Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Nirala Kavya Par Bangla Ka Prabhav
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निराला-काव्य पर वंगला का
प्रभाव
लेखन
इन्द्रनाथ चौधुरी एम० ए० (पग्रजी हिंदो)
प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, हसराज बॉलिज दिल्ली
भूमिका नसक
डॉ० नगेन्द्र डा. लिट.
मध्यन हिन्दी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय
प्रकाश
श्री भारत भारती प्राइवेट लिमिटिड
१ अनसारी रोड, नया दरियागज,
दिल्ली-६
प्रथम सस्करण-१६६४
मूल्य--पाच रुपये
मुद्रक
दि प्रिंटसमन
नई दिल्ली
दो शब्द निराना हिरे युगप्रवतः कातरी कसार। जीवन में ममान अपने साहित्य में भी वे प्राव रता और प्रारमविश्वास क साथ प्रक्ट होन हैं। निराला जी जाम स बगाली य मोर कुत-परम्परा मे उत्तरप्रवामी। हिन्दी और वगला रे समृट नाहित्यों व साप माप सस्कृत तथा अग्रेजी का भी उन्नि गभीर मध्ययन दिया था। उनकी कायना में दम ममन्वय का मोलिर एव विमित प मिलता है। निराला की काय कला का मम्पर मूल्यानररननिय सामायन वगना साहित्य और विशेपा विववानन्द एव रवीन्द्रनायक सानित्य प्रभाव वा दिलपण उपयोगी है और श्री बदनाय चौधुरी न इस ाि म स्तुप प्रयत्न दिया है । इदनाप चौधुरो हमार पूर्व छात्र एव मह्यागी । परिवार स बाली नात हुप मा उन अपनी Pिा हिनी र माध्यम स प्राप्त की है। हिन्दी एम. v• म प्रवासन म पूव दिल्ला विश्वविद्यालय म ही म अग्रेजी एम० ए० कर गुरप। सन १६६. महिनी एम. ए. की पगमा म इनका प्रथम श्रणी म प्रथम स्थान मिला था और इस वप रहोंने पी एच० डी० के लिये 'माधुनिक हिापौर बंगला काव्यगास्त्र । तुलनामा मध्ययन विषय पर गाय प्रबध भी प्रस्तुत पर दिया है। प्रस्तुत पुग्ना एम.ए. र विषय निव घस म्प में लिखी गई थी। इसम प्रभाव पद की दमानिस मास्था प्रस्तुत पर उन मूत्रा का अनुमधान रिपा गया है जिनका निराला र गाहिय म बगीय मम्पर र पमस्रम्प महर ही ममावत हो गया था। वस्तुत प्रभाव-एशिया प्रकार की हीनता का मूचर न होरर मौलित मम वय-गमता एव पत्तित्व का उगारताना हो पातर है। जिस रवि रामजनारमा म्पत्तित्व जितना पापा और मगन हाता है वह उदन हो पापर शत्रम प्रभाव पोर पापण प्रहण परता है । स्वर रवीटनाप इमरा खनन उदाहरण है। पपन पूवनों स जितना उन्होंने कहा किपा है उतना तुममौदाम को छोडसर गायक रिमा रवि न रिया हो। मैं मोनाप भोपुरी मो की प्रथम प्रकाशित रचना पर पागादिलाई। मरीरामना
है कि उनके मध्ययन व फलस्वस्प हिंदी पौर वगला साहित्या म पारस्परिक
सहयोग करता रहे और भारतीय साहित्य को अधिकाधिक समृद्धि प्राप्त होती
मध्यक्ष हिदी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय
दिल्ली-६
दिनाक ११६६४
-नगेद्र
प्रास्कथन पारिवारिक परम्परा स वगाली तथा जम स हिंदी भाषी होन के कारण मुझे गाव काल म ही भारत को दो समृद्ध भापामा एव साहित्यो को मचना का सौभाग्य समान स्प से पिलता रहा है । सवप्रथम मैन अपनी माताजी स बगला सीखो या पहासिया स हि दो, यह प्रयल रन पर भी मैं स्मरण नहीं कर पाता। परन्तु जय पाठशाला के नियम के अनुसार मुझे अपनी शिक्षा के लिय हि दो मौर वगाली मस एस को छोड़ दना पहा ता मैंन वगला की अपनी शिक्षा पाठशाला से बाहर पूरी की। कालज म भार वी० ए० म वगना, मस्कृत एव अग्रजी साहित्य दिल्ली विश्वविद्यालय पो परीमा लिय मेंन पढे । प्रभाकर तथा साहित्यरत को परोक्षामा न मेर हिदी प्रम को प्रथय दिया । एम० ए० म फिर दिदी विषय लकर मैंने अपन मध्ययन म सामरम्य स्थापित करने का प्रयाम दिया है। इस प्रसार माजी, सस्कृत तथा वगला का पाथय लकर जब मैं हसराज कालज म हिली विभाग के प्रध्या (प्रब रीडर, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्व विद्यालय) हो. मामा जो क सम्पन म मापा ता उनी सात, गम्भीर व उतार रष्टि न मरे मानिय-जीवन का पथ सदा के लिय निश्चित कर दिया। मुमको लगा कि पार चार साहित्यों का प्रमाद सर मैं दीन नही रह सकता भरा जीवन राष्ट्रभाषा यी रचनात्मक मवाद लिय ही मर्पित होना चाहिय । पग्रेजी को महावत है विव को रामनाए पोवन म पूरी होती है, गया परपस जीवन का यही सग्य है ? एम०० हिन्दी-परीक्षा के लिय एम निरप निसन म मनुमति मैंने पूग्य 7. नगेटजी म मांगी। डाक्टर माहय ने महप भनुमति देत हुए मुझे निरासा जी पर पाप करन का मुमार लिया। यही प्रस्तुत निव घ की जीवन-गाया है। प्रस्तुत निरा प म निराला जारसम्म पर वगीय प्रभाव का विनप पारमा एक मासोपनारमर मूत्रा को प्रतित परत हुप, एतिहागि तपा मना गनिर हटिग सम्पपन पिया गया है। इसम विपप के भनिरित पाच अध्याय है। विषय प्रवश म प्रभाव' पर तात्रिक विवचन दिया गया है। प्रथम अध्याय म निराला के कृतित्व और यत्तित्व पर विवचन है। दूसर अध्याय म निराला के प्रतिपाद्य पर यगला प्रभाव की मीमामा की गई है। तीमरे म निराला के कला पक्ष पर और चतुथ म निराला के गीत पर बगीय प्रभाव की समीक्षा है। पाचवा अध्याय उपमहार है। तदनन्तर चार परिशिष्ट हैं। प्रथम म निराला द्वारा मनूदित बंगला कवितामा का विश्ले पण है। दूसरे और तीसरे म निराला द्वारा लिखित बगला कविता और निराला को हिंदी-कवितामो के वगला अनुवाद का सक्षिप्त विवचन है। चतुथ परिशिष्ट म निराला को कतिपय परोटियो पर विचार किया गया है । मन म हिंदी बगला मस्कृत, अग्रेजा की उन पुस्तका की सूची है जिनकी इस निबंध लिखने म सहायता ली गई है। इस प्रकार २०० पृष्ठ के इस निबघ में मैंने कविवर निराला पर वगीय प्रभाव का सामा य विवेचन प्रस्तुत किया है, मेरी विशप दृष्टि क्वीद्र रवीद्र के प्रभाव व विश्लषगग म तत्पर रही है । मुझे विश्वास है कि मेरा यह विनम्र प्रयास कविवर निराला के अध्ययन म सहाया होन के साथ माय उत्तरभारत क दो ममृद्ध साहित्या को निकटतर ताने म भी सफल हो सकगा। इस निबध को लिखते हुए मुझे अपन निरीक्षक डा० प्रामप्रकाश स विशेष सहायता प्राप्त हुई जिसके लिए मैं उनक प्रति सवदा क लिय माभारी है। दिल्ली विश्वविद्यालय मे हिंदी विभाग की रीडर श्रद्धया डा० (श्रीमती) सावित्री सिहा जी स इस निवघ को रूपरेखा एव पानुलिपि के लिय समय समय पर मुझे अमूल्य सहायता मिली है। मैं उनक प्रति हृदय स कृतन ह । गुरुवय पूज्य डॉ० नगद्र जी की कृपा से ही मरा आधुनिक का य म इतना अनु राग हुमा और विषय निर्वाचन से लेकर इस निब ध की पूर्णता तक उनम भनेका प्रोत्साह्न मुझे मिलता रहा है । व हिदी विभाग की सृष्टि म व्याप्त मतरात्मा हैं। यदि मैं जीवन म उनका योग्य शिष्य सिद्ध हा सका तो प्रपन का घय समझूगा। - निराला यती स० २०२० -इद्रनाथ चौधुरी
विषय-सूची
विषय
पृष्ठ
१-१३
विषय-प्रवेश
प्रभाव का मुख्य यात
प्रभाव विम
वहत है
मौलिकता
प्रभाव की उपयागिता
निवध दाम्परखा
१४--४०
प्रथम प्रध्याय
व्यक्तित्व और कृतित्व
वर, परिवार तथा व्यनि
कृतिया
पारिवारिक परिस्थितिया तया युगीन
विचारधाराएं
द्वितीय अध्याय
निराला प्रतिपाच परबगला प्रभाव
दानिय प्रभाव
मदिवा विराध
विराट चित्र
मनन की जिनामा
प्रकृति
नारा प्रम
मानवतावाद
भनि
ग्य
रवीद्रनाथ को विषय वस्तु को ग्रहण कर रचित कविताए पुरातन वभव का अवन सस्कृति स्वदेश प्रम मृत्यु महापुरुषा की प्रशस्ति कविता सम्बधित रवीद्र के सौ दय दशन से प्रभावित निराला का सौदय दशन ८०-१३८ तृतीय अध्याय निराला के कला पक्ष पर बगला का प्रभाव कल्पनागत स्पवियास रुपक प्रतीक रवीद्र परिचित वस्तु तथा भावघटित प्रतीक द्वारा प्रभावित निराला के प्रतीक परम्परागत प्रतीक पुराण कहानी प्राश्रित परम्परावादी प्रतीक से प्रभावित निराला के प्रतीक मिथ रवीद्र प्राध्यात्मिक प्रतीवा द्वारा अनुप्ररित निराला के प्रतीक विम्ब लक्षित चित्र योजना उपललित चित्र योजना कलागत हप विन्यास अलकार पद वियास शाली वगला मेरी वैसी ही मातृभाषा है जैसी हिन्दी -निराला
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वायप
क्ला का प्रतिम स्प
१३६-१५०
चतुर्थ अध्याय
निराला के गीत पर बगला प्रभाव
प्राथना प्रधान गीत
नारी-सौन्दय प्रधान गीत
तथा प्रेम गीत
प्रकृति प्रधान गीत
स्वदाप्रम के गीत
दागनिक गीत
पचम प्रध्याय
उपसहार
परिशिष्ट
१ निराला द्वारा अनूदिन बगला-कविताएं
२ निराला को कवितायो का बगला अनुवाद
३ निराला की बगला-कविताएँ
४ बगला कविता पर लिम्वी गई परानी
१५४---१८४
१८८-१९५
१८५-१९६
१८६-१९८
सहायक प्रमों को सूची
१८६-१९३
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विषय-प्रवेश वनमान निब घ का पालाच्य विषय है, 'निराला के काय पर बगला ना प्रभाव । सशक्त कवि या लेखक के अनुवरणकारियो का किसी भी साहित्य में प्रभाव नहीं होता । वस तो क्षमताहीन अनुक्रणकारी कवि या लेखर' मनुकरण के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर पात परन्तु जिन लोगो म क्षमता है उनके अनुकरण म कभी भी निज वशिष्य का लाप नहीं होता। प्राचाय हजारीप्रसाद द्विवेदी अपनी पुस्तक 'हिदो साहित्य म विहारा ने सम्बध म लिखते हुए कहत हैं कि दूसरे कविया के विचारा को प्ररणारूप म प्रात्मसात पर उमको महा यता से कुछ नद बात कहना अच्च वियो का याय है जिम प्रकार बिहारी न पुरान कविया के भाव का ग्रहण किया था उस संवारा था, उम अपना बना लिया था। यह 'अपना बनाने की प्रक्रिया ही वास्तविक भाव प्रभाव की प्रक्रिया है । आधुनिक युग क साहित्य म एक दृष्टात लें ता हम कह साते हैं कि रवींद्रनाथ ठाकुर न अपन एक निवध म निर्वाक्-कुण्ठिना निशचारिणी उपक्षिता अमिला का वणन कर काव्य रसिका का ध्यान उस आर आकृष्ट किया और मपिलीशरण गुप्त ने उपरिता ऊमिला के इस भाव से प्रभावित हाकर अपना अमर महाकाव्य मावत' हिन्दी का प्रदान म्यिा । दस भाव प्रभाव म कही भी मौलिकता का प्रभाव नहीं दिखाई पडता । वास्तव म जावन के सम्पूरण अगा का जा वरण करना चाहता है, दूमर व प्रभाव मे वह बच नही सकता। निराला जीन स्वय लिखा है- दूमा के भाव लवर प्राय मर विपा न कविताए लिखी हैं परन्तु वहा हर एक कवि न दूमर व भाव पर विजय प्राप्त करन की, उससे बढकर अपना काई विप चमत्कार खिलान की चप्टा को है। रवीदनाय के विषय म लिखत हा प्रमयनाय विशी न भी यहा बात कही है 'प्रभाव माहित्य का केवल उपादान है व्यापार म जम मूल धन। दूसरा क मूत धन पर रवीद्र न बहुन मुनाफा इमाया है, इसीलिप उन्हें भी हार रहना २ १० हजाराप्रसाद विदा हिन्दा-साहित्य, पृ. ॥ २ निराना पा और पन्लब २ निराला काय पर बगता का प्रभाव नहीं पड़ा। प्रभाव का मुख्य स्रोत निराला जी व विषय म भी बिल्कुल यही बात कहा जा सकता है । रवीन्द्र जहाँ कालिदाम नपणव अघि चण्डोदास विद्यापति, विहारीलाल' तथा शली, कोटस प्रादि स प्रभावित हुए थे वहाँ निराला मुख्यतया रवी द्रनाथ तथा सामा पतया विवकानद और अन्य बगाली ववियो व काव्य तथा विचारधारा स प्रभावित हुए । इम सम्बध म निराला के पालाचकों का मत उद्धत किया जा सकता है । भाचाय रामचन्द्र शुक्ल का कहना है- 'निराला जी पर वग भापाकीवाव्य शलीका प्रभाव ममास म गुम्फित पद बनरा क्रियापद लोप आदि म स्पष्ट भनकता है।' डा. रामविलास गर्मा का कहना है- बसवाहे की प्राहा नोटको सस्कृति व इलावा युवावस्था म उनका सम्पक बगाल का दा महान सास्कृतिक धारामा सहुमा । एकता श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नतृत्व म बगाल व नवीन सास्कृतिक जागरण स और दूसरा स्वामी विवकान द द्वारा स्थापित श्री रामकृष्ण मिशन स । इन दोना का उन पर स्थायी प्रभार पहा है । और इसम सादह नहीं कि अपन साहित्यिक जीवन के प्रारम्भ काल म उह पहल हा स प्ररणा मिली । गिरीशद्र तिवारी भी निराला का शिक्षा दोभा क सम्बघ म लिखत हए बगीय प्रभाव का उल्लख करत है- बगला म उस ममय रवीद्र युग का प्रारम्भ पा । सवत्र उनक साहित्य की ख्याति छा रही थी। फिर हिंदी की चर्चा कौन करता । वगाल की सभी पाठ शालामा म बगला की ही भारम्भिक शिक्षा दी जाती थी । पिताजी न इह पांच वप की अवस्था म हो पाने के लिए पाठशाला भेज दिया। कुछ ही वीर उपरा त इनका प्रम वगला भाषा की पोर बना बगान मवदा से अत्यन्त भावुक प्रात रहा है और बगला भाषा भावुकता को प्रतिमूनि । भाषा की ही प्रासा करते हुए बक्मिचद्र न कहा है-- बगलार वधू मुम तार मधु पिर चालक सूपकान्त को कितनी माता बगला और वालिया समिता प्रमथनाथ विशा सा कान्य पवाह निीय खएर नगला कवि ३ रामवद शुक्न हिन्दी-मादित्य का इतिहास ४ रामपिताम रामा निराला पृष्ठ ८७ বিয়য় মা ३ ३ इसकी सागा वा उनका कृतिया हा है।" डॉ० रामरतन भटनागर भी इसी बात की पुष्टि बरत है- 'इन दोनों बगला-वविया (रवा द्रनाथ तथा विवकानन्द) का प्रभाव निराला के वाव्य म वरावर बना रहा, परन्तु निराला न उम प्रभाव का आत्मसान पर लिया। एम स्थल बहुन बम मिलगे जहां उना भाव उपयुक्त कविया को प्रति ध्वनि मात्र है । "राम की गरिन पूजा (१९३६) पर माइरल मधुसूदन व मध नाद-वध का प्रभाव भी लमित है । प्रत स्पष्ट है कि आधुनिक हिन्दी-काव्य मजा 'छायावाद बनाम स प्रसिद्ध है उस पर सीधे तौर स बगला-काव्य का प्रभार निराला की रचना द्वारा माया । परन्तु निराला के व्यक्तित्व को सजीवता और मोनिपता ने इस प्रभाव को वही भी प्राग नहीं बटन दिया । वय उना काम म जा रहस्यवादिता है वह निम्हश्य यात्रा जसी रामाटिक कवितामा और गीतानि जमी रहस्यवादा कवितामा की रहस्यवादिता स भिन्न एष नप प्रभार का वस्तु है। फिर भी मूल बाता का एसदम उपक्षा नहा की जा सकती। बगाल मय कविया प्रभाव में मम्बध मलिपत हुए डा० रामरतन भटनागर य एष स्थान पर रहत है- वगना ३ रवी द्रनाय, अनुनप्रसाद मन और बाजा नजान लाम र गाल जिम अशा प हैं, उसा धणी की चीजें निराला न हिदी म दा हैं।' इसी प्रकार वगला के दमर बविया के प्रभाव र मुम्ब पम लिखत हुए डा. रचनसिंह कहत हैं.- 'प्रारम्भिक बाल म बगला 4 थप्ट क्लाबार -रविवायू, बड़ीदारा, विवानन्द और चप्णव व वियाना प्रभाव भी उन पर था।' वएव कवियो प प्रभावक सम्बधम डा० राम विलास शर्मा न भी प्रपना मत प्ररट दिया है। उनका कहना है निराला न मपन निबार 'चादाम' (१९२०) म-यएर पविया पर रविबाबूने जा नदिनारिया है-~-उसका वहन किया है । वसम उतरी भक्ति इस मानवीय दो पार जहान सरेन रिया है। जिन रवियर न राधा भोर कृष्ण की तमपना पासा प्रभावशाली बणन किया था, उहान अवश्य ही अपन जीवन म उम त मयतारा अनुभव किया होगा । रविवायू न इन पर लेप , गिराशचन्द्र तिवारी व निरा भार उनकायमा इन्य रामरतन भग्नार रवि निराला-क अपयन, पृ. है बड़ा पृष्ट २३० रचना अनिवनिराला कर .
निराला काथ्य पर बगला का प्रभाव और रविताए हा नहीं लिखी वरन् उनकी गली के अनुकरण पर 'भानुसिंहर पदावली की रचना कर डाली थी। बगला की रोमाटिक कविता का एक सात यह वणव कवि भी थ । हिन्दी के नए कवि जा बगला भी जानते थ, अनिवाय रूप म इन कविया को पार आकृष्ट हुए । निराला जी ने वणव कविया की शृगार साधना पर आगे चलकर लख भी लिस और गाविददास क गीतो का हिदी म अनुवाद भी किया । उन्होन रामाटिक कवि को त मयता का अपना आदश बनाया है।" शातिरजन वद्यापाध्याय भी निराला पर बगीय प्रभाव काउल्लेख करत हए कहत है- 'छायावादी युग तथा हि दो-काव्य-माहित्य में सबस अधिक शक्तिशाली कवि निराला है । बगाल देश (महिपादल) म इनगा जाम हुमा या वगाल म हा पल हैं और बगला-साहित्य के प्रभाव स सविरुप प्रभावावित है । यथा- गध प्याकुल • कुल उर सर लहर क्च कर कमरा मुखपर हप अलि स्वर स्पण शर सर गुज बारबार । (रे कह) निशा प्रिय उर शयन सुख धन सार या कि प्रसार ' (रे कह) इस प्रकार की छ दभगी हिदी-कविता म पहले नहा थी । इस विषय म निराला नि सदह रवी द्रनाथ क भरणी है। . , रामविलास शमा निराना पृ०६६ छायावार युगेर तथा या युनिक हि काय माहित्यर सब चय शासशाला कवि निराला बागला दश (महिपाल) एर म वागला दश भानुप वागला माहित्यर प्रभाव प्रभावान्निा गदिशेप । यथा गरब्यागुल कुल उर मर लहर पंचवर कमल मुप पर हप भलि स्वर पण शर सर गुन बारवार ह) निशा प्रिय उर शयन-सुस धन मार याक असार (रकह प-चरणर भाग हि कविनाय भाग दिलना। व्यापार निराला निसरह रवानावर काठ प्रया-प्राधुनिक मारनीय माहित्य, पृष्ठ ५७ विषय प्रवेग परन्नु उपर्यंत मालोचका मताके विरुद्ध प्रभाव को बात का न मानने हुए पालोचर मानव बहन है- गाभीर अध्ययन के प्रभाव में हिंदी के कुछ फाड तपक रहस्यवाली रचनाकारा का रवीन्द्र रवोद्रम प्रभावित कह डालन म तनिक भी सपनाया अनुभव नहीं करने । मरी सम्मति म ऐस बरवानी न तो रहस्यवाद वा ययाय तात्पय मममत है न रहस्यवाद की ऐतिहामिर परम्परा का अमित जान हो वह है और न नी व रवीनाथ और निराला का ही भली भाति समभन परतु क्या 'मानव हम निराला नगगे पर भी अविश्वास करने बारहगे। निराला ने स्पष्ट लिसा है- 'मैं यहा अवय बगला का निराध नहीं कर रहा, उना प्राधुनिक अमर मानित्य का मुझ पर पापी प्रभाव है।' वास्तवम मानव प्रभाव पाय नही समझ पाय । प्रभाव किसे कहते हैं ? प्रभाव 'T की व्युत्पत्ति म परवर्ती रचना पर पूर्ववर्ती रचना प्रभुत्व को गोतना सष्ट है । रिन्नु परवर्ती रचना का पूर्वगामी प्रारण म म पुष्ट हाना हो मावश्या है-मी काइ बान माहिय य क्षेत्र म नहा कही गई है। डॉ० धुजटीप्रमा गुप्त का कहना है पारिताविक वे सहयाग स वृद्धि वा लाग प्रभाव रहत हैं। 'डा. विमल कान्ति समटार इमरा मौर पर बर दते हैं। उनका कहना है कि प्रभाव सामायत हा प्राार का होता है । एकता दुबल माम मनुकरण जा माहि य का मानाच्य विपय नरी बन सकता है परन्तु एक दूसरे प्रकार का प्रभाव है जिमनी गणना-प्रबल यद्यपि सूदम हान रे कारण हो...प्रभाव प म की जा मरती है जो परवर्ती लबा वीर अपन भाव तमा पारिपारिक्ता रा परिमण्डल इस प्रकार मचाग्नि करता है कि उसरे नूतन प्राधय मे उसमोर स्वतापम देसा नहा जा सकता है। करणी लम्बक अपनी प्रतिर लम. सम अपना बना मते. है । पचोला रस्ता यही अवश्य है। মনির বা প্রায় ৪াৰ শখ থামে বিল । সপ ধরে। নে হয় प्रमाय न प्रम तया प्रत्यर शाम परवों साहित्यको श्रीमम्मान निराला काय ही दिश' पुस्तक में मत , परिमारी भूमिका, १०७ प्रतिश्शरमायो तार प्रभारले ३५.१.
६ निराला काव्य पर बगला का प्रमाव दिया है । इन सभी त्राम माहित्य प्रभाव अनुराग जात है।' वास्तव म म प्रकार के अनुरागजनित प्रभाव की ही गणना साहित्य म हाती है और प्रत्येक साहित्य म इस प्रकार का प्रभाव दृष्टिगोचर है तथा प्रत्यक देश के पालोचा इस प्रकार के प्रभाव का नियमानुकूल मानत है। सस्कृन के वदि वह गयह- कविरनुहरतिच्छायामय कुवि पदानिक चौर । सवप्रब पहनें साहस नमस्तस्म ॥ अर्थात दूमरा की छाया मात्र का लने वाला कवि कहलाता है भाव का अपहरण करने वाला कुकवि कहलाता है जा भाव के माय पावली का भी अपहरण करता है वह चोर कहलाता है और जो पट, वाक्य और अथ समेत सारे काय का अपरगण करना है उस साहम करने वान का दूर स ही नमस्कार है। मस्कृत के प्राचाय पानवधनाचाय ने ३ यालोक + चतुथ उद्यात म और राजरोखर ने का यमीमामा के १२ व १३ वें अध्याया म दम सबध म विवचन दिया है। मानन्वधनाचाय कहते है- यदपि तदपि रम्य यत्र लोकस्य किञ्चित स्फुरितमिदमितीय बुद्धिरन्युज्जिहोते। अनुगतमपि पूवच्छायया वस्तु ताहक सुकवित्पनिवघ्नन निद्यता नोपयाति ॥ (घया० ४११६) अर्थात जिस कविता म महृत्य भावक का यह सूझ पडे कि हाँ इमम कुछ नूतन चमत्वार है फिर उमम पूववि का छाया ही क्या न मनम्ती हा तो भी कोई हानि नही ऐमा कविता के निर्माता सुवि अपनी वधच्छाया' स पुराने भाव को नूतन म्प देने के कारण निदनीय नही समझे जा सक्ते। यही प्रभाव' का वास्तविक रूप है। ' प्ररन अथच मूलत सूक्ष्म बलिया' म जानाय प्रभाव प गणना र यात पार याहा पर लसकर मभ्य आपनभाव आ पारपाश्चिकतार परिमएन एमनभावे सचारित करे मे राहार नूतन आश्रय हस्त उद पार स्वतत्र करिया देवा चन ना ऋणी लेखक हा श्रापनार प्रतिमा बले आफ्नार करिया तोलेन । अवाचान रचना के मखाने अवश्य' मालिकतार, प्राय सम्मान महाय पारक म्वन- प्रान करिया थान । एइ श्रेणार प्रभाव सबटश श्री मकान परवती साहित्य के धीमया करिया छ । पद सकल क्षेत्र मादित्य प्रभाव अनुरागनान र काय कानिगमेर प्रभाव कवि हत्य पृ०७६ २ विषम प्रदेश १० गुलाबराय का कहना है कि अच्छा रवि यदि छाया भी ग्रहण करता है तो उमम एक नवीन जीवन भर देता है । वह अपन पूर्ववर्ती रवि की कृतिया म नया चमत्तार उत्पन्न कर देता है। इस प्रकार हम दसते है कि 'मानव अपन तर म मौलिकता प्रश्न रावतमकमार'प्रभाव के वास्तविक अथ को नहीं समझ सर । डा. विस्तम्भर नाथ उपाध्याय मानव वनों का उत्तरत हुए एप प्रमजी पालो का मन उद्धत कर रहते हैं.--- उधार लेना और बात है प्रभावित हाना मोर वान । निराला का काव्य रवीन्द्र की कता का अनुसरण नहीं है पर यह भी ठीक है कि निराला ने प्रेरणा के लिए रवीद्र की प्रार देवा है उसी पद्धति को अपनाया है। 'और मम दोप भी नहीं है और यह बहुत स्वाभाविक भी है । जसारि हम पहल कह चुके है कि जो जीवन में सम्पूरा भगो का वरण करना चाहता है वह दूसरे प्रभाव से बच नही सकता। रवट लि. तो प्रभाव को ही प्राधुनिक मान्य का सपोटी बताते है.---- What is most important in modeca poetry is not that which distinguishes it from the poetry of yesterday but that which makes it in its degree one with the poetry of Homer and Sappho, of Shakespeare म सम्वम विलियम दुलन बाट को उनि बहुन हो टीक है--- The art of pactry is not perfected in a day It is brought to cxccllcncc by slow degrees, from the first rude and imper ſect attempts of versification to the finished productions of its greatest masters The gorgeousness of poctic imagery the curious feliciues of poetic language the music of poetic numbers the spell of uords that act like magic on the heart, are not created by one poct in any language in any country An innumerable multitude of sentiments of illustrations, of mpassioned iurm of regTMIHOD of 'harmonious combinations of words both fixed in bools and floating in coversation must " २ गुलारराय मिदान मार मदन, १०६१ Borrowat is on thing and infuence is quite another thing विग्यम्मरनाथाय गिता-पाय क्या और रिश * On potiry and it e modern men - ६ निराला काव्य पर बगला का प्रभाव - previously exist either in the vernacular language of the poet or in somº other which he has studied and whose beauties and riches he seeks to transport into his own before he can produce any work which is destined to live टी. एस० इलियट भी बिल्कुल यही बात कहते हैं - No poet no artist of any art has his complete meaning alone His significance, his appreciation is the appreciation of his relation to the dead poets and artists मौलिकता परन्तु प्रभाव के प्रथम यह हम कभी नही कहना चाहा कि निराला म मोलिपता नहीं है। निराला न जो कुछ ग्रहण किया है अपनी प्रतिभा के बल स उस अपनी सपदा बना लिया है मोर यही अच्छे कविया का काम होता है। प्रभाव ना मनुष्य पर तब तर पडेगा, जब तक उसम जीवन है। जहाँ जीवन का वग अधिक है प्राण धारा का बहाव तज है उसी स्थान से उसका ऐश्वय छितराएगा हो । पालोक सीमा म चधना नहीं चाहता । इसका धम ही प्रकाशित हाना और प्रकाशित करना है।' इस 'प्रभाव के अतिरिन सम्पूण मौलिक भावाको नकर भी निराला जी न वाव्य का प्रणयन किया है क्याकि कविका पूर्ववर्ती कलाकारो म क्तिना भी सम्बध क्या न हो कोइ कवि किमी विचार को मागापाग नहीं उतार लेता है । जसापि गुलाबराय का कहना है- विचार के भी कई पहलू होते है । जा पहलू जिसका अपील करता है वह उमको अपने विवचन का विषय बनाता है और उसम नवीनता पदा कर देता है। निराला जी म भी इस प्रकार की नवीनता क प्रोप निदशन प्राप्त हो जात है परन्तु मौलिक्ता हमारा मालोच्य विषय नही है अत मौलिक्ता के प्रश्न हम बचन को ही चेष्टा करगे । यद्यपि हमारे लिए प्रभाव का विषय मौलि क्ता सापम है क्याकि इस प्रकार के प्रभाव का दृष्टान्त ससार के प्रत्येक साहित्य म प्राप्त होता है तथा ससार के विख्यात अालोचकगण इसका मौलिक साहित्य मानते हैं जसापि उपयुक्त प्रभाव क्या है क अतगत विचारो से स्पष्ट हा On originality and imitation American Criticism Tradition and the individual talent Selected E says ३ हजारीप्रमा- दिवेदी माहित्य वा मम पृ०५० ४ सिदान्त और मध्ययन पृष्ठ . ५ विस्तृत भागचना प्रभाव क्या है। मतगत की गई है। , २ विषय प्रवेग ६ जाता है। जिस हम मौनिक पहत हैं उसम प्राचीन परम्परा प्राप्त चिन्तन का मोगदान रहता है। एक विद्वान का कहना है कि सामाजिक मगल दे मनुकूल परम्परा प्राप्त चिरन और विचारधारा से परिप्कृत तथा नवीन परिस्थिति पर विजय की प्राकाक्षा स समृद्ध व्यक्तित्व का रसमय और ग्राह्य वनार अभिव्यक्ति परले में भी साहित्यिक मोलिश्ता या माहित्यिस्ता हा सकती है । इस प्रकार मौलिक उस साहित्य को कहा जाएगा जहा रवि प्राचीन विचार धारा का ग्रहण कर उसका नवीकरण करता है । मत हमारी दृष्टि म प्रभाव मौलिकता सापक्ष है। पालाम निवव की पालावना इही विचारो के आधार पर की जायगी। प्रभाव की उपयोगिता विषय के अन्नगत प्रभाव की उपयोगिता पर भी विचार कर लेना होगा। प्रश्न है कि प्रालोच्य निबध की उपयोगिता क्या है । इसके उत्तर महम रह सक्त हैं कि प्राचान साहित्य की तुलना म माधुनिक साहित्य विशप स्प स मह प्रधान है । अतएव जाप जिनासा के साथ ही रवि से मानसिक स्थिति की जिनासा का सम्णव अति निविड है और मानमिर स्थिति प्रश्न का हल करन के लिए पति र जीवन पर बाह्य परिस्थितियों का प्रभाव नथा अय पविया के काव्य का प्रभाव पयवा तुलनात्मक भाव-साम्प का निभावश्यर है। भाव साम्प तपा विधार-साम्य र मावभौमिक तप्प है जैसा निराला स्वय रहते हैं- सम्यता मे भादिवरान स सार प्राज तर जितनी बडी-बही यात माहित्य व पृष्ठा म लिया हुई मिलती हैं, उन वाम पा म साम्य न रहन पर भी व एर हो सत्य का प्रकाश दती है। माज तर मानवीय सम्पत्ता जनावही एक दूसरी मम्यता म टार सनी पाई है वहा उमर वाह्य म्पा म हा वषम्य रता है, पाभूपणा, भाचार स्वहारा तया उच्चारण मोर भाषापारा ही बहिरग भे रहा है। उन सभ्यतामों में विरमिन पखिय तो एक ही सत्य का पटल भपार महिमा यहाँ मिलती है।' इस प्रकार प्रभारी भालापना द्वारा विचार-साम्य जम एक चिरलन तथ्य पर प्रकार पडता है । इस अतिरिक्त, महृदय पाटन क्सिा काव्य अध्ययन के समय उसम निष्टि विसा विशेष भाव या वारगिमा पाकाई प्राय प्रयका प्रयन्न भितिरा, रिमा मरे पविरे राज्य म माप दस्ता है तो यह घर नूनन मान? म पुतक्ति हो जटता है। निराला को मध्या मुदरी सोही न तोजिए- सुमनमा माहियो र विमाम्य , प्रय-पन १० निराला काय पर बगला का प्रभाव दिवसावसान का समय मेघमय प्रासमान से उतर रही है वह सध्या सुदरी परी सो घोरे-धोरे-धीरे उक्त पत्तिया रमिक पाठकों के मन में रम-सनार करन म समथ हैं । किंतु कविता-पाठ के समय जिनका निम्न पक्तिया और स्मरण हा पाएगी- नामे सध्या त द्रालसा, सोनार प्राचल खसा हाते दीपशिखा। वे कुछ अधिक रसाप्लुत हागे टसम मह नही । कारण, इसके पीछ हटल की मनोवनानिक थियौरी ग्राफ एमोसियशन का यागदान रहेगा । हटल के अनुमार यदि किसी वस्तु के माथ हम अपने विमा पूर्व स्मरण का सम्बध स्थापित कर सकत है तो हम अधिक पान द प्राप्त होता है । कवि, जो दूसरे कवि क का य का नवायन सभव कर सका है, गम वान को पविता पाठ करते हुए हृदयगम कर सहृदय मात्र, जिमवा दोनो भाषायो का ही नान है एक विशेष प्रकार के पान द से उ लमित हो उठता है । यह एक प्रकार का अभिनव रस परिवपण है। इस अभिनव रम के सम्ब च म लिखत हुए डा० विमलकाति ममद्दर कहत है कि जिस प्रकार निता त परिचित प्रियतम का सवा नए नूतन वाम देखने की चेष्टा वणव कविया ने की है.--कभी दानी रूपम भी योगी वा म तो कभी नाविक रूप म-वस नी यह भी एक प्रकार का नवीन रमास्वादन प्रयाम है। निवाघ की रूप रेखा रवीन्द्रनाथ अपनी 'जीवन स्मृति की रचना कर जिन प्रभाव उपादाना से सहायता स उनका जीवन गठिन हुमा है उनको स्पष्ट कर गए है। परन्तु निराला जी ने ऐसी कोई जीवन स्मृति की रचना नहीं की इसीलिए प्रभाव की रेखा हमारे लिए अस्पष्ट सी है। प्रभाव की रेखा उनके काव्य मही देवल हम खिंची मिल सकती है और वहीं से उनका चयन हम करना पडेगा । प्रस्तुत निबध को मामग्री 'विपय प्रवा को छोडकर पांच प्रकरणाम विभत की गई है- १----पतिल और कृतित्व । प्रानेर एकान्न परिचित प्रियतम नव नव वेश वैधाव कविगण ये दग्विार चटा करियायेन-कमनओन वेश क्खनो यांगीतश, क्सना नाविक वंश प नेमनइ एक प्रकार नवग्न रमास्वादन प्रयाम रखारकाये कालिगामेर प्रभाव विषम प्रवेश २--निराला के प्रतिपाद्य पर वगला-प्रभाव । ३-निरालाला-पक्ष पर बगला प्रभान । --निराला गीत पर बगना प्रभाव । ५----उपसहार। इसके अतिरिक्त निवध की परिधि र माथ परिगिट भी जाड दिया गया है जिसम निम्नलिखित पर विवचन है- निराला द्वारा अनूदित बगला-पिताए । २--निराला की कवितामा का बगला अनुवाद । -~-निराला द्वारा निषिन एन वगला-कविता । 6-निराला द्वारा बगला-ववितामा पर लिखी गई पराडी। प्रभाव का माध्यम है-~-पक्ति एव व्यक्ति किन परिस्थितियाम और किम प्रकार विसी वि गाहित्य म बम प्रभावित हुपा कर मक पति तपा निया के निशामिन तथा मनावनानिए अध्ययन म पता लग जाता है । दमी लिए प्रथम अध्याय म निराता र व्यक्तित्व तथा कृतिया पर एतिहाभिक तथा मनायनानिरष्टि स विवचन दिया गया है। मप्रकार इम मरायपन्न गत सोन विभिन्न विषयों पर हमन विचार विमा है- या परिवार नपा पनि २~-निया -~~-দিন ধৰিণিবিয়া মধ্য যুণীৰ নিৰায় গ্য टूमरे अध्याय म निराला में प्रतिपाद्य प्रति उन विचार-रस पर गला प्रमात्र विवचन दिया गया है। मम मुख्यतया रवी की दानिर मान्यतामा या निराला पर प्रभाव प्रगन र निराला न विचारों को भीमामा की गई है । चरि य विचार अवलमात्र अनुराग नहीं है -मीलिए अनुभूतिजय प्रभाव-मूओं पर विवचन करते हुए वोट दानिक विचारोरे प्रभाव विस्तार যন নিলে পিল নিষ বিঘয়া রাধা থং বিয়া - १-~-विराट चित्र प्रति ३-नारी प्रम ४-मानवतावार ५-भनि पानी र म प्रापर निरातारा मनुभूतिया पर मसार र दुखदायरा कोर पापान पचन पर उन विचाराराम्बाप ही बदल जाता है और वह निराला काव्य पर बगला का प्रमाव निम्न दा पो म उनके काव्य म प्रकट होता है- १-मामाजिक विद्रोह २- यग्य इन दा विचारो पर बगला प्रभाव का भी विवचन किया गया है । इसके उपरान्त, रवीद्र की विषय वस्तु के अनुरूप जो निराला की विषय वस्तु है उम पर आलाचना भी प्रस्तुत वी गई है । जो सरया म , है- १-पुरातन वभव वा अपन २-मस्कृति ३-स्वदेश प्रम ४-मृयु ५-महापुरुषो की प्रास्ति ६-पविता सम्बन्धी यहाँ तक विचार पक्ष अर्थात बुद्धितत्व पर विवचन होता है । बुद्धितत्व के उपरात निराला की कल्पनाजान भाव भूमिया पर वगीय प्रभाव की मालाचना प्रस्तुत की गई है । कविता में विचार भाव का आधार ग्रहण वर उपस्थित होता है और भाव का उ मेप कल्पना की सहायता से होता है । इसीलिए बुद्धितत्त्र के माथ ही काल्पनिर भावनाग्रा का भी विवेचन आवश्यक है । विचार पथ भाव पा के अन्तगत क्यापि भावपक्ष के दो म्प हात वौद्धिक तथा भावमम अथवा काल्पनिर । बुद्धितत्व म सरय और शिव की रक्षा हाती है और कल्पना अथवा भावतत्व समुदर का निर्माण होता है । इसलिए इस अध्याय के मन म निराना क सौदय-ददान पर विवचन और उस पर बगीय प्रभाव की भी पालोचना की गई है। इस प्रकार सम्पूण प्रध्याय की विषय वस्तु निराला का मत्य शिव तथा सुन्दर पर बगीय प्रभाव की मालोचना है। तृतीय अन्याय में निराला की कला पर बगीय प्रभाव का विवेचन है । प्राधुनिक युग की प्रभावस्वरूप क्लाभि पनि म यक्तिगत अभिव्यजना का प्रभाव बहुत ही अधिक पडा है और यक्तिगत अभियजना का सम्बध कल्पना के माय बहुत अधिक है । प्रत निराला के क्लापम को हमने दा भागा म विभक्त कर लिया है- १-कल्पनागत पवियाम २०-लागत रूप विन्यास बल्पनागत रूप दियास के मतगत कल्पनाजात मभियक्ति व तीन रूपोपर विवेचन दिया गया है और उम पर यगोय प्रभाव की मालोचना प्रस्तुत की गई है-- विषय प्रवेश १३ २.-प्रती कलागत रूप दियाम व मनगत परम्परानुसार निराला का क्ता विभिन्न पा पर बगौष प्रभाव की इस प्रकार मरेमामारी गई है। १-~-अलकार (पाश्चात्य मलबारा र प्रभाव पर भी विवचन दिया गया है) -~-पदवियाम जिसक अन्तगत नापा और गली का निया गया है रम अध्याय त म कला मन्तिम Fu---भाव और मापा की एकरूपनार विवचन कर यह प्रमागिन दिया गया है शि निराला की कला और वस्तु रवीन्द्र की तरह मपृक्त है और कला रा वही अप्ठ रूप है। चतुय अध्याय म निराला गीत पर वगाय प्रभाव वा विदेवन निम्नलिखित त्रिपया में मापार पर दिया गया है- प्राथना प्रधान गीत -नारी-मीन्य प्रमाल-गीत तथा प्रमगीन प्रकृति प्रधान गान -स्वदाप्रम दे गोन y---दानिक गात मन्न म सम्पूरण निव का उपमहार प्रस्तुन लिया गया है जहा निराला का मौगिरना पर का प्रस्ट न करन हुए भी उप प्रस्न वा उपस्थापना नहीं गई है। वारा प्रस्तुन निव य म मौलिकता पर विवचन अपमित नहीं है। निवर की परिधि माय एवं परिनिट भी मयुक्त है अहा निराला द्वारा प्रतिबगला-करितामा पर विवधन प्रस्तुत रिया गया है। निराला लिए अनुवाद व्यक्तित्व मापन रहा है मति अनुवार ने व्यक्तित्व नप भनिन विषय पर स्पप्टन लात हानी है। मोर रन प्रकार मरण अनुवाद नह राजन २ कारण इन अनूदित कवितामा की मालाचना प्रस्तुत की गई है जिनस 'प्रभाव अन्नगत समाहार हा गया है। निराला की दवितामा दे गला अनुराद र माय हा निराला द्वारा निर्मित एक गाविना की भी मालाचना मातुन की गई है जानली काव्य-पुन म प्राप्त है । इस प्रनिरिन परिशिष्ट गगन रवीन्द्रनाराबवितामा पर लिमिट निगला को परामियाना भी विवरन लिया गया है याशिव भी प्रभाव नपारण ही नियो गड पात हाती हैं।
प्रथम अध्याय व्यक्तित्व और कृतित्व प्रस्तुन निव व के पालाच्य विषय के अनुसार निराला जी क पक्तित्व तथा उनकी कृतिया पर सवप्रथम हष्टिपात करना हागा ! प्रभाव का माध्यम है यक्ति एव “यक्ति किन परिस्थितिया म और किस प्रकार किसी विशप साहित्य से कम प्रभावित हुा वह उस व्यक्ति तथा कृतिया के इतिहास मूल अध्ययन से ही पता चा मक्ता है । यह एतिहामिक अध्ययन प्रस्तुत निव ध या पट भूमिमा हागी जिमम निराला जा ६ का प पर बगला माहित्य के प्रभाव का रखारा स्पष्ट और स्वच्छ हो सकेंगी । वस भी प्राचीन साहित्य की तुलना म अाधुनिक साहित्य विगप रूप से यह प्रधान है । अतएव काय जिज्ञामा के साथ ही कवि को मानसिक स्थिति के प्रति भी हमारी जिनामा बना रहती है। इस मानसिक स्थिति क नान के लिए कवि क जीवन ममय का क्रमिक अध्ययन अत्यन्त मावश्यक है। हिपाला ते टेन' न कवि पत्तित्व निरीक्षण के लिए तीन वस्तुमा का पावश्यन बताया है—वि या लखक का वश परिवार पारि पाश्विक परिस्थितिया और उस युग का विचार धारा तथा विश्वास । इस प्रकार इम अध्याय प्रतगत तीन विभिन्न विपया पर हम विचार करगे- १-व-परिवार तथा यक्ति २-कृतिया ३-पारिपाश्विन परिस्थितिया तथा युगीन विचारधाराए न तीनो पर विचार करने से ही दन विषया व अन्तरम अधारारूप प्रवा हित निराना के “यक्तित्व का परिचय हम प्राप्त हो सकेगा। यक्तिरूप का विकास ही मनुष्यत्व का विकास तथा सभ्यता का विकास है । मानव जा काम करता है उम उसके व्यक्तिरूप का वास्तविर फन कहा जा सकता है व्यक्तिरूप यदि वृत है ता पम उसका पत। वृत की प्रकृति पर फल की प्रकृति निभर करती है अतएव व्यक्तित्व के नान स ही कृतिया का मान हो सकता है । वस भी यह , टेन हिमशिनिटरचर प्रमथनाय विशी नहर व्यक्ति तथा यतिख २ विषय प्रवेग सवविदित है कि कलाकार कृतित्व का समभन क लिए उमर जीवन की परि म्पितिया तया विभिन पात प्रतिपाता का अध्ययन प्रावस्यक है क्याकि उसकी सहायता म ही हम कलाकार की चतना का नान प्राप्त हाता है। वश परिवार तथा व्यक्ति सन १५.६इ० की वमन्त-पचमी का दिना वगाल क घर परम मरम्वती पूजा व पायाजन म मब व्यस्त हैं। वामती को अपूव हरातिमा वगाल की अतु लनीय गाभा का और भी बता रही है। निराना जी वहन है- वहा (वगाल म) मलय पवन वहता है नयुक्त प्रान्त (ग्रीि प्रान्त) म नहीं । वगास म ऋतु पहले माती है । रवीद्रनाय का कल्पना म यह गाभा और भी सप्ट हा गइ है। बहुत दूर का असीम पानामा आज बनराजिनाला पृथिवी के सिरहान पर भुक पडा। काना काना म वहा मैं तुम्हारा हूँ। मर मधु मान चचल हुए है वया यह तुम दख नहीं पाती हा मरा वभ प्राज तुम्हारे "यामन हृदय र ममान ही श्यामल बन गया है। बसन्त तार गान लित याय पूलिर परे कि प्रादरे । ताइ स पूला उठे हसे बारे बारे बारे बारे स्पर साजि प्रापनि भरे दिमादरे ।। (वमन्त अपना गाना धूलि पर लिखता है इमालिा ता वह धूलि बार बार इस उठनी है । बार-बार अपन म्प को टाला स्वय हा चितन प्यार स भरनी है) और वमन न उमी प्यार स वगाल महिपाल स्थान म रहन वाल १० गममहाय त्रिपाठा व घर का भी मजा लिया। मरम्पती व वर पुत्र सूयकान्त विपाठी निराशा जाम उसी दिन हुमा । वास ती पौर वाग्वा दाना हा पुग म भूम पहीं और मौल्य तथा विद्या म उम विभूपिन किया। यह भन्टा हा या विनिराना पिता ५० राममहायजा गाशाला, जिला उनादक रहन वात हान पर भी नौकरी र वारण वगाल व मदिनीपुर ति की महिपाटल नाम वा जमातारा म वम गए य । वगान म रहत हुए निराला उमरी क्ला माहित्य नभा उमवी मिट्टा म परिचित हुए जिस मिट्टी म मवदा गात को ही ध्वनि गुजित रती है। निराला जा कहत है-- दगार मरा ज मभूमि है इन नि बन्न प्रम है।' मोर यह हमारा मौभाग्य है कि रवि निराला न बगदा महापण निराना म उ7 वनाय नन रवनास प्रवादि निगना प्रप पर निराला-काव्य पर बगता का प्रमाव म एक एस समय जम लिया था जब वगला-समाज की भित्ति की दरार इतना विस्तीरा नहीं हुई थी कि एक जगह से दूसरी जगह चलना ही दुष्कर हा जाए और इस भित्ति का हत्ता कवि के लिए बहुत ही आवश्यक है । इस सामाजिक भित्ति के प्राथय में ही रवि सवप्रथम खडा हाता है । परन्तु दुर्भाग्यवश उस भित्ति की दरार निराला क जम तृतीय बप स ही स्फीत हान लगी। निराला अभी तीन वप के ही थे कि उनकी मा का देहात हा गया और यह दरार बरते-वरत उनके जीवन का एक घार यग्य बनकर रह गई । गायद इसी कारण व केवल महत् जातीय कवि हा पाय हे महत्तर सवजातीय कवि नही हो सके । रवीदनाथ भी यदि जीवन की प्राथमिक अवस्था स ही इस प्रकार के ग्राघात सहन तो गायद प्रतिभा का प्राचुय होन पर भी महत्तर कवि नही हा पात । माता का दहा त रवि के लिए विगार कल्पना पर पहला प्रहार या । कवि का अनगिनत आ गए शरण म जन जननी स उस अभाव की पूर्ति करनी पटी।' मा क अभाव म भी निराला काफी स्नह ग पाल गए । निराला के पिता महिपादल राजा के प्रियपान होन के कारण सम्पन भी हो गए थे नमी कारण मिगला + पालन पोपण म किसा भा प्रकार का कठिनाई नहीं हुई। वे इसा समय म वसवानी भाषा तथा बगला दाना बोलत थ। निराला + लिए य दाना ही भापाए मातृ भाषा व ममान थी। उहान प्रवध प्रतिभा म लिखा है- बगला मरी वमी ही मातृ भाषा है जसी हिी। निराला जी जन । वप क हुए तब उह एक बगला पाठशाला म पढने के लिए भेजा गया । इम मम्बधम गगाप्रसाद पाण्डेय न लिग्वा है भावुक वगावी अध्यापन निराला को शिक्षण के साथ साथ अपना स्नह भी दत रह ता कुछ पाश्चय का बात नहीं और इस प्रचार प्रारम्भिक बाल स ही उन पर बगला का प्रभाव पन्ता रहा। यह बहुत हो दुख की बात है कि जीवन म क्वल घात प्रतिघात महते हुए दुखा कवि अपन जीवन म हा वीतराग हो गए थे टमी कारण रवीद्रनाय की तरह किसी भी प्रकार की जावन स्मृति उहान नहा लिम्बी। यति लियत ता रवीद्रनाथ के समान उनके जानन के प्रारम्भिक प्रभाव का हम महज हा मान हा जाता। पाठशाला को पटाइ ममाप्त करके व महिपादल के हाई स्कूल म अग्रजी पन्त रह । स्कूल म निटी परन का काई सुविधा नहीं थी घर पर सिपाह्यिा के साथ . राम विलास शमा निराला निराला प्रबर प्रतिभा गगाप्रमा पाण्डेय मनाप्राण निराना .
