Bhartiya Shruti Darshan Kendra,jaipur
Shri Siddha Chakra Vidhan
Front matter
- प्रथम सग्करण श्री दि०जैन स्वाध्याय मन्दिर टम्ट सोनगढ द्वितीय मम्करण पण्डित टोडरमल म्मारक टम्ट जयपुर तृतीय मम्करण अखिल भारतीय जैन या फैटरशन चतय मरकरण अखिल भारतीय जैन या पेरेशन पचम सम्बरण अखिल भारतीय जैन यया फेडरेशन १,१०० १,००० ५,००० ३,२०० ३,२०० १३,५०० मृल्य ग्यारह रुपए 1300 मुद्रफ गजश्वरी फोटामटा (प्रा नि):/१२ पजागं बाग नाली-1100 म पाठ विपय-मची विपय प्रकाशकीय प्रस्तावना मगलाचरण १ ३० १ २ ३ ५ ६ प्रथम पूजा द्वितीय पूजा तृतीय पूजा चतुर्थ पूजा पचम पूजा षष्टम पूजा सप्तम पूजा अष्टम पूजा ४३ ५१ ૬૨ ८२ ११८ १७६ ८ ९ प्रकाशकीय (पंचमसंस्करण) सिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन की ओर से 'सिद्धचक्रविधान' का यह पचन मन्याण फोटो कम्पोज के माध्यम से ऑफसेट पद्धति द्वारा प्रकाशित करते हुए हमे अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। इन मिद्धचर विधान के रचयिता कविवर प श्री नन्तलालजी है, जो महारनपुर के कस्वा नकर के रहने वाले थे। उनके पिता का नाम श्री मज्जनकुमार था। ये महारनपुर के प्रतिष्ठित घराने में श्री शीलचदजी के वशज । कविवर का जन्म मन १८३८ में हुआ था। कवि के सस्कार प्रारम्भ से ही धार्मिक गे, जो उन्हें माता-पिता में विरासत में मिले थे। परिवार के सब लोग धमात्मा थे। आपने न्डकी कालेज में अध्ययन किया था। आपको साहित्य में प्रेम था। मिदचक्र की हिन्दी पूजा न होने से आपने इनका विचार क्यिा और प्रस्तुत रचना कर डाली। आप विद्वान थे, कवि थे और भरत थे। जनघम परक्मिी प्रकार का आधात आप सहन नही करते थे। आर्य नमाज के साथ कई बार आपके शास्त्रार्थ हुए, जिनमे आप विजयी रहे। आप म्वतन्त्र व्यवनायी थे, आपने नौकरी नहीं की। आप सुधारवादी विचागे के थे। ममाज में व्याप्त कह करीतियों के निवारण मे आप और आपके परिवार ने काफी योगदान क्यिा है। जैन विवाह विधि के अनुसार विवाह करने की परिपाटी उन प्रान्न मे चलाई। मिथ्यात्ववर्धक कई रूढ़ियों को आपने मिटाया। आप अधिक नहीं जिये, अन्यथा और भी कई साहित्यिक कार्य आप कर जाते। ५२ वप की आयु मे जून सन् १८८६ मे आपका स्वर्गवास हुआ। आपने निद्धचक्र मण्डल विधान के अतिरिक्त भी अनेक पूजाये एव भजन लिखे हैं। इस सिद्धचक्रावधान के माध्यम से कवि ने सिद्ध भगवन्तो के गुणानुवादो के माथ-साथ उनका स्वम्प एव सिद्धपद प्राप्ति की प्रक्रिया का भी वर्णन किया है, जो कवि के गहन अध्ययन एव आध्यात्मिक रुचि का परिचायक है। पूजन के माध्यम से जैनधर्म का सैद्धान्तिक पक्ष प्रस्तुत करना-इस विधान की मौलिक विशेषता है। पूजा के अप्टको मे भी कवि ने अष्ट द्रव्य का वर्णन न करके उन्हे चढ़ाने के प्रयोजन का वर्णन भीकिया है। इस प्रकार भावो की प्रधानता से लिखा गया-यह विधान भावो की शुद्धि का विशेष निमित्त भूत है।
इसमे भावपूर्णता के साथ-साथ कवि की काव्यकला भी अपने प्रौढ़रूप मे सामने आयी है। यह ब्रजभाषा मे लिखा गया है। कवि की भाषा भावानुगामिनी, सरल और माधुर्यगुणयुक्त है। इसमे ४७ प्रकार के छन्दो के प्रयोग से ज्ञात होता है कि कवि छन्दशास्त्र के विशेष ज्ञाता थे। उपमा और रूपक अलकारो के स्वाभाविक प्रयोग ने काव्यगत सौन्दर्य द्विगुणित कर दिया है। विधान मे सर्वत्र भक्तिरस व्याप्त होकर मानो सिद्ध भगवन्तो से साक्षात्कार ही कर रहा है। इस प्रकार अनेक दृष्टिकोणो से यह विधान कवि की श्रेष्ठतम कृति है। इस विधान मे आठ पूजने हैं। प्रत्येक पूजन के अॉ की सख्या उसके पहले की पूजन से द्विगुणित है। इस क्रम मे प्रथम पूजन मे आठ, दूसरी मे सोलह, तीसरी मे बत्तीस, चौथी मे चौसठ, पाँचवी मे एक सौ अट्ठाईस, छठवी मे दो सौ छप्पन, सातवी मे पाँच सौ बारह, और आठवी मे एक हजार चौबीस अर्ध्य है। यद्यपि अष्टान्हिका महापर्व के साथ-साथ दशलक्षण महापर्व भी वर्ष मे तीन बार आता है, तथापि अष्टान्हिका महापर्व इस अर्थ मे दशलक्षण महापर्व से अधिक भाग्यशाली है कि वह वर्ष मे तीन बार मनाया भी जाता है, जबकि दशलक्षण महापर्व केवल एक बार। अभी तो बहुत से जैन भाइयो को यह भी पता न होगा कि दशलक्षण महापर्व भी वर्ष मे तीन बार आता है। अष्टान्हिका महापर्व के साथ सिद्धचक्रविधान का ऐसा सहज सबध स्थापित हो गया है कि बिना सिद्धचक्रर्विधान कराये यह महसूस ही नही होता कि हमने अष्टान्हिका महापर्व मनाया भी है। यद्यपि इस धारणा में यह दोष उत्पन्न हो गया है कि किसी जैनी भाई को सिद्धचक्रविधान कराने का भाव उत्पन्न हुआ हो तो वह अष्टान्हिका के आने की राह देखता है। वह सोचता है कि कब अष्टान्हिका आये और सिद्धचक्रविधान कराया जाये, भले ही तब तक उसका विधान कराने का भाव ही न रहे। अत यह ध्यान रखना चाहिए कि यह विधान कभी भी कराया जा सकता है। अरे । यह जब कराया जायेगा, तभी आठ दिन का पर्व हो जायेगा, भले ही उसे अष्टान्विा महापर्व नाम न मिले। इसके पूर्व इस विधान की विभिन्न प्रकाशन सस्थाओ से हजारो प्रतिया प्रकाशित हो चुकी हैं। स्व पूज्य कानजी स्वामी के देहावसान के उपरान्त सोनगढ़ मे सिद्धचक्र विधान के आयोजन के समय इसकी ११०० प्रतिया प्रकाशित की गई जो हाथो हाथ बिक गईं। इसके पश्चात् १००० प्रतियो का द्वितीय सस्करण टोडरमल स्मारक ट्रस्ट जयपुर द्वारा प्रकाशित हुई परन्तु वे भी अतिशीघ्र समाप्त हो गई। मार्च ८४ मे युवा फैडरेशन द्वारा ५००० प्रतिया प्रकाशित की गई जो २ वर्ष मे ही समाप्त हो गई। इसका चतुर्थ सस्करण ३२०० की सख्या मे प्रकाशित किया गया जो हाथो-हाथ बिक गया फलत यह पचम नस्करण प्रकाशित किया गया है। पस्तुत प्रकाशन को अल्प मूल्य में उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जिन महानुभावो का आधिक नहयोग हमे प्राप्त हुआ है उसके लिये हम सभी दातारो का हृदय में आभार मानते है। मार ही माहित्य पकाशन एव प्रचार विभाग के प्रवन्धक श्री आयल बनल एम ए, जे डी भी बधाइ के पात्र है, जिनका महयोग प्रकाशन एव वाइण्डिग व्यवस्था में प्राप्त हुआ है। सभी आत्माधी वन्धु इन पुस्तक को पढ़कर लाभान्वित हो और अपने जीवन को निर्मल बनाते हुए मुक्तिपथ का माग प्रशस्त करे, इसी आशा और विश्वान के माध- व०जतीशचन्द शास्त्री असिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन अध्यक्ष,
No text on this page.
सकलन प्रस्तावना प्रतिष्ठाचार्य व पण्डित अभिनन्दनकुमार जैन मी शास्त्री, वी एम सिद्धचक्र मण्डल विधान · उद्देश्य एवं महत्व जैन शास्त्रो मे वर्णित अनेक पूजन-विधान है, उनमे सिद्धचक्र मडल विधान का विशेष महत्त्व है, क्योंकि हमारा चरम लक्ष्य सिद्ध दशा प्रगट करना है और इस विधान में सिद्ध भगवान का विस्तृत गुणानुवाद किया गया है। जो मसार के बन्धनों से छूट गए हैं, जिनमे अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्त मुख और अनन्त वीर्य प्रगट हो गए है, जो द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोर्म से सर्वथा रहित हो गए हैं, उन्हे सिद्ध कहते है। ऐसे अनन्त सिद्ध परमात्मा लोक के अग्रभाग में विराजमान हैं। सिद्धो का समुदाय ही सिद्धचक्र कहलाता है और इस सिद्धचक्र विधान मे सिद्ध दशा प्रगट करने का विधान (उपाय) बतलाते हुए सिद्धो का गुणानुवाद किया गया है। जानी का चरम लक्ष्य पूर्ण मुख प्रकट करना है, अत उसके हृदय मे पूर्ण मुखी अरहन्त और सिद्ध परमेष्ठी तथा पूर्ण सुख के आराधक आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी तथा पूर्ण सुख का मार्ग बताने वाली जिनवाणी के प्रति भक्ति-भाव होना स्वाभाविक है। ज्ञानी जीव विपयकषाय रूप अशुभ भावो मे तो रहना नही चाहते ओर सिद्धो के ममान पूर्ण शुद्ध भाव प्रगट करने की उनकी सामर्थ्य नही है, अत सिद्ध भगवन्तो के गुणानुवाद के माध्यम से अपने लक्ष्य के प्रति मतकं रहते हुए वे अशुभ भावो से सहज ही बच जाते है। सिद्धचक्र विधान के साथ श्रीपाल और उनके साथियो का कुष्ठरोग दूर होने की घटना जुड गई है। सिद्ध भगवन्तो मे अत्यधिक गुणानुरागरूप शुभ भाव, तदनुसार सातावेदनीय कर्म का उदय और वाह्य अनुकूल सयोग की प्राप्ति-इस निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध से किसी के रोगादि दूर हो जाना आश्चर्य की बात नही है, परन्तु सिद्धचक्र की महिमा मात्र कुष्ठनिरोध तक सीमित करना, उसकी महानता मै कमी करना है। कुष्ठ तो शरीर का रोग है, आत्मा का रोग तो मोह-राग द्वेषादि विकारी भाव है। सिद्धो का स्वरूप .
२] [ सिद्धचक्रयिधान जानकर, उन जैसी अपनी आत्मा को पहचानकर, उममे ही लीन हो जाने पर मोह-राग-द्वेष और जन्म-मरण जैसे महान रोग भी नष्ट हो जाते है। सिद्धों की आराधना का सच्चा फल तो वीतराग भाव की वृद्धि होना है, क्योंकि वे स्वय वीतराग है। सिद्धो का सच्चा भक्त उनमे लोकिक लाभ की चाह नही रखता, फिर भी पुण्यवन्ध होने से उसे लौकिक अनुकूलताएँ सहज ही प्राप्त होती है, परन्तु ज्ञानी की दृष्टि मे उनका कोई महत्त्व नही है। लौकिक अनुकूलताओ के लक्ष्य से वीतरागी देव-गुरु-धर्म की या कुदेव-कुगुरु-कुधर्म की आराधना से तो पापबन्ध होता है, अत लौकिक अनुकूलताएँ भी उपलब्ध नहीं होती। इस सम्बन्ध मे पण्डितप्रवर टोडरमलजी मोक्षमार्ग प्रकाशक मे लिखते है "इस प्रयोजन के हेतु अरहन्तादिक की भक्ति करने से भी तीव्र कषाय होने के कारण पापबन्ध ही होता है, इसलिए अपने को इस प्रयोजन का अर्थी होना योग्य नही है। अरहन्तादिक की भक्ति करने से ऐसे प्रयोजन तो स्वयमेव सिद्ध होते है।" अत हमे वीतरागी देव-गुरु-शास्त्र का सही स्वरूप पहचान कर सिद्धचक्र विधान के माध्यम से वीतराग भावो का ही पोषण करना चाहिए। विधान प्रारभ करने की विधि जिस दिन से विधान करना हो, उसके एक दिन पूर्व वेदी के सामने ८४८ फुट अथवा छोटा-बडा चौकोर समतल तखतो पर मॉडना तैयार कर लेना चाहिये। माडना के बीच मे ॐ बनाना चाहिये तथा गोलाई मे आठ वलयो मे क्रम से ८, १६, ३२, ६४, १२८, २५६, ५१२, १०२४, श्री या फूल या साथिया या बिन्दू आदि बनाना चाहिये। विधान प्रारभ करने वाले दिन प्रात काल मे सूर्योदय के बाद जाप प्रारभ करना चाहिये। जाप करने का स्थान बद (शांतिवाला) होना चाहिये, जहाँ बालक आदि जप मे व्यवधान न कर सके। सामने पूर्व या उत्तर दिशा की ओर यत्रजी विराजमान करने के लिये टेबिल शुद्ध जल से धोकर रखे, उस पर चौकी के ऊपर सिहासन रखे और उस टेबिल के ऊपर एक चदोवा बाँधे व बीच मे सिहासन के ऊपर छत्र बाँधे। जापवाले कमरे को शुद्ध जल से धोकर टेबिल को दोनो ओर जापवालो के हिसाब से गिनती करकेशद्ध जल से धोकर पाटेलगावे, जिन पर पूजन की सामग्री, पस्तक आदि रखी जावे। सिंहासन पर विनायक यत्र विराजमान कर यत्रजी की वॉयी तरफ टेबिल पर पुष्पो से स्वस्तिक बनाकर . - १ मोक्षमाग प्रकाशक, पहला अधिकार, पृष्ठ ७ - पो, वर्षे इह . प्रस्तावना ] [३ विधान करने वाले की पत्नी से अथवा किसी प्रमुख व्यक्ति से निम्नमत्र बोलकर मगलकलश विराजमान करे- ॐ अद्य भगवतो महापुरुषस्य श्रीमदादि । ब्रह्मणो मतेऽस्मिन् मासे, तियौ, वासरे, नगरे, जैनेन्द्र-मन्दिरे, कार्यस्य निर्विघ्नसमाप्त्यर्थं मण्डपभूमिशुद्धयर्थं पात्रशुद्धघर्थ शान्त्यर्य पुण्याहवाचनार्थ नवरत्नगध-पुष्पाक्षतादि- बीजपूरशोभित मगलकलशस्थापन करोम्यहम् ची क्ष्वी ह स स्वाहा। (मगल कलश मे हल्दी, सुपारी, सवा रुपया, पुष्प, पीली सरसो आदि डालकर उसके मुंह पर नारियल रखकर केशरिया कपडे से रक्षाबंधन के धागे से अच्छी तरह से पहिले से बद कर चदन, गोटा, कागज आदि की माला तैयार रेखना चाहिये इसी प्रकार के चारकलश और तेयार करमडल के चारोकोनोपर रखना चाहिये। पश्चात यत्रजी का अभिषेक निम्न मत्र बोलकर करना चाहिये ॐ हीं भू व स्वदिह विघ्नौघवारक यत्र वय परिषेचयाम । जप मे सम्मिलित होने के लिए आवश्यक निर्देश . सिद्धचक्र मडल विधान में अपनी शक्ति व समय का विचारकर २१ हजार,५१ हजार, ७१ हजार या सवा लाख तक जप प्रतिष्ठाचार्य द्वारा निर्दिष्ट मत्र का किया जाना चाहिए। जप करने वाले व्यक्ति कम से कम गृहीत-मिथ्यात्व, लोकनिंद्य कार्य, अन्याय व अभक्ष्य के त्यागी अवश्य हो। अनुष्ठान के दिनो मे पूर्ण सयम से रहे। रात्रि में चारो प्रकार के आहार (खाद्य, पाद्य, लेहा, स्वार्य) ग्रहण नही करे। बाजार (होटलादि) का भोजन न ले तथा बार-बार न खाये। ५ मत्र का शुद्ध उच्चारण करे। ६ शारीरिक व मानसिक व्याधि न हो। शुद्ध धोती-दुपट्टे पहने। जप के समय परस्पर बाते न करे। ९ जप मे नियमित सम्मिलित होकर अपना सकल्प पूरा करे। १० जप के पूर्ण होने पर्यत यज्ञोपवीत धारण करे तथा बताये गये नियमो का पालन करे। १ २ m ४ ७ ४ ] [ सिद्धचक्रविधान ११ कम से कम महोत्सव की अवधि तक चमडे की वस्तुओ के प्रयोग का त्याग करे। जाप्यविधि जाप का मत्र कठस्थ होने पर भी अपने-अपने पाटे पर कागज पर लिखकर रखना चाहिये। प्रत्येक पाटे पर पूजन की सामग्री-जल, चन्दन, हल्दी, सुपारी, पीली सरसो, यज्ञोपवीत, रक्षासूत्र, माला-पूजन की पुस्तक तथा मालाये गिनने को २० लवग रखकर तैयार रहे। इसके बाद सभी जाप मे बैठनेवाले अपने-अपने पाटे के पास वेठ जावे और प्रतिष्ठाचार्य मगलाष्टक या मगल पञ्चक पढ़े और "कुर्वन्तु ते मगलम्" पद बोलते समय सभी थाली मे पुष्पक्षेपण करे। सिद्धीश्वरा, पूज्या साधव, मंगलाष्टक अर्हन्तो भगवन्त इन्द्रमहिता सिद्धाश्च आचार्या जिनशासनोन्नतिकरा उपाध्यायका श्रीसिद्धान्तसुपाठका मुनिवरा रत्नत्रयाराधका, पञ्चैते परमेष्ठिन प्रतिदिन कुर्वन्तु कुर्वन्तु ते मगलम् ।।१।। श्रीमन्नम्रसुरासुरेन्द्रमुकुटप्रद्योत रत्नप्रभा, भास्वत्पादन खेन्दव प्रवचनाम्भोधीन्दव स्थायिन । ये सर्वे जिनसिद्ध-सूर्यनुगतास्ते पाठका स्तुत्या योगिजनैश्च पञ्चगुरुव कुर्वन्तु ते मगलम् ।।२।। सम्यग्दर्शन-बोध-वृत्तममल रत्नत्रय पावन, मुक्तिश्री नगराधिनाथ जिनपत्युक्तोऽपवर्गप्रद । धर्म सूक्तिसुधा च चैत्यमखिल चैत्यालय श्रयालय, प्रोक्त च त्रिविध चतुर्विधममी कुर्वन्तु ते मगलम् ।।३।। नाभेयादि जिनाधिपास्त्रिभुवनख्याता चतुर्विशति, श्रीमन्तो भरतेश्वरप्रभृतयो चक्रिणो द्वादश । विष्णु प्रतिविष्णु-लागलधरा सप्तोत्तरा विंशति, त्रैलोक्यो प्रथितास्त्रिषष्ठिपुरुषा कुर्वन्तु ते मगलम् ।।४।। ये ये ये चाष्टाँग कर ते तथा, मगलाष्टक ] [५ ये सर्वोषधऋद्धय सुतपसो वृद्धिंगता पञ्च ये, महानिमित्तकुशला येऽष्टाविधाश्चारणा । पञ्चज्ञानधरास्त्रयोऽपिबलिनो बुद्धि-ऋद्धीश्वरा, सप्तैते सकलार्चिता गुणभृत कुर्वन्तु ते मगलम् ।।५।। कैलासे वृषभस्य निवृतिमही वीरस्य पावापुरे, चम्पाया वसुपूज्य सज्जिनपते सम्मदशैलेहताम्। शेषाणामपि चोर्जयन्तशिखरे नेमीश्वरस्याहतो, निर्वाणावनया प्रसिद्धविभवा कुर्वन्तु मगलम् ।।६।। ज्योतिय॑न्तर-भावनामरगृहे मेरौ कुलाद्री जम्बू-शाल्मलि-चैत्यशोखिषु तथा वक्षार-रौप्याद्रिषु । इष्वाकारगिरौ च कुण्डलनगे द्वीपे च नदीश्वरे, शैले..ये मनुजोत्तरे जिनगृहा कुर्वन्तु ते मगलम् ।।७।। यो गर्भावतरोत्सवो भगवता जन्माभिषेकोत्सवो, यो जात परिनिष्क्रमेण विभवो केवलज्ञानभाक् । कैवल्यपरप्रवेशमहिमा सभावित कल्याणानि च तानि पञ्च सतत कुर्वन्तु ते मगलम् ।।८।। इत्थ श्री जिनमगलाष्टकमिद सौभाग्यसपत्पद, कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस्तीर्थंकराणा मुखात् । श्रृण्वन्ति पठन्ति तैश्च सुजनैर्धमार्थकामान्विता, लक्ष्मीराश्रियते व्यपायरहिता निर्वाणलक्ष्मीरपि ।।९।। य य स्वर्गिभि , ये - मंगल पञ्चक गुणरत्नभूषा विगतदूषा सौम्यभावनिशाकरा सद्बोध भानुविभा विभाषितदिक्चया विदषावरा नि सीमसौख्यसमूह मण्डितयोगखण्डितरतिवरा कुर्वन्तु मगलमत्र श्री वीरनाथ जिनेश्वरा ।।१।। सध्यानतीक्ष्ण कृपाणधारा निहतकर्मकदम्बका. देवेन्द्र वृन्दनरेन्द्रवन्द्या प्राप्तसुखनिकुरम्का योगीन्द्र योगनिरूपणीया प्राप्तबोधकलापका कुर्वन्तु मगलमत्र ते सिद्धा सुखदायका ।।२।। ते सदा ६] [ सिद्धचक्रविधान ते ते सदा आचारपचकचरणचारणचुचव समताधरा नानातपोभरहैतिहापितकर्मका मुखिताकरा गुप्तित्रयीपरिशीलनादिविभूपिता वदतावरा कुर्वन्तु मगलमत्र श्री सूरयो जितशभरा ।।३।। द्रव्यार्थभेदविभिन्नश्रुत भरपूर्णतत्त्वनिभालिनो दुर्योगयोगनिरोधदक्षा मकलवरगुणशालिन कर्तव्यदेशनतत्परा विज्ञानगौरवशालिन कुर्वन्तु मगलमत्र ते गुरुदेवदीधितिमालिन ।।४।। सयम समित्यावश्यका परिहाणिगुप्तिविभूपिता पचाक्षदान्तिसमुद्यता समतासुधापरिभूषिता भूपृष्ठविष्टरसायिनो विविधर्द्धिवृन्द विभूषिता कुर्वन्तु मगलमत्र मुनय शमभूपिता ||५|| अंगन्यास मगलाष्टक के बाद शरीर की रक्षा और तत्तद् दिशाओ से आने वाले विघ्नो की निवृत्ति के लिए नीचे लिखे अनुसार अगन्यास करे। दोनो हाथो के अगुष्ठ से लेकर कनिष्ठिका पर्यन्त पाचो अगुलियो मे क्रम से अरहत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी की स्थापना करे। जप मे बैठने वाले महानुभाव सर्वप्रथम दोनों हाथो के अगूठो को बराबरी से मिलाकर सामने करे, और- * हा णमो अरहताण हा अगुष्टाभ्या नम -इसमन्त्र का उच्चारण कर सिर झुकावे। फिर दोनो हाथो की तर्जनियो (अगूठे के पास की अगुलियो) को बरावरी से मिलाकर सामने करे, और- ॐ ह्रीं णमो सिद्धाण हींतर्जनीभ्यां नम -यह मन्त्र पढकर सिर झुकावे। फिर बीच की दोनो अगुलियों को मिलाकर सामने करे, और- ॐ हू पमो आइरीयाणं हू मध्यामाभ्या नम - यह मत्र पढ़कर सिर झुकावे। फिर दोनो अनामिकाओ को सामने करे, और- ॐ हौं णमो उवजायाण हौं अनामिकाभ्या नम -यह मन्त्र पढ़कर सिर झुकावे। फिर दोनो छिगुरियो को मिलाकर सामने करे, और- - - -- अगन्यास *हणमो लोए सव्यसाहूण ह कनिष्ठिकाभ्या नम -यहमन्त्र पढ़कर गिर जावे। फिर दोनो हथेलियों का बरावर नामने फैलाकर-ॐ हा ही हू होह करतताच्या नम -यह मन्त्र पढ़कर सिर झुकावे। फिर दोनो चापटों को बगवर सामने फैलाकर-ॐ हा ही हू ही, ह परपुष्यभ्या नम -यह मन्त्र पटकर सिर झुकावे। ॐहा पमो अरहताण हा मम शीर्ष रक्ष रक्ष स्वाहा-यह मन्त्र पढ़कर मस या पिश करे। णमो आइरीयाण मम हृदय रक्ष रक्ष स्वाहा-यह मत्र पढकर हृदय या स्पर्श करे। ॐ हौं जमा उपसायाण हो मम नाभि रक्ष रक्ष स्वाहा-यह मन्त्र पटकर नाभि पाप करे। ह.णमो लोए सब सारण मम पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा-यह मत्र पढ़कर पणे का म्पशम्। णमोअरहताण हा पूर्वीदश आगतविघ्नान् निवारय निवारय मा रक्ष रक्ष स्याहा-यह मन्त्र पढ़कर पूर्व दिशा मे पुष्प अथवा पीली मरसो फेके। ॐ हीं णमो सिद्धाण ही दक्षिणदिश आगतविघ्नान् निवारय निवारय मा रक्ष रक्ष स्वाहा-यह मन्त्र पढकर दक्षिण दिशा मे पुष्प अथवा पीली सरसो फके। *ह णमो लोए सव्यसाहूण ह सर्वदिग्भ्य. आगतविघ्नान निवारय निवारय मा रक्ष रक्ष म्बाहा-यह मन्त्र पढ़कर दशो दिशाओ मे पुष्प या पीली मरनो फेका ॐ हा णमो अरहताण हा मा रक्ष रक्ष स्वाहा-यह मन्त्र पढ़कर अपने शरीर का स्पर्श करें। ॐ हीं णमो सिद्धाण हीं मम वस्त्र रक्ष रक्ष स्वाहा-यह मन्त्र पढ़कर अपने वस्त्रों का स्पर्श करें। ॐ हीं णमो आइरीयाणहू मम पूजा रक्ष रक्ष स्वाहा-यह मन्त्र पढ़कर अपने खड़े होने की जगह की ओर देखे। ॐ हीं णमो लोए सव्यसाहूण ही सर्व जगत् रक्ष रक्ष स्वाहा-यह मन्त्र पढ़कर चुल्नू मे जल लेकर सब ओर फेके। क्षा क्षीसूक्षी क्ष सर्वदिशासु, हा ही ह ही ह सर्वदिशासुओहीं अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणी अमृत स्रावय स स ब्लीं ब्ली ब्लू ब्लू द्रा द्रा द्रीं ह्रीं ८] [ सिद्धचक्रविधान द्रावय द्रावय ठ ठ ही स्वाहा-इम मन्त्र से चुल्लु के जल को मन्त्र कर अपने सिर पर सीचे। तदनन्तर प्रतिष्ठाचार्य-ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष रक्ष हू फट् स्वाहा-इम मन्त्र से पुष्प अथवा पीली सरसो को सात वार मन्त्र पढकर परिचारको के सिर पर डाले। तत्पश्चात् हूं फट् किरिट घातय घातय परिविघ्नान् स्फोटय स्फोटय सहस्रखण्डान् कुरु कुरु परमुद्रा छिन्द छिन्द परमन्त्रान् भिन्द भिन्द वा या हुँफट् स्वाहा'-इस मन्त्र मे पुष्प अथवा पीली मग्मो को मंत्रित कर मव दिशाओ मे फेके। तदनन्तर प्रतिष्ठाचार्य- 'ॐ नमोऽहते सर्व रक्ष हे फट् स्वाहा'-यह मन्त्र पढकर जप करने वाले महाशयो के दाहिने मणिवन्ध (कलाइ) म रक्षासूत्र बाधे। तदनन्तर निम्नोक्त श्लोक पढकर जप करने वाले अपने ललाट पर केशर का तिलक लगावे- मगल भगवान् वीरो मगल गोतमो गणी । मगल कुन्दकुन्दाद्यो जेनधर्मोऽस्तु मगलम् ।। तत्पश्चात 'ॐ नम परमशान्ताय शान्तिकराय पवित्रीकरणायाह रत्नत्रयस्वरूप यज्ञोपवीत दधामि मम गात्र पवित्र भवतु अहँ नम स्वाहा'-इस मत्र का सबसे उच्चारण कराकर यज्ञोपवीत धारण करावे। इसके बाद जप करने वाले महाशय अपने अपने आमनो पर बैठ जावे और यन्त्र के सामने बैठने वाला पृष्ठ १४ पर दी गई पञ्च परमेष्ठी पूजन करे। - इन्द्र प्रतिष्ठा इन्द्रों को निर्देश (१) नियमित रूप से विधान मे अन्त तक सम्मिलित रहे। (२) स्वस्थ हो। (३) विकलाग न हो। (४) हीन आचरण न हो। (५) विधान के अन्त तक सयम से रहे। (६) गृहस्थोचित शुद्ध भोजन करे। (७) विधान पर्यन्त व्यापार की चिंता से मुक्त रहे। यदि इनकी पत्नी इन्द्राणी बनना चाहती है तो उसमे भी उक्त विशेषताए इन्द्रप्रतिष्ठा ] [९ होनी आवश्यक हैं। साथ ही छह माह से अधिक गर्भवती न हो, अन्यथा विधि-विधान से आकुलता हो सकती है। इन्द्र-इन्द्राणियो को उत्तम पीतवस्त्र धारण करावे, मुकुट बाँधे तथा निम्नलिखित मन्त्र द्वारा रक्षासूत्र बाँधे। 'ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष हूँ फट् स्वाहा। फिर निम्नलिखित मन्त्र द्वारा अमृत स्नान करावे। ॐ अमृते अमृतोद्भये अमृतवर्षिणि अमृत द्रावय द्रावय स स क्लीं फ्लीं ब्लू ब्लूं बाबा द्रीं ह्रीं ब्रावय द्रावय ह स क्ष्वी क्ष्ची ह स स्वाहा'। (उक्त मत्र को पढ़कर प्रतिष्ठाचार्य इन्द्र-इन्द्राणियो पर जल के छीटे डाले।) तदनन्तर चन्दन, मुकुट, माला, केयूर, हार, कुण्डल आदि उपलब्ध आभूषणो को एक थाली मे रखकर मण्डल के सामने रखे और प्रतिष्ठाचार्य निम्नलिखित मन्त्र बोलकर उन पर पुष्प तथा पीली सरसो डाले। ॐ हा णमो अरहताण ॐ हीं णमो सिद्धाण ओ हैं णमो आइरीयाण ॐ हो णमो उवज्मायाण ॐ हणमो लोए सव्वसाहूण इन्द्र-इन्द्राण्योराभूषणानि पवित्राणि कुरु कुरु स्वाहा। उक्त मन्त्र से शुद्ध किये हुए चन्दन आदि को क्रम से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाकर धारण करावे। पात्रेऽर्पित चन्दनमौषधीश शुभ्र सुगन्धाहृतचञ्चरीकम् । स्थाने नवाके तिलकाय चर्च्य न केवल देहविकारहेतो ।। ॐ हा ही हौ र हौं ह मम सर्वांगशुद्धि कुरु कुरु स्वाहा । (उक्त श्लोक और मन्त्र बोलकर ललाट, मस्तक, ग्रीवा, हृदय, दोनो भुजाएँ, प्रकोष्ठ, नाभि और पृष्ठ भाग मे नौ तिलक लगावे) जिनांधिभूमिस्फुरिता स्रज मे स्वयवर यज्ञविधानपत्नी । करोतु यत्नादचलत्वहेतोरितीव मालामुररीकरोमि ।। (यह पढ़कर माला पहिनावे) धौतान्तरीय विधुकान्तिसूत्रै सद्ग्रन्थित धौतनवीनशुद्धम् । नग्नत्वलब्धिर्न भवेच्च यावत् सधार्यते भूषणमूरुभूम्या ।। (यह पढ़कर अधोवस्त्र का स्पर्श करावे) सव्यानमञ्चद्दशया विभान्तमखण्डधौताभिनव मृदुत्वम् । सधार्यते पीत-सिताशुवर्णमशोपरिष्टाद्धृतभूषणाकम् ।। (यह पढकर दुपट्टे का स्पर्श करावे।) शीर्षण्यशुम्भन्मुकुट त्रिलोकीहर्षाप्तराज्यस्य च पट्टबन्धम् । दधामि पापोर्मिकुलप्रहन्तु रत्नाढ्यमालाभिरुदञ्चितागम् ।।
No text on this page.
अभिषेकपाठ ] [११ अथ पौर्वाणकदेववन्नदनाया पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्म-क्षयार्थ भावपूजासतववन्दनासमेत श्रीपञ्चमहागुरुभक्तिकायोत्सर्ग करोम्यहम्। (यहाँ पर नौ बार णमोकार मन्त्र पढे) या कृत्रिमास्तदितरा प्रतिमा जिनस्य मस्नापयन्ति पुरुहूतमुखादयस्ता । सद्भावलब्धिसमयादिनिमित्तयोगा- त्तत्रैवमुज्जवलधिया कुसुम क्षिपामि ।।२।। (यह पढ़कर पुष्पाञ्जलि क्षेपण करके अभिषेक की प्रतिज्ञा करें) इति अभिषेक प्रतिज्ञायै पुष्पाजलि क्षिपामि। श्रीपीठक्प्लते विशदाक्षतौधै श्रीप्रस्तधे पूर्णशशाककल्पे । श्रीवर्तके चन्द्रमसीति वार्ता मत्यापयन्ती श्रियमालिखामि ।।३।। ॐ ह्रीं श्रीं अर्ह श्रीलेखन करोमि। (यह पढ़कर अभिषेक की थाली मे केशर से श्री लिखे) कनकादिनिभ कम्र पावन पुण्यकारणम् । स्थापयामि पर पीठजिनस्नपनाय भक्तित ।।४।। ॐ ह्रीं श्रीपीठस्थापन करोमि । (यह पढ़कर सिंहासन स्थापित करे) भृगारचामरसुदर्पणपीठकुम्भ- तालध्वजातपनिवारकभूपिताने । वर्धस्व पाठपदावलीभि सिंहासने जिनभवन्तमह श्रयामि ।।५।। ॐ हीं श्रीधर्मतीर्थाधिनाथ । भगवनिह पाण्डुकशिलापीठे सिंहासने तिष्ठतिष्ठा (यह पढ़कर प्रतिमा विराजमान करे) श्रीतीर्थकृत्स्नपनवर्यविधौ सुरेन्द्र क्षीराब्धिवारिभिरपूरयदर्थकुम्भान् । तांस्तादृशानिव विभाव्य यथार्हणीयान् सस्थापये कुसुमचन्दनभूषिताग्रे ।।६।। नन्द जय १२ ] [ सिरपक्रविधान (यह पदकर चारों कोनो मे चार क्लश रखे) आनन्दनिभरमरप्रमादिगाने वादित्रपूरजयशब्दक्लशप्रशस्तै । उद्गीयमानजगतीपतिकीतिमेना पीठम्थली वसुविधाचनयोल्लमामि ।।७।। ॐहीं स्नपनपीठस्थिताय जिनाणर्य निर्वपामीति स्वाहा । (यह पदर अघ्र चटा वादित्र नाद करावे तथा जय-ज्य शब्द क उन्चारण) क्मप्रवन्धनिगडेरपि हीनताप्न ज्ञात्वापि भक्तिवशत परमादिदेवम् । त्वा बीयकल्मषगणोन्मथनाय देव शुद्धोदकरभिनयामि नयार्थतत्त्वम् ।।८।। ॐ हीं श्रीं क्लीं ऐ अर्ह व महसत पर वह ह स स त त पपक्षींक्षी क्ष्वी क्ष्वी वा वा द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय नमोईते भगवते श्रीमते पवित्रतरजलेन जिनमभिषेचयामि स्वाहा। (यह पढ़कर चार क्लरों ने अभिषेक करें) दूरावनम्न तुरनाथ क्रीिट कोटी सलग्न रत्न किरणच्छवि धूनराधि । प्रस्वेद तापमल मुक्तमपि प्रकृष्ट- भक्त्या जलैजिनपति बहुधाभिषिचे ।। ॐ हीं श्रीमन्त भगवन्त कृपालसन्त वृषभादिमहावीरपर्यन्त चतुर्विंशति तीर्थंकरपरमदेव आचानामापे जम्बद्वीपे भरतक्षेत्र आर्यखडे नाम्नि नगरे मासानामुत्तमे मासे मासे पक्षे मुन्यायिका श्रावकश्राविकाणा सकलकर्मक्षया जलेनाभिविंचेयाम । शुभ दिने श्री पच परमेष्ठी पूजा अरहत सिद्ध आचार्य नमन, हे उपाध्याय हे साधु नमन । जय पच परम परमेष्ठी जय, भवसागर-तारणहार नमन।। मन-वच-काया पूर्वक करता हूँ, शुद्ध हृदय से आह्वानन । मम हृदय विराजो तिष्ठ तिष्ठ, सन्निकट होह मेरे भगवन।।
श्री पचपरमेठी पूजन ] ।। निज आत्मतत्त्व की प्राप्ति हेतु, ले अष्ट द्रव्य करता पूजन । तुम चरणो की पूजन से प्रभु, निज सिद्ध रूप का हो दर्शन ।। ॐ हीं श्री अरहत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधुपचपरमेष्ठिन. । अवतर अवतर सयौषट् आवाह्ननम् । अत्र तिष्ठतिष्ठठ स्थापनम् । मम सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधिकरणम् । मैं तो अनादि से रोगी हूँ, उपचार कराने आया हूँ । तुम सम उज्ज्वलता पाने को, उज्ज्वल जल भरकर लाया मैं जन्म-जरा-मृतु नाश करूँ, ऐसी दो शक्ति हृदय स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ।। ॐ ही श्री पचपरमेष्ठिभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलम् । ससार ताप मे जल-जल कर, मेने अगणित दुख पाये है । निज शान्त स्वभाव नहीं भाया, पर के ही गीत सुहाए हैं ।। शीतल चदन है भेट तुम्हे, ससार ताप नाशो स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी।। ॐ ह्रीं श्री पचपरमेष्ठिभ्यो ससारतापविनाशनाय चन्दनम् । दुःखमय अथाह भवसागर मे, मेरी यह नोका भटक रही । शुभ-अशुभ भाव की भंवरो मे, चैतन्य शक्ति निज अटक रही।। तन्दुल है धवल तुम्हे अर्पित, अक्षयपद प्राप्त करूं स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी।। ॐही श्री पचपरमेष्ठिभ्यो अक्षयपदप्राप्तयेअक्षतम् । मैं काम व्यथा से घायल हूँ, सुख की न मिली किञ्चित् छाया । चरणो मे पुष्प चढ़ाता हूँ, तुम को पाकर मन हर्षाया।। मैं काम भाव विध्वस करूं, ऐसा दो शील हृदय स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ।। ॐ हीं श्री पचपरमेष्ठियो कामबाणविध्वसनाय पुष्पम् मैं क्षुधा रोग से व्याकुल हूँ, चारो गति मे भरमाया हूँ । जग के सारे पदार्थ पाकर भी, तृप्त नही हो पाया हूँ।। नैवेद्य समर्पित करता हूँ, यह क्षुधा रोग मेटो स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी।। ॐ हीं रतु कोणेषु चतु कलशस्थापन करोमि।
१४ ] [ सिद्धचक्रविधान ॐ हीं श्री पचपरमेष्ठिभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यम् । मोहान्ध महा अज्ञानी में, निज को पर का कर्ता माना । मिथ्यातम के कारण मैंने, निज आत्मस्वस्प न पहिचाना ।। दीप समर्पण करता हूँ, मोहान्धकार क्षय हो म्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी।। ॐ हीं श्री पचपरमेष्ठिभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपम् । कर्मों की ज्वाला धधक रही, समार बढ़ रहा है प्रतिपल । सवर से आस्रव को रोकूँ, निर्जरा सुरभि महके पल-पल ।। मै धूप चढ़ाकर अव आठो, कर्मों का हनन करूं स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ।। ॐ ह्रीं श्री पचपरमेष्ठिभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपम् । निज आत्मतत्त्व का मनन करूँ, चितवन करूँ निज चेतन का । दो श्रद्धा-ज्ञान-चरित्र श्रेष्ठ, सच्चा पथ मोक्ष निकेतन का।। उत्तम फल चरण चढ़ाता हूँ, निर्वाण महा फल हो स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ।। ॐ ह्रीं श्री पचपरमेष्ठिभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलम् । जल चन्दन अक्षत पुष्प दीप, नैवेद्य धूप फल लाया हूँ । अब तक के संचित कर्मों का, मैं पुञ्ज जलाने आया हूँ।। यह अर्घ समर्पित करता हूँ, अविचल अनर्थ्य पद दो स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ।। ॐ हीं श्री पचपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यम् । । सस्कृत अर्घ्य अनादिसन्तानभवान् जिनेन्द्रान् अर्हत्पदेष्टानुपदिष्टधर्मान् । द्वेधाश्रियालिंगतपादपद्मान् यजामि भक्त्या प्रकृतिप्रसय॑ ।। १।। ॐ ह्रीं अनन्तचतुष्टयसमवसरणलक्ष्मी विनतेऽहत्परमेष्ठिनेऽयं । कर्माष्टनाशाच्युतभावकर्मोद्धतीन् निजात्मस्वविलासभूपान । सिद्धानन्तास्त्रिक्कालमध्ये गीतान् यजामीष्टविधिप्रसक्त्यै।। २।। ॐ हीं अष्टकर्मकाष्ठगण भस्मीकुर्वते सिद्धपरमेष्ठिनेऽयं । ये पञ्चधाचारपरायणानामग्रे सरादक्षिणशिक्षिकासु । प्रमाणनिर्णीतपदार्थसार्थानाचार्यवान् परिपूजयामि ।। ३।।
सस्कृत अर्घ्य ] [१५ ॐ ही पञ्चाचारपरायणाचार्यपरमेष्ठिनेऽयं .। अर्थश्रुत सत्यविवोधनेन द्रव्यश्रुत ग्रन्थविदर्भणेन । येऽध्यापयन्ति प्रवरानुभावास्तेऽध्यापका मेऽर्हणया दुहन्तु।। ४।। ॐ हीं द्वादशागपठनपाठनोद्यतायोपाध्यायपरमेष्ठिनेऽय. । द्विधा तपोभावनया प्रवीणान् स्वकर्मभूवीघ्रविखण्डनेषु । विविक्तशय्यासनहर्म्यपीठ स्थितान् तपस्विप्रवरान् यजामि ।। ५।। ॐ ही त्रयोदशप्रकारचारित्राराधकसाधुपरमेष्ठिभ्योऽयं । अहमगलमर्चे सुरनरविद्याधरैकपूज्यपदम् । तोयप्रभृतिभिरध्यविनीतमूर्धा शिवाप्तये नित्यम् ।। ६।। ॐ हीं अर्हन्मगलायार्घ्ययम् । धौव्योत्पादविनाशनरूपाखिलवस्तुबोधनार्थकरम् । सिद्ध मगलमिति वा मत्वाच चाष्टविधवस्तुभि ।। ७।। ॐहीं सिद्धनगलायाऱ्या यद्दर्शनकृतविभवाद् रोगोपद्वगणा मृग इव मृगेन्द्रात् । दूर भजन्ति देश साधुभ्योऽच्यते विधिना।। ८।। ॐ हीं साधुमगलायाय॑ । केवलिमुखावगतया वाण्या निर्दिष्टभेदधर्मगणम् । मत्वा भवसिन्धुतरी प्रयजे तन्मगल शुद्धयै ।। ९।। ॐहीं केवलिप्रज्ञप्तधर्मायार्थ्य लोकोत्तममथ जिनराट्पदाब्जसेवनयामितदोषविलयाय । शक्त मत्वा घृतजलगन्धैरर्चे समीहित प्रभवै ।।१०।। ॐहीं अहल्लोकोत्तमायार्घ्य .। सिद्धाश्च्युतदोषमला लोकाग्र प्राप्य शिवसुख व्रजिता । उत्तमपथगा लोके तानच वशविधार्चनया।। ११।। ॐ हीं सिद्धलोकोत्तमायाऱ्या इन्द्रनरेन्द्रसुरेन्द्ररर्थिततपसा द्रतैषिणा सुधियाम् । उत्तममध्वानम सावर्चेऽह सलिलगन्धमुखै ।। १२।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमायार्थ्य रागपिशाचविमर्दनमत्र धैर्यधारिणामतुलम् । उत्तममपगतकामो वृषमर्चे शुचितर कुसुमै ।।१३।। - भव १६ ] [ सिद्धचक्रविधान । । ॐ हीं केवलिप्राप्तधर्मायार्थ्य अर्हच्छरणमथार्चेनन्तजनुष्यपि न जातु सम्प्राप्तम् । नर्तनगानादिविधि मुद्दिश्याप्टकर्मणा शान्त्यै ।।१४।। ॐ हीं अर्हच्छरणायार्घ्य । निर्व्याबाधगुणादिकप्रागय शरण ममेतचिटनन्तम् । सिद्धानाममृताना भत्यै पूजेयमशुभहान्यर्थम् ।।१।। ॐहीं सिद्धशरणायाय चिदचिभेद शरण लौकिकमाप्य प्रयोजनातीतम् । त्यक्त्वा साधुजनाना शरण भूत्ये यजामि परमार्थम् ।।१६।। ॐ हीं साधुशरणायार्थ्य केवलिनाथ मुखोद्गतधर्म प्राणिसुखहितार्थमुद्दिष्ट । तत्प्राप्त्यै तद्यजन कर्वे मखविघ्ननाशाय ।।१७।। ॐ हीं केवलिप्रसप्तधर्मशरणायाऱ्या ससारदु खहनने निपुण जनाना नाद्यन्तचक्रमिति सप्तदशप्रमाणम् । सपूजये विविधभक्तिभरावनम्र शान्तिप्रद भुवनमुख्यपदार्थसाथै ।।१८।। ओं ही अहंदादिसप्तदशमन्त्रेभ्य समुदायार्थ्य जयमाला जय वीतराग सर्वज्ञ प्रभो, निज ध्यान लीन गुणमय अपार । अष्टादश दोष रहित जिनवर, अहंत देव को नमस्कार।। अविकल अविकारी अविनाशी, निजरूप निरजन निराकार । जय अजर अमर हे मुक्तिकत, भगवत सिद्ध को नमस्कार।। छत्तीस सुगुण से तुम मण्डित, निश्चय रत्नत्रय हृदय धार । हे मुक्तिवधू के अनुरागी, आचार्य सुगुरु को नमस्कार ।। एकादश अग पूर्व चौदह के, पाठी गुण पच्चीस धार । बाह्यान्तर मुनि मुद्रा महान, श्री उपाध्याय को नमस्कार ।। व्रत समिति गुप्ति चारित्र धर्म, वैराग्य भावना हृदय धार । हे द्रव्य-भाव सयममय मुनिवर, सर्व साधु को नमस्कार।। बहु पुण्य सयोग मिला नरतन, जिनश्रुत जिनदेव चरण दर्शन । हो सम्यग्दर्शन प्राप्त मुझे, तो सफल बने मानव जीवन ।। निज-पर का भेद जानकर मैं, निज को ही निज मे लीन करूँ । अब भेदज्ञान के द्वारा मैं, निज आत्म स्वय स्वाधीन करूँ।।
[१७
निर में गन्ना धारण कर निज परिणति को ही पहचाने ।
पर-परिणामको विमुरा मा निज जानतत्व ने ही जान ।।
जव भान-भर-शाना विकल्प तज, शुक्लध्यान में ध्याऊंगा ।
नल पार गतिमा क्षम वग्य, आत मापद पाऊंगा।।
* भिनन गित चपर मंग, पम् । पय उनको पाऊंगा ।
सम्पर रज एन पाने का, अब निजन्वभाव में आऊंगा।।
परनं पाप नी गनिन ? प्रभु । मैंने दी। पजन ।
नब नर नरगी में धान नवनवन शान हो मृत्ति मदन ।।
ही भी अरंत-सित-आचार्य-उपाध्याय
मयंनाएपनपरमेष्ठिम्यो माराम
मार र अमगलर, मगलमय मगल गान करे ।
गगन पग टमगाल नवकार मन्त्र का शान कर।।
{पमानामा
सकल्प
पनर बार नियनाय जप बग्ने वालो को हाथ में हल्दी,सुपारी, सरसों
नक्षमन र निम्नलिखित मयल्प पढ़वावं-
" जम्दवीप मरतक्षेने आर्यखण्डे देशे .प्रान्ते नगरे
ती मामे तिमी सवत्सरे जैनमन्विरे . पर्यत्य
निनिममाप्य इति मन्यस्य इति प्रमतस्य जापस्य सफल्प
एम, निर्विघ्न ममानिर्भयत हे नम स्यारा"।
उस्त मन्त्र पढ़कर हाथ में लिया हुआ नामान अथवा जल मामने चढ़ा दे।
.
जाप के मन्त्र
प्रनिप्यचार्य नवकं मुस ग मन्य का उच्चारण सुनकर, यदि अशुद्ध होतो
शत क्गद। जप वग्नं वाले • वार णमोकार मन्त्र पढ़कर, निश्चित मन्त्र का
जाप र कर दे।
(१) ॐ हा ही हो । असि आ उ सा सर्वशान्ति कुरु कुरु स्याहा।
अथवा
(२) 'ॐ हीं अर्ह अ सि आ उ सा सर्वशान्ति कुरु कुरु स्वाहा'।
१८] [ सिखचक्रविधान विधान की समापन विधि मण्डप मे वेदी के सन्मुख चौकोर, गोल और त्रिकोण ऐसे थाली मे चन्दन से स्वस्तिक वॐ बनावे। समापन विधि मे बैठने वालो की सख्या अधिक होतो अलग से थाली रख लेना चाहिये। प्रारम्भ मे सब लोग अपने स्थान पर खडे होकर मगलाष्टक पढते हुए पुष्प क्षेपण करे। तदनन्तर 'ॐ हीं क्ष्वी भू स्वाहा'-यह मन्त्र पढकर भूमि मे पुष्पक्षेपण करे। ॐ हीं मेघकुमार धरा प्रक्षालय प्रक्षालय अहस तपस्व सयक्ष फट् स्वाहा'-यह मन्त्र पढ़कर भूमि पर जल सीचे। 'ॐ ह्रीं अहं क्ष व व श्री पीठस्थापन करोमीति स्वाहा'- यह पढकर पश्चिम मे पीठ स्थापन करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐ अहं जगता सर्वशान्ति कुर्वन्तु भीपीठयन्त्र स्थापन करोमीति स्वाहा'-यह पढ़कर पीठ पर विनायक यन्त्र विराजमान करे। तदनन्तर नीचे लिखे मन्त्रो से यन्त्र की पूजा करे, व अर्घ चढ़ावे। निम्न मन्त्र पढकर धर्म चक्र को अर्घ दे। ॐ हीं अहं नम परमेष्ठिभ्य स्वाहा। ॐ ह्रीं अहं नम परमात्मेभ्य स्वाहा। ॐ हीं अहं नमोऽनादिनिधनेभ्य स्वाहा। ॐ हीं अहं नमो नृसुरासुरपूजितेभ्य स्वाहा। ॐ हीं अहं नमोऽनन्तदर्शनभ्य स्वाहा। ॐ हीं अहँ नमोऽनन्तवीर्येभ्य स्वाहा। ॐ हीं अहं नमोऽनन्तसुखेभ्य स्वाहा। ॐ हीं धर्मचक्रायाप्रतिहततेजसे स्वाहा'-यह पढ़कर धर्मचक्र के लिये अर्घ चढ़ावे। निम्न मन्त्र पढ़कर छत्रत्रय को अर्घ देवे। 'ॐ ह्रीं श्वेतछत्रत्रयश्रिये स्वाहा'। निम्न मन्त्र पढ़कर सरस्वती का आवाह्न करे। ॐहीं श्रीं क्लीं ऐं अहं सौ हौं सर्वशास्त्रप्रकाशिनि वद वद वाग्वादिनि अवतर अवतर, तिष्ठ तिष्ठ सन्निहिता भव भव वषट् । निम्न मन्त्र पढ़कर सरस्वती-जिनवाणी को अर्घ्य देवे। ही जिनमुखोद्भूतस्याद्वादनयगर्भितद्वादशांगश्रुतज्ञानार्ध निर्वपामीति स्वाहा।
सकल्प ] [१९ निम्न मन्त्र पढ़कर निर्ग्रन्थ गुरु का आवाह्न करे। ॐ हीं सम्यग्दर्शनशानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्योपाध्याय- सर्वसाधुभ्योऽयं निर्वपामीति स्वाहा। निम्न मन्त्र पढ़कर गुरु को अर्घ्यं चढ़ावे। ॐ हीं स्वस्तिविधानाय पुण्याहवाचनार्थं च कलश स्थापयामीति स्वाहा। निम्न मन्त्र पढ़कर चावलो पर जल से भरा हुआ एव श्रीफल आदि से सुशोभित कलश स्थापित करे। ॐ हीं हों हू हौं नमोऽहते भगवते पद्ममहापद्मतिगिच्छ-केसरिपुण्डरीकमहापुण्डरीकगगासिन्धुराहिद्रोहि -तास्याहरिद्धरिकान्तासीता-सीतोवानारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्ता रक्तोदापयोधिशुद्धजलसुवर्णघट-प्रक्षालितनवरत्लगन्धाक्षतपुष्पोर्जिता- मावक पवित्र कुरु कुरु सशौं नौं ववममहह ससततपपता वा द्रीं द्रींह ह स स्वाहा। उक्त मन्त्र पढ़कर कलश पर थोडा प्रासुक जल डाले। तदनन्तर निम्न मन्त्र को बोलकर क्रमश जल आदि आठद्रव्य चढ़ावे ॐ हीं नीरजसे नम (जलम) ॐ हीं शीलगन्धाय नम (चन्दनम्) ॐ हीं अक्षताय नम (अक्षतम्) ॐ ह्रीं विमलाय नम (पुष्पम्) ॐ हीं दर्पमथनाय नम (नैवेद्यम्) ॐ हीं ज्ञानद्योतनाय नम (दीपम्) ॐ हीं श्रुतधूपाय नम (धूपम्) ॐ हीं अभीष्टफलदाय नम (फलम्) ॐ हीं परमसिद्धाय नम (अयम्) तदनन्तर निम्नलिखित मत्रो को पढ़ते हुये पुष्यो का क्षेपण करे ॐ हीं अर्हद्भ्य स्वाहा। ॐ ह्रीं सिद्धेभ्य स्वाहा। ॐ ह्रीं सूरिभ्य स्वाहा। ॐ ह्रींपाठकेभ्य स्वाहा। ॐ हींसाधुभ्य स्वाहा। ॐ हींजिनधर्मेभ्य स्वाहा। ॐ हीं जिनागमेभ्य स्वाहा। ॐ हीं जिनबिम्वेभ्य स्वाहा। ॐहीं जिन चैत्यालेभ्य स्वाहा। ॐ हीं सम्यक्चारित्राय स्वाहा। (उपरोक्त प्रत्येक मन्त्र के बाद 'स्वाहा' शब्द का उच्चारण स्पष्ट तथा - २० ] [ सिसचक्रविधान प्रत्येक मन्त्र पर अध्य या पुष्प यडित (चबूतरे) पर थाली रखकर उसमे चढावे।) पीठिकामन्त्रा ॐ सत्यजाताय नम म्वाहा। ॐ अहज्जाताय नम म्बाहा। अनुपमजाताय नम म्वाहा। ॐ स्वप्रधानाय नम म्वाहा। ॐ अचलाय नम स्वाहा। ॐ अक्षयाय नम म्वाहा। ॐ अव्यावाधाय नम म्वाहा। ॐ अनन्तज्ञानाय नम म्वाहा। ॐ अनन्तदर्शनाय नम म्वाहा। ॐ अनन्नवीयाय नम स्वाहा । ॐ अनन्तमुखाय नम म्वाहा। ॐ नीरजमे नम म्वाहा। ॐ निमलाय नम स्वाहा। ॐ अच्छेद्याय नम म्वाहा। ॐ अभेद्याय नम म्वाहा। ॐ अजराय नम स्वाहा। ॐ अमराय नम म्वाहा। ॐ अप्रमेयाय नम म्वाहा। ॐ अगर्भवासाय नम म्वाहा। ॐ अक्षोभाय नम म्वाहा। ॐ अविलीनाय नम स्वाहा। ॐ परमधनाय नम स्वाहा। ॐ परमकाप्ययोगम्पाय नम म्वाहा। ॐ लोकाग्रनिवामिने नमो नम स्वाहा। ॐ परममिद्धेभ्यो नम म्वाहा। ॐ अहत्सिद्धेभ्यो नम म्वाहा। ॐ ही केवलिनिढेभ्यो नमो नम म्वाहा। ॐ अन्त कृतसिद्धेभ्यो नमो नम स्वाहा। ॐ परम्पर्गामढेभ्यो नमो नम म्वाहा। ॐ अनादि परम्परा-मिद्धेभ्यो नम म्वाहा। ॐ अनाद्यनुपर्मानद्धेभ्यो नम म्वाहा। ॐ सम्यग्दृष्टे आसन्नभयानवाणपूजाह अग्नीन्द्राय स्वाहा। मेवाफल पटपरमस्थान भवतु, अपमृत्यविनाशन भवतु, ममाधिमरण भवतु स्वाहा। यह काम्यमन्त्र पढकर प्रतिष्ठाचार्य इन्द्रो-इन्द्राणियो पर पुष्प फेंके अथवा जल के छीटे देवे। जातिमन्त्रा ॐ सत्यजन्मन शरण प्रपद्ये स्वाहा। ॐ अर्हज्जण्मन शरण प्रपद्ये स्वाहा। ॐ अर्हन्मातु शरण प्रपद्ये स्वाहा। ॐ अर्हत्सुतस्य शरण स्वाहा। ॐ अनादिगमनस्य शरण प्रपद्ये स्वाहा। ॐ अनुपमजन्मन शरण प्रपद्ये स्वाहा। ॐ रत्नत्रयस्य शरण प्रपद्ये स्वाहा। ॐ सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे ज्ञानमूर्ते सरस्वति सरस्वति स्वाहा। सेवाफल षट्परमस्थान भवतु, अपमृत्युविनाशन भवतु, समाधिमरण भवतु स्वाहा। निस्तारकमन्त्रा ॐ सत्यजाताय स्वाहा। ॐ अर्हज्जाताय स्वाहा। ॐ षटकर्मण स्वाहा। ॐ ग्रामपतये स्वाहा। ॐ अनादिश्रोपियाय स्वाहा। ॐ स्नातकाय स्वाहा। ॐ । सकल्प ] [२१ श्रावकाय स्वाहा। ॐ देवब्राह्मणाय स्वाहा। ॐ मुब्राह्मणाय स्वाहा। ॐ अनुपमाय स्वाहा। ॐ सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे निधिपते निधिपते वैश्रवण वैश्रवण स्वाहा। सेवाफल षट्परमस्थान भवतु, अपमृत्युविनाशन भवतु, समाधिमरण भवतु स्वाहा। ऋषिमन्त्रा ॐ सत्यजाताय नम स्वाहा। ॐ अर्हज्जाताय नम स्वाहा। ॐ निर्ग्रन्थाय नम स्वाहा। ॐ वीतरागाय नम स्वाहा। ॐ महाव्रताय नम स्वाहा। ॐ त्रिगुप्ताय नम स्वाहा। ॐ महायोगाय नम स्वाहा। ॐ विविधयोगाय नम स्वाहा। ॐ विवर्द्धये नम स्वाहा। ॐ अगधराय नम स्वाहा। ॐ पूर्वधराय नम स्वाहा। ॐ गणधराय नम स्वाहा। ॐ परमर्षिभ्यो नमो नम स्वाहा। ॐ अनुपमजातायनम स्वाहा। ॐसम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे भूपतेनगरपते नगरपते कालश्रमण कालश्रमण स्वाहा। सेवाफल षट्परमस्थान भवतु, अपमृत्युविनाशन भवतु, समाधिमरण भवतु स्वाहा। सुरेन्द्रमन्त्रा ॐ सत्यजाताय स्वाहा। ॐ अर्हज्जाताय स्वाहा। ॐ दिव्यजाताय स्वाहा। ॐ दिव्यर्चिजाताय स्वाहा। ॐ नेमिनाथाय स्वाहा। ॐ सौधर्माय स्वाहा। ॐ कल्पाधिपतये स्वाहा। ॐ अनुचराय स्वाहा। ॐ परम्परेन्द्राय स्वाहा। ॐ अहमिन्द्राय स्वाहा। ॐ परमार्हताय स्वाहा। ॐ अनुपमाय स्वाहा। ॐ सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टि कल्पपते कल्पपते दिव्यमूर्ते दिव्यमूर्ते वजनामन स्वाहा। सेवाफल षट्परमस्थान भवतु, अपमृत्युविनाशन भवतु, समाधिमरण भवतु स्वाहा। परमराजादिमन्त्रा ॐ सत्यजाताय स्वाहा। ॐ अर्हज्जाताय स्वाहा। ॐ अनुपमेन्द्राय स्वाहा। ॐ विजयाय॑जाताय स्वाहा। ॐ नेमिनाथाय स्वाहा। ॐ परमजाताय स्वाहा। ॐ परमार्हताय स्वाहा। ॐ सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे उग्रतेज उग्रतेज दिशाजन नेमिविजय नेमिविजय स्वाहा। सेवाफल षट्परमस्थान भवतु, अपमृत्युविनशन भवतु, समाधिमरण भवतु स्वाहा।
२२ ] [ सिद्धचक्रविधान परमेष्ठिमन्त्रा ॐ सत्यजाताय नम स्वाहा। ॐ अर्हज्जाताय नम स्वाहा। ॐ परमजाताय नम स्वाहा। ॐ परमार्हताय नम स्वाहा। ॐ परमम्पाय नम स्वाहा। ॐ परमतेजसे नम स्वाहा। ॐ परमगुणाय नम स्वाहा। ॐ परमस्थानाय नम स्वाहा। ॐ परमयोगिने नम म्वाहा। ॐ परमभाग्याय नम स्वाहा। ॐ परमर्द्धये नम स्वाहा। ॐ परमप्रसादाय नम स्वाहा। ॐ परमविज्ञानाय नम स्वाहा। ॐ परमदर्शनाय नम स्वाहा। ॐ परमवीर्याय नम स्वाहा। ॐ परमसुखाय नम स्वाहा। ॐ परमसवज्ञाय नम स्वाहा। ॐ अर्हते नम स्वाहा। ॐ परमेष्ठिने नम स्वाहा। ॐ परमनेत्रे नमो नम स्वाहा। ॐ सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे त्रैलोक्यविजय त्रैलोक्यविजय धर्ममूर्ते धर्ममूर्ते धर्मनेमे स्वाहा। सेवाफल पटपरमस्थान भवतु, अपमृत्युविनाशन भवतु, समाधिमरण भवतु स्वाहा। तदनन्तर जिस मन्त्र का जितना जप किया हो, उसकी दशाशपुष्पो द्वारा आहुतिया देना चाहिये। यह मन्त्र प्रतिष्ठाचार्य मन मे वोलकर स्वाहा शब्द का उच्चारण करे और तदनन्तर इन्द्रादि बनने वाले सव महाशय स्वाहा वोलकर पुष्प क्षेपण करे। समापन विधि समाप्त होने पर जो घट स्थापित किया था, उसे हाथ मे लेकर इन्द्र बृहच्छान्तिधारा दे। पुण्याहवाचन उसके बाद निम्नलिखित पुण्याहवाचन करे- ॐ पुण्याह पुण्याह लोकोद्यतनकरा अतीतकालसजाता निर्वाण-सागरप्रभृतयश्चतुर्विंशतिपरमदेवा व प्रीयन्ता प्रीयन्ताम्। (धारा) ॐ सम्प्रतिकालसभवा वृषभादिवीरान्ताश्चतुर्विशतिपरमजिनेन्द्रा व प्रीयन्ता प्रीयन्ताम्। (धारा) ॐ भविष्यत्कालाभ्युदयप्रभवा महापद्यादिचतुर्विशतिभविष्यत्परमदेवा व प्रीयन्ता प्रीयन्ताम्। (धारा) विंशति परमदेवा व प्रीयन्ता प्रीयन्ताम्। (धारा) ॐ वृषभसेनादिगणधरदेवा व प्रीयन्ता प्रीयन्ताम्। (धारा) ॐ सप्तद्धिविशोभिता कुन्दकुन्दाद्यनेकदिगम्बरसाधुचरणा व प्रीयन्ता प्रीयन्ताम्। (धारा) इह वान्यनगरग्रामदेवतामनुजा सर्वे गुरुभक्ता जिनधर्मपरायणा - जैनधर्म में हवन एक स्पष्टीकरण ] [२३ भवन्तु। दानतपोवीर्यानुष्ठान नित्यमेवास्तु। सर्वजिनधर्मभक्ताना धनधान्यैश्वर्यबलद्युतियश प्रमोदोत्सवा प्रवर्तन्ताम्। तुष्टिरस्तु, पुष्टिरस्तु, वृद्धिरस्तु, कल्याणमस्तु, अविघ्नमस्तु, आरोग्यमस्तु, कर्मसिद्धिरस्तु, इष्टसम्पत्तिरस्तु, काममागल्योत्सवा सन्तु, पापानि शाम्यन्तु घोराणिशाम्यन्तु, पुण्य वर्धताम, धर्मोवर्धताम्,श्रीवर्धताम्, कुल गोत्र चाभिवर्धेताम्, स्वस्ति भद्र चास्तु, आयुष्यमस्तु, पापानि क्ष्वी क्ष्वी ह स स्वाहा। श्रीमज्जिनेन्द्रचरणारविन्देष्वानन्दभक्ति सदास्तु। तदनन्तर शान्तिपाठ और विसर्जनपाठ पढ़े। जैन धर्म मे हवन एक स्पष्टीकरण जैनधर्म अहिंसाप्रधानधर्म है, अत इसमे पाप से बचने और पुन्योपार्जन के जितने भी साधन पूजा-निधानादि है, उनमे अहिंसात्मक पद्धति को प्रधान मानकर ही विधि-विधान है। यदि इसमे भी अन्य मत के समान पूजा-विधान आदि की पद्धति होती, तब तो हमे यह पता ही नही चलता कि जैनधर्म और अन्य धर्म मे भेद भी है। यह तो सर्वगत है कि जैनधर्म मे पद-पद पर जिस कार्य मे हिंसा कम और पुण्य अधिक हो, वही कार्य सराहनीय कहा गया है। यहाँ प्रत्येक क्रिया विवेकपूर्ण ही होती है। यदि हमने सावधानी न बरती और मात्र परम्परावश क्रिया के करने के पक्षपाती रहे तो निश्चित है कि हमे पुण्य के बदले पाप ही बँधने वाला है। भगवान वासुपूज्य की स्तुति करते हुए आचार्य समन्तभद्र ने 'वृहत्स्वयभूस्तोत्र' मे लिखा है --'सावद्यलेशो बहुपुण्यराशौ' । अर्थात् वृहत्स्वयभूस्तोत्र का वह सम्पण श्लोक इस प्रकार है पूज्य दिन त्वार्चयतो जनस्य सावद्यलेशो बहुपुण्यराशौ । दोषायनाल कणिका विषस्य न दृषिका शीतशिवाम्बुराशौ ।। सराग परिणति अथवा आरम्भजनित थोडा-सा पाप का लेश, बहुत पुण्य की राशि मे दोष के लिए समर्थ नही है। जिस प्रकार विष की अल्पमात्रा शीतल एव आल्हादकारी जल से युक्त समुद्र मे दोष उत्पन्न करने वाली नही हैं। -आचार्य समन्तभद्र वृहत्स्वयभूस्तोत्र, छन्द ३२। जिसमे आरम्भ थोडा और पुण्य बहुत प्राप्त हो, वह कार्य ही करना योग्य है। लेकिन आज जैनधर्म का मूल अहिंसा को जानने-मानने वाले और अपने - - २४ ] [ सिद्धचक्रविधान को जैनधर्म का कट्टर श्रद्धानी बताने वाले भी रूढिवश भट्टारक परम्परा मे प्राप्त विकृतियो को ही पीटते चले जा रहे है और विधान, वेदीप्रतिष्ठा पचकल्याणको मे शाति-विसजन मे अन्य धर्मों के समान मेवा, घी, शक्कर आदि पदार्थों से बनी धूप, जिसमे शीघ्र ही त्रसजीवो की उत्पत्ति हो जाती है,को अग्नियुक्त कुण्ड मे आहुति देकर हवन (यज्ञ) कराते जा रहे है। प्रथम तो अग्नि स्वय एकन्द्रिय जीव है तथा उसमे डाली गई धूप और समिधा मे भीत्रसजीव पाये जाते है-यह साक्षात हिसा प्रतिरूपक उदाहरण है। अत जो हिंसा के कारण यज्ञादि (हवनादि) को धर्म का कारण मान रहे है और विधान आदि कराने वाले यजमान को भी धूप व अग्नि से हवन कराने को बाध्य करते है, उन्हे देखकर बडा खेद होता है। यज्ञ (हवन) आदि के सम्बन्ध मे आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी ने भी मोक्षमार्गप्रकाशक मे लिखा है 'अग्नि आदि का महा आरम्भ करते है, वहाँ जीवघात होता है, सो उन्ही के शास्त्रो मे वा लोक मे हिंसा का निषेध है, परन्तु ऐसे निर्दय हैं कि कुछ गिनते नही।" यद्यपि यह बात पंडित टोडरमलजीने 'विविधमत समीक्षा' नामकपाचवे अधिकार के 'यज्ञ मे पशुहिंसा का प्रतिषेध'-इस प्रकरण मे लिखी है, परन्तु विचार करे कि जब हम अग्नि का महा आरम्भ कर जीवघात करते हैं तो क्या हमे मात्र जैन होने से ही उस अग्नि के महा आरम्भ मे हिंसा नही होगी और उस अग्नि मे जीवघात नही होगा? कई बार ऐसा देखने मे आया है कि प्रतिष्ठाचार्य महोदय ने तो धूप लिखा दी और श्रावक बाजार से बनी हुई धूप ले आये, जबकि उस धूप मे लट, तिरुला आदि दो-इन्द्रिय जीव भी पाये जाते है, लेकिन फिर भी उस धूप की अग्नि मे आहुति देते जाते हैं। साथ ही मेवा, शक्कर आदि खाद्य पदार्थो से बनी सुगन्धित धूप को अग्नि मे खेते जाते है, जिससे मदिर मे चारो ओर धुआँ भर जाता है, यहाँ तक कि हवन मे बैटने वालो की आखो से ऑसू बहने लगते हैं। जब मनुष्यो की यह दशा होती है, तब मक्खी, मच्छर आदि छोटे-छोटे जीवो की क्या दशा होती होगी-यह हमारे प्रतिष्ठाचार्यों की बुद्धि मे क्यो नही आता? 1 मोक्षमागप्रकाशक पाँचवाँ अधिकार पृष्ठ ११२ जैनधर्म में हवन एक स्पष्टीकरण ] [ २५ अरे, इस सुगन्धित धूप का धुआँ भर जाने से मक्खी, मच्छर ही नही, राजा वज्रजघ और रानी श्रीमती तक का मरण हो गया था। राजा वजजध के मरण के सन्दर्भ मे पुराणो मे जो उल्लेख मिलते हैं वे इस प्रकार हैं "एक दिन राजा वज्रजघ अपनी पत्नी रानी श्रीमती के साथ अपने शय्या गृह की कोमल शय्या पर शयन कर रहे थे। सेवक लोग प्रतिदिन की भाँति धूपघडो मे धूप डालकर शय्यागृह से बाहर निकल गये थे, लेकिन आज वे लोग झरोखो के द्वार खोलना भूल गये थे, इसलिए धूपघडो का धुआँ उसी गृह मे रुककर भर गया था। उस धुएँ से वे पति-पत्नी (राजा वजजघ और रानी श्रीमती) मूर्छित हो गये उनके श्वास रुक गये, और उसी रात्रि मे वे दोनो ही सदा के लिए इस लोक से विदा हो गये। हम जिस धूप को अग्नि मे डालकर धर्म मानते हैं, महापुराण के रचयिता आचार्य जिनसेन ने तो उस धूप को भोग का कारण कहा है भोगागेनापि धूपेन तयोरासीत्परासुता । धिगिमान् भोगि भोगाभान् भोगान् प्राणापहारिण ।। देखहु भोग का कारण जो धूप, ताकरि राजा-रानी (राजा वज्रजघ व रानी श्रीमती) दोऊ मृतक अवस्था कू प्राप्त भये, सो धिक्कार होऊ इन भोगनिकूँ।" समझ मे नही आता कि मेवा, खोपरा, शक्कर, घी आदि को अग्नि मे डालने से कौनसा धर्म होगा? यदि अग्नि मे भस्म करने के बजाय वह घी, खोपरा, शक्कर, मेवा आदि किसी गरीब को दे तो पुण्य हो सकता है, परन्तु ये गरीबो को तो नही देगे और मानकषाय के वश अग्नि मे डालते है। इस व्यर्थ के अपव्यय के बारे मे जो लोग जैनो की निन्दा करते हैं, वे यह ठीक ही कहते हैं कि 'लोगो को घी खाने को नहीं मिल रहा और ये जैन लोग उसे अग्नि मे डालते हैं। इसी सन्दर्भ मे वयोवृद्ध प्रसिद्ध विद्वान प० कैलाशचद जी शास्त्री, सिद्धाताचार्य बनारस ने लिखा है "अग्नि मे आहुति देकर देवताओ को तृप्त करने की वैदिक विधि इसके मूल मे है। वैदिक धर्म मे अग्नि को देवताओ को मुख कहा है, किन्तु जैनधर्म मे अग्नि न स्वय कोई देवता है और न देवताओ का मुख है। वह तो भस्म कर देने वाली जड वस्तु है। अत उसमे आहुति देकर किसी को तप्त करने का कोई प्रश्न ही नही है। पूजन तो अग्नि मे क्षेपण बिना भी सम्भव हैं।" ! आदिपुराण पर्व ९, छन्द ३० 2 जैन निबन्ध रत्नावली भाग १, पृष्ठ २५ (प्राक्कथन) , २६ ] [ सिद्धचक्र विधान इसी प्रकार इस धूप से हवन की अनेक त्रुटियां बताने हा श्री मिलापचदजी कटारिया ने भी माफ-माफ लिखा है "हवन, यह जेनधर्म की मृल मस्कृति नही है। जैनधम की मूल चीज है-अन्तरग मे रागद्वेपादि कपाओ की विजय और बाह्य में जीवदया का पालन,ये दोनो ही हवन मे घटित नहीं होते है। हवन में अग्निकायिकजीवो की विराधना होती हैं। दूर-दूर तक फ्लने वाले अग्नि के गरम-गरम धुएं मे वायुकाय आदि जीवो का विधात एव मक्खी-मच्छर आदि उड़ने वाले छोटे-छोटे बस जीवो को बाधा आदि तो प्रत्यक्ष ही दिखती है। साथ ही उसके काले धुएँ से मन्दिर की सफेद दीवागे पर मुन्दर चित्रो, छत्र-चमरो और बहुमूल्य चन्दोवो की भी खासी मिट्टी-पलीद हुये बिना नही रहती है। इसमे कभी-कभी आग लगने की सम्भावना भी रहती है। इस प्रकार हवन से सिवाय हानि के कोई लाभ नहीं दीसता है। अहिंसामय जैनधर्म मे यह निरर्थक सावद्य क्रिया कैसे पनप रही है? आज के जमाने मे घृत, मेवा, मिष्ठान्न, फलादि पदार्थ वेसे ही मंहगाई की पराकाष्ठा तक पहुंचकर जनसाधारण के लिए अत्यन्त दुर्लभ हो गये है। उनको अग्नि में जलाकर धर्म मानना-इससे बढकर अज्ञानता अन्य क्या हो सकती है? सिद्धचक्र विधानो मे हजारो रुपयो की सामग्री जलाकर खाक की जाती है। अगर ये ही रुपये दीन-अनाथो के काम मे लगाये जाये तो कितना पुण्य हो। यह भी तो सोचना चाहिये कि अग्नि में घृतादि जलाने के साथ धर्म का सम्बन्ध कैसे है? अविचारपूर्ण क्रियाओ का कोई फल मिलने वाला नही है। धर्म का असली तत्त्व छिपा जा रहा है और थोथे क्रियाकाण्डो का जोर बढ़ता जा रहा है। विवेकी विद्वान् मन मे सब कुछ जानते हुए भी अल्पज्ञ लोगो की रुख के विरुद्ध कदम उठाने का साहस नहीं कर रहे, यह बडे ही परिताप का विषय है।" पद्मपुराण में कहा "प्रथम तो यज्ञ की कल्पना ही निरर्थक है। दूसरे यदि कल्पना करनी ही है तो विद्वानो को हिंसा द्वारा यज्ञ की कल्पना नही करना चाहिए, उन्हे धर्मयज्ञ ही करना चाहिए। वह इस तरह कि आत्मा यजमान है, शरीर वेदी है, सतोष साकल्य है, त्याग होम है, मस्तक के केश कुशा हैं, प्राणियो की रक्षा दक्षिणा है, शुक्लध्यान द्वारा सिद्धपद की प्राप्ति फल है,सत्य बोलना स्तम्भ है, तप अग्नि है, चञ्चलमनपशु है और इन्दियाँ समिधाये हैं-यही धर्मयज्ञ कहलाता है। - - 1 जैन निबन्ध रत्नावली भाग १, पृष्ठ ८८ जैनधर्म में हवन एक स्पष्टीकरण ] [२७ इसी सम्बन्ध मे जैन निबध रत्नावली, भाग १ मे सकलित "जैन धर्म और हवन" नामक निबध,जिसमे लेखक ने आचार्यों के प्रमाण औरतों से यह सिद्ध कर दिया है कि अग्नि से हवन करना जैनधर्म की मूल सस्कृति नही है। अत जो भी भाई अग्नि सेहवन कराते हैं अथवा करते हैं, उन सभी से निवेदन है कि एक बार उस निबन्ध को अवश्य पढ़े,जिससे यह हिंसात्मक प्रवृत्ति बन्द हो तथा पुष्पो से शांतिविसर्जन की पद्धति को ही सभी अपनाये-यही भावना है। उपदेश ग्रहण करने की पद्धति "शास्त्रो मे कही निश्चयपोषक उपदेश है, कही व्यवहारपोषक उपदेश है। वहाँ अपने को व्यवहार का आधिक्य हो तो निश्चयपोषक उपदेश का ग्रहण करके यथावत् प्रवर्ते और अपने को निश्चय का आधिक्य होतो तो व्यवहारपोषक उपदेश का ग्रहण करके यथावत् प्रवर्ते। तथा पहले तो व्यवहार श्रद्धान के कारण आत्म- ज्ञान से भ्रष्ट हो रहा था, पश्चात् व्यवहार उपदेश ही की मुख्यता करके आत्मज्ञान का उद्यम न करे,अथवा पहले तो निश्चय श्रद्धान के कारण वैराग्य से भ्रष्ट होकर स्वच्छन्दी हो रहा था, पश्चात् निश्चय उपदेश की ही मुख्यता करके विषय-कषाय का पोषण करता है। इस प्रकार विपरीत उपदेश ग्रहण करने से बुरा ही ही होता है। -मोक्षमार्ग प्रकाशक, पृष्ठ २९८ S s | श्री सिद्धचक्र माहात्म्य श्री सिद्धचक्र गुणगान करो मन आन भाव से प्राणी, कर सिद्धो की अगवानी।।टेक।। सिद्धो का सुमरन करने से, उनके अनुशीलन चिन्तन से, प्रगटै शुद्धात्मप्रकाश, महा सुखदानी पाओगे शिव रजधानी।। श्री सिद्धचक्र० ।।१।। श्रीपाल तत्त्वश्रद्धानी थे, वे स्व-पर भेदविज्ञानी थे, निज देह-नेह को त्याग, भक्ति उर आनी s s s | हो गई पाप की हानी।। श्री सिद्धचक्र० ।।२।। मैना भी आतमज्ञानी थी, जिनशासन की श्रद्धानी थी, अशुभभाव से बचने को, जिनवर की पूजन ठानी sss | कर जिनवर की अगवानी ।। श्री सिद्धचक्र० ।।३।। भव-भोग छोड योगीश भये, श्रीपाल ध्यान धरि मोक्ष गये, दूजे भव मैना पावे शिव रजधानी s केवल रह गई कहानी।। श्री सिद्धचक्र० ।।४।। प्रभु दर्शन-अर्चन-वन्दन से, मिटता है मोह-तिमिर मन से, निज शुद्ध-स्वरूप समझने का, अवसर मिलता भवि प्राणी sss | पाते निज निधि विसरानी ।। श्री सिद्धचक्र० ।।५।। भक्ति से उर हर्षाया है, उत्सव युत पाठ रचाया है, जब हरष हिये न समाया, तो फिर नृत्य करन की ठानी sss | जिनवर भक्ति सुखदानी ।। श्री सिद्धचक्र०।।६।। सब सिद्धचक्र का जाप जपो, उनही का मन मे ध्यान धरो, नहिं रहे पाप की मन मे नाम निशानी s बन जाओ शिवपथ गामी।। श्री सिद्धचक्र० ।।७।। जो भक्ति करे मन-वच-तन से, वह छूट जाय भवबधन से, भविजन। भज लो भगवान, भगति उर आनी sss | मिट जैहे दुखद कहानी।। श्री सिद्धचक्र० ।।८।। पण्डित रतनचद भारिल्ल, ए-४, बापूनगर, जयपुर-३०२०१५ S s। .
