Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Jain Jati Nirnaya Samikshya
Front matter
पुस्तक मिलने का पता-
ठाकुर भैरूमिह देवीमिह,
मु. उखजाना
ठि. जैन धर्मशाला
पो० अलीगढ़ (टोंक)
एक पुस्तक वी०पी० में नहीं भेजी जाती । एक
पुस्तक मंगानी हो तो टिकोट भेजः ।
BEDIA
-
निवेदन।
जैन जाति निर्णय समीक्षा. शान्त भाव से लिखने पर भी
कोई ठिकाने कटुक शद देख पाठकल हमको टुपित न कहें
क्योंकि इन सब का मूल कारण ज्ञानसुदर ही है । यदि
उसने हमारी हमारे धर्मागर्य, गच्छ, धार्मिक ग्रन्य और
शुद्ध समाचारी श्रादि की भूटी बदनामी कर जैन समाज में
चिद्रोह फैलाने की चेन को होती तो हमें भी अपने अमूल्य
समय का बलिदान करना नहीं पड़ता || कयोकि धमाधम
पाणी अपने दुनियों से श्राधान पड़ेंग कर शान्तात्मायों
को भी उत्तेजित कर देता है । ज्ञान मुदर मुख चपेटो का नाम के
अन्य में शाह-के शरलाल, नन्दलाल लिखते हैं कि-वस्तु
वृत्ति अनेशक्तिनु अवलोकन रितां आपण ने पण उत्तम मध्यम
अनेकनिष्टपम प्रण प्रकारे व्यक्ति प्रो मालुम पडी आवे छे।
उत्तम प्रकारणी व्यक्तिया सागसारनी शोधक-सद्दसत् ने
जाना वालो-तत्वातच ने बताया वाली श्रने नीतिना सत्पं
थते प्राणाते पण स्थान आपवा वालो होय छ। मध्यम प्रका
रनो व्यकिलो वस्तुवरपनोभानकरवावाली वाघ अभ्यतर
विचारोने श्राचारमा मूकवावालो होय छे पण विघ्न सतोषी
होती नथी। अनेकलिष्ट व्यक्तिश्रा मूर्खताना मार्गनु रक्षन
फरनारी धर्माधर्मने नहीं जाणवावाली पोटी पाडित्यना ने
पोपवावाली सत्यपुरुषो ना पवित्र विचार सागरमा पत्थरों
* फेंकवावाली होय छ। श्राज काले सम्यक ज्ञानना श्रमायें
स्वछट विचारो चाला कंटलाकधमाधम श्रात्माश्रो समाजमा
शत्रुवत् घास पापी धर्म ने अधमप क्तिए लई जना ललचाय
के या दुष्प पिचारा ग्रुध धारी भोला जनो ने भग्माया साथ
महावीर मानु उन्मूलन करवा अधम प्रयलो प्रादी रहा
है। गाढ अधकारना प्रदेशमां भटकता तीन अज्ञानताना शोखरे
[२] चला या पोपमय प्रान्दोलनों ने प्रगटायनवाला पोताना उत्तम मनुष्य जन्म नो याल नही सरता दुशशयोने समान करवामांज हित समझेछ । तर्क शक्ति ने तीलांजली नार विचार बुद्धिनो विनाश फ्रनार सत्यता ने वेची माग्न । दृष्टि मर्यादानो देश निकाल करनार यो शास्त्र शैलिने हो कुवामा उत्तारनार, शाहीन भागीयो केवल धर्मना नाशक वनी समाजमा सडो घालो वेठा छे जेमाना एक स्थानकवासी माग माथी नासी श्रावेला उद भट वेपधारी शान हुदरेपण आधु निक सर्व महात्मानोना चरिनोमां केवल दुवुदिथी अज्ञान ताथी दोष दृष्टि थी दृष्टि अन्धता बी घणाज अनर्थ- कारक हड हडता झूटा श्रादेपो मूकी जेना भाप जैनपत्रना अधिपति द्वारा पुस्तको पहेचावी पोताना दुष्टाशयो चहार मूको समाजनी पवित्र अने दिव्य दृष्टि उपर स्याही चौपड वानु कार्ग कर्युछे ।। ज्ञा० मुच० पृ० २-३ । केवल हेर भावे या पूर्व भवनो कोई वेर श्राभावमां लेगामागता होय नहीं एचा दुष्ट श्राशय' थी तेमना कातिल कलेजाए अधमाधम हिमत चलाविने शाशन हित नहीं पण शाशन उस काया निमितेज ज्ञान सुदरे पोताना दुष्ट विचारो दर्शाव्याछ, समाज मा प्रगट कर्या छे॥ हुँ कई स्थितिएछु , कई योग्यतएछु, फा समर्थ शक्ति प्राप्त करी लखु छु तेनो लेस मात्र पण तेमणे विचार कर्यो होय तेम अमने लागतु नयो । मा० मु० च... ॥ उत्तम सत वृत्तिनो ने एक बम नलक अज्ञानी पामर वृत्तिए अवमता दर्शावका प्रयत करी जैन समाजना दिल दुःखान्यां घाल्या मलगाच्या त्रास फैलावी दीयो । जेधी आवा अधमो ने प्रत्युत्तर आपयोज जोईये पवो अमारो शाशन उन्नति रूप अभिलापा था थी (ज्ञानसुन्दर मुख
[]
चपेटोमा) नामनो पुस्तक प्राट फर्यो । आपुस्तकमां
तमना दुए विचारोनु सडन शास्त्रधारे युक्तिसर करवामा
श्रावेलु छ। ते याचकोने ज्ञान दृष्टि पूर्वक जोवाथी जणाई
श्राप से। तेमना श्रम प्राशयो कोई मदमति या साधारण
व्यतिना दिलमा विपमय असर न करे, गुरुयोपर,अश्रद्धा न
लावे, एज हेतु थी समाज हितनी श्राशाय समाज सेवा
निमित्त समाज शान्ति निमित्ते, अने पाया स्वछंदी विचारको
ना दुष्ट विचारोनो ध्वस करवानिमितेज भा पुस्तक श्रमे संघ
मेवामा भूययो छ । तेनो धर्म बुद्धि थी स्वीकार फरी सत्या.
सत्य ने ज्ञान चाए निहाली अशुभविचार कोना विपमय सग
थी दूर रहे सो अटक शोतोया सेवानी सघ सेवा कांईक
सफल थई मनाशे ॥ शा० मु० च० ०५ ॥ शान सदरना
अक्षानी यात्माथी प्रगटथयेला.पुस्तकोने, छापी घहेचचीमा जैन
पानी अधिपनिए जेहिमत धराची छे वेश्मने घणी आश्चर्य
जनक लागे छे। जैन नाम वरायो। अविपतिनों स्थान मेलबी
फरजों ने भूली जई श्रधनु। पोपन परे अवलयन श्रापे,
सहायकार थाय ते केटली वधी खेदजनक यात छ ? स्वार्था
न्धतामा लुब्ध थई श्रा अधम पक्ष ने पोपवामा अधिपतिजी
प्रवृत्ताथयाहशे के हृदय भ्रष्ठथयु हशे के शु ह शे ते ज्ञानी जाणे
अधमपक्षनुजय श्रापचमा काल मातो शुपण कोई कालमा
थयो नथी यवानो नथी अन थरोपण नहीं। एचोक्स जाणवु
जनावडे समाजने तरखुचे ते महन्त पुरुषो नोलोप परवानु
नमारी दृष्टि श्रन्धता स्वीकारे एक दाग्रह केवल अज्ञानताया
मिथ्याभिमान वृत्तिए तमे कहो शको .पा. लपो शको या
"अनुमोदन पापी शको, भेले भाई तमें गमे तेम करो समाज
हाल उधेछे जागृत नथी। जो कदाच जागृत होतो तमारो
. [ ४ ] श्राशय केवा परिणाम ने पाम्यो हात ते तमने तरतज मालम पड़ी श्रावत ॥ ज्ञा० सु० मु० च० पृ. ६-३॥ आगे ढा० २ में ज्ञान सु दर को चौर तथा नीच जातीय सिद्ध किया है यथा- तस्करनी वृत्ती कदीरे धर्म उपर नवि जाय । सोमण सावू थी धूरपरे। कागडा श्वेत न थाय ॥ ५॥ दोप ग्राही पने सदारे दृष्टि राखे श्रन्ध । प्राणान्ते लेशे नहींरे। गुण ग्राहोनु गन्ध ॥६ जभ्या जगमा जेटलारे श्रावातस्कराज । बस करे छे धर्म नोरे । जेम तीतर उपर वाज ॥७॥ श्राशय दुष्ट बतावो नेरे देगाडे छे जात । पत्थर पा क्यों होततोरे । धोवी ने धोवाथात ॥ - ॥ ज्ञा० मु. पृ० १० श्रागे ४ यी ढाल में इसको अज्ञानी उल्लु नगुरा न गामी श्रोर जारज बताया गया है । यथा- अज्ञानी था आभावनीमां श्राव्या तमें उल्लू राज ! सार असर नथो दृष्टिमा। तेथी वगाडयु छे काज । अज्ञानी ज्ञान सु दर सुणो वाणी ॥ १॥ घेवरचद नाम धरावी ढुंढक दीक्षा लोधी कातिल कुवचन छुरी चलावी । दीक्षा तोडी दीधि ॥श्रशानी॥ ॥२॥ दु ढक त्रासथी तृप्ति नपाम्या । श्राव्यां उत्तायला दौडी गुरु विना स्वयं घेश धरीने । वीर श्रारणा मोटो जोडी । श्रा ॥ ३॥ स्वेच्छाचारी थई भटकतां । प्रोवेन तमेने लाज । मुनी श्राभूषणों तमने न शोभे । शोभे नर्कनु राज ॥ ४ ॥ एकल विहारी मदमतीना, चलो बन्या स्वछदी । असत्यना सरदार वनी ने । चन्या तमें यमवन्दी अ० ॥५॥ सघ जाणे छे तमारी भवई (व्यभचार वृत्ति शु सघने सम माओ। ज्ञानसुन्दर कोणे नामज पाड्यो । पहेलाए जब बत्ताओ श्र०॥ ६॥ पिता विना पुत्र कोई काले । प्रगव्या नधो विश्व माहि । गुरु विना शिप्य क्या थी पडिया छो। एज श्रमोने न बाई ॥ ७ ॥ पृ० १२-१३॥ कल्पित ग्रंथो नवानी काली । रचना [५] तुदो वतावे । उत्तम ग्रंथो प्राचीन जोता। आलस तमने श्रावे ॥ ३१ ॥ दोप ग्रहण करवा थो तमोने । लाभ नही कदी थाले श्रार्तव्यानमा प्रायुप्ण खांसो । जन्म्यानुसार्थक जाये ॥२॥ हजुकहु तमे चेतोतो सारु । वीर श्राशा उरधारो। नहिंता आलढायतां पुरो। पाप नो मरशा भारो अ० ॥ ३३ ॥ पृ० १५॥ पांचवीं ढाल में ज्ञानसुन्दर को श्राचार भ्रष्ट परिग्रह धारी और श्रनत ससारी सावित करते हुए लिखा है कि- उचोराखो प्राचारने । क्रिया सम कितरूपजी । अन्धथई तमे शुपडौं । गोती जडो कूपजी । ज्ञानमुन्दर तमे साल! ॥११॥ हिये हाय एवुसदा । जपाई आवे छे वहारजी। कलदार सेवो तमे सदा । एतो भजे नवकारजी ॥ २४ ॥ शोख हमारी जो मानशो। तो थासे कल्याणजी । नहीं तो वोमवटकशा लोपी श्री वीरनी प्राणजी ॥ २१ ॥ पृ०१६-१७॥ श्रागे ६ ढा० में लि० कि-निंदा सूत्र उकेलियों। चग पेटें धरी ध्यान पापी । श्रायुप्य एम गुमावीयों । तोयन प्रावी शान पापी ॥ १ ॥ निस्पृही निस्वार्थी जेण ग्रह्यो । जिनमर्म पापी तेहनी शुनिंदा करो। निंदोत मारा कर्म पापी ॥ ३ ॥ आभव पर भर मव! भवे । तारक ये मुनिराज पापी । दोष लहो शु तेहमान फटने नहीं लाज पापी ॥२॥ आगम वाचना चालती। उघमा सुझेन काई-पापी। ककामा समझो नहीं। अमने लागेन वाई पापी ॥ २०॥ ज्ञानसुन्दर हवे समझीने । पाप वृत्ति करो वध पापी । शान्ति समता राखतां । पामशोध में नीगध पापी ॥ १५॥ पृ० १= इत्यादि इस दाल में ३० घार पापी साधन से ज्ञानसुन्दर का निरक्षर और महामूढ बताते हुए शिक्षादी है। आगे ढा० ७ में लिखा है कि-मोलाजन ने भरमाववारे । लई येठा अनाचार । ज्ञानी जनो समजेच धार। फेवा तुमारा श्राचार | मनोगी सामल जाधरी प्रीत । हुकडे शास्त्री नीरीन श्रमा० ॥ १॥ धृल नासो कदि सूर्य नेगे। झाक। सूर्य नवि याय । पडे पोताना पांख मारे । पाख समृली जाय ॥ ०४॥ खल पुरुषा सत्मगधीरे। साधुवत् पनीजाय तमैके बाखल श्राममेरेशपाया पृथ्वी माय ॥५ज्ञानमुन्दर नमे सामलोरे कोणी पाईयों तुम नाम | सुन्दर नौ सलोपता रेउ दरवत् करा काम ॥ ७॥ वीणा वेलीना सेलमारे धिम लोयोगी जथाय। चावा चन्या जंग धूर्त्तवारे जीवित एमज जाय अं०॥ १॥ रामसनेही ना' पथमारे शोभोत्या तो श्राप नाटलायी पते नहीं रे वाकी छे । छाप विभागी॥ २० ॥ दीक्षा तुमारी कोणे दीधि रे नान्ही मोटी जेह । पुछो पछेवी जीसाधुनेरे'' उत्तर प्रापंशेते ह। २३ ॥ शट पणो नहीं चाल शेरे सांचा सतनी माह्य । पग 'वले तेतो होल बोरे । पछी ज श्रीवजी श्रांद्य ॥ २४ ॥' इत्यादि इस ढाल में ज्ञानमुन्दर को अनाचारी धर्म धूर्त खल दुष्ट नगुरा और व्यभिचारी सावित किया है। प्रांगे'ढाल वीं में लिखा है कि-शु कीधोरे कालु 'कृत्य तमारो दीलवल तुवाची अमारु । 'मुनि निदारे सूत्र घणुजन ठारु लागेपण'स ने आकरूं। कइ ज्ञान दृष्टिए लस तारे खरेश्यानतेणी पेरें मसतारे। अधर्मीयई फरी डसतारे। हूकनेरे स्वीय भोजनपण प्यारो॥ २ ॥ अधमाधम वृत्तिारखी रे।भापापण दुर्मति भौंपी रे । जैन पत्र अधिपति राखी रे वह चायोरे फोलु 'रत्य तमारो॥ २ ॥ इजुचेतो तो घणु सारोरे मानो का वचन श्रमारोरे ज्ञानसुन्दर गजव श्राकृत्य तमारु रे गा इत्यादि इसमें ज्ञानसुन्दर को शुश्रर कुत्तादि यताया है आगे ढा०वीं में लिखा है कि सुलखु लजाहीन ने वार चौर रेजेने समजण नहीं लेंगाररे । ज्ञानसुन्दर गंभलो वाणी [७] रे तम धर्म को धूल वाणी रे तमारी बुद्धि पूगे बटलाणी ॥ १ ॥ इत्यादि इसमें ज्ञानमुन्दर को बडा निर्लज-और विटल बुद्धि तथा वर्म घातक बतलाया है ॥ श्रागे ११ ची ढाल में ज्ञानसुन्दर को मुनि का वेश छोडदेने के लिये जोर दिया है यथा-बाजोगर बनी आस में नागे विव विध विधरग। होला वचन जे वीर ना तेहनों करो छो भग।१॥ पलटानों परिधान ने । शोभे नही मुनि वेश । शासन शत्रु-थया तमे । यधोजाणे छेदेश ॥ २॥ पाटा पालो चढावता आवे नही काई लाज । ज्ञान सुन्दर तुमने शुलखु । यगडयु तमारु काज ॥ १० ॥ आगे १० वीं ढाल में लि० कि शु क्रीधो कालो काग- लरे हे मूर्ख ना सरदार । वाल्यु शु पूर्व नो वेर रे हे शदतणा सरकार ॥ १ ॥ पाथा मा रतायो तमे । जे जे अनाचार । तेने लायक छोजत में तो मानोल्या निरधार ॥ ५ ॥ सडेला रंग रग हाय । साफ कर शु श्रन्यने । यो पोते बालों वीजाने जाणा छा सहु तुमने ॥ ६॥ इत्यादि और भी कई विद्वानों ने इसका भडा फोड कर धिकार है। उन्हो को देखते हमारा कटुक वाक्य कुछ भी नहीं है । में ज्ञान पुन्दरजी के कनुपित जोवन से पूर्ण परिचित है । इसमें जितनी भी बात लिखी गई वे सब पूरी तहकीकात करके ही लिपी गई हे। श्रय मुनिवर्ग के समान मेरे ऊपर भी भूटा पाल चढा कर मान सुन्दर १० वर्षों से घोर जुल्म कर रहा हे शोर केई प्रकार को धमनिया देता है। इसका यह मय है कि मग्नसागर मेरा सर्व पाप प्रगट न करदे । परन्तु इसको मालुम नहीं कि ऐसा करने पर उरटी मुझे उत्तेजना मिलती है । म जोनमा परता अपना साधू धर्म समझ कर । अय जर यह हमारे धर्म पर भी उत्तार होगया तो लाचार होकर मुझे कुछ लिखना और
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८]
उत्तर देना पड़ा है। इसका पहेला भाग भी मंगा कर अव
श्य पढें। उसमे प्रथमिक शिक्षा, राजा हमीर का विस्तृत
जीवन, अनेक जातियों का निर्णय, जैन धर्म का महत्व श्रोस
चाल तथा राजपूतों का शातिरासा, और हमारी चौहान
वशावली है। मानसुन्दर भाई या उसके अनुयाईयों को इस
प्रथ में लिखी हुई किसी भी बात पर कुछ बहस करनी हो
सर्व सवुतियां देने के लिये हर जगह पर मै सर्वदा तैयार
रहूगा । कमलागच्छ के समस्त संघ को सूचना दी जाती है
कि वे ज्ञानसुन्दरजी को जरुर समझायें । अन्यथा इसी की
जुम्मेवारी उन्हीं पर रहेगी | हमने अपनी जन्म भूमो में एक
संस्था खोलदी है। हमारे धर्म पर किये गये श्राक्षेपों को यह
ठीक उत्तार देती रहेगी।
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कार्तिक कृष्णा ११
मुनीमग्नसागर
-
सम्वत १९६८
।
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+
-- अथ सिद्धान्त मग्नसागर भाग दूसरा आक्षेप परिहार। - । - प्राथमिक शिक्षा नामक पहला भाग पूर्ण हुआ। अब माघेप परिहार नामक दुसरा भाग श्रारम्भ होता है । सुशिक्षित प्राचीन निवासी आर्य राजपूतों को चाहिये कि यदि कोई अनार्य अपनी जाति, धर्म, समाज और पूर्वा । चार्यों पर थाक्षेप करें तो उसका परिहार भी अवश्य करना चाहिए। म्लेछों के सिवाय कितनेक आर्य भी बिना ही कारण हमारे शत्रु हो रहे हैं । असत्य कल्पना करके हमारे पूर्वाचार्यों की हंसी उडते हैं । साध्वियों का और विधवाओं का सतीत्व नष्ट करते हैं । बडे बडे साधुओं की मटी बदनामी उडाते हैं। शुद्ध साधुओं की योगो- पधानादि प्राचीन क्रियाओं को नष्ट करते है। शुद्ध पर- परागत प्राचीन समाचारी को छुड़ाकर लोगों को उन्मार्ग में लेजाते हैं। ऐसे पुराणे पापियों में इससमय एक-ज्ञान- सुन्दर नामक व्यक्ति है कि जिसने बिना गुरु के अपने, भाप ही जैन साधुका वेप पहन कर पवित्र जैनधर्म को
कलंकित किया है। कहते है कि जैन माधुका वेप में यह
छिपा हुआ मुसलमान है । जैन धर्म को मर्वथा नष्ट भ्रष्ट
कर देना ही इसका परम कर्तव्य है ! इस ही बात का
निश्चय कराके भद्रक जैनियों को इस म्लेछ की मायाजाल
से बचाने के लिये इसकी लिखी -हुई- पोथियों से दुछ
नमूने लिखकर प्रगट करता हूं । ज्ञान पुष्पमाला के २५
वा अकौ ४ पृ० परलि. "न माम भक्षणं दोपा, नमद्य,
नच मैथुन" इत्यादि व्याख्याविलास श्लोक ३७ वां देखो।
अंब पाठकहाँ कहिय ज्ञानसुन्दर भाई के मुसलमान होन''
में कुछ शक है ? एसी • सैकड़ों बातें इस व्याख्या वि. मैं
लिखी हेप जिसीसे पाया जाता है कि ज्ञा.'महामिथ्या:
दृष्टि और जैनधर्मका परमशत्रु है। यदि ऐमान होतातो
कुदेवों को नमस्कार और जैनधर्म को नष्ट करनेवाली
बातों का संग्रह अपने ग्रथ में कभी नहीं करता। अगर
कहो कि इन बातों का निषेध करने के वास्ते ही 'ये सर्व
श्लोक अन्य मजहां के ग्रंथों से उधृत करलिये हैं सो
तो इसमें कही दिखता नहीं है । दूभर का प्रमाण या ता
अपभी मान्यताको पुष्ट करने के लिये दिया जाता है। यो
उसकी की काट करने के लिये लिखा जाता है। जैन धर्मा'
से प्रतिकूल बातों का उल्लेख कर' उन्हीं के माय यदि
ज्ञा अपनी तर्फ से काट लिस देता तो उसमें जैनधर्म को
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.
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- इतना नुरुमान नहाता | धार्यसमाजी विद्वान कहत है. ( अनियो धनुमतम् ) अपने ग्रंथमें लिख कर यदि उस- श्लोक का निपंध नहीं किया तो वह बात उमके प्राश्य, ही स्वीकार्य है। इस निगम में जब ज्ञा० भाईन श्लो. नं. १४-२१-३१-३२-३७-४६-६७-७८-८८-६५अप दूसरे जनक में ४-२२-४४-५० बहुत मे श्लोक ऐसे है कि जिन्होंका नम्बर नहीं मिलता। वह यथाप्रसंग, लिख कर बताये जायंगे । अन्यमत्त के जोक अपने.प्रथः में लिप कर जयों के त्यो छोट दिये तो निचय हुआ कि उक्त लग्ब इमक मान्न है.गौर नानियों में इन बातों का, प्रचार करने के लिये ही यह च्या. विलास संग्रहित हुआ, हैं। अफसोय उन पूर्व जनों की चुदापर, जोडी, भ्रष्टा चारी को एमी.२ मि या पुस्तकों को पुराकर ज्ञानद्रव्या का दुरुपयाग करते हैं '. जनतर-विद्वानों को, विदित हो कि इम, ज्ञानसन्दरा नामक व्यक्ति की किसी भी पुरक से जैन धर्मका कोई मुनालुक नहीं है । इसकी कृतियों से-ही पाया जाता है। कि यह जना नहीं किन्तु । जनधर्म का पुरा शाह हैं।" आप व्याख्याविनासका ही १८ मा, पृ० देखें. ज्ञा० लि.,, खता किनोनयनी भयो, प्राणे, कलंगरपि । हस्तिना तोब्यमानोऽपि न गच्छन्न मादरम् ॥ ६६ ।। , . .
(, ४ )
M
पलंयुक्ला सुरापीत्वा ! गत्वा च गणिका, गृहं । हस्तिना,
वाड्यमानोपि न गच्छेज्जैनमदिरं ।। ६७ ।। ज्ञा० भाई का
श्रमिप्राय यह है कि प्राण जाते हुये भी यवनों की भाषा
मत बोलो। हाथी मारता हो तो भी जैनियों के मंदिर में
नंजानो । कसाइयों के जाकर मास खालो । कलारों के
जोकर मद्यपान करों । वेश्याओं के घर जाकर रंडीबाजी
करी मगर हाथी' मारता हो तो भी, जैन मंदिर में जाकर
अपनी हिफाजत मत करो। धिक २, अब तो ज्ञानसुन्दर
के भज्ञभक्तों को भी मालुम होगया कि ज्ञा० ने जैनधर्म
की कैसी.२ उन्नति की है। अगर कहो इन बातों के
संडन के लिये ये श्लो. लिखे हैं सो तो कहीं दीखता ही
नहीं है। मैंने सम्पूर्ण इस ग्रंथ के अक्षर २ देख लिये लेकिन
इन २ श्लोकों का खडन कहीं न पाया. मुतरां जब खंडन
नहा तो मंडन सिद्ध होचुका है। ऐसे नालायक को गुरू
मानने वालों की वुद्धीको कोटिशः धिक्कार है । ऐसे
ही अपने अन्धभक्तों को दानका उपदेश करते हुए
ज्ञानसुंदरजी लिखते हैं कि-"जो देवो तो वैश्या ने दीजे,
बामणने दिया तो नरक पडीजे । वैश्याने दिया बढेगावश :
ब्राह्मणने दिया जाय निवेश" ॥४१॥ ज्ञान विलाश
पृष्टं ३११ 'अर्थ स्पष्ट ही है । लेख देखने से..हो
भारत की श्रद्धा पाई जाती है उक्त लेखों से सुसजनों .
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को यह तो विदित होगया कि ज्ञानसुंदरजी जानयों देवगुरु और धर्म इन तीनोंका ही पूर्ण शत्रु है. यदि एमा न होता तो वह जैनोमात्र की झूठो बदनामी कमी ने करता । जिसका उल्लेख आगे चल कर किया जायेगा प्र.तो फिर ज्ञानसुंदर किस देवता को मानता है। उ. इसका विधान भी उसने अपने रिलासमें लिख दिया है देखो व्याख्या वि० पृ.४। कोमिनीसन्निभानास्ति देवतान्या जगत्त्रये । 'यां समस्तोऽपिपुवर्गो धत्तमानसमंदिरे अर्थ-विपयामिनापिनी स्त्री के समान तीन लोक में दुर्मस कोई मी देव नहीं है। क्योंकि बैंगन के 'पुरु मात्र एक 'इमी को ही अपने हृदयमंदिर में रख कर पूजते हैं। ठीक तैव ही विचारी ज्ञानसुंदरं विषयकी कौड़ा हाकरे कुत्ते के समान विर्डचना करता है और जहाँ जाता है वही ३ धिक्कार २ पाता है। आगे चलकर ज्ञा० 'लिखता है कि- अमरिस्मिसंसारे सारं सारंगलोचना॥४६॥ या 'विलास पृ. ५। अर्थ इम प्रसार संसार में हरिखी के समान नत्रों वाली एक स्त्री ही 'सार वस्तु है । फिर लिखता है कि-अमैथुन जरास्त्रीणा, व्या. वि. प. चान सुंदरजी के लिखने की अभिप्राय यह है कि रोज स्नी, मात्र को अवश्य मैथुन मवन करना चाहिये। पोकि मथुन के न कंग्न से स्त्री जल्दी ही ढी होजाती है। धिक. ऐमी र अनेक प्रश्शील पुस्तकें छपा कर दुराचारी ज्ञान ने पवित्र जैनधर्म की जड़ पर भयकर कुठाराघात किया है। इन पुस्तकों का नाम भोगविलाश देना "च्याव्यापिलास" से विशप ठीक था। क्योंकि इनों में भोग विलास की हजागे बात लिखी गई है, जिनों का आदर बिलासप्रिय पार नितन्ति प्रज्ञ हमारे कवलगाया भाइयों के सिवाय और कोई नहीं कर सकता, । २२ । समुदाय के जैन संघ की मैं धन्यवाद देता हु कि जिन्हों ने नालायक गयवरचद ज्ञानसुदर) को व्यभिचारी जाण चेष छीन कर उनी दम निकाल दिया और खेद होता है हमारे कॅवलागच्छो भाइयों की बुद्धिपर जो इस नगुरे को अपना धर्मगुरू- मान कर पूजते हैं, और इसकी बनाई झूठी पुस्तकों को छपाकर श्रापम में विरोध-बढाते हैं । यदि फिर भी यही दशा रही तो कोई दिन इसका नतीजा बड़ा मयंकर निकलेगा 11 अस्तु अब ज्ञानसुदर भाई के वारेगे अन्य विद्वानों के लिखे हुए कुछ लेख यहा भी दीये जात है । जगत्मसिद्ध वीर शासन अखबार में वा० १५ डिसं. स०.१६२२ प्रगट, दुआ था कि धर्म धूर्त साधू से साव- धान समस्त भारतवर्ष के जैन-श्रीसघको विदित हो कि -
.
"
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होकर उन्होंने अपनी सप्रदाय में इसको निकाल दिया
फलोदी मारवाड़ में एक प्रेवरचंद नामका व्यक्ति' जैन
श्वेताम्मर मांगी साधू का वप धारण कर के अपना नाम
ज्ञानशुदर रख लिया है और तीन वर्षों में थानापंथी
होके फलोदी में ही नठा है। इसके क्लुपित चरित्र का
सक्षिप्त वर्णन हम प्रकार है।
पहले यह जालने में दनिशाह पिस्तमजी के यहां नाकर
था उस वक्त अपने मालिक के रुप चोरी मे खा जान की वजह
से दावा करके इसे जल भिजवाने के लिये पारंट निकल
बाया गया। जब वह यहां स भागा भार रामपुरा (मालया)
में बाईम सप्रदाय
के
पूज्य
श्रीलालजी के पास जाकर, के
दीचा लली । २२ सप्रदाय में यह सदानन वर्ष रहा।
इम बीचमें भी इसने कितने ही शनाचार सेवन किये ।
जिन्होंके लिय इमको तीन बार फिर दीक्षा दिलानीपड़ी
तीमगार तो हमके दुष्कृत्यांसे तग होकर के मीनाशहर
में हमारांमलाजी याठिया के तहखाने में पुज्य श्रीलालजी ने
इसको पत्थर के स्तम का चेला करके छजीवनी सुनाई थी।
इतनी विडंबना होने परमी इसकी पती ठिकाने नहीं आई
और यह अष्टाचारी पणा करता हा रहा। जब लाचार
.
-
J.
बब यह यहाँपर आया और किसी भी साधुवर्ग के सामिज
'ने होता हुश्री स्वच्छंद पण सम्बगी साध का पॅप धारण
करके झूठाही अपना नाम ज्ञानसुदर रख लिया और २२ संप्रदाय वालों को बहुत ही अपशब्द हेन्डपिल द्वारा पा- 'गल की तरह नीचता धारण करके कहने लगा | कुछ काल के पश्चात् यह गुजरात में गया । पर वहा पर इस नगुरे स्वच्छंदी का बिलकुल ही मत्कार न होने से यह मूढ उत्तम साधुवर्गका द्वेषी होकर के पूज्य गुरुवर्य प्राचार्य श्री नेमविजयसूरीजी महाराज के मुखारावंद से इसको दीगई हितशिक्षा की अवज्ञा करके आचार्य महा- राज के मना करते हुए भी (मेझरनामो) नामक भ्रष्ट 'पुस्तक को इस जैनधर्म के शत्रू ने जैन पत्र (भावनगर) 'द्वारा छपवाके प्रगट कर ही दी । इस नराधम के कुरहार्थों से चित्री हुई काले कृत्यों की उस भ्रष्ट पुस्तक में सम्यगी 'साधुओं की समस्त धार्मिक क्रियाओंको कल्पित ठहराने को. व समस्त जैनाचार्यों और मुनिमहात्माओं को बीत- संग की आज्ञा के विराधक बतलाता हुआ, उन्हों की निंदा करके, उन्हे पतित ठहराने को. तथा आप खुद ही समस्त साधू वर्गमें उत्तम बनने का अथाग परिश्रम किया है जिसके प्रतिपक्ष में कई हेन्डषिल तथा पुस्तके प्रगट हो चुकी है। जिन्दी में उसके इस काले कृत्य को पिना प्र- माणं को झूठा साबित कर दिया है और उससे अपने पक्षको पुष्ट करने के लिए प्रमाण मांग हैं ॥ परंतु इसने 0 -- 7 , अपने पक्षकी पुष्टि में आज तक कोई यथार्थ प्रमाण नहीं दिया और खुद गुजरात से भाग करके पीछा यंदा भाके डेरा डाल दिया है। कल्पित सवेगी की दीक्षा लेने के कुछ ही काल पश्चात् श्रीमान रूपजी को इसने अपना चेला बनाया था बाद में एक नीच-अश्पर्य ) कुल के १० वर्ष के लड़के को दीक्षा दिला के मुनि रूपसुंदरजी के नाम का चेला करदीना और उसका नाम धर्मसुदर रख दीया था। पाद यह उसके साथ में वह, खिलाफ वजए फितरी. का फेल कुदरत के खिलाफ मंगत जो ताजी रात हिंददफा ३७७ का जुर्म गुर्दा मैथुन करने लगा। इस नीच कृत्य की रूपसंदरजी का सबर पढ़ जाने में उन्होंने -धर्मसुदरको तो निकाल ही दिया और ज्ञान सुदर को कह दिया कि खबर- दार पर प्रायदंसे यदि तुम्हारे ऐसे नीचे कृत्य देखने में आये तो तेरे हक में अच्छा न होगा । इतने पर भी इस का आचरण ठीक न होता देख रुपसुन्दरजी ने इस धर्म- अष्ट को छोड़ ही दिया और प्राचार्य महाराज श्री.नेम- विजयसरिजी के पास फिर से दीक्षा लेकर अपना श्रात्म कन्याण करने लगे । एक अत्यन्त-ही घृणित कार्य इस नीच ने यह किया है कि, १६७७ का माघ सुद ५ को । -फामान्ध होकर नालनमचारिणी, साध्वी श्री प्रमोद श्री -- .