पतित्व और कृतित्व व रामायण और बनविलास द्वारा हिन्दी मी मोखत रह। हाई स्कूल म निराला न द्वितीय भाषा के रूप म मम्कृत लाया। इस तरह हिन्दी, महत, बगला, भग्रेजो चारा भाषाए रहान साथ साय सोखी । डा० हजारीप्रसाद द्विवदी वा बहना है कि उनकी शिक्षा भा गरास ही भारम्भ हुई थी। उन्हाने तलालीन बगना साहित्य को स्वच्छ तावादी पौर रहस्यनाती कविताओं का अच्छा अध्ययन किया था। इसी समय म उहाने रविता लिखनी प्रारम्भ कर दी थी। अब तक व बगला में कुछ पद लिलामरत प, किन्तु उनका मन हिदी लिखने को भी प्रेरणा पान लगा। इस सम्बन्ध में गगाप्रसाद पाण्डेय ने लिखा है उहाने उस समय लिन गए एर शक्ति का कुछ मग इस प्रकार बताया- करि गमग बग माषाक समस्त पद बज अवयो मे प्रय पवित हमे लिपनो है। इस सम्ब 4 म निराला न स्वयं भी लिखा है-- मैं पति हो चला था । फलत पन की भावश्यक्तान पा प्रकृति का शाभा सता था। कभी-भीलडका को समभाता भी था कि इतनी बडी किताब मामन पड़ी है, लडर पास हान लिए सर क वन हा रह है व दिन कोटि है। लडा भवा दृष्टि स मुझे दखत रहत प, मरी बात का लाहा मानत पारितार उठान पर और भय हाता या, रख दन पर दूने दवाव स पल हा जान मा चिता। पलत बल्पना म पृथ्वी रिक्ष पार करन लगा । कल्पना रा वसा उडान आज तक नहा उहो ।' और राम प्रसार निराला का पाई पर वही पूर्ण विराम विच गया। परनु सस्कृत, वगना तया हित और भग्रेजी साहित्य का प्रपार शान उनराया। गायर यह रवीनाय का प्रभाव हागा शिव नवी रक्षा से प्राग नहीं बद । इसा बात को स्पष्ट करने के लिय गिरीशनिवारी गगाप्रसाद पाण्डय वपन या उदत करते हैं...- विसी न निराला सरह किया कि प्रतिभाशाली यक्ति भी परीक्षामा चरकर मनहा परन । स्वर रवीन्द्रनाथ नाट्य पाम है यह निरालाकापडी निधि मिना । उन्हान साया मुझे रवीद्रनाथ सरम योन हाना है और पराक्षा नहीं ३ नानादवि माहित्य . ४६० पाण्डेय महापाप निराश ३ निरार माल निराला काव्य पर गला का प्रभाव दा ताकि नवी कक्षा पास रह तिवारा जा कहते हैं कि निराला जी क इम क्थन म एसा नात हाता वि व वचपन स ही रवी द्रनाथ स प्रभावित थे साय ही बगला साहित्य स भी। आज भी रवी द्रनाथ के गीतो की सगीत माधुरी म प्रारम विभार हो कवि अपन वो ही रखो द्रनाथ समझ बठता है । चौदह वप की अवस्था म चादपुर जिला फतहपुरम निराला को शाला हा गइ । मातृ स्नह से वचित बालक का मनोहरादेवीम स्त्री-स्नह मिना। निराला का उनक माथ धनिष्ठ प्रम था जिसका प्रमाण सुकुल की बीवी का एक घाटा सा चित्र है । एकान म पत्नी जी मिली बडी तत्परता स बोली-वहा नाच देखकर भूतन जाइएगा। निराला जी एक जमीर का वरान म जा रह थ । उहान उत्तर गिया राम भजा- क्व मूय प्रभवावा क्व चाल्पविपयामति चला कहकर वह गव गुरु-गमन रा काम को चल दी।' परन्तु ववाहिक जीवन का यह सुख अधिक दिन तक नहीं बदा था। श्रा मनाहरा देवी न एक पुत्र और एक कया का जम दवर इ फ्लुएजा की वामारी मगरीर त्याग दिया। इस सम्बन्ध म डा० रामविनाम गमा लिखत है- पत्ता वा मृत्यु मायक म मां का गाद म हुद । सब कुछ समाप्त हान क वाद सूयकुमार भी वहा था पहूच । दस वज्रपात म उनका बुरा हाल था । घटा श्मशान म बट रहत । कहा काइ चूडी का टुका हड्डी या राख मिल जाती ना उस हृदय स लगाए घूमा करत । इ फ्लुएजा म इतने मनुष्य नष्ट हुए थे दिगगा के किनारे दिन रात चितामा को जात भी बद न हानी थी। अवधूत टोल पर बठा हुअा युवा कवि घटाता वहती हुइ लागा का दृश्य दखा करता। माता का देहात निराला की जावन भित्ति को पहला दरार यी और वह दरार स्त्री दहा त म और भी म्फीत हा गर्द । इस सम्बन्ध म विश्वम्भरनाथ उपाध्याय निखत हैं कि यहा म दा प्रतिक्रियाए स्पष्ट दृष्टिगाचर होती हैं एक कवि का रुभता जा उनकी प्रिया को सरम दृष्टि निक्षेप स नुप्त हो जाती थी, बनता हुई कुछ समय ता अद्ध चतनावस्था-सो रहा जिमम अन्तमुवा प्रकृति बनी दूसरा पार कामन आश्रय क नष्ट हा जान स उग्रता बरती गई। डा. , महाप्राण निराला, पृ००९ कवि निराला धार उनका काव्यमाहित्य पृ. सवल को बार। ४ रामविताम शमा निराला निराला-काव्य कला पार कृतिया , ध्यस्तिव और कृतित्व विश्वम्भरनाथ उपाध्याय का तात्पय है कि एक तारवि म प्रारम्भ स हा मता थी, परन्तु विवाह के उपरा । उनकी कविता म ऐन्द्रियता का समाव हुमा, फिर स्त्री को मृत्यु २ उपरा न उनम अमुवी प्रकृति व प्रसार के साथ उप्रता का भी सप्रसार हुप्रा । उपाध्याय जाका यह विवेचन अनुचित हो प्रतीत हाता है । जम यह कहना गलत होगा कि प्रारम्भ म ही निराला जी म रुक्षता थी वरन जा चीज उनम थी वह यत्तित्व या ग्रह था। परिवार में लगभग हरप की मत्यु से जब उन मामन जीविका कान पाया और इस वास्तविक जगत में उनका प्रथम वार तिक्त परिचय हुमा तब उनके ग्रह का काफी धक्का पहुँचा और उनम रुसता आ गई। उम महामारीम कवि की पत्नी की ही मत्यु नहा हुई पिता चाचा प्रादि एक व वाद एर सभी स्वग मिधार गए । चार भताजा और अपनी दो सतानो का भार २१ माल में युवर के वचा पर पडा। सम्पूर्ण परिवार के साथ परनी की अमामयिर मृत्यु का गार ही निराला में लिए वचपात म कम नहीं था ऊपर म बच्चा बा पालन पापण एक विक्ट ममस्या व प म मामन पाया। निराला माना स्त घ रह गा । व्यापक मटना और विचारा को अडिग हरता वकाल में ही उना बहुत बडी विशेषता थी। अब निराला साहित्य जीवन म पूर प्राण प्रवग के साथ प्रवश करन का कटिबद्ध हो गए । माहित्य का बहाने अपनी पारिवारिक तथा मामाजिक क्षतिपूर्ति का मायन बनाया । इस प्रकार जीविका के प्रश्न पर उनका इस ययाय ममार स दुखद परिचय हुअा जा उनके व्यनिस्व की भित्ति की दरार काम्पोत परन म महायर बना । प्रारम्भिक युग स ही व्यक्तित्व र प्रह मे युक्त हाने नारण जीवन की विषमताप्रा न उह विद्वाहात्मक तथा स्म बना दिया न स्त्रिीय वियोग न, यद्यपि स्त्री का वियाग परिवार का भार तथा जीविका का प्रान पोर ससार की निपमताएँ मवन एकत्रित हार उनर मह पर मापात दिया था और स्वरूप निराला जी हम बन गए थे। उपाध्याय जी की दूसरी बात नि विवाह के उपरात उनी अविता म एरिना या समावा हपा, भी उचित नहा लगती है । अभी हम रह चु हैं पिजीविका का समस्या र समाधान २ लिए निराला जो साहित्य क्षेत्र म प्रदा किया मद्यपि प्रारम्भिक अवस्था म हा रविता लिम्बन को प्ररणा उनम था और उनकी प्रथम प्रोट कविता 'जूरी की क्लो सन् १६ म निम्मी जा चुना था। जूही को पता म एरितामा चरमप निखाइ पडता है इसलिए यह रहना भ्रम हागामि विवाह स पर उनम एरिता नहीं यो यपि यह बात टार है कि विवाहोपरान्न यह एदिरता और भा भपिर व्यापर हा गई थी।
२० निराला काम्य पर गलाका प्रमाय जहा तक विश्वभरनाय उपाध्याय का तीसरा बात कि निराला की स्त्री की मृत्यु के कारण निराला को रुपता ने अद्ध चेतनावस्था म रहकर उनकी पन्त प्रकृति का प्रसार किया, भी दोपयुक्त है। पारण निराला के व्यक्तित्व का अह भी इस प्रवृत्ति का माधार है । व्यक्तित्व पर जीवन का प्रहार सहत हुए व विद्राहात्मक बन गए। मिल्टन को जब रेस्टोरेशन' के समय राज्य पद से बहिष्कृत कर दिया गया और साथ ही उनके नेत्रा की शक्ति जाती रही तब मिल्टन स्वय विद्रोही कवि बन गए थे। भगवान स वरवर शतान की महत्ता का उहान प्रतिपादित किया था। निराला और मिल्टन दाना ही यक्तित्ववादी पुरुप है प्रत इस विद्राह से ही 'विराटत्व की भावना' न उनके मन म माश्रय ग्रहण किया । इस विराटत्व की भावना के प्रसार म रवीद्र तथा विववान का वदा त तथा उपनिषद के विचार भी निराला व सहायक बने जहा इसके विपरीत मिल्टन की पियोरीटन फ्लिासफी उनके विराटत्व के प्रसार म महायव हुई थी। इस प्रकार निराला न इन दाशनिक विचारो स प्रभावित हाकर विश्वसत्ता व साथ तादात्म्य स्थापित करक विराट भावना की अभियक्ति प्रारम्भ की। यहा निराला रहस्या त्मक बन जात हैं और उनका प्रत प्रकृति का प्रसार इसी कारण हुमा । रहस्या त्मक भावना दिव्य रति क प म अागामी का य म प्रतिध्वनित होने लगी न निम्त्री की मत्यु के कारण गारिक अनुभूति दिव्य रति म परिवर्तित हुई। यदि ऐसा हाता ता उनकी रहस्यात्मक कविताए हीन प्रयिया (परवटेंड सक्स) की परिचायक हाती न कि सुष्ठु वदान्त का भावनामो की प्रपन । यद्यपि अपनी दिव्य रनि' को प्रमुख पात्र उनकी स्ना स्वयं थी । गीतिका के समपण मे उहाने यह स्पष्ट कर दिया है- जिसकी हिदी के प्रकाश स, प्रथम परिचय के समय म आख नहीं मिला सका-लजाकर हिंदी की शिक्षा के सकल्प स कुछ काल वाट दश स विदा पिता के पास चला गया था और उस हीन हिती प्रान्त म बिना शिक्षा में 'सरस्वती की प्रतिया लेवर पद साधना की और हिामीमी थी जिमका स्वर गृहजन परिजन और पुरजनो को सम्मति म मर (संगीत) स्वर वा पगस्त करता था, जिसकी मत्री की दृष्टि क्षणमात्र में मरी रुभता का दावकर मुस्करा दती थी जिसने मत में अदृश्य होकर मुझम मरी पूग्ग परिणीता की तरह मिलकर मर जड हाथ का अपन चतन हाय स उठावर दिय शृगार की पूर्ति की उम मुदक्षिणा स्वर्गीया प्रिय प्रकृति थामती मनोहरादेवी का सादर । इस प्रकार हम दखत हैं कि उनक माहित्यिक जीवन का प्रमुख आधार - EHAT गीतिका का समपण व्यक्तित्व और कृतित्व २१ सहजात साहित्यिक वृनि थी जिसका स्फुरण सन १६१६ म 'जूही को क्ली के माध्यम से हुा । साहित्यिक जीवन का दूसरा प्राधार था-स्वय निराला की जीविका का प्रश्न । मसार का समस्त भार जर १९१६ व बाद उन पर या पडा तब जीविका कमान के लिए ही उहोन मक्रिय हाकर साहित्य-सन म प्रवा क्यिा । और उनके कायकातीमग आधार था—व्यक्तित्व का ग्रह जिसम उनके प्रिय पात्रा की मृत्यु स उह एक भयवर धक्का पहुँचा, जिस कारण एवार उनकी सहजान-काय वृत्ति दानिक तटस्थता तथा विदग्ध हृदय की करुणा को लेकर फूट पडी और दूसरी पार अपन विध्वस्त अह का समीकरण निराला जी ने प्रकृति के विराट चित्र के प्रकन के द्वारा किया और इस प्रकार यापन ढग से व का य की रचना करने लगे । यहा से अब हम व्यक्ति के साथ ही कृतिया का भी विवेचन करेंगे। कृतिया जसाकि निराला ने स्वय सुकुल को बोबी म वहा है, बाल्यकाल में ही कविता लिखन की आर उनकी रुचि हो चली थी। निराला ने रवीद्र की तरह किसी 'जीवन-स्मृति का रचना नहीं की नही तो निश्चित रूप से उनके प्रारभिव' काग्य जीवन का इतिहास हम प्रस्तुत कर सकते। गगाप्रसाद पाण्डेय की पुस्तक 'महाप्रारण निराला म यह पता चल जाता है कि वगला के साथ ही अवधी और ब्रजभाषा मिश्रित भापा म व कुछ कवित्त सवये प्रारम्भिक काल से ही तिखन लग ५। जीविका के प्रश्न के कारण जब व निश्चित रूप से साहित्य भत्र म कूद पड मौर कविता प्रसारित करन लग तो उनकी प्रारम्भिर बगला-कवितामा को बहुन प्रशमा हुई। इस सम्बच म पाण्डेय जी लिखते हैं राजा के काम से प्राय निराला का बलात्ते जाना प्राना पड़ता था। धीरे धीरे लोग-बाग उह बलवत्त म भी मानन-जानने लगे। उनी बगला रविताना की तारीफ महिपादल म बलक्त्त तर समान रूप में होने लगी। हिटी की सवप्रथम प्रौढ रचना निराला का 'जुहा की कली है जा सन १९१६ म लिया जा चुकी थी। डॉ० रामविलाम शर्मा इसकी रचना के विषय म लिखत हैं कि निराला जा व पत्तित्व म निर्भीकता और उद्दण्डता टूट कूट पर भरी है । महिषादन म वे "मगान म घूमने जाया करतथे । जुही वा ग्ला रासुहाग उहांने वही पर देखा था।' मन् १९२० म निराला ने अपनी पर प्रथम १ गाप्रसाद पाण्डेय महाप्राण निराना पृ. ८ २ गगाप्रनार पारडेय महाप्राण निराना पृ. । ९ रामविनाम शर्मा निराला २२ निराला काव्य पर बगला का प्रभाव । रचना सरस्वती म छपने के लिए भेजी, कि तु द्विवदी जी ने इस लौटा दिया। मरस्वती से कविता लौटने का दुख निराला को कुछ कम नही हुआ, पर मम उनकी प्रतिभा के विकास म कोई बाधा नही पड़ी। सरस्वती म कुछ काल उपरात एक लेख में छपने पर उनका परिचय दिवटी जी से हो गया और द्विवेदी जी के मुभार पर व रामकृष्ण मिशन की हिदी पत्रिका समवय' के मपादव बन गए । यही स उनको काव्य प्रतिभा का स्फुरण प्रारम्भ होता है। उनमे नवीनता की ओर झुकाव था। माइकल मधु सूटन, रवी द्रनाथ तथा विवैवान द के प्रभावस्वरूप उहान हिदी म मुक्त छन्द तथा नवीन भाव योजना के साथ विवज्ञान व वेदात-गन का प्रचार किया। इस तरह हिदा-बाय म निराला ने अपन भाव विचारा सहित पदापण किया। सम वय काल मे मुक्त छ म लिखी उनका रचना पचवटी प्रमग उन की इसी मुक्त रुचि का प्रमूति है । निराला ने लिखा है--पुराण इतिहाम और ममाज तीन मुख्य आधार नाटका के लिए है । पौराणिव नाटको की भाषा प्रवाहपूण होनी चाहिए। प्राचीन युग का रूप तभी पूरा उतरता है । भापा इतनी रिलट न हा कि जनता समझ न सके पर ऐमी सीधी और शिथिल भी न हो कि प्राचीनता का गम्भीर वातावरण नष्ट हा जाय । मरा लिखा हुमा स्वच्छ द छद एमे ही नाटका क लिए उपयोगी है। इसी विचार स मैंने लिम्बा भी था । अवश्य काय लिखन के विचार म पहले मैंन उस मिल्टन की तरह विलप्ट भाषा पूर्ण कर लिया था पर मरा असली मतलब उम पौराणिक नाटको म लाना ही था। पचवटा प्रसग को अवतारगा का यही कारण है। इसका उदाहरण पश करने के लिए मैंन ता अपने लिये एक सामाजिक नाटक के एक पाट म इसका समावा कर दिया था और वह पाट पलक्ता को स्टेज पर मन खेला था। अपनी सब प्रारम्भिक कवितामो का अनामिका नाम स उहाने १६२३ म एक मग्रह निकाला । स समय व मतवाला' के सम्पादक थ और काय म क्रान्ति का प्रमार कर रहे थे । इस सम्बव म निराला ने मुकुल की बीबी म उम समय का स्मरण स प्रकार दिया है- बहुत हिना को वान है । तव में लगातार माहित्य समु मथन कर रहा या पर निकल रहा था चल गरल । पान करने वाल माले महादव बाबू। अनामिका (१९२३) म निराला की व कविता मगृहीन हैं जो 'नारायण १ रािला प्रबार प्रतिभा निराला मुरल को वारा ३ २ यत्तित्व और कृतित्व २३ 'मतवाला और 'मम वयं' म पहली बार प्रकाशित हुई थी और जिन्होंने बडो घोली निन्दी रविता म एक विशेष परिवर्तन की सूचना दी थी। प्य मम्ब व म गमरतन भटनागर लिखत हैं कि उस समय इन दिनाया की विशेष प्रमिद्धि नहीं हुई परन्तु माहित्य-पमालाबा और हिन्दी विना की गतिविधि मममन वालों का ध्यान उनकी पोर अवश्य गया। महादव प्रमादमा ने लिखा--- 'इतना मैं अवश्य रहूण और दाव न साथ वहमा वि त्रिपाठी जो न पचवटी प्रसग अधिवाय तया जूही की कला नामर कवितामा वा लिबार हिलीय पद्य गाहित्य म एक अभूतपूर्व Tी का ममावा किया है और यदि हिन्दी का कवि-समाज दम तोरा मार और अनुगमन परगा ता मातृ भाषा का जडा उपवार होगा और उमा लानित्य म ए नई वालपदा हो जायगी। रम पग्लो अनामिका को क्वल कुछ ही कविताए 'परिमल म पुन पाई है। व* पचवटी प्रमग अधिवाम जूही को क्ली और तुम और मैं । आप कविता पवि ने स्वय प्रौट समभकर छोट दी। इसी बीच निराला जो मम वय छोडवर मतवाला १ सम्पादन बन गर थ। फिर मनवाला भी छारना पड़ा और मन १९०८ म कलकत्ता छोडकर व लखनऊ मा गए । मन १९२० की तरह हिन्दा प्रान्त इस बार भी उनम विमुग्व नहा रह सका मोर सुधा न उनको कृनिया का स्वागत किया । मन १९३० का निराला का दूसरा काव्यमग्रह परिमल' प्रकाशित हुमा । डा. रामरतन भटनागर का कहना है कि 'प्रमाद न पासून जिम क्रान्ति का मून- पात दिया था, पत पल्लव' न जिस क्रान्ति का गहराइ दी उसा क्रान्ति का विस्तार निराला के दम महत्वपूर्ण काव्यपथ परिमन न प्रदान किया ।' निराना जा भापा भाव चन्द वा पूण की मयूण परम्परा म विद्राह परत हुए पाय थोर उनके लिए यह स्वाभाविक ही या नि उनका बात-चीत चाल द्वाल सभी म एक नवीनता का प्राभाम मिन। निरासान अपनी शक्ति-पाहम सममाज म रवि का अलग स्थान बनाया और जीवन ममानित्यारी प्रतिष्टा और महत्ता । उदघारिन दिया । चारा मोर निराला १ हदा की पैरोडो दनन सगी पर निशला इसम धवरान वान नहीं प । उह मना प्रकार में चिढ़ाने की भी चेणीजाती था, किन्तु निराना यह कह दिया परत थ- कुन भारत ही रहत ह हापो भपना धान म चला जाता है मना की र. रामरन भगार निराला दयन गि मासिनिमा (१३) राना भरनार विनिगला १ मध्यया . ३ ४ निराला-काश्य पर बगलाका प्रभाव में बादला का गरजना नही ग्यता।' हुमा ना यही क्यावि धीरे धीरे दस चीन भावधारा के पाव जमन लग और वह सवमम्मति म इम युग वी मूल रगा शक्तिक स्पम स्वीकार भी कर ली गई। निराला ने 'परिमल की भूमिका में लिखा है- "इस युग म कुछ प्रतिभाशाली अल्प वयम् साहियिन' प्राचीन गुरुडम क वच्छत्र साम्राज्य म बगावत व निए शासन-पत्र हो पा रह है अभी उह साहित्य राजपथा पर साधिकार स्वतत्र रूप म चलन का सौभाग्य नहीं मिला । परन्तु सा जान पडता है कि इस नवीन जीवन के भीतर म शीघ्र ही एक मा प्रावन धकर उठने वाला है जिसके साथ साहित्य के अगणित जल करण उस एक हा क्र की प्रदक्षिणा करते हुए उसके साथ एक ही प्रवाह म वह जायेंगे और यभ्रष्ट या विदग्य स गुप्क न एक ही जीवन के उदार महासागर म विलीन गे। सभी प्रतिभाशाली साहित्यिकाका निष्प्रभ नथा ह्य सिद्ध करक ससम्मान सन ग्रहण करने वाल महालेखक और महाकविगण मारित्य म अपनी प्राचीन लामा प्रथा को ही पुष्टि करत जा रह है। ऐमी स्थिति म परिमल निरन रहा है। *मा मैंन तीन वय क्यि है । यम ग्वन म सममायिन सात्यानुप्रास कविता है जिनक निए हिदी लभरण था के द्वारपालो का प्रवा निषध या भीतर जाने की सस्त मुमानियन है । मरे खपत्र म विषयमात्रिक सान्त्यानुप्रास कविताए हैं। तासर खण्ड म स्वच्छ द हैं, जिमने विषय म मुझे विगप कहन की जररत है कारण इम ही हिन्दी मर्वाधिर क्लक या भाग मिला है। यस सम्बन म बच्चनसिंह का कहना है-निराला न जिस मुक्त छद उद्दाम वधारा और दागनिक प्रोजस्विता के साथ हिंदी म प्रवग किया वह हिन्दी ला के लिए सवथा नवीन वस्तु थी । निराला का छतहीन नवीन प्रयास उनके नए अदभुत वस्तु या इमस उनकी रडिवद्ध रुचिया का मल तो दूर रहा इसका म्पर भी उन्हें प्रिय न या ! यही कारण है कि न ता इनको कृनिया का सहा भूतिपूण अध्ययन हुआ और न लोगों न रह समभन का ही प्रयत्न किया । हम भांति एक अप्ट प्रतिभामम्पन कवि की अवहाना हाने लगी। या ता नवीन डायावाद व सभी प्रवत्तकों का प्रवल विरोध हुमा किन्तु निराला का प्रौरा की TOPा प्रधिय मध्य नव विरोधों का सामना करना पड़ा । यह निराला का ही पाण्डेय मदाप्राण निगा पृ०२ निराला परिमल की भूमिका व्यक्तित्व और कृतित्व न्यक्तित्व है कि भनेर विरोधा और मघर्षों बीच में होन हा ग्राज य इतने वे पहुंच पाय है। निराला परिमल' की कवितामा के अनेक विषय है । साधारण दृष्टि स उसम प्राथनापरव कविताए, प्रकृति सम्व धी वविताए प्रमविषयक कविताए दश प्रम मप्ररित रविताए तथा मामाय मानव भूमि पर अाहत कविताए सक लित हैं। सम वय' के सम्मान-काल म इनकी दारानिक प्रवृत्ति का जो विकास प्राप्त हुआ था उसी का प्राकलन परिपलको पविताया म प्राप्त होता है । इनकी कवितामा म अदत शान की छाप स्पष्ट देखी जा सकती है । इम सम्बयम डा० रामविलास गर्मा का कहना है कि परिमल की रहस्यवादी ववितामा का एक साथ पढने पर पता लगता है मिरवादनाथ से अधिक कवि पर विवान या प्रभाय है। इसके उपरात निराला की नई कृति गीतिका १६ ६ म प्रकाशित हुई। इस बीच उनके ऊपर म नारुण ममा प्रवाह वह गया । सन ३५ म सरोज (नडकी) को असामयिक मृत्यु ने निराला का बहुत भारी प्राघात पहुंचाया। चारा पोर वे विराध पोर माहित्यिक व्यवसायिया क छलो स पीडित कवि वे लिए यह दुघटना महान क्षोभ का कारण बन गई। जावन ममा र बोच निराला एकाकी तक को भाति भरभोरे गय पर हिंदी के सौभाग्य स उखड़े नही और मन ३६ म छपी उनका गीतिका यी प्रभूत प्रामा हुई। गोनिका' व परिचय मश्री जयशनरप्रसाद निखत हैं- गोनिया हिती व नि मुन्दर उपहार है। उमा चित्रा की रखाए पुष्ट वों का विशाम भाबर । उमरा दानिक पभ गम्भीर और व्यजना मूर्ति मनी है। मालम्बन प्रतीत्र उहा के लिए प्रस्पष्ट हाग जिहान यह नहा मममा है पि रहस्यमयी अनुभूति युग र अनुमार अपन लिय विभिन्न माधार चुनती है। देरल कोमलता ही विश्व का पापरण्ड नहीं है। निराला जी ने माज और मौन्दय भावना और कोमल व पना का जो माधुपमय सरलन किया वह उनकी कविता मक्ति-साधना का उबल परिचायक है। स्वय निराला न इन गीता ने सम्ब य म कहा है-वडी बोलो को मस्कृति जव ता मसार की मच्छी पछी गोनप भावनामा म युपत न हागी, वह ममथ न होगी। उसकी मपूण धामीनना जीरा है। परपामा सिगरीवि निराना पृ०० २ रामविनाम राम! निराश . निराग गनिस की भूमि। है निराला-बाध्य पर वगला का प्रभाव परिमल म निराला के गीत प्रकाशित थे और विद्वाना में उनका बड़ा पार हुआ था। सगीत विशारदो न उनकी मगीतमयता की प्रशसा का थी। इन गोता म किसी एक सुदर भाव को लेकर दो तीन या चार बद उप स्थित किय जाते थे । वगला म रवीद्रनाथ यस प्रकार वे सस्रो गीता की रचना पर चुरे थे। अत रवी नाथ के गीतो की छाया म पलने वाले निराला का ध्यान इस पार जाता स्वाभाविक था । गातिका के गीता का मुख्य विषय रहस्य वाद है । म मबघ म श्री नर दुलारे वाजपेयी का यह क्थन महत्वपूर्ण है- 'रहस्यवाट तो इस युग की प्रमुख चिताधारा है । पराश की रहस्यपूण अनुभूति स उन गीत रजित है । रहस्य की कलात्मक मभि यक्ति जो बहुविध चेष्टा आधुनिक हिम की गई हैं उनम निराला की कृतिया विरुप उ लखनीय है । कुछ कविया ने तो रहस्यपूण कल्पना हो की किन्तु निराला वे याव्य या मरुत्पर ही रहम्यवाद है। उनके अधिकारी पदा म मानवीय जीवन व चित्र है अवश्य कितु व सबके सब रहस्यानुभूति म अनुरजित हैं ।' यद्यपि गीतिका म रहस्यवाद के अतिरिक्त दाभक्ति तथा प्रम विषयक कविताए भी मगृहीत हैं । मन १६५८ म उनका नया का यस ग्रह अनामिका' निकला। अनामिया व सम्बध म डा० रामरतन भटनागर का कहना है कि अनामिका TIम के प्रति निराला का मोह होना स्वाभाविक था। वह उनका प्रथम काव्य-मग्रह था जो १९२३ म प्रकाशित हुअा।। वप वार अपने एक अय प्रौन सग्रह का नाम दूरत हुए कवि को इस पहले मग्रह का ध्यान आया और उसने इस मग्रह मा नाम भा प्रनामिना रखा। यद्यपि इस मग्रह म पिछल मग्रह की कोई भा कविता नही है तथापि अनामिका (१९२३) और परिमल (१९५०) व चीन की कुछ रचनाएँ निराला न म सग्रह म प्रकाशित की हैं। इन रचनाम्रो म उनक प्रारम्भिक काल की प्रवृत्तिया पर विरुप प्रकार पडता है। इनम पहली कविताए व हैं जो रवीद्रनाथ या विवेकानद काय का हिंदी अनुवाद है । इस प्रकार यो कविताए ज्यष्ठ, कहा देश है 'लमा प्राथना रवीद्रनाथ की ववितामा वा अनुयार है मौर सपा के प्रति नाच उस पर श्यामा माता ह गीत में तुम्हा को मुनाने का विवकानन्द की कवितायो का अनुगद है। इन अनुवादा क सम्बन्ध म निराला न लिसा है - अनुवाद का सत्य वही ममता है मौलिक नय का चमत्कार उसी दृष्टि में अपना गोभनाय सटि , गारिका की भूमिक!, पृ०॥ १ रामरत्न भग्नागर कवि निराना एक अध्ययन, पृ० १६० व्यक्तित्व और कृतित्व की भापा रखना है अनुवाद और मूल दाना की भाषामो पर जिमका पूण अधिकार हो।' *मो का ममझात हुए निराला ने एक और लख म लिखा है- अनुवाद के लिए यह नियम नहीं कि मूत्र का प्रय पुस्तक का अक्षरा अनुवाद किया जाय परन्तु यह भी ठीक नहीं कि इन मूल का प्रय आदि कुछ और हा और अनुवाद का कुछ और । अनुवादा का मूल के प्रथ पर ध्यान रखना चाहिए । उनी भय को दूमरी मापा म प्रस्फुटित कर देना उसका क्त य है । यदि मूल म काई चमत्कार हा ता अनुवाद म भी चमत्कार दिखाना चाहिय । मूल की भाषा म यदि किसी एम मुहावर का प्रयाग हुअा है जिसकी पार स्वभावत पाठ पिच जाय तो अनुवादक का भी उसी ढग का करना चाहिए । साराम यह है कि मूल और भावा में अनुवाद की भाषा और भावो का गिविल न होने देना चाहिए। भारत के प्राचीन सास्कृतिक पत्र का उदघाटन अनामिका की कुछ कविनामा म बढे सुदर ढग से हुआ है। टॉ० बच्चनसिंह तो यह कहत है कि निराला भारतीय मस्कृति में प्रकले चित्रकार है।' बच्चनसिंह यह भी कहते ह कि जहा निराला भारतीय मस्कृति क प्रमी है जहा य प्राचीनता का प्रथय देन वाले हैं वही नवीन को मुक्त हृदय मे ग्रहण करने को प्रस्तुन रहते है। नवीनता का म्वागत करत हुए उदबोधन' म कहते है--- 'मागे मे नव जीवन का तू प्रजन लगा पुनीत बिखर झर जाने दे प्राचीन ।' अनामिका तक पहुचते पहुचत भाषा, उत, शली और विचार मा म कवि न प्रोरता प्राप्त कर ली थी। राम की गति पूजा', मराज स्मृनि' -नकी प्रौढनम रचनामो क प्रतीक है। इसके अतिरिक्त 'अनामिका को कुछ कविताम्रो म हम निराला की नई प्रगतिशील कविनाग्रा का आभाम मिलता है जिसमा मूत्रपात हिदी भेत्र म मन ३० स हा गया था। विमान को नई बहू की पाखें खुला श्राममान', ठट, 'तोडनी पत्यर' और 'महज' इसी प्रकार की कविता हैं। यद्यपि इनको मम्पूण प्रगतिवादी कवितायो को श्रगी में नहीं रखा जा सकता है। मारण इन रवितामो म अस्पष्टता और रोमाम र पुर जरूर है । परपर सोने वाल का याम तन भर बघा यौवन, दखन वाल ववि का गतT प्रगतिवादी निराना, भातुर निगता, परिवहन, चाबुक सन प्रान्निवागविनिगना ४ बा1 निराला काव्य पर बगला का प्रमाव सामाजिक दृष्टि से यह कविता भारतीय समाज यवस्था व एक अपरूप पक्ष का निदशन भा कराती है। मास्का टायलाज शुद्ध दिनानात्मक रचना है । इसम मास्वाजावा साम्यवादियां व अवरचर नान की खिल्ली उडाई है। बच्चन सिंह का कहना है वि उपालभ और व्यग्य समान हान के बाद कवि म विपादात्मक गाति प्रा जाती है। उनकी यह अवस्था बिल्कुल मनावनानिक प्रक्रिया के अनुकूल हुई है। अब इन क्थन में दुनिया के लिए मन्दश है, भग वान के प्रति अात्मनिवन्न है और है मामाजिर राजनीतिक तथा साहित्यिक महापुस्पा क प्रगस्ति अकन का प्रयास । ऐसा करन म रविवाबू की भाति इनसा स्वरूप भी मदेश दने वाल नता का हा गया है । एमी परिस्थितिया म कवि राजनीतिक नतृत्व के स्तर पर या जाता है । कवि के जीवन का यह एव नूतन पक्ष है। अणिमा टसी की यात्तक है।' इम काय मग्रह म भक्तिप्रधान विपान मूलक तथा प्रशस्ति या वृत्त लखन का प्रयास है। परिणमा की अधिकारी कविताए पुराने ढग को है परन्नु ना ग को अवलना नहा हुई । वास्तव म अणिमा सधिका य है। गयावाद और प्रगतिवाद के दुराह पर गडा रवि अपने सार माहित्यिक जावन का लखा जाता ल रहा है और नए मदान म उतर रहा है । कवि अपन हृदय का भी नए पथ पर चनने का उदबाधन दता है- गया अधेरा देख हृदय हुआ है सबेरा चलना है बहुत दूर है नहीं वहा परी नहीं हूर मूसा का जना, कुछ देने के लिए है निर्जीवन जीव दहन तूर, और कहीं डाल अपना डेरा- प्रघेरा। "स पर विवचन करते हुए रामरतन भटनागर लिखत है कि हूरा और परियो कपना लान म उतर कर कवि जावन | उस ढूह को पार आता है जा जन गया है जिसन पास बटन म कुछ मा दन के लिए नहीं है कल्पना का पानात भी नहीं है । दसी श्मशान म वह अपना डेरा डालगा और यही नए मानव का नई सस्कृति की बीन बजायगा । वला और नय पत्त (१९४३) भी इसा वप क प्रकाशन हैं । इनम कवि , बचनसिह मानिकारी कवि नराा ५० १२४ रामरतन भटनागर वि निराला एक यथन, ५ .. २ म्यत्तित्व और कृतित्व ३१ न अपन का छायावादी परम्परा म शत प्रतिशन ताद लिया है । वह नए काय की परखा गठन म त मय है --नव लोर नूतन दिशा, नवीन अभिव्यक्ति । कुकुरमुत्ता स हो कवि ाली के प्रति कुछ अधिक भुक गया है और टी. एस० इलियट प्रादि अग्रजी कविया का तरह शलीगत प्रयाग करन लगा है। 'वला और 'नए पत्त म भी दा पृथक्-गृथक शलिया--उटू पोर अंग्रेजी का हिन्दी म अपन अपने ढग म उपस्थित करन का प्रयाम दिया गया है । इमी ममय मेनी निराला को मानमिव अवस्था म अस्वस्थता क लक्षण दिखाई पडन लग थे । एमी स्थिति म बना' पार 'नए पत्त एमी कृतिया का सृष्टि एर अदमुत् घटना ह । बला क मम्ब ध म कवि निखत है—बना मर नय गीता का सुग्रह है । प्राय मभी तरह के गय गीत मम है भाषा सरल और मुद्रावरदार है । गद्य करने की प्रावग्यकता नहा, दाभक्ति क गीत भी है । वरकर नई बात यह है कि अलग अलग बन्दा का गजलें भी है जिनम पारमा र छदास्त्र का निर्वाह किया गया है। विकी दृष्टि धार वाता पर विशप स्पम जमी है.--गीतों की विविधता भाषा की मरलता तथा मुहावरदानी पारमीक बन्ना का प्रयाग और इम गद्य करन की पावश्यकता । निगता के ममग्रन म ग्रजला का भी ममा बाहुमा है। नय पत्त (मन १९४६) निगला का प्रतिम मग्रह है। रास्तव म जमा कि रामरतन भटनागर पहल हैं निराला क काय-जीवन उनराध के मब भग्रहा म स यह माह सबस महत्वपूर्ण है। गगाप्रमाद पाण्डेय का भी यही कहना है कि 'नय पत्त म उनका बना, जिमम काव्य प्रतिभा क माय-माय मालाचा की तथ्यपूण मनापा का भी मम्बर है, अपन चरम विकास का छूती है क्यादि इमम निराला क व्यग्य का वियप विकाम और प्रकाश मामन पाता है।' बच्चनसिंह का कहना है कि म मग्रह म निरागा न जहा मोठी चूटरिया ली है व स्थल बहुत मुदर वन पड है।' नय पत्त का कवितामा का हम कई वर्गों म बाट सक्त है । बुध कवितारामी है जा नई म पुरानी अधिर हैं। उनम हम 'अनामिका और परिमल + ववि के न हात ? । दवी मरम्बनी निला जलि और युगावतार परमस श्री रामकृष्ण दव र प्रति म श्रणी की रच माए हैं। इनम हम निराला की पभिजान पल्पना का प्रौटनम म्प मिनगा। . . निराना, भावान बला रामरतन भग्नार कवि निराना भयान, पृ०.०%3D पागडय मदामाय निराला पृ०11 रचनामा यनिवारा निगवा ." ३ ३२ निराला काव्य पर रगता का प्रमाय । विवकानट की कवितामा दा अनुवाद 'चौथी जुलाइ २ प्रति और 'काली माता भी इसी श्रेणी म पात हैं । एक दूसरी श्रणी क्ला। म गरत और स्फटिक शिला कवितामा का है जिसम ववि ने अध चेतना (सबकाशियस इगो) का मुक्त चलन दिया है-वह बहता गया, बहता गया भाव जम प्राय लिख दिय । स्मो का य म मायाकावस्की की कविताए इसी श्रग्गी म माता है । यूराप म विम्बवाटी (इमजिस्ट स्कूल) तथा प्रतिययाथ (स्योरिलिस्ट) पविगण इस प्रकार र प्रयाग करते रहे है परन्तु हिना म य पहल प्रयोग है परन्तु नय पत्त' म जो सवस महत्वपूर्ण है वह है पाश । इस शपाश म कवि नई भाषा और नई शली म सप्राण व्यग्य लिख रहा है। सारी एतिहासिक चेतना (हिस्टारिक्ल प्रोसस) सारी राजनीतिक प्रगति का कलम का नाक पर रखकर वह समाज धम राष्ट वग विशप और इनक क्णधारा पर छोटे उडाने चला है। चर्खा चला म एतिहासिक चतना वा प्रत्शन हुमा है गजे ने अपना रखवाली की म मामता समाज की सारी यवस्था सार धम क ग्वाखनपन का प्रर्शित किया है। खुशखबरी म सिनेमा और नृत्यप्रमिया पर व्यग्य किया है । 'नय पत्त अाधुनिक हिन्दी कविता म एक नितान्त अभिनय वस्तु है । पहली बार इतिहाम चतना सामाजिक और राजनतिर व्यग्य भौर जनता व लाक्नायकत्व क सुदर सुन्दर चित्र हम मिलते है । प्रचना और अाराधना कवि का मायुनिकतम गीत मग्रह है। रनको विशपता गीतिका और परिणमा के समान है। यस प्रकार हम दखत है कि प्राधुनिक का य का शव यौवन और प्रौट रूप निराला का लखनी + समथ सहयोग म परिपूरण हुआ है, उनका प्रचंड प्रतिभा न इस स्वरुपका मजाया और उसका गाररिया है। छायावानी मौर प्रगति वाला दोना युगा क वे बहुत ही बलिष्ठ कलाकार नै क्याकि दाना युगा की विशेषताए उनरे का प म निहित हैं । छायावाद की प्रगनिशाल गतिया का उभार उनकी कविता म मरम अधिक पाया जाता है। अनुभव व साथ चितन का महत्व काय मे सबस पहन निराला ने स्वीकार किया। प्राय यह है जसा कि गगाप्रसाद पापन्य कहत हैं कि दाश निर नेतना के साथ यथाथ अनुभूनि का बार निराला व वा य की सबस बडी विगपता है । भावात्मर स्थिनिया के साथ स्वर-सामजस्य व द्वारा चित्रात्मरता वा उत्घाटन उनकी अपनी निजी क्ला है।' छायावाद म लकर प्राधुनिक युग प्रवृत्तिया व पक्ष या विपक्ष म कवि न २ महाप्राण निराला पृ०103 ।
ग्यक्तित्व और कृतित्व अपने विचार काव्य के माध्यम से प्रक्ट किया है । वसे भी कवि युग से अलग नहीं है। शेक्सपीयर ने कवि को 'इट वर दो मिरर अपटू नेचर' कहा है। काडवेल ने भी अपनी पुस्तक म कवि को सामाजिक तथा व्यक्तिगत परिस्थितियो के मध्ययन के लिए कहा है जिससे कि कवि के समय का उचित विश्लेषण हा सके। रेल्फ फाक्स के अथ दो नावेल एण्ड दो प्युपिल' और एलिजवेथ मनरो की रचना 'दी नावेल एण्ड सोसाइटी' म इस प्रसग पर नवीन प्रकाश डाला गया है । हडसन ने अपनी पुस्तक 'इट्रोडक्शन टू दोस्डी प्रॉफ लिटरेचर' म टेन का उल्लेख करते हुए साहित्य की प्रालोचना म पारिपाश्विक परिस्थितिया की उप योगिता के सम्ब ध म लिखा है- I am to a certain extent following the lead of Taine who attempted to interpret literature in a vigorously scientific way by the application of his famous formula of the race, the mi lieu and the moment meaning by race the herıdıtary tempera ment and disposition of a people, by milieu, the totality of their surroundings, their climate physical environment political institutions social conditions and the like and by moment the spirit of the period, or of that particular stage of national development which has been reached at any given time इस प्रकार हम देखते हैं कि कोई भी कवि या लता अपने वातावरण से पलग होकर नही जीता। वातावरण कवि क जीवन को, उसके व्यक्तित्व को परोश पोर अपरोष दोनों ही रूपो म कई प्रकार स प्रभावित करता रहता है। यह सच है जमकि शिवप्रसादसिंह कहत हैं कि कपि केवल वातावरण की उत्तात्ति नहीं है वह वातावरण सास्कृतिक और सामाजिक दाना प्रकार के वातावरणा का निर्माता है । किन्तु निर्माण की यह दिन, या उस बदलने की यह क्षमता भी कवि को उसी से प्राप्त होती है। इस प्रकार यहाँ निराला को पारि पाविक परिस्थितिया नया युगीन विचारधारामा पर विवचन कर लेना होगा क्यानि वातावरण कवि के जीवन पर मवस वहा प्रभाव होता है और उस प्रभाव के बल पर हम अपने पालोच्य विषय पर विचार विमा कर पायेंगे । . म्लेट-०३.मान Caudwelt rifusion & Reality A study of the sources of poetry 1udson Introduction to the study of literature Page 9 ४ गिवरमा मह विधापति ३४ निराला-काव्य पर बगला का प्रमाण पारिपाश्विक परिस्थितिया तथा युगोन विचारधाराएं सन १९१५ म निराला का काव्यकाल प्रारम्भ होता है। डा० रामविलास शर्मा का कहना है कि निराला के काय तथा वातावरण का अन्योन्याश्रय सम्बध है क्याकि अपने वातावरण के प्रति उनकी ममा सत्व जागृत रहती है। इसी कारण प्रारम्भिक काल म बगाल म रहते हुए बगाल तथा बगना काय के प्रति उनकी मपार नद्धा रही। उस समय बगाल म तीन शक्तिया स्वतत्र रूप से अपने उ मेप मे व्यस्त थी। प्रथम स्वदेशी मा दालन द्वितीय रामकृष्ण मिशन की धार्मिक क्रान्ति, तथा तृतीय रवी द्रनाय का साहित्यिक नव निर्माण । इन तीनो शक्तिया के पीछ जो मूलमत्र था वह प्राचीन प्रथा कुरीति को त्यागकर भारत के चिरतन वभव, सम्यता तथा सस्कृति का जागरण करना था। इस सम्बध में रवीन्द्रनाथ न अपने एक प्रबध म लिसा था-इस बार के नव वप में हम भारतवप के चिर पुरातन म स ही नवीनता का ग्रहण करेंगे-सायाह म जब विथाम की घण्टी बजेगी तर हम चूर हार नही गिरेंगे-नव आशीर्वाद के साथ उस अम्लान गौरवावित माला को लेकर हम अपने पुत्रा के ललाट म उसका बाधकर उम निभय चित्त तथा सरल हृत्य स विजय पथ की मोर प्ररित करेंगे । जय होगी भारतवप की विजय हागी । जो भारत प्राचीन है जो प्रच्छन्न है जा बृहत उदार जो निर्वाक है उसकी विजय हागी--हम लाग जो अविश्वासी है मिथ्या वक्त हैं प्रास्फलन करत है हम हर साल कहते है- मिलि मिलि जामोव सागर लहरी समाना । उसस निस्त सनातन भारत की कोई क्षति नही होगी । भस्माच्छन्न मौनी भारत चारो पार मृगचम बिछाकर बठा है-हम लोग जव समस्त चटुलता को लकर बिदा हगि तब वह शातचित्त हमार पौत्रा लिए प्रतीक्षा करता रहगा। वह प्रतीभा व्यथ नहीं होगी, वे उन सयासी के स मुख करबद्ध होकर पाएगे पौर कहा-पितामह हम मत्र दीजिए । पितामह तब कहेंगे--'मोम् इति ब्रह्म । वे कहेंगे-भूमव सुख नाल्पे सुषमस्ति । पानद ब्रह्मणो विद्वान न विभेति कदाचन । ' इमो म स्वदेश प्रम का मूल मत्र छिपा है जहाँ भूमा के लिए, समस्त भारत के लिए अपने सुख को त्यागना पडेगा । यही रामकृष्ण मिशन का सेवाधम सम वे कहेंगे- - १ रामविलास शर्मा निराला, पृ. २६ २ रवीन्द्रनाथ ठाकुर सकलन व्यक्तित्व और कृतित्व ३५ न्वित वेदान्त के ब्रह्म का रहस्य भी छिपा है और यही छिपा है रवीद्र के साहित्य का मूनमात्र, विश्व में प्रमुख साहित्य का मूलमत्र-प्रानन्दम्' जो ब्रह्म अर्थात सववाद समवित है। मूयकाल त्रिपाठी निराला' इसी ददात तथा रवीद्रवे सववाद अर्थात रहस्यात्मक अनुभूति स प्रभावित हुए थे। डा. विश्वभरनाथ उपाध्याय ने अपनी पुस्तक म यही कहा है, 'रवीद्र और वेदान्त निराला की प्रारम्भिक कला के मानि सात मान जा सक्त हैं। 'डा. रामविलास शर्मा ने भी अपनी पुस्तक म लिखा है बसवाडे को पाल्हा-नौटको सस्कृति के अलावा युवावस्था मे उनका सम्पक बगला की दा महान् सास्कृतिक पाराग्राम मा । एक ता श्री रवी द्रनाथ ठाकुर के नतृत्व म वगाल का नवीन सास्कृतिक जागरण और दूसरा स्वामी विवकानद द्वारा स्थापिन श्री रामकृष्ण मिशन । न दोना वा उन पर स्थायी प्रभाव पड़ा है । मार इसम सदेह नहीं कि अपा साहित्यिक जीवन के प्रारम्भ- काल म उह पहन इही से परणा मिली। डा० बच्चनसिंह का भी यही कहना है प्रारम्भिक कालम, यगला थप्ठ कलाकारा~-रविवावू, चहौदाम, विवेकानन्द और वणव रवियो वा प्रभाव मीन पर था।' डा. रामरतन भटनागर भी यही रहते हैं कि प्रारम्भिक पवितानो म हम कवि वा साधना के पहल चरण म पाते हैं । अभी उसका रूप सुस्पष्ट नहीं हो पाया है । वह रवो द्रनाथ और विवानद + काव्य का छाह मागे कर रहा है। निराला जो न स्वम वेदान्त का साहित्यिक वाचा विश्ववाद' के बार में अपना समयन प्रकट करते हुए लिखा है भारत की देन है 'विश्ववाद' सव म एक मूक्ष्म चेतना, हर एक कदम वह चेतना स्वरूप यह मारमा वह विमु मोजून है खीर का विश्ववाद योरोप के मिटान्त के अनुकूल है, और उनके ब्रह्म समाजी होन में नारण उनका विश्ववाद उपनिषदा स भी सम्बप रखता है।' इस प्रकार यह स्पष्ट हा जाता है नि निराला जो हम भारतीय विश्ववाद मे प्रगार प्रदा रखत है जो सवयम पदारा प्रवनिल, पिर मा उपनि पदा द्वारा विवामित मोर गार द्वारा प्रभावित होता हुमा माधुनिक काल में पापर रवीन्द्र साप म चमका भोर निराला न इमका रवाद से हो ग्रहण , विरसम्मरनाथ उपाध्याय महाकदिराला कान्यक्ला भौर कृतिया १ रामविलास रामा निराला १०४७ ३ पपमा प्रातिशारा निराला १०६ रामरतन भटनागर निराला एक अध्ययन, पृ. ८० ५ निराला प्रबन्ध-पप निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव क्यिा । बगाल के स्वदेशी अन्दालन स भी व प्रभावित हुए थे जिसका उदाहरण कवि के स्वदेश प्रम की कवितायो म उपलब्ध है। कविता लिखत हुए जिस दूसरी युगीन विचारधारा स व प्रभावित हुए वह था छायावाद । यद्यपि छायावाट के मम्ब ध म यह कहा जा सकता है कि व जहा इससे प्रभावित हुए वही वे इसक निर्माता भी हैं क्यादि कवि केवल वाता वरण की उत्पत्ति नही है वह वातावरण-सास्कृतिक और मामाजिक दोनों प्रकार के वातावरण का--निर्माता भी है। छायावाद द्विवती युग के म्यूल दृष्टिकोण क विरुद्ध मूक्ष्म का विवाह प्रतीत होता है । डा० नगद इसका उपयोगिता के विरुद्ध भाक्ता, नतिक रतिया के प्रति मानसिक स्वातश्य और काव्य वधनो के प्रति स्वच्छद कल्पना का विद्रा कहत हैं । परन्तु इस काव्य-सघात के पीछ एक मौलिक द्वन्द्व भी छिपा हुमा दिवाई पड़ता है। वह द्वन्द्व है हृदयतत्व समाप्लुत भाव मस्कार (concept) तथा मस्तिष्क से प्ररित विचार (Idea) का द्वाद। इस द्वन्द्व का मन् १८ व भारत के नवजागरण (renascence) ने मानव अनुभूतिया की व्यापक्ता द्वारा और कविया के निजी जीवन की कुण्ठाना ने उगुद्ध किया अथात स्वप्नमय आटा और यथाथमय विभीपिका स उदबुद्ध इम द्वन्द्व में भावु क्ता ने विजय पाई। इन भावुकता के रूप का मममन के लिए एक उदाहरण ल मक्त हैं-यथा नारा क स्थूल चित्रण द्वारा उसक सौदय की अभियक्ति न कर एक गुलाव क सक्त म नारी २ मोदय की अभिव्यक्ति करना उस युग की भावुकता का प्राधय बना । इस भाव पद्धनि को हम ण्डीशन आफ स्ट्रज नसहयूटी कह सक्त है। इस प्रकार हम देखत है कि छायावाद एक विप प्रकार का भावात्मक दृष्टिकारण है। इस काय दो अन्तनिहित तत्व है- (१) प्रत्येक छायावादी कवि के मन म अप्राप्य का पाप्त न करने पर जा वदना का स्वरूप जग पड़ा है उसका अभि यकिन इसकी एक प्रमुख विशेषता है। (.) यक्तित्ववाद ( अह व कारण अथवा काव्यगत अनुभूति के कारण) से प्ररित काय के अन्तरग (intrinsic) सौदय का प्रकाशन इसकी दूसरी विशपता है। वस्तुत यह सब कुछ होन पर भी छायावादी कविया क द्वन्द्वात्मक चरित्र (split personality) कारण स्वच्छन् वार रहस्यवाद मानवतावाद राष्ट्री यता, अध्यात्मवार सर्वात्मवाद प्रादावाद सभी विपया का समाहार व अपन काव्यम बरते हैं। इसी कारण प्रत्यार मालोचक की दृष्टि म छायावाद विभिन्न डा० नगे या नुनिक हिन्द कविता का मुख्य प्रवृत्तिया व्यक्तित्व और कृतित्व है तत्त्वा ना भारलन है। रामचन्द्र गुक्ल के मतानुसार 'पुराने ईसाई सता के थायाभास (phantasm) तया यूरोपीय काव्यत्र में प्रवर्तित प्राध्यात्मिक प्रतीकवाद (symbolism) के अनुकरण पर रची जान के कारण वगाल म ऐसी कविताए गायावाद कही जान लगी थी। प्रत हिंदी में भी इस तरह की कवितामा का नाम 'छायावाद चल पड़ा। महावीरप्रसाद द्विवेदी छायावाद । बगला की रहम्यवादी कवितायो का अनुकरण या छायानुवाद मानत थे। प्रसाद के अनुसार जब वदना के प्राधार पर म्दानुभूनिमयी मभिव्यक्ति होने लगी नव हिदी म उम छापादाद नाम से अभिहित किया जाने लगा। श्री वाजपयी के अनुमार छायावाद वीमनी तादी की मानवीय प्रगति की प्रतिक्रिया का द्योतक नवीनकाव्य (छायावा) म ममस्त मानव अनुभूतियों को व्यापकता पूरा स्थान पा सको।' डा. गर्मा इम स्वच्छ दवाद (romanticism) का पर्याय मानत । अन हम यह निप्पप निकाल मरते है कि छायावाद एक विशप प्रकार का भावारमर इरिटकाण है वदना नया पतरग मौन्दप का प्रकाशन जिसके दो प्रमुख नत्व हैं परन्तु कविया के द्वन्द्वात्मक चरित्र के कारण हर प्रकार के विचारो तपा वादा का ममावा हा गया है। गली की दृष्टि म य स्वच्छादतावादी बगाली कविया से प्रभावित हुए और विगपतया भाव की दृष्टि म वगाली कवियो की भावुक्ना का पन्हान ग्रहण किया। निराला "म छायावादी विचारधारा स प्रभावित हुए और साथ ही छाया वाद म नवान तत्वों पा समावा विपा । निराला जब सक्रिय हावर काय की रचना पर रथ तब उन पर नाना प्रकार को विपत्तियों मडरा रही थी परन्तु उन पहन उह नीचा सना नहीं सिखलाया था। मग्राम,पराजय निरागापौर वाह्य प्रारा वीडी चार म व पराजित नहीं हुए।