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Nirmalyadravya - Charcha Volume - Ii

Doshi, Heerachand Nemachand · 2009/11

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जैन बुकडिपो, सोलापूर येथे मिळणारी पुस्तकें. A . २ २ . M 20 . । ३ - ३ शुतावतार कथा मराठी पुस्तकें. कि. रु. भा. कि. रु.ग. श्री महापुराणामृत ... १ • जैनकमविधी सागारधर्मामृत.... रत्नकरंट मराठी कविता ' ४ ममितगति श्रावकाचार ११२ बालबोध जैनधर्म भाग १-२० १॥ आत्मानुशासन भाग ३-४० जिनसेन व गुणभद्राचार्य पार्श्वनाथ चरित्र यांचे चरित्र ८ महावीर चरित उपदेशरत्नमाला मराठी प्रो.. ८ सामायिक पाठावली २ छहढाला मराठी 6 ३ देशभूषण कुलभूषण चरितसु पुण्यास्त्रव पुराण ओवीबद्ध २ ८ गजकुमार चरित्र उपदेश रत्नमाला ओवीबद्ध दशलाक्षणिक धर्म त्रिवर्णाचार. महतीसागर चरित पद्मनंदी पंचविंशति ३. ० जंबूस्वामीचरित्र पुराण....१ नमिदूतकाव्य जैनधर्मादर्श नेमिदूतकाव्य कविता पंचास्तिकायसमयसार ४ | भजन सोधमालिका देवागम स्तोत्र श्रावक,प्रतिक्रमण जीवंधरचरित्र ओवीबद्ध ० १२ श्रावक प्रतिक्रमण कविता ०. जैनकथा सुमनावली • १२ | बुद्धधर्माचे अमात्य नियम . अठरा तीर्थकर चरिने.... ० १२ | द्वादश अनुप्रेक्षा सम्यक्त कौमुदी भक्तामर अर्थ तत्वार्थाचा मराठी अर्थ ० १२ हिंसानिषेध वसुनदी श्रावकाचार ०.१०. स्मृतिपटल कियामजरी .० १३. रविवारव्रत कथा 'यशोधरचरित्र ८ कदकुदाचार्य चरित्र प्रश्नात्तर माणिक्यमाला जैनसिद्धात प्रवेशिका षोडशकारण भावना विद्योन्नती संवाद ईश्वर काही करतो काय! जैनएतिहासिक निया रूपिणी • ६ निर्माल्यद्रव्य चर्चा मराठी . ८ ८ mm ... + .... ४. नैन मेळ्याची पदें ६: पधावली ३ १ १ जैनव्रत कथा ४ जैन पुरोहित ६ 20 प्रस्तावना. , - आगे निर्मास्यद्रव्य-चर्चा' नामक एक पुस्तक और उसका एक पारीशष्ट ऐसे प्रसिद्ध हो चुके हैं जिसके वाद न्यायतीर्थ पंडित बनसीधर जीने जेनसिद्धात ' नामक मासिकपत्रमें 'निर्मास्यद्रव्य विनि- योग' शीर्षक एक लेख दिया, जिसका उत्तर हमने 'जैनमित्र ' साप्ता- हिकमें दियाथा. उसके प्रत्युत्तर जैनसिद्धांतमें आयेथे उसके उत्तर सहित सभी लेख इस पुस्तकमें एकत्रित किये है. पं० वनसपिरजी देवसेवा करनेवालेको निर्माल्यग्रहण करने में दोष नहीं है ऐसा बताते हैं बाकी सभीको निर्माल्यद्रव्य ग्रहण करनेमें पाप बताते हैं. भगवानका पूजन करनेवाला हरएक श्रावक देवसेवा करनेवाला कहा जा सकता है उसने निर्मास्यद्रव्य ग्रहण किया तो उसको दोष नहीं ऐसा कहना परस्पर विषी है, और ऐसा प्रतिपादन करने कोई मागम पमाण दिया नहीं ६. सो वाचमवृंद विचारेंगे. सोलापूर. हिगचंद नेमचंद दोशी ता. ३१३११९२२ EVENVERS

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निर्माल्य-विनियोग
एल
(जैनसिद्धान्त-भाद्रवमास वीरसंवत् २४४६,इ. सन १९३९.)
)
लेखक-पं० न्यायतीर्थ वंशीधरजी.
,
-
?
देवशास्त्रगुरूणां भी निर्मात्यं स्वीकरोति यः ।
वंशच्छेदं परिमाप्य स पश्चाद दुर्गतिं व्रजेत् ।।
[सकल कीर्ति-सुभापिका
अर्थ-देव शास्त्र गुरुओं के निर्मात्यको जो स्वीकार करता है उ.
सके वंशका उच्छेद होता है और वह दुर्गतिगामी होता है.
निर्मात्य ग्रहणका इतना वहा दोष है, तब इसका क्या क्रिया
जाय ! यह प्रश्न लोग आगे लाते हैं हम आगे चलकर यह दिखावेंगे
कि इस प्रश्नमें कुछ भी सार नहीं है और जो विनियोग इसका आजकल
हो रहा है वही होना चाहिये तोभी यह प्रश्न जो समाजमें जोर के साथ
फैलाया जा रहा है उसका कारण कहीं तो 'अज्ञान है और कहीं कपाय
है. कषायमें तो लोभ मुख्य है और अज्ञान शास्त्रों के अर्थका न समझना
है आज भी जो उपलब्ध आगम है उनका पूर्व पर विचार करने में
अकांड ताडव करने का प्रसंग नहीं आसकता है परंतु इतना श्रम करे कोन!
अब इस विषयमें जो लोगोंके आक्षप हाते हैं उनपर विचार
करते है उनमें से एक आक्षेप यह है कि अमृतचंद्र तत्वार्थसारमें इसका
निषेध करते है. देखो.
प्रमादादेयतादत्तनेवेद्यग्रहणं तथा ।
इत्येवतरायस्प भवन्त्यासंबईतयः ।।
यह श्लाक आतंत्र प्रकरणका है. इसका अर्थ है कि देवको
वर्पण किये हुए नैवेद्यका ग्रहण करने आदिक कार्य अंतराय कर्मका
1

, 1 (१) आसब करते हैं. राजवार्तिककार अक्षक देव भी ऐसा ही कहते है. और इन सर्व आचार्योंमें प्राचीन श्री कुंदकुंदाचार्यका यह वचन है कि. पुत्फलत्तविहीणो दारिदो पंगुमूकवहिरंधो । चाटालाइकुजादो पूजादाणाइदच्वहरो ॥ ३२॥ अर्थः-पूजादानादिके द्रव्यको जो हरता है वह पुत्रकलविहीन, दरिद्री, पंगु, मूक, बधिर, अंध इत्यादि दुःख पीडित होता है; परम- वमें चांडालादि कुलों में चन्म लेता है, यहापर हरण करनेका यह फल बताया है. हरणका अर्थ चोरी करना है अमृतचद्रादि आचार्योंने जो अंतरायका कारण इसे बताया है उससे भी ग्रहण 'करनेका अर्थ चोरी करना हो सकता है. क्योंकि, चोरी करना विघ्नकरण है जो कि मंत. रायका मुख्य कारण है. विघ्न करना इसलिये चोरी करनेपर सिद्ध होता है कि जिसके अधिकारमें जो है वह उसका उपयोग कर सकता है और करता है. परंतु उसके पाससे निकल जानेपर वह उस उपयोगसे वंचित हो जाता है. इसलिये चोरी करनेवाला पूर्वस्वामी के भोगमें विघ्न करता है. मगवत्कुदकुदके उक्त वचनसे यह मतलब नहीं निकलता कि अर्पण हुई चीजको हरनेमे उक्त दोष कगते हैं. तब ! पूजादानादिके लिये द्रव्य आगे काममें आनेवाला है उसे हरने उक्त फल प्राप्त होता है दरिद्री नौकर चाकर ऐसा प्रायःकरते हैं कि जो पूजा या दानके लिये सामान रक्खा हो उसमें से चुगलेते हैं आण हुए द्रव्यम से भी चुग लेना संभव है परतु वह तब जब कि चुगये विना मिल न सकता हो भ. र्थात् उसका कोई दूसग ही नियोगपूर्वक लेनेवाला सिद्ध होता जिसे मिलना नियोग ।प्त नहीं है वह कदाचित् चुगना चाहेंगा चुराने में मनु प्यकी तमी प्रवृत्ति होती है जब कि दूसरे मार्गसे मिलना कठिन दीखता इससे यह भी मालूम होता है कि अर्पित द्रव्यको ग्रहण करनेके नियोगी मनुष्य, प्राचीन समयमें भी थे जैसे कि आजकल है. अर्थात् | - - १) उस द्रव्यको लेनेका चाहे जिमे अधिकार नहीं है. यही बात निर्माश्य ग्राहणके निषेधसे दिखाई गई है. इसका यह कारण है कि निर्माल्यपना द्रव्यमें अर्पणके संकल्पसे उत्पन्न होता है. अर्थात् जो अर्पण करता है वह उसे निर्माश्य समझता है. उसका ग्रहण यदि वह स्वयं करे तो लोभापायकी निवृत्ति होना जो पूजादानका फल है वह फल प्राप्त नहीं हो सकता है. क्योंकि 'प- र्पण करके स्वयं ग्रहण जो करता है उपके परिणामों में स्वत्वानिवृत्तिरूप भाव उत्पन्न नहीं होपाता है. एवं, जो दुसरा कोई उसे ग्रहण करना चाहता है उसके परिणामोंमें न्यायोपार्जनकी बुद्धि नहीं रहती क्योंकि, किसी कामके बदलेमें जो किसी एक चीजका ग्राहण करना है उसका नाम न्यायोपार्जन है. इसका मतलब यह है कि यदि अर्पण करनेवाला स्वयं उस द्र- व्यको ग्रहण करले तो वह भी उसका अन्यायी है और जो कुछ भी उससे संबंध न रखनेवाला ग्रहण करके तो वह भी अन्यायी है. अर्थात् उसे जो मनुष्य किसी कामके बदले में लेता है वही केवल उस द्रव्यका न्यायोपानयिता है. शेष दोनो ही अन्याय्य वृत्तिके मनुष्य ठहरते हैं. यही कारण है कि उनको अंतरायका बंध होता है क्योंकि, जो नियोगी मनुष्यको प्राप्त होनेवाली थी उसे दुसरे हरण करके उस नियोगीके ला- ममें विघ्न डास्ते है. यदि ऐसा अर्थ न माना जाय तो अंतरायके कारण बतानेका दूसरा क्या मतलब होगा? इस सबका तात्पर्य यह है कि अंतराय कर्म के बांधने का कारण उस अवस्थामें कहा जासकता है जब कि किसी दूसरे का नियोग रहते हुए उसे आप के अर्थात् उसके लाभमें विघ्न करनेका कारण होनेसे अत- रायका बंध होता है. यह बात उस अवस्थामें है जब कि द्रव्यका अर्पण होचुका हो और जबतक अर्पण न हो तवतक हरण करलेनवाला दा- नांतरायका बंध करता है क्योंकि दान होनेमें विन्न किया है. इसमेसे (४) प्रश्न कर्ताओंका मुख्य आक्षेप निर्माल्य होने के चाद-समर्पण किये हुए द्रव्यके विषयमें रहता है कि उसका क्या किया जाय ? सो उत्तरमें हमारा यह कहना है कि यदि उस द्रव्यका नियोगी कोई भी मनुष्य न रहता हो तो उसका अहण करनेसे अंतराय या विघ्न किसका किया गया जिससे कि अरायका वह कारण हुआ? क्योंकि, अंतरायका मुख्य अर्थ विन है इमजिये यह मानना आवश्यकीय व न्याय प्राप्त होजाता है कि निर्मात्यके ग्रहण करनेवालेने किसी ऐसे लाभमें विघ्न किया है जो कि उस द्रव्यका अधिकारी बननेवाला है. अब रही यह बात कि जो नियोगी मनुष्य है उसके लिये क्या वह द्रव्य निर्माल्य नहीं है ? यदि है तो उस निर्माल्यके ग्रहणका दोष उसे भी माना जायगा या क्या ? इसका थोडेसेमें उत्तर यो है कि निर्माल्यपना प्रतिषेधका हेतु नहीं है किंतु दुसरेके विघ्नका कारण होना प्रतिषेधका हेतु है. प्रत्येक विधान कुछ अपेक्षा रखता है इसी प्रकार यहापर भी जो दूसरे कोका कारण न बताकर अंतरार्यका कारण माना है उसका हेतु विघ्नकरणता ही होसकती है. इस हेतुकी सिद्धि, जिसके ग्रहण करते समय, होस- कती है उसीकेलिये निर्माल्य है और नियोगीके लिये वह निर्माल्य नहीं है. जिस प्रकार सभीकेलिये सर्प सर्प होसकता है परंतु गरुहकेलिये वह सर्प नहीं होसकता. यहापर सर्प शब्द बोलते ही जिस प्रकार भीति- प्रद अर्थ भासने लगता है उसी प्रकार निर्मात्य' कहते ही 'अग्राह्य' अर्थ भासने लगता है। और यह उत्सर्ग वाक्य उसी प्रकारका चोला भी जाता है, तो भी जिस प्रकार उस उत्सर्ग वाक्यका तात्पर्यार्थ करते समय ‘गरुडको छोडकर शेष सबकेलिये भीतिमदपना' ऐसा मानना युक्त है उसी प्रकार निर्माल्य' शब्दका भी उत्सर्ग अर्थ ' अग्राह्यता: ऐसा किया जासकता है परंतु तात्पर्यार्थ के समय अपवादात्मक नियोगी । मनुष्यकेलिये 'ग्राह्यता' मानकर ‘शेष सबकेलिये वह अग्राह्य है' , --- (? ऐसा मानना युक्तिसंगत होता है. जैसे गरुडको अपवाद माननेका, कारण उसकी विशिष्ट शक्ति है वैसे इस नियोगीको अपवाद ठहरानेका कारण देवस्थानकी सेवा है कुछ लोगोकी कल्पना यह रहती है कि निर्माल्य हुआ द्रव्य दे. वके स्वामित्वका होता है. उसके स्वत्वमें विघ्न डालनेसे अंतरायका बंध होता है. परंतु यह समझ ठीक नहीं हैं. उपभोग्य वस्तुका स्वामित्व उपभोग लेनेसे पहिले पहिलेतक ठह- रता है बादमें वह वस्तु जिस प्रकार उपभोग्य न रहकर उपभुक्त हो जाती है उसी प्रकार उस भोक्ताका उसपरसे स्वामित्व भी हट जाता है और उस उपभोग्य वस्तुका उपभोगके बादका पर्याय त्याज्य हो जाता है. अर्थात् उपभोग्यता जाकर त्याज्यता उत्पन्न हो जाती है. यह उस विषयकी बात हुई. अब देखिये विषयीकी तरफः हम ऊपर कहचुके हैं कि भोक्ताका उस द्रव्यपर स्वामित्व तभी- तक रहता है जबतक कि उसे भोगकर खतम नहीं किया है, अर्थात भोगनेकी क्रिया समाप्त होनेसे पहिलेतक उस वस्तुका वह मनुष्य स्वामी रहता है जो कि उस द्रव्यको संचित करनेवाला है या जिसके लिये उस- का संचय हुआ है। बादमें वह वस्तु जिसके उपभोगमें आनेवाली है वह उसका स्वामी होता है और पहिलेका स्वामित्व हट जाता है, यह अधि. कार सृष्टिक्रमप्राप्त है, न कि किसीसे मिलनेपर यह प्राप्त होता है परंतु कृत्रिम अधिकार भी देखना हो तो इसी प्रकारसे दीख पडेगा. उदाहरणार्थ:-~भोजनकी वस्तुका स्वामित्व, जबतक भोजन नहीं किया हो तबतक, घरके मनुष्यको प्राप्त रहता है पर बादमें, जहा देहात है वहां, कुदरती स्वामित्व सूअर वगैरे विष्ठाभोजी जना. वरोंको प्राप्त हो जाता है. यदि वह विष्टा स्वातके रूपमें माना गया हो तो उत्तर प्रांतमें जमींदार लंबरदार वगैरह और दक्षिणके पाटील उसके स्वामी बन जाते है. एवं, जिन बडे शहरोंमें सुधारकी सीमा बढ़ चली है वहां गवर्मेट व म्युनिसिपालटियां उसकी स्वामिनी वननी है जहां और भी अधिक सुधार हो रहा है वहां उसके स्वामित्व प्राप्त करने के लिये आपसमें कलहतक होउठता है. एक कहता है कि इस विष्टाके भोगनेका मुझे अधिकार न्यायप्राप्त है, दूसग कहता है, मुझे प्राप्त है ऐसे कन्ह कभी कभी यहातक बढ जाते हैं कि सबके स्वामी उदार गवर्मेटको वीचमें पडकर फैसला करना पड़ता है. यह बात हुई एक व्यवहार संबंधी उदाहरणकी; पर ठीक यही दशा निर्मात्यकी है. स्थापनाके प्रारंमसे विसर्जन हुएतक पूजनकी क्रिया ममझी जाती है, यदि उस पूजाद्रव्य के साथ भाग्यभोजक सबंध देशका माना जाय तो वह संबंध और वह स्वामित्व विसर्जन के बाद में खतम हो जाता है, और भंडारमें जो वस्तु थर्पण हो चुकी है उसका स्वामित्व उसके बि. नियोगतक तथा फलभोग तक रहता है. कुछ लोगोंको यहापर शका होगी कि भंडारकी वस्तुओं के समान ही पूजन के द्रव्यका स्वामित्व पूजन होनेके बादमें भी पूर्ववत कायम रहना चाहिये परतु इसका उत्तर यह है कि पूजन व भंडाराक्रिया में एक विशेष अंतर है. वह यह कि जिस प्रकार पूजनकी अंत्यक्रिया विस- र्जन है उस प्रकार मंदारमें अर्पण करनेकी क्रिया अंतमें विसर्जनको नहीं दिखाती है इसीलिये पूजनका अर्थ एकवार भोग होना है और भडार करनेका अर्थ अनेकवार भोगकलिये रखना है. भोजन व वसमें जिस प्रकार उपभोग्यता व परिभोग्यताका अवर है उसी प्रकार ठीक पूजन व भंडारके सामानमें सकृद्भोग्यता व असकृद्भोग्यताका अंतर है. यही बात, पूजन के बाद विसर्जन करने व भंडार करने के बाद विसर्जन न करनेसे, सिद्ध होती है. इसपर लोग कहेंगे कि विसर्जनका मतकर नहीं है कि 'अर्पित द्रव्यके साथ का सबंध छूट जाता हो; किंतु पूर्व स्थान पर देवको बैठा देना है. परंतु इस बैठा देनेका ही यह मतलब उहरता है कि पूजन समाप्त हुआ. अर्थात, पूजनकी क्रियाका प्रारंभ - - (७) आहान है और विसर्जन समाप्ति है. पुजन क्रियाका अर्थ जलगंधादिका उपभोग कराना है. जिस प्रकार लाभांतरायके क्षयसे केवलीको जो अनं- तभोग होता है उसका साधन कुसुमवृष्टि आदि समझी जाती है, उसी प्रकार नजगधादि भी उस भोगकी सामग्री है. वह भोग सकृतमोग है इसलिये विसर्जनके वादमें वह भोग्यमोजकक्रिया समाप्त हो जाती है. इसी मतलबके लिये अकलकदेवने देवद्रव्यके दो भेद किये है। एक नि- वेध, दूसरा अनिवेद्य. यह वचन इस प्रकार है: 'तद्विस्तारस्तु देवतानिदेद्यग्रहण-प्राणिवधादिः' इसका अर्थ है कि देवताको निवेदित किया हुवा और निवेदित न किया हुमा ऐसा दो प्रकारका द्रव्य ग्रहण करनेसे दूसरेके दान लाभ भोगोपभोग वीर्यमें विघ्न उपस्थित होता है इसलिये उस द्रव्यको लेनेवाला अंतराय कर्म वांधता है. जो लोग विघ्नकरण-हेतुकी अपेक्षा न करके ग्रहण करनमानसे अंतरायका बंध हो जाना मानते है उनको तत्वार्थसारमें स्पष्ट करके खास बताया है कि. 'मादाद्देवतादत्तनैवेद्यग्रहणं तथा' अर्थात्, प्रमादाचरणपूर्वक- दूसरेको विघ्न उपस्थित हो ऐसी तरहसे देवतादत्त नैवेद्यादिका ग्रहण करे तो मंतरायका कारण हो. अकलंक देवने भी शका दिवाकर यही उत्तर दिया है:- अनपदिष्टहेतुकत्वादासवानियम इति चेन्न, स्वभावाभि- पंजकत्वात् '. अर्थत्, असरके जो कारण लिखे उनकलिये ऐसा कोई हेतु नहीं बताया कि ' इसलिये' अमुक आस्रवमें ये उपर्युक्त नै- वेद्य ग्रहणादिक कारण होते है। इसलिये इन वचनोंको कैमे माना जाय? इस शंकाका उत्त देते हैं जो हेतु जिस कर्मात्र केलिये बताये है उन हेतुओका उन उन बंधनेवाले कर्मों के साथ समान-स्वभाव मिनता है इसीलिये वे उन मासबों के हेतु होते है. भावार्थ, निर्माल्य अह- - - - . - (2) णसे किसीको विघ्न उपस्थित हो तभी यह अंतरायका कारण हो सकता है. अर्थात् ही नियोगी मनुप्यके सिवा यदि कोई दूसरा उस द्रव्यको ले तो नियोगीके लाभमें विघ्न हुआ माना जायगा; न कि, नियोगीको उसका दोप हो सकता है. हम ऊपर लिख चुके है कि निर्मात्य वस्तु स्वतः अपवित्र चीज नहीं है. इसलिये यह समझ भी दूर होनी चाहिये कि जहाँपर उस द्रव्यका स्पर्श हो जायगा वही पदार्थ दुपित हो जायगा. परंतु आज. कल समाजमें ऐसी ही समझ निर्माल्यके विषयमें वहुधा होरही है. इसे खानेवाला मनुष्य अभक्ष्यमोनी समझा जाता है. अत एव प्रायः लोग निर्मात्य खानेवाले के हाथका पानीतक नहीं पीत है. जन कि निर्माल्य के स्पर्श होनेका भी महा पाप समझते हैं, तो उसका भोजन करना तो अ त्यंत अपवित्रताका कारण मानना ही चाहिये. यही कारण है कि, ग्रंथकारोंने इसके भक्षणके विषयमें एक शब्द भी निषेध या विधानका नहीं लिखा, तो भी लोग इसके भक्षणका महापाप समझते हैं और वैसी ही समझमें सिद्धांत-समझ उत्पन्न करनेकी या ऐसी समझ कायम करनेकी कोशिस करते हैं. ऐसी समझ कुछ साधारण लोगोंकी ही नहीं है किंतु अच्छे समझदार कहानेवालोंकी भी यही समझ होरही है. सोलापूरके श्रीमान् शेठ हिराचंद नेमचंद तो इसका ऐसा पीछा कर रहे हैं कि जब अंथों में मक्षणके निषध का कोई एक शब्द भी कही. पर न मिला तब सचित्तत्याग प्रतिमाके विश्व कार्तिकेयानुप्रक्षा के एक मक्षणनिषध करनेवाले को निर्माल्य माणके निपे। करनेमें जोडकर उसके भक्षणक निषकको पुष्ट कर दिया. वह हम प्रकार कि, प्रथम तो अमृतचंद्रादि आचार्योंके वचन ग्रहण करने के नि. धपरक उद्धृत किये और बादमें ग्रहण का निषेध करते करते भक्षण. संबंधी का० अ० की गाथा उठाकर रखदी. और उसका अर्थ एंपा सर्वनामक सामान्य शब्दोंका प्रयोग करके लिखा कि पांचवाका यदि (९) + - मूल ग्रंथको न देख तो जरूर ही मानने लगे. वह इस प्रकार "जो णय भक्खेदि सयं तस्स ण अण्णस्स जुज्जदे दादु । 'भुवस्स भोजितस्स हि पत्थि विसेसो सदो कोवि ॥७९॥ सेठजी इसका अर्थ करते है कि " जो जिसका स्वतः भक्षण नहीं करता वह उसे दूसरेको भी न दे. क्योंकि स्वतः खाना 'व'दुसरे- को खाने के लिये देना इसमें कुछ फाक नहीं है. कृतकारित एकसेही होते है." यह हुआ सेठजीका अर्थ. अब इसकी , असली संस्कृत टीका देखियः च पुनः स्वयं आत्मना यः सचित्त ज़लफलदकमूलाकिसक यवीजादिकं न मक्षयति न अत्ति । यतः यस्मात्कारणात्' स्वयं भुक्तस्य स्वयं सचित्तादिकं भोजनं कुर्वतः सचित्तादिक भोजयि- प्यतः परान् भोजन कारयिष्यत: सतः अन्यान् हि स्फुट कोपि विशेषो न उभयत्र सदोपत्वात् ।। अर्थ:-जो स्वयं सचित्त--जल फल दल मूल किसलय बीज आदि भक्षण नहीं करता उसे चाहिये कि दुसरेको भी सचित्त न दे. क्योकि स्वयं सचित्तका खाना क्या और दुसरेको खिलाना क्या, दोनों में कुछ फरक नहीं है. ' इस प्रकार टीकाकार इतने विस्तारसे सचित्तके अभिप्रायको खु. कासा अनेक शब्द देकर कर रहे हैं और हिंदी भाषा जो अर्थ प्रसिद्ध हुआ है उसमें भी सचित्तका ही उल्लेख है. सेठजीने भी यह सब देखा न होगा यह वात नामुमकिन है. परंतु सचित्त के कुंक शब्दोंको उदाकर 'नो खावे नहीं वह दे भी नहीं ' इस प्रकार '' जिस उस ' शब्दोंका प्रयोग करके प्रकरण के रहस्यको छिपा दिया और लोगोंके मनपर निर्मा- स्यकी समक्ष्यताको छाप बैठाल दी. भव हम यह दिखाते हैं कि भक्षण व ग्रहणमें क्या मतलवका पर फर्क है. नहां नहा भक्षणका निषेव आता है वहां वहां या तो प्राण ti - - - . संयमकी रक्षाका हेतु रहता है, नहीं तो इंद्रियसंयमकी अपेक्षा होती है. और इन दोनोंका फल एक ही है. वह यह कि चाहें प्राणसंयमका मुख्यतासे भक्षणको छोड़ा हो और चाहे इंद्रियसंयमकी इच्छासे, परंतु उन दोनोंका फल चारित्रमोहकी निर्जरा या संवर होना है. यहांपर जो ग्रंथकार निर्माल्य ग्रहणका फल दिखाते हैं वह अंतरायकर्मका आस्तव होना है और उसका हेतू विन्न करना है. भक्षणका हेतू असंयमरूप परि- णाम है. इस प्रकार भक्षण व ग्रहणके अर्थमें स्वरूपसे भी भेद है, फलसे भी भेद है और हेतुसे भी भेद है, तो भी न मालम, सचि. के भक्षणनिषेधकी एक अप्रकृत गाथाको निर्मात्यके अप्रकृत. विषयमें सेठजीने क्यों जोडदिया। कूछभी, हो, उनका वे ही जानें, परंतु को- गोंकी ऐसी समझ होनेका तात्पर्य इतना ही है कि सर्व सामान्य इस निर्माल्यको अपवित्र समझ रहे हैं और समझदार लोग इसी अभिप्रायके फेलाने में अपने प्रयत्लकी सीमा देखा करते है. वास्तविक ' निर्माल्य ' शब्द का अर्थ निर्मल है. यद्यपि 'निर्म - लय भावो नैर्मल्यं ' ऐसा निर्मल अर्थमें शब्द बनता है परंतु इस वि शिष्ट प्रकार के निर्मकपनेके अर्थमें निर्मात्य शब्द बन जाता है. विशिष्ट प्रकारकी निर्मलता यहाँ इसलिये है कि देवाधिदेवको वह द्रव्य अर्पित हो चुका है. इस विशेष दशाका अभिप्राय प्रगट करनेकेलिये इस अर्थमें निर्माल्य-शब्दका प्रयोग लोगरूढ हो रहा है, जो लोगोंकी ऐसी समझ होरही है कि निर्माल्य ग्रहण करना महापाप है, इसकेलिये एक दुसरा भी प्रमाण बोला करते हैं. वह यह कि पद्मपुराण ग्रंथमें सीताको जब वनमें छोडनेकेकिये कृतांतवक्त्र नामका सेनापति रामचंद्रने भेना है तब सीताको छोडनेका कार्य अनुचित सम- शते हुए भी उसे छोढना तो पडा परंतु भृत्यकर्मकी निंदा उसके मुख: से कहलाई है; उस समय निर्माल्यकूटकी उपमा देकर मृत्यकी निंदा की गई है. - - - . -- - ११६) संस्कारकूटकस्येव पश्चानिवृत्ततेजसः । निर्माल्यवाहिनो घिग धिग् भृत्यनाम्नोसुधारणम् ॥ श्लोक'४४ पर्व ९७ अर्थात, जिसमें से तेज नष्ट होगया है ऐस निश्यिकुटके समान भृत्यका जीवन धिक्कारके योग्य है इससे लोग ऐसा तात्पर्य निकालते हैं कि जब निर्माल्यके संबंधसे कुट निंदित होगया तो जो मनुष्य, ग्रहण करेगा वह निंद्य क्यों न होगा ! भावार्थ, निर्माल्यका.' स्पर्श भी न कर ना चाहिये. इस प्रकार लोग एक मतलवको कहांतक वादरायण , संबंध बोदकर उसे खींचते है और ग्रंथके अर्थका विपर्यास करते हैं यह बात हम आगे दिखाते हैं. निर्माल्यकूटकी जहां मृत्यको उपमा दी है वहां कूटका विशेषण पानिवृत्ततेजसः ' ऐसा कहा है. इसका अर्थ होता है कि जिस- मेसे कुछ देरीके बाद तेज अर्थात् उष्णता निकल गई है. इसका तात्पर्य यह है कि पूजनके अंतमें जिन अनेक द्रव्योंसे अग्निकुंडामें हवन किया जाता है वे द्रव्य शांतिधारा छोड़ने के कारण अंतमें अर्धदग्ध' रहजाते हैं और धीरे धीरे उष्णता भी वहाँकी कम हो जाती है. उसीका नाम यहाँपर निर्माल्यकूट है. वह कूट बादमें अति असुहावना दीखने लगता क्योंकि, भस्म तथा अर्घदग्ध तेजःशून्य द्रव्य अव्यवस्थित पड़े दीखते हैं इसलिये उस दृश्यमें मनोमोहकता कहासे रहसकती है'! दुसरे उस निर्माल्यका स्वरूप चाहें पूर्ववत कायम भी हो परंतु वह निरुपयोगी चीज बन जाती है. जिस प्रकार भृत्य के जीवनमें परावलंबन के कारण निस्सा, रता रहती है उसी प्रकार निर्माल्य निस्सार वस्तु बनजाता है. यही निर्मात्यमें निंदाका कारण है. इस लेखपरसे, जो निर्मास्यद्रव्यका विनियोग दूसरेको लेने देनेसे रोककर जलाना पसंत कर' हैं वे, यह नजीजा निकालं केंगे कि आग्निकु- रोमें निर्माल्य द्रव्य पहिले भी जलाया जाता था. परंतु हम प्रथम अंकम T - (१२) पूजनके विषयमें अग्निकुंडोंका तात्पर्यार्थ व उपयोग लिखचुके है. उस- परसे मतलब यह सिद्ध होता है कि अहत्पूजन करने के बाद हवन- क्रिया. मुंदी की जाती है. उस समयकी अपेक्षासे उसका नाम निर्माल्य कूट कहा है. पद्मपुराणमें जिप्त निर्माल्यकूटका जिक्र आया है उसका नाम वहां संस्कारकूट लिखा है और निर्माल्य धारण करना उसका विशेषण, लिखा है. उसका तात्पर्य यह है कि संस्कारकर्म करनेकेलिये एक ऊंची वेदी बनाई जाती है और उसी जगह कुस्त्रय किये जाते हैं। जिनमें कि अर्हसूजनके बाद हव्य सामग्रीकी आहुति दे देकर गर्मजन्मादि संबंधी संस्कार किये जाते हैं. उसी स्थानपर हव्यादि द्रव्य फैल जानेसे और हवनका भस्मादिसमूह पिंडके रूपमें दीख पडनेसे उस सर्व समू- हका नाम, संस्कारकूट है., जिसमेंसे. धीरे धीरे तेज:प्रकाश निकल गया है और जिप्त उपभोगकेलिये वह सामग्री लाई गईथी वह सब उपभोग जिसका होचुका है, उत्सवकता समाजकी दृष्टिमें निरुपयोगी हुए उस निर्माल्य द्रव्यके धारक कूटकी तरफ समाजकी न्यकारकी भावना उत्पन्न होना ग्रंथकारने दिखाया है. सो ठीक ही है, नाच तमासा उठ जानेपर उस जगहका दृश्य फीका दीखने लगता है सर्व- सामान्य समाजको वह यद्यपि फीका दीखने लागता है परतु वहांकी, मालिकी रखनेवालेको वह बादमें भी रौनकदार और उपयोगी जान- है। उदाहरणार्थ, मेला उत्सव उठ जानेपर जगहमें कुडेके ढेर गते हैं; हूटे फूटे सामान पड़े रह जाते हैं. ये सब जी, सर्व सामान्य. लोगोंको तथा खुद उन चीजोके मालिकोंबो निरुपयोगी व असहावनी दीखने लगती हैं. परतु म्युनिसिपल कमेटी या जो कोई उसका हक- दार है उसे वह सर्व बहुमूल्य व सार्थक दीखता है और उससे हजारों लाखों २० का काम होता है, यदि कोई उसके., हकदारफेलिये भी उसे है पडता ।

