Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Jivavichar Prakaran Mool

2011/03

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है
१
है
ॐ
-
से
प्रथम जैनमार्गमा प्रवेश PART
जीवविचार प्रकरण मूल
गलावबोध सहित.
आ पुस्तक
मनोने जादोपत्री
दा नुदा, जागोनी जोतिया
नावमा माटे
मणवाने अथे धणोज उपयोगी होगरायी
भीगुवापुरीमध्ये ..
श्रावक नामसिद माणके
श्रीनिर्णयसागर मद्रायनमा मुद्रिा गच्यु
एनन् १९४० मन
--
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॥ श्रीगोतमाय नम
॥ अथ श्रीजीवविचार प्रकरण प्रारना॥
,
प्रयम अयानी श्रीशांतिसूरि, आँधमा मंगलाचरण
करतां प्रयोजनाटिकनु सुचन करें-
॥थायवित्ती
नुवण पश्च-धीर, नमिऊण नणामि
अबुद् वोहेछ । जीव सरूव किचि
वि, जहभाणियं पुबसूरीदि ॥१॥
अर्थ -(जुपए के) त्रय नुवन, एटले चतुर्द
श रज्ज्वात्मा जे लोक, तेनविप (प के०) प्रदी
प समान भने सकन पापने दूर करनारा एवा (ची
र के०) श्रीमहावीर स्वामीने, (नमिकण के०) नम
स्कार करीने, (जह के ) जेम, (पुत्वम्ररीहि के०)
। सुसम्म वाम्याटिक पूर्वसूरिजए, (नणिय के०) पोता
ना मागममा प्रगट कर दे, तेम दु पण, (यधुनोद
के) तर विचारनेविपे अज्ञानी जीवोने वोरथ
वाने अथ, (सिंचिवि के) लेशमात्र, (जीपसमय
केर) जीपनु स्वरूप, (नणामि के०) कह॥१॥

. -- (२) हवे जीवना जेट कही बतावे - जीवा मुत्ता संसा, रिणो अंतस थाव रा अ संसारी ॥ पुटवि जल जलप वाऊ, वणस्सई थावरा नेआ ॥२॥ अर्थ -(जीवा के०) जीव ते एक मुक्तिना तथा वीजा ससारी, ए वे प्रकारना , तेमांना (मुत्ता के)ज सकल कर्मरूप पटलोनो क्ष्य करीने मु क्ती पढने पाम्या वे ते सिह जीयो कहेनाय , (अके) तथा ( ससारिणो के०) जेमा समृति ने पमाय 2 ते ससार कहेवाय , एवा ससारनी नरकादि चार गतिमा जेब्रमण करें , ते स सारी जीवो कहेगाय , ते ( ससारी के०) ससा रीजीवना एक (तस के० ) त्रस (य के ) वली, वीजा ( थारा के) स्थावर, ए वे प्रकार , तेनमा ना स्थावर जीयोना पाच प्रकार , ते या प्रमाणे एक (पुढवि के०) पृथ्वीकाय, वीजा (जल के०) पाणी ते अपकाय, त्रीजा (जलण के) ज्यसन ते अनिकाय, चोथा (वाज के) वायुकाय पांचम) (वणमई के) वनस्पतिकाय, एवी रीते एथ वराके) स्थावर जीवो (नेथा के०) जाणवा ॥२॥ हवे ए स्थावर जीवोना नेदमा अनुक्रमे प्राप्त यएला टवीकाय जीवोना नेट कहे - फलिद मणि रयण विहुम, दिगुल ह रियाल मणसिल रसिदा ॥ कणगा धान सेढी, वन्नि अ अरणेय पलेवा ॥३॥ अप्नय तुरी ऊसं, मही पा हाण जाणेगा ॥ सोवीरजण लू णा पुढविनेआइ श्चाई ॥४॥ अर्थ-(फजिद के० ) स्फटिक प्रसिम, (म (ण के०) मणि ते चकातादिक अथवा जे समुश्मा उत्पन्न थाय ले ते, तथा (रयण के०) रत्न ते वज कर्केतनादिक अथवा जे खाणमा उत्पन्न थायवे ते (विहुम के) परवाला अथवा विथुम, (हिगुल के०) हिगलो, (हरियाल के०) हडताल, (मणसिल के०) मामीन, (रसिदा के०) पारो अथवा रसेइ, (कण र गाउ के) कनकादि धातु सात -सोनु, रूप, बांबू, कधीर, जसत, शीसुं, तथा लोहोढे, ए अनिसयो गना धनावे पृथ्वीकाय थने थग्निसयोग तेकका य ले ( सेढी के ) रवडी माटी अथवा चाफ कहे वाय ते, (वनि के०) हरमजी यथवा लाल रंग नी माटी याय ते, (धरणेय के० ) पापागना कटकानी माथे मजेली बोलीमाटी थाय ले ते तया (पलेवा के ) ए एक जातिनो पापाण ॥ ३ ॥ (थप्नय के० ) पांच वर्णनो अनरख, ते सोनी लोकोने सोनु तपाववाना उपयोगमा थावे वे अ थवा वैद्य लोको एनी जस्म वगेरे करीने योपधिमा वापरवाने कामे लगाडे , (तूरी के ) एक जा तनी माटी , ते कापडने पास देवाना काममा आवे , ( सं के०) ए पण एक जातिनी माटीज वे, पण दार लुमिमा उत्पन्न याथी दार अथवा खारो ए नामें उलखाय ठे, एवी रीते (मट्टी के० ) माटी, अने (पाहाण के) पापाण, ए चे पदार्या नी काली, नीली, राती, पीली अने वोली एवी (जा वणेगा के ) अनेक जातियो वे ते वधी सेवी तथा ( सोवीरजण के०) ए मुरमो एवे नामें उत्तरखा य ने ते यांग्वमा थजाय वे (सूणा के०) संप) साजी, बिडलवण, काचजपण, तथा समुजवण (५) (च्चाई के) इत्यादि, (पुढविनेया के) टथि वी कायससारी जीवोना नेद कहेवाय ने ॥४॥ हरे वादर अप्काय जीवोनु वर्णन करे - नोमतरिक मुदग, सा हिम करग हरितणू महिना ॥ दुति घणोददि माई, नेआणेगा य आजस्स ॥५॥ अर्थ -(लोम के०) कृपादिनु पयवीमा रहेछ तथा शिरोपानी, ए वधु नूमिजज कहेवाय , (थ तरिरकमुदग के०) सरोपरा दिकनेविपे जे मेघनु पा णी जराय , ते यतरिद उदक कहेवाय ने (उमा (के०) उसनु पाणी, ए तुपार अथवा जाकल पण कहेवाय वे, (हिम के) हिम पड्याथी जे वधाई जाय रे ते पाणी, (करग के०) वाशनुमा मेर प डतावायुना योगे पाणी वधाई कविण यईने धोला पापापना कटकाजेगा प्रथिवी उपर पडे , ते करा अथवा करक कहेवाय '(हरित के) गेला घाम प्रमुस वनस्पतिना मोर अथवा मान प्रमुखना पादाने वेडे जे पाणीना विड थाय ते हरितनु कहेवाय ने, (महिया के) आकाशनेविपे कोई - समये वादला थई श्रावे वे तेना योगे अतिसूक्ष्म जी एणकीणी पाणीनी खुटो पडेले. ते महिका यथवा घूमरीनु पाणी कहेवाय डे, एवी रीतें (थानस्स के०) थपकायना (घणोदहिमाई के)जेने याधा रेपथिवी रही ने ते घनोदधियादि देने वीजा पण (नेयाणेगा के०) अनेक नेदो (हुति के०) थाय , ए अप्काय जीवोना नेद कह्या ॥५॥ हवे तेचकाय जीवोना नेद कहे - गाल जाल मुम्मुर, जकासणि कण ग विङ्गुमाईआ ॥ अगणि जिआणं नेया, नायवा निनणबुझीए ॥ ६॥ अर्थ -(गाल के०) ज्याला विनानो अग्नि, का मुख वस्तुनु सत्व ज्यारे वली जाय , त्यारे य निनी ज्वालानो नाश थई जाय ,अने रक्त रत्ननी पठे चलकिन ककडा थई रहे , ते अगार कहेवाय बे, (जाल के०) ज्वालानो अग्नि (मुम्मुर के०) अमिनी ज्वालामाथी जे सूक्ष्म कण निकले ते त्रास दि अथवा बासडा कहेवाय , (उका के) को क कालनेविपे यकाशमाथी अग्निी वृष्टि थाय , - अथवा नदत्रो पड़े - ते नकापात कहेवाय , (असणी के०) वजनो मार मारता तेमाथी अनि पडे ते अशनि कवाय , (कएग के०) कोक कालनेविपे श्राफागमा थगिना तणवा उडता देखा यो त कनक एटले कपीयानो अग्नि कहेवाय ने (विकुमाईश्रा के०) विजजी श्रादिक ते वशतु प्र मुख कोइ पण अनुमा ज्यारे मावतु थाय ठे, त्यारे कोई वरखतें आकाशथी विजली दृथिवी उपर पडे , ते विद्युत्पात कहेवाय , इत्यादिक (अगणिजिया पा के०) अनिकायससारी जीवोना (था के०) नेटो ते (निकण्वुदीए के०) निपुण एटने सदन चु दिए करी (नायबा के) जाणवा योग्य ते ॥६॥ दवे वायुकाय जीवोना जेद कहे है- ननामग नक्कलिआ, मंगलि मुह सु ६ गुजवाया य॥घणतणु वायाई था, नेया खप्नु वाजकायस्स ॥ ७ ॥ अर्थ -(नामग के०) उचोयाकाशनेपिपेजे वा जय तृणादिकना ठेडाने भ्रमावे ,ते उधामक वायरो कहेवाय , (उतिया के०) जे वायु, नीची पडतो (८) होय ते उत्कतिक वायु कहेवाय ले (ममति के०) ए विटोलि अथवा ममलिक वायु कवाय ने (मुह के) कोकाल महोटो वायरो थाय ते महावायु (सुक्ष के)जे शने शने वाय ते शुक्ष्वायु (गुजवयाय के०) जे गुजारव करे, ते गुजवायु कदेवाय , (घणत णु के) जे चे वायुने आधारे नरक देवलोकादि र हेला , ते एक घनवायु पीजो तनवायु कहेवाय एवी रीते ए (खलु के) निश्चये करी(वायाई या के) वातादिक (वाउकायस्स के०) वायुकाय ससारी जीवोना (नेया के०) नेटो जागा एप माणे उ गाथाय करी टथिवी, अप, तेज तथा वायु कायना नेद कहा ॥७॥ हवे वनस्पतिकायना नेद कहे - सादारण पत्तेआ, वणस जीवा छ हा सुए नणि ॥ जेसिमणताण तणु, एगा सादारणा तेक ॥७॥ अर्थ -(वास जीवा के) वनस्पतिकाय जी वो ते एक (साहारण के०) साधारण अने नीजा (पनेया सु) प्रत्येक ए (उहा के० ) वे प्रकारना '(सुए के) सिवातोनेविप (नाणिया के०) कहेलावे. तेमा (जेसिमपताण के०)जे थनत जीवोनु (ता एगा के०) एक शरीर होय (तेक के०) ते (साहार पाके)साधारण वनस्पतिकाय जीयो जागरा हवे वे गाथाए करी ए साधारण वनस्पतिकाय जीवोना नेद कहे ने कटा अकुर किसलय, पणगा सेवाल नूमिफोडा अ ॥ अक्षय तिय गकर मो, उ वतुला येग पक्षका ॥७॥ कोमल फल च सघ, गृढसिरा सिपा पत्ता ॥ योनि कुँआरि गुग्गुलि, गलो य पमुहाइ चिनरुहः ॥ १० ॥ अर्थ -(कदा के) सरणादि सर्व जातना क्ट (यकुर के०) पाहेर नीकलेजा थंकुर (किसनय 20) सर्वं जातिना कुपलना नवा टसा फूटे ते पात रा जाएगापा (पणगा सेवा के०) पाच वर्णना मेवान जे पाणीनी ऊपर रग रानी पनि थार नेते, (नमि फोडा के०) वर्षाकालमा उत्रने श्राकारे पृथ्वीमाथी