गट के अनुसार--Agreat crisis uphlts a man little ones depress him-मभी बाधाए उनके लिए भविष्य का पुष्ट पायय वन गइ । इमा कारण पोर छायावादी कवियो की तरह करना' म व्याधुल वे वयक्ति नहीं बन गए वरन् विद्रोहात्मक वनकर विराट' की उपासना करन लग । इस प्रकार छायावाद म एक नय तत्व का 1 रामच" मुक्न हिना माडिरय शान्दिाम, माठवा मरण पृ०६१४ २fan मुकदि किपर ३ प्रमा' कायाला तथा अन्य निगर ४ सुमारे वापया माधुनिक मारस पृ. 16. ५ मा हिकान्य पर भाग्न प्रमाव निराला-काव्य पर अगला का प्रभाव आकलन किया । डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि वे प्रारम्भ से ही विद्रोही कवि के रूप मे दिदी म दिखाई पडे । गतानुगतिकता के प्रति तीव्र विद्रोह उनकी कवितामा म प्राति स अन्त तक बना रहा । व्यनित्व की जसी निधि अभिव्यक्ति इनकी रचनामो म हुइ है वैसी अय छायावादी कवियो में नहीं हुई। न ता उहोने भावो का कोमल करने का प्रयत्न किया है न उनकी समजस योजना के प्रति किसी प्रकार की आसक्ति दिखाई है। सवत्र यक्तित्व की प्रत्यत परप अभिव्यक्ति ही निराला का कवितामो का प्रधान प्राकपण है। फिर भी विरोधाभास यह है कि निराला म अपन व्यक्तित्व को सबसे अलग करके अभि व्यक्त करने की चेतना सबस कम है ।' निराला जी का कहना है--माहित्य मेर जीवन का उद्दश्य है जीने का नहीं, यह सच है कि मैं जीता भी अपन साहित्य म हू किंतु वह मेरे जीन का साधन मात्र नहीं।' इसी कारण छायायुग की प्रगतिशील शक्तियो का उभार उनकी कविता में सवस अधिक पाया जाता है । अनुभव के साथ चिंतन का महत्व का य म सबसे पहले निराला न स्वीकार किया। प्राचाय हजारीप्रसाद द्विवेदी के मतानुसार यह युग मुख्यत तीन बाता पर आधारित था-प्रथम क्ल्पना, द्वितीय चि तन और तृतीय अनुभूति । इन तीन श्रणी के विचारा के प्रस्तार विस्तार से प्राधुनिक काल की विपयो प्रधान कविता अनेकरूपा दीखनी है।' वास्तव मे काय की मुख्य प्रवृत्तिया इही ताना मनोवेगो पर आधारित है और इन तीनो के समन्वयात्मक महत्व का निराला ने प्रतिपादित किया जो कि दूसरे छायावादी कवि नहीं कर सके । विशष प्रकार की काव्य प्रक्रिया और नई शला की नई टेक्नीक निराला का मौलिक देन है क्योकि उनका मनन चितन अथवा दशन क्सिी अध्ययन का परिणाम नही बल्कि एक अनुभूतिजन्य विवेक है । गगाप्रसाद पाण्डेय के अनुसार छायावादी मुक्त रचनामा और गीता म सौदय शक्ति का समावेश सवप्रथम निराला ने ही क्यिा यद्यपि यह बगला में प्रभाव के कारण ही सम्भव हा सका है। प्राचीन छन्द कवित्त को ममयानुकूल बनाकर जीवन के साथ माहित्य के विकास का शिलान्यास करने में व मवसे भाग रहे हैं। गीतो मे सगीत का समन्वय जिस जागरूकता और अभिनव चेतनता के साथ निराला ने किया है उस तक किसी दूसरे की पहुंच ही नहीं । उ मुवत छद और मुक्त छन्द, सगीतात्मक्ता के लिए हजाराप्रसाद द्विवेदी हिरा साहित्य पृ० ४६७ २ पाण्डेय महाप्राण निराला पृ० १०३ ३ हजाराप्रमार द्विवेदी हिन्दी साहित्य, पृ०४५७ ४ पाएडेय महाप्राण निराना १०१०० , व्यक्तित्व और कृतित्व ३६ छायावाद उनका चिर ऋणी रहगा। पूर हायावादी युग को स्निग्ध चादनी म निराला को प्रकाशविरण की उपगता और मौलिकता पूर्ण रूप स परिव्याप्त है। जितनी गक्ति और मजगता के साथ उहान यायावादी भावधारा का उप याग दिया और अयावाद का अपन रग म रगा, उतनी ही सामय माप प्रगतिवादी विचारधारा में प्रभाव का भी ग्रहण किया । परिवर्तित जीवन के फलस्वरूप उत्पन्न हुए नय-नय जीवन के मूल्या और माना का अपनात चलना ही ता मानवता के उत्तरोनर विकास का रहस्य है । परन्तु प्रगतिवादी विचारधारा से प्रभावित व साम्यवादी न बनकर ममाजमेवी बन । यहा ना कि कुकुरमुत्ता' म साम्यवादी पर कठोर व्यग्य सा है। युद्धकाल स निराला ने व्यग्म का ही अधिक अपनामा है । गगाप्रमाद पाण्डेय पा कहना है कि मानवोचित नतिकता की रक्षा के लिए निराला न मोठे-तीखे व्यग्य वाणा वा प्रहार करव समाज म एक नई चेतना भरने को नेप्टा की है । स्वार्थी सडे ममाज ५ पडा और गासन की लोलुपता में पडे नतासा ने निराला के लिए धमा हा भला बुरा कहा जम लुई सोनहाँ न सा पौर वाल्टायर के लिए कहा था ता इसम कुछ विचित्रता नहीं। पर इसमें भी मदह नहीं विनिराला न प्रपन श्यग्या स जोरण गोण पुरातन सस्वारो और अविश्वामा का भम्मीभूत करवे देश र जीवन में नवीन उभेप का जा मत्र पूरा वह किमी और तरह मम्भव नही था। दूसरे महायुद्ध व बाद म उनको सामाजिक चतना म और भी तेजी भा गई है या व प्रारम्भ स बहुत मजग पनाकार रह हैं । इस युग को विषय पोर स्वाय-पूण अनुभूनिया न उनको कला को मा परिवतिन किया है। प्राज की विषमता और नारकीयता से उत्तजित भावा का निराला ने अपनी नई कवितामा ममजोरर युग सामने उसके वास्तविक स्वरूप का सहा वरन म पूरी मफ- लता पाई है। बला भौर नय पत्त की कवितामों म नतिकता नोनि पोर मामाजिरता र ताग वा जा मडाफोड निराला न दिया है वह उनकी निकिता पौर वाग्यक्ति दाना या परिपुष्ट प्रमाण है। यह ठीर है कि नता, ब्राह्मण पुराहिन, पूजीपनि शागर मोर पदवीधर तथा गोपर मभी उनव पायों में FORY 4 * किन्तु नमाज नपा युग म प्रभावित होन के कारण उनका लक्ष्य व्यक्ति न हार मब जगह ममाज हो रहा है जैमावि पापरेय तथा निरागा के एक पानालाप म चितुल पष्ट हा जाता है- १ पारय महामार निराना, पृ निराला-काव्य पर बगला का प्रमाव नये पत्त पर कर मैंने (पाण्डेयजी) कहा-निराला जी | इसमे तो पापने किसा का नहा छाडा, प्राय सभी प्रकार के यत्तिया पर साक्षेप किया है। बापू पदि तुम मुर्गी खाते, वाली कविता का रहस्य अब मुझे समझ म आ गया । निराला जी ने तुरत उत्तर दिया-क्या कहूँ तुम भी ऐमी बात कहते हा, वहा व्यक्ति का प्रश्न नही, क्योकि मरे सामन कविता लिखते समय व्यक्ति कभी नहीं माता, मैं ता पूरे समाज को देखता हू । व्यक्ति से मुझे लेना एक न दना दा । इसलिए मुर्गी वाली कविता मैंने अपने किसी सग्रह म नही दी । याद रखा व्यक्ति मत व्यग्स और माक्षेप करना भाड का काम है, मैं भाड नही रवि ह । यह ठीक है कि लालच म पाकर भाड स्तुति भी करता है गाधी पर बहुत सी कविताए इसी तरह की लिखी भी गई हैं पर मैंने न स्तुति की न व्यग्य लिखा । हा देश को राजनीतिक प्रगति से मुझे सतोष नही रहा और उसकी पाल का ढाल मैंन अवश्य बजाया है। इस प्रकार हम देखते है कि निराला अपनी पारिपाश्विक परिस्थितियो तथा युगीन विचारधारामा स प्रभावित हाकर उसके पक्ष या विपक्ष मे काय की रचना करते हैं। निराला ने युग की उपक्षा नही की वरन उनका काव्य युग के साय स्वर मिलाकर सारे युग का युग की सामाजिक अवस्था को आगे बढाता है । कलाकार के सम्मुख सारा युग उपस्थित है वस्तुा उमको अभिव्यक्ति म युग मत्य का निहित न रहना असम्भव है । निराला ने अपने साहित्य म इस ज्वलन्त सत्य को कभी उपेक्षा नहीं की। इसी कारण जीवन के प्रत तक उहे अपन युग का प्रतिनिधित्व करने का श्रय प्राप्त रहा। १ पाण्डेय महाप्राण निराला, पृ० १४६ द्वितीय अध्याय निराला के प्रतिपाद्य पर वगला-प्रभाव कवि की काव्य रचना का उपादान भाषा है और भाषा माध्यम स कवि अपने व्यक्तिगत विचारो को प्रकट करता है । विचार के प्रय म हम दानिक विचारों का ही लेते हैं जिसका मम्बध मस्तिष्क स होता है। परन्तु प्रमुख कविगण अपने विचारा का भाव-कल्पना के द्वारा इस प्रकार काव्य में समाहित कर लेते हैं कि वह किसी भी दृष्टि स दानिक विवचन नही प्रतात हाता । क्योकि काव्य का मूलतत्व ता रागात्मक या भावतत्व हो है और जो कवि अपने दानिक विचारा को भावमडित कर प्रस्तुत करन म समय होता है वही वास्तविक अथ म कवि या कविमनापी है। यदि कवि एसा न करे तो प्रतिपाद्य क्वल एक पतिवृत्त घटनामात्र बनकर रह जाता है । रवीदनाय का यही कहना है- 'जो वस्तु जसी है उसके उसी स्वरूप का उद्घाटन वनानिक का काय है। इसीलिए विमान माविष्कार करता है। इतिवृत्त घटना का ययाविधि वपन करना विज्ञान का काय है इसका, घटना का विवरण कहा जा सकता है । किन्तु माहित्य का काय आविष्कार भी नही , घटना का विवरण भी नहीं साहित्य तो सप्टि करता है और वह भी प्रयागमयी सृष्टि करता है। वास्तव म जहा दाशनिक विचारो पर पूण विराम पड जाता है वही म वाव्य का मूत्रपात हाता है। दोनो म भयो याश्रय सम्बध है। परन्तु एक प्रच्छन्न है पोर प्रच्छन्न रूप में रहना ही उमका काय है। उम प्रच्छन्नता की पभिव्यक्ति, जड मे प्रच्छन्न रूप में प्राणरस ग्रहण कर पुष्प का बिना ही काव्य है। निराला का प्रतिपाच मर्यात मूल विचार का मार है-दानिक भतवाद जिसका हम रवीन्द्र व म मीमा के बीच हो प्रमीम क माप मिलन की पारापना कहत है । इस अध्याय २ मतगत निराला के इस दानिक विचार पर बगला प्रभाव का विवचन करग मोर साही हा दखगदि विस प्रकार निराला ने भाव-वल्पना द्वारा इम दानिक विचार को विगर चित्र, नारी प्रम तथा प्रति चित्रण रे माध्यम से भावमय बनारमाव्य म मनुस्यूत दिया है।
४२ निराला-काव्य पर बगला का प्रमाव निराला के विचारा पर प्रर्थात् उनके कवि मानम पर प्रत्यक्ष या परोक्षरूप म बगला माहित्य का प्रभाव दिखाई पडता है। इस सम्बध म श्री सुधाकर चट्टो पाध्याय कहत हैं-- निरालाजीर कवि मानस सम्बघ मालाचना करल लक्ष्य वरा याय ये दीप दिन कलकाता-वास वगला साहित्य अ ययन रामकृष्ण विवकानद हते गुरु करे देविकाराणी उदयशकरर प्राक्पण प्रभृतिर माझखान दिय तार वगममता स्निग्ध चित्रटि धरा पड़ । इस प्रकार वातावरण तथा साहित्य ६ युग्म प्रभाव स्वरूप निराला जी का कविमानस वगला विचारो से अत्यधिक प्रभावित हुआ। पारिपाश्विक परिस्थितिया तथा युगीन विचारधारामो' पर विवचन करते हुए हमन निराला के व्यक्तित्व पर बगीय वातावरण के प्रभाव का विवेचन किया था। मब उनके विचारा पर बगला साहित्य प्रभाव की विवेचना करनी है । माधारणतया विचारा स प्रभावित हान के दा सूत्र होते हैं । प्रथम, व्यक्ति सशक्त विचारो स प्रभावित होता है मोर इसी कारण निराला रवीद्र के विचारा स इतने प्रभावित हुए क्योकि विद्वानो क मतानुमार रवी द्र के विचार उपनिषद के विचारो की भांति साक्त है। द्वितीयत प्रतिभाशाली यक्ति तभी दूसरो के विचारो स प्रभावित तथा प्ररणा ग्रहण करता है जब उसके मन में पहल स ही वे विचार प्राथय ग्रहण किय वैठे हैं । प्रत निराला के प्रतिपाद्य पर बगला प्रभाव का विवेचन करते हुए सवप्रथम निराला के वयक्तिक अनुभूतिजय प्रभाव पर विवेचन प्रप क्षित है कारण उसी क माघार पर ही प्रतिपाद्य पर पडे प्रभाव विशेप क सूत्रो फो हम पहचान सकगे तथा उस पर विचार विमश कर सवंगे। बगाल म रहने के कारण निराला का मन भी प्रत्यक्ष या पराभ रूप म बगला काय की अपरिमीम वस्तु तथा क्ला सौदय से प्रभावित होता रहा । चयक्तिक अनुभूतिया बगला-काव्य स रस ग्रहण करपोदे स वृक्ष का रूप धारण करती गड 1 वयक्तिक अनुभूतिया पर रवीद्र के विचारा का प्रभाव सवस अधिक पडा । डा० नगद कहते है कि भारम्भ म छायावादी कवियो की चिता-पद्धति पर रामकृष्ण परमहस विवेकानद मौर उधर रवीद्रनाय दानिक विचारा का सीधा प्रभाव पड़ा। इस सम्बध म डा० रामेश्वरलाल खण्डेलवाल'का भी १ मुधाकर चोपाध्याय भाधुनिक हिसाहित्ये बागलार स्थान, प्रथम पर पृ०६६ • दयिअप निबंध, 'यतित्व तथा कृतिल्ल ३ नगेद्र आधुनिक हिन्न कविता की मुग्य प्रवृत्तिया पृ०१२ ४ खरटेलान आधुनिक हिन्दी कविता में प्रेम और सादय, पृ०३॥
निराला के प्रतिपाय पर बगला का प्रभाव - पहना है कि गीताजलि क प्रकारान के साथ ही हिन्दी वविता मेत्र म भाव विचार तयाली सम्बन्धी एक नवीन क्राति उपस्थित हो गई। रवीन्द्र ने अपनी उक्त रचना क गीता म नवी मानवता पम और भविन माधना का नवीनतम तथा प्राजल म्प प्रस्तुत किया । इसम हान अपन अनुभूति-पथ मे पडन वाली मननगोल और मानन्दमय प्रात्मा को गम्भीर तथा रहस्यपूण भाकिया और भक्यिा सामन रखो, जिसन द्वारा महान प्रकृति के प्रति नितान मौलिक अनुराग नवीन प्रतीक विधान, मानवीकरण की क्लाका सौन्दय, नूतन छद विधान तथा नवीन बल्ल नामा व उपमाप्रा में सम्पन्न एक अभिनव पाय्य-संली वा मुग्धकारी सौन्दय बलामिया को भेंट की। अग्रेजी स्वच्छन्दतावाद से रमणीय काव्य-पाला तो मोहन वस्तु यो हो किन्तु विषय नवीन विचारधारा तथा कम,नान व भक्ति समन्वित माधना सम्बधी भावनाए} और शती (पद-लालित्य नूतन इद विधान, रमणीय कल्पना तथा स्निग्ध, पर रगोन मापा प्रादि) -~~इन दोना ही दृष्टियो से गीताजलि की सामूहिक वि घटा भारतीय भावना स पूर्ण कविया के हृदय के लिए अत्यधिक पुष्टिकर तथा रजनकारी प्रमाणित हुई। नवीन हिदी-वियों वनिए यह रचना वाय-कृतित्व का वादा हो गई। यह बहुत स्वाभाविक हो पा जसपि अग्रेजी लवर डी क्यूसी रहते हैं कि प्रत्यक प्रगतिशील साहित्य के लिए यह आवश्यक है कि वह अपन म अयाय साहित्य के प्रभावा का भी अगी मृत करे । जा साहित्य ऐसा परन में समय नहीं हाता वह क्रमा हामा मुषी बन जाता है। दाशनिष प्रभाव रवीद्र की गीताजकिदानिक पक्ष वा प्रभाव निराला र विचारा पर सबसे अधिक पहा था । यद्यपि रवीन्द्रनाथ के जीवन-दान का मूत्रमूत्र सीमा में वोच ही ममाम साय मिलन को माराधना निराला र मन म प्रारम्भ में ही मन उदभूत हुए । इम मध प म निरालान अपन नियम लिखा है---- 'हमालिए हम समाज तथा साहित्य में अपनी बहुत दिनो को भूली हुई उम शक्ति को प्राषित वरना चाहते हैं, जा अग्यताप से मचम व्यक्त अपनी ही भामा म विश्व को देखती हुई भरन ही भीतर उस राल हुए ह पानी की नरह गहमा जान धारामा म बहनो हुई स्वात, पिता की तरह सब पर पहली हुई मधुर, उजदल, अम्नान, मृत्यु की तरह नवीन जमदात्री, मदापापा को तरह मागिन प्रमार म पना हुई, प्रत्यक मूर्ति म विरहसनीय !' १ निराला र पम, १००० निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव और एक स्थान पर निराला न यही कहा है- यह ज्याति प्रवाह उपरूप है । जडो म यह चेतन सयोग ही गति है । प्रत्येक पद पर इसका अज्ञात स्पश जीव जग करता रहता है, अयथा दूसरा चरण उठ नही सक्ता, उस अपनी मत्ता का निश्चय नहीं हो सकता । वह वही निर्जीव प्रस्तर की तरह अचल है । उसम स्वत विचरण की शक्ति नही पृथ्वी के साथ हो उसे अलक्ष्य क इगित से महाकाश की परिक्रमा करनी पड़ती है । जीव का हर मास म वह स्पश मिलता है।' कविगुरु रवीद्रनाथ की मीमा के बीच ही असीम के साथ मिलन की पाराधना के अनुरूप निराला व उपयुक्त भाव हैं । रवीद्र न इसको स्पष्ट करत हुए लिखा था- 'क्षद्र का लवर ही बृहत सीमा का लेकर ही अमीम तथा प्रम का लकर ही मुक्ति है । प्रम का पालाक मिलते ही पाखो को पसार कर दखता ह सामा के बीच मीमा और नहीं है। प्रकृति का सौदय केवल मान मेरे मन की मरीचिका नही उसक बीच म असीम का आनद ही प्रकाशमान है एवं इसी लिए इस मौल्य के सामने हम अपने का भूल जाते है। मरी समस्त काव्य रचना का एक ही अध्याय है और उस अध्याय का नाम दिया जा सकता है 'मीमा के बीच ही असीम माथ मिलन की पाराधना । निराला के दाशनिक विचारो पर रवीद्र के रूप और अरूप की माय ताम्रा का प्रभाव स्पष्टतया पड़ा था इसका प्रमाण निराला क निबध काव्य में प और अरूप को पटने स और भी अधिक स्पष्ट हा जाता है- रूप की मायक लघु विराट कल्पनाए ससार के सुदरतम रगा स जिस तरह अक्ति हा उसी तरह रूप तथा भावनाप्रो का अरूप में मायक अवसान भी आवश्यक है । क्ला को यही परिणति है और काय का सबम अच्छा निष्कप । इस तरह काय के भीतर से अपने जीवन व सुख दुखमय चित्रो को प्रदर्शित करत हुए परिसमाप्ति पूणता म होगी। जसे- कमी उडते पत्तों क साथ मुझे मिलते मेरे सुकुमार यढाकर सहरों से लघु हाय बुलाते हैं मुझको उस पार ।' निराला प्रधपन पृ०१४४ . रवीन्द्रनाथ जावनस्मृति ३ निराला प्रबधपभ पृ०१।४ निराला के प्रतिमा पर बगला का प्रभाव निराला के "प और प्ररूप के इस दानिक विचार को डा. रामरतन भटनागर ने मदत-बदातवार' कहा है तथा डा. वध्वनाम्हि न भारतीय अद तवाद कहा है। और एक मालाचक न स जीव ब्रह्मपरक रहस्यवाद रहा है। परनु वास्तव म यह एक नवीन रहस्यवाद है जिसको पटमूभिवा प्रदतवाद होग हुए भी आधारभूत शिला-रूद्वि के प्रति विद्राहम्वरूप मानव मन की चेतना का नवरूपायण है । डा० नगद्रन टमवे पद ध म कहा है कि यहिग जीवन में मिमट कर जव कवि की चेतना न ग म प्रवेश किया तो कुछ बौदिर जिना साए जीवन और परण सम्बन्धी प्रवृति और पुप सम्बन्धी प्रारमा और विश्वात्मा सम्बधी काव्य म स्वभावत ही भा गई । बुध माध्यात्मिक क्षण ना प्रत्यक भावुर के जीवन म पात ही हैं। प्रतएव पायावाद की रहस्योक्तिया एक प्रसार म जिनासाए हैं जा छायावाद के उत्तराध म माध्यास्मिक दरान के द्वारा और भी पुष्ट हा गर हैं । परन्तु व पामिर माधना पर माश्रित नहीं हैं । उनका आधार वही भावना, कही दान चित्रण और पारम्भ म कहो-वही मन की दलना भी है। इसको स्पष्ट समभन द लिए साधारणनया तीन तवा पर विवचन मावश्यर है। प्रथम रडि विरुद्ध नवीन का जयघाप । दूसरा नवीन की स्थापना तथा तृतीय, जड व विराध म परिवतन की प्राकामा मोर उमरी स्थापना के लिए विराट चित्रा का प्रान और विराट चित्र सक्न क द्वारा स्वत ही अनन्त को जिलासा का काध्य म समावरा । इस प्रकार धार्मिक साधना पर माधिन न हात हुए भी माध्यामिक विचारा का प्रावलन मानव मन की चेतनाक नवम्पायर कारण मभव हा सका। दि का विरोध प्रयमत छायावादी बाविया न जा पात्माभिव्यक्ति की पारामा प्रस्ट की वह वस्तुन माम प्रमार को प्रावासा यो मारमप्रमार की भावना म उबुद्ध शका उहनि जीवन में सभी क्षेत्रो में सीएता का विराम किया है। धन का वद्वापन करत हुए निगला बहत हैं--- ताल तास से रे सदियों के जोहवरा-पार सोर देररनिहार प्रापे प्रम्पतर सयत धरणों से नस्य विराट रेन, पापे मामार। १ रामरतन भग्नपर कवि निराला एक अध्ययन पृ०१६ नो- माधुनित मिल्दा-दिनाका दो मुख्य प्रवृत्तिका १३ २ ४६ निराला-काटय पर बगता का प्रभाव कवि सदियो से जरडे हुए हृदय कपाट को खोलकर नय विराट के प्रागमन की आकाक्षा कर रहा है । उसका हृदय हर तरह की सकोणता का विराधी है। उसकी इच्छा है कि पृथ्वी की जडता समाप्त हो जाय और परिवतन के द्वारा नवीनता का सचार हो सारे ससार म वह रम जाय ! उसकी विराटता मपूण धरती स भी मन्तुष्ट नहा है, वह अपनी बाहो म एक ही साथ सारी धरती और अनात आकाश वाध लेने का हौसला रखता है । बीसवी सदी की नवीन विचार घारा ने किस प्रकार पुरानी सकोणता का दूर कर मानसिक भितिज का विस्तार क्यिा है, इस काव्य मे रूप और मरूप नामक निबध मस्पष्टत स्वीकार करत हुए निराला कहते है मसार को भौतिक सम्यता से सब देशो के गुथ जान के कारण ससार भर के लागा को प्रात्मलाभ पहुंचा । फलस्वरूप कलाम दश भाव की जा सकीणता थी, मादान प्रदान की सहृदयता ने उस ताड दिया । क्ला की सृष्टि व्यापक विचारा म हाने लगी और हर जाति की उत्तमता म प्रम सम्बध जोडकर लाग उसस अपनी जातीय क्ला को प्रभावित करने लग ।' निराला जी के अनुसार बगला माहित्य न जा आधुनिक युग म इतनी अधिक उनति को वह इसी नय विनान और नई सस्कृति का ही परिणाम है । इसी व्यापक भावना के कारण रवोद्रनाथ के चित्रा म विराटता के दान होते है। इम सम्बध म रवीन्द्र-काय के महान मालोचक चारुच वद्योपाध्याय कहत हैं कि रवी द्रनाथ का यक्तित्व पूण जीवन्त है। जीवन का लक्षण है नित्य निरन्तर परिवतन । जा जइधर्मी हो उसका परिवतन नहा होता है। इसीलिए मासीसी दाशनिक ने जीवन की सजा निर्देश की है-परिवतन क्रमागत निरन्तर परिवतन ही जीवन है एव वही सत्य है। कवि की प्रतिमा निझरिणी का जिस दिन स्वप्नभग हुआ था उसके बाद से आज तक वह अकारण अवरण चलने के प्रावग में अपना समस्त मकीणता समस्त बद्धगुहा तथा मब प्रकार में प्राचीर की मीमा का उल्लघन कर अनन्त के अभिसार की ओर अग्रसर हुई "निराला न भी इसी भावता स प्ररित होकर हिदाम भी हृदय का दिगन्त व्याप्त करने के लिए नवीन विचारधारामों प्राधार पर रूटिका विराध कर परिवतन का जयघोप किया और इस परिवतन के प्रवतन के द्वारा नवीनता के मागमन की कामना की। । , निराला प्रबन्धपद्य पृ० १५४ चारचद्र बन्योपाध्याय रवि-रश्मि भाग २ पृ० ३१५ निराला के प्रतिपाद्य पर अपना का प्रभाव विराट चित्र इम परिवतन की प्राकापा तथा अनन्त के प्रति अभिमार न जहाँ रवीन्द्र का विरादत्व व चित्रा वा भक्ति करन के लिए उदवुद्ध किया है वहाँ निराला भी जसाकि उन निदध काव्य य रूप और प्ररप म पता चलता है इस विराटत्व के विचार म प्रभावित हुए । डा० गमविलाय मा कहत हैं कि 'प्रपात के प्रति विना र श्री रवीनाय आकुर के निमर ने स्वप्नभग की झलक दिखाई देता है। 'स्वय निराला जी भी जब तरग म पूछते है कि पिस प्रनत का नीला प्रचन हिला हिलावर प्रातो हो तुम मजो मातार । पौर-~~'प्रा तुम्हारा किस विगान यक्ष स्थल में अवसान' ता व नदी की तरग के माध्यम म अपन विशाल हृदय का तरगया हा प्रकट करत है। विराट' को प्राकामा म अपनी गित मौमामा का ताइन का कितना माहस था यह इमी म मालूम हाता है जमेशि नामवर सिंह कहता कि माया वार युगन निर अथवा प्रपात पर जितनी कविताए लिखा उत्तना शायद ही किसी और गुग म लिमो गई हामी निभर पायावादी स्वच्छता का प्रतीक बन गया वह गिवे गनिरोष का ताना हा, धन वन प्रकार का पार कर वग म मनन्त जलनिधि की प्रोर चल दता है। प्रनन्त की जिज्ञासा यही स निराला के दासाना विचारारा तीमरा तत्व हमार सम्मुख उभर माता है । अर्थात रवीन्द्र की तरह निराला र भी प्रारम्भिर पाल मलियान विरक्ष नवीन तथा द विरद परिवतन पा जयाप दिया था और पर स्वरूप अपने पाय मदिरा ना मान किया। विराट प्रकन के द्वारा स्वत हा पनन्त को जिला रवोद्र की तरह उन काव्य म प्रतिपलित हान लगी। इस मम्प प म ० रामविलास शर्मा बहत है कि विप्लवो वादल की तरह निराला का प्रपार भी अपवार म सेलता है। पापा पदर यहाँ वन का अपार है । वि पूछता है कि यह बालर का विचार है या बुद्ध वामान्य व्यय हार जो वह हर मोर विवाद म अन्तर नहीं दखता । बुद्धि और चेतना का विरास जाप्रति हो हमा है । गतिशील प्रपात पायरा स उत्पन्न हुमा है । . राम बिलाम राम निराला, १.६१ २ रामबिलाप रामों जिगना प०६५ ४८ निराला-काव्य पर पगला का प्रभाव उसका पिता पवन है जो उसकी राह रोक्ते हैं । प्रपात उनसे टकराता है लेकिन जब उद पहचान लता है तो उसके होठा स मोठी मुस्कान फूट पडती है। वह मागे बढ चलता है परन्तु जड पत्थर के भीतर भी वह अपनी तान भर देता है- बस अजान की ओर इशारा करके चल देते हो, मर जाते हो उसके अतर मे तुम अपनी तान । निराला के 'तरगो प्रति' का भी यही भाव है- उस प्रसीम मे ले जाम्रो मुझे न कुछ तुम दे जानों। रवीद्र की प्रतिभा निझरिणी भी जसाकि हम उपर वह चुक हैं कारण प्रवरण चलने के प्रावग म अपनी समस्त सकीणता, समस्त बद्धगुहा तथा मब प्रकार प्राचीर की सीमा का उल्लघन कर मनात अभिसार की प्रार अग्रसर हुई है। रवी द्रनाथ सबसो क्रमागत सीमा का प्रतिक्रम कर समस्त बाधा का उत्तीण कर सुद्र का प्यामा हाकर अग्रसर हाने के लिए माह्वान कर रहे हैं । ' इस प्रकार रवीद्र के अनत ' स ही निराला के प्रजान ने प्ररणा ग्रहण की है और का य म सीमा और असीम + भाव का स्थान दिया है- वस्तुत यह अनन्त अजान या प्रसीम ही ब्रह्म है जिसकी प्राप्ति कवि की प्रतिम और चरम अभिलाषा है- भय जीवन की प्रबल उमग, जा रही मैं मिलने के लिए पारकर सीमा प्रियतम असीम के सग। (धारा) रवीर को नदी की धारा भी असीम" की तरह 'अकूल' स मिलन जा मोरे देख सेइ स्रोत हयेथे मखर तरणी कांपिछे थरथर । तोरेर सचय तोर पढे थाक ताकास्ने फिरे ! सम्मुखेर वाणी निक तोरे टानि १ मामार रवीन्द्रनाथ आमार सकलक मागत मामा अतिक्रम करिया सकल वाया उत्ताण हझ्या मुद्रेर पियामी हइया अग्रसर हइत आहान करितधन-प्रति निमपर येतच ममय निदण चये याका कुछ नय । चारुचद्र बन्योपान्याय रविरश्मि, ५०३१६ . निराला अपरा, पृ०१०६ निराला के प्रांतपाय परपमा का प्रभाव महास्रोते पश्चातेर कोलाहल हते मतत मांधारे-अकूत पातोते। रवीदनाथ को काव्य-माधना के मन में मीपा प्रमोम को मिनन गोला ये माव निहित हैं । किन्तु शकर दायनिक मत अनुयायी कवि ईश्वर को “एमाल्यूट वोद्ग" अपवा निगुर सत्ता के रूप में नहीं देखता है। विश्व के नाना वचिभ्य रे बीच कवि ईश्वर की उपलब्धि करत हैं। जब कवि न अपने जीवन म विश्व प्रकृति के पाप सौदय की उपलब्धियो, तब उहनि “मम 'जीवन-दवता" को लीला का प्रत्यक्ष देसा। रितु यह देवता निगुण निरुपाधि ब्रहा नहीं है, इस रवीदनाय ने बहुत मे स्थानों पर प्रस्ट दिया है। कवि का ईश्वर विश्व ম ন্যান্য কর্মী খন ৰা নানা ম এবং নেই। নয় সুখাৰৰ चट्टाराध्याय कहत है कि- 'एड सीमा असीमर मिलन-सौला नरनारीर मिसन विरह-तोलार पर मानपान परिव्यक्त हयछे। जीवन विता' क्सन भो प्रियतमा' सनमो प्रियतम-तारइ सग चलखें जीवन जोवन लुकारिर सला। एइ अनुभूति रवीन्द्रनाय पेय महामित पद छायावादी कविताय ।' डा. रामरतन भटनागर भी डा. सुघार घट्टापाध्याय के अनुरूप निराला का विश्वास है कि हट सत्ता पीछे एक अष्ट महान सत्ता है। इमो महप्ट सत्ता के प्रति रविन प्रापनारमा गीत लिस हैं । सम्भव है जिम निराला ने 'जीवन-सेवनहार' (वेवा) वहा है वह रवीन्द्रनाथ का जीवन देवता हो।" इस तरह शरवे पदत या की तरह निराना अपने असमी ईश्वर को निगुरा सत्ता के प में नहीं देखते हैं। विव र नाना वचि य क बीच कवि ईवर या दान करता है। विश्व प्रकृति में अपस्म सौन्दय को नविन अपने जीवन म जय अनुभव किया, तवजहोंने उममे मसीम रूपी जीवन-देवता की But as our religion can only have }s sigaibvance sa its pbecomeoul word comprebended by our bumag tell this absolute cosception of Brabrao is outilde the subject of my discutstoa -Tagore the Religion of mxa • मुरार माध्याय मधुनिक सिमदत्य नार पल-पएर १, २०७३ , रामरत्न मनार कवि निराला १६ मध्ययन, ३. १२७ निराला-पाय पर वगला का प्रमाव नीला को प्रत्यक्ष देखा । कवि का असीम ईश्वर विश्व क नाना कर्मों में अपने को नाना स्पो में प्रकट करता है। इस प्रकार जीव ब्रह्म अथवा सीमा असीम की मिलन लीला को प्रकट करने क लिए कवि निराला कभी तो प्रकृति का सहारा लेते हैं तो कभी मानुषी प्रम का क्योकि उनका ब्रह्म जगत यापी है। यह रवीन्द्र का ही प्रभाव है। इस सम्बध में रवी द्रनाथ कहते हैं- 'जीवेर मध्ये अनातक अनुभव करारइ नाम भालवासा प्रकृतिर मध्ये अनुभव करार नाम मोदय सभोग । इस प्रकार निराला ने भी अनन्त" को का यमय रूप देने क लिए प्रकृति तथा नारी प्रम को चुना है। प्रकृति श्रीमती महादेवी वर्मा ने छायावाद की आलोचना क प्रसग में कहा है कि छायावादी कविगण वहिविश्व के प्रापात विच्छिन खण्डवस्तु समूह क मध्य में एक अखण्डता, एक निरवच्छिन्नता अनुभव करते है। रवीद्रनाथ के बीच में यह उपाध बहुत ही छोटी उमर से पाई जाती है । इस सम्बध में होने अपनी जीवन स्मृति में इसका विवरण दिया है। रवीद्रनाथ की साधना में प्रकृति की परिदृश्यमान सीमा के बीच स मनजान असीम पुरुप की और चित्त की परिक्रमा ही यक्त है । इस प्रकार रवीद्र ने प्रकृति क साथ दो सम्बध जोड दिए हैं- १ प्रवृति को सजीव सत्ता क रूप म स्वीकार करना अर्थात प्रकृति म मानवीयता का सम्बध जोड देना। २ प्रकृत में आध्यात्मिक रूप का सप्रपण अर्थात "जो प्रकृति, जो वसन्त पुष्पभरणा प्रकृति अपने चचल पेलव सौदय को लेकर रोमाण्टिक रवीन्द्र क पास प्रम की वाणी वहन कर लाई, उस प्रकृति को ही ब्राह्म रवी द्रनाथ उप निपद अनुरक्त मिस्टिक रवी द्रनाथ ने ईश्वर क लीलाक द्र क रूप ग्रहण दिया है सुदरम की अभियक्ति के रूप में ग्रहण किया है । निराला ने रवीद्र के अनुरूप प्रकृति में सजीव सत्ता का सक्न दिया है और साथ ही उसम एक भावमय आध्यात्मिक तत्व का भी सयोजित क्यिा है- अम्बर पथ से मथर सध्याश्यामा All things that seemed like vagrant wives were revealed to my mind 10 relation to a boundless sca निराना प्रतिपाय पर वगला वा प्रभाव उतर रही पृथ्वी पर कोमल-पर भार। मद-माद वही पवन खुल गई हो,--- मजलि क्ल विनत नवल पदतल उपहार। और रखौद्र- ऐ पे सध्या धुलिया फेलित तार सोनार यसकार। ऐये प्राको लुगप प्रारुल चुत मजलि मरि धरित तारार फुल पूनाय ताहार मरित प्रपर। टा० सुधारक चट्टापाध्याय कहत हैं कि वीर की तरह निराला का कवि जीवन भी प्रवृति के द्वारा दोलायमान है । देवल शब्दाप सप रस तथा स्पर नहीं, जिसको रेसा नहीं जाता, उमको भी उन्ने प्रकृति के बीच अनुभव किया है।' निराला का एक गोत है- पल्पनामानन को रानी। मामो, पामो मृदु-पद मेरे मानस की सुमित वारणो सिहर उठे पल्लव दल नवग, बहे सुप्त परिमल की मृदुल तरग, जागे जीवन को नव ज्योति प्रमद, हिले पता त-समोर-स्पा से वसन तुम्हारा पानी। रवीद्र प्रभाव स्वाप निराला के उपयुक्न गीत म, प्रकृति म माध्यामिर भाव का प्रारोप कर, पपनी जीवन-मगिनी का भाद्वान किया गया है, जिसम रवि मन म नव-जीवन को सजोदिनी के भाव मर जाय। रवीन्द्र की एक माविता म वितुल यही भाव व्यक्त है- निराला देगा • चोदाय : माधुनिक हिन्दी काय साहित्य मांगनार प्रभाव प्रथम सड, पृ०१५ ६ निरागागातिका ५२ निराला काव्य पर बगला का प्रमाव खुले दानो द्वार, नीलाफाश क्रो प्रवारित, कौतूहली पुष्पगप कक्षे मोर करुक प्रवेश, प्रथम रौतर मालो सयदेहे होक सचारित शिराय शिराय, मामि बेंचे प्राछि तारि अमिन दनेर पाणी ममरित पल्लवे पल्लवे प्रामारे शुनिते दायो। और इस जीवन सगिनो के रहस्यात्मक रूप का निराला ने रवीद्र की तरह प्रकृति म अवलोक्न क्यिा है- फोन तुम शुभ्र किरण वसना? सीखा केवल हंसना, केवल हंसना- शुभ्र किरण यसना। मदमय भर प्रग गध मृदु बावल मलकालि कुचित ऋतु, तारक हार, चद्रमुख, मधुनातु सुकृत पुज प्रशना'- मथवा- गगन धन विटपी सुमन नक्षत्र ग्रह, नय ज्ञान भतरे तुमि हास्यानना ज्योत्स्ना वसन परिधान और रवीद्र- अयि सध्ये मन त प्राकाशतले यसि एकाफ्निो केश एलाइया मृदु मृदु मो की कथा कहिस प्रापन मने गान गये गये निखिलेर मुख पाने चेये अथवा- कि विचित्र सुरतान करि प्राण भरपूर के तुमि गाहिछ गान माकाश मण्डले । १ निराल) गीति w निराला के प्रतिपाद्य पर बगला का प्रभाष ज्योतिर प्रवाह माझे विश्वविमोहिनी राजे के तुमि लावण्यलता मूर्ति मधुरिमा । नारो प्रेम इस प्रकार प्ररूप 'जीवन-सगिनी' का प्रियतमा वनावर प्रम का अभिषेक निराला ने रवीद्र की प्ररणा स्वरूप क्यिा है। इस सम्बध म निराला ने स्वय कहा है- ' साहित्य म इम अरूप की स्वतत्र सत्ता को नारिया में स्थिर रूप दिया गया है । क्लाविदा ने वही पुरुष और प्रकृति का सौहादय, दोना के अपार प्रम का निरन्तर योग देखा । पारपण दोना के सभोग विलास में ही है वह और प्रच्चा जब एक ही आधार मे हा । यही वीज मत्र है जिसको जप कर उन्होंने नारिया के अगणित अपार रूपा मे सिद्धि प्राप्त की । य सिद्ध रूप परवर्ती काल के साहित्य को प्रारमा म प्राणो का प्रवाह भरते गए हैं। वाह्य महापूय की चेतना-स्परा से जगी हुई असख्य रूपसी अप्सरामो की तरह य साहित्य को पृथ्वी पर चपल चरण, नम्र, शिष्ट भिन्न भिन्न अनेक प्रकृति की श्री शृगारमयी रूप के ऊपालोक म अपलक ताक्ती हुई लावण्य की ज्याति से पुष्ट-यौवना युवती, कुमारिकाए हृदय पूय के चेतन स्पा से जगकर उठी हुई हैं जोमूत वाह्य रूप राशि ही की तरह अमर हैं जिनम बाह्य स्वतत्रता की तरह अपार प्रातरिक स्वतत्रता मिलती है और बाह्य के साथ अन्तर के साम्य का निरुपद्रव सदेश । रवीद्र न जसे कि हम कह चुद हैं, नर-नारी के प्रम को आध्यात्मिक साधना माना है। उनका 'जीवन देवता' कभी प्रियतम है तो कभी प्रियतमा और इस प्रकार प्रेम का व्याकुलता, विरह, मिलन के द्वारा मीमा की असीम के साय मिलन-साधना साधित हुई है। डा. सुधाकर चट्टोपाध्याय के अनुमार रवीद्र के मानुषी प्रम का रूपक ईश्वर एषणा' को, घायावादी कविता की विषय वस्तु म, अभिव्यजना हुई है । परन्तु यह प्रेम सूफिया का मम प्रकृति (होमोसक्मुमल) का प्रम नहीं है परन् यह प्रम विषमजातीय (होटरोसमुपल ) नरनारी का प्रम है। रवीर ने इस प्रेम रूपक को वाउल, सन्न, वणव कविया स ग्रहण किया है और निराला ने रवीद्रसे, जो निराला-काव्य म निम्नलिखित दोस्पाम प्रफ्ट १ सीमा और अमीम-प्रिया मोर प्रिय मथवा प्रिय एव प्रिया प्रम रूप , निराना रूप और नारी प्र पथ, पृ. १४ निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव में प्रकट हुप्रा है। २ भक्त भगवान का प्रेम 'तुम और 'मैं' के रूप में प्रकट हुआ है । रवीन्द्र नाय के प्रकृति वणन म अधिष्ठित नारी उनके जीवन की अधिष्ठात्री देवी में विवत्तित होती है और उसके प्रति प्रम निवेदन ही उनके नारो प्रम का मूल वत्तव्य है, जहा प्रम मे प्राध्यात्मिक सीमा असीम का रग चढा हुआ है- नयन दुटि मेलिले को परान हबे खुशि ये पथ दिया चलिया याब साबारे याय तुपि रयेछ तुमि, एकया कबे जीवन माझे सहज हवे- मापनि को तामारि नाम ध्वनिव सब काजे। एव- डक रे पावार माझिरे डाक बोझा तोमार या भेसे याक जीवन खानि उजाड कर सपे दे तार चरणमूले। एक- भनेक देखे क्लात एखन प्रारण, छेडेछि सब अकस्मातेर माना। एखन केवल एकटि पेलेइ माचि एसेछि ताइ घाटेर शाखाकाछि एखन शुघु प्राकुल मने याचि तोमार पाने खेयार तरी मापी निराला के प्रम निवेदन में भी यही भाव निहित हैं- प्रयम पलक खुलते ही देखा चरण चिह्न नूतन पय रेखा एक निमेय के लिए देख तन जीवन धन र घुको समपण। यह सुन्दरी ही निराला के वाव्य म देवी रूप म परिवर्तित होती है निराला के प्रतिपाद्य पर वगला का प्रभाव १५ डा० सुधाकर चट्टोपाध्याय कहते हैं- "रवीद्रनायेर जीवन देवना वा जीवन-देवीर सगे ये लीलाखेलार व्यापार रवीद्र-काव्य के विशिष्टतादियेछ सेइ लीला एखानेग्रो लक्ष्य करि । रवीन्द्रनाथ वलछेन- क्खन थेके पर चेये पार काल गुणे बसेइ प्राधि तोमार लागि, हाय प्रिय । टुटल यखन सकल प्रवगुण्ठन इ, रइल यख न केवल सुखेर लुण्ठन इ काल प्रकालेर याछ विचारे चुप प्रिय ।" अर्यात-रवीद्रनाथ के जीवन देवता अथवा जीवन-देवी के साथ लीला सेल के सम्बन्ध में जिस प्रकार रवीद्र काय ने विशिष्टता का प्रजन किया है उसी प्रकार की लीला निराला काव्य में भी परिलक्षित होती है। निराला जी ने कहा है- ? "कब से मैं पय देख रही, प्रिय ! और न तुम्हारे रेख रही, प्रिया तोड दिये जब सब अवगुण्ठन रहा एक केवल सुख लुण्ठन तब क्यों इतना विस्मय कुण्ठन प्रसमय समय न करो, खडी प्रिय।" मनन्त के साथ मिलन, विरह का वरणन हमने मागे चलकर निराला के प्रतीक-वन' में विस्तार से किया है । प्राध्यात्मिक प्रतीक 'तुम और मैं पर रवीद्र प्रभाव का विवेचन भी यहा विस्तार से किया गया है। यहा रवीद्रक जीवन-देवता सबधित उन दो तत्वो पर विवेचना मभीष्ट है जिससे जीवन-देवता रूपर की पूर्णता प्राप्त होती है और जिसका प्रभाव हम निराला को कवितामो मदिखाई पड़ता है। प्रथम, जीवन-देवता कवि को लकर ज म जमान्तर क क्रोडासेत्र में सुख दुप के मेल म मत्त हुए हैं। व ही कवि स कविता लिखवाले रहे हैं, गाना गवा रहे हैं। वे यत्री हैं तो कवि यत्र । - १ चट्टोपाध्याय माधुनिक हिन्न साहित्ये बागनार स्थान, सएड , १० १०१ . निराला गातिका ३ देशिए अन्वेष निग्य, अध्याय बला-पद निराला-काव्य पर बगला का प्रमाव द्वितीय, और फिर जब कवि इस पृथ्वी पर प्रत्यक्ष रूप म नही रहगे तब परोक्ष रूप मे वे प्रत्येक खेल मे ही हमारा साथ देंग। प्रथम तत्व से सम्बन्धित जीवन देवता के साथ लीला खेल के चित्र निराला की कविता म भी पाये जाते । निराला को जीवन देवी यात्री है तो निराला देवल यात्र- तुम्ही गाती हो अपना गान, व्यय मैं पाता हूँ सम्मान ।' अथवा- कसे गते हो? मेरे प्राणों मे प्राते हो, जाते हो लोग बाग बठे ही रह गए, अपने में अपना सब कह गए, सही छोर उनके जो गह गए बार बार उहें गहाते हो। रवीन्द्रनाय की अतयामी' के साथ निराला को देवी यहाँ एक हो गई हैं- प्रामि कि गो वोरणा पत्र तोमार? ध्ययाय पोडिया हृदयेर तार मूच्छना भरे गीत झकार ध्वनिध मम्ममाझे। 'मोर प्रम दिये तोमार रागिरणी कहितेछ कोन प्रनादि पाहिनी, पठिन माघाते प्रोगो मायाविनी जागामो गम्मीर इम अतिरिक्त रवीद्र के जीवन-देवता सम्बधी द्वितीय तत्व मर्यात् कवि के इस पृथ्वी पर न रहने पर भी उनको 'अलक्ष्य नित्य स्थिति के समान निराला ने भी जीवन देवता के चित्त म उनको चिरतन नित्य स्थिति को ही प्रक्ट किया है । रवी द्रनाथ कहते हैं- १ निराना गातिका २ देला ५७ निराला के प्रतिपाद्य पर बगला का प्रभाव यखन जमवे घुला तानपुराटार तारगुताय काटा लता उठवे घरेर द्वारगुलाय, फुलेर मागान धन पासेर परवे सज्जा वनवासेर, श्याप्रोला एसे घिरवे दिधिर पारगुलाय- प्रामाय तखन नाइ वा मने राखले तारार पाने चेये चेये नाइ वा प्रामाय हाकले। तखन के बले गो, सेइ प्रमाते नेइमामि । सकल सेलाय करवे खेला एइ~प्रामि । नतुन नामे गक्वे मोरे बाथवे नतुन बाहर डोरे, प्रासद याव विरदिनर सेइ-मामि । मामाय तखन नाइ-वामने राखले, तारार पाने चेपे चेये नाइ वा प्रामाय बापले और निराला- याद रखना, इतनी हो बात नहीं चाहते, मत चाहो तुम मेरे अध्य, मुमन-दल नाय ! मेरे वन में भ्रमण रोगे जब तुम, अपना पय श्रम प्राप हरोगे जब तुम, ढा सूगो में अपने दृग-मुख दिपा रहू गो गात। सरिता उस नीरव निजन तट पर मानोगे भव मद धरण तुम चलकर मेरे पूप घाट के प्रति, परसा पर देखोगे नित प्रात। मेरे पपको हरित लतायें, पृष दल, मेरे धम सिधित देखोगे प्रचपत, पलाहोन नयनों से तुमसे प्रतिपस हेरेंगे प्रमात । मैं न रह गो जब, सूना होगा जग, मनोगे तब, इह मगल पसरव सव - ५८ निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव या मेरे ही स्वर से सुदर जगमग, चला गया सब साथ। निराला के जीवन-देवता रवीद्र के जीवन देवता के समान द्वतभाव सम्पन होते हुए भी अद्वत का दृष्टिभेद है और यह अद्वत जीवन देवता कभी-कभी विवेकानद के प्रभाव स्वरूप मातृरूप में भी प्रकट हुआ है । इस सम्बध म डा० रामविलास शर्मा कहते हैं कि इष्टदेव की मातृ रूप में कल्पना को स्वामी विवेकान द ने ही लोकप्रिय बनाया था।' देवि तुम्हे मैं क्या दू एक बार बस और नाच तू श्यामा प्रादि रचनामो में यह प्रभाव स्पष्ट है । गीतिका का एक गीत- मा, तू भारत की पृथ्वी पर उतर रूपमय माया तन घर, देववत नटवर पदा कर, फला शक्ति नवीन- फिर उनके मानस-शतदल पर अपने चार चरण युग रख कर खिला जगत तू अपनी छवि मे दिव्य ज्योति हो लीन ! उपयुक्त उदाहरण मे रवीद्र का--- विकशित विश्ववासनार अरविद माभखाने पादपद्म रेखे तोमार प्रति लघुमार। --भाव स्पष्टतया लक्षित होता है। जीवन देवता की इस सेवा भावना म विवेकानन्द के मदत रहस्यवाद की मूल भावना निहित है । स्वामी जी जन सेवा के माध्यम से ब्रह्म प्राप्ति का उपदेश देते हैं और वृहत्तर मानवता वाद को ही ईश्वर की थष्ठ साधना मानते हैं। रवीद्र और निराला की ब्रह्म साधना भी वस्तुत लोक मेवा ही है इसीलिए रवीद्रनाथ व जीवन देवता का पयवसान मानव की वृहत्तर भूमि मे होता है जहा मानव स घटकर और जीवन में उच्चतर और कोई पदाथ नहीं है । निराला ने भी, रवीद्र के इस भाव की तरह (जस एबार फ्रािमा मोरे' वाली कविता म), अपने जीवन-देवता से, जगत् तथा जीवन के सुख-दुख के भीतर मात्मनियोग के लिये, प्ररणा की माग की है- १ रामविलास शर्मा निराला, पृ०६५ निराला के प्रतिपाद्य पर बगला का प्रभाव । जीवन को तरी खोल दे रे, जग की उत्ताल तरगों पर, दे चढा पाल कलधौत धवल, रे सबल उठा तट से लगर । इस प्रकार, निराला व दाशनिक विचार अर्थात सीमा असीम से सम्बधित तीसरा तथा प्रतिम तत्व हमारे स मुख उभर पाता है । यह तत्व है मानवतावाद का। मानवतावाद सीमा और असीम के मूल म मानवतावाद का सूक्ष्म किन्तु दृढ तन्तु ग्रथित है क्योकि जो असीम अथवा अनन्त को पाने का इच्छुक है उसके लिए कुछ भी तुच्छ नही, वरन सभी अन त के रूप हैं । रवीद्र का द्व तवाद अर्थात कवि और जीवन देवता अद्वत का ही दृष्टिभेद है इसीलिए रवीद्र के लिए सम्पूण जगत ब्रह्म का ही लीलाक्षेत्र है- सीमार माझे असीम तुमि बाजामो मापन सुर । मामार मध्ये तोमार प्रकार ताइ एत मधुर । सम्पूण जगत ब्रह्म होने के कारण रवीद्र के लिए तुच्छातितुच्छ वस्तु का भी महत्व है । जगत् म छोटा या तुच्छ नाम की कोई वस्तु नहीं है। सीमा को लेकर ही असीम है । सीमा को छोड देने पर असीम प्यता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसीलिए सम्पूण मानवता से कवि को प्रेम है । कवि की प्रतिभा निझरणी जिस दिन समस्त बाधा का उल्लघन कर अनन्त'क अभिसारम अग्रसर हुई थी उस दिन उसने सम्पूर्ण मानव-समाज को भी अपने साथ चलने का माह्वान किया था । पय क नगे म कवि भाग ही बढ़ जाता है- पयेर मेगा मामाय लेगे दिल पय भामारे विये दिल । निराला क 'सीमा मसीम का दागनिक तत्व भी इस मानवतावादी गति धम से प्रभावित है । यदि प्रत्येक मानव को पुकार पुवार कर जहता से मुक्त होकर जगने के लिए माह्वान कर रहा है- पब से मैं रही पुकार- माणो फिर एक बार उगे प्रणाचन मावि प्राईमारती रति कवि-कण्ठ में क्षण-क्षरण में परिवर्तित होते रहे प्रकति पट, ६० निराला काव्य पर बगला का प्रभाव गया दिन, प्राई रात, छाई रात, खुला दिन ऐसे ही ससार के बीत दिन पक्ष, मास वष क्तिने ही हजार- जागो फिर एक बार।' रवीद्र के 'कुडिर भितर कादिछे गध प्रध हय' के समान निराला को भी समय बीत जाने का डर है इसलिए वह सम्पूण बाधा को ताडकर फूल के विकास की माग करता है- टूटे सकल रप कलिके, विशा जान गत हो रहे गया विकास के लिए यह पाक्षिा निराला ने रवीद्रनाथ से प्राप्त की है। रवीदनाथ ने मानव जीवन के विकास की इस स्थिति को गति म खोजा है । गति म ही मानव जीवन का सत्य निहित है-यही रवीद्रनाथ की अनुभूति थी। परतु इस अनुभूति की कल्पना माधुनिक युग म सवप्रथम फास के प्रकाड दाशनिक वेगस ने की थी इसलिए उनके दशन कागतिवाद नाम से अभिहित किया जाता है । प्राधुनिक दाशनिक-वनानिक कहते है कि निरवच्छिन स्थान व काल नाम को वाई वस्तु इम पृथ्वी पर नहीं है, केवल वस्तु की गति के द्वारा ही हमार मन म स्थान तथा काल का नान समाहित होता है ।' प्रतएव एकमात्र गनि ही सत्य है। रवी द्रनाथ का सम्पूण बलाका काव्य इस गतिवाद का ही प्रचार करता है। किन्तु रवी द्रनाथ वेगर्स की तरह वेवल उद्दश्यहीन गति म विश्वास नही करत हैं । बेगर्स ने जीवन म केवलमात्र गति का ही अवलोकन क्यिा था परतु उहाने असीम के साथ जीवन के योग-सूत्र का अनुभव नहा क्यिा । रवीद्रनाथ की गति भनत क साथ मिलनेच्छा वो गति है क्योकि मन त साय मीमा के मिलने पर ही मानद का अनुभव हो सकता है। भारत के प्राचीन युग में भी गति के द्वारा प्रानन्द की प्राप्ति का भाव ध्वनित हुमा था- चरण व मधु विति-चरण स्वादुम उदुम्बरम । सूयस्य पश्य घमाण यो न तद्रयते घरण ॥ -चरवेति, चरवेति- - . . निराला भपग निराला गीतिका एन्य-The new cosmogony Journal of philosophial studies July 1929 .