1 ' - (१३) निरुपयोगी कहे तो वह प्राकृतिक ज्ञानसे शून्य समझा जाता है, सेठजी म्युनिसिपल कमिटीके बहुत दिनतक चेअरमेन रहे हैं और मॉ० मजिस्ट्रेट भव भी हैं. इधर जैन शास्त्रों के रहस्यको अच्छा जानते हैं; जैन स्यादादके दृढ विश्वासी है; परंतु न मालूम. निर्माल्य- की ही अग्राह्यतामें क्यों स्यादादकी योजना नहीं करते और क्यों सर्वथा उसे अग्राह्य मान रहे हैं ! कुछ भी हो, परंतु प्राकृतिक हेयादेयकी ही भांत ठीक निर्मात्यकी व्यवस्था रहनी चाहिये; वह हमारी समझ वस्तुस्थिति के अनुसार है. राजवातिकमें जो देवतानिवेद्यानिवेद्य ऐसा शब्द लिखा है उसका. यह तात्पर्य है कि देवसंबंधी द्रव्य दो प्रकारका होसकता है; एक वह जो कि पूजन करनेमें अर्पण किया जाता है; दुसरा वह कि जिसका पूजन करने में समर्पण नहीं किया जाता परंतु देवस्थानकी रक्षा करनेकेलिये दिया जाता है और उसके खसे पूजनीय व्यकी व्यवस्था हुआ करती है उदाहरणार्थ- खेतका देवको नाम पट्टा करादेना, गांव घर देना, जिसकी कि आमदनी से देवस्थानकी व्यवस्था व पूजनकी व्यवस्था निर्वाध चलती रहे. इसी बातको जिनसेन स्वामीने अपने आदि पुराणके ३८ ३' पर्वमें लिखा है कि- शासनीकृत्य दानं च ग्रामादीनां सदार्चन ॥२८॥ अर्थात्, गांव खेत वगैरह देवस्थान के लिये देदेना, एक प्रकारकी नित्यपूजा है; क्योंकि, पूजनका प्रबंध ऐसा करनेसे, चिरकालतक पूजन व देवस्थानकी व्यवस्था चकती रहसकती है. इस प्रकार कार्यकारण या निमित्तनैमित्तिक संबंधका अर्थ मनमें रखनेसे उन खेत वगैरह द्रव्योंको पूजादानादिद्रव्य कह सकते हैं. और यही अभिप्रायें भगवत्कुंदकुंदके उपर्युक्त वचनका होता है जो कि ' पूजादाणाइदव्वहरो' ऐसा कहा है. अज्ञान व कषायवश आजकल सामाजिक व्यवस्था उलटी होरही - । --- -- । (१४) है. जो पंचोंके स्वाधीन देवद्रव्यः रहता है। जिसकी कि रक्षा करना, व वृद्धि करते रहना पंचोंका कर्तव्य होना चाहिये, जिसकी व्यवस्थाके लिये-कि भगवरकुंदकुंद व अकलंक देव सरीखे आचार्य यों कहते है कि जो इस द्रव्यमें गडबड करता है वह अंतराय महा पापकर्मका भागी होता है और दुर्गति भोगता है; उस द्रव्यको आजकक इतनी दुर्व्य- वस्था, होरही है कि जहा देखो वहां यह शिकायत है ही. देवके सामने मनपूर्वक थोडेसे फल नैवेद्य आदि जो साग दिये जाते है फिर वे कभी वैसे उपयोगमे नहीं भासकते. इसलिये उन द्रव्यसे फिर आगामी देवस्थानकी किसी प्रकारकी रक्षा होनेकी संभावना भी नहीं रहती; प्रत्युतः उस स्थानसे हटाकर कही डालना ही पड़ता है. और वहांसे वह हटाना जरूरी भी होता है; क्योंकि, वह द्रव्य कूडे कचडे के तुल्य समझा जाता है; जैसी कि पद्मपुराणमें उस निर्मात्यकूटकी निंदा की है., उस तुच्छ द्रव्यके पीछे तो लोग हाथ धोकर पड़े हैं कि उसकी व्यवस्था नई तरहसे करें; परंतु जो पूजाद्रव्य महत्वका है, और जिसकी रक्षा करना समाजका कर्तव्य है उसकी तरफ दुर्लक्ष्यही होरहा है जो मनुष्य निर्माश्य ग्रहण करता है उसके हाथका तो समाजमें, पानी पीना भी मनुचित- 'समघते हैं. परंतु जिन पंचोंके, यहां हजारों लाखोंकी संख्या में देवद्रव्य बेहिसाब पड़ा रहता है उन पंच मुखियोंके, घर भोजन करनेमें लोगोंको, संकोच नहीं होता समाजके हासका कारण निर्मात्यस्पर्श नहीं है किंतु उक्त संपत्तिका हजम करना है क्योंकि, एकके यहां हजम हुई संपत्तिका अपराध रोटी बेटीके नातेसे समाज- भरमैं फैल जाता है. 1, 1 कुछ लोग निर्माल्य ,ग्रहण करनेवालोंकी दरिद्रताको निर्मात्यके कारण बताते हैं उन्हें सोचना चाहिये कि निर्माल्यका इतना मिलना ही असंभव होरहा है कि जिससे उदरपूर्ति भी होसके, तो मी जो वर्ग देवसेवा नियोगमें ,पूर्वागत 'अभी कायम है. उससे जैनधर्मकी रक्षाका , - - - +- - . (१५) एक अंग कुछ अंशों में निरवच्छिन्न है और उस वर्ग के लिये इस वृत्तिका न छोरना भूषणावह है. परंतु लोग, उस वर्गकी श्रेष्टताका विचार तो बाजूमें रख देते हैं और उसकी दरिद्रता-दोषक कारण. निंदा करते हैं तथा निर्माल्यके संबंधसे अस्पृश्य बताकर समानमें से जुदा करना चाहते हैं समाजके उन सुधारकोकी और हितचिंतकोंकी बुद्धिपर यह बलिहारी है. क्या ऐसी निंदा-और, दूर दूर करते रहनेसे वह वर्ग:चिरकाल- तक इस देवसेवा वृत्ति कायम रहेगा ? यदि न रहा.तो शेष समाजके हाथसे आज क्या देवसेवाकी क्रिया होरही है जो कि आगे. आशा.की जाय ! यदि नियत वर्गसे ही काम नहीं होसका तो. उस कर्मकेलिये अनियत समाज क्या, उसकी क्षतिको पूरा करेगा ? निर्मात्यके निषेधक लोगोंकी कल्पना यहांतक बही है कि यदि निर्माल्य चढेगा ही नहीं वो खाकर पातकी बननेफी वारी ही न आवेगी इसीलिये. मेवा मिष्टान्न ताहि मक्खी हू-जुगरि जात, ' वगैरह वगैरह ताते महाराज मेरी सूखी नमस्कार.' यह दशा होचली है. इसका परिणाम यह होगा कि नियोगी वर्ग कुछ न मिलनेपर: नष्ट हो नायगा और देवपुजाका कर्म दुर्दशामें आपहुंचेगा., भंडारोंमें दिये हुए घनकी इधर पंच गडबड करेगे उधर-समाजहितचिंतक लोग इसका दुरुपयोग दिखावेंगे, अंततो गत्वा समाज इस फर्मसे उपेक्षित हो बैढेगा. अब हम यह देखना चाहते हैं कि निर्माल्योपजीवी वर्गकी-हम कहांतक योग्यता समझें, एक हिंदी भाषामें कहावत है कि जिसके हाथ सोई, उसके हाथ सब कोई' अर्थात् प्राकृतिक - लोगोंमे यह व्यवहार देखनेमें आता है कि जो किसीके उदरभरणका कारण होता है वह अपनेको उदर भरनेवालेखे.श्रेष्ट समझता है. वह मानता है कि मेरे-सहारे इसका उदरनिर्वाह होता है. यों तो ऐसी घमंड तुच्छके प्रति मी न करनी चाहिये, क्योंकि, किसीके भी हाथ वास्तविक है क्या । परंतु श्रेष्ठके प्रति तो यह व्यवहार सर्वथा वयं रहना चाहिये.

- (१६) उदाहरणार्थ, साधु, त्यागी, तपस्वी भी गृइस्थके यहासे हो भोजन करते है; परंतु एतावता गृहस्थ श्रेष्ठ नहीं होजाता किंतु श्रेष्ठ वे ही रहते है. इसी प्रकार गृहस्थों में भी तरतम भाव रहता ही है. विचार रुका उपजीवन शिष्य करते हैं परंतु पुज्यपाद गुरु ही रहता है; शिष्य नहीं हो जाते. एक थीमत साथमेंके अपने उपाध्यायकी परवाह न करके, जहां जाना था वहांके लिये, आप तो गाडीमें बैठकर निकला और उसका अध्यापक गुरु पांव पांव चलने लगा. उस समय एक समंजस सच्चरित्र मनुष्यने उस श्रीमंतको उलाहना दिया कि 'स्वयं हि रथेन गच्छति, उपाध्यायं पदातिं गमयति.' अर्थात्, रे, तू आप तो रथमें चढकर चल रहा है और अपने उपाध्यायको पांवों चला रहा है. ऐसा व्यवहार करनेवालोंका पहिला भी अभाव नहीं था परंतु आज उसकी सीमा बहुत ही बढरही है. यदि दूसरा उपाध्याय उससे अच्छा न मिलता दीखा तो उस पहिलेकी तनख्वाह दशकी जगह बारह करदी जाता है; परंतु उपाध्याय ऊपर वह, बडाभारी अहसान दिखाकर. इधर उपाध्यय भी अहसान कबूल करता है. अर्थात्, उसे भी यही मान हो चला है कि मेरे अन्नदाता शेठजी ही है. इस प्रकार किसी एककी तरफही चूक नहीं है किंतु दोनो ही अपने कर्तव्यसे पराङ्मुख होते जारहे है यदि उपाध्याय पराधीन निष्कर्भा न बने तो शिष्य या शेठजीकी क्या विसाद है कि उसे तुच्छ देखें. एवं, यदि शेठजी अपने कर्तव्यके मदमें चूर न हुए हों तो क्यों संभव है कि उस माष्टरका दर्जा हीम सिद्ध हो. पहिलें भी 'द्रव्येषु सर्वे वंशाः' यह कहावत प्रचलित थी परंतु जो पहिले मूर्खताकी थी वह आज बुद्धि. मत्ता 'समझी जाती है. यही कारण है कि द्रव्यके भरभराटमें गुण छिपते जारहे है. हिंदीकी एक कहावत है कि 'गुण ना हिरानो, गुणगाहक, (१७) हिरानो है.' हिंदुस्थान देशभरमें धर्मकी, नावत क्या और राष्ट्रीय बापत क्या, सर्वत्र यही दशा होरही है. और यही दशा देशके राष्ट्रीय धार्मिक अभ्युदयकी घातक है ठीक ही है, जब कि द्रव्य कारण हो कीमत ठहरेगी तो गुणों का विकाश होगा कैसे ? इसके विरोधी लोक यहां यह सवाल करेंगे कि यादे कोई मनुष्य नामसे उपाध्याय होगया हो परतु अपनेसे श्रेष्ट अपने को न जचता हो तो उसका सीमासे अधिक आदर ही क्यों किया जाय ? इसके उत्तरमें हम पूछते हैं कि जिसमें वास्तविक योग्यता है वह तो शिष्योंको बलात्कार नमा लेगा, परंतु अपने स्थितीकरण धर्मका उपयोग कहांपर होगा ? स्थितीकरणका यही मतलब है कि कर्तव्यके नियोगी मनुष्य व्यक्तिको अथवा वर्ग-समूहको कर्तव्य के योग्य न रहते हुए भी उसको उसके कर्तब्यकी प्रशंसा करके उसे कर्तव्यमें दृढ किया जाय. इसके लिये प्रोत्साहन देनेका सर्व सामान्य मार्ग यही होसकता है कि उसका उस कर्तव्यकेलिये आदर किया जाय. धर्मके अनेक क्षयोन्मुखी मंगोमसे ही एक अंग उपाध्याय वर्ग है. गृहस्थी के धर्मों के साधक नियोगी वगौमसे भनेकोंका नाश होगया परंतु यह उपाध्याय वर्ग जीवित है. उसकी लोग निर्माल्यजीवी फहकर अवहेलना करते है उत्तर प्रांतसे यह अवहेलना सुरू हुई और सर्व सामान्य लोग इसी विचारके बनजानेसे निर्मात्यजीवी वर्ग रहो ही नहीं दक्षिणमें यह, उत्तरकी देखादेखी अवहेलना सुरू हुई है. उसका भी परिणाम यह होचला है कि उपाध्यायावर्गके कुछ लोग देवपूजन करने से घृणा करने लग हैं: और अपनी उन्नति के लियोआनुवंशिक कर्मको छोडकर वैद्यक व्यापार आदिके व्यवसायों में ग रहे हैं. और समाजमें उनको प्रतिष्ठा बढाकर शेष वर्गको भी देवसेवाके कर्मसे पराङ्मुख करडालनेके लिये कुछ-इने गिमे गोगोसे लोग ऐसी प्रतिज्ञाए कसकरकिर पत्रोंमें प्रसिद्ध कर रहे है कि हमने निर्मात्य खाना छोरी.. हो नहीं समझताकि ऐसी प्रतिज्ञा (१८) करने करानेवाले क्या दूसरा काम समझते हैं. हा इस परसे, उपाध्याय वर्ग कुछ कालमें सर्वथा अपने कर्मसे पराङ्मुख हो जायगा जिससे कि देवपूजा कर्म नियोगशून्य होकर दुर्दशामें पहुंच नायगा, यह दीखता है. इसी प्रकार 'धर्माश्रित आजीविका करे वह पापी' इत्यादि अभिप्रायके उपदेशोंको ठसा ठसा कर धर्मके व्यवहारका अज्ञ मनुष्योंने कंठगत प्राण कर दिया. हमारा यह कहना नहीं है कि ये सिद्धांत असत्य हैं. परंतु नय योजनाके विना एकांत का प्रकोप बदजानेसे धार्मिक व्यवहार लुप्तपाय हो चला है इस समर्थन में हम एक ही वातकी याद दिला देते है कि निश्चयमबुध्यमानो यो निश्चयतस्तमेव संश्रयते । नाशयति चररणकणं स वहिःकरणाकसो वालः ।। (अमृतचंद्र) यहाँ यह विचारणीय है कि कदाचित् धर्मके किसी साधकको स्वोचित न भी समझा हो तो भी उसके कर्मका या उसका उच्छेद कर. नेकी तजवीन सोचना भी तो महापाप है. क्योंकि, ऐसा करनेसे धमा- गोंका -हास होता है. इसके बावत समाधानकारक आशापरका एक वचन है:- उच्चावचजनमायः समयोय जिनेशिनाम् । नैकस्मिन् पुरुष तिष्ठेदेकस्तम्भ इवाळयः ।। अर्थात्, ऊंचे नीचे सभी प्रकारके मनुष्य मिलनेसे जिनेश भग- वान्का यह शासन जीवित अवस्थामें मौजूद है. उंचसे उंचे सर्वथा निर्दोष किसी एकाध मनुष्यको ही यदि जैनधर्मी माना जाय तो क्या जैन शासनकी जीवित दशा ठहरसकती है ? क्या किसी मकानकी रचना या स्थिति एक ही खंभ या दीवारपर होसकती है ! भावार्थ:-धर्मको जीवित रखना है तो समेट करनेकी बुद्धि रखो. नास्तिकता पूर्ण विधीयों परदेशियोंके माक्रमणों से ही एक तो - (१९) धर्ममें फूट बदरही है। दूसरे, हम खुद भी यदि धागोक सुधारक बन- कर उच्छेद करेंगे तो धर्म कहांपर टिकेगा ? इसके सिवा एक यह बात भी विचारणीय है कि निर्माल्यके ग्रहणका भयंकर पाप समनकर जो लोग उसकी सत्तातक इसलिये शेष करने के प्रयत्नमें लग रहे हैं कि न निर्माल्य बचेगा और न लोग उसे लेकर पापी बनेंगे-'न रहेगा वांस, न वजेगी पसरी ।' उन्हें यह भी सोचना चाहिये कि 'वृत्तिलोप' या वृत्तिच्छेद नामका भी एक भयंकर पाप है. जहांपर निर्माल्य ग्रहणका निषेध किया है वहांपर वातिककारने दृत्तिलोप करनेका भयंकर पाप वर्णन किया है. जो नि- माल्यजीवी वर्ग है उसका, क्या निर्माल्य जलाकर मस्मरूप कर देनेसे, भाजीविका संबंधी बढा साधन नष्ट न होगा जिससे कि वृचिलोपका पाप लगता है. यहापर प्रश्न यह उपस्थित होगा कि चिळोप व निर्माल्य ग्रहण इन दोनों से अधिक पापकर्म कौनसा है। इसका उत्तर हमारे अपरके विवेचनसे होजाता है. लोग यह समझेंगे कि वृत्तिलोपका पाप बचा तो निर्मात्य ग्रहणका पाप बच नहीं पाता. यदि निर्माल्य छुटावें वो पृत्तिकोपका पाप सिरपर आजाता है. अर्थात, दोनो पाप बचानेका प्रयत्न एकदम नहीं होसकता है. परंतु यह समझ ही भूलकी है कैसे ? हम ऊपर बताचुके हैं कि जो वर्ग देवसेवाका काम करके उसके बदले निर्माल्य ग्रहण कर रहा है और उसीपर उसकी वृत्ति निर्भर है उसके सिवा को शेप वहुमाग पूनक वर्ग है उसीको निर्माल्य ग्रहण करने का दोष गसकता है. यदि यह प्रसंगोपात अर्थ ठीक हो तो वृतिलोप तथा निर्मात्य ग्रहण ये दोनो पापकर्म गृहस्थ के हाथसे बचसकते हैं और दोनो पापोंका टाकना परस्पर विरोधी होजाता है. यहांपर, वस्तुपरिस्थिति व वाक्यार्थ निर्णयके लिये एक और भी उपयोगी उदाहरण देखिये:- - (२०) यहा सिद्धांतसंमत है कि कालद्रव्यके निमित्त विना कोई भी पर्याय नहीं होता. परंतु कालके पर्याय होनेमें क्या दुसरा कोई काल कस्सित करना चाहिये ! यदि कल्पना करें तो अनवस्था दोष आता है और यदि न करें तो, काल निमित्तके विना पर्याय न होनेका वचन दृषित होता है अथवा काल कूटस्थ नित्यः ठहरता है; जो कि द्रव्यस्वभावके विरुद्ध है. इस आक्षेपका निरसन इस प्रकार किया है कि इतर प्रत्येक न्यके परिणमानेमें, जो उससे इतर द्रव्यकी. अपेक्षा पढती है वह अपेक्षा अपनेको. परिणमाते समय नहीं, पडती; क्योंकि, जिस शक्तिका उपयोग इतरके परिणमनमें निमित्त रूप होता है वह नवा अपनेमें साक्षात् विष- मानं हो तो दूसरी जगहसे वह पूर्ण क्योंकी जाय? निर्माल्यका निषेध देखते समय-इस दृष्टांतका उपयोग, इतनामात्र करना चाहिये कि निषेध या विधान सार्वदेशिक नहीं होता. 'शुद्ध वस्तुनि संकल्पः कन्याजन इचोचितः' इस सोमदेवके वचनका अर्थ - यह है कि कन्या प्राय है. पर क्या, जिसकी वह कन्या है उसको भी? इसका उत्तर 'नहीं' ही होगा. इसी प्रकार निषेध. सर्वत्र निषेध ही नहीं होता. प्रत्येक उपदेश- केलिये पात्रका भेद करना आवश्यकीय है. अत एव, लोग जो यहांतक मानरह है कि कीडीतक यदि निर्माश्य खाले तो वह मी नरकादिके पाप संचित करे, यह समझा वस्तुस्थिति के विरुद्ध है. इसलिये उसका निषेष केवल पूजककेलिये ही सार्थक है. .