1
नीकलें ते ते (श्र के) वली (अनयत्तिय के)
आईक त्रिक एटले लीलु याद्, लीली हलदर, तथा
लीलो कचूरो, (गकर के) गाजर, (मोड के) मोय
(वनुलो के०) वथुनो नामे गाकविरोप, (थेग के)
वामुरा, थेगी, (पत्रक के) ए नामनु शाकविरोप में
एने लोको पालखु कहे ॥ए ॥ (च के०) वली
(कोमल फल सब के) सर्व कोमल फल एटले जेमा
बीज यया न होय अने (गूढसिराइ के०) जेनो कण
शलो अथवा पोख ठानो होय, एटले जेना कण पाध
रा देखाता न होय,तथा जेनी नसोअथवा सांध्यो स्प
ट दे खाती न होय त्या सधी ते अनंतकाय जाणवा ते
(सिणाइपत्ता के०) सणाटिकना पातरां यादिशन्हें
करी जारना पातरा पण लेगा (योहरि के) घोहर
नी सर्व जाति, एमा काटालो तथा खुरसाणी पण जा
एवो (कुँवारि के) कुमारि थाय ने तेलोकमा प्र
सिह ,एने घरमा उची टांगी होय तो पण सूकाती
नयी कितु एनानवा मोर नीकलता जाय डे (गुग्गु
जि के) गूगल प्रसिक (गजोयपमुहा के०) गडू
ची प्रमुख एने गडू पण कहे , ए वल्लीने याकारे यार
, ए ज्वरादिक मटाइवानीयोपचिविशेष ने (था
प

-
(११)
के) ए थादें देइने वीजा पण सर्वे जे (विन्नरुहा)
वेद्या थकां पण वाव्यायी फरीने जगे, ते सर्व सा
पारण वनस्पति अथवा अनतकाय कहीये ॥ १०॥
चाणो अणेगे, वति नेया अपत
कायाण ॥ तेसि परिजाणणच, ल
कणमेय सुए नणिय ॥ ११ ॥
प्रथ-(चाणो के०) इत्यादिक (थपतका
याण के)यनतकाय जीवोना पिम, कचूर तयागि
रिकर्णिकादिक (धरणेगे के०)अनेक (जेया के०)
नेटो (हवति के०) होय , (तेमि के ) ते अन
तकाय जीमोने (परिजाणण के)सारी रीत जा
णवाने अर्थ (एय के०) था वक्ष्यमाण एटले जे
श्रागत केहेहो ते (तरकण के) जपो (नुए
के.) सत्रोनेविपे (नापिय के०) कह्या ॥११॥
हवे श्रनतकाय वनस्पतिजीमोना लदाणहीतावे
गूढ सिर सधि पब, ममनग मदी
रुग च चिनरुद् ॥ सादारण सरी
र, तधिवरीअ च पत्तय ॥ १२॥

(१२) अर्थ-(सिर के) कणसला प्रमुख शिर, (संधि के)साधा अथवा नसो, (पच के०) पर्व अथवा गांठो, एत्रणे जे फाडनां (गूढ के०) गुप्त गनां होय, एटले दीवामान आयतां होय अने (समनगके )नों ग्याथी जेना सरखावे फामिया थई शकतां होय (थ हिस्ग के) ततु रहित जेमा तातणा होय नही, (च के )पुन एटले पली(विन्नरुद के) जेटीने फरी वावीए तो ऊगे, ए सर्व प्रकारना वृदोने (साहारणं सरीर के०) साधारण वनस्पति कायना शरीर कहिये, यने एज अनतकाय पण कहेवाय वे (तविवरीयं के०) ते थकी विपरीत सदाप वाली वनस्पतिने (प नेय के०) प्रत्येक वनस्पतिकाय कहियें ॥ १२ ॥ एग सरीरे एगो, जीवो जेसि तु ते य पत्तेया ॥ फल फूल गल्लि कहा, मूलग पताणि बीयाणि ॥२३॥ अर्थ-( एग सरीरे के) एक शरीरने विपे (एगो जीवो के०) एक जीप (जेसि तु के०) जे वृदने विप होय ( तयपनेया के०) तेने प्रत्येक वनस्पनि --- (१३) काय कहिये ए प्रत्येक वनस्पतिकायना सात प्रका र नेते श्री प्रमाणे -(फल के ) सर्वप्रकारना फल, (फूज के ) सर्वप्रकारनां फलो, (बलि के) कप रनी त्वचा अथवा हाल, (का के०) सर्वप्रकारनु काष्ठ अथवा लाकडु (मूलग के ) जुइ तलीयानु थड, (पत्ताणि के०) सर्व जातिना पांदडा (वीया णि के०) सर्व वीज, ए साते स्थानक प्रत्येक जिन जिन जीवरूप होवायी एउने प्रत्येक वनस्पतिकाय कहियें एवी रीतें ए वाटर प्रथिव्यादिक पाचे था वरना नेद विवरीने कह्या ॥ १३ ॥ दवे पाच स्थावर सूक्ष्मनु वर्णन करे - पत्तेय तरु मुत्तं, पचवि पुढवाइणो स यल लोए । सुदमा वति नियमा, अत मुदुत्तान अदिस्सा ॥ १४ ॥ अर्थ-(पनेपतरु मुत्न के०) ए पूर्वोक्त प्रत्येक व नस्पतिकाय मूकाने (पचवि पुढवाणोके०)पाचेष्टयि व्याटिक (सयल लोए के) सफल चौट राजतोफनेवि पे (सुहमा के)सम (हवति के) होय ते (नियमा के०) निश्चय करी एने पाच स्थावर कहिये ते (अंजाम - (१५) दुत्ताउ के०)थतरमुहूर्तना थायुष्यवाला होय वे ध ने (अदिस्ता के०) अदृश्य होय ने एटले चर्मदृष्टिएं देखाय नही तेथीज ए सूक्ष्म कहेवाय ते ॥ १४ ॥ ए पाच स्थावर सदन थने पाच वादर मलीने दु शनेट थया धने प्रत्येक वनस्पतिकाय ते वादरज होय , पण सूक्ष्म होय नही तेथी प्रत्येक वनस्प तिकायनो एक जुदोजनेट होवाथी सर्व घग्यार ने द याय ते ते अग्यार पर्याप्ता तथा अग्यार अपर्या ता मलीने वावीश नेद स्थावर संसारी जीवना कहा ने अने जीजा ससारी त्रस कवाय ठे, तेना मूल चार नेट वे ते था-वडी, तेंडी, चोरिडी तथा पचेसी, तेउमाना प्रथम वेडी त्रस जीवना नेद कहे ते. सख कवड्डय गॅमुल, जलोय चंदणग अलस लगाई। मेहरि किमिपूत्र रगा, वे इदिय माई वाहाई॥ १५॥ अर्थ -(सख के०) दक्षिणावर्त प्रमुख मोटा त था नाना शख होय देते, (कवड्डय के) कपर्दक अथवा कोडी थने कोमा थाय ने ते, (गमुल के.) १. गंमोला एने गगुता कहे ने, एउटरमा महोटा कमिया

(१५)
उत्पन्न थाय ने ते,जाणवा (जलोय के) जलो ए शरी
रनी ऊपर फोडा वगेरे पाव्या होय त्यारे तेनी कप
र मूक्याथी ते जग्यानु रक्त शोपण करी निये येते,
(चदणग के) एने सिक्षातोमा श्रद एवा नामथी
प्रतिपादन कसु , एने थारिया पण कहे , ते साधु
स्थापनामा राखे ठे, (अलस के ) वर्षाकालमा त
टि थाय ने ते वरखते एथिवीमाथी सर्पना श्राकारे
लाल रगवाला जे यति पातला जीवो उत्पन्न थाय
वे, ते ज्या मुधी वाट थतो होय त्यां सुची ज्या त्या
घणा फरता दीनामां आवे छे, ज्यारे वर्षांट रही जाय
के,ने तडको पडे वे त्यारे ते मानो एक पण दीठामा
पावतो नथी एने नूनाग अथवा अलसिया पण क
हे (सहगाई के) रोटली प्रमुख पकायेनु बन्न
वासी रही गयायी केटलाएक काले तेमा जे जीव प
डे , तेने लालिया कहे (मेहरि के०) काठमा
जे कीडा थाय नेते, (किमि के०) ए पण एकजात
ना कीडा होय चे, ते उदरमा उत्पन्न याय वे, जेवा
के, गुदप्रदेशने विपेहरसा थाय , तथा गुबडा वगेग्ना
इतने विपे जे कीडा थाय ने तेने कमि कहे वे (पूय
रगा के०) ए जीव पाणीमा उत्पन्न थाय , एजी

. (१६) चोनो वर्ण रातो होय अने मुख का दोय. एने कही नापामां पूरा कहे थने (माश्वाहाईके) मातृयाहादिक एने चुडेल पण कहे , मूल गाथामां आदि शब्दचे ते यादिशथी मनुष्यना थगमा जे वा ला थाय ने ते पण सेवा, न्यादिक (वेदिय के०') वेंझिय जीव जाणी लेवा, ए जजमां तथा स्थलमा उत्पन्न याय ते अनेक प्रकारना ते एउने स्पर्शने यि तथा रसनेश्यि ए वे ऽभियो होय ॥१५॥ हवे वे गाथावडे तेही जीवोना नेद कहे - गोमि मकण जूआ, पिपीलि उद्देदिया य मकोडाल्लिय धयमिल्लीन, सावय गोकीड जाईदागहदय चोरकीडा, गोमयकीडाय धनकीडा य॥ कुंथु गुवा लिय इलिया, तेदिय इंदगोवार॥ अर्थ-(गोमी के०)कानखजरिया, एना पग घ पा होय ते,ने ए कानमा पेशी जईने माणसने घणी इजा करे , एम कहेवाय - (मका के०) माण सना स्वाना रिवानामां अथवा वाटला प्रमुखनी नवारमा जे जीवो उत्पन्न थाय ने तेने मांफड कहे ,

(१७)
(जूया के) यूका, ए जीवोमाणसना माथाना वाल
मा उत्पन्न याय ,अथवा माणसना कपडामा उत्प
न्न थाय वे,एट ए माणसना शरीरना मेलमाथी
स्पन्न थाय चे एने कही तथा गुजरातीचापामां लीख
कहे चे, ते सस्रुत जिद शब्दनो अपनश (पि
पीति के) एने पिपीलिका, कहे , एनी राती थने
काली एवीधणी जाति होय, ते लोकमांप्रसि.
(उदेहिया के०) उद्देहिका, एने वाल्मिक जीपण
कहे ए जीवो वृक्षमा, काठमा अथवा गृहमा ज्यां
ज्यांप्रवेश करे हे त्या त्या पोतानु शरीर रहेवा पूरतुं घर
वनावीने तेमांयी ते वृदादिकने खाती खाती चाली
जाय (य के०) वली (मझोडा के०) मकोटिका,ए
जीव घणु करीने वावलना फाडना थडमा उत्पन्न था
य ,अथवा गोल प्रमुग्व मिष्ट पदार्थ ज्या होय त्यां
। थाय वे (इलिया के० ) इलिका ए जीव धान्यादिक
मा उत्पन्न याय ने एने ईज पण कहे वे (घयमिनी
उके) ए जीव घृतमा उत्पन्न थाय ठे, एने धीमेल
पण कहे वे (सावय के०) सावा ए जीव मनुष्यनाश
रीरना माथा शिवाय वीजा सर्व अवयवमाना केशोना
थडमां उत्पन्न थाय ने तेमां पण विशेपे करी थांखो