धन्य धन्य वीतराग वाणी
2011 Funn"
धन्य धन्य वीतराग वाणी,
अमर तेरी जग में कहानी ।
चिदानन्द की राजधानी,
अमर तेरी जग मे कहानी।।टेक।।
उत्पाद-व्यय अरू धौव्य स्वरूप,
वस्तु बखानी सर्वज्ञ भूप ।
स्यावाद तेरी निशानी,
अमर तेरी जग में कहानी।।१।।
नित्य-अनित्य अरू एक-अनेक,
यस्तु कथचित् भेद-अभेद ।
अनेकान्तरूपा बखानी,
अमर तेरी जग में कहानी।।२।।
भाव शुभाशुभ बन्धस्वरूप,
शुद्ध चिदानन्दमय मुक्तिरूप ।
मारग दिखाती है वाणी,
अमर तेरी जग में कहानी।।३।।
चिदानन्द चैतन्य आनन्द धाम,
ज्ञानस्वभावी निजातम राम ।
स्वाश्रय से मुक्ति बखानी,
अमर तेरी जग में कहानी।।४।।
-पण्डित अभयकुमार जैन
शास्त्री, जैनदर्शनाचार्य, एम कॉम
A-4, बापूनगर जयपुर-302025
ॐ नम सिद्धेश्य कविवर पं० सन्तलालजी कृत श्री सिद्धचक्र विधान मंगलाचरण दोहा z नमि, रचो, जिनाधीश शिवईस सहसगुणित विस्तार । सिद्धचक्र पूजा शुद्ध त्रियोग सभार।।१।। नीत्याश्रित धनपति सुधी, शीलादिक गुण खान । जिनपद अम्बुज भ्रमर मन, सो प्रशस्त यजमान।।२।। देश काल विधि निपुणमति, निर्मल भाव उदार । मधुर बैन नयना सुघर, सो याजक निरधार ।।३।। रत्नत्रयमडित न सशयहरण सुहितकरन, करत सुगुरु उपदेश।।४।। महा, विषय-कषाय लेश । छप्पय निर्मल मडप भूमि दरव-मगल करि सोहत । सुरभि सरस शुभ पुष्प-जाल, मंडित मन मोहत ।। यथायोग्य सुन्दर चित्राम दीरथ मोल सुडोल, बसन झखझोल सरूपा।। हो वित्तसार प्रासुक दरब, सरब अग मनको हरै । सो महाभाग आनद सहित, जो जिनेन्द्र अर्चा करै।।५।। मनोज्ञ, अनूपा । सुर-मुनि सिद्धचक्र मन सो दोहा आनन्दकर, ज्ञान सुधारस थापहू, विधि-दव-जल धार । उनहार।।६।।
[३१ . अडिल्ल 'अहं' प्रसिद्ध अर्द्ध-मात्रिक महा, अकारादि स्वर मंडित अति शोभा लहा । अति पवित्र अष्टाग अर्घ करि लायके, पुरव दिशि पजो अष्टाग नमायके।। ७॥ ॐ हीं अह अ आ इ ई उ ऊ ऋ ल ल ए ऐ ओ औ अ अ अनाहत- पराक्रमाय सिद्धाधिपतये नम पूदिशि अर्घ्य निर्यपामीति स्वाहा। सोरठा वण क्वर्ग महान, अष्ट पूर्वावधि अर्घ ले । भक्ति भाव जर यान, पूजो हो आग्नेय दिशि।। ८।। ॐ हीं अहं च छ ज न ज अनाहतपराक्रमाय सिद्धाधिपतये दक्षिणदिशि अध्या वर्ण चवग प्रसिद्ध, वमविधि अर्घ उतारिके । मिलि हे वसुविधि रिद्धि, दक्षिण दिशि पूजा करौं ।। ९।। ॐ हीं अहं कखगघअनाहतपराक्रमाय सिद्धाधिपतये वक्षिणदिशि अर्घ्य वर्ण टवर्ग प्रशस्त, जलपलादि शुभ अर्घ ले । पाऊँ सब विधिम्वस्ति, नैऋत्य दिशि अर्चा करीं ।।१०।। ॐ हीं अर्ह ट ठ ड ढ ण अनाहतपराक्रमाय सिद्धाधिपतये नेऋत्यादिशि अध्यन वर्ण तवर्ग मनोग, यथायोग्य कर अर्घ धरि । मिलि है सबशुभयोग, पूजन करि पश्चिम दिशा ।।११।। ॐ हीं अर्ह त य द ध न अनाहतपराक्रमाय सिद्धाधिपतये पश्चिमदिशि अध्य। वर्ण पवर्ग सुभाग, करू आरती अर्घ ले। सब विधि आरति त्याग, वायव दिशि पूजा करा।।१२।। ॐ ही अर्ह प फ ब भ म अनाहतपराक्रमाय सिद्धाधिपतये वायव्यदिशि वर्ण यवर्गी सार, दवं-अर्घ वसु द्रव्य करि । भाव-अर्घ उर धार, उत्तर दिशि पूजा करों।।१३।। ॐ हीं अर्ह य र ल व अनाहतपंगक्रमाय सिद्धाधिपतये उत्तरदिशि अयं०। भा अय।
३२ ]
[ सिद्धचक्रविधान
शेष वर्ण चउ अन्त, उत्तम अर्घ वनाइके ।
नशे कर्म वसु भत, पूजो हो इशान दिशि ।।१४।।
ॐ हीं अर्ह श ष स ह अनाहतपराक्रमाय सिद्धाधिपतये ईशानदिशि
.
अy०।
विनय और विवेक
विनय के बिना तो विद्या प्राप्त होती ही नही है,
पर विवेक और प्रतिभा भी अनिवार्य है, इनके विना भी
विद्यार्जन असम्भव है। गुरु के प्रति अडिग आस्था का
भी महत्वपूर्ण स्थान है, पर वह आतक की सीमा तक न
पहुचना चाहिए, अन्यथा वह विवेक को कुण्ठित कर
देगी।
समागत समस्याओ का समुचित समाधान तो
स्वविवेक से ही सम्भव है, क्योकि गुरु की उपलब्धि तो
सदा और सर्वत्र सम्भव नही। परम्पराएँ भी हर समस्या
का समाधान प्रस्तुत नही कर सकती, क्योंकि एक तो
समस्याओ के अनुरूप परम्पराओ की उपलब्धि सदा
सम्भव नही रहती दूसरे, परिस्थितियाँ भी तो बदलती
रहती है।
यद्यपि विवेक का स्थान सर्वोपरि है, किन्तु वह
विनय और मर्यादा को भग करने वाला नही होना
चाहिए। विवेक के नाम पर कुछ भी कर डालना तो
महापाप है, क्योकि निरकुश विवेक पूर्वजो से प्राप्त
श्रुतपरम्परा के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
क्षेत्र और काल के प्रभाव से समागत विकृतियो का
निराकरण करना जागृत विवेक का ही काम है, पर
इसमे सर्वाग सावधानी अनिवार्य है।
-आप कुछ भी कहो, पृष्ठ३१
No text on this page.
३४ ] [ सिद्धचक्रविधान ॐ हीं णमो सिद्धाण श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नम श्रीसम्यक्त्वादि अष्टगुण- सयुक्ताय चन्दन०।।२।। दीरघ शशि किरण समान, अक्षत ल्यावत हूँ । शशिमडल सम बहुमान, पूज रचावत हूँ।। अन्तरगत अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं नमू सिद्धचक्र शिव-भूप, अचल विराजत हैं ।।३।। ॐ हीं णमो सिद्धाण श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नम श्रीसम्यक्त्वादि अष्टगुण- सयुक्ताय अक्षत०।।३।। तुम चरणचन्द्र के पास, पुष्प धरे सोहैं । मानू नखत्रन की रास, सोहत मन मोहैं।। अन्तरगत अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं । नमू सिद्धचक्र शिव-भूप, अचल विराजत हैं।।४।। ॐ हीं णमो सिद्धाण श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नम श्रीसम्यक्त्वादि अष्टगुण- सयुक्ताय पुष्प।।४।। उत्तम नेवज बहु भांति, सरस सुधा साने । अहमिन्द्रन मन ललचाय, भक्षण उमगाने ।। अन्तरगत अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं । नमू सिद्धचक्र शिव-भूप, अचल विराजत हैं।। ५।। ॐ हीं णमो सिद्धाण श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नम श्रीसम्यक्त्वादि अष्टगुण- सयुक्ताय नैवेद्य० ॥५॥ फैली दीपन की जोति, अति परकाश करै । जिम स्याद्वाद उद्योत, सशय तिमिर हरै।। अन्तरगत अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं । नमू सिद्धचक्र शिव-भूप, अचल विराजत हैं।।६।। ॐ हीं णमो सिद्धाण श्रीसिद्धपरमेष्ठिने नम श्रीसम्यक्त्वादि अष्टगण- सयुक्ताय दीप०॥६॥ धरि अग्नि धूपके ढेर, गध उडावत हूँ । कर्मो की धूप बखेर, ठोक जरावत हूँ।। अन्तरगत अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं । नमू सिद्धचक्र शिव-भूप, अचल विराजत हैं।।७।।
No text on this page.
स्वरूपा ३६ ] [ सिद्धचक्रविधान सकल त्रिधा षट् द्रव्य अनन्ता, युगपत जानत है भगवता । निर आवरण विशद स्वाधीना, ज्ञानानद परम रम लीना ।।२।। ॐ ह्रीं अनन्तज्ञानाय नम अर्घ्य० ।।२।। चक्षु अचक्षु अवधि विधि नाशी, केवल दश जोति परकाशी । सकल ज्ञेय युगपत अवलोका, उत्तम दर्श नमू सिद्धो का।।३।। ॐ हीं अनन्तदर्शनाय नम अर्घ्य० ।।३।। अन्तराय विधि प्रकृति अपारा, जीवशक्ति घाते निरधाग । ते सब घात अतुल वल स्वामी, लमत अखेद सिद्ध प्रणमामी ।।४।। ॐ हीं अनन्तवीर्याय नम अर्घ्य ।।४।। रूपातीत मन इन्द्रिय नाही, मनपर्यय हू जानत नाही । अलख अनूप अमित अविकारी, नमू सिद्ध सूक्षम गुणधारी।।५।। ॐ हीं सूक्ष्मत्वाय नम अर्घ्य ।।५।। एक क्षेत्र-अवगाह भिन्न-भिन्न राजै चिद्रूपा । निज-पर-घात विभाव विडारा, नमू सुहित अवगाह अपारा।।६।। ॐ ह्रीं अवगाहनत्वाय नम अर्घ्य ।।६।। परकृत ऊँच नीच पद नाही, रमत निरतर निजपद माही । उत्तम अगुरुलघु गुण भोगी, सिद्धचक्र ध्यावै नित योगी।।७।। ॐ हीं अगुरुलघुत्वात्मकजिनाय नम अयं ।।७।। नित्य निरामय भवभयभजन, अचल निरतर शुद्ध निरजन । अव्याबाध सोइ गुण जानो, सिद्धचक्र पूजन मन मानो।।८।। ॐ हीं अव्याबाधात्वाय नम अर्घ्य ।।८।। जयमाला दोहा जग आरत भारत महा, गारत करि जय पाय । विजय आरती तिन कहूँ, पुरुषारथ गुणगाय ।।१।। पद्धडी जय करण कृपाण सु प्रथम बार, मिथ्यात सुभट कीनो प्रहार । कोट विपर्यय मति उलंघि, पायो समकित थल थिर अभग।। १।। निज-पर विवेक अतर पुनीत, आतम रुचि वरती राजनीत । जग विभव विभाव असार एह, स्वातम सुखरस विपरीत देह ।। २।।
No text on this page.
सोलह गुणसहित द्वितीय पूजा । नम छप्पय ऊरध अधो सुरेफ सविंदु हकार विराजे । अकारादि स्वर लिप्त कर्णिका अन्त सछाजे ।। वर्गनिपूरित वसुदल अम्बुज तत्त्व संधिधर । अग्रभाग मे मत्र अनाहत सोहत अतिवर।। पुनि अत ही बेढ्यो परम, सुर ध्यावत अरि नाग को । ह्वै केहरि सम पूजन निमित, सिद्धचक्र मगल करो।। हीं णमो सिद्धाण श्रीसिद्धपरमेष्ठिने षोडशगुणसयुक्तसिद्धपरमेष्ठिन् अत्रावतरावतर सवौषट् आह्वाननम्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम्। अब मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्। पुष्पावलि क्षिपेत्। दोहा सूक्ष्मादि गुण सहित हैं, कर्म रहित नीरोग । सिद्धचक्र सो थापह, मिटै उपद्रव जोग।।२।। इति यत्रस्थापनार्थं पुष्माजलिं क्षिपेत्। हरिगीतिका हिमशैल धवल महान कठिन पाषाण तुम जस रासतै । शरमाय अरु सकुचाय द्रव वै बहो गगा तासतें।। सम्बन्ध योग चितार चित भेटार्थ झारी मे भरू । षोडश गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करू ।।१।। ॐ हीं णमो सिद्धाण षोडशगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने जल निर्व- पामीति स्वाहा। काश्मीर चन्दन आदि अन्तर-बाह्य बहुविधि तप हरै । यह कार्य-कारण लखि नमित मम भाव हू उद्यम करै ।।
द्वितीय पूजा ] [ ३९ म हू दुखी भवताप से घसि मलय चरनन ढिंग धरू । षोडष गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करू ।।२।। * ही णमो सिद्धाण षोडशगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने चन्दन। सोरभि चमक जिस तरह सहन सकि अम्बुज वसैं सरताल मे । शशि गगन वनि नित होत कृश अहिनिश भ्रमै इस ख्याल मे।। सो अक्षतोष अखण्ड अनुपम पुज धरि सन्मुख धरू । पोडश गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करू । ।अक्षत।।३।। जग प्रकट काम सुभट विकट कर हट करत जिय घट जगा । तुम शील कटक मुघट निकट सरचाप पटक सुभग भगा।। इम पुष्पराशि सुवाम तुम ढिग कर सुयश वहु उच्चरू । पोडश गुणान्वित मिद्धचक्र चितार उर पूजा करू । । पुष्प।।४।। जीवन सतावत नहिं अघावत क्षुधा डाइन सी बनी । मो तुम हनी, तुम ढिंग न आवत, जान यह विधि हम ठनी।। नेवेद्य के सकेत करि निज क्षुधानाशन विधि करू । षोडश गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करू।।नैवेद्य।।५।। मैं मोह-अन्ध अशक्त अरु यह विषम भववन है महा । ऐसे मले को ज्ञानदुति विन पार निवारण हो कहाँ।। सो ज्ञानचक्षु उधार स्वामी दीप ले पायनि परू । पोडश गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करू ।।दीप।।६।। प्रासुक सुगंधित द्रव्य सुन्दर दिव्य घ्राण सुहावनो । धरि अग्नि दश दिश वास पूरित ललित धूम्र सुहावनो।। तुम भक्ति भाव उमग करत प्रसग धूप सु विस्तरू । पौडश गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करू ।। धूप।।७।। चित हरन अचित सुरग रसपूरित विविध फल सोहने । रसना लुभावन कल्पतरू के सुर असुर मन मोहने ।। भरि थाल कचन भेट धरि ससार फल तृष्णा हरू । षोडश गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करू ।।फल।।८।। शुभ नीर वर काश्मीर चदन धवल अक्षत युत अनी । वर पुष्पमाल विशाल चरु सुरमाल दीपक दुति मनी।। वर धूप पक्व मधुर सुफल लै अर्घ अठ विधि सचरू । षोडश गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करू।।अर्घ्य।।९।।
४० ] [ मिवचाविधान गीता निर्मल मलिल शुभवान चन्दन धवन्न जान यन मनी । शुभ पुण्य मधुकर नित रम चन प्रचर ग्बाद वि पनी ।। वर दीपमाल उजाल धपायन ग्मायन करि अघ निट ममह पजन कमटन गन टनमन ।।10।। ते मावत नशाय यगपत ज्ञान निमनन्प है। दस जन्म टाल अपार गण मक्षम गन्प जनर है।। क्माप्ट विन लाग्य पज्य अदज शिव बमलारती । मुनि ध्येय मेय अमेय चह, गण गह या हम शभमनी ।।११।। ॐ हीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये नम महाध्य० । सोलह गुण सहित अर्घ्य त्रोटक दशन आवणी प्रकृति हनी, ाित जवनार मभाव बनी । इक नाय नमान लसो मव ही नम मिद अनत दृगन अबहीं।। १।। ॐ हीं अनन्तदर्शनाय नम अर्घ्य। विधि जानावण विनाश क्यिो निज ज्ञानम्वभाव विमाश लियो । ममयातर मव विशेष जनो नम ज्ञान अनन न निद ननो।।२।। ॐ हीं अनन्तज्ञानाय नम अर्घ्य। मुख अमृत पीवत म्वेट न हो, निज भाव विराजत सेट न हा । असमान महावल धारत है हम पूजत पाप विदारत है।। ३।। ॐ हीं अतुलवीर्याय नम अर्घ्य । विपरीत सभीत पगश्रितता अतिरिक्त धर न कर थिरता । पर की अभिलाप न सेवत ह निज भाविक आनन्द बेवत हैं।। ४।। ॐ हीं अनन्तसुखाय नम अर्घ्यः । निज आत्म विकाशक बोध लयो भम को परवेश नलेश कह्यो । निजम्प सुधारस मग्न भये हम मिद्धन शुद्ध पतीति नये ।। ५।। ॐ हीं अनन्तसम्यक्त्याय नम अy०। निज भाव विडार विभाव न हो, गमनादिक भेद विकार न हो। निजस्थान निम्पम नित्य बसे, नमू सिद्ध अनाचलरूप लमे।। ६।। ॐ हीं अचलाय नम अy०।
द्वितीय पूजा ] [४१ चौपाई गुण पर्यय परणतिके भेद, अति सूक्षम असमान अछेद । ज्ञान गहे, न कहै जड बैन, नमो सिद्ध सूक्षम गुण ऐन।। ७।। ॐ हीं अनन्तसूक्ष्मत्वाय नम अय॑०। जन्म-मरण युत धरे न काय, रोगादिक सक्लेश न पाय । नित्य निरजन निर-अविकार, अव्याबाध नमो सुखकार ।। सुखकार।। ८।। ॐ हीं अव्याबाधाय नम अयं। एक पुरुष अवगाह प्रजत, राजत सिद्ध-समूह अनत । एकमेक बाधा नहिं लहैं, भिन्न-भिन्न निजगुण मे रहैं।। ९।। ॐ हीं अवगाहनगुणाय नम अर्य। काययोग पर्यापति प्रान, अनविधि छिन छिन होवे हान । जरा कष्ट जग प्रानी लहै, नमो सिद्ध यह दोष न सहै।।१०।। ॐ हीं अजराय नम अयं । काल-अकाल प्राणको नाश, पावै जीव मरनको त्रास । तासौं रहित अमर अविकार, सिद्ध-समूह नमू सुखकार ।।११।। ॐ हीं अमराय नम अयं । गुण-गुण प्रति है भेद अनन्त, यो अथाह गुणयुत भगवत । है परमाण अगोचर तेह, अप्रमेय गुण बदू एह ।।१२।। ॐ ह्रीं अप्रमेयाय नम अयं०। भुजगप्रयात अनुकर्म फर्स वर्णादि जानो, किसी एक वीशेष को किं प्रमानो । पराधीन आवर्ण अज्ञान त्यागी, नमू सिद्ध विगतेन्द्रिय ज्ञान भागी।।१३।। ॐ हीं अतीन्द्रियज्ञानधारकाय नम अर्घ्य। त्रिधा भेद भावित महाकष्टकारे, रमण भावसो आकुलित जीव सारे । निजानदरमणीय शिवनार स्वामी, नमोपुरुषआकृति सबैसिद्ध नामी ।।१४।। ॐ हीं अवेदाय नम अयं। विशेष सकल चेतना धार माही, भये लै भली विधि रहो भेद नाही । तथा हीन अधिकाय को भाव टारी, नमो सिद्ध पूरणकला ज्ञानधारी । १५।। ॐ हीं अभेदाय नम अर्घ्य। ।
४२ ] | मितपरिधान निजानन्दग्ग म्याद गलीन अना मगन गगटन निग्ना । करानी को आपका पार नाही, धग आपापी गरमागी।।१६।। ॐहीं निजाधीन जनाय नम अध्य०। जयमाल दोहा पन परम परमान्ना गरन पर । जग प्रपन विर्गान गदा नमा गार।।111 बोटक दरवाग्न गप विदाग्न में वश माग्न गग निवान्न । भविताग्न पग्णसारण हा, नत्र निर नमा मामाग्न ।।।। ममयामृत पन्ति दव नहीं पर पन्ति दव नहीं पर जाक्न मर्गत श नही । विपर्गन विभाव निवाग्न , नव निट नमा गरमग्न हो।।३।। असिना अभिना आएना नपग, अभिदा सिदा अविनाशवग । यमजाम जग दसजाग्न हो नब निट नमा मतमान हो।।८।। निर-आश्रित ग्वाचित वानित हा पर आश्रित संद विनाशिन हा । विधि धाग्न हाग्न पाग्न हा नव निट नमो मतमग्न हो।।५।। अमधा अा अद्विधा आवध अवधा सुमुधा नबुधा मुनिः । विधि कानन दहन हनाशन हो, नव निद्ध नमो नसमग्न हो।।६।। शग्न चरन करन धरन मन्न नग्न भव-वार्गिध तारन हो मब निद्ध नमो मुसकाग्न हो।।७।। भववान बाम विनाशन हो दसगन विनान हनाशन हो । निज दामन बाम निवाग्न हो सब मिड नमो मुसकाग्न हो।।८।। तुम ध्यावत शाश्वत व्याधि दहे, तुम पूजत ही पद पृज लह । शरणागत 'मत' उभाग्न हो, सब मिद्ध नमो मुखकारन हो।।९।। दोहा सिद्धवग गुण अगम है, शेष न पावै पार । हम किह विधि वरणन करे, भक्ति भाव उर धार ।।१०।। ॐ हीं अनन्तदर्शनज्ञानादिषोडशगुणयुक्त सिद्धेभ्यो महाय० । इत्याशीर्वाद (यहाँ १०८ बार 'ॐ हीं अर्ह असिआउसा नम' मत्र का जाप करे।)
बत्तीस गुण सहित
तृतीय पूजा
छप्पय
ऊरध अधो सुरेफ सबिंदु हकार बिराजे,
अकारादि स्वर लिप्त कर्णिका अत सु छाजे ।
वर्गनिपूरित वसुदल अम्बुज तत्व संधिधर,
अग्रभागमे मत्र अनाहत सोहत अतिवर।।
पुनि अत ही बेढ्यो परम, सुर ध्यावत अरि नागको ।
ह्वै केहरि सम पूजन निमित, सिद्धचक्र मगल करो।।१।।
ॐ हीं णमो सिद्धाण द्वात्रिंशत्गुणसहितविराजमान श्रीसिद्धपरमेष्ठिन्
अत्रावतरावतर सवौष्ट् आह्वाननम्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम्। अत्र
मम सन्निहितो भव भव वषट् सनिधिकरणम्। (पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत)
दोहा
सूक्ष्मादि गुण सहित हैं, कर्म रहित नीरोग ।
सकल सिद्ध सो थापहू, मिटै उपद्रव योग ।।
इति यत्रस्थापनार्थ पुष्पाजलिं क्षिपेत्।
अथाष्टक
प्रभु पूजो रे भाई, सिद्धचक्र बत्तीसगुण, प्रभु पूजो रे भाई
भवत्रासित अकुलित रहै, भवि कठिन मिटन दुखताई।।
विमल चरण तुम सलिल धार दे, पायो सहज उपाई।।प्रभु पूजो रे०।।
ॐ हीं णमो सिद्धाण द्वात्रिंशत्गुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिन्
जन्मजरा रोगविनाशनाय जल।।१।।
जगवदन परसत पद चन्दन, महाभाग उपजाई ।
हरिहर आदि लोकवर उत्तम, कर धर शीश चढ़ाई।।प्रभु पूजो रे०।।
ॐ हीं णमो सिद्धाण द्वात्रिंशत्गुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने
ससारतापविनाशनाय चन्दन० ।।२।।
४४ ] - रत्न इस [ सिद्धचक्रयि धान शिवनायक पूजन लायक है, यह महिमा अधिकाई । अक्षयपद दायक अक्षत यह, साचो नाम धगई ।। प्रभु पूजो रे०।। ॐ हीं णमो सिद्धाण द्वात्रिंशत्गुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपद प्राप्तये अक्षत ।।३।। कामदाह अति ही दुखदायक, मम उर मे न टराइ । ताहि निवारण पुष्प भेट धरि, मागू वर शिवराइ ।।प्रभु पूजो रे०।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाण द्वात्रिंशत्गुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने कामवाण विनाशनाय पुष्प० ।।४।। चरुवर प्रचुर क्षुधा नहिं मेटत पूर परो इन ताइ । भेट करत तुम इनहू न भेटू, रहूँ चिरकाल अघाइ।।प्रभु पूजो रे०।। ॐ हीं णमो सिद्धाण द्वात्रिंशत्गुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्य० ।।५।। दिव्य देश-कालमे, क्है कौन है नाई । तुम पद भेटे दीप प्रकट यह, चितामणि पद पाई।।प्रभु पूजो रे०।। ॐ हीं णमो सिद्धाण द्वात्रिंशत्गुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने मोहाधकार-विनाशाय दीप० ।।६।। धूप हुताशन वासन मे धरि, दसदिश वास वसाई । तुम पद पूजत या विधि, वसु विधि ईधन जर हो जाई।।प्रभु पूजो रे०।। ॐ हीं णमो सिद्धाण द्वात्रिंशत्गुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्म-दहनाय धूप० ।।७।। सर्वोत्तम फल द्रव्य ठान मन, पूजू हू तुम पाई । जासौं जजै मुक्तिपद पइये, सर्वोत्तम फलदाई।।प्रभु पूजो रे०।। ॐ हीं णमो सिद्धाण द्वात्रिंशत्गुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफल-प्राप्तये फल०।।८।। वसुविधि अर्घ देऊ तुम मम द्यो वसुविधि गुण सुखदाई । जासु पास वसु त्रास न पाऊ, 'सन्त' कहे हर्षाई । ।प्रभु पूजो रे०।। ॐ हीं णमो सिद्धाण द्वात्रिंशत्गुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने सर्वसुखप्राप्तये अय० ।।९।।
तृतीय पूजा ]
[ ४५
गीता
निर्मल नलिल शभ वास चन्दन धवल अक्षत युत अनी ।
शुभ पप्प मधुकर नित रमे चरु पचुर स्वाद सविधि धनी ।।
वर दीपमाल उजाल धूपायन रसायन फल भले ।
करि अर्घ लिड-समूह पूजत, कमदल मच दलमले ।।
ते क्रमावर्त नसाय युगपत, ज्ञान निर्मल रूप है ।
दुल जन्म टाल अपार गुण, सूक्षम स्वरूप अनूप
काष्ट विन त्रैलोक्य पूज्य, अदूज शिव कमलापती ।
मुनि ध्येय मेय अमेय चहुँ गुण गेह, द्यो हम शुभमती ।।
ॐ हीं णमो सिद्धाण द्वात्रिंशत्गुणसयुक्ताय श्री सिद्धपरमेष्ठिने महाय॑०।
।।
सहित बत्तीस गुण अर्घ्य
पद्धडी
चेतन विभाव पुद्गुल विकाल, है शुद्ध बुद्ध तिस निमित टार ।
दृगवोध सुरूप सुभाव एह, नमू शुद्ध चेतना सिद्ध देह ।।१।।
ॐ हीं शुद्ध चेतनाय नम अर्घ्य।
मति आदि भेद विच्छेद कीन, क्षायक विशुद्ध निज भाव लीन ।
निरपेक्ष निरन्तर निर्विकार, नमू शुद्ध ज्ञानमय सिद्ध सार ।।२।।
ॐ हीं शुद्धज्ञानाय नम अयं ।
मांग चेतना व्याप्तरूप, तुम हो चेतन व्यापक सरूप ।
पर लेश न निज परदेश माहि, नमू सिद्ध शुद्ध चिद्रूप ताहि ।।३।।
ॐ हीं शुद्धचिद्रूपाय नम अयं० ।
अन्तरविधि उदय विपाक टार, तुम जातिभेद वाहिज विडार ।
निज परिणिति मे नहिं लेश शेष, नमू शुद्धरूप गुणगण विशेष ।।४।।
ॐ हीं शुद्धस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।
रागादिक परिणति को विध्वश, आकुलित भाव राखो न अश ।
पायो निज सहज स्वरूप भाव, नमू सिद्धवर्ग घर हिये चाव ।।५।।
ॐ हीं परम शुद्धस्वरूपभावाय नम अयं ।
-- ४६ ॥ | मिद्धव दोहा निह चाल म ना नि निजानन यान । नम श द गण मारा जिगर भगगना ॐ हीं शुद्धढ़ाय नम अध्यं०। निज आवतरमा निाया गर्दा नान्न । नम शद जावनी र निर रिये अडान।।।। ॐ शुद्ध ही शुद्धआवर्तकाय नम अध्यं । परम्पत कर उपज्या नही जानादिर निर भाव । नमा निट निज अमलपट पाया गार गभाव ।।८।। ॐ हीं शुद्धम्ययभवे नम अध्यं । पदडी निज मिद अनन्न चतट पाय निज शट-चेतनापज वाय । निज शुद्ध मब पायो सयोग तम निहगज ग शुद्ध जोग।।९।। ॐ हीं शुद्धयोगाय नम अध्यं० । एकेन्द्रिय आदिक जातिभेद, हीनाधिक नामा प्रति छैट ! मपूरण लब्धि विशुद्ध जात, हम पज है पद जोर हाय ।।१०।। ॐ हीं शुद्धजाताय नम अयं । दोहा महातेज आनन्दघन, महातेज परताप । नमो मिद्ध निजगुण महित,दिपे अनूपम आप ।।११।। ॐ हीं शुद्धतपसे नम अर्घ्य० ॥ पद्धडी वर्णादिक को अधिकार नाहि, सस्थान आदि आकार नाहि । अति तेजपिंड चेतन अखड, नमू शुद्ध मूर्तिक कर्मखड ।।१२।। ॐ हीं शुद्धमूर्तये नम अर्घ्य । बाहिज पदार्थ को इष्टमान, नहिं रमत ममत तासो जुठान । निज अनुभवरस मे सदालीन, तुम शुद्ध सुखी हम नमन कीन ।।१३।। ॐ हीं शुद्धसुखाय नम अy०। . -
[४७
तृतीय पूजा ]
दोहा
धर्म अर्थ अरु काम विन, अन्तिम पौरुष साध ।
भये शुद्ध पुरुषारथी, नमू सिद्ध निरवाध ।।१४।।
ॐ हीं शुद्धपौरुषाय नम अर्य।
पद्धडी
पुद्गल निरमापित वर्ण युक्त, विधि नाम रचित तासो विमुक्त ।
पुरुषाक्ति चेतनमय प्रदेश, ते शुद्ध शरीर नमू हमेश।।१५।।
ॐ हीं शुद्धशरीराय नम. अर्घ्य० ।
दोहा
पूरण केवलज्ञान-गम, तुम स्वरूप निर्वाध ।
और जान जाने नही, नमो सिद्ध तज आध।।१६।।
ॐ हीं शुद्धप्रमेयाय नम अगे।
दरशन ज्ञान सुभेद है, चेतन लक्षण योग ।
पूरण भई विशुद्धता, नमो शुद्ध उपयोग ।।१७।।
ॐ ह्रीं शुद्धोपयोगाय नम अर्घ्य
पद्धडी
परद्रव्य जनित भोगोपभोग, ते खेदरूप प्रत्यक्ष योग ।
निजरस स्वादन है भोगसार, सो भोगो तुम हम नमस्कार ।।१८।।
ॐ हीं शुद्धभोगाय नम अर्घ्य।
दोहा
निर्ममत्व युगपत लखो, तुम सब लोकालोक ।
शुद्ध ज्ञान तुमको लखो,नमो शुद्ध अवलोक । । १९।।
ॐ हीं शुद्धावलोकाय नम अर्घ्य
पद्धडी
निरइच्छुक मन वेदी महान, प्रज्वलित अग्नि है शुक्लध्यान ।
निर्भेद अर्घ दे मुनि महान, तुम ही पूजत अरहत जान ।।२०।।
ॐ हीं प्रज्वलितशुक्लध्यानाग्निजिनाय नम अर्य।
४८ ] [ सिद्धचक्रविधान दोहा आदि-अन्त वर्जित महा, शुद्ध द्रव्य की जात । स्वयंसिद्ध परमात्मा, प्रणम् शुद्ध निपात ।।२१।। ॐ हीं शुद्धनिपाताय नम अर्घ्य० । लोकालोक अनन्तवे, भाग वमो तुम आन । ये तुमसो अति भिन्न है, शुद्ध गर्भ यह जान ।।२२।। ॐ हीं शुद्धगर्भाय नम अy० । लोकशिखर शुभ थान है, तथा निजातम वास । शुद्ध वास परमात्मा, नमो सुगुण की रास ।।२३।। ॐ हीं शुद्धवासाय नम अयं० । अति विशुद्ध निज धर्म मे, वसत नशत सव खेद । परमवास नमि सिद्धको, वासी वास अभेद ।।२४।। ॐ हीं विशुद्धपरमवासाय नम अर्घ्य० । बहिरतर द्वै विधि रहित, परमातम पद पाय । नमू नमू सुखदाय ।।२।। ॐ हीं शुद्धपरमात्मने नम अy०। हीन अधिक इक देश को, विकल विभाव उछेद । शुद्ध अनन्त दशा लई, नमू सिद्ध निरभेद ।।२६।। ॐ हीं शुद्धअनन्ताय नम अर्घ्यं । निरविकार परमात्मा, त्रोटक तुम राग-विरोध विनाश कियो, निजज्ञान सुधारस स्वाद लियो । तुम पूरण शांति विशुद्ध धरो, हमको इकदेश विशुद्ध करो।।२७।। ॐ हीं शुद्धशाताय नम अy०। विद पंडित नाम कहावत है, विद अन्त जु अन्तहि पावत है । निजज्ञान प्रकाश सु अन्त लहो, कुछ अश न जानन माहिं रहो।।२८।। ॐ हीं शुद्धविदताय नम अर्घ्यं । वरणादिक भेद विडारन हो, परिणाम कषाय निवारन हो । मन इन्द्रिय ज्ञान न पावत ही, अति शुद्ध निरूपम ज्योति मही।।२९।। ॐ ह्रीं शुद्धज्योतिजिनाय नम अy०।
[ ४९ तृतीय पूजा ] जन्मादिक व्याधि न फेरि धरो, मरणादिक आपद नाहिं वरो । निवांण महान विशुद्ध अहो, जिन-शासन मे परसिद्ध कहो।। ३०।। ॐ हीं शुद्धनिर्वाणाय नम अगे। करि अन्त न गभ लियो फिरके, जनमे शिववास जनम धरके । जिनको फिर गर्भ न हो क्वहू शिवराय कहाय नमू अव हू।।३१।। ॐ ह्रीं शुद्धसदर्यगर्भाय नम अर्ध्य० ॥ जग जीवन पाप नशायक हो, तुम आप महा सुखनायक हो । तुम मगल मूरति शांति मही, सब पाप नशे तुम पूजत ही।।३२।। ॐ हीं शुद्धशाताय नम अयं०। जयमाला दोहा पच परमपद ईश है, पचमगति जगदीश । जगतप्रपच रहित बसे, नमू सिद्ध जग ईश।। परम ब्रह्मा परमातमा, परम ज्योति शिवथान । परमातम पद पाइयो, नमो सिद्ध भगवान ।।१।। कामिनी मोहन जन्ममरण-कष्ट को टारि अमरा भये,जरादिरोगव्याधिपरिहार अजराभये । जय द्विविधि कर्ममल जार अमला भये, जय दुविधि टार ससार अचला भये ।। जय जगतवाम तज जगतस्वामी भये, जय विना नाम थिर परमनामी भये । जय कुबुद्धिरूप तजि सुबुद्धिरूपा भये, जय निषधदोष तज सुगुण भूपा भये ।। करिपु नाशकर परम जय पाइए, लोकत्रयपूरि तुम सुजस घन छाइये । इन्द्र नागेन्द्र धर शीश तुम पद जजै, महा वैरागरस पाग मुनिगण भ6।। विधनवन दहन को अघन घन पौन हो, सघन गुणरासके वासको भौन हो । शिवतिय वशकरन मोहिनी मत्र हो, काल क्षयकार बेताल के यत्र हो।। कोटिथित क्लेशको मेटिशिवकर रहो,उपल की नकलहो अचलइकथलरहो । स्वप्न मे हू न निज अर्थ को पावही, जे महा खल न तुम ध्यानधरि ध्यावही ।। आपके जाप विन पाप सव भेटही, पाप की ताप को पाप कब मेटही । 'सत' निज दास की आस पूरी करो, जगत से काढ़ निजचरण मे ले धरो।।
५० ] [ मिहविधान घत्ता जय अमन अनृप, शुद्ध वन्प, निटिन निन्प धनंग । जय विवन नगार, नगलनयर, निहुँ जगनायक पन्नग ।। ॐ हीं मिद्धचक्राधिपतये नम हातिवगत्गुणमयुक्तनिटेभ्यो नम पूणार्य। (यहाँ १०८ दारही अर्ह अनिआउना नम'मत्र का जाप करना चाहिये।) आज नहीं तो कल आत्मानुभवी नत्पन्षो के सम्पर्क में आकर शुद्धात्मतन्त्र के प्रतिपादक शास्त्रो को पढकर आत्मा की चर्च-बातां करना अलग वान है और शुद्धात्मा का अनुभव करना अलग। अधिकाश जगत तो गतानुगतिर ही होता है। जो जिनप्रकार के वातावरण मे रहता है, उनीप्रकार की बाते करने लगता है, व्यवहार करने लगता है. परन्तु वस्तु की गहगई तक बहुत कम लोग पहुँच पाते हैं अधिकाश नो हॉ मे हॉ मिलानेवाले और ऊपर से वाह- वाह करनेवाले ही होते हैं। जो लोग तत्व की गहराई तक पहुँच जाते हैं, उन्हे तो परमतत्व की प्राप्ति हो ही जाती है, किन्तु जो अपनी स्यूल बुद्धि के कारण परमतत्व को प्राप्त नहीं कर पाते हैं, उन्हें भी इतना लाभ तो होता ही है कि वे जगत के वासनामय कषायमय विषाक्त वातावरण से तो बहुत-कुछ बचे रहते हैं, उनका जीवन सहज सात्विक वना रहता है, परिणामो मे भी निर्मलता बनी रहती है। तथापि यदि अच्छी होनहार हो तो काल पाकर उनका भी पुनपार्थ जागृत हो जाता है और आज नहीं तो कल वे भी निज तत्व तक पहुँच ही जाते हैं। -सत्य की खोज, अध्याय ३४, पृष्ठ १८९
चौसठ गुण सहित
चतुर्थ पूजा
छप्पय
ऊरघ अधो सु रेफ सबिंदु हकार बिराजे,
अकारादि स्वर लिप्त कर्णिका अन्त सु छाजे ।
वर्गनिपूरित वसुदल
अम्बुज तत्त्व संधिधर,
अग्रभाग मे मत्र अनाहत सोहत अतिवर।।
पुनि अत ही बेढ्यो परम, सुर ध्यावत अरि नागको ।
ह्वै केहरि सम पूजन निमित, सिद्धचक्र मगल करो।।
ॐ हीं णमो सिद्धाण चतुःषष्ठिगुणसहित १ श्रीसिद्धपरमेष्ठिने
अत्रावतरावतर सवौषट् आह्वाननम्। अत्रतिष्ठतिष्ठठ ठ स्थापनम्। अत्र
मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम्। (पुष्पाजलि क्षिपेत)
दोहा
सूक्ष्मादिक गुण सहित हैं, कर्मरहित नीरोग ।
सिद्धचक्र सो थापहू, मिटै उपद्रव योग।।
(इति यत्रस्थापनार्थ पुष्पाजलि क्षिपेत्।)
सिद्धगण पूजो हरषाई, चौंसठि गुणनामा विधिमाला ।
सुमरो सुखदाई, सिद्धगण पूजोरे भाई।।अचरी।।
त्रिभुवन उपमा वास लखै, तुम पद-अम्बुज माई।।
निर्मल जल की धार देहु, अवशेष करण ताई।।सिद्ध०।।
हीं चतुःषष्ठिगुणसहित
श्रीसिद्धपरमेष्ठिने
जन्मजरारोगविनाशनाय जल०।।१।।
तुम पद अम्बुज वास लेन मनु, चन्दन मन भाई ।
निज सो गुणाधिक्य सगति को, लहि मन हरषाई। सिद्ध०।।
ॐ हीं चतु षष्ठिगुणसहित श्री सिद्धपरमेष्ठिने
ससारतापविनाशनाय चदन० ।।२।।
। ५२ ] [ सिद्धचक्रविधान क्षीरज धान सुवासित नीरज, कर सो छरलाई । अगुलसे तदुलमो पूजत, अक्षय पद पाई। । सिद्ध०।। हीं चतु षष्ठिगुणसहित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपदप्राप्तये अक्षत०।।३।। धूलियार छवि हरण विवर्जित, फूलमाल लाई । कामशूल निरमूल करणको, पूजहू तुम पाई।।सिद्ध०।। ॐ हीं श्रीचतु षष्ठिगुणसहित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने कामवाण विनाशनाय पुष्प० ।।४।। भूखागार अक्षीण रमी हू, पूरति है नाइ । चरु लाय तुम पद पूजत हो, पूरन शिवराइ । ।सिद्ध०।। ॐ ह्रीं चतुषष्ठिगुणसहित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोग- विनाशनाय नैवेद्य० ।।५।। दीपनि प्रति तुम पद नित पूजत, शिवमारग दरशाई । घोर अध ससार हरण की, भली सूझ पाई। सिद्ध०।। ॐ हीं चतु षष्ठिगुणसहित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने मोहाधकार- विनाशनाय दीप० ।।६।। कृष्णागरु कर्पूर पूर घट, अगनी से प्रजलाई । उडै धूम यह, उडे किधो जर करमन की छाइ । । सिद्ध०।। ॐ हीं चतुःषष्ठिगुणसहित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्मदहनाय धूप० ।।७।। मधुर मनोग सु प्रासुक फल सो, पूजो शिवराई । यथायोग विधि फल को दे गुण, फल की अधिकाई। सिद्ध०।। हीं चतुःषष्ठिगुणसहित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफलप्राप्तये फल०।।८।। निरघ उपावन पावन वसुविधि, अर्घ हर्ष ठाई । भेट धरत तुम पद मैं पाऊ, निर-आकुलताई।।सिद्ध०।। ॐ हीं चतु षष्ठिगुणसहित-श्रीसिद्धपरमेष्ठिने सर्वसुख- प्राप्तये अर्घ्य०।।९।।
चतुर्थ पूजा ] [५३ गीता छन्द - . निर्मल सलिल शुभ वास चन्दन, धवल अक्षत युत अनी । शुभ पुष्प मधुकर नित रमैं चरु, प्रचुर स्वाद सुविधि धनी।। वर दीप माल उजाल धूपायन, रसायन फल भले । करि अर्घ सिद्ध-समूह पूजत, कर्मदल सब दलमले ।।१।। ते क्रमावर्त नसाय युगपत, ज्ञान निर्मल रूप हैं । दुख जन्म टाल अपार गुण, सूक्षम स्वरूप अनूप हैं।। कर्माष्ट बिन त्रैलोक्य पूज्य, अदूज शिव कमलापती, मुनि ध्येय सेय अमेय, चहुँ गुण गेह, द्यो हम शुभमती ।।२।। ॐ हीं अहंतजिनादिसिद्धेभ्यो नम पूर्णाध्य। अथ चौसठ गुण अy (चाल - आलोचना पाठ) चउ घाती कर्म नशायो, अरहत परम पद पायो । द्वै धर्म कह्यो सुखकारा, नमू सिद्ध भए अविकारा।। १।। ॐ ह्रीं अरहत-जिनसिद्धेभ्यो नम अयं० । सक्लेश भाव परिहारी, भए अमल अवधि बल धारी । सो अतिशय केवलज्ञाना, उपजाय लियो शिवथाना।। २।। ॐ हीं अवधिजिनसिद्धेभ्यो नम अy०। निर्मल चारित्र समारा, परमावधि पटल उघारा । केवल पायो तिस कारण, नमू सिद्ध भये जग तारण।। ३।। ॐ हीं परमावधिजिनसिद्धेभ्यो नम अर्घ्यं । वर्द्धमान विशद परिणामी, सर्वावधि के हो स्वामी । अन्तिम वसुकर्म नसाया, नमू सिद्ध भये सुखदाया।। ४।। ॐ ह्रीं सर्वावधिजिनसिद्धेभ्यो नम अयं । जिस अन्त अविध को नाही, तुम उपजायो पद ताही । निर्मल अवधी गुणधारी, सब सिद्ध नमू सुखकारी।। ५।। ही अनन्तावधिजिनसिद्धेभ्यो नम अy०। तप बल महिमा अधिकाई, बुद्धि कोष्ठ रिद्धि उपजाई । श्रुत ज्ञान कोष्ठ भडारी, नमू सिद्ध भये अविकारी।। ६।। ॐ ह्रीं कोष्ठबुद्धिऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्य।
५४ ] - - ८।। . [ सिद्धचक्रविधान ज्यो बीज फले वहुरासी, त्यो छिन ही वह अभ्यामी । यह पावत ही योगीशा, भये सिद्ध नमू शिव ईशा।। ७।। ॐ हीं बीजवृद्धि ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अयं । पदमात्र समस्त चितारे, यह रिद्धि पद अनुसारे । यह पाय यतीश्वर ज्ञानी, भये सिद्ध नमू शिवथानी।। ॐ हीं पादानुसारिणिऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अयं० । जो भिन्न-भिन्न इक लारै, शव्दन सुन अर्थ विचारै । यह ऋद्धि पाय सुखदाता, नमू सिद्ध भये जगत्राता।। ९।। ॐ हीं सभिन्नसश्रोतृऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अy० । मति श्रुत अर अवधि अनूपा, विन गुरु के सहज सरूपा । भयो स्वयबुद्ध निज ज्ञानी, नमू सिद्ध भये सुखदानी।।१०।। ॐ हीं स्वयबुद्धेभ्यो नम अय॑०। जो पाय न पर उपदेशा, जाने तप ज्ञान विशेषा । प्रत्येकबुद्ध गुण धारी, भये सिद्ध नमू हितकारी।।११।। ॐ हीं प्रत्येकबुद्ध-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य । गणधर से समकित धारी, तुम दिव्यध्वनि अनुसारी । ज्ञानिन सिरताज कहाये, भये सिद्ध सुजस हम गये ।।१२।। ॐ हीं बोधितबुद्धेभ्यो नम अय। मन योग सरलता धारे, तिस अन्तर भेद उघारै । जो होय ऋजुमति ज्ञानी, नमू सिद्ध भये सुखदानी।।१३।। ॐ हीं ऋजुमति-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अy०। बाके मन की सब बाता, जाने सो विपुल कहाता । तुम पाय भये शिवधामी, नमू सिद्धराज अभिरामी।।१४।। ॐ ह्रीं विपुलमति-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्यं । सुर-विद्या को नही चाहैं, निज चारित विरद निवाहैं । दस पूर्व ऋद्धि यह पायो, भये सिद्ध मुनिन गुण गायो।।१५।। ॐ हीं दशपूर्वकऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अय० । चौदह पूरव श्रुतज्ञानी, जाने परोक्ष परमानी । प्रत्यक्ष लखो तिस सारू, भये सिद्ध हरो अघ म्हारू।।१६।। ॐ हीं चौदहपूर्व-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अय।
चतुर्थ पूजा ] [५५ . सुन्दरी ज्योतिषादिक लक्षण जान कैं, शुभ अशुभ फल कहत बखानिकै । निमित ऋद्धि प्रभाव न अन्यथा, होय सिद्ध भये प्रणम् यथा ।।१७।। ॐ ह्रीं अष्टागनिमित्त-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अj०। बहु विधि अणिमादिक ऋद्धि जू, तप प्रभाव भई तिन सिद्धि जू । निष्प्रयोजन निजपद लीन हैं, नमू सिद्ध भये स्वाधीन हैं।।१८।। ॐ ह्रीं विवर्ण-श्रद्धिसिद्धेभ्यो नम अy०। भूमि जल जतु जिय ना हरें, नमू ते मुनि शिवकामिनी वरै । नैक नही बाधा परिहार हो, नमू सिद्ध सभी सुखकार हो।। १९।। ॐ ह्रीं विज्जाहरण-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घा।। जघ पर दो हाथ लगावही, अन्तरीक्ष पवनवत् जावही । पाय ऋद्धि महामुनि चारणी, यथायोग्य विशुद्ध विहारणी।।२०।। ॐ हीं चारण-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नमा अy०। खग समान चलैं आकाश में, लीन नित निज धर्म प्रकाश मे । शुद्ध धारण करि निज सिद्धता, पाइयो हम नमन करै यथा।।२१।। ॐ हीं आकाशगामिनि-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अय। वाद विद्या फुरत प्रमान ही, वज्रसम परमतगिरि हानही । सब कुपक्षी दोष प्रगट करें, स्याद्वाद महादुति को धरै ।।२२।। ॐ हीं परामर्श-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य। विषम जहर मिला भोजन करें, लेत ग्रासहिं तिस शक्ती हरें । ते महामुनि जग सुखदाय जू, हम नमे तिन शिवपद पाय जू।।२३।। ॐ ह्रीं आशीविष-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अय। जो महाविष अति परचण्ड हो, दृष्टि करि तिन कीने खण्ड हो । सो यतीश्वर कर्म विडारकैं, भये सिद्ध नमू उर धारक।।२४।। ॐ हीं दृष्टिविषविष-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य० । अनशनादिक नित प्रति साधना, मरणकाल तई न विराधना । उग्र तप करि वसुविधि नासतें, हम नमे शिवलोक प्रकाशतें ।।२।। ॐ हीं उग्रतप-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अयं ।
५६ ] [ सिद्धचक्रविधान बढति नित प्रति सहज प्रभावना, उग तप करि क्लेश न पावना । दीप्ति तप करि कर्म जरायक, भये सिद्ध नम् सिर नायकै।।२६।। ॐ ह्रीं दीप्ततप-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्यं । अन्तराय भये उत्सव बढे, वाल चन्द्र समान कला चढे । वृद्ध तप की ऋद्धि लहै यती, भये सिद्ध नमत सुख हो अती ।।२७।। ॐ हीं तपोवृद्धि-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य । सिंहक्रीडित आदि विधानते, नित बढावत तप विधि मानते । महामुनीश्वर तप परकाशते, नम् मुक्त भये जगवासते।।२८।। ॐ ह्रीं महातपो-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्यं । शिखर-गिरि ग्रीषम, हिम सर-तटे, तरु निकट पावस निजपद रटें । घोर परिपह करि नाही हटै, भये सिद्ध नमत हम दुख कटैं।।२९।। ॐ ह्रीं घोरतपो-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य०। महाभयकर निमित मिलै जहा, निविकार यती तिप् तहा । महापराक्रम गुण की खान हैं, नमो सिद्ध जगत सुखदान है।। ३०।। ॐ हीं घोरगुण-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अयं० । सघन गुण की रास महायती रत्नराशि समान दिपै अती । शेष जिन वर्णन करि थकि रहै, नमू सिद्ध महापद को लहै।।३१।। ॐ हीं घोरगुणपरिक्रमाण-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अयं० । अतुल वीर्य धनी हन काम को, चलत मन न लखत सुर-वाम को । बालब्रह्मचारी योगीश्वरा, नमू सिद्ध भये वसुविधि हरा ।। ३२।। ॐ हीं ब्रह्मचर्य-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अयं । सकल रोग मिटै सस्पर्शते, महा यतीश्वर के आमर्शते । औषधि यह ऋद्धि प्रभावना, भये सिद्ध नमत सुख पावना।।३३।। ॐ हीं आमर्षऋद्धि सिद्धेभ्यो नम अयं । मूत्र मे अमृत अतिशय बसे, जा परसते सब वयाधी नसे । औषधी यह ऋद्धि प्रभावना, भये सिद्ध नमत सुख पावना ।।३४।। ॐ हीं आमोसिय-औषधि-ऋद्धि सिद्धेभ्यो नम अy०। तन पसीजत जल-कण लगतही, रोग व्याधि सर्व जन भगतही । औषधि यह ऋद्धि प्रभावना, भये सिद्ध नमत सुख पावना ।।३५।। ॐ हीं जलोसियऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अय।
No text on this page.
है, आयके, ५८ ] [ सिद्धचक्रविधान हस्तकमल मे अन्न मधुर रस देत मधुकर सम जिय वचन गध को लेत है । मधुश्रावी यह ऋद्धिभई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजू तिन पाय जू।।४२।। ॐ ह्रीं मधुस्रावी-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य। अमृत सम आहार होय कर वचनामृत सुक्ख श्रवण मे जायके । आमियरस यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजू तिन पाय जू।।४३।। ॐ हीं आमियरसऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य। जिस बासन जिस थान आहार करें यती, चक्री सेना खाय अखै होवे अक्षीणरसी यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजू तिन पाय जू।।४४।। ॐ हीं अक्षीणरस-ऋद्धिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य । दे अती । लसे । सोरठा सिद्धरास सुखदाय, वर्धमान नितप्रति नमू ताहि सिर नाय, वृद्ध रूप गुण अगम है।।४५।। ॐ ह्रीं बड्ढमाण सिद्धेभ्यो नम अर्य। रागादिक परिणाम, अन्तर के अरि नाशके। लहि अरहत सु नाम, नमो सिद्धपद पाइया।।४६।। ॐ हीं अरहन्तसिद्धेभ्यो नम अर्घ्यं । दो अन्तिम गुणथान, भाव-सिद्ध इस लोक मे । तथा द्रव्य-शिवथान, सर्व सिद्ध प्रणम् सदा।।४७।। ॐ हीं णमो लोए सर्वसिद्धेभ्यो नम अयं०। शत्रु व्याधि भय नाहिं, महावीर धीरज धनी । सिद्ध जिननाह, सतनिके भवभय हरै।।४८।। ॐ हीं भगवते महावीरवड्ढमाणाय नम अर्घ्यं । नमू सिद्ध
No text on this page.
६० ] [ सिद्धचक्रविधान स्वय सिद्ध भगवान, ज्ञानभूत परकाशमय । लसत नमू मन आन, मम उर चिंता दुख हरो।। ५९।। ॐ हीं णमो स्वयभूसिद्धाय नम अर्घ्य। मन इन्द्रिय सो भिन्न, मन इन्द्री परकाश कर । सोई ब्रह्म अखिन्न, साधित सिद्ध भये नमू ।। ६०।। ॐ हीं णमो ब्रह्मसिद्धायनम अयं । द्रव्य अनन्त गुणात्म, परणामी परसिद्ध परसिद्ध के । पद निज-आत्म, साधत सिद्ध अनत गुण।।६१।। ॐ हीं मो अनन्तगुणसिद्धाय नम अयं । सर्व तत्वमय पर्म, गुण अनन परमातमा । सो पायो निजधर्म, परम सिद्ध तिनको नमू ।। ६२।। ॐ हीं णमो परमानन्तसिद्धाय नम अy०। लोक शिखर के वास, पायो अविचल थान निज । सर्व लोक परकाश, ज्ञानज्योति तिनको नमो।। ६३।। ॐहीं लोकाग्रवासिसिद्धाय नम अर्घ्य। काल विभाग अनादि, शास्वत रूप विराजते । याते नहिं सो आदि, नमि अनादि सिद्धान को ।। ६४।। ॐ ही णमो अनादिसिद्धाय नम अर्घ्य। जयमाला दोहा तीर्थंकर त्रिभुवन धनी, जापद करत प्रणाम । हम किह मुख वर्णन करै, तिन महिमा अभिराम ।।१।। चौपाई जय भवि-कुमुदन मोदन चदा, जय दिनन्द त्रिभुवन अरविंदा । भव-तप-हरण शरण रस-कूपा, मद ज्वर जरन हरण घनरूपा ।। २।। अकथित महिमा अमित अथाई, निर-उपमेय सरसता नाई । भावलिंग विन कर्म खिपाई, द्रव्यलिंग बिन शिव पद पाई।। ३।। नय विभाग बिन वस्तु प्रमाणा, दया भाव बिन निज कल्याणा । पगु सुमेरु चूलिका परसै, गुग गान आरम्भे स्वर सै।। ४।।
८।। चतुर्ष पूजा } [ ૬૧ यो अजोग काग्ज नहीं होई, तम गुण कवन कठिन है मोई । मवं बैन-शानन जिनमाही. भाग अनन्त धरै तुम नाही।। ५।। गोसर में नहि निध नमावे, वायन लोक अन्त नही पावै । नाते स्चत भक्ति भाव तुम, पावन कगे अपावन उर हम।। ६।। जे तुम पश निज मुत उच्चार, ने निह लोक मुजम विस्तारै । तुम गुणगान मान कर पानी पावै लगण महा मुरादानी।। ७।। जिन चित ध्यान नलिल तम धाग, ने पनि तीरय हैं निरधाग । तुम गण हन तुम्ही मरवामी, वचन जाल में लत न फामी।। नगत बध गुणनिध दयानिधि, बीजभत कल्याण मवनिधि । अक्षय शिव-चम्प श्रिय स्वामी, पुरण निजानन्द विधामी।। ९।। ग्णागन गवन्य महिनवर, जन्म-मरण दस आधि-व्याधि हर । 'मन भक्ति तम हा अनगगी, निश्चै अजर अमर पद भागी।।१०।। ॐ ही चतु पटियनोपरिस्थितसिद्धेभ्यो नम महाय० । पतानन्द जय जय मसमागर, मजन उजागर, गुणगण आगर, तारण हो । जय मन उधाण विपति विसरण, नुरा विस्तारण, कारण हो ।। नन गणगान परम फलदान, मो मत्र प्रमान विधान करू । जहरी चौन वैरी की क्हरी, अमहरी भव की व्याधि हरू।। इत्याशीर्वाद (यहाँ १०८ बार 'ॐ ही अर्ह असिआउसा नम' मत्र का जाप करना चाहिये।) आत्मधर्म धर्म का आरम्भ भी आत्मानुभूति से ही होता है और पूर्णता भी इसी की पूर्णता मे। इससे परे धर्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आत्मानुभूति ही आत्मधर्म है। साधक के लिए एकमात्र यही इष्ट है। इसे प्राप्त करना ही साधक का मूल प्रयोजन है। -मैं कौन ह, पृष्ठ १८ एक सौ अबईस गुण सहित पंचम पूजा छप्पय । ऊरध अधो सुरेफ सविंदु हकार विराजे । अकारादि स्वर लिप्त कर्णिका अन्त सुछाजै।। वर्गनिपूरित वसुदल अम्बुज तत्व संधिधर । अग्रभागमे मत्र अनाहत सोहत अतिवर।। पुनि अन्त ही बेढ्यो परम, सुर ध्यावत अरि नागको । ह्वै केहरि सम पूजन निमित, सिद्धचक्र मगल करो।। ॐ हीं णमो सिद्धाण अष्टविंशत्यधिकशत-(१२८) गुणसहित विराजमान श्री सिद्धपरभष्ठिन् अत्रावतरावतर सवौषट् आह्वाननम्, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्। दोहा सूक्ष्मादि गुण सहित हैं, कर्म रहित नीरोग । सिद्धचक्र सो थापहूँ, मिटै उपद्रव योग।। (इति यत्र स्थापनार्थं पुष्पाजलिं क्षिपेत्। (चाल -बारहमासा छन्द) चन्द्रवर्ण लखि चन्द्रकातमणि, मनते श्रवै हुलसधारा हो । कज सुवासित प्रासुक जलसो, पूजू अतर अनुसारा हो।। लोकाधीश शीश चूडामणि, सिद्धचरण उरधारा हो । चौसठि दुगुण सुगुण मणि सुवरण, सुमिरत ही भवपारा हो ।।१।। ॐ हीं णमो सिद्धाण अष्टविंशत्यधिकशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्ध- परमेष्ठिने जन्मजरारोगविनाशनाय जल निर्वपामीति स्वाहा ।।१।। सुरगण मणिधर जास वास लहि, मद तजि गध लुभावत हैं । सो चदन नदनवन भूषण, तुम पदकमल चढ़ावत हैं।।लोकाधीश०।। ॐ हीं णमो सिद्धाण अष्टविंशत्यधिकशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्ध- परमेष्ठिने ससारतापविनाशनाय चन्दन ।।२।।
पचम पूजा ] चपक ही के शम अमरावलि, समत चकित चकराज भए । शशि मण्डल जानो नो अक्षत. पुजधार पद कज नये ।। लोवाधीश भीश चूडामणि, सिद्धचक्र उरधारा हो । चीनति दगुण मुगुण मणि सुवरन, सुमरत ही भवपारा हो।। ॐ हीं णमो सिद्धाण अष्टविंशत्यधिकशतगुणसहिताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपदप्राप्तये अक्षत० ।।३।। मदन वदन तहग्न बरन ति, लोचन अलिगण छाय रहे । पुष्पमाल वानिन विशाल मो, भेट धरत उर काम दहे।।लोकाधीश०।। ॐदीं पटविंशत्यधिकशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने कामवाण विनाशनाय पुष्पं० ।।४।। चतवत मन वरणत रनना, ग्न म्वाद लेत ही तृप्त थये । जन्मानर हु की छधा निवार, नो नेवज तुम भेट धरे।।लोकाधीश०।। ॐ हीं अष्टविंशत्यधिकशतगुणसहिताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य० ।।५।। लवणिपभा अनुपम मुर, निज शीश धरण की रास करे । या विन तुच्छ विभव निज जाने, मो दीपक तुम भेट धरे ।।लोकाधीश०।। ॐ हीं अष्टविंशत्यधिकशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने मोहाधकार-विनाशनाय दीप० ।।६।। नीलजना मुरी नभ मे ज्यो, ऋषभ-भक्ति कर नृत्य कियो । मो तुम सन्मुख धूप उडावत, तिम छवि को नही भाव लियो । ।लोकाधीश०।। ॐ हीं अष्टविंशत्यधिकशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्म दहनाय धूप० ।।७।। सेव रगीले अनार रसीले, केला की ले डाल फली । डाली हू नृपमालि हूँ,नातर प्रासुकता की रीति भली।।लोकाधीश०।। ॐ हीं अष्टविंशत्याधकशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफल प्राप्तये फल०॥८॥ एक से एक अधिक सोहत वसु-जाति अर्घ करि चरण नमू । आनद आरति आरत तजिकै, परमारथ हित कुमति वमू।।
६४ [ सिद्धचक्रविधान लोकाधीश शीश चूडामणि, सिद्धचक्र उरधारा हो । चौंसठि दुगुण सुगुण मणि सुवरन सुमिरत ही भवपारा हो।। ॐ हीं अष्टविंशत्यधिकशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपद प्राप्तये अयं ॥९॥ गीता निर्मल सलिल शुभ वास चन्दन, धवल अक्षत युत अनी, शुभ पुष्प मधुकर नित रमे, चरु प्रचुर स्वाद सुविधि घनी । वर दीपमाल उजाल धूपायन रसायन फल भले, करि अर्घ सिद्ध-समूह पूजत, कर्मदल सब दलमले।। ते क्रमावर्त नसाय युगपत, ज्ञान निर्मल रूप हैं, दुख जन्म टाल अपार गुण, सूक्षम स्वरूप अनूप हैं । कर्माष्ट बिन त्रैलोक्य पूज्य, अदूज शिव कमलापती, मुनि ध्येय मेय अमेय, चहुँ गुण गेह, द्यो हम शुभमती ।। ॐ हीं अष्टविंशत्यधिकशतगुणयुक्तसिद्धेभ्यो नम पूर्णाय० ॥१०॥ एक सौ अट्वईस गुण सहित अर्घ्य रोटक निरबाध सु तत्व सरूप लखो, इक लेश विशेष न शेष रखो । अति शुद्ध सुभाविक क्षायक है, नमू दर्श महासुखदायक है।। १।। ॐहीं सम्यग्दर्शनाय नम अय। निरमोह अकोह अबाधित हो, परभाव थकी न विराधित हो । निरअस चराचर जानत हैं, हम सिद्ध सुज्ञान प्रमानत हैं।। २।। ॐ हीं सम्यग्ज्ञानाय नम अy०। सब राग-विरोध निवारन है, निज भाव थकी निज धारन है । पर मे न कबहू निज भाव वहै, अति सम्यक्चारित्र नाम यहै।। ३।। ॐ हीं सम्यक्चारित्राय नम अर्थ्य। उत्पाद विनाश न बाध धरै, परनाम सुभाव नही निसरै । तुम धारत हो यह धर्म महा, हम पूजत हैं पद शीश यहाँ ।। ४।। ॐ हीं अस्तित्वधर्माय नम अर्घ्य।
No text on this page.
No text on this page.