. - करके झूठाही अपना नाम ज्ञानसुदर रख लिया और २२ संप्रदाय वालोंको बहुत ही अपशब्द हेन्डपिल द्वारा पा- गल की तरह नीचता धारण करके कहने लगा । कुछ काल के पश्चात् यह गुजरात में गया । पर वहा पर इस नगुरे स्वच्छंदी का बिलकुल ही सत्कार न होने से यह मूढ उत्तम साधुवर्गका द्वेषा होकर के पूज्य गुरुवर्य आचार्य श्री नेमविजयसूरीजी महाराज के मुखारविंद से इसको दीगई हितशिक्षा की अवज्ञा करके आचार्य महा- राज के मना करते हुए भी ( मेझरनामो) नामक भ्रष्ट पुस्तक को इस जैनधर्म के शत्रू ने जैन पत्र ( भावनगर) 'द्वारा छपवाके प्रगट कर ही दी । इस नराधम के कुरहार्थों से चित्री हुई काले कृत्यों को उस भ्रष्ट पुस्तक में सम्पेगी साधुओं की समस्त धार्मिक क्रियाओंको कल्पित ठहराने 'को. व समस्त जैनाचार्यों और मुनिमहात्माओं को पीत- राग की आज्ञा के विराधक बतलाता हुश्रा, उन्हों की निंदा करके, उन्हे पतित ठहराने को. तथा श्राप खुद समस्त साधू वर्गमे उत्तम बनने का अथाग परिश्रम किया है जिसके प्रतिपक्षमें कई हेन्डरिन तथा पुस्तके प्रगट हो चुकी है। जिन्हो में उसके इस काले कृत्य को चिना प्र- भाणं को झूठा साबित करदिया है और उससे अपने पदको पुष्ट करने के लिए प्रमाण मांग है। परंतु इसने T . - S H 1 M अपने पक्षकी पुष्टि में आज तक कोई यथार्थ प्रमाए ना दिया और खुद गुजरात स भाग करके पीछा यहा भार डेरा डाल दिया है। कल्पित सवेगी की दीक्षा लेने के कुछ ही काल पश्चात् श्रीमान रूपजी को इसने अपना चेला बनाया था बाद में एक नीच अश्पर्य ) कुल के १६ वर्ष के लड़के को दीक्षा दिला के मुनि रूपसुदरजी के नाम का चेला करदीना और उसका नाम धर्मसुदर रख दीया था। बाद यह उसके साथ में वह, खिलाफ वजए फितरी. का,फेल कुदरत के खिलाफ संगत जो ताजीराव हिंददफा ३७७ का जुर्म गुर्दा मथुन करने लगा। इस नीच कृत्य की रूपसंदरजी को सपर पड़ जाने में उन्होंने धर्मसुदर को तो निकाल ही दिया और ज्ञान सुदर को कह दिया कि खबर- दार भप प्रायदंसे यदि तुम्हारे एसे नीचे कृत्य देखने में पाये तो तेरे हक में अच्छा न होगा । इतने पर भी इस का पाचरण ठीक न होता देख रूपसुन्दरजी ने इस धर्म- भ्रष्ट को छोड़ ही दिया और प्राचार्य महाराज श्री,नेम- विजयहरिजी के पाम फिर से दीक कर अपना आत्म कन्यास करने लगे. एक अत्यन्त ही प्रणित नीच ने यह किया है कि 10 कामान्ध होकर बालापायी -
है। ऐसे नीच पुरुष के कैलकित पर्दन पर परम पवित्र
भगवान महावीर स्वामी की बेप रहना जैन धर्म का कलेके
रुप है इसका जीवन चरित्र कैसी कलुपित और पशाचिके
'कृत्यों की दुर्घटनाओं से भरा हुआ है जिसका सविस्तर
वर्णन एक गयपरलीला नामक पुस्तक जल्दा प्रकाशित
होगा उसमें होगा। इसकी ऐसी परम निकृष्ट आचरण
देखते हुए इस नरपिशाच श्रद्धाभ्रष्ट पतित को श्रीसंघ में
सामित रखना श्री जैनधर्म के लिये महान् अनिष्टकारी
है। ऐमा सुविचार करके फलोदी (मारवाड़) के समस्त
जैन श्रीसंघ ने इम ज्ञानसुन्दर नामक जैन वेषधारी धर्म
धूर्त साधु को श्रीसंघ से पहार कर यह घोषणा करदी
है कि इमे जैनी साधु समझ के कोई श्रावक 'वंदना न
करें और न इसे कहीं जैन धर्माश्रमों में रहने के लिये
'स्थान दें । इसी तरह समस्त भारतवर्ष के जैनी श्रीसंघ
से फलोदी के श्रीमंध का निवेदन है कि हर एक 'जगई
से इस ज्ञानसुन्दर को श्रीमय से चाहर कर के जैन्दी
उक्त घोषणा प्रगट कर दें। जैसे कि मागे मी कई श्रद्धा
भ्रष्टों के लिय की गई थी। इस लेख को प्रकाशित करने
के लिये फलोदी के समस्त श्रीसघ ने प्राज्ञा दी है।
द. श्री-संघ का सेक नेमीचा कोचर मु. फैजादी
(मारसाद) मृगशिर शु.१४ २०:१६७६ पिछले
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पत्रों में इस लेख को मंजूर फरमाने वाले फलोदी श्री' मघवन्ति सैंकड़ों महाजनों के दस्तखत है। ग्रन्थ बढ़ जाने - के भय से मैंने सब छोड दिये है कुछ यथा प्रसंग फिर लिखूगा। फलोधी के श्री संध को मैं कोटीशः धन्यवाद देता। हु कि उन्होंने इस कुकर्मी को ठीक सलाह दी । यदि सब ही, लोग फलोदी के श्री संघ का अनुकरण करलें तो: बेशक जैन समाज ज्ञान जैसे नगुरे धर्मधूों से बचा सकती है। इमने सिवाय नुकसान के आज दिन तक जैन प्रजा की कुछ भी सेवा नहीं बजाई । जैनी मात्र की, झूठी बदनामी के सिवाय इसके म्लेच्छ, गुरू ने दूसरा कोई पाठ ही नहीं पढ़ाया था । २२ समुदाय के मुनि कहते हैं कि इसकी माता एक मुसलमान फकीर से चीस- चपुर में खाती पीती थी। उस अनार्य के कलुषित वार्य से २ पुत्र हुए । एक का नाम गयवरचन्द और दूसरे का नाम हस्तीमल, था। गयवरचन्द तो अपना बाप के ही ; अनुरुप धोकाबाजी और उगविद्या में -एमा प्रतिनिपुण होगया कि जिसने बड़े बड़े धनिकों के यहा नौकरी के. बहाने रह कर हजारों रुपये चारे । निदान पाप का घटा, फूटा और जेलखाने की नौबत आने पर भागकर अपना म्लच्छ चाप के पास आया तो उसने यह उपाय बताया, 1
।
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समय इसने मौदजी का चेला नहीं रह कर पूज्यजी का,
पाटवी चेला बनने की बड़ी हुजत की । तब अांख निकाल
कर पूज्यजी बोले " भय नालायक. क्या तू मेरा नाम
भनाम करना चाहता है । मोढजी तो गुरु, माई है परन्तु
ले अपके तुझे मैं इस पत्थर के थंभे का चेला बनाता हूं".
ऐसा कह पूज्यजी ने इसको थमे के सामने हाथ जोड़ कर ,
सड़ा कर दिया और बञ्जीवनी सुना कर यमे का चला
बना दिया। इतने पर भी इसकी अकल ठिकाने नहीं आई।
और भी यह भ्रष्टाचारीपना करता ही रहा । कहते हैं कि
मगनजी., को लेकर यह पापी, मेवाड़ में गया और कोई
दो वर्षांतक यह दोनों आपस में,गुदा मैथन करते रहे ।
फराने का भी यह बडा.ही शोख रखता है। छी २ पापीयों
के पाप की सख्या नहीं रहती। कालु नाम के गाव में
जब हमने कपड़ा देकर एक मंगण से काला मुंह किया
तो पूज्यनी को इससे बहुत ही घृणा श्रागई । और
सूगालचन्दनी अग्रवाले को भेजकर भैप छीन कर इसको
निकाल ही दिया गया । और गावों गांव यह घोपणा-
करादी गई कि, न कोई इस कर्म चण्डाल को रहने के
लिस स्थान, दें और न रोटी दें, न पात्र दें, वख दें
न पुस्तक 'दें कुत्ते को डाल देना अच्छा, परन्तु इस:
कुपात्र को देना महा पाप है । जब २२ टोलों के संघ ने
.
ग
,
(२७। को धिक्कार के निकाल दिया तो यह मूढ़ उन्हीं का परमद्वेपी चन गया और मांड के म्मान फिर नया वेप बनाकर फिरवा हुमा जाबपूर माया और हूंढ र धर्म को सर्वथा नष्ट कर देने के लिये मूर्तिपूजक जैन संघ से मदद मांग परन्तु उन्होंने इसको नालायक जान कुछ भी गदद न दी। निदान सं०१६- ७२ में वीपरी चीमासे रहकर इस धूत ने जुगराजजी प्रास- करणनी लूस करराजी यादि भद्रीक धारकों को अपना जाश में फंपागा । और प्रतिमा छतीमो अादि झूठी २ पुस्तके और डरिल छपा २ कर समस्त २२ टोलोंवालों की पदनामी करने लगा, जिन्होंका सक्षिप्त सार यहां दिया जाता हैं । २२ समुदाय वालों ने जब इमको मच्छ समझ कर निकाल दिया और गांवों गांव कुचे के समान धुदकारा तो मूर्तिपूजकों की मदद पा इसने यह हैन्डपिल निकाला के, गयर एक भरु श्वान अनेक । सब ही भूस रहे देखो देख ॥ गयर उची फीनी शूद । भाग गये श्वान सब ढूंढ ॥ १ ॥ ऐ रावत गयवर मया, धान भये सप ढूढ । भूस भूस खाने खामड़ा पिना अरुल के मूढ ॥ २ ॥ चाह क्याहि सभ्यता वापरा है जिन साधुओं ने इस को संसार के दुखों से पचाया । गुरु मंत्र दिया। शास्त्र पढाये । पोथियां दी उन्हीं के बदले में अब यह फुत्ते बनाकर जूतों की मारता है । सच्च है संतोकी संभव पाकर भी नीच जाति का मनुष्य अपनी अधमता को- नहीं (१८) . छोरतों । कहा है कि-यो हि यस्य स्वभावोम्ति सतस्यदुरति क्रमः श्वा यदि क्रियते राजा । किन पत्तिउपानई ॥१॥ अर्थात् जिसका जैमा स्वभाव होता है वह कभी नहीं छूटता, कुत को यदि राज्य सिंहासन पर बैठा दिया तो क्या वह जूता नहीं खाता १ ज्ञानसुदर माई तो कुत्ते स भी नीच हैं क्योंकि कुन्धा तो एक बार भी गेटी डानने वाले को कभी नहीं काटता और ज्ञानसुन्दर भाई तो ८ वर्षों तक २२ समुदाय वालों की रोटी खाकर भी निमकहरामी होगयी। स्मृतियों में ऐसे ऐसे पापियों की गति घताई है कि, एकाक्षर स्यापिदातारं, यो गुरु नेव मन्यते धान योनि शतंगत्वा चाडालेधपि जायते ॥१॥ अर्थात् एके अक्षर का दान देने वाले गुरु को भी जो नहीं मानता है वह गुरु निंदक पापी कृत्ते की योनि में मो चार जन्म लेकर फिर भगी होता है । कुच के जमा होने पर भी कुतुहल प्रियो की मदद पाकर ऐरावत बना हुअा, उत्तम साधुओं के निंदक विचारे गयवर की भवान्तर में क्या दशा होगी सो परमात्मा जाण । स्थानकवासी मात्र में इम को एक भी गुण- वान् मुनि नहीं दीखता, यह कितनी पड़ी भारी नालायकता है। दो हजार वर्षों की स्थिति वाले सम्मग्रह का नाम लेकर मेसे तेरेहपंथी श्वताम्बर भाई पूर्व के सब ही जैनों को, धर्मभ्रष्ट भवा और भीषणजी को ही जैनधर्म का प्रगट कर्या को उद्धारक या प्रचारक मानते हैं । ठीक जानसुन्दरजी मी -- चैसे ही अपने पूर्ववर्ती सर्च जैनी मात्र को रदी करके भीषणजी से मी अधिक प्सरों के समान अपने का महावीर स्वामी का अवतार मानता या फिर में जैन धर्म की अपनी 'मन मानी नयी सृष्टि करने के लिये कहता है कि "भस्म ग्रह उत्तरी गयो बम्म पाच मे हो वक्र ना अन्त के । अढाई हजार वर्षों तुज धर्म नो । था से महोदय को इस श्राप मणेत कं १५ शासन नायक तू प्रभु । खुद भटेयो हा मैं मापे आपके बहायक रो प्रभु भली पा। मोहरा मालिक हो । मुझ मन में व्याप के ॥ ६ ॥ ज्यारे गलानी हा धर्मनी त्यार साहायक हो तु थाय जरूर के । भक्तों को संकट टालमा । आपों पापहो तूं थाय धजूर के ।। १०१ ॥ बीनती शतक ज्ञान विलास पृ० ३५० ।। परपरा इम चालती थायो पंचमो काल पदरासो एकतीस में. बैठा धूम केतु विकराल । ७ ।। जिन भक्ति उत्थापवा प्रगटी लुपकजाल । लिंग गख्यो सब जैन को श्रदा पहुंची पाताल ॥ ८॥ सम्बत् सत्तगमे पाठ में लूपक बज्र रग साध तेहनो शिष्य क्रोध से, लवजी कीर्यो उन्माद ।। १३ ।। मुबड़ है बांधी मुहपची। दंडो धारियों दूर लटकती झोली हाथ में गुरू निंदक भंडसूर ॥ १४ ।। गुरु बहुत समझावियो । नो हा न मान्यो मूढ । दोखे चेप डरावणों, नाम धरायो टूढ ॥ १५ ॥ धर्मदास दृढक हो । अज्ञानियों में मिरदार' ।। वेप श्रद्धा जुदी खुदी नाम घगयो सत: मम्बत अठार बन्दरांतरे प्रेमव्यो -
(२०)
-
मौषम पन्थ ॥ २० ॥ जुदी पकाई खीचड़ी, दया शान
उत्थाप्यादाये मृढ चूका कई चीर ने रुगनाथ गुरु दियो रोग
॥२॥ जीव मारियां पाप एक छै बचाया कहें अठार | जिन
वचनों के उपरे मारे मूह मुठार |॥ २४ ॥ राखोडियोपायो
पाव । नतिरयां काचा नीर भाषा की भावना ।।
क्रिया सुकी पेहेले तीर ॥ २६ ॥ अजीय पंथा अलग
पडया नहीं माने धान्य में जाव । विचर पंजाब ने देश
में जुदी दूढक से नीव ।। २७॥ साठ कोठी गुजरात में सामायिक
ना पञ्चखाण । गुलाव पथ नगुरोथयो जिण लोपी दृढक नी
आण ॥ २८ ॥ कुंडापंथी करड़ा घणा । जिन प्रतिमा से देश
पंचगी उत्थापता जाणेन आगम रहस्य || २६ ॥ देशी की
नह - कटवा परदेशी लियो अवतार | आप थापी
अभिमानियां आडंबर पूजावण हार । ३४ । स्थानकर
में उतरे नहीं । उष्णोदक में बतावे पाप मूल्य माठ गृहस्थी
घर में रहें गुप्त पाणी पीवे सेवे पाप ॥ ३५ ॥ मोटी बांध
पूंपनत्ती । धौवै पेसाब से भाव यास तपसी नाम धरावता
अध पिलोई पीवै छास ॥ १॥ मोटा हाकी पातरा
तेहपण तीन चताय । अशुची तेह में ही करें किया
ही में लाई खाय ॥२ ॥ सूत्र अर्थ के उपरें
स्याही सपेतोपूर । करै आगम भाशातना । कृतघ्नी
कर ॥ ४ ॥ वासी चिलद टाले नहीं । नहीं टा
A
- . ऋतु धर्म । मोघड जिम श्राचारण । केही छाने करें कुकर्म ॥ ५॥ दया दया मुप से स्टेजी । करें हिंसा का काम । दिन जगत मूढो बाघताजी। समुर्लिप उपजे शिणस्थान, हूढ को तजदो कलिंगी को वैष ।॥ १ ॥ घोवण दध पाटा भोला राखनोजी सध्या रम चलित होय । कीडा श्रदरकिलविलजी । परि- ठोतयार ॐ जाय हूँ ॥ २ ॥ अनंताजी निगोदनाजी विफ- रस जाय पिग्लाय उत्कएरा देसी थकीजी । परदेशी रहया फैन्त मचाय ॥ ३ ॥ नंदकुमरकी दूढणीजी इन्ही पेटा में जाम काईक अधिकाई यापटनी जी । तीजा अादि पिछाण | मूढणी मक्षार जाण नीनो कप करण हसिगार । काम पडे उचर । तणोजी । तो रात्री में करें विहार हु ॥ ५ ॥ लिंग निर्णय रत्तरी ज्ञान मिला। पृ० १६० वर्तमान में लौंका गच्छ के सप है। यति महात्मा और शासक लोक वीतरागदेव की मूर्ति मानने पूनन है । लौकाजी को जिन भक्ति उत्थापक भादि गानियों देकर उनके भक्तो की आत्मा दुराना और गई - गुभरी रात को लिख कर फिर से दोद फैलाना, यह भी जैन । पा के 7 बानसुदर की पड़ी भारा नालायकता है। इस गमय तो जैनी मात्र का अपना भाई समझ ऐक्यता बढाना अत्यावशाक था, परत दुष्ट प्रापी से भली पात नहीं बनती। १२ टोलों के आदि पुरुष लबत्री स्वामी को तो जानसुंदर . माई, उन्मादी, मट, गुरुनिंदक, और महसूगदि विशेषण देता । 7 . . है। परंतु उक्त सर्व दोप खुद ही में परे पड़े हैं, उन्हों को नहीं देखता, यह कितनी बड़ी मूर्सता है । नीति कार ठीक लिखते है कि खलः सर्पपमात्राणि, परच्छिद्राणि पश्यति । आत्मानो विन्य मात्राणि, पश्यन्नपि न पश्यति ॥ १॥ आगे २६ वी कड़ी में राख का पानी को सचिन लिखा मा भी ज्ञान- सुंदर की पक्ष पात है। हाँ मटकी भर पानी में, चुटका भर राख डाल कर, प्राशुकजल मान लेना, यह तो तेरपंथी भाइयों की बेशक भूल है । लेकिन १ सेर भर पाणी में पाव भर राख घुलने पर अन्तर मुहूर्त के बाद नित्तर जाने पर भी वह अचित्त तीर है और घडी तक वह कच्चा पानी नहीं हो सकती । उष्णेदकन मिलने पर राख के पानी को संवेगी साधु भी, काम में लेते हैं आगे तेरह पी और २२ समुदायक सभी जनी साधुओं को कुंडापंथी ओघद पंथी आदि लिया है यह भी ज्ञान सुदर की परम नीचता है। ज्ञान सुदर भाई अगर ओसवाल का अंश हाता तो, नो कार गुण ने बालों को ऐसा कभी न लिखता जैनी भाईयों की बदनामी द्वारा ज्ञान सुंदर ने अपना नीच कुलसप्रमाणित किया है यथा-नजार जातस्य ललाटभृग। कुलप्रसूते नंच पाणि पद्मम । यदा यदा मुंचति वाक्य वाणं । तदातदातस्य कुल प्रमाण ॥१॥ कर्मचन्दजी महाराज तथा सामालालजी आदि अनेक साधु हम समय भी २२ सप्रदाय में विद्यमान हैं, कि जिन्हों की जिन प्रतिमा पर A ।
(२३) पूर्ण श्रद्धा है । पार जा गिरनादि तीर्थों की यात्रा करते हुए मैंने थनेक ढूंढिय साधुओं को देखा । रेखगजजी फकीर बदजी रामचंदजी आदि सैकड़ो दिये साधु पंचागी को । सत्य मानते थे, और बहुत से अब भी मान रहे हैं । पूज्य मुहारमलजी मनालाल जी उ. आत्मारामजी तथा ताव । धानी रवचन्द्रजी विगेरे सकड़ों साधु २२ सम्प्रदाय में, इस । समय भी मौजूद हैं कि जिन्हों की विद्वता के लाख हिस्से | भी मुख ज्ञानसुदर नहीं पहुंच सकता । २९ कड़ी में उन्हों की समाज मात्र की हीलना कर महा मिथ्यादृष्टी ज्ञानसुदर ने महा मोहनिय कर्म वांधा है । पचमारक युग प्रधानाचार्यों की नामावली में एक धर्मदामजी भी दर्ज है । पूज्य जयमल्लजी ५२ वो तक न मोए । परदेशियों में पूज्य हुकमीचदजी फक्त एक ही पच्छवडा में जीवन पर्यन्त रहें। भार १८ वर्षों तक निरन्तर छठ २ तप के पारणे भाम्बिल किया। नंद- कुवरजी ने मापज्जीचे चलें २ तप और पारणे प्राये आम्निल करा ऐमे गुनी खेताजी बगेरा कई मतिया होगई और है। सच ही का कनन का और छाने कुकर्म करने वाले । श्रादि लिख कर अपने समान बना दिये ॥ यह ज्ञानसुदरजी को जाति नचिता का ही लक्षण है । उत्तम पुरुष किसी की मी बदनामी नहीं करते, 'घावन पीने में दाप बताया यह भी ज्ञान सुदर की अज्ञानता है कारण भाचारांग का सूत्र आदि
..-
।
(२४)
जेनगमों में लिसे ए २१ प्रकार के धोवन मंबेगी साधु
भी पीते हैं। हां जा अनछाने पानी का धौवन हो, ६ घड़ी से
भी ज्यादे काल का हो, छाने पर जिममें पानी के नाम जांच
निकलते हो, जिस्मे विदल का संमेल होगया हो । प्रमजीवों क
मृतकलबर्ग में व्याप्त हों और पत्ते गागादिपशुश्रा ने
जिसमें मुंह डाल दिया हो ऐसा धौवन जैन माधु नहीं पी
सकने । गर्म जल तो अजैन के घर से भी ले लिया गया।
परन्तु धावन हर किसी के घर से नहीं लिया गया। जो
परम पवित्र जैन धर्म की घृणा कराता है । वह भाना
में दुर्लभवाधी होता है । २२ समुदाय के परदेशी TE
उष्णोदक में पाप नहीं बचात, जैनी मात्र का परम शतु ज्ञान
सुन्दर उन्हों की झूटी बदनामी उडाता फिरता है, और मा
माइयों को आपस में लड़ा कर जैन धर्म को कमजोर करना
है। इसकी समी कृतियां भद्रक जनों को उन्मार्ग में ले जाती है
परलोक का ता इसको कुछ भी भय नहीं । गिरधर करि का
भूठा ही नाम लेकर स्थानकवासी मात्र के लिये लिग्यता
कि इंढिये इसी संसार में पेट भरने के काज । गद्धा जिग जगता
किर, जिम तीतर पर वाज जी तीतर पर पाज, लाज इन्हीं
को नहीं भावे । मैले कपड़े पहर ज्ञान उतारा ही सनावे को
गिरधर कविराय। कहो ये किसके मुंडियां धादि धर्म उठावे पापी
वरक
में जावे दृढिया ॥ १०८ ॥ तेरहपंथी भाइयों के लिये
.
.
।
-
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( २५)
मी नियमितपी धर्म में नही दया नहीं जान। चूका
का ने भरे उसे ध्यान धरे उन्हीं का धान
ज्ञान बनी ना ही सुनार। पार नाक में नामोगको
साथ ने जान । हें विरघर रायमुना में स्था पंथी।
नहीं दगा दाब पर है १०० ॥ नान पिलाम
ष्ट.३० ॥ २ मा नाकर
जी की रानी मा, क जना के भान
। मृर जदर की कितनी पढी नाग नालामाता है । जेन
शासाना कि एक ना का। गुनगाना भी
नरक कमीना माता मायामा म्लेच पनी
दकात में रत्नपिताबादी के नाम से नोभी- कर
नरक पाना । कहा है किनिदा नाक लाय, fin
:चा पैर पढाव । निंदा गुगों का नाश, खिा पर
। दाह समाने । निदा गरे फार, निंदा दुर्गण गय तारें।
निंदा मान फामा निदाद राये । शिन पमा धौरी
| मिल्यो निंदक 'ये । ज्ञानी गाना कमप की का
। खेल ॥१॥ कर्माधीन मार कमी पर गो या ₹गी अपना
- ज्ञानसुदा नाम बताता है । कहीं पर गरारचद तो कहीं पर
3, महात्मा रिपमदासादि नाम प्रगट करता है। जोधपुर की,
। शारदापी जाताण पभा इस धर्म धुर्च को महातामधेश में
- दुरात्मा कह कर पाधित करती है और कावा है कि इसने
( २६.),
बिलकुल वे सिर पैर की ऐसी अंड बंड वासें लिपी है कि जैसे
किमा पागल का प्रलाप हा या किमानशबाज का नशे की
हालत में मुंह खुलगा हो अथवा बहुन हुँसी क्रोधी यां
किसी मृत्यु शय्या पर पड़े हुए व्यक्ति के अम्पष्ट और
अनर्गल उद्गार हो । देखो ढोल में पाल पृष्ठ ३ । अजमेर निवासी
राधावल्लभ धीमलान लिखते हैं कि इसको विद्याम्माम विलकूल
ही अल्प है यहा तक कि अपना नाम भी शुद्ध लिखना नहीं
जामता । :मके लेखों में इतनी अशुद्धिया है कि जिनका शुद्ध
करना अत्यन काठन है। अपने मन घडत लेखों से हमने मर्व
साधारण को पूरा धोका दिया है । इपी द्वेष भरे हुए मिथ्या
कपल कल्पित गयोड़ों को मत्य प्रमाणित करने की इच्छा से
असुद्ध और अमम्य लेप लिखने वान को महात्मा लिखना
अनुपयुक्त ममझ मने 'मको 'मुढात्मा ही सोधन किया है।
देसी ऋपमदाम की गर्षे पृष्ट (ख. ) अस्तु जब तीवर्ग में २२
संप्रदाय वालो ने इसक पाप खोल दिये तो वहां मलजित होकर
भांडके ममान वेश बनाये हुए यह मुढ योसिया गया। उस
समय वहा फलोदी निवासी भेठ श्रीमान फूलचदजी गौलेछाजी
की तरफ से मर्व जैन मंदिर और धर्मशाला का जिणोद्धार
हो रहा था। और एक जैन वोडिंग भी उल सेठ साहच की
नरफ से खाली गई थी जा माज दिनो दिन उन्नति पाती
दी जारही है । नहा स्थानक नामियों के न होने से इस धर्म
(२७ )
पूर्व में मद्रक मेठ फूलचंदजी को अपनी माया जाल में खूप
ही फसया पार झूठी २ पुस्तकों को छपाने के लिये उक्त
सेठजी के हजारों रुपये इसने बग्बाद कर दिये । फिर भी इसको
| वृष्णा बढती होगई। तीर्थ भोमियाजी में यात्रियों की बडी भीड़
भाड देख कर इस धर्म ठग ने अपन पास मठजी के हाथ से
ए एक पेटी रखवाली । उपमे ज्ञानकोष के बहाने घोका देकर
सन आंगतुक यात्रियों में मैकड़ों रुपे ठग लिये। १२ महिनों
1 तक तो किमी को मालूम ही नहीं हुआ कि यह धर्म तम्तकर
। अपने पाम कई चाचियां रसता है। परंतु जर पटी खोली
| गई तो कुछ भी नहीं निकला, सब की सब रकम, न मालूम
कहां उड़ादी गई। ध्यान करने के बहाने पर यह ढोंगी रात के
समय कहीं बहार जाया करता था। अनुसधान करने पर
एक दिन ढेडों के मोहल्ले में पता लग गया । बस उसी दिन
से परमनिकृष्ट कुलोत्पन्न समझ कर मंठ फूलचंदजी ने इस
अधर्म को वंदनादि सर्व सत्कार करना छोड़ दिया । और
मध्यम्यभाव में देखने लगे। प्राना पाप प्रगट हाता देख
यह धून वहां स रवाना हा फलादी बला ज्या । वहा परस
करलागच्च के कतिपय सज्जनों का तो इस धर्च ने अपनी
मायाजाल में इस प्रकार मालिया कि अब उन्हीं का उद्धार
ही नहीं हो सकता । उन माइयों का हम कपटी ने यह विश्वासा
दिया कि अगर तुम लोग तन मन धन से मुक मदद देते
*
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4-
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( २६ -
बिलकुल वे सिर पैर की ऐसी अंड अंड वा लिम्बी है कि जी
किमी पागल का प्रलाप हा या किमा नशवाज का नशे की
हालत में मुंह खुल गया हो अथवा बहन दुःसी क्रोधी या
किसी मृत्यु शय्या पर पड़े हुए व्यक्ति के अम्प और
अनर्गल उद्दार हो । देखो ढोल में पाले पृष्ठ ३। अजमेर निवामी
राधावल्लभ धीग्रलाज लिखते हैं कि उसको विद्याधाम पिलकुल
ही अल्प है यहा तक कि अपना नाम मी शुद्ध लिखना नहीं
जानता । :मके लेखों में इतनी अशुद्धियां है कि जिनका शुद्ध
करना अत्यंत कठन । अपने मन घड़त लेखों से इसने मन
साधारण को पूरा धाका दिया है । इर्षा द्वेष भरे हुए मिथ्या
कपल कल्पित गपोहों को सत्य प्रमाणित करने की इच्छा से
असुद्ध और श्रमभ्य लेप लिसने वान को महात्मा लिखना
अनुपयुक्त ममम मने “मको मुढात्मा हा सोधन किया है।
देखो ऋपमदाम की गले पृष्ट (ख. ) अस्तु जब तीवर्ग में २२
सप्रदाय वालो ने इसक पाप खोल दिय तो वहांम लजित होकर
भांडके ममान वेश बनाये हुए यह मुढ थोसिया गया। उस
समय वहा फलोदी निवासी भेठ श्रीमान फूलचदी गौलेछाजी
की तरफ से सर्व जैन मंदिर और धर्मशाला का जिणोद्धार
हो रहा था। और एक जैन वोडिंग मी उक्त सठ साहय की
नरफ से खाली गई थी जा भाज दिनो दिन उन्नति पाती
दी जारही है | वहा स्थानकवामियों के न होने से इस धर्म
-
- मध्यस्थभाव में देखने लगे । प्रना राप 11 यह धूत वहां स रवाना हा फलादी बला (२७) धून ने भद्रा मेठ फूलचंदनी को अपना माया जाल में खूप ही फसया पार झूठी २ पुस्तकों को छपवाने के लिये उक्त मेठजी के हजारों रुपये इसने परयाद कर दिये। फिर भी इसका । तृष्णा बढनी होगई। तीर्थ प्रोमियाजी में यात्रियों की बडी भीड़ : भाह देख कर इम धर्म ठग ने अपन पास मठजी के हाथ से • एक पेटी रखवाली। उपमें ज्ञानकोप के बहाने घासा देकर : इसन आंगतुक यात्रियो से मैकड़ों रुपे ठग लिये । १२ महिनों । तक तो किमी को मालूम ही नहीं हुआ कि यह धर्म तस्तकर, अपने पाम कई चाचियां रखता है । परतु जब पेटी सोनी गई तो कुछ भी नहीं निकला, सब की सब रकम, न मालूम- कहो उड़ादी गई। ध्यान करने के बहाने पर यह ढोंगी रात के समय कहीं बहार जाया करता था। अनुसंधान कान पर एक दिन टेढों क महिने में पता लग गया । म दिन से परमनिकृष्ट कुलोत्पन्न समझ कर मठ फूपाजी २ 18 अधर्म को बंदनादि सर्व सत्कार करना सही कॅगलागच्छ के कतिपय सज्जनों को कोनी. कर मायाजाल में इस प्रकार मालि हो। ही नहीं हो सकता । उन माइTHATRE न दिया कि अगर तुम लोग देव . 7 । ५ । नो
.
(२८)
रहे तो निस्सदेक मैं रत्नप्रसारिजी गा चेला मन कर मरे
दुए फवलाच्छ को पुनः संब्रीपन दर दंगा । शीर तमाम
गच्चों को रद्द कर मारत श्रीमाग गौरवार, राधा मोसमालों
को एकरलागच्छदी ले गाउंगा। लख गहन शिव
मेघा को तो यहां तक विधास दे दिया कि यदि भाप लोग
झको समना साधु तरीके पूजा दें, तो मालगाल मरदगा ।
घर छोड़ परदेशों में धनोपार्जनार्थ जाना न पडेगा । लोम
बस और भी ईश्लेपार मविकारतज गये निदान करना
गच्छति और मरणका अनादर कर उस सनी ने
असा ही वायगे रत्नम मुसीर की जड मूर्ति के हाथ में रास
छोप गादिया और सस्तर पर की साघीमों बोला "हम
उपाय लेकर मेरे उपर डाल दो" तप गानाएँ
उनकार गोरे ने दी मति के हाथ में से पास
चूर्ण उठा का जो पिर पर स्पलिया। शोर दुनिया में
स्टोर पर 15 कारकेश गचरत्नमरि का
शिष्य । पालो ने पाया कौन और कय हुना तो, यह
भाग अपने गुरु प्राजसं २४०० वो कभी पोली और
पाश्वनाथ के ६ पार पा बनाता है। क्या ही मूर्ते की लीला
पाप की तु बाई हो के बाद उत्तान होने
बाला पुत्र अवश्य ही जाच होता है। ऐगे २ पापियों की
गुरु पहारा को नष्ट कर जैन, धर्म का सत्यानाश किया है।
-
(२९)
और फिर भी न गातुम यहां तक इसको रसातल पचायेंगे।
पिना गुरु के सपनों को मुनि के पामरो जैनदीचा नही आसकी
विचारे अज्ञान उदर को इराना भी मोध नहीं कि मूर्ति केवल
ध्यान का घालमन, साची व पाटगिरी के लिये ही होती है।
दीक्षा लेने की विधी में प्रमुक पाठ शिष्य को और प्राक
पाठ गुरु से उधारण करना पड़ता है। मूर्ति के मामने सान
ही हो सकता। जैन मुनि को गुरु प्रथम सामाधिकारोपण
(लघु दीचा) कराते हैं और फिर योग वहन करके पंव
- महावत (चड़ी दीक्षा) देते हैं, भोर अपना इल गण शाखा
मादि पताते है कि जिससे वह फिर उन्मार्ग में न पड़े । सर
अब मी कुछ बोध हो तो ज्ञानपुन्दर भाई अगलिया सूत्र
बरूर देखें, और अपनी अज्ञानता पर खेद प्रगट, फरें, तथा
मिथ्यामिमान छोड़ फर किसी कवनागछ केही यति के
पास यथाविधि योग्यता सुजन नत लें, जिससे कुछ आत्म
कल्याण हो । आत्मारामजी असे समर्थ पुरुषों को भी गुरु
के ही पास दीक्षा लेना पड़ा है। जैन शास्त्रों में ऐसा कहीं
१ नहीं देखा गया कि नातिस्मरणादि अतिशय ज्ञान वर्जित
कोई मनुष्य निरजीव मूर्ति के पास साधु का वेश पहन कर
मस ज्ञान सुन्दर के ही समान निरचर मट्टाचार्य बन बैठा हो।
अदि ऐसा होना छानवत् भांड और बहुरुपीयादिः, भी-जैन
साधु बजेगा । मस्तु जन. कॅववागच्छा. भाइयों ने साना
है
-
। ३२)
पैटी में जाता था। और रस में. उशी धर्शश्रम
के अंदर उसी 'र्मा दे की रकम से साव सिगों के साथ
अनल संकन करता था। धकार ।। जैन शास्त्रों में लिखा
कि-प्रन्यस्थाने कृतं पापं । स्थाने मुच्यते । धर्मस्थाने
कृतपा । वजनेपाय आयते ॥ १ ॥ अन्यग्थानों पर किया
हुआ कठोर पाप धर्म के ठिकाने भाग में ही छूट जाते हैं।
मगर धर्माश्रग में रहकर यदि मष्य पाप कम करता है तो वह
पाप कोटान फोटी भयोतक भी यज्र या लेप के मकान नहीं
छूटते । जिस मकान में मामायिक पोपध प्रतिक्रग्ण प्रभु
भजन पूजन व्रत नियम स्मरणादि धार्मिक क्रिय एँ होती है।
उसी मकान में ज्ञान सुंदर माई ५ आश्रम देवन करता है । यह
कितना बड़ा भारी जुल्म है। नरसिंघमीर कसरी के गजारव से
सुदा श्री का अहातो नष्ट होगया। परन्तु आश्चर्य है किधर्म गीचे
को नष्ट करने वाले दुष्ट गयवर पर अभी तक कराल मुख कयरी की
फूर दृष्टि तक भी नहीं पडती । जोधपुर के सिवाय फलोदी से
भी बहुतसी रकम मंगा कर इम धर्म घातक ने उनरंडा स्त्रियों
को दी है । जब पाप का घड़ा फूटने पर पाया तो
बोधपुर से रवाना होकर यह धूर्त गुजरात में चला गया।
वहाँ पर इसको नगुरा स्वछन्दी और महामृढ तथा व्यमि
चारी समझ कर किसीने कुछ भी सत्कार नहीं किया। फक्त
पालीताखे में हरीसगारबी और सूरत में रखदिनमा
-
-
की मदत से कुचे के ममान रोटी मिलती रही । गुजरात में जैनों' की योगोपधानादि धार्मिक क्रियाओं का ठाठ चार, जिन पूजा तीर्थ यात्रा संघसमेलादिको का बड़ा भारी मरघस, तथा तपागछी सघवेगी साधुओं का अति सम्मान और अपना अनादर देख कर यह मृद जल कर खाक हो गया ! और अपनी हार्दिक दाह बुझाने के लिये भगड़िये तीर्थ में आकर तपागच्छ के समस्त प्राचार्य उपाध्याय पन्यास साधु साध्वी और श्रावक' श्राविकानों की बदनामी के गीत बना २ कर गाने लगा तय गुजराती मोइयों ने नालायक समझ कर इसका वेश छीन लेने का विचार किया तो यह धूर्त वहां से भाग कर पीछा मारवाड़ में भागया। और हमेशा फलोदी में ही पड़ा रहने के अभिप्राय से जस- वत सरोय में डेरा डाल कर अपना घृणित जीवन व्यतीत करने लगा। उस समय फलादी में गीतार्थ साधुओं के न होने से इस, धर्मधूर्त ने जसवंत संगय में खूप ही, अशा जमा लिया , नाना भांति से लोगों को ठग कर हज़ारों रुप फिर इकडे कर लिये अपने दृष्टी सागयों में से किसी को मुनीम किसी को रोकड़िया आदि बना कर धर्म की रफम से खूप गुल्लरे उड़ाने लगे। अधिक मास में खरंटर और तपा 'दोनों गच्छों के अलग २. पर्युषयों में स्वमादि के हज़ारो रुपया की समस्तः आमदनी को इस धर्मर्च ने अपनी ही संस्था में
,
जमा करा दी । इस संस्था में आज दिन तक करीब पौने में
लाख रुपये आचुके । इतनी बड़ी रकम से अगर जैनांगमें
भाजीणोद्धार कराया जाता तो, वेशक जमलमेर पाटन अहं
मदाबाद आदि के समस्त प्राचीन जैन ज्ञान मंडारीक
जीर्णोद्धार सहज में ही हो जाता । परन्तु खेद है मारवाड
जैनों की बुद्धि पर कि उन्होंने गोएँ दोहकर कुचों को
पिलाया। तब ही वो. आत्मारामजी महाराज ने जैन धर्म
विषयी प्रश्नोचर ग्रंथ में चर्चमान जमानों के जैनियों को नाला
यफ लिखा है । इम रत्नप्रभाकर ज्ञान पुष्पमाला के धन के ४
हिस्सों में से दो,हिस्से तो अ० प० जैन व पुस्तक मुद्रको
को दिये जाते हैं। एक हिस्सा मुनीम गुमास्ते रोकडिये व
प्रकाशकों को मिलता है। और एक हिस्सा ज्ञानसुन्दरजी
के भोग में कार्म श्राता है । विषयवर्द्धक और पुष्टी २ कारक
दवाएँ मंगता है और जान सीखने के बहाने चूला कर अपने
भक्तों की ही बह बेटियों को बिगाड़ता है । टीका चूनी मान्य
नियुक्ती आदि का एक अक्षर भी यह मूर्ख नहीं जानता केवल
भाषा और.टब्बा टब्बी सुना कर मद्रक लोगों को जैन धर्म
से पवित करता है । कमला गच्छ के सिवाय हमारे:-
.
