मलाही नरक को मात होता, मकेरमही परम गति को प्राप्त होता है। १५ तृणंब्रह्मविद स्वर्गस्तृणशूरस्यजीवित म् ॥ जिताक्षस्यतृणन्नारीनिस्टहस्यत णं जगत् ॥१४॥ दोहा-तृणसम जीवन मटन मरु, शानिम तृणमुरधाम निस्पृह जन हित जगत तण जिसइदिन सणवाम १४ मर्प-समवानीको स्वग पण के समान है, शूर फो जीवन तिनका में समान रे, मितान्त्रिप को मारी विनका के समान है, सपा निस्पृहको नगस सिमका के समान है॥१४॥ विद्यामित्रप्रवासेपुमार्यामित्रगृहेपुच ॥ व्याधितस्यौपधीमत्रधर्मोमित्रंमृतस्य- च॥ १५॥ सार-विद्यामीत विदेश माहि अरु धर्म मृतफ हितकारी मन मापभी रोग मोहि अरु मीत मन मई मारी १५ मापाटीसरतम् मर्प-विपा परदेश में मित्र, सपा घर में श्री मित्र है, रोगकी औषधी पित्र, मोर मृतक का धर्म मित्रौ ॥१५॥ वृथाष्टिःसमुद्रेपुवृथातृप्तपुभोजनम् ॥ पृथादानधनाढ्येपुवृथादीपोदिवापिच दोहा-तृप्तन मेोजन व्यर्य अरु, सागर परसा व्यर्थ दिवस मध्य दीपक पृथा, धनिन दाम घिनम||१६॥ मर्य-पी समुद्र में व्यर्प है, वम को भोजन देना म्पर्प है पनियों को दान देना म्यर्प दे, तपा दिन में दिया बसाना म्पर्प ॥१६॥ नास्तिमेघसमतोयनास्तिचात्मसमव लम ॥नास्तिचक्षु समतेजो नास्तिधा न्यसमंप्रियम् ॥१७॥ दोहा-मेघ समान न वारि भरु, नहिं घर आत्म समान पक्षु समान न सेज है, अन्न सरिस नहिं मान १७ मर्प-मेष पी समाम जस नरी है। भोर मारमालक समान पर नहीं मांस र समान धन नहीं है, गोर मन की समान मिय नहीं। १७॥

04
अधनाधनामिच्छतिवाचंचैवचतुष्पदा
मानवाःस्वर्गमिच्छंति मोक्षमिच्छतिद
वताः॥ १८
दोहा-निरपन पाहत पम तया, नर गन पाइत स्वर्ग।
चतुष्पाद पाषा बहस, सुर पाहत अपवर्ग ॥१८॥
मर्प-मिर्मनी पनकी छा करते है, पप्पद मापी की
इजा करते हैं। मप्प स्वर्ग की पण करते है, देवता
मोम की करते ॥१८॥
सत्यनधार्यतेएथ्वीसत्येनतपतेरवि ॥
सत्येनवातिवायुश्वसर्वसत्येप्रतिष्ठित१९
दोहा-परासत्य पळ ई घरी, रवितप सत्यमभार ।
पायु वहत पक सत्य मरु, थित सब सत्यमधारा
मर्प-स्प से मृमि पारण मी माती ,सरप से सर्प तपते हैं।
मोर सस्य से पायु पहती है,तपा सस्प स सपही स्पिकरें१९
चलालक्ष्मीश्चला. प्राणाचलेजीवितम
दिरे । चलाचलेचससारे धर्मएकोहिनि
चल.॥२०॥

४
मापाटीनसारिखम्
दोहा-पेपर लक्ष्मी धाम अरु, पक जीवन अरु प्रान
निश्चल फेवक धर्म यहि, पर अरु भघर जहान ।२०।
मर्य-सत्मी पंचर,माण भी पहो । जीवन प्रपा पर
चला मोर चराचर इस संसार में एक पर्मी
निधयो॥२०॥
नराणांनापितोधुर्त पक्षिणाचैववायस॥
चतुष्पदाश्गालस्तुस्त्रीणांधूर्तीचमालि
नी५२१॥
दोहा-शठ चौपदम श्रृगाल भरु, नाई नर बिच मीच
फाग पूर्त पक्षिन अघम,मालिनी तिय गम बीच॥२१॥
मर्प-पम्पों में माईत है, तथा परियों मे कौमा,सपा
चौपापों में भगाल, मोर नारियों में मापिनी ॥२१॥ Lr
जनिताचोपनेताच यस्तुविद्याप्रयच्छ
ति॥ अन्नदाताभयत्राता पञ्चैतपितर
स्मृताः॥२२॥

८
पाणपतीविनम्
(छद) ममद की सपनपनादिक, निज पित मप रस
पार । कामात पर पौध पिता, मोरिपा दातार २२ .
मर्प-उत्पन्न करने वाला, और उपनयनादि प्रस्कार करने
पासा, सपा जो विपा देता है। अमदावा तया कष्ट से बचा
नेसाला यह पापों पिता को गये हैं॥२२॥
राजपन्नीगुरो पत्नीमित्रपनीतथैवच ॥
पनीमातास्वमाताचपञ्चैतामातर.
स्मृता ॥२३॥
दोहा-पाँच कही है मातु यह, मित्र नारि गुरु पाल
सिय माता निज मातु अरु इहि बिधि तिय मरपाल२३
मर्प-राजा की खी गुरू पी सी इसी प्रकार मित्र की
मी पाप तपा मपनी माता मा पाँच माता कही गई ॥२३॥
इतिश्री पाणक्यनीतो शियवाट पौग्य कृत भाषा
टीकापी पंचमोऽप्पापः५॥
मम परमोध्याय प्रारम ॥६॥
श्रुत्वाधर्म विजानाति श्रुत्वात्यजति
दुर्मतिम् ॥ श्रुत्वाज्ञान मवाप्नोति श्रु-
त्वामाक्ष मवाप्नुयात् ॥१॥

१९
भावाटीकासाविषम्
दोहा-सुनि जानत
धर्म
मरु, सुनि के पावत ज्ञान
सुनि ही के त्यागत मुमति, सनिपावत निर्वान ||
भर्ष-पासादि समकाही धर्म को मानता है, धनकर
हा धर्मति को स्पासाहे एनफर ही शानको पाता है, सन
परही मोम को प्राप्त होता॥१॥
काक पक्षिषुचांडाल.पशुनां चैव कुक्कर
पापोमुनीनांचाहाल सर्वेषांचैवनिंदक.
दोहा-काग पक्षिगन मॉर्हि शठ,श्वान पशुन गन बीच
मुनिगन म पापी मपम, सप म. निंदक नी॥२॥
मर्प-पशमों में कुकर तपा पमियों में कोमा पांगत
। मुनियों में पापी तथा सब में पागल निवफर ॥२॥
भस्मनारायते कांस्यताम्रमम्टेन
शुद्धयति ॥ रजसा शुद्धयते नारीनदी
-वेगेन शुद्ध्यति॥ ॥३॥
सोरठा-लिय हो रम ते शुष्ट, काँस शुद्ध हो भस्म ते।
सरित वेगसन शुद्ध, ताप खटाई कहि विमल ॥३॥

चाणक्यनीक्दिनम्
मर्य-कास भस्म से एड रोता , पावा साई से घर
होता है। सी रमस्ता होने पर शुए होता है ।वामी
वेग से शुद्ध होती है॥५॥
भ्रमन सपूज्यते राजा भ्रमन्सपूज्यते
दिज । भ्रमन् सपूज्यते योगी स्वी
भ्रमन्ती विनश्यति॥४॥
दोहा-द्विज पूजित हो भ्रमण ते,पूज्य भ्रमण नर पास
योगी पूजित भ्रमण ते, नष्ट भ्रमण ते पाक ॥४॥
मर्प-विचरने वाला राणा पूनित होता है, ममण शीक
बामण पूषित होता है । प्रमण ग्रीस पोगी प्रणित रोता
३, [पत ] भ्रमण पीस मारी मा होती है।
यस्यास्तस्य मित्राणियस्यास्ति-
स्य बान्धवा ॥ यस्यार्थाः सपुमाल्लोके
यस्यार्थ सच पंडितः॥५॥
दोहा-जिहिकेयन सिहि मित्र मरु जिहि धन सोइ महा
न वाधव साके जासु पन, जिहि धन सो विहान॥५॥

मापाटीकामारियम
मर्प-मिनके पन है, तिसके मिष है, जिसके धन है
सफे पर है, जिपरे पन हे वही लोक में श्रेए पुरुष
जिसके पम , पदी परित,१॥५॥
ताशी जायते बुद्धिर्व्यवसायोपि ताह
शः ॥ सहायास्तादृशा एव यादृशी
भवितव्यता॥६॥
दोहा-ससहि हो उद्योग अरु, सैसहि घुहि उदोत ।
होत सहायक ताहि विधि, भावी जिहि विधि होत॥६॥
मर्प-पेपी ही पुद्धि परपन्न होती है, पेशाही पोग तपा
से दी सापफ से मात । जैसी भविसम्पता होती
२६॥
काल पचति भूतानि काल सहरतेप्रजा
काल सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरति-
मम ॥७॥
दोक्षा-प्रजन नशावत काल अरु, मक्षम प्राणिन कार
जागत काल सुसुप्ति मह, निभय दुस्तर काल ॥ ॥

पाणल्पनाविनम् सर्प-काली प्राणियों को साता है। कारदी प्रणामों का हर परता है, सोते में कामी नागसा, निधयहाँ काल एपन के भयोग्य रे..॥ ७॥ न पश्यति.च जन्मान्ध कामान्धो नै- व पश्यति ॥ मदोन्मत्ता न पश्याति अर्थी दोष न पश्यति॥८॥ दोहा-मद मसवार न लखत मरूलखत नाहि कॉमान्म मर्थी दोष न बरखत,नहीं करवत नहीं जन्माग्ध ॥८॥ अर्प-मम्म कामपा महीं सता, कामौष नहीं देखता, तपा मदसे मतपाला नहीं देखता, भौर नयाँ दोष को मही देसवा ८॥ स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वय तत्फलम श्रुते ॥स्वय भ्रमति संसारे स्वय त- स्माद्विमुच्यते ॥९॥ दोहा-करत मापही भात्म कृत,भोगत तिहि फळ आप भाप भ्रमस संसार महै, मुक्त होत जग माप ॥ ९ ॥ -

माषाकासासिम्
भई आत्मा मापही कर्म करता है, मापही ससका फल
मोगसारे। भापही संमार में प्रमरण करता है, सपा भाप
ही सबसे [ संसार से) मुक होसारे ॥९॥
राजा राष्ट्रकृत पापं राज्ञ पापं पुरोहितः
॥मा च श्रीकृत पापं शिष्य पापं
गुरुस्तथा ॥१०॥
दोहा-उपरोहित नृप पापळह, प्रजा पाप भूपाळ।
शिप्प पाप पावत गुरू पुरुष पाप कह पाल ॥ १० ॥
सर्प-प्रबाके किये पाप को राजा, राजा के पाप को पुरो
रित तपासी किस पाप को पति, मौर शिष्य से किये
पाप को गुरु भोगमा १०॥
ऋणकर्ता पिता शत्रर्माता च व्यामि-
चारिणी ॥भार्या रूपवती शत्रु पुत्र
शत्रपण्डितः॥११॥
दोहा-प्राणकर्ता पितु शत्रु मरु रिपु माताव्य मिधार ।
पुत्र अपंदित शवई, रूपवती मरि नारि ॥ १॥

पापनाविनम्
पर्व-माण करने वाला पिता शर, मोर म्याभिचारिणी
माता है। रूपपती नीशा है, या मूसे पुष या
है॥ ११॥
लुन्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्ध मजलि
कर्मणा ॥ मुर्ख छैदानुवृत्त्या च यथार्थ
त्वन पण्डितम् ॥ १२॥
दोहा-लोभिहि धम ते वश करहि, सविनय सह अमि-
मान । शठहिं तासु अनुसार पति सत्यहिते
विद्वान ॥१२॥
मर्प-लोभी को पन से बच बरे, मभिमानी को हाप
जोडकर मूर्स पो उसके मनुसार पस्ने मे, सपा पति को
सत्यसा से (पश करें]॥१२॥
वरं न राज्य न कुराजराज्यं वरं न मि
त्रन कुभित्रभित्रम् ॥वर न शिष्यो न
कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा नकु-
दारदारा॥१३॥

--
भावाटीकासाहेवम्
७-भीवन पर न कृमिम मित्र पर नृप नहिं पर नर्दिछु
तृपमुगाछ शिष्य नहि र शिप्प फ रिप्पन, नारिन भल
नाई बाल बाल ॥१३॥
मर्प-नाम्प का न होना अच्छा है। पर दुष्ट राना का
राम भसा नही, मित्र होना मठारे पर पित्र का
मिय होना भला नहीं। शिप्प विना बारे पर शिष्य
पापिप्प रोना भला नहीं, स्त्री महोना मष्ठा पर खराब
स्त्री फासी होना अण्णा नहीं ॥१५॥
कुराजराज्येन कुतःप्रजासुखं कुमित्र-
मित्रेण कुतोहि निति ॥ कुदारदारै-
श्व कुतो गृहे रति कुशिष्यमध्यपयत.
कुतो यश.॥ १४॥
ईद राज फुराज प्रमान कहा सुख शांति कहा शठ
मित्रहिं पाय । मारि कुनारि पाय गृह रति कह यश
होत कुशिष्य पढाय ॥१४॥
मर्थ-दुष्ट रामाके राम्प में प्रमानों को उस पहो ।
कमित्र के मित्र होने से उस पदौ १ मार फुखी ए सी होनसे
पर प्रीति पौतपा फाशप्पथे पाने मे यश से दो
सफा॥१४॥

44
सन सीबहि
पाणपोलिपनम्
सिंहादेके बकादेक शिक्षेञ्चत्वारिकुक्कु
टात । वायसात्पच शिक्षच्च षट् शुन
स्त्रीणिगर्दभात् ॥ १५॥
(सार)सीखहि गर्दभ गुण प्रयपक इक, मुझट सन
गुणचारी । इक केहरि पट वाम नग
मुख कामारी ॥१५॥
मर्प-सिंह से एक, बमसे से एक, तपा मुर्मा से पार पुष
सीसमे पाहियर सेनगुण, तयाकोर से पांच गण मौर
गम से तीन गुप सीसमा चाहिये १५ ॥
प्रमृतं कार्यमल्पं वा यन्नर कर्तुमिच्छ-
ति।। सारमेण तत्कार्य सिंहादेक प्रच
क्षते ॥१६॥
(सार)मधुषा कार्य महान करम नर, इमा पारहि
मोई॥ समप्रकार करिषो यह गुण इक,सिमादि सिंह
सम सोई॥१६॥

मापटीपासादिम्
भर्प-गोपागोटे कार्य को वो ममुप्प करने की इच्छा
करतारे, सब प्रकार के प्रपस्न से उसको करना या एफ सिंह
सेसीसना । १६॥
इंद्रियाणि च संम्यय बकवत्पण्डितो
नर ॥देशकालंबले ज्ञात्वा सर्वकार्याणि
साधयेत् ॥१७॥
दोहा-सयको इद्रिन-वश्यकरि, देश काळमक मान ।
सकळ काज पूरण करहि, पडित नर मातिमाम ॥१७॥
मर्प-परित पनुप्प ईदियों को बगसे की समान रोककर,
देश का पावस मानकर सब फापों को सिख को १७॥
प्रत्युत्थान च युद्धं च सविभागं च व-
न्धुषु ॥ स्वयमाक्रम्य भोग च शिक्षेञ्च-
त्वारि कछटात् ॥१८॥
(प्तार)जगव समय पर षषु माग सम, देव सज-
गता गरि करि माक्रमण स्वतः मोगष गुन, सीखहि
कुष्टचारी ॥१८॥

भागातीनिक्लिए
दोहा-बीस गुणन इन आचरत, मनुज यथाविधि
जौन सकक कार्य महोत है,अजय भविष्यत तीनर
मर्य-जो मनुष्य इन पीस गुणों को भापरण करेगा,
यह भविप्पत में मोप होगा ॥ २२॥
इति श्री पाणक्य नीती शिदास पौडेम कृत भाषा
टीकापो पोऽध्यायः॥
"भप सप्तमोम्पायः॥७॥
अर्थनाश मनस्तापं गृहिणीचरितानि
च॥नीचवाक्य चापमान मतिमान
प्रकाशयेत्॥१॥
दोहा-मारि परित पम नाश मरु,नीष वचन अपमाम
मम को साप प्रकाश अनि, करहि पुरुष मसिमान॥३॥
मर्प-पनका नाध, मन का ताप, स्त्री के परित्र मौर
मीप पुरुषों के पचन, मोर भपमान को मुदिमाम म प्रका
प्रित॥१॥

मावाटीकासस्विम् धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासग्रहणेषुच ॥ आहारे व्यवहारे च त्यक्तलन सुखी मवेत ॥२॥ दोहा-होत सुखी विधा ग्रहण, अरु महार व्यवहार । केन देन धन धाम्य म, लज्जा त्यागनहार ॥२॥ मर्प-धन पाम्प के प्रयोग में विपाके ग्रहण करने में, मोर मादार में, तया म्पवहार में छाज स्पागने पाला पसी होवारे२॥ सतोपामृततृप्तानां यत्सुख शांतिरेव च ॥ न च तद्वनलुब्धानामितश्चेतच धावताम्॥३॥ दोहा-दप्तन सतोषामृत नरन होत शांति सुरण जौम भ्रमण हार इस उत लहत, धन कोलुप नहिं सोन ॥ मर्थ-संतोप रूपी अमृत से तृप्त हमों को, जो उस तप पाम्तिो पाइपर पर दौडने पासे पनके सोभियोंको महीं होता ૬૨ पाणमनीविषम संतोषस्त्रिषु कर्तव्य स्वदार भोजने धने। निष चैव न कर्तव्योध्ययने जपदा- नयो॥४॥ दोहा-सोप करहु इन तीन घन मोजम निज तिय माहि दान पठन जप इन, प्रय मई कीजिये नाहिं ॥४॥ मर्य-अपनी स्त्री में, भोजन में, पन में, इन तीन में संतोष फरमा चाहिये, पड़ने में जप ओर वान इन तीन मै न करना पाहिये ॥४॥ विप्रयोर्विप्रवहयोश्च दपत्यो स्वामिभृ. त्ययो ॥अन्तरेण न गतव्यं हरस्य - पभस्य च ॥५॥ दोहा-दुई बामण द्विज अनल विच, अरु हल विष शसिमाल । पहिय जान नहिं मृत्य प्रमु, मष्य मध्य पति पाल ॥५॥ मर्प-दो मामणोंके, मामण तथा ममि के स्खी सपा पुष

3
मापाटीकासहिदम् ।
स्वामि तथा घेसर बार रे तपा पुष से पाप में म
माना पाहिये ॥५॥
पादाभ्या न स्टशेदग्निं गुरु ब्राह्मणमेव
च ॥ नैव गां न कुमारी च न वृन्ह न
शिशु तथा ॥६॥
दोहा-परणन ते परसै नहि, अनल पृद्ध हिजराय ।
महि कमारे नहिं शिशु तथा, महिं गुरु अरु नहि
गाय ॥६॥
मर्प-ममि को, गुरुपो, सपा प्रण कोपरणों से स्पर्श
नपरे । पाम नापो, म कुमारी को, म पक्ष्या, न शिशु
पो.
शकट पचहस्तेन दशहस्तन वाजिनम्
हस्तिन तु सहस्रेण देशत्यागेन दुर्जनम्
"॥७॥
दोहा-पाप दाप ते सफट अरु, हाधिर्टि हाथ इजार ।
तने मश्व यश दाप से मरु ताने देश गवार ॥७॥