पंचम पूजा ] [६७ पर के मन क्रोधी सरम्भा, करत मूढ़ नाना आरम्भी । सिद्धराज प्रणम् तिस त्यागी, निर्विकल्प निजगुण के भागी।।२४।। ॐ हीं अकारितमन क्रोधसरम्भनिर्विकल्पधर्माय नम अर्थ्य। भुजंगप्रयात मनोयोग रभा प्रशसीक क्रोधा, निजानद को मान ठाने अबोधा । महानिंदनी भाव को त्याग दीना, निजानद को स्वाद ही आप लीना।।२५।। ॐ हीं नानुमोदितमन क्रोधसरम्भसानन्दधर्माय नम अयं०। मनोयोग क्रोधी समारभ धारी, सदा जीव भोगे महाखेद भारी । महानद आख्यात को भाव पायो, नमो सिद्ध सो दोष नाही उपायो।।२६।। ॐ हीं अकृतमन क्रोधसमारम्भपरमानन्दाय नम अy०। दोहा समारम्भ क्रोधित सु मन, परकारित दुख परमातम पद पाइयो, नमू सिद्ध गुण ताहि ।। ॐ हीं अकारितमन क्रोधसमारम्भपरमानन्दाय नम अj०। नाहि । भुजगप्रयात समारम्भ क्रोधी मनोयोग माही, धरे मोदना भाव को जीव ताही । भये आप सतुष्ट ये त्याग भावा, नमू, सिद्ध सो दोष नाही उपावा।।२८।। ॐ हीं नानुमोदितमन क्रोधितसमारम्भ परमानन्दसतुष्टाय नम अय॑०। पद्धडी निज क्रोधित मन आरम्भ ठान, जग जिय दुख मे सुख रहे मान । सो आप त्याग सक्लेश भाव, भये सिद्ध नमू धर हिये चाव ।।२९।। ॐ ह्रीं अकृतमन क्रोधारम्भ स्वसस्थानाय नम अर्य। क्रोधित मनसो आरम्भ हेत, पर प्रेरित निज अपराध लेत । जग जीवन की विपरीत रीति, तुम त्याग भये शिव वर पुनीत ।।३०।। ॐ हीं अकारितमन क्रोधारम्भबन्धसस्थानाय नम अय। क्रोधित मनसो आरम्भ देख, जिय मानत है आनन्द विशेष । तुम सत्य सुखी इह भव क्षार, भये सिद्ध नमू उर हर्ष धार ।।३१।। ॐ हीं नानुमोदितमन क्रोधारम्भसस्थापनाय नम अय।
८ ] [ सिद्धदक्रयिधान , दोहा मान योग मन रभ मे. ठरतत है जग जीव । भये सिद्ध सक्लेश तजि, तिन पट नम नदीव ।। ३२।। ॐ हीं अकृतमनोमानारम्भसाधर्माय नम अर्घ्य। मान उदय मन योगते, परको रम्भ क्गन । त्याग भये परमातमा, नम् मग्न पर हान।।३३।। ॐ हीं अकारितमनोमानसरम्भअनन्यशरणाय नम अध्य० । मान सहित मन ग्भमे, जग जिय गस चाव । नमो सिद्ध परमातमा, जिन त्यागो इह भाव ।।३।। ॐ हीं नानुमोदितमनोमानसरम्भसुगतभावाय नम अर्घ्य० । अडिल्ल समारभ परिवतमान यत मन धरे । विकलपमई उपकरण विधि इकठेकर ।। महाकष्ट को हेत भाव यह ना गहो । प्रणमू सिद्ध अनत सुखातम गुण लहौ ।।३।। ॐ हीं अकृतमनोमानसमारम्भसुखात्मगुणाय नम अर्घ्य। मान सहित मनयोग द्वार चितवन करे । समारभ पर कृत्य करावन विधि वरै।। तहा कष्ट को हेत भाव यह ना गहो । प्रणम् सिद्ध अनन्त गुणातम पद लहौ ।। ३६।। ॐ हीं अकारितमनोमानसमारम्भ-अनन्यगताय नम अर्घ्य० जोडे चित न समाज विविध जिस काज मे । समारभ तिस नाम सोम जिनराज मे।। माने मानी मन आनद सु निमित्त से । नमू सिद्ध हैं अतुल वीर्य त्यागत तिसे ।।३७।। ॐ हीं नानुमोदितमनोमानसमारम्भ-अनन्तवीर्याय नम अयं० । अशुभकाज परिवर्त नाम आरभको । मान सहित मन द्वार तास उद्यम गहो।। जगवासी जिस नितप्रति पाप उपाय है । णमो सिद्ध या रहित अतुल सुखराय हैं।। ३८।। ॐ हीं अकृतमनोयोगमानारम्भ-अनन्तसुखाय नम अयं।
परम पूजा ] [६९ वोहा मनो मान आरम्भके, भये अकारित आप । अतुल ज्ञानधारी भये, नमत नसैं सब पाप ।।३९।। ॐ हीं अकारितमनोमानारम्भ-अनन्तशानाय नम अy०। मनो मान आरम्भ मे, नानुमोदि भगवत । गुण अनत युत सिद्ध पद, पूजत है नित सत।।४०।। ॐ हीं नानुमोदितमनोमानारम्भ-अनतगुणाय नम अयं० । बहु गीता जो अशुभ काज विकल्प हो, सरम्भ मनयुत कुटिलता । कर कर अनादित रक जिय, भाति पाप उपावता।। सो त्याग सकल विभाव यह तुम, सिद्ध ब्रह्मस्वरूप हो । हम पूजि हैं नित भक्तियुत, तुम भक्त वत्सलरूप हो।।४१।। ॐ हीं अकृतमनोमायासरम्भब्रह्मस्वरूपाय नम अy०। दोहा मायावी मनते नही, कबहुँ आरम्भ कराय । सिद्ध चेतना गुण सहित, नमू सदा मन लाय।।४२।। ॐ अकारितमनोमायासरम्भचेतनाय नम अy०। मायावी मनते कभी, रभानन्द न होय । सिद्ध अनन्य सुभाव युत, नमू सदा मद खोय ।।४३।। ॐ हीं नानुमोदितमनोमायासरम्भ अनन्यस्वभावाय नम अर्घ्य। पद्धडी मायावी मनते समारम्भ, नहिं करत सदा हो अचल खभ । तुम स्वानुभूति रमणीय सग, नित रमन करो धरि मन उमग।।४४।। ॐ हीं अकृतमनोमायासमारम्भस्वानुभूतिरताय नम अय॑०। मन वक्र द्वार उपकर्ण ठान, विधि समारभ को नहिं करान । निज साम्यधर्म मे रहो लिप्त, तुम सिद्ध नमो पद धार चित्त।।४५।। ॐ हीं अकारितमनोमाया-समारभसाम्यधर्माय नम अर्घ्य।
आनन्द । ७० ] [ सिद्धचक्रन्धिान दोहा मायावी मनमे नही, समारभ नमो सिद्धपद परमगुरु, पाऊ पद सुखवृन्द ।।४६।। ॐ हीं नानुमोदितमनोमायासमारभगुरवे नम अy० । पद्धडी बहु विधिकर जोडे अशुभ काज, आरम्भ नाम हिंसा समाज । मायावी मन द्वारै करेय, तुम सिद्ध नमू यह विधि हरेय ।।४७।। ॐ हीं अकृतमनोमायाssरम्भपरमशाताय नम अयं । पूर्वोक्त अकारित विधि सरूप, पायो निर आकुल सुख अनूप । सर्वोत्तम पद पायो महान, हम पूजत हैं उर भक्ति ठान ।।४८।। ॐ हीं अकारित मनोमायाssरभनिराकुलाय नम अयं । दोहा मायावी आरम्भ करि, मन मे आनन्द मान । सो तुम त्यागो भाव यह, भये परम सुख खान।।४९।। ॐ हीं नानुमोदितमनोमायाऽऽरभ-अनन्तसुखाय नम अयं० । लोभी मन द्वारे नही, करें सदा समरभ । हम अनन्त-दृग सिद्धपद, पूजत हैं मनथभ ।। ५०।। ॐ हीं अकृतमनोलोभसरम्भ-अनन्तदृगाय नम अय० । लोभी मन समरभ को, पर-सो नाहिं कराय । दृगानन्द भावातमा, नमू सिद्ध मन लाय ।। ५१।। ॐ हीं अकारितमनोलोभसरम्भदृगानन्दभावाय नम अy०। लोभी मन समरभ मे, मानै नहिं आनन्द । नमू नमू परमातमा, भये सिद्ध जगवद ।। ५२।। ॐ हीं नानुमोदितमनोलोभसरम्भसिद्धभावाय नम अयं०। समारम्भ नहि करत हैं, लोभी मन के द्वार । चिदानद चिद्देव तुम, नमू लहूँ पद सार ।। ५३।। ॐ हीं अकृतमनोलोभसमारम्भचिद्देवाय नम अर्घ्यं । पर सो भी पूर्वोक्त विधि, कबहूँ नही कराय । निराकार परमात्मा, नमू सिद्ध हषाय ।। ५४।। ॐ हीं अकारितमनोलोभसमारभ-अनाकाराय नम अयं ।
पचम पूजा ] [७१ ऐसे ही पूर्वोक्त विधि, हर्पित, होवे नाहि । चित्सरूप साकारपद, धारत हूँ उरमाहिं ।। ५५।। ॐ हीं नानुमोदितमनो लोभसमारम्भसाकाराय नम अर्घ्य। रचना हिंसा काज की, लोभी मन के द्वार । नही करै है ते नम्, चिदानद पद सार ।। ५६।। ॐ ह्रीं अकृतमनोलोभारभचिदानन्दाय नम अy०। नम लोभी मन प्रेरित नही, पर को आरभ हेत । चिन्मय रूपी पद धरै, नमू लहूँ निज खेत।। ५७।। ॐ हीं अकारितमनोलोभारम्भचिन्मयस्वरूपाय नम अर्घ्य। मन लोभी आरभ मे, आनद लहे न लेश । निजपद मे नित रमत हैं, ध्याऊ भक्ति विशेष ।। ५८।। ॐ हीं नानुमोदितमनोलोभारभस्वरूपाय नम अर्घ्य० । . अडिल्ल । क्रोधित जिय वचयोग द्वार उपयोगको । रचना विधि सकल्प नाम समरभ सो।। तागे धरै प्रवृत्ति पाप उपजावते । नमू सिद्ध या बिन वचगुप्ति उपावते ।। ५९।। ॐ हीं अकृतवचनक्रोधसरम्भवाग्गुप्तये नम अयं०। क्रोध अग्नि करि निज उपयोग जरावही, वचनयोग करि विधि सरम्भ करावही । सो तुम त्याग विभाव सुभाव सरूप हो, नमू उरानन्द धार चिदानन्द रूप हो।।६०।। ॐ हीं अकारितवचनक्रोधसरम्भस्वरूपाय नम अयं०। सोरठा क्रोधित निज वच द्वार, मोदित हो सरभ मे । सो तुम भाव विडार, नमू स्वानुभव लब्धियुत ।। ६१।। ॐ ह्रीं नानुमोदितवचनक्रोधसरम्भस्वानुभवलब्धये नम अर्घ्यं ।
७२ ] [ सिद्धचक्रयिधान दोहा क्रोध सहित वाणी न ही, समारभ परव्रत । स्वानुभूति रमणी रमण, नमू सिद्ध कृतकृत्य ।। ६२।। ॐ हीं अकृतवचनक्रोधसमारम्भस्वानुभूतिरमणाय नम अर्य। समारभ क्रोधित जिये, प्रेरित पर वच द्वार । नम् सिद्ध इस कर्म विन, धर्मधरा माधार ।। ६३|| ॐ हीं अकारितवचनक्रोधसमारभसाधारणधर्माय नम अयं । समारभ मय वचन करि, हपित हो युत क्रोध । नमू सिद्ध या विन लहो, परम शाति मुख बोध ।।१४।। ॐ ही नानुमोदितवचनक्रोधसमारभपरमशाताय नम अyo! मोतियावाम वैर वचयोग धरै जियरोप, करै विधि भेद, आरम्भ सदोष । तजो यह सिद्ध भये सुखकार, नमू परमामृत तुष्ट अवार।। ६५।। ॐ हीं अकृतवचनक्रोधारम्भपरमामृततुष्टाय नम अर्घ्य० । अकारित वैन सदा युत क्रोध, महा दुखकार अरम्भ अबोध । भये समरूप महारस धार, नमे हम मिद्ध लहै भवपार ।।६।। ॐ हीं अकारितवचनक्रोधारम्भसमरसाय नम अy०। दोहा नानुमोद आरम्भ मे, क्रोध सहित वच द्वार । परम प्रीति निज आत्मरति, नमू सिद्ध सुखकार ।। ६७।। ॐ हीं नानुमोदितवचनक्रोधारम्भपरमप्रीतये नम अर्घ्य। अडिल्ल वचन द्वार सरम्भ मानयुत जोड करण उपकरण मानसो ऊचरै । नानाविधि दुखभोग निजातमको हरै, नमू सिद्ध या विन अविनश्वर पद धरै।। ६८।। ॐ हीं अकृतवचनमानसरम्भ-अविनश्वरधर्माय नम अयं । मान प्रकृति करि उदै करावै ना कदा, वचनन करि सरभ भेद वरणू यदा । इन्द्रिय अव्यक्तस्वरूप अनूप हो, गुणसागर स्वातमरूप हो।।६९।। ॐ हीं अकारित वचनमानसरम्भ अव्यक्तस्वरूपाय नम अर्घ्य। के करें, मन नमू सिद्ध . पचम पूजा ] [७३ सोरठा नानुमोद वच योग, मान सहित मरम्भ मय । दलभ इन्द्री भोग, परम सिद्ध प्रणम् सदा ।।७०।। ॐ हीं नानुमोदितवचनमानसरम्भदुर्लभाय नम अयं० । चौपाई समानभ निज वैनन द्वार, करत नहीं हे मान सभार । ज्ञान महित चिन्मति सार, परम गम्य हे निर-आकार ।।७१।। ॐ हीं अकृतवचनमानसमारभपरमगम्यनिराकाराय नम अय० । वचन प्रवृत्ति मानयत ठान, ममारम्भ विधि नाहि करान । शुद्ध म्वभाव परम सुखकार, नमूमिद्ध उर आनन्द धार ||७२।। ॐ हीं अयारितवचनमानसमारभपरमस्वभावाय नम अय। वचन प्रवृत्ति मानयुत होय, समारम्भमय हर्षित सोय । त्यागत एक रूप ठहराय, नम एकत्व गती सुखदाय ।।७३।। ॐ हीं नानुमोदितवचनसमारम्भ-एकत्वगताय नम अर्घ्य० । मानी जिय निज वचन उचार, वरतत हे आरम्भ मझार । परमातम हो तजि यह भाव, नमू धर्मपति धर्मस्वभाव ।।७४।। ॐ हीं अकृतवचनमानारभ परमात्मधर्मराजधर्मस्वभावाय नम अध्य। मे । सोरठा मानी बोले वैन, पर-प्रेरण आरम्भ मो त्यागो तुम ऐन, शाश्वत सुख आतम नम्।।७।। ॐ हीं अकारितवचनमानारम्भशाश्वतानन्दाय नम अ। हपित वचन उचार, मान सहित आरम्भमया । मो तुम भाव विडार, निजानन्द रस घन नमू ।।७६।। ॐ हीं नानुमोदितवचनमानारम्भ-अमृतपूरणाय नम अर्घ्यं । पद्धडी धरि कुटिल भाव जो कहत वैन, सरम्भ रूप पापिष्ट एन । तुम धन्य धन्य यही रीति त्याग, हो बेहद धर्मस्वरूप भाग। ७७।। ॐ हीं अकृतवचनमायासरमा-अनन्तधर्मैकरूपाय नम अर्ध्य० ।
७४ ] [ सिद्धचक्रविधान मायासुत वचननको प्रयोग, मरम्भ करावत अशुभ भोग । तुम यह कलक नहिं धरो लेश हो अमृत शि पृज़ हमेश।।७।। ॐ हीं अकारितवचनमायासरम्भ अमृतचन्द्राय नम अर्घ्य० । वच मायायुत सरम्भ कीन, सो पापम्प मापी मलीन । तिम त्याग अनेक गुणात्मरूप, गजत अनेक मृगत अनृप ।।७।। ॐ हीं नानुमोदितवचनमायासरम्भ-अनेकमूर्तये नम अर्घ्य० । तम समारम्भकी विधि विधान, नहि करत कुटिलता भेट ठान । हा नित्य निरजन भाव-युक्त, म नम् सदा मशय विमुक्त ।।८।। ॐ हीं अकृतवचनमायासमारभनित्यनिरजनस्वभावाय नम अर्घ्य । दोहा मायायुत निज वेनतें, समारभके हेत । नहि प्रेरित परको नमू, निजगुण धम समेत ।।१।। ॐ हीं अक्रितवचनमायासमारभआत्मैकधर्माय नम अगे। मायाकरि बोलत नही, समारभ हाय । सूक्ष्म अतीन्द्रिय वृष नम, नमू सिद्ध मन लाय ।। ८२।। ॐ हीं नानुमोदितवचनमायासमारभ-आत्मैकधर्माय नम अर्घ्य। मायायुत आरभ की वचन प्रवृत्ति नशाय । नमू अनन्त अवकाश गुण ज्ञान द्वार सुखदाय ।।८३|| ॐ ह्रीं अकृतवचनमायारभ-अनन्तावकाशाय नम अर्घ्य। मायायुत आरभ मय, भेट वचन उपदेश । भये अमलगुण ते नमू, रागद्वेष नहीं लेश ।। ८४।। ॐ हीं अकारितवचनमायारभ-अमलगुणाय नमा अर्घ्य। मायायुत आरम्भ मय, मेट वचन आनन्द । भये अनन्त सुखी नमू, सिद्ध सदा सुखवृन्द ।।८।। ॐ हीं नानुमोदितवचनमायारभनिरवधिसुखाय नम अयं ।
पचम पूजा ] [७५ अडिल्ल छन्द जो परिग्रह को चाह लोभ सो मानिये, विधि-विधान ठानत सरभ बखानिये । वचन द्वार नही करे नमू परमातमा, सब प्रत्यक्ष लखे व्यापक धर्मातमा।।८६।। ॐ हीं अकृतवचनलोभसरम्भव्यापकधर्माय नम अयं । वर्तावन सरम्भ हेत परके तई, लोभ उदै करि वचन कहै हिंसामई । नमू सिद्ध पद यह विपरीति सु जिन हरो, सकल चराचर ज्ञानी व्यापक गुण वरो।।७।। ॐ हीं अकारितवचनलोभसरम्भव्यापकगुणाय नम अy०। लोभी वच सरम्भ हर्ष परकाशन, नाना विधि सचरे पाप दुख नाशन । सो तुम नाशत शाश्वत धुवपदपाइयो, नमू अचलगुणसहित सिद्ध मन भाइयो।।८।। ॐ हीं नानुमोदितवचनलोभसरम्भ-अचलाय नम अy०।१८।। सोरठा समारम्भ के बैन, लोभ सहित पर आसरैं । तज निरलम्बी ऐन, नमू सिद्ध उर धारिकै।।८९।। ॐ हीं अकृतवचनलोभसमारम्भनिरालवाय नम अy०। समारभ उपदेश, लोभ उदै, थिति मेटिके । पायो अचल स्वदेश, नमू निराश्रय सिद्ध गुण ।।९।। ॐ हीं अकारितवचनलोभसमारम्भनिराश्रयाय नम अयं० । नानुमोद वच लोभ, समारभ परवृत्त मे । नमू तिन्हैं तजि क्षोभ, नित्य अखण्ड विराजते।।९१।। ॐ हीं नानुमोदितवचनलोभसमारम्भ-अखण्डाय नम अय। दोहा लोभ सहित आरम्भ को, करत नही व्याख्यान । नूतन पचम गति लहो, नमू सिद्ध भगवान ।।९२।। ॐ हीं अकृतवचनलोभारभपरीतावस्थाय नम अय।
-- तनी, [ सिद्धचक्रविधान लोभ वचन आरम्भ को, कहत न पर के हेत । समयसार परमातमा, नमत सदा सुख देत ।।९३।। ॐ हीं अकारितवचनलोभारम्भसमयसाराय नम अयं । सोरठा नानुमोद वच द्वार, लोभ सहित आरम्भमय । अजर अमर सुखदाय, नमू निरन्तर सिद्धपद ।।९४।। ॐ हीं नानुमोदितवचनलोभारम्भनिरतराय नम अयं । अडिल्ल क्रोधित रूप भयकर हस्तादिक करत समस्या सो सरम्भ प्रकाशनी । सो तुम नाशो काय गुप्ति करि यह तदा, दृष्टि अगोचर काय गुप्ति प्रणम् सदा।।९५।। ॐ हीं अकृतकायक्रोधसरम्भकायगुप्तये नम अय॑०। सोरठा पर प्रेरण निज काय, क्रोध सहित मरम्भ तज । चेतन मूरति पाय, शुद्ध काय प्रणम् सदा।।९६।। ॐ हीं अकारितकायक्रोधसरम्भ शुद्धकायाय नम अर्घ्य। हर्षित शीश हिलाय, क्रोध उदय सरम्भ मे । त्यागत भये अकाय, नमू सिद्ध पद भावयुत ।।९७।। ॐ हीं नानुमोदितकायक्रोधसरम्भ-अकायाय नम अर्घ्य । समारम्भ विधि मेटि, कायिक चेष्टा क्रोध की । स्वै गुणपर्य समेत, भक्ति सहित प्रणमू सदा ।।९८।। ॐ हीं अकृतकायक्रोधसमारम्भस्वान्वयगुणाय नम अर्घ्य० । दोहा समारम्भ विधि क्रोध युत, तनसो नही कराय । नित-प्रति रति निजभाव मे, बदू तिनके पाय ।।९९।। ॐ हीं अकारितकायक्रोधसमारम्भभावतरये नम अयं । समारम्भ सो कायसो, क्रोध सहित परसस । स्वै अभिन्न पद पाइयो, नमू त्याग सरवस ।। १००।। ॐ हीं नानुमोदितकाय क्रोधसमारम्भस्वान्वयधर्माय नम अर्घ्यं। .
- पचम पूजा ] [७७ कोधित कायारम्भ तजि, परसो रहित स्वभाव । शुद्ध द्रव्य मे रत नमू, निज सुख सहज उपाव ।। १०१।। ॐ हीं अकृतकायक्रोधारम्भशुद्धद्रव्यरताय नम अyo। क्रोधित कायारम्भ नहिं, रच प्रपच कराय । पचरूप ससार हानि, नमू पचमगति राय।।१०२।। ॐ हीं अकारितकायक्रोधारम्भससार-छेदकाय नम अy०। क्रोधित कायारम्भ मे, हर्ष विषाद विडार । अनेकात वस्तुत्व गुण, धरै नमो पद सार ।। १०३।। ॐ हीं नानुमोदितकायक्रोधारम्भजैनधर्माय नम अयं । मान सहित सरभकी, तनसो रचना त्याग । पर प्रवेश विन रूप जिन, लियो नमू बडभाग ।। १०४।। ॐ हीं अकृतकायमानसरम्भस्वरूपगुप्तये नम अर्ध्य। मान उदय सरम्भ विधि, तनसो नही कराय । निज कृत पर पकार बिन, लियो नमू तिन पाय ।। १०५।। ॐ हीं अकारितकायमानसरम्भनिजकृतये नम अयं० । मान सहित सरभ मे, तनसो हर्प न लेश । ध्यान योग निज ध्येय पद, भावित नमू अशेष ।। १०६।। ॐ ह्रीं नानुमोदितकायमानसरम्भ-ध्येयभावाय नम अयं । मदयुत तनसो रच भी, समारभ विधि नाहिं । परमाराधन योगपद, पायो प्रणम् ताहिं ।। १०७।। ॐ हीं अकृतकायमानसमारम्भ-परमाराधनाय नम अयं । ममारम्भ निज कायसो, मदयुत नही कराय । ज्ञानानन्द सुभाव युत, प्रणम् शीश नवाय।। १०८।। ॐ हीं अकारितकायमानसमारम्भनदगुणाय नम अय॑०। समारम्भ मय विधि सहित, तनसो हर्ष न होय । निजानद नन्दित तिन्है, नमू सदा मद खोय ।। १०९।। ॐ हीं नानुमोदितकायमानसमारम्भस्वानदानन्दिताय नम अर्घ्य। अर्द्ध चौपाई अकृत मानारभ शरीर, पर अनिंद्य बन्दू धर धीर।।११०।। ॐ हीं अकृतकायमानारम्भसतोषाय नम अयं । - ७८ ] [ सिद्धचक्रविधान कायारभ अकारिन मान, स्वस्वरूप-रत वन्दू तान ।।१११।। ॐ हीं अकारितकायमानारम्भस्वरूपरताय नम अर्घ्य० । मानारभ अनन्दित काय, प्रणम् विमल शुद्ध पर्याय ।। ॐ हीं नानुमोदितकायमानारम्भशुद्धपर्यायाय नम अर्घ्य। दोहा मायायुत सरम्भ विधि, तनसो नही कराय । गुप्त निजामृत रस लहैं, नमू तिन्हैं तज पाप ।।११२।। ॐ ह्रीं अकृतकायमायासरम्भ-अमृतगर्भाय नम अर्घ्य। मायायुत सरम्भ विधि, तनसो नही कराय । मुख्य धर्म चैतन्यता, विलसे प्रणम् पाय ।।११३।। ॐ हीं अकारितकायमायासरम्भचैतन्याय नम अयं । मायायुत सरम्भ मय, नानुमोदयुत काय । वीतराग आनन्द पद, समरस भावन भाय ।।११४।। ॐ हीं नानुमोदितकायमायासरम्भ-समरसीभावाय नम अy०। समारम्भ माया सहित, अकृत तन विच्छेद । वन्ध दशा निज पर द्विविध, नमत नसै भव खेद ।।११।। ॐ हीं अकृतकायमायासमारम्भबधच्छेदकाय नम अय० । समारम्भ तन कुटिलसो, भये अकारित स्वामि । निज परिणति परिणमन विन, गुण स्वातत्र नमामि ।।११६।। ॐ हीं नानुमोदितकायमानसरम्भ-ध्येयभावाय नम अर्घ्य० । नानुमोदित तन कुटिलता, समारम्भ विधि देव । गुण अनन्त युत परिणम्, धर्म समूही एव।। ११७।। ॐ हीं नानुमोदितकायमायासमारम्भधर्मसमूहाय नम अयं । मायायुत निज देहसो, नही आरम्भ करेह । परमातम सुख अक्ष-बिन, पायो बन्दू तेह ।।११८।। ॐ ह्रीं अकृतकायमायारम्भपरमात्मसुखाय नम अy०। मायारम्भ शरीर करि, परसो नही करान । निष्ठातम स्वस्थित नमू, सिद्धराज गुणखान ।।११९।। ॐ हीं अकारितकायमायारम्भनिष्यत्मने नम अध्य।
पचम पूजा ] [ ७९ मायारम्भ शरीरसो, नानुमोद भगवन्त । दर्शज्ञानमय चेतना, सहित नमे नित 'सन्त' ।। १२०।। ॐ हीं नानुमोदितकायमायारम्भचेतनाय नम अयं । अर्द्ध पद्धडी सरम्भ चाह नहिं काययोग, चित परिणति नमि शुद्धोपयोग।। १२१।। ॐ हीं अकृतकायलोभसरम्भप मचित्परिणताय नम अy०। सरम्भ अकारित लोभ देह, निज आतम रत स्वसमय तेह।। १२२।। ॐ ह्रीं अकारितकायलोभसरम्भ-स्वसमयरताय नम अर्घ्य। सरम्भ लोभ तन हर्ष नाश, नमि व्यक्त धर्म केवल प्रकाश ।। १२३।। ॐ हीं नानुमोदितकायलोभसरम्भ-व्यक्तधर्माय नम अयं० । सोरठ लोभी योग शरीर, समारम्भ विधि नाशके । ध्रुव आनन्द अतीव, पायो पूजू सिद्धपद ।। १२४।। ॐ हीं अकृतकायलोभसमारम्भ-नित्यसुखाय नम अयं० । लोभ अकारित काय, समारम्भ निज कर्म हनि । पायो पद अकषाय, सिद्ध वर्ग पूजू सदा ।। १२५।। ॐ हीं अकारितकायलोभसमारम्भ-अकषायाय नम अy०। पूर्ववर्तनानन्द, परिग्रह इच्छा पायो शौच स्वछन्द, नमू सिद्ध पद भक्ति युत । । १२६।। ॐ हीं नानुमोदितकायलोभसमारम्भशौचगुणाय नम अर्घ्य। दोहा काय द्वार आरम्भ की, लोभ उदय विधि नाश । नमो चिदातम पद लियो, शुद्ध ज्ञान परकाश ।। १२७।। ॐ हीं अकृतकायलोभारम्भचिदात्मने नम अय॑०। काय द्वार आरम्भ विधि, लोभ उदय न कराय । निज अवलम्बित पद लियो, नमू सदा तिन पाय ।।१२८।। ॐ ह्रीं अकारितकायलोभारम्भ-निराबबाय नम अर्घ्य। लोभी तन आरम्भ मे, आनन्द रीती भेट । नमू सिद्ध पद पाइयो, निज आतम गुण श्रेष्ठ।। १२९।। ॐ हीं नानुमोदितकायलोभारम्भात्मने नम अर्घ्यं । मेटिके ।
८.] [ सिसचक्रावधान हैं , सवैया जेते कछु पुदगल परमाणु शब्दरूप, भये अतीत काल आगे होनहार हैं । तिनको अनत गुण करत अनतवार, ऐसे महाराशि रूप धरै विसतार हैं।। सव ही एकत्र होय सिद्ध परमातमके, मानो गुण गण उचरन अर्थधार भी इक समयके अनत भाग अनढको, क्हत न कहैं हम कौन परकार हैं।।१३०।। ॐ ह्रीं अष्टाविंशत्यधिकशतगुणयुक्तसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य। हैं । तौं जयमाला दोहा शिवगुण सरधा धार उर, भक्ति भाव है सार । केवल निज आनन्द करि, करू सजस उच्चार ।। पद्धडी नय मदन कटन मन करण नाश, जय शातिरूप निज सुख विलास । जय क्पट सुभट पट करत सूर, जय लोभ क्षोभ मद दम्भ चूर ।। १।। पर-पातमो अत्यन्त भिन्न, निज परिणतिमो अति ही अभिन्न । अन्यन्त विमल नव ही विशेष, मल लेश शोध राखो न शेष ।। २।। मणि दीप मार निर्विधन ज्योत, स्वाभाविक नित्य उद्योत होत । वलोक्य शिखर राजत अखण्ड, सम्पूरण द्युति प्रगटी प्रचण्ड ।। ३।। मान-मन-मन्दिर को अन्धकार, तिस ही प्रकाशसौं नशत सार । सो सुलभ रूप पावै न अर्थ जिस कारण भव-भव भ्रमे व्यर्थ ।। ४।। जो क्ल्प-काल मे होन सिद्ध, तुम छिन ध्यावत लहिये प्रसिद्ध । भवि पतितन को उद्धार हेत, हस्तावलम्ब तुम नाम देत।। ५।। तम गुण नुमिरण नागर अथाह, गणधर मरीस नही पार पाह । जो भवधि पार अभव्य रान, पावे न वृथा उद्यम प्रयान।। ६।। जिन-मुख व्रहमो निकनी अभग, अति वेग रूप सिद्धान्त गग । नय-सप्त भग क्लोल मान, निहुँ लोक वही धारा प्रमान।। ७।।
पचम पूजा ] [ १ मो द्वादशाग वाणी विशाल, ना सुनत पढ़न आनन्द ग्मान । याने जग मे नीग्य मुधाम, कहिलायों है मन्याय नाम।। । मो तुम ही मो है शोभनीक नातर जल मग जु वह नटीर । निज पर आतर्माहत आन्म-मृत, जयमे है जब उनपत्ति मृत ।। १॥ ज्या महाशीत ही हिम प्रवाह, है मेटन नमग्य अगिन गह । न्यो आप महा मगलम्वरूप, पर विधन विनाशन गार 1101 है 'मन्त' दीन तुम भक्ति लीन. मी निश्चय पार्य पद प्राण । नार्ने मन-वच-तन भाव धार. तुम निदनर मम नमबार 111111 ॐही अर्ह अष्टाविंशत्यधिकशतदतोपरिन्यिासढेभ्यो नम अगे। दोहा जो तुम ध्यावे भावनो, ते पाव निज भाउ । अर्गान पाक मयोग करि, शुद्ध मवण उपाव ।।१०।। (यहाँ १०८ बार ॐ मह असिआउसा नम 'मद कर माप करें।) इत्याशीर्वाद दो सौ छप्पन गुण सहित षष्ठ पूजा छप्पय ऊरध अधो सु रेफ सविन्दु हकार विराजै, अकारादि स्वर लिप्त कर्णिका अन्त सु छाजै । वर्गनिपूरित वसुदल अम्बुज तत्त्व संधिधर, अग्रभाग मे मत्र अनाहत सोहत अतिवर।। पुनि अन्त ही बेढ्यो परम, सुर ध्यावत अरि नाग को । ह्वै केहरि सम पूजन निमित, सिद्धचक्र मगल करो।। ॐ हीं श्री सिद्धचक्राधिपतये नम , षड्पचाशदधिकद्विशतगुण- सयुक्ताय श्री सिद्धपरमेष्ठिने अत्रावतरावतर सवौषट् आह्वाननम्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्। पुष्पाजलि क्षिपेत्। दोहा सूक्ष्मादिक गुण सहित हैं, कर्म रहित निररोग । सकल सिद्ध सो थापहूँ, मिटे उपद्रव योग।। इति यत्रस्थापनार्य, पुष्पाजलिं क्षिपेत्। गीता अति नम्रता तिहुँ योग मे निज भक्ति निर्मल भावही । यह गुप्त जल प्रत्यक्ष निर्मल सलिल तीरथ लावही।। यह उभय द्रव्य सयोग त्रिभुवन पूज्य पूज रचावही । द्वै अर्द्धशत षट अधिक नाम उचार विरद स गावही ।। ॐ हीं षड्पचाशदधिकद्विशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने जन्मजरारोगविनाशनाय निर्वपामीति स्वाहा ।।१।। अति वास विषय न वासनायुत मलय शील सुभावही । अरु चदनादि सुगन्ध द्रव्य मनोज्ञ प्राशक लावही ।।यह उभय०।। ॐ ह्री श्री सिद्धपरमेष्ठिने षडपचाशदधिकद्विशतगुणसहिताय ससारताप विनाशनाय चन्दन।।२।। जल पष्टम पूजा ] [८३ परिणाम धवल गवण अक्षत मलिन मन न लगावही । निन मार अक्षय अलग स्वच्छ सुवास पुज बनावही ।। यह उभय द्रव्य नयोग विभुवन पज्य पूज रचावही । है अदंशत पट अधिक नाम उचार विरद स गावही ।। ॐ हीं पड़पचाशदधिद्विशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपद प्राप्तये अक्षत॥३३॥ मन पाग भक्त्यनगग आनंद तान माल पुरावही । तिन भाग क्लुम नुहाग अरनर नागवान न लावही । (यह भय०।। * हीं पड़पचाशदधिकद्विशतगुणसहिताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने कामवाण विनाशनाय पुष्य० ।।४।। जिनभक्तिग्म में तृप्तता मन आन म्वाद न चावही । अतर चम वाहिज मनोहर निक नवज लावही । यह उभय०।। * ही पड़पचाशदधिकद्विशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने सुधारोगविनाशनाय नैवेय० ।।५।। सन्धान दीप पदीप्न अतर मोह तिमिर नशावही । माणदीप जगमग ज्योति तेज नुमान भेट धरावही । ।यह उभय०।। ॐ हीं पड्पचाशदधिकद्विशतगुणमयुक्ताय श्री सिद्धपरमेष्ठिने मोहाधकार विनाशनाय दीप० ।।६।। आनन्द धम प्रभावना मन घटा धृन छावही । गाँधत दग्व शुभ प्राण प्रिय अति अग्नि मग जरावही । ।यह उभय०।। ॐ हीं पडुपचाशदधिकद्विशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्म दहनाय धूपं नि० ।।७।। शुभ चितवन फल विविध रस युत भक्ति तरु उपजावही । रमना लुभावन कल्पतरू के सुर असुर मन भावही ।। यह उभय०।। ॐ हीं पड्पचाशदधिकद्विशतगुणसहिताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफले प्राप्तये फल०॥८॥ समकित विमल वसु अग युत करि अर्घ अन्तर भावही । वसु दरव अर्घ बनाय उत्तम देहु हर्प उपावही ।।यह उभय०।। ॐ हीं पड्पचाशवधिकद्विशतगुणसयुक्ताय अनर्घ्यपदप्राप्तये अध्य०।।९।।
८४ ] [ सिद्धचक्रविधान . गीता निमल मलिल शुभ वाम चटन, धवन अक्षत युत अनी । शुभ पुष्प मधुकर नित रमे, चरु प्रचुर स्वाद मुविधि धनी ।। वर दीपमाल उजाल, धूपायन ग्मायन फ्ल भले । करि अघ सिद्ध-समूह पूजत, कमदल मव दलमले ।। ते क्रमावर्त नशाय युगपत, ज्ञान निर्मल स्प हैं । दुख जन्म टाल अपार गुण, मूक्ष्म मरूप अनूप है।। कर्माप्ट विन त्रैलोक्य पूज्य, अदूज शिव क्मलापती । मुनि ध्येय सेय अमेय,चहुगुणगेह,द्योहमशुभमती ।।१।। ॐ हीं णमो सिद्धाण षड्पचाशदधिक-द्विशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धचक्राधिपतये पूर्णाऱ्या । दो सौ छप्पन गुण सहित अर्घ्य चौपाई मिथ्यातम कारण दुखकारा, नित्य निरजन विधि ससारा । तिस हनि समरथ अतिशयरूपा, केवल पाय नमू शिव भूपा।। १।। ॐ हीं चिरन्तरससारकारण-ज्ञाननिद्धृतोद्भूतकेवलज्ञानातिशय- सपनाय सिद्धाधिपतये नम अर्घ्य। मन-इन्द्रिय निमित मतिज्ञाना, योग देश तिष्ठन पद जाना । क्षय उपशम आवर्ण विनाशो, नमो मिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।। २।। ॐ हीं अभिनिबोधवारकविनाशकाय नम अy०। द्वादश अगरूप अज्ञाना, श्रुत आवरणी भेद बखाना । क्षय उपशम आवर्ण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।। ३।। ॐ हीं द्वादशागश्रुतावरणीकविमुक्ताय नम अयं० । है असख्य लोकावधि जेते, अवधिज्ञान के भेद सु तेते । क्षय उपशम आवर्ण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।। ४।। ॐ हीं असख्यभेदलोक-अवधिज्ञानावरणविमुक्ताय नम अy० । है असख्य परमान, प्रमाना, मनपर्यय के भेद बखाना । क्षय उपशम आवर्ण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।। ५।। ॐ हीं असत्यप्रकारमन पर्ययज्ञानावरणकविमुक्ताय नम अगे।
पष्टम पूजा [२५ निखिल रूप गुणपर्यय ज्ञान, सत स्वरूप प्रत्यक्ष प्रमान । केवल आवर्णी विधि नाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।। ६।। ॐ हीं निखिलरूप-गुणपर्याय-बोधकफेयलज्ञानावरणविमुक्ताय नम अध्य। द्वारपती भूपति के ताई, रोक रहै देखन दे नाही । सोई दर्शनावरण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।। ७।। ॐहीं सकलदर्शनावरणकर्मविनाशकाय नम अध्य। मूतीक पद को प्रतिभासन, नेत्र द्वार होवै परकाशन । चक्षु-दर्शनावरण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।। ८।। ॐ हीं चक्षुदर्शनावरणकर्मरहिताय नम अय०। दृग विन अन्य इन्द्री मन द्वारे, वस्तुरूप सामान्य उघारे । अदृग -दर्शनावरण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।। ९।। ॐ हीं अयशुवर्शनायरणरहिताय नम अध्य० । देश-काल-द्रव-भाव प्रमान, अवधि दर्श होवे सब ठान । अवधि-दर्श-आवरण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।।१०।। ॐही अवधिवर्शनावरणरहिताय नम. अय। बिन मर्याद सकल तिहु काल, होय प्रकट घटपट सिंह हाल । केवल दर्शनावरण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।।११।। ॐहीं केवलदर्शनावरणरहिताय नम अध्य०। बैठे खडे पडै घुम्मरिया, देखे नही निद्रा की विरिया । निद्रा दर्शनावरण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।।१२।। ॐ हीं निद्राकर्मरहिताय नम अर्घ्य। मावधानि कितनी की जावे, रच नेत्र उघडन नही पावे । निद्रा निद्रा कर्म विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।।१३।। ॐहीं निद्रानिवाकर्मरहिताय नम अय। मदरूप निद्रा का आना, अवलोकै जाग्रतहि समाना । प्रचला दर्शनावरण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।।१४।। ॐ ही प्रचलाकर्मरहिताय नम. अय।
८६ ] नमू सिद्ध [ सिद्धचक्रविधान मुखसो लार बहै अति भारी, हस्त पाद कपत दुखकारी । प्रचला-प्रचला वर्ण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।।१५।। ॐ हीं प्रचलाप्रचलाकर्मरहिताय नम अर्घ्यं । मोता हुआ करै सव काजा, प्रगटावै प्राकर्म समाजा । यह स्त्यानगृद्धि विधि नाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो।।१६।। ॐ हीं स्त्यानगृद्धिकर्मरहिताय नम अj० । जे पदार्थ है इन्द्रिय योग, ते सव वेदे जिस निज जोग । सोई नाम वेदनी होई, तुम नासो सोई।।१७।। ॐ हीं वेदनीयकर्मरहिताय नम अयं। रति के उदय भोग सुखकार, भोगै जिय शुभ विविध प्रकार । माता भेद वेदनी होय, नमू सिद्ध तुम नाशो मोय ।।१८।। ॐ ह्रीं सातावेदनीयकर्मरहिताय नम अयं । अरति उदय जिय इन्द्री द्वार, विपयभोग वेदे दुखकार । एही भेद असाता होय, नमू सिद्ध तुम नाशो सोय।।१९।। ॐ ह्रीं असातावेदनीयकर्मरहिताय नम अर्घ्य। ज्यो असावधानी मदपान, करत मोह विधितै सो जान । ता विधि करि निज लाभ न होय, नमू सिद्ध तुम नाशो सोय ।।२०।। ॐ हीं मोहकर्मरहिताय नम अy०। जाके उदय तत्त्व परतीत, सत्य रूप नही हो विपरीत । पच भेद मिथ्यात निवार, भये सिद्ध प्रणमू सुखकार ।।२१।। ॐ हीं मिथ्यात्वकर्मविनाशनाय नम अर्घ्य। प्रथमोपशम् समकित जब गले, मिथ्या समकित दोनो मिले । मिश्र भेद मिथ्यात निवार, भये सिद्ध प्रणम् सुखकार ।।२२।। ॐ हीं सम्यक्मिथ्यात्वकर्मरहिताय नम अर्घ्यं । दशन मे कुछ मल उपजाय, करै समल नहिं मूल नसाय । सम्यक्-प्रकृति मिथ्यात निवार, भये सिद्ध प्रणम् सुखकार ।।२३।। ॐ हीं सम्यक्त्वप्रकृतिमिथ्यात्वरहिताय नम अर्घ्य। धर्म-मार्ग मे उपजे रोष, उदय भये मिथ्यात सदोष । यह अनन्त-अनुबध निवार, भये सिद्ध प्रणम् सुखकार ।।२४।। ॐ हीं अनन्तानुबन्धीक्रोधकर्मरहिताय नम अयं ।
[२७ पष्टम पूजा ] देव-धम-गुरुनो अभिमान, उदय भये मिथ्या सरधान । यह अनन्त अनुवध निवार, भये सिद्ध प्रणमू सुखकार ।।२५।। ॐ हीं अनन्तानुवन्धीमानकर्मरहिताय नम अर्घ्य० । छलनी धर्म रीति दलमले. उदय होय मिथ्या जव चले । यह अनन्न अनुवध निवार, प्रणमू सिद्ध महासुखकार ।।२६।। ॐ हीं अनन्तानुवन्धीमायाकर्मरहिताय नम अयं । लोभ उदय निमालय दर्व, भक्षे महानिंद मति सर्व । द अनन्न अनुवध निवार, भये सिद्ध प्रणम् सुखकार ।। २७।। ॐ हीं अनन्तानुवन्धीतोभकर्मरहिताय नम अर्घ्य । सुन्दरी बोध कः अणुव्रत नहि लीजिये, चारितमोह प्रकृति सु भनीजिए । है अप्रत्यास्यानी कर्म मो, भये मिद्ध नमू तिन नासियो।।२८।। ॐ हीं अप्रत्याख्यानावरणक्रोधकर्मरहिताय नम अर्घ्य। मान की अणुव्रत न हो कदा, रहे अव्रत युत दर्श सदा । है अप्रत्यास्यानी कर्म सो, भये सिद्ध नमू तिन नासियो।।२९।। ॐ हीं अप्रत्याख्यानावरणमानकर्मरहिताय नम अy०। देशव्रती धावक नहीं होत है, वक्रताको जहँ उद्योत है । है अप्रत्यास्यानी कर्म सो, भये सिद्ध नमू तिन नासियो।।३०।। ॐ हीं अप्रत्याख्यानावरणमायाविमुक्ताय नम अy। मोह लोभ चरित जे जिय वसे, देशव्रत श्रावक नही ते लसे । है अप्रत्याख्यानी कर्म सो, भये सिद्ध नमू नासियो ।।३१।। ॐ हीं अप्रत्याख्यानावरणलोभविमुक्ताय नम अध्य। अडिल्ल प्रत्याख्यानी क्रोध सहित जे आचरे, देशव्रती सो सकल व्रत नाही धरे । चारितमोह सु प्रकृति रूप तिह नाम है, नाश कियो मैं नमू सिद्ध शिवधाम है।।३२।। ॐ ही प्रत्याख्यानावरणक्रोधविमुक्ताय नम. अर्घ्य।
८८] [ सिहयक्रयिधान प्रत्याख्यानभिमान महान न शक्ति है, जास उदय पुरणसयम अव्यक्त है । चारितमोह सु प्रकृति रूप तिह नाम है, नाश कियो मैं नमू सिद्ध शिवधाम है ।।३३। ॐ ह्रीं प्रत्याख्यानावरणमानरहिताय नम अयं । प्रत्याख्यानी माया मुनि-पदको हतै, श्रावकव्रत पूरण नही खडे जासते । चारितमोह सु प्रकृति रूप तिह नाम है, नाश कियो मैं नमू सिद्ध शिवधाम है।। ३४।। ॐ ह्रीं प्रत्याख्यानावरणमायारहिताय नम अर्घ्य। श्रावक पद मे जास लोभ को वास है, प्रत्याख्यानी श्रुत मे सज्ञा त्रास है । चारितमोह सु प्रकृति रूप तिह नाम है, नाश कियो मैं नमू सिद्ध शिवधाम है।।३५।। ॐ ह्रीं प्रत्याख्यानावरणलोभरहिताय नम अy०। भुजंगप्रयात यथाख्यात चारित्र को नाश महाव्रत को जास मे हो उजारा । यही सज्वलन क्रोध सिद्धान्त नमू सिद्ध के चरण ताको नसाया।।३६।। ॐ ह्रीं सज्वलनक्रोधरहिताय नम अy०। रहै सज्वलन रूप उद्योत जेते, न हो सर्वथा शुद्धता भाव तेते । यही सज्वलन मान सिद्धात नमू सिद्ध के चरण ताको नसाया।। ३७।। ॐ हीं सज्वलनमानरहिताय नम अर्घ्य वहै सज्वलन की जहा मद धारा, लहै है तहा शुक्लध्यानी उभारा । यही सज्वलन माया सिद्धात गाया, नमू सिद्धके चरण ताको नसाया ।।३।। ॐ ह्रीं सज्वलनमायारहिताय नम अर्घ्य। कारा, गाया, गाया, boomt बस्टम पुग] गजानन नोभ नाही निजन को बाग हा नही । पी लोभ গান नम पिस 7 चा नाया नमाया ।।३।। भी सरचनननोमगरताय नम अर्पण मोदक जागा नापस मा चिये पनी यह पाहि । मो नम नाग नाभी धीश नम नमको धरि नाहि ।। ४०।। हीयममंगीताय नम अर्य। पनीरगना माना, मोन भर विधी निज जानति । नानापिनी जगा शीश नम नमयो रिहानहिं ।।४।। *हीं गतिरहिताय नम अप्पं०। सेना मनामन आर्गन प है निज आनन । मो नग नाश किया गना, शीश नम नमका धरि हायहि ।। ४२।। *ही अतिपमंगीताय नम अर्य। गभर गायनाट विनोगत गंगा परिणाम न शोकहिं । न्ग नग नाश विरगना भी, शीश नम नमवा धार हायहि ।। ४३।। गोक्कर्मगीताय नम आर्य। हो म्हंग उन्नाटन गरि, मन नन पित होत अपहि । नम नाश गिरगना हि शीश नम तुमयो धरि हायहि ।।४४।। *नी भयपर्मानाय नम अM०। पवैया जो पग्का अपगध उपारत, जो अपनों कछु दोप न जाने । जो परक गण गण जानन, जो अपने गुण को प्रगटाने ।। मो जिनगज असान जर्गाप्मन, है जियनो विधि के वश ऐमो । है भगवन । नम तुमको, तुम जीति लियो छिन मे अरि तैसे ।।४५।। ॐ हीं जुगुप्साकर्मरहिताय नम अय० । जो नर नारि रमावन की, निजमो अभिलाप धरै मनमाही । मो अति ही परकाश हिये नित, काम की दाह मिटे छिन माही।।
९० ] [ सिद्धचक्रावधान सो जिनराज बसान नपुसक, वेद हनो विधिके वश ऐमो । हे भगवत । नम तुमको, तुम जीति लियो छिन में अरि तैमो।।४।। ॐ हीं नपुसकवेदरहिताय नम अध्यं०।।४६।। जो तिय मग रमे विधि यो मन, ओग्न मे क्षु आनन्द माने । किंचित काम जग उर मे नित, शाति मुभावन की शुधि यने।। सो जिनराज, वसानत है, नर-वेद हनो विधि के वश ऐमो । हे भगवन्त । नम तुमको, तुम जीन लियो ठिन में अपि नमो।।४७।। ॐ हीं पुरुषवेदरहिताय नम अध्य० ।।४७।। जो नर सग मे रमे मुख मानन, अन्नर गट न जानत कोइ । हाव विलास हि लाज धर मन, आनुग्ता करि तृप्त न होई।। सो जिनराज वसानत है, तिय-वेद नो विधि के वश ऐमो । हे भगवन्त । नम तुमको, तुम जीत लियो छिन मे अरि तेमो।।४।। ॐ हीं स्त्रीवेदरहिताय नम अय०।।४।। - वसन्ततिलका तुम देव आयु प्रमाण दृढ़ वधन ओर नाही, गत्यानुसार थिति पूरण कण नाही । सोई विनाश कीनो नाथा, वद् तम्हे तरणकारण जोर हाथा ।।४९।। ॐ ही आयुकर्मरहिताय नम अयं० ।। ४९।। जो है कलेश अवधि सब होत जातो, तेतीस सागर रहे थिति नर्क तासो । सोई विनाश कीनो वदू तुम्हे तरणकारण जोर हाथा।।५०।। ॐ हीं नरकायुरहिताय नम अर्घ्य० ।।५।। याही प्रकार जितने दिन देव देही, नासै अकाल नहिं जे सुर आयु से ही । सोई विनाश कीनो तुम देव नाथा, वदू तुम्हे तरणकारण जोर हाथा ।।५१।। ॐ हीं देवायुरहिताय नम अर्घ्य० ।।१।। तुम देव नाथा, on- नाथा, नष्टम पूजा ] [९१ जानी रे पियग की र्शित आउ पूरी, मा. वहीं निजग आग महालपरी । विनाश यांनी तुम देव नाधा, नमः ताणचारण जार हाथा।।५२।। ही तिपंगापुरहिताय नम. अय० ।।२।। गम विधि दे न आप जाको नेनं पजाम नर कप भगाय नायो । ना तीनो तम देव बः तम् नरणकारण और हाथा ।।५३।। ही मनुष्यायाताय नम अH०।।५।। पद्धड़ी नं च सेवा बार प्रकार ज्या चिपकार चिनाम भार । गे मानवम नर नाश पीन. मैं नम गदा उर भतिलीन ।।५४।। नामकमंगरताप नम अर्य। जामो बजे दिन जीद रहे भानहीन निवल सदीय । मी निपान नम नाश चीन, मैं नम मदा उर भक्तिलीन ।।५।। नीतिपतिरारिताप नम अर्य। ग उदय नारकी देश पाय, नाना दुस भोगे नर्क जाय । गो नरगती नम नाश चीन में नम मदा उर भक्तिलीन ।।५६।। गतिरहिताय नम अध्य। व विधि गुरपट जामा लहाय, विषयातुर नित भोगे उपाय । मो देवगती तुम नाश कीन, मैं नम मदा उर भक्तिलीन ।। ५७।। ॐनी देवनतिकर्मराहताय नम अध्य। जा उदय भय मानण्य हात, लहै नीच ऊच ताको उद्योत । मा मानुष पनि नम नाश कीन, मैं नम सदा उर भक्तिलीन ।।५।। ॐ ही मनुष्यगतिरहिताय नम अय० । कामिनीमोहन एक ही भाव मामान्यका पावना, जीव की जातिका भेद सो गावना । होत जो थावग एक इन्द्री कहो, पजहू मिडके चरण ताको दहो।। ५९।। ॐ हीं एकेन्द्रिय-जातिरहिताय नम अय॑०॥५९।।
९२ ] [ सिद्धचक्रविधान फर्स के साथ मे जीभ जो आ मिले, पायसो आपने आप भूपर चले । गामिनी कर्म सो दोय इन्द्री कहो, पूजहू सिद्धके चरण ताको दहो।।६०।। ॐ ह्रीं द्वीन्द्रिय-जातिरहिताय नम अy०।।६।। नाक हो और दो आदिके जोड मे, हो उदय चालना योगसो दोल मे । गामिनी कर्म सो तीन इन्द्री कहो, पूजहू सिद्धके चरण ताको दहो।।६१।। ॐ हीं त्रीन्द्रिय-जातिरहिताय नम अयं०।।६१।। आख हो नाक हो जीभ हो फर्श हो, कान के शब्द का ज्ञान जामेनहो । गामिनी कर्मसो चार इन्द्री कहो, पूजहू सिद्धके चरण ताको दहो।। ६२।। ॐ हीं चतुरिन्द्रियजातिरहिताय नम अयं० ।।२।। कान भी आ मिले जीव जा जाति मे, हो असज्ञी सुसज्ञी दो भाति मे । गामिनी कर्मकी पच इन्द्री कहो, पूजहू सिद्धके चरण ताको दहो ।। ६३।। ॐ हीं पचेद्रियजातिरहिताय नम अर्घ्य० ।।६३।। लावनी हो उदार जो प्रगट उदारिक, नाम कर्म की पकृति भनी । लहै औदारिक देह जीव तिस, कर्म प्रकृति के उदय तनी।। भये अकाय अमूरति आनद, पुज चिदातम ज्योति घनी । नमू तुम्हे कर जोर युगल तुम सकल रोगथल काय हनी।। ६४।। ॐ हीं औदारिकशरीरविमुक्ताय नम अy० ।।६४।। निज शरीर को अणिमादिक करि, बहु प्रकार प्रणमाय वरे । वैक्रिय तन कहलावे है यह, देव नारकी मूल धरे।। भये अकाय०।। ॐ हीं वैक्रियिकशरीरविमुक्ताय नम अर्घ्य०।।६५। धवल वर्ण शुभ योगी सशय-हरण अहारक का पुतला । जो प्रमत्त गुणथानक मुनि के, देह औदारिक सो निकला।। भये अकाय०।। ॐ हीं आहारकशरीररहिताय नम अj०।।६६।। पुद्गलीक तन कर्म वगणा, कारमाण परदीप्त करण । तैजस नाम शरीर शास्त्र मे, गावत हैं नहिं तेज वरण ।। भये अकाय०।। ॐ हीं तैजसशरीररहिताय नम अर्घ्यं ।।६७।। पुद्गलीक वरगणा जीवसो, एक क्षेत्र अवगाही है । नूतन कारण करण मृल तन, कारमाण तिस नाम कहैं। । भये अकाय०।। ॐ ह्रीं कार्माणशरीररहिताय नम अर्घ्य।।६८।।
पष्टम पूजा ] [९३ इन्द्रवजा ज्ने प्रदगा तन बीच आर्य, मान मिले जोड न छिट पावै । मघात नामा जिप दर गना, पज तम् मिद यह कम हानो।।६९।। *हीं औनारियसपातरहिताय नम अर्य। ऐने प्रराग ननमें भाग, गधी मिलाया कर वेतनारा । नयान नामा जिप देह जानो पर तुर्म निद यह बम हानी ।।७०।। *ही आहारपसपातहिताय नम अर्य। वैरियर गर जी होत नाही नपाननामा जिन चैन माही । नपान नगमा नियरे माना, पज तुम्ह नित यह कम हानी ।।७१।। ॐ त्रिपकमतररिताय नम अध्य। नेउळ अन उपग मारे गधी मिलाया निन मारि धारे । मपान नामा चि देह जानों पर नन्द गिट यह बम हानी ।।७२।। *ही तेजसमपातरिताय नम अप्पं०। शानादि आमावा कर-पाया, नायो मिलाया त माहि गाया । मपान नामा लिग दर जाना पज तम् निद यह कम हाना ।।७३।। *ही श्री कामाणसघातररिताय नम अर्य। चौवोला पुढगनीय वगणा जोग तें, जब जिय करत अहारा । प्रणवावे निनयों एकत्र रि, बध उदय अनुमाग ।। यही औदारिक बन्धन तुमन, छेद क्येि निरधारा । भये अवध अकाय जनपम, जज़ भक्ति उर धाग।।७४।। ॐहीं औवारिकवन्धनरहिताय नम अय०। वैश्यिक तन परमाण मिल, परम्परा अनिवारा । हो म्कन्ध रूप पर्याई, यह बन्धन परकारा।। वैक्रियिक तनु बन्धन तुमने, छेद कियो निरधाग । भये अवध अकाय अनूपम, जजू भक्ति उर धाग।।७।। ॐ हीं वैक्रियिफवन्धनच्छेदकाय नम अध्य। मुनि शरीरमो वाहिज निमरे, सशय नाशनहारा । ताको मिले प्रदेश परस्पर, हो सम्बन्ध अवारा ।।
९४] [सिद्धचक्रावधान यही अहारक वन्धन तुमने, छेद कियो निरधारा । भये अवध अकाय अनूपम, जजू भक्ति उरधारा ।।७।। ॐ हीं आहारकवन्धनच्छेदकाय नम अय। दीप्त जोति जो कारमाणकी, रहै निरन्तर लारा । जहा तहा नहिं विखरै किन ज्यो, वहै एक ही धारा ।। तैजस नामा बधन तुमने, छेद कियो निरधारा । भये अवध अकाय अनूपम, जजू भक्ति उरधारा।।७७।। ॐ हीं तैजसवन्धनरहिताय नम अर्घ्य । द्रव्य कर्म ज्ञानावरणादिक, मुद्गल जाति पसारा । एक क्षेत्र अवगाही जियको, दुविधि भाव करतारा।। कारमाण यह वधन तुमने, छेद कियो निरधारा । भये अवध अकाय अनूपम, जजू भक्ति उरधारा।।७८।। ॐ हीं कार्मापवन्धनरहिताय नम अय। रोला . तन आकृति सस्थान आदि, समचतुरस्र वखानो, ऊपर तले समान् यथाविधि सुन्दर जानो । यह विपरीत स्वरूप त्याग, पायो निजात्म पद, बीजभूत कल्याण नमू, भव्यनि प्रति सुखप्रद ।।७९।। ॐ हीं समचतुरम्रप्तस्पामषिमुक्ताय नम अर्घ्य । ऊपर से हो थूल तले हो न्यून देह जिस, । परिमण्डलनिग्रोध नाम वरणो सिद्धात तिस।।यह विपरीत०।1001 ॐ हीं न्यग्रोधपरिमण्डलसस्थाननरहिताय नम अर्घ्य । नीचेसे हो थूल न्यून होवे उपसही, बमई सम वामीक देह जिन आज्ञा माही। यह विपरीत०।।१।। ॐ हीं वामीकसस्थानरहिताय नम. अj०। जो कूबड आकार रूप पावे तन प्राणी, कुब्ज नाम सस्थान ताहि वरण जिनवानी। यह विपरीत।।२।। ॐ हीं कुब्जकनामसस्थानरहिताय नम अयं०।
पष्टम पूरा ] [९५ लप नो ठिगना रूप गम नन होवे जाको, बामन । पर्गनत लोप में माने तायो । यह विपरीत०11८६।। ॐही दामनसस्थानगताय नम अर्य। ग्नि तिन दा आचार वही नहि हो परनाम् र अनि अगायन पाप पन प्रगट उपर यह विपरीत०।।४।। *संस्थान रताय नम अय। लक्ष्मीधरा व आपभावनी जयमयी क्रिया परंत, अग या उपग मो शरीर उपय मर्मत । गौ ओगरिवी शरीर अग वा उपग नाश. नितस्पो नमी न पाइयो अबाध वाम ।।८५|| *ही औदारिकागोफगरहिताय नम अर्य। देव नागदी भरीर मान रक्त ने न होत, नानो जनर भाति आप देन उद्योत । वैरिय गो शरीर अग या उपग नाश, गिदम्पनी नमो न पा.यो अवाध वाम ।।६।। ही वैक्रिपिपागोफगरहिताय नम अप्य । माध में शरीर मल-ते क्ढ़े प्रशगयोग, मशय को विध्वनबार पंवली मुलत भोग । आरक्ष मो शरीर अग वा उपग नाश, गिदम्प हो नमो न पाइयो अबाध वाम ।।७।। ॐही आहारकागोपागरहिताय नम अर्य। गीता महनन वन्धन हाद होय अभेद वज मा नाम है, नागच कीनी वृषभ टोरी बाधने की ठाम है । है आदि को जो नहनन जिम वज़ मव परकार हो, यह त्याग वध-अवर्धानवमीपरम आनन्दधारहो।।१८।। ॐ हीं वजभनाराचसहननरहिताय नम अर्घ्य। ज्यो वजकी कीली टुकी हो हाड मधी मे जहा, मामान्य वृपभ जु जेवरी ताकरि बधाई हो तहा ।
[ सिद्धचक्रविधान
है दूसरा सहनन यह नाराच वज्र प्रकार हो,
यह त्याग बध-अबध निवसौपरम आनदधारहो।।८९।।
ॐ हीं वज्रनाराचसहननरहिताय नम अyo।
नहिं वज्र की हो वृषभ अरु,नाराच भी नही वज्र हो,
सामान्य कीली करि ठुकी,सब हाड वज्र समान हो ।
है तीसरा सहनन जो, नाराच ही परकार हो,
यह त्याग बध-अबधनिवसौ,परम आनदधारहो।।१०।।
ॐ हीं नाराचसहननरहिताय नम अर्य।
हो जडित छोटी कीलिका, सो संधि हाडो की जबै,
कछु ना विशेषण वज्र के, सामान्य ही होवे सबै ।
है चौथवा सहनन जो, नाराच अर्द्ध प्रकार हो,
यह त्यागबध-अबध निवसौ,परम आनदधारहो।।९१।।
ॐ हीं अर्द्धनाराचसहननरहिताय नम अर्घ्य० ।
जो परस्पर जडित होवे, संधि हाडनकी जहा,
नहिं कीलिका सो ठुकी होवे, साल सधी के तहा ।
है पाचवा सहनन जो, कीलक नाम कहाय हो,
यह त्याग बध-अबधनिवसौ,परम आनदधारहो।।९२।।
ॐ ह्रीं कीलिकसहननरहिताय नम अयं।
कछु छिद्र कछुक मिलाप होवे, संधि हाडोमय सही,
केवल नसासो होय बेढी, माससो लतपत रही ।
अंतिम स्फाटिक सहनन यह, हीन शक्ति असार हो,
यह त्यागबध-अबधनिवसौ,परमआनदधारहो।।९३।।
ॐ ह्रीं स्फाटिकसहननरहिताय नम अय।
दोहा
वर्ण विशेष न स्वेत है, नामकर्म तन धार ।
स्वच्छ स्वरूपी हो नमू ताहि कर्मरज टार।।९४।।
ॐही स्वेतनामकर्मरहिताय नम अर्घ्यं ।
वर्ण विशेष न पीत है, नामकर्म तन धार।।स्वच्छ०।।
ॐहीं पीतनामकर्मरहिताय नम अय० ॥१५॥
। ९७ पष्टम पुजा । दन विशेष न न नागवन तन धाराम्ब०।। *ही रक्तनामयमरहिताय नम आध्यं० ।।१६।। पनविनाग्नि नागवम तन धाराम्वच्छ०।। *ही हरितनामस्मरहिताय नम अर्य० ।।९।। परवगन या. नामरस नन धार । ग्वच्छ०।। ही सापनाममगरताय नम. अध्यं०11९८।। गांव शभ ही नामवमानन पारम्वच्छ०।। * ही मुगन्धनामरमंगहताय नम अध्यं ।।१९।। गध विशेष न शमी नाम कमनन धार ।।स्वच्छ। *ही वर्गन्धनामफमरहिताय नम अध्यं०।।१०।। mirननन.नामवगनन भाराम्बच्छ०।। *fi तिक्तमरिताय नम अध्यं०।।१०१।। बाट विगनबदर नामयम तन धार ।।ग्वन्७०।। *ही कटरमननाय नम अध्यं० ।।१०२।। ग्यगट विशेषनभाना.नामकम तन धार।।म्वच्छ०।। ही आम्नरसरहिताय नम अध्य० ।।१०३।। ग्वाट विशेष न मधुर है. नामकम तन धार ।।म्वच्छ०।। ॐ हीं मधुररमरहिताय नम अध्य० ।।१०४।। ग्वाट विशेष न पाय , नामकम नन धार । स्वच्छ०।। *हीं पायरसहिताय नम अर्घ्य० ।।१०।। पन विशा न नर्म है, नामक्म तन धार।।म्वच्छ०।। *ही मृदुत्वस्पर्शरहिताय नम अर्घ्य० ।।१०६।। फन विशेष न कठिन है, नामकमं तन धार सम्वच्छ०।। *ही कठिनस्पर्शरहिताय नम अर्घ्य० ।।१०७।। फ्न विशेष न भार है, नामर्म तन धार । स्वच्छ०।। ॐ हीं गुरुस्पर्शरहिताय नम अर्घ्य० ।।१०८।। फर्म विशेष न अगुरू हे, नामकर्म तन धार । ।स्वच्छ०।। ॐ हीं लघुस्पर्शरहिताय नम. अर्ध्य० ।।१०९।। .
९८ ] [ सिद्धचक्रावधान फर्त विशेष न शीत है, नामकर्म तन धार।।स्वच्छ०।। ॐ हीं शीतस्पर्शरहिताय नम अy० ।।११०।। फर्स विशेष न उष्ण है, नामकर्म तन धार ।।स्वच्छ०।। ॐ हीं उष्मस्पर्शरहिताय नमः अर्घ्य० ।।१११।। फर्स विशेष न चिकण है, नामकर्म तन धार ।।स्वच्छ०।। ॐ हीं स्निग्धस्पर्शरहिताय नम अर्घ्य० ।।११२।। फर्स विशेष न रूक्ष है, नामकर्म तन धार ।।स्वच्छ०।। ॐ रूक्षस्पर्शरहिताय नमः अy० ।।११३।। मरहव 4 हो जो प्रजाप्त वर, पणइन्द्रीधर, जाय नर्क निरधार, विग्रहलु चाल मे, अतराल मे, धरै पूर्व आकार । सो नर्क नामकरि, गावत गणधर, आनुपूर्वी सार । तुम ताहि नशायो, शिवगति पायो, नमित लहूँ भवपार।।११४।। *हीं नरकगत्यानुपूर्वीछेदकाय नम अyo! निजकाय छाडकरि, अत समय मरि, होय पशू अवतार, विग्रहसु चाल मे, अन्तराल मे, धरै पूर्व आकार । सो तिर्यंच नामकरि, गावत गणधर, आनुपूर्वी सार । तुम ताहि नशायो, शिवगति पायो, नमित लहूँ भवपार ।।११।। ॐ हीं तिर्यवगत्यानुपूर्वीविमुक्ताय नम. अर्ध्य० । समकिततो मर वा कलेश करि, धरहिं देवगति चार । विहग्रसु चाल मे, अन्तराल मे, धरै पूर्व आकार।। सो देव नामकरि, गावत गणधर, आनुपूर्वी तार । तुम ताहि नशायो, शिवगति पायो, नमित लहू भवपार।।११।। ॐ हीं देवगत्यानुपूर्वीविमुक्ताय नम अy० । हो मित्र प्रणामी वा शिवगामी वरै मनुजगति सार, विग्रहलु चाल मे अन्तराल मे धरै पूर्व आकार । सो मनुष्य नामकरि गावत गणधर, आन्पूर्वी सार । तुम ताहि नशायो शिवगति पायो नमित लहू भवपार ।। ११७।। ॐ ही मनुष्यगत्यानुपूर्वीविमुक्ताय नम. अय० ।
वष्टम पुग। नोटक तनभार भए निज पान टने, तिमी या विधि ऐनी ज बने । असा मा निदान भनो, रग पज्य भए तमु मल हनो।।११।। अपपातमरहिताय नम अपं०। वित आदि अनेर उपाधि धरे पर प्रानको निर्मल करे । पन्यानि न म निदान भनो जग पजा भार तिन मन हनो।।११९।। ही परपातनामकमरहिताय नम अर्य। मंत तेजमा. परदीन ना, नव-विव विष जिय भूमि लहा । यह आनार बम गितान भनी जग पत्र भय निम मल हनो।।१२०।। ही अतितेजमपी आतप-नामकर्मरहिताय नम अध्य०। परकममा रिम बिष शशी. पाधी जिय पावत देह उनी । पनि नाम व निसात गगे. जग पूज्य भये तिम मल हनो।। १२१।। • उपोतनामपर्मरहिताप नम. आया दनकीन काल ज्यान गहे. म्बर अन्तर बाहर भेद वहै । यह बाम सरम निदान भनो, जग पूज्य भये तिन मल हनी ।। १२२।। * म्यासमरहिताय नम अय। राम चान चने अपनी जिनमे,गि ज्यो नम मोहत है तिममे । नभमं गति रम निदान भनो, जग पज्य भये तिम मूल हना।। १२३।। *ही विहायोगतिनाम-कर्मयिमुक्ताय नम अर्घ्य० ॥ पर दन्द्रिय जात विरोध मई. चतुर्गात मुभावक प्राप्त भइ । अन नाम मुक्म निद्धात भनी, जग पूज्य भये तिम मूल हो।। १२४।। *ही प्रसनामकर्मीयमुक्ताय नम अय० । इक इन्द्रिय जानहि पावत है, अम शंप न ताहि धरावत है । यह थावर कम गिद्धान भनो, जग पूज्य भये तिस मूल हनो।।१२५।। ॐही स्थावरनामकर्मरहिताय नम अर्घ्य। पर मे परवेश न आप कर, पर को निज मे नहिं याप धरै । यह वादर कर्म मिद्धात भनो, जग पूज्य भये तिम मूल हो।।१२६।। ॐही यावरनामफर्मरहिताय नम अर्घ्य। २२॥
१०० ] [ मिद्धचक्रयिधान जलसो दवसो नही आप मरे, मब ठौर रहै पर को नम हरे । यह सूक्षम कर्म मिद्धात भनो, जग पृज्य भये तिम मल हनो ।। १२७।। ॐ हीं सूक्ष्मनामकर्मरहिताय नम अर्घ्य । जिसते परिणरणता करि है, जिन शक्ति ममान उदय धरि है । पर्याप्त सुकर्म सिद्धात भनो, जग पृज्य भये तिम मूल हो ।। १२८।। ॐ हीं पर्याप्तकर्मरहिताय नम अय॑01 परिपूरणता नहि धार सके, यह होत सभी माधारण के । अपरयापति कर्म मिद्धात भनो, जग पूज्य भये तमु मल हो।। १२९।। ॐ हीं अपर्याप्तकर्मरहिताय नम अर्घ्य । जिम लोहन भार धरे तन मे, जिम आकन फूल उडे वन मे । है अगुरुलघु यह भेद भनो, जग पृज्य भये तमु मूल हनो।।१०।। ॐ हीं अगुरुलघुकर्मरहिताय नम अर्ध्य० । इक देह विपे इक जीव रहे, इकलो तिमको मव भोग लहे । परतेक सुकम सिद्धात भनो, जग पूज्य भये तमु मूल हनो।।१३१।। ॐ हीं प्रत्येककर्मरहिताय नम अर्घ्य इक देह विपे बहु जीव रहै, इक माय मभी तिम भोग लहै । यह भेद निगोद सिद्धात भनो, जग पूज्य भये तमु मूल हनो।। १३२।। ॐ हीं साधारणनामकर्मरहिताय नम अर्घ्य। उपेन्द्रवज्रा चले न जो धातु तजै न वासा, यथाविधि आप धरै निवासा । यही प्रकारा थिर नाम भासो, नमामि देव तिस देह नासो।।१३६।। ॐ हीं स्थिरनामकर्मरहिताय नम अy०। अनेक थान मुख गौण धात, चलति धार निजवासघात । यही प्रकाराऽथिर नाम भासो, नमामि देव तिस देह नासो।। १३४।। ॐ हीं अस्थिरनामकर्मरहिताय नम अयं० । यथाविधी देह विशाल सोहै, मुखारविंदादिक सर्व मोहै । यही प्रकारा शुभ नाम भासो, नमामि देव तिस देह नासो।। १३५।। ॐ ह्रीं शुभनामकर्मरहिताय नम अर्घ्यं । - पष्टम पूजा ] [१०१ असुन्दराकार शरीर माही, लखो जहाँसो विडरूप ताही । यहै प्रकाराऽशुभ नाम भासो, नमामि देव तिस देह नासो।।१३६।। ॐ हीं अशुभनामफर्मरहिताय नम अy० । अनेक लोकोत्तम भावधारी, करें सभी तापर प्रीति भारी । नुभगता को यह भेद भासो, नमामि देव तिस देह नासो।।१३७।। ॐ हीं सुभगनामकर्मरहिताय नम अर्घ्य। धरै अनेका गुण तो न जासो, करें कभी प्रीति न कोई तासो । दुर्भाग ताको यह भेद भासो, नमामि देव तिस देह नासो।।१३८।। ॐ हीं दुर्भगनामकर्मरहिताय नम अर्घ्य० ॥ पद्धडी ध्वनि वीन भांति ज्यो मधुर बैन, निसरै पिक आदिक सुरस दैन । यह सुम्वर नाम प्रकृति कहाय, तुम हनी नमू निज शीस लाय ।। १३९।। ॐ हीं सुस्वरनामकर्मरहिताय नम अय॑oi गर्भभस्वर जैसो कहो भाम, तैसो रव अशुभ कहो सु भास । यह दुस्वर नाम प्रकृति कहाय,तुम हनी नमू निज शीस लाय।।१४०।। ॐ हीं दुस्वरनामफर्मरहिताय नम अर्घ्य। अडिल्ल होत प्रभामई कांति महा रमणीक जू । जग जन मन भावन माने यह ठीक जू।। यह आदेय सुप्रकृति नाश निजपद लहो । ध्यावत हैं जगनाथ तुम्हें हम अघ दहो।।१४१।। ॐ हीं आदेयनामकर्मरहिताय नम अyo। रूखो मुखको वरण लेश नहिं कातिको । रूखे केश नखाकृति तन बढ़ भांतिको ।। अनादेय यह प्रकृति नाश निजपद लहो । ध्यावत हैं जगनाथ तुम्है हम अघ दहो।।१४२।। ॐहीं अनादेयनामकर्मरहिताय नमः अj०॥ होत गुप्त गुण तो भी जगमे विस्तरै । जगजन सुजस उचारत ताकी थुति करें।।
१०२ ] [ सिद्धचक्रविधान यह जस प्रकृति विनाश सुभावी यश लहो । ध्यावत हैं जगनाथ तुम्हें हम अघ दहो।। १४३।। ॐ हीं यश प्रकृतिछेदकाय नम अL० । जासु गुणनको औगुण कर मब ही ग्रहै । करत काज परशसित पण निदित कहैं।। अपयश प्रकृति विनाश मुभावी यश लहो । ध्यावत हैं जगनाथ तुम्हे हम अघ दहो।। १४४।। ॐ हीं अपयश नामकर्मरहिताय नम अय० । योग थान नेत्रादिक ज्यो के त्यो बनो । रचित चतुर कारीगर करते है तनो।। यह निर्माण विनाश सभावी पद लहो । ध्यावत हैं जगनाथ तुम्हें हम अघ दहो।। १४५।। ॐ हीं निर्माणनामकर्मरहिताय नम अर्घ्य। पचकल्याणक चोतिस अतिशय राजही । प्रातिहार्य अठ समोसरण द्युति छाजही।। तीर्थंकर विधि विभव नाश निजपद लहो । ध्यावत हैं जगनाथ तुम्हें हम अघ दहो।। १४६।। ॐ हीं तीर्थकरप्रकृतिरहिताय नम अर्घ्य। चाल जो कुम्भकार की नाई, छिन घट छिन करत सुराई । सो गोत कर्म परजारा, हम पूज रचो सुखकारा ।। १४७।। ॐहीं गोत्रकर्मरहिताय नम अयं । लोकनिमें पूज्य प्रधाना, सव करत विनय सनमाना । यह ऊच गोत्र परजारा, हम पूज रचो सुखकारा ।। १४८।। ॐ हीं उच्चगोत्रकर्मरहिताय नम अयं । जिसको सब कहत कमीना, आचरण धरे अति हीना । यह नीच गोत्र परजारा, हम पूज रचो सुखकारा।।१४९।। ॐ हीं नीचगोत्रकर्मरहिताय नम अर्घ्य।
पष्टम पूजा ] [१०३ ज्यो दे न सके भण्डारी, परधन को हो रखवारी । यह अन्तराय परजारा, हम पूज रचो सुखकारा ।।१५०।। ॐ हीं अन्तरायकर्मरहिताय नम अy। हो दान देन को भावा, दे सके न कोटि उपावा । दानातराय परजारा, हम पूज रचो सुखकारा।।१५१।। ॐ हीं वानातरायकर्मरहिताय नम अर्य। मन दान लेन को भावे, दातार प्रसग न पावै । लाभातराय परजारा, हम पूज रचो सुखकारा । १५२।। ॐ ही लाभातरायकर्मरहिताय नम अय० । पुष्पादिक चाहै भोगा, पर पाय न अवसर योगा । भोगातराय परजारा, हम पूज रचो सुखकारा।।१५३ ।। ॐ हीं भोगातरायकर्मरहिताय नम अय। तिय आदिक बारम्बारा, नहिं भोग सके हितकारा । उपभोगातराय परजारा, हम पूज रचो सुखकारा।।१५४।। ॐहीं उपभोमातरायकर्मरहिताय नम अय। चेतन निज बल प्रकटावे, यह योग कबहु नहिं पावे । वीर्यान्तराय परजारा, हम पूज रचो सुखकारा।।१५५।। *ही वीर्यान्तरायफर्मरहिताय नमः अध्य। ज्ञानावरणादिक नामी, निज काज उदय परिणामी । अठ भेद कर्म परजारा, हम पूज रचो सुखकारा।।१५६।। ॐहीं अष्टकर्मरहिताय मम अय० । इकसौ अडताल प्रकारी, उत्तर विधि सत्ता धारी । सब प्रकृति कर्म परजारा, हम पूज रचो सुखकारा।।१५७।। ॐही एकशताष्टचत्वाशित् कर्मप्रकृतिरहिताय नम अय। परणाम भेद सख्याता, जो वचन योग मे आता । सख्यात कर्म परजारा, हम पूज रचो सुखकारा।।१५।। ॐ हीं सख्यातकर्मरहिताय नम अध्य० । है वचनसो अधिकाई, परिणाम भेद दुखदाई । विधि असख्यात परजारा, हम पूज रचो सुखकारा।।१५९।। ॐही असख्यातकर्मरहिताय नम अर्घ्य १०४ ] [ मिद्धचक्रविधान अविभाग प्रछेद अनन्ता, जो केवलज्ञान लहन्ना । यह कर्म अनन्त परजारा, हम पृज रचो मुखकाग। १६०।। ॐ हीं अनन्तकर्मरहिताय नम अर्घ्य। सब भाग अनन्तानन्ता, यह सूक्ष्मभाव धरता । विधि नन्तानन्त परजारा, हम पूज रचो सुखकाग।।१६१।। ॐ हीं अनन्तानन्तकर्मरहिताय नम अर्घ्य । मोतियादाम . न हो परिणाम विषै कछु खेद, मदा इकमा प्रणवै बिन भेद । निजाश्रित भाव रमै सुखधाम, कर तिम आनन्दको पिरणाम ।। ॐ हीं आनन्दस्वभायाय नम अर्घ्य० ।।१६२।। धरे जितने परिणामन भेद, विशेपनि त सव ही विन खेद । पराश्रिता विन आनन्द धम, नमू तिन पाय लहू पद शर्म।। ॐ हीं आनन्दधर्माय नस अयं।।१६३।। न हो परयोग निमित्त विभाव, सदा निवमै निज आनन्द भाव । यही वरणो परमानन्द धम, नमू तिन पाय लहूँ पद पर्म ।। ॐ हीं परमानन्दधर्माय नम अर्घ्य० ।।१६४।। कबहु परसो कछु द्वेष न होत, कबहु पुनि हर्प विशेष न होत । रहै नित ही निज भावन लीन, नमू पद साम्य सुभाव सु लीन।। ॐ हीं साम्यस्वभावाय नम अयं० ।।१६५।। निजाकृति मे नहिं लेश कपाय, अमरीत शातिमइ सुखदाय । आकुलता बिन साम्य स्वरूप, नमू तिनको नित आनन्द रूप।। ॐ हीं साम्यस्वरूपाय नम अयं ।।१६६।। अनन्त गुणातम द्रव पर्याय, यही विधि आप धरै वहु भाय । सभी कुमति करि हो अलखाय, नमू जिनवैन भली विधि गाय ।। ॐ हीं अनन्तगुणाय नम अर्घ्य० ।।१६७।। अनन्त गुणातम रूप कहाय, गुणी-गुण भेद सहा प्रणमाय । महागुण स्वच्छमयी तुम रूप, नमू तिनको पद पाइ अनूप ।। ॐ हीं अनन्तगुणस्वरूपाय नम अयं० ।।१६८।। .
