Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Swadhin-bharat
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हिन्दी-गौरव- ग्रंथमावा-१२ वाँ ग्रंथ ।
स्वाधीन-भारत
[महात्मा गाँधीकी 'इण्डियन होमरूल' नामक
अँगरेजी पुस्तकका अनुवाद ।]
अनुवादक,
पं० छविनाथ पाण्डेय, बी० ए० एल० एल० वी०
प्रकाशक,
गाँधी हिन्दी पुस्तक भंडार,
प्रयाग
द्वितीय संस्करण
मूल्य एक रुपया
चैत्र १९८७
प्रकाशक:
गाँधी हिन्दी-पुस्तक भण्डार,
प्रयाग।
-
मुद्रक :-
सूरजप्रसाद खन्ना,
हिन्दी-साहित्य प्रेस, प्रयाग ।
स्वाधीन भारत
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विषय
१३
अध्याय,
राष्ट्रीय सभा तथा उसके व्यवस्थापक
२ बंग-विच्छेद
अशान्ति तथा हलचल
स्वराज्य क्या वस्तु है
५ इङ्गलैण्डकी स्थिति
CU
४
२२
w'
सभ्यता
३५
७
४२
४८
९
५३
भारतका सत्यानाश क्यों हुआ
भारतकी स्थिति
भारतकी स्थिति-रेलें
१० भारतकी स्थिति-हिन्दू और मुसलमान
२१ भारतकी स्थिति-वकील
१२ भारतकी स्थिति-डाक्टर लोग
७६
[ २ ]
८६
१३ वास्तविक सभ्यता
१४ भारतको स्वतन्त्र होनेके मार्ग
१५ भारत तथा इटली
१६ पशुशक्ति
९१
१७ सत्याग्रह
१११
१२५
९८ शिक्षा
१९ मशीनरी या यन्त्र
२० परिशिष्ट
१३५
१४१
दरिद्र भारतके अभ्युदयार्थ
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स्वाधीन भारत
पहला परिच्छेद
राष्ट्रीय सभा ( कांग्रेस ) तथा उसके व्यवस्थापक
पाठक-आजकल सारे भारतमें स्वराज्यकी हवा वह
रही है। जहाँ देखिए वहीं स्वराज्यकी चर्चा है। प्रायः
सारी भारतीय जनता स्वतन्त्रताके लिये दीवानी हो रही है।
अफ्रीकामें जो भारतवासी चले गये हैं उनको भी यही धुन
सवार है। इस समय भारतमें जागृति हो रही है और
सब लोग अपने अधिकारोंके लिए लोलुप हो रहे हैं। कहिए
इस विषय में आपकी क्या राय है ।
सम्पादक-आपने प्रश्न तो खूब किया है, पर उसका
उत्तर देना सहज नहीं है। सम्पादकोंका पहला तथा सबसे
चड़ा काम जनताके भावोंको समझना तथा उनका प्रचार
२
स्वाधोन भारत
करना है। दूसरे उनमें कुछ नई आवश्यक बातोंकी जागृति
कराना है; और तीसरे निडर होकर समाजके दोषोंको
दिखलाना है। आपका प्रश्न इन तीनों विपयोंसे भरा है।
तब उत्तर देनेके पहले मुझे यह सोच लेना आवश्यक
है कि इन तीनोंका उत्तर समयानुकूल कहाँ तक दिया
जा सकता है। जनताका मत कुछ न कुछ प्रकट किया
जा सकता है, उसमें थोड़ी बहुत जागृति भी डाली जा
सकती है और किसी किसी विषयकी आलोचना भी
की जा सकती है। पर तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देना तो
आवश्यक है।
पाठक तो क्या आप यह कहते हैं कि स्वराज्य शब्द
हम लोगोंको सिखाया गया है।
सम्पादक-स्वराज्यकी आकांक्षाहीने तो जातीय सभाको
निर्माण कराया। जातीय शब्दसे सिवा स्वराज्यके और
किस अर्थका बोध हो सकता है।
पाठक-पर यह बात वास्तव में प्रतीत नहीं होती। कम
से कम बीसवीं शताब्दीका भारत तो यह नहीं बतलाता।
अब कांग्रेसकी परवा ही कौन करता है। अब तो लोग
उसे घृणाकी दृष्टिसे देखते हैं। कितनोंको तो यह भी
राष्ट्रीय सभा (कांग्रेस) तथा उसके व्यवस्थापक
विश्वास होने लगा है कि यह नौकरशाहीकी जड़ पुष्ट
करती है।
सम्पादक-पर यह ठीक नहीं है। यदि इसी राष्ट्रीय
सभा द्वारा प्रातःस्मरणीय दादाभाई स्वराज्यका बीज न बो
गये होते तो आज स्वराज्यकी चर्चा सुननमें भी न आई
होती। हम लोगोंको महात्मा ह्य मके वचन भूल न जाने
चाहिए। किस परिश्रम तथा उद्योगसे उन्होंने हम लोगों
को कर्तव्य-मार्गकी शिक्षा दी, और कांग्रेसके मन्तव्योंकी
प्राप्तिके लिए हम लोगोंको सोतसे जगाया। विलियम
वेडबनने तो इसीके लिए अपना तन, मन, धन सभी कुछ
दे दिया था। उनके लखोंको पढ़ कर अब भी आशाका
उदय हो जाता है। जातीय संगठन के लिए स्वर्गवासी
गोखले दरिद्रता स्वीकार, कर वीस वर्ष तक उसीकी धुनमें
लगे रहे और दरिद्र ही स्वर्ग सिधारे। बदरुद्दीन तैयवजीने
भी इसी द्वारा स्वराज्य शब्दका प्रचार किया। यदि पिछला
इतिहास देखा जाय तो प्रत्येक प्रान्तमें स्वराज्यके भिक्षुक
कांग्रेसके भक्त थे, चाहे वे भारतीय रहे हों या अँगरेज़ ।
पाठक-वाह साहब, आपने तो खूब घोड़ा छोड़ा।
मार्गका तो आपको ध्यान ही नहीं रहा। जरा सोचिए कि
:
स्वाधीन भारत
मेरे प्रश्न और आपके उत्तरमें क्या सम्बन्ध है। मैंने तो
स्वराज्यके बारेमें प्रश्न किया और आपने पर-राज्यकी बात
छेड़ दी। यह तो वही हुआ-पूछा, "उर्दका क्या भाव
है," उत्तर मिला-"मटर १० सेर ।” मैं अँगरेजोंका संबंध
नहीं चाहता और आप उसीकी तान अलापे चले जा रहे
हैं। इस बातसे हम आप सहमत नहीं हो सकते। इस
लिए कृपा कर आप केवल भारतीय आत्माओंका ही ध्यान
रखिए। मैं और बातें चाहे वे कितनी अच्छी हों-नहीं
चाहता।
सम्पादक-जरा धीरज रखिए । मैं तो आपके मतानुसार
चलनेमें असमर्थ हूँ। यदि चुपचाप मेरी बातें सुनना
पसंद करें तो आपका मतलब हल हो जायगा। कहावत
है कि "लड़का पैदा होते ही मर्द नहीं हो सकता।" आपकी
बातोंसे तो प्रतीत होता है कि आपके लिए स्वराज्य अभी
कोसों दूर है। जब आप भारतके हितैषियोंका ही श्रादर
करना नहीं सीखेंगे तो आपकी सहायता कौन करेगा।
यदि भारतमाता आपके जैसी दस-बीस सन्तान और उत्पन्न
कर दे तब तो उन्नतिका मार्ग ही रुक जाय ! जरा मेरी
बातोंको ध्यानसे सुनिए।
राष्ट्रीय सभा (कांग्रेस) तथा उसके व्यवस्थापक , पाठक-मालूम होता है आप घुमा-फिरा कर हम लोगों- को बहकाना चाहते हैं और हमारे प्रश्नोंको ज्योंका त्यों रहने देना चाहते हैं। जिन्हें आप भारतके हितैषी बतलाते हैं उन्हें मानता ही नहीं तो फिर आपकी बातोंको मैं क्यों सुनने लगा। जिसे आपने जातीयताके खयालसे बड़ा आदरणीय समझा-जातीयताका जन्मदाता बतलाया है-उसने भारतके लिए क्या किया ? उसने तो कहा था कि शासन- वर्ग न्यायसे चलेंगे, हम लोगोंको चाहिए कि हम भी उनसे प्रेमभावसे मिलें। सम्पादक-वस, चुप रहिए। आपको शर्म श्रानी चाहिए। इतने बड़े प्रतिष्ठित पुरुपके बारे में ऐसी लज्जा- जनक बातें कह रहे हैं। कैसे निर्लज्ज हो। आपमें कृतज्ञताका लेश भी नहीं रह गया है। उनसे आप क्या चाहते थे और उन्होंने क्या नहीं किया। जानते हैं भारत- माताके चरणों में उन्होंने अपना जीवन समर्पण कर दिया था। जब हम लोग आँखें बन्द कर कानोंको मूंद कर गाढ़ी नींदमें पड़े थे उस समय दादाभाईहीने हम लोगोंको जगाया और दिखलाया कि अँगरेज लोग हमारा खून चूसे चले जा रहे हैं। उन्हीं दादाभाईको यदि अंगरेज जनतामें
६
स्वाधीन भारत
अटल विश्वास था तो इसमें हर्जकी वात ही क्या है।
क्या एक कदम आगे बढ़ जानेहीसे हम लोगोंको उनका
महत्त्व भूल जाना चाहिए ? और क्या इसीसे हम लोग
ज्यादा बुद्धिमान हो गये ? क्या इसे भी बुद्धिमानी कहते
हैं कि जिस सीढ़ीसे हम ऊपर चढ़े अब उसी को
ठुकरा दें। याद रखिए उसका एक डंडा भी खिसका कि
हम लोग भी गिरे। बालकसे जवान होने पर हम लोग
बचपनको घृणासे नहीं देखते, बल्कि उसके लिए लालायित
रहते हैं। यदि कठिन परिश्रम करके किसीने कुछ योग्यता
प्राप्तकी और हमें भी उसने कुछ सिखलाया और
समयानुकूल उस शिक्षा द्वारा हमने कुछ काम कर लिया
तो इसका यह मतलब है कि हम उस शिक्षादाताको मूर्ख
कहें ? और इस कहने में हम कितने योग्य समझे जायेंगे ?
उचित तो यही है कि मैं उसकी इज्जत करूँ और सदा इस
बातका खयाल रक्खू कि मैंने जो कुछ किया वह सब
उसीकी बदौलत किया है। इसी बातको दादाभाईसे
मीलान कीजिए तो आपको मेरा कहना अक्षरशः सत्य
प्रतीत होगा। वास्तवमें भारतमें जातीयताके जन्मदाता
वही थे।
राष्ट्रीय सभा (कांग्रेस) तथा उसके व्यवस्थापक
पाठक-क्षमा कीजिए। आपकी बातोंसे मेरी भ्रान्ति
दूर हो गई। दादाभाई अवश्य प्रतिष्ठाके पात्र हैं। यदि
आज उन्होंने इस पवित्र भूमि पर जन्म न लिया होता तो
कदाचित् हम लोग अब तक सोते ही रहे।होते। यदि
उठे भी होते तो उत्साह हीन रहे होते। लेकिन ये सब
बातें गोखलेके लिए कहाँ तक सच कही जा सकती हैं ।
वह तो मरते दम तक अँगरेजोंके मित्र बने रहे। जगह
जगह पर उन्होंने कहा है कि हम लोगोंको अँगरेजोंसे बहुत
कुछ सीखना है। पहले उनसे योग्यता प्राप्त कर ली जाये
तब स्वराज्यकी चर्चा की जाये, इत्यादि। उनके व्याख्यान
पढ़नेसे तो तबीयत ऊब जाती है।
सम्पादक-इसका केवल एक मात्र कारण यापकी
अधीरता है। इस विषयमें मुझे केवल इतना ही कहना
है कि जो लोग अपने माता-पिताको फूक फूक कर कदम
रखते देख वे-मन हो जाते हैं या उन्हें अपने लड़कोंकी
वातें न मानते देख झिड़क उठते हैं, उनसे हम कोई आशा
नहीं कर सकते; क्योंकि उन्होंने अनाज्ञाकारिताका पहला
सवक पढ़ लिया है। यदि वास्तवमें देखा जाय तो स्वर्गीय
गोखले हम लोगोंके पिताके तुल्य हैं। हमें उनकी उतनी
स्वाधीन भारत
.
ही प्रतिष्ठा करनी चाहिए जितनी हम अपने पिताकी करते
हैं। फिर चाहे उनसे हम सहमत हों या न हों। यदि
हमें जातीय स्वतन्त्रताकी अभिलापा है और उसको पानेका
प्रयत्न करना है तो पूर्वजोंको भूलना उचित नहीं है।
जिसमें पूर्वजोंके प्रति श्रद्धा, भक्ति नहीं रह गई उसका
जन्म ही व्यर्थ समझिए। क्योंकि जिस मनुष्यमें उतावला-
पन है और विवेचना-शक्तिका सर्वथा अभाव है वह अपना
शासन स्वयं कर ही नहीं सकता। अच्छा इस बातको
जाने दीजिए। उनके कामोंका ही खयाल कीजिए।
भारतीय शिक्षाके लिए उन्होंने कितना प्रयत्न किया।
क्या आप दो चार नाम हमें और ऐसे बतला सकते हैं,
जिन्होंने इस महान कार्यके लिए उनका चतुर्थाश भी
प्रयत्न किया हो। यदि विचार-पूर्वक देखा जाय तो जो
कुछ उन्होंने किया निष्पक्षपात तथा शुद्ध हृदयसे किया।
मातृभूमिकी सेवाको ही उन्होंने अपना परमधर्म माना था ।
उसके लिए वे अपनी जान भी निछावर करनेके लिए तैयार
थे। जो कुछ भाव उनके हृदयमें उत्पन्न हुए उन्होंने साफ
साफ कह दिया तो कुछ बुरा नहीं किया। यही सब बातें
हमारी श्रद्धा तथा भक्तिको उनकी तरफ खींचती हैं।
राष्ट्रीय सभा (कांग्रेस) तथा उसके व्यवस्थापक
पाठक-तो क्या हमें प्रत्येक विषयमें अनुकरण करना
चाहिए।
सम्पादक-मैंन यह कब कहा। यदि किसीका आत्मा
शुद्ध रूपसे मतभेद दिखलाता है तो उसे अपनी आत्माके
अनुकूल करना चाहिए। यही उनका भी मत था। मेरे
कहनेका तात्पर्य केवल इतना ही है कि उनकी अप्रतिष्ठा
करना अथवा उन्हें तुच्छ समझना हमारा धर्म नहीं है।
क्योंकि उन्होंने हमारी भलाईके लिए बहुत कुछ किया है.
और जो कुछ हम करेंगे उससे उसकी कोई तुलना नहीं है।
कितने अखवारवाले उनकी निन्दा करते हैं। हम
लोगोंका परम धर्म है कि ऐसे निन्दावादका विरोध करें
और उनका मुँह बन्द कर दें। महात्मा गोखले स्वराज्यके
स्तम्भ हैं। ही सच्चे हैं और सब झूठे हैं, जो हम करते
है वही देशके लिए लाभदायक है इत्यादि बातें तुच्छ
लोगोंके मुंहसे निकलती हैं।
पाठक-अव इन लोगोंका महत्त्व कुछ कुछ मेरी
समझमें आने लगा है। अब मैं इस पर सोचूँगा । लेकिन
राम तथा बेडर्बनके विषयमें जो बातें आप कहते हैं उन
पर मैं शायद विश्वास नहीं कर सकता।
स्वाधीन भारत
सम्पादक, क्या हमें सब बातें फिरसे दोहरानी होगी।
भारतीयोंकी जगह पर अंगरेजोंको रख दीजिए, फिर
देखिए सव बातें मिल जाती हैं या नहीं। सभी अंगरेजोंमें
दोष लगाना सर्वथा अनुचित है। उनमेंसे कितने ऐसे हैं
जो भारतके लिए स्वराज्यके पक्षपाती हैं। अन्य लोगोंकी
अपेक्षा इनमें स्वार्थान्धताकी विशेषता है, पर इससे सबको
बुरा नहीं कह सकते । यदि आप न्याय चाहते हैं तो न्यायका
अवलम्बन करिए। जहाँ तक देखने में आया है बेडवर्नन
भारतकी बुराई नहीं की है। क्या यह कम प्रशंसाकी
बात है। यदि कृतज्ञता हममें नहीं है तो हमारा काम
कौन करेगा। इन बातों. पर आप जितना कम ध्यान
दोजिएगा, उतनी ही देर आपके काममें होगी। पर यदि
दूसरे यह जानते हैं कि भारतीय लोग कृतन्न नहीं हैं तो वे
आपकी सहायता करेंगे, आपका साथ देंगे और आपको
सफलता पर पहुंचावेंगे।
पाठक-सम्पादकजी, यदि आप खफा न हों तो
साफ कह देना चाहता हूँ कि आपकी ये बातें बिलकुल
अनुचित हैं। भला इससे भी बढ़कर कोई दूसरी बेवकूफी
हो सकती है कि अँगरेजी जनता भारतकी सहायता कर
राष्ट्रीय सभा (कांग्रेस) तथा उसके व्यवस्थापक मैं उसे स्वराज्य दिलावेगी। भला, वे लोग कब हमें स्वराज्य- प्राप्त देखना चाहेंगे। जाने दीजिए, इस पर वहस कर अपना समय व्यर्थ नष्ट नहीं करना चाहता। पहले इसी समस्याको हलकर लिया जाय कि स्वराज्य मिलनेके क्या उपाय हैं और तब शायद मैं आपकी बातें समझ सकूँगा। आपने अँगरेजोंकी सहायता पर इतना अधिक जोर दिया कि आपकी तरफसे मुझे सन्देह होने लगा है। इस लिए इस समय इस प्रसंगको छोड़ देना ही उचित होगा। सम्पादकः-मुझे इसकी कोई खास इच्छा नहीं है। आपको मेरी ओरसे सन्देह होने लगा है, इसकी भी मुझे विशेष चिन्ता नहीं है। क्योंकि 'कड़वी औपध विन पिये, मिटै न तनकी ताप,' अथवा 'अप्रियस्य च सत्यस्य श्रोता वक्ता च दुर्लभः ।' इस लिए अच्छा ही हुआ जो मैंने सब बातें आपके सामने रख दी। हाँ, एक बातका प्रयत्न अवश्य करूँगा। आपका सन्देह मिटानेका प्रयत्न करूँगा। पाठक-मैं भी यही चाहता हूँ। यहीं पर मैं एक वात और जान लेना चाहता हूँ कि स्वराज्य तथा कांग्रेससे क्या सम्बन्ध है। मैं मैं
स्वाधीन भारत
सम्पादक-सुनिए। कांग्रेसमें भिन्न भिन्न प्रान्तके
लोग सम्मिलित होते थे। सम्मेलनसे उनमें जातीयताके
भाव उत्पन्न हुए। सरकार जातीयताकी विरोधी थी।
कांग्रेस लगातार चिल्लाती आई है कि आय तथा व्यय
जनताके हाथमें होना चाहिए। जिस तरहकी स्थिति
कनाडामें है उसी तरहका स्वराज्य यहाँ भी माँगा जाता
है। चाहे वह मिले या न मिले, इतना ही काफी है या और
कुछ चाहिए-इन बातोंका उल्लेख यहाँ पर नहीं होगा।
बस हमको केवल यही दिखलाना है कि स्वराज्यकी तरफ
हम लोगोंका ध्यान कांग्रेसहीने खींचा। यह बात सर्वमान्य
है। इसे हम किसी तरहसे इन्कार नहीं कर सकते।
यदि हम कांग्रेसको जातीय खयालसे हानिकारक मान लेते
हैं तो हम उसका दुरुपयोग करते हैं और हम लोगोंका
काम यहीं खतम हो जाता है; क्योकि बिना उसकी
सहायताके कोई काम नहीं हो सकता।
दूसरा परिच्छेद बंग-विच्छेद पाठक-यदि आपकी बातें मान भी ली जाये तो उससे केवल इतना ही मतलब निकलता है कि कांग्रेसने स्वराज्य- की नींव डाली। पर वास्तविक जागृतिका यह कारण नहीं प्रतीत होता। वास्तविक जागृति कब हुई और इसका क्या कारण है इसको भी मैं जानना चाहता हूँ। सम्पादक-प्रकृतिका अटल नियम है कि वीज कोई नहीं देखता। बीज खेतमें बो दिया जाता है, उससे अंकुर निकलता है, वही बढ़कर पेड़ होता है, उसीको लोग देखते हैं, पर वीज तो वहीं जमीनमें सड़ जाता है। बस कांग्रेस की भी यही हालत है। पर यदि सचमुच देखा जाय तो वास्तविक जागृति "बंग-विच्छेद" के बाद हुई। प्रत्येक भारतवासीको बड़े लाट कर्जन महोदयका कृतज्ञ होना चाहिए। यह आपहीकी असीम कृपा थी कि यह दिन देखनेको मिला। उस समय लोगोंने अनेक तरहकी १४ स्वाधीन भारत प्रार्थनाएँ की, इंग्लैण्ड तक मेमोरियल भेजा गया, पर सुनता कौन है । कर्जनको तो यही विश्वास था कि भारत- वासी मार खाते जायँगे और बकते जायँगे, विशेष कर बंग-जनताकी तो उन्हें और भी परवा न थी, क्योंकि उस समय तक "हुजते बंगाला" यही प्रसिद्ध था। लोगों- की प्रार्थनाओंका अपमान करते हुए उन्होंने "बंग-विच्छेद" कर ही डाला। वास्तवमें उस दिन बंग-विच्छेद नहीं हुआ, बल्कि ब्रिटिश राज्यका भंग हुआ। • उससे ब्रिटिश राज्यको जो क्षति पहुँची उसकी पूर्ति नहीं हुई। देखिए यहाँ पर समझनेमें भूल न करिएगा। हमारे कहनेका यह तात्पर्य नहीं है कि अन्य जो जो अन्याय भारतके साथ किया गया है वह इससे साधारण है। नमक पर जो 'कर' लगाया गया, उसे क्या थोड़ा अन्याय कह सकते हैं। इन बातोंकी चर्चा तो हम आगे करेंगे। यहाँ पर बंग-विच्छेदके ही विषयमें कुछ कहना है। हाँ, पर जनता तो इसके विरोधके लिए कमर बाँध चुकी थी। लोगोंके क्रोध तथा क्षोभका कुछ ठिकाना न रहा। बंगीय जनता तो जान तथा मालकी भी परवा नहीं करने लगी। उन्हें अपनी शक्तिका भरोसा था और उसीके सहारे वे. लोग आगबबूले हो रहे थे।
बंग-विच्छेद जनता भी बढ़ थी और नौकरशाही भी अटल रही। दोनों दल भली भाँति जानते थे कि इसके क्या माने हैं; क्योंकि बंग-बिच्छेदसे नौकरशाहीका कुछ और ही मतलब था । वह तो जातीयता पर ही कुठाराघात कर रही थी। स्वराज्य के आन्दोलनकी जड़ खोद रही थी। विच्छेदको मिटाना (फिरसे जोड़ना ) स्वराज्य आन्दोलनको सींचना था ; पानीसे नहीं, बल्कि अमृतसे। इसी लिए नौकरशाहीने वंग-विच्छेदको जैसाका तैसा रखना चाहा। इसके बाद बंग-विच्छेद रद्द किया गया। पर इससे होता क्या है। परस्पर वैमनस्यका भाव तो बना रह गया। पाठक-इतना तो मैंने भी समझ लिया कि "वंग- विच्छेद" ही वास्तविक जागृतिका कारण है। पर यह तो बतलाइए कि इससे और परिणाम क्या निकले। सम्पादक इसके पहले आज तक तो हम लोगोंको यही विश्वास था कि अपना दुःखड़ा रोनेके लिये हमें राजा तक निवेदन-पत्र भेजना चाहिए। और यदि उसके यहाँ भी हमारी सुनवाई नहीं होती तो लाचार चुपचाप बैठ जाइए और मेमोरियल भेजा कीजिए। इसके सिवा और कोई वश नहीं था। परन्तु बंग-भंगने कुछ नई बातें सिखलाई।
स्वाधीन भारत पहले तो यह कि मेमोरियल बिना किसी सहायताके कोई काम नहीं कर सकता। उसका सहायक केवल एक आत्म- बल है। यदि जनता शारीरिक कष्टका ध्यान छोड़ कर आत्मबलसे काम ले तो वह बहुत कुछ काम कर सकती है। बंग-भंगके पूर्व यह बात किसीको भी नहीं ज्ञात थी। इसका पहला पहल परिचय उसी समयसे मिलता है। समाचार-पत्रोंने जी खोल कर लिखना शुरू किया। इसके पहले जनता जिन बातोंकी चर्चा करते डरती थी अब खुल्लम- खुल्ला सम्वाद-पत्रों तथा लेक्चरोंमें उनकी चर्चा होने लगी। स्वदेशी आन्दोलन जारी हुआ इसके पहले लोग अँगरेजोंके नामसे डरते थे; अब वे सब बातें जाती रहीं। अब तो उन्हें जान-मालकी भी परवा नहीं थी। उनके साथ ज्यादती भी मनमानी की गई। परिणाम यह हुआ कि अब भी भारतमाताके अनेक अमूल्य रत्न निर्वासनकी यातना सह रहे हैं। केवल मेमोरियल आदिसे यह परिणाम न निकला होता। जो जोश तथा उत्साह लोगोंमें उस समय आया वह केवल बंगाल ही तक नहीं था। उसकी हवा बड़े जोरोंसे बही और वह पश्चिममें पंजाब तथा दक्षिणमें कन्याकुमारी तक फैल गया।