१६४
पागलपनाविधनम्
मई-पाच हायसे गागको दश हाय से पोरे को, हजार
हायचे हसपीको, तया दुर्जन को देश स्पाग करके स्पाना
पाहिपे ॥७॥
हस्ती चंकुशमात्रेण वाजी हस्तेन ता.
त्यते॥ श्रृगी लगुडहस्तेन खङ्गहस्तेन
दुर्जनः ॥८॥
मगन मकराते पानि इस्त ते, निवप वश मे आई।
मुंगी साटास शह, मासकर, पंडित कानो माई ।
अर्प-निमयही बापी मधमाध से, पोश हाप से, सी
मबापटपारी हापसे, तपा दुर्मम सा घारी आप से
दरित किया जाता है । ८२
ष्यन्ति भोजने विप्रा मयूरा घनग-
जिते ॥ साधव परसपत्ती खला परवि
पत्तिषु॥९॥
दोहा--धन गर्जन सुनि मोर अरु पर धन निरखि
सुजान । तुष्ट होत द्विज असम कहि, पर दुष दुष्ट
मजान॥९॥

मापाटीपासादिवस मर्य-वामण भोजनसे, तथा मोर बादल गरजनेसे, साधु जन परमपवि देसफर, सपा दुष्ट दूसरेकी रिपवि देखकर संवर होते हैं। अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्वलम् आत्मतुल्यवल शत्रु विनयेन वलेन वा॥१०॥ दोहा-पक हीनन प्रतिकूलसा, ममुफूलता महान । पल से अथवा विनय ते, वश मरि करहि समान|| 200 मर्प-भनुकूलतासे बड़ीश, प्रतिकृरतासे दूर्षलरो, मपनी परावरमा धनुको, विनप या बसचे वय करे । १०॥ वाहुवीर्यवल राज्ञो ब्राह्मणो ब्रह्मविहली रूपयोवनमाधुर्यं स्त्रीणा वलमनुत्तमम् दोहा-पाविज्ञ हिजपर पती, पाहु वीर्य घलभूप । पल अति उत्तम मधुरता, यौवन तियगन रूप ॥११ R पाणायनविएपनम् अर्थ-मुमामोंका पराक्रम राजाका पर समका का मेवाला बामणवली होता है। रूप, योवन या मघुस्सा लि पोको परमोचम महो। १६॥ नात्यन्त सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वन स्थलीम् ॥ छियंत सरलास्तत्र कुब्जा स्तिष्ठति पादपा ॥ १२॥ दोहा-होन न चाहिये मप्ति सरल, पतिदेखहु बमठा सरक वृक्ष कटिजात लित,बमे रहत सश्याम ॥१२॥ भर्प-अस्पंत सीपे महीं दाना पारिये मनस्पठीको नाकर सोहा सीपे दमकट जात है, से दस स्पिर रहते है ॥१२॥ यत्रोदकं तत्र वसति हसास्तथैव शुष्क परिवर्जयति ॥न ह सतुल्येन नरेण भाव्य पुनस्त्यजत-पुनराश्रयन्त॥१३॥ (द) मिस जस ममत ईस वितरि विषि, सूसमरे पनि Ka स समान न हान पहिये नर, तजि पुनि आमप

मापयिकासाविम्
मर्प-नहाँ मडरे, तहाईस निवास करते है, इसी भौति
सूलपानपर स्याग देवे है।इसकी समान ममुष्पको न होना
पाहिये, फिर स्पाग देते हैं, फिर मामय लेते हैं॥ २५
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि
रक्षणम् ॥ तडागोदग्सस्थानां परिनी
इवांमसाम् ॥१४॥
दोहा-सम्पादित धनको महि, रक्षण फेयक दान ।
उदर सरोवर नळ सुफळ, जिमिधाहर थक जान ॥१४॥
मर्प-सम्पादन (पत्र) फिये पनका त्याग फरलाही रमा
है। भैसे परोपरके मम्म स्थित घरका बाहर क्षेत्रादिम निक-
जना प्रफल १४॥
यस्यार्थस्तस्य मित्राणि याथस्तस्य
बांधवा ॥ यस्यार्थ स पुमाल्लोके य
स्यार्थ सच जीवति ॥१५॥
सार-जिहिके धन जग मीत तासुके,जिहिधन वा-
घव ताके जीवित सोधन महहि जासु अरु नर अग
वह धन जाके॥ १५॥

૬૮
पापासीविपना.
मर्प-जिसके पन है, उसके मित्र है। जिसके पर ,न्स
केषु है, जिसके पन , पागतमें पुरुष । मिलो पन
, परीनीता॥१५॥
स्वर्गस्थितानामिहजीवलोके चत्वारि
चिन्हानि वसति देहे ॥ दानप्रसंगो मु-
धुरा च वाणी देवार्चनं ब्राह्मणतर्पणच
(1)इदिवग मौ मापे स्पर्मिक तन, पिन तपार।
हिमन पप्ति र सेपवान भरु, कोमस बम सदार १५॥
मर्प-समें नियास करनेवाले इस नीलोकमें मामेपर
घरीरमें पार पिम होते है, पानका मरंग, मपुर वाणी. सपा
देवतामोंकी पूजा मोर बामणोकी प्ति करना ॥१५॥
अत्यन्तकोप कटुका च वाणी दरिद्रता
च स्वजनेषु वैर ।। नीचप्रसंगः कुलहीन
सेवा चिन्हानिदेहे नरकस्थितानाम्१७
(द) स्पनन द्रोह कटुवपन पोप मति, पाखवा मम
नीष सनेह । सेगा परियो हीन मंशकी, पिन पसव पह मर
पिन ॥१०॥

६९ माटीयंसचिवम् मर्प-मस्पंत कोप तपा फटुमानी, निर्धनता, सपा अपने कवरियोस मेर, नीकी संगति प्रपा पुलहीनकी सेवा पर विप नरक, रानेवालोंके हैं। १७॥ गम्यते यदि मृगेन्द्रमदिरंलभ्यतेकरिक पोलमौक्तिकम् ॥ जबुकालयगते च प्रा प्यते वत्सपुच्छखरचर्मखण्डनम् ॥१८॥ (प) मोती मिलन कपोह गमन जो केसरि मंदिर मारे जम्युक गृह स्वर पर्म भाग मरु छ मस्तकी पापे ॥ १८ ॥ मर्प-जो सिंहके मंदिरमें जाप, तो दापीक गणस्पसके मोती मिलते हैं। मौर सिमारो स्थानमें नानेसे मछडेकी ऎस तया गदके पर्पका टुकरा मिस्वारे॥१८॥ शुन पुच्छमिवव्यर्थं जीवित विद्यया विना। नगुह्यगोपने शक्त न च दशनि वारणे ॥ १९॥ दोहा-विद्या पिन जीवन अपहि, धान पूँछ सम व्यर्थ । गुम शरीर न कि सस्त,देश इनम म समर्थ ॥१९॥ मर्प-रिपाफे बिना कुवेकी के समान जीवन म्प३

10
पाकामनीलिए
पोन गत मंग कमे, नगस निवारण करमे समर्प ।।१९।
वाचा शोचं च मनसः शौचमिन्द्रिय
निग्रहः ॥ सर्वभूतदया शौचमेतच्छीचं
परार्थिनाम् ॥२०॥
(क) परमार्पिन फरोप मी पपा करम सब
मानी । पौष हदय भरु शनिय गमदम, तपा गोषपन
पानी ॥२०॥
भर्प-या परपार्पियोका प्रोपोमाणीका शौष मनका।
पौषद्रियोंका नय, नपा सम माणिपॉपर मा॥२०॥
पुष्पं गधं तिले तैलं काष्ठेग्नि पयसि
घृतम् ॥इक्षा गुड तथा देहे पश्यात्मानं
विवेकता॥२१॥
(द) पुप्प गप तिहरु दुग्प घृत, इस राहत रस मेसे।
मनरूपाउ सम तवम भासम, Bसा छानते मेसे ॥२१॥
अर्प-जैसे पुप्प गप,तिहमे तेल काठमें ममि,दूषम पूल तया
इसमें गुरु रहता है। वैसे मान देश में मास्माको देखो। २१॥
इति भी चाणक्य नीती शिवाघ पदिय कृत भाषा
हीरापा सप्तमोऽध्यायः॥७॥

भाषाधिकासपिम्
। मपाएमोण्यापः।
अधमा धनमिच्छन्ति धन मानं च
मध्यमा.॥ उत्तमा मानमिच्छन्ति मा
नो हि महतां धनम् ॥१॥
दोहा-पाहत हैं धन मधम नर,मध्यम नर बह मान ।
उत्तम पाहत मान मरु,धनही मान महाम ॥१॥
भर्प-मघम पुरुष पनकी इच्छा करते हैं। तया मध्यम
धनकी तपा मानपी इण करते है। एवम पुरुष मानकी
इच्छा करते हैं। क्योंकि मान बरे पुरुषोंका पन है॥९॥
इखूनप पयो मूल ताम्बूलफलमौषधम्॥
मक्षयित्वापि कर्तव्या नानदानादिका
किया ॥२॥
दोहा-उरण मूल फलवूध जल, तथा मोपली पान ।
इमके भोजन दिया पर, उचित दान भस्नान ॥२॥
फरक, जल, दूप, मूग, पान, तया फल, मोपधि खापर भी
स्नारदानादिक रिपा करना चाहिये ॥२॥

R
पासपोषिपणम्
दीपो भक्षयते ध्वांत कन्जल च प्रसूयते
यदन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते ताशी
प्रजा ॥३॥
दोहा-तम कई भक्षत दीप अरु,प्रगटत काजळ माहि
प्रजा होति तिमिही प्रगट, मन नित्य जिमि माहि॥
सर्प-दीपक बंधकारको लाता है सपा कामको प्रगट
भरतारे,भसा निस्प भम सापा मावासी मजा पस्पम
होती रे॥३
वित्तं देहि गुणान्वितेषु मतिमन्नान्यत्र
देहि क्वचित प्राप्तं वारिनिर्जल घन-
मुखे माधुर्ययुक्त सदा जीवन स्थावर-
जगमांश्च सकलान् संजीव्य भुमडल-
भूयः पश्यति देव कोटिगुणित गच्छ-
त्तमम्मोनिधिम् ॥४॥

I
-
मावाटीकासचिवम्
७३
[कवित्त ] दीजै घन गुमिन अनत न रूचित दीजै,
वारि निधि वारि घन मुख में समाय के।
कहत मधुरता निरसर ही पारि वही,
सकल घराचर प्रजान को जिवाय के।
सकल जियावत महान भूमि मंडल को,
ताले पुनि कोटि गुन और जल काय के।
पदो मति विज्ञ देव पुनि इमि देख्यो जात,
मिलत महान वारि निधि मोहिं जाय के।४॥
मर्प-रे परिमान । गणियोंको धन दो, मम्पत्र न दव,
समुद्रामा मयके मुसमें प्राप्त होनेसे निरन्तर पधुरता युक
सेवा। भोर मही मस सम्पूर्ण परापर भीपोंग मिपाकर,
मूर्पटलको निवाता हमारे देव । फिर पोटि गुमा पर सस
सागर नाताऐसा दसाहे॥४॥
। चांडालानां सहस्रश्च सूरिमिस्तत्त्वदर्शि
मि ॥एको हि यवन प्रोक्तो न नीचो
यवनात्पर ॥५॥

पाणम्पनीविपन
दोहा-अधिक सहस चौहाल से,अघमी यवन महान ।
तत्व विदन माप्यो कविन, नीच न यवन समान ॥५॥
मर्प-तत्वदर्शी करियोंने सहस्रपोगसाँसे मीप एक परन
कहारे, पवन नीच दूसरा नहीं है॥५॥
तैलाभ्यंगे चिताधूमे मैथुनेचौरकर्मणि
तावद्भवति चांडालो यावत्नानं-नचा
चरेत् ॥६॥
(ब)स लगाये पिठाधूम से, मोर दिये रतिदान । तब
लग रहास परत नर्षि, नवी मनु स्माम ॥६॥
अर्प-दस पहनेसे पिताकी धूम उगमसे मैथुन करने
भोरपरानेसे सनतक मनुष्य पागल रहता है, मातक स्नान
न करे।।।
अर्जीणे मेपज वारि जीर्ण वारि वलप्रद
म् भोजने चामृत वारि भोजनांते
विषप्रदम् ॥७॥

४५
भापासासाराम
सार-औषधि वारि मोर्ण माहि अरु, असन मत
विषकारी भोजन समय ममिय है जक है, पचन
समय बलकारी ||७॥
अर्थ-ममीम जस ओपपि है, पचनेके समप बस पल
आपकरे। भोमनके समय जल ममृत, सपा मोजनके
पघात् माजन विपके समान गुण परता॥७॥
इत ज्ञान क्रियाहीन हतश्चा ज्ञानतो
नर ॥हत निर्नायक सैन्य स्त्रियो न
साह्यभर्तृका ॥८॥
(छ) नारीगन दिन पति विनर , ममुन नए महान ।
नष्ट शान त्रियाहीन भर, रसद पिना प्रपानnen
भर्प-पासमीन जान नप, मोर मन्नानसे पनुप्प नष्ट
बिना सेनापतिषी सेना नप, सया पति विहीन सिपो
मा हो जाती
वृहकाले मृता भार्या वधुहस्तगत घ-
नम् ॥ भोजन च पराधीन तिस पुसा
विडम्बना ॥९॥

गानीविदनम्
पाहा-पंधु हरत घन गत तथा, पुषकार इत नार ।
पराधीभ मोअन माहि, पुरुषहि प्रय दुखकारि : ॥९॥
मर्प-सरकारमें मेरी हई स्त्री, एमोके हाथमें गया इम
पन, 'तमा परायेके माधीन भागन, पुरुषको तीनों
विरमाना ॥९॥
अग्निहोत्रं विना वेदा न च दान विना
क्रिया॥ न मावेन विना सिद्धिस्तस्मा
ब्रावो हि कारणम् ॥१०॥
पोहा-ममि हो बिन वेद मरु,नष्ट क्रिया विनदान ।
भाव विना नहिं सिद्धि कछु, साते माय प्रधान ॥१०॥
भर्प-अमिहोपरे बिना बद, मोर माफियाके बिना दाम,
पता मावरे बिना सिदि महीं, इस कारण मावही कारण
है॥ १०॥
काठपापाणधातूनां कृत्वा भावेन सेव-
नम् ॥ श्रद्वया च तथा सिदिस्तस्य वि-
ष्णो प्रसादत ॥११॥

मापारीकासहिदम्
दोहा-सेव करन मई मुर्तिरचि,धातु काठ पाखान ।
प्रहाते तिमि सिद्धिलह, कृपा विष्णु भगवान ।।११।।
मर्प-बार पापाण पाहावी मतिमी मनावर भावसे सेवा
करनेमें भी प्रदाने वैसी पिदी विष्णुफे प्रसादसे होती हे ॥११॥
न देवो विद्यते काठे न पापाणे न मृ-
ण्मये ॥ भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्धा-
वोहि कारणम् ॥ १२॥
दोहा-काठ मोहि माहि देप अरु,ना कपन न पखान
ताते कारण मावही, माव माहि मगधाम ॥ १२ ॥
मर्पन परमार १, न पासान, न सपर्णमें, निषयही
देवता मारमें विपपान रे, इसीसे भारी मारणारे॥१२॥
शातितुल्य तपो नास्ति न सतापात्पर
मुग्वम् ॥ न वृष्णाया परोव्याधिर्न च
धर्मा दयासम ॥ १३॥
दोहा-अधिक न सुख सतोपत,सुषमा शातिसमान
तृष्णात नाई प्याधी अति,धर्म म दया समान ॥१३॥

पावनाविवाम मर्प-योतिके समान पख नहीं है, संतापसे मषिक पस नहीं। पप्णमे मपिफ ध्यापि महीं है और दमामे समान धन मही॥ १५॥ क्रोधो धैवखतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी। विद्या कामदुधा धेनु सतोपो नन्दन वनम् ॥ १४॥ (५) मोपरि यमरान सपा सरि, बेतरनी तृष्णाही। नंदन पन प्रताप महरिभरू, पामपेन विपाही ॥१४॥ मर्पोपही पमराम , तृष्णाही वैतरनी मदी। नि पाही कामषेम गोरे, संतोपही नंदन बनो। १४ गुणो मृषयते रूपं शील मृषयते कुलम सिद्धिर्मपयते विधा मोगा मूषयते ध- नम् ॥१५॥ (ब) पूणरूप मूपित करस, सिद्धिहि पाम विपाशाभ । हल करत मूषित शीळ, मरुपम मोमवे सायोम।१५। अर्प-गुणरूपको मूषिप्त रसा, ग्रीस कसको भूषित करवारे । सिदि पिपाका मूपित करती है, मोग पमको भू पित परमारे। १५॥

मापारीपासहिदम् निर्गुणस्य हतं रूप दु शीलस्य हत कु लम्॥ असिद्धस्यहता विद्या अभोगेन इतधनम्॥ १६॥ पोहा-निर्गुण कर है रूपहत, इत कुशीळ परिवार । विया नए मसिरकी बिना मोग धन छार ॥ १६ ॥ मर्प-निर्पणका रूप हत है, दुम्पालिका करू इव है, सिद्धि रहित की रिपाइव है, पिना भोगके पम इस रे । १६ ॥ शुद्ध भूमिगत तीय शुद्धा नारी पति- व्रता ॥ शुचि शेमकरोराजा संतुष्टोत्रा ह्मण शुचि ॥१७॥ दोहा-धरा प्राप्त जल शुषि तथा, शुषि पतिव्रत रत पाळा शुद्ध विप्र संतोष धर,शुषि क्षेमी नरपाल |१७|| मन्मपि प्राप्त जस शुद्ध रे, पतिव्रता खी शुख है। कल्याण कर्ता राजा राम है, संतोपी मामा पविप२९७॥ असन्तुष्टा द्विजा नष्टा सतुष्टाश्च मही-

पापनाविनम्
मृतः॥सलज्जा गाणका नष्टा निर्लज
श्च कुलांगनाः॥१८॥
दोहा-मसतोषधर नष्ट हिज, सतोषी नरपाल ।
गणिका नष्ट सलज्ज भरु, गत लजा कुछ चाळ ॥
मर्थ-संतोपहीन बामण नष्ट , तवा सतोपी रामा मारे,
निम्न कुलस्त्री, व्यासजावाम गणिका नहर १८:-
किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहि-
नाम् ॥ दुष्कुलं चापि विद्वषो देवैरपि
सुपूज्यते ॥ १९॥
दोहा-देहिन विद्या हीन के, का कुळ भये महान ।
पूजा पायन सुरत सन, नीच घेश विधान ॥ १९ ॥
मर्प-देहपारियोंके विपासे दोन पोलो क्यारे विदा
मका फहमी देक्सामोंसे पूर्वा नाता है।॥ १९॥
विहान प्रशस्यते लोके विद्वान सर्वत्र
गौरवम् ॥ विद्यया लमते सर्व विद्या
सर्वत्र पूज्यते ॥२०॥

