Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Hingul Prakaran Sindur Prakaran (hindi Arth Sahit)vinay Sagar
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आ179 पूर्ण येन सुमेरु शृंग सदृश चैत्य सुदे दीप्यते, य कोति यजमान धम कथन प्रस्फूजिता भाषते । यी स्पर्धा कुरुते जगत्त्रयदरमहादीमत दोषारिणा, सोऽय मगल स्प मुख्य गणन कुम्भश्विर नन्दतात् ॥ १॥ 卐 हिगुल प्रकरण व सिदर प्रकरण ( हिन्दी अथ सहित) लोक रचयिता श्री.विनयसागर उपाध्यायजी श्री भरतरगच्चीय ज्ञान मन्दिर, जयपुर सशोधन एव परामशदाता मागीलाल व्यास 'मयक'
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पुस्तक प्राप्ति स्थान
श्री हित सत्क ज्ञान मन्दिर
मु० पो० घाणेराव (मारवाड़)
卐
गोविन्दचन्द मेहता
गृहपति :
श्री श्वेताम्बर जैन छात्रावास
मु. पो. गुढाबालोतान
स्टेशन जवाईवाघ (राज.)
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नागोडाजी तीर्थोद्वारक परम पूज्य १००८ श्री प्रावायविजय
.
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हिमाचल सुरीश्वरजी महाराज साहेब
Tम Eि ग १६६४
पास •ि ग १६५
दीपा वि में १९८०
मापाय वि म २००१
--
दो शब्द यह अत्यन्त ही हपं की बात है कि मेवाड केसरी, नाकाड़ा तियोद्धारक-व्याख्यान वाचस्पनि ३० प्राचार्य श्री हिमाचल मूरो- श्वर जो महाराज. सा. को आज्ञावति पू. साध्वोजो महाराज श्रा पुष्ष श्री जो को विदुषी शिष्या पू० सावो ना श्री उद्यात पोजो महाराज सा. ने ज्ञान पिपासु श्रद्वालुप्रो के लिये हिंगुल प्रकरण एवं सिंदूर प्रकरण के हिन्दो अनुवाद को सरल भाषा में अमृत कुंभ नामक पुस्तक छपवाकर महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। जान ही मुक्ति का साधन है । इस दृष्टि से ऐसी पुस्तकों सरल अनुवाद एव व्याख्या अत्यन्त ही उपयोगी हैं। साध्वीजी श्री का प्रयास स्तुत्य है। आप श्री ने और भी अनेक पुस्तकें प्रकाशित करवाई है । इन पुस्तको को मरल मापा में व्याख्याएँ यह प्रमाणित करती हैं कि साध्वोजो श्रो को साहित्यिक रूचि भी सराहनीय है । जैन धर्म के सिद्धान्तो को सरल भाषा में प्रस्तुत करवाना ग्राज के युग की मांग है। प्रभु-महावीर के सिद्धान्तो का प्रवार जनता मे करना नितान्त आवश्यक है। इस दिशा में माध्वोजी श्री का प्रयास उपयोगी हो नही अपितु सराहनीय है। मैं साध्वोजी श्री को इस सरून पुस्तक प्रकाशन के लिये हार्दिक बधाई देता हूँ। अापका शुभ चिन्तक गोविन्दचन्द मेहता गृहपति
पुज्य पुन्यश्रीजी महाराज साहेब
जम तपादरी (मेवाड)
घोसा दुजाणा (मारपाड)
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॥ धी॥
दानदातामो की सूचि
"
९०१) जन श्री सघ सरथ (बही टुकडी)
१०१)
(छोटी टुकडी)
१०१) श्रीमान तिलोकच दजी साहव जन सरथ
१०१) बाबूलालजी चुन्नीलालजी मेगलोर
१०१) भैरवमलजी मगलजी जाकोर
१०१) त्रिलोकच दजी की बहिन
बाबूलालजी जालोर
५१) गुडा उपासरा को बहनो की तरफ से
.
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धन्यवाद !
जिन महानुभावो ने इस पुस्तक के प्रकाशन मे आर्थिक
सहायता प्रदान की है उसके लिये वे बधाई के पात्र है । जान ही
मुक्ति का साधन है। पुस्तके ज्ञान के दीपक हैं । ऐसे पुनीत कार्य
में जिन महानुभावों ने आर्थिक सहायता दी है वह प्रशसनीय
है। उन्हें हार्दिक धन्यवाद !
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पुज्य उद्योतश्रीजी महाराज साहेब
जाम दि म १९५९
दीभावि स २००६
महमदाबाद
भाणपुरा ( मेवाड)
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प्रथ-
॥ह्रो प्रहं नम ॥
श्री हिंगुल प्रकरण
श्री मद्री वासुपूज्यश्च, जगदानददायक ।
करावृपोपमोभूया-मुपपततिमिद्धये ॥ १ ॥
प्रथ-जगत को माद देने वाले तथा कल्पवृक्ष के समान
ऐमे श्री गपूग्य प्रमु सुप की सिद्धि को देने वाले वने ॥१॥
हिंगुन प्रकरोऽय च, बालारुणो विचक्षणा ।
तकयतीति य दृष्ट्वा, पदमप्रभो मुदेऽस्तुम ॥२॥
-जिनसरो देखने से यह हिंगुल के समूह है तथा उदित
होता हुप्रा गूप है, इस प्रार पण्डिन तर परते हैं ऐसे श्री पदम्
प्रनु हप पे लिए बने ।।२।।
जनपति वा पुयान, भाग्य स्वोपाजित यया ।
ग्रघान् पुर्वति विद्धामो, गुणा द्विम्तरता भवेत् ।।३।।
मप-स्त्रिया पनों को जाम देनी है, पिन्नु उनमा जैमा
भाग्य (1) मा है, उमी प्रसार विद्वान प्रय बनाते हैं
नि र मृगों ही उन विग्नार होना है ॥३॥
मुपाये कोरिदिधा, नुपातिकमाना।
गुपाने तात्री, तुपातीतिराम ॥ ४ ॥
प-रात्र मागेविदा, मुपात्र यादी बना,
गुजार र माप कीमिया, सपा सुपात्र मा दिया हमा धन
PRोपामा॥४॥
कुपात्रेऽनर्थकृद्विद्या, कुपात्रेऽनर्थकृत्कला। कुपात्रेऽनर्थकृन्मैत्री, कुपात्रेऽनर्थकृद्धनम् ॥ ५ ॥ अर्थ-कुपात्र को दी हुई विद्या, अनर्थ करने वाली है। उसी प्रकार कुपात्र को दी हुई कला भी अनर्थ करने वाली है कुपात्र के साथ की हुई मित्रता भी अनर्य करने वाली है, उसी प्रकार कुपात्र को दिया हुया धन भी अनर्थ करने वाला है ।।५।। नास्ति न्यायसमं सत्यं, नास्ति धर्मसमः सखा । नास्त्युद्यमसमं मित्र,नास्ति भाग्यसमं धनम् ॥ ६ ॥ अर्थ-न्याय के समान कोई सत्य नही धर्म के समान कोई दूसरा मित्र नही, उद्यम के समान कोई साथी नहीं तथा भाग्य के समान कोई धन नही ॥ ६ ॥ देहस्य भूषण प्रौढिः, सुमंत्री राज्यभूपणम् । रूपय भूपणं विद्या, सद्धार्म्य नरभूपणम् ॥ ७ ॥ अर्थ-शरीर का भूपण गंभीरता है, राज्य का सुयोग्य मंत्री, रूप का भूपण विद्या है तथा पुरुष का भूपण उद्यम धर्म के प्रति लगन है ॥ ७ ॥ देहस्य दूषणं तंद्रा, कुमंत्री राज्यदूपणम् । रूपस्य दूषणं जाड्य-मधार्म्य नरदूषणम् ॥ ८ ॥ अर्थ-आलस्य शरीर का दूपण है, अयोग्य मंत्री राज्य का शत्रु है, मूर्खता रूप का शत्रु है, अधार्मिकता पुरुष का शत्रु है।॥८॥ + -२-
.
पुण्याच्च धनमाप्नोति, कोतिमिहैति तद्धनात् ।।
परय स्वगसौख्य च, ह्यपवर्ग क्रमात्तत ॥ ॥
प्रथ-पुण्य से प्राणी को धन मिलता है तथा धन से इस
(पृथ्वी पर) लार मे कीर्ति प्राप्त होती है, पर लोक मे स्वर्गीय
सुम मिलता है तथा बाद मे मोष भी प्राप्त होता है MEH
सम्यगाराधिनो वर्ग, प्रयमो यैश्च जन्तुभि ।
तेषां साध्यास्त्रयो वर्गा, अनुक्रमेण मत्रिवत् ।। १० ।।
प--जिस मनुष्य ने धम अथ काम माक्ष में से प्रथम धम
की भलि प्रकार पाराधना को है, उसे कम से अथ काम मोक्ष
अपने पाप मत्री को भाति प्राप्त हो जाते हैं ॥ १० ॥
प्रिय यूहि प्रिय'कुर्यात्, प्रिंयमेवामृत परम् ।
प्रियवच प्रदानेन भवति प्रारिणन प्रिया ।। ११ ।।
' 'प्रध-हे प्राणो। तू प्रिय ' बोल तथा प्रिय लगने वाले
पार्यों को कर क्यापि प्रिय उत्कृष्ट गमृत के समान है और
प्रिय वान बातो मे लोग प्रिय बन जाने है. ॥ ११ ॥
विद्यामम नास्ति शरीरभूपण,
निदासम नास्ति शरीरदूपणम,
तृप्यासमा नास्ति परा च चिंता ।
पगोपशावे समता परा न ।। १२ ।।
भष-विद्या ये समान प्रय माई गरीर या भूपरण नही,
दमी प्रकार निगममा शुगेरपा भय योई दुगण नही
तृपया गमान राई वही पिता नहीं तया पलेप में साति वे
समान उताट पाई समता ही ॥ १२ ॥
शब्दोरूपं रसोगंध:, स्पों भोगोहि पंचधा, किंपाकफल वनात्वा, दूरे यांति मनीपिणः ॥ १३ ॥ अर्थ-शव्द, रूप, रस, गद्य और स्पर्शना भेदो से भोग पांच प्रकार के हैं। उसको किपक्त वृक्ष का फल तुल्य जानकर सज्जन दूर जाते हैं ॥ १३ ॥ संतोपः परमं सौख्यं, संतोपः परमामृतम् । संतोषः परमं पथ्यं, संतोपः परमंहितम् ॥ १४ ।। अर्थ-सतोप ही परम सुख है, सतोष. परम अमृत है, संतोप ही परम पथ्य है तथा सतोप ही परम हित है ॥ १४ ॥ स्थानानि चाष्टादश किल्विपस्य, तथैव सप्त व्यसनानि विश्वे । त्याज्यानि भव्यैर्भवदु: खहेतुविशेषतः । पापमतिः प्रमोच्या ॥ १५ ॥ अर्थ-संसार रूपी सागर में रहने वाले मनुष्य को इस दुनियां में अठारह पापस्थानको को उसी प्रकार ही सात व्यसनों को त्यागना तथा संसार दुख के समान ऐसी पाप रूपी बुद्धि को विशेष प्रकार से त्याग देना चाहिए ।। १५ ।। घायः प्रबोधो त्दृदि पुण्यदानं, गोलं सदांगीकरणीयमेव । तlतपोभावनयैवकार्या,जिनेंद्रपूजागुरुभक्तिब्धम. ॥ १६ ॥ अर्थ-हृदय मे अच्छी वाणी को धारण करना, पुण्य दान करना गील व्रत को सर्वदा धारण करना, तप तपस्या करना तथा भावना से जिन पूजा करना, गुरु भक्ति करना और उसो प्रकार उद्यम भी करना चाहिए ॥ १६ ॥ 卐 1 - 1 प्राणातिपातप्रक्रमः यो दधाति तृणवक्त, प्रत्यनीकोऽपि मानवी, सोऽवध्य सता लोके कथ वध्यास्तृगादना ॥ १ ॥ प्रथ-जो मनुष्य तृण भक्षण करने वाला शत्रु है। वह सज्जनो के मारने लायक नहीं होता है तो तृण भक्षण करने वाले (पशुओ) को कसे मार सकते हैं ॥१॥ प्रमादेन यथा विद्या, कुशीलेन यथा धनम् । कपटेन यथा मैत्री, तथा धर्मो न हिंसया ॥२॥ अर्थ-प्रमाद से जसे विद्या नही पाती दुष्ट आचरण से जैसे धन नहीं पाता तथा कपट से जसे मियता नहीं होती उसी प्रकार हिंसा से धम नही हो सकता ॥२॥ शिला समधिस्ढाश्च, निमझति जलातरे । हिमा श्रिताश्च ते तद्वत् समाश्रयति दुर्गतिम् ॥ ३ ॥ अथ-जिस प्रकार पत्थर पर चढे हुए मनुष्य पानी मे डुबते हैं उसी प्रकार हिंसा से पाश्रिन प्राणी दुगति मे जाते हैं ॥ ३ ॥ लावण्यरहित रूप, विद्यया वजित वपु । जलत्यक्त सरोभाति, तथा धर्मो दयाविना ॥ ४ ॥ अर्थ-जिस प्रचार सुदरता बिना रूप की शोभा नही, विद्या विना शरीर की शोभा नहीं तथा जल विमा तालाव को शोभा नहीं उसी प्रकार दया बिना धर्म की शोभा नही होती॥४॥ 1 - मृपावाद प्रकरण संध्याभ्ररागवन्मिथ्या, वचनं कथमुच्यते । ' प्रतोतिभगकृच्चात्र, परत्र दुखकारगम् ॥ १ ॥ अर्थसध्याकाल के बादलो के रंग के समान मिथ्यावचन क्यो बोलना चाहिए। क्योकि वे इस लोक में विश्वास को भंग करने वाले परलोक मे दुख का कारण है ।। १ ।। याऽरण्ये रोदनासिद्धि, र्यासिद्धिः क्लोबकोपनात् । कृतघ्नसेवना सिद्धिः सासिद्धि: कूटभाषणात् ।। २ ।। अर्थ-वन मे जाकर भटरने से जो सिद्धि होती है तथा नपुसक के क्रोध से जो सिद्धि हातो है, वही सिद्धि झूठ बोलने से होती है ॥२॥ अग्निनासिच्यमानोऽपि, वृक्षोवृद्धिन चाप्नुयात् । तथासत्यविना धर्मः, पुष्टि नायाति कहिचीत् ।। ३ ।। अर्थ-जिस प्रकार अग्नि से जला हुआ वृक्ष वढ़ता नही उसी प्रकार सत्य के बिना धर्म की किसी समय भी पुष्टि नहीं होती॥३॥ असत्यवक्तुर्भुवि पक्षपातं,कुर्यान्न विद्वान्-किलसंकटेऽपि । तेन ध्र वं हि वसुराजवत्स, इहापवादं नरकं पुरत्र॥४॥ अर्य-विद्वान मनुष्य संकट याने पर भी वे पक्षपात क ते नहीं क्योकि इससे वसुराजा की तरह इस लोक मे उनकी बुराई : होती है और परलोक मे नरक भोगी होते हैं ॥ ४ ॥ .卐 -६- .
1 -- . । 17 । . TI - अदेत्तादान प्रकरण कातराणा यथो बर्य, ध्याना सततिर्यर्थी। नविश्वासस्तथा लोक; नृणामदत्तहारिणाम ॥१॥ अथ-डरपोक का जिस प्रकार घय तथा वध्यो के जिस प्रकार स तान नही हाती उसी प्रकार इस दुनिया में चोरी करने वाले का विश्वास नही होता ॥ १ ॥ कुक्षि शाकेन पूर्येत, यदिस्तोक घनाजनम् । परनाऽदत्तमादद्या, द्यत स्याद्भपतेभयम् ॥२॥ 7) अथ-थोड़ी कमाई होने पर सिफ शाक खाकर भी, पेट भर लेना चाहिए कि तु जहाँ राजा का भय होता है, ऐसा चोरी नहीं परनी चाहिए ॥२॥ प्रदत्त धननादद्या, सुखलिप्सुहिमानव । यमद्योदु धमाप्नुयान् मद्रुकचौरवत्किन अथ - सुख चाहने की इच्छा करने वाले मनुष्य को चोरी का धन नहीं लेना चाहिए। क्यापि उमको मडक चोर की तरह तुरन्त दु ख मिलता है ॥३॥ अनिष्ट पचरे घूर स्वामिद्रोही नरेषु च । अनीटादयनिष्च, अदनमपलक्षणे ४ प्रय-पक्षिया मे घुबड पक्षो अनिष्ठ है तथा मनुप्यो मै स्वामी से शत्रुता रखने वाला अनिष्ठ है उसी प्रकार कुलक्षण मे चोरी अनिष्ठ से भी अनिष्ठ है ।। ४ ॥ ॥३॥ . r 31 ॥
माऽदत्त हि गृहाण वस्तु यदिचेत्तन्नास्तियदद्भ ज्यते, धैर्य धेहि तथापिपक्षिभिवहा नीरं लभते स्थले । दत्त येन वपुः सएव भुवि नो चितनकरिष्यत्यहो, का बार्ता खलु ताः समग्ररचनाश्चिंता च तस्मिनस्थिता ।।५।। अर्थ-है प्राणी ! तू चोरी नामक अवगुण ग्रहण मत कर, अगर तेरे पास कोई चीज नहीं हो तो जो चीज तेरे पास हो उसी मे धैर्य कर । क्योकि जिस प्रकार पक्षियो के जीने के लिए हर स्थान पर जल रख दिया जाता है। ज्यादा क्या कहना, जिसने शरीर दिया है वही जगत में अपनी फिकर करेगा और सारी रचना तथा चिना उसो में ही रही हुई है ॥ ५ ।। मैथुन प्रकरण स्त्रीलुब्धो जगति यश्चा, ऽत्यजयशस्तु तं.चनरम् । दासीलुब्ध्या यथा मुजो, ऽपकीा गीयते न किम्। अर्थ-जो मनुप्य.जगत मे स्त्रियो से.मोहित है उन मनुष्यों के यश त्याज्य है। क्या दासी से मोहित मुज राजा की अप- कीर्ति नही हुई ? अर्थात (हुई) ॥ १ ॥ अन्तर्दुष्टामुखेमिष्टा, अनिष्टाका अतःपरम् । विषवल्लरीवत्त्याज्या, ज्ञानिभिःसुखकामिभिः ।। २ ।। अर्थ-दिल मे दुष्टता तथा मुख से मीठो ऐसी स्त्री से दूसरी कौनसी वस्तु अनिष्ठ है । उसी प्रकार मुख की इच्छा करने वाले ज्ञानी भी जहरी बेल को तज देते है ।। २ ॥
-
उग्रसभोगत सूरि-कता हि नरकं गता।
स्वर्ग गत प्रदेशोच, तत्रा सवरकारणम्। ॥३॥
मथ-सूरिकता उग्र संभोग से नरक में गई है और प्रदेशी
राजा स्वम में गये हैं। उसमें सवर कारण रूप है ॥३॥ -
(सवर-कर्मों का पाना रोकना)।
मंत श्यामा बहि श्यामा, रक्षाया गुटिकाइव ।
बहिर्दधति सौंदर्य-मतस्ताभस्मराशय ॥४॥
प्रथ-जो स्त्रियों राख की गोली के समान अदर और
बाहर श्याम होती है। फिर बाहर से सुन्दरता को धारण
करती है किन्तु अन्दर से तो ऊपर के खीरे के समान है ॥ ४॥
श्रीमत्कोणिकराट्च चेटकनृपै साक महत्सगर,
चकारण किलकामकेलिकलित पद्मावतीप्रेरित ।
भोगासक्तमना नृपो मरिणरथो भ्रातासम चाऽकरोत,
द्रोह मोहवशात्परतु तदनु प्राप्त फलं कीदृशम् ॥ ५॥
भष-पद्मावती से प्ररित तथा काम कोटा से युक्त हुए
ऐमे श्री श्रोणि राजा ने घेडा राजा के साथ महायुद्ध किया
मोह वश भोगा से मासक्त जिनका मन ऐसे मरिगरथ राजा के
भाई के साथ विद्रोह किया किन्तु उसके बाद उसको पेसा फ्ल
।
1
मिता ॥४॥
-- 7 परिग्रह प्रकरण प्रमेहिनां विषं सपि-मैथुनंचजुरोगिणाम । तद्वन्निश्शेपजंतूनां, कालकूट: परिग्रहः ॥ १ ॥ अर्थ-प्रमेह के रोग वाले के लिए घी जिस प्रकार विष के समान है तथा अांख के रोगियो के लिए जिस प्रकार मैथुन विप के समान है उसी प्रकार सभी प्राणियो के लिए परिग्रह विप के समान है। ॥१॥ यथाब्धेर्जलबिंदूनां, संख्यानैवात्र लभ्यते । तथैव धनलुब्धानां, दुःखमानं न दृश्यते ॥२॥ अर्थ-जिस प्रकार इस जगत मे समुद्र के पानी की बू दों की संख्या मिलती नहीं उसी प्रकार धन के लोभियो के दु.ख का प्रमाण नहीं दिखाई देता ॥२॥ अशुष्कं यदि वाशुष्क, मग्निः किं गणयेत् कदा । परिग्रंहरतस्तद्वन्, न जानते परं निजम् ।। ३ ।। अर्थ-अग्नि क्या गीला या सूखा, गिनती नही ? उसी प्रकार परिग्रह से प्रासक्त 'हुया मनुष्य अपना व परायो ‘नही जान सकता ॥३॥ शीतज्वरीवशीतेन, वस्त्रावृत्तोऽपि पीड्यते । परिग्रही धनासक्तः, पीज्यते धनतृष्णया ॥४॥ .
