Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Navaratnavivahpaddati Ditiya Sanskaran
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भगतराम विष्णुदन- जगत (लक्ष्म पादाम शाल ग्राम तुलसी राम धनैया काशी मन (गोंदा (गणपती हरजस (हरगोगले यस वटा आत्मा लालू रामना) स (घनैया (पोल्हो (साह धारी (वराय रामजी सप. पर्वत (मनोहरो वासमा गुजर तरामा राज.' 'सहजा) (हाटी) (जयरामा सुषा दिलारामा (गंदा नेणा भारा लाहार रामसहाई वंशवक्ष ग्रंथकफिीवंशावली.
विज्ञापना। . DKA विदित हो कि हमारे आर्यावर्त भारतखण्डमें अतिचिरसे .वधित अधर्मरूप यवनराज्यके प्रताप( संताप)से नित्यआ- नंदरूप-शीतलस्वभावसंपन्न सगुणनिर्गुणात्मक पूर्वोत्तर तट युक्त और वेद,४ पुराण १८ न्याय र मीमांसा २ धर्मशास्त्र १८ शिक्षा १ कल्प २ व्याकरण ८ निरुंक्त १ छंद. ३ ज्यो- तिप ६ काव्य २ नाटक १० चंपू.१ आख्यायिका इतिहास कोश५६अलंकार नीति मंत्र २ तंत्रचिकित्सा ८ गणित २ वेदान्त सांख्ययोग कर्मकाण्डादिकरूप विकसित जो अने- क कमल उनपर लोभायमान भुंगरूप विद्वद्वंद और आनंद- तमन्न कविरूप हंस चक्रवाक.पारावत क्रौंचादियोंसे शोभाय- मान वेदविद्यारूंप नदीके किश्चित् शुकमाय होनेपर तदनं- तरही सर्वान्तर्यामी कृपालु परमेश्वरकी कृपादृष्टि और अखण्डप्रताप. श्रीमती. महराजराजेश्वरी श्रीविकटोरीया- जीके राज्यप्रतापरूप अरुणोदय होनेपर और धर्मरूप चारों तरफ वृष्टिके होनेसे वही सनातन वेदविद्यारूप नदी सगा- ध होकर वहने लगी उस्की अशुद्धिरूप मलनिवृत्ति कर्नेके लिये हमारे भ्रातृगण क्षत्रि वैश्य शूद्रादि वनमनधनसे अ- ति उद्यत होनेपर बौद्ध चार्वाक जैन अनार्यादि नूतनमलके निवृत्त होनेसे वही हंसादिरूप विद्वान् निर्मलजलपान कर्तेहैं तथापि विना कपायपदार्थ हरीतक्यांदि भक्षण विन जैसे जलका मधुरगुण (मिठास) मालुम नहीं होती तद्वत विना अर्थ. विनियोगके वेदविद्याका फलरूप · गुण मालुम नहीं होता इस्में श्रुति प्रमाणभीहै यथा (स्थाणु- रय भारहार किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योर्धम् । योऽर्थज्ञ इत् सकलं भद्मश्नुते नाकमति ज्ञानविधूतपाप्मा) . .
२ विज्ञापना। इसलिये सापकारके लिये विवाहपद्धतीका मेने वेदभाष्य. सायन उवटमहीधरादिदेख और श्रीनिवाहूरामकृतसंस्कृत टीका तथा ब्राह्मणसर्वस्व हरिहरभाप्यआदि ग्रंथोंका सार ले तथा अनेक विवाहपद्धति गृह्यसूचसे मिलाय पाठ शुद्ध कराहै और जो मंत्र पद्धतियोंमें अप्रचारसे अंशुद्ध थे वह यजुर्वेदादि संहितासे मिलांय शुद्ध करे साथ वेदका.प्रमाण अध्याय मंत्रांक भी लिखे हैं और मंत्रोंको ऋषि छन्द देवता- दिसे सुशोभितकर कर्तव्यतामंत्रार्थ भावार्थ गूढार्थ युक्त नवप्रकरणसंयुक्त भाषामें टीका बनाय सर्वाधिकारसमेत " खेमराज श्रीकृष्णदास". श्रीवेंकटेश्वरयंत्रालयाधिपतिके 'समर्पणकी है इस लिये सजनपुरुष इस पुस्तकको स्वीकार कर मेरे परिश्रमको सफल करे और इस पुस्तकमें जो वर कन्याके प्रति उपदेश आचार दोष गुण कहेहैं वह उपदेश करें ऐसे करनेसे लोक परलोकमें यश और धर्मकी प्राप्ति होगी ॥ इस परिश्रमसे सर्वातर्यामी परमेश्वर श्रीराम- चन्द्रजी प्रसन्नहीं। राजधानी कर्पूरस्थलनिवासी गोतमगोत्र (शोरी) अन्वयालंकृत दैवज्ञ दुनिचन्द्रात्म पण्डित-विष्णुदत्तशमा वैदिक.
वि: प० विपयनिरूपण। ३. विवाहपद्धतिस्थितविषयनिरूपण. (प्रथमप्रकरणज्योतिपशास्त्रमें) जिस्में स्त्रीप्रशंसा, देवज्ञपूजन, विवाहप्रश्रा प्रश्नसे शुभा शुभक्चिार, वैधव्ययोगका व्रत शांति आदिसे परिहार,सा-, वित्रीव्रतविधान, पिप्पलविवाह, कुंभविवाह,अच्युतविवाह- विधान, प्रश्नसे कन्यास्त्रीपुत्रविचार, मंगलशब्द अशुभशब्द, बालकवरण नक्षत्र, कन्यावरणविधि, कन्यापरिणयनकाल, चैत्रादिमासनियमव्यवस्था, ज्येष्ठमें विवाहनिषेध, पुत्र विवाहके अनंतरविवाहनिषेध और विधान, मुण्डनविचार, विवाहकेमुहूर्त,पुरुषस्त्रीराशिचक्रवर्णचक्र, योनिचक्र,गणच- कलत्तापातायुतिवेधांचरणवेध।जामित्र। वुधपंचक । सर्वदे- शमें एकागल चक्र। यह सबदोषपरिहारसहित उपग्रह । क्रांतिसाम्य ।दग्धातिथि । दशयोग । पंग्वंधकाणलग्नविचा र । ग्रहनैसर्गिकमैत्रीचक्र । दुष्टभकूट । लग्नशुद्धि । गोधूलील- ना वधूप्रवेश । द्विरागमनमुहूर्त ।.शुक्रविचार परिहार सहित । यह सब भाषाटकासहित प्रथम प्रकरणमें लिखे हैं। (द्वितीयप्रकरण कर्मकाण्डविपयमें) यथार्थगृहचित्रामण्डपचित्र तिलकमण्डलचित्र सर्वतोभ- द्राचित्र। पञ्चाग्निकुण्ड । आज्यस्थाली। चरुस्थाली ।प्रणीता पात्र । पुरोडाशपात्र ।सवाउपभृत्युका ध्रुवा नुक् । पुष्करमुक। अग्निहोत्रहवनी । वैककतनुकू । उलूखल । मुंसल। शूर्प । शम्या । स्फ्यःमृतावदान । उपवेप । कृर्च । दृषत् ।
. वि०प० विपयनिरूपण। उपल। षड्वत आभ्रि । अरणी । उत्तरारणी मोविली। प्रमन्थ । नेत्र । अन्तर्धानकट । हविर्धानपात्री । प्राशिव- हरण । चमसा । इडापावी । यजमानासन । पन्यासन । होवासन । ब्रह्मासन । यजमानपात्री । पत्नीपात्री। कृष्णा- 'लिन । इनसर्वके प्रमाणसहितचित्र । कात्यायनोक्तपात्रोंके लक्षण । विनियोगवर्णन ऋषिछंददेवतालक्षण। छन्दसंख्या गायत्रीछन्दभेद यह सर्व श्रेष्ठतासेद्वितीयप्रकणमें लिखेहैं। (तृतीयप्रकरणकात्यायनोक्तशांतिमें) जिसमें प्रमाणसहित स्वर संयुक्त अतिशुद्धकर वेदोंके. मंत्र । स्वस्तिवाचन । गणपत्यादिपूजन । रक्षाविधान । आ- चार्यादिवरणावेदस्वरूप । आशीर्वादमंत्र । कलश । वास्तु- पूजन । योगिनी ब्रह्मा विष्णु । शिव। इंद्रादि दशदिक्पाल । नवग्रहपूजन । बलिदान । संकल्प । शांति । सामग्रीहै।. (चतुर्थप्रकरणसंकल्पादिभेदमें) विवाहसामग्री। चतुर्थीकमसामग्री । कन्योद्वाहमें यज- मानकर्तृक प्रतिज्ञासंकल्प । यजमानकर्तृक शुभ्रचौलशाटि- कासंकल्प । कन्यापितृकर्तृक वेदीदानसंकल्प । यजमानकरी कचतुर्थीदानसंकल्प । यजमानकर्तृक उपाध्यायदक्षिणासं कल्प । यजमानकर्तृककन्या यज्ञ अंतमें भूरि अन्नद्रव्यदान- संकल्प । यजमानकर्तृक विवाहप्रतिज्ञासंकल्प । वरकर्तृ- कपत्नीप्रतिग्रहगोदानसंकल्प । अभावे सुवर्णमयीगोदा- नसंकल्प । उपाध्यायदक्षिणासंकल्प । यजमानकर्तृकंखवा' 11 जलवेष्टनागोत्रोच्चारण। अतिविस्तृतकन्यासं वि०.पं. विपयनिरूपण । ... कल्प । संक्षेपसेकन्यासंकल्प । परिभाषा । सूर्यादिनवग्रह मंत्र | इन्को पूजनीयता। षोडशोपचार पूजा । ज्योतिषबो- धकनवग्रहमंगलाष्टकपारस्करोक्तकुशकंडिकामें विवाहसूनं. (पंचमप्रकरणम् ). विवाहपद्धातेमारम्भ । मंगलाचरणग्रंथकतुःप्रशंसा | वा- ग्दानविधि । वालकवरण । वेदोच्चारण। गणेशस्तुति । ऋ- पिसृष्टि । शिवसंकल्प.। शांतिपाठ यह सब अत्युत्तम भा- पाटीका सहित साथप्रमाण स्वरयुक्त मंत्र है (पष्टप्रकरणविवाहविधिमें) (तत्र कन्याहस्तेन) इहाँसे आदिले (प्राङ्मुखौ वधूवरो 'स्थितौ भवतः)इस पर्यंत अर्थात् संपूर्ण पद्धति अनेक पद्धति यौसे मिलाय संस्कृत शुद्धेकरऋग्वेदादिचतुर्वेदोंसे मंत्र नि- काल और जिसवेदका जोमंत्र उस्का प्रमाणातथा स्वरसहित अतिशुद्ध कर विनियोगोंके सहित लिखेहैं।इस्की टीका म- हीधरभाप्य सायनभाप्य उवटभाप्यं ब्राह्मणसर्वस्व गृह्यसूत्र हरिहरभाप्य ॥ तथानिवाहुरामकृतटीका जिस्को पाचाल- देशीय महाविद्यानिकरके मुख्य संस्कृताध्यापक.श्रीपंडि- त गुरुप्रसादजीने शुद्ध किया ॥ इत्यादि अनेक वेदार्थयो- धक ग्रंथोंसे मंत्रोंके अर्थ साथ मन्वादि प्रमाण देकर सबकी समझमें आनेवाली मनभाविनी अतिसुंदर भापाटीकामें करेहैं इसी प्रकार साथ प्रमाणोंके विवाहपद्धतिके पद २ का अर्थ स्पष्टभापाटीकामें लिग्वाहे ॥
. .६ प्रार्थना। (सप्तमप्रकरणमें) चतुर्थीकर्म अतिविस्तृत भाषाटीकासहित है। (अप्टमप्रकरणस्त्रीआचारमे) धर्मशास्त्रादि अनेक शास्त्रोक्त विवाहानंतरजो स्त्रीमात्र- को पतिसेवाआदि प्रतिदिन कर्तव्य है वह अतिविस्ता- रसे निरूपण करा है। (नवमप्रकरणरजस्वलाकृत्यमे ) अर्थात् जिस समय स्त्रियोंको ऋतु आता है उस दिनसे तीनदिनपर्यन्त स्त्रीरक्षा भोजन शयनासनादि व्यवस्था जिससे गर्भाशय शुद्ध रहनेसे अति शौर्य बल बुद्धिसंपन्न और दुराचारसे दुष्टकुकर्मीसतान होतीहै ।यह सब धर्म- शास्त्र कर्मकाण्ड ज्योतिष चिकित्सासे शुद्ध कर अति- सुंदर निरूपण करा है ॥ इति ॥ तथा प्रकीर्णाऽध्याय लिखा है। (प्रार्थना)यद्यपि अनेक विवाहपद्धति मूल और सस्कृतटी कासवलितसे कार्यसिद्ध था तथापि वेदमंत्रोमें अशुद्धिका सन्देह और सस्कृतटीकाको सर्वोपकारक ना होनेसे तथा विना विवाहप्रकरण अन्य स्थानोमें मत्रार्थ कर्तव्यताकी इच्छा लग्नशुद्धि कात्यायनीशांति संकल्प आदिकी आव- श्यकता विचार कर संस्कारकी शुद्धि और लोकोपकारा- की जिस्को पढकर सामान्य विद्यासंपन्नभी पुरुष अति- विशेपद्रष्टव्य। 'सुगमरीतिसे समझंकरं आनंदपूर्वक निर्वाह करे इस लिये मैंने अत्युत्तम भाषाटीकासहित .विवाहपद्धतिका पुस्तक नवप्रकरणमें अतिपरिश्रमसे बनायाहै । इस्को महाशयं जन-स्वीकार कर प्रचरित करे । और जो मुझकी अशुद्धि हो वह क्षमा करे ॥ पुष्पाञ्जलि:-यदशुद्धमसम्बद्धमज्ञानाच्चकृतमया। विद्वद्भिक्षम्यतांसवालत्वादयमञ्जलिः।। .(कर्पूरस्थलनिवासि-दैवज्ञ.दुनिचन्द्रात्मज (शोरी) पण्डित-विष्णुदत्तशर्मा-वैदिक. MDURTI विशेषद्रष्टव्य.। यथाह सुश्रुते भगवान् धन्वन्तरि॥ अथास्मै पंचविंशति वर्षाय द्वादशवर्षा पत्नीमांवहेत् । पित्र्यधर्मार्थकामप्रजात्रा स्यतीति ॥ किञ्च-॥तद्वर्गद्वादशात्कालेवर्तमानमसृक्पुनः । जरापक्कशरीराणांयातिपंचाशताक्षयम् ॥ उनपोड शवर्षायामप्राप्तःपंचविंशतिः ।. यद्याधत्तेपुमान्गर्भ कुक्षिस्थासविपद्यते ॥ जातोवानचिरंजीवेनीवेद्वादु बलेन्द्रियः । तस्मादत्यन्तवालायांगर्भाधानंनकार- येत् ॥ इममेवाशयमालम्ब्यभावमिश्रोपिभावप्रका- शेक्योधिकांनिंदन्वालास्तौति ॥
विशेपद्रष्टव्य । यथा-पूतिमांसंस्त्रियोवृद्धावालार्कस्तरुणंदाध । प्र- भातमैथुननिद्रासद्य प्राणहराणिपटू ॥वृद्धोपितरुणी गत्वातरुणत्वमवाप्नुयात् । वयोधिकांस्त्रियंगत्वातरू णःस्थविरायते ॥ अत्याशितोऽधृतिःक्षुद्वान्सव्यथा गःफ्पिासितः । बालोवृद्धोन्यवेगातस्त्यजेद्रोगीचमै थुनम् ॥.लिंगिनींगुरुपत्नींचसगोत्रामथपर्वसु । वृ- द्धांचसंध्ययोश्चापिगच्छतोजीवनक्षयः ॥ विपयै चैवमैथुनमित्याद्यनेकवचनंप्रामाण्यात्तत्तद्रंथाऽव- लोकनांच्चस्त्रियावरोद्विगुणोऽभावेसा वास्त्रीत्वयवी यसीएवविधेयाइतिमेप्रतिभात्यंतश्चेहलौकिकपार- लौकिकहितेप्सुभिःपुरुपैरस्यप्रचार कर्तव्यतिशम् ॥ प्रार्थनयंदै० दुनिचंन्द्रात्मजकपूरस्थलीयपंडित- विष्णुदत्तवैदिकशर्मणः। (अंवशिदेखिये देखनयोगू) सुश्रुतमें भगवान धन्वंतरि स्वयं लिखते हैं कि पच्चीस२५ वर्पके बालकको द्वादश १२ वर्षकी स्त्रीसे विवाहकर्नेसे धर्म . अर्थ काम संयुक्त पिताको हित दीर्घायुवाली संतान प्राप्त होतीहै ।। और स्त्रीको द्वादशवर्षसे ले ऋतु पचास वर्षपर्य- न्त रहते हैं और पोडश १६ वर्षसे.न्यून (कम) स्त्रीको यदि से कम (न्यून) पुरुष प्राप्त हो उससे जो गर्भ हो विशेषद्रष्टव्य । - वह नवजाताहै अर्थात् गिरजाताहै । वा उत्पन्न होकर चि- रकाल जीवत नहीं रहता यदि रहताहै तो दुर्बलशरीर (नताकत) असमर्थ इंद्रियवाला चिरजीवताहै । इस का: रणसे अतियालकोंका गर्भाधान नाकरावें ॥ अर्थात् २५ प- चीसवर्षका पुरुष औ १६ वर्षकीस्त्रीवा१४वर्षकी स्त्री औ२० वीसवर्षका पुरुपहो इससे न्यून नाहीं।। और इसी आश- • यको लेकर भावमिश्नजीभावप्रकाश ग्रंथमें वृद्धा (बडी) स्त्रीका निषेध और बालास्त्रीका स्वीकार कहते हैं। जैसे स- ढा मांस । वृद्धस्त्री। लाल दधि । वादिनमें बनायाहुआ दधि ॥ मातःकाल स्त्रीसे संभोग । और प्रातःकाल निद्रा यह शीघ्र बलको नष्ट कर्तेहैं। वृद्धपुरुष यौवनवती स्त्रीको प्राप्त होय युवा होताहै और अपनेसे वडीस्त्रीको यदि युवानपु- .रुष प्राप्तहोय तो शीघ्रही वृद्ध (बूढा) होजाताहे । और बहुतअन्न भोजन कर धैर्यरहित क्षुधायुक्त पीडायुक्त तृषायुक्त और वालक अर्थात् वीस २० वर्षसे न्यून ( कम) और 'वृद्ध (अशीति ८० वर्षसे ) ऊपर पुरुप | और रोगातुर और जो एकसे संभोगकर चुकाहो यह ७ पुरुष मैथुन ना करे यदि यह करे तो प्रत्यक्ष फलको प्राप्तहोतेहै।इसीप्रकार संन्यासयुक्त स्त्रीसे वा गुरुकी स्त्रीसें और अपने गोत्रकी स्त्रीसे वा कन्योंसे और पर्वकाल अष्टमी अमावसं एकादशी आदिमें और वृद्धास्त्रीसे तथा संध्याकालमें संभोग कर्नेसे जीवनका क्षय होताहै ॥ इसलिये विंशति अर्थात् वीस २० वर्षके ऊपर पुरुषको मैथुन करना चाहिये इत्यादि अने- कवचन निदर्शनसे सिद्ध यह भया की स्त्रीसे बालक द्विगुण अर्थात् दुगुण (दूमा)होना चाहिये। जैसे स्त्री बारह १२ व- विशेपद्रष्टव्य । घकी और पुरुष २५ वर्षका यदि ऐसा योग्य गुणयुक्त वरना मिले तो. द्वादश १२ वर्षकी लडकीको वर विंशति २० वर्ष- का 'अवश्य होना चाहिये और कन्या वरसे सदैव न्यून हो- नी चाहिये ऐसे कर्नेसे इस लोकमें यश परलोकमें अनंत सुख प्राप्त होताहै इस लिये संसारभीरु धर्मनिष्ठपुरुषों को इस्का प्रचार तनमन धनसे अवश्य करनाचाहिये । प्रार्थनेयं दैवज्ञदुनिचन्द्रात्मज (शोरि) कर्पूरस्थलीय विष्णुदत्तवैदिकशर्मणः। जो महाशय इस रीतिंसे वरकन्याका विवाह करें वा करवावें तो उन्को लिखनेपर हम प्रशंसापत्र देंगे ॥ . प्रकाशक खेमराज श्रीकृष्णदास, " श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना खेतबाड़ी-मुम्बई.
श्री। अथ नवरत्नविवाहपद्धतिः-भापाटीकासहिता। ॐ स्वस्ति श्रीगणेशाय विनहर्त्रे नमोनमः। मंगलाचरणम् । शिवंशिवकरंगौरी रामसीतासमन्वितम् । नत्वालग्नविशुद्धयर्थ टीकांकुवैमनोहराम् ॥१॥ अथ मुहूर्तचिंतामणी विवाह ( उपयमन ) प्रकरणम् ॥ भा-त्रिवर्गकरणशुभशीलंयुक्ता शीलंशुभं भवतिलगवशेनतस्याः।तस्माद्विवाहसमयः परिचिंत्यतेहितन्निनतामुपगताःसुतशीलधर्माः॥१॥ भा टी-भार्या अर्थात् जिससे विवाह होय वह स्त्री शु- भशीलसे युक्त धर्म अर्थ कामका साधन होती है। वह शु- भशीलता लग्नद्वारा होनेसे विवाहका समय प्रथम चिंतना कर्तेहैं। भावार्थ यह है कि यदि लग्न दशदोषादिरहित शुद्ध होय तो उस्में पाणिग्रहण कनेंसे स्त्री दुष्टभी श्रेष्ठ (अच्छी) और वंध्यायोगघाली पुत्रवती और पापिष्ठ धर्मयुक्त लग्नके भावसे होजाती है॥१॥ आदौसंपूज्यरत्नादिभिरथगणकंवेदयेत्स्वस्थचितः कन्योराहंदिगीशानलहयविशिखेप्रश्नलमाद्यन्दुिः ॥.
२ विवाहपद्धति भा. टी. दृष्टोजीवेनसबः परिणयनकरोगोतुलाकर्कटाख्यं वास्यात्प्रश्नस्यलग्नंशुभखचरयुतालोकितंतद्विदध्यात् २॥ भाण्टी-प्रथम रत्न सुवर्ण रजतादिसेगणितविद्यानिपुण ज्योतिषी स्वस्थचित्त बैठेको भेटकर कन्याका विवाह नि- वेदन (कथन) करे इँहा रत्नादिसे यह प्रयोजन है जितनेसे संतुष्ट हो जाय उतना द्रव्य देना वा यथाशक्ति अनुसारदे ना ।। और साथ यह कहनाकी मैं कन्याका विवाह कर्नाचा- हृताहूं ॥ यदि उसकाल विवाहप्रश्नसे दशम २० एकादश९१ तृतीय ३-सप्तम ७ पंचम ५ स्थानमें चन्द्रमा होय और पूर्ण- दृष्टि नवम ९ पंचम ५ से वृहस्पति चंद्रमा को देखे वा वृष तुला कर्क यह प्रश्नके लग्न होय और शुभग्रह युक्त होने वा देखे तो शीघ्रही विवाह होताहै ॥२॥ विपमभांशगतौशशिभार्गवौ तनुगृहंवलिनौ यदिपश्यतः। रचयतोवरलाभमिमौ-यदा युगलभांशगतौ युवतिप्रदौ॥३॥ भा०टी०-यदि शुक्रचंद्र विषम (मेप. मिथुन. सिंह. तुला. धन. कुंभ)राशिक नवांशोंमें बलयुक्त प्राप्त होकर प्रश्नलग्नको देखे तो यह वरकी प्राप्ति कन्याको कर्तेहै ।यदि शशि.शुक्र समराशिके नवांशमें हो और बलयुक्त प्रश्नलनको देखे तो कन्याकी प्राप्ति बालकको कर्तेहैं ॥३॥ पष्ठाऽयस्थ प्रश्नलग्नाधदीन्दुर्लग्नेक्रूर सप्तमेवांकुजः स्यात् । मूर्तीविन्दुःसप्तमेतस्यंभौमोरंडासास्यादष्ट संवत्सरेण ॥४॥ भा०टी०-प्रश्नलग्नसे षष्ठ ६ अष्टम ८ इनस्थानोमें चंद्रमा और लग्नमें क्रूर ग्रह होवै यह एक योगहै ॥१॥ वा प्रश्न . .
३
प्रकरणम् १
लग्नसे षष्ठ ६ अष्टम ८ इनस्थानोंमें चंद्रमा होय और प्रश्न
लग्नसे भी.सप्तम ७ स्थानमें मंगल होवे यह द्वितीय योग है
॥२॥ अथवा लग्नमें चंद्रमा और सप्तम ७ स्थानमें मंगल
होवे यह तृतीय योग है॥३॥फल इन्का ऐसे होनेसे आठ वर्षके
अंतर वह कन्या रंडा होती है ॥४॥
प्रश्नतनोर्यदिपापनभोगाःपंचमगोरिपुदृष्टशरीरः।
नीचगतश्चतदाखलुकन्यासाकुलटात्वथवामृतवत्सा५॥
भा०टी०-प्रश्नलग्नसे पापीग्रह अर्थात क्षीणचंद्रमा सूर्य मं-
गल शनैश्चर और इन्के साथ युक्त बुध यह पापीग्रह लग्न
पंचमस्थानमें होय और लग्नमे स्थितहो शत्रुग्रह उस्को
देखे ॥ वा नीचगत होय तो निश्चयसे वह कन्या व्यभि-
चारिणी वेश्या कुलटा होती है। अथवा मृतवत्सा अर्थात्
नारहणेवाली संतानवाली होतीहै ॥ प्रमाण वृहज्जातकका
पापी नीच उच्च ग्रहोमें यथा (क्षीणेद्वमहीसुतार्कतनयाः
पापा बुधस्तैर्युतः । अजवृषभमृगांगनाकुलीरा झपवणिजौ
च दिवाकराक्षितुंगाः ॥ दश १० शिखि ३ मनुयुक् २८
तिथी १५ न्द्रियांशै ५ स्त्रिनवक २७विंशति २० भिश्चतेऽस्त-
नीचाः) अर्थात् मेषके १० अंश सूर्य उच्च औं तुलाके १०
अंश नीच इसप्रकार वृषके ३ अंश चंद्रमाउच्च औ वृश्चिकके
३ अंश नीचं ॥ औमंगल मकरके २८ अंश उच्च औ कर्कके २८
अंश नीच औ कन्याके १५ अंश बुध उच्च औं मीनके १५
अंश नीच होताहै और बृहस्पति कर्कके ५ अंश उच्च
औ मकरके ६ अंश नीच ॥ शुक्र मीनके २७ अंश उच्च
औ कन्याके २० अंशनीच । शनैश्चर तुलाके २० अंश उच्च
औ मेषके २० अंश नीच होताहै ॥५॥
विवाहपद्धति भा. टी. यदिभवतिसितातिरिक्तपक्षेतनुगृहतःसमराशिगः शशांकः अशुभखचरवीक्षितोऽरिरंधेभवतिविवाह विनाशकारकोऽयम् ॥६॥ भान्टी-यदि लग्नग्रहसे कृष्णपक्षमेंसमराशिगत चंद्रमा होय और षष्ठ ६ अष्टम ८ इनस्थानमें स्थितहो पापी ग्रह देखे तो विवाहका नाशकर्नेवाला होताहै ॥६॥ जन्मोत्थंचविलोक्यवालविधवायोगविधाय्यव्रतं साविन्याउतपैप्पलंहिसुतयादद्यादिमांवारहः ।। सल्लग्नेऽच्युतमूर्तिपिप्पलपटैःकृत्वा विवाह स्फुटं दद्यात्ताञ्चिरजीविनेऽवनभवेद्दोपःपुनभूभवः॥७॥ भा०टी०-प्रश्नलग्नसे जैसे विधवा योग विचारा इसीप्रकार जातकशास्त्रसे जन्मलग्नसे उत्पन्न विधवा योग विचारकरे (जैसे लिखा भी है-बाल्ये विधवा भौमे पतिसंत्यक्तादि- वाकरेऽस्तस्थे । सौरे पापैर्टटे कन्यैव जरां समुपयाति) अन्य व (उत्सृष्टारविणाकुजेन विधवा बाल्येऽस्तराशिस्थिते) अर्थात् यदि मंगल स्त्रीके जन्मलग्नसे सप्तम स्थान स्थित हो तो स्त्रीको बालविधवा योग होता है यदि सप्तम स्थानमें सूर्य स्थितहो तो पति स्त्रीको त्याग देता है ॥ यदि कन्याकी जन्म कुंडली में शनैश्चर पापदृष्टियुक्त सप्तममें स्थि तहो तो कन्याही वृद्धहो जातीहै अर्थात विवाह नहीं होता और भी लिखाहै (लग्नेव्यये च-पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे। कन्या भर्तृविनाशाय भर्ता कन्याविनाशकः) अर्थात् जन्म- लग्न चतुर्थ सप्तम ७ द्वादश १२ अष्टम ८ इनस्थानों में .सदि.कन्याके मंगल होय तो पतिका नाशकर्ता है यदि प्रकरणम् १ पुरुषके इनस्थानोमें मंगल होय तो स्त्रीकानाशकर्ता है। इत्यादि योगोंसे अच्छीतरह बालविधवायोगको 'विचार आगे कहनाजो वैधव्यनाशक सावित्रीकाव्रतपिता कन्यासे विधिपूर्वक करवावें ॥ यदि भर्ताके स्त्रीनाशक और स्त्रीके भर्तानाशक योग पहा होय तो उन दोनोंका विवाह कर्ना श्रेष्ठ होता है और वैधव्यकारक योग नहीं रहता। इस्में दृष्टान्त यह है कि जैसे दोनो अंगार आपसमें युद्ध करें तो घातसे दोनोही निस्तेज हो जाते है औ सर्प दोनो युद्धकरे तो उस्की विष उस्को उस्की विप उसको नहीं बाधा की। और केवल स्त्रीकेही विधवायोग होय तो एकांतमें कन्याका पिता कन्यासे सावित्रीव्रत करवाय पश्चात् पिप्पलसे वा घट अथवा सुवर्णमयी विष्णुमूर्तिसे यथोक्त विधिसे विं. वाहकर पीछेसे चिरायुवाले वरसे विवाह करे तो पुनर्भूदोप नहीं होता।प्रमाणभी जैसे व्रतखंडमे लिखाहै(सावियादि व्रतादीनि भत्या कुर्वन्ति याः स्त्रियः। सौभाग्यश्च मुहत्वश्च भवेत्तासां सुसन्ततिः ) यह सब अष्टम प्रकरण स्त्रियोंके आचारमें अच्छीतरह आगे लिखाई ॥ ७ ॥ (अथ पिप्पलवत ज्ञानभास्करोक्त लिखतेहें) बलवद्विधवायोगेवाल्येसतिमृगीदृशाम् । पितारहसिकुर्वीततद्भङ्गशास्त्रसम्मतम् ॥ सुदिनेशुभनक्षत्रेचन्द्रताराबलान्विते । अवैधव्यकरोगलग्गग्रहबलान्विते ।। व्रतारम्भप्रकुर्वीतवालवेधव्यनाशकम् । सुनातांचित्रवसनांकन्यांपितृगृहादहिः॥ नात्वाऽश्वत्यशमीस्थानेयद्रावदरिकाश्रमे । .
विवाहपद्धति भा. टी. आलवालं प्रकुर्वीतयदिवामृदुकर्पितम् ॥ कुमा-चार्यनिर्दिकृत्वासंकल्पमादरात् । करकाम्बुप्रमाणेनसिंचनंप्रतिवासरम् ॥ चैत्रेवाश्विनमासेवातृतीयाऽसितपक्षतः। यावत्कृष्णतृतीयान्यामासमेकंयथाविधि ॥ ब्राह्मणानांतथास्त्रीणांपूजनंचसमाचरेत् । तदाशिपाप्नुयात्कन्यांसौभाग्यञ्चसुखान्वितम्॥ प्रतिमांपार्वतीनाम्नी वैणवेभाजनेऽर्चयेत् । चंदनाक्षतदूर्वाद्यर्विल्वपत्रैर्यथाविधि ॥ उपचारैर्यथाशक्त्यानैवेद्यैः प्रतिवासरम् । एवंत्रतप्रभावणवालवैधव्यनिष्कृतिः॥ जायतेकन्यकानाञ्चततः पाणिग्रहक्रियाः। इत्यश्वत्थव्रतविधानम् ॥ भाण्टी-भावार्थ यह है कि बलिष्ठ स्त्रीको विधवा योग पडनेसे एकांत स्थानमें पिताशास्त्रोक्त उस्काभंगवक्ष्यमाण शुभदिन शुभनक्षत्रों में करे ॥ कन्याको स्नान करवाय वस्त्र- भूषण पहनाय घर (गृह ) से बाहिर (अश्वत्थ ) पिप्पल के स्थानमें कन्याको साथ ले पिप्पलकी आलवाल ( आढ) चारो तरफ कर कन्या संकल्पपूर्वक जो चतुर्थप्रकरणमें लिखा। प्रतिदिन जलसे सिंचन करे फिर चैत्र वा आश्विन शुक्कतृतीयासे कृष्णतृतीयापर्यन्त ब्राह्मण और स्त्रियोंका कन्या पूजनकर उन्के आशीर्वाद कन्या ग्रहण करे । और सुवर्णपात्र में पार्वतीजीको षोडशोपचार वक्ष्यमाणसे पूजन है करे इस व्रतके प्रभावसे कन्यौंका बालवैधव्य योग नाश होता है पीछेसे चिरायुवाले वरसे विवाह देवे॥
प्रकरणम् १
(अथ अश्वत्थविवाहविधिःसूर्यारुणसंवादोक्तोलिख्यते ॥)
सुहृद्विजगुरून्नारीमङ्गलोचारणैः समम् ।
आहूयोराहकालेचरम्यभूमौचमण्डपे ।
गत्वाप्रणम्यगौरीश्चगणनाथंचभूरुहम् ।
भवानींचैवमन्थानीपितामंत्रमुदीरयेत् ॥
उद्वाहयिष्येविधिवदश्वत्थेनमनोहराम् ।
कन्यांसौभाग्यसौख्यार्थहेतवेऽहंद्विजोत्तमाः ।।
नमस्तेविष्णुरूपायजगदानंदहेतवे ।
पितृदेवमनुप्याणामाश्रयायनमोनमः ॥
पूर्वजन्मकृतंपापंवालवैधव्यकारकम् ।
नाशयाशुसुखंदेहिकन्यायाममभूरुह ।। इति ।।
भा०टी०-भावार्थ यह है कि अश्वत्यव्रतके अनंतर मित्र
द्विज गुरु स्त्री मंगल शब्दके साथ विवाहकालमेंइन सर्वको
साथ लेकर सुंदर मण्डपभूमिमें प्राप्त होय गौरी गणेश पि-
प्पल भवानी मंथानी इन्को प्रणाम कर इस मंत्रसे प्रार्थना
कन्याका पिता करे। हे ब्राह्मणगण! आपके प्रत्यक्ष सौभाग्य
सुख अर्थके लिये अपनी कन्याको अश्वत्थके साथ विवाह
कर्ता हे जगवआनंद हेतु विष्णुरूप औ पितर देव मनुप्यों-
का आश्रय इस अन्धत्यको वारंवार नमस्कार कर साथ
प्रार्थना कर्ते है भो अश्वत्थदेव पूर्वजन्मकृत जीवालवैधव्यका
रक पाप इन्को नाश करो और मेरी कन्याको मुग सौभाग्य
देवो ॥ इति ॥ यह प्रार्थनाके मंत्र हैं और विवाहविधि
वक्ष्यमाण यथावत,मंत्रोंसे कनी चाहिये।
विवाहपद्धति भा० टी०
( अर्थ कुम्भविवाहः सूर्यारुणसंवादे ॥)
विवाहोक्तेनमंथन्याकुम्भेनचसहोद्हेत् ।
विवाहात्पूर्वकालेतुचंद्रताराबलेशुभे॥
पितासंकल्प्यवाह्यञ्चविवाहविधिपूर्वकम् । .
सूत्रेणवेष्टयेत्पश्चाद्दशतन्तुविशेपेतः।
कुंकुमालंकृतंदेहंतयोरेकान्तमन्दिरे॥
ततःकुम्भंविनिस्सार्यप्रभज्यसलिलाशये ।
ततोऽभिपेचनंकुर्यात्पञ्चपल्लवपारिभिः ।। .
तत्सर्ववस्त्रपूजाद्यब्राह्मणायनिवेद्यच ॥
कन्यालंकारवस्त्राचंब्राह्मणायनिवेदयेत् ॥
प्रार्थना।
वरुणांगस्वरूपत्वंजीवनानांसमाश्रय॥
पतिनीवयकन्यायोचिरपुत्रान्सुखंवरम् ।।
देहिविष्णुवरानन्दकन्यांपालयदुःखतः ।।
इतिकुम्भविवाहः।
भाण्टी-भावार्थ यह है कि विवाहके प्रथम शुभदिनमें
विवाहोक्तविधिसे मन्धनी कुंभसे संकल्पपूर्वक विवाह करे
पीछेसे दशतंतुसूत्रसे वेष्टन कर कुंकुम (केशर) लगाय
एकान्तमें फिर कुंभको निकाल सलिलस्थानमें प्रक्षेपकर
(फैक) पंचपल्लवसे अभिषेक कन्याको करे अनंतर संपूर्ण
कुंभपूजनकी सामग्री ब्राह्मणको दे कन्याकेभी वखभूषण
"१ दशवन्तुविधानत इत्यपिपाठः।
९
१
प्रकरणम् १
ब्राह्मणको देवे ॥ और वरुणकी प्रार्थना करे हे जीवनके
आश्रय वरुणस्वरूप घट कन्याके पतिको चिरंजीवी करी
हे विष्णो कन्याकी पालना कर सुख सौभाग्यको देवो ॥
इति । इस प्रकार सुवर्णमयी चतुर्भुज विष्णुकीमूर्ति बनाय
विवाह कर यथावत् विधिसे ब्राह्मणको मूर्ति देवे ॥ दानका
प्रकार जैसे वहांही लिखाहै यथा ।
शुभेमासेसितेपक्षेसानुकूलग्रहेदिने ॥
ब्राह्मणंसाधुमामंत्र्यसंपूज्यविविधाहणैः॥
तस्मैदयाद्विधानेनविष्णोर्मूर्तिचतुर्भुजाम् ॥
शुद्धवर्णसुवर्णेनवित्तशत्त्याथवापुनः॥
निर्मितांरुचिरांशंखगदाचक्राब्जसंयुताम् ॥
दधानांवाससीपीतेकुमुदोत्पलमालिनीम् ।।
सदक्षिणांचतांदद्यान्मंत्रमेतमुदीरयेत् ।
यन्मयापूर्वजनुपिघ्नन्त्यापतिसमागमम् ॥
विपोपविपशस्त्रायैर्हतोवातिविरक्तया ॥
प्राप्यमानमहाघोरंयशःसौख्यधनापहम् ॥
वैधव्यायतिदुःखौघनाशायसुखलब्धये ॥
महासौभाग्यलब्ध्यैचमहाविष्णोरिमांतनुम् ।।
सौवर्णनिर्मितांशत्त्यातुभ्यंसैप्रददेद्विज ॥
अनघात्वहमस्मीतित्रिवारंप्रवदेदिति ॥
एवमस्त्वितिविपाशीर्गृहीत्वास्वगृहविशेत् ॥
ततोवैवाहिकंतातोविधिकुर्यान्मृगीदृशाम् ।।
इतिविष्णुप्रतिमादानविधिः॥
. विवाहपद्धति भा० टी० भा०टी०- सानुकूल ग्रहदिनमें ब्राह्मणको बुलाय सुवर्ण- निर्मित चतुर्भुज शंख चक्र गदा पद्म युक्त पीतवस्त्र वन- माला सहित साथ दक्षिणाके प्रतिमा देय यह मंत्र पढे कन्या की जो मैंने पूर्वजन्ममें पतिसमागम नाशकर्नेसे वा विप उपविष शस्त्रसे पतिको मारा उससे उत्पन्न जोवैधव्य योग उसके नाशके लिये और सुख प्राप्तिके लिये यह सुव- र्णमयी महाविष्णुकी मूर्ती हे ब्राह्मण! तुमको दान कर्ती हूं इससे मैं पापरहित भई यह तीन वार कहे एवमस्तु ऐसे ब्राह्मण वाक्यके अनंतर गृहमें आवे तब पिता वरक साथ मंगल शब्द पूर्वक विवाह करै ।। शास्त्रार्थ । यदि कोई महाशय शंका करे कि विष्णुमूर्ति कुंभपिप्पल इन्मेसे एकके साथ विवाह कर फिर द्वितीयवार मनुष्यके साथ विवाह कर्नेसे पुनर्भूदोष स्त्रीको होना चाहिये ।।उस्का उत्तर यह है कि जो एक मनुष्यके साथ विवाह कर फिर द्वितीय पुरुषके साथ विवाह किया जाय वह स्त्री पुनर्भू कहलाती है । इस्में हम प्रमाण देते हैं याज्ञवल्क्यस्मृति अध्याय १प्रथम (यथा-अक्षताच क्षता चैव पूनर्भूःसंस्कृता पुनः) अर्थात् पतिके मरजाने पर वा जीवतपर जो फिर दूसरे मनुष्यसे संस्कृत विवाही जाय वही पुनर्भू होती है। यदि पिप्पलादि विवाहके अंनंतर मनुष्यके साथ विवाह होनेसे पुनर्भूदोष है तो याज्ञवल्क्यजीने अक्षताच क्षता यह शब्द किसलिये कथन करा (ऐसे लिख देना था कि पूनर्भूः संस्कृता पुनः) और अक्षता च क्षता इन शब्दोंके अर्थ मिताक्षरा में यह लिखा है पति अक्षत हो अर्थात् जीवत प्रकरणम् १ ११ हो वा (चक्षता) क्षतही अर्थात् मरगया हो।फिर संस्कार कर्नेसें पूनर्भू संज्ञा होती है । इसलिये पिप्पल देवादि विवाहसे पुन दोष नहीं है हम औरभी प्रमाण देते हैं कि जो, घटादिविवाहसे पूनर्भूदोष न हो.॥ प्रमाण विधान व्रतखंडका जैसे (स्वर्णाम्बुपिप्पलानाञ्च प्रतिमा विष्णुरूपि- णी । तयासह विवाहेच पूनर्भूत्वं न जायते । अन्यच्च लक्ष्मी रूपासदा कन्या हरिरूपं सदा जलम् । हरेर्दत्तञ्च यदानंदातुः पापहरं सदा।।अर्थ सुवर्ण घटं पिप्पलकी प्रतिमामूर्ति विष्णु- रूप होती है इन्के साथ विवाह कनेसे पून दोप नहीं होता।। और लक्ष्मी सदेव कन्या हरिरूप सदैव जल होता है।इसलिये विष्णुको जो दान दिया जाय वह यजमानके पाप नष्टकर्नेवाला होताहै। इसलिये इन्के साथ विवाह "कर्नेसे पुनर्भूदोष नहीं प्रत्युत (किञ्च) कन्याका वैधव्यना- शक है। और वेदमेंभी सोम, सूर्य, अग्नि पालनकर्नेसे स्त्रीके रक्षक लिखे हैं। और चतुर्थ मनुप्य पति लिखाहे यथा (सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविदउत्तरः। तृतीयो अ- ग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः ) इस मंत्रका अर्थ विस्तार पूर्वक आगे विवाहप्रकरणमें लिखाहै । यदि कोई महाशय अबभी यह आक्षेप करे कि जो वस्तु. एकको दानकरे वा भोगनेके लिये दीजाय फिर यदि वही वस्तु दूसरेको भोग- नेके लिये दी जाय तो वह उच्छिष्ट (जूठ) होती है और उच्छिष्टका सर्वत्रही निषेध है। इस लिये प्रथम विष्णु घट वा पिप्पलको स्त्री दी फिर वही मनुष्य के साथ विवाह दी तो वह भी उच्छिष्ट भई इस लिये मनुप्यको स्वीकार कर्नी नहीं चाहिये। उत्तर महाशय मित्रवर आपने युक्तिसे फिर भी वही दोप उच्छिष्ट मान कर लगाया महो आप बड़े निपुण हो और अति चंचलमुद्धि है परंतु आपको , विनयपूर्वक हम यह कहते है कि आप उच्छिष्टका त्याग. A '१२ विवाहपद्धति भा० टी० सर्यव कर्नेहो या आपके पूर्व पूर्व पुरुषोंने किया जैसे मधु (शहत) (दुग्ध) यहभी उच्छिष्टही है यह आप किस लिये भक्षण का हो और श्राद्धादि कमांसे मधुवातादि मं- त्रौंले मधुपित्तरीके अर्पणकत होवा नहीं।बस अब चुपहोगये भला जरासा तो कहिये वस अब नहीं कहेंगे निरुत्तरभये अच्छा अपने प्रश्नका तो उत्तर श्रवण कोजिये महात्मन् जैसे मधुमक्षिकासे दुग्ध वत्ससे कमल भ्रमरोंसे उच्छिष्ट भयाभी देवपितृकर्म में आता है और जगतको पंचगव्यादिसे पवित्र कर्ता है उसीमकार विष्णु घट पिप्पलसे संस्कृत स्त्रीमतुप्यके साथ विवाह कर्नेके अनंतर पुत्रपौत्रादिसंतानसे शुभलोक- की प्राप्ति और इसलोकमें सुख देती है यथा(याज्ञवल्क्यस्मू- तिमें लिखा है अध्यायः १ लोकानत्यं दिवामाप्तिः पुत्रपौत्र- प्रपौत्रकैः। यस्मात्तस्मानिया सेव्याकर्त्तव्याश्च सुरक्षिताः इति ॥) और विधानखंडमेंभी लिखा है यथा ( यथालिनु- क्तकमलं देवानां पूजनायवै ॥ अहं भवति सर्वत्र तथा कन्या तृणां भवेत् ॥.) इस लिये भास्कराचार्य मथानीसे कन्याका विवाह यत्नसे कती भया । और रेणुक महर्षि अश्वत्यसे कन्याका विवाह का भया ।प्रमाण अभिधानखण्डका जैसे (मन्यन्या भास्करी यत्नात्कृतवान्दहितविधिम् ॥ रेणुकोपि स्वकन्यायास्तरुद्वाहं चकारसः) इसलिये पुत्रवत कन्याकीभी-जन्मकुण्डली सर्व महाशयजनोंको अवश्य ब- नानी चाहिये। यदि कर्मानुसार जिस्के योग पडाहो उस्का शास्त्रोक्त उपाय करानेसे शांति होजाय तोसुखहो।हत्यलम्॥ प्रश्नलमक्षणेयाशाऽपत्ययुक्वेच्छयाकामिनीतब चेदावजेत् । कन्यकावासुतोवातदापण्डितैस्तादृशा पत्यमस्याविनिर्दिश्यते॥
प्रकरणम् १
१३
भाण्टी०-प्रश्नकालमें जैसी संतानयुक्तस्त्री अपनी इच्छासे
उसस्थान आजाय ॥ वा कन्या वा बालक बुद्धिवान् ज्यो-
तिषी तादृश उस्की संतान कहै । अर्थात् जैसी स्त्री कन्या
बालक प्राप्त होय वैसेही उस्को स्त्री पुत्रादिक मिलते हैं।
शङ्खभेरीविपंचीरवैर्मगलंजायतेवैपरीत्यंतदालक्षयेत् ।
वायसोवाखरश्वाशृगालोपिवाप्रश्नलग्नक्षणेरौतिनादंयादि ।
भाण्टी-शंख दुंदुभी वीणा सतारका शब्द प्रश्नकालमें
शुभ होता है । और काक श्वान गर्दभ शृगाल यह प्रश्नका-
लमें शब्द करे तो निषिद्ध अशुभहै ।.
अथराशिमेलनम् ।
वरस्यपंचमेकन्याकन्यायानवमेवरः।
एतत्रिकोणकंग्राह्यपुत्रपौत्रसुखावहम् ।
मरणंपितृमात्रोश्वसंग्राह्यनवपंचकम् ।
पडप्टकेभवेन्मृत्युर्यनंतस्याविचारयेत् ।
टी०-वरकी राशिसे कन्याकी राशि पंचम ५ होय
कन्याकी राशिसे घरकी राशि नवम ९ होय तो यह वि-
कोण शुभ है। यदि विपरीत हो कन्यासे ५ में वर वरसे९
कन्या हो तो मातापिताकी मृत्यु कहै । इसलिये राशिको
विचारले ॥
अथवलम् ॥
वरस्यभास्करपलंकन्यायाश्चगुरोपलम् ।
द्वयोश्चंद्रबलंयायविवाहोनान्यथाभवेत् ।।
विवाहपद्धति भा० टी० अष्टमेचचतुर्थेचद्वादशेचदिवाकरे। विवाहितोवरोमृत्युप्राप्नोत्यवनसंशयः॥ जन्मन्यथद्वितीयेचपंचमेसप्तमपिवा । नवमेचदिवानापूजयापाणिपीडनम्॥ एकादशेतृतीयेवापष्ठेवादशमेपिवा । -वरस्यशुभदोनित्यंविवाहेदिननायकः॥ भाण्टी-वरको सूर्यका बल कन्याको बृहस्पतिका बल , दोनोंको चंद्रबल ग्रहणकर्ना अन्यथा विवाह नहीं होता अर्थात् इन्की शुद्धिविन विवाह शुभ नहीं होता।यदि व- रको अष्टम ८चतुर्थ ४ द्वादश १२ में सूर्य होय तो विवाह- से वर मृत्युको प्राप्त होता है इसमें कुछ संशय नहीं है । यदि सूर्य जन्मका १ वा द्वितीय पंचम ५ सप्तम ७ नवम ९ सूर्य होय तो पूजासे विवाह होता है अर्थात् पूजनीय है। यदि सूर्य ११ एकादश ३ तृतीय ६छठे १० दशमें होय तो वरको अतिशुभ होता है। अटमेद्वादशेवापिचतुर्थेवावृहस्पतौ। पूजातवनकर्तव्याविवाहप्राणनाशकः॥ पटेजन्मनिदेवेज्यतृतीयेदशमेपिवा । भूरिपूजापूजितःस्यात्कन्यायाःशुभकारकः ॥ एकादशेद्वितीयेवापंचमेसप्तमेपिवा । नवमेचसुराचार्य कन्यायाः शुभकारकः ॥ मा०टी०-वृहस्पत्तिाशाहोतोशुभ नहीं पूजामत करो। यदि ६।१३।१। वृहस्पति होतो बहुत पूजा कर्नेसे शुभ' कर्ता है। यदि वृहस्पति ११॥५॥७॥९॥ होतो क. * प्रकरणम् १ न्याको शुभ होता है। इसी प्रकार चंद्रमा १।४।६।८। १२ स्थानमें शुभ-नहीं विशेषकर इन्को देखना योग्य है । अथविवाहनक्षत्राणि। विश्वस्वातीवैष्णवपूर्वाचयमैत्रैर्वस्वाग्नेयाकरपीडो चितऋः । वस्त्रालंकारादिसमेतैःफलपुष्पैस्सन्तो प्यादौस्यादनुकन्यावरणहि ॥ भा०टी०-अब कन्याका वरण लिखते हैं ज्येष्ठा स्वाती श्र- वण पूर्वात्रय अनुराधा धनिष्ठा कृत्तिका अंथवा पाणिग्रहणो- चित नक्षत्रों में फल पुष्प वस्त्रालंकारादिसे कन्याको संतुष्ट- कर पीछेसे वरण करे॥ धरणिदेवोऽथवाकन्यकासोदर शुभदिनेगीतवाद्या दिभिःसंयुतः ॥ वरवृतिवस्त्रयज्ञोपवीतादिभिर्छ वयुतैर्वत्रिपूर्वात्रयैराचरेत् ।। भा०टी०-अथ बालक वरण लिखते हैं। ब्राह्मण वा कन्या- का भ्राता (भाई) शुभदिनमें गीतादिवाद्यसहित होय व- स्त्रयज्ञोपवीतादिसे । उत्तराफाल्गुनी । उत्तराभाद्रपदा । उत्त- रापाढा ।रोहिणी । कृत्तिका। पूर्वाफाल्गुनी । पूर्वाभाद्रपदा। पूर्वापाढा इन नक्षत्रोंमें वरका वरण करे । इस प्रकार वर वरण कर पीछेसे कन्याको वस्त्रालंकारादि श्वशुरगृहसे जो प्राप्त उससे पूर्वोक्त नक्षत्रोंमें वरण कर्ना ॥ गुरुशुद्धिवशेनकन्यकानांसमवपुपडब्दकोपरिष्टात् । गविशुद्धिवशाच्छुभोवराणामुभयोश्चंद्रविशुद्धितीविवाहः।। भा०टी०-गृहस्पतिजीकी शुद्धिसे कन्याका पद ६ व.
विवाहपद्धति भा० टी० के ऊपर अष्टम ८ दशम १० समवर्षमें विवाह शुभ है। ' और सूर्यकी शुद्धिद्वारा वरका विवाह श्रेष्ठ है और वर कन्या दोनोंका चंद्रमाकी शुद्धिसे विवाह शुभहोता है भावार्थ यह है कि कन्याकी जन्मराशिसे गुरु औ वरकी जन्मराशिसे सूर्य और दोनोंको चंद्रमाजीकी शुद्धिसे श्रेष्ठ विवाह होता है। इसी आशयको काशीनाथजी कहतेहैं।(वरस्य भास्क- रवलं कन्यायाश्च गुरोर्बलम् ॥ द्वयोश्चंद्रबलं पाह्यं विवाहो नान्यथा भवेत् ॥) मिथुनकुम्भमृमालिवृपाजगोमिथुनगोपिरवौत्रिलवेशु चिः । अलिमृगाजगतेकरपीडनंभवतिकार्तिकपौ पमधुप्वपि॥ भाल्टी-मिथुन कुंभ मकर वृश्चिक वृष मेष इन राशि- यों में सूर्य होय अथवा आषाढके १० दशदिन पर्यंत मिथुन राशिगत सूर्य हो वा वृश्चिक मकर मेषगत सूर्य होय तो कार्तिक पौष चैत्रमें भी पाणिग्रहण शुभ है। आद्यगर्भसुतकन्ययोयोर्जन्ममासभतिथौकरग्रहः। नोचितोथसबुधैःप्रशस्यतेचेद्वितीयजनुपो सुतप्रदः॥ भा०टी० आद्यगर्भ प्रथमगर्भ अर्थात ज्येष्ठ पुत्र वा कन्या होय तो उन दोनोंका जन्मके मासमें वा जन्म तिथिमें अ- थवा जन्म नक्षत्र में पाणिग्रहण श्रेष्ठ नहीं यदि वह दोनों दूसरें गर्भके होय तो जन्ममास तिथि नक्षत्र में विवाह पुत्रके देनेवाला है। ज्येप्टद्वंद्रमध्यमसंप्रदिष्टंत्रिज्यैष्टंचैनैवयुक्तंकदापि ॥ केचित्सूर्यवह्निगंप्रोक्तमाहुर्दैवान्योन्यज्येष्ठयोःस्याद्विवाहः।।
॥ प्रकरणम् १ भा०टी०-ज्येष्ठ बालक ज्येष्ठकन्याका विवाह मध्यम होता है यदि ज्येष्ठका महीना (मास) ज्येष्ठ बालक ज्ये- ष्ठाही पान्या यह तीन ज्येष्ठ किसी कालमेंभी श्रेष्ठ नही अति निषिद्ध है। कई आचााँका यह मतहै की जिसका- लपर्यंत कृत्तिकामें सूर्य हो उतना काल ज्येष्ठमास नि- षिद्ध है ॥ परंतु सिद्धांत मत यही है वरकन्या ज्येष्ठोंका आपसमें विवाह श्रेष्ठ नही॥ सुतपरिणयात्पण्मासान्तःसुताकरपीडनंनचनिजकुले तद्रामण्डनादपिमुण्डनम् ॥नचसहजयोयेभ्रात्रोस होदरकन्यकेनसहजसुतोदाहोदार्धेशुभेनपितृक्रिया ॥ भा०टी०-पुत्रविवाहके अनंतर षण्मास ६ के बीच में क- न्याका विवाह शुभ नहीं ॥ इसप्रफार अपनी कुलमें मंडन (विवाहकर्म)के पीछे मुंडन(चूडाकर्म)पट्६महीने के अन्तर श्रेष्ठ नहीं और एकपिताके दो पुत्रोंको दोभ्राताकी कन्यासे सहोदर(सगे) भाइयोंका विवाह शुभ नही। यदि एक पि- ताकीदो कन्या होय तो एकपिताके दो पुत्रोसे विवाह का दोष नही॥ सहोदर शब्दका यह अर्थ है कि एकमाता के गर्भसे नाहो और एकपित्तासे सपत्नी में उत्पन्न भ्राता सहो- दर नहीं कहाते ॥ प्रमाण ( समानोदर्य्यसोदर्य सगर्यस्तु सनाभयः इत्यमरः) और वालक फन्याकेविवाह के अनंतर षट् मास ६ पर्यन्त पितृक्रिया श्राद्धादि शुभ नहीं है। वध्यावरस्यापिकुलेत्रिपूरुपेनाशवजेत्कश्चननिश्चयो त्तरम् । मासोत्तरंतत्रविवाहइप्यतेशान्त्यायवासूतक निर्गमेपरे ।।
१८ विवाहपद्धति भा० टी०
भा०टी०-वधूवरके तीनपुरुपमें यदि निश्चयके अनंतर कोई
नाशको प्राप्तहो जाय एक मासके अनन्तर विवाह करे ।
अथवा कूष्मांड शांतिफर विवाह करे । कोई आचार्य सूतक
पातककी निवृत्तिके अनंतर कहते हैं ॥यदि कन्यादान हो
चुकाहो फिर सूतक पातकपडेतोभोजनादि सर्व विवाहांग
कनेका दोप नहीं।
चूडात्रतंचापिविवाहतोत्रताच्चूडाचनेप्टापुरुपत्रयान्त
रे। वधूप्रवेशाचसुताविनिर्गमः पण्मासतोवान्दविभे
दतःशुभः॥
भाण्टी-विवाहसे चूडाकर्म चूडाकर्मसे विवाह पण्मासके
बीच श्रेष्ठ नहीं इसप्रकार वधूप्रवेशसे कन्याका निर्गम
६ षट् मासके अन्तर श्रेष्ठ नहीं। यदि वर्षका भेद होयतो
दोप नहीं। विवाहमें सूर्यसंक्रान्तिसे वर्षका भेद होताहै ।।
॥ अथविवाहमुहूर्तानि ॥
निधैःशशिकरमूलमैत्रपित्र्यवाह्मांत्योत्तरपवनैः
शुभोषिवाहः। रिक्ताऽमारहिततिथोशुभह्निवैश्वप्रां
त्यांनिश्रुतितिथिभागतोऽभिजित्स्यात् ॥
भा०टी०-वेधरहित मृगशिर हुस्त मूल अनुराधा मघा
रोहिणी रेवती उत्तरात्रयं ३ स्वाती यह नक्षत्र विवाहमें शु-
भहैं ॥ चतुर्थी ४ नवमी ९ चतुर्दशी १४ अमावस ३० इनसे
रहित तिथीयाँ श्रेष्ठहैं । विवाहमें चंद्र बुध बृहस्पति शुक्र
यह वार शुभ होतेहैं । उत्तराषाढाका अंतका चरण श्रव-'
णकी ४ चारघटी अभिजित् नक्षत्र होताहै । और राशि
वर्ण योनि गण पडाष्टक नवपंचक द्विादश राशिनाडी
प्रकरणम् १ १९ चक्रवर्ग लत्तादिकदश १० दोष अवश्य विचारणे योग्य इस लिये सारणी बनाकर सबकी समझमें आनेवालीअति- सुगम रीतिसे आगे लिखेहैं । अथ राशिचक्रम् ॥ सिंह १ मकर पूचतुप्पद तुला कुंभ नरद्विपद मेप वृप मिथुन कन्या मीन पराई वृश्चिक कर्क मकर जलचर . कीटसंज्ञक पुरुपकी राशि स्नीकी राशिसे बली उचित है ओर सम्पूर्ण चतुष्पद द्विपदोंके वश्य, सिंहके विना ॥ जल चरभक्ष्य हे सर्प पिछु भयदायक है। अथ वर्ण चक्रम् ॥ मीन वृश्चिक, कर्क ब्राह्मण मेप सिंह धन क्षत्री वरस्यवर्णतोधिकावधूनश त्यतेबुधः । अर्थात्परके वर्णसे अधिक वधू श्रेष्ठ नहीं वरका वर्ण कन्यासे अधिक श्रेष्ठ है. वृप मकर कन्या वश्य मिथुन कुंभ तुला शूद्र अश्व घोडामहिप सिह गज छाग मदा . २० विवाहपद्धती भा० टी० अथ योनिचक्रम् ॥ अश्वि, स्वा०, धनि.भरणी पुष्य श्रवण उरपा मृग नक्षत्र नी । हस्त'पू भा रेवती, कृत्ति पू पा अभि रोहिणी वानरानकुल सर्प योनयः ज्येष्ठा मुला श्लेषा मघा चित्रा, उफा अनु. आर्द्रा पुनर्व.पूफा विशा उभा मृग श्वान विला चूहा व्याघ्र गौ। भैसामन्च भनयोर्वेर । अनयोवर | अनयोः अनयोचरं.. योनिवरं वैर वैर वैर वैर यह योनिचक्र विवाहमें सेव्यसेवक भावमें मैत्रीकार्य में अवश्य विचारणा चाहिये. अथ गणचक्रम् ॥ छ । ज्ये मूला। शत कृत्ति चि । वि पु फा पू पा पू भा उ फाउ पा उ भा रोहि । भर आर्द्रा मनुष्य अनु पुन | मृ । श्र | रेव स्वा ह | अश्वि पुष्य देवता अपने गणके साथ परमप्रीति देवता मनुप्योंकी सम देवता राक्षसोंका युद्ध मनुप्य राक्षसकी मृत्यु गणोंकी आपसमें होती है। अथ पडटकचक्रम् ॥ मे वृप मि कर्क सि क पुरुपराशि मृत्युः का तु । वृच च. म । कुं स्त्रीराशि मृत्युः अथ नवपंचकचक्रम् ॥ मे वृमिक सि क कुं अन्योन्यपुरुपसंतानहानि सिक तु वृधम मिथु स्त्रीराशिकीकलि होतीहै म राक्षस प्रकरणम् १ २१ अथ द्विादशचक्रम् ॥ मे | वृमि कर्क | सिं क वृ म मी दारिद्य वृमि कक सिंक तुध कुं| मे दारिद्यं मृत्युःपडप्टके ज्ञेयोऽपत्यहानिर्नवात्मजे। द्विादशेनिर्द्धनत्वंद्वयोरेन्यत्रसौख्यकृत् ।। अथनाडीचक्रम. .. दम्पत्योरेकनाड्यांपरिणयनमसन्मध्यनाड्यांहिमृत्युः । अर्थात् स्त्रीवरका एक नाडीमें स्थित नक्षत्रोंमें विवाह अ- शुभ होताहै और मध्यम नाडीमें मृत्यु होतीहै । इसलिये तृतीय नाडी शुभ है अथ वर्गचक्रम् ॥ गरुड विडाल सिंह श्वान सर्प मूपिक मृगमेंढा अ॥ क च ट त यश ख फ राप ग द घ झ ध वाह भ अपने वर्गमें परम प्रीति होती है और अपने वर्गसे पंच- म वर्ग शव होताहै और चतुर्थ मित्र औ तृतीय उदासीन होताहे इन्का फल वर्ग सदृशहै. प shra भ म ण न ૨૨. विवाहपद्धती भा० टी० अथ राशिस्वामिचक्रम् । मि वृमि क सि क तु वृधम कुं मी राशयः में शुबु च सूबुशुम श श स्वामिनः अथ राशिचक्रम। मे | मि क सिं क तु ध म कुं. मी चुइ का हि म टोरा तो ये भोज गु दि चे उकि हुमि परिन यो जजे गे दु चो ए कु हे मु पि रु | नि भ जिजो गो भ लाओ व हो मे पुरे नु भि खिख सझ लिवा ङ डा मो परो ने भू खू सि थ लु वि छ डिटा ण. ता नो घ खे सु दे लेबु के हु टिठति या फा खो से दो लो वे को डे टु पे तु यि ढाग सोच अवो हा डो टेपो ते युभे गि द चि अथ लत्ताचक्रम्। सूर्य । चद्र मगल बुध शुक्र शनि विचाहनक्षत्र पू.पा पूभा। भर मधा उभा पुष्य शत रोहि कृ पूफा रेवती से সূমাহায় रौ पुष्य वि चि अश्विनी आर्द्रा मघा ज्येष्टा पुन वि भरणी पुण्य पूफा मुल हस्त पुष्य स्वाती अनुराधा अनु पूभा चि धनि उफा स्वा। मू उत्तराषाढा स्वा पूपा दशमृ उपा कृ उत्तराभाद्रपदा वि उभा पभा आश्र रेवती उपाउभा उभा मृ ज्य पूभा कृ मृ आ मघा उत्तराफा पु अनु उपा घ पूफा वा ध उफाउपा पूभा आ पुप्य म विपभा चि भ मू पु पुप्य पूपा
२३
.
प्रकरणम् १
यह लत्तादोष विवाहादि शुभकायों में जित है. वि-
शेषकर मालव देशमें अवश्य वर्जनीय है।
अथ पातदोपचक्रम् ।
वैधृति हर्पण व्यतीपात | शूल | गंड | योगानाम्
अन्ते विवाहनक्षत्रं यथा गंड योग १५ घटी रेवती ३०
वा २५ घटी पातेन पतितं नक्षत्रं विवाहे वयं कुरु
जांगलदेशे अवश्यं वय॑म् ॥
अथ युतिदोपचक्रम्।
चं.स.च.म. चं चं चं शु च गचं ग युति
। दारघ्यं मरणं | शुभ सौम्य सापत्न्य मृतिः। मृतिः फलं
वेगग्यं
अथ वेधचक्रम् ।
रा. म. म. ठफा. ह. स्वा. न. म. उ.पा./उ.भा. रव. विवाह न.
भि. उ.पा. रे. उ.भा.ग. भ. प. म. ह. ट.फा.सूर्यादयः
अथ चरणवेधचक्रम् ।
न.प्र.अ.प्र.नक्षत्रके प्रथम पादमें ग्रहको विवाह नक्षत्रक चतुर्य),
३पादका वैध है विवाहमें सर्व दशम धवयं दे अत्याव
श्यकम चरणवेध घजनीय है।
अथ यामिवनक्षत्रचक्रम् ।
रा. म.म.उ.फा. ह. । स्वा.अनु.म. ट.पा. टि.भा.र. चि.न
तु. ज्ये.ध.प.भा.उ.भा.वि. कृ. म. ए. | उ.फा.. ग्रहा।
लग्नसे चंद्रमासे सप्तम ग्रह यामित्रकारक होताहे अथवा
लग्न नवांशसे वा चंद्रराशिस्थ नवांशसे पंचपंचाशत् ५५
नवमांशमें जो ग्रट टोय वट यामियकारक होता ठाभ
नहीं होताई ॥
.