(१७)
नी पापणमां थाय वे ते जे वखतें मनुप्यना शरीरमां
उत्पन्न थाय ते वखते नविष्यकालविपे एवु अनुमा
न थाय ने के कां पण कष्ट प्राप्त थशे एने लोक
सावा कहे वे (गोकीडजाईन के०) गोफीटक जाति,
ए जीव गाईप्रमुख पशुना शरीरना अवयवोमा उत्पन्न
थाय ठे, ते तेउनी त्वचामा चोटी रहेला होय ने एने
कही नापामां चिञ्चडी अथवा गोगीडा पण कहे
॥ १६ ॥ (गद्दहय के०) ए जीव गऊशाला प्रमुखमा
उत्पन्न थाय एननो वर्ण श्वेत होय ,एनने शास्त्रो
मां उत्तिगा पण कहे ने (चोरकीडा के) ए जीव
विष्ठामा उत्पन्न थाय बे (गोमयकीडा के) ए जीव
ठाणमां उत्पन्न थाय ने (धन्नकीडा के०)ए जीव
धान्यमा उत्पन्न थाय , ते लोकमां धनेरिया एवे ना
मे उसखाय (य के०) वली (कुथु के)ए जीव
सूक्ष्म उता पाच रगना थाय , एने कुथुआपण कहे
ठे (गोवालिय के०) गोपालिक, ए एक जातिना ए
वाज जीव थाय , ते अप्रसिदचे (इलिया के)
इलिका, ए जीव खांम अथवा चोखामा उत्पन्न थाय
वे (इदगोवाइ के) गोपादि, एजीव वश्तुमा
वर्षात् पडे त्यारे उत्पन्न थाय ने, एनो अत्यत रक्तवर्ण

होय , एने लोकमां मेहना मामा पण कहे ये 5 त्यादिक (तेदिय के ) त्रीडिय जीवो वीजा पण घणा ते ते सर्व जाणीलेवा एत्रीयि जीवोने स्प र्शनेश्यि थने रसनेश्यि तथा घ्राणेंघिय एत्रण दि यो होय ने एम ए तेंश्यि जीवोना नेद कह्या ॥१७॥ हवे चतुरिश्यि जीवोना चेट कहे . चरिदिया य वितु, ढिकुण नमरा य जमरिया तिड्डा ॥ मच्चिय मसा मस गा, कसारी कविल मोलाई ॥२७॥ अर्थ-(चरिदिया के०) चतुरिक्ष्यि जीवोथाचे (वित के) विधू एजातना जहेरी जीवो थाय , तेना पूण्डामा एक काटो होय , तेना मारथी माणसने विप चडे , ते चितृ एवे नामे लोकमा प्रसिदले (ढि कुण के०) ए जीवो काइक मदिकाने मलता होय , ते घोडाना तवेला प्रमुखने ठेकाणे उत्पन्न थाय ठे, तेने लोकमा बगाई कहे (जमरा के)ए जीवो काला वर्णना होय , अने ते घणु करीने ज्या सुगधिक पु प्पोना वृदो होय रे त्या रहे , ए जीवोने पुप्पोनो सुगध घणो प्रिय होय उ ए चमर एवे नामे लोक -

(२०)
मां प्रसिद (जमरिया के०) भ्रमरिका, ए जीवो
पीतादिक घणा रगवाला होय चे, तेमज विविध था
कारवाला होय रे (तिड्डा के) ए जीवो वाक'
तुना अवसानमा जे वरखते धान्यना रद पाकी रहे
ला होय , ते चखते आकाशमार्गे अगणित सख्या
वक्ष उडता कोइ धान्यना क्षेत्र वगेरे ऊपर आवीने
पडे ,ते जेटली जगामां आवी पडे ,तेटली जगानां
जाड पान वगेरे सर्व खाईने सफा करी नाखे , ते
तीड एपे नामे लोकमां प्रसिद (महिय के)
मक्षिका, ए जीवो लोकमां यति प्रसिद, ए मा
खी एवा नामें उनखाय , उपसणथी मधुमक्षि
का पण जाणीवी (मसा के०) मांसा ए जीवो:
सिधुदेशमा प्रसिद्ध ए घj करीने वकालमांची
कडनी जमिनमा उत्पन्न थाय (मसगा के०) म
सक, ए जीयो लोकमा महर एवे नामे उतरवाय ने,ए
लोकमां प्रसिद्ध के, (कसारी के०) ए जीवो घणु क
रीने साड घर प्रमुखमा उत्पन्न थाय वे,ते लोकमांप्र
सिघ , (कविलमोल के०) तेमां कवित एटले कोलि
थावडा यने मोलिका एटले त्रीलोडीतेने लोकमां
खडमांकडी कहे , ए बदु प्रसिद नथी,(आके०)

4 (२१) थादि शब्द थकी पतग तथा ढिढण प्रमुख वीजा जे चरिस्यि जीवो होय ते सर्व जाणी सेवा, ए जीव ने स्पर्शनश्यि, रसनेश्यि, ग्रा0श्यि, तथा नेत्रेश्यि ए चार इश्यिो होय ॥१७॥ हवे पंचेश्यि जीयोना नेद कहे - पचिदिया य चनदा, नारय तिरि था मणुस्स देवा य॥ नेरश्या सत्त विहा, नायबा पुढविनेएण ॥२॥ अर्थ -(पचिदिया के०) जेने स्पर्शनेंझ्यि, रसने झ्यि,नाणेश्यि, चक्षुरिक्ष्यि,तथा श्रोत्रेश्यि ए पाच शियो होय ते पचेंघिय जीव कहेवाय ठे, शहा“च" समुच्चयार्थमा ले ते जीप (चव्हा के) चार प्रकारना ने एक (नारय के०) नारकी, वीजा (तिरिया के०) तिर्यच, त्रीजा (मषुस्स के) मनुष्य, चोथा ( देवा के०) देवता, तेउमा प्रथम (नेरश्या के०) नारकी जीव ते (पुढविनेएण के०) रत्नप्रनादि पृथ्वीना ने करी (सत्तविहा के०) सात प्रकारना (नायबा के) जाणी लेवा ते सात पृथ्वीना नाम कहे वेरना ना, शर्करामना, वालुकापना, पकाना, धूमप्रना, त (१२) म प्रना, तथा तमस्तमप्रना, ए सात 'ठेकाणे उत्पन्न थएला जीवोने नारकी कहिये तथा वीजां नाम कहे वे घमा, वशा, सेला, अंजण, रिन, मघा, तथा माघ वती, ए नाम पण वे एसात प्रकारने पर्याप्ता तथा थप र्याताना नेदें गणतांचौदनेद नारकी जीवोना थायडे हवे पचेंड्रिय तिर्यचना नेद कहे - जलयर थलयर खयरा, तिविदा पंचे दिया तिरिका य॥ सुसुमार मच क उव, गाहा मगरा जलचारी॥२०॥ अर्थ -(तिरिरका पचेंदिया तिविहा के०) तिर्य चपंचेंश्यि त्रण प्रकारना , ते था-एक (जलयर के) जलचर एटले जे जीवो पाणीमा उत्पन्न था' य, पाणीमां रहे, तथा पापीमाज नाश पामे, तेज लचर जीव जाणवा वीजा (थलयर के०) स्थल चर एटले जे जीवोनी उत्पत्ति, स्थिति तथा नाशनो सनव जलचरोनी पत्रे पश्चि पर होय ते, तथा त्री जा (खयरा के०) खेचर एटले जे जीवोनी चाल वानी स्थिति आकाशने विपे होय ते जाणवा, ते मां प्रथम जलचर जीवना मुख्य पांच नेद ने ते आ

(२३)
प्रमाणे- एक (ससुमार के) पामाना जेवा मत्स्य
होय , ते घणु करी मीठा पाणीना तलाव प्रमुख
मां दीठामा थावे , वीजा (मठ के) नानाप्रका
रना जे वीजा मानां दीठामा श्रावे हे ते, ए जाति
ना जीवो घणुं करी खारा समुष्माहे विशेप दीवामां
थावे ,त्रीजा (कठव के०) कठप ए जीवो घणु
करी मीग पाणीना तलाव अथवा खोदेला कूवाना
पाणीमां दीगमां थावे , एनी त्वचा घणी कठिण
होय वे थने तेमांथी दाल,एवा नामनो हथीयार देह
रदाणाथै लोक करे वे, ए जीवने लोकमा काचवाना
नामें उनसे , चोथो (गाहा के)ए जीवो समुह
मा तेमन मीना पाणीना तलाव प्रमुखमां पण थाय
ठे ए जीव तंतु थाकारें होय ठे, ने अति बलवान हो
य, पाणीमा एनु एटलुं जोर होय रे के, ते हाथीने
पण घसडीजाय , एने लोकमा फूड एवे नामें उजखे
'वे, (मगर के०) मकर एजीव समुश्मां होय ठे, एनुश
रोर थति विशाल होय , ए लोकमा मगरमत्स्य एवे
नामें उजखाय ने, ए (था के०)थादिशब्दें करीबी
जा पण (जजचारी के०)जलचर जीव घणा प्रकारना
ए जलचर पंचही तियेच जीवनानेद कह्या ॥२०॥

+
.
(२४)
हवे स्थलचर जीवोना नेद कहे -
चउपय उरपरिसप्पा, नुयपरिसप्पा य
थलयरा तिविदा ॥ गो सप्प नजल
पमुहा, बोधवा ते समासेणं ॥१॥
अर्थ -(थलयरा तिविहा के) स्थलचर जीवो
त्रण प्रकारना ठे, ते आ-एक (चउपय के०) चतु
प्पद एटले चार पगवाला सर्व प्रकारना पशुजाणी
सेवा, बीजा (उरपरिसप्पा के०)रपरिसर्प ए जीवो
नदरथा चाले ने एनी नाग प्रमुख घणी जाति होय
जे,एमां केटलाएक जीवो विपरहित होय ,अने केट
ला एक विपसहित होय , ते लोकमा प्रतिदने,
(य के०) वलीत्रीजा (नुयपरिसप्पा के०) जुजपरि
सर्प ए जीवो भुजावडे चाले ले ते नोतिया प्रमुख
जापी सेवा ए ऊपर कह्या जेत्रण प्रकारना स्थल
चर जीयो तेश्रनुक्रमे (गो के०) गाईप्रमुख ते चतु
प्पद, (सप्प के) सर्पप्रमुख ते उर परिसर्प तथा
(नवलपमुहा के०) नोलियाप्रमुख ते सुजपरिसर्प,ए
(समासेष के०) सपमात्रे करी (वोधवा के)
जापी सेवा, ए स्थलचर जीवोना नेद कह्या ॥१॥