निर्माल्य द्रव्य-चर्चा। -- जैन सिद्धांत मासिक पुस्तक वर सं० २४४६ के भाद्रपद्र मासके अंकों (ई० सन् १९२०) निर्माल्य विनियोग' इस शीर्षकका एक लेख न्यायतीर्थ पंडित वनसीघरजीने दिया है । उसमें निर्माल्य द्रव्य ग्रहण करनेके दोप भावत् महाकलंक और अमृनचंद्र सूरि और सकल- कीर्ति आचार्यने जो बताये हैं सो सर मान्य किये हैं। लेकिन जो मनुष्य किसी कामके बदलेमें निर्माल्य लेता है उसको दोष नहीं है यह ही केवल उस द्रन्यकी न्यायोपार्जयिता है। अर्थात् पुजारी-उपाध्याय इन लोगोंको निर्माल्य ग्रह्ण करनेका हक है ! और उस हकको जो कोई वाघा करते हैं उनको अंतरायकर्मका आना होता है ऐण लिखा है। पंडितजी ऐसा मी सिद्ध करना चाहते हैं कि पूजन करनेवालेने अपने पृननकी समाप्ति किये बढ उनका उस निर्माल्य द्रव्यपर कोई हक नहीं। पत्र दोमें पंडितनीने लिखा है-" अर्पण करके स्वयं जो ग्रहण करता है उसके परिणाममें स्वत्व निवृत्तिरूर भाव उत्पन्न नहीं हो पाता है। एवं जो दूसरा कोई ग्रह्ण करना चाहता है उसके परिणामों में न्यायोपार्जनकी बुद्धि नहीं रहती है, क्योंकि किसी काम के बदले में जो किसी एक चीनका ग्रह्ण करना है उसका नाम न्यायोपान है।" इससे यह सिद्ध हुवा कि-उस निर्माल्य द्रव्यपर अर्पण करने- वालेका कुछ हक नहीं रहा। अम निर्मात्य हुआ द्रव्य देव के स्वामित्वका होता है या नहीं इस प्रश्नके ऊपर पंडितजी लिखते हैं कि-"स्थापनाके प्रारम्भसे विसर्जन हुवे तक पृनाकी क्रिया समझो जाती है । यदि उस पूना व्यके साथ भोग्य मोजक संवत्र देवका माग जाय तो वह संबंध और वह स्वामित्व विसर्जनके बादमें खतम हो जाता है।"

(२) इस परसे पंडितनीने ऐसा सिद्ध किया कि उस निर्माल्य व्यका स्वामित्व अरिहंतादि देवोंका मी नहीं रहा । सिर्फ उसका स्वामित्व पुनारी-उपाध्यायका रहा । उस निर्माल्य द्रव्यको पुजारी-उपाध्याय सिवाय दूसरा कोई ग्रहण करेगा तो उसने उपाध्यायकी वृत्तिमें विन डायनेसे उसको अंतराय कर्म के मास्त्रव होने चाहिये । अब विचार करनेकी बात यहांपर ऐसी है कि-निस निर्माल्यके ऊपर देव गुरु इत्यादिकों का स्वामित्व नहीं है और सिर्फ पुमारी-उपा- ध्यायका ही स्वामित्व है । और उन पुनारी-उपाध्यायके सिवाय अन्य कोई उसका ग्रहण काले तो उसको अंतराय कर्मके अवत्र अथवा दुर्ग तिका फल जो आचा ने बताया है, वे आचार्य अपने वाक्यम-देवता ओंका नैवेद्यादि निर्माल्य ऐसा क्यों लिखते हैं ? देवताओंके एवजमें-" उपाध्याय-पुजारी-निवेद्यानिवेद्य ग्रहणम् और " प्रमादादुपाध्याय (पूजारी ) दत्त नैवेद्यन्नहणं तथा " अथवा "पूनारी-उपाध्यायानां निर्माल्यं स्वीकरोति यः । वंशच्छेद परिप्राप्यस पश्चा. दुर्गतिं व्रजेत् ।" ऐसा लिख देते थे। लेकिन कोई भी आचार्यने ऐसा लिखा नहीं है । यदि लिखा हुआ पंडितर्न के जानने में माता था तो पण्डितजी इन वाक्योंको अपने रेखमें जरूर उदृत कर देते थे। लेविन- " दारोगोपमोगादि प्रत्यूहावरणं तथा " इस श्लोक्से पूनारी उपाध्याय ही क्या रेविन सारी दुनियाभर के प्राणिमात्रके मोगोपमोगलामादिपमें विघ्न करनेसे तराय कर्मके अलब होते हैं। ऐसा सिद्ध होता है तो फिर केवल उपाध्याय-पूनारीले निर्मात्य ग्रहणमें नि कानेवालेके वास्ते तत्वार्थसार-- ॥ प्रमादान्त दत्त- नैवेद्यग्रहण तथा" ऐसे अलग वाक्य डाल्नकी क्या जरूरत थी ? इन वाक्योंका संबंध उपाध्यायकी आजीविकासे पण्डितजीने जोडा है स्पष्ट बदरायण संबंा दीखता है सो (३) इस परसे निर्माल्य-द्रव्य ऊपर पूजारी-उपाध्यायका स्वामित्व है ऐसा स्यागमप्रमाणसे पण्डितजीसे सिद्ध होने नहीं पाया। अब युक्ति प्रमाणसे कैसा सिद्ध होता है सो देखेंगे। पण्डितनी कहते हैं कि- " अर्पित द्रव्यको ग्रहण करने के नियोगी मनुष्य प्राचीन समयमें भी थे कि आजाल हैं। अर्थात् उस द्रव्यको लेनेका च है जिसे अधिकार नहीं है । यही बात निर्मात्य द्रव्यके प्रण निपंघसे दिखाई गई है प्राचीन मय, भगवान् वृपमदेवसे लगाकर अंतिम तीर्थकर महा- वीर तक गिना जाता है । तो इस प्राचीन समयमें निर्माल्य ग्रहण करनेवाले कौन कौन थे उनका वर्णन किप्त पुराणमें है वह पंडितनीको बतलाना चाहिये था । यदि उस प्राचीन समयके पुर.गोंमें नहीं मिलता होगा तो किस प्राचीन समयमे-हासे कहांतक-ऐसे नियोगी मनुष्यका वर्णन पाग नाता है सो लिखना चाहिये था। नियोगी मनुष्यका अर्थ पंडितजीके अमिनायसे-जो देवकी सेवा करना है सो नियोगी मनुष्य ऐसा होता है। देवकी सेवा अनेक मनुष्य अनेक प्रकारसे करते हैं जैसे-कोई मदिरमें झाडू बुहारी देता है, कोई प्रक्षाल करता है, कोई पूजन करता है, कोई अभिषेक करता है, कोई दीवायत्ती करता है। कोई भक्तामर सुनाता है, कोई सुत्रीका पाठ सुनाता है, कोई शास्त्र सुनाता है, मोजक inर्व मनन गाते हैं, कोई चौघडा ममाता है; जैसा कि भूपाल स्तोममें लिखा है- "देवंद्रास्तव मज्जनानि विदधुर्देवांगना मंगला- न्या पेटुः शरदिदुनिर्मलयशो गंधर्वदेवा जगुः ॥ शेपाश्चापि यथा नियोगमाखिलाः सेवा सुराश्चक्रिरे तक्किं देव वयं विदध्म इति नश्चित्तं तु दोलायते ॥२२॥" अर्थात्-मगवान्का देवेद्रोंने अभिषेक किया ( जन्म कल्याणिक अभिषेक किया), देवांगनाओंने कल्याणकारक गीत गाये, गंधर्वाने शरद ऋतुमेंसे चंद्रके माफक निर्मल-शुद्ध ऐसे तुम्हारे यशोंका वर्णन किया, और शेष सब देवोंने अपने अपने अधिकारके माफक सेवा की। हे भगवान् ! अब हम क्या करें ऐसे विचारसे हमारा चित्त आंदोलन पाता है। ऐसे कई प्रकारकी सेवा कई मनुष्य करते हुये देखने में आते हैं। उप्तमेंसे पण्डितनी किसको नियोगी ठहराना चाहते हैं ? यदि फक्त पूजारी-उपाध्यायको ही नियोगी कहेंगे तो उसको आगम प्रमाण क्या है और वह कबसे नियोगी बना ? और उसको किसने नियोगी नियत किया इसका मी कुछ सवून चाहिये । क्या श्री ऋषभदेव महारानने अथवा श्री वर्धमान तीर्थकरने अपने केवलज्ञानके समय कह दिया था कि हमारी पूजन फलाना फलाना पुजारी या उपाध्याय करेगा उसको हमने नियोगी ठहराया है । ऐमा कोई पट्टा या सनद इन उपाध्यायोंके पास मौजूद है ऐसा पंडितजी बता सके हैं अब कोई गंवमें नया नदिर बनता है और उसकी प्रतिष्ठा होती है उस समय उसके मालिक उस गांवमेंसे अथवा बाहरगावमेंसे कोई उपाध्याय-पुजारीको बुलवा लेते हैं और उससे करार करते हैं कि इस मंदिरकी पूजा प्रक्षाल करनेका तु कबूल करता है क्या ? उसके बदले में निर्माल्य द्वन्य-चावल, बादाम तेरेको मिलेंगे। नारियल और पैसा टका जो चढेगा सो हम रख लेंगे उमको बेचकर इन रुपयोंमेंसे तनखा दूसरे सेवा करनेवालेको देगे तेरेको नहीं देंगे। फक्त चापल बादामकी निपन उसकी आजीविका पूर्ति हो तो वह कबूल भी कर देता है। यदि पूर्ति न हो तो दो चार दस रुपया माहवारी अधिक मांगता है । करार कुछ मुदत तकका होता है, फिर बदला जाता है । कुछ दिन बाद उसका काम पसंद नहीं पड़ा तो उसको बदलके " (५) है दूसरा मी लाया जाता है। उसके साथ अलग शर्ती वनती है। जैसा पंडितनी पत्र १२ में लिखते हैं दुसरा उपाध्याय मी रखा जाता है। नारियल पैसा टका जो रखा लिया जाता है वो वेचकर दूसरे सेवा करनेवाले नियोगियोंको दिया जाता है। कोई कोई गांवमें दो चार घर जैनियोंके रहते हैं सो एक एक दिन बारीसे भगवान की पूजा, प्रक्षाल, दवाबत्ती, झाडू बुहारी, कर लेते हैं; किसी पुजारी उपाध्यायको नियत करते मी नहीं । तो फिर वहांका नियोगी कौन और निर्मात्य किसके हकका समझना चाहिये? ? देवकी सेवा करने वाला नियोगी होता है ऐसा पंडितजी कहते हैं । अब वह दो चार घरवाले जो देवकी सेवा करते हैं तो उन्होंने अपनी सेवाके बदलेमें निर्माल्य द्रव्य ले लेना ऐसा पंटितजीके अभिप्रायसे छायोपानित हो सकता पण्डितजीके वर चैत्यालय है, उसकी पूजा प्रक्षाल, दीवारत्ती, झाबुहारी इत्यादि देवसेवा पंटितनी अपने हाथसे करते हैं। दूसरा कोई नियोगी नही है। जिससे देवसेवा करनेके बदले में पंडितजीको ही अपने चैत्यालयका निर्माल्य-द्रव्य ग्रहण करना न्यायोपार्जित समझना पड़ेगा। क्योंकि पण्डितजीने अपने पैत्यालयमें पूजन विसर्जन किये बाद उनका स्वत्व उस निर्माल्य द्रव्य पर कुछ भी नहीं रहा। और भावानका मोग्य मोनक संबंधका कार्य विसर्जन हुये बाद खतम हुवा तो फिर उस निर्माल्य द्रव्यके ऊपर देवसेवाके बदले में पण्डितजीका हो स्वामित्व सिद्ध हो चुना। पदि वह निर्माल्य द्रव्य आप न अहण करें और अपने चैत्यालय के देवकी सेवा न करनेवालेको दे तो वह मी पंडितनीके अभिप्रायसे अन्याय है। इसपरसे मालूम होगा कि-कोई स्वयंसिद्ध हकदार नियोगी आदमी नहीं होता है। मंदिरके मालिककी इच्छानुकूल 2 (६) अन्य नौकर आदमियोंकी माफक यह भी एक नौकर रहता है उसकी निर्माल्य-द्रव्य ग्रहण करनेके बारे में वरावर शत बदली जानी हैं। तो फिर निर्माल्यका विनियोग करनेका अधिकार मंदिरके मालिक के हायमें रहा या पुजारी-उपाध्यायके हाथमें रहा यदि मंदिरके मालिकके हाथमें रहा तो फिर उपाध्यायका हक्क कुछ नहीं और अंतराय कर्मके मास्त्रवोंका सम्बंध जैसे पंडितजी मान रहे वैप्सा बनता ही नही। इस परसे ऐसा सिद्ध हुवा कि-युक्ति प्रमाणसे मी उपाध्याय का निर्माल्य ग्रहणका हक्क कुछ भी नहीं । इस मुजब मंदिरके मालिक और उपाध्याय-पुनारीके दरम्यान निर्मात्य-द्रव्यका विनियोग हो रहा है तो अब शास्त्राज्ञानुक्ल अंतराय कर्मके स्त्रकका भागी कौन होता है ? और सकळकीर्तिके वाक्यानुसार दुर्गतिको कौन जायगा ? इस पर विचार करनेसे मालूम होता है कि दोनों ही इस पापके अधिकारी हो सके हैं। मंदिरका मालिक जिसने पूजन करके द्रव्य भगवान्को चढाया वह उस निर्माल्य-द्रव्यको ग्रहण कर नहीं सक्ता है, यह बात पंडितजीको मान्य है। अब वो दूसरेको देनेसे कारित नामका पापका भागीदार होता है ऐमा हमने स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाके-" जो गप मक्खेदि इस गाथासे सिद्ध किया था वह गाथा निर्मायके सम्बन्ध नहीं ला सकती ऐसा पण्डितजी बताते हैं। लेकिन मो भाप ग्रहण करने में पाप लिखा है वही पाप अन्यको ग्रहण करानेमें है यह कृतकारितामुमोदनका सम्बन्ध जैन सिद्धांतमें घराबर चला आता है । देखिये, आसबके प्रकरणमें एक सूत्र ऐसा है- " आद्यसरंभसमारंमारंभयोगकृतकारितानुमतकषायविशेषैसिन्निनिश्चतुश्चक- शः" इस सुत्रकी अनुवृत्ति आगे आनेवाले समी सूत्रोंपर चली जाती है तो फिर फक्त-" विघ्नकरणमंतरायस्य, इस सूत्र पर और इस सुत्रके सयं."

वाक्य (७) वार्तिक-" देवता निवेद्यानिवेद्य ग्रहणम् " इस पर क्यों नहीं चलनी चाहिये ? " संकल्पाकृत कारितमननाद्योगत्रयस्य चासत्वान् " और स्थूलमली के न वदति न परान् वादयति" इत्यादि जगह जगह कृत कारितके समान दोपके प्रमाण मिलते हैं यदि इस सुत्र या वार्तिक ऊरं उस सूत्रकी अनुवृत्ति नहीं लेनी चाहिये ऐपा सुत्रकार अथवा वार्तिककारका अभिप्राय होता था तो वैसा अपवाद वह लिाब देते थे। निर्माल्य द्र-य आप न ग्रहण करवे दुरेको देने में पातक नहीं ऐमा दृष्टांत सिद्ध करने के लिये एक सोमदेवसुरिका हदांतमें दिया है कि अपनी कन्या स्थं मोगते नहीं हैं लेकिन दूसरेको मोगनेको देनी पड़ती है। यह दृष्टांत विषम है। क्योंशि-एक वक्त अष्टद्रय रूपी अनी कन्या भगवान्को अर्पण कर चुके हैं, और भगवान् भोग्य भोनक सबंधसे उपको भोग चुके हैं, तो फिर वह कन्याका दान दुमरी रख्त कैम किया जायगा और यदि पृनन करनेवालेका निर्मला द्रव्य पर हक्क ही नहीं तो वह दूसरेको कमा दे देगा। गदि नियोगी मनुष्य फमना ऐसा निश्चित नहीं हो सका है तो निर्माज्य द्रव्य ग्रहण करने कोई मी मनुष्य न्यायोपानित ठहर नहीं सत्ता और निर्माल्य-द्र-य सभ के वास्ते अग्राहय है यही सिद्धान्त कबूल करना पडेगा । अर उस अग्र हय पदार्थको निर्माल्पकूटमें डालकर मस्म करना पड़ेगा। पण्डितनी करते हैं कि-हवन क्रिया जो द्रव्य निर्माल्यकूटमें डाला जाता है वह द्रव्य पूनन किये वाद जो बचता है उसको डालना पहता है यह अभिप्राय " तेवहदीन्या शेषांशैराहुतिर्मत्रपूर्विका " इस वाक्यमें जो शेष." शब्द पडा है उन परसे निकालते हैं। लेकिन शेषा" शब्दका अर्थ 'पूजन सामग्रीसे बचा हुवा या ऐया महापुराण कर्ताने - (८) और कोशकारने किया नहीं है । घरसेन मुनिकृत विश्वलोचन : कोसमें "शेषा" शब्दका अर्थ इस मुनव है-" शेषा निर्माल्य भिद्यपि " माने निर्माल्य द्रव्यको “ शेषा" ऐसा कहा है। महा पुराणकर्ताने पर्व ४२ में कहा है कि- स्वयं महान्वयत्वेन महिम्नि क्षत्रियाः स्थिताः । धर्मास्थया न शेषादि ग्राह्यन्तैः परलिंगिनाम् ॥ १८ ॥ तच्छेपादि ग्रहे दोषः कश्चनाहात्म्यविच्युति । अपाया वहवश्वास्मिन् न तस्तत्परिवर्जनम् ॥ १९ ॥ माहात्म्यप्रच्युतिस्तावत्कृत्वाऽन्यस्य शिरोनतिम् । ततः शेषणधुपादाने स्यान्निकृष्टत्वमात्मनः ॥ २० ॥ x x x तच्छेषाशीर्वचः शांति वचनाद्यन्यलिगिनाम् । पार्थिवः परिहर्तव्य भवेन्न्यकुलताऽन्यथा ॥ २३ ॥ जैनास्तु पार्थिवास्तेषामहत्पादोपसेविनाम् । तच्छेषानुमतिाय्या ततः पापः क्षयो भवेत् ॥ २४ ॥ रत्लत्रितयमूर्तित्वादादि क्षत्रियवंशजाः ॥ जिनाः सनाभयोऽमीषा मतस्तच्छेपधारणम् ॥ २५ ॥ अथाहिकुलपुत्राणां माल्यं गुरुशिरोधृतम् ।। मान्यमेवं जिनेन्द्रोधिस्पर्शान्माल्यादि भूषितम् ॥ २६ ॥ कथंमुनिजनादेषां शेषोपादानमित्यपि ॥ नाशंक्यं तत्सजातीयास्ते राजपरमर्षयः ॥ २७ ॥ x x x x - 1 ततः स्थितमिदं जैनान्मतादन्यमतस्थिताः ॥ क्षत्रियाणां न शेषादि प्रदानेऽधिकृता इति ॥ २९ ॥ अर्थात्-बड़े बडे वशोंमें उत्पन्न हुये क्षत्रिय लोग अपने आप ही महत्वके-बडप्पनके स्थानपर विद्यमान हैं इस लिये उन्हें अन्रमतियोंके धर्ममें श्रद्धा रख कर उनके दिये हुये शेषा ( चढाहुवा अक्षत स्नानोदक + + + -- (९) वगैरह ) कमी ग्रहण नहीं करना चाहिये । कदाचित् कोई यह कहे कि उनके शेपा-अक्षतादि-ग्रहण करने में क्ण दोष है ? उसके लिये कहते हैं कि, उनके शेपादि लेने में अपने महत्त्वका नाश होता है। और अनेक अनिष्ट वा विघ्न आ उपस्थित होते हैं। इस लिये उनके ग्रहण करने का त्याग कर देना ही चाहिये । अन्य मतवालोंको नमस्कार करनेसे अपने महत्वका नाश होता है, इस लिये अन्यमतके गेषा-स्नानोदक आदि ग्रहण करनेसे अपनी निकृष्टता वा हीनता होती है । इसलिये राना लोगोंको अन्य मतवालोंके शेषा, आशीर्वाद, शां. तिवचन, शांतिमंत्र और पुण्याहवाचन आदि सबका त्याग कर देना चाहिये, यदि वह इन सबके ग्रहण करने का त्याग नहीं करेगा तो फिर वह नीच कुलवाना हो जायेगा । राजा लोग गैनी होते हैं इसलिये आ. हंतदेवके चरण कमलोंकी सेवा करनेवाले उनके अरहंत देवकी शेषा आदिश ग्रहण करना तो न्याय ही है क्योंकि अहंत देवकी शेषा ग्रहण वरनेसे उनके पापका नाश होता है। श्री जिनेन्द्र देव रत्नत्र यकी मृर्तिव्य होनेसे आदि क्षत्रिय ऐमे श्री वृपमदेवके वंशन हैं। अतएव वे सब (क्षत्रिय अर ग्निद्र) एक ही गोत्रके माई बधु है । इस लिये क्षत्रियोंको जिनेंद्र देवकी शेषा आदि ग्रहण करना ही चाहिये। जिस प्रकार कुल पुत्रोंको गुरुके मस्तक पर धारण की हुई माला मान्य है उसी प्रकार उन्हें जिनेंद्र देवके चरण कमलों के स्पर्शसे पवित्र हुई माला आदि भी मान्य सम्झनी चाहिए। कदाचित् कोई यह कहे कि इन राजाओंको मुनि लोगोंसे शेषा मादिका ग्रहण किस प्रकार करना चाहिये ? परन्तु उनकी यह शंका भी ठीक नहीं है । क्योंकि मुनिराज मी रानऋपि हैं इस लिये वे मी रानाभोंके सनातीय हैं । इस लिये यह बात निश्चित हो चुकी कि जो जैनमतसे मिन्न मतवाले लोग है उन्हें राजा लोगोंको वा क्षत्रियों को शेपा आदि देनका कुछ भी अधिकार नहीं है।"

(१०) शेष शब्दका अर्थ अंग्रेजी कोशकारने इस मुजन दिया है- The remains of offerings made by an idol. और त्रैवर्णिकाचार पृ० १७७में ग्रंथकारने 'शेषा धारण करनेका श्लोक लिखा है सो इस मुनर है- "त्रिः परीत्य जिनाधीशं भक्त्या नत्वा पुनः पुनः । जिन श्रीपादपीठस्थां शेषां शिरसि धारयेत् ॥ " अर्थात्-मिनद्रको तीन प्रदक्षणा देकर और मक्तिसे बारनार नमस्कार करके जिनेंद्रके श्रीपादपीठस्थ शेषा (गंध, अक्षत, पुष्प आदि पदार्थ) अपने मस्तकपर धारण करें। यदि शेषा शब्दका अर्थ पूजन करके बचा हुवा द्रय ऐसा करेंगे तो पूजन पंच परमेष्टीका करते हैं, फिर निगि क्षेत्रोंका करते हैं। अकृत्रिम चैत्यालयोंका करते हैं, ऐसे कोई पूजन करते करते द्रव्य नहीं बचा तो फिर हवन क्रिया बंद करनी पडेगो । क्योंकि नया द्रन्यसे हवन क्रिया करना कहा नहीं। पण्डितनी कहते हैं पूजन भर हवन दो अलग हैं ऐसा-" संध्यास्वग्नित्रये देवपूजने नित्य कर्मणि । भवन्त्याहुतिमंत्राश्च त एते विधिसाधिताः ॥७९॥ पर्व ४० इस श्लोक परसे बताते हैं और इसका अर्थ-"तीनों संध्याओं में जो जो देव पूजारूप नित्य कर्भके आतमें भमित्रयमें हवन करना होता है।" ऐसा करते हैं सो 'अन्तमे' यह अर्थ क्सि शब्दका पंडितजीने किया है सो मालुम नहीं होता है। पण्डित लालारामजी इस श्लोकका अर्थ इस मुनव वरते हैं- "विधि पूर्वक सिद्ध किये हुये ये ही मंत्र प्रातःकाल मध्यान्हकाल और हाकाल इन तीनों समय तीनों प्रकारकी अग्न्मेिं देव पूजन करते समय और नित्य कर्म करते समय आहुतिमंत्र क्हे नाते हैं।" और पण्डित दौलतरामजीकी बचनिका अर्थ इस मुजब है- (११) "ए मंत्र विधि करि साधे संते ती संध्या देवपूना विखै तथा नित्य कर्म विषे तनूं अगनिविष होमके मंत्र हैं।" अर पंडित वल्लप्पा निटवे लिखते हैं-" विधि पूर्वक साधिलेले ते हे मंत्र, तिन्ही संध्याच्या समयीं अग्नित्रयाचे ठिकाणी नित्य कर्म स्वरूप देव पृननाच्या निमित्ताने आहुति देण्याचे मंत्र हि होतात । " सो ये तीनों भी विद्वान् पण्डित हैं । इन तीनोंमेंसे किसीने भी इस श्लोका अर्थ करनेमें • अंतमें ' यह शब्द नहीं डाला तो फिर पंडित बर्स घरजीने किस हेतुसे ड.ला है सो मालूम नहीं होता है । वदाचित देव पूजन और नित्य कर्म ये एक नहीं हैं अलग अलग हैं ऐसे बतलाने के लिये डाला हो तो म लुम नहीं लेकिन देव पूजन और नित्य कर्म एक ही है। ऐसा-" देवपूजा गुरुपास्ति स्वाध्यायः संयमस्तपः ॥ दानं चेति गृहस्थानां पट् कर्माणि दिने दिने ।" इस श्लोक्से देः पूना और नित्य कर्म एक ही है अलग नहीं है ऐसा सिद्ध होता है। यहां पर एक दृष्टांत कथारूपमें देते हैं- एक राजा अपनी कचहरी में बैठा था उस वक्त एक साहुकार वर्फी, डू, आम, दाडिम, द्राक्ष, संत्रा, केला इत्यादि बहुत बढिया मेवा मिठाई अपने घरसे लेकर राजाको भेट करनेको छाया। रामाके सामने भेट पर दी । और बड़ी नम्रतासे रामाको स्वीकार करने के वास्ते प्रार्थना की । रामाने बहुत संतुष्ट हो कर स्वीकार करली । साहुकार अपने घर चला गया । रामा भी थोड़ी देर कचहरीमें बैठके जनानखानेमें चला गया । भेटकी थालियां वहां ही रहीं । राजाके नौकर जो राजाको कपड़े पहिनाना, कपड़े उतारना इत्यादि खिदमतगारी करनेवाले वहां खड़े थे, वहां एक वकील साहब भी बैठे थे उनको एक खिदमतगारने पूछा-पंडितजी साहब इस भेटको अब क्या करना चाहिये ? राजा (१२) साहब तो विना कहे चले गये। वकील साह ने कहा कि-साहुकार तो भेट रखार अपने घर चले गये, जिससे उनका इस भेट पर स्वत्व कुछ नहीं। राना साहब मी भेटको स्वीकार करके चले गये । तुं राजा साहबका सेवा करनेवाला खिदमदगार है। तेरी सेवाके बदले में इस भटके ऊपर तेरा ही हक्क है । तू इसको उठा कर अपने घरको ले जाता है, ऐसा कानून कहता है । उस मुमब वकील साहनकी सलाह सुन कर वह खिदमदगार भेटकी सव थालि । उठा कर अपने घर ले चला। रास्ते में नाते पहेरेवालोंने उसको पाड लिया, और न्यायाधीश के पास भेन दिया । न्यायाधीशने उमको पूछा कि-यह राजा साहकको दी हुई भेट राना साहबको बिना पूछे उनके बिना हुकुमसे कैसे ले जा सक्का है १ खिदमदगारने कहा-मेरेको यह भेट ले जानेके वास्ते राना साहबने तो हुक्म नहीं दिया है, राना साहब तो विना कुछ बहे कचहरीसे चले गये, वकील साहब वहां पर बैठे थे उनके कहनेपर में ले चला हूं । यदि वहो तो वकील साहबको यहां लेके आता हूं । वाया धीशने कहा अच्छा ले आओ उसपर खिदमतगार वकीलको ले आया। न्यायाधीशने वकीलको पूछा-इस खिदमतगारको गनाकी भेट अपने घर जानेके वास्ते तुमने कैसी सलाह दी ? वकीलने कहा कि भेट रख मानेवाले रखकर चले गये और राजा साहबने भेट स्वीकार ली और अपनी कचहरी से निरल गये। जिससे उनका विसर्जन हो चुका । खिद मदगार रानाकी सेवा करनेवाला है उसका ही उस भेट पर स्वामित्व हा यह बात कानूनसे सिद्ध होती है तो फिर खिदमदगारको ले जाने में क्या हर्ज है? . - न्यायाधीशने कहा-रानाकी चीन राजाके हुक्म विना खिदमदगार लेसता है ऐसा कानून बताते हो तो तुम्हारी भी कोई चीम तुमको विना पूछे तुम्हारा कोई नौकर घर ले जायगा तो तुम चुप बैठोगे ? वकीलने (१३) उत्तर दिया-मै चुप कैसा वैठेगा ? मैं उसी वख्त उसको जेलखानेमें भेज दूंगा। न्यायाधीशने कहा-रानाकी चीन मी रानाके हुक्म बिना कोई ले जायगा तो उसको मंडी भारी सजा होनी चाहिये। ऐमा पुनकर वकील साहब बोले । खिदमतगार पर मारी भाई हुई भेटसे राजी रहता है और अपनी नौकरी के बदले में राजा साहबसे तनखा नहीं मांगता है इससे राना साहबमा दप्त वीस रुपया माहवारीका फायदा हुवा सो रानासाहन भी ऐसा करनेसे गनी होंगे इस बातका भी आपको विचार करना चाहिये। इस पर न्यायाधीश बोले-हां ठीक है । लेकिन भेट देनेवाले साहु- कारकी इच्छा भेट देने में क्या थी सो उसको पूछेगे ऐमा कहकर साहु. कारको वहां बुला लिया और उसको पृछा कि-तुमने राजासाहको जो भेट दी है उपका मोग खुद राना साहबको लेना चाहिये ऐमा आप चाहते हैं अथवा राना साहनकी सेवा करनेवाला उसको ले नायगा तो. चलेगा। साहुकारने जबाव दिया कि मैंने बडा मारी खर्च करके मिठाइयां बनाई हैं और दुरदरसे फलफलावल मंगाये हैं, सो खुद राजा साहनके मोगमें खाना चाहिये ऐसी मेरी खास इच्छा है-नौकरके वास्ते इतना परिश्रम मैने नहीं उठाया है। इतना सुनकर न्यायाधीशने साहुकारको लौटा दिया और मह भेटकी यालिलां राजा साहनकी भोजनशालामें भेन दीं। इस कपाका सारांश इतना है कि रानाके हुकम विगर कोई भी नौकर रानाको दिई हुई मेट अपने घर ले जा सक्ता नहीं और भेट देनेवाला उस भेटका मोग राजाको ही लेना चाहिये ऐसा चाहता है। नौकरोंको देना नहीं चाहता है। अब भगवानको बढ़ाया हुवा द्रव्य भगवान तो खाते नहीं तो मगवानको उस द्रव्यको भोगना चाहिये यह चढानेवालेकी इच्छा कैसे (१४) पूरी हो सकी है ? ऐसा प्रश्न यहां खडा होता है। उसका समाधान 'जैन सिद्धान्त' सन् १९२० प्रथम अंक 'मूर्ति पूना' शिरो लेख पत्र १९में पंडित बनसीधरन ने भावार्थ दिया है उससे होता है। उसमें पंडितजी कहते हैं-"प्रथम अक्षतादिरूप द्रव्यको जो देखना है उसका यह ताप्तर्य है कि ये अक्षनादि द्रव्य हैं । बादमें, अक्षतादि शब्दोंका जो क्षयाभाव विशिष्ट ऐमा अर्थ होता है उम अर्थको केवल विशेषण रूपसे ग्रहण करता हुवा पूनक, उन विशेषणों का आधार नो महत मगवान उसे विशेष्यरूपसे देखता हुवा विशेषण विशेष्यका संबंध हुआ मानता है । अर्थात् ऐसा मानता है कि जो अक्षतादि पोंका अर्थ है वही अहंत भगवानका स्वरूप है । इस प्रकार पवहारनयकी भावनासे भेद करता हुवा विशिष्टपनेका अनुभव उसे अर्हन्तमें होता है । बादमें , जिप्त प्रकार भेदरूप रत्नत्रयके स्वरूपसे अभेदरूप ठहराया जाता है उसी प्रकार, वह होता तेनपुंजरूप अग्निपिडमें अक्षतादि क्षेपण करता हुवा उस अग्नि पुनको अर्हतकी भावनासे भाने लगता है।" इस परसे सिद्ध होता है कि अग्निकुण्डमें डाला हुवा द्रव्य भगवानकू पोंच जाता है। ऐसी पूनन करनेवालेकी भावना हो जाती है। इस पर पंडितजी कहेंगे यह तो हमने हवनकर्मका मावार्थ दिया है पूमन कर्म अलग है और वह हवनसे पहले होता है । इसका प्रभाग ऐसा है । महापुराणके ३९४०४१ पामें जहाँपर ईन्या वातां च दत्तिं च इत्यादि षट् कमौका वर्णन विस्तारसे किया है वहांपर ईज्या, महेन्या, पूना इत्यादि जो शब्द हैं सो पूजन वाचक ही हैं हवन शब्द ही नहीं है । ऐसा-"अस्मिन्नग्नित्रये पून "नित्येज्या यस्य समनि, "तेष्वहंदी- ज्याशेषांशः" इत्यादि वाक्योंसे अग्निकुण्डोंमें पूनन करना ऐमा तो शब्द मिलता है लेकिन 'हवन' शब्द मिलता नहीं है।