वंग-विच्छेद
पाठक-आप बहुत ठीक कहते हैं। वंग-भंगसे वास्तव में
बड़ा लाभ हुआ।
सम्पादक-इसमें तो कोई शक नहीं। पर आप जानते
ही हैं कि कमलके साथ साथ कीचड़ भी रहता है। इस
लाभके साथ उसने कुछ बुराई भी पैदा की। पहले तो
हम लोगोंक नेताओं में मतभेद हो गया। नर्म तथा गर्म
दलका नाम जो आजकल आप बहुधा सुनते हैं, वह इसीका
फल है। कदाचित् आप इसके अर्थको तत्त्वतः नहीं समझ
सके होंगे, तो सुनिए। इसके कई अर्थ हैं, कोई तो एकको
डरपोक और दूसरेको निर्भय दल बतलाता है। कोई
पहलेको सरकार या नौकरशाहीका मित्र बतलाता है,
इत्यादि। मेरी समझमें इनके उचित अर्थ यही होंगे कि
एक तो गरियार वैलकी तरह चल रहा है जो "दिनभर
चले अढ़ाई कोस" और दूसरे बारह सिंहेकी तरह छलांग
मार रहे हैं कि कहीं "झाड़ीमें सींग फँसा और मरे ।" अव
परस्पर वैमनस्य भी अधिकाधिक होता जा रहा है। एक
दूसरे पर विश्वास नहीं रखता, उस पर अनेक प्रकारका
दोषारोपण करता है। सूरत कांग्रेसके समय तो इसकी
मात्रा इतनी बढ़ी थी कि वहाँ झगड़ा ही हो गया। इतना
१८
स्वाधीन भारत
तो मैं अवश्य कह सकता हूँ कि इस प्रकारके कलहों तथा
वैमनस्योंसे हानिको छोड़ देशको किसी प्रकारका लाभ
नहीं है। पर ऐसे झगड़े बहुत दिन तक रह भी नहीं
सकते। यदि दोनों तरफके नेता लोग जरा भी ध्यान दें
तो ऐसे झगड़े बहुत जल्दी निपट सकते हैं।
--
तीसरा परिच्छेद
अशान्ति तथा हलचल
पाठक-इतना तो निश्चय हो गया कि भारतमें वास्तविक
जागृति "वंग-भंग" से प्रारम्भ होती है। इससे लोगों में
जो अशान्ति फैली उसे क्या आप अच्छा समझते हैं।
सम्पादक-जब आदमी नींदसे उठता है तो वह एकदम
जागृत अवस्थामें नहीं हो जाता। उठनेके पहले वह
अँगड़ाई लता है, कुछ देर तक बेचैन रहता है और तव
सुस्ती झाड़ कर उठ बैठता है ; या यों कहिए कि खड़ा हो
जाता है। यही हालत हम लोगोंकी समझिए । 'वंग-भंग'
ने हम लोगोंकी निद्रा तो अवश्य भंग की, पर हम लोग
अभी उठ खड़े नहीं हुए। नींदकी खुमारी अब तक भी
हमारी आँखामें मौजूद है। पड़े पड़े हम लोग अंगड़ाई लेते
हुए सुस्ती झाड़ रहे हैं। इस लिए जैसे नींद खुल जाने
पर, उठनेके पहले अँगड़ाई लेने तथा सुस्ती भाड़नेके लिए
कुछ समय आवश्यक है उसी तरह मोह, आलस्य तथा
२० स्वाधीन भारत नींदके भंग हो जाने पर एकदमसे उठ खड़े होनेके पूर्व यह अशान्तिका समय आवश्यक समझा जाना चाहिए क्योकि यह अनिवार्य था। जब नींदसे हम लोग उठते हैं तो पड़े पड़े अंगड़ाई ही थोड़े लेते रहते हैं, दस पाँच मिनिटके बाद खुमारी दूर कर उठ ही जाते हैं। इसी तरह यदि वास्तवमें अशान्ति फैली है तो हम लोग उसे दूर कर खड़े ही होनेका प्रयत्न करेंगे। पाठक-क्या और भी किसी प्रकारकी अशान्ति वर्त- मान है। सम्पादक-अशान्ति नहीं, बल्कि असन्तोष है। उसी- को आप अशान्ति कह सकते हैं। इसका वास्तविक नाम असन्तोष है। राम महोदयकी कल्पना थी कि भारत- जनतामें असन्तोष फैलना स्वाभाविक है। इससे बड़े बड़े काम होते हैं। जब तक कोई मनुष्य अपनी वर्तमान स्थितिसे प्रसन्न है तथा सन्तुष्ट है तब तक उससे अन्य काम होना कठिन है। कोई बड़ा काम वह तभी कर सकता है जब वह अपनी वर्तमान स्थितिको सन्तोष जनक नहीं जब तक कपड़े प्यारे हैं तब तक मैं उन्हें फेंक नहीं सकता। जब वे दिलसे उतर जायँगे तभी उनको फेंक समझता।
अशान्ति तथा हलचल
२१
कर नये कपड़ोंकी अभिलापा होगी। मोह-निद्रामें पड़े,
राम-नामका भजन करते-"चना चवैनी गंगजल जो पुरवे
करतार, काशी कबहुँ न छोड़िये विश्वनाथ दरवार ।" "भाग्यं
फलति सर्वत्र न विद्या न च पौरुपं" इत्यादि वेदमन्त्रीको
जपते जपते हम लोगोंका जीवन उसी दशामें बीतता चला
जाता और हम लोग उसी दशाको सबसे अच्छा समझ कर
प्रसन्नता-पूर्वक उसे अपनाये रहे होते। पर हम लोगोंके
भाग्यसे हमारे भारतीय नेताओं तथा अँगरेज महात्माओंने
निवन्ध लिखलिख कर और हम लोगोंको हमारी तथा अन्य
देशोंकी स्थितिका ज्ञान करा कर हमारी आँखें खोल दीं।
हम लोग तबसे अपनी गिरी दशाको जानने लगे। उसका
ज्ञान होते ही अशान्ति फैली,अशान्तिसे हलचल मच गई।
और कितनी जानें गई, कितने जेलकी हवा खानेको भेजे
गये और कितने प्यारी मातृभूमिसे सदाके लिए वियुक्त
किये गये। पर इसका यही अन्त होनेवाला नहीं है।
कुछ दिन और यही क्रम रहेगा और यह आवश्यक भी है।
इन सबको सुधारका अंग समझिए, पर कभी कभी इनसे
बड़े बुरे परिणाम भी निकलते हैं।
चौथा परिच्छेद
स्वराज्य क्या वस्तु है
पाठक-आपकी कृपासे इतनी बातें तो हमें मालूम हो
गई कि कांग्रेसने हमें जातीयता सिखलाई और "बंग-भंग"
से हम लोगोंकी निद्रा भंग हुई और देशमें अशान्ति तथा
हलचलने डेरा जमाया। अब मैं स्वराज्यके बारेमें कुछ
जानना चाहता हूँ। कदाचित् इसमें हम लोग सहमत
न हों।
सम्पादक-बहुत कुछ सम्भव है कि इसमें आप हम
दोनों सहमत न हों। इस समय जिसे देखिए वही स्वराज्य
स्वराज्य रट रहा है। पर यह किसीने नहीं सोचा है कि
वह क्या वस्तु है। कितने तो यही कहते हैं कि नौकरशाही
अब अपना काम कर चुकी, उसे यहाँसे निकाल देना
चाहिए। पर मेरी समझमें नहीं आता कि इसका क्या
कारण है।
क्या उन्होंने इस पर पूरी तरहसे विचार
किया है। मैं यहीं पर आपसे भी एक प्रश्न पूछ लेना
स्वाराज्य क्या वस्तु है चाहता हूँ। थोड़ी देरके लिए मान लीजिए कि जो कुछ हम माँगते हैं वह मिल जाय तो क्या अँगरेजोंको यहाँ से निकाल देना जरूरी होगा। और थोड़ी देरके लिए मान लिया जाय कि वे चले भी गये तव क्या किया जायगा । पाठक-इस प्रसंगमें इसका उत्तर देना उचित न होगा उनके चले जाने पर यह बात उचित रूप से निर्धारित की जा सकती है। आपके कथनानुसार यदि वे शासनकी वागडोर छोड़कर हट गये तो हम लोग उन्हींकी शासन- पद्धतिसे काम लेंगे। हम लोगोंको सेना इत्यादि भी मिल जायगी और सारा कंटक दूर हो जायगा । सम्पादक-कदाचित् आपका यही खयाल हो। पर यहाँ पर आप हममें मतभेद है । इस विपयमें मैं वादविवाद नहीं करना चाहता। मुझे केवल आपके प्रश्नका उत्तर देना है और वह मैं आपसे कई प्रश्न पूछ कर ही कर सकता हूँ। पहले यह तो बतलाइए कि अँगरेजोंको निकाल. भगाने में आपका क्या तात्पर्य है। पाक-क्या आप नहीं देख रहे हैं कि भारतकी क्या दशा हो रही है। सालमें करोड़ों रुपया तो बाहर जाता है और हम लोग मुट्ठीभर चनेके लिए तरस रहे हैं। जिस
२४
स्वाधीन भारत
तरह हो सकता है सभी उच्चपद वे अपने हाथोंमें रक्खे हुए
हैं और मामूली नौकरियाँ उन्होंने हम लोगोंके लिए छोड़
दी हैं। गोया हम लोग 'दास' उत्पन्न हुए हैं। यह सब
उनके शासनहीका दोष है न। दूसरे उनका व्यवहार
कैसा दुष्ट होता है।
सम्पादक-थोड़ी देरके लिए मान लीजिए कि वे हम
लोगोंकी एक कौड़ी भो यहाँसे बाहर नहीं ले जाते। अच्छे
अच्छे ओहदों पर हम लोगोंको भी नियुक्त करते हैं और
भले आदमी बन जाते हैं तब तो उनके रहनेमें आपको
किसी तरहकी आपत्ति नहीं है।
पाठक-आपका यह प्रश्न तो बड़ा बेढंगा है। यदि
कोई आपसे पूछे कि यदि शेर अपनी पाशविक वृत्ति छोड़
कर सच्चरित्र हो जाय तो क्या आप उसके पास निधड़क
जा सकते हैं। ऐसे प्रश्नोंका उत्तर देना पागलपन सा है।
हाँ यदि आप यह माननेको तैयार हैं कि शेर अपनी पाशविक
वृत्ति छोड़ सकता है, तब यह मानना कोई कठिन नहीं
होगा कि अँगरेज लोग भी अपनी प्रकृति बदल देंगे। पर
अनुभव यह नहीं बतलाता और ऐसा होना भी प्रकृतिके
नियमों के विरुद्ध है।
स्वाराज्य क्या वस्तु है
२५
सम्पादक-खैर इन झगड़ोंको जाने दीजिए। अच्छा,
अब यह बतलाइए कि यदि कनाडा तथा दक्षिण अफ्रिकाके
आधारपर हम लोगोंको स्वराज्य मिल जाय तब तो सब
शिकायतें दूर हो जायेंगी।
पाठक-यह प्रश्न भी ऊपरवाले प्रश्नकी भाँति हा बेढंगा
है; क्योंकि जब हम लोगोंमें उतनी शक्ति होगी तभी वह
हमें मिलेगा। तब हम लोग स्वराज्यका झण्डा फहरावेंगे।
जो स्थिति इस समय जापानको है वही तब भारतकी होगी।
तब सब सामान हमारे पास हो जायँगे। उस समय
संसार जानेगा कि भारत भी कहीं है।
सम्पादक-आपने कल्पना तो खूब की । आपके कथनका
यह आशय हो सकता है कि अँगरेजी शासनका अनुकरण
भर हम लोग कर, पर अँगरेजोंकी बू तक यहाँ नहीं रहने दें।
शेरकी आदतें आप अपने में लाना चाहते हैं, पर उसका
संसर्ग नहीं चाहते । आप भारतको विदेशी बनाना चाहते हैं
और हिन्दुस्तान न पुकार कर उसे इङ्गलिस्तान कारना
चाहते हैं। इस तरहका स्वराज्य नहीं चाहता।
पाठक-मैंने आपके सामने अपने विचार प्रगट कर
दिये। मेरी समझमें भारतमें इसी तरहके स्वराज्यकी
पर
मैं
स्वाधीन भारत
आवश्यकता है ! यदि हम लोग प्राप्त शिक्षाका उपयोग
करना चाहते हैं, यदि मिल आदि विद्वानों के लेख किसी
महत्त्वके हैं, यदि अँगरेजी व्यवस्थापक-समाका अनुकरण
करना है तो हमारी समझमें अँगरेजोंका पूरी तरहसे
अनुकरण करना ही हमारा अभीष्ट है। हम तो उनका
अनुकरण यहाँ तक करना चाहते हैं कि जैसे वे लोग अपने
मुल्कमें किसीको जमने नहीं देते उसी तरह हम लोग भी
अपने देश में उनका अथवा अन्य किसी विदेशीका पैर
क्यों जमने दें। जो कुछ उन लोगोंने अपने देशमें किया
है और कहीं भी नहीं किया गया है। इस लिए मैं उन्हीं
की व्यवस्थाका अनुकरण श्रेयस्कर समझता हूँ। अच्छा
तो आपकी इसमें क्या राय है।
सम्पादक-जरा धीरताकी आवश्यकता है। यदि आप
धैर्यसे हमारी बातें सुनते रहेंगे तो आपका प्रश्न यों ही हल
हो जायगा। स्वराज्यका तत्त्व जानना मेरे लिए उतना ही
कठिन प्रतीत होता है जितना आप उसे सरल समझ रहे हैं।
इस लिए तब तक हम इतना ही कह कर छोड़ देंगे कि जिसे
आप स्वराज्य कह रहे हैं वह वास्तविक स्वराज्य नहीं है।
.
पाँचवाँ परिच्छेद इंग्लैंडकी स्थिति पाठक-सम्पादकजी, आपके कहनेसे तो विदित होता है कि इंग्लण्डका शासन अनुकरण करने योग्य नहीं है। सम्पादक-आपकी धारणा एकदम सही है। यदि इंग्लण्डकी वर्तमान दशा पर विचार किया जाय तो रोमाञ्च हो उठता है। मैं तो दिन-रात परमेश्वरस यही माँगता रहता हूँ कि किसी भी दशामें यह देश क्यों न रहे, विदेश के जैसी बातें इसमें नहीं आने पावें। जिस व्यवस्थापक- सभाको अभी आपने संसारके सभी व्यवस्थापक-साओंकी जन्मदात्री बतलाया है, जानते हैं उसकी वास्तविक दशा क्या है। यदि धृष्टता न हो तो उसके लिए 'खानगी' शब्द बहुत ही उपयुक्त होगा। यह शब्द है तो जरा निंद्य, पर उपयुक्त अवश्य है। उसने अपनी ओरसे आज तक एक भी प्रशंसाके योग्य काम नहीं किया है। उसकी जैसी स्थिति है उससे प्रत्यक्ष है कि वाह्य उत्तेजनाके विना वह
२८
स्वाधीन भारत
कोई काम कर ही नहीं सकती। इसको हमने 'खानगी'
इस खयालसे कहा है कि इसके स्वामी बराबर बदलते
रहते हैं (प्रधान मन्त्री ही इस सभाके स्वामी होते हैं)।
यदि आज उस पर आस्विथका अधिकार है तो कल ही
कोई दूसरे आ सकते हैं।
पाठक-आपने यह ताना मारा है। परन्तु पक्षपात
रहित होकर देखिये तो 'खानगी' शब्दका उचित प्रयोग
नहीं किया गया है। जब उसके कार्यकर्ता जनतासे
निर्वाचित किये रहते हैं तो जनताका जोर उस पर अवश्य
ही रहेगा। मेरी समझमें यही तो उसके प्रधान गुण हैं।
सम्पादक-आप गलती पर हैं। आइए इस विषय
पर जरा ध्यानसे विचार करें। जनता अपनी समझमें
योग्यसे योग्य प्रतिनिधि चुन कर भेजती है। और वे
लोग भी निःस्वार्थ भावसे बिना कुछ लिये काम करते हैं;
अर्थात् जनताका भला ही उनके लिए परम कार्य है। पढ़ी-
लिखी जनता निर्वाचनमें कदाचित् ही भूल करेगी। ऐसी
सभामें आवेदन-पत्र, प्रार्थना-पत्र, मेमोरियलकी क्या
जरूरत है। उसका काम इतना न्याय्य होना चाहिए कि
देखनेवाले दंग हो जायँ। पर अभाग्य-वश बहुधा देखनेमें
इङ्गलैण्डकी स्थिति
आता है कि इसके सदस्य स्वार्थी तथा संकुचित हृदयके
होते हैं। प्रायः सभी अपने स्वार्थकी चिन्ता रखते हैं।
केवल भविष्य-निर्वाचनका भय ही उन्हें जनताके लिए कुछ
कर देनको उत्तेजित करता है। उनकी बातोंका भी कोई
ठिकाना नहीं रहता है। जो कुछ वे लोग करते हैं उसे
जरासी ही वात पर रद्द कर दे सकते हैं। कोई भी काम
उन लोगोंका ऐसा नहीं है जो चिरस्थायी समझा जा सकता
है। कभी कभी तो ऐसा भी देखनेमें आया है कि सभामें
एक ओर तो किसी भारी विपय पर जोरोंमें वहस चल
रही है और दूसरी तरफ सभासद लोग पैर फैलाये कुर्सी
ही पर खुर्राटे ले रहे हैं (प्रधान-मन्त्री लार्ड नार्थ )। कभी
एक सभासद व्याख्यान दे रहा है और बाकीके लोग अपने
गप्प लड़ानेमें भिड़े हैं। उनको उसका ध्यान ही नहीं है ।
कार्लाइलने उसका नाम "चण्डूखाना" रक्खा था। यही
कारण है जो वे बिना सोचे-समझे अपनी राय दे बैठते हैं।
देखनेवालेको विदित हो जाता है कि मानो भेड़िया-धसान
है। दलबन्दीका तो वहाँ कहना ही क्या है। हाँ, सभाके
आचार-विचार तथा नियमोंका परिपालन भली भाँति
होता है। यदि कोई सभासद दलसे पृथक् होकर अपनी
2U
स्वाधीन भारत
स्वतन्त्र संमति प्रकट करता है तो लोग उसे बनाते हैं।
इसकी अपेक्षा यदि वही द्रव्य तथा समय कुछ थोड़े शिक्षित
समाजको दे दिया जाय और शासन-भार उनके सिर पर
रख दिया जाय तो इंग्लैण्डकी अपरिमित उन्नति हो सकती
है। यदि वास्तवमें पूछिए तो व्यवस्थापक-सभा एक
तरहका खिलौना है, जिसको उन लोगोंने विशेष धन लगा
कर बनवाया है। यह सुन कर आपको आश्चर्य होता
होगा, पर यह मेरी ही राय नहीं है-अनेक शिक्षित अँगरेजोंने
भी यही बात कही है। अभी थोड़े ही दिन हुए उसी
सभाके किसी सदस्यने कहा था कि जिस मनुष्य को ईसाई
धर्मका जरा भी खयाल है वह इसका सदस्य कदापि नहीं
होगा। दूसरेने कहा था कि अभी तो यह निरा बच्चा
है। यदि उसीका कहना सच है तो भी इससे क्या
आशा की जा सकती है।
जब सात-सौ वर्ष में भी इसका
लड़कपन न गया तो भला यह युवावस्था कब प्राप्त करेगी।
पाठक-आपने तो मुझे चिन्तामें डाल दिया। पर मैं
आपको सभी बातें माननेको तैयार नहीं हूँ। आपने तो
एक दमसे अचम्भेकी बात कह डाली। अच्छा, पहले
'खानगी' शब्दकी व्याख्या कर दीजिए।
इङ्गलैण्डकी स्थिति
सम्पादक-मैं भी मानता हूँ कि आप मेरी बातांसे
एकदम सहमत नहीं हो सकते। यदि इस विषयका
साहित्य पढ़नका आप प्रयास करेंगे तो आपको सब बातें
विदित हो जायेंगी। इस सभाका कोई भी योग्य स्वामी
नहीं है। प्रधानमन्त्रीके अधीन इसकी गति अनवस्थित
रहती है। बल्कि खानगीकी भाँति उसे इधरसे उधर और
उधरसे इधर लुढ़कना पड़ता है। प्रधान मन्त्री सभाली
उन्नतिका उतना अधिक ध्यान नहीं रखता, जितना अपने
स्वत्व तथा अधिकारको रक्षाका ध्यान रखता है। उसका
सारा प्रयत्न अपने दलकी सफलतामें लगता है। सदा न्याय
करनेका भी ध्यान उसे नहीं रहता। कितने प्रधान-मंत्रियोंने
केवल अपनी दलबन्दीके खयालसे न्यायका गला घोंटकर
कितने अनुचित कार्य इसके द्वारा किये हैं, इन सब बातोंका
खयाल रख कर मनन करना चाहिए।
पाठक-आप तो उसीकी निन्दा करने लगे जिसे अव
तक हम लोगोंने सबसे अधिक देशभक्त तथा न्यायी मान
रखा था।
सम्पादक-ठीक है, मैं प्रधान मन्त्रीके विरोधमें कुछ भी
नहीं कहता, पर उनके सम्बन्धमें जो कुछ देखने तथा
३२
स्वाधीन भारत
सुननेमें आता है उससे स्पष्ट है कि वे सच्चे देशभक्त नहीं
कहे जा सकते। हाँ केवल एक दोष उनमें नहीं है। अर्थात्
वे लोग घूस नहीं लेते। पर इससे क्या, केवल इसीसे वे
देशभक्त अथवा ईमानदार नहीं कहे जा सकते ! क्योंकि
और भी कई बातें हैं जिनसे इस बातकी परीक्षा होती है
और उनमें इनकी त्रुटि है। आप तो चूस नहीं लेते, पर
अपना काम निकालनेके लिए अन्य कर्मचारियोंको कमसे
कम उपाधिकी धूस तो अवश्य देते हैं। मैं तो दृढ़ता-पूर्वक
कह सकता हूँ कि न तो उनमें ईमानदारीका लेश है और न
आत्मबल ही है।
पाठक-पार्लमेन्टकी बातें जो आपने कहीं उससे हमें
विलायतके निवासियोंके ऊपर भी सन्देह होने लगा है।
यदि कृपया आप उनके रहन सहन और चालढालके बारेमें
भी
कुछ
बताते तो मैं उनकी शासन-पद्धतिका कुछ अनुमान
कर सकता।
सम्पादक-वहाँकी जनता सम्वाद-पत्रों पर अधिक
भरोसा रखती है, वही उनके पूज्य देवता हैं। सब बातोंका
'पता उन्हें उन्हींसे मिलता है, इससे उन पर सच्ची बातें
जल्दी प्रकट ही नहीं होती, क्योंकि संवाद-पत्र प्रायः झूठी
इंग्लैण्डकी स्थिति ३३ वातें लिखा करते हैं। एक ही बातको प्रत्येक सम्वाद-पत्र अपने अपने ढंगसे लिखेंगे अर्थात् जिस दलके सदस्यसे वह पत्र सम्पादित किया जाता होगा, उसी दलके विचार तथा मतानुसार उस सम्बादका खण्डन अथवा मण्डन किया जायगा। एक ही व्यक्तिको कोई सत्य-मूर्ति बतलायेगा और कोई वेईमानोंका दादा कहेगा । तव आप स्वयं समम सकते हैं कि जिन लोगोंके सम्वाद-पत्रोंकी यह गति है उनकी दशा ही क्या होगी। पाठक-कृपा कर उसका भी संक्षेपमें वर्णन कर जाइए। सम्पादक-इनकी राय स्थिर नहीं रहती है। क्षण क्षण पर उसमें परिवर्तन होता रहता है। प्रकट रूपमें भी दिख- लाया जाता है कि कमसे कम सातवें वर्ष तो इनकी रायमें परिवर्तन अवश्य होता है। घड़ीके लटकनकी तरह यह इधरसे उधर घूमा करती है ; कभी भी स्थिर नहीं रहती। जनता प्रायः उसीका साथ देती है जो जोशीली स्पीचसे उसे सुग्ध कर ले, अथवा दावत इत्यादिसे उसे वशमें कर ले। जब जनताकी यह दशा है तो पार्लमेण्टकी भी वही दशा होगी। हाँ, एक गुण उनमें अवश्य है जिसकी मुक्तकण्ठसे प्रशंसा की जा सकती है। अपने देशकी रक्षाके लिए वे .
४
स्वाधीन भारत
जान-माल सभी त्यागनेको तैयार रहते हैं। यदि कोई भी
उसका अकल्याण चाहता है तो वे उसको निर्मूल कर देने-
हीका प्रयत्न करते हैं। पर इसीमें समग्र गुणोंका अन्त नहीं
है और केवल इसीके कारण उनका अनुकरण करना भी
उचित नहीं है। कमसे कम मुझे तो पक्का विश्वास है कि
यदि भारत विलायतका अनुकरण करना चाहता है तो
उसके नाशके दिन दूर नहीं समझना चाहिए ।
पाठक तो क्या मैं यह जान सकता हूँ कि वहाँकी ऐसी
दशा क्यों है ?
सम्पादक:-इसमें जनता निर्दोष है। आधुनिक सभ्यता
के कारण ये सब बातें देखनेमें आ रही हैं। आधुनिक
सभ्यताको वास्तविक सभ्यता कहना सर्वथा सभ्यताकी हँसी
उड़ाना है। इसीकी हवासे यूरोपके देश प्रति दिन अध.