हवे खेचर जीवोना नेद कहे - खयरा रोमयपरकी, चम्मयपरकी य पायडा चेव नरसोगा बादि, समुग्गपरकी वियय परकी ॥२॥ अर्थ -(खयरा के०) खेचर जीवो ते आकाश नेविपे विचरनारा जे पदी ते वे प्रकारना -एक (रोमयपरकी के०) रोमन पदीन, एटले जेना पदो रोमसंयुक्त होय ,जेवा के गुक, हस तथा सारसा दिक पदी तेमज पारेवा, कागडा, चक्ला, पोपट प्र मुख एनी पारख मोवालानी होय , ते (य के) वीजा (चम्मयपरकी के०) चर्मजपदोनो (पायडा के०)प्र गट अर्थ वे एटले जेनी पारखो चामडाना जेवी होय तेने चर्मपखी कहीये जेवा के, चामाचीडिया थ थवा चर्मचीटिका, तथा वडवागुल अथवा वदगुलीप्र मुख ए (चेव के०)निश्चे लोकमा प्रसिद्धचे थने (न रलोगाउँ वाहि के०) मनुष्य लोकनी बाहेर (समुग्ग परकी के) समुन पदी, तथा (विययपरकी के) वितत पदी होय तेमनुष्य लोग्नु प्रमाण शास्त्रो मां थावी रीते का बे-जबुदीप, धातकीखम, तथा (२६) पुप्फर वर हीपना घर्ष जाग सुपी मनुष्योनी वस्ती के एटले ए बढी दीपोमां मनुप्यो ते बढी दीपोम ना प्रथम जवुद्धीपने चोफेर खाश्नी पेठे लवण सस वीटी रह्यो , तथा वीजा धातकी खंमने, काल दधि चींटी रह्यो अने थढीहीपनी चोफेर स्वर्णमा मानुष्योत्तर पर्वत किमानी पठे वेष्टित थ रहेलो में एनर लोकत्रिनु प्रमाण एकदर पिस्तालीश तारख य जननु का छे शहाज मनुष्योनां जन्म तथा मरएन सनव होवाथी ए मनुष्य लोक कहेवाय बे, तेथी व हेर कपर कहेला वे जातिना पदोन होय वे, तेम समुभवत् पदीयोनी पारख वेसती वखते सकोचने प मे जे, अने विततपदीयोनी पांख सदासर्वदा विस्त रेलीज होय जे ए सर्व खेचर जीवो जाणवा ॥१२। हवे ऊपर त्रण प्रकारना जे तिर्यच जीवो कहा। एकेकना वली वे वेद धीजी रीत कहे - सब्बे जल थल खयरा, संमुहिमा गत या उदा ढुंति ॥ कम्माकम्मग नूमि, अंतरदीवा मणुस्सा य ॥ १३ ॥ सर्थ -ए कपर कहेला (सधे के०) सर्व प्रकारन 4

(२)
(जल थल खयरा के) जलचर, स्थलचर तथा खेच
र जीवो ते एक (समुचिमा के०) समूमि अने वीजा
- (गप्नया के०) गर्नज ए (उहा के०) धिा एटले वेप्रका
रना (हुति के) 2. एम प्रत्येकना बब्बे प्रकार होवा
थी नेद थया तेमा जे जीवो माता पितानी अपें
का पिना उत्पन्न याय ते समूर्टिम कहेवाय ने यने
जे जीवो गर्नमा उत्पन्न थाय ते गर्नज कहेवाय ठे
तिहां एकेंझ्यि, झझ्यि, त्रीश्यि तथा चतुरिंशिय ए सर्व
जीयो समूर्तिमज होय छे ए तियंचना सर्व मली अ
डताजीश ने थाय ने ते थावी रीतें -प्रथम एकेंश्यि
जीव वधा थावर कहेवाय तेनावावीश नेदभागल
चौदमी गाथाना अर्थमा दर्शाव्या ने अने बीजात्रस
जीवनावेंडी,तेडी,चौरिंडीयने पंचेंडीए चार नेद मूल
वे तेमां बेंडी, तेंडी, तथा चोरिछी एत्रण विकलेंडीने
पर्याप्ता तथा थपर्याप्ता गणता व जेद थाय ते पूर्वी
तवावीश साये मेलवता अभावीश नेट थया
हवे पचेंडी तियंचना वीश नेट वे ते देखाडे
जलचर, थलचर, खेचर, उर परिसर्प थने सुजपरि
सर्प,ए मूल पांच नेद समूर्छिमनाथने पांच गर्नजना
मती दश नेद थाय ते उश पर्याप्ता अने,
Ma

(२६) पुष्कर वर हीपना अई नाग सुधी मनुष्योनी वस्ती, एटले ए थढी छीपोमां मनुप्यो चे ते श्रदी वीपोमा ना प्रथम जवुछीपने चोफेर खानी पे लवण समु ६ वींटी रह्यो , तथा वीजा धातकी खंमने, कालो दधि वींटी रह्यो ने यने घढीहीपनी चौफेर स्वर्णमय मानुप्योत्तर पर्वत किन्नानी पर्ने वेष्टित थ रहेलो . एनर लोकदेवनु प्रमाण एकदर पिस्तालीश लाख यो जननु का ने शहाज मनुष्योनां जन्म तथा मरणनो सनव होवाथी ए मनुष्य लोक कहेवाय , तेथी वा हेर कपर कहेला वे जातिना पहीन होय , तेमां समुभवत् पदीयोनी पांख वेसती वखतें संकोचने पा मे , अने विततपदीयोनी पांख सदा सर्वदा विस्ता रेतीज होय ने ए सर्व खेचर जीवो जावा ॥२॥ हवे कपर त्रण प्रकारना जे तिर्यंच जीवो कह्या तें एकेकना वली ये वे द बीजी रीतें कहे - सचे जल थल खयरा, संमुचिमा गन्न या उदा ढुंति ॥ कम्माकम्मग नूमि, अंतरदीवा मणुस्सा य ॥ २३ ॥ सर्थ-ए ऊपर कहेला (सधे के) सर्व प्रकारना (२७), - ग्य का चौदमी गाथाना थर्थमा दर्गाव्या ३ अनसहरिवर्प क्त वावीश साये मेसरता अस्वी जलचर, थलचर, ग्वेचर, हापारि यार्नु (जल थल खयरा के) जलचर, स्थनचर तथा खेर र जीवो ते एफ (समुछिमा के) समूर्तिम अने बीजा (गप्नया के) गर्नज ए (हा के०) धिा एट प्रका रना (हुति के०) . एम प्रत्येकना चे प्रकार होवा थी व नेद यया तेमा जे जीवो माता पितानी बरे का विना उत्पन्न थाय ते समूर्टिम कहेवार को जे जीवो गर्नमा उत्पन्न याय ते गर्नज कडेवार तिहां एकेंड़िय, घोड़िय, त्रीयि तथा चतुरिड़िया जीवो समूर्तिमज होय ए तिर्यचना सर्व मानी । इतनी डतालीश नेद थाय रे ते थावी रीने प्रथम पूवो जीव वधा थावर कहेवाय ठे तेना वावी गदिश मा एक जीवनावेंडी,तेंडी,चोरिंदीथने पीएम ने तेमा वेशी, तेंडी, तथा चाग्दिी गलीया पर्याप्ता तथा थपर्याप्ता गणना ना वर्ने चे हवे पचेड़ी तिर्यचना वीर निपध सर्प,ए मूल पाच नेद ममूर्णिमा मली दश नेद नि वे प थी उत्त

w
(२०)
प्तिा मली वीश जेद थया, तेने पूर्वोक्त यावीश
साथे मेलवता घडतालीश नेद तिर्यचना थाय. ए
रीतें गाथाना पूर्वार्डमां पचेंही तिर्यचनु वर्णन कयु
हवे गाथाना उत्तराईमां पंचें मनुष्यना नेद कहे
-(कम्माकम्मग नूमि के०) कर्म नूमिमां उत्पन्न
थएला, अकर्मनूमिमा उत्पन्न थएला तया (अंतर
दीचा मणुस्साय के ) तर बीपमा उत्पन्न थएला
एत्रण प्रकारना मनुष्य होय ने तेमां रुपिवाणिज्या
दिक कर्मप्रधान नूमि ते कर्मनूमि कहिये, ते नूमिने
विपे जे मनुष्य उत्पन्न थाय ते ते कर्मभूमिज कहेवा
य ले ते कर्मनूमि थढीहीपमा पंदर चे अने जे
मा कृपी वाणिज्यादि कर्म नथी एवी अकर्मनूमि
त्रीश , तथा अतरदीप उप्पन्न ले ते या प्रमाणे
ए जबुदीपना मध्यनागे मेरु पर्वत ते मेरुया ददि
पदिने लवणसमुश्ने लगतो लवण समुश्नी उत्तरदि
शें चरत क्षेत्र जे, ते कर्मनूमिज तथा ते जरतक्षेत्र
ने उत्तरतिशिने वेहेडे हेमवत पर्वत वे ते पर्वत मूकी
तेनी उत्तरटिशिमा हिमवत नामे युगलीयानु देव ने
अने वली मेरुथकी उत्तरदिशें लवण समुइनें लगतुंस
मुश्नी दक्षिण दिशें ऐरवत क्षेत्र २ ते कर्मभूमिज .
-

(ए) रदिशे मेरुनी तरफ मागची निस्ट्र ते ऐरवतनी दक्षिणदिशिने नेहेडे शिम्पी नाम पर्व त, ते पर्वत मूकीने तेनी दक्षिण दिशा हम्मा वत नामें युगजीयानु क्षेत्र से एटाने गुर्दे जा हिमवत अने बीजो हिरण्यवंत एवेन ठे एने विपे युगलीया मनुष्य रहे में जान में एक गाउ देहमान ने एक पल तिहा सदा का त्रीजो यारो बनो. तथा चली ते पूर्वोक्त दिमन्नाने तर तथी उत्तर दिशें एक मदादिमत उत्तरदिशे दरिवर्प नामें पुगनीम केट, क हिरण्यवत नामें युगजीपाना देवको विपरी एक रूपी नामें पर्वत के तेल का रम्यक नामे युगलीया त्रि तथा बीजो रम्यक एवेत्र वसे ने तेनु सदा का कुन व्योपम आयु निदा महा तथा वली दरियन नामें पर्वत ते तेनी पान नाम क्षेत्र तथा पती मेनाटि जे पे, वा ने Fcter यंत नी मार -

(३०)
युगलीयानु देव ,तेनायी दक्षिण दिशे नीले वर0 ए
क नीलवत नामे पर्वत , ते पर्वतथकी दक्षिण दिशे
मेरुनी पासें एक उत्तरकुरु नामें युगलिया देवले.
एटले एक देवकुरु अने वीजो उत्तरकुरु ए वे अकर्म
नूमि क्षेत्र के तेने विपे युगलीयां मनुष्य रहे ने तेनु
सदाकाल त्रण गाउनु देहमान अने त्रस्य पढ्यो
पमायु तिहां सदाकाल पहेलो थारो वर्ने
तथा निपध अने नीलवत ए वे पर्वतो कहा तेनी
वचा मेरु पर्वत , ते मेरुनी चारे दिशि मांहेथी पूर्व
दिशे पूर्व महाविदेहनी शोल विजय ते अने पश्चिम
दिशे पश्चिम महा विदेहनी शोल विजय ने एबेदुमली
पत्रीश विजयनो एक महाविदेह नामे कर्मनूमिदेव
ए रीते प्रथम जवुद्दीपने विपे एक हेमवत अने हि
रएयवत, वीजो हरिवर्प ने रम्यक, त्रीजो देव कुरु ने उ
तर कुरु, ए त्रण जोडले मलीन क्षेत्र युगलीयां मनु
प्यनांबे तेथफर्म नूमिज कहीये, कारण के ए क्षेत्रोमा
जे मनुष्य रहे वे तेने प्रायें कर्म थोडा लागे कैम के
असी मसीने कसी एत्रण वस्तु कर्मबंधनु कारण ते
वस्तु ए देनोमा नथी अने एक जरत, एक ऐरवत,
तथा एक महाविदेह मजीत्रण क्षेत्र कर्मचूमिज ने