१
विवाहपद्धति भा० टी० अथ वुधपंचकचक्रम् । ८. रोग. भक. घाण वति. राजा. चौर, मृत्यु. । शुक्ल प्रतिपत्से गततिथि लगसे युक्त कर नौसे भागले शेष रहा अंक वाण जानना ॥ यह दक्षिण देशमें निषिद्ध है- अथ सर्वदेशे बुधपंचकम् ०८ {s: रोग वन्हि राज चौर । मृ यु । वाणः ५ दिने ०२ ०४ ०२ १० सर्यसंक्रांतिमें इन दिनों में २० वाण है। २४ ૨૮ सूर्य शनि मंगल बुध_इन दिनाम ततमे गृह मृप यात्रा विवाहमे इन कायाम वर्जित है। गोपमें सवा रात्रिम दिनमे। दिनमे रात्रिम संध्यामे एकागलचक्रम् व्या. गड़. । व्यति. | वि०. शूल, वैधृति. । वज्र. परि. | तिग यदि सूर्यनक्षत्रले विवाहनक्षत्र विपमाभिजित सहित स्थित हो तोएका गल योग कुरुवारहीक देशमेवर्जित है. अथोपग्रहाः १९ ।१५। १८२१ २२ २३ २४ २५ यदि सूर्यनवस इन अंकाम विवाहनक्षत्र होय तो उपग्रह दोष होता ।।।
प्रकरणम् १ (अथ क्रांतिसाम्यम् ) मे. मी. कुं. च. वृ. म.सू. घ. मि. क. सि. क. तू. अर्थात् चंद्रमा सूर्य अन्योन्य नक्षत्रगत होय सन्मुख स्थित होय तोक्रांतिसाम्य दोष होताहै विवाहमें शुभनहीं होता ।। ( अथ दग्धातिथि) मातोम. ४ मीन. प. मप. कन्या. वृश्चिमकर, चैत्र । जैष्ट. विशाय भाश्विन मार्गशी. माघ. १० ૧૨ धन. फुभ. कर्क. मिथु. सिह तुला. पीप. फाल्गुन श्रावण आपाढ. भादा, कार्तिक १२ ६ ८ दग्धातिथि मासाम .४ ६ ८ दग्धातिथि यह शुभ काम दग्धातिधी वर्जित॥
विवाहपद्धती भा० टी० (अथ दशयोगाः ) सूर्य चंद्र नक्षत्र योगः३७ शेषः ।। ६ १० ११ १५/१८ ऽग्नि नृप चौर मृति रोग वन्न ०० ४ ०२ नि वात वाद क्षिति यथा सूर्यक्ष श्रवण २२ चंद्र धनिष्ठा २३ अनयोर्योगा४५ भशेषः २७ सप्तविंशतितष्ट: १८ वज्रपातयोगःn (अथ पंग्वंधकाणलग्नानि ) म मे वृमि कके सिक तू वृ कुं भी अंध अध अंध अंध अंध अंध बधिर धि. बधिर वधिर पंगु पंगु दिन दिन रात्रि रात्रि दिन राधि अप अप अप | संध्या सं० सं० में | में में में में में राहमें राहेराहे में यह गौड मालव देशमें त्याज्यहै अथवा गुरुदृष्टिसे कि सी स्थानमें भी दोष नही है ! (अथ ग्रहनैसर्गिकमैत्रीचक्रम् ) ग्रहाः सूर्य चंद्रमा मंगल बुध वृहस्पति शुक्र शनि मं०० सूर्य च० वृ०) सूर्य सूर्य बुध शुक्र चं० बुध सूर्य शुक्र मं०० शनि बुध वृ०० शुक्र मं० श० मंगल ठा०म० शनि सूर्य शनि शुक्र शान बुध सूर्य सू०चं० धुध चं० मंगल सम | मित्र . वृहस्पति गृहस्पति चंद्रमा शुक्र शत्रु प्रकरणम् १ २७ प्रोक्तदुष्टभकूटकेपरिणयस्त्वेकाधिपत्येशुभो ऽथोराशीश्वरसौहृदेपिगदितोनाडयक्षशुद्धियदि ॥ अन्यझेशपयोर्वलित्वसखितेनाडयक्षशुद्धौतथा ताराशुद्धिवशेनराशिवशताभावेनिरुक्तोबुधैः ॥ भाण्टी-दुष्टभकूटमेंमी विवाह शुभ होताहै यदि दोनों- राशिका स्वामि एकहो अथवा दोनोंकी आपसमें मैत्रीहोय। (अथलगशुद्धिमाह) कार्मुकतौलिककन्यायुग्मलवेझपगेवा ॥ यहिभवेदुप यामस्तर्हिसतीखलुकन्या ॥व्ययेशनिःखेऽवनिजस्तृ तीयेभृगुस्तनौचंद्रखलानशस्ताः।लग्गेटू कविग्लौश्च रिपौमृतौग्लौर्लग्नेट शुभाराश्चमदे च सर्वे ॥ व्यायाप्ट पट्सुरविकेतुतमोर्कपुत्राख्यायारिगःक्षितिसुतोद्विगु णायगोब्जः ॥ सप्तव्ययाप्टरहितौज्ञगुरू सितोप्टत्रि द्यूनपव्ययगृहान्परिहत्यशस्तः॥ त्याज्यालग्नेव्ध योमन्दात् पप्ठेशुक्रंदुलग्नपाः । रंध्रेचंद्रादयःपंचसर्वे स्तेऽब्जगुरूसमौ ॥ भा०टी०-धन तुला कन्या मिथुन मीन इन लग्नों में वा इनके नवमांशेमें विवाह होवे तो कन्या सती होतीहै। और चरलग्नका नवांश न होवे तुला मकरमें चंद्रमा होवे तब चरलग्न भी शुभहै । और लग्नसे द्वादश १२ स्थानमें शनि दशमे १० मंगल तृतीय ३ शुक्र लग्नमें १ चंद्रमा मंगल श- नि सूर्य शुभ नहीं होते हैं। पाठ ६ स्थानमें लग्नेश शुक्र चंद्र- मा शुभ नहि ॥और अष्टम८ स्थानमें चंद्रमा लग्नेश युध य. तिन मंगल.काम नहीहै । और सप्तम ७ स्थानमें
२८ विवाहपद्धती भा० टी०
संपूर्णग्रह शुभ नही होतेहैं । अन्यच्च तृतीय ३ एकादश ११
अष्टम ८ पष्ठ ६ स्थानमें सूर्य केतु राहु शनि श्रेष्ठहैं और तृ-
तीय ३एकादश११ पष्ठ ६ स्थानमें मंगल शुभ और द्विती-
य र तृतीय ३ एकादश ११ स्थानमें चंद्रमा शुभहै ७१ १२ ॥
८।३।६। इनस्थानके विन और स्थान बुध गुरु शुक्र शुभ
है। अन्यञ्च ॥ लग्नमें शनि सूर्य चंद्र मंगल यह नहोय और
पष्ठ स्थानमें शुक्र चंद्रमा लग्नेश न होय और अष्टम स्था-
नमें चंद्रमा मंगल बुध बृहस्पति शुक्र नहोय । सप्तम स्था:
नमें कोई भी ग्रह न होय अर्थात शुद्ध होवे तो शुभहै कई
आचार्य सप्तम स्थानमें चंद्रमा वृहस्पतिको सम कहते हैं।
(कर्तरीदोपमाह) .
लग्नात्पापावृज्वनृजूरिष्फार्थस्थौयदातदा ॥
कर्तरीनामसाज्ञेयामृत्युदारियशोकदा ॥
भाण्टी-लग्नसेद्वितीयस्थान वक्रीग्रह और द्वादश १२
स्थानमें मार्गी ग्रह होय तो कर्तरीदोष होताहै। शुभनही।
(पुटिमाह)
त्रिकोणेकेंद्रेवामदनरहितेदोपशतकहरेत्सौम्यःशु
कोद्विगुणमपिलशंसुरगुरुः ॥ भवेदायेकेन्द्रंगपउतलवे
शोयदितदासमूहंदोपाणांदहनइवतूलंशमयति ॥
भाण्टी-विवाहलग्नसे नवम पंचम प्रथम चतुर्थ दशम
यदि बुध होय तो शत १०० दोषका नाश कर्ताहै यदि शुक्र
होय तो द्विगुणशत २०० दोषका नाश कर्ताहै बृहस्पति जो
होय तो लक्ष १००००० दोषका नाश कर्ताहै यदि एकादश
११ चतुर्थ सप्तम लग्न दशम स्थानमें यदि लग्नेश ऊन नवमां-
शेश होय तो दोपोंके समूहको जैसे अग्नि तूलके पुंजको
क्षणभरमें नाश कर्ताहै तद्वत् नाश कर्ता है ।
प्रकरणम् १ २९ (अथसंकीर्णजातीनांविवाहः) कृष्णपक्षसौरिकुजार्केपिचवारेवय॒नक्षत्रेयदिवा स्यात्करपीडा । संकीर्णानांतर्हिशतायुःखलुलाभः प्रीतिप्राप्तिःसाभवतीहस्थितिरेपा॥ भा०टी०-कृष्णपक्षमें शनैश्चर मंगल सूर्य वारमें और विवाहमें वर्जित नक्षत्रोंमें यदि संकीर्ण शबर किरात नि- षाद भिल्ल पुलिंद म्लेच्छ यवन प्रभृतियोंका विवाह होय तो आयु सुत प्रीतिका लाभदायक होता है । (अथगोधूलीलग्नमाह) पिण्डीभूतदिनकृतिहेमन्तौस्यादर्धास्तेतपसम येगोधूलिः । संपूर्णास्तेजलधरमालाकालेधायो ज्यासकलशुभेकाऱ्यांदौ॥ भा०टी०-जब नक्षत्रादिक शुद्धि न होय तब गोधूली समय सर्वकार्य में शुभ होताहै जैसे मार्गशिर पॉपमें जब पिंडाकार सूर्य होय तोगोधूली समय हाताहै (फाल्गुन माघ मेंभी इसीप्रकार) और (चैत्र वैशाख ज्येष्ठ आपाढमें ) अर्द्ध- सूर्य जब होय तव गोधूली समय होताहै । और श्रावण भाद्रपद ( आश्विन कार्तिकमें) संपूर्ण सूर्य अस्त होने पर गोधूलीसमय होताहे यह सर्व कार्यमें श्रेष्ठहै ॥ (अथवप्रवेश) समाद्रिपंचांगदिनविवाहाद्वधूप्रवेशोप्टिदिनांतराले । शुभःपरस्ताद्विपमान्दमासदिनेक्षवात्परतोयथेष्टम् ।। भा०टी०-विवाहदिनसे ।२।४।५।६।७1८1९1१०॥ १२॥ १४ । १६ । दिनमें इस्के ऊपर विपम वर्षमें वा मासमें विवाहदिनसे ५ पंचवर्प उपरत यथेच्छ प्रवेश करे ।
३० विवाहपद्धती भा० टी० ध्रुवक्षिप्रमृदुश्रोत्रवसुमूलमघानिलेवधूप्रवेशःसन्नेप्टोर ताराङबुधेपरैः॥ भाण्टी०-हस्त अश्विनीपुष्य अभिजित् उत्तरायरोहिणी मृगशिर चित्रा अनुराधा श्रवण धनिष्ठा मूल मघा स्वाती इन नक्षत्रोंमें वधूप्रवेश श्रेष्ठ है और चतुर्थी ४ नवमी ९ चतु- दशी १४ यह तिथि न होय और मंगल सूर्य बुध इन वा- रोंके विना वधू प्रवेश शुभहै ।। (अथ द्विरागमनमुहूर्तः) चरेदयोजहायनेपटालिमेपगेरवौरवाज्यशुद्धियोगतः शुभग्रहस्यवासरे ॥ नृयुग्ममीनकन्यकातुलावृपेवि लग्नगेद्विरागमंलघुध्रुवेचरेस्रपेमृदूडुभिः ।। भा०टी०-विवाहकालले विषमवर्ष अथवा विषममाल कुंभ वृश्चिक मेपगत सूर्य होय और मिथुन कन्या तुला मीन वृप यह लग्नहोय और सूर्य बृहस्पति शुद्धहोय शुक्र बृहस्प- ति चंद्र बुध इन दिनों में और हस्त अश्विनी पुप्य अभिजित उत्तरात्रय स्वाती पुनर्वसु श्रवण धनिष्ठा शतभिषा मूल मृगशिर रेवती चित्रा अनुराधा इन नक्षत्रों में द्विरागमन शुभ होताहे॥ अथ स्त्रीणां भूपणघटनमुहूर्तम् ॥ .बिपुष्करदिनमें स्वाति पुनर्वसु श्रवण धनि शत. हस्त. अश्विनी पुप्य अभिजित् उत्तरा ३ रोहिणी यह नक्षत्र होवे ४। १४ । ९ तिथिविना मंगलवारविना वार तिथि शुभहे ॥त्रिपुष्कर योग २१७॥ १२ तिथिमें शनि मंगल सूर्यवा- रोंमें विशाखा उ० फा० पुनः कृ० पूर्वाभा उत्तराषाढा नक्ष- ग्रहों ।। इन तीनोंसे विपुष्कर योग होताहे ।। k ३ प्रकरणम् १ अथ कर्णवेधः कन्यानां नासिकावेधः ।। ६।७।८.मासमें विषम वर्षमें चतुर्मास विना श्र० ध० पुष्य मृ०२० चि० अनु० ह० अश्वि० पुन० अभि० इन नक्ष- त्रोंमें ।। शुभ वारोंमें ॥ जन्मका मास रिक्तातिथि अवमति- थिजन्मताराके विना अष्टम शुद्धहो । ११४१७१ १०९।५। इन्में शुभ ग्रहहों।६।११। ३ पापीहो।२।७।९। १२ लग्नमें वृहस्पति हो तो कर्णवेध श्रेष्ठहै । नासिका वेध विशेष उत्त०३श० स्वा० शुक्लपक्ष पूर्वाह चं० चु० बृ० शु० वार शुभ होतेहैं । नत्थनीभी उक्त मुहूर्तमें पावें ॥ (अथ शुक्रविचारमाह) दैत्येज्योपभिमुखदक्षिणेवदिस्याद्गछेयुर्नहिशिशुगर्भि णीनवोढा ॥ बालश्चेद्रजातिविपद्यतेनवोढाचेद्वंध्या भवतिचगर्भिणीत्वगर्भा॥ भा०टी०-यदिशुक्रजी सन्मुख वा दक्षिण भागमें स्थित होय तब बालक गर्भिणी नवीन युवती यह तीन न जाय यदि बालक यात्राकरे तो मृत्युको प्राप्त होताहे और यदि गर्भवती स्त्री जाय तो गर्भरहित होती है अर्थात् गर्भ नव जाताहै और यदि नवीन युवती यात्राकरे तो वंध्या हो- जातीहै । और वामांग पृष्टमें शुक्र श्रेष्ठ होताह यात्रामें।। (अथापवादमाह) नगरप्रवेशविपयाधुपद्रवेकरपीडनविबुधतीर्थयात्र योः॥ नृपपीडने नववधूप्रवेशने प्रतिभार्गवोभवति दोपकृन्नहि ।। पित्र्ये गृहे चेत्कुचपुष्पसंभव विवाहपद्धती भा० टी० स्त्रीणां न दोप-प्रतिशुक्रसंभवः । भृग्वंगिरोवत्सव सिप्टकश्यपात्रीणां भरद्वाजमुनेःकुले तथा॥ इति श्रीदेवज्ञाऽनंतरामसुतविरचिते मुहूर्तचिंतामणौ वि वाहंप्रकरणं समाप्तम् ॥ भा०टी०-अपने नगरमें एकगृहसे द्वितीयगृह में प्रवेश- कर्ना होवे अथवा देशभंग वा राजभंग होय और विवाहमे अर्थात विवाहको मुख्य रख यात्रामें और देवयात्रा पंच- क्रोशी आदि तीर्थ यात्रा गंगादि और नवीन वधूके आग- मनमें सन्मुख शुक्र दोपकारक नहि होता प्रमाणभी जैसे वादरायणका (स्वभवनपुरप्रवेशे देशानां विभ्रमे तथोद्वाहे। नूतनवध्वागमने प्रतिशुक्रविचारणं नास्ति ॥ एकग्रामे पुरे वापि दुर्भिक्षे राजविप्लवे । विवाहे तीर्थयात्रायां प्रति शुको न दुप्यति) और कई आचार्य दीपमालाके अनंतर प्रतिपत्- में आगमनसे शुक्रकासन्मुख दक्षिण दोष नहि कहते ॥ प्रमाण (अस्तंगते गुरौ शुक्र सिंहस्थे वा वृहस्पती ॥ दीपो- त्सवदिने चैव कन्या भर्तृगृहं विशेत् ॥) यदि कन्याके पित- गृहमें कुच पुप्पका संभव हो अनंतर विवाह कर्नेसे शुक्रका दोप नहि होता प्रमाण चंडेश्वरका (पिन्यागारे कुचकुसुम- यो संभवो वा यदि स्यात्पत्युः शुद्धिर्न भवति सफला से- वितुं स्वामिसन ॥) और भृगु अंगिरा वत्स वसिष्ठ कश्यप अघि और भरद्वाज इनके कुलमेंभी शुक्रकृत दोप नहि होता ।। इतिश्री गौतम गोय (शोरि) अन्वयालंकृत श्रीदे- वज्ञ दुनिचन्द्रात्मज कर्पूरस्थलनिवासि पण्डित विष्णुदत्त वैदिक संगृहीत विवाहमुहूर्त तत्कृतटीका समाप्तिमगात् ।। समाप्तमिदं प्रथम प्रकर्णम् ।शुभमस्तु कुलदेव्याःप्रसादात् ।।
३३ अथाहितीयप्रकरणं. अथयथार्थ गृहचित्र. पूर्व. कूप स्थान ग्रह मंथनरह ईशा अमि देवस्थान पाक प्राज्य स्थान सर्वधाम भाण्डारगृह योषष उत्तर | दक्षि अंगनभूमि शयनस्थान पुरीयोत्सर्गस्थान मस्व स्थान धान्य रोदन | भोजनस्थान विद्याभ्यास रह चाय पाश्रम अभाचे यथाशक्या समादिक वीक्ष्य युद्ध गृहं विधेयमिति॥ मंडपचित्र- जामा हलचतुष्टय वेदि १६। कन्याहसषोडश कौतुम स
३४
विवाहपहति भाटी.
अथतिलक नाममण्डलचित्रम्.
कुभ
पूर्व
वायु
६४ यो
भु
१६ मावा
ब्रसा
काल
A.
मस
विष्णु
प
ने
डिनीयप्रकरणम्.
अथ पंचाग्निकुंडचित्रम्.
१
आहब नीयकुण्ड आवसथ्यकुंर सभ्यकुण्डम् ३ गार्हपत्यकुण्ड ४
दक्षिणाभिकुण्डमिति ५ ब्रह्मासनं. यजमानासनम्.
आज्यस्थाली १ अथपात्रापामाकृतयः
चरस्थालीर
पणीनापात्र३ पुरोडाशपात्र
विवाह पद्धतिभा टी.
सुप५
उपभन्सुर ६
ध्रुरासुक्५
पुष्करलुक
८
अग्निहोत्रहवनी ९
पैकडूतनुप १०
उखलए
मुसलं२२
शूर्पम् १३
द्वितीयकरणम्.
१४ शम्या
१५ स्पय.
शतावदानं१६ / उपवेप:(१७)
कूर्च१८
१९६पत्
२०उपल
२१ षड़त
A
२२ अधि
२३ अरणि
२४ उत्तरारति ||२५मोपिली.
विवाहपद्धतिभा दी
२७ नेत्रम्.
२६ प्रमन्थ.
२८ अंतर्धानकर-२ हविर्धानपात्री ३ याशिवहरणं
३१ चमसा
३२ इडापात्री ||३३यजमानासन ||३४ पल्यासनं
३५ होत्रासन
द्वितीयप्रकरणम्.
३९
३६ ब्रह्मासनम्
३७ यजमानस्यपात्री
३८ पत्नीपात्री.
३९ कृष्णाजिनम् .
विवाहपद्धतिभा टी.
सर्वतोभद्र.
m
नादीमुखवाद उपवाहके प्रथम करना चाहिये । नादीश्राद प्रापि
पर या अन्य ग्रंथान्तरसे देरसलें
प्रकरणम् २ ४१ यज्ञपात्राणि कात्यायनसूत्रे-ऋचोयजूपिसामा निनिगदामन्त्रास्तेपांवाक्यं निराकाङ्क्षं मिथः से बद्धं-वैकङ्कतानिपात्राणिखादिरःसुवः स्फ्यश्चपाल शीजुहूराश्वत्थ्युपभृद्वारणान्यहोमसंयुक्तानि बाहुमा व्यःनुचःपाणिमात्रपुष्करास्त्वग्वालाहसमुखप्रसेक मूलदण्डाभवन्त्यरनिमात्र नुवोऽङ्गुष्ठपर्ववृत्तपुष्करः स्पयोऽस्पारकृतिसदकृति प्राझिमहरपंचपसा कृति वा चात्वालोत्करावस्तरेणसञ्चर प्रणीतोत्क राविष्टिपु ॥३॥ विस्तरस्तुतत्रैववासंस्कारभाष्ये द्रष्टव्यः॥ विस्तरभयानलिखितम् ॥ विवाहप्रकरणे येपांप्रयोजनंतेपांप्रमाणपुं० ३३ आरभ्य ४० पर्यंत पत्रोपरिलिखितमन्यान्यादर्शमात्राणि ॥ ॥ इति श्री दैवज्ञदुनिचंद्रात्मजविष्णुदत्तसंग्रहतिगृहमण्डपपात्र चिन्हंनामप्रकरणसंप्रमाणंसमाप्तम् ॥ शुभम् ॥ श्रीः॥ (अथ विनियोगवर्णन) व्याख्यालिख्यते ॥ विदित होकि आगामि सर्वमंत्रोंका साथ विनियोग दिखायांजावेगा इसलिये प्रथमपिनियोग- कि पुष्टि कहें कि विनियोग उस्को कहते हैं कि ऋषि छंद दे- वताओंका स्वर कर्ममें योजन करना अर्थात् इस मंत्रका यह ऋपि और यह देवता अमुक छेद इन्का यथार्थ ज्ञानको ५
४२
विवाहपद्धति भा० टी०
विनियोग कहते हैं और विना विनियोगके मंत्र सिद्धिको
प्राप्त नहीं होता इसकारणसे विनियोगकी आवश्यकता है
ऋषि किनको कहते हैं-(द्रष्टारे ऋषयः) अर्थ मंत्रद्रष्टा ऋषि
होते हैं जैसे इस मंत्रका गोतम ऋषि वा भरद्वाज वा आने
रस इत्यादि ऋषि है वहां समझना कियह मंत्र इस ऋषिको
अपने तपोवलसे प्रत्यक्ष स्मरण भया उस्को निश्चय गुरुसे'
कियाथा फिर वही मंत्र वेदसे सदृश मिलनेसे वह ऋषि उ
स मंत्रका भया कि इसने प्रथम मालूम किया ॥१॥ और
देवता उन्को कहतेहैं (स्मारः परमेष्ठयादयः) अर्थात् जैसे
ब्रह्माने अमुक वेदका स्मरण किया विष्णुने अमुक स्मर
णकरा इसप्रकार रुद्र इंद्र अग्नि सूर्य चंद्रादि जिस २ मंत्रों
को स्मरण कर्तेभये वह उनर के देवताभये॥२॥ अब छंद लि-
खते हैं (छन्दांसि गायत्रीप्रभृतीनि) अर्थात् गायत्रीसे आदि-
लेकर मंत्रोंक छंद होतेहैं अब छंदोंको यथावत् लिखते हैं
किजो वेदमंत्रोंके हैं ।उक्ता १ अत्युक्ता २ मध्या ३ प्रतिष्ठा
४सुप्रतिष्ठा ५ गायत्री ६ उष्णिक ७ अतुष्टुप् ८ बृहती ९
पंक्ति १०. त्रिष्टुप् ११ जगती १२ अतिजगती १३ शक्करी
१४ अतिशकरी १५ अष्टि १६ अत्यष्टि १७ धृति १८
अतिधृति १९ प्रकृति २० आकृति २१ विकृति २२ संस्कृ-
ति २३ अभिकृति २४ उत्कृति २५ यह छंदसंख्या है।
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प्रकरणम् २ ४३ . . Ro ४८८ १२ १११० २०२४ २८ ३२ १० ११ १२ गायत्री उष्णि अनुष्टुप् बृहती पंक्ति त्रिष्टुप् जगती १८ २०२२ २४ ५४६०६६/७२ ९ अथ गायत्र्यादिछन्दोभेदाः॥ ८ ३२ १६ २८ २. १२ २१ ४२ २४ १५ १२ १८ छन्दः प्राजापत्या) .८ आपी आसुरी दैवी याजुपी सानी आर्ची ब्राझी mihow 28 86 86 M miolour इसप्रकार सम्पूर्णछन्दोंके अनेक भेद है विस्तारके भयसे लिखते नहीं एक गायत्री छन्द उदाहरण मात्र दिखलादि याहै जिनमहाशयोंको और भेद देखने की इच्छाहो वह सभाप्य पिंगलसूत्र छंदशास्त्रसे देखलेवे ।। श्रीः। इति श्रीदै- वज्ञदुनिचंद्रात्मजपण्डितविष्णुदत्तकृतऋपिछंददेवतावर्णनं नाम द्वितीयं प्रकरणं समाप्तम् ।। इति द्वितीयं प्रकरणम् ।
विवाहपद्धति भा. टी. ओस्वस्तिश्रीगणेशायनमः ॥ श्रीगुरवेनमः ॥ अथ कात्यायनीशान्तिप्रयोगः ॥ आदौगणपतिवन्देविघ्न नाशंविनायकम् । ऋपीश्चदेवजननींग्रहस्थापनमा रभे॥१॥ भाण्टी-श्रीगुरुचरणसरोज नत्वा गणपत्यादिदेवांश्च ।। कात्यायनकृतशान्तेः कुर्वेनृभाषयाटीकाम् १ काव्यकलापे कुशलाः सन्तियद्यपिसर्वभूदेवाः॥सर्वजनसुखाप्तिहेतो क्रि- यतविष्णुदत्तेन ॥ २॥ श्रीविघ्नविनाशक विनायक गणप- तिजीको तथा ऋपियोंको देवजननी दुर्गाजी अथवा आदि- तिजीको वंदन कर प्रथम ग्रहों की यथावत स्थितिका प्रारंभ करते है । देवजननी इस शब्दले लक्षणद्वारा ब्रह्मा विष्णु रुद्रादि देवता और ब्रह्मविद्याका ग्रहण होताहै ॥ मण्डलंचततः कृत्वा सर्वतोभद्रमेवच । व्रतोपनयने चूडेयत्रशांतिरुदाहृतां ॥२॥ विवाहादौलिखेन्नित्यंति लकनाममण्डलम् ।द्वादशाङ्गुलमध्यस्थवर्तुलाप्टदलर विम्॥३॥चन्द्रमदलिखेत्तत्र ह्याग्नेय्यां चतुर्विंशतिः॥ त्रिकूटंभूसुतंचैवदक्षिणेचतुरंगुलम् ॥ ४॥ धनुपाका रंनवाड्मुल्यमीशानेचबुधंतथा ॥ उत्तरेचगुरुःस्थाप्यः पद्माकारोनबाडुलः ॥५॥ पूर्वसंस्थापयेच्छुक चतु कोणनवांगुलम्।खड्गाकृतिनवाडल्यं प्रतीच्यांशनिमे वच॥शनिब्रत्याराडंसंस्थाप्यमत्स्याकारंनवांगुलम्।। केतुंदीयथाराहुंवायव्यांदिशिसंस्थितम् ॥७॥स्व स्वदिक्षुग्रहाःस्थाप्या संख्या रेखाभवध्रुवम् । भा
प्रकरणम् ३
स्करांगारकौरक्तौ श्वेतौ शुक्रनिशाकरौ ॥८॥ सों
मपुत्रोगुरुश्चैवउभौतौपीतकौस्मृतौ । कृष्णवर्णीभ
वेत्सौरीराहुकेतूचधूम्रकौ ॥९॥ ब्रह्माविष्णुश्चरुद्श्च
उत्तरेचतथाऽनलः ॥ इंद्रोवायुभवेत्पूर्वेसर्पकालौच
दक्षिणे ॥१०॥ऐशान्यांकलश स्थाप्य ओंकारादी
श्वसर्वशः । मातरश्चोत्तरेस्थाप्याआग्नेय्यांयोगिनी
न्यसेत् । कनिष्टिकाप्रमाणेनरेखा कार्या प्रयत्न
तः ॥ ११ ॥ स्थूलाः सूक्ष्मानकर्तव्यायदीच्छेच्छ्रे
यआत्मनः॥१२॥ इतिग्रहस्थापनम् ॥ -
भा०टी०-व्रतमें उपनयन चूडाकर्म तथा जहां शांति हो
वहां सर्वतोभद्र मण्डल रचना चाहिये, विवाहमें तिलकनाम
मण्डल लिखे ॥ यह मंडलका चित्र पीछे लिखा है इस लिये
अर्थ सुगम होनेसे लिखते नहि । तथापि सूर्य मंगल यह
रक्त वर्णसे लिखे बुध गुरु पीतवर्णसे शुक्र चंद्र श्वेत. और
कृष्णवर्णसे शनि राहु केतु धूम्रवर्ण लिखे व यदि कल्याण
की ईच्छा हो तो ना अति सूक्ष्म और ना स्थूल लिखे ॥
इति नवग्रहस्थापनविधानम् ॥
अथ स्वस्तिवाचनम् ॥
हरि ओम् शुकृयजुर्वेदअध्याय २५ क०मंत्र १५
स्वस्तिनु इन्द्रौद्ध श्रीवास्तुस्तिनापू
पाविश्श्ववेदाह। स्तुस्तिनुस्ताक्ष्योऽय
रिष्टनेमिः स्वस्तिनोवृहस्पतिर्दधातु ॥१॥
विवाहपद्धति भा० टी० यजु० अध्याय ३५॥ मंत्र ३६ -पय-पृथुिझ्याम्पयु ऽओपंधीपुपयौदि व्यन्तरिक्षेपयौधार । पय॑स्वती प्रदि श: सन्तुमहयम् ॥२॥ शु० यजु ० अध्याय मंत्र २१॥ विष्णोरराटमसिविष्ण्णो नप्त्रैस्स्थो विष्ण्णो र स्यूरसि विष्ण्णौर्बुवोसि । वै एण्णुवर्मसि विष्ण्णवेत्त्वा ॥३॥ यजु० अध्याय १४ मंत्र२०॥ अग्गिर्दैवतावातौदेवतासूर्यो देवताच न्द्रमादेवतावसवो देवता सुद्रादेवता दित्त्यादुवांमुस्तदेिवता विश्वेदेवादे बताबृहस्पतिवतेन्द्रौदेवता बरुणोदे वता ॥४॥ यजु० अध्याय ३६ मंत्र १७॥ द्यौशान्तिरन्तरिक्षठशान्ति पृथिवीशा M ४७ प्रकरणम्-३ न्तिरापुत्शान्तुिरोपंधयुत्शान्ति वनस्प तयुत्शान्तिर्विश्वेदेवा शांतिब्रहमशा . न्ति सर्वशान्ति शान्तिरेवशान्ति सामाशान्तिरेधि ॥५॥ यजु० अध्याय ३० अनुवाक १ मंत्र ३ विश्वानिदेवसवितर्दुरितानिपरासुव । यद्धद्वन्तन्न आसुंव ॥६॥ यजु० अध्याय १६अनुवाक ७मंत्र४८ इमारुद्राय॑तुवसैकपर्दिनैक्षयवीरायुप्रभ रामहेमती ॥ यथा शमसद्विपदेचतुष्प्प देविश्व॑म्पुष्टय़ामैऽअस्म्मिन्ननातुरम्णा यजुर्वेद अध्याय २ मंत्र १२ एतन्तदेवसवितर्यज्ञम्प्राहुबृहस्पतयेत्रु ह्मणे । ते यज्ञमवतै युज्ञपतिन्तेनमार्मव८॥ यजुर्वेद० अध्याय ३ मंत्र १३ मौजूतिर्नुपतामाज्यस्युबृहस्पतिर्दा
विवाहपद्धति भा. टी.
ज्ञमिमंतनोत्त्वरिष्ष्टश्यज्ञर्छसंमिमन्दधा
तु । विश्वेदेवासऽऽहमादयन्तामोध
तिष्ठ ॥ एपवैप्रतिष्टानाम यज्ञोयत्रतेनय
नियुजन्तेसर्वमेव प्रतिष्ठितंभवति ।ॐ३म्
यजुर्वेद अध्याय २३॥ मन्त्र १९॥.
गुणानान्त्वा गुणपतिर्छ हवामहेप्रिया
णान्त्वाप्रियपतिठेहवामहे निधीनान्त्वा
निधिपति : हवामहे वसोमम । आहम
जानिगkधमात्वमजासिग धम् ॥
शुक्लयजु अध्याय १६ मंत्र २५॥
नौगणेभ्योगुणपतिभ्यश्चवोनमो नमो
बातेभ्यो ब्वातपतिभ्यश्ववो नमोनमा
गृत्संभ्योगृत्संपतिभ्यश्चवो नमोनमो
विरूपेभ्योविश्वरूपेभ्यश्चवोनम ॥
ओसुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गर्जेकर्णकः । लंबो
दरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥धूम्रकेतुर्गणी
ध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । द्वादशैतानिनामानियः
यह मंत्र ब्राह्मणका।।
प्रकरणम् ३ पठेच्छृणुयादपि ॥ विद्यारंभेविवाहेचप्रवेशेनिर्गमेत था। संग्रामसंकटेचैवविघ्नस्तस्यनजायते ॥ श्रीगण पतयेनमः॥इति स्वस्तिवाचनम् ॥ भाटी०-यह स्वस्तिवाचनका अर्थ आगे विवाहप्रकर- णके आदिमें लिखाहै इस लिये पिष्टपेषण नहि कर्ते॥(म- नोजूति इस्का)(अर्थ.) अति वेग युक्त मेरा मन आज्यको सेवन करे इस यज्ञको वृहस्पतिजी विस्तृत करे तथा अरि- ष्टको तथा इस यज्ञकी पुष्टि करे। और विश्वेदेवा १३ नाम देवगण इहां आनंदसे मग्न होवे वामदयुक्त होवे ।। (सुमुख चेति ) यह १२ द्वादश गणेशजीके नाम विद्याके प्रारंभ तथा विवाहमें प्रवेशनिर्गम संग्राम संकट अर्थात् जहां भी- तिहो वहां लेनेसे विघ्नादि सर्व उपद्रव शान्त होतेहैं इस लिये आदिमें गणपतिपूजन यथोक्त करना चाहिये । ततःसंकल्पः॥ ओतत्सदद्यब्रह्मणोद्वितीयपराद्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जंबूद्वीपेभरतखंडे, आर्यावर्तेवर्तमानकलियुगप्रथम चरणेवैवस्वतमन्वंतरे अष्टाविंशतिमेकलियुगेऽमुक ऋतौअमुकमासेऽमुकपक्षेऽमुकतिथौअमुकवासरान्वि तायाममुककरणनक्षत्रयोगयुक्तायां श्रुतिस्मृतिषु राणोक्तफलावाप्तिकामः धर्मार्थकाममोक्षार्थमनोभि लपितप्राप्तयेअमुकगोत्रो ऽमुकशर्मा ऽहममुकक मनिमित्तककात्यायनीशान्तिकारप्ये ।। तनिर्विघ्नप रिसमाप्तयेगणपतिपूजनंचकरिप्ये इति ॥
विवाहपद्धति भा० टी०
भाटी-संकल्पमें यथावत् संवत्सरादिनामादि उच्चारण
कर्ने चाहिये । और शर्मके स्थान क्षत्री वर्मा यह पद कहे
और वैश्य गुप्त यह पद कहै ॥ प्रमाण. (शर्मवाह्मणस्थ वर्म
क्षत्रियस्य गुप्तेति वैश्यस्य) गृह्यसूत्र । १ कांडमें।
अथगणपतिपूजनम् ॥ ॐगणानांत्वागणपति ठ
हवामहेइतिमंत्रेण । भूर्भुवः स्वः भगवनगणपति
दैवतइहागच्छइहतिष्ठ सुप्रतिष्ट वरदोभवममपूजांग
हाण ॥ पाद्यादिभिरर्चयेत् । भगवन्गणपतिदेवएत
त्पाद्यादिभिगधाक्षतादिभिश्चपूजितःप्रसन्नोभव ॥ पु
नः। वक्रतुंडमहाकायकोटिसूर्यसमप्रभ । अविघ्नंकु
रुमेदेवसर्वकार्येषुसर्वदा॥ इति । अथपंचोपचारपूज
'नम्।।आवाहयाम्यहंदेवमोंकारंपरमेश्वरम्।त्रिमात्रंत्र्य
क्षरंदिव्यंत्रिपदंचत्रिदेवकम् ।त्र्यक्षरंत्रिगुणाकारं सर्वा
क्षरमयंशुभम् । व्यणप्रणवहसंसप्टारंपरमेश्वरम् ।।
अनादिनिधनदेवमप्रमेयंसनातनम् ।। परंपरतरंवीज
निर्मलंनिष्कलंशुभम् ॥
भाल्टी०-गणानांत्वा इस मंत्रसे गणपतिका पूजन करे
और प्रार्थना करे हे भगवन् गणपति देव इहां आओ और
बैठो बरको देवो और पूजाको ग्रहण करो ॥ पाद्य अर्च
आचमनीय इत्यादिसे आगे लिखे षोडशउपचारसे पूजन
करे । इस प्रकार ओंकारके मंत्रोंसे ओंकार पूजन कर्ना।
शुक्लयजुर्वेद अध्याय २२ अनुवाक ७ मंत्र २२
ॐआब्रह्मन् ब्राहमणोब्रह्मवर्चसीजाय
प्रकरणम् ३ तामाराष्ट्रराजन्य-शूरैइपुढ्योतिव्याधी महारथो जायतान्दोग्धी धेनुर्षोढान डानाशुःसप्तिपुरंन्धिोपाजिष्ण्णूरथे ष्ठात्सुभेयोयुवास्युयजमानस्यवीरोजा यतान्निकामेनिकामनःपुजन्यौवपतुफ लवत्त्योन ओषधयत्पच्च्यन्ताश्थ्योगक्षे. मोन कल्पताम् ॥ भा०टी०-( मंत्रार्थ ) हेब्रह्मन् हे ब्रह्माजी आप कृपासे यज्ञको करना कराना पढना पढाना दाल ले देना इत्यादि पट्कर्म करनेवाले और ब्रह्मतेजवाल ब्राह्मण होमे ॥ और हमारे राष्ट्रमें क्षत्री व्याधि कातर- तासे रहित शूरवीर महारथ इस यजमानके हो और इस यजमानकी दुग्ध देनेवाली गौऊ होमे और शीघ्र गमनवाले घोडे और सुंदर रूपवाले होमे ॥ और पुरुष रथमें बैठनेवाले युवान सभा योग्य इस यजमानके संबंधि पुत्रादि होमे और हमारी प्रार्थनासे दृष्टि हो और फल युक्त, औषधीयां पके हमारेको योगक्षेम होवे ॥ अथ रक्षाविधानम् ॥ शुकृयजु अध्याय ३ मंत्र ३० ।। ॐमानुत्शर्टसोअररुपोधूर्ति प्रणमत्यं स्य । रक्षाणोब्रह्मणस्पते ॥
विवाहपद्धति भा० टी:
यजु० अध्याय ३४ मंत्र ६२॥
ॐयदावन्द्वन्दाक्षायुणाहिरण्यशुतानी
कायसुमनुस्यमानानातन्मुआवनाम
शुतारदायाऽऽयुष्माजुरदंष्टिर्यथा
संम् ॥ इतिपठन् ॥ .
- भाल्टी०-(मानःश सः) हे ब्रह्मण्यते हमारे अनिष्ट
चिन्तक परंतु मारणेमें असमर्थ हमारे शत्रुको धूर्ति नाम
हिंसा आप मत करे किंतु हमारी रक्षाकर अर्थात् असमर्थ
शत्रुका क्या मारना वह आगे मृत होताहै (यदावनन् )
दक्षकी संतान जो सुवर्ण शतानीक अर्थात् बहुत सेनायु-
के राजाको बंधते भये प्रसन्न चित्त होकर शतजीवनके लि-
ये तिस प्रकार जैसे हम वृद्धावस्थाको प्राप्त होमे तंद्वत्
.
वांधते हैं।
अथ मातृपूजनम् ॥
गौरीपद्मा२शची३मेधा ४ सावित्री विजया ६
जयादेिवसेना८स्वधा स्वाहा.१० मातरो ११
लोकमातरः१२॥हृष्टिः१३पुष्टिस्तथातुष्टि १५
स्तथात्मकुलदेवता ॥ १६॥ श्रीकुलदेव्यंतर्गतगौ:
-दिपोडशमातृभ्योनमः॥अथऋत्विजांवरणम्॥
यथाचतुर्मुखोब्रह्मासर्ववेदधर प्रभुः ॥ तथात्वमम
यज्ञेऽस्मिन्ब्रह्माभवद्विजोत्तम गृहीत्वातु करामुष्टं
प्रकरणम् ३ यजमानःपठेदिदम् ॥ अस्यकर्मण प्रतिष्ठापनार्थ त्वंब्रह्मा भव (अहंभवामि ब्रह्मा ब्रूयात् ) भा०टी०-गौरीसे आदि षोडश१६ मात्रा भिन्नभिन्न अंक देकर लिखीहै.मूलमें.॥ उन्की यथावत् षोडशोपचार पूजा करनेसे वह संतुष्ट होकर शुभको विधान की हैं। ऋत्विक होता आचार्य ब्रह्मादि वरणमें प्रथम ब्रह्माका वरण होताहे अर्थ जैसे चतुर्मुख संपूर्ण वेदविद्याके जाननेवाले ब्रह्माजी है तद्वत् आप मेरे यज्ञमें होमे यह कहे हस्तका अंगुष्ठ पकड कर यजमान इस कर्मकी प्रतिष्ठाके लिये आप ब्रह्मा हो। होताहै यह ब्रह्मा कहै ।। आचार्य्यस्तुयथास्वर्गेशक्रादीनांबृहस्पतिः । तथा "त्वममयशेऽस्मिन्नाचार्योभवसुव्रत ॥ गृहीत्वातुक रांगुष्टंयजमानःपठेदिदम् ॥ अस्यकर्मणःप्रतिष्टा पनार्थत्वमाचार्योभवे । अहंभवामि ॥ ऋग्वेदःपद्मप त्राक्षोगायत्र्यः सोमदेवतः । अत्रिगोत्रस्तुविप्रेन्द्र त्विक्त्वंमेमखेभव ॥ गृहीत्वातुकरांगुष्टंयजमानःप ठोदिदम् ॥ अस्यकर्मण प्रतिष्ठापनार्थमृग्वेदीभव । अहंभवामि॥ भाण्टी.-जैसे स्वर्गमें इंद्रादिकोंका आचार्य (गुरु) बृहस्पतिजी है तद्वत् आप मेरे यज्ञमें आचार्य होवे गृही- त्वा तु इसका पूर्वोक्त अर्थ है यदि कोई कहे कि आचार्य- को गुरु कसे कहते हैं उत्तर जो उपनयन कर शोचता और वेद विद्या पहावे वह आचार्य अर्थान् गुरुको कदत प्र- माण भी यास्कजीने निरुक्तमें लिसाह (आचार्यःयस्मा
विवाहपद्धति भा० टी०
दाचार्यआदाचारंग्राहयित्वा चिनीत्यर्थात् ) याज्ञवल्क्य
जी भी लिखते हैं"उपनीयददद्वेदमाचार्यःसउदाहृतः"इस
प्रकार ऋग्वेदादिक चार वेदोंका वरण जानना ॥ स्वरूप
ऋग्वेदका पद्मपत्रवत् नेत्र गायत्री छंद सोम देवता अत्रि
गोत्र इत्यादि।
कातराक्षोयजुर्वेदस्त्रिष्टुभोब्रह्मदेवतः। भारद्वाजस्तुवि
पेंद्रऋत्विक्त्वमेमखेभव ॥ गृहीत्वातुकरांगुष्टंयजमा
नःपठेदिदम्॥ अस्यकर्मणप्रतिष्ठापनार्थत्वमेयजुर्वे
दीभव(अहंभवामि)सामवेदस्तुपिंगाक्षस्त्रिष्टुभोविष्णु
दैवतः । काश्यपेयस्तुविद्रऋत्विक्त्वंमेमसंभव ।।
गृहीत्वातुकरांगुष्ठयजमान पददम् ॥ अस्यकर्म.
ण प्रतिष्ठापनार्थत्वं सामवेदीभव (अहंभवामि )
भा०टी०-करता युक्त नेत्र त्रिष्टुप् छंद ब्रह्मदेवता भारद्वाज
गोत्र इत्यादि यजुर्वेदका स्वरूपहै और पिंगलवर्ण नेत्र त्रि-
छुप् छंद विष्णुदेवता काश्यपगोत्र इत्यादि सामवेदका स्व.
रूप छंदादिक है।
अथाशीर्वादः॥
ऋग्वेदस्तुयजुर्वेदः सामवेदोह्यथर्वणः । ब्रह्मवाक्यैश्चतै
नित्यं हन्यतांतवशत्रवः ॥ अपुत्राःपुत्रिण सन्तुपुत्रिणः
सन्तु पौत्रिणः। अधना सधनाः सन्तु संतुसर्वार्थसाध
काः ॥ विप्रहस्ताचगृहीयाद्यज्ञपुष्पफलाक्षतान् ।
चत्वारस्तववर्द्धन्तामायुःकीर्तिर्यशोवलम् ॥ अथ क
लशपूजनम् । ॐ ऋग्वेदायनमः यजुर्वेदायनमः सा
* प्रकरणम् ३ मवेदायनमः अथर्ववेदायनमः कलशायनमः वरुणा यनमः रुद्रायनमः समुद्रायनमः गंगायैनमः यमुना यैनमः सरस्वत्यैनमः कलशकुंभायनमः। भा०टी०-ऋक् यजु साम अथर्वण यह ४ वेद ब्रह्मवाक्य पु राणादि सहित तुमारे शत्रुओंको नष्टकरे । और जिन्के पुत्र नहीं वह पुत्रयुक्त हों और पुत्रोंवाले पौत्रोंसे युक्त हों निर्धन धनवान् ही धनवान् संपूर्ण कामना सिद्धकरनेवाले हो॥ य- ज्ञमें ब्राह्मणके हाथसे पुष्प फल अक्षत ग्रहण करे ४ चार व- स्तु आयु १ कीति २ यश ३ बल ४ वृद्धिको प्राप्त हो॥ ब्रह्मणानिर्मितस्त्वंहिमत्रैरेवामृतोद्भवः ॥ प्रार्थयामिचत्वाकुंभवांछितार्थतुदेहिमे ॥ शुक्लयजु०अध्याय ४ मंत्र०३६ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्यस्कम्भु सज्जनीस्त्थो वरुणस्यऋतुसदन्यसिब रुणस्यऽऋतुसदनमसि वरुणस्य ऋतुस दनुमासद ॥ भा०टी०-(वरुणस्योभनमसि ) अर्थ-हे शम्प तुम व- रुणके जलकी स्तंभन कर्नेवाली है और वरुणकी तुम शि- पिल शम्पा २ होवे और वरुणके सत्य स्थानमें हो और वरुणके सत्य स्थान होनेसे आप इहाँ स्थित होवें ॥ यह 'वेदमंत्रार्थ है ॥ १॥ ब्रह्माजीने अमृतोद्भय मंत्रोंसे आपको रचा और हम आपकीना कतेह की हमारेको यांछित अर्थ देवे॥
विवाहपद्धति भा० टी० अंथ वास्तुपूजा। अथातः संप्रवक्ष्यामि यदुक्तं वास्तुपूजनीयिनपूजा विधानेन कर्मसिद्धिस्तुजायते॥अनंतपुण्डरीकाक्षं ' फणाशतविभूपितम्। विद्युगन्धूकसाकार कूमारू ढं प्रपूजयेत् ॥ शुक्लयजु अध्याय १३ मंत्र ६ नमौस्तु सर्पेभ्यो येकच प्रथिवीमनु । येऽअन्तरिक्षे येदिवितेभ्य: सुप्र्पेभ्योन म॥वासुक्यायष्टकुलनागेभ्योनमः ॥ भाण्टी-इसके अनंतर वास्तुपूजा लिखते हैं जिस्के कर- नेसे कर्मोंकी सिद्धि होतीहै। यह कर्मका अंग है कमलस- दृश नेत्रवाला और शतफणोंसे सुशोभित विद्युत्कांतियुक्त कूर्मदेवपर स्थित अनंत ( शेष ) की पूजन करे ॥ [ नमोस्तु मंत्रार्थ ] जो पृथ्वीमें रहतेहै और जो आकाशमें तथा स्व- में सर्प रहतेहै तिन्हों संपूर्णी के लिये यह प्रणाम बारंवार हो और वह रक्षाकरे यह फलितार्थ है। अथ योगिनीपूजा ॐआवाहयाम्यहं देवींयोगिनी परमेश्वरीं। योगाभ्या सेन संतुष्टापरध्यानसमन्विता ॥१॥ दिव्यकुण्ड लसंकाशा दिव्यज्वाला त्रिलोचना । मृर्तिमती ह्य मृता च उग्रा चैवोग्ररूपिणी ॥२॥ अनेकभावसं प्रकरणम् ३ युक्ता संसारार्णवतारिणी। यज्ञं कुर्वन्तु निर्विघ्नं श्रे यो यच्छन्तु मातरः ॥३॥ दिव्ययोगी महायोगी सिद्धयोगी गणेश्वरी । प्रेताशी डाकिनी काली कालरात्री निशाचरी । हुंकारी सिद्धवेताली 'खर्परी भूतगामिनी । उर्ध्वकेशी विरूपाक्षी शुप्कां गी मांसभोजनी।फूत्कारी वीरभद्राक्षी धूम्राक्षी कलहप्रिया । रक्ता च घोरा रक्ताक्षी विरूपाक्षी भयंकरी । चौरिका मारिका चंडी वाराही मुण्ड धारिणी । भैरवी चक्रिणी क्रोधा दुर्मुखी प्रेतवासिनी। कालाक्षी मोहिनी चक्री कंकाली भुवनेश्वरी। कुण्ड लातालकौमारी यमदूती करालिनी कौशिकी यक्षिणी यक्षी कौमारी यंत्रवाहिनी।। दुर्घटे विकटे घोरे कपाले विपलंघनोचतुःपष्टिःसमाख्यातायोगिन्योहि वरप्रदा त्रैलोक्ये पूजिता नित्यं देवमानुपयोगिभिरिति । भाण्टी-परब्रह्ममें खचित योगाभ्यासकर संतुष्ट परमे- धरी देवी श्रीयोगिनीका आवाहन कर्ते हैं॥१॥ दिव्य कुंड- लोंसे युक्त तेजयुक्त त्रिनेत्रमूर्तिवाली और मूर्तीसे रहितम- यानक इत्यादि अनेक भावोंसे संयुक्त संसाररूपी समुद्रके पार उतारनेवाली योगिनी माता इस यजको विघ्नरादित करे और हमारेको कल्याण देवे ॥ यह ६४ योगिनी संकंट- में विपत्तीमें अर्थात् जहाँ भीतिहो वहां स्मरण की हुई बे- रको देती संकट दरकतीद इस कारणसे देव मानुष योगि- •जनोंकर यह पूजनीय है अर्थात् संपूर्ण जगत् इन्की पूजा 14 विवाहपद्धति भा० टी० ॥ • अथ ब्रह्मपूजा शुक्लयजु अध्याय १३ मंत्र ३॥ ब्रह्म'जज्ञानम्प्रंथुमम्पुरस्ताद्विशीमतः सुरुचौ वेनआवर ॥ सबुध्याऽउपुमाऽ स्यधिष्वा सुतश्श्चयोनिमसतश्श्चचिव ॥ इति पाद्यादिभिर्ब्रह्माणमर्चयेत् ॥ अथ विष्णुपूजा यजु० अध्याय ५ मंत्र २१॥ ॐविष्णोरराटमसिविष्णोत्नप्त्रैस्थो विष्णो स्यूरसिविष्णोध्रुवासि । वष्णुव मंसि विष्णवेत्वा॥ भा०टी०-( मंत्रार्थ वा ) ब्रह्म सर्वव्यापि सूर्य प्रथम पूर्व- दिशामें उदय होताहै फिर अपने प्रकाशसे चारोंतरफम- ध्यवर्ती प्रकाश करताहै वह प्रकाशमान लोक वेनमेधावी आदित्य दिशाओंसे जानाजाताहै इस जगविद्यमानका अधिष्ठाताह और अमूर्त अदृश्यमान जगतका कारणहै । अर्थात् सूर्य भगवानही संपूर्ण लोकोंको दिशाको प्रकाश। कर्ताहै ॥ विष्णोरराटमसि, इस्का अर्थ आगे लिखाहै शां- तिपाठमें ॥ ॥ इति विष्णुं पाद्यादिभिरर्चयेत् ॥
. प्रकरणम् ३ अथ शिवपूजा शुक्ल यजुर्वेद अध्या० १६ मंत्र ४१॥ ॐ नमशम्भवाय चमयोभुवायचुन म-शङ्करायच मयस्करायच नम शि वायच शिवतरायच॥ भा०टी०-(नमाशंभवायोति) नमस्कारहै शेमके देनेवाले तथा सुख कल्याणादिगुण देनेवाले शंकरजीको॥ इति शिवं पाद्यादिभिरर्चयेत् ॥ ॥ अथेंद्रपूजा ॥ यजु० अध्याय २० मंत्र ५॥ ॐ त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र्र्छहवेहवेस हवर्छशूरमिन्द्रम् । ह्वयामिशुक्रम्पुरुहूत मिन्द्रस्युस्तिनौ मुघवा धात्विन्द्रः ॥ ॐइंद्रायनमः इति पूजयेत्॥ भा०टी०-(वातारमिंद्र ) रक्षाकरनेवाला जिससे इंद्र- जीको कहते हैं बुलावनेमें शोभन शूरवीर वह इंद्र हमारे कर बुलायाभया ना नष्ट होनेवाला धन और स्वस्ति हमा- रेको देवे हम प्रार्थना करते हैं । अथ वायुपूजा। यजु० अ०२७ मंत्र ३२॥ वायोयतेसहस्रिणो रथासुस्तभिरागहि॥ नियत्वात्मोमपीतये॥ .
6. ६० विवाहपद्धति भाटी यजु० अ०९ मंत्र ७॥ अवांतो वामनौवा गन्धर्वा सप्तबिठेश ति ॥ तेअग्रेवमयुऑस्तस्मिन् जवमा दधुः॥ ॐ वायवेनमः ॥ इतिपूजयेत् भा०टी० (हेवायुदेव)जो तुमारे सहस्रसंख्यक रथसह- शरथ है उन्से युक्तहोकर आप सोमपानके लिये आओ ह- मप्रार्थना करते हैं। “अथ धर्मपूजा यजु० अध्याय ३ मंत्र १८॥ ॐ अग्नै सपन दम् नमदब्धासोअदा भ्यम् । चित्रावसो स्वस्तितेपारमंशीय॥ धर्मायनमः॥ इतिपूजयेत् ॥ भाटी०-(अग्नेसपत्न) हेभगवन् अग्निदेव तुम शत्रुओंको नाशक रनेवाले हमारेको ना हिंसनकरते हमारी वृद्धिकरे हेचि पावसो हेरात्रि ! नाशहोनेवाली कल्याणदेवे. (रा- विचित्रावमुरिति श्रुतिः ) औरतुमारे पारको सुखपूर्वक प्राप्त होयाकरे॥ अथ यमपूजा।शुयजु० अध्याय २९ मं०॥१४॥ ॐ असियुमो अस्यादित्यो अर्वन्नासित्रि तोगुयन व्रतेन । असिसोमैन सुमया -- प्रकरणम् ३ विष्टंक्त आइस्तेत्रीणिदिवि बंधनानि ॥ई ति यमपूजा दक्षिणेकार्या ॥ अथ नवग्रहपूजा ॥. शु यजु० अध्याय ३४ मं०३१ ॥ ॐ-आकृष्णेन रजसावर्तमानोनिवेशय मृतम्मत्यञ्च ॥ हिरण्यय नसवितारथे नादेवोयांतिभुवनानिपश्यन् ॥ ॐसूर्या यनमः ॥ इतिसूर्यं पूजयेत्॥ भा०टी०-आकृष्णेनेति ॥ सूर्यदेव रात्रिरूप रजसे वर्त- मान वारंवार भ्रमण कर्ता तथा अपनेरस्थानमें देवताओंको अमृत मनुप्यादिकोंको अन्न देताहुआ सुवर्णके रथसे १४ भुवनोंको देखता भया और आरोग्य देता भया फिरताहै उदय होताहै ॥१॥ शक्लयजु०अध्याय १० मंत्र १८॥ इमंदैवाऽअसपत्नठसुंवद्ध्वम्मुहेतक्षत्राय महुतेज्येष्ट्यायमहुतेजानराज्यायेन्द्र स्येन्द्रियाय।ईमममुष्यपुत्रमुमुष्यपुत्र मुस्यविशऽएपामीराजासोमोस्माकम्बा ह्मणाना:राजा ॥ ॐसोमायनमःइतिपू० ॥
विवाहपद्धति भा० टी० भाण्टी-इमंदवा-देवो दानादिति-हे दानशील पुरुषो तुम इस चंद्रमाको शूरवीरताके लिये ज्येष्ठता राज्य ऐश्वर्यादि- • के लिये अमुक पुत्र इसकी सेवा करो यह चंद्रमा हम ब्राह्म- णोंका राजा है। श्रीतार्थमें हे देवताओ यह संबंध करना ॥ शुक्लयजु० अध्याय ३ मंत्र १२ अग्निर्मुदिव कुकुत्पति पथिव्याऽ अयम् ॥ अपायतार्थसिजिन्वति ॥ ॐ अंगारकाय इतिपू० ॥ भा०टी०-अग्निर्मूर्द्धा-हे अग्निस्वरूप वा अग्नितत्व मंगल देव स्वर्ग आकाशमें सूर्यरूप होकर मूर्द्धवार्तिहो और ककुत् ब- डे तेजस्वी और पृथिवीके पुत्र हो और तुमही जलवृष्टि रेतो. त्पत्ति में कारण है ।। (ौतार्थमें अग्निस्तुतिमें विनियुक्त है). प्रमाण बृहजातके शिखिभूखपयोमरुद्गणानां वशिनी भूमिसुतादयःक्रमेण ॥ यजु० अध्याय १९ मंत्र ३॥ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहित्वमिष्टापुर्तेस मुंजेथामयञ्च ॥ अस्मिन्त्सुधस्थेऽध्यु त्तरस्मिन्विश्वदेवायजमानश्चसीदत ॥४॥ ॐबुधायनमःइ० पू० मा०टी०-उदयुध्यस्व-हे बुधदेवअग्निवत् प्रकाशमान आ प प्रसन्न हो आपकी प्रसन्नतासे यद यजमान इष्टमनोरथ
प्रकरणम् ३
को प्राप्त होवे और इस लोकमें ऐश्वर्यादि भोग उत्तर लोक
में देवताओंके साथ निवास करे यह हम प्रार्थना करते हैं
(श्रौतमें अग्नि)
यजु० अध्याय २६मंत्र ३॥
वृहस्पतेऽअतियदुर्यो ऽ अघुिमद्विभा
तिक्रतुंमुज्जनैपु ॥ यहीदयुच्छवसऽऋत
प्रजातुतदुस्मासुर्वणन्धेहिचित्रम् ॥
ॐबृहस्पतयेनमः इ० ॥ .."
भा०टी०-बृहस्पते-हे बृहस्पति देव अतिशयसे धन
अर्थ स्वामिता अई पूजा यज्ञकरनेवाले पुरुषमें धारण
करे और बलसे जो रक्षाकरनेवाल तथा सत्यसे हैं
उत्पत्ति जिनकी वा सत्य प्रजावाले पुरुपोंको अनेक प्र.
कार चित्र विचित्र धन देने में यह प्रार्थना करते हैं।
यजु० अध्याय १९ मंत्र ७५॥
अन्नात्परिस्रतोरसम्ब्रह्मणाच्यपिवत्क्ष
त्रम्पयुह सोमम्प्रजापति ऋते सत्यमि
न्द्रियविपान: शुक्रमन्धसइन्द्रस्यन्द्रि
यमिदम्पयोमृतम्मधु ॥६॥ ॐशुक्रा
यनमःइतिः ॥
विवाहपद्धति भा० टी० भा०टी०-अन्नात्परिनुतः-हविलक्षणरूप अनका परिचुत रसत्रयी लक्षण ब्रह्मसे व्याप्त और क्षत्रसे व्याप्त सोम प्रजा- पति संबंधि पय इस सत्यसे युक्त इंद्रकी इंद्रिय अन्न यह शुक्रजीके संबंधसे युक्त हो यह प्रार्थना करते हैं। यजु० अध्याय ३६ मंत्र १२ शत्रौदेवीरभिष्टय आपोभवन्तुपीतये । शैय्योरभिस्रवन्तुनः ॥ ॐशनैश्चरायन मः ॥ इतिपू०॥ भाण्टी-शनोदेवी-सुखरूप हमारे कल्याणकारक देव- स्वरूप रोगके विनाशके लिये भयके दूर करनेके वास्ते शनिदेवको स्तुति और प्रार्थना कर्ते हैं ॥ श्रौतमें वरुण संबंधिस्तुत्यमंत्रहें । यजु० अध्याय २७ मं३९॥ कयौनश्चित्र आभुवद्रुतीसुदाधुत्सखा ॥ कयाशचिष्टयावृता ॥ ॐराहवेनमः ॥ इतिपू०॥ भाटी• केपानचित्र हे राहुदेव किस आगमनसे तुम हमारेको आनंद करत हैं और किससे हमारेको धन देते हैं वहं हम उपाय करे (पूजा इति शेषः) (श्रौतमें इंद्र) मन कामपाम अर्थ रिसाद शिष अपं प्राशास तसे भाग लिया २पने प्रकरणम् ३ यजु०-अध्याय १६ मंत्र ३॥ केतुङ्कण्वन्नकेतवेपेशौमर्याऽअपेशसे ।स मुपद्भिरजायथा ॥ ॐकेतवेनमः ।। इतिपू० + ॐब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरांतकारी भानुः शशीभूमिसु तो बुधश्चागुरुश्चशुक्रः शनिराहुकेतवःसर्वेग्रहाः शां तिकराभवन्तु॥इतिनवग्रहपूजा ॥त्र्यंबकं यजामहे इति त्र्यंबकपूजनम् ॥ अथकुशकण्डिकाप्रारम्भः॥ ततोहोमार्थ चतुरंगुलोच्छ्रितहस्तमात्रपरिमितां वे- दि कुर्यात कुशैः परिसमूह्य तान्कुशानेशान्यांप- रित्यज्य गोमयोदकेनोपलिप्य खादिरेण सुवेण चो- लेखनहस्तेनोद्धरणं जलेनाभ्युक्षणं कांस्यपात्रयुग- लेन लौकिकंनिर्मथितं वाग्निमानीय स्थापयेताततः पुष्पचंदनतांबूलवासांस्यादाय अद्यकर्तव्यामुक शान्तिहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म- कर्तुमसुकगोत्रममुकशर्माणमेभिः पुप्पचंदनतां चूलवासोभिर्ब्रह्मत्वेन त्वामहंवृणे इति ब्रह्माणं. णुयात् ॥ ॐवृतोस्मीति प्रतिवचनम् । यथाविहि तकर्मकुर्वित्याचार्येणोक्ते करवाणीतिप्रतिवचनम् । ततोग्मेदक्षिणतः शुद्धमासनंदत्वा तदुपरि प्रागया न्कुशानादायास्तीर्य भनि प्रदक्षिणं कारयित्वा
विवाहपद्धति भा० टी०
ऽस्मिन्कर्मणि त्वमेब्रह्माभवेत्यभिधाय भवानीति
तेनोक्तेतदुपार ब्रह्माणमुदमुखमुपवेश्य प्रणीता
पात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य कुशैराच्छा
द्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्यानरुत्तरतः कुशोपरिनिद
ध्यात् ततः परिस्तरणं वहिपश्चतुर्थभागमादाया
ग्रीशानांतंब्रह्मणोऽग्निपर्यन्तं नैर्ऋत्याद्वायव्यन्तम
मितःप्रणीतापर्यन्तंततोग्नेरुत्तरतःपश्चिमदिशिपवित्र
च्छेदनार्थकुशवयंपवित्रकरणाथसाग्रमनन्तर्गर्भकुश
पत्रद्वयंप्रोक्षणीपात्रमाज्यस्थालीसेमार्जनार्थकुशत्रय
मुपयमनार्थवेणीरूपकुशत्रयं समिधस्तिस्रः सु
वः आज्य:- पटपंचाशदुत्तराचार्य्यमुष्टिशतद्वयाव
च्छिन्नामतण्डुलपूर्णपात्रं ततः पवित्रच्छेदनकुशैः
पवित्रेछित्त्वासपवित्रकरणप्रणीतोदकंत्रिः प्रोक्षणीपा
निधायअनामिकांगुष्ठाभ्यांपवित्रेउत्तराग्रेगृहीत्वात्रि
रुत्पवनं प्रोक्षणीपात्रचामकरणादाय । अनामिका
'गुष्ठाभ्यांगृहीतपवित्राभ्यांतजलंकिंचित्रिरुत्क्षिप्यप
णीतोदकेनप्रोक्षणीमभिपिच्य प्रोक्षणीजलेनासादि
तवस्तुसेचनंकृत्वाग्निप्रणीतयोर्मध्येप्रोक्षणीपात्रनिद
ध्यात् आज्यस्थाल्यामाज्यनिरूप्याधिश्रयणं त
तः कुशंप्रज्वाल्याज्योपरिप्रदक्षिणंभ्रामयित्वावगीत
प्रक्षिप्यनुवतिअंताप्यसम्मार्जनकुशानामग्रेरंतरतो
मूलाह्यतः श्रूवंसंमृज्यप्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्यपुनस्त्रिः
प्रकरणम् ३
प्रताप्यदक्षिणतोनिदध्यांतआज्यस्यामेरवतारणंतत
आज्यंणोक्षणीवदुत्पूयावेक्ष्य सत्यपद्रव्येतन्निरसनंक
त्वापुनःप्रोक्षणीमुत्पूय ततउत्थायो पयमनकुशान्वा
महस्तेकृत्वाप्रजापतिमनसाध्यात्वातूष्णीमग्नौ घृता
क्ता समिस्तिस्त्रक्षिपेत् ॥ उपविश्यसपवित्रप्रो
क्षण्युदकेनप्रदक्षिणक्रमेणार्मिपर्युक्ष्यप्रणीतापापवि
निधायपातितदक्षिणजानु कुशेन ब्रह्मणांन्वारब्धः
समिद्धतमेऽनौवेणाज्याहुतीर्जुहोति । तत्तदाहुत्य
नंतरंखुवावस्थितधृतशेपस्यप्रोक्षणीपात्रप्रवेशः ।
अथवपूजनम् ॥ ॐआवाहयाम्यहंदेववंशेवधिमु
त्तमम्। स्वाहाकारस्वधाकारवपटूकारसमन्वितम् ।।
अष्टांगुलंत्यजेन्मूलमओत्यक्त्वादशांगुलं । कर्तव्यंगो
पदाकारंदंडस्यायेतुकंकणम् ॥विष्णोःस्थानप्रगृह्णी
यायतेचहुताशनम् ॥ :पद्मयोनिसमादायहोता
सुखमवाप्नुयात् ॥ इतिवपूजनम् ।।
भाण्टी-कुशकंडिका आगे विवाह में स्पष्टार्थ लिखी है
इसलिये महाशयोंको उचित है की विवाहप्रकरणमें देखे।
पौर सुवको हस्तमें कंकण यंधकर पूजन कर्ना।
अथवृताहुतिः। प्रजापतयेस्वाहाइदंप्रजापतये इति
मनसा ॥ ॐइन्द्रायस्वाहाइदमिझायः ॥ इत्यापारी
अग्नयेस्वाहाइदमनये । सोमायस्वाहा इदंसो
६९
प्रकरणम् ३
पा गृह्यसूत्रे।
ॐ येतेशतंवरुणयसहस्रयज्ञिया पाशावि
ततामहान्तः । तेभिन्नॊअद्यसवितोतवि
ष्णुर्विश्वमुंचंतुमरुतःस्खुर्काःस्वाहा । इंद
वरुणांयसवित्रेविष्णवेविश्वेभ्योदेवेभ्योम
रुद्भ्यःस्वर्केभ्यः ॥
यजु० अध्याय २१ मंत्र १२॥
ॐउर्दुत्तुमंवरुणुपाशमुस्मदाधुमविम
ध्यमईश्रथाय । अर्थाव्यमादित्यव्रते
तवानागमोऽअदितये स्यामस्वाहा।
इदंवरुणायः । एताः सर्वप्रायश्चित्तसंज्ञका अंगण
पतयेस्वाहा । इदंगणपतये विष्णवेस्वाहा इदं
विष्णवे । ॐशम्भवेस्वाहा इदंशम्भवेॐलक्ष्म्यै
स्वाहा इदंलक्ष्म्य ॥ॐसरस्वत्यैस्वाहा इदंसरस्व
त्यैः । ॐभूम्येस्वाहा इदंभूम्य० ॥ *सूर्यायस्वा०
इदंसूर्याय० ॥चंद्रुमसेस्वाहा इदचंद्रमसे० ॥ ॐ
भौमायस्वाहा इदंभो० ॥ अवधायस्वाहा इदंयु
धाय० ॥ ॐवृहस्पतयेस्वाहा इदंबृहस्पतये ॥
ॐशकायस्वाहा इदंशुक्राय०॥ॐशनेश्वरायस्वाहा
।
विवाहपद्धति भा. टी.
इदेशनैश्चराय० ॥ राहवेस्वाहा इदंराहवे.
॥ॐकेतवेस्वाहा इदंकेतवे० ॥ ॐव्युष्टचैस्वाहा.