पतनको चले जा रहे हैं।
छठा अध्याय
सभ्यता
पाठक-आधुनिक सभ्यता पर जो आप दोष लगाते हैं
मैं जान लेना चाहता हूँ कि तब आप सभ्यताका क्या अर्थ
करते हैं।
सम्पादक-यह केवल मेरा ही मत नहीं है, बल्कि अनेक
अँगरेज भी आधुनिक सभ्यताको वास्तविक सभ्यता नहीं
बतलाते। इस विषय पर अनेक पुस्तकें लिखी गई हैं।
सभ्यताके नाम पर समाजमें प्रचलित बुराइयोंको रोकनेके
लिए सभा-सोसाइटियाँ स्थापित की गई हैं। किसी अँगरेज
ने इस विपय पर एक पुस्तक लिखी है। उसका नाम उसने
"सभ्यता और उसके साधनके उपाय रक्खा है।" उसमें
उसने दिखलाया है कि आधुनिक सभ्यता केवल एक प्रकार
का रोग है।
पाठक-पर यह बात तो सबको विदित नहीं है।
स्वाधीन भारत सम्पादक-इसका तो साधारण जवाब यह है कि हम लोग इस विषय पर आपसमें बातचीत नहीं करते। जो लोग आधुनिक सभ्यता पर मुग्ध हैं वे इसके प्रतिकूल अपनी आवाज उठा ही नहीं सकते। वे सदा उसकी पुष्टिका ही प्रयत्न करेंगे; क्योंकि भूलसे अथवा प्रमादसे वे इसीको वास्तविक सभ्यता समझ बैठे हैं। जैसे सोते हुए मनुष्य- को स्वप्नावस्थामें स्वप्नकी सब बातें यथार्थ प्रतीत होती हैं और जागृत होने पर उसका भ्रम दूर होता है आधुनिक सभ्यतामें विश्वास करनेवालेकी भी यही दशा है। सभ्यता के संबंधकी जितनी पुस्तकें हम लोग पढ़ते हैं वे प्रायः उन्हीं लोगोंकी लिखी रहती हैं जो आधुनिक सभ्यताके पक्षपाती हैं। उनमें बड़े बड़े विद्वान् भी हैं और उनके लेख हम लोगोंको मुग्ध कर देते हैं। पाठक-यह तो एक विचित्र वात जान पड़ती है। इस विषय पर आप अपना मत भी बतलाइए। सम्पादक-पहले यही देखना चाहिए कि 'सभ्यता' से किस स्थितिका' बोध होता है। वास्तविक सभ्यता वही है जिसमें मनुष्य शरीर-साधनको ही जीवनका मुख्य उद्देश्य मानते हैं। उदाहरणके लिए-यूरोपवाले सौ वर्ष पहलेके
सभ्यता
वनिस्वत आज कितने अच्छे बने हुए तथा स्वच्छ मकानों में
रहते हैं। यह सभ्यताकी एक निशानी है और इससे
शारीरिक सुख मिलता है। किसी समय ये लोग चमड़ा
पहनते थे और उनके स्थान पर तलवार घाँधते थे। वे
ही लोग अब विविध भाँतिके सुन्दर मुन्दर वस्रोंसे अपने
शरीरको भूपित करते हैं और भालों तथा बों के स्थान
पर अब तमञ्चे लेकर चलते हैं। इतना ही नहीं अव
चारों ओर यही हवा फैल गई है। जिस देशमें अधिक
वस्त्र धारण करनेका रिवाज नहीं था और यदि वहाँ के लोग
भी इन्हीं यूरोपवालोंकी तरह अपने शरीरको अधिक
कपड़ोंसे लाद लें तो वे भी असम्यसे सभ्य कहलाने लगते
हैं। किसी समय यूरोपमें हल-बैलसे खेती होती थी, पर
इस समय वाष्पकी शक्ति द्वारा उसका चौगुना या पचगुना
काम हो सकता है। यह भी सभ्यताके लक्षण हैं। पहले
गिने-गिनाये लोग पुस्तकें लिखते थे और वे अतीव उपयोगी
होती थीं, अब कोई भी मनुष्य मनमानी पुस्तक लिख कर
छपवा सकता है और लोगोंके पवित्र मनको कलुपित कर
देता है। पहले लोग छकड़ोंमें बैठ कर यात्रा करते थे, पर
अब तो लोग आस्मानमें चिड़ियोंकी भाँति उड़ने लगे हैं।
.
३८
स्वाधीन भारत
इसे सभ्यताका शिखर कहते हैं। कहा जाता है कि अब
थोड़े ही दिनों में कपड़े पहनने के लिए भी यन्त्र बना दिये
जाएँगे। मनुष्यको इसके लिए भी हाथ-पैर नहीं हिलाना-
डुलाना पड़ेगा। बस बटन दवाया कि कपड़े आपसे श्राप
पास आ गये। उनके दैनिक जीवनकी सारी सामग्री वस
कलों द्वारा आ जाया करेगी। युद्धहीको देखिए, लड़नेके
पूर्व लोग अपनी ताकत तथा सैन्यवलको आजमा लिया
करते थे, पर अब उसकी आवश्यकता ही न रही। कहीं
पहाड़ पर एक मशीनगन लगा दीजिए और अकेला एक
आदमी हजारों की जाने लनेके लिए काफी है। पहले लोग
खुले मैदानमें-जहाँ स्वच्छ हवा मिलती हो-अपनी
इच्छानुसार काम करते थे, पर आजकल सहस्रों कुली एक
कारखानेमें ठूस दिये जाते हैं, जहाँ उन्हें जान जोखममें
डाल कर काम करना पड़ता है और उससे लाभ केवल
कारखानोंके मालिक करोड़पतियोंको होता है। उनकी
दशा पशुओंसे भी बदतर है। पहले दासताकी प्रथा थी
और लोग शक्तिके बलसे दास बना लिये जाते थे, पर अब
लोग रुपये के जोरसे तथा तज्जनित आरामके लिए दासता
अब ऐसी ऐसी बीमारियाँ सुनाई देती
ग्रहण करते हैं।
सभ्यता
हैं जिनका स्वप्नमें भी अनुमान नहीं किया गया था। आज
उन्हींके उपायोंके निकालनेमें सहस्रों डाक्टर लगे हैं। अब
इससे बढ़ कर सभ्यताका क्या नमूना हो सकता है । पहले
समयमें सम्वाद भेजनेमें कितनी कठिनाई तथा व्यय उठाना
पड़ता था, पर अब तो दो पैसे खर्च कीजिए और घर बैठे
जिसके पास जो चाहे लिख भेजिए। पहले घरमें बना
हुआ पदार्थ दो या तीन बार भोजनके लिए मिलता था, पर
अब तो लोगोंको प्रत्येक दो घण्टेके बादकुछ न कुछ खानेको
चाहिए, जिससे अब उन्हें दूसरे कामोंके लिए समय ही
नहीं मिलता। इस विषय पर लिखी हुई सैकड़ों ही
'पुस्तकें भी हैं। ये सब सभ्यताके दृष्टान्त हैं और यदि
कोई इनका विरोध करे तो वह मूर्ख समझा जाता है ।
इस सभ्यतासे सदाचार तथा धार्मिक बातोंसे कोई सम्बन्ध
नहीं। धर्मको तो वे लोग ढोंग समझने लगे हैं और उसका
कारण अंध-विश्वास बताते हैं। कितने तो झूठे धार्मिक
बन सदाचारकी शिक्षाके बहाने दुराचार सिखाते हैं। ऊपर
जितनी बातें बतलाई गई हैं उनमें सदाचारका तो नामो-
निशान नहीं हैं-वे केवल शारीरिक साधनके प्रयत्न है, पर
उसमें भी सफलता नहीं है।
४० स्वाधीन भारत इसे भ्रष्टता कहते हैं और यूरोपवालोंके दिमागमें इसकी गन्ध इस प्रकार समा गई है कि इसके पीछे वे मतवाले हो रहे हैं। न तो उनमें शारीरिक बल है न साहस। वे केवल नशेके सहारे अपनी शक्तिको स्थिर रखते हैं। एकान्त- वास उन्हें दुःखरूप जान पड़ता है। गृहोंकी मर्यादा स्त्रियाँ रास्तोंमें भटकती फिरती हैं या कारखानों में कुलीका काम करती हैं। पेटके लिए केवल इंग्लैंडमें करीब पाँच लाख स्त्रियाँ किस विपत्तिकी दशामें कारखानों अथवा अन्य स्थानों में काम कर रही हैं। इसी कारण स्त्रियोके अधिकार के लिए वहाँ इतना भारी आन्दोलन उठ रहा है। पर इसको रोकनेके लिए प्रयत्न करना भी व्यर्थ है। केवल चुपचाप इसको देखते चलिए, इसका क्षय आपसे आप हो जायगा। मुसलमानी धमके अनुसार इसे शैतानोंका युग और हिन्दू धर्मानुसार इसे कलियुग कहना चाहिए । इसका पूरा परिचय तो मैं दे नहीं सकता। अँगरेजोंके जीवनको यह नष्ट कर रहा है। पार्लमेण्टको दासताका प्रत्यक्ष उदाहरण समझना चाहिए। इन बातों पर पूर्ण रूपसे विचार करने पर अँगरेजोंसे सहानुभूति होने लगती है। वे बड़े चतुर हैं, इस कारण किसी न किसी
सभ्यता
दिन इस बुराईको अवश्य अपनेमसे निकाल बाहर कर
देंगे। क्योंकि उत्साही तथा परिश्रमी होने के कारण उनके
विचारों में दिन दिन परिवर्तन होता है। उनका हृदय भी
अच्छा है। इस आधुनिक सभ्यताका लोप अवश्य होगा,
पर इस समय तो यह यूरोपको ये तरह दबोचे हुए है।
स्वाधीन भारत इस विपयकी जमेगा। जो लोग भारतकी हृदयसे भलाई चाहते हैं उन्हें इन प्रश्नों पर आदिसे अन्त तक विचार करना होगा। यदि अधिक भोजन किया जायगा नो अपचेकी सम्भावना रहेगी ही, फिर पानीको क्यों दोप दिया जाय। सजा तथा चतुर वैद्य वही है जो किसी बीमारीका वास्तविक कारण निकालनेका प्रयत्न करता है। यदि कोई भी भारतका सच्चा हितैषी है तो उसे इन बुराइयोंको तत्त्वतः देखना चाहिए। पाठक-आपका कहना ठीक है। इस चर्चाको समाप्त कीजिए। इस विषयमें आपका पूर्ण- रूपसे मत जानना चाहता हूँ। इस समय हम लोगोंने एक गहन विषय उठा लिया है। मैं आपकी वातोंको अक्षरशः समझनेका प्रयत्न करूँगा और जहाँ कहीं समझमें नहीं आवेगा पुनः आपसे पूढूंगा। सम्पादक–पर आगे बढ़े कि मतभेद प्रारम्भ हुआ। पर कोई चिन्ताकी बात नहीं, केवल आपके टोंकने पर मैं बहस करूँगा। इतना तो निश्चय है कि हमी लोगोंके उत्साह दिलानेसे अँगरेजोंने भारत में पैर जमाया। फिर क्या था, राजा लोग पारस्परिक युद्धमें कम्पनी वहादुरकी मैं
भारतका सत्यानाश क्यों
हुमा
४५
बेरोक-टोक सहायता लेने लगे। कम्पनी व्यवसाय तथा
युद्ध दोनोंमें निपुण थी। सदाचार और नीतिका तो उसे
कोई विचार नहीं था। उसका मन्तव्य केवल व्यवसाय
चढ़ाकर रुपया कमाना था । हम लोगोंसे सहायता
पा-पा कर उसने अपने कारखाने और भी बढ़ाये। उनकी
रक्षाके लिए उसने सैन्यबल भी रक्खा, जिसका उपयोग हम
लोग भी यथा-समय करते थे। यह सब हम लोगोंकी
करनीका फल है। इसके लिए अँगरेजीको या और किसी
को दोप देना व्यर्थ है। हिन्दू-मुसलमानोंमें घोर वैमनस्य
था। इससे भी कम्पनीको अवसर मिलता गया। और
इन्हीं अवसरोंसे लाभ उठा कर कम्पनीने भारत पर अपना
सिक्का जमाया। कहना तो यह चाहिए कि हम लोगोंने
भारतको कम्पनीके हाथमें सौंप दिया ।
पाठक-अब थोड़ा यह भी बतलाइए कि भारत अभी
तक उनके हाथमें कैसे है।
सम्पादक-जिन कारणोंसे भारत उनके फन्देमें फंसा
उन्हींके कारण अब तक वह उनके अधिकारमें पड़ा है।
कुछ अँगरेजोंका मत है कि भारत पर बलात् अधिकार किया
गया है और शस्त्र-शक्तिकी बदौलत उस पर अब तक उनका
स्वाधीन भारत
अधिकार बना हुआ है। पर यह भावना सर्वथा गलत है ।
भारत पर तलवारके बल कभी भी अधिकार नहीं किया जा
सकता। उनको स्वयं हम लोग रक्खे हुए हैं। नेपोलियन
ने अँगरेजोंको दूकानदारकी उपमा दी थी। और यदि
वास्तवमें देखा जाय तो यह सच भी है। जहाँ कहीं ये गये,
केवल व्यवसायके खयालसे गये। सैन्यवल आदि भी
व्यवसायकी रक्षाके लिए ही रक्खा जाता है। टान्सवाल
में व्यवसायकी सुविधा तथा लाभ न देखकर प्रधानमन्त्री
मि० ग्लैडस्टनने उस पर अधिकार जमाना निःस्वत्व
बतलाया था। पर जव वहाँ भी व्यवसायसे लाभ होने
लगा तो विरोध खड़ा हो गया और युद्ध आरम्भ हो गया।
अब मि० चॅम्बरलेंन मुँह खोल कर कहने लगे कि इङ्गलैण्ड
का ट्रान्सवाल पर पुराना आधिपत्य है। कहावत है कि
एक समय किसी ने कर्जन महोदयसे पूछा था कि चन्द्रमामें
सुवर्ण है या नहीं। उन्होंने उत्तर दिया 'नहीं। उसने पुनः
पूछा-यह आप कैसे जानते हैं।
उत्तर मिला-यदि
इसकी जरा भी सम्भावना होती तो अँगरेज लोग बिना उस
पर अधिकारकिये न रहते। कितनी समस्याएँ केवल इतने
से हल हो जाती हैं कि रुपया ही उनका आराध्य देव है।
भारतका सत्यानाश क्यों
हुधा
?
२७
इससे सिद्ध होता है कि केवल स्वार्थसे हम लोग अँगरेजोंको
भारतमें टिकाये हुए हैं। उनके माल हमें पसन्द हैं, तरह
तरहकी फैन्सी वस्तुओंसेहमें ललचा कर वे लोग मनमाना
लाभ उठाते हैं। यदि ये बातें स्वीकार कर ली जाय तो
स्पष्ट है कि अँगरेज लोग यहाँ केवल व्यवसायके अभिप्रायसे
आये और इसी लिए टिके भी हैं और हम लोग लगातार
उनको सहायता करते जा रहे हैं। नहीं तो शस्त्रसे ही वे
लोग अब तक न अड़े रह जाते । जापानमें जापानी भण्डा
न फहरा कर अँगरेजी मण्डा फहरा रहा है। उन लोगोंने
जापानियोंसे व्यवसायिक सन्धि कर रक्खी है और वे
वहाँ भी अपने व्यवसायको फैलानेकी ताकमें लगे रहते
हैं। संसार भरके हाटोंमें वे अपना ही माल देखना चाहते
हैं। पर वे ऐसा कर नहीं पाते। इसमें भी उनका दोप
नहीं है। अपनी प्रयोजन-सिद्धिके लिए वे कोई भी काम
कर सकते हैं।
-
आठवाँ अध्याय
भारतकी स्थिति
पाठक यह बात तो अब दिलमें ठीक जम गई कि
भारत पर विदेशियोंका अधिकार केवल हमी लोगोंके कारण
है। अब मैं कुछ भारतकी स्थितिके सम्बन्धमें भी जानना
चाहता हूँ।
सम्पादक-इस समय देशकी स्थिति बड़ी ही खराब हो
रही है। उसकी हीन दशाका स्मरण करते हुए आँखोंमें
आँसू आ जाते हैं और गला सँध जाता है। मेरी समझमें
उसकी जो स्थिति है, कदाचित् उसका सविस्तर वर्णन भी
मैं नहीं कर सकूँगा। मेरी भावना तो यह है कि आधुनिक
सभ्यतासे भारतकी जितनी क्षति हो रही है उतनी अँगरेजों
की स्थितिसे नहीं हो रही है। उस पर इसका इतना अधिक
भार है कि वह दम तक नहीं ले सकता ।
बचानेका समय है, पर इस ओर बिलकुल ध्यान नहीं दिया
अब भी उसके
भारतकी स्थिति
जाता है। दिन प्रति दिन कठिनाई बढ़ती जा रही है।
भारतीयोंको धर्म अतीव प्यारा है, पर दुःख है कि हम लोग
प्रति दिन अधर्मी हुए चले जा रहे हैं। मेरा अभिप्राय
किसी धर्म-विशेपसे नहीं है, बल्कि मेरे कहनेका यह तात्पर्य
है कि हम लोग ईश्वरसे ही मुख मोड़े जा रहे हैं।
पाठक यह कैसे ?
न्यम्पादक हम लोगों पर दोष लगाया जाता है कि हम
लोग आलसी हैं और यूरोपवाले मिहनती तथा उत्साही हैं।
हम लोगोंने इसे सत्य भी मान लिया है। इस लिए हम
लोग इस हालतसे अपनी इस दशाको बदलना चाहते हैं।
सनातन-धर्म, इस्लाम तथा ईसाई-धर्म प्रायः सभी यही
शिक्षा देते हैं कि मनुष्यको सांसारिक विपयोंकी तरफ कम
मुकना चाहिए और धार्मिक विपयोंकी तरफ अधिक ।
पाठक-अर्थात् आपके कहनेका यह मतलब है कि हम
लोगोंमें धर्म-तृष्णा अधिक आ जानी चाहिए। इसी
तरहकी बातें बनाकर कितनोंने लोगोंका सर्वस्व हर लिया है।
सम्पादक-यह धर्म पर वरा आक्षेप है। सभी धर्मों में
चालबाज होते हैं। दिया के तले ही अन्धेरा होता है।
पर सांसारिक विपयोंमें जितनी चालवाजी होती है धार्मिक
स्वाधीन भारत
विषयमें उससे कहीं कम ही होती है। जो चालें सांसा-
रिक कामोंमें चली जाती हैं धर्ममें उनका नाम भी नहीं
सुननेमें आवेगा।
पाठक-यह आप कैसे कह सकते हैं। धर्महीके नाम
पर हिन्दू और मुसलमान प्रति दिन लड़ा करते हैं। उसीके
नाम पर ईसाइयोंमें घमासान लड़ाई हुई थी। हजारों
बे-गुनाहोंकी जानें गई थीं। कितने लोग धर्मके नाम पर
जिन्दे जला दिये गये थे। यह कैसी सभ्यता है !
सम्पादक-पर मेरी समझमें तो ये बातें 'सभ्यताकी'
कठोरतासे कहीं सरल हैं; क्योंकि यद्यपि इनके माथे पर
धर्मका टीका लगा है, पर धर्मसे इनसे कोई सम्बन्ध नहीं है ।
और इनका रहना तभी तक सम्भव है जब तक हम लोगों में
शिक्षाका प्रचार नहीं होता। पर सभ्यताका विष तो फैलता
ही जायगा। इसकी शीतलताके धोखेमें पड़ कर लाखों
इसके शिकार बनते हैं। उनका धर्म-कर्म भी नष्ट हो जाता
है और संसारमें उन्हें शान्ति नहीं मिलती। यह सभ्यता
बिलकुल चूहेके जैसी है जो देखनेमें सीधा-सादा और अच्छा
मालूम पड़ता है, पर वस्तुओंको काट कर बड़ी क्षति पहुँ-
चाता है। जिस समय इसके अस्तित्वको जान लोगे,
भारतकी स्थिति उस समय विदित होगा कि धार्मिक विश्वाससे इसके बनिस्वत कितनी कम क्षति होती है। पाठक-आपके कथनसे तो विदित होता है कि विलायत- की छाया हम लोगों पर व्यर्थका वोमा है। सम्पादक-उससे कोई लाभ हम लोगोंको नहीं हुआ है। कहीं भी शान्तिके चिन्ह नहीं दिखलाई देते । पाठक-कदाचित् आपको स्मरण नहीं है कि ठगों, कोल-भीलों तथा पिण्डारियोंने इस देशको किस तरह सता रक्खा था। सम्पादक-पर यदि आप विचार कर देखें तो आपको विदित होगा कि उनसे कोई विशेष कष्ट नहीं थे। यदि इनका अत्याचार अति श्रीपण रहा होता तो अँगरेजोंके आनेके पूर्व ही भारत गारद हो गया होता। यह वर्तमान शान्ति भी चिरस्थायी नहीं है। इसने हम लोगोंको बुजदिल और नामर्द बना दिया है। अंगरेजोंने भी कोई भील-पिण्डारियोंकी प्रकृति नहीं बदल दी है। मेरी तो यही धारणा है कि इस तरह दूसरोंकी शरणमें रह कर बुजदिल बने रहनेसे तो पिण्डारियोंका अत्याचार सहना ही अच्छा था। स्त्रियोंकी भाँति घरमें छिप कर सुरक्षित रहनेके કર स्वाधीन भारत बनिस्बत भीलोंका सामना कर मर जाना ही अच्छा है। जब तक अँगरेजोंकी छाया इस अभागी भारत-भूमि पर नहीं पड़ी थी यह वीर-प्रसविनी कहलाती थी। वीरोंसे भरी थी। भारतवासियोंको बुजदिल कह कर मेकालेने घोर अज्ञानताका परिचय दिया था। हम लोग कभी वुजदिल थे ही नहीं। जंगली तथा पहाड़ी हिंसक पशुओंसे भरे देशमें कायर लोग कितने दिन तक अपनी रक्षा कर सकते थे। क्या कभी आपने किसानोंकी झोपड़ीकी सैर की है। जिस निर्भीकताके साथ हमारे किसान अपने खेतोंमें आज भी सोते हैं, आप देख कर चकित हो जायेंगे, और अँगरेज या उनके बड़े भी उस तरह सोनेका साहस नहीं करेंगे। शक्ति किसे कहते हैं। मांस तथा मज्जासे लदे हुए शरीर- वाला शक्तिशाली नहीं कहलाता। भय-रहित होना ही शक्तिके प्रधान लक्षण हैं। कमसे कम स्वराज्यवादियोंसे एक बात कहना है। आप भारतके लिए स्वराज्य चाहते हैं। ये कोल, भील, आसामी तथा पिण्डारी भी भारतके अंग हैं। इनको ठीक कर सीधे मार्ग पर लाना भी हमी लोगोंका काम है। जब भाई-बिरादरोंका ही डर है तो स्वराज्य लेकर क्या होगा।
नवाँ अध्याय
भारतकी स्थिति-रेल
पाठक-भारतमें शान्तिका जो मैं स्वप्न देख रहा था
उसे तो आपने भंग कर दिया।
सम्पादक-अभी तो मैंन केवल धार्मिक प्रसंगकी चर्चा
की है। यदि मैं भारतकी दरिद्रताका दिग्दर्शन कराने लगूं
तो आप मुझसे घृणा करने लग जायेंगे। क्योंकि जिन
बातोंको हम लोगोंने भारतकी भलाई के लिए समझ रक्खा
था, वह एकदम विपरीत निकला।
पाठक वह क्या चीज है।
सम्पादक-रेल, तथा डाक्टरोंने भारतको लूट कर
कङ्गाल बना दिया है, इन साने यहाँ तक खसोटना आरम्भ
किया है कि यदि हम लोग समय रहते सँभल न जायँगे तो
मिट्टी में मिल जायेंगे।
पाठक-सन्देह है कि हममें तथा आपमें यहाँसे मतभेद
