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Mahakavi Subrahmanya Bharati Ki Rashtriya Kavita

Dr. N. Sundram · 2011/03

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महाकवि सुब्रह्मण्यं मारती
की राष्ट्रीय कविताएँ
(हिन्दी पद्यानुवाद)

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महाकवि सुब्रह्मण्यं मारती
की राष्ट्रीय कविताएँ
(हिन्दी पद्यानुवाद)
रूपान्तरकार
डॉ० एन० सुन्दरम्
डॉ. विश्वनाथ 'विश्वासी'
लोकभारती प्रकाशन
१५ ए, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद-१

लोकभारती प्रकाशन
१५-ए, महात्मा गाधी मार्ग
इलाहाबाद-१ द्वारा प्रकाशित
मूल्य:४००
प्रपम सस्करण
१५-अगस्त, १९७१
मुपरफ़ाइन प्रिंटर्स,
१-सी, बाई मायाग, इलाहाबाद

जिनका प्रोत्साहन हमे
पग-पग पर मिलता
उन्ही
आदरणीय गुरुवर डॉ. उदयनारायण तिवारी
को
सादर समर्पित

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कुछ शब्द हमारे देश में सास्कृतिक एकता किसी राजनैतिक प्रभाव में न तो पनपी, न तो मुरझाई । हमारी सास्कृतिक एकता एकरूपता मे भी कभी विश्वास नहीं करती रही है । प्रत्येक सृजनात्मक युग में भारत के विभिन तारो से राग समय-समय पर छेडे जाते रहे है, वे एक आन्तरिक समरसता क कारण एक दूसरे को और अधिक लम और ताल मे बाधते रहे है । भक्तिमान्दोलन से लेकर राष्ट्रीप आन्दो- लन तक समस्त भारतीय भाषाओ के साहित्यो में हम इस प्रकार की समतालता का निदर्शन मिलता है । राजनैतिक सत्ता ने हमारी सास्कृतिक चेतना को बराबर तुच्छ समझा । इसी कारण मुगल सम्राटो के शासन को नकारने के लिए हमारे कवियो ने राम राज्य, वृन्दावन, गोलोक अनहद नाद सुख की योजना को और एक प्रदेश का राग दूसरे प्रदेश के राग के साथ अपने माप चेतना की विवक्षता से समताल होता रहा । उनीसवी शताब्दी के अन्त और बीसवी शताब्दी के प्रारभ में एक साथ जो पददलित भारतीय जनता के उद्धार के लिए भारत जननी की महाशक्ति की प्राणप्रतिष्ठा नाना प्रकार के मत्रो से की गई, उसके पीछे भी देश की एकता का वही प्रवहमान सत्य था। बकिमचन्द चट्टोपाध्याय, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, नर्मदा चिपुलणकर और सुब्रह्मण्य भारती का प्राविर्भाव एक शृखला के रूप में हुमा । अपनी भाषा, अपने देश और अपनी सभावना का साक्षात्कार इन सभी ने किया, क्योकि ये सभी, भानेवाले युग के द्रष्टा थे। इन सबमें अपनी मातृभापा के प्रति प्रगाढ भनुराग था। अप्रेजी की दासता के विरुद्ध तीव्र तोम था और भारत की सभी भाषामो के प्रति ममता थी। यह आकस्मिक सयोग नहीं है कि भारत जननी को कल्पना के साथ साथ समस्त भारतीय सतानो को एक भाषा की कल्पना इसी युग मे सम्भव हुई। केशवचन्द्र सेन, दयानन्द सरस्वती, शारदाचरण मित्तर और सुब्रह्मण्य भारती ने हिन्दी सीखी, हिन्दी में एकता लाने की क्षमता देखी और दूसरी ओर भारतेन्दु और उनके साथियों ने दूसरी भापामो से हिन्दी में अनुवाद प्रस्तुत किए।