। प्रथ-जिस प्रकार ठण्डे शीत बुवार वाले मनुष्य को बहुत पहा से ढकने पर भी दुखी ही रहता है उसी प्रकार धन का लोभी परिग्रह धारो मनुष्य धन को तृष्णा से दुखी होता है ॥ ४॥ गिर्यारोहणता समुद्रतरण देशाटनासेवन, पाताले विवरे प्रवेशकरण निशिकमित्यादिकम् य कुर्याच परिग्रहेकहृदयश्चेष्टामनेकामिह, '11 मृत्वेतो नरकावटेषु गमन चक्री सुभूमोऽकरोत् ॥५॥ प्रथ जिस प्रकार सुभूम चक्रीय परिग्रह से मासक्त होकर पवत पर पढ़ने को, समुद्र में तरने को देशाटन करने की, पाताल व भोयरा में प्रवेश करने की चेष्टा को उसी प्रकार वह मृत्यु पाकर पर मे गया ॥५॥ . 1 - क्रोध प्रकरण दहमुष्टि प्रहाराध-ननि फरोत्याश' भूतावेटितवल्लोके, कोपयुक्तो हि मानव ॥१॥ पप-पोप से भरा हुमा माप्य दुनिया में भनेपा प्रकार से हिना विचार से मुष्टि प्रहार प्रादि भनेर प्रहार कसरी मनथ पर है.१॥ ।
Objective F दुर्गति प्रापणे पक्षो, विपक्षः शुभकर्मणाम् । सपक्ष प्रापदः क्रोधः, सकेनाद्रियते ततः ॥२॥ अर्थ-दुर्गतिं की प्राप्ति मे पक्ष करने वाला, शुभ कार्यों में शत्रु के समान प्रापदानो की सोबत करने वाला जो क्रोध है उसको कौन अंगीकार करे ? ॥२॥ ज्वलव्दवूलवद्भाति, कायः प्रायोऽतिकोपिनः । मुखे वायांतरे दाहः,सर्वेपांभीमदर्शनः ॥३॥ अर्थ- अत्यन्त क्रोधी मनुष्य का शरीर प्रायःकर मुड़े हुए ववुल के समान होता है। मुख मे विप होता है तथा अन्दर अग्नि समान दाहे वाला ऐसा वह भयंकर दर्शन वाला होतो है ।। ३॥ आकरः सर्व दोपारणां, गुणानां च दवानलः । संकेतोऽखिलकष्टानां, क्रोध स्त्याज्यो मनीषिणा ॥४॥ अर्थ-सभी प्रकार दोषों की खान के समान तथा गुणो को जलाने मे दावानल के समान तथा सभी दुखों को सकेत रूप ऐसा क्रोध बुद्धिमान को तजना चाहिए ॥ ४ ॥ क्रोधाभिभूतपुरुषा नरके व्रजेयु-स्तत्रापि ताडननिर्वधनमारणोत्थम् । दुःखं घनं च सहनं कृतकर्मणां च, श्रीकृष्णवङ्गनगणाःसमुपार्जयति ॥५॥ -१२-
अथ-कोष से पराभव पाये हुए मनुष्य नरक मे जाते हैं
वहाँ ताडन बंधन, वे मारण आदि से उत्पन्न हुए दुई देते हैं।
और उसी प्रकार मनुष्यो का समूह श्री कृष्णजी की तरह किये
हुए कर्मों को भोगता है ॥ ५॥
---
--
।
1
। मान प्रकरण
य स्तब्धो गुरुणा साक-मन्यस्यनमन कुत ।
न छाया ये न लाभाय, मानो कथेरवन्न पाम् ॥१॥
अर्थ-जो मानी मनुष्य गुरु के समीप प्रकार से रहता है
तब तो दूसरो के सामने भमने की सोमात हो क्या करनी ?
मत इस प्रकार का मानी मनुष्य कयेर के वृक्ष के समान
मनुष्यो को छायादायक या लाभदायक नहीं हो सकता।
स्थारगुर्वा पुरुपो वाध्य दृष्टवेति तर्कयतियम् ।
स मानी दूरतस्त्याज्यो नम्रा दिगुणवर्जनात् ॥२॥
मथ-जिसको देखने से ठूठ है या पुरुप । इस प्रकार का
मनुप्प तप करते हैं। ऐसे नग्रादिक गुणो से रहित हुए मानी
व्यक्तिका दूर रमो ॥२॥
शिक्षा लभते नो मानी, विद्यामीयाग्न कहिचित् ।
विनयादिवियागून्य', स्तभवत्स्तम्यता गत ॥३॥
८ अर्थ-विनय की क्रिया से शून्य हुआ तथा स्वभ की तरह स्तब्धता प्राप्त करने वाला ऐसा अहंकारी, मनुप्य शिक्षा प्राप्त नही कर सकता तथा किसी समय भी विद्या प्राप्त नहीं कर सकता ॥३॥ अरण्यजं तरोः पुष्पं, समुद्रांभश्च शोतलम् । लावण्यं दंभिना तद्वन्मानिमानं विरर्थकम् ॥४॥ अर्थ-जिस प्रकारं वन में पैदा हुआ पुप्पं निरर्थक है समुद्र मे रहा हुग्रा: शीतल पानी निरर्थक है तथा कपटो को सुन्दरता निरर्थक है । उसी प्रकार घमण्डी का घमण्ड भी निरर्थक है। 'धात्रा दत्तं मानवत्यां लघुत्वं ।। मानोन्मत्ते रावणे दुर्मतित्वम् । दर्पोत्कृष्ट कोणिके दुर्गतित्वं दुष्टान्मानात्सङ्गतिः केन लब्धा ॥५॥ अर्थ-जिस प्रकार मानवती को देव ने लघुता दी तथा अहंकार से उन्मत हुए रावण को दुर्गति दी कोणीक राजा को दुर्गति दी उसी प्रकार ऐसे दुष्ट मानी को कौन सुगति दे (कोई नहीं देता) ॥५॥ .. -१४- . -- -- . - .", "माया प्रकरण मायोत्पादविश्वासा-मुखामृतोऽपि मानुष परमेयप्रवेश च, नाप्नुयात् श्वानवत्सदा ॥१॥ मर-मुख मे मीठा वचन बोलने वाला ऐसा मनुष्य कपट से उत्पन्न हुए प्रविश्वास से हमेशा कुत्ते के समान दूसरे के घर में प्रवेश पा नहीं मवता 1 । बधना पठित शास्त्रं, तदनोंय केवलम् । हरिभद्रस्य शिष्याणां, फल किमुत न थ तम् ॥२॥ प्रय-मपट मे पढा हुमा शास्त्र पेयल अनथ ही करेगा पयापि उसमे श्री हरिभद्राचाय महाराज के शिष्या को जो फल मिला वह पापने शास्त्रा पता होगी ॥२॥ मायया यत्तपस्तात ; महारलेन साधुना । पोवेदो जितस्तेन, मुक्तो मल्लीभवेच स' ॥३॥ पप-महावन गाधु नै ती जप कपट ने तपस्या की थी उममे उमरो जीवेद उपाजन किया और यह स्त्रीवेद उपयो श्रीमतीलाप निया भर में भागा पहा ॥३॥ दागीपुर 'गुमर पिनाति नरयणमानोऽपि दार, पागयता घिra पारवानिद्यमान समतान् ।
मायाया हेतुरत्र भव सुगुणनिधे भव्य मायाविरक्तो, माया संसारमूलं प्रणिजगदुरिति स्वस्तिकारा जिनेंद्राः ॥४ अर्थ-लोगों से नमस्कार करवाता उत्तम रूपवाला ऐसा कपील 'तु दासी पुत्र' तुझे धिक्कार है। इस प्रकार कहकर क्या तुने स्त्री को त्यागा हो ? आखिर उसने तो तुझे त्यागा नहीं। तथा पडित लोगों के वचन से चारों ओर से निंदा पात्र हुमा है ? इसी प्रकार होने का कारण माया ही थी इसलिए है उत्तम गुरग का भण्डार भव्य मनुष्य तू माया (कपट से) विरक्त था क्योकि माया संसार का मूल है इस प्रकार कल्याणकारी श्री जिनेश्वर प्रभु ने कहा है ।। ४ ।। से लोभ प्रकरण । स्थले चरेच्च बोहित्थे, शिलोयामुदयेत्कजम् । लभेत्कं मृगतष्णात-स्तदा हि लोभतः सुखम् ॥१॥ अर्थ-यदि जमीन पर जहाज चले, पत्थर पर क्मल उगे तथा मृगतृष्णा से यदि पानी मिले तो लोभ से सुख मिल सकता है ॥१॥ सर्पोऽनिष्टोऽथवा लोभो, द्वयोर्लोभस्त्वनिष्टकः । दोच्च महितः सर्पो, लोभो दशति सर्वदा ॥२॥ 4N -- -१६-
प्रयं-मप दुमदायी है या लोभ दुग्नदायी है इन दोनो में
पूपा जाए ता लोभ हो दुखदायी कहलाएगा। क्योकि सप तो
मदन परने में प्राने पर ही उसता है। किन्तु लोभ तो हमेशा
उमता है,,२॥
ममुद्रम्यैव पल्लोलाचल्लोलो वचते यथा ।
तदरलाभाच्च नोभोऽपि, मम्मगवरिणजो यथा ॥३॥
पर-रिम प्रकार समुद्र में लहरा से लहरे सहती हैं उसी
प्रभार मम्मणिर के समान तोम मे लोनों वृद्धि होती
4
-
-
गगनापाद च, पितर भातर सुतम् ।
अपार भय मृयो-योभी यया च मद्यप ॥४॥
मप-मपान मरन याने पे समान सोभी मनुष्य अप
Tf माह या पुत्र बामहा म तपा रा बालन मी
गपा शारे पपी परवाह नही करना ॥४॥
नानामपिारपासता हा नारा भने,
मानामानविगारमुरुमा वाम निरन्ना पुरा ।
ग्या मधमार्मधरता देवाचन अवता,
मेगा नया रिमात लोगो नगशापर !!
n-मों में रिपोपाय में
mmभार, सपा मार, प्रमानमा
विभाuिn must 13 म. राधाम
Virwim, म र य में प्राय
TARATHI Traryोपान MERA
remganी रिमाने ना ॥१॥
राग प्रकरण मुच्यते शृखलाबद्धो, नाडीवद्धोऽगिमुच्यते । न मुच्यते कथमपि,प्रेम्णा बद्धो निरर्गलः ॥ १ ॥ अर्थ-सांकल से बघा हुआ प्राणी भी पहुँचाया जाता है ! उसी प्रकार डोरी से बघा हुआ प्राणी भी मुक्त हो सकता है किन्तु प्रेम से बधा हुआ प्राणी किसी प्रकार से भी मुक्त नहीं हो सकता ॥ १॥ भर्तु विरहतोनार्यः, प्रविशत्यनलांतरे । स्वेच्छया च सहर्षण, तत्र प्रेमप्रपंचकः ॥ २ ॥ अर्थ-पति के विरह से स्त्री अपनी इच्छा से हपं सहित अग्नि मे प्रवेश करती है, उसमे भी प्रेम का प्रपंच है ।।२।। मनस्तत्र वचस्तत्र, जीवस्तत्रैव संवसेत् । नेत्रावलोकनं तत्र, रागो यत्रोपतिष्ठते ॥, ३ ।। अर्थ-जहाँ राग है वहाँ मन, वचन और जीव.. बसा-हुआ रहता है, तथा आँखो की दृष्टि भी, वही रहती है-॥ ३ ॥ रागिरिणगुणता. पश्ये:द्वैगुण्य हि विरक्तके। रागीगुणावगुणंच, नपरीक्षति कहिचित् ॥ ४ ॥ अर्थ-रागी 'मनुष्य रागी के समान ही गुण देखता है तथा विरक्त के समान अवगुण को देखता है । वह रागो मनुष्य किसी भी दिन गुण व अवगुण, की परीक्षा करता नही ।।४।। .. -१८- . । पय । पोतो नीरे तरति तपन शीतकिरण, दधात्येव नित्यं कि, कुमुदबघु खरकरम् । घरत्युर्वी गुर्वी कथमपिच भारेण नमति, तथा तीने रागे कनकरयवच्छ भवति भो ॥५॥ अथ-लोहे का जहाज पानी मे किस लिए तरता है ? सूय चद्र का विस लिए धारण करता है, तथा ऐसी बडी पृथ्वी भार से किम लिए नमती है ? उसी प्रकार तीव्र राग होते हुए भी करन रथ को तरह क्या सुख होता है ।। ५ ।। . - h- - द्वेष प्रकरण - । - यस्माच्च बद्धयते कर्म, तपस्यतो न मुचते । तत्प्राणिनामितिमात्वा, त्याज्यो द्व पोवुध सच ।। १ ।। प्रय-जिस द्वप मे प्राणिया या कम वधन होता है । तथा तपस्या तपने पर भी जिसके कारण प्राणी को मोक्ष प्राप्त होता नहीं, यह जानकर उस 'देप को पण्डितो को त्याग देना पारिए॥१॥ स्वकीय परसोयच, द्वेपाझन सदा जना । विद्धपरन् वाक्यशल्यन, बब्बुलकटका यथा ॥ २ ॥ मपं-मनुष्य दप से वूल के काटा ये समान हमेशा अपने ओर पगये मनुष्यों का वचन रूपी शल्यो से छेदते हैं।॥ २॥ येषु यावच्च रागोऽभूत, तेपु तावच्च सद्गुणाः । द्वपोत्पन्नेषु तेष्वेव, दोपं पश्येद्धि केवलम् ॥ ३ ॥ अर्थ-जिन मनुप्यों में जहाँ तक राग हो वहाँ तक उसमें सद्गुण द ढे जाते हैं और उसी में से जब द्वप होता है तब केवल दुपण ही ढूंढते हैं ॥ ३॥ द्वेषिणां ज्वरिणां लोके द्वयोः साम्या प्रति क्रिया । क्रूरत्वं कटुकत्वं च, बहिरंतोऽपितापवान् ॥ ४ ॥ अर्थ-द्वपी मनुष्य और ताप वाले (क्रोध) मनुष्य की प्रकृति समान होती है क्योकि द्वेपी मे जैसे क्रोध प्रवृति होती है उसी प्रकार ताव वाले में भी कडवाहट होती है। तथा बाहर से अतरग से वह ताप वाला होता है ।। ४ ॥ श्रीद्वीपायनतापसेन महती प्रज्ज्वालिंता द्वारिका द्वैपादेव च वर्धमाननगरे श्रीशूलपाणिरभूत् । मारी येन विमोचिता च सहसा लोकाश्च दुःखो कृता, तस्मात्सोऽत्र विमुच्यतामिति ज़िनाख्यायि संघेनघे ॥५॥ अर्य-द्वेष से द्वीपायन नामक तपस्वी ने महान् द्वारिका - नाम की नगरी को जला दिया तथा वर्धमान नाम के नगर में. जो शूलपाणी यक्ष हुआ । तव तुरन्त मरकी चला कर लोगो को. दु.खों किया। अर्थात् द्वेष को छोडो। इस प्रकार जिनेश्वर भगवान् के द्वारा निष्पापी संघ के समक्ष कहा हुआ है ।। ५ ॥ -२०-~- 1 कलह प्रकरण - । . अग्नि मूते यथा धूम धूम सूतेऽसिता तिम् ।। अयायोऽपयश सूते , तद्वत्क्लेशश्चकिल्विपम् ॥ १॥ प्रयं-अग्नि जिस प्रकार धुओं पंदा करती है, घुमा जिस प्रकार श्याम कान्ति को पदा करता है तथा प्रयाय जिस प्रकार अपयश को उत्पन्न करता है उसी प्रकार कलेप दुख को उत्पन्न करता है ॥१॥ स्तोकोऽप्यग्निर्दहत्येव, कारादिप्रभूत धनम् । केशलेशोऽत्र तद्वच्च, वृद्धितस्तनुदाहक ॥ २ ॥ अथ--थोडो भाग्नि भी जिस प्रकार ज्यादा लकडी जला सकती है उसी प्रकार ले मात्र क्लेश की वृद्धि से शरीर जल जाता है ॥२॥ पलकेन यथा चद्र, क्षारेण लवणावुधि । कनहेन तथा भाति, ज्ञानवानपि मानव ॥ ३ ॥ । भय-जिस प्रकार कवक से चद्रमा, सार से समुद्र । उसो प्रकार मानी मनुष्य लिह से शोभित होना है।॥३॥ प्रान्मान तापनित्य, तापयेच्च परानपि । उनयोतुं सकृत्वलेगो, ययोपणरेणुका क्षिती॥ ४ ॥ । । . .
अर्थ-इस पृथ्वी में गर्म हुई रेत-की तरह क्लेश है जो कि खुद को व दूसरे को हमेशा ताप देते हैं । अतः इसी प्रकार क्लेश भी दोनों को दुःख देता है ।। ४ ।। संग्रामतोऽनेन सुखं ह्यवाप्तमितिश्रुतं केन न दृष्टमुयां । कसेन सा जोवजसाशु लेभे,या युग्मवंशक्षयकारिणो च ॥५॥ अर्थ-सग्राम करने से किसे मनुष्य को सुख मिला। यह दुनियाँ में किस मनुष्य ने सुना है ? क्योकि कस ने जीव जसा को प्राप्त किया जो दोनो वंशों का क्षय करने वाली सिद्ध हुई है ।। ५॥ ३ . A -- अभ्याख्यान प्रकरण काचकामलदोषेण, पश्येने त्रे विपर्ययम् । अभ्याख्यानं वदेझीह्वा, तत्र रोगःकउच्यते ॥ १॥ अर्थ-मनुष्य काच कामल नाम के दोष से विपरित तरह से देखता है किन्तु जीभ जो अभ्याख्यान बोलती है उसमें कौन सा रोग कहलाता है ।। १-11 यथाऽभक्ष्यं न भक्ष्येत, द्वादशव्रतधारिभिः । ; . अभ्याख्यानं न चोच्येत, तथा कस्यापि, पंडितः ।। २-३ र ३ -- --२२- - 7 मर्थ-जिम प्रकार वारह व्रतधारी अभक्ष वस्तुनही खाते उसी प्रकार पडित भी किसी का अभ्याख्यान नहीं बोलते 1000 अग्नि स्तोकाह द्धिमायाति योगात् तह द्धि क्लेशलेश प्रयाति । अभ्यारयानात् स्तोकतः कर्म वृद्धि प्राप्नोत्येन कप्टत सा न याति ॥ ३ ॥ प्रथ-जिम प्रकार अग्नि थाडे योग से वृद्धि पा जाती है उसी प्रकार क्लेश का लेश मात्र भी वृद्धि पा जाता है। उसी प्रकार थाहे अभ्यारयान से कर्मों को वृद्धि पाते हैं और इन कर्मों को वृदि इस प्रकार कष्ट से भी जाती तही।। ३ ।। देवेषु किरिबपो देवो, ग्रहेषु च शनैश्चर.॥ । - अभ्याल्यान तया कर्म, सव कर्मसु गहितम् ॥ ४ ॥ प्रय-जिस प्रकार देवो में किल्विष देय तथा ग्रहों में सनियर उसी प्रकार अभ्याख्यान सभी कर्मों में निंदनीय 1 देवश्चाद्वारमूद्घाटित तत् सोभद्राया घोलमाहात्म्यमेव । मिच्यापिया दुगतित्व हि तस्या अरचा अन्यान्यामेयान हेतु ॥ ५ ॥ प-यो पापा नारावाद्वार खोला पा उसा प्रकार से मिलता भुलता सुभद्रा के शील का महात्मय था । तया उसकी मिथ्यात्वी मृ मासु की दुर्गति हुई उसमें सिर्फ मभ्याख्यान ही कारण था ।। ५॥ पैशून्य प्रकरण प्रदाता च यथा लोके, वरो निःस्वो धनी न च । मूको वरं न वाक्दनः, पैशून्यं यदि तिष्ठति ॥ १ ॥ अर्थ-जिस प्रकार दुनियां में निर्धन अच्छे होते हैं किन्तु नहीं दान देने वाला धनवान अच्छा नहीं होता। इस प्रकार गूगा मनुष्य अच्छा होता है किन्तु जो चुगलीखोर मनुष्य होता है ऐसा वाचाल मनुष्य अच्छा नहीं होता ।। १ ।। दानशीलतपोभाव-रस्यैघतेवृपो भुवि । यस्य मनोवच.कायै;, पैशून्यं नाभिसंश्रयेत् ॥ २ ॥ अर्थ-जिस मनुप्य के मन में, वचन में और काया में - चुगली का आश्रय रहा हुआ नहीं है उसका धर्म, दान, शील, तप और भाव दुनियाँ मे वृद्धि पाता है ।। २ ॥ अन्यस्य तापनाद्यर्थ, पैशून्यं क्रियते जनः । स्वात्मा हि तप्यते तेन, यदुसं स्यान्फलं च तत् ।। ३ ।। अर्थ-दूसरों को दुख देने के लिए जो मनुप्य चुगली खाता - -- हैं उससे उल्टा खुद की मात्मा को दुख होता है क्योकि जैसा वोपा हो वैसा फल मिलता है ।। ३ ।। दान व विफल नित्य, शौर्य तस्य निरर्थकम् । पशून्य केवल चित्ते, वसेद्यस्याऽयसो भुवि ॥ ४ ॥ अथ-जिनके मन में केवल चुगलो ही रही हुई है उसका दान निष्फल जाता है तथा उसका पराक्रम भी निष्फल जाता है पौर उसका भपयश पृथ्वी पर फैल जाता है ।। ४ । रत्यरति प्रकरण न विद्यतेरति प्राज्ञ, न विद्यतारति पुन । कर्माधीन च सर्व स्या-त्ततस्तामल्पताकुरु ॥ १॥ अथ-मच्या मनुष्य रति को गिनता नही उसो प्रकार परति को भी गिनता नहीं, क्योकि सभी कमी के 'आधीन है। सनिए सन रति परति को कम करो॥१॥ प्रादौ रागस्ततो वेप-स्तस्माल्केशपरंपरा । तद्वदादो रतिश्चार-तिस्तत कर्मयधनम् ॥२॥ भव-बित प्रकार पहले राग, और उससे द्वेप तथा उससे परणको परपरा पड़ जाती है । उसी प्रकार पहले रवि उससे परति भोर उसमे ही यम वपन होता है ।। २॥
वरं छाया वरं वायु-वरं पुत्रो वर धनम् । वरं बंधुर्वरं जाये-त्यादिरत्युद्भवं वचः ॥ ३ ॥ अर्थ-छाया उत्तम है वायु उत्तम है, पुत्र उत्तम है, धन उत्तम है, बधु उत्तम तथा खी उत्तम हैं इत्यादि वचन रति से उत्पन्न होने वाला जानना चाहिए ।।३।। उष्णा छाया धनस्तोक, वायुलूतादिसंयुतः । कुपुत्रः कुलंटा रामे-त्याद्यरत्युद्भवं वचः ॥ ४ ॥ अर्थ-छाया उष्णा है, धन-थोड़ा है, वायु लू चलने जैसा है, पुत्र दुराचारी है, स्त्री कुलटा है इत्यादि वचनो को अरति से उत्पन्न हुआ जानना चाहिए ।।४ yon to १ परोपवाद प्रकरण रजांसि दशना यत्रा-ऽधरोष्ठठिक्करीद्वयम् । । : मूर्खरसनापराप-वादगूथं समुद्धरेत् ॥१॥ अर्थ-जहाँ दान रूपी रज है तथा होठ रूपी दोनो ठीकड़ी है उसी प्रकार मूर्यो की जोभ दूसरो के लिए अपवाद रूपी विष्ठा उठाती हैं ।। १।। वक्तु नैव क्षमा जोह्वा, यदि मूकस्य तद्वरम् । परं परापवादं च, जंजप्यतेन -तद्वरम् ।। २ ।। - -२६- - . अर्थ-जिस प्रकार गूगे मनुष्य-की, जीस बोलने के लिए शक्तिवान होती नहीं, फिर भी श्रेष्ठ है । किन्तु जो जीभ दमरो का प्रपवाद बोलती है, वह उत्तम नही है ॥ २॥ वक्त परापवादेन, स्वस्य यत्समल कृतम्। तञ्च केनाप्युपायेन, कतुं नार्हति निर्मलम् ॥ ३-17-TE अथ-दूसरे का अपवाद से खुद कासमुहामलीलता वाला हुमा है उसको वह किसी भी, उपाय, से,निमल नहीं कर 17 TIP एके च जातिचडाला, कर्म चडाल निंदक । झात्वेति हृदये-सम्यक, प्रापवादमात्यजेत् ॥ ४ ॥ अथ-इस दुनिया में कितने ही तो जाति से चण्डाल हैं किन्तु, निन्दा, करने वाले का कम भी तो चण्डाल ही है, इसलिए ठीक तरह से हृदय में जानकर दूसरा को अपवाद करने का त्याग सकते ।। ३ ।।- III 7 - करो।॥४॥ - . मायामपा प्रकरण मनस्यन्यद्वचस्यन्यत् मायामृपा च सोच्यते । कदापि सुसदा न भ्या-दिश्च यथा परणागना ॥ १ ॥ प्रथ-मान में क्या भोर वन में क्या उसको माया मृपा कहते हैं जिस प्रकार जगत में वश्या को कमी भी सुख फरने वाली नहीं I air 'TTA -- फलं यथेंद्रवारुण्याः, कटु मायामृपावचः । अंतरंगविया श्रेयस्करं न स्याद्यतोऽत्र च ॥ २ ॥ अर्थ-जिस प्रकार इन्द्रवारुणी नामक वेल का फन कटवा होता है, उसी प्रकार मायामृषा का वचन कड़वा है और वह अतरंग बुद्धि से, इस दुनिया में कल्याणकारी होती नहीं ॥ २ ॥ खङ्गधारां मधुलिप्तां, विद्धि मायामृपां ततः । वर्जनोया प्रयत्नेन, विदुषा शिववांछता ॥ ३ ॥ अर्थ-मायामृपावाद को मधु से लिपटाती हुई तलवार की धार समान जानना चाहिए, उसी प्रकार कल्याण चाहने वाले ऐसे पण्डितो को प्रयत्नपूर्वक उसका त्याग करना चाहिए ।। ३ ।। मुग्धप्रतारणांद्यार्थं मायामृपां वदेन च । पूर्व सुधानिभा सा च, यतोऽते तत्फलं कटु ॥ ४ ॥ अर्थ-भोले मनुष्य को ठगने आदि के लिए मायामृषावाद वोलना नही क्योकि पहले तो अमृत रस के समान लगता है किन्तु उसका परिणाम उसका कड़वा फल है ।। ४ ।। ".. मिथ्यात्वशल्य प्रकरण शत्रुभिनिहितं शस्त्रं, शरीरे जगति नृणाम् । यथा व्यथां करोत्येव, तथा मिथ्यात्वमात्मनः ॥ १॥... -२६- - . u 17 अय-शत्रु द्वारा शरीर पर फेंका हुमा शस्त्र जिस प्रकार इस जगत मे मनुष्य को दुस देते हैं, उसी प्रकार मिथ्यात्वा शल्य प्रात्मा को दुख देता है ॥ १॥ दुर्वचन पराधोन, शरीरे कष्टकारकम् । शल्य शल्यतर तस्मात्, मिथ्यात्वशल्यमात्मनि ॥ २ ॥ अथ-शल्य समान कुवचन है पराधीनता जिस प्रकार कष्ट कारक है जादा शल्य रूप वसा ही मिथ्यात्व प्रात्मा को कष्ट पारक है ॥२॥ स्वाध्यायेन गुरोभक्त्या दीक्षया तपसा तथा । येन केनोद्यमेनव, मिथ्यात्वशल्यमुद्धरेत् ॥ ३ ॥ अथ-सज्झाय के ध्यान से, गुरु की भक्ति से, दीक्षा से, तप से इस प्रकार जहाँ तक हो उद्यम से मिथ्यात्व-रूपी,शल्य का उद्धार कर ॥ ३ ॥ मिथ्यात्वशल्यमुन्मूल्य, स्वात्मान निर्मलीकुरु । यथाऽजस्त्र सुसिंदूर-रजसाभुवि दपण ॥ ४ ॥ पप हे भव्य प्राणी ! तू मिथ्यात्व रूपी सत्य को मूल में से उखाटकर तेरी सुद को मारमा-पो निमल कर । किस तरह उस तरह कि हमेशा सिन्दूर के रज से दुनियां में जिस प्रकार दपण निमत होता है उसी प्रकार ॥४॥ - . --