आरंभ होगा। जिन बातोसे हम लोगोंको अगणित लाम
हुआ है उन्हींकी आप निन्दा कर रहे हैं।
स्वाधीन भारत
सम्पादक-जरा एकाग्र-चित्त होकर सोचिए। सभ्यता-
की बुराइयाँ कठिनतासे समझमें आवेंगी। रोगी मर रहा
है, जीने की आशा नहीं है, पर डाक्टर साहब आशा देते
चले जा रहे हैं। क्षयरोगकी झलक सहसा नहीं दीख
पड़ती। किसी किसी हालतमें तो बीमारी बढ़ते रहने पर
भी रोगीकी अवस्था देखनेमें अच्छी विदित होती है।
रोगीका चेहरा दमकने लगता है, जिससे लोगोंको विश्वास
हो जाता है कि उसकी दशा उत्तरोत्तर अच्छी हो रही है।
यही दशा आधुनिक सभ्यताकी है। जानते हैं हमें कितना
होशियार होकर रहना है।
पाठक-पहले यह बतलाइए कि रेलोंसे हम लोगोंको
क्या हानि पहुँची है।
सम्पादक-इतना तो आप अवश्य स्वीकार करेंगे कि
यदि रेलें न होती तो अँगरेजोंका पञ्जा भारत पर इतना
चपक कर नहीं बैठ सकता था। प्लेगके फैलनेका एक
मात्र कारण रेलें हैं। यदि रेलें न होती तो सर्व-साधारण
का स्थानान्तर इतना सहजमें न होता। इसीके द्वारा प्लेग
के कीड़े फैलते हैं। प्राचीन समयमें असामयिक मृत्यु
नहीं होती थी। रेलोंके समयसे ही अकाल इतना अधिक
भारतकी स्थिति रेले
होने लगा है। स्थानान्तरकी सुविधा होनेसे लोग अपना
सारा गल्ला वेच देते हैं और वह जाते जाते खूब मँहगा हो
जाता है। लोग लापरवाह भी हो जाते हैं। यही अकालके
अधिकताका कारण है । तीर्थस्थानोंकी भी दुर्गति हो रही
है। पहले यात्रा करनेमें अनेक प्रकार की कठिनाइयों का
सामना करना पड़ता था। इस लिए सच्चे धार्मिक ही वहाँ
तक जानेका साहस करते थे। पर अव तो तीर्थक्षेत्र भी
बदमाशोंके अड्डे हो रहे हैं।
पाठक-आपने पक्षपातसे एक-तर्फी डिग्री दी है। इन
स्थानों पर अच्छे बुरे सभी जा सकते हैं। तो फिर अच्छे
ही लोग रेलोंका लाभ क्यों नहीं उठाते।
सम्पादक-धर्मकी गति मन्द है। इस कारण रेलें
उसके लिए लाभकारी नहीं हो सकती। धार्मिक लोग
स्वार्थी नहीं होते, अतः उनमें उतावलापन भी नहीं होता।
वे समझते हैं कि धर्मभाव फैलानेमें समय लगता है।
पापके पर होते हैं। वह उड़ कर फैलनेवाला है। मकान
चनाने में समय लगता है। पर उसका बिगाड़ना सहज है।
इसी तरह रेलोंसे बुराई विशेष फैल सकती है। अकालका
मुख्य कारण रेले हैं या नहीं इस पर विचार किया जा
५६ स्वाधीन भारत सकता है, पर यह तो निस्संदेह और सर्व-सम्मत है कि रेलोंसे हमारे देशमें बड़ी बुराइयाँ फैली हैं । पाठक-आपकी सभी बातें ठीक मान ली जाये तो भी रेलोंसे इतना अधिक लाभ हुआ है कि वह बुराईके पलड़ेको दबा देता है। भारतमें जातीयताके भावोंकी जागृति रेलों द्वारा ही हुई है। सम्पादक-यह भी भ्रम है। अँगरेजी शिक्षाने हम लोगोंकों वहकाया है कि हम लोगों में जातीयता नहीं थी और उसके भावोंको आनेके लिए अभी सैकड़ों वर्षों की आवश्यकता है। इसके लिए कोई प्रमाण नहीं है कि हममें पहले जातीय भाव नहीं थे। अँगरेजोंके चरण- स्पर्शके पहले भी इस देशमें एक जातीयता थी। एक ही भावसे हम सब प्रेरित थे। हम लोगोंका एक ही प्रकारका जीवन था। हम लोगोंमें जातीयता होनेसे ही हमारे पूर्वज एक साम्राज्य स्थापित कर सके थे। बादको अँग- रेजोंने आकर हमें विभक्त किया ; हममें मतभेद डाला। पाठक इस बातको जरा स्पष्ट करके कहिए । सम्पादक-मेरा कहना यह है कि हम सब पहले जाती- यतामें बद्ध थे। इससे मेरा तात्पर्य यह नहीं है कि हम
भारतकी स्थिति-रेले
लोगोंमें मतभेद था ही नहीं। कहनेका तात्पर्य यह है कि हम
लोगोंके नेता उस समय पैदल अथवा रथों पर देश-देशकी
यात्रा कर सब भाषाओंको सीखते थे। उनमें किसी तरह
की उदासीनता नहीं थी । तीर्थस्थानोंको इतने दूर दूर बनाने
का क्या प्रयोजन था। क्या सेतुबन्ध रामेश्वर, जगन्नाथ
तथा वद्रीनाथ एक ही स्थानमें नहीं रह सकते थे। वे लोग
मूर्ख नहीं थे। वे जानते थे कि मनचंगा तो कठौतमें गङ्गा ।
उनका कथन था कि ईश्वरने भारतको एक देश बनाया है।
वे लोग अपने प्रयाससे भी उसे उसी तरह रखना चाहते
थे। इसी खयालसे वे लोग भिन्न भिन्न स्थानों में भिन्न भिन्न
धर्मक्षेत्र बना कर धर्मके मिस लोगोंमें जो जातीयताका भाव
पैदा कर सके वे संसारमें कहीं भी प्राप्त नहीं हो सकते ।
दो भारतीयोंमें जो प्रेमभाव रहता है वह दो अँगरेजीमें
कदापि नहीं पाया जा सकता। इस समय उन लोगोंमें जो
भेदभाव आ गया है वह केवल आधुनिक सभ्यताकी बू है ।
केवल रेलोंके जारी होनेके बादसे ही हम लोग एक दूसरेको
पर आप उलटा ही समझ रहे हैं कि
रेलों द्वारा ही जातीयताके भाव उदित हुए हैं। अफीमची
अफीमकी मुक्तकण्ठसे प्रशंसा करता है। क्योंकि खाने
पृथक् समझने लगे।
स्वाधीन भारत
पर उसे उसके दोष विदित हो जाते हैं। रेलके बारेमें जो
कुछ मैंने कहा है उस पर विचार कीजिए।
पाठक-अवश्य । एक सन्देह मेरे मनमें फिर भी
उठता है। आपने भारतकी जिस दशाका दिग्दर्शन कराया
है वह मुसलमानोंके पूर्वका भारत था। अब तो हिन्दू,
मुसलमान, पारसी, ईसाई आदि सभी भारतमें बस रहे हैं।
अब उनमें एक जातीयताके भाव कैसे हो सकते हैं। हिन्दू-
मुसलमानोंमें आजन्मकी शत्रुता है। दोनोंमें इतना विषम
मतभेद है कि एक पूरब मुँह पूजा-पाठ करता है तो दूसरा
पश्चिम । मुसलमान लोग हिन्दूको 'काफिर' (मूर्ति-
पूजक) कह कर गालियाँ देते हैं। वे गोहत्या करते हैं,
हिन्दू उसे पूजते हैं। "अहिंसा परमो धर्मः' हिन्दुओंका
मूलमन्त्र है, पर मुसलमान इसके विरुद्ध हैं। अर्थात् पग
पग पर मतभेद है, फिर इनमें जातीयताके एक भावका
सञ्चार कैसे होगा।
दसवाँ अध्याय
भारतकी स्थिति-हिन्दू और मुसलमान
सम्पादक-आपका प्रश्न तो जटिल है पर विचार करने
पर इसका उत्तर इतना कठिन नहीं प्रतीत होता। रेल,
चकील तथा डाक्टरोंके प्रसंगमें यह प्रश्न उठ चुका है। हम
लोगोंन रेलकी बातें तो देख ली, अव वकील तथा डाक्टरों
की दशा पर विचार करेंगे। यहाँ पर मैं एक वात प्रकट
रूपसे कह देना चाहता हूँ कि परमेश्वरने मनुष्यमें एक
शक्ति दी है जिसके अनुसार वह अपनी गतिका विस्तार
उतना ही कर सकता है जितनी हाथ-पैर फैलानेकी उसमें
शक्ति रहती है। यदि हम लोग रेलें अथवा इसी प्रकारके
अन्य शीघ्रगामी यन्त्रों द्वारा इधर उधर अधिक भ्रमण न करें
तो कितनी दिक्कतें रफा हो जायें या उनके उठनेका अवसर
ही न मिले । कठिनाइयोंको हम लोग स्वयं बनाते हैं । स्रष्टाने
अनेक उपायोंसे मानसिक अभिलाषाओंको नियन्त्रित
करना चाहा। मनुष्य उनका उल्लङ्घन करनेका प्रयत्न करने
६०
स्वाधीन भारत
लगा। परमेश्वरने केवल इस लिए बुद्धि दी थी कि उसके
प्रयोगसे मनुष्य अपने स्वामीका ज्ञान प्राप्त कर सके । पर वह
उसका दुरुपयोग कर स्वामीको ही भूलनेका प्रयत्न करने
लगा। मेरी रचना इस तरहकी है कि मैं केवल अपने
पड़ौसीकी सहायता कर सकूँ, पर मैंने अपनी बुद्धिको
इतनी गति दी कि अब सारे संसारकी सहायता करनेका
दावा कर रहा हूँ। इस प्रकार असम्भव वस्तुके पानेका
प्रयास करने में मनुष्यको भिन्न प्रकृति, भिन्न मतका सहवास
होता है और फिर उससे वह घबड़ा जाता है । इन उपर्युक्त
बातोंसे भी विदित हो जायगा कि रेलें कितनी हानिकारक
हैं। उनके द्वारा मनुष्यने अपने पिता, जगत्स्रष्टाको भी
मात कर दिया।
पाठक-पर पहले मेरे अन्तिम प्रश्नका उत्तर मिलना
चाहिए। क्या इस्लामके प्रवेशसे जातीयताका बन्धन
ढीला नहीं पड़ गया है।
सम्पादकः-केवल भिन्न भिन्न मतावलस्वियोंके निवास
से ही भारतकी जातीयतामें कोई कमी नहीं आ सकती है।
विदेशियोंका आना जातीयताका बाधक नहीं होता, बल्कि
वे लोग भी उसीमें मिल-मिला जाते हैं। केवल उस
,
भारतकी स्थिति-हिन्दू और मुसलमान
देशमें दूसरोंको अपनेमें मिलानेकी शक्ति होनी चाहिए ।
भारत इसकी योग्यता रखता है। यदि देखा जाय तो
भारतमें अनेकानेक पन्थ हैं, पर जिन्हें जातीयताका अभि-
मान है वे परस्परके धर्ममें विरोध नहीं दिखलाते । यदि
मत-मतान्तरके झगड़े उठ खड़े हों तो वह देश पतित है।
यदि हिन्दुओंको इस बात का अभिमान हो कि भारतमें
केवल हिन्दू ही रहें तो यह उनका केवल सुख-स्वप्न है ।
भारतके प्रत्येक निवासी चाहे वह हिन्दू हो, मुसलमान हो
अथवा पारसी या ईसाई हो सभीको अपनी भलाईके
लिए परस्पर मेल रखना होगा। धर्म तथा जातीयता ये
दोनों एक शब्दार्थ नहीं हो सकते ।
पाठक-पर हिन्दू तथा मुसलमानोंकी स्वाभाविक
शत्रुताके विपयमें आपका क्या कहना है ।
सम्पादक-हमारे शत्रुओंने इस शब्दकी व्युत्पत्ति की
है। यह शत्रुता केवल उस समय थी जब दोनोंमें परस्पर
युद्ध हुआ करता था, पर वे दिन तो अब नहीं रहे । अब
स्वाभाविक शत्रुताका प्रश्न उठ ही नहीं सकता। एक बात
और स्मरण रखिए । केवल अँगरेजोंके आगमनके समयसे
ही हम लोगोंका लड़ना वन्द नहीं हुआ है। मुसलमान
६२
स्वाधीन भारत
शासकोंके अधीन हिन्दुओंकी और हिन्दू शासकोंके अधीन
मुसलमानोंकी उत्तरोत्तर बढ़ती होती रही है। तब दोनोंने
समझ लिया था कि इस तरह लड़ना हानिकर है और
अस्त्रके बलसे धर्म छुड़ाना कठिन है। इस लिए दोनोंने
शान्त होकर रहना पसन्द किया। अँगरेजोंके आगमनके
साथ ही यह कलह पुनः जागृत हो उठा।
आपका यह कथन उस समयका है जब दोनोंमें परस्पर
शत्रुता थी। अब तो वह बात नहीं है। कितने ही
मुसलमानोंके वंशज हिन्दू थे और उनकी नस-नसमें अब
भी वही रक्त वर्तमान है। क्या केवल धर्म छोड़नेसे वे
अपने भाईके शत्रु हो गये। क्या हिन्दू मुसलमानोंके
ईश्वर भी भिन्न भिन्न हैं। धर्म तो एक तरहकी विश्वास-रूपी
धारा है जो दो मार्गसे होकर एक ही समुद्रमें गिरती है ।
यदि दोनोंका एक ही लक्ष्य है तो मार्गकी विभिन्नता हानिकर
नहीं हो सकती। यहाँ तो कलहका कोई कारण नहीं
प्रतीत होता।
मुसलमानोंकी बात तो न्यारी है। हिन्दुओंके ही शैव
तथा वैष्णव दोनों सम्प्रदायोंको ले लीजिए। क्या उनमें
परस्पर राग, द्वेष तथा वैमनस्य नहीं है। पर उनमें
भारतकी स्थिति-हिन्दू और मुसलमान
जातीयताके पृथक् भाव कोई नहीं बतलाता। सनातन
वैदिक-धर्म तथा
जैनधर्म में
बहुत
विशेष अन्तर है, पर दोनों
सम्प्रदायोंको कोई भी भिन्न जातीयताका नहीं बतलाता ।
असल बात यह है कि हम लोग दासताकी वेडीमें वे-तरह
जकड़े हैं, इसी लिए हम लोगोंमें द्वेषभाव है और आपसमें
लड़ पड़ते हैं और उसके निर्णयका भार दूसरोंके सपुर्द
करते हैं। हिन्दू तथा मुसलमान दोनमें कुटीचर हैं।
ज्ञानकी वृद्धिके साथ हम लोगोंको जान पड़ने लगता है
कि अन्यमतावलम्बियोंके साथ द्वेप भाव रख कर विग्रह
करना नितान्त मूर्खता है।
पाठक-गो-रक्षाके विषयमें भी मैं यहीं पर कुछ जान
लेना चाहता हूँ।
सम्पादक-मुझमें भी गो-भक्ति है। गौको मैं श्रद्धाकी
बटिसे देखता हूँ। भारतके उद्धारका भार गौ पर ही है।
कृपि-प्रधान होनेके कारण गो-सन्तानों पर इसे बहुत कुछ
निर्भर रहना पड़ता है। इसके अतिरिक्त और भी हजारों
तरहसे यह उपयोगी है। कमसे कम इतना माननेके लिए
तो मुसलमान भाई भी अवश्य तैयार होंगे।
६४ स्वाधीन भारत पर जितनी भक्ति मुझे गौकी है उतनी ही श्रद्धा तथा प्रेम मुझे मनुष्यसे भी है। चाहे वह किसी भी सम्प्र- दायका क्यों न हो-उसकी उपयोगिता गौसे कम नहीं है। ऐसी दशामें क्या गो-रक्षाके लिए मुसलमानोंसे लड़ना या उनकी हत्या करना उचित है। इससे तो हम दोनोंके शत्रु हो जाते हैं। इस लिए ऐसा न कर उचित तो यह होगा कि हिन्दू लोग मुसलमानोंके पास जाकर हाथ जोड़ कर उनसे प्रार्थना करें कि गौ-हत्या वन्द कर उनकी रक्षामें वे लोग भी हिन्दुओंका हाथ बँटावें। यदि वे लोग राजी नहीं होते तो हम लोगोंको अपनी अयोग्यता समझ कर गो-रक्षाका कार्य त्याग देना चाहिए। यदि गौओं पर हम लोगोंको अधिक दया है तो दूसरेकी जान न लेकर हमें अपनी ही जान देनी चाहिए। यही सनातन-धर्म है । पर यदि जिद्द ही पड़ गई हो तो दूसरी बात है। ऐसी दशामें यदि हम एक राग छेड़ेंगे तो मुसलमान भाई दूसरी राग छेड़ देंगे। पर यदि हम लोग उनका आदर करेंगे तो वे उसका बदला अवश्य चुकावेंगे। हम उन्हें सलाम करेंगे तो वे और भी नम्र होकर उसका उत्तर देंगे । यदि जवाबमें उन्होंने सलाम नहीं भी किया तो हम लोगोंकी प्रतिष्ठा
भारतकी स्थिति-हिन्दू और मुसलमान
नहीं घट जाती । गो-रक्षिणी सभाओंकी स्थापनाने गो-वध
और भी बढ़ा दिया है। लज्जाकी बात है कि इस कामके
लिए हमें समायें स्थापित करनी पड़े। इससे तो यही
विदित होता है कि हम लोग गो-रक्षाके साधन भूल गये ।
रक्तका प्यासा कोई भाई गो-वध करने पर उतारू है।
उस वक्त हमारा क्या धर्म है। उसे मार डालना चाहिए या
विनती कर उसे उस कार्यसे रोकना चाहिए। मेरी समझसे
तो अन्तिम उपाय ही लाभकारी प्रतीत होता है। इसीका
प्रयोग हम लोगोंको मुसलमानोंके साथ करना चाहिए।
क्या हिन्दू लोग गौओंके साथ दुर्व्यवहार नहीं करते।
वहाँ पर उनकी कौन रक्षा करता है। बेचारा वैल चार मन
का बोझ लिये चला जा रहा है, थक कर धीरे धीरे चलने
लगा। यह देख उससे स्वामीने उसकी दण्डोंसे पूजा की।
उस समय उनका सहायक कौन होता है। पर इससे तो
जातीयतामें कोई भेदभाव नहीं उत्पन्न हुआ।
थोड़ी देरके लिए मान भी लिया जाय कि हिन्दू "अहिंसा
परमो धर्मः" सूत्रको मानते हैं और मुसलमान नहीं मानते
तो इस समय हिन्दूका क्या धर्म है। यह कहीं नहीं लिखा
है कि अहिंसा धर्मको माननेवाला उस मतके विरोधीकी
स्वाधीन भारत हत्या कर डाले। उसका मार्ग तो साफ है। एककी रक्षा कर दूसरेकी हत्याका उसे कोई अधिकार नहीं है। केवल वह उसकी रक्षाके लिये विनती कर सकता है-अभयदान माँग सकता है। वस यही उसका धर्म है। पर क्या अहिंसामें सभी हिन्दुओंको विश्वास है । यदि विवेचना की जाय तो ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं पाया जायगा जो इस महामन्त्रका अनुसरण करता हो। हिंसासे मुक्ति पानेके लिए सनातन-धर्म है। तब तो जितने मांसाहारी हिन्दू हैं अहिंसा धर्मके उपासक नहीं कहे जा सकते। इस लिए यह कहना कि हिन्दू अहिंसा धर्मको मानते हैं और मुसलमान नहीं मानते, इस कारण दोनों एक साथ प्रेमभाव से नहीं रह सकते, निर्मूल है। स्वार्थी तथा बनावटी धर्मात्माओंकी यह निर्मूल कल्पना है और अँगरेजोंने नमक-मिर्च लगा कर उसे और भी ठीक कर दिया। अँगरजोंमें इतिहास लिखनेका उन्माद है। वे लोग संसारके प्रत्येक प्राणीके रस्म-रिवाज तथा रहन-सहन- को जाँचते हैं। ईश्वरने हम लोगोंको परिमित बुद्धि दी है, पर वे लोग ईश्वरका भी हाथ बँटानेको तैयार हैं। अपने आविष्कारोंकी मुक्तकण्ठसे प्रशंसा कर हम लोगोंको वे
भारतकी स्थिति-हिन्दू और मुसलमान
वहकाना चाहते हैं। हम लोग भी ऐसे मूर्ख हैं कि उन्हींको
श्रद्धाकी दृष्टिसे देखते हैं।
जो लोग सुलावे में न पड़ कर वस्तुतः ज्ञान प्राप्त करना
चाहते हैं उन्हें कुरानकी आयतें पढ़नी चाहिम । अनेक
आयतें उसमें हिन्दुओंके अनुकुल मिलेंगी भगवद्गीताको
ही देखिये। उसमें अनेक बातें ऐसी हैं जो मुसलमानांको
भी मान्य हैं। कुरानकी आयतें या तो मेरी समझमें
नहीं आती या मुझे पसन्द नहीं हैं, इससे क्या मुझे
मुसलमानांस वृणा करनी चाहिए। विना दोनों हाथों-
के ताली नहीं बजती। यदि में झगड़ा बचाना चाहता हूँ
तो क्या कोई मुसलमान यों ही आकर लड़ने लगेगा। यदि
हवामें शन चलाया जाय तो केवल अञ्चकी क्षति होगी।
यदि दोनों श्रादमी अपने अपने धर्मके तत्त्वको समझ लें
और उसीका अनुसरण करें और स्वार्थी पण्डितों तथा
काजियोंकी बातें न सुने तो झगड़ेकी जड़ ही मिट जाय ।
पाठक तो क्या अँगरेज लोग कभी भी दोनोंमें मेल
होने देंगे।
सम्पादक यह प्रश्न केवल भीरुताका द्योतक है। इससे
हमारे हृदयकी क्षुद्रताका बोध होता है। यदि दो आई
६८
स्वाधीन भारत
आपसमें मेल रखना चाहते हैं तो क्या नीसरा उनमें कभी
भी कलह करा सकता है। यदि वे लोग बुरी सलाहों पर
कान दें तो वे परले दर्जे के मूर्ख हैं। इसी तरह यदि अँगरेजों-
के बहकानेसे हिन्दू और मुसलमान आपसमें लड़ जायें तो
मैं अँगरेजीको दोपन देकर हिन्दू-मुसलमानोंको ही मूर्ख कहूँगा
मिट्टीके कच्चे बरतन पर ढेला मारनेसे वह अवश्य फूट
जायगा। एक बार बच भी जाय तो दूसरी बार नहीं बच
सकता। उसकी रक्षाका क्या उपाय है । छिपा कर रखने-
की बनिस्बत उसे पका कर पका कर लेना ही अच्छा है।
इसी तरह से हमें अपने हृदयको पका करना होगा। फिर
भयकी कोई बात न रह जायगी। हिन्दू लोग इस कामको
बड़ी आसानीसे कर सकते हैं। उनकी संख्या अधिक है,
उनमें शिक्षा अधिक है, इस लिए परस्परके बन्धनकी पतली
रस्सीको सुरक्षित रखनेका अधिक भार उन पर ही है ।
भेदभावके साथ साथ आपसमें विश्वास भी नहीं है ।
इसीलिए मुसलमानोंने लार्ड मालेसे कुछ बातें अपने सुविधे-
की माँगी। हिन्दुओंने उसका विरोध क्यों किया । यदि
हिन्दू लोग चुप रह गये होते तो अंगरेजोंको भी पता लग
गया होता। मुसलमानोंकी भी तबीयत भर गई होती और
भारतकी स्थिति-हिन्दू और मुसलमान
धीरे धीरे भ्रातृभाव बढ़ता जाता । अपने मगडेका निबटारा