मापाटीबासहितम् । दोहा-विधा पूजित ठाम सघ,लह घुब सब जग मान । विधा ते सब मिलन है, पहित पूज्य जहान ॥२०॥ मर्प-प्रसारमें परित पूमित होता है, पंडित पत्र गौरव पातारे, विपास सर प्राप्त होता है, विपा सब स्पामि पूजी जाती। २०n रूपोवनसपन्ना विशालकुलमभवा.॥ विद्याहीना न शोभते निर्गधा इव कि- शुका.॥२१॥ (द) दिपा दिन यौनन एमि युननर, उपमेश महान। योमा पारत नॉटिंगप दिन, टेसू पुप्प समान ॥ २२ ॥ मर्प-रूप पोरनसे पुफ, बरे फुसमें सस्पन र विपसो दोन पुरुष, मंपि रहित सूरे पूरे पमान ग्रोमा नहीं ,मांसमक्षे.सुरापानर्मूर्खश्चाक्षरवजिते.॥ पश्यामि पुरुपाकाराराकातास्ति मे- दिनी ॥२२॥ पान १

८२
पामसमाविष्र्पनर
(छर)रापान कारी मसर मरि, शठपह ममबहार
पुरुषा कार पशन से बसपा, मति सेगुत मार ॥२२॥
मा पौष खाने, पुरापान करनेरासे मार से ही
पर्स पुरुषाकार परमोंसे मर्दिनी मारसे माकान्त ॥ २२॥
अन्नहीनो दहेद्राष्ट्र मंत्रहीनश्च ऋत्वि
ज.॥यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञ-
समो रिपुः ॥२३॥
दोहा-ममहीम राज्यहिं वहस दान हीन यममान ।
मंत्रहीम ऋत्विजन करें, रिपु म यज्ञ सम मान॥२३॥
मर्प-ममहीन राज्यको, तथा मशीन सविमान
हीन पजमानको नए सातारे । यह समान मौर थम
नहीं है।
विमाणत्पनीको मापाटीकापामामोप्यायः ॥ ८॥

मापटीपासाम् अप मदमोध्यायः मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयाविषव- त्यज॥क्षमार्जवदयाशौचं सत्य पीयू- पवत्पिव ॥१॥ (७५)शात पात को मुकि स्पा सो, विपप गरछ सममान । भार्जव दया क्षमा सत शोधर्डि, पी तूमपा समान १॥ भर्प-देतात, जो मुक्ति की इण्डा भरतारे,तो विपयों को दिपमे समान स्याग दे, तपा क्षमा, मार्जव, पया, शोष क्या सस्प को भमूत के समान पी५ परस्परस्य मर्माणि ये मापंते नराधमा त एव विलय यांति वल्मीकोदरसर्प- वत॥२॥ दोहा-बात परस्पर कटु बधन, नरन नराधम जोन पल्मी कोदर सर्प सम, माशाहिं पायप्त तीन ॥२॥ मर्प-जो मनुष्योम मपम परस्परमें पर्म अपनोफामोलसे बामा परे सपपे समान नाराको माप्त होत २॥

Fee र्धजीवी धाड पुरा कोऽपि न वृद्धिदो गंधः सुवर्णेफलमिश्नुदंडे नाकारि पुष्प खलु चंदनस्य ॥ विद्यान धनी मुपतिदी मृत्॥३॥ (क) पदम पुष्प दीर्पवय-मूपति इस वर फाप पन बान । घबर न गैपनकी न प्रथम नाई, भयो लिपि मंत्र कोस माम॥३॥ मर्य-मोनेमें मंप, कसमें फल, पवन पुप्प, परितक पनवान, भूपतिको दी धीमी, नहीं किपा(धानपश्ता परिस मधाताको कोई पार्द देनेवासा नहीं हुमा ॥३॥ सर्वोपधीनाममृता प्रधाना सर्वेषु सौ ल्येष्वशनं प्रधानम् ॥सर्वेद्रियाणां नर न प्रधान सर्वेषु गात्रेपुशिर प्रधानम् (द) ममिप मपाम सकस भापषि मई, समास माँ मसन प्रधान । पगाधन माँ शीस मुमबईदि मई मर्यन प्रपान ॥४॥ भर्प-पई घोपषियोंमें गिछाप माम. सम्पर्ण लाभ

माषीकासात्वम्
मोबन ममान है। सर्व इम्मियों नयन मपान है,सप मंगो
घिर प्रपान ४॥
दूतो न सचरति खे न चलेच्चवार्ता पूर्व
न जल्पितमिद नच संगमोस्ति ।व्यो-
नि स्थितं रविशशिग्रहण प्रशस्तं जा-
नाति यो द्विजवर स कथ न विहान ५॥
[ ] महिं पर मातम बात पठति पह, पूर्वन फपिस
न संयम हाय । ममपित रविणसि प्राण मान मो, बामण
पर किमि पुप नहिं सोय ॥५॥
मर्प-दूत माकाशमें महीं आता, मौर म पाव पल्सी, पर
पहिले किसी ने नहीं कर रखा, भौर, न मेल होता।
माकागमें स्थित चंद्र सूर्य का प्रण मो दिममेए मानता है।
पहरेसे पवित महीn५॥
विद्यार्थी सेवक पांथ क्षुधातों भयका-
तर ॥भांडारी प्रतिहारश्च सप्त सुप्तान्
प्रबोधयेत् ॥६॥
दोहा-क्षात्र, दास, पंथी क्षुधित, करनहार मंडार ।
सोबत सात जगावही, भय कातर प्रतिहार ॥ ७ ॥

पानमनीविपंग भर्प-विपापी,मार, पविक भूख से प्याकुल, तपा मयुरे म्याकूब मगरी क्या हारपास इन सातको सोये हुए गरे। अहिं नृप च शार्दूल किटिं च बालक तथा॥ परश्वानं च मुखं च सप्त सुप्ताव बोधयेत्॥७॥ दोहा-सर्प नृपति वालफ तथा,किर्टि सिंह पर श्वाना इन सातन न जगावठी, सोवत नरन अमान ॥ ८ ॥ मर्थ-सर्पको, राजापो, सिंहको, मोर किटिको तया बाल कको दूसरेफे फसेको, पपा मूर्त, इम पात-सोते हमाको माजगाये ७॥ अर्थाधीताश्च यर्वेदास्तथा शुद्रान्नभो- जिन ॥ते द्विजा. किंकरिष्यति निर्वि- षा इव पन्नगा.॥८॥ दोहा-हिज भक्षी शूद्राम जो,श्रुति पढ पन हित-जाम दिन विष पनगगम सरिस,का करि है हिज तौम ॥5॥ मर्प-जिमोंने बेद ममा निमिछ परे है सेही मोशन- का मम सामेगाले हैं। बामण विना विपके सर्पके समान क्या करेंगे ८० मापटीपासाधित यस्मिन् रुष्टे भय नाम्नि तुष्टे नैवधना- गम ॥ निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति सरुष्ट किं करिष्यति॥९॥ दोहा-जिहि संतुष्ट न प्राप्ति धन, रूठे भय महिं जौन कृपा दरु जिहि शक्ति महि, रूटि कारहि का तौन९॥ मर्प-निसफे रूळनेसे भप नहीं, मष्ट होने पनकी माप्ति नहीं, धपा बिष दर देन, भमुग्रह प रमेकी प्रकि नहीं। 'पहरूळमकर या फरेगे॥९॥ निर्विरेणापि सर्पण कर्तव्या महती फ- णा ॥ विपमस्तु न चाप्यस्तु घटाटोपो मयंकर ॥१०॥ सार दिन विष के पन्नग काई चाहिये,दरशावन फणमारी विप हो गयया नहि होवे,पटाटोप भयकारी ॥ १०॥ भर्प-बिना पिपरे सर्पकाभी पहा फन दिसाना पादिये रिपोपा महो पटाटोप मयंवर रोताद।१॥ प्रात'तप्रसगेन मध्यान्हे स्त्रीप्रसगत ॥

पाणपनीविनम् रात्रौ चोर प्रसंगेन कालो गच्छति धी- मताम्॥११॥ [ ] रानि चोर हरि कपाभागवत, पत पोहु पर्थ प्राप्त । मम्प नारि पन पन्त राम प्रणा, समप उपना भात ॥१॥ मर्प-प्रभात समप पत प्रसंगवाले प्रेम महामारतके, वदा मध्यान्ह सपय स्त्री प्रसंगके प्रेप रामापणके तपा रानिमें पोर मखमपासे प्रेय भीममाणपतफे पाडमेमें पुद्धिमानोंका समय जावा॥११॥ स्वहस्तग्रथिता माला स्वहस्तधृष्टच- न्दनम् ॥ स्वहस्तलिखितं स्तोत्रं शक- स्यापि श्रिय हरेत् ॥१२॥ [टिपली ] प्रातः काल मरतने पर से या विचार, कि पूर्व का साशनि कारक होता है। मम्मान कार यमायण की क्या कर मनुष्य परिन केसा सना पारिये इस बात का विचार को रात्रिको भागवत की कंपा तुनकर पा विचार करे कि मीण व १६८.८ सियों के मममें सर भी रेस. निवेद्रिय थे, वैसा मनुकरण पमपो भी करना चाहिये। क्योकि इम्प मी विवेन्द्रियों से

मावाटीकासश्विम्
दोहा-निज परको चदन घिसो,निन करकीकृत माळ
निज कर कृत स्रोत्र मरु, संपति हर सुरपाळ ॥ १२॥
मर्प-अपने हापकी गूंपी माला, अपने हापमा पिसा
हमापदन, अपने आपका हिसा हमा छोक, कीमी
समीर तेरें।१०॥
इक्षुदडास्तिला. शूद्रा कांता हेमच
मेदिनी॥ चंदन दधि तांबुल मर्दन गु-
णवर्धनम् ॥१३॥
(सार) उप तथा सिक शूद्र तथा वधि,महि चन्दन भरु
नारीताम्बूल हुकचन को मर्दन है गुण वर्धनमारी १३
मर्य-ऊस, तिक, शूद्र, सी, वर्ण तपा पुली, पापन,
सपा ही वपापानका मर्दन करना गुण पर्पक है।॥ १५॥
दरिद्रता धीरयता विराजते वस्त्रता
शुम्रतया विराजते ॥कदन्नता चोष्णत-
या विराजते कुरूपता शीलयुता विरा-
जते ॥१४॥

पाण्याविनम् [८] वरिष्ट्रासोति पीरता पता मोति जी पता ते । स मम हे सोहत गणताते । मसवा सोसिस घाताते ॥१४॥ मर्प-दरिद्रता धीरतासे सोहसी है, वत्रता समता पोमा पाती है। खराब मम मरम होनेसे घोमा पातारे, व्या रूपसा शीरसे शामिप्त होती १४॥ इतिथीचाक्पनी शिवदास पोरेपास माषा सीकापा मबमोऽध्यायः ॥ धनहीनो न हीनश्च धनिकः समुनिश्व य ॥विद्यारत्नेन यो हीन स हीन स- ववस्तषु ॥ १॥ दोहा-निश्चय वा घमवान मर,पन विहीन नहिं दीन। विधा रन विहीन जो, यह सब वस्तुम हीम ॥ १ ॥ मर्प-धनहीन हीन नहीं होता, मह निवपही धनी है। जो मियारूपी गनसे नाहीन है, यह सब वस्तुमि हीन ॥ १८ दृष्टिकृतं न्यसेत्पाद वसपूत पिवेजलम् t मामटीकामाविषम् शाम्रपूत वदेद्वाक्यं मनःपूत पमाचरेत दोहा-दृष्टि शोचि राखौचरण, वस्त्रछानि पियवारे । शास्त्र शुद्ध कह वपन कर, काग्ज हृदय विषारि॥२॥ मर्प-दृष्टि ग्रोधार परण रपये, पखसे छानकर जल पीरे । घास से पहपबा माई मन से विचार फर फार्प करे॥२॥ मुखार्थी चेत्यजेद्विद्या विद्यार्थी चेत्य- जेत्सुख । सुखार्थिन कुता विद्या सुखं विद्यार्थिन कुत.॥३॥ दोहा-विधापाही तजहि सुख,विद्या तम सुख पाह। सुरण पाहिन विद्या कहाँ विद्यार्थिन धन काह ॥ ३ ॥ मर्प-मखमीणोता रिपाया स्पाग परे विपाकी रातो मत का त्याग परे पुसार्पियो पो पिपानी रिपापित कही। १ कवयः किं न पश्यति कि न कुर्वति

पानीविनम्
योषितः॥मद्यपा किं न जल्पंति किं
न खादति वायसा.॥४॥
दोहा-कषिगण देखत काह नहि,काह करत तिय मारे
मपप जल्पत काइ महि,वायस काहन खाहि॥४॥
मर्ष-करिया नहीं देखते मियों क्या नहीं करतीं । माप
स्पा महींपकते। कौए क्या नहीं साते ॥४॥
रक करोति राजानं राजान रकमेवच॥
धनिनं निर्धन चैव निर्धन-धनिनं-
विधि ॥५॥
दोहा-नृप कहूँ करत दरिद्र अरु,दीमहि करत भुवार।
धनद रंक रकी धनद, कर विषि सिरजनहार ॥ ५॥
मर्य-निपाता स्त्रिी को रागा, सपा राजा को रफ, मोर
बमियों को निर्मन तथा दरिद्रियों को समयान करता है।५।
लुधानां याचक शर्मुर्खाणां बोधको
रिपु ॥जारखीणां पति शत्रुश्चोराणां
चंद्रमा रिपु ॥६॥

मापटीकासरियम् ५३ दोहा-कोभिन यापक शन्नु मरु, ज्ञानद शत्रु गैवार । पोरन के मरि पदमा, पति अरि सियगन जार ॥६॥ वर्य-शोभियों का पापक शह है मूखों को धान देनेमा पारम्पमिवारिणी त्रिपों का पति देवपा चोरीका पर पंद्रमा रे.. येषां न विद्या न तपोन दान न चापि शीलं न गुणो न धर्म ॥ ते मृत्युलोके मुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्च- रन्ति ॥७॥ दमन सिपा नदि शीठ न गुण नाई पर्म तपस्पा बरू मार दान मरवमय जगत मरे विचरत भार रूप मृगा भमान000 मर्प निनयो न पिपान तपन दान सपा मशीस गुणरेम पर्पये मृरपुराक में पृप्पी प भार रूप पमु परूप से मृगाधपते ॥७॥ अंत सारविहिनानामुपदेशो न जाय-

पाणायनीतिवफ्नम
ते॥मलयाचलससर्गान्न वेणुश्चंदनाय
ते॥८॥
(सोरठा )लागत नहिं उपदेश,मीतर सार बिहीन के ।
पौस म चदन वेश, कह मल्याळ संग ते ॥ ८॥
अर्थ-भीतर से सारहीनों को उपदन महीं छगता महमापक
की गति से पति पदन नहीं होता है
यस्य नास्ति स्वय प्रज्ञा शास्त्रं तस्य
करोति किं॥ लोचनाभ्यां विहीनस्य.
दर्पण किं करिष्यति ॥९॥
दोहा-शान कारहि तिहि काइ धौ,है जाके मसि माहि।
दर्पण कारहि काहलो, छोपन हीनन कोहि ॥ ९ ॥
मर्य-निसके पुद्धि नासिरोशाख क्या र सफारे
मेनों से दीनको दर्पण या परेगा॥९॥
दुर्जनं मजन कर्तुमुपायो नहि भृतले ॥
अपानं शतघा धातन श्रेष्ठ मिन्द्रिय
भवत् ॥१०॥

.
मोपटीपासहित
दोहा-पुर्जन कह सजन करन, माहि उपाय जहाम।
घाई होत न धार शत, इन्द्रिय श्रेष्ट अपान ||१०॥
मर्प-पुर्षन को सप्तन करने का उपाय पृथ्वी में नहीं 17
से पार भोई भी मपान इंद्रिय भेष्ट विय नहीं रोती १०॥
आप्तद्वेषाद्भवेन्मृत्यु- परवेषाहनक्षयः॥
राजवेषादवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः॥
दोहा-हेप वहन से मरणहो, सब क्षय हेप भुवार
शत्रु द्वेष धन नाश हो,हिज मरिता, कुकछार ॥१३॥
अर्प- देश से मृत्यु होतीराव दे ५ से पम का
माघ दोबाराबार ष स सका नाश होता रसपानाम
म के सेकसमा नाय होता है। १९॥
वर वने व्याघ्रगजेंद्रसेविते दुमालये पत्र
फलो सेवनम्॥तृणेषु शय्या शतजी-
पविल्कल न धुमध्ये धनहीन जीव-
नम्॥१२॥

वापानीवि पर्णम् पद-सेपन बस फसवण या भसापान नमन सेषित कर मोमिक्स मस प्रसंगनि पन सब म मा अधुन मन महिं ।। १२० वर्ष-पान तपाहापियों से सेवित परसबा बम में पत्र फस दपा पर का सेवन तृण पी शप्पा वषा घोगडी का पुराना बरक्स मठाई पर बधु भों में निर्मम होकर जीना मकानहीं। १२॥ विप्रो वृक्षस्तस्य मुलं च संध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् ॥ तस्मान्स- ल यत्नतो रक्षणीय छिन्ने मुलें नव शा- खान पत्रम् ॥ १३ ॥ चंद-धर्म धर्म र पत्र म दिन भूल ना संध्या मुतिहार रसिप मूह यल त तिहि तरु भप नरह पम नEिRum मर्प-बामण भरें ससपी जामाबेद वाला प्रपा पर्म फर्म घइस कारण मूल भी पान से सामानाचा रिये मूसफे शिम होने में न पासा राखी न प १३॥ माता च कमला देवी पिता देवो जना-

मापटीका सचिवम्
देनः ॥बांधवा विष्णुमक्ताश्च स्वदेशो-
मुंबनत्रयम् ॥१४॥
चंद-मननी कममा देषि पिता मायदेव , पिाभिक
गन वर्ग सब, तीन छोफ निम देश ॥ १५ ॥
मर्म-समी देवी माता रे सपा मनाईन देवही पिता रे
मौर निष्ण भक बाँपर सपा सीनोखोफ मपमा देश
एकक्षसमारूढा नानावर्णा विहंगमा।।
प्रमाते दिनु दशम यांति का परिदे-
वना॥१५॥
दोहा-बैठे एकहि विटप तर, वर्णम अमित विहंगा
प्रास दिशा दश जात उरि, यह की शोक प्रसग १५
मई-पपदी इस पर ठे हुए भमे वर्ण के पक्षी प्रभात होने
परदेशी दिशा में पसे नाते इसमें क्या पुस । १५॥
बुद्धिर्यस्य वलं तस्य निर्बुद्धश्च कुतो-
वलम्॥ वने सिंहो मदोन्मत्तो जंबुकेन
निपातितः॥१६॥