(१५) मूर्तिपूना शीर्षक लेखमें पंडित ने महापुराणके २९ लोक दिये हैं। जिसमें हनन' शब्द नहीं है तो मी वादी संतोषार्थ अग्निकुण्डोंमें हवन भी किया जाता है ऐमा मानलें तो मी कुण्डको निर्मात्रकूट यह नाम दिया हुवा इस लेखके पत्र ( में पडितनी बूल करते हैं। यदि उसको नि-ल्यि कूट कहोगे और उमका विशेषण-निर्माल्यवाहिनः' ऐमा पद्मपुराणमें दिया हुवा आप क्वूल करते हैं, तो उसमें निर्माल्य द्रव्य डालना ही पडेगा । निर्मात्य द्रव्य ढाले विगर उसको निर्माल्यकूट यह नाम और निर्माल्य वाहिनः' यह विशेषण कैसे प्राप्त हो सकेगा ? हवन क्रिया में पंडिनजीके अमनायसे निर्माल्य कुछ मी डाला नाता नहीं, आ पूजनका निलय द्रव्य देवसेवा करनेशला अपने घर ले नायगा तो फिर निर्माणकूटमें कौनसा निर्माल्य-द्रव्य डाला जायगा ? इस शंका पण्डितन के लेखमें कहीं पर पी उत्ता नहीं है। यदि निर्माल्य कूटमै हदन क्रियासे निर्मात्य द्वन्य डाला जाता नहीं तो पूनन क्रियाका निर्माल्य-द्रव्य अश्य डालना ही पडेगा। इस पर पण्डितनीका तक ऐग है कि, यदि अग्निकुण्डोंमें पूजन कर दिया तो निल्पि बचता ही नही और उसको कोई ग्रहण कर क्ता ही नहीं तो फिर उके ग्रहण करनेवालों को इतना पाप आच यौँको बतानेकी जरूरत नहीं थी यह तर्क कृद्दर्शनी योग्य दखता है। लेकिन थोडा विचार रस उका जवाब मिल सकता है। कई लोग ऐना विचार करते हैं कि हमारों रुपयोंके निर्माल्य- से सैकड़ों आदमियों की आजीविका होनेवाली थी उसको अग्निमें मत्मकर देते हैं यह अर्थशास्त्र के नियम नुपार दुनियांका वडा भारी नुकसान करते है । शास्त्र में लिखनेवालेकी नयविवक्षा कुछ और होगी। अपन तो इस द्रव्यको जलायगे नहीं किसी को देखेंगे और उसके बदले में मंदिरकी सेवा कराटेंगे, जिसमें अपना खर्श बचेगा।

'(१६) ऐसे हेतुवाले अभी बहुनसे अदमी हैं वैसे पहिले यी होंगे इसका नमूना देखना हो तो अविषेकके समयं नजर पड़ता है। उपाध्याय-पूनारी लोग जब प्रतिमाका अभिषेक करते हैं उस वख्त दूध, दही प्रतिमाके 'मस्तकके ऊपर डाल कर तजवीजसे अलग पात्रमें निकाल लेते हैं। और जब शर्करा अभिषेक करते हैं उस बख्न शर्कराको मस्तक पर नहीं डालते हैं । प्रतिमाके मुखसे अलग रिकाबी से दूसरी एक रिकात्रीमें गिराते हैं जिससे वह साबित उनको मिलती है । यदि मस्तक ऊर डालेंगे तो वह शर। जलमें मिल जायगी उनके हाथ कुछ नहीं आयगा यह उनका लोम कषाय सच कोई जानते हैं । सो ऐसे लोम पायी अर्थशास्त्री जैसे अभी हैं वैसे पहिले मी थे । वे भग्नि न डाल का घर ले जाते थे उनको पापसे बचानेके लिये निर्माश-द्रव्य ग्रहण करनेका पाप आचार्योंको लिखना पड़ा। अग्कुिण्डमें पूजन करते समय जब तक अपने रिजाबी में दृव्य है और जब तक 'अय निर्वामि' ऐसा नहीं कहा गगा तब तक वह निर्माल्य नहीं है । 'अयं निर्वपापि इतना कह दिय बाद वह निर्माल्य हो चुका और 'इति स्वाहा' ऐ-। कह कर निर्माल्यकृटमे डाल दिया। पूजन विधि समाप्त हो चुकी । कदाचित् कोई ऐसा भग्निकुण्डमें पूजन न करके चौकी पर या टेबल पर करेगा तो वह निर्मालग-द्रव्य हवन क्रिया करके निरि। कूटमें तो डालना ही पडेगा । यदि देवसेवा करनेवाले उसको ले जायेंगे तो निश्यिकूटमें अब क्या डालेंगे ? और उसका सार्थक नाम निर्माल्यकूट कैसा - रख सकोगे। पत्र ३ मे पंडितनी लिखते हैं "जिस प्रकार समीके लिये सर्प सर्प हो सकता है, परन्तु गरुडके लिये वह सर्प नहीं हो सकता है वैसे औरों के लिये निर्माल्यका दोष लगता है लेकिन नियोगीके (देवसेवा करनेवाले) लिये वह निर्मात्य ग्रहणमें दोष नही " । यहां सर्प और (१७) गरुहका दृष्टांत भी प्रतिकूल है । सर्पका पूंछ गरुड अपने चोंचमें पडकर उसको आकाशमें लेनाता है वहां उसको खूब धुमाकर ऊंचेसे जमीन -पर पटक देता है जिससे सर्प मर-नाता है । इस वजेसे सर्पको गरुह मार ढालता है यह बात सत्य है । लेकिन गरुड नीचे जमीनपर बैठा हो, और उसकी नजर चुराके यदि सर्प उसके पांवको काट ले तो गरुड मर जाता है। ऐसा जानवरोंकी दवा करनेवाले व्हिटरेनरी सर्जन कहते हैं जैसा गरुड सर्पको मार डालता है वैसा मोर मी सर्पके शिरपर चांच मार कर उसको मार डालता है और विल्ली मी उसको मार डालती है। लेकिन मोर या विल्लीको सर्पने डश किया तो वे भी मर जाते हैं। सो इस गरुडके दृष्टांतसे पंडितजीने निर्माल्य ग्रहण करनेवाले पुनारी उपा- ध्यायको निर्माल्यके पापसे बचानेको सिद्ध करना चाहा सो सिद्ध हो नहीं पाया । यदि भगवान्की सेवा करनेवाला निर्माल्य ग्रह्णके पापसे बचता है तो इतर हिंसा, चोरी, झूठ, व्यभिचार इत्यादि पापोंसे भी बचना चाहिए !! पण्डितनी. इस लेखके पत्र ४ में लिखते हैं-" मोजनके बाद उस मोजनकी जो विष्ठा बनती है उा विष्ठाके उपर विष्ठा करनेवालेका स्वामित्व नष्ट होकर म्यूनिसिपालिटियोंका स्वामित्व स्थापन हो जाता है। लेकिन वास्तवमें ऐसा नहीं है। यदि विष्ठाका मालिक अपनी विष्ठा उठा करके अपने खेतमें डाल दे तो उसको म्यूनिसिपालिटी हरकत नहीं कर सकती। विष्ठाके मालिकको अपनी विष्ठा उठा ले जानेके वारते ग्यनिप्तिपालटीको अभी देनी पड़ती है और म्यूनिसिपालि- टीको इस कामके वास्ते साडेचार रुपये दरसाल देने पड़ते हैं तब म्यु- निसिपालिटी विष्ठा उठाती है। अस्पताल में आदमियोंकी विष्ठा यहांकी मट्टीमें जला देते हैं ऐसा दादरकी मिलिटरी अस्पतालमें देखने में आया। सोलापुरमें मिलवालोंके दोसौ पायखानेकी विष्ठा -म्यूनिसिपलिटी .

(१८) उठाती नहीं । उसको मिलवाले आप वेव देते हैं । म्यूनिसिपालिटी उस पर अपना कुछ हक्क बताती नहीं । और कोई गवर्नमेंटको वीचमें पडनेकी जरूरत पडती नहीं। अब आगे होनेवाले इलेक्शनमें पंडितनी यदि म्यूनिसिपालिटीमें मेंबर चुने जायेंगे तो म्युनिसिपालिटीका शहरके विष्ठाके ऊपर कितना हक्क है सो उनको बराबर मालुम हो जायगा। यदि विष्ठ के ऊपर म्यूनिसिपालिटीका स्वामित्व नहीं है ऐसा पण्डितनीके जानने में आवेगा तो निर्माल्य दरके ऊपर उपाध्याय पूजारीका कुछ स्वामित्व नहीं है ऐसा उनकी समझमें भाजायगा । पण्डितजीने पत्र १३में पुरुषार्थसिद्धयुपायका एक लेक दिया वह इस मुजब है- निश्चयमबुध्यमानो यो निश्चयतस्तमेव सश्रयते । नाशयति करणचरणं स वहिः करणालसो वालः ॥ ५०॥ अर्थात्-जो जीव निश्चय नयके स्वरूपको न जानार व्यवहाररूप बाह्य परिग्रहके त्य गको निश्चयसे मोक्षमार्ग जान अंगीकार करता है, वह मूर्ख शुद्ध पयोगरूप आत्माकी दयाको नष्ट करता है । यह श्लोक पुरुषार्थसिद्धयुज्यमें अदिताके विषयों का है। इसका संबंध निर के विषयसे कुछ भी नहीं है । कदाचित् निर्माल्य ग्रहण करनेवालेके हायसे भगवान् का पूजा प्रक्षाल नहीं कराना चाहिये ऐसा कहनेवाले ऐ० पन्नालाल महाराज, क्षुल्लक मुन्नालाल महाराज, ब्रह्मचारी शीतलप्रसादजी, पं० श्रीलालजी, पं० गुलमारीलालजी इत्यादि मूर्ख हैं ऐसा बतलानेके लिये यह श्लोक दिया हो तो मालूम नहीं लेकिन इस श्लोक के ऊपर पण्डि-जीने ही यह श्लोक देनेका सबब दिया है सो ऐसा है-" इस प्रकार धर्माश्रित आजीविका करे वह पापी इत्यादि मभिप्रायके उपदेशोंको ठसा ठसाकर धर्मके व्यवहारका अज्ञ मनुष्योंने कण्ठगत प्राण कर दिया । हमारा यह कहना नहीं है कि ये सिद्धांत अहत्य है - (१९) इममें पंडितनी कबूल करते हैं कि ये सिद्धान्त सत्य हैं। तो फिर उन सिद्धान्तोंका उपदेश करने वालोंको मुर्ख कहना यह बडी मारी भूल है । धर्माश्रित आजीविका करना निंद्य है ऐमा पंडितनीके गुरूजी पं० गोपालदासनी और उनके गुरुजी पं० वलदेवदासजी कहते थे । प्रतिष्ठापाठमें लिखा नैव पाखंडि पुत्रो वा देव द्रव्योपजीविक ! +++ एवं समासतः प्रोक्तं प्रतिष्ठाचार्यलक्षणं ।। अर्यात्-देवव्यसे आजीविका करनेवाला प्रतिष्ठाचार्य न होना चाहिये। इस ही लोकके नीचे पण्डितनीने एक श्लोक दिया सो इस मुजन है- उच्चावचजनप्रायः समयोऽयं जिनेशिनाम । नैकस्मिन् पुरुपे तिप्ठेदेकम्म्म इवालयः ।। अर्या-ऊंचे नीचे समी प्रकारके मनुष्य मिलनेसे जिनेश भगवानका यह शासन जीवित अवस्थामें मौजूद हो। ऊंचेसे ऊंचे सर्वथा निर्दोष किसी एकाध मनुष्यको ही यदि जैन धर्मी मानानाय तो क्या जैन शासनकी जीवित दशा ठहर सकती है ? क्या किसी मकानकी रचना या स्थिति एक ही खम या दीवारपर हो सकती है ? यह श्लोक आशाधरका है ऐमा पण्डितनी लिखते हैं लेकिन सागारधर्मामृन देखनेसे यह श्लोक आशाधरका नहीं है लेकिन माशा- घरका एक श्लोक- "विन्यत्यैदं युगीनेषु मतिमामु जिनानिव ॥ भक्त्यापूर्वमुनीनचेत् कुतः श्रेयोति चर्चिनाम् ॥ ३४ ॥ .. " अर्थात्-जैसे रत्न पापाणकी मूर्ति करके उसको ऋषभ, अजित इत्यादि नाम देकर उसकी स्थापना करके पृना करते हैं उस ही प्रकार

(२०)
इस पंचम कालके मुनियों में पूर्वकालके मुनियोंकी कल्पना करके भक्तिसे
उनका सत्कार करना चाहिये । कारण बहुत चिकित्सा करनेसे क्या
फायदा है"
इस श्लोकके नीचे सोम देवसुरीके श्लोक नोट में दिये हैं उसमेंका यह
एक है । इसका संबंध निर्माल्य विनियोगके विषयसे कुछ भी नहीं है।
इसका जो असली अभिप्राय है कि-जैन धर्ममें उच्च चारित्रके
और नीचे चारित्रके आदमी होना चाहिये सो सभीको मान्य है, कई
पाक्षिक हैं, कई दर्शनिक है; कई दूसरी प्रतिमाधारी, कई तीसरी, चौथी,
पांचमी, छही, सातवीं ऐसे ग्यारहवीं प्रतिमातक श्रावक, और छट्टे गुण
स्थान, सप्तम गुणस्थानके मुनि मी पाये जाते हैं ऐसे समी किसमके
मनुष्य देखनेमें आते हैं उनको उनकी योग्यतानुसार सभी मानते है ।
लेकिन पं० बनसीधरजी और पं० वल्लाप्पा अनंत उपाध्याय आदिका यह
श्लोक बतलानेका आशय ऐसा है कि-ऊचे मालमें हलका माल सामिल
हो जाना चाहिये । वस्त्रधारी मट्टारकोंको पंचम कालके मुनि मानकर
उनकी मुनिके माफक नवधा भक्तिपूर्वक पाद-पूजा सत्कार होना चाहिये।
यह बात जैन सिद्धान्तके तारतम्यताके विरुद्ध है। यदि वे वस्त्रधारी
अपनेको मुनि अथवा भट्टारक न कहला कर श्रावकके दर्जे में अपने पद..
वीके अनुकूल माननेको कहेंगे तो चल सका है। वह अपने चारित्रके
'माफक नामः धारण करके वर्तगे तो उनका कोई तिरस्कार नहीं करेगा।
पदि पंडितनी इस सोमदेवसरिके श्लोकका अभिप्राय ऐसा निकालेंगे कि
ऊँचे नीचे समीको समान मानना चाहिये तो " टक्के सेर मानी के सेर
खाना " ऐसा हो जायगा । सो यह बात सोमदेवसुरिको मी पसंद नहीं
है। वे अ.गेके अपने श्लोकमें कहते हैं---
सत्कारादि विधावेषां दर्शनं दूषितं भवेत् ।
यथा विशुद्धमप्यम्बु विपभाजनसंगमाव ॥३॥

(२६) -- अर्थात-इनका पन्कार गैरह नारनेस उमका सम्यक्त्र विषपात्रमें रखे हुये नल माफक दुपित होगा। पढितनी कहते हैं-" निर्माश्य ग्रहणका इतना घटा दोप है यह प्रश्न जो समाजमें गोरके साय फेया ना रहा है, उसका कारण कहीं तो अज्ञान है और कहीं कपाय है । कपारमें तो लोम मुख्य है और अनान शास्त्रोंके अर्थका न समझा अब लोम दपार निर्माल्य द्रव्य त्या जाने होगा या ग्रहण करने में होगा, इसका उत्तर कोई भी यही देगा कि-हण करने में लोभ कपाय है न कि त्यागनमें । अब दुमना कारण भनान मात्र अर्थका न मममना है, ऐसा बताते हैं तो व-" प्रमादास्तादत्त नैवेद्यग्रहण तया ।" इसका अर्थ देवताओंको अर्पण किया हुवा नैवेद्य लोम पायसे ग्रहण करना यह अर्थ सीधा है। पंडितनीने यी तत्वार्थसारमा नो अर्थ लिखा है वहांपर इस मुनब मर्य लिया है- " नैवेद्य देवको समर्पण करदेनेपर फिर नए लोभवश होकर उठा लेना " ऐसा किया है । और निर्माल्य विनियोग लेखमें इस मनत्र अर्थ किया है कि "प्रमाटावरण पूर्वक दुसरेको विघ्न उपस्थित हो ऐसी तरहसे देवता दत्त नैवेद्यादिका प्रहण करे तो अंतरायका कारण हो" इसमें "दुमरेको विघ्न उपस्थित हो ऐसी तरहसे" इतने शब्द श्लोकमैसे किस शब्दसे निकाले सो मालूम नहीं। उन्हीके तत्वार्थसार ग्रंथक्के अयमें ये शब्द नहीं है लेकिन इस रेखमें पंडितनीने डाल दिये और लिखते हैं। तस्वार्थसारमें स्पष्ट करके खाम बताया है । पेप्साही-'देवता निवेद्या निवेद्य ग्रहणम्" इसका अर्थ देवताको निवेदित किया हुवा और निवेदित न किया हुवा ऐमा दो प्रकारका द्रव्य ग्रहण करनेसे दूसरेके दान लाम मोगोपभोग वीर्यमें विघ्न उपस्थित होता है।

- (२२) इस लिये उस द्रव्यको लेनेवाला अंतराय कर्म बांधता है । " ऐसे इस लेखमें पंडितमी अर्थ करते हैं। और इस ही वार्तिकका, तत्वार्यसारका अर्थ लिखते समय नोटमें अर्थ इस मुजब लिखते हैं कि-"शजवातिकमें अर्पित अनर्पित दोनोंको देनेवाला अंतराय कर्मका मागी लिखा है।" इस अर्थमें और लेखके अर्थमें बडीमारी तफावत है । देखिये "दूसरेको विघ्न उपस्थित हो ऐसी तरहसे" ये शब्द इस अर्थ में नही है। पडित भूघरदासजीने अपने चर्चा समाधान ग्रंथमें तत्वार्थसारके श्लोकका और राजवातिकके वार्तिकका अर्थ ४० ९७में दिया है सो इस मुनब है । "निर्माल्यके दो भेद हैं । एक देव द्रव्य, दूना देवधन । जो नेवन आदि वस्तु देवता निमित्त निवेदन करिये, समर्पण करिये, चढाइये, तिसे निर्माल्य द्रव्य कहिये है। अर पृना चैत्याच्यादिका द्रव्य होई तिसे देवधन कहिये । तिनमें जो देवचढी वस्तु खाई तिसे अंतराय कर्मका बंध होई । भर जो देव धनको अंगीकार करें सो नरक जाड ! अर पं० जय चंद्रजी अपने सर्वार्थसिद्धि बचनिकामें लिखते हैं कि- "निर्माल्य द्रव्य लेना इससे अंतराय कर्मके आत्रत होते हैं अर पं० सदासुखजी अपने अर्थ प्रकाशिका पृ० २९२में लिखते हैं-देवताको चढी वस्तुके ग्रहण करनेसे अंतराय कर्मके भास्रव होते हैं। फिर आगे पत्र २९३में लिखते हैं-" यहां कोई ऐसी आशंका कर-जो कोई पुरुष अभक्ष्य मक्षण करे ताको वर्जन करे, तो ताके अंतराय कर्मका आत्रा पैसे नहीं कहा ? ताका समाधान-जो कोई भभक्ष्य भक्षण करता देख ऐसा विचार करें जो अमक्ष्य भक्षणते नरक नायगा । भर हिंसात महान् पापा बन्ध होगा। किसी तरह याके यातना नहीं होई ऐसी स्णा भावना करि वर्जन करें ताके तो अंतराय कर्मका बन्ध नहीं होय। अर नाका केवल भोग बिगाडनेका अमिगयते ही वर्जन करें ता अंतरायका आस्रव होयगा।" " -- (२३) इस मुनब पं० भूधरदापनी, पं० जयचंदजी, पं० सदासुखजी ऐसे तीनों पडितोंने जो अर्थ दिया है उसमें किसी मी-दुसरेके दान लाम मोगोपमोग वीर्यमें विघ्न उपस्थित होता है इसलिये" और "दुस- रेको विघ्न उपस्थित हो ऐसी तरहसे" ये शब्द डाले नहीं। पं० वंसी- घरनीने मी तत्वार्थप्तार अथका अर्थ जो दो वर्ष पहिले लिखा है उसमें भी ये शब्द दीखते नहीं हैं। फक्त इस निर्माल्य विनियोग नामके लेखमें ही ये शब्द लगा दिये हैं सो क्या पं० भूधरदासजी, पं० जयचंदनी और ५० सदासुखनीका अनान है ? और उनको शास्त्रोंका अर्थ समझ- नमें नहीं आया ऐसा पं० बन्सीधरजी कहते हैं ? खुद पं० वन्सीघर- जीने दो वर्ष पहिले तत्वार्थपारका जो अर्थ लिखा उस वक्त शास्त्रका अर्थज्ञान उनके समान में नहीं आया और अत्र आया ऐसा पंडितनी कवृल करेंगे? बराबर है तो उस यदि उपर्युक्त चारों पंटितोंका लिखा हवा અર્થ अर्यके अनुसार ऐठक पन्नालाल महारान, क्षुल्लक मन्नालाल महाराज, पं० श्रीलालजी अलीगढव,ले, पं० सेठ मेवारामनी खुवाले, ब्रह्मवारी शीत. लप्रपाद नी इत्यादि कहते हैं-कि निर्माल्य द्रव्य पुनारी-उपाध्यायको देकर उसके बदले में उनके हाथसे पात्रान्की पूना कराना पाप है ऐसा कहते है सो शास्त्रका अर्थ समझे नहीं है ऐसा पडितजी कहते हैं ? अथवा लोम व पायके का हो कर ऐसा कहते हैं ऐमा पंडितजी कहेंगे ? बोम कपाय तो निर्माल्य द्रव्य ग्रहण करनेमें है अथवा किसीको देकर बदलेमें मदिरका काम लेनमें निर्माल्यका त्याग करने अथवा निर्माल्य कूटमें डाल कर माम करने में नहीं है ? यदि प० नन्सीधरजी दो वर्ष पहिले निा.लि द्रव्य ग्रहण करने में पाप है एसा लिख चुके और आन देवसेवा करनेवाले ग्रहण करें तो उनको पाप नही ऐमा लिखते हैं । सो कदाचित् लोभ कपायके उत्पन्न ३ (२४) होनेसे ही लिखते होंगे। ऐसा अनुमान हो सकता है। क्योंकि शास्त्रोंका अर्थ जब सादमी लोमके वश होता है तब पट देना है। पंडित बंसीधरनी श्लोकका और पातिकका अर्थ समझने में अज्ञानी है ऐसा हो नहीं सकता। क्योंकि उन्होंने न्यायतीकी परीक्षा दी है । जैसे वसुरानाको "en" शब्दका अर्थ पुराना घान ऐमा नगर मालूम था तो मी पर्वतले माके शिफारस वाम्ने मुगनाने अन शन्दका सर्य बकरा होता है ऐसा पलटा दिया सो शास्त्राचा अर्थ कपायके यश होनेसे बड़े बड़े विद्वान् लोग भी पटटा देने है। पंडितशी पत्र में लिखते हैं कि-"जन ग्रंथों में मशगके निषेपका कोई एक शब्द भी कहींपर न मिला तर सचित्त त्याग प्रतिमा के विषय में कार्तिकेयानुप्रेक्षामेंके एक मक्षण निषेध कानेवाले लोकको निर्माल्य पक्ष- णके निषेध करनेमें जोडकर उसके मक्षणके निपेनको पुष्ट कर दिया ।" ठीक लेकिन-" प्रमादाढेचतादत्तनैवेद्य ग्रहण तथा . इसमें गो 'ग्रहण' शब्द पडा है उसका अर्थ यहां 'मक्षग' होता ही नहीं गया ? उदाहरणार्थ तत्वाशर के अर्श पत्र २१६में पंडिननीने नोट दिया है कि "देवताको अर्पण कर दी गई जानकी नीमको प्रमादरश होकर ग्रहण करनेवाला अंतागय अर्म बांधना है।" इसमें खाने की चीन ग्रहण करना सो भक्षणके वास्ते ही है। और मी त्रैवर्णिकावार १० ३५६में-"पूग-तावृद्ध पर्णानि गृहीवानखशुदये । अर्थ-नंतर मुबा- च्या शुद्धी करितां ताम्बूल भक्षण करावें " ३२ प्रकार पं० लाश निटवे 'प्रहण' शब्दका अर्थ पक्षण करना लिखने है और ए०२२६में लिखते हैं। "देवाचकश्च निर्माल्यभोक्ता जीव दिनाशकः । xxx इत्यादि दुष्टसंसर्ग सन्त्यजेत्पत्ति भोजने ।। गर्यात-देवना र उनर निर्वाह कणहारा और निर्माण भक्षण करणहारा ये पन्हि भोजनअयोर है। पं० भृनरहामनी लिखते हैं "देव चढी नातु बाई तिसे अराय कर्मशा बंध होई इस प्रकार (२५) निर्माल्य मक्षणके निषेधका प्रमाण कई ग्रंथोंमें मिलता है तो फिर ग्रहणका अर्थ मक्षण समझके कृतः कारितका समान पाप बतलानेमें स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षाकी सचित्तत्याग विपयकी गाथा प्रमाणमें देनेसे क्या विगडा सो मालूम नहीं होता। मन 'पूजा' शब्दका अर्थ अग्निकी पूना ऐसा पंडितजी करते हैं सो कैसा होता है। अस्मिन्नग्नित्रये पूजां मत्रैः कुर्वन् द्विजोत्तमः । आहिताग्निरिति ज्ञेयो नित्येज्या यस्य समनि ॥८॥पर्व ४०॥ "अर्थात-गो इन तीनों प्रकारकी अग्नियों में इन मंत्रोंसे पूमा करता है वह उत्तम दिन वा ब्राह्मण कहलाता है और जिसके घर ऐसी पूजा नित्य होती है उसे आहिताग्नि अथवा अग्निहोत्री समझना चाहिये ।" इस प्रकार पंडित लालारामनी उपर्युक्त श्लोकका अर्थ लिखते हैं। और पं० बल्लाप्पा निटवे भी इस इलोकका अर्थ-"या अग्नित्रयांचे ठिकाणी पीठिका मंत्रांनी पृना करणारा ब्राह्मण श्रेष्ठ होय । ज्याच्या घरी ही पूना नित्य चालते तो आहिताग्नि समजावा । " और पं० दौलतरामजी इस शोकका अर्थ इस मुनब लिखते हैं-"इनि विष उत्तम द्विन मंत्रनिकरि होमरूप पूजा करता संता अग्निहोत्री कहिए नित्य है पूना नाके घर विष ॥८॥" भर पंडितजी अपने मूर्तिपृना लेख पत्र १३में इस छोकका अर्थ ऐसा देते हैं। इन तीन अग्नियोंकी पूना जिप्तके घरमें सदा रहती है और जो उत्तम द्विन मंत्र पूर्वक इन तीन अग्नियों में प्रजा करता है वह आहिताग्नि अथवा अग्निहोत्री कहाता है।" इस प० बनसीधरजीका अर्थ ऊरके तीन पंडितोंके अयोंसे मिला- न करेंगे तो-'इन तीन अग्नियोंकी पृना ये शब्द उपरले उन तीनों पंडि. तोंके अर्थ में नहीं हैं तो फिर पं० ननसीधरजीने यह अर्थ श्लोक किस पदसे - (२६) निकाला सो मालूम नहीं होता है। कोई भी सुरतसे अनिका पूनन सिद्ध करनेके वास्ते यह अर्थ पल्लुका लगा, दिया ऐसा अनुमान होता है। इस श्लोकमें-'अग्नित्रये यह शब्द है उसकी सप्तमी विमक्ति है जिसका अर्थ 'अग्नियोंमें ऐसा अर्थ तो पंडितजीने किया है । अब उसके भागेका शब्द 'पूजां ऐसा है वह किसकी पूना इसका खुलासा श्लोकमें नहीं है, जिससे पंडितनीने अपने पक्षका शब्द 'अग्नियोंकी पूना ऐसा लिख डाला । लेकिन उस 'पू' शब्दके मागे 'भत्रैः' ऐसा शब्द पड़ा है। वह शब्द करणीतृतीयाका-है, सो वे मंत्र देखनेसे निश्चय होगा कि यहां पर पुना अग्निकी है या भगवानकी है ? वे मंत्र इस मुनब है सत्यजाताय नमः । अहज्जाताय नमः । परमजाताय नमः। परमाईताय नमः । सर्वज्ञाय नमः । अर्हते नमः । परमेष्टिने नमोः नमः । इत्यादि इस परसे यह मंत्र भगवानके नामके हैं। अग्निके नामका एक भी मंत्र नहीं है । अग्निके नामके मंत्र होते तो- अग्नये नमः । वन्हये नमः । हव्यवाहनाय नमः स्वाहा। वैश्वानरायनमः स्वाहा। इत्यादि मंत्र लिखते थे। लेकिन ऐसा एक भी मत्र नहीं है । इस परसे यहां पर-'अग्निकी पूजा' ऐसा अर्थ हो सक्ता नहीं । और किसी पंडितने किया भी नहीं फक्त पं० बंसीधरजीने अपना पक्ष समर्थन कर नेके हेतुसे ठीक दिया है। अग्निकुण्डोंमें पूजन करनेके दूसरे प्रमाण उत्तरपुराण-पर्व ६७, पृ० ३३८ र तथा तीर्थगणाधीश शेषकेवलिसद्वपुः ॥ संस्कार महितामीद्र मुकुटोत्याग्निषु त्रिषु ॥ २०४॥ परमात्मपदं प्राप्ताग्निजान् पितृ पितामहान् | उद्दिश्य भाक्तिका पुष्पगंधाक्षतफलादिभिः ॥२०५।। आषोंपासक वेदोक्त मंत्रोचारणपूर्वकम् ।