अँगरेजीसे कराना लज्जास्पद है। यदि विचार कर देखिए
तो चुप रहने में कोई विशेष क्षति नहीं है। दूसरोंके हृदयमें
विश्वास तथा श्रद्धाकं अंकुर उगानेमें किसीको भी हानि नहीं
पहुँच सकती।
पर मेरे कहनेका अभिप्राय यह नहीं है कि हिन्दू और
मुसलमान लड़ेंगे ही नहीं। यदि दो भाई भी इकट्ठा रहते
हैं तो उनमें खटपट हो ही जाया करती है। कभी कभी
सिर-फुडोवल हो ही जाया करेगी, क्योंकि दोनों जातियों में
एक ही तरह के लोग तो है नहीं। क्रोधमें आकर कितनी
वेशीकी बातें हो जाती हैं। इन सबको सहना ही पड़ेगा।
पर लड़ कर चुप हो जाना चाहिए। फिर अदालत या
वकीलोंकी शरण न लेनी चाहिए। दो आदमी लड़े।
दोनोंने अपना सिर फोड़ डाला, या एकहीका फूटा। मेरी
खमममें यह नहीं आता कि तीसरा आदमी उनके बीच क्या
न्याय कर सकता है। यदि दो लड़ेंगे तो चोट खामखाह
लगेगी ही, फिर न्यायालयकी क्या आवश्यकता ।
,
,
ग्यारहवाँ अध्याय
--
भारतकी स्थिति-वकील
पाठक-आपने अभी कहा है कि जब दो आदमी लड़ते
हैं तो उन्हें न्यायालयमें नहीं जाना चाहिए। यह तो अंधेर
की बात है।
सम्पादक-आप इस अन्धेर कहें या और कुछ, पर मैंने
आपसे सच्ची सच्ची बातें कह दी। अब मैं वकीलोंका प्रश्न
उठाता हूँ। मुझे दृढ़ विश्वास है कि भारतकी दासताके
जड़ वकील ही है। हिन्दू-मुसलमानोंके परस्पर वैमनस्यके
भी यही लोग कारण हैं। और अँगरेजोंके अधिकार भी
इन्हीं लोगोंकी बदौलत इतने सुदृढ़ हुए हैं।
पाठक-कहनेको तो आपने इनके मत्थे इतने दोप मढ़
दिये, पर सावित करके बतलाना जरा कठिन होगा। यदि
सचमुच पूछिए तो वकीलोंने ही स्वतंत्रताका रास्ता दिखलाया
है, दीनदुखियोंकी रक्षा की है, गरीबोंको बचाया है।
कांग्रेस-जिसकी आपने मुक्तकण्ठसे प्रशंसा की है, वकीलों
भारतकी स्थिति-वकील
की ही जमाई है। इतने उपकारी लोगोंकी निन्दा करना
अनर्थकारी है। वकीलोंकी निन्दा करके आप सारे वकील
समाजको कलङ्कित कर रहे हैं।
सम्पादक-किसी समय मेरा भी यही विश्वास था।
मैं यह नहीं कहता कि उनके द्वारा देशको लाभ नहीं हुआ
है। मनमोहन घोप आदिने कितने ही गरीबोंकी सहायता
की है। कांग्रेस पर भी उनका बहुत कुछ ऋण है।
भलाई करना मानुपिक प्रकृति है और वकील भी मनुष्य
ही हैं । पर जो कुछ उपकार उन्होंने किया है वह मनुष्यताके
सम्बन्धसे, न कि वकीलीकी हैसियतसे। मेरे यह सब
कहनेका केवल यही अभिप्राय है कि यह पेशा मनुष्यके
आचरणको पतित कर देता है-उसे कमीना बना देता
है। इसमें बहकानके इतने सामान हैं कि गिन-गिनाये
अपनको बचा सकते हैं।
हिन्दू, मुसलमान लड़े। साधारण आदमी यही
कहेगा, जाने दो। भाई, भूलसे हो गया, आपसमें तय कर
लो, आइन्दसे ऐसा मत करना । पर यदि वकील के पास
जाइए तो वह क्या कहेगा। वह अपने मुअकिलका पक्ष
ग्रहण करेगा। न जाने कहाँ कहाँकी बातें लाकर अपने
७२
स्वाधीन भारत
।
मुअकिलको बचाने तथा दूसरेको फँसानेका प्रयत्न करेगा।
यदि ऐसा न करें तो उनकी प्रतिष्ठा हमपेशोंमें नहीं हो
सकती। इस लिए लड़ाईको दवाना तो दूर रहा, वे लोग
उसे बढ़ानेहीका प्रयत्न करेंगे। आजकल लोग वकालत
क्यों पढ़ते हैं तथा दूसरोंको आपत्तिसे बचानेका उन्हें जरा
भी ध्यान रहता है ? कदापि नहीं। केवल रूपया कमाना
ही उनका मुख्य उद्देश्य होता है। केवल रुपया कमानेके
लिए ही वे वकालत पढ़ते हैं। इससे झगड़ोंको कम करना
तो दूर रहा, वे उन्हें बढ़ाते ही जाते हैं। मैं अच्छी तरह
जानता हूँ कि दो आदमियोंके लड़नेसे वे बहुत ही प्रसन्न होते
हैं। मामूली वकील तो झगड़ा करवा देते हैं । उनके दलाल
घूम-घूम कर लोगोंको फँसा कर उनका रक्त चूसनेकी
चिन्तामें लगे रहते हैं। वकीलोंको संसारका बहुत काम नहीं
करना है। आलसी, दूसरोंको लूट कर विलास चाहनेवाले
ही इस पेशेको प्रिय समझते हैं। इसे सच मानिए। यों
तो उसको सार्थक बनानेके लिए अनेक बातें कही जा
सकती हैं। केवल वकीलोंने ही यह तत्त्व निकाला है कि
इस पेशेमें बड़ी प्रतिष्ठा है। अपनी मतिके अनुसार वे नियम
बनाते हैं, इच्छानुसार मेहनताना रखते हैं।
बनावटपन
भारतकी स्थिति-वकील
उनमें इतना अधिक है कि विचारे गरीव उनको ईश्वर
समझने लगते हैं।
सजदूरोंसे अधिक मेहनताना वे लोग क्यों लेते हैं,
उनकी आवश्यकतायें इतनी अधिक क्यों हैं। किस हैसियत
से वे मजदूरोंसे अधिक देशका उपकार करते हैं। क्या
जिनसे अधिक उपकारकी सम्भावना हो उन्हें अधिक
पुरस्कार मिलना चाहिए। यदि द्रव्यके प्रलोभनमें पड़ कर
उन्होंने किसी तरह देशको लाभ पहुँचाया तो उसका एहसान
ही क्या।
हिन्दू मुसलमानोंके परस्पर विरोधकी जिसे भीतरी
जानकारी है वह भली भाँति जानता है कि इसके कारण
वकील लोग ही हैं। इनकी कृपासे कितने बंश रसानल
चले गये। भाई-भाईने इन लोगोंने वैमनस्य करा दिया।
कितनी रियासतें इनके हाथमें पड़ कर वरवाद हो गई।
एक नहीं इनके अनेकों उदाहरण मिल सकते हैं।
पर सबसे बुरा काम जो उन लोगोंने भारतके लिए
किया है वह यह है कि उन्हीं की कृपासे भारत पर अंगरेजों
बैठ
क्या तुम समझते हो कि
इन अदालतोंके विना सरकार एक मिनटके लिए भी शासन
का पता चपक कर
गया।
स्वाधीन भारत
कर सकती है। यह समझना भूल है कि इन अदालतोंसे
रियायाको किसी तरहका लाभ पहुँच सकता है। यह
केवल अधिकार दृढ़ करनेका एक उपाय है। यदि हम तुम
अपना झगड़ा आपसमें ही निपटा लें तो किसी तीसरे व्यक्ति-
को अपना रोव जमानेकी क्या जरूरत पड़े। जव लोग
आपसके झगड़ेकोलड़ कर या सम्बन्धियोंको बीचमें मध्यस्थ
वना कर तय कर लेते थे उस समय लोगोंमें मनुष्यत्वकी
मात्रा अधिक थी। युद्ध द्वारा अपने कलहको तय करनेको
बर्बरता, असभ्यता, दासता अथवा जंगलीपन कहा जाता
है। पर क्या दूसरों के सहारे न्याय पानेके लिए रहना
सभ्यताकी निशानी है। भला तीसरा व्यक्ति कब न्याय
कर सकता है। यह केवल हम लोगोंकी मूर्खता है जो
हम लोग यह समझे हुए हैं कि तीसरा व्यक्ति रुपया लेकर
हम लोगोंका झगड़ा तय कर देगा।
बिना वकीलोंके अदालतोंकी स्थिति क्या हो सकती थी।
बकीलोंके बिना अदालतें नहीं चल सकती थीं और अदा-
लतोंके बिना इनका शासन नहीं ठहर सकता था। पर
यह कहा जा सकता है कि यदि हिन्दुस्तानी इस तरह
उनका साथ न देते तो वे सब ओहदों पर अँगरेजोंहीको
भारतकी स्थिति-वकील
रखते। ठीक है ऐसा किया जा सकता था, पर अँगरेज
जज, अँगरेज वकील और अँगरेज पुलिस केवल अँगरेजों
पर शासन कर सकती है। बिना हिन्दुस्तानियोंक उनका
एक मिनट भी नहीं चल सकता था। पहले जमाने में
किस किस तरहकी शिफारिस तथा पुरस्कार देकर
लोगोंको अँगरेजी पढ़ने तथा वकील बननेके लिए तैयार
किया जाता था, यह जाननेकी बात है। इसको जानकर
आपको भी मेरी भाँति इस पेशसे वृणा हो जायगी। यदि
आज भारतके सभी वकील रण्डियोंकि पेशेकी तरह इस
पेशेको घृणित समझ कर त्याग दें तो मैं दावेसे कह सकता
हूँ कि कल ही अँगरेजोंके शासनका अन्त हो जाय । हम
लोगों पर जो कलह-प्रिय होनका दोप लगाया जाता है
उसके कारण यही वकील लोग हैं। यही बातें जजोंके
वारेमें भी सही हैं। इनको भी उनका भाई समझिए । ये
लोग एक दूसरेके परस्पर सहायक हैं।
बारहवाँ परिच्छेद
भारतकी स्थिति-डाक्टर लोग
पाठक-हाँ अब मेरी समझमें आया कि वकीलोंकी
कैसी दशा है। उनसे देशका लाभ होना कठिन है। यह
पेशा बहुत ही घृणित है। पर वकीलोंके साथ आप डाक्टरों
को क्यों घसीटते हैं।
सम्पादक-जो मत मैंने प्रकट किया है वह पूर्ण
विचारके बाद किया है। और यह दूसरोंके मतसे लिया
गया है, कोई मेरा निजका ही मत नहीं है। पश्चिमी
लेखकोंने इन्हें और भी घृणित वतलाया है। किसी
समय मुझे भी डाक्टरीसे बड़ा प्रेम था। देशसेवाके
खयालसे मैं भी डाक्टरी ही पास करनेवाला था ।
अब मुझे वह प्रेम नहीं रहा। और धीरे धीरे मुझे मालूम
हो गया कि वैद्योंकी इतनी प्रतिष्ठा क्यों नहीं होती।
पर
भारत की स्थिति डाक्टर लोग
इससे भी अँगरेजोंको लाभ ही हुआ है। कितने
अँगरेजी डाक्टरोंन देशी राजाओंकी दवा कर राजनैतिक
लाभ उठाया है।
डाक्टरोंने हम लोगोंको अपाहिज बना दिया है।
देखिए डाक्टरका काम है शरीरकी रक्षा करना, उसकी
देख रेख करना । या यों कहिए अनेक तरहकी बीमारियोंसे
शरीरको मुक्त करना। बीमारियोंका कारण हम लोगोंकी
लापरवाही है। मान लीजिए कि मैंने आज ज्यादा भोजन
कर लिया। मुझे अपचा हो गया। मैं दौड़ा दौड़ा डाक्टरके
पास गया। उसने दवा दे दी । मैं अच्छा हो गया । दूसरी
चार मैंने पुनः अधिक भोजन कर लिया और अपचा हो
गया । डाक्टरने पुनः पाचनकी गोली देकर मुझे आराम
कर दिया। यदि डाक्टर साहबने मुझे पाचक गोलियाँ
पहले ही बार न दी होती तो मैं अपनी करनीका फल भुगत
कर सदाके लिए होशियार हो गया होता और फिर अधिक
खानेका नाम न लेता। डाक्टरने अधिक भोजन करने में
मेरी सहायता की। शरीरको आनन्द मिला, पर मनकी
शक्ति कम जोर पड़ गई। अर्थात् दवाइयोंका जितना प्रयोग
स्वाधीन भारत मैं होगा उतना ही इन्द्रियों परसे अपना अधिकार उठता जायगा। वे विवश होती जायेंगी। मैंने कोई बुरा काम किया। उससे बीमारी उत्पन्न हो गई। डाक्टरने दवा करके मुझे आराम किया। इसके माने यह है कि उसने मेरे बुरे कर्ममें सहायता दी, क्योंकि यह जान कर कि डाक्टर आराम तो कर ही देगा उसे और भी करूंगा। यदि डाक्टरका हाथ न लगा होता तो मैं अपने किये कर्मका फल भुगतता और अच्छा होने पर उस कामसे मुँह मोड़ लेता। अस्पतालोंको पाप-गृह कहना चाहिए । मनुष्य अपने शरीरकी परवाह नहीं करता और व्यभिचार बढ़ने लगता है। यूरोपीय डाक्टर तो सबसे गये गुजरे हैं। मनुष्यको भला पहुँचानेके भ्रममें वे प्रति वर्ष लाखों जीवोंकी जान लेते हैं। अपने आविष्कारोंके प्रयोग वे वेचारे जानवरों पर करते हैं। कोई धर्म यह शिक्षा नहीं देता-मनुष्य के लिए इतने जीवोंकी हत्या करना धर्म नहीं सिखलाता। डाक्टर लोग धर्मके भी घातक हैं। उनकी दवाएँ मांस तथा मदिरासे बनी रहती हैं। यह दोनों हिन्दू तथा मुस- लमानको ग्राह्य नहीं हैं। हम लोग सभ्यताकी आड़में
भारत की स्थिति-डाक्टर लोग
धार्मिक बन्धनोंको आडम्बर समझ कर चाहें जो करें, पर
इतना अवश्य कहा जायगा कि इन सबोंके कारण डाक्टर
हैं। उन्हींके आशीर्वादसे हम लोग शक्तिहीन होकर त्रियोंके
जैसे हो गये हैं। इस स्थितिमें हम लोग देश-सेवाके
सर्वथा अयोग्य हैं। अँगरेजी प्रकारसे डाक्टरी पढ़ना तो
दासताकी वेडीको और भी पुष्ट करना है।
यहाँ पर यह भी जान लेना चाहिए कि डाक्टरी पास
करनेका आन्तरिक अभिप्राय क्या रहता है। कमसे कम
लोकसेवाके खयालस तो कोई इसमें प्रवेश नहीं करता।
केवल धन तथा प्रतिष्ठा कमानेके लिए ही यह पेशा उठाया
जाता है। ऊपर मैंने यही दिखलानेका प्रयास किया है कि
इनसे देशका कोई लाभ नहीं है, बल्कि उलटा हानि होती
है। डाक्टर लोगोंको अपनी डाक्टरीका वड़ा अभिमान
होता है। वे फीस अधिक लेते हैं। दवाओंका दाम इतना
अधिक लेते हैं कि दमड़ीकी दवाके लिए चार पैसा लेंगे।
रोगसे निमुक्त होनेकी आशामें लोग मुँहमाँगा देते हैं। तो
क्या फिर भी डाक्टरोंको अच्छा ही कहा जायगा।
तेरहवाँ परिच्छेद
वास्तविक सभ्यता
पाठक-रेल, वकील तथा डाक्टरोंको तो आपने वाहि-
यात बतलाया। मशीनोंको भी आप व्यर्थ कहेंगे। तव
सभ्यता के क्या लक्षण हैं।
सम्पादक-इसका उत्तर तो सहजमें दिया जा सकता
है। जिस सभ्यताका रस भारतने पीया है वह संसारसे
कभी भी उठ नहीं सकती। हमारे पूर्वजोंने जिस सभ्यता
का वीज बोया है उसकी बराबरी संसारकी कोई सभ्यता-
नहीं कर सकती। हम लोगोंके देखते देखते रोमका पतन
हुआ, यूनानको रोमका साथ देना पड़ा, फरोहाकी शक्ति
पद-दलित हुई, जापान पर पश्चिमी हवाका असर पड़
गया, चीनके बारेमें कुछ कहना ही नहीं है, पर हम अव
भी जैसे के तैसे बने हैं। यूरोपवाले यूनान तथा रोमकी
सभ्यतासे शिक्षा लेते हैं, पर उनका पता कहाँ है, न
तो अब रोमका ही उत्कर्ष रहा और न यूनानका। उनका
,
वास्तविक सभ्यता
अनुकरण करनेसे यूरोपवालोंकी यह भी भावना रहती है
कि उनकी भूलं वे छोड़ते जायँगे । पर अनेक तरहक झकोरे
खाने पर भी हमारा बूढ़ा भारत जैसाका तैसा है।
यह कम प्रशंसाकी बात है। हमारे देशकी निन्दा करनेवाले
लोग कहते हैं कि यहाँ के लोग इतने असभ्य, मृद तथा
कट्टर होते हैं कि उनकी स्थितिमें जल्दी परिवर्तन लाना
कठिन है। यह दोष वास्तवमें दोप नहीं है, बल्कि हम
लोगोंका गुण है । अनुभवसे जिनकी स्थिरता तथा सत्यता-
का ज्ञान हम लोगोंको हो चुका है उसको कैसे छोड़ा जा
सकता है। कितने लोगोंने हम लोगोंको बहकानेका प्रयत्न
किया, पर हम लोग वैसे ही दृढ़ बने हुए हैं। यही हम
लोगोंके आशाकी दारसदार है।
कर्तव्य-पथ पर लेजानेवाले मार्गको सभ्यता कहते हैं
उसे चाहे आप कर्तव्य-पालन कहिए चाहे सदाचार कहिए,
दोनोंके एक ही अर्थ हैं। ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय पर
विजय पाना ही सच्चा सदाचार है। इससे अात्माका ज्ञान
होता है। सभ्यताके माने ही सद्व्यवहार है ।
यदि उपर्युक्त परिभाषा ठीक मान ली जाय तो हमारे
देशको विदेशियोंसे किसी प्रकारकी सभ्यता नहीं सीखनी
८२
स्वाधीन भारत
है। प्रकृति चञ्चल है। इसकी आकांक्षा बढ़ती ही जाती
है। इसे कभी भी सन्तोष नहीं होता। इन्द्रियों परसे
जितना अधिकार हटाते जाइए उतना ही अधिक वे स्वतन्त्र
होना चाहेंगी। इस लिए पूर्वजोन विलास-भोगकी सीमा
बनादी है। उन्होंने देखा कि मानसिक प्रसन्नता ही सच्ची
प्रसन्नता है। केवल धनी या निर्धन होनसे कोई व्यक्ति
प्रसन्न या दुखी नहीं हो सकता। सब कोई तो धनी हो
नहीं सकते। इन्हीं बातोंको जान कर पूर्वजोंने हम लोगोंका
मुँह भोगविलाससे मोड़नेको प्रयत्न किया।
जहाँ तक हो सका हम लोग भी उनका अनुकरण करते
आये। हम लोग अब भी अधिक तर उसी तरहके मकानों
( झोपड़ों) में रहते आये और हम लोगोंकी शिक्षाका भी
वही प्राचीन क्रम बना है। स्पर्धाकी हम लोगोंमें कोई
प्रथा नहीं थी। अपने अपने व्यवसायमें सब लोग रहते
थे और नियमित मेहनताना ले लेते थे। यह वात नहीं
थी कि वे लोग यन्त्रोंका आविष्कार करना नहीं जानते थे,
१६ जान-बूझ कर उन लोगोंने उस तरफसे मुँह मोड़ा था।
वे लोग जानते थे कि उसके फेरमें पड़नेसे हम लोग दास
और दुराचारी हो जायँगे। इस कारण उन लोगोंने केवल
वास्तविक सभ्यता
.
बाहुवलका ही उपयोग कराना उचित समझा। और
इसीमें हम लोग आरोग्य तथा प्रसन्न रह सकते हैं। उन
लोगोंने यह भी देखा कि बड़े बड़े शहरोंके वसानेमें बड़ा
अनर्थ होगा। लोगों पर व्यर्थका भार पड़ेगा, लोगोंको
अनेक प्रकारके प्रलोभन मिलेंगे, डाकू-चोरोंकी संख्या बढ़
जायगी, व्यभिचारकी मात्रा बढ़ जायगी, अनेक प्रकारकी
बुराइयाँ फैलने लगेंगी और अमीर लोग गरीवोंका रक्त चूस
डालेंगे। इसी लिए उन्होंने झोपड़ी हीको अच्छा समझा।
उन लोगोंने यह भी देखा कि विद्यास्नके सामने राजवल
तथा शस्त्रवलको सिर झुकाना पड़ता है, इस लिए उन
लोगोंने साधु-महात्माओंकी तुलनामें इस संसारको तुच्छ
माना। जिस राष्ट्रमें उपर्युक्त व्यवस्था थी वह दूसरोंको
सिखा सकता है, दूसरे उसे क्या सिखलावेंगे। उस समय
भी न्यायालय, वकील तथा डाक्टर थे, पर उनकी परिधि
थी। प्रत्येक व्यक्ति जानता था कि यह पेशा अधिक
प्रतिष्टित नहीं है। इसके अतिरिक्त वे लोग ठगने तथा
धोखा देनेका साहस नहीं रखते थे। कहनेका सारांश
यह है कि ये लोग सर्व-साधारणसे बढ़कर नहीं थे।
न्यायालयोंमें न्याय होता था। पर जहाँ तक हो सकता
स्वाधीन भारत
उस समय
था अदालतकी शरण नहीं ली जाती थी। लोगों को
फंसा कर अदालतमें ले जानेके लिए आजकल की भाँति
दलाल नहीं घूमा करते थे। हाँ ये सब दोष राजधानियोंके
आसपास अवश्य दृष्टिगोचर हो जाते थे। जनता पूर्ण
स्वतन्त्रतासे कृषि-कार्यमें लगी रहती थी।
भारतमें स्वराज्य था।
जहाँ कहीं इस चाण्डालिन अाधुनिक सभ्यताने अपना
सिका नहीं जमाया है वहाँ अब भी वही हाल है। वे लोग
आप लोगोंकी बातें सुन सुन कर हँसेंगे। उन पर अँगरेजों-
का शासन नहीं है। आपसे उनका कोई सम्बन्ध नहीं
है। जिनको देशभक्ति है उन्हें उन प्रान्तोंमें जाकर वर्ष,
६ मास रहना चाहिए, जहाँ रेल भवानीकी सवारी अब
तक नहीं पहुँची है। वहाँ रहने पर आपको स्वराज्यके
तत्त्वका बोध होगा।
इसीको मैं वास्तविक सभ्यता कहता हूँ। जो लोग
इस देशकी प्राचीन स्थितिको उलट फेर कर बदलना चाहते
हैं उनको देशका कट्टर शत्रु तथा पापात्मा समझना चाहिए।
पाठक-जिस दशाका आपने वर्णन किया है यदि
वह आज भारतमें वर्तमान होती तो क्या पूछना था। पर
पास्तविक सभ्यता
८५
आजकल यहाँकी क्या दशा है। लाखों बाल-विधवायें
पड़ी हैं, दो वर्पके अबोध बालक शादीके बन्धनोंसे जकड़
दिये जाते हैं, बारह वर्षकी बालिकायें माता होकर गृहस्थी-
का बोझ सँभाल रही हैं, पुनर्विवाह करती हैं, नियोगकी
प्रथा जारी है, धर्मके नाम पर नियाँ वेश्या बनाई जाती हैं
और लाखों जीव देवी-देवताओंके लिए बलि चढ़ते हैं।
क्या ये सब उसी प्राचीन सभ्यताके अंग हैं ?