पाणश्मनीविनम् ईद-मिरियुद्धि पठ तास है, मह कहाँ कुमति मेधार सन्मस मद हरिदि मारपी, विपिन मध्य सियार ॥५॥ अर्थ-मिप पुदि उसने बहरे निति से मस होई बम में मतबा सिंह को सियार ने मार मला १५ ॥ का चिंता मम जीवने यदि हरिविश्व- मरो गीयते। नोचेदर्मकजीवनाय जन- नीस्तन्य कथ् नि सरत ॥ इत्यालोच्य मुहर्मुहर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलमत्व- त्पादोबुजसेवनेन सतत कालो मया नीयते ॥ १७॥ द- विमरहरि को जात बोकाका मम जीरन फॉविं पदि भस नाई तोक्षीर होत किमि पारन हित ममनारमा हे मसापति । य दुनापक पार बार गमि के इमि पार तव पादाम्युज सेबन महै नित मरते समय बितायोमात १५ मर्थ-अोभगवान विभा हे आते हैं तो मेरे मीपन क्या का है यदि ऐसा न होता,वोपासकको जिपामे निमिध इसकी माता क दूध फेस निकटमा इसी प्रकार पारं बार विचारमा यदुपति समीपति फवस मारे परम माघटिका सोवर कमों के सेवन सेही मुसवे निरंतर सपप विसपा आना है॥१७॥ गीर्वाणवाणीषु विशिष्ट बुद्धिस्तथापि भाषातरलोलुपोहम् ॥ यथा सुराणाम मृते च सेविते स्वर्गागनानामधरासवे रुचिः ॥ १८॥ द- तपापि लोलुप माशावर पदि शुभमनिवासी गीर्वान सेवन अमिय याहिं पाइव मर जिमि पुरतिय भघरासमपान ८ मर्प-देवनाणी यपपि सचम युद्धिवाला हूँ सोमी में भाप तरका छुप है जैसे देवताओं की ममृतके सपन करने में भी वर्ग फी नारिपों क अपर रूपी भासबमें रुषि होती है। अन्नाद्दशगुण पिष्ट पिष्टादशगुण पय ॥ मपयसोऽष्टगुण मास मांसाद्दशगुण धृत- म्॥१९॥ द-भपिक पिघाम ममते दरागुण, पप दाणहेमपिफ पाणपनीवि वर्पमक्ष पिसान पयते मांस माठ गुणो मरु, पम पम पनि महान ॥ १९॥ मर्थ- -अभ से पिसान पाण्ण है पिसाम से पाणदूमो पूष से माठाण मास तथा पौस से पाप यी है। १९ ॥ शाकेन रोगा वर्धते पयसा वर्धते तनुः।। घृतेन वर्धते वीर्य मासान्मांसं प्रवर्धते॥ दोला-पटत शाक ते रोग, दूध ते सन है पावन । घृत ते वर्षत वीर्य, मांस ते मासहि पाहत ॥ २० ॥ अर्प-पाक से रोग यया रेप से शरीर परखा। पीसे पीर्य पड़ता रेमास से मांस परताहे ॥२०॥ इति भी पाणम्पनीको शिपयास परिपक्व मापानीकायां दशमोऽध्यायः ॥१०॥ दातृत्व प्रियवक्तृत्त्व धीरत्वमुचितज्ज्ञ- ता॥अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वार सहजा गुणा ॥१॥ (द) पीरमर्षव सुषका दानी, होपो ननिस विचार। वन प्राप्त मस्न कीनेते.सामाषिक गुण पार, मापाटीपासचिवम् मर्प-दाताहाना, सवका रोना, पीरमा हाना मषित, वि पार होना, पर चार सामाविक गुण हैं मम्याससे नहीं प्राप्त होते है॥१॥ आत्मवर्ग परित्यज्य परवर्ग समाश्र- येत ॥स्वयमेव लय याति यथा राज्य- मधर्मतः॥२॥ (क)मात्म पस परित्याग करत जो, मम्यपम स्वीकार मिमि अपर्म ते राग हात पह, मापरि तिमि संहार ॥ २॥ मर्प-मपने पक्ष को जो त्यागपर मम्पके पक्षका मामय करता र मापही नानको प्राप्त होता है से मर्म से राम्प॥२॥ हस्थी स्थूलतनु स चांकुशवश कि- हस्तिमात्रोंकुशा दीप प्रज्वलिते प्रण- * श्यति तम किं दीपमात्र तम ॥ वज्र- णापि हता पतन्ति गिरय किं वज्र- मात्रा नगास्तेजो यस्य विराजते स-

पाणपनीविनम्
वलवान स्थुलेपू का प्रत्ययः॥३॥
छप्पय-इस्ती तनु स्थूल होत वश अकुश से है।
साते मकुश का परापरी इस्ती के है॥
दीप प्रकाशित होत माहि तम जात भसाई ।
ताते दीपक काह घराधार तम है नाई॥
पतितपम्र हत होत गिरि ताते सम गिरि कुर्किश कहा
मारी तन विश्वास कह जाके तेज महाम वह ॥ ३॥
अर्प-नापी स्यूए शारीरहे पाश से मशीभूत होता
है, क्या मंकुश रापी के बराबर है। अपकार दीपकरे प्रम
मित रोने से नए रोताहै, क्या अपरार दपिकके बराबर है,
पर्वत बम से भी इस हए गिरते हैं, क्या पर्वत पब की बराबर
बिसके तेज विराजमान हाताहै, पर ही रोता ,स्पून
परीर बालों का क्या विश्वासरे।
कलो दशसहस्राणिहरिस्त्यजति मेदि-
नीम् ॥ तदधैं जान्हवीतोयं तदर्धग्राम-
देवताः॥४॥

माटीकासाविम्
दोहा-अयुत वर्ष पीते तजत,महि कलि महँ धनश्यामा
तासु मर्म महँ गग जळ, तासु अर्ध सुर ग्राम ॥४॥
मर्प-फसि में वापस पर्ष मातने पर मिष्णु पृथ्वी को
स्याग देते हैं, जिससे मापे में गंगाजल सपा तिसके मापेमे
माम देवता ॥४॥
गृहासक्तस्य नो विद्या नो दया मांस-
भोजिन ॥ द्रव्यलुब्धस्य नो सत्य बै-
णस्य न पवित्रता॥५॥
दोहा-पिधा नहिं गृह कोपर्हि, दयान मास अहारि ।
द्रव्य काळचिाई सत्य नाहि, शौष नहिं वशनारी॥५॥
भर्य-प्रासक पुरुषों का विपा प्रास नहीं होती, मौसमो
नियों से दया नहीं आती, दम्य साए पी के रस्य नहीं होता,
तपा स्त्री पे बनीमूत को शौच नही होता ॥५॥
"न दुर्जन साधुदशामुपैविप्रकारैरपि
शिक्षमाण ॥ आमूलसिक्त पयसा घृ-
तेन न निवरक्षो मधुरत्वमति ॥६॥

पानश्यापिएलम
दोहा-दुर्जन लइत न साधु गति,शिक्षित विविध प्रकाशा
पय घृत सीपों मीम तरु,जह न मधुरता धार ॥ ६ ॥
अर्प-पात प्रकार से सिखायाा दुर्जन साधुवाको,
प्राप्त नहीं होता। मसी प्रकार मूख्से सींपा हमा मांग पूष
मपुरतारो नहीं माप्त होता ॥३॥
अन्तर्गतमलो दुष्टस्तीर्थस्नानशतैरपि।
न शुद्धयति यथा भाड सुराया दाहितं-
च तत् ॥७॥
सार-अंतर मळवारी शठ तीरथ,मज्जन शुम न होई।
मदिरापान न शुष्ट होत जिमि,दमो मनक महे सोई०
[अर्प) मतरमें विकार पारी पापी पुरुष सैकरों की
पार्क स्नान से भी घर नहीं होता । मेसे जापानमा
भी मदिराका पात्र पर नहीं होता ॥ ७॥
न वेत्तियो यस्य गुणप्रकर्ष सत सदा
निन्दति नात्र चित्रम् ॥ यथा किराती
करिकुमलब्धांमुतां परित्यज्य विमति
पुजाम्॥८॥

मापटीकासाविम्
[] का अपरज पर निंदत पो सिदि, जो हि
पुणन म जान सदार । यया किराती मुका फार गम, त
जिने पारत माहार ॥ ८ ॥
[अर्प]-मो जिसके श्रेष्ठ गुणोंको नह। नानता, पर
उसकी निरंतर निंदा करताहे इसमें आश्वय श्या ।
मेसे मीनी हापीक पण्डस्थलमें मिले हये मोविपों
को स्पाग गुगा धारण करती है॥८॥
येतु सवत्सर पूर्ण नित्य मौनेन मुंजते
युगकोटिसहस्र ते पूज्यते स्वर्गविष्टपे॥
दोहा-पूर्ण वर्ष मरि मौन व्है, जो नित करत महार
सुरपुर पूजित होत ते, नर युग कोोट हजार ॥ ९॥
{मर्प]-जो पूर्णवर्षभरि निस्प पोन होकर भोगन फ
रते है। वे सहस पाटि युग तरु स्वर्गमें पूछे जाते हैं ॥९॥
कामक्रोधी तथा लोभ स्वादु भृगार-
कौतुके। अति निद्रातिसेवे च विद्या-
र्थी त्वष्ट वर्जयेत् ॥१०॥

चाणापनीवि पर्पणम्
दोहा काम क्रोध अतिसेव अरु, कोम स्वाद भृक्षार ।
मति निद्रा कौतुक तजहि, विद्या चाइनहार॥ १० ॥
[मर्प] काम, कोष, पपा मोम साद शृक्षार, पाको
क, अवि मिद्रा, मति सेवा, यह माठ बस्त विपापी
स्याग दे१०॥
अकृष्टफलमूलानि वनवासरति सदा॥
कुरुतेऽहरह श्राद्धमृषिर्विप्र.स उज्यते॥
व-भूमिम अकृषि साय फस मूसी करत भार नि
तमोई । नित दिन रत बनबास विप्रवर, फपो जात ऋमि
माँ॥ ११॥
मर्प-विना जोती मिसे उत्पम हय फस मूहमा मा
मन, निरसर वनवासमें प्रीति, तपा [मो] निरंतर भार
करता है, पर मामण भाषि कहा जाता है।११
एकाहारण सतुष्ट पदकर्मनिरत सदा।।
ऋतुकालाभिगामी च स विप्रो द्विज
उच्यते ॥ १२॥

मापाटीपातम्
-18 एपही बार आपनते, प्रात विय रति पर जो
। सदा निरस पर धर्म विमपर, मनो मात दिज दि १२
मर्य-एकही पारक भोजन से संतए, सदा पठमर्म
मिरत, तपा [मो] मातुपाहमें स्त्री प्रसगफारी मामा
मण दिज कहा मासाहे। १२ ।
लौकिके कर्मणि रत पशूना परिपा-
लकः॥ वाणिज्यकृषिकर्मा य.स विप्रो
वैश्य उच्यते ॥१३॥
पद-पारस पपी पाणिरूप :पा, रस व समारी मोई
लिम पशुनगण पाटनकारी, पैश्य महारत सोई ॥१५॥
मर्थ संसारके पमा प्रीप्ति पारी, पामोरा पाटन फ
रनेवासा, सपा मो वाणिश्प सपा सेटी नेहारा है यह
मामय परा माता ॥१५॥
५ लाक्षादितेल्नीलीना कौसममधुसर्पि-
पां विक्रेता मद्यमांसाना स विप्र शू-
द्र उच्यते ॥ १४॥

१.८
पालापनीवित
छंद-मधु पीकसम तेल लासादिकतया नीलको मेषमहार
पद मांसादिक को विक्रेता, ममो शुद्ध वह विप्र कुमार ॥१४॥
मर्य-सात इस्पादि, पदार्प, तेल, नीस, एम, मधु, पी,
मप तपा मांस का ऐषनेवाला मामण शन कहा जाता
है। १४॥
परकार्यावहताच दांभिक स्वार्थसाध-
क.छली द्वेषी मृदु कुरो विप्रो मार्जार
उच्यते॥ १५॥
पद-देवी छही कर मृदु दौभिक,भरु परकाम विगारनहार
कमोजात मारि विमरे, मरु स्वार्प निज सापनपार ॥१५ ।
मर्प-दूसरो पार्पा मा करनहारा, मोर पावडी,
स्वार्य साधम, छली सपा हेपी मृदु तयार मामण
मागार कहा जाता है॥१५॥
वापीकृपतडागानामारामसुरवेश्मना-
म् ॥ उच्छेदन निराशंक स विप्रो म्ले-
च्छ उच्यते ॥१६॥

मापारीकासहितम् । द- पापही सपा सरोवर, पर मंदिर ममा। नाश करम मरे होत न शापित, सो हिज म्लेस काई ॥१६॥ मर्ष-नापी इस साग, तपा अमराई, देव मंदिरमे ना- घ करमेमे का मकानेहारा मामण म्लेच्छ महाजाताद।। देवद्रव्य गुरुद्रव्य परदारामिमर्शनम् ।। निर्वाह सर्वभूतेषु विप्रश्चांडाल उच्य- ते॥१७॥ द-घरपन गुरुधन महाविशारी, मलसमेत पर पाल। सब माणिनसों निहिनादिन, कमो जात चांगला १७॥ मर्य-दवद्रम्प, गुरुद्रम्प, तथा पर स्त्री पत पूर्वक भोग परनहारा तपा सब प्राणियोंसे निर्वाह करनपाला विम पांगत पा जाताई ॥१७॥ देयं भोज्यधन धन सुकृतिमिनों सच- यस्तस्य वै श्रीकर्णस्य वलेश्च विक्रम- पतेरद्यापि कीर्ति स्थिता॥ अस्माक मधु दान भोगरहित नष्ट चिरात्सचितं

निर्वाणादिति नष्टपादयुगलं घर्षत्यहो
मक्षिका ॥१८॥
[छप्पय देव मोज्य घन द्रव्य तर्था सुकृतीन नरन में
संचित उचित न सासु उपार्जित निश्चय धनको ॥
पकि विक्रम श्री कर्ण सुयश ममलों जग छायो ।
हमरो नाश्यो दान मोग विन शहद कमायो ।
ममित काळ सचित कियो, यहि विधि नष्ट विषाद है।
मधु हित शोफित युगल निज,घिसप्त मक्षिका पावई.८
मई-पुण्यात्माओं को भोगम के योग्य पन, तपा दम्प
देना पाहिये । निधप परफे उसपा संप म करना पाहिपे
भीषण, वलि, तथा विक्रमपी कीर्ति भवतक स्पिष्ट रे, दान,
सपा भोग से रहित बहतकारस संचित पिपाहमा हमारामधु
ना होगमारे इसप्रकार नरहोनेसे मछरे । मि मालिका-
मपने दोनो पैरोमो पिसा मरती ॥१८॥
इतिश्रीपादयनीयो पियदास पौरप स भाषा
दीपाया मेरानोऽध्यापः ॥११॥

मापटीकासपियम् समय दादशोऽपापः॥ १२॥ सानदं सदनं सुतास्तु सुधियः कांता- प्रियालापिनी॥इच्छापूर्ति धनं स्वयोषि ति रति. स्वाज्ञापरा.सेवका ॥ आति- थ्यं शिवपूजन प्रतिदिन मिष्टान्नपानं गृहे।।साधो. संगमुपासते च सततन्यथो गृहस्थाश्रमः॥१॥ [छप्पय ] गृह आनंद ते पूर्ण,तथा प्रियवादिनि मारी अतिथि जनन सत्कार, मृत्यगन माज्ञाकारी ॥ इच्छापूरक द्रष्य, प्रीति उत्तम निज पाला। सगति पावन परम, साधु जनकी सप काला॥ दोहा-जळ भोजन मिष्टान्न नित,सेव सदा शसि घदनकर । ग्रह माश्रम इमि धन्य है,सुवन परम मतिमान वर॥१ अर्प-पर मानदसे पूर्ण, सपा पुरिमान पुष तपानिपवा दिनी स्त्री इच्छा पूर्विकारक पन, पर-अपनी सी में मी

।
पापानीमिर
पानी भाषा पासक सेवक, मविविएसेवा, शिरपूजन
प्रतिदिन गृहमें मिराम मोपन तथा पान, विवर प्राध
मनोंकी मति, इसमकारका गृहस्पापम पम्प ॥ १ ॥
आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्च यच्छूडया
स्वल्पमुपैति दानम् ॥ अंनतपारं सम
पैति राजन यहीयते तन्नलमेरिजम्य.
उंद भारत हिमन दया मना सह, दियो जाव को राम
दियो दिखन मा सियो जात माई, सो मृप होत महान २२॥
मर्प-दुसी मामणों में दमाम गुफा भो महासे पोगामी
दान दिया भाय, रामन 11 अनंतवाको माप्त होगा।
वापामणों से नहीं लिया जाता ॥२॥
दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्य-
सदा दुर्जने, प्रीति साधुजने स्मय. स्व.
लजने विदन्नने चार्जवम् ॥शौर्य शत्रु-
जने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता, इ-
त्थं ये पुरुपा कलाम कुशलास्तेष्वेव
लोकस्थिति ॥३॥

. मापटीकासहितम् [उप्पय ] मानव विद्यावान,जनन सन्मुख सराई । चातुरता मिज जनन, अधम जन गन मधमाई ॥ प्रीति साधु ज़म सग, दया पर ना पर कई ।। झोप गर्व खक नरन, क्षमा गुरु जन हित धरई ॥ मारी जन सम पूर्तता, अरिजन सन्मुख शौर्यवर।। सिनही ते मर्याद जग,जे इहिविधि गुण कुशकमर HA "मर्प-मपने परिवारमें दमता, दूसरे मनुष्यों में दया दुर्मयों में निरंतर दाम्पर प्राघु जनोंमें प्रीति एमनोंमें अमिमान, सपासरितों में सपा मोमें शूरता, उकानों में प्रमा, प्रिमिता.. "मानो पुरुष कौशल में पर होते हैं । तिनफीदी सोफमे पर पारे ।। हस्तौ दानविवर्जिती मतिपटी सारस्व- तद्रोहिणो, नेत्रे साधु लोकनेन रहिते पादौ न तीर्थं गौ ॥ अन्यायार्जित- वित्तपूर्णमुदरं गर्षेण तुगं शिसे,रेरे ज म्बुक मुंच मुंच सहमा नीचं मुनिंद्य व- पुः॥४॥ [छप्पय ) उभय विलोचन रहित,साधु पर्शन से माहीं। दीन्मों काहूँ पाम, युगळ हापन ते नाही ॥ तीर्घा श्रम न पयाम, कीन माही युग परनन ॥ सरस्वती ते द्रोह, महईि राखत युग श्रवनम || उमत मस्तक गर्व से अनय द्रव्य पूरण उवर ॥ रे रे जम्मुझ शीघही इमि निन्दितवपु त्याग कर ॥ ४ ॥ मर्याप पानसे रहित, तथा भमण सरस्मती से मोकारी बोनों मेत्र साधु दर्शन से रहित, सपा परण तार्थको नहीं ग। मम्याप से उत्पन्न किये धनसे ही मिनफा दर पूर्णी है, तथा गर्वसे शिरसपाही रहता है रे । ॥ मम्युक । श्रीमदी ऐसे निम्बित शरीरका त्यामफर ॥४॥ येषां श्रीमद्यशोदासतपदकमले नास्ति भक्तिर्नराणां येषामामीरकन्याप्रिय- गुणकथने नानुरक्ता रसज्ञा ॥ येषां श्री- भापाटीकासहिषम् कृष्णलीलालीलतरसकथासादरौ नेव- कर्णो, धिक् तान धिक् तान धिगतान्क थयति सतत कीर्तिनस्थो मृदंग.॥५॥ [सवैया ] मानवकी जिहि प्रीति नहीं यशुदासुत के पद पकज माहीं गोप सुता प्रिय के गुण वर्णन में रस. मा जिमकोलुप नाहीं॥ सुदर कृष्ण परिषन मे जिन कर्ण नहीं युत मादर माहीं ॥ गान समैहि मृदंग सदा कहहै धिक है धिक है सिन काहीं॥५॥ मई-मिन पनुप्पोंको यशोदापत रुपणके पाणोंमें प्रीति मही है।मिनकी जिवा प्रजगोपियों मिप भीकृष्णके गुण कपन में मनुरागिमी नहीं जिनमे पास पहिष्णकी सम्पर सीमा मरी क्यामोमें भादरपाले नहीं है । इसप्रकारके सम [ मनुष्यों को विकार समको विकार हे उमको शिकार है। इसप्रकार निरतर कीर्तन स्पिद मृदंग पसारे ५॥ पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसंत- स्य किं नोलकोप्यवलोक्ते यदि दिवा ।