स्वतत्रता प्राप्ति के बाद एकता के लिए हमारा एक सहज प्रयल राज- नैतिक प्रयत्न से जुड़ गया । इससे सुविधाएँ तो बढी, पर तनाव भी साथ ही साथ वढने लगा । इस तनाव को कम करने मे निजी प्रयत्न ही अधिक कारगर होगे, ऐसा मेरा विश्वास है । ये प्रयत्न जितना ही स्वत: उद्भूत होगे, उतना ही इनका गहरा प्रभाव पडेगा। मुझसे जब सुब्रह्मण्य भारती के हिन्दी रूपान्तर पर दो शब्द लिखने को कहा गया तो मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि यह रूपान्तर तमिल भापी और हिन्दी भापी दो लेखको ने मिलकर किया है । यह प्रयत्न स्वतः उद्भूत है और इसमें हमारे राष्ट्रीय एकता का शिव निहित है। सुब्रह्मण्य भारती का प्रादुर्भाव सन् १८८२ में हुआ और भारतेन्दु की हो भांति वे अल्प अवस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हुए । उनका निधन सन् १९२१ मै हुआ। भारतेन्दु को 'भारतेन्दु' विरुद्ध पंडितो की सभा मे आशीर्वाद के रूप मे मिला । यह विरुद सरकार द्वारा दी गई "सितारे हिन्द' खिताब की तरह दासता का पुरस्कार नहीं था, यह था जनता का सम्मान । भारती को भी 'भारती' को उपाधि स्थानीय जनता द्वारा ११ वर्ष की अवस्था मे उनकी प्रतिभा को प्रखरता के उपलक्ष में दी गई। उन्होने अपने बाल्यकाल में ही अंग्रेजी शिक्षा के विरुद्ध विद्रोह किया और १८६८ से लेकर १६०२ तक काशी में रहकर उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा पाई । यहाँ रहकर उन्होने भारत की महान् शक्ति का साक्षात्कार किया। १९०४ से १६१२ तक उनका जीवन, विद्रोह को जगाने, भारत की शक्ति को प्रामंत्रित करने और विदेशी शासन से लोहा लेने में ही लगा रहा। इस मामले मे वे भारतेन्दु से अधिक क्रियाशील रहे । उनके कृतित्व का सबसे उवर काल १९०६ से लेकर १९१६ है । भारती को प्रतिभा, भक्ति, प्रेम मौर राष्ट्र जागरण के भनुभवों को मुखरित करने में एक तरह से समर्थ थी, पर उन्माद उनमें सबसे अधिक भारतीय जागरण का था। गापीयुग के प्रादुर्भाव के पूर्व ही उन्होने कृषको मौर श्रमिको के राज्य की रस्पना की, भारत के गौरव की स्थापना की, स्वतंत्रता की जन-जन कल्याणी प्रतिभा को मावार दिया, भावी सुख शाति को माधार भित्ति तयार की, प्रतीत के प्रत्याक्लन से वर्तमान के दुस-दन्य का बोध मिटाया, समस्त भारत की प्रादेशिक विशेषतापो को एक घ्यज स्तंभ के नीचे लाकर खड़ा कर दिया और भारत की प्रकृति को राष्ट्रीयता की भावना से एक साथ द्रवित कर दिया। उस कवि की उपलब्धि या हमारे लिए माज एक ऐतिहासिक महत्व है । मैं हृदय से प्रस्तुत रूपान्तर का स्वागत करता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि इससे ऐसे विनम्र पर सहज प्रयत्नो की शृखला की कडी बनेगी। इस प्रयत्ल द्वारा हिन्दी भाषीगण भारती के कृतित्व से गौरवान्वित होगे। मुझे आशा है कि हिन्दी से भी इसी प्रकार के रूपान्तर तमिल में प्रस्तुत किए जायेंग । -विद्यानिवास मिश्र अल्हलादपुर, 'सूरत सदन' गोरखपुर (उ० प्र०) अनुक्रम है ३१ ३३ ४० ४१ सुब्रह्मण्य भारती एक परिचय १ रे विदेशियो, भेद न हममें २ वन्दे मातरम् ३. नमन करें इस देश को ४ भारत सर्वोत्कृष्ट देश है ५ सब शत्रुभाव मिट जाएंगे ६ चलो गावें हम ७ जय भारत ८. भारत माता ६ भारत मां की गुरुवा १० उन्मादिनि मा ११ भारत जननी जागरी १२ भारत मां के पवित्र दशाक १३ भारत माता की नवरलमाला १४. भारत मां की ध्वजा १५ वर्तमान भारतीय १६ जानेवाला भारत व मानेवाला भारत १७ भारत समुदाय १८ स्वतत्रता की चाह १६ स्वतत्रता का पौधा २० स्वतत्रता की प्यास २१ स्वतत्रता देवी की स्तुति २२ स्वतत्रता २३ नाचेंगे हम २४ तानाशाह जारका पतन २५. गन्ने के खेत में २६ बेल्जियम को स्तुति ४५ ४६ ४८ ५० ६२ ६ ६६ ७२ सुब्रह्मण्य भारती एक परिचय महाकवि सुब्रह्मण्य भारती का जन्म सन् १८८२ में सुदूर दक्षिरा के तिरुनेलवैलो के शिवपेरी नामक गांव म हुआ था। उनके पिता का नाम चिन्नस्वामी अय्यर और माता का नाम लक्ष्मी अम्माल था। प्रगाढ़ तमिल ज्ञान, गणित को अपूर्व योग्यता तथा सूक्ष्म मेघा शक्ति से प्रभावित होकर एट्टयपुरम के महाराजा ने चिन्नस्वामी अय्यर को अपने दरबार में रख लिया था। राजघराने से सम्पर्क के कारण कवि सुब्रह्मण्य का भी दरबार में आना-जाना होता था। भारती के जन्म देने के पांच साल बाद ही माता लक्ष्मी अम्माल का देहान्त हो गया था और उनके देहान्त के बाद चिनस्वामी अय्यर ने दूसरा विवाह भी कर लिया था। सौभाग्य को बात थी कि विमाता कारण भारती को कोई कष्ट हुप्रा । अपनी बहन भागीरथी के साथ भारती को दूसरो माता से वह प्यार मिला, जो पहली माला से भी प्राप्त नहीं हुपा था। चिन्नस्वामी भारती के शारीरिक विकास का ध्यान न करते हुए मौलिक विकास पर ही बल देते थे । इसका सकेत भारती की 'प्रात्मकथा' से मिलता है। एकात इन्हें अधिक प्रिय था । अकेले ही घर से बाहर बगीचो, तालादो आदि के किनार बैठे देर तक प्रकृति-सौन्दर्य को निहारा करते थे। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव भारती के प्रत करण पर बालकपन से ही पडने लगा था। यही कारण है कि उनको रचनाप्रो में आगे चलकर प्रकृति के प्रति एक कुतूहल और आकर्षण के दर्शन हुए । भभिजात ब्राह्मण-कुल में जन्म लेने के कारण उत्तम संस्कार के साथ-साथ, घर में थानेवाले विद्वतजनो का सम्पर्क भी भारतो को मिलता रहा। बाल्यकाल से ही पिता के साथ दरबार में जाते, और स्वरचित छोटी-छोटी कविताओ को सुनाने के साथ ही यह घोषणा भी करते थे कि "उनके कारण यह अभिशाप मिटकर रहगा कि तमिलनाडु में आधुनिक काल में तमिल का कोई प्रख्यात कवि नहीं हुआ।" इन सब बातो से महाराजा बहुत प्रसन्न होते थे और भारती के साथ ही उनके पिता को भी प्रोत्साहन दिया करते थे। कवित्व शक्ति से प्रभावित होकर ही राजदरबार के विद्वानो ने सुब्रह्मण्य को भारती' की उपाधि से विभूषित किया था। इसके पूर्व वे सुब्बय्या के नाम से पुकारे जाते थे। प्रारम्भ से ही भारती को भावुकता स्पष्ट होने लगी थी । अध्ययन काल में भी सब कुछ भूलकर मि के बीच नाचने-गाने लगते थे । अग्रेजी की उच्च १० सुब्रह्मण्य भारती को राष्ट्रीय कविताएँ शिक्षा पाने के लिए, पिता ये मादेश में भारती निरसयेली गये, पर अग्रेजी में मध्ययन में पभी उनका मन नही रमा। फिर भी पिताजीमी माशा का पालन करना ही पा । प्रतएव कुछ दिनो ये मध्ययन यार में ही भारती ने मच्छी अग्रेजी सीम ली। सच तो यह है कि अंग्रेजी से उन्हें हार्दिक पुरणा पी। उपरोक्त पटना या उल्नेस करते हुए अपनी प्रामयया में भारती एप स्थान पर लिया है, "गरन हृदय पिताजी ने मेरे समुचित विकास और उच्च शिक्षा के उद्देश्य को ध्यान में रखकर मुझे यहाँ भेजा । परिणामस्वरूप पिताजी के हजारो रुपयों का भपथ्यम हुभा, पर मुझे लाम एक भी नहीं हुमा । बदले में मुझे हजारो बुराइयों की एक ढेरी मिली, इसे मैं चालीस हजार मन्दिरों में जाकर यह सपता हूँ।" पिता व माता यो इच्छा के पारण यारह वर्ष यो अल्पायु में ही भारती या विवाह घेल्लम्मा नामक कन्या से सम्पन्न हो गया था। पेस्तम्मा उस समय बहुत ही छोटी थो । विवाह सस्कारको भारती ने सेल ही समझा था। वे बार-बार यहाँ थे कि अगर वशिष्ठ, राम और यल्लुवर की धर्मपलिया जैसी पत्नी विसी को मित्र तो वैवाहिक जीवन उचित है, अन्यया ब्रह्मचर्य ही अच्छा है। परम सौभाग्य की वात थी, उनकी धर्मपत्नी उनके मनोनुकूल हो पो । विवाह-मंडप में ही पत्नी के प्रति एक कविता सुनावर भारती ने अपने 'माशुकवि' होने का परिचय दे दिया था । घर पर भी पत्नी को सम्बोधित करते हुए प्रेम गीत गाते रहते थे। दम्पति की छोटी अवस्था के कारण इन गीतो का कोई प्रभाव या प्रतिकार तो सम्भव नही था, फिर भी चेल्लम्मा इन गीतों को सुनकर मानन्दविभोर हो जाया करती थी। विवाह के दो वर्षों के बाद ही भारती के ऊपर विपदामो की प्रत्यक्ष छाया अपना प्रभाव जमाने लगी। एकमात्र सहायक पिता ने १४ वर्ष के प्रत्यल्प वालक के कधे पर गृहस्थी का सारा बोझ डालकर स्वयं परलोक की राह ले ली । राज- दरवार से सम्पर्क टूटते हो दरिद्रता घर में नग्न नृत्य करने लगी। इसके पूर्व ऐसे कष्टपूर्ण जीवन से होकर भारती का परिवार कभी नही गुजरा था । यही कारण था कि भारती उन दिनो अपने जीवन से स्वकर, जन्म पाना ही व्यर्थ समभने लगे थे। 'धन की महिमा' नामक कविता में भारती ने उन दिनों का स्पष्ट सकेत किया है। पिता के आकस्मिक निधन से भारती को एक वर्ष बाद अपनी फूफी के पास वनारस चला जाना पड़ा। फूफा ने भारती को प्रतिभा को देखकर उनके लिए हिन्दी और सस्कृत के अध्ययन की व्यवस्था कर दी थी। इन दोनो विषयों के अध्ययन के साथ ही प्रवेश परीक्षा में प्रथम उत्तीर्ण होकर भारती ने अद्वितीय बुद्धिमत्ता का परिचय दिया था। फूफा कट्टर सनातन धर्मो थे। एक दिन की घटना है-भारती ने अपनी - - सुब्रह्मण्य भारती: एक परिचय 1 शिखा को दूसरे ढग से सजाकर काट लिया 1 इसे देखकर फूफा के क्रोध का ठिकाना न रहा । उन्होंने प्रतिज्ञा को कि इस धर्मविमुख के साथ वे कभी भोजन नही करेंगे । इस घटना के कुछ ही दिन बाद एक और घटना घटी। फूफा के निर्देशन में ही चलनेवाले शिवमन्दिर का पुजारी, भजन के समय उपस्थित नही हो सका । उसके प्रभाव में पूजा के विधि-विधान में बाधा पडते देखकर फूफा ने रुष्ट स्वर में ही भारती को कोई शिव वन्दना सुनाने की प्राज्ञा दी । फूफी की भी आज्ञा पाकर भारती ने जद सुमधुर कठ से 'विरुवेम्पावै' के गीत गाये तो उप- स्थित जन-समुदाय मन्त्रमुग्ध हो गया। यहां तक कि बहुत दिनों से रुष्ट फूफा ने पूजा के उपरान्त भात्मविभोर होकर भारती को गले लगा लिया और कहने लगे "तुम ही सच्चे शिव भक्त हो । तुम्हारे हृदय में ही शिव-काति प्रज्ज्वलित हो सकती है।" उस दिन से फूफा भतीजे एक साथ बैठकर भोजन करने लगे। बचपन से ही भारती अच्छे वस्त्र पहनने और ठाट-बाट से रहने के पक्षपाती थे । दरिद्रता के प्रदर्शन से उन्हें चिढ थी । अपने वस्त्रो के साथ वे सैनिक के चिन्ह भी धारण करते थे। पूछने पर उत्तेजना के साथ उत्तर देते थे कि वे ही भारत रानी के सच्चे प्रतिनिधि सिपाही है। काशी में रहते समय भारती बहुधा नौकारूढ होकर गगा की प्राकृतिक छटा देखा करते थे। भारती के अन्तर्मन पर इसका भी गहरा प्रभाव पड़ा था। काशी- वास का इनके बाद के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। इसने ही उनको व्यापक दृष्टि दी थो, अन्यथा भारती संकुचित दायरे में हो सीमित रहकर प्राचलिक बन जाते। एक वर्ष काशी में बिताने के उपरान्त सन् १९०२ में भारती पुन अपने गाँव एट्टयपुरम लौट गये थे। तमिल काव्य एव शास्त्रादि के अध्ययन के लिए तथा समाचार पत्रो की विवेचना के लिए एट्टयपुरम के महाराजा ने पिता की तरह भारती को भी दरवार में रख लिया। यहाँ रहते हुए भारती नै माग्ल भाषा के प्रसिद्ध कवि शेक्सपियर, शेली, बायरन एव कोट्स का गहरा अध्ययन किया था। प्राग्ल भाषा के प्रति अधिक रुचि न होने पर भी शेली से प्रभावित होकर उन्होने अपने को 'शैल्लिदासन' के नाम से लिखना प्रारंभ कर दिया । ऐसा उन्होने उपरोक्त अंग्रेजी कवियों के भावो को जनता तक लाने के लिए ही किया था। इस उपनाम से ही कवियो की कवितापो के सारश पत्र-पत्रिकामो में लिखते थे। भारती को अध्ययन के प्रति विशेषकर प्राचीन मान्य के अध्ययन में अत्यधिक रुचि थी। इस सबंध में एक घटना उल्लेखनीय है। क्रिस्मस तथा प्रपम जनवरी प्रादि के त्योहार मनाने के लिए एट्टयपुरम के राजा अपने मित्रो के साथ एक बार मद्रास भाये। उनके साथ भारती भी थे। घर से चलते समय भारती की पत्नी ने सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएं राजा द्वारा दिये गये पुरस्कार से अच्छी साडियां और कपड़े लाने की प्रार्थना की थी। मद्रास से लौटते समय भारती अपने साथ दो गाडी सामान भरकर लाये । दूर से देखकर चेल्लमा प्रत्यधिक प्रानदित हुई । पास माने पर जो देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा । दोनो गाडियां प्राचीन तमिल साहित्य से सबंधित पुस्तको से भरी थी । भारती ने पत्नी के कुछ न कहने पर भी उसको प्रातरिक वेदना को भांपकर कहा, "मुझे खेद है कि तेरे लिए केवल एक ही साडी ला सका। ये साहित्यिक कृतियां ही वास्तविक स्थायी सम्पत्ति है, शेष सब क्षणभगुर है।" प्रातरिक वेदना को दबाते हुए चेल्लम्मा ने भी इस कथन का समर्थन किया, क्योकि पति की प्रसन्नता ही पत्नी को प्रसन्नता थी। भारती जातिभेद प्रथा के घोर विरोधी थे। एक बार मुहल्ले में जातिभेद को लेकर उपद्रव हो जाने पर एक वीच-बचाव करनेवाले को धुरे से घयाल होकर जान गंवानी पडी। इस घटना से दुखी होकर भारती उस दिन से ही जाति- भेद की तीव्र पालोचना करते हुए कविताएँ करने लगे। जिन दिनो अग्रेजी सरकार बगाल के बंटवारे पर दृढ सकल्प थो, उन दिनो बग-भग आन्दोलन को लेकर काफी अशाति हुई थी। भारती ने इस प्रान्दोलन मे खुलकर भाग लिया था। तमिल की एक पत्रिका "विडुतले' ( स्वतत्रता ) में वे उन दिनो अग्रेज सरकार के विरुद्ध बराबर लिखते रहे । अपने विचारो को वे व्यक्त करने के लिए स्वय एक पत्रिका प्रकाशित करना चाहते थे। इस रुचि में आर्थिक कठिनाइयां उनका मार्ग अवरुद्ध कर रही थी । राष्ट्रप्रेमी तिरुमल अय्यगार, जो उन दिनो एक अंग्रेजी पत्रिका का सम्पादन कर रहे थे, एक तमिल पत्रिका भी प्रकाशित करना चाहते थे। इसके सम्पादन के लिए एक वरिष्ठ व्यक्तित्व को अपेक्षा थी। भारती की मौलिक सूझ और कवित्व से प्रभावित होकर तिरुमल अय्यगार ने उस पत्रिका के सम्पादन का कार्य-भार भारती को ही सौंप दिया। सन् १९०७ में सर्वप्रथम यह पत्रिका 'इण्डिया' के नाम से प्रकाशित हुई । प्रारभ से अन्त तक इस पत्रिका के माध्यम से स्वतत्रता सवधी भावावेशयुक्त माग उगलनेवाली कवितामो के द्वारा भारती जन-जागृति करते रहे। इसके बाद तीन ऐतिहासिक घटनाएं घटो । प्रथमत लाला लाजपतराय को क्रातिकारी घोषित करके सरकार ने उन्हें देशनिकाला दिया। दूसरे गरम दल और नरम दल मे प्रापसी मतभेद हो जाने के कारण 'सूरत काग्रेस' 'बिना किसी निर्णय वे सघषमय वातावरण में समाप्त हो गया। तीसरी घटना यह हुई दि तमिलनाडु के देशभक्त व० उ. चिंदबरम् पिल्ले को प्रांग्ल सरकार को श्रीर से भयकर कारावास की सजा दे दी गई। इन घटनामो का भारती के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पडा। बंगाल के क्रातिकारी नेता श्री विपिनचन्द्र पाल और - सुब्रह्मण्य भारती एक परिचय सुरेन्द्रनाय मार्या यादि को मद्रास में प्रामषित करके भारती विशाल जनसभाएं करने लगे । समुद्र के किनारे प्रायोजित इन सभाग्री में हजारो की संख्या मे जनता भारती के प्रोजस्वी भाषण सुनने के लिए लालायित रहती थी। सूरत बाग्रेस से लौटने पर भारती ने 'मद्रास जनसघ' की स्थापना की। इस मद्रास जनसघ से तिलक का गहरा सबध था। भारती राजनैतिक क्षेत्र में बाल गगाधर तिलक को ही अपना गुरु मानते थे । सुब्रह्मण्य भारती आवश्यकता से अधिक भावुक थे। तिलक की पार्टी के राष्ट्रीयता-दिवस मनाने के सकल्प को, मात्र जुलूस का नेतृत्व करनेवाले व्यक्ति के अभाव में विनष्ट होते देव, उन्होंने अपने का कमाण्डर जैसा बनाकर नेतृत्व के लिए तैयार किया। सरकार को प्राज्ञा का उल्लघन करने के फलस्वरूप उनके कपर गिरफ्तारी का वारएट कर दिया गया। स्मरण रहे कि उन दिनो व० उ० चिंदबरम् पिल्ल ने जिस स्वदशी स्टीम नेविगेशन कम्पनी की स्थापना की थी, उसे सफल बनाने के लिए प्रार्थिक सहायता अपेक्षित थी। स्वदेशी कम्पनियो की स्थापना का यह प्रथम प्रयास था । तिलक की सहायता से भारती ने इस यज्ञ मे अभूतपूर्व योग दिया था। भारती का पुदुवे (पाडिच्चेरो) प्रवास 'इण्डिया' पत्रिका के प्रचार और प्रभाव को देखकर सरकार घबरा गई थी। यह पत्रिका सरकार के लिए सिरदर्द का कारण वन गई थी। सरकार किसी प्रकार से इसे समाप्त करना चाहती थी । फलस्वरूप एक अधिवेशन को सरकार द्वारा अवैध घोषित करके उसम भाग लेनेवाले वीर चिदवरम् पिल्लै, सुब्रह्मण्य शिवा प्रभूति कई लोगो को गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय का कारावास बहुत भयकर हुआ करता था। पत्थर तोडने से लेकर चक्की के बैल के काम कैदियो से लिये जाते थे। यातना की प्रचडता 'इण्डिया' के प्रकाशन पौर साहित्यिक सर्जना में बाधक हो सकती है, यह सोचकर भारतो अपने किसी मित्र के पास पुदुवै- फेंच कालोनी-चले गये। यहाँ रहते हुए गुप्त रीति से 'इण्डिया' का प्रकाशन पुन प्रारभ हुआ। पुदुचे में जिस मित्र के यहां भारती शरणार्थी के रूप में रहते थे, उस मित्र ने दूसरो को धमको मे आकर भारती से अपना घर खाली कर देने के लिए निवेदन किया । ऐसी विषम परिस्थिति में भी पुलिस के पातक, आर्थिक कठिनाई और 'इण्डिया' के दायित्व का वोझ लिये भारतो एक के बाद एक पाने- वाली यातनामो का सामना दृढ सकल्प से करते रहे। इस परेशानी का सकेत भारतीकृत 'कोयल' नामब खह-काव्य म मिलता है। इसमें एक स्थान पर भारती लिखते है "मुझे उस समय जितनी यातना मिली, उतनी करघे में इधर- मुयाय भारती को राष्ट्रीय विताएं एपमन्य उपर बार-बार पाने-जानेवाती सरी को भी न गिलती होगी।" स्थान पर ये लिपते है-"मेरे कार पष्ट 4 ही पाते रहे, जिस प्रकार पारा प्रवाह चल रहे सगीत में एक ये वाद एप सास माजाने है।" निराधार जीवन ये क्षणों में ही भारती की भेंट एप पन्य गित से हुई। इस मित्र ने स्यय भारि पटिनाई में होने हए भी पयारानिः भारती यो पायिर पठिनाई को दूर करने में सहायता की पी 1 उसने पूर्व में पने मित्रों में परिचय कराया, जो बाद में भारती के लिए सहापर सिद्ध हुए। उन. मिना नाम था 'युवल पप्णमाचारी' । समरतः इस मित्र में प्रभाव में भारर उराये प्रति ही भारती ने अपनी प्रसिद्ध पविता पान्ह मेरा सेयर' (पएणन एन सेवपन्) लिगी। यहना न होगा कि मात्र उग मित्र की सहायता से हो 'इण्डिया' या प्रकाशन कुछ दिन होता रहा । मपने पदुवं ये प्रयाग में ही भारती एव पुत्री में पिता बने, उनको इच्छा ये अनुसार ही पुत्री का नाम शकुन्तला रखा गया। सन् १९१० में यानू परविन्द घोष पर स्वतत्रता मान्दोलन में भाग लेने पौर जनता पो सरकार के विरुद्ध भावाने या पारोप लगापर गिरफ्तारी का वारपट कर दिया गया । पुलिस की दृष्टि से यचकर घोप भी पुदुवै पले माये । भारती के लिए यह एक सुयोग हो पा । दोनो विद्रोही नित्य प्रति मिलते और कई घटो तर राजनैतिय चर्चाएं करते रहते थे। भयकर प्रान्तिकारी य. ये० सु० मय्यर भी किसी प्रकार बचकर पुदुवै मा गये थे। इन सब लोगो का भारती के राजनैतिक जीवन पर गहरा प्रभाव है । सबनी सहायता होते हुए भी भारत सरकार द्वारा 'इण्डिया' के कपर अपनी सीमा में माने पर प्रतिबन्ध होने से तथा विचित् फेंच सरकार की कठिनाइयो के कारण भी 'इण्डिया' का सम्पादन १६१० में बन्द कर देना पड़ा । यही वह मनहूस घडो यो जव स्वतत्रता मान्दोलन को बल देनेवाली लगभग सभी पत्रिकाएं, 'दैनिक विजया', 'सासाहिक सूर्योदय', अग्रेजी साप्ताहिक 'बाल भारती', मासिक 'कर्मयोगी' प्रादि सरकार द्वारा प्रतिबन्ध लग जाने के कारण बन्द हो गई। उल्लेखनीय है कि इन सब पत्रिकामो से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में भारती का सर्वदा सबध रहा। भारतो उन दिनों मग्रेजी तमिल को एक व्यग्य पत्रिका प्रकाशित करने की योजना बना रहे थे । समय के अनुकूल न होने के कारण यह भी सम्भव नही हो सका । सारे प्रयलो से निराश होकर भारती अरविंद घोष के साथ वेद, नीतिग्रथ एव मागमशास्त्र का गभीर अध्ययन करने लगे। अपने प्रात्मचरित्र से सवधित कवितामो का 'स्वप्न' नामक एक सग्रह इन दिनो मे ही भारती ने प्रकाशित कराया। पुदुवै में रहते हुए उनके जीवन को एक और विशिष्ट घटना घटी थी। भारती की अनुपस्थिति में ही पुलिस ने पाकर उनके लिखे हुए मथो की पाडु- सुब्रह्मण्य भारती एक परिचय । लिपियों एव अन्य मावश्यक कागज हहप लिये। घर पाकर भारती ने यह दृश्य देखा तो उनका हृदय इस अनाचार की माग मे जलने लगा। लाचारी थी, क्या किया जा सकता था। जीवन में पहली बार इस वेदना से हो ऊबकर भारती दुखी और निराश हुए थे । वास्तव में एक साहित्यिक व्यक्ति के लिए सबसे प्यारी उसकी रचनाएं ही हुआ करती है । गुप्तचरो का जाल बिछा होने के कारण भारती के मित्र उनसे दिन में मिल नही पाते थे। काफी रात गये वे लोग जब भारती के घर पाते, तो विविध कठिनाइयो के होते हुए भी भारती उन्हें स्वरचित कविताएं सुनाने से नहीं चूकते थे। मित्रा के प्रातिथ्य के लिए भारती अपनी पलो चेल्लम्मा को, जो पुत्री पैदा होने बाद स्वय पुदुवै चली पायी थी, तग किया करते थे। घर म पैसा और सामग्री का सदा ही प्रभाव रहता था। एक बार की घटना है कि पत्नी के यह कहने पर कि घर में सामग्री नहीं है, भारती बहुत उत्तेजित हो गए थे मोर चिल्लाकर कहने लगे 'मागे से मैं 'इस नहीं' 'शब्द को ही ससार में नहीं रहने दूंगा।' पत्नी को उन्होने सिखाया 'अगर कोई सामान नहीं है तो सबके सामने मेरी बेइज्जती मत किया करो। साकेतिक शब्द 'नकार' और 'इकार' का प्रयोग करो। भारती उम्र होने के साथ ही अत्यन्त उदार और भोले स्वभाव के थे। एक बार की घटना है कि पुलिस के दलाल ने भारती से पाकर कहा कि उनके ऊपर से वारएट उठा लिया गया है । मानन्दातिरेक में निश्छल हृदय भारती, पत्नी पुत्री आदि को पुदुर्द में ही छोडकर मद्रास को पोर उसके साथ चल पड़े । उधर से प्राते हुए किसो मित्र के द्वारा यह ज्ञात होने पर कि यह पुलिस का पड्यन्त्र है, भारती को अपनी भूल पर लज्जा हुई और मित्र के प्रयत्न से पुन पुदुवै लौट सके । दो-तीन दिन के बाद वह गद्दार मित्र भारती के यहां भाया । भारती उससे प्रेम के साथ मिले । इतने प्रेम- पूर्वक मिलते देखकर भारती को मित्र-मडली एव उनकी धर्मपत्नी भी अत्यन्त रुष्ट हुई । बडे सीधे ढग से उन्होने सबको समझाया, साथ ही एक कविता लिख डाली, जिसका भाव है, 'हे मन, तू शत्रुमो पर भी दया रख ।' भारती को दानशोलता के भी अनेक उदाहरण है। कहते हैं, एक बार भारती कही से भच्छे कपड़े खरीद लाए । उसे उन्होने उस दूकान पर सिलाने के लिए दिया, जहां उनके अन्य मित्रों के भी कपडे सिले जा रहे थे । दर्जी से भारती ने शर्त रखी कि यदि वह हमारे कपडे सबसे अधिक अच्छा सिले तो उसे उचित पारिश्रमिक से अधिक दिया जायगा। परिणाम कुछ दूसरा हो हुमा । भारती के कपडे सबसे अधिक ढोले-ढाले भद्दे ढग से तैयार किए गए । पाश्चर्य तो यह है कि इतना होने पर भी उस दर्जी को सबसे अधिक पारिश्रमिक दिया। उसे पहनकर जब घूमने निकले, तो भद्दी सिलाई को देखकर लोग उनका परिहास करने लगे। .