द्य तव्यसन प्रकरण
न च स्याद् द्रोहतः प्रेम, परस्त्रो लंपटाद्यशः ।
दयया रहितो धर्मो, यया यू ताद्धनं तथा ॥ १ ॥
अर्थ-जिस प्रकार द्रोह से प्रीती होती पर स्त्री से प्रेम करने
से यश मिलता नहीं तथा दया विना जिस प्रकार धर्म होता
नही उसी प्रकार जुगार खेलने से धन नहीं होता ॥ १ ॥
धू तस्य व्यसनं त्याज्यं, नरेण शुभवांछता ।
हठाद्यदि न मुच्येत, तदा क्लेशपरंपरा ॥ २ ॥
अर्थ कल्याण को चाहने वाले मनुष्य को जुगार की व्यसन
त्याग देना चाहिए और अंगर व भी हठ से जो उसको त्याग
करने में नही आवें, तो क्लेश ही क्लेश होता है ।। २ ॥
लभेत गं पराधोनात्, तत्वबुद्धिं तु मद्यपात् ।
यदा प्रमादतो ज्ञानं, भवेद् द्यूताद्धनं तदा ॥ ३ ॥
अर्थ-जो पराधीनता से सुख मिलता हो, जो मदिरा पान
करने वाले मनुष्य के पास से तत्व को बुद्धि मिलती हो तथा
प्रमाद से जो जान मिलता हो तो जुगार से धन मिलता
है ।।३॥
न यंत्रसाध्यं न च तंत्रसाध्यं, नमंत्रसाध्यं न च मंत्रिसाध्यम् ।
एवंविधं धू तमतः प्रमोच्यं, नो चेत्त्यजेत्पांडववद्भवेच्च ॥४॥
- । अर्थ-जुगार को यत्र से भी साध सकते नही, तसे भी साघ'सकते नही, मंत्र में भी साध सकते नहीं तयो मैत्री से भी साध सकते नही प्रत इस प्रकार के जुगार का त्यागकरो। अगर उसका त्याग नही कर सकोगे तो, पाण्डवो की तरह दुस मिलेगा। धूतानलेनापि च-राज्यभाग्ममोचि द्रव्य-नृपकोटिभिश्च। श्रोमूलदेवप्रमुखस्तयेह लभेत को तत एव धूम्नम् ॥५॥ अथ-'जुगार से नल राजा को गज्य भार त्यागना पडा तथा श्री मृतदेव आदि "झोडोगम के राजापो का द्रव्य त्याग परना पड़ा इस प्रकार इस दुनिया में किस मनुष्य ने 'जुगार से धन प्राप्त किया है ।।५।। है T - । मांसव्यमन प्रकरण- 1 - 1 मामादनात्प्रणश्यति, देहश्री सुमति सुसम् । शौच मत्य या पुण्य, अद्धाविश्वाससद्गति ॥ १॥ प्रप--माम भाण करने में शरीर की शोभा, उत्तम बुद्धि, मुष, पवित्रमा मत्य या, पुण्य वहा, विश्वास गति का नाश होता है ॥१॥ मामादनामनाना हि, जायते विभ्रमो ध्रुवम् । निदयत्वमगोच्य च, दुर्थीदु सपरपरा ॥२॥ . तयार उत्तम - में अयं-अर्थात मांस भक्षण से मनुष्यों को वास्तव में विभ्रम, निर्दयता, अपवित्रता, दुर्बुद्धि तथा दुख प्राप्त होता है ।। २ ।। प्रपश्यंति पशून् यत्र, मनस्तत्र प्रवर्तते । रागता मांसपुष्टेस्या, दुर्बलत्वे विरागता ॥ ३ ॥ अर्थ-अर्थात् मांस खाने वाला मनुष्य जैसे ही पशुप्रो को देखता है वैसा ही उसका मन हो जाता है । अर्थात् पशु मास पुष्ट हुआ होता है उसके उपर राग बंध जाता है तथा जो पशु दुर्वल होता है उसके प्रति उसको विराग हो जाता है ।। ३ ।। पापकर्मघटे पूर्णे, रौद्राध्यानवशं गते । मांसभुग्मरणं प्राप्य, व्यथां सहते दुर्गतेः ॥ ४ ॥ अर्थ-मांस भक्षण करने गले मनुष्य अपने आप कर्मों का घड़ा भरते हुए भो रौद्ध्यान के वशीभूत होते हुए भी मृत्यु प्राप्त कर नरक की वेदन सहन करते है ।। ४ ।। सा रेवती या नरके प्रविष्टा मांसादनाद्भीम कुकर्मकी श्री श्रेणिकेनापि पलाशनाच्च प्राप्ता हि पीडा नरकस्य तीव्रा ॥५॥ अर्थ- भयकर कुकर्म करने वाली प्रसिद्ध खेती को मांस भक्षण करने से नरक मे प्रवेश करना पड़ा। मौर श्रीणिक राजा ने भी मास भक्षण से नरक की भयकर पीड़ा प्राप्त की ।। ५ ।। 7 ३ *
मदिरापान व्यसन प्रकरण
पारवश्यमशुचित्व, विकलत्वमचेष्टत्ता ।
निर्दयत्व भवेत्तस्मात्, सुरापान विवजयेत् ॥ १॥
प्रथ-मदिरा पान से परवश्ता, अपवित्रता, विकलता,
निच्चेप्टता तथा निदयता होतो है । अत मदिरा पान का त्याग
परना चाहिए।॥ १॥
शथिल्य विग्रहे वस्त्रे, नेतयुग्मे मदाधता ।
पतन या तनापि, मद्य पिवेत्ततो न च ॥ २ ॥
प्रथ-प्रर्यात मद्यपान करने से शरीर में और वस्त्र में
शिथिलता होती है। दोना प्रांखो मे मदाधता (नजर कम)
होती हैं तथा जसे तसे पतन होता है। इस कारण मदिरा पान
नहीं परना चाहिए ॥२॥
सततिर्नास्ति वध्याया , कृपरणस्य यशो न हि ।
कातरस्य जयो नैव, मद्यपस्य न सद्गति ॥ ३ ॥
अप-जमे वध्या स्त्री के सतात नहीं हातो कृपण का यश
नहीं मिलता, डापार को विजय नही मिलती, उमी प्रकार
मदिरा पान परा वाले मनुष्य को उत्तम गति नहीं मिल
साती ॥३॥
यस्या धवो माधयवासुदेव , सुवर्णदुर्गा धनदेवदत्ता।
मा द्वारिपा प्रग्यजिता च नून
समापिहा रिल मद्यपानम् ॥ ४ ॥
अर्थ-जो द्वारिका नगरी के स्वामी श्री वसुदेव थे तथा जिनके सोने का गढ था तथा जिसको कुवेर ने दिया था वह द्वारिका जो वास्तव में जल गई उसमें भी मद्यपान का ही फल था ॥४॥ वेश्या व्यसन प्रकरण कुष्टाभिभूतमृत्यानां, मन्येतानंगतुल्यताम् । द्रव्याथं न च स्नेहाथ, गरिणका सुखदान न सा ॥१॥ अर्थ-जो वैश्या स्त्री स्नेह के लिये नही परन्तु सिर्फ द्रव्य के लिये कोढ़ से पर भव पाये हुए मनुप्यों को भी काम देव समान मानती है अतः ऐसी वैश्या सुखदाई नहीं ॥ १ ॥ लोभार्थिनी निर्लझा च, पापिष्टा पापिष्टा पापकुडिका । विट्चुविता च नि.स्नेहा, कथं सेव्या पणांगना ॥२॥ अर्थ-केवल लोभ के ही प्रयोजन वाली, विना लज्जावाली, पापिष्ट, पापो के कुण्ड के समान वैश्यागामी पुरूषो से चुनवन करने वाली तथा विना स्नेह की ऐसी वैश्या स्त्री का क्यों सेवन करना चाहिये ॥२॥ सा कंयाश्लेपमाधत्ते, परं प्रीतिविजिता । तेनाऽझास्तत्र वध्यन्ते, यथा सिहान पंजरे ॥ ३ ॥ -३४-- 7 - अर्थ-वह कठ से आलिंगन तो करती है, किन्तु वह विना प्रेम की ही होती है। अर्थात् गज्ञानी मनुष्य, पिंजरे मे जिस प्रकार सिंह बघता है उसी प्रकार उसके साथ प्रेम से बध जाता है ।।३॥ वैश्यासगाच्च सप्तव, नश्यत्यच्छवियश । लझा च सतति सिद्धि, द्रव्य च गृहगागना ॥ ४ ॥ अप-वश्या के सग से नीचे बताई हुई साथ वस्तुनो का नाश होता है शरीर को काति, यश, लज्जा सतति, सिद्धि, धन तथा घर की स्त्री का नाश होता है ।।४।। कदापि वेश्या न गुणार्थिनी स्या, द्रूपायिनी नैहितार्थिनीच। विद्यार्थिनी नापि न मन्यसे चेद्वार्ता शृणु त्व कयवन्नकस्य ॥ ५॥ अप-अश्या स्त्री फभी गी गुण वाली, रूप पाली, हित करने वाली, विद्या को प्रयोजन वाली नहीं होती। प्रता हे भव्य प्रारणो अगर तू यह बात नहीं मानता हो तो तू कयवान की कथा का श्रवण कर ॥५॥ , याखेट व्यसन प्रकरण घूपात्प्रस्विन्नदेहश्च, ह्यस्यते धनगहारे । पासेटे कि मुस तन, पापस्पे निजात्मन ॥१॥ - - अर्थ-जो तुझे शिकार पकड़ने से शरीर पर पसीना होता है तथा भयकर वन मे भटकना पडता है तो ऐसे पाप रूपी शिकार में तुझे अपनी आत्मा को क्या सुख मिलता है ।। १ ।। पुनः पुनः प्रपच्येत, परभवे नरकावनौ। सतत रुधिरालिप्त-करेगाखेटकारिणा ॥२॥ अर्थ-हमेशा खून से लिपटा हुआ जिसका हाथ होता है ऐसा शिकार करने वाला मनुष्य पर भव मे नरक मे जाकर वरावर अत्यत दुख पाता है ॥ २ ॥ आखेटकेषु विध्येरन्, प्राणिनः प्राणिनोऽत्र ये। नरके तेऽप्यनुविध्येरन्, परत्रेत्यवदझिनः ॥ ३ ॥ अर्थ-जो प्राणी इस जगत मेशिकार पकड़ कर.भारता है वह पर भव मे नरक में जाकर विधाता है इस प्रकार श्री जिनेश्वर भगवान् ने कहा है ।। ३ ।। श्वभ्रद्वाराणि पंचैव, द्रोहो हत्या तथा भुवि । मांसादनं गुरोनिदा, तथा खेटकपातकम् ॥ ४ ॥ अर्थ--इस जगत मे नरक जाने के पाच द्वार कहे हैं द्रोह (दूसरों की ईर्ष्या) हत्या यानि जीवो की हिसा मांस, भोजन गुरु की निंदा तथा, शिकार से हुए पाप ये पाँच नरक के द्वारा है।। ४ ॥ पाखेटकं चेचदि न त्यजेच्च, परत्र वधादिक दुःखराशिम् । A -३६ सहेत चास्मिन् परमापद हि, यथाऽजपुतो रघुवंशजात ॥५॥ प्रथ-प्राणी । कोई भी मनुष्य परलोक मे जिस प्रकार वधन आदि'दु सो के समूह से भरा पड़ा है ऐसा मनुष्य अगर शिकार को नही त्यागता है तो वह रघुवश मे उत्पन्न हुमा मज पुन की तरह इस लोक में भी अत्यत दुख सहन करता है ॥ ५॥ 1 H चौर व्यसन प्रकरण चौर्यकार्ता चौरमनी, स्थानदश्चौर रक्षक । चौरेण सह व्यापारी, चौर पचविध स्मृत ॥ १ ॥ प्रथ-चोरी करने वाला, चार के साथ गुप्त बाते करने वाला, चोर को रहो पे लिए स्थान देने वाला चोर का रक्षग्ग परने वाला तथा चोरो के साथ, व्यापार करने वाला इस प्रकार के पाच प्रकार के चार कहलाते है ॥ १॥ निय सरवाक् कूर , शोधृष्टश्च निर्भय । 'निर्दाक्षिण्य क्रूरकर्मा, चौरम्याष्टौ गुणा स्मृता ॥२॥ अथ- पिना दया वाला, कठोर वचन बोलने वाला, क्रूर लुच्चाई परने वाला, ढीढ, विना भयवाला, अनुदार तथा कर कार्य करने वाला, इस प्रकार ने पाट दूपण चोरी के यादलाते हैं ।। २॥ चीरस्य पंच चिन्हानि, भ्रमट्टर चंचलाननः । वस्त्वासक्तमना व्यग्र, इतस्ततो निरीक्षणम् ॥ ३ ॥ अर्थ-चोर के निम्नलिखित चार चिन्ह होते हैं। वह त्रमयुक्त दृष्टि वाला, चंचल मुख वाला, वस्तुनो मे यासक्त मन वाला व्यय तथा चर उधर देखने वाला होता है ।।३।। भयं भिक्षा वयो दंभः शृंखलापदबंधनम् । शूलिकारोपणं मृत्युः, फलानि चीरकर्मणः ॥ ४ ॥ अर्थ-भय, शिक्षा, वध, दण्ड, साकल से पर बचे हुए, मूली पर चढने वाला तथा मृत्यु इतने चोरी करने के फल है ।। ४ ।। झातातो विजयस्य चीर्यकरणं संसारसंप्लावनं, चान्यस्मासुभूतितस्करकथां श्रुत्वा त्यज दूरतः । यत्पुण्यं भज रोहिणेयक इव प्रौढं सुखं लिप्ससे, नोचेदुर्ग नियातनाफलमिदं भुक्ष्व स्वकर्मोदयात् । ५॥ अर्थ-ससार में डूबाने वाली, ऐसी विजय करने वाली चोरी जानकर तथा वसुभूति चोर की कथा सुनकर उस चोरी को हे प्राणी तू छोड़ दे । यदि तुमको उत्कृष्ठ मुख की इच्छा हो तो रोहिणेय नाम के चोर के पुण्य को भजो.? नही तो कर्मो के उदय से तुम्हे दुर्गति का फल भोगना पड़ेगा ।। ५ ।। i परदार प्रकरण . प्रथ- नित्य मनोवचःकाय, यं परस्त्रीषु लपट । सहते स हि दुख च, श्वभ्रे ताडना दिकम् ॥ १ ॥ अर्थ-जो मनुष्य हमेशा मन, वचन, और काया से परखी मे लिपटा रहता है। उस मनुष्य को नरक मे ताडन प्रादि का दुख सहन करना पडता है ।। ५॥ रणे फलेच्च वृक्षश्चेत्, सुयश स्यात्कुकर्मण । कुवाक्याच्छ लभते य-त्तदा परस्त्रिय सुखम् ॥ २ ॥ -यदि रेतीले मदान मे वक्ष से फल पैदा होगा, कुकम से यश मिलेगा, कुवचन से सुख मिनेगा, तव ही पर स्त्री सेवन से सुख प्राप्त होगा ॥२॥ इद्रधनु: कराऽस्पृक्च, न वश पवनो यथा । तथा दुर्गाह्यमेव स्यात्, परस्त्री हृदय' सदा ।। ३ ।। अथ-जिस प्रकार इन्द्र के धनुप को हाथ से स्पश नही वर सकते तथा पवन को वश में नही कर सकते, उसी प्रकार पर स्त्री के मन की भी हमेशा पहिचान नही सकते ॥ ३ ॥ लोके दुर्गहता ख्याता, या सार्थसप्तवापिकी । परस्त्री सैव विझेया, यत प्राप्नोति चापदम् ।। ४ ॥ अथ दुनिया में जो साढे सात वप की पनोती प्रसिद्ध है उसी प्रकार उस पर घी को भी जानो, क्योकि इससे दुपही होता है।।। ४ ॥ -- त्यजेत्युखार्थी परदारसंग, नोचेत्स पद्मोत्तरवद्भवेच्च । मतातरे गौतमतापसस्य, दारानुगगादभवद्रवेः किम् ॥ ५ ॥ अर्थ-युव को चाहने वाले मनुष्य को पर स्त्री के संग को त्याग देना चाहिए। नहीं तो पद्मोत्तर राजा को तरह अापदा होती है तथा अन्य दर्णने में भी जैसे गोतम ऋपि को स्त्री के अनुराग से सूर्य की क्या दगा हुई ॥ ५॥ पाप प्रकरण * भवेयुः प्राणिनः पापा-कासवासज्वरादयः । सखायोऽपि कदचि, नागश्रीवन्मही तले ॥ १ ॥ अर्थ-पाप से प्राणियों को खांसी, श्वांस, तथा ज्वर आदि की बिमारियां होती है । तथा इस पृथ्वी पर नाग श्री की तरह नीच सोते होती हैं ।।१।। अमृतं कालकूट स्या-न्मित्रं शत्रुःसुघोरधीः । सझनोदुर्जनः पापा, द्विपरीतं फलं त्विह ॥ २ ॥ अर्थ-पाप से अमृत जहर होता है, मित्र शत्रु होता है, उत्तम बुद्धि वाला निर्बुद्धि वाला होता है तथा सब्जन दुर्जन होता है। इसी प्रकार पाप से विपरित फल होता है ।।२।। - 1 - - - -- . गुणश्च दोपता याति, पापतो हच्च शून्यताम् ।- ज्ञानमज्ञानतामेव, भ्रमरोगादिव देहिनः ॥ ३ ॥ प्रथ-भ्रम के रोग से किसी प्रकार के पाप से प्राणों के गुण दापो मे हो जाते है । उदय शून्य की तरह ज्ञात होने लगता है । तथा ज्ञान प्रज्ञान की तरह हो जाता है ।। ३ ।। दुष्टा रामा सुता दुष्टा, दुष्टा परिजना जना । भ्रातरो दु सदातार , पापाद्भवंति सर्वदा ।। ४ ॥ अर्थ-पाप से हमेशा स्त्रियां, पुत्र तथा नौकर भी दुष्ट हो जाते हैं और भाई हमेशा दु ख देने वाला हो जाता है 117॥ श्रीब्रह्मदत्तो नरचक्रवर्ती, मृत्यागत सोऽपि हि सप्तमी च । निगत्य तप्माद्भवपक्रमग्न- स्तत्रापि हेतु किल पातकस्य ॥ ५॥ प्रथ-जिस प्रकार- ब्रह्मदत चक्री, मृत्यु ,पारर सातवी नरक मै गये तथा वहाँ से निकल कर वे ससार स्पो कोचद मे दूधे उस में भी पाप के कारण जानना चाहिए ॥५॥ - - ... " सम्यक्त्व प्रकरण उपसामिकमेक च, परक्षायोपशामिकम् ।। होय धारियका सुष, सालाधन च वेदकम् ॥१॥ ।
अर्थ-पहला उपशामिक, दूसरा, क्षायोपमामिक, तीसरा क्षायिक, चौथा सास्वादन तया पांचवा वेदक सम्यक्व जानना चाहिए ।। १ । जैनधर्म च दक्षत्वं, संस्थैर्योन्नतिभक्तयः । तीर्थसवेति पंचापि, सम्यक्त्वभूपणानि च ॥ २ ॥ अर्थ-जैन धर्म में दक्षता, स्थिरता, उन्नति, भक्ति, तथा तीर्थ सेवा, ये पांच समकित के भूपण हैं ।। २ ।। शंकाकांक्षाविचिकित्सा, जैनादन्यस्य संस्तुतिः । तत्संस्तवोऽपि पंचव, सम्यक्त्वदूपणानि च ॥३॥ अर्य-शंका, कंखा, विचिकित्सा, जैन के सिवाय दूसरे की स्तुति और अन्य मत की प्रगसा, ये पांचों समकित के दूषण है ।।३।। मूलं धर्मस्य सम्यक्त्वं, स्वर्गसौख्यफलप्रदम् । अनुक्रमेण मोक्षस्य, सुखदं भरिणतं ध्रुवम् ॥ ४ ॥ अर्थ-वर्म का मूल रूप, ऐसा समाकित स्वर्ग का मुख रूपी फल देने वाला है । तथा इसी तरह वास्तव में मोक्ष का सुख देने वाला कहाँ है ॥ ४ ॥ प्रबोवरत्नं हृदि यस्य नित्यं, . वसेदरं तस्ययगोऽपि माम् ।
। लभेत पूजामिह मुक्तिमये, स भूपति श्रेणिकवत्पृथिव्याम् ॥ ५॥ अध-जिसके हृदय मे हमेशा उत्तम एच ज्ञान रूपी रत्न बसा हुआ है उन मनुप्यो का इसी पृथ्वी पर यश होता है तथा वे पूजने के लायक हैं और आखिर में वे घेरिएक राजा को तरह मोक्ष प्राप्त करते हैं ॥५॥ - पुण्य प्रकरण कातरूप यशोलाभ, विद्वत्व भामिनीसुखम् । पूर्ण धन सुत पुण्यात्, प्राप्नुयात् पूर्वसचितात् ॥ १॥ प्रथ-पूर्व भव मे सचय क्येि हुए पुण्य से मनोहर रूप, यश, विद्वता, स्त्री सुख, धन और पुत्र प्राप्त करता है ।।१।। सभाव्यते ह्यसभाव्य, निजपुण्यप्रभावत । देवदत्यास्तिलके य-तेजोऽभूत् पूर्वपूण्यत ॥ २ ॥ अय-अपने पुण्य के प्रभाव से असमवित वस्तुएँ भी सभव हो जाती है क्योकि पूर्व भव के पुण्य से दमयति ये तिलक मे तेज हुमा ॥२॥ राजमार पनाम्यत्न, सद्गुणान्यप्रियासुखम् । पूर्ण यशो विवेकिन, पुण्यद्र मफलानि च ॥ ३ ॥ है - अर्थ-राजा की तरफ से मान, धनाढ्यपन, सगुणो स्त्री का सुख, सम्पूर्ण यश तथा विवेक ये सत्र पुण्य रूपी वृक्ष के फल है.||३॥ तीर्थकरत्वं चक्रित्वं, वासुदेवत्वमेव च । लभते, च नरो भूम्यां, देवत्वं पूर्वपुण्यतः ॥ ४ ॥ अर्थ-पूर्व भव के पुण्य से मनुष्य पृथ्वी पर तीर्थ कर गौत्र, चक्रवर्ती वसुदेव तथा देव आदि पद भी प्राप्त कर सकता है ।। ४ ।। श्रीरामचंद्रस्य महाजयोभूत, पुण्यात्पुरा रावणसंगरे च । पुण्याढ्यराजा परमं प्रतापं, लेभे बलं तत्र वृपस्य हेतुः ।। ५ ।। अर्थ-पूर्व भव मे किये हुए पुण्य से रावण के संग्राम मे श्री श्री रामचन्द्रजी की महान् जय हुई तथा पुण्य प्राप्त किये हुए राजा ने उत्कृष्ट प्रताप तथा बल जो प्राप्त किया है उसका पुण्य ही कारण है ॥ ५॥ TM Y दान प्रकरण स्याझन्म 'सफलं तस्य, सफलं चापि जीवितम् । यस्य वक्र वसेन्नित्यं, दानमित्यक्षरद्वयम् ॥ १॥ ४४- Er-ft मुष में पा, मेरो दा मगर हमेशा यमे हुए . मगन पा 377॥१॥ पुतीयाति, मर्गभ्य मुगमपद । TETrainm, प्राप्यने दाननो नर ॥२॥ ५५-TR मारायो पुत्र गा मुग, वग के मुगा पमा भोग प्राय हो ॥२॥ मितिम्नयच च । तुमा पर माग, सानातिनुसुलमा ॥३॥ st IIT, मति उमो प्रारतम rina ranqषी पर दानति तुलम mratri fruit.मायामारपत् ॥ ४ ॥ C- Trma परमार #tra Ert IIT RTR भारत 71 • EnramRRITTPHY" FReोगा, +-rrrrrram !