इदंव्युष्टयैः ॥ ॐउग्राय स्वाहा इदमुग्राय० ॥ॐ
शतक्रतवेंस्वाहा इदंशतकतवे ॥प्रजापतयेस्वा
हा इदेनजापतये ॥इतिमनसा प्राजापत्यं । ॐ अम
येस्विकृतेस्वाहा इदमनयेस्विष्टकृतेः । इतिस्विष्ट
कृद्धोमः । ततःसंस्रवप्राशनमाचमनं ततोब्रह्मणे
दक्षिणादानम् ॥
भाटी०-त्वन्नोअग्ने १सत्वन्नो अग्ने • येतेशतं ३ अयाश्चा-
ने ४ उदुत्तमं ५ यहपांच मंत्रोंका विवाहकी कुशकंडिकाके
अन्तमें अर्थ लिखाहै इसलिये पुनःपिष्टपेषण नहिंकरते॥और
आगेके नामोक्तमंत्र २१ है इन्में सूर्यादि नवहै । और प्रजा-
पतये स्वाहा यह मंत्र मनमें उच्चारण करना और सर्व स्पष्ट
मुखसे उच्चारण करने ॥
ॐअधएतस्मिच्छांतिहोमकर्मणिकृताकृतावेक्षण
रूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ट्रार्थमिदंपूर्णपाचप्रजापतिदैवतं असु
कगोत्रायामुकशर्मणेब्रह्मणेदक्षिणांदातुमहमुत्सृजे ॥
अस्वस्तीतिप्रतिवचनम् । ततोब्रह्मग्रंथिविमोकः ॥
यजु० अध्याय मंत्र
ततः सुमित्रियान आपऽओपधयःसंतु इतिपवित्रा
भ्यांजलमानीयतेनशिरः संमृज्यदुम्मित्रियास्तस्मै
*
प्रकरणम् ३ ७१- सन्तुयोऽस्मान्द्रोष्टयञ्चवयंद्विष्मः ॥ इत्यैशान्यां प्रणीतान्युजीकरणम् । भाण्टी-आज इस शांतिके होमरूप कर्ममें करना वाना करना इस्की परीक्षारूप ब्रह्माके कर्मकी प्रतिष्ठालिये यह पूर्ण पात्र प्रजापतिसंबंधि अमुक गोत्रव्राह्मणको दक्षिणा दे- नलिये देताहुं ॥ स्वस्ति ब्राह्मण कहे ॥ कुशतिर्मित ब- झाकी ग्रंथी खोलदेणी विवाहप्रकरणमें ब्रह्मादिकोंका लक्षण लिखाहै ( पंचाशताभवेद्ब्रह्मा ) इत्यादि । और सुमि त्रिया १ दुर्मित्रिया २ इनदोनों मंत्रोंका अर्थभी स्पष्ट वि- वाहप्रकरण में लिखा है। ततःस्तरणक्रमेणवर्हिरुत्थाप्यवृतेनाभिवार्यहस्तेनै वजुहुयात्। यजु० अ०८मं०२१॥ ॐ देवोगातुविदौगातुम्बित्वागातुमित मनसस्पत इमदेवयज्ञस्वाहाबातेधाःस्वाहा इतिवहिहोमः । ततःआचारादशदिक्पालेभ्योदधि मापबलियः क्षेत्रपालबलिदानंच.॥ ततःस्थालीपा कादिपक्वान्नेनगणपतिप्रमुखसूर्यादिग्रहेभ्यस्तत्तन्मत्रै बलिदेयः। ततोब्राह्मणभोजनम् । भाण्टी-स्मरणक्रमसे कुशाग्रहणकर घृतलगांय हाथसे हवन करे। देवागातु इसमंबसे इस्का अर्थ विवाहप्रकरणमें लिखाहै ॥ फिर आचारसे दशदिक्पालोंको दधियुक्त माषों- .
७२ विवाहपद्धति भा० टी०. की बलीदेनी दश दिक्पालयहहै। इंद्र १ वद्विरधर्मराज नैत ४ वरुण ५ मरुत ६कुबेर ७ ईश.८ और पृथ्वी आ- काशका स्वामी २। यह १०.अनंतर स्थालीपाकसे पकाहु. आ पक्कानसे श्रीगणेशजीसे आदि सूर्यादि नवग्रह ओंकार सर्प योगिनी अर्थात जो २ पीछे स्थापन करहैं उनके मंत्रों- से सबको बलिदान करना। ॐअद्यकरिष्यमाणभोजनसांगतासिद्धयर्थमिदंदक्षि ‘णाद्रव्यंतेभ्योविभज्यदातुमहमुत्सृजे ततोगुरवेदक्षि णादेया॥ ततः छायापात्रदानं । तदनंतरंपूर्णाहुतिः तद्यथा सुवेणपूगीफलादिकंगृहीत्वा ॥ यजु: अध्याय ७ मंत्र २४ ॐमुनिदिवोऽअतिम्मृथिव्यावैश्वानर मृतआजातमग्निम् । कुवि सुम्म्राजमति थिञ्जनानामासत्रापात्रञ्जनयन्तदेवावा हा ॥ ततः वेण भस्मानीयदक्षिणांना मिकांगृहीतभस्मनाऊँत्र्यायुषंजमदग्नेः। इति ललाटे । ॐकश्यपस्यत्र्यायुपम् । इति ॥ ग्रीवायाम्।ॐयद्देवेपुत्र्यायुपम् । इति दक्षिणवाहुमूले ॐतन्नो अस्तुत्र्या युपम् । इति हदि॥
प्रकरणम् ३
७३
'भा०टी०-प्रथम संकल्प ब्राह्मणोंको दक्षिणाका है । पीछे
छायापात्र दान करना अनंतर फल पुप्प सुवमें स्थित घृतसे
मूर्धानं इस मंत्रसे पूर्णाहुति करनी। यह मंत्रका अर्थ विवा-
ह प्रकरणमें लिखाहै।
यजमानपक्षेतनोइत्यस्यस्थाने तत्तेइतिविशेपः। त
तोऽभिपेकः ॥ तच्चाम्रपल्लवकुशादिकेनकलशस्थ
जलमानीयआपोहिप्टेत्यादिमंत्रेणयजमानमभिपिंचे
त् ॥ आचार्यादीनां दक्षिणादेया ततोभूयसीदद्या
त् । ॐआज्येन वर्द्धतेवुद्धिराज्येनवर्द्धतेयशः॥
आज्येनवर्द्धते आयुर्दर्शनंपापनाशनं । अथ विशेप
पूजा । ग्रहागावोनरेंद्राश्चब्राह्मणाश्चविशेषतः। पूजि
ताः प्रतिपूज्यंतेसावधानाभवन्तुते । अथ अग्निवि
सर्जनम् । गच्छगच्छसुरश्रेष्ठस्वस्थानं परमेश्वर ॥
यत्रब्रह्मादयोदेवास्तंत्रगच्छहुताशन ॥
भा०टी०-घृतसे बुद्धि बल यश आयु वृद्धिको प्राप्तहोती
और पाप नष्ट होते हैं ॥ आयुवृद्धि में प्रमाण भावप्रकाश.
चिकित्सा शास्त्रमें जैसे ( स्वमाननं घृते पश्येद्यदीच्छेञ्चिर
जीवितुं) ग्रह गोआ बाह्मण राजा यह पूजन किंए हुये
विशेष फल देते हैं । गच्छ २ इस मंत्रसे अग्निका विसर्जन
आगतास्तुयथान्यायंपूजितास्तुयथाविधि । कृत्वा
कृपांमयिदेवायत्रासंस्तत्रगच्छत ॥ यजमानहिता
र्थायपुनरागमनायच । शत्रूणांबुद्धिनाशाय मित्रा
णामुदयायच ॥ यथाशस्त्रप्रहाराणां कवचंवारणंभ
करना॥
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विवाहपद्धति भा० टी० वेत् । तद्वदेवाभिघातानांशांतिर्भवति वारणं ॥ अथ , ग्रहादीनांविसर्जनम् ॥.यान्तुदेवगणाः सर्वेपूजामा दायमामकीं। यजमानहितार्थायपुनरागमनायच । ऋ०प्र० अटक अ०१म१॥ ॐअग्निमीळेपुरोहितयज्ञस्य॑देवमृत्विजम् । होवार रत्नधातमम् ॥ भा०टी०-भलीभांति आये हुये और पूजन किये हुये मु- झपर कृपा कर अपने २ स्थानको देवगण सिधारे यजमान- की कुशलताके लिये तथा फिर आवे लिये ॥ जैसे खनादि शस्त्रोंक प्रहारसे रक्षा कर्नेवाला कवच (संजोया) होता है, तद्वत् संपूर्ण विघ्नोंके दूर करने लिये शांति है ॥ अग्निमीळे यह मंत्र ऋग्वेदके आदिका है। ॐ विष्णुस्तत्सदद्यामुकगोत्रोहममुकशर्माहंइदंसमि एंघृतपत्रविष्णुदैवतंभगवद्विष्णुप्रीतये यथानामगो चाय ब्राह्मणायाहंददे । ॐअद्यकृततत्समिष्टघृतपं क्वदानप्रतिष्ठासांगतासिद्ध्यर्थविष्णुप्रीतयेयथानाम गोत्रब्राह्मणायदक्षिणांदातुमहमुत्सृजो अद्यतत्सद्धि वाहांगत्वेनेमिष्टघृतपर्कविष्णुदैवतं कुलदेवताप्रीत, येसौभाग्यताप्राप्तयेयथानामगोत्राय ब्राह्मणायाहंद दे। इतिकन्यापक्षे॥ ततः सुपूजितंकंकणवंधनं तत स्तिलकंकुर्यात् । तदनंतरंसूर्यायार्घ्यदानं ॥ इति श्रीकात्यायनीशान्तिःसमाप्ता ॥शभं भ्रयात॥
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प्रकरणम् ३
भा टी०-अमुकगोत्रव्राह्मणको विष्णुप्रीतिलिये घृतपक्क
अन्न देता हूं। और इस्की प्रतिष्ठाके लिये दक्षिणा देताह
कन्यापक्ष सौभाग्यतालिये यह पद कहना। फिर पूजन
कर कंकण बंधना तिलक करना।
इति श्रीकर्पूरस्थलनिवासिगौतमगोत्र ( शोरि )
अन्वयालंकृतश्रीअपारमहिमा.पं.वनैयारामतत्पुत्रवै
कुण्ठपीठाधिष्ठितश्रीतुलसीरामतत्पुत्र श्रीसकलजन
वंद्यदैवज्ञदुनिचन्द्रतदात्मजशौर्यौदार्यधैर्य्याद्यालं.
कृतअधीतवेदवेदांगधर्मशास्त्रादिश्रीपंडितविष्णुद.
त्तवैदिककृतकात्यायनीशांतिटीका अद्विवेदांकभू
मिते १९४७. वैक्रममाधवेमासिकृष्णदशम्यां
चंद्रवासरेसमाप्तिमगात् ॥ साचशुभावहास्यात्
श्रीरामचंद्रप्रसादात् ॥
अथ शांतिसामग्री।
मौली रोला पंचरंग आटा चावल गुढ केशरपुष्पधूपदीप
नैवेद्य तांबूल सुपारी ७ वतासे मढ़िया चुंगनिया दाला ७
वृत तैल कुशा नुव पलाश समिधा पटढी यव तिल गोमय
बटना कंकण रेत पत्र प्रहजप । इति ।।
७६ विवाहपद्धति भा० टी० चतुर्थप्रकरणम्। • ओस्वस्ति श्रीगणेशायनमः॥ ओंवंदपुरुषायनमः ॥ श्री: अथविवाहसामग्रीलिख्यते ॥ आटा गुड चावल मौली रो- ला केशर पुष्प नैवेद्य मेवाधूपदीप अटे ७सुपारियां११ दूर्वा चंदन पुष्पमाला २ आम्रके पत्र १०० पटडीया २ वेद १ चंदो- या १ खारे २ वाचौकिया २ घृत- प्रणीतापात्र प्रोक्षणीपात्र कांस्यपात्र २ मधुपर्क गौका दुग्ध दधी वृत शहत नालकेर १धोती उपर्णा बालकनू । अर्घचौल अट्टे २ सिंधूर शूर्प १ लाजा अर्धशेर जंडीक पत्र शण शंख सुवर्ण वीडेपानके २ पूर्णपात्र १ चावल अभिषेककेलिये गागरवां कुंभ 'वाकौरी १ समिधां पलाश वा वेरीकी १० सेर वटना शिलावट्टा शर्करा वहारी १ सालगिरा ५ पर्णा १ कुशा समवस्त्र गज ४ सुवा १ आसन २ अर्धा हलपजाली मठिया ५इति॥अथ चतुर्थदिन- में चतुर्थीकर्मकी सामग्री लि आटा गुड मौली चावल केसर धूप दीप नैवेद्य सुपारिया ५ दूर्वा आम्रपत्र १० पटडीया २ चंदोया १ घृत प्रणीताप्रोक्षणी अर्धचावल पृथूदकपात्रकुना- ली १ हलपजाली गोदुग्ध अर्धसेर चावलपूर्णपात्र १ वस्त्रग- ज १० सिंदूं डांगा ४ शण सुवर्ण रेत घुवा कुशा समिधा च- रुस्थाली इति चतुर्थीकर्मसामग्री।। १ अर्थकन्योताहेयजमानकर्तृकप्रतिज्ञासंकल्पःवि- प्णुर्विष्णुर्विष्णुः अधब्रह्मणोद्वितीयपरार्दै श्रीश्वेतवा राहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतिमेयुगे कलि- युगेप्रथमचरणे अमुकसंवत्सरे मुकगोलेऽमुकायनेऽ करणम् ४ ৩৩ मुकपदेऽमुकमासेऽमुकतिथौनक्षत्रकरणयोगयुक्तेऽमु- कवासरे अमुकगोत्रोत्पन्नोह जन्मनामत प्रसिद्धनाम- तश्चामुकशहिं कृतकायिकमानसिकसांसर्गिकज्ञा ताज्ञातसमस्तदोपपरिहारार्थ श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फलावाप्तिकाम श्रीयज्ञपुरुपनारायणप्रीत्यर्थतत्प्रसा- दात्कायवाडूमनोभिर्महापातकादिदोपनिवृत्तिपूर्वकै हिकामुष्मिकेश्वरप्रसादानुरूपविभवयोगक्षेमप्राप्तयेच अश्वमेधपुण्यजनकताकपुत्रीविवाहात्मकदानमहं क- रिष्ये तनिर्विघ्नतासिद्धये यथोपलंधोपचारद्रव्यैः गणपत्यादिनवग्रहपूजनमहंकरिष्ये ॥ इति ॥ पश्चा गणेशादिपूजनं कुर्यात् ॥ २ अथ- यजमानकर्तृकशुभ्रचौलाधोतीपर्णानांदा न संकल्पः॥ अद्येत्यादि पुत्रीविवाहकर्मणि क- न्यादानप्रतिपत्त्यर्थमादाविमानि चतुष्टयवस्त्राणि प. दृकापासादिसंपादितानि मांजिष्ठारियादिनानारं- जितानि वृहस्पतिदैवतानि कन्यावरयोवैवाहिकस- मये. परिधानयोग्यानि सदक्षिणानि अमुकगोत्रप्र- वरायाऽमुकनामशर्मणे विष्णुरूपिणेवरायतुभ्यमहं संप्रददे ॥ इतिशुभ्रचौलादिदानम् ।। ३ अथ-कन्यापितृकर्तृकवेदीदानसंकल्पः॥३॥ अंतत्सदोति० नानारागानुरूपयज्ञाधिष्टातृपरमे- त: प्रीत्यर्थं तत्प्रसादात् ७८ विवाहपद्धति भा० टी याज्ञिकभूमिदानजन्यनानास्वर्गादिफलप्राप्तये इ- मानि रजतमुद्रिकानि चंद्रदैवतानिसदक्षिणानिक- न्यावैवाहिकचतुष्टयवंशनिर्मितस्तंभवेदिकान्तरभू- मिप्रतिनिध्यात्मकानियथानामगोत्रायः इतिवेदी दानसंकल्पः॥ ४ अथ-यजमानकर्तृकचतुर्थीदानसंकल्पॐअये त्यादि० कृतेतत्पुत्रीविवाहचतुर्थीकर्मप्रतिष्ठार्थसां गवासिद्ध्यर्थचेमारजतमुद्रिकांसदाक्षिणांचंद्रदेवतां अमुकगोत्राय अमुकशर्मणेब्राह्मणायतुभ्यमहंसंप्रद दे० स्वस्तीति प्रतिवचनं सर्वत्र इतिचतुर्थीदानं॥ ५ अथ-यजमानकर्तृकउपाध्यायदक्षिणासंकल्पः॥ ॐअद्येत्यादि कृतैतदग्निष्टोमादिकृतसमपुत्र विवाह योगमंत्रोच्चारणादिकर्तव्यताककर्मप्रतिष्ठार्थ सांग- तासिद्धयर्थचेदंद्रव्यरजतंचंद्रदैवतं अमुकगोवाया मुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहंसंप्रददे ।। इति ॥ ६ अथ-यजमानकर्तृककन्यायज्ञान्ते अन्नदानभू- रिद्रव्यदानसंकल्पः॥ अयेत्यादि० श्रीयज्ञपुरु- पपरमेश्वरप्रीत्यर्थ तत्प्रसादादवगताऽनवगतसक लदुरितोपदुरितशमनपुरस्सराक्षयफलावाप्तयेच व- रखध्वोः पूर्णायुरादिसुखसंपत्तिसिद्धये प्रजापतिक दास्यमानान्नं तथाभूरिद्रव्यंताम्रवारजतं सूर्यदेवतं सदक्षिणं यथारनाम गोत्रेभ्यो ब्राह्मणे ता प्रकरणम् ४ भ्यो विभज्यदातुमहमुत्सृजे ॥ इतिकन्यापित- कर्तृकनानाद्रव्यदानसंकल्पः ॥ शुभमस्तु ।। ७ अथ-बालककर्तृकविवाहप्रतिज्ञासंकल्पः ॐ तत्सदद्यति० जन्मलग्नतो वर्पलग्नतश्च तथा वैवा- हिकलग्नतःखेटावेदतानिष्टफलनिरसनोत्तरेष्टंफल- प्राप्तिपुरस्सरसकलकर्मसिद्धयर्थ गार्हस्थ्यनानाक- माधिष्ठानात्मकस्वविवाहकमर्माहं करिष्ये ॥ तदं गत्वेनतनिर्विघ्नतासिद्धयर्थआदौगणपत्यादिनवंग्रह पूजनमहंकरिष्ये ॥ १॥ इति ।। ८अथ-पत्नीप्रतिग्रहगोदानसंकल्पः॥अंतत्सद- घेत्यादिश्रौतस्मार्तवैदिकेतिहासपुराणोक्तफला- वाप्तिकाम श्रीपरमेश्वरनारायणादिविशेषेणविशि- एभगवत्प्रीत्यर्थ तत्प्रसादात् जन्मराशितोनामरा शितश्चजन्मलग्नतोवर्पलग्नतश्चजन्यजननजनिप्य- माणात्मकदोपत्रयनिरसनोत्तरजन्मलग्रतो विवा- हलग्नतश्चानिष्पखेटावेदिताशुभदुरितक्रमनिवृत्तयेप तीपाणिग्रहणजन्यप्रतिग्रहविशेषताकपुरस्सरभा यांत्रिवर्गकरणमित्यनेनप्रतिपादितधर्मार्थकामपात- पत्तयेचेमांगां सुवर्णरजतवस्त्रेः यथाशक्त्यलंकृतां कांस्यदोहोपयुक्तां सवत्सां मुक्तालांगूलभृपितां सुशीलां रुद्रदेवतां अमुकगोत्राय अमुकाम णे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे ॥ १ अयंद- ८० विवाहपद्धति भा० टी० क्षिणासंकल्पः ॥ ॐ अद्यकृतैतद्गोदानप्रतिष्ठार्थ मिदंद्रव्यं रजतंवा सुवर्ण चंद्रदेवतवाअग्निदैवतं यथा नामगोत्रायेत्यादि ॥ ९अथ-गोदानाभावे दक्षिणादानसंकल्पः॥ ॐअये त्यादि सर्वं पूर्ववत् इमांगांइत्यस्यस्थाने गोदानप्र तिनिधिभूतमिदं द्रव्यं अमुकदेवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे ॥ दक्षिणापूर्ववत् ॥ १० अथ-उपाध्यायदक्षिणादानसंकल्पः ॥ ॥ अद्येत्यादि० गतानवगतसकलदुरितोपदुरितक्ष- यपुरस्सरसकलचस्वशरीरकल्याणोत्तरपूर्णायुरादि सुखसंपत्ति सिद्धिकामः कृततजन्मादिदशसंस्कारां तर्गतस्वविवाहात्मकमहत्संस्कारमंत्रोचारणकार यितव्यकर्तव्यताककर्मप्रतिष्ठाथैच साङ्गतासिद्धय र्थम् इमाममुकद्रव्यमयीमुपाध्यायदक्षिणां अमुक दैवतां यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणांदातुमहमु त्सृजे १ इति॥ ११ अथ-विवाहे यजमानकर्तृकसवादानसंक स्पः। तत्रकन्यापितासपत्नीक कृतनित्यक्रियः कृमि जवस्त्रपरिधानपूर्वकोत्तराभिमुसः।आदौगोधूमचूर्णे नगणपत्यादीन्विधाय स्वस्तिवाचनपूर्वकं प्रतिज्ञा संकल्पंकुर्यात् ॥ तत्सदद्येत्यादि देशकालपू
प्रकरणम् ।
'८१
र्वक० श्रुतिस्मृत्यायुक्तफलावाप्तिपुरस्सरावगतान
गतसकलदुरितमहापातकक्षयानंतरज्ञाताज्ञातकृत
कायवाङ्मन कृतसमस्तपातकोपपातकजन्मत्रयो
पार्जितपापक्षयकामः राजद्वारतोव्यवहारतश्चसुप्रति
ष्ठितैश्वयसुखावाप्तये च श्रीमद्भगवच्चरणारविंदप्रीति
जनककन्यादेहरोमसमसंख्याकल्पावच्छिन्नस्वर्गलो
कवासजनककन्योद्धाहांगभूतविचित्रवर्णवस्त्रायाभर
णरीतिकांस्यलोहपैत्तलबपुसीसकमापपिष्टपक्वान्न
रजतसुवर्णरूप्याबनेकभूपणताम्रायनेकद्रव्ययु
क्तखट्वादानमहं करिप्ये ॥ ॥ ततः दक्षिणशिरसं
मुत्तरपादां तूलकोपधानादिपुरस्कृतां वस्त्राभरण
पात्राधलंकृतां खट्वां वरकन्यारोहणपूर्वकां पूर्व
दिक्पार्श्वरक्तसूत्रोपवद्धां कन्यापितापत्न्यासह ग्रंथि
बंधनंकृत्वा खट्वातंतुगंधाक्षतपुष्पजलैः संकल्पं.
कुर्यात् ॥ १२ अथ-ॐतत्सदद्यत्यादि देशकालौ
संकीर्त्य • श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासेत्यादि प्रतिपा
दितफलापाप्तिफामरोक्यतनवगतसकलदुरितोरदु-
रितक्षयकामश्चनानापटतंतुसंख्यासमानानेककल्पा
वच्छिन्नवैकुंठलोकपाप्तिकामः श्रीलक्ष्मीनारायणग्री
तिजनकंबहुअश्वमेधयज्ञफलसूचकस्वपुत्रीविवाहाङ्ग
भूतां इमां सतूलोपधानादिसंस्कृतां सवां उत्ताना
मांगिरोदेवतांवहम्पतिदेवताकमितकपीताद्यनेक
८२
विवाहपद्धति भां० टी०
विधसुवर्णरजततंतुमिश्रितवस्त्रसंयुतां विश्वकर्मदे
वताकैः यथापरिमितैः रीतिकांस्यलोहमयपात्रैः
सपात्रितां ' चंद्राग्निसामुद्रदैवताकअनेकविधविर
चितरजतसुवर्णभूपणविभूपितां प्रजापतिदैवताक
विविधपक्वान्नाद्यधिकरणकां सूर्यचंद्रदेवताकयथा
परिमितताम्ररजतमयैः . द्रव्यैस्सदक्षिणाममुकंगों
त्राय अमुकप्रवरायामुकनाम्ने वराय तुभ्यमहं सं-
प्रददे॥ स्वस्तीति प्रतिवचनं वरप्रत्युक्तिवादक्षि
णायाभिन्नसंकल्पः । ॐअधकृततत्ववादानप्रति
टार्थमिदं ताम्ररज़तद्रव्यं सूर्यचंद्रदैवतं अमुक०॥
आचारात् कन्यादातासकलजलेनवरकन्यासहि
तखट्वांसव्येन वेटनंकुर्यात् ततःसपत्नीकोयजमानः
खट्वापश्चिमभागेपूर्वाभिमुखः सन् कन्यावरक्षिप्तधा
न्यानिगृहीगृहीयात्सबांधवैः।। अथधान्यप्रक्षेपेमंत्र:
॥विश्वामित्रो जमदग्निर्वसिष्ठो गौतमस्तथा ।
कश्यपोचिर्भरद्वाजोविष्णुब्रह्मादयश्चये । तेसर्वेत्वां
प्रयच्छंतुधनधान्यादिसंपदम्।।*सनकःसनंदनाचा
श्वधेनवोमातरस्तथा । देवाःसर्वेप्रयच्छंतुधनधान्यं
सदागृहे २ अचिरंजीवतुममाता चिरंजीवतुमपिता॥
चिरंजीवतुमेधाता चिरंजीवंतुबांधवाः ३ ॐ दि
वारक्षतुसूर्यायं राजौरक्षतुचंद्रमाः । वंशंरक्षतुभौमश्च
धनधान्यादिसंपदाम् १ पितृवंशंबुधोरक्षेत् मातृ
८३ .. प्रकरणम् ४ वंशंगुरुस्तथा । बंधुवर्गचरक्षेत्तुभृगुर्दैत्यपुरोहि तः ५ अश्विन्यादीनिऋक्षाणि योगाविष्कंभका दयः। तिथयःप्रतिपद्याद्याः शुभंयच्छन्तुतेसदा॥ ॐतेजोवृद्धिर्यशोवृद्धिवंशवृद्धिस्तथैवच । लोककी तिर्भवेत्तात धनधान्यंसदागृहे ॥७॥ ॐगंगाद्याः सरितः सर्वाः शोणाद्याश्चनदास्तथा । कृतंपापं प्र शाम्यंतु प्रयच्छन्तुसुखंचते ॥८॥ ततोयजमानः श्रीसूर्यायाय॒दद्यात् ॥ इतिखट्वादानविधिः ॥ (अथ गोत्रोच्चारणम्) ॐ श्रीमत्पंकजविष्टरो हरिहरौ · वायुर्महेन्द्रोनल चंद्रोभास्करवित्तपालवरुणा प्रेताधिपायाग्रहाः ॥ प्रद्युम्नो नलकूबरौ सुरगनश्चितामणिः कौस्तुभः स्वामीशक्तिधरश्चलांगलधरः. कुर्वन्तु वो मंगलम्।। १ ॥श्लोकान्तेगावमुच्चारयेयुः ३ गौरीश्रीकुलदेव ताचसुभगाभूमिः प्रपूर्णाशुभा सावित्रीचसरस्वती चसुरभिःसत्यव्रतारुंधती । स्वाहाजाम्बवती च रु. क्मभगिनी दुःस्वप्नविध्वंसिनी वेलाचांबुनिधे-समीन मकरा कुर्वतुवो मङ्गलम् ॥२॥ गंगासिंधुसरस्व- तीच यमुनागोदावरी नर्मदा कावेरी सरयुर्महेंद्रतनं- या चर्मण्वती वेदिका ॥ क्षिप्रावेत्रवती महासुरन- दी ख्याता च यागंडकी पुण्या:पुण्यजलैः समुद्रस- 4 ८४ विवाहपद्धति भा० टी० हिताःकुर्वतुवो मङ्गलम् ॥ ३॥ लक्ष्मी कौस्तुभपा रिजावकसुराधन्वंतरिश्चंद्रमाधेनुः कामदुधा सुरेश्व- रगजो रंभाचदेवांगना । अश्वःसतमुखो विपं हरि- धनुः शंखोमृतं चांकुधेरत्नानीति चतुर्दश प्रतिदिन कुर्वन्तुवो मङ्गलम् ॥१॥ ब्रह्मावेदपतिः शिवःपशु पति सूर्योग्रहाणांपतिःशक्रोदेवपतिहविर्हतपतिःस्क दश्वसेनापतिः । विष्णुर्यज्ञपतिवलीरधःपतिः श- क्ति पतीनांपतिः सर्वतेपतयः सुमेरुसहिताःकुर्वन्तु वो मङ्गलम् ॥ ५॥ इति सर्वोपयोगिगोत्रोच्चारणं ।। इति श्रीगौतमान्वयालंकृत (शौरि ) देवज्ञममार्य श्रीदुनिचंद्रसंगृहीतं संकल्पप्रकरणं समाप्त शुभं भू०॥ अथ निवाहुरामटीकायां । कन्यासंकल्प विधिः ॥ हरिःउम् ॥ विष्णुविष्णुर्विष्णुःपुनातु अद्यतत्सद्ब्रह्म अथानन्तवीर्यस्य श्रीमदादिनारा यणस्याऽचिंत्यापरिमिताऽनंतशक्तिसमन्वितस्य स्वकीयमूलप्रकृतिपरमझत्त्याप्रकोडमानस्य स चिदानन्दसन्दोहस्वरूपस्वात्मनिसर्वाधिष्टाने स्वा ज्ञानकल्पितानां महाजलौघमध्ये परिभ्रम्यमा णानामनेककोटिब्रह्माण्डानामेकतमेऽस्मिन् ब्रह्मांडे ऽव्यक्तमहदहङ्कारपृथिव्यतेजोवाय्वाकागादिभिर्द शगुणोत्तरेरावरणेरावृते आधारशक्तिश्रीकृर्मवराह धर्मानन्ताएदिग्गजादिप्रतिष्ठिते . ऐरावतपुण्डरी ८५ प्रकरणम् ४ कवामनकुमुदाऽञ्जनपुष्पदन्तसार्वभौमसुप्रतीका • ख्याप्टदिग्दन्तिशुण्डादण्डोत्तण्डितॆतद्ब्रह्माण्डख- ण्डयोरन्तर्गतभूलोकभुवर्लोकस्वर्लोकमहर्लोकजन- लोकतपोलोकसत्यलोकाख्यानांसर्वज्ञसर्व शक्तिसमन्वितसर्वोत्तमसर्वाधिपश्रीचतुर्मुखप्रभू तिस्वस्वलोकाधिष्टातृषुरुपाधिष्टितानामधोभागे. फणिराजस्य शेपस्य सहस्रफणामण्डलैकफणोपरि सर्पपैककणांयमानमहीमण्डलान्तर्गतातलवितल सुतलतलातलरसातलमहातलपातालानां स्वस्था धिष्टावधिष्ठितानामुपरितने सुमेरुमंदरमन्दराचल निपधहिमगिरिशृङ्गवद्धेमकूटदुद्धरपारियान शैलमहाशैलमहेंद्रसह्याद्रिमलयाचलविंध्यर्फामू कचित्रकूटमैनाकमानसोत्तरत्रिकूटोदयाचला स्ताचलपय॑न्तानेकाभिधानादिगणप्रतिष्टितायां जम्वृप्लक्षशाल्मलीकुशकोचशाकपुप्कराख्य सप्तद्वीपवत्यां लवणेक्षुसुरासर्पिदधिक्षीरशुद्धोदका स्यंसप्तसागरसमन्वितायां समस्तभूरेखायां कमल कदम्बगोलकाकारायां वर्तमाने कुवलयकोशान्त गतदलवद्विराजमाने उत्तरकुमाहिरण्मयरम्यकभ द्राश्वकेतुमालेलावृतहरिवपकिम्पुरुपभारता ख्यनवखण्डवति जम्बुद्धीपे .सर्वेभ्योप्यतिरिक्तसा खतिदेवादिभिरप्पीष्टसुकृतक्षेत्रभृतहेतुनाभिल विवाहपद्धति भा० टी. पिततमे अङ्गंवङ्गकलिङ्गकालिङ्गकाम्बोज- सौवीर सौराष्ट्रमहाराष्ट्र बङ्गालोत्कलमगधमालव नेपालकेरलचोरलगौडमलपाञ्चालसिंहलम स्य द्रविड द्राविड कर्णाट राटंव-शूरसेन कोकण टोंकण पाण्ड्य पुलिंदान्ध्य द्रौण दशार्ण विदेह वि दर्भ मैथिल कैकय कोशल कुन्तल मैन्ध्रुव जावल सार्वसिन्धु शालभद्र मध्यदेश पर्वत काश्मीर पुष्टाहार सिंधु पारसीक गान्धार वाल्हीक (हूण.) प्रभृतिवहुविधदेशविशेपसंपन्ने दण्डकारण्य महा रण्याद्वैतारण्य · कामुकारण्य सैन्धवारण्य प्रभृत्य नेकारण्यवति श्रीगंगा यमुना सरस्वती गोदावरी नन्दालकनन्दा मन्दाकिनी कौशिकी नर्मदा सरयू कर्मनाशा चर्मण्यती क्षिप्रा वेत्रवती कावेरी फल्गु. मार्कण्डेय रामगंगा शतद्रु विपाशेरावती चन्द्रभा गा वितस्ता सिन्धु दृपद्धती प्रभृत्यनेकनंदनदीवति कुरुक्षेत्र हरिद्वार क्षेत्रमाल क्षेत्रादि बहुक्षेत्रान्विते भारतखण्डे तत्रापि मध्यरेखाकुरुक्षेत्रादमुकदिग्भा गेअमुकनदीमध्ये श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्व न्तरेऽष्टाविशेकलीयुगे कलिप्रथमचरणे-वते पुण्यवृहस्पतिक्षेत्रे शुभसंवत्सरेऽस्मिन्नमुकायनगत सूये अमुकर्तावामुकमासेऽमुकपक्षेऽमुकतिथाव मुकवासरे यथायोगकरणमुहूर्ते वर्तमाने चंद्रतारा,
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प्रकरणम् ४
ऽनुकूलेपुण्येऽहनि अमुकगोत्रस्य अमुकसूत्रिणोऽमु
कशर्मणःप्रपौत्राय।।अमुकगोत्रस्य यथोक्तप्रवरस्या
ऽमुकवेदिनोऽमुकशाखिनोऽमुंकसूत्रिणोऽमुकशर्मणः
पौवाय ॥२॥ अमुकंगोत्रस्य यथोक्तंप्रवरस्याऽमुक़
वेदिनोऽमुकशाखिनोऽमुकसूत्रिणोऽमुकशर्मणः पु
वाय ॥३॥ अमुकगोत्रस्य यथोक्तप्रवरस्याऽमुक
वोदिनोऽमुकंशाखिनोऽनुकसूत्रिणोऽमुकशर्मणः प्रपौ
जी १ अमुकगोत्रस्य यथोक्तप्रवरस्य अमुकवेदिनो
ऽमुकसूत्रिणोऽमुकशर्मण पौत्री २ अमुकगोत्रस्या
मुकवदिनोऽमुकशाखिनोऽमुकसूत्रिणोऽमुकर्मणः
पुत्रीं. ३ इत्येवं गोत्रप्रवरादिनिरूपणपूर्वकप्रपिता
महादिसंज्ञासंबंधकथनं विरावर्त्य ३ अमुकगोत्रांय
यथोक्तप्रवरायाऽमुकवेदिनेऽमुकशाखिनेऽमुकसूत्रिणे
अमुकशर्मणे ब्राह्मणाय वरायअमुकगोत्रांयथोक्तप्रव
राममुकनानीमिमां कन्यां यथाशक्त्यलंकृतां महत
वस्त्रद्वयावृतांविवाहदीक्षितां प्रजापतिदेवतकां गङ्गा
वालुकाभिःसप्तर्पिमण्डलपर्यन्तराशीकृतरेणुपुञ्जस्य
मध्यादर्पसहस्रावसाने एकेकवालुकापकपणेन सर्व
वालुकापकर्पणसम्मितकालपर्यन्तं सूर्यलोकनिवा
ससिद्धयर्थ यवेश्चन्द्रमण्डलपर्यन्तं कृतएव राशि
तो वर्पसहस्रावसाने एकैकयवापकपणेन सर्वयवाप
कर्पणसम्मितकालपर्यन्तं चंद्रलोकनिवाससिद्धय
.
८८ विवाहपद्धती भा० टी०
थे मापधुंवमण्डलपर्यन्तराशीकृतमापेभ्यो वर्ष
सहस्रावसाने एकैकमापापकपणसमितकालं याव
द्विष्णुलोकरुद्रलोकधुवलोकनिवाससिद्धयर्थ
गन्धर्वाप्सरोगणमण्डितहंसपारावतशुकसारिका:
रुंतनादित किङ्गिणीशतसमलंकृत दिव्यविमानेन
मनोऽभिलपित देशगमन पूर्वक गिरि नदी नद सिं
धुद्वीपदिव्यदेश नन्दन चैत्ररथ प्रभृति स्थाने स्वा
भिलपित भोग्यविपयोपभोगार्थ मयासह दशपूर्वेपां
दशावरेप मइंश्यानामग्निष्टोमातिराजवाजपेय पु
ण्डरीकाश्वमेध ऋतुशतफल जन्य ब्रह्मलोक निवा
साथै पत्नीत्वेन तुभ्यमहं संप्रददे ।। इतिशंखावस्थि
तद्रव्ययुत जलेन सह कन्याहस्ते [सांगुष्टं]
वरंहस्ते दद्यात् ॥ इतिनिवाहुरामटीकाधृतकन्या
संकल्पविधानम् ॥श्रीः॥
अथ संस्कारभास्करोक्तः संक्षेपतः कन्यासंकल्पः
ततो दाता स्वदक्षिणे पत्न्यासंह वरदक्षिणपार्श्व
भागे शुभासने उदङ्मुख उपविश्य आचम्य प्राणा
नायम्य संवत्सरादि क्षेत्रादि देशकालौ.संकीर्त्य एवं
गुणविशेपेणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ अस्मि
पुण्याहे अस्याः कन्याया अनेनवरेण धर्मप्रजया
उभयोः वंशयोवंशवृद्धयर्थ तथाच मम समस्तपितृ
णां निरतिशयसानंद ब्रह्मलोकायाप्त्यादि कन्यादान
८९ प्रकरणम् ४ कल्पोक्त फलावाप्तये अनेम वरेण अस्यां कन्याया मुत्पादयिष्यमाणसंतत्या दशपूर्वान्दशावरान्मांच एकविंशतिपुरुपानुद्धतु ब्राह्मविवाहविधिना श्रील क्ष्मीनारायणप्रीतये कन्यादानमहं करिष्ये इति ॥ अब सर्वसंकल्पादिषु शर्म इत्यस्यस्थाने क्षत्रिय वैश्यविवाहे वर्मन् गुप्तक्रमेण कथनम् ॥ यत्र अद्ये- त्यादि०दृश्यते तत्र पूर्वमुक्तं सर्व योजनीयम्।।गोत्रो च्चारणं श्लोकान्ते संकल्पविहितं प्रपितामहपूर्विका वंशसंख्या कथनीया इति परिभापा॥ अनुक्तं श्लो- कतः सर्व ज्ञातव्यम् ॥ श्रीः॥ • अथ त्रैवर्णिकानां पूजनार्थ शुक्लयजुर्वेदोक्तं सुस्वर साहितं नवग्रहमंत्रविधानं लिख्यते॥ अथ सूर्यकाण्डका ॥ आकृष्णेनुरजंसावर्तमानोनिवेशयन्नमृत म्मत्य॑ञ्च॥ हिरण्ययनसवितारथुनादेवो यांतिभुवनानिपश्यन् ॥ १॥ अथ चंद्रम कण्डिका ॥ इमन्दॆवाअसपत्नई सुंबद्धम्महुतेक्षुत्रार्य गहतेज्येष्ठयायमहुतेजानराज्यायेन्द्रस्ये
९२
विवाहपद्धति भा० टी०
अर्थपोडशोपचाराणिज्ञानमालायामुक्तानि।। तद्यथा
आवाहनम् १ आसनं२ पायं.३ अर्घ्य ४ आचमनी
यम् ५ स्नानम् ६वस्त्रम् ७ यज्ञोपवीतम् ८ गधम् ९
पुप्पम् १० धूपम् ११ दीपम् १२ नैवेद्यं मध्येपा
नीयं उत्तसंपोशनं हस्तप्रक्षालनं मुखप्रक्षालनं १३
ताम्बूलम् १४ दक्षिणा १८ नमस्कारम् १६॥ इति
पोडशोपचारााण एवं गणपत्यादीन्सर्वान्पूजयेत् ॥
अभावेद्रव्यस्य यथाशक्त्योपलव्धवस्तुभिः पुष्पा.
क्षतादिभिःश्रद्धायुक्तः पूजयेत् ॥
.
९३ * . प्रकरणम् ४ तवर्णमगधश्चात्रेयगोत्रोद्भवो वाणेशानदिशः सुहृ च्छनिभृगुः शुत्रुःसदाशीतगुः । कन्यायुग्मपतिर्दशा एचतुरपण्नेत्रगःशोभनो विष्णुः मौरुष देवते श शिसुतः कुर्या ॥६॥ जीवश्चाङ्गिरगोत्रज़ोत्तरमु . खो दीर्घोत्तरासंस्थितः पीताश्वत्थसमिञ्च सिन्धु जनितश्चापोऽथमीनाधिपः । सूर्येन्दुक्षितिजप्रियो बुधसितौ शत्रू समाश्चापरे सप्ताङ्कद्विभवः शुभःसुरगु रुः कुर्या० ॥५॥ शुक्रोभार्गवगोत्रजः सितनिभा चीमुखः पूर्वदिपञ्चाङ्गोवृपभस्तुलाधिपमहाराष्ट्रा धिपोदुम्बरः। इन्द्राणीमघवानुभौवुधशनीमित्रार्क चन्द्रौरिपूपष्ठोद्विर्दशवर्जितोभृगुसुतःकुर्या०॥६॥ न्दकृष्णनिभस्तुपश्चिममुख सौराष्ट्रक-काश्यपःस्वा मीमकरकुम्भयोर्बुधसितौमित्रेसमश्वाङ्गिराः॥स्थानं पश्चिमदिक्प्रजापतियमौदेवौधनुप्यासन पट्विस्थः शुभकृच्छनीरविसुतःकुर्या० ॥७॥ राहुःसिंहलदे शजश्चनितिःकृष्णाङ्गशूर्पासनोयः पेठीनसिसम्भवः श्वसमिधोदूर्वामुखोदक्षिणायःसायधिदेवतेचनि तिप्रत्याधिदेव सदापट्विस्थःशुभकृञ्चसिंहिकसुतः कुर्या ॥८॥ केतुर्जेमिनिगोत्रजः कुशसमिद्वाय . व्यकोणेस्थितश्चित्राङ्गध्वजलाञ्छनोहिमगुहा योद क्षिणाशामुसब्रह्माचेवसचित्रचित्रसहितःप्रत्याधिदे नवग्पतिःकर्यात्सदामंगल .
विवाहपद्धति भा० टी० . न्द्रियाय ॥ इमममुप्यपुत्रममुप्य पुत्र मुस्यैविशाएपर्वामीराजासोमोस्माकम्बा ह्मणानार्थराजा ॥२॥ अथ भौमकण्डिका ॥ अग्निहींदिवककुत्पतिम् पृथिव्याऽ यम् । अपारेतार्थसिजिन्न्वति ॥ ३॥ अथ बुधकण्डिका॥ उद्रुदयखानेप्प्रति जागृहिलमिष्टापूर्ते स[जेथामयञ्च ॥अस्मिन्त्सुधस्थेऽध्यु त्तरस्मिन्न्विश्वेदेवायजमानश्चसीदत॥४।' अथ वृहस्पतिकण्डिका॥ बृहस्पते अतियों ऽ अहाँधुमद्विभा तिक्रतुमुज्जनैपु ॥ यद्दीदयुच्छवसऋत प्रजाततदस्मासुरविणन्धेहिचित्रम् ॥५॥ अथ शुक्रकण्डिका। अात्परिनुतोरसुम्ब्रह्मणाच्यापवत्क्षुत्र म्पयुल्सोमम्प्रजापतित् ॥ तेनसत्यमि पी प्रकरणम् ४ न्दुियंछिपानझुक्क्रमन्धसऽइन्द्रस्येन्द्रि यमिदम्पयोमृतम्मधु ॥६॥ अथ शनिकाण्डका॥ शत्रौदेवीरभिष्टंयुऽआपोभवन्तुपीतयै शैय्योरभिस्रवन्तुनः ॥७॥ अथ राहुकण्डिका ॥ कानश्चित्रआभुवदुतीसाधु सख । कयाशचिष्ष्ठयायुता.॥८॥ अथ केतुकण्डिका केतुङ्गुण्वन्नकेतवेपेशौमाअपेशसे । स मुपद्भिरजायथा ॥९॥इति ॥ ( यञ्चयस्य यदातुष्टः स तं यत्नेन पूजयेत् । ब्रह्मणे पावरोदत्त-पूजिता पूजयिष्यत ॥ ग्रहाधीना नरें दाणामुच्छायाः पतनानिच ॥ भावाऽभावौच जगत स्तस्मात्पूज्यतमारहा इति। याज्ञवल्क्यस्मृती प्रथ माघ्याये ग्रहशांतिप्रकरणे उक्तम् । अतः पोडशो पचारगणपत्यादीन् संपूज्य विशेपेण पूजनीयाः ॥ सन्तुष्टाः सन्तवतेअनिष्टान् शमयंति ॥ ३॥ प्रा नेयं विष्णुदत्तस्य॥
९२
विवाहपद्धति भा० टी०
अर्थपोडशोपचाराणिज्ञानमालायामुक्तानि।। तद्यथा
आवाहनम् १ आसनं२ पायं.३ अयं ४ आचमनी
यम् ५ स्नानम् ६वस्त्रम् ७ यज्ञोपवीतम् ८ गधम् ९
पुष्पम् ११ धूपम् ११ दीपम् १२ नैवेद्यं मध्यपा
नीयं उत्तरापोशनं हस्तप्रक्षालनं मुखप्रक्षालनं .१३
ताम्बूलम् १४ दक्षिणा १५ नमस्कारम् १६॥ इति
पोडशोपचारााण एवं गणपत्यादीन्सर्वान्पूजयेत् ॥
अभावेद्रव्यस्य यथाशत्त्योपलब्धवस्तुभिः पुष्पा
क्षतादिभिःश्रद्धायुक्तः पूजयेत् ॥
अथ नवग्रहमङ्गलाष्टकानि.॥ भास्वान्काश्यपगोत्र
जोऽरुणरुचिर्य-सिंहराशीश्वरः पट्विस्थोदशशो
भनो गुरुशशीभीमेपुमित्रंसदा । शुक्रोमन्दरिपुः
कलिङ्गजनितश्चामीश्वरौ देवते मध्ये वर्तुलपूर्व
दिग्दिनकरः कुर्यात्सदांमङ्गलम् ॥ १॥ चंन्द्रः क
केटकप्रभुः सितनिभश्चात्रेयगोत्रोद्भवश्चाग्नेय्यांश्चतु
रस्रवारुणमुखश्चापोप्युमाधीश्वरः । पटू सप्तग्नि
दशैकशोभनफलो नोर्खिधार्कप्रियः स्वामी या
मुनदेशाजो हिमकरः कु० ॥२॥ भीमो दक्षिणदिक
त्रिकोणयमदिग्विनेश्वरो रक्तभः स्वामी वृश्चिक
मेपयोः सुरगुरुश्चार्कःशशीसोहदः । ज्ञोरः पति
फलप्रदश्ववसुधास्कन्दो क्रमाद्देवते भारद्वाजकुलो
द्भवः क्षितिसुतः कुर्या० ॥३॥ सौम्योदया।
प्रकरणम् ४
९३
.
तवर्णमगधश्चात्रेयगोत्रोद्भवो वाणेशानदिशः सुह
च्छनिभृगुः शुत्रुःसदाशीतगुः । कन्यायुग्मपतिर्दशा
चतुरःपण्नेत्रगःशोभनो विष्णुः मौरुप देवतेश
शिसुतः कुर्या० ॥६॥ जीवश्वाङ्गिरगोत्रज़ोत्तरमु
खो दीर्वोत्तरासंस्थितः पीताश्वत्थसमिच्च सिन्धु
जनितश्चापोऽथमीनाधिपः । सूर्येन्दुक्षितिजप्रियो
बुधसितौ शत्रू समाश्चापरे सप्ताङ्कद्विभवः शुभःसुरगु
रुः कुर्या० ॥५॥ शुक्रोभार्गवगोत्रजः सितनिभा
चीमुखः पूर्वदिक्पञ्चाङ्गोपभस्तुलाधिपमहाराष्ट्रा
धिपोदुम्बरः । इन्द्राणीमघवानुभौबुधशनीमित्रार्क
चन्द्रौरिपूपष्ठोद्रिर्दशवर्जितोभृगुसुतःकुर्या ॥६॥म
न्द कृष्णनिभस्तुपश्चिममुखःसौराष्ट्रक-काश्यपःस्वा
मीमकरकुम्भयोबुधसितौमित्रेसमश्चाङ्गिराः ॥स्थानं
पश्चिमदिक्प्रजापतियमौदेवौधनुष्यासन पतिस्थः
शुभकृच्छनीरविसुतःकुर्या० ॥७॥ राहुःसिंहलदे
शजश्वनिक्रति कृष्णाङ्गगासनोयः पैठीनसिसंम्भवः
श्वसमिधोदूर्वामुखोदक्षिणः यःसायधिदेवतेचनि;
तिमत्पाधिदेव सदापरमिस्थाशुभकृयसिंहिकासुतः
कुर्या० ॥८॥ केतु मिनिगोत्रजः कुशसमिद्धाय
यकोणेस्थितश्चित्राङ्गध्वजलाञ्छनोहिमगुहा योद
क्षणाशामुसब्रह्माचेवसचिवचित्रसहितःप्रत्याधिदे
सदापत्रिस्थःशुभकृञ्चवर्वरपतिःकुर्यात्सदामंगल
९४ विवाहपद्धति भा. टी. म् ॥ ९ ॥ इत्येतगृहमङ्गलाष्टनवकंलोकोपकारप्रदं पापौषप्रशमं महच्छुभकरंसौभाग्यसंवर्द्धनम् । यः प्रातः(शुद्धः)शृणुयात्पठत्यनुदिनं श्रीकालिदासो .,दित स्तोत्रमंगलदायकंशुभकरं प्राप्नोत्यभीष्टंफलंम् ॥१०॥ इतिनवग्रहमङ्गलाष्टकानि ॥ पारस्करगृह्य सूत्रोक्तं कुशकण्डिकासूत्रम् ॥ अथातोगृह्यस्थाली पाकानां कर्म. परिसमुह्योपलिप्योल्लिख्योद्धृत्याभ्यु क्ष्याग्निमुपसमाधायदक्षिणतोब्रह्मासनमास्तीर्यप्रणी यपरिस्तीbऽर्थवदासाद्यपवित्रेकृत्वाप्रोक्षणी संस्कृ त्यार्थवत्प्रोक्ष्यनिरूप्याज्यमधिश्रित्य पर्यग्नि कुर्या त्वंप्रतप्यसंमृज्याभ्युक्ष्यपुनःप्रतप्य निदध्यादाज्य मुद्रास्योत्पूयावेक्ष्यप्रोक्षणीश्चपूर्ववदुपयमनान्कुशा नादाय समिधोभ्याधायपर्युक्ष्यजुहुयादेपएवविधि यंत्रक्कचिरोमः॥१॥अर्थात् सर्वत्रहोमएपएवविधि तिव्यति॥ (मंत्रार्थ आकृष्णेनेति) सुवर्ण मय रथसे भुवनोंको देख- तामया अर्थात् कर्मभूमिमें स्थित मनुष्योंके पापपुण्यको साक्षि होकर देखता हुआ। कृष्ण मलीन रात्रिसे वर्तमान प्रतिदिन स्तुत्य सूर्य भगवान् देवताओंको और मनुष्यों- को परस्पर व्यापार में प्रेरता हुआ उदयको प्राप्त होता है । (मंत्रार्थ इमंदेवाइति) इहाँ इम शब्दसे प्रकृत होनेसे. सोमका परामर्श है ।। संपूर्ण देवतागण इस चंद्रमाको उत्प- न कर्ते भये ॥ फसेको शत्रु रहित और सौम्य सर्व मियको प्रकरणम्.४ ९५ 'किस प्रयोनजके लिये उत्पन्न कर्ते भये क्षत्रके लिये अर्थात् लोकपालोंको राजभावके लिये और सर्वोत्तमताके लिये और अतिशय युक्तको इस प्रत्यक्ष दृश्यको (अमुं) नित्य ब्रह्मस्वरूप होनेसे परोक्ष दृश्यको । सूर्यके पुत्रको अर्थात् सूर्यकी किरणोंसे चंद्रमाकी वृद्धि होनेसे सूर्यपुत्र कहा जाता है । अमुष्य दिशाके पुत्रको अर्थात् पूर्व दिशासे उत्पन्न उदय होनेसे पुत्रता है ॥ अत्रि महर्षिजीके चक्षुसे उत्पन्न तेजको दिशाने धारण किया यह पुराणोंके अभि प्रायसे युक्तार्थ है ॥ किसलिये यह दिशाने धारण किया (अस्यविशे) प्रजाके अनुग्रह अर्थात् अमृत रसकी उत्पत्ति कांति आंनदके लिये और यह चंद्रमा हम ब्राह्मण जा- सिका राजा है। (मंगलमंत्रका विनियोग) अनिर्मूर्धा इस मंत्रका विरूपाङ्गिरस ऋषि अग्नि देवता गायत्री छंद अग्निके उपस्थानमें विनियुक्त है (मंत्रार्थ अ- निर्मुद्धति) यह भौम अत्यंत तेजवाला होनेसे अग्निका मृर्द्ध (मस्तक) है वा अत्यंत रक्तवर्ण होनेसे और आका- शका (ककुंत) चिन्ह है। और वृष्टि कने में मुख्यहेतु होने- से जलका वह स्वामीहे(प्र० चलत्यंगारको वृष्टिरिति) अर्थ मंगलके राश्यंतर होनेसे वर्षा होतीहै और पृथिवीका रेत बीजरूप है अर्थात् अपनी शक्तिसे पृथिवी जातको प्रीणन कर्ताह (प्रमा० .जा. अ. २ कालात्मा दिनकृन्मनस्तु- हिनगो सत्वंकुजोजोगिरः ) अर्थात बलका अधिष्ठाता मंगल है। (बुधमंत्रका विनियोग) चुधमंयका परमष्ठि-ऋषि अग्निदेवता वितुर छंद चितिके उपस्थानमें यिनियुक्त। (मंत्रार्थ) हेअग्ने उदयुध्यस्य अर्धा- विवाहपद्धति भा० स० त् प्रकाशहो हे बुधदेव तुम हमारे कर क्रियमाण इस कर्ममें सावधानहो ॥ और बुध अग्नि तुम दोनों इष्टापूर्त नामं यज्ञमें यजमानके संसर्गको करें। यह ग्रहयज्ञमें ऋत्विक्की प्रार्थनाहै | और सर्वोत्कृष्ट इस पूजास्थानमें यह यजमान और संपूर्ण देवता स्थितहो । सहोपदेनसधसाधयोश्चयो वेति इस सूत्रसे सहके स्थानमें सध आदेश भया। (बृहस्पतिके मंत्रकाविनियोग) बृहस्पतिजीके मंत्रका गृत्समद ऋषि ब्रह्मा देवता विपू छंद: बाईस्पत्य ग्रहणमें विनियुक्त है ॥ अर्थ-हे बृहस्पति देव ऋत अर्थात संत्यं नानष्टहोनेवाली प्रजा (संतान ) द्रविण ( धन ) हमको देवो कैसा धन कि जिस धनसे ईश्वरकी पूजा करे और जो लोकमें प्रकाशही और दीप्तियुक्त जिससे यज्ञादि कर्म कियेजाय और जि- स्की बलसे रक्षा कीजाय ऐसा गौवस्त्रसुवर्णादिरूप धनको दीजिये ।। यह प्रार्थनावाक्यहै ॥ शुक्रजीके मंत्रका प्रजापति ऋषि अश्वि सरस्वती इंद्र- देवता जगती छंद सौत्रामणिनाम यज्ञमें पयके ग्रहणमें विनियुक्त है ॥ अर्थ-प्रजापति (ब्रह्मा) हविरूप अन्नसे परिसुत रसको पान कर्ता भया । कैसेको क्षत्रको ( वा सोमरसको ब्रह्मा पान कर्ता भया) किसद्वारा पानकर्ता भया (ब्रह्मण) पE- चरहित मंत्ररूप वेदसे इस अनके 'सोमरूप रसको जो अ- से उत्पन्न भया । विपान ) ब्रह्माजीका विशिष्टपान वह शुक्रमीजना नाश होनेवाला( दंद्रिय )इंद्रियोंका सार देव- राज इंद्रका वीर्य पय क्षीर अमरमें कारण (मधु) पितृगण- की तृप्तिमें मुख्य हेतु होता भया । परितं यह द्वितीयाके अर्थम प्रथमाविभक्ती है।
प्रकरणम् ४ ९७. अर्थ-शनैश्चरजीके मंत्रका दध्यडङाथर्वण ऋषि गायत्री छन्द जलदेवता शांतिकरणमें विनियुक्त है। अर्थ-याज्ञवल्क्यादिविहित आदित्य प्रभव अपोंसे अभे- दोपचारसे अपशब्दसे शनिका ग्रहण है (आपो देवी)श- निश्चरदेव हमारेको कल्याण हो किस अर्थके लिये वृद्धि- द्वारा तृप्ति हेतु पानके लिये और कल्याणके योग्य जल अभिमुखको प्राप्त हो । अपशब्दको बहुवचनांत होनेसे ब- हुवचनांत विशेषण जानने ॥ अर्थ-राहुजीके मंत्रुका अग्नि ऋषि दुर्वेष्टका देवता अनुष्टु- पूछन्द दूर्वेष्टकाके उपधानसे विनियुक्त है ।। अर्थ-हे दूर्वे प्रतिकांड पर्व प्रतिपरुष ग्रंथियुक्त सर्वतो भावसे उत्पन्न भई तुम हमारेको शतसहस्त्र संख्यका पुत्र- . पौत्रादिसे विस्तृत करों। अथ-केतुजीके मंत्रका मधुच्छंदऋपि अग्निदेवता निरुक्ता गायत्री छंद केतुके अभिमंत्रणमें विनियुक्त है । अर्थ-हे केतुदेव ध्वजरूपको तुम प्राप्तहो किनसे जन्यमान गृहस्थियोंसे क्या कर्ता भया मनुप्योंकी केतुज्ञानको कर्ता हुवा और (पेश ) सौंदर्य और सुवर्णको कर्ता भया । नि- घंदुः-प्रमाण. पेशकारी पेशसो मात्रामापादयेदिति ॥ कैसे मनुप्योंको जो अज्ञानी और निर्धन कुरुप उन्को सुवर्ण रूप सौंदर्य देता भया । कित ज्ञाने इस धानुका फतुमर है। अकेतवे अपेशसे यह बहुवचनमें एकवचन है।
विवाहपद्धति.भा० टी० अथ पारस्करगृह्यसूत्रे प्रथमकाण्डे विवाहसूत्रम् ॥ तद्यथा आवसत्थ्याधानंदारकालेदायाधकालएकेपावैश्यस्य बहुपशाहादग्निमाहृत्य चातुष्प्राश्यपचनवत्सर्व- मरणिप्रदानमेकेपंचमहायज्ञाइतिश्रुतेरग्न्याधेयदेवता- भ्यः स्थालीपाकश्रपयित्वाऽज्यभागावष्टाज्याहुती- जुहोति ॥ त्वन्नोऽअनेसत्वन्नोऽअंग्नेऽइसमेवरुण तत्वा- यामि येतेशतमयाश्चाग्नऽउंदुत्तमं भवतन्न इत्यष्टौ पुरस्तादेवमुपरिटात्स्थालीपाकस्याम्याधेयदेवता- भ्योहुत्वाजुहोतिस्विष्टकृतेचायास्याग्नेर्वपट्कृतंयत्क- 'मणोत्यरीरिचं देवागातुविद इति वहिर्तुत्वा प्राश्नाति ॥ ततोब्राह्मणभोजनम् ॥२॥ पडाभ वन्त्याचार्यऽऋत्विग्वैवाह्योराजाप्रियःस्रातकइति प्रति सम्वत्सराईयेयुर्यक्ष्यमाणास्त्वृत्विज आसनमाहार्या ह साधुभवानास्तामर्चयिष्यामोभवन्तमित्याहरंति विष्टरंपायंपादार्थमुदकमय॑माचमनीयमधुपकैदधिम धुघृतमपिहितका स्ये काश्स्येनान्यस्त्रिस्त्रियाहवि- परादीनि विष्टरं प्रतिगृह्णातिवमोस्मिसमानानामुय- तामिवसूर्यः।इमन्तमभितिष्टाम योमांकवाभिदासती त्येनमभ्युपविशति पादयोरन्यविष्टर आसीनायसव्यं पादप्रक्षाल्यदक्षिणप्रक्षालयति ब्राह्मश्चेदक्षिणं प्रथम प्रकरणम् ४ ९९ विराजोदोहोसि विराजोदोहमशीय मयिपाद्यायविरा- जोदोह इत्यप्रतिगृह्णात्यायस्थयुष्माभिःसर्वान्कामा नवाप्नुवानीतिनिनयन्नभिमंत्रयतेसमुद्रव अहिणोमिस्वां योनिमभिगच्छते अरिष्टास्माकंवीरामापरासेचिमत्प. यऽइत्यांचामत्यामागन्यशसास५ सृजवर्चसातंमाकुरु प्रियंप्रजानामधिपति पशूनामरिष्टिं तनूनामिति मित्रस्यत्वेतिमधुपर्क प्रतीक्षते देवस्यत्वेति प्र- तिगृह्णाति सव्येपणीकृत्वा दक्षिणस्यानामिकयात्रिः प्रयौति नमःश्यावास्यायां नशनेयत्तऽआविद्धं तत्तेनिष्कृन्तामीत्यनामिकाङ्गुप्टेन च त्रिनिरुत्क्षप- यति तस्यात्रि-प्राश्नांति यन्मधुनोमधव्येनपरमेणरूपे- णानायेन परमोमधव्यान्नादोसानीतिमधुमतीभिर्वा प्रत्यूचंपुत्रायान्तेवासिनेवोत्तरतऽआसीनायोच्छिष्टंद- यात् सर्वम्वाप्राश्नीयात्प्राग्वासंचरे निनयेदाचम्यप्राणा संमृशति वाङ्म आस्येनसो प्राणोक्ष्णोश्चक्षुःकर्ण- योःश्रोत्रंबाह्वोर्डलमूर्वोरोजोरिष्टानिमेगानितनूस्तन्वा मेसहेत्याचांतोदकायशासमादाय गोरिति त्रिपाहप्र- त्याह मातारुद्राणांदुहितावसूना स्वसादित्यानाममृ- तस्यनाभिः ॥ अनुवोचंचिकितुपेजनायमागामना गामदितिवधिष्टाममचामुप्यचपाप्माहन शहनोमीति यद्यालभेत यद्युत्सिसक्षेन्ममचामप्यचपाप्माहतः। भो मुत्सृजततृणान्यत्त्विति बयानत्वेवामा सोपस्याद विवाहपद्धति भा० टी० धियज्ञमधिविवाहं कुरुतेत्येवव्यायद्यप्यसकृत्संवत्स रस्यसोमेनयजेतकृतार्थ्याऽएवैनंयानयेयुर्नाकृतार्ध्या इतिश्रुतेः॥३॥ चत्वारःपाकयज्ञाहुतोऽहुत प्रहुतःप्रा- शितऽइतिपंचसुवहि-शालायां विवाहेचूडाकरणऽउपन यने केशान्तेसीमन्तोन्नयन इत्युपलिप्तऽउद्धतावोक्षि- तेग्निमुपसमाधायनिर्मथ्यमेकेविवाहऽउदगयनऽआपूर्य माणपुण्याहे कुमार्याःपाणिगृह्णीयात्रिपुत्रिपूत्तरादिषु- स्वातौमृगशिरसिरोहिण्यांवातिस्रोब्राह्मणस्यवर्णानुपू- व्य॒णदेराजन्यस्यैकावैश्यस्य सर्वेपा शूद्राणामप्येकें मंत्रवर्ण्यमथैनां वास परिधापयति जरांगच्छपरिधत्स्व वासो भवाकृष्टीनामभिशस्तिपावा ॥ शतञ्चनीवशेर- दसुवारयिंचपुत्राननुसंव्ययस्वायुष्मतीदंपरिधत्स्व वासऽइत्यथोत्तरीयं याऽअकृतन्नवयंयाऽअतन्वतयाश्च देवीस्तंतूनभितोततंथ तास्त्वादेवीर्जरसे संव्ययस्वायु प्मतीदंपरिधत्स्ववासऽइत्यथैनौसमंजयंति समजन्तु विश्वेदेवाःसमापोहृदयानिनौ ।सम्मातरिश्वासंधातास- मुदेष्ट्रीधानुनावितिपित्राप्रत्तामादायगृहत्विानिष्का- मति यदैपिमनसदूरंदिशोनुपवमानोवा ॥ हिरण्यव गोवेकर्णः सत्वामन्मनसांकरोत्वित्यसावित्यथैनौस मीक्षयत्ययोरचक्षुरपतिभ्येषिशिवापशुभ्यःसुमना सु- वर्चाः ॥ वीरसूदेवकामास्योनाशनोभवद्विपदेशञ्चतु प्पदे॥ सोमःप्रथमोविविदेगंधवोंविविदऽउत्तरः। तृती- प्रकरणम् ४ १०१ योऽअग्निष्पतिस्तुरीयस्तेमनुष्यजाः॥ सोमोददद्ध- यिगंधर्वोदददग्नये । रयिंचपुत्रांश्चादादग्निर्मामथो इमाम् ।। सानःपूपाशिवतमामेरय सानऽऊरूउशती विहर यस्यामुशंतः प्रहरामशेतं यस्यामुकामा बहवोनिविष्टया इति ॥ ४ ॥ प्रदक्षिणमानपर्यो णीयैकेपश्चादग्नेस्तेजनीकटवा दक्षिणपादेनप्रहृत्योप- विशत्यन्वारन्धआधारावाज्यभागौमहाव्याहृतयःस- प्रायश्चित्तं प्राजापत्यश् स्विष्टकृच्चैतन्नित्य सर्वत्र- प्राङ्महाव्याहृतिभ्यःस्विष्टकृदन्यच्चेदाज्यादविःसर्व प्रायश्चित्तं प्राजापत्यान्तरमतेदावापस्थानं विवा- हे.राष्ट्रभृतइत्थं जयाभ्यातानांञ्चनानन्येनकर्मणेच्छे दितिवचनचित्तंचचित्तिश्चाकूतञ्चाकूतिश्च विज्ञातंच विज्ञातिश्च मनश्वशक्करश्च दर्शश्चपौर्णमासं च वृहच्च रथन्तरंचप्रजापतिज्जयानिंद्राय वृष्णेप्रायच्छदुग्रामृत नाजयेपु । तस्मैविश समनमंतः सर्वाः स उग्रः सइह व्योबभूवस्वाहेत्यग्निर्भूतानामाधिपतिःसमावत्विद्रोज्ये. प्ठानांयमः पृथिव्या वायुरन्तरिक्षस्य सूर्योदिवश्चंद्र मानक्षत्राणां वृहस्पतिव्रणोनिध-सत्यानांवरुणापार समुदः स्रोत्यानामन साम्राज्यानामधिपतिस्तन्मात्र तुसोमओपधीना सवित्ताप्रसवाना रुद्रःपशूनांत्व टारूपाणांविष्णुःपर्वतानांमरुतोगणानामधिपतयस्ते मावन्तुपितरः पितामहाःपरेवरेततस्ततामहाः ।
१०२ विवाहपद्धति भा० टी०
मावन्त्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यांपुरोधा
यामस्मिन्कर्मण्यस्यादेवहूत्या ५ स्वाहेति सर्वत्रानुप
जत्यग्निरेनुप्रथमोदेवताना ५ सोस्यैप्रजांमुञ्चतुमृत्यु
पाशात् ॥ तदय राजावरुणोनुमन्यतायथेय स्त्रीपौ.