4 (२७) दानादिसत्कियोपेता गेहाश्रमतपस्विनः ॥ २०६ ।। नित्यमिष्लेन्द्रसामानिकादिमान्यपदोदिताः। लौकान्तिकाश्च भूत्वामर द्विजा ध्वस्तकल्मपाः ॥२०७॥ अर्थात-इसके सिवाय तीर्थकर गणधर और शेष केवलियोंके उत्तम शरीरके संस्कारसे पूज्य तथा अग्निकुमार इंद्रके मुकुटसे उत्पन्न हुई तीन मग्नियां हैं। उनमें अत्यंत भक्त तथा दान आदि उत्तम उत्तम क्रिया- भोको करनेवाले गृहस्थ-तपस्वी परमात्मपदको (सिद्ध पदको ) प्राप्त हुए अपने पिता पितामह आदिको उद्देश्य कर ऋषिप्रणत उपासका ध्ययन नसके वेदमें कहे हुए मंत्रोंको उच्चारण कर पुष्प, अक्षत, गंध, फल आदिके द्वारा जो सदा आहुति देते हैं वह दूसरा आर्पयज्ञ कहलाता है। इस यज्ञके करनेवाले लोग भी इंद्र सामानिक आदि पून्य पद पाते है तथा देव ब्रह्मण (लौकान्तिक देव ) होते हैं। और अन्तमें कर्म रूपी पापको नाशकर मुक्त होते हैं ॥ २०४-२०७ ॥ पटू प्राभूत पर श्रुतसागरकी टीकामें गाव प्राभूतमें पत्र १६१ में वसु, पर्वत, नारद इनकी कथामें लिखा है " वनिमुखे देवार्चन विद्वांसो राजं वदति। " अर्थात् अग्निमुखसे देव-पूजा करनेको विद्वान् लोग यज्ञ कहते हैं। अमरकोप संस्कृत टीका पत्र १७१ में स्वाहा शब्दका और हन्य शब्दका अर्थ लिखा है अग्निमुखेन देवेभ्यो अन्न दीयते ॥ भात भनि-मुखसे देषोंको अन्न देते हैं पत्र १३में पंडितभी दिखते हैं कि प्रतिष्ठोष यात्तिच्छेद नामका मी एक भयंकर पाप है। जहां पर निर्माल्य ग्रहणका निषेध किया है वहीं पर वातिककारने सिलोप करनेका भयंकर पाप वर्णन किया है। नो निर्माल्यजीवी वर्ग है उसका क्या निर्माल्य जला कर भस्मरूप कर देनेसे आजीविका संबंधी बड़ा साधन नष्टं न होगा ? जिससे कि वृत्ति- लोपका पाप लगता है।

M (२८) इस कोटिक्रमका विचार करते समय पहले वृत्ति किसको कहिये। और लोप अथवा छेद किसको कहिये सो देखना चाहिये । पंडितजी पत्र १२में लिखते हैं कि " यदि दुमरा उपाध्याय उससे अच्छा न मिलता दीखा तो उस पहिलेकी तनखाह दशकी जगह बारह कर दी जाती है" इत्यादि । इस परसे उपाध्याय अपनी नौकरी मालि- कके पाससे तनख्वाह अथवा निर्माल्य लेकर करते हैं, और कुछ सत्र होनेसे बदले भी जाते हैं। जैसे मंदिरोंके दूभरे नौकर बदले जाते हैं। कोई मी नौकर एक मालिकसे रुखप्तत पाया तो दूसरे मालिकके पाप्त नौकरी करता है । और तनखाह पाता है । उसके बदलेमें पहला मालिक अपने यहां दूसरा नौकर रख लेता है । कदाचित् नौकरी नहीं मिली अथवा करनेकी इच्छा न हुई तो स्वतंत्र धंदा करके अपनी आजीविका करता है [ जैसा पंडितजीने विशालकीर्तिकी नौकरी छोडकर श्रीधर प्रेस खोल दिया । इसमें किसकी वृत्तिका किसने लोप किया ? इसमें वृत्तिलोप कुछ भी नहीं है। यदि आप कहोगे कि निर्माल्य-द्रय उपा- घ्यायको देते तो उसके ऊपर उसकी आजीविका चलती थी । सो तुमने निर्मात्य-कूटमें जला देनेसे उसकी वृत्तिलोप हुवा या नहीं। इसका उत्तर ऐसा है कि, हवन क्रिया करनेमें जो पूननसे बचा हुआ थोडा बहुत भी द्रव्य हवन करनेको आप फर्माते हैं तो यह द्रव्य हवन न करके उपाध्यायको देते तो उसकी आजीविकामें अथवा वृत्तिमें उतनी अधिक माती होती थी सो तुमने हवन करनेसे थोडा महुत तो वृत्तिलोपका पाप बांध लिया। वृत्तिलोपके पापसे आप भी बिलकुल बचे तो नहीं लेकिन इसमें वृत्तिलोप करनेमें कपायका सद्भाव देखना पडता है । यदि निर्माल्य द्रव्य ग्रहण करने में पाप है ऐसा मानाजाय और उस पापसे छुडानेके हेतुसे उसको निर्माल्य द्रव्य ग्रहण करनेसे कोई छुडाता हो तो इसमें वृत्तिलोपका पाप बिलकुल नहीं है। जैसे भामटा लोक हमेशा चोरीसे ही अपनी आजीविका करते हैं उनको चोरी करना (२९) छुडवा कर नौकरीमें अथवा खेतीवाडी करके आजीविका करनेमें लगा दिया तो उसमें पाप होगा पा पुन्य होगा ? उसकी चोरी करके माजीविका करनेका वृत्तिलोप तो हुवा लेकिन ऐसा वृत्तिलोप करनेमें आचार्योंने पाप बताया नहीं है। कई आचार्योंने चोरी करनेवालेको चोरीसे छुडाया है और न्यायमार्गसे आजीविका करनेका उपदेश दिया है। कईने मांसाहार छुडाया है। एक धीवरकी आजीविका मत्स्य पकडकर वेचने पर थी उसको उस आजीविकासे एक मुनिने छुडाया सो क्या उन्होंने वृत्तिकोपका पाप किया ? कभी नहीं होता। यहां पर एक दृष्टांत देर इसको स्पष्ट करेंगे। एक गृहस्थके पास एक घोडा था। बडेके वास्ते उसने एक नौकर रखा । घोडको चंदी अच्छी मिटती थी। जिससे घोडेकी लीद बेचनेसे पंधरा रुपये महीना उपनते थे। नौकरने मालिकसे करार किया कि, मेरेको नौकरीके बदलेमें घोडेकी लीद दो। मै तनखा मांगता नहीं। मालिकने कबूल किया। वह नौकर उस लीदको एक गोवालको वचता था। गोवाल वह लीद अपनी भैसको खिलाता था। उसी मेंप्तका दूध यह नौकर लाकर पीता था । एक दिन नौकर बीमार हुवा । वैद्यने उसकी परीक्षा की और कह दिया कि घोडेकी लीद खानेवाली मेला दूध पीनेस तेरेको यह बीमारी हुई है । वैद्यने यह हाल उसके मालिकको कह दिया । मालिकने विचारा कि घोडेकी लीद भी खाती हैं । उसका दूध आदमी पीते हैं। जिससे बीमार होते हैं। सो लीद किसीको देना अच्छा नहीं उसको मलादेना ऐमा विचार कर नौकरको कहा कि हूं आगेसे लीद येचना नहीं मला वेना और तेरी नौकरीके बदलेमें तेरेको पंधरा रुपये माहवारी हम देते रहेंगे। नौकरने कबूल किया । इस दृष्टांतका तात्पर्य इतना है कि, नौकरकी धृत्ति लीद पर थी, सो मालिकने छुडवाकर उसको पंधरा रुपये माहवारी करदी। इसमें उसका वृत्तिलोप किया या उसका कुछ मला किया।

न (३०) पत्र १२में पंडितनी लिखते हैं कि, उत्तर-प्रांतमें निर्माल्य- जीवी वर्ग रहा ही नहीं । दक्षिणमें यह उत्तरकी देखा देखी अबहेलना शुरू हुई है । जिससे कि देवपृना कर्म नियोगशून्य हो कर दुर्दशामें पहुंच जायगा, यह दीखता है। इससे यदि निर्माल्यनीवी पुनारी वर्ग नष्ट हो जयगा तो देव पूजा कर्म बंद हो जायगा और मदिराके ताले लग जायगे ऐमा वडी मारी धास्ती पंडितजी बताते है । पडतनीकी जन्म भृ मे उत्तर प्रातमें हैं, उनका विद्याध्ययन सत्र उत्तर प्रांत में हुवा है उनको उत्तर-प्रातमा अच्छा अनुभव है सो उत्तर प्रातमें निर्माल्योपजीवी पृनारी वर्ग रहनेसे कौनसे गांवमें कौनसे मंदिरमें देना बढ हो गई और दक्षिग प्रातसे अधिक दुर्दशा कौनसी हो गई सो पंडितनी बता साते है । श्री जेनचद्री और मूडविद्री तरफ पडितनी गये थे । वहां पर बहुतसे उपाध्याय पुजारी जिनको इंद्र संज्ञा है ऐसे ही निर्माल्योपनवी हैं । लेकिन मंदिरमें एक मूलनायक प्रतिमाका प्रमाल करते हैं बाकी सैक्डों प्रतिमा विना प्रक्षाल रहती हैं। ऐण पंटितीन देना होगा। अनमित्र वीर संवत २४ ४७ चैत्र सुदी १४के अंमे मालूम होता है कि, श्रवणबेलगुलके हरएक मंदिरमें उपाध्याय द्वारा प्रतिमाका नित्य प्रक्षाल कराया जाय ऐसा प्रस्ताव न० शीतलप्रसादनी और दौली शास्त्री- नीको पाप्त करना पड़ा। श्रवणवेलगुल्में विव्यगिरी पहाड़परकी श्री बाहुबली स्वामीकी पड़ी मूर्तिक चरणोंका र काला पड़ गया है उसका रस सफेद सुंदर है। चरणों का काला रंग अपरके माफिक रखनेका भी इन निर्मास्योपजीषियोंसे पनता नहीं है। दक्षिण कर्नाटक प्रांतके सभी मंदिरों में निर्माल्योपजीवी उपाध्याय रहते हैं उनकी रसोई मंदिर में होती है। उनकी रोटियां रखनेका शिका मंदिरमें रहता है। उनकी गौ मैप्स भी मंदिरनीमें; गोरी मी मंदिरजीमें; उनका सभी संसार मंदिरजीमें और मंदिरनीके मालिक आप ही बनें (३१) बैठे हैं। श्री स्तवनिधीमें तो उपाध्याय लोगोंने धर्मशालाकी जगा रोक दी है। यात्रियोंको उतरने में भी हरकत करते हैं। भगवान्का पूजन मारे हाथसे ही होगा अन्य श्रावकको करने नहीं देंगे ऐसा कहते हैं। ऐसे लोगोंसे मंदिरका रक्षण होगा ऐमा पंडिनजी कहते हैं सो बड़ा आश्चर्य है। यह निर्माल्योपजीवी पुनारी उपाध्याय वर्ग भारतवर्ष में फकत कर्नाटक प्रांतमें हैं। पंजाब, वायव्य प्रांत, संयुक्त प्रात, राजपूताना, मारवाट, गुजरात, मध्य प्रांत, बंगाल इत्यादि दिगंवरियोंकी पांच लाख वस्तीमें कहीं भी नहीं है फक्त कर्नाटककी लाख हेद लाख वस्तीमें इन लोगोंके दो शासौ घर हैं। सो क्या फकत कर्नाटक प्रांतमें प्रसाल होता है और बाकीके प्रांतोंमें देवपूजा होनी बंद हो गई ऐसा पंडितजी रहेंगे ? यदि तुलनात्मक दृष्टिसे देखा जाय तो दक्षिण प्रांतके मंदिरोंसे उत्तर प्रांतके मंदिरों की स्वच्छता विनय, पूजन, प्रक्ष ल, शस्त्र लाध्याय, उपकरण, स्य-यात्रा इत्यादि बहुत ही बढिया ननर पायगो और ऐसा दक्षिण प्रांतके कई लोग जो उत्तर प्रांत के मंदिरोंके दर्शन करके अ.ये है सो कबूल करते हैं। पत्र ७ में पंडितनी लिखते है कि " निर्माल्य " का अर्थ निर्मल है । यद्यपि : निर्मलस्य पादो नर्मस्य । ऐसा निर्मल अर्थमें शब्द बनता है, परंतु इस विशिष्ट प्रकारके निर्मलपनेके अर्थमें निर्माल्य शब्द बन जाता है। विशिष्ट प्रकारकी निर्मलता यहा इस लिये है कि देवाधि- देवको वह द्रव्य अर्पित हो चुश है। " इस मुनव निर्माल्य शब्दके अर्थसे ही अत्यंत पवित्र ऐसा निर्माल्य द्रव्य सप्त धातुमय और विष्टायुक्त अत्यंत अपवित्र ऐसी जो मनुष्पकी जठराग्नि उसमें डालना अविनयकारक और अत्यंत घृगायुक्त समझकर उसका विनियोग पवित्र ऐसे अग्निकुडोंमें डाल देना ही उचित मानना चाहिए । और इस ही सबबसे उन अग्नि- कुंडों को निर्मालाकूट ऐसा पवित्र नाम दिया गया है । भगवानकी मूर्ति (३२) अथवा जिनवाणीकी पुस्तक रखना हो तो पवित्र जगहमें रखेंगे या विष्टा ग्रहों ? क्या नियोगी पुजारी उपाध्यायकी जठराग्नि अपवित्र विष्टायुक्त नहीं है ऐसा पंडितजी कहेंगे ? वह मी तुम्हारे हमारे माफिक औदारिक शरीरवाला जिसमें अपवित्र सप्त धातु मरी हुई हैं तो फिर अत्यंत पवित्र निर्माल्य द्रव्य अत्यंत अपवित्र जगहमें रखना पंडितजीको पसंद हुवा ये बड़ा आश्चर्य है !! पत्र ६ में पंडितनी लिखते हैं कि " निर्माल्य ग्रहणसे किसीको विघ्न उपस्थित हो तमी वह अंतरायका कारण हो सकता है । अर्थात ही नियोगी मनुष्यके सिवाय यदि कोई दूसरा उस द्रव्यको ले तो नियोगीके लाभमें विघ्न हुवा पाना जायगा; न कि, नियोगीको उसका दोष हो सकता है ।" यह मी जो पंडितनीने दिया है सो भी अलंक- स्वामीके "भनपदिष्ट हेतुकत्वादात्रता नियम इति चेन्न, स्वभावामिव्यंज- कत्वात्' इस वार्तिकका दिया है । लेकिन बार्तिकमें "नियोगी मनुष्य सिवा यदि कोई दूसरा उस द्रव्यको ले तो नियोगीके लाभमें विघ्न हुवा" इस भावार्थक शब्द कहां हैं ? । ये शब्द हैं ही नहीं । विघ्नकरणत्व हेतु बतानेके लिये ये शब्द पंडितजीने वार्तिकमें तो डाल दिये हैं। लेकिन यदि निर्माल्य द्रव्यपर मावानका हक है । ऐमा सिद्ध हो गया तो वह द्रव्य भगवानको न पहुंचा कर दूसरा कोई भी लेजायगा तो उसने पूजनमें विघ्न किया ऐमा विघ्न करणत्व हेतु सिद्ध हो जाता है। और निर्माल्य द्रव्य मगवानका है ऐसा पंडितनीके लेखसे ही सिद्ध होता है सो देखिए। पत्र में पंडितजी लिखते हैं कि, "स्थापनाके आरमसे विसर्जन हुए तक पूजनकी क्रिया सप्झी जाती है । यदि उस पूना द्रव्यके साथ मोग्य मोजक संबंध देवका माना जाय तो वह संबन्ध और वह स्वामित्व विसर्जनके बादमें खतम हो जाता है। इससे विसर्जन तक तो भगवानका स्वामित्व रहा यह बात पडितजीने कबूल की है । अब विसर्जन जो - (३३) होता है सो "पूनन के अंतमें निन अनेक द्रव्योंसे अग्निकुंटोंमें हवन किया जाता है वे द्रव्य शांतिधारा छोडनेके कारण अनमें अर्ध दम्ब रह जाते हैं। ऐसा पत्र ( में पंडितनी लिखते हैं उस शांति-धाराके माद होता है। देखिए शांति-धाराका श्लोक- मध्वस्तपातिकर्माणः केवलज्ञानभास्कराः। कुर्वतु जगतः शांति पभाद्या जिनेश्वराः ॥ ऐसा शांतिधाराका लोक कह कर शांतिधारा छोडे पीछे पुष्पा- मलि देकर विसर्जन करते हैं, उसके श्लोक इस मुजव- आहूता ये पुरादेवा लव्यभागा यथाक्रमात् । ते जिनाभ्यर्चनं कृत्वा सर्वे यांतु यथास्थिति ॥ : आव्हाननं न जानामि नैद जानामि पूजनं । विसर्जनं न जानामि त्वं सिद्ध परमेश्वर ।। मंत्रहीन क्रियाहीनं द्रव्यहनि कृतं मया । तत्सर्व पूर्णतामेतु त्वत्प्रसादाजिनप्रभो ॥ ऐसा विसर्जन हुये वाद मूर्तिको उठाकर जहांकी वहां रख देते हैं। भौर पूजन हवन समाप्त हुवा ऐसा कह कर सब चले जाते हैं, । जैसा समाका काम संपूर्ण होने बाद समा विसर्जन हुई ऐसा समापति कह देते है और उठ कर समा मंडपको छोड़कर चलने लगते हैं उस नख्त समी लोग उनके पीछे चले जाते हैं। इस मुनब पूनन हवन पूर्ण हुये बाद विर्जन होता है इतना सिद्ध हवा, तो फिर निर्माल्य द्रव्य पर भगवान्का हक्क सिद्ध हो चुका उसको नीचमें कोई लेगा तो उसने देवपूजामें विघ्न किया ऐसा विघ्नकरणस्व हेतु सिद्ध, हुवा । कदाचित् विघ्नकरणत्व हेतु सिद्ध नहीं भी हुवा तो भी पूर्व सुत्रमें 'इति' शब्दकी अनुवृत्ति लेकर वार्तिककारने 'द्रव्यपरित्याग' इत्यादि विघ्नकरणत्व हेतु न होनेपर मी अंतराय कमके आस्त्रोंक कारणों में लिये हैं। वैसा निर्माल्य ग्रहण करनेमें विघ्नकरणत्व हेतु न होने पर भी उससे अंतराय कर्मके पात्रोंके कारणों में गिना है, मारक O (३५) चोद्यते सुत्रनुपात्तः सर्वास्त्राप्रपंचः कथमेवगंतुं शक्यते ? इत्यत्रोच्यते- इति करणानुवृत्तः सर्वत्रानुक्कसंग्रहः ॥३॥ इति करणानुवर्तते । व प्रकृतः १ भांति शौचमिति सद्वेवास्येत्यतः तेनानुतार्थ संग्रहः सर्वत्र वे- दितव्यः । प्रकारार्थो हि इति कारण इति । इस विषयमें पं० पल्लाप्पा निटवे इस मुजब लिखते हैं-अंतराय कर्मास्त्रक्त्वाला विघ्नकारणत्व हाच जर हेतु असतां तर वार्तिक- कारांनी संत्रहीत अंतरायानवांपैकी 'द्रव्या परित्याग प्राणियादि। अनेक आसवांना विघ्नः रणन्व नसताहि संत्रायास्त्रवत्व अभ्युपगत केलें आहे ते प्रमादाचे होईल. वो, द्रन्या परित्य गादि कर्माचे ठायींहि विन- करणत्व आहे म्हणावे तर 'विघ्नकरण' या शब्दाने विघ्नकरणत्या व. च्छिन्नाचा संग्रह झाला अमता परंतु 'अन चोचते ' असे म्हणून वार्तिक- कारांनी केलेश्या आक्षेराच्या समाधानांत ' इति' शब्दाची अनुवृत्ति लिहिण्याचे कारण नव्हतेः या करिता असेच म्हटले पाहिजे की, विघ्नकर- ण कम व आचार्यानी संग्रहीत दुमरी कम ही दोन्ही हि अंतराय कर्म निरूपित अस्रवता विशिष्ट आहेत. केवल विघ्नकरणत्वाला आत्रात्वानु- मापकत्वही नाही ६ अस्त्रवलक्षणत्वहि नाही. तेव्हां निर्माल्यग्रहण भनिवेद्य पदार्थग्रहण स्वरूप कर्म असल्याने अंतराय कर्मास्त्रवच होते. आता 'विघ्नकरणमंतरायस्य' या सूत्रात् वार्तिककारांच्या लिहि- ज्या प्रमाणे 'इति' शब्दाची अनुवृत्ति (क्षांतिः शौचमितिसद्वेद्यस्य या सुत्रावरून) करावयाची असल्याने केवळ 'विनकरणत्व' हा हेतु आलवत्व साधक नव्हे. तर 'विघ्नकरण इति शब्दसंग्रहीत निवेद्यानिवेद्यग्रत्णादि- फर्मान्यतमत्त हा हेतुहि भानवल साधक आहे. व तो प्रकृतोद्देश्यभूत निर्माल्य ग्रहणात्मक कर्माचे ठायी असल्याने दोषली शास्त्रीच्या म्हणण्या प्रमाणे स्वरूपासिद्ध नांवाचा हेत्वाभास हो। नाही. तसेंच ऊ निर्दिष्ट हेतु हेच भावाचे रक्षण असल्याने निर्मात्य ग्रहणरूप कर्माचे ठा- त्याची भन्याप्तिहि येत नाही. इत्यहं विस्तरेणेति विरम्यते ।। फाटापा भरमाप्पा निटवे.