एसमुझमध्ये वे बेदाढा नीकली।
[
सांचो ते पर्वतनी पूर्व तया पश्चिम एकेकी शिलव
(३१)
, ए रीते बीजो धातकीखम हीप श्रने पुप्पाबाई
थई ए टोढ हीपमा प्रत्येकें प्रत्येके एक पूर्वटिमिय
अने वीजो पश्चिमदिगिय मली वे वे मेरु पर्वत तय
ने ज्या एक मेरु होय तिहां एक नरत एक ऐरवन
तथा एक महाविदेह, एत्रण कर्मनूमिकेत्र होय थने
पूर्वोक्त जयदीपनी पेठे उ युगलीयाना क्षेत्र होने
वारे वे जरत, वे ऐरवत, वे महाविटेद,
पत्रक
मनूमिनां अने ये हेमवत, वे हिरण्यवत वे ददर्ष,
वे रम्यक्, ये देवकुरु थने वे उत्तरकर, सर्वमनीया
र युगलीयाना क्षेत्र धातकीनाम वीजारमयने
तेटलाज वली पुप्फराई नामा त्रीना काहीपमा
पण जे केम के ए वेदु दीपमा यब मेरु
ए रीतें ए अढीद्दीपना देवने एकला वय तेवा
त्रीश त्रि थकमनूमिना यने पर देन कर्मनूमिना
थाय, सरवाले पीस्तालीश देव मनुप्पनां थया,
हवे वली उप्पन्न नेट नीचा दावाडे के अचूदीप
माहेला नरत देवना उत्तरने वेडे हेमवत नामा
त ते पूर्वदिशे अने पश्चिम दिहा लवण समर
ई
તેવા

(२) चार दाढाउँथइ तेवीजरीतें ऐरवत देवने दक्षिणने के हेडे शिखरी नामें पर्वत .ते पण पूर्व पश्चिम देमवंतनी परेलांचो तेमाथी पण हेमवंतनी रीतें वे दिशियम ली चार दाढा समुश्मां निकली ए ये पर्वतनीआ दाढा माहेली एकेकी दाढाने विपेसात सात अत रदीपले,तेवारे श्रात दाढाउने प्रिपे वप्पन्न थतर हीप थया तेने विपे पण युगलीया रहे,तेनेथतर छीपना मनुष्य कहीये,ते मनुष्य एकांतरे थाहार लीये वेत था तेमना शरीरनी चंचा थावसो धनुप्यनी, श्र ने पत्योमना असख्यातमा नाग जेटलुं तेमनु वायु डे ए प्रमाणे मनुष्यना पिस्तालीश नेट पूर्व कह्या ते नी साथे ए थंतर दीपना वपन्न नेट मेलवता ११ नेद थाय तेने पर्याप्ता ने अपर्याप्ता ए वे प्रकारे ग पीये, तेवारे २०२ जेट थाय तथा वली एहिज ग नज मनुष्यना मन, मूत्र, लेप्म प्रमुख चौद स्थान कने निपे जे उपजे तेने समूर्हिम मनुष्य कहिये,तेस मूर्णिम मनुष्य सर्वथधुरी पर्याप्तियज मरण पामे जे. माटे ए अपर्याप्ताज होय तेथी एना १०१ नेद पूर्व क्त २०२नी साथे मेलवता ३०३ नेद मनुष्यना था य ए रीते मनुष्य पंचेंडीना नेद कहा ॥२३॥ d -- w

-
1
भ
।
।
त
श्रम नरकन दस जाडपणे यजमर्नु
तरे एकेका लग्नपनि देवानी निकाय . ते दोनि
कायमा प्रत्येक एक ददिरा थने एक उत्तरें मला
चेश्य ने तवार निकायना पींश ने ए
(३३)'.
हवे चार निकायना देवोना नेट कहे -
दसहा नवणादिवई, अविदा वाण
मंतरा इंति ॥.जोइसिया पंचविदा,
अविदा वेमाणिआ देवा ॥ २४ ॥2
थर्थ-जवनपति, व्यतर, ज्योतिप्क तथा वमा
निक, ए चार प्रकारना जे देब ने, नेउमाना(दतहान
वणाहिवई के ) जम्नास्पिति देवांना दश रेटनेने
था-थसुरकुमार, नागकुमार, सुपर्णकुमार, विद्युतुक
मार, थनिकुमार, दीपकुमार, वधिमार, दिदिक
मार, वायुकुमार तथा स्तनितकुमार, एमट कसा
हवे एनु रदेवानुं स्थान कहे में रखना नाम
, तेमा तेर पायदान ते दर पायदाना वार या
रा, तेमांची पहेलो थने नेहेनो धानरो मूकीने
बाकीना दश धानरा, रचा न्या, ननांहे एकदा
नवनपति ६
शानक का
.

-
३
(३४)
हवे वीजा व्यंतर निकायना देवो कहे . (ब
विहा वागमतरार्दुति के)थावप्रकारना वायव्यंतर
देवो , तेमां व्यंतर देवोना था नेद जे, ते श्रा'-
पिशाच, नूत, यद, रादत, किन्नर, किंपुरुप, महोरग,
अने गंगर्व, तथा वीजायणपन्नी, पणपन्नी, कृषिवादी,
नूतवादी, कदित, महाकदित, कोहम, पतंग, ए श्राप
जेटजेने ते वाणव्यंतर देवोना जाणवा.
मेरुपर्वतना मूलमां सरखी दृथिवी वे -तिहाथी मां
मी नीचे जश्ये तेवारे ( १७००००) योजन रन
प्रना पृथिवीना तलीया लगण थाय, तेमांथी एक ह
जार योजन कपर यने एक हजार योजन नीचे मू
कीये वाकी (१७००००) योजनमां पूर्वोक्त तेर पा
थडा जे तेमा दश नवनपतिना देवो रहे अने उप
रता एक हजार योजन मूक्या वे तेमांथी वली शो
योजन हेतल बने शो योजन ऊपर मूकी बाकी था
शो योजन रह्या तेमां बाउ व्यंतरनी निकाय ,ए
आठ निकायमां पण दक्षिण अनें उत्तरदिशि मली
एकेकी निकायना ये वेश, तेवारें शोल व्यं
तर देवोना ले तया, वली उपरला जे एकशो योज
न मूक्या तेमांथी वली दश योजनकपर तथा दश

रानां विमान ने, तिहांची दश योज. सूर्यनु विमान
तिदेवोना वीश व मेलवी तेवारंवावन श थाय.
= .(जोसिया पत्रविहा के ज्योतिष्क देवोना
तारा, ते फरीदे प्रकारना ठे-एक चरनेवीला स्थिर
ते जे मनुष्य वनविपज्योतिषी ते चर एटले थ
स्थिर सदा काल फरतारहे ,धनेजे मनुष्य क्षेत्री
"बाहेर ते स्पिर ने कैम के तेमनां विमान फरतान
पेमांची एक चश्मा थने बीजो सूर्य. एवेने शप
दवीचे वीजाने पदवी नयी मेरुने मूः संन्तला
पदीयकी सातशे ने योजन उंचा जय तिहां ता
योजन नीचे मूलीय बाकी ऐसी योजन रहेतेमांथा
कारना वायनर देवो न्हे एमां पण पूर्वोक
३. सेनें एकेकी निमायने विषे गणतांशोज
६ वाज्यंतर देवांना सर्व मजा वे प्रकारना व्यं
तरदेदोना बत्रीय हवे तेनी मा पूर्वोक्त नवनप
"हवें त्रीनी ज्योतिषी देवोनी निकायना देदो कहें
पाव भेद ते था-च, सूर्य, ग्रह, नत्र तथा
L
के, तिहाथी
जे, तिहां
थी उंची
पीचार
जन चश्मा
नश्वना
.

१
-
शोज योजनमा वली जूदा जूदा ग्रहनां विमान ठे
ए रीते सर्व मती सातशे नेबु योजनथी परें एक
शो दश योजनमा ज्योतिषी देव रहे .
हवे चोथा वैमानिक देवोनी निकायना देवो कहे
वे (विहा वैमाणिया देवा के०) वैमानिक देवो
नावे नेद , ते कहे . एक तो जे श्रीतीर्थकरादि
कना पांच कल्याणकने विपे थावे जाय ले ए एनो
कल्प एटले थाचार जाएवा माटे एने कल्पोपपन्न दे
वो कहीये ते देवता सौधर्म ईशानादिवार देवलोकना
ने करी बार प्रकारे ने ते बार देवलोकमां वली
याच देवलोक पर्यत तो प्रत्येके एकेको ५ वे थ
ने नवमो तथा दशमो ए वे देवलोकनो मती एक
इले तथा अगियारमो थने बारमो ए वे देवलोक
पण, एक एरीत वार देवलोकना मती दरा
इंजे यने पूर्व नवनपतिना वीश-तथा व्यतरना
वत्रीश अने ज्योतिपीना चे.मली चोपन २६ कहा
नेनी साये ए दग इ मेलवीये तेवारें सर्वमती चो
शत ३२ थाय ए सर्व कल्पोपपन्न देवता कहेवाय
हवे वीजा जे कल्प एटले आव्या गयानो याचार
करी रहित वे तेने कल्पातीत देवो कही, तेना
M

.
(३७)
1
वजी के भेद ,एक तो नव वेयकना देवो थने
बोजा पांच थनुत्तर विमानना देवो जावा
हवे ए कल्पोपन्न तथा कल्पातीत देवोना स्थानक
कहे जे. चवद राजलो तेमां सात राज नीच साते
नारकीयें करी पूखो वे थने सात राज उँचो ने ए ची
दुराज लोक पुरुपर्ने थाकारे, तेमा नानिने स्थान
मनुष्य लोक ने अने मेरुने मूलें सनूतता पृथिवी ठे
तिहाथी सातों नेवु योजनथीमामीने नवशे योजन
पर्यत वचा ज्योतिषी देवों रहे ,तेवार पनी एक राज
ने थाशरे उंचा जश्ये तिहां दक्षिणदिशे सोधर्म देवलो
कथने उत्तर दिशे ईशान देवलोक, एरीते थे देवलोक
जोडा जोडें ले तेवार पठी वली केटलाएक उंचा ज
श्य तेवारें वस्तीत्राजो सनत्कुमार दक्षिण दिशिये थ
ने चोथों माहें उत्तर दिशे, ए रीतेचे देवलोक जोडा
जोहे ने तेवार पनी वली पाचमो ब्रह्मदेवलोक, को
सांतक, सातमो शुक्र,थाउमो सहस्त्रार, ए चार देवलो
कथनुक्रमें एक एकनी ऊपर केटले केटले यांतरे एक
सा एकलाजले तेवार पठी चली केटला एक उचा जई
ये तिहां नवमो थानत अने दशमो प्राणत एवे देर
लोक दक्षिण बने उत्तरे जोडा जोडे जे तेवार

(३०)
यती पण केटला एक उंचा जये तेवारे धगीयार
मो श्रारण्य अने बारमो अच्युत, एचे देवलोक ददि-
ण अने उत्तरदिशे जोडा जोडें जे, तेवार पडीवाली केट
लाएक उचा जयेंतेवारें चउद राजलोकरूप पुरुपना
गलाने स्थानके नव ग्रैवेयक तेवार पठी वली केटले
क उचे पांच अनुत्तर विमान ने, तेवार पनीचोदराज
लोकरूप पुरुषना ललाटने काणे सिमशिला ले, ते
स्फटिक रत्ननी परे निर्मल ने, तिहा सिना जीवोर
ह्या वे एम ए देवताने रहेवाना स्थानक कह्यां हवे ३
हा वलीत्रण प्रकारना किदिबपिया देवो तथा नवन
कारना लोकातिक देवो ले तेने रवानां स्थानक ब
तावे , तिहां प्रथम किल्बिपिया देवोनां स्थान कहे
बे एक तो पहेला थने वीजा देवलोकनी नीचें त्रण
पल्योपमना आयु वाला रह्याने अने वीजा वली त्री
जा तथा चोथा देवलोकनी नीचे त्रस्य सागरोपमना
आयुवाला रहा ,तथा त्रीजा वली पांचमा अने उस
देवलोकनें नीचें तेर सागरोपमना आयु वाला रह्या
ने एत्रणे प्रकारना किस्विपिया देवो चमालप्राय जा
रणवा तथा वली पाचमा देवलोकने हेडे उत्तर
पूर्वनी अन्यतर कृष्णाराजीमा नव प्रकारना