त्रमपन्नरादोत्स्वा०॥इमामग्निस्त्रायतांगार्हपत्यः प्रजाम
स्यैनयतुदीर्घमायुः। अशून्योपस्थाजीवतामस्तुमाता
पौत्रमानंदमभिविवुध्यतामियश्स्वाहा।स्वस्तिनोअग्ने
दिवापृथिव्याविश्वानिधेह्ययथायदत्र यदस्यांमहिदिवि
जातंप्रशस्तंतदस्मासुद्रविणंधेहिचित्र स्वाहा ॥सुग
त्रुपन्थांप्रदिशन्नएहिज्योतिष्मद्धे जरन्न आयुः। अपै
तुमृत्युरमृतंमआगाद्वैस्वेतोनाअभयंकृणोतुस्वाहेतिप
रंमृत्यवितिचैकेप्राशनान्ते ॥५॥ कुमार्याभ्राताश
मीपलाशमिश्राँल्लाजानंजलिनाञ्जलावावपति तांजुहो
तिस हतेन तिष्ठत्यर्यमणंदेवंकन्या अग्निमयक्षत सनो
अर्यमा देव-प्रेतोमुञ्चतुमापतेस्वाहा ॥ इयन्नायुपते
लाज़ानावपंतिका । आयुष्मानस्तुमेपतिरेधन्तां ज्ञात
योममस्वाहा ॥ इमॉल्लाजानावपाम्यग्नीसमृद्धिकरणं
ममतुभ्यञ्चसंवननंतदग्निरनुमन्यतामियश्स्वाहा ॥
इत्यथास्येदक्षिणहस्तंगृह्णातिसांगुष्टंगृभ्णामितेसौभ
गत्वायहस्तंमयापत्याजरंदष्टियथासः भगोअर्यमास
वितापुरंधिर्मसन्त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः ॥ अमोहम
स्मिसात्व सात्वमस्यमोऽअहं । सामाहमस्मिऋक्त्वं
प्रकरणम् ४ १०३ धौरहपृथिवीत्वं । तावेहिविवहावहैसहरेतोदधावहै । प्रजांप्रजनयावहै. पुत्रानविदावहैवहून् । तेसन्तुजरदष्ट यः सप्रियौरोचिष्णूसुमनस्यमानौ । पश्येमशरद शतं जीवमेशरदःशत शृणुयामशरदः शतमिति ॥६॥ अथैनामश्मानमारोहयत्युत्तरतोग्नेर्दक्षिणपादेनारोहेम मश्मानमश्मेवत्वस्थिराभव । अभितिष्टपृतन्यतो ववाधस्वपृतनायत इत्यथगाथांगायति सरस्वतिले दमवसुभगेवाजिनीवति । यात्वाविश्वस्यभूतस्यप्रजा यामस्याग्रतः । यस्याभूत समभवद्यस्यांविश्वमिदं जगत्।तामद्यगाथांगास्यामियास्त्रीणामुत्तमंयश इत्य थपरिकामतस्तुभ्यमग्नेपर्यवहत्सूर्यावहतुनासह।।पुनः पतिभ्योजायांदागेप्रजयासहेत्येवंद्विरपरं लाजादिचतु र्थ५ शूर्पकुष्टया सर्वालाजानावपतिभगायस्वाहेतित्रिः परिणीतांप्राजापत्यश्हुत्वा ॥७॥अथैनामुदीची सप्त पदानिप्रक्रामयत्येकमिपे देऊर्जे त्रीणिरायस्पोपायच त्वारिमायोभवाय पंचपशुभ्यः पट्टतुभ्यः सखे सप्तप दीभवसामामनुव्रताभव विष्णुस्त्वानयत्वितिसर्वत्रानु पति । निष्क्रमणप्रभृत्यदकुंभ स्कंधे कृत्वा द क्षिणतोनेग्यितः स्थितोभवत्युत्तरत एकेपां . त त एनांमूदन्यभिपिंचत्यापः शिवाः शिवतमाः शा न्ताः शान्ततमास्तास्तेकृण्वन्तुमेपमित्यापोहिष्टे तिचतिसृभिरथेना सूर्यमुदीक्षयाति तचक्षुरित्यथा
विवाहपद्धति भा० टी०
स्यैदक्षिणा ५समधिहृदयमालभतेममत्रतेतेहृदयंद
धामिममचित्तमनुचित्तंते अस्तु।ममवाचमेकमनाजु
पस्वप्रजापतिष्ट्वानियुनक्तुमह्यमित्यथैनामभिमंत्रयते
सुमङ्गलीरियंवधूरिमा समेतपश्यत । सौभाग्यम
स्यैदत्वायाथास्तविपरेतनेतितांदृढपुरुपउन्मथ्यप्रा
ग्वोदग्वानुगुप्तांगारआनडुहेरोहितेचर्मण्युपवेशयती
हगावोनिपीदविहाश्वा इहपूरुपाः। इहोसहस्रदक्षिणो
यज्ञ इहपूपानिपीदत्वितिग्रामवचनंचकुर्युविवाहश्म
शानयोमिंप्राविशतादितिवंचनात्तस्मात्तयो मप्रमा
णमितिश्रुतेराचार्यायवरंददातिगौत्राह्मणस्यवरोग्रामो
राजन्यस्याश्वोवैश्यस्याधिरथ ५ शतंदुहितमतेस्त
मितेध्रुवंदर्शयति ध्रुवमसिध्रुवत्वापश्यामिध्रुवैधिपो.
प्येमयिमात्वादाबृहस्पतिर्मयापत्याप्रजावती संजी
वशरद शतमिति । सायदिनपश्येत् पश्यामीत्येवब्रू
यातत्रिरात्रमक्षारालवणाशिनौस्यातामधः शयीया
ता५ संवत्सरन्नमिथुनमुपेयातां द्वादशरात्र पडू
रात्रत्रिरात्रमन्ततः ॥ ८.॥ उपयमनप्रभृत्यो
पासनस्यपरिचरणमस्तमितानुदितयोर्दनातण्डुलैर
क्षतैर्वानयेस्वाहा प्रजापतयेस्वाहेति साय५ - सूर्या
यस्वाहाप्रजापतयेस्वाहेतिप्रातः पुमा सौमित्राव-
रुणीपुमा५ साश्विनावुभौ । पुमानिन्द्रश्चसूर्यश्च
पुमा मंवर्ततांमयिपुनः स्वाहेति पूर्वीमकामा॥९॥
प्रकरणम् ४ १०५ राज्ञोक्षभेदेनद्धविमोक्ष्ये यानविपर्यासेन्यस्यां वा व्यापत्तौ स्त्रियाश्चोरहने तमेवाग्निमुपसमाधाय आ ज्य संस्कृत्येहरातरितिजुहोतिनानामंत्राभ्यामन्यद्या नमुपकल्प्य तत्रोपवेशयेद्रांजान स्त्रियं वा प्रतिक्षत्रं ऽइतियज्ञांतेनान्वाहार्यमिति चैतयाधुयौदक्षिणाप्राय श्चित्तिस्ततो ब्राह्मणभोजनम् ॥ १० ॥ अथ चातुर्थ्यकर्मणिपारस्करसूत्रम् । तद्यथा- चतुर्थ्यामपररात्रेभ्यन्तरतोऽग्निमुपसमाधाय दक्षिण तो ब्रह्माणमुपवेश्योत्तरतउदपा–प्रतिष्ठाप्यस्थाली पाक श्रपयित्वाज्यभागाविष्ट्वाज्याहुतीर्जुहोत्यनेपा यश्चित्तत्वंदेवानांप्रायश्चित्तिरसिब्राह्मणस्त्वानाथका म उपधावामि यास्यैपतिघ्नीतनूस्तामस्यैनाशय स्वाहा॥वायोप्रायश्चित्तेवदेवानां यास्यै प्रजानीत नूस्तामस्यै नाशयस्वाहा सूर्यप्रायश्चित्तेत्वदेवानां. यास्यैपशुनीतनूस्तामस्यैनाशयस्वाहा ॥ चंद्रप्राय श्चित्ते यास्यैगृहनीतनूस्तामस्यैनाशयस्वाहा।।गंध प्रायास्यैयशोनीतनूस्तामस्यैनाशयस्वाहेतिस्था लीपाकस्य जुहोति प्रजापतये स्वाहेतिहुत्वा हुत्वे तासामाहुतीनामुदपात्रे सवान्त्समवनीयततए नांमृईन्यभिपिचतियातेपतिनीप्रजानीपशुग्नीगृहन्नी .
विवाहपद्धति भा० टी० यशोन्नीनिंदितातनूर्जारनी ततएनांकरोमिसाजी यत्वंमयासहासावित्यथैना स्थालीपाकं प्राशय ति प्राणैस्तेप्राणान्त्संदधाम्यस्थिभिरस्थीनिमा) सैर्मा सानि त्वचात्वचमिति तस्मादेवेविच्छ्रोत्रि यस्य दारेणनोपहसमिच्छेदुतह्येवंवित्परोभवतिता मुदुह्ययथर्तुप्रवेशनं यथा कामीवा काममाविजनि तो संभवामेतिवचनादथास्यै दक्षिणा समधिहृदय मालभते यत्तेसुशीमे हृदयं दिविचंद्रमसि श्रियं । वेदातन्मांतद्विद्यात्पश्यमशरदः शतं जीवेमशरदः शतशृणुयामशरद शतमित्येवमतऊर्ध्वम् ॥ ११॥ इतिश्री कर्पूरस्थलनिवासी गौतमगोत्र (शोरि) अन्वयालङ्कृतदैवज्ञदुनिचन्द्रात्मजपण्डितविष्णुदत्त वैदिकसंगृहीतं चतुर्थप्रकरणं समाप्तम् ॥ शुभमस्तु श्रीरामचंद्रप्रसादात्॥ ( समाप्तमिदं चतुर्थं प्रकरणम्) अथ पंचमप्रकरणम्। ॐनमोगणपतये। अथविवाह पद्धतिलिख्यते । तत्रादौ युग्मकेन्मङ्ग लाचरणम् ॥ संधिविग्रहमन्वेन्द्रो रुद्रदेवतनूद्भवः। भूमिपालशिरोरत्नरनितांत्रिसरोरुहः॥१॥ ..
प्रकरणम् १०७ भाण्टी-ऑस्वस्ति श्रीगणेशाय नमः॥ अथ विवाहप द्धतिकी व्याख्या भाषामें कतेहैं । प्रथम (मङ्गलाचरणं शि- चारात्फलदर्शनात् श्रुतितश्चेति)श्रुत्यादि विहित मङ्गला- चरणको होनेसे विघ्नविनाशनके लिये लिखते हैं ॥ गणेशं गुरुं पद्मनाभं महेशं कुमारं महेन्द्रं रमां शारदांच ।। ग्रहां स्तुङ्गगान्वीर्ययुक्तांस्तथैव नमस्कृत्य सर्वान्सुटीका करोमि ॥१॥ याकृता रामदत्तेन निवाहुरामशर्मणा। ताम्विलो- क्योपकाराय सर्वेषां क्रियते मया ॥ २॥ व्याख्यानृगिरया सैवधर्मकामार्थसिद्धिदा । प्रत्यरागद्वेषौ च द्रष्टव्यासु- विचक्षणः॥ ३॥ यदशुद्धमसम्बद्धमज्ञानाच्चकृतमया। विद्व- द्भिः क्षम्यतांसर्व बालत्वादयमञ्जलिः ॥४॥ विवाहपद्धतेा ख्याकृता यत्नाद्विलोक्यताम् ॥ उल्लसिप्यन्तिदुप्यन्ति सन्तोऽसन्तश्चभृतले ॥५॥ सन्धिविग्रहकृच्छ्रीमद्वारेश्वरसहोदरः। महन्महत्तरः श्रीमान्विराजतिगणेश्वरः॥२॥ युग्मकम् ॥ भा० टी० (सन्धिविग्रह इति ) सन्धि जो परस्पर मिला- वट अर्थात् मेल विग्रह अर्थात् युद्ध इन्का जो मन्त्र सम्यक् विचार तिस्में इन्द्र ईश्वर अर्थात् तीक्ष्णबुद्धिद्वारा संधिवि- ग्रहके यथार्थ ज्ञानमें समर्थ रुद्रदेव जोमहादेव तिस्का पुत्र प्रमाण जैसे अथर्व वे० (नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायएकदन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय वरदमूर्तये नमः )इति इहां यद्यपि तनृद्भवसे और सपुत्र लियाजाताहै तथापि सहि (प्रसिद्धि) से क्षेत्रज पुत्र में भी वर्तताहै सरसिज(कमल)वत् भाव यहहै कि सरोवर में जो उत्पन्नहो वह पाटलि अर्थात गुलार जो पृथ्वीपर पैदा होताहै इस्कोभी कहते हैं। सरसिज (कमल) १ पद्धनि । २ टीइति दोपः।
विवाहपद्धति भा० टी० अक्षरार्थसे कहा जाताहै तथापि प्रसिद्धिसे प्रमाण जैसे (स्थलारविन्दश्रियम् ) फिर कैसे है भूमिपाल राजा लोक इन्के प्रति दिनराजकार्य तिन्में विघ्नका संदेह उस्के निवृत्त कर्नेके लिये प्रणाम कररहै राजाओके से मुकुट रनोंसे विचि- त्रित हुए हैं चरणकमल जिनके ॥ १॥ (संधि इति) तारक दैत्यके वधमें संधिविग्रह कर्नेवाला श्रीमान् वीरेश्वर अर्थात् वीरपुरुषोंका स्वामी और युद्धमें लगानेवाला जो स्वामि कार्तिकजी इन्के भाई और महान् जो व्यास वसिष्ठादि उन्में जो बडे ब्रह्मादिक उन्का पूज्य और गणोंका स्वामी श्रीगणेशभगवान् विराजमान अर्थात् शोभताहै ॥२॥ युग्मका लक्षण साहित्यदर्पणमें लिखा है (द्वाभ्यां तु युग्मकं ज्ञेयं ) अर्थ दो श्लोकोंसे एकार्थ कहनेसे युग्म होताहै ॥ श्रीमतारामदत्तेनमन्त्रिणातस्यसूनुना । पद्धतिःक्रियतेरम्याधा वाजसनेयिनाम् ॥३॥ भा०टी०-श्रीमान् शोभायुक्त संहिता पद क्रम जटा घन और वेदार्थमें चतुर श्रीगणेशनाम कर स्वपिताके पुत्र राम- दत्तजी मैं शुक्लयजुर्वेद माध्यन्दिनी शाखा वाजसनेयी सं- हिता कात्यायन सूत्रवाले जो त्रैवर्णिक अर्थात् ब्राह्मण क्षत्री वैश्य इनकी धर्मयुक्त मनोहरतासे शोभित विवाहकी पर- ति प्रगट कर्तेहैं इससे शूद्रका विवाह वेदोक्तमंत्रोंसे नहीं चाहिये.प्रमाण याज्ञः स्मृतिवाक्य-ब्रह्मक्षत्रियविशुद्रा वर्णास्त्वाद्यास्त्रयो द्विजाः । निषेकादिश्मशानांतास्तेषां वे मंत्रतःक्रियाः॥नतु शूद्रस्य ॥ स्त्रीशद्रोऽनुपनीतश्च वेदमंत्रान् १०९ प्रकरणम् तत्रक्रमः॥ तावत्पूगीफलोपवीतदानं तत्रकन्याधा तापुरोधाअन्योब्राह्मणोवाकश्चित् ।। भाण्टी०-(तत्रक्रमः)तिसपद्धतिमें जो शास्त्रक्रम अर्थात मंत्रपूर्वक ब्राह्मण सूत्रविहित मर्यादा वही मुख्यहै नहि अ- पने मुखसे रचित वा न्यून आधिक अन्यथा वेदविरुद्ध हो- नेसे प्रत्यवाय होताहै ॥ अथकन्यादानका फल लिखते हैं। भूमिदानं वृषोत्सर्गों दानं गजसुवर्णयोः। उभयतोवदनागौ- श्च तुलाया दानमुत्तमम् ॥ कन्यादानं जीवदानं शरणागत- पालनम्। वेददानं महाराजमहादानानि दशतधाप च महाबाहो कन्यादानमनुत्तमम् । कन्यादानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति ।। यह मार्तण्डमें लिखाहै ॥ अर्थ-भूमी १ वृषोत्सर्ग २ हस्ति३सुवर्ण ४ उभयतोमुखीगौ ५ तुलाकन्या ७ शरणागतकी रक्षा ८ जीवदान ९ वेददान १० यह महादानहें तिस्मेंभी कन्यादान अधिकहै ।। अन्यच्च विधि- वत्कन्यकादानमश्वमेधसम कलौ। गोविंदराज ऐसे कहते हैं अर्थ अन्य युगामें अश्वमेध और कलियुगमें कन्यादान यह दोसशहे।अन्यच्च तिस्रः कोट्योधकोटीचतीर्थानां वायुर- ब्रवीत् । दिवि व्यंतरिक्षेच कलो ते सन्ति जान्हवी ॥वेदतं- प्रणीतायायानि मन्त्राणि सर्वशः । वेदमातुर्जपेतेषां फलं प्रोक्तं कलौ युगापद्मपुराणमें यह लिखाहाअर्थ सुगमहे॥चिंता मणीनां गिरयाकल्पवृक्षाःसहस्रशः । बजाश्च कामधेन्नांतत्र गच्छेदुहितदकांचनानिच हाणि नद्यःपायसकर्दमा फलान्यमृतकल्पानितगच्छेदूदुहितृदः ।। यह मार्कण्डेयका वचन ॥ ऐसा महाफलका दाता कन्यादान तीनप्रकारका है । प्रथमवाग्दान अर्थ सगाई वा कुडमाई द्वितीय क- न्यादान अर्थात् पाणिग्रहण वा विवाह तृतीय बहादि पारि.
។ ១ विवाहपद्धति भा० टी० बर्हदान प्रमाणभी जैसे वृद्धमनुजी"वरंसम्पूज्य खार्जूरं फलं दत्वामुखे तथा । तस्मिन्कालेऽग्निसान्निध्ये पितातुभ्यं प्रदा स्यति॥इति प्रतिज्ञयायच कन्याभ्रात्रादिनाचसा।वाचायद्दी यते तुल्ये वाग्दानं प्रथम स्मृत ॥ वरं संपूज्य विधिना वेद्या मग्निं विधाय चादात्रा प्रदीयते यच्च कन्या संकल्प्य वाग्य तः॥ द्वितीयं कन्यकादानं तनु प्रोक्तं मनीषिभिः । वधूवरौ च खदायां मण्डपे संनिवेश्यच । पारिबह महद्दत्वा जलेन च विसर्जनम् । तृतीयंकन्यकादानं व्यासाद्या मुनयोजगु" अर्थ सुगमहै ॥ (तत्रकन्याभ्रातेति ) कन्याका भाई वा पुरोहित अथवा अन्य ब्राह्मण संगाई करे मनुजीभी लिखते॥ ऋत्विक पुरी- हितः पुत्रो भाऱ्या भृत्यः सखा तथा । एतदद्वारा कृतं यचं तत्कृतं स्वग्रवाहि ॥ अर्थ-इन द्वारा जो किया जाय वह आपही किया होताहै। उदङ्मुखःप्रत्यङ्मुखो वा उपविश्य प्राङ्मुखस्य वरस्य गन्धाक्षतैरचितस्य मुखदत्तखारादिफलस्य स्वयंपूगीफलयज्ञोपवीतमादाय ॥ - भा टी-उत्तराभिमुख वा पश्चिमामुख स्थित होकर पूजन करे इस्में प्रमाण मनुजीका लिखते हैं । पूज्यश्चं प्राङ्मुखो यत्रोदङ्मुखः पूजको भवेत् । अचयेदेवमभित इति प्रत्यङ्मुखश्चसः) यह वाक्य जो है कि(प्रत्यङ्मुखंस्था पयेत्त देवं पूज्यं तथैवच । पूजकः सन्मुखस्तत्र इति धर्मानु शासनम् ) कहते हैं कि यद्यपि पूज्य हानेसे वरको प्रत्यङ्मु- खहोना उचितहै तथापि (प्रत्यङ्मुखं स्थापयेत्तु देवं पूज्यं । वरं विना ॥ वरस्तु प्रामुखःपूज्यः पूजकः स्यादुदमुखः) इस व्यासस्मृतिप्रमाणसे तथा( प्रत्यङ्मुखान्पूजनीयदेवां प्रकरणम् स्तत्संमुखः स्थितः । अर्चयेनित्यमेवेत्थं विधिरित्येव सम्म तः ॥ स्थित्वाचाभिमुखनाचेंच्छम्भुं जामातरं तथा। इंद्रं चो दङ्मुखं स्थाप्य स्वयं प्राङ्मुखसंस्थितः ॥ उदङ्मुखोर्चये दाता वेदिस्थं प्राङ्मुखं वरम्)।यह पराशरजीके वचनसे वर को प्राङ्मुख बैठाय गंधाक्षतसे पूजन कर मुखमेंखघुर (छु- हारे) का फलदेवे (नारिकेलफलं चैव तदन्तर्भक्ष्यमुत्तमम्॥ खजूरादि फलं राजन् विवाहे मङ्गलप्रदम् ॥) इस भृगुजीके वचनसे विवाहादिक सब मंगलकार्य में खजूरादि फल देना सिद्ध होताहै । (स्वयमिति ) आप पुगीफल (सुपारी ) य ज्ञोपवीतको लेकर कन्याका भ्राता वा पुरोहितादिमान्य पु- रुष जो आगे लिखेंगे वह कहकर वरण करे अर्थात सगाई वा कुडमाईकरे वर कैसाचाहियेवह लिखते हैं (ययोरेव समं वित्तं ययोरेवसमं कुलं।तयोर्विवाहोमैत्रीच न तु पुष्टविपुष्टयोः)॥ यह महाभारतमें लिखाहै अर्थ-जिनका धन कुल आचरणा- दिसमहो उनका विवाह कर्माचाहिये लक्षण वरके जैसे गो- विंदराजजीने कहेहें(सुशीलश्चारुयुद्धिश्च व्यवहारपटुःक्षमी। उदारो वाक्पटुर्वाग्मी गुणयुक्तो वरो मतः ।। परस्पराप्तसंबं धकुलजातो महाकविः । कान्तःसुलक्षणः श्रीमान् मातृपि तृयुतोवरः)॥ इत्यादिलक्षणसम्पन्न वरं चाहिये ।। तस्मिन्कालेमिसांनिध्येस्नातः स्नाते ह्यरोगिणि ॥ अव्यङ्गे पतितेलोवेपित्तातुभ्यं प्रदास्पतीतिपठित्वा हस्तेदद्यात् । भाण्टी--(तस्मिन्कालेति ) तिस प्रसिद्धकाल विवाह समयमें अग्निके समीप साक्षिद्वारा वाताइमरी कुष्ट मेह- 'महोदर भगन्दर इत्यादि रोगरहित-यधा 'वाताइमरी कुष्ठ मेहमहोदरभगंदराः ॥ अर्शश्च ग्रहणी व महारोगाः खुदु- स्तराः। इनके मंद त्रिफित्साशास्त्रमें लिखे हैं मूल विरुद्ध . ११२ विवाहपद्धति भा० टी० होनेसे नहि लिखे जाते हैं इनसे रहित और व्यंग जो यो- निज और जातिज दोप्रकारका उस्से रहित अर्थात् धृता (धरेल ) विवाहिता (दासी) यह तीन स्त्री निपिद्ध होती है इन्के लक्षण जो विधवा स्त्री प्रीतिपूर्वक सुंदर वाणी और पुष्कल भोजनद्वारा घरमें स्त्रीभावनासे रक्षितहो उ- स्को धृता (धरेल) कहते हैं ॥ और जो पूर्व विवाही हो अनन्तर मरजाने पतिके फिर. कन्याभावसेजो विवाहीजाय उस्को विवाहिता स्त्री कहते हैं । अर्थात् पुन ॥ दासी स्को कहते हैं कि प्रथम घरमें भृति ( नौकरी ) कर्तीही फिर यौवन सुंदरतासे कामवश होकर जो स्वीकार की जावे ॥ इन स्त्रियोंसे उत्पन्न संततिको अपने कुलमें जो मिलाना वह योनिव्यंग कहाताहै। और अपनि जाति- का हीन जातिसे सम्बन्धको जातिव्यंग कहते हैं । इनसे रहित तुमको और चक्षु चरण कटि इन्का भंग और अंधता पंगु प्रभृतिया देहव्यंग उन्से रहित और अपतितको(बह्महा मद्यपस्तेनस्तथैव गुरुतल्पगः । एते महापातकिनो यश्च तै: सह सम्वसेत् ॥ ब्रह्महत्यादिके पापे जातिभ्रंशकरे तथा । वृषलीगमनेत्यर्थ सावित्रीविरहेपि च ॥ अभक्ष्यभक्षणे चैव पतितो भवति ध्रुवम्॥)इत्यादि कालादर्शादि निरूपित पत नादिसे रहित और क्लीय अर्थात् नपुंसकतासे रहितको प्र०॥ भस्मनि होमकरणात्पंढे कन्याप्रदानतः। कुलधर्मपरि- त्यागानरके नियतं वसेत् ॥याज्ञवल्क्यजी वरके लक्षणमें भी लिखते हैं ।।( एतैरेव गुणैर्युक्तः सवर्णः श्रोत्रिपो वरः । य- नात्परीक्षितः पुंस्त्वे युवा धीमान् जनप्रियः) इति प्रथ- माध्याये अर्थ पूर्वोक्तगुणोंसे युक्त सवर्णी अर्थात् ब्राह्मणीर से ब्राह्मण क्षत्रियाणीसे क्षत्री इत्यादि वेदके जाननेवाला और यनसे पुंस्त्वमें परीक्षा कियाहो । युवा और सर्व प्रकरणम् ११३ प्रियहो ॥ ॐ इत्यादि दोषसे रहित तुमारेको पिता कन्यादान देवेगा यह प्रतिज्ञाको उच्चस्वरसे कहकर वरके हाथ पूगीफल यज्ञोपवीत कन्याका भ्राता अथवा पुरोहित वा ब्राह्मणद्वारा देवे ॥इति वाग्दानविधिःसमाप्तः। शुभभू० श्रीः ।। श्रीः ॥ भावयह है कि कन्याका भाई आप वा पुरो- हितसे अर्थात् जिसपर अपना दृढ विश्वासही उस्के द्वारा सगाई करे॥ और कन्यासे वर दुगुणा अथवा डेढा अर्थात् कन्या ८ वरसकी बालक १६ वरसका होना चाहिये ना मिलने पर ऐसा तो कन्या ८.वर्षकी बालक १२ वर्षसे कम । न्यून) ना होना चाहिये । अन्यथा जो लोभ मोहादिके वशसे बाध- नी देख कर आठवर्षके बालकके गले में १६ वर्षकी कन्याको 'चमेडदेवे उस्कोभी प्रत्यक्ष फल मालूम होना चाहिये.कि बालक पुष्ट नहीं होता और शुष्कवदन वलरहित प्रजो- त्पादनमें असमर्थ होताहै उस्की संतान उस्से निर्बल होती है इत्यादि बहुत दोपहैं जिन महाशयोंके देखने की इच्छा हो वह मैंने एक चिकित्साशास्त्रकी दिनरात्री ऋतुचर्यादि बहुत प्रकारको युक्त स्वस्थपुरुष नामकर ग्रंथ. धनायाहे उस्के देखले ॥ प्रार्थनेयं वैदिकविष्णुदत्तस्य ॥ यजु० अध्याय १७ मंत्र ३ ॐ ऋतवस्थाऽऋतावर्धा ऋजुप्यस्था ऋतावृधा। घृतथ्युतौमधुश्च्युतौबिराजो नामकामदुधाऽअक्षीयमाणाः ॥ इतिपठित्वाशिरस्यक्षतादिकंदद्यादरः। भ्रातृव्यतिरिक्तपक्षे पितेत्यवदातेत्युच्चारयेत् ॥
विवाहपद्धति भा० टी० भाण्टी-(ऋतवस्था इति)भोकन्याके देनेवाले तुम ऋत- नाम सत्यमें तिष्ठित होनेवालेहो अर्थात् सत्य प्रतिज्ञा युक्त रहें। (ऋजुष्ये सन्मार्गे तिष्ठन्तीति ऋजुप्यस्थाः) अर्थात् सन्मार्गमें स्थितहो (ऋता सत्या अवधयो मर्यादाः सम- या वा येषांते) अर्थात् मर्यादा पालक हो ॥धृतश्च्युतः ब- हुत होनेसे जिस्के घरमें घृत गिरताहै ॥ मधुश्श्युतः मधूनि मधुराणि गुडशर्करानि श्ययान्त अर्थात् बहुत मधुररस- वाले तुम होवो विशेषेण राजन्ते इतिविराजः सुशोभितही कामदुघा कामनाके पूर्ण कर्नेवाले हो नाम प्रसिद्धहो अ- क्षीयमाणाः नाहि नष्टभये धनादि जिनके.ऐसे आप होवे ॥ इस मंत्रसे वर आशीर्वाद देकर जो वाग्दान करे उस्के शि- रपर अक्षताको धरदे॥ अथसर्वेभ्योवेदाध्ययनश्रवणक्रियाव्यतिरिक्तक्रियानिवृत्तयेऽ क्षतानिदत्वा सहस्तस्वरेणाभावे तारस्वरेण वेदोच्चारणं कुर्यात् ॥ भा०टी०-(अथ सर्वेभ्य इति) ग्रंथके आदिमें मंगल कर्ना चाहिये इस शिष्टाचारसे अथ शब्दका मंगल और निष्का- दि संस्कारोंसे अनंतर यह दो अर्थहै । प्रमाण (अथ मंगला नन्तरारम्भ प्रतिज्ञाधिकार समुच्चयेषु ) विवाहके आरम्भ में हस्तस्वर सहित वेद उच्चारण करे प्र० याज्ञवल्क्यशिक्षा में ॥ हस्तस्वरेण योधीते स्वरवर्णार्थसंयुतमित्यादि बहुत लिखाई॥ अभावमें ऊंचस्वरसे कंठस्वर वा हस्तस्वरसे यथाबुद्धि करना चाहिये।तारस्वरसे उच्चारण कर्नेभी प्र०याज्ञवल्क्यः में यथा ।। स्वरस्तु द्विविधः प्रोक्तो वेदोच्चारणकर्माण । कण्ठ स्वरोहस्तस्वरोगौणमुख्यप्रभेदतः ॥ तारस्वरेणतावेव भवे -- प्रकरणम् ५ ११५ तामिति निश्चयः।वेदस्योच्चारणं कुर्याद्यथाविधिच वेदवित् । सर्वविघ्नविनाशाय सर्वारम्भेषु सिद्धये ।। अर्थ-हस्तस्वर औ- र कण्ठस्वर गौणमुख्यन्यायसे दो भेद है वह दोनों हि ऊंचे स्वरसे कहे जातेहैं विघ्ननाश और सर्वसिद्धि लिये आदि- में वेदोच्चारण कर्ना चाहिये।अक्षत देकर अन्यकार्यसे निवृ- तहो वेदभगवान्का उच्चारण और श्रवण कर्ना सर्वपुरुषको चाहिये ।। शुक्लयजुर्वेद संहिता वाजसनेयी अध्याय २३ मं० १९ ॥ गुणानान्त्वा गुणपतिहवामहे प्रियाणा न्त्वाप्रियपतिहवामहे ॥ निधीनान्त्वा निधिपतिथंहवामहेवसोमम। आहमजा निग धमात्वमजासि गर्भुधम् ॥१॥ भा०टी०- (गणानान्त्वेति)(हेममवसो) मेरेधन श्रीग- णेशदेव (गणानांपति) गणोंके स्वामी(त्वां) तुमको(हवा- महे )बुलावते हैं (प्रियाणां.) इंद्रादि देवताका जो (प्रियप- ति)तारकादिदैत्योंक वधसे प्रियकार्तिकेयादि उनके विन- के नाश कर्नमें समर्थ (त्वां) तुमको (हवामहे) बुलावतेहैं (निधीनांनिधिपति)निधी जोधनादि उनमें जो निधि अर्था- अनंतफल देनेवाली योगसिद्धि उनकेस्वामी तुमको बुला- तेहैं (हेगणपते अहं त्वया अजानि ) गणेशदेव मुझको तु- गमने उत्पन्न किया। कैसामैहुँ (गर्भधं)मातेके गर्भसे पैदाहुआ (अज) हेअनादि (त्वं )तुम (गर्भधमासि) गर्भसे नहीं- ११६ विवाहपद्धति भा० टी० भयेहो ।भाव गर्भद्वारा परतंत्रतासे मैं जीव और आप ग- दिरहित स्वतन्त्रतासे प्रकाशहुये ईश्वरहै इसलिये सर्व- जगत बनाने में समर्थ होइति ॥ यजुः शु० अध्याय १६ मन्त्र २५।। ॐनमोगणेभ्यो गणपतिभ्यश्चवोनमो नमोबातेभ्यो ब्वातपतिब्भ्यश्चवो नमो नमोगृत्सभ्यो गृत्संपतिभ्यश्श्चवो न मोनमोचिरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्श्चवो नमः॥ भा०टी०-(नमोगणेभ्यो) तुम गणनाम समूहोंको और गणोंके स्वामी याको नमस्कारहै(वातेभ्यो)वातनाम रा- शीभूत तुमको और (व्रातपतिभ्यो) राशीभूतोंके स्वामी तुमको प्रणामहै ॥ (नमोगृत्सेभ्यो ) नमस्कारहै विघ्नके कर्नेवाले याको वा विषयमें लंपटाको वा युद्धिवालो तुमको (गृत्सपतिभ्योनमः) और उन्के पालनेवाले तुमको प्रणामहै (नमो विरूपेभ्यो) प्रणामहै अनेकरूपवालो वा कुत्सित रुपवालो वा विशिष्ट रूपवालोंको (विश्वरूपेभ्यश्चवोनमः) संपूर्णरूपवालो तुमको प्रणामहै ॥ इति गणेशस्तुतिः ॥ शुक्ल यजु० अध्याय० ३४ मन्त्र ४५॥ सुहस्तीमा सुहच्छन्दसऽवृतम्सहर्ष माऽऋपया सुप्तदैव्या पूर्वेषाम्पन्थामनु .
प्रकरणम् ११७ दृश्युधीराऽअन्यालेभिरे रुत्थ्योनरंश्मीन्॥ मा०टी०-(सहस्तोमा)(सप्तऋषयः) अर्थात् भरद्वाज १ कश्यप २ गौतम ३ अत्रि ४ विश्वामित्र ५ जमदग्निव- सिष्ठ ७ यह सातऋषि (पूर्वेषां) प्राचीनोंके (पन्थानं ) मा- गैको (अनुदृश्य )देखकर (अन्वालेभिरे) सृष्टिको उत्पन्न- कर्तेभये कैसे ऋषि (सहस्तोमाः) सृष्टिकर्नेकी ईच्छावाले (सहच्छन्दसः) छन्द अर्थात् वेदसहित ज्ञानवान् (आ- वृतः) आशब्दसे कर्म उससे युक्त अथवा अपने जो कर्म श्रद्धासत्यप्रधान उनसे युक्त अर्थात तपरूप कांके अनुष्ठा- न कर्नेवाले (सहप्रमाः) यथार्थ ज्ञानयुक्त प्रमाण ( यथार्थ ज्ञानंप्रमा)(देव्याः) जो ब्रह्माकि प्रथम देवीसृष्टिहै और ईश्वरतासे मृष्टिकने में समर्थ (धीराः)ज्ञानमुष्टियुक्त (कथं) कैसे (अन्वालेभिरे) सृष्टिकर्तेभये (रथ्योनरश्मीन् ) रथ्य जो सारथि जैसे रश्मियोंसे ॥ भावहै किउत्तमसारथि यां- छितदेशकी प्राप्ति लिये और घोडोंके वांधनेलिये रश्मि ओंको बनाताहै । तैसे वह ऋषि कारणोंसे सृष्टि रचतेभये ।। इति मङ्गलस्तुतिः॥ यजु० अध्याय ३४ मंत्र॥ यज्जाग्ग्रतोदूरमुदति दैवंतर्दुसुप्तस्यतथैवै ति । दूरङ्गमञ्ज्योतिपाज्योतिरेकुन्त न्मेमन शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ मा०टी०-(पंजाप्रतः) जो जाग्रतअवस्थामें इन्द्रियोंसे (दूरमुदति) दरको जाताहे कैसाह(द )देवस्वम्प(तमुत्त . ११८ विवाहपद्धति भा० टा. स्यतथैवेति स्वप्नावस्थामें भी सूक्ष्मेंद्रियोंसे स्वरचित वि- षयों में भ्रमताहै (दूरंगमं ) दूरगामी (ज्योतिषांएकं) इंद्रि- योंमें प्रधान ज्योति प्रकाश कर्नेवाला प्रभगवतगीताका.(इ- न्द्रियाणांमनश्चास्मि)(तन्मेमनः ) ऐसा मुझका मन (शि- वसंकल्पमस्तु) सत्वप्रधान वृत्तिवाला अथवा ब्रह्मलोकादि- कोंमें वसनेवाला होवे ॥ यजु० अध्याय ३४ मंत्र ६॥ येनुकर्माण्यपसौ मनीपिणौयुज्ञेकृण्व न्ति विदथेषुधीराः । यदपुर्वैय्यक्ष्ममन्तः अजानान्तन्मुमन+शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ भाण्टी-(येनकर्माणि)(येन)जिस मनकर्के (अपसो मनीषिणः) अप अर्थात् कर्ममें कुशल प्रमाण निघंटु । २ ॥१ (अप इति कर्मनाम )( यज्ञेकाणि कृण्वन्ति) यज्ञमें काँ- को विस्तृत कतैहें कैसेहैं (विदथेषुधीराः)यज्ञादिकोंमें जो- पण्डित है वा यज्ञ साधन ज्ञानमें (यदपूर्व)जो अपूर्व अर्था- त् नित्य वा अद्भुत (यक्ष्म)पूजनेयोग्य (प्रजानामन्तः) देहों- के अन्तर वर्तनेवाला वह मन शिवसंकल्प युक्तहो ॥ ६ ॥ यजु० अध्याय०३४ मन्त्र ७॥ यत्प्रज्ञानमुतचेतोधृतिश्चयज्ज्योतिरन्त रमृतंम्प्र॒जासु । यस्म्मान्नऽऋतेकिञ्चन कम्मक्क्रियते तन्मेमनं शिवसंकल्प मस्तु ॥ .
प्रकरणम् ५ ११९ भा०टी०-(यत्मज्ञानमिति) (यत्प्रज्ञानं) जो मन बुद्धिरूप (उत)समुच्चयसे (चेतः)चेतनतासेस्मरणात्मक ज्ञान(धृति- श्)धैर्यरूप(ज्योतिरन्ना)इंद्रियोंके प्रकाश कर्नेवाला (प्र० सुखंदुःखधृतिरकृतिःसंशयविपर्ययकामःसर्वमनएवेति श्रुतिः प्रजासु अमृतं) विनाशि शरीरोंमें जो अमृत अर्थात् नित्य (यस्मान्न ऋतेकिंचनकम क्रियते ) जिसके विना कोईकाम नहि कियाजाता वह मेरा मन शिवसंकल्पवाला होवे ।। शुक्लयजुर्वेद अ० ३४ मन्त्र ८॥ येनेदम्भूतं भुवनम्भविष्यत्परिंगृहीत ममृतेनुसम् । ये युज्ञस्तायतें सुप्त हौतातन्मेमन-शिवसङ्कल्पमस्तु भाण्टी--(येनेदंमिति) (येनेदम्भूतं भुवनं भविष्यत्प रिगृहीतं)जिसने वर्तमान भूतभविष्यत् तीनकालमें संपूर्ण भुवनकोश जाना, कैसेने (अमृतेन) नित्यने (येनसतहो- ता यज्ञस्तायते) जिस मनने सप्तह होता जिस्में ऐसा अ- निष्टोम नाम यज्ञ विस्तृतकरीदा वह मेरा मन शिव संकल्प- वाला होवे॥ यजु अध्याय ३४ मंत्र ९॥ यस्म्मिन्नच सामुयजूंपियस्मिन्न्प्र तिष्टितारथनाभाविवाराह । यस्म्मिँचि त्त सर्वमोतंम्प्रजानान्तन्मेमनः शिवसं कल्पमस्तु ॥
१२० विवाहपद्धति भा० टी० भा०टी०-(यस्मिन्तृचः)(सामयजू शषि) अर्थात् जिस्में ऋक् यजु सामवेद (प्रतिष्ठिताः)आश्रितहै (रथनाभौआरा इव) रथके चक्रकी नाभिये आरकीन्याई (यस्मिन् ) सर्व प्रजानां चित्तं ओतं) जिसमे संपूर्णप्रजाका चित्त सम्बद्ध है ऐसा मेरामन शिवसंकल्प युक्तहोवे ॥ यजुर्वेद० शु० अध्याय०.३४ मंत्र० १०॥ सुषारथिरश्वा निवुयन्न्मनुष्यान्नेनीयते भीशुभिर्धाजिन इव । हुत्प्रतिष्टुन्थ्यदैजि रञ्जविष्टुन्तन्मेमन शिवसंकल्पमस्तु॥१०॥ भा०टी०-( यन्मनुप्यान्नेनीयते ) जो मन मनुष्यलोकसे लेकर सर्वदेव दानव ऋषि इत्यादि स्थूल सूक्ष्म जीवोंको श्रेष्ठ और निषिद्ध कर्ममें लगाताहै किसकी तरह (सुपार- थिर्भाशुभिर्वाजिनः अश्वान्इव ) श्रेष्ठसारथि रश्मिसे वेग- वाले अश्वोंको मार्गसे निवृत्त और जैसे प्रवृत्त करे (यवह- प्रतिष्ठं)जो मन हृदय गत है (अजिरं ) नित्य है (यविष्ठ) अतिशय वेगवाला वह मेरामन शिवसंकल्प युक्त हो।१०॥ इति शिवसंकल्पव्याख्या सम्पूर्णा ॥ शुभम् ।। अथ स्वस्तिवाचनम् । यजु० अध्याय २५६०१८॥ स्वस्तिनु इन्द्रौव्वृद्धश्रवा स्तुस्तिन प्रकरणम् ५ पूपाविश्ववेदा ॥ स्वस्तिनस्ताक्क्ष्यों रिष्टनमित्स्वस्तिनोबृहस्पतिर्दधातु ॥१॥ भाण्टी-बडीकीर्तिवाला इन्द्र हमारे अविनाशि शुभ- को देवे और सर्वधनोंका स्वामी पूपा हमको स्वस्तिदेवें नहीं नष्टभई चक्रधारा वा पक्ष जिस्के ऐसा रथ वा गरुड. हमको स्वस्तिको दे और देवताओंका गुरु बृहस्पतिजी हमकोस्वस्ति अर्थात् कल्याणको देवे ॥ यजु० अध्याय ३६ । कंडि० ३६॥ पर्यटथिव्याम्पयुऽओपधीपुपयाँदिक्ष्य न्तरिक्षेपयोधाः । पय॑स्वती प्रदिशः सन्तुमह्यम् ॥२॥ भा टी-वे अग्निदेव तुम पृथिवीमें पय नाम रसको धारण करो और ओपधी अन्नादिमेंभी रसको दे (ओषध्यः फलपाकान्ता)इति इसप्रकार स्वर्गम अंतरिक्ष आ- काशमें रसको स्थितकर परंतु मेरेलिये दिशा और वि- दिशा पयस्वती नाम रसयुक्त हो मैं यह प्रार्थना कर्ताहुँ । . यजु० अध्याय कंडि०२१॥ विष्णोरराटमसि विष्ष्णोल्नप्त्रैस्त्थो विष्प्णोल्स्यूरसिविष्णौ वोसि । वैष्ण मंसिविष्णवेत्वा ॥३॥ ।
१२२ विवाहपद्धति भा० टी० भाण्टी-हे दर्भरूपविष्णु तुम हविर्धान मण्डपके ललाट- स्थानहो हेरराट्यन्त तुम विष्णुनाम हविर्धान मण्डपके (श्र- प्वेस्त्थः) ओष्ठकी सन्धिरूपहो हेलस्यूजनि अर्थात् बृहत्सूची तुम विष्णुनाम हविर्धान मण्डपकी सूचीहो हे रज्जुगन्धि तुम हविर्धानको धुवनाम ग्रंथिहो हेहविर्धान तुमविष्णुसंबं- धिहो इसलिये अर्थात् विष्णुसंबंधि होनेसे आपकी स्तुति- कर्ताहुवा स्पर्श कर्ताहुं ॥६॥ यजु० अध्याय १४ कंडिका २० ॥ अग्निवतावातौदेवतामों देवताच न्द्रमादेवतावसंवोदेवतारुद्रादेवतादित्या देवतामस्तौदेवताविश्वेदेवादेवताबृहस्प तिर्दैवतेन्द्रौदेवतावरुणोदेवता ॥४॥. भा०टी०-हे हविर्धान और जो तुम अग्नि वायु सूर्य चंद्र- मा वसु ८ रुद्र ११ आदित्य १२ मरुत ४९ विश्वेदेवा १३ बृ- हस्पति इन्द्र वरुण इत्यादि देवतास्वरूपहो इसलिये आ- पकी स्तुति वा स्पर्श कर्ता हुँ॥ यजु० अध्याय ३६ कंडिका १७॥ चौशान्तिरन्तरिक्षुशान्ति पथिवीशा न्तुिरापुत्शान्तुिरोपंधयुत्शान्ति वनस्प्प तयुत्शान्तिर्विश्वेदेवा शान्तिाशा प्रकरणम् १२३ न्तित्सर्वशान्तुिल्शातिरवशान्तुिल्सामा शान्तिरेधि ॥५॥ भा०टी०-स्वर्गरूप जो शांति और आकाशरूप जो शां- ति पृथिवीरूप जो शांति जलरूप जो. शांति औषधीरूप जो शांति वृक्षरूप तथा सर्वदेवरूप और शांतिस्वरूप जो शांति वह मेरेको हे गणेशदेव आपकी प्रसन्नतासे होवे ॥ यजुर्वेद अध्याय ३० । अनु० १ मं०३॥ विश्वानिदेवसवितर्दुरितानिपरीसुव ॥ यद्न्तन्न आसुंव ॥६॥ भा०टी०-हे अंतर्यामीसूर्यदेव तुम मेरे संपूर्ण पापको दूर लेजाओ अर्थात् नष्ट करो और जो कल्याण है वह मुझको देवो ॥ सूर्यभगवान्को अन्तर्यामी होने में प्रमाण ( आदि- त्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च- रात्रिश्च उभेच सन्ध्ये धोपि जानाति नरस्य वृत्तम् ) इति नीती (सूर्य आत्माजगतस्तस्थुषश्च इतिश्रुतिः)॥ यजुर्वेद अध्याय १६ अनु० ७ मं०४८॥ इमारुद्रायतबसे कदिनक्षुयहीरायुप्रभ रामहेमती ॥ यथाशमसहिंपदेचतुष्प्प देविश्वम्पुष्टामै अस्म्मिन्ननातुरम्॥७॥ भा०टी०-(तवसे) बलवान्(कपर्दिने) जटिल (क्षयद्रीरा) शूरवीरोंसूरपारा के नाश काले और(द्विपदे) धनों १२४ विवाहपद्धति भा० टी० केदेनेवाले(चतुप्पदे)च पायनाम पशुओंके देनेवाले जो महा- देव उनसे जैसे इस ग्राममें सुख और संपूर्ण लोक सुखी नीरोग होवै तैसे मतिको समर्पण कर्तेहैं अर्थात् प्रार्थना कर्ते हैं ॥७॥ यजु० अध्याय २ मंत्र १२॥ एतन्तदेवसवितर्थयज्ञम्प्पाहबृहस्प्पत येब्रह्मणे ॥ तेनयज्ञमवुते यज्ञपतिन्ते नुमामव ॥८॥ भा०टी०-हे सर्वान्तर्यामी सूर्यदेव यह किया हुआ यज्ञ तुमारे लिये यजमान लोक कहते हैं किश्च तुमारसे प्रेरित देवोंके यज्ञमें जो ब्रह्मा वृहस्पति उस्के लियेभी कहते हैं औ- र अपना जान यज्ञरक्षा करो और ब्रह्मारूप जो मैं मुझकी भी रक्षा करो ॥८॥ सुप्रतिष्ठितावरदाभवन्तुदेवाः ॥१०॥ इतिस्वस्ति वाचनम् ॥ भा०टी०- सत्कारकिये हुए देवता लोकभी वरके दाता होवें ॥ १०॥ इतिश्री. *कारपूर्वहियोगोपासनंयानिनित्यानिकर्माणिइत्या दिश्रुतिसे पूर्वकसर्वमंत्रोंकाउच्चारणकर्नाचाहिये। इति श्रीकर्पूरस्थल निवासी देवज्ञ दुनिचंद्रात्मज(शोरी) पं.विष्णुदत्तकृतटीकायां पंचमप्रकरणं समाप्तिमगात् ॥ । (इति पंचमप्रकरणम्) प्रकरणम् ६ १२५ अथ विवाहविधौ पटं.प्रकरणम् । AAC स्वस्ति श्रीगणेशाय नमः।। अथविवाहमा तत्रक न्याहस्तेनपोडशहस्तपरिमितंमण्डपंविधायतदक्षि णस्यादिशिपश्चिमांदिशमाश्रित्यमण्डपसंलग्नमुत्तरा भिमुखकौतुकागारंचमण्डपावहिरैशान्यांजामातृच तुर्हस्तपरिमितांसिकतादिपरिष्कृतांवेदीञ्चकारयेत् ॥ भा०टी०-स्वस्तिवाचनके अनन्तर विवाहविधि लिखते हैं कि कन्याहस्तपरिमाणक सदृश १६ हाथका मण्डप बना- कर उस्की दक्षिणकोणमें पश्चिमदिशाको ले अर्थात् निर्ब- तिकोणमें उत्तराभिमुख जाना आनेके लिये और कुलरीति कर्ने के लिये कौतुकागार बनावे और मण्डपके बाहर साथ मिलता ईशानकोणमें जामात(जुवाई) के चारहस्त परिः मिता तुप (तुह) केश (रोम) शर्करादि निषिद्ध वस्तुयों- से रहित अर्थात् शुद्ध अग्निस्थापनके लिये चारथंभोंवाली वेदीको बनवावे ॥ और विवाहमें तिलकनाम मण्डल रच- ना (विवाहादो लिखेन्नित्यं तिलकनाममण्डलं) इस का- त्यांयनजीके प्रमाणसे-तिलकमण्डलका लक्षण लिखतेहैं । (सूर्यादयो ग्रहा यत्र राजन्ते मध्यसंस्थिताः । इन्द्रादयःप्र- सिदिश स्वस्वभावयवस्थिताः । पहिरिशयछुराधार र्चतोभद्रमुच्यते ॥ विघ्नराजो भवेद्यत्र मध्येनान्यस्तुकथन । सुमहत्सुन्दरश्चैव तिलक नाम मण्डलन् । गृहारामप्रतिष्ठा- यां दुर्गाहोमे नवग्रहे । सर्वतोभद्रकं कुन्मिण्डपे तिलक लिखेत् ॥३॥)इत्यादि वेदी बनाने केभी बहुत प्रमाण परं- तु विस्तारके भयसे लिखे नहिं जाते ॥
IN १२६ विवाहपद्धति भा० टी० विवाहदिनेकृतनित्यक्रियेणजामातृपित्रामातृपूजापू वैकंआभ्युदयिकश्राद्धंकर्तव्यम् ॥कन्यापितास्नातः शुचिःशुक्लांबरधर कृतनित्यक्रियोमातृपूजाभ्युदयि केकृत्वाअर्हणवेलायांमण्डपेप्रत्यङ्मुखःप्राङ्मुखंवर मूर्द्धजानुतिष्टतंसंवोध्य ॥ ततःस्वस्तिवाचनंगणेश कलशादिपूजनंचकृत्वा॥ भा०टी०-विवाहके दिन वरके पिताने नित्यक्रियासंध्यो- पासन पंचमहायज्ञादि मातृपूजा पूर्वक आभ्युदयिक (नां- दीश्राद्ध) कर्ना चाहिये ॥ कन्याका पिताभी स्नानकर पवि- बहो नित्यक्रिया कर धोतवस्त्र धार पोडशमातृपूजा नांदी- मुखश्राद्धकर पूजनकालमें मण्डपमें पश्चिमाभिमुखहो ऊ- ईजानु प्राङ्मुख बैठे वरको संबोधन कर स्वस्तिवाचन क- लशपूजन गणेशादि पूजन करे॥विवाहमें अवश्य नांदीमुख श्राद्ध के कनमें प्रमाण (कन्यापुत्र विवाहेतु प्रवेशेनववेश्मनि ॥चूडाकर्मणिवालानां नामकर्मादिके तथा॥ सीमन्तोन्नय- नेचैव पुत्रादिमुखदर्शने ) इत्यादि बहुत प्रमाणहै (सर्व- डोहि पितरःपूजनीयाःप्रयत्नतः) इति शातातपः। इसकी प्रक्रियाश्राद्धविवेकमें लिखीहै ॥ याज्ञवल्क्यजी सूक्ष्मतासे लिखने हैं ॥ एवंप्रदक्षिणावृत्कोवृद्धौ नान्दीमुखान्पितन् । यजेत दधिकर्कन्धुमिश्रान्पिण्डान्यवैःक्रियेति ॥ प्रथमाध्या- ये श्राद्धंप्रकरणे। साधुभवानास्तामितिप्रजापतिपिब्रह्मादेवतायजु छंदोवराचनेविनियोगः। ॐसाधुभवानास्ताम मानघलावासमपज्योतिषशास्त्रोताजानना।
- प्रकरणम् ६ १२७ चंयिष्यामोभवंतमितिस्यात् । *अर्चयेतिवरेणो ते वरोपवेशनार्थेशुद्धमासनंदत्वाविष्टरमादाय वे आएरो विप्टरो विष्टरइत्यनेनोक्तवष्टर प्रतिगृह्यतामि तिदातावदेत् । अवष्टरंपतिगृहामीत्यभिधायवरो. विष्टरंगृहीत्वा॥ भा०टी०-साधुभवान् इस मंत्रका प्रजापति ऋषि ब्रह्मा देवता यजुछंद वरके पूजनमें विनियोग है विनियोग वि- ना मंत्रोच्चारणमें दोष लिखते हैं (विनियोगविनामंत्रः पङ्के गोरिवसीदति) इसलिये मंत्रोच्चारणकमथम विनियोग क- र्ना चाहिये इस्का लक्षण जैसे (ऋषिछंदादेवतानां कर्मणि, । विनियोजन । विनियोगः स आदिष्टो मंत्रमंत्र प्रयुज्यते) (मंत्रार्थ)आप साधु-श्रेष्ठबृत्तिवाले होमे हम तुमारेको पूजन कर्तेहैं । पूजनीय पद६ पुरुप होतेहैं जैसे पारस्करजी लि- खतेहैं ( पढा भवन्त्याचार्य ऋपित्वग्वैवाह्यो राजा प्रियः स्नातकइति प्रतिसंवत्सरानहयुर्यक्ष्यमाणास्त्वृत्विजाति) याज्ञवल्क्यस्मृतिमें जैसे (प्रतिसंवत्सरंत्वा स्नातका चार्यपार्थिवाः ।। प्रियोविवाह्यश्चतथा यज्ञंप्रत्याविजापुनः) अर्थात् स्नातक १ गुरु २ राजा ३ मित्र ४ वर ५ ऋत्विक् ६ यह पूज्य होते हैं ।। पूजनकरें ऐसे वर कनेके अनंतर बैठने लिये वरको शुद्धआसन देकर विष्टरको हाथमेले विष्टरो वि- एरोविष्टरः। ऐसे कहकर विष्टर ग्रहण कीजिये दातावरको यह फहे. विष्टरग्रहण काहुँ ऐसे वरकह विष्टर हाथ में ले आगेका मंत्र पढे॥॥विष्टरका लक्षणलिखेह( पंचाशनामधे ट्रेमा तदर्धन तुविष्टरः। उर्द्धकेशोभवेद्रह्मालम्बयोशन्तु वि- टरः।। दक्षिणावर्तको व्रमा वामावर्नस्तु विष्टरः ॥ पिष्टरं सर्वयज्ञेषु लक्षणं परिकीर्तितम् ॥)
१२६ विवाहपद्धति भा० टी० विवाहदिनकृतनित्यक्रियेणजामातृपित्रामातृपूजापू वैकंआभ्युदयिकंश्राद्धकर्तव्यम् ॥कन्यापितास्नातः शुचिःशुक्लांबरधर कृतनित्यक्रियोमातृपूजाभ्युदयि केकृत्वाअर्हणवेलायांमण्डप्रत्यङ्मुखःप्राङ्मुखंवर मूर्द्धजानुतिष्टतंसंबोध्य ॥ ततः स्वस्तिवाचनंगणेश कलशादिपूजनंचकृत्वा॥ भा०टी०-विवाहके दिन वरके पिताने नित्यक्रियासंध्यो- पासन पंचमहायज्ञादि मातृपूजा पूर्वक आभ्युदयिक (नां- दीश्राद्ध) कर्ना चाहिये ॥ कन्याका पिताभी स्नानकर पवि- अहो नित्यक्रिया कर धोतवस्त्र धार पोडशमातृपूजा नांदी- मुखश्राद्धकर पूजनकालमें मण्डपमें पश्चिमाभिमुखहो ऊ- ईजानु प्राङ्मुख बैठे वरको संबोधन कर स्वस्तिवाचन क- लशपूजन गणेशादि पूजन करे॥विवाहमें अवश्य नांदीमुख श्राद्धके कनमें प्रमाण (कन्यापुत्रविवाहेतु प्रवेशेनववेश्मनि ॥चूडाकर्मणिबालानां नामकर्मादिके तथा ।। सीमन्तोन्नय- नेचैव पुत्रादिमुखदर्शने ) इत्यादि बहुत प्रमाणहै (सर्ववृ- डोहि पितरःपूजनीया प्रयत्नतः) इति शातातपः। इसकी प्रक्रियाश्राद्धविवेकमें लिखीहे ॥ याज्ञवल्क्यजी सूक्ष्मतासे लिखने हैं ॥ एवंप्रदक्षिणावृत्कोवृद्धो नान्दीमुखान्पितन् । यजेत दधिकर्कन्धुमिश्रान्पिण्डान्यवैःक्रियेति ॥प्रथमाध्या- ये श्राद्धप्रकरणे। साधुभवानास्तामितिप्रजापतिपिब्रह्मादेवतायजु *छंदोवराचनेविनियोगः। ॐसाधुभवानास्ताम भागवलापासमययोतिषशास्त्रोताजाननी ।
प्रकरणम् ६ १२७ चयिष्यामोभवंतमितिस्यात् । ॐअर्चयेतिवरेणो ते वरोपवेशनार्थेशुद्धमासनंदत्वाविष्टरमादाय वि स एरो विटरो विष्टरइत्यनेनोतवष्टर प्रतिगृह्यतामि तिदातावदेत् । विष्टरंपतिगृहामीत्यभिधायवरो विष्टरंगृहीत्वा॥ भा०टी०-साधुभवान् इस मंत्रका प्रजापति ऋषि ब्रह्मा देवता यजुछंद वरके पूजन में विनियोग हैं विनियोग वि- ना मंत्रोच्चारणमें दोष लिखते हैं (विनियोगविनामंत्रः पड़े. गौरिवसीदति) इसलिये मंत्रोच्चारण के प्रथम विनियोग क- र्ना चाहिये इस्का लक्षण जैसे (ऋपिछंदादेवतानां कर्मणि. विनियोजन । विनियोगः स आदिष्टो मंत्रमंत्रे प्रयुज्यते). (मंत्रार्थ)आप साधु-श्रेष्ठवृत्तिवाले होमे हम तुमारेको पूजन कर्तेहैं । पूजनीय पद६ पुरुष होतेहैं जैसे पारस्करजी लि- खते हैं ( पडा भवन्त्याचार्य ऋषित्वग्वैवाह्यो राजा प्रियः स्नातकइति प्रतिसंवत्सरानहथेयुर्यक्ष्यमाणास्त्वृत्विजइति) याज्ञवल्क्यस्मृतिमें जैसे ( प्रतिसंवत्सरंत्वा स्नातकाs चार्यपार्थिवाः ॥ प्रियोविवाह्यश्चतथा यज्ञप्रत्यार्वजःपुनः)' अर्थात् स्नातक १ गुरू २ राजा ३ मित्र ४ वर ५ ऋत्विक्६ यह पूज्य होते हैं। पूजन करें ऐसे वर कहनेके अनंतर बैठने लिये वरको शुद्धआसन देकर विष्टरको हाथमें ले विष्टरो वि- टरोविष्टरः। ऐसे कह कर विष्टर ग्रहण कीजिये दातावरको यह कहे । विष्टरग्रहण काहुँ ऐसे वरकह विष्टर हाथ में ले आगेका मंत्र पढे ॥ ॥विष्टरका लक्षणलिखेह( पंचाशताभवे व्रह्मा तदर्षेनतुविष्टरः । उर्द्धकेशोभवेद्ब्रह्मालम्बकेशरतु वि- प्टरः॥ दक्षिणावर्तको ब्रह्मा वामावर्तस्तु विष्टरः ॥ विष्टर सर्वयज्ञेषु लक्षणं परिकीर्तितम् ॥)
१२८ विवाहपद्धति भी० टी० वर्मोस्पीत्याथर्वणऋपिर्विष्टरोदेवताऽनुष्टुप्छन्दःउ पवेशनेविनियोगः॥ ॐवमोस्मिसमानानामुद्यता मिवसूर्यः। इमंतमभितिष्टामियोमार्कश्चाभिदासति इत्यनेनआसनेउत्तराप्रविष्टरोपरिवरउपशति ॥ --- मा०टी०-(वप्नोस्मि ) इसमंत्रका अथर्वणऋपि अनुष्टु- प्छन्द विष्टर देवता वरके बैठने में विनियोग है । ( मंत्रार्थ) जैसे नक्षत्रतारागणमें मध्यसे. सूर्य भगवान् श्रेष्ठहै तद्वतं अपनि जातिसे हम श्रेष्ठहै जो मेरा तिरस्कार कर्नेको यत्न कर्ता है उस्को और इस विष्टरको पादमें रखकर स्थित है इस मंत्रसे उत्तराभिमुखं विष्टरपर बैठजावे ।। ओंपा पाद्यपायमित्यनेनोक्तंपायंप्रतिगृह्यतामिति दातावदेत् पाद्यप्रतिगृहामीत्यभिधायवरः। ऑवि राजोदोहोसिविराजोदोहमशीयमयिपाद्यायविराजो दोहः॥ इतिदक्षिणंचरंणप्रक्षाल्यानेनैवक्रमेणवामच. रणप्रक्षालनम् ॥ भाटी-पाधं पाधं पाद्यं ऐसे अन्य पुरुपके कहने अनं- तर पायग्रहण कीजिये यह दाता. कहे पश्चात् पाद्यको ग्रह- ण कर्ताहुं यह वर कहे ॥ विराजो दोहोसि इस मंत्रका प्रजापति ऋषि अतुष्टप्छन्द जलदेवता पादको प्रक्षालनमें विनियोग है (मंत्रार्थ) हे जले तुम विशिष्टदीप्ति परमा- त्माका दोहनाम रस साररूप हो इस लिये हे जल ! आप- को ग्रहण कर्तेहैं.किश्च हे विराजोदोह अर्थात् मंचसंस्कृत जल मेरे चरणके प्रक्षालन योग्यहो।मंत्रपाठ सहित दक्षिण पाद धोये । अतरवामपादधोये । ददामंत्रके अंतमें विधान
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प्रकरणम् ६
१२९
नहिं । और ब्राह्मण वरका प्रथम दक्षिणपाद प्रक्षालन कर्ना
(धोना)और क्षत्री वैश्योंका प्रथम वामचरणं प्रक्षालन कर्ना
चाहिये, प्रमाण गृह्यसूत्रे (सव्यंपादं प्रक्षाल्य दक्षिणं प्रक्षा.
लयति ब्राह्मणश्चेदक्षिणं प्रथम) और भी ( ब्राह्मणो दक्षिणं
पादं पूर्व प्रक्षालयेत्सदा ।क्षत्रादिः प्रथमं वाममितिधर्मातु-
शासनम् ) यह पद्मपुराणमें लिखाहै ॥
ततःपूर्ववद्विष्टान्तरंगृहीत्वाचरणयोरधस्तादुत्तरा
अवर कुर्यात् । ततो दूर्वाक्षतफलपुप्पचंदनयुतार्यपा
गृहीत्वायजमानः ॥ ॐअर्यइत्यादिविष्णुपिस्त्रि
टुप्छन्दोविष्णुर्दैवताअर्घदानेविनियोगः । ॐअर्यो
ऽर्थोऽर्घइत्युक्तेऽन्येनाप-प्रतिगृह्यतामिति दातावदे
त् । ॐअर्घप्रतिगृहामीत्यभिधाय । वरोयजमानह
स्तादर्घगृहीत्वा । आपःस्थइत्यादिमंत्रस्यसिन्धु
द्वीपऋपिरापोदेवताअनुष्टुप्छन्दोर्पाक्षतादिधारणति
नियोगः ॥ ॐआपस्थयुष्माभिःसन्किामानवान
वानीतिशि रसिकिञ्चिदक्षतादिकंधृत्वा ॥
भाण्टी-पूर्वोक्तवत् और विष्टरको उत्तरान चरणोंकि नी.
चे रखकर इसके अनंतर दूर्वा (नवीनतण) अक्षत तण्डुल चं-
दन पुष्पयुक्त । यजमान अर्धपात्रको लेकर ।। ॐअर्घ इस में-
त्रका विष्णुमपि त्रिष्टुप्छंद विष्णुदेवता अर्घके दानमें वि-
नियोगहै। यथार्थज्ञान होनेसे उत्तम दान होताहै इसलि-
ये विष्टर पाद्य अर्घ्य आचमनीय आदिका तीन तीनवार
उच्चारण कर्ना चाहिये प्रमाणभी गृह्यसूत्रमें जैसे लिखा
(अन्यस्त्रिनिःप्राह विसरादीनि) अर्थ ॥ १॥ २॥॥३॥है
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.. विवाहपद्धति भा. टी. यजमानवाक्यके अनंतर अर्घको वर स्वीकार कर यजमान- के हाथसे लेकर ॥ आपःस्थइस मंत्रका सिंधुद्वीपऋषि आपो. देवता अनुष्टुपछंद अर्घ अक्षतधारणमें विनियोगह।।(मंत्रार्थ) हे जलदेवता जिस हेतुसे तुम अमृत दुग्ध दधि मधु फल : पुप्प पत्र यव अन्नादि सर्ववस्तुमें व्याप्तहै इस लिये तुमारे आश्रयही हम संपूर्ण कामनाको प्राप्तहोमे इस मंत्रसे कि- चित् शिरमें अक्षत धारण करे॥ समुद्रवइत्यादिमंत्रस्याथर्वणनापबृहताछन्दावरुणा देवताऽजलप्रवाहेविनियोगः । ॐसमुंद्रवः प्रहिणो मिस्वांयोनिमभिगच्छत । अरिष्टास्माकंवीरामापरा सेचिमत्पयः ॥ ४॥ इत्यर्वपात्रस्थजलमैशान्यांत्य जनपठेत्। ततआचमनीयमादाययजमानआचमनी यमाचमनीयमाचमनीयमित्यन्येनोक्तआचमनीयंत्र तिगृह्यतामितिदातावदत् ॥आचमनीयंप्रतिगृह्णामी त्यभिधीयवरोयजमानहस्तादाचमनीयं गृहीत्वा ॥ भाण्टी०-समुद्रंवं इस मंत्रका अथर्वण ऋषि बृहती छंद वरुण देवता अर्घजलके गेरनेमें विनियुक्तह (मंत्रार्थ) हे ज- लदेवता सिद्ध किया अर्थ जिन्होंने ऐसे तुमको समुद्र में प्रा- त करताहूं । अर्थात कारणताको प्राप्तकर्ताहै इसलिये मेरे करप्रेरित तुम (स्वायोनि ) अर्थात् समुद्रको प्राप्त होमे कि- ञ्च तुमारे प्रसन्नतासे हमारे भाई शूरवीर और हमारे पुत्र (अरिष्टा) अर्थात् आरोग्य रहे और मेरी पूजाके योग्य ज- ल मत नष्टहो अर्थात सदा रहे और मैंभी पूजाको प्राप्त होमा ॥ इस संबको ईशान दिक्में
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प्रकरणम् ६
१३१
त्यागन कर्ता जलंको पढे इस्के अनंतर आचमनीयकों
यजमान लेकर ।। आचमनीय इस मंत्रका आपस्तम्ब ऋषि
उप्णिक्छन्द जलदेवता आचमनीयके देने में विनियोगहै ।।
यह आचमनीयहै ३ ऐसे अन्य पुरुपके वचनंसे आचमनीय
ग्रहण करो यह दाता'वरको कहे पश्चात् वर आचमनीय
ग्रहण काहुँ यह कहकर यजमानहाथसे आचमनी लेकर ॥
आमागन्नितिपरमेष्टीऋपिवृहतीछन्दआपोदेवताअ.