अर्थ-जिनके कमल रूपी हायों से अत्यन्त दान देने की प्रकृति रही है। उनके राजा, दुर्ग के रक्षक, प्रधान सार्थवाह (समुद्र मार्ग से व्यापार करने वाला) आदि सपं, बाव, तथा हाथी आदि जलचर, भारडं ग्रादि पक्षी, भूत, प्रेत, पिशाच तथा यक्षों के समूह भी उनके वश मे होते हैं ।। ५ ।। .." शील प्रकरण MP हस्तसिद्धिर्वचःसिद्धिः, संपत्तस्य पदे पदे । श्रीसुदर्शनवद्यस्य, गीलमस्ति समुज्ज्वलम् ॥ १ ॥ अर्थ-जिनके पास सुदर्शन सेढ की तरह उज्जवल गोल रहा हुआ है उसको हस्तसिद्धि, वचनसिद्धि तथा पग पग पर संपति मिलती है ।। १॥ कदाग्रहग्रहग्रस्ता, नारदा: क्लेशकारिणः । लेभिरतेऽपवर्ग च, तत्र शीलस्य कारणम् ।। २ ।। अर्थ-हठ रूपी ग्रह से जकड़े हुए क्लेग कराने वाले नारद भी जिन्होंने मोक्ष पाया है उसमे शील का ही कारण है ॥ २ ॥ अग्निर्जलं द्विपन्मित्र, तालपुटं सुधानि भम् । सिंधुः स्थलं गिरिभूमि, हेतुः शीलस्य तत्र च ॥ ३ ॥ अर्य-अग्नि जो ठडी हो जाती, शत्रु मित्र हो जाते हैं, जहर अमृत हो जाता है, समुद्र स्थल हो जाता है तथा पदत जो भूमि रूप हो जाना है-उसमे भी शील का ही कारण है ।। ३ ।।
.
यन्मत्र सिद्धता याति, तत्र फलति निश्चितम् ।
यत्र कार्यकर स्याच, तत्र शोलविज़ भितम्॥ ४॥
अर्थ-जो मन सिद्ध हो जाता है, तत्र निश्चय करके फल
जाता है तथा यत्र कम करने वाला हो जाता है उसमे भी शील
का हो महत्व जानना चाहिए ॥ ४ ॥
प्रभावती चदनबालिका'च,
राजीमती द्रुपदराजपुत्री
इत्यादिकानामुपसंगहत,
शोल समाख्यायि जिन समासु ॥ ५ ॥
अय-प्रभावती, चन्दनबाला राजीमती तथा द्रोपदी इत्यादि
के उपसग हरने वाले जिनेश्वरो के सभा में शोले हा कहा
हैं ।।५HTTr
11
तप प्रकरण
स्वलालयेव कुष्टोप-शमन दर्शित यत ।
लब्धा सा तपसा लब्धि., सनत्कुमारचक्रिरणा ॥१॥.
प्रथ-जिसने अपनी लार से कोढ शात कर दिखाया है वह
लब्धि सनतुमार चक्रो के तप से प्राप्त हुए हैं ॥१॥
. - वस्त्रं जलेन पूतं स्या-त्पुनस्तन्मलिनं भवेत् । तपसा च कृतः शुद्धों, देहो न स्यान्मलीमसः ॥ २॥ . अर्थ-वस्त्र जल से पवित्र होता है, परन्तु वह वापस गन्दा भी हो जाता है किन्तु तप से शुद्ध किया हुआ शरीर गदा होता नही ।। २ ।। दानेन न च या सिद्धि, मंत्रतंत्रादिभिर्न च-1 सिद्धयति तपसा सिद्धिः, श्री बाहुबलिवकिल ।। ३ ।। -- अर्थ-जो सिद्धि दान से या मंत्र तंत्र.अादि से भी नहीं होती, वह सिद्धि श्री बाहुबली की तरह वास्तव में तपस्या से सिद्ध हुई है ।। ३ ॥ तपसा क्षीयते कर्म, केवली कर्मणः क्षयात् । वृणुयात्तं च मुक्तिस्त्री-स्तत्र सौख्यं निरंतरम् ॥ ४ ॥ अर्थ-तप से कर्म क्षय होते हैं, कर्मो के क्षय से प्राणी केवल ज्ञानी होते है तथा उससे मोक्ष रूपी मुक्ति प्राप्त होती है और उन्हें वहाँ निरतर सुख मिलता है ।। ४ ।। तंतप्यते यश्च तपोऽभिराम-मटाट्यते नैव भवार्णवं च । ललभ्यते मुक्तिकरं स सद्यों, द्रढप्रहारीव सुखी च लोके ॥५॥ अर्थ-जो मनुष्य मनोहर तप तपता है उसको इस भव-रूपी समुद्र में भ्रमण करना नही पड़ता और वह तुरन्त- ही मोक्ष- है - - ।
पाता है और दृढ प्रहारी को तरह जगत में वे सुखो होते हैं ॥५॥ भाव प्रकरण भव्यश्च भावना भाव्या, भरते वरवद्यथा । फलति दानशीलाद्या, वृष्ट्यायथेह पादपा ॥१॥ प्रयं -भय लोका यो, भरत राजा को तरह, भावना भानी साहिए जिम प्रार वृष्टि में यहां वृष फनते हैं वमे हो दानशील मादि पनत है। पनि पचभिर्याश्च, भावना पचविंशति । तामिमहायतान्येव, साधयत्यमृत पदम ॥२॥ अप-पान और पांव से गुणा करने मे भावनाए पच्चीम प्राार की है मौर उन भावनामो से (मुनि) महाग्रता पी पोर मोम्पान की साधना परते हैं ॥२॥ बानेशोले तपस्येव, भावना मिलिता यदि । सदा मोक्षमुगापाक्षा, चिंतनोया जनरिह ॥३॥ ५५-दार, गोल पोर सर में जा पाता मिती १६ हो गुभाग माना की 3 फग्नो चाहिये ।।३।।
सर्वतो देशतश्चैव, विरतिः सफला तदा । यदा भावयुता लोके, स्वर्गमोक्षसुखप्रदा ॥४॥ अर्थ-जो भावना से युक्त हो तभी सवसे, और देश से विरक्ति, इस लोक मे सफल हो सकती है तथा स्वर्ग और मोक्ष के सुख को देने वाला हो सकता है ।। ४ । पट्खंडराज्ये भरतो निमग्न-स्तांवूलवक्त सविभूषणश्च । आदर्शहयें जटिते सुरत्न, निं स लेभे वरभावतोऽत्र ।। ५ ।। अर्थ-छः खण्ड के राज्य में प्रासक्त हुए मुख में तंबुल का पान वाला तथा आभूषण वाला ऐसा भरत महाराज उत्तम रत्नो से जड़ा हुआ ऐसे प्रादर्श (आरिसा) भुवन मे भी यहाँ उत्तम भाव से केवल ज्ञान प्राप्त किया है । पूजा प्रकरण धनाढ्यत्वं च सौभाग्यं विद्वत्वं सुपरिच्छदः । एकछत्रनृपत्वं च, देवपूजा फलं मतम् ॥१॥ अर्थ-धनाढ्य पना, सौभाग्य, विद्वता, उत्तम परिवार, तथा एक छत्री राज्य ये सव देव पूजा के हो फल है।
दारिद्य मथ दौर्भाग्य, मूर्खत्व डु परिच्छद ।
दुमिन दुर्नु पो दुर्थी, नैते स्युर्देवपूजनात् ॥२॥
अथ-दरिद्रता, दुर्भाग्य, मूखता, दुष्ट परिवार, दुष्ट मित्र,
दुष्टराजा तथा दुष्ट बुद्धि ये सब देव पूजा से होते नहीं ॥२॥
योहि देवार्चन कुर्यात्, संव हस्त प्रशसक ।
तद्विना च सर्वस्यापि, करो नीरर्थको मत ॥ ३ ॥
अथ-जिस हाथ से देव पूजा को जाती है वही हाथ
प्रशसनीय होता है कि तु विना देव पूजा वाला हाथ निरथक माना
हुआ है ॥३॥
ये देवा ये पुमासश्च, शुद्धसम्यक्त्वघारिण ।
प्राप्नुयुर्देवपूजा ते, तिर्यचो नारका न च ॥ ४ ॥
पर्य-जो देव तथा पुरुष शुद्ध समकीत को धारण करने
वाले हैं उन्हें देव पूजा मिल सकती है । तियच मा १ या नारकी
नहीं मिलती ॥४॥
देवार्चन भव्यजनैविधेय, निरतर निर्मल भावयुक्त ।
सौभाग्यमत्र त्रिदिव परत्र, सुर्याभवन्मुक्तिप्रद क्रमेण।।
मप-निमल भाव वाले ऐसे भव्य लोगो यो पूजा करनी
पाहिये जिमसे वि यहा सौभाग्य तथा परलोक मे देवलोक मिले,
सपा इस तरह करने से सूर्याभवी तरह मास दने वाला होता
है॥५॥
गुरू प्रकरण अयोमयोऽपि यो मर्त्यः, सुवर्णमुकुटोपमः । कृतो यगुरुणा नालं, तस्योपकार पूर्तये ॥ १ ॥ अर्थ-लोहे के समान मनुष्य को भी जिसने सुवर्ण के मुकुट के समान बनाया है ऐसे गुरु के उपकार का बदला चुका सकते नही ॥१॥ गुरुः प्रवहणं सम्यक्, संसारार्णवतारणे। यथा केशीकुमारोऽभूत्, प्रदेशीनृपतारकः ॥ २ ॥ अर्थ संसार रूपी समुद्र से तिराने में गुरू उत्तम जहाज के समान है। जिस प्रकार केशी कुमार मुनि प्रदेशी राजा को तारने वाले हुए ॥२॥ हर्म्यज्योतिनिशाज्योति-रहोतिस्ततोऽधिक । गुरुज्योतिश्च येनाहं, तेजः पुंजमयः कृतः ॥३॥ अर्थ-दीपक, चन्द्र तथा सूर्य से भी गुरू रुपो दीपक अधिक तेज है जिसने कि मुझे तेज तारों के समूह की तरह किया हैं ॥३॥ हावलंबनं स्तंभो, दंडो वृद्धावलबनम् । देहावलंबनं भोज्यं, भव्यावलंबनं गुरुः ॥४॥ -५२-
प्रथ-जिस प्रकार घर के भार का सहारा स्तभ है वृद्ध
का महारा लकडो है तथा शगेर का सहारा भोजन है उसो
प्रकार भव्यो का सहारा एक मात्र गुरु है ॥४॥
गुरुयश्च लब्धो वरो वोरनाथ,
सदानदमुरयर्दशश्रावकश्च ।
प्रमादात्तत स्वगसौख्य भजति,
मानुष्य भव प्राप्य मुक्तोश्वरास्ते ॥ ५ ॥
भय-पान दयादि जा दम प्रावका को श्रा वीर भावान
जमे उत्तम गुरु के पास भेजा था ये गुरु को कृपा से स्वग के सुवा
पा भोग रहे हैं। तथा प्राखिर मे मनुष्य भव पार कर मुक्ति के
स्वामी हगि ॥५॥
उद्यम प्रकरण
उद्यमेन विना विद्वन् न सिद्धयति मनोरथा ।
तीर्थकरपद तेभे, रेवत्युद्यमहेतुत
प्रय-रे विरान । उद्यम विना मनोरय सिद्ध होता नही,
पयोगि उधम से हो रेवती ने तोपर पद प्राप्त किया है ॥१॥
विष्यती ति यद्भाव्य, वदत्यालम्पदेहिन ।
शानिाचेति जल्पति, लभेरन् घमनो जयम् ॥२॥
अर्थ-जो होना होगा वही होगा, इस प्रकार ग्रालसी मनुप्य वोलते है और नानी तो यह कहते हैं कि धर्म से जय मिलती है ॥ २ ॥ तंद्रां विहाय कर्तव्यः, प्राणिभिः सर्वथोद्यमः । दानगोलतपोभावाः, सार्थाः स्युजिनशासने ॥ ३ ॥ अर्थ-पालस को त्याग कर प्राणियों को सर्व प्रकार से उद्यम करना चाहिये कि जिससे जिन शासन मे दान, शील, तप और भावसार्थक हो ॥३॥ मौनं कृतं मल्लीजिनेन चात्र, तत्पं तपश्चादिजिनेन तीव्र। नानोपसर्गाः सहितास्तु वीरैः, कोऽप्युद्यम वारयितु समर्थः ॥ ४॥ अर्थ यहीं पर मल्लीनाथ प्रभु ने मौन धारण किया था। आदिनाथ प्रभु ने कड़ो तपस्या की थी तथा वीर प्रभु ने तरह तरह के उपसर्ग सहन किये थे, अतः उद्यम का निवारने में कोन समथ है ? |॥ ४ ॥ - ५४- - ॥ ॐही अहं नम ॥ श्री सिन्दूरप्रकर मगलाचरण शादूलविक्रीडितवृत सिन्दूरप्रकरस्तप करिशिर क्रोडे कपायाटवी- दायाचिनिचय प्रचोघदिवसप्रारम्भ सूर्योदय । मुक्तिम्त्रीवदनंककुड कुमरस श्रेयस्तरो पल्लव- प्रोल्लास क्रमयो खद्य तिभर पार्थ प्रभो पातु व ॥१॥ अथ प्रभु पाश्वनाथ के दोना पैरो के नखो यो याति का समूह सपम्या कपी हापी पे मस्तर पे मध्य भाग मे सिदूर के तिलक पे समान पोभा है (पोर) पपायम्पो वन को जलाने के लिये सायााल (अग्नि) ये समूह पे समान मालूम होता है । (तया) गाम्पीदिपामारम परने को सूय उदय पे समान है । [एव] मुक्तिरपी स्त्री ये मुम पर रहे हुए पुयुम पे तिलक के सद्दमा तपा मल्पारणम्पो वृक्ष पे लिए नवी7 पल के समान है। (एमा यह गा पा समूह) तुम मचा या रसरण परें॥१॥ सज्जनों के प्रति प्रथफर्ता का निवेदन- पाद प्लविनोटितयत 17 गतु मम प्र उनमनगो वाचा विचारोयता सूतेऽम्म मनानि तत्परिमल याता वितन्वन्ति यद् । वाटम्पयनयानया यदि गुणोऽम्त्यासा ततस्ते स्वय, परिप्रपन न नेदय या प्रत्यथिना तेन पिम् ॥ २॥ -१५- . अर्थ-वाणी के विचार करने में तैयार हुए सत्रुप मेरे उपर 'बुगी मनवाले हों। अथवा इम प्रार्थना से क्या मतलब है ? क्योंकि, पानी कमल के पुप्पो को पैदा करता है परन्तु उन कमलों को, ग्वशत्रु को, वायु ही, इधर उधर फैलाती है। इसलिये अगर इन मूक्तियो में कुछ भा गुण हैं, तो वे सत्पुरुप खुद ही इन मूक्तियों के प्रसिद्धि करने वाले हो जायेंगे और यदि इन सुक्तियों में गुण नहीं है, तो फिर यश को कलंकित करने वाले उस विस्तार से याने सुक्तियो की प्रसिद्धि से क्या फायदा है ॥२॥ त्रिवर्ग में धर्म का प्राधान्य. उपजातिवृत. त्रिवर्गसंसाधनमन्तरेण, पशोरिवायुविफलं नरस्य । तत्रापि धर्म प्रवरं वदन्ति, न बं विना यद् भवतोऽर्थ- कामौ ॥ ३॥ अर्थ-त्रिवर्ग याने धर्म, अर्थ, काम इन तीनो की साधना के विना मनुष्य का जन्म पशु के समान वृथा है। इनमें भी (महात्मा लोग ) धर्म को श्रेष्ठ कहते हैं। क्योकि धर्म के बिना अर्थ और काम नहीं होते हैं ।। ३ ।। मनुष्य जन्म की दुर्लभता इन्द्रवज्रावृत. यः प्राप्य दुष्प्राप्यमिदं नरत्वं, वर्म न यत्नेन करोति मूढ । . -५६- क्लेश प्रवन स लब्धमब्धी, चिन्तामणि पातयति प्रमादात् ।। ४ !! अर्थ-जो मूल मनुष्य दुरी से मिलने योग्य मनुष्य जम को पाकर के प्रयल पूचर धम को नही करता है वह मूस चडी तकलीफ से प्राप्त हुए चितामणि रल को गफलत से मे गिरा देता है । ४॥ भावाथ--जो कठिनता से मिले हुए मनुष्य जाम को पाकर ३ भी जो धम का प्राचरण नहीं करता है वह महामूख है। तथा वह मानो कठिनता से प्राप्त चिन्तामणि रत्न जसे नर जन्म को यो हो भव सागर मे गवा देता है ॥४॥ मनुष्य जन्म को व्यर्थ गंवाने वाले की गलतिएँ । मादाका ता वृत स्वर्णस्थाले क्षिपत्ति स रज• पादशौच विधते, पोयूपेण प्रवरकरिण वायत्यन्धभारम् । चिन्तारत्न विकिरति कराद्वायसोड्डायनार्थम् । यो दुष्प्राप गमयति मुघा मयंजन्म प्रमत्तः ॥५॥ भावाथ-जो मनुष्य कीमती सोने के थाल में यदि धूल भरके रख दे तो उसे दुनियां के लोग पागल कहेगे ऐसे ही जो मनुष्य राजा के बैठने योग्य मस्त हाथी पर लकडो का नाम लाददे अथवा मुश्किल से मिलने वाले अमृत से (जो कि पीने को भी मिलना कठिन है।) अपने पैर धोवे या कौए को उडाने के लिए साधारण पत्थर न फेककर अमूल्य चिन्तामणि रत्न को ही अपने हाथ से फेक दे तो वह भी पागल हो गिना जायेगा। ठीक इसी तरह यदि कोई मनुष्य अपने अनेक जन्मो के सतकर्मो से प्राप्त मनुष्य जन्म को धर्म सेवन न कर व्यर्थ खो देवे तो उसे भी महात्मा लोग मूर्ख गिनते हैं। सारांश यह है कि मनुष्य जन्म पाकर धर्म का संचय जरूर करना चाहिये ।। ५ ।। शार्दूलकिवीडितवृत. ते धत्त रतरुवपन्ति भवने प्रोनमूल्य कल्पद्रुम, चिन्तारत्नमपास्य काचशकलं स्वीकुर्वते ते जडाः । विक्रीय द्विरदं गिरीन्द्रसदृशं क्रीणन्ति ते रासभं, ये लव्ध परिहृत्य धर्ममधमा धावन्ति भोगाशया ॥ ६ ॥ साराश-जो मनुष्य उत्तम धर्म सेवन को छोड़ विपयो को सेवता है वह मानो कल्पवृक्ष जैसे वृक्ष को काट कर उसकी जगह अपने घर मे धत्त रे को लगाता है। रत्न को छोड़ काच के टुकड़े को उठाता है तथा हाथी वेच बदले मे गधा खरीदता है । सारांश मनुष्य जन्म धर्मार्थ है, न कि कामार्थ ।। ६॥ शिखरिणीवृत. अपारे संसारे कथमपि समासाद्य नृभवं, न धर्म य. कुर्याहिपयसुखतृष्णातरलित. ।
अ डन् पारावारे प्रवरमपहाय प्रवहण, स मुस्यो मूर्खाणामुपलमुपलब्धु प्रयतते ।।७।। सारांश-जो मनुष्य नाना पुण्यो के प्रताप से प्राप्त मनुष्य देह को प्राप्त करके इस भव सागर से पार लगाने वाली जहाज के सदृश धम का सहाग नहीं लेता है वह महा मूख है ॥७॥ प्रथगत-इकवीस प्रकरणो के नाम शादू लविनीडितवत भक्ति तीथकरे गुरौ जिनमते सघे च हिंसानृत- स्तेयाब्रह्मपरिग्रहाद्य परम क्रोधाद्यरीणा जयम् । सौजन्य गुणिसङ्गमिन्द्रियदम दान तपोभावना, वैराग्य च कुरुष्व निर्वृतिपदे यद्यस्ति गन्तु मन ॥ ८ ॥ प्रथ-हे भव्य । यदि मोक्ष पदको पाने की इच्छा हो तो तीथकर प्रभु को तथा गुरु की भक्ति को करो। एव पवित्र जन धम पर तथा जैन सघ पर भी श्रद्धाभाव रखो। तथा जीयो को मारना, झूठ बोलना चोरो करना, ब्रह्मचय व्रत का नाश करना, और परिग्रह आदि से विरक्त भाव धारण कर श्रोध लोभ, मोह आदि अतरग शनुमो को जीतना, सज्जनता धारना, गुणवानो की सगति करना, इद्रियो का दमन करना, दान देना, तपस्या करना या उसी के समान भावना रखना और वराग्य का सेवन आदि इन इक्कीस नियमो का पालन करो ॥८॥ -५६-
इक्कीस नियमों के नाम- १. तीर्थ कर भक्ति. २. गुरु
भक्ति, ३. जिनमत भक्ति, ४. जैन सघ पर श्रद्धा.