तिम सूर्यस्य किं दूषणं ॥ वर्ष नैव पतेत्त चा- तकमुखे मेघस्य किं दूषण, यत्पूर्व वि- धिनाललाटलिखितं तन्मार्जित के क्षम.॥६॥ सर्पया-पत्र फरीर मही यदि हैं कह दोष महै ऋत राजहि काही हे कइ घोष प्रभाकर में यदि नाहि 3- लूक करी विम माहीं ॥ वर्षत यातकके मुख माहिं कहा तब दूषण वारिख पाहीं । भाग लिस्यो विधि जो तिहिको मस कौम समय मिटावन माहीं॥ मर्पयो करके पममें पसे नहीं है, तो संतका क्पा दोनो सष्टम दिनमें नहीं देसता, तो सूर्पका दूपण क्या १ पौवक के मुममें वर्षा नहीं होती, वो मेपको क्या दूषण ?मो पहिले विधावाने मस्तकमें मिस डिपारे उसे मिटा- मेको कोन समरे 100 सत्संगाद्भवति हि साधुता खलानों मी धूनां नहिखटसंगत खरत्वमः ।। आमो मापाटीकासरितम् दं कुसुममव मृदेव धत्ते मृगधं नहि कु- सुमानि धरयान्ति ॥७॥ ९द-सहत साधुता सल सगते पापु म सरपन खस संग पाहि। मृतिका पारत पुष्प गप मई, पुष्प गैप माह भारत माहि ॥७॥ बर्प-दुष्टोंरो ससंगति से घाघुता होतीही , सटौती सगानिस पापुमाका इएता नहीं होती ॥ मिट्टीही महोरी गधिको पारण परती है, पुष्प मिट्टीरी गपिरो नहीं पार ण करते॥७॥ साधना दर्शन पुण्यं तीर्थमताहि साध- व ॥कालेन फलते तीर्थ सद्य साधु समागम ॥८॥ दोदा-साधु तादि से तीय यपु, दश पुण्य वपु सत । साथ समयपर देत फर, साधु प्रसंग तुरत ॥८॥ भ-पापुरा दर्शन पुष्पम्प , निपरा रिसापु जनतापमपाप मपपर फस इता। धाएमोरी सपासात पस ताtun विप्रास्मिन नगरे महान कथय कस्ता- लट्ठमाणां गणको दातारजको ददा- ति वसनं प्रातहीत्वा निशिाको दक्षः परवित्तदारहरणे सर्वोपि दक्षोजनक- स्मान्जीवसि हे सखे विषकमिन्यायेन जीवाम्यहम् ॥९॥ कविश्व-विप्र यहि नगर महान कौम माष तौ- सावनके वृक्षको समूहही महान है। वाता कौन रजक के प्रातकाल वसनको देत माहि रात्रिकाल माँहि यस भान है। कौम है सुजाम परपन मरु मारिन के ग्रहण करन मोहि सकळ सुजान है। मीत विहि माँति इहि नगर में जीवत हो विष लमि भ्याय इस जीवत प्रमान है | मर्थ-ई निम ! इष मगरमें बम कौन कहो, वास मोका गरे वा कोन है। पोपी, 1 १२९ मापारीकासपिम् सवेरे लेकर रात्रिको देदेता है। पर फोन है ? परायापन सपा कि ग्रहण करनेमें सबही जन पतुर है, हे मित्र । रिस प्रकार इस मगरमें जीते हो विष कमि म्पायत में जीता १ न विप्रपादोदककर्दमानि न वेदशास्त्र ध्वनिगर्जितानि ॥स्वाहास्वधाकारवि वजितानि श्मशानतुल्यानि गृहाणि तानि ॥१०॥ द-दिन पादोदक कीप माहिं भरू, पद पास पनि गर्मन मादि। स्वाहा स्वपा विहीन शम्द३, पर मृतर मृमि सम मादि १०॥ अर्प-जदीमामो परणविपरसे शीष नहीं है। वेद शाष की पनिपी गर्मना नहीं है। तपास्ताहा,सपामार दाम्दसे भी रहित रे, रे पर इमसानी समान है॥१०॥ सत्य माता पिता ज्ञान धर्मा म्राताद- या सखा॥ शाति पत्नी क्षमा पुत्र पडते मम वांधवा. ॥११॥ सार-भानपिता तियर्शति तथा क्षमासुवन सप्तमाता पानापनीविषगर क्ष्यामित्र यह पट बाँधव मम, धर्म महहि ममभ्राता ॥ सर्प-सस्प माता ,पान पिता, धर्म भाई, दमा मिष है। शोति ली है, क्षमा मोयाग मेरे बारे म१॥ अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शा श्वत ॥ नित्यं सन्निहितोमृत्यु कर्तव्यो धर्मसंग्रह ॥ १२॥ दोहा-वैभव शाश्वत नित्य नहि, महहिं शरीर अमित्य ताते संप्रा धर्म फूस, मृत्यु समीपहि नित्य १२ ।।. मर्ष-रीर बनिस्प , क्या विभव मिरेतर स्थापी, मृत्यु निस्पही समीप , [इससिप) मर्मका संग्रह करना सावित २२ निमत्रणोत्सवा विप्रा गावो नवतृणो- त्सवा पित्यत्साहयता भार्या अहे - ष्ण रणोत्सव. ॥१३॥ दोहा-विप्र निमश्रण प्रिय सथा, मय सृण उत्सुक गाय उत्सुक पति तिय प्राप्तिकी, मैं रण प्रिय यदुराय १३॥

१२१ भाषाटीकासरितम् मर्प-मामण नियंपण सत्त, गोए नवीन हणकी इगुम है, स्त्री पति प्राप्तिकी उत्तर है।हे कृष्णा में रण पा सरहकई॥५॥ मातृवत्परदारांश्च परद्रव्याणि लोप्टव- त॥ आत्मवत्सर्वभूतानि य पश्यतिस- पश्यति ॥१४॥ द-परपन सोप्ठ समान मम्पतिप, हसत माव सम जोई। सब माणिन निज सरिघहिजामत निघय देसत घोई ॥१४॥ मर्प-पर सिपोगो माता समान, पर द्रम्पको मिटीरे देचे मान सब प्राणियारो अपनी गमान जो देखता २.पी पुटिमान॥१४॥ धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समु- त्साहता, मित्र वचकता गुरौ विनयता चित्तेतिगभीरता॥ आचारे शुचिता "गुणे रसिकता शास्त्रेषु विज्ञातता, रूपे सुदरता शिवे भजनता त्वय्यस्ति मो- राघव।।१५॥

१२२ पाणपतीविना छप्पय-मधुराई मुख महि, तथा उत्साह दानमहे चित म. अति गॉमीर्य, रहितता झपटमित्रपई शुचिताई माचार, रसिकताई गुण माही । शास्त्रन महें विज्ञान, मजमता अरु शिवपाहीं। तत्परता दढ मर्म मह, सुंदरताई रूप पर। विनय शीलसा गुरुन सम, तुम म. राषष धमुपधर ॥ १५॥ भर्प-धर्ममें सस्परसा, मुसमें मपुरवा, दानमें रस्सार मिमसे एक रहिवता, गुरु नम्रता, पिप गंभीरता, मा. पारमें शसप्ता, गुणमें रसिकवा घाखमें पान, रूपमें संव रखा, शिपमें भमनता, (महिसारे राम ! या सन गुण तुममें है॥१५॥ काष्ठं कल्पतरु सुमेरुरचलचितामणिः प्रस्तर ॥सूर्यस्तीवकर शशी क्षयकर. क्षारोहि वारा निधि कामो नष्टतनुर्ब- लिदितिसतो नित्य पशु.कामगौ।तां

१२६
मापटीपासाविम्
स्ते तुलयामि भो रघुपते कस्योपमा
-दीयते॥१६॥
छप्पय-काष्ठ कल्पतरु महहि, मेरु गिरि मचल
महाना । र्षितामणि पाषान, किरण धारक हैं माना ॥
भयधारक शिवनाथ, वारि माकार है खारी । काम
शरीर विहीम, सुवन वितिबकि रणकारी १ अहदि
मुसुर नित्यपण, तुम सम देखत नाहि इन । रामघ-
द्र रघुपश मणि, दई माहि उपमाजु किन ॥ १६॥
मर्य-कल्पतरु पाए रे, मेरु पर्वत मषरू है। चिन्ता
पणि पत्पर है, सूर्य ती किरमयाला पद्रमा सयधारक
है, पारिनिषि तारा है, कामदेव शरीर दीन रे राजापति
दितिपुष है। कामधेनु निरंतर पछ है, हे राप ! इनका
हमारी पराबर महीं देखता, तो किसकी उपमा दीमाप १६॥
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु
च॥व्याधिस्थस्यौषधं मित्रं धर्मा मि-
त्र मृतस्य च ॥ १७॥

. १२१ पाणरमनीमानम् दोहा-विषा मित्र प्रवास मई गारि मित्र या माहि मित्र औषधी व्याधि मई, धर्म मित्र मस कॉहि ॥ मर्य-परदेशमें पिपा मिधा, और ग्राम भार्या मित्र मोर रोगीकी मौपाप पिपरे, भौर सूतकका पर्म मित्र विनय राजपुत्रेभ्यःपंडितेभ्य सुभाषि तम् ॥ अनृतं घूतकारेभ्यस्त्रीभ्या शिक्ष त कैतवम् ॥१८॥ दोहा-बुधजन सन माषण शमग,माषण असतोरि सिखय विनय नृप सतन तन,तया कपटता मारि१८ सर्प-नागपूषों से विनय, पंडितों से भाषण, हुमौरियों हत्यभाषण तथा सिपा से कपट सीखे १८॥ अनालोक्य व्यय कर्ता अनाथ कलह प्रिय ॥ आतुर सर्वक्षेत्रषु नरः शधि विनश्यति ।। १९॥ पोहा तरवियन सम्म अरु प्रिय फलद मझार पर हो भनर पर न विचार ॥ १९ मापाटीकासहितम् मर्प-बिना बिमारे सर्प करने वाला, स्वामिहीन कर पिप समाति की सिपों में मोग करने को भातर मनुष्य सीव नाग्रहोजाताnnn नाहार चिंतयेप्राज्ञो धर्ममेकहि चिंत- येत् ॥आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते ॥२०॥ (द) परहिम पिता वित मसनको निधय कर पुपर्म विचार पोपी मानर गणन संगही, मगट होत है भषि महार ॥२०॥ मर्प-पुदिमान भोजन की पिम्ता म परे, निषय परफे एक पर्प काही रिचार करें क्योरि मोमन मनुष्यों के नाम के पाप प्रगट होताहे॥२०॥ धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासग्रहणे तथा।। "आहारे व्यवहारे च त्यकरन. मुखी भवेत ॥२१॥ [छंद] पन नरु पान्य प्रयोग परिमा, सेयदि रिया ग्रहण महार, उसी होव म्पवहार मोहि, मानप रुमा स्पागमहार ॥ २१॥ अर्प-पन पाम्प के प्रपोगमें तेसेही मिपाके पहनमें मोर भोमन में व्यवहार में सजा का स्पागनेहारा मसी होतात जलबिदुनिपातेन क्रमशःपूर्वते घटः॥ स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥२२॥ [] कम्मी बूंद भूद पान से, कम मादी पर मरि बाहित परकम र विषा पन को भरु, तपा धर्म सीप को माहि॥२२॥ अर्प-अरूकी र पूँद के गिरनेसे, प्रमशः घर भर भात. है पाकर सब विपामोता, पर्प फा तपा पन के समय क मी कारण है॥२२॥ वयस-परिणामेऽपि यःखल. खल एव. स.॥ सपक्वमपि मार्यं नोपयातींद्रवा रुणाम् ॥२३॥ J १२७ मापाटीपासरितम् (द) यपस मत मद महादि दुष्प जो, रहते दुष्ट हे सोई इंद्रापण फस पको भली पिषि, तदपि पघुर नहि होई ॥२३॥ मर्प-मवस्पा के मसाल मे भी जो सछ, यह सटही पता, मही प्रमार पपा भी इन्द्रायण मधुरता को प्राप्त नहीं होता ॥२३॥ इतिमी पाणक्य नीतो शिवदास पाटयकृत, भापाटीपापा दशोऽप्पापः॥१२॥ मप प्रयादगाऽम्पायः १३॥ मुर्हतमणिजीवेच्च नर शुक्लेन कर्मणा॥ न कल्पमपि कप्टेन लोकद्वयविरोधि- ना।।१॥ पद-पदपमत नर माती, नियरिसर तो माही। कतमपर्म तुर पिपी शुभ परूपही नाही ॥१॥ मर्प-मनुप्प हरपस मुरमायमी भी, तो सफ्स दोनोरोग सिपी मपम पम पम्प पेत अरिनभी मग मरी१० गते शोको न कर्तव्यो भविष्य नव चि- पापनातिदार तयेत॥पर्तमानेनाकालेन प्रवर्तन्ते वि चक्षणीं ॥२॥ दोहा-शोक न वीसे कर उचित करहिन मावि विचार वर्तमान अनुसारही, वर्तत पुरुष उवार ॥२॥ भर्प-दीडएका शोक मरमर चाहिये, रेलहारका विपरम को । दिसण पुरुष वर्तमानकारके मरमार बर्ताव करते है। स्वमावेन हि तुष्यति देवा-सत्पुरुषा. पिता॥ज्ञातयःस्नानपानाभ्यो वाक्य दानेन पडिताः ॥३॥ दोहा-सुर पित तथा महाजम; तुष्ट स्वमविधि होत । वाक्य दाम ते विस जन, खान पान जनं गोत॥ मर्प-पता, मामा दपा पिता समारसही अवशो है। पाविजन स्नान वानर, तपा परितमान पाप। आयु. कर्म च वित्तं च विद्या निधनमे १२९ यापटीपास व च ॥ पचेतानि च सृज्यते गर्मस्था- स्यैव देद्दिन ॥४॥ दोहा-मायु कर्म अरु धन तथा, विधा यस निदान यह देहिनः गर्मी, ५ प होत नमान ॥ ४ ॥ मर्प-अपरया यम, हार पन बिपा, तामाभी पर पापादेपार गम में रिपतरे ६मपी एम माatnam अहो वत विचित्राणि चरितानि महा- त्मनाम ॥ीं तृणाय मन्यन्ते तदा- रेण नमति च॥५॥ दोहा-अहो महाअघरज मर, मानव पीस महान । नमत २६मा माग्से मान । तृणदि समान ॥ ५ ॥ P-माप मारमारना विविध मिरम रोपी समान मानत है। मोर उसके मास हरु भार॥५॥ यस्य स्नेहो भय तस्य स्नेहो दु खस्य

पापस्तीवर
भाजन ॥ स्नेहसूलानि दुखानि तत
त्यक्त्वावसत्मुखम् ॥६॥
दोहा-मेह मूल केशकर, जाहि नेह हि त्रास ।
त्यगि मेहनर सुखयुत करहि नियास॥६॥
मर्य-निसाहीको भय है ना इसका
पारन ला मूल है। सम स्नामो त्यागकर
घस पूर्वक निवास करे ॥ ६ ॥
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्त-
था । हावतो मुखमेधत यदिव्य वि.
नश्यति ॥७॥

, मापोका सार समाः ॥गजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रज' ॥८॥ राप पारी पो सम नृप रेत समान । मनुवर्तन रे भरत नृपतिको, मिमि नृप तपा प्रजान ८n अर्प-चम राना पसरप धरों पापा पाने से पापी समपने ममा होती है। हम प्रार राजा ना अनुगर्नन पी जैसा रामा होता है, सोपना पnिen जीवन्त मृतवन्मन्ये देहिन धर्मवर्जि- तम् ॥ मृतो चर्मण सयुक्ता दीर्घजीवा न सशय ॥९॥ पर-नीति पर्म हान परीपा, मानत मृतक समान । वीरी दर मशंसप नीति, मृार सपर्म महान ॥ ९ ॥ नई-पर्व पति जीत हए । मृतक के पपान पानताई । प पुक मृार भी निर्मदर दर बीरी॥९॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्य कोऽपि न ससका वानप्लाविपक्ष विद्यते ॥ अजागलस्तनस्येव तस्य ज. न्म निरर्थकम् ॥ १० ॥ छद-पर्म मर्प मह काम मोम मरे, पाह माही जाको ममा समम्पर्प पपोपासम्म पर्याको ॥१०॥ [भ] जिसके धर्म भर्य काम मास में एम्भी नहीं है। मकरी के गछेक स्वन के समान म्पपी। दह्यमाना सुतीव्रण नीचा परयशोऽग्नि ना॥अशक्कास्तत्पद गन्तु ततो निंदा प्रकुर्वते ॥११॥ पद-पल मना पर फीति तीव यति, तिहि पर खास पारि भरपर्यनीय महा पर निंदा कारक, का तार की मम्दा म्पर्प । २९ मर्प-नीर पुका अस्पंत तीच दूसरे की कीर्ति रूर भनि देवसे हुए, उसकी पोग्यता का आने को मक होते? किसी से उसकी गिम्दा परते। १९॥ वन्धाय विषयासको मुक्ती निविपर्य

मापरीमती ।
मनः ॥ मन एव मनुष्याणां कारण
वन्धमोक्षयो ॥१२॥
(2)सर सारिपन मनसिप रात करन निन
पनहरे पनुष्य गन फेरो, कारन पर मोक्ष पान ॥ १२॥
मर्प-रिपपों की संगतिपन निमित है।सियों से
रति पर मुक्ति या कारण है। मनुष्योरेपन तपा मात्र
काकारण पनीर।१२ n
देहामिमान गलिते ज्ञानेन परमात्म-
न । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र
समाधय ॥१३॥
दोहा-परम पुरुषके जानते, मष्ट गवने गाल।
तितनित होति समावि है, जा जहा मन जात १३
भर्प-दाधिपान के नए रास परमात्मा के छान सजा
मा पर मातारातहतियार
ईप्सित मनस सर्व कस्य संपद्यते सुख-
म् ॥ दैवायत्तं यत सर्व तस्मात्सन्तो.
पमाश्रयेत्॥१४॥

बानम्माविरम
उंद-मन चाहे पुस सफल मातही, ऐप ही पौवादी
विहिवे गादि दोष नर मिर, देव वश्य सर माहीं ॥ १४॥
अर्थ-मनका इष्ठित सब सुख फिचरा प्राप्त होता
जिससे कि सब देवरे भाषोन है विस संतोष
भापप करें॥ १४॥
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो गच्छति मात-
रम् ॥तथा यच्च कृत कम कतारमनुग-
च्छति ॥ १५॥
-महसन घेनु मम्पही बछरा, जात मातु रिग जैसे।
कम कियो जो सो कर्ता फे, गमनत पाप देखे ॥ १५ ॥
मर्य-असे सरस्र गायोंमें बता पावाके समीप जाना
है।सही को किया हुमा कर, माता के पीठे
जाताहै। १५४
अनवस्थितकार्यस्य न जने न बने मु-
खम् ॥ जनो दहति ससर्गाहन संगवि-
वर्जनात ॥१६॥