पामुपस्पर्शनेविनियोगः ॥ ॐआमागन्यशसास
सृजवर्चसातम्माकुरुप्रियंप्रजानामधिपतिपशूनाम
रिहंतनूनां ॥ इत्यनेनसकृदाचामेद्विस्तूष्णींआचा
मेत् । ततोयजमानःकांस्यपात्रस्थदधिमधुघृतानि
समादायान्येन कांस्यपात्रेण पिधाय कराभ्यामादा
यामधुपर्केति मधुछन्द ऋपिबहतीछन्दो मधुभुक
देवता मधुपर्कदाने विनियोगः ॥ॐमधुपर्को मधुप -
र्को मधुपर्क इत्यनेनोक्त मधुपर्कःप्रतिगृह्यतामि
तिवदेत् मधुपर्क प्रतिगृह्णामीत्यभिधायैववरः ।
मित्रत्यति प्रजापतिक्रपि पंक्तिच्छन्दो मित्रोदेव
ता मधुपर्कदर्शने विनियोगः । मित्रस्यत्वा पक्षु
पाप्रतीक्ष्य इतिदातृकरस्थमेव मधुपर्क निरीक्ष्य दे
वस्यत्वेति ब्रह्माऋपिर्गायत्रीछन्दः सविता देवता म
धुपर्कग्रहणे विनियोगः॥
१३२ विवाहपद्धति भाटा यजुर्वे० अ०.६ मं १ ॐदे॒वस्य॑त्वासवितुप्रसुवेऽश्विनौडिभ्या भपूष्णोहस्ताभ्यांप्रतिगृहामि । इत्यभि धायवरोमधुपकैगृहीत्वावामहस्तकृत्वा॥ भा०टी०-आमागन् इस. मंत्रका परमेठी ऋषि-बृहती छंद जलदेवता जलके स्पर्शन कर्नेमें विनियोगहै.॥ (मं- प्रार्थ) हे वरुणदेव तुमारे आश्रित मुझको आप यशस्वि अर्थात् यशसंयुक्त करो किञ्च ब्रह्मतेजसे युक्त करो अर्थात् क्षत्री वैश्यकोभी स्वतेजसे युक्त करो। और महात्मा पुरु- पोंकी मित्रतासे तथा पशुओका मालिक और सुखी करो इस मंत्रसे वर एक आचमन करे फिर दो चुपचाप (तू- णीसे.) आचमन करे अनंतर यजमान कांस्यपात्र में दधि मधु घृतको पाकर ऊपरसे अन्य कांस्यपानसे बंद कर हाथ में लेवे मधुपर्क इसमंत्रका मधुच्छन्दऋषि, बृहती छंद मधुभुगदेवता, मधुपर्कके देने में विनियोगहै। मधुपर्क- के बनानेमैं पराशरजी लिखते हैं। कि (सपिरेकगुणप्रोक्तं शोधितंद्विगुणंमधु । मधुपर्कविधीप्रोक्तं सर्पिषा च समं दधि) अर्थात् वृत एक गुणा शहत दो गुण दधि एक गुण होना चाहिये । गधुपर्कग्रहण करे, अनंतर ग्रहण कर्ता हूं यह वर यजमानसे कहे। मित्रस्य इसमंत्रका प्रजापति ऋपि, पक्तिछंद मित्रदेवता मधुपर्कदर्शनमें विनियुक्तहै (मंत्रार्थ) हेमधुपर्क तुमारेको मित्रदेवके नेत्रोंसे देखता हुं। इस मंत्रसे दाताक हाथमेंही स्थित मधुपर्कको देखे ॥ देवस्यत्वा इसमंत्र का प्र- हामपि गायत्रीमन्द सूर्यदेवतामधुपर्ककै ग्रहण कर्नेविनि- .
प्रकरणम् ६ १३३ युक्तहै ॥ (मंत्रार्थ) हेमधुपर्क सवितानामदेवता की, आ- ज्ञासे हम तुमारेको, अश्विनीकुमारकी बाहु तथा पूर्पणः, अर्थात् सूर्यदेवके हाथोंसे ग्रहण कर्तेहैं ॥ आशय यह है कि सूर्यदेवकी कृपासे, अश्विनीकुमारने दियाहै बली जिनको ऐसे बाहुओंसे तद्वत् सूर्यके हाथोंसे ग्रहण कर्ताह ।। इसमंत्रको पढकर वर मधुपर्क ग्रहण कर वामहा- थमें रखकर ॥ ॐनमःश्यावेतिप्रजापतिपिर्गायत्रीछन्दःसविता देवतामधुपर्कालोडनेविनियोगः ॥ ॐनमःश्यावा स्यायानशनेयत्तआविद्धतत्तनिष्कृन्तामीतिअनामि कयात्रिप्रदक्षिणमालोज्य अनामिकाङ्गुष्ठाभ्यांभूमौ किञ्चिन्निक्षिप्यपुनस्तथैवद्विःप्रत्येकंनिक्षिपेत् । तत आचारान्मधुपर्ककिञ्चित्कन्यायैद्रष्टुंदयात् ॥ ॐ यन्मधुनइत्यस्यकौत्सऋपिर्जगतीछन्दःमधुपकोंदे वतामधुपर्कप्राशनेविनियोगःॐयन्मधुनोमधव्यंपर मरूपमन्नाद्यं ॥ तेनाऽहंमधुनोमधव्येनपरमेणरूपे णानायेनपरमोमधव्योन्नादोसानि २ इत्यनेनवार त्रयंमधुपर्कप्राशनप्रतिप्राशनान्तेचैतन्मंत्रपाठः ॥ ततोमधुपर्कशेपमसंचरेदेशेधारयेत् ।। भा०टी०-नमाश्यावेति इस मंत्रका प्रजापति ऋपि गाय- श्रीछंद सवितादेवता मधुपर्कके आलोडनमें विनियोगहे ॥ (मंचार्थ) हेजठराग्ने कपिश अर्थात् धूम्रवर्ण जिस्का और अन्नके पचानेवाले तुमको प्रणाम कर्ते हैं और जो मैंने भो- १३४ विवाहपद्धति भा० टी० जनकालमें निषिद्ध पदार्थ भक्षण किया वह निकालताहूं ॥ इसमंत्रको पट अनामिकासे तीनवार प्रदक्षिणा क्रमसे आलोडन कर और अनामिका अंगुष्ठसे पृथिवीपर किंचि- त्-तीनवार मधुपर्क गेरे अनन्तर लोकाचारसे मधुपर्क किंचित् कन्याक लिये देखने को भेजे । यन्मधुन इसमंत्रका कौत्सऋपि जगती छंद मधुपर्कदेवता प्राशनकनेमें विनियु- क्तहै (मंत्रार्थ) हे देवगणो ! जो मकरंदका परम उत्कृष्टरू- . प (अन्नाद्यं ) अर्थात् अन्नादिवत् प्राणधारक तिसपर उत्कृष्ट अर्थात् शरीरमें व्याप्त सर्वरूपको प्राप्त हुए रसक मैं सबसे श्रेष्ठमधुप के योग्य अन्तके भोगनेवाला होमर ॥ इसमंत्र- को पढ तीनवार मधुपर्क प्राशन कर मंत्रपाठके अनंतर प्रा- शन कर्ना ॥ शेष रहा मधुपर्क शुद्धभूमि जिस्पर पाद ना आवे वहां गेरदेवे ॥ इस स्थान सूत्रकारके बहुत मतहै कि-" शेष मधुपर्क जो पूर्वस्त्रीका पुत्रहो उस्को देना वा पूर्वदिशा. असंचर स्थानमें गेरदेना वा संपूर्ण आप पीना अथवा शे- ष अपने विद्यार्थीको देना यथासूत्रं (मधुमतीभिर्वा प्रत्यूचं पुत्रायान्तवासिन उच्छिष्टं दद्यात्सर्व वामानीयात्प्राग्वासंच रेनितयेदिति)॥ ततत्रिराचामेद्वरः वाङ्मआस्येअस्तु॥नसोमैप्राणोऽ स्तुअक्ष्णोर्मेचक्षुरस्तुकर्णयोर्मेश्रोत्रमस्तुवाव्होर्मेव. लमस्तुउर्वोमेओजोऽस्तुअरिष्टानिमेऽङ्गानितनूस्त न्यामेसन्तु ॥ इतिप्रत्येकंसर्वगात्राणिसंस्पृशेत् ॥ भान्टी०-सजलहाथसे अंगन्यासकरे (मंत्रार्थ) वाक (दा णी) देवता मेरे मुझे में हो और नासिकामें प्राण हो नेत्रों में चक्षुरिंद्रिय हो कॉमें श्रोत्रंद्रिय हो वाहुमें बलहो और प्रकरणम् ६ १३५ 'उरुवोंमें ओजहोतथा मेरे संपूर्ण अंग अरिष्ट अर्थात् आरो- ग्य हो. इस मंत्रसे एक २ अंगके क्रमसे स्पर्श कर्ना ॥ अव जैसे अंगुलीसे चाहिये वह क्रमलिखते हैं। कराग्र अंगुली तीन १ तर्जनि अंगुष्ठ २ मध्यमा अंगुष्ठ ३ अनामिकांगुष्ठ अंगुष्ठकनिष्ठिका ५ सर्वांगुलि निमीलन ६ यह क्रमपूर्वक रीतिहै। ततोयजमानद्वारागौौौरितिपाठः ॥ अत्र वरयन मानाभ्यांतृणच्छेदनमाचारोनतुविधिः ॥ अतएवप इतिपु॥ततोवरस्तृणंयजमानेनसहगृहीत्वाऽग्रिमम पठेत् ॥ मातारुद्राणामितिमंत्रस्यब्रह्माऋपिस्त्रिष्टु प्छन्दः शौरिदेवताऽभिमन्त्रणेविनियोगः॥ॐमाता रुद्राणांदुहितावसूनाश्स्वसादित्यानाममृतस्यनाभिः ॥प्रनु वीचंचिकितुपेजनायमागामनागामदितिवधि एममचाऽमुष्यचपाप्माहतः ॥ॐउत्सृजततृणान्य तूद्धत्योत्सृजेत्इतित्रूयात् ॥ उत्सृजेत्ततामितितृणं छिन्यादित्युत्सृजेत्त्यजेत् ।। भा०टी०-तदनंतर यजमानद्वारा गौगाँगी, यह तीनवार कहाना इहां वर यजमानका तृणछेदन आचार है नाहि वि- धि इसलिये पद्धतिओंमें वर यजमानक साथ अग्रिम मंत्र पढे॥माताराद्राणां इस मंत्रका ब्रह्मा ऋषि बिष्टुप्छंद सौरि देवना अभिमंत्रणमें विनियोगहै (मंत्रार्थ ) श्रीमहारुद्रजी नन्दिकेश्वररूप कर ऋषियोंसेभयभीत हुए गौके गर्भद्वारा प्र- गट भये इसलिये रुद्रोंकी माताहै। देवटारगेको समुद्रमं- १३६ विवाहपद्धति भा० टा. थनसे श्रांतहुओंको देखकर विष्णुने समुद्रमंथनद्वारा उत्प- नकी । इसलिये विष्णु और विष्णुके अंश होनेसे वसुवों कि पुत्रीहै । इसलिये वैष्णवी सुरभी माता यह कहते हैं और नारायणके पुत्र होनेसे आदित्यनाम देवोंकी भगिनी है ॥ (नारायणाद्वादशादित्या इतिश्रुतेः) अमृत दुग्धकी नाभिअर्थात् उत्पत्तिस्थानहै।। और मेरे कर अवध्यगौहे परं- तु मेरे और यजमानके पापही नष्टहो। हिंसा करने में प्राय श्चित्त लिखाहै । (ब्राह्मणं गौ तथा कन्या हन्यादज्ञानतोपि- यः। निरये भुज्यते तावद्यावदिन्द्राश्चतुर्दश) इसलिये त्या ग देनी चाहिये ॥ओं मनमें कह कर (उत्सृजततृणान्यत्तु) यह ऊंचे स्वरसे कहे शंका कर्ते हैं कि गवालम्भभी गौणपक्ष है तो कैसी व्यवस्था चाहियोइसपर उत्तर कि गवालम्भन- को अस्वयं और लोकविरुद्ध होनेसे और यह वार्ता ना- ममात्र कहनेसेभी प्रायश्चित्ति होनेसे निषेधहै।प्रमाण. (या ज्ञवल्क्य स्मृति । अ. १ अस्वयं लोकविद्विष्टं धर्ममप्याच रेनतु ) अर्थ जो अंतमें दुःखदायक और लोकविरुद्ध ध- मको भी ना करे और यह महापातकहै जैसे मनुजी लिखते हैं(नपरं पातकं घोरं कलौगोहत्ययासम)नाममात्रसे प्रायश्चित्त पाराशरजी कहते हैं (कलो वाङ्मात्रगोमेधो निर ये प्राप्नुयानरं । पितृभिःसहधर्मात्मा नैवकुर्यादतश्चतम्) और कलियुगमें यह वजित है (गोमेधोनरमेधश्च विवाहे गोर्वधस्तथा। परक्षेत्रेसुतोत्पत्तिः कलावतानि वर्जयेत् ॥) इस लिये गोको त्यागदो यह तृणको भक्षण करे और हमा- रेको पुष्टि हो । ततोवेदिकायांतुपकेशशर्कराभस्मादिरहितांचतुरस्र भूमिकुशैःपरिसमूह्यतानेशान्यांपरित्यज्यगोमयोद
.
.
प्रकरणम् ६
૧૨૭
केनोपलिप्यस्फ्येन वेणवाप्रागग्रपादेशमितमुत्त
रोत्तरंक्रमणविरुल्लिख्योल्लेखनक्रमणानामिकांगुष्ठा
भ्यांमृदमुद्धृत्यजलेनाभ्युक्ष्यतत्रतूष्णींकांस्यपात्र
स्थंविहितंवह्निनाङ्मुख प्रत्यङ्मुखमुपसमाधाय
तदक्षार्थकञ्चिनियुज्यकौतुकागारादर कन्यामानी
यमण्डपउपवेश्यअथैनांवास परिधापयति ॥
भाटी-गोरुत्सर्गानन्तर कुशकण्डिका लिखतेहैं-तुष
केश शर्करा (रेत) भस्मादि निषिद्धं वस्तुसे रहित चारों
कोणसे हस्तपरिमाण वेदी बना उस्को सवत्सां गौके गोयरसे
लेपन कर खङ्ग वा सुवेसे पूर्वाभिमुख प्रादेशमात्र दक्षिणसे ।
उत्तरकी तरफ तीनवार लिख और रेखा क्रमसै तीनवार
अनामिकासंगुष्ठसे मृत्तिका निकाल शुद्ध जलसे अभ्युक्षण
कर अनंतर कांस्यपात्रमें अग्नि रखकर ऊपरसे बंदकर तूपणी
हो प्रत्यरमुख घेठ प्राङ्मुख आग्निस्थापन कर उस्के रक्षाके
लिये समिधा रखे। और कौतुकागारसे वर कन्याको लेकर
मण्डपमें बैठाल कन्याको वस्त्र पहनावे आगेके मंत्रसे ।
ॐजरांगच्छेतिमंत्रस्यप्रजापति—पिस्त्रिष्टुप्छन्दस्तं .
तवोदेवतावस्त्रपरिधानेविनियोगः॥ॐजरांगच्छपरि
धत्स्ववासोभवाकृष्टीनामभिशस्तिपावा। शतंच
जीवशरद सुवर्चारयिञ्चपुत्राननुसंव्ययस्वायुष्मती
दंपरिधत्स्ववासः ॥ इतिमंत्रणपरिधानवस्त्रंपरिधाप.
येत् वरः ॥ अथोत्तरीयंवास समादायवरोऽग्रिंममं
त्रेणपरिधापयेत् । याऽअकृन्तन्नवयन्याअतन्वत
विवाहपद्धति भा० टी० याश्चदेवीइत्यादिमंत्रस्यप्रजापतिक्रपिर्जगतीछंदोवि धान्योदेवतावस्त्रधारणेविनियोगः ॥ॐयाअकृन्तनव यन्याअतन्वताश्चदेव्यस्तन्तूनभितस्ततंथ । ता स्तादेवीर्जरसेसंव्ययस्वायुष्मतीदंपरिधत्स्ववासः ।। इतिमंत्रेणअहतवासोधौतवासौत्रेणाच्छादयोतेतिश्रु त्यनुसारेणवरोप्येताहवाससीझत्रपरिधत्तेपरिधा स्यैइत्यादिमंत्राभ्याम् ॥ भाण्टी--(जरांगच्छ) इस मंत्रका प्रजापतिऋषि बिष्टुपु- छन्द तन्तुदेवता वनके पहनानेमें विनियुक्तहै। ( मंत्रार्थ) हे आयुप्मती अर्थातसंपूर्णायुयुक्त तुम हमारे साथ निर्दोष जरा अर्थात् बुढापनको प्राप्तहो ।। और मेरे मनको अच्छी प्रतीत होनेवाली हो और क्रूरता कपटताको त्यांग श्वशुरा- दि संबंधियोंसे संकुचित होकर सौम्यस्वभाववाली हो। वा स्त्रियोक मध्यसे तुम श्रेष्ठ हो और शतवर्ष अर्थात् पूर्णा- यु पर्यन्त मेरे साथ प्राणंधारण करो यह पूर्वोक्तसे जानना चाहिये । और पतिव्रता हो धर्मसे बडे तेजवाली होकर धन और पुत्रको प्राप्त हो ॥ यह मेरे करके दिया हुआ वस्त्र धारण कर ॥.इहां परिधत्स्वपद प्रथम.आशंसामें दूस- रा प्रेरणामें होनेसे पुनरुक्ति दोष नहि ॥ इस मंत्रसे वर कन्याको अधोवस्त्र पहनावे ॥१॥ याअकृन्तन् इस मंत्रका प्रजापति ऋपि जगती छंद विधावीदेवता वरके धारणमें विनियुक्त (मंत्रार्थ ) जो देवि इस वस्त्रको कातती भई और जो बयति अर्थात विनती भई और जोर देवी सुबको तनुती भई तुरी वेमादिसे उस २ सामथ्र्यके देनेवाली देयोलोग निदोपदीर्घकाल जीवनके लिये तुमारेको वख प्रकरणम् ६ १३९ पहनाती है । इस हेतसे हे आयुप्मति इस वस्त्रको उत्तरी- य होनेसे धारण करो। इस मंत्रसे नवीन वस्त्र आप धोता हुआ धारण करावे । न किरजकादिसेधौत होवे इस श्रुति अनुसार वरभी अधोवस्त्र उत्तरीयवस्त्रकोधारण करे परि-. धास्य इत्यादिमंत्रोंसे ।। परिधास्य इत्यादिमंत्रस्याथर्वणऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दः तन्तवोदेवता वास परिधानविनियोगः । अपरिधा स्यैयशोधास्यैदीर्घायुष्ट्वायजरदटिरस्मिः।शतञ्चजी वामिशरदः पुरूचीरायस्पोपमभिसंव्ययिष्ये । इति पठित्वावर परिधत्ते (अथोत्तरीयमाच्छादयतीति सूत्रम्)*यशसेत्यादिमंत्रस्यप्रजापतिपिजगतीछ न्दोविधान्योदेवतावासोधारणेविनियोगः॥ *यश सामाद्यावापृथिवीयशसेन्द्रावृहस्पती यशोभगश्चमा विदद्यशोमाप्रतिपद्यतामितिपठित्वोत्तरीयंपरिधत्ते॥ ततःकन्यायावरस्यचद्विराचमनम् । भाण्टी-(परिधास्यै ) इस मंत्रका अथर्वणऋषि त्रिष्टुप् छन्द तन्तु देवता । वस्त्र धारणमे विनियोग है (मंत्रार्थ ) हे वस्त्रदेवता तुमारेको अनेक श्रेष्ठवस्त्र धारणके लिये तथा यशकीर्तिके लिये और निर्दिष्ट चिरकाल जीवनके लिये। तुमारी कृपासे पूर्णायुके भोगनेवाला मैं बहुपुत्र धनादि युक्त धनके देनेवाले तुमको धारण करताहूं और तुमारे संबंधसे शतवर्ष जीवित रहा इसमंत्रको पढकर अधोवस्त्र धारण करे।। आगेके मंत्रसे उत्तरीय जैसे यशसा इस मंत्र- का प्रजापतिऋषि जगतीछन्द विधात्री देवता वखधारणमें - १४० विवाहपद्धति भा० टी० विनियोग है। (मंत्रार्थ )हे वस्त्रदेवता यशसे युक्त आकाश पृथिवी. तथा यशयुक्त इंद्र बृहस्पति तद्वत् यशयुक्त सूर्य •मुझको जाने और उन्हकर सम्पादन किया यश मुझको • प्राप्तहो इसमंत्रसे उत्तरीय धारण करे अनंतर कन्या और वरको दोवार आचमन करना चाहिये एक अधोवस्त्र धारण कर द्वितीय उत्तरीय धारण कर प्रमाण जैसे याज्ञवल्क्य- स्मृति अध्याय (आचांतः पुनराचामेद्वासो विपरिधा- यच )॥ अर्थ- आचमन कियाहुआ फिर आचमन करे वस्त्रको धारण कर्केभी इति 'ततःकन्याप्रदेनपरस्परं समओयामितिप्रेपितयो पर स्परसम्मुखीकरणंम् ।। समनंत्वितिमंत्रस्यअथर्वण ऋपिरनुष्टुप्छन्दोविश्वेदेवादेवतामैत्रीकरणेविनियो गः ॥ समञ्जन्तुविश्वेदेवाःसमापोहृदयानिनौ ॥ सम्मातरिश्वासंधातासमुदेष्ट्रीदधातुनः ॥ इतिवरःपठे त् ॥ ततःकन्याप्रदकर्तृकग्रन्थिवन्धनम् ॥ हस्तले पनशाखोचारणम् ॥ ८२ भा०टी०-अनंतर यजमानद्वारा कन्यावरकी मैत्री करानी समंजंतु इस मंचका अथर्वण ऋषि अनुष्टुएछन्द विश्वेदेवा देवता मैत्री करनेमे विनियुक्तहै। (मंचार्थ) हे, कन्ये संपूर्ण देवता तथा शुद्ध जलसे तुह्मार हमारे मनको गुणातिशय-. द्वारा संस्कार करे अर्थात् दुष्टवासनासे रहित शुद्ध करे त- द्वत् अनुकूल प्रजापति और उपदेशके करनेवाली सावित्री (गायत्री) देवताभी, हमारी तुमारी बुद्धि धर्म अर्थ काम मोक्षमे लगावे ॥ इस मंत्रको वर पढे॥ शंका करतेहैं की घरको कन्या इस शब्दसे. कहना उचित नहि कि ।
. प्रकरणम्६ उनकी जो पुरुष स्त्रीको माता वा भगिनी वा कन्या क- हे उसको प्रायश्चित्त करना लिखाहै। उत्तर- यद्यपि तुम्हारा कथन सत्यहै तथा इसकाल पर्यन्त और स्त्रियोंकीवत् यह भी कन्याही थी वरकाभी कुछ संबंध नहींथा और वाग्दा- नके अनंतरभी कन्याही कही जाती है यथा प्रमाण.(वर- दानोचिताकन्या)फिर पाणिग्रहणके अनंतर यह वधूशब्द- सेकही जावेगी (स्वस्वत्वानिवृत्ति पूर्वकपरस्वत्वोपादानात् ) इस न्यायसे हम सूत्रकारकामी प्रमाण देते हैं.(सुमङ्ली रियंवधूरिमा समेतपश्यत सौभाग्यमस्यैदत्वायाथास्तवि परेतनेति) और नारदस्मृतिकाभी प्रमाण जैसे ( दशवर्षा भवेत्कन्या सम्प्रदांनेवधूभवेत् । साइगुष्ठग्रहणेभार्या पत्नी चातुर्थकर्मणि ॥) अनंतर यजमानद्वारा द्रव्य पुष्प अक्ष- • तादि कन्याके वस्त्रमें रखकर बांध. वस्त्रको वरके वस्त्रसे बधि जिस्को लोक गठचीतन कहते है प्रमाणभी जैसे योगि याज्ञवल्क्यजीका (कन्यकासुदशेपार्श्वे द्रव्यपुष्पाक्षतानिच। निक्षिप्यतानिसंबंद्धा वरवस्त्रेणसंयुजेत् ॥ वस्त्रैः संयोज्य तोपूर्वकन्यादानंसमाचरेत् । दानेनयुक्तयोः पश्चाद्विदध्या- त्पाणिपीडनम् ) इति । अनंतर हाथों में कन्याके उद्वर्तन (उबटना लगाना.)॥ अथकन्यादानम् ॥दाताशंखस्थदूर्वाक्षतफलपुष्पचं न्दनजलान्यादाय ॥ अथकन्याप्रद जामातृदक्षिण करोपरिकन्यादक्षिणकरंनिधाय ॥ दाताऽहंवरुणोरा जाद्रव्यमादित्यदैवतम् ॥ विप्रोसौविष्णुरूपेणप्रति. गृह्मात्वयविधिः।। इतिदातापठेत् ॥ गोत्रोच्चारणंच कुर्यात् ॥ विप्रातिरिक्तपक्षेविप्रोसावित्यत्रवरोसावि .
.
१४२ विवाहपद्धति भा० टी०
तिपठेत् ॥ अस्वस्तीतिवचनमुक्त्वाद्यौस्त्वाददातु
पृथिवीत्वाप्रतिगृह्णात्वितिमंत्रेणकन्याहस्तंवर प्रति
गृह्णीयात् ॥ ततःकन्याप्रदःअद्यकृततत्कन्यादान
यथोचितफलावाप्तयेकच्यादानप्रतिष्ठार्थमिदंहिरण्य
मग्निदेवतममुकगोत्रायाऽमुकशर्मणेब्राह्मणायवरायद
क्षिणांतुभ्यमहंसम्प्रददे इतिदक्षिणांगोमिथुनंवादद्या
त् ॥ ततःस्वस्तीतिवर प्रतिब्रूयात् ॥
(अथ क्षेपकम् ).
कन्यादानानंतरंकन्यापितावधूवरौप्रार्थयते ॥ तत्रा
दौवरप्रार्थना ॥ तद्यथा ॥ कन्यां लक्षणसंपन्नांकन
काभरणैर्युताम्।दास्यामिविष्णवेतुभ्यंब्रह्मलोकजिगी
पया॥ऋपयः सर्वभूतानांसाक्षिणःसर्वदेवताः।इमां
कन्यांप्रदास्यामिपितॄणांतारणायच ॥ कन्यादानंम
हादानंसर्वदानेपुदुर्लभम्।।तदद्यदैवयोगेनत्वंगृहाणवरो
त्तम ॥ गौ कन्यामिमांविप्रयथाशक्तिविभूपिताम् ।
गोत्रायशर्मणेतुभ्यंदत्तांविप्रसमाश्रय ॥ ममवंशसमु
द्भूताअप्वणिपालिता। तुभ्यंविषमयादत्तापुत्रपी
वप्रवर्धनी॥
'. अथ कन्यामीश्वरं च प्रार्थयते॥
कन्येममानतोभूयाःकन्येमेदेविपार्श्वयोगकन्येमेपृष्ठ
तो भूयास्त्वदानान्मोक्षमाप्नुयाम् ॥ त्रैलोक्यनाथ
प्रकरणम् ६
१४३
देवेशसर्वभूतदयानिधे । दानेनानेनमेप्रीतोभवशां
तिंप्रयच्छमे ॥ श्रुत्वाकन्याप्रदानंचपितर प्रपिता
महाः ॥ विमुक्ताःसर्वपापेभ्योब्रह्मलोकंब्रजतिते ॥
इति संप्रार्थ्य प्रतिज्ञावचनं वरेण कुर्यात् ॥ धर्मेचा
थैचकामेचत्वयेयमतिचारतः । नत्याज्याज्याहुतिरि
वभूमोसंसारभूतिदा ॥ यस्त्वयाधर्मश्चरितः कर्त
व्यश्चानयासह ।। धर्मेचार्थेचकामेचत्वयेयनातिचरि
तंव्या वरः॥ अहंनातिचरामीहयदुक्तंभवताततः॥
धर्मार्थकामकै कार्यदेहच्छायेवसर्वदा ॥ नातिचरा
मीतिवरोवदेत् ।।
(अथ दशमहादानमंत्राणि)
कन्याथै कनकं धेनुदासीरथंमहीगृहम् । महिष्यश्वग
जाःशय्यामहादानानिवैदश ॥ सुवर्णमंत्रः॥ हिरण्य
गर्भसंभूतंसौवर्णचाडलीयकम् । सर्वप्रदंप्रयच्छामि
प्रीणातुकमलापतिमाक्षीरोदमथनपूर्वमुद्धृतंकुण्डल
द्वयम्।श्रियासहसमुद्भूतं ददेश्री प्रीयतामितिकांच
नंहस्तवलयरूपकांतिसुखप्रदम् विभूपणंप्रदास्यामि
विभूपयतुतेसदा ॥अथधेनुदानमंत्रः । यज्ञसाधनभू
तायाविश्वस्यायौवनाशिनी । विश्वरूपधरोदेवःप्रीय
तामनयागवा ॥ अथदासीदानमंत्रः । इयंदासीमया
तुभ्यंश्रीवत्सप्रतिपादिता । सर्वकामकरीभोग्यायथे
भदमस्तुमे ॥ ॥ रथायरथनाथा
विवाहपद्धति भा०. टी.
य नमस्तेविश्वकर्मणे । विश्वरूपायदेवायअरुणाय
नमोस्तुते ॥ पृथिवीदानमंत्रः ॥ सर्वेपामाश्रयादेवी
वराहेणसमुद्धता। अनंतसस्यफलदाअतःशांतिप्रय
च्छमे ॥ गृहदानमंत्रः । इदंगृहंगृहाणत्वंसर्वोपस्कर
संयुतम् । तवविप्रप्रसादेनममसंतुमनोरथाः।गृहंमम
विभूत्यर्थगृहाणत्वंद्विजोत्तम । प्रीयतामे जगद्योनि
वास्तुरूपी जनार्दनः॥अथमहिपीदानमंत्रः॥महिपी
यमरूपात्वविश्वामित्रविनिर्मिते । पूजिताहरमे पाप
सर्वदानफलप्रदे॥ अथाश्वदानमंत्रः ॥ महार्णवसमु
त्पन्नउच्चैःश्रवसपुत्रक । मयात्वं विप्रमुख्यायदत्तोहय
सुखीभव ॥ गजदानमंत्रः ॥ गजेन्द्र मत्तमातंगदै
त्यसैन्यविनाशक । नवंदानेनमेशांतिः सर्वदास्तु
महत्सुखम् ॥ अथशय्यादानम् ॥ यथानकृष्ण
शयनं शून्यं सागरजातया । तथाशक्त्या ममाप्य
स्त्वशून्या जन्मनिर्जन्मनि ॥ इति ॥ अन्यान्यपिदे
यानि ॥ अथताम्रपात्रदानम्।।परापवादपैशुन्यादभ
क्ष्यस्यचभक्षणात्।। उत्पन्नपापं दानेन ताम्रपात्रस्य
नश्यतु ॥अथ कांस्पपात्रदानम् । पानिपापानिका
म्यानिकामोत्थानि कृतानिच ॥कांस्यपात्रप्रदाने
न तानिनश्यतुमेसदा ॥ अथरौप्यपात्रदानम् ।। अग
म्यागमनंचैव परदाराभिमर्शनम् । रौप्यपात्रप्रदा
नेनतत्पाप्मेव्यपोहतु.॥
प्रकरणम् ६. १४५ अथ तांबूलदानमंत्रः॥ पूरितंपूगपूगेन नागवल्लीदलान्वितम् । पूर्णेन चूर्ण पात्रेण कर्पूरपिष्टकेनच ॥ संपूगखंडन दिव्यं गंधर्वा प्सरसां प्रियम्।ददे देव निरातकें त्वत्प्रसादात्कुरुप्व माम् ॥ दीपदानमंत्रः॥ दीपस्तमो नाशयति दीपः काँतिं प्रयच्छति । तस्मादीपप्रदानेन मम वंशप्रव र्धनम् ॥इति। अत्र अन्येपिकन्यावान्धवाः यथासंभ वं द्रव्यं वरवध्वर्थेप्रयच्छंति केचनहोमांतेप्रयच्छं वि। इयंदेशाचारतो व्यवस्था ज्ञातव्योति शम् ॥ इति क्षेपकम् ॥ भा०टी०-वस्त्रग्रंथि बंधनके अनंतर कन्यादान लिखते हैं यजमान शंखमें दूर्वाक्षता फलपुप्पं चंदन जल लेकर दाता वरके दक्षिण हाथपर कन्याका दक्षिण हाथ राखे पूर्वोक्त (में वार्थ)वरुणरूप में यजमान और सूर्य संकल्प रूप यह द्रव्य विष्णुरूप वर यह विधि ग्रहण करे इस मंत्रको दाता पढे स्व स्ति हो ऐसे कहे (मंत्रार्थ ) आकाश तुझारेको देताहे और पृथ्वी ग्रहण कर्ती है । इस मंचसे कन्याका हाथ.वर ग्रहणकरे अनंतर आज किये कन्यादानकी शास्त्रविहित स्वर्गादि माप्तिके लिये यह सुवर्ण अग्निदेव संयंधि अमुक शर्मादि वरको दक्षिणासे देताहे वा गौ दो वत्ससहित देताहे ॥ इसके अनंतर तुमको कल्याण हो ऐसे घर कहे- और संकल्पकी विधि वृहत्पाराशरजी लिखते हैं (क न्यादानसमारम्भेदाताशढे समाददेव । दाक्षतफलं पुष्प चंदनं जलमेयच ) इत्यादि संपूर्ण विधानको विस्तारके म- १४६ विवाहपद्धति भा०.टी. यसे नहीं लिखते ॥ और संकल्प पूर्व कन्यादामका लिखा हुआ है. ॥ स्वस्तीति (इसस्थान आचारसे' और संबंधि पुरुषभी सुवर्ण कर .रजत ताम्र गौ महिषी ग्रा- म पृथ्वी यौतुक होनेसे कन्याको यथाशक्ति देते हैं ॥ . कई होमके अनंतर कई २ वधू वरके विसर्जन अनंतर खदा दि दान कर्तेहैं ॥ यह सब अपनेर देशाचारसे व्यवस्था मा- ननी जिस देशमे जैसे हो तैसेही करना इससे मुनियोंके मतभी बहुत लिखते हैं (कन्याप्रदानन्तुविधायतातस्तदक्षि णांगोमिथुनं सुवर्णीदत्वाप्रदद्याद्वरणंवरार्थ वस्त्राणि पांत्राणि विभूषणानि ॥ तत्रैवदेयानिबहुश्रुताजगुर्वाल्मीकजाबालिप राशराद्याहोमान्तआहुर्भृगुनारदाद्या विसर्जनेव्यासमरी चिकौत्साः) इत्यादि । और देशाचारमें प्रमाण (ग्राम- वचनंच-कुर्युविवाहश्मशानयोमिंप्राविशतादिति वच नात्तस्मात्तयोमप्रमाणमितिश्रुतेः)॥ अर्थ कि । विवाह- के कर्तव्यतामें और श्मशान अर्थात् प्रेतक्रियामें ग्राममें प्र- वेश कर ग्रामवचन करे इस श्रुतिसे अपने २ देशरीति औ र कुलरीति और प्रामरीति परंतु जो धर्मविरुद्ध मा होवे उन्को करे॥ यजुर्वेद अध्याय ७ मूल मंत्र ४८ ॐकौदात्कस्माऽअदात्कामौदात्का मायादात् । काौदाताकामप्रतिगृही ताकामैतत्ते ॥ इतिवरः पठेत् ॥ ततस्तांपाणौगृहीत्वा । यदैपिमनसादूरंदिशोनुपवमानो वा । हिरण्यवर्णोवेंकर्णः सत्वामनमन्सांकरोतु ॥ श्रीम १४७ प्रकरणम् ६ मुकदेवीइतिपठनिष्कामति । ततोवेदिदक्षिणस्यांदिशिवारि पूर्णदृढकलशमूद्धतिष्ठत्तोमौनिनः पुरुपस्यस्कन्धेअभिषेक पर्यन्तंधारयेत्।ततःपरस्परंसमीक्षेथामितिकन्याप्रैपानंतरम् ॐअंरचक्षुरपति धिशिवापशुभ्य+ सुमनाः मुंवर्ची ॥ वीरसूक्कोमास्यो नाशुनौभषद्विपदेशचतुष्पदे ॥ सोमःप्रथमोविविदेगंधर्वोविविढउत्तरः। तृतीयोअमिष्टपतिस्तुरीयस्तेमनुष्युजाः॥ सोमौददद्गन्धुर्वायंगन्धर्वोदददुग्नयः। रयिंचपुत्रांश्चादादग्निमामथौ डुमाम् ॥ सांनःपूपाशिवतमामेरयंसानऊरूंउशती विहर । यस्यामुशन्तःप्रहरामशेपंयस्या मुकामावहयोनिविष्टयै। इतिचरपठितम. न्त्रान्तेपरस्परंनिरीक्षणम् । भा टी०-कोदादिति (मंत्रार्थ) मन-कौन देताहेत्तर- काम अर्थात् इच्छाही देती है। जिससे कामही देता और कामही लेनेवाला इस लिये यह पत्नी प्रतिमह उस काम मधोरणशुपम अर्थाणो. ना १४ अनुमंग टिपारे । (३ सोम प्रयोगदि-पहप कम्वेद मंडल ..सत. ८५ भंग ४.१(१) कर म... मूत. ८५ मंत्र ॥
१४८ वेवाहपद्धांत भा०टा० (संकल्प) के लिये है ॥ वली है सर्वसे और धन्य है कि जो क्षत्रियांदि जो दान मरणपर्यंतभी नहीं लेते अधिकारके ना होनेसे यह उन्कोभी दान महाकन्यारूपी देतीहै। यह इच्छाकी स्तुतिपर मंत्रहै | इस मंत्रको प्रथम वर पंढे पीछे से वधूको हस्तसे ग्रहण कर यदेषि इस मंत्रको पढ़े (मंन्ना-. र्थ ) प्राच्यादिसे लक्षित वायुकी न्याई तुम्हारेको पिता गू- हसे दूर लेजाताहै वह वायु और हिरण्यवर्ण सूर्य वैकर्ण अग्नि अर्थात् दिक् वायुसूर्य अग्न्यादि देव मुझमें लगाहै. हृदय जिस्का ऐसी तुमको करे। इस मंत्र के अंतमें वर के- न्याका नाम लेवे । आत्मनाम गुरोर्नामेति आगे नाम कभी नां ग्रहण करे अनंतर दक्षिण दिशामें जलपूर्ण कलश स्कंध (कांधेपर) रखकर अभिषेकपर्यन्त दृढ पुरुष स्थित रहे उठकर ।। तुम आपसमें देखे यह यजमान कहे (मंत्रार्थ) हे कन्ये । तुम सौम्यदृष्टिवाली हो और (अपतिघ्नी) अर्था- तू पतिकें अर्थके नाशकरनेवाली मतहो इस विवाहसंस्का- रंके अनंतर पंशुवत् जो आश्रित पुरुष उन्मे हित करनेवाली हो और प्रसन्नं · चित्तवाली सुंदर प्रतापवाली ।.सत्पुत्र और वीरपुत्रोंके पैदा करनेवाली (देवकामा) देवान् अत्र्या- दीन् पूजाथें कामयति इच्छतीति) अर्थात् देवताओंमें तथा पित्रोंमें श्रद्धावाली हो (स्योना ) सुखी हमारेको कल्याण देनेवाली हो । सिद्धांत यह है कि तुमारेसे हम- को सर्वदा लाभ हो ॥ ( मंत्रार्थ ) कन्यास्तुतिका-हेकन्ये! प्रथम रक्षाकरनेवाला चंद्रमा जन्मदिनसे सार्द्धद्वय वर्ष (अर्थात्) २ ॥ अढाई वर्षपर्यंत तुम्हारी पुष्टि कर्ता हुआ तिस्के अनंतर गंधर्व अर्थात् सूर्य पांचवर्ष पर्यंत तुहारेको पढ़ाता हुआ इसलिये सूर्य तुम्हारा दूसरा पति (पाति रक्षति इति पतिः)अर्थात् रक्षाकरनेवाला अनंतर पांचवर्षसे प्रकरणम् ६ १४९ लेकरसाढे सातवर्षतक अग्नि तुम्हारेको शुद्धता सर्व काममें देता हुआ इससे अग्मितीसरा पति रक्षाकरनेवाला भया।प्र- माण जैसे (पूर्वस्त्रियासुरैर्भुक्ताःसोमगन्धर्ववहिभिः। प्रतिपो- ष्याध्याप्यसंशोध्यपरित्यक्तांनरोभजेत् ॥)अर्थ-जन्मदिनसे ले साढ़ेसात वर्ष में अढाई २॥ वर्ष क्रमसे सोम चंद्रमा सूर्य अनिं देवने क्रमसे (भुक्ताः)रक्षा की । भुज पालनाभ्यवहा: रयोः इस धातुसे क्तप्रत्ययके आनेसे बहुवचनान्त होनेसे भुक्ता यह शब्द.सिद्ध होताहै। और. क्रममें पुष्टकर तथा पढाकर और शुद्धकरके त्यागी हुई स्त्रियोंको नरं भजते हैं अर्थात् सेवन करते हैं भजसेवायां इस धातुसे लिहूल-. • कारके आनेसे यासकेस्थानमें ईय तिपू आदि आनेसे रूप भजेत् बनताहै। इस लिये साढेसातवर्षके नंतर ज्योति- षशास्त्र में दोष लिखाहै विवाह करनेका ॥ (मंत्रार्थ ) चंद्र- मा ३० मासमें पुंष्टकर सूर्यको देता भया सूर्यभी ३० मही- नेके अनंतर दक्षता पांडित्यको देकर अग्निके समर्पण कर्ता भया वह अग्निदेव इस स्त्रीको साथ पुत्रोंके धनके धर्मके शुद्धकर मुझे देताह प्रमाणभी जैसे-"याज्ञवल्क्यस्मृति.अ ध्याय १ सोम शौचंददावासांगन्धर्वश्चशुभांगिरं । पावकःस र्वमेध्यत्वमेध्यावैयोषितःस्मृताइत्यादि " अर्थ-पृर्षातही है इसलिये ही सर्व स्त्रीको विना पढाये स्त्रियोंको ऐसी चातु- र्यता होती है कि जो विद्वान् लोक हैं उनकीभी बुद्धि नष्ट- कर अपने आधीन करलेती है और नृत्यादि.कलामें ऐसी कुशल होतीहै कि जो नहीं कही जाती यह विना सूर्य के अंतःकरणमें उपदेश करनेके कैसे होसक्ताह ॥ अचन्द्र माको कार्ग देखे कि, जो पुरुप गांधर्वविद्यामें दिनराव अ- भ्यास करते हैं वही स्त्रीका स्वाभाधिक राग श्रवण कर संकु चित होजाते हैं तो कहिये वह किस गन्धर्वकी शिप्य .
१५० .. विवाहपद्धात भा० टी० 'बनकर शिक्षाको प्राप्त होती है इत्यादि बहुत गुण हैं जो पुरुषको जन्मभरमेंभी ना आम बुद्धिवान् पुरुष सर्व जान ते हैं। इस अपनी तर्कके सिद्ध करनेके लिये शास्त्रके प्रमा- ण देते है"आहारोद्विगुणःस्त्रीणां बुद्धिस्तासांचतुर्गुणा!षडूगु णो व्यवसायश्च कामश्चाष्टगुण स्मृतः॥ स्त्रियाश्चरित्रं पुरुष स्यभाग्यं देवो न जानातिकथंमनुष्यः॥स्त्रीणामशिक्षितपटु त्वममानुषीषुसंदृश्यतेकिमुत याः परिबोधवत्यः प्रागंतरि- क्षगमनात्स्वमपत्यजातमन्पर्द्विजैःपरभृताः खलुपोषयन्ति" अर्थ-दुष्यन्तराजा कहताहै कि विना शिक्षाके चातुर्य- • ता जो पशु पक्षियोंकी स्त्रीहै उन्में देखते हैं। जैसे कोकिल अपने पुत्रोंको कागादिसे पुष्ट कराती है लौ हम मनुष्योंकी स्त्रीमें क्या कहें यह प्रसंग" शकुंतलानाटक में विस्तारसे है। इति ॥. (मंत्रार्थ. सान इति ) जगतका चक्षु सूर्यदेव कल्याणयुक्त इस्को हमारेमें अनुरक्त करे। यह स्त्री हमारेसे सुख और पु त्रोंको इच्छा करती भई ऊरु अर्थात् जंघाको पसारे और हम स्वीकी योनिसे सुख और पुत्रोंको इच्छा करते भये शेफ अर्थात् लिंगको प्रवेशन करे। जिसमें धर्म पुत्र रतिसुखा- दिरूप.बहुत गुण होते हैं.(निविष्टथै) अर्थात अग्निहोत्रा 'दि कर्मद्वारा अंतःकरण शुद्ध होनेसे मुक्तिके लिये भाव यह है कि धर्म अर्थ काम मोक्षका साधन पतिव्रता स्त्री है प्रमाण याज्ञवल्क्यस्मृति अ०१-(लोकानंत्यं दिवामातिः पुत्रपौत्रप्रपौत्रकैः । यस्मात्तस्मात्त्रयः सेव्याकर्तव्याश्चसुर क्षिताः) इति । 'विशेपद्रष्टव्य-जिनको अर्थमें कुछ भ्रांति होवह ऋग्वेदक चिन्हसे भाप्य देखे और सूबब्राह्मण मिलावेतोउन्का हमारे पर अत्युपकार होगा और(दशास्यांपुत्रानाधेहिपतिमेकादशं .
प्रकरणम् ६
कृधि) इन्कोमी देखे तो अच्छाही है अन्यथा हम गप्पाष्टक
नहीं मानते और विस्तारकेभयसे यहांबहुत लिखते नहीं।
विशेषार्थ देखना होतो विधवाविवाहखंडनमें देखले ॥
ऋग्वेद मंडल ३० सू० ८५ मं० २५ ।।
इमांत्वमिन्द्रमीवःसुपुत्रां सुभगांकृणु ।
दशास्यांपुत्रानाधैहिपतिमेकादशंकृधि॥
अर्थ-हे परमेश्वर। इस्की सौभाग्य साथ पुत्रोंके वृ-
द्धि करे और इस्में दशपुत्र उत्पन्न हो उन्को और साथ. १०
पुत्रोंकेसहित११ में पतिकी वृद्धि करोधनादिसे॥इंस अर्थमें
जिनको संदेह पडे वह ऊपर लिखित चिहसे ऋग्वेदमें देखे ॥
इति क्षेपक.
ततोनिप्रदक्षिणीकृत्यपश्चादग्नेरहतवस्त्रवेष्टितंतृणपू
लकंकटंवानिवेश्य तदुपरिदक्षिणचरणंदत्वा वधू
दक्षिणत कृत्वातामुपवेश्यपुष्पचंदनताम्बूलान्यादा
य॥ओतत्सदद्यकर्तव्यविवाहहोमकर्मणिकृताऽकृता
वेक्षणरूपब्रह्मकर्मकर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणंब्राह्मण
मेभिःपुष्पचंदनताम्वूलवासोभिब्रह्मत्वेनत्वामहंवृणे
इतिब्रह्माणंवृणुयात्।।वृतोस्मीतिप्रतिवचनम् ॥ यथा
विहितंकने कुर्विति वरेणोक्त करवाणीतिब्रह्मात्या
त्॥ ततोपरोऽनेदक्षिणतः ब्रह्माणमनिप्रदक्षिणक
मेंणानीयभनत्वंमेब्रह्माभवेत्यभिधायकल्पितासनेस
मुपवेशयेत् ॥
११२ विवाहपद्धति भा० टी० . भाटी-परस्पर निरीक्षणके अंनंतर अग्निको प्रदक्षिणा कर अग्निके पश्चिम भागमें अहत (ना दग्ध) वस्त्रवेष्टन कर तृणपूलक वा कट(सक) रखकर उस्के ऊपर दक्षिण पाद दे- कर अर्थात् उल्लंघन ना कर वधूको दक्षिणभागमें लेकर उस्का वामपाद रखकर बिठाय पुप्प चंदन तांबूल (पान) हाथ में ले । आज कर्तव्यविवाहके होमकर्ममें कर्मकी शुद्धि अशुद्धिकी परीक्षा इत्यादि ब्रह्माका जो कर्म उस्के लिये अमुक गोत्र अमुक ब्राह्मण ब्रह्मां समझकर आपको वरण करता हूं।हमने वरणीलई यह ब्रह्मा कहे।तुम यथावत् कर्म करो ऐसे घर कथनके अनन्तर कर्ता हैं ऐसे ब्रह्माजी कहे अनंतर अग्निप्रदक्षिणक्रमसे ब्रह्माको लेजाय तुम कर्म- साक्षी मुझका ब्रह्मा हो ऐसे कह अग्निसे दक्षिणभागमें :आ. सनपर विठ्ठलावे अर्थात् वरणवृक्षसे बनेहुए काष्ठके पीठ-) पर कुशा बिछाय पूर्वोत्तर क्रमसे उसपर कर्मके तत्वकोजा- ननेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण बैठावे यदि ऐसा ना मिले तो पचास कुशोंका ब्रह्मा रचकर बिठावे ॥ ततःप्रणीतापात्रंपुरत कृत्वावारिणापरिपूर्य कुशैरा च्छायब्रह्मणोमुखमवलोक्यअग्नरुत्तरतःकुंशोपरिनि दध्यात् ॥ ततः परिस्तरणंबर्हिपश्चतुर्थभागमादाय आग्नेयादीशानांतंब्रह्मणोऽग्निपर्यन्तंनैर्ऋत्याद्वायव्या न्तमग्नित प्रणीतापर्यन्तंततोऽग्नेरुत्तरतःपश्चिमादशि पवित्रछेदनार्थकुशवयंपवित्रकरणाथसागमनंतंर्गर्भ कुशपत्रद्वयंप्रोक्षणीपात्रंमाज्यस्थालीसंमार्जनाथैकु शत्रयंसमिधस्तित्रः सुवआज्यपट्पञ्चाशदुत्तरमुरि द्वयावच्छिन्नतण्डुलपूर्णपात्रंपूर्वपूर्वदिशिक्रमेणासा. दनीयम्.॥
प्रकरणम् ६ भाण्टी-ब्रह्माजीकी वर्णीके अनंतर प्रणीतापात्रको मु- खके बराबर आगे कर'जलपूर्ण कुशासे आच्छादन कर सा- दी होनेसे ब्रह्माजीको देख अग्निकी उत्तरकोणमें कुशापर स्थित करदे । अनंतर.कुशमुष्टिका चौथा भाग ले अ- निकोणसे ईशानकोणपर्यन्त ब्रह्मासे अमिपर्यन्त नैर्ऋति- कोणसे वायुकोणपर्यन्त पूर्वान उत्तराम कुशा बिछावे । अनं- तर अग्निकी उत्तर तरफ पश्चिममें पवित्रछेदन लिये तीन कुशा पवित्र कर्नेके लिये साथ अग्रके और मध्यपत्रसे रहित दो कुशपत्र । प्रोक्षणीपात्र आज्यस्थाली संमार्जनके लिये तीन कुशा उपयमनके लिये वेणीरूप तीन कुशा। तीन समिधा सुवा घृत पुष्ट ब्राह्मणतृप्तिकारक वा २५६ मुष्टिप्र- माण तंडुलपूर्णपान आगे २ पूर्वदिशामें क्रमसे रखने चाहि- ये॥ नीचे लिये लक्षण पावोंके सर्व जानने ॥ (१) प्रणीताका लक्षण-वरणवृक्षका १२ अंगुलदी- ४ अंगुल विस्तार औरखोदा हुआप्रणीतापात्र होताहै। (२) प्रोक्षणीपान लक्षण-देवलोक्त प्रणीतानैर्ऋतभागे तद्वायव्यगोचरे । वारणसंविजानीयात्सर्वकर्मसुकारयेत् ॥ सर्वसंशोधनार्थोदपात्रंवारणमिप्यते। द्वादशाङ्गुलि दीर्घचक रतलोन्मितखातकं । पद्मपत्रसमाकारंमुकुलाकारमेवया ॥ (३) आज्यस्थालीका लक्षण जसरसन्मयीकाप आज्यस्थालीप्रकीर्तिता। द्वादशाङ्गुलविस्तीर्णाप्रादेशोचा प्रमाणतः॥ (१)चरुस्थालीका लक्षण-चरुस्थालीतथैवापिदीर्घोचा तुप्रमाणतः। नानयोरन्तरंयस्माद्रव्यसंस्कारणार्थकइति ।। .
विवाहपद्धति भा० टी०
(५) सम्मार्जनकुशमें प्रमाण-सुवसम्मानार्थन्तुकु
शत्रयमुदीरितम् । इति व्यासस्मृतौ ।।
(६) उपयमनकुशाकाप्रमाण-उपयमनार्थमाख्यातास्त्रि
पण्नवमिताःकुशाः। वेणीरूपानिरोधार्थानिरोधेवहुभिःसुखं
इतिभृगुवचनात् ॥
(७) समिधाश्मेंप्रमाण-पालाशजंतुप्रादेशमात्रंदैयेणस्थूल
ताकिनिष्ठिकासमंध्यात्वाविधिमग्नौक्षिपञ्चतत् इतिपराशरः।
(८) सुव वा ब्रह्महस्तलक्षण-खुवस्तुब्रह्महस्ताख्यास्क
न्धान्तोवाहुरुच्यते । स्वाहाकारस्वधाकारवपद्कारसमन्वि
तः॥ दण्डाकारोभवेन्मूलेस्यादरन्यांतुतत्समः। सकङ्कण)
स्तुदण्डाग्रेहस्ताकारस्ततोवहिः॥ अष्टांगुलिपरीमाणमूला
भ्यंतरतस्त्यजेत्।।दशाङ्गुलिंपरीमाणमूलाभ्यंतरतस्त्यजेत्
दशांगुलिपरिमाणमारभ्यकङ्कणावधि ॥ हस्तमात्रभवेद्धस्त
सुवइत्यभिधीयते ॥ सादिर शैशिपोवापिह्यन्योवापुण्यवृक्ष
जः॥धावकोपिसमाख्यातोहोमाथैमुनिभिः कृतः॥ इतिका
.
त्यायनः॥
(९)घृतलक्षणम्-तथाचस्मृतिम् गव्यमाज्यंजुहुयात्
तदभावेमाहिस्मृतम् ॥ तथाचश्श्रुतिः॥ गव्यमाज्यंजुहुया
त्तदभावेमाहिपेयमिति ॥
(१०)चरुलक्षणम्-त्रीहितंदुलसंसिद्धोमुख्य प्रोक्त सुर
पिभिः । इत्याचारचंद्रोदयें ॥
प्रकरणम् ६
(११) पर्यग्निकेलक्षण श्रुति-पर्यग्निं कुर्वन्ज्वलदु
ल्मुकमादायप्रदक्षिणमाज्यचर्वोसमंताद्धामयेदिति।।
(३२)समिधालक्षणं-पलाशखदिराश्वत्थशम्युदुम्बर
जासमित् । अपामार्गकदूर्वाग्निकुशाश्त्यपरेविदुः ॥
सत्त्वच समिधः स्थाप्या ऋजुलक्षणा समांस्तथा ।
शस्तादशाडलास्तास्तु द्वादशांगुलिकास्तुताः॥
आHःपक्का समच्छेदास्तजन्यंगलिवर्तुलाः। अपा
टिताचविशिखा कृमिदोपविवर्जिताः ।। ईदृशाहोम
येत्प्राज्ञःप्राप्नोतिविपुलांश्रियं ॥ इतिव्यासकात्याय
नवसिष्टगौतमभरद्वाजाः ॥ इति लक्षणानि ॥
अथतस्यामेवदिशिअसाधारणवस्तून्युपकल्पनीया
नि तत्रशमीपलाशमिश्राः लाजा पदुपलंकुमारी
भ्रातासूर्यदृढपुरुपः॥ अन्यदपितदुपयुक्तमालेपना
दिद्रव्याततःपवित्रच्छेदनकुशैपवित्रेछित्वाततःसप
वित्रकरणप्रणीतोदकंत्रि-प्रोक्षणीपात्रेनिधायअनामि
कांगुष्ठाभ्यांउत्तराग्रेपवित्रेगृहीत्वात्रिरुदिंगनंप्रेणीतो
दकेनप्रोक्षणीजलेन यथासादितवस्तुसेचनं ॥ ततोऽ
ग्निप्रणीतयोर्मध्येग्रोक्षणीपात्रनिधानं ॥ आज्यस्था
ल्यामाज्यनिर्वापः॥ ततोऽधिश्रयणं ॥ ततोज्वलत्त
णादिनाहविर्वेष्टयित्वाप्रदक्षिणक्रमेणवह्नीतत्प्रक्षेपः
पर्यमिकरणं ॥ ततःस्रुवप्रतपनंकृत्वासम्मार्जनकुशा
नामग्रेरंतरतोमूलेयतः॥ वंसंमृज्यप्रणीतोदके
विवाहपद्धति भा० टी०
( ५ ) सम्मार्जनकुशमें प्रमाण-ब्रुवसम्मानार्थन्तुकु
शत्रयमुदीरितम् । इति व्यासस्मृतौ ॥
(६) उपयमनकुशाकाप्रमाण-उपयमनार्थमाख्यातास्त्रि
पण्नवमिताःकुशाः। वेणीरूपानिरोधार्थानिरोधेवहुभिःसुखं
इतिभृगुवचनात् ॥
(७)समिधामेंप्रमाण-पालाशजंतुप्रादेशमात्रंदैर्येणस्थूल
ता।कनिष्ठिकासमंध्यात्वाविधिमग्नौक्षिपेच्चतत् इतिपराशरः।
(८) सुव वा ब्रह्महस्तलक्षण-सुवस्तुब्रह्महस्ताख्यास्क
न्धान्तोवाहुरुच्यते । स्वाहाकारस्वधाकारवपद्कारसमन्वि
तः॥ दण्डाकारोभवेन्मूलेस्यादरत्न्यांतुतत्समः। सकङ्कण
स्तुदण्डाहस्ताकारस्ततोबहिः॥ अष्टांगुलिपरीमाणमूला
भ्यंतरतस्त्यजेत्।।दशाङ्गुलिंपरीमाणमूलाभ्यंतरतस्त्यजेत्
दशांगुलिपरिमाणमारभ्यकङ्कणावधि ॥ हस्तमात्रभवेद्धस्त
सुवइत्यभिधीयते ॥ खादिर शैशिपोवापिह्यन्योवापुण्यवृक्ष
जः॥ धावकोपिसमाख्यातोहोमार्थमुनिभि कृतः॥ इतिका
त्यायनः॥
(९)घृतलक्षणम्-तथाचस्मृतिगव्यमाज्यंजुहुयात्
तदभावमाहिपंस्मृतम् ॥ तथाचश्रुतिः॥ गव्यमाज्यंजुहुया
त्तदभावेमाहिपेयमिति ॥
(१०)चरुलक्षणम्-त्रीहितंदुलसंसिद्धोमुख्य प्रोक्त सुर
पिभिः । इत्याचारचंद्रोदयें॥
प्रकरणम् ६
(११) पर्यमिकेलक्षणमेंश्रुति-पर्यसिकुर्वन्ज्वलदु
सुकमादायप्रदक्षिणमाज्यचर्वोःसमंताद्धामयेदिति।।
(२)समिधालक्षणं-पलाशखदिराश्वत्थशम्युदुम्बर
जासमित् ।अपामार्गकदूनिंकुशाश्चेत्यपरेविदुः ॥
सत्वच समिधः स्थाप्या ऋजुश्लक्ष्णाःसमांस्तथा ।
शस्तादशाङ्गुलास्तास्तु द्वादशांगुलिकास्तुताः ।।
आर्द्राःपक्का समच्छेदास्तजन्यंगुलिवर्तुलाः। अपा
टिताश्वविशिखा कृमिदोपविवर्जिताः ॥ ईदृशीहोम
येत्प्राज्ञःप्राप्मतिविपुलांश्रियं ॥ इतिव्यासकात्याय
नवसिष्ठगौतमभरद्वाजाः ॥ इति लक्षणानि ।
अथतस्यामेवदिशिअसाधारणवस्तून्युपकल्पनीया
नि तत्रशमीपलाशमिश्राः लाजा पदुपलंकुमारी
भ्रातासूर्यःदृढपुरुपः॥ अन्यदपितदुपयुक्तमालेपना
दिद्रव्यो।ततःपवित्रच्छेदनकुशै पवित्रेछिन्वाततःसप
वित्रकरणप्रणीतोदकत्रि-प्रोक्षणीपात्रेनिधायअनामि
कांगुष्ठाभ्यांउत्तराग्रेपवित्रेगृहीत्वात्रिरुहिंगनप्रणीतो
दकेनप्रोक्षणीजलेन यथासादितवस्तुसेचनं ॥ ततोऽ
निप्रणीतयोमध्येप्रोक्षणीपावनिधानं ॥ आज्यस्था
ल्यामाज्यनिर्वापः॥ ततोऽधिश्रयणं ।। ततोज्वलत्तू
.णादिनाहविर्वेष्टयित्वाप्रदक्षिणक्रमेणवतोतत्प्रक्षेपः
पर्यनिकरणं ॥ ततःसुवप्रतपनंकत्वासम्मानकुशा
..
१५६ विवाहपद्धति भा० टी० नाभ्युक्ष्यपुनःप्रतप्यनुवंदक्षिणतोनिदध्यात् । ततः आज्यस्याग्नेरवतारणंततआज्येप्रोक्षणीवदुत्पवनं ॥ अवेक्ष्यसत्यपद्रव्येतन्निरसनं ॥ पुनःप्रोक्षणीवदुत्प वनम् ॥ भा०टी०-अनतर तिस दिशामें और सर्ववस्तु स्थापन कर्नी जैसे शमी जंडी पलाशसे युक्त लाजा ( फलिया) शिला वट्टा कन्याका भाई देखनेलियें सूर्य मजबूत पुरुष और भी जो कामकी वस्तु हो वहभी पास रखले पवित्र कुशासे पवित्रको छेदन कर फिर साथ पवित्रके हाथसे प्र- णीताके जलको तीनवार प्रोक्षणीपात्रमें रखकर अनामिका और अंगुष्ठसे उत्तराग्र पवित्र ग्रहणकर तीनवार ऊपरको जल फैकना प्रणीता और प्रोक्षणीका जल मिलाय सर्ववस्तुको सिश्चन कर्ना अनंतर अग्नि और प्रणीताके म- ध्यमें प्रोक्षणीपात्र रखना आज्यस्थालीमें आज्य पाना और अग्निपर रखनी जलते तृणसे हविर्वेष्टनकर प्रदक्षिणक्रमसे तृ- णको अग्निमें गेरदेना जलती चमातीसे प्रदक्षिण क्रमसे घृ- त चरुके चारों पार्श्वमें फेरनी ॥ अनंतर त्रुव तथा संमार्जन कुशाके अग्रभागसे अनंतर मृलसे बाहिरसे युवको पोच प्र- णीतोदकसे अभ्युक्षण कर (सिंचन) फिर तपाय दक्षिण भागमें राले । पुसवृत्त अप्रिसे उत्तार आज्यका प्रोक्षणी वत् उत्पवन करना यदि निषिद्धवस्तु हो तो निकाल देनी पुनः प्रोक्षणीवत् उत्पवन कर्ना ॥ ततःउपयमकुशानादायउत्तिष्टन्प्रजापतिमनसाध्या त्वातूप्णीमगौघृतातास्तिस्रः समिधःक्षिपेत् ॥ततउ प्रकरणम् ६ १९७ पविश्यसपवित्रप्रोक्षणीउदकेनप्रदक्षिणक्रमेणाग्निपर्यु क्षणंकृत्वाप्रणीतापात्रेपवित्रेनिधायपातितदक्षिणजा नुःकुशेनब्रह्मणान्वारब्ध समिद्धतमेग्नी सुवेणान्याहु तीर्जुहोति । तत्रापारादारभ्यद्वादशाहुतिपुतत्तदाहु त्यनंतरंबुपावस्थितहुतशेपघृतस्यप्रोक्षणीपात्रेप्रक्षे पः॥ॐप्रजापतयेस्वाहाइतिमनसा-इदंप्रजापतयेा. ओमिन्द्रायस्वाहा-इमिंद्रा० ॥ इत्याचारोओंभ नयेस्वाहा-इदमग्नये । ऑसोमायस्वाहां-इदंसो माय०॥ इत्याज्यभागो।ओंभूःस्वाहा-इदमग्नये. ओंभुवःस्वाहा-इदंवायवे ॥ ऑस्वःस्वाहा- इदं सूर्याय एतामहाव्याहृतयः॥ भा०टी०-अनंतर उपयमन कुशाको ले उठकर मनसे प्र- जापतिका ध्यान कर्ता हुआ चुपचापसे घृतयुक्त पूर्वोक्त तीन समिधा अग्निमें मेरदेवें ॥ अनंतर पेठकर साथ पथि- व प्रोक्षणी जलसे प्रदक्षिणा क्रमसे अग्निको पर्युक्षण कर प्रणीतापानमें पवित्र रख दक्षिणजानु निमाय फुशाद्वारा ब्रह्मासे संयुक्त हो यही जलती अग्निमें मुचसे पृतका आ- दुति हयन करताहे वसे लगे हुए घृतको प्रोक्षणीपात्रमें फेकाना ॥ प्रजापतये० इदं प्र० ग्रह मनमें कर आहुति देमी इंद्राय इदमिंद्राय। यह आधारसंज्ञकहे अन्नदम० सोमा इदंसो० यह आज्यभागसंगकदै ॥ ॐभः - म० अभुयः -मदं था. 1 ॐ स्या-दंसा यह माहाव्या- इति दे।
विवाहपद्धति भा० टी०
शुक्लयजु० अध्याय० २१ मंत्र३॥
ॐत्वन्नोऽग्नेवरुणस्यविद्वान्देवस्यहेडोअ
वयासिसीष्ठाः ॥ यजिष्ठीवन्न्हितमुत्शो
शुचानो विश्वाछेपासिप्रमुमुग्ध्युस्म
त्स्वाहा ॥ इद्मनीवरुणाभ्याम् ॥
शुकृयजु० अध्याय २१ मंत्र॥
ॐसत्वन्नोऽग्नेऽवुमोभवोतीनोदिष्टोऽअस्याउ
पसोव्युष्टौ । अवयवनोवरुणराणोबाहिम
ड्डीकश्मुहवौनएधिस्वाहा।इदमनीवरुणाभ्यां।
यजुर्वेद मंत्रभाग ॥
ॐअयाश्चाग्नेस्यनभिशस्तिपा (वा) श्वसत्यमित्व
मयाअसि । अयानोयज्ञवहास्ययानोभेपजश्स्वाहा
इदमग्नये॥
यजु० मंत्र॥
ॐ येतेशतंवरुणयसहस्रयज्ञियाः पाशाविततामहा
न्तः। तेभिन्नोऽद्यसवितोतविष्णुर्विश्वमुञ्चन्तुमरुतः
स्वःिस्वाहा ॥इदं वरुणायसवित्रेविष्णवेविश्वेभ्यो
मरुद्भयःस्वभ्यः ॥
.
+ प्रकरणम् ६ ..१६९ भा०टी०-त्वनो और सत्वनो इन मंत्रोंका वामदेव ऋषि त्रिष्टुपछंद अग्नि और वरुणदेवता सर्वप्रायश्चित्तमें विनि- योगहै । ( अयाश्चाग्ने) इस मंत्रका वामदेवऋषि बिष्टुपछंद आग्निदेवता प्रायश्चित्तहवनमें विनियोगहै ।। (येतेशतं) इस मंत्रकाशुनाशेपऋपित्रिष्टुप्छंद वरुण देवता वरुणसंबंधिशा- पके मोचनमें विनियोगहे ॥ अब इन्के अर्थ क्रमसे लिखते हैं । (त्वन्नइति) हे अग्ने तुम इस कर्ममें वैगुण हो- नेसे वरुणदेवके क्रोधको हरण करो कैसे तुम सर्व कर्ममें साक्षि चतुर हो और सबसे उत्तमहो और सबदेवताओं- को यज्ञका भाग देनेवालेहो प्रकाशमान हो इस लिये मंद- बुद्धिवाले हमको जान हमारेसे की हुई अवज्ञा अनादर- को क्षमा कर सर्वप्रकारसे कल्याण देवो ॥ १॥ (मंत्रार्थ-स- त्वन्नद्दति) हे अग्ने तुम सबको पालना कर्नेवाले है। इस लिये आजदिनके प्रातःकालसे लेकर मुझकी रक्षा करो। नहि केवल रक्षा किंतु हमारे कर बुलाये तुम मुखपूर्वक आकर सुखदेनेवाला चरु यज्ञके मालिक वरुणदेवताको देकर पूजन करो । जिससे वरुणदेवभी प्रसन्न हो हमारे- को सुखदे ॥२॥ (मं० अयाश्वानइति ) हे अग्ने तुम सर्वातर्यामी और प्रा- यश्चित्तद्वारा सर्वप्राणीको शुद्ध कर्नेवाले और शुभके दाता हमारे किये हुए यज्ञको कृपाल होनेसे इंद्रादिदेवताओंको देनेवाले इस लिये हमकोभी भेषज अर्थात् सुखके देनेवाला दुःखविनाशक अपूर्व सुखदेवों ॥३॥ • (मंत्रार्थ येतेशतमिति ) हे घरुण यज्ञके पिनसे पैदाटुये बढे २ भारी महान कठिन जो तुमारे शतसंग्ख्याक और सहस्र संख्याक पाशद, यह पापम्पपाश इमारे सविता १६... विवाहपद्धति भा० टी० सूर्य विष्णुरूप इंद्र और सर्वदेवता और वायु सुंदर हृदय- वाले आदित्य हमारे,पापोंको नष्ट करें ॥४॥ शुक्लयजु० अ० १२ (मूल.) मंत्र १२ ॥ उर्दुत्तुमरुण पाशं मुस्म्मदाधुर्मविम ध्यम श्रथाय ।अथावुयमादित्यब्रुते तवानागमोऽअदितयेस्यामस्वाहा । इदं वरुणाय० । एता सर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः॥५॥ ततोऽन्वारब्धविना प्रजापतयेस्वाहा । इदंप्रजाप तये॥ॐअग्नयेस्विष्टकृतेस्वाहा । इदमग्नयेस्विष्टकृ ते०॥उदकोपस्पर्शनम् ॥ अथराष्ट्रभृत्यः ।। भा टी-उत्तम मध्यम अधम यह-तीन वरुणके पाश हैं (मंत्रार्थ) हे वरुण जो तुमारा उत्तम पाशहैं उससे हमारी रक्षा करो जो मध्यम पाशहै उससेभी हमारी रक्षा करो पाशको शिथिल करो हे वरुण हम ब्रह्मचर्यसे तुमारेसे निरपराध होकर दीनतासे रहित होते हैं । 'दीनतायां दितिःप्रोक्ता दितिःस्यादैत्यमातरि ॥ इस वचनसे दि. तिनाम दीनताकामीहै ॥ अनंतर अन्वारब्धविना । प्र जापतये । इदं प्र०॥ अग्नयस्विष्टकृते० इदम स्विष्टकृते॥ यह दोआहुति देजलको हाथ लगावै । इसके अनंतर राष्ट्र भृत्यनाम आहुति लिखते हैं ।
प्रकरणम् ६
१६१
तत्रद्वादश मन्त्रा यथा
शुक्लयजु अध्याय १८ मंत्र ३८॥
ॐऋतापाड्डतामाग्निग्गन्धर्व सनडुद
म्ब्रह्मक्षत्रम्पातुतस्म्मस्वाहावाट् ॥इदमृ
तासाहेनतधाम्नेऽग्नयेगंधर्वाय० ॥
ॐऋतापाडतधामाग्निग्गन्धर्वस्तस्योप..