सुब्रह्मण्य भारती को राष्ट्रीय कविताएं इन सबको सहन परते हुए कुछ दूर ही गये होंगे कि उन्हें एक व्यक्ति नगे बदन भीख मांगता दिसायी पडा। रिना युष सोचे विचार पुरता और टोपी उमे पहनाकर घर वापस पा गए। भावावेश के क्षणों में दिए गए भारती ये कार्य कमी-कमा पागलपन की सीमा तक पहुंच जाते थे। एक पार को पटना है कि य एवं गदहे ये बच्चे को कधे पर लेकर घूमने निकले और उसे बार-बार चूमन लगे । जो भा पूछता तो कहते 'अगर में पागल हूँ तो शिवजी भी पागल थे, जो सुपर बनकर सुपर के बच्चे को दुग्धपान करा चुके हैं। सन् १९१२ स १६१४ तक का जीवन अत्यन्त परिप्रमसिद्ध होते हुए भी भारती के लिए अत्यधिक मह वपूर्ण सिद्ध हुमा । इस समय हो इनके 'कायल' (कुयिल), 'पाचाली शपतम्', 'कान्हा गीत' ( कण्णन पाट्ट) मादि प्रसिद्ध पाव्य सग्रह प्रकाशित हुए । 'स्वदेशमित्रन' के सम्पादक को प्रार्थना पर भारती ने अविकल प से लेख, कविता, कहानी मादि लिखना प्रारम किया । इनके पारिश्रमिक से उनकी आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगो। स्वतत्रता प्रान्दोलन के पचास वर्षों के इतिहास का भारती ने धारावाहिक रूप से उस समय हो 'स्वदेशमियन' म लिखा था। प्रथम महायुद्ध प्रारभ हो गया था। पुदुवै के जीवन से ऊबकर भारती मपनी पली के साथ मद्रास लौट पाये। यहां पाते ही अग्रेज सरकार ने उन्हें कैद कर लिया । ३६ दिन कारावास भुगतने के अनन्तर निर्दोष सावित होने के कारण वे रिहा कर दिये गए। जेल से छूटने के बाद भारती अपने गांव 'कडयम' में सपत्नीक निवास करने लगे। यहां भी अपन भावावेश से उह मुक्ति नहीं मिली। घूमते समय एक बार कुछ लडको को नीम और इमली के फल खाते देखकर उन्हें आश्चर्य हुमा । यह जानकर कि उनके पास कुछ और खाने को नही है, भारती रो पड ! प्रावेश में स्वय भी इमली और नीम के फल खाने लगे। इसी तरह की एक और घटना उल्लेखनीय है। लोगो से अपनी आर्थिक स्थिति पर निदा सुनकर वे अत्यन्त आवेश मे पा गए और स्वदेशमित्रन से पारिश्रमिक के रूप में प्राप्त सौ रुपये को हवा में उडाते हुए चिल्लाने लगे 'कौन कहता है कि मैं गरीब हूँ, मेर पास कुछ नहीं है, लूटो जिसे जितना लूटना हो।' उपस्थित भीड में से लोग एक-एक करके रुपया लेते हुए भारती को प्रशसा करते हुए चले गये। कडयम में रहते हुए सन् १९२० में ही भारती, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साथ ही नोबेल पुरस्कार म भाग लेना चाहते थ । पर कुछ कठिनाइयो के कारण यह सभव नहीं हो सका।

सुब्रह्मण्य भारती . एक परिचय १७ कुछ दिनो के वाद १६२० में ही ये एट्टयपुरम मा गये। एक दिन पत्नी के लाख मना करने पर भी बलपूर्वक उनके साथ हाथ में हाथ डालकर चलने लगे। सडक पर मातो-जाती भीड के लिए यह नितात नया दृश्य था। कितने ही लोगो ने अपनी पाखें बद कर ली। कितने ही 'छी छी' करने लगे। इसका भारतो के मस्तिष्क पर उग्र प्रभाव हुआ। घर लौटकर तत्कालीन समाज के सकीर्ण मनोभावो से दुखित होकर नारी-पुरुष की समानता से सम्बन्धित गीत लिखने लगे। कहा जाता है कि एक बार वे तिरुवनतपुरम में अजायबघर देखने गये। विभिन्न प्रकार के पशुओ को देखते हुए जब वे सिंह के समक्ष पहुंचे, तो अकडकर खडे हो गए और कहने लगे सिंह राजा ! देखो तुम्हारे सामने कविराजा खडा है। तुम अपने समान शारीरिक बल इसे दो। अदर कुछ सोचकर बाहर दूसरा न कर सकने के अपने स्वभाव को भी अगर तुम दे सके तो अच्छा हो।' ऐसी ही चमत्कारी पटनाएँ भारती के पग-पग के जीवन में भरी पडी है । सन् १९१६ के मार्च में राजाजी के घर पर गाधीजी से भारती की भेंट हो चुकी थी। उन दिनो वे तिरुवल्लिक्केणी के मदिर नित्यप्रति जाते थे और वहां के हाथी को गन्ना, नारियल प्रादि खिलाते थे । एक दिन को घटना है कि हाथी मतवाला हो गया था । लोगो द्वारा उसके पागल होने की बात जानकर और लाख मना करन पर भी भारती उसे फल खिलाने के लिए चले गये। परिणामस्वरूप हाथो के धक्का मार देने के कारण उनकी हड्डियां टूट गई । पूर्वपरिचित मित्र 'कुवले' वहाँ अचानक प्रा गये। मूच्छित अवस्था में उन्हें चिकित्सालय ले गये । चिकित्सालय में रहते समय हो 'मली बन्धु मद्रास आये थे। उनके साथ गाधीजी भी थे। भारती को देखने के लिए ये लोग उनके यहां गये । भारती उनसे मिलकर अत्यधिक मानदित हुए। चोट लगभग ठीक हो गई थी, किन्तु शन-शनै बढ़ती कमजोरी ने उहे क्षीण- काय कर दिया । कमजोरी के कारण हो पेचिश की बीमारी बढती गयो और इसके हो असाध्य हो जाने के कारण सन् १९२२ में १२ सितम्बर की अर्धरात्रि मे भारत के उस अनय सेवक महाकवि भारती को प्रात्मा, अनेक नेतामो, मित्रो, संबंधियो, पली तथा पुत्री प्रादि को शोकाकुल अवस्था में तडपती छोडकर महा- प्रयाण कर गयो । भारतो का भौतिक शरीर भारत की धरती से उठ गया, कि तु उनका जीवन और उनकी भाव-सबल रचनाएँ सदा सर्वदा, देशभत्तो, साहित्य- कारो एव विचारको के लिए मार्गदर्शन का कार्य करती रहेगी। भारती की साहित्यिक साधना सुब्रह्मण्य भारती बहुमुखी प्रतिभा सम्पन व्यक्ति थे। समाज और वातावरण को कोई भी अच्छाई व बुराई उनके भावुक हृदय पर सीधे प्रभाव डालती थी।

काव्य, सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएं कोई भी सवेदनशील प्रसग उनकी लेखनी का सहारा पा सकता था। यही कारण है कि उनकी रचनामो में हमें विविध दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं । साधारण रूप से उनकी रचनाएं निम्नलिखित वर्ग में विभाजित की जा सकती है-खण्ड विविध मुक्तक रचनाएं, गद्यगोत, विविध निवघ एवं कहानियां । भारती के खण्ड-काव्यो में 'पांचाली शपथम्', 'कान्हा के गीत' ( कएणन पाटु) और 'कोयल के गीत' (कुयिल पाटु) का ही नाम लिया जाना चाहिए। इनके अतिरिक्त भी कुछ ऐसी रचनाएँ है, जो कलेवर को दृष्टि से तो खण्ड-काव्य के समान ही है, पर उन्हें लयी कविताएँ कहना ही समीचीन होगा। महाभारत की द्रौपदी शपथ की कथा को आधार बनाकर भारती ने 'पाचाली शपथम्' की रचना की है। पांच वर्गों में विभाजित इस भावप्रधान रचना में उन्होने नारी के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन करते हुए तत्कालीन सामाजिक सकेतो के सगठन को आधुनिक सामाजिक परिस्थितियो के परिप्रेक्ष्य में रखकर परखने का सफल प्रयास किया है । इस काव्य में द्रौपदी के माध्यम से भारत देश की परिस्थितियो का चित्रण प्रस्तुत है। द्रौपदी अपना केशवधन तब करती है जब दु शासन का प्रत होता है । यह धारणा प्रकारान्तर से यह भी सूचित करती है कि भारत देश तभी स्मरणीय हो सकेगा जब इसके परस्पर विभेदक तत्व, छल, पाखण्ड, मधविश्वास आदि समाप्त हो जाएंगे , दासता समाप्त हो जाएगी। स्वतत्रता के दर्शन होगे अर्थात् कुरीतियो का दुशासन जब समास होगा, तभी भारत देशरूपी द्रौपदी अानन्द लाभ करेगी। ‘कान्हा के गोत' का तमिल वाड्मय मे अद्वितीय स्थान है। इसकी रचना प्राचीन तमिल काव्य शैली के आधार पर हुई है । कवि ने अपनी कल्पना में कृष्ण के भिन्न-भिन्न रूप देखे, वे कही नायक है, कही नायिका । कही माता-पिता है' कही पुत्र । कही गुरु है तो कही शिष्य और कही सखा । प्राचीन तमिल शैली का आधार होने पर भी इस काव्य-रचना मे प्राधुनिक, वैज्ञानिक और प्राध्या- त्मिक विचारो का सुन्दर समन्वय द्रष्टव्य है। राधारमण कृष्ण और गीता का उपदेश देनेवाले कृष्ण का मिश्रित व्यक्तित्व ही भारती को प्रभावित कर सका है। कोयल गीत भारती की विशुद्ध मौलिक कल्पना है । एक स्वप्न के माध्यम से कवि ने इस रचना में एक मोहक प्रेम कथा का वर्णन किया है। मोह, माया, ममता का सवध जन्म जन्मान्तरो से होता है । ये मात्मा के आध्यात्मिक उत्थान में सर्वथा वाधक होते है। इनके हो बधन में पड़ी आत्मा मुक्ति के लिए छटपटा रही है। इसी माध्यात्मिक सकेत को प्राधार बनाकर कोयल को आध्यात्मिक प्रेम कहानी कही गई है । इस रचना में माद्यन्त शृङ्गारिकता देखी जा सकती है ।

सुब्रह्मण्य भारती: एक परिचय - बीच-बीच में शिष्ट हास्य का पुट देना भी भारती नही भूलते । शृङ्गार और हास्य का इतना पुष्ट भोर शिष्ट समन्वय तमिल साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ ही है। मुक्तक रचनामों में 'भारतो छियासठ' कवि की एक विचारधारा को छिया. सठ कवितामो का संग्रह है । ये सभी कविताएँ प्राध्यात्मिकता का पख बांध- कर अपना जयनाद करती है। ये रचनाएँ भारती द्वारा प्रकाशित व सम्पादित पत्रिकामो में धारावाहिक रूप प्रकाशित हुई थी। भारती की दीर्घाकार बवितानो मे 'मुरसु' (नगाडा), 'पाप्पा पाटु' (बच्चो के गीत), 'नयी पात्तिच्चूडो (अकारादि क्रम से लिखित उपदेशात्मक रचना), विनायक मणिमाले (गणेश स्मृति) आदि उल्लेखनीय है इनके अतिरिक्त भारती ने लगभग ४०० फुटकल गोत लिखे हैं । इन गीतो को भी विभिन्न भावनापी के आधार पर कई वर्गों में विभाजित किया जा सकता है . राष्ट्रीय, सामाजिक और दार्शनिक रचनाओं के साथ-साथ शक्ति सबधी तथा नाना उपदेशात्मक रचनाएँ भारती की यशस्वी लेखनी की अमिट देन है। तमिल में गद्यगीत लिखने का श्रीगणेश भारती से हो होता है । 'वेद रिपिकलिन कवितं' अर्थात् वैदिक मृषियो की कविता इस प्रकार की ही रचना है । यह वैदिक छदो के आधार पर विरचित एव सुन्दर काव्य है । 'ज्ञानम् रथम्' भारती को दूसरी गद्यगीतात्मक रचना है। इस रचना में तत्कालीन सामाजिक स्थिति का स्पष्ट परिचय है । इनमें बीते हुए समाज की तुलना भारती ने गन्धर्व लोक से की है। अपने समय को सामाजिक दुरवस्था का उल्लेख करते हुए प्रत में यह परचाताप प्रकट किया गया है कि हमारे बीते हुए दिन भव नही रहे। भारतो न केवल कवि थे, अपितु प्रभावशाली गद्यलेखक तथा पत्रकार भी थे । 'दैनिक स्वदेशमित्रन' के कई वर्षों तक सहकारी सम्पादक रहे । 'दैनिक इण्डिया' के सम्पादक पद से अनेक मौलिक निबधो को प्रस्तुत कर उन्होने तमिल साहित्य को श्रीवृद्धि की । 'चन्द्रिक' नामक एक उपन्यास भी लिखता प्रारम्भ किया था, परन्तु उसके पूर्ण होने के पूर्व ही भारती कराल काल के हाथो हमसे सदा के लिए छीन लिये गये । भारती को सम्पूर्ण रचनाएं मद्रास सरकार द्वारा 'भारती ग्रथावली' के नाम से तीन भागो में प्रकाशित हो चुकी हैं। एक भाग में इनके पद्य, दूसरे में गद्य और तीसरे मै ललित निबंध सगृहीत हैं । प्रथावलो को जनसुलभ बनाने के लिए मद्रास सरकार ने भारती की समस्त रचनामो पर स्वत्वाधिकार कर लिया है। भारती की राष्ट्रीयता इस संग्रह में महाकवि सुब्रह्मण्य भारती को राष्ट्रीय कवितामो के पद्यानुवादन २० सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएं है। यह समय और समाज को एक मांग थी। उसकी पूर्ति बनकर भारतो प्राय पोर साथ में उनकी कविताएँ भी । वह हमारे पराधीन जीवन का ऐसा क्षण था, जब हमारी आत्माएं स्वतत्रता की प्यास से तिलमिला रही थी। मन में स्वाधीनता को चाह थी, पर विदेशियो के पैरों तले हमारो गर्दनें दबी हुई थी। कायरता, अकर्मण्यता, आलस्य और मजबूरी हमारे ऊपर बलात् लाद दी गई थी। इन सब के असहनीय बोझ से दबे-दवे हम छटपटा रहे थे, पर बोलने की क्षमता नही थी और समय भी अनुकूल नही था । स्वतंत्रता की धाग कही-कही भडक जाती थी, पर उसे गाधीजी जैसे सुदृढ़ व्यक्तित्व का भली भांति प्रतिनिधित्व अभी नहीं मिला था । अत्याचार और अनाचार की पापाणी चाकी दिनोंदिन तीव्रतर होती जा रही थी, पर असन्तोप, घृणा और विद्रोह को जन्म देती हुई, पुष्ट बनाती हुई । कुल मिलाकर देश मे जागृति थी, उसे नेतृत्व मात्र चाहिए था। जनता में आवेश था, जनमानस में ऊहापोह था, उसे वारणो चाहिए थी। लोग परतंत्रता के मनहूस धुएं में घुटते-घुटते खुले वातावरण के लिए लालायित हो उठे थे। अंधकार से ऊवकर प्रकाश चाहते थे। ऐसे ही समय भारती के संयम का बांध टूट गया। उन्होने खुले स्वर में स्वतंत्रता का जयनाद किया। जनमानस की घुटती हुई भाव- नामो को नेतृत्व दिया । जिन्हें कुछ कहना था, उन्हें स्वर दिया। दूसरे शब्दो में भारती ने भारत को वाणी दी, समय को स्वर दिया। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बहुत पूर्व ही भारती ने स्वतंत्रता और स्वतंत्र भारत का मोहक चित्र खीचा- उन्होने मुक्त कंठ से कहा नाचेंगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे ! आनन्द स्वराज मिला हमको हम नाचेंगे। नाचेंगे हम अानन्द मगन हो नाचेंगे। दिन बीत गया है, ब्राह्मण को, प्रभु कहने का। गोरे फिरगियो को हुजूर भी कहने का । आनेवाले नये भारत का रूप चित्रित करते हुए भारती कहते है- कांतियुक्त आँखोवाले तू आ आ पा । भारत ! सुदृढ हृदयवाले तू आ आ आ । अमृत के समान मृदुभाषी आ पाया। वन स्कधयुक्त भारत तू आ आ आ तत्कालीन भारत के प्रति कटुवचन प्रयोग करते हुए भारती कहते है- मान और अपमान शून्य कुत्ते के जैसा- आज तुम्हारा जीवन भारत, जा जा जा।

सुब्रह्मण्य भारती एक परिचय भय के कारण पर न सका कृतज्ञता ज्ञापित- चाटुकारिता करनेवाले जा जा जा। स्वतत्रता से पहले ही भारती ने भारत में जन-जन को समान भौर स्वतन होने का स्वप्न देसा था। स्वप्न में ही जैस यह उठ थे स्वतत्रता स्वतत्रता स्वतमता है स्वतत्रता भगो और चर्मकारा का है स्वतत्रता प्रादिवासियो बनजारो को सबको मिलो देश म आज स्वतत्रता स्वतयता स्वतः वतनता अपने नये सविधान की कल्पना करते हुए उहोंने लिखा--- नियम दूसरे का न रहेगा, अपना स्वय विधान बनेगा। तन मन धन से उसे देश का- बच्चा बच्चा वरण करेगा। भारती ने अपने समय के वातावरण का सूक्ष्म दृष्टि से मध्ययन किया था। छुपाछूत के प्रश्रय के कारण सामने पानेवाल बुरे परिणामो को उन्होने आँख खोलकर देखा था। समाज को इस भीपण रोग से बचान के लिए व सदैव चेतावनी देते रहे । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सवको महान होने की बात कही। सभी धर्मों के समान होन का दावा किया- ब्राह्मण कुल का हो या अछूत, जो भी है इस भू पर प्रसूत । है जन्मजात ही वह महान । सब जाति घम, सब जन समान, हजारो जातियों में बैटो भारत को कई करोड जनता का एक ही भारत माँ के गर्भ से प्रसूत बतलाकर विदेशियो को चेताय करते हुए भारती न सबमें एक ही खून के दशन किए- मां के एक गर्भ से जन्मे रे विदेशियो भेद न हममे। मन मुटाव से क्या होता है हम भाई भाई ही रहेगे।

२२ सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएँ साथ रहेगे तीस कोटि हम साथ जियेंगे साथ मरेंगे। एकता का स्वर भारती में सर्वप्रमुख है। उत्तर-दक्षिण, पूरव-पश्चिम मादि की सकुचित धारणा से ऊपर उठकर इन्होंने उदार मन से प्रखड भारत की कल्पना की है । सभी दिशाओं से, कोने-कोने से व्यापारिक, धार्मिक एव आवागमन सवधी, सबघ-सूनो के अतिरिक्त सास्कृतिक विनिमय का भारती ने दिल खोलकर आह्वान किया है । इस सवध में कुछ उदाहरण देना समाचीन होगा- खूब उपजता गेहूँ गगा के कछार मे ताबूल अच्छे हैं कावेरी के तट के । ताबूल से विनिमय कर लेंगे गेहूं का सिंह समान मरहठो को ओजस कविता के पुरस्कार मे उनको हम केरल-गज-दत लुटाएंगे। सब शत्रुभाव मिट जाएंगे। दूसरा चित्र देखिए- सिन्धु नदी की इठलाती उर्मिल धारा पर उस प्रदेश की मधुर चांदनीयुत रातो मे केरलवासिनी अनुपमेय सुन्दरियो के सग, हम विचरेगे बल खातो चलती नावो मे कर्णमधुर होते हैं तेलुगु गीत उन्हे हम गाएँगे सब शत्रु भाव मिट जाएंगे। भारती को अपने देश की संस्कृति, सृजनात्मक क्षमता, मेघा शक्ति और यशोगाथा पर गर्व था। सब दृष्टियो से वे भारत को विश्व में सर्वोत्कृष्ट मानते थे। देश की शक्ति के ऊपर उन्हें विश्वास था। एक स्थान पर वे कहते हैं- धैर्य शक्ति म, सैन्य शक्ति मे, परोपकार उदार भाव मे, सार शास्त्र के ज्ञानदान मे, भारत सर्वोत्कृष्ट देश है। भारत को श्रेष्ठता प्रतिपादित करते हुए वे लिखते है- हमारा नभचुबी नगराज, विश्व म इतना ऊँचा कौन ? हमारी भागीरथी पवित्र, नदी इतनी गौरवमय कौन ?