(३५) इस मुनत्र पं० कल्लापा निटवे कर्नाटक देशके होकर भी निर्माल्य द्रव्यके ग्रहणसे अंतरायकर्मके आस्रव होते हैं ऐसा शास्त्रार्थ करके सिद्ध करते हैं। निर्मात्य द्रव्य पुनारी-उपाध्यायको ग्रहण करनेसे और मक्षण करनेसे उनको दोष नहीं है ऐसा स्याद्वाद किसी भी पंडितने स्थापन नहीं किया है। फकत पंडित बनतीघरजीकी ही यह अपूर्व नयविवक्षा है। पत्र १२ में पंडितनी लिखते हैं कि उपाध्याय वर्गके कुछ लोग देवपूजन करनेसे घृणा करने लगे हैं और अपनी उन्नति के लिये अनुवंशिक कर्मको छोडकर वैद्यक व्यापार आदिक व्यवसायोंमें लग रहे हैं।" इत्यादि । इसपरसे पंडितनी ऐसा चाहते हैं कि, उपाध्याय वर्गके पुत्रोंने अधिक कमाईकी विद्या पढना नहीं और अधिक कमाईके व्यवसायमें लगना नहीं-५० गोपालदासनी कहते थे कि दक्षिणके उपाध्यायके लड़के नो विना पढ़े देखने में आये हैं उनको काव्य, व्याकरण, न्याय, जैन सिद्धांत, वैद्यक, गणित इत्यादि विषय पढाओ मिससे दक्षिणका ज्ञान दूर हो का वहां मी उत्तरके माफिक शास्त्र स्वाध्याय, शास्त्रममा, शास्त्रचर्चा गांवांवमें देखने में मा जायगी । इस उपदेशसे ही कोल्हापुर, मूडबिद्री, महैसुर, श्रवणबेलगुठ इत्यादि जगहमें पाठशालाएं खुली और उनमें से कई उपाध्याय मोरेना, मनारस इत्यादि पाठशालामें पढ र विद्वान् निकले जिसमें वासुदेव शास्त्री, पाठवकि शर्मा, वल्लाप्या अनंत उपाध्याय, शांतरानव्या, कुमारय्या ये तो, पढाईका और मंदिरमें शास्त्र वाचनेका काम कर रहे हैं । और श्रीपाल वैद्य, आप्पाराव वैद्य, मरमण्णा वैद्य इत्यादि कई पवित्र औषधालय चला रहे हैं। उनको पुमारीपनामें जो कमाई होती थी उमसे चौगुनी कमाई हो रही है। सो पंटितनीकी एसे समाजका बड़ा नुकसान हुवा होगा। लेकिन सब मारतवर्ष के स्त्री पुरुषोंको जबरीन विद्या पदाना और उनका दारिद्य दुर करना उनको अज्ञानताके पशुपनेसे छुडाना यह बात आन मारतवर्षके मुखिया और जैन समाएं पुकार पुकारके चिल्ला रही हैं सो पंडितनीके हिसारसे सब अवनति ही है । हां, कई लोग पंडितजीके (२६) माफक कहते देखने में आते हैं कि यदि इस बखत ही हमको नीकर आदमी मिलते हैं तो फिर सब लोग लिखेपढे हो गये पीछे बड़ी मुश्कीलीसे नौकर तो मिलेगा ही नहीं और मांडे वर्तन हायसे मांगना पड़ेंगे तो वही फिकर आन पडेगी !! पूजन उपाध्यायके हायसे कराना या अपने हायसे करना इम पारेमें शास्त्राज्ञा क्या है सो पंडितनीको बताना चाहिये था । अपने हाथसे पूजन करना चाहिये सोही सची भक्ति है ऐसी शास्त्राना जगह जगह देखने में आती है। और उपाध्याय पुनारीके हायसे पूजन कराया सो माडोत्री पूजा है ऐसा श्री ऐल्लक पन्नालाल महारान आदि कहते हैं। तो फिर पंडिननी उपाध्यायके हाथसे ही पूजन कराने के लिये इतना महत्व क्यों देते हैं मालूम नहीं होता। देवपूजा यह श्रावकोंके नित्यकर्मों का एक कर्म है। यदि देवपूजा आप न करके उपाध्याय पुनारीके हाथसे कराना चाहिए ऐमा कहोगे तो 'गुरूपास्ति' यह दुना नित्यकर्म मी दुसरे कोई नियोगीके हाथमे करना पडेगा वैसा ही तृतीय नित्यकर्म स्वाध्याय, और चौथा संयम, पांचवां तप और उट्ठा दान, ये भी अन्य आदमियों के हायसे ही कराने पडेंगे । वाहवा ! ये तो बहुत ही अच्छा हुवा !! समी पट्कर्म परमारे हो चुके ! धर्म कायम रखनेका बहुत सुलम उपाय मिल गया !! ब्रह्मचारी शीतलप्रसादनी लिखते थे कि, निर्माल्य-द्रव्यकी पर्चा उपर पंडित लोग कुछ लिखते नहीं सो खेदकी बात है। लेकिन अब पंडित लोग लिखने लगे यह हर्पकी वात हुई है। पं० ननसीधरनीने संस्कारकूट माने निर्माल्यकूटमें अग्नि होती है यह बात मान्य की है और उसमें पूजनसे बचे हुवे दन्यसे हवन करना चाहिये इतना मान्य किया। अब सिर्फ निर्माल्यद्रव्य उस निर्माल्यकूटमें डालना या उपाध्याय, पुनारी, माली, व्यास, गोठी इत्यादि मंदिरोंके नौकरोंको देकर उनके पास मंदिरकी पूजा नौकरी करालेना इनमें से कौनसी बात शास्त्र संमत है इतने ऊपर पंडितों के विचार प्रसिद्ध होनेकी जरूरत है। ता० २४-६-२१. हिराचंद नेमचंद, सोलापुर ।

-- - 4 (३३) होता है सो "पूननके अंतमें जिन अनेक द्रव्यों से अग्नि कुंडोंमें हवन किया जाता है वे द्रव्य शांतिधारा छोडनेके कारण अनमें अर्ध दम्व- रह जाते हैं । ऐमा पत्र ८ में पंडितजी लिखते हैं उस शांति-धाराके F नाद होता है । देखिए शांति-धाराका श्लोक- मध्वस्तघातिकर्माणः केवलज्ञानभास्कराः। कुतु जगतः शांति ऋषभाद्या जिनेश्वराः ॥ ऐसा शांतिधाराका श्लोक कह कर शांतिधारा छोडे पीछे पुष्पां- मलि देकर विसर्जन करते हैं, उसके श्लोक इस मुनव- आहूता ये पुरादेवा लब्धभागा यथाक्रमात् । ते जिनाभ्यर्चनं कृत्वा सर्वे यांतु यथास्थिति ॥ आव्हाननं न जानामि नैव जानामि पूजनं । विसर्जनं न जानामि त्वं सिद्ध परमेश्वर ।। मंत्रहीन क्रियाहीनं द्रव्यहनिं कृतं मया । तत्सर्व पूर्णतामेतु त्वत्प्रसादाजिनमभो । ऐसा विसर्जन हुये वाद मूर्तिको उठाकर जहांकी वहां रख देते हैं। भौर पनन हवन समाप्त हुवा ऐसा कह कर सब चले जाते हैं, । जैसा समाका काम संपूर्ण होने बाद समा विसर्जन हुई ऐसा समापति कह देते है और उठ कर समा मंडपको छोड़कर चरने लगते हैं उस बन सभी लोग उनके पीछे चले जाते हैं। इस मुनर पूनन हवन पूर्ण हुये वाद विसर्जन होता है इतना सिद्ध- हुवा, तो फिर निर्माल्य द्रव्य पर भगवानका हक सिद्ध हो चुका उसको बीचमें कोई लेगा तो उसने देवपूजामें विघ्न किया ऐमा विघ्नकरणस्व हेतु सिद्ध हुवा । कदाचित विघ्नकरणत्व हेतु सिद्ध नहीं मी हुवा तो मी पूर्व सुत्रमें 'इति' शब्दकी अनुवृत्ति लेकर पातिककारने 'द्रव्यपरित्याग' इत्यादि विघ्नकरणत्व हेतु न होनेपर मी अंतराप कर्मके आस्त्रयोंके कारणों में लिये हैं। वैसा निर्माल्य ग्रहण करनेमें विघ्नकरणत्व हेतु न होने पर भी उससे अंतराय कर्मके मास्त्रोंके कारणों में गिना है, मार- (३४) चोद्यते सुत्रनुपात: सर्वास्तवमपंचः कथमेवगतुं शक्यते ! इत्यत्रोच्यते- इति करणानुवृत्तेः सर्वत्रानुक्तसंग्रहः ॥ ३ ॥ इति करणानुवर्तते । क्व प्रकृतः १ क्षति शौचमिति सद्वेद्यस्येत्यतः तेनानुक्तार्थ संग्रहः सर्वत्र वे- दितव्यः । प्रकारार्थो हि इति कारण इति । इस विषयमें पं० बल्लाप्पा निटवे इस मुजब लिखते हैं-अंतराय कर्मास्त्रवत्वाला विघ्नकारणत्व हाच जर हेतु असतां तर वार्तिक- कारांनी संग्रहीत अंतरायास्त्रवांपैकी 'द्रव्या परित्याग प्राणिवधादि' अनेक मानवांना विनमरणत्व नसताहि पारायास्त्रवत्व अभ्युपगत केले आहे ते प्रमादाचे होईल. बरे, द्रव्या परित्य गादि कर्मा ठायींहि विघ्न- करणत्व आहे म्हणावे तर 'विधकरणं' या शब्दाने विघ्नकरणत्वा. च्छिन्नाचा संग्रह झाला अमता परंतु 'अन्न चोदते ' असे म्हणून वार्तिक कारांनी केलेल्या भागाच्या समाधानांत ' इति' शब्दाची अनुवृत्ति लिहिण्याचे कारण नव्हतेः या करितां असेंच म्हटले पाहिजे की, विघ्नकर- ण कर्मे व आचार्यानी संग्रहीत दुमरी में ही दोन्ही हि अंतराय कर्म निरूपित आस्रवता विशिष्ट आहेत. केवल विघ्नकरणत्वाला मात्रात्वानु- मापकत्वही नाही व स्रवलक्षणत्वहि नाही. तेव्हा निर्माल्यग्रहण अनिवेद्य पदार्थग्रहण स्वरूप कर्म असल्याने अंतराय कर्मास्त्रवच होते. आता 'विघ्नकरणमंतरायस्य' या सुत्रात् वार्तिककारांच्या लिहि- ज्या प्रमाणे 'इति' शब्दाची अनुवृत्ति (क्षांतिः शौचमितिसद्यात्य या सुत्रावरून) करावयाची असल्याने केवळ 'विघ्नकरणत्व' हा हेतु आलवत्व साधक नव्हे. तर 'विघ्नकरण इति शब्दसंग्रहीत निवेद्यानिवेद्यग्रहणादि- कर्मान्यतमत्वा हा हेतुहि मानवत्व साधक आहे. व तो प्रकृतोद्देश्यभूत निर्माल्य ग्रहणात्मक कर्माचे ठायीं असल्याने दोषली शास्त्रीच्या म्हणण्या प्रमाणे स्वरूपासिद्ध नांवाचा हेत्वाभास होत नाही. तसेच उर्व निर्दिष्ट हेतु हेच भानवाचे रक्षण असल्याने निर्मात्य ग्रहणरूप कर्माचे ठायीं त्याची अव्याप्तिहि येत नाही. इत्या विस्तरेणेति विरम्यते ॥ झालापा भरमाप्पा निटवे.

(३५) इस मुनर पं० कल्लापा निटने कर्नाटक देशके होकर भी निर्मात्य द्रव्यके ग्रहणसे मंतरायकर्मके आस्रव होते हैं ऐसा शास्त्रार्थ करके सिद्ध करते हैं। निर्माल्य द्रव्य पुनारी-पाध्यायको ग्रहण करनेसे और मक्षण करनेसे उनको दोष नहीं है ऐमा स्याद्वाद किसी मी पंडितने स्थापन नहीं किया है। फकत पंडित बनसीधरजीकी ही यह अपूर्व नयविवक्षा है। पत्र १२ में पंडितजी लिखते हैं कि उपाध्याय वर्गके कुछ लोग देवपूजन करनेसे घृणा करने लगे हैं और अपनी उन्नतिके लिये अनुवंशिक कर्मको छोडकर वैद्यक व्यापार आदिक व्यवसायों में लग रहे हैं।" इत्यादि । इसपरसे पंडितजी ऐसा चाहते हैं कि, उपाध्याय वर्गके पुत्रोंने अधिक कमाईकी विद्या पढना नहीं और अधिक कमाईके व्यवसायमें लगना नहीं-० गोपालदासजी कहते थे कि दक्षिणके उपाध्यायके लड़के जो विना पढ़े देखने में आये हैं उनको कान्य, व्याकरण, न्याय, जैन सिद्धांत, वैद्यक, गणित इत्यादि विषय पढाओ निससे दक्षिणका सज्ञान दूर हो कर वहां भी उत्तरके माफिक शास्त्र स्वाध्याय, शास्त्रतमा, शास्त्रचर्चा गांवगांवमें देखने में मा भायगी । इस उपदेशसे ही कोल्हापुर, मूडबिद्री, म्हैसुर, श्रवणवेलगुल इत्यादि जगहमें पाठशालाएं खुली और उनमें से कई उपाध्याय मोरेना, बनारस इत्यादि पाठशालामें पढ दर विद्वान् निकले जिसमें वासुदेव शास्त्री, माहुबलि शर्मा, कल्लाप्पा अनंत उपाध्याय, शांतराजय्या, कुमारय्या ये तो फाईका और मंदिर में शास्त्र बाचनेका काम कर रहे हैं। और श्रीपाल वैद्य, आप्पाराव वैद्य, मरमण्णा पेद्य इत्यादि कई पवित्र औषधालय चला रहे हैं। उनको पुनारीपनामें जो कमाई होती थी उससे चौगुनी कमाई हो रही है। सो पंडितनीकी 'एसे समानका बड़ा नुकसान हुवा होगा। लेकिन सब मारतवर्ष के स्त्री पुरुषोंको जबरीन विद्या पढ़ाना और उनका दारिद्य दूर करना उनको अज्ञानताके पशुपनेसे छुडाना यह बात आन मारतवर्ष के मुखिया और जैन समाएं पुकार पुकारके चिल्ला रही हैं सो पंडितनीके हिसानसे सन अवनति ही है। हां, कई लोग पंडितजीके ।

(२६) माफक कहते देखने में आते हैं कि यदि इस वख्त ही हमको नौकर आदमी मिलते हैं तो फिर सब लोग लिखेपढे हो गये पीछे बड़ी मुश्कीलीसे नौकर तो मिलेगा ही नहीं और मांडे वर्तन हायसे मांजना पड़ेंगे सो बढी फिकर आन पडेगी !! पूजन उपाध्यायके हायसे कराना या अपने हाथसे करना इस बारेमें शास्त्राज्ञा क्या है सो पंडितजीको बताना चाहिये था। अपने हाथसे पूजन करना चाहिये सो ही सच्ची भक्ति है ऐसी शास्त्राज्ञा जगह जगह देखने में आती है। और उपाध्याय पुनारीके हाथसे पूजन कराया सो माडोत्री पूजा है ऐसा श्री ऐल्लक पन्नालाल महाराज आदि कहते हैं। तो फिर पंडिनजी उपाध्यायके हाथसे ही पूजन करानेके लिये इतना महत्व क्यों देते हैं मालुम नहीं होता। देवपूजा यह श्रावोंके नित्यकौमेंका एक कर्म है। यदि देवपूजा आप न करके उपाध्याय पुनारीके हाथसे कराना चाहिए ऐसा कहोगे तो 'गुरूपास्ति' यह दुना नित्यकर्म भी दूसरे कोई नियोगीके हाथसे करना पडेगा वैसा ही तृतीय नित्यकर्म स्वाध्याय, और चौथा संयम, पांचवां तप और उट्ठा दान, ये मी अन्य आदमियोंके हायसे ही कराने पडेंगे । वाहवा ! ये तो बहुत ही अच्छा हुवा !! समी षट्कर्म परमारे हो चुके ! धर्म कायम रखनेका बहुत मुलम उपाय मिल गया !!! ब्रह्मचारी शीतलप्रसादनी लिखते थे कि, निर्माल्य-द्रव्यकी चर्चा ऊपर पंडित लोग कुछ लिखते नहीं सो खेदकी बात है। लेकिन अब पंडित लोग लिखने लगे यह हर्षकी बात हुई है। पं० बनसीघरनीने संस्कारकूट माने निर्माल्यकूटमें अग्नि होती है यह बात मान्य की है और उप्तमें पूजनसे बचे हुवे द्रन्यसे हवन करना चाहिये इतना मान्य किया। अब सिर्फ निर्माल्यद्रव्य उस निर्मात्यकूटमें डालना या उपाध्याय, पुजारी, माली, व्यास, गोठी इत्यादि मंदिरोंके नौकरोंको देकर उनके पास मंदिरकी पूना नौकरी करालेना इनमें से कौनसी बात शास्त्र संमत है इतने ऊपर पंडितोंके विचार प्रसिद्ध होनेकी जरूरत है। ता. २४-५-२१. हिराचंद नेमचंद, सोलापुर । .

(३७) अग्निकुण्डांत पूजन करण्याविषयी दुसरा आधार. -- . - [प्रगति आणि जिनविजय-आषाढ वद्य १ शके १८४२] (ता. २ जुझई सन १९२०) श्रीयुत संपादक 'प्रगति आणि जिनविनय ' यांस- जयजिनेंद्र वि० वि०-खालील मजकूर येत्या अंकी प्रसिद्ध करण्याची मेहेरवानी करणे. सया तीर्थगणाधीशशेषकेवालसर्पः । संस्कारमाहितामींद्रमुकुटोत्थानिषु त्रिषु ॥ २० ॥ परमात्मापदं प्राप्तान्निजान् पितृपितामहान् ॥ उद्दिश्य भाक्तिकाः पुष्पगंधाक्षतफलादिभिः ॥ २०५।। आर्षांपासक वेदोक्तमंत्रोचारणपूर्वकम् ।। दानादि सत्कियोपेतागेहाश्रम-तपस्विनः ।। २०६ ॥ नित्यमिष्ट्वंद्र सामानिकादिमान्यपदोदिताः ॥ लोकांतिकाश्च भूत्वामरद्विनाध्यस्तकल्मषः ॥ २०७ ॥ अर्थः-तीर्थकर गणधर आणि शेष केवति यांच्या उत्तम देह- संस्कारामुळे पूज्य व अमिकुमारेंद्राच्या मुकुटापासून उत्पन्न झालेले तीन ममि आहेत. पा अग्नीत महाभक्त व दान वगैरे उत्तम क्रिया करणारे गृहस्थ-तपस्वी सणजे परमात्मपदास (सिद्धपदास) पोहोचलेले बे मापके पिता पितामह त्यांना उद्देशून अषिप्रणीत उपासकाध्ययन नावाच्या -

३
(e)
वेदांत सांगितलेल्या मंत्राचा उच्चार करून पुष्पगंधाक्षतर्फक' इमादि.
कानी जी नेहमी आहुती देणे याला दुसरी आर्ष-यज्ञ मणतात.
असा यज्ञ करणारे लोक इंद्र, सामानिकआदि पूज्यपदास बा.
तात. तसेच ते देवनामण-लौकातिकदेव होतात, आणि शेवटी कर्म
रूपी,पाप नाश करून मुक्त होतात.
(उचरपुरीण सौर्थ हिंदी पर्व ६७ पृ०३६८) ।
+
ता. १२ जून ।
सन १९२०
..
रावजी सखाराम दोषी
।' सोलापूर
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निर्माल्य द्रव्य-चर्चा | [अनमिन-वि० श्रावण वदी ६ वीर सं. २०४६] (ता. ५ भागस्ट १९२०.) निर्मात्य द्वन्य ग्रहण करना पाप है ऐसा नैन शास्त्रमें कहा हुवा भापको मान्य है क्या ? ऐसा प्रश्न पं० वनसीपर उदयलालको किया या विसका उपर उन्होंने दिया कि-ऐसा जैन शासमें कहा नहीं है। लेकिन तत्वार्थ सार १०४ पृ० २१५ में अंतगय कर्मके मा- सद हेतु कहते हुवे- " प्रमादादेवतादत्त नैवेद्य ग्राहणं तथा " इस सोका मर्ष पं. पनसीघर उदयलाल लिखते हैं कि " नेवेद्य देवको समर्पण कर देनेपर फिर वह लोमवश होकर उठालेना ++ ++ ये सब कार्य संतराय कर्मके आसव कारण है। " और समर्पण शब्दपर नोट देकर माप लिखते है । ' देवताको समर्पण कर दी गई खानकी पीजों को प्रमादवश होकर ग्रहण करनेवाला अंतराय कर्मको बांधता है ऐसा इस प्रथम लिला । परन्तु गजवातिको अर्पित अनर्पित दोनोंको ही लेनेवागणंतरायकर्मका भागी लिखा है। और वह मी नैवेद्यही नही किंतु कोई भी चीज हो। अर्पणका अर्थ पूजा है । आण न की हुई-देवद्रव्य-वह समझनी चाहिये कि जो देव देवालयके उपयोगके लिये जमीन मा घर, संपत्ति इकट्ठी की जाती है।" ऐमा तत्वार्थ मारके श्लोकोंका अर्थ खुद्द पं० बनसीपरजी उदयलालने लिखा है । मौर मीसकलकीर्ति आचार्य कृत सापितावलीमें निर्मात्यत्यजन व. भन नामक प्रकरणमें " देवशास्त्र गुरूणांमो निर्माल्यं स्वीकरोति यः ॥ संशच्छदं परिप्राप्य सपश्चादुर्गतिं व्रजेत् ॥” इत्यादि पाच सात लेक निर्मास्य ग्रहणका पाप नतानेवाले जगनाहेर हो कर भी पंडितजी बहते हैं कि ऐसा जैन शास्त्र में कहा नहीं है" इसका सबर क्या। रावजी सखाराम होश्री, झोलाएर। .