-
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तपागच्छ वाले भी कितने ही लोक इस धर्म भ्रष्ट और
जैन मुनियों के निंदक को साधु समझ कर मानते पूजते हैं
अपना धर्म गुरु मान कर चौमासा करवाते है और व्यर्थ रही हजारों रुपये खर्च कर इस जैन धर्म के शत्रु की बनाई हुई झूटी पोथियों को छपवा कर, शुद्ध जैन धर्म की बदनामी कर- इस बात हैं, कि जिससे बहुतों के पोध पीज का सर्वथा 'नीश गा होकर सिपाय नुकसान के कुछ भी लाम नहीं होता। हमारे पागच्छीय भाइयों के हितार्थ अब में कुछ उन बातों का दिग्दर्शन कराता हूं कि जिनमें ज्ञानसुन्दरजी ने तपागच्छीय र सवेगी माधुओं की झूटी २ वदनामी गाई है। | लिखता है।-कि सवेगीनोम धरायने, द्रो मृक्यो हो संवेग नो रंग के । लोक लजावै, बापटे, न्यारा २ हो जाणो सोहना दंग के ॥ १०॥वष क्रिया पदवी- नणा, करे झगड़ो हो माहों माहि झूठ क । अन्तानु बन्धी राखी रह्या ग्वाली हो कर माथा -कृट के-१३ इत्यादि ज्ञान-विलास इसमें आपका अभिप्राय यह है कि वर्षमान समय के सब संवेगी साधु अनन्तान बन्धी की चौकडी वोलं मिथ्याती है इन्हों में-मार्गानु- सारी और सम्यक्य पण का भी गुण नहीं है। आगे चल कर फिर लिखते हैं कि पापारभ करावता. सदो- पितले अन्नन पान के । राख रखोवे परिगहो, करे आडवर हों झूटा तोफान के १७ टीकिट कारट क्चर घणा, रोखै पासे डोड। नोटों मम्मान के नामामंडावे
न
१
.
(३६)
गृहस्थना कलयुगिया जाग्या शैतान के लेख
पंडित राखं साथ में नौकर चाकर हो साथ रा
साध के, सिड़ साधक जोड़ी मिला भोला जीव
हो पकडे जिम व्याध के.१६ झूटी यहाना चंदावत
तार टीपाल हो लेता वी पी आपके । मणिआ
भोकलावता, भज कलदारं हो, बैंठा जपै जापर
चौमासानी विनती करे.श्रावक हो तब बोले रकम
वेचार आठ हजार में दश हजार हो बोले हर
॥ चौमासनी पैदासने, पोते मंगाची हो रा
निज पास के। नगद नारायण पेली करं । भोलाज
वो ने हो आपे बहु त्रास के ॥ २२ ॥ उपधान बाह
ढावंता, पैसा रोकडा हो तिम उनमणों माहि के
दीक्षा यात्रा पर्वत में लटो लूटी हो करे बापडाना
के ॥ २४ ॥ ग्रंथ लिखोव कोरणे, ग्रंथ छपवा हो मां
पंसा रोक लाओ लाओ करता फिरे कलियुगियो ।
हारें संयम फोंके ।। २५॥ धर्मशाला उपासरा मठधार
हों आपणा करि लीध के । खोतां पीता राखे तेहना
मुनि पर्द ने हो 'जलांजली दीध पाठशाला था
आपणी टीप मंढावे हो। योपडा 'गामोंगाम:
मायाना 'मजुरोया फिर घणा । लज्जाव हो प्रध
- पीलो नो नाम ॥ २८ ॥ व्याज वर्णज करे घणां। भाड
.
।।
(३७)
लेवें हो करे धीर उद्धार । केस लडे को रटचढे ।
पीली पलटण ना हो यह छै समाचार ।। २६ ।। छापा
परस्पर छापता देता चलेन्जो लडता मांहो मांहि।
लोक लेजाव चापडो, पीताम्बरी हो अब, विगहता
जांय के ॥ ॥ इत्यादि
इन १७ से ३० तक मैं पाग के सभी सर्वगी
साधुओं को ६ कायजीवों के और करने वाले और
परिग्रह धारी सावित किये हैं। फिर आगे लिखती
है कि
साधुपयों न पाले कदी रुडो कहते हो प्रभु गृहस्थावास ।
उभये भ्रष्ट महापापीया पीला कपड़ा नों हो चाले सत्या-
नाश ॥ ३६ ॥ इसमें समस्त तपागच्छीय संवेगी साधुओं को
गृहस्थों से भी महाभ्रष्ट बताया है। फिर भागे उन्हीं को
शिक्षा देते हुए लिखता है कि -भवामिनन्दी वापढा,, सुख
शैल्या हो पामर थांता जाय चूडाणं, यूडिपाण, न्यायची
कलयुगिया हो दुर्लभ बोधि व्याय ।। ४७ ॥ माया कपा
समाचरे मान बढ़ाई, हो, मृपा वादहित शिक्षा माने नहीं।
अन्योअन्य हो करे बाद विवाद ॥४८॥ पास स्थाने कुशी
लिया. आहा छंदाही संसकानुसार । उसना नित्य मिडिया।
बत खटियों हो, बहुतसमुदाय ॥ ५० ॥ पंडित नाम घरानला
-
मुर्ख ना हो करे काम । आचार्य नाम घरायने थाना
चार हो सेवे ठामो ठगम ।। ५१ ॥ कनक कामनी लालची
फरे पाला हो अपरंपार ४ ज्ञा. वि. पृ०.३४५ ॥ समीक
इसमें तपागच्छ के तमाम साधु. पन्यास, और,माचार्यों को पूं
व्यभिचारी पवाये गये हैं । अब 'संपूर्ण भारतवर्ष में मात्र
जैनी साधुओं की नास्ति करके ज्ञानसुन्दर खुद युग प्रधान
चार्य मनता है.. और गृहस्थों की अपने ही पास दीक्षा लेन
की सलाह देता है। दुकानदारी चलावता । कलयुगीया हो।
मिन्या कर्मसंयोगी, लोक पुकारे किरण ‘खने उचम मुनिनों ही
प्रायः आज वियोग ॥ ५७ ।। सद्गुरु योग चिना प्रमु अक
लावे हो, घणां गृहस्थ लोक । फिणने पास दीक्षा, लेऊ किम
सुधरे हो मारो'आपर लोक ॥ ५८ ॥ जैसी दशा- पीला तणी
तेसी इंढकोनी हो थई श्रावार । सामी नहीं कोई बात :
तुं जाणे ही तसु सब प्रकार ॥ ३८ ॥ शाशन रक्षक देवता उठं
जागाहो थयो सावधानः। सहायक करो शाशन वा श्रम
उपर हो । थाहो महस्वान ॥ ९२॥ युग' प्रधान मुनिराजजी
'दोय सहस्र ने हो। चारहुसे जेह तीरण तारण कालिकाल में
भव्यजीवों ना हो उपकारक तेहाशाशाशन 'पड तो देख कै तब
उपन्या ही दिले में बहुदाम् । साहाय करो कोई जीवनें जिमसुधरे हो
स्वपरना कान ।। ६४ ॥ ज्ञा० वि० पृ० ३५० समीक्षा व्यभि
का कीडाहोकर भी, वैप विटंबक ज्ञानसुन्दर, पागल
क
(१)
.
-
में समानान को स्वछंदता से युग प्रधान समझा कर,
शाशन देवताओं की मदद से जैन समाज को उन मार्ग में
लेजाना चाहता है। परन्तु इस भ्रष्टाचारी और नगुरा समझ
कर उन्होंने आज दिन तक कुछ भी मदद न दी और यह
'मदेश भेजा कि माया विनाश ज्ञान, माया अज्ञान बढाये
माया गुमार मान माया प्रतीत उठाने । मायाला मिथ्यात्व,
पशु' की यानी पारे । माया' नरक निगौद, चौराशी बाट
चत्ताव । कपट कुटिलता, दम्भ त्यज, भज श्री गुरु के पाय ।
ज्ञान माम्यग्म पान कर, हृदय शुद्ध हो जाय ।। १॥ तृष्णा
प्राग अपार, तृष्णा जग मील मगावे । तृष्णा अत्याचार,
तृष्णा यच ज्ञान भुलाये । वृष्णा करे फनीत, तृष्णा ले कैद
करात्र । तृष्णा , कटारे शीप, सृष्णा तुज नरक दीखाये ।
गुरु मन्जना तृष्णा गिणन एक । ज्ञान मदा ममता
घगे प्रगट गुण अनेक ॥ २॥ ज्ञान गरीबी गुरु वचन,
नरम वचन निर्दोष । एत्ता कभी नहीं छेड़िये श्रद्धा शलि
संतोप ॥ ३ ॥ इतने पर भी हम मायाचारी की विषय तृष्णा न
चुमी और शाशन देवी मे निगश हो सीमधरस्वामी को झूटा
कागज लिखा । जिममें श्वेताम्बर, दिगंवर ८४ गच्छ स्थानक
कामी, तेरा पथी, आदि सब, ही जैनों को इसने चोर सावित
किया है। इस नुगुरे के उस काले कागज को नहीं पढ़ कर
यह भंगी की टोकरी में फेंकवा दिया, तो रोता हुआ यह मुंह
.
मात पिता
श्रोता किन
।
में हे नाथ, कागल (नो उचर केम नथी थी मायो, हम हूंडी'लखू छू' कागल का नहीं वांचियोर, माचियो घोर अंधार, इंडो सिकारो नाथजी न करो देर लगार ॥१॥ मेझरना पृ० ३- निदान गुरु परपरावार्जित इस नुगुरे कंगाल की सीमंधर स्वामी ने जाली हुडी भी नहीं स्वीकारी, तब रोकर यह मूर्ख फिर बोला कि, कागल तो मैं लख्योरे हुंडी माहरी र कम न सिकारी नाथ । कारण पामीर लखू पेठनेरे जन्दी सिकारोतात पृ० ४ । जैनी साधुओं को अज्ञानी मस्तामादि विशेषण इते हुए इस पैठ में लिखा है कि, चेला चेली करे चोरी तणार लगिरी जात न कुल । पुस्तक संचलाभी डाभं डार मारे । इम इमविगढ्योजग शुल ७ में पृ० ५। खुद नीच कुलो- स्पन्न होकर गुणी जनों की झूटी बदनामी करने वाला ज्ञान- सुन्दर को नालायक समझ सीमधर स्वामी ने पेड़ भी रही में डलवा दी, तब मूर्ख पर पेठ के नाम से कागज काली करने लगा कि- कागल हुंडी पैठने, केम न सीकारी नाथ । हवे पर' पैठ सीकोरलो। जोत में जगना तात । १ मे पृ० ६ समी।' इस पर पेठ में तपागच्छ के साधू और पन्यासों को परिग्रहधारों व्यभिचारी परप्राणघातक और जिनामाविराधिक लिखते J 5 . । " (४१) र उन्हों की उद्यापन, उपधान, जोगादि क्रियाओं को झूठी आई है । और उन्हों के श्रावकों को मिथ्यादृष्टि, कदाग्रही, या देव द्रव्य भक्षक लिखा है । निदान परपेठ भी पिना [हूकारी के इस नगुरे की अस्वीकार हुई । तब इस जैनधर्म परमशत्रु ने अपने कूर हाथों से जैन साधूओं की निंदारूप, झरनामा लिखा कि हुंडी पेठ खोवाई गई, परपेठ सीकारी नाथ, ते कारण मेझर लिखू । बन्दी सीकारो तात ॥५॥ म मेमर को सुनने के लिये इस अधम ने अनेक वाणियों के रसों में ढोके दी हाथ जोड़े, परन्तु किसी ने भी इस म्लेच्छ की प्रार्थना स्वीकार न की यथा-हूं पण संघने नमी करी। ह-मननी वाव । वोपण कोई न सोमले । हू जाणे जगतात । । मे० पृ०१। इस मेकर में तपागच्छ के आचायों के बारे i लिखता है कि-पाटीदार पटेशिया, कोई हो छीपा माली वाट । श्रग हीना के ही मांजरा । नहीं सोभे हो श्री पीर ने गट । ७ हाथी तणा घोडा लेई । नाखे हो खर ऊपर मूल । दिवी देवे अयोग्य ने । नहीं जुए हो जाति ने कुच १२ लायो लावो करता फरे । मज कलदार दो पेठा जपे जाप घरण स्थपाये तेहना । मूर्चि हो घरे मंदिर बीच । छपियों चत्ति राके यह मूली सापाहो करे वे नीच । १७ मे० ढा ४ पृ० १८ । पर्चमान आनंदसागरजी नेमविजयजी वनमषिजयजी विगेरे आचार्य विद्या का अभिमान तो, बहुत ही रखते हैं -- (४२." । -- परन्तु ज्ञानसुन्दर के आक्षेपों के उचा नहीं देते यह कितनी बड़ी भारी कमजोरी है । प्राचार्य श्री बुद्धीपागरसूरीजी चुटे- शायनी आत्मारामजी उपाध्याय श्री वीरविजयजी आदि तपा गच्छीय महान पुरुषों को नीच लिखना है । यह ज्ञान सुमाई की कितनी बड़ी मात्र नालायकता है। इसको मालूम नहीं कि जैन साधुओं के नीच कर्मोदय नहीं होता। कुग्विानों को सर्वथा छोड़कर जिनेन्द्र का जाप करने वाली अपवित्र जातियां भी पवित्र हो जाती है। चारों ही वर्णों की प्रजा को जैनधर्म पालने का पूर्ण अधिकार है। ऊच नीचा जैन शाखों में मनुष्यों की प्राचरण पर ही मानी गई है । शुद्धी द्वारा करकंह राजा ने हजारों भाग को बाहर किये थे। महतार्य पी भी जाति के भंगी थे जिन्होंने शुद्ध होकर गृहस्थाश्रम में महाराज श्रेणिक और बड़े २' कोटीश्वर महामनों की अनेक कन्याएं परणी थीं। चक्रवर्ती सभी जैनी राजे महाराजे अना और म्लेच्छों की हजारों कन्याओं के साथ 'लग्न करते थे और उन्हों की सभी सन्तान शुद्ध चत्रिय कहांती थी । जिनके चरणों में बड़े ब्राझग्न लोग भी अपना मस्तक रगड़ते थे, वह हरकेमीपल मुनि कुचे को भी पकाकर खाजाने वाली जाति में उत्पन्न हुए थे। जैन साधुओं से शुद्ध होकर हरीपल, माच्छी ने अनेक क्षत्रिय राज कन्याओं का 'पाणीग्रह किया था। भगवान् श्री महावीर स्वामी के १५६००० धावकों में मुख्य r याणंद नामक श्रावक शुद्र जाति में उत्पन्न हुया था। शुद्धी द्वाग.हमारे जैनाचार्यों ने सैकड़ों गामों के गांप जिन्हों में छत्तीसों ही पौन भाई जैनी चनाये थे। मूर्ख ज्ञान सुन्दर को मालूम नहीं कि मनुष्यों में जाति व्यवहार केवल कल्पनामात्र - ही है, यथा- २ 7 . . ** मनुष्याणां न रक्तस्य न मांसस्य न चाहिस्थनः प्राणम्य नात्मनो जाति, यवहाराहि कल्पितः॥ ॥ज्ञान मेवा श्रये द्विद्वान् जाति दोष विनाशयेत् जाति भेद , विनाशन, सर्व दुखि विनाशनम् ॥ २॥:- मैन साधुनों की जाति होलना करने वाला महामृषा वादी ज्ञानसुन्दर मनो कल्पना से अपने कोट पलदेपंवार के वंश में लिखता है, परन्तु जरा आंख खोल कर देखें अन्य विद्वान् क्या लिखते हैं, श्रीरतप्रभरि ने सब तरह की जातियों के मनुष्यों को अपने धर्म में कर लिये थे । जो चीराफाड़ी का काम करने वाले बैद्य नाई ओसवाल हो गये थे वे वैद्य कहाय, जाति अन्वेपण भा० १ पृ० १३५ । अगर यह पात मच तो कहना होगा कि खुद महा शुद्ध होने पर भी अन्य मुनियों की भूटी.पदनामी करने वाले ज्ञानं शुद्र का नातिमद करना गलत है ज्ञानसुन्दर माई ने जितना परिश्रम स्वपच को नष्ट करने के लिये किया है उसना ही अगर पर पच के लिये किया होता तो -
(४४)
जैन धर्म के हक में कुछ ठीक होता । परन्तु करें केसे उतना ज्ञान
'हो तपनं । मागे पागच्छी पंन्याम और संवेगीयों को लिखता
कि-जिनागम मांदी से नहीं, पंन्यामाना नाम । कदेवाय संचेगी
नामना । नहीं संवेग नोरंग ।। समिति गुप्ति जाने नहीं। सावध
निर्वद्य नहीं होय भान । दोष जाणे नहीं घाहार ना नहीं
भाषानुं ज्ञान । १ । हृष्ट पुष्ट साधु पन्या । माल खाई वएया
मस्तान । झूटा योग वहन करे । कलियुगी मांडयूं वोफान ।।
पूरामोदय साधु थया । आघांकर्मी खाई करे पुण्य नाश । पाप
पुरा उदय प्राविया । माधु होवे पछे पंन्यास-1 ८॥ यदरनो
रहस्य हवे सुणो । थई पंन्यास मांडे उपधान | माल पाणी
नाणु मिले । महीला मली करे सन्मान । १० । मे० टा० ५
पृ० २० तपागच्छ की योग विधि को झूटी ठहराते हुए भागे
ज्ञान सुंदरजी लिखते हैं कि-फल्पित छे विधि योगनी । भोला,
'पडीया मर्म । धर्म आज्ञा वीतरागनी आज्ञा बहार अधर्म।२।
मुंश योग वहन करे। आधा कर्मी -खावे पदवी काज । अगी
वाथ अभीमानिया । पदवी लेतां आवे नहीं लाज । । रुले
अनंत संसारमा । केम काहे बीजाने ताण । रामसनेही साधुना
भोजन बने घर पर तेम। कम नहीं योग वहनमा । वनडी
वठों पदोले जेम ॥ १॥ पंचखाण करे आविलदेखा।
दहीतणा करवा खाई जाय । मीठो मरों हींग जीरो दम
चीस भोजन बनवाय ॥ १५ ॥ नीवी तो जापे नामनी ।
.
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+ (४५) - : कलाकद सौरने ' ध पाक । तल्योगल्यों वपघयो । बदाम चिरंजी मेवादास ॥१६॥ पंचमवाण करें विगय तण। विगय खाप हो लागे मोटो पाप । महामोहनीय कर्म बांधता। समवायोगे हो भास्गो पाप ॥१७॥ साधषियों याचे एकही। लेने योग बहन नाम। काल विकाल गणे नहीं । कोण जाणे पंन्यासोना काम ॥ २०॥ योग करावे नहीं अन्यने । फगवां पाली को कोल । एटला पुस्तक आदि तया । रखावे पहली रोकडा मोल ॥ २६ ॥ मे० डा०६॥ प्रामाथी जिज्ञासुओं को 'तपागच्छ म तहकीकात करना चाहिए कि ज्ञानसुंदरजी का लिखना कहां तक सत्य है । यदि इसके लेखानुसार ही उन्हों का आचार विचार है, तब तो करना होगा कि, तपागच्छ की समाचाग जैनागर्मों से बिलकुल विपरीत है। आगे लिखता है कि उपधान करावना पदेला । पेसा होलेवे ज्ञान ने नाम पेढी जमाई मामलों परे। कोई कात्यो हो पैदामनो.फाम ॥२॥ आरम करावे नवा नवा । भोजन कारण हो देवे आदेश । 'माल उड़ाची करे मोजने । गांडो मिच्यो गुजरातनो देश । ५१ नाम लेवे नीवी सखो। आहार तेहनों जाणों जगमाण । दाम तलो इनवो न । घारी हो कलाकंद पिच्छार्थ । ७ वादा चरफी रणे । दुध पाक हो नहीं रहे दर देयरी ने घडला वणे । जुदा जुदा शार्क हो' हाहा भरपूर । ८, हरदी भरी भर पात माधुनी हो उड़ावे मान | धना पुन बागिया। . HE ।
ए: दश दीया।
.
.
(५४६ ),
पंन्याम हो विच्छावी जाल | अमुक
बाई
तुचो मोटा पानी येन । सौ के सो आपसो ।-धीरे धीरे हो.
हो बोले मधुरा चेण ॥ ११॥-राडी मंडो ठगवा भणी । भला
जाग्या हो, धोले दिन चोर । ज्ञान नामे धन भेलो करे । पापो
देय, हो-पड़े चोर में मौर ॥ १२॥ मेझरना० दा०.७ पृ०, २५॥
इस पुस्तक में ज्ञानसुंदरजी ने तपागच्छ के वर्तमान मंघ, की
खूब ही पोल खोली है । किसी विद्वान् मुनि ने श्राज दिन तक
कुछ भी उचर नहीं दिया। इसीसे पाया जाता है कि-भवश्य
कुछ दाल में काला है । खेद है उन महानुभावों की बुद्धी पर
जो कि अतिशय शुद्ध खरतर समाचारी को तो-छोड़ते हैं। और
उन्मार्गीयों की कल्पित समाचारी का पक्षपाती बन अपनी
शुद्ध गुरु परंपरा व जैनधर्म से पतिल होते जाते हैं। जैन समाज
में एक खरतर गच्छ की ही समाचारी जैन सूत्रानुकूल और
. सतिशय शुद्ध है कि, जिसको दोषित बताकर, कोई नहीं काट
सकता । इस गच्छ में योग, बहम करने वाले मुनि को, फक्त
उपवास, प्राचाम्ल, और निर्वि कृति (नीवी ) नामक तप
करना होता है-1-प्रायचिल तप में सिर्फ एक जाति का रुक्ष
धान्य और उप्णोदक, इन २ द्रज्यों के सिवाय.तीसरी कोई
चीज नहीं खाई जाती । नीवी में ५ विगय और ज्ञानसुदर
लिखित सब चीजों की कौन कहें, यंत्र
द्वारा
जिसमें से कुछ
चिकटास निकलती हों, वह-चीज भी नहीं खाई बाती..शान
।
1
(४७)
सुदरं का मेझर, तपाच्छ के ही साधुनों पर लागू पड़ता है।
कारण-पंन्यास पद अन्य गच्छ में नहीं, और गुजरात में प्राय
उन्हीं का प्रचार है । उन्हीं के लिये आगे झानसुदरजी लिखते,
हैकि-मोल तथा चेला करे । देवराव ने राकदा दाम। माल
साये मस्तानिया । अनाचार से ठामी ठाम | 8 | मेज० दास
धिकार • ज्ञा० तपागच्छ के सभी माधुओं को व्यभिचारी
समझता है । आगे तपागच्छ के साधुयों को बिलकुल नही।
पताते हुए ज्ञानसुंदरजी लिखते हैं कि-पहने प्रहारे चायनी ।।
बीजे पहोरे उड़ावे माल । बीजो पड़ोर निद्रा लखो। चौथ
पहारें चली चोखाने दाल । २७11 मे ढा० । साबू लेपो
कल्पे नहीं ? नहीं 'कल्प हो •मोढ़ा माजी खार शाशन थी।
श्रद्धा उच!'दुर्लम वोधी अनन्त संसार ! १६ । गृहस्थनों
मोटो घर हुवे । तो' साँवु लाव से पांच । मोटा साधु चौमामो
करें । सायं लावे मय पांच १०॥ दृढक बापने मातगमवेगी
पड्या सायुः लार यापम में निंदा करे । केनों कहूं सुद्धाचार ।
२३ । ढा ११ । हमने तपागच्छ के केही ग २ साप् और
आचार्यों को देखा परन्तु पांच : मण साचुन किमा क. पाम
नहीं देखा गया। महामृषावादी झानसुन्दर को असत्य लिखते
लला न आई । 'झूठ की भी कुछ इद होती हैं । साधु सोडा
मांजोदशी निंजीव वस्तु है । जीपदया. निमित मलीमा वस
को श्रेदलनार्थ गृहस्थ के घर से बैन साधु जरुरत होने पर
-
(५०) - निर्वाण पाठमां। देवी पासे मागे निर्वाण । भरतक्षत्र ना लोकनी । दशा बगड़ी हो नहीं रह्यो ज्ञान | ७ अजितशातिना अतमां । गाथा मिलावी सात, । उदेपुरमा लघुशांतिने । सुरु- करी नहीं छानु नाथ १५ नानु प्रतिक्रमणे गुपचुप करे । मोटो करे परिखदा बीच । अग्नि मां छुपे नहीं । मायाचारी 'ज्ञान को नीच । १६ ॥ वंदितु सूत्र मिद्ध दंड के । जयवीयगय गाथा दीथी मेल | न्यूनाधिक मिथ्यात्वछे । शुं लिखु श्रामरतनाखल । १७ । मन कल्पित आचरण करी । लखी पांताने हाथ । ते आज्ञामध्ये केम हुए । कोने कहू माहरा करानाथ ।। २६ में ढा? २२ ॥ एक दूसरे की ममाचारी को कल्पित और झूठी कह कर आपस में विरोध बढ़ाने वाले अदुरदृष्टि ज्ञानसुन्दर जैसे मूर्ख नेताओं ने ही मत्य जैन धर्म को रसातल में पहुचाया है। जो धर्म सब धर्मों का राजा था, प्राणी मात्र ' जिसको सीकार करने में अपना अहोभाग्य समझते थे. आज वही पवित्र जैनधर्म पददलित हो रहा ह । कहीं इन्हों पर टैक्स लगता है । कहीं इन्हों का तीर्थ खोसा जाता है । कहीं इन्हों की मूर्तिया छीनी जाती हैं। कहीं इन्हों का बहिष्कार होता है । इन सबका अगर मूल कारण देखा जाय तो श्रापस की फूट के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । मूर्ख ज्ञानसुन्दर को मालूम नहीं कि-मूल बातों को छोड कर जैन शास्त्रों में जमाने के अनुसार विशेष क्रियाओं में फेरफार होता रहता है । हमारे - । -- जैनाचार्यों को असतियार है कि समयानुसार वे जैन शास्त्रों में घटा बढ़ी कर म । सर्वधर्मानुकूल आधुनिक जैनाचार्यों के चचन मी प्रमाण कोटी में दाखिल होकर जैनी मात्र को परम मान्य हैं और ज्ञानसुन्दर के ममान विरोध बढाने वाले वचन चाह १४ पूर्वघर के भी क्यों न हों, मनुष्य मात्र को अमान्य है । आगे तरागच्छ के सभी साधुओं को पाचों ही महाव्रतों से सारिज सापित करते हुए ज्ञानसुन्दरजी लिखते हैं कि- माधू कारण तंबू रहै। तय कारणे गाडीने ऊठ । जीन- हणाने छै कायना । पूछे थी बली चोले झूठ १३ अाज्ञाचौरी वीतरागनी। महिला साथे भागे शीलनी बाड । ममता तो खूल्ली दीमे। पाचमों व्रत इम दीधो तोड। १४ मे ढा.२३ अधिकार अपने भाइयों को बर्मभ्रष्ट बताकर मुर्ख ज्ञानमुन्दर सधर्मान्नति का प्रयत्न कैस करता है, मानो कोई पक्षी अपनी पाखों को तोडकरअस्मान में उहना चाहता हो। वर्तमान तपा जैन शास्त्रों में चाहे लाख दर्जे भी पतित है, लेकिन उन्हों को सर्वथा रद्दी कर अपनी उन्नति कोई गच्छ नहीं पा सकता भागेसमस्त जैनियों को-संध-निकालना-तीर्थयात्रा देवगुरु दर्शन आदि धार्मिक क्रियायों को उत्थापते हुए ज्ञा० लिखते हैं कि-गुरु गौतम करी जातरा । अष्टापदे एकज्ञा प्राप। ते वखते सघ नहीं कह्यो। पामत्याए पाछल दीधो स्थाप ॥२१॥ कई तो धनना लोभिया । केई जुनो पुत्र ने काज । केई रोगादी काढेवा । यात्रा करवा मले समाज'॥ २४ ॥ वर्षिक - - (५२) ठगे वधा जगत ने । नहीं मुके वीतराग दश । जैनी संघ कढायता । ढूंढक जीव वदन काज । तेरापंथी जावे पूज सने। आडवरथी इम बगड़ी समाज ।। ३३ ॥ यात्रा कारण जनम ले, नहीं जैन धर्म नो रंग । जो यात्रा तारक कहे । दूरे मुक्यो संवेगानो संग ॥ ३५॥ में ढा० ॥ २३ ॥ ममत्वना मंदिर वन्या । अबदनीक अगम कहें श्राप । श्रवदनी कनें बांदतां । आज्ञा मांगे लागे माटो पाप ॥१॥म ढा० २४ अफसोस २ म्लचे ज्ञानसुन्दर ने जैन धर्म की जड़पर यहभारी कुठारा पात किया है । इस नुगरे को जैन शास्त्रों में अभी तक नहीं दीखा कि गौतमस्वामी से भी कोडों वर्ष पहले भरतादिकोने अनेक संघ निकाले है । इह लोग के स्वार्थ के लिये कोई जैनी तीर्थयात्रा नहीं करते । फक्त मुक्ति के लिये ही करते हैं। अगर कोई मद्रीक मनुष्य इस लोक के सुसार्थ अन्य मिथ्यात्तियों के तीथों में न भटक कर जिनेन्द्र भगवान की कल्याण भूमि स्पर्श की और वहां रह कर अपना दुख मिटाने के लिये दर्शन, पूजन, धर्म, नियम. दान, पून्य करे तो उसमें कोई भी प्रकार का दोष नहीं है । उसमें लोकोत्तर मित्थ्यात्त कहने चाला ज्ञानसुन्दर खुद महामिथ्यादृष्टी है । लोकोत्तर मिथ्यात्त होता है अन्यतीर्थी परिगृहीत जिन चैत्यो का चंदन पूजन करने पर भक्तिमान श्रद्धालू जन बड़े आडंबर से अपने २ गुरुओं को चंदन करने के लिये प्रतिवर्ष जाते है और - । ।
. 4 धिग् जातीय ज्ञानसुन्दर को व्यभिचारी समझ के कोई नहीं पाता । यस इमी कारण से इसने ३३ वी कडी गाई है। चर्चमान समय के जैन मंदिरों को अवंदनीक लिए कर ज्ञा० महा मूढता जाहिर की है । अवंदनीक मंदिर वह माना गया है कि चारिख छोड़ कर किसी साधु ने अपनी आजिविका निमित्त बनाया हो । आगे २२ समुदाय वालों को लिखता है कि, दिन भर मोढों बालों । कुलिंग हो लागे मिथ्यात्व भता भक्ष टाले नहीं। नहीं टाले कोई कुन ने जात ॥ १३ ॥ मुनो सुतक गिणे नहीं । न गिण नारी ऋतुध । लोक विरुद्ध आचरण करे । केही करे छाना कुकर्म ॥ २७॥ मोटा दोष साधु सेवता । गुर चूप घर माहे ढाक । लेणा-देणा समाचारनी गृहस्था नाम चलावे डाक ।। २८ । पूज पूज पग- घर । गापमां नीची राखे दृष्ट । विहार कर दश कोसनी मायाचारी ज्ञान को भ्रए २६ मे ढा. २५॥ । आगे तेरहपंथी भाइयों के वास्ते लिखता है कि-प्रतिमा ने पत्थर क । वीर प्रभू गया चूक । पाप कहे दया दानमा । अमानी वेबकूफ । २ । पंथी साधु ने फासी देवे । पणियाँ थी सेवे अत्याचार चलती गायों एत्रिणे ने । बचायता कहें पाप अपार ५ पंथी साधू छोडिने । कोई देवे चीजा न दान । ड्रव्ये कहे ससारमा । जुत्रोदुष्टों नों अज्ञान 1७। सतियों लावे . ।
(५४ ) गोचरी | जिमाडे गृहस्थी-परें साध । भक्षा भक्ष गिणे नहीं। पुदगला नंदी पडीया जीभने-स्वाद । १४ पडदे बैठा पूजजी । साध्वीयों रहे पडदा पाच । भोजन ना नवी जातना । अधारे करे मांखों मीच । १६ शुं लखू कर्म विटंबना । शु लखू पंथ- णियों का काम | दुराचार बध्यो घणों । नहीं छानों जाणे आत्मराम ॥ १६ ।। खसोटी करेनरूपणा निहद या आगम पाद । लिंगपण जूदो जैन थी । नहीं गृहस्थी नहीं साध । १९ ।। मे० ढा० २६ ॥ पाठक देखिये ज्ञानसुन्दर भाई का जैनी मात्र पर कितना बड़ा भारी द्वेप है इसको मालूम नहीं कि-जमाना संगठन का है । इंढिये तेरहपंथी भाई चाहे अपनी भूल से वीतराग भग- धान की मूर्ति को पत्थर कहें । दोष से। तो भी उन्हों का बाय- काट करके हम जैनधर्म की उन्नति कभी नहीं कर सकते । अपेक्षा कृत भेदों से सब ही मत सत्य है । जैनियों में यदि परस्पर आपस का विरोध न होता, निस्संदेह आज की परस्पर सुधरी हुई सभी प्रजा जैन हो जाती। एक दूसरे की बदनामी करने वाले अपारदर्शी मूर्ख वणियों ने ही चत्रियों चित सर्वोत्कृष्ट सात्विक जैन धर्म का भीषण हाम किया है। आज जब कि संसार की मब जातियों उन्नति कर रही है और साथ ही उनकी जन संख्या भी बड़ी तेजी के साथ बढ़ रही है। वहा हमारे जैनियों का भीपण पतन हो रहा है। पहले जैनममाज एक झण्डे के नीचे और सारे भारतवर्ष में फैला हुआ था। होते २ एक पंथ में दो विभाग हुए, श्वेताम्बर और दिगम्बर । भद्रबाहू से बहुत वर्षों तक ये दो विभाग रहे । जब एक चीज के दो टुकडे हो जाते हैं, तब ही से 'यह वस्तु कार होने लगती है। जब हमारी जैन समाज के दो विभाग हो गये, तो इनमें विरोध की निशानी, मैं और तू, चलने लगी। १ श्व० कहते थे हम सच्चे है २ दि० कहते थे हम । वास्तव में दोनों सच्चे थे । इस प्रकार विरोध चढ़ने पर, यदि एक संग- दाय पर कोई आपत्ति आ पड़ती थीं तो दूसरा कह देता था कि, उनपर हैं, हम पर नहीं। जब एक थे तो किसी अन्य धर्म वाले का साहस नहीं होता था कि हम पर हाथ डाले ।' पर जर आपस में ही विरोध हो गया तो, अन्य धर्म वाले जैनों को दबाने लगे। बहुत से जैनी दूसरे धर्मों में चले गये । ज्ञानसुन्दर भाई आचार्य बुद्धीसागरसूरी कृत, जैनधर्मनी प्राचीन अने अर्वाचीन स्थिति, नामक पुस्तक मंगाकर अच्छी तरह से देखें । जब तक दो ही विभाग थे तप तक भी खर थी लेकिन दो से चार और चार से छः याने विभाग में से भी विभाग होते ही गये और विरोध की निशानी बढ़ती ही गयी। जब तक दो ही विभाग थे तब तक जैनों की इतनी संख्या न घटी थी जितनी स्थानकवासी तेरापंथी आदि विभाग में विभाग हो जाने से घट रही है।
। उस समय जैनमत को मानने वाला सारा भारतवर्ष था: वहां आज केवल ११ लाख के करीब जैनी रह गये हैं। इतना भीपण हास आज तक किसी जाति को नहीं हुभी होगा, गत तीन सौ वर्षों में तो बहुत ही संख्या घटी है । अकबर के जमाने हमारे धर्म वालों की सं० ॥ करोड़ थीभाज ११॥ लाख है शाकमहाशोक इन हालतों से तोयही प्रगट होता है कि जैनियों का अब अंत होने को है । क्योंकि न विरोध और झगड़े कम 'करके जैन, जाति एक होगी और न इसका अत रुकेगा । जो वीतराग,धर्म था वह आज रागद्वेप का घर हो रहा है। विध- मियों को जैन बनाने में ही जिस शक्ति को पूर्ण तौर से लगाना चाहिये था । आज वही समस्त शक्ति दूसरे फिरके को सर्वथा नष्ट कर देने में लगाई जाती है। वारंवार इन सुधरे हुए जमानों का नाम ले ले कर ज्ञान- सुन्दर भाई कागले के समान का क्रां पुकारता है । लेकिन मैं 'कहता हूं कि उसको वर्चमान जमाने की गंध भी मालूम नहीं है। अगर उसको समय का ज्ञान होता तो न वह पद- नामी लेता और न कभी अपने भाइयों का पड़दा उधारता । सुधार तभी संभव है जब कि सुधार का बीड़ा चवाने वाला कुछ करके दिखांचे । खुद विपयं सेवन करते भी ज्ञानसुन्दर अपने को पार्श्वनाथ स्वामी की परम्परा में शुद्ध साधू,मान कर पुजाता है । और महावीर की परपरा गत सब ही जैन फिरकों - के लिये लिखता है कि-पासत्था कुदर्शनी, कलिंगी भ्रष्टाचार गुरु जाणी वंदन करै । रुलै अनत संसार । १ । में० पृ० ८७। द्वा० २८ भाग वर्तमान जैन श्रापकों के लिये भी लिखते हैं कि-जेनी दशा माधुओं तणी । तेपी श्रावकोंनी जाण । मैला हृदय माया घणी मघमा माडी खचाताण ।३। मक्षामक्ष आगेगता । होटलों में पीवे चाहने ध । आचार इत्यो जैन नो । मोह छाक्या नहीं रही शुद्ध । ६ । मोढुं देखी टीलू करें। जठी साची करे आपणी स्थाप । पक्ष करे पासत्थातणो । देवे शीथिलने साहाज । । । स्वामीवात्सल्य नामथी माल पिणी उडावे खुर । स्नान करे मागों पीवे । चौथो व्रत मांग घेवकूफ । ११ रोमनी करे रातना, मंदिर मालेवे भनिनु नाम । अणगिणता त्रसजीवना । प्राण जाये जु श्रोवणी कोंना काम में ढा० २६ आदि इस मेझर की अनेक ढालों में और दुहों में इस जमाने के समस्त जैन गृहस्यों को भी ज्ञानसुन्दरजी धर्मभ्रए बताते हैं। पाणंदजी कल्याणजी आदि पड़ी २ संस्थाओं की पोल खोला गई है । परन्तु एक सस्था का दोष सब ही संघ पर मढ़ दिया, यह ज्ञा० की नालायकता है । । जिन गृहस्थों की रोटी खाता है और उन्हीं की बदनामी गाता 1 है यह ज्ञा. निमकहरामी पण नहीं तो और क्या है। हमारी क्षत्रिय जाति को कोटिश धन्यवाद देना चाहिये कि । एक बार जिसकी रोटी खाली तो उसके लिये अपना प्राथ । १ - (५८) तक देने को सदो तैयार रहते हैं। अस्तु मी मंधर स्वामी ने इस नमकहरामी के प्रलाप रूप मेझर को भी नामंजूर फर्मा कर भगी'की टोकरी में दया पलवा दी और इसका योग्य उत्तर देने के लिये शासनदेव की ओर इसारा किया। शासन देव ने एक संदेश जैन श्रेयस्कर मंडल के हृदय में और एक लेख जैम पत्र में दिया । उन्हों का सार येही था' कि-तुम कौन हो। जैन दीक्षा किस गुरु के पास 'ली । 'तुम्हारा ज्ञान- मुन्दर नाम किसने दिया, जैन परम्परागत - अपने गुरु का नाम बतानी । चिनी गुरु के तस्करों की हुंडी आदि स्वीकारी नहीं जा सकती। यह पढ़ कर ज्ञानसुन्दर निराशे हुआ और मंडल को अपना सत्य परिचय इस प्रकार लिखा- काल अनंती हूँ मम्यो'। भव मण्डल ना बीच । मुझ सरीखो पापी नहीं । नींच नीच थी नाच । २'| चाल अना- दीनि मुझवणी । लव संक्षेपे बात । बालपणो खोयो खेलींन । तरुण वयं घणां विषय कपाय । शुलखू कर्म विटंबना । झूठी ही कोई जाल रचाय। ७ । जीव हिंसा झूठी बोलू हू । चौरी थी लीधी परमाल । रमणी रूपै. मोहियो । परिग्रह लेगा उर्जमाल । ८ । क्रोधादिक मिथ्यात्वनी । संव्या दारे पार्ष। कर्मादान न छोडियो चनी बैठी हुँ. पापनों चापं ।। ९ ॥ दुःख गर्मित वराग थी। घर छोड्यो पण नहीं छोड्यो स्थान कवासी में मैं दीक्षा लोधी । पूज श्रीलालजी नाम 1200 -- ह काम
--
२
(-५६)
दीक्षाले पूज्य थी । केर्ड वाच्या अगोपांग, । विरुधर स्तो
जाणीने । छोड्यो दृढक मंग ॥३१॥दर्शन अराधे वाण
विराधना वाण प्राराधे दर्शन विराधक होय, त्रीज़ो बन्न
आराधता चौथी भागो बन्न विराधक जोय:। हमणा महरा-
जेवा पालमा भागा चौधो पीछाण ॥२५|| चोर ,करे चौरियों
राजा पासेज बोले सांच मे० ढा० ३० ॥ धिक्कार २ पांच
आश्रय,और १८ पापों को मेवन करने पर भी हमारे कतिपय
मूर्ख जैनी माई ज्ञानसुन्दर को अपना गुरु मानते हैं, और
प्रातः स्मरणीय तथा पूज्यपाद श्रादि विशेषण देकर जैनधर्म
की हॉमी कराते हैं । इसमें ज्ञानसुन्दर -का कोई कसूर
नहीं, फक्त हमारे मारवाड़ी गाइयों की ही मूर्खता है। यदि
येही अनान दशा रही तो कोई दिन माड और यहुरुपीये भी
जैन साधू तरीके पूजे जायेंगे। ब्रानसुदर ने भी समझ लिया कि-
फलोदी में अब मेरी पोल न सुलेगी । जशवंतसराय में
पड़दा बंधपा कर व्यभिचार का अड्डा जमाया और मेकर
नामे का प्रचारबंध करके औरतो से प्रेमा प्रचार शुरू
सब से पहिली तो फूम चुहारने के बहाने पिछली रात को एक
सेवगण -थाने लगी । होते. १.प्रमोदधी नामका विदमी
साध्वी पर मी ज्ञानसुन्दर का मन ललचाया। अपनी विषय
चासना तृप्त करने के लिये यह महापापी उस विचारी साध्वी
को शास्त्रों की बातें शिखाने के नाम से बुला-२ कर हँसी
-
किया।
(६०)
-
उहा करने लगा, और प्रेम का भरणा शीर्षक निरलज्ज पर
लिख कर दिया। जो कि-धी यु-प्रे-क-टंकशाल-श्रहमदाबाद में
जैन कुल कलंक ज्ञानसुन्दर ( गयवरचद ) के भ्रष्टाचारों का
नमूना नाम से लामचद मंत्री जन समस्त श्री संघ समा
फलोदी ने छपवा कर प्रकाशित किया है।
निर्लज्ज शब्दों से भरा हुआ इम म्लेच्छ का भ्रष्ट पत्र
को अपनी पवित्र पुस्तक में लेना मैं नहीं चाहता था तथापि
श्रावकों के अनुरोध से इस धर्मघातक का लिखा हुआ प्रेम
का झरणा नामक असम्य लेख ज्यों का त्यों यहां दिखाया
जाता है यथा-
प्रेम का झरना।
क्या आपके वहा कुछ बातें हुई है जैवत श्रीजी
क्या साध्वी के अभाव से आया था, या आपके
लिये पहरादार । हे सुन्दर स्तनों के विभूषित हृदयवाली
आपके चंद्र विकाशित बदन और कोमल कपोल पर दमकती
कामदेव की छटा और नेत्रों के चाण से मेरे हृदय को भेद
दिया है। कामदेव मुझे इस कदर का सताता है कि- जिससे
न खाना न निद्रा न ध्यान न परमेश्वर अर्थात् बेहोस होगया
हूं । हे प्राणेश्वरी । क्या प्रीति की रीति ऐसी ही होती है कि-
प्यासे को महार्णव दिखला के एक बूंद तक भी नहीं पिलानां ।
।
,
8
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--
.