षष्टम पूजा ] [१ अभेद सुभेद अनेक सु एक, धरो इन आदिक धर्म अनेक । विरोधित भावनसो अविरुद्ध, नमू जिन आगम की विधि शुद्ध ।। ॐ हीं अनन्तधर्माय नम अर्घ्य ।।१६९।। रहै धर्मी नित धर्म सरूप, न हो परदेशनसो अन्यरूप । चिदातम धर्म सभी निजरूप, धरो प्रणमू मन भक्ति स्वरूप ।। ॐ हीं अनन्तधर्मस्वरूपाय नम. अर्घ्य०।१७०।। चौपाई हीनाधिक नही भाव विशेष, आतमीक आनन्द हमेश । सम स्वभाव सोई सुखराज, प्रणम् सिद्ध मिटै भवभास।। ॐ ह्रीं समस्यभावाय नम अy० ।।१७१।। इष्टानिष्ट मिटो भ्रम जाल, पायो निज आनन्द विशाल । साम्य सुधारसको नित भोग, नमू सिद्ध सन्तुष्ट मनोग।। ॐ हीं सतुष्टाय नम अy० ॥१७२।। पर पदार्थ को इच्छुक नाहि, सदा सुखी स्वातम पद माहिं । मेटो सकल राग अरु दोष, प्रणमू राजत सम सन्तोष ।। ॐ हीं समसतोवाय नम अर्ध्य।।१७३।। मोह उदय सब भाव नसाय, मेटो पुद्गलीक पर्याय । शुद्ध निरजन समगुण लहो, नमू सिद्ध परकृत दुख दहो।। ॐ हीं साम्यगुणाय नम अy० ।।१७४।। निजपदसो थिरता नहिं तर्जें,स्वानुभूत अनुभव नित भ6 । निरबाध तिष्ठै अविकार, साम्यस्थाई गुण भण्डार ।। ॐ हीं साम्यस्थाय नम अयं ।।१७।। भव सम्बन्धी काज निवार, अचल रूप तिष्ठै समधार । कृत्याकृत्य साम्य गुण पाइयो, भक्ति सहितहमशीशनाइयो।। ॐ हीं सम्यकृत्याकृत्यगुणाय नम' अर्घ्य० ॥१७६॥ सूलना भूल नही भय करै, छोभ नाही धरै, गैरकी आसको त्रास नाही धरै शरण काकी चहै, सबनको शरण है, अन्य की शरण विन नमू ताही वर। ॐजी अनन्यशरणाय नम अयं ।।१७७।।
१०६ ] [ सिचक्रविधान द्रव्य षट्मे नही, आप गुण आप ही, आप मे राजते सहज नीको सही । स्वगुण अस्तित्वता, वस्तुकी वस्तुता, धरत हो मैं नमू आपही को स्वता।। ॐ हीं अनन्यगुणाय नम अर्घ्य० ।।१७।। गैर से गैर हो आपमे रमाइयो, स्व चतुर खेत मे वास तिन पाइयो । धर्म समुदाय हो परमपद पाइयो, मै तुम्हे भक्तियुत शीश निज नाइयो।। ॐ हीं अनन्यधर्माय नम अर्घ्यं ।।१७९।। साधना जबतई, होत है तबतई, दोउ परिमाण को काज जामे नही । आप निजपद लियो,तिनजलाजलि दियो, अन्यनही चहत निजशुद्धतामेलियो।। ॐ ही परिमाणपिमुक्ताय नम अर्ध्य० ।।१८०।। तोमर दृग ज्ञान पूरणचन्द्र, अकलक ज्योति अमन्द । निरद्वन्द ब्रह्मस्वरूप, नित पूजहूँ चिद्रूप।।१८१।। ॐ हीं ब्रह्मस्वरूपाय नम अय। सब ज्ञानमयी परिणाम, वर्णादिको नहिं काम । निरद्वन्द ब्रह्मस्वरूप, नित पूजहूँ चिद्रूप ।। १८२।। ॐ हीं अलपुणाच नन अय। निज चेतनागुण धार, बिन रूपहो अविकार । निरद्वन्द ब्रह्मस्वरूप, नित पूजहूँ चिद्रूप ।। १८३।। ॐही ग्रहमवेतमाय नम अध्य। सुन्दरी अन्य रूप सु अन्य रहै सदा, पर निमित्त विभाव न हो कदा । कहत हैं मुनि शुद्ध सुभावजी, नमू सिद्ध सदा तिन पायजी।।१८४।। ॐ हीं शुखस्वभावाय नम अy०। पर परिणामनसो नहिं मिलत हैं, निज परिणामनसो नहिं चलत हैं । परिणामी शुद्ध स्वरूप एह, नमू सिद्ध सदा नित पाय तेह।।१८५।। ॐ ह्रीं शुद्धपारिणामिकाय नम अy०। वस्तुता व्यवहार नही ग्रहै, उपस्वरूप असत्यारथ कहै । शुद्ध स्वरूप न ताकरि साध्य है, निर्विकल्प समाधि अराध्य है।।१८६।। ॐ हीं अशुद्धरहिताय नम अयं ।
षष्टम पूजा ] [१०७ द्रव्य पर्यायार्थिक नय दोऊ, स्वानुभव मे विकलप नहिं कोऊ । सिद्ध शुद्धाशुद्ध अतीत हो, नमत तुम निज पद परतीत हो।।१८७।। ॐ हीं शुद्धाशुद्धरहिताय नम अयं । चौपाई क्षय उपशम अवलोकन टारो, निज गुण क्षाइक रूप उघारो । युगंपत सकल चराचर देखा, ध्यावत हू मन हर्ष विशेषा ।।१८८।। ॐ हीं अनन्तदृगस्वरूपाय नम अर्घ्य। जव पूरण अवलोकन पायो, तब पूरण आनन्द उपायो । अविनाभाव स्वय पद देखा, ध्यावत हू मन हर्ष विशेषा।। १८९।। ॐ हीं अनन्तदृगानन्दस्वभावाय नम अयं० । नाश सु पूर्वक हो उतपादा, सत लक्षण परिणति मरजादा । क्षय उपशम तन क्षायक पेखा, ध्यावत हू मन हर्ष विशेषा।।१९०।। ॐ हीं अनन्तदृगुत्पादकाय नम अयं। नित्य रूप निज चित पद माही, अन्य रूप पलटन हो नाही । द्रव्य-दृष्टि मे यह गुण देखा, ध्यावत हूँ मन हर्ष विशेषा।।१९१।। ॐ हीं अनन्तधुवाय नम अय॑०। कर्म नाश जो स्व-पाद पावै, रञ्च मात्र फिर अन्त न आवै । यह अव्यय गुण तुममें देखा, ध्यावत हूँ मन हर्ष विशेषा।। १९२।। ॐ हीं अव्ययभावाय नम अयं। पर नहिं व्यापै तुम पद माही, पर में रमण तुम नाही । निज करि निज मे निज लय देखा, ध्यावत हूँ मन हर्ष विशेषा।। १९३।। ॐ हीं अनन्तनिलयाय नम अयं । 'शंखनारी अनताभिधानो गुणकार जानो। धरो आप सोई, नमू मान खोई।। १९४।। ॐ ह्रीं अनन्ताकाराय नम अर्घ्य। अनता स्वभावा, विशेषन उपावा। धरो आप सोई, नमूमान खोई।।१९।। ॐ ह्रीं अनन्तस्वभावाय नम अय।
१०८ ] [ सिद्धचक्रविधा विनाकारम्पा यहचिन्मयम्बम्पा। धग आप माइ, नम मान साद।।१९।। . ॐ हीं चिन्मयस्वरूपाय नम अध्य० । मदा चेतनामे, न हो अन्यता मे। धगे आप मोइ, नम मान सोड।। १९७।। ॐ हीं चिद्रूपाय नम अध्य० । दोहा जो कुछ भाव विशेष है, मब चिद्रूपी धम । असाधारण पूरण भये, नमत नशे सब कर्म ।। १९८।। ॐ हीं चिद्रूपधर्माय नम अध्य०। परकृति व्याधि विनाशके, निज अनुभव की प्राप्त । भई, नमू तिनको, लहँ, यह जगवाम समाप्त ।। १९९।। ॐ हीं स्वानुभवोपलब्धिरमाय नम अय। निरावरण निज ज्ञान करि, निज अनुभव की डोर । गहो लहो थिरता रहो, रमण ठोर नहीं और ।। २००।। ॐ ह्रीं स्यानुभूतिरताय नम अर्घ्य० । सरवोत्तम लौकीक रस-सुधा कुरस सब त्याग । निज पद परमामृत रसिक, नमू चरण वडभाग ।।२०१।। ॐ हीं परमामृतरताय नम अर्घ्य । विषयामृत विषसम अरुचि, अरस अशुभ असुहान । जान निजानन्द परमरस, तुष्ट सिद्ध भगवान ।।२०२।। ॐ हीं परमामृततुष्टाय नम अर्घ्यं । शकातीत अतीतसो, धरै प्रीति निज माहि । अमल हिये सतनि प्रिये, परम प्रीति नमू ताहि ।। २०३।। ॐ परमप्रीताय नम अर्घ्य। अक्षय आनन्द भाव युत, नित हितकार मनोग । सज्जन चित वल्लभ परम, दुर्जन दुर्लभ योग।। २०४।। ॐ हीं परमवल्लभयोगाय नम अर्घ्य।
षष्टम पूजा ] [१०९ शब्द गन्ध रस फरस नहिं नही वरण आकार । बुद्धि गहै नहिं पार तुम, गुप्त भाव निरधार ।। २०५।। ॐ हीं अव्यक्तभावाय नम अर्घ्य। सर्व दर्वसो भिन्न हैं, नहिं अभिन्न तिहुँ काल । नमू सदा परकाश धर, एकहि रूप विशाल ।।२०६।। ॐ हीं एकत्वस्वरूपाय नम अर्घ्यं । सर्व दर्वसो भिन्नता, निज गुण निज मे वास । नमू अखड परमातमा, सदा सुगुण की राश।।२०७।। ॐ हीं एकत्वगुणाय नम अयं० सर्व दर्व परिणामसो, मिलै न निज परिणाम । नमू निजानद ज्योति घन, नित्य उदय अभिराम ।।२०८।। ॐ हीं एकत्वभावाय नम अर्घ्यं । चौपाई पर सयोग तथा समवाय, यह सवाद न हो ? भाय । नित्य अभेद एकता धरो, प्रणम् द्वैत भाव तुम हरो।।२०९।। २०९।। ॐ ह्रीं द्वैतभावविनाशकाय नम अर्घ्य० । पूरव पर्याय नासियो सोई, जाको फिरत उतपात न होई । अव्यय अविनाशी अभिराम, शाश्वत रूप नमू सुखधाम।।२१०।। ॐ ह्रीं शाश्वताय नम अर्घ्य निर्विकार निर्मल निजभाव, नित्य प्रकाश अमन्द प्रभाव । अव्यय अविनाशी अभिराम, शाश्वत रूप नमू सुखधाम।।२११।। ॐ हीं शाश्वतप्रकाशाय नम अर्घ्य । निरावरण रवि बिम्ब समान, नित्य उद्योत धरो निज ज्ञान । अव्यय अविनाशी अभिराम, शाश्वत रूप नमू सुखधाम।।२१२।। ॐ ह्रीं शाश्वतोद्योताय नम अयं। ज्ञानानद सुधाकर चन्द्र, ज्योति अमन्द । अव्यय अविनाशी अभिराम, शाश्वत, रूप नमू सुखधाम ।।२१३।। ॐ ह्रीं शाश्वतामृतचन्द्राय नम अर्घ्य० । - सोहत पूरण ११० ] - नभ गुण यह जोग [ सिद्धचक्रविधान ज्ञानानन्द सुधारस धार, निविच्छेद अभेद अपार । अव्यय अविनाशी अभिगम, शाश्वत स्प नम मुखधाम ।।२१४।। ॐ हीं शाश्वतामूर्तये नम अर्घ्य०। पद्धडी मन-इन्द्रिय ज्ञान न पाय जेह, हे सूक्षम नाम सस्प तेह । मनपर्यय जाकू नाहिं पाय, सो सूक्षम परम मुगुण नमाय ।।२१५।। ॐ हीं परमसूक्ष्माय नम अर्घ्य। बहु राशि नभोदर मे समाय, प्रत्यक्ष म्यूल ताको न पाय । इकसो इकको वाधा न होहि, मूक्षम अविकाशी नमो सोहि ।।२१६।। ॐ हीं सूक्ष्मावकाशाय नम अर्घ्यं । ध्वनि हो नाहि, हो जिसो गुणी गुण तिसो ताहि । सो राजत हो सूक्षम स्वरूप, नमहूँ तुम सूक्षम गुण अनूप।।२१७।। ॐ हीं सूक्ष्मगुणाय नम अयं० । तुम त्याग द्वैतताको प्रसग, पायौ एकाकी छवि अभग । जाको कबहूँ अनुभव न होय, नमू परमरूप गुप्त सोय।।२१८।। ॐ हीं परमरूपगुप्ताय नम अर्घ्य। त्रोटक सर्वार्थविमानिक देव तथा, मन इन्द्रिय भोगन शक्ति यथा । इनके सुखको एक सीम सही, तुम आनदको पर अन्त नही ।।२१९।। ॐ ह्रीं निरवधिसुखाय नम अर्घ्य । जगजीवनिको नहिं यहै, निज शक्ति उदय करि व्यक्ति लहै । पूरण भाव इम अन्त बिना गुणरास गहो।।२२०।। ॐ ह्रीं निरवधिगुणाय नम अर्घ्य० । भवि-जीव सदा यह रीति धरे, नित नूतन पर्य विभाव धरे ।। तिस कारण को सब व्याधि दहो, तुम पाइ सुरूप जु अन्त न हो ।।२२१।। ॐ हीं निरवधिस्वरूपाय नम अयं । है भाग्य तुम क्षायक लहो, षष्टम पूजा ] [१११ अवधि मनपर्य सु ज्ञान महा, द्रव्यादि विर्षे मरजाद लहा । तुम ताहि उलघ सुभावमई, निजबोध लहो जिस अन्त नही ।। २२२।। ॐ हीं अतुलशानाय नम अयं । तिहुँ काल तिहूँ जग के सुख को, कर वार अनत गुणा इनको । तुम एक समय सुख की समता, नही पाय नमू मन आनदता ।।२२३।। ॐ हीं अतुलसुखाय नम अy० । नाराच सर्व जीव राशके, सुभाव आप जान हो । आपके सुभाव अश, औरकौ न ज्ञान हो।। सो विशुद्ध भाव पाय, जासकौ न अन्त हो । राजहो सदीव देव, चरणदास 'सत' हो।।२२४।। ॐ हीं अतुलभावाय नम अर्घ्यं । आपकी गुणौष वेलि फैलि है अलोकलो । शेष से भ्रमाय पत्रकी न पाय नोकलो।। सो विशुद्ध भाव पाय जासकौ न अन्त हो । राजहो सदीव देव चरणदास 'सन्त' हो।।२२५।। ॐ ह्रीं अतुलगुणाय नम अयं । सूर्यको प्रकाश एक-देश वस्तु भास ही । आपको सुज्ञान भान सर्वथा प्रकाश ही।। सो विशुद्ध भाव पाय जासको न अन्त हो । राजहो सदीव देव चरणदास 'सन्त' हो।।२२६।। ॐ हीं अतुलप्रकाशाय नम अर्घ्य । तास रूप को गही न फेरि जास नाश हो । स्वात्मवास में विलास आस त्रास नाश हो।। सो विशुद्ध भाव पाय जासको न अन्त हो । राजहो सदीव देव चरण दास 'सन्त' हो।।२२७।। ॐ हीं अचलाय नम अj०। सोरव मोहादिकरिपुजीति, निजगुण निधि सहजेलहो । विलसो सदा पुनीति, अचल रूप बन्दो सदा।।२२८।। ॐ हीं अचलगुणाय नम अर्घ्य० ।
११२ ] [ सिद्धचक्रयिधान उत्तम क्षाइक भाव, क्षय उपशम सव गये विनशि । पायो सहज सुभाव, अचल रूप बन्दो सदा।।२२९।। ॐ ह्रीं अचलस्वभावाय नम अy० । अथिर रूप ससार, त्याग सुथिर निजरूप गहि । रहो सदा अविकार, अचल रूप बन्दो सदा।।२३०।। ॐ हीं अचलस्वरूपाय नम अय० । मोतियादाम निराश्रित स्वाश्रित आनदधाम, परै परसो न परै कछु काम । अविन्दु अवधु अबध अमद, करू पद-वद रहू सुखवृन्द ।।२३१।। ॐ हीं निरालम्बाय नम अy० । अराग अदोष अशोक अभोग, अनिष्ट सयोग न इप्ट वियोग । अबिन्दु अबधु अबध अमद, करू पद-वद रहू सुखवृन्द ।।२३२।। ॐ हीं आलम्बरहिताय नम अय० । अजीव न जीव न धर्म-अधर्म, न काल अकाश लहै तिस धर्म । अबिन्दु अबधु अबध अमद, करू पद-वद रहू सुखवृन्द ।।२३३।। ॐ ह्रीं निर्लेपाय नम अय० । अवर्ण अकर्ण अरूप अकाय, अयोग असयमता अकषाय । अबिन्दु अबधु अबध अमद करू पद-वट रहू सुखवृन्द ।।२३४।। ॐ हीं निष्कषाय नम अयं० । न हो परसो रुष-राग विभाव, निजातम मे अवलीन स्वभाव । अबिन्दु अबधु अबध अमन्द, करू पद-वन्द रहू सुखवृन्द ।।२३५।। ॐ ह्रीं आत्मरतये नम अर्घ्य० । दोहा निज स्वरूप मे लीनता, ज्यो जल पुतली खार । गुप्त-स्वरूप नमू सदा, लहू भवार्णव पार ।।२३६।। ॐ हीं स्वरूपगुप्ताय नम अय। जो है सो है और नहिं, कछु निश्चय-व्यवहार । शुद्ध द्रव्य परमातमा, नमू शुद्धता धार।।२३।। ॐ ह्रीं शुद्धद्रव्याय नम अय० । - [११३ पष्टम पूजा ] पूर्वोत्तर सन्तति तनी, भव भव छेद कराय । अससार पदको नमू यह भव वास नशाय ।।२३८।। ॐही अससाराय नम अर्य। नागरूपिणी तथा अर्धनाराच हरो सहाय कर्णको, सुभोगता विवर्ण को । निजातमीक एक ही लहो अनन्द तास ही।।२३९।। ॐहीं स्थानन्दाय नम अध्य० । न हो विभावता कदा, स्वभाव मे सुखी सदा । निजातमीक एक ही लहो अनन्द तास ही।।२४०।। ॐ हीं स्वानन्वभावाय नम अय० । अछेद रूप सर्वथा, उपाधि की नही व्यथा । निजातमीक एक ही, लहो अनन्द तास ही।।२४१।। ॐ हीं स्वानन्दस्वरूपाय नम अय० । दुभेदता न वेद हो, सचेतना अभेद ही । निजातमीक एक ही, लहो अनन्द तास ही।।२४२।। ॐ हीं स्वानन्दगुणाय नम अध्य० । न अन्यकी परवाह है, अचाह है, न चाह है । निजातमीक एक ही, लहो अनन्द तास ही ।।२४३।। ॐ ह्रीं स्वानन्दसतोषाय नम अय० । सोरठा रागादिक परिणाम, हैं कारण ससार के । नाश, लियो सुखधाम, नमत सदा भव-भय हरूँ।।२४४।। ॐ हीं शुद्धभावपर्यायाय नम अय० । उदइक भाव विनाश, प्रगट कियो निज धर्मको । स्वातम गुण परकाश, नमत सदा भव-भय हरू।।२४५।। ॐहीं स्वतधर्माय नम अर्ध्य० । निजगुण पर्ययरूप, स्वय-सिद्ध परमात्मा । राजत हैं शिवभूप, नमत सदा भव-भय हरू।।२४६।। ॐ हीं आत्मस्वभावाय नम अध्य।
दर्श-ज्ञान-गुणसार, ११४ ] [ सिद्धचक्रविधान विमल विशद निज ज्ञान, है स्वभाव परिणतिमई । राजे हैं, सुखखानि, नमत सदा भव-भय हरू ।। २४७।। ॐ हीं परमचित्परिणामाय नम अध्य० । दर्श-ज्ञानमय धर्म, चेतन धर्म प्रगट कहो । भेदाभेद सुपर्म, नमत सदा भय-भय हरू ।। २४८।। ॐ हीं चिद्रूपधर्माय नम अयं० । जीवभूत परमातमा । राजत सब परकार, नमत सदा भव-भय हरू।।२४९।। ॐ ह्रीं चिद्रूपगुणाय नम अर्घ्य० । अष्ट कर्ममल जार, दीप्तरूप निज पद लहो । स्वच्छ हेम उनहार, नमत सदा भव-भय हरू।।२५०।। ॐ हीं परमस्नातकाय नम अध्य० । रागादिक मल सोध, दोऊ विविध विधान विन । लहो शुद्ध प्रतिबोध, नमत सदा भव-भय हरू।।२५१।। ॐ ह्रीं स्नातकधर्याय नम अध्य० । विधि आवरण विनाश, दर्श-ज्ञान परिपूर्ण हो । लोकालोक प्रकाश, नमत सदा भव-भय हरू ।।२५२।। ॐ हीं सर्वावलोकाय नम अय० । निजकर निज मे वास, सर्व लोकसो भिन्नता । पायो शिव सुख-रास, नमत, सदा भव-भय हरू ।। २५३।। ॐ ह्रीं लोकाग्रस्थिताय नम अर्य। ज्ञान-भानकी जोति, व्यापक लोकालोक मे । दर्शन बिन उद्योग, नमत सदा भव-भय हरू ।।२५४।। ॐ हीं लोकालोकव्यापकाय नम अर्यं। जो कुछ धरत विशेष, सब ही सब आनन्दमय । लेश न भाव कलेश, नमू सदा भव-भय हरू।।२५५।। ॐ ह्रीं आनन्दविधानाय नम अयं । जिस आनन्दको पार, पावत नहिं यह जगतजन । सो पायो हितकार, नमत सदा भव-भय हरू ।। २५६ ।।
षष्टम पूजा ] [११५ वोहा इत्याधिक आनन्द गुण, धारत सिद्ध अनन्त । तिन पद आठो दरवसो, पूजत है नित 'सन्त' ।। * ही आनन्दपूर्णाय नम अध्यं०। जयमाला दोहा यावर शत विषय धरे, वन थावर पर्याय । यो न होय तो तुम मुगुण, हम किहविधि वर्णाय ।।१।। तिनपर जो क्षु कहत हैं, केवल भक्ति प्रमान । बालक जल शशि-विवको, चहत ग्रहण निज पान ।।२।। पद्धडी जय पर-निमित्त व्यवहार त्याग, पायो निज शुद्ध-स्वरूप भाग । जय पालन विन जगत देव, जय दयाभाव विन शांतिभेव।। ३।। पर सुख-दुसकरण कुरीति टार, पर मुख-दुख-कारण शक्ति धार । पनि पुनि नव नव नित जन्मरीत, विन सर्वलोक व्यापी पुनीत।। ४।। जय लीला रान विलास नाश, स्वाभाविक निजपद रमण वास । शयनामन आदि क्रिया-कलाप, तज सुखी सदा शिवरूप आप।। ५।। विन कामदाह नहिं नार भोग, निरद्वन्द निजानद मगन योग । वरमाल आदि श्रृगार म्प, विन शुद्ध निरजन पद अनूप ।। ६।। जय धर्म भर्म वन हन कुठार, परकाश पुज चिद्रूपसार । उपकरण हरण दव सलिलधार, निज शक्ति प्रभाव उदय अपार ।। ७।। नभ मीम नहीं अरु होत होउ, नही काल अन्त, लहो अन्त सोउ । पर तुम गुण रान अनत भाग, अक्षय विधि राजत अवधि त्याग।। ८।। आनन्द जलधि धारा-प्रवाह, विज्ञानसुरी मुखद्रह अथाह । निज शांति सुधारस परम खान, ममभाव बीज उत्पत्ति थान।। ९।। निज आत्मलीन विकलप विनाश, शुद्धोपयोग परिणति प्रकाश । दृग ज्ञान असाधारण म्वभाव, स्पर्श आदि परगुण अभाव।।१०।। निज गुणपर्यय समुदाय स्वामि, पायो अखण्ड पद परम धाम । अव्यय अबाध पद स्वय सिद्ध, उपलब्धि रूप धर्मी प्रसिद्ध ।।११।। - ११६ ] [ सिद्धचक्रावधान एकाग्ररूप चिन्ता निगेध, जे ध्यावे पावें म्वय बोध । गुणमात्र 'सत' अनुराग स्प, यह भाव देह, तुम पद अनुप ।।१२।। दोहा सिद्ध सुगुण सुमरण महा, मत्रगज है मार । सर्व मिद्धि दातार है, मव विधन हतार ।।१३।। ॐ हीं अहं पड्पचाशदधिकद्विशतदलोपरिस्थिसिद्धेभ्यो नम अध्य० । तीन लोक चूडामणी, सदा रहो जयवन्न । विघन हरण मगल करण, तम्हे नमै निन मन' ।।१८।। इत्याशीर्वाद। (यहाँ १०८ बार 'ॐ हीं अहं असिआउसा नम' मत्र का जाप करें।) -तस्य देशना नास्ति अबुधस्य वोधनार्य मुनीश्वरा देशयन्त्यभूतार्यम् । व्यवहारमेव केवलमवैति यस्तस्य देशना नास्ति।।६।। माणवक एव सिंहो यथा भवत्यनवगीतसिंहस्य । व्यवहार एव हि तथा निश्चयता यात्यनिश्चयमस्य ।।७।। व्यवहारनिश्चयो य प्रबुध्यतत्त्वेन भवति मध्यस्य प्राप्नोति देशनाया स एव फलमविकल शिष्य ।।८।। आचार्यदेव अज्ञानीजीवी को ज्ञान उत्पन्न करने के लिए अभूतार्थ व्यवहारनय का उपदेश देने है, परन्तु जो केवल व्यवहारनय ही का श्रद्धान करता है, उसके लिए उपदेश नही है। जिसप्रकार जिसने यथार्थ सिंह को नहीं जाना है, उसके लिए विलाव (विल्ली) ही सिंहरूप होता है, उसी प्रकार जिसने निश्चय का स्वरूप नही जाना है, उसका व्यवहार ही निश्चयता को प्राप्त हो जाता है। जो जीव व्यवहारनय ओर निश्चयनय के स्वरूप को यथार्थरूप से जानकर पक्षापातरहित होता है, वही शिष्य उपदेश का सम्पूर्णफल प्राप्त करता है। --पुरुषार्थसिद्धयुपाय, श्लोक ६-७-८ . , सप्तम पूजा पाँच सौ बारह गुण सहित छप्पय उर अधो म्फ नविंद हकार विराजे, अचागांद ग्वर लिप्त कणिका अन्त मु छाजे । बग्गांनपनि वनटन अम्बज तत्व धिधर, जगभाग मन्न अनाहत मोहन अतिवर । पनि अत ही बंदयो पग्म नुर ध्यावत और नाग को । स्वं कहरि सम पूजन निमित, मिद्धचक्र मगल करो।। * ही पमो सिद्धाण द्वादशाधिकपचशतगुणसयुक्तविराजमान श्रीमिहपन्मेप्टिन अगावतरावतर सयौषट् अत्र तिष्ठतिष्ठठ ठ स्थापनम्, अत्र मम् मन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्। पुष्यालिक्षिपेत्। दोहा मध्मादि गुण महिन है, कर्म रहित नीरोग । सिद्धना मो थापह, मिटै उपद्रव योग ।। (इति यत्र स्थापनार्य पुष्पाजलि क्षिपेत्।) (चाल चारहमासा) मुर मणि-कुम्भ क्षीर भर धाग्न मुनि मन-शुद्धप्रवाह बहावहिं । हम दोऊ विधि लाइक नाही, कृपा करहु लहि भवतट भावहिं ।। शक्ति मारु सामान्य नीरमो पृजू हूँ शिव-तियके स्वामी । द्वाटश अधिक पचशत सख्यक, नाम उचारत हूँ सुखधामी।।१।। ॐ हीं वादशाधिकपचशत-(५१२) गुणसहिताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने पन्मजरारोग-विनाशनाय जल निर्यपामीति स्याहा। नतु कोऊ चन्दन नत कोज कोऊ केमरि, मेट किये भवपार भयो है । केवल आप कृपा-दृग ही सो, यह अथाह दधि पार लयो है।।
११८ ] [ सिद्धचक्रयिधान रीति सनातन भक्तन की लख, चन्दनकी यह भेट धरामी । द्वादश अधिक पचशत सख्यक, नाम उचारत हूं मुखधामी।।२।। ॐ हीं वादशाधिकपचशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्लेि ससारताप विनाशनाय चन्दन। इन्द्रादिक पद हूँ अनवस्थित, दीखत अन्तर रुचि न कर है । केवल एकहि स्वच्छ अखण्डित, अक्षयपद की चाह धरै है।। ताते अक्षतसो अनुगगी, हू मो तुम पद पज क्गमी । द्वादश अधिक पचशत मस्यक, नाम उचारत हूँ सुखधामी।।३।। ॐ हीं वादशाधिकपचशत गुण सयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अक्षय- पदप्राप्तये अक्षत। पुष्प-वाण सो ही मन्मथ-जग, विजई जगमे नाम धरावे । देखहु अद्भुत रीति भक्तकी, तिस ही भेट धर काम हनावे ।। शरणागत की चूक न देखी, तातें पूज्य भये शिरनामी । द्वादश अधिक पचशत सख्यक, नाम उचारत हूँ सुरधामी ।।४।। ॐ हीं द्वादशाधिकपचशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने कामवाण- विनाशनाय पुष्पा हनन असाता पीर नही यह, भीर परै चरु भेटन लायो । भक्त अभिमान भेट हो स्वामी, यह भवकारण भाव सतायो।। मम उद्यम करि कहा आप ही, सो एकाकी अर्थ लहामी । द्वादश अधिक पचशत सख्यक, नाम उचारत हूँ सुखधामी।।५।। ॐ हीं द्वादशाधिकपचशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य नि। पूरण ज्ञानानन्द ज्योति घन, विमल गुणातम शुद्ध स्वरूपी । हो तुम पूज्य भये हम पूजक, पाय विवेक प्रकाश अनूपी।। मोह अन्ध विनसो तिह कारण, दीपन सो अ— अभिरामी । द्वादश अधिक पचशत सख्यक, नाम उचारत हूँ सुखधामी।।६।। ॐ हीं वादशाधिकपचशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने मोहान्धकार विनाशनाय दीप०। धूप भरै उधरे प्रजरे मणि, हेम धरे तुम पद पर वारू । बार बार आवर्त जोरि करि, धार धार निज शीश न हारू।।
सप्तम पूजा ] [११९ धूम्र धार समतन रोमांचित, हर्ष सहित अष्टाग नमामी । द्वादश अधिक पचशत सख्यक, नाम उचारत हूँ सुखधामी ।।७।। ॐ हीं द्वादशाधिकपचशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्मदहनाय धूप। तुम हो वीतराग निज पूजन, बन्दन थुति परवाह नही है । अरु अपने समभाव वहै कछु, पूजा फलकी चाह नही है।। तौभी यह फल पूजि फलद, अनिवार निजानन्द कर इच्छामी । द्वादश अधिक पचशत सख्यक, नाम उचारत हूँ सुखधामी।।८।। ॐ हीं द्वादशाधिकपचशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफलप्राप्तये फल। तुमसे स्वामी के पद सेवत, यह विधि दुष्ट रक कहा कर है । ज्यो मयूरध्वनि सुनि अहि निज विल, विलय जाय छिन बिलमन धर है।। तातें तुम पद अर्घ उतारण, विरद उचारण करहुँ मुदामी । द्वादश अधिक पचशत सख्यक, नाम उचारत हूँ सुखधामी।।९।। ॐ हीं द्वादशाधिकपचशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने सर्वसुखप्राप्तये अy०। 4 गीता - निर्मल सलिल शुभ वास चन्दन, धवल अक्षत युत अनी । शुभ पुष्प मधुकर नित रमे, चरु प्रचुर स्वाद सुविधि घनी।। वर दीपमाल उजाल धूपायन, रसायन फल भले । करि अर्घ सिद्ध-समूह पूजत, कर्मदल सब दलमले।। ते क्रमावर्त नशाय युगपत, ज्ञान निर्मल रूप है । दुख जन्म टाल अपार गुण, सूक्षम सरूप अनूप है।। कर्माष्ट बिन त्रैलोक्य पूज्य, अदूज शिव कमलापती । मुनि ध्येय सेय अमेय, चहुँगुण गेह, मती।।१०।। ॐ हीं द्वादशाधिकपचशतगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने पूर्णपदप्राप्तये महायँ। द्यो हम शुभ . १२० ] [ सिद्धचक्रविधान अथ पाँच सौ बारह गुण अर्घ्य अर्द्ध जोगीरासा लोकत्रय करि पूज्य प्रधाना, केवल ज्योति प्रकाशी । भव्यन मन तम मोह विनाशक, बन्दू शिव-थल वासी।। १।। ॐ ह्रीं अरहताय नम अर्घ्य। सुरनर मुनिमन कुमुदन मोदन, पूरण चन्द्र समाना । हो अहंत जात जन्मोत्सव, बन्दू श्री भगवाना।। २।। ॐ ह्रीं अर्हज्जाताय नम अर्घ्य । केवल-दर्श-ज्ञान किरणावलि, मडित तिहुँ जग चन्दा । मिथ्यातप हर जल आदिक करि, बन्दू पद अरविन्दा।। ३।। ॐ हीं अर्हच्चिद्रूपाय नम अयं । घातिकर्म रिपु जारि छारकर, स्वचतुष्टय पद पायो । निजस्वरूप चिद्रूप गुणातम, हम तिन पद शिर नायो।। ४।। ॐ ह्रीं अहच्चिद्रूपगुणाय नम अयं । ज्ञानावरणी पटल उघारत, केवल-भान उगायो । भव्यन को प्रतिबोध उधारे, बहुरि मुक्ति पद पायो।।५।। ॐ ह्रीं अर्हज्शानाय नम अयं । धर्म-अधर्म तास फल दोनो, देखो जिम कर-रेखा । बतलायो परतीत विषय करि, यह गुण जिनमे देखा।। ६।। ॐ हीं अहंदर्शनाय नम अयं । मोह महा दृढ बध उघारो, कर विषतन्तु समाना । अतुल बली अरहत कहायो, पाय नमू शिवथाना।। ७।। ॐ हीं अर्हवीर्याय नम अy०। युगपति लोकालोक विलोकन, है अनन्त दृगधारी । गुप्त रूप शिवमग दरसायो, तिनपद धोक हमारी।। ८।। ॐ हीं अर्हद्दर्शनगुणाय नम अय। घटपटादि सब परकाशत जद, हो रवि-किरण पसारा । तैसो ज्ञान-भान अरहत को, ज्ञेय अनन्त उघारा।। ९।। ॐ हीं अर्हज्जानगुणाय नम अयं० ।
No text on this page.
१२२ ] [ सिद्धचक्रविधान तास विरोधी कर्म जीति करि, केवल-दरशन पायो । इस गुण सहित नमत तुमपद प्रति, भावसहित शिरनायो।।२०।। ॐ हीं अर्हत्केवलदर्शनाय नम अj०। निर-आवरण करण बिन जाको,शरण हरण नही कोई । केवल-ज्ञान पाय शिव पायो, पूजत हैं हम सोई।।२१।। ॐ ह्रीं अर्हत्केवलज्ञानाय नम अय। अगम अतीर भवोदधि उतरे, सहज ही गोखुर मानो । केवल बल अरहन्त नमे हम, शिव थल बास करानो।।२२।। ॐ ह्रीं अर्हत्केवलवीर्याय नम अर्य। सब विधि अपने विघ्न निवारण, औरन विघ्न विडारी । मगलमय अहंत सर्वदा, नमू मुक्ति पदधारी।।२३।। ॐ हीं अर्हन्मगलाय नम अर्य। चक्षु आदि सब विघन विदूरित, छाइक मगलकारी । यह अहंत दर्श पायो मैं, नमू भये शिवकारी ।।२४।। ॐ हीं अर्हन्मगलदर्शनाय नम अर्य। निजपर सशय आदि पाय बिन, निरावरण विकसानो । मगलमय अरहत ज्ञान है, बन्दू शिव सुख थानो।।२५।। ॐ हीं अर्हन्मगलज्ञानाय नम अर्य। परकृत जरा आदि सकट बिन, अतुल बली अर्हता । नमू सदा शिवनारी के सग, सुखसो केलि करता ।।२६।। ॐहीं अर्हन्मगलवीर्याय नम अर्घ्य। पापरूप एकान्त पक्ष बिन, सर्व तत्व परकाशी । द्वादशाग अरहन्त कहो मैं, नमू भये शिववासी।।२७।। ॐ ह्रीं अर्हन्मगलद्वादशागाय नम अy०। बिन प्रतक्ष अनुमान सुबाधित, सुमतिरूप परिणामा । मगलमय अर्हतमती मैं, नमू देउ शिवधामा।।२८।। ॐ हीं अहन्मगल-अभिनिबोधकाय नम अर्य। नय-विकलप श्रुत-अग पक्ष के, त्यागी हैं भगवन्ता । ज्ञाता दृष्टा वीतराग, विख्यात नमू अरहता।।२९।। ॐ ही अर्हन्मगलश्रुतात्मकजिनाय नम अj०।
. सप्तम पूजा ] [१२३ मगलमय सर्वावधि जाकरि, पावै पद अरहता । वन्दू ज्ञान प्रकाश, नाश भव, शिव थल वास करता ।।३०।। ॐ हीं अर्हन्मगलावधिज्ञानाय नम अयं० । वर्धमान मनपर्यय ज्ञान करि, केवल-भानु उगायो । भव्यनि प्रति शुभ मार्ग बतायो, नमू सिद्ध पद पायो।।३१।। ॐ हीं अर्हन्मगलमन पर्ययज्ञानाय नम अय। ता विन और अज्ञान सकल, जगकारण बध प्रधाना । नमू पाय अरहत मुक्ति पद, मगल केवलज्ञाना।।३२।। ॐ हीं अर्हन्मगलकेवलज्ञानाय नम अयं । निरावरण निरखेद निरन्तर, निराबाधमई राजै । केवलरूप नमू सव अघहर, श्री अरहन्त विराजै ।।३३।। ॐ हीं अर्हन्मगलकेवलस्वरूपाय नम अर्घ्य। चक्षु आदि सब भेद विघन हर, क्षायक दर्शन पाया । श्री अरहन्त नमू शिववासी, इह जग पाप नशाया ।।३४।। ॐ हीं अर्हन्मंगलकेवलदर्शनाय नम अर्घ्य। जग मगल सब विघन रूप है, इक केवल अरहन्ता । मगलमय सब मगलदायक, नमू कियो जग अन्ता।।३५।। ॐ ह्रीं अर्हन्मगलकेवलज्ञानाय नम अर्घ्य। केवलरूप महामगलमय, परम शत्रु छयकारा । सो अरहन्त सिद्ध पद पायो, नम पाय भवपारा ।।३६।। ॐ ह्रीं अर्हन्मगलकेवलरूपाय नम अर्घ्य० । शुद्धातम निजधर्म प्रकाशी, परमानन्द विराजै । मो अरहन्त परम मगलमय, नमू शिवालय राजै ।।३७।। ॐ ह्रीं अर्हन्मगलधर्माय नम अर्घ्य० । सब विभावमय विधन नाशकर, मगल धर्मस्वरूपा । मो अरहन्न भये परमातम, नमू त्रियोग निरूपा।।३८।। ॐ ह्रीं अर्हन्मगलधर्मस्वरूपाय नम अयं । सर्व जगत सम्बन्ध विघन नही, उत्तम मगल सोई । सो अरहन्त भये शिववासी, पूजत शिवसुख होई ।। ३९।। ॐ ह्रीं अर्हन्मगलोत्तमाय नमः अयं । - १२४ ] [ सिद्धचक्रविधान लोकातीत विलोक पूज्य जिन, लोकोत्तम गुणधारी । लोकशिखर सुखरूप विराजै, तिनपद धोक हमारी ।।४०।। ॐ हीं अहल्लोकोत्तमाय नम अर्घ्य । लोकाश्रित गुण सब विभाव है, श्रीजिनपदसो न्यारे । तिनको त्याग भये शिव बन्द, काटो बन्ध हमारे ।। ४१।। ॐ हीं अहल्लोकोत्तमगुणाय नम अर्घ्य० । मिथ्या मतिकर सहित ज्ञान, अज्ञान जगत मे सारो । ता विनाशि अरहन्त कहो, लोकोत्तम पूज हमारो।। ४२।। ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तमज्ञानाय नम अर्घ्य० । क्षायक दरशन है अरहन्ता, और लोक मे नाही । सो अरहन्त भये शिववासी, लोकोत्तम सुखदाई।।४३।। ॐ हीं अहल्लोकोत्तमदर्शनाय नम अर्घ्य० । कर्मबली ने सब जग बाध्यो, ताहि हनो अरहन्ता । यह अरहन्त वीर्य लाकोत्तम, पायो सिद्ध अनन्ता।।४४।। ॐ हीं अहल्लोकोत्तमवीर्याय नम अर्घ्यं । अक्षातीत ज्ञान लोकोत्तम, परमातम पद मूला । यह अरहन्त नमू शिवनायक, पाऊ भवदंधि कूला।।४५।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमाभिनिबोधकाय नम अर्घ्यं० । परमावधि ज्ञान सुखखानी, केवलज्ञान प्रकाशी । यहै अवधि अरहन्त नमू मै, सशय तम को नाशी।।४६।। ॐ ह्रीं अहल्लोकोत्तमावधिज्ञानाय नम अर्घ्यं । जो अरहन्त धरै मनपर्यय, सो केवल के माही । साक्षात् शिवरूप नमो मै, अन्य लोक मे नाही।। ४७।। ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तममन पर्ययज्ञानाय नम अर्घ्य । तीन लोक मे सार सु श्री-अरहन्त स्वयभू ज्ञानी । नमू सदा शिवरूप आप हो, भविजन प्रति सुखदानी।।४८।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमकेवलज्ञानस्वरूपाय नम अर्घ्यं । सर्वोत्तम तिहु लोक प्रकाशित, केवल ज्ञान स्वरूपी । सो अरहन्त नमू शिवनायक, सुखप्रद सार अनूपी।। ४९।। ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तमकेवलज्ञानाय नम अयं ।
सप्तम पूजा ] [१२५ जान तरग अभग वहै, लोकोत्तम धार अरूपी । सो अरहन्त नमू शिवनायक, सुखप्रद सार अनूपी।। ५०।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमकेवलपर्यायाय नम अयं । सहित अमाधारण गुण-पर्यय, केवलज्ञान सरूपी । सो अरहन्त नमू शिवनायक, सुखप्रद सार अनूपी।।५१।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमकेवलद्रव्याय नम अयं । जगजिय सर्व अशुद्ध कहो, इक केवल शुद्ध सरूपी । सो अरहन्त नमू शिवनायक, सुखप्रद सार अनूपी ।। ५२।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमदेवलाय नम अय० । विविध कुरूप सर्व जगवासी, केवल स्वय सरूपी । सो अरहत नमू शिवनायक, सुखप्रद सार अनूपी।। ५३।। ॐ हीं अहल्लोकोत्तमकेवलस्वरूपाय नम अयं । हीनाधिक धिक् धिक् जग प्राणी, धन्य धुवरूपी । सो अरहत नमू शिवनायक, सुखप्रद सार अनूपी ।। ५४।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमध्रुवभावाय नम अर्यं० । दोहा सब, ससारिनके भाव बन्ध हेत वरणाय । मुक्तिरूप अरहत के, अरहत के, भाव भाव नमू सुखदाय ।। ५५।। ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तमभावाय नम अयं । कबहुँ न होय विभावमय, सो थिर भाव जिनेश । मुक्तिरूप प्रणम् सदा, नाशे विधन विशेष ।।५६।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमस्थिरभावाय नम अर्घ्य० । जा सेवत वेवत स्वसुख, सो सर्वोत्तम देव । शिववासी नाशी त्रिजग-फासी नमहूँ एव ।। ५७।। ॐ ह्रीं अर्हच्छरणाय नम अयं० । जिन ध्यायो तिन पाइयो, निश्चै सो सुखरास । शरण स्वरूपी जिन नमू, करै सदा शिववास ।। ५८।। ॐ ह्रीं अर्हच्छरणस्वरूपाय नम अयं ।
१२६ ] [ सिद्धचक्रविधा पद्धडी स्वाभाविक गुण अरहत गाय, जासो पूरण शिवसुख लहाय । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनद पाय ।। ५९।। ॐ हीं अर्हद्गुणशरणाय नम अयं० । बिन केवलज्ञान न मुक्ति होय, पायो है श्री अरहन्न जोय । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत' आनद पाय ।। ६०।। ॐ हीं अर्हज्ज्ञानशरणाय नम अर्घ्य० । प्रत्यक्ष देख सर्वज्ञ देव, भाख्यो हैं शिव-मारग असेव । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनद पाय।।६१।। ॐ ह्रीं अर्हद्दर्शनशरणाय नम अर्घ्यं । ससार विषम बन्धन उछेद, अरहन्त वीर्य पायो अखेद । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय ।। ६२ ।। ॐ हीं अर्हद्वीर्यशरणाय नम अर्घ्यं । सब कुमति विगत मत जिन प्रतीत, हो जिसते शिवसुख दे अभीत । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय ।। ६३।। ॐ हीं अर्हद्वादशागायश्रुतगणशरणाय नम अy० । अनुमानादिक साधित विज्ञान, अरहन्त मती प्रत्यक्ष जान । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत' आनन्द पाय।। ६४।। ॐ हीं अर्हदभिनिबोधकाय शरणाय नम अर्घ्य । जिन भाषित श्रुत सुनि भव्य जीव, पायो शिव अविनाशी सदीव । हम शरण गहीं मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय।। ६५। ॐ हीं अर्हत्श्रुतशरणाय नम अयं । प्रतिपक्षी सब जीते कषाय, पायो अवधी शिवसुख कराय । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय।।६६।। ॐ ह्रीं अर्हदवधिबोधशरणाय नम अयं । मुनि लहैं गहैं परिणाम श्वेत, जिन मनपर्यय शिव वास देत । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत' आनन्द पाय ।। ६७।। ॐ हीं अर्हन्मन पर्ययशरणाय नम अयं० ।
सप्तम पूजा ] [१२७ आवरण रहित प्रत्यक्ष ज्ञान, शिवरूप केवली जिन सुजान । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत' आनन्द पाय।।६८।। ॐ हीं अर्हत्केवलशरणाय नम अर्घ्यं । मुनि केवलज्ञानी जिन अराध, पावै शिव -सुख निश्चय अबाध । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत' आनन्द पाय ।। ६९।। ॐहीं अर्हत्केवलशरणस्वरूपाय नम अर्घ्य । शिव-सुखदायक निज आत्म-ज्ञान, सो केवल पावै जिन महान । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय ।।७०।। ॐ हीं अर्हत्केवलधर्मशरणाय नम अयं । यह केवलगुण आतम स्वभाव, अरहन्तन प्रति शिव-सुख उपाय । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत' आनन्द पाय ।।७१।। ॐ हीं अर्हत्केवलगुणशरणाय नम अy० । ससाररूप सव विघन टार, मगल गुण श्री जिन मुक्तिकार । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय ।।७२।। ॐ ह्रीं अर्हन्मगलगुणशरणाय नम अर्घ्य० । छय उपशम ज्ञानी विघन रूप, ता विन जिन ज्ञानी शिव सरूप । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय।।७३।। ॐ हीं अर्हन्मगलज्ञानशरणाय नम अयं । अरहत दर्श मगल स्वरूप, तासो दरशै शिव-सुख अनूप । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय।।७४।। ॐ हीं अर्हन्मगलदर्शनशरणाय नम अयं । अरहत बोध है मगलीक, शिव-मारग प्रति वरते अलीक । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत' आनन्द पाय ।।७५।। ॐ ह्रीं अर्हन्मगलबोधशरणाय नम अयं । निज ज्ञानानन्द प्रवाह धार, वरते अखण्ड अव्यय अपार । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत' आनन्द पाय ।।७६।। ॐ हीं अर्हन्मगलकेवलशरणाय नम अयं । जा बिन तिहुँ लोक न और मान, भव सिंधु तरण तारण महान । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत आनद पाय।।७७।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमशरणाय नम अयं ।
१२८ ] [ सिद्धचक्रविधान स्वाभाविक भव्यन प्रति दयाल, विच्छेद करण समार जाल । हम शरण गही मन वचन काय, नित नम 'सत' आनद पाय ।।७८।। ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तमशरणाय नम अर्घ्य० । तुम विन समरथ तिहुँ लोकमाहि, भवसिंधु उतारण और नाहि । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमें 'सत' आनन्द पाय ।।७९।। ॐ ह्रीं अहल्लोकोत्तमवीर्यशरणाय नम अर्घ्य बिन परिश्रम तारणतरण होय, लोकोत्तम अद्भुत शक्ति सोय । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनद पाय ।। ८०।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमवीर्यगुणशरणाय नम अj० । अप्रसिद्ध कुनय अल्पज्ञ भास, ताको विनाश शिवमग प्रकाश । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय ।।१।। ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तमद्वादशागशरणाय नम अर्घ्य० । सब कुनय कुपक्ष कुसाध्य नाश, सत्यारथ-मत कारण प्रकाश । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय ।।२।। ॐ हीं अहल्लोकोत्तमाभिनिबोधकाय नम अयं० । मिथ्यात प्रकृति अवधि विनाश, लोकोत्तम अवधीको प्रकाश । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय।।८३।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमावधिशरणाय नम अर्घ्य । मनपर्यय शिव मगल लहाय, लोकोत्तम श्रीगुरु सो कहाय । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनद पाय ।।८४।। ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तममन पर्ययशरणाय नम अर्घ्यं । आवरणतीत प्रत्यक्ष ज्ञान, है सेवनीक जग मे प्रधान । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत' आनद पाय ।।८।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमकेवलज्ञानशरणाय नम अयं । हो बाह्य विभव सुरकृत अनूप, अन्तर लोकोत्तम ज्ञानरूप । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत' आनद पाय।।८६।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमविभूतिप्रधानशरणाय नम अर्घ्य० । रहनत्रय निमित मिलो अबाध, पायो निज आनन्द धर्म साध । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमै 'सत' आनन्द पाय ।।७।। ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तमविभूतिधर्मशरणाय नम अयं ।
सप्तम पूजा ] [१२९ सुख ज्ञान वीर्य दर्शन सुभाव, पायो सब कर प्रकृती अभाव । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं 'सत' आनद पाय ।।८।। ॐ हीं अर्हल्लोकोत्तमअनन्तचतुष्टयशरणाय नम अर्घ्य० । अडिल्ल है । हरी, दर्श ज्ञान सुख बल निजगुण ये चार हैं, आतमीक परधान विशेष अपार इनही सो है पूज्य सिद्ध परमेश्वरा, हम हूँ यह गुण पायें नमन याः करा।।८९।। ॐ हीं अर्हदनन्तगुणचतुष्टयाय नम अयं । क्षयोपशम सम्बाधित ज्ञानकला पूरण ज्ञायक स्वय बुद्धि श्रीजिनवरी । इनही सो है पूज्य सिद्ध परमेश्वरा, हम हूँ यह गुण पायें नमन यातै करा।।९०।। ॐ हीं अर्हनिजज्ञानस्वयभुवे नम अयं । जनमत ही दश अतिशय शासन मे कही, स्वय शक्ति भगवान आप तिन को लही । इनही सो है पूज्य सिद्ध परमेश्वरा, हम हूँ यह गुण पायें नमन यातें करा।।९१।। ॐ हीं अर्हद्दशातिशयस्वयभुवे नम अर्यं। ये दश अतिशय घातिकर्म छयको करे, महा विभव को पाय मोक्ष नारी वरैं । इनही सो है पूज्य सिद्ध परमेश्वरा, हम हूँ यह गुण पायें नमन यातें करा।।९२।। ॐ हीं अर्हद्दशातिशयाय नम अर्घ्यं । केवल विभव उपाय प्रभू जिन पद लहो, चौदह अतिशय देवनकरि सेवन कियो । इनही सो है परमेश्वरा, हम हूँ यह गुण पाये नमन यातै करा।।९३।। ॐ ह्रीं अर्हच्चतुर्दशातिशयाय नम अयं । पूज्य सिद्ध १३० ] [ सिद्धचक्रविधान चतिम अतिशय ज पगण वरण महा मस्ति समाज अनपम श्री गन ने यहा । इनहीं मां है निद परमश्वग, हम हैं यह गण पाय नमन यान वग।।०८11 ॐ हीं अर्हच्चतुम्बिशत-अतिशयविगजमानाय नम अर्घ्य। डालर लाकालोक अणु मम जाना, ज्ञानानत मगण पहिचाना । मी अग्हत मिद-पद पाया भाव नाहन हम शीश नवायां।। ९५। ॐ हीं अर्हज्जानानन्तगुणाय नम अध्यं० । नमग्न मुम्थिर भाव याग युगपत लायालाय निहाग । मो अग्हत निदपट पायो भाव माहत हम शीश नवायो।। ०६।। ॐ हीं अर्हद्ध्यानानन्तध्येयाय नम अयं० । इक इक गुण का भाव अनन्ना, पययन्प मा है अन्हन्ना । मो अग्हत मिदपट पाया भाव महित हम शीश नवायो।। ९७।। ॐ हीं अहंदनतगुणाय नम अयं । उत्तर गुण नव लस चागनी, पण चाग्नि भेद प्रकाशी । मो अग्हत निद्धपद पायो, भाव सहित हम शीश नवायो।। ९८।। ॐ ही अर्हत्तप-अन्तगुणाय नम अध्यं० आतमक्ति जान कार छीनी, तान नाश प्रभताइ लीनी । मो अग्हत मिदुपट पायो, भाव महित हम शीश नवायो।। ९९।। ॐही अर्हत्परमात्मने नम अर्ध्य० । निज गुण निज ही माहि ममाया, गणवाद वग्नन न गया । मो अग्हत मिद्धपद पायो, भाव सहित हम शीश नवायो।।१००।। ॐ हीं अर्हत्स्वरूपगुप्ताय नम अर्घ्य । दोधक जो निज आतम साधु सुखाई, सो जगतेश्वर सिद्ध कहाई । लोक शिरोमणि हैं शिवस्वामी, भाव सहित तुम को प्रणमामी।।१०१।। ॐहीं सिद्धेभ्यो नम अर्घ्य।
सप्तम पूजा ] [ १३१ सर्व विशुद्ध विरूप सरूपी, स्वातम-रूप विशुद्ध अनूपी । लोकशिरोमणि हैं शिवस्वामी, भाव सहित तुम को प्रणमामी।। १०२।। ॐहीं सिद्धस्वरूपेभ्यो नम अयं । पराश्रित सर्व विभाव निवारा, स्वाश्रित सर्व अवाध अपारा । लोकशिरोमणि हैं शिवस्वामी, भाव सहित तुम को प्रणमामी।।१०३।। ॐ ही सिद्धगुणेभ्यो नम अर्घ्य । आकुलता सब ही विधि नाशी, ज्ञायक लोकालोक प्रकाशी । लोकशिरोमणि हैं शिवस्वामी, भाव सहित तुम को प्रणमामी।। १०४।। ॐ ह्रीं सिद्धज्ञानेभ्यो नम अy० । जीव अजीव लखे अविचारा, हो नही अन्तर एक प्रकारा । लोकशिरोमणि हैं शिवस्वामी, भाव सहित तुम को प्रणमामी।।१०।। ॐहीं सिद्धदर्शनभ्यो नम अध्य० । अन्तर बाहिर भेद उघारी, दर्श विशुद्ध सदा सुखकारी । लोकशिरोमणि हैं शिवस्वामी, भाव सहित तुम को प्रणमामी।।१०६।। ॐ हीं सिद्धशुद्धसम्यक्त्वेभ्यो नम अर्घ्य० । एक अणू मल कर्म लजावै, सोय निरजनता नहिं पावै । लोकशिरोमणि हैं शिवस्वामी, भाव सहित तुम को प्रणमामी ।। १०७।। ॐ हीं सिद्धनिरजनेभ्यो नम अय० । अर्द्धरोला चारो गति को भ्रमण नाशकर थिरता पाई । निजस्वरूप मे लीन, अन्य सो मोह नशाई।। १०८।। ॐ हीं सिद्धाचलपदप्राप्ताय नम अय० । रत्नत्रय आराधि साधि, निज शिवपद पायो । सख्या शिवालय वास करायो।।१०९।। ॐ ह्रीं सख्यातीतसिद्धेभ्यो नम अय० । असख्यात एक ताहू सो वीते । विजयी लक्ष्मीनाथ, महावल सब विधि जीते।।११०।। ॐ हीं असख्यातसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य० । भेद उलंघि, मरजाद, - १३२ ] [ सिद्धचक्रविधान काल आदि मर्याद अनादि-सो इह विधि जारी । भए अनन्त दिगम्बर साधु, जे शिवपद धारी।।१११।। ॐ हीं अनन्तसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य० । पुष्करार्द्ध सागर लो, जे जल थान वखानो । देव सहाइ उपाई, ऊर्ध्व-गति गमन करानो।। ११२।। ॐ हीं जलसिद्धेभ्यो नम अर्घ्यं । वन गिरि नगर गुफादि, सर्व थलसो शिव पाई । सिद्धक्षेत्र सब ठौर बखानत, श्री जिनराई।।११३।। ॐ ह्रीं स्थलसिद्धेभ्यो नम अयं । नभ ही मे जिन शुक्लध्यान-बल कर्म नाश किये । आउ पूर्ण वश ततछिन, ही शिववास जाय लिये ।। ११४।। ॐ ह्रीं गगनसिद्धेभ्यो नम अयं । आय स्थिति सम अन्य कर्म-कारण परदेशा । परसैं पूरण लोक, आत्म, केवली जिनेशा।।११५।। ॐ हीं समुद्घात-सिद्धेभ्यो नम अर्घ्यं । केवलि जिन बिन समुद्घात, शिववास लिया है । स्वते स्वभाव समान, अघाती कर्म किया है।।११६।। ॐ हीं असमुद्घातसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य। उल्लाला तिन विशेष अतिशय रहित, सामान्य केवली नाम है । सिद्ध भये तिहुँ योगते, तिनके पद परणाम है।।११७।। ॐ हीं साधारणसिद्धेभ्यो नम अयं । त्रिभुवन मे नही पावतो, जो जिन गुण अभिराम हैं । सिद्ध भये तिहुँ योगरौं, तिनके पद परणाम है।।११८।। ॐ हीं असाधारणसिद्धेभ्यो नम अy० । गर्भ कल्याण आदि युत, तीर्थंकर सुखधाम है । सिद्ध भये तिहुँ योगते, तिनके पद परणाम है।।११९।। ॐ ह्रीं तीर्थंकरसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य।
सप्तम पूजा ] [१३३ तीर्थकर के समय मे, केवली जिन अभिराम है । सिद्ध भये तिहुँ योगरौं, तिमके पद परणाम है।। १२०।। ॐ हीं तीर्थंकर-अन्तरसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य० । पच शतक पच्चीस पुनि, धनुष काय अभिराम है । सिद्ध भये तिहुँ योगरौं, तिनके पद परणाम है।। १२१।। ॐ हीं उत्कृष्टावगाहनसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य । आदि अन्त अन्तर वि, मध्यावगाहन नाम है । सिद्ध भये तिहुँ योगरौं, तिनके पद परणाम है।। १२२।। ॐ हीं मध्यमावगाहनसिद्धेभ्यो नम अy० । तीन अर्ध तन केवली, हस्त प्रमाण कहाय हैं । सिद्ध भये तिहुँ योगरौं, तिनके पद परणाम हैं।। १२३।। ॐ हीं जघन्यावगाहनसिद्धेभ्यो नम अर्घ्यं । देव निमित्त मिलो जहा, त्रिजग केवली धाम है । सिद्ध भये तिहुँ योगते, तिनके पद परणाम है।।१२४।। ॐ हीं त्रिजगलोकसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य। षट्विध परिणति काल की, तिन अपेक्ष यह नाम है । सिद्ध भये तिहुँ योगरौं, तिके पद परणाम है।। १२५।। ॐ ह्रीं षड्विधकालसिद्धेभ्यो नम अयं० अन्त समय उपसर्गत, शुकलध्यान अभिराम है । सिद्ध भये तिहुँ योगते, तिनके पद परणाम है।। १२६।। ॐ हीं उपसर्गसिद्धेभ्यो नम अय० । पर-उपसर्ग मिलै नही, स्वत शुक्ल सुख धाम है । सिद्ध भये तिहुँ योगरौं, तिनके पद परणाम है।। १२७।। ॐ हीं अन्तर निरूपसर्गसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य। अन्तर द्वीप मही जहा, देवन के अभिराम है । सिद्ध भये तिहुँ योगते, तिनके पद परणाम है।। १२८।। ॐ हीं अन्तर द्वीपसिद्धेभ्यो नम अयं । देव गये ले सिंधु जब, कर्म छयो तिंह ठाम है । सिद्ध भये तिहुँ योगरौं, तिनके पद परणाम है।। १२९।। ॐ हीं उदधिसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य० ॥१३०।। २९॥
१३४ ] [ सिद्धचक्रविधान मुद्रा पलौथी लगाये, निजानद साजा, भुजगप्रयात धरें जोग आसन गहे शुद्धताई, न हो खेद ध्यानाग्नि सो कर्म छाई । भये सिद्ध राजा निजानद साजा, यही मोक्ष नाजा नम सिद्ध काजा।।१३०।। ॐ ह्रीं स्वस्थित्यासनसिद्धेभ्यो नम अy० । महा शाति कियो कर्म को नाश ज्ञानी कहाये । भये सिद्ध राजा यही मोक्ष नाजा नम सिद्ध काजा।।१३१।। ॐ ह्रीं पर्यंकासनसिद्धेभ्यो नम अयं० । लहै आदि को सहनन पुरुष देही, लखायो परारभ मे भाव ते ही । भये सिद्ध राजा निजानद साजा, यही मोक्ष नाजा नम सिद्ध काजा।।१३२।। ॐ हीं पुरुषवेदसिद्धेभ्यो नम अयं । खपायो प्रथम सात प्रकृति विमोहा, श्रेणी क्षयो क्षयो कर्ममोहा । भये सिद्ध राजा यही मोक्ष नाजा नम सिद्ध काजा।।१३३॥ ॐ हीं क्षपकश्रेणीसिद्धेभ्यो नम अयं । समय एक मे एक वासौ भनता, धरो आठ ताप यही भेद भेद अन्ता । भये सिद्ध राजा निजानद साजा, यही मोक्ष नाजा नम सिद्ध काजा।।१३४।। ॐ ह्रीं एकसमयसिद्धेभ्यो नम अध्य० । किसी देश मे वा किसी काल माही, गिने दो समय मे तथा अन्तराई । भये सिद्ध राजा निजानद साजा, यही मोक्ष नाजा नम ॐ हीं द्विसमयसिद्धेभ्यो नम अयं । गहो शुद्ध निजानद साजा, सिद्ध काजा।।१३५।।
स-तम पूजा ] [१३५ समय एक दो तीन धाराप्रवाही, कियो कर्म छय अन्तराय होय नाही । भये सिद्ध राजा निजानद साजा, यही मोक्ष नाजा नम सिद्ध काजा।।१३६।। ॐ हीं त्रिसमयसिद्धेभ्यो नम अध्य० । हुवे हो सु होगे सु हो हैं अबारी, त्रिकाल सदा मोक्ष पथा विहारी । भये सिद्ध राजा निजानद साजा, यही मोक्ष नाजा नम सिद्ध काजा।।१३७।। ॐ ही त्रिकाल सिद्धेभ्यो नम अर्घ्य।। तिहूँ लोक के शुद्ध सम्यक्त्व धारी, महा भार सजम धरै है अबारी । भये सिद्ध राजा निजानद साजा, यही मोक्ष नाजा नम सिद्ध काजा।।१३८।। ॐ ह्रीं त्रिलोकसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य० । मरहठा तिहुँ लोक निहारा, सब दुखकारा, पापरूप ससार । ताको परिहारा सुलभ सुखारा, भये सिद्ध अविकार।। हे जगत्रय नायक मगलदायक, मगलमय सुखकार । मैं नमू त्रिकाला हो अघ टाला, तप हर शशि उनहार।।१३९।। ॐ हीं सिद्धमगलेभ्यो नम अय० ।।१३९।। तिहुँ कर्म-कालिमा, लगी जालिमा, करै रूप दुखदाय । तुम ताको नाशो, स्वय प्रकाशो, स्वातम रूप सुभाय ।। हे जगत्रय-नायक मगलदायक, मगलमय सुखकार । नमू त्रिकाला, हो अघ टाला, तप हर शशि उनहार ।। १४०।। ॐ ह्रीं सिद्धमगलस्वरूपेभ्यो नम अर्घ्य० ॥१४०।। तिहुँ जग के प्राणी, सब अज्ञानी, फसे मोह जजाल । हो तिहुँ जगत्राता, पूरण ज्ञाता, तुम ही एक खुशहाल ।। हे जगत्रय०।। ॐहीं सिद्धमगलज्ञानेभ्यो नम अy०।।१४१।। मै १३६ ] [ सिद्धचक्रविधान यह मोह अधेरी, छाई घनेरी, प्रबल पटल रहो छाय । तुम ताहि उघारो, सकल निहारो, युगपत आनददाय ।। हे जगत्रय०।। ॐ हीं सिद्धमगलदनिभ्यो नम अयं० ।।१४२।। निजबधन डोरी, छिन मे तोरी, स्वय शक्ति परकाश । निरभय निरमोही, परम अछोही, अन्तरायविधि नाश।। हे जगत्रय०।। ॐ हीं सिद्धमगलवीर्येभ्यो नम अy० ।।१४३।। जाके प्रसादकर, सकल चराचर, निजतो भिन्न लखाय । रुष-राग निवारा, सुख विस्तारा, आकुलता विनशाय ।। हे जगत्रय०।। ॐ ह्रीं सिद्धमगलसम्यक्त्वेभ्यो नम अयं ।।१४४।। अस्पर्श अमूरति, चिनमय मूरति अरस अलिंग अनूप । मन अक्ष अलक्ष, ज्ञान प्रत्यक्ष, शुभ अवगाह स्वरूप ।। हे जगत्रय०।। ॐ ह्रीं सिद्धमगलावगाहनेभ्यो नम अy० ।।१४५।। अव्यक्त स्वरूप, अमल अनूप, अलख अगम असमान । अवगाह उदर धर, वास परस्पर, भिन्न भिन्न परनाम।। हे जगत्रय०।। ॐ ही सिद्धमगलसूक्ष्मत्वेभ्यो नम अयं० ।।१४६।। अनुभूति विलासी समरस रासी, हीनाधिक विधि नाश । विधि गोत्र नाशकर, पूरण पदधर, असवाध परकाश।। हे जगत्रय०।। ॐ हीं सिद्धमगल-अगुरुलघुभ्यो नम अy० ।।१४७।। पुद्गल कृत सारी, विविधि पकारी, द्वैतभाव अधिकार । सव भाति निवारी, निज सुखकारी, पायो पद अविकार ।। हे जगत्रय०।। ॐ हीं सिद्धमगला-व्याबाधितेभ्यो नम अy० ।।१४८।। अवगाह प्रणामी, ज्ञानारामी, दर्शन-वीर्य अपार । सूक्षम अवकाश अज अविनाश, अगुरुलघू सुखकार ।। हे जगत्रय०।। ॐ हीं सिद्धमगलाष्टगुणेभ्यो नम अर्घ्य० ।।१४९।। शुद्धातम सार, अष्ट प्रकार, शिव स्वरूप अनिवार । निज गुणपरधान, सम्यकज्ञान, आदि अन्त अविकार ।। हे जगत्रय०।। ॐ हीं सिद्धमगल-अष्टरूपेभ्यो नम अर्घ्य० ।।१५०।। मगल अरहन्त, अष्टम भन्त, सिद्ध अष्टगुण भात । ये ही विलनावें, अन्य न पावै, असाधारण परकाश।। हे जगत्रय०।। ॐ हीं मिद्धमगल-अष्टप्रकाशकेभ्यो नम अर्घ्य० ।।१५१।। .
No text on this page.