५. हिंसा
त्याग, ६ असत्य त्याग, ७. चौर्य त्याग,
८. विषय भोग
६. परिग्रह शाति, १०. क्रोध, ११. मान, १२. माया
१३. लोभ आदि शत्रुजय १४. सौजन्य धारण, १५ गुरिणयो का
संग, १६. इन्द्रिय दमन, १७. लक्ष्मी का स्वभाव, १८, दान
का उपदेश, १६. तपस्या, २०. वैराग्य की भावना।
त्याग,
जिन पूजन प्रकरण
शार्दूलविक्रीडितवृत.
पापं लुम्पति दुर्गति दलयति व्यापादयत्यापदं,
पुण्यं संचिनुते श्रियं वितनुते पुष्णाति नोरोगताम्
सौभाग्य विदधाति पल्लवयति प्रीति प्रसूते यशः,
स्वर्ग गच्छति निर्वृति च रचयत्यहितां निर्मिता ।।।
अथ-श्री अहंन् भगवानो की की हुई पूजा पाप को काट देतो
है खराव गति को मिटा देती है, आपक्ति को नष्ट कर देती है,
पूण्यो को इक्ट्ठा करती है, लक्ष्मी को फैलाती है, आरोग्यता को
पुष्ट कर देती है, सुख को देती है, प्रीति को बढाती है, कीर्ति को
उपजाती है, स्वर्ग को देती है। मोक्ष मार्ग को वनाती है ।
शादूलविक्रीडितवत
.
स्वगस्तस्य गृहागण सहचरी साम्राज्यलक्ष्मी शुभा,
सौभाग्यादि गुणावलिविलसति स्वैर वपुर्वेश्मनि ।
ससार सुतर शिव करतलक्रोडे लुठत्यञ्जमा,
य श्रद्वाभरमाजन जिनपते पूजा विधत्तेजन ॥१०॥
अथ-जो मनुष्य श्रद्धायुक्त चित्त से जसे हो वसे ही भगवान
जिनद्र की पूजा को करता है उस मनुप्य के घर का आगन
स्वग समान हो जाता है। तथा कल्याणकारक साम्राज्य रूप
लक्ष्मी (उसकी) साथ रहने वाली स्नी के समान हो जाती है।
उसके देह रूपो घर में सोभाग्य सपत्ति आदि गुणो की पक्ति
स्वतत्र जैसे ही वसे विहार करती है तथा उसके लिए ससार
रूपी समुद्र सुख से तरने योग्य हो जाता है । और साधन स्प मोक्ष
उसके हथेली मे ही झट से लौटने लग जाता है ॥ १॥
शिखरिणीवृत
कदाचिन्नातक कुपित इव पश्यत्यभिमुस,
विदूरे दारिद्य चकितमिव नश्यत्यनुदिनम् ।
विरक्ता कान्तेव त्यजति कुगति सङ्गमुदयो,
न मुञ्चत्यभ्यरणं सुहदिव जिनार्चा रचयत ॥ ११ ॥
अर्थ-जिनेन्द्र भगवान की पूजा करने वालो के वीमारी गुस्से मे हो जाती है। जैसे कभी भी सामने नहीं देखती है । तथा गरीबी भयभीत हो गई हो जैसे हमेशा हूर ही से नष्ट हो जाती है एवं खराव गति विरक्त हुई स्त्रो के जैसे सग को छोड़ देती है। और उन्नति मित्र के जैसे समीपताको नहीं छोड़ती है। शार्दूलविक्रीडितवृत यः पुष्पैजिनमर्चति स्मितसुरस्त्रीलोचनैः सोऽर्च्यते, यस्तं वन्दत एकगस्त्रिजगता सोऽहनिशं वन्द्यते । यस्तं स्तीति परत्र वृत्रदमनस्तोमेन स स्तूयतेः यस्तं ध्यायति क्ल्टप्तकर्मनिधनः स ध्यायते योगिभि:।१२। अर्थ-जो पुरुप पुप्पहार से श्री जिनेन्द्र भगवान को पूजता है वह हास्यमुखवाली देवागनायो के नयनो से पूजा जाता है। तथा जो जिनेन्द्र भगवान को एकवार वन्दना करता है, रात दिन त्रिलोकी के मनुप्यो द्वारा वन्दित होता है । एव जो उन जिन भगवान को स्तुति करता है। वह परलोक में इन्द्रादिकों के समूह से स्तुति किया जाता है। और जो उन भगवान को ध्याता है वह कर्मों का नाश करके योगी महात्माओं द्वाम भी ध्याया जाता है। .. - गुरु महत्व प्रकरण वंशस्थवृत्त अवद्यमुक्त पथि यः प्रवर्तते, प्रवर्तयत्यन्यजनं च निस्पृहः। स एव सेव्यः स्वहितैपिणा गुरु: स्वयं तरंस्तारयितु क्षमपरम
अथ-प्रपना कल्याण चाहने वाले पुरुष से वही प्राचाय
सेवने योग्य है जो निर्दोप माग पर चलता है तथा निष्काम
होकर दूसरे मनुष्य को भी उस सत्य माग पर चलाता है एव
सुद भवसागर से तरता हुआ दूसरो को भी भवसागर से तराने
मे समथ है।
मालिनीवत
विदलयति कुवोध भोधयत्यागमार्थ,
सुगतिकुगतिमार्गों पुण्यपापे व्यनक्ति ।
अवगमयति कृत्याकृत्यभेद गुरुयो,
भवजलनिधिपोतस्त विना नास्ति कश्चित ॥ १४ ॥
अथ-जो प्राचाय अज्ञान को नाश करता है, शास्त्रो के
तत्त्व को समझाता है। सद्गति एव असद्गति के माग स्वरूप
पुण्य और पाप को पृथक-पृथक करता है। तथा कृतयाकतव्य
के भेद का हृदयग मकगता है। उस गुरु के बिना दूसरा कोई
भी पसार सागर से पार लगाने वाला जहाज नही है ।
साराश-इस संसार में सत्य के भेद को बताने वाला तथा
अपार भवपारावार से पार लगाने वाला जहाज के समान
केवल गुरुदेव ही है । ॥ ४॥
शिखरिणीवृत पिता माता भ्राता प्रिय सहचरी सूनुनिवहः, सुहृत्स्वामी माद्यत्करिभट रथाश्वः परिकरः । निमज्जन्तं जन्तु नरककुहरे रक्षितुमलं, गुरोधमाधर्मप्रकटनपरात्कोऽपि न परः ॥ १५ ॥ अर्थ-धर्म और अधर्म को बताने वाले गुरु से बढ़कर कोई भी मनुष्य नरक कुण्ड मे डूबते हुए प्राणी को बचाने को समर्थ नही है। ज्यादा क्या खास प्राण प्रिया स्त्री पुत्रो का समूह मित्र (तया) मदोन्मक्त हाथी, घोडे और योद्धा वाला स्वामी एव अन्य कुटबी जन भी। ऐसे प्राणी को नरक से बचाने मे असमर्थ है। शार्दूलविक्रीडितकृत कि ध्यानेन भवत्वशेषविषयत्यागैस्तपोभिः कृतं. पूर्ण भावनयालमिन्द्रियदमैः पर्याप्तमाप्तागमः । किंत्वेकं भवनाशनं कुरु गुरुप्रीत्या गुरोः शासनं, सर्वे येन विना विनाथवलवत्स्वार्थाय नाल गुणा ।१६। अर्थ-प्रभु ध्यान से क्या प्रयोजन है। संपूर्ण विषयवासना के त्याग से कुछ मतलब नही तपस्याओ करने से ही सद्भावना से भी कुछ होने का नही। इद्रियनिग्रह से भी सिद्ध होने का नहीं। विश्वस्त शास्त्रों से भी आवश्यकता नही। कितु ससार -६४- रूप सागर को पार लगाने वाला। एक गुरु के प्रादेश को बड़े प्रेम से पालन करो। क्योकि जिसके बिना सभी गुण बिना मालिक की सेना के जैसे अपना काय सिद्ध करने के लिए भी समय नहीं हैं। जिनमतप्रकाणम् शिखरिणीवृत न देव नादेव न शुभगुरुमेव न कुगुरु, नधर्म नाधम न गुणपरिणद्व न विगुणम् । न कृत्य नाकृत्य न हितमहित नापि निपुण, । विलोकन्ते लोका जिनवचनचक्षुविरहिता ॥ १७॥ अथ-भगवान जिनेद्र के उपदेश रूपी पाखो के बिना मनुष्य नहीं तो अच्छे देव का और नहीं बुरे देव को। नहीं तो अच्छे गुरु को, नहीं खराव गुरु यो। नहीं तो धम को और 7 अधम को । नहीं गुणवान को और न गुण रहित को। नहीं तो कतव्य को और न अकतव्य को। नहीं तो भले को और नही बुरे को । अच्छी तरह से देख सकते हैं ॥ १७ ॥ शादूलविक्रीडितवृत मानुष्य विफल वदन्ति हृदय व्यर्थं वृथा श्रोत्रयो- निर्माण गुणदोपभेदकलना तेपामस भाविनीम् ।
दुर्वारं नरकान्धकूपपतनं मुक्ति बुवा दुर्लभां, सार्वनः समयो दयारममयो येपां न कर्णातिथि ॥१८॥ अर्थ-दयारस से प्रोत-प्रोत भगवान सर्वन जिनदेव का, उपदेश जिन मनुष्यो के कर्णकुहरो में प्रविष्ट नहीं हो सका है। पडित लोग उन मनुप्यों के मनुष्य जन्म को फिजूल बताते है । तथा उनका हृदय भी वेमतलब का बताते हैं। उनके कानों की बनावट भी निक्कमी है। उनकी गुण दोपों की निरुपण की व्यवस्था असमवित ही है। उनका नरक के अन्वे कुए में गिरना दूर नहीं हो सकता है। तथा ज्यादा क्या हैं ? उन्हे मुक्ति मिलना कठिन है। शार्दूलविक्रीडितवृत पीयूपं विपयज्जलं ज्वलनवक्त जस्तमस्तोमव- मित्रं शात्रववत्स्त्रजं भुजगवच्चिन्तामणि लोष्ठवत् । ज्योत्स्ना ग्रीप्मजघर्मवत स मनुते कारुण्यपण्यापणं, जैनेन्द्र मतमन्यदर्शनसमं यो दुभतिर्मन्यते ।। १६ ।। अर्थ-जो मूर्ख दया की दुकान के जैसे भगवान जिनदेव के धर्म को दूसरे धर्म के समान ही मानता है, वह मूर्ख अमृत को जहर के सदृश, पानी को अग्नि के समान प्रकाश को अधेरे के तुल्य, हितैषी को दुश्मन के बरावर, पुष्पहार को साफ के जैसे, अमूल्य चिन्तामरिण नाम के रत्न को ढले के समान तथा चन्द्रमा की निर्मल क्रान्ति को गर्मी की मौसम धूप के समान मानता है।
शादू लविक्रीडितकृत धर्म जागरयत्यघ विघटयत्युत्थापयत्युत्पथ, भि ते मत्सरमुच्छिनत्ति कुनय मथ्नाति मिथ्यामतिम्। वैराग्य वितनोति पुष्यति कृपा मुष्णाति तृष्णां च य- त्तज्जैन मतमर्चति प्रथयति ध्यायत्यधीते कृती।२०। अथ-विद्वान पुरुष जिस जैन धम को पूजते हैं, प्रशसित करता है, ध्याता है और पढाता है । वह जन धम मनुष्य के मानवी कतव्य को जागृत करता है, पाप को नष्ट करता है, कुर्माग को मिटाता है, ईर्ष्या डाहको दूर करता है । अ याय को उसाड फेंकता है । मिथ्यात्व बुद्धि को मथकर नष्ट कर देता है, वराग्य की भावना को फलाता है, करुणा को पुष्ट करता है, तथा मानसिक मृगतृष्णा को चुरा देता है ।।२०।। . %3D (४) सघप्रकरणम् शादूलविक्रीडितवत रत्नानामिव रोहणक्षितिधर ख तारकारणामिव, स्वर्ग कल्पमहोरुहामिव सर पङ्के रुहारगामिव, पाथोधि पयसामिवेन्दुमहसा स्थान गुणानामसा- वित्यालोच्य विरच्यता भगवत सघस्य पूजाविधि ।२१। प्रय-अमूल्य रत्ना को पैदा करने वाला रोहणाऽचल नाम पहाड के समान तारामा के लिये आपाश के समान कल्पवृक्षो के ~६७-- लिये स्वर्ग के समान कमलों के लिये तालाब के समान चन्द्रमा के समान उज्जवल, जलो के लिये समुद्र के जैसा सम्पूर्ण गुणों का जन्म स्थान है। ऐसा सोचकर के भगवत्स्वरूप श्री संघ की पूजन करिये ॥२॥ शार्दूलविक्रीडितवृत यः संसारनिरासलालसमतिर्मुक्त्यर्थमुत्तिष्ठते, यं तीर्थ कथयन्ति पावनतया येनास्ति नान्यः समः । यस्मै तीर्थपतिनमस्यति सतां यस्माच्छुभं जायते, स्फूतिर्यस्य परावसन्ति च गुणा यस्मिन् स संघोऽय॑तामा२२॥ अर्थ-जो (श्री सघ) संसार को छोड़ने के लिये लालसा बुद्धिवाला होता हुआ मोक्ष के लिए प्रयत्न करता है और भाविक लोग जिस सघ को अत्यन्त पवित्र होने से तीर्य स्वरूप कहते हैं। तथा जिसके बरावर इस संसार में दूसरा कोई नहीं है । जिसको तीर्थकर देव भी नमस्कार करते हैं। जिससे सत्पुरुषों का कल्याण होता है। और जिसकी अति उत्तम महिमा है जिस श्री सत्र में अनेकागुण निवास करते हैं उस सघ की तुम पूजा करो ॥२२॥ शार्दूलविक्रीडितवृत लक्ष्मीन्तं स्वयमभ्युपैति रभसा. कीर्तिस्तमालिङ्गति, प्रतिस्तं भजते मतिः प्रयतते तं लब्बुमुत्कण्ठया । ~६८- स्व श्रोस्त परिरब्युमिच्छति मुहुमुक्तिस्तमालोकते, य सघ गुणराशिकेलिसदन श्रेयोरुचि सेवते ॥ २३ ॥ प्रथ-अपने कल्याण को चाहने वाला जो मनुष्य नाना गुणो के कोडा स्थान श्री सव को सेवता है उस मनुष्य को धन दौलत खुद ही प्राप्त होती है । इज्जत उसको जोर से प्रालि गन करती है, दिव्य प्रम स्वय ही उसके पास दोडा प्राता है। बुद्धि उस पुरुप को पाने को इच्छा पूर्वक प्रयत्न करती है। स्वग लोक की राज्यलक्ष्मी उसको मेटने को चाहती है और मोक्ष उसको वारवार देखता है ।। २३ ।। शादू लविकाडितवत यद्भक्त फलमहदादिपदवी मुरय कृपे सस्यव- चक्रित्वत्रिदशेद्रतादि तृणवत्सासङ्गिक गीयते । शक्ति यन्महिमस्तुतौ न दधते वाचोऽपि वाचस्पते , सघ सोऽनहर पुनातु चरणन्यासैः सता मदिरमा२४। अथ-खेती के लिए घाय की तरह जिस श्री सघ की भक्ति वा प्रधान लाभ तीथ कर प्रादि दुलभ पद को पाना है और साव भौम चक्रवर्तीपना तथा इद्रपद आदि तो घास की तरह गौण गिना जाता है। जिसकी महिमा की स्तुति करने में स्वय देव गुरु बृहस्पति को वाणी भी ताकत को नहीं रखती है । पापो को हरने वाला वह श्री सघ अपने पैरा रखकर सत्पुरुपो के घरो को पवित्र करें ।। २४ ॥
(५) अहिंसा प्रकरणम् शार्दूलविक्रीडितवृत क्रीडाभूः सुकृतस्य दुष्कृतरजः संहारवात्याभवो- दन्वन्नीव्य॑सताग्निमेघपटली सकेतदूती श्रियाम् । निःश्रेणिस्त्रिदिवौकसः प्रियसखो मुक्त: कुगत्यर्गला सत्त्वेषु क्रियतां कृपैव भवतु क्लेशैरशेषैः परैः ॥२५॥ प्रर्थ-पुण्य की क्रीड़ास्थलो पापरुप रज को उड़ाने वाली आँधी, ससार सागर से पार लगाने वाली नाव दुःखरुप- दावाऽनल को वुझानेवाली घनघोर घटा, सौभाग्य को मिलाने वाली स्वर्ग की निसरणो ! मुक्ति की प्यारी साथिन, दुर्गति की आगल सरीखी दया हो प्राणियो पर करो। दूसरे कष्टो से कुछ भी न हाना है । ।। २५ ।। शादू लविक्रीडितवृत यदि ग्रावा तोये तरति जररिणर्यद्य दयति, प्रतीच्यां सप्ताचियदि भजति शैत्य कथमपि । यदि मापीठं स्यादुपरि सकलस्यापि जगत , प्रसुते सत्त्वानां तदपि न वध. क्वापि सुकृतम् ॥ २६ ॥ अर्थ-पत्थर की चट्टान भी शायद पानी पर तरजायें, सूर्य शायद पश्चिम मे उदय हो जायं, किसी प्रकार शायद अग्निदेव -- , प्रस्त भी ठडे हो जाये, शायद पथ्वी मडल भो समचे ससार के ऊपर हो जायें। परतु तो भी प्राणियो को हिंसा कही पर मो पुण्य को पैदा नहीं करती हैं 1 ॥२२॥ मालिनोवृत स कमलवनमग्नेसिर भास्वदस्ता- दमृत्तभुरगवक्त्रात् साधुवाद विवादात् । रुगपगममजीर्णाज्जवीवित कालकूटा- दभिलपति वघाद्य प्राणिना धर्ममिच्छेत् ॥ २७ ॥ अथ-जो जीवा को मारने से पम को चाहता है, वह (मानो) अग्नि के अदर से कमला के वन की उत्पति को, होते हुए सूर्य से दिन की उत्पति को, सप के मुह से अमृत को, लडाई स शाबाशी को, प्रजोग से रोग की शाति को और कालकूट नाम के भयकर विप से जीवन को चाहता है ।।२७) शादू नविकोडितवत आयुर्दीर्घतर वपुर्वरतर गोत्र गरीयस्तर, वित्त भूरितर बल बहुतर स्वामित्वमुच्चस्तरम् । आरोग्य विगतातर विजगति श्लाध्यत्वमपेतर, ससाराम्बुनिधि करोति सुतर चेत कृपान्तरम् ॥२८॥ अथ-कृपा से भीजा हुआ अत करण (मनुष्य की) आयुष्य को लपी करता है। शरीर को सुदर करता है, वश को महीमा , वाला करता है, धन को बढ़ा देता है, ताकत को अधिक करता है, मालिकपने को बहुत ऊंचा करता है । तंदुरुस्ती को निरन्तर रहने वाली करता है। तीनो लोको मे अतिशय प्रशमा को करता है । और पसार रुपी समुद्र को सुब से तरने योग्य करता है। ।।२८॥ सत्यप्रकरणम् शार्दूलकिवीडितवृत. विश्वासायतनं विपत्तिदलनं देवैः कृताराधनं, मुत्त:पथ्यदनं जलाग्निशमनं व्याघ्रोरगस्तम्भनम्, श्रेयः संवननं समृद्धिजननं सौजन्यसंजीवनम्, कीर्तः केलिवनं प्रभावभवनं सत्यं वच: पावनम् ॥२६॥ अर्थ-विश्वास का स्थान विपत्ति को दूर करने वाला देवताओं से भी पाराधना किया हुआ मुक्ति के मार्ग मे खुराक (भातारुप) जल और अग्नि का शमन करने वाला, व्याघ्र और सर्प को रोकने वाला कल्याण को वशीभूत करने वाला, सज्जनता को जिलानेवाला, कीत्ति को क्रिडोद्यान और महिमा का आगार पवित्र एक सत्य वचन ही है ।। २६ ।। शिखरिणीवृत यशो सस्माद्भस्मोभवति वनवह्नरिव वनं, निदानं दुःखानां यदवनिरुहारणां जलमिव । -
नयन स्याच्छायाऽनप इव तप सयमाथा,
फचित्तन्मिथ्यावचनमभिधतेन मत्तिमान् ॥ ३०॥
प्रय-दावानल ने जसे जगल राव मय हो जाता है वो
ही अमत्य भाषण से भौति नष्ट हो जाती है और जो असत्य
भापण वृक्षा के लिए जल के जसे दुखो का प्रधान कारण है
और जहाँ धूप में छाया के जैसे तपस्या और इद्रियनिग्रह की
बानता नहीं है। ऐसे उम प्रमत्य भापए का बुद्धिमान आदमी
हिमो से भी नहीं रहता है ।। ३० ॥
यशस्थवृत्त
असत्यमप्रत्ययमूलकारण, युवासनाझ समृद्धिवारणम् ।
विपनिदानपरयश्चनोजित,कृतापराध कृतिभिर्विजितम्।३१।
प्रय-अविश्वास मा प्रधान कारण चुरी वामनामा का
म्यान, पनि पौर सुगममृद्धि यो रोक्न वाला । मापत्ति का
मुख्य कारण दूसरे का गो में ममप तथा प्रपराध युक्त, रोमा
अगरम मिया माण परिता त्याज्य है।॥ ३१ ॥
शाद विकोटितवत
स्थाग्निर्जनमा स्थनमरिमित्र मुरा किटूरा,
गान्तार गर गिरि महिर्माल्य मृगारिमूंग ।
पार यिनमस्त्रमुपलदन व्यान गानो विप,
पार निगम 7 या मत्यानित यक्ति य ॥३०॥