(१०.) हिमाल्का किनियोग क. , है A - (जनसिद्धान्त-भाषाढमास वीर,सं. २४४७, जुलाई १९२१) निर्माल्यके विषयमें जो हमने एक केख प्रकाशित किया था उस. पर श्रीयुत सेठ हिराचंद , नेमचंद सोलापुरवालोंने कुछ प्रश्न किये हैं उनका सविस्तर उत्तर भागामी अंकमें प्रकाशित करेंगे परंतु यहांपर एक दो जरूरी बातोंपर विचार प्रकाशित करते है. सेठजीने एक आक्षेप यह किया है कि-तत्वार्थसारका जो अर्थ कुछ दिन पेस्तर इन्होंने लिखा था उसमें और अवके इनके लेखमें जो उसकी एक कारिकाका अर्थ लिखा गया है उन दोनोमें परस्पर फर्क पढगया है. यह सेठजीका लिखना पक्षपात मात्र है. हमारे मर्म नित. नेमें बिलकुल फर्क नहीं पडा. । बात यह है कि तत्वार्थसारमें अंतरायके कारणोंका : जहां प्रकरण है वहां मंतरायका मुख्य कारण विघ्न करना बताया है. यह क्षण ऐसा सामान्य है कि अंतरायके चाहे जिस विशेष कारणमें विघ्न करना किसी कारणसे सिद्ध होता न हो तो वह अंतरायका कारण कभी नहीं होसकता. मूल लक्षण दिखानेवाले श्रीतत्वार्थस्त्रजीमें भी इसी गरजसे अंतरायका लक्षण विघ्न करना लिखा है. इसलिये यह सिद्ध हुमा इसके पेटेकी जितनी कलमें होगी वे सब विन्न करनेवाले कक्षणको जरूर रखेंगी. इस अंतरायके पेटेकी एक कलममें बताया है कि निर्मात्म प्रह- णसे अंतरायक्रमका बंध होता है. इस पेटेकी कलमका ऐसा भर्थ, कौन न करेगा कि यह कलम पेटेकी है इसलिये विघ्न, करनेरूप अंतरायका सामान्य लक्षण इसमे भी गर्मित है. यह बात सेठजीको मालम है कि पेटेफी कलमोंमे तिरेके खतेका नाम,खोलनेकी जरूरत नहीं पडती तो d (४१) भी देखनेवाला सिरेके खातेको उस पेटेंमें समझ जरूर लेता है. यह बात वन होसकती है जब कि पूरा खाता सामने मौजूद हो. जब पूरा माता सामने न हो किंतु पेटेकी एक कलमकी रकम ही किसीको कि. सकर बतानी हो तो वहां खातका खुलासा नाम भी बताना पड़ता है इसी तरह जब तत्वार्थसार हमने पुरा लिखा था तब अंतरायका खाता सिरेपर बताकर पेटेकी कलममें विघ्न करनेरूप खातेका नाम पुनः न लिखकर फक्त यह किफ दिया था कि निर्माल्य ग्रहणसे अंतरायका बंध होता है. परंतु नव लेखमें खाता सामने नहीं था तब उस फारिकाक, अर्थ बताते हुए साता भी वतादिया कि निर्मात्य ग्रहणसे तभी मंतराय कर्म बंधेगा जब कि किसीको उससे विन होना संभव हो. पाठक विचार करें कि इस प्रकार हमारे दोनोवारके लेखमें फर्क या विरोध क्या पड़गया ? सेठजीको ऐसा अर्थका विपर्यास करना मुना- सिब नहीं है. दूसरी बात इस विषयमे यह पहनी है कि सेटजी जो हमको इस निर्माल्यके लेखके कारण कपाय पुष्ट किया बताते हैं सो ठीक नहीं है. अपने दोपको दूसरेपर डालना ठीक नहीं है. हम द्रव्य पूजाके सम. र्थक होनेसे थोडा तो भी द्रव्य पूजामें खर्च करेगे परंतु सेठजी निषे. पक होनेसे अग्नि कुंडका उन्हें जन्मभरमें एक दो वार ही मौका मिला होगा इसलिये सेठजी बिलकूल ही सूखा नसस्कार करनेवालोमेंसे एक हैं. इसलिये सरासर अपनेपरका मिथ्या आक्षेप हमारे उपर करनेका सा- हस सेठजी भायंदेसे न करें तो ठीक है. - (१२) निर्माल्य विचार. - . - [जैनसिद्धांत-श्रावणमास वारसं. २४४७ आगष्ट १९२१ ] हमने निर्मात्य द्रव्यका क्या किया जाय इस प्रश्नका उत्तरः . पने-निर्माल्य विनियोग लेखमें किया था, उसपर सोलापूरके, श्रीयुन सेठ -हिराचंद नेमचंदनी कुछ आक्षेप करते हैं. हमारा अभिप्राय यह था कि देवस्थानोंमें जो लोग निरंतर काम करें है और उनकी आजीविकाका दूसरा कोई साधन नहीं है उन्हें निर्मात्य द्रव्यपर पेट भरके इस काममें लगे रहना चाहिये या नहीं; एवं, यदि वे उसमें लगे रहे और निर्मा- स्यपरसे पेट भरा तो उन्हें जैनधर्मी न कहकर पातकी-कहना चाहिये या उस अवस्था में वे जैनधर्मसेवी होमकते हैं । यह एक प्रश्न हुआ., दुसरा प्रश्न यह कि यदि निर्मात्यपर पेट भरनेवाला भषमी समझा जाता है ऐसा समझकर देवस्थानके कामको वे लोग छोर दें पौर दूसरा भी कोई इसी कारण वह काम न करे तो वह काम कैसे हो ? इसीसे लगता तिसरा प्रश्न यह है कि क्या उस कामको काने- बालेकी उपनीविका किसी दूसरी तरहसे निर्विप्न सदा चल सकती है जिससे कि उस उपजीविकासे निराकुलताके साथ निर्वाह कर वह मनुष्य देवकार्यमें लगा रहे और काममें विघ्न न पडे ! इन प्रश्नों के उत्तरमें हमने अपने लेखमें यह बताया था कि नि- मरिय प्रहण करनेसे वह पापी नहीं होजाता. पापीका अर्थ हिंसा, झट, चोरी मैथुन व इतर वस्तुओंमें उत्कट लालसा रखना है. संक्षेपमें पाप समझना हो तो अन्यायका नाम पाप है. उसी अन्यायके झूट चोरी भा. दिपांच भेद है. निर्माल्य ग्रहण जो देवस्थानकी सेवाके बदले है वह मन्याय नहीं है. "धर्मो दयावृत्तित्वमन्याय प्राणिमारणं ऐसा (१६) भन्यायका लेक्षण भगवज्जिनसेनने बताया है। इसका भी वही तात्पर्य है. क्योंकि अन्यायसे दसरेका-भहित होता है. और अपनी निष्ठुर वृत्ति होनेसे अपना मी अहित होता है. यह धर्मशास्त्र की अपेक्षा अर्थ है और न्यवहारकी चपेक्षासे राजनियमविरुद्धको अन्याय कहते हैं. “उक्ति सेठजीने भी पांच पापोका यह तात्पर्य-बताया है कि सबसे बरे ये ही पाप है और इनके छोडनेसे मनुष्य किसी प्रकार के. राजदंसमें भी फस नहीं सकता: इससे मालम होता है. कि सेठजी मी - मुख्य पाप पांच ही मानते है. मन सवाल यह होनाता है कि निर्माल्यग्रहणको यदि पाप माने जैसा कि ग्रंथकारोंने पताया है तो उसे . उक्त पांच पापोमे-गर्भित करना चाहिये या नहीं ! धर्मशास्त्रका उपदेश देखनेसे पता लगता है कि पांचके सिवा छटा पाप छोई नहीं है। वो फिर इसे भी किसीमें गर्भित करना ही होगा. इसीलिये हमने अपने लेखमे ब. ताया था कि राजवासिककारके कथनानुसार अंतराय-विनका कारण होनेसे चोरीमें इसे गर्मित करना चाहिये, यदि यह विश्न - फरनेका कारण है जो किसीका विप्न हो तभी चोरीमें इसे सामिल किया जाय, नहीं तो नहीं. इसीसे नियोगी मनुष्य चोरीके दोषसे बच जाता है, यह हमने दिखाया-भा. इस. मार्मिक वातपर एक भी अक्षर न लिखकर- इंदोरसे गो. भानी-कोसने लगे और मापने स्वयं इसके विषयमें एक भी मुक्तिन देकर केवल यह सर्टिफिकेट दे दिया कि ये इनकी, कुयुक्ति हैं. गोधानी- को भौर सेठजीको मालम होना चाहिये कि हमने बो चौशम गर्मित करते हुए नियोगीफो उससे छुटादिया है वह -विना आगमयुक्तिको को. सने और सर्टिफिकेट देनेसे संदित नहीं हो जायगा. जिसमें हिंमत हो बन्ने चाहिये कि पांच पापो से किसीमें गर्भित करके दिखायें और और हमारे समर्थनको प्रदोष ठहरायें । उपाध्यायपुजारीनिवेवानिवेध' मिर सेठनी विद्वानों में हसी कराते हैं और यह पचा सगजाता है कि - . (४४) सेठजीको शब्दोंका परस्पर कारकसंबंध बिलकुल मालम नहीं है. क्या हमारे लेखका यह तात्पर्य है कि उपाध्यायको द्रव्य अर्पण किया जाता है! जिसे हम कूदा समझते हैं वह त्यागयोग्य होजानेसे उसे दुखरा कोई लेले तो हमारी उसने कोई चोरी नहीं की, इसी प्रकार देवताको अर्पित द्रव्य बादमें देवळी अपेक्षासे कूठा है-त्याज्य है; इसलिये उस देवत्याज्यको जो अपने काममें लेलेता है. वह देवकी चोरी करनेवाला नहीं कहा जासकता ऐसी हालतमें उसे किसका विघ्न करनेवाला को इसका शेटनी और गोधानी उत्तर दें. यह भी वे उत्तर दें किविघ्न कर- नेका अर्थ न ठहरता हो तो भी क्या अंतरायफा उसके ग्रहणसे बंध होगा ही इसे जो अंतरायका कारण बताया है वह क्या विना ही हेतुके बताया है। क्या अंतरायका सामान्य लक्षण इसमें नहीं घटता! नहीं घटता तो क्यों 'विघ्नकरणमंतरायस्य' इसी सूत्रकी व्याख्या इसे लिया है ? विध्न होता है तो किसका और फैसे ! यह सब उत्तर देना सेठजीकी तर्फ है. शेठजीने कुछ श्लोक इस बातके उद्धत करके दिखाये है कि जुदे जुदे देव भगवानकी पूजा भक्तिक नियोगी हैं परंतु वे निर्माल्य ग्रहण नहीं करते. इसका उत्तर यह है कि विना भोजन.. की फिक्र किये देव नियोगी होसकते हैं परंतु मनुष्य नहीं होसकते मनुष्य पेटका नियोग पेस्तर करता है. पीछे दूसरी बात यदि पेटकी चिंता किये विना-भी मनुष्य इतर नियोगमें लग सकता होता तो असि मसि आदि नियत नियोग करनेकी जरूरत ही न पडती. सुनियों तकको दान लेनेकी जरूरत पड़ती है. कुछ लोग धर्मके लिये दान देते हैं और कुछ लोग लेनेके योग्य होते है। यह विधि मार्ग है और कर्तव्य धर्मका स्वरूप है. परंतु जिनें कोई पात्र भी मानता नहीं है और देवकी सेवा करना अपना कर्तव्य जिन्होंने वंशपरंपरासे समझही रक्खा है वे उस कर्वम्यसे ६ (४५) विमुख हो जाय यह अच्छा या निर्माल्यो निह का सेवा लगे रहें यह अच्छा? हम समझते है कि निर्माणसे निक के भी जो आनु- वंशिक धर्मको छेडने नहीं है बह अच्छा है भान रू; लोग कृपण होगये इसलिये उनको सत्का के साथ देकर रिह भी नहीं करानेकी फकर करन और दबा दे विचारे निम.हापर निर्वाह करके भी सेवा में लगे रहे हैं , इस बातजो उनकी निंदा करते हैं यह आपनेलिदे भूषणबह नहीं है ये वे पृहस्थ हैं 'जि- नको कि भरत महामने धन पाय मे पूजा का इस धर्ममें दृढ किया था. आज हमारी यह कु और कृपणता उसको मदत तो. दमडीकी नहीं ही करने देती परंतु यथानया के उन अपने नियोगमें लगा है उनका उममे विपुख कर डालने का हम प्रयत्न करते हैं जहां ये लोग नहीं हैं ऐसे प्रांतोंमें पूजामा वारपार कैसा फजिहता होता है सो अन्नमय कसेही मालूम हो पाता है. इस वक्त भावना चाहै जैमी हो परंतु वस्तुस्थती एपीहे कि ये लोग पूजा करें और अपन उनकी गृहस्थीका निर्वाह चलाने दान दें तथा घरद्वार कायम करते रहें. अपन इम वातको भूलगये भरतचक्राने धर्म स्मा समझ उनको धनधान्य नहा दिया जो कि राजा महाराजा थे किंतु -- यज्ञ पूजामें जो गे रहने के कारण उदानिर्वाह की जु सटपट नहीं कर सकते थे उन्ह निर्माईके यं उन सब कुछ दिया विचार करने की बात. है कि जिनके हजारो गहन हों ऐसे गजाओंको वाइन या दिये जाय गे और कभी धर्मनी रक्षा हेतु । इससे स्पष्ट होता है कि जो धर्ममें आसक्ति रहने के कारण अपना निर्वाह स्वय नहीं कर सकते थे उन्हीको भरतने सब कुछ दिया और प्रजास दिलानेकी रिवाज डाल दी आज उनके हम जैन वहानेवाले रहा ठहा भी छुड़ा लेना चाहते है, तभी तो धर्मकी यह दशा है! - 4 - 1- 1. ४६), जब वे लोग पूजा करनेके नियोगी हैं तो इस पूजाको सामग्रीपर उनका हक भी सुतरा होनाता है कि वे चाहे सो उसका करें जब उन्हें श्रावक लोग पूजते थे तब वे इस सामग्रीका चाहे सो करते होंग पातु जब श्रावकोंसे निर्वाह न होसका तबसे वे उस सामग्रीको अपने काममें लाने लगे. कोई समय ऐसा भी बीता है जब कुछ श्रावकोंने उन्हें पूजना भी छोडदिया हो और सामग्री स्वयं लेना चाहा हो; उस समय 'श्रावकों उसका अधिकार नहीं. ' ऐसा निषेध किया गया हो भौर. निर्माल्य ग्रहणसे, अंतरायका बंधन होना बताया गया हो नहीं तो मंतरायके बंधका कारण होना किस प्रकार संभव होगा, वह सेठजीको बताना चाहिये. नियोगीका अर्थ सेठजीकी समझमें नहीं आया इसलिये हमने यह बताया है. अपने मनसे नियोग नहीं ठहरता, भरत और मादिनाथ महागजने उन्हें और आपनेको जो फर्म करना बताया है . । १ वह उसका नियोग है. 7 निर्माल्यद्रव्य-चर्चा. - , ३ (प्रगति आणि जिनविजय-मार्ग शु०१ वीर सं० २४४८, ता. ३०/११।२१.) पुष्कळ दिवसापासून निर्मात्यद्रव्यचर्चा चालं आहे; परंतु बाचा - विनियोग ( उपयोग) कसा करावा याचा निकाल अद्यापि लागलेता नाही. तथापि हा प्रश्न अत्यंत महत्वाचा होऊन बसला आहे. यासंबंधी एक लेख पं० वंशीधर यांनी जैनासद्धात मासिक वीर सं. २१४६ भाद्र. पदमास अंक २ मध्ये निर्माल्यका विनियोग' या नावाने प्रकाशित फेला आहे. त्यातील अभिप्राय असा आहे की, निर्मात्यग्रहण करण्याचा हक फक्त उपाध्यायवर्गास आहे. कारण देवाची पूजा केल्याबद्दल माचा मोबदला ह्मणून हे द्रव्य त्यास दिले जाते. । व त्यांचे घेणे हे (१ - न्यायास अनुसरून आहे. नियोगीशिवाय (उपाध्यायाशिवाय ) इत- रांस घेण्याचा अधिकार नाही. ग्रहण के असतां दुर्गति प्राप्त होते. पूर्वपरंपरेस अनुसरून उपाध्यायवर्ग निमाल्य ग्रहण करीत असतां, स्यामध्ये जो कोणी विघ्न करील त्यास अंतराय कर्माचे भासव येतात. परितांनी नियोगी याचा अर्थ देवसेवा करणारा उपाध्यायवर्ग मसा केला आहे. तर देवाची सेवा करणारे उपाध्यायलोकच आहेत, इत नाहीत काय ? अर्थात् सर्व देवसेवा करणारे आहेत. मग सर्वानी निर्माश्य भक्षण करावे काय ! देवसेवेचा अधिकार फक्त उपाध्यायास दिला माहे असे शास्त्रांत कोठेहि सापडत नाही व तो माहीत असण्यास परितजींनी प्रसिद्ध करावा अशी त्यांन आमची सविनय सूचना आहे. केवळ रूढीवरून देवसेवेचा मक्ता उपाध्यायास देणे कधीहि योग्य होणार नाही असे कोणीहि समंजस माणूस कबूल करी. कारण पूज. नाचे कार्य स्वतः केल्याने जितकी फनप्राप्ती होते तितकी दुसन्यामा हातून केलेली पूजा (भाडोत्रीपूजा ) फलदायक होत नाही ही गोष्ट सूर्य प्रकाशाइतकी स्पष्ट आहे. वास्तविक पाहता आपल्या समाजात अज्ञान जास्त असल्यामुळे कोकांना पूजा कशी करावी व त्याचा विधेि कपा आहे हे समजत नाही, अथवा प्रपंचामध्ये सवट होत नसल्यामुळे उपाध्यायाकडून पूजा करबि- ण्याचा प्रघात पडला असावा असे माझांस वाटते. अद्याप देखील कि- त्येकांस देवापुढे नीट अध्येसुद्धा देता येत नाही ही शोचनीय स्थिती सर्वत्र दृष्टीत पडत आहे हा प्रघात जर असाच चालं राहील तर यापेक्षा पूजनाविषयी जास्त अज्ञान वाढणचा संभव आहे. याकरितां प्रत्येकाने स्वतः पूजा केली पाहिजे. कारण श्रावकांची सहा कर्तव्य शास्त्रात सां- गितली आहेत, त्यापैकी जिनपूजा हे पहिने कर्तव्य आहे व ते पाळणे मशक्य झाल्यास बाकीची कर्तव्ये कशी पाळणार ! याकरिता प्रत्येकाने पूजा करावयास शिकणे अत्यंत जरूर आहे अशी सर्वास भामची नम (४८) प्रार्थना आहे या योगाने उपधायाचे युद्धां श्रम वांचतील. पूजा कर. ण्याचे प'मर्थ आम्ने असे काही दिवसानी समाजाच्या अंगी आल्या. वर उपाध्यायाच्या पिढी नाद हावा मात्र गदा यंगार याची वाट काय ! याचे उत्ता अमें अह की, देवळातलि ननिरक्षालन करण्याचे काम उपाध्यायाय निर्माल्या ऐवनी पगार देऊन करन घ्यावे त्या योगाने निमय भक्षण च्या पारागमून उपाध्यायाचा बचाव होईल पंडित. जींनी असे झटके आह क', 'निर्मात्र काम याज्य आहे परंतु निये,गी हगजे पुतन्यास त्याय नाही. ज्याप्रमाणे स सर्वास भयकर आहे परंतु गाहात नाही. पडिन पुनारी नेकाप गडाचा दृष्टान दिला आहे; परंतु तो यथें वर वर नगगू पडत नाही हे एकता नष्ट विचार केला असतां सहन समजण्यासाने आहे गा आगि चाचा नैसर्गिक स्वभाव अगदी किन्न आहे या दोघाच्या स्वभावामः बढक कगवा असे कोणी मनान आगिन्याय ते हों में अशा केटीतील आहे. कारण निसर्गामध्ये केव्हाह बदल होत नाही असा नृटिशासाचा नियम आहे. त्याप्रमाणे पुजायचा पूजन करणे हा नमणिक धर्म नव्हे कारण त्याचा गुण उपाध्यायाशिगय इतराच्या अंगीददील अमतो. देवमेवा हा गुण स- मि साध्य होण्यागरखा आहे अमें गत्वाचे सामर्थ सर्पाच्या अंगी येत नाही त्याचप्रमाणे पुजनाचे सामर्थ दुमनाच्या अंगी येणार नाही मगूनच की काय डराव्यायाम निहित याज्यं नाही असे वि. धान केले आहे ? तु हे विधान कोणत्या मासात लिहिले आहे. याचा हा पडितजींनी गवयाचा होता मणजे त्याचे झणणे आ. हास पटले अन्त के युतीन बोगद्याहि गटी विश्वालाल पन होत नसतात, त्याम शास्त्र यादी आवश्कता अपत दुर यांनी अधार दाखविला असता तो याना परत नाही. लागलेच त्याचा विपर्यास करतात. 2 .

(४९) सोलापूर येथील सुपसिद्ध पुढारी गुरुवर्य शेट हिराचंद्र नेमचंद यानी निर्माश्यद्रव्यचर्चा' या पुस्तकामध्ये कुन कुदाचार्य, उमास्वामी, अकलंकदेव, अमृतचद्राचार्य आणि सकलकति वैगरे आचार्याच्या शास्त्रातील प्रमाणे दाखविली आहेत तो पहितजींना मान्य आहेत. शे. वटी त्यांनी असे सिद्ध करून दाखविले आहे की, निर्माल्य भक्षण करणे महापाप आहे. ते स्वतः खाऊ नये व दुसन्यास देऊ नये. कारण निर्माल्य भमण करणान्या मनुष्याप चोरीचा दोप लागतो आणि त्यास मंतरायकाचे आश्रव येतात, वगच्छद होऊन शेवटी त्यास दुर्गति प्राप्त होते याकरिता निर्मात्यद्ग अग्निकुडात भस्म केले पाहिजे. याचप्रमाणे पंडितजींनी निर्मात्यद्रव्य नियोगीशिवाय इतरानी भक्षण करू नये अशी शास्त्र ची आज्ञा दाखवून आपले मत प्रदर्शित करावे 'अशी त्यांस पुन्हा एकदा नम्र विनंति करून हा ले व संपवितो. ता. १०-१०-२१. आपला नम्र, गाणिक गोबिंद कटके, सोलापूर. - . निर्माल्यद्रव्य-चर्चा जुलाई सन १९२१ के जैन सिद्धातमें प० बनसीधरजी लिखते कि, तत्वार्थ सारका अर्थ लिखा है उपमें और इस लेग्वमें फरक पडा ऐसा जो आक्षेप किया है सो वाब नहीं है सिशने रकम और पेटेकी रकम देविनेसे फर्क नहीं है एना मालुम होगा. इसका उत्तर ऐसा है कि तत्वार्थ सारके विघ्नकरणमतगयम्य' इससूत्रका अर्थ अथमे इति तक कोई भी देवेगा तो म लुभ होगा कि, उसमें देवमेवा करनेवाला नियोगी यदि निर्मात्यग्रहण करेगा उमको अतराय कर्मके भासव नहीं होगे ऐमा लिखाही नहीं है. ग्रहण करनेवालेको भासव होत है ऐसा लिखा है. . - X ( ५ ) फिर भी पशुभनाम कर्मके पासवाम भी लिखा है. चैत्यस्य च तथागन्धमात्यधूपादि मोषणम् ।। X X x x + अशुभस्येति निर्दिष्टा नान्न आसव हेतवः ॥ १७ ॥ अर्थात्:--प्रतिमाके गंध, माला, धूप इत्यादि चीजोंकी चोरी करना वगैरह अशुभ नामकर्म के आसव दिखाया है. (तत्वार्थमार म० ६ श्लो. ४७) निर्मास्यद्रव्य ग्रहणको चोरी समान गिना है. सो इस मुजब- क्षत्रे ग्रामे खळे घोपे पचने काननेपनि विस्मृतं पतितं नष्एं निहितं स्थापित स्थितम् ॥ ४९ ॥ अदत्त न परद्रव्यं स्वीकुर्वन्ति महाधिपः ।। निर्माल्पमिव पश्यन्तः परतापविभीरवः ॥५०॥ अर्थात् खतमें गांवमें खलियानमें ( खटमें ) गौशालामें पत- । नमें ( नगरमें ) वनमें और मार्गमें भूले हुये, गिरे हुये, हराये हुये, गो हुये, खखे हुये, वा स्थापन किये हुये, विना दिये हुये ( माटिककी बा- ज्ञाके बिना ) पर द्रव्यको निर्माल्यकी समान देखतहुये परतापसे मीत पुद्धिवान्पुरुष कदापि ग्रहण नहीं करते (पं० पन्नालालजी बाकलीवाल कृत-धर्मपरीक्षा उच्चरार्थ सार्थ पृ. २७०।२७१) अब विघ्नकरणत्व हतके ऊपर पंडितजीका जो बहोत जोर है, उसका उत्तर हम दे चुके हैं कि भगवानको अर्पण किया हुआ द्रव्य निर्माल्यकूटमें डाला जाता है तबतक वह पूजाही है इस कार्यकै पहिलेही नो कोई उठालेगा उसने पूजनमें विघ्न किया यह नाव सिद्धही है. नि. माल्यकूटमें निर्मात्यद्रव्य दालना चाहिये यह वात पडितजी कबुल कर चुके है. तो फिर उसके पहलेही कोई उठाले नायगा तो उसने पूजनमें विन किया अथवा चोरी किई ऐसा कहनाही पडेगा. विनकरणत्व हेतू (५९) सिवाय इतर केई बातोसे अंतरायकर्मफे आसव होते हैं ऐसे वाक्ये भाचार्यों के लिखे हुवे हम बता चुके हैं उनको कैसे छोड सकोग ? यदि नियोगी-पुबारी निर्माल्य ले नायगा नो निर्माल्यकूट में क्या डालोगे. इस प्रश्नपर पंडितजी अभीतक निरुत्तर हैं, पंडितजीने निर्माल्यका त्याग करनेवालेपर लोभ कषायका दोष दिया था. उसका उत्तर देते समय-कोम कपायका दोष निर्माश्य त्याग करनेवाळेपर होता नहीं निर्माल्य ग्रहण करनेवालेपर होता है ऐसा हमने लिखा है सो योग्यही है. त्यागधर्मका अर्थ लोभ कपायका अ. स्तित्व ऐसा परितजी करेंगे तो क्या माननाही पडेगा! परितजी लिखते हैं । हम द्रव्यपुजाके समर्थक होनेसे थोडा तो भी द्रव्यपूजामें खर्च करेंगे. परंतु शेठजी निषेधक होनेसे अग्नि- करका उन्हें जन्ममरमें एक दो बारही मोका मिना होगा. इसलिये सेठबी विरकूलही सूखानमस्कार करनेवालों से एक हैं. " इत्यादि इसका उत्तर ऐमा है कि, हम द्रव्यपूजाके निषधक हैं ऐसा जो पंडितनी करते हैं सो चिकूल असत्य है. हमने द्रव्यपूजाका निषेध नहीं किया है, ऐसा परितनीक खपरसेही सिद्ध होता है. हमने अभिकुंडमें एक दो बारही पूजन किया ऐसा पंडितजी लिखते है यदि अतिकडमें पुजन होता है सो द्रव्यपुजनहीं है तो फिर द्रव्यपुजनका निषेधक अमिकुंडमें पुजन फैसा करेगा ? इसमे हमारे ऊपरका द्रव्यपूजनके 'निषेधक' नामका दोपारोप पंडितजीक वाक्योंसे ही खंडित होता है हम निर्मात्यके निषेधक है और पंदितजी निर्मात्य ग्रहण के प्रतिपादक है. पंडितजी थोडा वो भी द्रव्यपूजामें खर्च करते हैं वैसा हम भी थोडासा हररोज द्रव्यपूजामें खर्च करते है. पंडितजी दो लविंगसे अथवा तीन चापलसे द्रव्य पुजा करते होगे. हम दो अगरबत्तीसे करते हैं. सो भी द्रव्य पूजन कहा जाता है. हम सूखानमस्कार करनेवाले से एक हैं ऐसा पंडितजी किलते हैं. सो कोई वखत पंडितजीके खोसेमें लवंग न होनेसे पंडितनी २ पुजा निगद्यते ॥ शास्त्राज्ञा ( ५२ कू भी सूग्वानमरकार करना पन्ता है 21 हमको भी अगरबत्ती नजीक न होनेसे अथवा सलगाने की सामनी न हानये सूखानमस्कार भी करना पड़ता है. और एंपा सूनबार बहोत श्रावक करते देखने में आते है इसमें कोई पाप हे रेपा पडेतजीने दत.या भी नहीं. सूखानमस्कार करने की तो मात्र ज्ञा--" बचो विग्रह संकोचो द्रव्य इस अमितगतिश्रावकाचारसे मिलती है लेकिन द्रव्यपूजनमें द्रव्य अर्पण करके उन निर्माल्य द्रव्यको देवमेवाके बदलेमें उठालेनको जनधर्ममें नहीं है. पंडितजी पत्र ३४ में लिखते है कि,--" अब सवाल यह हो. जाता है कि, निर्माल्य ग्रहण को यदि पाप माने जैसा कि ग्रंथकारोंने बताया है तो उसे उक्त पाच पापोंमें गर्मित कर लेना चाहिये या नहीं? धर्मशास्त्रोंका उपदेश देखने से पता लगता है कि पाचके सिवा छठा पाप कोई नहीं है, तो फिर इसे भी किपीमें गति का नाही होगा. इसीकिये हमने अपने केखमें बनायाथा राजवानिक कारक कथनानुपार अंत. राय-विनका कारण होनेसे चोरी हो गर्मित करना चाहिये." इयादि. इसपरसे देखना चाहिये कि पाचके सिवा छठा पाप कोई नहीं है यह कैसा कह सकते ? धर्मशासौ कर्मशी एकपो अडतालीस प्रकृति कही है उसमें एकस प्रकृति पाप बंधकी बताई है उस पाप प्रकृतियों में ही अंतरायकर्म है यदि पांच मेंही गर्भित करना चाहो तो भी आपने निर्माल्य ग्रहणको चोरीके पर्म गर्मिन कालिया है निर्मात्य द्रव्य ग्रहण करने में पाप हे ऐमा श्रीकुदबुदाचार्य. श्रीभकतंकाचार्य, श्रीअमृतचंद- सूरि, श्रीसकळकीर्ति आचार्यके ग्रयों में लिखा आप भी बतारहे है तो फिर सवाल काहे का ? देवमेवा करनेके बढळेमे निर्मास्यद्रव्य उठाने उसको पाप नहीं है ऐसा कोई श्लोक अथवा सूत्र अथवा वार्तिक है ही नहीं. केवल आपकी कल्पना है. उमका कारण पुजारियोंका पेठ कैसा मोगा और यदि निर्माल्य उनको नहीं मिलेगा वो मंदिरजीमें पुना - .