९.म्पादक यही तो हम लोगोंकी भूल है । ये हम लोगों-
में दोष हैं। इनको सभ्यताका नाम कौन दे सकता है।
इनको मिटानेका सर्वदा प्रयत्न होता आया है, पर उनका
उठ जाना कठिन है। इस नई शक्तिका उपयोग हम लोगों
को उनके दूर करनेकी चेष्टामें करना चाहिए। पूर्णता तो
किसी कालमें किसी देशकी सभ्यातमें नहीं आ सकती।
पर पूर्वीय तथा पश्चिमीय सभ्यतामें केवल इतना भेदभाव है
कि पूर्वीय सभ्यता सदाचारकी शिक्षा देती है और पश्चिमाय
सभ्यता दुराचारका पाठ पढ़ाती है। इन बातों पर पूर्ण
विचार कर यदि देशकी उन्नति हृदयसे चाहते हैं तो हम
लोगोंको गुड़-चीटेकी तरह प्राचीन सभ्यताको अपनाना
चाहिए। इसीमें हम लोगोंका कल्याण है।
चौदहवाँ परिच्छेद
मैं
भारतको स्वतन्त्र होनेके मार्ग
पाठक-सभ्यताका जो ज्ञान आपने दिया है वह ठीक
प्रतीत होता है। पर मैं विचार किये बिना सबको स्वीकार
करनेके लिए तैयार नहीं हूँ। आपहीके विचार मान लेने
पर भारतको निर्मुक्त करनेके क्या उपाय हो सकते हैं।
सम्पादक-मेरा यह अभिप्राय नहीं है कि आप मेरे
कथनको ठीक मान लें। जो
कुछ कहता हूँ उसे सुनिए,
उस पर विचार कीजिए; और उचित प्रतीत हो तो लोगोंमें
उसका प्रचार कीजिए। भारतको स्वतन्त्र होनेके कारण
तो हम ऊपर बतला आये हैं, पर वह घुमा-फिरा कर कहा
गया था। अब मैं सीधे शब्दोंमें उसे बतलानेका प्रयास
करूँगा। यह वात सिद्ध है कि यदि कारण मिटा दिये
जायँ तो कार्यका भी वहींसे अन्त हो जायगा। इसी तरह
यदि भारतकी दासताके कारण मिटा दिये जायें तो वह
आज स्वतन्त्र हो सकता है।
भारतको स्वतन्त्र होनेका मार्ग
पाठक-आपने अभी कहा है कि हमारी सभ्यता सबसे
अच्छी है तो दासताकी चू उसमें कहाँ से आई।
सम्पादक-इसकी उत्कृष्टता सर्व-मान्य है, पर सभी
सभ्यताको कसौटीकी रगड़ खानी पड़ी है; और जिसने
अपना रंग नहीं बदला उसी सभ्यताने संसारकी सारी
सभ्यताओं पर विजय लाभ की है। हम लोगोंकी अयोग्यता
से हमारी सभ्यता लाञ्छनीय हो गई है। पर इसकी तारीफ
इसीमें है कि वह इस लाञ्छनाको सह कर पुनः जैसीकी
तैसी हो जायगी। इसके अतिरिक्त सारे देशमें लाञ्छना
नहीं लग गई है। केवल वे लोग हीन हो गये हैं जिनको
पश्चिमी सभ्यताकी हवा लग गई है। हम लोग अपनी
आँखसे सारे संसारको देखते हैं। 'आप डूवे तो जग डूवा'
की कहावत हम लोगों पर ठीक घटती है। पर वास्तवमें
यह बात नहीं है। पर समूचे भारतको दासताकी वेडीमें
जकड़ा हुआ समझ लेना ही ठीक होगा। इसका फल यह
होगा कि मेरे उद्धारके साथ साथ भारतका भी उद्धार हो
जायगा । और यही स्वराज्यकी परिभापा है। अपना प्रवन्ध
आप कर लेना ही स्वराज्य है। अर्थात् स्वराज्य अपनी
मुट्ठीमें है। इसको स्वप्न मत समझिए। चुपचाप बैठ कर
स्वाधीन भारत
सोचनेका समय नहीं है। इस स्वराज्यके लिए प्रत्येकको
अनवरत परिश्रम करना पड़ेगा। सबको अपने अपने लिए
प्रयत्न करना होगा। क्योंकि डूबता हुआ, दूसरेको कैसे
वचा सकता है। यदि हम लोग दासताकी बेडीमें जकड़े
रह कर दूसरोंको उबारना चाहें तो इसे व्यर्थ प्रलाप
समझना चाहिए। इतना तो आप समझ हो गये होंगे कि
अँगरेजोंको मार भगाना हम लोगोंको अभिमत नहीं है।
यदि वे लोग भारत के होकर रहें तो ठीक है, नहीं तो
पश्चिमी सभ्यताके साथ रहने के लिए हमारे पास उनके
लिए अंगुल भर भी भूमि नहीं है। इस अवस्थाको लाना
हम लोगोंका काम है।
पाठक-अँगरेजीको पूर्वीय ढंगका बनाना असम्भव है ।
सम्पादक-इसके माने तो यह है कि वे मनुष्यत्व रहित
हैं। इसके अतिरिक्त हमसे इससे क्या मतलब, चाहे वे
अपनी दशाको बदलें या न बदलें । हम अपने घरकी स्थिति
सुधार लेंगे और उसमें वही लोग रहने पावेंगे जो उसमें
रहनेके योग्य होंगे; दूसरोंको लाचार हो कर उसे छोड़ देना
पड़ेगा। यह बातें होना स्वाभाविक हैं।
पाठक-पर इतिहास इस बातका साक्षी नहीं है।
भारतको स्वतन्त्र होनेका मार्ग
पैदा हुए
सम्पादक-'जो अब तक इतिहास में नहीं हुआ है वह
अब नहीं होगा' इसको मान लेना मनुष्यकी मर्यादाको
घटाना है। चाहे हुआ हो या न हुआ हो, पर जो उचित
प्रतीत होता है उसको कार्यक्रममें लाना आवश्यक है । सब
समय वरावर नहीं होते। भारत निराला है। इसकी
शक्ति अतुलनीय है। इस लिए किसी अन्य देशके
इतिहाससे इसको तौलना ठीक नहीं है। मैंने कहा है कि
कितने
राष्ट्र
और अपनी अपनी सभ्यताको लेकर
चले गये, पर धक्के पर धछे पड़ने पर भी हमारा भारत
व्योंका त्यों खड़ा है।
मैं ठीक ठीक नहीं समझ सकता। इसमें तो
सन्दह नहीं कि हम लोगोंको बलात् अँगरेजोको निकालना
पड़ेगा। इनके रहते हमें चैन कहाँ से मिल सकता है।
किसी कविने कहा है कि 'दासोंको स्वप्नमें भी आनन्दका
अनुभव नहीं मिलता।' ये लोग दिन पर दिन हम लोगोंको
क्षीण करते चले जा रहे हैं। हम लोगोंका महत्त्व लुम हो
गया। लोगोंको मारे भयके साँस भी नहीं आता। ये
लोग हमारी जानके ग्राहक हैं। किसी न किसी उपायसे
इन्हें निकालना ही पड़ेगा।
१०
स्वाधीन भारत
सम्पादक-जोशमें आकर आप प्रसंग ही भूल गये ।
ही लोगोंने उन्हें आनेका अवसर दिया और हमी लोगोंके
कारण वे अब तक ठहरे हैं। उनकी सभ्यताका हम
लोगांने अनुकरण किया है। यही कारण है कि वे जमे
हैं। यदि उनसे घृणा न कर उनकी सभ्यतासे घृणा करें
तो वे सहजमें दूर किये जा सकते हैं। अच्छा, थोड़ी
देरके लिए मान लिया जाय कि वलसे उन्हें निकालना
होगा तो क्या किया जायगा।
पाठक-इटलीका अनुकरण करना होगा। जो कुछ
करना मेजिनी तथा गैरीवाल्डीके लिए सम्भव था हम
लोगोंके लिए भी सम्भव है। वे लोग महात्मा थे।
-
१ मेजिनी तथा गैरोवाल्डी दोनों इटलीके उद्धारक महात्माओं
में से थे। अनेक तरहकी यातनायें सह कर उन लोगोंने इटलीको
प्रसाके चङ्गुलसे निकाला था।
पन्द्रहवां परिच्छेद
भारत तथा इटली
सम्पादक-अच्छे वक्त पर आपने इटलीकी चर्चा छेड़ी।
मेजिनी महापुरुप था, गैरीवाल्डी वीर सिपाही था। दोनों
पूजनीय हैं। उनके जीवनसे हमें अनेक तरहकी शिक्षाएँ
मिल सकती हैं। पर भारत और इटलीकी स्थितिमें भेद
है। पहले मेजिनी और गैरीवाल्डीमें जो भेदभाव था उसीको
जान चाहिए लेना। इटलीमें जो कुछ मेजिनी चाहता था
वह न हो सका । मेजिनीने मनष्यके कर्तव्योंकी आलोचना
करते हुए लिखा है कि मनुष्यको जानना चाहिए कि अपना
शासन किस प्रकार करना होता है। यह वात इटलीमें
नहीं है। गैरीवाल्डीको इसमें विश्वास नहीं था। गैरी-
वाल्डीकी उत्तेजना पर इटलीवालोंने कृपाण उठाया । इटली
और आष्ट्रिया दोनोंकी एकसी सभ्यता थी। वहाँ पर
जैसेको तैसाका मामला था। किसी न किसी उपायसे
गैरीवाल्डी आष्ट्रियावालोंसे इटलीको मुक्त कराना चाहता
६२
स्वाधीन भारत
था। परिणाम क्या हुआ। कदाचित् आप समझते होंगे
कि इटली पर स्वयं इटलीवालोंका शासन है। इससे वहाँ
सुख तथा शान्ति होगी। पर आप भ्रममें हैं। मेजिनीने
लगातार यही बात दिखलाई है कि इटली स्वतन्त्र नहीं
हुआ। जो स्वन्त्रता इटलीको प्राप्त हुई उसका मेजिनी कुछ
और अर्थ लगाता था और विक्टर इमनल कुछ और ।
कावूर, इमनल तथा गैरीवाल्डीका मत था कि राजा तथा
राज्यवर्ग ही इटलीके सब कुछ हैं। मेजिनीका कहना था
कि देशके समस्त किसानोंका खयाल करना आवश्यक है ।
इमनल इत्यादि तो केवल उनके दास थे। जिस इटलीका
स्वप्न मेजिनी देखता था वह अभी भी दासताकी बेड़ी में
जकड़ा पड़ा है। वह राष्ट्रीय युद्ध वास्तवमें दो राजाओंका
युद्ध था और जनताको व्यर्थ जान देनी पड़ी थी। मजदूरों-
की स्थिति अब भी खराव है। इसी लिए कभी कभी वे
उठ खड़े होते हैं और विद्रोह कर बैठते हैं। आष्ट्रियाकी
सेना हट जानेसे इटलीको क्या लाभ हुआ। जिन सुधारों-
के लिए युद्ध किया गया कदाचित् वे अभी तक कार्यक्रममें
नहीं लाये गये। जनताकी अवस्था पहलेके जैसी शोचनीय
ही है। क्या भारतमें भी आप वही बातें करना चाहते
भारत तथा इटलो
हैं। मैं समझता हूँ कि भारतवासियोंको सुख तथा शान्ति
में रखना ही आपकी आन्तरिक अभिलाषा है, न कि
शासनकी वागडोर केवल अपने हाथमें ले लेना। यदि
प्रत्येकको सुखी बनाना है तो एक बातको चिन्ता करनी
चाहिए। ये लैंतीस करोड़ भारतीय स्वराज्य कैसे पा
सकते हैं । देशी राजाओं के शासनकी क्या दशा है । प्रजा
पर मनमाना अत्याचार होता है और कोई सुननेवाला नहीं
है। उनके राज्यमें अँगरेजोंसे भी अधिक अत्याचार किये
जा रहे हैं। यदि शासनकी बाग डोर अपने हाथमें लेकर
भारतको इसी स्थितिमें डालना है तो वह जैसा है वैसा ही
एक आपत्तिको दूर कर उससे भीषण
आपत्तिको निमन्त्रण देनेसे पहली आपत्ति झेलते रहना ही
अच्छा है। यदि मुझमें शक्ति होती तो देशी राजाओंके
अत्याचारोंको भी रोकनेका प्रयत्न करता। देश भक्ति
से मेरा अभिप्राय प्रत्येक भारतवासीके सुख तथा शान्तिसे
है; और यदि यह अँगरेजोंसे प्राप्त हो सकता है तो मैं
उन्हींके अधीन रहना श्रेयस्कर समझता हूँ। यदि किसी
अँगरेज महात्माने भारतको स्वराज्य दिलानेके लिए थोड़ा
भी प्रयत्न किया ; उस पर किये गये अत्याचारों का विरोध
अच्छा है।
१४
स्वाधीन भारत
किया, यथा शक्ति भारतकी सेवाकी तो मैं उस अँगरेजको
भारतीय करके मानूँगा।
भारत इटलीके समान तभी युद्ध कर सकता था जब
कि उसके पास शस्त्र होते। इस बात पर आपने विचार
नहीं किया। अँगरेज लोग अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित हैं,
इसका मुझे भय नहीं है।
पर भारतको उनके मुकाविलेका
बनाने के लिए लाखों भारतवासियोंको अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित
करना पड़ेगा; और इसके लिए बहुत समय लगेगा।
भारतमें इस भाँति अस्त्र-शस्त्रके प्रचार करनेके माने भारतको
यूरोप बनाना है। इससे यहाँकी स्थिति भी यूरोपकी तरह
शोचनीय हो जायगी। तब भारतको भी यूरोपीय सभ्यता
पूरी तरहसे ग्रहण करनी पड़ेगी। यदि यही करना है तो
इन्हीं अँगरेजोंको बने रहने देना चाहिए, क्योंकि ये उस
सभ्यताके दक्ष पण्डित हैं। इन्हींके रहते हम अधिकारोंके
लिए आन्दोलन करते रहेंगे और जो कुछ मिल जायगा
उसीसे सन्तुष्ट हो समय बितावेंगे। पर वास्तवमें भारत
कभी भी शस्त्र ग्रहण करनेके लिए तैयार नहीं होगा और
यह भारतके सौभाग्यकी बात है।
भारत तथा इटली पाठक-आप असंभव वात सोच रहे हैं। सवको शस्त्र ग्रहण करना आवश्यक नहीं है। पहले कुछ अँगरेजोंको हत्या करके हम लोग उन्हें भयभीत कर देंगे, इसके बाद कुछ थोड़े लोग सशस्त्र तैयार रहेंगे जो उनके साथ खुल्लम- खुल्ला युद्ध करेंगे। दो चार लाख जानें अवश्य जायँगी, पर देशभूमि पराधीनतासे मुक्त हो जायगी। गुरिला-युद्ध कर अँगरेजोंको परास्त करेंगे। सम्पादक-अर्थात् भारतकी पवित्र भूमिको आप कलुपित करना चाहते हैं। हत्या करके देशकी स्वतन्त्रता प्राप्त करनेमें आप जरा भी नहीं हिचकेंगे। इससे तो आत्महत्या श्रेष्ठ है। दूसरोंकी हत्या करना भीरुता है। नृशंसतासे हत्या करके भारत स्वतन्त्र नहीं होना चाहता। वर्तमान सभ्यताके मदसे चूर हुए लोग ही इस पतित कार्यको करनेका साहस कर सकते हैं। मारकाटसे अधिकार लेकर देशमें सुख तथा शान्ति नहीं स्थापितकी जा सकती। यदि भारतको विश्वास है कि धिङ्गरा * मराठोंकी तरह पहाड़ोंमें छिप कर छापा मारना; सेना एकत्रित कर खुला युद्ध नहीं करना ।
१६
स्वाधीन भारत
आदिके कर्तव्योंसे उसे लाभ हो सकता था तो उसने
भूल
की है। धिङ्गरा देशभक्त था, पर उसमें दूरदर्शिता नहीं
थी। वह बुरे मार्ग पर था। उससे केवल हानि हो
सकती है।
पाठक-मेरा तो विश्वास है कि इन हत्याओंसे डर कर
ही अधिकारी-वर्ग शासन-सुधारकी आयोजना कर रहे हैं ।
सम्पादक-वे लोग वीर भी हैं और भीरु भी
मुमकिन है कि वे लोग डर कर ही सुधार करते हों। पर
स्मरण रहे डरा कर लेना लाभदायक नहीं हो सकता,
क्योंकि भयका कारण उठा कि वह भी हाथसे गायब हुआ।
हैं
सोलहवाँ परिच्छेद पशु-शक्ति पाठक यह तो आपने एक विचित्र वात वतलाई कि जो कुछ डरसे दिया जाता है वह चिरस्थायी नहीं रह पर जो कुछ दिया जायगा वह लोटा नहीं लिया सकता। जा सकता। सम्पादक-वह लौटा नहीं लिया जायगा। पर उसका जो रकम कर दिया जायगा। सन् १८५७ की घोपणा गदरके बाद की गई थी और उसका एक मात्र अभिप्राय शान्ति स्थापन करना था जव पूरी तरह से शान्ति स्थापित हो गई उसका जोर कम कर दिया गया । यदि दण्डके भयसे किसी ने चोरी करना छोड़ दिया है तो भय हट जाते ही वह पुनः चोरी करना आरम्भ कर देगा । यह युग-युगान्तर- का अनुभव है। हम लोगोंको दवा कर काम निकालनेकी आदत पड़ गई है।
स्वाधीन भारत पाझपर आप अपने ही प्रतिकूल कह रहे हैं। यह तो आप मानते हैं कि विलायतमें अँगरेज लोग जो कुछ पा सके हैं वह केवल पशु-शक्तिके उपयोगसे पा सके हैं। आपने यह भी कहा है कि उसकी प्राप्ति निरर्थक है। पर इससे मेरे मतका खण्डन नहीं होता। जिस वस्तुको पानेकी वे लोग चेष्टा करते रहे उसको उन लोगोंने पाया। मेरे कहने का केवल यही तात्पर्य है कि उनकी मनोकामना पूरी हुई। चाहे किसी तरहसे सिद्धि क्यों न हुई हो। हमारा अभिप्रेत तो निरर्थक नहीं है । किसी भी उपायसे हमें उसको हस्तगत करना चाहिए। मान लीजिए कि घरमें चोर घुसा और पकड़ा गया। उस वक्त हम उसके साथ व्यवहार करनेका उपाय कहाँ तक सोच सकेंगे। किसी न किसी तरह उसे निकालना ही पड़ेगा। इतना तो माननेके लिए आप तैयार हैं कि हम लोगोंको कुछ भी नहीं मिला है और न मित्रता करनेसे मिल सकता है। तब हम लोग भी पशु-शक्तिके प्रयोग द्वरा ही अपने अभिप्रेतकी सिद्धि क्यों न करें। जो कुछ मिल जायगा उसे चिरस्थायी रखनेके लिए भी आव- श्यकतानुसार हम उसी शक्तिका प्रयोग करते रहेंगे। मान लीजिए कि एक लड़का अपना पाँव रह-रह कर आगमें
पशु-शक्ति
r
--
डाल कर जला लेता है। उसकी रक्षा करनेके लिए उसे
डरवाते रहना अनुचित नहीं होगा। भली या बुरी तरहसे
हमें अपने इष्टको सिद्धि कर लनी है।
सम्पादक-आपने बात तो बड़े मतलवकी कही है।
इसके चक्कर में कितने आ चुके हैं। पहले मैं भी इसी तरह
की बातें किया करता था। पर अव मेरा सब भ्रम दूर हो
गया है और अब मैं आपका भी भ्रम दूर करनेका प्रयत्न
करूंगा। पहले इसी बात पर विचार किया जाय,-
"चूंकि अँगरेजोंने पशुबलके प्रयोगसे अपना अभीष्ट साधन
किया, इससे हम लोगोंको भी उस शक्तिका प्रयोग करना
चाहिए।” इसका परिणाम क्या होगा। जिस वस्तुकी
उन्हें प्राप्ति हुई उसीकी हमें भी होगी। पर मुझे वह नहीं
चाहिए। आपको इस वातका विश्वास है कि साधन तथा
उसके उपायमें कोई सम्बन्ध नहीं है, पर यह गलत है
इसी मोहजालमें पड़ कर बड़े बड़े धर्मधुरन्धरोंने भी भूलें की
हैं। आपके कथनसे तो प्रतीत होता है कि आपको विश्वास
है कि "बोयके धतूर पेड़ अामफल चाहत हो।" समुद्र,
पार करनेके लिए जहाजका होना अत्यावश्यक है। पर.
यदि जहाजमें न चढ़ कर गाड़ी पर चढ़ कर पार होनेका.
स्वाधीन भारत प्रयास किया जाय तो एक मिनिटमें हम और गाड़ी दोनों पानीकी तहमें चले जायेंगे। कहावत है,-"यथा हि शीतला देवी तादृशो खरवाहनः । इसके अभिप्रायमें हेरफेर कर लोग मार्गको छोड़ कर भटकने लग गये हैं। साध्यको उपमा पेड़ और साधककी उपमा वीजसे होनी चाहिए। वृक्ष तथा बीजमें जितना घना सम्बन्ध है साध्य और साधकमें भी वही सम्बन्ध है। शैतानकी उपासना करनेसे ईश्वरकी पूजका फल नहीं मिल सकता। इस लिए यदि कोई मनुष्य कहे कि चाहे शैतानकी उपासना क्यों न की जाय, पर मेरा मन तो ईश्वरमें लीन है और उसका अभीष्ट फल होगा ही, तो वह भूल पर है। 'सींचे पेड़ मदारको आम कहाँ होय ।' अँगरेज लोग वोट देनेका अधिक अधिकार चाहते थे, उन्होंने पाशविक शक्ति- का उपयोग कर उसे प्राप्त किया। पर वास्तविक अधिकार तो कर्तव्य पालनसे ही मिल सकता है, और यह वास्तविक अधिकार उन्हें अब तक नहीं मिला है। इससे आजकल इङ्गलैण्डकी क्या स्थिति हो रही है। चारों ओर अधिकार- हीके लिए शोरगुल मच रहा है, पर कर्तव्यका किसीको भी खयाल नहीं है। जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अधिकारहीका भूखा
पशु-शक्ति
है वहाँ किस किसको कौन कौन अधिकार दिये जा सकते
हैं। मेरे ऊपर कहनेका यह तात्पर्य नहीं है कि वे लोग
कर्तव्य पालन करते ही नहीं, बल्कि मेरा यह अभिप्राय है
कि जिस अधिकारको वे लोग चाहते हैं उस संबन्धके जो
कर्तव्य हैं उनका पूर्ण रीतिसे पालन नहीं होता। और
इसी लिए वे अधिकार प्राप्त होने पर एक तरहके बोझ रूप
हो जाते हैं। अर्थात् जिस उपायका उन लोगोंने प्रयोग
किया है उसीके अनुरूप ही फल पाया है। उन लोगोंने
किसी भी उपायसे अपना इष्ट साधन ही श्रेय समझा।
यदि मैं तुम्हारी घड़ी लेना चाहता हूँ तो उनके तीन उपाय
है; या तो मैं उसे चुरा लूँ, या खरीद लूँ, या पुरष्कार रूपसे
लेलँ। मैं जिस उपायका प्रयोग करूँगा उसीके अनुकूल
इसका नाम पड़ेगा, अर्थात् चोरीकी वस्तु, खरीदी हुई वस्तु
या इनाममें पाई हुई वस्तु । देखिए एक ही वस्तुको पानेक
लिए भिन्न भिन्न उपायोंका प्रयोग हो सकता है और भिन्न
भिन्न उपायोंस प्राप्त वस्तुकी भिन्न भिन्न मर्यादा होगी।
क्या फिर भी आप कहेंगे कि उपाय कोई वस्तु नहीं है।
अब मैं चोरवाला उदाहरण लूँगा।
कि किसी उपायसे चोरको भगाना चाहिए। इसमें मैं
आपका मत
१०२ स्वाधीन भारत एक आपसे सहमत नहीं हूँ। भिन्न भिन्न व्यक्तिके लिए भिन्न भिन्न उपायोंका प्रयोग किया जायगा। मान लीजिए कि स्वयं किसीके पिता या मित्र चोरी करनेकी नीयतसे घरमें घुसे हैं तो क्या उनके साथ भी वही बर्ताव किया जायगा जो किसी अज्ञात पुरुपके साथ किया जाता। कहीं गोरे सफेद चमड़ेका चोर हुआ या दुर्बल हुआ तो भी भिन्न भिन्न उपाय होंगे। और यदि कहीं चोर महाशय भी अस्त्र- शस्त्रसे सुसज्जित हुए तो चुप ही रह जाना पड़ेगा। बात और भी होगी। यदि चोरराम मकानदारके पिता हुए, और अस्त्रशस्त्रसे सुसज्जित हुए तो मकानदार नींदमें गाफिल होनेका बहाना कर पड़ा रह जायगा और जान-बूझ कर चोरी करा देगा; क्योंकि दोनों के दोनों वलमें बढ़कर निकलेंगे, इससे तरह दे जाना ही अच्छा होगा। फिर देखिए, उन दोनों शक्तियोंमें भी भेद है। पिताकी शक्ति देख कर मुझे करुणासे रुलाई आने लगेगी, पर अज्ञात पुरुपकी शक्तिके सामने अपनेको वेवस पाकर क्रोध चढ़ आवेगा और कुअवसर जान कर चुप रहने पर भी मन ही मन बदला लेनेकी जीमें ठान लेनी होगी। एक ही बातके लिए तीन चार प्रकारकी स्थितिका सामना करना पड़ा । इन उदाहरणों पशु-शक्ति १०३ से उपायके लिए अब भी भेदभाव रह सकता है। किस उपायका अवलम्बन करना चाहिए यह सुझे नात है, पर कदाचित् उसकी चर्चासे तुम डर जायो। इस लिए मैं उसकी चर्चा नहीं करना चाहता । मैं तुम्हारे ऊपर ही उसका विचार छोड़ देता हूँ। यदि तुम सोच कर कोई एक उपाय निकाल सको तो ठीक है, नहीं तो लाचार होकर तुम्हें अनेक तरहसे भिन्न भिन्न उपायोंका प्रयोग करना होगा। जरा सोचनेसे तुम्हें यह भी विदित हो जायगा कि हरेक उपायसे यह काम नहीं हो सकता, प्रत्येक अवस्थामें तुम्हें उचित उपाय ढूँढ निकालना होगा। इससे यह मतलब निक- लता है कि उचित उपायका प्रयोग करना आपकी इच्छा पर नहीं निर्भर है, बल्कि समय तथा अवस्था पर निर्भर है। मान लीजिए किसी हथियारवन्द डाकूने आपके घर डाका मारा। मारे क्रोधके श्राप आग-बबूला हो रहे हैं। आपको अपनी हानिकी कोई परवा नहीं है, पर आप दूसरों के लिए ऐसा कर रहे हैं ; क्योंकि हिम्मत बढ़ जानेसे वह आपके पड़ोसियोंको तङ्ग करेगा। ठीक है, बूढ़ेके मरनेका इतना भय नहीं है, जितना यमके घर देख लेनेका भय है। आपने चन्द हथियारबन्द आदमियोंको इकट्ठा
१०४
स्वाधीन भारत
कर उसके घर पर धावा मारनेका विचार किया। उसे
पता लग जाता है और वह भाग जाता है। इससे उसके
दिलमें भी बदला लेनेकी ठस जाती है। अब वह अन्य
डाकुओंको एकत्रित कर आपके पास सन्देशा भेजता है कि
"होशियार रहिएगा, अमुक दिन दो पहरको मैं खुले आम
आपके घर पर डाका मारूँगा।" आप भी निडर हो
दलबल सहित उसका मुकाबिला करनेके लिए तैयार
हैं। पर वह क्या करता है। आपको चकमा देकर वह
आपके पड़ोसियोंके घर डाका डालता है। वे आकर
आपके पास अपना दुःखड़ा रोते हैं ।
आप उत्तर देते
हैं,-"भाई, मेरा माल लुटा जा रहा है, पर उसकी परवा
न कर मैं आप लोगोंकी रक्षाके लिए ही इतना कर रहा
हूँ।" पड़ोसी लोग रोकर कहते हैं,-"बाबा, आजके
पहले डाकुओंने हम लोगोंको कभी भी नहीं छेड़ा था।
जबसे आपने उनसे बैर ठाना है तभीसे हम लोगोंके सिर
पर यह बला आकर उपस्थित हुई है। अब तो आप दोनों
तरफसे गये। आप चले भलाई करने और परिणाम कुछ.
उलटा ही हुआ। उनका कहना भी यथार्थ है। आपकी
स्थिति कैसी हो गई है। यदि इस अवस्थामें आप डाकूका
पशु-शक्ति याप पीछा छोड़ देते हैं तो आपकी अप्रतिष्टा होती है। उनको अनेक तरहसे धैर्य देते हैं और कहते हैं,-"भाई लो, मेरे पास जो कुछ है सब आपका है, मैं आपको अस्त्र- शस्त्र दूंगा, उनका प्रयोग सिखलाऊँगा। डाकुओंका संहार किये बिना नहीं रहना चाहिए।" डाकू लोगोंकी संख्या भी दिन दिन बढ़ती गई। दोनोंमें गाढ़ी शत्रुता हो गई। इससे आपको क्या मिला। डाकुओंकी आजन्म शत्रता और पड़ोसियोंकी निन्दा। यदि विचार कर देखिएगा तो आपको विदित होगा कि मैंने कोई बात अनुचित नहीं कही है। अब इसके दूसरे पक्षको देखिए। आपने अपने मनमें सममा कि इसने अज्ञान-बस यह काम किया है। इसे समझा बुझा कर ठीक मार्ग पर लाना चाहिए। अवसर पाकर अपने मनमें आप सोचने लगे भाई, यह भी तो ईश्वरकी सन्तान है, भला इसने ईश्वरीय आज्ञाका उल्लंघन क्यों किया। आपने अपने मनमें ठान लिया कि यथासाध्य इसे इस पापकर्मसे दूर करेंगे। इधर तो आपके मनमें ये बातें समाई और उधर वह दूसरी बार पुनः चोरी करने आया। तव क्रोध न आकर आपको उस पर दया आती
स्वाधीन भारत
है। आप अपने मनमें सोचने लगे, कदाचित् चोरी
करनेकी उसे कोई बीमारी हो गई है। तब आपने हर
तरहसे उसका
मार्ग
सुगम कर दिया। रातको घरका
द्वार नहीं वन्द करते, सोनेकी जगह बदल दी, इतना ही
नहीं, आपने माल-असवावको भी इधर उधर मैदानमें फेंक
दिया। चोर फिर आया । पर यह सब अनहोनी बातें
देख कर वह घबरा जाता है। उस बार भी वह चोरी
करता है। पर उसके मनमें एक विचित्र आन्दोलन
उठता है।
वह आपके विषय में जाननेका उद्योग करता
है। उसे आपके प्रेमभाव तथा उदारताका परिचय मिलता
है। अपने किये पर उसे पछतावा होने लगता है। वह
आपका सब माल-असबाब लिये आपके पास आकर उसे
लौटा देता है और क्षमा माँगता है। उसी दिनसे वह चोरी
करना छोड़ देता है। वह आपकी तावेदारी करने लगता
है। आप उसे अच्छे पद पर नियुक्त करते हैं ।
आपने क्या देखा। एक ही कार्यमें दो भिन्न उपायोंसे
भिन्न भिन्न परिणाम निकले। मेरे कहनेका तात्पर्य यह नहीं
है कि सभी डाकू या चोर इसी तरहका व्यवहार करेंगे;
या सभी मालवाले आपही की तरह दया और प्रेमभाव
पशु-शक्ति
दिखलायेंगे। अभिप्राय यह है कि अच्छे कामका सर्वदा
अच्छा परिणाम होता है और यदि सब जगह नहीं तो
अधिकतर हालतोंमें जो काम प्रेमसे निकल सकता है वह
भयसे नहीं निकल सकता। पाशविक शक्तिके प्रयोगमें
क्षतिकी हमेशा सम्भावना रहती है, पर दयाधर्म इससे
एकदम खाली है।
यहीं पर प्रार्थनाके विपय पर भी दो चार शब्द कह
देना अच्छा होगा। इसे सब मानते हैं कि शक्तिके विना
प्रार्थना बेकार होती है। पर स्वर्गवासी जस्टिस रानाडेका
कथन है कि इससे एक विशेष लाभ यह होता है कि
जनतामें ज्ञान-संचार होता है। इससे शासकोंको अपनी
प्रजाकी वास्तविक स्थितिका बोध हो जाता है। इस
कारण उन्हें व्यर्थ नहीं कहा जा सकता। यदि किसी
वरावरीवालेकी ओरसे प्रार्थना-पत्र आया हो तो उसे
सुजनताकी निशानी समझनी चाहिए। और यदि सेवकने
भेजा हो तो उसे दासताका रूप जानना चाहिए। जिस
प्रार्थना पत्र के साथ साथ धमकीके भी शब्द हों तो उसे भी
बरावरीका समझना चाहिए और यह उसकी नम्रता है कि
अपनी माँगको उसने प्रार्थना-पत्र द्वारा माँगा है। प्रार्थना-
१०८
स्वाधीन भारत
पत्रके साथ दो प्रकारकी धमकी रह सकती है । 'यदि आप
हम लोगोंकी' प्रार्थना पर विचार नहीं करेंगे तो पछताना
पड़ेगा' यह एक तरहकी है और दूसरी यह है-'यदि हम
लोगोंकी प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया जाता तो स्मरण
रखिए, हम लोग आपके सामने भिक्षुक बन कर नहीं खड़े
होंगे। जब तक हम लोग चाहते हैं तभी तक आप हमारे
ऊपर शासन कर सकते हैं। आजसे हम लोग आपसे
किसी तरहका सम्बन्ध नहीं रखना चाहते।' इसीको
आत्मबल या सत्याग्रह कहते हैं। यह अक्षय है। प्राचीन
समयसे हम लोगोंमें एक कहावत प्रचलित है-"एक
नकार छत्तीस बीमारियोंकी अोपधि है। सत्याग्रह या
आत्मबलके सामने शक्तिबल या पाशविक शक्तिको सिर
झुकाना पड़ता है।
अब हम आपके अन्तिम उदाहरण लड़केके आगमें पैर
घुसाने पर विचार करेंगे । उससे आपको विशेष लाभ नहीं
होगा। आप लड़केके साथ क्या व्यवहार कीजिएगा।
मान लीजिए कि उसे इतना हठ है कि वह आपका डर न
मान कर पैर आगमें डालने ही जाता है। ऐसी दशामें
आपके सम्मुख दो ही कर्तव्य हैं। यदि आप यह नहीं
पशु-शक्ति
१०६
देख सकते तो उस वालकका प्राणान्त कर डालिए अथवा
यदि उसकी मृत्यु आपको अत्यन्त दुखदाई है और आप
उसके इस कर्तव्यको भी नहीं देख सकते तो अपनी ही
हत्या कर डालिए। पर यह जरा कठिन है। यदि आपके
हृदयमें लड़केकी मुहब्बत पराकाष्ठा पर नहीं पहुंच गई है
तो आप लाचार होकर देखते रहिएगा और लड़केको
जलने दीजिएगा। तव आपने क्या देखा। आपने
शक्तिवलका प्रयोग नहीं किया। यह वल क्या है, समझना
पड़ेगा।
स्मरण रखिए, लड़केको वल-पूर्वक रोकनेमें आप
उसकी भलाईका खयाल रखते हैं। उसके फायदेके लिए
आप यह सब कर रहे हैं, पर अँगरेजोंके प्रतिकूल पाशविक
शक्तिके प्रयोगमें ये बातें नहीं हैं। इस हालतमें आप
अपने स्वार्थको सामने रक्खे हुए हैं। आपका जातीय
स्वार्थ है, देशका स्वार्थ है, मातृभूमिका स्वार्थ है। यहाँ
पर दया-प्रेमका प्रश्न नहीं उठता। यदि आप कहें कि
अँगरेजोंकी बुराइयाँ अग्निरूप हैं और अज्ञान-वश उन
बुराइयोंको दोहराते जानेसे वे उसके शिकार बन रहे हैं
और हमारा यह धर्म है कि हम उनकी उससे बालककी
स्वाधीन भारत
भाँति रक्षा करें, तो आपको अपना त्याग भी करना
होगा। बालककी तरह यदि वे नहीं मानते तो आपको
उसका विपरीत परिणाम भोगना होगा। यदि आप
दयाभावसे प्रेरित होकर इतनी यातना सहनेको तैयार हैं
तो वेशक पाशविक शक्तिका प्रयोग आप कर सकते हैं।
सत्रहवाँ परिच्छेद
.