माटिकासविषय
द-मनपीस्पत कार्यन बर्ता पसल म मनम बम माही
रहत संगते जन सम्रा मरु, गहन मन मोह । १६ ॥
मर्य-अनस्थित कार्य या पुरुष पो न ममुप्पोमेन
पन में इस होता है । संसर्ग से गुप्य पातारे या
सगरे श्याग से दहता है॥१६॥
यथा खात्वा खनित्रेण मृतले वारि वि-
न्दति ॥ तथा मुस्गती विद्यां शुश्रूपुर-
विगच्छति ॥१७॥
द-मूसष्ठ पर जछ प्राप्त हास है, सन कुवारिहि जैसे
पेवाकारी छिप्प गुरू की, दिपा पायत से । १७॥
अपे-से कुदाल से सोदने में मृपितछ में वारि माप्त
होता है।सेही शस्था परमेषाला शिष्य शरू की विपा
को मासस । १७॥
कमायत्त पल पृसा वृद्धि कर्मानुसारि-
णी ॥ तथापि धियश्चार्या सुविचार्य
व कुर्वते ॥१८॥

चामपनपवान
म-पुकान व भमुसार होस फल, मतिदोक्त मनुसार
कारण करत विचार पदापि मर, मापस रिखसवार ॥ १८॥
मर्ष-पुरुषों के कर्मानुसार फल होता है, पर बम के
मनुसार होती है । तपापि परिमान महम्मा भी मठी में
कार दिपार कर कार्य करते है।१८॥
सन्तोपनिषु कर्तव्य स्वदारे मोजने घ-
ने । त्रिषु चैव न कर्तव्योऽध्ययने जप-
दानयो ॥१९॥
१५-मम मौरी सेतोप बदहित, पन भोगम भरु मिन
तिप मास । विपाम्पास दाम रुप पार, पिप्त धोका
मोइस नौ।१॥
मई-पपमी सी में, मावन में, पन में, वीनों में मोष
कर्तम्परे, पिपाम्पास में, अप में दाम में, तीनों में से
मकरमा पादिये।१९।
एकाक्षरप्रदातार यो गुरु नाभिवदते ॥
श्वानयोनिशत भुक्त्वा चाण्डालेष्वामि-
जायते ॥२०॥

भांबायकासारवम् छ- प्रभर दातार एकर, करत प्रमाप , जोई। धान याने शत भोगिरात पाडाला पर सोई॥ २० ॥ भर्प-यो एक भर मिसान पासे गुरुका प्रमाण नहीं काता! पाकव की सोपोनि मोगकर पहाड़ों में सम्म सतारे॥२०॥ युगांते प्रचलन्मेरु पल्पति सप्तसागगः साधव प्रतिपन्ना न चलति कदाच न॥२१॥ प-पडित मरु करपात हरोत भरू, सागर पप्त पारित फल्पात महर्सिन पसित देत रबई पर, धार्प प्रतिव विड बन प्रांत २१॥ मर्प-युगान्त में सुपेरु पछापमान हमा, कस्पात में सम सागर पक्षापमान दोनोपगे प्रतिता किये मर्प पारे पापु भी पठापमान महीं रोत ॥२१॥ इतिमी पाणपनीतो शिवदास पौडप, मिरमित मापाठोकापा घपादशाऽपाय२१॥

पानश्पनीविचम् मप पतुदशोऽध्याय । १४॥ एथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभा- षितम् ॥ मूढैःपाषाणखंडेषु रत्नमख्या विधीयते॥१॥ दोहा-अन्न वारि माषण शुभग, महिषय रन प्रधान । खह पखानन म फरस, रस विधान अयान ॥ १॥ मर्पस, ममः सपा अच्छा मापण पृथ्वीमें तीन नाई, पानहीनोन परपरके सगेम रत्नोंकी पंरपा विधानसी ॥१॥ आत्मापराधक्षस्य फलान्येतानि दे- हिनाम् ॥ दारिद्यरोगद् खानि वैधनव्य सनानि च ॥२॥ दोहा-आत्म दोपतरु फल महि, तनधानि यहरोग दारिदता यधन तया, जगत ध्यसन अरु शोग ॥२॥ मर्प-दरिद्रता, राग या दुःस, सपन और म्पसन, पहले पारियोंरे भपन भपरापरूती प्रसव फरार २ मापाटीकासदितम् पुनर्वित्त पुनर्मित्र पुनर्भार्या पुनर्मही । एतत्सर्व पुनर्लभ्य न गरीरं पुन पुन-३ दोहा-धन पुनि तियपुनि धरणिपुनि,मित्र पेरि है जॉय यहसब किरिक मिलतपर, मिळत देह पुनि नाहि ॥३॥ मर्ष घन फिर होमाता, मिन फिर होजाते हैं। स्त्री फिर रोजाती है। पप्पी फिर होमाती है। यह सन फिर मिल जात शरीर वारपार नहीं मिलता। बहुना चैव सत्वानांसमवायोरिपुंजय वधिाराधरोमेघस्तृणैरपि निवार्यते४ दोहा-रिपुन जर्य है जात है, यहु जीवन समुदाय । धारिद वर्षा धार धर, तृणसन रोक्यो जाय ॥ ४ ॥ भई-महतसे जीयोपामुदाप को भीतनयाा रोटा वर्षाती पारा धारण परनयारा मप नृणामेनी निवारण दिया जाता ४ जले तेल खलं राह्य पात्रे दान मनाग- . पि॥ प्राज्ञे शास्त्रं स्वय याति विस्तार वस्तुशक्तितः॥५॥ (द) तक पारि मौदानपत्र मरे, वानी राप्त गवार । घास माय मर मस्त शाषिता, पर्यस्मस विस्तार ॥५॥ मर्प-महमें ठेस, इथपुरुषमेत बास, पारम दान बुद्धि माम मात्र पोहर मातापस्मी शकिक मनसार माप सविस्तारको प्राप्ति होता है। धाख्याने श्मशाने च रोगिणा या मतिमवेत ॥सा सर्वदेव तिच्चका न मुच्येत बंधनात ॥६॥ द-पर्मक्पा मई मरुमसाम मई, रोगिम मो मति रोय । तोमहोप जग बप मुक्तको, रसहि सदा जो सोप म-पर्मक मास्यानमें, शाममें, मौर मिपोंगी जो पति रती है। नासपाही स्पित गरे । सा सारके पनवे कोन महीं मुक्त गा॥ उप्तन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृ-

प्रपटामसजिद
शी। तादृशी यदि पूर्व स्यात्कस्य न
स्यान्महोदय ॥७॥
छर-पमाताप भये ते मर की, पुद्धिपति मैसी।
अमराप महान मारो, अपम होप जो देसी ॥ ७n
मय-पघाताप के उत्पम होनेपर जेसी मुदिती
सीमा पारे हा। तो निसीका महान मनमगा।।।
दाने तपसि शोर्ये वा विज्ञाने विनये
नये ॥ विस्मयो नहि कर्तव्या बहरत्ना
वसुघरा ॥८॥
नही रन मार्य परिसस,विमप शूरता उप मरदान
नीत सपा विद्वान पौरि, पासपुष्ट रन महान .cn
मर्प-दान में तप में, शूरता में, विधान में, विनय ,मी.
ति में माप न करना चाहिये । क्योंकि पपी पान
रान पारिनी
दूरस्थापि न दूरस्थो यो यस्य मन स-
स्थित ॥ यस्य त्दृदये नास्ति स-
मापस्थोऽपि दूरत ॥५॥

पाणपतम् दोहा-जो जाके मन मोहि है, दूरि दूरि नहिं तीन । वह समीप रहि दुरि अति, नहि जिहिके मन जीन । मर्प नो मिस मम में स्थित या दूर होने पर भी पूरन मोर मो सिप हप नगरे। घर समीप स्पिन भी दूर है।९॥ यस्माच्च प्रियमिच्छेत्तु तस्य बृयात्सदा प्रियम॥ व्याधो मृगधगंतु गीत गा- यति सुस्वरम् ॥ १०॥ 8द-काहि सदाक्रियामा सन मिकी मासा गवत पापा गति मधुर सर, मात गा हित मास १०॥ मर्प-जिसस मियी प्यार, सिसमा निम्मर हिम करें। सुगमे मारन को सातामा म्पाप मधुर स्वर गीत मातारा.॥ अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्था न फल- प्रदा ॥ सेव्यता मध्यभागेन राजा व. हिर्गर स्त्रिय ॥११॥ पोहा-कारण नाश समीप अति पारद दूरिमतिमाह ११५ मापकातीवम् मध्य भाग नृप सेइये, गुरु पायक निय कहि ॥an अपनात समोर हातन विनाग देवने । बहादूर होनेम फलदाप नहीं। इमस रामा भनि, तपा गुरु तपा सिपोफी मध्यभागसे प्रेगकरना चाहिये ॥१९॥ अग्निराप स्त्रियो मृर्व सर्पो गजकुला- नि च ॥ नित्य यत्नेन मेव्यानि सद्य प्राणहराणि पद ॥ १२॥ दोहा-अग्नि पारि तिय मूर्य अहि,प्राण विनाशनहार । यह पट सेस्य यन्न सो, तरतहि वश भुवार ॥ १२॥ मर्य-प्रमि, जल, स्त्री मूर्म, हर्प सपा रानकुलके ठोगा पाण रम्तही माणोरे हरनेवाले इससे पानसे सेरने पाहिय ॥ १२॥ स जीवति गुणा यस्य यस्य धर्म स- जीवति ।। गुणवर्मविहीनस्य जीवित निष्प्रयोजनम् ॥ १३ ॥ दोहा-धर्म जादि महै जियतसी,गुण जिी जीवत सोय - राणसीविसमर होम धर्म गुण पुरुषको, जिया व्ययही होय ॥१३॥ मीनीम के गुम मा जोतिर खिा पर मोतिनो एण या पविहीन पुरुषमा जीपा स्पो यदीच्छांस शोक जगदेकेन कर्मणा ॥ पुगपंचदशास्येभ्यो गां चरती नि- वारय ॥ १४॥ दोहा एकहि कुन सन जगत फोफरत पान वश जोय भ्रमत पंचदश प्रयम इन रोका मतिक, सोय ॥१४ अर्प-जो परही कर्म प्रसार गय करनेकी इजा करता है, परिवहन पनाम रिसरग करसोही का नि पारण करे। प्रस्तावसदृश वाक्य प्रमावसदृश प्रि- यम् ॥ आत्मशक्तिसम कोप यो जाना ति सपण्डित ॥१५॥ दाग-वाक्प प्रग समान रु प्रिय प्रभाव समजोय क्राप मास्म सम मागजो, महहि सो पंडित सोम १५ कदाटीवातास्तम् अर्प-मक मपाम पाNT प्रभा महरा मिप, अपनी मार कारनामा पोरहे॥१५: एक एसो पदार्थम्नु त्रिपा भवति वी- क्षित ॥ कणाप कामिनी मांस योगि- मि कामिमि श्वभि ॥ १६ ॥ ज्द-रात पदाप एप्रिय गिपि शप, उस मधिमपुतान मामीणन नारितारे जान्पा यागिन मृतर समान १६ मर्प-राद। पप पागिपोन मृतकरूपस, पापियान खी कर कुमार पोसारस, एस तीन महाररा ऐसारे तारे॥१५॥ सृसिदमापन धर्म गृहच्छिद्र च मैथुन कुभुक्त कुवत चैव मतिमान्न प्रकाश- येत् ॥१७॥ । दोहा-सिरि मोपो छिद्रप्रह, रति मम मसन मलीन प्रतिट पर धर्म की, प्रगट म फरविप्रवीना मर-मोर.पा, सरिया, मगर १०॥ बनिनाविपर निश्चित भोगनको, छनेहसे पुरेमपनको, मतिपान, प्रकाश नफरे १७॥ तावन्मौनेन नीयन्ने कोश्चिक वा- सराः ॥यावत्सर्वजनानन्ददायिनी वा क् प्रवर्तते ॥ १८॥ दोहा-पिकसे तबलग मौनते दिवस विताये जात । जवळग सबजम मोदकर, होत गिरा मृदु प्राप्त॥१७॥ मर्प-गोपिसोरा बस दिम मोमसाविताये जात । जबसक सय पुरुपोंको मानन्द पनेपाली वाणी मात्र होती। धर्मं धन च धान्य च गुरोर्वचनोप धम् सुगृहीत च कर्तव्यमन्यथा तु न जीवात॥ १९॥ दोहा-धर्म वचन शुरु धान्य धम, मोपधि मले प्रकार। गृहण याज्य : यथा, प्राण संहार ॥ १९॥ मर्प-पर्य, पनपा पाम्य, मोर प्रम पम सपा भार +

११७
मा पटोपासावर
पषि भी सम्पप पण पाना चाहिये।मम्यपा प्राण हानि
होती॥ १९॥
त्यज दुर्जनसंसगै मज साधुसमागमम्
कुरुपुण्यमद्दोरात्र स्मरनित्यमनित्यतः
दोहा-खल सग तजवर साधु रुग, पुराण कीजिये
नित्यानित्य ईश सुमिर न रहे,हि देव मनित्य
-दुर्गम पोंकी गतिको तज, पापुमा जति
का सेवमयर, दिरात पूण्यपर, इस ममिस्प शरीरसे नित्य
रिफा सरणपर ॥२॥
इरिपी पापमा विपदास परिपक्व
भापाटीपापो पर्दापापः ॥१४॥
यस्य चित्त द्रवीभृत कृपया सर्वजन्तु
पु ॥ तस्य ज्ञानेन मोक्षण किं जटाम-
। स्मलेपने ॥१॥
पोहा-धीमत्त रिस दयाते, सघ प्रजिन म जाह।
बाद मरम मुक्ति से, जटा ज्ञान से साद॥१॥

पापापा संग
र मर्प-पर्व प्राणियोमें दया जिसका पिस मूित है।
उसको पानसे, मोनसे सपा अटा सपा भस्मलेपनस स्पर।
एकमेवाक्षर यस्तु गुरु शिष्यं प्रबोध-
येत॥एथिव्यां नास्ति तद्रव्य यहत्त्वा
चानृणी भवेत् ॥२॥
दोहा-इक भक्षर उपदेशही,शिष्य काहि गुरु जौन
उमण होय दे जाहि काथ्य न महि महें,तीन ॥२
मर्प-मो गुरू शिप्पा एक मक्षाही उपदेश करता है।
पृथ्वी परम्प है। रिमी-पप्प समण
होगाय ॥२॥
खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रति-
किया ।उपानन्मुखमगो वा दुरतो वा
विसर्जनम् ॥३॥
दोहा-बाँटे को मरु खलनको,प्रतिफल उमय विधान
परिहि ते त्यागन तथा, मुख मईन पधान ॥३॥

मर्प-दुशेशमाटोमा निकर दो प्रकारसे ही है। जूते । मुख मेनन करना, या दरसे स्पाग देना। कृचैलिन दन्तमलोपधारिण बव्हाशि- न निष्टुरमापिण च ॥ सूर्योदये चास्त- मिते शयानं विमुचति श्रीयदि चक्र- पाणि ॥४॥ [४] सोरमदार प्रात संध्या मरु, पटु पवाह मारी। पर इस शिदि स्यागत, रमा र पदि पारी॥vn मर्प-महान बसपारण परम पारेको परीम दौत पाठे को, बहन सान से का, मिष्टर पण मरने हारे को सपोद पतपासूर्यास्त में मेवाले मोहमी त्यागदेखी पाई, पक्रपाणि भीnva त्यजति मित्राणि धनैर्विहीन दाराश्च मृत्याश्च सहजनाश्च ॥त चार्थवत पु- नराश्रयते यर्था हिटोके पुरुपस्यबंधु द-सेवक नारि पित्र पाँपन जनपन रितीन जनकतामे देत पापा मम होय मोहिमा प्रापिन,पन गुग विहिपनि मामपन वर्ष-मित्रपति को स्पाम देते है। मोर सिये, सबक बोर मित्रमर्ग मी त्याग देते। मोर पन प्रहित समका फिर मामपरपोरे। लोक में पनही एका कागपुर अन्यायोपार्जित द्रव्य दशवर्षाणि ति- ठति प्राप्ते एकादशे वर्षे समूलं च वि- नश्यति ॥६॥ दोहा-- ARARों रहत है, प्रध्यार्जित अयाय). प्राप्त वर्ष दश एक मोमू सहित मसि माय ॥ ६ ॥ मर्प-मम्माम म पार्गक किपा ट्रम्प दश वर्ष तात ३ । पाग पो प्राप्त होते पूस प्रति माह जाता अयुक्त स्वामिनो युक्त युक्तं नीचस्य दू- पणम ॥ अमृत राहवे मृत्युर्विप शकर मुपणम्॥७॥ [ पापमपोग्पोखमा,पितमात मापासासापर महान मयो राहकह ममिय मृत्यु पनि माण कर भगवान॥७॥ मर्य-मयोग्य भी प्रमों को पोग्य है। पोप मीनी माप्प को दूषण राहु को प्रतारा रूप हमा नपा कर को विष पण॥७॥ तदोजन यहिजमुक्तशेष तत्सौत्ह य- क्रियते परस्मिन् । सा प्राज्ञता या न करोति पाप दभ विनाय क्रियतेमधर्म: (द) ही भसन रेप दिमन जो,मोहरा कर पर सन जोपाजोन दम दिन पर्म मारियो, जो भरकर पाप म पविदा सोय ८॥ सर्प मामोंकि भोमन शेप मोरे, वहीं भोमनरे। दूसरे के देव किपा मावा रे, की पोराई है। पुदिमानता पदा रेनो पाप नहीं करती । विमा दमो मो किपा मा वारही पर्म है॥८॥ मणिलठति पादाने काच शिरसि था- पानापनाक्षिपर यते ॥ क्रयविक्रयबेलायां काच काचो माणिमणि. ॥९॥ दोहा-मणि कोटत पद अब मई, घरी जात शिरकोप कय अरु विक्रय के समय, मणि मणि बहि कॉप मर्ष-पौर के मप्रमाग में रल लोता है। कार थिए परपरण किया जातापदबने सपा मेसोने के समय कौर कौरी तथा मणि मणि है अनंतशाख बहलाच विद्या अल्पव कालो बहुविघ्नना च ॥ यत्सारमूर्त तदुपासनीय हंसो यथा क्षीरमिया बुमध्यात्।। १०॥ [] विण ममित मनम्त शासद, मगसर मा भर विन मपार । ईस पारित भार व मिमि सेवन करहदोप मो पार ९० [मर्प)धान मनम ₹सपा रिपा मी भनम्व है। तपा समप पोग मौर वितरहुन । भोमारोमो समन काना पारिप । रंस मसमें से भीर निकास. सारे..