मुब्रह्मण्य भाद्री: २५ पते अंदन दिन उहां की बटन किन्नई चलो गाहन्नन्त स्वतंत्रता की हुए, उसकी रक्षा करदार उनके अनुसार 'डिना sert इस धरती पर पाईगे । टटकाईन नहीं नीर में पाला पोसा, प्रांखों का जल देकरमा। हे सर्वेश देन बह पोगन्न पिघलेगा क्या? स्वतंत्रता की प्यास को वे बच नहीं पाते है- प्याम चूमेगी कब अवर मे बताती पराधीनता के कद ना यान्टिी? वे अपनी प्रोसित दवंप्रदादी को गन्यापी में विनष्ट हो जाऊँ चिनी हे स्वतंत्रते भूल न मरता नमस्यार करना तुम्हें की। निवेष प्रपा की भीषणता से भारती पुजा करने लगे थे। हंगे पट्टालिकामों में विकास करनेवाले धनिक वर्ग और दूसरी र ter पुटपापपर बारनेवाले दोनहीनों को देखकर उनका अन्तम् दहा मार होपारण है कि यो ग्रनामों में कहीं-कहीं साम्यवादी स्वर भी मार पाता है। जो भारत मदर नामक कविता में एक स्थान पर होलकर कमलमविकार ही कॉ सर्व सम्पत्ति पर पनिटर रग का होगा जग रंगमंच पर: हो नि तेरी २४ सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएं इस कविता मे हो आगे चलकर वे लिखते है- क्षुधित दिख गया अगर कभी भी भारत भू का एक व्यक्ति भी- हम विनष्ट कर देंगे स्थायी रहान सकेगा विश्व भी कभी। इस संग्रह में भारती के कुछ देश निर्माण सबंधी गीत भी है। भारत के सर्वांगीण विकास की वे सदा कामना करते । कृपि से लेकर कल-कारखाने के साथ-साथ अन्य नाना प्रकार के यत्रो के निर्माण मौर विकास का स्वप्न उन्हें सदैव दिखायी देता था। एक चित्र देखिए- छतरी बोड़े से, खीले से, वायुयान तक, अपने घर में ही तैयार कराएंगे हम । कृषि के उपयोगी यंत्रो के साथ साथ हो इस धरती पर वाहन भव्य बनाएंगे हम । दुनिया को कम्पित कर दें ऐसे जलयान चलाएंगे। सब शत्रु भाव मिट जाएंगे। तथा- सरस काव्य की रचना होगी और साथ ही, कर देंगे चित्रित अति सुन्दर चित्र चितेरे । जग के सब उद्योग यही पर हो स्थापित हो जाएंगे। सब शत्रु भाव मिट जाएंगे। देश को माता के रूप मे मानकर भारती ने उसका कई मोहक रूपों में वर्णन किया है । उसको गुरुता का चित्र खोचते हुए उन्होंने लिखा है- तीस कोटि मुख, प्राण एक, यह भारत माँ की गुरुता। एक चिन्तना किन्तु अठारह भाषाओ को क्षमता । निरत धर्म रक्षा में मां को साठ करोड़ भुजाएँ। टुकड़े टुकड़े कर देंगो जो शत्र युद्ध को आएं। सहृदयता, सहिष्णुता तथा क्षमा में स्वयं पृथ्वी से भागे होने पर भी भारत माता पाक्रामक अन्यायी के प्रागे चण्डीरूपा बन जाती है। उसकी जिह्वा पर वेदवाक्य तरते रहते है । उसके हाथो में सुमंगलकारी सद्ग दुष्टो के दलन और शरणागत को रक्षा हेतु सदैव चमकती रहती है। इस प्रकार के ही अनेक रूप भारती ने २५ सुब्रह्मण्य भारती एक परिचय चित्रित किए है। भारत माता को उन्मत्त रूप में चित्रित करते हुए वे लिखते अति भयावह रूप देखो मातु का-- है हमारी माँ प्रबल उन्मादिनि । यह करेगी प्यार शिव उन्मत्त को, हाथ मे जो तीन ज्वाला है लिये। भारत जननी को जगाते हुए भारती कहते है- दीपित दिनकर का तेजोमय स्वरूप देखा हमने नभ मे ; वैसी हो तेरी ज्योति विश्व मे देखें यह इच्छा मन मे। ले शन प्रकपित करनेवाला शूल निर्मले, जाग रो। भारत जननी री जाग री।। स्वतत्र भारत की कल्पना के साथ ही उन्होने उसके लिए स्वतत्र ध्वजा की भी कल्पना की थी। उनके द्वारा कल्पित ध्वजा माज के 'तिरगे' से बिलकुल ही यहाँ इन्द्र का बनायुध है, यहाँ तुरक का अर्ध चन्द्र है- वन्दे मां, है मध्य अकथ गति का अनुमान लगाओ सब मिल करके विनय और श्रद्धा से शीश झुकाप्रो । भारती की कल्पना में मूर्त ध्वजा, मात्र रेशमी वस्त्र नहीं है । मझावात उसका बाल बांका नहीं कर सकते । तूफानो में भी वह अविरल गति से लहराती रहती है । उसमें इन्द्र के वच्चायुध के समान दृढ शक्ति है । उसके नीचे दक्षिरण के युद्ध- प्रिय तमिल, केरल और तुलुभापो तथा तैलगो के साथ ही, वीर मरहठे एव हिन्दी प्रदेश के देव-प्रशसित राजपूत एक साथ हुकार करते है । उसके नीचे हिन्दुओ के अतिरिक्त तुरको को भी समान पाश्रय मिलता है । जात-पात, ऊंच-नीच का भेद, उसकी छाया का स्पर्श नहीं कर पाता है। स्वतत्रता प्राप्ति से पूर्व के भारतीय समाज की दुरवस्था का स्पष्ट चित्रण भारती ने इस सग्रह को वर्तमान भारतीय' नामक कविता में किया है। भारतीयो में कायरता, अकर्मण्यता एवं छल-पाखड़ भपनी अन्तिम सीमा तक प्रवेश कर गये थे । इन सबका ययार्थ चित्र प्रस्तुत करके भारती ने समाज को अनेक प्रकार की चेतावनियां दी है । उन सव कुरीतियों को देखकर भारती का हृदय फटने लगता था। एक स्थान पर वे कहते है- देख सिपाही, चौकीदार दिल धडक धडक जायेंगे, कोई ले बन्दूक चले तो घर मे छिप जायेंगे।

२६ सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएँ देखें यदि अति दूर सुसज्जित किसी व्यक्ति को प्राते ; भय के कारण हाथ जोडकर स्वयं खडे हो जाते। सबके आगे भीगी बिल्ली बन जाया करता है; देख पाज के जन की हालत हृदय फटा जाता है । इस प्रकार को उद्बोधन और निर्माण सबधित कवितामो के अतिरिक्त भारती की दो विदेश संबंधी कविताएं भी इस संग्रह में ग्रहण की गई है । इनमें से एक बेल्जियम की स्तुति में और दूसरी तानाशाह जार के पतन के प्रति लिखी गई है। बेल्जियम की पराजय तो हुई, किन्तु शत्रु के सामने नितान्त शक्तिहीन और साधन हीन होते हुए भी बेल्जियम ने जो पौरुप और पराक्रम दिखलाया था, वह अवर्णनीय है । बेल्जियम के वीरो ने संख्या में अत्यन्त अल्प होते हुए भी जिस वीरता का परिचय दिया था, उसकी प्रशसा करते हुए इतिहास के पृष्ठ नही थकते । इस घटना का गहरा प्रभाव भारती के भावुक हृदय पर हुआ था। इससे प्रभावित होकर ही वे एक स्थान पर लिखते हैं- सूप से जिसने भगाया व्याघ्र को- अ तबली उस आदिवासिनी की तरह, साधनो से दीन होते हुए भी- विश्व मे कृत कर्म से ऊंचे बने । स्वाभिमान और वीरता के आधिक्य के कारण ही बेल्जियम का पतन हुमा था । अपने को असमर्थ जानकर भी दृढता के साथ शत्रु का सामना उसने किया था । इसका सकेत करते हुए भारती लिखते है- स्वाभिमानी था पतन तेरा हुआ, शत्रु शासक नीच, गर्वित शक्ति पर, अति बलिष्ठ रहा तथापि अभाव मे- शक्ति के भी, रग मात्र न डरा तू । पराजित बेल्जियम की उन्नति की, भारती कामना ही नही करते, अपितु विश्वास के स्वर मे कहते है- तुम पराजित हुए किन्तु अवश्य ही, क्रान्ति एक महान होगी देश मे- क्षणिक अवनति प्राप्त तेरा यह पुनः पूर्णतः उत्यान पायेगा कभी। जार की तानाशाही और उसके पतन से संबंधित कविता में भारती ने तत्कालीन रूस का सच्चा स्वरूप चित्रित कर दिया है। जार की तुलना हिरण्यकशिपु से करते हुए, उसके द्वारा किए गये नाना प्रकार के अत्याचारों की उन्होंने भत्सना सुब्रह्मण्य भारती : एक परिचय २७ को है। उसके शासन में सद्धर्मी और सज्जन अनाथ बनकर तड़प रहे थे। श्रमी किसानों को अन्न नहीं मिलता था। धर्म पर अधर्म हाबी था । वहाँ 'हाँ' बोलने को सजा थी कारावास । 'क्यो ?' पूछनेवाले की सजा थी प्राजन्म वनवास । ऐसे ही समय में कान्ति देवी ने अपनी कृपापूर्ण दृष्टि रूस के ऊपर फेरो थो । अपने कुल और सगे सम्बन्धियों सहित यम रूपी जार इस प्रकार विनष्ट हो गया, जैसे कलिकाल रूपी दीवार ही धराशायी हो गई हो। इन सब रूपो का बिम्बात्मक चित्र देकर भारती ने नए रूस से बनते हुए रूसी समाज को कृतयुग की संज्ञा दी है । एक चित्र देखें- हां बोले तो कारावास, मिले वनवास अगर क्यों पूछे । लुप्त हुआ सद्धर्म, अधर्म, धर्म था नीच जार के नीचे। उपरोक्त सभी कविताओ से भिन्न दो और विशिष्ट कविताएँ इस संग्रह में संग्रहीत है । 'भारत माता के पवित्र दशांग', 'नवरल माला', ये प्राचीन तमिल शैली के माधार पर विरचित भारत माता की प्रशस्तियां ही है। अन्त में पामार प्रदर्शन शेष रह जाता है । प्रकाशन और मुद्रण में लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद से हमें अपूर्व सहयोग प्राप्त हुआ है। इसके लिए हम उनके हृदय से प्राभारी है। डॉ० विद्यानिवास मिश्र ने (संप्रति अध्यक्ष एवं प्राचार्य, भाषा शास्त्र विभाग, वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय) इस संग्रह के प्रति 'दो शब्द' लिखकर जो महत्व प्रदान किया है, उसके लिए हम जितना भी लिखें, अल्प ही है। वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्राचार्य श्री लक्ष्मीनारायण तिवारी को अमूल्य सहायता धन्यवाद के साथ ही कभी न भूलने के लिए हमें बाध्य करतो है। समय-समय पर आवश्यक परामर्श देकर श्रद्धेय म० श्रीनिवास राघवन्, मित्रवर विमलेश कांति वर्मा एवं पादरणीय बन्धु श्री कच्छपेश्वरन् ने अनुगृहीत किया है । बन्धुवर श्री गोपालकृष्णन् ने अनेक शंकामों का समाधान करके तथा श्री मणि ने कविवर भारती का चित्र भेजकर पुस्तक के महत्व में पर्याप्त सहयोग दिया है। हम इन सबके प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करते है। बापू बाल-समाज के संस्थापक थी टी० कृष्णस्वामी एवं दक्षिण भारत समाज, जबलपुर के कार्यकर्तामो, विशेषकर समाज के मंत्री श्री कृष्णस्वामो के हम ऋणो हैं, जिन्होने अनेक सभापो का आयोजन करके हमारे अनुवादों को जनसाधारण तक पहुँचाने का सुअवसर दिया है। कस्तुरी कललय, मद्रास के कलाकार श्री रमणन् एवं कुमारो कल्पलता ने 'नाचेंगे हम....' गीत का भावाभिनय कर इस रूपान्तर के महत्व को बढ़ा दिया है। एतदर्थ वे हमारे धन्यवाद के पास है।

२८ सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएं साप्ताहिक 'धर्मयुग' ने हमारे अनुवादों को विशेष अवसरों पर प्रकाशित कर हमें प्रोत्साहित किया है । इसके अतिरिक्त 'माजकल', 'नवभारत' 'माज', 'नई दुनिया' 'युगधर्म', 'भारत' आदि पत्र-पत्रिकाप्नों ने इन अनुवादों को प्रकाशित कर व्यापक महत्त्व दिया है । इन सबके प्रति आभार प्रदर्शन हमारा कर्तव्य है। जबलपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्राचार्य गुरुवर डॉ. उदय नारायण तिवारी के प्रति हम नतमस्तक है, जिनके प्रोत्साहन के फलस्वरूप हो यह कार्य सम्पन्न हो सका है। अन्त मे, मैं स्नेही बन्धु श्री जग्गीलाल गुप्ता एवं अन्य मित्रो का स्मरण करना अपना कर्तव्य समझता हूँ, जिनकी प्रेरणा व आर्थिक सहायता पाकर इस साहित्यिक आदान-प्रदान कार्य में प्रवृत्त हुआ और इस कार्य को सम्पन्न कर सका। वस्तुतः यह सम्पूर्ण कार्य उन्ही को प्रेरणा का प्रतिफल है । -सुन्दरम् --विश्वनाथ 'विश्वासी'

सुब्रह्मण्य भारती
की
राष्ट्रीय
कविताएँ

سه रे विदेशियो । भेद न हममें हम वन्दे मातरम् कहेगे। बार-बार हाँ, बार-बार भारत भू की वन्दना करेंगे। हम वन्दे मातरम् कहेगे । . ' , - ब्राह्मण कुल का हो या अछूत जो भी है इस भू पर प्रसूत है जन्मजात हो वह महान् सब जाति-धर्म, सब जन समान । ऊँच-नीच का भेद भुलाकर, जाति-धर्म का दम न भरेंगे। हम वन्दे मातरम् कहेगे ॥१॥ जो भी प्रदूत, क्या व्यर्थ समी ? जन-जीवन मे सार्थक न कभी ? क्या वे चीनी बन जायेंगे। हम को कुछ क्षति पहुंचायेंगे ? यह नितात दुसाध्य, असम्भव, ये न विदेशी कभी मनेंगे। हम वन्दे मातरम् कहेगे ॥२॥ तुम्हारा। सहस्र जाति का देश हमारा चाहेगा सबल न मां के एक गर्भ से जनमे रे विदेशियो ! भेद न हममे । मनमुटाव से क्या होता है, हम भाई-भाई ही रहेगे। हम वन्दे मातरम् कहेगे ।।३।। , वैर भाव है हममे जब तक अघ पतन ही होगा तब तक । बना यदि हममे संगठन रहेगा। जोवन मधुमय