निराला के प्रतिपाय पर वाला का प्रमाव अर्थात, जो चलता है वह मधु को प्राप्त कर सकता है, जो चलता है वह अमतमय स्वादु फ्ल का लाभ करता है । यह देखो मूय को दीप्ति महिमा-दह जा चलते चलत कभी त द्राविष्ट नही हाता । अतएव, चला, चला। रवीद्र की गति में इस पानद प्राप्ति के भाव निहित हैं- जीवनेर खरस्रोते भासिछे सदाइ भुवनेर घाटे घाटे । प्रावार प्रति तारे शकिछे ताहारे । तार निमत्ररण लोके-लोके नव-नव पूर्वाचले पालोके पालोके । निराला के भी मीमा असीम की मिलन साधना का अन्तिम लक्ष्य प्रानन्द का प्राप्नि है । असीम स मिलने के लिए कवि (सीमा) अग्रसर होता है । वह गति म विश्वास करता है और उसका लक्ष्य प्रानन्द प्राप्ति है- तुमसे चल तुम मे ही पहुंचे जितने रस मानद रहे। निराला तरगा स प्राथना करता है कि उस भी तरगो को गति प्राप्त हा जिसम कि वह ममीम से मिलकर चिरानन्द का प्राप्त कर सक- उस असीम में से प्रायो। मुझे न कुछ तुम दे जामो।' परन्तु रवाद की तरह निराला भी सीमा मसीम की मिलन-माधनास प्रानन्द- प्राप्ति क उपरान्त मोष की कामना नही करत । वणव कविया की तरह इन दा वियो गे पागा भाकाक्षा वकुण्ड के लिए सचित नहीं रहती वरन् गिल के मादा-विचार (Ideal Realism) की तरह इस संसार म हो वे मानद का मनुभव सम्पूण मानवता के साथ करना चाहत है। दोनों कवि हा इस जीवन स, इस पृथ्वी क मनुष्यों स प्रम करत हैं । रवीन्द्र बहत हैं- कवि दिले मापन वोहार तारे भार, गान उठल माशा जय हक मानुपेर, ऐनव जातार, रे चिरजीवितर । , निराला मारा २ निराला परिमल ६२ निराला-काव्य पर अगला का प्रभाव सकले जानु पेते वसल राजा एव मिक्ष साधु एव पापी, जानी एव मूढ- उच्चस्वरे घोषणा करले, जय होक मानुपेर, मोइ नवजातकेर, ऐ चिरिजीवितेर । अथवा मरित चाहि ना प्रामि सुदर भुवने, मानवेर माझे प्रामि बाचिवारे चाइ । निराला काव्य मे मानव की इस प्रकार को प्रशस्ति बहुत से स्थानो म पायी जाती है- "तुम हो महान तुम सदा हो महान् है नश्वर यह दोन भाव, कायरता, कामपरता, ब्रह्म हो तुम, पदरज मर भी है नहीं पूरा यह विश्वभार" अथवा "विश्व का नियम निश्चल, जो जसा, उसको घसा फल, देती यह प्रकति स्वय सदया, सोचने को न रहा कछ नया, सौन्दय गीत, यह वरण, गध माषा, भावों के पदबघ, और भी उच्चतर जो विलास, प्राकतिक दान वे, सप्रयास या मनायास भाते हैं, सब सब मे श्रेष्ठ, भय, मानव।" मानव का रवीद्र तथा निराला दोनो ही असामा य असीम रहस्यमान साचत हैं इसी कारण मानव के दुख से दोना कवि ही दुखी होकर कभी-कभी १ निराला परिमल २ निराला अनामिका निराला के प्रतिपाद्य पर माला का प्रमाव रम्य-लोक को छोडवर प्रभाव-ला का मन करने को उद्यत हो जाते हैं। इस सम्बच म डा० सुधार चट्टोपाध्याय कहते हैं कि निराला ने वेक्त रहस्यवाद के क्षेत्र मे गला के भाद पन का अवलम्बन नहीं लिया चरन प्रभाव को रबिना में भी बगला के पथ के अवलम्बन का इगित हम प्राप्त हो जाता है।' रवीन्द्रनाय जिस प्रकार भाव-लोक से कभी कभी प्रभाव ला म बूद पडते हैं कहते हैं--- प्रोरा काज करे देशदेशान्तरे, मग वग कलिगेर समुद-नदीर घाटे घाटे, पजाबे घोम्बाइ गुजराटे। इसी प्रकार निराला न भी कहा है- वह तोडती पत्थर, देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पय पर- वह तोडती पयर। प्रभाव ला सदुखी कवि प्रत्येक मानव के लिए सुख की प्रार्थना करता है और उनके माय इम जीवन का मुखमय बनाना ही मोक्ष का पर्याय समझता है। रयोग की "एटि स्वप्न मुग्ध-सजल नयन । एकटि पद्म हृदम-वृन्त शयने' की तरह निराला नी जीवन म मानन्द की कामना करते हैं- एक स्वप्न तन जगनयनों मे खिला रही सुख प्रम भयनों में। मानव को मसीम का रूप सममने के लिए जहाँ रशेद ने पुरातन मृत्य', 'रामा पा रानी नाटक का नौवर शबर 'सोकाबा परमादतन' का नौर राइचारण पश्चिम बी मजदुर लहरो, 'दुइ बिघा जमि' का उपन, एक्वायर मनिदीना भिखारिनी जस लोगा का वरान किया है वसे ही निराला भपने माय म मजदूर लहवी, विधवा रमणी, किसान प्रादिका वएन दिया है। रवीन्द र मतिरिक्त परी निराला पर स्वामी विवरान मानवतावादी दान का प्रभाव भी है। डा. रामविलास गर्मा कहते हैं | इनरविनामों को पिता पह है कि भारताक मामुपों परत जोक्न को दाम अषा का गहरे रगा म पवित्त लिया गया है। और माता स्पष्ट देवी मानद स प्राधिक गति । , महापाप मानिक हिन्दी साहित्य भागलार म्यान, प्रथम खण्ड पृ०१.. २ निराला अनामिका निरानातिका ६२ निराला-काव्य पर यगला का प्रभाव सक्ले जानु पेते वसल राजा एव भिक्षु साधु एव पापी ज्ञानी एव मूढ़- उच्चस्वरे घोषणा करले, जय हो मानुषेर, पोइ नवजातकेर, ऐ चिरिजीवितर। अथवा मरित चाहि ना मामि सुदर भुवने, मानवेर माझे प्रामि वांचिवारे चाइ। निराला के काव्य म मानव की इस प्रकार की प्रशस्ति बहुत से स्थानो म पायी जाती है- 'तुम हो महान तुम सदा हो महान है नश्वर यह दोन भाव, कायरता, कामपरता, ग्रह्म हो तुम, पदरज मर भी है नहीं पूरा यह विश्वमार". अथवा "विश्व का नियम निश्चल, जो जसा, उसको वसा फल, देतो यह प्रकति स्वय सदया, सोचने को न रहा कछ नया, सौदय गीत, बहु वरण, गध भाषा, मावों के घर-बध, और भी उच्चतर जो विलास, प्राकतिक दान वे, सप्रयास या अनायास पाते हैं, सब सब में धष्ठ, पय, मानय ।' मानव का रवीद्र तथा निराला दोनो ही असामा य असीम रहस्यमान सोचते हैं इसी कारण मानव के दुख से दोनो कवि ही दुखी होकर कभी कभी १ निराला परिमल • निराला मनामिका निराला के प्रतिपाद्य पर बगला का प्रभाव रहस्य-लोक को छोडकर अमाव-लार का वणन बरले को उद्यत हो जाते हैं। इस सम्ब र म डा० सुधारर चट्टोपाध्याय कहते हैं कि निराला ने केवल रहस्यवाद में क्षेत्र मे वगना के भाद-पक्ष का अवलम्बन नहीं लिया वरन प्रभाव की कविता म भी बगला व पय में अवलम्बन का गित हम प्राप्त हो जाता है। रवीन्द्रनाथ जिस प्रकार भाव-लोक से कभी कभी अमाव ला म कूद पडते हैं, मोरा काज करे देश देगान्तरे, मग भग कॉलगेर समुद्र-नदोर घाटे घाटे, पजावे बोम्बाद गुजराटे। इमो प्रकार निराला न भी वहा है-- वह तोडतो पत्यर, देखा उस मैंने इलाहाबाद के पय पर--- वह तोडती पत्थर ।' प्रभाव लार से दुखी रवि प्रत्यर मानव के लिए सुख की प्राथना करता है और उन माय इस जीवन को सुखमम बनाना ही माप का पर्याय मममना है। रखोद की एव टि स्वप्न मुग्ध मजल नयने । एकटि पद्म हृदय-वृन्न गायन की तरह निराका मा जीवन म मानन्द का कामना करते हैं- एक स्वप्न तन जरा-नयनों मे खिला रहा सुख दुम प्रयनों में।' मानव का मसोम का प समझने के लिए जहा रवीन्द्रन 'पुरातन वृष, 'गजा पा राना' नाटर का नौकर गर, 'सोरावा प्रत्यायतन' गौर राइचरण, पश्चिम की मजदूर लड़की, 'दुइ बिधा अमि' । उपन, "पदया मनितीना भिसारिनी उस लोगों का वएन किया है वम ही निराला ने र पाव्य म मजदूर लारी, विधवा रामगो विमान प्रानि का दान किया है। दन्द्र ६ मनिरिन यहाँ निराठा पर स्वामी विववानर र मानवता "r प्रभाव भी है। हाल गमविलास शर्मा र रिन दिनों यह है कि मारता के प्रमों व पदर जीवन मी दाrr मस्ति किया गया है। भोर माता म्प म एmart , महोगपय माधुनिक हिलेम,r, he , राना अनामिका, गा ६४ निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव को देवी है । वह कविको पलायनवादी ससार म नही ले जाती, न सुनहली किरणो स उसक पास जस आंसू पाछ लेती है। वह उसे दुखभार सहन करने के लिए प्ररणा देती है और माना कहती हैं कि यह भार वहन करना ही उसकी श्रष्ठ उपासना है। भक्ति यह सवा भक्ति की भावना निराला ने रामकृष्ण परमहस तथा विवकानद से ग्रहण की थी जिम उदाहरण निराला को कविता सवा प्रारम्भ , स्वामी प्रमानन्द जी महाराज', 'कलाश म शरत , 'युगावतार परमहस श्री रामकृष्ण देव क प्रति म प्राप्त हो जाते है । दिनकर के अनुसार विवकानद ने अपनी प्राध्यात्मिक अनुभूति का व्यावहारिक रूप देकर सेवा धम का प्रतिपादन क्यिा है। दिनकर जी इम कमठ वदान्तवाद कहते है । पचवटी प्रसग म जो मा रूप म भक्ति का प्रसा प्राप्त होता है वह भी राम की सेवा भक्ति म शक्ति की उपासना का प्रभाव है । इसक बारे में डा० रामरतन भटनागर कहते है कि इस कविता (पचवटी प्रमग) म जो माता (मोता) के प्रति भक्तिवाद मिलता है वह स्पष्ट ही बगाल प्रदेश में उधार लिया गया है ।' राम की शक्ति-पूजा में भी बगाल की "क्ति-पूजा का प्रभाव परिलमित होता है । विवकााद की सवा भक्ति तथा रविद्रनाथ की भक्ति मे तत्वत काई भेद नहीं है । विवकान द अद्व तब्रह्म का प्राप्त करने के लिए मानव को संवा तथा भक्ति का माग अपनाने को कहते है । रवीद्र भी असीम से मिलने का इच्छा म इस पृथ्वी पर रहना चाहत हैं और मानव प्रम को भक्ति रूप में अपनाना चाहत हैं । उह मोम की इच्छा नही, मानवीय भक्ति की कामना ही उनक जीवन की सबसे बड़ी कामना है क्यापि वही सीमा का असीम के साथ मिलन होता ययाय थावे सबार प्रथम दोनेर हत दीन, सइखाने ये धरण तोमार वाजे सवार पिछे सवार निचे सब हारादेर माझे। , रामविनाम शमा निराला पृ०६५ ६६ निकर सम्वृति ई चार अध्याय पृ० ४६३ ३ रामरतन मटनागर कवि निराला एक मध्ययन, पृ०६६ निराला के प्रतिपाद्य पर बगलामा प्रमाव इसीलिए मरित चाहि ना प्रामि सुदर भुवने, मानवेर माझ प्रामि वाविवारे चाइ । वरायसाधने मुक्ति से प्रामार नय॥ मोह मोर मुक्ति म्ये उठिये ज्वलिया, प्रेम मोर मक्ति रुप रहिवे फलिपा। निराला की भक्ति भावना म विवकानद तथा रवीद्रनाथ दाना का ही युग्म प्रभाव है और इसी कारण निराला मातृरूप जीवनदेवता की भक्ति की ही कामना ? - मुक्ति नहीं चाहता में भक्ति रहे, काफी है मुधाकर को कला मे प्रग यदि बन कर रहूं तो अधिक प्रानदह अथवा यदि होकर धोर, कुमुद नागप पोता रहूँ सुधा इदु सिधु से यरमती हुई तो मुख मुझे अधिक होगा इसपे सदेह नहीं मानद बन जाना हेप ह धेयरपर मानद पाना है' और इस माध्यात्मिक भविन म प्रम मपुर प्रारम निवेदन वा एवं प्रिय मिलन मा मानन निहित है। यह मानद ही निराला का लश्य था । यह मानद हो एर नवीन रहस्यवाद है जिमरा पटभूमिका प्रतिवाद हात हुए नी माधारभूत पिला कर प्रति विद्राह-स्व मानव मन बी चेतना का नवरूपाया है। यही रवीदादानिय विचार, सीमा र बीच मसोम र माय मिलन-सायना का मानन्द है और यही निराला कप और मरूप का मान दमय सगम है । ध्याय परवर्ती युग म पार निराला र प्रतिपाद्य पर प्राधुनिक समाज काठिन्य तपादुम एव प्रभारवा प्रभाव या मनुभूनिमय दुमातिरवम प्रभावित उनकी रविना म समार को विकृति का दान होना है मौर प्रभावस्वर उनी रविना मयतिर विपाठ एव व्यग्य या माधिस्य हो जाता है। तीन्द्रनाप की गप समम । ধন निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव की कविताना म भी पृथ्वी के धूलि धूसरित प्रात का चित्रण ही अधिक प्राप्त होता है जिसम कवि मन का विषाद् अकित है। वासा बॅछि मालगा माटिते से चलित माटि नदीर जले नदीर जले एसेछिल भेसे, ये माटि पडवे गले श्रावण धाराय । याव मामि। तोमार यथाविहीन विदाय दिने प्रामार भागामिटेर परे गाइवे दोयेल लेज दुलिये। एक साहानाइ बाजे तोमार बाशिते, योगो श्यामली ये दिन प्रासि, पाबार ये दिन पाइ चले। इस प्रकार की “यक्तिगत दुखानुभूति स सम्पूण निराला काय भरा पडा है । परवर्ती युग में पाकर उ हाने भी रवीद्र की तरह लिखा था- में प्रक्ला देखता ह, प्रा रही मेरे दिवस की साध्य बेला।' अथवा स्नेह निझर बह गया है रेत ज्यो तन रह गया है। माम की यह डाल जो सूखी दिखी कह रही ह-मव यहा पिक या शिखी नहीं पाते पक्ति मे वह हू लिखी नहीं जिसका प्रथ- जीवन दह गया है।' परन्तु रखी विपरीत, निराला के य दुसपूण भाव या तो सामाजिक विद्राह मथवा सामाजिक व्यग व स्पम प्रकट हुए है 1 वास्तर म यह दोनो रूप ही पाश्चात्य कविया की दन है जो वगाली कवि नजरुल इस्लाम तथा १ निराला अधिमा २ निराला मणिमा निराला के प्रतिपाद्य पर बगला का प्रमाव प्रमीयकुमार चक्रवर्ती के माध्यम से निराला के काव्य म सयोजित हुई है। नजरुल इस्लाम तथा अमीयकुमार चक्रवर्ती ने व्यक्तिगत अनुभूति स अनुप्ररित होकर अपने का य म समाज पर व्यग्यात्मक चोट की है । पाश्चात्य कवियो म इएटम एलियट, अडेन तथा टुअनर ने कविता के माध्यम स समाज पर कसकर व्यग्य क्सा है जहा स अनुप्ररित हाकर एव परिस्थितिजय प्रभावस्वरुप वह व्यग्य- तत्त्व वगला काव्य म पदापण करता है और काफी प्रग तक वही स रस ग्रहण पर निराला ने अपने काय म सामाजिक यम्य का स्थान दिया है। इस सम्बध म प्रभाकर माचवे का कहना है कि वगला उदाहरणा म निराला के व्यग काव्य की समानता है, किंतु मराठी गुजराती उदू म जो उदाहरण मिलते हैं वे व्यग्य युक्त भले हो, उनम अभिव्यक्ति का वह वलक्षण्य नहीं जिसके कारण ही निराला की व्यग्य-कविताएँ विशेषरुपम उल्नखनीय हैं। उदाहरणस्वरूप अमिय चक्रवर्ती की एक कविता ली जा सकती है- मोटर गाडिर चाकाय प्रोडाय धुलो, यारा सोरे याय तारा सुषु लोकगुलो, कठिन, कातर, उद्धन असहाय, यारा पाय यारा सबइ कि नाहि पाय फेन किछु माथे वोभानो, बोझा ना पाय मेलाबेन ।' पोर निराला- दाय गई गाडी, बायें मुडी जसे, एक पोर स्टो चबूतरे को रि कुटिया से निक्ली पाली एक नारी गाली देती, खाली दिल्ली देखकर चबूतरा।' रवीद्रनाथ को विषय वस्तु को ग्रहण पर रचित कविताएं यहाँ हम निराला को पविताना व उन विपया पर विवचन करेंगे जा रवीन्द्र काव्य स निराला ने ग्रहण किया है । वास्तव म ग्वीद्र-बाप स प्ररित हार निराला जी ने इन विषया का अपनी कवितामा लिए नुना है परन्तु इन विषयो वा अपनी अनुभूति से रग कर निराला इस ढग स प्रस्तुत करते हैं कि वही भी यह दूसरे का प्रभाव नहीं लगता है । यही निराला प्रभाव को प्रात्मसात कर मते हैं। १ निराला काव्य में प्रतिययायवाद, माहित्य काय अक २००७ २ माधुनिक नागला कविता, पृ० ८० ३ निराना नये पत्ते निराला-काग्य पर बगला का प्रभाव . १ पुरातन वैभव का प्रकन इस सम्बध में डा० रामविलास शर्मा कहत हैं कि रहस्यवाद छायावाद का एक पहलू था। दोना को एक मान लेने पर बहुत तरह के भ्रम उत्पन हो जाते हैं। अय रामाटिक प्रान्दोलनो की तरह छायावाद म भी विरोधी प्रवृत्तिया और प्रसगतियो का अभाव नहा है। पलायन और अध्यात्मवाद के साथ उसम सधप का स्वागत और क्रान्ति की चाह भी है। पलायन का रूप अध्यात्मवादी ससार की कल्पना ही नही है इतिहास से वे युग ढूढकर निकाल जाते हैं जिनसे कवि को प्रातरिक सहानुभूति होती है। 'दिल्ली" और खण्डहर कवितायो म पुरा तन व भव के प्रति भावुक सहानुभूति प्रकट की गई है। शिवाजी का पत्र ' गुरु गाविन्दसिंह पर और 'जागो फिर एक वार" नामक कविता में उस हिदू पुनर्जा गरण के चिह्न मिलत हैं जा शुरु म हमारे राष्ट्रीय जागरण के ही एक अग रहे । 'यमुना म उहांने पौराणिक संसार को नवीन जीवन दिया है । ब्रज और यमुना को दबकर अनेक आधुनिक कवियो न नटनागर श्याम और पनघट पर गापिया की मधुर प्रमलीला के जा चित्र अक्ति क्यि हैं उनका प्रारम्भ इसी कविता स होता है। परन्तु हम डा० रामविलास शर्मा के इस पलायन विवेचन से सहमत नहा हैं। निराला ने रवीद्र की तरह प्राचीन वभव का चित्राक्न रोमा टिक कविया की तरह पलायन (escape) मनोभाव को प्रदर्शित करने के लिए नहीं किया था वरन इसक पोछे अपनी मस्कृति तथा प्राचीन वभव र प्रति श्रद्धा प्रदशन करना ही मुख्य उद्दश्य था । यद्यपि रवीन्द्र का तरह निराला भी प्राचीन वभव के अभाव म दुखी अवश्य हो जाते हैं परन्तु इसका यह प्रथ नहीं कि वे भाव राज्य (Eutopia) म जाने के इच्छुक हैं । व ता मानव स प्रम करत हुए मम्पूण मानन साय इस पृथ्वी म रहकर इस पृथ्वी को सुखमय बनाना चाहते हैं। रवीद्र- सेइ क्दम्बेर मूल यमुनार तोर, सेइ से गिखोर नृत्य एखनो हरिधे चित्त, फेलिछ विरहछाया श्रावण तिमिर । माजमो माये वृदावन मानवेर मन । १ रामविवाम शमा निराना पृ• ६७६८ ६६ निराला के प्रतिपाद्य पर वगला का प्रभाव गरतेर पूणिमाय श्रावणर वरिपाय उठे विरहेर गाया बने उपवने एखनो से बागि बाजे यमुनार तोरे । एखनो प्रेमेर खेला, सारा दिन, सारावेला एखनो कादिधे राधा हृदय-कुटीरे। और निराला यमुने, तेरो इन लहरों में किन अधरों की प्राकुल तान पथिक प्रिया-सी जमा रही है उस प्रतीत के नीरव गान? बता कहा प्रव वह वणीवट ? कहा गए नटनागर श्याम चल चरणों काव्यात पनघट यहाँ माज वह वृदाधाम ।' यहाँ पलायनवाद की प्रवृत्ति नही वरन् यह दुख का अध्य है । रवीद्र'मत्य शिव सुन्रम' के पवि थे और मत्य क्टोर मूर्ति होता है उसकी पूजा के लिए दुख प्रध्य ही सफल समझा जाता है । निराला न रवीद्र क स भाव को ही ग्रहण किया है। २ सस्कृति उपयुक्त विवचन स स्पष्ट हो जाता है कि निराला न रवीद्र से भारतीय सस्कृति को दोगा ग्रहण को पी। दानिक विचारपग में भारतीय सस्कृति का सदमे मरवपूण विचार पद्वतवाद वा भाव निराला को कविता म पाया जाता है। इस अतिरिक्त पश्चिम भौतिकवाद के विरुद्ध अपनी मस्कृति की महत्ता का प्रतिपादन रवीद्रनाथ न अपनी बहन-मोपविनामों तथा दोगोनि-नाश्य तासेर दा' और 'रनगरवी म दिया है । उगाहरणतया- गतानगर प्राजि रत्तमेघ माझे मात गेलो,-हिसार उत्सवे माजि याने १ निराशा: परमन ७० निराला काय पर वगला का प्रमाव प्रस्ने प्रस्ने मरणर उ माद-रागिनी भयकरी! दयाहीन सभ्यता नागिनी तुलेछ कुटिल फ्ण चक्षरे निमिपे । निराला ने भी पश्चिम के भौतिक विकास क विरुद्ध हमारी प्राध्यात्मिक सस्कृति की महत्ता का प्रतिपादन क्यिा है- प्राज सभ्यता के वज्ञानिक जड विकास पर गवित विश्व नष्ट होने को और अग्रसर स्पष्ट दिख रहा, सुख के लिए खिलौना जसे बने हुए वनानिक साधन, केवल पसे प्राज लक्ष्य मे हैं मानव के, स्थल जल अम्बर रेल तार बिजली जहाज नभयानों से भर दप कर रहे हैं मानव, वग से वगगण मिडे राष्ट स राष्ट, स्वाय से स्वाथ विचक्षण। तथा- 7 क्तुि क्या योग्य जन जीता है, पश्चिम की उक्ति वहीं गीता है, गीता है स्मरण करो बार वार-२ परन्तु पश्चिम के प्रति घृणा व भाव प्रदशन करना भारतीय सस्कृति के अनु स्प नही था और इसी लिए रवीन्द्र की तरह निराला ने सम्पूण विश्व की उन्नति की कामना कर विश्वधम का प्रतिपादन किया है जो हमारी संस्कृति की सबसे महत्त्वपूण धारा है- भृति विश्वे अमृतस्य पुत्रा प्राये घामानि दिव्यानि तस्थु । श्वेताश्वतर अध्याय २१५ स्वामी विवेकानद न सी विश्वधम का प्रचार सम्पूर्ण जगत म किया । निराला विवेकानद तथा रवीद्र दोनों में इम विचार का ग्रहण कर अपन काव्य म विश्वयम का प्रतिपादन करत हैं- १ निराना अपरा २ निराना पनि ७१ निराला के प्रतिपाद्य पर बगला का प्रभाव है मोर चित्त, पुष वर दे, वीणावादिनि वर दे प्रिय स्वतनरव अमृत मन नव भारत मे मर दे। क्लुप भेद तर हर प्रकाश भर जगमग जग कर दे। मद गति, नवलय, ताल छद नव मवल कठ, नव जलद मद्र रव नव नम के नव विहा वृद को नव पर, नव स्वर दे। यहाँ कवि स्वदेश म ही स्वातन्य रव फनन की आकाशा नही करता अपितु सम्पूर्ण विश्व को ज्यानिपूण दसन की अभितापा कर रहा है । रवीन्द्र की कवि- तामा म यह विश्वप्रम सवत्र भनक्ता है- तीय जागोरे धीरे- एह मारतेर महामानवेर सागरतीरे। हेपाय दांडायः दु बाहु वाडाये नमि नरदेवतारे, उदार छदे परमानदे वदनपरि तारे। ३ स्वदेश प्रेम श्रीमती महादवी वर्मा याधुनिक कवि सीरीज' वाने सग्रह की भूमिका म छायावाद युग की सामाजिक और राष्ट्रीय कवितामा के वार म लिखती हैं- 'राष्ट्रीय भावनानी को लेकर लिखे गय जय-पराजय के गान स्थूल धरातल पर स्थित मूरम मनुभूतिया में जो मामिक्ता ला सके हैं वह किमी और युग के राष्ट्र गीन द गगे या नहीं, इमम सन्द है। निराला की राष्ट्रीय या स्वदा प्रम की मतिमा पर युगपन वगाल व स्वदेगी मान्यतन द्विद्रलालराप, रवीन्नाथ तया नवरुन इम्लाम का प्रभाव लात हाना है। भारत प्रास्नि, विद्रोह-गान तथा स्वदा म विश्वका मिलन यह ममी भाव निराला का नजाल, दिजन्द्रलाल राय तथा खीद्र से प्राप्त हुए हैं । हिजेन्द्रलालराय की भारत प्रशस्ति देखिय- . गतिम ७२ निराला काव्य पर बगला का प्रभाव १ ये दिन सुनिल जलधि हइते उठिल, जननी मारतवष उठिल विश्वे से दि फ्लरव, से किमा भक्ति स कि मा हप । इसी के अनुरूप स्तोत्र शली म निराला के लिखे हुए भारत प्रशस्ति के गीत प्राप्त हो जाते हैं- वद पद सुदर तव, छदे नवल स्वर-गौरव, जननि, जनक जननि जननि ज मभूमि मापे ! जागो नव अम्बर भर- ज्योतिस्तर वासे उठे स्वरोमियों मुखर दिक कुमारिका पिक रव। इसके अतिरिक्त नज़रुल की तरह भरव रव म निराला ने स्वदेश गान भी गाया है। नजरल-- प्रासछे एवार मनागत प्रलय नेशार नृत्य पागल सिधु पारेर सिह द्वारे धमक हेने मागल पागल । मृत्यु गहन अध फूपे महाकालेर चण्ड स्दे- धूम्न घूपे बच गिखार मगाल ज्वेले मासछे भयकर- ओरे ऐ हासछे भयकर। तोरा सब जयध्वनि कर् तोरा सब जयध्वनि पर और निराला- , निराला ने इन शर्मा को रवाद से ग्रहण क्यिा है- मामि भुवन मनोमोहिना । मामि निमल मयकरो क्ल धरणी जनक जननी-जनना। २ निराला गीतिका निराला के प्रतिपाद्य पर बगला का प्रभाव ७३ जग गद जनता, हुए तुण्ठित मुकुट जीवन सुहाये । रुपड मुण्डो से मरे हैं खेत, गोलो से बिछाये मथवा- इस जग के मा के मुक्त पाए । गाप्रो विहग ! सदध्वनित गान, स्पागोज्जीवित, वह उध्व ध्यान, धारा सव' जहां निराला ने रवीन्द्र विदेश प्रम की कविताओं से भाव ग्रहण कर अपने स्वदेश प्रम को कविताग्रा को मजोया है वहाँ साधारणतया दो तत्त्व स्पष्ट परि लक्षित होते हैं- प्रथम, रवीद्र ने सम भाव वे पादश स प्ररित होकर प्रत्येक मानव को सम दृष्टि से देखा है और प्रत्यक को प्रेम के सूत्र में प्रावद्ध करने की इच्छा प्रकट कोह- क्वे देव ए रजनी हवे अवसान 7 स्नान करि प्रभातेर गिशिर सलिले तरुण रविर रे हासिने पृथिवी । प्रयुत मानवगए एक कण्ठे देव, एक गान गाइवेक स्वग पूरा करि' नाहिक दरिद्र धनी प्रधिपति प्रजा, कह कारो कुटीरते परिले गमन मर्यादार अपमान परिवे ना मने, सक्लेइ सक्लेर करितेशे सेवा, देह कारोप्रभु नय, नहे फारो दास । से दिन प्रासिबे गिरि एखनए येनो दूर भविप्पत सेइ पतेधि वखित- येइ दिन एक प्रेमे हइया निबद्ध मितिवेक कोटि कोटी मानवहृदय । निराला ने भी अपनी पवितामा म इस माम्य भाद वा प्रदरित किया है परन्तु रवीद्र जहाँ ' वनि विश्व अमृतस्य पुत्रा' स प्रभावित हुए य वहां निराला ने युगीन प्रगतिवादी विचारों म प्रभावित हारर इस प्रकार को रवितामा का १ निराला देना • निराला तुलसीदाम निराला काव्य पर बगला का प्रभाव प्रणयन किया है इसलिए पूणत इनम रवीद्र का प्रभाव नहीं दिखाई पडना है। उदाहरणतया- जल्द जल्द पर बढ़ानो प्रानो प्रायो। आज अमीरा की हवेली किसानों की होगी पाठशाला सारी सम्पत्ति दा को हो, सारी मापत्ति देश को बने, जनता जातीय वेश की हो, याद से विवाद यह ठने, कांटा काटे से क्ढ़ानो। द्वितीयन निराला रवीद्र के स्वदेश प्रम के उस भाव से प्रभावित हुए हैं जहा कवि ने स्वदेश की स्वल्प परिधि को त्याग कर विश्व को अपनाया है। इस सम्बध म चारुचद्र व द्योपाध्याय कहते हैं कि रवीद्र विश्वप्रमी हैं। अति शशवकालस । उनका कवि चित्त सकोण शकाल की सीमा में प्राबद्ध रहने के कारण दुख तथा दीनता के विरुद्ध युद्ध घोषणा करता रहा है। इसीलिए रवोद्रनाथ का स्वरेश प्रम कभी भी उग्र स्वदेश प्रम का प धारण नहीं कर पाया है। निराला की कवितामा म भी रवीद्र में स्वदश प्रम की पवितापो की तरह विश्व प्रम की झनक स्पष्ट प्रतिफलित दिखलाई पड़ती है। उदाहरणतया रवीद्रनाय- चिर ल्याएमयो तुम पाय, दा विदेो वितरिछ मन, जाह्नवी यमुना विलित करणा पुण्य पीयूप स्तम वाहिनी और निराला- जागो नीवन धनिक विश्न पराय प्रिय वणिके।' , निराला वेला २ चारपद न्योपाध्याय रवि-रश्मि, भाग २, पृ. ३५- ३ निराला गातिका निराला के प्रतिपाद्य पर बगना का प्रभाव ७५ तथा- नर जीवन के स्वाय सक्ल बलि हो तेरे चरणों पर, मा, मेरे श्रम सचित सब फल । अशत विश्व प्रम का यह भावना निगला ने विवकान द क विश्वधम के भावा से भी ग्रहण की है। । ४ मृत्यु दाशनिक विचार के अतगत मृत्युविषयक मा यनामा को हम ल सकते हैं । कारण रवीन्द्र और निराला दोना ही मृत्यु को असीम का ही पर्याय भेद मानत हैं। तथा मोमा और प्रमीम के मिलन हतु आन द की प्राप्ति म मीमा असीम क रूप का अन मानत हैं। इस पान द-यन के पुरोहित रवीन्द्र के लिए इस मसार वा कोई भी व्यापार प्रानन्दहीन नही है । इसलिए जिस मृत्यु के भय स जगत वासी सत्रस्त है उस मृत्यु को खीद न अभय-मूर्ति रूप म दवा है एव मृत्यु की विभीपिका का मोचन र मृत्यु को भी मुदर रूप में प्रदर्शित किया है । मृत्यु यदि नहीं रही तो जीवन भी नहीं रह पाता, मृत्यु के द्वारा ही हम जीवन के अस्तित्व को उपलब्धि करत है । रवीद्र कहत हैं- मामि तो मत्युर गुप्त प्रेमे रव ना घरेरकोणे येमे। प्रामि चिर यौवनेरे पराइव माला हाते मोर तारि तो वरण्डाला तथा- मरण के प्राण वरण करे बाँचे । एवं प्रत्यक जीव- पहिल मरगरपो जीवन-स्रोत से ये ऐ मांगा गडार ताले ताले मेचे याप दो दंगे काले काले। मृत्युमम्बानिराला व विचार मवा रवीद्र के अनुपूत हैं । रवीद्र को तरह निराला भो मृत्यु का वरण करना चाहट हैं कारण मृत्यु के द्वारा ही हम मपन जीवन से पस्तित्व बामनुभव परत है- १ निराना गानिका निराला काव्य परबगला का प्रभाव । दे मैं वहं वरण जननि, दुखहरण पद राग रजित मरण। एव मुक्ति हूँ मैं मत्यु मे प्राई हुई, न उरो। रवी द्र की तरह निराला जीवन को मृत्यु के द्वारा ही पाते हैं- मरण को जिसने बरा है, उसी ने जीवन भरा है। परा भी उसी, उसी के प्रक सत्य यशोधरा है।' ५ महापुरषो को प्रशस्ति रवीद्र के अनुरूप निराला ने भी महापुरुषो को प्रशस्ति म कविता की रचना की है । रवीद्र की कविता अरविद रवीद्र लहो प्रणाम तथा 'सत्येन्द्रनाथ दत्तर प्रति' के अनुरूप निराला ने सम्राट एन्वड प्रप्टम के प्रति,' 'सत कवि रविदास जी के प्रति', मादरणीय प्रसाद जी के प्रति,' भगवानबुद्ध के प्रति, प्राचाय शुक्ल 'जी के प्रति श्रद्धाजलि 'श्रीमति विजयलक्ष्मी पडित के प्रति, युगप्रवर्तिका श्रीमती महादेवी वर्मा प्रति तथा युगावतार परमहस श्री रामकृष्ण देव क प्रति, कवितामा मे इन महापुरुषा की प्रास्तिया गाई हैं । इस प्रकार रवीन्द्रनाथ की विषय वस्तु को ग्रहण कर निराला को कवितामो की रचना पर प्रभाव मून की धारा स्पष्ट हो जाती है। उपयुक्त विषया क अतिरिक्त रोमाटिक प्रम, रवि विरह तथा मिलन भाव जसे विपपो को ग्रहण कर निराला ने कवितामा वा प्रणयन क्यिा है जिसका वणन हमने कला पक्ष क पन्तगत प्रतीक वणन 'म विस्तार से किया है। यहा क्वल एक और विषय पर विवेचन गेप रह जाता है जिसका रवीद्र स ग्रहण कर निराला ने कविता की रचना की है। ६ पविता सम्बघित रवीद्रन अपनी कवितायो म वही-कहा कविता को सम्बोधित कर नविता वी रचना की है । जस- , निराला अपरा २ निराला अनामिका १ निराला भनामिका २ दखिये क्ला-पत्र निराला के प्रतिपाद्य पर वगला का प्रभाव ७७ छदे उठिछे च द्रमा, छदे कनक रवि उदिछे छ दे जगमण्डल चलिछे, ज्वलत कविता तारका सबे, ए कवितार माझे तुम के गो देवि, पालोक पालो प्राधारि। कवि और कविता सम्बधित कविताए निराला ने भी लिखी हैं और यह सम्भव है कि रवीद्र को इस प्रकार को कवितामा की विषय वस्तु से प्रभावित होकर निराला ने यह कविता लिखी है- ऐ, कहो मौन मत रहो। सेवक इतने कवि हैं-इतना उपचार- लिए हुए हैं दनिक सेवा का भार, धूप, दीप, चदन, जल, गघ सुमन दूर्वादल, राग भोग, पाठ विमल मात्र, पट परतल गत मृदग, घपल नृत्य, विविध भग वीणा वादित सुरग तय। रवीन्द्र के सौदय दशन से प्रभावित निराला का सौदर्य दशन- निराला क विचार-पक्ष पर विवेचन करत हुए हमने स्वत निराला क भाव-पग पर भी विचार कर लिया है कारण भाव पक्ष के प्रतगत विचार-पक्ष मा जाता है जसे कि भाव-पल के दो प्रग मे प्रक्ट है- (१) बौद्धिक तथा (२) काल्पनिक इसम बौद्धिक भाव ही विचार-पण वे अन्तगत हात हैं । यहाँ इस विषय पर गुलाबगप का मन उदधृत करना उपयुक्त होगा। उनका कहना है नि बाध्य का मूल तत्व तो रागात्मक या भावतत्व ही है रितु उसक साय पाश्चात्य दा म पल्पनातत्व, बुद्धितत्व, मौर पालीतल का भी माना है। पल्पनाभाव को पुष्ट बरती है। उस लिए सामग्री उपस्थित करता है भौर साय-माय ही अभि व्यक्ति म भी सहायक होती है । क्ल्पना वा सम्बध मानसिक सृष्टि म है, यह चाहे कवि को भावनामो र अनुकूल ब्रह्मा को सष्टि का पुनर्निमाण हो और १ निराना मनामिका ७६ निराला काय पर बगला का प्रमाव चाहे उसम जोड तोड और उलट केर परक बिल्कुल नई (कि तु सुसगत और सुसम्भव) रचना हो । बुद्धितत्व कल्पना का उच्छ खल हाने से बचाये रखता है। कठोपनिपद म बुद्धि को इद्रियरूपी अश्वो को लगाम कहा है । वह इद्रियो की ही लगाम नहीं है वरन कल्पना के घोडो की भी लगाम है। हमार यहा पौचित्य दोषा और क्रम प्रमाण, सार एकावली प्रादि अलकारो में कही तो पूर बुद्धि तत्व का और कही उसके भावमय आभास का (जस काव्यलिंग आदि म) समावेश हो जाता है । बुद्धितत्व से सत्य और शिव की रक्षा होती है और कल्पना तथा भावतत्व में सुदरम का निर्माण होता है । कल्पना से सुटरम' का शरीर बनता है और भावना म उसको प्रात्मा रहती है । 'मुदरम् रस का विषयागत पक्ष है। निराला की कल्पना न प्रकृति के विराट रूप, नारी के महिमाचित रूप, प्रतीत के भावमय आकलन प्रादि भाव भूमिया के माध्यम से काय मे सोदय को ही प्रकट किया है। क्योकि कवि का मोदय टशन उसके काय की भाव भूमि से घनिष्ठ रूप म सयोजित रहता है । परन्तु साथ ही जसा कि प्रवास जीवन चौधुरी कहत हैं कि विश्व प्रकृति तथा जीवन को जव नि स्वाय दृष्टि स देखा जाता है तन उसकी समग्नता तथा उसका सामजस्य अतर को एक महान् सौदय तथा प्रानट से परिपूर्ण कर देता है । यह सौदर्यानुभूति ही काय सौ दय की भित्ति है ।' रवीन्द्रनाथ ने अपन जीवन म इसी सी दय का सधान किया था। यही रस की साधना तथा एक और सत्य तथा प्रात्मापलाध की साधना है । रवीद्र न तटस्थ दृष्टि स विश्व प्रकृति तथा जीवन म अपने जीवन दवता को अनुभव किया और इसीलिए उसम सौदय एव मानन्द की उपलधि की । यही उनके लिए रसोपा ध रही । कारण, जीवन देवता (ईश्वर) ने ही तो रस के लिए इस समस्त विश्व चराचर को सृष्टि की है-रसा व स । कवि के व्यक्तिगत जीवन की यही साधना थी। रवीद्र काव्य के अनुरूप निराला न भी भावभूमिया के माध्यम स अपने जीवन देवता को खोजा है और निराला के लिए उसकी प्राप्ति मानद की प्राप्ति तथा रस की प्राप्ति रही जो सोदय काही पर्याय है । रवीद्र तथा निराला दाना ने ही कल्पना के द्वारा जीवन के सुख-दु स प्राशा निराशा के बीच सृष्टि के उस वृहत् सामजस्यपूण सौदयमूर्ति को उपर्ला की है जो उपाध उह उनक - १ गुलाबराय मिद्वान और अध्ययन, पृ०१७ २ प्रवास जीवन चौधरी रवा द्रनाथेर सौन्यशन, पृ० १४०
निराला के प्रतिपाद्य पर बगला का प्रभाव
जीवन-देवता के समीप ले जाती है । तब यह मुष दुव और व्यन्ति भावा
वग मान न रहर रम म परिणत हो जाता है । यही रवीद्र तथा निराला का
सौदर है जहा निराला रवीद्रसरित हाकर भपन माहित्य म कल्पना के
माध्यम स भाव भूमिया मालन द्वारा सौदय की सयाजना करत हैं। रवीन्द्र
के भनुम्प निराला जीवन की सम्पूर्ण अभिनता जब रसामित हा जाती है
तब पुष्टि समस्त रूप तया भाव भीतर निगला जीवन-दवता का अनुभव
भरत हैं और उसक प्रति अपना प्रगाम अपित परत हैं। जम रवा :--
ये देह मोर बेसेथे मालो
ज्वलेथे घरे ताहारि पालो,
ताहारि माझे सवारि प्राजि पेयेधि प्रामि परिचय,
सबारे प्रामि नमि।
और निराला-
जन जन के जीवन क सुदर
है घरो पर
मार बराबर
दू तन मन धन योहार पर।
इस प्रकार बौद्धिव-तत्त्व द्वारा सत्य गिव तथा भावतव तथा वल्पना
द्वारा सुदरम्' मा समाहार निराला काव्य म रवीन्द्र के अनुरूप सुप्ठु तथा सुदर
दर से हुभा है । यही निराला की सबस वडी महानता है।
, निराला भगिमा
तृतीय अध्याय निराला के कला-पन पर वगला का प्रभाव १५ अगस्त सन १६३७ को लिखे एक पत्र म निराला जी ने था जानकी वल्लभ शास्त्री को अपनी कला के सम्ब ध में निम्नलिखित बात लिखी थी- 'कला के सम्बन्ध म पत्र में क्या लिखू ? उसके विकास और सौन्न्य की बातें लाखा तरह की हैं-एक देखिए- कोई न छायादार पेड, पह, जिसके तले बठी हुई स्वीकार, श्याम तन भर बँधा यौवन नत नयन, प्रिया कम रतमन, गुरु यौडा हाय, परती बार बार प्रहार सामने तरु मालिका अट्टालिका प्राकार । यहाँ सीधा वरान हाने पर भी हथोडे की चोट पत्थर पर पड़ने पर भी देखिए, किस तरह अट्टालिका पर पडती है लखक के वणन प्रकार के कारण पौर निर्देश से। ऐमी बहुत सी बातें इसम है । वह जहाँ वठी है यह पड़ छायादार नहा है और पट्टालिका तरुमालिन। है ।-अट्टालिका भी तम्मालिया है फिर भादमी जितनी छाह म है। बधा यौवन छलकता नहीं, कसी पवित्रता है ! स्वास्थ्य मी कसा ।। में तोडती पत्थर'-प्रत का स्वमावत समझ मे मा जायगा- मैं तोडती पत्थर-हृदय । निराला को सम्पूण कला अभिव्यक्ति क पीछ यह योगी की चोट काम कर रही है। प्राचीन वो छिन्न भिन्न करवे नवीन वी स्थापना ही उनकी क्ला की पहली कमोटो है । परतु यहाँ प्राचीन की अवमानना नही हुई है वरन् नवीन को वाधन के लिए निराला ने नूतन का माह्वान किया है क्यापि कला की अभि व्यक्ति यदि युग के नवीन भावा की अग्नी क साथ कदम न रख सच नये-नय , निराला के पत्र साहित्य में प्रशशिन सख्या कातिक २००७।
निराला के कला पक्ष पर बगला का प्रमाव ८१ भावा की व्यजना के लिए यदि भापा प्रस्तुत न हा तो कवि मानस की दृष्टि अवश्य ही सकुचित हो जायेगी। और वसे भी निराला का युग कला का परिष्कृत युग माना जाता रहा है जिनके सम्ब प म लिखत हुए डा० हजारीप्रसाद द्विवदी कहते हैं कि उस युग की कविता म छ- अलकार, रस, ताल तुक आदि सभी विषया म गतानुगतिकता से बचने का प्रयल था और जिनम शास्त्रीय रियो के प्रति कोई आस्या नहीं दिखाई गई थी। छायावादी युग की इस विशे पता को स्पष्ट करते हुए डा० बच्चनसिंह अपने प्रवध 'निराला की कविता म लिखते हैं कि जिस सास्कृतिक पुनर्जागरण की भूमिका पर छापावाद अधिष्ठित हुमा है उसके सम्बध म देखने से प्रतीत हाता है कि छायावाद की मूल प्ररणा स्वत यता या मुक्ति (liberty) को कामना है। इन मुक्ति-कामी कविया को रचनाओं म सवय इसकी प्रतिध्वनि सुनी जा सकती है। निराला जी इस सव थप्ठ प्रतिनिधि हैं । य छन्द के बघना मे मुक्ति चाहते थे, सडी गली मा यतामो से मुक्ति चाहते थे पुराने नतिक मूल्यो से मुक्ति चाहत थे, माहित्यिक रूढिया से मुक्ति चाहते थे। इसीलिए निराला का विद्रोहा या प्राप्तिकारी कहा गया है। यहाँ मुक्ति का तात्पय मभावात्मक से नहीं है वरन निराला जी को मुक्ति की धारणा सवदा भावात्मा हो रही है। कला के सम्बघ म स्वय कवि निराला न 'मेरी गीत-कला' शीपक निवाय म बहुमूल्य विचार प्रस्तुत किये हैं जिनस उनको वना पर अच्छा प्रकाश पडता है। कवि ने लिखा है-- भया सिद्ध कर उलटा जापू' यदि किमी पर घट सकता है ता एकमात्र मुझ पर, पबीर उलटवामी के कारण विपता रखते हैं पर वहाँ पदा वा साम्य है उलटवांसी नहीं, यहाँ छन् व भाव दाना को उल्टी गगा वती है । यह उलट पुलट मैन न बूमबर नही दिया, पोर यह उलट पुलट है भी नही इसम मीधा मोर प्राणाक पास पहुँचता रास्ता, छन्दा के इतिहास में दूसरा नहीं।' रवि प्रारम्भ मे हो ला विराघो परम्परा तथा मा यताप्रा के विद्राही रह है" पाह वह किमी क्षेत्र म क्या न हो । कवि ने इस व्यापर विद्राह को 'उलटा जाप' . कवि । इस विद्वाह क पोछे प्रपात इस छायावादी विद्राह पाछ मुस्यतया माजी स्वतावाद तथा बगला-कविता का पूणतया प्रभाव लक्षित होता है । नाराप्रमाद दिवेरी हिन्दा माहित्य पृ.४६ २ मालोचना' पत्रिका २५ भक काव्यानोचन विशशाक में मुकलित ३ निराला प्रबन्ध ५५ १०२६७ ४ निराना प्रबन्ध पा १० २६७ २ निरालाकाव्य पर बगला का प्रभाव दोनो का माधार नवीन चेतना थी। प्रग्रजी स्वच्छन्दतावाद सम्ब ब म प्राज ने अपनी पुस्त' म बतलाया है कि रामैटिसिज्म न एक नवीन चतना का निर्माण विया या । पर उसकी मा यतामापर प्रापत्ति करत हुए क्राचे न कहा कि स्वच्छ दतावाद क्वल इतना नहीं है वह अपने चालू तथा ऐतिहासिक अथ म काफी गूट है । वह अनेक भावा, विचारो मा यतामा स भरा पडा है । जो भी हो, यदि स्वच्छन्दतावाट की सर्वाधिक व्यापक प्रवृत्ति का उल्लख कसा हो तो कहना न होगा कि वह प्रवृत्ति स्वच्छ दता की है । इस प्रकार की स्वछन्दता बगला नवीन कविता व प्रकाशस्तम्भ माइकल मधुसूदन तथा बिहारीलाल की कविता के माध्यम स बगला काव्य म समा गई और बाद म जिसने आकर रवीद्रनाथ की कविता में पूणरूप धारण किया । इम सम्बध म लिखत हुए सुकुमारसन कहत है-पहल पहल वणव कविता र द्वारा वगला साहित्य म शक्तिमान साहित्य की सृष्टि हुई थी । पचदा शता दी के बगला साहित्य की भापा इस कविता लिए उपयुक्त यो। परवर्ती साहित्य म यह भाषा ही एक्च्छत्र साम्राज्य करती रही । उस ईडियम को हटान की क्षमता या सात्म विमी का न रह्न पर ऊन विश तानी मध्य भाग पयन वगला कविता सम्पूण व ध्य ही रही । माद क्ल मधुसूदन ने भाव तथा भापा की ओर मनवजीवन प्रदान करन की चेष्टा की। व अवश्य ही काफी अश तक साथ हुए थ पर तु पूरगत नहा । और फिर उनक अनुवतिगण उन साथ सष्ट उपानाना का काम म नहीं लगा पाय । अपना पथ ढूट निकालन को याम्यता उन लोगो म नही थी । इनक बाद रवा द्रनाथ प्रात है । पति शेगव से ही रवी द्रनाथ साहित्य की मत दीक्षा स दीक्षित हुए थे इसी कारण सम सामयिक वगला काव्य के प्रति उनकी वितृष्णा जगी थी। भ्रमर अभ्रान्त बोध को लिए हुए वालर पवि ने वणव-पदावली म मधुर वो ढूढ़ निकाला। उसी के साथ सस्कृत तथा प्रग्रेजी साहित्य का रस भडार भी उसके अधिगत हुआ। काव्यशिल्प व उपादान के लिए उसको और कोई चीज दूरने की मावश्यक्ता नहीं रही। वणव कविता का ललित माधुप सस्त कविता की कठिन दीप्ति, अग्रजी कविता का मूधम शिल्पकाय रवीद्रनाय के लखना बिदुपर विवरणी मगम के रूप म मधिष्ठित हुभा। हिदी छायावादी कविया न तथा मुख्यतया निराला जी न बगला अग्रजी मान रामटिक एगाना २ मुहमारमेन बागला साहित्यर शहास, तृतीय मरत, पृ० १६ निराला के कलान्यक्ष पर भगता का प्रभाव - तथा मस्कृत को इस विवरणी धारा का अपन माहित्य म ग्रहण किया। इस सम्ब र म निराला जी न लिखा है- ससार का हर एक भाषा स्वाधीन बात सही पल कर और भिन्न भिन्न भापामा से ही लवर अपना भण्डार भरती है। हिन्दी के पद प्रारणा म अधिक प्रभाव बगला और अग्रजीमा पड़ा है मपि दा एक प्राचार्यों न सस्कृत का हा TM समयन किया है। अग्रजी का असर पड़ा उस राज्यमापा हाने । कारण और वगला न अपना प्रभार जमाया अपनी उन्नति की बदौलत।' हिती अविनामा पर दूसरा भाषा का प्रभाव निराला जा का काम्य था। कारण वे साचते थे कि इस प्रकार हा हिटी उन्नति पर पायगी । और उनका यह मत सन १९२८ से हो स्पष्ट रूप धारण कर चुरा था । सन् १९५८३ लेख महोन लिखा था- मनात अनादि काल स लाराज तक समय क परिवतन के साथ ही साथ हमार भाषा-साहित्य का भी परिवतन हाता गया है । जस साहित्य भी प्टि की नवरता नियमा म वधा हा.- नवीन गृह्णाति में अनुशल चल रही हो। जो मूक्ष्मातिमूम नारण युग घम व रूप स माहि य म इस प्रकार परिवत्तन भरत भाय हैं। हमारो पराधीन हि दो पर पराधीनता ये ही कारण फारसी का भाव पहा अग्रजी वा पह रहा है भोर माश्चय है उसकी प्रातीय सहनिया बगला मराठी मादि भी उम पर राव गाठ रही हैं। प्रजभाषा हिन्दी में समय फारमी का प्रोडर दूसरो किसी भी प्रान्ताय भाषा का उस पर प्रभाव छोडन का सौभाग्य नहा धान हुया, बलि वगना नमो प्राीय नापामा पर उसी का प्रभाव पड़ता रहा। दूसरी भापायाम रलाका अवश्य ग्रहण करना चाहिए परन्तु प्रभावित हार नही प्रीति स परित हावर निराला जो न अपनी इस प्रीति भावनास उद्बुद हार अपना रविता के मला पाका जहाँ तर सम्भव हा मराई वगला कविता पर वियास समजोया है । परन्तु पर पबियाम दासत्र की भारना म प्ररित हार नहीं हुमा है वरन् इयर पोर छायावाट युग को वह मूल परगा है जिसर सम्बयम डा० हजारोममाद दिदी न अपना मनुष्य लिया है..- मानवतायती प्टिका राप्रपनान वादि व चित्तम उनवाय-कादिया पा प्रभाव नहा यह गाना गादीघकालीन परम्पग भोर रानिवद्ध चितन पद्धति , निराना मामाको गीभन्दिाकारील', चयन * বিয়া বিবি সাথে ফানি, যাৰ निराला-काव्य पर बगला का प्रभाय के माग स सरक्ती हुई सहृदय क चित्त पर आ गिरी होती है और क पना के अविरल प्रवाह म तथा भावेगो की निधि अभिव्यक्ति म अन्तराय उपस्थित करती है । इस दृष्टिकोण को अपनाने से सो दय की नई दृष्टि मिलती है क्योकि मानवीय पाचारा और क्रियाया व मूल्य म अन्तर आ जाता है । इस अवस्था म सौ दय केवल बाह्य रूप मे नही वलि प्रातरिक प्रौदाय और मानस गठन में भी व्यक्त होता है । सौदय के बधे सधे आयोजना घिसे घिसाए उपमाना और पिटी पिटाई उत्प्रक्षाग्रा पर आधारित चिन्तन शूय कायरूढियों मे मुक्ति पाया हुमा चित्त मानवता के मापदण्ड से सब कुछ को देखता है और फिर कल्पना के अविरल प्रवाह से घन मश्लिष्ट भावेगो की वह उवर भूमि प्रस्तुत होती है जो रोमाटिक या स्वच्छ दतावाटी माहित्य के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती है । मानवीय दृष्टि के कवि की कल्पना, अनुभूति और चितन के भीतर स निवली हुई, वयक्तिक अनुभूतियों के प्रावेग की स्वत समुच्छित अभिव्यक्ति बिना किसी आभास और बिना किसी प्रयत्न के स्वय निकल पड़ा हुआ भावनात ही छाया घाती कविता का प्रारग है। और इस प्रकार कल्पनागत नवीनता की खोज म छायावादी कवि न बगला-साहित्य का अपना प्रेरणा स्रोत बनाया क्याकि उस साहित्य म छायावादी कविया की कल्पना के अनुरूप उपादान उपस्थित थे। निराला जी इनम अग्रगण्य है और कल्पनागत अनुभूति की तीव्रता के कारण उनको कविता न मगला कविता को नूतनता को प्रात्ममात् कर लिया और बगला-कविता " माध्यम स अग्रजी क्लागत प्रेरणाए भी उनके काय म समा हिन हो गइ । निराला क काव्य मस्कार म रवीन्द्रनाथ के वाव्य का बहुत अधिक हाथ है इम स्वय निराला ने भी कई बार स्वीकार किया है। वे रवीद्रनाथ को सामने रखकर हिदी को समृद्ध करन का प्रयल करत रहे। कल्पना की दुरि शक्ति ने जहाँ निराला की कविता में नव भावों के समावश के लिए जगतापाय से तथा मुख्यतया रवीद्रनाथ से प्ररणा ग्रहण की वही व लागत स्प दियास म नूतनता तान के लिए बगला-काव्य व कला वियास स अपने को वियस्त रिया । ऐस भी कल्पना के दो उपयोग हैं- पहला, जब वह रचना व स्प निर्माण म योग देती है और दूसरा जब वह स्वय विषय अथवा विषय की मूल प्ररणा बनकर पाती है। पिछले अध्याय म कल्पना-पक्ष पर विचार करते हुए हमने निराला को पविता क कल्पनागत विचार-पान पर विवेचन दिया है यहां निराना , हजारीप्रमाद द्विवेदी दिनी साहित्य, पृ० ४६२ २ नामवरमिह छायावाद २०१०२ निराला ला पक्ष पर बगला का प्रभाव की कविता के कल्पनागत रूप वियास विवचन करेंगे और इस अन्तगन मूतिविधान पत्तीचपन तथा रुपक पर बगला प्रभाव हमारा विवच्य विषय होगा क्यानि भूतिविधान, पनीरचयन तथा रूपा के द्वारा मावो को परिचित स्प देने म कल्पना सरम अधिर दौड लगाती है और छायावादी युाम ता उमने समान ही कर दिखाया है। कल्पनागत रूप विन्यास नामवरसिंह बहते हैं निभाव-वेग से उत्पन्न अन्तरदायिनी और हष्टि विधायिनी कल्पनाने कविता क प दियास म इतना क्रान्तिकारी परिवतन कर गिया कि बडे बडे मुधी समालाचवा को भी छायावाद ववल नई काव्य गली प्रतीत हुमा । मोर यह रूप वियाम मातरिक सौन्दय भावना-जिम सम्बध म पावाय हजारोप्रमार द्विवदी का मत पिछले पृष्ठ में द्रष्टव्य हैका परिणाम है । परन्तु यह मौन्य भावना रीतिकालीन सौन्दय भावना से प्रभावित न होकर यूरोपीय तथा वगला प्रभावस्वरूप हिन्दी में आई यद्यपि इमम प्राचीन संस्कृत माहिया प्रभाव भी नि म देह है । छायावादी कविया न रीतिकालीन माविता भारिवादिता और कृत्रिमता को अच्छी तरह भाग लिया था इसलिए उन्होंने पविता रेप विमास में नयीन भावों को समाहित करन के लिए प्राचीन र विधि का निराध पल्पनागत रूप वियास से आधार पर लिया | जसाकि हम बता चुके हैं जिनागत प दियास के प्रमुख तीन आधार पर प्रतीक मधा विधा एपर एक से योजना में वस्तु सत्य प्रभावशील पोर मनोरम बनता है। पल्पना ये प्रमुप उपरणाम से यह एक है जसारि माइ० ए० रिचट म २ कहा है कि पलत माया र प्रयोग में भी पल्पना होगाय वरती है। रूपा, उपमा, पगा प्रादि पतवारा निर्माण इसी में पन्तगत पाता है जब मसाधारण प में इनका प्रयोग किया जाता है। और इस प्रसाधारण प्रयोग कारण यह मल- शारमात्र न रहार पति विशेष बन जाता है। मान मन से माय ને मुस्पष्ट १ नामवर छायादार,१०८3 The use of figurative language is frequeatly all that is meant People who naturally em loy, metaphor and imite especlally in it is of an unusual kand are said to have imaradt A Rihards, Principles of literary Criticism page 249 निराला-काव्य पर गला का प्रभाव सज्जा दन के लिए कवि म्पर का प्राश्रय ग्रहण करता है। रूपक पद्धति' भाव बोध का एक अत्यन्त सशक्त रूप है और उसम कल्पना का जो प्रौढ और सयत म्प समाविष्ट है, उसकी उपक्षा करना श्रष्ठ कवि के लिए असम्भव है । यहाँ Fपक स रूपक काव्य (allegory) हमारा प्राय नहा वरन् रूपक (metaphor) अलकार है जो कल्पना के सयोग मे एक पद्धति विशेप बन जाता है । इस पद्धति विशेष को स्पष्ट करत हुए मोहित लाल मजुमदार लिखते हैं कि भाव यदि अशरीरो अर्थात लेखक अन्नर स उत्थापित हुअा हा तर उसे रूप देने के लिए लेखक के मानस भण्डार म प्रचुर इद्रिय सयुक्त स्प-स्मृति के सचित काप का रहना प्राव श्यक है । लेखक उसी म मे लेकर भाव की रूप रचना करता है यहाँ भाषा पात्मा बन जाता है । यत प्रलवार नहीं भाव प्रकाशन का यथाथ उपाय मात्र है। उदाहरणाय- बादल छाये य मेरे अपने सपने पाखो से निकल, मडलाये' मानविक भाव-वेग के विस्तार के द्वारा निराना जी बहि प्रकृति को नवीन रूप में स्पायित एव नव रस म रमायित कर विधाता के प्राचीन सृष्टि-पट पर नवीननर चित्र प्रस्फुटित करने म समय हुए हैं और यह रूपक के द्वारा सभव हो सका है । यद्यपि कल्पनागत म्पक का प्रसार निराला जी म बहुत कम ही प्राप्त हाता है तथापि जो कुछ भी है वह कायस्प वि यास म सफलता के साथ प्रयोग म लाया गया है । यह पक-पद्धति मुख्यतया रवीद्र के प्रभाव स्वरूप उनके काव्य म मयोजित हुई है । मन के किसी भाव काप्रकट करने के लिए प्रकृति की सहायता लना रवीद्र काव्य की एक विशेष प्रक्रिया है । जस रूपक भाव स वियस्त रवीन्द्र की कविता म वर्षा जीवन मत्ता को चिरतन निगूर अतृप्ति का प्रतिफलन करती है और इस प्रकार वर्षा पर रवीद्र पाय का एक रूपक बन जाना है। उदाहरणलया- भर मर झरे जल, विजुलि हाने पवन मानिये यने पागल गाने । प्रामार पराण पुरे कोन खाने व्यथा फुटे, कार क्या भेजे उठे हृदय-कोसे। , मोहित लाल मजुमदार माहित्येर स्टाइल' निराला पणिमा .