सत्याग्रह
पाठकः-ऐतिहासिक घटनासे कहीं आप दिखला सकते
हैं कि सत्याग्रहको वास्तविक सफलता मिली है। सत्याग्रह
से क्या किसी राष्ट्रकी उन्नति हो सकती है। क्या शारीरिक
दण्ड दिये बिना दुष्ट लोग अपने कामसे बाज आ
सकते हैं।
सम्पादक-महात्मा तुलसीदासने कहा है-"दया धर्म
को मूल है।" इस लिए यावज्जीवन हम लोगोंको दया-
धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। यही सच्चा धर्म है। यही
सत्याग्रह है। इसको हम पग पग पर प्रत्यक्ष देखते हैं ।
बिना इसके विश्व ही स्थिर नहीं रह सकता। पर इसके
लिए आप ऐतिहासिक प्रमाण चाहते हैं। इतिहासमें इन
सब बातोंका मिलना कठिन हैं; क्योंकि उसमें तो केवल
परस्पर युद्धके वृतान्त अरे हैं। उसमें दिखलाया गया है
११२ स्वाधीन भारत वे कि राजाओंने परस्परके वैमनस्यसे एक दूसरेको जानका ग्राहक किस भाँति बनाया। वही दृष्टान्त यह दिखलानेके लिये पर्याप्त है कि यदि संसारमें केवल इतना मात्रही होता रहता तो संसारका अब तक अन्त हो गया होता। यदि संसारका आरम्भ युद्धसे ही हुआ होता तो कदाचित् अव तक उसमें एक मनुष्य भी अवशेष नहीं रह गया होता । जिनके साथ युद्ध किया गया, लापता हो गये; जैसे आष्ट्रोलिया के आदिम निवासी। अव उनमेंसे एकका भी पता नहीं है। कारण कि इन लोगोंने आत्म-बलका अवलम्बन नहीं किया। पर संसार जन-रहित है। अब भी इसमें डेढ़ अरव से अधिक जन वर्तमान हैं। इससे स्पष्ट है कि आत्म- रक्षाके लिये उन्होंने आत्म-वलका प्रयोग किया होगा। भीषण भीषण युद्धोंके होते हुए भी लोग जीवित हैं। सत्याग्रह के प्रयोगका यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। सत्याग्रह ही कितनोंके जीवित रहनेका कारण है। अनेक घरोंके झगड़े इसीके कारण दब जाते हैं। करोड़ों आदमी सुखसे रहते हैं, पर इतिहासको इससे क्या करना है। यदि विचार पूर्वक देखा जाय तो इतिहासमें वे दो
सत्याग्रह
घटनाएँ भरी हैं जहाँ दस शक्तिका लोप हुआ है। इसका
ह्रास हुआ है। देखिए, दो भाई आपस में लड़ जाते
हैं उनमें से एक यह सोचकर कि भाई भाईका युद्ध अच्छा
नहीं, गम खाकर चार वातें सह कर चुप रह जाता है।
दोनामें पुनः वही प्रेमभाव या जाता है और वे शान्तिसे
रहने लगते हैं। किसीको पता भी नहीं लगता कि क्या
हुआ। यह आत्मवलकी बदौलत था।
अब देखिए
दोनों भाई लड़ते हैं और एक दूसरेके जानके ग्राहक हो
जाते हैं। फिर अदालतकी (यह भी एक प्रकारकी पाशविक
शक्ति है) शरण लेते हैं । अखवारवाले भी उनका नोट देने
लगते हैं। यही बात राष्ट्र राष्ट्रके साथ है। क्योंकि जोनियम
कुटुम्बवालोंके लिए है वही नियम राष्ट्र के लिए भी है । इससे
यही विदित होता है कि जहाँ मनुष्य प्राकृतिक नियमका
उल्लंघन करता है उसीका इतिहास उल्लेख करता है । सत्या-
ग्रह प्राकृतिक है, इससे इतिहासमें इसकी चर्चा नहीं है ।
पाठक-आपके कथनसे प्रत्यक्ष है कि सत्याग्रहके
दृष्टान्त इतिहासमें नहीं मिल सकते। इससे सम्यक्रीतिसे
समझ लेना चाहिए। कृपया आप इसकी सविस्तृत मीमांसा
कीजिए।
.
स्वाधीन भारत
सम्पादक-शारीरिक यातना सह कर ही अपने स्वत्वको
प्राप्त करना सत्याग्रह है। जिम कामको करनेके लिए
हमारा अन्तरात्मा रोकता है और उसे हम नहीं करते, यही
सत्याग्रह है। मान लीजिए कि सरकारने हम लोगोंके
लिए कोई नियम बनाया। वह हम लोगोंके अनुकूल नहीं
है। इसके न माननेक दो उपाय हैं, एक तो पाशविक
शक्तिका उपयोग करना और दूसरे इसको न मान कर
निर्धारित दण्डका भागी होना। यही अन्तिम उपाय
सत्याग्रह है।
इस वातको मानने के लिए प्रत्येक व्यक्ति तैयार है कि
आत्मवल सबसे श्रेष्ठ है। और इसमें यातना भी आत्मगत
है। दूसरोंको इसका भागी नहीं बनना पड़ता। सत्याग्रहके
प्रयोगके पूर्व प्रत्येक व्यक्तिको भली भाँति जान लेना चाहिए
कि जिसका वह विरोध करने जा रहा है वह वास्तवमें
असंगत है, क्योंकि कितनी बातें अन्तमें संगत प्रतीत होने
लगती हैं।
पाठक-तो आप नियम पालन नहीं करेंगे। यह
अराजकता है। हम लोग न्याय-प्रियताके लिए विख्यात
हैं। आप तो गर्मदलवालोसे भी बढ़े चढ़े प्रतीत होते हैं।
तो
सत्याग्रह
।
भला वे तो सभी नियमको पालन करनेके लिए तैयार है,
केवल अनुचित नियम बनानेवालोंको किसी प्रकार
निकालना ही उन्हें अभिष्ट है ।
सम्पादक-मैं केवल सत्यका अवलम्बन चाहता हूँ
इसमें यदि मैं गर्मदलवालोंसे भी बढ़कर निकलूं तो कोई
चिन्ता नहीं। हम लोग न्यायप्रिय हैं, इस वाक्यका
वास्तविक अर्थ यह है कि हम लोग सत्याग्रही हैं। कोई
नियम हम लोगोंके अनुकूल नहीं है। इसके लिए हम
लोग निर्माताकी हत्या करना नहीं चाहते । केवल
उसको स्वीकार न कर स्वयं दुःख उठाते हैं। न्यायप्रियके
अर्थ यह नहीं है कि नियम भले हों या बुरे हम उनका
पालन करते रहेंगे। ऐसा कभी भी देखने में नहीं आया
है । प्रायः सभी कालमें लोग प्रतिकूल नियमों को
स्वीकार न कर अनेक तरहकी यातनायें सहते रहे हैं।
प्रकृति तथा इच्छाके प्रतिकूल नियमोंको मानते जाना
मनुष्यताके विपरीत है। इसे दासता कहना चाहिए । यदि
आज यह नियम बना दिया जाय कि प्रत्येक व्यक्ति नंगे
निकलें तो क्या उसका पालन किया जायगा। यदि मुझमें
अात्मवल है तो मैं साफ साफ कह दूंगा कि आपका नियम
स्वाधीन भारत
केवल आपके लिए है, मैं इसको नहीं मान सकता। पर
हम लोग इतने पतित हो गये हैं कि बुरेसे बुरे नियमोंको
पालन करनेसे लिए तैयार रहते हैं।
जिसमें मनुष्यत्व है, वह किसी दूसरेकी परवा नहीं
करता। उसे केवल ईश्वरका भय है। मनुष्य-निर्मित
नियमोंकी वह कोई परवा नहीं करता। सरकार भी ऐसी
आशा नहीं कर सकती। किसी भी नियममें यह नहीं
लिखा है कि इसका पालन करना ही पड़ेगा, केवल इतना
ही लिखा रहता है कि इनकी अवज्ञाका परिणाम शारीरिक
दण्ड होगा। पर हम लोग इतने पतित हो गये हैं कि उनको
पालना ही अपना धर्म समझते हैं। यदि हम लोग इस
वातको समझ लें कि असंगत नियमोंको पालनेके लिए
हमारा अन्तरात्मा बाधित नहीं करता तो हम लोम बहुत
कुछ स्वतन्त्र हो सकते हैं। यही आत्मवल या सत्याग्रहका
मूलमन्त्र है।
अधिक सम्मतिसे जो बात निश्चय हो गई उसे प्रत्येक
व्यक्तिको मानना पड़ेगा, यह भूल है। ऐसे कितने ही
प्रमाण हैं जहाँ पर अधिक सम्मतिने भूलें की है। जितने
सुधार हैं प्रायः सभीकी जड़ कम सम्मतिवाले ही होते
सत्याग्रह
हैं । उन्हीके लगातार दवावस अधिक सम्मतिवालों
को दवना पड़ता है। मान लीजिए कि डाकू होने के लिए
डाका मारनेकी विद्या आवश्यक है तो क्या पण्डितको भी
उस सीखना चाहिए।
जब तक हम लोग अपने दिल
से यह वात दूर नहीं करते कि प्रत्येक नियमका पालन
करना यावश्यक है, हम लोग दासतासे मुक्त नहीं हो
सकत। इस विश्वासको मिटाने के लिए सत्याग्रहही एक
मात्र यब है।
पाशविक बलका प्रयोग, गोल-बारूदका प्रयोग सत्याग्रह
के नियमके विरुद्ध है। इससे विदित होता है कि हम लाग
अपने प्रतिद्वन्दीस कुछ कराना चाहते हैं और उसके करने में
वह आनाकानी करता है। इस लिए हम लोग पाशविक
शक्तिका प्रयोग करते हैं । यदि इस शक्तिका प्रयोग हम लोगों
की ओरसे समुचित है तो उसका प्रयोग करना उसके लिए
भी ठीक है। इससे हम लोगोंमें मत-भेद बना रहेगा।
तेलीके बैलकी भाँति हम लोग आँख बन्द कर कोल्हूके
चारों ओर लगातार चार लगाया करें और उन्नतिका
स्वप्न देखा करें। यदि किसी निर्मित नियमको पालन करने-
सेहमारा अन्तरात्मा रोकता है तो हमें केवल सत्याग्रहसे.
स्वाधीन भारत
काम लेना चाहिए। किसी अन्य शक्तिका उपयोग
हानिकर है।
पाठक-यापके कथनसे विदित होता है कि जब तक
कोई शक्ति कमजोर है वह सत्याग्रहसे काम ले, पर वलिष्ट
हो जाने पर वह शब ग्रहण कर सकती है।
सम्पादक-आपने बिलकुल गलत समझा । सत्याग्रहका
कोई मुकाबिला नहीं कर सकता। शत्रकी शक्तिसे वह
कहीं बढ़ कर है। उसे दुर्बलोंका प्रख कैसे कह सकते हैं।
जो लोग बल-शक्तिमें भूले हैं उन्हें सत्याग्रहके महत्त्वका
ज्ञान ही नहीं है। भला कभी डरपोक आदमी भी किसी
नियमको न पालन करनेका साहस कर सकता है। गरम
दलवालोंको लोग पाशविक शक्तिका पक्षपाती बतलाते हैं।
पर नियम पालन वे भी सिखलात है। मैं उन्हें दोपी नहीं
ठहराता। वे कर ही क्या सकते हैं। यदि इस भाँति
वे अँगरेजोंको निकाल कर आप शासक बन सके तो अपने
नियमोंका हम लोगोंसे पालन करानेका प्रयत्न करेंगे। यही
उनके शासन-पद्धतिके अनुरूप हैं। पर सत्याग्रही जान
पर आपड़ने पर भी अनुचित नियमोंका पालन करनेके
लिए तैयार नहीं होगा।
सत्याग्रह
आपकी सम्मतिमें अधिक साहसी कौन है। वह जो
तोपसे दूसरोंको उड़ा देता है या वह जो मुस्कराता हुआ
निर्भय तोपके सामने जाकर अपनेको कुर्बान कर देता है।
एक मनुष्य मृत्युको अपना चिर सहचर मान कर उसे गले
लगानको दौड़ता है, और दूसरेके हाथमें अनेकोंकी मृत्युकी
लगाम है। दोनोंमेंसे कौन सच्चा वीर कहलाएगा।
जिसमें शक्ति, साहस तथा मनुष्यत्व नहीं है वह सत्याग्रही
होने के योग्य नहीं है।
शारीरिक बलकी इसमें कोई आवश्यकता नहीं है।
प्रत्येक व्यक्ति यदि चाहे तो इसका प्रयोग कर सकता है।
स्त्री, तथा पुरुष दोनोंके लिए यह खुला है। इसके लिए
शिक्षाकी आवश्यकता नहीं है । केवल संयम होना चाहिए ।
फिर क्या, शत्रु कभी भी सामने आनेका साहस नहीं
कर सकता।
सत्याग्रह दो धारवाली तलवार है। उसका किसी भाँति
भी उपयोग किया जा सकता है। यह प्रयोज्य तथा
प्रयोजक दोनोंके लिए लाभकारी है। बिना रक्तपातके यह
असम्भाव्य परिणाम उत्पन्न करती है। यह भोठी नहीं हो
सकती न और चुराई जा सकती है। स्पर्धास भी इसमें
१२०
स्वाधीन भारत
क्षतिकी सम्भावना नहीं है। इसको रखनेके लिए किसी
अलग म्यानकी आवश्यकता नहीं।
पाठक-आपने कहा है कि सत्याग्रह केवल भारतकी
विशेष शक्ति है। क्या यहाँ शखका प्रयोग नहीं हुआ था ।
सम्पादक-भारतसे आपका अभिप्राय उन गिने गिनाये
राजाओंसे है, पर मेरा अभिप्राय उन जन-समुदायसे है जिन
पर उन राजाओंकी स्थिति निर्भर है।
राजा लोग सदा पशु-शक्तिका प्रयोग करेंगे, क्योंकि वे
उसीमें उत्पन्न हुए हैं। उनको हुकूमत करनेकी व्याधि लग
गई है। पर जिनको उनकी आज्ञाओंका पालन करना है
वे शस्त्रका प्रयोग नहीं चाहते। संसारमें इन्हींकी अधिकता
है। इनके सामने दोनों शक्तियाँ उपस्थित हैं। यदि इन्होंने
पशु-शक्तिका आश्रय लिया तो दोनों गये । पर जहाँ उन्होंने
सत्याग्रहका आश्रय लिया कि उनकी विजय हुई। किसानों
को आज तक न तो किसीने तलवारके बल दवा पाया है,
न दबा पावेगा। वे लोग शस्त्रका प्रयोग नहीं जानते,
इससे उससे डरते भी नहीं। जो राष्ट्र मृत्युसे भयभीत
नहीं होता उसे सर्वोच्च मानना चाहिए। भारतकी जनता
ने प्रायः सभी अवस्थाओंमें सत्याग्रहका उपयोग किया है।
सत्याग्रह
शासकोंने अनुचित व्यवहार किया। जनताने उनका साथ
नहीं दिया। यही सत्याग्रह है।
किसी ग्रामके निवासी अनुचित राजाज्ञासे दुखी थे !
वे ग्राम छोड़ कर जाने लगे। राजाको जब यह विदित
हुबा तब वह घबड़ाया और उनके पास गया। अपने
कियेके लिए उसने उनसे क्षमा माँगी और अपनी आज्ञाको
उठा लिया। भारत में ऐसे अनेक उदाहरण वर्तमान हैं।
सत्याग्रह के सहारे चलनेवाली जाति ही वास्तविक स्वराज्य
की अधिकारिणी हो सकती है। वहाँ दूसरा शासन नहीं
चल सकता।
पाटल-तो शारीरिक बल बढ़ानेकी कोई यावश्यकता
नहीं है।
सम्पादक-मेरा यह अभिप्राय नहीं है। विना इसके
सत्याग्रही होना भी असम्भव है। शारीरिक दुर्बलताके
साथ मानसिक दुर्बलता भी आ जाती है। मानसिक
बलके विना आत्मबल नहीं रह सकता। वाल-विवाह
तथा विलास-प्रियताको दूर कर हमें शारीरिक वल बढ़ाना
होगा। दुर्वल मनुष्यको इतना साहस कहाँ से हो सकता
कि वह तोपका सामना कर सके ।
Kitc'
१२२ स्वाधीन भारत पाठक-सत्याग्रही होना सहज नहीं प्रतीत होता। मैं जानना चाहता हूँ कि मनुष्य सत्याग्रही कैले हो सकता है। सम्पादक-सत्याग्रही वनना यदि कठिन नहीं तो सरल भी नहीं है । मैंने एक चौदह वर्पके बालकको कट्टर सत्याग्रही वनते देखा है। बीमारोंको मैंने सत्याग्रह व्रत लेते देखा है। साथ ही साथ बड़े बड़े बलवानोंको इसके नामसे डरते देखा है। इन सब बातोंसे अनुभव कर मैंने देखा है कि देशसेवाके लिए सत्याग्रह व्रत धारण करनेमें चार बातें आवश्यक हैं:-(१) सदाचार, (२) दरिद्रता, (३) सत्यपालन, (४) निर्भीकता। सदाचरणके बिना मानसिक वल नहीं हो सकता। व्यभिचारी मनुष्य दुर्वल हृदयका होता है। उससे कोई महत्त्वका काम नहीं हो सकता। इसके अनेक प्रमाण वर्तमान हैं। अब प्रश्र यह उठता है कि विवाहित मनुष्य इस व्रतको ले सकता है या नहीं। शास्त्रानुसार विवाह- सम्बन्ध, केवल सन्तानोत्पत्तिके लिए है। स्त्रीके साथ भी अधिक प्रसंग करना मना है। पर सत्याग्रहीको नियमित संसर्गको भी त्यागना होगा। उसे सन्ततिकी अभिलाषा त्यागना होगा। इस प्रश्न पर अधिक नहीं कहा जा सकता, सत्याग्रह १२३ क्योंकि इसके साथ अनेक प्रासंगिक प्रश्न उठ सकते हैं और यहीं पर सवका उत्तर देना कठिन है। पर जो लोग सत्याग्रह-व्रत ग्रहण करना चाहते हैं उन्हें सब बातोंको विधिवत् समझ लेना होगा। दरिद्रता भी सत्याग्रहका एक अंग है। धनकी लालसा तथा सत्याग्रहमें परस्पर विद्रोह है। जिनके पास द्रव्य है उन्हें फेंक देने की शिक्षा नहीं दी जाती, पर उन्हें लापरवाह होना पड़ेगा। पाई पाईको गँवा देने के लिए तैयार होना पड़ेगा। सत्याग्रह शब्दक अर्थ ही सत्य पर चलनेके होते हैं। इससे सत्यता इसका प्रधान अंग है। इससे सत्याग्रहीको प्रत्येक भाँति सत्य पालनके लिए कटिबद्ध होना चाहिए । अव यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि प्राण-रक्षाके लिए झूठ चोलना चाहिए या नहीं। सत्याग्रहीको किसी भी अवस्था में झूठका नाम नहीं लेना चाहिए । निर्भीकताके विना सत्याग्रही एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। निडर मनुष्य ही सत्याग्रहके मार्ग पर अटल रह सकते हैं। जिन्हें न घर-द्वारकी परवा है, न मान-
१२४
स्वाधीन भारत
आदरका खयाल है, नधन-दौलतकी चाह है और न मृत्युसे
भय है वही सच्चे सत्याग्रही हो सकते हैं।
कष्टसाध्य मान कर इनका त्याग निषिद्ध है। ईश्वरने
मनुष्यमें वह शक्ति दी है कि वह सारी आपदाओंका
सामना कर सकता है। जिन्हें देश-सेवासे विशेष रुचि
नहीं है उनमें भी ये गुण होने चाहिए। योद्धा होना केवल
इच्छा मात्रसे नहीं हो सकता। बिना इन चारों गुणोंके
वह भी वास्तविक शक्ति नहीं पा सकता। किसी तरहके
भयसे प्रेरित होकर ही मनुष्य सच्चाईसे मुँह मोड़ता है।
पाशविक बल पर भरोसा रखनेवालेको और कितनी व्यर्थ
बातोंकी आवश्यकता होती है जिनसे सत्याग्रही बचा है।
केवल निर्भीकताकी कमीसे ही अस्त्र-शस्त्रका अधिक प्रयोग
आवश्यक होता है। निर्भय मनुष्यके लिए अस्त्र-शस्त्रादि
व्यर्थ हैं।
अठारहवाँ परिच्छेद
शिक्षा
पाठक- आपने शिक्षाकी आवश्यकता कहीं नहीं
बतलाई। प्रत्येक व्यक्तिसे उसकी कमीकी शिकायत सुनने
में आती है। दशमें प्रारम्भिक शिक्षाका प्रवन्ध हो रहा
है। महाराज बड़ादाने अपने राज्यमें इसका प्रचार भी
किया है। इस महान् कार्यके लिए सब लोग महाराजाकी
मुक्तकण्ठसे प्रशंसा करते हैं, इसके वारेमें आपका क्या
मत हैं।
सम्पादक-यदि हमारी सभ्यता सर्वोच्च है तो इस
प्रयासका अधिकतर भाग व्यर्थ है। महाराजा तथा अन्य
नेताओं का प्रयास अवश्य सराहनीय है। पर इससे क्या
परिणाम निकलेगा वह भी छिपा नहीं रह सकता।
"शिक्षा" शब्दसे क्या बोध होता है। इसके माने
अक्षरका ज्ञान है। यह भी एक प्रकारका यन्त्र है। इसका
स्वाधीन भारत इन बातोंको वतला इससे न तो हम लोग वास्तविक मनुष्य बन सकते हैं और न भले प्रकार अपना धर्म ही पाल सकते हैं। पाठक-पर यदि आपको उच्च शिक्षा नहीं मिली होती तो आप इस तरह हम लोगोंसे बातें कैसे कर सकते और सकते। सम्पादक-आपका प्रश्न यथार्थ है। उत्तरमें मुझे कहना है कि प्रारम्भिक अथवा उच्च शिक्षाके बिना मेरे जीवन में जरा भी अन्तर न आया होता। और आपको ये बातें बतलाने में मैं कोई देश-सेवा नहीं कर रहा हूँ। मुझमें देश- सेवाकी इच्छा है, इससे मैं प्राप्त शिक्षाका उपयोग कर रहा हूँ। पर इससे कितनोंको लाभ हो रहा है। केवल तुम्हें । तो उस शिक्षाका कितना थोड़ा उपयोग हुआ। हम तुम दोनोंको अप्राकृतिक शिक्षाकी बू लग गई है। मैं उससे मुक्त हो चुका हूँ और अपने अनुभवका लाभ तुम्हें पहुँचा रहा हूँ। उसीके वर्णनमें मैं तुम्हें शिक्षाकी हीनता दिखला पर मेरे कहनेका तात्पर्य यह नहीं है कि अक्षरका ज्ञान बुरा है। मेरे कहनेका तात्पर्य केवल यह है कि हमें उसके पीछे पागल नहीं हो जाना चाहिए। उसे कामधेनु नहीं
शिक्षा
१२६
समझ लेना चाहिए। उससे लाभ भी वहुत हो सकता है।
इन्द्रियोंको वश करनेमें हम लोगोंको इससे विशेष सहायता
मिली है। ऐसी शिक्षाले हम लोग अवश्य लाभ उठा
सकते हैं। यह भी एक प्रकारका आभूपण है। पर
इस सार्वजनिक करनेकी आवश्यकता नहीं है। प्राचीन
प्रणाली पर ही शिक्षा होना पर्याप्त है। सदाचारकी
शिक्षाको प्रधानता देनी चाहिए और इसे ही सार्वजनिक
बनाना चाहिए। इसीकी जड़ पुष्ट करनी चाहिए।
पाठक स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए अँगरेजी शिक्षा भी
अनावश्यक है ?