३२
सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएँ
यही ज्ञान यदि आ जाये तो, और अधिक हम क्या चाहेगे?
हम वन्दे मातरम् कहेगे ॥४॥
हमारा।
रहेगा,
लेकर सब का सबल सहारा ।
होगा पूर्णोत्थान
ऊँचा जितना माथ
उसमे
सबका हाथ रहेगा।
साथ रहेगे तीस कोटि हम, साथ जियेंगे, साथ मरेंगे ।
हम वन्दे मातरम् कहेगे ॥१॥
दास वृत्ति करते आए हैं.,
नीच दास
हम कहलाए है।
गत जीवन पर लज्जित होवें
चिर कलक मस्तक
का घोवें।
कर लें यह सकल्प कि पहले सरिस न हम परतन्न रहेगे ॥
बार-बार हां, बार-बार भारत भू की वन्दना करेंगे ।
हम वन्दे मातरम् कहेगे ॥६॥

वन्दे मातरम
जय भारत जय वन्दे मातरम् ॥
जय-जय भारत, जय-जय भारत, जय-जय भारत, वन्दे मातरम् ।
जय भारत जय वन्दे मातरम् ।।
एक वाक्य है केवल,
जिसको दुहराना है,
आर्य भूमि को आर्य नारियो नर सूर्यों को वन्दे मातरम् ।
जय भारत जय वन्दे मातरम् ॥
एक वाक्य है केवल,
जिसको दुहराना है,
घुट-घुटकर मरते भी अति पीडित जन-जन को वन्दे मातरम् ।
जय भारत जय वन्दे मातरम् ॥
प्राण जायं पर चिर नूतन उमग से भरकर
केवल एक वाक्य गायेंगे हम सब मिलकर वन्दे मातरम् ।
जय भारत जय वन्दे मातरम् ॥
जय-जय भारत, जय-जय भारत, जय-जय भारत, वन्दे मातरम् ।
जय भारत जय वन्दे मातरम् ॥

नमन करें इस देश को इसी देश में मातु-पिता जनमें पाए प्रानन्द अपार, और हजारों वरसों तक पूर्वज भी जोते रहे- अमित भाव फूले - फले जिनके चिन्तन में यहीं। मुक्त कंठ से वन्दना और प्रशंसा हम करें- कहकर वन्दे मातरम्, नमन करें इस देश को ॥१॥ इसी देश में जीवन पाया, हमको बौद्धिक शक्ति मिली, माताओं ने सुख लूटा है, जीवन का वात्सल्य भरे-- मोद मनाया है यही जुन्हाई में हँसकर क्वारेपन का। घाटों पर, नदियों के पोखर के क्रीड़ानों की आनन्दभरी कहकर वन्दे मातरम्, नमन करें इस देश को ॥२॥ गार्हस्थ्य को यहां नारियों ने पल्लवित किया है, गले लगाया है जनकर सोने के से बेटों को- भरे पड़े हैं नभचुंबी देवालय भी इस देश में। निज पितरों की अस्थियां इस माटी में मिल गई- कहकर वन्दे मातरम्, नमन करें इस देश को ॥३॥ .

भारत सर्वोत्कृष्ट देश है भारत सर्वोत्कृष्ट देश है। निखिल विश्व मे, अपना सर्वोत्कृष्ट देश है अपना सर्वोत्कृष्ट देश है भक्ति, विराग, प्रचण्ड ज्ञान मे, रख मे, अन्न दान मे अमृत वर्षक काव्य गान मे भारत सर्वोत्कृष्ट देश है ॥१॥ धेर्य शक्ति मे, सैन्य शक्ति में परोपकार, उदार भाव में, सार शास्त्रो के ज्ञान दान मे- भारत सर्वोत्कृष्ट देश है ॥२॥ नेको में, तन की समता मे संस्कृति में, अपनी दृढता में स्वर्ण- मयूरी पतिव्रता भारत सर्वोत्कृष्ट देश है ॥३॥ नव रचनात्मक कार्यों मे रत उद्योगो मे परमोत्साहित, भुजबल और पराक्रम मडित- भारत सर्वोत्कृष्ट देश है ॥४॥ प्रति महान आदीवाला, अवनी रक्षा का मतवाला, सिन्धु सदृश वृहद् अनीवाला- भारत सर्वोत्कृष्ट देश है || मेघा शकि, मनोदृढता में, शुभ संकल्प, कार्यक्षमता सत्य भावमय ध्रुव कवि गरण में- भारत सर्वोत्कृष्ट देश है ॥

सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएं
याग यज्ञ में, तपस् तेज में,
ईशोपासन, योग - भोग में,
उत्तम देव प्रदत्त
भारत सर्वोत्कृष्ट देश है ||७||
ज्ञान में-
वृक्षराशि, वन भाग के लिए,
अधिक उपज, फल प्राप्ति के लिए
अक्षुण्ण निधि आगार के लिए
भारत सर्वोत्कृष्ट देश है ॥८॥

Etia
सब शत्रुमाव मिट जायेंगे।
भारत देश नाम भयहारी, जन-जन इसको गायेंगे।
सब शत्रुभाव मिट जायेंगे।
विचरण होगा हिमाच्छन्न शीतल प्रदेश मे,
पोत सतरण विस्तृत सागर की छाती पर ।
होगा नव - निर्माण सब कही देवालय का-
पावनतम भारत भू को उदार भाटी पर ।
यह भारत है देश हमारा कहकर मोद मनायेंगे ।
सब शनुभाव मिट जायेंगे ॥१॥
हम सेतुबध ऊंचा
कर मार्ग बनायेंगे,
पुल द्वारा सिंहल द्वीप हिन्द से जोडेंगे।
जो वग देश से होकर सागर मे गिरते,
उन जल - मार्गों का मुख पश्चिम को मोडेंगे।
उस जल से ही मध्य देश में अधिक अन्न उपजायेंगे।
सब शत्रुभाव मिट जायेंगे ॥२॥
खोज लिया जायेगा, सोने को खानो को,
खोद लिया जायेगा, स्वणं हमारा होगा।
पाठ दिशाप्रो मे, दुनिया के हर कोने में-
सोने का अतुलित निर्यात हमारा होगा।
स्वर्ण वेचकर अपने घर में नाना वस्तु मंगायेंगे।
सव शत्रुभाव मिट जायेंगे ॥३॥
डुबको लगा फरेगो नित दक्षिण सागर मे
लेंगी मुक्ताराशि निकाल हमारी यहि
मच गे दुनियों के व्यापारी, पश्चिम के-
तट पर सडे देसते सदा हमारी राहे
कृपाकाक्षी बनकर वे हर वस्तु वाछित लायेंगे।
सव अनुभाव मिट गयेंगे ॥४॥

सुब्रह्मण्य भारती को राष्ट्रीय कविताएं सिन्धु नदी की इठलाती उर्मिल धारा पर- उस प्रदेश की मधुर चांदनीयुत रातो मे । केरलवासिनि अनुपमेय सुन्दरियो के सग- हम विचरेंगे बल खाती चलती नावो मे कर्णमधुर होते हैं तेलुगु गीत उन्हे हम गायेंगे। सब शनुभाव मिट जायेंगे ||शा खूब उपजता गेहूँ गगा के कछार मे, ताम्बूल अच्छे हैं कावेरी के तट के, ताम्बूल दे विनिमय कर लेंगे गेहूँ का- सिंह समान मरहठो की प्रोजस् कविता के- पुरस्कार मे उनको हम केरल गजदत लुटायेंगे। सब शत्रु भाव मिट जायेंगे ॥६॥ ऐसे यन बनेंगे, काचीपुरम बैठकर- काशी के विद्वज्जन का सवाद सुनेंगे । लेंगे खोद स्वर्ण सव कन्नड प्रदेश का- जिसका स्वर्णपदक के हेतु प्रयोग करेंगे। राजपूत वीरो को हम ये स्वर्णपदक दे पायेंगे सब शत्रुभाव मिट जायेंगे ॥७॥ यहाँ रेशमी वस्त्र बनाकर उन वस्त्रो की- एक बहुत ऊँची सी ढेर लगा देंगे हम । इतना सूती वस्त्र यहाँ निर्माण करेंगे- वस्त्रो का ही एक पहाड बना देंगे हम । बेचेंगे काशी वरिणको को अधिक द्रव्य जो लायेंगे। सब शनुभाव मिट जायेंगे ॥८॥ -- अस्त्र शस्त्र का, कागज का उत्पादन होगा, सदा सत्य वचनो का हम व्यवहार करेंगे। श्रौद्योगिक, शैक्षणिक शालाएँ निर्मित होगी- कार्य म कभी रच मान विश्राम न लेंगे। कुछ न असभव हमे, असम्भव को सम्भव कर पायेंगे। सब शनुभाव मिट जायेंगे |

सब शत्रुभाव मिट जायेंगे
३६
छतरी बाडे से, खोले से वायुयान तक-
अपने घर मे ही तैयार करायेंगे हम ।
कृषि के उपयोगी यत्रो के साथ-साथ हो-
इस धरती पर वाहन भव्य बनायेंगे हम।
दुनियां को कपित्त कर दे, ऐसे जलयान चलायेंगे।
सब शत्रुभाव मिट जायेंगे ॥१०॥
मत्र-तत्र सीखेंगे, नभ को भी नापेंगे,
अतल सिन्धु के तल पर से होकर आयेगे।
हम उडान भर चन्द्रलोक मे चन्द्रवृत्त का-
दर्शन करके मन को आनदित पायेंगे।
गली-गली के श्रमिको को भी शास्त्रज्ञान सिखलायेंगे।
सब शत्रुभाव मिट जायेंगे ॥११॥
सरस काव्य की रचना होगी और साथ ही--
कर देंगे चिनित अति सुन्दर चिन चितेरे।
हरे-भरे होगे वन - उपवन, छोटे घधे-
सुई से, बढई तक के होगे घर मेरे।
जग के सब उद्योग यही पर ही स्थापित हो जायेंगे।
सब शत्रुभाव मिट जायेंगे ॥१२॥
मात्र जातियां दो, नर-नारी अन्य न कोई,
सद्वचनो से मार्गप्रदर्शक मान श्रेष्ठ है।
अन्य सभी हैं तुन्छ कभी जो पथ न दिखलाते
चिर सुकुमारी अपनी मधुर तमिल वरिष्ठ है।
इसके अमृत के समान वचनो को हम अपनायेंगे।
सब शत्रुभाव मिट जायेंगे ॥१३॥

चलो गावें हम मे इतना का हमारा नभ - चुम्बी नगराज, विश्व ऊचा कौन? हमारी ही भागीरथी पवित्र, नदी इतनी गौरवमय कौन? हमारे ही उपनिषद महान्, श्रेष्ठतम कहे विश्व हो मान। जहाँ की धरती ही दिन-रात स्वर्ण किरणो को चमक रही। चलो गावें हम भारत की समता मे कोई देश नहीं ॥१॥ देश जो ऋषियो की तपभूमि, जहाँ पर उपजे वीर महान्, जहाँ गूंजे नारद के गीत, जहां सद्विषयो सम्मान। जहां पर अतुल ज्ञान है भरा, दिये उपदेश बुद्ध भगवान् । हिन्द से अधिक, विश्व मे कोई देश कही प्राचीन नही । चलो गावें हम 'भारत की समता मे कोई देश नहीं' ।।२।। विघ्न - बाधाओ से क्यों डरें ? दोन बन कष्ट न भोगें कभी। स्वार्थ मे नीच कर्म क्यो करे? निराश न हो इस भू पर कभी। मूल, फल, कदली, पय, मध, धान, भरे - पूरे भारत मे आर्यजन की इस धरा समान, समुन्नत घरा न दूजी कही । चलो गावें हम 'भारत की समता मे कोई देश नहीं ॥३॥ सभी ।

जय भारत देश महान् कभी बुद्धिमत्ता से अपनी जीते थे যার विजित बहादुर उन देशो के करते थे जय गान कभी धीरता गरिमा और शौर्य भी धर्म निज खो बैठी हो फिर भी धर्म अटल जननी जय हो, तेरी सदेव जय हो ॥१॥ रचना हुई कोटि ग्रंथो की, शत देशो के प्रतिनिधि पडित। माये विषय पाने को अतिशय मनकामना मडित कभी ज्ञान का स्तर गिरने पर, परम अधोन्नति भी पाई हो । फिर भी शाश्वत सत्य पर अटल- माँ, तेरी जय हो, जय हो ॥२॥ कुठित हुई शक्ति जब वीरो के असि की क्षमता अतुलित ज्ञानप्रद सद्ग्रथो की रचना शक्ति हुई शिथिलित विषम समय मे भी तुम नही प्रकम्पित होती हो उपयोगी सद्ग्रन्थो की रक्षक, माता तेरी जय हो ॥३॥ देवगरयो के लिए स्वादमय, मधुरिम अमृत कुम्भ समान । मा ऐश्वर्य रहे की भांति घटी, तेरा पूरा

४२
सुब्रह्मण्य भारती को राष्ट्रीय कविताएं
भू को
पापी हृदय शक्ति तेरी
हरने का सदा यत्ल करता हो।
फिर भी
अक्षुण्ण निधिधारी
माता मेरी, तेरी जय हो ||४||
इस
उत्कृष्ट
किया
कर, सुखप्रद उद्योगो-धो को
तुमने जन्म
दिया प्रानन्द-
प्रदायक कितने ही धर्मों को-
सत्य खोजने जो आये हैं
उनको
मे दी हो
हमको भी
स्वतत्रता के प्रति
आकाक्षा दी, तेरी
जय हो ॥५॥

भारत माता जिसने लंका के निशाचरो का हनन किया वह धनु किसका है ? वह धनुप मार्य रानी! भयकरी ! अपनी भारत देवी का ॥१॥ जिसने दो टुकड़े इन्द्रजीत के कर डाला वह धनु किसका है ? वह मंत्र मुग्ध करनेवाली भैरवी! हमारी जननी का ॥२॥ 'परब्रह्म एक', हम पुत्र सभो, जग सुखमय तरणी के समान । वेदादि ग्रंथ में लिखनेवाले भारत मां के कर महान् ॥३॥ अय सिद्ध, जग सत्य, चित्त मे स्थिर हो जाय तो सब हो- वाधामो पर पा सके विजय, यह कथन आर्य रानी ही का ॥४॥ केहरि शावक के साथ खेल, उज्ज्वल यश भारत रानी का- उज्ज्वलतर करता शकुतला-शिशु, निज भारत मां ही का ॥५॥ गाडीव पार्थ की चढा, विश्व विजयो पत्थर स्कन्ध किसका? जो हम सबका पालन-पोपण करती उस भारत जननी का ॥६॥ मरणासन्न समय मे भी निज कुडल दे डाले पर किसके ? वे कर मधुरिम भाषा मे कवि वर्णित निज भारत माता के १७॥ युद्ध भूमि मे ज्ञानमयो गीता का गायक था मुख जिसका ? वह शत्रुता, विनाशक ज्ञानप्रदायक मुख भारत माता का ॥८॥ सुस के लिए पिता के, सुख-शासन का और मोद दारा का- कभी न चाहूँगा जग मे, कहनेवाला अन्तर निज मां का ॥६॥ 'शिव है प्रेम, विश्व-दुख मिट सकता है सारा प्रेम मान से' वचन तथागत के निकले थे भारत माता के ही मुख से ॥१०॥ मिथिला जलती है सुनकर भी, वेद तत्व सुनते विदेह की- निज चितन से कार्य करे जो मति, वह मति भारत जननी को ॥११॥ यह दैविक शकुन्तला नाटक, किसको मधुर काव्य रचना है ? यह भारत देवी, सर्वज्ञ हमारी माता की कविता है। - AM

भारत माँ की
गुरुता
क्षमतामय सर्वज्ञ और जो भूतकाल का ज्ञाता,
चह भी सोच नहीं सकता कव जन्मी भारत माता ॥१॥
है इतनी प्राचीन कि कह सकना आसान नहीं है,
पर माता जग में चिरकुमारी ही सभी कहीं है ॥२॥
तीस कोटि मुख, प्राण एक, यह भारत मां की गुरुता।
एक चिन्तन किन्तु अठारह भाषाओं की क्षमता ॥३॥
वेद-वाक्य जिह्वा पर, कर में खड्ग सुमंगलकारी ।
दुष्ट-दलन, शरणागत रक्षा हित सुबाहु बलधारी ॥४॥
निरत धर्मरक्षा में मां को साठ करोड़ भुजाएँ।
टुकड़े-टुकड़े कर देंगी जो शत्रु युद्ध को आएँ ॥५॥
सहृदय और सहिष्णु, क्षमा में माँ धरती से आगे।
पर चण्डी रूपा आक्रामक अन्यायो के आगे ॥६॥
चन्द्रमौलि, तपसी को, सिर पर जटा-जूटधारी को-
नमन करेगी सप्त लोक पालक सुचक्रपाणि को ॥७॥
मानें एक ब्रह्म की सत्ता, अद्वितीय योगिनि है।
अनुपमेय ऐश्वर्य समन्वित एक महा भोगिनि है ॥८]
धर्मपाल शासक का भला करेगी करुणा देकर ।
हो भनक तो नृत्य करे आनदित उसे निगलकर |
है नगपति को शालिनि तनुजा, फुफकारती रहेगी।
मिटे हिमालय की सब शक्ति, न मां की कभी मिटेगी ॥१०॥