क्या आपके लिये यह बात उचित है । हे मृगनयनी ! मैने
बहुत सी पुरुषामिलामिाणयों को देखी है, और उन्हों का अन्तः
करण भी खरीद कर लिया था । परन्तु मेरी तरफ से एक
बंद ता क्या हस्तस्पर्शन का दान नहीं दिया था । परन्तु है
करनाग के दोनों टीमों को धारण करने वाली । तेरी
विद्वत्ता, चातुर्यता. मौदर्यता, और इशारे मात्र में सपूर्ण ज्ञान
को धारण करना इन्यादि गुणों मे मुग्ध हो के मेरा अन्तः
करण मैंने तेरे श्यामपन के मनोहर मन्दिर में ममपंगा किया है।
अगर भापके दिल में कुछ रहमता होतो 'मेरे दर की
प्रतिष्ठ।' आपके उन्हीं श्यामवन के मन्दिर में करादो' । और
जमक, शमक, दोनों वन के पहाड़ों की यात्रा उदारवा से प्रेम
पूर्वक करादो और बदले में भाप भी हमारे "शिवनरायण',
को स्पर्श कर अपने कर कमलों को पवित्र बना लो।
आपका प्रेम र प्रतिदिन बढ़ताही जाता है । एक
चम मात्र भी अलग रहना नहीं चाहता है । अगर
तुम लोग इसको ऐमा ही छोड़ जाओगी तो, हमारे हृदय में
सहस्र नन मे भी अधिक, दावानल लग जायेगा और एक
प्रेमी की हत्या कादीप तेरे शिर पर रहेगा। क्या प्राण प्यारा!
मेरे को इना.दुःख होता है तो तेरे को इससे अधिक न होता
होगा ? नहीं नहीं नहीं अवश्य होता ही होगा । हे मधूर
मापिणी । कोकिल के सदृश्य तेरा सुस्वर कठ से मेरे हृदय में
"
(६२)
वेर वेर दावानल उत्पन्न - होता है । यातो मेरी इस
इच्छा को पूर्ण कर दो या आपका यह पाला जोवन
और कोमल कपोल, सुन्दर नेत्रों को बूंघट में छिपालो।
क्यों मेरे को तरसा रही हो ? क्या तेरे हृदय में दया, नहींई,
तेरा शैतान जोवन से तृप्त करादो । अपना प्रेम का वार्तालाप
थोकड़ो के नाम से करते रहना । माने जाने के लिये एक टेम
ऐसी निकालो कि-कोई लड़की को साथ में लेके सुबह या
शाम को कोई दवाई का कारण पाके प्राओ । इस पत्र का
उत्तर यहा पर ही थोकड़ा अल्पा बहुत के नाम से सूत्र का
पाना देखते जाओ और मनमानी वहार करते नाओ । खूब
खुल्ले दिल से-प्रेम युक्त पत्र लिखो। जहा तक संयोगःन मिले,
यहां तक, पत्र द्वारा ही दिल को सतोप करेंगे । विद्वानों का
प्रेम चित्त को 'आनन्द-के लिये ही होता है। खास ध्यान में
रक्खो कि अगर एक दफे खुल्ले दिल से वार्तालाप वगेर
ही चले गये तो, मेरे-को पड़ा भारी दुःख होगा । देखिये प्यारी
पूर्व-का कैमा संस्कार है, कि प्रीति से मुझे कितना अनुराग
हुना
है ? अब आपका दिल कैमा है, वह आपके कर कमलों
से लिखाकोमुझे देदो, तब ही मेरे जीवाको तसल्ली आयेगी।
यह पत्र भी पढ़ के एक सूत्राके पत्र में देखो 1. पाठ पूछने का
कारण से मुझे देदो, ताके फाड़ के काम लगादें। दो दिन में
दो पत्र लिख के फाइ-दिया हैं । श्रगर आप वहां से पन्ने लिख
.
--
।
, . के लाओ तो, बड़े ही जायते के साथ लाना। क्योंकि कहीं पर गिर न जाये। मैंने बहुत सी स्त्रियां दोनों प्रस्थाओं में देखी है । परन्तु आपका प्रेम और चातुर्य कुछ और ही बजे का है । अर्थात् इसरियों में यह सद्गुण देखने में नहीं आया है। आपकी मैं कहां तक तारीफ लिखू । पत्र जल्दी लिखो। अगर रजिस्टर में थोकड़ों के नाम से पत्र लिखोगी, तो भी मैं वह कागद, काटलूंगा खुशी मे लिखो। धिक्कार ३ हमारे पाठकों को अब वो निस्सदेह मालूम होगा होगा कि-ज्ञानसुन्दर जाति का हिन्दू नहीं है । अगर यह शोसवाल वेद का अश होता तो अपनी भाणजी साध्वी को ऐसा अधम आमत्रण कभी न लिखता । साधू की कौन, कहें,पापी से पापी गृहस्थ भी ऐसा निरलज पत्र लिख कर किसी औरत को नहीं दे सकता। ज्ञानसुन्दर जैसे धर्म विघातक अनार्य वंशधरी ने ही हमारे जैन धर्म का महत्व घटाया है । एक जैन ही क्या किसी भी धर्म का महत्व उसके सपादकों, संचालको, और सदस्यों पर होता है । जिस समाज के नेता, जितने ही अधिक विवेकशील, सहिष्णु, त्यागी, धर्मभीरू, तथा समाज के हित के लिये मर मिटने वाले होंगे। वह समाज उतनी ही अधिक आदर्श और उन्नत होगी । क्योंकि व्यक्तियों से ही समष्टी का अनुमान लगाया जाता है । पट लोई का एक चांपल देख कर ही उसके पकने न पकने का निश्चय किया जाता है।
-
(६६)
छोटी के आधीन है । निदान जैसलमेर से मेरा भी पाना
फलोदी हुआ और ज्ञानसुन्दर के सर्व अत्याचारों की हकीकत
कह दीपचन्दजी गुलेच्छा ने प्रेम का भरणा लाकर मुझ का
दिया । चिरपरिचित्त होने के कारण ज्ञानसुन्दर के हस्ताक्षर
मैने अच्छी तरह से पहिचान लिये, और एक पत्र लिखकर एक
यती द्वारा इनला दी, तब उसी दम आकर ज्ञानसुन्दर मेरे पैरों
में पड़ा, और हाथ जोड कर गिहगड़ाता हुआ बोला कि-
चापजी अब मेरा जीना आपके हाथ है । अगर आप मेरा यह
पाप प्रगट कर दोगे तो निश्चय मैं जहर खा कर मर ही
जाऊगा । मैने कहा साधु के वेश में रह कर तुमने यह बड़ा
भारी जुल्म किया है, इतने दिन तो फक्त लोगों के मुख मे
ही तुम्हारे व्यभिचारों की बातें सुनता था, अब मैंने नेत्रों से
देख लिया है । तुम मेरे भक्त हो इसीलिये अब मैं तुम्हारे हित
के लिये कहता हूं कि-या तो तुम किसी विद्वान् साधू के
पास जाकर चिंधी से दीक्षा लो या साधू का बाना छोड
अपनी योग्यतानुसार धर्माराधन करो, अन्यथा तुम्हार हक में
अच्छा न होगा, इत्यादि हकीगत पहुत विस्तार से फिर कभी
लिखूगा।
निदान पाप का घड़ा फूटा और फलोदी के समस्त श्री
संघनपूर्ण तहकीकात के बाद इसको धर्मभ्रष्ट जानकर जैन श्री
संघ से बाहर निकाला । फलोदी समस्त श्री संघ की तरफ से
-
(३७) . . ज्ञानसुन्दर के बहिष्कार की घोपणा-जो लाभचन्द मत्री बैन समस्त श्री मंघ सभा फलोदी से छप कर प्रगट हुई थी ! उसमें लिखा है कि-सकल जैनसमाज को विदित हो कि ज्ञानसुदर नाम मात्र का जैन वेषधारी साधु है जो श्रद्धा भौर चारित्र इन दोनो से पतित ठहर चुका है। इसलिये फलोदी का समस्त श्री मंघ, ज्ञानसुन्दर के बहिस्कार की घोषणा के उदराव को मंजूर करता है । और प्राशा रखता है कि- भारतवर्षी समस्त जैनसमाज इस ठहराव को समर्थन करके श्री जैन शासन के हित में सहायक होंगे। हस्ताक्षर-छोगमल गुलेच्छा, छोगमल कोचर, चपालाल चैद. जेठमल ढढा, लिछमीलाल नीमाणी, अगरचद लूणावत, भासकरण पछावत, केवलपद लुगीया, मेघराज ललवाणी, जीवणचन्द, चराडया, सुगनमल डाकलिया। युद्धमल नहार, वगतावरमल कोठारी, गमीरमल पारस, घेवरचन्द बांठियां, सुरजमल डेगचा, सिवलाल चूरड, नथमल गोधरा , नेमीचद, छजलाणी, जोग- राज सराफ, अखयराज लोढा, दीपचन्द मांगी, अनराज बोहग। ममीरमल काऊरिया । शिवललाल गु० सूरजमल गु०। दीपचंद गु० चुनीलाल गु० । मनसुखदास गु० । प्रतापचंद गु. सुजाणमल गु० पन्नालाल चैद सिमरथमल गु० सुजाणमल गु २ जडावचंद द. लक्ष्मीचंद ढढा अमरचंद ढ मीसरीलाल ढ सुगनमल गु. केमरीचद गु. दीपचंद मु. २ हीरालात गु. . क . . m- ।
(६८) न 7 किसनलाल गु सोभागमल गु. भासणचद गुं. मोहनलाल नीमा रेखचंद नी. लछमीलाल लूणा आसकरण गु० राजमल गु. माणकचंद गु. लीछमीलाल गु० सुगनमल गु० २ धेवरचंद गु. राजमल गु २ मूणलाल गु० जोगराज गुरु भैरुदान गु० रोणुलाल गु० सोमागमल गु. २ घेवरचंद कोठा सोभागमल गु. ३ समीरमल वैदा कल्याणमल वै. चादमल वे उदेराज पार. सवमल पा. मोनराज गु. जोगराज गु. २ 'हिरालाल गु.- २ सेंसमल गु. मीसरीलाल गु. किमनलाल गु. पाबूदान गु० अगरचंद० गु० लिखमीचंद गु० सपतलाल गु. जोगराज गु. ३ संपतलाल गु २ नेमीचद गु, सुखलाल गु० धनराज गु. कुंवरलाल गु० अगरचंद्र गु० अगरचद गु० शिवदानमल गु० नेमीचंद गु० २ रतनलाल गु० दोलतमल नाहर | गुजावचंद गु० प्राइदान गु० नेमीचन्द गूलेच्छा चम्पालाल गु० अखराम गु० नथमला वै• रतनचद गु० कन कमल गु० राजमल ३ चंपालाल गु० तेजकरण काठा० लामनंद कोठा पेमचंद ढ० मोहनलाल ढा० मिमरथमल गु० २ केसरचंद, गु० रोणुन्ताल गु० २ अमरचंद गु० संपतलाल सरा मीसरीलाल गु. २ शंकरलाल गु. समीरलाल गु० लूणकरण संकरलाल गु. नेमीचंद गु० ४प्रेम गु. लीछमीलाल गु० २ कुवर- लालगु. दीपचंद गु० २ श्रासकरण गु० २ कुवरलाल नीमा. लाभचंद नीमा० मगरलाल नीमा० घेतरचन्द गुलेला रंथासकरण गुलछा मनालाल गु० राजमल गु० ४ मूलचद गु. लाभचद वैद जेठमल वेद मगनमल गु. नेमीचंद गु. घेपरचद ५ गु० मौणकलाल गु. मीठुलाल गु० कुवरलाल गु. फूलचंद बृरड । नेमीच० गु-घेवरच गु. ४ मोनरागु० पानमेल गु० मदनसिंह ढढा गुलाश्चद गु० तेजराज गु० दलीचद वैद्य छगनलाल मुत्ता पानम० गु० सुगनमल कोचर । आदि करी २०० मुखिया२ श्रावकों केद. हैं इस घोपणा में फलोदी मे व्यभि- चार का अड्डा टूटने पर ज्ञानसूदर के सब अधे भक्त निराश होगय क्योंकि रत्नप्रभाकर ज्ञान पुष्पमाला की रकम से ही वे लोग गुलच्छरै उड़ाते थे, अब उन्हों के सूत्रधार की पोल खुल जाने से उन्हों की शिकार मारी गई । निदान ५-७ गुंडों ने मिलकर फलोदी श्रीमघ के नाम मे एक अभिनन्दन पत्र तैयाफिया और ज्ञानसुन्दर के पास आकर बोले कि महाराज श्राप न घबराहये हम हर तरह से श्राप की मदद में तैयार है आपके तीन चौमासे में हम को बहुत लाभ हुआ है । लो यह हम सार्टिफिकेट देते है कि आप पक्के ब्रह्मचारी और पूज्यपाद प्रातः स्मरणीय है सोजत से हम वकील बुलाते हैं चाहे ज्ञानपुष्प माला की सारी- रकम जैन पत्र के योफिस में चली जोयो, मगर आप की महिमा हम नहीं घटने देंगे। फिर क्या था, दुम दबा कर भागते हुए कुत्ते को मानो दीवार की प्रोट मिल गई । समुद्र में डूबता हुआ मनुष्य जमे फैन पकड कर बाहर निकलना चाहता है से ही श्रीमंघको .
झूठा कह कर महामृपावादी ज्ञान सुन्दर साध्वी की भी झूठी
बदनामी उडाता हुआ अपने को निर्दोष बताने की चेष्टा कर
ने लगा, निदान सफा झूठा होकर यह. भ्रष्टाचारी फलोदी
से निकल भागा और लोहावट में जाकर फिर व्यभिचार
सेवन करने लगा । घेवरचन्द के भ्रष्टाचारों के नमूनों
में लाभचंद जैन लिखते है कि "जाका पडा स्वभाव
जाशी जीव हूं । नीचन मीठा होय, चाहे सींची गुइ घी वसू १॥
छोगमलजी पृथीराजजी आदि केई एक भद्रीक श्रावकों को तो
इस धर्मधूर्त ने अपने पजे में ऐसे फमा लिये कि वे लोग प्राय
मीचकर अन्धे होगये । विचारे हीरालालजी नामक २२ ममु
दाय के साधु ने तो लोगों को बहुत समझाया था, कि, यह
पुराना पापी है। हमारे इन्द्रमलजी, खेमराजजी, मगनजी,
मुन्नीलाल सुवालाल, श्रादि कई साधुओं को इस महापापी ने ही
विगाड़े थे । यह अमली की ओलाद नहीं है इसका छोटा भाई
तो अपने शाप द्वारा मुसलमान बना लिया गया है, और यह
म्लेच्छ जहां तहां जैनधर्म को भ्रष्ट करता फिरता है इत्यादि
हीरालालजी की कही हुई मर घटनाओं का उल्लेख कारण पा
कर फिर कभी लिखूगा । निदान केवलचदजी ओस्तवाल न
बीसलपुर आदमी भेज कर इन सारी बातों की जाच कराई तो,
सच सत्य निकली वहां के लोगों ने कहा आज १२ चर्प उपर
हो गये। ज्ञानसुंदर के छोटे भाई हस्तमित का कहीं पता नहीं
-
.
(७१)
है अफमोम जब १२ समुदाय वालों ने लोहावट में यह घोपणा
कादी कि ज्ञानसुदर म्लेच्छ के । से पैदा हुवा है । तब
यह मृढ हीरालालजी साधु पर जल कर खाख होगया और
उनों के १०८ साधु सतियों का पडदा खोल कर पागल के
समान बकने लगा। तथा कई इश्तिहार और पुस्तकें छपा
कर उन्हों को पेशावपन्थी श्रादि विशेषण देकर झूठी बदनामी
करने लगा । यह लोहावट काड भी बहुत लया है, पुस्तक बढ़
जाने के भय से छोड़ता है, अगर हमारे पाठकों की विशेष
प्रार्थना होगी तो फिर कभी लिखूगा । निदान पाप छुपाया ना
छूपे । छूपैज मोटा भाग दागी कमी ना रहे, रुई लपेटी
आग ॥ १ ॥ एक युवती विधया का जन्म भ्रष्ट करदेने के
कारण ज्ञान सुदर को पुलिश ने या पकहा परंतु ज्ञान पुष्पमाला
ओफीस से धन की थैलियां लेकर ज्ञान सुंदर के पिठुलोहावट
पहुच गये और जमानत देकर इस भ्रष्टाचारी को रातों
रात नागोर की तरफ रवाना कर दिया । धिक्कार २ व्यमि-
चारियों के पक्षपाती और स्वास्थपरायण हमारे कितनेक,
मूर्ख श्रावकों ने ही परम विशुद्ध जैन धर्म का सत्यानाश किया
है। हयकडिये डलवा कर इस महानीच व्यभिचारी को जेल
जाने देना ही अच्छा था कि, आयदे पर और भी ऐसा कुकर्म
कमी न करे । ज्ञान साते की रकम फलोदी से नागोर लेजा-
कर ज्ञान सुंदर के भक्तों ने पूजा प्रभावना और साधर्मीवात्सत्य
( ७२ ) द्वारा भक्ति दिखा कर सब लोगों को इस धूर्त की माया जाल में खूष ही फमायें और माति २ के लाभ बता २ कर आस्तिक जेनों से हजारों रुपये बटोरलिये । मझरनाम की १२ वीं ढाल में तपागच्छ के साधुओं के लिये तो ज्ञान सुंदर लिखता है कि, "रचना करावे पहाडनी उमा रही पोते आप ! अमुको लामा पहोलो करो अज्ञानी मेवे बहू पाप ५ अणुमात्र पृथ्वी कायमा जल पिंद्र कह्या जीव असंख्य । त्रस थावर हणावता लज्जा छोडी हुना निसंक 180 चैत्यवासी पहेला कइ । नहीं मणाई कोई पूजा साध । आगम पाठ दीसे नहीं पास थाए मूकी मर्याद १४ साधु गाचे राग थी। जेम २ वागे मृदंग ताल । द्रव्यस्तर जेणे मेवीयो द्रव्यलिंगी मोवे कह्या बाल ||१५|| परन्तु नागोर के श्रावक कहते थे कि यहा पर ज्ञानसुन्दरजी खुद पहाड़ों की रचना कराने के लिये मिट्टी सुंदवा कर मंगवाते थे, कच्चे पानी की विराधना करवा कर ड्गर बनवाते थे, त्यागी साधुओं की प्रति क्रमाणदि ममस्त क्रियाओं को छोड़ जिन मंदिरों में जाकर दीपक की रोसनी में पहर रात्री तक अपने हाथों से फल काटते थे । धिक्कार २ सावध कामों को सुद न छोड़ कर दूसरों की झूटी चैदनामी करना यह ज्ञानसुंदर की नीचता नहीं तो और क्या है । साध्वीयों को बिगाड़ देने परभी खरतर गच्छ वालों को अपना पक्षपाती देख ज्ञानसुदरनी, को निश्चय हो गया कि अब मै आहिस्ते २ खरतरगच्छ को भी - स्त नाबूद कर सर्व पोसवालों को अपने पक्ष म मिला लूंगा नदान फलोदी ( पार्श्वनाथ में ) पा इस जैन धर्म के शत्रुने हाजन वश मुक्तावली की काट शुरुकी, जिसको अनेक विद्वानों और थीपूज्यों के पुराने दफ्तरों से सग्रह करके निर पक्षदृष्टी न बीकानेर निवासी उपाध्याय यति वर्य श्री रामलालजी णिने ३० वर्षों पहेले छपवाई थी । जैनियों को आपस में लड़ाने के लिये इस काट का नाम, जैन जाति निर्णय, तो लिख- कर इस जैन धर्म के शत्रुने छपवा दिया, परन्तु किसी प्राचीन और प्रमाणिक ग्रंथ का पाठ देकर विद्वानों के सामने आज दिन तक किमी भी जैन जाति का निर्णय नहीं कराया है। भेझरनामे की भु० पृ० १० पर ज्ञानसुन्दर लिखते हैं कि पुस्तक छपावा चायत सघ सभा में दाखल करचु अने सभा मंजूरी आपे तोज छपाववो । ठीक दूसरों के लिये कायदा घडता है, और खुद एकात कोटडी में बैठ, चे शिर पैर की उट पटाग बातें लिखकर बिना किमी को बताये ही मन माना जैन जाति निर्णय छपा कर जनता को धोखा दिया, यह ज्ञानसुंदर की कितनी बड़ी भारी धृष्टता है । इस पुस्तक की पूर्ण प्रत्यालोचना तो उक्त यचिजी ही करेंगे, किन्तुं बहुत से सज्जनों के अनुरोध से मुख्य २ बातों का ही समाधान मेरी तरफ से लिखा जाता है किसी मले आदमी के घर में कुत्ता नुकशान करता हो तो देखने वाला विवेकी मनुष्य उमे अनुचित समझ अवश्य धुत कारता है -
(७४)
दुष्ट बुद्धि ज्ञानसुन्दर के अनुयायी लोग खरतर गच्छ की पति
को देख भले ही खुम हों परन्तु मैं तो किसी का पक्षपात न
कर सत्य कहूंगा कि ज्ञान सुंदर भाई ने अपनी अज्ञानता में महान्
उपकारी मांस मदिरादि दुर्व्यसनों को छोडा कर राजपूतों का
जैनी बनाने वाले खरतर गच्छ के प्राचीन जैनाचार्यों का
नाम तक भुला कर ओसवाल समाज को कृतघ्नी बनाने का
साहस किया है
--
.
जब कि संसार भरमें संगठन का श्रान्दोलन हो रहा है,
सब मजहब वाले संगठित होकर अपने २ धर्म की उन्नति कर
रहे हैं। जिस संगठन की जैन कौम को अत्यन्त आवश्यकता
थी, ऐसे समय में अनार्य ज्ञानसुंदर ने अश्लील पुस्तकें प्रका-
शित कर, जैन कॉम का संगठन करना तो दर किनारे रहा,
कुछ रहे सहे प्रेम को भी, धूल में मिला दिया है । पृ०-११ वें
में श्राप लिखते हैं कि उपाध्याय रामलालजी ने अपनी किताबों
में जो जो अनुचित बातें लिखी हैं उस पूर्वपक्ष में रख उसका
योग्य समाधान 'उत्तर' पक्ष में किया जावेगा || समीक्षा-३०
वर्षों से तो महाजन वश मुक्तावली में किसी विद्वान् को कहीं
अनुचित बातें न दीखीं, और अब उन्लू के समान पैदा हो
कर ज्ञानसुदर महाजन वंश 'मुक्तावली को अनुचित ठहराते
हुए, शान्ति प्रिय जैन. सघ में विद्रोह फैलाता है ।
(७१), इस के पहले पृ०७३ ज्ञा. लिखते है कि यतिजी की लिखी महाजन वश मुक्तावली के लिये तो 'सारा समुद्र के सिवाय अन्य स्थान ही कौनसा है कि जहा पर विश्राम ले। समीक्षा विना कारण ही ज्ञान सुंदर माई का श्री खतर गच्छ के यतियों पर कितना बड़ा द्वेष है कि उन्हों की पवित्र पुस्तकों को यह सारे समुद्र में फेंक देने लायक बताता है। ऐसे ही पृ०२ से ४ तक श्री खटरगच्छ के महान २ प्राचार्य जिन्होंने अपने योगवल से सर्व साधारण को जैन धर्म की महिमा दिखा कर तथा मरते हुए अनेकों को अभय देकर सदा के लिये जैनी बनाये, उन्हीं की हसी उड़ाकर ज्ञानसुदर भाई ने अपनी नास्तिकता जाहिर की है। इन ९ कलमों की भी समीक्षा यथा प्रसंग करूगा। प्रथम मूल की ही समीक्षा की जाती है। कारण-एक तो अपने ज्ञान ध्यान के आगे हम को इतनी फुर- सत ही नहीं । फिर द्रव्य का भी सर्वथा अभाव है। और ज्ञानसुंदर ऐसा कोई प्रमाणिक पुरुष भी नहीं है कि जनता पर जिसकी प्रत्येक उक्ति का प्रभाव पडे । अतः मोटी २ चातों की ही समीक्षा कर देनी ठीक है कि जिससे कोई भद्रीक - मनुष्य मलेछ ज्ञानसुंदर की मिथ्या पुस्तक को पढ़ कर मति भ्रंस न हो ॥ कुमला गच्छीय लखजी महात्मा के अनुरोध से सरल चित्त उ० रामलालजी गणिक अपनी महाजन वश मुक्तावली में लिखा था कि रनप्रभासुरी एक शिष्य के सग ।
- (७८), के लिये माचीन पट्टाग्ली का झूटा ही नाम रख कर ज्ञा. लि. कि "श्री मदरत्नप्रभसूरी पंचसय शिष्य, समेतलुणाद्रही ममायति" समीक्षा-क्याही मुखों की लीला है। बात कहता है ओशीयां की और लेख बताता है । लुणा द्रही का यह लुणाद्रही क्या ज्ञा० नानी है । प्रोशीयों हमने बहुत ही तपास की मगर लुणाद्रही का कहीं पता नहीं चलता अगर कहो यह नाम उसी डूंगरी का है, जहां कि इस समय रत्नप्रभूमरिजी के चरणों की स्थापना है तो यह भी असत्य है कारण सं० १९३५ की बनी हुई ज्ञान सुन्दर की प्राचीन पटावली कहती है कि " देव. गृहस्य उत्तर स्यांदिशी लूणद्रहा भिधान डूमरी काया श्री महा- बीर चिंकारयि तुमारब्धं समी० मंदीर से. उत्तर की तर्फ हमने कोसों तक तलाश की परंतु रेती के टीयों के सिवाय लुणद्रह, वा इंगरी का कहीं-नाम निशान भी नहीं पाया । अतः सिद्ध हुआ कि ज्ञानसुंदर और उसका पट्टावली कार दोनोंही महा मृपावादी है। क्योंकि आधुनिक चरणों की कल्पना वाली डूंगरी श्रोसियां के मंदिर से अनीकोण में है, न कि उत्तर दिशा में और उसका, लुणाद्रही,, नाम भी कोई नहीं कहता । ज्ञानसुंदर भाई अपनी पट्टापली का पृ० ५ वॉ अच्छी तरह से देखे-सूरी-पंचासया-शिष्य लुणाद्रही-और समायाति, आदि पदों को देखने से पाया जाता है कि-इसको बनाने वाला बिलकुल ही निरवोध था । मूखों के वचनों पर विश्वास कर शाति मार्ग ।
में कांटे विखरना, समझदारों का काम नहीं आगे पृ० १२ पर ज्ञा लिखा पात्राणि प्रतिलेष्य मासं यावत संतोपेणस्थितावाद सूरिजी विहार करने लगे तब देवीने विनती करी इम पर ३५ साधु विशेष तपश्चर्या के करने वाले सूरिजी के पास चतुर्मास किया शेष ४६५ मुनि (जो कच्चे थे) विहार कर अन्य स्थान चर्तु- मांस किया,, समी० महामृढ ज्ञान सुंदर को अपनी समाचारी का भी बोध नहीं है। देखिये पात्राणि प्रतिलेष्य मासंयावत्सतोषेण स्थिता: पश्चात् विहारः कृतः । पुनः कदाचित त्रायातः । शासन देव्या कथित मा आचार्य अत्र चतुमसिक कुरु । तव महालाभो विष्यति। गुरु. पंच'त्रिंशत् मुनि मिः सह स्थित: उ०प० 'पृ० ६ आगे पृ० १२ परही त्रा० लि. " यतिजीने जैसा माटों से सुना वैसा ही लिख मारा है । न तो रुई का सांप सूरिजी ने बनाया, न राजा के पुत्र को सांप काटा था " समी० सैकड़ों वर्षों की लिखी हुई और प्रचालित माटों की ख्यातों को कन्पित्त यता कर, और मन मानी झूठी बातों की पोथियां छपवा कर 'सत्य इतिहास का ख्न करता है, यह ज्ञानसुन्दर की कितनी बड़ी नालायकता है । चारण 'भाट जागा कुलकुरु श्रादि की पोथियों के सिवाय किसी शास्त्र में कोई भी 'जति का प्राचीन इतिहास नहीं मिल सकतायति गमलालजी झूठे नहीं अगर झूठा है तो, कुचला गच्छ का कुलगुरु लखजी महात्मा है । देखिये वह क्या लिखते हैं। . १ F (८०) -- लखजी महात्माने भी आगे हो; अपना इतिहास लिखने दिया कि वह मैंने सरल भाव से लिख लिया हम तो सिर्फ खरतराचार्य प्रति बोधित मात्र श्रावकों का ही इतिहास लिखते थे असत्या. क्षेप निराकरण पृ० १३ । यह अमत्यता मेरी नहीं किन्तु कुंअला गच्छ के गृहस्थी महात्मा लखजी ने जो मुझे पत्र दिये उनकी है पृ० ६ । अस्तु ज्ञान सुंदर माई इतिहास कल्पद्रुम देख इममें लिखा है कि। राजा उपलदे परमार, नगर ओसिया नरेश्वर । राजरीत भोग चे, सगत संचीया दीनो वर, ना - सौ चरू निधान, दिये सौनिइया देवी, उलाऊ परा अंगज किया, पाय नामा केवी इमरी राज , भोग-वे, अदल बोहुर परस वदित होय नहीं राज पुत्र चिंता निपट . कहि कथा सोय ॥१॥ हे राजा कहिये काज करो चिंता मन माहि, सुतन उदर तब लिख्यो, देऊ कि मैं अक विनाहिं । नरपति हुवे विनती, जोड कर हाजिर ठाढो कृपा करो महाराज, धर्म में रहस् गाढौं । पटा परगना गांव खजाना खास खुलाऊ । कबहून लोपूकार, हुक्म श्रवण सुण पाऊं गुरु को त्याग धन मांगवा, एक वचन मोहि दीजिये मिथ्यात्व त्याग जिन धर्म गहो दान शील तप कीजिये ॥ १० तहति वचन उर धार नृपति श्रावक व्रत लिया पुरडूंडी फिरवाय नार, नर मेला किया । भिन्न भिन्न सुणे वखाण गुरु मुख के वापक । . .