१(३१) जीवोना एक (सरीर के०) शरीरोनु बन के०)जपन्यतया उलायी श्रीजु (निई सकामि के) एक viry पामीने फरि त्यांज उत्पन्न था स्थिति तेनुं प्रमाण, चोथु (पाणा श प्राणन प्रमाण, पांच मुं (जोणि 'शी लच योनिमाहेती- कया कथा टली योनियो दोय तेनु प्रमाणते जे जे जीवातुं जेट .(तन सोनु नेटनु अमें कहीये ॥ २ ॥ ना प्रमाणनो प्रकार कहे -- ख नागो, सरीर मेगि 1 ॥ जोयण सहस्स पत्तेय रुकाणं॥३॥ गिदियाश सगर के सर्वे भून एक्सि डीवाना करी ग N म ग Jay " 9 श नु 1 -- ५ - . (५०) हवे वीजा सिम जीवोना भेद कहे - सिहा पनरस नेया, तिठ अति चाइ सिनेएणं ॥ एए सखेवणं, जीव विगप्पा समरकाया ॥५॥ अर्थ.-(सिधा के०) सिबते सर्व कर्मोथी मुक्त थ एला जीवो, तेना (तिन अतिना के) तीर्थकर तथा अतीर्थकरादि (सिनेएण के)सिना जे करी (पनरस जेया के०) पंदर नेद थाय ने ते पंदर जेट ना नाम नवतत्त्वना बालाववोधथकी जाणवा (एए सखेवेश के ) ए पूर्वोक्त सर्व सोपे करीने (जीव विगप्पा के) जीवना विकल्प एटले नेद ते (सम, स्काया के०) रुडे प्रकारे कह्या वे ॥२५॥ हवे जे पागल कहेवा योग्य ते मूल ग्रंथ कर्ता पोतेज गाथा वडे कहे एएसि जीवाणं, सरीरमाक लिई सकायंमिपाणा जोणिपमाण, जे. सि जं अजित नणिमो ॥२६॥ अर्थ -(एएसि के ) ए पूर्वोक्त एकॅझ्यिादिक, . - .

(at) (जीवारों के)जीवोना एक (सरीर के०) शरीरोनु प्रमाण, बीजं (थाक के)जघन्यथी तथा उकरथी वायुप्यतुं प्रमाण, त्रीजें (लिई सकायमि के) एक चिादिक जीवो मरण पामीने फरि त्यांज उत्पन्न था य, एवी लेखकायस्थिति तेनु प्रमाण, चोथु (पाणा के) इंडियादिक दश प्राणनु प्रमाण, पाचमुं (जोणि 'पमाण के० ) चोराशी लक्ष योनिमांदेली कया कया जीवोमा केटली केटली योनियो होय तेनु प्रमाण,ते (जेसिजंयमिके) जे जे जीवोनु जेटलुं ने. (नं न 'पीमो के)ते जीवोनु तेटलु थमे कहीशुं ॥२६॥ तिहां प्रयम शरीरना प्रमाणनो प्रकार कहे अंगुल असख नागो, सरीर मेगि दियाण सवेसि ॥ जोयण सदस्स मदियं, नवरं पत्तेय रुकाण ॥५॥ थर्य-(सवेसि एगिंदियाण सरीर के०) म सधा तथा बादर पृथ्वीकाय प्रमुख एकदिन जीना शरी रोनुं प्रमाण (थंगुल यसख जागो कथजना अतख्यातमा लाग जेटलु होय ठे (न के) पण एटली विशेपता ने जे (पनेय माण) ha (४२) क वनस्पतिना शरीरनु प्रमाण, (जोयण सहस्तम, हियं के०) एक हजार योजनथी कांक अधिक होय ने ते समुशदिकनेविपे उत्सेधागुल प्रमाण हजार यो जनना उमा पाणीमां पद्मनाल होय ठे तथा या अ. ढी दीपथी वाहर एवी लता पण होय .याहि यय पि सामान्यपणे पृथ्विकायादिक एकेंझ्यिजीवोना शरी रोनुं प्रमाण अगुलनो असख्यातमो नागमात्र का वे तथापि सग्रहिण्यादिकनेविपे विशेपे करी जाणवामा आवे , के अंगुलना असख्यातमा नागना पण थ संख्य जेद माटे ते प्रमाणे यहीयां पण कहेवू ॥२७॥ एवी रीते एकेंझ्यिना शरीरनु प्रमाण का. हवे हीझ्यिादिक विकलेंश्यि जीवोना शरीरोनुं प्रमाण कहे - वारस जोयण तिन्ने,व गाना जो यण च अणुकमसो॥ वेदिय ते 5 दिय, चनरिदिय देद मुच्चत्तं ॥२॥ थर्थ-मनुष्यदेवनी बाहिर रहेला (वे इदिय के०) शखादिक वेश्यिजीवना शरीरनी उंचाई (वारस जो यण के)बार योजननी होय ने थढीछोपनी बाहें д (४३) र रहेला (तेदिय के० ) कर्णशृंगालादिक तेश्यि जी वोना शरीरनी उचाई (तिन्नेव गाउया के.)त्रण गावनी होय ले तथा अढी हीपनी बाहेर रहेला(च उरिदिय के०) चमरादिक चरिंश्यि जीवोना (देहमु वर्त के० ) शरीरनु उंचपणु (जोयच के) एक योजन होप बे (अपुकमसो के०) गाथाना पदना अनुक्रमें एटले वे इंडियने वार योजन वगेरे कहेवा ॥२॥ ए विकडिय जीवोना शरीरोनुं प्रमाण कयु हवे नारकी थादिक पचेंश्यिजीवोना शरीरोनु प्रमाण कहेतो थको प्रथम नारकी जीवोना शरीरनुं प्रमाण कहे घणुसय पच पमाणा, नेरझ्या स त्तमा पुढवी ए॥ ततो अश्णा, नेया रयणप्पदा जाव ॥ ॥ अर्थ-(सत्तमाइ पुढीए के) तमस्तम प्रना नामनी सातमी थादि नरकप्टथ्वीमा रहेनारा (नेर श्या के०) नारकीना शरीरोनु प्रमाण भावी रीतें बे-(धणुसय पच पमाणा के०)सातमी पृथ्वीना नारकीटना शरीरोनु प्रमाण पाचशे धनुष्य जेटली r (४४) उंचातुं वे एम अनुक्रमें (तत्तो थम्बूणा के ) तेथी थर्ड थर्ड संख्या कपी करवी, एटले श्रदीशे धनुष्य जेटला प्रमाणनु शरीर ही प्रथ्वीना नार- कीयोनो होय वे सवाशो धनुष्य उंचाइनुं प्रमाण पां चमी पृथ्वीना नारकीयोना शरीरोनु होय . साडा बासर धनुष्य कचानु प्रमाण चोथी पृथ्वीना नारकी योना शरीरोनु होय .सवा एकत्रीश धनुष्य कचानु प्रमाण त्रीजी पृथ्वीना नारकीयोना शरीरो होय साडा पदर धनुष्य अने बार थंगुन उंचाईनु प्रमाए वीजी पृथ्वीना नारकीयोना शरीरनु होय . एमथ नुक्रमें (जापरयणप्पहा के०) यावत् रत्नप्रना ना मनी पहेली पृथ्वीना नारकीयोना शरीरोनुं प्रमाण पोणा थाउ धनुष्य थने तथंगुलनु (नेया के०)जोण नु एटलुं स्वनाधिक देह प्रमाण होय हे ते का, पण एन वैक्रिय शरीरनु प्रमाण तो एथी बमणु' होय ॥श्या एम नारकीयोना शरीरोनुं प्रमाण का हो तिर्यच पचेश्यि जीवोना शरीरोन प्रमाण थढी गाथायें करी कहे - जोयण सदस्स माणा, मचा Mainamine 4- 2- - य गप्नया दुति ॥ धणु पुहुर्त पस्किम, नुयचारी गाउ अ पुहुत्तं ॥ ३०॥ खयरा धणु पुडुत्तं, नुयगा उरगा य जोयण मग प्रदत्त मित्ता, समुचिमा ३१ । बच्चे गा श्रीगुरवनम ।' गप्नया मुणेयवा ॥ और दमलजोडदाकुंज चने समूर्णिम स्त्र । जना शरीर,प्रमाशा औरतगरीबमकुगुर हस्त जोपण मामाका होटा मत्म्यो समय साबका साजश्रीकारिनु प्रमाण पानी धरा वर पग्सि की लालकेसीसारखे उधाणुत्र शो काहीसा तो मिलीयासे होय. जोपीजसीमारवीन हातापुसाईलाजाया। देव गोति चाई व जन ॥२०॥५॥ गर्न म के

(४६)
रीतें -(खयरा जयगा धषु पुरतं के) खेवर एट
से पदीथने शुजग एटले मुजपरि सर्पना शरीरोर्नु
प्रमाण धनुप पशुत्व एटले वे धनुपथी मामीने नव
नुप सुधी होय , तथा (उरगाय जोयण पुदुत्तं के०)
उरग एटले तर परिसर्पना शरीरनु प्रमाण योजन
धुत्व एटले वे योजनथी मामीने नव योजन सुधी
होय , थने (चप्पया गाउय पुर्न मित्ता के०)च
तुप्पद एटलें चार पगवाला जीवोना शरीरनु प्रमाण,
गाउटश्रुत्व एटले वे गाउथी मामीने नव गाउ सुधी
होय छे, एवीरीते (समुचिमा नलिया केसमूर्ति
म तिर्थच जीवोना शरीरोनुं प्रमाण का ठे केटलाए
क पुस्तकोमा "जयगा उरगाय जोयण पुदुत्न " एवो
पात ,ए प्रमाणे थर्थ करतां जुजपरि सर्पना शरीरनु
प्रमाण योजन पृथुत्व थाय ते समीचीन नथी कैम
के, प्रज्ञापना तथा सयहिण्यादि सूत्रोथी विरुषले
॥३१॥अने (चउप्पया गप्नया उच्छेव गान्या के)
गर्नज चतुष्पद जीवोना शरीरोनु प्रमाण उत्कष्टथीब,
गानु (मुणेयवा के०)मनाय वे एवामोटा शरीरना
हस्ति देवकुर्वादिक युगलीयाना क्षेत्रोमां होय डे
.