इनही गुण १३८ ] [ सिद्धचक्रविधान निरभेद अछेद विकामित है, मव लोक अलोक विभामित है । मे मन पागत हे, शिववाम करो शरणागत है ।। १६१।। ॐ हीं सिद्धदर्शनशरणाय नम अर्घ्य० । निरबाध अगाध प्रकाशमई, निग्द्वन्द अवध अभय अजइ । इनही गुण मे मन पागत हे, शिववाम कगे शरणागत है।। १६२।। ॐ हीं सिद्धज्ञानशरणाय नम अर्घ्य० । हितकारण तारण-तरण कहे, अप्रमाद प्रमाद प्रकाशन है । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत है ।।१६३ ।। ॐ ह्रीं सिद्धवीर्यशरणाय नम अर्घ्य० । अविरुद्ध विशुद्ध प्रसिद्ध महा, निज आतम-तत्त्व प्रबोध लहा । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत है।। १६४।। ॐ हीं सिद्धसम्यक्त्वशरणाय नम अर्घ्य । जिनको पूर्वापर अन्त नही, नित धार-प्रवाह बहै अति ही । इनही गुण मै मन पागत है, शिववास करो शरणागत है।।१६५।। ॐ ह्रीं सिद्ध-अनन्तशरणाय नम अर्घ्य० । कबहू नही अन्त समावत है, सु अनन्त-अनन्त कहावत है । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं।। १६६।। ॐ हीं सिद्ध-अन्तानन्तशरणाय नम अर्घ्य० । तिहुँ काल सु सिद्ध महा सुखदा, निजरूप विषै थिर भाव सदा । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत है।। १६७।। ॐ ह्रीं सिद्धत्रिकालशरणाय नम अर्घ्य० । तिहुँ लोक शिरोमणि पूजि महा, तिहुँ लोक प्रकाशक तेज कहा । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं ।१६८।। ॐ ह्रीं सिद्धत्रिलोकशरणाय नम अयं । गिनती परमाण जु लोक धरे, परदेश इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं।। १६९।। ॐ हीं सिद्धासख्यातशरणाय नम अयं। पूर्वापर एकहि रूप लसे, नित लोक सिंहासन वास बसे । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं।। १७०।। ॐ ह्रीं सिद्धघौव्यगुणशरणाय नम अर्घ्यं । समूह प्रकाश करे ।
सप्तम पूजा ] [१३९ जगवास पर्याय विनाश कियो, अब निश्चय रूप विशुद्ध भयो । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं।। १७१।। ॐ हीं सिद्धोत्पादगुणशरणाय नम अर्घ्य। परद्रव्य थकी रुष राग नही, निज भाव बिना कहु लाग नही । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं।। १७२।। ॐ हीं सिद्धसाम्यगुणशरणाय नम अयं० । बिन कर्म-कलक विराजत हैं, अति स्वच्छ महागुण राजत हैं । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं।। १७३।। ॐ ह्रीं सिद्धस्वच्छगुणशरणाय नम अयं । मन इन्द्रिय आदि न व्याधि तहाँ, रुष-राग कलेश प्रवेश न ह्वा । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं।। १७४।। ॐ हीं सिद्धस्वस्थितगुणशरणाय नम अयं । निजरूप विषै नित मगन रहैं, पर योग-वियोग न दाह लहैं । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं।। १७५।। ॐ हीं सिद्धसमाधिगुणशरणाय नम अयं। श्रुतज्ञान तथा मतिज्ञान दऊ, परकाशत हैं यह व्यक्त सऊ । इनही गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं।। १७६।। ॐ ह्रीं सिद्धव्यक्तगुणशरणाय नम अर्घ्य० । परतक्ष अतीन्द्रिय भाव महा, मन इन्द्रिय बोध न गुह्य कहा । इनहीं गुण मे मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं।। १७७।। ॐ ह्रीं सिद्ध-अव्यक्तगुणशरणाय नम अर्ध्य० । मालिनी निजगुणवर स्वामी शुद्धसबोधनामी। परगुण नहिं लेशा एक ही भाव शेषा । मनवचतन लाई पूजहो भक्ति भाई। भवि भवभय चूर शाश्वत सुक्खपूर ।। १७८ ।। ॐ ह्रीं सिद्धगुणस्वरूपाय नम अयं० ।।१७।। सब विधि-मल जारा बन्ध-ससार टारा । जगजिय हितकारी उच्चता पाय सारी।।
भाई। १४० ] [ सिद्धचक्रविधान मनवचतन लाइ पूजहो भक्ति भाई । भवि भवभय चूर शाश्वत मुक्टर ।। १७९।। ॐ हीं सिद्धपरमात्मस्वरूपाय नम अय० ।।१७९।। पर-परत-खण्ड भेटवाधा-विहण्ड । शिवमदन निवामी नित्य स्वानदरामी।। मनवचतन लाइ पूजहो भक्ति भाई । भवि भवभय चूर शाश्वत सुक्खपूर ।। १८०।। ॐ हीं सिद्धासण्डस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।१८०।। चितसुविलमान आकुल भावहान। निज अनुभवमार द्वैतमकल्पटार।। मनवचतन लाइ पूजहो भक्ति भवि भवभय चूर शाश्वत सुक्खपूर ।। १८१।। ॐ हीं सिद्धचिदानन्दस्वरूपाय नम अय० ।।१८१।। परकरणनिवार भाव सभाव धार। निज अनुपम जान मुक्वरूप निधान ।। मनवचतन लाई पूजहो भक्ति भाई। भवि भवभय चूर शाश्वत सुक्खपूर ।। १८२।। ॐ हीं सिद्धसहजानदाय नम अध्य० ।।१८२।। विधिवश सब प्रानी हीन-आधिक्य ठानी। तिसकरण निमूलापाय रूपाधल्ला।। मनवचतन लाई पूजहो भक्ति भाई। भवि भवभय चूर शाश्वत सुक्खपूर ।। १८३।। ॐ हीं सिद्धाच्छेदरूपाय नम अयं ॥१८३।। जव लग परजाया भेद नाना धराया। इक शिवपद माही भेद आभास नाही ।। मनवचतन लाई पूजहो भक्ति भाई। भवि भवभय चूर शाश्वत सुक्खपूर ।। १८४।। ॐ हीं सिद्धाभेदगुणाय नम अय० ।।१८४।। अनुपम गुणधारी लोक सभावटारी। सुरनरमुनि ध्यावै सो नही पार पावै ।।
सप्तम पूजा ] [१४१ मनवचतन लाई पूजहो भक्ति भाई । भवि भवभय चूर शाश्वत सुक्खपूर ।। १८५।। ॐ ह्रीं सिद्धानुपमगुणाय नम अर्घ्यं ।।१८।। जिस अनुभव सरसै धार आनद वरसै। अनुपम रस सोई स्वाद जासो न कोई।। मनवचतन लाई पूजहो भक्ति भाई। भवि भवभय चूर शाश्वत सुक्खपूर ।। १८६।। ॐ हीं सिद्ध-अमृततत्त्वाय नम अय० ।।१८६।। सब श्रुत विस्तारा जास माही उजारा । यह निजपद जानो आत्म सभावमानो।। मनवचतन लाई पूजहो भक्ति भाई। भवि भवभय चूर शाश्वत सुक्खपूर ।। १८७।। ॐ हीं सिद्धश्रुतप्राप्ताय नम. अर्घ्य० ॥१८७॥ दोधक जीव-अजीव सबै प्रतिभासी, केवल जोति लहो तम नाशी । सेद्ध-समूह नमू शिरनाई, पाप कलाप सब खिर जाई ।। १८८।। ॐ हीं सिद्धकेवलप्राप्ताय नम अय० । चेतनरूप प्रदेश विराजै, आकृतिरूप अलिंग सु छाजै । सिद्ध-समूह नमू शिरनाई, पाप कलाप सवै खिर जाई ।। १८९।। ॐ हीं सिद्धसाकारनिराकाराय नम अy० । नाहिं गहैं पर आश्रित जानो, जो अवलम्ब बिना पद मानो । सिद्ध-समूह जजो मन लाई, पाप कलाप सबै खिर जाई।।१९०।। ॐ ह्रीं निरालम्बाय नम अy० । राग-विषाद वसै नहिं जामे, जोग वियोग भोग नहिं तामैं । सिद्ध-समूह जजो मन लाई, पाप कलाप सबै खिर जाई ।।१९१।। ॐहीं सिद्धनिष्कलकाय नम अयं । ज्ञान प्रभाव प्रकाश भयो है, कर्म-समूह विनाश भयो है । सिद्ध-समूह जजो मन लाई, पाप कलाप सबै खिर जाई।। १९२।। ॐ ह्रीं सिद्धतेज सपन्नाय नम अy० ।
. १४२ ] [ सिद्धचक्रविधान आतमलाभ निजाश्रित पाया, द्वेत विभाव समूल नसाया । सिद्ध-समूह जजो मन लाई, पाप कलाप सबै खिर जाई ।। १९३।। ॐ हीं सिद्धात्मसपन्नाय नम अय। मोतियादाम चहूँ गति काय-स्वरूप प्रत्यक्ष, शिवालय वास अनूप अलक्ष । भजो मन आनन्दसो शिवनाथ, धरो चरणावुजको निज माथ । । १९४।। ॐ हीं सिद्धगर्भवासाय नम अर्घ्य० । निजानन्द श्रीयुत् ज्ञान अथाह, सुशोभित तृप्त भयो मुख पाय । भजो मन आनन्दसो शिवनाथ, धरो चरणावुजको निज माथ ।। १९५।। ॐ हीं सिद्धलक्ष्मीसतर्पकाय नम अर्घ्य । सुभाव निजातम अन्तर लीन, विभाव परातम आपद कीन । भजो मन आनन्दसो शिवनाथ, धरो चरणाबुजको निज माथ ।। १९६।। ॐ हीं सिद्धान्तराकाराय नम अयं । जहाँ लग द्वेष प्रवेश न होय, तहाँ लग सार रसायन होय । भजो मन आनन्दसो शिवनाथ, धरो चरणावुजको निज माथ ।। १९७।। ॐ हीं सिद्धसाररसाय नम अर्घ्य० । जिसो निरलेप हुए विषतुव्य, तिसो जग अग्र निराश्रय लुब्य । भजो मन आनदमो शिवनाथ, धरो चरणाबुज को निज माथ । । १९८।। ॐ हीं सिद्धशिखरमण्डनाय नम अर्घ्य० । तिहूँ जग शीश बिराजित नित्य, शिरोमणि सर्व समाज अनित्य । भजो मन आनदसो शिवनाथ, धरो चरणाबुजको निज माथ।। १९९।। ॐ हीं सिद्धत्रिलोकाग्रनिवासिने नम अर्घ्य० । अकाय अरूप अलक्ष अवेद, निजातम लीन सदा अविछेद । भजो मन आनदसो शिवनाथ, धरो चरणाबुज को निज माथ ।।२००।। ॐ हीं सिद्धस्वरूपगुप्तेभ्यो नम अर्घ्यं । . अडिल्ल ऋषभ आदि चितधारि प्रथम दीक्षा धरी, केवलज्ञान उपाय धर्मविधि उच्चरी ।
No text on this page.
साध १४४ ] [ सिद्धचक्रविधान निजस्वरूप थितिकरण हरण विधि चार है, परमारथ आचार्य सिद्ध सुखकार है।।२०७।। ॐ हीं सूरिवीर्यगुणेभ्यो नम अर्घ्य० ।।२०७।। षट्त्रिंशति गुण सूरि मोक्षफल पाइयो, तातें हम इन गुणकर ही जश गाइयो । निजस्वरूप थितिकरण हरण विधि चार है, परमारथ आचार्य सिद्ध सुखकार है।।२०८।। ॐ हीं सूरिट्त्रिंशत्गुणेभ्यो नम अय। पचाचार आचार शिवपद लियो, वास्तव मे ये गुण निज मे परगट कियो । निजस्वरूप थितिकरण हरण विधि चार है, परमारथ आचार्य सिद्ध सुखकार है।।२०९।। ॐ हीं सूरिपचाचारगुणेभ्यो नम अर्घ्य० । गुण समुदाय सरूप द्रव्य आतम महा, परसो भिन्न अभेद निजातम पद लहा । निजस्वरूप थितिकरण हरण विधि चार है, परमारथ आचार्य सिद्ध सुखकार है।।२१०।। ॐ हीं सूरिद्रव्यगुणेभ्यो नम अy० । वीतराग परणति रचही सुखकार जू, परम शुद्ध स्वय सिद्ध भयो अनिवार जू । निज स्वरूप थितिकरण हरण विधि चार है, परमारथ आचार्य सिद्ध सुखकार है।।२११।। ॐ हीं सूरिपर्यायगुणेभ्यो नम अयं० । चचला आप सुक्खरूप हो सु, और सौख्यकार होत, ज्यू घटादिको प्रकाशकार है सुदीप जोत । सूरि धर्म को प्रकाश सिद्ध-धर्म-रूप जान, मैं नमू त्रिकाल एकही अभेद पक्षमान ।।२१२।। ॐ हीं सूरिमगलेभ्यो नम अयं ।
No text on this page.
१४६ ] [ सिद्धचक्रविधान शील आदि पर भेद कर्मके कलाप छेद, आत्म-शक्तिको प्रकाश शुद्ध चेतना विलास। सूरि धर्मको प्रकाश, सिद्ध-धर्म-रूप जान, मैं नमू त्रिकाल एक ही अभेद पक्षमान ।।२१९।। ॐ हीं सूरितपेभ्यो नम अर्घ्य० । लोक चाहकी न दाह, द्वेष को प्रवेश नाह, शुद्ध चेतना प्रवाह, वृद्धता धरै अथाह । सूरि धर्म को प्रकाश, सिद्ध-धर्म-रूप जान, मैं नमू त्रिकाल एक ही अभेद पक्षमान ।। २२०।। ॐ हीं सूरिपरमतपेभ्यो नम अy० । मोह को न जोर जाय घोर, आपदा नसाय, घोरते तपो सु लोक-शीश जाय मुक्ति पाय। सूरि धर्मको प्रकाश, सिद्ध-धर्म-रूप जान, मैं नमू त्रिकाल एक ही अभेद पक्षमान ।।२२१।। ॐ हीं सूरितपोधोरगुणेभ्यो नम अयं । कामिनी मोहन वृद्ध पर वृद्ध गुण गहन नित हो जहाँ, शाश्वत पूर्णता सातिशय सूरि सिद्धात के पारगामी मैं नमू जोर कर मोक्षधामी भये।।२२२।। ॐ हीं सूरिघोरगुणपराक्रमेभ्यो नम अर्घ्य० ।। एक सम-भाव सम और नही ऋद्धि है, सर्वही ऋद्धि जाके भये सिद्ध है। सूरि सिद्धात के पारगामी भये, मैं नमू जोर कर मोक्षधामी भये ।।२२३।। ॐ हीं सूरिऋद्धिऋषिभ्यो नम अर्घ्य० ।। जोगके रोकसे कर्म रोक हो, गुप्त साधन किये साध्य शिवलोक हो । सूरि सिद्धात के पारगामी मैं नमू जोर कर मोक्षधामी भये।।२२४।। ॐ हीं सूरिसुयोगिनेभ्यो नम अय० ।। गुण तहाँ । भा का भा भो. नमू जोर है, सप्तम पूजा [१४७ ध्यान-वल कर्म के नाशके हेतु है, कर्मको नाश शिववास ही देत है । सूरि सिद्धात के पारगामी कर मोक्षधामी भये ।।२२।। ॐ हीं सूरिध्यानेभ्यो नम अय० ।। पचधाचार मे आत्म अधिकार वाहय आधार-आधेय सुविकार है । सूरि सिद्धात के पारगामी भये, मैं नमू जोर कर मोक्षधामी भये ।।२२६।। ॐ हीं सूरिधात्रिभ्यो नम अध्य० ।। सूर सम आप परतेज करतार है, सूर ही मोक्षनिधि पात्र सुखकार सूरि सिद्धात के पारगामी भये, मैं नमू जोर कर मोक्षधामी भये ।।२२७।। ॐ हीं सूरिपात्रेभ्यो नम अर्घ्य० ।। वाहच छत्तीस अन्तर अभेदात्मा, आप थिर रूप हैं सूर परमात्मा । सूरि सिद्धात के मैं नमू जोर कर मोक्षधामी भये ।।२२८।। ॐ हीं सूरिगुणशरणाय नम अर्घ्य० ।। ज्ञान उपयोग मे स्वस्थिता शुद्धता, पूर्ण चारित्रता पूर्ण ही बुद्धता । सूरि सिद्धात के पारगामी भये, मैं नमू जोर कर मोक्षधामी भये ।।२२९।। ॐ हीं सूरिधर्मगुणशरणाय नम अध्य० ।। शरण, दुख हरण, पर आपही शर्ण हैं, आपने कार्य आपही कर्ण हैं । सूरि सिद्धात के पारगामी जोर कर मोक्षधामी भये ।।२३०।। ॐ ह्रीं सूरिशरणाय नम अर्घ्य० ।। पारगामी भये, मे भये, मैं नमू १४८ ] [ सिद्धचक्रविधान दोहा ज्यो कचन बिन कालिमा, उज्ज्वल रूप सुहाय । त्योही कर्म-कलक बिन, निज स्वरूप दरसाय ।।२३१।। ॐ हीं सूरिस्वरूपशरणाय नम अर्घ्य० । भेदाभेद सु नय थकी, एक ही धर्म विचार । पायो सूरि सुबोध कर, भवदधि करि उद्धार ।। २३२।। ॐ हीं सूरिधर्मस्वरूपशरणाय नम अर्घ्य । अन्य समस्त विकल्प तजि, केवल निजपद लीन । पूरण-ज्ञान स्वरूप यह, पायो सूरि सुधीन ।।२३३।। ॐ हीं सूरिज्ञानस्वरूपाय नम अय० । सुखाभास इन्द्रीजनित, त्यागी सूरि महन्त । पूरण-सुख स्वाधीन निज, साध्य भये सुखवन्त ।।२३४।। ॐ हीं सूरिसुखस्वरूपाय नम अय० । अनेकात तत्वार्थ के, ज्ञाता सूरि महान । निरावर्ण निजरूप लखि, पायो पद निरवाण।।२३५।। ॐ ह्रीं सूरिदर्शनस्वरूपाय नम अय० । मोहादिक रिपु नाशिके, सूर्य महा सामर्थ । शिव भामिन भरतार नित, रमै साध निज अर्थ ।।२३६।। ॐ हीं सूरिवीर्यस्वरूपाय नम अर्घ्यं । पद्धडी जिन निज-आतम निष्पाप कीन, ते सन्त करें पर पाप छीन । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण सही आनद पूर।।२३७।। ॐ हीं सूरिमगलशरणाय नम अy० । रत्नत्रय जीव सुभावभाय, भवि पतित उधारण हो सहाय । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर।।२३८।। ॐ हीं सूरिधर्मशरणाय नम अर्घ्यं । तपकर ज्यो कचन अग्नि जोग, वै शुद्ध निजातम पद मनोग । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर ।।२३९।। ॐ ह्रीं सूरितपशरणाय नम अर्घ्य० । .
सप्तम पूजा ] [ १४९ एकाग्र-चित्त चिन्ता निरोध, पावै अबाध शिव आत्मबोध । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर।।२४०।। ॐ हीं सूरिध्यानशरणाय नम अय० । केवलज्ञानादि विभूति पाइ, ह्दै शुद्ध निरजन पद सुखाइ । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर।।२४१।। ॐ हीं सूरिसिद्धशरणाय नमः अध्य० । तिहुँ लोकनाथ तिहुँ लोक माहि, या सम दूजो सुखदाय नाहिं । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर ।।२४२।। ॐ हीं सूरित्रिलोकशरणाय नम अय० । आगत अतीत अरु वर्तमान, तिहुँ काल भव्य पार्दै निर्वाण । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर।।२४३।। ॐ हीं सूरित्रिकालशरणाय नम अर्य० । मधि अधो उर्द्ध तिहं जगतमाहि, सब जीवन सुखकर और नाहिं । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर।।२४४।। ॐ हीं सूरित्रिजगन्मगलाय नम अय० । तिहुँ लोकमाहि मुखकार आप, सत्यारथ मगल हरण पाप । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर ।। २४५।। ॐ हीं सूरित्रिलोकमगलशरणाय नम अर्घ्य । उत्तम मगल परमार्थ रूप, जग दुख नासे शिव-सुख-स्वरूप । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर।। २४६।। *ही सूरित्रिजगन्मगलोत्तमशरणाय नम अय० । शरणागत दुखनाशन महान, तिहुँ जग हितकारण सुख निधान । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर।।२४७।। ॐ हीं सूरित्रिजगन्मगलशरणाय नम अयं । तिहुँ लोकनाथ तिहुँ लोक पूज्य, शरणागत प्रतिपालन अदूज्य । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर।।२४८।। ॐ हीं सूरित्रिलोकमण्डनशरणाय नम अर्घ्यं । अव्यय अपूर्व सामर्थ युक्त, ससारातीत विमोहमुक्त । शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनद पूर।।२४९।। ॐ हीं सूरिऋद्धिमण्डल शरणाय नम अय० ।
१५० ] [ सिद्धचक्रविधान त्रोटक निज रूप अनूप लखे सुख हो, जग मे यह मत्र महान कहो । धरि भक्ति हिये गणराज सदा, प्रणम् शिववास करै सुखदा ।।२५०।। ॐ हीं सूरिमत्रस्वरूपाय नम अयं । जिम नागदेव वश मत्र विधि, भव वास हरण तुम नाम निधि ।। धरि०।। ॐ हीं सूरिमत्रगुणाय नम अर्घ्य० ।।२५१।। जगमोहित जीव न पावत है, यह मत्र सु धर्म कहावत है।। धरि०।। ॐ हीं सूरिधर्माय नम अर्घ्य० ।।२५२।। चिदरूप चिदातम भाव धरे, गुण सार यही अविरुद्ध करे।। धरि०।। ॐ हीं सूरिचैतन्यस्वरूपाय नम अर्घ्य।।२५३।। अविकार चिदातम आनन्द हो, परमातम हो परमानद हो।। धरि०।। ॐ हीं सूरिचिदानदाय नम अयं।।२५४।। निज ज्ञान प्रमाण प्रकाश करै, सुख रूप निराकुलता सु धरै ।। धरि०।। ॐ हीं सूरिज्ञानानन्दाय नम अर्घ्य० ।।२५५।। धरि योग महा शम भाव गहै, सुख राशि महा शिववास लहैं।। धरि०।। ॐ हीं सूरिशमभावाय नम अर्घ्यं० ।।२५६।। सम भाव महा गुण धारत है, निज आनद भाव निहारत है।। धरि०।। ॐ हीं सूरितपोगुणानन्दाय नम अय० ॥२५७।। शिवसाधन को विधिनाश कहा, विधिनाशन को तप कर्ण महा । धरि भक्ति हिये गणराज सदा, प्रणम् शिववास करै सुखदा।। ॐ हीं सूरितपोगुणस्वरूपाय नम अयं० ।। २५८।। निज आत्म विर्षे नित मगन रहैं, जग के सुख मूल न भूलि चहैं । । धरि०।। ॐ हीं सूरिहसाय नम अर्घ्य० ।।२५९।। वनवास उदास सदा जगतै, पर आस न खास विलास रत।। धरि०।। ॐ ह्रीं सूरिहसगुणाय नम अयं० ।।२६०।। निज नाम महागुण मत्र धरै, छिन मात्र जपे भवि आश वरै।। धरि०।। ॐ हीं सूरिमत्रगुणानन्दाय नम अय॑ ।।२६१।। परमोत्तम सिध परियाय कही, अति शुद्ध प्रसिद्ध सुखात्म मही।। धरि०।। ॐ हीं सूरिसिद्धानन्दाय नम अयं० ।।२६२।।
सप्तम पूजा ] [१५१ माला मूरि निजभेद क्यिो परसे. भये मुक्त म नमू शीश नित जोर युगल करसे।। टेक ।। शशि मन्ताप क्लाप निवारण ज्ञान कला सरसै । मिथ्यातम हरि भवि आनद करि अनुभव भाव दरसै ।। ॐ हीं सूरि-अमृतचन्द्राय नम अर्घ्य० ।।२६३।। पूरणचन्द्र मस्प कलाधर ज्ञान-सुधा वरसै । भवि चकोर चित चाहत नित मनु चरण जोति परसै ।। सूरि०।। ॐ हीं सूरिसुधाचन्द्रस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।२६४।। जर्गाजय ताप निवारण कारण विलने अन्तर सै । देव मुधा मम गुण निवाहकर, मकल चराचर से।। सूरि०।। ॐ हीं सूरिसुधागुणाय नम अर्घ्य० ॥२६५।। जा धुनि मुनि मशय विनमे जिम ताप मेघ वरसै । मनहु कमल मकरद वृन्द अलि पाय सुधामर सै।। सूरि०।। ॐ हीं सूरिसुधाध्वनये नम अर्घ्य० ।।२६६।। अजर अमर मुसदाय भाय मन ज्यो मयूर हरमै, गाजत घन वाजत ध्वनि मुनि मनु भाजत भय' उरसै । सरि निज भेद कियो परस, मैं नमू शीश नित जोर युगल करसैं ।।। ॐ हीं सूरि-अमृतध्वनिसुरूपाय नम अर्ध्य० ।।२६७।। भये मुक्ति चकोर जो अपने गुण वा पयाय, वरै निज धर्म न होत विनास । द्रव्य कहावत है स अनन्त,स्वभाव धरे निज आत्म विलास।। मूरि कहाय सु कर्म खिपाइ, निजातम पाय गये शिवधाम । सु आतमराम सदा अभिराम,भये सुख काम नमू वसु जाम।। ॐ हीं सूरिद्रव्याय नम अयं० ।।२६८।। ज्यो शशि जोति रहै सियरा नित, ज्यो रवि जोति रहै नित ताप । त्यो निज ज्ञानकला परपूरण, राजत हो निज करण सु आप।। सूरि०।। ॐ हीं सूरिगुणद्रव्याय नम अर्घ्य० ।।२६९।।
- १५२ ] [ सिद्धचक्रविधान हो अविनाश अनूपमरूप सु, ज्ञानमई नित केलि करान । पै न तजै मरजाद रहै, जिम सिन्धु कलोल सदा परिमाण ।। सूरि०।। ॐ हीं सूरिपर्यायाय नम अy० ।।२७०।। जे क्छु द्रव्य तनो गुण है, सु समस्त मिलै गुण आतम माही । ताकरि द्रव्य सरूप कहावत, है अविनाश नमैं हम ताई।। सूरि०।। ॐ हीं सूरिद्रव्यस्वरूपाय नम अय० ।।२७१।। जा गुण मे गुण और न हो, निज द्रव्य रहै नित और न ठौर । सो गुण रूप सदा निवसैं, हम पूजत हैं करके कर जोर।। सूरि कहायसु कर्म खिपाइ, निजातम पाय गये शिवधाम । सु आतमराम सदा अभिराम, भये सुखकाम नमू वसु जाम ।। ॐ हीं सूरिगुणस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।२७२।। जो परिणाम धरै तिनसो, तिनमे करहै वरतै तिस रूप । सो पर्याय उपाय बिना नित, आप विराजत हैं सु अनूप ।। सूरि०।। ॐ हीं सूरिपर्यायस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।२७३।। हो नित ही परिणाम समय प्रति, सो उत्पाद कहो भगवान ।। सो तुम भाव प्रकाश कियो, निज यह गुण का उत्पाद महान ।। सूरि०।। ॐ हीं सूरिगुणोत्पादाय नम अय० ।।२७४।। ज्यो मृतिका निज रूप न छाडत, है घटमांहि अनेक प्रकार । सो तुम जीव स्वभाव धरो नित, मुक्त भए जगवास निवार । । सूरि०।। ॐ ह्रीं सूरिध्रुवगुणोत्पादाय नम अयं० ।।२७५।। ये जग मे सव भाव विभाव, पराश्रित रूप अनेक प्रकार।। ते सव त्याग भये शिवरूप, अवध अमन्द महा सुखकार ।। सूरि०।। ॐ ह्रीं सूरिव्ययगुणोत्पादाय नम अयं० ।।२७६।। जे जगमे पट-द्रव्य कहे, तिनमे इक जीव सुज्ञान स्वरूप।। और सभी विन-ज्ञान कहे, तुम राजत हो नित ज्ञान अनूप ।। सूरि०।। ॐ हीं सूरिजीवतत्त्वाय नम अर्घ्य० ।।२७७।। ज्ञान सुभाव धरो नित ही, नहिं छाडत हो कवहूँ निज वान । ये ही विशेष भयो सवसो, नही औरन मे गुण ये परधान ।।
सप्तम पूजा [ १५३ नगि चहाप न ग लिपा:. निजातम पाय गये शिवधाम, न जनमगा नया अभिगम, भये मरा वाम नम वनु जाम ।। *ही सरिजीयतत्त्वगुणाय नम अयं ।।२७८।। से पनादि अनेर मुभाव निजानम में परमै अनिवार । में पर न लगाव नही, निजही निजकम रहो मलकार ।। मरि०।। ही समिनिसस्यभावधारवाय नम अयं ।।२७९।। दव्य तथापि, विभाव वा धि, कम प्रवाह वह विन आदि । ते नव एक भये पिकप निजातम शद नुभाव प्रनाद ।। मूरि०।। ॐ हीं सरि-आप्रयविनाशाय नम अर्घ्य० ।।२८०।। मोदक वध दस विधिये दर गाण. नाश क्यिो भवपार उतारण । नार भये निज ज्ञान क्लावर. निट भये प्रणम् मै मनधर ।। ॐहीं सरिवधतत्त्वविनाशाय नम अयं० ।।२८१।। नपरतत्व महा मुख देत है। आव रोकनको यह हेत है।।सूरि० ।। ही सरिसवरतत्त्वसहिताय नम अय० ॥२८२।। ज्य मणि दीप अबोल अनपही। मवर तत्व निराकुलरूप ही।। मृरि०।। ही मुरिसयरतत्त्वस्यम्पाय नम अमे० ।।२८३।। नवग्वं गुण ने मुनि पावत, जो मुनि शुद्ध मुभाव मु ध्यावत ।। सरि०।। ही सूरिसवरगुणाय नमः अध्यं० ।।२८४।। नवर धमतनी शिव पावहिं । मवर धरम तहां दरशावहिं । । सूरि०।। ॐ हीं सूरिसवरधर्माय नम अय० ।।२८५।। दोहा एक देश वा सर्व विधि, दोनों मुक्ति म्वरूप । नम् निरजरा तत्व मो, पायो सिद्ध अनूप ।। ॐ हीं सूरिनिर्जरातत्याय नम अर्ध्य० ।।२८६।। शुद्ध मुभाव जहाँ तहाँ, कहो कर्मको नाश । एम निरजग तत्त्वका, रूप कियो परकाश ।। ॐ हीं सूरिनिर्जगतत्त्वस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।२८७।।
. १५४ ] [ सिद्धचक्रविध कोटि जन्मके विघन सब, सूखे तृण सम जान । दहे निर्जरा अग्निसो, इह गुण है परधान ।। ॐ ह्रीं सूरिनिर्जरागुणस्वरूपाय नम अयं० ।।२८८।। निज बल कर्म खपाइये, कहो निर्जरा धर्म । धर्मी सोई आत्मा, एक हि रूप सुपर्म ।। ॐ ह्रीं सूरिनिर्जराधर्मस्वरूपाय नम अय० ।।२८९।। समय समय गुणश्रेणि का, खिरै कर्म बल ध्यान । ये सम्बन्ध निवार करि, करै मुक्ति सुख पान । ॐ ह्रीं सूरिनिर्जरानुबधाय नम अर्घ्य० ।।२९०।। अतुल शक्ति थिर भावकी, सो प्रगटी तुम माहि । यही निर्जरा रूप है, नमू भक्ति कर ताहि।। ॐ हीं सूरिनिर्जरास्वरूपाय नम अर्ध्य।।२९१।। सर्व कर्म के नाश बिन, लहै न शिव-सुखरास । निश्चय तुम ही निर्जरा, कियो प्रतीत प्रकाश।। ॐ हीं सूरिनिर्जराप्रतीताय नम अर्घ्य।।२९२।। सकल कर्ममल नाशते, शुद्ध निरजन रूप । ज्यो कचन बिन कालिमा, राजै मोक्ष अनूप।। ॐ हीं सूरिमोक्षाय नम अर्घ्य० ॥२९३।। द्रव्य-भाव दोनो सु विधि, करै जगत मे वास । द्वैविध बन्ध उखारिकै, भये मुक्त सुखरास।। ॐ हीं सूरिबन्धमोक्षाय नम अयं० ।।२९४।। पर विकलप सुख दुख नही, अनुभव निज आनन्द । जन्म-मरण विधि नाशकर, राजत शिवसुख कद ।। ॐ हीं सूरिमोक्षस्वरूपाय नम अयं० ।।२९५।। जहाँ न दुखको लेश है, उदय कर्म अनुसार । सो शिवपद पायो महा, नमू भक्ति उर धार ।। ॐ हीं सूरिमोक्षगुणाय नम अय० ॥२९६।। जो शिव सुगुण प्रसिद्ध है, तिनसो नित्त प्रबन्ध । जे जगवास विलास दुख, तिनकू नमू अबन्ध ।। ॐ हीं सूरिमोक्षानुबधाय नम अयं० । अयं० ।।२९७।। .
सप्तम पूजा ] [१५५ जैसी निज तन आकृती, तज कीनो शिववास । ते तेसैं नित अचल हैं, ज्ञानानन्द प्रकाश ।। ॐ हीं सूरिमोक्षानुप्रकाशाय नम अयं० ।।२९८।। क्षयोपशम परिणाम कर, साधन निजका रूप । वा निजपद मे लीनता, ये ही गुप्त-स्वरूप।। ॐ हीं सूरिस्वरूपगुप्तये नम अy० ।।२९९।। इन्द्रियजनित न दुख जहाँ, सदा निजानन्दरूप । निर-आकुल स्वाधीनता, वरतै शुद्ध स्वरूप ।। ॐ हीं सूरिपरमात्म-स्वरूपाय नम अयं० ।।१०।। रोला सपूरण श्रुत-सार निजातम बोध लहानो, निजअनुभव शिवमूल मानु उपदेश करानो । शिष्यन के अज्ञान हरै ज्यू रवि अंधियारा, पाठक गुण सभवै सिद्ध प्रति नमन हमारा।। ॐ ह्रीं पाठकेभ्यो नम अर्घ्य० ।।३०१।। मुक्ति मूल है आत्मज्ञान सोई श्रुत ज्ञानी । तत्व-ज्ञान सो लहै निजातम पद सुखदानी।। शिष्यन०।। ॐ ह्रीं पाठकमोक्षमण्डनाय नम अर्घ्य० ।।३०२।। भवसागर ते भव्य जीव तारण अनिवारा । तुम मे यह गुण अधिक आप पायो तिस पारा।। शिष्यन० ।। ॐ हीं पाठकगुणेभ्यो नम अy० ।।३०३।। दर्शन ज्ञान स्वभाव स्वभाव धरो तद्रूप अनूपी । हीनाधिक बिन अचल विराजत शुद्ध सरूपी।। शिष्यन०।। ॐ हीं पाठकगुणस्वरूपेभ्यो नम अy० ।।३०४।। निज गुण वा परयाय अखण्डित नित्य धरै है। तिहुँ काल प्रति अन्य भाव नही ग्रहण करै है।। शिष्यन०।। ॐ ह्रीं पाठकद्रव्याय नम अध्य० ॥३०५।। सहभावी गुण सार जहा परभाव न लेसा । अगुरुलघू परणाम वस्तु सद्भाव विशेषा।। शिष्यन०।। ॐ हीं पाठकगुणपर्यायेभ्यो नम अर्ध्य० ।।३०६।।
१५६ ] [ सिद्धचक्रविधान गुण समुदायी द्रव्य याहिते निरगुण नाही । सो अनन्त गुण सदा विराजत तुम पद माही।। शिष्यन०।। ॐ हीं पाठकगुणद्रव्याय नम अर्घ्य० ।।३०७।। सत सरूप सब द्रव्य सधै नीके अवाधकर । सो तुम सत्य सरूप विराजो द्रव्य भाव धर।। शिष्यन०।। ॐ ह्रीं पाठकद्रव्यस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।३०८।। जे जे है परनाम बिना परनामी नाही । परनामी परनाम एक ही है तुम माही।। शिष्यन के अज्ञान हरै ज्यू रवि अंधियारा । पाठक गुण सभवै सिद्ध प्रति नमन हमारा।। ॐ ह्रीं पाठकद्रव्यपर्यायाय नम अयं ।।३०९।। अगुरुलघू पर्याय शुद्ध परनाम बखानी । निज सरूप मे अन्तरगत श्रुतज्ञान प्रमानी।। शिष्यन०।। ॐ हीं पाठकपर्यायस्वरूपाय नम अy० ।।३१०।। जगतवास सब पापमूल पापमूल जियको दुखदाई । ताको नाशन हेतु कहो शिव मूल उपाई।। शिष्यन०।। ॐ हीं पाठकमगलाय नम अy० ।।३११।। जहा न दुखको लेश सर्वथा सुख ही जानो । सोई मगल गुण तुम मे प्रत्यक्ष लखानो।। शिष्यन०।। ॐ हीं पाठकमगलगुणाय नम अy० ।।३१२।। औरन मगलकरन मगलमय राजै । दर्शन कर सुखसार मिलै सब ही अघ भाजै।। शिष्यन०।। ॐ हीं पाठकमगलगुणस्वरूपाय नम अयं० ।।३१३।। आदि अनत अविरुद्ध शुद्ध मगलमय मूरति । निज सरूप मे बसै सदा परभाव विदूरित ।। शिष्यन०।। ॐ हीं पाठकद्रव्यमगलाय नम अर्घ्य० ।।३१४।। जितनी परणति धरौ सबहि मगलमय रूपी । अन्य अवस्थित टार धार तद्रूप अनूपी।। शिष्यन०।। ॐ हीं पाठकमगलपर्यायाय नम अर्घ्य० ।।३१५।। आप सप्तम पूजा ] [ १५७ निश्चय वा विवहार सर्वथा मगलकारी । जग जीवन के विधन विनाशन सर्व प्रकारी।। शिष्यन।। ॐ हीं पाऊकद्रव्यपर्यायमगलाय नम अर्घ्य० ।।३१६।। भेदाभेद সনা वस्तु सर्वस्व वखानो । वचन अगोचर कहो तथा निर्दोष कहानो।। शिष्यन०।। ॐ हीं पाठकद्रव्यगुणपर्यायमगलाय नम अर्घ्य० ।।३१७।। मव विशेप प्रतिभासमान मगलमय भासे । निर्विकल्प आनन्दरूप अनुभूति प्रकाशे।। शिष्यन०।। ॐ हीं पाठकस्वरुपमगलाय नम अर्घ्य० ।।३१८।। पायत्ता निर्विघ्न निराश्रय होई, लोकोत्तम मगल सोई । तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया।। ॐ हीं पाठकमगलोत्तमाय नम अर्घ्य० ।।३१९।। जगजीवनको हम देखा, तुम ही गुण सार विशेखा।। तुम गुण०।। ॐ ह्रीं पाठकगुणलोकोत्तमाय नम अर्घ्य० ।।३२०।। पद्रव्य चित जग सारा, तुम उत्तम रूप निहारा।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकद्रव्यलोकोत्तमाय नम अयं० ।।३२१।। निज ज्ञान शुद्धता पाइ, जिम करि यह है प्रभुताई।। तुम गुण०।। ॐ ह्रीं पाठकज्ञानाय नम अर्घ्य० ।।३२२।। जग जीव अपूरण ज्ञानी, तुम ही लोकोत्तम मानी।। तुम गुण०।। ॐहीं पाठकज्ञानलोकोत्तमाय नम अर्घ्य० ।।३२३।। युगपत निरभेद निहारा, तुम दशन भेद उघारा।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकदर्शनाय नम अयं ।।३२४।। हम सोवत है नित मोही, निरमोही, लखे तुमको ही।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकदर्शनलोकोत्तमाय नम अy० ।।३२५।। दृगवत महासुखकारा, तुम ज्ञान महा अविकारा।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकदर्शनस्वरूपाय नम अयं० ।।३२६।। निरशस अनन्त अबाधा, निज बोधन भाव अराधा । । तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकसम्यक्त्वाय नम अयं० ।।३२७।।
१५८ ] [ सिद्धचक्रविधान सम्यक्त्व महासुखकारी, निज गुण स्वरूप अविकारी । तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया।। ॐ हीं पाठकसम्यक्त्वगुणस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।३२८।। निरखेद अछेद अभेदा, सुख रूप वीर्य निर्वेदा।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकवीर्याय नम अर्घ्य० ।।३२९।। निज भोग कलेश न लेशा, यह वीर्य अनन्त प्रदेशा।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकवीर्यगुणाय नम अर्घ्य० ।।३३०।। परनाम सुथिर निज माही, उपजै न कलेम कदाही ।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकवीर्यपर्याय नम अर्घ्य० ।।३३१।। द्रव्य भाव लहो तुम जैसो, पावै जगजन नाह ऐसो।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकवीर्यद्रव्याय नम अर्घ्य० ।।३३२।। निज ज्ञान सुधारस पीवत, आनद सुभाव सु जीवत।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकवीर्यगुणपर्याय नम अर्घ्य० ।।३३३।। अविशेष अनन्त सभावा, तुम दशन माहि लखावा ।।तुम गुण० ।। ॐ ह्रीं पाठकदर्शनपर्यायाय नम अर्घ्य० ।।३३४।। इकवार लखे सवही को, तद्रूप निजातम ही को।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकदर्शनपर्यायस्वरूपाय नम अयं० ।।३३५।। सपरस आदिक गण नाही चिद्रूप निजातम ही को ।।तुम गुण० ।। ॐ हीं पाठकज्ञानद्रव्याय नम अर्घ्य० ।।३३६।। शरणागति दीनदयाला, हम पूजत भाव विशाला ।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकशरणाय नम अर्ध्य० ॥३३७।। जिनशरण गही शिव पायो, हम शरण महा गुणगायो।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकगुणशरणाय नम अj० ।।३३८।। अनुभव निज वोध करावे, यह ज्ञान शरण कहलावै । तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया।। ॐ हीं पाठकज्ञानगुणशरणाय नम अर्घ्य० ।।३३९।। दृग मात्र तथा सरधाना, निश्चय शिववास कराना।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकदर्शनशरणाय नम अy० ।।३४०।।
सप्तम पूजा ] [१५९ निरभेद म्वरूप अनुपा, है शरण तनी शिव भूपा ।। तुम गुण०।। ॐहीं पाठकदर्शनस्यरूपशरणाय नम अर्घ्य० ।।३४१।। निजआत्म-स्वम्प लगाया, इह कारण शिवपद पाया।। तुम गुण०।। *हीं पाठकसम्यक्त्वशरणाय नम. अर्ध्य० ॥३४२।। आतम-म्वम्प मरधाना, तुम शरण गहो भगवाना।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकसम्यक्त्वस्वरूपाय नमः अय।।३४३।। निज आतम माधन माही, पुरुपारथ छूटे नाही।। तुम गुण०।। ॐही पाठकवीर्यशरणाय नम अय० ।।३४४।। आतम शक्ती प्रगटाव, तब निज म्वरूप जिय पावै ।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकवीर्यस्यम्पशरणाय नम अर्घ्य० ।।३४५।। परमातम वीयं महा है पर निमित न लेश तहाँ है।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकवीर्यपरमात्मशरणाय नम अर्घ्य० ।।३४६।। श्रुतद्वादशाग जिनवानी, निश्चय शिववास करानी।। तुम गुण० ।। ॐ हीं पाठकद्वादशागशरणाय नम: अर्घ्य० ।।३४७।। दश पूर्व महा जिनवाणी, निश्चय अघहर सुखदानी ।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकदशपूर्वांगाय नम अर्घ्य० ।।३४८।। दश चार पूर्व जिनवानी, निश्चय शिववाम करानी ।। तुम गुण०।। ॐ हीं पाठकचतुर्दशपूर्वागाय नम अर्घ्य० ।।३४९।। निज आत्म चण प्रकटावे, आचार अग कहलावै ।। तुम गुण०।। ॐही पाठकाचारागाय नम अर्घ्य० ।।३५०।। । रेखता विविध शकादि तुम टारी, निरन्तर ज्ञान आचारी । पूर्ण श्रुतज्ञान फल पाया, नमू सत्यार्थ उवझाया।। ॐ हीं पाठकज्ञानाचाराय नम अय० ।।३५१।। पराश्रित भाव विनशाया, सुथिर निजरूप दर्शाया ।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकतपसाचाराय नम अय० ।।३५२।। मुक्तपद दैन अनिवारी, सर्व बुध चर्ण आचारी।। पूर्ण०।। ॐहीं पाठकरत्नत्रयाय नम अर्घ्य० ।।३५३।।
. १६० ] [ सिद्धचक्रविधान शुद्ध रत्नत्रय धारी, निजातमरूप अविकारी ।। पूण०।। ॐ हीं पाठकरत्नत्रयसहायाय नम अर्घ्य० ।।३५४।। धौव्य पचम-गती पाई, जन्म पुनि मर्ण छुटकाई ।। पूण०।। ॐ हीं पाठकधुव-अससाराय नम अर्घ्य० ।।३५५।। अनूपम रूप अधिकाइ, असाधारण स्वपद पाइ ।। पूण०।। ॐ हीं पाठक-एकत्वस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।३५६।। आन तुम सम न गुण होइ, कहो एकत्व गुण सोई ।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठक-एकत्वगुणाय नम अर्घ्य० ।।३५७।। निजानन्द पूर्ण पद पाया, सोइ परमात्म कहलाया।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठक-एकत्वपरमात्मने नम अर्घ्य० ।।३५८।। उच्चगत मोक्षका दाता, एक निजधर्म विख्याता ।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठक-एकत्वधर्माय नम अर्घ्य० ।।३५९।। जु तुम चेतनता परकासी, न पावै ऐसी जगवामी ।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठक-एकत्वचेतनाय नम अर्घ्यं ।।३६०।। ज्ञान दर्शन स्वरूपी हो, असाधारण अनूपी हो । पूर्ण श्रुतज्ञान फल पाया, नमू सत्यार्थ उवझाया।। ॐ हीं पाठक-एकत्वचेतनस्वरूपाय नम अy० ।।३६१।। गहौं नित निज चतुष्टयको, मिलै कबहूँ नही परसो।। पूर्ण०।। पूर्ण श्रुतज्ञान फल पाया, नमू सत्यार्थ उवझाया।। ॐ हीं पाठक-एकत्वद्रव्याय नम अर्घ्य० ।।३६२।। स्वपद अनुभूत सुख रासी, चिदानन्द भाव परकासी ।। पूण०।। ॐ हीं पाठकचिदानन्दाय नम अy० ।।३६३।। अन्त पुरुषार्थ साधक हो, जन्म मरणादि वाधक हो ।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकसिद्धसाधकाय नम अर्घ्य० ।।३६४।। स्वातम ज्ञान दरशाया, ये पूरण ऋद्धि पद पाया।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकऋद्धिपूर्णाय नम अर्घ्य० ।।३६५।। सकल विधि मूरछात्यागी, तुम्ही निरग्रथ वडभागी।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकनिम्रन्थाय नम अर्घ्य० ।।३६६।। ।
सप्तम पूजा ] । १६१ निजाधित असं जानाही अवाधिन अब तम माही ।। पूर्ण०।। *हीं पाठकाविधानाय नम अर्घ्य० ।।३६७।। न फिर नमार पद पाया, अपरब बन्ध विनमाया ।। पण०।। * ही पाठक्ससाराननुवन्धाय नम अर्ध्य० ।।३६८।। आप कल्याणमय गजो नक्ल जगवान दस त्याजो।। पूर्ण०।। ही पाठपकल्याणाय नम अर्य० ।।३६९।। स्वप जिनकार गणधारी, परम कल्याण अविकारी ।। पृण०।। ॐ हीं पाठरफ्त्याणगणाय नम अय॑ ।।३७०।। अहित परिहार पट जो है. परम कल्याण तामो है ।। पृण०।। *ही पाठकल्याणस्वम्पाय नम अध्य० ।।३७१।। म्चनुर द्रव्याक्ये माही जहाँ क्छ पर निमित नाही ।। पूर्ण०।। ॐही पाठरल्याणहव्याय नम अयं ।।३७२।। जोई माई आमत काला, अन्यथा भाव विधि टाला । पर्ण भूननान पल पाया, नम मन्याथ उवझाया।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठक्तत्त्वगुणाय नम अर्घ्य० ।।३७३।। न्हे नित चनन माही, यह चिद्रप मुनि ताही ।। पूण०।। ॐ हीं पाठफचिद्रूपाय नम अय॑ ।।३७४।। मवथा ज्ञान परिणामी प्रक्ट है चेतना नामी ।। पृण०।। ॐ हीं पाठकचेतनाय नम अर्घ्य० ।।३७५।। नहीं अन्यत्व भंदा है गुणी गुण निर-विछंदा हे।। पूण०।। ॐ ह्रीं पाठकचेतनागुणाय नम अर्घ्य।।३७६।। घटाघट वस्तु परकाशी, धरे है जोति प्रतिभाशी।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकज्योतिप्रकाशाय नम अर्घ्य० ।।३७७।। वस्तु मामान्य अवलोका, ह यगपत दश निद्धोका ।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकदर्शनचेतनाय नम अर्घ्य० ॥३७८।। विशेषण युक्त माकाग, ज्ञान दुति मे प्रगट सारा ।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकज्ञानचेतनाय नम अयं० ।।३७९।। जानमो जीव नामी है, भेद ममवाय स्वामी है ।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकजीवचिदानन्दाय नम अर्घ्य० ।।३८०।।
१६२ ] [ सिद्धचक्रावधान चराचर वस्तु म्वाधीना, समय एकहि मे लव लीना ।। पृण।। ॐ हीं पाठकवीर्यचेतनाय नम अर्ध्य० ।।३८१।। सकल जीवो केमुस कारन,शरण तुमही हा अनिवाग्न ।। पृण०।। ॐ हीं पाठकसकलशरणाय नम अय० ।।३८२।। तुम हो त्रयलोक हितकारी अद्वितीय शण लिहारी ।। पृण०।। ॐ हीं पाठकत्रैलोक्यशरणाय नम अय० ।।३८३।। तुम्हारी शण तिहुँ काला, करन जग जीव प्रतिपाला।। पृण०।। ॐ हीं पाठकत्रिकालशरणाय नम अर्ध्य० ।।३८४।। शरण अनिवार मुसदाइ, प्रगट निदान्त मे गाइ । पूर्ण श्रुतज्ञान फल पाया, नमू मत्याय उवझाया।। ॐ हीं पाठकत्रिमगलशरणाय नम अर्घ्य० ।।३८५।। लोक मे धम विस्याता, सो तुमही में मुखनाता ।। पूण०।। ॐ हीं पाठकलोकशरणाय नम अर्घ्य० ।।३८६।। जोग विन आश्रवे नाही, भये निर आथवा ताही ।। पूण०।। ॐ हीं पाठकाश्रवावेदाय नम अयं० ।।३८७।। आश्रव कर्म का सोना, कार्य था अपना होना।। पूण०।। ॐ हीं पाठकाश्रवविनाशाय नम अर्घ्य० ।।३८८।। तत्त्व निवाध उपदेशा, विनाशे कम परवेशा।। पूण०।। ॐ हीं पाठक-आश्रवोपदेशछेदकाय नम अर्घ्य ।।३८९।। प्रकृति सब कर्म की चूरी, रभाव मल नाश दुख पूरी ।। पूर्ण०।। ॐ ह्रीं पाठकबध-अन्तकाय नम अj० ।।३९०।। न फिर ससार अवतारा, बन्ध-विधि सन्त कर डारा।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकबधमुक्ताय नम अर्घ्य० ।।३९१।। आश्रव कर्म दुखदाई, रुके सवर ये सुखदाई।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकसवराय नम अर्घ्यं ।।३९२।। सर्वथा जोग विनसाया, स्व-सवररूप दरशाया।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकसवरस्वरूपाय नम अयं० ।।३९३।। कलुषता भाव मे नाही, भये सवर करण ताही।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकसवरकरणाय नम अयं ।।३९४।। - सप्तम पूजा ] [१६ कुपरणति राग-रुष नाशन, निरजरा रूप प्रतिभासन ।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकनिर्जरास्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।३९५।। कामदेव दाह जग सारा, आप तिस भस्म कर डारा।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठककदर्पच्छेदकाय नम अयं ।।३९६।। चहुँ विधि बध विधि चूरा, ये विस्फोटक कहो पूरा।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठककविस्फोटकाय नम अy० ।।३०७।। दऊ विधि कर्मका खोना, सोई है मोक्ष का होना ।। पूर्ण०।। ॐ ह्रीं पाठकमोक्षाय नम अy० ।।३९८।। द्रव्य अर भाव मल टारा, नमू शिवरूप सुखकारा।। पूर्ण०।। ॐ हीं पाठकमोक्षस्वरूपाय नम अर्घ्यं ।।३९९।। अरति-रति पर-निमित खोई,आत्म-रति हैप्रगट सोई । पूर्ण श्रुतज्ञान फल पाया, नमू सत्यार्थ उवझाया।। ॐहीं पाठक-आत्मरतये नम अयं ।।४००।। लोलतरग तथा बड़ी चौपाई अठाईस मूल सदा गुण धारी, सो सब साधु वरै शिवनारी । साधु भये शिव साधनहारे, सो तुम साधु हरो अघ म्हारे।। ४०१ । ॐ ही सर्वसाधुभ्यो नम अर्घ्य० ।।४०१।। मूल तथा सब उत्तर गाये, ये गुण पालत साधु कहाये ।। साधु भये०। ॐ ह्रीं सर्वसाधुगुणेभ्यो नम अy० ।।४०२।। साधुनके गुण साधुहि जाने, होत गुणी गुणही परमाने ।। साधु भये०। ॐ हीं सर्वसाधुगुणस्वरूपाय नम अय॑ ।।४०३।। नेम थकी विश्वास करे जो, द्रव्य थकी शिवरूप करै जो।। साधु भये। ॐ हीं सर्वसाधुद्रव्याय नम अy० ।।४०४।। जीव सदा चित भाव विलासी, आपहीआप सधै शिवराशी।। साधु भये। ॐ ह्रीं सर्वसाधुगुणद्रव्याय नम अर्ध्य० ।।४०५।। ज्ञानमई निज ज्योति प्रकाशी, भेद विशेष सबै प्रतिभासी।। साधु भये०।। ॐ ह्रीं साधुज्ञानाय नम अj० ।।४०६।। एकहि बार लखाय अभेदा, दर्शनको सब रोग विछेदा ।। साधु भये०।। ॐ ह्रीं साधुदर्शनाय नम अर्घ्य।।४०७।।
१६४ ] [ सिद्धचक्रयिधान आपहि माधन माध्य तुमही हो, एक अनेक अवाब नही हो । माधु भये शिव माधनहारे, मो तुम गाधु हगे अब म्हारे ।। ॐ हीं साधुद्रव्यभावाय नम अर्घ्य० ।। ४०८।। चेतनता निज भाव न छारे, म्प म्पशन आदि न धार ।। मा भये०।। ॐ हीं साधुद्रव्यस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।४०९।। जो उतपाद भये इक्वाग मा निम्बाब म्ह अविकाग।। नाव भये०।। ॐ हीं साधुवीर्याय नम अर्घ्य० ।। ४१०।। हे परनाम अभिन्न प्रणामी मो नम नाव भय शिवगामी ।। मातु भये०।। ॐ हीं साधुद्रव्यगुणपर्यायाय नम अघ्य ।। ४११।। जो गुण वा पाग्याय धरो हो, मो निज माहि अभिन्न वर्ग हो।। माधु भये०।। ॐ हीं साधुद्रव्यगुणपर्यायाय नम अर्घ्य० ।। ४१२।। मगलमय तुम नाम कहाव, लेहि नाम नु पाप नसावे ।। माधु भये०।। ॐ हीं साधुमगलाय नम अर्घ्य० ।। ४१३।। मगल रूप अनूपम मोह, ध्यान किये नित आनन्द होहे ।। माधु भये०।। ॐ हीं साधुमगलस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।४१४।। पाप मिटै तुम शरण गहेते, मगल शरण क्हाय लहैते।। माधु भये०।। ॐ हीं साधुमगलशरणाय नम अर्घ्य० ।।४१५।। देखत ही सब पाप नसे है, आनन्द मगलरूप लसे ह ।। साधु भये०।। ॐ हीं साधुमगलदर्शनाय नम अर्घ्य० ।।४१६।। जानत है तुमको मुनि नीके, पाप कलाप मिटै तिनहीके ।। साधु भये०।। ॐ ह्रीं साधुमगलज्ञानाय नम अर्घ्य० ।।४१७।। ज्ञानमई तुम हो गुणारासा, मगल ज्योति धरो रविकासा ।। साधुभये०।। ॐ ह्रीं साधुज्ञानगुणमगलाय नम अर्घ्य० ।।४१८।। मगल वीर्य तुम्ही दशाया, काल अनन्त न पाप लगाया।। साधु भये०।। ॐ ह्रीं साधुवीर्यमगलाय नम अर्घ्य० ।।४१९।।
सप्तम पूजा ] [१६५ वीप महा मरम्प निहान पाप विना नित ही अविकारा । माधु भये शिव नापनहारे, मो तम माधु हगे अघ म्हारे ।। *ही सायुपीर्यमगलस्यम्पाय नम अध्यं० ।। ४२०।। मगल पीय मत गणधामी निज पम्पाहि मोक्ष लहामी ।। माधु भये०।। ॐ हीं माधवीर्यपरममगलाय नम अर्घ्य० ।।४२१।। वीर स्वभाविक पण तिहाग कम नशाय भये भवपारा ।। साधु भये०।। ही साधवीर्यद्रव्याय नम अध्य० ।।४२२।। नीन हि लोप लस सब नाद आप ममान न उत्तम कोई।। साधु भये०।। ॐही साधुलोकोतमाय नम अयं० ।।४२३।। लोक सभी विधि बन्धन माही तुम नम रूप धरे ते नाही।। साधु भये०।। ॐ हीं साधुनोखेतमगुणाय नम अध्यं० ।।४२४।। नारनवे गण पाप कनेशा उत्तम रूप नहीं तुम जेमा ।। माधु भये०।। ॐ हीं साधुनोकोत्तमगुणस्वरूपाय नम अयं० ।। ४२५।। लोक अलोक निहाक नामी उत्तम द्रव्य नम्ही अभिगमी ।। साधु भये०।। ॐ ही साधुलोकोत्तमद्रव्याय नम अयं० ।।४२६।। लाक मभी पटद्रव्य ग्चाया, उनम द्रव्य तम्ही हम पाया ।। माधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमद्रव्यस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।४२७।। ज्ञानमई चित उत्तम माह, ऐमो लोक विप अफ को है ।। साधु भये०।। ॐ हीं माधुलोकोत्तमज्ञानाय नम अy० ।।४२८।। ज्ञान स्वरूप सुभाव तिहाग, उत्तम लोक क इम सारा।। साधु भये०।। ॐ हीं माधुलोकोत्तमज्ञानस्वरूपाय नम अयं० ।।४२९।। दसन मे कुछ आड न आवै, लोग तनी सब उत्तम गावे ।। साधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमदर्शनाय नम अर्घ्य० ।।४३०।। देखन जानन भाव धरै हो, उत्तम लोकके हेतु गहे हो।। साधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमज्ञानदर्शनाय नम अयं० ।।४३१।।
१६६ ] [ सिद्धचक्रयिधान जाकर लोकशिखर पद धारा, उत्तम धर्म कहो जग माग।। माधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमधर्माय नम अयं० ।। ४३२।। धर्म स्वरूप निजातम माही, उत्तम लोक विप ठहगइ।। माधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमधर्मस्वरूपाय नम अy० ।।४३३।। अन्य सहाय न चाहत जाको, उत्तम लोक कह वल ताको ।। माधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमवीर्याय नम अर्घ्य० ।।४३४।। उत्तम वीर्य सरूप निहारा, साधन मोक्ष कियो अनिवाग।। माधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमवीर्यस्वरूपाय नम अy० ।।४३५।। पूरण आत्मकला परकाशी, लोक विपे अतिशय अविनाशी ।। साधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमातिशयाय नम अर्घ्य० ।।४३६।। राग-विरोध न चेतन माही, ब्रह्म कहो जग उत्तम ताही।। साधु भये०।। ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमब्रह्मज्ञानाय नम अj० ।।४३७।। ज्ञान-स्वरूप अकम्प अडोला, पूरण ब्रह्म प्रकाश अटोला।। साधु भये०।। ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमब्रह्मज्ञानस्वरूपाय नम अर्य० ।।४३८।। राग विरोध जयो शिवगामी, आत्म अनातम अन्तरजामी।। साधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमजिनाय नम अर्घ्य० ।।४३९।। भेद विना गुण-भेद धरो हो, साख्य कुवादिक पक्ष हरो हो ।। साधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमगुणसम्पन्नाय नम अर्घ्य० ।।४४०।। साधत आतम पुरुष सखाई, उत्तम पुरुष कहो जग ताई।। साधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमपुरुषाय नम अयं० ।।४४१।। साधु समान न दीनदयाला, शरण गहै सुख होत विशाला।। साधु भये०।। ॐ हीं साधुलोकोत्तमशरणाय नम अयं० ।।४४२।। जे जन साधु शरण गही है, ते शिव आनन्द लब्धि लही है।। साधु भये०।। ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमगुणशरणाय नम अयं० ।।४४३॥ ।
सप्तम पूजा ] [१६७ नागुन के गुण द्रव्य चितारे, होत महासुख शरण उभारे ।। साधुभये० ।। ॐ हीं साधुगुणद्रव्यशरणाय नम अध्य० ।।४४४।। लावनी तम चितवत वा अवलोकत वा सरधानी, इम शरण गहे पावै निश्चय शिवरानी । निजस्प मगन मन ध्यान धरे मुनिराजे, में नम माधु सम सिद्ध अकप विराजै ।। ॐ हीं साधुदर्शनशरणाय नमोऽर्थ्य० ।।४४५।। तुम अनुभव करि शुद्धोपयोग मन धारा । यह ज्ञान शरण पायो निश्चे अविकारा।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुज्ञानशरणाय नमोऽध्य० ।।४४६।। निज आत्मरूप में दृढ़ मरधा तुम पाइ । थिर रूप मदा निवसो शिववास कराई।। निजरूप०।। ॐ हीं साधु-आत्मशरणाय नमोऽयं० ।।४४७।। तुम निगकार निरभेद अछेद अनूपा । तुम निगवरण निरद्वद स्वदर्श स्वरूपा।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुदर्शस्वरूपाय नमोऽयं० ।।४४८।। तुम परम पूज्य परमेश परमपद पाया । हम शरण गही पूजे नित मनवचकाया।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुपरमात्मशरणाय नमोऽयं० ।।४४९।। तुम मन इन्द्री व्यापार जीत सु अभीता । हम शरण गही मनु आज कमरिपु जीता।। निजरूप० ।। ॐ हीं साधुनिजात्मशरणाय नमोऽयं ।।४५०।। भववास दुखी जे शरण गहैं तुम मन मे । तिनको अवलम्ब उभारो भयहर छिन मे।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुवीर्यशरणाय नमोऽयं० ।।४५१।। दृग वोध अनन्तानन्त धरो निरखेदा । तुम वल अपार शरणागति विघनविछेदा ।। निजरूप०।। ॐ ह्रीं साधुवीर्यात्मशरणाय नमोऽयं० ।।४५२।।
महा सोहै । १६८ ] [ सिद्धचक्रविधान निज ज्ञानानन्दी लक्षिमी सुर असुरन मे नित परम मुनी मन मोहै।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुलक्ष्मीअलकृताय नमोऽयं ० ।।४५३।। भववास महा दुखरास ताहि दुखरास ताहि विनशाया । अति क्षीन लीन स्वाधीन महासुख पाया।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुलक्ष्मीप्रणीताय नमोऽयं० ।।४५४ त्रिभुवन का ईश्वरपना तुम्ही मे पाया । त्रिभुवन के पातिक हरौ मनू रवि-छाया ।। निजरूप०।। ॐ ह्रीं साधुलक्ष्मीरूपाय नमोऽy० ।।४५५।। तुम काल अनतानत अबाध विराजो । परनिमित्त विकार निवार सु नित्य सु छाजो।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुधुवाय नमोऽy० ।।४५६।। तुम छायकलब्धि प्रभाव परम गुणधारी । निवासौ निज-आनद मांहि अचल अविकारी।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुगुणधुवाय नमोऽयं ।।४५७।। तेरम चौदस गुणथान द्रव्य है जैसो । रहै काल अनन्तानन्त शुद्धता तैसो ।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुद्रव्यगुणधुवाय नमोऽयं ।।४५८।। फिर जन्ममरण नही होय जान्म वो पाया । ससार-विलक्षण निज अपूर्व पद पाया।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुद्रयोत्पादाय नमोऽयं ।।४५९।। सूक्षम अलब्धि पर्याप्त निगोद शरीरा । ते त्च्छ द्रव्य करनाश भये भवतीरा।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुतव्यापिने नमोऽयं ।।४६०।। रागादि परिग्रह टारि तत्त्व सरधानी । इम साधु जीव निज साधत शिवसुखदानी।। निजरूप०।। ॐ ह्रीं साधुजीवाय नमोऽy० ।।४६१।। स्वसवेदन विज्ञान तज इष्ट-अनिष्ट विकल्प जाल दुखसाना ।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुजीवगुणाय नम अर्घ्य० ।।४६२।। परम अमलाना ।
अरू सप्तम पूजा ] [१६९ देखन जानन चेतन सु रूप अविकारी । गुण-गुणी भेद मे अन्य भेद व्यभिचारी।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुचेतनगुणाय नम अर्घ्यं० ।।४६३।। चेतनकी परिणति रहै सदा चित माही । ज्यो सिंधु लहर ही सिंधु और कुछ नाही ।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुचेतनस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।४६४।। चेतनविलास सुखरास नित्य परकाशी । सो साधु दिगम्बर साधु भये अविनाशी।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुचेतनाय नम अर्घ्य० ।।४६५।। तुम असाधारण परमात्मप्रकाशी । नहीं अन्य जीव यह लहै गहै भववासी।। निजरूप०।। ॐ ह्रीं साधुपरमात्मप्रकाशाय नम अर्घ्य० ।।४६६।। तुम मोह तिमिर बिन स्वय सूर्य परकाशी । गुणद्रव्यपर्य सन्न भिन्न-भिन्न प्रतिभासी।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुज्योतिस्वरूपाय नम अर्घ्य० ।।४६७।। ज्यो घटपटादि दीपक की ज्योति दिखावै । त्यो ज्ञानज्योति सब भिन्न-भिन्न दरशावै ।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुज्योतिप्रदीपाय नम अय० ।।४६८।। सामान्यरूप अवलोकन युगपत सारा । तुम दर्शन ज्योति प्रदीप हरै अंधियारा।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुदर्शनज्योतिप्रदीपाय नम अय० ।।४६९।। साकार रूप सु विशेष ज्ञानद्युति माही । युगपत कर प्रतिबिंबित वस्तु प्रगटाई।। निजरूप०।। ॐ ह्रीं साधुज्ञानज्योतिप्रदीपाय नम अय० ।।४७०।। जे अर्थजन्य कहैं ज्ञान वो झूठेवादी । है स्वर-प्रकाशक आतम-ज्योति अनादी।। निजरूप०।। ॐ हीं साधु-आत्मज्योतिषे नम अयं० ।।४७१।। तारणतरण जहाजाश्रित भवसागर । हम शरण गही पार्दै शिववास उजागर ।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुशरणाय नम अयं० ।।४७२।। है विषम दुखकार १७० ] [सिद्धचक्रावधान सामान्यरूप सव साधु मुक्ति-मग साधैं । हम पावै निजपद नेमरूप आराधे।। निजल्प०।। ॐ हीं साधुसर्वशरणाय नम अयं० ।।४७३।। वसनाडी ही मे तत्वज्ञान सरधानी । तार माधै निश्चय पावै शिवरानी।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुलोकशरणाय नम अर्घ्य० ।।४७४।। तिहॅलोक क्रन हित वरते नित उपदेशा । हम शरण नही मंटो भववास क्लेशा।। निजल्प०।। ॐ हीं साधुत्रिलोकशरणाय नम अर्घ्य० ।।४७५।। ससार असार अपारा । तिल छेदक वैदक सुखदायक हितकारा।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुससारछेदकाय नम अर्घ्य० ।।४७६।। यद्यपि इक क्षेत्र अवगाह अभिन्न विराजें । यद्यपि निज सत्ता माहि भिन्नता साजै ।। निजरूप०।। ॐ ह्रीं साधुएकत्वाय नम अयं ।।४७७।। यद्यपि सामान्य-सत्प तु पूरणजानी । तद्यपि निज आश्रयभाव भिन्न परनामी।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुएकत्वगुणाय नम अर्घ्य० ।।४७८।। अनाधारण एकत्वद्रव्य तुम माही । तुम सम सतार मझार और कोउ नाही।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुएकत्वद्रव्याय नम अय॑ ।।४७९।। यद्यपि सब ही हो असख्यात परदेशी । तद्यपि निज मे निजरूप स्वद्रव्य सुदेशी।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुएकत्वस्वरूपाय नम अय० ॥४८०।। सामान्यल्प व्रम क्हा वैज्ञानी । तिनमे तुम वृषभ न परमब्रह्म परणामी।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुपरब्रह्मणे नम अर्घ्य० ।।४८१।। सापेक्ष एक ही क्हे नु नय विस्तारा । तुम भाव प्रक्टकर कह सुनिश्चैकारा।। निजल्प०।। ॐ हीं साधुपरमस्याहादाय नम अy० ।।४८२।। । है सव सप्तम पूजा ] [ १७१ है ज्ञाननिमित यह वचन जाल परमाणा । है वाचक-वाच्य सयोग ब्रह्म कहलाना।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुशुद्धब्रह्मणे नम अयं ।।४८३।। षद्रव्य निरूपण करै सोई आगम हो । तिसके तुम मूलनिधान सु परमागम हो।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुपरमागमाय नम अर्घ्य० ॥४८४।। तीर्थेश कहै सर्वज्ञ दिव्य धुनि माही । तुम गुण अपार इम कहो जिनागम ताही।। निजरूप०।। ॐ ह्रीं साधुजिनागमाय नम अy० ।।४८५।। तुम नाम प्रसिद्ध अनेक अर्थ का वाची । ताके प्रवोध सो हो प्रतीत मन साची।। निजरूप०।। ॐ ह्रीं साधु-अनेकार्थाय नम अर्ध्य॥४८६।। लोभादिक मेटे विन न शौचता होई । है वृथा तीर्थ-स्नान करो भी कोई।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुशौचाय नम अयं० ।।४८७।। है मिथ्या मोह प्रवल मल इनका खोना । शुद्धशौच गुण यही, न तनका धोना ।।निजरूप०।। ॐ ह्रीं साधुशुचित्वगुणाय नम अर्घ्य० ।।४८८।। इकदेश कर्ममल नाशि पवित्र कहायो, तुम सर्व कर्ममल नाशि परमपद पायो।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुपवित्राय नम अर्घ्यं ।।४८९।। तुम रहो बधसो दूरि एकात सुखाई । ज्यो नभ अलिप्त सब द्रव्य रहो तिस माही।। निजरूप०।। ॐ ह्रीं साधुविमुक्ताय नम अर्घ्य० ।।४९०।। द्रव्य-भाव-नोकर्म बध छुटकाया । तुम शुद्ध निरजन निजसरूप थिर पाया।। निजरूप०।। ॐ हीं साधुबन्धमुक्ताय नम अर्घ्य० ।।४९१।। सब %3D १७२ ] [ सिद्धचक्रविधान अडिल्ल भावाश्रव विन अतिशय सहित अवध हो । मेघपटल विन ज्यो रविकिरण अमद हो।। मोक्षमार्ग वा मोक्ष श्रेय मव साधु है । नमत निरतर हम हुँ म रिपुको दहे ।। टेक ॐ हीं साधुबन्धप्रतिबन्धकाय नम अर्घ्य० ।।४९२।। निज स्वरूप मे लीन पग्म सवर करै । यह कारण अनिवार कर्म आवन हरै।। मोक्षमार्ग०।। ॐ ह्रीं साधुसवरकारणाय नम अर्घ्य० ।।४९३।। पुद्गलीक परिणाम आठ विधि कर्म है । तिनकी करत निरजरा शुद्धसु पम है।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुनिर्जराद्रव्याय नम अर्घ्य० ।।४९४।। पर्म शुद्ध उपयोग रूप वरते वरते जहा । छिनमे नन्तानन्त कम खिर है तहाँ ।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुनिर्जरानिमित्ताय नम अर्ध्य० ।।४९५।। सकल विभाव अभाव निर्जरा करत है । ज्यो रवि तेज प्रचड सकल तम हरत है।। मोक्षमार्ग०।। ॐ ह्रीं साधुनिर्जरागुणाय नम अर्घ्य० ।।४९६।। जे ससार निमित्त ते सब दुख रूप है । तुम निमित्त शिव कारण शुद्ध अनूप है।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुनिमित्तमुक्ताय नम अर्घ्य ।।४९७।। सशयरहित सुनिश्चै सम्मतिदाय हो । मिथ्या-भ्रम-तमनाशन सहज उपाय हो।। मोक्षमार्ग०।। ॐ ह्रीं साधुबोधधर्माय नम अy० ।।४९८।। अति विशुद्ध निजज्ञान स्वभाव सु धरत हो । भव्यनके सशय आदिक तम हरत हो।। मोक्षमा०।। ॐ हीं साधुबोधगुणाय नम अर्घ्यं० ।।४९९।। अविनाशी अविकार परम शिवधाम हो । पायो सो तुम सुगत महा अभिराम हो।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुसुगतिभावाय नम अर्घ्यं ।।५००।।
सकल सप्तम पूजा ] [ १७३ जासो परे न और जन्म वा मरण है । सो उत्तम उत्कृष्ट परम गति को लहै।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुकरमगतिभावाय नम अयं० ।।५०१।। पर निमित्त रागादिक जे परनाम है । इन विभाव सो रहित साधु शुभ नाम है।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुविभावरहिताय नम अर्यं० ।।५०२।। निजसुभाव सामर्थ सु प्रभुता पाइयो । इन्द्र-फनेन्द्र-नरेन्द्र शीश निज नाइयो।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुस्वभावसहिताय नम अर्घ्य० ।।५०३।। कर्मबध सो रहित सोई शिवरूप हैं । निवसे सदा अवध स्वशुद्ध अनूप है।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुमोक्षस्वरूपाय नम अध्य० ।।५०४।। द्रव्य पर्याय विषै स्वज्ञान हो । सत्यारथ निश्चल निश्चै परमाण हो।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुपरमानन्दानाय नम अयं० ।।५०५।। तीन लोकके पूज्य यतीजन ध्यावही । कर्म-शुत्र को जीत 'अर्ह' पद पावही।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधु-अर्हत्स्वरूपाय नम अर्घ्यं ।।५०६।। परम इष्ट शिव साधत सिद्ध कहाइयो । तीन लोक परमेष्ट परमपद पाइयो।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुसिद्धपरमेष्ठिने नम अj० ।।५०७।। शिव-मारग प्रकटावन कारण हो तुम्ही । भविजन पतित उधारन तारन हो तुम्ही ।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुसूरिप्रकाशिने नम अर्घ्य० ।।५०८।। स्वपर सुहित करि परम बुद्धि भरतार हो । धरत आनद-बोध दातार हो।। मोक्षमार्ग०।। ॐ ह्रीं साधु-उपाध्यायाय नम अय० ।।५०९।। पच परम गुरु प्रकट तुम्हारो नाम है । भेदाभेद सुभाव सु आतमराम है।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधु-अर्हतसिद्धाचार्योंपाध्यायसर्वसाधुभ्यो नम अर्घ्यं ।।५१०।। ध्यान व्यापक १७४ ] [ सिद्धचक्रविधान लोकालोक सु जानमुभावते । तद्यपि निजपद लीन विहीनविभावते ।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधुआत्मरतये नम अर्घ्य० ।।५११।। रतनत्रय निज भाव विशेष अनत अनत है । पच परमगुरु भये नमे नित मत है।। मोक्षमार्ग०।। ॐ हीं साधु-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुरत्नत्रयात्मकानत- गुणेभ्यो नम अर्घ्य० ।।५१२।। पच परम गुरु नाम विशेषण को धरे । तीन लोक मे मगलमय आनन्द करै।। पूरणकर थुतिनाम थुतिनाम अन्त अन्त सुख पूजूं हूँ युत भाव सु अर्घ उतारण।। ॐ हीं अर्ह द्वादशाधिकपचशतगुणयुतसिद्धेभ्यो नम पूर्णाऱ्या० ।। कारण । अथ जयमाला रत्नत्रय भूषित महा, मच सुगुरु शिवकार । सकल सुरेन्द्र नमे नमू, पाऊ सो गुणसार।।१।। पद्धडी जय महा मोहदल दलन सूर, जय निर्विकल्प आनन्दपूर । जय द्वैविधि कर्म विमुक्त देव, जय निजानन्द स्वाधीन एव ।।१।। जय सशयादि भ्रमतम निवार, जय स्वामिभक्ति द्युतिथुति अपार । जय युगपत सकल प्रत्यक्ष लक्ष, जय निरावरण निर्मल अनक्ष ।।२।। जय जय जय सुखसागर अगाध, निरद्वन्द निरामय निर-उपाधि । जय मनवचतन व्यापार नाश, जय थिरसरूप निज पद प्रकाश ।। ३ ।। जय पर-निमित्त सुख-दुख निवार, निरलेप निराश्रय निर्विकार । निज मे परको पर मे न आप, परवेश न हो नित निर-मिलाप ।। ४ ।। तुम परम धरम आराध्य सार, निज सम करि कारण दुर्निवार । तुम पच परम आचार युक्त, नित भक्त वर्ग दातार मुक्त ।। ५।। एकादशाग सर्वाग पूर्व, स्वैअनुभव पायो फल अपूर्व । अन्तर-बाहिर परिग्रह नसाय, परमारथ साधू पद लहाय ।। ६ ।। हम पूजत निज उर भक्ति ठान, पावे निश्चय शिवपद महान । ज्यो शशि किरणावलि सियर पाय, मणि चन्द्रकांति द्रवता लहाय ।। ७ ।।
सप्तम पूजा ] [ १७५ जय घतानन्द भव-भयहार, बन्धविडार, सुखसार शिवकरतार । नित 'सन्त' सु ध्यावत, पाप नसावत, पावत पद निज अविकार ।। ॐ हीं द्वादशाधिकपचशतदलोपरिस्थितसिद्धेभ्यो नम पूर्णाय० । सोरठा तुम गुण अमल अपार, अनुभवते भव-भय नशै । 'सन्त" सदा चित धार, शांति करो भवतप हरो।। इत्याशीर्वाद (यहाँ १०८ बार "ॐ हीं अर्ह अ सि आ उ सा नम" मत्र का जाप करे।) बन्धन क्या है? बन्धन तभी तक बन्धन है, जबतक बन्धन की अनुभूति है। यद्यपि पर्याय मे बन्धन है, तथापि आत्मा तो अबन्धस्वभावी ही है। अनादिकाल से यह अज्ञानी प्राणी अबन्धस्वभावी आत्मा को भूलकर बन्धन पर केन्द्रित हो रहा है। वस्तुत बन्धन की अनुभूति ही बन्धन है। वास्तव मे 'मैं बँधा हू' -इस विकल्प से यह जीव बँधा है। लौकिक बन्धन से विकल्प का बन्धन अधिक मजबूत है, विकल्प का बन्धन टूट जावे तथा अबध की अनुभूति सघन हो जावे तो बाह्य बन्धन भी सहज टूट जाते है। बन्धन के विकल्प से, स्मरण से, मनन से दीनता-हीनता का विकास होता है। अबन्ध की अनुभूति से, मनन से, चिन्तन से शौर्य का विकास होता है, पुरुषार्थ सहज जागृत होता है, पुरुषार्थ की जागृति मे बन्धन कहाँ? -तीर्थकर महावीर और उनका सर्वोदय तीर्थ, पृ० ७० .