धयोऽप्सरसोमुदोनामताभ्य स्वाहा ।
इदमोपधिभ्योऽप्सरोभ्योमुद्भयः ० ॥
यजु० अध्याय १८ मंत्र ३९॥
सुर्थहितोविश्वसामासूर्योगन्धुर्वसनडु
दम्ब्रह्मक्षुत्रम्पातुतस्मैस्वाहावाट् ॥ इद
सहितायविश्वंसाम्नेसूर्यायगन्धर्वाय० ॥
यजु० अध्याय १८ मंत्र ३९॥
सुहितोविश्वसामानयॊगन्धर्षस्तस्य
मरीचयोऽप्सुरसंऽआयुवोनामताभ्यः
स्वाहा ॥ इदंमरीचिभ्योप्सरोभ्यआयु
वोभ्यः॥
.
१६२ विवाहपद्धति भा० टी०
यजु० अध्याय १८ मंत्र ४०॥
ॐसुषुम्ण सूर्य्यरश्मिश्चन्द्रमाग़न्धुर्व
सनडुब्रह्मक्षुत्रपातुतस्मैखाहा वाट् ॥
इदंसुषुम्णाय सूर्य्यरश्मयेचंद्रमसेगंध
य ० ॥
यजु अध्याय १८ मंत्र४०॥
ॐसुपुम्म्ण मूर्य्यरश्म्मिश्चन्द्रमागन्धु
बस्तस्युनक्षेत्राण्यप्सुरसौभेकुरैयोनाम
ताभ्यःस्वाहा ॥ इदंनक्षत्रेभ्योऽप्सरोभ्यो
भेकुरिभ्यः ॥
यजु० अध्याय १८ मंत्र ४१॥
ॐइपिरोविश्वव्यंचावातौगन्धर्वसन इद
म्ब्रह्मक्षुत्रम्पातुतस्मैस्वाहावाट् ॥ इदमिषि
रायविश्वव्यचसेवाताय॥
यजु० अध्याय १८ मंत्र ४१॥
ॐडुपुिरोविश्वव्यंचाव्वातौगन्धुबस्तस्या
पौऽप्सुरसुऊ नामताभ्यःस्वाहा ॥ इद
मद्भ्योऽप्सरोभ्यऊरयः ॥
.
प्रकरणम् ६
१६
यजु० अध्याय १८मंत्र४१॥
ॐभुज्यु सुपर्णोयज्ञोर्गन्धर्व-सनइदम्ब
ह्मक्षुत्रपातुतस्मैस्वाहावाट् ॥ इदंभुज्यवे.
सुपर्णाययज्ञायगन्धर्वाय० ॥
यजु० अध्याय १८ मंत्र४१॥
ॐभुज्युःजुंपुर्णोयुज्ञोर्गन्धर्वस्तस्यदक्षि
णाअप्सुरसस्तावानामताभ्य स्वाहा ॥
इदंदक्षिणाभ्योऽप्सरोभ्यस्तावाभ्यः० ॥
यजु० अध्याय १८ मंत्र ४२॥
ॐप्रजापतिर्बिश्वकर्मामनौगन्धुर्वः सन
इदंब्रह्मक्षुत्रपौतुतस्मैस्वाहावाट् । इदंप्र
जापतयेविश्वकर्मणेमनसेगंधर्वाय० ॥
ॐप्रजापतिर्विश्वकर्मामनौगन्धर्वस्तस्य
ऽऋकूसामान्यप्सुरसुऽएपयोनार्मताभ्यः
स्वाहा ॥ इदंऋक्सामभ्योऽप्सरोभ्य
एपिभ्यः ॥ इतिराष्ट्रभृत् ॥
भा०टी०-इन द्वादश मंत्रोंके अर्थ यथाक्रमसे
यह + यह चिन्ह होगा वहां पूर्वोक्त अर्थ समझें । (मं.
वार्थ १) जो सत्यके सहनेवाला सत्त्यका म्यान गंधर्वरूप
जानने
१६४ . विवाहपद्धति भा० टी० जो अनि उस्को दी हुई आहुति बहुतहो वह अग्नि हमारा ब्रह्मज्ञान और (क्षत्र) वीर्य बलको रक्षा करे । (२) जो सत्यका स्थान सत्यशील गंधर्वरूप अग्निति- स्की औषधी अर्थात् यवगोधूम माष व्रीहि मुद्गादि सर्व प्रा- णिको आनंददायक अप्सराहै तिस अग्नि और अप्सराके लिये सुहुत हो (+) इत्यादि। (३) दिनरात्रिका स्वामी गंधर्वरूप जो सूर्यभगवान् संपूर्ण सामवेदके जाननेवाले उनके लिये मुहुत हो (+) इत्यादि। (४) रात्रिदिनपति गंधर्वरूपी सूर्यजीकी मिश्रित होने- वाली मरीचिया (किरण)रूप अप्सराहै सो (+) इत्यादि। (५) निरंत सदेव आनंदके देनेवाले गंधर्वरूपी सूर्यकि- रणोंसे वृद्धिक्तो प्राप्त भये .जो चंद्रमा भगवान जी (+) इत्यादि। (६)तिस गंधर्वरूपी चंद्रमाजीकी ( ईकुरी) अर्थात जो एक पिताकी द्विकन्याका एकही पति हो उन्को ईकुरी कहते हैं (+)प्रमाणभी जैसे गंगाधरजी लिखतहे (सपित- काएकपतिका ईकुर्य्यस्ता उदीरिताः) ऐसेजो क्षत्र तारका अप्सराहै उस्के पतिजो (+) इत्यादि ।। (७) जो वायु गमनस्वभाव और सर्वगत गंधर्वरूप है (4) इत्यादि। (८) जो वायुरूप गन्धर्व उन्का सर्व वस्तुके देनेवाला जल अप्सराहै (+) इत्यादि। (९) जो यज्ञरूप गंधर्व है पालन कर्नेवाला और शोभ- नगतिवाला उस्की जलरूप अप्सराहे उस्के (+) इत्यादि। (१०) जोन्यज्ञरूप गंधर्व है स्तवनरूप उस्की दक्षिणा नाम अप्सराहे उस्के (+) इत्यादि।
०
प्रकरणम् ६
१६५
(११) प्रजाका ईश्वर कि जिरके आश्रय विश्व बनती है
ऐसा मनरूप जो गंधर्व है (+) इत्यादि।
.(१२) जो मनरूप गंधर्व उस्की धर्म अर्थ काम मोक्ष
(पुत्रादि) की देनेवाली ऋग्वेद सामवेदरूपी अप्सराहे
उसके लिये सुहुतहो वह मन हमारा प्रत ज्ञान वीर्य बल
वृद्धि करे इत्यादि क्रमसे अर्थ जानना यह राष्ट्रभृत नामसे
हवन है।
अथ जयाहोमः॥चित्तञ्चस्वाहा - इदंचित्ताय०१
चित्तिश्चस्वाहा-इदंचित्त्ये०२ ॐआकूतंचस्वाहा-
इदमाकूताय०३ आकूतिश्चस्वाहा-इदमाकूत्यै
४ विज्ञातंचस्वाहा-इदंविज्ञाताय०विज्ञाति
श्वस्वाहा-इदंविज्ञात्यै०६ मनश्चस्वाहा-इदंमन
से०७ ॐशकर्यश्वस्वाहा-इदंशकरीभ्यो०८ दर्श
श्वस्वाहा-इदंदायः
० ९ ॐपोर्णमासञ्चस्वाहा-इ
दंपौर्णमासाय० १० ॐवृहचस्वाहा-इदंबृहते
११ अरथंतरंचस्वाहा-इदंरथंतराय० १२ ॐप्रजा
पतिजयानिन्द्रायवृष्णेप्रायच्छदुनःपृतनाजयेपु ॥
तस्मैविश समनमंतसर्वाःसउग्रःसहइहव्योवभूवस्वा
हा १३ इतिजयाहोमः॥
भा०टी०-यह १३ प्रयोदशमंत्र जयानाम होमहे इन्में
द्वादश (१२) सुगम। (मंत्रार्थ) १३ प्रजापति-प्रजाका
स्वामि शत्रुओंकी सेनाके नाश कर्नमें उग्र परमेश्वरजीमें
इंद्रका जयानाम मंत्रोंका उपदेश कर्ते भये । जिस मंत्रों के
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៤១ विवाहपद्धति भा० टी०
प्रभावसे इंद्र सर्वका. राजा और वर्षाके कर्नेवाला सर्वसे
मुख्य (अंग्रणी) होता भया तद्वद ऐसी कृपाशील परमे-
श्वर मुझकोभी जय देवे ॥ और हमारेसे दी हुई आहुति
सुहुतहो ॥ १६ ॥भाव यहहै कि जिन मंत्रोंके उपदेशद्वारा
इंद्र ऐश्वर्यसे युक्त सर्वसे मुख्य भया इस लिये इन्का जया
नाम है। इति॥
अथाभ्याताननामहोमः॥ओंअनिर्भूतानामधिपतिःस
मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरो
धायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्याश्स्वाहा.॥ इदम
नयेभूतानामधिपतये०१ॐइन्द्रोज्येष्ठानामधिपतिः
समावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पु
रोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्याश्स्वाहा ॥ इद
मिन्द्रायज्येष्ठानामधिपतये०२ ऑयमापृथिव्याऽअ
धिपतिःसमावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेस्यामाशिष्य
स्यांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्याश्स्वाहा॥
इदंयमायपृथिव्याअधिपतये०३अत्रप्रणीतोदकस्प
शः॥ओवायुरन्तरिक्षस्याधिपतिःसमावत्वस्मिन्ब्रह्म
ण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्य
स्यादेवहूत्याश्स्वाहा ।। इदंवायवेऽन्तरिक्षस्याधिपत
ये०४ ॐ सूर्योदिवाअधिपतिःसमावत्वस्मिन्ब्रह्मण्य
स्मिन्क्षनेस्यामाशिष्यस्यांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्य
स्यांदेवहूत्या स्वाहा । इदंमूर्यायदिवाअधिप०५
ॐचंद्रमानक्षत्राणामधिपति समावत्वस्मिन्ब्रह्मण्य
प्रकरणम् ६
१६७
स्मिन्क्षत्रे स्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्म
ण्यस्यांदेवहूत्याश्स्वाहा ॥ इदंचंद्रमसेनक्षत्राणामधि
पतये० ६ वृहस्पतिर्ब्रह्मणोधिपतिःसमावत्वस्मि
ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यांपुरोधायामस्मि
न्कर्मण्यस्यां देवहूत्याश्स्वाहा ॥ इदंबृहस्पतयेब्रह्म
णोऽधिपतये०७ ऑमित्र सत्यानामधिपतिःसमावत्व
स्मिन्ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेस्यामाशिष्यस्यांपुरोधायाम
स्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्याश्स्वाहा ॥ इदमित्रायस
त्यानामधिपतये०८ॐवरुणोऽपामधिपतिःसमवित्व
स्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायाम
स्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्याश्स्वाहा । इदंवरुणायम
पामधिपतये० ९ॐ समुद्रःस्रोत्यानामधिपतिःसमा
वत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यांपुरोधा
यामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्या५ स्वाहा ॥ इदंसमु
द्रायस्रोत्यानामधिपतये० -१० ॐ अन्न साम्राज्या
नामधिपतिःसमावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेस्यामा
शिप्यस्यांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्या५
स्वाहा । इदमन्नायसाम्राज्यानामधिपतये० ११ ॐ
सोमओपधीनामधिपतिःसमावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मि
न्क्षनेस्यामाशिष्यस्यांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां
देवहूत्याश्स्वाहा। इदंसोमायओपधीनामधिपतये
१२ॐ सविताप्रसवानामधिपतिःसमावत्वस्मिन्ब्रह्म
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१६८ . विवाहपद्धति भा. टी.
ण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यांपुरोधायामस्मिन्कर्म
ण्यस्यांदेवहूत्या स्वाहा ।। इदंसवित्रेप्रसवानामधिप
तये० १३ ॐ रुद्रःपशूनामधिपति-समावत्वस्मिन्त्र
मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिप्यस्यांपुरोधायामस्मिन्कर्म
ण्यस्यांदेवहूत्या स्वाहा । इदंरुद्रायपशूनामधिपत
ये०१४ अत्रप्रणीतोदकस्पर्श त्वयारूपाणामधि
पतिःसमावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यांप्पु
रोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्या स्वाहा।।इदंत्वष्ट्ररू
पाणामधिपतये १५ अविष्णुःपर्वतानामधिपतिः
समावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेस्यामाशिष्यस्यांपुरो
धायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्यारस्वाहा ॥ इदवि
प्णवेप्रजानामधिपतये १६ॐमरुतोगणानामधिप
तयःस्तोमांवत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां
पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यांदेवहूत्या स्वाहा ।।इदम
रुद्योगणानामधिपतिभ्यः० १७ ॐ पितरःपिताम
हा परेवरेत्ततास्ततामहाइहमावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यास्मिन्क्ष
प्रेस्यामाशिप्यस्यांपुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यादेवहू
त्यारस्वाहा ॥ इदंपितृभ्यःपितामहेभ्यः परेभ्यो
वरेभ्यस्ततेभ्यस्ततामहेभ्यः० १८ अत्रप्रणीतोद
कस्पर्शः॥ इत्यभ्याताननामहोमः॥
भा०टी०-इन अष्टादश १८ मंत्रोंकाप्रजापतिऋषि पंक्ति
छंद मंत्रोक्तदेवता अभ्यातान नाम होममें विनियोगहै ॥ इ.
नका अर्थ यथाक्रमसे जानना ॥
प्रकरणम् ६ १६९ १(मंत्रार्थ) सर्वका स्वामी अग्निदेव मुझको वेदादि अ- ध्ययन कर्ममें और बल वीर्य वर्तमान इस विवाहमें तथा आगे होनेवाली वृद्धि में तथा देवपूजनादिक कर्ममें मुझ- की रक्षा करे यह आहुति अग्निके लिये सुहुत हो । (२)सबसे बडे जो बृहस्पतिजी उनका जो अधिपति राजा होनेसे इंद्र सो मुझको इत्यादि पूर्वोक्त अर्थ जानना १७मंत्रोंमेंही॥ (३) मर्त्यलोकके प्राणियोंको दण्ड देनेवाला इस लिये पृथिवीका स्वामी जो धर्मराजजी वह मुझको इत्यादि। यह आहुति देकर हाथ प्रक्षालन कर्ने । (४) आकाशगामी होनेसे आकाशका स्वामी श्रीवायु देवताजी मुझको + इत्यादि। (५)संपूर्ण अंधकार नाश कर्नेसे दिनके स्वामी सूर्यनारा- यण वह मुझको + इत्यादि। (६) अश्विनीसे आदि और दाक्षायण्यादितारका चंद्र- माजीकी स्त्री है इस लिये नक्षत्रोंके स्वामी चंद्रमाजी मु- झको + इत्यादि। (७) महादेवजीके शिष्य वन अपार व्याकरणादि जान और अत्युत्तम संस्कृत उच्चारणादिसे बृहस्पतिजीको वेदों- का पतित्व उचितहै वह मुझको+इत्यादि। (८)सत्यपदार्थका स्वामी जो मित्रदेवताजी वह मुझको +इत्यादि ॥प्रमाण जैसे (मित्रत्वं जायते सत्यात्सत्यादेवप्र वर्द्धते । सत्यात्मफलते नित्यं सत्यहेतुर्हि मित्रता)। (९) जलोंका स्वामी वरुणदेवजी मुझको + इत्यादि ।। प्रमाण जैसे (जलानां जलजन्तूनां पाशी धानाधिपः कृतः) इति ॥
१७० विवाहपद्धति भा० टी० (१०) स्रोत्यनाम जो नल नदी नाले वहनेवाले और गंभीर दुर्वगाह उनका मालिक समुद्रजी मुझको + इ- त्यादि। (११)(अद्यते अत्ति च भूतानि इति अन्नं ) अर्थात् जि- स्को मनुष्यादि भक्षण करे और जो मनुष्यादिको भक्षण क- रे और उत्पन्न करे तथा पालन करे ऐसा जो अन्न परमेश्वर हस्ति हय (घोडा) गृह बाग बगीचा इत्यादि सर्व वस्तु- का स्वामी वह मुझको + इत्यादि ॥ (१२) सर्वके उत्पन्न कर्नेमें सामर्थ्य सविता देवताजी मु- झको+इत्यादि। (१३) औषधियोंका स्वामी सोमदेवजी मुझको कामधे- नुके गर्भद्वारा नंदिकेश्वरका अवतार होनेसे महादेवजीको पशुओंके स्वामी कहा जाताहै वह मुझको+ इच्यादि । (१४) रूपोंका स्वामी त्वष्टादेवजी मुझको (१५) पर्व .जो आमावास्यादि चंद्रग्रहणादि दर्शपर्ण- मासादि यज्ञोंका स्वामी विष्णुपरमात्मा परमेश्वरजी मुझको ०॥ (१७) यलि होनेसे देवगणों के स्वामी वासुदेवताजी मु- झको ० ॥ (१८)देवऋपि आंगिरस भार्गव ब्राह्मणक्षत्री वैश्य शूद्र और जो पिता पितामह प्रपितामहादि सनातन फिर अग्निप्वा- त्तादि और आधुनिक जो हमारे गोधी वह सर्व मुझको इत्यादि । इहांभी प्रणीताजलसे स्पर्श कर्ना जिन २ देव- ताकी आहुतीके अनंतर जलस्पर्श करना चाहिये वह प्रमा- लिपते हैं ॥(यमो रुद्रश्च पितरः कालो मृत्युश्च पंचमः। पंच क्रूरा विवाहस्य होमे तच्छान्तिमाचरेत् ॥ प्रणीताअतु शान्त्यर्थ मनु-स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ .
9१ प्रकरणम् ६ जिन अभ्यातानमंत्रोंसे देवता असुरोंको मारतेभये इस लिये इन्की अभ्यातान संज्ञा भई तथाच श्रुतिः ( यदेवा अ- भ्यातानैरसुरानभ्यातन्वतः) इति ॥ अथाज्यहोमः ॥ॐअग्निरैतुप्रथमोदेवतानाश्सोस्यैप जामुंचतुमृत्युपाशात् ।तदयाशजावरुणोनुमन्यतां यथेयत्रीपौत्रमपन्नरोदात्स्वाहा। इदमग्नये ॥१॥ ॐइमामग्निस्त्रायतांगार्हपत्य प्रनामस्यैनयतुदीर्घमा युः ॥ अशून्योपस्थाजोवतामस्तुमातापोत्रमानन्द मभिप्रबुध्यतामियश्स्वाहा।इदमग्नये०२स्वस्तिनोड दिवापृथिव्याविश्वानिधेह्यऽयथायजत्रा ॥ सदस्यां महि दिविजातंप्रशस्तं तदस्मासुद्रविणंधेहिचित्र स्वाहा । इदमग्नये. ३सुगंनुपंथांप्रदिशन्नएहिज्योति ष्मद्धेयजरन्न आयुः। अपैतुमृत्युरमृतंनआगाद्वैवस्व तोनोऽभयंकृणोतुस्वाहा।।इदमग्नये ॥४॥परंमृत्योऽ नु परेहिपंथांयस्तेऽन्यइतरोदेवयानात् । चक्षुष्मतेशृ ण्वतेतेब्रवीमिमानःप्रजारीरिपोमोतवीरानुस्वाहा।। इदंवैवस्वतायः॥६॥अत्रप्रणीतोदकस्पर्शः॥ ततो वधूमग्रतः कृत्वा वधूव प्राङ्मुसोस्थितो भवतः॥ ततोवराञलिपुटोपरिसंलग्नवध्वलिपुटोपरिसंलग्न . वध्वनलिघृताभिधारितवधूभ्रातृदत्तशमोपलाशमि श्रेला वधूकर्तृकोहोमः॥ १ असायसिपाग:
१७२ विवाहपद्धति भा० टी० भा०टी०-अग्निरेतु इत्यादि चार मंत्रोंका प्रजापति ऋषि त्रिष्टुपछंद मन्त्रोक्तदेवता घृत होममें विनियोगहै ।(मंत्रार्थ) देवताओंमें आदि अग्नि देवता आकर इस कन्यामें आगे होनेवाली संतानको मृत्युपाशसे मृत्युसे बचावे वा मृत्युपा- शको भस्म कर इस्का प्रजापुत्रादि वरुणराजाकी आज्ञासे जैसे यह स्त्रीपुत्र संबंधिदुःखसे ना रोदन करे ऐसी प्रजापु- बादि संतानको देवे ॥१॥ (इमामग्नि) अग्निहोत्र संबंधि अग्नि इस कन्याके प्रजा. पुत्रादिको दीर्घायुको प्राप्त करें पुत्रोंसे नहीं शून्य गोद(अं- . क) जिस्की वा जीवत् वत्सा हो यह स्त्री पुत्रपौत्रादि सं- बंधि आनंदको जाने अर्थात् भोगे ॥ २ ॥ (स्वस्ति नो) पूजन कर्नेवालोंकी रक्षा कर्नेवाली हे अग्ने पृथिवीसे आदिले स्वर्गपर्यंत जो कल्याण क्रमको छोड अ- र्थात् एकदाहीं हमारेमें धारणा करो। और पृथिवी स्वर्गमें पैदा होनेवाली महिमा वा यश नानाप्रकारके सुवर्ण मोती पझराग मरकत प्रवाल रजतादि द्रव्य सर्व मुझको देवो ॥ (सुगन्तु )सुखपूर्वक जाना आना जिसमें ऐसा गृह और मुखपूर्वक चिरकाल जीवन धर्मदानादि कर्नेसे यशसे मुक्त जरा रोगसे रहित आयु देवो ॥ और अपमृत्यु आदि हमारे नष्ट होवें ॥ अमृत आनंद.हमारेको मिले धर्मराजभी ह- मारेको अभय देवे अर्थात हमारे पापका जो फल नरकादि क्लेश उनसे तुमारी कृपाद्वारा हमको बचावे॥ यह आहुति अग्निके लिये मुटुतहो॥ (परंमृत्यो) इस मंत्रका संकर्षण ऋषि त्रिष्टुपछंद मृत्युदेव- ता आज्यहोममें विनियोगहे । हे मृत्युदेव ! सर्व व्यापारा- दिके साक्षि और सुननेवाले जिस कारणसे तुमारा देव- .
प्रकरणम् ६ ૧૭૨ मार्गसे भिन्न मार्ग है इस लिये अपने मार्गको जावो और हमारेसे आहुति पूजाले हमारी पुत्र पौत्र भ्रातादि संतती- को मतमारे किंतु प्रसन्न हो रक्षा करो हम आपसे यह प्रा- र्थना कर्ते हैं॥५॥ इस मंत्रसे आहुति देकर जलस्पर्श क- ॥ अनंतर वरके आगे वधूको करे पूर्वकी तरफ मुख कर होमे वर वधू हवनके लिये स्थित होमे ॥ वरकी अंजलीपर वधूकी अञ्जलीरखकर कुमारीके भ्राताने दी हुई जो घृत शमीके पत्रोंसे युक्त लाजा (फूलिया) से वधू हवन करे मंत्रपूर्वक ॥ अर्यमणंदेवकन्याअग्निमयक्षत । सनोअर्यमादेव प्रेतो मुञ्चतुमापतेः स्वाहा ॥ १॥ इयंना[पतेलाजानावपं तिका । आयुष्मानस्तुमेपतिरेधन्तांज्ञातयोममस्वाहा ॥ ॥२॥ इमॉल्लाजानावपाम्यग्नेसमृद्धिकरणंतव।ममतुभ्यंचसं वननंतदग्निरस्तुमन्यतामिय स्वाहा ॥ ३ ॥ अथास्यै दक्षिण हस्तंगृह्मांतिवरः साङ्गुष्टम् । ॐगृभ्णामितेसो भगत्वायहस्तंमयापत्याजरदष्टिर्यथासः । भगोर्यमासवि तापुरंधिर्मांत्वादुर्गार्हपत्यायदेवाः॥४॥ अमोहमस्मिसात्व सात्वमस्यमोऽहं । सामाहमस्मिऋक्त्वंद्योरहंपृथीवीत्वम् ॥६॥ तावेवविवहावहेसहरतोदधावहेपजांप्रजनयावहेपुत्रान विद्यावहेबहून् ॥६॥ भा०टी०-अर्यमणंइत्यादि तीनमंत्रोंका दध्यइदाधर्षण- ऋपि अनुष्टुपछंद अग्निदेवता लाजाहोममें विनियोगहै ॥ (मंत्रार्थ) .
१७४ विवाहपद्धति भा० टी० (अर्यमणं) यह पूर्वकन्या सूर्यदेवकी पूजनादि कर्ती भई वह सूर्य भगवान् प्रसन्न होकर पितृकुलसे श्वसुर गृहया- नेके लिये मोचन करे नहीं मुझपतिसे भिन्न करे ॥ १॥ यह तीन मंत्र वरकन्यासे कहावे ॥ (इयंना[प) संतानप्राप्तिके लिये सूर्यदेवको प्रसन्नकर। लाजाको अग्निमें गेरती हुई ग्रह स्त्री पतिको सुंदरवाणीसे कहती है ॥ कि मुझका पति वीर्यपुष्टियुक्त चिरायुवाला होवे और मेरे बांधव ज्ञातिके लोक पित्रादि मातुलादि सब वृद्धिको प्राप्त होवें ॥२॥ (इमॉल्लाजान ) हे पति तुम्हरि समृद्धिके लिये यह ला- जा अग्निमें गेरतीहै । और हमारी. तुमारी प्रीतिको अग्नि सर्वांतर्यामी अनुमोदन करे अर्थात् तुमारी प्रीति हमसे सदा अवछिन्न रहें ॥३॥ (अनंतर वर वधूका साथ अंगुष्ठसे हस्तग्रहण करे )(मं- त्रार्थ) ( गृभ्णामि )(हेपनि तुमारे हाथको ग्रहणकर्ता है) जिस हाथके ग्रहणकनेंसे तुम बहुतवर्ष जीवित रहो॥शंका+ आप किसकी आज्ञासे पाणि ग्रहण कन्याका कर्तेहैं । उत्तर- गाईपादि काँके कनेंलिये भग अर्यमा-सविता और संतान तथा आनंदके लिये सुंदररूपवती तुमको मुझे देने भये इस हेतुसे हम आपको ग्रहण कतेहैं ॥४॥ (अमोहमास्मि ) इस मंत्रका भरद्वाज ऋपि उप्णिक् छंद विष्णुदेवता हाथके ग्रहणमें विनियोगहे॥अर्थ हेपनि.मैं अम नाम विष्णु वा वेदत्रयात्मकहूं और तुमसा नाम लक्ष्मी वा देवीत्रयसप अर्थात् ब्रह्माणी रुद्राणी वैष्णवीहै । प्रमाण ज़ से (ओविष्णुरः शिवः प्रोक्तःप्रपंचे अस्मृतस्तथा )(साच- लक्ष्मी युधःप्रोक्ता) और केदानांसामवेदोस्मि इस वाक्यसे प्रकरणम् ६ १७५ मुख्यता होनेसे मैं सामवेदहूं।.और ऋक् शब्दको स्त्रीलिं- गहोनेसे तुम ऋग्वेदहो प्रमाण (स्त्रियामृक् सामयजुषी हु- त्यमरः) और मैं आकाशरूप तुम पृथिवीरूपहै ॥ भावार्थ- कि जैसे आकाश पृथिवीपर छादितहै तद्वत् मैंभी अपने गु- णोंसे तुमारेपर छादित रहा अर्थात् तुम हमारे अधीन रहे और जैसे पृथिवी छेदन भेदन की हुई और भारसे दवाई हुई अग्निसे दग्धकी हुई शांतिस्वभाव होनेसे कुछ नहीं क- हती तद्वत् मेरे घर तुम श्वश्रू(सास) ननद आदिकर उपा- लम्भ कटु वचनो प्राप्तभई भी उन्को कुछ निषिद्धवाणी ना कहे किन्तु उनकी सेवाकरे ॥ इस मंत्रको लेकर दृष्टांतदेते हैं यथा शुश्रूषस्व गुरुन् कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने भ तुर्विप्रकृतापि रोषणतया मास्मप्रतीपंगमः॥ भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी यान्त्येवं गृदीणीपदं युवतयो वामा कुलस्याधयः शकुंतलाके श्वशुरकुलगमन- कालमें इस वेदमंत्रका आशयलेकर भगवान्काश्यपजी शकुंतलाको उपदेश कर्तेहैं कि हे शकुंतले तुम इहांसे जा- कर अपने श्वशुर सास सौहरा पती सपतयोहरा इत्यादि जो २ गुरुजन उनकी सेवा की और सपत्नी में भी मित्र- ता भगिनीवत् कर्नी यदि तुमारा भर्ता किसीकारणसे तु- मपर कुद्धही दुर्वचनभी कहे तो आपने कुछ नहीं कहना परंतु उस्का क्रोध मधुरवचनोंसे निवृत्त करना और जो परि- जन नौकर चाकर दास दासी उनमें चतुर (चुस्त) रहना (और किसीकी उन्नती देख शोच नहीं करना) इत्यादिक श्रेष्ठ आचारसे स्त्रियां सर्व वस्तुकी मालिकमिय होतीहैं ज्यतिरिक्त खीकुलोंमें एकमानसिक रोगहीती तथा नि- दरको प्राप्तहोतीहै इति ॥ आगेमी नियोंफा आच- (ण कहेंगे।
१७६ विवाहपद्धति भा० टी० (मंत्रार्थ-तावव) तुम हम विवाह अर्थात् ऋषिवाक्य वेदद्वारा मंत्रबलसे कन्याको वरके गोत्रमें मिलाना और पतिमांव कनेको विवाह करते हैं इसको करे ॥ अनंतर वि- वाहके तुम हम पुत्रोत्पत्तिके लिये वीर्य धारण कर बहुत पुत्रोंको प्राप्त होमें ॥६॥ तेसन्तुजरदष्टयः संप्रियौरोचिष्णूसुमनस्यमानौ ॥ पश्येमशरदःशतंजीवेमशरद शतश्शृणुयामशरदः शतमिति.॥७॥ ॐआरोहेममश्मानमश्मेवत्व स्थिराभव ॥ अभितिष्टतपृतन्यतोऽववाधस्वपृतना यतइति ॥ अथगाथांगायति ॥ सरस्वतीप्रेदमवसुभ गेवाजिनीवति ॥ यांत्वाविश्वस्यभूतस्यप्रजायामस्या ग्रतः । यस्यांभूत समभवद्यस्यांविश्वमिदंजगत् । तामद्यगाथांगास्यामियास्त्रीणामुत्तमंयशइति ॥ अ थेवधूवरीअमिप्रकामयतस्तुभ्यमग्रेइतिमंत्रेणेति ॥ ऋ० मं० १० अ०७ सू०८५ मंत्र ३८। तुभ्यमग्रेपर्यंवहन्मु-वहुतुनोसुह । पु नुःपतिभ्योजायांदाअंग्नेप्रजयांसहेतिप ठन् परिकामेत् ॥ १०॥ भा टी०-ते संतु इस मत्रका प्रजापति ऋषि यजुम्छंद विष्णुदेवता हस्तग्रहणमें विनियोग है ॥ मंत्रार्थ वह पुत्रपौ- धादि चिरंजीवी होमें और तुमहम प्रेमयुक्त सुमन पुत्रादि सहित शत १०० वर्ष रुपमहणमें (देखने में) तथा श्रवण कर्नमें सामर्थ्य जीवित रहे ॥ ७॥.
प्रकरणम् ६ ৭৩৩ आरोहेम:इस मंत्रका अथर्वण ऋषि अनुपछंद वधूदेव- ता अश्म (शिला) के आरोणहमें विनियोग है ॥ (मंन्नार्थ) हे पनि तुम पाषाणवत निश्चलहों और हमारे शत्रुकीं सेनाको उद्यमवालीको निरुद्यम करों॥८॥ कन्याके पाषाणपर स्थित होने में गाथा गायन करे वर ॥ सरस्वतीप्रेद इस मंत्रकाविश्वावसुऋषि अतुटुप्छंद सरस्व- ती देवता गाथाके गायनमें विनियुक्त है। (मंत्रार्थ ) हेवा- 'णिरूप सरस्वती कल्याण गुण विशिष्ट अन्नादिके देनेवाली अन्नपूरणे तुम यह वधूरूप द्वंद्वोंकी रक्षा करो तुमकोही इस पृथिव्यादिसर्व प्रपंचजातकी कारणरूप प्रकृति कहते हैं कि जिसमें विश्व लयको माप्त होती तथा सृष्टिके आदिमें उत्पन्न होती हैं प्रमाण सांख्यतत्वकौमुदी. कारिका६॥तस्मान्न वध्यतेऽसोन मुच्यते नापिसंसरतिकश्चित् । संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रयाप्रकृतिः॥ अर्थ की पूर्वोक्त जो अनुप- कारि पुरुषमें उपकार करनेवाली प्रकृति तिस्के अर्थको नष्ट कर आचरण कर्ती है इसलिये पुरुप ना बंधहोता ना-. त्यंत मुक्त होता ना जन्मता मरता है परंतु प्रकृति नाना- श्रय मुक्तकी बंधनकर्ती उत्पन्नकर्ती है ॥ (असङ्गोयं पु- रुपः) यह सांख्यसूत्र में भी लिखाहै ॥ विस्तारके भयसे व्याख्या नहि कर्तेहैं और हम उस गाथाको गानं कर्तेहैं जो स्त्रियोंकी उत्तम पतिव्रतादि यशहै ॥ ९ ॥ . अनंतर तुभ्यमने इस मंत्रसेमे वधू वर अग्निकी परिक्र- मा कर ॥ तुभ्यमने इसमंत्रका अथर्वण ऋषि अनुष्टुप् छंद अग्निर्देवता प्रदक्षिणामें विनियोगहै ।। (मंत्रार्थ) हे अमे तुगारे लिये ही सोमादिदेवता इस कन्याको ग्रहण फतें भये । अर्थात् २ घर्ष चंद्रमा पालन कर सौंदर्यताको दे गं. धर्वको देता भया वह २ वर्ष पालन कर सुंदर फंठ वाणी- १७८ विवाहपद्धति भा० टी० को देतुमारेको देता भया तुमभी तद्वत् पालन कर वर्ष प- र्यंत और पवित्रताको देकर मुझको देवे अर्थात हे अग्ने पा- लनके अनंतर पुत्रादि दे मुझ भर्ता के साथ मिलामें ॥ एवंपश्चादनेःस्थित्वालाजाहोमसाङ्गुष्ठहस्तग्रहणाश्म रोहणगाथागानाग्निप्रदक्षिणानिपुनरपिद्विस्तथैवक र्तव्यानोति ॥ एतेननवलाजाहुतयःसाङ्गुष्ठहस्तग्रह णत्रयेचसंपद्यतीतथाआसनविपर्ययः ततोऽवशिष्टला जैः कन्याभ्रातृदत्तैरञ्जलिस्थशूर्पकोणेनवधूर्जुहोति ॥ॐभगायस्वाहा-इदंभगाय० ॥ अथावरः प श्चात्कन्यातूष्णीमेवचतुर्थपरिक्रमणंकुरुतः । ततो वरउपविश्यब्रह्मणान्वारब्धःआज्येनप्राजापत्यंजुहुया त् प्रजापतयेस्वाहा इदंप्रजापतये इतिमनसा॥ अत्रप्रोक्षणीपात्रेआहुतिशेपाज्यप्रक्षेपः ॥ ततआले पनेनोत्तरकृतसप्तमण्डलेपुसप्तपदाक्रमणंवर कारये त् । वक्ष्यमाणमंत्रैः॥ भाटी०-इस प्रकार अग्निके पीछे स्थित हो लाजा हवन साथ अंगुष्ठके हस्त ग्रहण अश्मारोहणगाथाका गान आग्नि- की प्रदक्षिणा फिर दीवार की चाहिये ।। अर्थात पूर्वोक्त तीन २ वार कर्तव्य है । और आसनका बदलाना एकवार चाहिये शेषकन्या भ्राताने दीहुई लाजोंसे शूर्पकी कौन- से वधू हवन करे भगायस्वाहा इसमंत्रसे ॥ फिर आगे वर पीछे कन्या चुपचापसे चतुर्थ परिक्रमण करे ॥प्रजाप ० इ- स्को मनसे कहे और इस हवनमें आहुतिशेधृत काप प्रो- . प्रकरणम् ६ १७९ क्षणीपात्रमें प्रक्षेप कर अनंतर आलेपन (पटना) से उत्त- रोत्तर क्रम सप्तमण्डलको वर आक्रमण करवावे वधूसे ।। ॐएकमिपेविष्णुस्त्वानयतु ॥ द्वेउज्जैविष्णुस्त्वानं यतुं ।। त्रीणिरायस्पोपायविष्णुस्त्वानयतु । चत्वारि मायोभवायविष्णुस्त्वानयतु।पञ्चपशुभ्योविष्णुस्त्वा नयतु । पटऋतुभ्योविष्णुस्त्वानयतु।सखेसप्तपदा भवसामामनुव्रताभवविष्णुस्त्वानयतु ॥ ततोऽग्नेःप श्चादुपविश्यपुरुपस्कंधे स्थितात्कुम्भादाम्रपल्लवेन जलमानीयतेनवरोवधूमभिपिञ्चति ॥ ॐआपः शिवाः शिवतमा:शांता शान्ततमास्तेकृण्वन्तुभेपमिति । अनेनपुनस्तथैवतस्मादेवकुम्भात्तथैवानीतजलेन य०अ० ११ मं:५॥ आपोहिष्ठामयोभुवुस्तानऊर्जेद्धातन ॥ मुहेरणायुचक्षसे ॥ यो शिवतमोर सुस्तस्यभाजयतुहनः॥उशतीरिवमात र ॥ तस्माऽअरङ्गमामवोयस्स्यक्षयाय जिन्न्वथ ॥ आपोजुनयथाचनः ॥ इति तिसृभिर्वधूमात्मानंचाभिपिञ्चति।।इति।। भाल्टी-विष्णुरूप में तुमको अन्नादि प्राप्तिके लिये कपद आक्रमण कराताहे ॥ प्रसन्न हो वधू यह कह (धनंध ... विवाहपद्धति भा० टी० 'न्यंचमिष्टान्नं व्यञ्जनायंचयगृहे । मदधीनंचकर्तव्यं वधूराये पदेवदेत् ) ॥१॥ विष्णुस्वरूप हम बलके लिये द्वितीयपद आक्रमण कराते है। फिर वधू यह कहै । (कुटुंबंप्रथयिष्यामि तेसदाम - भाषिणी। दुःखेधीरासुखेहटा द्वितीयेसाब्रवीदरम्॥२॥वि- ष्णुस्वरूप हम धन पुष्टिके लिये तुमारा तृतीय पदाक्रमण कर्ते हैं॥ अनंतर वधू यह कहे (ऋतौकालेशुचिःस्नाताक्री. डयामि त्वयासह ।नाहंपरपतियायांतृतीयेसाब्रवीद्वरम्)३ चतुर्थपदको विष्णुस्वरूप हम सुखकी प्राप्ति लिये आक- मण कराते हैं ।फिर वधू यह कहै (लालयामिचकेशान्तंग- 'धमाल्यातुलेपनकाञ्चनैर्भूषणैस्तुभ्यं तुरीयेसाब्रवीद्वरम्॥) ॥४॥विष्णुस्वरूप हम पशुसुख गो महिषी इत्यादिका दुग्ध द धिघृतभक्षणरूप और अश्वादिआरोहणके लिये पंचमपदको आक्रमण कराते है। वधूभी यह वाक्य कहे ॥(सखीपरिवृता ..नित्यं गौर्याराधनतत्परा । त्वयिभक्ताभविष्यामि पंचमे सा ब्रवीद्वरम्)॥५॥विष्णु स्व०हम छः(पट)ऋतुओंके सुख भोगने लिये तुमारा पदाक्रमण कर्ने हैं।।वधूवाक्य जैसे-(यज्ञेहोमेच दानादौ भवेयंतववामतः । यत्रत्वंतत्रतिष्ठामि पदेषष्ठेऽत्र- वीद्वरम् ॥६॥ • मुझकी आज्ञामें होकर पतिव्रतादिधर्मशीलसे तुम सप्त- लोकमें प्रख्यात हो जैसे अरुंधति जानकी इत्यादि पतिव- ता हो अद्यपर्यन्त सप्तलोकमें प्रसिद्धहे ॥ ७॥ इति सप्तप- दाक्रमणमैत्रिः॥ अनंतर पश्चिम अग्निके स्थित हो पुरुष स्कंधस्थित घटप्से आम्रपत्रसे जल लेकर वर वधूका मस्तक अभिपिंचन,कर्ता है (आपः शिवा इत्यादि मंत्रोंसे) आप.शिवा इस मंत्रका A .
प्रकरणम् ६ १८१ प्रजापतिऋषि यजुछन्द जलदेवता अभिषेचनमें विनियोग है (मंत्रार्थ) कल्याणहेतु अतिशयसे कल्याणकारक और शीतल अतिशयसे शान्ति करनेवाले जलदेव तुमारेको आरोग्य करें।।। आपोहिष्ठादि तीनमंत्रोंकासिन्धुद्वीपऋषि गायत्रीछंद जलदेवता मार्जनमें विनियुक्तहै ॥ (मंत्रार्थ ) हे. जलदेव!प्रसिद्ध यश और अनुभव किये तुम मुझको बलके लिये अन्नादि भोगनेलिये धारण करे और महान् सुंदर देखने योग्य अत्यंत कल्याणके देनेवाले बलपुष्टि करनेवाले दुग्ध घृत स्तन्यपानादिसे माताकी न्याई आप मुझको रस देवें और जिसपापके नाशलिये उत्पन्न कर्तेहैं तिसरसके लिये हमशीघ्र जाते है।हे जलदेवं ! आप मोक्षप्राप्तिकेलिये योग्य हमको उत्पन्न करो अर्थात् तुम्हारी कृपा और आचरणसे शौचादिसे हमको मोक्षहों॥ प्रमाण जैसे पातंजलदर्शन- योगसूबमें (शौचात्स्वांगेजुगुप्सापरैरसंसर्गः) इति ।। तत्सूर्यमुदीक्षसेतिवधूसंवोधयातिवरः ॥ तच्चक्षुरित्य चंपठित्वावधू-सूर्यपश्येत् ।। मंत्रोयथा ।। यजु० अ०३६ मंत्र २४॥ तच्चक्षुर्दैवहितम्पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । प. श्यमशुरदं शुतञ्जीवैमशरद-शुतशृणु यामशरद शुतम्प्रन्ब्रवामशरद-शुतम दीनात्स्यामशुरद शुतम्भूय॑श्वशुरद शुतात् ॥ .
१८२ विवाहपद्धति भा. टी. . इतिपठित्वासूर्यपश्यति ॥ अस्तंगतेसूर्यध्रुवमुदी क्षस्वइतिप्रैपानन्तरंध्रुवंपश्यामीतिब्रूयात् । तत्रवर पठनीयोमंत्रः ॥ ॐध्रुवमसिध्रुवंत्वापश्यामिध्रुवैधि पोष्यामयिमांत्वादाबृहस्पतिर्मयापत्याप्रजावती सञ्जीवशरदःशतमिति पठेत् ॥ भा०टी०-सूर्यको देखो यह वर वधूको कहे तच्चक्षु इस त्रको पढ वधू सूर्यको देखे तच्चक्षु इस मंत्र का दध्यगाथ- र्वण ऋषि अक्षरातीतिपुरउष्णिक्छंदःसूर्य देवता सूर्यक उ पस्थान में विनियोगहे। (मंत्रार्थ) स्वाहा स्वधाप्रभृति संपूर्ण देवता और पितर जिस्के उदय होनेसे तृप्त होते हैं ऐसा देवहित और नेत्रोंसे होनेसे चक्षु जोसूर्यभगवान् प्रमाण यजु अध्याय ३१(चक्षोः सूर्यो अजायत ) अर्थ विराड़ भगवान्के नेत्रसे सूर्य जो भ- .ये॥ आदिमें कामादि और अविद्यादि दोषरहित उद- यको प्राप्तहो ऊर्ध्वको जाता है उस सुर्यभगवान्को हम शत १०० वर्ष देखे और जीवत रहे कोंसे यश श्रवण करे वा- णीसे श्रेष्ठस्तुत्यादि करे और अदीन रहकर शत १०० व- से अधिक वीस वर्ष जीवत रहे प्रमाण पूर्णायु में जैसे-- हजातके (समापष्टिविनामनुजकरिणांपंचचनिशा) इस प्रमाणसे १२० वर्ष और पंचरात्र मनुष्य की पूर्णायुहै रात्रिमें धुवजीको दर्शन करे वरमंत्रको पढे ध्रुवमासे इस मंत्रका परमेष्ठिसपि पंक्तिद प्रजापतिदेवता ध्रुवजोक द. शनमें विनियुक्त। (मंत्रार्थ) हे तुम सदैव रहनेवाले नि-ल है इसलिये तुमका दर्शन कर्ते हैं (माव.) जैसे ध्रुव जी निश्चलहै तद्वत् तुम निश्चल हो और मेरे पुत्रपौवादिके पुष्टि कर्नेवाली हो .
प्रकरणम् ६ १८३ इसलिये प्रजापति ब्रह्माजी मुझको देते भये मेरेसे युक्त प्रजापति तुम शतवर्ष जीवित रहो ॥ यदि वधूकी दृष्टिमें ध्रुव ना आवे तो देखतीहूं यह कहदे ।। अथ वरोवधूदक्षिणांसस्योपरिहस्तंनीत्वातस्याहृद यमालभेत् । मंत्रोयथा।।ममव्रतेतेहृदयंदधातुममचि त्तमनुचित्तंतेऽस्तु ॥ ममवांचमेकमनाजुपस्वप्रजाप तिष्ट्वानियुनक्तुमामितिमंत्रेण । अथवधूमभिमन्त्रय तिवरः ॥ सुमङ्गलीरियंवधरिमा समेतपश्यत । सौ भाग्यमस्यैदत्वायाथास्तविपरेतनेति ॥. अंथस्विष्ट कृद्धोमः। ॐअग्नयेस्विष्टकृतेस्वाहा इदमंग्नयेस्विष्ट कृते. ॥ अत्र वावशिष्टाज्यस्यप्रोक्षणीपात्रेप्रक्षेपः॥ 'अयञ्चहोमोब्रह्मणान्वारब्धकर्तृकाअथसंस्रवप्राशनं ।, ततआचम्यपूर्णपानंदक्षिणांब्रह्मणेदद्यात् ॥ ॐअद्य कृतैतद्विवाहहोमकर्मणिआचार्यकर्मप्रतिष्टार्थइदं हिरण्यमग्निदेवतद्रव्यं यथानामगोत्रायाऽमुकशर्मा णेब्राह्मणायदक्षिणांतुभ्यमहंसंप्रददे ॥ ततोब्रह्मग्रंथि विमोकः ॥ भा टी-वर वधूके दक्षिणअंसपर हस्तको रख हृदयको स्पर्शकरेममनते इसमंत्रका परमेष्ठि ऋषि बिष्टुप्छन्द प्रजाप- तिदेवता हृदयस्पर्शमें विनियोगहै (मंत्रार्थ) मेरे शास्त्र- विहित नियमाचरणमें तुम्हारे हृदयको प्रजापति धारण करे और मेरे चित्तके अनुकूल तुम्हारा चित्त होवे और मेरे वचनको सुखपूर्वक करो । अनंतर वधूको अभिमंत्रण १८४ विवाहपद्धति भा. टी.. करे वर सुमङ्गली इस मंत्रका प्रजापतिऋषि अनुष्टु- पूछंद विवाहाधिष्ठातृदेवता अभिमंत्रणमें विनियोगहै ॥ (मंत्रार्थ) हे विवाहाधिष्ठातृदेवता!गौरी पद्मा शची प्रभृत- यायह सुमंगलयुक्त वधूको मिल इसको दृष्टिसे देखे और इस्को सौभाग्य पुत्रपौत्रादि देकर पुनः आनेके लिये जाओ। (ॐअग्नये स्विष्टकृत) इस मंबसे आहुति देकर सुवालग्न - तको प्रोक्षणीपात्र में गेरना और यह होम ब्रह्माका अन्वा- रब्ध कर कर्ना संस्रव प्राशन कर्ना अनंतर आचमन कर पू- पात्र दक्षिणा ब्रह्माको देवे संकल्पकर ब्रह्मा स्वस्ति कहे ।। अनंतर ब्रह्मग्रंथि खोलदेनी ।। अथ पुष्पाञ्जलयः। अत्रग्रामवचनंचकुर्युः ॥ ॐ सुमित्रियानआपओप धयःसन्तुइतिप्रणीताजलेनपविगृहीत्वाशिरःसंमृज्य दुर्मित्रियास्तस्मैसन्तुयोऽस्मान्द्रष्टियञ्चवयंद्विष्मः॥ इत्यैशान्यांसपवित्रांसजलांप्रणीतांन्युजीकुर्यात् ॥ ततस्तरणक्रमेणवहिरुत्थाप्यआज्यनावधार्यवक्ष्य माणमन्त्रेणहस्तेनैवजुहुयात् ॥ य० अ०८ मं० २१॥ ॐदेवांगातुविदोगातुंचितागातुमित । म नसस्पतडुमदेवयज्ञस्वाहापातेधार स्वाहा ॥ इति वर्हिोमः॥ ततउत्थायवध्वादक्षिणहस्तेनस्पृष्टः सुवस्थघृतपु प्पफले पूर्णाहुतिकुर्यात् ॥ मुनिमितिमंत्रस्यभ
प्रकरणम् ६
१८५
रद्वाजऋवैिश्वानरोदेवता त्रिष्टुप्छंदः पूर्णाहुतिहोमे
विनियोगः॥
यजु अ०७मं०२४॥
ॐमुनंदिवोऽअरंतिम्टैथिव्यावैश्वान
रमृतऽआजातमग्निम् । कविसम्राजम
तिथुिजनानामासन्नापत्रिंजनयन्तदेवाः
स्वाहा ॥
इदमनये ॥ ततउपविश्यवेणभस्मानीयदक्षिणा
नामिकाग्रेण।
य० अ०३ मं०६२॥
त्र्यायुपंजमदग्ने इतिललाटे । कुश्यपस्य
त्र्याय॒पम् इतिग्रीवायाम् । यद्देवेपुत्र्यायु
पं इतिदक्षिणवाहुमूले तन्नोऽअस्तुत्र्या
युपम् इतिहृदये॥
अनेनैवक्रमेणवध्वाअपित्र्यायुपंकुर्यात् । तत्रतन्नो
इत्यत्रतत्ते इति विशेपः॥
भा०टी०-नगरका आचार करे कुलटीति जैसे सुमिधि-
यान इस मंत्रका विश्वामित्रऋपिअनुष्टुप छंद मित्रदेवता मा-
र्जनमें विनियुक्तहै ॥ (मंत्रार्थ ) जल और औषधी हमरिको
।
१३
१८६ विवाहपद्धति भा० टी० परमसुख देवे इस मंत्रसे शिरको जलसिञ्चन करै ॥ और जो हमारेसे द्वेष कर्ता जिसको हम शत्रु मानते हैं इस्को जल औषधी दुःखको दे इस मंत्रसे साथ जलके प्रणीताको साथ जलसे न्युब्ज (पुठो) करे ईशानमें ॥ अनंतर पूर्वोक्त आस्तरण क्रमसे कुशा उठाय वृतसे युक्त कर देवागातु मं- वपढ हाथसे हवन करे ॥ (देवागातु इस मंत्रका अर्थ ) हेदेवता लोक तुम यज्ञके जाननेवाले है इसलिये विष्णुरूप यज्ञको जान कर सुखपूर्वक जाओ। हे अंतर्यामि ब्रह्मस्वरूप यह यज्ञफल तुमारे अर्पण किया जाताहै तुम वायुको अर्प- ण करो ॥ अनंतर उठकर वधूके दक्षिण हाथते युक्त स्रुवपर वृत पुप्प फल रख मूर्धानं इस मंत्रसे पूर्णाहुति देवे । मूर्दानं इस मंत्र का भारद्वाजऋषि अग्निदेवता त्रिष्टुपछंद पूर्णाहुति होममें विनियुक्त है। (मंत्रार्थ)स्वर्गादि लोकसे ऊपर पृ- थिव्यादि पांचभूतोंसे विरिक्त ब्रह्माण्डको प्रकाश कर्नेवाला ईश्वर सत्यरूप जन्मादि षड्भाव रहित निर्विकार प्रकाश- मान् सर्वज्ञ परमानंद तीन कालसे रहित सृष्टिलयसे प्राणि- यौका पारभूत और जो देवताको उत्पन्न कर स्वस्वव्या- पारमें लगाताह तिस परमेश्वरके लिये यह आहुति सुहुत हों। बैठकर स्रवसे भस्मको लै दक्षिण अनामिकासे लला- टीवारदक्षिणबाहु ३ हृदयमेंट्यथाक्रम व्यायुपं इसमंत्रसे लगावै वर और वधूके लगाने में तन्नो इस स्थानमें तत्ते यहपढे। 5 अथ क्षेपकम् ॥ सुमंगलीकरणानंतरंसमाचाराधूंवरस्यवामभागेउप वेशयति ॥ वरस्यवामांगेउपविष्टाकन्यावरंप्रतिप्रति ज्ञावचनानिवते।कन्योवाच ॥तीर्थव्रतोद्यापनयज्ञदा' नमयासह त्वं यदिकिनकुर्याः । वामांगमायामितदा
प्रकरणम् ६
१८७
त्वदीयंजगादवाक्यंप्रथमंकुमारी।।हव्यप्रदानैरमरान्
पितॄश्चकव्यप्रदानैर्यदिपूजयेथाः । वामांगमायामित
दात्वदीयंजगादकन्यावचनंद्वितीयम् ॥कुटुंवरक्षाभ
रणेयदित्वंकुर्याःपशूनांपरिपालनंच । वामांगमाया
मितदात्वदीयंजगादकन्यावचनंतृतीयम् ॥ आयव्य
योधान्यधनादिकानांपृष्ठानिवेशेप्रगृहनिदध्याः । वा
मांगमायामितदात्वदीयंजगादकन्यावचनंचतुर्थम् ॥
देवालयारामतडागकूपवापीविदध्यायदिपूजयेथाः ।
वामांगमायामितदात्वदीयंजगादकन्यावचनंचपंचमम्
॥ देशांतरेवास्वपुरांतरेवायदाविदध्याकयविक्रयौ
त्वम्।वामांगमायामितदात्वदीयंजगादकन्यावचनंच
पष्ठम् ॥ नसेवनीयापरपारकीया त्वयाभवोद्भाविनी
कामिनीति ॥ वामांगमायामितदात्वदीयंजगादक
न्यावचनंचसप्तमम् ॥ वरउवाच॥मदीयचित्तानुगतं
चचित्तंसदामदाज्ञापरिपालनंच । पतिव्रताधर्मपरा
यणात्वं कुर्याःसदासर्वमिमंप्रयत्नम् ॥ इतिमिथ प्रति
ज्ञांकुर्वीयाताम् ॥ अत्रावसरेवध्वाःसीमंतेवर सिंदूर
ददाति ॥
ॐवाममुद्यसवितर्वाममुश्वोदिवेदिवेवाम
मुस्मभ्यसावी ॥ वामस्यहिक्षयस्य
1 यह मंत्र यजद अध्याय ८ अनु: २ भत्र ६ ॥
१८८ विवाहपद्धति भा० टी०.
देवभूरैयाधियामुभाज-स्याम ॥
दक्षिणतउहैकऽउपदधातितदेताः पुण्यालक्ष्मीदक्षि
णतोदध्म इति ॥ तस्माद्यस्यदक्षिणतोलक्ष्मभवति
तंपुण्यलक्ष्मीक इत्याचक्षतऽउत्तरतःस्त्रियाउत्तरतऽ
आयतनाहिस्त्रीतत्तत्कृतमेवपुरस्तात्त्वैवेनाऽउपदध्या
यत्राहैवशिरस्तदेवहनूतजिव्हाथैताः पुण्या लक्ष्मी
मुखतोपत्तेतस्माद्यस्यमुखेलक्ष्मभवतितपुण्यलक्ष्मी
कइत्याचक्षते ॥ इतिवर पठेत् ॥ अथपतिपुत्रान्वि
ताश्चतस्रःस्त्रियःसुभगास्तस्यैववै सौभाग्यदध्युः ॐ
गौर्याःसावित्र्यास्तवसौभायंभवतु'इतिवधूदक्षिणक
णेताभिर्वक्तव्यमिति अत्रैवचर्विवाहादूर्द्धचतुर्थीकर्मतः
पूर्वअरुंधतीदेवीपूजनीया इरणीदेवताकवंशंपात्र (सु .
हागपटारी) दानम् ॥
इति क्षेपकम् ॥
ततआचारात्शंणशङ्खशमीपुप्पाक्षतारोपणसिं?
दूरकरणंवर कुर्यात् ॥ अथवेदितोमण्डपमागत्य
दुर्वाक्षतादिग्रहणम् ॥ ततस्त्रिराबमक्षारालवणाशिनी
अधःशायिनानिवृत्तमेथुनोभवतः प्रामुखौवधूवरी
'स्थितीभवतः ॥ इति श्रीपदक्रमजटायनोद्यखिलवे
दवेदाङ्गन्यायमीमांसादिशास्त्रसंपन्नअपारमहिमावि
राजितश्रीमच्छ्रीगणेशमृनुश्रीरामदत्तकृतावाजसने
प्रकरणम् ६ १८९ यीयजुर्वेदीयकात्यायनसूत्रवतांविवाहपद्धतिःसमा ता॥ शुभंभूयात् । श्री श्री श्रीः॥ भा०टी०-आचारसे शण शंख शमी पुष्प भिगेचावलका और सिंदूरका मस्तकपर कन्याके चढाना ॥ और ग्रामके वचनको वर करे ॥ अनंतर वेदिसे मंडपको आकर दूर्वाक्षत अहण कर्ने बाद तीनराव लवण क्षार भोजन मैथुन नहि क- र्ना और भूमिशयन प्राङ्मुख होकर बैठना होगा ।। प्रमाण जैसे गृह्यसूत्र में (त्रिरात्रमक्षारालवणाशिनौस्यातामधाश- यीता संवत्सर नमिथुनमुऐयातां द्वादशरावर षडानंत्रि- रात्रमन्ततः) इति श्रीगुरुदेवद्विजगोचरणसेवक काव्यनाट- कनीतिसाहित्यज्योतिषचिकित्सादि प्रवीण शिक्षा सूत्र । व्याकरण छंदयुक्त शुक्लयजुर्वेदाध्यायी गौतमगोत्र ( शोरि) ज्ञातिसम्भूत विपाशाशतद्रुरंतर्गतश्रीमहाराज जगजीत सिंहरक्षित राजधानी कर्पूररथलानिवासी श्रीधनैयाराम- शमणः प्रपौत्रः श्रीतुलसीरामर्शमणः पौत्रः श्रीदैवज्ञदुनि- चंद्रात्मजश्रीयुतकरुणासिंधुसर्वबंधुश्रीपण्डितविष्णुदत्तवैदि ककृतविवाहपद्धतिटीका विक्रमादि ऋषिवेदांकभूमित - १९४७ वर्षे मधुमासे रामनवस्यां तिथौ रात्री समाप्तिम गातुं ॥ तच्च शुभं भूयात् श्रीरामचंद्रप्रसादात् विप्राज्ञयाच।। प्रार्थना । यदशुद्धभसम्बद्धभज्ञानाञ्चकृतमया विद्वद्भिक्षम्याक्तरुप बालत्वादयमञ्जलि ॥ सूर्याचन्द्रमसौ यावत् पृथ्वी विश्व- स्य धारिणी । विवाहपद्धतेष्टीक्रातावत्तिष्ठतमेकता ॥ श्री: नमोगणपतये ॥ श्रीः॥ इति पष्टप्रकरणम्) १९० विवाहपद्धति भा० टी० अथ सप्तमप्रकरणम् । स्वस्तिश्रीगणेशाय नमः॥अथचतुर्थीकर्मप्रारभ्य ते॥ तत्रचतुर्थ्यामपररात्रेचतुर्थीकर्म तच्चगृहाभ्यन्त रएवकार्यम् । ततउद्वर्तनादिकृत्वायुगकाप्टउपवि श्यवधूवरौप्रामुखौभवतः॥गणपत्यादिदेवतापून नम्।।ततः कुशकण्डिकाप्रारम्भः। तत्रंक्रमः ॥जामा तृहस्तपरिमितांवेदीकुशैः परिसमूह्यतान्कुशानशा न्यांनिक्षिप्यगोमयोदकेनोपलिप्यस्फ्येनसुवेणवामा गग्रप्रादेशमात्रविरुत्तरोत्तरक्रमेणोल्लिख्य उल्लेखनक मेणअनामिकाङ्गुष्टाभ्यामृदमुद्धृत्य । जलेनाभ्युक्ष्य तत्रतूष्णींकांस्यपात्रेणानिमानीयस्वाभिमुखंनिदध्यात्। टीका-विवाहके अनंतर चतुर्थीकर्म लिखते हैं । विवाह- की रात्रिसे चतुर्थरात्रमें चतुर्थीकर्म गृहके अंतरमें कर्ना चा: हिये । और उद्वर्तन ( वटना ) आदिकर्म कर युगकाष्ठ अर्थात् हलपजालिपर बैठ स्नान कर शुद्ध वस्त्रको शुभवस्त्र आदि धारण कर घरमें प्रवेश हो वधूवर पूर्वमुख हॉकर बैठे और गणपति पोडश १६ मात्रा नवग्रहादि विवाहवत् सर्वपृजा करे ॥ अनंतर कुशकण्डिका की। तिसमें विधि यह है जामातृके हस्त ४ सदृश वेदि बनाय कुशोंसे समूह- न कर वह कुशा ईशानमें प्रक्षेप कर गोमय जलसे लेप देय स्फ्य वाघुवसे प्रादेशमात्र उत्तर क्रमसे उल्लेखनत्रय रेखाकर प्रकरणम् ७ १९१ इसी प्रकार मृत्तिका प्रक्षेपकर जलसे अभ्युक्षण कर कांस्य- पात्रमें तूष्णीं होय अग्निले अपने सन्मुख वेदिमें स्थित करे। ततःपुष्पचन्दनतांबूलवस्त्राण्यादाया अस्यांरात्री कर्तव्यचतुर्थाकर्महोमकमणि कृताऽकृतावेक्षणरूप ब्रह्मकर्मकर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणंब्राह्मणमेभिः पु प्पचंदनतांबूलवासोभिब्रह्मत्वेनत्वामहंवृणे । इतित्र माणंवृणुयात्। वृतोस्मीतिप्रतिवचनम्।यथाविहि तंकर्मकुर्वितिवरेणोक्ते । करवाणीतिब्राह्मणोवदेत् ।। ततोऽग्नेर्दक्षिणतः शुद्धमासनंदत्वातदुपरिप्रागग्रान्कु शानास्तीर्यब्रह्माणमग्निप्रदक्षिणक्रमेणानीय अत्र' त्वमेब्रह्माभवइत्यभिधाय । अभवानीतिब्राह्मणेनो ते। कल्पितासनेउदङ्मुखंब्रह्माणमुपवेशयेत्॥ भा०टी०-अनंतर पुष्प चंदन तांबूल वस्खले । इस चतुर्थ- रात्रिमें कर्ना जो होम उस्की अशुद्धि शुद्धि साक्षीके लिये अमुकगोत्र ब्राह्मण तुमको ब्रह्मा समझकर वर्ण कर्ता है। मैंने वर्णीली। फिर यथा विहित आप कर्म कीजिये यह वर कहै । करताहूं ब्रह्मा कहै । अनंतर दक्षिण अग्निसे शुद्ध आ- सन देकर ऊपर पूर्वाग्र कुशा विछायं अग्निकी प्रदक्षिणा कर इहाँ तुम ब्रह्मा होवे । हुआ यह ब्राह्मण कहे। फिर उ- तराभिमुख उस आसनपर ब्रह्माको स्थित करे ।। ततःपृथूदकपात्रमग्नरुत्तरतःप्रतिष्टाप्यप्रणीतापापु रतःकृत्वावारिणापरिपूर्यकुशैराच्छाद्य ब्रह्मणोमुख सवलोम्याग्ररुत्तरतःकुशोपरिनिदध्यात्। ततःपरि १९२ विवाहपद्धति भा० टी० स्तरणम् । वहिपश्चतुर्थभागमादायआनेयादीशाना न्तंब्रह्मणोग्निपर्यन्तंनैर्ऋत्याद्वायव्यान्तममितःप्रणी तापर्यन्तम्।ततोऽग्नेरुत्तरतःपश्चिमदिशिपवित्रच्छेद नार्थकुशत्रयं पवित्रकरणार्थ सायमनन्तर्गर्भकुशपत्र द्वयंप्रोक्षणीपात्रम् । आज्यस्थाली ॥ सम्मानार्थकु शत्रयमुपयमनाथवेणीरूपकुशत्रयम्।समिधस्तिस्रः । सुवः । आज्यम् । पट्पञ्चाशदुत्तरखरमुष्टिशतद्वयाव च्छिन्नतण्डुलपूर्णपात्रम्।एतानिपवित्रच्छेदनकुशानां पूर्वपूर्वदिशिक्रमेणासादनीयम् ॥ ततःपवित्रच्छेदन कुशै पवित्रेछित्त्वाप्रादेशमितपचित्रकरणम् ॥ . भाल्टी०--अग्निसे उत्तर जलसहित पित्तलका कुंभ स्था-- पनकर प्रणीतापात्रको सन्मुखकर जलसे भर कुशोंसे आ- च्छादित कर ब्रह्माजीको देख अग्निसे उत्तर कुशामें स्थित करे ॥ अनंतर कुशोंका चतुर्थभागले अग्निसे ईशानपर्यंत ब्रह्मासे अग्निपर्यंत निक्रति कोणसे वायुकोणपर्यंत और समिद्धत अग्निसे प्रणीतापर्यंत पूर्वोत्तर क्रमसे आस्तरण करे फिर अग्निसे उत्तर पश्चिम दिशामें पवित्र छेदनार्थ कुश- वय । और पवित्रकरणके लिये गर्भपत्र रहित अग्रसहित दो कुशपत्र प्रोक्षणीपात्र आज्यस्थाली । संमार्जन शुद्धिके. लिये तीन कुशा उपयम (हस्तग्रहण) के लिये वेणीरूप तीन कुशा । तीन समिधा पालाशकी।नुव घृत५६ मुष्टिमि- न तण्डुलयुक्त पूर्णपात्र । यह पवित्र छेदन कुशाके पूर्वर स्थित क्रमसे ॥ अनंतर पवित्र च्छेदन कुशोंसे पवित्रे छेदन कार प्रादेशमात्र पवित्रा बनाये ।। .