m LA णुतरे इक्विक परिदायी ॥ लोकना धंत सुधी जे सुचनपति, अंदर तया योनि हाणी" अनक्रमें एकेक पटादनां. (w); दवे पंचेंश्यि मनुष्यना, शरीर, स्मात गाथाना उत्तराई वडे कहे है- कोस तिगं च मणुस्सा, नको स'सरीर माणेणं ॥ ३ ॥ अर्थ.-(मपुस्सा उक्कोस सरीर मारेन है. लष्टय मनुष्यना शरीरनु प्रमाण (रोमनिग ) त्रण कोशनु होप ठे ते देवकुळदिक देवोन युगी लियां जाणवां ॥ ३२ ॥ ए मनुष्यनां देवनदया. श्वे देवोना स्वानाविक शरीरोन्नं प्रमान रहे है-- ईसापत सुराणं, रयणी मन ईन्नि उच्चतं ॥ उग उग जग वगन, द. अर्थ-(ईसाणंत सुराग देशी शान देव क देव ते तेना शरीरोनी (सत्त रयणी दुति के ) साह दायनी दीय र पठी "जुग जुग उग चा विडाणुनरे Tar य 4 4.1 1 (४). सनत्कुमार अने माहें ए ( उग के) किं, एटले बन्ने देवलोकमांना देवोना शरीरोनु कंचानुं प्रमाण । बहायर्नु होय . ब्रह्मथने लांतिक ए (गके.)वे. देवलोकमा पांच हाथ होय , युक्र थने सहस्रार ए. (जुग के)वे देवलोकमां चार हाथ होय , एत्रण छिक कहीधने आनत, प्राणत,धारण्य तथा अच्युत ए (चन के) चार देवलोकमांत्रण हाथ होय है; (गेविड के०)नव अवेयकमा वे हाथ होय वे अने (अणुत्तरे के० ) पांच अनुत्तरवासी देवलोकमाना देवो ना शरीरोनुं प्रमाण एक हाथ होय ने एएरीतें (इकि कपरिहाणी के०) एकेक हाथनी हाणी करतां-जवु, तेवारे पूर्वोक्त मान थाय ए सर्व जीवोना शरीरोनु प्रमाण नत्सेधांगुलनी रीते जाणवु ॥ ३३ ॥ हवे जीवोना आउखानु बीचं धार कहे डे बावीसा पुढवीए, सत्तय आउस्त ति नि वानस्सोवास संहस्सा दस तरु, गणाण तेज तिरित्ताउ ॥ ३४ ॥ अर्थ-(पुढवीए के०)पृथ्वीकाय जी योनु श्रायु उरुष्टथी- हजार वर्षनु - - (४९) ( सत्तय थाउस के०) थप्काय जीवोनु थायु सा न हजार वर्पनु, (वास्ततिनि के०) वायुकाय नागनु थापु त्रण हजार वर्पन (तरुगणाण के) प्रत्येक वनस्पति समूहनु थायुष्य, (दम सहस्सा वास के०) दश हजार वर्षy होय वे थने (तेउ निरिता के) तेजस्काय नीयोनी उरुष्ट थायु स्थि तित्रए अहोराननी होय वे थने एबमा जानु जघन्ययी थतर्मुहूर्त श्रायुप्य होय रे ॥ ३५ ॥ हवे विगलेंश्यि जीवोनु श्रायु कहे ठे वासाणि वारसाक, वि दियाण ति उटियाणं तु॥अनणा पन्न दिणा, चरिदीप तु उम्मास ॥ ३५ ॥ अर्थ -(विदिया वारसाक वासाणि के०) चंडीय जीवोनुं उत्कृष्टथी चार वर्षनुं थायुप्य होय वे (तिदियाणतु के) त्रीश्यि जीमोनुं थायुष्य (य णा पन दिणा के०) गण पचास दिवस होय ठे थने (चरिदीगतुं के) चतुरिंघिय जीवोनु रस्य (उम्मास के०) उ महिनानु होय . तेमज -- - - (५०) ए सर्व जीवोनु जयन्यथी पूर्ववत् थतर्मुहूर्त्तनु थायुष्य होय ॥ ३५ ॥ ए विकलेंशियनु श्रायुष्य कत्यु हवे पंचेश्यि जीवोर्नु उत्कृष्टयी बायु प्रमाण कहे वे - सुर नेरश्याणगई, जक्कोसा सागराणि ति तीसं ॥ चनपय तिरिय मणुसा, तिन्नियप लिवमा दुति॥३६॥ जलयर उर नुयगा ण, परमान दो पुत्व कोडिन॥परकीण पुण नपिन,असंख नागो अपलियस्स ॥३॥ अर्थ -(सुर नेरश्यातिई के० ) देव यने नार कीयोनायायुप्यनी स्थिति, (उकोसा के०) चत्रु प्टथी(तित्तीस सागराणि के) तेत्रीश सागरोपमनी होय छे एटटुं आयुष्य पांच अनुत्तर विमानोना टे वोनु तथा सातमी नरकना जीवोनुं उत्कृष्ठथी जाणी सेवु, अने ( चपय के) चतुप्पद एटले चार पग वाला (तिरिय के) तिर्यंच जीवोनुं तथा (मस्सा के) सर्व प्रकारना माणसोनु उत्कृष्टया (तिनियप लिवमा के)त्रण पब्योपमनु थायुप्य (त्ति के.) होय ने एवा थायुष्यवाला जीवो देवकुर्वादिक क्षेत्री मा होय ने अहि पव्योपम तथा सागरोपमने विपे

(५१)
समताथी अथवा विशेषण विशिष्टनु ग्रहण कस्या
न्थी देव तथा नारकीयोर्नु जघन्यथी आयुष्य दश हजा
र वर्पनु होय ने अने मनुष्य तथा तिर्यच जीयोन न
धन्यथा पूर्वनी पेठे अंतर्मुहूर्त्तनुं आयुष्य होय ॥३॥
गर्नज यने समूर्छिम एवे प्रकारना (जलयर केए)
जलचर जीवो (उर के) उदरथी चालनाराजे
सो , (जुयगाण के ) नुजायी चालनाराजे नो
लिया प्रमुख जीवो ने, तेनु (परमाज के ) उरु
एयी थायुप्य ( पुचकोडी के० ) पूर्व कोडीन (होइ
के) होय ने सित्तेर लाख अने उप्पन्न हजार कोटि
वर्पनो एक पूर्व थाय ने एवा एक कोटि पूर्वनु वायु
प्य जाणवु (परकीय के०) पदीनु (पुण के०)
तेवी रीतेंज (पजियस्स यसखनागोध के) पव्योप
मना यसख्यातमा नाग जेटलु थायुप्य(नणिके०)
कहेलु ने ए गर्नज पदीयोनु थायुष्य जाणवु था प्र
करणमा समूर्डिम स्थलचर तथा खेचरादि पचेंड़ियो
नुं उत्कृष्टयी यायु का नथी, पण बीजा ग्रथोमा कहे
खु , ते या प्रमाणे -समुखि पणिटि थलयर, खय
र उरग जुयय जिसि, कमसो, वास सहस्सा चुल
सी, निसत्तरी चायाजा ॥ ॥ इति ॥ ३७॥

- (५२) दवे सूक्यादि जीवोना थायुप्यनु प्रमाण कहे वे सवे सुटुमा सादा, रणाय संमुचि मा मणुस्सा य ॥ उक्कोस जहन्नेणं, अतमुत्त चिय जियंति ॥३॥ थर्थ -( सन्चे के) पृथ्वीकार, थपकाय, तेउका य, वायुकाय, तथा वनस्पतिकाय,ए सर्वे (सुदुमा सा हारणाय के० ) सूक्ष्म तथा वीजा साधारण एटले वादर निगोदरूप जे अनतकाय जीवो वे ते अने (समुहिमा मपुस्साय के ) समूर्बिम मनुष्यो जे एकशो ने एक क्षेत्रोनेविपे उत्पन्न ययेला गर्नज मनु प्योनाज मल मूत्र, तथा वातादिकने विपे उत्पन्न था यचे, ते वधा ('उकोस के) उत्कृष्टथी (जहन्ने के) जघन्यथी (यत मुदत्त चिय के० ) एक अत मुहूर्त मात्रज (जियति के) जीवे ठे ॥ ३० ॥ उपला घे हारमा जे का, ते गाथावडे सूचवे जे- गादगाउ माणं, एवं संखेवन स मकायं ॥जे पुण श्च विसेसा, वि सेस सुत्ताउ ते नेया ॥ ३५ ॥ - । (५३) थर्थ -(गाहणाउमाणं के)जेनेरिपे जीवनी स्थिति होय ले जेमां जीव रहेठे तेने अवगाहना क हिये, एतु जे प्रत्येक जीवनु शरीर तेना थायुष्यनुं प्र माण (एव के) एवी रीतें (सखेवन के) सर्वे करी (समरकायं के) समाख्यातं एटले का, परतु (जे पुण श्व केए)अत्रे बली जे काई देवलोकादिक नेविपे प्रतरादि थाश्रित (विसेसा के०)पिप थव गाहना तथा आयुना नेद . (ते विमेस सुत्ता के.)ते विशेष सूत्र संग्रहिणी तथा प्रज्ञापनादिक सूत्रों ने तेथकी (नेया के० ) जाणी सेवा ॥ ३५॥ ए सरीते थवगाहना तथा या स्थिति मलिवेधार कलां हवे त्रीजु, स्वकायस्थिति हार कहे वे एगिदिया य सवे, असख जस्सप्पि णी सकायमि ॥ नववर्षाति चयति अ, अपंतकाया अणताउ ॥ ४॥ अर्थ-(सधे एगिदियाय के) पृथीकाय, अप काय, तेउकाय, वायुकाय घने वनस्पतिकाय, ए जे ते सर्व (यसव उस्तप्पिएणी, भणी तया अासर्पिणी पांच स्थावर के.)

(५४) (सकायंमि के) तेज पोतानी कायनेविपे (उवध हुति के० ) उत्पन्न थाय , अने (चयंतिथ के)म रणने पामे से थर्थात् तेज कायमा उत्पन्न थईने फ री त्यांज नाशने पामे , तथा (थपंतकाया के) अनंत काय वनस्पति जीवो जे वे ते (याता के०) अनंत उत्सर्पिणी थने अवसर्पिणी सुधी यावत् स्व कायमा उत्पन्न थईने तेज कायमांनाश पामे ॥४०॥ एवी रीते एकेश्यि जीवोनी काय स्थिति कही हवे हीझ्यिादि विकलेंशियनी काय स्थिति कहे - सखिज समा विगला, सत्तह नवा पणिनि तिरिमणुया ॥ नववजति स काए, नारय देवा अनो चेव ॥४॥ अर्थ -(विगला सखिक समा के)वेश्यि तेंड य तथा चरिश्यि ए जे विकश्यि जीवो, तेत ख्याता वप सुधी (उववऊतिसकाए के)उपपद्यति स्वकाये एटले स्वकायने विपे उत्पन्न थाय ने अने चवे वे तथा (पणिदि तिरि मपुया के०) पचेश्यि तिर्यच अने मनुष्य ए वे जातिना जीवो ते तेवाज नव पणे केडावेडे (सत्तनवा के) सात अथवा घाउ जव करे . सात नव तो उत्कृष्ट सख्याता वर्ष सुधी मां थई शके वे अने उरुष्ट यसख्याता वर्ष सुधीमा था नव थई शके ने एटले आठ नवमा पूर्वकोटी पृथक्त्व थनेत्रण पथ्योपम अधिक काल जाणी ले वो थने जघन्यथी सर्वत्र कायस्थिति थतर्मुहूर्तनी जाणी लेवी तथा (नारय देवाय नोचव के०) ना रकी जीवो अने देवो मरण पामीने फरी तेज गति मां उत्पन्न यता नया एटसे नारकी मरीने फरी ना रकीमा न उपजे अने देवता मरी फरी देवतामा न उपजे अवश्य एक चे नव बीजी गतिमा करीने प ठी ते गतिमा उपजे, तेम वली देवता मरी नरकमां पण न जाय थने नारकी मरी देवतामा पण न जा य एत्रीजु स्वकायस्थिति हार कत्यु ॥४१॥ हवे चोथु प्राण धार कहे दसहा जियाण पाणा, यदि उसासान जो ग वलरूवा ॥ एगिदिएसु चनरो, विगले सुप सत्त अहेव ॥ ४ ॥असन्नि सन्नि पचि,दिएसु नव दस कमेण बोधवा । तेहि सद विप्पनगो, जीवाण नपए मरण ॥४३॥ - , (५६) अर्थ-(दसहा जियाण पाणा के०)जीवोना दश प्रकारनां प्राण होय वे ते कहे (इदि के)इंश्यो, (उसास के) श्वासोच्बास, (याउ के०) यायु तथा (जोगवसरूवा के ) योगनां वलरूप जाणवां एटले स्पर्शनादि पांच इश्यिो, उछो उल्हास नि श्वास, सात मु आयु तथा मन, वचन, काय, एत्रण योगना त्रण वन मली दश प्राण तेमा (एगिदिएसु के) एके यि जीयोने स्पर्शनेश्यि, श्वासोवास,आयु तथा का यवल, ए (चतरो के०) चार प्राण होय अने (वि गले के०)विकलेश्यि एटले हीडिय जीवो ने स्पर्श नेश्यि, रसनेश्यि, श्वासोवास, आयु, कायवल तथा वचनबल, ए (के) प्राण होय ते ब्रीझ्यि जीवो ने स्पर्शनेश्यि, रसनेश्यि, ग्राणेश्यि, श्वासोवास, था यु, कायवल तथा वचनवल, ए (सत्त के०) सात प्राण होय वे चतुरिश्यि जीवोने स्पर्शनेश्यि, रसनेश्यि, घाणेश्यि, श्रोत्रेयि, श्वासोवास, आयु, काययल, त था वचनवल, ए (अध्व के)यात प्राण होय॥३॥ (अमन्नि सन्नि पचिदिएमु के) असझी पचेश्यि तथा सझी पश्यि जीवोने (नव दस के० ) नव यने दश (कमेण के०) क्रमे करी (घोपवा के)