(८१) दिलगीर, दीननायक फिरदाखे, पुत्र विना सूरी राज म्हारो कुण राखै । देवी दया विचार, वचन दीनो निरदोसी । रहयो राय निरचित पुत्र निश्चय इक होसी । जुग जाहर जिस पूरसुख । घणा नरा पण हलटसी । चहूं आण आण फिरसी अठे परमारांगद पलटसी ॥२॥ देवी के घर दान पुन्य राज फल पायो नाम-दीयो जयचंद, वरस पन्नरे परणायो । मात, पिता मड महला सुख , माणे तिण अवसर रिसीराय रतनप्रभु, मास खमाणे । सिख चौरासी साथ व्रत सयम, सब साधे.। घरे ध्यान इकतार, देव जिन इन्द्र अराधे । शहर में गया सिख वहरवा। धर्मलाभ करता फिरे । इण नगरी में दावा न को । बसे सूम- साखा सिरो।। ३ ।। घर घर सिस फिर गये पवित्र अहारन पायो । विप्न एक तिणवार वचन इस डोवतलायो । ममगृह पाचन, करो धन धन माग हमारो ॥ आज हुओ श्रावणो मुनि इह देश तुम्हारो सुझतो अहार दोपण विना । खीर.साड वहिरा: हिया उज्जले चित्त-दोह,जणा ले गुरु आगल आइया ॥ ४॥ देखी गुरां-गोचरी ध्यान आलोयन-कियो । शरदतणे प्रमाण जोय ब्राह्मण घर लियो। नगर माहि, नव. लाख बसे घर एक सरिसा । सगति पंथ मतवाद शीस सीदूरी टीका । समझ हुआ थिर मान, ध्यान अन्तर मुं खोले । शिष्य प्रति महाराज मुसक्ती, मुखवायक बोले । , गुरु कहें वार लागी घणी, कहे शिष्य कि कारणे । शिष्य कहे.ाहर मिलियो-नहीं हू फ़ियों - ।
(८२) -- घर घर पारणे ॥ ५ ॥ शिप्य मुख के सुण वयण अहार पृथ्वी पंरिठायो । पिवण सांप होय गया महल, नृप सुत के धायां । पविण सांप पाई गयो कंवर ने चेत न काई । नहीं सास विश्वास सो गहुये ' गयो सताई । हाहाकार हुओ शहर में दाग देण चाली दुनी। रतनप्रभु सामल रुदन दया देख मेह ल्यो मुनि ॥ ६ ॥ मुनि वायक सुण सैण भ्रम राजन भूलानों कौन नाम 'गुरु कठै सांच दाखवो ठिखानो। नृप वचन सुन कहे मुनी उत्तर इम धारो, उण खेजडै अस्थान कुमर तुम लेर पधारो । साधा सरणे आय नृपत विनती करावे । सीस हुति सेहरो मुकट ऋपि चरण चढावे ॥ माफ करो तकसीर अब श्राप चूक वख साईयो मौं वृद्ध काल की लाज हे गुरा कुंवरजी वाहिये,॥७॥ करुणा सिंधु दयाल नृपति को हंसी वर दियो। गयो रोस तत काल, मृतक सुत तत छिनेजी यो। धियों स्वास विश्व- वास, नयन खुलिया मुख वाचा । रोग दोप सब दूर शब्द सत गुरु को सांचा । श्रीलस मोडत उठियो । कहे नींद आई भला किहि काज म्हने लाया अठे, धूरसे कहो सांची गलॉ ॥ ८ ॥ खमा खमा सब कहे सब उठी गुरु चरणे लागा। मगलधरल अपार बंधावा धानबागा वाग तारेण । छत्रनिशान कलश सौवन, भर मोतियन का थाल, सखियन मिल मंगल गावे | ओछदिया महल बाजार घर रतना चौक पुराइया, जरी खान खाप पड पांतिया रत्नप्रभु पधाराईया ॥ ६॥ नृपत करे १ (८३) १ में - चीनती जोडि कर हाजिर ठाढो । कृपा करो महाराज, घरम रहसु गाढो, पटा परगना गाव सजाना सास खुलाऊ । काहुन लो पूकार हुकूम अवणा सुण पाऊं । गुरु को त्याग धन मागमा एक वचन मोहि दीजिये। मिथ्यान त्याग जिनधर्म गरो दाने शाल तप कीजिये ॥ १० ॥ तहति वचन उर धार नृपति श्रावक व्रत लीया । पूर दृडी फिग्वाय नार नर भेला कीयाभिन्न भिन्न सुणे वसाण गुरु मुखके वायक । के काया प्रति पालशील संजम सुखदायक । करि मन सुभोमस्लमिल, मान मौड़ कर जोडिया सिद्धान्त जान जिन धर्म को शक्ति पथ मुठ मौड़िया ।। ११ ।। शील तणा'दृढ मांच कर पौपा पडिकोणा। सामायिक मम भार समकिती दिन दिन दौणा । हिंसा को नहीं लेशु, देश मै प्राण फिराई, धर्म तणा फल मीष्ठ सबे सांभल ज्यो भाई । इहि माति जन धूम धारियो, शक्त पथ मुस मौड़ के गुग वचन शिरधारी नृप मान मोडी कर जोड के ॥ १२ ॥ इष्ट मिल्यो मन मिल गयो । मिली मिली मिलिया मेल । फूल वास घृत दूध ज्युं तिलयन माहि तेल ॥१३॥ सहस चौराशि एक लाख, घर गिणती पुर माहि एकण थाल पारोगिया । मिन्न मात्र कुछ नाहि ॥१४॥ भाटा झगडा छोडिया गढमढ शस्त्र सिपाह । निर हिंसक निर कपट हो चालत झीनी राह ।। १५ ।। ( इतिहास कल्पद्रुम के देखने से यह भी पाया जाता है कि वर्द्धमान सुरि के ५२ वर्षों क - , (८४) बाद आचार्य पद पाकर रत्नप्रभःमूरिने ओसियां के उत्पलराज को प्रतियोध देकर जैन खरतर थावक बनायां) यथा । । - वर्द्धमान तणे पछे, वरस वावन पदलियो, रत्न प्रमः सूरी- नाम तासु सत गुरु व्रत दीयो, औस्याहृति उठीया जाय, भिन्न माल वसांणा, क्षत्री हुश्रा शाख अठार, उठे सवाल कहाणा । इखलाख चौरासी सहस, घर राज कुली प्रति बोधियां श्री रत्नप्रभ: ओस्यां नगर पोसवाल जिण दिन किया ॥१६॥ प्रथम साख परमार । शेप शीसोदे शिगाला । रणथंमा राठोड वंश चौहाण पंचाला । दया भाटी सो नगग कछवा धन गौड कहीजे । जादव झाला जिंद, लाज मरजाद लहीजे-खर तरा पाट औपे खरा लेणा पटाज लाखरा । एक दिवस इता महाजन हुषा शूर बड़ा भड शाखरा ॥ १७ ॥ इत्यादि । और जाति भास्कर पृ० १३१ वें पर भी राजा के पुत्र को जीवित दान लिखा है, यथा ऋषि ने कृपा कर उत्पल राजा के पुत्र को जिवा दिया, तब घर'२ महा मंगल छा गया, राजा ऋषि के सामने हाथ जोडकर खड़ा हो गया, और कहा जो आज्ञा हो सो करूं। तब ऋषिराज ने और कुछ न कह कर राजा को जैन धर्म की दीक्षा दी । राजा के जैन धर्म स्वीकार करते ही सब प्रजा वर्ग भी जैनी होगये, फिर वह प्रोस्यां से उठकर भीनमाल में वसे । क्षत्रिय अठारह शाख के जैनी हुए । वह स्थान पहिला
ओसिया से ओसवाल कहाये। मुरादाबाद निवासी ५० ज्वाला-
प्रमादजी मिश्र निर्मित जा० मा पृ० ॥१३१ ।।
अन्य दर्शनियों के ग्रंथों के प्रमाण इसीलिये दिये जाते
हैं कि प्रगढा मिथ्यात्व के उदय से ज्ञानसुन्दर भाई -उन्हीं
को ठीक समझता है । और जैन यति महात्माओं का कथन
इसको पिलकूल-नहीं रुचता अपायह देखना चाहिए कि उत्पल
राजा कर हुआ। ज्ञानसुन्दर के परम मान्य पं० गौरीशकरजी ओझा
न पीकनिर पडे उपाने में श्री पूज्यजी से हमारे सामने कहा है
कि ओसवाल जाति के आदि पुरुष राजा उत्पलदेव परमार,
विक्रमादित्य के एक हजार वपों के बाद हुए है 1.नि० दशवी
शताब्दी के पहिले किमी. राजपूत की ससार में, ओसवाल
सज्ञा कहीं नहीं थी । उक्त पंडितजी ने रामलाल जी मे भी कहा
था कि आपकी संग्रहीत महाजन वंश मुक्तावली के सब ही
लेस सत्य है, परन्तु उत्पलराजा को विक्रमी के चारसो ४००
वर्ष पहिली लिखा यह गलत है। उ०,रामलालजी ने अपनी
भूल स्वीकार की, और कहा कि यह गलती अबकी श्रावृति
में सुधार ली जायेंगी, इत्यादि ज्ञानसुदर भाई अमत्या
नि० पृ० ६७ देखें । वि० सू १०९३ में पदिली के शिर
लेख पताम्त्र पत्रों आदि में उत्पलरीजा का कहीं नाम निई
भीनहीं पाता। ज्ञान सुदर भाई प्राचीन लेख मणिमाला।
खंड लेख नं०६३ देने तथा महाजन वंशमुक्तापली को भी
-
.
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(८६)
ठहराने के लिये जिन २ ग्रन्थों को प्रमाण रूप मान कर जान
सुन्दर ने अपनी समालोचना के पृ० ६ पर प्रकाशित किया है
उन्हीं के नं०६ भारत के प्राचीन राजवंश भा० १ की भूमिका
के पृ० १७ पर लिखा है कि यह उत्पल देव मडोर के राजा
का शाला था और भीनमाल में कुछ गड़बड़ हो जाने के
कारण मडोर में आ गया था । यहां पर इसके बहनोई ने मंडोर
से पीस कोश के उत्तर का एक बड़ा थल जो उजाड पडा था
इसे रहने को दे दिया। यहीं पर उत्पलदेव ने प्रोमियाला नाम
का एक शहर बमाया । मारवाडी भाषा में ओसियाला,
शरणागत को कहते है । यही शहर अब ओसिया नाम से
प्रसिद्ध है । यहां ओसियाले के पवार धांधूल कहलाते थे
तथा इसी ग्रं. पृ०,६६ पर लिखा है कि- धूमराज के.वंश
में सिंधूराज हुआ। सिंधुराज का पुत्र उत्पलराज हुआ ।
मृता नैणसी ने भी अपनी ख्यात में धूमराज और सिन्धराज
के पाद उत्पलराज से ही वंशावली प्रारंभ की है। उसने
लिखा है।
ऊपलराई -कि राहू छोड ओसियां यसियो, सचियाय
प्रसन्न हुई, माल बतायो, ओसियों में देहरो करायो इत्यादि ।
आगे उत्पलराज महित १६ पीढियों का वर्णन, उन्हों
व का ज्ञात समय, और समकालीन अन्य राजाओं के नामतक
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६
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(८७)
जख दिये हैं। उत्पलराज की तीसरी पीढी में धराणीवराह,
ने सौलंकी मूलराज के ममय वि० सं० १०३० से १०५३
क विद्यमान लिखा है । ५ वें पट्टे पर धन्धुक चौलुक्य भीम
के समय वि० सं०१०७८ से ११२० तक और १०.या पट्ट
घर कुमारपाल के समय लिखा है।
-
छेचट १५ वा पट्टधर प्रतापसिंह वि० सं० १३४४ में
हुआ और इसके उत्तराधिकारी से वि० सं० १३६८ के पास
पास चद्रावती को छीन कर चौहानरांव लूभा ने इनके राज
की.ममाप्ती कर दी मा० प्रा०रा०व० मा० १ पृ०८३ देखो।
ज्ञानसुंदर भाई अपने मान्य ग्रथों के निर्माता' राय ३० पं०
गौरीशंकरजी प्रोझा और साहित्याचार्य पं० विश्वेश्वरनाथ
रेउ (दोनों पं० भी मौजूद हैं ) को पूछकर हमारे सामने
निश्चय करलें । ओसवाल जाति इतनी प्राचीन नहीं है जैमी
१ तुमने इस जैन जाति निर्णय में लिखा है । और उक्त पडितों
ने ओसवाल जाति के विषय में कोई ग्रंथ भी नहीं बनाया है।
तुमने झूठा ही नाम लेकर उन महानुभाओं का अपमान
किया है। आगे इसी पृ० १२ पर ज्ञा० लि. मंत्रीश्वर उहड
सुतं भुजगेन दृष्टाः ।। समिक्षाः- ज्ञानसुंदर भाई का अभिप्राय
यह है कि राजा के पुत्र को सर्प ने नहीं काटा, किंतु दिवान
मा के पुत्र को सांप खागया था।
स
।
(८) यह लेख भी ज्ञानसुंदर और उसके समाचारी लिखने वाले की मूढता सुचित करता है। यह बात कोई नहीं मान सकता कि, एक दिवान के साथ में राजा प्रजा सब ही जैनी होगये हों। यदि कहो यह उद्दड मत्री ही ओसियां का राजा था, तो यह भी असत्य है, कारण उपकेश पट्टावली में बहुत से ठिकाणे इसको, सेठ लिखा है । , यथा-श्रेष्टस्य महान् दुखी:खोजातः । जीवितं कथं ज्वा लयततः श्रेष्टिने कथित । अष्टिनाझपाणो वातिप्तः। मृतका- मानीय गुरुअग्रे मुंचति, श्रष्टिं गुरुचरणेशिरं, निवेश्य एवं कथयति, भोदयालु ममदेवोरुष्टः ममग्रहोशून्यो भवति । तेन कारणेन ममपुत्रभिक्षामदेहि । लोको कथितष्टि सुतः नूतनं जन्मो आगतः । श्रेष्टिना गुरुणा अग्रे अनेकमाणेमुक्ता फल सुवर्ण वस्त्रादि आनीय भगवान् गृहयतां ।, पूर्वश्रेष्टिना नारा- यणप्रासाद कारयितु मारब्ध । इत्यादि पृ० ६ देखो उ० ग. प० ज० सा० सं० छपी हुई ॥ अगर उहड के पास कुछ जागारी होती तो वह मणी मोती वस्त्रादि की प्रार्थना के पदले, 'ग्रामादि देता। खैर आगे ज्ञा० लि० गुरुणा प्रास. जल मानयि चरणौ. प्रक्षान्य तस्य. छटित ससाह- कारणे सज्जो विभुवः समाक्षाः इस लेख में 'ज्ञानसुन्दर । पूर्ण मूढता जाहर की है। शुद्ध लिखने और घोलने an (८६) की मी योग्यता नहीं और ग्रन्थ लिखने को चैठ जाना, यह कितनी बड़ी मारी धृष्ठता है। हमारे पाठक विचारे कि प्रासु महसात्कारणे विभुव कौनसी भाषा के शब्द है। हरद्वार से आये हुए एक बाबानी को अजमेर में एक भक्त ने पूछा था कि महाराज कहा से आये, कहा जाओगे | उत्तर में बाबाजी गोले, बच्चा हंगद्वार से श्राया, घरुद्वार मेरा इंगद्वारा में ही है, और वहीं पर मैं रहता है। गुरु के साथ ४ दिन फौकी- ' रजी के मेले में रहकर मैं तो हंगलाज को जाऊंगा, और ' गुरुजी हाभू की फाड में होकर पीछा हंगद्वार में जा पहुंचेगें। E भक्त यह सुन कर वोला कि महाराज यह अापका निवास स्थान हंगद्वार कहा पर है। बाबाजी बोले बेटा हंगद्वार तो ॥ बढ़ा तीर्थ और गुदापुरी के पास है । भक्त पोला ठीक महाराज कुछ प्रसादी पाओगे। चाचाजी वोले बच्चा गुरुजी के तो का प्राज खाधसी है सो वह तो नर प्रहार ही करेगें और मुझको दरा तो एक भगत मिल गया सो नारायण के नाम से मैंने आज ग खूब भीष्टान्न ही मीष्टान्न पा लिया । भक्त बोला महाराज ऐसे का क्या कहते हो। बाबाजी बोले बच्चा जैसा मेरा गुरुजी ने गू खाया ऐसे ही मैं खाता हूं । छी २ ठीक यही दशा हमारे तर ज्ञानसुन्दरजी की है प्रासुक को, प्रासु । सहसात्कारण को माहे सहसास्करर्ण और वभुव को विभुव लिखता है । सुन इसकी सभी पुस्तके महान् भ्रष्ठ और अशुद्धियों से भरी मा गो r
(80)
है । बुद्धिमान कोई उन्हें पसंद नहीं करते ।, फलोदी
1
का श्री संघ लिखता है किः-
हु
-
जैन कुल कलंक ज्ञानसुन्दर के लिये यहा की सरकारी
अदालतों में वेवा औरतें फौजदारी मुकदमों में झगढ़ रही है
ज्ञान प्रचार के निमित से द्रव्य मंग्रह करने के लिये ना
इसने, यहां पर एक तरह की दुकानदारी खोलरखी है। उन्हीं
रुपैया के जरिये जैन पत्र को भी प्रलोभन में डाल के अपने
हाथ का कठपूतली बना रखा है, उीके पास से अपनी
झूठी माहमा बढाने के लिये अशुद्ध भाषा की भ्रष्ट पुस्तकें वां
मन माने अप्रमाणीक लेख प्रगट करवा के जैन समाज को भ्रम
में डालने और अपने अवगुण -छिपाने का जी.तोड़ परिश्रम
कर रहा है।
-
.
ज्ञानसुन्दर ने, अपने अज्ञ और अन्ध भक्तों की श्रेणी में
अपने हाथ से झूठ-मूठ ही कागद काले करके गुलेछाव
अन्य केई , जाति, वालों के शुभ नामों का उल्लेख कर अपनी
महिमा, बढ़ा के दुनिया को भ्रम में डालने का प्रयत्न, किया
है कि, हमें इतने आदमी मानते हैं, पर यह झूठा है, इसे
यहां कोई समझदार साधु नहीं मानता ज्ञा० ब० घो० खेर
ज्ञानसुन्दरजी के लेख से रत्नप्रभुसूरी बडे अमिमानी और
+
(8). पानी सिद्ध होते हैं जैसे-गुरुणा प्रासुजलमानीय चरणा न्य तस्य छटित" अर्थात् गुरु ने प्रासुजल लाकर , अपने दोनों चरण धोयें, र,उमीका छींटा देने से उमी, दमे सेठे का,नेटा जी उठा । न जा०नि० के पृ० २ के समान हमको भी यहा पर ना विचार अवश्य होता है कि-- अगर सेठ उहड़ के पुत्र को मरी दफे किमी साप ने गट साया हो, और उसका पिप किमी मुमलमान फकीर ने तारा हो तो, उन ३८४००० घरों के प्रोसवालों को उस आइजी का उपामक बनना पड़ा होगा। . - - । . 4 १ "एवं उन्हीं के परिवार वालों को कितनी बार सांप काटे और किचनीवार धर्म पदलावे इनकी मख्या तो ज्ञानसुन्दरजी ही कर सकते हैं अगर इसके रत्नप्रभुरि नेपान या अनार्यः देश में चला गया होता, तो वहा फिरोडों म्लेच्छों को सहज में जनी बना लेता । कारण वहा साप बहुत है और बहुतों को काटा करते है । खरतर गच्छ को नेस्त नाबूद कर अपना मतलप चाहता है। यह ज्ञानसुन्दर की कितनी पृष्ठता है । ज्ञान- सुदर को पूछो 'जाये कि यह " सुप्राजल" क्या चीज है, नोपानी (ममाधिया) तो नहीं है, बारा सूत्रों की मापा पृ. ४८ (६२) वे पर सपदि सब ही प्रकार के जहरों की एक ही दवा "पेशाब " ज्ञानसुंदर ने लिखी है इससे भी पाया जाता कि मासुजल प्रस्रवजल को ही कहा है । खुद अशुची का आचरण करते हुए भी २२ संप्रदाय वालों की बदनामी करना ज्ञानसुंदर की यह कितनी बड़ी नीचता है । आगे पृ० १३ पर उपकेश और कोरट का अाधुनिक श्लोक भी झूठा है । इन । सुधरे हुए जमानों में तुम्हारे बहूरुपियों की इन्द्रजाल माया को विद्वान् नहीं मान सकते । अगर विक्रमादित्य के ४०० वर्ष पहिले ऐसा प्रमाविक पुरुप कोई हुआ होता तो अवश्य ही जैन शास्त्रों में उनका वर्णन आये बिना नहीं रहता । दर असल में उद्योतनसरि के ८४ विद्यार्थियों में २५ वां शिष्य • रत्नप्रभुसूरि था । देख तुम्हारे माने हुए प्रमाणिक ग्रन्थ में नं० १० जैन गौत्र सग्रह पृ० ४ पत्र जीर्ण होने के कारण रत्न शब्द फट गया है आगे इसी जैन जाति के निर्णय पृ० १३ पर श्री खरतरगच्छी यतियों को झूठे ठहराने के अनेक हेतु बताते हुए ज्ञानसुन्दरजी लिखते हैं कि अवल तो सं० १०८० में पाटण में दुर्लभ राजा ही नहीं था। फिर आगे पृ० १४ चे पर चार कारण बताये हैं कि जिनेश्वरी अभयवसूरी ने अनेक ग्रन्थ लिख उन्होंने कहीं खरतर शब्द नहीं लिखा है । ज्ञानसुन्दर भाई मै . (६३) Fr अभिप्राय यह है कि श्राचार्य श्री जिनेश्वरमरिजी और अभयदेवसरिजी खरतरगच्छ में नहीं हुए हैं । केसी और गच्छ में हुए हैं । और जिनेश्वरि को बरतर पद देनेवाला सं० १०८० में पाटन के अन्दर कोई दुर्लभ नाम का राजा नहीं हुआ है । खरतर गच्छ वाले जो कहते हैं कि सं० १०८० में दुर्लभराजा ने पाटण में जिने- श्वरमरि को परतर विरुद दिया बिलकुल झूट है । समीक्षा- कहता हूँ की ज्ञा० की यह लेख श्री खरतरगच्छ पर पूर्ण द्वेप और निरी मूर्खता, तथा अज्ञता का सूचक है। तुम कौनेस ज्ञान से कहते हो कि मं० १०८० के अन्दर पाटन में दुर्लम- राजा नहीं था । स्यात् धर्ममागरानुयायी तपागच्छीयों से सुनकर ज्ञानसुंदर ने ऐमा लिखा है । यदि हा तो बड़ी मूर्खता की है। ज्ञानसुंदर भाई में यदि कुछ भी ज्ञान का अंश होता तो वह निन्हों का अनुकरण कमी न करता। उपा० रामलालजी ने ठीक लिखा है कि "ज्ञानसुंदरजी नाम है, पर नहीं ज्ञान का लेश | गुरु जन के निन्दक प्रबल हृदय भरा है द्वेप ॥१॥" श्रज्ञान क्श लोग आपको ज्ञानसुंदरजी व साबूजी कहते होंगे । क्योंकि लोकोक्ति है कि "जगतण को भगतण कहें, कहें चीर को शाह । को गाड़ी कहें यही जगत की राह ॥२॥ असत्या. - (६६) कहई अनामुका त्रीवाड़ी पाकिस्यु । तेत्रीयडी कहई यमहा कोई देव शक्ति पुनः अत्र गौ १ अनई वत्सी जीवने अभयदान ना दातार कृपावंत दयावंत जांणी सकल मिथ्याति श्री गुरु ने नम्या । श्री जिन शासननी उन्नति हुई इंएतल इम नाम तो श्री जिनदत्तसूरी पिण गौ १ वत्सी २ ने अभयदान देव थकी उपगारी हया । तेह थकी सकल मनुष्य बडनगरें मिली श्री जिनदत्त ने (उपगारी सूरी) एवि जो नाम कह्यो। पुनः श्रण हिल्लपत्तन पश्नै श्री वायड नगरे श्री गुरुई वायड ज्ञाती या घणा गृहस्त प्रतिबोधी जिनधर्म वासित, कीधा । पुनः पुनः श्री सुरीई वृद्ध सिंधु देशी उचा नगरे पंच नदी मध्य भागई सेयद मलेछन इंवाद ई जीत्या । तिहा घणा जिन शासन ई शोभनीक सुरी कही वाणा श्री गुरुना नाम स्मरण दुखार्ति विलय जाय । अनुक्रमिनी कुमारपाल राज्ये विक्रम स० १२१६ वर्ष श्री सुरीनई स्वर्ग गमन हुआ इति श्री जिन दत्त सुरी सम्बन्ध पृ० ॥ २८ ॥ ३ तपागच्छ की इस पट्टावली को देखने से मालूम होता है कि धर्मसागरजी के पाहिले, खरतर गच्छ और तपागच्छ में बिलकुल वेप भाव नहीं था । और इससे यह भी पाया जाता है कि उंच्चा नगर में श्री जिनदत्तसुरि के प्रतियोधे हुए १८ गोत्रों के क्षत्रियों पर से ही हमारे कुमलागच्छीय (६७) भाईयों ने ग्नप्रभसुरी के नाम से अपनी प्राचीनता का ढांचा खड़ा किया है । खैर हम किमी की उन्नति में बाधा नही डालते परन्तु अफमाम है ज्ञानसुन्दर की नालायकता पर, कि यह उपगारी पुरुषों की बदनामी कर, अपनी उन्नति चाहता है। खरगच्छ को चीन ठहराने के लिये बहुत से अन लोक धर्ममागरजी निर्मितं ग्रयों का प्रमाण देते हैं। ज्ञान- सुंदरजी ने भी उन्ही का अनुकरण कर अपनी हार्दिक दुष्टता प्रगट की है। क्योंकि पापियों को पापी का ही मार्ग अच्छा लगता है । ज्ञान सुन्दर भाई एतिहापिक सम मग्रह भाग चौथा अच्छी तरह से देखें । इममें धर्मपागरजी कथित सभी ग्रंथ अप्रमाणिक माने गए हैं ॥ जैन साहित्य संशोफ खं.२ $०३ में लिखा है कि श्वेताम्मर मत ना सरतर अने तपगच्छ मवेनी मतामती पण प्रपल थह पडी हत्ती । अने तेमा धर्ममागर उपाध्यायजी नामना तपगच्छीय विद्वान् पण उग्र समापी साधूर,कुमती कंद कुदाल ( याने प्रवचन परीक्षा) नामनो अथ बनायी तप- गच्छ मिवायना अन्य स गच्छ भने मत सामे अनेक आक्षेपो मुक्या । बाथी ते गतो खलमनी उठ्या । अने तेनुं जो समाधान न थायतो याखा जैन ममाजमा दावा नल अग्नि प्रगटे । आमाटे जोग्बमदार आचार्यों ने बच्चे पड्या (80) - . . घगर रही शकाय नहीं, तेथी तपगच्छाचार्य विजयदाननीय उपरोक्त ग्रथ पाणी मां वा नावी दीधा अन तेने श्रप्रमाण ठा ध्या । तमणे जाहरनामुकाढी. मात बोलनी आज्ञा काढी, एक बीजामत वालाने वाद विवादनी अथडा मण करता अटका कव्याहता, पण अटाल था विरोध जोहिए तमो, ने शम्यो । त्यारे विजयदानमूरि पला भाचार्य होगविजयसूरिये उक्त सात योल पर विमरणकरी, बार बोले, ए नामनी वार श्राज्ञाओ जाहरे करी हनी स० १६४६ आशी जैन ममानमा घणी शान्ति आवा। अनेखातर गच्छ ना अने तपा गच्छना प्राचार्यों एक वीजानी निंदामा न उत्तरता जैन धर्म नो प्रभाव अन्य ममाज' मां पाडवा माटे प्रयत्नशील थया । तपा ग० वृ० पहाबली में भी । लिया है कि । मांडवगढ चौमाम रही पुन गुजराति गाधरा नगरें रही उमर ठन गरें श्राव्या तिहां उपकेश गछि पि वंदणिक विरुद्ध श्री सिद्ध सुरी आचार्य वंशी श्री जीव कलमे (लाके केकोजी मट्टारक एहवु नाम जाणवु ०ि स० १५८४ वर्षे श्री विजय दान सूग्नेि बंद्या ॥ सकन सचित त्यागी एकात उपगस चउ विहार तपना कारक यति धर्मि अगिला याराजांणी श्री विजय- दान सुरिई अणहिल्ल पाटणि मणिकार पाट कि सं० १५६१ चर्ये गच्छ नायक पद देई स्वपाटि श्री राज विजय सूरी नाम दीर्छ । श्री गुरु शिष्य युक्त हिंदु आणि देशी विहार करता - (88) भरदयानगरें प्राव्या । एह वह कोरक रची शाखाना गीतार्थ प्रति श्रीभीन्न माल प्रमुख क्षेत्रन ईबदल र जाणीस.१६१३ बरें मोग्या नगर श्री राज्यविजय गिनो गच्छ भिन्न हुश्री । विक्रम म० १५१९ वर्षे उपाध्याय श्री धर्म सागरजी नइ गच्छ बाहिर की धो। कंद कुदाला नाम ग्रन्थ जल मरण कीधा। तहनो लियाचको विस्तार कन्या बंध कराची तेहनो मिच्छामि दुकाई दीधा । जै० सा० सं० ख० १ ० ३ ।। उसी समय का प्राचीन लेख मेरे पास भी मौजूद है । सुरु से ही हममें लिखा है कि तपागच्छीय श्री विजयदान सुरिशिष्य धर्भमागर उपाध्याय श्री खरतरगच्छीय सुविहित साधुवर्ग रूपा द्वेप बुद्धि धरत थक, वीम बोल सूत्रा सुविरुद्ध प्ररुप्या । मौर पिण श्री अभयदेव मूरि परपरादिकनी मन कल्पित प्ररुपणा कीधी । जे एहवा प्राचाये खरतरगच्छ में न थया, इत्यादि । असबध वचन भाष्या, तिवारे सं १६१७ कार्तिक शु०७ दिने शुक्रवारे श्रीपाटण नगरे श्री खरतरगच्छ नायक परम सवेगी, परम वैरागी युगप्रधान, गुरु श्री जिनचंद्रसूरी समस्व दर्शनी एक ठाकरी शास्त्र कढाव्या तिवारे सर गच्छीय गीतार्थे मिली घणा प्रथ जोई, धर्म सागर ने तेडाव्यापच्छे छपी रह्योन मान्यो तिवारे कार्तिक शु० १३ दिने सर्व दर्शनी मिली चर्चायें सोटो जागीने, निहव थाप्यो । जिन दर्शन .
(१००)
थी चाहिर कीधो शुद्ध मार्गी तपागच्छीय गीतार्थ पण,
निव जाणी तहनो बचन प्रमाण न कियो इत्यादि ।। ३०
वातों के समाधान सहित ९ पानों में बडा लंबा चौहा
लेख है संगठन के जमाने में गयी गुजरी बातों का उल्लेख
करना ठीक न समझ कर छोड़ते हैं। बूझी आग को प्रज्वलित
करना यह ज्ञान सुन्दर जैसे दुष्ट जनों का काम है | हम धर्म
सागर के अनुयाइयोंने अपने गच्छ नायक श्री विजयसेन
सूरिजी महाराज को भी जहर देकर मारा था । ज्ञान सुंदर माई
विचार करो किं, जिन्होंने अपने गुरु का भी जीवन नष्ट किया
वह खरतरगच्छ को नष्ट क्यों नहीं करेगा। सर्व ही सागर तपागच्छ
से बाहर किये हुए हैं, इन्हों के सब ही ग्रन्थ असत्य ठहरा कर
पानी में गाले हुए हैं। ज्ञान सुन्दर माई एतिहासिक रास संग्रह
भा० ४ मंपूर्ण देखे अगर धर्म मागरजीके पहिलेका प्रमाण हो तो
पेस करें।
जै० जा० नि० पृ० १४ पर सधिशतक बृहत्वृत्ति आदि
झूठा ही नाम लिख कर महा मिथ्या दृष्टी ज्ञान सुन्दर जैनाचार्य
श्री जिनदत्तसूरीजी पर मिथ्या कलंकारोपण करता हुआ
लिखता है कि जिनदत्तरि को कोई भी प्रश्नादिक
। पूछते थे तब सूरीजी चडी मगरूरी (मिथ्या घमंड ) और
खेराई के साथ उत्तर दिया करते थे। जबसे लोक खरतरा २
कहने लगे इत्यादि प्रमाणों से यतियों का १०८० लिखना
"
। (२०१} H बिलकल मिथ्या ई । समीक्षा ज्ञानसुन्दर माई की दुष्ट अभिप्राय यह है कि जिनदत्त सूरिजी बड़े घमंडी और क्राधी थे, बम उन्ही में स्वरतर गच्छ निकला है। जिनदत्तसूरीजी के पहिले " संसार में कहीं खरतर नाम का कोई गच्छ ही नहीं था इस लेख से भी ज्ञान, भाईने अपनी नालायकना प्रगट की है । जब तपा आदि मवही गच्छ वाले खरतरगच्छ को मं० १०८० में श्री जिनेश्वर सुरी से प्रसिद्ध लिख चुके हैं तो निध ज्ञान की कुयुक्तियों को कौन साक्षर मनुष्य सीकार कर सकता है राजा गलियों के समान गुरु परंपग देखकर ही निर्पक्ष विद्वान लोक पूर्वाचार्यों के गच्छ का निर्णय कर लेते हैं। ऐसे तो सैंकड़ों प्राचीन धुरंधर श्राचार्यों ने अपने अनेक ग्रन्थों में अपना गच्छ का नाम लिखना जरुरत न समझ कर छाद दिया तो क्या वे भी ज्ञानसुदरजी के ही समान नगरें और पिना गच्छ के थे । जिनेश्वरमारजी ने अपना ही हाथ से अपना खरतर विरुदन लिखा इमका मुख्य कारण यह है कि "वड़ा बड़ा ही ना करें बढ़ाने बोले चोल । हारा मुख से ना कहे, लाख हमार मोल" ॥१॥ क्योंकि खरतर शब्द का अर्थ यह होता है कि अतिशयन खरा इति सरतराः।। अस्तु व प्राचार्य श्री जिनेश्वर मूरिजी और अभयदेव सरिजी के लिये तपागच्छ की पदावली में जो लिखा है सो सुनिये। श्री सीरोही नगरे वि० सं० १११७ वर्षे विजापान सगोत्रि पर भाश श्री .