अर्थ-जो पुरुष सत्य युक्त वचन कहता है उसके लिए पाग पानी की तरह शीतल हो जाती है अथाह समुद्र जमीन के समान हो जाता है, दुग्मन भी दोस्त के सदृश्य हो जाता है, सब देवता भी नीकरो के तुल्य हो जाते हैं बीहड़ जगल भी शहर के समान हो जाता है, पहाड के घर नुल्य हो जाता है, सांप पुष्प माला के समान हो जाता है, सिंह रिण के अनुरूप हो जाता है, भयकर पाताल साधारण छिद्र के तुल्य हो जाता है, तीक्ष्ण घार अस्त्र (तलवार आदि) भी कमल हो जाता है, दल के समान सुख हो जाता है, पागल हाथी सियार के सदृश्य उल्टा उससे डरने वाला हो जाता है। जहर अमृत के तुल्य हो जाता है उसी प्रकार उल्टा भी मुल्टा हो जाता है ।। ३० ! अस्तेय प्रकरणम् मालिनीकृत तमभिलपति सिद्धिस्तं वृणीते समृद्धि- स्तमभिसरति कीतिर्मुश्चते तं भवार्तिः । स्पृह्यति सुगतिस्तं नेक्षते दुर्गतिस्तं, परिहरति विपत्तं यो न गृहणात्यदत्तम् ॥ ३३ ॥ अर्थ-जो मनुष्य नहीं दिया हुआ ग्रहण नहीं करता है । आपति उस पुरुप को छोड़ देती है। बुरी गति उसकी तरप •७४---
नही देखती है । सद्गति उसको चाहती है। ससार की सारी
पोडाएँ उसको छाड देती है। पश उसकी ओर माना है सुख
सपति उसको अगीकार करती है और अणिमादिक पाठ
सिद्धिए उसको अभिलाषा करती हैं ।। ३३ ॥
शिखरियोवृत
अदत्त नादत्ते कृतसुकृतकाम किमपि य
शुभश्रेरिणस्तस्मिन् वसति कलहसीव कमले।
विपत्तस्माद्दूर व्रजति रजनोवाम्बरमरणे-
विनीत विद्यव त्रिदिवशिवलक्ष्मी जति तम् ॥ ३४ ॥
अथ-जिसने पुण्य प्राप्त करने का मनोरथ किया है कुछ भी
नही दिया हुप्रा नही ग्रहण करता है उस पुरुप के प्रदर
गल्यारणा को पक्ति कमल वन मे क्लहस पक्षो को स्त्री के जैसे
निवास परती है। तथा उस पुरप से मकट दूर रहता है।
सूय से रात दूर जाती है तथा प्रलोक्य की शुभ राज्य लक्ष्मी
भो नान नमता को प्राप्त हो जाती है उसे उस पुरुष को भजती
मेपती है ॥३४॥
शादू लविकोडितवृत
यग्निवतितकीतिधर्मनिधन सर्वागसा साधन,
प्रान्मोलद्वधन्धन विरचितक्लिप्टाशयोद्वोधनम् ।
योगत्येक निवन्धन पृतसुगत्याश्लेपम रोपन,
प्रो मर्पत्प्रपन जिवृक्षति न तदीमानदत्त धनम् ॥ ३५ ॥
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. (८) शीलप्रकरणम् शादू लविक्रीडितवृत्त कामात्त स्त्यजति प्रबोधयति वा स्वस्ती परस्त्री न यो दत्तस्तेन जगत्यकीर्तिपटहो गोत्रे मपोकूर्चक- श्वारिनस्य जलालिगुणगणारामस्य दावानल , सकेत सकलापदा शिवपुरद्वारे कपाटो दृढ ।। ३७ ॥ प्रथ-जो कामासक्त पुरुप अपनी पत्नी का नहीं समझाता है और परायी पत्नी को नहीं छोडता है, उस पुरुप ने समार मे अपयश का नगाटा वजाया है और अपने कुल मे कालिख का पोता लगाया है, एक सच्चरित्र के ऊपर पानी को अजलि रेल दी है, तथा गुणो के समूह रूप उपवन के लिए दामाग्नि के सदश्य ही सपूण अापत्ति के लिए इशारे का स्थान है। शिर मोम माग के द्वार पर मजबूत क्विाड के समान हैं अर्थात् मोक्ष जाने का द्वारा उसके लिए ब द है। ३७ ॥ शादू लविक्रीडितवत व्याघ्रव्यालजलानलादिविपदस्तेपा प्रजाति क्षय, पल्याणनि समुल्लसन्ति विवुधा सान्निध्यमध्यासते । योति स्फूर्तिमिति यात्युपचय धर्म प्रणश्यत्यय, बनिवरिणमुग्वानि सनिदधते ये शोलमाविभ्रते ॥ ३८ ॥ ,
अर्थ - जो मनुष्य सच्चरित्र को धारण करते हैं। उन पुरुपी
की व्याख्र, साँप, जल, अग्नि प्रादि की विपत्तिएं नष्ट हो जाती
है । कल्याण के कर्म विकसित हो जाते है। देवता लोग उनके
पास पाने को करते है। बड़ाई फैलाव को प्राप्त होती है।
उनका धर्म भी वृद्धि को प्राप्त होता है। पाप नष्ट हो जाते है,
तथा स्वर्ग और मोक्ष इनके मुख भी गीलवारी पुरुष को प्राप्त
होते हैं ।। ३८ ॥
मालिनीवृत
हरति कुलकसङ्घ लुम्पते पापपङ्क,
सुकृतमुपचिनोति श्लाध्यतामातनोति ।
नमयति सुरवर्ग हन्ति दुर्गोपसर्ग
रचयति शुचि गोलं स्वर्गमोक्षी सलीलम् ।। ३६ ।।
अर्थ-सत् चरित्र, खानदान के कलक को हरण करता है।
पापपो कीचड़ को धो डालता है, पुण्यो को बढ़ाता है, प्रशंसा
को फैलाता है, देवताओ को भी झुकादेता है, भयकर उपद्रवो
को मिटा देता है, स्वर्ग और मोक्ष को भी लीला से ही जमे
हो तैसे बना देता है 11 ३६ ।।
शार्दूलविक्रीडितवृत्त
तोयत्यग्तिरपि स्त्रजत्यहिरपि व्याघ्रोऽपि सारङ्गति,
व्यालोऽप्यश्वति पर्वतोऽप्युपलति ध्वेडोऽपि पोयूपति ।
विघ्नोऽभ्युत्मवति प्रियत्यरिरपि क्रीडातडागत्यपा-
नाथोऽपि स्वगृहत्यव्यपि नृणा शीलप्रभावाद् ध्रुवम् ॥४०॥
अथ-मनुष्या के सत्स्वभाव के प्रताप से निश्चय करके प्राग
भी पानी के समान शोतल बन जाता है । साप भी माला के
समान गोभायमान बन जाता है। खूखार वाध भी हरिण के
समान सीया बन जाता है । दुष्ट हाथो भी घोटे से तुल्य सुखारोह
हो सकता है । ऊँचा हाड भी छोटे पत्थर के सदृश हो जाता
है । जहर भी अमृत बन जाता है। उपद्रव भी उत्सव के सरीखा
हो जाता है। शत्रु भी मित्र के समान हो जाता है । समुद्र भी
क्रीडा सरोवर बन जाता है, और जगल भी अपना घर हो
जाता है ।। ४० ॥
(९) परिग्रहत्यागप्रकरणम्
शादू लविक्रोडितवृत
कालुष्य जनयन् जडस्य रचयन् धर्मद् मोन्मूलन,
क्लिप्यन्नितिकृपाक्षमाकमलिनीर्लोभाम्बुधि वर्धयन् ।
मर्यादातटमुद्र जन् शुभमनोहसप्रावास दिश-
किन क्लेशकर परिग्रहणदीपूर प्रवृद्धि गत ॥ ४१ ॥
rama अर्थ-वृद्धि को प्राप्त हुआ परिग्रह याने हर एक वस्तु का विशेष यंग्रह वह मानो एक तरह को नदी उसका प्रवाह मूख पुरुष के चित्त में पाप प्रकृति को उपजाता हुअा, तथा धर्मरुपी वक्ष का नाश करता हुग्रा एवं नीति, कृपा और क्षमा रूपा कमलों को वनावली को मुरझाना हुघा लोन रुपी समुद्र को बढ़ाता हुआ और भी मर्यादा रुपी तीर को तोड़ता हुआ एव सात्त्विक विचार रुपी हम को परदेश भेजता हुग्रा क्या दुख पैदा करने वाला नहीं है ? अपितु ऐसा परिग्रह जरुर दुःखदायी ही है ।। ४१ ॥ मालिनीत कलहकलभवीन्ध्यः क्रोवगृध्रश्मसानं, व्यसनजगभुरंध्र पदस्युप्रदोषः । सुकृतवनदवाग्निर्दिवाम्भोदवायु- नयनलिनतुपारोऽत्यर्थमर्थानुरागः ॥ ४२ ॥ अर्थ -~-अत्यन्त ज्यादा परिग्रह का प्रेम कलह लड़ाई स्पी हाथी के बच्चे के लिए विन्ध्याचल पहाड़ के समान है क्रोध रुपो गीध के लिये मसारण के तुल्य है। दुःख रुपी सांप के लिये दिल के सदृश हैं । द्वेपरुपी चोर को सुख देने के लिये रात के गुरुग्रात के समान है। पुण्य रुपी वन को जलाने के लिये दावानल अग्नि है । सज्जनता रुपी वादल के लिए वायु है और न्याय पी कमल के लिए बर्फ के सहा है ॥ ४२ ।।
. शादूलविक्रीडितकृत प्रत्यर्थी प्रशमस्य मित्रमधृतेर्मोहस्य विश्रामभू , पापाना खनिरापदा पदममध्यानस्य लीलावनम् । व्याक्षेपस्य निधिर्मदस्य सचिव शोकस्य हेतु कले. केलिवेश्म परिग्रह परिहतेोग्यो विविक्तात्मनाम् ॥४३॥ प्रथ-जो शान्ति का शत्रु है, अधोरता का मित्र है, प्रज्ञान का विश्राम स्थान है, पामो की खान है, आपत्तियो का स्थान है, बुरे विचारो का खेलने का बगीचा है, घबराहट का खजाना है, पागलपन (अभिमान) का मत्री है, दुःख का कारण है और लडाई का क्रीडा निकेतन है । ऐसा वह अधम परिग्रह मसार त्यागियो के वास्ते सवथा छोडने के लायक है ॥४३॥ शादूलविक्रीडितक्त वह्निम्तृप्यति नेधनरिह यथा नाम्भोभिरिम्भोनिधि- स्तद्वल्लाभघनो धनरपि धनजन्तुर्न सतुष्यति । नत्वेव मनुते विमुच्य विभव नि शेपमन्य भव, यात्यात्मा तदह मुधैव विदधाम्येनासि भूयासि किम् ।।४४॥ प्रथ-जैसे इस ससार मे अग्नि काष्ठ आदिक से तृप्त नहो होती है और समुद्र जसे पानी से तृप्त नहीं होता है। वसे ही प्रत्य त लोभी प्राणी वहुत ज्यादा भी धन से सतुष्ट नहीं होता है फिर भी इस तरह नहीं विचारता है कि यह जीव सपूर्ण धन को यही छोड़कर दूसरे भव को प्राप्त होता है तो मैं व्यर्थ ही इतने ज्यादा पापो को क्यो करूं ? ॥४४॥ (१०) क्रोधत्याग प्रकरणम् शार्दूलविक्रीडितवृत यो मित्रं मधुनी विकारकरणे संत्राससंपादने, सर्पस्य प्रतिबिम्बमङ्गदहने सप्ताचिषः सोदरः । चतन्यस्य निषूदने विषतरोः सब्रह्मचारी चिरं, स क्रोधः कुशलाभिलाषकुशलः प्रोन्मूलमुन्मूल्यताम् ।।४।। जो क्रोधः विगाड़ करने मे तो शराब का दोस्त है, भय पैदा करने में सांप का प्रतिविम्ब है, शरीर को जलाने में अग्नि का सगा भाई है, चेतनता को दूर करने मे विष वृक्ष का सहपाठी है। ऐसा वह क्रोध अपना कुशल चाहने वाले पुरुषों से जड़ से जसे हो तैसे उखाड़ कर फेकना चाहिए ॥४५॥ हरिणीवृत फलति कलितश्रेयः श्रेणीप्रसूनपरम्परः, प्रशमपयसा सिक्तो मुक्ति तपश्चरणद्र मः । यदि पुनरसी प्रत्यासत्ति प्रकोपहविर्भुजो- भजति लभते भस्मीभावं तदा विफलोदयः ।। ४६ ॥
प्रथ-यह तपश्चर्यारुपी वृक्ष को यदि शान्तिरुपी पानी से सीचा जाय तो सुदर कल्याण को श्रेणो रुपो पुष्प परम्परा से युक्त हो सके । मुक्ति रुपी फल को उत्पन्न करता है परतु यह भा यदि क्रोध रुपी अग्नि की समीपता को सेवता है। तो फल रहित होकर उल्टा भस्मीभूत हो जाता है याने जलवल के राख हो जाता है । साराश यह है कि तपस्या शाति से सफल होती है और क्रोध से बिल्कुल नष्ट हो जाती है । अत मुक्ति चाहने वाले के लिए यह योग्य है कि वे क्रोध का परित्याग कर शान्ति को धारण करें॥४६॥ शादू लविक्रीडितवृत सताप तनुते भिनत्ति विनय सौहार्दमुत्सादय- त्युद्वेग जनयत्यवद्यवचन सूते विधत्ते कलिम् । कोति कृन्तति दुर्मतिं वितरित व्याहन्ति पुण्योदय, दत्त य कुगति स हातुमुचितो रोप सदोप सताम् ॥४७॥ प्रथ-जो क्रोध स ताप को फलाता है नम्रता को दूर करता है मित्र भाव को मिटाता है, दुख को पैदा करता है, झूठे भाषण को उत्पन करता है, कलह करता है, कीर्ति को काटता है दुष्ट वुद्धि को बढाता है, पुण्य के उदय को रोकता है और दुगति को प्रदान करता है, वह क्रोध दोपयुक्त है । प्रत सत्पुरुपो के लिए छोडने योग्य है ॥४॥ -२३-
शार्दूलविक्रीडितवृत
यो धर्म दहति द्रमं दव इवोन्मध्नाति नीति लता,
दन्तीवेन्दुकला विधुन्तुद इव क्लिश्नाति कीर्ति नृणाम् ।
स्वार्थ वायुरिवाम्बुद विघटयत्युल्लासयत्यापदं,
तुप्रणां धर्म इबोचितः कृतकृपालोपः स कोपः । थम् ॥४८||
अर्थ-जिस प्रकार वन की अग्नि वृक्ष को जलाती है उसी
प्रकार क्रोध धर्म को जलाता है। हाथी वैल की तरह जो नीति
(न्याय) को मथता है, राहु चन्द्रमा को कला को मनुप्यो को
कोर्ति को घटाता है, हवा बादल की तरह स्वार्थ को छिन्न भिन्न
करती है, तथा गर्मी प्यास की तरह जो आपत्ति को बढाती है,
और जिसने कृपा का लोप किया है उसमें वह क्रोध कैसे योग्य
है। किसी तरह भी क्रोध धारण करना योग्य नही है ॥४८॥
(११) मानत्याग प्रकरणम्
मन्दाक्रान्तावृत्त
यस्मादविर्भवति विततिर्दुस्तरापन्नदीनां,
यस्मिन् शिष्टाभिरुचितगुणग्नामनामापि नास्ति ।
यश्च व्याप्त वहति वधधोधूम्यया क्रोधदावं,
त मानाद्रि परिहर दुरारोहमौचित्यवृत्तः ॥ ४६ ॥
अथ-जिससे दुस्तर दुम्ब से तरने योग्य प्रापत्ति स्पो नदिया का झुण्ड प्रकट होता है, जिसमे शिष्ट भले मनुष्या के मन पस द गुणा के समूह का नाम भी नहीं है और जो हिंसा बुद्धिरुपी धुपाचार से युक्त काध रूपो दावाऽनल (वन को अग्नि) का धारण करता है । उस योग्य व्यवहार के लिये दुख से भी नही चढने योग्य । मिथ्या अभिमानी पहाड को छोड दे ॥४६॥ शिखरिणीवृत्त शमालान भञ्जन विमलमतिनाडि विघटय- किरन्दुर्वाकूपासूत्करमगरणयन्नागमसृरिणम् । भ्रमन्न या सवैर विनयनयवोथिं विदलय- अन क नानथं जनयति मदाधो द्विप इव ॥ ५० ॥ अय-मिथ्याऽभिमा 1 स अधा हुआ मनुष्य मदा भत्त हाथा के जसे शानि रूपी व धन स्तभ को तोडता हुआ निमल बुद्धि रुपो रस्सी को तोडता हुआ दुष्ट वायो रुपी धूल की ढुगलो का उडाता हुमा, श्रागम सिद्धा त शास्त्र रूपी अकुश को नहीं घारता हुमा, पृथ्वी तल पर स्वत प्रतापूर्वक घूमता हुआ, नम्रता और 'याय रूपी मार्ग को उजाडता हुअा, किस जुल्म को पदा नहीं करता है । अर्थात सभी जुल्मो को पैदा करता है ।।५।। शार्दूलविक्रीडितवृत औचिन्याचरण विलुम्पति पयोवाह नभस्वानिव प्रध्वस विनय नयत्यहिरिव प्राणस्पृशा जीवितम् ।
कीति कैरविणी मतजङ्ग इव प्रोल्लासयत्यञ्जसा मानो नोच इवोपकारनिकरं हन्ति त्रिवर्ग नृणाम् ॥५१॥ अर्थ-मिथ्याऽभिमान मनुष्यो के धर्म, अर्थ और काम को नष्ट कर देता है, (जैसे कि) नीच आदमी (अपने साथ किये गये) उपकारो के समूह को भूला देता है । मान- श्रेष्ठ व्यवहार को मिटा देता है (जैसे कि) वायु बादलो को मिटाती है। फिर मिथ्यामान क्या करता है ? बताते है । विनय-नम्र आचरण को नष्ट कर देता है (जैसे कि) सांप सपूर्ण जीव धारियो के जीवन को डश कर अपने जहर से नाश करता है। फिर क्या करता है ? सो भी कहते है। अर्थ- मनुष्यो के उज्जवल यश को एकदम मला कर देता है (जैसे कि) हाथी कमल के पौधे को (उखाड) कुम्हला देता है ।। ५१॥ वसन्ततिलकावृत मुष्णाति य. कृतसमस्तसमीहितार्थ, संजोवनं विनयजीवितमङ्गभाजाम् । जात्यादिमानविषज विषम विकारं, तं भार्दवामृतरसेन नयस्व शान्तिम् ।। ५२ ।। अर्थ-जो मिथ्याऽभिमान शरीर धारियो ने किया है उन्होने सपूर्ण मनोग्थो को सिद्ध करने वाले और सजीवनी -८६- - टात उम गुण सरने याने नमना पो जीवन या नाश पर दिया है। प्रत रेमिमानी जानि युल और गोत्र के मिथ्या निषोपदा हा पाले पत्पन उप विगाः को याम सतासी ममृत से पान पर ॥५२॥ १२-मापात्याग प्रकरणम् मालिनीपत गुगनायध्यां सत्यसूर्यास्तमन्ध्या, मुगनियुपतिमान मोरमाउजगालाम् । मग हिमानी दुयंगोराजधानी, यसनामहायो दन्तो मुद्रा मायाम् ॥ ५३ ।। प- Bी पपा (बन पोरस) मान, गुर पापाम पर दने में गांपणाम rare. प्रसार पहिलो माय माता में समान, 1. पीमित र पासा गमा fignrrit frरमोचमा मा मन (arryा (II गला गोमाय TH) nurr ram nापना सानेपानीको Prakaratment उपेन्द्रबजायत विधाय मायां विविधरूपायैः, परस्य ये वञ्चनमाचरन्ति । ते वञ्चयन्ति त्रिदिवापवर्ग-सुखान्महामोहसखाः स्वमेव ।५४ अर्थ-जो मनुष्य तरह • के उपायों से माया जाल को करके दूसरे को ठगते हैं बड़े भारी अज्ञान के साथी है तथा वे माया वाले मनुष्य जो स्वयं अपने आप को ही स्वर्ग और मोक्ष के सुख से दूर रखते है अर्थात जो मनुप्य स्वार्थ के लिए माया जाल द्वारा दूसरो को ठगता है वह परवंचना के पाप से स्वर्ग और मोक्ष का अधिकारी नहीं बन सकता है अतः स्वय ही अपने आप से ठगा जाता है ।। ५४।। इन्द्रवज्रावृत मायामविश्वासविलासमन्दिरं, दुराशयो यः कुरुते धनाशया। सोऽनर्थसाथं न पतन्तमोक्षते, यथा विडालो लगुडं पयः पिवन् ॥ ५५ ॥ अर्थ-जो दुष्ट अतः करण वाला मनुष्य धन कमाने की इच्छा से अविश्वास की क्रीड़ा स्थली माया (कपट) को करता है वह मनुप्य अपने ऊपर गिरते हुए आपत्ति के समूह को नहीं देखता है । जैसे दूध को पीता हुआ बिलाड़ा लाठी को नहीं देख सकता। किसी वर्तन मे रखे हुए दूध को नीचा मुह करके जब विल्ली पान मोरि पोरा पार पोई लाठो मारे तो वह साठी जादोग ही पटनो तद्वत् राई घामाने को दच्या #TT परटा । परमार परनु उस गपट प पाप से हाने पार प्रविय सो पाा पाम बरालो पता नहीं * ॥५५॥ पगन्नतिनगरत मुगप्रसारमपरापगमुनिहोते, पाटव पटसम्परागते । जीरंगुषप्वामयन्यमिहायाग नापजानियामपणापतो तत् ।। ५६ ।। wp-tगुर पुलमिट में रिपोर्ट मिति 21 } गा मे" पाप प्रपट हा पर पाम 4 गिार नियम शिविता नागिरयामा मात्रा विप्प ranfrinामा RT II नाम र म मृत "पाय rrrrr .innar पारा YTE Im (१३) लोभ प्रकरणम् शार्दूलविक्रीडितवृत यद्द गमिटवीमटन्ति विकट क्रामन्ति देशान्तरं, गाहन्ते गहनं समुद्रमतनुक्लेशां कृषि कुर्वते । सेवन्ते कृपणं पति गजघटासंघट्टदुःसंचरं, सर्पन्ति प्रधनं धनान्धितधियस्तल्लोभविस्फूजितम् ॥५७॥ अर्थ -धन के लोभ से अंधबुद्धि वाले लोग जिस कारण से अगम्य जगलों में भ्रमण करते हैं। भयंकर देश परदेश में घूमते है। ज्यादा दुखो वाली खेती को करते हैं । दु.सचरम् हाथियों की घटा की भीड से नही जाने योग्य ऐसे कंजूस पति के पास जा के भी उसकी सेवा करते है तथा मृत्यु तक को आलिंगन करते हैं। वह सब लोभ का ही फल है ।। ५७ ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत मूलं मोहविषद्र मस्य सुकृताम्भोराशिकुम्भोद्भवः, क्रोधाग्नेररणिः प्रतापतरणिप्रच्छादने तोयदः ।. क्रीडासद्म कलेविवेकशशिनः स्वर्भानुरापन्नदो- सिन्धुः कीर्तिलताकलापकलभो लोभः पराभूयताम् ॥५८।। अर्थ-हे मनुष्यों ! अज्ञान रुपी विप वृक्ष की जो जड है पुण्यो के समुद्र के लिए अगस्तत्य ऋपि के समान है। क्रोध रुपो अग्नि को पैदा करने के लिए अरणि (एक जात का काष्ठ ) मंथन M - ममत। तेज मी य स योदयौ में जो बादल फे पारितासाम्पस (पर) है। पान पोपद्र यो (पमा लिए) मो ग १ ममान है 1 प्राति स्पो नदिया सो (हर जगह पट्टा परम लिये जा) ममुद्र पे तुल्य है। रापामा रोपटी पानाग पर मैं जोहापो पे बने पेमामासान रापमा पाटो यमातमि बात from दापिजम्ममागे, दुगोपनमा विपदरातियो। गारगोपालमागमदीप्यमाने, नौमामा मते गोप ॥ १६ ॥ HTTE747 का जना। में उपाए । TET RIL ५१९ मा पप गुणे कोपमान 4. EntrARो प्रा1ि 17 नपारे। narefrigriting frun रोने 417 RI RAr fT में मुगार मरर rofiarr RT पुर गुरो प्रति, fair aafi पिम् ।