।
(५७)
जाणवा एटले थसझी पचेश्यि जीवोने एक मनो
बत होतुं नयी वाकीनां नवे प्राणो होय ते श्रने
सही पचेश्यि जीवोने दो प्राणो होय वे ए प्राण
जेने जेटलां कह्यां रे ते जीवने (तेंहि सहविप्प
गो के०)ते प्राणोनो जे वियोग थाय ने ते (जीवा
ए मरण नमए के०)जीवने मरण कहेवाय व
ली जिहां उपजे, तिहा एफ थायु तो पूर्वजा जानु
बाधेनु होय वाफी बीजां सर्व नवा प्राण थने नी
पर्याप्ति उपजती बेलायें वा हा देव, नारकी, ग
नज तिर्यच तथा मनुप्य एजीयो सझी पश्यि कहे
वायचे थने समृधिम तिर्यग् तथा संमूर्णिम मनुष्य
असझी पश्यि कहेवाय ने तेउमा समूर्छिम मनु
प्यो तो जायारूप वाग्यलादिकें करी रहित होवाथी
ते सात तथा यात प्राणवाला कह्या ॥ १३ ॥
यही एवी थाशका उत्पन्न थाय वे के, जीवने
प्राण पियोगरूप जे मरण कत्यु ते केटला काल सुधी
थया करे ? एहना निरासार्थ उत्तर कहे वे
एवं अणोरपारे, संसारे मायरंमि
नीममि ॥ पत्तो अणत खुत्तो, जी
वेदि अपत्त धम्मेदि ॥ ४ ॥

(५७)
अर्थ (अपत्त धम्मेहि के) जेठने धर्मनी प्रा
प्ति थई नथी एवा (जीवेहि के०)जीवोने (एव केण्)
पूर्वे कही थाव्या तेम था (थोरपारे के०)पारा
वार रहित एटले जेनी आदि पण नयी थने यत प
ण नथी एवो (नीममि के०) महा जयकर (ससारे
सायरमि के०) ससार रूप समुश्ने विपे (यात खु
तो के०) अनतवार प्राणवियोगरूप मरण (पत्तो
के) प्राप्त थाय ॥४४॥ ए चोयुं प्राण हार का
एटले जे जीव धर्म नथी पाम्या ते जी वएकेकी
योनिने विपे अनती अनंती वार मरण जीवन प्रत्ये
करे योनि एटले जे स्थानमा घणा जीवोनो एक
वर्ण, एकगध, एक रस, एक स्पर्श, एटला वानां स
रखा बरोबर होय, ते सर्व जीवनी एक योनि कही
ये ते योनियो केटली नेते सर्व जातिना जीवोनी
जूदी जूदी सख्याये थागली गाथाये कहे जे
हवे पांचम योनि हार कहे बे-
तद चनरासी लका, सखा जोगीण हो
जीवाणं ॥ पुढवाईण चनपहं, पत्तेय
सत्तसत्तेव ॥४५॥ दस पत्तेय तरूणं,

(एए) चन्दस लरका दवति श्यरेसु ॥ विगलि दिएसु दो दो, चनरोपंचिदि तिरियाण ॥४६॥ चनरो चनरो नारय, सुरेसुमणु -आण चउदस दवति ॥ सपिमिया य सबे, चुलसी लरकान जोगीणं ॥४७॥ अर्थ-(तह के) तथा ( जीवाणं के) जीवो नी (जोणीण के ) योनिनी (सखा के०) सख्या (चउरासी लरका के०) चोराशी लद (होश्के) बे जीवोनु जे उत्पत्तिस्थानक ते योनि कहेवाय ने तेउमा ( पुढवाईण चाह के) पृथ्व्यादिक चार एटले पृथ्वीकाय, अपकाय, तेउकाय तथा वाचका य, ए चार प्रकारना जीवोनी (पत्तेय के०) प्रत्येक नी (सत्तसत्तेव के) सात सात लाख योनियो जाणवी एम चारेनी सर्व मली अचवीश सद यो नि थई ॥ ४५॥ (पत्तेय तरूण के) प्रत्येक व नस्पतिकाय जीवोनी (टस के०) दस सद योनि यो (श्यरेस के) इतरेषु एटले एथी इतर जे सा धारण वनस्पतिकाय जीवो ने तेनी (चपदस सरका के०) चद् लद योनियो (हवति के) (विगलेटि ६ 1 (६०) एसु दो दो के०) विकश्यि एटलेश्यि जीवोनी वे लाख, तेंश्यि जीवोनी चे लाख, तथा चतुरिश्यि जीवोनी पण वे लाख योनियो जाणवी, थने (पचि दितिरियाण के) पंचेश्यि तिर्यक् जीवोनी (चव रो के०) चार लद योनियो ॥४६॥ (चरोना रय के) नारकी जीवोनी चार लदा योनियो ,(सु रेसु चनरो के०) देयोनी पण चार लद योनियो ठे (मषुधाण के०) मनुष्य प्राणीयोनी (चउदस ह वति के०) चौद लाख योनियो ने एवीरीते (स पिमियाय के० ) अधीने एकवी करतां शरवाले (स वे के ) सर्व (चुलसी के०) चोराशी (लरकाउ के०) लाख (जोगीण के०) योनियो थाय ॥ ४ ॥ एवी रीते ससारी जीवो विपयिक शरीरनु मान, आउखानी स्थिति, कायस्थिति, प्राण अने योनि ए पाच हार कहां हवे सिम जीवो विषयक कहे वे सिक्षण नचि देदो, न आन कम्म न पाण जोणी ॥ सा अणता तेसि, विई जिणंदाऽऽगमे नणिया ॥४॥ थर्थ (सिवाण देहो नमि के०) सिम परमा (६१) माने शरीर नथी, माटे (न आउ कम्म के) घायु अने कर्म पण नथी अने ज्यां आयु न होय त्या (पाण जोगणी न के० ) प्राण अने योनि प ण नथी ए सर्वनो अनाव होवाची कायस्थित्यादि कनो पण अनाव दर्शाव्यो एम सर्व कर्मोपानि पिमु त अने जे लोकना अग्रजागनेपिपे स्थित (ते सि के) ते सिद जीवोनी (साश्यणता लिई के) सादि यनतस्थिति, ते (जिपदाऽऽगमे के ) जिनें प्रणित सिक्षातोनेविपे (जपिया के) कही एटले जे दिवसें यहींथी सिझमा गमन थाय ते दि वसें सिमने सादिपणु का ठे, अने फरी त्यांथी च वननो अनाव होवाथी अनतपणु ॥ ७ ॥ हवे फरि ससारी जीववि कहे - काले अणा निदणे, जोणी गदणमि नीसणे च॥नमिया नमिति चिर, जीवा जिण वयण मलहता ॥४ए॥ यथे-आदि एटले प्रारन, निधन एटले नाश ए बन्ने शब्दो विनक्ति विनाना होवायी तेउनु एक अन्व यित पद "यादि निधन” एम थाय ने ए पदनो थ (६२) थे वृत्तिकार श्राम करे -जेनो प्रारनयने नाश दी वामांबावतो नथी, तेने अनादि निधन कहिये ए(थ गाइ निहणे काले के०) अनादि अनंत कालनेविपे (जिण वयण मलहता जीवा के) हितोपदेशरुप जिनवचनने जे जीवो पाम्या नथी, ते(जोणी के०) चोराशी लाख सख्यावाली जे योनि तेणे करी (गह पमि के०) महा गहन ऽख देनारो, (नीसरोके) जयने देनारो (इस के) शहा वर्णव्यो एवो जे था ससार तेने विपे (नमिया के) अतीत कालनेवि नटकेना ,अने फरि (नमिहति चिर के) यागल यागामिक कालमां पण घणो नमण करो ॥४॥ हवे ग्रंथकार पोताना नामनी सूचना करतो । तो धर्मोपदेश कहे - ता सपश् संपत्ते, मणुअत्ते उक्ष वि सम्मत्ते ॥ सिरि संति सूरि सिके, करेद नो नङमं धम्मे ॥ ५० ॥ अर्थ -(ता के) ते पूर्वोक्त कारण माटे (नो के ) हे जव्य जीवो, (संप के ) सांप्रत या समयने रिपे दश दृष्टांतें करी (सुनहे के) उर्जन

(६३)
एबु जे था (मणुयत्ते के०) मनुष्य पणु ते (संप
के०)प्राप्त थयु उतां थने (विसम्मत्ते के०) तेमां
पण उर्जन जिनोत तत्त्वत्रयरुचिरूप सम्यस्त्व प्राप्त
थ\ उता (सिरि संति सूरि सि के०) श्री एटले
ज्ञानादी लक्ष्मी, शाति एटले रागादिकनोपशम, एक
ए करी जे सूरि एटले पून्य एवा श्री तीर्थकर तथा
गणधर ते शिष्टे करेला उपदेश रूप (धम्मे उडम
करेह के०) धर्मनेविपे उद्यम करो ॥ ५० ॥ था प
द्यमा कविये पोतान नाम सूचव्युं वे ते याची री
तें -श्री शांति सरि उपदेश करे ले के, शिप्टें एटले उ
तम पुरुपोएं थाचरण करेला धर्मने विपे उद्यम क
रो एपो थन्वय करवो थथवा श्री शाति सूरिए क
रेला जगव चनानुसारें धर्मोपदेशनो उद्यम करो
हवेथा ग्रथ सिक्षातमांयी कहाडेलो,एम कहे वे-
एसो जीव वियारो, संखेव रुईण जा
गणा देन॥सखित्तो नभरिन, रुहा
में सुय समुद्दा ॥५१॥ इति ॥
श्री-जीवविचार प्रकरण समाप्त ॥
थर्थ -(एसो के०) एजे (जीपवियारो

(६४) जीव विचार कह्यो, ते (सखेव रुण के०) सदेप रुचि एटले स्वल्प मतिवाला जीवोने (जाणणात के०)जाणवाने अर्थ (रुद्दा के०) जेना विस्तार ग्रहण थई शके नही एवा (सुयसमुद्दा के) श्रुतस मुथकी (सखित्तोउरित के.) सद्देपथी नकार करीने या निवध कखोले एथी या सर्व जे काइका ते पोतानु मन कल्पित नथी का परतु सिद्धांतोमांया उधार करीने का वे, एवी सूचना करी ॥ १ ॥ इति श्री जीव विचारप्रकरण प्रारुत व्याख्यासहितं सपूर्णम् ॥ न

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Jivavichar Prakaran Mool

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Jivavichar Prakaran Mool
File name
Jivavichar Prakaran Mool
Text
OCR done
Citation
1891
Published
2011/03
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
74
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
553178
Barcode
99999990044352.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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6HObGSdL5jR
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