(१०२) - पृथ्वीराज हुश्री श्री मुनि चन्द्रमूरि पानी सूत्र ग्रन्थ निप- जाव्या एक इ वि० सं० १११८ वर्षे श्री अभयदेव मार प्रगट हुआ श्री अभयदव सूरिनी उत्पत्ति कह ई छ । मद पाट दमे वड सल्लग्रामई नू भर सग्गो नामि राज पुत्र रह छ । तिहा काटिक गच्छ एस्तर बिरुद धार श्री जिनेश्वरसरि विहार करता तिहां प्राच्या श्री सूरिनई देखी सिधो (सग्गा) नम्यो श्री गुमइ भव्यात्मा जाणिं उपदेश कहा। सामली सरगो वुझ्या तत्काल दीक्षा लीधी जाग्य जाणी आचार्य पद दई श्री अभयदेव नाम दीधी । अत्युन तपपत् विगयना त्याग थकी पूर्व कर्मा नुमारे दही कुष्ठ हुश्री श्री सुरि पूर्वी पार्जित कर्म अहिय मता थक्का गुजरात देशि भाणपूर गाम आव्या । पड वृक्ष हेटलि रात्री सुता सुप्नमा तपलब्धि थकी प्राधीनिमाई शामन देवी पानी कहई रुपीश्वर जाग्रत छ।। ते देव बाणी मामली सूरी करें रोग ग्रस्त नई निद्राकी हांथ की। एदवी प्राचार्य नी वाणी साभली शासन देवीई बालिका स्वरूप परी भावीनं प्राचार्य नई जिमणे हाथै सूत्रनाकोकड़ा नव दई श्रा० कहई मुझ देही समाधी हुइ उबेली स्युं । तेसा मली थी सरस्वती कहई सेढी नदी ने कठई पालांस वृक्ष हेठई चीकणी भुमि का । तेश्रहिनाणई पहिला श्री नागार्जुन योगीई विद्या सिद्ध भूमंडास्तितपिंच श्री थमणपाश्वनों स महिम्नछह तिहा तुम जाज्यो । श्री धमणपार्श्वनी स्तुती करज्यो । कीर्तना करता (१०३) ते विच मद्य प्रगट हमर तेहनास्नात्र ने जल माल गग एदेह . थकी जास्ये । पिण कोकड़ा नव तुम्ह उघेल ज्यो । म कहि व्या श्री शारदा म्ब स्थान का गया तेहना पचन ने अनुमार गांध चीकरणी भूमिइ अहिनागाइ ग्यापल वृक्ष हठली जाई श्री अभय दवा चार्य उभार ही श्रीथभण पामनी कीर्ति तद्रूपी जयनिहुअण पत्रशाई फाणफण फार फुर तम्यण १७ मुं काव्ए करिता श्री पार्म विचं भूमि का थकी तत्काल प्रगट हुप्रो । श्री मंध स्नान घोच्छ यह श्री पार्श्वना अभिपतनयो जल सूची पात्र भरी गृ'स्थः श्री आचार्यनी देही नई छाट वई करी गुरुना अंगथ की सकल रोग उपद्रव माम्या । दह तप्त सुवर्णेपम हुई । महोछ व मगल जय शब्द हो। तिणदिन ठिकाण मढी नदी भइ तरि थमण पुग्ना म गाम थाप्या प्रामाद नापजावी स. १११९ वर्षि श्रीअभादव सुरी नह हाथइथभण पुर प्रासादि श्री पामजी थाप्या तिहाथकी विहार करता श्री श्रणहिन्ल पाटाणे श्री पंचाश्वा पाम ने जुहारी तिहा चौमामि रह्या तिहार दिनाथ का एकदा गुरुने शामन देध्यादत्त न व शवना कोकडानों उपयोग प्राव्यो । तिपाई श्री सूगैई सं० ११२० वर्षि भगरती प्रमुख नव अंग सूत्रना जे सिद्धान्त तेहनी टिकानी पजापी। एहनई श्री थमण पाम प्रगट कार सं ११४५ वर्षे श्रीगोप (गवालेर ) नगरे प्राचार्य श्री अभयदेव सूरी स्वर्ग दुमा । तेह पछी केतलेक वर्षों गुर्जर देसी पानराज हुमओ विवारई - (१०४) - श्री मकल संधि मिली सप्रभाव विच जाणी सं० १९६२ वर्षे श्री खंभायत नगरे सु ठीकाणों घणे यने श्री थंमण पाई थाप्या । नीलुप्पाल समान नीलवर्ण देह धारक सकल शूद्रोपद्रव वारक तेचिंब आज लगाणि स प्रभाव छे ।। इति श्राचार्य श्री अमयदव सूरि संबंध ।। जै० साहि० सं . खं १ अक ३। ज्ञान सुन्दर भाई हिन्दी विश्वकोप देखें, लिखा है कि अभय देव मूरि वृहत्खरतर गच्छ के ४१ वे पहाचार्य थे। इनके पिता का प्रमदेव और माता का नाम धन देवी रहा । इन्होंने धारा नगर में जन्म लिया और तृतिय से एकादश तक जैनागमा का टीका ऍलिखी थी। वि० का मा० १ पृ०७४३ श्री जिनेश्वरसूरी के लिये सौ धर्म वृहत्तपागलीय श्री राजेन्द्र सूरिजी लिखते है कि निश्वर सूरि न पुं० श्री वर्द्धपान सूरि शिष्य अभयदा सूरी गुगै स्वनामाख्यात आचार्य, एतस्मादेवाऽवार्यात् स्वरतर गच्छः प्रवृत्तः । अयमाचार्यों चक्रमीये १०८० वर्ष विद्यमाम आसीत् । एतेन जावालपुर मंपित्वा हारी माद्राप्ट फटी का पंचलिगी प्रकरण, वीर चरित्र, लीलावती कथा, रत्न को शश्चत्यादि का अनेक मन्था रचिता. अभिधान राजेन्द्र भा० ४ पृ० १५०८ । इत्यादि अनेक प्रमाणों के होते हुए भी खरतर गच्चीय ग्रंथों को अमत्य कह कर विद्रोह फैलाना, यह 1 मानसुन्दरभाई की कितनी बड़ी मूर्खता है। महाजन वश मुजावली में रामलालजी ने लिखा था कि सं० १०२६ में वर्द्धमान सूरि ५०० शिष्यों परिवार महित दिल्ली पधारे उम समय वहां के राजा सोनीगर चौहान का पुत्र साहित्य कुमार वगीच में मर्पक काटने पर अचेत पडा हुअा था । राजाने गुरु के पाप आकर बड़ी नम्रता मे वीनती करी कि 'हे सन्त महापुरुष आप का दया धर्म सफल हो किसी तरह मेरा सुत सचेत हो जाय तो में और मेरा सा परिवार श्राप के उपकार से सदा याभारी रहेंगे और इम पुत्र की सन्तान जहा तक सूर्य चन्द्र इम पृथ्वी पर उद्योत करते रहेंगे वहा तक श्रापके सतानों के चरणों की मेवा करते रहेंगे, निदान मपरिवार राजा के जैन धर्म पालने की प्रतिज्ञा लेने पर प्राचार्य महाराजने दृष्टि पाम कर कमर को मंचेत किया । सर्व लोको में परम आनन्द हुआ । गुरु महा- राज को महोत्सव पूर्वक नगर में लाया और व्याख्यान सुन राजा ने मपरिवार सम्यक्त्व पूर्वक १२ व्रत लिये। विषमयी मूञ्छितावस्था से गुरु महाराज ने राजकीमार को सचेत कियाथा । अत उन्हीं की पोलाद वाले प्रोमवाल मचेती व संचेती कहाये । इस गौत्र में धोटे वा पहिले सेठ पृद्धिचन्दजी सैंधिया सरकार के खजांची थे, जिनके पुत्र गुलाबचन्दजी ने फलवर्डी पार्श्व- नाथ मन्दिर के चारों ओर गढ़ वणवाया, इन्हीं के पुत्र होरा- चन्द जी अजमेर में महा श्रीमन्त धर्मशील देवगुरु के परम भक्त है। इत्यादि प्राचीन ख्यात को श्रमत्य ठहराने के लिये अनेक प्रलाप करते हुए बानसुन्दरजी ३० ना. नि. पृ० १७ .
(१०६)
-
!
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पर लिखते हैं कि न तो दिल्ली में उस समय चौहानों का
राज था, न उम ममय चौहानों के माथ मोनीगरों की उपा.
घि थी, न उस समय बर्द्धमान सुरिका होना साबित होता है ।
समीक्षा-माधुनिक पंडितों के एकाध लेख को ही देख कर,
विद्वान यतियों के प्राचीन इतिहास को असत्य ससझ लेना,
यह ज्ञानसुंदर जैसे मूखों का ही काम है ! खैर ज्ञानसुंदर भाई
अब भी तपागच्छ वृद्ध पहावली देखें, उसमें लिखा है कि
३० तत्पट्टे श्री वीर प्रभसूरि । एचई वि० सं० ६२९ वर्षि
दिल्ली इ चहाणे हुआ । तुं अरने दिल्ली थकी नहाणे
कान्या । पुन वि० सं० ६५२ वर्ष श्री नाडोल नगरे, श्री
नेमि विवसूरिह प्रतिष्ठयों । एडवें अवमरें दंडनायक श्री विमल
प्रगट हुमो । जै० सा० म० ख० १ ० ३ ॥ प्राचीन इति-
हासों में लेख है कि पाश्वनाथ के समय में उत्पन्न हुए चौहान
कुल ने समस्त'भारतवर्ष में अपनी प्रपल प्रभुताका विस्तार
किया था। चौहान नी के ३७ वे पट्टधर सहदेवजी से दिल्ली
छूटी । देखो पृथ्वीराज रासो १० ॥ पृ० ५७ ॥ पृथ्वीराज के
भी पहिले १२ घराणों में दिल्ली का राज्य रह चुका
अपना माना हुआ नं०८टा० स० भूमिका मा० १ देखें।
वि० सं० १३२६ के पहिलं सोनिगरों की नास्ति बताने वाले
ज्ञानसुदरजी को जैमलमेर की तारीख में० १६४८ अजमेर
की छपी देखना चाहिए। पृ०१७ में लिखा है कि १०७ राब
।
-
है
ज्ञा०
(१०७)
कहर में०८१६ मरोट गद्दी पैठे, राणी ४ सोनगिरीजी १
झाली २ पुजारी ३ शोलखणी ४ पाटबी कुमर, तिणूजी हुआ।
छठे कुं० जाम के चश का पाणिया भाटिया हुआ । जै० ०
पृ १७५० १४ ऐसे ही पृ० २१ पर ११० वांपट्ट धर महारा-
पल श्री सिद्ध देवराजजी मं० ६०० गढ़ देशर, गाया १६
जिनों में १६ वी राणी सोनगरी राव धूपड़ की बेटी लिखा है ।
फिर
पृ० २३ देखो महारावल मिद्ध देवराजजी व सवलसिंहजी
ने गढ़ जालोर सानगिरों को, देरावर भानजे दहियों को मंडोर
पडिहारों को दिया । और नवकोटो मारवाड़ में प्राणफेरी,
दुनागढ़ लुद्रयां, पुगल, सातलमेर, फिरोहर, मटनेर, चीजकोट,
'मुमणवाहण, मरोट, किराड, पाटकर, राहडी, मक्खर, वगेरे
खालमे लिखे हैं । जै० त० पृ० २३ ५० ४ । तो फिर कौन
मृर्स कहता है कि सं० १०२६ में चौहानों के साथ सोनिगिरों
की उपाधी न थी । ज्ञानसुदर माई पृथ्वीराज रासो देखें ४०
वां समय में लिखा है कि पाटन का राजा भीमदेव अजमेर के
राजा सोमेश्वर को मार कर सोनिागेरा के किले में जाकर सुख
से रहा । पृ० ११५४ । तो फिर पृ० १६ पर लिखा हुभा
तुमारा मिथ्या प्रलाप कौन मानेगा। सं० १२३६ के बाद
में सोनगिरी पहाद पर किल्ला को बनाना और उसके मी पाद
में सोनागरी जाति का होना लिख कर मुख ज्ञानसुंदर ने
इतिहास का गला घोटा है । सौनगिरा जाति चौहानी में
.
(११०)
हुए जैन मदिरों में जिनेन्द्र भगवान् की प्रतिष्टा करने वाले की
वर्द्धमानसरी का सं१०२६ महीना अमंभव कोई नहीं कह सकता
एंव चौहानो के साथ सोनगरी विशेषण मी वर्द्धमानसूरीजी
के पहिले ही से था । ज्ञा० अपने माने हुये ग्रथों में न०८
टाड़ राजस्थान हिन्दी अनुवाद द्वि खं० अ ३ अच्छी तरह म
देखे वि० सं० -६८ में विद्यमान चीतोडाँधीश खुमानराय की
मदत में म्लेच्छों से लड़ने के लिये भारत के जो २ आर्य राज
महाराजे आऐ उन्हों की संक्षिप्त सूची निम्न लिखत है
गजनी से गिहलौट आये । असरि के टाक । नादोल के चौहान,
राहिर के चालूक, सेत वंदर के जीर केदा, मडोर के खैरावी !
मागरोल के मछवानी ( मीना) जेतगढ़ के जोडिय तारगढ़ के
खेड, नरवड़ के मछवा ( मीना ) सचोर के कालम जूनागढ़
के जादव अजमेर के गौड, लौदरगढ के चान्दा, कसौदी के
डांडर, दिल्ली के तुवर, पाटन के चांगडा जालोर के सौनगडे,
शिरोही के देवरे, गांगरोन के खींची, पाटरी के झाला जैनगढ़
के
दुमाना, कनोज के राठोर छोटियाला के वल, परिनगढ के
गोहिल, जैसलमेर के भाटी, लाहोर के बूमा ( मीना ) रौनिजा
के सांकला, खैरली के शिरहट, मंडलगढा के निप, गजोड़ के
बंड गूजर, सीकर के सीकरवार, उमरगढ के जेतवा, पानी के
चार गोते, खुनतरगढ के जागजा, जीरा गांव के खरबद आये
पुं० १११ अन्यमतावलंपी गृहस्थों की गणों के आधार महा
जन वश, मुक्तावली की अमत्य समालोचना कर ज्ञानसुन्दरजी 'न अपनी हार्दिक दुष्टता प्रगट की है। जैन इतिहाम के ममान जन शास्त्र भौर वीर शासन को भी यह मूढ झूठा समझता है। तभी तो पाश्वनाथ और रसप्रभुमूहिके नाम से जुदी खीचडीपकाई जाती है कमला गच्छ अपना इमलिये बताता है कि उसमें अपनी पोल ग्वालन बाला अम कार्ड माधु नहीं रहा । मचती वगैरह मई मोमवाल तथा श्रीमाल और पोरवाडौं को अपना गच्छ में इमालय बताता है कि यह लोग इसको अपना गुरु मान कर अपनी बहू बेटियों को हमके पास भेजते ।कुकर्मों को छुपाते और हजारों रुपये ठगाते रहे परमभी जैन मूर्व नहीं है । जो ममकदार होते हैं व प्राचीन निस्पक्ष लेगों को देख कर सत्या मत्य का निर्णय करजते हैं। हम जैन जाति निर्णय नामक पुस्तक में बानसुन्दर माई न एक भी प्रमाण ऐमा नहीं दिया कि प्राचीन ग्रन्थों में जिस का कहीं नाम निशान हो, आप लिखत है " कि वीराद ७० वर्षे प्रोशिया नगर में प्राचार्य रत्रप्रमरी १८ गौत्र में १० वा गात्र मती स्थापन किया । संचती गौन की यशापली आज तक उपकेश कमला गच्छी लिखते आगे है जहां पर कमलागच्छाचार्यों का विचार न हुआ वहां कितनेक मचेती क्रिया तपा खरतरा दृढिया, तेरापथियों करने लग गये हैं । इनमे उन जाति का मूल गच्छ बदल नही सकता सीतयों का मूल गच्छ तो कमला गन्ध ही है । यत्तियों की गप्पों ने .
(११२) . -- पर कोई संचेती विश्वास न करेगा" जैन. जा.नि.पृ० १७॥ समीक्षा जैन यति संगृहीत प्राचीन इतिहासों को तो ज्ञानसुदरनी गप्पो ठहराते हैं और अपनी कल्पित बातों पर झूठा विश्वास देकर भद्रिक जैनों की खरतर समाचारी छोडाते हैं । ज्ञानसुन्दर माई की यह कितनी बड़ी भारी जबरदस्ती है । अनेक विद्वानों ने निश्चय कर लिख दिया है कि औमवाल जैन बणि विक्रम की दशमी शताब्दी में बने हुए हैं। इसमे पहिले ओसवाल महाजनों का कहीं पता नहीं वीर ७० वर्ष तथा २२२ की सब बातें निमूल है विक्रम से ४०० वर्ष पहिले जैन धर्म में यदि कोई ऐमा प्रभा- विक आचार्य हुआ होता तो जैन शास्त्रों में उसका नाम आये विना कभी नही रहता था शास्त्रकार जैनाचार्य ऐमा कृतम नहीं है कि एकैक नगर में लाखों मनुष्यों को जैन बनाने वाले परमोपकारी ४ ज्ञान १४ पूर्ववारी धर्मगुरु का नाम तक न लें। पं० राधावनमधीसुलाल लिखते हैं कि विक्रम से ४०० वर्ष पूर्व तथा २२२ वर्ष पश्चात् दोनों ही गलत है। मान लिया जाय कि श्री महावीर के ७० वर्ष बाद आचार्य रत्नप्रभ सुरि ने आसिया नगरी उम समय का प्रचलित नाम (उपकेश) पटन में ३८४००० घरों को जैनधर्म धारण कराया, तो निम्न लिखत मवाल उठते हैं:- (१) जब भोमियां का उन दिनों का नाम उपकेशा पट्टान या तो उस नमर के रहने वालों का नाम उपकेशवाल आदि -- . (११३) न पडकर ओसवाल क्यों पडा १ प्रोसवात शन्द तो भोसिया वाल का अपभ्रंश है। (२) इतिहासज्ञों के मतानुसार जैन धम के दो विभाग (श्वेताम्बर भौर दिगम्बर ) लगभग वि. पहली शताब्दी के बाद हुए थे फिर क्या कारण कि मोस- वाल मिर्फ वेताम्बर मत वाले ही पाए जाते हैं दिगम्बरमत पाले नहीं? जर कि मोमवाल पहिले बन चुके भौर जैनमत के दो विभाग बाद में हुए तो यह मुमकिन नहीं कि ३८४००० घरों की संतान सन की सर श्वेताम्बर ही रही हो। अनुमान से संच बात तो यह जती है कि यह प्रोसवाल जाति लगभग १० नीं शताब्दी के बाद चनी । भोसिया नगरी तथा मोमवान शन ज्यादा पुराना नहीं है । इतिहासज्ञों के मतानुसार यह जाति स्वामी शंकराचार्य के पाद में बनी भोर जैनमत के दो विमाग हुए के भी मुद्दत बाद में बनी है। इससे यह न समझना कि पोसवाल होने के पहिले जैनमत था ही नहीं, या जैनमत के मरम्म होते ही प्रामवाल जाति बन गई । जनमत तो पुराना ही है इससे हमें कोई वहम नहीं-हमारा कथन तो सिर्फ यह ही है कि पोसवाल जाति जब शकराचार्यजी के वैदिक धर्म प्रचार । से अन्य म धर्म लोप से हो गये थे उसके बाद में बनी है दा. ग. ३४-३५१.उ० रामलालजी गाण लिखते हैं कि जैन धर्म में श्वेताम्बर, दिगम्बरचार्यों के रचे लाखों ग्रंथ हैं। किमी ने भी १८ गोत्रस्थापक रनममसार का नाम निशान
तक नहीं लिखा है, नास्ति म्न कृतो शाग्वा । अम. नि. पृ.६
तुमने ३ लाख ८४ हजार अभियां में प्रामवालों का होना
किम प्रमाण मे लिख डाला। अपत्याक्षे नि. पृ. ३१ ॥
सत्य वारता तो यह है कि खरतरादिगच्छ के वा भौर गच्छ
के महान् अचायों ने प्रोसंवाल जाति बनाई है। शंकराचार्य
के जुल्म गुजरने के पीछे विक्रम के नौमो (६००) वर्ष व्यतीत
होने के पीछ शिला लेख, मूर्ति लेखों में आसवाल जाति का
नाम लिखा पाया जाता है। इस समय उपकेश वा कुमलागच्छ
में कोई रत्नप्रभसुरि श्राचार्य नहीं हुमा । असत्याक्षेप
नि पृ.६ ।
कमलागच्छ के महात्मामों के सचेतियों की वंशावली
लिखने मात्र से भी संचेति कमलागच्छ में नहीं हो सकते
कारण-अपनी आजीविकार्थ ममी जातियों की वंशावली
महात्मा (मधेरण) सेवक, जागा, भाट पुरोहित, चारण विगेराह
लोग लिखते रहते हैं अपनी पोथी वृत्ति आदि को गिरवी
रखते, और एक दूसरे को बेच भी देते हैं। मंगण जातियों की
नजीरें देकर ज्ञानसुंदर ने अपनी हंसी करवाई है। मूर्ख बान
मुन्दा को पूर्वा पर विरोध का भी ख्याल नहीं रहता । यहा
तो लिखता है कि कमलागच्छ वालों, का जहा पर विहार
नहीं हुमा यहां के संचति तपासरतरादि हो गये। और
पृ० १५ चे पर लिखता है कि उस समय उपकेश (कमला)
च्छ के हजारों त्यागी वैरागी मुनि भृमडल पर विहार करते थे। ला ऐमा कमी होमकता है कि पंचति श्रावक त्यागी वेगगी पौर अपने उपगारी गुरुमों की समाचारी छोड़ कर दमरों के च्छ में चले जावें । दर अमल में ज्ञानसुन्दर का लिखना ही पदा मिथ्या है पिना पूर्ण मति के कागज काले करना मूखों 61 काम है। ज्ञानसुंदर भाई को यदि सत्य की खोज करनी को तो बीकानेर में बड़े उपामरे का प्राचीन मडार देखें। श्री ज्यों के पुगणे दफ्तर में लिखा हुआ लेख ज्यों का त्यों यह । अथ संचिति गोत्र उत्पत्ति लिख्यते । . प्रथम उत्पति चाहुआण राज कुली छे । चहुआणारी उत्पत्ती वर्णनं । मैव प्रचड चार मुख, रक्तवर्ण चतुरंग। अनल ऋडे उपज्यो । अवश्य ब्रह्मारे प्रमग ॥१॥ हि वे चहु प्राणारी २४ स्वाप १ हाडा, देवड़ा, सोनगरा, मालडीचा, खींची, पीहल, उदणेचा, बेडा, बालोत, चीया, काचा, कैभट, मेलवाल चालीचा, मान्हण, पावैचा, कांपलेचा, रापडिया, दुदणेचा, नाहर, ईचरा, राकसिया, बाघोडा, साचारा, २४ । श्लोक श्राकाशे तार. का सख्या नृणा संख्या महितले गायां मालु का संख्या । चहुआण संख्या न विद्यते ॥१॥ सोनगरा चहुओण यी सचिती गोत्र थपाणो . 'राजा धर्म मिन्यो। कवितः-संवत् दश छायीसमा मास शास्त्र सवाई । गुरु . ( ११६) पुष्प नोमी संयोग कुमरजीवत देखाई, मद्य मागहु छोर थापक फुलवट गही सारी । वोहिथ कुमरसजी गुरु वचन एहु मन धारी। श्री वर्द्धमानसुरिाखे वचन मचिति गात्रज थपियो । ग्वस्तर गच्छ रह जो तुमे । यह वचन मुनि जप्पियो ॥ १ ॥ चाहिध मोईई हाथ सुंगुरु आगे हितकारी फरमामो मन आजति के सहु करु संभारी । अवरदेवं सहु छोर मन नपकार ही जप्पो । यह चालो कुलरीति गोत्र संचिती थप्यो । माता सचाय मानों सुमे । भवरदेव मत मानजो । कुलरी वृद्धि थास्मे अधिक। यह रीति सत्य जाण जो।।२।। संवत् १०२६ वैशाख सुद६ नोभी गुरुवारे पुष्प नक्षत्रे संचिति गौत्र थाप्यो। गोत्र जाचा मुडा अपर' सच्चि का गोत्र जारो लागनालर १ करदो हाथ १ सुपारी घृत सेर १ लापसी मेर १० नीकरणी। नोने वन्ज सुं पूजीजे। वेशास सुदी गुलटाक २१ आसोज सुदी हतिलचट वाकुला खेत्र पालने जीजे | इति पाना १० अपनी अज्ञानता से चाहे संचेती भाई भी खरतरगच्छकी सुविहीत समचारी छोउदें परन्तु जो समझ दार होगा वह व्यभिचारी ज्ञानसुंदरकी गयों पर कमी विश्वास न करेगा। संचेती, चौधरी, गांधी वेगाणी, कोठारी, सोनी, संघवी, भादि ४४ गोत्र के मोसवालों को संचेतियों के भाई (एक बाप की पोलाद ) लिख कर तो. मूढ़ ज्ञानसुदर ने अपना प्रत्यक्ष मृषावादीपना जाहर किया है। कारख-उक्त गौत्रवातों में, सैकड़ों वर्षों से बेटी व्यवहार पत्ता मारहा है। -
(८११७ )
कम्पित वंशावलीयें ना कर अज्ञ प्रोसवालों को पाप मार्ग
में, लेजाने और जैन मंख्या घटा देने के लिये ज्ञानसुंदरजी ने
बड़ा भारी धोका दिया है । जिम गौत्र के साथ भाईपा का
कुछ भी संबध नहीं था, वहा भाईपा बना दिया । और जहां
भाईपा था वहा भापस में सगपण करवादिया है। हमारे
पाठक वृन्द जैन जाति नि. द्वितीयाक पृ० ७१ से ७८ तक
देखें । क्या कोई समझदार प्रोसवाल, यतियों की बातों को
नहीं मान कर मूर्ख ज्ञानसुंदर की मन घडत बातों का
विश्वास करलेगा। अस्तु भागे इमी पृ० १७ पर वरढीया
जाति के बावत उ० रामलालजी के नाम भूटा लेख, रना कर
धानसुन्दर ने जैनों को बड़ा धोका दिया है। मैंने महाजन वंश
'मुक्तावली की दोनो भावृत्ति मच्छी तरह से प्रायोपन्ति देखी
लेकिन कहीं नहीं पाया कि (सरिजी ने लक्ष्मण को धन बता
कर तीन पुत्र भी दे दिये । वरदीपों के घर में पुत्री जन्मेगी,
वह सुखी न रहेगी । लक्ष्मण के मकान की भीत स्पर्श करने
से रोग चला जावेगा) नकर में अकल मिला कर,
कागज काला कर डालना या महा पापियों का ही काम है।
सैर भागे पृ० १८ पर ज्ञानसुदरजी लिखते हैं कि-" इतिहास
की तरफ देखते हैं तो दोनों पतियों का लेख निर्मल मिया
है। कारण वि० सं० ६५४ में न तो धारा पर राजा भोज का
राज था. न मारा तुमरों ने बीन ली भी । न उस समय पर
--
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(११८)
दिया जातिहई थी। ममीक्षा:-ज्ञानसुन्दर भाई ने इतिहास और
नैनों की वर्तमान दशा की तर्फ यदि देखा होता तो वह मिथ्या
बातें लिख कर जैन जातिनिर्णय के नाम से ओसवाल जाति
को कमी धोग्या नहीं देता ।और न महाजन वंश मुक्तावली को
झूटी कहकर जैन ममाज में विसव मचाता। बिना गुरु गमके
ऐतिहासिक पुस्तकों को देख ज्ञानसुन्दरजी ने कस्तुरी के भरोसे
कोयल खाय निधि ज्ञानसुंदर को इतना भी ज्ञान नही कि
प्राचीन आचार्यों ने विक्रम संवत् सनंद और अनद दो प्रकार
से माना है । मालव संवत् में मे ९१ वर्ष नंद के बाद करदेने
पर शुद्ध विक्रम । अनंद ) संवत होता है प्राचीन इतिहास कार,
कवि और ज्योतिषी लोकों ने इस अनंद संवत् को ही विशेष
मान दीया है यथा एकादस से पंचदह, विक्रम साक अनद
तिहिरि पुजय पुर हरन को भये प्रिथिराज नरिंद ६९४
घृथ्वी रा. रा. श्रादि पर्व ॥ वर्तमान में अनंद की गौगणता
और सनद ( पूर्ण मालव ) संवत की मुख्यता हो गई है।
नितान्त प्रज्ञा पिचार ज्ञानसुन्दर की कौन कहे पूर्व कवियों के
इस अंनद विक्रम संवत् के न समझने ही के कारण रेउ और
ओझादि बडे २ विद्वानों ने भी भूलखाई है । मेरा यह कथन
कहां तक सत्य है ज्ञानसुन्दर माई काशी नागरी प्रचारणी
समा का छपा पृथ्वी राजरा सा पृ० १४० देखे । महाजनवंश
मुक्कावनी के ९५४ वर्षों में ही प्रचित करने पर १०४५ होते
।
(११)
है ठीक रमी समय तृतीया भोज धारा के सिंहासन पर बैठे थे।
भारत के प्राचीन राजवश मी १ पृ. १११ मे १२० तक
ज्ञा० माग्दै खोल कर अच्छी तरह में देम्बे' गजापन पर बैठने
के समय भोज १५ वर्ष का था वि. स. १.६६ में वह महमूद
गजनवी से लदा था । मंवत् १०७६ में वर चोलुक्य
नयमिह में हारा था । ५५ वर्ष ७ माम और तीन दिन उमने
राज्य किया। जैन इतिहामों और यतियों को झूठ ठगने के
क लिये केवल १०६९ ही भोज का समय लिवकर ज्ञा० ने अपना
धूर्तता प्रगट की है। खेद है कि ज्ञानसुन्दरजी अपन हाथ में
रही हुई पुस्तक को भी नही देखत "लिखा है कि मालिन्यतर्हि
कस्मादनु मवसि, मिलक जला लवी ना, नेत्राम्भो मिः,
किमा सासमजनि, कुपित:" कुन्तल दोणि पाल भर्थात् ममुद्र
नर्मदा में पूछता है कि तेरा जल काला क्यों है उत्तर में नर्मदा
ने कहा कि कुन्तलेश्वर के हमले से मरे हुए मालवे बालों
की स्त्रियों के कजल मिश्रित आसुओं के जल में मिलने में
मेरा जल' काला हो गया है। इससे मी सूचित होता है कि
उस समय कुन्तल के राजा ने मालवे पर चढाई कर भोज को
हराया था। मा• प्रा० ० मा० १.११४ तोमर कुन्तल दोनों
शब्दों का एकही अर्थ होता है । सस्कृत का बोध न होने के
कारण शानमुन्दर माई के पयार्य चाची शब्द समझ में न
आये और गुरु पिना गोबर खालिया है खैर अब परदिया
नाति का प्राचीन इतिहास देखिये। लेखच्यों कात्पी यह है।
। (१२०') अथ पर लब्ध गौत्रस्य मूलोत्पत्ति लिख्यते । पूर्व श्री विक्रम संवत्सरात् १०७३ वर्षे भोजराज परमार वंश ज्ञातौ श्री सूर्य मंशीय । धारा नगरयों सर्गलोक नगात दाती मरै बल बत्तरः भारा राज्य गृहीत तदनुमोज वशीयः निहंगपाल, तालण पाल, सेजपाल, तिहअणपाल, अनंगपाल, पोतपाल, गोपाल, लक्ष्मणपाल, मदनपाल, कुमारपाल, कीर्तिपाल, जयपाल प्रमुखा राजपुत्राः मथुराया मागता । तस्मादते माथुराः कथ्यन्ते । किगद् वर्ष गते गोपाल लक्ष्मणपालो द्वौ भ्रातरी केका ग्रामी गती सं० ११०२ वर्षे श्री मथुरायां श्री पार्श्वनाथ यात्रार्थ श्री वृहद गच्छीया नेमीचंद्र सूरय समागता गुरुवस्तीर्थ यात्रा कृत्वा चलितास्ते केकई ग्रामे समागताः । लक्ष्मण पालस्य गृहे व सत्यर्थ गतास्तेन स्थापिता माम कल्प याबद्र विताच गुरुवः । परिचया जैन मार्ग शृणवन् जैन धर्मी जातः। कदाचि ' लक्ष्मणपालन संरय पृष्टाः स्वामिन मुत्रतीर्थ यात्रा कृतासती महते फलायस्यात् । गुरु मिरुक्तं । जैनमते चाष्टपष्टी तीर्थानि सति परन्तु सर्वेपा तीर्था नामध्ये शिरोमणि श्री शत्रजयस्तितत्र यात्रा कृतासती महत्पुण्या स्यात् । एतद नगुरो चव श्रुत्वाः स परिवार संसघोलक्ष्मणपालः गुरु मिस्साई यात्रा कृतवान् । महा ,व्य ध्येयोकृतः । 'संघवी पर्द' गुरुणा सध समच दुत्त । लक्ष्मणघनी जात । पुन 'गुरु मिस्सह मधुरा याम प्रयागता कदाचिन - पुनः गुरमो विज्ञप्ता । भरत प्रमागद, सुलब्ध जन्मा, पुन्य। माग जातास्मि । परन्तु मंताने नाविना, चेनो हत्या भन्यो स्ति । गुरुरामा शुनज्ञानोपयागे नोक्त । भो मंघाति लक्ष्मणपाल: तर गृहे यो पुत्राम विष्यन्ति । तेभ्यस्तर फुल बाद्धे भविष्यति । त्वयाचित्तभ्य बाराी माकृथाः इत्युक्त्व गुरसोऽन्यत्र विहना । मघवी लक्ष्मणपाला गुरुचमि सप्रत्ययो मनस्यानद मुद वहन् गृहेमतिप्टस्तस्य पुत्रत्रेय जात जमोधर नारायण महिचन्द्रश्च । अनुक्रमण परिणी तास्ते। अन्यदा, नारायणसपनी गुपिणि माता । प्रथम प्रसवार्थ स्वपितुः गृहंगता । क्रमणं प्रसवकाल ते नैका पुत्री, नागपो पुत्रश्च जनितः । तददृष्ट्वा सघवी लक्ष्मण पाला द्याश्चकिता कि मेतदिति इति स्वरूप सर्वान् जनान् पृछतिस्म । परतत् स्वरूप सत्यं न कोपियक्ति । यास्मन्न वर श्रीने पीचद्रमरीणाशिघ्या श्री नयनचन्द्र मुग्यः समागता । गुम मक्तया मं. लक्ष्मणपलिन वदयित्वा नागस्वरूपं पृष्टवान् पिना गुंग भूरभिः सूरिभिः शमय छेतु नयिन्ति गुरु भक्त,' अयोगजी वस्ता भ्राता गोपालस्त वोपरि जैन धर्मागी करणन यात्रा करणेनच तब प्रसिद्धि महात्म्य मममानः आद्रध्याना- न्मृत्वा नागपो मनुजो जोतोस्ति । एतद गुरु वचः श्रुत्वा सोपि नागरुपधारी मनुनेः जाति स्मृति प्राप्य वैरत्यक्तवान् पुन: गु निरुक्तं अयनागजीर गरशे गोत्र स्थाप कोऽनु कमणे भनिगति । गुरमोऽन्यत्र विजह तज्जुगल यथा पंचत्व- (१२२) मापत दाह । निशासमयेम नागः प्रत्यहं चूल्हक पाश्वेशते । अन्यदाशीवात्तों नागो भवितव्य वमात् कद्प्ण रक्षा मध्ये शयितोस्ति । प्रारास्तद भगिन्यातद व्यति करम नानंत्या चून्द के चाग्निप्रचितस्तत्तापन यहि मृत्वा व्यन्तगेड ननि नागरुपेण मन्यन्तरस्त त्रागत्य भगनी धृस्कृतवान यदा सव्यन्तरो समितदा संघपति लक्ष्मणपाल गोत्र पुत्र्योन सुग्विन्यो भविष्यति । न तथा चेत्तदाशरीरे केचिक्षणं भविता । अस्मिन्न नमरे देवो ज्ञात्वा वहयो लोकास्तत्रमिलिता स्तन्मध्यादकेनचि स्कटि व्यथावता प्रोक्तं । भोस्त्वं देवोस्पिदा में कटिव्यथाम पहर । नागेनश्रुत्वेदं प्रोक्त । मच्छरीर स्पर्शण तब कटि व्यया स्थाति । तदैव तमागशरीरे म्परीण तस्य कटिव्यथा गता । तदा संघपति लक्ष्मण पालेन चितित । नाम शरीरं कियत् कालंस्थास्यति । परमस्या वाचा गद्यते । इति विमृ श्योकं भोव्यन्तर यदि नागजीव सत्य मे तद्वाचन प्रवर्तते । तदाम पौत्रस्तं मा पिता महं. किदास्यसि । देवे सतुष्ट नाम प्रसिद्धिः । देवात् सं० लक्ष्मणस्य बुद्धिरले नवदत्तं । सस्कृते बर लब्धं गोत्रं स्थापितं । पुन देवेन किं वरदत्त । भो संघपत्ति लक्ष्मणपाल । तवसतात, कर स्पर्शण कटि व्यथोपशम भावी । नागोपद्राथन भविष्यति इति वदत्त इत्यु क्त्वा स्वस्थानं गतो देव तस्मिन् समयेतद् भगिनी विकृता सती हणा, भ्रातुईत्या ममलग्नेति मत्या, नागपाशन मृत्वा व्यन्तरी जाता । सापि -- (१२३) - 1 में तेषां प्रत्यदी भूय, भूपाल स्वगोत्रनं नामानाच्य, मां पूजां गौर प्रबत्तितवती । श्री वरलन्ध गोत्र भूवाल गौत्रजा ब्रामी ग्राम जाना, पूर्व पामार चशीय माथुरिया नाम अमीत् । संघवी लक्ष्मणस्य मार्यानाम धानी । तस्या पुत्रास्त्रय यशोधर नारायण महिचंद्रश्च पुनः त्रयाणामपि भातृणामते त्रयोपुत्राः । धनपति दोदालाश्च एतेदादा एतणी दुलही सरस्वति एतदादी सप्तप्रतिमा कागपिता प्रसाद स्फुटिका। पूर्वतु नागपुरे वास्तव्याः। कालेपतिते सती दागिरोगना । पुन: ० महीचंद्रमा० रुप्पिणी पु० धनपती रजिनदेव नामानौद्वौभ्रातरौ । स्वनगरं गन्तुकामोमार्गे मडपा चलेस्थितो । तत्रकियद्वपीणि स्थिता के चिन्नागपुरे समागताः के चित्तत्रैव स्थिता । इतिवरदी यागात्र उ० लिखित मिदं ५० मान धर्म मुनिना स० १३५५ वर्षे धी रस्तु । पाना नं. ३०॥ । . . हमारे पाठक इस लेख से निश्चय कर सकते है कि किसका लिखना कहा तक मत्य है। ज्ञानसुदर भाई बीकानेर पढ़े उपाश्रय के भडार में जाकर अब भी इस साढे छ सौ वर्षों के पुराने - लेख को जरूर देखें । पिना किमी प्रसिद्ध प्रमाण के, प्राचीन 'इतिहास की, कतल करते म्लेच्छ ज्ञानसुंदर को शरम न भाई। (ले० जा. नि० प्र० पृ० ७ज्ञानसुदरजी लिखते हैं कि "यतिजी ने खरतर श्री पूज्यों या बड़े उपाश्रय का नाम लिख जनता को धोका दिया है । दरियाफत करने पर ज्ञात हुना कि न तो (१२४) एसा गप्पों का खजाना श्री पूज्यों के पास है । न नहा उपा श्रय में है। सिर्फ उक्त स्थानों को कलंकित करने को ही नाम लिख मारा है । यह कहना भी आते शयोक्ति न होगा कि यतिजी ने जैनों का इतिहास नहीं लिखा पर जैन इतिहास का खून किया है समीक्षा:-धिकार २ पापी तेरी सात पीढ़ी को। नैन यति ही यदि जैन इतिहास का खून कर देगें तो, किर जैन धर्म के रक्षक ही मंसार में कौन है। ज्ञानसुंदर ने अगर प्राचीन इतिहास की कुछ भी दर्यापन की होती तो वह यतियों का इतना तिरस्कार कमीन हीं करता। जैनशास्त्र कहता है कि यति मान्यों यात सैच्या यति पूज्या मनीषिभिः । शत्रुज, म. सच पूछो तो जैन धर्म ही यतियों में है । यतियों ने ही सबद्दी को जैनी बनाये थे। जिस दिन यति न होंगे जैन धर्म उठ जायगा। यतियों से मेरा कुछ लेना नहीं है, और न ज्ञानसुंदर पर द्वेप है, मगर सच कहना पड़ता है। कि महाजन वश मुक्तावली जैन की जड़ है, इसको काटने वाला जैन धर्म को नष्ट करदेना चाहता है । इसमें ऐमी कोई बात नहीं लिखी गई कि किसी के धर्म गच्छ, या दिल पर आघात पहुंचे । दोनों आवृत्तिये मैने अच्छी तरह से देखी । इसके सभी लेख सप्रमाण सिद्ध है, जिनों को यथा प्रसग स्थान देता रहूंगा । इसके विरुध में किसी प्रमाणिक और प्राचीन ग्रयों के पाठ ज्यों के त्यो, -शिला लेख मय फोटु न ।
देकर केवल नाम मात्र से लिख महा मृपावादी ज्ञानसुदर,ने जेन जनता को बड़ा धोका दिया है । पृ० १८ पर श्राप लिखते हैं कि " वि० सं०० ६५४ में धारा पर भोज का राज तो क्या परतु भोज का जन्म भी नही था । और भोज के पीछे तुंवरों का राज भी धारा पर नहीं हुआ था । न जाने यनियों ने नशा के तोर में ऐसा श्रमत्य लेख क्यों लिखा हागा स्यात् परड़ियों पर हुकुमत चलानी होगा-कि तुम्हारे पूर्वजों को हमारे प्राचार्यों ने धन संतान दिया था" समीक्षा-हे पापी तु अपना,माना हुआ इतिहास तो जरा आँस खाल कर देख । टाड़ रा०.। स० ११० ६ पृ० ४७ में धारा पर, परमार कुल में भोज नाम के तीन राजा लिखे हैं। पहला भोज वि० सं० ६३१ मा.७२१ और तीसरा ११०० तक। तो फिर कौन सूर्य कहता है कि उस समय भोज का जन्ग ही न था। पढ़ भाषाओं का, बिलकुल ज्ञान न होने की के कारण मूर्ख ज्ञानसुदर को महाजन वंश मुक्तावली के शब्द समझ में न आएँ । तोवर तोमर शब्द का अपभ्रम है । जिस का अर्थ भालों, से लड़नेवाली क्षत्रिय जाति विशेष होता है । प्रमाण यह पहले लिखतो चुका कि-तोमरः बल- वत्तौ घाराराज्य गृहीतं । श्री० द० । कृषित. कुन्तलक्षोणि- पाला । भा० प्रा० रा. 1 जैन धर्म में सामान्य गृहस्य को भी, भाग, तमाखु, गांजा, चर्श, मद्य, माजुम, प्रादि सर्न नशे
-
--
(१२६)
।
मात्र की शरस्त मना है । तो फिर जैन यतियों को नशेबाज
लिख कर हीलना करना यह ज्ञानमुदर की नालायकता नहीं
तो और क्या है। हमारे जैनाचार्य न धन रखते थे और न
संतान पैदा करते थे, उन्हों को धन संतान के देने वाले
लिख कर नालायक ज्ञानसुदर ने अपनी हार्दिक दुष्ठता प्रगट
की है । व्यभिचारी ज्ञानसुंदर को मालुम नहीं कि त्यागी
महात्माआ की शुमा शीप मात्र से ही आस्तिकजनों की
मनो कामनाएं पूर्ण होजाती है । आगे पृ० १९ पर ज्ञानसुं
दर लिखता है " नगर के लोगों का अहोभाग्य है कि लक्ष्मण
की भीतही उनके लिये हकीम बनगई । न जाने विचारे वैद्य
हकीमों का क्या हाल हुश्रा होगा । दरसल परडियां जाति
नागपुरियां तपागच्छ के श्रावक है । सपी:-नास्तिक ज्ञा.