उन्मादिनि मां
अति भयावह रूप देखो मातु का
है हमारी मां प्रबल उन्मादिनी।
यह करेगी प्यार शिव उन्मत्त को
हाथ मे जो तीन ज्वाला है लिए ॥२॥
उस मधुर संगीत सागर की प्रबल-
मचलती सी उर्मियो की बाढ मे
पुलक अवगाहन करेगी डूबकर
मोद मे गोता लगायेगी सदा ॥२॥
अमृतवर्षी कवित उपवन मे जहाँ
पवन नित दैविक सुगन्धि लिये चले।
पहन हार परागपूर्ण प्रसून का
मां करेगी नृत्य, कर मे जाम ले ॥३॥
जान लो यह वेदध्वनि उच्चारती
सत्य का ले शूल नाचेगी सदा ।
मनन कर पठनीय शास्त्रो को सभी
वपन कर देगी जगत के सामने ॥४॥
महाभारत युद्ध क्या कुछ खेल है ?
प्रकट होगी पार्थ को गाडीव मे।
काट क्षण मे कोटि रिपुत्रो को सदा-
मगन डूबी रहेगी रक्त मे ॥५॥

मारत जननी री!जाग री! भारत जननी री! जाग री! पो फटी निविड़तम दूर हुआ, धरती से हम सबके तप से। कनकामा फेली, बुद्धि-सूर्य भी दीप्त हो उठा है अव से । करके स्तुति पुनः नमन करने के लिए तुम्हे भारत जननी- हैं यहां सहस्र स्वयंसेवक भी खड़े प्रतीक्षा में कब से ।। पाश्चर्य यही तुम अब भी सोती हो री ! माता जाग भारत जननी री ! जाग री!॥१ - बज उठे विशाल नगाड़े, पक्षी कुल चह-चह कर कूज रहा। हो उठे निनादित धवल शंख, रव स्वतंत्रता का गूंज रहा। आने-जाने है लगी रमरिणयां, पथ मुखरित पदचापों से- ब्राह्मण कुल वेद-निपुण तेरा सकीर्तन सबको सुना रहा । हे अमृत वर्षिणि ! मातु हमारी, प्राण प्यारी, जाग री। भारत जननी री ! जाग री! ॥२१॥ दीपित दिनकर का तेजोमय स्वरूप देखा हमने नभ में। वैसी ही तेरी ज्योति विश्व में देखें यह इच्छा मन में । तेरी पद-सेवा हेतु पके फल सा मृदु अन्तर ले आये- तुमसे सुसस्कृति कोटि शास्त्र एव श्रुतियां पायो जग मे ।। ले शत्र प्रकपित करनेवाले शूल निर्मले ! जाग रो! भारत जननी री! जाग री! ॥३॥ क्या नही जानती, दृग सौन्दर्य देखने को हे माँ तेरे- कितनी आकाक्षाएँ उमडा करती अन्तर्मन मे मेरे । हे कनक वर्णवाली माता, धवलित हिमगिरि की तपजाया-- कितने युग तप करके भी लाले होगे तब कृपा के रे? क्या सत्य की अब तक है तू सोयी प्राण प्यारी जाग री। भारत जननीरी! जाग री ||४||

भारत जननी री! जागरी!
४७
F
क्या उचित कि हम शिशु जगा रहे, लेकिन रे जननी तू सोती?
भू-अधिष्ठात्री ! तुतली वाणी पर न द्रवित जो मां होती?
गो-मातु ! देश वागो !! फरते स्तुति अठारहों भाषाओं में
अपनाकर कर देती कृतार्थ तो सबकी मनस्तृप्ति होतो ।
क्या नहीं सुन रही तुम यह सब, वात्सल्य भरी मां जाग री !
भारत जननी री ! जाग री! ॥५॥

भारत मां के पवित्र दशांक १. नामकरण हरित वर्णवाले प्रिय तोते! उस माता का नाम बता, जिसने मुझसे पापी को भी श्रेष्ठ योग का ज्ञान दिया। पूर्ण ज्ञान का कीतिरूप दीपक जिसने प्रज्वलित किया- इस धरती पर भारत माता ही वह माता है, तू गा। २. देश मृदुल कंठवाले तोते ! उस स्वर्ण देश का नाम बता, देवी मेरे लिए जहाँ की बनी प्रकट आनन्द समान । नभचुम्बी नगराज हिमालय से कन्याकुमारी तक- फैला विस्तृत आर्य देश ही है वह देश, इसे तू जान । ३. नगर तुतली वाणीवाले शुक ! हम सबकी प्राण प्यारी माँ, हम सबके क्षेमार्थ व्यस्त नित किस नगरी में रहती है ? प्राप्त अहं ब्रह्मास्मि ज्ञान को, योगी जहां विचरते है- प्राणों से बढ़कर प्रिय काशी नगरी ही, वह नगरी है। ४. नदी अरे रंगीले तोते ! वन्दे माँ कहकर स्तुति करें अगर-- तो विनाश से बचा, क्षेमदायक सरिता है कौन कहो? निज पथ पर सत्कार्य और सद्धर्म, स्वर्ण उपजानेवाली , गंगा यहाँ गगन से आयी, उसका ही गुणगान करो। ५. पर्वत हे वाटिका-विहारी तोते ! इतना तो तू मुझे बता- निज तनुजा को अंक समेटे, चतुर्वेदधारी गिरि कौन ? अद्वितीय जग के शृंगों में, सबसे उच्च गगनचुंबी। कांतियुक्त, द्युति घवल, हिमालय हो वह गिरि है देखो।

भारत मां के पवित्र दशांक
४६
६. वहन
-
तोते बता प्रमत्त शान में और परम ऐश्वर्य में पगो-
मातु हमारी किस वाहन पर चढ़कर मार्ग चला करती है
रथ पर अथवा अश्व पर नहीं, विश्व प्रकंपित करनेवाले-
केहरि पर होकर प्रारूड सदा पर्यटन किया करती है।
७. सेना
शुक रे! माता प्रति कृपालु है, फिर भी कभी कुपित होने पर,
शत्रु समूल संहार करे जो, उसको वह वाहिनी कौन है ?
केवल अपने दृष्टिपात से, निज प्रतिद्वन्द्वी आक्रामक पर;
उसे समूल विनष्ट करे जो, ऐसा ही वह वनायुध है।
-
5. नगाड़ा
प्यारे तोते ! निज माता के यहाँ सदा प्रशस्त प्रांगन में-
जय निनाद करता रहता है, मुझे बता कौन नगाड़ा?
सत्यंवद, धर्ममचर ऐसे शब्दों से गुंजायमान जो-
जीव मुक्ति देनेवाला बह वेदस्वरूप विशाल नगाड़ा।
९. माला
आपोशुक! बतलानो निजभक्तों को प्रतुलित सुखको दाता-
माता सदय, कंबु ग्रोवा में कौन माल धारण करती है ?
रिपुत्रों से पार्थक्य, मात्र मुस्क्यान पसार, मिटानेवाली~-
जननी, कनक कमल की माला पहन सदैव जगमगाती है ।
१०. पताका
मोती सदृश वर्णवाले शुक ! कह शत्रुता और अन्याय,
खण्डित करनेवाली माँ की कोन समुज्ज्वल विजय ध्वजा?
परिपालन हित शिष्ट जनों के, दुष्ट जनों के निग्रह हित--
वज सदृश जाज्वल्यमान जो ध्वजा, वही वह अटल ध्वजा।
-

भारत माता की नव रत्नमाला
4
मंगलाचरण
तीस कोटि वीरों की जननी, भारत मां के कमल चरणो मे,
में यह नव रत्नो को माला सादर अर्पित करता हूँ।
शिव के रत्नपुर । मेरो भव वाधानो को दूर करे ।
आंखो की पुतली हे भारत | तेरे नामोच्चारण से,
उत्तम नग सा कान्तियुक्त तन, धर्मनिष्ठ मति, चिन्तन शक्ति,
और अनेकानेक लाम हम प्राप्त करेंगे बिना प्रयास ।
२
नील सिन्धुरूपा ग्रिनेत्र, जो सेतु वनाती समय सिन्धु पर,
उसका पादस्पर्श करें तो हमसे यम कंपायेगा थर-थर ।
भयाक्रान्त यम को काया, कर जोडेगो, भग जायेगी,
कहाँ शत्रुता मे क्षमता, जो हमसे आँख लडायेगी?
३
मोती से विशुद्ध मरिण वचनो को कहकर सबके पास
तुमने रचे पुराण, उपनिषद्, वेद और अनगिन इतिहास
कितने ज्ञानयुक्त शास्त्रो का सृजन किया है। महा
समर्थ
हम जिनकी स्तुति और प्रशसा करने मे भी हैं असमर्थ
देखो माँ, सब ज्योतिपुज बन यत्र-तत्र जगमगा रहे हैं
ये वास्तविक विजय विभुवर के, काल से परे, अमर देन हैं
धवल शख फूको सब जय-जयकार करो
सदा ज्ञानियो से यह वसुधरा रक्षित है,
सुनो, मानते रहे आज तक वीर अधर्मी
बुद्धियुक्त यह कार्य बुद्धिमानो के जग मे,

भारत माता की नव रत्नमाला शीर्ष मुकुट में धारण करना अनाचार को-- और बनाकर रखना दास मनुष्य मात्र को। - नीच शासकों ने कलंकिनी शैन्य शक्ति से- प्रोछे न्याय विधान घरा पर रच डाले थे। किन्तु आज भारत ने दुनियाँ के समक्ष यह नया धर्म प्रस्तुत कर हमें चेतना दी है। कान खोलकर सुनो, ध्यान दो उन वचनों पर- मधुर प्रवालों सी कविता के सर्जनकर्ता विश्व कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ने कहा था जिन्हें, गांधी अवतरित हुए हैं आदर्श पुरुष के रूप मे। पावन भारत धरती पर धर्मावतार के रूप में। राजनीति के धर्म में पथ निर्देशक मान, वेदवाक्य इनका सुन, 'केवल सत्य महान्' राजनीति के परे भी जितने जग के काम- सदा विजय पाता है, उनमें सत्य ललाम ! वेदनाद जो अघर से बापू के झरते रहे। पालन उनका अन्तं तक अक्षरतः करते रहे। हम देखेंगे शीघ्र ही, रक्षा संभव विश्व की- सदा ज्ञानियों से हुई, आगे होती रहेगी। रक्षक केवल धर्म है, सैन्य शक्ति असमर्थ, चूर - चूर हो जायेगी, हो जायेगी व्यर्थ । धवल शंख फूंको सब जय-जय नाद करो। सदा ज्ञानियों से यह वसुन्धरा रक्षित है। जय ध्वनि बोलो मनोवांछा नभ में गूंज उठे। धर्म, वृहद नादों से हवा निनादित लहर उठे। कन्तियुक्त मारिणक्य अहिंसा और सत्य के । धर्म रूप में हमने अपनाए हैं बढ़ के ॥

५२
सुमनाम भारती की राष्ट्रीय कविताएं
हमे न अर पीडा सहनी है, यह निश्चित है।
हमे प्राप्त होगी स्वतनता, यह निश्चत है ।।
६
सुदृढ जान लो अपने मन मे, मन की बात हमारो।
शपथ कृष्ण के पाद कमल पी मरकत छायाधारी।।
दूषित नहीं, अगर जन-जन का मन पवित्र है।
स्वतयता उपलब्ध हमे होगी निश्चित है।
हम स्वतयता प्राप्त करेंगे जय पायेंगे
अहिंसात्मक क्रान्ति बढाता रहा बोलकर,
पतन और शैथिल्य नही सेवक को जैसे-
उष्ण-शीत का भान नहीं होता अात्मा को ।
धर्मयुद्ध के लिए कटिवद्ध रहो तुम
कहता रहता सबसे यही प्रतिज्ञा साधी
करता रहता है जयनाद सभी के आगे-
गौमेतक सा महत् हमारा नेता गाधी।
फेरे कृपा कटाक्ष खडी, स्वरिणम भारत पर,
करती सदा निवास कान्तियुत जो देवी श्री-
पद्मराग मणि सदृश सुगधित पुष्पराशि मे।
भूल ही गये नर, शैथिल्य और निज भय को-
क्योकि सभी ने गाधी का जयघोष सुना है।
&
ज्वालामय वैदूर्य सदृश आँखो से शोभित--
सिंह पर सदा विचरण करनेवाली माता।
क्षण भर के ही लिए हमारे सम्मुख पाओ।
कृपाकाक्षी देशो को कर दूर यातना दिव्यस्वरूपा,
मुस्क्याकर आनन्द सिन्धु मे हमे डुबायो।

भारत माँ की ध्वजा
यह बहुमूल्य ध्वजा भारत मां को है देखो प्रानो ।
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ॥
कितना ऊँचा ध्वज-स्तभ है
यह वन्दे मातरम् लिखित है-
चमक रहा जो, फहर रही किस गति से दृष्टि टिकायो ।
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकानो ॥१॥
यह न मात्र रेशमी वस्त्र है।
झावातो से न अस्त है--
तूफानो से भी अविचल उडती है मोद मनायो ।
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकानो ॥२॥
यहाँ इन्द्र का वज्रायुध है ।
यहा तुरफ का अर्ध-चन्द्र है-
वन्दे मां है मध्य, अमित गति का अनुमान लगानो।
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ ॥३॥
देखो ध्वज स्तभ के नीचे
अद्भुत जन - समूह दृग मीचे
ये योद्धा कहते तन देकर ध्वज की आन बचानो।
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ ॥४॥
पक्तिबद्ध यह दृश्य मनोहर,
युद्ध कवच शोभित छाती पर-
वीर शौर्यमय कितने चिताकर्षक हमे बतायो ।
तब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ १५
मधुर तमिलभाषी नर योद्धा,
रक्तिम प्रांखो वाले क्षत्रिय
केरल वीर, मातु पद सेवक-
तुलभापी, तेलंग युद्ध प्रिय ॥६॥

सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएँ
यम को त्रास दिखानेवाली-
वीर मरहठे, रेड्डी-कन्नड ।
जिनकी देव प्रशसा करते-
वे हिन्दी - भापी योद्धा गरण ७॥
जब तक धरती, धर्म-युद्ध है,
हिन्द नारियो मे सतीत्व है।
वे राजपूत अटल जिनकी इस-
भू पर तब तक अमर कीर्ति है ॥६॥
वीर सिन्धुवासी जिनको-
अभिमान 'पार्थ की भू पर रहते'
बंगनिवासी न भूलते-
मां की सेवा मरते-मरते ॥ell
ये सब देखो यहां खडे हैं ।
करके दृढ सकल्प अड़े हैं ।
इनकी शक्ति और सबसे पूजित ध्वज की जय गानो ।
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकामओ ॥१०॥

वर्तमान भारतीय
देख आज के जन को हालत, हृदय फटा जाता है।
भय के कारण दुनियाँ मे जोते-जो मरा करेंगे।
कोई ऐसी वस्तु नही जो देखे नही डरेंगे।
उनके लिए दम्भ, प्रतिकार, कपट के दैत्य खडे है ।
इस तरुवर, उस तरुवर, उस खण्डहर मे छिपे पडे है ।।
यही सोच करके मानव अब क्लात हुप्रा जाता है ।
देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है ।।१।।
तात्रिक का तो नाम मात्र सुनकर घबरा जायेंगे।
'प्रोझा' और 'मदारी' 'जादूगर' सुन थर्रायेगे।
शक्ति हमारी ले हम पर ही शासन जो करते हैं।
मानव ऐसे राजनीतिज्ञो से भी अब डरते हैं ।
उनको भूत समझकर जिनका खून सूख जाता है।
देख आज के जन को हालत, हृदय फटा जाता है ।।२।।
देख सिपाही, चौकीदार, दिल धडक-धडक जायेगे ।
कोई ले बन्दूक चले तो घर मे छिप जायेंगे।
देखें यदि अति दूर सुसज्जित किसी व्यक्ति को पाते।
भय के मारे हाथ जोडकर स्वय खडे हो जाते।
सबके आगे भीगी बिल्ली बन जाया करता है।
देख आज के जन को हालत, हृदय फटा जाता है ॥३॥
फटता हृदय कहूँ क्या, हममे कितने भेद यही है।
एक कोटि यदि कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति नहीं है ।
पुत्र अगर कहता है, है नागेश पांच सिरवाला।
और पिता कह दे छ. सिर, भारी अन्तर कर डाला।
इतने अन्तर से हो उनमे वैर बढा जाता है।
देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है ॥४॥

सुमागम भारती की राष्ट्रीय कविताएं
शास्तपादमी शास्तो पिशाप पामत मानेंगे।
अन्तर पड़ने पर स्वगोन पो गाली दे डालेंगे।
धपी, प्रपची, गपटी यो वे सेवा तय परते हैं।
मुर गंठ से परें प्रशसा और नमन करते हैं।
व्यकि व्यक्ति वह शैव, अमुक वैष्णव कहता लडता है।
देस प्राज ये जन की हालत, हृदय फटा जाता है ।
हृदय फटा जाता है पर मै घृणा नहीं कर पाता।
हाय । प्रभागो को न अन्न, भर पेट कभी मिल पाता।
ये कारण जानने के लिए यल नहीं करते हैं।
जहाँ देखिए है अकाल, सब तडप-तडप मरते हैं।
उनके कष्ट-हरण का पथ ही दृष्टि नही आता है।
देख आज के जन को हालत, हृदय फटा जाता है ||६||
शक्ति नहीं चलने की ग्रस्त सदा रहते रोगो से ।
पर के दिलाये पथ पर चलते शिशु से, अधो से
चार हजार करोड से अधिक रग बिरगी मधुर कलाएँ-
जनमी जिस भारत भू पर, जिन पर सब जग मे गर्व मनायें।
उसमे व्यक्ति विवेकहीन पशु-सा जीवन जीता है ।
देख आज के जन को हालत, हृदय फटा जाता है ।।७।।
-