(एक हजार चौवीस गुण महित) अष्टम पूजा छप्पय उधर अधो सम्प नविन्द बार विगजे । अकार्गाट स्वर्गलप्त कणिका अन्न न छाजे।। वानग्नि वसढल अम्बुज तत्व माधधर । अग्रभाग मे मन्त्र अनाहत मोहत अतिवर।। पनि अन्न ही वेढयो परम सर व्यावत अनि नागो । हवै कहार नम पूजन निमित्त सिचर मगल क्गे।। ॐ हीं णमो मिद्धाण श्रीमिद्धपरमेष्ठिन् ' चतुर्विशत्यधिकैकसहस्र- गुणसहितविराजमान अत्रावतरावतर सवौषट् आह्माननम् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् । (पुष्पालि क्षिपेत् ।) दोहा मृक्ष्मादि गण सहित हे क्म गहत नीगेग । निद्धचक्र मो थापहूँ मिटे उपद्रव योग ।। (इति यत्रस्थापनार्थं पुष्पाजलि क्षिपेत् ।) गीता निज आत्मन्प सु नीथ मग निन सम्म आनन्दधार हो । नाशे त्रिविधि मल सक्ल दसमय भव-जलधिके पार हो । यातें उचित ही है जु तुम पढ, नीरमो इक महम अरु चौवीन गुण गण भावयुत मन मे धत् ।। ॐ ही चतुर्विशत्यधिकैकसहस्रगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल निर्वपामीति म्वाहा ।।१।। शीतल यरूप सुगन्ध चन्दन एक भव नप नामही । मो भव्य मधुकर प्रिय सु यह नहि और ठौर मु वान ही।। पूजा क्र ।
अष्टम पूजा ] [ १७७ याते उचित ही है जु तुम पद, मलयसो पूजा करू ।। इक सहस०।। ॐ हीं चतुर्विशत्यधिकैकसहस्रगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने ससारतापविनाशनाय चन्दन० ।।२।। अक्षय अबाधित आदि-अन्त, समान स्वच्छ सुभाव हो । ज्यो तुम विना तदुल दिपै त्यू, निखिल अमल अभाव हो।। याते उचित ही है जु तुम पद, अक्षत पूजा करू।। इक सहस०।। ॐ हीं चतुर्विशत्यधिकैकसहस्रगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपदप्राप्तये अक्षत०।।३।। गुण पुष्पमाल विशाल तुम, भवि कठ पहिरै भावसो । जिनके मधुपमन रसिक लुब्धित, रमत नित-प्रति चावसो।। याते उचित ही है जु तुम पद, पुष्पमो पूजा करू।। इक सहस०।। ॐ हीं चतुर्विशत्यधिकैकसहस्रगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने कामवाणविनाशनाय पुष्प० ।।४।। शुद्धात्म सरस सुपाक मधुर, समान और न रस कही । ताके हो आम्वादी सु, तुम सम और सतुष्टित नही ।। यातें उचित ही है जु तुम पद, चरुनसो पूजा करू ।। इक सहस०।। ॐ हीं चतुर्विशत्यधिकैकसहस्रगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य० ।।५।। स्वपर प्रकाश स्वभावधर ज्यू, निज-स्वरूप सभारते । त्यू ही त्रिकाल अनत द्रव, पर्याय प्रकट निहारते ।। यातें उचित ही है जु तुम पद, दीपसो पूजा करू ।। इक सहस०।। ॐ ह्रीं चतुर्विशत्यधिकैकसहस्रगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने मोहाधकारविनाशनाय दीप० ।।६।। वर ध्यान अगनि जराय वसुविधि, ऊर्ध्वगमन स्वभावते । राजै अचल शिव थान नित, सिंह धर्मद्रव्य अभावते,।। यातें उचित ही है जु तुम पद, धूपसो पूजा करू ।। इक सहस०।। ॐ हीं चतुर्विशत्यधिकैकसहस्रगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्मदहनाय धूप० ।।७।। सर्वोत्कृष्ट सु पुण्य फल, तीर्थेश पद पायो महा । तीर्थेश पदको स्वरुचिधर, अव्यय अमर शिवफल लहा।।
१७८] [ सिद्धचक्रविधान यातै उचित ही है जु तुम पद, फलनमो पूजा करु । इक सहस अरु चौवीस गुण गण भावयुत मन मे धर ।। ॐ हीं चतुर्विशत्यधिकैकसहस्रगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफलप्राप्तये फल०।। अष्टाग मूल सु विधि हरो, निज अष्ट गुण पायो मही । अष्टार्द्ध गति ससार मेटि सु अचल । अष्टम मही ।। यातै उचित ही है जु तुमपद अर्घसो पूजा करू ।। इक सहस०।। ॐ हीं चतुर्विशत्यधिकैकसहस्रगुणसयुक्ताय श्रीसिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य० ।।९।। निर्मल सलिल शुभ वास चदन, धवल अक्षत युत अनी । शुभपुष्प मधुकर नित रमे, चरु प्रचुर स्वाद सुविधि घनी।। वर दीपमाल उजाल धूपायन रसायन फल भले । करि अर्घ सिद्ध समूह पूजत, कर्मदल सव दलमले ।। ते क्रमावर्त नशाय युगपत, ज्ञान निर्मल रूप है । दुख जन्म टार अपार गुण, सूक्षम सरूप अनूप हैं।। काष्ट बिन त्रैलोक्य पूज्य, अदूज शिवकमलापती । मुनि ध्येय सेय अमेय चहुँ गुण-गेह द्यो हम शुभ मती।। ॐ हीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने सर्वसुखप्राप्तये महागॅ०।। दस सौ चौबीस गुण अर्घ्य दोहा इन्द्रिय विषय-कषाय है, अन्तर शत्रु महान । तिनको जीतत जिन भये, नमू सिद्ध भगवान।। ॐ हीं अहं जिनाय नम अयं० ।।१।। रागादिक जीते सु जिन, तिनमे तुम परधान । ताते नाम जिनेन्द्र है, नमू सदा धरि ध्यान।। ॐ हीं अहं जिनेन्द्राय नम अयं ।।२।। रागादिक लवलेश बिन, शुद्ध निरजन देव । पूरण जिनपद तुम वि, राजत हो स्वयमेव ।। ॐ हीं अहं जिनपूर्णताय नम अर्घ्य० ।।३।।
अष्टम पूजा ] [१७९ . बाह्य शत्रु उपचरित को, जीतत जिन नही होय । अतर शत्रु प्रबल जये, उत्तम जिन है सोय।। ॐ हीं अहं जिनोत्तमाय नम अयं ।।४।। इन्द्रादिक पूजत चरन, सेवत है तिहुँ काल । गणधरादि श्रुत केवली, जिन आज्ञा निज भाल।। ॐहीं अर्ह जिनप्रष्यय-नम अय० ।।५।। गणधरादि सत-पुरुष जे, वीतराग निरपथ । तुमको सेवत जिन भये, साधत है शिवपथ ।। ॐ ह्रीं अहं जिनाधिपाय नम अय० ।।६।। एक देश जिन सर्व मुनि, सर्व भाव अरहत । द्रव्यभाव सर्वातमा, नमू सिद्ध भगवत।। ॐ हीं अहं जिनाधीशाय नम. अय० ॥७॥ गणधरादि सेवत चरण, शुद्धातम लवलाय । तीन लोक स्वामी भये, नमू सिद्ध अधिकाय।। ॐ हीं अह जिनस्वामिने नम अय० ।।८।। नमत सुरासर जिन चरन, तीन काल धरि ध्यान । सिद्ध जिनेश्वर मै नमू, पाऊ शिवसुख थान ।। ॐ हीं अहं जिनेश्वराय नम. अय।।९।। तीन लोक तारण तरण, तीन लोक विख्यात । सिद्ध महा जिननाथ हैं, सेवत पाप नशात ।। ॐहीं अहं जिननाथाय नम अर्घ्य।।१०।। एकदेश श्रावक तथा, सर्वदेश मुनिराज । नित-प्रति रक्षक हो महा, सिद्ध सु पुण्यसमाज ।। ॐहीं अह जिनपतये नम अर्घ्य० ।।११।। त्रिभुवन शिखा-शिरोमणी, राजत सिद्ध अनत । शिवमारग परसिद्ध कर, नमत भवोदधि अत।। ॐहीं अह जिनप्रभवे नम अय० ।।१२।। जिन आज्ञा त्रिभुवन विर्षे, वरते सदा अखड । मिथ्यामति दुरपक्षको, देत नीतिसो ॐ हीं अहं जिनाधिराजाय नम अय० ।।१३।। दड।।
१८० ] [ सिद्धचक्रनिधान . तीन लोक परिपूर्ण है, लोकालोक प्रकाश । राजत है विस्तीर्ण जिन, नमू हरो भववास ।। ॐ हीं अहं जिनविभवे नम अर्घ्य० ।।१४।। आत्मज्ञ जिन नमत है, शुद्धातम के हेत । स्वामी हो तिहुँ लोक के नमू वसे शिवखेत।। ॐ हीं अर्ह जिनभर्त्रे नम अर्घ्य० ।।१५।। मिथ्यामति को नाश करि, तत्त्वज्ञान परकान । दीप्ति रूप रवि सम सदा, करो सदा उरवास ।। ॐ हीं अहं तत्वप्रकाशाय नम अध्य० ।।१६।। कर्मशत्रु जीते सु जिन, तिनके स्वामी सार । धर्ममार्ग प्रकटात है शुद्ध सुलभ सुखकार ।। ॐ हीं अहं जिनकजिताय नम अय० ।।१७।। अमृत सम निज दृष्टिसो, यथाख्यात आचार । तिन सबके स्वामी नमू, पायो शिवपद सार।। ॐ हीं अर्ह जिनेशाय नम अयं ।।१८।। समोसरण आदिक विभव, तिसके तुम परधान । शुद्धातम शिवपद लहो, नमू क्म की हान ।। ॐ हीं अह जिननायकाय नम अय० ।।१९।। सूरज सम तिहुँ लोक मे, मिथ्या तिमिर निवार । सहज दिखायो मोक्षमग, मैं वटू हित धार।। ॐहीं अहं जिननेत्र नम अय० ।।२०।। जन्म मरण दुख जीतिकर, जिन 'जिन नाम धराय । नम् सिद्ध परमात्मा, भवदुख सहज नसाय ।। ॐ हीं अहं जिनजेत्रे नम अयं ।।२१।। अचल अबाधित पद लहो, निज स्वभाव दृढ भाय । नमू सिद्ध कर-जोरिकर भाव सहित उर लाय।। ॐ हीं अहं जिनपरिदृढ़ायनम अय० ।।२२।। सर्व-व्यापि परमात्मा, सर्व पूज्य विख्यात । श्रीजिनदेव नमू त्रिविध, सर्व पाप नशि जात ।। ॐ हीं अहं जिनदेवाय नम अर्घ्य० ।।२३।।
लोक सुखदाय । महा, उपदा Hin. अष्टम पुजा । १८१ धीजिनेश जिनराज हो, निजम्वभाव अनिवार । पर-निमित्त विनी गकल बद, शिवसुखकार ।। *ही अहं जिनेश्वराय नम अर्घ्य० ।।२४।। परम प्रम दानार हो. तीन तीन लोर मैं बदृ शिवगय ।। *हीं जिनपातकाय नम अर्य० ।।२५।। गणधनदि भवत महा तुम आना शिर धार । शिक अधिक जिनपद लहो. नमू कगे भवपार ।। *ही अहं जिनाधिराजाय नम अर्य० ।।२६।। प्रकटायो शिवराय । धीग्नि निज जानद मे, वर्त वद ताय।। * अहं जिनशासनेशाय नम अर्घ्य० ।।२७।। पावन निपुण, नव देवन के देव । पज नित भावमा पाऊ शिव स्वयमेव ।। *हीं आई जिनदेवाधिदेयाय नम अर्घ्य० ।।२।। नीक चिरन्यात तारण-तरण जिहाज । नुम नम दव न और है, तुम मवके शिरताज।। *हीं अहं जिनाद्वितीयाय नम अर्घ्य० ।।२९।। तीन लोक पजत चन्न, भाव महित शिर नाय । इन्द्रादिक युति और पर्व, मैं वदू तिम पाय ।। ॐ हीं अहं जिनाधिनाथाय नम अय॑ ।।३०।। तुम ममान नहीं देव है, भविजन तारन हेत । चरणाम्बुज मंवत सुभग, पावै शिवमुख खेत।। ॐहीं मह जिनेन्द्रविवंधाय नम अर्घ्य० ।।३१।। भवाताप करि तप्त हैं, तिनकी विपति निवार । धमांमृत कर पोषियो, वरते शशि उनहार ।। *हीं अहं जिनचन्द्राय नम अर्घ्य० ।।३२।। मिथ्यातम करि अन्ध थे, तीन लोकके जीव । तत्त्व मार्ग प्रकटाइयो, रवि सम दीप्त अतीव।। ॐही अहं जिनावित्याय नम. अयं ।।३३।। है शिवमुख पायो १८२ ] [ मिद्धचक्रविधान विन कारण तारण तरण, दीप्न म्प भगवान । इन्द्राटिक पूजत चरण, रत क्मी हान।। ॐ हीं अर्ह जिनदीप्तस्पाय नम अर्घ्य० ।।३४।। जने कुजर चक्रके, जाने टलको माज । चार नघ नायक प्रभु, बद निद्ध समाज।। ॐ हीं अर्ह जिनकुञ्जगय नम अर्घ्य० ।।३।। टीप्न म्प तिहुँ लोक्मे, है प्रचण्ड पन्ताप । भक्तनको नित देन है, भोग शिवमुख आप।। ॐ हीं अहं जिनाय नम अर्घ्य० ।।३६।। रत्नत्रय मग माध कर, निद्ध भये भगवान । पूरण निजमुख धरत है, निजमे निज परिणाम ।। ॐ हीं अह जिनधौर्याय नम अर्घ्य० ।।३७।। तीन लोकके नाथ हो, ज्यू तागगण मृय । परमपद, बदो श्रीजिन धूय्य ।। ॐ हीं अर्ह जिनघूर्याय नम अर्घ्य० ।।३८।। पराधीन विन परमपद, तुम विन लह न आर । उत्तमातमा मे नम्, तीन लोक शिग्मोर ।। ॐ हीं अर्ह जिनोत्तमाय नम अय० ।।३९।। जहा न दुखको लेश है, तहाँ न परमो कार । तुम बिन कहूँ न श्रेष्ठता, तीन लोक दुखटार ।। ॐ हीं अहं त्रिलोकदुखनिवारकाय नम अय० ।। ४०।। पूर्ण रूप निज लक्ष्मी, पाइ श्री जिनराज । परमश्रेय परमातमा, वदू शिवमुख शिवमुख साज।। ॐ हीं अहं जिनवराय नम अर्घ्य० ।।४१।। निरभय हो निर आश्रयी, आश्रयी, नि सगी निवध । निजसाधन साधक सुगुन, परमो नहिं नवध ।। ॐ हीं अर्ह जिननि सगाय नम अर्घ्य० ।।४२।। अन्तराय विधि नाशके, निजानन्द भयो प्राप्त । 'सन्त' नमैं कर जोरयत, भव-दुख करो समाप्त ।। ॐ हीं अर्ह जिनोद्वाहायन नम अर्घ्य ।।४३।। .
अष्टम पूजा ] [ १८३ शिवमारग मे धरत हो, जग मारगते काढ़ । धर्मधुरन्धर मैं नमू, पाऊ भव वन बाढ़।। ॐ हीं अहं जिनवृषभाय नमः अध्य० ।।४४।। धर्मनाथ धर्मेश हो, धर्म तीर्थ करतार । रहो सुथिर निजधर्म मे, मैं बदू सुखकार ।। ॐहीं अहं जिनधर्माय नम अयं ।।४५।। जगत जीव विधि धूलि सो, लिप्त न लहैं प्रभाव । रत्नराशि सम तुम दिपो, निर्मल सहज सुभाव।। ॐ हीं अहं जिनरत्नाय नम अयं ।।४६।। तीन लोकके शिखर पर, राजत हो विख्यात । तुम सम और न जगतमे, बडा कोई दिखलात ।। ॐहीं अहं जिनोरसाय नम अy० ।।४७।। इन्द्रिय मन व्यापार बहु, मोह शत्रु को जीत । लहो जिनेश्वर सिद्धपद, तीन लोक के मीत।। ॐ ह्रीं अहँ जिनेशाय नम अध्य० ।।४।। चारि घातिया कर्मको, नाश कियो जिनराय । घाति-अघाति विनाश जिन, अन भये सुखदाय।। ॐ हीं अहं जिनाग्राय नम अध्य० ।।४९।। निज पौरुषकर साधियो, निज पुरुषारथ सार । अन्य सहाय नही चहैं, निज सुवीर्य अपार ।। ॐ हीं अहं जिनशार्दूलाय नम अर्घ्य० ।।५०।। इन्द्रादिक नित ध्यावते, तुम सम और न कोय । तीन लोक चूडामणि, नमू, सिद्धसुख होय।। ॐ हीं अहं जिनपुगवाय नम अर्घ्य० ॥५१॥ निजानन्द पदको लहो, अविरोधी मल नास । समकित बिन तिहुँलोकमे, और नही सुखरास ।। ॐ ह्रीं अहं जिनप्रवेकाय नम अय॑ ।।५२।। जगत शत्रु को जीतिके, कल्पित जिन कहलाय । मोहशत्रु जीते सु जिन, उत्तम सिद्ध सुखाय ।। ॐ ह्रीं अहं जिनहसाय नम अर्घ्य० ।।५३।।
१८४] [ सिद्धचक्रविधान द्रव्य-भाव दोनो नही, उत्तम शिवसुख लीन । मनवचतन करि मै नमू, निज समभाव जु कीन।। ॐ हीं अहं जिनोत्तमसुखधारकाय नम अर्घ्य० ।।५४।। चार सघ नायक प्रभू, शिवमग सुलभ कराय । तारण तरण जहान के, मैं बदू शिवराय ।। ॐ हीं अह जिननायकाय नम अy० ।।५।। स्वयबुद्ध शिवमार्ग मे, आप चले अनिवार । भविजन अग्रेश्वर भये बदू भक्ति विचार ।। ॐ हीं अहं जिनाग्रिमाय नम अर्घ्य० ॥५६।। शिवमारगके चिह्न हो, सुखसागरकी पाल । शिवपुरके तुम हो धनी, धर्म नगर प्रतिपाल।। ॐ ह्रीं अहँ जिनग्रामण्यै नम अर्घ्य० ।।५७।। तुम सम और न जगत मे, उत्तम श्रेष्ठ कहाय । आप तिरे पर तारते, बदू तिनके पाय ।। ॐ हीं अहं जिनसत्तमाय नम अर्घ्यं ।।५।। स्व-पर कल्याणक हो प्रभू, पचकल्याणक ईश । श्रीपति शिव-शकर नमू, चरणाम्बुज धरि शीश ।। ॐ हीं अहं जिनप्रभवाय नम अर्घ्यं ।।५९।। मोह महाबल दलमलो, विजय लक्ष्मीनाथ । परमज्योति शिवपद लहो, चरण नमू धरि माथ ।। ॐ हीं अहं परमजिनाय नम अy० ।।६।। चहुँ गति दुःख विनाशिया, पूरा निज पुरुषार्थ । नमू सिद्ध कर-जोरिकैं, पाऊ मैं सर्वार्थ ।। ॐ हीं अहँ जिनचतुर्गतिदुखान्तकाय नम अय० ।।६१॥ जीते कर्म निकृष्ट को, श्रेष्ठ भये जिनदेव । तुम सम और न जगत मे, बदू मैं तिन भेव।। ॐ हीं अहं जिनश्रेष्वय नम अर्घ्य० ।।६२।। आप मोक्षमग साधियो, औरन सुलभ कराय । आदि पुरुष तुम जगत मे, धर्म रीत वरताय ।। ॐ हीं अहं जिनज्येष्ठाय नम अर्घ्यं ।।६३।।
No text on this page.
कर्म । आत्मा, १८६ ] [ सिद्धचक्रविधान रागादिक मल बिन दिपो, शुद्ध सुवर्ण समान । शुद्ध निरजन पद लियो, नमू चरण धरि ध्यान।। ॐ हीं अहं निरजनाय नम अy० ।।७४।। द्रव्य-भाव दो विधि करम, नाशि भये शिवराय । बन्दू मनवचकाय करि, भविजन को सुखदाय ।। ॐ ह्रीं अह कर्मविनाशकाय नम अर्घ्य० ।।७।। ज्ञानावर्णी आदि ले, चार घतिया तिनको अत खिपाइके, लियो मोक्षपद पर्म।। ॐ हीं अहं घातिकर्मान्तकाय नम अय० ॥७६।। ज्ञानावरण पटल बिन, ज्ञान दीप्त परकाश । शुद्ध सिद्ध परमातमा, बंदित भवदुख नाश।। ॐ हीं अहं जिनदीप्तये नम अर्घ्य० ।।७७।। कर्म रुलावे रागदिक उपजाय । तिनको मर्म विनाशकैं, सिद्ध भये सुखदाय ।। ॐ हीं अहं कर्ममभिदे नम अय॑ ।।७।। पाप कलाप न लेश है, शुद्धाशुद्ध विख्यात । मुनि मन मोहन रूप है नमू जोरि जुग हाथ ।। ॐ हीं अहं अनुदयाय नम अय० ॥७९।। राग नही थुतिकारसो, निंदकसो नही द्वेष शम सुखिया सुखिया आनन्दघन, बदू सिद्ध हमेश।। ॐ ह्रीं अहं वीतरागाय नम अय० ।।८।। क्षुधा वेदनी नाशकार, भुजनहार । निजानन्द सतुष्ट है, बदू भाव विचार।। ॐ हीं अहं अक्षुधाय नम अy० ।।१।। एक दृष्टि सबको लखे, इष्ट-अनिष्ट न कोय । द्वेष अश व्यापै नही, सिद्ध कहावत सोय।। ॐ हीं अहं अद्वेषाय नम अy० ।।२।। भवसागर के तीर है, शिवपुरके है राहि । मिथ्यातम-हर सूर्य है, मैं बदू हूँ ताहि ।। ॐ हीं अहं निर्मोहाय नम अर्घ्य० ।।३।। स्व-सुख
No text on this page.
नमू सिद्ध पाऊ अलक्ष।। १८८ ] [ सिद्धचक्रविधान भ्रम बिन, ज्ञान प्रकाश मे, भासें जीव-अजीव । सशय बिन निश्चल सुखी, बदू सिद्ध सदीव।। ॐहीं अहं नि सशयाय नम अयं ।।९।। तुम पूरण परमातमा, सदा रहो इक सार । जरा न व्यापै तुम विषै, नमू सिद्ध अविकार।। ही अहं निर्जराय नम अय० ।।९।। तुम पूरण परमातमा, अन्त कभी नही होय । मरण रहित बदू सदा, देउ अमर पद सोय।। ॐ हीं अहं अमराय नम अयं ।।९६।। निजानन्द के भोगमे, कभी न आरत आय । याते तुम अरतीत हो, बदू सिद्ध सुहाय ।। ॐ हीं अहं अरत्यतीताय नम अयं० ।।९७।। होत नही सोच न कभू, ज्ञान धरै परतक्ष । परमातमा, ज्ञान ॐ हीं अहं निश्चिताय नम अध्य० ।।९।। जानत हैं सब ज्ञेय को, पर ज्ञेयनतै भिन्न । याते निर्विषयी कहे, लेश न भोगै अन्य ।। ॐ हीं अहं निर्विषयाय नम अयं ।।९९।। अहकार आदिक त्रिषट्, तुम पद निवसै नाहिं । सिद्ध भये परमात्मा, बन्दू हूँ ताहि ।। ॐ हीं अहं त्रिषष्ठिजिते नम अर्घ्य० ।।१०।। जेते गुण परजाय है, द्रव्य अनन्त सुकाल । तिनको तुम जानो प्रभु, बदू मैं नमि भाल।। ॐ हीं अहं सर्वज्ञाय नम अर्घ्य० ।।१०१।। ज्ञान-आरसी तुम विषै, झलके ज्ञेय अनन्त । सिद्ध भये तिनको नमे, तीनो काल सु सत ।। ॐ हीं अर्ह सर्वविदे नम अर्घ्य ।।१०२।। चक्षु अचक्षु न भेद है, समदर्शी भगवान । नमू सिद्ध परमातमा, तीनो योग ॐ हीं अहं सर्वदर्शिन नम अर्घ्य० ।।१०३।। मै प्रधान ।।
No text on this page.
| मिरविधा '. =ोर । ग --पयाय विश। हा सोपानद नम अध्य० ।।११४।। ति दिन गाना निगम *आ आनन्दाय नम अध्य० ।।११५।। कान्ति व दन 7 विभप ।। ॐ आ मदानाय नम २० ।।११६।। मित न हार । - उ. माग।। * र महादयार नम अव्य० ।।१७।। म HT नी | 11 . मा निन्याय नम अगा० ।।११८।। मिन i. ।। प्रागन नम भरल 117011 . मा : ती 37 मानद नम ||१०।। . - 4. .
No text on this page.
१९२ ] सिद्धचक्रविधा आतमको गुण ज्ञान है, यही यथारथ होय । ज्ञानानन्द ऐश्वर्यता, उदय भयो है सोय।। ॐ हीं अर्ह आत्ममहोदयाय नम अर्ध्य० ।।१३४।। दर्श ज्ञान सुख वीर्यको, पाय परम पद होय । सो परमातम तुम भये, नमू जोर कर दोय।। ॐ हीं अह परमात्मने नम अर्थ्य० ।।१३५।। मोहकर्म के नाशते शान्ति भये सुखदेन । क्षोभरहित प्रशान्त हो, शात नमू सुख लेन।। ॐ हीं अहं प्रशान्तात्मने नम अर्घ्य० ॥१३६।। पूरण पद तुम पाइयो, यातै परे न कोय । तुम समान नही और है, बदू हूँ पद दोय।। ॐ हीं अहं परमात्मने नम अय० ।।१३७।। पुद्गल कृत तन छारकै निज आतममे वास । स्व-प्रदेश गृहके विषै, नित ही करत विलास ।। ॐ हीं अहं आत्मनिकेतनाय नम अय० ।।१३८।। औरन को नित देत है, शिवसुख भोगै आप । परम इष्ट तम हो सदा, निजसम करत मिलाप ।। ॐ हीं अहं परमेष्ठिने नम अy० ।।१३९।। मोक्ष-लक्ष्मी नाथ हो, भक्तन प्रति नित देत । महा इष्ट कहलात हो, बदू शिवसुख हेत । ॐ ह्रीं अहं महितात्मने नम अर्घ्य० ॥१४०।। रागादिक मल नाशिक, श्रेष्ठ भये जगमाहि । सो उपासना करणको, तुम सम कोई नाहिं।। ॐ ह्रीं अहं श्रेष्यत्मने नम अर्घ्य० ।।१४१।। परमे ममत विनाशकै, स्वै आतम थिर धार । पर-विकल्प सकल्प बिन, तिष्ठो सुख-आधार ।। ॐ हीं अहं स्वात्मनिष्ठिताय नम अयं० ।।१४२।। स्वै-आतममे मग्न है, स्वै-आतम लवलीन । परमे भ्रमण करैं नही, 'सन्त' चरण शिर दीन ।। ॐहीं अहं ब्रह्मनिष्ठाय नम अय० ॥१४३।।
No text on this page.
जान-दर्श १९४ ] [ सिद्धचक्रविधान आवर्ण विन दीपो नतानत । सकल ने प्रतिभाम है, तुम्है नमे नित 'मत' ।। ॐहीं अह अनतदीप्तये नम अर्घ्य० ।।१५४।। इक इक गुण प्रतिछेद को, पार न पायो जाय । नो गुण रान अनत हैं, वढ़ निनके गय ।। ॐ ह्रीं अर्ह अनन्तात्मने नम अयं० ।।१५५।। अहमिदन की शक्ति जो, कगे अननी गन । मो तुन शक्ति अनत गुण, रे अनत प्रकाश।। ॐ हीं अह अनतशक्तये नम अर्घ्य० ।।१५६।। मायक दशन जोति मे, मे, निरावरण परकान । नो अनत दृग तुम धरौ, नमैं चरण नित नाम ।। ॐ हीं अर्ह अनतदर्शये नम अर्घ्य० ।।१५७।। जाकी शक्ति अपार है, हेत-अहेत प्रसिद्ध । गणघरादि जानत नही, मैं वदू नित निद्ध ।। ॐ ह्रीं अहं अनतशक्तये नम अर्घ्य० ।।१५८।। चंतन शक्ति अनत है, निरावरण जो होय । यो तुम पागे सहज ही, कर्म पुजको खोय ।। ॐ ह्रीं अर्ह अनतचिदेशाय नम अर्घ्य० ।।१५९।। जो मुख है निज आश्रये मो मुख परमे नाहि । निजानन्द रन लीन है, मैं बदू हूँ ताहि ।। ॐ हीं अहं अनतमुदे नम अर्घ्य० ।।१६०।। जाकै कर्म लिपै न फिर, दिपै सना निरधार । मदा प्रकाशजु नहित है वढू योग मम्हार ।। ॐ हीं अर्ह सदाप्रकाशाय नम अर्घ्य।।१६१।। निजानन्द के माहि हैं, सव अर्थ परसिद्ध । मो तुम पायो महज ही, नमत मिले नवनिद्ध ।। ॐ हीं अर्ह सर्वार्थसिद्धेभ्यो नम अयं० ।।१६२।। अति सूक्षम जे अर्थ हैं, काय अकाय कहाय । माक्षात् मवको लयो वन्दू तिनके पाय।। ॐ हीं अहं साक्षात्कारिणे नम अy० ।।१६३।।
अष्टम पूजा ] [ १९५ सकल-गुणनमय द्रव्य हो, शुद्ध सुभाव प्रकाश । तुम समान नही दूसरो, वन्दत पूरे आस ।। ॐही आहे समग्रर्द्धये नम. अर्घ्य।।१६४।। सर्व कर्मको छीन करि, जरी जेवरी सार । सो तुम धूलि उडाइयो, बदू भक्ति विचार ।। ॐहीं अहं कर्मक्षीणाय नम अर्घ्य० ॥१६५।। चहुँ गति जगत कहात है, ताको करि विध्वश । अमर अचल शिवपुर वसै, भर्म न राखो अश।। ॐ हीं अहं जगद्विध्यसिने नम अयं ॥१६६।। इन्द्री मन व्यापार मे, जाको नहिं अधिकार । सो अलक्ष आतम प्रभू, होउ सुमति दातार ।। ॐ हीं अहं अलक्षात्मने नम अर्घ्यं ।।१६७।। नही चलाचल अचल हैं, नही भ्रमण थिर धार । सो शिवपुर मे वसत हैं, बदू भक्ति विचार।। ॐ हीं अहं अचलस्थानाय नम अy० ॥१६८।। पर कृत निमित विगाड हैं, सोई दुविधा जान । सो तुममें नही लेश है, निराबाध परणाम ।। ॐ ह्रीं अहं निरावाधाय नम अर्घ्य० ॥१६९।। जैसे हो तुम आदिमे, सोई हो तुम अन्त । एक भांति निवसो सदा, बदत है नित 'सत' ।। ॐही अहं अप्रताय नम अर्घ्यं ।।१७०।। धर्मनाथ जगदीश हो, सुर मुनि मार्ने आन । मिथ्यामत नही चलत है, तुम आगे परमाण ।। ॐ ह्रीं अहं धर्मचक्रिणे नम अर्ध्य० ।।१७१।। ज्ञान शक्ति उत्कृष्ट है, धर्म सर्व तिस माहिं । श्रेष्ठ ज्ञानतम पुञ्ज हो, परनिमित्त कछु नाहिं ।। ॐ हीं अहं विवावराय नम अय० ॥१७२।। निज अभाव से मुक्त हो, कहैं कुवादी लोग । भूतात्मा सो मुक्त हैं, सो तुम पायो जोग।। ॐ हीं अहं भूतात्मने नम अर्घ्य० ।।१७३।।
- १९६ ] [ सिद्धचक्रविधान सहज सुभाव प्रकाशियो, परनिमित्त कछु नाहिं । सो तुम पायो सुलभते, स्वसुभाव के माहि ।। ॐ हीं अहं सहजज्योतिषे नम अर्घ्यं ।।१७४।। विश्व नाम तिहुँ लोकमे, तिसमे करत प्रकाश । विश्वज्योति कहलात है, नमत मोहतम नाश।। ॐ हीं अह विश्वज्योतिषे नम अर्घ्य ।।१७५।। फरश आदि मन इन्द्रिया, द्वार ज्ञान कछु नाहिं । याते अतिइन्द्रिय कहो, जिन-सिद्धात के माहिं ।। ॐ हीं अहं अतीन्द्रियाय नम अर्घ्य० ।।१७६।। एक मान असहाय हो, शुद्ध बुद्ध निर अश । केवल तुमको धर्म है, नमे तुम्हे नित 'सत' ।। ॐ हीं अह केवलाय नम अयं०।।१७७।। लौकिक जन या लोकमे, तुम सारू गुण नाहिं । केवल तुमही मे बसैं, मै बदू हूँ ताहि ।। ॐ हीं अह केवलालोकाय नम अर्घ्यं ।।१७८।। लोक अनन्त कहो सही, तातें नन्तानन्त । है अलोक अवलोकियो, तुम्हें नमे नित 'सत' ।। ॐ हीं अहं लोकालोकावलोकाय नम अर्घ्य० ।।१७९।। ज्ञान द्वार निज शक्ति हो, फैलो लोकालोक । भिन्न-भिन्न सब जानियो, नमू चरण दे धोक ।। ॐ हीं अहं विवृताय नम अर्घ्य० ।।१०।। बिन सहाय निज शक्ति हो, प्रकटो आपोआप । स्वयबुद्ध स्वै-सिद्ध हो, नमत नसै सब पाप ।। ॐ हीं अह केवलावलोकाय नम अय॑ ।।१८१।। सूक्षम सुभग सुभावते, मन इन्द्रिय नहिं ज्ञात । वचन अगोचर गुण धरै, नमू चरन दिन-रात ।। ॐ ह्रीं अह अव्यक्ताय नम अयं ।।१८२।। कर्म उदय दुख भोगवै, सर्व जीव ससार । तिन सबको तुमही शरण, देहो सुक्ख अपार।। ॐ हीं अहं सर्वशरणाय नम अर्घ्य।।१३।।
अष्टम पूजा ] [ १९७ चितवनमे आवै नही, पा न पावे कोय । महा विभवके हो धनी, नमू जोर कर दोय।। ॐ हीं अहं अचित्यविभवाय नम अर्ध्य० ।।१८४।। छहो कायके वासको, विश्व कहै सब लोक । तिनके थभनहार हो, राज काज के जोग ।। ॐ हीं अहँ विश्वभृते नम अy० ।।१८।। घट-घट में राजो सदा, ज्ञान द्वार सब ठौर । विश्व रूप जीवात्म हो, तीन लोक सिरमौर।। ॐ हीं अह विश्वरूपात्मने नम अर्घ्य० ॥१८६।। घट-घट मे नित-व्याप्त हो, ज्यो घर दीपक जोति । विश्वनाथ तुम नाम है, पूजत शिवसुख होत।। ॐ हीं अर्ह विश्वात्मने नम अप॑ ।।१७।। इन्द्रादिक जे विश्वपति, तुम पद पूजै आन । याते मुखिया हो सही, मे पूजू धरि ध्यान ।। " ही अर्ह विश्वतोमुखाय नम. अय० ।।१८।। ज्ञान द्वार सब जगत मे, च्यापि रहे भगवान । विश्व व्यापि मुनि कहत हैं, ज्यू नभ मे शशि भान ।। ॐ ह्रीं अहं विश्वव्यापिने नम अर्ध्य० ।।१८९।। निरावरण निरलेप हैं, तेज रूप विख्यात । ज्ञान कला पूरण धरै, मैं बदू दिन रात।। ॐ हीं अहँ स्वयजोतिषे नम अयं ।।१९०।। चितवन मे आ नही, धारै सुगण अपार । मन वच काय नमू सदा, मिटै सकल ससार ।। ॐ हीं अह अचिंत्यात्मने नम अj०।।१९१।। नय प्रमाणको गमन नही, स्वय ज्योति परकाश । अद्भुत गुण पर्याय में, सुखसू करै विलास ।। ॐ हीं अह अमितप्रभावाय नम अy० ।।१९२।। मती आदि क्रमवत बिन, बिन, केवल लक्ष्मीनाथ । महाबोध तुम नाम है, नमू पाय धरि माथ ।। ॐ हीं अहं महाबोधाय नम अय० ।।१९३।।
नहीं, १९८ ] [ सिखचक्रयिधान कर्मयोगते जगत मे, जीव शक्ति को नाश । स्वय वीर्य अद्भुत धर, नमू चरण मुखगम ।। ॐ हीं अर्ह महावीर्याय नम जय० ।।१९४।। क्षायक लब्धि महान है, ताको लाभ लहाय । महालाभ यातें कहे, बद तिनके पाय।। ॐ हीं अहं महालाभाय नम अध्य० ।।१९५।। ज्ञानावरणादिक पटल, छायो आतम ज्योति । ताको नाश भये विमल दीप्त ल्प उद्योत ।। ॐ हीं अहं महोदयाय नम अध्यं० ।।१९६।। ज्ञानानन्द स्व लक्ष्मी को, भोग बाधाहीन । पचम गति मे वास है, नमू जोग पद लीन ।। ॐ हीं अर्ह महाभोगसुगतये नम अयं० ।।१९७।। पर निमित्त जामे स्व-आनन्द अपार । परमानन्द है, भोगे भोगे निज आधार ।। ॐ हीं अर्ह महाभोगाय नम अयं० ।।१९।। दर्श ज्ञान सुख भोगते, नेक न वाधा होय । अतुल वीर्य तुम धरत हो, मैं बदू हूँ सोय।। ॐ ही अहं अतुलवीर्याय नम अर्घ्यं ।।१९९।। शिवस्वरूप आनन्दमय, आनन्दमय, क्रीडा करत विलास । महादेव कहलात हैं, वन्दत रिपुगण नाश ।। ॐ हीं अहं यज्ञार्हाय नम अयं ० ।।२०।। महाभाग शिवगति लहो, ता सम भान न और । सोई भगवत है प्रभू, नमू पदाम्बुज ठौर ।। ॐ हीं अहं भगवते नम अयं० ।।२०१।। तीन लोक के पूज्य हैं, तीन लोक के स्वामि । कर्म-शत्रु को छय कियो, तातै अरहत नाम ।। ॐहीं अहं अर्हते नम अयं ।।२०२।। सुरनर पूजत चरण युग, द्रव्य अर्थ जुत भाव । महा-अर्घ तुम नाम है, पूजत कर्म अभाव ।। ॐ हीं अहं महााय नम अय० ।।२०३।।
No text on this page.
ध्यावतें, २०० ] [ सिद्धचक्रविधान अचल शिवालय के विर्षे, अमित काल रहैं राज । चिरजीवी कहलात हो, बदू शिवसुख काज ।। ॐ हीं अहँ बनायुषे नम अर्घ्य० ।।२१४।। मरण रहित शिवपद लसै, काल अनन्तानन्त । दीर्घायु तुम नाम है, बन्दत नित प्रति 'सत' ।। ॐ हीं अहं दीर्घायुषे नम अर्घ्य १२१५।। सकल तत्व के अर्थ कहि, निराबाध निरशस । धर्म मार्ग प्रकटाइयो, नमत मिटै दुख अश।। ॐ हीं अहँ अर्थवाचे नम अर्घ्य० ।।२१६।। मुनिजन नितप्रति ध्यावतें, पावे निज कल्याण । सज्जन जन आराध्य हो, मैं ध्याऊ धरि ध्यान ।। ॐ ह्रीं अर्ह सज्जनवल्लभाय नम अy० ।।२१७।। शिवसुख जाको पावै सन्त, मुनीन्द्र । परमाराध्य कहात हो, पायो नाम अतीन्द्र ।। ॐ हीं अह परमाराध्याय नम अy० ।।२१।। पचकल्याण प्रसिद्ध हैं, गर्भ आदि निर्वाण । देवन करि पूजित भये, पायो शिव सुख थान ।। ॐ हीं अहं पचकल्याणपूजिताय नम अयं० ।।२१९।। देखो लोकालोक को, हस्त रेख की सार । इत्यादिक गुण तुम विर्षे, दीखै उदय अपार ।। ॐ हीं अहँ दर्शनविशुद्धिगुणोदयाय नम अर्घ्य० ॥२२०।। क्षायक समकित को धरै, सौधर्मादिक इन्द्र । तुम पूजन परभावते, अन्तिम होय जिनेन्द्र ।। ॐ हीं अहं सुरार्चिताय नम अर्घ्य० ।।२२१।। निर्विकल्प शुभ चिन्ह है, वीतराग सो होय । सो तुम पायो सहज ही, नमू जोर कर दोय ।। ॐ हीं अहं सुखदात्मने नम अy० ।।२२२।। स्वर्ग आदि सुख थान के, हो परकाशन हार । दीप्त रूप बलवान है, तुम मारग सुखकार ।। ॐ हीं अहं दिवौजसे नम अयं ।।२२३।।
ते , अष्टम पूजा ] [२०१ गर्भ कल्याणक के विरूँ, तुम माता सुखकार । पट् कुमारिका सेवती, पावै भवदधि पार।। ॐ हीं अहं शचीसेवितमातृकाय नम अर्घ्य० ।।२२४।। अति उत्तम तुम गर्भ है, भवदुख जन्म निवार । रत्नराशि दिवलोक वर्षे मूसलाधार।। ॐ हीं अहं रत्नगर्भाय नम अय० ।।२२५।। सुर शोधन ते गर्भ मे, दर्पण सम आकार । यो पवित्र तुम गर्भ है, पावै शिव सुख सार ।। ॐ हीं अहं पूतगर्भाय नम अर्घ्य० ।।२२६।। जाके गर्भागमन तें, पहले उतसव ठान । दिव्य नारि मगल सहित, पूजत श्री भगवान ।। ॐ ह्रीं अहं गर्भोत्सवसहिताय नम अy० ।।२२७।। नित-नित आनन्द उर धरै, सुर सुरीय हरषात । मगल साज समाज सब, उपजावें दिन-रात ।। ॐहीं अहं नित्योपचारोपचरिताय नम अर्घ्य०।२२८।। केवलज्ञान सु लक्षमी, धरत महा 'विस्तार । चरणकमल सुर मुनि जजै, हम पूजत हितधार ।। ॐ हीं अहं पद्मप्रभवे नम अर्घ्य।।२२९।। तिविध विधि-मल धोयकर, उज्ज्वल निर्मल होय । शिव आलय मे वसत हैं, शुद्ध सिद्ध है सोय ।। ॐ हीं अहं निखलाय नम अर्घ्यं ।।२३०।। असख्यात परदेश मे, अन्य प्रदेश न होय । स्वय स्वभाव स्वजात हैं, मैं प्रणमामी सोय । ॐ हीं अहं स्वयस्वभावाय नम अय० ।।२३१।। पूज्य यज्ञ आराधना, जो कुछ भक्ति प्रमाण, । तुम ही सबके मूल हो, नमत अमगल हा ॐ हीं अहं सर्वीयजन्मेन नम अर्घ्य।।२३२।। सूर्य सुमेरु समान हो, या सुरतरु की ठौर । महा पुन्य की राशि हो, सिद्ध नमू कर जोर ।। ॐ हीं अह पुण्यागाय नम अय॑ ।।२३३।।
२०२ ] [ सिद्धचक्रविधान ज्यू सूरज मध्यान्ह मे, दिपै अनत प्रभाव । त्यो तुम ज्ञानकला दिौ, मिथ्या तिमिर अभाव ।। ॐ हीं अहं भास्वते नम अर्घ्यं ।।२३४।। चहुँविधि देवन मे सदा, तुम सम देव न आन । निजानद मे केलिकर, पूजत हूँ धरि ध्यान ।। ॐ हीं अहं अद्भुतदेवाय नम अर्य० ।।२३५।। विश्व ज्ञान युगपत धरै, ज्यू दर्पण आकार । स्वपर प्रकाशक हो सही, नमू भक्ति उरधार।। ॐ हीं अहं विश्वज्ञातृसम्भृते नम अy० ।।२३६।। सत-स्वरूप सत-ज्ञान है, तुम ही पूज्य प्रधान । पूजत है नित विश्वजन, देव मान परमान ।। ॐ हीं अहं विश्वदेवाय नम अयं ।।२३७।। सृष्टि को सुख करत हो, हरत दुक्ख भववास । मोक्ष लक्षमी देत हो, जन्म-जरा-मृत नास ।। ॐ हीं अहँ सृष्टिनिर्वृत्ताय नम अय० ।।२३८।। इन्द्र सहस लोचन किये, निरखत रूप अपार । मोक्ष लहै मैं पूजू मनधार।। ॐ हीं अहँ सहस्राक्षदृगुत्सवाय नम अयं० ।।२३९।। सपूरण निज शक्ति के, है परताप अनन्त । सो तुम विस्तीरण करो, नमे चरण नित सत।। ॐ ह्रीं अर्ह सर्वशक्तये नम अy० ।।२४०।। ऐरावत रूढ है, देव नृत्यता माड । पूजत है सो भक्ति सो, मेटि भवार्णव हाड ।। ॐ हीं अहं देवैरावतासीनाय नम अर्घ्यं ।।२४१।। सुर नर चारण मुनि जर्जें, सुलभ गमन आकाश । परिपूरण हर्षात है, पूरे मन की आश।। ॐ हींअहँहर्षाकुलामरखगचारणर्षिमतोत्सवाय नम अर्घ्य० ।।२४२।। रक्षक हो षट् काय के, शरणागति प्रतिपाल । सर्वव्यापि निज-ज्ञानतै, निहाल।। ॐ हीं अहँ विष्णवे नम अy० ।।२४३।। सो नेमतें, पर पूजत होय अष्टम पूजा ] [२०३ महा उच्च आसन प्रभू, है आसन प्रभू, है सुमेर विख्यात । जन्माभिषेक सुरेन्द्र करि, पूजत मन उमगात ।। ॐ हीं अर्ह स्नानपीठैतादृसराजे नम अयं० ।।२४४।। जाकर तरिए तीर्थ सो, मानें मुनि गणमान्य । तुम सम कौन जु श्रेष्ठ है, असत्यार्थ है अन्य ।। ॐ हीं अहं तीर्थसामान्यदुग्दाब्धये नम अयं० ।।२४५।। लोकस्नान गिलानता, मेटै मैल शरीर । आतम प्रक्षालित कियो, तुमही ज्ञान सु नीर ।। ॐ हीं अहं स्नानाम्बूस्वावासवाय नम अर्घ्य० ॥२४६।। तारण तरण सुभाव है, तीन लोक विख्यात । ज्यू सुगध चम्पाकली, गन्धमई कहलात ।। ॐ ह्रीं अहँ गन्धपवित्रितत्रिलोकाय नम अy० ।।२४७।। सूक्ष्म तथा स्थूल मे, ज्ञान करै परवेश । जाको तुम जानो नही, खाली रहो न देश।। ॐ हीं अहं वज्रसूचये नम अर्घ्य।।२४८।। औरन प्रति आनन्द करि, निर्मल शुचि आचार । आप पवित्र भये प्रभू, कर्म धूलि को टार ।। ॐ हीं अहं शुचिश्रवसे नम अy० ।।२४९।। कर्मों करि किरतार्थ हो, कृत फल उत्तम पाय । कर पर कर राजत प्रभू, बदू हूँ युग पाय ।। ॐ हीं अर्ह कृतार्थकृतहस्ताय नम अय० ।।२५०।। दर्शन इन्द्र आघात हैं, इष्ट मान उर मांहि । कर्म नाशि शिवपुर बसैं, मैं वदू हूँ ताहि ।। ॐ ह्रीं अहं शक्रष्टाय नम अy० ।।२५१।। मधवा जाके नृत्य करि, ताके तृप्ति महान । सो मैं उनको जजत हूँ, होय कम की हान । ॐ हीं अर्ह इन्द्रनृत्यतृप्तिकाय नम अर्घ्य।।२५२।। शची इन्द्र अरु काम ये, जिन दामन के दाम । निश्चय मनमे नमन कर, नित वदित पद जाम ।। ॐ हीं अहं शचीविस्मापिताय नम अय॑ ।।२५३।।
२०४ ] [ सिद्धचक्रविधान जिनके सनमुख नृत्य करि, इन्द्र हर्प उपजाय । जन्म सुफल मानें सदा, हम पर होउ महाय ।। ॐ हीं अहं शक्रारब्धानदनृत्याय नम अर्घ्य० ।।२५४।। धन सुवर्ण ते लोक मे, पूरण इच्छा होय । चक्रवर्ती पद पाइये, तुम पूजत हैं सोय ।। ॐ हीं अहं रैदपूर्णमनोरथाय नम अर्घ्य० ।।२५५।। तुम आज्ञा मे है सदा, आप मनोरथ मान । इन्द्र सदा सेवन करै, पाप विनाशक जान । ॐ हीं अर्ह आज्ञार्थीन्द्रकृतसेवाय नम अर्घ्य० ।।२५६।। सब देवन मे श्रेष्ठ हो, सव देवन सिरताज । सब देवन के इष्ट हो, वदत सुलभ सुकाज ।। ॐ हीं अहं देवश्रेष्ठाय नम अर्घ्य० ।।२५७।। तीन लोक मे उच्च हो, तीन लोक परशस । सो शिवगति पायो प्रभू, जजत कर्म विध्वस ।। ॐ हीं अह शिवौद्यमानाय नम अयं ।।२५८।। जगत्पूज्य शिवनाथ हो, तुम ही द्रव्य विशिष्ट । हित उपदेशक परमगुरु, मुनिजन माने इष्ट ।। ॐ हीं अहं जगत्पूज्यशिवनाथाय नम अर्घ्य० ।।२५९।। मति, श्रुत, अवधि अवर्ण को, नाश कियो स्वयमेव । केवल ज्ञान स्वतै लियो, आप स्वयभू ॐ हीं अहँ स्वयभुवे नम अy० ।।२६०।। समोसरण अद्भुत महा, और लहै नही कोय । धनपति रचो उछाह सो, मैं पूजू हूँ सोय ।। ॐ हीं अहँ कुवेररचितस्थानाय नम अy० ।।२६१।। जाको अन्त न हो कभी, ज्ञान लक्षमी नाथ । सोई शिवपुर के धनी, नमू भाव धरि नाथ ।। ॐ हीं अहँ अनन्तश्रीजुषे नम अर्यं० ।।२६२।। गणधरादि नित ध्यावते, पावै शिवपुर वास । परम ध्येय तुम नाम है, पूरै मन की आश।। ॐ ह्रीं अह योगीश्वरार्चिताय नम अर्घ्य० ।।२६३।। देव ।।
अष्टम पूजा ] [२०५ परमब्रह्म का लाभ हो, तुम पद पायो सार । त्रिभुवन ज्ञाता हो सही, नय निश्चय-व्यवहार ।। ॐ हीं अहं ब्रह्मविदे नम अर्घ्य० ।।२६४।। सर्व तत्त्वके आदिमे, ब्रह्म तत्त्व परधान । तिसके ज्ञाता हो प्रभू, मै बदू धरि ध्यान ।। ॐ ह्रीं अहं ब्रह्मतत्त्वाय नम अर्घ्य० ।।२६५।। द्रव्य भाव द्वै विधि कही, यज्ञ यजनकी रीति । सो सब तुमही हेत है, रचत नशै सब भीति ।। ॐ हीं अहं यज्ञपतये नम अy० ।।२६६।। महादेव शिवनाथ हो, तुमको पूजत लोक । मैं पूजू हूँ भाव सौ, मेटो मनको शोक ।। ॐ हीं अहं शिवनाथाय नम अय० ।।२६७।। कृत्य भये निज भाव मे, सिद्ध भये सब काज । पायो निज पुरुषार्थको, बदू सिद्ध समाज ।। ॐ हीं अहं कृतकृत्याय नम अy० ।।२६८।। यज्ञविधान के अग हो, मुख नामी परधान । तुम विन यज्ञ न हो कभी, पूजत हो कल्यान ।। ॐ हीं अहँ यज्ञागाय नम अर्ध्य० ।।२६९।। मरण रोग के हरण से, अमर भये हो आप । शरणागत को अमरकर, अमृत हो निष्पाप ।। ॐ हीं अहं अमृताय नम अयं ० ।।२७०।। पूजन विधि स्थान हो, पूजत शिवसुख होय । सुरनर नित पूजन करै, मिथ्या मतिको खोय।। ॐ हीं अहं यज्ञाय नम अर्घ्य० ।।२७१।। जो हो सो सामान्य कर, धरत विशेष अनेक । वस्तु सुभाव यही कहो, बदू सिद्ध प्रत्येक ।। ॐ हीं अर्ह वस्तुत्पादकाय नम अयं ।।२७२।। इन्द्र सदा तुम युति करें, मनमे भक्ति उपाय । सर्वशास्त्र में तुम थुति, गणधर्गाद करि गाय ।। ॐ हीं अर्ह स्तुतीश्वराय नम अर्घ्य० ।।२७३।।
२०६] [ सिद्धचक्रविधान मगन रहो निज तत्त्वमे, द्रव्य भाव विधि नाश । जो है सो है विविध विध, नमू अचल अविनाश।। ॐ हीं अहं भावाय नम अर्घ्य० ।।२७४।। तीन लोक सिरताज हैं, इन्द्रादिक करि पूज्य । धर्मनाथ प्रतिपाल जग, और नही है दूज्य ।। ॐ हीं अहं महपतये नम अy० ।।२७५।। महाभाग सरधानते, तुम अनुभव करि जीव । सो पुनि सेवत पाप तज, निजसुख लहैं सदीव ।। ही अहं महायज्ञाय नम अयं ।।२७६।। यज्ञ-विधि उपदेशमे, तुम अग्रेश्वर जान । यज्ञ रचावनहार तुम, तुम ही हो यजमान ।। ॐ हीं अहं अग्रयाजकाय नम अर्घ्य० ।।२७७।। तीन लोकके पूज्य हो, भक्तिभाव उर धार । धर्म-अर्थ अरु मोक्षके, दाता तुम हो सार ।। ॐ हीं अहँ जगत्पूज्याय नम अj० ।।२७८।। दया मोह पर पापते, दूर भये स्वैतत्र । ब्रह्मज्ञानमे लय सदा, जपू नाम तुम मत्र ।। ॐ हीं अहं दयापराय नम अy० ।।२७९।। तुम ही पूजन योग्य हो, तुम ही हो आराध्य । महा साधु सुख हेतुते, साधे है निज साध्य ।। ॐ हीं अहं पूज्यााय नम अर्घ्यं० ।।२८०।। निज पुरुषारथ सघनको, तुमको अर्चत जक्त । मनवांछित दातार हो, शिव सुख पावै भक्त ।। ॐ हीं अहं जगदार्चिताय नम अy० ।।२८१।। ध्यावत है नितप्रति तुम्हें, देव चार परकार । तुम देवनके देव हो, नमू भक्ति उर धार ।। ॐ हीं अहं देवाधिदेवाय नम अर्घ्यं ।।२८२।। इन्द्र समान न भक्त हैं, तुम समान नही देव । ध्यावत है नित भावसो, मोक्ष लहैं स्वयमेव ।। ॐ हीं अर्ह शक्राच्चिताय नम अर्घ्य० ।।२८३।। .
[२०७ स्वलक्ष्मी, अष्टम पूजा ] तुम देवन के देव हो, सदा पूजने योग्य । जे पूजत हैं भावसो, भोगें शिवसुख भोग ।। ॐ हीं अहं देवदेवाय नम अयं ।।२८४।। तीन लोक सिरताज हो, तुम से वडा न कोय । सुरनर पशु खग ध्यावते, दुविधा मन की खोय।। ॐ हीं अहं जगद्गुरवे नम अयं।।२८५।। जो हो सो ही तुम सही, नही समझमे आय । सुरनर मुनि सब ध्यावते, तुम वाणीको पाय । ॐ हीं अहं देवसघाचार्याय नम अर्घ्य० ।।२८६।। ज्ञानानन्द ताके हो भरतार । स्वसुगध वासित रहो, कमल गधकी सार।। ॐ हीं अहं पद्मनन्दाय नम अर्घ्य० ॥२८७॥ सब कुवादि वादी हते, वन शैल उनहार । विजयध्वजा फहरात हैं, बदू भक्ति विचार ।। ॐ हीं अह जयध्वजाय नम अर्घ्य० ।।२८८।। दशो दिशा परकाश है, तिनकी ज्योति अमद । भविजन कुमुद विकास हो, वदू पूरणचद ।। ॐ ह्रीं अहं भामण्डलिने नम अर्घ्य० ।।२८९।। चमरनि करि भक्ति करें, देव चार परकार । यह विभूति तुम ही, विर्षे, बदू पाप निवार ।। ॐ हीं अहं चतु षटीचामराय नम अय॑० ।।२९०।। देव दुदुभी शब्द करि, सदा करें जयकार । आप परसिद्ध हो, ढोल शब्द उनहार ।। ॐ ह्रीं अहं देवदुभिये नम अर्घ्य० ।।२९१।। तुम वाणी सव मनन कर, समझत है इक्नार । अक्षरार्थ नही भम पडे, सशय मोह निवार।। ॐ हीं अर्ह वाङ्स्पष्टाय नम अय० ।।२९२।। धनपति रचि तुम आमन, महा प्रभूता जान । तथा स्व-आसन पाइयो, अचल रहो शिवधान।। ॐ हीं अहं लब्धासनाय नम अध्य० ।।२९३।। - गलाय । गावै शुभ गुण गान । २०८] [ सिद्धचक्रावधान तीन लोकके नाथ हो, तीन छत्र विख्यात । भव्य-जीव तुम छाहमे, सदा स्व-आनद पात ।। ॐ हीं अहं छत्रत्रयाय नम अय० ।।२९४।। पुष्प वृष्टि सुर करत हैं, तीनो काल मझार । तुम सुगध दशदिश रमी, भविजन भ्रमर निहार।। ॐ हीं अहं पुष्पवृष्टये नम अय० ।।२९५।। देवन रचित अशोक है, वृक्ष महा रमणीक । समोसरण शोभा प्रभु, शोक निवारण ठीक ।। ॐ हीं अहं दिव्याशोकाय नम अर्घ्य० ।।२९६।। मानस्तम्भ निहारके कुमतिन मान समोसरण प्रभुता कहै, नमू भक्ति उर लाय ।। ॐ हीं अहं मानस्थम्भाय नम अयं० ।।२९७।। सुरदेवी सगीत कर, भक्ति भाव उरमे जगे, बदत श्री भगवान।। ॐ हीं अहं सगीतार्हाय नम अy० ।।२९८।। मगल सूचक चिह्न हैं, कहे अष्ट परकार । तुम समीप राजत सदा, नमू अमगल टार।। ॐ हीं अर्ह अष्टमगलाय नम अयं ।।२९९।। भविजन तरिये तीर्थ सो, तुम हो श्रीभगवान । कोई न भगे आन जिन, तीर्थचक्र सो जान ।। ॐ हीं अहं तीर्थचक्रवर्तिन नम अर्घ्य० ।।३००।। सम्यग्दर्शन धरत हो, निश्चै परमवगाढ़ । सशय आदिक मेटिके, नासो सकल विगाढ ।। ॐ हीं अहं सुदर्शनाय नम अर्घ्य० ।।३०१।। कर्ता हो शिव काजके, ब्रह्मा जगकी रीति । वर्णाश्रम को थापके, प्रकटायी शुभ नीति ।। ॐ हीं अहं करें नम अध्य० ।।३०२।। धर्म प्रतिपालके, पोषत हो ससार । यदि श्रावक दो धर्मके, भये नाथ सुखकार ।। ॐहीं अहं तीर्थभर्ने नम अयं ।।३०३।। सत्य [२०९ अष्टम पूजा ] धर्मतीर्थ मुनिराज हैं, तिनके हो तुम स्वामि । धर्म नाथ तुम जानके, नितप्रति करू प्रणाम ।। ॐ हीं अहं धर्म तीर्थेशाय नम अy० ।।३०४।। लोक तीर्थ मे गिनत है, धर्मतीर्थ परधान । सो तुम राजत हो सदा, मैं बन्दू धरि ध्यान ।। ॐ हीं अहं धर्मतीर्थकराय नम अय० ।।३०५।। तुम बिन धर्म न हो कभी, ढूढो सकल जहान । दश-लक्षण स्वधर्मके, तीरथ हो परधान ।। ॐ हीं अहं धर्मतीर्थयुवाय नम अर्घ्य० ।।३०६।। धर्म तीर्थ करतार हो, श्रावक या मुनिराज । दोनो विधि उत्तम कहो, स्वर्ग मोक्ष के काज।। ॐ हीं अर्ह धर्मतीर्थकराय नम अय० ।।३०७।। तुमसे धर्म चले सदा, तुम्ही धर्म के मूल । सुरनर मुनि पूर्जे सदा, छिदहिं कर्म के शूल ।। ॐ हीं अहं तीर्थप्रवत्तकाय नम अध्य० ।।३०८।। धर्मनाथ जगमे प्रगट, तारण तरण जिहाज । तीन लोक अधिपति कहो, बन्दू सुख के काज।। ॐ हीं अहं तीर्थवेधसे नम अy० ।।३०९।। श्रावक या या मुनि मुनि धर्मके, हो दिखलावनहार । अन्य लिंग नहीं धर्मके, बुधजन लखो विचार ।। ॐ हीं अहं तीर्थविधायकाय नम अय० ।।३१०।। स्वर्ग मोक्ष दातार हो, तुम्ही मार्ग सुखदान । अन्य कुभेषिनमे नही, नही, धर्म यथारथ ज्ञान ।। ॐ हीं अर्ह सत्यतीर्थकराय नम अय॑ ।।३११।। सेवन योग्य सु जगतमे, तुम्ही तीर्थ हो सार । सुरनर मुनि सेवन करें, मैं बन्दू सुखकार ।। ॐ हीं अह तीर्थसेव्याय नम अर्घ्य० ।।३१२।। भवि समुद्र भवसे तिरै, सो तुम तीर्थ कहाय । हो तारण तिहुँ लोकमे, सेवत हूँ तुम पाय ।। ॐ हीं अह तीर्थतारकाय नम अर्य० ।।३१३।।
! प्रवनंगे तन २१० ] [निहाविधान नवं अर्थ जाना नरनिर इ नुन चैन । सनानं गजत हो ऐन।। *ही अह मन्यवाक्याधिपाय नम अय० ।।१४।। धनं नाग पन्गट को ने भानन महलाय । गे नगर आप हो नि- नग्न व्हाय।। ही अर्ह मत्यगामनाय नम अर्य० ।।१५।। नगर नन न हों नानावन्न वनाम । नेम्बर मत मन ही मिन्ट मन प्रगा। ॐ हीं अर्ह अप्रनिशामनाय नम अय॑ ।।१६।। न्हैं क्यान इन्ने न्न वन मुलका । में नगर्ने नाघिणे नर नि-व्यव्हार ।। ॐही अर्ह न्याहादिने नम अर्थ्य० ।।१७।। निर जनर गनी टि वियत्र की गन्न । अजग हो गगर्दै न्न न्यन मन अन्ज।। ॐ हीं अहं दिव्यध्वनये नम अर्य० ।।१।। नय प्रनाग नहीं हान हैं तुन पना भयं । मिन्ट धन बिमैं नहीं गिनत हैं ।। ही अर्ह अव्याहनार्याय नम अर्घ्य ।।१९।। * गन - आना अशुभ क्न्ल लोय । पहुँचा उर्च नगान तुन दिलायो नोय।। ॐ हीं अहं पुण्यबाचे नम अर्ध्य० ।।३२०।। चान्य तुन भायों मन्यव विर्षे प्रधान । निया निवाग अनुन पान ॐहीं अर्ह अर्यबाचे नम अर्य० ।।३२१।। देव तिगायनों वित ही अजगर्य न्य होय । नियध्वनि निश्चय नभाय नमो वाय।। ॐ हीं अर्ह अर्द्धमागधीयुक्तये नम अर्घ्य० ।।२२।। नब जीवनमा इट है गेम निजानन्द बन । नो तुन्ने दिलाइणे नाय नह दिनाश।। ॐहीं अर्ह इष्टवाचे नम अर्ध्य० ।।२३।। मनान ।
पूजू तिनके पाय।। अष्टम पूजा ] [२११ नय प्रमाण ही कहत हैं, द्रव पर्याय सु भेद । अनेकान्त साधे सही, वस्तु भेद निरखेद ।। ॐ हीं अह अनेकातदर्शिन नम अर्घ्य० ॥३२४।। दुर्नय कहत एकातको, ताको अन्त ताको अन्त कराय । सम्यक्मति प्रकटाइयो, ॐ हीं अहं दुर्नयातकाय नम अर्घ्य० ।।३२५।। एक पक्ष मिथ्यात्व है, ताको तिमिर निवार । स्याद्वाद सम न्यायते, भविजन तारे पार ।। ॐ हीं अहँ एकातध्वातभिदे नम अर्ध्य० ॥३२६।। जो है सो निज भावमे, रहै सदा निरवार । मोक्ष साध्यमे सार है, सम्यक् विर्षे अपार ।। ॐ हीं अहं तत्त्ववाचे नम अय० ।।३२७।। निज गुण निज परयायमे, सदा रहो निरभेद । शुद्ध बुद्ध अव्यक्त हो, पूजूं हूँ निरखेद ।। ॐ हीं अहं पृथक्कृते नम अर्ध्य।।३२८।। स्यात्कार उद्योतकर, वस्तु धर्म तासु ध्वजा निर्विघ्नको, भाषो विधि विध्वस ।। ॐ हीं अहं स्यात्कारध्वजावाचे नम अर्ध्य० ।।३२९।। परम्परा इह धर्मको, उपदेशो श्रुत द्वार । भवि भव सागर-तीर लह, पायो शिवसुखकार ।। ॐ हीं अहं वाचे नम अय० ॥३३०।। द्रव्य दृष्टि नहिं पुरुष-कृत, है अनादि परमान । सो तुम भाष्यौ हैं सही, यह पर्याय सुजान ।। ॐ हीं अहं अपौरुषेयवाचे नम अर्घ्य० ।।३३१।। नही चलाचल होठ हो, जिस वाणी के होत । सो मैं बदू हो किया-मोक्षमार्ग उद्योत।। ॐ हीं अहं अचलोष्ठवाचे नम अy० ।।३३२।। तुम सन्तान अनादि है, शाश्वत नित्य स्वरूप । पाऊँ शिव-सुख कूप ।। ॐहीं अहं शाश्वताय नम अयं ।।३३३।। निरशस । तुमको बदू भावसो, २१२ ] [ सिद्धचक्रविधान हीनादिक वा और विधि, नही विरुद्धता जान । एक रूप सामान्य है, सब ही सुखकी खान ।। ॐ हीं अहं अविरुद्धाय नम अय० ।।३३४।। नय विवक्ष ते सधत है, सप्त भग निरवाध । सो तुम भाष्यो नमत हूँ, वस्तु रूपको साध ।। ॐ हीं अहं सप्तभगीवाचे नम अय॑ ।।३३५।। अक्षर विन वाणी खिरे, सर्व अर्थ करि युक्त । भविजन निज सरधानते, पावै जगते मुक्त ।। ॐ हीं अहं अवर्णगिरे नम अर्घ्यं ।।३३६।। क्षुद्र तथा अक्षुद्र मय, सव भाषा परकाश । सुख मुखते खिरकै करै, भर्म तिमिरको नाश।। ॐ हीं अहं सर्वभाषामयगिरे नम अर्घ्य० ।।३३७।। कहने योग्य समर्थ सब, अर्थ करै परकाश । तुम वाणी मुखते खिरे, करै भरम-तम नाश।। ॐ हीं अहं व्यक्तिगिरे नम अर्घ्य० ।।३३८।। तुम वाणी नही व्यर्थ है, भग कभी नही होय । लगातार मुखते खिरे, सशय तमको खोय।। ॐ हीं अहं अमोघवाचे नम अर्घ्य० ।।३३९।। वस्तु अनन्त पर्याय है, वचन अगोचर जान । तुम दिखलाये सहज ही, हरी कुमति मतिवान ।। ॐ ह्रीं अहं अवाच्यानन्तवाचे नम अयं० ।।३४०।। वचन अगोचर गुण धरो, लहैं न गणधर पार । तुम महिमा तुमही विर्षे, मुझ तारो भवपार ।। ॐ हीं अहं अवाचे नम अy० ।।३४१।। तुम सम वचन न कहि सकै, असतमती छद्मस्थ । धर्म मार्ग प्रकटाइयो, मेटी कुमति समस्त।। ॐ हीं अह अद्वैतगिरे नम अर्घ्य० ।।३४२।। सत्य प्रिय तुम बैन हैं, हित-मित भविजन हेत । सो मुनिजन तुम ध्यावते, पार्दै शिवपुर खेत ।। ॐ हीं अहं सूनृतगिरे नम अर्घ्य० ।।३४३।।
अष्टम पूजा ] [२१३ नही साच नही झूठ है, अनुभव वचन कहात । सो तीर्थंकर ध्वनि कही, सत्यारथ सत बात ।। ॐ हीं अहं सत्यानुभयगिरे नम अर्घ्य० ।।३४४।। मिथ्या अर्थ प्रकाश करि, कुगिरा ताकौ नाम । सत्यारथ उद्योत करै, सुगिरा ताको नाम ।। ॐ हीं अर्ह सुगिरे नम अर्घ्य० ॥३४५।। योजन एक चहूँ दिशा, हो वाणी विस्तार । श्रवण सुनत भविजन लहै, आनद हिये अपार ।। ॐ हीं अह योजनव्यापिगिरे नम अy०।।३४६।। निर्मल क्षीर समान हैं, गौर श्वेत तुम बैन । पाप मलिनता रहित हैं, सत्य प्रकाशक ऐन ।। ॐ हीं अहं क्षीरगौरगिरे नम अयं ।।३४७।। तीर्थ तत्व जो नही तजैं, तारण भविजन वान । याते तीर्थकर प्रभू, नमत पाप मल हान।। ॐ हीं अहं तीर्थतत्त्वगिरे नम अर्घ्य० ॥३४८।। उत्तमार्थ पर्याय करि, आत्मतत्व को जान । सो तुम सत्यारथ कहो, मुनि जन उत्तम मान ।। ॐ ह्रीं अहं परमार्थंगवे नम अय॑ ।।३४९।। भव्यनिको श्रवणनि सुखद, तुम वाणी सुख देन । मैं बदू हू भाव सो, धर्म बतायो ऐन ।। ॐ हीं अह भव्यैकश्रवणगिरे नम अय० ।।३५०।। सशय विभ्रम मोह को, नाश करै निर्मूल । सत्य वचन परमाण तुम, छेदत मिथ्या शूल ।। ॐ हीं अहं सद्गवे नम अy० ।।३५१।। तुम वाणी मे प्रकट है, सब सामान्य विशेष । नानाविध सुन तर्क मे, सशय रहै न शेष ।। ॐ हीं अहं चित्रगवे नम अयं ।।३५२।। परम कहै उतकृष्टको, अर्थ होय गम्भीर । सो तुम वाणी मे खिरै, बदत भवदधि तीर।। ॐ हीं अर्ह परमार्थगवे नम अयं० ।।३५३।।
- करि, धार।। २१४ ] [ सिद्धचक्रविधान मोह क्षोभ परशात हो, तुम वाणी उरधार । भविजन को सतुष्ट कर, भव आताप निवार ।। ॐ हीं अहं प्रशातगवे नम अर्घ्य० ।।३५४।। वारह सभासु प्रश्न कर, समाधान करतार । मिथ्यामति विध्वस वदू मनमे ॐ हीं अहं प्राश्निकगिरे नम अर्घ्य० ।।३५५।। महापुरुष महादेव हो, सुर नर पूजन योग । वाणी सुन मिथ्यात तज, पावे शिवमुख भोग ।। ॐ हीं अहं याज्युश्रुतये नम अj० ।।३५६।। शिव मग उपदेशक सुश्रुत, मन मे अर्थ विचार । साक्षात् उपदेश तुम, तारे भविजन पार ।। ॐ हीं अहं सुश्रुतये नम, अर्घ्य० ।।३५७।। तुम समान तिहुँ लोक मे, नही अर्थ परकाश । भविजन सम्बोधे सदा, मिथ्यामति को नाश।। ॐ हीं अर्ह महाश्रुतये नम अy० ।।३५८।। जो निजात्म-कल्याण मे, वरतै सो उपदेश । धर्म नाम तिस जानियो, बदू चरण हमेश ।। ॐ हीं अहं धर्मश्रुतये नम अर्घ्यं० ।।३५९।। जिन शासन के अधिपति, शिवमारग बतलाय । वा भविजन सतुष्ट करि, बदू तिनके पाय ।। ॐ हीं अहं श्रुतपतये नम अयं० ।।३६०।। धारण हो उपदेश के, केवल ज्ञान सयुक्त । शिव मारग दिखलात हो, तुमको बदन युक्त।। ॐ ह्रीं अहं श्रुतधृताय नम अर्घ्य० ।।३६१।। जैसो है तैसो कहो, परम्पराय सु रीत । सत्यारथ उपदेश तें, धर्म मार्ग की रीत।। ॐ हीं अहं धुवश्रुतये नम अर्घ्य० ॥३६२।। मोक्ष मार्ग को देखियो, औरन को दिखलाय । तुम सम हितकारक नही, बदू हूँ तिन पाय।। ॐ हीं अहं निर्वाणमार्गोपदेशकाय नम अy० ।।३६३।। - दृष्टा लोकालोक रेखा अष्टम पूजा ] [२१५ स्वर्ग मोक्ष मारग कहो, यति श्रावक को धर्म । तुमको बन्दत सुख महा, लहै ब्रह्म पद पर्म ।। ॐ हीं अहँ यतिश्रावकमार्गदशकाय नम अy० ।।३६४।। तत्व अतत्वसु जानियो, तुम सब ही परतक्ष । निज-आतम सतुष्ट हो, देखो लक्ष अलक्ष।। ॐ हीं अहं तत्वमार्गदृशे नम अर्घ्य० ॥३६५।। सार तत्व वर्णन कियो, अयथार्थ मत नाश । स्वपर-प्रकाशक हो महा, बदे तिनको दास।। ॐही अर्ह सारतत्त्व-यथार्थाय नम अj०।।३६६।। आप तीर्थ औरन प्रति, सर्व तीर्थ करतार । उत्तम शिवपुर पहुँचना, यही विशेषण सार।। ॐ हीं अहं परमोत्तमतीर्थकृताय नम अर्घ्य० ।।३६७।। लोकालोक के, हस्त समान । युगपत सबको देखिये, कियो भर्म तम हान ।। ॐ हीं अहं दृष्टाय नम अय० ।।३६८।। जिनवाणी के रसिक हो, तासो रति दिन रैन । भोगोपभोग करो सदा, बदत ह्वै सुख चैन।। ॐ हीं अहं वाग्मीश्वराय नम अर्घ्य० ।।३६९।। जो ससार समुद्र से, पार करत सो धर्म । तुम उपदेश्या धर्म कू, नमत मिटै भव भर्म ।। ॐ हीं अहं धर्मशासनाय नम अय० ।।३७०।। धर्म रूप उपदेश है, भवि जीवन हितकार । मैं बदू तिनको सदा, भवार्णव पार।। ॐ हीं अहं धर्मदशकाय नम अर्य॥३७१।। सब विद्या के ईश हो, पूरन ज्ञान सुजान । तिनको बदू भाव से, पाऊ ज्ञान महान ।। ॐ ह्रीं अहं वागीश्वराय नम अय० ॥३७२।। सुमति नार भरतार को, कुमति कुसौत विडार । मैं पूजू हूँ भाव सो, पाऊ सुमती सार।। ॐ हीं अहं त्रयीनाथाय अर्घ्य० ।।३७३।। करौ २१६ ] [ सिद्धचक्रविधान - धर्म अर्थ अरु मोक्ष के, हो दाता भगवान । मैं नित-प्रति पायन परू, देहु परम कल्याण ।। ॐ हीं अहं त्रिभगीशाय नम अय० ।।३७४।। गिरा कहै जिन वचन को, तिसका अन्त सु धर्म । मोक्ष करै भवि-जनन को, नाशै मिथ्या भर्म ।। ॐ हीं अहं गिरापतये नम अयं ।।३७५।। जाकी सीमा मोक्ष है, मोक्ष है, पूरण सुख स्थान । शरणागत को सिद्ध है, नमू सिद्ध धरि ध्यान ।। ॐ ह्रीं अहं सिद्धागाय नम अय॑ ।।३७६।। नय-प्रमाणसो सिद्ध है, तुम वाणी रवि सार । मिथ्या तिमिर निवार कैं, करै भव्य जन पार ।। ॐ हीं अहं सिद्धवाङ्मयाय नम अy० ।।३७७।। निज पुरुषारथ साधकैं, सिद्ध भये सुखकार । मन वच तन करि मैं नमू, करो जगतसै पार ।। ॐ हीं अर्ह सिद्धाय नम अy० ।।३७८।। सिद्ध करै निज अर्थ को, तुम शासन हितकार । भवि जन मानै सरदहै, करै कर्म रज छार ।। ॐ हीं अहं सिद्धशासनाय नम अर्घ्यं ।।३७९।। तीन लोक मे सिद्ध है, तुम प्रसिद्ध सिद्धान्त । अनेकान्त परकाश कर, नाशै मिथ्या ध्वात ।। ॐ हीं अहं जगप्रसिद्धसिद्धाताय नम अय० ।।३८०।। ओकार यह मत्र है, तीन लोक परसिद्ध । तुम साधक कहलात हो, जपत मिलै नवनिद्ध ।। ॐ हीं अहं सिद्धमत्राय नम अयं ।।३८१।। सिद्ध यज्ञ को कहत है, सशय विभ्रम नाश । मोक्षमार्ग निजानन्द परकाश।। ॐ हीं अह सिद्धवाचे नम अय० ।।३८२।। मोहरूप मलसो दुरी, वाणी कही पवित्र । भव्य स्वच्छता धारिके, लहै मोक्ष पद तत्र ।। ॐ हीं अहं शुचिवाचे नम अयं० ।।३८३।। मे ले धरै,
No text on this page.