निराला ना-पप पर बगनास प्रभाव निराला को कविता में भा मनोरन्यथा वपाई पर दे माध्यम से और भोकावर बन जाती है--- बादल रे, जी तप शिये उपाय साडो तन के, मन के, चरण मिले सम्जन के, “यय प्रायना जम भव है पन्जर पिज्जर करके। प्रब पियाली ही वस्ती है, छाया चाया पर बहती है प्रारणों के धन श्याम गगन से बूदों भी न बरम । पि जाती हैं धषि विजली मे सरसर से दवतो है ही मे, चूदों को धन-धन से उमन मारण न मेरे हरस । रवीद्रनाथ को म' पर ववव पदावती में मिला है जैसेरि सुमारमन कहत है वार-मावलीत वर्षामय विरहिणीर अन्तर दिगन्न मेदुर करिमा दिपाय । पादित मेयाम भार ढावा तमासनीपकुजे रसर उत्सबर | पाडित दादुरादुरी राष्ट्रप डाहुको ।दिरे ग्रहकोणविरहिणीर हृदय प्रविगलित । पनि परिमा पर पारलीत वर्षा मेध चलिष्णु खण्ड रूप पाडिया अपरूप भब परिवा रचना करिया । परन्तु जहाँ वणव-नविना म वर्षा पवन राधाकृष्ण का प्रणय-नीला मा प्रयतम प्रधान परिजश है वहाँ इमरे विपरीत रसीदनाय कामविता म वर्षा जासता या चिरन्तन, निगूठ मतृनिका प्रतिफलन करती है। वोर-वाग्य म वरपर पति तथा वृहत्तर मानव जीवन का कारण पपा है... एमरा दादर दिने सोविये ग्याम बिने काननर पप चिने मन येते घाम । . निराशा माता . मामारमन, माहिर था, तृतीय मा, यि मरपरण निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव विजन यमुना-कूते विकसित नीममूले कादिया परान बुले विरह ययाय । निराला जी म भी यह रूप प्राप्त है- घन पाये घनश्याम न पाये। जल बरसे मांसु दृग छाये । पडे हिंगोले, घडरा प्रामा, बढी पंग, घबराई काया, चले गये गहराई छापा, पायल बजे, होगमुरझाये। मूले छिन, मेरे न क्टे दिन खुले कमल, मैने तोडे तिन, अमलिन मुख की सभी सुहागिन मुख सीधे न समाये। रवीद्र तथा निराला वे काव्य म विश्व प्रकृति का हम इस प्रकार नूतन रूप म देखते हैं । यहा यहि प्रकृति पर मानव प्रकृति की छाया पड रही है । जसे, वदिक-कविता में निसग चित्रो म दवलीला को अभिनय अनुकृति काफी प्रश तक मानवलीला क मनुसरण पर होती रही और इसीलिए ऋग्वर की कविता म वहि प्रकृति के चित्र म मानव प्रकृति की छाया पडती है । और इस छाया का स्पष्ट रूप जसारि सृकुमारसेन कहते हैं रूपक-उत्प्रक्षा के माध्यम स ही प्रनिलित जस अहोरानि का द्वत नृत्य- नाना चमाते यम्या धपूपि । तपोरयद रोचते कृष्णमपन् । श्यावी च यदरुषी च स्वसारी। महद्दवानामसुरविमरम -ऋग्वेद, ३ ५५११ (यमन यादय पृथक सजा स मज्जित होती हैं । एक को सज्जा स दीप्ति तथा दूसरे को मज्जा स कालिमा विच्छरित हाती है । श्याम तथा श्वेत दो वहनें वे हैं । देवगणा की महत् महिमा एक हो है)। हुमा है। निराला गतगुज १०८ ३ धामारमेन बागला माहिरयर का तृतीय सण्ड निराला के कला पक्ष पर बगला का प्रमाव ८६ के कालिदास के काव्य म वहि प्रकृति दवसभा को त्याग कर मनुष्य के पास आ खड़ी हुई है । कालिदास की कल्पना ने मानव प्रकृति के साथ बहि प्रकृति का सादृश्य तथा साम्य प्रगिन कर सहृदय का य रूप धारण किया है । मुकुमारमन कहते हैं कि कालिदाम जीव तथा जड लोला के बीच प्रभेद काफी प्रश तक हटाने में ममध हुए हैं । जम स्वय वर सभा म रघु इन्दुमती का दृष्टि विनिमय- तत सुन दावचनावसाने लज्जा तनुकृत्य नरेद्राया। दृष्टया प्रसादमलया कुमार प्रत्यग्रहीत सवरणस्रव ॥~~ रघु०, ६८० जड प्रकृति को मानव प्रकृति का प देकर मेघदूत काय म वालिदाम प्रापु निक्ता की पोर अग्रसर हो प्राय है- गत्वा चोद्ध दामुखभुजोरछवासित प्रस्य सघे कलासस्प पिदावनितादपणस्पातिथि स्मा । गह गोच्छाय कुमुदविषदखयो वितत्य स्थित रागीभूत प्रतिदिनामिष त्र्यम्बकस्याट्टहास ॥ -~-मेघदूत, पूवमेध, ५८ रवीन्द्र राय म मार यह यहि प्रकृति का मानव प्रकृति पर विस्तरण नूतन रूप धारण करना है कारण रवीद्र कालिदाम को तरह विषय प्रधान (objec tine) पवि न होपर विषयो प्रधान (subjective) कविय भौर इसीलिए अपने भाग का मप्रसारण (Projection) उहाँने रूप के द्वारा बहि प्रकृति मे पिया जम जनाय नटी-मक्त पर सघ्यागगन के मस्तराग का दखकर अनजान ही विरह की प्रभावित स्मृति जग पडतो है-मालूम होता है- पिपुर हय सध्या मुधे यामोमा तोमार सिबुरे। यह व्यक्तिगत भाव विशप मन वा छोडवर निविशप (universal) यन जाने कारण ही इतना प्रपणाय बन मा है। नम्प भाव निरालाजीम भी पाया जाता है- भागना मारित्रकथा, सृतीय राष्ट्र (गिनीय सस्करण)..
६० निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव डूबा रवि अस्ताचल, सध्या के दृग छल छल। सूर्यास्त के द्वारा रखीद्र की तरह निराला जी न भारतीय संस्कृति के विनाश का भी रूपक प्रस्तुत किया है। जमे- रवीद्र- ताम्दीर सूय प्राजि रक्तमघ माझे अस्त गेलो,-हिसार उत्सवे प्राजि बाजे असे प्रले मरणैर उमाद रागिनी भयकरी । और निराला- भारत के नम का प्रमापूप शीतलच्छाय सास्कृतिक सूय प्रस्तमित पाज रे–तमस्तूय दिइ मण्डल,' फिर गभीर यामिनी म भिल्लिरव को रवीद्र ने ध्यानमान विश्व प्रकृति का रूपक देवर प्रस्तुत किया है जो- अधकारेर जयेर मालाय एकटाना सुर-गूथता जा रहा है। निराला ने भी अधकार को ध्यान निमग्न व्यक्ति रूप म प्रक्ट किया है- स्तब्ध अधकार सघन मद गधभार पवन, ध्यानमग्न नश गगन मूदे पल नौलोत्पत।' अथवा है आमा निगा उगलता गगन घन अपकार, खो रहा दिशा का ज्ञान स्तन्ध है पवन वार, अप्रतिहत गरज रहा पोछे मम्बुधि विशाल, भूघर ज्यों ध्यान मग्न, केवल जलती मशाल । इसके अतिरिक्त वमत प्रभान म प्रकृति को उज्ज्वल परिपूर्णता के बीच मचानक दि रोड चौर जाल हैं-बहनो हवा म उह किसी का मामास मिलता है- , निराला गतिश • निराला तुलसीदाम ३ निराला गातिका ४निगराना की गसिपना निरालाला-पम पर बगला का प्रभाव ३१ प्रासा-याप्रोग्रार प्रामास मासे वातासे चचल । कवि निराला का भी यह नान होता है-- ऊपा के अधरों में प्रदरण अधोर भर मुग्धा को चितवन मे अनजान, तरुण प्रदरण यौवन प्रभात विज्ञान, प्रयम सुरमि में भर उमाद-विकास प्रमी प्रमोप्राई थी मरे पास । वातायन में कर कोमल प्रापात स्वप्न-जस्ति जीवन-गोर, उच्छ खलता को गह डोर, खींच रही थी अपनी प्रोर,-~प्रजात ।' इस प्रकार निखिल चराचर व ऊपर मानविक अनुभूति को यह स्थिति मरय हो एक अभूतपूर्व प्रक्रिया है । कही कहीं रवीटनायक पर विराट महिमा म महाका पर कल्पना का छाह प्राग वर जात हैं, जम- कालेर रासाल तुम सप्याय तोमार गिगा बाजे, ग्नि घेनु पिरे प्रासे स्तम्घ तव गोष्ठ गृह माझ, उतष्ठित वेगे। निजन भातरतले मानेयार पालोग्वले विप्न-हिनर सप हाने युगातेर मेघे । मुमारान इस cosmic metaphor 'की प्रास्या दत हैं। इस प्रकार के cosmic metaphor का प्रयाग निराला की कविता मनी प्राप्य है- गत त प्रार्गको सांध्य काल यह माचित-भू.पुटिल भात पाया प्रम्बर पर जलद-जाल ज्यों दुस्तर, प्रपत्रा-- सोई घर गगन का मन, पन, कुण्डली-नगनतीन विन्द जन ।' , निगल परिमन . निराला नुनमा निराश ६० निराला काय पर बगला का प्रभाव डूबा रवि प्रस्ताचल सध्या हग छल छल । मूर्यास्त के द्वारा रवीद्र की तरह निराला जी ने भारतीय मस्कृति के विना का भी रूपक प्रस्तुत किया है। जमे- रवीद्र- शताब्दीर सूप प्राजि रत्तमेघ माझे प्रस्त गेलो,-हिसार उत्सवे प्राजि बाजे प्रस्र प्रये मरणेर उमाद रागिनी भयकरी । और निराला- भारत के नम का प्रमापूय शीतलच्छाय सास्कृतिक सूप प्रस्तमित प्राज रे-तमस्तूप दि मण्डल, फिर गभीर मामिनी म भिल्लिरव का रवीन्द्र ने ध्यानमग्न विश्व प्रकृति का रूपक देकर प्रस्तुत किया है जो- अधकारेर जयेर मालाय एक्टाना सुर-गूथता जा रहा है। निराला ने भी अधिकार को ध्यान निमग्न व्यक्ति रूपक म प्रक्ट किया है- स्तब्धप्रधकार सघन मद गधभार पवन, ध्यान मग्न नश गगन, मूदे पल नीलोत्पल।' अथवा है प्रमा निशा उगलता गगन घन मधफार, खो रहा दिशा का ज्ञान स्तब्ध है पवन वार, प्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुषि विशाल, भूधर ज्यों ध्यान मग्न, केवल जलती मशाल । इसके अतिरिक्त वगात प्रभान म प्रकृति को उज्ज्वल परिपुणता के बीच अचानक कवि रवीद्र चौंक जान हैं-बहती हवा म उहे किसी का आभास मिलता है- , निराला गातिका • निराला तुनमीतान ३ निराला गानिका ४ निराला राम की गतिपूजा निरालाक कला पक्ष पर बगलामा प्रभाव - प्रासा पाप्रोग्रार प्रामास मामे वातासे चचल । कवि निराला का भी यह नात होता है- ऊपा के अधरों मे प्रहरण अपार मर मुग्धा को चितवन मे मनजान, तरुण प्ररण यौवन प्रभात विज्ञान, प्रथम सुरमि मे भर उमाद-विकास अभी अभी पाई थी मरे पास । वातायन मेकर कोमत प्रापात स्वप्न-जरित जीवन शोर, उच्छ खलता को गह डोर, खींच रही यो अपनी मोर,-प्रजात। इस प्रकार निखिल चराचर पे झार मानविक अनुभूति को यह स्पिति कई एक अभूतपूर्व प्रक्रिया है । कही कहीं रवीनाथ के पर विरार मति महापक कल्पना को छोड आग बन जात है, जम- कालेर राखात तुम सध्याय तोमारा दार, दिन घेनु पिरे प्रासे स्तम्घ तव गोप-गृह मान, उत्तष्ठित वेगे। निजन प्रातरतले प्रालेवार पालोज्वले विष्युत-बहिनर सप हाने युगानेर में। मुरुमारगन || cosmic metaphor Antr: cosmic metaphor का प्रयाग निराला का. गतगत प्रनों की साध्य रन यह भाचिन-5 दुरिम:- छाया प्रम्बर पर पर- प्रपवा- सोई पर मान कार - कुण्डली-नगर • निराला तुन • निरागा ६२ निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव प्रतीक कल्पनागत रूप वियाम का दूसरा सूत्र प्रतीक है । प्रतीक के सम्ब ध म क्मिी मालाचक का मत है कि प्रतीकात्मा का य म रूपक जस विस्तार की पावश्यक्ता नहीं है । मूक्ष्मता और यजक्ता 'प्रतीक र विशिष्ट गुण हैं । प्रणय की उत्कटता दिखान के लिए दीप पतग जसे प्रतीक प्रादिम काल से चल पात है। नये-नये प्रतीनो को खोज और पुराने प्रतीका का नय सदभ म उपयोग कविता की भाव-यक्ष सम्ब धी वृद्धि के लिए अनिवाय है । नामवरसिंह प्रतीक को रूप प्रयवा फाम स अलग मानत हैं । उनका कहना है कि प्रग्रेजी म जिसे पाम कहते हैं उनका सटीक अथ सगति है अर्थात फाम वह है जिसम भाव के साथ स्प की पूण सगति हो।' यह कथन प्रसिद्ध पालोचक ए० सी० बाडल का है। व कहते हैं कि विषय भौर रूप म काई भेद नहा है । यह एक प्रकार की ऐसी अभेदमयो स्थिति है जस रक्त तथा जीवन की । और यह अभेदमय स्थिति ही कविता है, पौर कला भी है ।' नामवरसिंह इसके उपरात कहते हैं कि भाव और रूप की पूण सगति के बाद कभी-कभी काय को रूप विधि एव और काय करती है । अपनी साथक्ता प्रमाणित कर चुकने + बाद जव स्प अपवा फाम' किसी पतिरिक्त भाव की व्यजना करता है तब वह 'प्रतीक हो जाता है । झझा जब अपनी ध्वनि से आधी पानी दाना को पूण बोध करा रती है ता उसके रूप को साथकता पूरी हो जाती है। किन्तु इमम मागे बटकर जब वह किसी हृदय की व्यथा और क्षाभ की मार सकेत करती है तो अपनी सायकता क मतिरिक्त काय करती है।' नामवरसिंह का प्रतीक क सम्बध म यह मत स्वतोव्याघात (self contradiction) से युक्त है क्योंकि प्रतीर रूप वियाम की एक प्रक्रिया है और रूप वास्तव म भाव का वियास है और इस प्रकार भाव और रूप की सगति न भीतर ही प्रतीक को स्थान मिलना चाहिए उसस अलग नहीं । श्रीमान केदारनाथसिंह मा भी यही मत है- १ नामवरमिह छायावाट, १०८७ It is a unity in which you can no more separate a substance and a form than you can separate living blood and the life in the blood Add this identity of content and form you will say is no accident it is of the esscoce of poetry in so far as it is poetry and of all art in so far as it is art Oxford lectures on poetry Page 15 ३ नामवरसिंह छायावाट पृ० निराला के क्ला-पक्ष पर बगता का प्रभाव मान्य का कलात्मक प (फ्राम) न नावल बिम्ब म हाता है, न प्रतीक म न उत्प्रेक्षा में और न श मगीत अथवा छन्द के प्रवाह में । वह इन सबकी 'एशान्विनि' या मुमघटन' म हाता है। यह 'सुमघटन नहीं बाहर से नहीं माता । यह स्वय वस्तु का गुग्ण है कल्पना इसी सुमघटन' को साज करती है। इस प्रार कल्पनागत पविन्याम प्रतीक आदि 'मुमघटन प्रर्यात 'सगति' क लिए पाय भरली है । भगति म ही उसरा अन्त है । प्रतीक की परिभाषा दते हुए रेदारनाथमिह लिखत हैं कि मनुष्य के भावलौर म बहन-मो ऐसी बातें हाती हैं जिहें हम मामाय व्यवहार की मापा अथवा स्यूताश्रयी विम्या के माध्यम स नहीं व्यक्त कर सकत । ऐसे मूत्रम तथा पदस्पष्ट मावा क लिए मनुप्य प्रतीकों की सृष्टि करता है । मानव-सम्यता र विरासम प्रतीकाका उतना ही योग है जितना हमार जीवन के विकास म मूय तथा जन वा।' उनरा और कना है कि साहित्य और कला म प्रयुन हान वाल प्रतीरावा क्षेत्र बहुत व्यापर है । मय क्षेत्राम बौद्धिक प्रतीका का प्राधाय हाता है, काव्य म सवदनात्मक प्रयवा भावात्मक प्रतीर हो ग्राह्य होत हैं। कारए यर है कि वहाँ प्रतीको का निमाए सचयन और मयाजन कल्पना व द्वारा होता है। इस काय म कल्पना का विशाल सास्कृ निर उपाधया और चिराचरित भावना-पदतिया से सहायता मिलती है। केवल यही नही कल्पना के माध्यम स कभी-कभी नूतन प्रतीका को पालना भी हाती है और माधुनिक पाय म नय प्रतीरों की महत्ता ही सबस पधिर है। छायावादी पवियों को प्रताव पोजना माधारणतया नवीनता को लिए हए है।मेदारनाथसिंह का कहना है कि रवीद्रनाथ ठाकुर की कवितापों के द्वारा पहल-पहा नवीन प्रतीसराको मयगत मभावनामों की मार लागों का ध्यान गया। ग्लिीनी पायावादी कविता पर भी इसका प्रभाव पडा।' जमावि हम बता भुके हैं कि प्रतार गणक्ति का मूल उत्म है परन्तु व्यवहार करने स प्रतीक का रंग पीपापड जाता है विशेप वान माधारण उत्ति में परिणत हो जाती है । तब प्रयाजन होता है नूतन प्रतानों का भषया पुरान प्रतीकामा नवरुपायन । रवीन्द्र न यह पाय गरमा र माप किया पातु कुछ मालाचार मनानुसार इन नय प्रतीरासा प्रयाग रवी- न पास र विम्बवादी सारतिर स्तूल (Imagust school of symbolic poetry) के प्रभाव स्वम्ए अपनाया है । यह मिशात १ बगरनार्थमा कल्पना मार दायर १०%E २ कम्पना और छायावा,१०१६ ३ पदारनामह कन्पना और दादा, पृ०१०३ निराला काव्य पर बगला का प्रभाव भ्रमात्मक है । कारण फाम साकतिक कविगण न विशेप अथ यजना के लिए नूतन शता की सृष्टि की है । इस प्रकार के सदो को पारिमापिक या साकेतिक कहा जाता है। व्यापक रूप स उस प्रकार के शग का व्यवहार का य म नहा किया जा सकता । भाषा और साहित्य के अतीत इतिहास को मान लेना ही पडता है और रवीद्र ने उसको मानकर अपनी स्वकीयता का परिचय दिया है । साधा रग अत्यन्त परिचित प्रतीको का अपने विचारा के प्रसग म यवहार कर रवीन्द्र ने अपनी मौलिकता प्रदर्शित की है और जहां तक उनके माध्यात्मिक रहस्यवादी प्रतीकामा प्रश्न है वहाँ भी व उपनिषद के अद्वत सिद्धान्त स प्रभावित है न कि मास के प्रतीकवादी पाल भलरी प्रादि की तरह ईसाई सत-कविया के द्वारा । इसका स्पष्ट समझने के लिए प्राधुनिक का य के नवीन प्रनीको क समारम्भ पर विचार कर लेना होगा। ऊनविंश शताब्दी में जडवादी वस्तुविनान के प्रभाव से मास के साहित्य म मनचले वस्तुवाद की उद्भावना हुई थी । परतु धीरे धीरे जोला, फ्लवयर की पह कामना पक्लि वस्तुवादा दृष्टिभगी की प्रचडता शिथिल हाने लगी एव इसकी स्वाभाविक प्रक्रियास्वरूप एक विरोधी नवीन पादश क्रमश साहित्य म पनपने लगा। लखका न समझा पाठक ने भी अनुभव किया कि इस वस्तुपुजवे अतराल मजो अमूत मध्यात्मजगत विराजमान है उमी का जानना हागा और जतलाना होगा । तभी स प्रतीकात्मक काय(सिम्बोलिक पायटी)का सूत्रपात हुप्रा । इन्द्रिय सुरा के माध्यम म प्रतीन्द्रिय सुधा का सधान प्रारम्भ हुमा । यह अन्तर की मुक्ति है प्रात्मा की मुक्ति है परमात्मा की मुक्ति है । साइमन ने अपनी पुस्तक म भी यही बात कही है। इसका स्पष्ट करने के लिए यह कहा जा सकता है कि मानव मपूण है उसकी भाषा भी प्रपूरा है इसीलिए उस भाषा ६ द्वारा काई पूणभाव या भादा प्रका गित करना सम्भव नती है । परतु उस पूणता का माभास प्रतीक में प्राप्त हो जाता है । नारी सौदय को समझाने के लिए यति एवं गुलाब के फून का उदा हरण दिया जाय ता नारी सौ दय कापूण भादा प्रतिभासित हा उठता है । इएदस ने यही बात कही है। मानव जिस प्रकार अपूण है मानव प्रम भी उसी तरह अपूण है किंतु जब वह अपना प्रम भगवान् के चरए। पर अपित करता है तब उमका पूणता का मास्वाद प्राप्त हाता है, उसरा प्रम परिपूण तथा सापक बनता है । मानव तथा भगवान् का यह प्रम सम्बध पाल भलरी तथा रवीद्रनाथन + It is all an attempt to spiritualise literature to cv ade the old bondage of thetoric the old bondage or exteriority 3 Symbols are the only thogs (res enough from ait bonds to speak ol perfectioa निरालाक्तापक्ष पर बगला का प्रभाव स्थापित किया है। परन्तु रवीद उपनिपद के प्रदत सिदात मप्रभावित ५ तथा पॉन भरी ईसाई सतकवियों से प्रभावित हार बियाण्ड को खोज म लगे थे। दोना का विषय है परन्तु प्रभाव सम्पूरण अलग। रवीदनाप की रचना में भारतीय अध्यात्म भावना तया माहित्य-साधना का समश्य प्राप्त हाता है । सुकुमारसन रह हैं वि मनन म त्या प्रशान म पर म्परागत चली आती हुई भारतीय साहित्य मजा बुध मौलिक विगिप्टना ह वही रवीद्र रचना म अवश्य ही प्रतलान है एव किमी क्सिी भाव म व्यजित है। भारतीय साहित्य-साधना पहले सही अध्यारम नावनामय र इमो लिए अधिक प्रतीकाधित है । तपा इमो बारम्प रवी वाणी शिल्प म प्रतार का व्यवहार अनपक्षित नहीं है। सुकुमारमन रवीद्र-काव्य की इस अन्यात्म भावना का स्पष्ट ररत हुए रहत हैं रि अस्ति-नास्ति व गनि स्थिति में पलम म महाकात की निमेष-गणना चल रही है। रचीद्रनाथ का पवि-कल्पना तपा अध्यारम भावना भी नाचित है यद्यपि वह दानव नाम्नि वजिन है उससा कहा जा सकता है मुर्वास्तिवादी । ए और जीरन दवना अभिमार लिए वढा चला माया है और दूसरी पार भलयामी स्वयवर १ लिए बनी चला पा रही है । कवि हृदय रइम द्विपाभिन सत्व (Ego and super ego) को सहयामिता में ही जीवन पूर्णता की मार अग्रसर होता है । यही रवीद रचना मानवाद है। और यह ढतवार गभीरतर मदतानुभूति र उपर प्रतिष्ठित है। रवोद्रनाय कायम प्रतीसानी सयाजना इम भार न ममपणन लिए मयोजित हुई है जा रामा यत तीन प्रकार है परिचित वस्तु तथा भाव घटित प्रताः । २ पुरान कहानी कालिदास व काव्य तया वणव-मावता स गृहात पर- म्परागत प्रतीक्षा ३माध्यास्मिर प्रतीर । रवीरनाय न इन प्रवास द्वारा निरारा बहन हा प्रभावित हुए हैं और मुसळया रो माध्यारिमा का द्वारा सारि निराला रा विचारा रवोद्र मसारम विधारा स बत ही प्रभावित है । इमरा विवचन हम रवीद्र प्रतीसरे वगन द्वारा रंग। जमादि हम बता गुर है कि रवीद्रन नय प्रतापरावष्टि प्रपना मत. १ मामा मामात्र स्था, म यस नग्न करपा पर ३७० निराला काव्य पर बंगला का प्रमाव भावना को प्रकट करने के लिए की है परतु यह काय उहोन पूर्व परिचित वस्तुमा म नवीन प्रथ भर कर दिया है । निराला ने भी व्यजनागर्भी प्रतीको का प्रयाग रहस्यात्मक सत्ता का प्राणवान बनाने के लिए किया है । नामवरसिंह यही बात कहते हैं-छायावादी कवियो ने कभी भी व्यजनागर्भी प्रतीको का प्रयोग क्यिा । एसा प्राय वहाँ हुआ है जहा किसी रहस्यात्मक सत्ता की ओर सकेत है । परन्तु रवीद्र के प्रतीक जहा अद्वत विचार पक्ष की दूत भावना को प्रकट करने के लिए मुख्यतया सयोजित हुए हैं और इसी कारण दो प्रतीका का इक्ट्ठा सचपन सुकुमारसेन शदो म गतिस्थिति की तरह द्वत रूप मे रवीद्र काव्य म पाया जाता है वसो कोई स्थिति गीलता निराला काय म नहीं है। कारण निराला का दाशनिक विचार रवीद्र की तरह एको मुखी नहीं है इसलिए निराला के प्रतीक सामान्यत द्वत भावना के प्रतीक नही हो पाये हैं यद्यपि मोटे रूप म वे मदत की व्याख्या करत हैं। रवीद्र ने जहा-कहा से भी दाशनिक विचारा का चयन किया है वह उनक मूलभूत प्रदत विचार को प्रतिष्ठित करन के लिए हा है न कि विभिन्न दाशनिक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए। इसीलिए उन सभी प्रतीक एक ही द्व त भावना का प्रकाशमय करते है जाकि भद्र ता नुभूति की भूमिका पर मधिष्ठिन हैं। सुकुमारमन ने इसकी एक सूची तयार को है जहाँ द्वत रूप म दो प्रताका का प्रस्तुत किया गया है। पथ स्रोत, पथ घर पयारथ, हाट वाट प्रागुन प्रदीप पति वीणा धूला घास प्रादि । इन युग्म प्रतीकों के द्वारा रवीद्रन अद्वत की ही प्रतिष्ठा की है। निराला के प्रतीक इस प्रकार एक निश्चित रूप रेसा में प्रतगत नहीं समा सकते हैं यद्यपि प्रथ की दृष्टि से रवीद्र के व्यजनागर्भी प्रतीका का अय हो इहान ग्रहण किया है जा प्रदतधर्मों है । यह सभी रहस्यात्मक प्रतीक है अतगत हैं । रवीद्र के परिचित वस्तु तया भाव घटित प्रतीक द्वारा प्रभावित निराला के प्रतीक- ५५-रवीद्र के लिए पय सामा यत तीन अथ हैं- (4) पप "यक्ति के जगम जीवन पा प्रतीक है- यत प्रागा पथेर मागा पये जेतेइ भालवासा, पथे चलार नित्य रस दिने दिने जीवन उठे माति । १ नामवरमिद मायावार पए ६६ निराला के क्ला-पक्ष पर गला का प्रभाव ६७ निराला न भी पथ प्रतीक का यही अथ ग्रहण किया है-- नयन ज्योति मे ज्ञान प्रकम्पित चली जा रही नत मुख, विकसित, जीवन के पथ पर अविचल चित, छवि अपार सुदर। यथवा पय पर मेरा जीवन भर दो। (ख) यहाँ रवीन्द्र के लिए पथ प्रयास पा प्रतीक है घरेइ तोमार पाना गोना पये कि पार तोमाय जिन निराला ने इसे भी ग्रहण क्यिा है- कब से मैं पय देख रही, प्रिय, उर न तुम्हारे देख रही, प्रिय ।' (ग) पथ प्रतीक का तीमरा अथ रवीद के लिए कवि-सत्व की सचेप्ट जीवन लीला है पये चले येते येते कोथा कोन्याने, तोमार परस प्रासे कखन जाने। निराला ने भी पथ मे द्वारापदि का जीवन-लीला का प्रकट किया है- मैं वठा या पथ पर, तुम माये घढ़ रय पर। हंसे किरण फूट पड़ी टूटी जुट गई बडी मूल गये पहर पी माई रति रप पर ।' रवीर लिए रप जीवन-देवता का पाविर्भाव है। परम भानन्द मा मनुभव है निराला गानिका - निराला भपरा राना गातिका ४ निराना भगिमा निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव तोमार कि रथ पौछवे ना मोर दुयारे । निराला के उपयुक्त पथ प्रतीक कविता के चरणा म रथ का यही प्रतीकात्मक अथ ग्रहण किया गया है यद्यपि निराला के लिए रथ और भी प्रतीकात्मक अय है जस- जीवन के रथ पर चढकर सदा मत्यु पय पर बढकर । मथवा- नव वाया का माया रथ। रोका लख सु दर कानन । चरण-चिह्न रवीद्र के लिए चरण चिह्न का प्रतीक, मुकुमारमन के अनुसार जीवन देवता का गोपन आविर्भाव है। हृदये मोर कखन जानि पडल पायेर चिह्नखानि । निराला का प्रतीक भी इसी भाव का द्यातक है- प्रथम पलक खुलते ही देखा चरण चिह्न, नूतन पथ रेखा।' घाट तथा बाट घाट, सुकुमारसन के अनुसार रवीद्र क लिए ससार की अभिनता का प्रतीर है तथा बाट ससार की क्भधारा है मामारे ये नामते हबे घाटे घाटे। एव-- तोरा कोन रूपेर हाटे चलेछिस भवेर बाटे। निराला न भी विल्कुल -सी अय को प्रकट करने के लिए इन दाना प्रतीका मा वणन किया है। एके नहीं धनि धरण घाट पर, देखा मैंने मरण बाट पर, टूट गये सब माट ठाट, घर, छूट गया परिवार , निराला गोतिका ३ वही
निराला कालपप पर बगला का प्रभाव
द्वार
सुदुपारमन व प्रतुमार रवीन्द्र क लिए द्वार के दो प्रतीकात्मक प्रय है।
(क) रुक्ष द्वार जा अनानजनित वाघा तथा मूढना प्रकाशित करता है
ये राने मोर दुयारगुलि मांगलो झडे
निराला ने भी 'रुद्ध द्वार स यही अथ ग्रहण किया
रख द्वार पर रवखे थे मने कितने ही बार
अपने ये उपहार कृपा के लिए तुम्हारी अनुपम ।
वह खुला न द्वार, दिवस चौता,
हो गई निरय सरल गोता
में सोया पथ पर सिनमना
मुद गई दृष्टि ज्योति कारा।
(4) उमुरु द्वार प्रस्नुनि तथा स्वागत का द्यातक है
तोमार निरय पोरबे ना मोर दुपारे
निराला न भी यही पथ ग्रहण किया है
प्रात तय द्वार पर,
प्राया, जननि, नाघपय पार कर।'
बसत
गुदुमारमन र अनुमार रवीद्र के लिए वसन्त के भी प्रतीकात्मक अप
दो हैं।
(क) मामाय रूप स वमा ऋतु
फागुन ये वान रहे माटिर पापारे।
निरारा लिए भी 'वमन्न' वा एक भय सामाय वमन्त ऋतु है
सति वसत पाया।
मराहप वन मन,
नवोत्तप पाया।
(स) रवीद्र पपिए वसनरामरामप है-ववि मत्व कायौवन स्मृति
निराला परिमण
निराला गनिश
३ निराना का
१०० निराला काव्य पर बगला का प्रमाव प्रामार हेयाय फागुन वृथाय बारे बारे डाके ये ताय । निराला के लिए भी 'वस त यौवन का प्रतीक है अभी न होगा मेरा मत। प्रमो प्रमी हो तोप्राया है मेरे बन मे मृदुल वसत- अमीन होगा मेरा प्रत। बासुरी और वोरणा सुकुमारसन कहते हैं कि रवीद्र के लिए 'सिम्बल की दृष्टि स बांसुरी दो अथ हैं- (क) ससार म व्यस्त जावन दवता की पुकार प्रामार ए तार बाधा काछेर सुरे, ऐ बांशि य बाजे दूरे। निराला क वासुरी प्रतीक का एक प्रथ यह भी है हृदय मे फौन जो छेडता बांसुरी?" (ख) जीवन को दुख वदना के मध्य स उत्पन्न प्रकारण हप के अनुभव पा प्रतीक पराणे बाजे बाशि नयने बहे धारा। और निराला म भी मासुरी जो बजी लाज मुल को तजी। पमुना पुलिन प्रजन, प्राजे नयन, सजन तन, यसे फूल जन मन देखकर लजी।' वीणा रवीद्र क लिए जीवन और भुवन को मानद-त मयता है तोमार वीणा प्रामार मनोमा सनो शुनि क्खनो भुलि क्खनो शुनि ना , निराला परमल २ मुमारमेन बागना माइत्येर क्या, तृनीय खएर द्वितीय मरकरण, पृ. ३७८ निरारा गातिका निराला भाराधना 3 निराला के कला पक्ष पर बगता का प्रभाव निराला के लिए भी वीणा की भकार प्रानन्ददायक है नाय, तुमने गहा हाय वोरणा बजी विश्व यह खो गया साथ द्विविधा लजी।' मुकुमारमन के अनुसार वणु तया वीग्गा रवीद्र-वागी का सबसे बडा मिम्बल है । वेणु के लिए व वणव-पदावली के ऋणी हैं परन्तु वीणा का रूपक रवोद का अपना है। निराला इन दोनो प्रतीकों के लिए रवीन्द्र के ऋणी हैं यद्यपि वीणा व स्थान पर उहाने मोबभी मिनार' का प्रयाग कर अपनी स्वकीयता का परिचय दिया है फिर सवार सितार लो। बांधकर फिर वाट अपने श्रक पर झकार दो। यह्नि तथा दोप सुकुमारमेन रहते हैं कि रवीन्द्र लिए वह्नि दुःखदहन का भस्म निर्वाण पर्यात पग्नि-परीमा है ज्यसते हे तोर मागुन टारे, भय रितु नारिस तारे पाइ हपे रो निमवे पखन ज्वलवे ना पार कभु तये । निराला न भी दहि' का नही-वही इम प्रती प्रय म ग्रहण किया है मुझे स्नेह क्या मिल सकेगा ? स्तम्प, दग्प मेरे ममा तर बया पाकर खिल न सकेगा।' प्रदीप रवीधर लिए शोर दहन वा मगल पानोर है। पामार सक्स दुखेर प्रदीप ज्वेले दिवस गेले करब निवेदन । निराला लिए भी दीप इसा भाव पा प्रतीक है जीवन प्रदोप घेतन तुमसे हमा हमारा ध्योतिषश उजासा ज्योतिष्य स उतारा। निराला देना . निराना मारा राना निराला काय पर बगला का प्रभाव तरी रवीद्र के लिए जीवन देवता के पास पहुँचन का वाहन है- एबार भासिये दिते हो नामार एइ तरी। तीरे बसे याय ये बेला मरि गो मरि ।। निराला के लिए भी नौका जगत के पार पहुंचन का प्रतीक है जीवन की तरी खोल दे रे जग को उत्ताल तरों पर। प्याला सुकुमारसन कहत हैं कि रवीद्र के अनुसार प्याला जीवन में द ख सुस की मनोरणता तथा सक्षिप्तता को यजित करता है मिलनेर पात्रटि पूण ये विच्छेद वेदनाय । परतु इस प्रथ म निराला के प्याला प्रतीय का यवहार नही हपा है । सुकुमारसन के अनुमार रवीन्द्र ने प्याला का एक और प्रतीक गभित अथ लिया है जिमय अनुसार प्याला जम मृत्यु यवच्छिन्न मत्य जीवन का प्रतीक है प्रामार पात्रखाना याय यदि याक भेंगे चुरे। निराला ने क्वल इस अथ म 'प्याला यो ग्रहण किया है मृत्यु निर्माण प्राण-नसर कौन देता प्याला मर भर?' अथवा-- आज प्याले गरल के धन, कह रही हो हंस-पियो, प्रिय पियो प्रिय निरुपाय। मुक्ति हूँ मैं, मृत्यु मे माई हुई, न डरो।' राखी रवीन्द्र तथा निराला दाना के अनुमार रायी जीवन के सम्पूण पान की माता की प्रतीक है। रवीद्र-तोमार हातर राखीपानि यांघो प्रामार दखिन-हाते । १ निराला गीनिका २ निराना अनामिका ३ निराला बहा निराला के कला-पक्ष पर बगला का प्रभाव - निराला-उडी, तमिस्त्रा की रक्षा को राखी जोबाधी। शेफालिका निराला काव्य म रामरतन भटनागर के अनुसार शेपालिका या शेफाली प्रात्मा की प्रतीक है। प्रात्मा के परमात्म विलास का पविन इम सुन्दर रूपक द्वारा स्पष्ट किया है। रवीन्द्र न भी पाला का प्रयोग काव्य म किया है परन्तु उनके लिए फाली जस मभी फूल, सफलता के प्रतीक हैं ताराय ताराप र तारि वारणी कुसुम फुटिवे प्राण। निराला के लिए भी फूल सफलता का प्रतीक है और इसीलिए उसका कुम्हताना उनका प्रभीप्ट नही है मेरा फल न पुम्हला पाये, जल उलीच पर, मूल सींच कर लोटे तुम तरु-तर के सोय। परम्परागत प्रतीक रवीद्र को प्रणव पावली से गृहीत प्रतीको का निराला पर प्रभाव सुकुमारमन पहल हैं दिवोद्र रचना म-विशेषकर गान म-मन्तर्भावित प्रतीका म विगिष्टतम है कविसत्व की नायिका-वल्पना । यह वल्पना प्रधानत वपरगद कविता की राधा वे आधार पर निर्मित है और इमम कालिदास का प्रभाव भी पापा जारा है । पदावली की रापा और मेघदूत की यणकान्ता (एक या) समा गई हैं कवि चित्त की विरह भावना म । ढन्न पर रवीन्द्र म राधा भाव ये सय रमो का इगित मिल जायगा ।' निराला भी रवीद्र की तरह इन वप्रणव पविया की प्रमभक्ति से प्रभावित हुए पे परन्तु रवीद्र की तरह इनकी भी यह विशेषता रही जमे वि रामरतन भटनागर कहत हैं शिव भक्ति-काय ग इतर नये ही रूपका का प्रयाग निराला ने किया है । राधा कृपा मोर गोपिया के पर दतन प्रचलित हा गय थे, मोर दागनिर्यो न उमरी इतनी व्याख्याएँ कर दी थी जनता म रम्प-दान का बडो मरता मे समझ तो पी।' १ रान मदागर ददि निराला एक यययन, 8 . निराना भारारना ३ मुरसारमेन पागला सदिस्यर कथा, नृतोय पण यि समर . 20 ४ रामरतन भटनागर कवि निराला एक प्रयत्न, पृ ...
निराला काव्य पर बगला का प्रभाव सुकुमारसन के अनुसार रवीन्द्र को कविता म नवीन प्रतीका की सहायता स मानिनी के प्रति सखि की उक्ति ही प्रकाशित होती है बाजबे बागि दूरेर हामोयाय, चोखेर जले शूय चानोयार काटवे प्रहर- बाजबे युके विदाय पथेर चरण फला दिनयामिनी, हे गरबिनी॥ निराला म वगव कवियो की यह रोमाण्टिक भावना रामानी प्रताको के माध्यम से प्रतिफलित होती है । अब नहीं पातो पुलिन पर प्रियतमा, श्याम तृण पर बठने को, निरुपमा बह रही है हृदय पर केवल प्रमा, क्षणिक मिलन के उपरान्त वेदना को याकुलता रवीद्रम प्रामार काजेर माझे माझे कानाहासिर दोला तुमि यामते दिले ना ये। मामाय परदा करे प्राण सुधाय मरे तुमि याप्रो ये सरे बुझि प्रामार ध्ययार प्राडालेते दाडिये या प्रोगो दुख जागानिया निराला में भी यह वष्णव भावना प्राप्त हाती है तुम छोड गये द्वार तब से यह सूना ससार। मुकुमारसेन कहते हैं कि विरह के उपरान्त मिलन है । रवीद्र कविसल पी स्वपवर-वल्पना वणव पदावली की सक्तकुज म राधा अभिसार में साथ तथा रघुवा को राज-सभा को इदुमती स्वयवर २ माथ सम्मिलित हो गई है। इसको हम स्वयवराभिसार वह सात । रवीदनाय के वाग्य म भिसार मिलना प्रतीक है-जीवन-देवता रविसत्व के साथ सम्मिलित होता है। अभिसार प्रतीर का प्रयोग निरासा में सामा यत नहीं मिलता है (क्वल अनामिका की 'क्षमा प्रापना कविता म मिलता है और वह भी रवीद्र र भावा से मनुप्ररित होते हुए क्षण मिलन के उपरात वना का प्रतीक स्वरूप है- 'यौवन-यन-अभिसार १ निराला गोनिका निराला लापक्ष पर बगला का प्रमाव १०५ निगा का यह पसा प्रवसान !") यद्यपि निराला ने एक स्थान पर इसका स्पष्ट उल्लस किया है-'तुम्हारी मुधि की प्रतिम सांस लार लज्जा को पर्दा-फाड, मलने चली प्रीति अभिसार चपल छिपती पलका की प्राइ है। यह रवीद्र के "प्राजि भडेर राते-तोमार अभिसार' के अनुरूप हैं । परन्तु अभिसार के फ्ल स्वरूप मिलन का समारोह रवीद्र की तरह नहीं होते हुए भी निराला रवीद्र व भावो के उच्छवाम का प्रक्ट कर देता है । जम रवीन्द्र तोमाय मामाय मिलन हवे प्रालीय प्राकार भरा, तोमाय प्रामाय मिलन हवे भले फुल्ल श्यामल घरा। तथा निराला उठी है तरण बहा जीवन निस्सग चला तुमसे मिलन को खिलने को फिर भर भर । प्रथधा- यमुरी जो बजी साज कुल की तजी। यमुना पुलिन प्रजन सन, बसे फूल, जन मन देखकर सजी। रवीद्र के पुराण कहानी प्राथित परम्परावादी प्रतीक से प्रभावित निराला के प्रतीक पुराण कहानी माथित परम्परागत प्रतीव 'मिथ' ये मतगत पाते हैं। यहाँ 'मिथ' सम्बध म विवेचन पर लना उचित होगा कारण निराला न गिव ह तथा दव प्रमुर जम मिय का प्रयोग प्रतीकारमय प म दिया है जो रवी तथा बगाती क्ति पूजा का प्रभाव है। मिय , मिप पौराणिक इल्पना-व्यापार का कहते हैं । पदारलायमिह मामला है frजा पाम पला अपन मौस्यमूला प्रपागा रे द्वारा परनी है यही काम १ निरामा मलमा २ निराला मरापना १०२ निराला काव्य पर बगला का प्रमाव 'मिथ भी विधिया और सम्बारा द्वारा करता था । इस पगार मिथ भी काय म कल्पनागत स्प वियाम का काम करता है । यहा मिय पर शास्त्रीय पालो चना अपक्षित नहीं है । क्वन इतना ही कहना है कि अाधुनिर माहित्य म मिथ' का प्रयाग तान स्पा म पाया जाता है- (क) उपमा रूपक, प्रतीक अयवा निम्ब के रूप म (ख) प्रवर का य नाटको एव उप यासो के क्याना के रूप म (ग) कुछ अत्याधुनिक प्रध विश्वासपरक धारणामो के रूप म जिह सुविधा के लिय आधुनिक मिय कह सकते हैं। रवीद्र ने प्रब व काय तथा नाटकोक क्थानक व रूप म एव प्रतीक केम्प म मिथ का प्रयाग कल्पनागत रूप वि यास के लिए किया है । रवीद्र के पुराग कहानी माथित प्रतीक शिव रुद्र का प्रयोग निराला न भी किया है । रवीन्द्र के लिा सुकुमाग्मन कहत -शिव सुदर रूप प्रतीक है। निराला के लिए भी शिव सुदरता का प्रतीक है जो रूपी डान का हरा भरा कर दता है मधु प्रत में रत वधू मधुर फ्ल देगी जगको स्वाद तोष दल गरलामृत शिव प्रासुतोष रल विश्व सकल नेगी, वसन वासती लेगी। मुकुमारमन के अनुसार स्ट रवीन्द्र के लिए ताण्डव उमत्तता का प्रतीक है तो गपन क्रोध दाह से अ याय पाप को ध्वस कर भुवन को माजित करता है तथा जीवन की भी माजना करता है । निराला का रुद्र प्रतीक भी इमी भाव या मप्रपा करता है नाचो हे रुद्रताल, प्रांचो जग ऋजु प्रराल झरे जीव जीण-गोरा उद्भव हो नव प्रकोण करने का पुन तोग हों गहरे अतराल ।' -- कटारनामह कल्पना श्रार दायात्रा • निराला गातिका ३ निराला माराधना निराला क्सा पथ पर बगलामात्र १०७ रवीन्द्र का दूसरा पौराणिक प्रतषि उदशी का भाव निराला म नहीं मिलता है यद्यपि बनरेला म उमा विचित सदेत मिल जाता है जो अनल की मुरभिवास सिर पर लरर उठती है मन्ना पर लेकर उठी प्रतल को प्रतुल सास, ज्यो मिद्धि परम, भेदार मजीवन * दुस्तर बोग, सुषम आई ऊपर, जसे पारपर क्षीर सागर प्रासरा सुघर । जही तर रवीय पौराणिक वल्पनागत स्थान का सम्बध है वहाँ निराला रवी से अधिक प्रभावित नहीं हुए हैं । निराला की 'राम को शक्तिपूजा' मजा प्रचलित 'मिय' का प्राधार है वह रवीद्र का प्रभाव नहीं है वरन वगाल को पनि पूजा मप्रताप' का प्रभाव है और इस प्रतिरिम विकानद का प्रभाव भी है । बारनायसिंह कहते हैं शि निराला न स 'मिष' को प्रतीकात्मर रूप देवर मानव जीवन म जाएत रहने वार सत और अमत न्वी और प्रामुगे त्तिपो 'पराजप समर पाबा भन्ध चित्र गीचा है । बीच म राम, ত্ব সী গায় পা ম শ গরিণ ৰা মা হব ? বাবা কলা ফা उत्कृष्ट प्रमाण है।' रवीद्र के प्राध्यात्मिक प्रतीको द्वारा अनुप्रेरित निराला के प्रतीक माध्यारिमन प्रा 'मामि-मुभि मा' मुभारमन में अनुमार रवाद र तिए कमा मत मी मा कविरात्व, जीवन देवता तथा विश्वभुवन का प्रतीक है। "मामि-तुमि" अन्तर्यामी जीवन-रेवता का नाम है जा प्रदान का ही दृषि तुमि पन प्रोइ पराग उदार धामि ऐन भोई सीम पापर, माल परेथे माझयाने तार কানাঘুমি। एस्प्रेियरमामारे मिगेधे १ निराला भाग रामरत्न गटनर २३ निराला ययन, १०.३० ३ नाना और पा.१९ .
निराला काव्य पर बगला का प्रभाव सकल प्रेमेर स्मृति, सक्त कालेर सकल कविर गति । निराला में 'तुम मैं के इस प्राध्यात्मिक प्रतीक का प्रयोग प्राप्त होता है तुम नम हो मैं नीलिमा अथवा- तुम्हारा मैं तुम्हारा ता तुम्हारा ही विपुल धन जन समझकर भी न समभा मन, मिटानी मोह घन गौरव। रवीद्र का तुम अपने आलोक स 'मैं व अधिकार को दूर करता है और निराला म भी तुम पाकर सतप्त 'मैं" को उपहार से सुश करता है । यथा- रवीद्र- तोमार एइ लोके लोके प्रदीप ज्वाला, प्रामार एइ अाधार टुकु घुचले परे ॥ तथा निराला- विश्व पादय छाया मे म्लान- मन बठा, प्याकुल थे प्राण, तिमिर तर प्रमा हगों में जान उतर आई तुम ले उपहार निराला के कुछ प्रतीक पिवेकान द स प्रभावित हैं जम प्रदत ब्रह्म को 'मा स्प म सम्माधित करना। रवीद्रनाथ की अध्यात्म चिता म जीवन देवता को मातृरूप म सूचित नहीं दिया गया है । सुकुमारसन कहते हैं कि रवीद्र म यह सबसे बड़ा 'म-बगालीत्व का परिचय है यद्यपि रवीद्र म मातृदेवता वा अध्य रचा ही नहीं गया यह माचना मूरता होगी। परन्तु वहाँ मा' बल देश प्रम व म्बर म जननी को माहान वरना है- प्राय मागो यात्रा करि जगतेर बाजे सुच्छ परि निज दु ख गोफ । निराजा म भी यह भावना प्राप्त है-- १ निराला परिमन 2 নিল। শিমা ३ निराना गाटिका ४ मामार मेन शंगला साहित्येर इतिशम, तृतीय सए (द्वितीय स करण) २०१३.