मामयदाता दूरागत पथि श्रांत या च गृहमागत- म् ॥अनर्चयित्वा यो भुक्त सबै चाडा ल उच्यते ॥११॥ ए-माग पकित दूरत आपे, दपा पपारे पाम महार । दिन पस्कार करते को भोजन, पानात महोपंगर ११ [भ] दूर पगापे मार्ग से पके हुए पानिप्पोष न पर पापे को रिमा ससार विमोसावा है। यह निधय पागल कहा माता । ११॥ पठति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्य- नेकशः॥ आत्मान नैव जानन्ति दर्वी पाकरस यथा ॥ १२॥ दोहा-शास्त्रन पढे अनेक मरु, पढे चारिहू वेद । पाक रसहि मिमि करमुदी, जान न आतम भेद ।।२ [भ] भागेदों को सपा बहन थानों को परते है। बोर मारमाको महा मानते । ब ११७ही पके हुए पारसको । १२॥

धन्या हिजमयी नौका विपरीताभवा वे ॥तरत्यधोगता. सर्व उपरिस्था. पत्तत्यधः॥१३॥ घोहा-बाय नाव विपरीत हिम, यहि मसिंधु झाय सपर विस सो गिरत मध, मम थित हो पार॥१३॥ 'मर्य-संसार सागर में विपरीत पस्ने मासी बामण रूप नो का पम्प माचे रिपत हपेमातर जाते है ।प्रामें स्थित होमे पाहे नीचे गिरते है। (सोल का भावार्थ पर। किमामणों के अपमान कर्ताओं का नारा होगा। सपा पनसे मान रहने पाले संसार यापर से परमाते हैं। अयममृतनिधान नायकोऽप्योषधीना मभृतमयशरीर कांतियुक्तोऽपि चन्द्रः ॥मवति विगतरश्मिमैडलं प्राप्य मा-- नोःपरसदननिविष्ट'कोलधुवन याति -अमिप पामरमाईश मिश्यपु भभामान पनि रमि मापाटीपासावर भामाप कोवि विहीन होत पर ग्रामी,माप सहन नारे को अलाप ॥ १४॥ मप-मस्त का स्पान मौषधिरों का नापरु ममत पर पारी, कोते पुक या पापा सूर्य मोड में प्राप्त कर निस्म होता है दूसरे के घर जाफर कोन सधुवा नहीं पाता॥१४॥ अलिरय नलिनीदलमध्यग कगलिनी मकरदमदालस. ॥ विधिवशात्परदेश- मुपागतःकुटजपुष्परस बहु मन्यते १५ -पारदि ममा मध्य कपरिनि मई करविनि महस गमसमाप विपि वयात परदेश जाप सो, मामत कुटम मैप मधिराप । १५॥ पर्प-पर अपर महिनीके मम्प में प्राप्त होकर कमहि मी मादक मद में आपसी रावापा प्रारम्प पद्यात पर ऐप को मामहमा कोरिया को रसको पहत मानता है।५ पीत ऋद्धेन तातश्चरणतलहतो वल्लभो येन ऐपादावाल्यादिप्रवर्यै स्ववदनवि पानासलीपिरपन वरे धार्यते वैरिणी मे गेह मे छेदय- न्ति प्रतिदिवसमुमाकांतपूजानिमित्त तस्मात् खिन्ना सदाह द्विजकुलनिलयं नाथ युक्त त्यजामि ॥ १६॥ (छप्पय ] जौन क्रुद्ध अमित, पान पितुकार शारयो जौन क्रुद्ध अमित, कात पातम को मारयो ।। पर विप्रन मुख विवर, पास्यते मम भरि पानी।। करत वास है सदा, परम विद्याकी खानी । उमाकान्त पूना निमित, मम ग्रा नित छेदम करत । ताते में अति विमति, वर विप्रन नई परिहरता॥ मर्पयोषका मात जिनसे परे पिताको पान कर हिमा कोषरे मेरे साती का परम से तार किया प्रहबाम गोदारापासमपन से ही मपने सस का रिमें मेरी पी। सरसती धारण की बाती है पाटी पविकी पूमाके निमिष मो मेरे परको प्रतिदिन ऐपन करते सेना इस कारण निरंतर विभई योग्य मामको महको

मापदायमा
वधनानि खलु संति वनि प्रेमरज्जुक
तवनमन्यत ॥ दारुमेदनिपुणोऽपि प
उघ्रिनिष्क्रियो भवति पंकजकोशे १७॥
पर-नपन निमप भमित भारिपर, प्रेमरन उत्तरपन मोर
निीत का भेदप पही, निपिप कमस कोशमा मार
अर्थ-निमपफरके बहन से अपन परम्त प्रेम रहका में
बन मोरही है। जिसके कारण कारणे भेदनेमे पार मोग
मसाठी भ्यापार रक्षित रोप्रावाt nsn
छिन्नोपि चंदनतरुन जहाति गंध वृद्धो
पे वारणपतिर्न जहाति लीलाम ॥ य
प्रार्पितो मधुरतां न जहाति चेक्षु शी-
णोपिनत्यजतिशीलगुणान्कुलीन.१८
पर-भीतर पिन नी स्पागत है माघ ।
हीनया पर कसने पिठास।
श्रो महान गवस्थागत नादि सीता।
स्वामीन नारि भीण प्रणादि पीग।

पामस्लाविर वरे धार्यते वैरिणी मे गेह मे छेदय- न्ति प्रतिदिवसम्माकांतपूजानिमित्त तस्मात् खिन्ना सदाहं द्विजकलनिलयं नाथ युक्त त्यजामि ॥१६॥ (छप्पय ] जौन क्रुद्ध अमित, पान पितुकार गरयो औम कुशव्द अमित, नात पातम को मारयो । घर विपन मुख विवर, वाल्यते मम मरि वानी।। करत वास है सदा, परम विद्याकी खानी में उमाकाम्स पूजा निमित, मम ग्रह नित छेदम करत । ताते में अति खिमायत, बर विप्रन प्रह परिहरता॥ पर्ष-कोपका मा मिनसे मेरे पियानो पान कर लिया कोपो मेरे सा को परम से साडन किया प्रमाबाम, पोदाराबासमपम से अपने मुस रूप विपरमें मेरी पी(सरसती धारण की जाती है पाती पतिकी पूमाके निमितमो मेरे परको प्रतिदिन भर करते रहते हो माया इस कारण निरंतर सिमई में पोप मामामाको

गटासारतम्
वचनानि खलु सति वहनि प्रेमरज्जुक
'तवनमन्यत । दारुभेदनिपुणोऽपि प
डनिनिष्क्रियो भवति पकजकोशे १७॥
पर-पर निमप पिन प्राहिया प्रमाणु तपन पोर
मितिकार मदम पहो निषिप रमा मौर
अप-रिमपरररर पपरसपान प्रप राई
उको मिचाण प भदन पर मोर
पाही पारारदिन माता
सिन्नापि चदननमर्न जहाति गधं रहो
आप वारणपतिर्न जहाति लीलाम् ॥य
प्रपितो मधुरता न जहानि चेक्षिी.
णानिनत्यजनिशीलगुणान्छीन १८

१५८ पानातीविनम् मर्य-कायामामी बदन पर गंवको नहीं त्यागता । र गनरामभी छीठाको नहात्मागता । पत्नमें पेराई ईसा को नहीं स्वागती कुलीन पुरुष तीण पनेरमा पीली गुणाको मही स्पागते ॥१८॥ उा कोपि महिपरो दोभा धृतो लीलया तेन त्वं विदि मुतले च विदि- तो गोवईनोहारक ॥ त्वांत्रेलोक्यधर वहामि कुचयोरग्रे न तद्गण्यते किंवा केशव मापणेन वट्ठना पुण्यैर्यशोल- भ्यते ॥१९॥ -मी मल पिच कोट एक, स्यु पर्वत साही। दोक फरन उठाप लियो, फेशन छीलाही । ताते परगण प्लप तपा परिमाप महाना। गामपनपर विदित नाम हप रे भगराना। परत कसायन हपरिमें, गनत नको तिति विनगर। मन भारत का पुण्यरित परत पर मापाटीपा सहम मर्प-मस्तीपर कोई एमपन्त छोटी पर्वत कीसापूर्वक पारण कर लिया।सीले म स्वमि तया मतमें गारमन पारक सिदिस हो । निशाने पाणकोनगाहेरूपको अपने। EAR प्रमााममाण 61 सोमही गिमा माता १५६ ११७ से याद, पीपा प्राप्त होता । इसिमीपायनीही शिवदास पौरप कृस भाषा- टीकापी पचदशोऽध्यायः ॥ ५॥ अप पदशोऽध्यायः न ध्यात पद-श्विरस्य विधिवत्ससार विच्छित्तये स्वर्गद्वारपाटपाटनपटु- धर्मोऽपि नोपार्जित ॥नारिपीनपयो घरोस्युगुल स्वप्नेपि नालिंगित मात. केवलमव योवनवनच्छेदे कुठारा वयम् (उप्पय] मसागर से मुक्त हत विभिपत गतिवाई।

पानापनीतापान ध्यान म कानो घरण कमल प्रमु मन सुखदाई । खोल न स्वर्ग झपाट हार मह निपुण सुधर्म' । ताके संचित हेतु किया नहिं छु शुभकर्म । तियगमके मुष पुष्ट शुम, उरु भालिंगम न पियो याँधम जमनी हेतु कन,हम कुठार को पपुरियो। मर्प-सपारसे पुरू होने निमिच लिपिक या पर बोका पान म दिया स्वमदार पारसारमेमें निपुण पर्म भीमपमित म पिपा विनों रसम सपा नारी स्मभी माहिम म बिपा म वह माता योगरूप पमक.मे हिप कुमररूपये ॥१॥ जल्पति साईमन्येन पश्यत्यन्य सवि- भ्रमा । त्हदये चिंतय त्यन्य न स्त्री- णामेक्तो राति ॥२॥ दोहा-मेगरि पर पई लखति, आनरुग सRIAL दिय प्याम सर को महाप्रमिामतिय जाति मापयशासाहम् मर्य-दूसरे के संग गात रखी है। दूसरे को विसास पूर्व कमतीरे इलप में मोर काप्पान करती है। खियो की एकसे प्रीति नहीं ॥ २॥ यो मोहान्मन्यते मूढोरक्तेयं मयि का- मिनी ॥स तस्या वशगो मृत्वा नृत्ये- कीडाशकुंतवत् ॥३॥ दोहा-यह तिय मम रत मोह से,मानत मल इमिजौना कीडा विहग समान शठ,नाचा तिय पश तान ॥३॥ अर्प-पहनीमुन से प्रसन, जो मूर पोर से ऐसा मान पारस खीरे वशीभूत होर फाटा पती के समान मापता कोर्थान्प्राप्य न गर्वितो विपयिण क- स्यापदोऽस्तगता स्त्रीभि कस्य न ख- डित भुवि मन का नाम राजप्रिय.॥ क कालस्य न गोचरत्वमगमत्कोऽर्थी .

पापनातिपय
ध्यान म कोनों परण पमल प्रमु मन सुखदाई ।
खोकन स्वर्ग कपाट हार मह मिपुण सुधर्म
ताके संचित हेतु बियो महिं का शुभकर्म ॥
तियगनके कुच पुष्ट शुभ, ठरू भारिंगन न दियो।
याधम जममी हेतु बस,हम कुठार को वपु लियो।
भ-समार मुरू होने के निमिव विपिपूर्ण इमामे पर
पौका पाम म दिया सहारने पाठ सोसमें निपुण धर्म
मीपनि दिपाश्री दानों पर रतम सपा घागरी
स्वप्रमभी माहिंगम मनिपा एम एस माता पोर रूप
पमके मेक हिप मारूपये ॥ १॥
जल्पति साईमन्येन पश्यत्यन्य सवि.
नमा । त्दृदये चिंतय त्यन्य न स्त्री-
णामेक्तो राति ॥२॥
दोहा-मंग पर खति, मानरुग EMA
इदय याम सोनी, प्रेममितिय जाति॥२॥

मांपोटीका सहिम् नेर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते 'मयी कुरंगी॥तथापि तृष्णा रघु- नस्य विनाशकाले विपरीतबुदि.५ रचित नकार अपम हप्ती नहिं सनी न फंपन मपीशरीर फाल पिपरीति दाति मीत, भर तयापि कृष्णा रघुबी॥५॥ -किसी से भी निर्माण में की गई। न पहिले देखी न गई, की सवर्ण पीहरिणी होती है। सपापि रामचंद्रनी कृष्णाई । पिनाथ फाल म पिपरीत दुम्दि पाती है गैरुत्तमतां यांति नाचरामनसस्थि- । प्रामादशिखरस्थोऽपि काक कि रुडायते॥६॥ हा-गौरवता गुणते रहत, मासन मेरह नाहि । पायस गडदो, देवल मम्नक माहि ॥ ६ ॥ 'ण से ससमता पा प्राप्त रोते रे, मापन पर नहीं बन पा शिक्षामा कोमा १५२ पानश्मनीविपन गतो गौरव को वा दुर्जनदुर्गुणेषु पति त क्षेमेण यात पथि॥४॥ (कवित्त ) मयो अभिमानी नहिं पाय धन कोम मग, कौन विषयी को सघ विपत्ति नशामी है। खंडिस भयो नमन काको जग नारिन ते, रूप गन मेरो जग कौन प्रिय प्रामी है। फाल की अगापासा पायो जग कौन ऐसो, मयो य जगत प्रपच बीच शानी है। पाई गस्ताई कौन मगम अगत पंथ, बुशल धारो कान मौष गुण मानी।। भध-पन पापापर यौन मभिपानी म हमा । रिस विपी । माध्येि मस्तई ॥ भूतत में छिपा हारा विसमा मन सनम हुमाराप्रापा प्रियान सकार पानापरला पो पोन मान नहीं भा।रॉन मांगमगा हातारा माम-1 पर माणों में परमर पप Bसार माग बन गया

मंपोटीका सहिम्
न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते
हेममयी कुरगी॥तथापि तृष्णा रघु-
नंदनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धि.५
दाचित न काह प्रथम कसी नी,मी न कंपन मृगीशरीर
मायफाल विपरीतिदाति मीत, मा तपाप सृष्णा रघुबीरा॥५॥
भर्प-किसी कर भी निर्माण म की गई । म परिसे देनी न
मी गई, की वर्ण की परिणी होती है तथापि रामचंद्रनी
मोहम्माहई । विनाश पासप विपरीत पुष्टि हासी ॥५॥
गुणैरुत्तमतां याति नोभेरामनसंस्थि-
ता. प्रामादशिखरस्थोऽपि काक किं
गरुडायते ॥६॥
दोहा-गौरवता गुणते छहत, मासन तेलह नाहि ।
पैठि न वायस गडदो, देवल मस्तक माहि ॥ ६ ॥
भर्प-गुण से सहमता को प्राप्त शेत, मासन पर
देठन से माध महादति । मइसके फपर रेटाहमा फोमा
क्या गरो प्रकारे॥६॥

१६२ पामामा-विषम गतो गौरव को वा दुर्जनदुर्गुणेषु पति त क्षेमेण यात पथि॥४॥ (कबिछ) भयो अभिमानी नहिं पाय धन कोन जा फोन विषयी की सप विपत्ति नशामी है संडित भयो नमन काको जग नारिम ते नृप गम करो जग कौन प्रिय प्रानी है। काल्फी अगोचरता पायो जग कौन ऐसा भयो यह जगत प्रपथ घीप शानी है पाइ गुरूताई कौन मगन जगत पंथ, कुशल पधारो याम नीष गुण मानी।।।। मप-एन पापपरमोन मभिपानी महमा । रिस Pी या भाप मस्त पद ॥ पूतल में दिया दारा विस मन मन न हमा। रामारामियानका गाना पो फोन प्रार नहीं मान मौगना हा गुहारमाम 11 या पोर प्रणों में पर र ससार माग गया।

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मापोटीका सहिदम्
न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते
हेममयी कुरगी॥तथापि तृष्णा रघु-
नंदनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धि ५
पद-नपित न का प्रयम एसी है,सनी न पन मृगीशरीर
नाशकाल विपरीति होति मति, भासपापि तृष्णा रघुवीरा
मर्प-किसी करके भी निर्माण की गई। न पहिले देखी म
सुनी गई, की सरर्ण की परिणी होती है। पापि रामपद्रमी
मोमाई । विनाश या प विपरीन बुद्धि रोती ॥५॥
गुणेरुत्तमतां याति नोचैरामनसस्थि-
ता प्रामादशिखरस्थोऽपि काक किं
गरुडायते ॥६॥
दोहा-गौरवता गुणते रहत, आमन मेलह नाहि ।
ठि ग पायस गढ़ दो, देवल मस्तक माहिं ६ ॥
मर्पण उपता । प्राप्त रोउ है, आसन पर
पेटन ये माम मान । महर का पाहमा कोमा
मागरमपारे॥६॥

पापक्मनीसिमर गुणा सर्वत्र पूज्यते नमहत्योऽपि संप दै ॥ पूर्णेदु-किं तथा वैद्यो निष्कलंको यथा कृश ॥७॥ दोहा-पूम होत गुण ठाम सप, सम्पति नाहि महान। माह पूर्ण क्षसि पंच तिमि,मिमि द्वितिया शसि माना॥ मई-सब स्पान में प्रण पूजे जाते हैं। पी बरी म्पति, महीपूजी माती ।या पूर्ण पद सिसही मार बना किया बातारे से पक रहिट मीण हया का द्रमा परस्तुतगणो यस्तु निर्गणोपिगुणी म- घेत् ॥द्रोऽपि लघुतां याति स्वयप्रख्या यितैर्गुण ॥८॥ ए-मपरन जिदि प्रण कीन मर्यसा,भपुण गुणी माई। मिन प्रण निम मुस रूपन फिपेने, वसमत साताई ॥ ८॥ भर्पको दूसरी ने दिसके गुणों की निकी पर निक मी पुणी बारे। मपने माप स्पन किसे पणों से इंद्र भी मधुता को प्रास वारे॥

माटोका मस्वि विवकिनमनुप्राप्ता गुणा यांति मनोज्ञ- ताम ॥ सतरा रत्नमाभांति चामीकर- नियोजितम ॥९॥ [0]ishra Yण पात, हिप पर ताई। सवरन हीरा चरित सात, संदरतामपिका.. मर्प-दानी को प्राप्त हुए गुण मनोहरा को मात समपर्णपाहमारा पस्पत गोमाका पात दरोडा गुण सर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निरा- श्रय ॥अनर्थ्यमपि माणिक्यं हेमाश्र- यमपक्षेते ॥१०॥ दोहा-पिन अधार इस टास मरो, गुण सर्वज्ञ सुश समान । पहत सदा आश्रय पन को, मौस्पाम अनि रम महान॥ १०॥ मई-जो वह परमेधा पमान भी, मोस

पानापनीविपश्य
गुणाःसर्वत्र पूज्यते न महत्योऽपि संप
दैः॥ पुणेंदु किं तथा वेद्यो निष्कलंको
यथा कृश ॥७॥
दोहा-पून होत गुण ठाम सम, सम्पति नाहिं महाना
काह पूर्ण शसि पंथ तिमि,निमि हिसिया शसि माना।
भर्प-सब स्थान में गुण पूजे जाते हैं। वरी मही
म्पति मही पूनी माती या पूर्ण पर विसही प्रकार
बदना किया मातारे मे पर रहित मीण दिनिया का
पंद्रमा ॥७॥
परस्तुतगणो यस्तु निर्गणोपि गुणी म-
घेत॥द्रोऽपि लघुतां याति स्वयप्रख्या
यितैर्गुणे ॥८॥
पद-भपरन मिति पण मीन प्रशंसा,मण गुणी नाई।
निम गुण मित्र मुमापन किये ने, इंद्र यत सघुनार ॥ ८॥
मर्प-गोदसरा मे बिसरे पुणों पी निती मा
नि भी गणी जाताहै। मपने माप पन दिये
पणो से इंद्र भी सपुताबो माठ सारे ॥८॥

मण्येश सचिम विवकिनमनुप्राप्ता गुणा यांति मनोज्ञ- ताम ॥ मुतरा रत्नमामांति चामीकर- नियोजितम् ॥९॥ [दानी दिम गुण पासव, प्रतिशपरवाई। हरन हीरा जति सारे, सदरता मंपिका.. मर्प-पानी को मात इप गुण मोदरता को म राहवर्ण पराामासरा मस्पत योमा प्राप्त होता गुणे सर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निरा- श्रय ॥ अनर्घ्यमपि माणिक्यं हेमाश्र- यमपेक्षेते ॥१०॥ दोहा-दिन मधार दुख लइस मकेलो, गुण सर्वज्ञ सुर्दश समान । पहत सदा माश्रय कपन को, मौल्यवान मन्ति रन महान ॥१०॥ मर्य-प्रमों में सर्पन परमेश्वर के प्रमान भी, मकेम