प्रकरणम् ७ १९३ ततःसपवित्रकरणप्रणीतोदकंत्रिःप्रोक्षणीपात्रेनिधा यानामिकाङ्गुष्टाभ्यामुत्तराने पवित्रे धृत्वा निरुत्पव नंततःप्रोक्षणीपात्रस्यसव्यहस्तकरणम् । पवित्रेगृही त्वात्रिरुदिङ्गनम्। प्रणीतोदकेनप्रोक्षणीग्रोक्षणं । ततः प्रोक्षणीजलेनयथासादितवस्तुसेचनम् ॥ ततोऽग्नि प्रणीतयोर्मध्येप्रोक्षणीपात्रंनिधाय ॥ आज्यस्थाल्या माज्यनिर्वापः । ततोऽधिश्रयणं । ततोज्वलत्तृणादि नाहविर्वपयित्वाप्रदक्षिणक्रमेणपर्यनिकरणम् । ततः सुवंप्रतप्यसम्मार्जनकुशानामौरन्तरतोमूलबाह्यतःलु वसंमार्जनम् ॥ प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्यपुनःप्रतप्य सुवं दक्षिणतोनिदध्यात् ॥ भा०टी०-अनंतर सपवित्र हस्तसे प्रणीताके जलको ती- नवार प्रोक्षणीपात्र में प्रक्षेप कर अनामिका अगुष्ठसे उत्तरा- अपवित्राधारण कर तीनवार उर्द्धको पवित्रेसे जल फेंकना फिर प्रोक्षणीपात्रको वामहस्तमें स्थितकर पवित्रग्रहण- कर तीनवार उदिंगन करे ॥ और प्रणीताजलसे प्रोक्षणी पात्रको प्रोक्षण कर फिर प्रोक्षणीजलसे सर्व वस्तु सिंचन को । अनंतर अगि प्रणीतामध्यमें प्रोक्षणीपात्र धरदे आ- ज्यस्थालीमें घृतपाय अग्निमें रख ज्वलन्तृणसे हविषेष्टन कर प्रदक्षिणक्रमसे पर्यग्नि करण अर्थात् अग्निमें प्रक्षेप करे तृणको फिर युवको तपाय सम्मान कुशाके अग्रमा- गसे मध्यसे साफ करे और मूलसे ऊपर साफ कर फि अग्रिमें नपा दक्षिण में स्थित करे।
१९४ विवाहपद्धति भा० टी० ततआज्यस्याग्नेरवतारणम् । ततआज्येप्रोक्षणीवदु त्पवनम् । अवेक्ष्यसत्यपद्रव्येतन्निरसनम् । पुनःपूर्वव प्रोक्षण्युत्पवनम् । उपयमनकुशान्वामहस्तेनादाय उत्तिष्ठन्प्रजापतिमनसाध्यात्वातूंप्णींघृताक्ता समि धास्तस्रःक्षिपेत् ॥ततउपविश्यप्रोक्षणीजलेनाग्निप्रद क्षिणंपर्युक्ष्यपवित्रप्रोक्षणीपात्रे धृत्वाब्रह्मणान्वारब्धः पातितदक्षिणजानुर्जुहुयात् । तत्रापारादारभ्याहु तिचतुष्टयेतत्तदाहुत्यनन्तरं युवावस्थिताज्यं प्रोक्ष ण्यांक्षिपेत् । प्रजापतयेस्वाहा इंदप्रजापतयेइ तिमनसा । ॐइन्द्रायस्वाहा। इदमिन्द्राय । इत्या वारौ। ॐअग्नयेस्वाहा। इदमग्नयेसोमायस्वा हा।इदंसोमाय०॥इत्याज्यभागौ।तत पंचाज्याहुतिपु स्थालीपाकाहुतीचप्रत्याहुत्यनन्तरंखुवावस्थितहुत शेपघृतस्यप्रोक्षणीपात्रेप्रक्षेपः॥ भा०टी०-घृतको अग्निसे उतार घृतकोभी प्रोक्षणीवत् उत्प- वनकर यदि कुत्सित द्रव्य घृतभे होय तोनिकाल फिर पूर्व- वत् प्रोक्षणीका उत्पवनकर उपयमन कुशा वामहस्तमें ले उठकर प्रजापतिका मनमें ध्यानकर तूणांहो वृतयु- क्त तीन समिधा अग्निमें प्रक्षेप करे फिर बैठकर प्रोक्षणी जलसे अग्निको प्रदिक्षणक्रमसे पर्युक्षण कर पवित्रा प्रोक्षणी पात्र में रख ब्रह्मासे अन्वारब्ध अर्थात् कुशामिलाय दक्षि- ण गोढानेमाय खुवसे हवन करे और चार आहुतिके अं- नंतर सुवमें अवशिष्टघृतका प्रोक्षणीपात्र में प्रक्षेप करे ।। प्र- जापतिकी आहुति मनसे कहे इंद अग्नि सोम यह क्रम- प्रकरणम् ७ से चार आहुति हवन करे फिर घृतसे जो पंच आहुति और स्थालीपाक आहुति के अनंतर घुवमें अवशिष्ट वृतका । प्रोक्षणीपात्र में प्रक्षेप करना ॥ ततोब्रह्मणान्वारब्धविना । अग्नेप्रायश्चित्तेत्वंदेवानां प्रायश्चित्तिरास । ब्राह्मणस्त्वानाथकामउपधावा मियास्यैपतिनीतनूस्तामस्यैनाशयस्वाहा ॥ इदम नये न मम । ॐ वायोप्रायश्चित्तेत्वंदेवानांप्रायश्चि त्तिरसिब्राह्मणस्त्वानाथकामऽउपधावामियास्येप्रजा नीतनूस्तामस्यैनाशयस्वाहा ॥ २॥ इदंवायवेन मम ॥ अंसूर्यप्रायश्चित्ते त्वंदेवानांप्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वानाथकामऽउपधावामियास्येपशुनीतनू स्तामस्यैनाशयस्वाहा ॥ ३॥ इदंसूर्यायनमम ।। ॐचन्द्रप्रायश्चित्तेत्वदेवानांप्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मण स्त्वानाथकामऽउपधावामियास्ये गृहन्नीतनूस्ताम स्येनाशयस्वाहा ॥ ४॥ इदंचंद्रमसेनमम ।। गन्ध प्रायश्चित्तेत्वंदेवानांप्रायश्चित्तिरसिब्राह्मणस्त्वाना थकामऽउपधावामियास्ययशोन्नीतनूस्तामस्यैनाश यस्वाहा ॥५॥ इदंगन्धर्वाय नमम ।। भा०टी०-(मंत्रार्थ-अग्रेप्रायश्चित्ते) हे अग्निदेव पायाश्च- तस्वरूप देवताओंके दोपनाशक ! तुमकोही स्तुतिपूर्वक में ब्राह्मण प्राप्त होता हूं कि, इस स्त्रीका पति विरोधिक अ- र्थात् पतिनाशक अंगलक्षण शरीरको नाश करो अरये यह चतुयर्थ में पष्ठी विभक्ति है।
१ १९६ विवाहपद्धति भा० टी० २ (मंत्रार्थ-वायोप्रायश्चित्ते )हे वायुदेव!इस स्त्रीका जो प्रजानी,संतानविरोधि अर्थात् पुत्रनाशक शरीर ( वाअंग. विशेष) उस्का नाशकरो। ३ (मंत्रार्थ-सूर्यप्रायश्चित्ते ) हे सूर्यदेव ! इस स्त्रीका जो पशुविरोधि अर्थात् पशुनाशक शरीर वह नाश करो ॥ ४ (मंत्रार्थ-चंद्रप्रायश्चित्ते ) हे चंद्रमादेव! इस स्त्रीका जो गृहविरोधि अर्थात् गृहनाशक शरीरहै वह नाश करो। ५(मंत्रार्थ-गन्धर्वप्रायश्चित्ते ) हे यशके प्रकाशक गन्धर्व- देव!इस स्त्रीका जो यश विरोधि अर्थात् यशनाशक शरीर उस्का नाश करो॥ चरुमभिवार्यततःस्थालीपाकेनजुहुयात् ॥ ॐप्रजा पतयेस्वाहा। इदंप्रजापतये ॥ इतिमनसा । अ ग्न्याहुतिनवकेहुतशेपघृतस्यप्रोक्षणीपात्रेप्रक्षेपः ॥ अयंचहोमोब्रह्मणान्वारब्धकर्तृकः ॥ ततआज्यस्था लीपाकाभ्यांस्विष्टकृद्धोमः अग्नयेस्विटकृते स्वा हा । इदममयस्विष्टकृते. ॥ ततआज्येन । ॐभूः स्वाहा। इदमग्नये॥ॐ भुवःस्वाहा । इदंवायवे ।ओं- स्वःस्वाहा । इदंसूर्यायः॥एतामहाव्याहृतयः॥ भा टी०-चरुको तप्त कर स्थालीपाकसे हवन करे ॐ प्रजापतये स्वाहा यह मंत्र मनसे कहे । अग्नये स्वाहा इस आहुतिसे नव आहुतिपर्यन्त हुतशेप घृतका प्रोक्षणीपा- . अमें प्रक्षेप करे ।। यह होम ब्रह्माके अन्वारब्धकर्तृक होमहै। शुक्लयजुर्वेद अध्याय २५ मंत्र ३॥ ॐवन्नोऽअग्नेयरुणस्यविद्वान्देवस्युहेडोऽ
१९७
प्रकरणम् ७
अवयासिसीष्ठाः॥यजिष्ठोवन्हितमुत्शो
शुंचानोटिवश्वाद्वेपार्थसिप्रमुग्ध्युस्म्म
त्स्वाहा । इदमग्नीवरुणाभ्याम् ॥१॥
शुक यजु०अध्याय २१ मंत्र॥
ॐसत्वन्नोऽअग्नेयमोभवोतीनोदिष्ठोऽअ
स्याऽउपसोव्युष्टौ ॥अवयक्ष्वनीवरुण
राणाबीहिडीकमुहान एधिस्वा
हा ॥ इदमग्नये ॥२॥
शुक्ल यजु०अध्याय मंत्र॥
ॐअयाश्चाग्नेस्यनभिशस्तिपाश्चसत्यमि
त्वमयाऽअसि।अयानोयज्ञंव्वहास्ययानो
धेहिभेपजस्वाहा ॥ इदमग्नये ॥३॥
शुक यजुर्वेद अध्याय मंत्र ॥.
ॐयेतशतम्बरुणयेसहायज्ञियाःपाशा
विततामहान्तः । तेभिन्नॊऽअद्यसवितो
तविष्णुर्विश्वेमुञ्चन्तुमस्तःस्वःिस्वा
हा।। इदंवरुणायसवित्रेविष्णवविश्वभ्यो
देवेभ्योमरुद्भ्यःस्वर्केभ्यः ॥ ४ ॥
१९८८ विवाहपद्धति भा० टी० शुक्लयजुर्वेद अध्याय २१ मंत्र १२॥ ॐउर्दुत्तमम्बरुणुपाशमुहम्मदवाधमँवि मध्यम श्रथाय । अथाव्यमादित्यत्रु तेतवानांगसोऽअदितयेस्यामस्वाहा ॥५॥ इदंव्वरुणायएताः॥५ सर्वाःप्रायश्चित्तसं ज्ञकाः॥ भा०टी०-त्वन्नी और सत्वन्नो इस मंत्रोंका वामदेवऋषि बिष्टुप्छन्द अग्नि और वरुणदेवता सर्व प्रायश्चित्तमें विनि- युक्तहै । और (येते शतं ) इस मंत्र का शुनःशेपऋषि बिष्टुपु छंद वरुणदेवता वरुणसंबाध शापके मोचनमें विनियुक्त है ॥(मंत्रार्थत्वन्नो अग्नेइति) हे अग्निदेव!तुम इस कर्ममें वैगु- ण होनेसे वरुणदेवके क्रोधको दूर करो कैसे तुम सर्वकर्ममें साक्षी चतुर हो । और सबसे उत्तम हो और सर्वदेवता- ओंको यज्ञका भाग देनेवाले हो प्रकाशमान हो इसलिये 'मंदबुद्धिवाले हमको जानकर हमारसे कीहुई अवज्ञा (अ- नादर ) को क्षमाकर सर्व प्रकारसे कल्याण देओ॥१॥ (मंत्रार्थ सत्वनइति) हेअग्ने! तुम सर्वकी पालना कर्नेवाले हैं इसलिये आजदिनके प्रातःकालसे लेकर मुझकी रक्षा करो। नहीं केवल रक्षाही क्तिन्तु हमारे कर बुलाये, तुम सु- खपूर्वक आकर सुख देनेवाला चरुयज्ञके स्वामी वरुणदेव- ताको देकर पूजन करो। जिसे वहणदेवभीप्रसन्न हों हमा- रेको सुख दें।॥ २॥ (मंत्रार्थ-अयाश्वानइति ) हे अग्ने!तुम सीतर्यामी और प्रायश्चित्तद्वारा सर्वप्राणियोंको शुद्धकर्ने- वाले। और शुभके दाता हमारे किये हुए यज्ञको कृपालु .
. प्रकरणम् ७ १९९ होनेसे इंद्रादि देवताओंको देनेवाले इसलिये हमकोभी भेषज अर्थात् सुखके देनेवाला विविध दुःखविनाशक अपू- र्व सुख देवो ।। (मंत्रार्थ-येतेशतमिति) हे वरुणदेवायज्ञके विघ्नसे उत्प- .त्र हुए बडे २ भारी महान् कठिन जो तुमारे शत-संख्यक और सहस्रसंख्यक पाश।वह पाश पापरूप हमारे सविता सूर्य विष्णुरूप इंद्र और सर्वदेवता और वायुदेव ४९ सुंदर हृदयवाले आदित्य १२ हमारे पापोंको नष्ट करें ॥४॥ (मंत्रार्थ-उदुत्तममिति ) उत्तम मध्यम अधम यह तीन वरुणजीक पार्शहें ॥ हे वरुणदेव!जो तुम्हारा उत्तम पाशहै उससे हमारी रक्षा करो। और जो मध्यम पाशहै उससेभी हमारी रक्षा करोपाशको शिथिल करो हे वरुणदेव! हम ब्रह्मचर्यसे तुमारेसे निरपराध होकर दीनतासे रहित होते हैं।(दीनतायां दितिःप्रोक्ता दितिस्यादैत्यमातरि) इस वचनसे दितिनाम दीनताकाभी है ॥५॥ यह आहुति सर्वप्रायश्चित्तम है। ॐप्रजापतयेस्वाहा।इदंप्रजापतये । इतिमनसा ॥ इदंप्राजापत्यं ततःसंस्रवप्राशनम् । आचम्य । ॐअ स्यांरात्रौकृततच्चतुर्थीहोमकर्मणिकृताऽकृतावेक्षण रूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदंपूर्णपा–प्रजापतिदैवतम मुकगोवायामुकर्मणेब्राह्मणायदक्षिणांतुभ्यमहंसं प्रददे ॥ इतिदाक्षिणांदयात् ॥ स्वस्तीतिप्रतिवचन म् ॥ ततोब्रह्मग्रंथिविमोकः) ततःसुमित्रियान आप .ऽओपधयःसन्तु । इतिपवित्राभ्यांशिरःसंमृज्य । (आध्यात्मिक र आधिभौतिक ३ आधिदैविकभेदसे पारा तीन प्रकारका है इनकेभेदभरघुपभेद मत्थरारामगीताविषमपदीटीकासपिस्वरा हिरो , विवाहपद्धति भा० टी० ॐ दुम्मित्रियास्तस्म्मैसन्तुयोऽस्मान्द्रष्टियञ्चवयंद्वि ष्मः। इत्यैशान्यांदिशिप्रणीतांन्युब्जीकुर्यात् ।ततः स्तरणक्रमेणवर्हिरुत्थाप्यघृताक्तहस्तेनैवजुहुयात् ॥ शुक्लयजुर्वेद अध्याय ८ मंत्र २१॥ . ॐदेवांगातुविदोगातुंब्वित्वागातुमित । मनसस्पतऽहमन्देवयज्ञठवाहाब्वाते धाःस्वाहा॥ भा०टी०-प्रजापतये यह मनसे कह प्रजापति संबंधि ह- वनकर फिर संस्रव प्राशन करे ॥ इस रात्रिमें कृत चतुर्थी कर्मकी सांगतासिद्धिके लिये अमुकगोत्र ब्राह्मणको दक्षि- णा देताहै ब्राह्मण स्वस्ति कहै । फिर ब्रह्माकी' ग्रंथि खोल देते (सुमिश्रियान आप ओषधयःसन्तु) इस मंत्रसे शिरको जलसे मार्जन करे ( दुर्मित्रिया) इस मंत्रसे प्रणीताको ई- शानकोणमें न्युब्जकरे फिर आस्तरणक्रमसेही कुशाले घृ- त लगाय देवागातु इस मंत्रसेही हवन करे ( मंत्रार्थदेवा गात्विति)हे देवतालोक'तुम यज्ञके जाननेवाले हैं इसलिये विष्णुरूपयज्ञको जानकर सुखपूर्वक जाओ हे अन्तर्यामी ब्रह्मस्वरूप! यह यज्ञका फल तुमारे अर्पण किया जाताहै तुम वायुको अर्पण करो। आम्रपल्लवेनजलमादायभूविरोवधूमाभिपिञ्चति । ॐयातेपतिनीप्रजानीपशुघ्नीगृहन्नीयशोमीनिंदितात नूजारनीततएनांकरोमिसाजीयत्वंमयासहश्रीअमुक देव्या।इतिमंत्रेणाततोपचूंस्थालीपाकंप्राशयतिवरः।
प्रकरणम् ७ ग्राणैस्तेप्राणान्संदधामिअस्थिभिरस्थीनिसंदधा मि ॥ ॐमा सेस्तेमाश्सानिसंदधामित्वचातत्व चंसंदधामि ॥ इतिमंत्रचतुष्टयेनप्रतिमंत्रान्तेअन्नं प्राशयेत् ॥ ततोवधूहृदयस्पृष्ट्वा वरःपठेत्।। यत्ते सुशीमेहृदयदिविचन्द्रमसिश्रियम्। वेदाहंतन्मांतद्धि यात्पश्येमशरदःशतंजीवेमशरदःशतश्शृणुयामशर दाशतमिति॥ भाण्टी-आम्रपत्रसे जल ले वर वधको यातेपतिनी इस मंचसे मार्जनकरे ।।(मंत्रार्थ-याते) हेस्त्री जो तुमारा प- तिनाशक पुननाशक पशुनाशक गृहनाशक यशनाशकनि- 'दित शरीरहे सो जीर्ण(नाश)को प्राप्तहोय मुझकाभीजीस्त्री पुत्र पशु गृह यशनाशक शरीरहै उस्के साथ और मैं तुम- को जारके नाशकर्नेवाली अर्थात् पतिव्रता काहः॥ अ- नंतर वधूको वर प्राणेस्ते इन चारमंत्रोंसे स्थालीपाक प्राश- न करवाये ॥ (मंत्रार्थ-माणेस्ते)हे वधू तुमारे प्राणों के सा- थ मैं अपने प्राण और अस्थियोंसे आपनि अस्थि मांससे मांस त्वचासे त्वचास्थित कर्ताह अर्थात तेरे और मेरे में कुर- छभेदयुद्धि नहीं अनन्तर वरवधुके हृदयको स्पर्शकर यत्ते मुशीमें यह मंत्र पढे । (मंत्रार्थ-यत्ते सुशीमे)वधू जो तु- हातारे हृदयमें चंद्रमसि शोभा लक्ष्मीमें जानताई घ मुदर- को प्राप्तहो उसको मैं शतवर्ष पर्यंत देखा और शतधर्प जीय- तरहा और शतवर्षही श्रवणकरा ।। भावार्थ यादहे कि तुमा- रे साथ रोगरहित शतवर्षपर्यत सुखपूर्वक प्राणोंको धारणकरा॥ अथकङ्गणमोक्षणादीनियुतग्रंथिविमोकादीनिआचा १४
।
२०२ विवाहपद्धति भा० टी०
रात्प्राप्तानिकर्तव्यानि ॥ मंत्रः-कंकणंमोचयाम्यद्य
रक्षांसिनकदाचन।।मयिरक्षांस्थिरांदत्वास्वस्थानंगच्छ
कंकण ॥ ततउत्थायवधूदक्षिणहस्तस्पृष्ट वेणघृतफ
लपुष्पपूर्णेनपूर्णाहुतिजुहुयात् ॥
यजु०अध्याय ७ मंत्र२४॥
ॐमुद्धीनंदिवोऽअतिथिव्यावैश्वा
नुरमृतऽआजातमुग्निम् । कुविधंसम्म्रा
जुमतिथुिञ्जनानामासन्नापात्रञ्जनयन्त
देवां स्वाहा । इदमग्नये ॥
ततःसुवेणभस्मानीयदक्षिणानामिकयाव्यायुपंकुंर्यात् ।
यजु० अध्याय ३ मंत्र६२॥
न्यायुपंजुमदग्नेः । इति ललाटे॥ॐ
कश्यपस्यत्र्यायुपम् । इति ग्रीवायां॥ॐ
यदुवे[न्यायपम् । इतिदक्षिणवाहुमूले।
ॐतन्नौअस्तुत्र्यायुपम् । इतिहृदये ।।
एवंवध्वाअपिण्यायुपकुर्यात् । तत्रतन्नोइत्यस्यस्था
नेतत्तइतिविशेपः । ततआचार्यायदक्षिणांदद्यात् ॥
भृयसीदद्यात् ॥ इति श्रीचतुर्थीकर्म समाप्तम् ॥
प्रकरणम् ७ २०३ भा०टी०-कंकणमोक्षण और युतग्रंथि (खट्ठचितावा) मोक्षण आचारसे ( मंत्रार्थ ) में आज कंकणको त्यागता है राक्षस दूर होये हेकंकण मेरेमें दृढ रक्षादे अपने स्थानको यथासुख जाओ। फिर उठकर वधूका दक्षिण हाथ मुक्के साथ लगाय घृतफलपुष्पयुक्त पूर्णाहुति वर हवन करें।मूर्दा- नं इस मंत्रसे (मंत्रार्थ मूनिमिति) स्वर्गादि सप्तलोकसे ऊपर पृथिव्यादि पांचभूतोंसे विरिक्त(रहित)ब्रह्माण्डको प्र- काश कर्नेवाला ईश्वर सत्यरूप जन्म आदि पड्भाव रहित निर्विकार प्रकाशमान् सर्वज्ञ परमानंद तीन कालसे रहित - सृष्टि (उत्पत्ति) लय( नाश) से प्राणियोंका पात्रभूत आ. धार और जो देवताओंको उत्पन्नकर स्वरव्यापारमें लगाता है तिस परमेश्वरके लिये यह आहुति सुहुतहो ॥ बैठकर शुवसे भस्मले दक्षिण अनामिकासे ललाट १ ग्रीवा २ दक्षि- ण बाहुमुल ३ हृदयमें ४ यथाक्रम न्यायुषं इस मंत्रसे ल- गावे इसीप्रकार वधूकेभी लगावे तन्नोके स्थान तत्ते यह वधूको कहना ॥ इतना विशेषहै ।। अनंतर आचार्यको द- क्षिणां भूयसी देवे॥ इति श्रीकपूरस्थलनिवासि गौतमगोत्र (शोरि) अन्व- यालंकृत देवज्ञ दुनिचंद्रात्मज पण्डित विष्णुदत्त वैदिककृत चतुर्थी कर्म टीका आद्रिवेदांकभूमिते १९४७ मधुमासे कृ- प्णपश्चम्यां गुरुदिने समाप्तिमगात् । साचशुभावहास्यात्कु- लदेव्याः प्रसादात् देवगुरुद्विजाशीभिः॥ ॥श्रीः॥ शुभम् ।। समाप्तञ्चेदं सप्तमं प्रकरणम् ॥
विवाहपद्धति भा० टी० (विशेपद्रष्टव्य) अथयाज्ञवल्क्यस्मृतौ विवाहप्रकरणम्। गुरवेतु वरं दत्वा स्नायीत तदनुज्ञया ॥ वेदव्रता निवापार नीत्वायुभयमेववा ॥ १ ॥ अविप्लु तब्रह्मचयोलक्षण्यांस्त्रियंमुहत् । अनन्यपूर्विका कान्तामसपिण्डां यवीयसीम् ॥२॥ अरोगिणी भ्रातृमतीमसमानार्पगोत्रजाम् । पञ्चमात्सप्तमादूर्द्ध मातृतःपितृतस्तथा॥३॥दशपूरुपविख्याताच्छ्रो त्रियाणांमहाकुलात् ॥ स्फीतादपिनसंचारिरोगदोप समन्वितात्॥४॥एतैरेवगुणैर्युक्त सवर्णःश्रोत्रियोवरः।। यत्नात्परीक्षितः पुंस्त्वेयुवाधीमानजनप्रियः॥५॥ भा०टी०-ब्रह्मचारी गुरुजीको गुरुदक्षिणा देकर वेदोंको वेदको वा व्रतको अथवा वेदव्रत दोनोंको समाप्तकर ब्रह्मः चर्यको ना नष्टकर उक्तलक्षणयुक्त स्त्रीसे विवाह करें । जो प्रथम विवाही नाही सुंदरहो सपिंडा और आयुसे अधिक नाहो अर्थात् छोटीहो मातुं (माताकी संतान ) कुलसे पं- चम पितृ (पिताकी संतान) कुलसे सप्तम अर्थात भगिनि भागनिभ्राता भ्रातृपुत्री पितृव्य चाचा ताया । एवं पिता- दि७ से ऊपर जिस्को इस समय अंग बोला जाताहे वह नामिले यह प्राचीन संप्रदायह पिताकुल माताकुल पिताके नानाके माताके नानाके ऐसीही .कन्या मातृकुंल कन्या पितृकुल कन्याक . पिताके नानाके यह ७ भये ॥ यह मतमिले। पांच मातासे पांच पितासे १० पुरुप (पेस्त) प्रकरणम् ७ २०५ से कुल प्रसिद्धहो श्रोत्रियोंकी बढी कुलसे॥परंतु रोग और दोपयुक्त कुल नाहोय ऐसी कुलकी कन्या इन पूर्वोक्त गुणों- से युक्त समानजाति वर युवा जनको प्यारा बोलनेवाला बुद्धिमान् यत्नसे पुंस्त्वमें परीक्षित(पुल्लिंग)होना चाहिये। यदुच्यतेद्विजातीनांशूद्रादारोपसंग्रहः। नैतन्मममतं यस्मात्तत्रायजायतेस्वयम् ॥ ६॥ तिस्रोवर्णानुपूयै ण द्वेतथैकायथाक्रमम् । ब्राह्मणक्षत्रियविशां भार्या स्वा शूद्रजन्मनः ॥७॥ब्राह्मो विवाह आहूय दीयते शक्त्यलंकृतातजःपुनात्युभयतः पुरुपानेकविंशति म्।।८॥यज्ञस्थऋत्विजेदैव आदायार्पस्तुगोद्वयम् । चतुर्दशप्रथमजःपुनात्युत्तरजश्वपट् ॥९॥ इत्युक्त्वा चरतां धर्म सह या दीयतेऽथिने।सकायः पावयेत्तजः पट्पट्वंश्यान्सहात्मना॥१०॥आसुरोद्रविणादानाद्गां धर्वःसमयान्मिथः॥ राक्षसोयुद्धहरणात्पैशाचः कन्य काछलात् ॥११॥ भा०टी०-जो द्विजातियोंको शुद्रकी कन्यासे विवाह अ- न्य ऋपि कहते हैं यह मेरेको ईप्सीत नहि कारण वह फिर उस शूद्रामें पुत्ररूप होकर पैदा होता है प्र० आत्मा वै पुत्र नामासि श्रुति है।ब्राह्मणको ब्राह्मणी १ क्षत्रिया२ वैश्या ३ शुद्रा और क्षत्रीको क्षत्रिया १ वैश्या २ शूद्रा ३ वैश्यको वश्या १ शद्रा २ भार्या लिखी है शूद्रको शुद्राही ? भार्या लिखी है ॥ ब्राह्म विवाह वह होता है जो यथाशक्ति अलं- कृत कन्या श्रेष्ठ वरको बुलाकर संकल्प दीजाती है उससे उत्पन्न संतान २१ कुलोंको १० पिताकी १० माताकी और २०६ विवाहपद्धति भा० टी० १आपको पवित्र की है॥८॥जो यज्ञमें ऋत्विको दीजाय वह देवविवाह होता है । यह १४ कुलको पवित्र कर्ता है। जो दो गऊ लेकर कन्या देवे वह आर्ष विवाह ६ कुलको पवित्र कर्ता है ।जो अर्थीको धर्माचरण करो यह कहकर दीजाय वह प्राजापत्य विवाह होता है वह १२ कुल पवि- त्र कर्ता है ॥ १०॥ जो द्रव्य लेकर कन्या देवे वह आसुरी विवाह होता है जो वर कन्या आपसमें विवाह चाहे वह गांधर्वी विवाह होता है।जो जबरदस्ती युद्ध में जीत कन्या लीहो वह राक्षस विवाह और छलसे कन्या ले तो पैशाच विवाह होता है ॥ ११॥ पाणीग्राह्यःसवर्णासुगृह्णीयात्क्षत्रियाशरम् ॥वैश्याप्रतो दमादद्याद्वेदनेत्वग्रजन्मनः ॥ १२॥ पितापितामहो भ्रातात्मकुल्याजननीतथा॥कन्याप्रदः पूर्वनाशेप्रकृ तिस्थापरःपरः ॥ १३॥ अप्रयच्छन्समाप्नोतिभ्रूण हत्यामृतावृतौ । गम्यंत्वभावेदातॄणां कन्याकुर्या स्वयंवरम् ॥१४॥ सकृत्प्रदीयतेकन्याहरस्तांचोरद ण्डभाकादत्तामपिहरेत्पूर्वाञ्छ्यांश्चेदरआवजेत्॥१९॥ अनाख्यायददद्दोपंदण्डउत्तमसाहसम् । अदुष्टांतुत्य जन्दण्डयोदूपयंस्तुमृपाशतम् ॥१६॥ भा०टी०-सवर्णों में अर्थात् ब्राह्मण ब्राह्मणीसे इत्यादि विवाहमें हाथ ग्रहण करना लिखा है । यदि ब्राह्मण क्षत्रि- याको विवाहे तो क्षत्रिया याण हाथमें पकडे वैश्या प्रतो- दको-शुद्रा वस्त्रको हाथसे पकडे ॥ कन्याके अधिकारी क्रमपूर्वक यह है कि पिता पितामह भ्राता कन्याका अप- प्रकरणम् ७ ने कुलका माता यह क्रमपूर्वक एकके अभाव वा उन्मा- दादि रोगयुक्त होनेसे पिछला २ होताहै। यदि विवाह- योग्य कन्याको ना विवाहे तो मास२ में गर्भहत्याके दोष- को प्राप्त होता है यदि कन्यादाता कोई ना हो वा (क- न्याही योग्य पतिको चाहती है) तो स्वयंवर करें। एकदी' वार कन्याका दान होता है यदि फिर देकर कन्याका हर- ण करे तो चोर दंडको प्राप्त होता है। यदि पुनः पूर्व वर- से अधिक गुणयुक्त श्रेष्ठवर आजाय तो अवश्य विवाहदे प- रंतु सप्तपदीसे पूर्वही दान होता है पीछे नहि ।। जो कन्या- • का दोप अंधत्वादिना कहकर विवाद देता हे यह उत्तम साहसंक दंडको प्राप्त होता है जो दोपरहित स्त्रीको त्यागे घा झठी तोहमत लाये वहभी दंडयोग्य होता है। अक्षताच क्षताचे पुनर्भूः संस्कृतापुनः । स्वेरिणी या पतिहित्वा सवर्ण कामतः श्रयेत् ॥ अपुत्रां गुर्व नुज्ञातो देवरःपुत्रकाम्यया । सपिण्डोवासगोत्रोवा घृताभ्यक्तऋतावियात्॥ आगर्भसंभवाद्गच्छेत्पतित स्त्वन्यथा भवेत् ।। अनेन विधिनाजातः क्षेत्रजोस्य सुतोभवेत्। हताधिकारांमलिनांपिण्डमानोपजीवि नीम्।परिभूतामधःशय्यांवासयेयवचारिणीम्॥सोमः शोचंददावासांगंधर्वश्चशुभांगिरम् ॥पावकःसर्वमेध्य त्वमेध्यायोपितोयतः॥ भान्टी-पतिक जीते या मर पर जो नी फिर थियादी जाय पद पुन हाती ॥जी म्बी अपने पतिको छोटकर सवर्णी अन्य पुरुपको अपनी इच्छास संपन करे. यादरपरिणी .
२०८ विवाहपद्धति भा० टी० स्त्री कहलातीहै । अपुत्रा स्त्रीको अपने बड़ोंकी आज्ञासे पु- त्रकी इच्छा रख सपिंडी वा सगोत्री घृत शरीरपर मर्दनकर ऋतुकालमें संभोग करें जबतक गर्भ ना हो तबतक गमन करे अन्यथा पतित होजाताहै । इसविधिसे उत्पन्न पुत्र क्षेत्रज कहलाताहै परंतु यह वाक्य वहांहै यहां बडाभाई- की सगाई हो वह मरजावे तो यदि उसकी सगाईको वि- वाह ले तो यह विधान करे इस्में मतुजीका वाक्यहै ।। (यस्याम्रियेत कन्यापावाचासत्येकृतेपतिः। तामनेनविधा- नेननिजोविदेतदेवरः।) अर्थ पूर्वही लिखाहै। जो स्त्री व्य- भिचारिणी होजाय उस्के पाससे भूषणादि छीन मलिन वस्त्र पहिराय केवल अन्नमात्र दे और पृथिवीपर शयन करवावे उस्से भोग करना प्रायश्चित्त निवृत्तिपर्यंत छोडदें। और तिरस्कार करतारहै परंतु घरसे बाहिर मत निकाले यह स्त्री अल्पही प्रायश्चित्तसे शुद्ध होतीहै कारण सोम इ- न्को पवित्रता देता भया गंधर्व शुभ वाणी अग्नि शुद्धि सो स्त्री शुद्धहै ॥ व्यभिचाराहतौशुद्धिगर्भत्यागोविधीयते॥गर्भभर्तृव धादोचतथामहतिपातके ॥ सुरापीव्याधिता धूर्ता वंध्यार्थघ्न्यप्रियंवदा । स्त्रीप्रसूश्चाधिवत्तव्यापुरुपद्धे पिणी तथा ॥ अधिविन्नातुभर्तव्यामहदेनोन्यथा भ वेत् । यात्रानुकूलंदंपत्योस्त्रिवर्गस्तत्रवर्पते ॥ मृते जीवति वापत्यो या नान्यमुपगच्छति।सेहकीर्तिम वानाति मोदतेचोमयासह ॥ आज्ञासंपादिनी दक्षांवीरसुं प्रियवादिनीम् । त्यजन्दाप्यस्तृतीयां शमद्रव्यो भरणं स्त्रियाः॥ .
प्रकरणम् ७ २०९ • भाण्टी-जो स्त्री मनमें पराये मतुप्यके साथ संभोग 'कर्ने की इच्छा की इस प्रायश्चित्तसे मासपीछे ऋतु आनेपर शुद्ध हो जातीहै यदि परपुरुपसे स्त्रीको गर्भ हो- जाय वा अपने पतिके गर्भको वा पतिको नाश कर्ना चाहे सत्य २ और ब्रह्महत्यादि दोष दूपित होय तो उस स्त्रीका त्याग लिखाहै ॥ यदि स्त्री मद्यपीवे वा व्याधियुक्तहो वा दुष्टा धूर्ता हो वा वंध्या धनके नाश कर्नेवाली कटुवचन संदेव कहे वा कन्याही उत्पन्न करे अथवा पतिसे मनमें विरोध राखे यह सत्य २ मालूम कर इ- न्के जीनेपर अन्य स्त्रीसे विवाह करावें । और जो प्रथम स्त्रीहै उस्कोभी भूषण वस्त्र अन्नसे पालन करे अन्यथा बडा पापहै । यहां स्त्रीपुरुषकी अनुकूलताहै वहां धर्म अर्थ काम बढताहै । जो मनुष्य कामवशहो आज्ञा माननेवा- ली चतुर पुत्रोंको उत्पन्न करनेवाली प्रिय वाक्य कहनेवा- लीको छोडताहे वह अपनी धनसे तीसरा हिस्सा उस स्त्री- को दे यदि धन ना होतो उस्को अन्न वस्त्र भूषण देरक्षाकरें। जो स्त्री पतिके मृतहोनेपर वा जीवतपर अन्य मनुष्यक साथ भोग नहिं की वह इस संसारमें कीर्तिको प्राप्तहो अंतकालमें पार्वतीके साथ आनंद कर्तीहै ।। स्त्रीभिर्भर्तृवचः कार्यमेपधर्म पर स्त्रियाः॥-आशुद्धेः संप्रदतीक्ष्योहिमहापातकदूपितःगालोकानंत्यंदिवःप्रा प्तिःपुत्रपौत्रप्रपौत्रकै यस्मात्तस्मास्त्रिय सेव्याःकर्त व्याश्चसुरक्षिताः।पोडशर्तुनिशा स्त्रीणांतस्मिन्युग्मा .सुसंविशेत् ॥. ब्रह्मचार्येवपर्वण्यायाश्चतस्रश्चवर्जये त् ॥ एवंगच्छस्त्रियंक्षामां मघांमूलंचवर्जयेत् । सुस्थइंदौसकृत्पुत्रंलक्षण्यंजनयेत्पुमान ॥
२१०
विवाहपद्धति भा० टी०
भाल्टी-स्त्रीयोंने भर्ताका वचन परिपालन कर्ना यही
स्त्रीका परम धर्महे ॥ यदि भर्ता महापातकसे युक्तहै तो
शुद्धिपर्यंत प्रतीक्षा करे ॥ अनेक चिर वंशकी स्थिति
और पुत्रपौत्र प्रपौत्रादिसे स्वर्गमाप्ति स्त्री मूल होनेसे
स्त्रीका सेवन अवश्यहै । स्त्रीकी१६रात्रि ऋतुकालसे ले गर्भ
होने की है उन्में ८ । १४ । १५ १३० । ११ तिथि मघा मूल
छोड श्रेष्ठचंद्रमा । युग्म दिन ४ । ६ । ८। १० । १२ में
भोगकर लक्षणयुक्त श्रेष्ठ पुत्रको उत्पन्न करें।
यथाकामी भवेद्वापि स्त्रीणांवरमनुस्मरन्।स्वदारनि
रतश्चैव स्त्रियोरक्ष्या यतः स्मृताः ॥ भर्तृभ्रातृपि
तृज्ञातिश्वश्रूश्वशुरदेवरैः। वंधुभिश्चस्त्रियाःपूज्या भू-
पणाच्छादनाशनैः॥ संयतोपस्करादक्षादृष्टाव्ययप
राङ्मुखी। कुर्याच्छ्शुरयोःपादवंदनं भर्तृतत्परा।।
क्रीडांशरीरसंस्कार समाजोत्सवदर्शनम् । हास्यं
परगृहेयानं त्यजेत्प्रोपितभर्तृका ॥ रक्षेत्कन्यांपिता
विन्नांपतिःपुत्रास्तुवाक|अभावेज्ञातयस्तेपांनस्वा
तंत्र्यं वचित्स्त्रियाः॥
भा०टी०-इंद्रने दिया जो वर की तुम्हारी काम इच्छा
नष्ट करनेवाला पातकी होताहै । इस्को स्मरण करता
हुआ यया कामीमी हो सकताहै। कारण अपनी स्वीही
संभोग करे और स्त्रीकी रक्षा करे ॥ भर्ता भ्राता पिता बां-
धव सास सोहरा देवर इनकर घीलोग भूषण वस्त्रादिसे
पूजनीयह।। और स्त्री घरकी उपकरण सामग्री अच्छी तरह
राखे चतुर प्रसन्न धनका खर्च मत करे और सास श्वसुरके
चरणपर वंदना करे परंतु प्रीति भाम राखे जिस स्त्रीका
.
प्रकरणम् ७ २११ पति परदेश गयाहो वह खेलना शृंगार समाज सभा मेला मत देखे हास्य मतकर पराये घरों में मत गमन करे । कन्याकी पिता स्त्रीकी पति वृद्धाकी पुत्र रक्षा करे अभा- वमें बांधव रक्षा करे स्त्रीको स्वतंत्र होना नहि लिखा ॥ पितृमातृसुतभ्रातृश्वश्रूश्वशुरमातुलैाहीनानस्यादि नाभ गर्हणीयान्यथाभवेत् ॥ पतिप्रियहिते युक्ता स्वाचारा विजितेद्रिया । सेह कीर्तिमवाप्नोतिप्रेत्य चानुत्तमांगतिम्॥सत्यामन्यांसवर्णायांधर्मकार्यनका रयेत्॥सवर्णासुविधौधय॒ज्येष्टयानविनेतेरा ॥ दाह यित्वाऽग्निहोत्रेण स्त्रियवृत्तवती पतिः। आहरेद्विधि वद्दारानगींश्चैवाविलंवयन् ॥ भा०टी०-स्त्रीविना भर्ताके पिता माता पुत्र भ्राता सास सोहरा मामा इन्के अलग ना रहै अन्यथा निंदित होजा- तीहै । जो स्त्री पतिके हितमें हो श्रेष्ठ आचारवाली जितें- द्रि हो वह यहां यशको अंतमें उत्तम लोकको प्राप्त होतीहै ॥ जिस मनुष्यकी बहुतस्त्री हो वह सवर्णाके विना अन्य वर्ण स्त्रीसे धर्म ना कराय यदि समान वर्णकी अनेक स्त्रीही तो प्रथम स्त्रीके साथ धर्मकार्य करें। यदि व्रतवती स्त्री मृत्युको प्राप्त हो तो उस्को अग्निहोत्रकी अग्निसे दाहकर विधिपूर्वक शीघ्रही स्त्रीको और अग्निको ग्रहण करें अ- न्यथा अग्निहोत्रका अभावसे दोपहै ॥ इति श्रीदेवज्ञदुनि चंद्वात्मजपं. विष्णुदत्तवैदिककृतनवरत्नविवाहपद्धतिधृत. विवाहविधानं भाषाटीकासहितं समाप्तम् ॥ शुभम् ॥ प्रीयताञ्चानेन श्रीरामचंद्रः॥
अथ विवाहमंत्राणां सूचीपत्रम् । संख्या मंत्र पृष्ठ संख्या मंत्र पृष्ठ . " " " १६० । " १ साधुभवानास्ताम् १२६/१९ यदैपिमनसा. १४६ २ वष्मास्मि १२८/२० अघोरचक्षुः १४७ ३ विराजोदोहोसि २१ त्वन्नो अग्ने १५८ ४आपःस्थयुप्माभिः१२९/२२ सत्वन्नो अग्ने ५ समुद्भवः १३०२३ अयाश्चाग्नेः ६ आमागन्यशप्ता १३१/२४ येतेशतम् ७ देवस्यत्वा १३२/२५ उदुत्तमम् ८ नमश्यावास्यायां १३३ २६ ऋतापाइतधामं १६१ ९ यन्मधुनोमधव्यम् ॥ २७ सहितो १० गौौगाः १३५/२८ सुपुम्णः. १६२ ११ मातारुद्राणाम् २९ इपिरोविश्वव्यचा १२ उत्सृजतंतृणानि ३० भुज्युःसुपर्णः १६३ १३ जरांगच्छ १३७/३१ प्रजापतिर्विश्वकर्मा ? १४ याअईतन् १३८ ३२चित्तञ्चति(द्वादश)१६५ १५ परिधास्यै १३९ ३३ प्रजापतिजयानिंद्राय" १६यशसामाद्यावा ३४ अनिर्भूतानाम् १६६ १७ समंजंतुविश्वेदेवाः१४०/३५ इन्द्रोज्येष्ठानाम् १८ कोदात् १४६।३६ यमःपृथिव्या . " 17 " " 11 " -सूचीपत्रम् २१३ संख्या मंत्र पृष्ठ संख्या मंत्र पृष्ठ " " 1 " " " " " " " ३७ वायुरंतरिक्षस्य १६६ ५७ अर्यमणंदेवम् १७३ ३८ सूर्योंदिवा ५८ इयंनारी ३९ चंद्रमानक्षत्राणां ५९ इमाँल्लाजानावपामि ४० वृहस्पतिर्ब्रह्मणो ६७/६० गृभ्णामिते ४१ मित्रःसत्यानां ६१ आरोहेममश्मानं १७६ ४२ वरुणोऽपां ६२ सरस्वतीप्रेदम ४३ समुद्रःस्रोत्यानां ६३ तुभ्यमग्रे ४४ अन्न साम्राज्यानां ६४ एकमिपेढेऊर्जेइत्यादि- ४५ सोमओपधीनां सप्त १७९ ४६ सविताप्रसवानां ६५ आपःशिवाः १७९ .४७ रुद्रःपशूनां १६८ ६६ आपोहिष्टा ४८ वटारूपाणां ६७ तच्चक्षुः १८१ ४९ विष्णुःपर्वतानां • १८२ ५० मरुतोगणानां १८३ २१ पितरःपितामहाः ५२ अग्निरैतु ७०सुमंगलीरियं १७१ ५३ इमामग्निस्त्रायता 7/७१ सुमित्रियादुर्मि- त्रिया १८४ 7./७२ देवागातु ५५ सुगनुपन्थाम् १/७३ मंानम् १८५ " 7 7 ६८ ध्रुवमासि "६९ ममत्रतते " " ५४ स्वस्तिनो अग्ने ५६ परंमृत्यो २१४ सूचीपत्रम् . संख्या मंत्र पृष्ठ संख्या मंत्र पृष्ठ " " ७४न्यायुपम् १८५, ९ त्वचात्वचमिति २०१ अथ चतुर्थीकर्ममंत्राः १० यत्तेसुशीमेइति " १ अग्नेप्रायश्चित्ते १९५ अथक्षेपकमंत्राणि २ वायोप्रायश्चित्ते १ तत्त्वायामि। ३ सूर्यप्रायश्चित्ते. २भवतन्नः। ४ चंद्रप्रायश्चित्ते ३ इममेवरुण। ५ गंधर्वप्रायश्चित्ते यहतीनमंत्रसूत्रकारने ६प्राणैस्तेप्राणान् २०१ लिखेहैं ७ अस्थिभिरस्थीनि ." पद्धतियों मेंनहींहै ॥ ८ मांसस्तेमांसम् इति विवाहमंत्राणांसूचीपत्रम् . " " अथ अष्टमप्रकरणम् । (स्त्रीणामाचारे) स्वस्ति श्रीगणेशाय नमः । श्रीगुरवेनमः ।। लोकानंत्यंदिवः प्राप्तिःपुत्रपौत्रप्रपौत्रकैः॥ यस्मात्तस्मास्त्रिय सेव्या कर्तव्याश्चसुरक्षिताः ॥. भा०टी०-याज्ञवल्क्यस्मृति और मन्वादि धर्मशास्त्र और श्रुतियोंमें स्त्रियोंका स्वीकार रक्षा यह सिद्धहै इस प्रकरणम् ८ २१५ लिये पुत्रपौत्र प्रपौत्रादिद्वारा स्वर्गादिप्राप्तिके लिये स्त्रि- योंका पाणिग्रहण करना चाहिये और स्त्रियोंको उपदेश करना आचारका तथा भर्ताकी पूजन अवश्य कर्तव्यहे और यइभी याज्ञवल्क्यस्मृति प्रथम अध्यामेंभी लिखाहे कि (प- तिप्रियहितेयुक्तास्वाचाराविजितेन्द्रिया। सेहकीर्तिमवानो- तिप्रेत्यचानुत्तमांगतिम)अर्थात् जो स्त्री पतिके प्रियमें तत्पर और शुद्ध आचार युक्त और इंद्रियजित ऐसी स्त्री इसलो- करें कीर्ति यश और परलोकमें उत्तमगतिको प्राप्त होताहे और भी लिखाहै (स्त्रीभिर्भतृवचःकार्यमेषधर्मः परस्त्रिया) अर्थात् भर्ताका वचन मानना यही स्त्रीका परम धर्महे ।। अन्यच्च (गुरुरग्निद्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः। पति- ,रेको गुरुःस्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः) अर्थात् ब्राह्मणोंका अग्नि गुरु, वर्णोंका ब्राह्मण गुरु, स्त्रीका एक पतिही गुरु हो- ताहै अभ्यागत सर्वका गुरुहै इत्यादि अनेक प्रमाणोंसे खियोंका पतिही गुरुहै इसलिये पतिकी सेवा और आज्ञा कर्नी आचार शुद्ध रखना यही स्त्रीका मुख्य धर्महै इसलि- ये कुछ यत्किंचित् स्त्रियोंका आचार धर्म शास्त्रोक्त लिखते हैं। जो सौभाग्यवती स्त्रीमात्रहै उन्को प्रातःकाल सूर्योद- यके प्रथम चार घडीके तडके(प्रातःकाल)उठकर नेत्रोंकोप्र- थम जल स्पर्श करना अनंतर अपने पतिके चरणोंपर सिर- को धर प्रणाम कर प्रथम पतिके मुखका दर्शन करना पश्चा- त शुद्ध (साफ) दर्पणमें अपना मुख देखना पीछेसे भूमिको प्रोक्षण (छिडकन) सम्मार्जन (वहारी)लेपनादिसे घरको शुद्ध करे और पृथिवीकी पूजा कर फिर शूद्रकमलाकरोक्त मंगलपाठ पढकर पतिकी सेवा पादप्रक्षालन आदिकर फिर वेणी (गूत) को कंकपत्र (कंगी.) से शुद्धकर और पुप्पादि- क धारण कर भाल (मस्तुक ) में तिलक लगाय हस्त कर्ण २१५ सूचीपत्रम् . संख्या मंत्र पृष्ट संख्या मंत्र पृष्ठ " " ७४व्यायुपम् १८५, ९ त्वचात्वचमिति २०१. अथ चतुर्थीकर्ममंत्राः १० यत्तेसुशामेइति १ अग्नेप्रायश्चित्ते १९५ अथक्षेपकमंत्राणि २ वायोप्रायश्चित्ते १ तत्त्वायामि। ३ सूर्यप्रायश्चित्ते. २भवतन्नः।। ४ चंद्रप्रायश्चित्ते ३ इममेवरुण। ५गंधर्वप्रायश्चित्ते यहतीनमंत्रसूत्रकारने ६प्राणैस्तेप्राणान् २०१ लिखेहें ७ अस्थिभिरस्थीनि ." पद्धतियों में नहींहै ॥ ८ मांसस्तेमांसम् इति विवाहमंत्राणांसूचीपत्रम् " अथ अष्टमप्रकरणम् । (स्त्रीणामाचारे) ॐस्वस्ति श्रीगणेशाय नमः । श्रीगुरवेनमः॥ लोकानंत्यंदिवः प्राप्तिःपुत्रपौत्रप्रपौत्रकैः॥ यस्मात्तस्मात्स्त्रियःसेव्याःकर्तव्याश्चसुरक्षिताः॥. भा०टी०-याज्ञवल्क्यस्मृति और मन्वादि धर्मशारू और श्रुतियों में स्त्रियोंका स्वीकार रक्षा यह सिद्ध है इस प्रकरणम् ८ २१५ अग्निगुरु, लिये पुत्रपौत्र प्रपौत्रादिद्वारा स्वर्गादिप्राप्तिके लिये स्त्रि- योंका पाणिग्रहण करना चाहिये और स्त्रियोंको उपदेश करना आचारका तथा भर्ताकी पूजन अवश्य कर्तव्यहै और यइभी याज्ञवल्क्यस्मृति प्रथम अध्यामेंभी लिखाहै कि (प- तिप्रियहितेयुक्तास्वाचाराविजितेन्द्रिया। सेहकीर्तिमवाप्नो- तिप्रेत्यचातुत्तमांगतिम्) अर्थात् जो स्त्री पतिके प्रियमें तत्पर और शुद्ध आचार युक्त और इंद्रियजित ऐसी स्त्री इसलो- को कीर्ति यश और परलोकमें उत्तमगतिको प्राप्त होती और भी लिखाहै (स्त्रीभिर्भतृवचःकार्यमेषधर्मः परस्त्रियाः) अर्थात् भर्ताका वचन मानना यही स्त्रीका परम धर्महे ॥ अन्यञ्च (गुरुरग्निद्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः। पति- रेको गुरुःस्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः) अर्थात् ब्राह्मणोंका वर्णोंका ब्राह्मणगुरु, स्त्रीका एक पतिही गुरु हो- ताहे अभ्यागत सर्वका गुरुहे इत्यादि अनेक प्रमाणोंसे स्त्रियोंका पतिही गुरुहै इसलिये पतिकी सेवा और आज्ञा कर्नी आचार शुद्ध रखना यही स्त्रीका मुख्य धर्महे इसलि- ये कुछ यत्किंचित् स्त्रियोंका आचार धर्म शास्त्रोक्त लिखते हैं। जो सौभाग्यवती स्त्रीमात्रहै उन्को प्रातःकाल सूर्योद- यके प्रथम चार घडीके तडके(प्रातःकाल)उठकर नेत्रोंकोप्र-- थम जल स्पर्श करना अनंतर अपने पतिके चरणोंपर सिर- को धर प्रणाम कर प्रथम पत्तिके मुखका दर्शन करना पश्चा- व शुद्ध (साफ) दर्पणमें अपना मुख देखना पीछेसे भूमिको प्रोक्षण (छिटकन ) सम्मार्जन (वहारी)लेपनादिसे घरको शुद्ध करें और पृथिवीकी पूजा कर फिर शुद्रकमलाकरोक्त मंगलपाठ पढकर पतिकी सेवापादप्रक्षालन आदिकर फिर वेणी (गूत) को कंकपत्र (कंगी.) से शुद्धकर और पुष्पादि- कारण कर माल (मस्तक) में तिलक लगाय हस्त कर्ण २१६ विवाहपद्धति भा० टी० बाहुके भूपणादि धारण कर फिर जिस प्रकार केशादिक जलसे किन्न (गिल्ले) ना होवे तद्वत् स्नान करे इस्में प्रमाण- भी जैसे सौभाग्यकल्पद्रुममें लिखाहै ।।. यथा युद्धात्रा मुहूर्तेनिजपतिचरणौसंप्रणम्यास्य मस्यप्रेक्ष्यप्रेम्णाथनेजशुभमुकुरतलेभूमिमभ्यय॑पत्नी । प्रातःस्मृत्यादिकृत्वापतिपरिचरणंसंविधायैववेणींसं रच्याधायभालेतिलकमथगलाधानिमजेत्सभूपा॥ और स्कांदमेंभी लिखाहै ( प्रसुप्तंच सुखासीनं रममाणं यदृच्छया।आतुरेप्वपिकालेपुपतिनोत्थापयेत्वचित अर्था- त् पति शयनअवस्थामें हो वा सुखपूर्वक आराममें होयावा स्वेच्छापूर्वक आनंद लेताहो ॥ अर्थात् अपनी तखलीफमें भी होय तबभी पतिको ना उठावे ॥ और पतिको सर्व प्रकारसे प्रसन्न करें ॥ और हरिद्रा ( हलदी) का मईन केशरका स्वीकार सिदूर कज्जल कूर्पासक ( बहुदेवाकंगण) ताम्बूल यह स्त्रियोंको मंगलदायक भूपण है । और केशोंका संस्कार कर्णके भूपण तथा हस्तोंके भूषण भर्नाकी आयुकी वृद्धिकी इच्छावाली स्त्री इन्को मत त्यागे । प्रमाणं । हरिद्राकुंकुमचैवकस्तूरीकजलंतथा । कू पसिकंचतांबूलंमांगल्याभरणस्त्रियाः ॥केशसंस्का रकवरीकरकर्णविभूपणम् । भर्तुरायुष्यमिच्छंतीदूर येनकचित्सती॥ और नियम काजल और पत्रपुष्प आदि जो आज्ञा करे पति वह आगे रखदे॥ और भर्ताका उच्छिष्ट सेवन करे ।। .
प्रकरणम् ८
२१७
और तीर्थस्नानकी इच्छावाली स्त्री पतिका पादोदकपान
करे और शंकर विष्णुसे अधिक स्त्रीको पति होताहै।
प्रमाणीप्रसुप्तंचसुखासीनरममाणंयदृच्छया।आतुरेष्व
पिकालेपुपतिनोत्थापयेत्वचित् ॥ हरिद्राकुंकुमचे
वसिंदूरंकज्जलंतथा । कूसिकंचताम्बूलंमाङ्गल्या
भरणस्त्रियः ॥ केशसंस्कारकवरीकरकर्णविभूषण
म् ।भर्तुरायुष्यमिच्छन्तीदूरयेन्नक्कचित्सती ॥ निय
मोदकवह्निचपत्रपुष्पादिकंचयत् । सेवेतभर्तुरु
च्छिएमिष्टमन्नंफलादिकम् ॥ तीर्थस्नानार्थिनीनारी
पतिपादोदकंपिवेत् । शंकरादपिविष्णोर्वापतिरेको
ऽधिकःस्त्रियाः॥
श्रीमद्भागवते।
स्त्रीणांचपतिदेवानांतच्छुश्रूपानुकूलता।तद्वन्धुष्य'
नुवृत्तिश्चनित्यंततधारणम् ॥ सम्मार्जनोपलेपा
भ्यांसेकमण्डलवर्तने ॥ स्वयंचमण्डितानित्यंप
रिमृष्टपरिच्छदा ॥ कामैरुच्चावचैःसाध्वीप्रश्रयेण
दमेनच ॥ वाक्यैःसत्यैःप्रियैःप्रेम्णाकालेकालेचयेत्प
तिम् ॥ संतुष्टालोलुपादक्षाधर्मज्ञाप्रियसत्यवाकू ॥
अप्रमत्ताशुचिः स्निग्धापतित्वपतितंभजेत् ॥
यापतिहरिभावनभजेछीरिवतत्परा॥हर्यात्मनाहरे
'लोकपंत्याश्रीरिवमोदते ॥दुःशीलोदुर्भगोवृद्धोजडो
रोग्यधनोपिवा । पतिःस्त्रीभिर्नहातव्योलोकेप्सुभिर
. २१८ विवाहपद्धति भा० टी० पातकी ॥ अस्वय॑मयशस्यंचफल्गुकृच्छ्भयावह . म् । जुगुप्सितंचसर्वत्र औपपत्यकुलस्त्रियाः॥ भावार्थ- स्त्रीलोगोंका पतिही परम देवहै इस्काही पूजन करना और आज्ञामें रहना और पतिके बंधु माता पिता इन्की सेवा करनी पतिव्रत धारण करना और पृथिवीकी शुद्धि संस्कार पूजन और अपने शरीरमें भूषण पुष्प धारण करने श्रेष्ठ कार्यों और वचनोंसे पतिनता स्त्री पतिकी सेवा करे और काल अर्थात् ऋतुकालमेंही पतिसे संभोग करे अन्यथा अतिविषयासक्त ना होवे । और सदैव संतुष्टरहै और साव- धान पवित्र स्नेहवती रहै ॥ जो स्त्री हरिभावसे लक्ष्मीवत पूजन कर्ती है विष्णुलोकमें वह स्त्री पतिके साथ विष्णुजी- वत् आनंद भोगतीहै ॥ यदि पति दुष्ट निर्द्धन वृद्ध मूर्ख जड रोगीभी होय वह लोकपरलोकमें सुख इच्छावती स्त्री न तिरस्कार करे ॥ और स्वर्गके ना देनेवाला यशके नाश- कर्ने वाला संपूर्ण शास्त्र वेदों में निंदित उपपति अर्थात् जारस्त्रीको होताहै इसलिये स्त्रियोंको परपुरुषसे एकांत भाषण हास्य विहार अति निषिद्धहै । और इसमें याज्ञव ल्क्यजीभी लिखते हैं। पितृमातृश्वसृभ्रातृजामिसम्बंधमातुलैः ॥ हीना. नस्याद्विनाभर्ना गर्हणीयान्यथा भवेत् । पतिप्रिय हितेयुक्तास्वाचाराविजितेन्द्रियो । सेहकीर्तिमवाप्नो तिमोदतेचोमयासहरक्षेत्कन्यांपिताविन्नांपतिःपुत्रा स्तुवाईकाअभावेज्ञातयस्तेपांनस्वातंत्र्यंक्वचित्स्त्रियाः।।
प्रकरणम् ८ २१९ अर्थ-पिता माता बहन भ्राता बंधुओंकी स्त्री संबंधि मातुल इन्से रहित विना भर्ताके स्त्री ना होवे यदि होय तो विना भर्ताके निंदित होतीहै ॥ और जो स्त्री पतिके प्रियमें हित आचार शुद्ध विजित इंद्रिय सो इस लोकमें सुखको प्राप्त होतीहे मरनेवाद पा- वैतीके लोकमें आनंद पार्वतीसे करती है । और कन्याको पिता रक्षा करे विवाहीकी पति रक्षा करे वृद्धकी पुत्र रक्षा करे इन्के अभाव में ज्ञाति रक्षा करे अर्थात स्वतंत्र स्त्रीनाहो और वसिष्ठसंहितामें लिखाहै ॥ पितारक्षतिकौमारेभ रक्षतियौवने । पुत्राश्चस्थवि रेभावेनस्त्रीस्वातंत्र्यमर्हति।असत्यंसाहसंमायामात्स यैचलचित्तता।निर्गुणत्वमशौंचत्वंस्त्रीणांदोपाःस्वभा वजाः॥अर्थात्-झूठबोलनासाहसमायाक्रोधचंचलता निर्गुणअपवित्ररहनायहस्त्रियोंकेस्वाभाविकदापहें ॥ अन्यच्च । पानंदुर्जनसंसर्गःपत्त्याचविरहोटनम् । स्वप्न श्चान्यगृहेवासोनारीणांदूपणानिपटू ॥ अर्थ-मद्यका पीना १ बुरी सोभत कुसंगत २ पतिसे वियोग कलहइभ्रमण देश स्थानोंमें४और के गृहमें शयन५ अन्य गृहमें वास ६ यह पट् दोपोंसे स्त्री दुष्ट हो जाती है कारण इस्में स्वतन्त्रता इस लिये स्त्रियोंको अपने वशमें रखना उचितहे और मांस का भक्षण स्त्रीको बडे रोगादि करनेवाला होनेसे वर्जनीयहै जैसे चिकित्सा शास्त्र भावप्र- काशमें लिखाहै ( आमिषस्याशनंयनात्ममदापरिवर्जये- त्) अर्थ-मांसका भक्षण स्त्री अवश्य छोडदे । और द्वार-
२२० विवाहपद्धति भा० टी०
देशमें बैठना अर्थात् प्रतिदिन अपने द्वारपर बैठ और'
सर्व बातमें हास्य (हंसना) और गवाक्ष (झरोखे) से देखना
बहुत प्रलाप (वृथा वाद करना) यह कुलस्त्रियोंके दोषहैं
इस्को व्यासजी लिखते हैं।
द्वारोपवेशननित्यंगवाक्षेणनिरीक्षणम् ।
असत्प्रलापोहास्यंचूदूपणंकुलयोपिताम् ॥
अन्यच्च
स्त्रीशूद्रोऽनुपनीतश्ववेदमंत्रान्विवर्जयेत् ॥अर्थ-स्त्रीशू
द्रयहवेदमंत्रोंकोत्यागदे ॥ इससेपुराणश्रवणाध्य
यनतुलसीपूजनहरितालिकाव्रतगौरीपूजनयहशूद्रक
मलाकरसेदेखेअवश्यकर्तव्यहै ॥ औरभगवान्परा
शरजी लिखतेहैं।ऋतुस्नातांतुयोभा-सन्निधौनोपग
च्छति । घोरायांभ्रूणहत्यायांयुज्यतेनात्रसंशयः॥
ऋतुस्नातातुयानारीभरिनोपसर्पति । सामृतानरकं
यातिविधवाचपुनःपुनः॥
अर्थ-जो स्त्री ऋतुस्नानके अनन्तर अपने भर्तासे संभोग
नहीं करती वह मरनेवाद नरकको प्राप्त होतीहे और वारं-
वार विधवा होतीहै इस प्रकार ऋतुकालमें स्वस्थ हो जो
पुरुप स्त्रीको नहीं प्राप्त होता वहभी घोर जो भ्रूणहत्या
अथवा गर्भहत्या उस्को प्राप्त होताहै यदि रोगयुक्त हो
तो ना जानेसे दोप नहीं होता अन्यथा प्रमादसे जो ना
प्राप्त होवे वह पापका अधिकारी अवश्यहै इस लिये प्रातुका
लमें स्त्रीको भर्तास संभोग आवश्यकई अन्यथा स्वच्छासेहै ।
प्रकरणम् ८
२२१
पराशरः।
दरिद्रव्याधितंधूतभर्तारयावमन्यते ।
साशुनीजायतेमृत्वासूकरीचपुनःपुनः॥
अर्थ-जो स्त्री निर्धन वा रोगयुक्त वा मूर्ख भर्ता का प्रमादसे
तिरस्कार करती है वह स्त्री मरकर शुनी (कुत्ती) सुकरीके
वारंवार जन्मको प्राप्त होती है । इसलिये भर्ताका अपमान.
स्त्री मात्रको कदाचित् ना करना चाहिये ।।
स्मृतिपाराशरः।
पत्यौजीवतियानारीउपोष्यव्रतमाचरेत् ।
आयुष्यंहरतेपत्युःसानारीनरकंब्रजेत् ॥
अर्थ-जो सौभाग्यवती अर्थात् पतिवती स्त्री उपवास
व्रत आचरण करतीहै वह पतिकी आयुको नष्ट कर मरकर
नरकको प्राप्त होतीहै ।।
मनुः।
.