आनेवाला भारत व जानेवाला भारत जानेवाले भारत के प्रति कटुवचन निर्बल कन्धोवाले भारत तू जा जा जा। दुर्बल मानसवाले भारत | तू जा जा जा । हे कातिरहित मुखवाले भारत! तू जा जा जा । तू हो निस्तेज नेत्रवाले ! तू जा जा जा } कुठित तेरा है कण्ठ हिन्द तू जा जा जा । है क्षीण तुम्हारी काति हिन्द तू जा जा जा । तुम शकाकुल अन्तरवाले हो, जा जा जा। तुम सदा दासता के इच्छुक हो, जा जा जा ॥१॥ मान और अपमान शून्य कुत्ते के जैसा- आज तुम्हारा जीवन भारत । जा जा जा। भय के कारण कर न सको कृतज्ञता ज्ञापित- चाटुकारिता करनेवाले जा जा जा । बीते जीवन के असत्य को सत्य मानकर उसको मुक्त प्रशसा करते जा जा जा। जगत् प्रसिद्ध सत्य को प्रबल असत्य बताकर दुनियाँ के सम्मुख ला धरते, जा जा जा ||२|| दुनियां को अनगिन भाषामो को सीखोगे- किन्तु न सोखोगे निज भापा, जा जा जा। पढ डालोगे ग्रन्थ सैकडो, किन्तु एक भी- ग्रन्थ सत्यभापी न पढोगे, जा जा जा। पाँच सैकड़े मत-मतान्तरो की चर्चा मे- सदा व्यस्त रक्खोगे निज को जा जा जा । तू असख्य दुर्गन्ध और कोचड ला लाकर अपने घर मे भर डालोगे, जा जा जा ||३|| सैकडो जातियां कहनेवाले, जा जा जा। एक तू धर्म स्थापित न करोगे, जा जा जा। ४ गुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएं शास्त्र न पढ, दमी शास्त्री पिशाच का मत मानेंगे। अन्तर पडने पर स्वगोत्र पो गाली दे डालेंगे। छनी, प्रपची, कपटी की वे सेवा तर करते हैं। मुक्त कठ से करें प्रशसा और नमन करते हैं। व्यक्ति व्यक्ति वह शैव, अमुक वैष्णव कहता लडता है। देख माज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है ॥५॥ हृदय फटा जाता है पर मैं घृणा नहीं कर पाता। हाय । अभागो को न अन्न, भर पेट कभी मिल पाता। ये कारण जानने के लिए यल नहीं करते हैं। जहाँ देखिए है अकाल, सब तडप-तडप मरते हैं। उनके कष्ट-हरण का पथ ही दृष्टि नही आता है। देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है ||६|| शक्ति नही चलने की ग्रस्त सदा रहते रोगो से । पर के दिलाये पथ पर चलते शिशु से, अधो से चार हजार करोड़ से अधिक रग बिरगी मधुर कलाएँ- जनमी जिस भारत भू पर, जिन पर सब जग मे गर्व मनायें। उसमे व्यक्ति विवेकहीन पशु-सा जीवन जीता है। देख आज के जन को हालत, हृदय फटा जाता है।

मानेवाला भारत व जानवाला भारत
जयी हाथवाले भारत | तू आ आ आ ।
विनययुक्त जिह्वावाले तू आ ग्रा ग्रा
पूरण ब्रह्म रूप भारत रे मा आ आ।
निखिल पदार्थो के प्रतीर तू आ आ आ
प्राप्त ज्ञान के साथक कर्ता आ आ आ ।
मनानुकूल रूप निर्माता आ आ था।
अद्वितीय है कार्य देश को एक बनाना-
इसको सफल बनानेवाले या आ आ

- 1 ५८ सुब्रह्मण्य भारती को राष्ट्रीय कविताएं करके चर्चा सेकडो उचित आदर्शों की- पैसे के कारण पांव पडोगे, जा जा जा। अत्याचारी बन नही डरोगे सम्मुख हो अत्याचारो को देव भगोगे जा जा जा। तुम ज्योतिर्मय माणिक्य के सदृश हो भारत- पर समय चक्र मे धूल धूसरित, जा जा जा ॥४॥ आनेवाले भारत की प्रशस्ति कातियुक्त प्रांखोवाले आ आ आ भारत सुदृढ हृदयवाले तू आ आ आ । अमृत के समान मृदुभापो आ आ प्रा। वज स्कधयुक्त भारत तू आ आ आ । भारत परम शुद्ध मतिवाले आ आ आ । देख नीचता खोल उठोगे आ आ आ । पिघल उठोगे देख दीनता आ पाया। वृषभ चालवाले भारत तू मा प्रा मा १५॥ सत्ययुक्त ग्रन्थो को ही वेद मानकर- उनकी स्तुति करते जानोगे आ आ आ । तुम असत्य से डरनेवाले आ आ आ । फेंकोगे अश्लील ग्रन्थ तू ा ा ा। तुम शैथिल्य रहित चिन्तनमय ] आ आ आ । हे आरोग्य तनवाले भारत आ आ आ। इस धरती से दैव श्राप को दूर हटाकर---- अति उत्कृष्ट बनानेवाले आ आ आ ॥६॥ पात्रो अरे युवक भारत तू आ आ आ । अद्वितीय बलशाली भारत । ग्रा प्रा प्रा। यह निस्तेज देश है, इसम प्रात सूर्य सी- प्रतिमा लकर ज्योतिर्मय तू आ आ आ कातिरहित यह देश, अपरिमित रूप मे इसे- कातिदान करनेवाले तू आ आ आ । पार्थ के सदृश, घटित सभी घटनाओ को निज- नेत्रो मे दिखलानेवाले आ आ आ ॥७॥ -

प्रानेवाला भारत व जानेवाला भारत
५६
जयो हाथवाले भारत! तू आ आ आ ।
विनययुक्त जिह्वावाले तू आ ना आ।
पूरण ब्रह्म रूप भारत । रे ा ा ा।
निखिल पदार्थों के प्रतीक तू या या प्रा।
प्राप्त ज्ञान के सार्थक कर्ता या प्रा श्रा।
मनोनुकूल रूप निर्माता आ आ श्रा।
अद्वितीय है कार्य देश को एक बनाना-
इसको सफल बनानेवाले मा प्रामा

भारत समुदाय रहो चिरंजीवि भारत समुदाय तुम्हारी जय हो, जय हो। तीस कोटि जन का समान अधिकार यहाँ की सव संपत पर, अद्वितीय यहरूप देश का होगाजग के रंगमच परःतेरी जयहो । रहो चिरंजीवि भारत समुदाय तुम्हारी जय हो, जय हो । मुंह का ग्रास छोनने का दिन अब भी क्या रह पायेगा? कष्ट देखकर एक व्यक्ति का दूजा हपं मनायेगा ? सुभग वाटिका, हरे-भरे सेतो से भरा अपना- क्या इसमे अब आगे भी कामुक जीवन रह जायेगा? भरा हुआ है कोने-कोने मे अतुलित धन-धान्य यहाँ, कंद मूल फल हमको यह देगा सदैव, देगा सदेवः तेरी जय हो। रहो चिरंजीवि भारत समुदाय तुम्हारी जय हो, जय हो ॥१॥ विनय दूसरे का न रहेगा । अपना स्वयं विधान बनेगा। तन मन धन से उसे देश का- बच्चा-बच्चा वरण करेगा । क्षुधित दिख गया अगर कभी भी- भारत भू का एक व्यक्ति भी- हम विनष्ट कर देंगे, शाश्वत- रह न सकेगा विश्व यह कभी : तेरी जय हो। रहो चिरंजीवि भारत समुदाय तुम्हारी जय हो, जय हो ॥२॥ गोत 1 का यह प्राप्त वचन- जिससे प्लावित है जन-जन- 'जीवन सर्वभूतेषु'- वासुदेव का व्यक्ति नही असमर्थ नितात- सम्मुख जग के परम अशात- रक्खेगा, हां हाँ, रक्खेगा- - सत्य कथन

भारत समुदाय
हिन्द अमरता
का सिद्धान्त
तेरी जय हो।
रहो चिरजीवि भारत समुदाय तुम्हारी जय हो, जय हो ॥३॥
हम सब एक वश वाले हैं
हम सब एक यश वाले हैं
व्यक्ति-व्यक्ति मे भेद न कोई,
हम सब भारत के वासी हैं ।
प्रतर नही मूल्य के स्तर के ।
भाव न यहाँ सेव्य-सेवक के
सर स्वामी हां, सब स्वामी-
हां, सभी यहाँ स्वामी भारत के तेरी जय हो।
रहो चिरजीवि भारत समुदाय तुम्हारी जय हो, जय हो ॥४॥

स्वतंत्रता की चाह जिनके उर मे चाह सदा अमृत पीने की, वे मद पान भूलकर भी क्या कर पायेंगे? जिनके उर मे चाह शौर्यमय स्वतंत्रता की, और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेगे। कोति प्रदायक सद्धर्मों को सब कुछ माने, शेष सभी कुछ व्यर्थ यहाँ, ऐसा जो जानें । वे जनदासवृत्तिपरजीवन यापन क्यो करना चाहेगे? जिनके उर मे चाह शौर्यमय स्वतत्रता को, और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेगे ॥२॥ 'जिसको जन्म मिला, मरना उसका निश्चित है' जो इस अटल सत्य से जीवन मे परिचित है- छोड धर्म को, मर्यादा को, आगे भी जीना चाहेगे ? जिनके उर मे चाह शौर्यमय स्वतंत्रता की, और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेगे ॥३॥ मानव जीवन पाना अति दुर्लभ इस भू पर दृष्टि डाल पाये हैं जो इस परम सत्य पर । वै न कभी भी सत्य छोडकर, सत्यभ्रष्ट जीवन चाहेगे। जिनके उर मे चाह शौर्यमय स्वतत्रता की, और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेगे ॥४॥ छोड निशा में ज्योति-प्रदायक रजनीचर को- कौनभला चाहेगा, टिमटिम जुगनूगण को। प्रांखो की पुतली स्वतंत्रता, छोड नही दासत्व करेंगे। जिनके उर मे चाह शौर्यमय स्वतंत्रता की, और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेगे ॥५॥ रखकर चाह धरा के सुख को अपने मन मे, स्वतंत्रता का गौरव क्या खोयेगे जग मे ?

स्वतंत्रता की चाह
भांख बेचकर, चित्रो के क्रयकार हंसी के पात्र बनेंगे।
जिनके उर मे चाह शौर्यमय स्वतंत्रता को,
और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेगे ॥६॥
कर लेंगे यदि नमन कमी वन्दे माँ कहकर,
माप झुकेगा क्या मायावी असत् वस्तु पर?
'वन्दे मातरम्' एकमात्र उद्धारक यह भूल पायेंगे।
जिनके उर मे चाह शौर्यमय स्वतत्रता की,
और न कुछ भी वे इस धरती पर चाहेगे ॥७॥

स्वतंत्रता का पौधा नही नीर मे पाला-पोसा, प्रासों का जल देकर सोचा। हे सर्वेश देस यह पौधा, मन पिघलेगा क्या ? ॥१॥ लास भावनाएँ घृत बनकर- विकसी प्राणों की अवनी पर तल चिराग यह जला, मुझे स्वीकार करेंगे क्या? ॥३॥ 'सत्यमेव जयते' सद्जन का- वचन झूठ हम होने दें क्या ? कृत का फल भोगा जो, वह पर्याप्त नहीं है क्या ? ॥३॥ श्रममय वर्ष सहस्र विताये- खोई मणि अपने घर लाये। फिर उसको हम किसी मूल्य पर खो सकते हैं क्या? ॥४॥ कारागृह में चुप पड़े-पड़े, सज्जन घुट-घुट रात-दिन मरे मेधावी पिसते कोल्हू में दृष्टि न आये क्या? ॥५॥ पीड़ा में मसोसते मन को- अनगिन सचरित्र, सज्जन को, अंधे शिशु सा व्यथित तड़पते देख न पाये क्या ? ॥६॥ रौंद मनोबल नवयुवकों के- बिलग मातु पितु जन से करते, यह अनीति की पराकाष्ठा देख सकोगे क्या? ॥७॥ तव प्रदत्त सब देन प्रकृति की हे प्रभु! मिट जायेगी फिर भी- पोड़ाएँ अतिरिक्त तुम्हारे अन्य हरेगा क्या?

स्वतंत्रता या पौधा
१५
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-
हुई तुम्हारी कृपापाक्षा
मिली हमे प्यारी स्वतंगता ।
करें अपहरण उसका निर्दय पशु, देखोगे क्या ? ॥६॥
हम न अगर स्थाधीन बनेंगे-
तो क्या अतिशय दीन बनेंगे ?
बिना गगन वर्षा के जन-जीवन राभव है क्या?॥१०॥
मन मे इच्छाएं उभरेंगी-
तेरे बिना न पूरी होगी।
छल पाखड रहित हम सबके उर निरखोगे क्या? ॥११॥
क्या हम व्यर्थ पुकार रहे है।
तन मन धन सब वार रहे है ?
हम सबका विलाप, यह तडपन व्यर्थ रहेगी क्या ? ॥१२॥
तब हित तेरी अनुकम्पा से-
तेरा हक मांगे दुनिया से ।
हम पर द्रवित तुम्हारा होना, उचित नहीं है क्या ? ॥१३॥
जो करते प्रार्थना तुम्हारी,
नई नही यह विनय हमारी,
नही पूर्वजो के सुखमय दिन याद करोगे पया ? ॥१४॥
अगर धरा पर धर्म सत्य है,
तब अस्तित्व अचल शाश्वत है।
तो हम दुनिया की इच्छाएं पूर्ण परोगे क्या ? ॥१५॥

स्वतन्त्रता की प्यास
प्यास बुझेगी का अन्तर से स्वतयता की?
पराधीनता के कव तक व्यामोह मिटेंगे?
कब तक टूटेंगी भारत मां को हथकडियां ?
अव के उत्पीडन कब बीते स्वप्न बनेंगे?
आर्यजनो के जीवन रक्षक एकमात्र प्रभु
सत्य विजय के लिए महाभारत मे आये।
रता, विजय हमारो सब तेरे हाथो मे-
क्या यह उचित कि भक्त तुम्हारा कष्ट उठाये ॥१॥
भुखमरी, पोडा क्या तेरे भक्तो को हो,
उन्नत जीवन शेष सभी दुनियांवालो को?
अनुचित किया नही क्या अब तक छोड निराश्रित-
अति पोडित, हम आश्रय मे आनेवालो को?
ठुकरा सकती है क्या माता अपने शिशु को-
अभय दान करना तेरा कर्तव्य नही है ?
भूल गये क्या धर्म, कुकर्मी असुर सहारक ।
वीर शिखामरिण और आर्य उत्तम तू ही है ॥२॥

स्वतंत्रता की स्तुति छोड भवन सुखमय, कठोरतम- कारावास भुगतने पर भी। खोकर यश, ऐश्वर्य, घृणा- निन्दा का पात्र बनूं में तब भो । कोटि कष्ट सहते - सहते ही- में विनष्ट हो जाऊँ फिर भी- हे स्वतते । भूल न सकता- नमस्कार करना तुम्हे कभी ॥१॥ कृपापात्र जो नही तुम्हारा- अद्वितीय धनवान क्यो न हो। विद्या बुद्धि समन्वित नाना- शास्त्रज्ञान मे दत्त क्यो न हो । अगरिगत महिमा लिए हुए वह- मानव अति महान् हो फिर भी उसका जोवन उस शव सा- जो सुन्दर आभूपण पहने हो ॥२॥ वह भी कोई देश, जहाँ पर-- दिव्य ज्योति तेरी पड़ी नही जीवन और विवेक वुद्धियुत सृजनात्मक क्षमता वहां कही ? उत्तम काव्य, कलाएं और- वेद शास्त्रो का सृजन न होगा- पापी है जिसको रक्षाहित तेरी कृपा कभी मिली नही ॥३॥ सदा मरेंगे व्यथित, राग से- मन मे नही उमग रहेगी। तुच्छ वन्य पशुओं से बढकर नीची उनको वृत्ति रहेगी।

स्वतन्त्रता की प्यास
प्यास बुझेगी कब अन्तर से स्वतंत्रता की ?
पराधीनता के कब तक व्यामोह मिटेंगे?
कब तक टूटेंगी भारत मां को हथकड़ियाँ ?
अब के उत्पीड़न कब बीते स्वप्न बनेंगे?
आर्यजनों के जीवन रक्षक एकमात्र प्रभु
सत्य विजय के लिए महाभारत में आये।
रता, विजय हमारो सब तेरे हाथों में-
क्या यह उचित कि भक तुम्हारा कष्ट उठाये ॥१॥
भुखमरी, पीड़ा क्या तेरे भक्तों को हो,
उन्नत जीवन शेष सभी दुनियांवालों को ?
अनुचित किया नहीं क्या अब तक छोड़ निराश्रित-
अति पीड़ित, हम आश्रय में आनेवालों को ?
ठुकरा सकती है क्या माता अपने शिशु को-
अभय दान करना तेरा कर्तव्य नही है ?
भूल गये क्या धर्म, कुकर्मी असुर संहारक ।
वीर शिखामणि और आर्य उत्तम तू ही है ॥२॥