२१८] [ सिद्धबक्रविधान देवा महा ध्वनि करत हैं, तुम सन्मुख धर भाव । केवल अतिशय कहत हैं, मैं पूजू युत चाव ।। ॐ हीं अहँ दुदुभीश्वराय नम अर्घ्य० ॥३९४।। इन्द्रादिक नित पूजते, भक्ति पूर्व शिर नाय । त्रिभुवन नाथ कहातहो, हम पूजत नित पाँय।। ॐ हीं अहं त्रिभुवननाथाय नम अय० ॥३९५।। गणी मुनीश फनीशपति, कलपेन्द्र के नाथ । अहमिन्द्रन के नाथ हो, तुमहि नमू धरि माथ।। ॐ हीं अहं महानाथाय नम अयं० ।।३९६।। भिन्न-भिन्न देख्यो सकल, लोकालोक अनन्त । तुम सम दृष्टि न औरकी, तुमैं नमे नित 'सन्त' ।। ही अहँ परदृष्टे नम अय० ।।३९७।। सब जगके भरतार हो, मुनिगणमे परधान । तुमको पूर्जे भावसो, होत होत सदा कल्याण।। ॐ हीं अर्ह जगत्पतये नम अy० ।।३९८।। श्रावक या मुनिराज हो, तुम आज्ञा शिर धार । वरतें धर्म पुरुषार्थ मे, पूजत हूँ सुखकार ।। ॐ हीं अहं स्वामिने नम अय॑ ।।३९९।। धर्म कार्य करता सही, हो ब्रह्मा परमार्थ मालिक हो तिहुँ लोकके, पूजीनीक सत्यार्थ ।। ॐ हीं अहँ कत्रे नम अj०।।४००।। तीन लोकके नाथ हो, शरणागत प्रतिपाल । चार सघके अधिपती, पूजू हूँ नमि भाल ।। ॐ हीं अहं चतुर्विघसघाधिपतये नम अयं।। ४०१।। तुम सम और विभव नही, धरो चतुष्ट अनत । क्यो न करो उद्धार अब, दास कहावै 'सत' ।। ॐ हीं अर्ह अद्वितीयविभवधारकाय नम अर्घ्य।।४०२।। जामे विघन न हो कभी, ऐसी श्रेष्ठ विभूत । पाई निज पुरुषार्थ करि, पूजन शुभ करतूत ।। ॐ हीं अहं प्रभवे नम अर्घ्य० ।।४०३।।
अष्टम पूजा ] [२१९ तुम सम शक्ति न औरकी, शिवलक्ष्मी को पाय । भौगै सुख स्वाधीन कर, बदू जिनके पाय ।। ॐ ह्रीं अहं अद्वितीयशक्तितधारकाय नम अय० ॥४०४।। तुमसे अधिक न औरमे, पुरुषारथ कहुँ पाई । हो अधीश सब जगतके, बदू जिनके पाइ।। ॐ हीं अहं अधीश्वराय नम अy० ।।४०५।। अग्रेश्वर चउ सघ के, शिवनायक शिरमौर । पूजत हूँ नित भावसो, शीश दोऊ कर जोर।। ॐ हीं अर्ह अधीशाय नम अय० ।।४०६।। सहज सुभाव प्रयत्न बिन, तीन लोक आधीश । शुद्ध सुभाव विराजते, बन्दू पद धर शीश।। ॐ हीं अहं सर्वाधीशाय नम अर्घ्यं ।।४०७।। क्षायक सुमति सुहावनी, बीजभूत तिस जान । तुमसे शिवमारग चलै, मैं बदू धरि ध्यान।। ॐ हीं अर्ह अधीशित्रे नम अर्घ्यं ।।४०८।। स्वयबुद्ध शिवनाथ हो, धर्मतीर्थ करतार । तुम सम सुमति न को धरै, मैं बदू निरधार ।। ॐ हीं अहं धर्मतीर्थकर्त्रे नम अयं ।।४०९।। पूरण शक्ति सुभाव धर, पूजत ब्रह्म प्रकाश । पूरण पद पायो प्रभू, पूजत पाप विनाश।। ॐ हीं अहं पूर्णपदप्राप्ताय नम अय० ।।४१०।। तुमसे अधिक न और है, त्रिभुवन ईश कहाय । तीन लोक अत्यन्त सुख, पायो बदू ताय ।। ॐ हीं अहं त्रिलोकाधिपतये नम अy० ।।४११।। तीन लोक पूजत चरण, ईश्वर तुमको जान । मैं पूजो हो भावसो, हो भावसो, सबसे बडे महान ।। ॐ हीं अहं ईशाय नम अर्घ्य० ॥४१२।। सूरज सम परकाशा कर, मिथ्यातम परिहार । भविजन कमल प्रबोधको, पायो निज हितकार।। ॐ हीं अहं ईशानाय नम अy०॥४१३।।
सब २२० ] [ सिद्धचक्रविधान क्रीडा करि शिवमार्ग मे, पाय परमपद आप । आज्ञा भग न हो कभी, बदत नाशे पाप ।। ॐ हीं अर्ह इन्द्राय नम अय० ।।४१४।। उत्तम हो तिहुँ लोकमे, सबके हो सिरताज । शरणागत प्रतिपाल हो, पूजू आतम काज ।। ॐ हीं अहं त्रिलोकोत्तमाय नम अy० ।।४१५।। अधिक भूतिके हो धनी, सुखी सर्व निरधार । सुरनर तुम पदको लहैं, पूजत हूँ सुखकार ।। ॐ हीं अहं अधिभुवे नम अर्घ्य० ।।४१६।। तीन लोक कल्याणकर, धर्म मार्ग बतलाय । देवनके देव हो, महादेव सुखदाय।। ॐ ह्रीं अहं महेश्वराय नम अy०।।४१७।। महा ईश महाराज हो, महा प्रताप धराय । महा जीव पूजे चरण, सब जन शरण सहाय ।। ॐ हीं अहं महेशाय नम अर्घ्य० ।।४१८।। परम कहो उत्कृष्टको, धर्म तीर्थ बरताय । परमेश्वर याते भये, ॐ हीं अहं परमेश्वराय नम अy० ।।४१९।। तुम समान कोई नही, जग ईश्वर जगनाथ । महा विभव ऐश्वर्य को, धरो नमू निज माथ ।। ॐ हीं अह महेशिने नम अयं ।।४२०।। चार प्रकानके सदा, देव तुम्हें शिर नाय । सब देवनमे श्रेष्ठ हो, नमू युगल तुम पाय ।। ॐ हीं अह अधिदेवाय नम अय॑ ।।४२१।। तुम समान नहिं देव अरु, तुम देवनके देव । यो महान पदवी धरौ, तुम पूजत हूँ एव ।। ॐ हीं अहं महादेवाय नम अय० ।।४२२।। शिवमारग तुममे सही, देव पूजने योग । सहचारी तुम सुगुण हैं, और कुदेव अयोग।। ॐ ह्रीं अहं देवाय नम अर्ध्य॥४२३।। बदू तिनके पाय।।
[ २२१ अष्टम पूजा ] तीन लोक पूजत चरण, तुम आज्ञा शिर धार । त्रिभुवन ईश्वर हो सही, मैं पूजू निरधार ।। ॐ हीं अहं त्रिभुवनेश्वराय नम अर्घ्य० ।।४२४।। विश्वपती तुमको नमैं, निज कल्याण विचार । सर्व विश्व के तुम पती, मैं पूजू उर धार।। ॐ ह्रीं अर्ह विश्वेशाय नम अy० ।।४२५।। जगत जीव कल्याण कर, लोकालोक अनन्द । षट्कायिक आह्लादकर, जिम कुमोदनी चद।। ॐ हीं अहं विश्वभूतेशाय नम अर्घ्य० ।।४२६।। इन्द्रादिक जे विश्वपति, तुमको पूजत आन । याते तुम विश्वेश सो, साच नम धर ध्यान।। ॐ हीं अहं विश्वेशाय नम अर्घ्य० ।।४२७।। विश्व बन्ध दृढ़ तोडके, विश्व शिखर ठहराय । चरण कमल तल जगत है, यू सब पूजत पाय।। ॐ हीं अह विश्वेश्वराय नम अयं ।।४२८।। शिवमारगकी रीति तुम, बरतायो शुभ योग । तिहूँ काल तिहुँ लोकमे, और कुनीति अयोग।। ॐ हीं अहं अधिराजे नम अयं ।।४२९।। लोक तिमिर हर सूर्य हो, तारण लोक जिहाज । लोकशिखर राजत प्रभू, मैं बन्दू हित काज।। ॐ हीं अर्ह लोकेश्वराय नम अर्घ्य० ।।४३०।। तीन लोक प्रतिपाल हो, तीन लोक हितकार । तीन लोक तारण तरण, तीन लोक सरदार ।। ॐ हीं अहँ लोकपतये नम अy० ।।४३१।। लोक-पूज्य सुखकार हो, पूजत हैं हित धार । मैं पूजो नित भाव सो, करो भवार्णव पार ।। ॐ हीं अह लोकनाथाय नम अयं० ।।४३२।। पूजनीक जगमे सही, तुम्हें कहैं सब लोग । धर्म मार्ग प्रगटित कियो, याते पूजन योग ।। ॐ हीं अहं जगपूज्याय नम अर्घ्य० ।।४३३।।
२२२ ] [ सिद्धचक्रविधान ऊरध अधो सु मध्य है, तीन भाग यह लोक । तिनमे तुम उत्कृष्ट हो, तुम्हें देत नित धोक।। ॐ हीं अहं त्रिलोकनाथाय नम अयं ।।४३४।। तुम समान समरथ नही, तीन तीन लोकमे और । स्वय शिवालय राजते, स्वामी हो शिरमौर।। ॐ हीं अर्ह लोकेशाय नम अy० ।।४३५।। जगत नाथ जग ईश हो, जगपति पूजे पाय । मैं पूजू नित भाव युत, तारण तरण सहाय।। ॐ ह्रीं अहं जगन्नाथाय नम अय० ।।४३६।। महा भूति इस जगतमे, धारत हो निरभग । सब विभूति जग जीतिक, पायो सुख सरवग।। ॐ हीं अहं जगत्प्रभवे नम अर्घ्यं ।।४३७।। मुनि मन करण पवित्र हो, सब विभावको नाश । तुम को अजुलि जोरकर, नमू होत अघ नाश ।। ॐ हीं अहं पवित्राय नम अर्घ्य० ।।४३८।। परधान हो, ब्रह्मज्ञान परवीन । बध रहित शिव-सुख सहित, नमैं 'सत' आधीन ।। ॐ ह्रीं अहं पराक्रमाय नम अयं० ।।४३९।। जामे जन्म-मरण नही, लोकोत्तर कियो वास । अचल सुथिर राजै सदा, निजानद परकाश ।। ॐ हीं अहं परत्राय नम अर्घ्य० ।।४४०।। मोहादिक रिपु जीत के, विजयवन्त कहलाय । जैत्र नाम परसिद्ध है, बदू तिनके पाय ।। ॐ हीं अहं जैत्रे नम अy० ।।४४१।। रक्षक हो षट् कायके, कर्म शत्रु क्षयकार । विजय लक्ष्मी नाथ हो, मैं पूजू सुखकार ।। ॐ हीं अह जिष्णवे नम अध्य० ।।४४२।। करता हो विधि कर्म के, हरता पाप विशेष । पुन्यपाप सु विभाग कर, भ्रम नही राखो लेश।। ॐ हीं अहं कत्रे नम अy० ।।४४३।। मोक्ष रूप
No text on this page.
२२४ ] [ सिद्धचक्रविधान तीन लोक की लक्ष्मी, तुम चरणावुज ठोर । यातै सब जग जीति के, राजत हो शिरमौर ।। ॐ ह्रीं अहं जगज्जेत्रे नम अर्घ्य० ।।४५४।। तीन लोक कल्याण कर, कर्म शत्रु को जीत । भव्यन प्रति आनद कर, मेटत तिनकी भीति ।। ॐ हीं अहँ जगज्जिष्णवे नम अयं।।४५५।। जग जीवन को अन्ध कर, फैलो मिथ्या घोर । धर्म मार्ग प्रकटाय कर, पहुँचायो शिव ठोर ।। ॐ हीं अहं जगन्नेत्राय नम अy० ।।४५६।। मोहादिक जिन जीतियो, सोइ जग मे नाम । सो तुम पद पायो महा, तुम पद करू प्रणाम ।। ॐ हीं अह जगज्जयिने नम अy० ।।४५७।। जो तुम धम प्रकट करि, जिय आनन्दित होय । अग्र भये कल्यान कर, तुम पद प्रणमू सोय ।। ॐ हीं अर्ह अग्रण्ये नम अर्घ्य० ।।४५८।। रक्षा करि षट् काय की, विषय-कषाय न लेश । त्रास हरो जमराज को, जयवन्तो ॐ हीं अहं दयामूर्तये नम अy० ।। ४५९।। सत्य असत्य लखन करै, सोई नेत्र कहाय । पुद्गल नेत्र न नेत्र हो, साचे नेत्र सुखाय ।। ॐ हीं अहं दिव्यनेत्राय नम अर्घ्य।।४६०।। सुर नर मुनि तुम ज्ञानते, जानै निज कल्याण । ईश्वर हो सब जगत के, आनद सपति खान ।। ॐ ह्रीं अर्ह अधीश्वराय नम अर्घ्य।।४६१।। धाभास मनोक्त के, मूल नाश कर दीन । सत्य मार्ग बतलाइयो, कियो भव्य सुख लीन ।। ॐ हीं अहँ धर्मनायकाय नम अy० ।।४६२।। ऋद्धिनमे परसिद्ध है, केवल ऋद्धि महान । सो तुम पायो सहज ही, योगीश्वर मुनि मान ।। ॐ हीं अहं ऋद्धीशाय नम अयं०।।४६३।। गुण शेष।।
अतुल वीयं अष्टम पूजा ] [२२५ जो प्राणी ससार मे, तिन सबके हितकार । आनद सो सव नमत हैं, पावै भवदधि पार ।। ॐ हीं अहं भूतनाथाय नम अमे० ।।४६४।। प्राणिन के भरतार हो, दुख टारन सुखकार । तुम आश्रय करि जीव सब, आनद लहैं अपार ।। ॐ हीं अहं भूतभर्ने नम अर्य० ।।४६५।। सत्य धर्म के मार्ग हो, ज्ञान मात्र निरशस । तुम ही आश्रय पाय के, रहै न अघ को अश।। ॐही अहं जगत्पात्रे नम अर्य० ।।४६६।। स्वशक्ति हो, जीते कर्म जरार । तुम सब बल नही और मे, होउ सहाय अवार।। ॐही अहं अतुलबलाय नम अर्य।।४६७।। धर्म मूर्ति धरमातमा, धर्म तीर्थ बरताय । स्वसुभाव सो धर्म है, पायो सहज उपाय ।। ॐ हीं अहं वृक्षाय नम अमे० ।।४६८।। हिंसा को वर्जित कियो, जे अपराध महान । परिग्रह अर आरभ के, त्यागी श्री भगवान ।। ॐहीं अहं परिग्रहत्यागीजिनाय नम अमे०।।४६९।। सर्व सिद्ध तुम सुलभ कर, पायो स्वय उपाय । साचे हो वश करण को, जग मे मत्र कराय।। ॐ हीं अहं मत्रकृते नम अय० ।।४७०।। जितने कछु शुभ चिन्ह हैं, दीप्त अशेष स्वरूप । शुभ लक्षण सोहत अति, सहजे तुम शिवभूप।। ॐही अर्ह शुभलक्षणाय नम अय० ।।४७१।। लोक विर्षे तुम मार्ग को, मानत हैं बुधवन्त । तर्क हेतु करुणा लिये, याते माने 'सत' ।। ॐ ह्रीं अहं लोकाध्यक्षाय नम अध्य० ।।४७२।। काहू के वश मे नही, काहू नमत न शीश । कठिन रीति धारै प्रभ, नम् सदा जगदीश।। ॐ ही अहं दुरोध्रष्टाय नम अय० ।।४७३।।
२२६ ] [ सिद्धचक्रविधान दासनि के प्रतिपाल कर, शरणागति हितकार । भवि दुखियन को पोष कर, दियो अखै पदसार ।। ॐ हीं अहं भव्यबन्धवे नम अर्घ्य० ।।४७४।। निराकरण करि कर्म को, सरल सिद्धगति धार । शिवथल जाय सु वास लहि, धर्मद्रव्य सहकार ।। ॐ हीं अहं निरस्तकाय नम अy० ।।४७५।। मुनि ध्यावै, पावे सुपद, निकट भव्य धरि ध्यान । पावे निज कल्याण नित, ध्यान योग तुम मान।। ॐ हीं अहं परमध्येयजिनाय नम अर्घ्यं ।।४७६।। रक्षक हो जग के सदा, धर्म दान दातार । पोषित हो सब जीव के, बदू भाव लगार ।। ॐ ह्रीं अहं जगत्तापहराय नम अy० ।।४७७।। मोह प्रचड बली जयो, अतुल वीर्य भगवान । शीघ्र गमन करि शिव गये, नमू हेत कल्याण । ॐ हीं अहं मोहारिजिताय नम अy० ।।४७८।। तीन लोक शिरमौर तुम, सब पूजत हरषाय । परमेश्वर हो जगत के, बदत हूँ तिन पाय ।। ॐ हीं अहं त्रिजगत्परमेश्वराय नम अयं ।।४७९।। लोक शिखर पर अचल नित, राजत है तिहुँ काल । सवोत्तम आसन लियो, लोक शिरोमणि भाल।। ॐ हीं अहं विश्वासिने नम अयं ।।४८०।। विश्वभूति प्राणीन के, ईश्वर हैं भगवान । सबके शिर पर पग धरै, सर्व आन तिन मान ।। ॐ हीं अहँ विश्वभूतेशाय नम अy० ।।४८१।। मोक्ष सपदा होत ही, नित अक्षय ऐश्वर्य । कौन मूढ कौडी लहै, सर्वोत्तम धनवर्य ।। ॐ हीं अहं विभवाय नम अS० ।।४८२।। त्रिभुवन ईश्वर हो तुम्ही, और जीव है रक । तुम तज चाहै और को, ऐसो कौ बुध बक ।। ॐ हीं अहं त्रिभुवनेश्वराय नम अय० ।।४८३।।
परणामसो, पाय । अष्टम पूजा ] [ २२७ उत्तरोत्तर तिहुँ लोक मे, दुर्लभ लब्धि कराय । तुम पद दुर्लभ कठिन है, महा भाग सो पाय ।। ॐ हीं अहं त्रिजगदुर्लभाय नम अy० ।।४८४।। बढ़वारी पूर्ण अभ्युदय भई अनत विशुद्धता, भये विशुद्ध अथाय ।। ॐ हीं अहं अभ्युदयाय नम अयं ।।४८५।। तीन लोक मगलकरण, दुखहारण सुखकार । हमको मगल द्यो महा, पूजो वारम्बार ।। ॐ हीं अहं त्रिजगन्मगलोदयाय नम अर्घ्यं ।।४८६।। आप धर्म के सामने, और धर्म लुप जाये । धर्मचक्र आयुध धरो, शत्रु नाश तव पाये।। ॐ हीं अहं धर्मचक्रायुधाय नम अर्ध्य।।४८७।। सत्य शक्ति तुम ही सही, सत्य पराक्रम जोर । है प्रसिद्ध इस जगतमे, कर्म शत्रु शिरमोर।। ॐ हीं अहं सद्योजाताय नम अर्घ्यं ।।४८८।। मगलमय मगलकरण, तीन लोक विख्यात । सुमरण ध्यानसु करत ही, सकल पाप नशि जात।। ॐ हीं अहं त्रिलोकमगलाय नम अयं ।।४८९।। द्रव्य-भाव दऊ वेद विन, स्वातम रति सुख मान । पर-आलिंगन रतिकरण, निरइच्छुक भगवान ।। ॐ ह्रीं अहं अवेदाय नम अयं० ।।४९०।। घातिरहित स्व-पर दया, निजानन्द रसलीन । सुखसो अवगाहन करें, 'सत' चरण आधीन ।। ॐ हीं अहं अप्रतिघाताय नम अर्घ्य० ।।४९१।। निजानन्द स्व-देशमे, खड खड नही होय । पूरण अविनाशी सुखी, पूजत हूँ भ्रम खोय ।। ॐ हीं अहं अच्छेद्याय नम अयं ।।४९२।। सिद्ध समान सु शुभ नही, और नाम विख्यात । कभू न जगमे जन्म फिर, सोई दृढ़ कहलात ।। ॐ हीं अर्ह दृढ़ीयसे नम अयं ० ।।४९३।।
२२८ ] [ सिद्धचक्रविधान जन्म मरण के कष्ट से, सर्व लोक भयवत । ताको नाश अभय करण, तुम्हें नमे जिय 'सत' ।। ॐ हीं अहं अभयकराय नम अर्घ्य० ।।४९४।। ज्ञानानन्द स्व-लक्षमी, भोगत हो निरखेद । महा भोग याते भये, हैं स्वाधीन अवेद ।। ॐ ह्रीं अहं महाभोगाय नम अर्घ्य० ।।४९५ असाधारण असमान हो, हो, सर्वोत्तम उत्कृष्ट । परसो भिन्न अखिन्न हो, पायो पद अविनष्ट ।। ॐ हीं अहं निरौपम्याय नम अर्घ्य० ॥४९६।। दश लक्षण शुभ धर्म के, राजसम्पदा भोग । नायक हो निज धर्म के, पूजि नमैं तिहुँ योग।। ॐ हीं अहं धर्मसाम्राज्यनायकाय नम अय० ।।४९७।। अधिपति स्वामि स्वभाव निज, परकृत भाव विडार । तिहूँ वेद रति मान बिन, सपूरण सुखकार ।। ॐ हीं अहं निर्वेदप्रवृत्ताय नम अध्य० ।।४९८।। यथायोग्य पद यथायोग्य सपूर्ण । नमू त्रियोग सभारिके, करू पाप मल चूर्ण ।। ॐ हीं अहँ सपूर्णयोगिने नम अर्घ्य० ।।४९९।। सब इन्द्रिय मन रोकके, आरोहण तिस भाव । श्रेणी उच्च चढ़ावमे, तत्पर अन्त सु पाव ।। ॐ ह्रीं अहँ समारोहणतत्पराय नम अय० ।।५००।। एकाश्रय निज धर्ममे, परसो भिन्न सदीव । सहज स्वभाव विराजते, सिद्धराज सब जीव ।। ॐ हीं अर्ह सहजसिद्धरूपाय नम अर्घ्य० ।।५०१।। राग द्वेष बिन सहज ही, राजत शुद्ध स्वभाव । मन विकल्प नही भावमे, पूजत हो धरि चाव।। ॐ हीं अहं सामायिकाय नम अy० ।।५०२।। निजानन्द निज लक्ष्मी, भोगत ग्लानि न होय । अतुल वीर्य स्वभावतें, परमादी नही होय।। ॐ हीं अहं निष्प्रमावाय नम अयं ।।५०३।। पाइयो, - अष्टम पूजा ] [ २२९ है अनादि मतान करि, कभी भयो नही आदि । नित्य शिवालय पर्णता, बसै जगत अघवादि ।। ॐ ही अहं अकृताय नम अय० ।।५०४।। पर-पदाथ नहीं इप्ट है, निजपद मे लवलीन । विघ्नहरण मगलकरण. तुम पद मस्तक दीन।। * अहं परमभायाय नम अय० ।।५०५।। नित्य शीच मतोष मय पर-पदार्थसी रोक । निश्चय नभ्य भाव मय, हैं प्रधान य धोक।। *हीं अहं प्रधानाय नम अपं० ।।५०६।। जान ज्योति निज धन्त हो, निश्चल परम मुठाम । लोकालोक प्रकाश कर, मैं बद मुख धाम।। ॐहीं अई स्वभासपरभासनाय नम अपं० ।।५०७।। एक म्यान मु धिर मदा, निश्चय चारित भूप । शुद्ध उपयोग प्रभावते, कम लिपावन रूप।। ॐही अहं प्राणायामचरणाय नम अध्य० ।।५०८।। विषय म्वादनी हट रहैं, इन्द्री मन थिर होय । निज आनम लवलीन है शुद्ध कहावै सोय ।। ही अहं शुद्धप्रत्याहाराय नम अर्घ्य० ।।५०९।। इन्द्री विषय न वश रहै, निज आतम लवलाय । मो जिनेन्द्र म्वाधीन हैं, वटू तिनके पाय ।। ॐही अर्ह जितेन्द्रियाय नम अय० ।।५१०।। ध्यान विर्य मो धारणा, निज आतम थिर धार । ताके अधिपनि हो महा, भये भवार्णव पार ।। ॐ हीं अई धारणाधीश्वराय नम अय० ।।५११।। गगादिक मल नाशिके, ध्यान मु धर्म लहाय । अचल रूप राज मदा, बदू मन वच काय ।। ॐहीं अहं धर्मध्याननिष्ठाय नम अर्घ्य० ।।५१२।। निजानन्दमे मगन है, परपद गग निवार । ममदृष्टी गजत सदा, हमे करो भव पार ।। ॐही अर्ह समाधिराजे नम अy० ।।५१३।। ।
२३० ] [ सिद्धचक्रविधान वीतराग निर्विकल्प है, ज्ञान उदय निरशम । समरसभाव परम सुखी, नमत मिटे दुख अश।। ॐ हीं अर्ह स्फुरितसमरसीभावाय नम अर्ध्य० ।।५१४।। एकै रूप विराजते, नय विकल्प नहिं ठोर । वचन अगोचर शुद्धता, पाप विनाशो मोर ।। ॐ ह्रीं अहं एकीभावनयरूपाय नम अर्घ्य ।।५१५।। परम दिगम्बर मुनि महा, समदृष्टी मुनिनाथ । ध्यावै पावै परम पद, नमू जोर जुग हाथ ।। ॐ ह्रीं अर्ह निर्ग्रथनाथाय नम अर्घ्यं ।।५१६।। योग साधि योगी भये, तिनको इन्द्र महान । ध्यावत पावत परम पद, पूजत निज कल्याण । ॐ हीं अहं योगीन्द्राय नम अर्घ्य० ।।५१७।। शिवमारग सिद्धात के, पार भये मुनि ईश । तारण-तरण जिहाज हो, तुम्हे नमू नित शीश।। ॐ हीं अहं ऋषये नम अy० ।।५१८।। निज स्वरूपको साधिकर, साधु भये जग माहि । निजपर हितकर गुण धरै, तीन लोक नमि ताहि ।। ॐ हीं अहं साधवे नम अy० ।।५१९।। रागादिक रिपु जीतके, भये यती शुभ नाम । धर्म धुरधर परम गुरु, जुगपद करू प्रणाम ।। ॐ हीं अहँ यतये नम अy० ।।५२०।। पर सपतिसू विमुख हो, निजपद रुचि करि नेम । मुनि मन रजन पद महा, तुम धारत हो एम।। ॐ हीं अहं मुनये नम अयं० ।।५२१।। महाश्रेष्ठ मुनिराज मुनिराज हो, निजपद पायौ सार । महा परम निरनन्, हो, पूजत हूँ मन धार।। ॐ हीं अहँ महर्षिणे नम अर्घ्य० ॥५२२।। साधु भार दुरगमन है, ताहि उठावन हार । शिव-मन्दिर पहुँचात हो, महाबली सुखकार।। ॐ हीं अहं साधुधौरेयाय नम अयं० ।।५२३।।
[ २३१ भ धमांग। विभाव अष्टम पूजा ] सन्दी मन जिन जे जती, तिनके हो तुम नाथ । परम्पग मरजाद धर, देह हमे निज साथ।। ही अहं यतीनाथाय नम अर्य० ।।५२४।। गय मुनिगजक, ईश्वर हो परधान । पर्गहतकर मामध्यं हो. निज नम करि भगवान ।। *ही अहं मुनीश्वराय नम अयं ।।५२५।। गणरादि मेवक महा. तिन आना शिरधार । नाचन ज्ञान न लक्षमी. पावत है निग्धार ।। ॐ हीं अहं महामुनये नम अर्घ्य० ।।५२६।। महानि नवम्ब हो, गति मरवाग । निना बद भाव गुत, पाऊ *हीं अहं मागमौनिने नम अध्य० ।।५२७।। प्टानिष्ट विन समष्टि म्वध्यान । मगन नई निजपद विर्ष ध्यान प भगवान ।। *हीं अई महाध्याननिने नम अध्य० ।।५२८।। व नभाव नही त्याग है नही ग्रहण पर माहि । पाप कलाप न आपमे, परम शुद्ध नम ताहि ।। *हीं अई महावतिने नम अर्घ्य ।।५२९।। प्राध प्रवृति विनाश के, धरै क्षमा निज भाव । ममग्न म्वाद मु लहत है, बदू शुद्ध स्वभाव ।। ॐ ह्रीं अहं महाक्षमाय नम अर्ध्य० ।।५३०।। मोह म्प मन्ताप विन, शीतल महा स्वभाव । पूरण मुख आकुल नही, बदू मन धर चाव।। ॐ हीं अई महाशीतलाय नम अय० ।।५३१।। मन इन्द्रिय के क्षोभ विन, महाशांति सुख रूप । निजपद रमण स्वभाव नित, मैं वदू शिव ॐ हीं अर्ह महाशाताय नम. अय० ।।५३२।। मन इन्द्रिय को दमन कर, पायो ज्ञान अतीन्द्र । स्वाभाविक स्वशक्ति कर, वदू भये जीतेन्द्र ।। ॐ ह्रीं अर्ह महोदयाय नम अर्घ्य० ।।५३३।। भूप ।।
पूजत हूँ नित ताहि ।। . २३२ ] [ सिखचक्रविधान पर पदार्थ को क्लेश तजि, व्यापै निजपद माहि । स्वच्छ स्वभाव विराजते, ॐ हीं अहं निर्लेपाय नम अर्घ्य० ।।५३४।। सशयादि दृष्टि नही, सम्यग्ज्ञान मझार । सब पदार्थ प्रत्यक्ष लस, महा तुष्ट सुखकार ।। ॐ हीं अहं निर्धाताय नम अर्घ्य० ।।५३५।। शांतिरूप निज शांति गुण, सो तुमही मे पाय । निज मन शांति सुभाव धर, पूजत हूँ युग पाय ।। ॐ हीं अहं प्रशाताय नम अर्घ्य।।५३६।। मुनि श्रावक द्वै धर्म के, तुम अधिपति शिवनाथ । भविजन को आनद करि, तुम्है नवाऊ माथ ।। ॐ हीं अर्ह धर्माध्यक्षाय नम अर्घ्य० ।।५३७।। दया नीति बरताइयो, सुखी किये जगजीव । कल्पित राग ग्रसित नही, जानत मार्ग सटीव ।। ॐ हीं अहं दयाध्वजाय नम अयं ।।५३८।। केवल ब्रह्म स्वरूप हो, अन्तर वाह्य अदेह । ज्ञानज्योतिघन नमत हूँ, मनवचतन धरि नेह ।। ॐ हीं अहं ब्रह्मयोनये नम अयं।।५३९।। स्वाय बुद्ध अविरुद्ध हो, स्वय ज्ञान परकाश । निजपर भाव दिखात हो, दीपक सम प्रतिभास ।। ॐ हीं अहँ स्वयबुद्धाय नम अj० ।।५४०।। रागादिक मल नाशियो, महा पवित्र सुखाय । शुद्ध स्वभाव धरै करें, सुरनर थुति न अघाय ।। ॐ हीं अहं पूतात्मने नम अy० ।।५४१। वीतराग श्रद्धानता, सपूरण वैराग । द्वेष रहित शुभ गुण सहित, रहूँ सदा पगलाग।। ॐ ह्रीं अहं स्नातकाय नम अयं ।।५४२।। माया मद आदिक हरे, भये शुद्ध सुख खान । निर्मल भाव थकी जजू, होत पाप की हान ।। ॐ हीं अहं अमदभावाय नम अy० ।।५४३।।
अष्टम पूजा ] [ २३३ अतुन वीय जा ज्ञानम, मयं ममान प्रकाश । मोक्षनाय निज धम जुत, स्व-ऐश्वर्य विलाम ।। *ही अरं परमेश्वर्याय नम अर्घ्य०11५४४।। मन्नर सोध ज ग्या, पर मे उप मुभाव । मा तम नाशो महज ही. निदिन दुपित विभाव ।। *ही अहं पीतमत्सगय नम अर्य० ।।५४५।। भार गिर धान्यर, समाधान परकाज । तुम नम श्रेष्ठ न धम अन तारण तरण जिहाज ।। ही अब धर्मवषाय नम अर्य० ।।५४६।। प्रोध बम जान नमा, भयो क्षोभ मव दर । महा शाति मरूप हो. पूजत अघ मव चूर ।। *हीं अई अक्षोभाय नम अय० ॥५४७।। पटमिर चाटरजरी विद्युत विधि कर खण्ड । जिण्ण महाकल्याणकर. शिवमग भाग प्रचण्ड ।। ॐहीं अई महाविधिखण्डाय नम अध्यं० ।।५४८।। अमृतमय तुम जन्म है, लोक तुष्टताकार । जन्म कल्याणक इन्द्र कर, क्षीरनीर करधार ।। ॐ हीं अहं अमृतोद्भवाय नम अर्घ्य० ।।५४९।। इन्दी विषय विपहरण, काम पिशाच विडार । मीक शुभ मन हो, देव जजे हित धार ।। ॐ हीं अर्ह मवमूतये नम अय० ।।५५०।। नौम्य दशा प्रकटी घनी, जाति विरोधी जीव । वैर छाड ममभाव धर, सेवत चरण मदीव ।। ॐ हीं अहं निरसौम्यभावाय नम अध्य० ॥५५१।। पराधीन इन्द्री विना, राग विरोध निवार । हो म्वाधीन न कर्ण पर, स्वय सिद्ध सुखकार ।। ॐ ह्रीं अर्ह स्वतन्त्राय नम अयं ।।५५२।। ब्रह्म म्प, नही बाह्य तन, सभव ज्ञान स्वरूप । म्वय प्रकाश विलास धर, राजत अमल अनूप।। ॐ हीं अहं ब्रह्मसम्भवाय नम अय० ।।५५३।। .
२३४ ] सिद्धविधान आनन्दधार न मगन है, नत्र विकल्प दुख टार । पर आधित नहीं भाव है, पज़ आनद धार ।। ॐ हीं अहं सुप्रसन्नाय नम अर्ध्य० ।।५५४।। परिपूरण गुण नीम है, मव त्ति भण्डार । तुमने मुगण न शेष है, जो न होय सुखकार ।। ॐ हीं अर्ह गुणावुधये नम अर्घ्य० ।।५।। ग्रहण-न्याग को गव तज, शुभ वा अशुभ अभेद । व्याधिकार है वन्नु मे, तुम्हे नम निन्द ॐ हीं अहं पुण्यपापनिरोधकाय नम अयं० ।।५५६।। मूक्षम रूप अलक्ष है, गणधर आदि अगम्य । आप गुप्त परमातमा, इन्द्रिय द्वार अगम्य ।। ॐ हीं अर्ह महगम् क्ष्मत्पाय नन अर्घ्य० ।।५५७।। अन्नगुप्त न्व-आत्मरन, ताजे पान क्रात । पर प्रवेश नहीं रच है, क्वल मन्न मुजात ।। ॐ हीं अहं सुगुप्तात्मने नम अय० ।।५५८।। निजकाग्र निज वर्णकर, निजपद निज आधार । निद्ध क्यिो निज ग्न लियो, पूजत हूँ हितकार।। ॐ हीं अहं सिद्धात्मने नम अर्य० ।।५५९।। नित्य उदे विन अस्त हो, पूरण दुति घन आप । ग्रहै न राहू जान शशि, नो हो हर मन्ताप ।। ॐ हीं अहं निरुपल्लवाय नम अयं ।।५६०।। लियो अपूरव लाभ को, अचल भये मुखधाम । पूज रचे जे भादमो, पूण होइ सब काम।। ॐ हीं अर्ह महोदय नम अय० ।।५६१।। है प्रशम तिहुँ लोक मे, तुम पुरुषार्थ उपाय । पायो धम मुधाम को, पूजो तिनके पाय ।। ॐ हीं अर्ह महोपायाय नम अर्घ्य ।।५६२।। गणधरादि जे जगतपति, तथा सुरेन्द्र सुरीश । तुमको पूजत भक्ति करि, चरण धरै निजशीश।। ॐ हीं अ जगत्पितामहाय नम अर्घ्य० ।।५६३।।
अष्टम पुगा [२३५ नुम ही मो भवि मुस लहै. तुम विन दुस ही पाय । नमस्प यही है तुम्हें, महानाम हम गाय ।। ही महापारणिकाय नम अय० ।।५६४।। महानगण की गन हो. राजत हो गुण रूप । नौस्यिगण औगण नही, नव ही द्वप सरूप।। *ही आहे शुतगुणाय नम अर्घ्य० ।।५६५।। जन्म-मरण दिर महा, क्लेश ताहि निरवार । पग्मनुरी नमको नम, पाऊ भवधि पार ।। ॐहीं आई महारतेशनिवारणाय नम अय० ।।५६६।। गगार नहीं भाव है, द्रव्य नेह नहीं धार । दीड मलिनता छाडिय, स्वच्छ भये निरधार ।। *हीं अब महाशुचये नम अय० ।।५६७।। आधि व्याधि नहीं गेग है, नित प्रसन्न निज भाव । आरलता विन शानि-मुस धारन महज सुभाव ।। *हीं अई अरुजे नम अय० ।।५६८।। यायोग्य पद पर मदा, यथायोग्य निज लीन । अविनाशी विकार है, नमै 'मत' चित दीन ।। ॐ हीं अई सदायोगाय नम अर्घ्य० ।।५६९।। म्वामृत रनको पान कार, भोगत है निज स्वाद । पर-निमित्त चाहे नही, कर न तिनको याद ।। ॐही अर्ह सदाभोगाय नम अय० ।।५७०।। निर-उपाधि निज धर्म में, सदा रहें सुखकार । रत्ननय की मृरती, अनागार आगार।। ॐ हीं अहं सदापतये नम अर्घ्य० ।।५७१।। गगद्वेष नहीं मूल है, है मध्यस्थ स्वभाव । दृष्टा जगतके, परसो नही लगाव ।। ॐ हीं अहं परमौदासीनाय नम अर्घ्य० ।।५७२।। आदि अन्त विन वहत है, परम धाम निरधार । अन्तर परत न एक छिन, निज सुख परमाधार ।। ॐ हीं अहं शाश्वताय नम अयं ।।५७३।। जाता ॐ ह्रीं अहं निरावरणगुणप्रकाशाय नम अर्घ्यं ।।५८३॥ २३६ ] [ सिवचाविधान मृल दह जाति रह, हा नाद अन्य प्रसार । मत्याशन उम नाम है, पज भात लगार।। ॐ हीं अर्ह सत्याशने नम अर्घ्य० ।।५७४।। पग्म शानि ससमय नटा, क्षाभ गहन निम म्वामि । तीनलाक प्रनि शानिर, तुम पट का प्रगामि ।। ॐ हीं अहं शातिनायकाय नम अध्य० ।।५७५।। काल अनतानन बार नल्या जीव जग माहि । आत्मज्ञान नहीं पाया नम पाया है ताहि।। ॐ हीं अहं अपूविद्याय नम अध्यं० ।।५७६।। यथास्यान चारित्र को जाना मानो भेट । आत्मज्ञान क्वल यसी पायो पट निम्भेट।। ॐ हीं अहं योगजायकाय नम अध्यं० ।।५७७।। चममृति मवम्ब हो गजन शुद्ध स्वभाव । बमति तुमको नम पाऊ মায় उपाव।। ॐ हीं अहं धर्ममूर्तये नम अयं० ।।५७८।। म्व-आतम परदेश में अन्य मिलाप न होय । आकृति ह निजधम की निज विभाव को सोय।। ॐ हीं अर्ह धर्मदहाय नम अध्य० ।।५७९।। म्वामी हो निज-आत्म के अन्य महाय न पाय । म्वय-मिद्ध परमातमा हम पर होउ ॐ हीं अर्ह ब्रह्मेशाय नम अर्घ्य० ।।५८०।। निज पुरुपाग्थ कार लियो, मोक्ष परम सुखकार । करना या मो करि चुके, तिष्ठ मस आधार।। ॐ हीं अर्ह कृतकृताय नम अर्घ्य० ।।५८१।। असाधारण तुम गुण धरत इन्द्रादिक नही पाय । लोकोत्तम वह मान्य हो वदू हूँ युग पाय ।। ॐ हीं अर्ह गुणात्मकाय नम अर्घ्य० ।।५८२।। तम गुण परम प्रकाशकर, तीन लोक विख्यात । सूर्य समान प्रताप धर, निरावरण उघरात ।। महाय।।
अष्टम पूजा ] [२३७ समय मात्र नही आदि है, वह अनादि अनत । तम प्रवाह इस जगत मे, तुम्हें नमै नित 'सत' ।। ॐ ह्रीं अह निर्निमेषाय नम अर्घ्य० ।।५८४।। योग-द्वार बिन करम रज, चढे न निज परदेश । ज्यो विन छिद्र न जल ग्रहै, नवका शुद्ध हमेश।। ॐ हीं अहं निराश्रयाय नम अर्घ्यं ।।५८५।। परम ब्रह्म पद पाइयो, पूरण ज्ञान प्रकाश । तीन लोक के जीव सब, पूजे चरण निवास ।। ॐ हीं अर्ह महाब्रह्मपतये नम अर्घ्य० ।।५८६।। द्रव्य पयाथिव दोऊ नय, साधत वस्तु स्वरूप । गुण अनत अवरोधकर, कहत सरूप अनूप ।। ॐ हीं अहँ सुनयतत्त्वज्ञाय नम अy० ।।५८७।। सूर्य समान प्रकाश कर, कर्म दुष्ट हनि सूर । शरण गही तुम चरण की, करो ज्ञान दुति पूरि।। ॐ हीं अर्ह सूरये नम अर्घ्य० ।।५८८।। तुम सम और न जगत मे, सत्यारथ तत्त्वज्ञ । सम्यग्जान हो अदोष ॐ ह्रीं अर्ह तत्त्वज्ञाय नम अy० ।।५८९।। तीन लोक हितकार हो, शरणागति प्रतिपाल । भव्यनि मन करि बदू दीनदयाल ।। ॐ हीं अहँ महामित्राय नम अर्घ्यं ।।५९०।। समता सुखमे मगन हे, राग द्वेष सक्लेश । ताको नाशि सुखी भये, युग-युग जिओ जिनेश ।। ॐ हीं अहं साम्यभावधारकजिनाय नम अयं ।।५९१।। निरावरण निज ज्ञान मे, सशय विभ्रम नाहिं । सम्यग्ज्ञान प्रकाशते, वस्तु दिखाय।। ॐ ह्रीं अहँ प्रक्षीणबन्धाय नम अर्घ्य० ।।५९२।। एक रूप परकाश कर, दुर्वािध भाव विनाशाय । पर-निमित्त लवलेश लवलेश नहीं, बदू तिनके पाय ।। ॐ हीं अहं निर्द्वन्द्वाय नम अर्घ्य० ।।५९३।। प्रभावते, सर्वज्ञ ।। आनद प्रमाण मोक्ष अनूप ।। २३८ ] [ सिद्धचक्रविधान मुनि विशेष म्नातक कह परमातम परमेश । तुम ध्यावत निवाण पद पावे भविक हमेश।। ॐ हीं अर्ह स्नातकाय नम अर्घ्य० ।।५९४।। पच प्रकार शरीर विन, दीप्त स्प निज रूप । सुर मुनि मन रमणीय ह, पृजन हूँ शिवभूप ।। ॐ हीं अर्ह अनगाय नम अर्घ्य० ।।५९५।। द्वय प्रकार वन्धन र्गहत, नित हो मोक्ष सत्प । भविजन वध विनाशकर, देही ॐ हीं अहं निर्वाणाय नम अर्घ्य० ।।५९६।। मुगुण रत्नकी राशके, आप महा भण्डार । अगम अथाह विराजते बढ़ भाव विचार।। ॐ हीं अर्ह सागराय नम अर्घ्य० ।।५९७।। मुनिजन व्यावै भावयुत, महा मोक्षप्रद माध । निद्ध भये मैं नमत हूँ चहँ मघ आराध ।। ॐ हीं अर्ह महासाधवे नम अर्घ्य० ।।५९८ ।। जान ज्योति प्रतिभास मे, रागादिक मल नाहि । विशद अनूपम लसत हो दीप्तज्योति शिवराह ।। ॐ हीं अर्ह विमलाभाय नम अर्घ्य० ।।५९९।। द्रव्य-भाव मल नाशकर शद्ध निरजन देव । निज-आतम मे रमत हो, आश्रय विन स्वयमेव ।। ॐ हीं अर्ह शुद्धात्मने नम अयं० ।।६००।। शुद्ध अनन्त चतुष्ट गुण, धरत तथा शिवनाथ । श्रीधर नाम कहात हो, हरिहर नावत माथ ।। ॐ हीं अर्ह श्रीधराय नम अर्घ्य० ।।६०१।। मरणादिक भयमे मदा, रक्षित है भगवान । स्वय प्रकाश विलास मे, राजत सुख की खान ।। ॐ हीं अर्ह मरणभयनिवारणाय नम अर्घ्य० ।।६०२।। राग-द्वेष नही भावमे आप । ज्यो के त्यो तुम थिर रहो तनक न व्यापै पाप ।। ॐ हीं अर्ह अमलभावाय नम अर्ध्य० ॥६०३।। शुद्ध निरजन मोह ।। कर अष्टम पूजा ] [२३९ भवनागर ने पार हो, पहुंचे शिवपद तीर । भाव सहित तिन नमत हैं, लहँ न पनि भव पीर ।। *ही अहं उद्धरणाय नम अर्घ्य ।।६०४।। अग्निदेव या अग्नि दिश, ताके देव विशेष । ध्यावत है तुम चरणयग, इन्द्रादिक मुर शेष ।। ॐहीं अई अग्निदेयाय नम अर्घ्य ।।६०५।। विपप-कपाय न रच है, निगवरण निरमोह । इन्द्री मनको दमन पर, बन्द सुन्दर *ही अर्ह सयमाय नम अर्घ्य० ।।६०६।। मोक्षम्प कल्याण मुरा-नागर के पार । महादेव म्वक्ति धर, विद्या तिय भरतार ।। ॐ हीं अहं शिवाय नम अय० ।।६०७।। पुष भेट धर जजत मुर, निज कर अजुलि जोड । कमलापति कर-कमल मे, धरै लक्ष्मी होड।। ॐहीं अहं पुष्पाजलयें नम अर्घ्य० ।।६०८।। पुरण नानानदमय अजर अमर अमलान । अविनाशी ध्रुव सिलपद, अधिकारी मव मान ।। ॐ ही अहं शिवगुणाय नम अयं० ।।६०९।। गेग शोक भय आदि विन, गजत नित आनन्द । खेद हित रति-अर्गत विन, विकमत पूरणचद्र ।। ॐ हीं अर्ह परमोत्साहजिनाय नम अर्घ्य० ।।६१०।। जो गुण शक्ति अनन्त है, ते मव ज्ञान मझार । एकनिष्ठ आकृति विविध, मोहत हैं अविकार ।। ॐ हीं अह ज्ञानाय नम अय० ।।६११।। परम पूज्य परधान है, परम शक्ति आधार । परम पुरुप परमातमा, परमेश्वर सुखकार ।। ॐ हीं अहं परमेश्वराय नम अर्घ्य० ।।६१२।। दोष अपोप सम सन्तोप अलोष । पच परम पद धारियत, भविजन को परिपोष ।। ॐ हीं अहं विमलेशाय नम अj०।।६१३।। अरोष हो, २४० । [ सिद्धचक्रविधान पचकल्याणक यक्त समानरण ले आदि । इन्द्रादिक नितकग्त ह तुम गणगण अनुवाद ।। ॐ हीं अर्ह यशोधगय नम अर्घ्य० ।।६१४।। काण नाम नीर्येश ह भावी काल कहाय । नर्मात गापियन नग रमत निजलीला दशाय ।। ॐ हीं अर्ह कृष्णाय नम अर्घ्य० ।।६१५।। सम्यग्जान ज मुनि धर मिथ्या मोह निवार । पर्गहनकर उपदश है निश्चय वा व्यवहार ।। ॐ हीं अह जानमतये नम अर्घ्य० ।।६१६।। वीतगग भवन है उपदेशक हितकार । मन्याग्थ परमाण कर अन्य मुमति दातार ।। ॐ हीं अर्ह शुद्धमतये नम अर्घ्य० ।।६१७।। मायाचार न शत्य है शुद्ध मरल परिणाम । जानानट म्वलक्षमी भोगत अभिगम ।। ॐ हीं अहं भद्राय नम अर्घ्य० ।।६१८।। शील स्वभाव मजन्म ल अन्त ममय निग्वाण । विजन आनन्दकार मव क्लुपना हान । है अष्टम पूजा ] [ २४१ हेतु तुम श्रेष्ठ चन्द । सब कुवादि एकातको नाश कियो छिन माहि । भविजन मन सशयहरण, और लोक मे नाहिं।। ॐ हीं अहं सुमतये नम अy० ।।६२४।। भविजन मधुकर कमल हो, धरत सुगन्ध अपार । तीन लोक मे विस्तरी, सुयश नाम को धार।। ॐ हीं अहं पद्मप्रभाय नम अर्घ्य।।६२५।। पारस लोहा हेम करि, तुम भव बन्ध निवार । मोक्ष गुण, धारत हो हितकार।। ॐ ह्रीं अहं सुपार्वाय नम अर्घ्य० ॥६२६।। तीन लोक आताप हर, मुनि-मन-मोदन लोक प्रिय अवतार हो, पाऊ सुख तुम बन्द ।। ॐ हीं अहं चन्द्रप्रभाय नम अयं ।।६२७।। मन मोहन सोहन महा, धाएँ रूप अनूप । दरशत मन आनन्द हो, पायो निज रस कूप ।। ॐ हीं अहँ पुष्पदताय नम अयं ।।६२८।। भव भव दाह निवार कर, शीतल भए जिनेश । मानो अमृत सींचियो, पूजत सदा सुरेश ।। ॐ हीं अहं शीतलनाथाय नम अर्घ्यं ।।६२९।। तीर्थकर श्रेयास हम, देहो श्री शुभ भाग । श्रीसु अनन्त चतुष्ट हो, हरो सकल दुरभाग।। ॐ हीं अहँ श्रेयाशनाथाय नम अर्घ्य० ।।६३०।। त्रस नाडी या लोक मे, तुम ही पूज्य प्रधान । तुमको पूजत भावसो, पाऊ सुख निरवाण।। ॐ हीं अहँ वासुपूज्याय नम अर्घ्य० ।।६३१।। द्रव्य भाव मल रहित है, महा मुनिन के नाथ । इन्द्रादिक पूजत सदा, नमू पदावुज माथ ।। ॐ ह्रीं अहँ विमलनाथाय नम अर्घ्य० ।।६३२।। जाको पार न पाइयो, गणधर और सुरेश । कित रहे असमथ करि, प्रणमे 'सन्त' हमेश।। ॐ ह्रीं अर्ह अनतनाथाय नम अर्घ्य० ।।६३३।। - २९२ [ सिद्धचक्रविधान अनागार आगारके. उद्धारक जिनराज । मनाय प्रणम मदा, पाऊ शिवमुस माज।। ॐ हीं अहं धर्मनाथाय नम अर्घ्य० ।।६३४।। शानिम्प पर शतिकर कम दाह विनिवार । शाति हेतु बन्द मदा, पाऊ भवधि पार ।। ॐ हीं अहं शातिनाथाय नम अर्घ्य० ।। ६३५।। पद वीय मत्र जीव के, रक्षक हे तीर्येश । शरणागत प्रतिपालकर, ध्याव सदा मुरेश।। ॐ हीं अहं कुन्थनाथाय नम अर्घ्य० ।।६३६।। पजनीक जगतके, मगलकारक देव । पजत है हम भावमो विनश अघ म्वयमेव ।। ही अर्ह अग्नाथाय नम अर्घ्य० ।।६३७।।
अष्टम पूजा ] अभेव ।। [२४३ अतुल वीर्य तन धरत है, अतुल वीर्य मन बीच । कामिन वश नहिं रचभी, जैसे जल बिच मीच ।। ॐ हीं अर्ह महावीराय नम अयं ।।६४४।। मोह सुभटकू पटकियो, तीन लोक परशस । श्रेष्ठ पुरुष तुम जगत मे, कियो कर्म विध्वश।। ॐ हीं अहं सुवीराय नम अर्घ्य० ।।६४५।। मिथ्या-मोह निवारि करि, महा सुमति भण्डार । शुभ मारग दरशाइयो, शुभ अरु अशुभ विचार ।। ॐ हीं अहं सन्मतये नम अयं० ।।६४६।। निज आश्रय निर्विघ्न नित, निज लक्ष्मी भण्डार । चरणाम्बुज नित नमत हम, पुष्पाजलि शुभ धार ।। ॐ हीं अर्ह महापद्माय नम अयं ।।६४७।। हो देवाधीदेव तुम, नमत देव चउ भेव । धरो अनन्त चतुष्टपद, परमानन्द ॐ हीं अहं सुरदेवाय नम अर्घ्यं० ।।६४८।। निरावर्ण आभास है, ज्यों बिन पटल दिनेश । लोकालोक प्रकाश करि, सुन्दर प्रभा जिनेश ।। ॐ हीं अहं सुप्रभाय नम अय० ।।६४९।। आतमीक जिन गुण लिये, दीप्ति सरूप अनूप । स्वय ज्योति परकाशमय, बन्दत हूँ शिवभूप ।। ॐ हीं अहं स्वयप्रभाय नम अध्य० ॥६५०।। निजशक्ती निज करण हैं, साधन बाह्य अनेक । मोहसुभट क्षयकरन को, आयुध राशि विवेक।। ॐ हीं अहं सर्वायुधाय नम अर्घ्य० ।।६५१।। जय-जय सुरधुनि करत हैं, तथा विजय निधिदेव । तुम पद जे नर नमत हैं, पावै सुख स्वयमेव ।। ॐ हीं अह जयदेवाय नम अयं ।।६५२।। तुम सम प्रभा न औरमे, धरो ज्ञान परकाश । नाथ प्रभा जगमे भये, नमत मोहतम नाश।। ॐ हीं अहं प्रभावदेवाय नम अर्घ्य० ।।६५३।।
२४४ ] [ सिद्धचक्रविधान सभा रक्षक हो षट्काय के, दया सिन्धु भगवान । शशिसमजिय आह्लाद करि, पूजनीकधरिध्यान ।। ॐ हीं अर्ह उदकाय नम अर्घ्य० ।।६५४।। समाधान सवके करै, द्वादश मझार । सर्व अर्थ परकाशकर, दिव्य ध्वनि दिव्य ध्वनि सुखकार।। ॐ हीं अहं प्रश्नकीर्तये नम अर्घ्यं ।।६५५।। काहू विधि वाधा नही, कवहू नही व्यय होय । उन्नति रूप विराजते, जयवन्तो जग सोय।। ॐ हीं अहं जयाय नम अर्घ्यं ।।६५६।। केवलज्ञान स्वभाव मे, लोकत्रय इक भाग । पूरणता को पाइयो, छांडि सकल अनुराग ।। ॐ हीं अहँ पूर्णबुद्धाय नम अर्घ्यं० ।।६५७।। पर आलिंगन भाव तज, इच्छा क्लेश विडार । निज सतोष सुखी सदा, पर सवध निवार ।। ॐ हीं अहँ निजानदसतुष्टजिनाय नम अयं० ।।६५८।। मोहादिक मल नाशकर, अतिशय करि अमलान । विमल जिनेश्वर मै नमू, तीन लोक परधान ।। ॐ हीं अहं विमलप्रभाय नम अy० ।।६५९।। स्वपद मे नित रमत है, कभी न आरति होय । अतुलवीर्य विधि जीतियो, नमू जोर कर दोय।। ॐ हीं अहं महावलाय नम अर्घ्य० ।।६६०।। द्रव्य भाव मल कर्म है, ताको नाश करान । शुद्ध निरजन हो रहे, ज्यो वादल विन भान ।। ॐ हीं अर्ह निर्मलाय नम अर्घ्य० ।।६६१।। तुम चित्राम अरूप है, सुर नर साधु अगम्य । निराकार निर्लेप है, ॐ हीं अर्ह चित्रगुप्ताय नम अर्घ्य० ।।६६२।। मग्न भये निज आत्म मे, पर पद मे नहिं वास । लक्ष अलक्ष विराजते, पूरो मन की आश।। ॐ हीं अहँ समाधिगुप्ताय नम अर्घ्य० ।।६६३।। धारत भाव असम्य ।।
अष्टम पूजा ] [२४५ निज गुण आतम ज्ञान है, पर सहाय नही चाह । स्वय भाव परकाशियो, नमत मिटै भव दाह ।। ॐ हीं अर्ह स्वयभुवे नम अy० ।।६६४।। मन मोहन सोहन महा, मुनि मन रमण अनन्द । महातेज परताप है, पूरण ज्योति अमन्द ।। ॐ हीं अहँ कदाय नम अर्घ्यं ।।६६५।। विजय लक्ष्मी नाथ हैं, जीते कर्म प्रधान । तिनको पूजै सर्व जग, मै पूजो धरि ध्यान।। ॐ हीं अह विजयनाथाय नम अयं० ।।६६६॥ गणधरादि योगीश जे, विमलाचारी सार । तिनके स्वामी हो प्रभू, राग द्वेष मल जार ।। ॐ हीं अहँ विमलेशाय नम अर्घ्य० ।।६६७।। दिव्य अनक्षर ध्वनि खिरै, सर्व अर्थ गुणधार । भविजन मन सशय हरन, शुद्ध बोध आधार ।। ॐ हीं अहं दिव्यवादाय नम अयं० ।।६६८।। नही पार जा वीर्य को, स्वाभाविक निरधार । सो सहजै गुण धरत हो, नमू लहू भवपार ।। ॐ हीं अहं अनन्तवीर्याय नम अर्घ्य० ।।६६९।। पुरुषोत्तम परधान हो, परम निजानद धाम । चक्रपती हरिबल नमे, निष्काम।। ॐ हीं अहँ महापुरुषदेवाय नम अध्य० ।।६७०।। शुभ विधि सब आचरण है, सर्व जीव हितकार । श्रेष्ठ बुद्ध अति शुद्ध है, नमू करो भवपार।। ॐ हीं अहं सुविधये नम अy० ।।६७१।। है प्रमाण करि सिद्ध जे, ते है बुद्धि प्रमाण । सो विशुद्धमय रूप हैं, सशय तमको भान।। ॐ हीं अहं प्रज्ञापरिमाणाय नम अर्घ्य० ।।६७२।। समय प्रमाण निमित तनी, कभी अन्त नही होय । अविनाशी थिर पद धरै, मैं प्रणमू हूँ सोय।। ॐ हीं अर्ह अव्ययाय नम अर्घ्य० ।।६७३।। मैं पूजू २४६ ] [ सिद्धचक्रविधान प्रतिपालक जगदीश है, सर्वमान परमान । अधिक शिरोमणि लोकगुरु, पूजत नित कल्याण ।। ॐ ह्रीं अहं पुराणपुरुषाय नम अy० ॥६७४।। धर्म सहायक हो प्रभू, धर्म मार्ग की लीक । शुभ मर्यादा बध प्रति, करण चलावन ठीक ।। ॐ हीं अहं धर्मसारथये नम अर्घ्यं ।।६७५।। शिवमारग दिखलाय कर, भविजन कियो उद्धार । धर्म सुयश विस्तार कर, बतलायो शुभ सार ।। ॐ हीं अहँ शिवकीतिजिनाय नम अy० ।।६७६।। मोह अन्ध हन सूर्य हो, जगदीश्वर शिवनाथ । मोक्षमार्ग परकाश कर, नमू जोर जुग हाथ ।। ॐ हीं अहं मोहाधकारविनाशकजिनाय नम अy० ।।६७७॥' मन इन्द्री व्यापार बिन, भाव रूप विध्वश । ज्ञान अतीन्द्रिय धरत हो, नमत नशै अघवश ।। ॐ हीं अहँ अतीन्द्रियज्ञानरूपजिनाय नम अर्घ्य।।६७८।। पर उपदेश परोक्ष बिन, साक्षात् परतक्ष । जानत लोकालोक सब, धारै ज्ञान ॐ हीं अहँ केवलज्ञानजिनाय नम अर्घ्यं ।।६७९।। व्यापक हो तिहुँ लोक मे, ज्ञान ज्योति सब ठौर । तुमको पूजत भावसो, पाऊ भवदधि ॐ हीं अहं विश्वभूतये नम अयं ।।६८०।। इन्द्रादिक कर पूज्य हो, मुनिजन ध्यान धराय । तीन लोक नायक प्रभू, हम पर होउ सहाय ।। ॐ हीं अहं विश्वनायकाय नम अर्घ्य० ।।६८१॥ तुम देवन के देव हो, महादेव है नाम । बिन ममत्व शुद्धात्मा, तुम पद करू प्रणाम ।। ॐ ह्रीं अहं दिगम्बराय नम अय० ।।६८२॥ सर्व व्यापि कुमती कहैं, करो भिन्न विश्राम । जगसो तजी समीपता, राजत हो शिवधाम।। ॐ ह्रीं अहं निरन्तरजिनाय नम अयं ।।६८३।। अलक्ष।। ओर।। .
अष्टम पूजा) [२४७ हितकारी अति मिष्ट है, अर्थ सहित गम्भीर । पियवाणी कर पोसते, द्वादश सभासु तीर।। ॐ हीं अर्ह मिष्टदिव्यध्वनिजिनाय नम अय० ।।६८४।। भवसागर के पार हो, सुखमागर गलतान । भव्य जीव पूजत चरन, पावे पद निरवान ।। ॐहीं अर्ह भयातकाय नम अर्घ्य० ।।६८५।। नहीं चलाचल भाव है, पाप कलाप न लेश । दृढ परिणत निज आत्मरति, पूजू श्री मुक्तेश।। ॐ हीं अर्ह दृढव्रताय नम अर्ध्य० ।।६८६।। असत्यात नय भेद है, यथायोग्य वच द्वार । तिन नवको जानो सुविध, महा निपुण मति धार।। ॐ ही अर्ह नयात्तुगाय नम अy० ।।६८७।। क्रोधादिक नु उपाधि है, आत्म विभाव कराय । तिनको त्याग विशुद्ध पद, पायो पूजू पाय ।। ॐ हीं अहं निष्कलकाय नम अy० ।।६८८।। ज्यो शशि-किरण उद्योत है, पूरण प्रभा प्रकाश । कलाधार नौहे सु इम, पूजत अध-तम नाश।। ॐ ही अहं पूर्णकलाधराय नम अर्घ्य० ॥६८९॥ जन्म-मरण को आदि ले, जग मे क्लेश महान । तिसके हता हो प्रभू, भोगत सुख निर्वाण।। ॐ ह्रीं अर्ह सर्वक्लेशहराय नम अy० ।।६९०।। ध्रुव स्वरूप थिर है सदा, कभी अन्त नहीं होय । अव्यावाध विराजते, पर सहाय को खोय।। ॐ हीं अहं प्रौव्यरूपजिनाय नम अय० ।।६९१।। व्यय उत्पाद सुभाव है, ताको गौण कराय । अचल अनत स्वभाव मे, तीन लोक सुखदाय।। ॐ हीं अहं अक्षयानतस्वभावात्मकजिनाय नम अय० ॥६९२।। स्व ज्ञानादि चतुष्ट पद, हृदय माहिं विकसाय । सोहत है शुभ चिन्ह करि, भवि आनद कराय।। ॐ ह्रीं अहं श्रीवत्सलाछनाय नम अय० ।।६९३।।
२४८ ] [ सिद्धचक्रविधान धर्म रीति परगट कियो, युग की आदि मझार । भविजन पोषे सुख सहित, आदि धर्मअवतार।। ॐ ह्रीं अहँ आदिब्रह्मणे नम अर्घ्य० ।।६९४।। चतुरानन परसिद्ध है, दर्श होय चहुँ ओर । चउ अनुयोग बखानते, सब दुख नासौ मोर ।। ॐ ह्रीं अहँ चतुर्मुखाय नम अर्घ्य० ।।३९५।। जगत जीव कल्याण कर, धर्म मर्याद बखान । ब्रह्म ब्रह्म भगवान हो, महामुनी सब मान ।। ॐ हीं अहं ब्रह्मणे नम अयं० ।।६९६।। प्रजापति प्रतिपाल कर, ब्रह्मा विधि करतार । मन्मय इन्द्री वश करन, बन्दू सुख आधार ।। ॐ हीं अहं विधात्रे नम अर्घ्यं ।।६९७।। तीन लोक की लक्षमी, तुम चरणाम्बुज वास । श्रीपति श्रीधर नाम शुभ, दिव्यासन सुखरास ।। ॐ ह्रीं अहँ कमलासनाय नम अर्घ्यं ।।६९८।। बहुरि न जग मे भ्रमण है, पचम गति मे वास । नित्य अमरता पाइयो, जरा-मृत्यु को नाश ।। ॐ हीं अर्ह अजन्मिने नम अर्घ्य० ।। ६९९।। पाच काय मुद्गलमई, तामे एक न होय । केवल आत्म प्रदेश ही, तिष्ठत है दुख खोय ।। ॐ हीं अर्ह आत्मभुवे नम अy० ।।७००।। लोक शिखर सुखसो रहै, ये ही प्रभुता जान । धारत है तिहुँ लोकमे, अधिक प्रभा परधान ।। ॐ हीं अहँ लोकशिखरनिवासिने नम अर्घ्य० ।।७०१।। अधिक प्रताप प्रकाश है, मोह तिमिर को नाश । शिवमग दिखलावत सही, सूरज सम प्रतिभास ।। ॐ हीं अर्ह सुरज्येष्ठाय नम अर्यं० ।।७०२।। प्रजापाल हित धार उर, शुभ मारग बतलाय । ब्रह्मा कहै, कहै, तुमरे वन्दू ॐ हीं अहं प्रजापतये नम अy० ।।७०३।। सत्यारथ पाय।।
अष्टम पूजा ] [२४९ गभ समय पड़मास ही, प्रथम इन्द्र हाय । रत्नवृष्टि नित करत है, उत्तम गर्भ कहाय।। ॐ हीं अहं हिरण्यगर्भाय नम अर्घ्य० ।।७०४।। तुम हि चार अनुयोग के, अग कहे मुनिराज । तुमसो पूरण श्रुत सही, नान्तर मगल काज।। ॐ हीं अर्ह वेदागाय नम अर्घ्य० ।।७०५।। तुम उपदेश थकी कहे, द्वादशाग गणराज । पूरण ज्ञाता हो तुम्ही, प्रणमू मे शिवकाज ।। ॐ हीं अहं पूर्णवेदज्ञानाय नम अर्यं० ।।७०६।। पार भये भवसिंधु के, तथा सुवर्ण ममान । उत्तम निर्मल थुति धरे, नमत कर्ममल हान।। ॐ हीं अहं भवसिंधुपारगनाय नम अर्घ्य० ।।७०७।। सुखाभास पर-निमितते, पर-उपाधिते होत । स्वत मुभाव धरो सही, सत्यानन्द उद्योत ।। ॐ हीं अहं सत्यानन्दाय नम अर्घ्य० ।।७०८।। मोहादिक परवल महा, सो इसको तुम जीत । ओग्न की गिनती कहाँ, तिष्ठो सदा अभीत।। ॐ ह्रीं अर्ह अजयाय नम अयं० ।।७०९।। दिव्य रत्नमय ज्योति हो, अमित अकप अडोल । मनवांछित फलदाय हो, राजत अखय अमोल ।। ॐ हीं अर्ह मनवाछितफलदायकाय नम अर्घ्य।।७१०।। देह धार जीवन मुकत, परमातम भगवान । मृर्य समान' मुदीप्त धर, महा ऋषीश्वर जान ।। ॐ हीं अर्ह जीवनमुक्तजिनाय नम अर्घ्यं० ।।७११।। म्व-भय आदिकसे परे, पर-भय आदि निवार । पर उपाधि विन नित सुखी, बन्दू भाव सम्हार ।। ॐ ह्रीं अर्ह शतानदाय नम अy० ।।७१२।। ईश्वर हो तिहुँ लोक के, परम पुरुष परधान । ज्ञानानद स्वलक्ष्मी, भोगत नित ॐ हीं अह विष्णवे नम अर्घ्य० ।।७१३।। अमलान।।
No text on this page.