अपृष्टाचैवभरियानारीकुरुतेव्रतम् ।
सर्वतद्राक्षसान्गच्छेदित्येवमनुरब्रवीत् ॥
अर्थ-जो स्त्री भर्ताकी आज्ञा विना व्रत नियम दानादि
करतीहै उसका फल राक्षसोंको मिलताहै ऐसे मनुजी कहते
हैं इस स्मृतिमें मनुजीका आशय है ॥
पाराशरी।
नऐमृतेप्रवजितेक्लीवेचपतितेऽपतौ ।
पंचम्वापत्सनागीणांपतिरन्योविधीयते ॥
२२२ विवाहपद्धति भा० टी० अर्थ-नष्ट मृत संन्यस्त कीव पतित इन पंच आपतमें स्त्री- को अन्य पति विधान कियाहै। शंका है कि एक पतिके मर- ने पर द्वितीयपति उस्के मरने तृतीय चतुर्थ आदि असंख्य स्त्रीको पति कर्तव्य है क्योंकी पराशरजी स्वयं लिखतेहैं नष्टे मृते इत्यादि उत्तर यह है कि पति शब्दका क्या अर्थहै यदि तुम कहो कि पति अर्थात् पाणिग्रहण जिससे करा हो तो हम कहते यह है की ( पती) यह रूप सिद्ध कैसे हो- ताहै यदि कहै कि पतिशब्दकी विभक्तिमें अचधेः) इस सूत्रसे घिसंज्ञकडिको (औत् धिको अत् ) होकर पता सिद्ध भया तो हम कहते हैं कि (पतिःसमास एवधिसंज्ञा) अर्थात् पतिशब्दकी समासमेंही घि संज्ञा होतीहै तो इहां समास नही एकही शब्दहै।और केवल पतिशब्दकासप्तमी विभक्तिमें (पत्या) यह शब्द बनताहै । इसलिये इहाँ असिद्ध असंस्कृत पति शब्दके प्रयोगस्ने भगवान् पराशर का यही आशयह कि, असंस्कृत अर्थात् जिस्का पाणि- ग्रहण नाही केवल वाड्मात्र से पतिहो अर्थात् वाग्दान माव कियाहो उस पतिको नष्ट मृत संन्यस्त क्कीच होनेपर और पति स्त्रीको कर्तव्यहै। और यह बात आचारसेभी सनातन सिद्धहै । यदि आप यह शंका करे कि भगवान् पराशरजीने यह अशुद्ध (पती) प्रयोग लिखा क्यों वह हमारे तुमारे सदृश थे वह तो आचार्य धर्मशास्त्र के मुख्य है तो इस्का उत्तर देतेहैं कि यह जो आपको पूर्वोक्त कहा सो उन्का आशय इस (पतौ) शब्दसेही मालुम होताहै। 'महाशय वह भगवान् पराशरजी तो ठीक २ लिखगये प- रंतु आपकी समझमेंही गडबड है । पराशरजीने अनन् तत्पुरुप समासान्त पति शब्दकी संजाकर (अपतो यह शब्द सिद्ध संस्कृत लिखाहै ॥ यथा न पतिः अपतिः तस्मि- अपती पतिमिन्ने पतिसहशे ईपत्स्तावित्यर्थः ॥तस्मिंश्च प्रकरणम् ८ २२३ नष्टे मते सति स्त्रीणामन्यः पतिविधेय इति ॥ ऐसे पराश- रजी अपने आशय को लिखते हैं यदि तुम कहो कि वहाँ तो क्लीवे च पतितेऽपतो.ऐसा लिखाहै अपतितो लिखा नहीं उत्तर- महात्मन् यहां पररूप एङ पदान्तादति इस सूत्रसे (पतितेअपतौ) अकारका पररूप भया । और आगे द्विती- यश्लोकमें भी इस स्मृतिश्लोकके प्रगट कर्ते हैं ।। मृतेभतरियानारीब्रह्मचर्यव्रतेस्थिता ॥ सामृतालभतेस्वर्गयथातेब्रह्मचारिणः॥ अर्थ-जो स्त्री पतिकी मृत्युपर ब्रह्मचर्य व्रतको धारण क- रतीहै वह मृत्यु होनेपर ब्रह्मचारीवत् स्वर्गको प्राप्त होती है इसलिये पतिशब्दसे असंस्कृत अर्थात् वाग्दान मात्र क- हाहै । तो उक्तदोष ना भया। नहीं तो पूर्वोक्त व्यर्थ होताहै ॥और इस वाक्यकी दृढताकेलिये और भी प्रमाण देते हैं। तिस्राकोव्योधकोटीचयानिलोमानिमानवे ॥ तावत्कालंवसेत्स्वर्गभरियानुगच्छति ॥ व्यालग्राहीयथाव्यालंबलादुद्धरतेविलात् ॥ तद्वद्भर्तारमादायतेनैवसहमोदते ॥ पुरुपेणापिचोक्तायादृष्टावाक्रुद्धचक्षुपा॥ सुप्रसन्नमुखीभर्तुःसानारीधर्मभाजनम् ॥ चितौपरिष्वज्यविचेतनंपति प्रियाहियामुञ्चतिदेहमात्मनः। कृत्वापिपापंशतलक्षमप्यसौ पतिगृहीत्वासुरलोकमानुयात् ॥
२२४ विवाहपद्धति भा० टी० इत्यादि अनेक प्रमाण सतीविधानके व्यर्थ होते हैं और दरिद्रं व्याधितंधूत । (पत्यौजीवति) इत्यादि (इमानारी- रविधवा मंडल १० सू०८५) इत्यादि अनेक वेदमंत्रोंसे विधवाविवाह औ उपपतिस्वीकार (जारसे मैत्री)निषि- द्ध है। यह मैंने विवाहका अंग समझकर साथ प्रमाणोंके स्पष्ट भाषामें सर्वोपकारके लिये स्त्रियोंका आचार दिङ्मा- बलिखाहै जिन महाशयोंको विशेष आकांक्षाहो वह म- न्वादि धर्मशास्त्र ऋग्वेदादिमें अच्छीतरह देखले । विस्तार भयसे बहुत नही लिखा ॥ इस्का प्रचार अवश्य धर्माभि- लाषी पुरुषोंको उचितहै ॥ इतिश्रीकपरस्थलनिवासिगौ- तमगोत्र (शोरि ) अन्वयालंकृत दैवज्ञ दुनिचन्द्रात्मज प- ण्डितविष्णुदत्तवैदिककृतःस्त्रीणामाचार समाप्तः ।। शुभम् ।। इत्यष्टमंप्रकरणसमाप्तम् ॥ श्री। अथ नवमंप्रकरणम् । (रजस्वलाकृत्यम्) अथ रजस्वलास्वरूपम् । भावप्रकाशे-द्वादशाद्वत्सरादूर्ध्वमापञ्चाशत्समाः स्त्रिं याः। मासिमासिभगद्वारात्मकृत्यैवार्तवस्रवेत् ॥ आर्त वस्रावदिवसाहतुःपोडशरात्रयः । गर्भग्रहणयोग्यस्तु सएक्समयःस्मृतः॥
प्रकरणम् ९
२२५
याज्ञवल्क्येनाप्युक्तम्।
पोडशर्तुनिशाःस्त्रीणांतस्मिन्युग्मासुसंविशेत् । ब्रह्म
चार्यवपर्वण्याद्याश्चतस्रश्चवर्जयेत्।एवंगच्छन्स्त्रियंक्षा
मांमघामूलंचवर्जयेत् ।सुस्थइन्दौसकृत्पुत्रलक्षण्यंज
नयेत्पुमान्।। सर्वासामेवचतुर्वर्णस्त्रीणांसर्ववादिसम्म
तःपूर्वोक्त समयः। ग्रंथातरेतुविशेपः। तद्यथानान
दिवसादूर्ध्वं द्वादशपरिमितरात्रावधिामण्याः।दश
रात्रावधिःक्षत्रियाया। अष्टरात्रावधिर्वैश्यायाः। पड़ा
त्रावधिशूद्रायागर्भधारणेशक्तिरिति ॥ रजस्वलास्व
रूपमुक्त्वानियमानाहभावमिश्रप्रकाशे।आर्तवस्राव
दिवसादहिंसाब्रह्मचारिणी।शयीतदर्भशय्यायांपश्येद
पिपतिनचाकरेशरावेपर्णेवाहविष्यंत्र्यहमाचरेत् । अ
श्रुपातनखच्छेदमभ्यंगमनुलेपनम्॥ नेत्रयोरञ्जनंना
नंदिवास्वापंप्रधावनम् । अत्युच्चशब्दश्रवणंहसनंबहु
भापणम् ।आयासंभूमिखननंप्रवातञ्चविवर्जयेत् ॥
इममेवाशययथाहभगवान्धन्वन्तरिःसुश्रुते । (ऋतौ
प्रथमदिवसात्प्रभृतिब्रह्मचारिणीदिवास्वनाथुपातस्त्रा
नानुलेपनाभ्यङ्गालङ्कारमाल्यनसच्छेदनप्रधावनह
सनकथनातिशब्दश्रवणांवरलेखनायासान्परिहरेत् ।
दर्भसंस्तरशायिनींकरतलशरावपर्णान्यतमशराव
भाजनाहावल्याशनान्यहंचभतसिंरक्षोदति । एता
२२६ विवाहपद्धति भा० टी०
नियमानुल्लंघ्ययावर्ततेताम्प्रतिदोपमाहभावप्रकाशे
भावमिश्रः ॥ यथा-
अज्ञानाद्वाप्रमादादालोभादादैवतश्चवा साचेत्कुर्या
निपिद्धानिग दोपाँस्तदाप्नुयात् ॥ एतस्यारोदना
गीभवेद्विकृतलोचनः । नखच्छेदेनकुनखीकुष्ठी
त्वभ्यंगतोभवेत् ॥ अनुलेपात्तथास्नानाद्दुःशीलोड
भ्यञ्जनादहक् ॥ स्वापशीलोदिवास्वापाच्चञ्चल:
स्यात्प्रधावनात्।।अत्युच्चशब्दश्रवणाधिरःखलुजा
यतोतालुदन्तोष्टजिव्हासुश्यावोहसनतोभवेत्।।प्रला
पीभूरिकथनादुन्मत्तस्तुप
परिश्रमात् ॥स्खलतेभूमिख
ननादुन्मत्तोपातसेवनात्॥अथचतुर्थदिवसानन्तरंवह
तिरक्तेगच्छतःपुरुपस्यदोपमाहभगवा छुश्रुतः ॥
किञ्चतत्रप्रथमदिवसेऋतुमत्यांमैथुनगमनमनायुष्यं
पुंसांभवति। यश्चतत्राधीयतेगर्भःसोऽप्रसवमानोवि
मुच्यतेप्राणैः॥ द्वितीयेप्येवं (सूतिकागृहेवा)तृतीये
प्येवमसम्पूर्णाङ्गोऽल्पायुश्चभवति ॥ यथानद्यांप्रति
स्रोतःद्रव्यंप्रक्षिप्तंप्रतिनिवर्ततेनोर्ध्वगच्छतितद्वदेव
द्रष्टव्यम् । तस्मानियमवतीत्रिरात्रंपरिहरेत् ॥
चतुर्थेतुसम्पूर्णाङ्गोदीर्घायुश्चभवति ॥ इममेवाशयं
भावप्रकाशेभावमिश्रोपिभर्तृकृत्येविशिनष्टि दृष्टा
•न्तेन ॥ यथा-प्रवहत्सलिलेक्षिप्तंद्रव्यंगच्छत्यधोयं
था ॥ तथावहतिरक्तेतुक्षिप्तवीर्य्यमधोबजेत्॥(अतः)
.
प्रकरणम्
२२७
आयुःक्षयभयार्ताप्रथमेदिवसेस्त्रियम् । द्वितीयेपि
दिनात्यैत्यजेतुमतीतथा॥ तत्रयश्वाहितोग जा
यमानोनजीवति । आहितोयस्तृतीयेगिस्वल्पायुर्वि
कलाङ्गकः ॥ अतश्चतुर्थीपष्टीस्यादष्टमीदशमीत
थाद्वादशीवापियारात्रिस्तस्यांतांविधिनाभजेतावि
धिनाकोर्थोगर्भाधानोक्तविधानेन।अत्रोत्तरोत्तरविद्या
.दायुरारोग्यमेवच ।प्रजासौभाग्यमैश्वर्यवलंचाभिग
.मात्फलं धर्मशास्त्रेप्रथमरात्रिचतुष्टयगमनेनिषेधमा
हपाराशरः ॥ प्रथमेऽहनिचाण्डालीद्वितीयेब्रह्म
घातिनी । तृतीयेरजकीपुंसायथावातथाङ्गना ॥
व्याधिमतीचवा ॥ तत्रस्त्रीणांव्याधय पदरादय
स्तयुक्तानिषिद्धा । तत्रापिविशेपायोनिरोगिणी
अशुद्धगर्भदोपमाविष्करोतिप्रकाशेभावमिश्रः ॥
दम्पत्योःकुष्ठबाहुल्यादृष्टशोणितशुक्रयोः । यदप
त्यंतयोर्जातंज्ञेयंतदपिकुष्टितमिति ॥ गर्भाधानेड
योग्यपुरुपंस्त्रियञ्चाहसएंव ॥ अत्याशितोऽधृतिःक्षु
द्वान्सव्यथाङ्गापिपासितः पालोवृद्धोऽन्यवेगातस्त्य
जेद्रोगीचमथुनम् ॥ रजस्वलाव्याधिमतीविशेपा
द्योनिरोगिणी ॥ वयोधिकाचनिप्कामामलिनागर्भि
तिथा एतासांसङ्गमात्पुंसांवगुण्यानिभवन्तिहि॥
युग्मरात्रीणांफलमाह।
युग्मासुपुत्रानायन्तस्त्रियोऽयुग्मासुरात्रिपुतवत्रीपु
।
२२८ विवाहपद्धति भा० टी०
रुपयोःसंभोगेयांदृयुक्तस्ताहगुच्यते।।स्नातश्चंदनलि
साङ्ग सुगन्धिःसुमनोचितः । भुक्तवृष्य सुवसनःसुवेपः
समलकृत ताम्बूलवदनस्तस्यामनुरक्तोऽधिकस्म
रमपुत्रार्थीपुरुपोनारीमुपेयाच्छयनेशुभाभा-पि॥
पुरुपस्यगुणैर्युक्ताविहितन्यूनभोजना।नारीऋतुमती
पुंसासङ्गच्छेत्तुसुतार्थिनी। पूर्वपश्येहतुस्नातायादृशं
नरमङ्गना।तादृशंचनयेत्पुत्रमतःपश्येत्पतिप्रियम्।।
प्रियमितिभर्त-सन्नेपुत्रादिकमपिपश्येत् ॥ अतः
किंसिद्धम् ॥ पतिस्नेहदृष्टयातथापुत्रंपश्येत्असमी
पेएपांभास्करंपश्येत् । एवंमंगलशब्दञ्चाऔपीत् ।
मधुरान्नंभक्षयेत् ॥भूपणवस्त्रादिकंसंधार्यरात्रौविहि
तन्यूनभोजनासुतार्थिनीस्त्रीसुमुहूर्तेसंगच्छेत् ॥ ए
तेनदिवसगमनंनिपिद्धकर्मकाण्डचिकित्साशास्त्रे ॥
यथाचगृह्यसूत्रेभगवा पारस्करः ॥ (यदिदिवामै
थुनंबजेत्कीवाऽल्पवीर्याअल्पायुपश्चप्रसूयन्तेतस्मा
देतद्वर्जयेत्प्रजाकामोगृहीति ) भावप्रकाशचिकि
त्साशास्त्रेभावमिश्रोप्याहं । आयुःक्षयभयाद्विद्वान्ना
हिमेवेतकामिनीम् । अवशेयदिमवेतलाएगीत्यस
न्तयोः ग्रीप्मवसन्तयोरित्यत्रभोगार्थसेवेतनतुसुता
र्थम् अन्यथातस्मादेतदर्जयत्प्रजाकामइतिव्यर्थस्या
त्॥ आवश्यकेभोगमपि ॥ गर्भाधानोक्तविधिनास
गच्छेदित्युक्तेगर्भाधानमुहूर्तमाहमुहूर्तचिंतामणौरा
मः॥.यथा-
•.
.
प्रकरणम् ९
२२९
• हस्तानिलाश्विमृगमैत्रवसुध्रुवाख्यैःशक्रान्वितैःशुभ
तिथौशुभवासरेच॥नायादथार्तववतीमृगपोष्णवायु
हस्ताश्विधातृभिरलंलभतेचगर्भम् ॥ यथाहस्तस्वा
तीअश्विनीमृगशिरअनुराधाउत्तरभाद्रपदारोहिणीज्ये
धाशुभतिथिरिक्तावर्जितशुभवारसौरारार्किविरहित
दिनेपुरजस्वलायाःस्नानविधेयम् ॥ मुस्नातावस्त्रभू
पणसंयुतारात्रौमृगशिररेवतीस्वातिहस्तअश्विनीरो
हिणीएपुभेपुगमनात्स्त्रीगर्भलभते.॥
(गमनेनिपेधमाहसएव)
गण्डान्तत्रिविधंत्यजेन्निधनजन्मइँचमूलान्तकंदात्रं
पोष्णमथोपरागदिवसंपातंतथावैधृति। पित्रोःश्राद्ध
दिनंदिवाचपरिघावर्द्धस्वपत्नींगमे भान्युत्पातहता
निमृत्युभवनंजमक्षतःपापभम् ॥
तद्यथा
गण्डान्तंचतुर्घटिकात्मकंज्येष्टाशतभिपारेवतीएपां
तथातिथिगण्डान्तंद्विघटिकात्मकंतथालग्नगण्डान्तं
नवांशाईपट्यात्मकं ॥ जन्मतअष्टमनक्षत्रंनिधन
संज्ञकंमूलांत्यमश्विनीरेवतीतथोपराग सूर्यचन्द्रग्रह
णम्।( उपरागोग्रहोराहुग्रस्तेन्विन्दौचपूणिच) व्य
'तीपातवैधृतियोगोपितुःश्राइदिनंतथादिनेपरिपाई
एतानिनक्षत्रयोगदिवसानिस्वस्त्रियं .संतानार्थ ग
.
२३० विवाहपद्धति भा० टी० च्छतापुरुपेणअवश्यवर्जनीयानि ॥ ऋतुमतीस्त्री मनसापिमैथुनचिंतनंनकुर्यात् । उक्तञ्चबृहन्नारदीये।। मैथुनमानसंवापिवाचिकंदेवतार्चनम् । वर्जयेचनम स्कारंदेवतानारजस्वलेति ॥ अथरजस्वलायाऋतुशुद्धयनंतरंपतिरेवद्रष्टव्यःअस मीपेपत्युःपुत्रमुखंद्रष्टव्यवासूर्यदर्शनंविधेयनान्यपुरु पंमनसावाचास्मरेत्चक्षुपानपश्येत् ॥ उक्तमिदं बृहन्नारदीये।सात्वान्यपुरुपनारीनपश्येच्चरजस्वला। ईक्षेतभास्करदेवब्रह्मकूर्चततःपिवेत् ॥ ब्रह्मकूर्चपंच गव्यंनानानन्तरंशुद्धयर्थपातव्यम् ॥ •भाषामें रजस्वलास्नीका कर्तव्य लिखतेहैं-भावपमें लि- खाहै कि, बारह वर्षके उपरंत५०वर्षतक स्त्रीकेमास २ में भग- द्वारा स्वभावसेही रुधिर ऋतु आतेहैं । और ऋतुके प्रथम दिनसेले १६ रात्रिपर्यंत गर्भ होनेके दिन होतेहैं । इसलिये उन दिनोंमें पर्वणी ८।१४। ११ । १५ । अमावस यह ति- थि और मघा मूलनक्षत्र छोड चंद्रअनुकूल हो तो गमन करें और रजस्वलास्त्री ३ तीन दिन' पर्यंत यह नियम धा- रणकरे कि, हिंसा मतकरे ब्रह्मचारिणी हो पृथ्वीपर कुशा विछायकर शयन करे पतिको मत दर्शन करें। हाथमें वां माटीके वर्तनमें डाल भात कोमल अन्न एकवार खाय तीनदिन नेत्रों में सुरमा स्नान दिनका शयन धावन बढा शब्दश्नवण करना हास्य बहुत बोलना कसरत पृथिवीका ना वायुसेवन छोडदेवें ।। अन्यथा जो स्त्री अज्ञानसेवा प्रमादसे वा लोभसे अथवा जीवके कर्मसे इन कामोंको करतीहै तो गर्भ दोषोंको प्राप्त होताहै। अर्थात् जो स्त्री ऋ प्रकरणम् ९ २३१ तुकालमें रोदनकर्तीहै उस्का गर्भ नेत्ररोगी होताहै ॥ यदि नख कटवावे तो गर्भस्थवालकके नख खराब हो जाते हैं। यदि स्त्री अभ्यंग उवटना मर्दनादि करे तो बालकको कुष्ठ होजाताहै ॥ चंदनलेप स्नानादि करनेसे बालक सदैव रोगी सा होताहै अंजनकरनसे नेत्रहीन अंध होजाताहै दिनके सोनेसे शयनशील होताहै और दौडनेसे चंचलहोताहै ब- डा ऊंचा शब्दश्रवण करनेसे बालक बाहिरा होताहै अति- हास्यसे तालुदांत ओष्ठमे काला होजाताहै बहुतभाषणसे बकवादी बालक होताहै ॥ कसरत और वायुके सेवनसे उ- न्मत्त (पागल ) बालक होजाताहै ॥ माटी खोदनेसे जंधा- में तागत नहीं होती लँगडा होताहैं । इसलिये नियम पालन करने चाहिये ॥ अन्यच्च- ऋतुकालके तीनदिवसों में स्त्रीसे संभोगकरना आयुके नष्ट- करनेवाला तेजहानिकारक अतिनिषिद्धहै उन्में यदि गर्भ कराजाय तो गिरजाताहै ॥ ऐसेही दूसरेदिन (और प्रसूत स्थानमें ) तृतीयदिन में हीनांग अल्पायु होताहै ॥ दृष्टांत जैसे वेगयुक्त नदीके प्रवाहमें फेंकी हुई वस्तु ऊपरको नहीं जाती अर्थात् नीचेकोही गिरजातीहै वैसे यहाभी समुझें. इसलिये चतुर्थी ४ षष्ठी ६ अष्टमी ८ दशमी १० द्वादशी १२रात्रिमें स्त्रीको गर्भ होनेसे क्रमपूर्वक आयु ४ आरोग्य ऐश्वर्य ६ प्रजा ८ सौभाग्य १० बल -१२ पूर्ण बालकमै हो- ताहै। और प्रथम दिन स्त्री चांडाली. दूसरे दिन ब्रह्म- हत्यारी तीसरे दिनमै रजकी वैश्या समान होतीहै इन दिनों में तथा व्याधियोनि रोगादियुक्त मलीन तथा ग- भिणी निष्काम स्त्रीसे भोग मत करे ॥ यदि स्त्री-पुरुषको कुष्ठ हो तो उन्के दुष्ट वीर्य ऋतुसे उत्पन्न गर्मभी समयमें . . ૨૨૨ विवाहपद्धति भा० टी० कुष्ठी होजाताहै ॥ इसलिये इन्को छोड़देवे ॥' और यह पुरुप मैथुन मतकरे, जो बहुत भोजन कर चुका धैर्य्यर- हित क्षुधायुक्तं रोगी तृषा युक्त बालक १६ वर्षके नीचे वृद्ध ८० वर्षके ऊपर जो प्रथम किसी स्त्रीसे भोग कर चुका हो यह पुरुष मैथुन मतं करे ॥ युग्मोंमें ४।६।८।१०। १२ दिनोंमें भोगकरनेसे पुत्र होताहै अयुग्म । ५।७।९।११। वें.दिनमें भोग करनेसे कन्या होतीहै । और वीर्य अधिकसे • पुत्र ऋतु आधिकसे कन्या वराबर दोनोंके नपुंसक होताहै। संभोगप्रकार। स्नानकर चंदन लगाय गंध धारण कर पुष्पमाला पहिन वृप्य अन्न दुग्ध घृतादि सेवनकर सुंदर वस्त्र भूषण धारण कर तांबूल भक्षणकर ऐसीही अपनी खीसे प्रीतिवालाअतिकाम- युक्त पुरुष पुत्रकी इच्छाकेलिये शुभपर्यकमें शयन करे नतु कामार्थ ॥ स्त्रीभी पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त अल्पं भोजन कर ऋतुसे शुद्ध हो उक्त दिनों में पुत्रकी इच्छाकर पुरुषके साथ भोग करे ॥ऋतुस्नात स्त्री जैसे मनुष्यका दर्शन करे वैसीही संतान उत्पन्न करतीहै इसलिये पतिको वा पुत्रको देखे यदि वह समीप नहो तो सूर्यभगवान्का दर्शन करे संभोगनिषेध । • आयुके क्षयके भयसे मनुष्य दिनको स्त्रीसे मत भोगकरे यदि वहाँ गर्भ होगा तो अल्पायुवाला कमताकत नपुं- सक मूर्ख होगा इस लिये गृहस्थी लोग दिनको मैथुन मत करे ॥ कामार्थ मतुप्य अवशहुआ ग्रीष्म वसंतमें भोग करे यहभी गौण वाक्य है परंतु दिनमें भोग न करना.यही मुख्य है।
विवाहपद्धति भा० टी० २३३
अथ गर्भाधानका मुहूर्त।
हस्त स्वाती अश्विनी मृगशिर अनुराधा उत्तराभाद्रपदा
रोहिणी ज्येष्ठा रिक्ता विना शुभतिथि शनि सूर्य मंगल
विना वारको रजस्वला मानकर भूषणादियुक्त रात्रिमें
मृगशिर रेवती स्वाती हस्त अश्विनी रोहिणी इन नक्षत्रोंमें
संभोग करनेसे गर्भधारण करती है ।
(निपिद्ध काल)
गंडकी ४ घटी अंतकी ज्येष्ठा शतभिषादि लग्नगंडांत
जन्मनक्षत्रसे अष्टम नक्षत्र अष्टम राशि मूल अश्विनी
रेवतीग्रहण व्यतीपात वैधृति पिताका श्राद्धदिन परिघका
अर्धभाग यह पूर्वोक्त नक्षत्रादि संतानकी इच्छासे अपनी
स्त्रीसे भोग करनेवाले मनुष्यको त्याज्य अवश्यहै ॥ ऋतु
कालमें स्त्री मनसेभी मेथुनकी इच्छा मत करे ॥ क्यों कि
अन्यथा दुष्टसंतान होती है ॥ऋतुके अंतमें पंचगव्य पानकर
संभोगादि विधि करें यह संक्षेपसे रजस्वला विधानलिखा है।
प्रार्थनेयं देवजनिचंद्रात्मज पं०विष्णुदत्तवैदिकशर्मणः।
इति श्रीकपूरस्थलनिवासिगौतमगोत्र (शोरि )अन्व
यालंकृतदैवज्ञदुनिचंद्रात्मजश्रीमच्छ्रीपण्डितविष्णु
दत्तवैदिकंकृतंरजस्वलाकृत्यसमाप्तम् ॥ शुभमस्तु
श्रीरामचंद्रप्रसादात् ॥ समाप्तंचेदंनवमंप्रकरणम् ॥
अथ प्रकीर्णाध्यायःप्रारभ्यते।
अर्थविवाहेलनादिद्वादशस्थानेसूर्यादीनांफलमाह ॥
अथसूर्यस्य ॥ मृति १,विधनंता २ धनं ३ सहजसं
२३४ विवाहपद्धति भा० टी०
क्षयः ४ पुत्रसूः५ प्रियंस्यपरमोन्नति ६ विधवता७
चिरंजीविताम् ॥शुभाकृति९ रशीलता१०विविधल
धि११रर्थक्षयः १२ तनुप्रभृतिभास्करसतिफलंभ
वेद्योपिताम्॥॥अथ चंद्रस्याप्राणस्यच्युतिपर्थसंप
२ दुभयप्रीतिश्च ३ बंधून्नति ४ वैपुत्र्यंच ५ सवैरता
च ६ नियतंसापत्न्य ७ मात्मव्यथा ८॥ स्त्रीसूतिः
९ परकर्मकृत् १० स्वमधिका ११ लब्धिक्षयः१२.
संपदां स्यादिदाबुदयात्सुखेतुकथितोवंधुक्षयः के
श्चन ॥२॥ अथभौमस्यफ०॥ पंचत्वञ्च १ दरिद्रता
२ सधनता३ सुभ्रातृवैरं ४ सुतानुत्पत्ति ५ र्दयितो
नतिः ६ कुचरिता ७ सक्तिश्चरक्तनुतिः ॥स्याद्भर्तृ
प्रतिकूलता ९ऽऽमिपरुचि१०वित्ताप्ति ११ रर्थक्षयो
१२नारीणामुदयादिवर्तिनिमहीपुत्रेविवाहोत्सवे ३॥
अथवुधस्यफलम्।।सौम्येभर्तृपरायणास्वगृहिणीर
स्यात्स्वामिपक्षार्चिता ३ बंधुत्वंच ४ सुतान्विताच
५ विगत ६प्रदेपिपक्षातथा वंध्याच ८ स्वभिरु
ज्झितातुकृतिनीमाया ९ विनीच क्रमात् १० भूरिद्र
व्य ११ वती बहुव्यय १२ परालग्नादिभावस्थित।।
अथ गुरुफलम् ॥
स्वाभीष्टा १ धनभागिनी २ प्रमुदिता ३ द्रव्यान्वि
ता स्वात्मजा ६ नष्पारि दर्दयितोज्झिता ७ च
विवाहपद्धति भा० टी० २३५
विगतप्राणा ८ रताश्रेयसि९॥सिद्धार्था १० विभवा
विता ११ च विधना १२ भावेषु मूर्त्यादिपु-
अथ शुक्रफलम्॥
मनोभीष्टाभर्तु १ र्धनचयपरा २ देवररता ३ कुले
या ४ सत्पुत्रा ५ विहितबहुवैरा ६ न्यनिरता ७ ॥
व्यसु ८ धर्मेप्यास्या ९ त्कुशलनिरता १० भूरिविभ
वा१निरर्था१२शुक्रेस्याद्भवतिखलुलग्नप्रभृतिषु॥
अथ शनिफलम् ॥
स्यात्पुंश्चल्य १ धना २ ऽर्थवत्य ३थयशोहीना ४
चहृद्रोगिणी ६ शटना ६ निजगर्भपाटनरता ७
नीरुक्च ८ भग्नव्रता९॥दुःशीला१० वहुवित्तसंग्रह
परा ११ पानप्रसक्तांगना १२ स्याल्लग्नाद्रविनंदनेन
शिखिनास्वर्भानुनाचक्रमात् ॥ शनिवत्राहुकेत्वो
इति श्रीकपूरस्थलीयदैवज्ञदुनिचंद्रात्मज (शोरि)
पण्डितविष्णुदत्तवैदिकसंगृहीतंविवाहकुंडलीस्थि
तग्रहफलंसमाप्तम् ॥ समाप्तश्चायंप्रकीर्णोध्यायः॥
डाभमस्तु श्रीरामचंद्रप्रसादात् ॥
.
रपि फलंज्ञेयम्॥
विवाहपद्धति भा० टी०
श्रीः।
अथार्कविवाहः॥
प्रयोगरत्नेमात्स्ये।
स्वस्तिश्रीगणेशाय नमः ॥ तृतीयांमानुपीनैवच
तुर्थीयःसमुद्हेत् । पुत्रपौत्रादिसंपन्नःकुटुंबीसाग्निको
वरः॥उदहेद्रतिसिद्धयर्थतृतीयांनकदाचन ॥मोहाद
ज्ञानतोवापि यदिगच्छेत्तुमानुपीम् ॥ नश्यत्येवनसं
देहोगर्गस्य वचनंयथा ॥
तत्रैवसंग्रहे-
तृतीयांयदिचोद्वाहेत्तहिंसाविधवाभवेत्।चतुर्थ्यादिविवा
हार्थतृतीयेऽकसमुद्हेत् ॥ आदित्यदिवसेवापिहस्तक्षेवा
शनैश्चरे । शुभेदिनेवापूर्वाह्नकुर्यादविवाहकम् ॥
व्यासः-स्नात्वालंकृतवासास्तुरक्तगंधादिभूपितम् । सयु
ष्पफलशाखैकमर्कगुल्मंसमाश्रयेत् ॥ सलक्षणेनसंयुक्तमर्क
संस्थाप्ययत्नतः।अर्ककन्याप्रदानार्थमाचार्यकल्पयेत्पुरा ॥
अर्कसनिधिमागत्यतनस्वस्त्यादिवाचयेत् । नांदीश्राद्धेहिर
.ण्येनमष्टवर्गान्प्रपूजयेत् । पूजयेन्मधुपंर्केणवरविप्रस्यहस्त
तः । यज्ञोपवीतंवत्रंचहस्तकर्णादिभूपणम् । उष्णीपगंध
माल्यादिवरायास्मैपदापयेत् । स्वशासोक्तप्रकारेणमधुप
कैसमाचरेत् ॥
विवाहपद्धति भा० टी० ૨૩૭ ब्राह्मे-ग्रामात्याच्यामुदीच्यांवासपुष्पफलसंयुतीपरीक्ष्य यत्नतोधस्तात्स्थण्डिलादियथाविधि ॥ कुर्यादितिशेपः॥ कृत्वाकैपुरतस्तिष्ठन्प्रार्थयेतद्विजोत्तमः । त्रिलोकवासिन्स नाश्वछाययासहितोरवे ॥ तृतीयोराहजंदोपंनिवारयसुखंकु हातबाध्यारोप्यदेवेशंछाययासहितरविम्॥वस्त्रैर्माल्यैस्तथा गन्धेस्तन्मंत्रेणेवपूजयेत् । तत्रैवश्वेतवर्णेनतथाकार्पासतंतु भिः । गन्धपुष्पैःसमभ्यय॑आब्लगैरभिपिच्यच॥ गुडौदनं तुनैवेद्यताम्बूलंचसमर्पयेत् । व्यासः-अकैप्रदक्षिणीकुर्वजपेन्मंत्रमिमंबुधः ममप्रीतिक रायेयंमयासृष्टापुरातनी ॥ अर्कजाब्रह्मणासृष्टाअस्माकंप्रति रक्षतु ॥ पुनःप्रदक्षिणीकुर्यान्मंत्रेणाननधर्मवित् । नमस्तेमंग लेदेवि नमःसवितुरात्मजे । त्राहिमांकृपयादेविपत्नीत्वमेइ हागता । अर्कत्वंब्रह्मणासृष्टःसर्वप्राणिहितायच । वृक्षाणामा दिभूतस्त्वंदेवानांप्रीतिवद्धनः ॥ तृतीयोद्धाहजपामृत्युंचा शुविनाशय । ततश्चकन्यावरणत्रिपुरुपंकुलमुद्धरेत् । आदि त्यः सविताचार्कपुत्रीपोत्रीचनप्तिका।गोकाश्यप इत्युक्त लोकेलौकिकमाचरेत् । सुमुहूर्तेनिरीक्षेतस्वस्तिसूक्तमुदीर यन् । आशीभिःसहितैःकुर्यादाचार्यप्रमुखर्द्विजैः ॥ अथाचा. यसमाहूयविधिनातन्मुखाच्चताम् । प्रतिगृह्यततोहोमंगृह्योक्त विधिनाचरेत् । आरोहिटेत्यादिभिर्मग्भि २३८ विवाहपंदति भा० टी० व्यासः-अर्ककन्यामिमांविप्रयथाशक्तिविभूपिताम्।गोत्राय शर्मणेतुभ्यंदत्तांविप्रसमाश्रय। अंजल्यक्षतकर्माणिकृत्वा कंकणपूर्वकम् ॥ यावत्पंचवृतासूत्रंतावदकैप्रवेष्टयेत् । स्व शाखोक्तेनमंत्रेणगायत्र्यावाथवाजपेत् । पंचीकृत्यपुनःसू स्कंधेवघ्नातिमंत्रतः ॥ बृहत्सामेतिमंत्रेणसूत्ररक्षांप्रकल्प येत्।अर्कस्यपुरतःपश्चादक्षिणोत्तरतस्तथा ।कुम्भांश्चनिक्षि पेत्पश्चादानेयादिचतुष्टये। सवस्त्रप्रतिकुम्भंचत्रिसूत्रेणैववे प्रयेत् ॥ हरिद्रागन्धसंयुक्तंपूरयेच्छीतलंजलम् । प्रतिकुंभं महाविष्णुंसंपूज्यपरमेश्वरम् । पाद्यार्थादिनिवेद्यान्तंकुर्यान्ना नैवमंत्रवित् ॥ अवशौनकोक्तहोमप्रकारः। तृतीयेस्त्रीविवाहेतुसंप्राप्तेपुरुपस्यतु।आर्कविवाहंवक्ष्यामिशौ नकोहंविधानतः॥ अकसन्निधिमागत्यतत्रस्वस्त्यादिवाच येत् । नान्दीश्राद्धंप्रकुतिस्थंडिलंचप्रकल्पयेत् ॥ अर्कम भ्यय॑सौऱ्यांचगंधपुष्पाक्षतादिभिः॥सौर्यासूर्यदेवत्यया ॥ आकृष्णेनेत्यनया । स्वयंचालंकृतस्तद्वद्वस्त्रमाल्यादिभिः शुभैः । अर्कस्योत्तरदेशेतुसमन्वारब्धएतया ॥. एतयार्क कन्यया । उल्लेखनादिकंकुर्यादाधारांतमतःपरम् । आ ज्याहुतिंचजुहुयात्संगोभिरनयैकया। यस्मैत्वाकामकामा येत्येतयाततःपरम् । व्यस्ताभिश्चसमस्तांभिस्ततञ्चस्वि एकृद्भवेत् । परिपेचनपर्यंतमयाश्चेत्यादिकंक्रमात् ।प्रार्थना मंत्रादिविशेपमाहव्यासः ॥ पुन प्रदक्षिणंकृत्वामंत्रमेतमुदी विवाहपद्धति भा० टी० रयेत् । मयाकृतमिदंकर्मस्थावरेपुजरायणा । अर्कापत्या निनोदेहितत्सर्वक्षतुमर्हसि । इत्युक्त्वाशांतिसूक्तानिज स्वातंविसृजेत्पुनः ॥ गोयुग्मंदक्षिणांदद्यादाचार्यायचभक्ति तः॥ इतरेभ्योपिविप्रेभ्योदक्षिणांचापिशक्तितः। तत्सर्वगु खेदद्यादंतेपुण्याहमाचरेत् ॥ ॥अथप्रयोगविधिः॥ तृतीयोद्वाहात्प्राग्दिनचतुष्टयाधिकव्यवहिते रविवारेश निवारेहस्तनक्षत्रेशुभदिनांतरेवाग्रामात्याच्यामुदीच्यांवापु प्पफलयुताधिस्तात्स्थण्डिलं कृत्वाऽर्कपश्चिमतउपवि झ्यमासपक्षाधुल्लिख्यममतृतीयमानुपीविवाहजदोपापनुत्त्य थैमर्कविवाहंकरिष्यइतिसंकल्प्य गणेशपूजास्वस्तिवाचन- मातृपूजनवृद्धिश्राद्धाचार्यवरणानिकुर्यात् । तत्रवृद्धिश्राद्ध सुवर्णेन ॥ अथाचायणपूजितोवरः ॥ त्रिलोकवासिन्सप्ता वछाययासहितोरवे । तृतीयोद्धाहजंदोपनिवारयसुखंकुरु इत्यकैसंप्रार्थ्याक॥ आकृष्णेनेतिछाययासहितरविमावाह्य श्वेतवस्त्रसूत्राभ्यामावेष्टय संपूज्यापोहिप्टेत्यादिभिरभिपि च्यगुडौदनतांबूलादिसमप्यं प्रदक्षिणीकुर्वन्ममप्रीतिकराये यमयासृष्टापुरातनी । अर्कजाब्रह्मणासृष्टाअस्माकंप्रतिरक्षतु इतिपठेत् ॥ द्वितीयप्रदक्षिणायांतु । नमस्तेमंगलेदेविन मासवितुरात्मजे । त्राहिमांकृपयादेविपत्नीत्वमेइहागता। अर्कत्वंब्रह्मणासृष्टःसर्वप्राणिहितायच । वृक्षाणामादिभूत स्त्वंदेवानांप्रीतिवर्द्धनः। तृतीयोद्धाहजपापंमृत्युंचाशुविना .. विवाहपद्धति भा० टी० शयेति ॥ ततआचार्येणमासपक्षायुल्लिख्यकाश्यपगोत्रामा दित्यपुत्रींसवितुः पौत्रीमर्कस्यप्रपौत्रीमिमामर्ककन्यामित्यु तेवर स्वस्तिनइंद्रोवृद्धश्रवाइतिसूक्तंपठन्नकनिरीक्षेत। तत आचायोंविप्रैःसहाशिपोदत्वाऽमुकगोत्रामुकशर्मणे संप्रदे इत्यर्ककन्यांदत्वा ॥ अर्ककन्यामिमांविप्रयथाशक्तिविभूपिताम्।गोत्रायशर्मणे तुभ्यंदत्तांविप्रसमाश्रयेतिपठेत् ।वरस्तुयज्ञोमेकाम समृद्धय 'तामितिप्रथमाधर्मोमेइतिद्वितीयां यशोमेतृतीयामितिबीन क्षतांजलीनर्कोपरिक्षिप्त्वागायत्र्यापरित्वेत्यादिनावा पंचा तासूत्रेणार्कमावेश्यतत्सूत्रं पुनःपंचगुणकृत्वार्कस्यस्कंधेव द्धाबृहत्सामेतिरक्षांपरिकल्प्यास्यदिग्विदिश्वष्टौकुंभान् संस्थाप्यवस्त्रेणत्रिसूत्रेणचावेष्टयहरिद्रागंधायंतःक्षिप्त्वातेषु नानामहाविष्णुमावाह्य पोडशोपचारैःसंपूज्यस्थंडिलमिप्र तिष्ठाप्यआधारावाज्येनेत्यंतमुक्त्वातप्रधानं बृहस्पतिमान वायुसूर्यप्रजापतिचाज्येनशेपेणेत्याधुक्त्वापारांतेसंगोभिरां गिरसोवृहस्पतिस्त्रिष्टुअर्कविवाहहोमेविनियोगः।।ॐसंगो भिराङ्गिरसोनक्षमाणोभगइवेदर्यमणनिनायाजनेमित्रोनदंप तीअनक्तिबृहस्पतेवाजयारिवाजोस्वाहाबृहस्पतयइंदनम मेतित्यजेत् । यस्मैत्वाकामदेवोग्निस्त्रिष्टुपविनियोग प्राग्वत् ॐयस्मैत्वाकामकामायवयंसम्राड्यजामहे ॥तमस्मभ्यं कामंदत्त्वाथेदंत्वंघृतंपिवस्वाहा ॥ अनयइदं०॥
विवाहपद्धति भा० टी० २४१
ततोव्यस्तसमस्तव्याहृतिभिर्तुत्वास्विष्टकृदादिकमशे
समाप्याकैप्रदक्षिणीकृत्य ॥ मयाकृतमिदंकर्मस्थावरेणज
रायणा । अर्कापत्यानिनोदेहितत्सर्वक्षन्तुमर्हसि ॥ इति
प्रार्थ्याचाव्यगोयुग्ममन्येभ्यश्चविप्रेभ्योयथाशक्तिदक्षिणां
दत्वाशांतिसूक्तंजावापूजोपस्करानाचार्यायदत्वादिनचतुष्ट
यमनिकुंभांश्चरक्षेत् ॥ कुंभेपुमहाविष्णुपूजयेच्च ॥
पंचमदिनकृत्यं ब्राह्मे-चतुर्थेदिवसेतीतेपूर्ववत्तांप्रपूज्य
च ॥ विसृज्यहोममग्निञ्चविधिनामानुपीपराम्।उद्वहेदन्यथा
नैवपुत्रपौत्रसमृद्धिमान् ॥ इत्यर्कविवाह समाप्तः ॥
श्रीहरिशरणम् ॥
अथ विवाहनिर्णयः॥
श्रीतारानाथतकवाचस्पतिभट्टाचार्यसंगृहीतवादार्थसा
रांशमादायनिश्चयार्थप्रमाणानिप्रदश्यते ।
तद्यथाईशंनत्वादयतेऽववेदादिशास्त्रमानतः॥एकस्य
कामतोऽनेकसवर्णापाणिपीडनम् ॥ धर्मतत्ववुभुत्सूनांवो
धनायैवमत्कृतिः। तेनैवकृतकृत्योऽस्मिनजिगीपास्तिलेश
तः॥पाणिग्रहणिकामंत्रानियतंदारलक्षणम् । तेपांनिष्ठातु
विज्ञयाविद्वाद्भःसप्तमेपदे।। मनुः-पाणिग्रहणसंस्कार सवर्णा
सूपदिश्यते।मनुः-विवाहमात्रसंस्कारंशूद्रोपिलभतेसदति ॥
मांगपरिशिष्टे स्वपितृभ्यः पितादद्यात्सतसंस्कारकर्म
२४२ विवाहपद्धात भा० टी०
णि ॥ पिण्डानोद्वहनात्तेपांतदभावेपितत्क्रमादिति विवाह
स्यसंस्कारत्वेसतितत्रविशेपोवक्ष्यते। वलादपढताकन्याम
न्त्रैर्यदिनसंस्कृताः॥ अन्यस्मैविधिवद्देयायथाकन्यातथैवसे
ति पराशरभाष्यादिधृतकात्यायनवचनेनराक्षसादावपहर
णमात्रेकन्यव।
यथावा-अद्भिाचाप्रदत्तायांम्रियेतोर्द्धवरोयदि।नचम
बोपनीतातुकुमारीपितुरेवसेति ॥
विवा-उद्धाहतत्वधृतवसिष्ठवचनेनवाङ्मावदानेउदक
पूर्वदानेवामंत्रसंस्काराभावेअन्यस्मैदेयेतिगम्यते ॥
मंत्रसंस्कृतातुसा-शरीराईस्मृताजायापुण्यापुण्यफले
समेति ॥ अस्थिभिरस्थीनिमा सैश्सिानित्वचात्वचमि
त्यादिभिःशरीराईहराअर्द्धफलभाग्भवतीत्याशयः॥
पतिलक्षणनिर्णयासिंधौ-यथा-नोदकेनचवाचाचकन्यायाः
पतिरुच्यते । पाणिग्रहणसंस्कारात्पतित्वंसप्तमेपदेशतिति
थाचहारातः-पाणिग्रहणेनजायात्वंकृत्संहिजायापतित्वंसप्त
मेपदेइति ॥
अथकाभार्याकार्या-अत्रपैठीनसिः-भार्याकार्याःस-.
जातीया सर्वेपांश्रेयस्यस्युरिति ॥
केनविवाहेन-गंधर्वादिविवाहेपुशुभोवैवाहिकोविधिः कर्त
व्यश्वविभिषणःसमर्थश्चानिसाक्षिकः॥ अवविभिरितिविशे
पणाद्विपस्यात्रनाधिकार इतिविशेषः॥
-
२४३
.
विवाहपद्धति भा० टी०
कोविधिस्तेष्वित्यपेक्षायाम् ॥ गांधर्वासुरपैशाचाविवा
हाराक्षसञ्चयः। पूर्वपरिश्रयस्तत्रपश्चाद्धोमोविधीयते ॥
सवर्णासु-पाणिग्रहणसंस्कारःसवर्णासूपदिश्यतइति-
विप्रेणक्षत्रियादिपरिणयने-शरःक्षत्रिययाग्राह्य प्रतोदो
वैश्यकन्यया॥ मनुः। तथाचयाज्ञवल्क्या-पाणिग्राह्यःसव
सुगृह्णीयात्क्षत्रियाशरम् ।वैश्याप्रतोदमादद्याद्वेदनेत्वग्रज
न्मनः।। वस्तुतस्तु-स्वदारनिरतःसदेतिमानववचनस्यपरदा
रानगच्छेदितिपरिसंख्यापरतायाः सर्वैःस्वीकारेणपरदा
रगमननिषेधातद्वयुदासेनअनिपिद्धस्त्रीगमनं शास्त्रविहित
स्त्रीसंस्कारंविनानुपपन्नमितिसंस्कारआक्षिप्यते॥ सवर्णायां
संस्कृतायांस्वयमुत्पादयेत्तुयम् । औरसंतविजानीयादिति॥
औरसोधर्मपत्नीजः । इति याज्ञवल्क्यस्मृतिः ॥
स्त्रीपरिणयनफलम्-अपत्यधर्मकार्याणिशुश्रूपारतिरु
त्तमा । दाराधीनस्तथास्वर्ग:पितॄणामात्मनश्चह ॥ मनुः॥
लोकानंत्यदिवःप्राप्तिःपुत्रपौत्रप्रपात्रकैः । यस्मात्तस्मात्त्रि.
यःसेव्याःकर्तव्याश्चसुरक्षिताः ॥ याज्ञस्मृ०पुन्नानोनरका
यस्मात्पितरंचायतेसुतः ॥ तस्मात्पुत्रइतिप्रोक्तइत्यादि
पुत्रःपुरुत्रायतेनिपरणादापुंनरकंततस्त्रायतइतिनिरुक्तम् ।।
पुत्रेणलोकायतिपोत्रेणानंत्यमभुते इत्यादि ।
कीहशीस्त्रीस्यादित्याकांक्षायाम्-मनुः।। असपिण्डाच
यामातुरसगोत्राचयापितुः । साप्रशस्ताद्विजातीनांदारक
फणिमेथुनेइति
२४४ विवाहपद्धति भा० टी०
तयाहिसहितःसर्वान्पुरुपार्थानसमश्नुते ॥ अनाश्रमीन
तिष्ठेत्तुदिनमेकमपिद्विजः। आश्रमेणविनातिप्टनप्रायश्चित्ती
यतेहिसःदक्षः॥ नगृहंगृहमित्याहुहिणीगृहमुच्यते॥तया
हिसहितःसर्वानपुरुपार्थान्समश्नुते।। द्वितीयमायुपोभागंक
तदारोगृहवसेदितिमनुः। अथनापुत्रस्यलोकोऽस्तीति।निमि
त्तिकानिकाम्यानिनिपतन्तियथातथा ॥ तथातथैवकार्या
णिनकालस्तुविधीयते ॥ अथप्रथमभार्यायांसत्यामन्याधि
वेत्तव्यानवेतिआकांक्षायां मनुःवन्ध्याएमेधिवेत्तव्यादशमे
स्त्रीमृतप्रजा॥ एकादशेस्त्रीजननीइत्यादि।स्त्रीप्रसूश्चाधिवे.
त्तव्यापुरुपद्वपिणीतथाइतियाज्ञवल्क्यः ॥ अधिविनातुभ
र्तव्यामहदेनोन्यथाभवेदित्युक्तेवंध्यादीनामपिभूपणवस्त्रादि
भिर्भरणनतुत्यागःपापभयात् । अधिविनातुयानारीनिर्गच्छे
द्रोपितागृहात् ॥ सासवस्तुनिरोद्धव्यात्याज्यावाकुलसन्नि
धौ ॥ एकामूवातुकामार्थमन्यांवोटुंयइच्छति ॥ समर्थस्तो
पयित्वार्थैःपूर्वोठामपरांवहेत् ॥ अप्रजांदशमेवप॑स्त्रीप्रजांदा
दशेत्यजेत् ॥ मृतप्रजापंचदशेसद्यस्त्वप्रियवादिनीम् ॥
अन्यच्च--अथयदिगृहस्थोद्वेभाय्येविन्देतकथंकुर्यादि
तिवौधायनमाशंक्ययस्मिन्कालेविन्देतोभावनीपरिचरोद
त्युपक्रम्यद्वयोर्भार्ययोरन्वारब्धयोर्यजमानइति ।।
तथाचकात्यायनः-नैकयापिविनाकार्यमाधानभार्य
याद्विजैः । अकृतंतद्विजानीयात्सर्वाभिरिभेदि ॥ एके
कामेवासांसंनह्यादेकैकांगार्हपत्यमीक्षयेत् । एकैकामाज्यम
२४५ विवाहपद्धति भा० टी० वक्षयेदिति ॥ यदेकस्मिन्यूपेढेरशनेपरिवयति ॥ तस्मादे कोद्वेभाव्यविन्देतेति श्रुतिः ॥ श्रुतिस्मृतिपुराणानांविरो धोयत्रविद्यते ॥ तत्रौतंप्रमाणस्यात्तयोधेस्मृतिर्वराव्या सः-विरोधेत्वनपेक्षेतसतिह्यनुमानमितिजैमिनिसूत्रम् ॥ तथाचमहाभारते-एकस्यवव्ह्योविहिता महिप्याकुरुन न्दन । नैकस्यावहवःपुंसःश्रूयन्तेपतयः क्वचित्॥भार्याका U-सजातीया सर्वेषांश्रेयस्यास्युरित्यत्रापिवहुवचनम् ॥ तथाचकात्यायनः-अग्निहोत्रादिशुश्रूपांबहुभार्यःसवर्ण या ॥ कारयेत्तद्वहुत्वेचज्येष्ठयागर्हितानचेत् ॥ सवर्णासुवि धौधय॒ज्येष्ठयानविनेतरेतियाज्ञवल्क्यः॥ तथाचमहाभारते-ददौसदशधर्मायकुश्यपायत्रयोदश। एकैवभार्यास्वीकार्याधर्मकर्मोपयोगिनी । प्रार्थनेचा तिरागेचग्राह्यानेकापिचद्विज ॥ आद्यायांविद्यमानायांति तीयामुदहेद्याद । तदावैवाहिकंकर्मकुर्यादावसथेऽग्निमान् । नि०सि० सदारोऽन्यान्पुनारानुद्वोढुंकारणांतरात् । यदी च्छेदग्निमान्कश्चित्कहोमोस्यविधीयते ॥ स्वेग्नावेवभवे दोमोलोकिकेनकदाचन ॥ कात्यायनः॥ मात्स्येयथा-उदहेद्रतिसिद्ध्यर्थतृतीयांनकदाचन।।मोहा दज्ञानतोवापियदिगच्छेत्तुमानुपीम् । नश्यत्येवनसंदेहोगर्ग स्यवचनंयथेति ॥ तृतीयम्रीविवाहेनुसंप्राप्तेपुरूपस्यतु । आ कविताइनक्ष्यामिशानकोऽहंविधानतः।। इत्युपत्राम्य । विस २४६ विवाहपद्धति भा० टी० . ज्यहोम्यमग्निचविधिनामानुपीपराम् । उदहेदन्यथानवपुत्र पौत्रादिवृद्धिमान् ॥ विमृज्याग्निंकणञ्चमानुपीमुद्हेत्परा म् । अनेनविधिनायस्तुकुर्यादविवाहकम् ॥ पुत्रपौत्रादि संपत्तिश्चतुर्थ्यालभतेनरः । चतुर्थादिविवाहाथैतृतीयेऽर्कसमु दहेत् । ऋणत्रयमपाकृत्यमनोमोक्षेनिवेशयेत् ॥ जायमा नोवैपुरुपस्त्रिभिर्ऋणैर्ऋणीभवतिब्रह्मचर्येणऋपिभ्यःयज्ञेनदे वेभ्यःप्रजयापितृभ्यइति ॥ एतदुक्तंभवति । दर्शितवहुप्रमा गैरेकपुरुपस्यवहुभार्याकरणसिद्धम् ॥ एतद्विपये किस्वव उतब्राह्मणादिभिरसवर्णाःकार्याअत्रकोमुख्य कल्पः क श्चगौणः॥ अत्रोच्यते।यथाहमनुः-सवर्णाद्विजातीनांप्रशस्तादार कर्मणि । कामतस्तुप्रवृत्तानामिमास्युःक्रमशोवराः॥ शू दैवभार्याशूद्रस्यसाचस्वाचविशःस्मृते । तेचस्वाचैवराज्ञ श्चताश्चस्वाचाग्रजन्मनः॥ तथाहयाज्ञवल्क्या-तिस्रोवर्णानुपू]णद्वेतथैकायथाक्रमम् ब्रह्मक्षत्रविशांभा-स्वाचैवशूद्रजन्मनः ॥ भार्याःकार्य्याः स्वाजातीयाःसर्वपश्रेियस्यास्युरिति मुख्य कल्पस्तदनुचत स्रोत्राह्मणस्यतिस्रोराजन्यस्यद्वेवैशस्येति ॥ सवर्णायांसव सुजायन्तेहिसजातयः ।अनिन्येषुविवाहेघुपुत्राःसन्तानव ईनाइतियाज्ञवल्क्यपैठीनसिमन्वादिवचनैःस्वजातीयविवा हे विशेपफलप्रतिपादनात्मुख्योऽयंकल्पःसर्वैरभिवंद्यः । कामतस्तुप्रवृत्तानामिमा स्युःक्रमशोवराः । यदिकामादा विवाहपद्धति भा० टी० २४७ गाल्लोभात्क्रमशःप्रवर्तते तदोत्तमंपक्षमाश्रयेदितिनिष्कपः याज्ञ स्मृ० अथविवाहभेदानिरूप्यन्ते-त्राझोविवाह आहूयदीयतेशत्यलंकृता । तजःपुनात्युभयतःपुंरुपानेक विशति।। यज्ञस्थऋत्विजेचैवआदायापस्तुगोहयोचतुर्दशन थमजःपुनात्युत्तरजश्चपट् ॥. इत्युक्त्वाचरतांधर्मसहयादीय तेऽर्थिने । सकायापावयेत्तच्चपट्पइंश्यान्सहात्मना ॥ सुरोद्रविणादानाद्वंधर्व समयान्मिथः ॥ राक्षसोयुद्धहरणा स्पैशाच कन्यकाच्छलात् ॥ पाणिग्राह्य संवर्णासुगृह्णीयात्क्ष त्रियाशरम् । वैश्याप्रतोदमादद्याद्वेदनेत्वग्रजन्मनः॥ अधिकारिणःकन्यादानस्य ॥ पितापितामहोभ्रातास कुल्योजननीतथा । कन्याप्रदःपूर्वनाशेप्रकृतिस्थ पर परः॥ अथकतिविधा पुत्राः-औरसोधर्मपत्नीजस्तत्समः पुत्रि कासुतक्षे० ज०ाक्षेत्रजातस्तुसगोत्रेणेतरेणवा।। गृहेप्रच्छन्न उत्पन्नोगूढजस्तुसुतःस्मृतः दद्यान्मातापितावायंसपुत्रोदत्त कोभवेत् ॥क्रीतश्चताभ्यांविक्रीत कृत्रिमःस्यात्स्वयंकृतः। दत्तात्मातुस्वयंदत्तोग:विन्नःसहोटजः॥ उत्क्षिप्तोगृह्यतेय स्तुसोऽपविद्धोभवेत्सुतः।इत्याद्युपक्रम्यांते ॥ पिण्डदोंशहर चैपांपूर्वाभावेपरःपरः ॥ इत्यादिप्रमाणेःपुरुपस्यवहुस्त्रीत्वं सिद्ध्यते॥अवाशंक्यतयथावहवःपुरुपस्यस्त्रियएवंस्त्रीणाम पिवहवःपुरुपाःस्युः ॥ अत्रकिमानं येनपुरुपेणबहवःस्त्रियः कार्याः नतुस्त्रियावहुपुरुपाइतिशयमानंप्रत्याह ॥ भयतांभोः॥ ..
.
है
२४८ विवाहपद्धति भा० टी०
तथाचश्रुतिः-यदेकस्मिन्यूपेढेरशनपरिवयति । त
स्मादेकोद्वेभाय्येविन्दते ॥ इतिश्रुतिःतस्मादेकोबव्हीर्विन्द
तेइतिश्रुतिः ॥ तस्मादेकस्यवह्वयोजायाभवन्तिनैकस्यवह
वासहपतयइतिश्रुतिः॥
तथाचस्मृतिः। याज्ञवल्क्यः ॥ सकृत्प्रदीयतेकन्याहर
स्तांचोरदण्डभाक् ॥ मृतेजीवतिवापत्यौयानान्यमुपगच्छ
ति।सेहकीर्तिमवाप्नोतिमोदतेचोमयासह।। इत्यादिश्रुतिस्मृ
तिनिष्पन्नत्वात्पुरुपस्यैववहवास्त्रियोनतुस्त्रीणां बहुपुरुपा
न्यथाव्यभिचारप्रसङ्ग स्यात् ॥
यथाहमनुः-आपधर्मोपदेशंचवेदशास्त्राविरोधिनाय
स्तकॆणानुसंधत्तेतद्धर्मवेदनेतरः। नतुस्वकपोलकल्पितयु
क्तयः॥ इतिश्रुतिस्मृतिपुराणनिष्पन्नोविवाहस्यसंक्षेपतोनि
र्णय कृतः। विस्तरस्तुतत्तद्थेभ्योज्ञयति शम् ॥
इतिश्रीकर्पूरस्थलनिवासिगोतमगोत्र (शोरि ) जात्या
लंकृतदैवज्ञदुनिचन्द्रात्मज० पं०विष्णुदत्तवैदिककृतविवा
हनिर्णयःसमाप्तःशुभमस्तु ।
(विधवाविवाहखण्डनम् ॥)
विदित होकी इस समयके आधुनिक - पंडितमन्य
स्वामी दयानंदानुयायि महामायि आई बताई एस्स आई
पंढनेसे शास्त्र वेदकी पंडिताई करनेवाले अनपढ यही सन्दे
चिल्लाते हैं कि देखो भाई इन विधवास्त्रियोंका फिर वि-
वाह करना बहत अच्छा वेदप्रतिपादित है ।" इस्में प्रथम
. विवाहपद्धति भा० टी० यही कहना चाहिये कि यदि ठीक हैं तो आप अपने घर- मेडी क्यूं नहि करते अगर वेदमें लिखा है तो प्रमाण दो आर्य उत्तर देता ओमायो डीयर (अन्यमिच्छस्वसु- मगे. पर्तिमत्) अर्थ है मेरी स्त्री मेरे बिना और पतिकी इच्छाकर ॥ सो यदि वेदको मानते हो तो ठीकहै ॥ उत्तर वाह जी वाह मंचकी.एक.टांग लोकोंको वहंकाने वास्ते प कई छोडीहै.प्रथम यह संपूर्ण मंत्र तो कह अर्थ करो तो तुम आपही जान लेगें आरयूबडवी) यह मंत्र क्या औरभी है ॥ नाहि भाई तुमारे लिने, इतनाही मंत्रहै । बस आपके स्वामीका पोल गोलम मोल-मालूम हो गया कि सपैदरी- छोको नकेल मंत्रकी पाकर नचाते है ॥ अंगर तुमको य- थार्थ वैद आताहो.तो कभी नये रास्ते नानिकालते यद्यपि (उपदेशोहि मूर्खाणां प्रकोपाय न शांतये ) परंतु भूलेको रास्ते पाना लिखाहै सो आप सावधान हो मंत्र और अर्थ सुने ।। अमेरे प्यारे मित्र केवल आप लोकोको अनजान होनेसे अपने पंथ (सहेकी तीन टांगवत) चलाने के लिये स्वामीजीको जाल है। अन्यथा आजतक पीछे लोग पढेही . नहिथे वा स्वामीजीने पंचम अन्यही वेद पढा सोदेखिये॥ । यह मंत्र ऋग्वेदं मं १० सू० १० । मं१० है । आघाता गच्छन्नुत्तराणि युगानियत्र जोमयकारष्य न्त्यजामि । उपवहि वृपभाय वाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिमत् ।। मंत्र १० इस्का निरुक्त पूर्वपट्क . अध्याय ४ अनु० २०.॥ ओगमिष्यति तान्युत्तरा णि युगानियत्र जामयः करिष्यंत्यजामी कर्मा- णि जाम्यतिरेकनाम वालिशस्य वा समानजाती- यस्य वोपजन उपधेहि वृषभाय. वाहुमन्यमिच्छ. स्वसुभगे पति मदिति व्याख्यातम् ॥ भाषार्थ-वह.घोर कलियुग आवेगा जिस्मे भ्राता मगि- नीयोंके साथ पापकर्म करेगेसोहे.यमी भगनि मुझसे २६०. विवाहपद्धति भा. टी. अतिरिक्त अन्य जातिका बलिष्ठ पुरुषसे विवाहपूर्वक भो- गकी इच्छा कर ।। भावार्थ यह वेद मंत्रका है कि यमयमी. का संवाद है उस्मे यम भ्राता अपनेसे यमी. भगिनी भोग करनेकी इच्छा रखतीथी तब यमने यह वाक्य कहाँ की मै तुमारा.भाई हूं सो बडा पाप है तुम अन्य जातिका वरकी इच्छाकर सो यह मंत्र तो भ्राताने भगिनी प्रति कहा है। नहि पति स्त्रीको कहता है कि तुम मेरे विना और पति करलों क्या वह नपुंसक वा वृद्ध हो आज्ञा कर्ता छः ।। आर्य क्यूंजी हमारेको स्वामीजीने और आज्ञा दीहै की स्त्री ग्यारह ११ पति करलें ॥, वह मंत्र यह है ॥ ऋवेद मंडल- १० सूक्तं.८५ ॥ मत्र इमांत्वमिन्द्रमीदःसंपुत्रांसुभगांकृणु । दशास्यांपुत्रानाधेहिपतिमेकादशंकृधि ।। सो इसका अर्थ क्या है ॥ वाह जी वाह अरे भोले आर्य श्राता तुम कुछ व्याकरण पढों तुमको अर्थके नामालुम होनेसे यह अंधकार है । अर्थ श्रवण करो। अन्वयः ॥ हे इंद्र इमांत्वम् ट्वःसपुत्रांसुभगां कृणु में. स्यां दशपुत्रान् आधेहि पुत्रैःसहितमएकादशंपतिकृधि। भाषार्थ-वे इंद्र इस्को तुमस्तुतियुक्त पुत्रयुक्त पति युक्त करो और इस्से दशपुत्र उत्पन्नहो दशंपुत्रोंके साथ ग्यारहवा पतिभी वृद्धिको प्राप्तहो अर्थात् इस्के पुत्र १० और, पति- जीवें तो यह पुत्रान् बहुवचन और पति एक वचन है। सो विशेष सायणभाष्यसे मालूम करो ॥ और “ नष्ट्र मृते प्रव्रजिते " इस स्मृतिका अर्थ स्त्रियोंक आचारमें लिखा है वहांसे.देखलें । और विवाहप्रकरणमे भी विशेष लिखाहै। विस्तारके भयसे नहि लिखा। इति श्रीदेवजनिचंद्रात्मज पं विष्णुदत्तवैदिककृतसंक्षेपविधवाविवाहखण्डनम् ।। अथ वधूप्रवेशप्रयोगः।। तत्र चतुर्थीकानन्तरं पुत्रोत्साहिविधानादिलौकिका चारं यथासंप्रदायं कृत्वा वरःपित्रादत्तांवधूं गृहीत्वा महोत्स .
. वरेषु नामवाचनपुरःसरं वध्वानाम प्रतिष्ठितं कुर्यात् श्री- विवाहपद्धति भा० टी २५१ प्रियुतः रथेवंध्वाः दक्षिणंत उपविश्य मंगलवाद्यघोषपुर:- सरं मंगलगीतपरैः पुरंधीजनराचार्यादिवि आनोभद्राः स्वतिन इन्द्रोवृद्धश्रवा इतिस्वस्तिवाचनपुर सरैश्चस्वगृह गच्छेत् । ततोवधूपिता दासीहस्ते दीपंदत्वा सहैवनयेत् ।। पर्यकादि यथाशक्तिं यथारुचि पारबर्हच दद्यात् ।। स्वर- हमागतेसपत्नीकेवर वरमाता ओदनंबलिंगृहीत्वादृष्टयुत्ता- रणं कुर्यात् गृहद्वारसमीपेप्रथमंतंडुलपूर्णा कंचुकी वधूहस्ते दद्यात् ॥ सातांगृहीत्वातत्रसततं तण्डुलानवकिरंतीद्वीप- द्वयंयुक्तद्वारमततोऽनेकदीविराजितगृहं . वधूः पादौ सुवर्णोपरिनिधाय वरेण सह.प्रथम दक्षिणपादपुरःसरंमंत्र वाद्यघोषहप्रविशेत् ॥ ततः शृंगारिते महानसे वस्त्रा- च्छादितें पीठे वर प्राइमुख उपविश्यं दक्षिणतः वधूमुंपवे- श्य इत्यखिलंलोकाचारमात्रम् ॥ ततोवरः आंचम्प प्राणा-. 'नायम्य देशकालौ स्मृत्वा अस्याः मम नवोदाया भार्यायाः प्रथमांगमने गृहप्रवेशांगलया विहितं मम सकलमनोरथ सिद्धयर्थ लक्ष्मीप्राप्त्यर्थ ज्येष्ठाख्यलक्ष्मीपूजनमहं करिष्ये।।. महानसपूजन राणपतिपूजनं स्वस्तिपुण्याहवाचनंच क रिप्ये ॥ इति संकल्प्य ॥ ततो ज्येष्ठाख्यलक्ष्मीपूजनं महा- नसंपूजनं गणपति पूजन स्वस्तिपुण्याहवाचनंच विधिव त्कृत्वा ततः यथांचारप्राप्तं कांस्यपात्रे तण्डुलान्प्रसार्य त दुपरि सुवर्णशलाकया श्रीकुलदेवताप्रयुक्तमादा अमुकी. तनाम विलिख्य ॥ ॐमनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्प तिर्यज्ञामिमंतनोत्वरिष्टं यज्ञ समिमंदधातु । विश्वेदेवास इहमादयंतामोप्रतिष्ठ ।। इति मंत्रेण प्रतिष्ठाप्य ॥ ओश्रीश्चते लक्ष्मीश्वपत्त्यावहोरात्रै पाश्र्धनक्षत्राणि रूपमश्विनाव्यात्तम्।। डणनिषाणामुम्मऽइपाण सर्वलोकंमद्दषाणाइत्यनेत मंत्रण षोडशोपचारैः संपूज्य ॥ अन्यद्यथाकुलाचारं कुर्यात् ॥ ततो. कुलदेवताप्रयुक्तमादौ अमुकनाम प्रतिष्ठित मिति विर्वाच २६२ विवाहपद्धति भा० ट्री वाक्षतान्दद्युःब्राह्मणेभ्योगधतांबलदक्षिणादिवत्वा तेरा पो यहीयात् इति वधूप्रवेशः ॥ श्रीहरिविजंयते । वंशवर्णनम् । न्यायशास्त्रस्यकर्तायाह्यक्षपागोतमोमुनिः महाप्रभावोसजर्षिर्मुनिमान्यअभूदिद। तस्यरत्नविशुद्धस्मिन्वंशेस्यादानुपूर्व्यतः ॥ महाप्रभावीविद्वांश्चकनैयालालविश्रुतः ॥२॥ तत्पुत्रोविशुद्धात्माश्रीतुलसीरामनामतः॥ अभूब्यापारविद्याांकुशलोधर्मपरायणः॥३॥ विवर्गसाधयित्वायोगांसमनुगम्यच ।।. ध्यानयोगेनसंपश्यन्नीश्वरंव्यसृजत्तनम् ॥ ४ ॥ ततभावाञ्चतत्सूनुं सर्वशास्त्रविचक्षणः ।। अंनन्यकल्पोदेवज्ञोदुनिचंद्रइतिश्रुतः ॥५॥ तस्यात्मजेनविदुषाविष्णुदत्तेनशौरिणा। वैदिकोपाव्हयुक्तनकृतोयग्रंथउत्तमः॥६॥ नत्त्वाश्रीरामनाथंचशास्त्रिणस्वगुरुतथा । श्रीमद्गोपालनामानमयोध्यावासिनंगुरुम् ॥७॥ श्रीहरिभक्तमहात्मानंशास्त्रिंणप्रणमाम्यहम् ॥ यमुनादचंचविद्वांसभायलाग्रामवासिनम् ॥ ८॥ मित्रंचसाधुरामश्चविष्णुदासतथैवच ॥ अन्यान्स्वाध्यायवर्गीयानमस्कृत्य पुनःपुनः ॥९॥ श्रीकपूरस्थलेरम्येअद्विवेदांकभूमिते॥ . वैक्रमेमधुमासेचकृताटीकामनारमा ॥ १०॥ यदशुद्धमसंबद्धमज्ञानेनकृतंभया । विद्वद्भिाक्षम्यतासमत्वामामल्पमेधसम् ॥११॥ विशेषेणार्यपुष्पाञ्जलिः। श्री।। पुस्तक'मिलनेकाठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास श्रीवेङ्कटेश्वर छापाखाना-