खोकर यश, ऐश्वर्य, स्वतंत्रता की स्तुति छोड भवन सुखमय, कठोरतम- कारावास भुगतने पर भी। घृणा- निन्दा का पात्र बनूं में तब भी { कोटि कष्ट सहते - सहते ही- में विनष्ट हो जाऊँ फिर भी- हे स्वतत्रते | भूल न सकता- नमस्कार करना तुम्हे कभी ॥१॥ कृपापात्र जो नही तुम्हारा- अद्वितीय धनवान क्यो न हो । विद्या बुद्धि समन्वित नाना- शास्त्रज्ञान मे दक्ष क्यो न हो । अगणित महिमा लिए हुए वह- मानव अति महान् हो फिर भी उसका जीवन उस शव सा- जो सुन्दर आभूपररा पहने हो ॥२॥ वह भी कोई देश, जहां पर-- दिव्य ज्योति तेरी पडी नही जीवन और विवेक बुद्धियुत सृजनात्मक क्षमता वहाँ कही ? उत्तम काव्य, कलाएँ और- वेद शास्त्रो का सृजन न होगा- पापी है जिसको रक्षाहित तेरी कृपा कभी मिली नहीं ॥३॥ सदा भरेंगे व्यथित, राग से- मन मे नही उमग रहेगी। तुच्छ वन्य पशुओ से बढकर नीची उनको वृत्ति रहेगो ।

६८
.
सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताएँ
अनुभव कभी अमर सुस का
न करेंगे, सुख न स्वप्न मे होगा-
गौरव अमिट प्रदायिनि मां !
जिनको न तुम्हारी कृपा मिलेगी ॥४॥
यदि मिले बन्दीगृह भी उसे--
स्वर्ग तुल्य हुआ करता सदा ।
तव कृपा के लिए देवी नित्य ही-
मुदित मन सर्वस्व अर्पण जो करे ॥५॥
विश्व सुखपूरित महल,अट्टालिका,
विषम कारागृह सरीखी है उसे ।
माँ!तुम्हारी जोन महिमाजानता-
दासता मे मन लगाता है सदा ॥६॥
नई गति पाश्चात्यादेशो को मिली-
शौर्यमय जयकार तेरी जो किए।
कह उठे तन कोटि दे यमराज को-
हम तुम्हारी कृपा से लेंगे सदा ॥७॥
कीर्ति की स्तुति मे तुम्हारी विनय में-
गा सकू क्या दास मे, असमर्थ हूँ।
छिन्न गौरव, पतन को है प्राप्त जो-
अहो । मैं उस देश मे पैदा हुआ ॥८॥
देवि हे ! सद्धर्म की सरक्षिका-
रो विदारिणी, कष्ट, दुख, रोगादि को ।
ज्योति ! मंगलमय सुधा ।। नर शूर की-
में सदा ही स्मरण रक्खूगा तुझे ॥६॥

নননা
स्वतनता स्वतग्रता स्वतयता
हैं स्वतत्रता भगी और चर्मकारो को ।
है स्वतत्रता आदिवासियो, बजारो को ॥
क्षमता के अनुकूल समी उद्योग चलायें ।
उच्च ज्ञान, शिक्षापा जीवन सुखद बनाएँ ।
सबको मिली देश मे आज स्वतत्रता ।
स्वतनता स्वतत्रता स्वतत्रता ॥१॥
वृहद् जाति मे नही अकिंचन, दास न कोई ।
अब भारत मेंनीच व्यक्ति का नाम न कोई ॥
शिक्षित हो,समुचितधन धान्य सभोजन पायें।
आपस में हिल मिल समताका समय बिताएँ।
सबको मिलो देश में आज स्वतता ।।
स्वतत्रता स्वतत्रता स्वतत्रता ॥२॥
जिससे जन नर से नारी को नीचा जाने ।
हम अपनी वह अज्ञानता दूर कर डालें ॥
तोड दासता को जीवन को सुखी वनावें ।
'नर नारी समान है' यह सद्भव जगावें ।
सबको मिली देश में आज स्वतत्रता ॥
स्वतत्रता स्वतनता स्वतत्रता ॥३॥

नाचेंगे हम नाचेगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे, आनन्द स्वराज मिला हमको, हम नाचेंगे। नाचेंगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे । दिन बीत गया है, ब्राह्मण को प्रभु कहने का, गोरे फिरगियो को हुजूर भी कहने का। हमसे करके याचना हमारे ऊपर ही- शासन करनेवालो की सेवा करने का । जिसने हमको अब तक अंधियारे मे रखा, उस दगाबाज अन्यायी का दिन बोत गया, हम नाचेंगे । नाचेंगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे ॥१॥ सर्वत्र यही चर्चा है अब हम है स्वतन्त्र, हर कठ यही गाता है अब हम है स्वतन्त्र । हैं निर्विवाद भारत भू के जन-जन समान- क्या ऊँच-नीच सब कहते हैं हम सब स्वतन्त्र ॥ हम शख फंककर जय जयध्वनि उच्चारेंगे- धरणी के कोने-कोने मे रव गूंजेगा- हम नाचेंगे। नाचेंगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे ॥२॥ आया रे । दिन जब सब समान बन जायेंगे। इस भू से जब छल दभ स्वय मिट जायेंगे। उच्चता नोचता का पैमाना बदल गया- सधर्मी, सकर्मी महान् कहलायेंगे। जायेंगे अपने आप यहाँ से पासडी- वचक विनष्ट हो जायें वह दिन पाया है, हम नाचेंगे। नाचेंगे हम अानन्द मगन हो नाचेंगे ॥३॥ हम मुक्त कंठ से कृषि के वन्दन गायेंगे। उद्योगो के मस्तक पर तिलक लगायेंगे।

माचेंगे हम
भक्षण करके भरपेट व्यर्थ जो रहते है-
उनको हम शब्द भर्त्सना भरे सुनायेंगे।
कमर धरती मे जल सिंचन से क्या होगा-
कोई न व्यर्थ कर्मों मे समय गवायेगा, हम नाचेंगे।
नाचेंगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे ॥४॥
अपना ही है यह देश हुआ है भास हमे,
अपना इस पर अधिकार हुआ है भास हमे।
परिपूर्ण ब्रह्म की सत्ता के अतिरिक्त किसी-
सत्ता पर होगा कभी नही विश्वास हमे ॥
दासता उसी को केवल कर सकते हैं हमे-
दूसरा हमे परतन्त्र न रखने पायेगा-हम नाचेंगे ।
नाचेंगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे ॥५॥

नाचेंगे हम नाचेगे हम आनन्द मगन हो नाचेगे, आनन्द स्वराज मिला हमको, हम नाचेंगे। नाचेंगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे । दिन बीत गया है, ब्राह्मण को प्रभु कहने का, गोरे फिरगियो को हुजूर भी कहने का। हमसे करके याचना हमारे ऊपर हो- शासन करनेवालो को सेवा करने का।। जिसने हमको अब तक अंधियारे मे रखा, उस दगावाज अन्यायी का दिन बोत गया, हम नाचेंगे। नाचेगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे ॥१॥ सर्वत्र यही चर्चा है अब हम हैं स्वतन्न, हर कठ यही गाता है अब हम है स्वतन्त्र । हैं निर्विवाद भारत भू के जन-जन समान- क्या ऊँच-नीच सब कहते हैं हम सब स्वतन्त्र ।। हम शख फंककर जय जयध्वनि उच्चारेंगे- धरणी के कोने-कोने मे रव गूंजेगा- हम नाचेंगे। नाचेंगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे ॥२॥ आया रे। दिन जब सब समान बन जायेंगे। इस भू से जब छल दभ स्वय मिट जायेंगे। उच्चता नोचता का पैमाना बदल गया- सधर्मी, सद्कर्मी महान कहलायेंगे। जायेंगे अपने आप यहाँ से पाखडी- वचक विनष्ट हो जायें वह दिन आया है, हम नाचेंगे। नाचेंगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे ॥३॥ हम मुक्त कठ से कृपि के वन्दन गायेंगे। उद्योगो के मस्तक पर तिलक लगायेंगे।

नाचंगे हम
भक्षण करके भरपेट व्यर्थ जो रहते है-
उनको हम शब्द भत्र्सना भरे सुनायेंगे ।
कसर धरती म जल सिंचन से क्या होगा-
कोई न व्यर्थ को म समय गवायेगा हम नाचेंगे।
नाचेंगे हम श्रानन्द मगन हो नाचेंगे ॥४॥
अपना ही है यह देश हुआ है भास हो,
अपना इस पर अधिकार हुआ है भास हम।
परिपूरण ब्रह्म को सत्ता के अतिरिक्त किसी-
सत्ता पर होगा कभी नही विश्वास हमे ॥
दासता उसी की केवल कर सकते है हम-
दूसरा हम परतन्त्र न रखने पायेगा-हम नाचेगे।
नाचेंगे हम आनन्द मगन हो नाचेंगे ॥५॥

- मे ॥२॥ तानाशाह जार का पतन महाकालि को, पराशक्ति को, वहाँ कृपा को दृष्टि हुई है। देखो देखो, रूस देश में एक महा युगक्राति हुई है। देख अन्त अत्याचारी का, है प्रसन्न अत्यधिक देवगण । यह नवीनता देखे दुनियाँ, देख जिसे मरते पिशाचगण ॥१॥ अन्यायी हिरण्य सा क्रूर जार ने अपना राज्य किया था, उस शासन मे सद्धर्मी, सज्जन, अनाथ वन तडप रहा था, महामूढ था, मान लिया था धर्मतुच्छ, उसके शासन मे- मूल पाखड भरे थे जैसे सर्प भरे होते हैं वन श्रमी किसानो को न अन्न था, बस बीमारियो का स्वराज था। जो असत्य के आश्रय मे थे, उनके घर ऐश्वर्य भरा था। फांसी थो आसान, सत्यवादी को बन्दीगृह की पीडा । साइबेरिया के वन मे थी मृत्यु बुलाती करती क्रीडा ॥३॥ हाँ, बोले तो कारावास, मिले बनवास अगर क्यो पूछे । तृप्त हुआ सद्धर्म, अधर्म धर्म था नीच जार के नीचे। पिषला उर मां का निकाल मे, सत्य सघ भक्तो की पालक- कृपादृष्टि फेरी अपनी, यम जार महापापी कुल-घातक ॥४॥ गिरा जार-शासन, जैसे हिमालय गिरे धरा पर । धर्मविनाशक असत् वचन से, एक एक कर मिटे समय पर । झझा के झोको मे जैसे वृक्ष टूट ईधन बन जाते । दुनियाँ ने देखा वैसे, अमियो को विनष्ट हो जाते ॥५॥ देखो यह जनतन्त्र, एक सा न्याय सभी को यहाँ मिला है। जन शासन है, पनप न सकती दासवृत्ति, उद्घोष हुआ है। गिरा हुमा कलिकाल, गिरी दीवार, यहां ज्यो ठोकर खाकर। खड़ा हो रहा है कृतयुग देखो उसको टूटी काया पर ॥६॥ - गन्ने के खेत में गन्ने के खेत, हाँ गन्ने के खेत में । यके हाथ - पैर इधर-उधर लुढक जाती है, पछताती हाय - हाय करती चिल्लाती है । हिन्दू महिलामो का खून उबल जाता है- पोडा मे पाठ-पाठ आंसू ढुलकाती है ।। इनको इस पीडा की दवा ही नही क्या ? पिसतो है रात-दिन कोल्हू के वेल सो : गन्ने के खेत में। गन्ने के खेत, हां गन्ने के खेत मे ॥१॥ होता ऐसा प्रभाव नारी के नाम का पिघल-पिघल जाता है अतर शैतान का। पर यह भी होगा क्या नारी के कष्ट देख- द्रवित नहीं होगा अतर्मन भगवान् का ? अश्रु चहाते वे क्या मिट्टी में समा जायेगी दक्षिण सागर मध्य शेप समय खोयेंगी तडप रही है वहनें अधे यन, द्वीपो मे : गन्ने के खेत मे। गन्ने के खेत, हाँ गन्ने के खेत मे ॥२॥ कब वे इस धरती की सुधि करने पायेंगी? कब तक निज भारत के दर्शन को भायेंगी? मातृ-भूमि का उनको ध्यान तक नहीं होगा, तुमने तो पवन । आर्तनाद भी सुना होगा ? कहो एक बार जो कहा है तुमसे सबने, दुख सागर मे क्या उत्पीडन सहती बहनें ? फूट-फूट रोने को शक्ति भी नहीं है अब : गन्ने के खेत मे। गन्ने के खेत, ही गन्ने के खेत मे ॥३॥ अन्यायी उत्पीडन देते ही रहते हैं, बहनो को त्रास दे सतीत्व भग करते हैं । बेचारी अबलाएँ तडप-तड़प रहती हैं- शोषण की ज्वाला घुट-घुटकर मरती हैं। -

७४
सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय कविताए
क्या ये शोपण, पीडन, प्रोत्साहन पायेंगे ?
क्या अब ये आगे भी सहन किए जायेंगे ?
प्राओ तुम हे कराल | चण्डी दुर्गे!! विशाल
.
गन्ने के खेत मे ,
गन्ने के खेत, हां, गन्ने के खेत मे ॥४॥

वेल्जियम् की स्तुति धर्म पर अपने सदा तू अटल था, घम के कारण पतन तेरा हुआ । सहन अत्याचार सब कर लिया जो शक्तिशाली विदेशी देते रहे । सूप से जिसने भगाया व्याघ्र को- अति बली उस आदिवासिनी की तरह । साधनों से दीन होते हुए भी- विश्व में कृतकर्म से ऊँचे बने ॥१॥ पतन तेरा हुमा बस औदार्य से, शत्रु सेना सिन्धु सी, दृढ शक्तियुत, आक्रमण को बढ़ी भी उस समय भी-~- रंच मात्र न धैर्य तेरा डिग सका। वीरता से प्राप्त करना प्रशंसा- उचित है, यह मान, मनदृढ कर लिया। अटल थे अधिकार के रक्षार्थ तुम- सत्य पर मर मिटे जो, उस देश के ॥२॥ स्वाभिमानी था, पतन तेरा हुआ, शत्रु शासक नीच, गवित शक्ति पर, अति बलिष्ट रहा तथापि अभाव मे- शक्ति के भी, रंच मान न डरातू । नाम मुड़ने का न पीछे लिया तू । यथाशक्ति किया करेंगे सामना कहा, और बलिष्ठ रिपु के मार्ग मे- तू सदा रोड़े बढाता ही रहा ॥३॥ वीरता से ही पतन तेरा हुमा- पिल पड़ी जब शत्रु, सैन्य पहाड़ सी । - छिप रहे रक्षार्थ अपने मात्र हो-- हृदय ने तेरे न स्वीकारा कभी ।।

. सुब्रह्मण्य भारती को राष्ट्रीय कविताएँ सर्प को ज्यो तुच्छ कीडा मान ले निपट लघु कर लिया इस सघर्प को । वढ रही उस शनु सेना का प्रबल सामना अत्यन्त दृढता से किया ॥१॥ पतन अगम, अटूट साहस मे हुमा, शनु को सेना अपरिमित शक्ति मे- अहकारो उगलती आग को- देश के सीमान्त पर चढ आ गई। उस समय भी वचन पर निज दृढ रहे, शरण में जाना न स्वीकारा कभी- पराजय तुम मान सकते थे नही- टोकते ही रहे अरि दल को सदा ॥५॥ भय न पास कभी फटकने दिया तू तुच्छ समझ घोरतम आपत्ति को । अति तरगाकुल नदी की बाढ सी- वाहिनी लेकर सबल, अनगिनत जब- शत्रु शासन भयकर अति दैत्य सा पिशाची बलयुक्त घुसने लगा था- 'जान जाने पर न आन गंवायेंगे' बोलकर हर बार तू भिडता रहा ॥६॥ किसी कारण से बढी हो शनुता , प्रकट होती हो किसी भी रूप मे देश को सीमा हमारी जब कभी- विना अनुमति शत्रु कोई लांघता, और घापित युद्ध करता देश मे चरण धर दे, गर्व, उसका चूरकर- कर समूल विनष्ट दम लेंगे, यही गर्जना करता डटा हो तू रहा ॥७॥ यज्ञ मे पाहत हुआ वलि पशु सदा- पुन उत्तम जन्म पाता है यही

बल्जियम् की स्तुति
वेद का यह वाक्य है उस तरह ही
देश हित आहुत हुए हो तुम बली।
तुम पराजित हुए, किन्तु अवश्य ही
क्रान्ति एक महान् होगी देश मे-
क्षणिक अवनति प्राप्त तेरा यश पुन
पूर्णत उत्थान पायेगा कभी 8
मन्द होती ज्योति दीपित दीप की
जब दिवाकर उदित होता पूर्व से
स्वर्ण का भी महल अक्षुण्ण है नही-
नष्ट होता है समय के चक्र मे ॥
तू नही भयभीत होता है कभी
शनु के अत्यधिक अत्याचार से
दृढ प्रकृति औ सजग मिटने को सदा
विघ्न बाधाएँ उसे क्या करगी ॥९॥

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Mahakavi Subrahmanya Bharati Ki Rashtriya Kavita

Author
Dr. N. Sundram
Title
Mahakavi Subrahmanya Bharati Ki Rashtriya Kavita
File name
Mahakavi Subrahmanya Bharati Ki Rashtriya Kavita
Text
OCR done
Citation
1971
Published
2011/03
Publisher
Lokbharati Prakashan Mahatama Gandhi Marg Allahabad
Language
Sanskrit
Pages
88
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551444
Barcode
4990010032183.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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6GapMQ5r1U4
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