सम्पादक-इसके दो उत्तर हो सकते हैं । सर्व-साधारण
को अँगरेजी भाषाकी शिक्षा देना, उन्हें वास्तवमें दास
बनाना है। मेकालने जिस शिक्षाका प्रचार किया उससे
हम लोग दास बन गये। मेरे कथनका यह तात्पर्य नहीं
है कि उन्होंने जान बूझ कर ऐसा किया, पर उसका परिणाम
यही हुआ। क्या यह शोककी बात नहीं है कि स्वराज्यकी
चर्चा भी हम लोग विदेशी भापामें करते हैं।
जो शिक्षा-प्रणाली हम लोगों में प्रचलित थी, उसको
यूरोपवाले ने घृणित तथा निन्दित बताकर उठा दिया है।
.
स्वाधोन सारत भाषाओंकी शिक्षा दें, युवा होने पर वे लोग अँगरेजी भी पढ़ लें, पर उसे आवश्यक या अपना अंग नहीं बनाना चाहिए। इतनी अँगरेजी पढ़ने में भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसके द्वारा कौन कौन बातें जाननी होंगी। यदि विचार कर देखिए तो आपको विदित होगा कि अँगरेजी डिग्रीकी तरफसे यदि हमलोग मुँह मोड़ लें तो हमारी सरकार भी चौकन्नी होने लगेगी। पाठक हम लोगोंको कैसी शिक्षा मिलनी चाहिए ? सम्पादक:-यहाँ तक इसी बात पर विचार होता आया है। इसकी थोड़ी चर्चा और करनी चाहिए । हमको प्रत्येक भारतीय भापाकी उन्नति करनी चाहिए। देशी भाषा द्वारा किन किन विपयोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, यहाँ बत- लाना आवश्यक नहीं है। उपयोगी अँगरेजी पुस्तकोंका देशी भाषाओंमें अनुवाद होना चाहिए। विविध विज्ञानके अध्ययनकी अभिलाषा त्याग देनी चाहिए। धार्मिक शिक्षाको उच्चतम स्थान देना चाहिए। हिन्दीका ज्ञान सबको प्राप्त करना चाहिए। इसके अतिरिक्त हिन्दूको संस्कृत, मुसलमानको अरबी और पारसीको फारसी भाषा जाननी चाहिए। इसके अतिरिक्त उपर्युक्त भाषाओंका
शिक्षा
भी परस्पर प्रचार होना चाहिए। राष्ट्रभाषा हिन्दी होनी
चाहिए, चाहे वह देवनागरी या फारसी अक्षरोंमें लिखी
जाय | हिन्दू-मुसलमानोंकी घनिष्टताके लिए दोनों
वर्णमालाओंका ज्ञान आवश्यक है। यदि इतना हो सके
तो अँगरेजी भाषा वातकी वातमें यहाँ से विदा हो सकती
है। अपनेको तथा राष्ट्रको दासतासे मुक्त करनेके लिए
यह आवश्यक है।
पाठक-धार्मिक शिक्षाका प्रश्न विकट है।
[सम्पादयः-पर धार्मिक शिक्षाके विना काम नहीं चल
सकता। यह देवभूमि है। नास्तिकताका प्रचार यहाँ
नहीं हो सकता। धार्मिक शिक्षाका प्रश्न मुझे भी चक्कर में
डाल देता है। हम लोगों के धार्मिक शिक्षक दम्भी और
स्वार्थी हैं। धर्मकी कुली हमारे यहाँ ब्राह्मणों, मुल्लों तथा
दस्तूरोंके हाथ है। हमें उन्हें समझाना होगा। यदि वे
नहीं समझेंगे तो अँगरेजी शिक्षासे प्राप्त शक्तिको इसी
काममें लगाना होगा। यह साध्य है। केवल हम लोगोंका
बाह्य भाग खराब हो गया है। उसीको ठीक करना है।
भाग गिने गिनाये हैं। इनका सुधार सहजमें हो सकता
है। अपनी प्राचीन सभ्यता ग्रहण करना ही भारतके
ये
स्वाधीन भारत
,
लिए श्रेयस्कर है। उसमें भी उन्नति, अवनति, सुधार
होते रहेंगे। पर यदि एकत्र प्रयत्नसे हम लोग पश्चिमी
सभ्यताको उखाड़ कर दूर फेंक दें तो सब काम होता
रहेगा।
उन्नीसवाँ परिच्छेद
मशीनरी या यन्त्र
पाठक-जब पश्चिमी सभ्यताको आप यहाँसे उखाड़
कर फेंक देना चाहते हैं तो आप मशीनों ( यन्त्रों) को भी
अनावश्यक समझते हैं।
सम्पादक-इस प्रश्नको उठा कर आपने मेरे दिलमें कड़ी
चोट पहुँचाई। स्व. रमेशचंद्रदत्तके 'भारतके आर्थिक
इतिहासका दिग्दर्शन' पढ़ कर मैं खूब रोया था। आज
उसीका स्मरण कर मेरा कलेजा कांप उठा। यन्त्रोंने ही
भारतको गारत किया। माश्चेष्टरने जो क्षति हम लोगोंको
पहुँचाई है वह कथनके बाहर है। माञ्चेष्टरकी करतूतसे
ही भारतकी कारीगरीका लोप हुआ ।
पर माञ्चेष्टरको व्यर्थ दोप क्यों दिया जाय। सारा
दोप हम लोगोंका है। माञ्चेष्टरके बने कपड़े हम लोग
पहनने लगे, इसीसे वे लोग उन्हें वना-बना कर यहाँ भेजने
स्वाधीन भारत
लगे। जिस समय वङ्गालने वहिष्कारकी घोपणा की थी,
हृदयसे प्रसन्न हुआ था। बङ्गालमें कपड़ेके कारखाने
नहीं रह गये, इसी लिए वहाँ कारीगरोंका प्रचार हो सका
है। बंगालने बम्बईके मिलवालोंको उत्साहित किया है।
यदि बंगाल सभी तरहसे मशीनके बने कपड़ोंका वहिष्कार
किये होता तो बड़ा भारी काम हुआ होता।
मशीनरी अव यूरोपका भी सर्वनाश कर रही है।
आधुनिक सभ्यताका विशिष्ट चिह्न यही यन्त्र हैं। इन्हें
पापका बोझ समझना चाहिए ।
चम्बई-मिलोंके कर्मचारी (कुली) गुलामोंसे भी बत्तर
हो गये हैं। मिलोमें काम करनेवाली स्त्रियोंकी दशा अति
शोचनीय है। जिस समय मिलें नहीं थीं तो क्या ये स्त्रियाँ
भूखों मरती थीं। यदि मशीनोकी इसी तरह बढ़ती होती
रही तो भारतसे सुख-शान्ति सदाके लिए कूच कर जायगी।
इससे अच्छा तो यही है कि हम लोग जन्मभर माञ्चेष्टरके
बने कपड़े ही पहनते रहें । माञ्चेष्टरके वन कपड़ोंको पहनने
से केवल द्रव्यकी हानि होगी, पर भारतको माञ्चेष्टर
बनानेने यहाँका आचरण लुप हो जायगा और इसका
उदाहरण मैं वर्तमान मिलोंको देता हूँ। विदेशियोंकी
मशीनरी या यन्त्र भाँति यहाँ भी धनी होने के लिए अनेक तरह के अत्याचार किये जायेंगे। दरिद्र भारत तो कभी न कभी स्वतन्त्र क्रिया भी जा सकेगा, पर आचरण-भ्रष्ट भारत कभी भी स्वतन्त्र नहीं हो सकता। आपको यह मानना पड़ेगा कि रुपयेवाले ही ब्रिटिश शासनको स्थिर रखना चाहते हैं। क्योंकि इसीमें वे अपनी भलाई समझते हैं। द्रव्य मनुष्य को लाचार बना देता है। दूसरा भय व्यभिचारका है। इन दोनों को विप समझिए। सर्पदंशसे भी इनको भयंकर समझिए। सर्पदंश तो केवल शरीरका नाश करके रह जाता है, पर उनसे तो शरीर तथा आत्मा दोनोंका नाश हो जाता है। इस लिए मिलोंकी बढ़तीका खयाल कर प्रसन्न होना ठीक नहीं है। पाठक तो फिर मिलोंको वन्द कर देना चाहिए । सम्पादक-जो बात एक बार हो गई उसे मिटाना कठिन है। किसी कार्यका अनारम्भ ही श्रेष्ट है। मिल- वालोंकी में निंदा नरहीं करता। केवल उनकी दशा पर तसे आता है। मिलोंको बन्द करना तो असम्भव है। पर उनके मालिकोंसे प्रार्थना करना चाहिए कि अब वे उन्हें वढ़ावे नहीं। यदि वे धीरे धीरे अपने कामको कम करते स्वाधीन भारत जायँ तो उनकी और भी कृपा होगी। वे लोग घर घर करगह खोलवा कर कपड़े विनवा सकते हैं। चाहे मिल- वाले यह न भी करें तो भी जनता मिलके बने कपड़ोंको त्याग सकती है। पाठक-आप केवल कलके वने कपड़ोंकी बातें यह रहे हैं, पर कलकी बनी तो अनेक चीजें हैं। उन चीजोंको या तो हम लोग बाहरसे मँगावें या उनके बनाने के लिए मशीनें मँगावें। सम्पादक-जब हम लोगोंके देवता ही विदेशसे वन कर आते हैं तो सुई, दियासलाई आदिकी कौन कहे। मैं एक बात पूछता हूँ। इन वस्तुओंके प्रचारके पूर्व भारतका काम कैसे चलता था। जैसे तब चलता था वैसे अव भी चल सकता है। जब तक हम लोग विना कलके आलपिन नहीं बना सकते तब तक हम लोग उसका प्रयोग ही नहीं करेंगे। शीशे इत्यादिकी वस्तुओंका प्रयोग ही हम लोछ देंगे । बत्ती हम लोग पहलेकी तरह रुईकी बना लेंगे और मिट्टीका दिया जलावेंगे। इससे आशातीत लाभ होगा। एक तो हम लोगोंकी आँखें अच्छी रहेंगी, दूसरे रुपया बचेगा, तीसरे स्वदेशीका प्रचार होगा और इसीसे स्वराज्य मिलेगा।
मशीनरी या यन्त्र
सभी लोग एकदससे इस कामको नहीं करने लग
जायँगे और न सब लोग एकदम मिलके बने कपड़े पहनना
छोड़ देंगे। पर यदि हम लोगोंका विचार दृढ़ है तो धीरे
धीरे उसकी सिद्धि हो जायगी। देखा-देखी सभी वही
करने लग जायेंगे। सर्व-साधारण तो नेता लोगोंका
अनु-
करण करनेका प्रयास करते हैं। यह बात बहुत कठिन भी
नहीं है। दूसरोंको अपने पक्षमें लानेके लिए रुके रहनेकी
कोई आवश्यकता नहीं है। जो लोग इसपर नहीं चलेंगे
उन्हें क्षति उठाना पड़ेगी और जो लोग इसके लाभको
जान कर भी इसका अवलम्बन नहीं करेंगे वे वुजदिल
कहलावेंगे।
पाठक-ट्राम्चे तथा बिजलीके बारेमें आपका क्या मत है ।
सम्पादक-यदि रेलके बिना हमारा काम चल सकता है
तो दाम्बेकी हमें विशेप आवश्यकता नहीं। कलकारखानों-
को साँपका विल ही समझना चाहिए। इसके साथ अनेक
आपदायें हैं। कल-कारखाने बड़े बड़े शहरों में ही रहते हैं।
जहाँ बड़े बड़े शहर होंगे वहाँ रेलगाड़ी तथा ट्राम्बे आदिका
रहना आवश्यक है। विलायतके ग्रामोंमें ये बातें नहीं हैं।
जहाँ इन वातोंकी वृद्धि हुई है जनताका स्वास्थ्य बिगड़ने
१४०
स्वाधीन भारत
लगा है। मुझे एक यूरोपके ग्रामका अनुभव है। उसमें
रुपयेकी कमीके कारण ट्राम्वे, वकील, डाक्टर सभीकी
आमदनीमें कमी पड़ने लगी । परिणाम यह हुआ कि सब ही
अच्छे स्वस्थ दिखलाई पड़ने लगे। इनके बारेमें एक भी
अच्छी वात मेरी स्मरणमें नहीं आती। इनकी बुराइयोंकी
गाथासे मोटी मोटी जिल्दें तैयार हो सकती हैं।
पाठक-जो कुछ आप कह रहे हैं यन्त्रमें ही छापा
जायगा। यह अच्छा है या बुरा ।
सम्पादक-नीतिमें कहा है विष विषको मारता है।
उपयुक्त कथन भी उसीका उदाहरण है। पर इससे
यन्त्रोंके पक्षका समर्थन नहीं हो सकता। यन्त्रोंसे केवल
उन्हींको लाभ हो सकता है जो उसके नशेमें पड़ गये
हैं। यन्त्रोंका प्रयोग हमेशा हानिकारक है। इस बातको
लक्ष्यमें रख कर ही हम लोग कुछ कर सकेंगे। एकदम
अभीष्ट सिद्धिके लिए कोई मार्ग नहीं बना है। यदि यन्त्रोंको
भाग्योदयका कारण न मान कर उन्हें हानिकारक समझा
जाय तो किसी न किसी दिन उनका अस्तित्व भी नष्ट
अवश्य हो जायगा।
वीसवाँ परिन्छेद
परिशिष्ट
पाठक-मुझे विदित होता है कि आप एक तीसरा दल
वनावेंगे। आपके मत न तो नरम दलवालोंसे मिलते हैं
और न गरमदलवालासे मिलते हैं।
सम्पादक-यहाँ पर भी थाप भ्रममें हैं। मैं कोई दल
नहीं बनाना चाहता। सब एक मतके नहीं हो सकते।
नरम दलवालोंमें ही मत भेद होगा। जब सबका उद्देश्य
देश-सेवा है तो दलवन्दीकी क्या आवश्यकता है। मैं तो
दोनोंके साथ हूँ, जहाँ मत-सेद होगा मैं अपना मत प्रगट
कर दूंगा।
पाठक-श्राप दोनों दलोंसे क्या कहिएगा।
सम्पादक-गरमदलवालोंसे मेरा वक्तव्य होगा कि आप
भारत के लिए स्वराज्य चाहते हैं। वह माँगनेसे नहीं मिल
सकता। सवको उसके पानेका प्रयत्न करना होगा। जो
,
१४२ स्वाधीन भारत कुछ दूसरे हमें दिलावेंगे वह स्वराज्य नहीं होगा, बल्कि विराज्य होगा। मैंने स्वराज्यके मूलतत्त्वोंका वर्णन किया है। उसकी प्राप्ति शस्त्र-बलसे नहीं हो सकता। भारत- की स्थितिके लिए पाशविक शक्ति अनुकूल नहीं है। इस लिए आत्मवल पर ही भरोसा रखना होगा। अपनी मनोरथ-सिद्धिके लिए खून-खरावीकी हमें कहीं भी जरूरत नहीं पड़ेगी। नरमदलवालोंसे मेरा वक्तव्य है केवल मिन्नतसे काम नहीं चल सकता। इससे केवल दुर्बलता प्रगट होती है। ब्रिटिश शासनको अनिवार्य मानना नास्तिकता है, क्योंकि ईश्वरके अतिरिक्त इस संसारमें कोई वस्तु अनिवार्य नहीं हैं और बृटिश शासनकी अनिवार्यता पर जोर देना अँगरेजोंमें दम्भ लाना है। अँगरेजोंके चले जानेसे भारत दीन नहीं हो सकता । यह सम्भव है कि दवावसे जो लोग दवे हैं उनके चले जाने से उपद्रव मचाने लगेंगे, पर दिलका गुब्बार निकाल देना ही अच्छा है, उसे दबानेसे कोई लाभ नहीं, यदि शान्तिके पूर्व युद्ध होना अनिवार्य है तो लड़ लेना ही अच्छा है। दुर्बलकी रक्षाके लिए तीसरे दलकी आवश्यकता नहीं
परिशिष्ट
है। इसीने तो हम लोगोंको कमजोर बना दिया। इस
तरहकी रक्षासे दुर्वल दुर्बल ही होता जायगा। जवतक
इन बातोंका हम लोगोंको पूरा ज्ञान नहीं होगा, स्वराज्य
मिलना कठिन है। किसी अँगरेज पादरीका मत है कि
विदेशी शासनसे स्थापित शान्तिसे स्वराज्यमें अराजकता
कहीं अच्छी है।
यदि उपर्युक्त विचारसे काम किया जाय तो मत-भेद
उठ जायगा और दोनों दल एक हो जायेंगे। परस्पर
अविश्वासका कोई कारण नहीं है।
पाठक-अँगरेजोंसे आप क्या कहिएगा।
सम्पादक-उनसे मेरा यह वक्तव्य है-आपको हम
अपना शासक मानते हैं। इस बातकी बहस हम आपसे
नहीं करना चाहते कि भारत पर आपने बलसे अधिकार
जमाया या हम लोगोंकी रायसे । आप भले ही यहाँ रहें,
पर आपको कर्मचारियोंकी भाँति रहना पड़ेगा। आप
मनमाना कोई काम नहीं कर सकते। हम लोगोंकी
इच्छाका आपको अनुसरण करना पड़ेगा। जहाँ तक लूट
सके इसे आपने लूटा, अब आप इसपर हाथ नहीं लगा
आपका काम भारतकी रक्षा होगा। व्यापारिक
सकते ।
स्वाधीन भारत आज- लाभका खयाल भी छोड़ देना होगा। आपको सभ्यताको हम लोग हवशीयन समझते हैं। पूर्वीय सभ्यता आपकी -सभ्यतासे कहीं उच्च कोटिकी है। हमारे धर्मके प्रतिकूल आप कोई काम नहीं कर सकते । भारतमें रह कर आपका कर्तव्य है कि हिन्दू तथा मुसलमानोंको सन्तुष्ट रखने के लिए आप गौ तथा सूअरका मांस खाना छोड़ दें। तक वेकसीकी हालतमें हम लोग चुपचाप पड़े रहे, इससे यह मत समझिएगा कि अपने इन कर्तव्योंसे आपने मेरी अन्तरात्माको पीड़ा नहीं दी है। आपकी शिक्षा प्रणाली तथा न्यायालयोंको हम लोग वाहियात समझते हैं। हम लोग अपनी प्राचीन प्रणाली चलाना चाहते हैं। भारतकी राष्ट्रभाषा अँगरेजी नहीं, बल्कि हिन्दी है। आपको हिन्दी सीखना चाहिए। आपको इसी भाषामें कामकाज करना चाहिए। आप फौज तथा रेलोंमें मनमाना द्रव्य नहीं लगा सकते। दोनोंमेंसे एककी भी आवश्यकता हमें नहीं है। कदाचित् आपको रूसका भय हो, पर हम लोग किसीकी परवा नहीं करते। जिस समय वे लोग आवेंगे हम देख लेंगे। विदेशी कपड़ोंको हम लोग नहीं चाहते। अबसे
परिशिष्ट
हम लोग स्वदेशी वस्त्रका ही प्रयोग करेंगे। आपको
मान्चेष्टरका खयाल छोड़ना पड़ेगा।
"उपर्युक्त वातें उन्मादमें नहीं कही जा रही हैं। हम
लोग जानते हैं कि आपके पास बड़ी फौज है, वेड़ा है।
आपसे लड़कर हम लोग पार नहीं पा सकते । पर इससे क्या ?
यदि आपको हम लोगोंकी बातें स्वीकार नहीं हैं तो हम
लोग आपसे कुट्टी कर लेते हैं। आप हम लोगों पर गोले
वरसवाइए, बोटी बोटी करके धज्जियाँ उड़वा डालिए।
पर हम लोग एक नहीं माननेवाले हैं। आपसे मुंह मोड़
लेगें। आप जानते ही हैं कि हम लोगोंकी सहायताके
बिना आप हिल तक नहीं सकतं ।"
शक्तिके मदमें चूर हुए आप लोग कदाचित् इसे
प्रलाप सममें; आपकी मोहनिद्रा शीघ्र नहीं टूट सके।
पर यदि हम लोगों में मनुष्यत्व है तो आपको शीघ्र ही
विदित हो जायगा कि इस मोहसे क्या हानि हो सकती है
और दूसरोंके माथे खेलनेका क्या फल होता है। आपका
हृदय धार्मिक भावोंसे भरा है। यह देश धर्मक्षेत्र है।
चाहे किसी कारणसे क्यों न हुआ हो, हम लोग चाहें तो
इस परस्परके सम्बन्धसे दोनोंका लाभ हो सकता है।
स्वाधीन भारत
जो अँगरेज भारतमें आ गये है वे सच्चे अँगरेज नहीं
हैं, और हम भारतवासियोंमें आधीसे अधिक अँगरेजियत
आ गई है, इससे हम लोग भी सच्चे भारतीय नहीं कहे
जा सकते। यदि अंगरेज जातिको आपकी करतूतोंका
सच्चा पता चल जाय तो उसे घृणा तथा लज्जा होगी।
साधारण हिन्दुस्तानियोंसे आपका वास्ता ही नहीं पड़ता।
यदि पश्चिमी सभ्यताके नशेको दूर कर आप वाइविलमें
ढूंढ़िए तो आपको विदित होगा कि हम लोगोंकी माँग
यथार्थ है। केवल लोगोंकी माँग पूरी करने पर ही आपका
यहाँ रहना हो सकता है। इसमें दोनोंका लाभ है। और
हम लोग मिल कर संकारका भी बहुत काम कर सकते हैं ।
‘पर सबका मूल कारण हम लोगोंके सम्बन्धकी स्थिरता है।
पाठक-जातिके प्रति आपका क्या वक्तव्य है ।
सम्पादक-जाति कहाँ है।
पाठक-वर्तमान जातिसे ही मेरा अभिप्राय है।
सम्पादक-इन लोगोंसे मेरा कहना है भारतके सच्चे
सपूत वही हैं जो निडर होकर अपना स्वत्व अँगरेजोंसे
माँग सकते हैं और यह उनके ही सामर्थ्य में है जो इस
बातको मानते हैं कि पश्चिमी सभ्यता दोष-पूर्ण है। यह
परिशिष्ट स्थायी नहीं रह सकती। इस तरहकी अनेक सभ्यताएँ आई और चली गई। यह ज्ञान उन्हींको हो सकता है जो आत्मबलके समको जानकर पाशविक शक्तिके सामने सिर नहीं मुकावेंगे। यह उन्हींसे हो सकता है जो इन वर्त- मान बुराइयोंमें पड़ कर इनके असली मर्मको जान गये हैं। यदि ऐसा एक भी भारतीय आत्मा होगा तो उसकी वातको लाचार होकर अँगरेजोंको मानना ही पड़ेगा। इनको माँग नहीं कहना चाहिए। ये हम लोगोंके अन्तःकरणके भावके सूचक हैं। माँगनेसे कुछ भी नहीं मिल सकता। अपने स्वत्वको आप लेना होगा और उसमें सफलताके लिए आवश्यक बल चाहिए। यह शक्ति उन्हींमें है जो १-अँगरेजी भाषाके दास नहीं हैं। २-यदि वकील हैं तो वकालत छोड़ करगह पर काम करें। ३-भारतीय जनता तथा अँगरेजोंको दशाका बोध करायें। ४-परस्पर कलह रोकेंगे, न्यायालयसे मुँह मोड़ लेंगे और दूसरोंको भी यही सिखलावेंगे।
१४८
स्वाधीन भारत
५-न्यायाधीश होना भी अस्वीकार करेंगे।
६-यदि डाक्टर हैं तो शरीर-रक्षाका कार्य त्याग कर
आत्माकी रक्षाका प्रवन्ध करेंगे।
७–धनी होकर निडर रहेंगे। स्वच्छन्दतासे अपने
विचारोंको दूसरों पर प्रगट कर सकेंगे।
८-अपने धनका उपयोग देशी कारीगरीके उत्थान
में करेंगे।
पाठक-इन बातोंको सब कहाँ तक कर सकेंगे।
सम्पादक-यही भूल है। किसीको किसीकी बाट
जोहनेकी आवश्यकता नहीं है। सबको अपना अपना
काम करना चाहिए। बस सब हो जायगा। इन वातों
पर विशेष ध्यान रखना चाहिए ।
१-आत्मसंयम ही वास्तविक स्वराज्य है।
२-आत्मबल या सत्याग्रह उसका एक मात्र मार्ग है।
३-सत्याग्रहकी सफलताके लिए स्वदेशी बननेकी
आवश्यकता है।
४-यह सब हम इस लिए नहीं कहते कि हम
अँगरेजोंसे घृणा करते हैं, बल्कि हमारा यह कर्तव्य है ।
नमक परसे महसूल उठ जाना चाहिए, उच्च पदों पर हिन्दु-
परिशिष्ट स्तानियोंको नियुक्त करना चाहिए, हम लोगोंको विलायती कपड़े नहीं पहनना चाहिए, अँगरेजी भाषा नही बोलना चाहिए तथा विदेशी कला-कौशलकी परवा नहीं करना चाहिए। मैं इन बातों पर इतना जोर केवल इसलिए दे रहा हूँ कि इनसे भारतकी वास्तविक क्षति है। अँग- रेजोंसे मुझे कोई वैमनस्य नहीं है। उनकी सभ्यता अवश्य निन्दनीय है। मेरी समझमें अब तक हम लोग 'स्वराज्य' शब्दका दुरुपयोग करते आए हैं। अपनी बुद्धिके अनुसार मैंने उसके वास्तविक स्वरूपको दिखलानेका प्रयत्न किया है। और आजसे मैं उसीकी प्राप्तिका व्रत लेता हूँ। शम।