को मालुम नही कि देव शक्ति में अचिंत्य प्रभाव होता
एक भीत ही क्या वह कहो जिस चीज को छुमा कर शारी-
रिक सब रोगों को मिटा सकते हैं। शान्त मूर्ति जैन गृहस्थी
के आश्रम के पास रहने पर भी प्राणी मात्र के त्रिताप अवश्य
मिट जाते हैं। मीत हकीम क्या होगी यह एक प्रकार का
बोटका है । मैंने खुद देखा है कि बीकानेर में जिम किसी के
कमर में चणक चली जाती है तो वह सक्स सोभागमलजी
चरदिया के पास चुपके से आजाते है तब वह उनकी कमर में
लात या मुक्की नमा देता है तो उमी दम आराम होजाने के
।
(१२७)
माण वह सता हुआ चला जाता है । अगर कोई परडिया
वक न मिले तो उन्होंके घर की दीवार पर जोर से अपनी
मर पिछाटने से भी जरूर चणक मिटजाती है । ज्ञानसुदर
गई बीकानेर जाकर जरूर इसकी तहकीकात करलें । प्रत्यक्ष
का प्रमाणातर देने की कोई जरूरत नहीं रहती । जब खरतर
च्छ के श्रावकों में भी इतनी मान्मिक शक्ति है तो फिर
उन्होंके धर्म गुरुयों में कितनी बड़ी शक्ति होगी । ज्ञानसुंदर
बाई विचारें।
उन्हों की हालत पर खेद प्रगट करते हुए ज्ञानसुन्दरी
घ हकिमों का तो भला चाहता है। और परडियों की गुरु
पग गत ममाचारी छोरा कर सरतगच्छ को नष्ट करना
बाहते हैं। यह दया कमी | पृ० १९ पर आप लिखते हैं कि
नागपुरिया तपागच्छ का श्रावक पुनड येष्ठि ने विक्रम की
२२ वीं सदी में सिद्धाचलजी का बड़ा भारी संघ निकाला
मा वहा पर चक्रधरी देवी ने वरदान देने से वरडिया जाति
ई है, समीक्षाः खेद है कि .मूर्स ज्ञानसुन्दर को समय का
मी बिलकुल ज्ञान नहीं है । अभिधान राजेन्द्र मा० ४ पृ.
२२८३ पर लिखा है कि चैत्रवाल गच्छीय श्री देवभद्रसरि के
पाम विधी सहित उप सपत ग्रहण कर श्री जगचन्द्रसरि ने.
वि० सं० १२८६ में आचामल तप से तपानाम पाया यथा-
श्री चैत्र गणाम्मोपो, विध् पमादेवभद्रगाणि मिथात् 1 . उप
(१२८) - जो संपन्नाचरणं, विधिना मंवेग वेग युताः ॥ आचाम्लाख्ध तपोभिग्रह वन्तो व्यधु वियूतमला। शरं करटि तराण (२२८५) ब, ख्यात स्तत इति तपागच्छः । फिर पृ० २१८५ पर लिखा है कि-तपागच्छ पु० घोर तपः कारित्वने तपाविरुद्ध । प्राप्ताज्जगचन्द्रमरिः प्रतिष्ठित गच्छे तपाइति शब्द स्तपार्थ : को देशी प्रसिद्ध तपागच्छं ही जब विक्रम की तेहरवी शता- ब्दी के मी ८५ वर्ष जाने के बाद में हुमा है तो फिर उनकी शाखा 'नागपूरी तपा' १२ वी शताब्दी में कहा मे श्रागई । चाप के बिना भी क्या बेटा और गुरु के बिना कोई चेला हो सकता है । स्यात् नगुरे ज्ञानसुंदर के ही समान स्वतंत्र नाग- पुरी तपागच्छा कोई पहेली से अलग हो तो उमका ठीक प्रमाण : देना था । इधर उधर की झूटी बातों से कागज का लेकर जनता को धोका देना यह सज्जनों का काम नहीं । मिद्धाच- लजी का संघ तो सभी धनिक गृहस्थ निकालते है और उन सन को ही.देवी चंवरी । वरदान देती है। तो फिर जैनी मात्र को वरंडिया जाति न होकर अकेले पंदड की ही क्यो हुई । नागपुरी तपा सहीत ज्ञानेसुदर में यदि सत्यती का कुछ भी अंश, हो. तो वे खरतर यतियों से पुराणी ठीक सबूती दें, कि जिमको वरडिये लोक मान लें।'जमाने के कारण पात्र' कल पवित्रा हिन्दः धर्म को भी छोड कर लोक गो भक्षक होते जाते है । मै वरंडियों का पता नहीं पकडता कि आप लोग' - , . - - । (१२) तिर ममाचारी न छोड़ें । परन्तु मलाइ यह है कि ज्ञान- न्दिर जमे धर्म धूर्तों के कहने में प्रोकर वे लोक अपने और संगों के उपगारी पुरुषों में मुव न हो । खरतर तथा दोनों हिद्छौंय एक है इन्होंको मिन्न समझने वाले ज्ञान सुन्दर मे ' मृढात्माओं की दृष्टि में फर्क है। मृर्व वणियों को मालूम नहीं कि जैन धर्म केरल चीतरागावस्था में ही है। लिया क्रियानों में झूदा ही फी डाल कर एक दूसरे को फूटा करने वाला समय का अजाण है । जै० जा. नि. पृ. ६७ ज्ञानसुमानी नियते हैं कि "क्या' यतिजी को यही विश्वाम था कि कमी को निर्णय काने नाजा मिलेगा भी नहीं । खरतरगच्छ की किसी भी प्राचीन पट्टापली या ग्रन्थ में यह नहीं लिया है कि नेमीचन्द्रूसारे, वर्धमानमुरि जिनेश्वर- सुरि जिनरल मसुरे ने कोई नया जैनी' बनाया हो। ममीः-- ज्ञान मुदर भाई ने यदि निर्पक्ष भाव मे थोडामा भी निर्णय किया होता नो यह कभी नहीं लिखता कि उक्त आचार्यों ने कुछ भी उपकार न किया हो। खैर अंग भी सरतरगच्छ के यतिषों से शास्त्रार्थ कर निर्णय करलें । नेमीचन्द्रमुरि ने पर- डिया कोचर'आदिका के पूर्वनों को प्रतिबोच कर श्रोमपानी में मिलाये थे । बर्द्धमानसुरि ने भी अनेक राजपूतों को ज्ञान देकर"जनी बनायें जो इस समय संचेती और लोढादि है श्रीवल्लम'मुरिजी ने मी' हजारों राजपूतों को प्रतियोध
.
देकर जनी बनाये जिन्हों के परिवार में आज बागडी, पलियाल
ननवाणा, नवलपा, काकरिया, सिंधी, बाफणा, मणसाली,
सालंकी, हरखावत, ब्रह्ममेचा, साहा, लालाणी, पाठिया,
कोठारी, घारीचाल, टाटीया, हमड, पंढर, बुकिया, साह,
गाधी, और चोपड़ा आदि है । इस विषय का प्राचीन इतिहास
देखना हो तो ज्ञानसुदरभाई खरतरगच्छ के श्री पूज्योंसे मिले
उन्हीं से जैसा देखा मन लिखा और फिर भी लिखता रहूग
और अपने मान हुए प्रमाणिक ग्रंथों में से (११) जैन म
प्रबन्ध बुद्धि सागरसूरी कृत भी तो जरा तुम दसो। पृ० २३६
श्री जिनवल्लभसूरिजी के वास्ते लिखा है कि शुद्ध चारित्र
पालन करता उता सकल शास्त्रों नुं अभ्यास करीने गीता
थया । तोश्रीए चितोड़ नगरनी चंडिकादवी ने प्रतियोध
ने जीव हिंसा छोडावी । अने चंडिकादेवी पण तेमना प्रतिभा
वाली बनी ते ओए तेजनगर मां ७२ जिनालय मंडित
..कापीर स्वामी ना देरासरनी प्रतिष्ठा करी। तेमणे पिं
विशुद्धी प्रचरण, शत् शाति प्रकरण, संघपट्टक श्रादि अने
ग्रन्थोरच्या, तथा दश हजार वागडी ( चौहान ) लोका
प्रतिबोध आपीने श्रावक बनाया । श्री खरतर गन्छी
प्रचार्यों के वार में किसी दूसरों की लिखी हुई बात को ।
ज्ञानसुन्दर भाई नहीं मानता। न मोलुम, उन्होंने इसका ३
विगाडा है। जिन बलम और जिनसमाजी में तो यह दं
-
.
.
”
ग
(१३१) सी दोष देखता है । पृ. १६पर रापलालजी के नाम से भूटा ही पूर्व पक्ष कर जिनरलभरि मडोर श्राये नानुदे राजा नि गुरु से पुत्र देने की अर्ज करी । सुरिजी ने कहा एक पुत्र इम का दे देना, मैं तुम को पुन देता है। गजा ने स्वीकार' किया । पुत्र होगये जिनदत्तमरि पाए, पुत्र मांगा तो न दिय सूरि के प्रभाव से पुत्र कोढया हो गया। और पृ० २० में समालोचना में दोनों ही यतियों को अमत्यवादी ठहरा कर चौपड़े पोसवालों को कुंचलागच्छ में बताया यह सय ज्ञानसुन्दर का मिथ्या प्रलाप है । न तो जैनाचार्यों के पाम किसीको देने के लिये पुत्र होते और न चे किमी के पुत्र की अपेक्षा रखते । श्री निनदनमूरिजा महागज के प्रभाव से तो हजारों के कोद चले गये और शान्तिको के अब भी जाते हैं। जैन यति झूट नहीं लिखते । अपनी जैन जाति महोदय की विक्री के लिय जैनधर्म के शत्रु ज्ञानसुन्दर ने इतिहास का नाम देकर जनता को यहा धोका दिया है। मिथ्यात्रियों के लेख पर क्या कोई समझदार विश्वाम कर सकता है। ज्ञानसुन्दर माई अप' भी तुम चीकानेर जाकर, या उन्हों को अपने पास बुलाकर जरूर तहकीकात करो श्री खरतरगच्छ के श्रीपूज्यजी के प्राचीन फ्तर में चौपड़ों की ख्यात निम्न लिखित है । अथ चौपड़ारी चशारली प्रथम आदि ब्रह्म सृष्टी कर्ता ( लोकमते ) हुओ। ब्रह्मागे स्वयंभू । स्वयंभूगे आदि राता । आदि राजर "
(१३२.)
मीच | मरीचये कृणम -फुण मरो कुहुक । कुहागंमागी ऋषि
मागी ऋपिरो भागीरथ । भागीरयरो-सगर । सगररो-अजयपाल
जयपालरो-वेणचको । वेण च रूपेरो-बच्छराज । बच्छराजरा-
परम्परा में नाहड़ाव दुयो, जिणें नाहड मर करायो। नाइडरा,
पुत्र धवलचन्द्र । मंडीपररो राजकरे तिण समय श्री खरतरगच्छ,
नायक भह रकमूग जिनवल्लभमूरिजी मडावर, पधारया ,
अबके. घणो महात्मरकरी शहर में पाव्या ।, श्रीफल सघ में
दीवा । तिण समय,मडोपररो घणो राजा धालचन्द्र भट्टारक
श्री जिनकल्लभमरिगी ने करामाती पुरुप, जाणी गुगरे पगे।
लामा । अने क्या स्वामी तुम परोपगारी छो। म्हारे शरीर
में बाहरी रोग छ मो थे दूर करे । तिवारे गुरु बोल्या ये मारा
जनधर्मी थापक होजावो तो रोग था जाप छ। तिवार
गुराग, वचन प्रमाण किया। में म्हारो रोग गया जैनधर्म
पारस्यु ।, 41ो श्रावक हास्यु । तिबारे गुरु लाम जाणी सची
यादवी बाराधी पर लिया । दनी यो, कहा कुंकुमरी गाय
लीज । तेदनो, ध जमा, माखण काढ। शरीरे चोपड़ाज्यो ।
चले कुलदेवी सचीमा थापज्शे। यहना रंग जासी, वश
विस्तार पामसी । स्यो कहाने देवी अलोप हुई । हने गुरु
२] जारे शरीररे कुकड़ी (लाल ) गायरो मासण चोपड़ाव्यो-
तिमारे शरीर पर तब, हुप्रो । कचनार्णी काया हुई । सम्पत
१११२ वर्षे वैश ख शुदी ७ गुरुवारे पुण योगे विजय मुहत्ते
1
~
। (१३३) राजा धवल चन्द्र गुरार पमे लागो। उपगार मोटो जायी गद्य पान समक्ष रात्री भोजन छोडी धारक दुयो। तिवार गुरु कम ( अड) चौपड़ा गांनी स्थापना कीगी। जाति ना पडिहार रजपूत छे । राजा धालरो वश विस्तार पामज्यो म्या कह्यो। तिणारे पाटे थी जिनदत्तमारजी द्या । स० ११७० महाप्रभाविक सरि मत्रधारी अतिशय करामाती हुया । चोपडा गोरे आपाद मुठी ११ श्री जिनदत्तसूरिजी रापगला थारी फुकुम कमर सु पूनया धृतरो दीनो करवा । सवा मामो रुपो वरमागरम पगला मासमारगी। न्यारम रे दिन कातणो न करे। चापटा श्रावक र जद्वार थी जीमण पासे घर करावे तां वंश लक्ष्मी बधे । पुत्र हुया सचियादेवी न नैवज्ज करे, थाली ४ लापमी, सु भर तिय थाली दीट लग दाडा खाना नग सात सात मेलणी, यानी १ सवामणी ने दवे, थाली १ काकरे घर, देव, थाली । श्रापरे घरे वच, थाली ? मामरे घर देव, एव ४ थाली दंगे ।। सुपारी ७ च ४ गेंहू पायली ४ नारेल ? सचियादेवी आग चाढ सो बहिनी लागछ। दीयो अखण्ड। रासे, रातीगो कर, इतरा थोक पुत्र जन्म हुया को, प्रथम पूत्र सुया पीर मोवृडा पहर, पीहर सु चीर मोचूडो भाव तो घट- काव नहीं, दीवोलीय जुहार लापमी नो करवो, चूडो पहरसा पछे पायली १ नी लापमी करणी, नारेल १ घधारणो, यह- कुलदेवी पूजा छ, परणता. लगनर पहिले दिन रातरो गोत्र . । . -- - (१३४) जारो लोग किया पछी जान चढे, यह रीन सब घोण्डा गांधी छ । राजा धवल चन्द्ररे चित्रांगद पुत्र हुयो, चित्रागदरे-राघर, राघवरे-दीपचन्द, दीपचन्द कर्मयोग सुं गहलो हुयो तिणसु राज लोग उमगव प्रधान पुरुष गजरा अधिकारी सर्व दिलगीर' रहे है, तिण समय मट्टारक श्री जिनदत्तमूरिजी पधार्या श्राव मोटे मोच्छमें मामेलोकरी शहर महि लीवा। श्रावक राघवजीय करामाती पुरुप जाणी श्री जिनदत्तमारजी ने राजद्वारे महात्मव करी तेड्या । ५००० रुपैया निमछणे ( न्योछावर') कीधा। और पिण घणी महिमा कांधी । पछेहाय जोड राजा राघर्ष अरज करी कि- - - स्वामी तुम्हारो पुत्र दीपचन्द गृस्थल छ | थारो श्रावक छे मो श्राप सु हज ओं उपगार हुम्य । इणने सज्ज करो। तिवारे लामाजाणी म०११७०, अपाढ सुदी ३ रे दिन गुरें दीपचन्दरे ओघी फो। तिण ममही दीपचन्द साजो हुनो । राजा उमराव म राजी हुआ । जैन धर्मरी घणी, महिमा हुई। दीपचन्दरे जैन धर्मरी घणी प्रस्ताआई। दीपचन्दगे पुत्र शिवराज, शिवराज पु० त्रिरुप-मधूकर -हमीर-साकर पुन- पाल-धनपाल-विक्रमसिंह-मांचो-ब्रिहणो-देवराज । देवराज दीक्षालीनी ।। इति चौरडारी कुलारुपात पाने ६ ॥ वादे वादे जायते तत्वः ।' ज्ञानसुन्दर भाई जैन जाति निर्णय के नाम से (१३५) 'अगर कागज काले न करता तो हमारी चौपदा जाति की प्राचीन सत्य कुलाख्यात मंडारों में ही पड़ी रहती। इसको ज्यों की त्यों मैंने मर्व साधारण के मामने रखदी यह भी एक बड़ा मारी गुण हुआ । मब ही जातियों के प्राचीन इतिहास की हमारे पास पूर्ण सामग्री प्रस्तुत हैं । जैन जाति महोदय दीखने पर सब, लेस सर्च किये जायगे । पृ०२० पर अपने विभंग ज्ञान के जोर से ज्ञानसुन्दरजी लिपते है कि जिन वल्लम. जिनदत्तः दोनों के समय न तो मडोर में कोई नानु- दव राजा था और न पडिहारो में इदा शाखा का जन्म भी हुमा था । समीक्षा:- - ज्ञानसुन्दरजी को मालुम नहीं कि एक राजकुल की अनेक शाखायें और एक पुरुष के अनेक नाम होते हैं । नानु- देव नागभट गरहड व नाहड एक की पुरुष के विभिन्न नाम है । देश प्रविहार पाउक का जाधपुर में शिलालेख प्रा० ले म. मा० पृ०७० ।। मरी समझ में नाहणदव का नानुदेव हो गया है। यदि सभ्यता से जैन इतिहास का शुद्धारता तो इसमें ज्ञानसुन्दर की तारीफ थी। परन्तु अज्ञानियों को ऊधी सुझती है । अस्तु कल्पसूत्र आदि जैन शास्त्रों में पुष्कर का तालाय महावीर स्वामी के समय उदायन राजा का सौदिया हुआ लिखा है। परन्तु ज्ञानसुन्दर इस बात को नहीं मानता वह लिखता
(१३८)
Phe
धाडीवालों को अपने गच्छ में सींच लेने के लिये उन्हों
मत्य इतिहास को असंभव कह कर ज्ञानसुन्दर भाई ने व्यर्थ
कागज काले कर डाले हैं। अधर्मयुक्त कार्य में मददग
जैनाचार्य तर होते जब कि उन्होंने डिट को धाडा पाडने :
मदद दी होती। श्री जिनवल्लभमूरि ने डीडू को हिसा भ
चोरी आदि का त्याग कराके जैनधर्म की विधि से श्रीका
का वाम संक्षेप दिया था। इममें दोप पताना- ज्ञानसुन्दर ३
धृष्ठता
। मुग्गल बादशाहनों और अनेक राजाओं ने अपन
लाखों फोजों सहित २४ वर्षांतक घोर परिश्रम किया मग
प्रफेला परतापसिंह हाथ न आया और वह अगणित सेना
काटता ही रहा, तो क्या चे निल थे। अनेक वादशाहों
बडे २ खजान जब कि निजामतों से उन्होंकी राज्यधानी
या हिन्दुस्थान से बहार जाते थे तब पारण राजपूत-जा
वगैरा उन्होंको लूटते थे तो क्या वे बादशाह कमजोर थे
जैन तवारीखों को यदि ज्ञानसुंदर अपनी फूटी आख से में
देखता तो उसको मालुम होजाता कि महाराज मिद्धरा
जयसिंह सच्चे जैन थे। दुर्दात वार डोडजी ने आचार्य श्र
जिनवल्लभारिजी के पास जेन धर्म स्वीकार कर समस्त ।
कृत्या का त्याग किया जानकर ही उनोंने प्रमन हो इतन
नाडी भाग इनाम उसको दी थी, न कि घबरा कर बीकाने
जाके श नमुन्दर भाई श्री. पूज्यों का प्राचीन दफ्तर देखें
(१३९) श्री पुरतर गच्छाचार्य प्रति योध: श्रावकों में धाडीवान ८७. न० की जाति है और धाडावाल कोठारी आदि इनकी शाखाये है। जाति अन्यचे पण नामक ग्रन्थ में लिखा है कि धाड़ी- वाली में सबलदाग नामक एक , राजा कोठारी हुआ था तय से उसके वश की वृद्धि हाने मे वह वंश कोठारी करके प्रसिद्ध , हुआ। (जा० अ० स० स० पृ० ४६२ चीमनगर शातिनाथ जी क मंदिर में रही हुई धातु प्रतिमा के लेख की नकल बुद्धि-, सागरमूरिजी देते हैं कि-स० १५२५ वर्षे मृग शिर शु० १०: शुक्र मूडहटा समीपे गोबड़ा सण ग्राम वास्तव्य साटहड गौत्रे सा० रणमिह पु० पूजा भार्या हाज़ पु० महजा, सागा । सहजा मा० कोरासुत प ना सहितेन श्री कुन्थूनाथ सिंच करित प्र० श्री कोग्ट तपागच्छे श्री मर्यदेव सूरि मि प० तपोरन उपदेश ने जैन गच्छ मत प्रपंव पृ० ६१ इमसे निश्चय होता है कि-कारट गच्छ यह तपागच्छ की ही एक शाखा है। इसको करलागच्छ कर कर लोगों को भ्रमित करना यह ज्ञानसुदर की पड़ी धूर्तता है । मरे हुए गच्छों को अपना के ज्ञा० इष्ठ,मिद्वि चाहता है, परतु मिवाय मूतों के, ये गिर "पैर की बातें, कोई नहीं मान सकता। मिलते हुए नाम-तो सबही गच्छों में आते है। ब्रा पटिहारों के शिला लेसों को, देखे. कक, नाम गृहस्थों, में भी प्राता है । कब, रत्न प्रम मिद, और देवगुप्त आदि नाम वाले सभी प्राचायों को -
।
(१४०)
गच्छ में मान लेना यह ज्ञानसुदर की बडी मूर्खता है । खैर
आगे पृ० २२ पर ज्ञा. लि. कि-" वि० सं० १५७५ में
झाबुआ नगरही नहीं था। वह तो ई० १६ वीं शताब्दी में
लाभाना जाति के झंबूनायक ने बसाया था" समी: १५७५
स० और ई० १६ वीं शताब्दी में विशप फर्क न होने पर भी
जैन यतियों से द्रोह करना जमानों के अनभिज्ञ ज्ञानसुदर की
नालायकता है। टाटिया भील का दमन अगर असत्य' है। तो
किस बात का इनाम में राठोड़ो को चादशाह ने झाचूना दिया
था, खैर आगे पृ० २३ पर ज्ञा० लिखता है कि " दादाजी
का सर्गवाम सं० १२११ में हुआ था । उस समय रायसियाजी
तथा ग्राम स्थानजी का जन्म भी नहीं था, तो दादाजी की
भक्ति किसने की और भविष्य किसको बतलाया। वि० सं०
१२८२ में राव पिराजी मारवाड़ में आये थे। श्रासस्थानजी
का समय १३३० का है तर दादाजी का स्वर्गवास १२११
का है पाठक सोच सकगें कि-यतियों ने किधर की ईट किधर
का पत्थर जोड़ कर ढांचा खड़ा किया है " । समीक्षा -जैन
समाज में श्री जिनदत्तमूरिजी भक्तजनों को आज भी प्रत्यक्ष
होकर दर्शन देते हैं । जैन यत्तियों का अभिप्राय नहीं समझ
कर उन्होंके इतिहास को झूटा बताना, यह ज्ञानसुंदर की
मूर्खता है । सियाजी मारवाड़ में स० १२८२ को आया लिखा
सो भी गलन है जरा अपना मान्य इतिहास देखिये-जिस दिन
-
।१४१)
यधनवीर शहाबुद्दीन के प्रचंड वाहुबल से कन्नोजका गज्यचूर्ण
हुआ. जिस दिन स्वदेश द्रोही जयचंद ने गगाजी के पवित्र
जल में गिर कर अपने किये हुए पापों का प्रायश्चित किया,
उमी दिन से १८ वर्षों के पछि मं० १२६८ में उसके पात्र
शिवाजी और संतराम अपनी जन्म भूमि को छोडा कर २००।।
साथियों के साथ मरु भूमि की और गये । टौ० राजस्थान मा०
२१० २ पृ. १३ श्री जिनदत्तसूरिजी महाराज सिद्ध पुरुप
उन्ही का झरा नाम सोमादित्य ( सोमचद्र ) है । टाडसाहन
लिखते हैं कि
वह यवनों के सिन्धु नद पार करने से पूर्व का यति
पुरुष था । जिसके धर्म का अधिकार सिंधु नद के पार दूर
तक फैला हुआ था। उसका करामाती कपड़ा अभी तक
जैसलमेर में मौजूद है.। टा० रा. भूमिका पृ०.२ नोट ।
अमरधाम गमन होने पर भी समस्त भारतवर्ष में, प्रतिग्राम'
उन्हों के चरण पूजे जाते थे। आज भी हिन्दुस्तान में ऐमा
कोई प्रसिद्ध नगर न होगा कि जिसमें जिनदत्तमरिजी के
चरणों की स्थापना ना हो। कलकत्ता बम्बई जैसे बड़े २
नगरों में प्रति दिन अगाखित नरनारी गुरु चरण वंदनार्थ
पाते है और मनोकामना पाते हैं । रासियाजी ने.मी पाली
नगर में सच्चे दिल से गुरुदेव के चरणों की मानकी थी।
-
(१४२) जिसीमे प्रमन्न होकर शामन देवता सहित सिद्वरूप से गुरु महाराज ने उमको दर्शन दिया और भावष्य बतलाया था । उमी सेमय का बना हुआ इन्दों का संवाद जैन परतर श्री पूज्यों के प्राचीन , दफ्तरों में लेकर यहां ज्यों का त्यों लिखता हू। अथ श्री जिनदत्तगिजी राठौर वश उजागर पाली नगर वरदत्त । परचो पाली परगडो, ब्राह्मण छो ताल । छूछपी सुलिच्छमी भई, टुकी एक करत निहाल ॥१॥ गुरु पैताल ब्राह्मण ने परचो दीनो ऋद्व समृद्ध दे दारिद्र गुमायो । इग्यारे से इक्केत्तरे, पाली शहर प्रमिद्ध । मिल्यो सिहो महाराज सो । करी फेरी नमी फिद्ध ॥ २॥ दीठो श्रादित्य ऊगतो, जागी जलदल जान । करजोडी कीर्ति करे । सिहोसेत- रामोत । ३ । जति बडो सिर सेहरो, सहरे सिरैज कोण । परणी जेमारी पृथः । लिख भी वार लौण । ४॥ महाराजा मुस उच्चरे । कहो नाम कुणा ठोड । हू. सिहों सेतरामरो । जाता.मिरे राठोड ॥ ५ ॥ जाऊं किण राजा कने। खरची यो मन सोल । आज्ञा,जो पापो सिरे ।, तो चंचल चढूंज चौल, ।। ६ ।। श्री गुरु महाराज वाक्य ।।, आज्ञा माहरी आकरी । सूरज भरसी साख पाली जुं थे पाल्हवों। भुये अमिचलदी भाख ॥ ७॥ सिंहाजी वाक्यं ।। अविचलं वाचा आपरी! + (१४३) -श्राविचल सूरजचंद । अविचल आपू पयरो। अचल, इन्द्राणी, इन्द ॥ ८॥ श्री गुरुमहाराज वाक्य || सिंहाथानी साहित्री। कोरत करसी कोड । राज घरा लग राजसी । रहमा धूर्ग राठोड़ ।। ६ ।। मिहातूं सुखियाहुमी। दुखियो रहेन कोय । पातक झड पडुर भयो । रह्यादिन करदोय ॥ १० ॥सिंहाजी चाक्य । अलिकन भारख्यो आप पाह। लिस्पोन को सुरपाण! -किरण प्रकाश में जगत में । थे उगतासुविहाण ।।११।। धन दिहाड़ो धन घड़ी, धन श्री जिनदत्त सूर । खरतर गुरु सिर मुकुटमणी। फलियो कल्पतरूर ॥ १२॥ केसर कुम्म पगलिया । अर चोसब पौसास । कडा मोड मोति कोडरा । गांमाज गज लास १३ पूजूमब जग में मिरे । पूजै पूत सुपूत । वायक जिन दत्त सूरिरो । राठौडा मजबूत ॥ १४ ॥ खाटी जिनदत्त सूररी । सादी सिंघमेत । धर वाणीजधूमा घणी । साग त्याग समेत ।। १५ ।। इति श्री जिनदत्त सुरिजी राठोडा ने चरदीनो । पाना ॥ २६॥ फलोदी बीकानेर आदि सब ही स्थानों के मायक श्रापक श्राज दिन तक खरतर समाचारी ही पालते हैं । तपागच्छ के माधु और श्रीपूज्य तथा श्राचार्य सरतरगच्छ की इतनी अदन करते हैं कि-बीकानेर में झायकों की गुगाड़ में होकर बाजे बजाते हुए नहीं निकलते , अगर मापक तपागच्छी है तो यह क्यों पीकानेर के राठोड राजाओं ने अन्य सबही गच्छवालों को शक्त मना लिखदी - (१४४.) है कि-ये खरतर गच्छ के श्रावकों की १३ गुपादों में भगवान् की सवारी के बाहने मी बाजा बजाते हुए निकल कर हमारे धर्म गुरवों को अपमान न करें। खरतरगच्छ वालों को कहीं मना नहीं है। वे समस्त मारवाड में राजभुवन तक बाजे बज- वाते चले जा सकते हैं । राजधानी जोधपुर में कुछ नायो और 'ब्राह्मणों ने एक समय आपत्ति की थि. जिम पर महाराज सूरजमिहजी ने उन्हों को गुन्हगार ठहराया और सदा के लिये पट्टा लिख दिया कि जोधपुर रियासत मात्र में कोई भी मनुष्य खरतरगच्छचाया की महिमा पूजा में हस्तक्षेप किसी प्रकार न कर सके। परवाने की नकल यों की त्यों यह है ।। श्रीपरमेश्वरजी खडगमही ॥ सस्ती श्री महाराजाधिराज महाराजा श्री सूरजसिंहजी कुंमर श्री गजमिहजी वचनात् एगप्रधान महारक श्री जिनचंद्र सूरिजी ने मयाकरी दुवोदियो ('दवादीयो ) जिसू श्री जोधनेर, सोजत, सिवाणे, •मेडते, जैतारण, आमोपरदेसे इतनी म्हारी धरती के तितर्ग माहि पाजा बजाओं मालर, 'शख, दमामा, बांजा मात्र ' बजावता कोई मनाह करें सो गुनहगार होमी। मागमिर वदी ६ सवत् १६६४ दुवै श्री मूर्व प्र. भाटी गोइंददामजी पा. जोधनेर ॥ मोहर छाप || श्री पुज्यों के पट्टे और परवानों के देखने “से मी पाया जाता है कि विक्रम की १८ नीं (१४५) शताब्दी के अंत तक तो राठोर गच्छानुयायी ही थे । यथा-- नृ। श्री खातर- श्री लक्ष्मीनागयण जी मोहर स्वस्ति श्री उपाध्याय गुण- सुदरजी संजोग महाराजाधिराज महाराजा श्री जोरावरसिंहजी लिखावतु 'नमसकार वाचज्यो अपरत्र इयादिना में भाग कागद न यायो सासदादीया करज्यो । थे म्हारघणा यात छो । म० १७६३ मिती चेत बद ११ मु० नार बीकानेर श्री पू० दफ्तर से | इसमे आग और भी देखिये श्री लक्ष्मीनाग- णजी मोहर । स्मात श्री महाराजाधिराज राजराजेश्वर नरिंद्र शिरामशी या रत्नामिहजी महाराज कुमार श्री मिरदारसिंहजी वचनात् चणारम में सम्तर गच्छरे श्री पूज्यजीरी जागा धर्म- शाला वा मदिर बगेगह गाय छे । जे जति कुशलचन्दजी रहताच्छो । मो जतिमजकुरतो गुजर गयो छे। हमे यजगा मजकूर में श्री पूज्यनी सोभागसूरिजी जिकेने राससी सो रहमी स. १८९३ मिती काती वदं १ मु. पायत पतं श्री बीकानेर । कोट दाखल सही रत्नसिंह । हम परवाने से भी निश्चय होता है कि राठोडों की तफ में खरतरगच्छ पालों को काशजी में कुछ जागारी भी दी गई थी और रामघाट का बडा जैन मंदिर तथा धर्मशाला उपागेर वगेरह सब सटोर राजाओं के ही बनाये गये थे। सर छाड़ता हु ! सटोर भाटी कच्छ। ना तथा बाद A (१४६) शाहों के पट्टे परवाने और फेमलों का मेरे पास खुप सग्रह है। जिन्हों की नकल यथा प्रसग दता रहगा । ज्ञानसुंदर के समान किसी ग्रंथ का केवल नाम मात्र ही लिख कर लागों को धोका देना यह हमारा काम नहीं है। जैन जा० नि पृ० २३ पर ज्ञा० लिखते है कि यतिजी को जरा तो विचार करना था कि बिलकुल झूटी बातों से झावक सामड, कैमे मान लेगा कि हमारे गुरु खरतर है ॥ दर अमल सामड और मारक तपागच्छाचार्यों के प्रतियोधिक श्रावक है ॥ विक्रम को अग्यारमी शताब्दी में किये हुए मामड़ों के मैकड़ों धर्म कार्य है इत्यादि ॥ समी० यह लेख मी ज्ञानसुंदर जी की महा मूढता जाहर करता है क्योंकि ११ वीं शताब्दी में तो तपागन्छ का जन्म भी नहीं हुआ था, तो फिर झारकों को बनाने वाले तपागच्छ के आचार्य कहां से आगए तपागच्छ की वृद्ध पदावली में लिखा है कि राउल श्री जयत्तसिंह सकल मनुष्य वृन्द समक्ष ई कहि भो भोलो को तुम एसुरी ने आज थकी- तपा कहिज्यों । एतले ई श्री चीरनीर्माण हुया पछा सत्तरमय अने पंचावन वर्ष गयेइ हुते । पुन वि स. १२८५ वर्षे वैशाख सित त्रीजने दिनि राउल श्री जयसि हृदत्त तपागच्छ विरुद श्री जगचद्रसरि ने हुयो । एतल- प्रथम पट्धर श्री सुधर्मा सामि थकीनि ग्रथ गच्छ एहबु नाम
(१४७)
३
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प्रथम कहिवाणुं । ते आटपाट लगई एविरुद कहिवाणो ?