अष्टम पूजा ] [ २५१ असुर काम अर हास्य इन, आदि कियो विवश । महाश्रेष्ठ तुमको नमू, रहै न अघ को अश।। ॐ हीं अर्ह असुरध्यसिने नम अर्घ्य० ।।७२४।। सधाधार द्यो अमरपद, धर्म फूल की बेल । शुभ मति गोपिन सग मे, हमे राख निज गेल।। ॐ हीं अर्ह माधवाय नम अर्घ्य ।।७२५।। विपय कपाय म्ववश करी, बलि वश कियो जुकाम । महा वली परसिद्ध हो, तुम पद करू प्रणाम ।। ॐ हीं अहं वलिवन्धनाय नम. अर्ध्य० ।।७२६।। तीन लोक भगवान हो, निजपर के हितकार । सुरनर पशु पूजत सदा, भक्ति भाव उर धार।। ॐ हीं अहं अधीक्षजाय नम अर्घ्यं ।।७२७।। हितमित मिष्ट प्रिय वचन, अमृत सम सुखदाय । धर्म मोक्ष परगट करन, बदू तिनके पाय ।। ॐ हीं अहं हितमितप्रियवचनजिनाय नम अy० ।।७२८।। निज लीला मे मगन है, साचा कृष्ण सु नाम । तीन खड तिहुँ लोक के, नाथ करू परणाम ।। ॐ हीं अहं केशवाय नम अर्घ्य० ।।७२९।। सूखे तृण मम की जगत की, विभव जान करवास । धरै सरलता जोग मे, करें पाप को नाश।। ॐ ह्रीं अह विष्टरश्रवसे नम अयं ।।७३०।। श्री कहिये आतम विभव, ताकरि हो शुभ नीक । सोहत सुन्दर वदन करि, सज्जनचित रमणीक ।। ॐ हीं अहं श्रीवत्सवाछनाय नम अy० ।।७३१।। सर्वोत्तम अति श्रेष्ठ है, जिन सन्मति थुति योग । धर्म मोक्षमारग कहैं, कहैं, पूजत सज्जन लोग।। ॐ हीं अहँ श्रीमतये नम अy० ।।७३२।। अविनाशी अविकार है, नही चिगे निज भाव । स्वय सु आश्रय रहत हैं, मै पूजू धर चाव ।। ॐ हीं अहं अच्युताय नम अर्घ्य० ॥७३३।।
२५२ ] [ सिद्धचक्रविधान नाशी लौकिक कामना, निर-इच्छुक योगीश । नार श्रगार न मन बसै, बदत हूँ लोकीश ।। ॐ हीं अह नरकान्तकाय नम अy० ।।७३४।। व्यापक लोकालोक मे, विष्णु रूप भगवान । धर्मरूप तरु लहिलहै, पूजत हूँ धरि ध्यान ।। ॐ ह्रीं अहँ विश्वसेनाय नम अर्घ्यं ।।७३५।। धर्मचक्र मन्मुख चलै, मिथ्यामति रिपु घात । तीन लोक नायक प्रभू, पूजत हूँ दिनरात ।। ॐ हीं अहँ चक्रपाणये नम अर्घ्यं ।।७३६।। सुभग सुरूपी श्रेष्ठ अति, जन्म धर्म अवतार । तीन लोक की लक्षमी, है एकत्र उदार।। ॐ हीं अहं पद्मनाभाय नम अर्घ्य० ।।७३७।। मुनिजन आदर जोग हो, लोक सराहन योग । सुर नर पशु आनन्दकर, सुभग निजातम भोग।। ॐ हीं अर्ह जनार्दनाय नम अर्घ्यं० ।।७३८।। सब देवन के देव के देव हो, हो, महादेव विख्यात । ज्ञानामृत सुखसो खिरै, पीवत भवि सुख पात ।। ॐ हीं अहँ श्रीकण्ठाय नम अy० ।।७३९।। पाप-पुञ्ज का नाश करि, धर्म रीत प्रगटाय । तीन लोक के अधिपती, हम पर दया कराय ।। ॐ ह्रीं अहं त्रिलोकाधिपशकराय नम अयं० ।।७४०।। स्वय व्यापि निज ज्ञान करि, स्वय प्रकाश अनूप । भाव परमातमा, बन्दू स्वय सरूप।। ॐ हीं अर्ह स्वयप्रभवे नम अy० ।।७४१।। सब देवन के देव हो, महादेव है नाम । स्व पर सुगन्धित रूप-हो, तुम पद करू प्रणाम ।। ॐ हीं अह लोकपलाय नम अर्घ्य० ।।७४२।। धर्मध्वजा जग फरहरै, सब जग माने आन । सब जग शीश नमे चरण, सब जगको सुखदान ।। ॐ हीं अहं वृषभकेतवे नम अर्घ्यं ।।७४३।। स्वय मान अष्टम पूजा ] [ २५३ जन्म-जग-गत जीति, निश्चल अव्यय रूप । मुरागी गजत नित्य हो वन्द्र हैं शिवभप ।। ॐ हीं अर्ह मत्युञ्जयाय नम अध्य० ।।७४४।। नव इन्द्री-मन जीनि के चार दीनो तम व्यर्थ । म्पय जान न्दी जग्यौ, नग सदा शिव अयं ।। *ही अर्ह विम्पाक्षाय नम अध्यं ।।७४५।। नन्दम्प मनोन है, मनिजन मन वशकार । अनाधारण शुभ अण लग, केवलज्ञान मगार ।। ॐहीं अई कामदेवाय नम अर्घ्य० ।।७४६।। मन्यग्टशन अम, चाग्नि एक नरूप । धर्म मार्ग दरशात है. लोकत रूप अनप ।। *हीं अहं त्रिलोचनाय नम अर्य० ।।७४७।। निजानन्द म्व-नक्ष्मी, ताके हो भरतार । शिवामिनि निन भोगते, परमरूप मुखकार।। *ही अहं उमापतये नम अर्घ्य ।।७४८।। जे अनानी जीव हैं, तिन प्रति बोध कगन । रक्षक ही पटकाय के, तुम नम कौन महान ।। ॐ हीं अहं पशुपतये नम अय० ।।७४९।। रमण भाव निज ति मो, धरै तथा दुति काम । कामदेव नुम नाम है, महाशक्ति बल धाम ।। ॐ हीं अहं शम्बरारये नम अर्घ्य० ।।७५०।। कामदाह को दम कियो, ज्यो अगनी जलधार । निजआतम आचरण नित, महाशील श्रियसार ।। ॐ हीं अर्ह त्रिपुरान्तकाय नम अर्घ्य० ।।७५१।। निज मन्मति शुभ नारमो, मिले रले अरधाग । ईश्वर हो परमातमा, तुम्है नमू सर्वांग।। ॐ हीं अई अर्द्धनारीश्राय नम अय० ।।७५२।। नही चिगे उपयोग मे, महा कठिन परिणाम । महावीर्य धारक नम्, तुमको आठो जाम।। ॐहीं अहं सद्राय नम अय० ।।७५३।।
२५४ ] [ सिद्धचक्रविधान गुण-पर्याय अनन्त युत, वस्नु स्वय परदेश । स्वय काल म्व क्षेत्र हो, म्वय सुभाव विशेष ।। ॐ हीं अर्ह भावाय नम अर्घ्य० ।।७५४।। सूक्षम गुप्त म्वगुण धरै, महा शुद्धता धार । चार जानधर नहीं रखै मै पूजू मुखकार।। ॐ हीं अर्ह गर्भकल्याणकजिनाय नम अर्घ्य० ।।७५५।। शिव तिय सग सदा रमे, काल अनन्त न और । अविनाशी अविकार हो महादेव महादेव शिरमौर।। ॐ हीं अर्ह सदाशिवाय नम अर्घ्य० ।।७५६।। जगत काय तुमसो क्रै, नव नुमरे आधीन । मवके तुम सरदार हो, आप धनी जगदीश।। ॐ हीं अर्ह जगत्कर्त्रे नम अर्घ्य० ।।७५७।। महा घोर अधियार है, मिथ्या मोह क्हाय । जग मे शिवमग लप्त था ताको तुम टरशाय।। ॐ हीं अर्ह अन्धकारातकाय नम अर्घ्य० ।।७५८।। नति पक्ष जुटी नही, नही आदि नहि अन्त । मदा काल विन काल तुम, राजत हो' जयवत ।। ॐ हीं अर्ह अनादिनिधनाय नम अर्घ्य० ।।७५९।। तीन लोक आगध्य हो, महा यज को ठाम । तुमको पूजन पाइये, महा मोक्ष ॐ हीं अर्ह हराय नम अj०।।७६०।। महा सुभट गणगम हो, मेवत है तिहुँ लोक । शरणागत प्रतिपालकर, चरणावुज द ॐ ह्रीं अर्ह महासेनाय नम अय० ।।७६१।। गणधर्गाद मेवे चरण, महा गणपती नाम । क्गे भव-निधुते, मगलकर ॐ ह्रीं अर्ह महागणपतिजिनाय नम अर्घ्य० ।।७६२।। चाग्मघ के नाथ हो, तुम आजा शिर धार । मग प्रवर्त्त कर, बन्दू पाप निवार ।। ॐहीं अर्ह गणनाथाय नम अर्घ्य० ।।७६३।। सुखधाम।। धोक।। पार मुखधाम।। चम अष्टम पूजा । | २५५ मोह-मप २ दमन गो. नकर ममान कहाय । गयो आदरचार हो तम गणपति मसदाय ।। *ही आमाविनायकाय नम अध्य० ।।७६४।। जे मोही अल्पज निननो हो प्रतिकूल । भमाधम विगे कर धर शीश पग धूल ।। * विगंधविनाशकजिनाय नम अय० ।।७६५।। जिनन दर गनार में निनको बार न पार । न Tम ही जानी नही नाहि तजो दस भार ।। *ही आं विपविनाशर्फाजनाय नम अध्यं० ।।७६६।। गर विा में चीज हो तुम वाणी परकाश । मरन वया मन त एक छिन में हो नाश ।। *ही अहंद्वादशात्मने नम अध्यं०॥७६७।। पर-निमिन न जीव या, गगादिक परिणाम । निना न्याग नभाव में राजन है मुखधाम ।। *ही अविभावर्गहताय नम अय० ।।७६८।। अन्तर-चाहिर प्रयन ग्पि जीन नय नही कोय । निमय अचन गांवर नई कोटि शिवालय मोय।। ॐ हीं अ दर्जयाय नम अध्य० ।।७६९।। धन नम गजन वचन है, 'भागे कुनय कुवादि । प्रयन प्रचट गयीय है. धर नगण इत्यादि ।। * ही अहं वृहद्भावाय नम अय० ।।७७०।। पाप गघन वन दाह दव, महादेव शिव नाम । जतन प्रभा धागे महा, तुम पद करू प्रणाम।। ॐहीं अई चित्रभानवे नम अर्घ्य । ७७१।। तुम अजन्म विन मृत्यु हो, मदा रहो अविकार । ज्यो के न्यो मणि दीप मम, पूजत हूँ मनधार ।। ॐ हीं अई अजरामरजिनाय नम अर्घ्य० ।।७७२।। मम्बार्गाद म्वगुण सहित, तिन करि हो आराध्य तुमको वदो भाव मो, मिटे सकल दुख व्याध्य । ॐ ह्रीं अहं द्विजाराध्याध्याय नम अध्य० ।।७७३।।
होत ।। सघ २५६ ] [ सिद्धचक्रविधान निज आतम निज ज्ञान है, तामे रुचि परतीत । पर पद सौ है अरुचिता, पाई अक्षय जीत ।। ॐ हीं अहं सुधाशोचिषे नम अर्घ्य० ।।७७४।। जन्म-मरण को आदि लै, सकल रोग को नाश । दिव्य औषधि तुम धरौ, अमर करन सुखरास ।। ॐ हीं अर्ह औषधीशाय नम अर्घ्य० ।।७७५।। पूरण गुण परकाश कर, ज्यो शशि करण उद्योत । मिथ्यातप निरवारते, दर्शित आनद ॐ हीं अहं कमलानिधये नम अर्घ्य० ।।७७६।। सूर्य प्रकाश धरै सही, धर्म मार्ग दिखलाय । चार नायक प्रभू, वदू तिनके पाय ।। ॐ ह्रीं अर्ह नक्षत्रनाथाय नम अy० ।।७७७।। भव-तप-हर हो चन्द्रमा, शीतलकार कपूर । तुमको जो नर सेवते, पाप कर्म हो दूर।। ॐ हीं अहं शुभाशवे नम अर्घ्य० ॥७७८।। स्वर्गादिक की लक्षमी, तासो भी जु ग्लान । स्वै-पद मे आनद है, तीन लोक भगवान ।। ॐ हीं अर्ह सौम्यभावरताय नम अर्घ्यं ।।७७९।। पर-पदार्थ को इष्ट लखि, होत नही अभिमान । हो अबध इस कर्मते, स्व-आनद निधान ।। ॐ हीं अहं कुमुदबाधवाय नम अy० ॥७८०।। सब विभाव को त्याग करि, हैं स्वधर्म मे लीन । प्रभुता पाइयो, है नहिं बन्धाधीन।। ॐ हीं अहं धर्मरतये नम अy० ।।७८१।। आकुलता नही लेश है, नही रहै चित भग । सदा सुखी तिहुँ लोक मे, चरन नमू सब अग।। ॐ हीं अर्ह आकुलतारहितजिनाय नम अर्घ्य० ।।७८२।। शुभ-परिणति प्रकटाय के, दियो स्वर्गको दान । धर्म-ध्यान तुमसे चले, सुमरत हो शुभ ध्यान।। ॐ ह्रीं अहं पुण्यजिनाय नम अयं ।।७८३।। ताते प्रभुता
No text on this page.
२५८ ] [ सिद्धचक्रविधान कर्मविषै सस्कार विधान, तीनलोकमे विस्तर जान ।। सिद्धसमूह०।। ॐ हीं अहँ सिद्धसमूहेभ्यो नम अर्घ्य० ।।७९३।। धर्म उपदेश देत सुखकार, महाबुद्ध तुम हो अवतार ।।सिद्धसमूह०।। ॐ ह्रीं अर्ह शुद्धबुद्धाय नम अयं० ।।७९४।। तीन लोकमे हो शशि सूर, निज किरणावलि करि तम चूर ।। सिद्ध०।। ॐ ह्रीं अर्ह तमोभेदने नम अy० ।।७९५।। धर्ममार्ग उद्योत करान, सब कुवादकी कर हो हान । सिद्ध०।। ॐ हीं अहं धर्ममार्गदर्शकजिनाय नम अर्घ्य० ।।७९६।। सर्व शास्त्र मिथ्या वा साच, तुम निज दृष्टि लियो है जाच । सिद्धसमूह जजू मनलाय, भव भवमे सुख-सपतिदाय ।। ॐ हीं अहं सर्वशास्त्रनिर्णायकजिनाय नम अर्घ्य० ।।७९७।। पचमगति बिन श्रेष्ठ न और, सो तुम पाय त्रिजग शिरमौर । ।सिद्ध०।। ॐ हीं अर्ह पचमगतिजिनाय नम अय॑ ।।७९८।। श्रेष्ठ सुमति तुमही हो एक, शिवमारग की जानो टेक ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहँ श्रेष्ठसुमतिदात्रिजिनाय नम अर्घ्य० ।।७९९।। वृष मजिद भली विधि थाप, भविजन मेटे सब सताप ।। सिद्ध०।। ॐ हीं अहँ सुगतये नम अर्य० ।।८००।। श्रेष्ठ करै कल्याण सु ज्ञान, सम्पूरण सकल्प निशान ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं श्रेष्ठकल्याणकारकजिनाय नम अy० ।।८०१।। निज ऐश्वर्य धरो सपूर्ण, विभूति बिन हो अघ चूण ।। सिद्ध०।।।सिद्ध०।। ॐ हीं अह परमेश्वरीयसम्पन्नाय नम अy० ।।८०२।। श्रेष्ठ शुद्ध निजब्रह्म रमाय, मगलमय पर मगलदाय । सिद्ध०।। ॐ ह्रीं अर्ह परब्रह्मणे नम अर्घ्य ।।८०३।। श्री जिनराज करिपु जीति, पूजनीक हैं सबके मीत । ।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं कर्मारिजिताय नम अयं ।।८०४।। षट् पदार्थ नव तत्त्व कहाय, धर्म-अधर्म भलीविधि गाय ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं सर्वशास्त्रज्ञजिनाय नम अयं ।।८०५।। है शुभ लक्षण मय परिणाम, पर उपाधिको नहिं कछु काम ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं सुलक्षणजिनाय नम अy० ।।८०६॥ ।
अष्टम पूजा ] [२५९ सत्य ज्ञानमय है तुम बोध, हेय अहेय बतायो सोध । सिद्ध०।। ॐ हीं अहं सर्वबोधसत्वाय नम अय० ।।८०७।। इष्टानिष्ट न राग न द्वेष, ज्ञाता दृष्टा हो अविशेष । सिद्ध०।। ॐ हीं अहं निर्विकल्पाय नम अर्घ्य० ।।८०८।। दूजो तुम सम नहिं भगवान, धर्माधर्म रीति बतलान । सिद्धसमूह जजू मनलाय, भव भवमे सुखसपतिदाय।। ॐ हीं अहं अद्वितीयबोधजिनाय नम अयं ।।८०९।। महादुखी ससारी जान, तिनके पालक हो भगवान ।। सिद्ध०।। ॐ हीं अहँ लोकपालाय नम अर्घ्य ।।१०।। जगविभूति निरइच्छुक होय, मानरहित आतमरत सोय ।। सिद्ध०।। ॐ ह्रीं अहं आत्मरसरतजिनाय नम अयं ।।११।। ज्यो शशि तापहरे अनिवार, अतिशय सहित शांति करतार । । सिद्ध०।। ॐ हीं अहं शातिदात्रे नम अय० ।।१२।। हो निरभेद अछेद अशेष, सब इकसार स्वय परदेश।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहँ अभेद्याछेद्य-जिनाय नम अर्घ्यं ।।१३।। मायाकृत सम पाचो काय, निजसो भिन्न लखो मत भाय । सिद्ध०।। ॐ हीं अहं पचस्कधमयात्मदृशे नम अर्घ्य० ।।१४।। बीती बात देख ससार, भव-तन-भोग विरक्त उदार ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं भूतार्थभावनासिद्धाय नम अयं० ।।१५।। धर्माधर्म जान सब ठीक, मोक्षपुरी दिखलायो लीक । सिद्ध०।। ॐ हीं अहं चतुराननजिनाय नम अर्घ्य० ।।१६।। वीतराग सर्वज्ञ सु देव, सत्यवाक वक्ता स्वयमेव ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अर्ह सत्यवक्त्रे नम अयं ।।१७।। मन-वच-काय योग परिहार, कर्मवर्गणा नाहिं लगार ।। सिद्ध०।। ॐ ह्रीं अहं निराश्रवाय नम अy० ।।८१८।। चार अनुयोग कियो उपदेश, भव्य जीव सुख लहत हमेश।।सिद्ध०।। ॐ ह्रीं अहं चतुर्भूमिकशासनाय नम अर्घ्य० ।।१९।। काहू पदसो मेल न होय, अन्वय रूप कहावै सोय।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं अन्वयाय नम अर्घ्यं ।।२०।। ।
२६० ] [ सिद्धचक्रविधान हो समाधिमे नित लवलीन, विन आश्रय नित ही स्वाधीन । सिद्धसमूह जजू मन लाय, भव-भवमे सुख-सपतिदाय।। ॐ हीं अहं समाधि-निमग्नजिनाय नम अर्घ्यं ।।२१।। लोक भाल हो तिलक अनूप, हो लोकोत्तम शेष स्वरूप ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं लोकभालतिलकजिनाय नम अर्घ्य० ।।२२।। अक्षाधीन हीन है शक्त, तिसको नाश करी निज व्यक्त ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं तुच्छभावभिदे नम अर्घ्यं०।।२३।। जीवादिक षट् द्रव्य सुजान, तिनको भलीभांति है ज्ञान । सिद्ध० ।। ॐ हीं अहँ षड्द्रव्यदृशे नम अर्घ्य० ।।८२४।। विकलरूप नय सकल प्रमाण, वस्तु भेद जानो स्वज्ञान ।। सिद्ध०।। ॐ हीं अर्ह सकलवस्तुविज्ञाने नम अर्घ्य० ।।८२५।। सब पदार्थ दर्शन तुम वैन, सशयहरण करण सुख चैन । ।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं षोडशपदार्थवादिने नम अर्घ्य० ।।८२६।। वर्णन करि पचासतिकाय, भव्य जीव सशय विनशाय ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं पचास्तिक्यबोधकजिनाय नम अर्घ्य० ।।८२७।। प्रतिबिंबित हो आरसि माहि, ज्ञानाध्यक्ष जान हो ताहि ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहँ ज्ञानाध्यक्ष जिनाय नम अर्घ्य० ।।८२८।। जामे ज्ञान जीव को एक, सो परकासो शुद्ध विवेक । ।सिद्ध०।। ॐ ह्रीं अहं समवायसार्थकजिनाय नम अर्घ्यं ।।८२९।। भक्तनि के हो साध्य सु कर्म, अन्तिम पौरुष साधन धर्म । सिद्ध०।। ॐ हीं अहं भक्तैकसाधनधर्माय नम अy० ।।८३०।। बाकी रहो न गुण शुभ एक, ताको स्वाद न हो प्रत्येक ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अर्ह निरवशेषगुणामृताय नम अy० ।।८३१।। नय सुपक्ष करि साख्य कुवाद, तुम निरवाद पक्षकर वाद । सिद्ध०।। ॐ ह्रीं अर्ह साख्यादिपक्षविध्वसकजिनाय नम अर्घ्य० ।।८३२।। सम्यग्दर्शन है तुम वैन, वस्तु परीक्षा भाखो ऐन । सिद्धसमूह जजू मनलाय, भव-भवमे सुख-सपतिदाय ।। ॐ ह्रीं अर्ह० समीक्षकाय नम अर्घ्यं ।।८३३।। ।
अष्टम पूजा ] [२६१ धमशास्त्र के हो क्ार, आदि पुरुष धारो अवतार ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं आदिपुरुषजिनाय नम अy० ।।८३४।। नय साधत नैयायिक नाम, सो तुम पक्ष धरो अभिराम ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं पविशतितत्त्ववेदकाय नम अy०।।८३५।। स्वपर चतुष्क वस्तु को भेद, व्यक्ताव्यक्त करो निरखेद । सिद्ध०।। ॐ हीं अर्ह व्यक्ताव्यक्तज्ञानविदे नम अy०।।८३६।। दर्शन ज्ञान भेद उपयोग, चेतनतामय है शुभ योग ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं ज्ञानचैतन्यभेददृशे नम अर्घ्य० ।।८३७।। स्वमवेदन शुद्ध धराय, अन्य जीव मलिन कुभाय । सिद्ध०।। ॐ हीं अहं स्वसवेदनज्ञानवादिने नम अर्ध्य।।८३८।। द्वादश सभा करै सतकार, आदर योग वेन सुखकार ।। सिद्ध०।। ॐ हीं अर्ह समवसरण-द्वादशसभापतये नम अयं ।।८३९।। आगम अक्ष अनक्ष प्रमान, तीन भेदकर तुम पहचान । । सिद्ध०।। ॐ हीं अहं त्रिप्रमाणाय नम अर्घ्य० ।।८४०।। विशद शुद्ध मति हो साकार, तुमको जानत हैं सु विचार ।।सिद्ध०।। ॐहीं अर्ह अध्यक्षप्रमाणाय नम अर्घ्यं ।।८४१।। नयसापेक्षक हैं शुभ वैन, हे अशस सत्यारथ ऐन । सिद्ध०।। ॐ हीं अहँ स्याद्वादवादिने नम अय० ।।८४२।। लोकालोक क्षेत्रके माहि, आप ज्ञान है सब दरशाहिं । । सिद्ध०।। ॐ हीं अहं क्षेत्रज्ञाय नम अy० ।।८४३।। अन्तर-वाह्य लेश नही और, केवल आतम मई अघोर ।। सिद्ध०।। ॐ हीं अर्ह शुद्धात्मजिनाय नम अर्घ्य० ।।८४४।। अन्तिम पौरुप माध्यो मार, पुरुष नाम पायो सुखकार । सिद्धसमूह जजू मनलाय, भव-भव मे सुखसपतिदाय ।। ॐ ह्रीं अहं पुरुषात्मजिनाय नम अर्घ्य० ।।८४५।। चहुँगतिमे नरदेह मझार, मोक्ष होत तुम नर आकार ।।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं नराधिपाय नम अर्घ्य० ॥८४६।। दर्श ज्ञान चेतन की लार, निरावर्ण तुम हो अविकार ।। सिद्ध०।। ॐ हीं अहं निरावरणचेतनाय नम अर्घ्य० ।।८४७।। . .
अमूरत देव २६२ ] [ सिद्धचक्रविधान भावन वेद वेद नरदेह, मोक्ष रूप है नहि सन्देह । ।सिद्ध०।। ॐ हीं अर्ह मोक्षरूपजिनाय नम अयं० ।।८४८।। सत्य यथारथ हो सब ठीक, स्वय सिद्ध राजो शुभ नीक । ।सिद्ध०।। ॐ हीं अहं अकृत्रिम जिनाय नम अर्घ्यं ।।८४९।। दोहा जारि तुमको जानिये, सो है अगम अलक्ष । निर्गुण यातें कहत है, भव-भयतें हम रक्ष ।। ॐ हीं अर्ह निर्गुणाय नम अy० ।।८५०।। चेतनमय हैं अष्टगुण, सो तुम मे इक नाम । शुद्ध देव हो, स्व-प्रदेश चिदराम ।। ॐ हीं अर्ह अमूर्ताय नम अर्घ्य० ।।८५१।। उमापती त्रिभुवन धनी, राजत भू भरतार । निजानन्द को आदि ले, महा तुष्ट निरधान ।। ॐ हीं अहँ उमापतये नम अर्घ्यं ।।८५२।। व्यापक लोकालोक मे, ज्ञान-ज्योति के द्वार । लोकशिखर तिष्ठत अचल, करो भक्त उद्धार ।। ॐ हीं अहं सर्वगताय नम अर्घ्य० ।।८५३।। योग प्रबन्ध निवारियो, राग द्वेष निरवार । देहरहित निष्कप हो, भये अक्रिया सार ।। ॐ हीं अहं अक्रियाय नम अर्घ्य० ।।८५४।। सर्वोत्तम अति उच्च गति, जहाँ रहो स्वयमेव । देव वास है मोक्ष थल, हो देवन के देव ।। ॐ हीं अर्ह देवेष्टजिनाय नम अर्घ्य० ।।८५५।। भवसागर के तीर हो, अचलरूप अस्थान । फिर नही जगमे जन्म है, राजत हो सुखथान ।। ॐ हीं अर्ह तटस्थाय नम अर्घ्य० ।।८५६।। ज्यो के त्यो नित थिर रहो, अचलरूप अविनाश । निजपदमय राजत सदा, स्वय ज्योति परकाश।। ॐ हीं अहँ कूटस्थाय नम अर्घ्य० ।।८५७।।
अष्टम पूजा ] [२६३ तत्त्व-अतत्त्व प्रकाशियो, ज्ञाता हो सब भास । ज्ञानमूर्ति हो जानधन, ज्ञान ज्योति अविनाश।। ॐही अहं शात्रे नम अयं ।।८५८।। पर-निमित्त के योगते, व्यापै नही विकार । निज स्वरूप मे थिर सदा, हो अबाध निरधार।। ॐहीं अहं निरापाधाय नम. अर्घ्य ।।८५९।। चारवाक वा साख्यमत, झूठी पक्ष धरात । अल्प मोक्ष नही होत है, राजत हो विख्यात।। ॐ हीं अर्ह निराभावाय नम अय० ।।८६०।। तारण तस्ण जिहाज हो, अतुल शक्ति के नाथ । भव वारिधि से पारकर, गसो अपने साथ।। ॐ हीं अह भयवारिधिपारकाय नम अयं ।।८६१।। वन्ध-मोक्ष की कहन है, सो भी हे व्यवहार । तुम विवहार अतीत हो, शुद्ध वस्तु निरधार ।। ॐ हीं अर्ह वधमोक्षरहिताय नम अर्घ्य० ।।८६२।। पुरुषारथ विष, मोक्ष पदारथ सार । तुम साधो परधान हो, सब मे सुख आधार ।। ॐ हीं अहं मोक्षसाधनप्रधानजिनाय नम अर्घ्य० ।।८६३।। कर्म-मैल प्रक्षाल के, निज आतम लवलाय । हो प्रसन्न शिवथल विपैं, अन्तरमल विनशाय ।। ॐ हीं अहं कर्मव्याधिविनाशकजिनाय नम अर्घ्य ।।८६४।। निज सुभाव निज वस्तुता, निज सुभाव मे लीन । वन्दू शुद्ध स्वभावमय, अन्य कुभाव मलीन ।। ॐ हीं अहं निजस्यभावस्थितजिनाय नम अयं ।।८६५।। निज स्वरूप परकाश है, निरावर्ण ज्यो सूर । तुमको पूजत भावसो मोह कर्म को चूर।। ॐ हीं अहं निरावरणसूर्यजिनाय नम अर्ध्य० ।।८६६।। निज भावनते मोक्ष हो, ते ही भाव रहात । स्वैगुण स्वैपरजाय मे, थिरता भाव ॐ हीं अहं स्वरूपरूढजिनाय नम अर्घ्य० ।।८६७।। चारी पुरुपारथ धरात।
२६४ ] [ सिद्धचक्रविधान शुद्ध भये सब कुभाव को जीतियो, निरमूल । शुद्धातम कहलात हो, नमत नशे अध शूल ।। ॐ हीं अहं प्रकृतिप्रियाय नम अर्घ्य० ।।८६८।। निज सन्मति के सन्मती, निज वुध के बुधवान । शुभ ज्ञाता शुभ ज्ञान हो, पूजत मिथ्या हान ।। ॐ हीं अहं विशुद्धसन्मतिजिनाय नम अर्घ्य० ।।८६९।। कर्म प्रकृति को अश विन, उत्तर हो या मूल । शुद्धरूप अति तेज घन, ज्यो रवि बिव अधूल ।। ॐ हीं अहँ शुद्धरूपजिनाय नम अर्घ्य० ।।८७०।। आदि पुरुष आदीश जिन, आदि धर्म अवतार । आदि मोक्ष दातार हो, आदि कर्म हरतार ।। ॐ हीं अहं आघवेदसे नम अy०11८७१।। नहिं विकार आवै कभी, रहो सदा सुखरूप । रोग शोक व्यापै नही, निवसैं सदा अनूप ।। ॐ हीं निर्विकृतये नम अy०।।८७२।। निज पौरुष करि सूर्य सम, हरौ तिमिर मिथ्यात । तुम पुरुषारथ सफल है, तीन लोक विख्यात ।। ॐ हीं अह मिथ्यातिमिरविनाशकाय नम अy० ।।८७३।। वस्तु परीक्षा तुम बिना, और झूठ कर खेद । अध कूप मे आप सर, डारत है निरभेद ।। ॐ हीं अर्ह मीमासकाय नम अयं० ।।८७४।। होनहार या हो लई, या पइये इस काल ।। अस्तिरूप सब वस्तु हैं, तुम जानो यह हाल।। ॐ हीं अहँ अस्तिसर्वज्ञाय नम अy० ।।८७५।। जिनवाणी जिनसरस्वती, तुम गुणसो परिपूर । पूज्य योग तुमको कहैं, करें मोह मद चूर।। ॐ हीं अहं श्रुतपूज्याय नम अयं ।।८७६।। स्वय स्वरूप आनन्द हो, निजपद रमन सुभाव । सदा विकसित ही रहैं, बन्दू सहज सुभाव ।। ॐ हीं अहं सदोत्सवाय नम अर्घ्यं ।।८७७।।
अष्टम पूजा ] [२६५ मन इन्द्री जानत नही, जाको शुद्ध स्वरूप । वचनातीत स्वगुणसहित, अमल अकाय अरूप ।। ॐ हीं अहं परोक्षज्ञानागम्याय नम अर्घ्य।।८७८।। जो श्रुतज्ञान कला धरै, तिनको हो तुम इष्ट । तुमको नित प्रति ध्यावते, नाशे सकल अनिष्ट ।। ॐ हीं अर्ह इष्टपाठकाय नम अy०।।८७९।। निज समरथ कर साधियो, निज पुरुषारथ सार । सिद्ध भये सब काम तुम, सिद्ध नाम सुखकार ।। ॐ हीं अह सिद्धकर्मक्षयाय नम अर्घ्य० ।।८८०।। पृथ्वी जल अगनी पवन, जानत इनके भेद । गुण अनन्त पर्याय सब, सो विभाग परिछेद ।। ॐ हीं अहं मिथ्यामतनिवारकाय नम अy० ।।८८१॥ निज सवेदन ज्ञान मे, देखत होय प्रत्यक्ष । रक्षक हो तिहुँ लोक के, हम शरणागत पक्ष ।। ॐ हीं अहं प्रत्यक्षकप्रमाणाय नम अयं ।।२।। विद्यमान शिवलोक मे, स्वगुण पर्य समेत । कहैं अभाव कुमती मती, निजपर धोका देत ।। ॐ हीं अहं अस्तिमुक्ताय नम अयं० ।।३।। तुम आगम के मूल हो, अपर गुरू है नाम । तुम वानी अनुसार ही, भये शास्त्र अभिराम ।। ॐ हीं अहं गुरुश्रुतये नम अर्घ्य० ।।८८४॥ तीन लोक के नाथ हो, ज्यो सुरगण मे इन्द्र । निजपद रमन स्वभाव धर, नमे तुम्हें देवेन्द्र ।। ॐ ह्रीं अहं त्रिलोकनाथाय नम अयं ।।८।। सब स्वभाव अविरुद्ध हैं, निजपर घातक नाहिं । सहचारी परिणाम हैं, निवसत हैं तुम माहिं ।। ॐ हीं अहं स्वस्वभावाविरुद्धजिनाय नम अर्घ्यं ।।८८६।। ब्रह्मज्ञान को वेद कर, भये शुद्ध अविकार । पूरण ज्ञानी हो नमू, लहो वेद को सार।। ॐ हीं अहं ब्रह्मविदे नम अy० ।।८८७।।
नयक उपाइके, परोक्ष ।। २६६ ] [ सिद्धचक्रविधान शब्द ब्रह्म के ज्ञानते, आतम तत्त्व विचार । शुक्लध्यान मैं लय भए, हो अतर्क अविचार ।। ॐ हीं अर्ह शब्दाद्वैतब्रह्माणे नम अर्घ्य।।८८८।। सूक्ष्म तत्त्व परकाशकर, सूक्षम कर्म अच्छेद । मोक्षमार्ग परगट कियो, कहो सु अन्तर भेद ।। ॐ हीं अर्ह सूक्ष्मतत्त्वप्रकाशजिनाय नम अर्घ्य।।८८९।। तीन शतक त्रेसठ जु है, सव मानै पाखण्ड । धर्म यथारथ तुम कहो, तिन सवको करि खड।। ॐ हीं अर्ह पाखण्डखण्डकाय नम अर्घ्य० ।।८९०।। कर्णरूप करतार हो, कोइक द्वार । सुरमुनि करि पूजत भए, माननीक सुखकार ।। ॐ हीं अर्ह नयाधीनजे नम अर्घ्यं ।।८९१।। केवलज्ञान तदनन्तर हो मोक्ष । साक्षात् बडभाग सैं, पूजू इहाँ ॐ हीं अर्ह अन्तकृते नम अर्घ्य० ।।८९२।। शरणागतको पार कर, देत मोक्ष अभिराम । तारण-तरण सु नाम है, तुम पद करू प्रणाम ।। ॐ हीं अहँ पारकृते नम अर्घ्यं ।।८९३।। भव-समुद्र गम्भीर है, कठिन जासको पार । निज पुरुषारथ करि तिरे, गहो किनारो सार।। ॐ हीं अहं तीरप्राप्ताय नम अर्घ्यं ।।८९४।। एक बार जो शरण गहि, ताके हो हितकार । याते सब जग जीव के, हो आनन्द दातार।। ॐ हीं अह परहितस्थिताय नम अर्घ्य० ।।८९५।। निज नेत्र सो, मोक्षपुरी पहुँचात । महादेव हो जगत पितु, तीन लोक विख्यात ।। ॐ हीं अहँ रत्नत्रयनेत्रजिनाय नम अर्घ्य० ।।८९६।। तीन लोक के नाथ हो, महा ज्ञान भण्डार । सरल भाव, विन कपट हो, शुद्ध-बुद्ध अविकार ।। ॐ हीं अहँ शुद्धबुद्धजिनाय नम अयं० ।।८९७।। रत्नत्रय अष्टम पूजा ] [२६७ निश्चै वा व्यवहार के, हो तुम जाननहार । वस्तुरूप निज साधियो, पूजत हूँ निरधार।। ॐ हीं अहं ज्ञानकर्मसमुच्चयिने नम अर्घ्य० ।।८९८।। सुर-नर-पशु न अघावते, सभी ध्यावते ध्यान । तुमको नित ही ध्यावते, पावै सुख निर्वाण।। ॐ हीं अहं नित्यतृप्तजिनाय नम अर्घ्य० ।।८९९।। कर्म-मैल प्रक्षाल करि, तीनो योग सम्हार । पाप-शैल चकचूर कर, भये अयोग सुखार ।। ॐ हीं अहं पापमलनिवारकजिनाय नम अर्घ्य० ।।९००।। सूरज हो निज ज्ञानधन, ग्रहण उपद्रव नाहि । बेखटके शिवपथ सब, दीखत है जिस माहि ।। ॐ हीं अर्ह निरावरणज्ञानघनजिनाय नम अy० ।।९०१।। जोग योग सकल्प-सब, हरो देह को साथ । रहो अपित थिर सदा, मैं नाऊ निज माथ ।। ॐ हीं अहं उच्छिन्नयोगाय नम अy० ।।९०२।। जोग सुथिरता को हरै, करै आगमन कर्म । तुम तासौं निर्लेप हो, नशौ मोह मद शर्म ।। ॐ हीं अहं योगकृतनिर्लेपाय नम अर्घ्य० ।।९०३। निज आतममे स्वस्थ हैं, स्वपद योग रमाय । निर्भय तुम निर-इच्छु हो, नमूजोर कर पाय।। ॐ हीं अहं स्वस्थलयोगरतजिनाय नम अर्घ्य।।९०४।। महादेव गिरिराज पर, जन्म समै जिम सूर । योग किरण विकसात हो, शोक तिमिर का दूर।। ॐ हीं अहं गिरिसयोगजिनाय नम अय० ॥९०५॥ सूक्षम निज परदेश तन, सूक्षम क्रिया परिणाम । चितवत मन नहिं वच चलैं, राजत हो शिवधाम ।। ॐ हीं अर्ह सूक्ष्मीकृतवपुःक्रियाय नम अयं० ।।९०६।। सूक्ष्म तत्त्व परकाश हैं, शुभ प्रिय वचनन द्वार । भविजन को आनदकरि, तीन जगत गुरुसार ।। ॐ हीं अहँ सूक्ष्मवाक्मितयोगाय नम अर्घ्य० ।।९०७।।
र्गहत, उमगण । २६८ ] [ सिद्धचक्रयिधान कर्म रहित शुद्धात्मा, निश्चल क्रिया रहात । स्वप्रदेश मय थिर मदा, क्तक्त्य मुस पान।। ॐ हीं अहं निष्कर्मशुद्धात्मजिनाय नम अर्घ्य० ।।९०८।। विद्यमान प्रत्यक्ष है, चेतनगय प्रकाश । कम-कालिमामो पृजन हो अप नाश।। ॐ हीं अर्ह भूताभिव्यक्तचेतनाय नम अर्घ्य० ।।९०९।। गृहस्थाचरण मुभेद मुभेद करि. चमन्प एक तुम्ही हो धर्म करि, पायो शिवपुर वान ।। ॐ हीं अहं धर्मरासजिनाय नम अर्घ्य० ।।९१०।। सूर्य प्रकाशन मोह तम, हरता हो शुभ पथ । पाप क्रिया विन विन गजते, महायती महायती निग्ग्रथ।। ॐ हीं अर्ह परमहसाय नम अर्घ्य० ।।९११।। वन्ध रहित सर्वस्व करि, निमल हो निर्लेप । शुद्ध सुवर्ण दिपे मदा, नही मोह मल लेप।। ॐ ह्रीं अहं परमसवराय नम अर्घ्य० ।।९१२।। मेघ पटल विन सूर्य जिम, दीप्न अनन्त प्रताप । निरावरण तुम शुद्ध हो, पूजत मिटि है पाप।। ॐ हीं अहं निरावरणाय नम अर्घ्य० ।।९१३।। कर्म अश सव झर गिरे, रहो न एक लगार । परम शुद्धता धारकै, तिष्ठो हो अविकार।। ॐ हीं अहं परमनिर्जराय नम अर्घ्यं ।।९१४।। तेज प्रचण्ड प्रभाव है, उदय रूप परताप । अन्य कुदेव कुआगिया, जुग-जुग धरत कलाप ।। ॐ हीं अहं प्रज्वलितप्रभावाय नम अर्घ्य० ।।९१५।। भये निरर्थक कर्म सब, शक्ति भई है हीन । तिनको जीते छिनक मे, भये सुखी स्वाधीन ।। ॐ हीं अहँ समस्तकर्मक्षयजिनाय नम अय॑ ।।९१६।। कर्म प्रकृतिक रोग सम, जानो हो क्षयकार । निजस्वरूप आनन्द मे, कहो विगार निहार।। ॐ हीं अह कमविस्फोटकाय नम अर्घ्य० ।।९१७।।
अष्टम पूजा ] [२६९ हीन शक्ति परमाद को, आप कियो हैं अन्त । निज पुरुषार्थ सुवीर्य यो, सुखी भए सु अनत ।। ॐ हीं अनन्तवीर्याजनाय नम अर्घ्यं ।।९१८।। एकरूप रस स्वाद मे, निर आकुलित रहाय । विविधरूप रस पर निमित, ताको त्याग कराय ।। ॐ हीं अहं एकाकाररसास्वादाय नम अy० ।।९१९।। इन्द्री मन के सब विषय, त्याग दिये इक लार । निजानन्दमे मगन है, छाडो जग व्यापार।। ॐ हीं अहँ विश्वाकाररसाकुलिताय नम अयं० ।।९२०।। पर सम्बन्धी प्राण बिन, निज प्राणनि आधार । सदा रहै जीतव्यता, जरा मृत्यु को टार ।। ॐ हीं अहं सदाजीविताय नम अy० ।।९२१।। निजरस के सागर धनी, महा प्रिय स्वादिष्ट । अमर रूप राजै सदा, सुर मुनि के हो इष्ट ।। ॐ हीं अहं अमृताय नम अयं ।।९२२।। पूरण निज आनन्द मे, सदा जागते आप । नहिं प्रमाद मे लिप्त है, पूजत विनसे पाप ।। ॐ हीं अह जाग्रते नम अy० ।।९२३।। क्षीण ज्ञान ज्ञानावरण, करै जीवको नित्य । सो आवर्ण विनाशियो, रहो अस्वप्न सुवित्य ।। ॐ हीं अहं असुप्ताय नम अj० ।।९२४।। स्व-प्रमाण मे थिर सदा, स्वय चतुष्टय सत्य । निराबाध निर्भय सुखी, त्यागत भाव असत्य ।। ॐ हीं अहं स्वप्रमाणस्थिताय नम अध्य० ।।९२५।। श्रमकरि नहिं आकुलित हो, सदा रहो निरखेद । स्वस्थरूप वेदो ॐ हीं अहं निराकुलितजिनाय नम अy० ।।९२६।। राजो सदा, ज्ञान अभेद ।।
भाव भेद २७० ] [ सिसचक्रावधान मन वच तन व्यापार था, तावत रहो शरीर । ताको नाश अकप हो, बन्दू मन धीर।। ॐ हीं अहँ अयोगिने नम अर्घ्य० ।।९२७।। जितने शुभ लक्षण कहे, तुममे हैं एकत्र । तुमको वदू सो, हरी पाप सर्वत्र ।। ॐ हीं अहँ चतुरशीतिलक्षणाय नम अर्घ्य० ।।९२८।। तुम लक्षण सूक्षम महा, इन्द्रिय विषय अतीत । वचन अगोचर गुण धरो, निर्गुण कहत सुनीत।। ॐ हीं अर्ह अगुणाय नम अर्घ्य० ।।९२९।। अगुरुलघू पर्याय के, अनन्तानन्त । गुण अनत परिणामकरि, नित्य नमे तुम 'सत' ।। ॐ हीं अहं अनतानन्तपर्यायाय नम अर्घ्य० ।।९३०।। राग द्वेष के नाशते, नही पूर्व सस्कार । निज सुभाव मे थिर रहैं, अन्य वासना टार।। ॐ हीं अहँ पूर्वसस्कारनाशकाय नम अर्घ्य० ।।९३१।। गुण चतुष्ट मे वद्धता, भई अनन्तानन्त । तुम और इस जगत मे, सदा रहो जयवत ।। ॐ ही अहँ अनन्तचतुष्टयवृद्धाय नम अर्घ्यं ।।९३२।। आर्ष कथित, उत्तम वचन, धर्म मार्ग अरहन्त । सो सब नाम कहो तुम्ही, शिवमारग के सत।। ॐ ह्रीं अहँ प्रियवचनाय नम अय॑ ।।९३३।। महाबुद्धि के धाम हो, सूक्षम शुद्ध अवाच्य । चार ज्ञान नहिं गम्य हो, वस्तुरूप सो साच्य ।। ॐ हीं अहं निरवचनीयाय नम अयं० ।।९३४।। सूक्ष्म तुमको है परवेश । आपै सूक्षम रूप हो, राजत निज परदेश।। ॐ हीं अहँ अनीशाय नम अयं ।।९३५।। ते सूक्षम विषै, अष्टम पूजा ] [२७१ कर्म प्रवन्ध सुघन पटल, ताकी छाय निवार । रविघन ज्योति प्रकट भई, पूरणता विधि धार ।। ॐ हीं अहं अनण पर्यायाय नम अर्घ्य।।९३६।। निज प्रदेश मे थिर सदा, योग निमित्त निवार । अचल शिवालय के विर्षे, तिष्ठं सिद्ध अपार ।। ॐ हीं अहँ स्थेयसे नम अयं० ।।९३७।। सन्तन मन प्रिय हो अति, सज्जन वल्लभ जान । मुनि जन मन प्यारे सही, नमत होत कल्याण।। ॐ हीं अर्ह प्रेष्ठाय नम अर्घ्य० ।।९३८।। काल अनन्ताकाल लौ, करै शिवालय वास । अव्यय अविनाशी सुथिर, स्वय ज्योति परकाश ।। ॐ हीं अहँ स्थिरजिनाय नम अर्घ्य० ।।९३९।। स्वै-आतम मे वास है, रुलत नही ससार । ज्यो के त्यो निश्चल सदा, बदत भवदधि पार ।। ॐ हीं अहं निजात्मतत्त्वनिष्ठाय नम अy० ।।९४०।। सुभग सरावन योग्य हैं, उत्तम भाव धराय । तीन लोक मे सार है, मुनिजन बंदित पाय ।। ॐ हीं अहं श्रेष्ठभवधारकजिनाय नम अy० ।।९४१।। सब के अग्रेसर भये, सब के हो सिरताज । तुमसे बडा न और है, सबके कर हो काज ।। ॐ हीं अर्ह ज्येष्ठाय नम अर्घ्य० ।।९४२।। स्व-प्रदेश निष्कम्प है, द्रव्य-भाव विधि नाश । इष्टानिष्ट निमित धरै, निज आनन्द विलास ।। ॐ हीं अहं निष्कपप्रदेशजिनाय नम अय॑ ।।९४३।। उचित क्षमादिक अर्थ सव, सत्य सुन्याय सुलब्ध । तिन सबके स्वामी नमू,पूरण सुखी सुअब्ध।। ॐ हीं अर्ह उत्तमक्षमादिगुणाब्धिजिनाय नम अय० ।।९४४।।
२७२ ] [ सिद्धचक्रविधान महा कठिन द शक्य ह. यह ममार निकाल । तुम पायो पुरुपाथ करि, लहो म्वन्धि अवाम ।। ॐ हीं अर्ह पूज्यपादजिनाय नम अर्घ्य० ।।९४५।। मरमारथ निज गुण क्हे, मोक्ष प्राप्ति मे होय । स्वारथ इन्द्रिय जन्य है, मो तुम इनको खोय।। ॐ हीं अर्ह परमार्थगुणनिधानाय नम अर्घ्य० ।।९४६।। पर-निमित्त या भेद करि या उप रत क्हाय । सो तुम मे सव लय भये मानो मुप्त क्राय ।। ॐ हीं अर्ह व्यवहारसुप्ताय नम अर्घ्य० ।।९४७।। स्व-पद मे नित रमन है अप्रमाद अधिकाय । निज गुण मदा प्रकाश है अतुल वली नमू पाय ।। ॐ हीं अर्ह अतिजागरूकाय नम अर्घ्य० ।।९४८।। मक्ल उपद्रव मिटि गये, जे थे परकी साथ । निभय मदा मखी भये, वदू नमि निजमाथ ।। ॐ हीं अर्ह अतिसुस्थिताय नम अर्घ्य० ।।९४९।। कहै हुवे हुवे हो नेममे, परमाराध्य अनादि । तुम महातमा जगत के, और कुदेव कुवादि ।। ॐ हीं अर्ह उदितोदितमाहात्म्याय नम अर्घ्य० ।।९५०।। तत्त्वज्ञान अनुकूल सव, शब्द प्रयोग विचार । तिसके तुम अध्याय हो अय प्रकाशन हार ।। ॐ हीं अर्ह तत्त्वज्ञानानुकूलजिनाय नम अर्घ्य० ।।९५१।। ना काह मो जन्म हो ना काहू सो नाश । स्वयंसिद्ध विन पर-निमित्त, स्व-स्वम्प परकाश।। ॐ हीं अर्ह अकृत्रिमाय नम अर्घ्य० ।।९५२।। अत्यन्त है, तुम सन्मति परकाश । तेजरूप उत्सव मइ, पाप तिमिर को नाश।। ॐ हीं अर्ह अमेयमहिम्ने नम अy० ॥९५३।। अप्रमाण अष्टम पूजा ] [२७३ रागादिक मल को हरें, तनक नही आवास । महा विशुद्ध अत्यत हैं, हरो पाप-अहि-डास ।। ॐ हीं अहँ अत्यन्तशुद्धाय नम अय।।९५४।। स्वयंसिद्ध भरतार हो, शिवकामनि के सग । रमण भाव निज योग मे, मानो अति आनद ।। ॐ हीं अह सिद्धिस्वयराय नम अयं० ।।९५५।। विविध प्रकार न धरत है, हैं अजन्म अव्यक्त । सूक्षम सिद्ध समान है, स्वय स्वभाव सुव्यक्त।। ॐ हीं अहँ सिद्धानुजाय नम अर्ध्य।।९५६।। मोक्षरूप शुभ वास के, आप मार्ग निरखेद । भविजन सुलभ गमन करें, जगत वास को छेद ।। ॐ हीं अहं शिवपुरीपथाय नम अयं० ।।९५७।। गुण समूह अत्यन्त हैं, कोई न पावै पार । थकित रहे श्रुतकेवली, निज बल कथन अगार ।। ॐ हीं अहं अनन्तगुणसमूहजिनाय नम अय० ।।९५८।। इक अवगाह प्रदेश मे, हो अवगाह अनन्त । पर उपाधि निग्रह कियो, मुख्य प्रधान अनत ।। ॐ हीं अहं पर-उपाधिनिग्रहकारकजिनाय नम अय० ।।९५९।। स्वयंसिद्ध निज वस्तु हो, आगम इन्द्रिय ज्ञान । कादिक लक्षण नही, स्वय स्वभाव प्रमान ।। ॐ ह्रीं अहं स्वयसिद्धजिनाय नम अर्घ्य० ।।९६०।। हो प्रछन्न इन्द्रिय अगम, प्रकट न जाने कोय । सकल अगुण को लय कियो, निज आतम मे खोय ।। ॐ हीं अहं इन्द्रियागम्यजिनाय नम अयं० ।।९६१।। निज गुण करि निज पोपियो, सकल क्षुद्रता त्याग । पूरण निजपद पाय करि, तिष्ठत हो बडभाग ।। ॐ हीं अहं पुष्टाय नम अy० ।।९६२।।
२७४ ] नन उपान [ सिद्धचक्रविधान वामचर्य पूग ध निजपद ग्नता नल अवन्ह भेद र शील नुभाव नु मा ।। ॐ हीं अर्ह अष्टादशमहनशीलेश्वराय नम अय० ।।९।। महा पन्य शिवपद क्मल नारे दल विक्मान । मुनि नन भनन ग्नग नयल गधानद नहान ।। ॐ हीं अर्ह पुण्यनक्लाय नम अर्ध्य० ।।९६४।। नति श्रत अवधि विजान यत चबुद्ध भगवान । स्तयुग ने नान बन धगे शिव माधव पन्धान ।। ॐही अर्ह बताग्रयुग्याय नम अर्य० ।।९३५।। पन्न शुक्ल शा ध्यान में नन भन्न हितगार । अपने छुटका।। ॐ हीं अर्ह परमशुक्लध्यानिने नम अर्घ्य० ।।९६३।। भाग्वार इन जलधि को भी क्यिो तुन अन्त । गोकार उत्रियो धगे व भुज बलवत ।। ॐ ही अर्ह समारसमुद्रतारकजिनाय नम अर्घ्य० ।।९६७।। एक समय ने गनन क क्यिो शिवालय वाम । काल अनत चल रहो मेटो जग धन त्रा।। ॐ हीं अर्ह क्षेपिष्ठाय नम अर्ध्य।।९६८।। पचालन लव जाप ने जितना लागे वाल । ऑनम पाना शुक्ल का ध्यान वनै जग भाल।। ॐही अर्ह पञ्चलध्वक्षरन्यितये नम अयं ।।९६९।। प्रति त्रयोदश शेष हैं जब तक मोन न होय । बं प्रकृति यिनि मेट पहुँचे शिवपुर नोय ।। ॐ हीं अर्ह त्रयोदशप्रकृतिस्थितिविनाशकाय नम अर्घ्य० ।।९७०।। तेरह विधि चारित्र के तुम हो पूरण शूर । निज पुत्पारय परि लियो शिवपुर अनद पूर।। ॐ हीं अहं त्रयोदशचारित्रपुर्णताय नम अर्घ्य० ।।९७१।।
अष्टम पूजा ] [ २७५ निज सुख मे अन्तर नही, परसो हानि न होय । स्वस्थरूप परदेश जिन, तिन पूजत हूँ सोय।। ॐ हीं अर्ह अच्छेद्यजिनाय नम अयं ।।९७२।। निज पूजनते देत हो, शिव सपति अधिकाय । याते पूजन योग्य हो, पजू मन-वच-काय ।। ॐ हीं अहं शिवदात्रीजिनाय नम अयं० ।।९७३।। मोह महा परचण्ड बल, सकै न तुमको जीत । नमू तुम्हे जयवत हो, धार सु उर में प्रीत ।। ॐ हीं अर्ह अजयजिनाय नम अर्घ्यं ।।९७४।। यग विधान मे जजत ही, आप मिले निधि रूप । तुम समान नही और धन, हरत दरिद दुखकूप ।। ॐ ह्रीं अर्ह याज्याय नम अर्घ्य ।।९७५।। लोकोत्तर सम्पद विभव, है सरवस्व अघाय । तुमसे अधिक न और है, सुख विभूति शिवराय ।। ॐ हीं अहं अनर्घ्यपरिग्रहाय नम अयं ।।९७६।। तुमरो आह्वानन यजन, प्रासुक विधि से योग । त्रिजग अमोलिक निधि सही, देत पर्म सुखभोग ।। ॐ हीं अह अनर्घ्यहेतवे नम अy० ।।९७७।। एक देश मुनिराज हैं, सर्व देश जिनराज । भव-तन-भोग विरक्तता निर्ममत्त्व सुख साज।। ॐ हीं अहं परमनिष्पहाय नम अय० ॥९७८।। परदुख मे दुख हो जहाँ, मोह प्रकृति के द्वार । दया कहैं तिसको सुमति, सो तुम मोह निवार।। ॐ ह्रीं अहँ अत्यन्तनिर्मोहाय नम अर्घ्यं ।।९७९।। स्वयबुद्ध भगवान हो, सुर मुनि पूजन योग । बिन शिक्षा शिवमार्ग को, साधो हो धरि योग।। ॐ हीं अर्ह अशिष्याय नम अय० ।।९८०।।
२७६ ] [ सिद्धचक्रविधान तुम एकत्व अन्यत्व हो, परमो नही सम्बन्ध । स्वयसिद्ध अविरुद्ध हो, नाशो जगत प्रवन्ध ।। ॐ हीं अर्ह परसबधविनाशकाय नम अर्ध्य० ।।९८१।। काहू को नहि यजन करि, गुरु का नहि उपदेश । स्वयबुद्ध स्व-शक्ति हो, राजो शुद्ध हमेश ।। ॐ हीं अहं अदीक्षाय नम अy० ।।९८२।। तुम त्रिभुवन के पूज्य हो, यजो न काहू और । निहित मे रत हो मदा पर-निमित्त को छोर ।। ॐ हीं अहँ त्रिभुवनपूज्याय नम अर्घ्य० ।।९८३।। अरहन्तादि उपासना, मोह उदयसो होय । स्वय ज्ञानमे लय भए, मोह कर्म को खोय ।। ॐ हीं अहं अदीक्षकाय नम अy० ।।९८४।। गौण रूप परिणाम है, मुख ध्रुवता गुण धार । अक्षय अविनश्वर स्वपद, स्वस्थ सुथिर अविकार ।। ॐ हीं अर्ह अक्षयाय नम अर्घ्य० ।।९८५।। सूक्षम शुद्ध स्वभाव है, लहै न गणधर पार । इन्द्र तथा अहमिन्द्र सब, अभिलाषित उरधार ।। ॐ हीं अहं अगम्याय नम अर्घ्यं ।।९८६।। अचल शिवालय के विषै, टकोत्कीर्ण समान । सदा विराजो सुखसहित, जगत भ्रमणको हान।। ॐ हीं अर्ह अगमकाय नम अy० ।।९८७।। रमण योग छद्मस्थ के, नहिं अलिंग सरूप । पर प्रवेश बिन शुद्धता, धारत सहज अनूप ।। ॐ हीं अर्ह अरम्याय नम अयं० ।।९८८।। पर-पदार्थ इच्छुक नही, इष्टानिष्ट निवार । सुथिर रहो निज आत्म मे, बन्दत हूँ हितधार ।। ॐ हीं अर्ह निजात्मसुस्थिराय नम अर्घ्यं ।।९८९।।
अष्टम पूजा ] [२७७ जाको पार न पाइयो, अवधि रहित अत्यन्त । सो तुम ज्ञान महान है, आशा राखे 'सत' ।। ही अहं ज्ञाननिर्भराय नम अय॑ ।।९९०।। मुनिजन जिन सेवन करें, पावै निजपद सार । महा शुद्ध उपयोग मय, वरतत है सुखकार ।। ॐहीं अह महायोगीश्वराय नम अर्घ्य० ।।९९१।। भाव शुद्ध परमातमा, द्रव्य शुद्ध विन देह । कर्म वर्गणा विन लिये, पूजत हूँ धरि नेह ।। ॐ हीं अहं वय्यशुद्धाय नम अय० ।।९९२।। पच प्रकार शरीर को, मूल कियो विवश । स्व प्रदेशमय राजते, पर मिलाप नही अश।। ॐ हीं अहं अदेहाय नम अर्घ्य० ।।९९३।। जाको फेर न जन्म है, फिर नाही ससार । सो पचमगति शिवमई, पायो तुम निरधार ।। ॐ हीं अहं अपुनर्भवाय नम अध्य० ।।९९४।। सकल इन्द्रियाँ व्यर्थ करि, केवलज्ञान सहाय । मव द्रव्यनि को ज्ञान है, गुण अनन्त पर्याय ।। ॐ हीं अहं ज्ञानकविदे नम अर्घ्य० ।।९९५।। जीव मात्र निज धन सहित, गुण समूह मणि खान । अन्य विभाव विभव नही, महा शुद्धता जान ।। ॐ हीं अह जीवधनाय नम अर्घ्य० ।।९९६।। मिद्ध भये परसिद्ध तुम, निज पुरुपारथ साध । महा शुद्ध निज आत्ममय, सदा रहे निरवाध ।। ॐ हीं अहं सिद्धाय नम अय० ।।९९७।। लोकशिखर पर थिर भए, ज्यो मन्दिर मणि कुम्भ । निजशरीर अवगाह मे, अचल सुथान अलुम्भ ।। ॐ हीं अहं लोकाग्रस्थिताय नम अy० ।।९९८।। सहज निरामय भेद विन, निरावाध निस्सग । एक रूप सामान्य हो, निज विशेष मई अग।। ॐ हीं अहं निर्द्वन्द्वाय नम अयं ।।९९९।।
२७८ ] [ मिचक्रावधान जे अविभाग प्रछेद हैं, इक गुण के अनन्न । तुममें पूरण गुण नही, धगे अनन्नानन्न।। ॐ ही अहं अनतानतगुणाय नम अर्घ्य० ।।१०००।। पर मिलाप नही लेश है, स्वप्रदेशमय रूप । भयोपशम जानी नुम्हे, जानत नहीं वन्य ।। ॐ हीं अर्ह आत्मरूपाय नम अर्घ्य०।१००१।। भमा आत्मको नाव है, बोध क्मनों घात । मो तुम क्मं विपाइयो भमा नभाव धगत।। ॐ हीं अर्ह महाक्षमाय नम अर्घ्य० ।।१००२।। शील नुभाव सु आन्मको, ओभ गहत सुखदाय । निर आकुलता धार है, बढ़ तिनके पाय ।। ॐ हीं अहं महाशीलाय नम अय० ।।१००३।। शशि स्वभाव ज्यों शानिधर, और न शाति धराय । आप शांति पर-शातिर, भवदुख दाह मिटाय ।। ॐ हीं अहं महाशाताय नम अर्घ्य० ।।१००४।। तुम सम को बलवान है जीन्यो मोह प्रचड । घरो अनन्त स्व-वीर्यको, निजपद मुथिर अखड।। ॐ हीं अर्ह अनतवीर्यात्मकाय नम अर्घ्य० ।।१००५।। लोकालोक विलोकियो, नशय विन इक्वार । खेद रहित निश्चल मुखी, स्वच्छ आरनी मार।। ॐ हीं अह लोकालोकनाय नम अर्घ्य० ॥१००६।। निरावर्ण स्वै गुण महित, निजानन्द पन भोग । अव्यय अविनाशी ना, अजर अमर शुभ योग ।। ॐ हीं अहं निरावरणाय नम अर्घ्य० ।।१००७।। परम मुनीश्वर ध्यान धर, पावै निजपद भार । ज्यों रविविव प्रकाशकर, घट-पट महज निहार ।। ॐ हीं अहं ध्येयगुणाय नम अर्घ्य० ।।१००८।। कवलाहारी कहत है, महा मूट मति मद । अशन असाता पीर विन, आप भये मुखकट ।। ही अहं अशनदग्धाय नम अर्घ्य० ।।१००९।।
अष्टम पूजा [२७९ लोक शशी छवि देत हो, धरो प्रकाश अनूप । बुधजन आदर जोग हो, नहज अकम्प सरूप।। ॐ हीं अर्ह त्रिलोकमणये नम अर्घ्य० ।।१०१०।। महा गुणन की रास हो, लोकालोक प्रजन्त । नुर मुनि पार न पावते, तुम्हें नमैं नित 'सत' ।। ॐ हीं अर्ह अनतगुणप्राप्ताय नम अर्घ्य० ।।१०११।। परम सुगुण परिपूर्ण हो, मलिन भाव नही लेश । जगजीवन आराध्य हो, हम तुम यही विशेष ।। ॐ हीं अर्ह परमात्मने नम अर्घ्य० ।।१०१२।। क्वल ऋद्धि महान है अतिशय युत तप सार । मो तुम पायों महज ही, मुनिगण वदनहार ।। ॐही अर्ह महापये नम अर्घ्य० ।।१०१३।। भूत भविष्यत् कालको, कभी न होवे अन्त । नितप्रति शिवपद पाय-कर, होत अनतानत ।। ॐहीं अहं अनन्तसिद्धेभ्यो नम अर्घ्य० ।।१०१४।। निर्भय निर-आलित हो, म्वय स्वस्थ निरखेद । काहू विधि घबगहट नही, निज आनद अभेद ।। ॐ हीं अर्ह अक्षोभाय नम अय० ।।१०१५।। जो गुण-गुणी मुभेद कार, मो जड मती अजान । निज गुण-गुणी सु एकता, स्वयबुद्ध भगवान ।। ॐ हीं अहं स्वयबुद्धाय नम अय० ।।१०१६।। निगवरण निज ज्ञान मे, सर्व स्पष्ट दिखाय । सशयविन नहिं भरमहै, मुथिर रहो सुखपाय ।। ॐ हीं अहं निरावरण ज्ञानाय नम अय० ।।१०१७।। राग द्वैप के अत मे, मत्सर भाव कहात । मो तुम नासो मूल ही, रहै कहाँ सो पात ।। ॐ हीं अर्ह वीतमत्सराय नम अर्घ्य० ।।१०१८।। अणुवत् लोकालोक है, जाके ज्ञान सो तुम ज्ञान अथाह है, बदू मैं चित धार।। ॐ हीं अह अनन्तानन्तज्ञानाय नम अयं० ।।१०१९।। मझार ।
२८० ] [ सिद्धचक्रविधान हस्तरेख सम सम देख हो, लोकालोक सरूप । सो अनत दर्शन धरो, नमत मिटै भ्रम कूप ।। ॐ हीं अहं अनतानतदर्शनाय नम अy० ।।१०२०।। तीन लोक का पूज्यपन, प्रकट कहै दिखलाय । तीनलोक शिरवास है, लोकोत्तम सुखदाय ।। ॐ हीं अहं लोकशिखरवासिने नम अy० ।।१०२१।। निजपद मे लवलीन हैं, निज रस स्वाद अघाय । परसो इह रस गुप्त है, कोटि यत्न नही पाय ।। ॐ हीं अहं सगुप्तात्मने नम अर्घ्य० ।।१०२२।। कर्म प्रकृति को मूल नही, द्रव्य रूप यह भाव । महा स्वच्छ निर्मल दिपै, ज्यो रवि मेघ अभाव।। ॐ हीं अर्ह पूतात्मने नम अy० ।।१०२३।। हीन अभाव न शक्ति है, कर्मवन्ध को नाश । उदय भये तुम गुणसकल, महा विभव की राश।। ॐ हीं अहं महोदयाय नम अर्घ्य० ।।१०२४।। पाप रूप दुख नाशियो, मोक्ष रूप सुख रास । दासन प्रति मगलकरण, स्वय 'सत' है दास।। ॐ हीं अहं महामगलात्मकजिनाय नम अy० ।।१०२५।। दोहा कहै कहॉलो तुम सुगुण, अशमात्र नही अन्त । मगलीक तुम नाम ही, जानि भजै नित 'सत' ।। ॐ हीं अहं पूर्णस्वगुणजिनाय नम पूर्णाऱ्या निर्वपामीति स्वाहा।। अथ जयमाला दोहा होनहार तुम गुण कथन, जीभ द्वार नही होय । काष्ठ पावसैं अनल नाप सकै नही कोय ।।१।। सूक्षम शुद्ध-स्वरूप कहना व्यवहार । सो व्यवहारातीत हैं, याते हम पै जो हम कछु कहत हैं, शान्ति हेत भगवन्त । बार बार थुति करन मे, नहिं पुनरुक्त थल, का, है लाचार ।।२।। पुनरुक्त भनन्त ।।३।।
अष्टम पूजा ] [२८१ पद्धडी जय स्वय शक्ति आधार योग, जय स्वय स्वस्थ आनद भोग । जय स्वय विकास आभास भास, जय स्वयंसिद्ध निजपद निवास ।। ४।। जय स्वयबुद्ध सकल्प टार, जय स्वय शुद्ध रागादि जार । जय स्वय स्वगुण आचार धार, जय स्वय सुखी अक्षय अपार ।। ५।। जय स्वय चतुष्टय राजमान, जय स्वय अनन्त सुगुण निधान । जय स्वय स्वस्थ सुस्थिर अयोग, जय स्वय स्वरूप मनोग योग ।। ६।। जय स्वय स्वच्छ निज ज्ञान पूर, जय स्वय वीर्य रिपु वज्र चूर । जय महामुनिन आराध्य जान, जय निपुणमती तत्त्वज्ञ मान ।। ७।। जय सन्तनि मन आनन्दकार, जय सज्जन चित वल्लभ अपार । जय सुरगण गावत हर्ष पाय, जय कवि यश कथन न करि अघाय ।। ८।। तुम महातीर्थ भवि तारण हेत, तुम महाधर्म उद्धार देत । तुम महामत्र विप विघ्न जार, अघ रोग रमायन कहो सार ।। ९।। तुम महाशास्त्र का मूल ज्ञेय, तुम महा तत्त्व हो उपादेय । तिहुँ लोक महामगल सु रूप, लोकत्रय सर्वोत्तम अनूप ।।१०।। तिहुँ लोक शरण अघ-हर महान, भवि देत परमपद सुख निधान । ससार महासागर अथाह, नित जन्म मरण धारा प्रवाह ।।११।। सो काल अनन्त दियो विताय, तामे झकोर दुख रूप खाय । मो दुखी देख उर दया आन, इम पार करो कर ग्रहण पान ।।१२।। तुम ही हो इस पुरुषार्थ जोग, अरु है अशक्त करि विषय रोग । सुर नर पशु दास कहे अनन्त, इनमे से भी इक जान 'सन्त' ।।१३।। घत्ता-कवित्त जय विघन जलधि जल हनन पवन वल सकल पाप मल जारन हो । जय मोह उपल हन वज असल दुख अनिल ताप जल कारन हो। ज्यू पगु चदै गिर, गूग भरे सुर, अभुज सिन्धु तर कष्ट भरै । त्यो तुम थुति काम महा लज ठाम, सु अत 'सत' परणाम करै ।। ॐहींअर्हचतुर्विशत्यधिकसहस्रगुणयुक्तसिद्धेभ्यो नम अयं निर्यपामिति स्वाहा । ।। इति पूर्णाय॑म् ।
२८२ ] है [सिद्धचक्रविधान दोहा तीन लोक चूडामणि, सदा रहो जयवन्त । विघ्नहरण मगलकरन, तुम्हें नमे नित 'सत' ।।१।। इत्याशीर्वाद। अडिल्ल पूरण मगलरूप महा यह पाठ सरस सुरुचि सुखकार भक्ति को ठाठ है । शब्द-अर्थ मे चूक होय तो कही, थुतिवाचक सब शब्द-अर्थ यामे शब्द-अर्थ यामे सही ।।१।। जिनगुणकरण आरभ हास्य को धाम वायस का नहिं सिंधु उतीरण काम है । भक्तनि की रीति सनातन क्षमा करो भगवत शांति पूरणमही ।।२।। इत्याशीर्वाद. (परिपुष्पाजलि क्षिपेत्।) यहाँ पर १०८ बार 'ॐ हीं अहं असि आ उ सा नम' मत्र का जाप करें। है, १ पै है यही, हन्त हस्तावलंब व्यवहरणनय स्थायद्यपि प्राक्पदव्या- मिह निहितपदाना हन्त हस्तावलब । तवपि परमर्य चिचमत्यवरमात्र परविरहितमत पश्यता नैव किञ्चित् ।।५।। यद्यपि प्रथम पदवी मे पैर रखनेवाले पुरुषो के लिए अर्थात् जबतक शुद्धस्वरूप की प्राप्ति नहीं हो जाती तव तक, अरे रे । (खेदपूर्वक) व्यवहारनय को हस्तावलम्बन तुल्य कहा है, तथापि जा पुरुष चैतन्य चमत्कारमात्र, परद्रव्य के भावो से रहित, परम-अर्थस्वरूप भगवान आत्मा को अन्तरग में अवलोकन करते हैं, उसकी श्रद्धा करते हैं, उस रूप लीन होकर चरित्रभाव को प्राप्त होते हैं, उन्हें यह व्यवहार-नय किञ्चित् भी प्रयोजनवान नहीं है। -आत्मख्याति (समयमार टीका), कलश ५ -
No text on this page.