विश्ववश्यमवश्यमेव सुलभा: स्वर्गापवर्गथियः, ये संतोपमगेपदोपदहनध्वंसाम्बुदं विभ्रते ।। ६० ॥ अर्थ -जो मनुष्य संपूर्ण दोप अग्नि को वुझाने मे बादलो के समान सतोप को धारण करते हैं। उन मनुष्यो के मुम्ब के सामने ही (मानो) कल्प वृक्ष पैदा हुआ है। घर मे काम धेनु ही (मानो) धुस पड़ी है। चिन्तामरिण नाम का रत्न हथेली में पाया हुधा ही उसे उपलब्ध है । देवतायो का धन भडार भी समीप में (पा गया है) सारा ससार उसके प्राधीन है तथा स्वर्ग और मोक्ष की लक्ष्मी निश्चय करके उसे सुप्राप्य है ।। ६० }} (१४) सौजन्य प्रकरणम् शिखरीणीवृत्त वर क्षिप्तः पाणिः कुपितफरिणनो वक्त्रकुहरे, वर झम्पापातो ज्वलदनलकुण्डे विरचितः । वरं प्रासप्रान्तः सपदि जठरान्तविनिहितो, न जन्यं दौर्जन्यं तदपि विपदां सद्म विदुपा ॥ ६१ ॥ अर्थ-क्रोधित हुए सांप के मुख रूपी विल मे हाथ डालना अच्छा है । जलते हुए आग के कुंड में कूद पड़ना अच्छा है । भाले की अरणी एकदम पेट मे घुसेड़नी अच्छी है । फिर भी ६२ ॥ बुद्धिमान पुरुप को अनेक प्रापत्तिया का घर ऐसी दुष्टता नही करनी चाहिए ॥ ६१॥ वसततिलकावृत मौजन्नमेव विदधाति यशश्चय च, स्वये यस च विभव च भवक्षय च । दौर्जन्यमावहसि यत्कुमते तदर्थ, धान्येऽनल क्षिपसि तज्जलसेकमाध्ये अथ-कीति समूह का और प्रात्म कल्याण को धन सपत्ति को और ससार बधन के नाश को तो किसी के साथ भलमसी पा व्यवहार भी कर देता है । फिर । है कुमते । अरे ! दुप्ट बुद्धियाले तूं उपरोक्त वस्तुप्रो के लिए जो दुष्टता को धारण करता है । वह तो मानो पानी पिलावर बढाने योग्य धाय के खेत में पाग को फेता है ।। ६२ ।। पृथ्वीवृत्त वर विभवव ध्यता मुजनभावभाजा नृणा- मसाधुचरिताजिता न पुनजिता सपद. । दात्वमपि शोभते महजमायतो सुन्दर, विपापविरमा न तु श्चयथुसभवा स्थलता ।। ६३ ।। पप-सज्जनता या सेवन करने वाले पुरषा को पन रहित होना अच्छा लगता है । परतु बुरे प्राचरण से इस्ट्टी को हुई.
- ऐसी कमाई हुई बडी बड़ी सम्पत्तियें भी अच्छी नहीं लगती हैं। भविष्यकाल में सुन्दर २ होने वाली ऐसी स्वाभाविक दुर्बलता भी शोभती है किन्तु भविष्य मे बुरा फल देने वाली सूजन से पैदा हुई शरीर को मोटाई नहीं शोभती है ।। ६३ ।। शार्दूलविक्रीडितवृत न ब्रूते परदूपणं परगुणं वक्त्यल्पमप्यन्वहं, संतोपं वहते परदिपु पराबाधासु धत्त शुचम् । स्वश्लाधां न करोति नोज्झति नयं नौचित्यमुल्लवय- त्युक्तोऽप्यप्रियमक्षमा न रचयत्येतच्चरित्र सताम् ॥ ६४ ।। अर्थ-जो दूसरे पुरुषो की एवो को नही कहता है किन्तु थोड़ा भी हो दूसरे पुरुषों के गुणो को ही हमेशा कहता है । पराये की सपति पर सतोप को धारण करता है तथा पराये दुःखों मे सोच करता है । प्रात्म प्रशंसा को नही करता है। न्याय मार्ग को नही छोड़ता है। लायकी का उलधन नही करता है। बुरा वचन कह देने पर भी क्रोध को नहीं करता है । सत्पुरुषो का यही चरित्र है ॥ ६४ ॥ , (१५) गुरिणसङ्ग प्रकरणम् शादूलविक्रीडितवत धर्म ध्वस्तदयो यशश्च्युतनयो वित्त प्रमत्त पुमा- काव्य निष्प्रतिभस्तप शमदमै शून्योऽल्पमेधा श्रुतम् । वस्त्वालोकमलोचनश्चलमना ध्यान च बाञ्छत्यसो, य सङ्ग गुणिनाविमुच्यविमति कल्याणमाकाड क्षतिा६५॥ मथ-जो पुरुप बुद्धि रहित होकर गुणवानो की सौपत को छोड प्रात्म पल्याण को चाहता है। वहीं मानो निदयी धन धम को नितिभ्रष्ट हो इज्जत को प्रालसी वन धन को, निर्वृद्धि हो, साहित्य प्राप्तो को शम दम से रहित हो तपस्या को अल्प ज्ञानवाला बन शास्त्र को प्रधा हो वस्तुप्रो के देखने को चचल चित बन समाधि को चाहता है । ६५॥ हरिणीवृत हरति कुमति भिन्ते मोह करोति विवेकिताम् वितरित रतिं सूते नीति ननोति विनोतताम । प्रथयति यशो धत्ते धर्म व्यापोहति दुर्गति जनयति नृणा किं नाभीष्ट गुणोत्तमसङ्गम ॥ ६६ ॥ अर्थ-गुरण प्राप्ति के लिये उत्तम पुरुषा ली सगति मनुष्यो के सि मनोरप को पूर्ण नहीं करती है याने सवहीं मनोरथों यो पूर्ण करती है क्यापि वह सराब बुद्धि को नष्ट यरती है।
अज्ञान को दूर कन्ती है । ज्ञान को पैदा करती है। प्रेम को प्रदान करती है । न्याय को उपजाती है । नम्रता को फैलाती है। इज्जत को बढाती है । धर्म को पुष्ट करती और खराब गति को हटाती है ।। ६६ ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत लन्धु बुद्धिकलापमापदमपाकर्तुं विहाँ पथि, प्राप्तु कीर्तिमसाधुतां विधुवितु धर्म समासेवितुम् । रोध्धुपापविपाकमाकलयितु स्वर्गापवर्गश्रियं, चेत्त्वं चित समीहसे गुणवतांसंङ्ग तदङ्गीकुरु ।। ६७ ।। अर्थ-रे मन यदि तू बुद्धि वैभव को पाना चाहता है. आपति को दूर करना चाहता है, सन्मार्ग मे विहार करना चाहता है, यश को पाने की इच्छा है, दुष्टता को दूर छोड़ने चाहता है, धर्म को सेवन करना चाहता है, पापो के परिणाम को रोकना चाहता है तथा स्वर्ग और मोक्ष की शोभा का अनुभव करना चाहता है । नो गुणवान पुरुषों की सौवत को स्वीकर कर ।। ६७ ॥ हरिणीवृत हिमति महिमाम्भोजे चण्डानिलत्युदयाम्बुदे द्विरदति दयारामे क्षेमक्षमाभृति वज्रति । समिधति कुमत्यग्नौ कन्दत्यनोतिलतासु यः किमभिलपतां श्रेयः श्रेयान् स निर्गुणिसङ्गमः ॥ ६८ ॥ -६६- - मग-ओरिगुगी पुष्पा या सगम महिमाप मगल ने लिए बापाचरण परता है. उनतिस्प बादला के लिा पर पाबा माचरण परता है, दपास्य वगाने के लिए हापापा पार करता है, पल्पा पहाड पे लिए बच्चा पारण मरता है, तुमतिम्प भाग लिये धन पापाचरण परता तपा प्रत्यापम्प वेलो लिए प” या माचरण करता है। यह गुरिया या सगम पुरषा पा पल्यान चाहो पायात पमा पल्याएमारी है ? नहीं पदापि पल्याण पाही है ॥६॥ (१६) इद्रियदमन प्रकरणम् शार्दू मनिपारितरत मालगन गुपया निगमाया य गुमनायायते प्रत्यारत्यविरजोवितोय गयो । 7 पुनः मरदाविपो स्तयागपते २१ सामुदमियमा रित्या गुनपुभव ।। ६६ ।। ar-:गों मापा गराबाग में ituRITE मा पामराम, सदा I.EET माहारापाने THerem .ran दर? - TRE .
मे तेज कुल्हाडे का आचरण करता है । तथा जिसने उस व्रत की मुद्रा को नष्ट की है ऐसे बलवान् इंद्रिय समूह को अपने काबू कर कल्याण युक्त हो जा ॥६॥ शिखरिणीवृत प्रतिष्ठा यन्निप्ठां नयति नयनिष्ठां विघटय- त्यकृत्येप्वाधते मतिमतपसि प्रेम तनुते । विवेकस्योत्सेकं विदलयात दत्त च विपदं, पदं तद्दोपारणां करणनिकुरम्बं कुरु वशे ॥ ७० ॥ अर्थ--जो इन्द्रिय समूह मनुष्य को इज्जत को नष्ट करता है, नीति के ध्यान को विच्छिन्न करता है, खराव कामों मे बुद्धि को लगाता है, तपस्या के भाव मे अर्थात नही तपस्या करने मे प्रेम प्रेम को फैलाता है, ज्ञान के उदय को रोकता है और आपति को प्रदान करता है। ऐसे उस अनेक दोपो के स्थान इंद्रिय समूह को अपने वश मे कर ॥ ७० ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत. घत्तां मौनमगारज्झतु विधिप्रागल्भ्यमभ्यस्यता- मस्त्वन्तर्गणमागमश्रममुपादत्तां तपस्त प्यताम् । श्रेयःपुजनिकुञ्जभञ्जनमहावातं न चेदिन्द्रिय- व्रातं जेतुमवैति भस्मनिहुतं जानीत सर्वं ततः ।। ७१ ॥ अर्थ-हे मनुप्य चाहे तू मौन व्रत को धारण करो घर को छोड़ दो। धर्म विधी की प्रगल्भता को सीखो। अन्दर पास करो - -85- शास्त्राभ्यास को प्रवरण करो। तपस्या को तपो परन्तु कल्याए के समूह रूप निकुञ्ज को नष्ट करने मे यांधी के समान इस इद्रिय समूह को जीतने को नहीं जानता है तो पूर्वोक्त इन सब बातो का राख मे होमे हुए के समान ही निष्फल जानो ।। ७१॥ शादू वित्रीडितवृत घमघसधुरोगमभ्रमरसावारोगमापत्प्रथा- लगुर्मीएमसर्मनिमितकलापारीणमेकान्तत । सर्वानीनमनात्मनोनमनयात्यन्तोनमिष्ठे यथा- कामीन कुपयाध्वनीनमजयन्नक्षीधमक्षेमभाक् ॥७२॥ भष-धम था नाश परने में मुस्प सत्य ज्ञान को ढकने वाले, प्रापति को फनाने वाले, प्रवल्याण को करने वाली कला मे पारगत एकाततया सबस्व यमाने वाले प्रात्मा का कल्याण परन पाले पति या पण लेन वाले अपनी इच्छा से करने पाने दुमाग पर चलने वाले ऐसे इद्रिय समूह को यदि नही बोता है सा वर प्रपन्ना मला परने वाला नहीं है पर्याप्त बुरा परने वाला है।॥२. - पाखरतरगच्छीय चान मन्दिर, जयपुर (१७) लक्ष्मीस्वभाव प्रकरणम् शार्दूलविक्रीडितकृत निम्नं गच्छति निम्नगेव नितरां निद्रव विष्भते, चैतन्यं मदिरेव पुष्यति मदं धूम्येव धत्तन्वताम् । चापल्यं चपलेव चुम्बति दवज्वालेव तृष्णां नय- त्युल्लासं कुलटाङ्गनेव कमला स्वैरं परिभ्राम्यति ॥७३॥ अर्य-लक्ष्मी नदी की तरह नीच पुरुप को ही प्राप्त होती है तथा निरतर नीद की तरह समन जान आगमन की सूचना के लिए पागल का आचरण करती है, शराब के जैसे अभिमान को पुष्ट करती है, धुमाँ के समूह की तरह मनुष्य को अंधा करती है, विजली की तरह चंचलता को पास रखती है, वन अग्नि के समान धनादिक की प्यास को पैदा करती है एवं, खराव स्त्री को तरह खुशी पूर्वक स्वतंत्र भटकती है। ।। ७३ ।। गार्दूलविक्रीडितवृत दायादाः स्पयन्ति तस्करगणा मुष्णन्ति भूमीभुजो गृह्णन्तिच्छ नमाकलय्य हुतभुम्भ भस्मीकरोति क्षणात् । अम्भः प्लावयते क्षितौ विनिहितं यक्षा हरन्ते हठाद् दुर्वृत्तास्तनया नयन्ति निधनं घिरब ह्वधीनं धनम् ।। ७४ ।। अर्थ-जिस धन की कुटुम्ब वाले इच्छा करते हैं, चोर चुरा कर ले जाते हैं राजा लोग कपट कर के हर लेते हैं, अग्नि क्षण धी खरतरगच्छीय ज्ञान मन्दिर, जयपुर 7
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भर मे जला देती है। पानी बहा के ले जाता है । पृथ्वी मे
रक्खा हुग्रा यक्ष लोग बलपूर्वक हर लेते हैं । दुष्ट बैटे नष्ट कर
देते हैं । इस प्रकार के इस बहुत जनो के प्राधीन हुए धा को
धिक्कार है। ।। ७४ ॥
शादू लविक्रीडितवृत
नोचस्यापि चिर चटूनि रचयन्त्यायान्ति नोचैनोति,
शवोरप्यगुणात्मनोऽपि विदधत्युच्च गुणोत्कोर्तनम् ।
निर्वेद न विदन्ति किश्चिदकृतज्ञस्यापि सेवाक्रमे,
कष्ट किन मनस्विनोऽपि मनुजा कुर्वन्ति वित्ताथिन ७५॥
अथ-घन चाहने वाले बुद्धिमान माष्य भी क्या २ वष्ट
नही उठाते हैं अथवा सभी कष्ट उठाते है। जैसे कि नोच पुरुष
के प्रागे भी चिरकाल तर मिथ्या स्तुति वाक्यो को बनाते है ।
नीचे झुक करने प्रणाम करते हैं । शत्रु हो तो भी तथा दुगुणी
हो तो भी उसके गुणो की प्रशसा जोर से करत हैं तथा क्येि
हुए उपकार को भूल जाने वाले का भी सेवा करने में कुछ भी
दुग्न को नहीं जानते हैं ।। ७५ ।।
शादू लविक्रीटितवृत
लक्ष्मी सपति नोचमर्णवपय सङ्गादिवाम्भोजिनी-
मसर्गादिव कण्टकाकुलपदा न क्वापि धते पदम् ।।
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चैतन्यं विपतन्निधेरिव नृणामुज्जासयत्यश्वना धर्मस्थाननियोजनेन गुरिणभिग्राह्य तदस्याः फलम् ।७६। अर्थ-समुद्र के पानी की संगति से ही मानो धन संपति नीच २ के पास सरकती है। तथा कमलिनी की सोबत से ही मानो कांटो से आक्रान्त पैरो वाली होकर कहीं पर भी पैर को नही रोकती है । जहर के ससर्ग से जैसे मनुष्यो के ज्ञान को झट नष्ट कर देती है। इस कारण से गुणवाले पुरुषो को धर्म कार्यो मे लगाकर इस लक्ष्मी का लाभ ग्रहण कर लेना चाहिए । १८-दान प्रकरणम् शार्दूलविक्रीडितवृत चारित्रं चिनुते तनोति विनयं ज्ञानं नयत्युन्नति. पुष्णाति प्रशभ तपः प्रबलयत्युल्लासयत्यागमम् । पुण्यं कन्दलयत्यघं दलयति स्वर्ग ददाति क्रमा- निर्वाणश्रियमातनोति निहितं पात्रे पवित्रं धनम् ॥७७॥ अर्थ-(सुपात्र) सत्पात्र में दिया हुआ अथवा सोपा हुआ उत्तम धन चारित्र को इकट्ठा करता है याने उत्तम बनाता है । नम्रता को बढाता है। बुद्धि को उदय मार्ग पर ले जाता है । शांति को परिपुष्ट करता है। तपस्या को बलवान करता है।