तिवारपछी नवमह पाटि श्री सुस्तित सामी यनई सुमति बुद्ध
स्वामि एविह गुरु भाई इकाकदी नगरी ई कोटि पार सूरि मंत्रनो
स्मरण कीधा तेथकी। बीजु नाम काटिक एहयु गच्छ कहि
चाणो । ते गन्छ के पाटल गण निरुद जाणवो २ तिवार पनर
में पाटि श्री'वज्रसेन सुगना शिष्य श्री चन्द्रसूरी हूया।
तेह थकी चंद्रगच्छ ए बीजो २ पुनः सोलमें पार्टि सामत
भद्रसरि तेनिस्पृहपण थकी चनने विपरहिया तसूरि थकी
वनमामी गच्छ ए चौधुं नाम । तेसाले पाटसूधी । तिवारपछी
ते त्रीसमें पार्टि सर्व देवसुरि ने उद्योतन गुरुइ श्रापूतज्ञहटी नह
पने ' वड वृक्ष हेटि पाठ शिष्य ने सुरी पदें किधी तेहथी
बड गच्छ एहपांच मुंनाम ५ 'एइग्यार पाटलगई। तिवार
पछी चउमालिममें पाटि श्री जिगचंद्रे सुरि हुया । तणड
श्रायुपर्यंत ' प्रालि तप करता वर्ष १२ हृया। तिवारि श्री
जगचद्रसुरी ने तपा विरुद्ध हो । तेह थकी हवणा छठा
तपागच्छ नाम कहिनाणो ६ ॥ जै० सा० सं० पृ० ३९ मूर्ख
ज्ञानसुन्दर को इतना भी गेध नहीं कि मूलनास्ति कुतः
शाखा, बीजनास्ति कुतस्तमः ग्राम नास्ति कुतः सीमा,
पितानास्ति कुतस्सुन ॥१॥ ऐमे है। सघी लोढा मुहनोत
हठ्ठा आदि प्रमिद्ध खरतरगच्छ के धारकों को भी तपागन्याय
प्रति मोधित लिग्बमारा है। मैने तपागच्छ की पहारली विगरे
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(१४८) . सैकड़ों ग्रन्थ देव लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं आता कि अमुक तपागच्छीय प्राचार्य ने किमी को प्रतिबोध देकर श्रामपाल जाति में मिलाया हो हिमतविजयजी विगेरा तपा- गच्छाय विद्वान यतियों को भी मैंन कई बार पूछा तो, निक्ष हाकर उन्होंने एही उत्तर दिया कि हमारे पूर्वजों ने अनेक अच्छे २ ग्रन्थ बनाये इसका तो हमें पूरा आभिमान है । परन्तु अन्य दर्शनियों को जैन कौम में मिला देने का सौभाग्य तो, फक्त खरतर और उप केशाचार्यों को ही प्राप्त हुआ है। इस समय सब ही गच्छ वाले तपागच्छ की क्रिया करने लग गये इसका मूल कारण साधु समाज और देखा देखी है । प्रचल- द्वेष के कारण आधुनिक प्राय मब ही तपागच्छीय माधु खरतरगच्छ की काट करते और समाचारी छोड़ाते देख-जाते परन्तु खरतरगच्छ में एमा कोई साधु न होगा कि अन्य गच्छ की काट करता या समाचारी छोडता हो । खर पृ०, ३ पर ज्ञा० लिखते है कि ह दादाजी ने झारक झाबड़, बाफ- णादि को विजय यंत्र देकर जैन बनाये। कम नशीब रिचारे दिल्लीपती पृथ्वीराज चौहान का, कि जिनकी ऐमा विजय यत्र न मिला, जिसीसे शार्य भूमि सदा के लिये-म्लेच्छों के. हाथों में चली गई" समीक्षा:- यत्र मत्र मणी औषधी और देवताओं में अचिन्त्य शक्ति सभी ही आस्तिक जन मानते हैं। कम नशीय विचारे, । ।
(१४६ )
ज्ञानसुन्दर जैसे नास्तिकों का कि-उन्दाको मूरि मत्र कल्प,
ही कार वल्प, नमस्कार मंत्र कल्प और मक्तामरम्तोत्र
अादि प्रमाणिक ग्रन्थों की शुद्ध अम्नाय बताने वाला सु गुरु
का योग न मिला, जिसीसे ही वह जैनाचार्यों की यत्र प्रयोग
क्रिकाओं को गप्प समझता है, । .
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- अजमेर में श्री निनदत्तसूरजी का स्वर्गवास हुआ तब
पृथ्वीराज केवल ५ वर्ष के थे। अगर गुरु ४५ वर्ष और
जिन्द रहत और हिन्द गजे - श्रापस की इर्षाओं को छोड़ क
जैन होमाते तो आर्यों का म्लेच्छो से मर्वनाश कभी नहीं हो
सकता, था। असली जैन वही है जो शत्रुओं को जीते ज्ञ नसु-
दरजी बीकानेर खरतरगच्छीय श्री पूज्यों को प्राचीन दफ्तर
देव लेख ज्यों का त्यों यह है । अथ श्री जिनदत्तपूरिजी तुर
काणी हटाई तिणश विरुद, लिख्यते । दु० जग में जिनवल्लभ
जया । चंद सूरज दोय शाखी । पच्यो इग्यागमे । पचीस को।
तब महीरु लती, राखी । श्री जिनदत्तमुरि विरुद । इग्यारेसे
गुणतेरै । इन्द्र इंद्राणी पाया । इग्यरेभै गुणतर देव भूमि
पर छाया । इग्यारस गुणं तरे पृथ्वी मिल मंगलगा । इग्यारेसे.
गुणतरे राजतिलक महागया | तखत उजाल जिनगल्लभ जगत
पाप पडल दु.स दुरजै । अखियात छात जल हल जगत ,
तपा जिणदत्तसूरिजै ॥ १ ॥ श्राज बड़ो उच्छरग पृथ्वी
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(१५०)
मंगल गाईजे । आज बड़ो उच्छरंग पृथ्वी मंगल छाईजे
आज बडो उच्छरंग पृथ्वी सुरराज विराजे । याज चडो
उच्छरग पृथ्वी सुरतरु छाजै ॥ श्राकाश ज्योति उद्योत
जग, पृथ्वी जीत पामुदो । जिनदत्तरि हाजिर हजूर,
प्रगट राज भालें उदो ॥२॥ सकल देव जिनदचसरि प्रत
पैमाल पर । सकल देव जिनदत्तरि कर भारती थाल भरै ।
सकल देव जिनदत्तरि करे नृत्य पागल भाई भाई । सकल
देव जिनदत्तमरि फिरै सब देव दुहाई । प्रत छत्र वाछिगहरी
नदी नीर नाला रहे, कहें धरण आकाश विच श्री जिनदत्त
भाणा पहें ॥ ३ ॥ चोमठ योगिनी जीत वीरगवन नित
हाजर । पकड़ चीजली हाथ पचपीर । पकड़ पिण गाजर ।
तुरक पीर उगणीश देख गया सब भाजर | धरणी पती
कुपकड़ पकड़े माणभद्रक नाजर । देख सबल जिनदत्तक,
रह्मो न देवतः धरपि । सुरपति नितपृथ। जीत पट्ट, ऐमो
कहण कुंहम"जच ।।४ ॥ देव पराक्रम देख पीर फिरे सब
डरता । देवां पराक्रम देख, शाही आयडिग भरता । देव
पराक्रम देख ऊचा बद बराबर । देव पराकम देख, विराजे
गज सवा पर । हिन्द चाणी देव तुरकाणी सह करजोड्या
हाजर खड़ा । जिणदत्त आणतप तेजभाण कर भारती चौलदा
॥ ५॥ मुओजीयो मुगल्ल सुगल पसरी धरण पर । मुओजीयो
पठाण तुरकोण सुणियो करण कर । मुअोजीयो विल्ल सम
(१५१) सेरसो कावळ । मुओनीयो काशमीर गुल शेरम्ब सात । मुआजीयो मुलनाण में, साहिसां सुलताणरो । देस निपाव निश्चय हुप्रो परचो ,जिणदत्त पाणरो ॥६॥ परचो पतिख देख मिल्या कारल रा काजी । परचो परितिस देख फिर मच नाठा पाजी। काजी मुल्ला गल्ल पीर इनों नेपकर्या । ऐमी घर घर अख साहलीयां पिण सकर्या । हुओ नधरण आकाश बीच मिली दिल्ली साह जिहानसु । देव पराक्रम देख छिपप- रद्या सगज्यु म्यानसु ॥७॥ पृथ्वीजीन पदपायो राजाओं ने पापमार्ग हिंसा छोडाय आपरे बसकिया । मन में राज विचार करा कार्यलाख विध उच्चो । प्रथम तीर्थ कर क्रम एकमो बाट समुच्चो । गच्छ तिलक बडराज रहें अखूट सदाई । देव दाणब वह माण प्रगट उद्योत पुन्या । कोई एक जोग राजा सबल मिल्या एक ठमाण मह । चहुआण परमार शोलक वर मरी पड्या हुआ थाण सहा ॥ ८ ॥ बड़ा घडा भृपाल मिन्या शहर विक्कमपुर में, जात जात चात्रियपट आण जुड्या नर सुर में । यणी फौज दश कोड मिल्या अढी सौ राजा । बारन क्षत्र चामर दुले किरणे त सहझाझा । देव प्रकोपमरी भय सरम भीत राजा पाया घणा ! लाखान् लाख मरी रोगसु गल्या समंधर कहें वेसणा ॥ ६ ॥ पाया श्री पूज्य पास लगें पायें दोलत निजर अरज । करै करी आश अपरन गती को देवघर । तारण जगत जिहाज सुम्पद नित . ।
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(१५२)
तुमचै लगे। करे, करा सूपिराज दान जीवित दो दुःस
सरणाई साधार रम घटालो मारी भरी। जालत पाप
छाडत जंत हुकम हुआ महाग सिरी ॥ १० ॥ हुक्कम
हुओ श्रीराज नरपति कर जोड्या । जीव सफल प्रतिपाल
चमा मन मो नहीं सोड्या । तप जप क्रिया दान ' मान मन
मों नहीं मोड्या । चढती ऋद्वि समृद्धि मत्र'नकारकन छोड्या
चढती ज्योति चढती कला, गच्छ हुक्कमपति 'रासज्यो ।
तप तेज देख राजा सकल, कहै "पृथ्वी जीत पद” भाखज्यो
॥११ । दृग्यारामै क्याशीय अखयतृतीया श्राखी । बड
नगर ब्रह्ममेण राज तिलक विधी दासी बाजी रथ गयन्द
खास पालसी समेला । मोतिये थाल वधाय दुधा राजेन्द्र
सहु मेला । तिण नगरे ब्रह्म धूदड बडो, गामृत देहरे नी ।
दिन मात रात दुखिया घणा, मातसे ब्राह्मण कीया गरी १२
नाकै नौं घताय कीया मह वाली व®, पाचे घुभै नृत्य करें
सह दशैं देशैं । वरस पांच अथ सात हुआ देख सह माडा ।
मुया गया के ही रह्या सौंहु चूगली चाडा खलक लाक
जिणदत्त पये ब्रह्ममेण भोजन कर्यो । पाछे लोक पांती पड्यो,
जद जीम भोजन भोजक धयों ।। १३ ।। इति दादा श्री
जिनदत्तमूरिजी " त्रिभुवन गुरुगज तिलक " पद नृपर्दत्त ॥
यह कविता श्री जिनदत्तमूरिजी के समय की ही बनी हुई है ।
। निपक्ष होकर देसं ॥ आगे पृ० २३ पर गठियादि का
n
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(५३)
गन्छ तपा बताया मो भी मिथ्या है ।। ज्ञानसुंदर माई सैलाना
निवासी रा० शेरसिंहजी गौड़ वंशीय कृत श्री जिनदत्त चरित्र
देखें, उममें लिखा है कि श्री जिनदत्तमूरिजी ने राठोड पंवार
चौहान सौलंकी' और पडिहारादि अनेक क्षत्रियों को जैन
बनाये जिन्हों के कितनेक गोत्र नीचे दिखाये जाते है।
नाहटा राखेचा मणशाली नमलखा डागा बहुफणा लुणिया
बोथरा चौपडा छाजेड़ वरडिया सवेती कोठारी पारख गुलेच्छा
झाबक धाड़ीपाल शेखापत नाहर चलाई पछारत हरकावत'
घेडिया 'खजानची पुंगलिया काकरिया याठिया कटारिया
मेठिया पटना फोफलिया चडेर महेता दफतरी मुकीम दुगड
जन्नाणो भंडारी लुणावत सुखाणची लोढ़ा जालौरी नवरिया
और श्रोथी माल ४४ आदि अनेक गोत्र स्थापन कर
प्राचार्य श्रीने अपगिमित उपकार किया है। श्री जि०० पृ.
है॥ इम में वाठिये श्रावक श्रीजिनदत्तमूरिजी प्रतिबोधित
और खरतर गच्छीय 'लिखा है ॥ उ. रामलालजी का मुठा
नाम लेकर पृ० २४ पर ज्ञानसुन्दर लिखता है। वा. ति.
रणत भौगर के पवार राजा, 'लालसिंह के पुत्र जलधर का
रोग हुवा था, वि० सं० १५६७ में जिनबल्ल मसूरिजी ने
चिकित्मा कर जैन बनाया ॥'ममी। हमने महाजन वश
मुन्नावली, भायोपान्त अच्छी तरह से देखी परन्तु कहा भी
नहीं पाया कि श्री जिनवल मसूरिजी ने किमी गृहस्थ की
4
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(१५४)
चिकित्सा की हो। ग्रंथकर्ता का तो यह लिखना है कि
गुरु ने चामुन्डा देवी को हुकन देकर राजकुमार के शरीर
में पाराम करवाया, तर राजा ने ७ सात पुत्रों समेत जैन
धर्म स्वीकार किया। राजा का प्रथम पुत्र बडा बंड योद्धा था,
अतः उनकी सन्तान वाले मभी घठ कहलाये, जिनों में
चिमनसिंह ने अनेक जैन मन्दिर और धर्माश्रमों का जीर्णोद्धार
कराया और मय महित तीर्थराज श्रीशत्रुजय की यात्रा जाते
अति ग्राम, में प्रति मनुष्य को एकक मोहर ( सुवर्ण मुद्रा )
बाटी, इमी कारण मे चिमनजी के परिवार वाल सभी महाजन
वारिये ( बाठिये ) कहलाये। आज कल ये लोक मारवाड
फलोदी चीकानेर भीनामर आदि में चमते है । साभगच्छ ता
इनों का खरतर ही है परन्तु मंगत पाकर पायचदीया दुढिया
आदि हो गये हैं। विक्रम की १२ वीं शताब्दी में चौहानों
के सिवाय रणथंमार में अन्य राजपूतों का राज्य न मानना
यह भी ज्ञानसुन्दर का मिथ्या हट है। ज्ञानसुन्दर भाई को
यह बात सदा ध्यान में रखनी चाहिये कि योग्य जागीरदार
को भी कवि लोक राजा ही मानते और लिखते हैं । बड़े २
राजाओं की तरफ से योग्य राजपूतों को राजा, महाराजा.
राम, महाराव, राणा, महागणा और राय बहादुर आदि
पदीया मिलती थी और उन्ही महान् पुरुषों को धोपदेश
हमारे धर्माचार्य जैन बनावे थे । दर असल लालसिंह
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(१५५)
यादुओं की एक शाखा मारण (टाटू ) जाति का गजा था ।
देखो सिद्धांत मग्नसागर प्रथम भाग पृ. ४६-५० पहिले
इनिहालों को देख कर फिर कुछ लिखता तो ज्ञानसुन्दर की
तारीफ थी । सेर अब भी जानसुन्दर भाई पृथ्वीराज समा
श्रच्छी तरह से देखें । उस में लिखा है कि आनागज की
माता गौरी रणथमोर के यादव राजा की बेटी थी। महाराज
पृथ्वीराज की गणी हमारती भी रणथंभोर के यादव राजाको
पुत्री थी । यादव ५६ कोटि ( प्रकार ) के थे, जिनों में मारगा
मी एक भेद है । उन्हीं को रामलालजी ने परमार लिखा है।
मारण, परमार ओर चार इन तीनों को ऐतिहासज्ञ एक ही
मानते है । हुमायू के ममय में कुछ फर्क है परन्तु हम पहिले
ही लिख आये है कि यह महाजन वश मुक्तावली प्रायः
प्राचीन कविताओं के आधार पर लिखा गया है। और कवियों
का (अनंद ) मरत् पर्चमान विक्रम में ये ६१ वर्ष घटा देने
पर होता है।
सोने के बर्तन चिमनजी न पीतल के भाव मोल लिये
इम में भी कोई ताज्जुब नहीं है। कारण कि वक्त का मौल
जाता है। पीतल की ही कौन हे हमार श्राफ राय बहादुर
श्री बद्रीदासजी के पिताजी ने जर लखनउ में मुमलमान और
अंग्रेजों के लडाई हुई थी तब महान् कीमती २ जागव और
" (१५३) सोने के जेवर-तथा वर्तन नाजा के बराबर-मोल लिये थे। ज्ञानसुन्दर भाई अपना मान्य भारत का प्राचीन गज वश प्रथम भाग अच्छी तरह से देखें, राव हमीर और अलाउद्दीन बादशाह के जब लडाई हुई उस समय रण थंभोर में चायलों की कीमत सोने स भी दुगुणी हो गई थी। अर्थात्, एक मे चावलों के बदले में दो सेर सोना दिया जाता था, दो सांच लूट के माल को घा ले जाने में सुभीता न देख,, मुमलमानों ने चिमनजी को सोने के बत्तन पीतल के भाव वेचा दीये, इस में क्या असंभव है। आग ज्ञान सु० पृ० २६ पर लिखते हैं कि जब यतिजी वि० सं० ११७६ में दादाजी ने चंदेरी के राठोड राजा को प्रतिबोध दिया लिखा यह बिलकुल मिश्या नहीं तो और क्या है। दरअप्सल जिनदत्तमूरि के १६०० चप पहिले प्राचार्य रत्नप्रभारि ने प्रोसीया में महाजन चंश के १८ गौत्र स्थापन किया था। जिस में ११ वा गौत्र आदित्य- नाग, जिसकी शाखा चोरडिया गुनेच्छा पारख आदि हैं। समीक्षाः -- ज्ञानसुन्दरजी का अभिप्राय सरतरगच्छ के सबही सोमवालों को अपना माना हुमा कलागच्छ में खींच लने का है । इमीही कारण स यह पुस्तक लिखी गयी है। मगर समझो कि यह सर्व मिथ्या प्रलाप है । मूखों की बातों को - - (१५७) ही मानेगे, विद्वान नहीं मान मक्त कि. श्रीसचान जाति जिनदत्तमूरिजी से। १६०० वर्ष पहिले की पुराणी है। ज्ञान- सुन्दर भाई श्वेताम्बर जैन प्रत्यार ता०.२० दिसम्बर स० १.२८ का देव ।। रा.पं. गौरीशकरजी प्रोझा लिखते हैं कि उत्पलदेव का ग्रामिया नगर वमाना अादि सर्प बातें कल्पित है । कारण कि भोमिया इतनी पुगणी नहीं है। एक ओसिया ही क्या, जल मे धुली हुई मारवाड की रती को देख कर विज्ञान वत्ताओं ने निर्णय कर लिया है कि पान में दा हजार वर्षा के पहिली यह समस्त प्रदेश ममुद्र के जल में हया हुआ था। समुद्र के जल के भीतर आपम में घिम कर गोल बने हुए गिल गच्चीयों के उपर बीकानेर बसा हुआ है। यीकानेर की कंकरीला भृमी के अन्दर गुमाओं में आज भी मगर और कछुओं की ईीया निकलती हैं । इम मे निश्चय होता है कि थोडे ही वर्षों पहिली यहां समुद्र था। भूपेत्ताओं को पूछ कर ज्ञानसुन्दरजी निश्चय करलें कि क्या हमारे रत्न. प्रमापूरी श्राज से ढाई हजार वर्षों के पहिली ही जल जन्तुओं को प्रतिगेध देन के लिये यहा आये थे। अपने अपने गच्छों की वडाइ के जिये ही ज्ञानसुन्दर जैसे मूर्व गूथ कारोंने सत्य जेन सूत्रों की महिमा घटाई है। हकीकत में आमवाल जाति किसी की बनाई हुई नहीं है । "अश्वपाल" घोड़ो को पालने वाले।।। यह गुण निष्यन्न नाम चंद्रवंशी राजपुतों की एक * (१५६) सोने के जेवर तथा वर्तन नाजा के घराघर-मोल लिये थे .! ज्ञानसुन्दर भाई अपना मान्य भारत का प्राचीन गज वश प्रथम-भाग अच्छी तरह से देखें, रार हमीर और अलाउद्दीन बादशाह के जब लडाई हुई उस समय रण थंभोर में चायलों की कीमत सोने से भी दुगुणी हो गई थी । अर्थात् एक मेरे चामलों के बदले में दो मेर सोना दिया जाता था, तो नाच लूट के माल को घर ले जाने में सुमीता न देख, मुसलमानों ने चिमनजी को सोने के बर्तन पीतल के भाव वेचा दीये, इस में क्या असंभव है। आग ज्ञान सु• पृ० २६ पर लिखते हैं कि जब यतिजी वि० सं० ११७६ में दादाजी ने चदरी के राठोड राना को प्रतिबोध दिया लिखा यह बिलकुल मिया नहीं तो और क्या है। दरअसल जिनदत्तरि के १६०० वर्ष पहिले प्राचार्य रत्नप्रभारि ने प्रोमीया में महाजन वंश के १८ गौत्र स्थापन किया था। जिस में ११ रा गौत्र आदित्य- नाग, जिसकी शाखा चोरडिया गूजेच्छा पारख श्रादि हैं। समीक्षा:- ज्ञानसुन्दरजी का 'अभिप्राय सरतरगच्छ के सही प्रोमवालों को अपना माना हुपा करलागच्छ में बीच लेने का है । इभीही कारण से यह पुस्तक लिखी गयी है। मगर समझो कि यह सर्व मिथ्या प्रलाप है । मूखों की बातों को ।
- . पूर्व ही मानेंगे, विद्वान, नहीं मान मक्ते कि श्रोमपाल जाति जिनदत्तमपिजी से. १६०० वर्ष पहिले की पुराणी है। शान- सुन्दर भाई श्वताम्बर जैन प्रवचार ता० २० दिसम्बर स० -१९२८ का देय ।। रा.पं. गौरीशकर,जी प्रोमा लिखते हैं कि उत्पलदेन का मिया नगर घमाना अादि सर्व वाते कल्पित है । कारण कि ओपिया इतनी पुगणी नहीं है।। एक श्रोमिया ही क्या, जल से धुली हुई मारवाड की रती को देख कर विज्ञान वत्ताओं ने निर्णय कर लिया है कि आज मे दा हजार वर्षों के पहिली यह ममस्त प्रदेश, ममुद्र के जल में दूबा हुआ था। समुद्र के जल के भीतर आपम में पिम कर गोल बने हुए गिल गच्चीयों के उपर बीकानेर बसा हुआ है। पीकानेर की कंकरीली भूमी के अन्दर गुफाओं में आज भी मगर और कछुओं की हड्डीयां निकलती हैं। इस मे निश्चय 'होता है कि थोडे ही वर्षों पहिली यहां समुद्र था। भूपेत्ताओं को पूछ कर ज्ञानसुन्दरजी निश्चय करलें कि क्या हमारे रत्न. प्रभारी श्राज से ढाई हजार वर्षों के पहिली ही जल जन्तुओं को प्रतिरोध देने के लिये यहा आये थे। अपने अपने गच्छों की बडाइ के लिये ही ज्ञानसुन्दर जैसे मूर्य गूथ कागेने मत्य जैन सूत्रों की महिमा घटाई है। हकीकत में आमपाल जाति किसी की बनाई हुई नहीं है। "अश्वपाल" घोड़ो को पालने वाले.। यह गुण निष्पन्न नाम चंद्रयशी राजपुतों की एक
।
समुदाय का ही नाम है जिमका अपभ्रंम 'ओमपाल' हो गया
है । पहिले ये लाग भीनमान की तरफ रहते थे | जय बहा
अनार्यों का अाक्रमण हुआ तो,' अपना जान माल लेकर इम
जंगल देश में ये लोग पा रहे । सुरु से तो ये लोग जैनी ही
थे परन्तु कारण पाकर जैन धर्म से पति न प्रायः हो गये थे,
चिन्हों को जैनाचार्यों ने फिर में शुद्ध कर लिये हैं। ज्ञा.
अपनी पट्टावली देख लिखा है कि-चन्द्रवंशीय दो भ्राता
ऊहड १ उद्धरण २॥ ढीलीपुर राजा श्री साधू तस्य ऊडेन
५५ तुरंगमा भेटी कृता, उचएमा संतुष्टोददौ, ततोभीनमाला
अष्टादश महस्त्र कुटुम्ब अगात् । द्वादश योजना नगरी जाता:
॥ उ० ५० पृ० ४ ॥ ज्ञानसुन्दर भाई को तहकीकात करना
चाहिये कि दिल्ली (बीली ) नगरी कर किम ने चमाई और
ऊहड़ को जागीरा देने वाला माधु गजा कर हुप्रा । इमी म
रत्नप्रभ्रमरिजी का भी पता मिल जायगा कि कब हुए हैं।
सैर अब चौरडियों के बारे में द्विानों की मम्मति दखिग,
रा० सेरसिंहजी गाँड लिखते हैं कि पूर्व देश में चन्देरी नाम
की एक नगरी थी. उम में खरहत्थ नाम का राजा राज्य
करता था, उम के अमदेव निम्बदेश मशाशाह और आप
पाल नाम क चार पुत्र थे। ये चार बड़े ही सुरीनीत और
अति ही पराक्रमी थे । एक ममय अनेक योद्धाओं को लेकर
यवन मेना हिन्दुस्थान में पानी के पूर की तरह मे पा घुमी
.
गये । परन्तु
1१५९)
शार अनेक प्रान्तों को लूट कर अगणित द्रव्य लेकर अपने
देश को माना हुई। यह ममाचार राजा के सुनने में आया
तो वह उमी ममय ४ पुत्रों सहित कुछ मना लेकर यवन
भेना के पीछे टूट पड़ । यद्यपि महाराज सरहत्यमिह की मेना
शत्रु की मेना में बहुत ही कम थी, तथापि वीरता में कम न
थी। मच है पाग की एक चिणगारी भी हजारों, मण हर्ड
को क्षण भर में भस्म कर देती है। ठीक इसी ही तरह क्षुद्र
मेना को नष्ट कर सर्व द्रव्य तथा युद्ध में शक्त घायल हुए
अपने चार पुत्रों को ल कर अपने नगर में श्रा
किमी क मुख पर हर्ष का कुछ भी चिन्द नहीं था। कारण
राजा को क्षत पीडित,अपने चारों ही पुत्रों के जाने की आशा
न थी । अनेक इलाज कराये लेकिन कोई फायदा
न हुमा । उन्हों की यह हालत देख राजा की
निगशा और घबराहट बढती ही गई । इम विपम
और दु सायम्था में पुण्य संयागे ग्रामानुग्राम विचाते हुए
पि० त० ११६. में युग प्रधान श्री जिनदत्तमूगश्वग्नी
महाराज पधार गये । यह शुभ समाचार सुनते ही राजा गुरु
के पास जाकर परणों में गिर पड़ा और रोकर मब दुःस
प्रगट किया । यह देग गुरु महाराज को बड़ी दया प्रागई
मोर एक देवी को हुम्म देकर चारों दी राज पुत्रों के शरीर
में माराम करवाया। इस प्रभार को देख सकल जन दादा
समुदाय का ही नाम है जिमका अपभ्रंस 'ओमपाल हो गया है । पहिले ये लोग भीनमान की तरफ रहते थे । जस हा अनार्यों का अाक्रमण हुग्रा तो, अपना जान माल लेकर इम जंगल देश में ये लोग पा रहे । सुरु से तो ये लोग जैनी ही थे परन्तु कारण पाकर जिन धर्म से पतित प्रायः हो गये थे, मिन्दों को जैनाचार्यों ने फिर मे शुद्ध कर लिये है। ज्ञा० अपनी पट्टापली देखें लिखा है कि-चन्द्रवंशीय द्वो भ्राता ऊहड १ उद्धरण २ ॥ ढीलीपुर राजा श्री साधू तस्य ऊहडेन ५५ तुरंगमा भेटी कृता, उवण्मा संतुष्टोददी, ततोमीनमालात् श्रष्ट दश महस्त्र कुटुम्ब अगात् । द्वादश योजना नगरी जाता: ॥ उ० १० पृ० ४ ॥ ज्ञानसुन्दर भाई को तहकीकात करना चाहिये कि दिल्ली लीली) नगरी कप किम ने कमाई और ऊबड़ को जागीरा देने वाला माधु गजा कर हुप्रा । इमी म रत्नप्रभ्रमरिजी का भी पता मिल जायगा कि वे कर हुए हैं। सैर अब चौरडियों के बारे में द्विानों की मम्मति देखि, रा० सेरसिंहजी गोंड लिखते हैं कि पूर्व देश में चन्दरी नाम की एक नगरी थी. उम में खरहत्थ नाम का राजा राज्य करता था, उम के अम्मदेव निम्बदेव मशागाह और आश्प पाल नाम क चार पुन ये। ये चार बड़े ही सुमीनीत और प्रति ही पराक्रमी थे । एक ममय अनेक योद्धाओं को लेकर यरन मेना हिन्दुस्थान में पानी के पूर की तरह मे आ घुसी
.
(१५९)
और अनेक मान्तों को लूट कर अगणित द्रव्य लेकर अपने
देश को रवाना हुई।
| यह ममाचार राजा के सुनने में आया
तो बड़ उमी ममय ४ पुत्रों सहित कुछ सेना लेकर यमन
मना के पीछ टूट पड़े । यद्यपि महाराज खरहत्यमिह की मेना
शत्रु को मेना में बहुत ही कम थी, तथापि शरता में कम न
थी। मच है आग की एक चिणगारी भी हजारों मण रूई
को क्षण भर में भस्म कर देती है। ठीक इमी ही तरह क्षुद्र
सेना को नष्ट कर सर्व द्रव्य तथा युद्ध में शक्त घायल हुए
अपन चार पुत्रों को ल पर अपने नगर में आ गये । परन्तु
किमी क मुम पर हर्ष का कुछ भी चिन्द नहीं था। कारण
राजा को क्षत पीडित अपने चारों ही पुत्रों के जाने की आशा
न थी । अनेक इलाज कराये लेकिन कोई फायदा
न हुा । उन्हों की यह हालत देख राजा की
निराशा और घबराहट बढती हो गई । इस विषम
और
दु सावस्था में पुण्य संयागे ग्रामानुग्राम विचाते हुए
वि० स० ११९२ में युग प्रधान श्री जिनदत्तसूरीश्वरजी
महाराज पधार गये । यह शुभ, समाचार सुनते ही राजा गुरु
के पास जाकर चरणो में गिर पड़ा और रोकर मब दुःख
प्रगट किया । यह देख गुरु महाराज को बड़ी दया भागई
और एक देवी को हुम्म्म देकर चारों ही राज पुत्रों के शरीर
में आराम करवाया। प्रभाव को देख सकल जन दादा
-
(१६.)
साहब की नानाविध भक्ति और स्तुति करने लगे कि ध
है गुरुदेव तुम्हारी असीम करुणा और 'इम जैन धर्म के
राजा भी गुरुदेव का उपदेश पाकर अनेक क्षत्रियों के म
जैनी होगया । एक समय राजा के बड़े पुत्र अनदेव ने अ
गान के नामी २ चौरों को पकड़ २ कर बेड़ियों में डाल
थे, इसी कारण मे उनका और उनके संतानों की चौर चड़ि
सज्ञा हुई, उन्हीं को अब लाग चौरड़ियों कहने लग गये।
मूल में तो ये लोक राठोड़ ही है परन्तु चौर चंडिया :
प्रसिद्ध होने पर भी इन्हीं में से तजाणी धन्नाणी पोपा
मोलाणी गल्लाणी देवसयाणी नाणी श्राणी ‘सद्दाणी का
मकड भक्कड लोटकण संसाग कौरा भट्टारकिया पीतल
मोनी फलोदीया' रामपुरिया सीपाणी '२१ अनेक गौत्र उत्
हुए हैं। राजा के दुसरे पुत्र निघदवकी संतानों में से किमी
“ भटनेर की चौधराई पचायती) की थी अतः उन्ह।
ओलाद वाले भटनेश चौधरी नाम से प्रसिद्ध हुए। राजा
तीसरा पुत्र भैमाशाह के पाच पुत्र थे उन्हों में स यड़ा कुंचर
नाम का ज्योतिय निमित और शकुनादि शास्त्रों का
वेत्ता था । एक समय परक्षिा के लिये चित्तोड़ के राणा
बुलाकर उन्हों से पूछा कि कहो कुंवरजी इस साल में श्राव
और भादवा के साक होगा। कुपरजी ने आसमान
तर्फ देस 'उत्तर'' दिया कि श्रावण सूका भाद
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