निराला कता पक्ष पर बगला का प्रभाव पाय कर दे मा वय प्रसून दिखा जग ज्योतिमय, मुख चूम । परन्तु 7 'प्रतीक नहीं रह सकत है। प्रतीक रूप म निराला ने जहाँ 'म का प्रयोग किया है वह साधारणतया विषकानन्द मत प्रहा बा प्रतीक है...- एक ही प्राशा मे सब प्रारण बौध मा, तनी गान। बिम्ब (चिन कल्पना) वल्पनागत रूप दियाम मन्तगत तीसरा सूत्र है बिम्ब प्रयवा चित्र पल्पना । माई. ए. रिचर स न इसको पल्पना प्रमुप उपररणाम म एम माना है ।' विम्ब तथा प्रताप म भेद बनाते हुए बादारनाथसिंह ने कहा है कि विम्ब अपनात पधिर स्वछन्द (arbitrary) और नाना प्रप-पजय हान हैं जबकि प्रती नियत और पाप स एवाय-व्यजा हान हैं।"रसा का स्पष्टी बरण यएटम (seats) व श म हम प्राप्त हो जाता है। उनका कहना है frr विम्ब जब एष हो यदि अपना क्लार की रचना म वारवार प्रयुक्त हाना है तो उसम प्रतीक को-मो निश्चितता पा जाती है और उसकी उत्तर सलीन रचनामा म वह मनियरूप म प्रतीक हो जाता है। पर प्रश्न है, बिम्ब है क्या ? मिसिल डे लुइम (cecit de levis} न इसकी परिभाषा दत हुए लिया है गि बाध्यगत विम्ब स्वय मानव मन या ही दूसरा नाम है जो प्रत्यक जीवित प्रथया मृतवस्तु र माय भपन मम्रय की धारणा रता है और इस पापरणा पा मच्छी तरह पिर भा परता है। इस प्रकार यदि वी जीवनानुभूति ही विम्य यो प्रार करती है जो जोवन तथा प्राति स सम्बधित है। एपिता भूतिविधान भी नियाय विशपता है । पाश्चात्य मानाचरा न विम्ब र मुम्यतया तीन गुण मान है-- , निराला गानित Richards Paracoles of Literary Chus Page 237 ५ वरनामा गा र मायावा,१००१ The poctic image in the mus siad claiming kiship with merything that ines or har tured and making good susclaim Peelte image Page25 & Crocaineese Freshness latensity निराला काय पर वगला का प्रभाव - (१) पूर्व स्मृति को जगा दन की शक्ति (२) नवीनता (३) तीव्रता। विम्ब केवल वस्तु का 'चित्रण ही नहीं करता वरन अपनी सत्ता स पवि की किमी विशेष मनोदशा और दृष्टिकोण को भी सूचित करता है। निराला क बिम्बो के आधार प्रकृति और मुख्यतया प्रकृति वा विराटत्व रामानो भावावेश और वामना का उदात्त प्रवाह तथा आधुनिक जीवन के प्राय प्रत्यक्ष क्षेत्र हैं। कारण मनुष्य की ऐन्द्रिय चेतना का तृप्त करना तथा उसका रागत त्रियो का भकृत करना विम्ब का ही काय है । इस दृष्टि से निराला म पद्रियता तथा मूर्तिमत की प्रधानता है। पेदारनाथसिंह कहते हैं कि अक्ल निराला ही ऐस है जिनकी कवितामा म अत्याधुनिक सभ्यता तथा सस्कृति के क्षेना स गृहीत विम्ब भी कभी भी मिल जाते है । निराला के इस बिम्ब विधान पर रवीद्र का प्रभाव मुख्यतया है । जहा विराटत्व का प्रश्न है वहा रवीद्र के माध्यम स कालिदास का प्रभाव है और कही कही अनजी प्रभाव भी रवी तथा अमियकुमार चक्रवर्ती क मा यम स उन काय म प्राया है जस प्रत्याधुनिक सभ्यता तथा सस्कृति व क्षेत्रा स गृहात विम्व । जहाँ प्रम की वासना + उदात्त प्रभाव का वणन विध माध्यम स किया गया है वहाँ भी चण्डीदास विद्यापति का प्रभार है जा रवीन्द्र के माध्यम से उनके काय म प्रस्फुटित हो उठा है। इसके विवेचन के लिए हम बिम्प क ललित तथा उपलक्षित वर्गीकरण का ग्रहण करेंगे। लक्षित चित्र योजना लक्षित चित्र योजना म वणन क द्वारा चित्र प्रस्तुत किया जाता है । वहा पर रेखा और रग का काम करत हैं। इसक सामा यत तीन भद होन हैं- (क) मामूहित चिन म साधारणतया भीड, प्रकृति अथवा शिकार प्रादि का मामूहि चित्र प्रस्तुत किया जाता है । इस प्रकार की चित्र योजना म निराला का मौलिकता को छाप अधिक स्पष्ट है । जस खुला प्रासमान म- बहुत दिनों वाव मुला प्रासमान निकती है पूप हुमा खुग जहान । दिखों दिशाएं' भनके पेट, घरने को धते ढोर गाय भस भेग, निराला के क्ला पक्ष पर बगला का प्रभाव खेलने लगे तो ऐड देर लडकियो धरा को कर भासमान।' रवीन्द्र को कविता म इस प्रकार की मामूहिक क्षित चित्र योजना भी प्राप्त हा जाता है जहाँ निराला स वही अधिन गभीरता परिलक्षित हाती है.~- तखन एमनि परे वाज बागि एइ नाटे, काटने गो दिन येमन पाजो दिन काटे। घाटे घाट मार तरी एमनि सेदिन उब भरि चरवे गार, खेलब रावार माइ माठे। (ख) लास्त व्यक्ति चित्र योजना का सुस्पष्ट चित्र निराला को अय लखका तथा बुख व प्रति अवाजलि म प्रगट हुपा है । यद्यपि रवीन्द्र नी ऐसी हो श्रद्धाजलियां कवि सत्यनाथदत्त तथा प्रसाद के प्रति अपित कर पविताएं लिखी * तयापि निराला की मौलिकता ही इन विधा म प्रकट हुई है। (ग) जहाँ तक लमित प्रकृति चित्रण का प्रश्न है निराला रवी र म बहुत ही प्रभावित हुए है। और वर मात्र प्रकृति चित्रण ही नहीं वरन् प्रकृति चित्रण माध्यम म वातावरण निमाण का काय निराला ? वहुत हा गुदर तमा मुटु दगम किया है । निराला भूयास्त का चित्र प्रस्ति परत हए वातावरण गान्त तथा विपादमय भाव को भी चित्रित परत हैं-~- दूबा रवि प्रस्तावल, सध्या हा दल दल । स्तम्धमयकार सपन मदगपामारपवन, ध्यान साननगगगन भूदे पल नीलोत्पल।' रवा भारम लक्षित चित्र-वलना द्वारा मध्या नाविपादमय चिप प्रक्षित परत है अपनी एक भावनाम- रवि मस्त माय मरण्यत प्रशार पारागात पालो। सध्या त मासि धोरे पासे दिवार पचात १ निराश भनामिका २ निरा गणित निराला-काव्य पर बगलर का प्रभाव - उपलक्षित चित्र योजना के मतगत उन प्रतीक चित्रो का वरपन भी अपभित है जो सम्पूण चित्र को उभार वर पाठक के सम्मुख प्रस्तुत वर दत हैं। इसके सम्म घ म हम अभी अभी पर कह पाय हैं कि ये चित्र कवि की प्ररणा के एक स्पश से उभर आते है। इनके द्वारा चित्र का चरम विटु स्वत उभर पाता है । राम की शक्तिपूजा म निराला न "जलती एक मशाल प्रतीक का वणन कर सम्पूग चित्र के गाम्भीय तथा व्यजित अथ का प्रक्ट किया है । रवीद्र भी 'शाहजहान ' म ' नयनेर एक विदु जल प्रतोय का प्रयाग वर सम्पूण चित्र को उसके व्यजित प्रथ को, सफलता के साथ प्रकट करत हैं। यहा उपलभित चित्र योजना के उक्त प्रमुग्व तीन गुण सयोजित मिलते हैं। भाव और कल्पना का यहाँ पूणरूप स सामजस्य प्राप्त होता है । निराला के चित्र या विम्बो म धूमिलता अस्पष्टता और अनव प्रकार की विकृतियां पाई जाती हैं किन्तु वह निराला के अब च कल्पना के विस्तारित वग के कारण हुआ है । अत्याधुनिक सम्यता तथा सस्कृति के क्षत्रा से गृहीत विम्वा के प्रकन ये समय इस प्रकार की धूमिलता अधिव प्रकट हुई है । रामरतन भटनागर इन चित्राको dream fantasy व अन्तगत रखते हैं । उनका कहना है कि कवि न अपन अधचेतन (subconscious ego) का मुक्त चलने लिया है ।' कलाम गरत तथा स्फटिक शिला के चित्र दमी ढग व है। यद्यपि यह प्रभाव जसावि रामरतन भटनागर का बनना है यूरापीय विम्ववादी सूल (इमजिस्ट स्कूल) का है । रवीद्र के स्थान पर नई पीटी के नसक अमियकुमार चक्रवर्ती मादि न बगला म दमरा प्रयाग किया था। हो सकता है कि निराला न यही स प्ररणा ग्रहण की हा । यद्यपि रवीद्र को बहुत-मी कवितामा म अाधु निक समाज व चित्र प्रक्नि किय गए है जहाँ कवि का तटस्थता तथा भाव और कल्पना का सामजस्य सबस अधिक दशनीय वस्तु है वह निराला है इन चित्राम नहा है। फ्लागत एप वियास कल्पनागत रूप दियाम व अन्तगत तीन मूत्रा यया स्पर, प्रनी और बिम्ब पर विवचन करत हुए हमने यह देखा वि छायावाद पविया को तया मुख्यतया निराना की कवितामा की मूल प्ररणा दि म मुक्ति पाना या। सव सम्बध म डा० हजारीप्रमाद द्विवदी पहत हैं कि मानवीय दृष्टि य कवि वा पल्पना अनुभूति और चितन के भीतर म निक्ली हुई वयतिव अनुभूतिया व मावग को स्वन १ रामरतन भटनागर कवि निराला एव भययन, ५००४० निराला केला पक्ष पर बगता का प्रमाव समुच्छित अभिव्यक्ति बिना किसी प्रामाम की भोर दिना पिसी प्रयत्न के स्वय निकल पड़ा हुमा भावस्रोत ही छायावादी कविता का प्राण है। और इस वयतिर अनुभूति म प्ररित जमपि हम "व्यक्तिव और कृतिव" अध्याय मकह चुप है'छापावादी कविया ने काव्य के अन्तरग सौम्य का प्रकाशन किया। और इस प्रकार छायावादी नविन प्रात्माभि पक्ति द्वारा सौदर्यानुभूति का चित्रण परता काश्य का लक्ष्य समझा है। डा. गम्भूनायसिंह बहत हैं कि सौन्दय का भी व वनातिवादिया मा अभिव्यजनावालिया की तरह हा वाह्य और वस्तुगत नही, मात्मगत और प्रान्तरित मानत थ । व वस्तु र स्यूल शारीरिर मौन्दय से अधिक उसने मूगम परा र सौन्द्रय का महत्त्व दत य । स सूम परान मौन्दय यो महत्व दन र मारण जिस प्रकार उहाँने प्रपन याव्य का बल्पनागत रूप विन्यास द्वारा सजीया उपो प्रकार क्लागत रूप वियाम मरी जनरा पल्पनामयी सौदय भावना ही काय करती रही । इस कारवाही व परम्परागत कला वि याम मे विसुर गय । परम्परागत मलकार पद वियास उद, काव्य म्प मभी स मुक्ति पाना ही उनका काम्य रहा और इसके पीछ उनको नवीन सौन्दर्यानुभूति पाय करती रही। अलकार नामवर सिंह कहत हैं विरोनिराल और छायावार को कविता म्प वियास या पन्तर मलकारा की बहुलता मोर यूनता का नहीं बल्कि उन अलराणे के पीछ काम भान वानी रुचि भयका मौन्दय भावना का है। पोइ मध्य युगीन रुचि है तो दूमर व पोछ मायुनिक रचि।' इम प्राथुनिन रचि या प्रमार निराला काम्य म मुम्पनया रवी माध्यम म हुमा । माधुनिक चिय प्रभावस्वरूप निराला म चार प्रकार की मलकार-याजना का बहुलता खिलाई पडता है--पहला उपमा-~-निमम प्राकार-माम्प से अधिप प्रभाव-माम्य पर बल लिया गया। प्रभाव-साम्य की विशेषता बतलात ए गुरजी पत हैं कि मिस परियों की दृष्टि एम हो प्रस्तुता की पार जाती है जो प्रस्तुत + ममान हा मोम, दीप्ति शानि,कोमलता प्रचहता भापणता उप्रता, स्वामी प्रसाद सिमता इत्यादि की भावना पाठ है। प्रभाव-माम्बरे पन्नगत निराला न हमाराम विदो हिन्दी माय, पृ.४६१ पिनिर, प्रथम अध्याय ३ राम्भूयदि दादा पुग पृ. २६॥ ४ नाम मत हाय बाद, ५०६ रामा गुम्म हिन्दी मास्पिनिहाम ५० ६५० निराला काव्य पर बगला का प्रभाव मनुष्य तथा प्रकृति के बीच सम्बघ स्यापित करने का काय इह उपमय तथा उपमान मानकर क्यिा । लघु तथा विराट उपमानो को याजना भी की । दूसरा, मानवीकरण, तीसरा विपण विपयय तथा चौण वयथ “यजना। इन सब पर रवीद्र का प्रभाव बहुत ही स्पष्ट परिलक्षित होता है जिसका वणन पर हम प्रस्तुत करत हैं। उपमा उपमामा की याजना से कवि को कल्पना शक्ति का पता चलता है। इसी कारण आई. ए. रिचड स ने अलकारो को कल्पना , उपादाना म स एक माना है । उनका कहना है कि अलकृत भाषा के प्रयोग में भी कल्पना ही काय करती है। रूपक उपमा उत्प्रक्षा प्रादि अलकारो का निर्माण इसी क अतगत आता है।' निराला ने उपमा के प्रतगत प्रभाव साम्य पर विरोप रूप स ध्यान केन्द्रित किया है । यथा-बादल के प्रागमन को ध्वनि का प्रभाव प्रस्तुत करन के लिए रथ के पहिया की घघर ननि का उपमान प्रस्तुत क्यिा गपा है- तुम पाए रय का घघर-नाद तुम्हारे पाने का सवाद ऐ ग्रिलोक जित ' इद्र-धनुधर रवीद्र न भी काल-चसाखी बादल के लिए यही उपमान प्रस्तुत किया था- रय चक्र घघरिया एसेछ विजयी राज सम गति निभय- वनमत्रे को घोषिल युझिताम ना- बुझिलाम, जय तब जय। 'तुलसीदाम म निराला ने रत्नावली का गान' की उपमा देकर एक ऐमा रूपक प्रस्तुत किया है जा तुलसीदास का और भी गोकातुर बना देता है- वह माज हो गई दूर तान इसलिए मधुर वर मौर गान ।' २ + The use of figurative language is frequently all that macant People who naturally employ metaphor and simile especially when it is of an un usual kind are said to have imagination Principles of literary Cntıcı sm P239 २ निराला परिमल १ निराला दुलमीदास निराला के क्ला-पक्ष पर बंगला का प्रभाव रवीन्द्र- अयि सन्ध्ये, अनन्त प्राकाशतले बसि एकाकिनी, निराला- के एलाइया सुलाती उन्हें प्रक पर अपने, दिखलातो फिर विस्मृति के वह क्तिने मोठे सपने। प्रद्धरात्रि को निश्चता मे हो जातो वह लोन, रवीन्द्र- अयि सन्ध्या, स्नेहमय तोर स्वप्नमय कोले ताइ मामि मासि निति निति, स्नेहेर पाचल दिये प्रारा मोर दिस् टेके, एने दिस् प्रतीतेर स्मृति। मन्ध्या 'दोप-शिखा' ले उतरने का वर्णन निराला ने 'माग्रह' कविता में बिल्कुल उसी प्रकार किया है- उतर रही है लिए हाय मे प्यारा तारा-दीप।' यामिनी के वेशा का वर्णन भी निराला ने बहुत-से स्थानो पर किया है- खुले देश प्रशेप सोमा मर रहे।' इसी प्रगर तरगा के मानवीकरण की पद्धति निराला ने रवीन्द्र से ग्रहण की है जो अपनी उदात्त रागिनी देड रही है- निराला- पिस अनन्त का नीता अंचल हिला हिलार माती हो तुम सजी मंग्ला कर? एष रागिनी मे अपना स्वर मिला-मिलाकर गातो हो ये कंसे गीत उदार?' रवीन्द्र- घलेछो ये निर्देश सेइ पता तोमार रागिरणी, शमहीन मूर। अन्तहीन दूर। १. निरालाःपरिमन २. निराना भरा १. निरातारा निराला-काव्य पर बंगला का प्रमाव वीणा बजी; विश्व यह हो गया साय, द्विविधा लजी। खुल गये डाल के फस, रंग गये मुख विहग के, पूल मग को हुई विमल सुख, रवीन्द्र की कविता में प्रभात वीणा को बजाकर ससार को जगाता है-- प्रमनि प्रमात तार वीणा हाते पाहिरिया मासे, शून्य मरे गाने, ऐश्वर्य छड़ाये देय मुक्तहस्ते प्राकायो प्राकाशे, क्लान्ति नाहि जाने। मानवीकरण गिरीशचन्द्र तिवारी कहते हैं कि मानवीकरण की प्रवृत्ति हिन्दी साहित्य मे प्राचीनकाल से चली आ रही है । फिर भी इस मलकार में उतनी कुशलता नहीं मा पाई थी जितनी छायावादी युग मे या सकी । इसका एकमात्र कारण पाश्चात्य प्रभाव है परन्तु यह प्रभाव केवल पाश्चात्य प्रभाव नहीं वरन् निराला पर इसका मूलगत प्रभाव रवीन्द्र का है। उपयुक्त 'प्रभात' का मानवीकरण स्पष्टतया रवीन्द्र का प्रभाव है । इसके और भी दृष्टान्त निम्नलिखित है- निराला--- दिवसावसान का समय मेघमय पासमान से उतर रही है वह संध्या-सुन्दरी परी-सी धीरे-धीरे-धीरे, रवीन्द्र- नामे संध्यातन्द्रालसा सोनार मांचल खसा हाते दीपशिखा। निराला-- गुया हुमा उन घुघराले काले-काले बालों से हृदय-राज्य की रानी का यह परता है भभिषेक । १. निराला: वेला २. गिरीशमन्द्र तिवारी यदि निराला और उनका काव्य-साहित्य, पृ० १५० ३. निराला.परिमन निराला क्ला-पक्ष पर बगला का प्रभाव १२१ शन्द बघा वनिमय साकार" रहे । गिरीशचन्द्र तिवारी इस सम्बन्ध में कहते हैं कि इससे काव्य मे सगीतात्मरता की वृद्धि होती है तथा एक प्रकार के माधुर्य का अनुभव होता है । इससे चित्रमयता, नादव्यजकता एव भाव-व्यजकता की वृद्धि होती है । यह अलकार रीतिकालीन परम्परा के काव्यो मे भी प्राप्त होता है । इसमे काव्य मे छिपी चित्र-भाषा स्पष्ट होती जाती है। नामवरसिंह छाया- वादी पवियो की इस क्ला के विषय मे लिखते हैं कि शब्द-रचनासम्बन्धी सगीत का जहाँ तक प्रश्न है छायावादी कवियों ने अलग-अलग एक-एक शब्द के सगीत पर ध्यान रखने के साथ ही सम्पूर्ण सन्द-मगति अथवा शब्द-गुम्फन ने सगीत पर भी ध्यान रखा । शब्द-सगति वंठाने में इन कवियों ने स्वर अपवा व्यजन सन्वन्धी अनुप्रास का महारा लिया है । निराला मे यह प्रवृत्ति मधिक प्रबल दिखाई पड़ती है , जैसे- दिवसावसान का समय मेघमय प्रासमान से उतर रही है यह सध्या-सुन्दरी परी-सो धीरे-धीरे-धीरे। यहाँ "दिवसावमान-प्रासमान", "समय मेघमय" तथा" सुन्दरी परी-सी धीरे" मे स्वर और व्यजन सम्बन्धी अनुप्रास को घटा देखने योग्य है।' पहना न होगा कि यह प्रभाव सम्पूर्ण बगला-बाय का निराला पर है । रवीन्द्र ने इस प्रकार ध्वन्यायं-म्पजना की पूर्व सयोजना अपने काव्य मे को है-- नामे सध्या तन्द्रालसा, सोनार-मांचल-खसा, हाते दीपशिखा। अपवा- दीपशिखासमापे मोत मालोवासा। ध्वन्यात्मा म्पजना रवीन्द्र-काम्य गरी एक विशेष निपि है। इस मलवार प्रयोग में रवि ने सस्कृत शब्द का प्रत्यधिक सहारा लिया है और निरालाने बिल्कुल पही पिया है- रवीन्द्र-शिला राशि राशि परिये ससे । निराला-माल राशि-राशि बल पर धाता साता पदार।' रापन्द्र तिवारी कवि निरामा और उनरा पाव्य साहित्य, १० १६८ नामिह छापावार ०१०६ ना परिमन १२० निराला-काव्य पर वगला का प्रमाव ! इस प्रकार मानवीकरण के उदाहरण निराला मे बहुलता से प्राप्त हो जाते हैं और इन पर रवीन्द्र का प्रभाव स्पष्टत दिखाई पड़ जाता है। विशेषरण विपर्यय इसमे विशेष्य के गुण का विशेषण पर मारोप होता है। इसमे एक ऐसे विशेषण की सहायता ली जाती है, जिसमें विशेष्य प्राय. अरूप रहता है । उसमे एक ऐसा विशेषण लगा दिया जाता है कि एक अरूप चित्र सहसा पाठक के सामने भा जाता है धरा के खिन्न दिवस के विदाई के भनिमेष नयन ! विशेषण विपर्यय से काव्य में कलात्मक बोध तथा चित्राकन शैली द्वारा बातो को ग्रहण कराने मे वडी सहायता मिलती है । यह मलकार निराला मे बहुलता से नहीं मिलता, क्योकि ये नाद-व्यजना के कवि हैं । तो भी कुछ उदाहरण प्राप्त अवश्य हो जाते हैं किस विनोद को तृषित-गोद मे, माज पोंछतो वे हम नीर । अथवा- शिथिल सेज निद्रित जीवन । अपवा- चल चरणों से व्याकुल पनघट कहाँ पाज वह वृन्दाधाम । डा० विश्वम्भरनाथ उपाध्याय कहते हैं कि उक्त नूतन प्रयोग कवि ने रवीन्द्र की पवितामो रो प्रेरणा लेकर किये हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है- निराला--यह निशोष को नग्न वेदना रवीन्द्र–फेलिये विरह छाया भावण तिमिर । ध्यन्यर्थ व्यंजना- नाद-व्यजना विशेषतः समास-शेती वाले कवियो ये काव्यो म मिलती है। "मेरे गीत मौर बला" निवन्ध में निराला जी ने सस्कृत के "पण वल" और हिन्दी "राम रस" संगीत की जो रोचक व्याख्या की है. वह ध्वन्यपं व्यजना वाली प्रवृत्ति की सूचा है । उनके लिए "वणं-चमत्तार" इसी में था कि "एक एक १. विश्वम्मरनाथ उपाध्याय : महाकवि निराला पान्य क्ला और कृतियां, पृ. ११८ निराला के क्ला-पक्ष पर बंगला का प्रमाव के माध्यम से प्रकट करना ही काव्य का धर्म है। जिसको प्रकट करना है वह लेग की अपनी सृष्टि है इसीलिए उसकी भाषा भी लेखक को अपने आप ही प्रस्तुत करनी पड़ती है, शब्द-योजना तया शब्दार्थ-व्यजना से उस भाव को वही रूप देना पड़ता है। भाव जिस प्रकार अभिनव और मौलिक होता है, शब्द विन्यास तथा वाक् पद्धति को भी वहीं अभिनव रूप देना आवश्यक है। भाषा की शक्ति उमकी प्रकाश-क्षमता है और युग के भावो की अग्रगति के साथ ही कदम बढ़ाकर भापा यदि चल न पाये तो कवि-मानस की दृष्टि में बाधा मा जाती है । द्विवेदी युग के इतिवृत्तात्मय वाव्य के लिए भापा का जो रूप प्रयुक्त हो रहा था, उसमे वह शनि न थी जो छायावादी नूतन मूक्ष्म भावनानो के भार को वहन कर सके । मत जमे हा० विश्वम्भरनाथ कहते हैं कि छायावादी कवियो को भाषा का बहुत बुध रूप गढना पडा, बगला की पद्धति पर एक और कोमलवान्त पदावलीका सन्नि- वेश दृप्रा और दूसरी ओर भग्रेजी के अनुकरण पर लक्षणात्मक प्रयोगो का प्रच- सन हुमा।' डा० श्रीकृष्णलाल ने इस सम्बन्ध में कहा है कि स्वच्छन्दतावादी अान्दोलन के द्वितीय चरण मेवाव्य-मापावाप्रादर्श विल्कुल बदल गया और एक समृद्ध भाषा शैली वा विकास होने लगा, जिसमें सस्कृत-नत्मम तथा घनि-व्यजक पान्दो का प्राधान्य था। वह चमत्तारपूर्ण और प्रालीक्मय विशेपणो तथा चित्र- मय और धन्यारमर गन्दो का युग था।' परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि द्विवेदी. युग में सस्कृत-नत्मम तयाघनि-व्यजक सब्दो का प्रयोग ही नही हपा। परन्नु द्विवेदी- युग में इस प्रकार वे शब्दो का प्रयोग परवे भी उस युग के साहित्यकार भाव को प्रेषणीय नहीं बना मरे कारण वे यह नहीं समम सरे पे कि रविता की भाषा में भावात्मकता को ही प्रधानता रहती है । प्राई. ए. रिचर्डम ने अपनी पुस्तक में यही बात कही है। भाषा गन्नो की सस्या से धनी नहीं होती, धनी होगे है उनकी भाव-व्यनरता से । निराला ने भाषा के सम्बन्ध में कहा "भाषा बहुभावात्मिका रचना को इन्दामात्र मे बदलने वाली देह है। रचना पुरनोगत है, भापा तदनुरूप पस्त्र । इस प्रस्त्र का पारणत वीर साहित्यि ही ययागमय समुचित प्रयोग कर सकता है। पानि को भाषा के भीतर से भी देम सकते हैं। बाहरी दृष्टि में देखने की अपेक्षा साहित्य ने भीतर से देसन या महत्त्व १. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय : महावि निराला काम्य कला और दतिया, १० २७४ ..मोरयार: आधुनिक हिन्दी माहित्य का विराम But it may also be use for the sake of the elects in emotions and attitude produced by the reference in Occasions. This is the emotive use of languages-Pnnciples of literary Criticism, P. 267 १२२ निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव अथवा- रवीन्द्र अरुणमयो तरुण उपा जागाये दिल गान । निराला- तरुण-प्ररुग-यौवन-प्रभात विज्ञान ।' मथवा- रवीन्द्र ककरण भंकार नूपुर गजे । निराला- करण-करण र ककरण, प्रिय किरण-किरण रव किकिरणो। अथवा- रवीन्द्र गुरु गुरु मेघ गुमरि गरजे गगने गगने, गरजे गगने। निराला- झूम झूम मृदु गरज-गरज घनघोर ।' अथवा- रवीन्द्र रथेर घर्घरमन्द्र। निराला- रथ का घर्घर नाद ।' प्रथवा- रवीन्द्र प्राज वारि झरे झर झर भरा बादरे । निराला- झर झर झर झर धारा झर।' निष्कर्षत निराला के अलकारो पर बगला-काव्य का प्रभाव काफी है जो रवीन्द्र-काव्य के माध्यम से उनके काव्य मे सप्रेपित हुपा है । यद्यपि निराला ने इन प्रभावो को, जैसाकि उपर्युक्त दृष्टान्तो से पता लग सकता है, आत्मसात् कर अपना बना लिया है। पद-विन्यास पद-विन्यास के अन्तर्गत भाषा भोर शंली के प्रश्न पर विवेचन करेंगे। निराला के पद विन्यास पर भी रवीन्द्र का प्रभाव विस्तारित है। काव्य-सृष्टि के दो उपा. दान है, कवि ना मन तथा वाव्य की भाषा। भाषा मे हम शब्द-विन्यास पर विचार करते हैं । पाब्द-समूह रूप विन्यास का मूल घन है । मन के भावो को भाषा १ निराला परिमल . निराला' गीनिगा ३ निराला परिमल ४. निराला वही ५. निराला:गीतिरा निरातारे सास पर बंपता रामनाव गीतिका में इस प्रामा प्राप्त होता हैनिराला को पहती कविता "उही नीली' के पदों ने दाला-कदिता को पदावतो कामनुगुजन रूष्ट सुनाई पडता है, शिंवतः स भारम्नमें- विजन-वन-दन्तरो पर सोती यो सुहागनरो स्नेह स्वप्न मान-प्रमत-कोमत तनु तरतो नुही को क्लो, हग बदनिए, शिथिल, पत्राक मे। नामपरनिह कहते हैं कि यहाँ "विजन-वन-वल्लरी", 'स्नेह-स्वप्न-पन्न", "अमन-मल-न" मयदा मगले चरणों में "कुज-तता-पुज" और "उपचन-सर- मरित गहन गिरि जानन" जैसे पदोच्चय रवीन्द्रनाप को कवितामा पदो को गंज म मरे हैं। ये पद-समूह एकत्र ही रवीन्द्रनाय को पिसी कविता म भले ही न मिलें और निराला जी ने जान-बूझकर एक ही जगह से उन्हें भले ही न उठा लिया हो, परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि ऐमी पद-रचना का प्रेरणा सात वही है, यहाँ तर मि इनका उच्चारण भी पोडा-मा रगला की मुख-मुख-परम्परासी पपेक्षा रखता है । निराला को "मम्राट एडवर्ड अष्टम में प्रति" पविता को रवीन्द्रनाथ की 'साहनहा" कविता के साथ पढने स दोनो में ध्वनि-साम्प ना पता चलेगा। निराला-सम्राट् ! दिखाया सत्य कोनसा यह मुन्दर। जो निमा, प्रिया यह रही सदा हो पनामिका रवीन्द--हे सम्राट कवि एइ तब हृदयेर पवि एह तय नव मेघदूत अपूर्व पद्भुन पन्दे गाने उटिया प्रलयर पाने पेपा सर विरहिग्गी प्रिया रपये मिशिया १. गुभावर रोपायपनिर ल्दिी साहित्य बांगमार स्थान, १.८ १२४ निराला काव्य पर बगला का प्रभाव अधिक होगा।' निराला ने और एक स्थान पर भापा के सम्बन्ध में विचार करते हुए लिखा है "प्रकृति की स्वाभाविक चाल से भाषा जिस तरफ भी जाय-शक्ति- सामथ्यं और मुक्ति की तरफ या सुखानुभयता, मृदुलता और छन्दलालित्य की तरफ । यदि उसके साथ जातीय जीवन का भी सम्बन्ध है तो यह निश्चित रूप से कहा जायेगा कि प्रारण शक्ति उस भापा मे है।" पत ने इसी को दूसरे शब्दो मे रागतत्व कहा है जो भाषा का और मुख्यत कविता की भापा का प्राण है ।' भाषा के भावारमा प्रयोग के लिए छायावादी कविगरण और उनमें मुख्य- तया निराला ने बगला रे महाकवियो से प्रेरणा ली। सस्कृत के तत्सम शब्दो का प्रयोग द्विवेदी-युग मे प्रारम्भ हो जाने से भी छायावादी कवियो ने इस विशेषता को बगाली कवियो से ग्रहण किया है कारण वगला कवियो मे उन्होने भावात्मक भाषा के रूप का प्रपन देखा था। इस सम्बन्ध म नामवरसिंह कहते हैं कि हिन्दी की अपनी परम्परा के असख्य लोक-प्रचलित तथा साहित्यरूढ दाब्दो के स्थान पर संस्कृत शब्दो को पुनर्जीवित करने का प्रयल किया गया । इस दिशा मे वगला हिन्दी की अग्रणी है । माइकेल मधुसूदनदत्त और रवीन्द्रनाय ने बगला भाषा को सस्कृत के तत्सम पान्दो की सहायता से एकदम नया रूप दिया है । हिन्दी में इस तरह का प्रयत्न प्राचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, अयोध्यासिंह उपाध्याय मादि ने भी किया परन्तु छायावादी कवियो ने अपने भाचार्यों की अपेक्षा बगला के महाकवियो से प्रेरणा ली। तात्पर्य यह कि छायावादी सादियो ने सस्कृत के तत्सम शब्दो को सीधे सस्कृत कोशो अपवा वाव्यो से न लेकर बगला के माध्यम से लिया और इसका कारण या। रवीन्द्र ने कालिदास जैस कवि के शब्द-सस्कार से तत्सम शब्दो को लेकर भी नवीन भावों को ऐसे प्रवाह मे सजो दिया कि वे नई मयंवत्ता से भर उठे। रवीन्द्रनाथ ने निर्जीव से लगने वाले संस्कृत सान्दो मे भावो को नवीन सजीवनी डालकर उन्ह सजीव कर दिया। इसीलिए इन पुनर्जीवित सन्दो ने छायावादी कवियों का ध्यान विशेष पाकृष्ट दिया। निराला ने शन्द-रचना व पद-मंत्री की दृष्टि से क्रान्ति की है यद्यपि प्रभाव अधिकतर रवीन्द्र या है । डा. सुधाकर चट्टोपाध्याय के अनुसार निराला की वाव्य-भाषा का माध्यम माटे तौर पर रवीन्द्रनाथ वो भाषा है, उनके काम्य-प्रथ १. नया साहित्य, निराला भरा, मन् १९५३ निराला को व पिता-बच्चन सिंह का लेस मालोचना में २५ वे पूर्णाक में उद्धत । ३. नामरसिंह पापारा, पृ. १०० 5 निराला के क्ला-पक्ष पर बगलामा प्रभाव निराला ने अग्रेजी शब्दों का भी प्रयोग परवर्तीकाल में ज्यो वा त्यो र दिया है । गिरीशचन्द्र तिवारी कहते हैं कि इसका मुख्य कारण कवि के मन की सुध दशा है, जिससे एक व्यग्य की भावना निकलती है। इस सम्बन्ध में प्रभार माचवे का कहना है कि वगला के उदाहरणो से निराला व्यग्य-वाव्य की ममानता है। वस्तुत प्रमियचक्रवर्ती के प्रभाव-स्वरूप ही निराला की कविता म इस प्रकार के व्यग्य को अभिव्यक्ति हुई है। डा. सुधाकर चट्टोपाध्याय निराला की कविता में प्रयुक्त यथार्थ दुनियावी गन्दी के प्रयोग को रवीन्द्र को "शेष रागिरगोर प्रथम धूयां" का प्रभाव बतलाते हैं । इसको स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि निराला में समास-गुम्फित तत्सम शब्दो का पुष्प-प्राचुर्य रवीन्द्र के यौवन बसन्न काल के प्रभाव-स्वरूप लक्षित होता है, और फिर शप वाल म, कविगुरु का वादंक्य-शीत-जर्जर यावेगविहीनता ने प्रभाव विस्तारित किया है निराला को गद्य-कविता म । वहाँ निराला को कापलता स तत्तम गन्द तया प्राणवेग-चचल भाषा के रगीन माधुर्य भर कर गिर पड़े हैं।' शैली भाव जितना अभिनव प्रौर मौलिक हागा, गन्द-विन्यास नपा वारपद्धति का भी उमी प्रसार अभिनव होना पावश्यक है । और फिर जिमको भाषा व माध्यम में प्रगट ररना है वह बोई चिन्नावस्तु नही-वेवल एक भाव है और इम भाव या भावावस्या को एक मन से दूसरे मन में मक्रमित करना ही काव्य- सृष्टि है । इस प्रकार भाव को भी सुम्पष्ट, मुनिर्दिष्ट भयंवाचा गब्द मे हम बांध नहीं सकते, नहीं तो वह भाव न रहार एक प्रपं-ममन्वित तत्व का रूप प्रहण करेगा-किमी एक चिना वा प्रावार धारण करेगा । प्रत्येक तत्व ही एक निविशेष माधारण बुध प्राट रता है किन्तु भाव टीर उमरे विपरीत है, विशेषत्व (particularity) ही उसका सर्वस्व है। प्रतएव वाक्य में गिनी निर्दिष्ट भयंबन्धन को शिपिल व किमी एर पनिमय विशिष्ट भावरा भाषा-प निर्माण करना ही वापसी समस्या है । यही दांनी की ममस्या है। गाय कोली रिस प्रार होगी वह लेबर की मानरिर मनुभूति ही निर्णय पर सेती है. एव जब भाषा में राम को वह अनुभूति हमारे मम्मुग उद्भामित हो उठती है, तब हम ममझ पाते है-इम रचना मी यही पयार्य मापा है. पयार्य- १. निराला के माम्य पावर, मासिक पर... .. गुहार गोपाध्याय :मधुनिक हिन्दी साहित्य वापर स्थान, १.६९ ३, १.१..
निराला काव्य पर बगला का प्रमाद इस प्रकार एक और- वीक्षण पराल, बज रहे जहाँ जीवन के स्वर भर छन्द ताल मौन मे मन्द्र। तो दूसरी ओर है- हीरा मुक्ता मारिएक्येर घटा जेनो शून्य दिगन्तेर इन्द्रजाल इन्द्रधनुच्छटा । संस्कृत शब्दा का प्रयोग, निराला ने विराटत्व के प्रदर्शन के लिए, माइकेल तथा रवीन्द्र में प्रभावस्वरूप किया है। और इस प्रक्रिया में वे गला कवितामो की भाति क्रियापद का लाप पर बैठे हैं परन्तु उससे ओज बढ़ गया है। निराला ने बहुत धन्यर्थ व्यजक दाब्दो का भी अपनी काव्य भाषाम प्रयाग रिया जैसे-उत्ताल तरग, अट्टहास, लोल हिलार, झूम-झूम, गरज गरज, घनघोर निझरपात, धरनाद, कलकल, छलछल, झरझरभर निझर, खलखल, धकधक, थरथर, लक्लक आदि । यह सब बगला-भाषा के प्रभाव-स्वरूप निराला नेअपनाया जिसके उदाहरण 'ध्वन्ययं व्यजना" के विवरण म हम दे चुके हैं। डा० विश्वम्भरनाथ उपाध्याय कहते हैं कि मौलिकता की दृष्टि से 'निराला' ने बगला से सगीत व शब्द-विधान लिया है किन्तु यह प्रेरणा मात्र है उन्होन हिंदी म जा सगीत व शब्द साधना को है, वह उनको अपनी है, माज तक कोई रवि उनका अनुकरण नहीं कर सका। निराला एक ही शब्द को दा दो बार एक ही वाक्य में प्रयुक्त करते हैं। जैसे तृय-नृण, गहन गहन, रहन-रएन पादप-पादप, रेणु रेगु, किए-णि, पुज-पुज । गिरिशचन्द्र तिवारी इसका रवीन्द्र का प्रभाव कहत है- पन्दे छन्दे नाचि उठे सिंघु माझे सरगेर दल । अथवा- बाजितेथे रागिनि तोमार तृण तृणे पल्लवे पल्लवे । इसके अतिरिक्त निराला न वगला मोर उर्दू शब्दो का भी व्यवहार किया है जिसर सम्बन्ध म हा० शम्भूनाथसिंह कहते हैं कि पन्त तथा निराला न वगला के सवाल का व्यवहार कई जगह किया है ।' कांदना, सिहरना छलपल प्रथ- पात प्रादि दाद भी वगला स ग्रहण रिय गय हैं । उर्दू तथा फारसी शब्दा का व्यवहार एक ओर ता निराला को मौलिक विशपता है और दूसरी और वगना कवि नस्ल इस्लाम का प्रभाव है। १ विश्वम्भरनाथ उपाध्याय महारवि निराला-याव्य और कृतियाँ, १० १८० • गिरीराचन्द तिवारी कवि निराला और उनका याव्य साहित्य, पृ. 12 ३ शम्भूनामिट छायावादी युग, १.३४७ निराला के कला-पक्ष पर बंगला का प्रभाव १३१ की सत्य- स्वय लिखा है- कल्पना की सुन्दर भूमि में हिन्दी के अभिनय को सफलता पर विचार करते हुए, वोलते हुए, पार्ट खेलते हुए, जिस छन्द को सष्टि हुई, वह यही है और पीछे से विचार करके भी देखा तो हमे स्वभाववश निश्चल हृदय ज्योति की तरह इसे निरला हुआ पाया। यहाँ मुक्तगीत तथा मुक्त-छन्द मे भेद समझ लेना उचित होगा । मुक्त गीत के चरणो को भावानुवूल घटाया बढाया अवश्य जाता है, किन्तु उसम तुको की अवहेलना नहीं की जाती। मुक्त-छन्द मे तुको का न कोई विचार है और न चरणो में नियत मात्रा का प्राग्रह । मुक्त गीत का प्रवत्तंन हिन्दी में निराला से पूर्व हो गया था। मुक्त गीत वास्तव मे भसमपदी मित्राक्षर छन्द है । इसके वास्तविक निर्माता रवीन्द्रनाथ हैं जिस कारण इसको "वलाका" छन्द भी कहा गया है। इसी पक्तियो मे रवर की तरह प्रसरणशीलता व हस्व-दीर्घ-कचन होने पर भी अन्त मे तुक की अवहेलना नहीं की जाती है। निराला से पहले हिन्दी मे रवीन्द्र में प्रभावस्वरूप इसका प्रवत्तंन हो गया था यद्यपि निराला ने भी इसका प्रयोग दिया है- मान नहीं है मुझे और कुप चाह प्रय-विषच इस हृदय मल मे मा तू प्रिय छोड पर बन्धनमय पन्दों को छोटो राह । गजगामिनी रह पय तेरा सकीएं, कटकाकोएं। परन्तु हिन्दी में निराला ही सर्वप्रथम मुक्त छन्द के प्रवर्तक हैं। इस सम्बन्ध में रा० हजारीप्रसाद द्विवेदी कहते हैं- यह ध्यान देने की बात है कि निराला जी के प्रारम्भिर प्रयोग धन्द ये बन्धन से मुक्ति पाने का प्रयास है। पद से बधनी के प्रति विद्रोह करके उन्होंने उस मध्ययुगीन मनोवृत्ति पर पहला पापात किया था जो घद और कविता को प्रायः समानापं समझने लगी थी। निराला जी ने जब पदो के प्रति विद्रोह पिया तो उनका उद्देश्य पद को अनुपयोगिता यताना नहीं था। वे बवलमपिता में भावो की-पतिगत अनुभूति पे भावो को-स्वच्छद अभिव्यक्ति को महत्व देना चाहते थे। जिसे वे मुक्त पद पहते थे उममे भी एक प्रकार का भार पौर एप प्रगारी ताल विद्यमान है। उदाहरणा- विजन-वन-वल्लरी पर सोतो पो सुहाग-मरो (बारोमास हिरो:न्दिी साहित्य, पृ.४६ निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव रवीन्द्रनाथ भी मुक्त छन्द के सम्बन्ध में कहते हुए प्राचीन सस्कृत की बात करते हैं जो मत श्री क्षितिमोहन सेन ने अपनी पुस्तव में उद्धृत किया है- 'सस्कृत छन्दे विषमेर देखा पापीया याय । वसं-लिवेरेतेपो ता पाछे । शार्दूल-विक्रीडित स्रग्घरा प्रभृति सस्कृत छन्दे चमत्कार ध्वनि ऐश्वर्य (म्यूजिक) रयेचे । ताके नृत्य-छन्देर गुरुगम्भीर वा चल-चल नाना ताले सजानो याय । प्रकृतिर क्षेत्रो ताई। पाश्चात्य पालोचको वे भी मुक्त छन्द के सम्बन्ध में निराला जैसे विचार है । कालरिज का कहना है कि-श्रेष्ठतम कविता बिना छन्द के भी सभव है।' छायावादी युग, जैसाकि हम इस अध्याय के प्रारम्भ मे कह चुके हैं, रूढि से मुक्ति पाने की कामना पर आधारित रहा । इसलिए रीतिकाल के विरुद्ध छायावादी कविया ने वारिणक छन्दो मे उपेन्द्रवजा, इन्द्रवजा, शार्दूल-विक्रीडित, चशस्थ- वृत्त, द्रुतविलम्बित, वसततिलका, मन्दाक्रान्ता और शिखरणी का प्रयोग खूब चलाया। मात्रिक म उर्दू के बहरो, बगला के पयार, अग्रेजी के सानेट तथा पारसी की रुबाइयां भी हिन्दी में इस युग मे लिखी जाने लगी। फिर तुव के विरुद्ध प्रति. क्रियास्वरूप मुक्त छन्द का प्रसार भी इसी युग मे चला । डा० उपाध्याय कहते हैं विमुक्त छन्द वगला में माइकेल मधुसूदन द्वारा प्रवर्तित हुआ था, गिरोदाचन्द्र नाट्याचार्य ने नाटको म इस छन्द का प्रयोग किया था, निराला ने 'माइकेल" के समान हिन्दी में इसका प्रवर्तन किया।' मुक्त छन्द के बारे म निराला ने लिखा है-मुक्त छन्द वह है जो छन्द की भूमि पर रहार भी मुक्त है, मुक्त छन्द का समर्थक उसवा प्रवाह है, वही उसे छन्द सिद्ध करता है, और उसका नियम-राहित्य उसकी मुक्ति। डा० बच्चनसिंह का कहना है कि वचपन से ही व गाल में रहने के कारण निराला वो बग साहित्य के समुचित अध्ययन का अवसर मिला 1 वगाली रगमच पर भभिनय देखने के मुयोग भी मिले। उस समय हिन्दी-रगमच क लिए भी यलकत्ता प्रसिद्ध स्थान था। हिन्दी रगमच के अलफेड और कोरोग्थियन के नाटक इन्ह पसन्द न पाते थे। पात्रा के भद्दे अस्वाभाविव क्योपवयन को ठीक करने की कल्पना से ही मुमत छन्द वी सप्टि हुई। "पतजी पौर पल्लव' लेख में इन्होन १. बलापाचाव्य परिक्रमा में उपत 3 Poetry of the highest kind may exist without meier ३. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, महावि निराला :वान्याना और कृतिया, पृ. २७० ४ वहीं से उत ५ नयनमिद मान्तिगरी रवि निराला, पृ. २४ निराला के क्ला-पक्ष पर बंगलारा प्रभाव विन्तु उसमे तु का निर्वाह नहीं । इसके विपरीत निराला ने "राम को शक्ति. पूजा" मे तुकान्त का निर्वाह करते हुए भी धारावाहिकता बनाये रखी है। इस छन्द मे निराला का अपना नयापन झलकता है। यह विचार भ्रमात्मक है क्योरि माइल तथा रवीन्द्र दोनो ने ही तुकान्त का प्रयोग अमित्राक्षर घद मे किया है । जमे रवीन्द्र का उद्धरण मित्राक्षर-प्रमित्राक्षर छन्द के सम्बन्ध में देते हुए श्री अमूल्यधन मुखोपाध्याय कहते हैं- है प्रादि जननी सिन्पु, वसुन्धरा सन्तान तोमार एकमात्र कन्या तव कोले ताइ तन्द्रा नाहि मार। इसके अतिरिक्त "मेघनाथ-वध" को मुक्त-छद (फी वर्म) हम नही वह सकते कारण वह पयार छन्द में अमित्राक्षर तथा यति-प्रनिश्चयता को लेकर बना है और ऊपर का उदाहरण मित्राक्षर होते हुए भी यति की अनिश्चितता पर स्थित है इसलिए इसको मित्राक्षर-अमिताक्षर कहा गया है। निराला न जहाँ गद्यमय वविता की रचना है वह निश्चय ही रवीन्द्र- नाय तया अमियकुमार चक्रवर्ती का प्रभाव है । वास्तव में गद्यमय कविता को ही मुक्त-दद कहा जाता है । मुक्त-गीत मे तुर का बन्धन रहता है जिसे असम- पदी मित्राक्षर छन्द कहना अधिक उपयुक्त है । भौर मुक्त-छन्द विनुल ही मुक्त है। इस उदाहरण "नये पते" तथा "कुकुरमुत्ता" म प्राप्त होते हैं । गद्य-कविता का लक्षण है--विषममात्रिर यनि, असम छन्द-स्पन्दन एव गद्योचित वाचनभगी । गद्य के साथ गद्य-नविता का भेद पक्ति सजाने में नहीं वरन् यह भेद पन्द के बहाव तया वाचन-रीति के द्वारा प्रराशित होता है। गद्य तया पद्य के बीच गद्य-कविता स्थित है । सुकुमारमेन इमवो स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि गद्य वा छन्द वारया का अनुसरण करता है, वहाँ यति वाक्य में मध्यारा पर पहती है जहाँ भयं के साथ ही राम-वायुरे लिए भी सामयिक विराम मावश्या है, एव वहाँ वास्य ने बीच ताल प्रपदा मात्रा-ममता वा प्रश्न नहीं उठना है । पच का धन्द मात्रा पयवा ताल पो समता का अनुमरण करता है, वहाँ विराम निर्दिष्ट मात्रा प्रपदा ताल के बाद होता है । गद्य-नविता पन्द मे यति गरा-छन्द की तरह अर्थ-समाप्ति के माय वानवायु रे स्वल्पविराम पर पड़ता है, और यह भी बात है रिनिर्दिष्ट मात्रा समता नहीं रहने पर भी वाप रे बीच साल के सानित्य का अनुभव होता है । मोटी बात तो १. परि निराला और उनका न्य-साहित्य, १.१८० २. अमूल्यपन मुरोपाध्यायः बागना दन्देर मूसमूत्र १३२ निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव स्नेह-स्वप्न-मग्न अमल-कोमल-तनु तरुणी जुही की कली हग बन्द किए-शिथिल-पाक मैं। निराला के कथनानुसार इसकी सफलता के लिए कवित्त-छन्द का आधार ग्रहण करना होगा। वित्त का सौन्दर्य पढने के ढग पर अवलम्बित है। इस तरह मुक्त छद में पार्ट प्रॉफ म्यूजिक (Art of music) नही मिल सकता वहाँ है पार्ट ऑफ रीडिंग (Art of reading)।' निराला ने इस छद को अपने नवीन भाव में सप्रेषण के लिए हो अपनाया जैसावि" "मेरे गीत और क्ला" निवन्ध में उन्होने लिखा है- भावों को मुक्ति छन्दो की भी मुक्ति चाहती है। यहाँ भाषा, भाव और छन्द तीनो स्वच्छन्द है। भाव के सप्रेषण के साथ-साथ प्रवाह तथा गति की दृष्टि से साधारण छन्दा की अपेक्षा मुक्त-छन्द अधिक स्वाभाविक सिद्ध होता है । निराला ने मुक्त-छन्द की प्रेरणा भूमि रवीन्द्र को मानने स सवथा इनकार कर दिया है और "पत और पल्लव" म इस कारण पत को वे नीचा दिखाते है। इसकी वास्तविक प्रेरणा गिरीशचन्द्र से मिली है। इसका सकेत उन्होने अनेक स्थानो पर दिया है । परिमल की भूमिका के अन्त में उन्होंने लिखा है- बगला में माइकेल मधुसूदनदत्त द्वारा अतुवान्त कविता की सृष्टि हो जाने पर नाट्याचार्य "गिरीराचन्द्र" ने अपने स्वच्छद छन्द का नाटको म ही प्रयोग किया। यह बात ठीक है कि मुक्त-छद (भमित्राक्षर छद नहीं) का सर्वप्रथम और उचित व्यवहार कर्ता गिरीराघोप है न कि रवीन्द्रनाथ । यह बात "वागला छन्देर मूलसूत्र" पे प्रणेता प्रख्यात विद्वान् श्री प्रमूल्यधन मुखोपाध्याय मानते हैं । उनका कहना है- गिरीश घोपेर नाटके ये छन्द व्यवहृत हइयाछ ताहावेह वर फ्री वर्म नाम देपोया येते पारे। इस प्रकार वे गिरोश घोष को ही पी वर्स (Free verse) अर्थात् मुक्त-छन्द का प्रथम प्रणेता मानते हैं जहाँ से निराला ने प्रेरणा ग्रहण की है । हिन्दी-साहित्य में इसरा प्रयोग निराला ने सर्वप्रथम किया है । 'पचवटी प्रमग' ही इसका प्रथम उदाहरण है। श्री गिरीशचन्द्र तिवारी का कहना है कि मेघनाद भी मुक्त-छन्द में है। १. निराला पत भार पल्लव २. गिररा घोपय नाटक में जो छन्द गवान दुभ है उमरोही प्रोबस (Free verse) महावा माता-पृ. १६३ निराला के क्ला-पक्ष पर बंगला का प्रमाव १३५ पुइवाइ चलती है, नही फूलों से मरी; दूर तक हरयाली ज्वार को, अरहर की." और रवीन्द्र- पश्चिमेर गंगातीर शहरेर शेष प्रान्ते वासा । दूर प्रसारित घर शून्य भाकामेर नचे शून्यतर भाष्य करे येन। हेया-होया घरे गर शस्यशेष बाजरार खेत, गद्य-कविता वा भाभासयुन अन्त्यानुप्राम-विरहित काव्यमय स्पन्दनयुक्त छन्द का एक उदाहरण प्रस्तुत है- रवीन्द्र- पलेश्वरी । नदी तोरे । पसीदेर प्राम तार देप्रो.रेर मेये,। प्रभागार । साये तार । विवाहेर । दिल ठिक। ठाक। इसका प्रभाव निराला पर स्पप्टतया लक्षित होता है- दूर तक । हरियाली जवार को। अरहर की। सन मुग । उड़द और। चनो के हरे खेत। दूर के । पहागे को। भोर पानी । नीतिमा। बगला से प्रभावित होकर निराला ने 'मित्राक्षर-प्रमित्राभर', 'मुक्तगीत' या 'प्रममपदी मित्राक्षर' तथा 'मुस्त छन्द' (झी वसं) या 'गद्य-गीत' का प्रयोग अपने काम मे दिया है। डा. सुधार घट्टोपाध्याय ने निराला-बाव्य मे कुछ उदाहरण उदत पर यह भी प्रमाणित पर दिया कि उपयुक्त छन्दो मतिरिक्त निराला ने रवीन्द्रनाप रे प्रथम युग के पदों से भी प्रभाव ग्रहण दिया है। उदाहरणतया- १-ए-ए-वर पण, प्रिय रिण-णि परिरिणी, रएनरएन नूपुर, और साज सोट रगिणि... तया-नदि-बसरत, पल-सी रह पवि दिगन्त पसरी निराला-काम्प पर बगला का प्रभाव शिगद्य प्रतिताल, पद्य समताल एव गद्य प्रविता विषमताल पर स्थित है। 'पुनश्च' की भूमिका में गद्य कविता के सम्बन्ध में रवीन्द्रनाथ ने कहा था- गद्य-कान्य में प्रतिनिरूपित छन्द का बन्धन तोडना ही यथेष्ट नहीं है, पद्य काव्य की भाषा तथा प्रकाशरीति में जो एक ससज्ज सलज्ज अवगुण्ठन की प्रथा है उसी को हटाने से ही गद्य के स्वाधीन क्षेत्र म उसका सचरण स्वाभाविक होगा। मसकुचित गद्य-रीति के द्वारा कान्य के अधिकार का प्रसार करना सभव होगा। यह मेरा विश्वास है एव इसी की मोर दृष्टि रखकर इस ग्रन्थ में प्रकाशित कविताएँ मैंने लिखी हैं। उदाहरण के रूप मे- रवीन्द्र- हठात् सन्धाय। सिन्धु वारोयांप लागे तान ।। समस्त प्राकाशे वाजे प्रादि कालेर विरह वेदना हठात्-खबर पाइमने प्राक्वर यादशार सगे हरिपदरातीर कोन भेद नेइ। निराला की गद्य-नवितामो म रवीन्द्र को उपर्युक्त कवितामो का प्रभाव स्पष्टतया लमित होता है । उदाहरण के लिए- निराला--- कुकुरमुत्त हूँ, पर बेनजोइन (Ben zon) वैसे, बने वर्शन शास्त्र जैसे। प्रोमफलस (omphalos) मोर ब्रह्मावर्त, घेसे ही दुनिया के गोले और पतं ।' अपवा- निराला- पने घने बादल हैं एक मोर गरगगने, १. मुकुमारमैन बगला मारित्यर तिहास, एतीय सड, द्वितीय सस्मरण, १० १४४ २, निराला कुकुरमुत्ता निराला के क्ला-पक्ष पर बगला का प्रभाव के कारण यह प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है। अपने युग को इस प्रवृत्ति को रवीन्द्रनाथ ने 'क्षणिक' को एक कविता 'क्षतिपूरण' में बहुत अच्छी तरह व्यक्त किया है- माम नावो महाकाव्य सचरने दिलो मने- ठेक्लो कखन तोमार कांफ्न- विरिणीते कल्पनाटि गेलो फाटि हाजार गोते महाकाय्य सेइ प्रमाव्य दुर्घटनाय पायेरा पदिए भाजे पापकरणाय। यद्यपि निरालातया रवीन्द्र दोनों ने ही लम्बी प्रास्यानात्मक कविताएँ (Narrative Poems) लिखी है तथापि निराला को 'पचवटी प्रमग', 'राम को शक्ति-पूजा' तपा 'तुलसीदास' रवीन्द्र को 'पच-देवयानी मवाद', 'गाधारीर भावेदन', 'पुजारिनी', 'शिगुतीर्थ' मादि कविताएं महाराव्य के उदात्त भाव (Epic Grandeur) से लिए हुए हैं । फिर निराला ने रवीन्द्र तया युगीन विचारधारा से प्रभावित गीत, प्रगीत, गीतिनाट्य, शौक्गीत सवोधगीत प्रादि गीतो की रचना की है। इन पर प्रभाव का विवेचन चतुयं अध्याय में किया गया है। निराला ने रवीन्द्र को दुध कवितामो पर पैरोडी भी लिखी है जिमने सम्बन्ध मे द्वितीय परिशिष्ट में विवेचन पिया गया है। जहाँ व्यग-काव्य-रूपोका गद्यमयी भाषा में प्रयोग दिखलाई पड़ता है वह वस्तुत. रवीन्द्र तथा अन्य बगाली पवियों का प्रभाव है। मस्सोगपनौग्स, कुकुरमुत्ता मादि निश्चयरूप से रगला प्याय-नाग्य के अनुरूप हैं जैसाकि प्रभारर मारवेषहते हैं- रगना के उदाहरणो से निराला में व्यग्य-बाय की समानता है, किन्तु मराठी, गुजराती, उर्दू में जो उदाहरण मिलते हैं ये पग्य-युक्त भले हों, उनमें पभिव्यक्ति का वह वैतराय नहीं जिसके कारण ही निराला को पग्य-कविताएं विशेष रूप से उन्लेगनीय है। 'मानेट' ा उल्लेग हम 'पन्द' के विवेचन में पर पुरे हैं। हमारे १. निराला काय में निदपायदाद, 'मारियापौर , ....