पानातीविषयम्
माभयहीन हासी हासा है।महे मोल का भी रत्न सई
के मामय कीछा करता १०॥
अतिक्लेशेन ये अर्था धर्मस्यातिक्रमण
तु॥शत्रूणां प्रणिपातेन ते अर्था मा
भवतु मे ॥११॥
दोहा-अति सुख ते अतिक्रमण धर्म ते,
प्राप्त होति है सम्पति जॉन ।
शधु वर्ग कहें नमन किये ते,
मिलहि मोहि जनि सम्पनि सौन॥१॥
मर्प बोधन मस्र्पत केश से, तपा पर्म के मति फमण
परने से, सणाशमो यो प्रणाम गरने से प्राप्त होते हैं।
बम मेरे मिपिव मरो । ११॥
किं तया क्रियते लक्ष्म्या यावधूरिव के
पला । या तु वेश्येव सामान्या पथिक
रैपि मुज्यते ॥१२॥

मापटीत
दोहा-तिहि लक्ष्मी कई करियका जौन बासम माहि।
दा धेश्या वत सर्व प्रिय,ग्मा पथक सन जाहि ॥१२॥
अर्प-उस लक्ष्मी क्या किया जाय, जो फेयर के
समान है। या यो वेश्या के समान सर्व साधारण रेमो पपिक
मनों से भी भोगी माती ॥१२॥
धनेषु जीवितव्ये च स्वीप चाहारकर्म
सु॥अतृप्ता प्राणिन सर्व याना यास्य-
तियोति १३॥
दोहा-धन मई जीवन तियन मःमोजन कारज माहि।
मसन्तुष्ट सब जन गये, जान सकल अरु नाहिं।।१३।।
मई-पम में जीवन में,तपा मामनपापा मे पर माया
महागप, भाते है। मौनीप॥
क्षीयते सर्वदानानि यहोमबलिकि-
या ॥न क्षीयते पात्रदानमभय सर्व-
देहिनाम् ॥१४॥

पापानीविरम
दोहा-यज्ञ होम बलि कमै असनष्ट होत सब दान।
मभयदान देहिम सफल, नशत न पान सुदान॥१४॥
मर्च-मरीम वारदानालिफर्म, तथा सम्पूर्णान जी
हो जाते हैं। सत्पात्र को दिया हमाधान,सपा सब दो पारि
पोको ममपदान दना नहीं मर होता.१४.
तृण लघु तृलात्तुल तुलादपि च याच
कवायुना किन नीताऽसौमामय या-
चयिष्यति।। १५॥
उद-मब तुम मधु तूप पण ते सपने घु पापड
माहियामाते यापमा परति जनि, पपन यादि विमिरे
महिना ५॥
मर्प-से लघु पण है। वण से मधुर मोर
पापक रूई से भीरप पर पयन सक्यों महीनापा
पावार समसतारे पि पर मच पापना पर
वरं प्राणपरित्यागो मानमगेन जीव-
नात ॥प्राणत्यागेक्षण दु.ख मानर्मग-
दिने दिने ॥१६॥

भारोमानिए ईद-पानमग जीवन भरूनहिं परमाण त्याग र माई। माम स्याम न देन भोक मरु,मानमनित दई॥ १५. अर्थ-मानभग होने से भीवनसे प्राण परित्याग मारे। माण स्पाम के सपप प पत्र के होवा पर पानप सनसे प्रतिदिन शिवा ॥१५॥ प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यति जन्त- छ । तस्मात्तदेव वक्तव्य बचने किंद- रिदना ॥१७॥ 6-य मापम मुदित है ERE अगर मानी। वा मारण न मुरादरिद्रता ॥१७॥ मर्प-प्रियन पोरम से सब प्राणी aurat कारण वह दीवाना पाहिले पनीया दरिद्रतing. संसारक्टुवृक्षस्य ह फले अमृतोपमे। मुमापित च मुस्वाद सगति सुजने- जने ॥१८॥ दोहा-अमिय सारस फळ उभय घर,यदि स्टारससार।

पापसतीशियन दोहा-यज्ञ होम बकि कर्म मह,नष्ट होत सब दाम । ममयदान पेहिन सकल, नशत न पात्र सुदान॥१४॥ मर्ष पहरोम बतिदानादिपर्म, तथा सम्पूर्णमान हीन से भाते है । सत्पात्र को दिया हुभा दान,तथा सब पर परि पोंगो समयदान दना नहीं मर होता ॥ १४॥ हण लनु लात्तुल तुलादपि च याच कावायुना किन नीताऽतोमामय या- चयिष्यति।। १५॥ उद-सम से सण सा तूप एण सहा पापा पारिपरमाते पापमा परी जनि, पान पारिरिषिरे मह आदि १५॥ मर्ष-सबसे तण है। वण से पुर। मोर पापर से भी यह पपनसक्यों मही रसमा पाता। मसता रियर पापना रेगा १५॥ वरं प्राणपरित्यागो मानभगेन जीव- नात ॥ प्राणत्यागेक्षण दुख मानभंग- दिने दिने ।। १६ ॥

मारिए छंद-पानभंग नीमन मा मार पर,माण त्याग र माई। माण स्पाम न देन पोक अरु,मानभंग मितदई ॥ १६० -पानभगवान से भीवन प्राण परित्याग पाहै। माण स्पाग के समय सण मय केश तारे। पर पानर्मप ने प्रतिदिन दश रोया है।॥ १६॥ प्रियवास्यप्रदानेन सर्वे तुष्यति जन्त- व ॥ तस्मात्तदेक वक्तव्य बचने कि द. रिद्रना।। १७॥ - मापन मुदिन में पस जगतके मानी। मारण aha 4 मा कारिद्रता माना ॥१७॥ मई- मन पार पाणी कारण सपना बाहिप पादरिदaitute ससारक्टुवृक्षस्य ह फले अमृतोपमे । समापित च मुस्वाद सगति मुजने- जने ॥१८॥ दोहा-अमिय सारस पळ उभय पर,यदि स्टारससार।

पाणामनौति अपन स्वाद यत धाम मधुर संगति सुमन उदारम १८ मर्य-संसार रूपी फद सके अमुक्त के समान को घस्मादिएसमधम तपा मसे पुरुषों की गति ॥ १८॥ बहुजन्मसु चाभ्यस्त दानमध्ययनात प॥ तेनैवाभ्यासयोगेन देहमभ्यस्यते पुन ॥१९॥ मंद-महबम्मन मम्पास किमो तप, पान अध्ययन गई। पुनि सम्पास गक प्राप्त होई ॥१९॥ मर्प-यात ससम्मों में सम्पास रिपाठमाधान, भारत म पाप सी मम्यास योगदारा फिर भी मास होता १९॥ पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेपु यहन. मा उत्पन्नेषु च कार्येपुन सा विद्यान- तहनम् ॥ २० ॥ लोसपा पुस्तपम मरिमर, पर हस्तमपन पो । समय anम नाहिसा शिपाम पम घो...

मापाटीकासास्तम् मर्य-यो दिपा पुस्तकों में है, और जो धन पापे सपने है।पाकि परपन होने के समय मबह पिपारे, सन २०० इतिमी पाणपनीतो शिवदास पटिप विरचित मापाटीकायो पारपाऽध्यायः ॥२६॥ मप सप्तरयमोऽध्यायः १७n पुस्तकप्रत्ययाधीत नावीन गुरुमनि- धोसिमामध्येनशोभते जारगी इव खिय ॥१॥ दौदा-पुस्तक दी ते पठित अरु पठिन महीं गुरु पोहा जार गर्म तिय गम सरिस, सो६ ममा म मार॥१॥ मई-पुलिपी प्रतीनि पराएमा तपाने पीप पराहमागास पार गर्म पारिणीमिपोर मान समाज पप गोमारा प्राRAprn कृते प्रतिकृति कुर्यादिसने प्रतिहिंसन- १०१ म् ॥ तत्र दोपो न पतति दुष्टे दुष्टं समा चरेत ॥२॥ द-की प्रति सपफारमेरे को, अपने संम भनाई मेने तिहिदाप नहीं लिनि, म समरम्बाई अर्प-उपकार करने पर प्रकारको, म १r सहा दोष नी, हर कार २७ यवर यवराराध्य यच दुरे व्यवस्थितम। तत्सर्वं तपसा साध्य तपो हि दुरतिश मम् ॥ ३॥ दोहा-दूर पसत मोदूर जो, दुराग्य है औम । दुरतिमम तप साह से, सकल सुलम तप सौम | BH मर्प-जो दूर, भादुरापाप्य है। कोरस - मतपस सलमदे, मिष कि परविक्रम लोभश्च गुणेन किं पिशनतायद्यस्ति- किंचातक सत्य चेत्तपसा च किंशुचि मनो यद्यस्ति तीर्थन किमासौजन्य- मापाटीकासविषय यदि किं गुणे सुमहिमा यद्यस्ति किम- हनःसद्विद्या यदि किंधनेरपयशो यद्य- स्ति किं मृत्युना ॥४॥ [उप्पय ] अवगुण से है काह, लोम जो मनमें रहई। काह पाप से हानि, पिशुनता जो नर गईई ।। तप से है १६ टाम, सत्यता जो मन माहीं। जो पपिन मन है, लाम सारय ते नौहा। का गुण गोधुजनता,महनतेष.इनो सुपश। सहिपाजोधन कहा, फहामरण जोमयश १ मई-जोमर,वो मरणों सयाजी पुगी। तोपातमा समाजासापास गरे, जो परिणाममा ताप ए मारना एमनमा । ताम पाना परिमारेगमे याद जामरी रिपारा पर पपारा मपपरा यो परयुगे पपाn २७१ पापम्पनीलिपर पिता रत्नाकरो यस्य लक्ष्मीर्यस्य सा दरी ।। शखो मिक्षाटन कुर्यान्नादत्त पतिष्ठते ॥५॥ छंद-जाको पिता रदपि रत्नाकर,मा मगिनि मिीि माँ भिक्षाटन हित फिरत रास सो पिसत दिय दिन नौहा। अर्थ-जिसका पिता ममद्ररे, निसफी सगी पदिन सक्ष्मी है।पा शंख भीख मांगन सिप प्रमण सारे गिन दिया नहीं मिलता।५॥ अशक्तस्त भवेत्साधुब्रह्मचारी च निर्ध न ॥ व्याधिष्ठो देवमकश्च वृद्धा नारी पतिव्रता॥६॥ ७५-पाधु होप्त मसप सपा हो, निर्पन जम ममया। म्यागिर र मतहस नर, पतिमत पवा मारी ।। अप-मर्पो साघु दोहा, मोर मिर्धनी प्रमपारी होगा। भोर म्याप प्रात दर भकता, और पर सी पनियता हासी ६० . मापकारिणम् नान्नोदकसम दान न तिथिर्वादशीम- मान गायत्र्या परो मत्रो न माई- बत परम् ॥७॥ -मममरि समदान मान नहिनिपिनदिमर दादग्रीसमान गापात पाम पर नर्षि, माना त महिं देष महान ७॥ मा-माम मा समान दान नही। हादशी समान लिपि महापापणी पर पंप महा ३ सपा पाता से मपिर अट दाना नदीn७॥ तक्षरम्य विष दते मक्षिकाया विप शिर ।। रविवस्य विप पुच्छे मग दुर्जनो विपम ॥८॥ -kी माल मर गरिति दान दी। परिपत , पुरन सिपी HD मप में मिला THATim में पितnfrifmरानो परावा. ।

सिनीलिम पत्युराज्ञां विनानारी उपोष्य व्रतचारि णी॥ आयुराहरते मर्नु सानारी नरके व्रजेत् ॥९॥ दोहा-पति माज्ञा दिन रहतम्रत,मरु उपास सियजौना हरति मामु पतिकी सथा,नरक जाति तिय तौम ॥॥ मई-पतिपीमावारे विना नो मारी रुपासीदिर बरती। पामारी पतिकी भवस्पाकारतीया नरक को जाती। ९० न दानै शुद्यते नारी उपवासशतैर- पि ॥ न तीर्थमेवया तहद पादोदके- र्यथा॥ १०॥ -मपितराव सपवास दान , शराति तिप नाti होत एबमर्षि गमन सन,मिमि पति पद ९ महिमा मर्म-सी न सैनो दाम म प स स शुर दोवी है।म तीर्थ सेपासे एद इसी है, जैसे सामान परगोंदक पेपद पाती।। १०.

१७७ सपाटीपासरि पाद्यशेषं पीतशेष संध्याशेष तथैव च। श्वानसूत्रेसम तोयं पीत्वा चांद्रायण- चरेत् ॥११॥ ॐद-पीने से भस प प बल पग घोपन से जोई। धान म सम बारि पिये नर, कर चौदापण सोइ र ११॥ भप-पार पोने से पवाहमा, पाने से बचाइमा इसी प्रकार पंप्या सपाहमा जापान के पूरे समान २॥ उसे पीपर पान्द्रायणप्रत परे। ११॥ दानेनपाणिन तुक्कणेन स्नानन शुद्धि- नर्तु चन्दनेन। मानेन तृप्तिन तु भोज- नेन ज्ञानेन मुक्तिन्तुमण्डनेन ॥१२॥ मंद-का दान होत परिष पन, किये पान मी मानते शनिहाति पदन, म नतिन पहि मान सनराशाम मोजम, किपे त नाई त । बार निर्मानापनहानि पान रोता २२ मर्पनापदान से पटवा,म शिकसम से, स्नान १७८ पाणपनीविरूपणम् से पद्धता होती है न कि पंदन से, मान से तृप्ति होती म कि भोजन से, वान मुकि होती मनिहार से। नापितस्य गृहे क्षौर पापाण गंधलेप नमा आत्मरूप जले पश्यञ्छस्थापी श्रिय हरेत् ॥ १३॥ (७८)मापित फररावन,दसब जस निज रूप। तन पसान से गप लगावम, हर सम्पतिहर मूप ॥ १५ ॥ भर्प-माइके पर में हम मत पनाना, पापाण सेकर गंप सगाना, अपने रूप पो जस में देखना छुनेर की भी इस्मी र सता॥१५॥ सद्य प्रज्ञाहरा तुडी सद्य प्रज्ञाकारी वचा॥ सद्य शक्तिहरा नारीसद्य शक्ति करं पय ॥१४॥ ए-दरूसीमटीहरण फाति पति,पप पर पर सरकार, परमात पपन पासीघातिपत पास १४॥ गई-एसपीमदी दिपोरण तापपी माप्रटीकासहित रीति कोपाती है। स्त्री शीघही शक्ति हरण करती है। घ तत्काल ही पछटावा। १४ ॥ यदि रामा यदि च रमा यदि तनयो विनयगुणोपेत ॥ तनये तनयोत्पत्ति. सुरवग्नगरे किमाधिक्यम् ॥ १५॥ द-प्रतादि गुण युफ पुष को सक्ष्मी पदि जोमारी। जनप मप सत्पपिहोप पदि, सर पुर समामारी ॥ १५॥ मप-मो एपोग्य सी मोर जोरपीर मो नम्रता- पुणों स पुफ पुष ।पुर के पुष बीपस्पधिरे।तो दक मा मगर मेश्या मधिपता १५॥ परोपकारण येपां जागतिं हृदये सता- म् ॥ नश्यति विपदस्तेपासपद स्यु पदे प॥१६॥ छंद-मिनपत पुरुषन हिपम्दै आगत,निशिदिन परस्पारण पद पर तिनबारे मिति सम्पदा, पोति विपति प्रण RR मर्प-मिन मापुरुषों से ददय में परापर भागता

पागलपनाविलय
ग्मेकी विपचि माहसी रेतया पर पद में सम्पति मात्र
होती? १५॥
आहारनिद्रामयमैथुनानि ममानि चै-
तानि नृणां पशूनाम् ॥ ज्ञान नराणा-
मधिको विशेपो ज्ञानेन हीना पशुभि
समाना ॥ १७॥
दोहा-असम नींद मय सग तिय,ये पशु र म समान।
ज्ञान हीन पशु सरिस नर,मर म मति घर ज्ञान||१७A
मर्प-माहार, निद्रा, भप, स्त्री, प्रसंग, पे मनुष्यों क्षमाप.
एमों को समान प्राप्त है। मनुम्पोंगे विशेष पिक पान मात्र
तपान से सीन ममुप्प पशुफी समान है ॥ १७
दानार्थिनो मधुक्रा यदि वर्णसालेरी
कृता करिवरेण मदान्धबुद्ध्या
गण्डयुगमण्डनहानिरेपा भूगा पुनर्वि-
कचपनवने वसति॥१॥

१८१ माप्रटीकासहितम् वात्पर्य गुणीजनों के सिरस्सार करने से तिरस्कार की कीही निहाती है। गुणी मनसो सर्वध मादर पाने) द-कर्णतास हे मदरत महियदि,मयमरिपोमदमसिगजराम। पातिदिएग गडस्पल सति पुनि,मत महमम मधुपसमाज मर्प-ए गमरान स मदान्य पुदि से, कर्ण रूप हालीस पदमपदी छापाले अपर मोदर सिये गपेरें । पर सस की दोनों गणस्पलों क शोमादी हानि भरि फिर मीतिले बन में निवास करते है॥१८॥ राजावेश्या यमचाग्निस्तस्करो वाल याचको । परदु ख न जानति अष्टमों ग्रामकंटक ॥१९॥ दोदा यापक शिशु यम अनल अरु गणिका योपन हार अएम पटक मगर नृप गनत म शाक परार ॥१९॥ मर्प-नामा, इपा ममि पम, और पार तथा पाथ्य और पारफ,सपा मारो ग्राम वापियों यो पर देनेवासा परापे इसको मरीयानमा अध-पश्यमि किंवाले पतितं तव किं- - पामापनीविनर मुवि ।। रेरे मूर्ख न जानासि गत तार ज्य मौक्तिकम् ॥२०॥ दोहा-पाळा मीच लखतियों, का महि गिरो तिहार २ मौवन मुक्तगिरो, रे नई जान गवार ॥२०॥ मर्प-रेवासा तू मापे क्यों देसतो, पपी में वेरामा गिर गया।रारे । मर्म नहीं जानता मेरा ताम्म मौफिक गिर गयारे॥२०॥ व्यालाश्रयापि विफलापि सकंटकापि- धक्रापि पकिलभवापि दुरासदापि ॥' गन्धेन वन्धुरसि केतकि सर्वजतोरेको गुफ.खलु निहति समस्तदोपान्॥२१॥ पए महि मामित कीपक भटर युत, केतक मफर दुरासदक। घुर्गम वे निज मन मग सम, प्रति इकणार ममित सिंक २१H मर्य-सपास माभिव, भी. फाममी. reem मापाटीकासविषम सीमी, कीप सपने वासी मी, दुास से मात देने पाठी भी फेवकी ? मपनी विमरू गपिके कारण सम माणि- पों का बंधु रूप निमय एकही गुण सब दोपोंको र करवाई।२१॥ इतिमीपास्यमीठो शिवदास परिपकल मापा टीकायां समदपोऽध्यायः॥ १७ ॥ सम्पूर्णम् ॥ पुस्तक मिस्ने का पता प० श्रीधर शिवलाल ज्ञानसागर प्रेस पोस्ट माहंगा-मई

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Chankya Neeti Darpan

Author
Pandey, Shivdas
Title
Chankya Neeti Darpan
File name
Chankya Neeti Darpan
Text
OCR done
Citation
1915
Published
2011/08
Publisher
Bambai, Gyansagar Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
188
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314077
Barcode
99999990312227.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
69Sp5TAR3DP
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