शास्त्र नान वो विक्सत करता है घम को अकुरित करता है पाप का विनाश करता है । स्वग को प्रदान करता है। मोक्ष को लक्ष्मी को मिला देता है ।। ७७ ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत दारिद्य न तमीक्षते न भजते दौगत्यमालम्बते, नाकोतिन पराभवोऽभिलपते न व्याधिरास्फन्दति । दैन्य नाद्रियते दुनोति न दर किश्नन्ति नैवापद पाने यो वितरत्यनथदलन दान निदान श्रियाम् ॥७॥ प्रथ--जो मनुष्य लक्ष्मीप्राप्ति के मुख्य कारण एव श्रयाय मो मिटाने वाले दान को सुपात्र में प्रदान करता है । उस मनुष्य पो गरीबो देस भी नहीं सकती है । खराव हालत उसकी हो नहीं सकती है। अपयश उसका पासरा ने नहीं सकता है। पराजय उसको चाहती नहीं हैं। बीमारी उसे थका नहीं सकती है। दुवलता उसमा सग ही करती है। भय उसे दुपी नहीं कर सक्ता और प्रापत्तिएं सता नहो सकती है। ।।७।। शादू लविक्रीष्ठितवत लक्ष्मी कामयते मतिमृगयते कीर्तिस्तमालोकते, प्रीतिश्च म्बति सेवते सुभगता नोरोगतालिगति । धेय सहतिरभ्युपैति वृणुते स्वर्गोपभोगस्थिति-- मुक्तिर्वाञ्छति य प्रयच्छति पुमान् पुण्यार्थमयं निजम्।७६। -03- अर्थ -जो पुरुप पुण्य कमाने के लिए अपने धन को दान देता है उस पुरूप की सम्पति लक्ष्मी) चाहती है । ज न उसको खोजना है। यश उसकी तरफ देखता है । प्रेम उसका चुम्बन करता है । सौभाग्य उसको सेवता है । तन्दुरुस्ती उमका आलिंगन करती है । कल्याण समूह उसके पास आता है । स्वर्ग के भोगो की स्थिति उसे वर लेती है । तथा मोक्ष उसकी वाञ्छना करता है। ।। ७६ ।। . मन्दाक्रान्तावृत्त तस्यासन्ना रतिरनुचरी कीर्तिरुत्कण्ठिता श्री:, स्निग्धा वुद्धि. परिचयपरा चक्रवर्तित्वऋद्धिः । पाणी प्राप्ता त्रिदिवकमला कामुको मुक्तिसंप- सप्तक्षेत्र्यां वपति विपुलं वित्तबोज निजं यः ।।८०॥ अर्थ-जो पुरुप सातो क्षेत्रो मे अपने प्रचुर वनरूप वीज को वोता है। उसके सतोष या प्रीति आठो पहर पास रहती है। प्रशसा उसकी दासी होकर रहती है । लक्ष्मी उसके लिये लाला- यित होती है । जान विशुद्ध हो जाता है। साम्राज्य सपति उस पुरुप से परिचय बढाने लग जाती है । स्वर्गीय समृद्धि उसके करतल गत होती हैं । एव मोक्षलक्ष्मी भी उस पुरुप से उपभोग करने की इच्छा वाली हो जाती है ।।।। + -१०४- - १६-तपप्रकरणम् शाटू लविङ्गीरितवृत यत्पूजितकर्मशैलकुलिश यत्कामदावानल- ज्वालाजालजल यदुनकरणग्रामाहिमन्त्राक्षरम् । यत्प्रत्यूहतम समूहदिवस यल्लविधलक्ष्मोलता- मूल तद्विविध यथाविधि तप कुर्वीत वीतस्पृह ॥५१॥ प्रय-जो पूर्व भव मे सचित किये गये कमरूपी पहाड लिए पत्र के समान है । जो कामापी दावाग्नि की प्रचण्ड ज्वालामो समनाथ जलके समान है। जो अति भयकर इन्द्रिय समूहरूपी साप के उत्कीलन के लिए माक्षर के समान हैजा विघ्नरूपी गाढाऽधकार के लिए दिन के समान है तथा लोलव्धी पी लक्ष्मी लता को जड के समान है। उस तरह के तपस्या वा यथाविधि नि स्पृह होकर करें।८१ ।। शादूलविक्रीडितवत यस्माद्विापरम्परा विघटते दास्य सुग मुक्ते रामः पाम्यति दाम्यतोद्रियगण कल्याणमुत्सर्पति । उमोनति महर्दय क्लयति ध्वस च य कर्मणा, स्वाधीन पिदिय शिव च भवति नाय॒ तपस्तन विम्।८२ अप-जिगो विना TI गमूह ना होता है, देवता मौरी | मदायर 17 हाता है दिया ये समूह का दमन होता है, कल्याण फैलता है, बड़ी २ सम्पतियें विकसित होती है, तथा जो कर्मों का नाश करता है और जिससे स्वर्ग और मोक्ष स्वायत (स्वाधीन) होता है। वह तप क्या प्रशसनीय नहीं है । अपितु वह तप जरूर प्रशंसनीय है ।।२। शार्दूलविक्रीडितवृत कान्तारं न यथेपरो ज्वलयितु दषौ दवाग्नि विना, दावाग्नि न यथापर. शमयितु शक्तो विनाम्भोधरम् । निष्णातः पवनं विना निरसितु नान्यो यथाम्भोधरम्, कौघं तपसा विना किमपरो हन्तु समर्थस्तथा :८३। अर्थ-जिस तरह जगल को जलाने में दावानल के सिवाय दूसरा समर्थ नही है । जिस तरह दावानल को बुझाने मे वादलों के सिवाय दूसरा समर्थ नहीं है। जिस तरह वादलों को अलग करने मे वायु के सिवाय दूसरा चतुर नहीं है। वैसे ही कर्मों के समूह को तपस्या के सिवाय दूसरा कोई नाश करने को क्या समर्थ है ? अथवा कोई नही । कर्म नाश तपस्या से होता है।८३। स्त्रग्धरावृत्त. संतोपः स्थूलमूलः प्रशमपरिकरस्कन्धबन्धप्रपञ्चः, पञ्चाक्षोरोधशाखः स्फुरदभयदलः शीलसंपत्प्रवालः । श्रद्धाम्भः पूरसेकाद्विपुलकुलबलैश्वर्यसौन्दर्यभोग- स्वर्गादिप्रासियुप्पः शिवपदफलदः स्यात्तपः कल्पवृक्षः।८४॥ ? -१०६-
।
अथ-तपस्यारूप जो कल्पवृक्ष है, उसके सतोप तो प्रधान
जड हैं । शान्ति के उपकरण है। वे गोड (तना) शाखा आदि
का विस्तार है। पाच इन्द्रियो का रोध रोकना है वही छोटी
मोटी डालिए हैं। खिलता हुआ जो अभयदान देना है, वही
पत्र समूह है, शील को जो सपति है, वही नवीन पत्तो का उद्गम
है। श्रद्धा रूप जो अभ पूर पानी का प्रवाह उसके सोचने से
ऊँचा घराना प्राप्त होता है । वल प्राप्त होता है । एश्वय मिलता
है। सोदय पाना, सासारिक विषय सुखा का भोगना तथा
स्वर्गादि को प्राप्ति करना आदि जिसके पुष्प हैं एवं मोक्षरूपी
मप्राप्य उत्तम फलों को देने वाला है । ।। ४ ।।
२०-भावनाप्रकरणम्
शादूलविक्रीडितवत
नोरागे तरुणीकटाक्षितमिव त्यागव्यपेतप्रभो ।
सेवाकप्रमिवोपरोपरणमिवाम्भोजन्मनामश्मनि ।
विश्वग्वर्षमिव परक्षितितले दानाहदर्चातप -
स्वाध्यायाध्ययनादि निष्फलमनुष्टान विना भावनाम्।८५॥
अय-रागरहित पुरुप पर किये गये युवती स्त्री के कटाक्ष
की तरह देने में कठोर कृपणमालिक को की गई नौकरी के समान
पत्थर पर कमल के पौधा के उगाने के जसे वजड जमीन पर
चारो तरफ हुई वर्षा की तरह दान देना, जिनेन्द्र भगवान की
पूजा करना, तपस्या करना, शात्रों का विचारना और पढ़ना
आदि क्रियायें सब श्रद्धा भक्ति के बिना फिजूल है ।। ८५ ।।
जैसे पानी पर उगने वाले कमलो को यदि पत्यर पर उगाया
जाय ता कमल तो उगने दूर रहे उल्टा परियम भी व्यर्थ जाता है।
तथा जैसे खारी जमीन पर कोई घास आदि तो उगता नही
और उस पर यदि वरसा होवे तो व्यथ ही जाती है। वैसे ही
यदि जिस पुरुप के दिल मे श्रद्धा भक्ति न हो तो फिर उसका
दिखावे मात्र के लिए दान देना, पूजा पढ़ाना, तपस्या करना
आदि सत्कार्य भो व्यर्थ ही हैं। अर्थात् यथार्थ फलदायी नही
होते ।। ८ ॥
सारांश --जिस प्रकार जितेन्द्रिय पुरुप के पास जाके स्त्री
विषय याचना करे तो उल्टा उसे ही मिदा होना पड़ता है,
जसे जो स्वामी अपने नौकरो को पूरी तनख्वाह न दे और
उमकी जो कोई नौकरी करे तो नौकरो को खाली दु.ख हो
होता है।
शार्दूलविक्रीडितवृत
सर्व जोप्सति पुण्यमोप्मति दयां वित्सत्यघं भित्सति,
क्रोधं दित्सति दानशीलतपसां साफल्यमादित्सति ।
कल्यारणोपचयं चिकीपति भवाम्भोधेस्तटं लिप्सति,
मुक्तिस्त्रीपरिरिप्सते यदि जनस्तद् भावयेद् भावनाम्।८६॥
-१०५--
अथ--अगर मनुष्य सर विपयो को जानना चाहता है, धम को इच्छता है, दया को धारण करना चाहता है पाप को दूर करना चाहता है गुस्से को दूर करना चाहता है दान शोल और तपस्या को सफलता को पाना चाहता है कत्यारण की वृद्धि को करना चाहता है, भवसागर के पेलो तीर को जाने को चाहना करता है। तथा मुक्ति प्राप्ति रूप स्त्री को प्रालिंगन करना चाहता है तो श्रद्धाभक्ति को अपने दिल मे भावित करे ॥८६॥ पृथ्वीवृत्त विवेकवनसारिणी प्रशमशसजीवनी, भवाणवमहातरी मदनदावमेघावलीम् । चलाक्षमृगवागुरा गुरुपायशैलानि, विमुक्तिपथवेसरी भजत भावना किं परै ? ॥८॥ -विवेक रूपो व मे अतिवेग से बहने वाली नदी के समान शाति और सुख को पदा करने वाली ससार रूपी समुद्र को पार लगाने वाली बडो जहाज के समान, कामरूपी दावाऽनल को बुझाने में मेघ घटा के समान, चचल इद्रिय रूपी हरिणो को रोकन लिए वागुरा के समान, नडे २ कपायम्पी पहाडो के लिए -१०६-
।
वज्र के समान, मोक्ष मार्ग में ले जाने के लिए घोड़े के समान,
श्रद्धाभक्ति को ही अपने दिल में धारण करो। अन्याय साधनो मे
क्या प्रयोजन है ? अर्थात् कुछ नही भावना ही सबसे बढकर
है ।। ८७॥
शिखरीगीवृत्त
धनं दत्तं वित्तं जिनवचनमभ्यस्तमखिलं,
क्रियाकाण्डं चण्डं रचितभवनी सुप्तमसकृत् ।
तपस्तोवतप्तं चरणमपि जीर्ण चिरतर.
न चेच्चित्त भावस्तुपवपनवत्सर्वमफलम् ।।८८॥
अर्थ-यद्यपि मनुप्य ने जन्म मे ज्यादा
मे ज्यादा धन का दान
दिया, सम्पूर्ण जैन शास्त्रो को पढ लिया इस अति उग्र धर्म क्रिया
को सपादित किया। चिरकाल तक जमीन पर शयन किया
कठिन तपस्या तपी, बहुत समय तक चारित्र का पालन किया
परन्तु हृदय मे भावना नही है ता उपयुक्त ये सारी बातें खेत मे
फूस उगाने के समान फिजू । है । जिस तरह खेत मे खूव हल
जोते, अच्छा खाद भी डाला पर वीज को जगह तुप (धान का
छिलका मात्र ) लगा दे तो उगता नही और केवल जोताईव
बोवाई मे तकलीफ पड़ती है। इसी तरह भावना विना ये सारी
बातें फिजूल हैं ।। ८८ ।।
द
~११०-
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२१-वैराग्यप्रकरणम्
हरिणीवन
यदशुभरज पाथो दृप्तेन्दिरदाङ्कश,
कुशलकुसुमोद्यान माद्यन्मन करिशृङ्खला ।
विरतिमणोलालवेश्म स्मरज्वरभेपज,
शिवपथर यस्तद् वैराग्य विमृश्य भवाभय ॥८६॥
अथ-जो अ मागलिक धूल को धोने के लिए जल के समान
है, बलवान होने से स्वतन हुई इन्द्रियो के समूह रूप हाथो को
वश करने में अकुश के समान है, ल्यारण रूप पुष्पो का
बगीचा है, उ मत हाथी को बांधने के लिए साकल के समान
है, विरलिरूप सुदरी का मानो श्रीडा घर है, कामज्वर का
अमाघ प्रौषध है तथा मोक्षमाग में ले जाने के लिए रथ के
समान है। उस वराग्य को हे भाविकजन! तू धारण कर
(विचार कर) निभय होजा ।। ८६ ।।
वसन्ततिलकावृत
चण्डानिल स्फुरतमन्दचय दवाचि-
वृक्षग्रज तिमिरमण्डलमबिम्बम् ।
वज महोध्रनिवह नयते यथान्त,
वराग्यमेकमपि कम तथा समग्रम ॥६॥
अर्थ-जैसे भयंकर हवा नाकाग मण्डल मे विचलित हो वादलों को घटा को विबेर देतो है, जगल को अग्नि वृक्षो के समूह को जला देती है, अाँधी का भयंकर गोट मूविव को छिपा देता है, वज्र पर्वतकुल को तोड़ देता है । वैसे ही एक भी विरक्तिपरण (वैराग्यपणा) सपूर्ण कर्मजाल को विनष्ट कर देता है ।। १० ॥ शिखरिणीवृत नमस्या देवानां चरणवरिवस्या शुभ गुरो- स्तपस्या नि.सीमक्लमपट मुपास्या गुणवताम् । निपद्यारण्ये स्यात्करणोदमविद्या च शिवदा, विरागः क्रू रागः क्षपणनिपुरगोन्तः स्फुरति चेत् ।।६।। अर्थ-यदि भयंकर अपराधो को मिटाने वाला वैराग्य अन्तः करण में विराजमान है, तो देवताओं को किया हुया नमस्कार, अच्छे गुरु के पैरो की सेवा, अपार दुखों वाली तपस्या, गुण- वानों की संगति, वन मे वैठना, तथा इन्द्रियों का निग्रह, ये सब मोक्ष देने वाले होते हैं ।। ६१ ॥ शार्दूलविक्रीडितंवृत भोगान् कृष्णभुजङ्गभोगविपमान् राज्यं रजःसन्निभं, वन्धून बन्धनिवन्धनानि विपयग्रामं विपानोपमम् । - ११२- 1 भूति भूतिसहोदरा तृणतुल स्लण विदित्वा त्यज- स्तेष्वासक्तिमनाविलो विलभते मुक्ति विरक्त पुमान ।। अथ-इन्द्रियो के सुखो को श्याम सर्प के समान भयकर जानकर, राजलक्ष्मी को रेत के तुल्य जागकर, कुटुम्बियो को वधन के कारण जानकर, इन्द्रिय समूह को जहरीले प्रश्न के समान जानकर, ऐश्वय को राख के सदृश जानकर, स्त्री समूह को तिनके के समान जानकर, उक्त विषयो के प्रेम को छोडता, हुमा, निप्पाप और विरक्तं चितवाला पुरुप मोक्ष को प्राप्त होता है ।। ६२॥ "ITS TFT प्रथ मनुष्य जन्म रूप वृक्ष के फल उपजातिवृत्त जिनेन्द्रपूजा गुरुपर्युपास्ति सत्त्वानुकम्पा शुभपायदानम् । गुणानुराग श्र तिरागमस्य,नृजन्मवृक्षस्य फलान्यमूनिाह। अर्थ-जिनेन्द्र भगवान की पूजा, गुरुचरणों को सेवा, प्राणिमात्र पर दया, सत्पात्र को दान देना, सद्गुणा पर प्रेम -- रखना, तथा शास्त्रों पर श्रदा रखना। ऊपर की ये बातें इम मनुप्य जन्मरूपी वृक्ष के फल है ।। ६३ ।। . सामान्य उपदेश शिखरिणीवृत. त्रिसन्ध्यं देवा! विरचय चयं प्रापय यशः, श्रियः पात्रे वापं, जनय नयमार्ग नव मनः । स्मरक्रोधाद्यारीन् दलय कलय प्रारिणषु दयां, जिनोक्त सिद्धान्तं शृणु वृणु जवान्मुक्तिकमलाम् ॥१४॥ अर्थ-हे भविकजन प्रातः मध्यान्ह, और सायं तीनो काल में भगवान की पूजा को कर, यश को प्राप्त कर, सुपात्र मे लक्ष्मी का खर्च कर, चित्त को न्याय के मार्ग पर लेजा, काम क्रोध आदि शत्रुनो का नाश कर तथा जीवों पर दया कर, सर्वज्ञ जिनेश्वर भगवान के कहे हुए सिद्धान्तों को सुन एवं जल्दी से मोक्षलक्ष्मी को वरो ।। ६४ ॥ -११४- । TI शादू लविक्रीडितवृत कृत्वात्पदपूजन यतिजन नत्वा विदित्वागम, हित्वा मगमधर्मकमठधिया, पात्रेषु दत्त्वा धनम् । गत्वा पद्धतिमुत्तमक्रमजुपा जित्वान्तरारिव्रज, स्मृत्वा पञ्चनमस्क्रिया कुरु करकोडस्थमिष्ट सुख ॥६५॥ 1 अप-जिनेद्र भगवान की चरण सेवा को करके, साधु समुदाय को नमस्कार करके, शास्त्रो को पढकर के, पापियो की सगति छोडवर के, सुपात्र मे धनदान देकर के सन्माग जाने वाले महात्मामा के माग पर जाकर के अन्त शत्रुनो को जीत पर के पचपरमेष्ठी नमस्कार मय को करके, वाछित सुख को हथेली म स्थित करो ।। ५ ।। - हरिणीवृत . प्रसरति यथा कोतिदिक्षु क्षपाकरसोदरा- भ्युदयजननी याति स्फीति, यथा गुणसन्ततिः । कलयति यथा वृद्धि धर्म कुकर्महतिक्षम , मुलभपुराले न्याय्ये कार्य तथा पथि वर्तनम् ॥ ६६ ।।
Rad अयं -- सज्जनो को चाहिये कि पल्याण से नुप्राप्य नोति के मार्ग पर उस तरह चलना चाहिये जिससे चन्द्रमा के समान उज्जवल चारों दिशाओं में फैलता है, तथा उन्नति का कारण ऐसो गुणगि विकास को प्राप्त होती है और दुष्कर्मों को दूर करने में समर्थ एमा पुण्य वढता है ।। ६६ ।। me- महापुरुषों के प्राभूपण गिखरिणीवृत्त । करे श्लाव्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणमनं, मुखे सत्या वारणो तमधिगतं च श्रवणयोः । हृदि स्वच्छावृत्तिविजयि भुजयोः पौरुपमहो, विनाप्यैश्वर्येण प्रकृतिमहतां मण्डनमिदम् ॥ ७ ॥ अर्थ- अहो ! यह आश्चर्य की बात है कि विना धन संपत्ति के भी स्वभाव से हो महान् प्रोत्मा वाले पुरुषों का यह नोचे लिखा हुआ वर्णन शृगार है तथा हाथो मे तो प्रशंसनीय दान देने की प्रवृति है । मस्तक पर ( मुकुट की जगह ) बड़े - ११६ लोगो को प्रणाम करने की प्रवृति है, मुख मे स्वरण" कीलिकामो के स्थान पर सच बोलने की प्रवृति है, कानो में कुण्डलो को एवज मे शास्त्र सुतने की प्रवृति है, हृदय मे हार के बदले मे' निर्मल भावना है तथा भुजानो पर भुजगन्द की जगह जयशील पुरुषाथ है । ये महात्माप्रो के सच्चे आभूपण हैं ॥१७॥ विषयत्याग शिखरिणीवृत्त. भवारण्य मुक्त्वा यदि जिगमिपुमुक्तिनगरी, तदानी माकार्षीविषयविपवृक्षेपु वसतिम् । यतश्यायाप्येपा प्रथयति महामोहमचिरा- दय जन्तुर्यस्मात्पदमपि न गन्तु प्रभवति ॥ १८ ॥ अप-हे भविषजन ! अगर तू ससार रूपी गहन वन को मोटवर मास नगर पा जाने यो इच्छा वाला है तो इद्रिय भागरपो जहरीले पेड़ों पर मुगाम मत पर पयोधि यह विषया की धाया भोपने मे हो भयपर मूच्या या 'फलाती है पौर -११- जिससे यह प्राणी एक पैर भी आगे चलने को समय नहीं हो सकता॥5॥ ग्रथकर्ता का नाम और इस ग्रंथ के उपदेश का फल- उपजातिवृत्त सोमप्रभचार्यमभा च लोके, वस्तुप्रकाशं कुरुते यथाशु । तथायमुच्च पदेशलेगः, शुभोत्सवज्ञानगुणांस्तनोति ।६६ अर्थ-जिस तरह शोव्र ही ससार मे चन्द्रमा की कान्ति और सूर्य की कान्ति प्रत्येक वस्तु को दिखाती है। तथा वैसे ही या थोड़ा सा उपदेश बड़े २ अच्छे २ कल्याणकारी ज्ञान गुणों को हृदय मे विस्तृत करता है। इस मे कवि ने अपना नाम सोमप्रभाचार्य यह भो प्रकट कर दिया है ।। ६६ ।। प्रशस्ति मालिनीवृत -- अभजदजितदेवाचार्यपट्टोदयाद्रि-. धु मरिणविजयुसिहाचार्यपादारविन्दे । -११८-
मधुकरसमता यस्तेन सोमप्रभेरण
व्यरचि म निपनेता सूक्तिमुक्तावलीयम् ॥ १०० ।।
अथ-जो श्री अजितदेव प्राचाय से पट्ट प्रासन रूप सुमेरु
पहाड पर सूय के जसे विजसिंह प्राचाय
चरण कमलो मे
भ्रमर भाव को सेवते थे। उन मुनियो के मा य सोमप्रभाचाय
ने यह सुक्ति रूप मोतियो की माला बनाई है ।। १०० ॥
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प्राप्ति स्थान :
२. श्री गोविन्दचन्द मेहता
गृहपति
श्री श्वेताम्बर जैन छात्रावास
मु० पो० गुढावालोतान
स्टेशन जवाईबाध (राज.)
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