निराला-काव्य पर बगला का प्रमात्र घनगहन-गहन वन्धु दहन असहन निस्तल को... उपयुक्त इन दोनो उदाहरणो मे रवीन्द्रनाथ की "प्रोगो मरण, हे मोर मरण" कविता के छन्द का प्रभाव स्पष्ट लक्षित होता है। इसके अतिरिक्त- २-सौध शिखर पर प्रात मनोहर करणक गात तुम भरण चरण धर सररिएन्सरणि पर उतर रही मर छन्द-भ्रमर-गुजित नीलोत्पल इसमे "कल्पना" काव्य की कविता "भारतलक्ष्मी" वे छन्द की अनुकृति स्पष्ट लक्षित होती है । इस प्रकार डा० चट्टोपाध्याय कहते हैं कि निराला की भाषा तथा छन्द की आलोचना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि रवीन्द्र के प्रारम्भिक जीवन का उद्दाम तथा शेष जीवन का स्तिमित माधुर्य का युगपत् प्रकाश निराला को भाषा तथा छन्द मे हुआ है।' इसके अतिरिक्त निराला ने अग्रेजी 'सॉनेट' का भी प्रयोग किया हुपा है। 'अणिमा' म 'रविदास जी के प्रति' और 'विजयलक्ष्मी पडित के प्रति' वाली पविताएं सॉनेट के ढग में लिखी गई हैं। इस सम्बन्ध मे डाक्टर शम्भूनाथसिंह लिखते हैं कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कुछ सुन्दर चतुर्दशपदियो की रचना की थी जिनको देखा-देखी हिन्दी में प्राधुनिक कवि भी इस पोर प्रवृत्त हुए : किन्तु यह विदेशी शैली हिन्दी नविता की प्रवृत्ति के अनुकूल नहीं थी, मत वह अधिक प्रचलित न हो सकी। काध्य-एप छन्द की ही तरह काम्य-रूपो की दृष्टि से भी निराला का कान्य घायावाद में सबसे अधिक विविधतापूर्ण है। निराला ने महाकाव्य की रचना नहीं की। नामवर. सिंह कहते हैं कि यह माधुनिक युग की विशेषना है कि किसी भी कवि ने महाकाव्य को रचना नहीं की और यदि "कामायनी" जैसे महाकाव्य लिखे भी गए तो वे लम्बे प्रतीत होकर ही रह गए। रवीन्द्रनाथ वापरोक्ष प्रभाव यायावादी कवियो पर पग्ने मुधाकर चट्टोपाध्याय आधुनिक हिन्दी साहित्ये चांगनार स्थान, प्रथम खण्ड, १०१०२ २ राम्भूनाथसिंह 'छायावाद युग, १० २३१ ३. नामवर मिशः दायाबाद, पृ.१२६ चतुर्थ अध्याय निराला के गीत पर बंगला-प्रभाव पिटले अध्याय में निराला के क्ला-पक्ष पर विदेचन करते हुए हमने यह देखा है कि निराला के वला पक्ष म नवीनता का समावेश वस्तुत नूतन भावाभि. व्यक्ति वे समागम के कारण ही हुमा है । भावाभिव्यक्ति की तीव्रता के कारण ही काव्य में प्रगीतात्मकता का समावेश होता है जैसाकि मगीत के प्रख्यात मालोचक हबंटे स्पेन्सर ने वहा है।' नूतन भावाभिव्यक्ति के उच्छलन ने उस युग में प्रगीतात्मकता का सयोजन ही नहीं किया वरन् वह सयाजना पूर्णत नूतन ढग की हुई । खडी बोली म रीतिकाल के विरुद्ध विल्कुल नए दग व गीता की रचना 'प्रसाद' ने प्रारम्भ की। ये गीत उन नाटको दे पात्र विशेष वातावरण में गाते हैं । निरपेक्ष रूप म अलग गीत लिखने का श्रेय सवप्रथम निराला को हो है । १० बच्चनसिंह का कहना है कि विश्ववि रवीन्द्रनाथ टैगोर की भाति इनका मुकाव भी सगीत-काव्य की भोर विशेष रहा है ।' दोनो ही ने नई ली - गीतो को रचना की। पुरानी लीक के विरुद्ध निराला का मत बहुत ही तीन TIउनका कहना था- हिन्दी गयो वा ममपद पर माना मुझे ऐसा लगता था जैसे मजदूर नरसी का बोझ मुराम पर लारर धम्म से फेकार निश्चिन्त हुमा । निराला ने गीतो की नवीन शैली को रवीन्द्र तथा डिजेन्द्रलालराप से ग्रहण रिया था। इस सम्बन्ध में हा. वचनसिंह का कहना है कि प्रप्रेडी पोर रगला पविता में प्रभाव से छायावादी मावियों ने भावानुवून व्यजना, लाक्षणिक वंचिय, मूर्तप्रत्यक्षीकरण, भाषा को वश्ता रे नवीन विन्यास से सडी बोली मो मामी समृद्ध बनाया पाण्य मी तरह सगीत का क्षेत्र भी पारचात्य प्रभावों से मछूना न बच मरा। प्रपर क्षेत्र में भप्रेजियत रा प्रभाव सबसे पहले बगना Music is tut an idealisation of the natural Language of emotion, and that consequently, must te good or tad accordingly, as it conforms to the laws of altural language--The orfin sed fun,fion of music २ पचनर्मिी मानिसरी कवि निराण, ०७४ निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव अतिरिक्त गजल का विवेचन गीतिकाव्य नामक अध्याय में किया गया है। निष्कर्ष मे हम कह सकते हैं कि छन्द की ही तरह काव्य-रूपो को दृष्टि से भी निराला का काव्य छायावाद में सबसे अधिक वैविध्य-सम्पन्न है जिसकी प्रेरणा उन्हे निश्चय रूप से बगला कवियो से प्राप्त हुई। कला का अंतिम रूप शेली-पक्ष पर विचार करते हुए हमने कहा है कि काव्य की शंलो किस प्रकार की होगी, उसका निर्णय लेखक की प्रान्तरिक अनुभूति ही कर लेती है, एव जब भाषा मे लेखक को वह अनुभूति हमारे सम्मुख उद्भासित हो उठती है, तब हम समझ पाते हैं-इस रचना की यही यर्थाथ भाषा है, यथार्थ वाणी रूप है । जब हम यह समझ पाते है, तब उस रचना के समग्र वाङमय को भाव की समग्रता के साथ मिलाकर देखते है-दान्द या वाक्य का कोई पृथक् मूल्य स्वीकार नही करते हैं । भाव के माधार पर यदि उनका पारस्परिक सम्बन्ध सामजस्यपूर्ण तया मभिन्न है तभी उनका चयन और उनकी योजना सार्थक है। इस प्रकार भाव तथा भाषा का एकागी सम्बन्ध है । व्रडले तथा क्रोचे ने इसी मत का प्रतिपादन किया है ।' निराला के अपने नूतन काव्यजात भावो की व्यजना के लिए नूतन भाषा तथा रूप-विन्यास के उपकरणो की प्रावश्यक्ता हुई। और इन नूतन उपकरणो की खोज में उन्होने बगला काव्य स प्ररणा ग्रहण की। यदि वे ऐमा न करते तो नवीन अनुभूतिजन्य भावाभिव्यक्ति म शायद समर्थ न होते पोर यदि होते तो शायद भाव तया भापा का एषागी रूप हमारे सम्मुख उद्भासित नहीं हो पाता। - 1 And this identity of Content and Form, you will say, is no accident, It is of the casence of Poetry in so far as it is Poetry, and of all art in 10 far as it is art--Bradley Orford lectures on Poetry, P. 13 निराला-काम्य पर बगला का प्रभाव कारण अनादिवाल से गीत के मूल मे वेदना की छाया ही सबसे अधिक प्रस्फुटित दिखाई पडी है । सगोत चिरकाल का है। वेद तथा उपनिषद् के ऋषियो ने गम्भीर ध्यान के द्वारा यह जानना चाहा था कि सगीत का मूल कहाँ है, क्यो वह हमारे मन को प्रापित करता है, एव क्यो सगीत एक अनिर्देश्य मावेग के द्वारा प्राण को पूर्ण करता है तथा मन को उदास बना देता है । शान्तिदेव घोष कहते हैं कि इन ऋषिगण ने चिन्ता के गम्भीर स्तर मे उतर कर एक दिन अनुभव किया वि सृष्टि को गम्भीरता में एक विश्वव्यापी प्राण-कम्पन की ध्वनि गूंज रही है मोर गाना सुन कर उसी का वेदनावेग मानो हम अपने चित्त में अनुभव करते हैं। रवीन्द्र के गीतों मे भी यह विरह वेदना व्यजित हुई है- मामि ये मार सइते पारि ने सुरे बाजे मनेर माझे गो, कया दिये कइते पारिने । तुमि ये मामारे चामो मामि से जानि केन ये मोरे कांदाप्रोग्रामि से जानि। मौर निराला ने भी- मां वहां तू ले चल देगा वह द्वार-दिवस का पार बेसुध पडा जहाँ वेरना का ससार मा घेदनँ ! में भी तुझको गा गाकर जीवन दूं। विषय की दृष्टि में निराला के गीत पांच भागो में विभक्त हा सकते हैं- - (.) प्रार्थना-प्रधान गीत । (२) नारी-सौंदर्य-प्रधान गीत तथा प्रम-गीत । (३) प्रकृति प्रधान गीत । (४) राष्ट्रीयता प्रधान गीत । (५) दार्शनिक गीत । इन पांचो वो वे गीतोम रवीन्द्रकातपा नजरुल इस्लाम माविषयगत-प्रभाव सबसे अधिक परिलक्षित होता है। गीतिका के गीतो के सम्बन्ध म लिखते हुए डा० रामरतन भटनागर वहते हैं पि वगला म रवीन्दनाय इस प्रकार के गीतो भी सह्माश रचना कर चुके थे। मत रवीन्द्रनाथ रे गीतो की छाया म पलने - १ शान्ति देव धोप, रवीन्द्र सगीत.०१ निराला-काथ्य पर बगला का प्रमाव निराला के आध्यात्मिक हास्य-प्रधान गीतो मे रवीन्द्र को प्राध्यात्मिकता की छाप स्पष्टत. परिलक्षित होती है । सुकुमारसेन कहते हैं कि रवीन्द्रनाथ के गीतो मे वैष्णव पदावली का प्रभाव उतना नहीं है जितना वाउल गान का प्रभाव लक्षित होता है। यहाँ 'मरिणमा' के एक गीत में यह प्रभाव दिखाई पड़ता है- सुन्दर है, सुन्दर दर्शन से जीवन पर बरसे प्रविनश्वर स्वर । परसे ज्यों प्रारण, फूट पा सहज गान, तान-सुर सरिता वही तुम्हारे मगल पद छूकर। उठी हैं तरग, बहा जीवन निस्सग चला तुमसे मिलने को खिलने को फिर-फिर भर-भर इसे पढकर रवीन्द्र का यह गीत स्मरण हो पाता है-- एहे लोमिनु सग तक, सुन्दर, हे सुन्दर पुण्य हलमग मम धन्य हल प्रन्तर सुन्दर, है सुन्दर मालोके मोर चक्षु हटि मुग्ध हये उठल फूटि, हृदयगगने पवन हल, सौरमते मन्थर, मुन्दर, हे सुदर एहे तोमारि परदा-रागे चित्र हल रजित, एहे तोमारि मिलन-सुपा रइस प्राणे सचित १. मुकुमारसेन बागला साहित्थर वया, तोय खएर, ५० ३६६ निराला के गीत पर बंगला का प्रमाव १४७ पुण्य के शुभ प्रस्रवण ये, हृदय द्वार गये। पौर रवीन्द्र- ऐसो श्यामल सुन्दर प्रानो तवतापहरा तृपाहारा सगसुधा। विरहिणी चाहिया प्राये प्राकाशे । निराला वे इस वर्पा-गीत में तथा अन्य प्रकृति के गोनो मे रवीन्द्र का प्रभाव होने पर भी रवीन्द्र की रागात्मक अन्विति (जो गीतों की मुख्य विशेषता है) की प्रेरणा को निराला ग्रहण नहीं कर पाये हैं। इसीलिए ये चित्र रवीन्द्र की तरह इतने प्रवाहमय नही दीख पडते हैं। निराला ने कही-कही अपने प्रकृति-प्रधान गीतो में नजरुल-इस्लाम के भाव को प्रेरणा को भी ग्रहण किया है जैसाकि बादल-राग के गीतो ये सम्बन्ध में डा. रामविकास शर्मा कहते हैं कि वादल-राग की दूसरी कविता मे जहाँ नजरुल इस्लाम के 'विद्रोही' की तरह विप्लव का नव जल- घर है वहां क्ली की भी निखरकर उसे पीडित करने वाला उद्दण्ड नायक भी है।' "गीतगुज" वे एव गीत में भी प्रेरणा वा सूत्र स्पष्ट दिखाई पडना है-- निराला-बढ़ बट पर बहती पुरवाई, धुन मलार-क्जली को पाई। नउरुल-दुरन्त वायु पुरवइयां बहे अधीर मानन्दे। स्वदेश-प्रेम के गीत निराला रवीन्द्र में स्वदेग-प्रेम का बखान करते हुए लिखते हैं नि महावि रवीन्द्रनाप ने रेवल दूसरे विपयो वी उत्तमोत्तम रवितामो की रचना मे ही अपन सम्पूर्ण वाल नहीं विताया, उन्होंने देश के सम्बन्ध में भी वही मर्म-पशिनीपतिः ताएं लिपी हैं। वास्तव में उम समय में प्रत्येक रवि ने स्वदेश-प्रेम की वविताएँ या गीत लिमे है। निराला ने भी रवीन्द्र मादि पवियों से प्रेरणा ग्रहण कर स्वदेश-प्रेम में गीतो वा प्रणयन किया। इन। स्वदेश-प्रेम भारतवर्ष के प्राचीरों तर ही मोमिन नहीं है, बलि उममें रवीन्द्र की तरह मम्पूर्ण विश्व को वरा गया है। निराता- .. रामबिलास रामा: निराला. १.५१ .. निराला: रवीन्द्रविदापानन, १०५३ निराला-काय्य पर बगला का प्रमाव - सब मयु तार चरणे तोमारिरिया। कही कही नारी के चित्रण द्वारा सात्विक प्रेम का रूप प्रक्ट किया गया है। जैसे निराला के इस गीत में प्रकट होता है- कोन तुमि शुभ्रकिरण बसना ? सोखा केवल हसना, केवल हंसना अथवा- वहा स्नेह का सरस सरोवर श्वेत-वसन लौटो सालज घर, मलख सखा के ध्यान-लक्ष्य पर डूबी, प्रमल धुलो। नारी के इस प्रकार के चित्र रवीन्द्र की कविता में भी मिलते है-- प्राजि निर्मलवाय शान्त ऊपाय निर्जल प्रवसाने शुभ्रवसना चलियाछो धीरे-धीरे। प्रकृति-प्रधान गीत निराला ने प्रकृति से सम्बन्धित दो प्रकार के गीत लिखे है । एक मे कारा प्रकृति-चित्रण होता है और दूसर में प्रकृति के माध्यम से मे उत्पन्न विविध विचारो का चित्रण । निराला के प्रकृति-वर्णन पर रवीन्द्र के प्रभाव का विवेचन हम कर चुके हैं और प्रकृति में नारी-स्प के मारोप वा भी वर्णन हा चुका है। यहाँ प्रकृति-प्रधान गीतो का वर्णन करेंगे जहाँ प्रगीतात्मक विशेषता से युक्त होकर इनमे वला की अपेक्षा सहज अन्त प्रेरणा तथा प्रवाहमयी शैली का प्राधान्य रहा है । वर्पा ये वर्णन मे यह रूप सबसे अधिक फूट पड़ा है और इनका वर्षा- वर्णन जैसाकि डा. रामविलास शर्मा कहते है-नद और ददल के वर्णन से स्पष्ट है कि यह वर्पा वगाल की है।'परिमल के वर्पा-गीतों में वगाल तथा बगला- कवियों का, मुख्यतया रवीन्द्र का प्रभाव लक्षित होता है। उदाहरणतया 'गीतगुज' का एक गीत लेते हैं- गगन मेघ छये नए नयन नये प्रारण धन के श्याम धनये तापजल शीतल प्रवण ये, हृदय - १. राम बेलाम शर्मा : निराला, पृ०५६ निराला ये गीत पर बंगलादा प्रभाव 'मियलजि' प्राप्त होती है परन्तु वहीं-कही गीत सार्वजनीनता के पद को प्राप्त पर गए है। नागो मोनो के बाजाय, घनफुलेर मालार गन्ध वाशिर ताने मिरी पाम । अधर छुये बोशिखानि.. । जीव और ब्रह्म सम्बन्धी रहस्यवाद निराला का प्रिय विषय है। डा. भटनागर रहते है कि जिम गीताजति से आधुनिक छायावादी काव्य को विशेष प्रेरणा मिली, उसमें भी प्रात्मा-परमात्मा के रहस्यात्म और भक्तिभावपरष भने गीत हैं। गीत में निराला ने जहां-वही भी इम भाव को व्यक्त किया है वह प्रात्मपरक भाषना मे उदयुद्ध होने के कारण रवीन्द्र की तरह विरागपूर्ण यन गया है- कितने बार पुकारा, खोल दो द्वार, बेचारा। रवीन्द्र तोमाय डाकिनु यो कुजयने तखनो मामेर बने गन्य दिल, पानि ना को लागि छिल अन्यमने तोमार दुयार केन बन्ध छिल । उम ब्रह्म को बुलाने के लिए निराला सितार को झकार से वातावरण को मुखर पर देने हैं पौर जहाँ मिनार सराय हो जाता है वहां निराला रवीन्द्र की तरह मितार को मारने में लग जाते हैं- फिर सवार सितार लो। पार फिर ठाठ, अपने प्रकपर झंकार दो।' प्रौर रवीन्द्र- एकटि एकटि करे सोमार पुरानो तार सोलो, सेतारखानि नूतन घे तोलो। इस सम्बन्ध में विमा विवरण हम 'निराला ने प्रतिपाद्य' वाले अध्याय में दे चुरे हैं। 1. मुकुमार मेन:ला मादित्येर कथा तृतीय र १०३७० २ निराना :गीतिरा निराला काव्य पर बगला का प्रभाव जागो जीवन धनि के विश्व पराय-प्रिय वरिपके भारत का वर्णन भी इसी प्रकार प्रेरणास्प में किया है। डा० बच्चन सह कहते हैं कि बगला के गीतो की तरह निराला की भारत-भूमि को यह प्रशस्ति है ।' लंका पदतल शतदल, गजितोमि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल स्तव कर बहु अयं भरे। x x x प्रचल मे सचित सुमन मुकुट शुभ हिम तुषार। रवीन्द्र-नीलसिन्धुजल-धौत चरण तल, अनिल-विकम्पित श्यामल प्रचल, प्रम्बर-चुम्बित माल हिमाचल शुभ्र-तुषार-किरिटनो। पराधीनता के विरुद्ध कवि का प्राक्रोश सवंदा नजरूल की तरह है। दोनों ही विद्रोही कवि थे और दोनो ने ही उदात्त गम्भीर गैली में विद्रोह का गाना गाया है। दार्शनिक गीत दार्शनिक गीतो का प्रतिपाद्य मदतवाद है। डा. भटनागर कहते है कि जिस मुरली-ध्वनि को गोपिकानो न वृन्दावन में सुना था, वहीं मुरलीध्वनि जीवात्मा वो जब भीतर-भीतर सुनाई पडती है, तब उस जगत् के वचन धीरे-धीरे टूटने लगते हैं। तब अभिसारिखा-पी जीवात्मा ये मन में उस प्रिय रे प्रति जिजामा जाग उठती है .. हृदय मे कौन जो छेड़ता नामुरी हुई ज्योत्स्नामयो अखिल मायापुरी , यह प्रेरणा रवीन्द्र की विचारधारा की है। रवीन्द्र के सम्बन्ध म मुहमारमैन कहते हैं कि नितान स्वाभाविर स्प में उनके गाने में वैष्णव-पदावली म्प-रस की ? १. रचमिह जातिगरी यदि निराला, पृ.43 २. भटनागर बवि निराला एक भयवन, पृ० १४- ३. निराला ' गीतिका पंचम अध्याय उपसंहार प्रस्तुत निवन्ध म जहाँ तर मम्भव हो सका है, तटम्य तथा निरपेक्ष होरर निराला-काव्य में बगीय-प्रभाव के मूत्र को स्पष्ट करन की चेप्टा की गई है । इम मम्बन्ध में मालोचना करते हुए हमने मुन्यतया निराला पर रवीन्द्रनाप का प्रभाव प्रदर्शित लिया है । इस अतिरिक्त प्रानुपगिय म्प में विवेकानन्द, नवरल- इस्लाम, द्विजेन्द्रतालराय तथा वगाली या मैपिली बंपाव कवि विद्यापनि और चारोदाम वे प्रभाव की भी मालोचना प्रस्तुत की गई है। चूंकि "निराला-काव्य पर वगला का प्रभाव पालोचना वा विषय रहा है इसीलिए बगीय चिन्तनधारा तथा वातावरण के प्रभाव को भी स्पष्ट कर दिया गया है । सम्पूर्ण निवन्न म प्रानुपगित प्रभाव-प्रदर्शन के अतिरिन मुन्यतया तीन विषयो पर व्यवहारगन पालोचना प्रस्तुत की गई है-- १ निराला काव्य की मालोचना। • रवीन्द्र के दाव्य (पमान ) की पाचना । ३ निराला पौर रवीन्द्र व राज्य को माम्य या वैषम्यमूलब पालोचना । निरारा माव्य को पालोचना करते हुए उनके सम्पूर्ण काम साहित्य की व्यवहारगत (प्रविटरल) मालोचना प्रस्तुत की गई है और साथ ही रवीन्द्र पाव्य- माहित्य में विचार-पा तथा रसापक्ष की मालोचना का विषय बनाया गया है। पृथर प्रागौचना होने के उपरान निराला पर रवीन्द्रय प्रभाव विस्तार की प्याल्या की गई है पोर निष्कर्ष सर में ग्वीन्द्र से साम्प या बंपम्य का भी प्रदर्शन किया गया है। निराला द्वारा अनूदित बगला-कविनामों वाले परिशिष्ट' में रवीन्द्ररे रिवारों के इस विराम को म्याच्या मनोवैमानिस तथा ऐतिहामिक दृष्टि से प्रस्तुत की गई है। इस प्रकार सम्पूर्ण निबन्धको विषयवस्तु निराठा तपा रवीन्द्र साम्य की मानोचना ही रहो। प्रस्तुत निबन्ध को पानोपना र सक्ष्य विषयगत तप्पो मी पापा हीही मीलिए निराला को मौनिरता या हिन्दी माहित्य को निरालापी मौसिक देन ..देशित परिस्टि १५० निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव इस प्रकार निराला के गीतो के प्रतिपाय पर स्पष्टतया रवीन्द्र का प्रभाव परिलक्षित होता है । यद्यपि यह कहना ही पड़ेगा कि निराला के गीतो में भाव- प्रवणता, सहज अन्त प्रेरणा तथा प्रवाहमयी शंली का अधिकतर प्रभाव है। इनमे गेयता तथा प्रात्मतत्व के गुण प्राप्त हो जाते है परन्तु रागात्मक अन्विति के अभाव के कारण इनमे भाव का सहज उच्छलन दृष्टिगोचर नहीं होता। शायद इसी कारण डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी निराला के गीतो को, मुख्यतया गीतिका के गीतो को ठूठ ६ पर्याय मे रखते हैं।' इमी कारण उनके गीत द्विजेन्द्रलाल. राय तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर की तरह इतने प्रसिद्ध नही हो सके है। बाद में चलकर उन्होंने "नये पत्ते" मे गजल के तर्ज पर कुछ गीत लिम्बे थे परन्तु यहां भी निराला व्यर्थ हुए । डा. भटनागर कहते हैं कि नज़रल को गजलो मे बगला की अपनी रूप-रेखाएं उभर आई हैं । यह वात निराला की इन गज़लो मे नहीं। जहा निराला ने हिन्दुस्तानी सगीत के माधार पर गीत रचे वहा वे सफल बन पाये हैं जिसके उदाहरणों से सम्पूर्ण गीतिका के पृष्ठ भरे पडे हैं । जहा तक निराला वे गीतो के क्ला-पक्ष का सम्बन्ध है वहा वे रवीन्द्र के गीतो की सहज भापा, रीति तथा ढग से प्रभावित दिखाई पड़ते हैं यद्यपि कही कही रवीन्द्र की तरह तत्सम शब्दो का प्रयोग भी काफी करते है। रवीन्द्र ने कीर्तन, बाउल तथा भाटियाली प्रादि लोक-गीतो के ढग पर अपने गीत रचे परन्तु ऐसा कुछ काम निराला ने अपने गीतो मे नही किया यद्यपि रवीन्द्र वी वान्त पदावली तथा नजरुन की उदात्त दौली का अपने गीतो के लिए निराला ने ग्रहण किया था। सोप म हम कह सकते हैं कि रवीन्द्र के गीतोस अनुप्ररित निराला ने अनेक गीतों की रचना वो परन्तु ये गीत भाव तया कल्पना की अन्विति के प्रभाव के कारण प्राय रवीन्द्र के गीतो की भाति सुन्दर तथा क्लात्मक रूप धारण नही कर पाय । जहा पही भी वे भाव तथा कल्पना की प्रन्विति करने म समर्थ हुए हैं वहा निराला की प्रतिभा स्पष्टतया सहज स्फूर्त उद्गीत वा स्प धारण कर लेती है और गीत के माध्यम से अपनी विधुच्छटा को प्रतिभासित करती है। जारीप्रसाद द्विवेदी:हिंदी साहिश्य, पृ. ४६६ २ भटनागर' पदि निराला:कमध्ययन, पृ०२३७ उपसहार पत पर रवीन्द्र ने प्रभाव की मालोचना करते हुए कहते हैं कि प्रभाव का अप- हरण न कहकर मलकरण बना चाहिए। इस मलवरण के प्रयास में ही छिपी हुई है-~-निराला को मौलिकता, जिसका अभिनव प उनके काव्य ने माध्यम से प्रकट हुअा है और इस प्रकार इस प्रकरण व प्रयास म ही छिपा हुआ है । निराला का व्यक्तिन्द जो कवितामो में अपने सम्पूण काव्यत्व को लवर प्रक्ट हमा है और जिसका प्राधेय है- "नव जीवन की प्रबल उमग, जा रही में मिलने के लिए, पार पर सीमा प्रियतम असीम के सग।"
निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव आदि विषयो को पालोच्य विषय के अन्तर्गत नही रखा गया है जिसके सम्बन्ध में भूमिका में वात स्पष्ट कर दी गई है। भूमिका में हमने कहा है वि निराला में मौलिकता का प्रभाव नहीं है और जहां रवीन्द्र से प्रभावित भी हुए हैं वहां रवीन्द्र के भाव को आत्मसात् पर उसको मौलिक रूप मे प्रक्ट भी किया है। 'प्रभाव' की आलोचना करने का या निराला के काव्य मे वगीय प्रभाव-विस्तार को प्रदर्शित करने का अर्थ यह नहीं कि निराला मे मौलिकता नही है वरन् उनकी या छायावादी कवियो की मौलिकता को वगाली मालोचक भी स्वीकार करते हैं । सुधारर चट्टोपाध्याय का कहना है- यायावादी कविरा साहित्यकार कवि। भारतेर विभिन्न प्रचले तादेर अनेक कविताइ अनुकूल अभ्यर्थना पावे सहृदय-हृदयर काछे । तादेर अनन्त कवितार मध्ये खुजले अनन्त कालेर दु एकटि कवितायो प्राविष्कृत हो ।' अर्थात् छायावादी कवि वास्तविक कवि हैं। भारत के विभिन्न प्रान्तो के सहृदय हृदय के पास से उनकी बहुत-सी कविताएं अनुकूल अभ्यर्थना पा सकेंगी। उनकी अनन्त कविताप्रो के बीच ढूंढने पर अनन्तकाल के लिए लिखी गई दो-एक कविताएं अवश्य ही मिल जायेंगी। यहाँ उपसहार के रूप में दो प्रश्नोपर हम प्रकाश डालना उचित समझेगे- प्रथम, प्रभावान्वित कवितामो का मूल्य क्या है ? द्वितीय, प्रभाव को किस रूप में निराला ने अपनाया है ? प्रथम प्रश्न का उत्तर हम भूमिका में 'प्रभाव की उपयोगिता' म दे चुके हैं। यहाँ केवल इतना ही कहना है कि रवीन्द्र-प्रभावान्वित होने से ही निराला की कविताएँ मूल्यहीन नहीं हो जाती। जिस प्रकार रवीन्द्र की कवितामों ने, दूसरे साहित्यकारो के प्रभाव से पूर्ण होते हुए भी, अपनी मलग सत्ता को बनाए रखा है उसी प्रकार निराला की कविताएँ अनुकरण की स्थूलता से मुक्त होकर स्वी. करण की सार्थकता से पूर्ण बनी हुई हैं । यही निराला को कवितापो का परम मूल्य है और यह सार्थकता ही इन कवितामो को हिन्दी-काव्य की स्थायी सम्पत्ति ? बनाए रखेंगी। जहाँ तक दूसरा प्रश्न है कि निराला ने प्रभाव को विस रूप में अपनाया है उमरे उत्तर में हम कह सकते हैं कि प्रत्य छायावादी पवियो की तरह निराला के अनुपरण की पेप्टा अनुभूतिजन्य होने के अतिरिक्त अपने काव्य को मलकृत करने का प्रयास भी है। इस विषय मे नन्ददुनारे वाजपेयी, सुमित्रानन्दन .. चट्टोपाध्याप : माधुनिक हिंदी साहित्ये बांगलार स्थान, प्रथम खर, पृ. १११ परिशिष्ट उसो अथं को दूसरी भाषा में प्रस्फुटित कर देना उसका कर्तव्य है। यदि मूल में कोई चमत्कार हो तो अनुवाद में भी चमत्कार दिखलाना चाहिए । मूल की भाषा मे यदि किसी ऐसे मुहावरे का प्रयोग पाया है जिसकी अोर स्वभावत पाठक खिच जाय तो अनुवादक को भी उसी ढग का करना चाहिए । सारारा यह है कि मूल की भापा और भावो मे अनुवाद की भापा और भावा को शिथिल न होने देना चाहिए।' अनुवाद के सम्बन्ध में प्रत्येक वडे पालोचक का भी यही मत है । अग्रजी साहित्य के विख्यात इतिहासकार कोमटन रिवेट भी यही कहते हैं- "A literal translation as the student of letters knows often does far less justice to the genius of the original than a free translation कोमटन रिबेट ने अपना यह मत फिटजल्र्ड द्वारा अनूदित उमर खैयाम की रुबाइयो के सम्बन्ध म पालोचना करते हुए व्यक्त किया है । कोमटन रिवेट कहते हैं कि "पिटजल्डं द्वारा उमर खैयाम की रवाइयो पा सफल अनुवाद का रहस्य है कि अनुवादक का व्यक्तित्व मूलवस्तु के साथ घुलमिल गया था और इसी ममरमता के कारण अनुवाद इतना सफल हो पाया- Although only a tolerable scholar with a partial knowledge of persian, he found in Omar a writer with whom he Was spiritually at one, and for this reason his bold and un blusiung liberties with the text, his own variation to the orto ginal music are in perfect accord with the primal melody For this reason Fitz Gerald's translation has the force and beauty of an original work निराला को अनूदित कवितामो ये सम्बन्ध में भी विल्कुल यही बात कही पा सरती है । रवीन्द्रनाय तथा विवेकानन्द ये विचारों द्वारा अनुप्ररित उन्होंने पाण्य-रचना प्रारम्भ की थी। इन दोनो बगला-ववियो या प्रभाव निराला पाप पर परावर बना रहा, परन्तु निराला ने उस प्रभाव को पात्ममात् पर लिया और यह मारमसात्, परस्पर विचारों की ममता में भारत ही सम्भव हो सका। निराला वेदान्न से प्रभावित थे इसीलिए वे 'विराट व .. निराला, 'चरित्रहीन', घाम २ Ricket.Ahistory of Ex Lit Page 467 Rickett. A history of Eng Lit Page 467 परिशिष्ट (१) निराला द्वारा अनूदित बगला-कविताएँ निराला द्वारा अनूदित बगला-कविताए पालोच्य निवन्ध की परिधि के भीतर नहीं समा सक्ती क्योरि सामान्यत अनुवाद का 'प्रभाव' के साथ कोई मम्बन्ध नहीं होता है । परन्तु निराला के लिए अनुवाद एक सामान्य वस्तु नही है, उनके साहित्यिक जीवन में अनुवाद का एक विशेप स्थान है । निराला के लिए अनुवाद प्रभावसापक्ष है । जैसाकि वे कहत हैं कि अग्रेजी या गला की अनूदित पुस्तको को भापा चाह कितनी सावधानी से क्यो न लिखी जाये परन्तु मूल ग्रयो के जातीय भावा का निराकरण कभी क्यिा नहीं जा सकता।' निराला ने उन्ही दो वगाली कवियो अर्थात् रवीन्द्र तथा विवकानन्द की ही कवितानो या अनुवाद किया है जिन्होन उन्ह माव्य की सृष्टि म सबसे अधिक प्रभावित किया है। इसी कारण, मालोच्य विषय को अगहानि वे दोप से बचने के लिए अनूदित कवितानो पर पालोचना प्रावश्यक-मी हो गयी है । और यह प्रावश्यक्ता पोर भी निगूढ बन जाती है जब हम अनुवाद ये सम्बन्ध में निराला नी मौलिक मान्यताप्रा स परिचित हाते है । निराला ने लिए अनुवाद प्रभाव-सापक्ष में अतिरिक्त व्यक्तित्व-सापक्ष भी है अर्थात् अनुवाद के लिए यह आवश्यक नहीं कि मूल पुस्तक का अक्षरश अनुवाद किया जाय वरन् उसमें अनुवादव की व्यक्तिगत मान्यताप्रा तथा चि वा रग यदि चढ जाय तो कोई आपत्ति नहीं पौर वैसे भी व्यक्तिगत रग तो अनूदित वस्तु म लग ही जाना है । निराला वी अनूदित कवितामो में निराला के व्यक्तित्व की छाप स्पष्टतया परिलक्षित हाती है और इसीलिए इस विषय पर विवेचन यावश्यक हा गया है यद्यपि व्यक्तिगत छाप या प्रपं यह नहीं कि अनुवादक मूल वस्तु के गाथ मनमानी करे। इगी बात को ध्यान में रखते हा निराला ने कहा है- भनुवाद के लिए यह नियम नही कि मूल पुम्नर का अक्षरमा अनुवाद पिया जाय, परन्तु यह भी ठीक नहीं कि मूल का अर्थ मादि कुछ पोर हो और मनुवाद का कुछ भौर । मनुवादा का मूल के प्रथं पर ध्यान रमना चाहिए । - , निराला भाषा की गति और हिंदी की रानी, नयन परिशिष्ट इस प्रकार हम देखते है रि निराला के अनुसार अनुवाद लिए दानो भापापो का परिपक्व ज्ञान तथा अनूदित कविता के भावो वा मुललित चित्रण प्रावश्यक है यद्यपि अक्षरस उन्ही शब्दो तथा भाव-म का अनुवाद प्राव- श्यक नहीं है इमी दृष्टि से दखने पर हम यह ज्ञात हाता है कि जहां तत्र विवेकानन्द की कविताओं के अनुवाद का प्रश्न है निराला एक सच्चे अनुवादर रह पाये हैं परन्तु रवीन्द्र की कवितामो का अनुवाद परत हुए व अपन भाव, विचार तथा कल्पना के स्रोत म इतने प्रागे वह गए हैं कि अनूदित कविताएँ मूल भाव से स्पष्ट होने पर भी स्वतत्र दीख पडनी है। किसी निप्पं पर पहुंचन मे पहले मूल तथा उमरे अनुवाद पर आलोचना कर ली जाय । रवीन्द्र की कविताओ का अनुवाद कहाँ देश है ? (निरुद्देशयाना) रवीन्द्रनाय को रचनामो को कालानुक्रमिन मूची व अनुसार हम अनूदित कवितापी वो मालोचना करेंगे। इस दृष्टि स सर्वप्रयम रवीन्द्र + 'सानारतरी' साव्यमग्रह वे अन्तर्गत 'निरुद्देश यात्रा' कविता में अनुवाद की मालाचना करनी होगी। 'निरुद्देश यात्रा' शीर्पक को बदलकर निराला न कविता वा नूतन नाम परण 'कहाँ देश है' रखा है। यहां 'सोनार तरी' काव्य नग्रह व मूलगत भावना विचार को हम समझ सना होगा कारण उसी स ही हम निरहशा याना' में अन्तनिहित मूल चिन्ननधारा की अनुभूति हागी भोर हमे यह समझन म सुविधा भी होगी कि केवल अनुवादार्थ निराला न इमा अनुवाद किया मथवा उसकी भाव-धारा से प्रभावित हाार उन्होंन इसका प्रणयन किया और करते हुए उनी मौलिक भावो का भी ममावेश इममें हो गया। 'सोनार नरी' यो चिन्तनधारा की मालोचना करते हुए मुकुमार मन वहत है कि विमानम की प्रवृति तथा उसकी रस-दृष्टि से विवाम तथा परिणति के प्राधार पर विचार करने स रवीन्द्रनाथ की मुदीर्घ काव्य-सप्टि का तीन काला म विभक्त किया जा सरता है- मात्ममुषीन-~-इन्ट्रोस्पंक्टिर प्राइ मुसौन-प्रोविटव पराइ मुगौन-रिट्रोस्पंक्टिव बचपन म पठार शामन मन्दर रहने से मेवल उनकी मन्नर्यामी मारमाही प्रार. भिर रपनामों में प्रस्फुटित हुई है। धीरे-धीरेमवि चित्त अपनी रखी हुईबापागा १. मुरमार सेन, बागला साहित्पर तिहाम तृतीय सट, पृ. ४ निराला काव्य पर बगला का प्रभाव उपामक" थे और इसी कारण स्वामी विवेकानन्द के वेदान्त से अनुप्रेरित वे कवितानो का सफल अनुवाद कर सके । इसके अतिरिक्त रवीन्द्र को सौन्दर्यानु- भूति तथा स्वदेश-प्रेम और रहस्यवादी कविताओं के विचारो ना स्वतः स्फुरण उनके मन में वाल्यकाल से ही हो गया था इसी कारण वे रवीन्द्र के भी सफल अनुवादर बन सबै क्योकि विचारोको समता ही मफल अनुवाद का रहस्य है । निराला के अनुवाद में प्रति अपने विचार सशक्त तथा प्रवल है । वे गलन अनुवाद के घोर विरोधी है और गलत अनुवाद करनेवाले को नीचा दिखाने में वे पदापि नही चूक्ते । पडित रूपनारायण पाण्डेय के गलत अनुवाद पर निराला के विचारो को प्रस्ट करते हुए डा० रामविलास शर्मा लिखते हैं- एक जगह 'फुकी' का अर्थ पाण्डेय जी ने 'रोटी' लिखा था जवनि उम का अर्थ चिनगारी' था । बगला के वाक्य का अर्थ है-उसका तरण हृदय माग की चिनगी की तरह चारो ओर फैल रहा था (ताहादेर भावप्रवण तरण हृदय मागुनेर पुलकीर मननेंइ स्वाधीन प्रानन्देर उज्जवलताय क्षणे क्षणे पापनादिगो चारिदिक विकीर्ण करिते थाक्तिो) । पाण्डेय जी ने अनुवाद किया था "उसमा भाव-प्ररण तरुण हृदय सिर रही पुलकी (रोटी) की तरह ही स्वाधीन मानन्द की तरह पूल पून उठता था ।" पाण्डेय जी ये अनुवाद पर टीका करते हुए निराला जी कहते है, "खूब । पण्डित जी, जान पडता है, उस समय भूरा वडे जोरो की लगी थी, नहीं तो रोटी क्यो सेवते यहाँ न कही रोटी है न दाल, पुलकी है गो वह भी चिनगारी है रोटी नहीं । कल्पना भी कंसी। मूल में तो है "विकीरणं वरित थारितो" और मनुवाद मे "फूल फूल उठता या ।"" फूल-फूल उठना रुपनारायणजी की रोटी के लिए ही उपयुक्त है । अच्छा है, सेंकिए रोटी।' यहाँ निराला ने पाण्डेय जी के प्रति व्यक्तिगत रोप के कारण इम प्रसार की मालोचना नही को वरन् उन्होंने तो एक सच्चे अनुवादक के नाते गलत मनुवाद का केवल गराक्त शब्दो में विरोध दिया है, नही तो पाण्डेयजी के सुन्दर अनुनादो का निराला सवंदा प्रशसा करते रहे । अनुवाद के लिए निराला दोनो भाषामो में शान को बहुत महत्त्वपूर्ण समभते थे। उनका कहना है- अनुवाद का प्रथं वही समझता है, मौलिक ग्रप का चमत्तार उसी दृष्टि में अपनी गोभनीय सप्टि रखता है-अनुवाद मौर मूल दोनो की भापापी पर जिसका पूर्ण अधिकार हो। .. , रामविनाम शर्मा, निराला, पृ०७६ २ निराला, चाबुक परिशिष्ट १५६ द्वितीय स्तर को कवितामो म नव यौवन के प्रकृतार्य प्रम ने, रसायिन लोनातीत प्रादर्श में परिवर्तित होकर, कवि को चिरविरही बनाया है। यह विरह-रसाधित प्रेम ही रवीन्द्रनाथ के पवि-जीवन का प्रधान पालम्बन बन गया है- ए प्रेम प्रामार सुख नहे दुख नहे इम द्वितीय स्तर की कविताग्री में ही 'मानमी' का निजस्व स्वर धनित है। वास्तव प्रेम के मोह के टूट जाने के माथ ही प्रेम-कल्पना को पेन्द्रित पर कवि- हृदय की मारी प्रावाना तथा प्राशा घोरे-धीरे सुस्पष्ट रूप धारण कर वि. जीवन दे ध्र वतारा वे प म उदिन हुई है। यही रवीन्द्र की 'मानम- प्रतिमा है। 'सोनार तरी' म हृदयवेग स्तिमित हा गया है तथा कवि-वित्त म गम्भीर मान्ति एवं कवि-दृष्टि में प्रगाइतर रसावेग का पचार हुआ है । 'सोनारतरी' मी 'मानम सुन्दरी' कविता में 'मानमो' की 'मानसी प्रतिमा को प्रतीत अनागत र चिरन्तन रसालोक मे पहुँचाकर विचित्त ने उसे रमानुभूनिये परम पालम्बन ए म ग्रहण किया है-- छिने खेलार सगिनी एषन हयेछ मोर ममर गहिनी, जीवनेर अधिष्ठात्री देवो । जीवन की अधिष्ठात्री देवी,अपनी मानस-सुन्दरी वो लवर कवि 'सोनारतरी' पर बंठ निरद्देशयात्रा' को निकला है--विश्वजीवन की चेतना में जागृत होकर रवि गाता हुआ चला है- मार कतद्दर निये जावे मोरे हे सुन्दरी बलो, योन पार मिडिवे तोमार सोनार तरी। मान ली तरी की चालक मानम-मुन्दरी इमरे उत्तर में हंस देती है। मानम. सुन्दरी रोमाम को नायिवा या परीक्षा की मोहनी के रूप में पविह्दय । पम्पिस सागर को मपित पर चली है फिर भी अपने रहस्य को सम्पूर्ण स्पस पन नहीं करती- तरीते उठिया, धानु तखन माये कि होयाय नवीन जीवन - १. मकुमार मेन, बांगला साहित्येर इतिहास, पृ० १४ निराला-काव्य पर वगला का प्रभाव . भेद कर वृहत्मसार की विभिन्न अभिज्ञता के स्वाद को ग्रहण करने निकल पडता है । सुकुमार सेन के अनुसार 'कडि प्रो कोमल' काव्य संग्रह से यह द्वितीय अर्थात् प्राड मुखीन युग का प्रारम्भ होता है। कवि-हृदय की अतृप्त विरह-वेदना प्रय ममंदहन का कारण न बन रस-परिणति का कारण बनती है एव भावापित अथवा 'माईडिएलाइज्ड' होकर एक पोर तो प्रतीन्द्रिय अध्यात्मलोक तर बढ जाती है, और दूसरी पोर विश्व प्रकृति वे योच फैल जाती है ।' यही से हम रवीन्द्रकाव्य के ब्रह्म तथा विश्व, जीव तथा जगत् वे अखड भाव का कारण समझ पाते हैं । हमारा जीवन एक अोर ग्रह द्वारा केन्द्रित सीमावद्ध है, दूसरी पोर विश्व में परिव्याप्त है । जीवन जहाँ ग्रह वेन्द्रित है, वहाँ 'मैं छोटा' म है तया 'पिंजरे की चिडिया' है । जीवन जहाँ विश्वमुखीन है वहां 'मै वडा' म है तथा 'वन की चिडिया' है। तपनकुमार वन्द्योपाध्याय के अनुसार इस प्रह म विश्व की ओर बढना, छोटा-मैं स बडे-मैं को और अभिसार ही रवीन्द्र दर्शन तथा रवीन्द्र-साहित्य वी मर्मवाणी है । 'सोनार तरी' वाव्य में पिंजरे क पक्षी तथा वन व पक्षी का पहला परिचय हम पाते हैं। जिस अभिनव जीवन-ध्यान स अनुप्ररित कवि साने वे पिंजरे से निकल पाए, जिस बृहत्तर जीवन-बोध से प्ररित यदि वा मानसाभिमार शुरू हुअा, उसी विकसित चेतना अथवा वृहत्तर जीवन-बोध को ही कवि ने सोनार तरी' कहा है । कवि के सोने के पिंजरे में एक सोने की तरी डोल रही है । पिजरे की चिडिया उस नौरे की सहायता से बाहर निक्लन की चेष्टा पर रही है। रवि पहले अपने व्यक्तिगत जीवन के सुख- दुख म मग्न थे, अब कवि विश्व-जीवन की प्रानन्द चेतना स उद्बुद्ध हुए हैं । पविचित्त का यह उद्बोधन ही 'सोनार तरी' याव्य की मर्मवाणी है। यद्यपि इस चिन्तनधारा का मूत्रपात, जैमावि हम पहने यह नुवे है, 'कडि पो कोमल' से हो गया था मोर 'मानसी म प्रारर इसको और भी अधिक स्पष्टता प्राप्त हुई । भाव तथा पालानुमार मानसी की पविनामो य दो स्तर लक्षित होते हैं। पहले स्तर को वविता म हम देखते है कि प्रम-स्वप्न छिन्न- भिन्न हो गया है और पविचित्त प्रात्मस्थ होकर स्थूल प्रेम की अतृप्ति तथा नानि से चलकर स्थिरतर प्रारमरति मध्य प्राथय ढूंढ़ रहा है। फिर भी मनन्द्र की पति विल्लुल लुप्त नहीं हो गई है । इसीलिए प्रश्न है- हदपेर धन कभु घरा याय देहे ? । १ मुकुमार सेन, बागला साहित्येर इतिहास, तृतीय सएड, पृ०१३ तपनकुमार बन्योपाध्याय, रवीन्द्र त्रिशासा.., ३ परिशिष्ट सामना दिवो करना न पडे- मुलसाता जल तरल प्रनल है प्लावित कर जग को प्रसीम रोदन लहराता, खडी दिग्वयू, नयनों मे दुख को है गाया प्रवल वायु मरती है एक मधीर श्वास, है करता अनय प्रलय का-सा मर जलोच्छ्वास, यह चारों पोर घोर समयमय क्या होता है ? क्यों सारा ससार प्राज इतना रोता है ? जहा होगया इस रोदन शशेष, बयो सखि, क्या है वही तुम्हारा देश' परन्तु रवीन्द्र की कविता जीवन में भागना नहीं, जीवन को परिपूर्णरूप से पाने गोव्याकुलता है जो साधारण मानवी प्रिया की सहायता से सभव नही वरन् उसके लिए तो एक ऐसे व्यक्ति की पावश्यकता है रहस्याच्छन्न विदेशिनी हो- माधार रजनी मासिने एपनि मेलिया पाखा, सध्या-पाका स्वर्ण-मालोक परिने का। शुधु मासे तब देहसौरम, सुयु काने मासे जलकतरव गाये उरे पडे वायुमरे तप केमेर राशि । विक्ल हृदय विवश शरीर डाकिया तोमारे कहिय अधीर- 'कोया माय मोगो, करह परश निकटे प्रासि ।' कहिये न कया, देखिते पाव नानौरव हासि । निष्कर्ष में हम कह सकते हैं कि यह पविता वास्तव में अनुवाद नही वरन् रवीन्द्र के भावों का सचयन कर निराला ने अपने मन के अन्तदंन्ट गो एक नया रूप देना चाहा है । रवीन्द्र के 'मानस मुन्दरी' जैसे भतीन्द्रिय रूप को ग्रहण पर उसकी नयी सष्टि में यह पन्तदंद ही अधिक प्रकट हुमा है जहाँ वह स्पूल तथा मनोदिप प्रेम का समन्वयात्मर रूप बन गया है। रवीन्द्र की पविता का स्थायित्व, इसी पन्तन्दपारण, इस पविता को प्राप्त नहीं हुआ है। निराला में पलायनवादी प्रवृत्ति पधिर लक्षित होती है जहाँ रवीन्दी कविता में निग तथा विश्व समन्बयामा बोध से परिपूर्ण जीवन की प्राजिमोदा पधित दिगाई पड़ती है। निरामा पो इस पलायनारमा भाव सप्रेषण के लिए रवीन्द्र सोपविता भाव-प्रमा परिवर्तन करना परा है और इस प्रकार निराला-काव्य पर बगला का प्रमाव मानस-सुन्दरी विदेशी, 'अपरिचिता' है क्योकि वहाँ कवि स्थूल प्रेम को अतृप्ति तथा ग्लानि से विमुख होकर स्थिरतर प्रात्मरति के मध्य प्राश्रय ढूंढ रहा है । और निराला म विराटत्व की जिज्ञासा के साथ ही अवचेतना से अनुप्रेरित रोमास का पुट कविता को कुछ और ही रूप दे देता है। इसी कारण रवीन्द्र को 'विदे- शिनी' 'अपरिचिता निराला के लिए 'प्रिय' तथा 'सखि' । चूंकि निराला की मानस सुन्दरी उसकी अपनी प्रिया है इसीलिए वह उसे गाना भी सुनाती है, जो निराला को मौलिक सयोजना है- प्रिय, समालती हुई कपोलों पर के कुचित केश, मुझे चढाया बाह पकड अपनी सुन्दर नौका पर, फिर समझ न पाया, मथुर सुनाया कैसा वह सगीत सहज-कमनीय-कण्ठ से गाकर । इसके अतिरिक्त निराला अपनी प्रिया के सान्निध्य म पाकर वास्तविर जगत् वी क्रूरता को भूल जाते है, यह भी निराला को मौलिक समाजना है- मिलन मुखर उस सोने के सगीत राज्य मे मैं बिहार करता था,- मेरा जीवन-धम हरता था, मोठी थपकी क्षम्य हृदय मे तान-तरग लगाती मुझे गोद पर ललित कल्पना को यह कभी सुनाती कमी जपाती। जगकर पूछा, कहो कहाँ में पाया ? हंसते हुए दूसरा हो गाना तब तुमने गाया फिर ब्याकुलचित्त होकर प्रिया वे 'त्रस्त वस्त्र' को पकडना भी काफी रोमाण्टिक है, यह भी निराला को मौलिक सयोजना है- झांका खिडको खोल तुम्हारी छोटी सी नौका पर, प्याकुल यो निस्सीम सिन्धु को ताल तरगें। गीत तुम्हारा सुनकर, विक्ल हृदय यह हुमा और जब पूछा मैंने पर तुम्हारे अस्त वस्त्र का छोर वास्तव म रवीन्द्र की 'सोनार तरी' या स्पर प्रति व्यक्ति या विश्व - साप मिसन के लिए मात्रा के भाव का प्रभाव निराला को कविता म दीसता है । निराला मी रविता में जीवन यो गास्तविक्ता स डरे हुए रवि का जीवन स पलायन (Escape) की इच्छा अधिक द्रष्टव्य है और वह एक ऐन भाव-देश में (Eutopra) भागकर जाना चाहता है जहाँ जीवन को फ़्र वास्तविस्तामा परिमिष्ट भनि हो नहीं जीवन को भी मनामी की सेवा में लगा दिया है। इसी स्पष्ट करते हुए तपनकुमार वन्द्योपाध्याय रहते हैं कि 'सोनार तरों' को भर्या ससार की तरणी ने विवया कोममार की मधिष्ठात्री को देवी रूप में कल्पना बात स्वय रवीन्द्रनाय नै व्याख्या करते हुए कही है। नेवध्य' और 'शाति नियतन' में रवीन्द्रनाय के जीवन-देवता का ध्यान विश्वदेवता के ध्यान में पर्यवसित हो जाता है परन्तु उस 'नवध्य' मोर 'शान्ति निकेतन' रे स्तर पर पवि 'मोनार तरी' के विक्या का प्रात्मगत रूप म ध्यान नहीं कर सके हैं। भाषामा (objective) ध्यान-कल्पना 'सोनार तरी' म स्पष्ट नहीं है पद्यपि इसका इगिन अवश्य मिल जाता है ।' 'सोनार तरो' म वृहत्तर जीयन-नेतना का योप हो जाता है किन्तु वह विषयगत (subjective) है तथा वह येयल बोधमान है। यह बोधमात्र ही परवर्ती रचना में विश्वजीवन की वास्तविक भूमिका को ग्रहण करती है और इस प्रकार जीवन-देवता विश्व देवता में परिणत हो जाता है। 'सोनार सरी' से होते हुए चित्रा' काव्य के भीतर से चलकर हम इस परिणाम में उपनीत होते हैं। 'निरुद्देश यात्रा के खिवैया में जीवन-देवता के बोध मा प्रथम भाभारा हम प्राप्त होता है । यहाँ 'दोष' शब्द का प्रयोग जान-यूभवर किया गया है। कारण जैसाकि तपनकुमार बन्योपाध्याय रहते हैं वि जीवन-देवता को रवीन्द्रनाय रे ने एक निदिष्ट तत्व के रूप में नहीं जाना है, वरन् उसकी एक भाव या प्राइडिया रूप में उपलब्धि की है। मीलिए जीवन देवता में प्रसग में हम रवीन्द्रनाथ में जीवन-देवता ज्ञान नहीं रहेंगे, जीवन-देवता या योध रहगे।' 'निरहंदा पात्रा को विदेशिनी ही में पवि के जीवन-देवता या प्रथम प्रपारा होता है परन्तु ये विदेशिनी कवि जीवनदेवता है यह बात तब तम पवि नहीं समझ पाए थे । जीवनदेवता का निगून मयोग प्रभी तय परिस्फुट नहीं हपा पा, पस रपि की नौवनम्पी वस्तु उदासीन व्ययगायी जात होते हैं । जिस रहस्यमीर में उसकी दूान है उम रहस्यलोक का पता रवि को नहीं है। उनको पूछने पर देवेदन मोन हेमते हैं। यह रहस्यमय हो अविरे जीवन कापर्णधार है। प्रकार 'मोनार नरी' में हम देगते. हि जिम जगत् म रवि जीवन में गोन रोफमर गो माता पात्र होगी वह जगत् लिग प्रकार अविरे मिए प्रस्पष्ट है उसी प्रारग रग मी पगल में मगायो परिपप पि लिए १. सामानणरया, १... FATAR.fदामा, ."
१६४ निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव कविता की मूलगत भावना मे प्रभेद आ गया है यद्यपि जहाँ कही वाक्यो को ग्रहण कर अनुवाद किया गया है वह सुन्दर तथा स्वच्छ हुआ है । उदाहरणार्थ- नोरवे देखायो अंगुलि तुलि =मौन इशारा किया उठा कर उंगलो तुमने । भौर दूरे पश्चिमे डुबिछे तपन गगन कोणे । =धंसते पश्चिम सान्च्य गगन में पीत तपन की मोर । और झलितेथे जल तरल अनल, गलिया पड़िछे अम्बर तल, दिपवधू येन छलछल-प्रॉखि प्रचजले =मुलसाता जल तरल प्रनल गलकर गिरता सा प्रम्बस्तल है प्लावित कर जग को असीम रोदन लहराता; खड़ी दिग्वयू, नयनों मे दुख की गाया। तथा हू हू करे वायु फेलिये सतत दीपंश्वास अन्य प्रावेगे करे गर्जन जलोवास । संदायमय धमनील नोर, =प्रबल वायु भरती है एक अधीर श्वास, है करता अनय प्रलय का सा भर जलोच्छ्वास, यह चारों भोर घोर सदायमय क्या होता है ? तट पर (विजयिनी) रवीन्द्रनाथ की दूसरी पविता 'विजयिनी' का अनुवाद निराला ने 'तट पर' शीर्षक से किया है । यह रवीन्द्र के चित्रा' काव्य-संग्रह में सगृहीत है। 'सोनार तरी' के उपरान्त ही रवीन्द्र का यह दूसरा काव्य-सग्रह है । मुबुमारसेन के अनुसार 'चित्रा वाम्प में 'सोनारतरी' रूपक ने एक विशिष्ट रूप धारण कर लिया है। रविमानम मुन्दरी, जीवन देवता रूप में, प्रेयसी राजी के सिंहासन पर अधि- प्टित होकर उसके जीवन की निगूड प्रेरणा दो नियत्रित कर रही हैं एवं उसकी समस्त सफलता-विफलता रा पूजोपहार ग्रहण कर रही है। कवि ने अपनी परिशिष्ट चैप्टा ही व्यजित हो पायी है और इसी कारण रूप का उदात्तीकरण (मवली. मंशन) यहाँ स्पष्ट हो उठा है। वामना के स्थगंमार से विरहित महिमामय नारी-मौन्दयं को अनवद्य प्रतिमा "विज्ञपिनी' है । ऐसा ज्ञात होता है कि बाणभट्ट को मानमो महाश्वेता को स्मरग र रवीन्द्रनाय ने विजयिनी का चित्र अस्ति किया है। पच्योदरलरोवर में नहार सोपान पारवर तीर पर पा सही हुई है सुन्दरी- छामासानि रक्त पदतले च्युत यसनेर मत रहिल पडिया प्ररण्य रहिल स्तम्प, विस्मये मरिया। इस रूप को कवि वासना-भोग के द्वारा बांधना नहीं चाले हैं। यह रूप महा- विश्वसगीत है । इस कविता में, समग्र विश्व-परिव्याप्न सौन्दयं की वन्द्रीभूत सता २ मम्मुख, मनगदेवता को हम प्रणाम करते देखते हैं। सौन्दपं-मत्ता को मनग देव भोग के बीच बाप नहीं सके है, उससे केवल प्रणाम र नापं हुए हैं- सम्मुखेते प्रासि समरिया दांडाल सहासा : मुखपाने चाहित निमेषहीन निश्चत नयाने क्षणकाल तरे। परतणे भूमि परे जानु पाति वसि, निर्वाक विस्मयमरे नत्ततिरे, पुष्पपनु पुष्प वर मार समपिल पदप्रान्ते पूजा-उपचार ठूए शून्य करि । निररात्र मदन पाने चाहिला सुन्दरी शान्त प्रसन्न वपाने । रवीन्द्रनाथ इम भाव के सम्बन्ध में कहते हैं-'सौन्दयं को हमारी वासना से, मोम से हटारर स्वतन्त्र म्प में उगे नहीं देखने पर उमरी पूर्ण रूप से देखना नहीं होता है। उस पशिक्षित प्रसयत, ममपूर्ण दृष्टि से हम जो कुछ देरते हैं, उसमे हमे नृप्ति नहीं मिलती है, तृष्णा ही बदती है।" प्रयाग जीवन चौधुरी या बला है वि सौन्दर्य-योधरे साप रवीन्द्रनाथ की यह सपम-भावना राप्रथं हम तभी समझ पाएंगे रद हम यह समझ लेंगे रि बाहर रे साप मन्नर की मंत्री की स्थापना से ही सौन्दना बोप होता है और मह मंत्री तभी सभव हो मरेगी जब बाहर की पिसी चीज से अपने स्वार्थ सरनाम :मादिस्य.
निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव अस्पष्ट है । 'सोनार तरी' में जो विरोध तथा वेदना दिखाई पड़ती है वह मूलत रम बोध की अस्पष्टता के कारण है।" परन्तु 'चिया' मे यह बोध और अस्पष्ट नहीं रह जाता है । अब कवि के सम्मुख दो जगत् स्पष्ट हो उठे हैं-एक रूपमय विश्वजगत् दूसरा भावमय स्वप्न-जगत् । यह दोनो जगत् ही अपने स्व-पार्थक्य को लेकर कवि के सम्मुख स्पष्ट हो उठे हैं। एक जगत् मे कवि नाना प्रकार के दुख, दैन्य तथा प्रभाव अभियोग की अनुभूति कर रहे हैं एव दूसरे जगत् में परिपूर्णता तथा सार्थकता की अनुभूति हो रही है-वहाँ सब दैन्य विलीन हो चुका है, समस्त प्रभाव मिट चुके है। किन्तु इस स्पष्टता में भी कवि मन के विरोध का शमन नहीं हो पाया है। कवि इन दोनो पृथक् जगत् के मध्य सामजस्य स्थापित करना चाहते हैं परन्तु इनके बीच सामजस्य स्थापित नही कर पा रहे हैं। कवि जब भाव- राज्य म चले जाते हैं तब उस अन्तर के अन्त पुर से समस्त विश्वजगत् निर्वासित हो जाता है, और फिर जय विश्वजगत् म वापिस चले माते हैं, तन उस सुख स्वर्गलोक से उन्हें विदा लेनी पडती है। चूंकि रवीन्द्रनाथ पलायनवादी (एस्केपिस्ट) कवि नहीं हैं इसीलिए वास्तविक जगत् को वे तुच्छ नही समझते हैं पौर मुख स्वर्गलोक से उसके सामजस्य की चेष्टा करते हैं। कारण इन दोनो के सामजस्य से ही मानव की मानवता का परिचय उद्घाटित होता है जैसे रवीन्द्रनाथ ने स्वय कहा है-- 'वास्तविक जगत् म मनुष्य का जो परिचय है वही उसकी प्रतिष्ठा है । परन्तु बाहर के इस परिचय का यदि भीतर के सत्य के साथ मिलन न हो तो उसके अस्तित्व में एक प्रात्मविच्छेद घटित होता है ।' रवीन्द्र इन दोनो का मिलन चाहते हैं परन्तु चाहने पर भी मिलन नहीं हो पा रहा इसीलिए कहीं केवल रूप. लोक का वर्णन है तो कही भावलोक या । परन्तु इन दोनो लोको मे सामजस्य दूदते हुए कवि ने अनुभव क्यिा दि 'दीनता से होकर महिमा बीच, क्षुद्र से होकर वृहत्तर में मध्य, मकोणता से होरर व्यापकप्ता ने बीच मात्मा के विकाम द्वारा मानव का मन मुक्ति लाभ करता है, और उस मादर्शलोक में समस्त श्रेष्टता के बीच विभपने जीवन देवताको मधिष्ठित देखते हैं। परन्तु चित्रा में सामजस्प नहीं हो पाया है केवल कवि के रूप-जगत् मे पर्षात् सीमा म उसे बांधने की १ तपनकुमार बन्योपाध्याय रवीन्द्र-निशामा, पृ. ३१ २ रवीन्द्रनाय: 'धर्म' ३. पनकुमार बन्योपाध्याय रवीन्द्र-निहामा, पृ०४८ परिशिष्ट ---तो भी यह कहना ही पड़ेगा कि इस भाव को व्यजना रवीन्द्रनाथ की कविता में, कामदेव के प्रतीक की सहायता से, अधिक प्रेषणीय (Communicative) हो पाया है । कामदेव चिरन्तन वसन्त के प्रतीक हैं और उस चिर-वसन्त का निरस्त्र होकर विजयिनी को प्रणाम करना विजयिनी के स्यूल देह-सौष्ठव ये चित्र को एक्दम हो उदात्त बना देना है पर निराला का- नव-वसन्त कापा पत्रों मे, देख हगों को कोर। -~-से साधारण वसन्त ऋतु का ज्ञान होता है और उसके- मूदित वसन्त पत्रों पर। --इस समाचार से वसन्त का चिर-सौन्दर्य के सम्मुख प्रात्मसमर्पण नहीं वरन् उसे देखकर भावावेग में मूछित होना ही प्रकट होता है । और आखिर के दो तरु से वृन्तच्युत फूल, गिरे उस तरपी के चरणों पर से ऐमा प्रकट होता है कि वसन्न वे मूर्षित होने पर उसके देहभार से विध्वस्त वृक्ष से वृन्तच्युन होकर कुछ पूल प्रस्मात् ही तरुणी के चरणो पर गिर पडते हैं न कि वसन्त के प्रणाम-निवेदन स्वरूप वे गिरे हैं । वास्तव में अनग वे प्रसग को हटाकर साधारण वसन्त के प्रमग को उत्यापना द्वारा निराला रवीन्द्र भाव का मौन्दयं को खो देते हैं। इमा भनिरिक्त निराला नए शब्दों की सपोजना से अपवा रवीन्द्र में दो वाम्यवहार न करने से रवीन्द्र की कविता के चित्रात्मर रूप वैभव का ममाहार पपनी कविता में नही कर पाये हैं । उदाहरणा- खड़ी बूर सारस की जोड़ी, रया जाने क्या या कहर दोनों ने गोवा मोड़ी। प्रभिधारमा चित्र रे रूप-वैभव में निराला ने 'क्या जाने क्या-क्या बहार' सन्दी को सपोजना पर उसो वापिस पगौन्दर्य को हानि पर दी है। रवीन्द्रनाय का यह चित्र पपिर सुन्दर तथा भावों रे मोपण में प्रपिर महापर है- स्पोत दम्पति यति शान्त प्रापित धम्पारे से पन बंषु घुमनेर प्रसारले निमते रितेनिस विद्वत पूजन ।। यालय में पूरीमविता में बिनने भी मभिधारपस मित्रो का परांन है ये मून १६८ निराला-काश्य पर धगला का प्रमाव लिए प्रेम न कर हम उसे उसके लिए ही (A thing for its own sake) प्रम करें। इस प्रकार, रवीन्द्रनाथ की विजयिनी' कविता की आधारभूत चिन्तनधारा के सम्बन्ध मे हम जान जाते हैं। इसके अनुवाद मे भी निराला ने वही प्रथा अपनायी है जिस प्रथा से अनु- प्रेरित उन्होंने निरुद्देश यात्रा' का अनुवाद किया था अर्थात् अनुवाद न परवे वेवल कुछ भावो को ग्रहण कर अपने मौलिक भावो के साथ उसकी सयोजनावर हुए प्रपती चिन्तनधारा यो एक नवीन रूप दिया है । यह कविता भी सन् १६२४ को लिखी गई थी और निराला के जीवन या यह एक ऐसा समय था जयकि वे रोमान्स तथा वृहत्तर जीवनोपलब्धि के बीच मडरा रह थे मोर इस भावतं म फंसे हुए वे रोमान्स को ही अधिक रूप दे रहे थे । रवीन्द्र की भांति वे स्थिरतर पात्मरति मे सौन्दर्य की अनुभूति कर स्व का विश्व में विकास नही कर पाये घे इसीलिए जहाँ तक रवीन्द्र यो सौन्दर्यानुभूति मे घासना के पुट का लेशमात्र नही वहाँ निराला की सौन्दर्यानुभूति म वासना चारो मोर छाई हुई है मौर उस वासना को रूप देकर ही वे शान्त नहीं होते है वरन् पादटिप्पणी लिखकर स्पष्ट भी कर देते हैं--- नान याहुमों से उछालतो मोर, तरगों मे हूये दो कुमुदों पर हसता पा एक कलापर निराला ने ही इरावा भाव स्पष्ट किया है-(दिन में भी) दो कुमुद (उरोजो) को देखकर चन्द्र (मुख) हंस रहा था।' यद्यपि विजयिनी' रविता के समान इस पविता या पन्त भी प्रेम के उदात्तीकरण र हुमा है- वायु सेविका-सो पाकर पौधे युगल उरोज, याह, मधुरापर । तपणी ने सय पोर देख, मन्द हंस, दिपा लिये उन्नत, पीन उरोग, उठा र शुष्क वसन पा पोर। मूधित परान्त पत्रों पर, तब से वृन्तध्युत पुष फल गिरे उस तरणोपरणों पर। १. प्रवाम जीवन चौपुरा रवीन्द्रनार सौन्दर्य दरांन, प. ३१ परिशिष्ट उड़िया पलितपिल गलितनीहार फैलासेर पाने । बहू बनगध बहे अकस्मात प्रान्त वायु उत्तप्त प्राग्रहे सुटाय पड़ितेछिल सुदीर्घ निश्वासे मुग्ध सरसोर वक्षे स्निग्ध बाहुपाशे । फिर निराला ने जहाँ-जहाँ रवीन्द्र के भावो का भापानुवाद किया है वै साधारणतया ठीक नहीं हो पाये हैं और वही-कही गलत प्रषं भी लगा लिये हैं, जैसे रवीन्द्र के मच्छोदसरसोनोरे का अनुवाद 'सीण-कटि तटिनी के तट' गलत किया है । 'अच्छोर' का अर्थ 'क्षोण-कटि' नही है। फिर रवीन्द्र के वसन्त, यथा- वसन्त नवीन सेदिन फिरितेछिल भूयन च्यापिया प्रयम प्रेमेर मतो कापिया कापिया भणे क्षणे शिहरि तिहार - इस प्रसग को निराला ने वसन्त तथा वायु म बाट वर भाव वे धनस्व को कम कर दिया है जैसे- मव बसन्त करता था वन की सर X X पाप रही थी वायु प्रीति को प्रथम रात को नवागता, पर प्रियतम-कर पतिता सो प्रेममयो। फिर रवीन्द्र के समीरण के 'प्रताप' को 'मेल' में परिवर्तित करना उचित नहीं हमा है । यया-- समीरण प्रलाप बक्तिपिल प्रन्यापसघन पल्लव सायन तले, मध्याहो ज्योति पूदित बनेर बोले, और निपला पर नीरव प्रपरिचिता-सी किरण-बालिकाएँ महरों से रोल रही थी प्रपने ही मन से, पहरों से। पपपि कहीं-नहीं अनुवाद स्वय सपा मुन्दर हुमा है ममापि भाव को प्रेपरणीय मनाने में गम भी हमा है। उदाहरणा- १७० निराला काव्य पर बगता का प्रमाव भाव-प्रर्यात् नारी के सौन्दर्य की अभिव्यक्ति म सहायक रूप मे हैं। वै चित्र एक ऐसे वातावरण की सृष्टि करते हैं जिसस नारी का सौन्दर्य द्विगुणित हो जाता है और वह सौन्दर्य बहुत ही सहज प म हमारे लिए प्रेपणीय बन जाता है । परन्तु निराला न अधिकतर उन सब चित्रो को त्याग दिया है और इस प्रकार सौन्दर्यानुभूति के वातावरण की सृष्टि नही कर पाये हैं । परन्तु रवीन्द्र के वे चित्र वातावरण के लिए बहुत ही उपादेय सिद्ध हुए हैं, जैसाकि- चौविके उठिते छिल मपुर रागिनी जले स्थते नमस्तले । सुन्दर काहिनी के येन रचिते छिलो छाया रौद्रकरे, अरण्येर सुप्ति पार पातार मर्मरे, यसन्तदिनेर कत पदने कम्पने निश्वासे उच्छवासे मापे प्रामासे गुजने चमके झलके। येन माकाशवीनार रविरश्मि तत्रोगुलि सुरवालिकार चम्पक प्रगुलियाते सगीत झकारे कांदिया उठित छिल मौन स्तब्धतारे वेदनाय पीडिया मूछिया। तरुतते स्खलिया पडितैछित नि दाम्दे विरले विवश पकुलगुलि, कोकिल केवति प्रशान्त गाहितधिस, विफल काकलि कांदिया फिरित छिल बनातर पुरे उदासिनी प्रतिध्वनि, पायाय प्रदूरे सरोवर-प्रान्तदेशे क्ष निझरिणी पल नृत्य यागाइया मारिणश्यफिक्षिो कल्लोस मिशितेछिल, तृणाचित तोरे जलासक्तस्वरे मध्याह्न समोरे सारस घुमाये छिल दोघं गोदाखानि भगोमरे बाकाया पृष्ठ लये टानि पूसर गनार माझे, राजहस दल मामारी बलायोपि सरवर घचस रपजिबन नदी-संक्त विहार कामात परिशिष्ट निराला बहुत ही सफल हुए हैं। यहाँ अनुवाद का प्रश्न नहीं निराला के कवित्व रा प्रश्न है और कवित्व का विषय अर्थात् लज्जाशीला नारी का वर्णन बहुत ही सफल हुअा है और उसके लिए निराला को मौलिक उद्भावनाएं भी बहुत ही स्पष्ट हैं तथा व्यजना में सहायक बनी हैं । यथा- देख चतुर्दिक, सरिता मे उतरी तिर्यम्हग, अविचल-चित । तया- तरुणी ने सब मोर देख मन्द हंस, छिपा लिए उन्नत पीन उरोज उठाकर शुष्क वसन का छोर --प्रादि वर्णन में पिपयानुकूल नारी का ही रूप चित्रित हुमा है। कदाचित् इसी कारण कविता के शीर्षक 'विजयिनी' वो बदल र 'तट पर' शीपंक के द्वारा नारी के नदी-तट पर एक साधारण स्प-सौन्दर्य का चित्र प्रक्ति करना ही निराला को प्रभीप्ट था और इस वायं मे वे सफल भी हुए हैं। ज्येष्ठ (वैशाख) रवीन्द्रनाथ की रचनाम्रो की बालानुक्रमिक सूची के अनुसार तीसरी मनू. दित कविता 'ज्येष्ठ' है । रवीन्द्रनाथ वे 'कल्पना' काव्य-मग्रह मे सगृहीत यह वयिता है जिसका शोपंक रवीन्द्रनाय ने 'सार' रखा था। रवीन्द्र की रचनामो की कालक्रमानुसार पालोचना करते हुए हमन यह देखा कि 'चित्रा' की कवितानों में सोनारतरी' : विशुद्ध हृदयावेग में उपर भक्ति रग का लेप लगा हुमा है । 'मानमसुन्दरी' मानो भव पवि-हृदयनी वासना के प्रतीत में जारर 'अन्तर्यामी' हो कवि निगूढ व्यत्तिरव योग-मुख वो विचित्र अभिनता के बीच से प्राध्यात्मिक प्रभिव्यक्ति तथा परम सार्थवता बीमोर बढाए ले जा रही है। चिया' के पश्चात् 'चंतानि' में हम पयि को जीवन रस की सर्वागीण भनुभूनि में मनुप्रेरित मंचावल्य-स्पृहा से मुक्त दमते हैं । जीवन में महज मानन्द तथा प्रकृति के सरल गोन्दयं ने पवि चित्त में रम की इस परि. पूर्णता को मचित रिया है । यथा- पाय मामि हेरितदिमागेर मासो पाप मामि जगतेरे दासिपापि मालो। १. गुरुमर सेनगा सरिर गिराम, दलीय सरार १७२ निराला काय पर बंगला का प्रमाय तोरे श्वेत शिलातले सुनौल वसन लुटाइछे एक प्रान्त स्खलित गौरव प्रनाहत =रखी साड़ी शिला-खण्ड पर ज्यो त्यागा कोई गौरव-वर । तथा- जलप्रान्ते क्षग्य क्षण कम्पन राषिया, सजल घरगचिह्न प्रक्यिा मांकिया सोपाने सोपाने, तोरे उठिला रूपसो; X X x प्रगे प्रमे यौवनेर तरंग उच्छल लावण्येर मायामन्त्र स्थिच लर बन्दी हपे प्राथे =वियोग से नदी-हृदय कम्पित कर, तट पर सजल-वरण रेखाएं निज प्रकित कर, केश-भार जल-सिक्त चली वह धीरे-धीरे शिला खण्ड को प्रोर, x X अंग-अंग मे नव-यौवन उच्छ खल, किन्तु मापा लावण्य-पाश से नम्र सहास प्रचंचल । X तथा- सेवकेर मतो सिक्त तनु मुधि निल पातप्त पंचते =वायु सेविका-सो पार पोधि युगल उरोज, बाह, मपुरापर। इसके अतिरिक्त निराला को कुछ मौलिर उद्भावनाएं सराहनीय हैं जैसे नारी का अपने साप साडी ताना- साप वसन्ती रंग की, पुनी हुई, गाड़ी लाई थी। निष्कर्ष में हम कह सकते हैं कि रवीन्द्र पी विजयिनी कविता से भाव ग्रहण परने पर भी निराला की नारी विजयिनी की तरह विश्व सौन्दयं का प्रतीक नहीं परन् यह एक माधारण सुन्दरी सग्गाशीसा नारी है और उसके वर्णन में परिशिष्ट ज्वलितेछे सम्मुखे तोमार लोलुप चिताग्निशिखा लेहि लेहि विराट अमर- निखिलेर परित्यक्त मृत स्तूप विगत वत्सर करि भस्मसार चिता ज्वले सम्मुखे तोमार ।। है वैरागी करो शान्ति पाठ। उदार उदास कण्ठ याक छुटे दक्षिणे प्रो वामे~ याफ नदी पार हपे, पाक चलि प्राम हते प्रामे, पूर्ण करि माठ। हे वरागी, करो शान्ति पाठ ।। यहां पर भी निराला रवीन्द्र की दूसरी कवितामो के अनुवाद के समान केवल बुध भावो का चपन पर अपनी कविता म उसे स्पान दे अपनी मौलिक चिन्तनधारा का विकास करते है और इस कविता म पूर्णरूप से अपनी चिन्नन. धारा की अभिव्यक्ति में सफल हुए हैं। सम्पूर्ण कविता एवं प्रखण्ड इकाई (whole) रूप में हमारे सम्मुख उपस्थित हुई है और रवीन्द्र के भाव को मयोजना द्वारा एक प्रखण्ड मौलिक भाव प्रस्फुटित हो उठा है। निराला के जीवन की दो मौलिक चिन्तनधारापो का समन्वित रूप है यह कविता | कवि-मन का विद्रोह तथा विवेकानन्द वे कर्ममय प्रदतवाद को रूप मिला है इस कविता में। भूमिकारूप में कविता का पहला पद निराला को मौलिक रचना है- ज्येष्ठ कुरता-शता के उपेष्ठ ! सृष्टि के मादि ! बरे उसवत प्रमम प्रकार! प्रन्त ! सृष्टि के जीवन के हे मन्त! विश्व के ग्यापि। घरावर हे निदेय प्रास सृष्टिमर रे प्यारल माहान !~मचल विश्वास । सटिभर के शामिल प्रथसान !-दोघं निश्वास देते हैं हम तुम्हें प्रेम सामन्त्रण, प्रामो जीवन-दामन, यापु, नौवन-पन । रम प्रारमविदिशोह की भावना से अनुप्रंरित हा समार में शालि माना चाहते हैं। रमवार ही पान्ति र दोवर है मौर मी भाव रा सम्परा रविता रे पन्त मेहपाजो निरामानी भरनी मोनिर देन है।
निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव 'तालि' में सुकुमारसेन के अनुसार कवि के दृष्टिकोण के दो रूपो की उपलब्धि होती है। एक तात्विक, दूसरा रोमाष्टिक और 'कल्पना' की अधिकारा कवितामो में रोमाण्टिक दृष्टिकोण का भाव प्रसार हो भधिक परिलक्षित होता है। परन्तु यह साधारण रोमाण्टिक दृष्टिकोण नही है कारण इस रोमाण्टिक दृष्टि-माधुर्य का अर्थ है--प्रत्यक्ष इन्द्रियानुभूति से निर्लिप्त होना-जो भाव हमे रवीन्द्र को कवितामो में सहज ही मिल जाता है। धीरे-धीरे 'चंतालि' के प्रशान्त परिवेग के अवसान पर मुक्ति का जो शान्तरस पविहृदय को प्राप्लुत किये हुए था वह जीवन को नूतनतर साधना के रुद्र आह्वान से खतम हो जाता है ।' सुकुमारसेन कहते हैं कि यह साधना नवनियुक्त मृत्य का श्रमदुर्भर कर्म- चाचल्य नही, विश्वस्त सेवक का लीलासाहचर्य है।" 'वर्ष शेप' तया 'वैशाख' के उन्मादनृत्य म पविहृदय ने सर्वविध जडता तथा सस्तार से मुक्त होने के दुर्जय अाह्वान को स्वीकार किया है। छाडो डाक, हे रुद्र यशाख । मागिया मध्याह्न तन्द्रा जागि उठि बाहिरिब द्वारे, चेये रब प्राणोशून्य दग्धतृण दिगन्तेर पारे निस्तब्ध निर्याक । हे भैरव हे रुद्र वंशाख । रुद्र एव गम्भीर रूप का प्रकृति-वर्णन रवीन्द्र-काव्य मे हमे पहले-पहल यहीं दीख पडता है । वर्णन मे चित्र तथा सगीत का समन्वय दर्शनीय विशेषता है- है भैरव, हे वैशाख । धुलाय यूसर रुक्ष उड्डोन पिगल जटाजाल, तप क्लिष्ट तप्त तनु, मुठे तुलि पिनाक कराल बारे दामोडक, हे भैरव हे रुद विशाख । प्रवृत्ति यं इस रुद्राप के सम्बन्ध में एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पमियबुमार सेन कहते हैं कि कवि प्रकृति में इस स्प को अधिक देर तक सह नही पाते हैं। दूर दिशा रे घने पुजमेघ को दीघं छाया को यपि 'धरणोर स्निग्ध गन्धोद्धास' से कोमल बना देते हैं और वैशात से अनुरोध करते हैं कि वह मपने शान्तवारि के द्वारा होमाग्निशिखा को निर्वापित कर दे। .. मुगुमारसेन · बागना साहित्पर तिहास, तृतीय सएट २ वही, १० ११६ ३ भमयमार मेन, प्रातिर कवि रवीन्द्रनाथ, पृ. ११६ परिशिष्ट वर्ष के उज्ज्वल प्रयम प्रकाश ग्रोम ऋतु से वर्ष का प्रारम्भ मानने पर ज्येष्ठ वर्ष का प्रथम महीना होता है कारण वैशास मे वसन्त छाया रहता है गरमी नही दिखाई पड़ती। निवपं में हम कह सकते है कि निराला इस कविता मे रवीन्द्र से भाव- ग्रहण करने में सम्पूर्ण रूप से सफल हुए हैं और रवीन्द्र के प्रभाव को इन्होंने मपनी मौलिक चिन्तनधारा की सहायता से रम रूप में प्रारमसात् कर लिया है । यही कारण है कि यह कविता निराला की थेप्ठ ववितानो में अन्यतम सिद्ध होती है। विवेकानन्द को अनूदित कविताएं विवेकानन्द की कविताप्रो का अनुवाद करते हुए निराला ने रवीन्द्र की कवितापो के तथाकथित अनुवाद की भाति केवल कुछ भावो का चयन कर मौलिक विचारी या प्रतिपादन नहीं किया है वरन् मक्षरस अनुवाद किया है । विवेकानन्द के प्रभाव ने ही निरालाको इन कवितामो के अनुवाद के लिए प्रेरित किया था। डॉ. रामस्लिाम शर्मा इस सम्बन्ध में लिखते हैं कि 'परिमल' की रहस्य- वादी कविताओं को एक साथ पढने पर पता लगता है कि रवीन्द्र से अधिक कवि पर विवेकानन्द का प्रभाव है । इप्टदेव की मातृ रूप मे कल्पना को स्वामी विवेकानन्द ने ही लोकप्रिय बनाया था। 'देवी तुम्ह मैं क्या हूँ' 'एक वार बस मोर नाच नू श्यामा' मादि रचनाप्रो में यह प्रभाव स्पष्ट है । इन कवितामो की विशेपता यह है कि भावुक्ता रे मासुपो रे वदले जीवन को दारुण व्यया को गहरे रंगो मे मरित किया गया है और माता के रूप मे इष्टदेवी मानन्द से अधिक शक्ति की देवी बन गई हैं। मन् २४ मे निराला जी ने स्वामी विवेकानन्द को कई रचनामी का अनुवाद किया था। डॉ. रामविलास शर्मा का कहना है कि सरल भाषा में प्रवाह में वे मूल बंगला ये भोज को भलीभाति सुरक्षित रख सके हैं। इन कवितामों में गार से विरनि पौर ध्वस से प्रेम प्रकट किया गया है। यायावादी कदियों ने प्रलयपर रद्ररे ताण्डव में जो गीत गाये हैं, उनका श्रीगणेश 'नाचे उस पर यामा' पाहि पवितामों से होता है।' निरासा ने मप्रथम विवेकानन्द को 'गार गौ7 गुनाते सोमाया भनुवाद रिया पार पक्षरसः मनुवाद होने पर विमानन्द यो चिननधारा सम्बन्ध में मानाचना की भावपयरता मोर नहीं रह गई है क्योकि मूल भावपारा में रही मी परिवर्तन नहीं हुमा पौर न ही .. रामरिनास सोःनिरागपु.१६ .. रामरिणाम रामा: निराला..६६ निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव कर्मयोग–को विमल पताका मौर मोह का प्रस्त, सत्य जीवन के फल का त्याग । मृत्यु मे तृष्णा में प्रमिराम एक उपदेश, कर्ममय, जटिल, सृप्त, निष्काम देव, निश्शेष ! तुम हो यत्र-कठोर किन्तु देवयत, होता है ससार प्रतः मस्तक-नत। और इस मौलिक भाव को स्पष्ट करने के लिए निराला ने रवीन्द्र के 'वैशाख' से भावो का चयन किया जो कविता के वातावरण में सुन्दर रुप से समा गया है। और उनका अनुवाद भी सुन्दर हुअा है यद्यपि यह अनुवाद अक्षरशः शब्दानुवाद नही है जैसे- धुलाय धूसर रक्ष उड्डोन पिंगल जटाजाल, तप: विलप्ट तप्त तनु, मुखे तुलि विषारण भयाल, कारे दाम्रो डाक, घोर जटा पिंगल मंगलमय देव ! योगिजन सिद्ध । धूलि पूसरित, सदा निष्काम ! उग्र ! लपट यह तू को है या शूल-करोगे बिद्ध उसे जो करता हो माराम । तया- ज्वलितेथे सम्मुखे तोमार लोलुप चिताग्निशिखा लेहि सेहि विराट अमर निखिलेर परित्याक्त मृत स्तूप विगत वत्सर करि भस्मसार =उगलते पागधरा प्राकाश; पडा चिता पर जलता मृत गत वर्ष प्रसिद्ध मसार, तया-तोमार गेरुमा वस्त्रांचल दामों पाति नमस्तले-विशाल वैराग्य प्रावरिया -माम हो गई, फलानो वह पीत गेरुमा यस्त्र, रजोगुण का यह मनुपम राग, तो हम देखते हैं कि मूल भावधारा की अभिव्यक्ति में चयन क्येि गये भाव यहुत ही सफल रूप से सयोजित हुए हैं । इसके अतिरिक्त वर्ष को समंमय जीवन या प्रतीक मानने के कारण निराला ने "शास" शोक की बदस बर "ज्येप्ट" घर लिया है; मारण ज्येष्ठ है- परिशिष्ट गलता है हिम-ग टपक्ता गुहा मे, घोर नाद करता हुमा टूट पड़ता है गिरि, स्वप्न-समजल-विम्ब जल मे मिल जाता है। इसके अतिरिक्त निराला ने भूल कविता के कुछ शब्दो मे हेर फेर कर तथा कुछ नवीन वाक्यो का सयोजन पर भाव को और भी अधिक तीव्र बना दिया है। जैसे- शियरे दाडाप तुमि रेते निर्वाक मानन, छल छल प्राखि चाह मम मुखपाने । और निराला का अनुवाद है-- चिन्तु निशाकाल में देखता हूँ, शम्पा शिरोभाग मे खड़े तुम चुपचाप, पल छल प्रसि, मुख की पोर एक्-रक। यह अनुवाद मूल से प्रपिय सुन्दर है। यद्यपि एक स्थान पर निराला की, बुध वायो यो कविता में फिर से दुहरावर पपं को सरल करने की पेप्टा सराव नहीं तो येकार अवश्य रही है । जहाँ विवेकानन्द वल एक वाक्य को-~- महा मन्यकार फेरे अन्धकार-युरे -दुहराते है वहाँ निराला पूरे भाव को दुहरा जाते है- प्रलय समय में जब ज्ञान-जय-माता-सप होता है प्रगणन ब्रह्मा-प्रासपरके, यह प्यस्त होता ससार, पार पर जाना है की सीमा नहीं रह जाता एप मर्प-धन-सारा-गृह- यद्यपि हम इमे दोष नहीं कह सकते मयापि गरी हम गुण पन्तर्गत भी नहीं रस सरते। निष्कर्ष में हम रह गये है कि उन गामान्य टि-विम्युनिराने पर भी मर प्रसाद गामीण दिगदर।। हेरते हो मेरे निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव निराला ने किसी नए भाव को सयोजना की बात ही सोची है। अनुवाद की दृष्टि में यह एक सफल अनूदित कविता है जहाँ शीर्षक से लेकर अन्त तक मूल की स्थिति उसी रूप में वर्तमान है । विवेकानन्द की कठिन चिन्तनधारा समन्वित कविता के सुष्ठु अनुवाद से निराला के गम्भीर बगला-ज्ञान का पता चलता है । उदाहरणार्थ- मेरुतटे हिमानी पर्वत, योजन योजन से विस्तार अभ्रभेदी निरभ्र माकाशे शत उठे चूड़ा तार। झकमकि ज्वले हिमशिला शत शत विजलि-प्रकाश। उत्तर प्रयने विवस्वान, एकोमूत सहस्र किरण, कोटि दसम करधारा ढाले यवे ताहार ऊपर, शृगे भृगे मूर्छित भास्कर, गले चूड़ा शिखर गह्वर, विकट निनादे खसे पड़े गिरिवर, स्वप्नसम जले जले जाय मिले।' योजनो तक फैला हुमा हिम से प्राच्छादित मेर तट पर है महागिरि अभ्रभेदी यह शृंग प्रभ्रहीन नम मे उठे, दृष्टि झुलसती हुई हिम की शिलाए थे, विद्युत विकास से है शतगुण प्रखर ज्योति उत्तर भयन मे उस एफोमूत कर को सहल ज्योति-रेखाएं कोटि-य-सम-सर-कर-पारा जय दासती हैं। एक एक शृंग पर मूच्छिम हुए-से-भुयन-मास्तर है दोसते, , विवेशनन्द वीरवाया, पृ. ४० .
परिशिष्ट १८१ १ तारों की कोमल झंकार ताल-ताल पर चली बढ़ाती ललित वासना का संसार । इसके अतिरिक्त, इस स्पष्टीकरण की प्रक्रिया में उन्होने अपनी ओर से कई वाक्यो को सयोजना कविता में की है, जैसे- मलय वनज-बन-यौवन हास २. दहक दहक दह कपा रहीं मू-नम के छोर । ३ (बढ़ा हाय दोनों मिलने को) चलती प्रकट प्रेम प्रमिसार ४. (किन्तु कलाधर को ही देता) सारा विश्व प्रेम सम्मान ५. 'दयामयो' कह कह चिल्लाते, मां, दुनिया का देखा डोंग। तथा ६ (नाचे उस पर श्यामा), धन रण मे लेकर निज भीम कृपाण । निवपं में हम कह सकते है कि निराला ने श्रेष्ठतम अनुवादो मे इस पविता यो स्थान मिलंगा । मनुवाद करते हुए कविता मे छिपे हुए सौन्दर्य का उद्घा. टन करने में कवि निराला समर्थ हुए हैं और वेवल समयं ही नहीं, वहीं-वही अधिन पयित्वमय होकर विवेकानन्द से भागे भी बढ गए हैं । 'मनामिका' (१९३७) मे जो तीसरी विवेकानन्द की अनूदित कविता है उसका शीर्षन है 'ससा के प्रति'। यह भनुवाद भी विवेकानन्द को अन्य अनूदित कवितामी के समान मुन्दर तथा स्वच्छ है । विवेरानन्द की पटिन भाषा या मुन्दर तथा प्रांजल अनुवाद सत्य ही प्रशसनीय है । उदाहरणार्य- पक्षहीन शोन विहाम, ए ये नहे पप पालावार मारंवार पाइछ प्रापात, केन कर वृयाय उद्यम? धार विद्या जप यज्ञ यत, स्यायं होन प्रेम ये सम्बल, देश शिक्षा देय पतंगम अग्निशिखाररि प्रालिगन । एपमुग्य अन्य कोटापम, प्रेममत्त सोमार हृदय हे प्रेमिरा, स्वापं मसिनता अग्निपुणे कर विसर्जन । पक्षविहीन हो रहे हो तुम, मुनो यहारे वियोग सरस । नहीं रही बानेश पय है. यहाँ माग जानोगे तुम बार यार पापात पा रहे–स्य कर रहे हो रखम। 342 १८० निराला-काव्य पर बगला का प्रभाव विवेकानन्द की दूसरी कविता 'नाजुक ताहाते श्यामा' का अनुवाद भी सुन्दर हुआ है । इस कविता में कोमल तथा कठोर भाव के चित्रों को पास-पास दिखाया गया है । कोमलता प्रत्येक को प्रिय है, यह भी अभिव्यक्त है-'मन चाय हासिर हिन्दोल 'इत्यादि । कठोर भार को कोई नही चाहता है, सभी उससे दूर रहना चाहते हैं । विन्तु कोमल-प्राण व्यक्ति यदि दारिद्रय, दुख, रोग, महामारी इत्यादि का देख कर भय से अभिभूत हो जाते है, फिर वह कोमलता यथार्थ दृष्टि से दुर्बलता तथा कापुरुपता है, उसको हटाकर सर्वदा मृत्यु को प्रालिंगन करन के लिए प्रस्तुत रहना ही वीरत्व तथा मनुष्यत्व है एव इस प्रकार के कठोर भावुक के हृदय पर श्यामा नृत्य करती है, वही यहां परिणत है । निराला ने अनुवाद करते हुए इसी भाव को सुन्दर रूप से व्यजित किया है और स्थान-स्थान पर मूल से अधिक कवित्वमय भाव को प्रकट किया है । उदाहरणार्थ- भ्रमर चचल, कत या कमल दोले। -चल-शतदल पर भ्रमर विहार । नि सन्दह निराला का यह अनुवाद पधिक पवित्वमय है । ववित्वमय का और एक उदाहरण- स्वरमय पत्रमिनिचय, लुकाय पाताय, शुनाय सोहागवाणी । -स्वरमय विसलय, निलय विहगों के यजते सुहाग के तार ॥ इसक अतिरिक्त विवेकानन्द के भावो को निराला नूतन शब्दो म सयाजित कर उमका प्रपूर्व स्पष्टीचरण करन म समय हुए हैं। उदाहरणार्थ- पएंसेला धरातल छाय, राग परिचय मावराशि जेगे उठे। =परा-अपर धारण करते हैं,- रगदे रागों के प्राकार देख देख भावुक जन मन में जगते कितने माय उदार। मोर इस स्पष्टीकरण की प्रक्रिया में निराला कही-कही विवेकानन्द स धागे भी बढ़ गए हैं। जैस- थतिपये वोणार भकार, वासना विस्तार, राग ताल मान सये। बनती है पुति पर मे वोगा, परिशिष्ट रइल पखन केवल सुतेर तुण्ठन-३ तखन केन विस्मयेर एइ कुण्ठने काल-प्रकालेर पाच-विचार चुप, प्रिय ?' मुधाकर द्वारा अनूदित निराला की एक गद्य कविता के कुछ प्रश का अनुवाद भी नीचे प्रस्तुत किया जाता है : प्राज ठण्डक अधिक है। वाहर मोले पड़ चुके हैं, एक हपते पहले पाता पडा या- पड़हर कूत-को कूल मर चुरो थी, हवा हाड़ तक वेप जाती है, गेहूँ के पेड़ ऐंटे खड़े हैं, खेतिहारों में जान नहीं मनमारे दरवाजे कोड़े ताप रहे हैं एक दूसरे से गिरे गले बाते करते हुए, कुहरा छाया हुमा। इमा बगला-अनुवाद है- प्राज ठाण्डा क्छुि येशि बाइरे पड़े शिल हप्ता खानेक प्रागे झरेधे बरफ प्रहरेर फूल के कूल गेथे मरे हामोया हाडेर मितर याच्ये दिये गमेर चारा तेबरे रये खास क्सिानदेर फुति नेइ मने मनमारा-दरजाय मागुन पोयाच्छे ए प्रोर साये निचुगलाय पपये कया ऐयेथे दुपामा । (३) निराला को बंगला-कविताएं निराला अपने प्रारम्भिर पात में बगला-भाषा मे रविताएँ रषा करते थे जिमरा प्रमाण उनग एक दोहा है- .. सनिरंजन बस्योगध्याय :माधुनिक भारतीय माहिश्य, पृ. ५० २. दही:.५८ निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव जड़-समेत उखाड़कर, हर बला पय की साफ करके। शोर से मा मिला सागर, उठ रहे हैं कृष्ण नम को स्पर्श करने के लिए व्रत, अनुवाद की सुन्दरता बगला के प्रख्यात कवि सत्येन्द्रनायदत के अनुवाद से तुलना करने पर और भी स्पष्ट हो जाती है - निःशेपे निबेछ तारादल, मेघ एसे प्रावरिछ मेघ स्पन्दित, ध्वनित अन्धकार, गरजिछे घूयंवायुवेग ! लक्ष लक्ष उन्माद पराग वहिगत बन्दिशाला हते, महावृक्ष समूल उपाड़ि फुत्कार उड़ाये चले पये। समुद्र संग्रामे दिल हाना, उठे देउ गिरिचूड़ा जिनि नमस्तल परशिते चाप ! (२) निराला की कविताओ का बंगला-अनुवाद निराला के भनुवादो की मालोचना के उपरान्त निराला की कवितामो ये बगला-अनुवाद का उल्लेख कर देना यहाँ अनुचित न होगा । अनुवाद साधारण- तया लेखक मूल की भावनामो से प्रभावित होकर ही करता है । परन्तु निराला जहाँ चगला से प्रभावित हुए थे वहा बगला को भी उन्होंने प्रभावित किया है इसीलिए उनकी कवितामो का अनुवाद हमे बगला-भापा मे प्राप्त होता है । सुधाकर चट्टोपाध्याय द्वारा अनूदित कविताप्रो के कुछ प्रश नीचे उदृत किये जाते हैं- कर से मैं पय देख रही, प्रिय पौर न तुम्हारे रेख रही, प्रिय । तोड़ दिये जब सब प्रवगुंठन रहा एक वेवस सुख लुण्ठन तय क्यों इतना विस्मय कुण्ठन ? मसमय-समय न करोतको, प्रिय ? इसरा वगला-मनुवाद- पवे पेके पप घेये प्रार काल पुणे यसेर माधि सोमार सागि हाय प्रिय । टल परन सकल प्रवगुष्ठन- परिशिष्ट : रइल यखन केवल सुखेर लुण्ठन--३ तखन केन विस्मपेर एइ कुण्ठने काल-प्रकालेर बाछ-विचार धुप, प्रिय " सुधार द्वारा अनूदित निराला को एक गद्य-कविता के कुछ प्रश का अनुवाद भी नीचे प्रस्तुत किया जाता है प्राज ठण्डक अधिक है। बाहर प्रोले पड़ चुके हैं, एक हफ्ते पहले पाला पड़ा या- प्रडहर फूल-को कूल मर चुकी थी, हवा हाड़ तक बेच जाती है, गेहूँ के पेड ऐंठे खडे हैं, खेतिहारों मे जान नहीं मनमारे दरवाजे कौड़े ताप रहे हैं एक दूसरे से गिरे गले बातें करते हुए, कुहरा छाया हुमा। इसका बगला-अनुवाद है- प्राज ठाण्डा किछु बेशि बाइरे पड़ेथे शिल हप्ता खानेक प्रागे झरेथे बरफ अडरेर फूल फूल गेछे मरे हाम्रोया हाडेर भितर याच्ये विये गमेर चारा तेवरे रयेथे खास किसानदेर फुति नेइ मने मनमारा-दरजाय मागुन पोयाच्थे ए मोर साये निचुगलाप का कया येथे पाग (३) निराला को यंगला-कविताएं निराला अपने प्रारम्भिक माल मे बगना-भाषा में रविताएँ रमा करते थे जिमका प्रमाए उनका एर दोहा है- . शांतिरंजन पोपल्याप :माधुनिर भारतीय साहित्य, पृ.५० २. पहा :.१८ १८४ निराला-काध्य पर बंगला का प्रभाव जड समेत उखाडकर, हर बला पथ को साफ करके। शोर से मा मिला सागर, उठ रहे हैं कृष्ण नम को स्पर्ण करने के लिए दूत, अनुवाद की सुन्दरता बगला के प्रख्यात कवि सत्येन्द्रनाथदत्त के अनुवाद से तुलना करने पर और भी स्पष्ट हो जाती है - नि शेषे निबेछ तारादल, मेघ एसे भावरिछे मेध स्पन्दित, ध्वनित अन्धकार, गरजिछे घूर्ण्यवायुवेग ! लक्ष लक्ष उन्माद पराण वहिंगत बन्दिशाला हते, महावृक्ष समूल उपाडि फुत्कार उडाये चले पथे। समुद्र संग्रामे दिल हाना, उठे टेउ गिरिचूडा जिनि नमस्तल परशिते चाय! (२) निराला की कवितायो का बंगला-अनुवाद निराला के अनुवादो की मालोचना के उपरान्त निराला की कवितामो ये अगला-अनुवाद का उल्लेख कर देना यहाँ अनुचित न होगा। अनुवाद साधारण- तया लेखर मूल की भावनामो से प्रभावित होकर ही करता है । परन्तु निराला जहाँ वगला से प्रभावित हुए थे वहा बगला को भी उन्होने प्रभावित किया है इसीलिए उनको कवितामो का अनुवाद हमे रगला-भापा म प्राप्त होता है । सुधाकर चट्टोपाध्याय द्वारा अनूदित कविताभो के कुछ प्रा नीचे उद्धृत किये जाते हैं- कब से में पप देख रही, प्रिय और न तुम्हारे रेख रही, प्रिय । तोड दिये जब सय मवगुंठन रहा एक पेषल मुख लुण्ठन तब क्यों इतना विस्भय कुण्ठन ? प्रसमपनामपरी पड़ी, प्रिय? इसना बगला-मनुवाद- ये पेके पप धेये पार काल गुरणे बसेर प्रापि तोमार लागि हाम प्रिम । टुटल यक्षन सरस भवगुण्ठनाइ परिशिष्ट - रइल यखन केयल सुखेर लुण्ठन-इ तखन केन विस्मयेर एइ कुण्ठने काल-कालेर बाछ-विचार चुप, प्रिय ?' सुधाकर द्वारा अनूदित निराला को एक गद्य-कविता के कुछ प्रश का अनुवाद भी नीचे प्रस्तुत किया जाता है : प्राज ठण्डक अधिक है। बाहर प्रोले पड़ चुके हैं, एक हपते पहले पाला पडा या- पड़हर फूल-को फूल मर चुकी थी, हवा हाड़ तक बेप जाती है, गेहूँ के पेड़ ऐंठे खड़े हैं, खेतिहारों मे जान नहीं मनमारे दरवाजे कौड़े ताप रहे हैं एक दूसरे से गिरे गले बातें करते हुए, कहरा छाया हुमा। इसका बगला-अनुवाद है- प्राज ठाण्डा किछु बेशि बाइरे पढ़ेथे शिल हप्ता सानेक प्रागे झरेछ बरफ प्रड़रेर फूल के कूल गेथे मरे हाम्रोया हाडेर मितर याच्थे विधे गमेर चारा तेबड़े रयेछे खाड़ा किसानदेर फुति नेइ मने मनमारा-दरजाय प्रागुन पोयाच्थे ए मोर साये निचुगलाय साये कया ऐयेथे दुपाता।' (३) निराला को बंगला-कविताएं निराला भपने प्रारम्भिक काल मे बगला-भाषा में मयिताएँ रपा परते थे जिमका प्रमाण उनरा एक दोहा है- ..शातिरंजन कायोपाध्याय :माधुनिक भारतीय सारिरव १.१७ २. वही:पु.५८ १८४ निराला-काव्य पर बंगला का प्रमाव जड़-समेत उखाड़कर, हर घला पथ को साफ करके। शोर से प्रा मिला सागर, उठ रहे हैं कृष्ण नम को स्पा करने के लिए द्रुत, अनुवाद की सुन्दरता वगला के प्रख्यात कवि सत्येन्द्रनाथदत्त के अनुवाद से तुलना करने पर और भी स्पष्ट हो जाती है - निःशेपे निवेछ तारादल, मेघ एसे प्रावरिछे मेघ स्पन्दित, ध्वनित मन्धकार, गर्राजछे घूर्यवायुवेग । लक्ष-लक्ष उन्माद पराग हिगत बन्दिशाला हते, महावृक्ष समूल उपाडि फुत्कार उड़ाये चले पपे । समुद्र संग्रामे दिल हाना, उठे ठेउ गिरिचूड़ा जिनि नमस्तल परशिते चाय ! (२) निराला की कवितानो का बंगला-अनुवाद निराला के अनुवादो की मालोचना के उपरान्त निराला की पवितामो रगला-अनुवाद का उल्लेख कर देना यहाँ अनुचित न होगा। अनुवाद साधारण- तया लेसर मूल की भावनामो से प्रभावित होकर ही करता है । परन्तु निराला जहाँ बगला से प्रभावित हुए पे वहा वगला को भी उन्होने प्रभावित किया है इसीलिए उनकी कवितामों का अनुवाद हमे बगला-भाषा में प्राप्त होता है। सुधाकर चट्टोपाध्याय द्वारा अनूदित कविताप्रो के कुछ प्रश नीचे उद्धृत रिये जाते हैं- ? कब से मैं पय देख रही, प्रिय और न तुम्हारे रेख रही, प्रिय । तोर दिये जप सब अवगुंठन रहा एक केवल सुख लुण्ठन सय क्यों इतना विस्मय कुण्ठन प्रसमय-समय न करो खड़ो, प्रिय? सपा बगला-अनुवाद- पये के पथ घेये भार कास पुणे बरोइ माधि तोमार सागि हाय प्रिया दृटल पखन सकस प्रवगुण्ठन- सहायक ग्रन्थों की सूची हिन्दी प्रकाशक ४. गुलाबराय प्रत्यकार ग्रन्थ १. वेदारनाथसिंह कल्पना और छायावाद २. गगाप्रसाद पाण्डेय महाप्राण निराला साहित्य ससार, प्रथमावृत्ति, म०२००६ ३. गिरीशचन्द्र तिवारी कवि निराला और उनका साहित्य भवन, इलाहाबाद, काव्य-साहित्य प्रथम सस्करण, २०१३ वि० सिद्धान्त और अध्ययन प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली ५. धीरेन्द्र वर्मा (म०) साहित्य कोप ज्ञान मण्डल लि०,वनारस याधुनिक हिन्दी-नविता गौतम बुक डिपो, दिल्ली, को मुख्य प्रवृत्तिया प्रथम प्रकाशन सन् १९५१ ७. नामवर सिंह छायावाद सरस्वती प्रेस, बनारस ८. 'निराला' मूर्यान्त परिमल गगा ग्रथागार, लखनऊ त्रिपाठी ६. 'निराला' मूर्यकान्त अनामिका भारती भण्डार, इलाहाबाद त्रिपाठी १०. 'निराला' सूर्यकान्त गीतिका भारती भण्डार, इलाहाबाद त्रिपाठी ११. 'निराला' मूर्यकान्त तुलसीदास भारती भण्डार, इलाहाबाद त्रिपाठी १२. 'निराला' मूर्यकान्त कुकुरमुत्ता तिाच महल, इलाहाबाद त्रिपाठी १३. 'निराला' मूर्यमान्त नए पत्ते त्रिपाठी १४. 'निराला' मूर्यकान्न बेला त्रिपाठी १५. 'निराला' मूर्यभान पपरा माहिरयार-मसन, प्रयाग त्रिपाठी
निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव
मा उसको कहती है रानी
प्रादर से, जैसा है नाम:
लेकिन उसका उल्टा रूप,
चेचक के दाग, कालो, नक-चिष्टी,
गंजा सर, एक प्रांख कानी ।
जैमाकि हम बता चुके है कि ये परोडियां निकृष्ट कोटि को कलागत कृत्रिमता
को प्रदर्शित नहीं करती हैं वरन् निराला को विद्रोही भावना ने हमारी सामाजिक
कुरीतियो पर व्यग्य-प्रहार करना चाहा प्रत फलस्वरूप इस प्रकार की कविताएँ
उन्होने लिम्बी जहाँ हृदय की व्यथा व्यग्य में परिणत हो गई हैं । यही इन
पैरोडियो का रूप है।
सहायक प्रन्यों की सूची ३४.विश्वरम्भनाथ महाकवि निराना-काव्य, उपाध्याय कला और कृतियां ३५. दाम्नुनायसिंह छायावाद युग मरस्वती मन्दिर, बनारस ३६. शिवप्रसादसिंह विद्यापति ३७ हजारी प्रसाद हिन्दी साहित्य प्रतर चन्द्र रपूर एण्ड मुस द्विवेदी दिल्ली ३८ हजारी प्रसाद हिन्दी साहित्य की भूमिका हिन्दी ग्रथ रत्नाकर कार्या- लय, ववई, चतुर्थ मस्करण बंगला ३६ प्रमियकुमार मैन प्रकृतिर कवि रवीन्द्रनाय विश्वभारती प्रथालय, लक्ना ४०. प्रमूल्ययन बगला छदेर मूलमूत्र मुखोपाध्याय ४१. चारचन्द्र कवि-रश्मि (द्वितीय सड) ए. मुखर्जी एण्ट को, बन्योपाध्याय कलकत्ता २. तपनकुमार रवीन्द्र-जिज्ञासा बन्योपाध्याय ४३. धूटिप्रसाद वक्तव्य विद्योदय लाइब्रेरी मुखोपाध्याय ४४. प्रवान जीवन रवीन्द्रनाथर सौन्दयं दांन ए मुगनी एण्ड सी०, चौधरी वसमत्ता ४५. प्रथमनाप विसी रवीन्द्रकान्य प्रवाह मित्र एष्ट घोप, बलात्ता (द्वितीय सण्ड) ४६. प्रयमनाप विशी नेहम्म्पति तया व्यक्तित्व भाधुनिक वागना रविवा एम. मि. मरवार गट (सम्पादर) मम लिमिटेड, कलकत्ता । मोहित सात साहित्य विचार मजुमदार vt रवीन्दनाय रापुर गीताप्रति विश्वभारतीयानय नूनन ममरण, १२५५वमान्दा २०. बोन्दनाय टापुर मचयिता ४७. बुद्धदेव बमु १६० निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव प्रन्यकार प्रकाशक १६ "निराला' सूर्यकान्त गीत-मुज हिन्दी प्रचार पुस्तकालय, त्रिपाठी बनारस १७ 'निराला' सूर्यकान आराधना साहित्यकार-ससद् प्रयाग निपाठी १८. 'निराला' सूयकान्त अणिमा युग मन्दिर, उन्नाव त्रिपाठी १६ 'निराला' सूर्यकान्त रवीन्द्र कविता कानन हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय, त्रिपाठी बनारस २० 'निराला' सूर्यकान्त चयन वल्यारण दास एण्ड ब्रदस, त्रिपाठी राणसी २१ 'निराला' मूर्यकान्त प्रबन्ध-पद्म श्री दुलारे लाल भागव, त्रिपाठी लखनऊ २२ 'निराला' सूर्यकान्त चायुक त्रिपाठी २३ 'निराला' सूर्यकान्त पत प्रौर पल्लव त्रिपाठी २६ 'प्रसाद' जयशकर काव्य क्ला और अन्य निवध २५ वच्चनसिंह क्रान्तिकारी रवि निगला काशी, प्रथम रास्करण, २००४ २६ मानव विश्वम्भरनाय निराला काव्य-दिशाएं २७ रवीन्द्र सहाय वर्मा हिन्दी-काव्य पर पागल परजा प्रकाशन, कानपुर प्रभाव २८ महावीरप्रसाद द्विवेदी सुरपि विवर २६ रामधारीसिंह सस्कृति में चार मध्याय राजपाल एण्ड सन्स दिनकर दिल्ली २. रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी साहित्य वा नागरी प्रचारिणी सभा, इतिहास पासी, नूनन मम्मरण। " रामविलास रामा निराला जन-प्रकाशन-गृह, बम्बई। ३२ रामरतन भटनागर बपि निराला.एक अध्ययन विताय मल, इलाहाबाद ३३ वाजपेयी नन्द दुसार प्राधुनिक साहित्य सहायक प्रन्यों की सूची 69.Codwell Illusion & Reality; A History of the Sources of Poetry Poetic Image People's Publish. ing House, Bombay, 1947 70. Cecil Day Lewis Jonathan Cape, London, 1947 71. Hurbert Spencer The Origin and Function of Music 72. Hippolyia Tenne History of English Literature 73. I.A. Richards Principles of Literary Criticism Routledge & Kegan Paul Lid London. 74. Progue 75. Shakespeare 76.T.S. Eliot Romantic Agony Hamlet Selected Essays Faber & Faber Ltd., London Geroge G. Harrap &Co.Ltd. 77. W. H. Hudson An Introduction to the Study of Literature कवि रहस्य संस्कृत ७८. उद्भट ७६.कालिदास मेघदूत मजुर्वेद पत्र-पत्रिकाएं ८१.रामलोचन पिपाक-पालोचना पा २५ प्रक १२. नया साहित्य, निराला पर २२. साहित्य पविरातिर २००७ ८४. दीपू पास्मोगनी जनरल माफ क्रिोगोपिकल स्टडीज, पुनाई, १est १६२ निराला-काव्य पर बंगला का प्रभाव " " " " " " ॥ ग्रन्थकार प्रन्य प्रकाशक ५१ रवीन्द्रनाथ ठाकुर चयनिका विश्वभारती ग्रन्थालय ५२ रवीन्द्रनाथ ठाकुर सकलन ५३ रवीन्द्रनाथ ठाकुर पुनश्च ५४ रवीन्द्रनाथ ठाकुर साहित्य ५५ रवीन्द्रनाथ ठाकुर निवध-सग्रह ५६ रवीन्द्रनाथ ठाकुर जीवन-स्मृति ५७ विश्वपति चौधुरी वाव्ये रवीन्द्रनाथ मित्र एण्ड घोप, कलवत्ता ५८ विवेकानन्द वीरवाणी विवेकानन्द सोसाइटी, लग्ता ५६ विमल काति रवीन्द्र काव्य कालि गुरुदास चट्टोपाध्याय एण्ड समद्दार दासेर प्रभाव सस, कलकत्ता ६० शातिरजन प्राधुनिक भारतीय वन्द्योपाध्याय साहित्य ६१ शातिदेव घोप रवीन्द्र संगीत ६२ सुधाकर चट्टोपाध्याय प्राधुनिक हिन्दी साहित्य शरत् साहित्य, कलकत्ता बागलार स्थान,प्रथमखण्ड ६३ सुकुमार सेन वागला साहित्यर इतिहास, प्रथम संस्करण, १६५३, तृतीय खड (रवीन्द्रनाथ मर्डन बुक एजेन्सी, कलकत्ता ठाकुर) ६४ सुकुमार सन वागला साहित्यर इतिहास, द्वितीय सस्करण, महंन युक तृतीय खण्ड (रवीन्द्रनाय एजेन्सी सन् १९५२ ठाकुर) ६५ क्षितिमोहन सेन बलाका-याव्य-परिक्रमा अंग्रेजी 66 AC Bradley Oxford Lectures on Macmillan & Co. Poetry London 67 Albert, D. Van Literary Criticism The Liberal Art (Editor) 10 America Press, New York 68 Arthur Comp. A History of Eng. Thomas Nilson & ton Ricket lish Literature Sons Ltd
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