, (५५) होना बंद होजायगी इस फिजूल भयसे आप उनको निर्मात्यके पापसे छुदाना चाहते है. लेकिन डरनेका कुछ काम नहीं है. उनोंने निर्माल्य ग्रहण करना छोट दिया तो उनको आजीविका पुरती तनखा मंदिरजी • बनानेवाले और प्रतिष्ठा करानेवाले दे सकते है. श्रीकुंथलगिरीमें दस मंदिर है उनमें पूजा करनेवाले निर्माल्य नहीं लेते है, उनको तनखा मिलती है. व-हाड, मध्यप्रात, बंगाल, उत्तर हिंदुस्थान इत्यादिमें पूजन करनेवाले निर्माल्य नहीं लेते हैं उनको तनखा मिलती है जिससे पूजन- का काम बराबर चला है. सोलापूरमेंभी सेतवाळके मंदिर में भगवानका प्रक्षा करनेवाला निर्माल्य नहीं लेता है उसको पंधरा रुपये तनखा मिलती है. मुख्य देवसेवा तो प्रक्षाल करनेकी है. निर्माल्य लेजानेवाला नो उपाध्याय है सो प्रक्षाल समाप्त हुयेबाद साडेनऊ बजे आता है. और एक प्रतिमा पीठ में रखकर दुधका अभिषेक करता है और दोचार अर्य देता है. इतना काम तो इतर श्रावक भी करते हैं. लेकिन उपाध्याय तो निर्मात्य सब एकत्र कर गठडी बांधकर घटे देडटेमें चला जाता पडे मंदिरजीमें जब क्षुल्लक मनालालजी आयेथे उस वखत उनोंने निर्माल्य ग्रहण करनेवाले के हातसे पूना नहीं करानी चाहिये ऐसा कहा, तब शेठ हिराचंद अमीचंदने अकेलेने पंधरा रुपये महावारी देना कबूल कियाथा. इससे अनुमान होता है कि पंडितजीका डर फिजूल है. जो मादमी दसवीस हजार रुपये खर्च करके मंदिर बनायगा अथवा प्रतिष्ठा करायगा उसको दस पाच रुपये महिनेका खर्चा पूनाके वास्ते क्या नहीं मिकेगा लाखो रुपये धर्म काममें श्रावक लोक खर्च करते है तोभी पंडितजी उनके ऊपर कृपणताका ही दोषारोप रखते है. निर्माल्यके बदलेमें उपा. ध्याय वर्गको तनखा मिलेगी तो क्या वे धर्म मार्गमें लगे नहीं रहेंगे ? क्या निर्मात्य खानेसेही धर्म मार्गमें आदमी लगा रहता है ! निर्मात्य खानेवालेकी माडोत्री पूजा हो जानेसे श्रावकोंका बड़ा भारी नुकसान हुवा है. बहाद मध्यपातमें निर्माल्य भक्षकों के हातसे - बनाया (५४) पूजा नहीं कराते माप खुद्द करते है जिससे उनका पूजाका पाठ सर्व कंठगत है. जहां निर्माल्य भोजीके हातमे पुजा होती है वहाके श्रावको को 'उदफचंदन तंदुक' इतनाभी पाठ आता नहीं. उनको उपाध्याय कहता है "तुम चाहार बैठो और झागट वजाओ मै सव पुजा करलेता हौं." पंडितजी कहते है भाग्तचक्रीने और मादिनाथ तीर्थकरने इनको पुजा करनेको और निर्माल्य लेनेको नियत किया है. परतु ऐसा कोई वाक्य पंडितजीने बताया नहीं. भरतचक्रीने अन्य वर्णमसे ब्राह्मणवर्ण सो चौथे कालके अंततक ठीक चलेगा पंचम काल में भ्रष्ट होना. यगा ऐसा श्रीआदिनाथ महाराजने कहा है. देखो आदि पुराण पर्व ११ में पं. लालारामजी लिखते है. " भरतचक्रेश्वर भगवानसे इस प्रकार निवेदन करने लगा। कि हे भगवन् ! मैने आपके द्वारा कहे हुये उपासकाध्याय सूत्र अनु. सार चलनेवाले और श्रावकोंके आचरण करनेमें निपुण ऐसे ब्राह्मण निर्मापण किये हैं ॥३०॥ हे प्रभो इन्हें मैंने ग्यारह प्रतिमाओंके विमा. गसे व्रतोंके चिन्हरूप एकसे लेकर ग्यारहतक यज्ञोपवीत दिये है। हे देव ! समस्त धर्मरूपी सृष्टिको साक्षात् उत्पन्न करनवाले ऐसे आपके होते हुये भी मैंने अपनी वडी मूर्खतासे यह काम किया है ॥ ३२ ॥ हे नाथ इस ब्राह्मणोंकी रचनामें क्या दोष है और क्या गुण है तथा इनकी रचना योग्य हुई अथवा अयोग्य इस तरह के झूमें मेरा चित्त झूब रहा है, आप इसका निश्चयकर इस मेरे मन को स्थिर कर दीजिये।३३॥ भगवान कहने लगे हे वत्स ! तेने जो साधुओंके समान धर्मा- मा द्विजोंका पूजन किया है सो वहुतही अच्छा किया है, परंतु इसमें कुछ दोष है उसे तु सुन ॥ ४५ ॥ हे चिरजीव । तेन जो इन गृहस्थों की रचना की है सो जबतक चौथाकाल है तबतकतो ये अपने योग्य आचरणों का पालन करते रहेंगे ।। १६ ।। परंतु नव कलियुग समीप आ- नायगा तब ये अपनी ब्राह्मण जातिके अभिमानसे अपने सदाचारसे प्रष्ट (५५) होकर इस श्रेष्ठ मोक्षमा के विरोधी वन नायंगे ॥ १७॥ पंचम काम ये लोग " हमें सब लोगोंसे बड़े है।" इस प्रकार ब्राह्मण जातिके अभि- मानसे फंसकर केवल धनकी इच्छासे मिथ्याशास्त्रों के द्वारा सब कोगों को मोहित करते रहेंगे ॥ १८॥" इत्यादि. इसपरसे अनुमान होता है कि, उपाध्याय वर्ग तुवरके दालका, बनेके दालका अभिषेक करते हैं पर प्राप्तीके वहानेसे क्षेत्रपाल पद्मावति मादिके पूजनका बंड शास्त्रानाविरुद्ध उन्होंने बढाया ऐसा जैनवोधकार लिखते हैं. और एकही पीठमें अहंतकी प्रतिमा और पद्मावतीको रखकर मभिषेक शास्त्रजाविरुद्ध करते है.ऐसा पंडित जिनदास लिखते है. सो सब भरतचक्रीके स्वनाका भविष्य श्री आदितीर्थकरने अपने दिव्यध्वनी में बताया सो ही देखने आता है. निर्माल्यपर निर्वाह करनेवाले उपाध्याय वर्ग बढे पवित्र है उनको अपवित्र कहनेवाले मूर्स है ऐसा पडितजी कहते है. परंतु इनके पवित्र ताकी योग्यता कितनी है इस विषयमें इनके श्रद्धेय भट्ठारक सोमसेनने अपने त्रैवर्णिकाचारमें देवाचक (देवसेवानियोगी) और निर्माल्य- भोजी ये इतर पातकी समान पंक्तिभोजनत्याज्य है ऐसे कहा है यह ग्रंथ पं० कल्लप्पा भरमप्या निटवेने सार्थ मराठीमें लिखा है वे पृ० ३२६॥ ३२७ लिखते है कि भोजनपंगतमें अयोग्य मनुष्य ये हैं- पंक्त्ययोग्यं ततोवक्ष्ये विजातीयो दुरात्मकः ॥ मलयुक्ताम्वरोऽस्नातश्च्छिन्नांगः परिनिन्दकः ॥१५४ ॥ श्वासीकासी व्रणी कुटी पीनसच्छदिरोगिणः ॥ मिथ्यादृष्टि विकारीच उन्मत्तः परिहासकः || १५५ ॥ असंतुष्टश्च पाखण्डी लिंगी भ्रष्टः कुवादिकः ।। सप्तव्यसनसंयुक्तो दुराचारी दुराशयः ॥१५६॥' चतुष्कपायिको दीनो निपुणांगोऽभिमान्यपि ॥ - (५६ ) अतिवालोऽतिवृद्धश्वातिश्यामोऽतिमतिभ्रमः ॥ १५७।। पण्डश्च पश्चिमद्वारी पंचभिश्च वहिप्कृतः ।। देवार्चकश्च निर्माल्यभोक्ता जीवविनाशकः ॥ १५८ ।। राजद्रोही गुरुद्रोही पूजापीडनकाकरः ।। वाचालोऽतिमृपावादी वक्रांगश्चातिरामनः ॥१५९॥ इत्यादि दुष्टसंसर्ग सन्त्यजेत्पंक्तिमोजने ।। श्वानसूकरचाण्डालम्लेंच्छहिंसकदर्शनम् ॥१६०॥ अर्थात्-अव भोजन पंक्तीमें अग्राय कौन कौन है सो कहते है. अपने जातसे भिन्न मानव, दुष्ट अतःकरणका, मलीन वस्त्र धारण करणहारा, स्नान न किया हुआ, जिसका कोई अवयव टूटगयाहो ऐसा, लोगोंकी निंदा करणहारा; श्वास, कास, व्रण, कुष्ठ, पीनस और बमन इनमें से कोई भी बीमारी जिसको हो गई हो, सतत वीमार हुवाहो, मिथ्यादृष्टि, निष्कारण शरीर झुकानेवाला, उन्मत्त हुवा हो, हमेशा वि. नोद करनेवाला, असंतुष्ट मनका, पाखण्डी, शरीरपर मुद्रा वगैरह चिन्ह धारण करनेवाला, भ्रष्ट हुवा, विसंवाद करनेवाला, सप्तव्यसनामेसें कोई भी-व्यसन जिसनें ग्रहण किया हो, दुराचरण करनेवाला, अपने मनमें दुष्ट भाव धारण करनेवाला, चतुष्कषाय धारण करनेवाला, दरिद्री, नि. र्दय, अभिमानी ऐसे मानवोंको भोजनपंगतमें न लेना चाहिये. और ऐसेही अतिछोटा बच्चा और अति बुढा मानव इनकोमी पंक्तिमें नहीं लेना. अतिश्यामवर्णवाला और जिसके वुद्धीको भ्रम हुवा हो ऐसा पंगतमें नहीं केना. नपुंसफ, गुदद्वारको प्रतिबंध न करनेवाला,पंचोंसे बहिष्कृत हुवाहो, सतत देवपूजाकरके अपना उदरनिर्वाह करनेवाला, निर्माल्यभक्षण करनेवाला,जीवोंका घात करनेवाका, राजद्रोह, गुरुद्रोह करनेवाला, पूनामें विघ्न करनेवाला, व्यर्थ बकवाद करनेवाला, झूठ बोलनेवाला, जिसके अवयव टेढा हो ऐसा, और अति. वामन, ऐसे मानवोंको पंगतमें नहीं लेना चाहिये. .

(५७) इस परसे निर्मात्यपर आजीविका करके पूजन करनेवाकाका पूर्वा कितना हलका वताया है सो विचारना चाहिये. पंक्तीभोजनमें निसको वर्ज किया उसके हायसे भगवानका पूजन नहि करना ऐसा भी ऐलक पन्नालालजी और मन्नालालजी कहते हैं सो योग्य है. पंडितजी कहते हैं-मईतकी पूजाकरके उनका विसर्जन हुये बाद महतका स्वत्व निर्माश्यपरसे हट जाता है. परंतु अहंत भगवानका विर्सजन होताही नहीं है, वह शासन देवताओंका होता है. ऐसे जेनबोधककार अपने जानेवारी १९२२ के अंकमें लिखते है. और इनका यह मत श्री० बप्पाशास्त्री व कल्लप्पा अनंतशास्त्री इन दोनों पंडितोंने तो जैनसिद्धांता- नुसार मानलिया है. ऐसे जैनवोषक १९२२ फरीके अंक पृ० २३६ मेसे ज्ञात होता है. यदि अहस भगवानका विसर्जन नहीं होता ऐसा मानें तो फिर निर्मात्यद्रव्यपर उनका स्वत्व बना रहा; और वह कोई उठा लिया तो उसने भगवान की चोरी फिई. इससे विघ्नकरणत्व हेतू सिद्ध हो चुका. पंडितजी कहते हैं पूजाके काममें लगे हुये जैन उपाध्यायको नि मौस्य प्रहण करने में दोष नहीं है. इधर श्रीयुत चवरे वकील फेब्रुवारी १९२२ के जैनबोधकमें लिखते है-" निदान परधर्मी व पूजा वगैरे न करणा-या माळ्याला निश्यिद्रव्य घेऊ देण्यात काही दोष येतो असे वाटत नाही.+ x + निर्माल्यद्रव्य जैन लोकानी व पूजा करणान्या- नी कोणत्याही स्वरूपाने स्वतःचे उपयोगात आणू नये, असा निर्वध उचर हिंदुस्थानांत व मध्यप्रांतांत आहे व तो अत्यंत योग्य आहे " इत्यादि इससे ज्ञात होता है कि यदि जैन धर्माको निर्माल्य नहीं ग्रहण करना चाहिये तो फिर अन्य धर्मी मालीको देना चाहिये ऐसा कैसा कहा जा. अगा ? क्या मालीकेवास्ते पाप पुण्य न्यारा है ? पापपुण्यतो सभीको एकही है. यदि माली पाप नहीं समझता हो तो उसको समझाना नहीं चाहिये : मालीमी जैनधर्मके श्रद्धानी हो सकते हैं. उनकोभी पापसे (५८) हुलाना चाहिये, यदि मालीमी पाप समझकर निर्माल्यलेना छोरदेगा तो क्या करोगे ? मंदिरमें अग्नीकुंड रखना अव्यवहार्य है अशक्य है ऐसा श्रीयुत चवरे लिखते हैं. सो मंदिरजीमें हवन क्रिया होती है सो अमि- कुंट संस्कारकूट निर्माल्यकूट विना कैसी होगी ? हवन क्रियाको पंडित बनसीघरजीमी मानते हैं. पूजाके समय मंदिरजीमें तीन अग्निकुंड होना चाहिये ऐसा आदिपुराणमें लिखा है तो फिर अव्यवहार्य और अशक्य कैसा कहते हैं ? क्या इस समय मंदिरजीमें अमिकुंड देखनेमें नहीं आता है जिससे अमिकुड अव्यवहार्य और अशक्य होगया ? पचास बरस पहले जैनीयोंमे कोई बी. ए. बी एल देखनेमें आता नहीं था उस वखत बी. ए का पढना अव्यवहार्य समझा जाताथा. अब दरसाल जैनीयों में दसवीस वा ए. पास होने लगे हैं सो व्यवहार्य बात होगई ! दो बरस पहले. बडे आदमी कोई खादीकी टोपी और कोट पेहेरता नहीं था उसवस्वत वह बात मन्यवहार्य कही जातीथी. अब हजारो आदमी पेहरते देखनेमें आते हैं. जिससे वही अव्यवहार्य वात व्यवहार्य होगई ! पचास बरस पहले केई गांवमें भगवानका रथ निकालना अथवा पालखी निकालनी अशक्य वात थी अब गांवगांवमें निकलती है सो वात शक्य होगई. वैसाही धर्मपु- स्तक छपाना, बोर्डिग खोलना, पाठशाला खोलना ये बातें अव्यवहार्यथी सो व्यवहार्य हो गई है. जब माली लोक निर्माल्य खाना बंद करेंगे उस बखत आप निर्माल्यको क्या करोगे ? क्या देह चमारोंको देगे ? निर्मा- स्यको अति पवित्र मानते है उसको अत्यंत पवित्र ऐसे अनीकुंड अथवा निर्माश्यकूटमें रखना सोही योग्य स्थान है. देवसेवा करनेवाले उपाध्यायने यदि पं० वंशीधरजीको निर्मात्य बस्तु-दूध केला बादाम लवंग या सुपारी आदि खानेकेवास्ते दिये तो वे अन्यमतीके माफक उस निर्माल्यको प्रसाद (पवित्र ) मानकर भक्षण करें। गेही, कारण पंडितजीके मतसे वह निर्माल्य वस्तु एकता निर्मल याने पवित्र है और दूसरे यहा विघ्नकरणत्व हेतुका असंभव होनेसे पापभी नहीं लगेगा. एसाहि इनके "निर्मात्यविनियोग" नामक लेखसे निष्कर्ष निकरता है. ता. ८ारा२२ हिराचंद नेमचंद सोलापूर.

(५९) निर्माल्यद्रव्य-चर्चा. जैनमोधक जानेवारी १९२२ च्या अंकांत कीर्तनकार चोपडेबुवा पांचा एक लेख 'निर्माल्य द्रव्य चर्चा' या मथळ्याचा आहे त्यांत श्री० चोपदेवुवा मणतात-" गंधोदक किती जरी प्याले तरी त्यापासून अपाय होणार नाही." परंतु घागरमर गंधोदक पिऊन पाहा भडाभट उलट्या होतात की नाही. ! तेच घागरमा गंधोदक अंगावर ओतल्याने काही अपाय होणार नाही. गंधोदक प्राशन केल्याने रोग बरे झाले असते तर तशी उदाहरणे प्रथात सांपडली असती. श्रीयुत शांतारामानी व श्री. चोपडेवुवानी श्रीपाल राजाचे उदा. हरण अंगाला गंधोदक लावण्याचे नसे दिले तसे ते ममक्याने प्राशन केले व त्याचा अमुक अमुक रोग वरा झाला असे उदाहरण द्यावयास पाहिले होते. श्री. शांतारामानी श्री समंतभद्राचार्याचे उदाहरण त्यानी महादेवाच्या देवळातील नैवेद्य खाल्याचे व त्या योगाने त्यांचा भस्मक व्याधि-रोग-बरा आल्याचे दिले आहे त्याबद्दल श्रीयुत कीर्तनकार चो. पटे लिहितात की, ते उदाहरण-"शेठ हिराचंद नेमचंद यांस पटल्याचे दिसत नाही असे वाटते." तेव्हां ह्यावरून ते उदाहरण कीर्तनकार चोपडे यास पटले असावे असे अनुमान निघते. व ज्याअर्थी महादे- वाचा नैवेद्य खाल्ल्याने श्री समंतभद्राचार्यांचा रोग नाहीसा झाला तर मग महंत मगवानाचा नैवेद्य खात्याने श्रावकाचे आणि मुनीचे रोग बरे झालेच पाहिजेत अशी कीर्तनकार नुवाची समजूत आहे. त्याप्रमाणे खांनी लोकांना उपदेश केल्यास लोक लागलीच टाळ्या वाजवितील निर्मात्य द्रव्यावर आजारी लोकाच्या महाभड उड्या पडतील. मग उपाध्यायाला व माळ्याला देण्याचा प्रश्नच उरणार नाही. चोपडे बु. वांनी फार चांगला शास्त्रापार काढला !! गंधोदक प्राशन केल्याने रोग बरे होतात असे शास्त्राधार भी, - , (६) चोपडे बुवांनी दाखवावयास पाहिजे होते परंतु दाखविले नाहीत. ह्यावं. रून तसे आधार नाहीतच असे झाणावे लागेल, अंगाला गंधोदक अथवा नुसती भगवंताची चरणधूकि बावल्याने पोटातीक मोठमोठे रोग बरे होतात असे भक्तामर स्तोत्रांत पट आहे.- उद्भूतभीपणजलोदरभारभनाः ॥ शोच्यांदशामुपगतायुतजीविताशा ॥ त्वत्पादपंकजरजोऽमृतदिग्धटेहा ।। मां भवन्ति मकरध्वजतुल्यरूपाः ॥ ४५ ॥ अर्थ:-ज्यास भयकर जलोदर झाले आहे, व त्याच्या भारान जे केवळ भग्न झाले आहेत, आणि त्यामुळे शोचनीय अवस्थेप्रत प्राप्त होऊन ज्यांनी आपल्या जीवाची आशा सोडली आहे, असेहि कोषी असले तरी, त्यांच्या शरीरास तुझ्या चरण कमलांची घूली हेच कोषी अमृत, त्या अमृताने माखिले असतां, ते मदनासारखे सुंदर होतात. (पं० कल्लप्पा भरमप्पा निटवे कृत-सार्थ भक्तामर.) शात 'दिग्धदहा ' असे पद आहे त्याचा अर्थ शरीराका मासणे, कावणे, चोपडणे असाच होतो. तांडाने प्राशन करणे असा होत नाही. व नकोदर हा पोटांतील रोग आहे. तो बरा करण्यासाठी प्राशन न करता नुसते अंगास लावल्याने बरा कसा होईल हा चोपडे बुवांचा तर्क बाहे. परंतु जिनवाणीची आज्ञा अंगाला लावण्याची आहे. इकटे चोपडेबुवानी लक्ष द्यावे. कारण. येथे श्रीमानतुंगाचार्यानी भगवंताच्या चरणरजास सर्वोत्कृष्ट पेय पदार्थाचे ( अमृताचे) जरी रूप दिले आहे तरी यांनी पोटातील रोगावर सुद्धा ते प्राशन करण्याविषयी न सांगतां मुद्दाम अंगाव लावण्यासच सांगितले आहे. याचे कारण तरी हेच की- निर्मात्य कोणत्याहिं प्रसंगी कोणाच्याच भक्षण करण्यात येऊ नये ही जिनामा चालविण्याविषयी आचार्यांनी घेतलेली पूर्ण खबरदारीच होय, असे था- वरून स्पष्ट सिद्ध होत आहे.

(६६) यावरून पोटातील रोगशमनार्थ से गंधोदक वगैरे (निर्मात्य) भक्षण केलेच पाहिजे असे में चोपडे बुवांचे झणणे आहे ते निराधार माहे असे ठरते. अंगाला लावणे तसेच नाकाने फुराचा वास घेणे आणि, तोंडाने नैवेद्य भक्षण करणे हे सगळे चोपडेबुमा ह्मणतात-" माझ्या मताने इंद्रि- यांच्या धर्माप्रमाणे देवाच्या वस्तु सेवन करण्यांत पापपुण्य सारखेच वाटले जाईल." तेव्हां हें एक मोटेंच को त्यांनी पुढे माहले आहे. परंतु हे कोडे त्यांच्याच केसातील एका वाश्यानं सहज उलगड जात आहे. पहा, पत्र २०१ मध्ये चोपडेबुवा लिहितात की, " ज्याने परमेश्वरापुढे जी वस्तु ठेवली ती पुनः त्यानेच घेऊ नये आणि याला शेटजींनी निर्माल्य खाणारा यांस काय फळ मिळते याचा श्लोकाधार दिला आहे तोच श्लोक मामध्या वरील अनुमानाका माधार भूत झाला आहे." पुत्त कळतविहीणो दारिहा पंगमूक बहिरंधो । चांडालाइकुजादो पूजादाणाइ दबहरो ॥" " अर्थः-पूजा, दान, इत्यादिकाचे द्रव्य जो घेतो तो पुत्रविहीन स्त्रीविहीन, पांगळा, मुका, आंधळा असा होऊन नीच कुळांत जन्म (श्रीरयणसार-कुंदकुंदाचार्य.) ह्यांत " ज्याने परमेश्वरापुढे नी वन्तु ठेवली ती पुनः त्याने घेऊ नये. " असे जे चोपडे बुवांचे मणणे आहे तेच या कोड्याचे उत्तर आहे. कारण कां घेऊ नये असा प्रश्न केल्यास घेतल्याने पाप लागते अमें कुंदकुंदाचार्यानी सागितले आहे " ते वचन प्रमाण आहे त्याच्यावर पूर्ण भरंवसा ठेवला पाहिजे" असें चोपडे बुवाच मणतात. तेव्हा त्यानीच प्रश्नाचे उत्तर दिले असून दुसन्याना काय झणून विचारतात : कडेवर मूल असून गावभर हुडकती माझें मूल को गले ? या नमुन्या- था चोपटे बुवाचा हा प्रश्न आहे ! पुढे चोपडेवुवा लिहितात-" पण वरील श्लोकाप्रमाणे उपाध्याय वर्गावर कोणताच परिणाम झालेला दिसत नाही. लोकात घट बाहे । घेतो."

की, निर्मास्य भक्षकाचा जन्म नीच कुलांत होतो पण उपाध्याय कुछ नीच आहे असे कोणीच मणणार नाही." वगरे. यावरून चोपो तुवांची अशी समजून दिसते की, नीच कुळांत जन्म होण्यासाठी में गोत्रकर्म बांधावे लागते ते निर्मात्य खाणे सुरू करण्याच्या आधीच पूर्व जन्मी बांधावे लागते. कारण उपाध्याय वर्ग निर्माल्य खातो तो खा जन्मी, तेव्हा त्याचे फळ भणजे कूळ पूर्वजन्मी कसे बांधालें गेलें ! ह्या जन्मीच्या पापपुण्याचे फळ घा जन्मी नाही मिळा तर पुढ- ज्या जन्मी मिळेल. परंतु उनटे मागच्या जन्मी ते कसे जाईल ? झणून उपाध्यायवर्गाचें घा जन्मांतील कूळ जे आहे ते मागस्या जन्माचे बांध- ले आहे. या जन्माचे कूळ कसले बांधले नाईल ते पुढच्या जन्मी समजेल. तेव्हां चोपडेबुवांनी उपाध्यायांच्या हल्लीच्या कुळाचा चांग- पणा जो वर्णन केला तो काय उपयोगाचा ? तसेच ॥ उपाध्यायवर्ग अनादिकालापासून निर्माल्य खात आला आहे, मग सारेच अंघ पंगू झाले भसते. स्त्रीविहीन झाले मणावे तर सर्वांच्या बायका आहेत त्याकरिता वरील श्लोकाधार असेंच ठरते की, जे श्रीमंत आहेत त्यांना हे वरील आचार्याचे वचन लागू माहे मणने त्यांनी एकदां जी वस्तु किंवा में धन देवार्पण केले किंवा देवाच्या नावाने काढून ठेवले तर त्यांनी ते पुनः परत घेऊ नये वगैरे ह्यावरून श्रीमतांनी मात्र निर्माल्य खाऊ नये गरी. बांनी खाल्ल्यास त्यांना पाप लागणार नाही असे कीर्तनकाराचे मणणे माहे. झणजे गरीवाला इन्कमटॅक्स लागत नाही आणून त्यांना निर्मा स्थाही पाप लागत नसावे की काय ? परे, निर्माल्य खाणारे उपाध्ये अंध, पंगु, स्त्रीविहीन झालेले दिसत नाहीत असें चोपडेबुवा लिहितात तर मग श्रीमंत लोक जे निमाल्य खातात व देवाचे धन हरण करतात. त्यांतील तरी किती जण अंध, पंगु, स्त्रीविहीन असे चोपडे वुवांच्या दृष्टीस परले अणून श्रीमतांनी निर्माल्य खाऊ नये असा अभिप्राय त्यांनी दिला ! बेथे प्रत्यक्ष प्रमाण सांपडत असेल तेथे आगमप्रमाण मान्य करण्याची जरूरी नाही असे बोपडेबुवांचे झणणे दिसते. व जरी भागमप्रमाणाविषयी . (६१) हे लिहितात की, कुंकुंदाचार्याच्या श्लोकावर भरवसा ठेवला पाहिजे तरी स्याचा निर्मात्य खाण्याचा जो दोष आहे त्याचा अर्थ तरी निराळा करावा.' असे ते पत्र २०२ मध्ये लिहितात. त्यांनी 'पुत्तकलाविहीणो' या गाथेच मर्थ देतांना 'दारिदो' 'बहिचांडाळाई' ह्या शब्दाचा अर्थ गाळून टाका माहे. शेठजीच्या 'निर्माल्यद्रव्यचर्चा' नामक पुस्तकातील पान ५ वरून चोपडेवुवानी हो गाथा घेतली असें झटके आहे तर त्या पांचव्या पानांत गाथेचा खाली दारिदो वगैरे शब्दांचा अर्थ दिलेला आहे तो येथे का गाळला हे समजत नाही कदाचित गरीबी आणि दारिद्य हे सारखेच शह असल्यामुळे निर्मात्य खाण्याने दारिद्य येते असें दिसल्यास गरीबाला निर्माल्य खाण्यास मोकळीक राहणार नाही. यावरून श्रीकुंकुवाचा- याँच्या गाथेचा अर्थ बदलण्याकडे चोपडे बुवांचा रोख दिसतो. गरीबां- ना निर्माल्य खाण्याचे पाप लागू नये असा अर्थ झाल्यास त्यानां पाहिजे 'माहे. तसेच उपाध्याय वर्गालाही निर्मात्य खाण्यापासून पाप लागू नये असा अर्थ " देवतानिवेद्यानिवेयग्रहणं " ह्या राजवातिकातील वार्तिकाचा करावा अशी त्यांची इच्छा आहे. ते मणतात, " अर्थात् जो धनिक श्रावक देवासाठी रकम अर्पण करतो किंवा करण्यासाठी काढून ठेऊन पुन्हां त्यांत मन दाखवितो त्याला अंतराय फर्माचे आसव होतील. उपाध्याय वर्गाचा यांत कांहीच संबंध येत नाही." " हे वाक्य उपाध्याय वर्गासाठी आहे का धनिक श्रावकांसाठी आहे याचा विचार वाचकच करोत." असे जे घटले आहे त्याचा आशय कसे तरी करून गरीबांला अथवा उपाध्याय लोकांनां निर्माल्य खाण्याने पाप लागू नये असा अर्थ राजवार्तिकातील वार्तिकाचा व कुंदकुंदाचार्याच्या गायेच केल्यास बरे होईल अशी चोपडे बुवांची इच्छा आहे. परंतु ती पार पाडणे मात्र वाचकांच्या मर्जीवर आहे. श्रीकुंदकुंदाचार्याच्या गाथेचा व राजवातिक काराच्या वार्तिकाचा अर्थ फिरविण्याची इच्छा न ठेवता सरळ अर्थ जशाचा तसा घेण्याचे बोपरेनुवानी मनांव आणल्यास व श्रीकुदकुंदाचर्याची निष्णुद्धार पाहा I भुजह सो मुजइ (६४) नांवची त्याच पांचव्या पानांतील गाथा डोच्यापुढे ठेवल्यास नाकाने वास घेणे, कानाने भजन ऐजण. अगाम गघोटक लावणे नदीचं पानी फुकट पिणे, महाबळेश्वराची हग फुस्ट खाणे वगरेपासून निर्मात्याच्या दोषाचें तर्कशास्त्र उर्फ नुक्तेचैनी रदबीन बसण्याची जलरी राहात नाही. त्यानी फक्त भक्षण करण्यापासून व अपहार करण्यापासूनच महान पाप घडते असेच सागितले आहे. पहा "जो जिणुद्दिठ णिस्यगइ दुख्ख ॥३॥" सणजे जिनमदिरादिकाचा जीर्णोद्धार, प्रतिष्ठा, जिनपूजा, तीर्थवंदना या संबंधाचे द्रव्य नो नक्षण करतो तो नरकगतीचे दुःख भोगतो, असे जिनेश्वरानी सागितले आहे." मणून टलें आहे. नाकानें वास घेण्यापासून अथवा अगाला गंधोदक लावल्यापा- सून पाप घडत असते तर त्यानी तसे सागितले असते. आचार्याच्या वाक्यावर भरंवसा ठेवला पाहिजे असें तर मगावयाचे परंतु त्यातून निसटण्या. साठी एखादी पळवाट काढण्याचाही प्रयत्न करायाचा. ही गंमत आहे! । श्रीयुत चोपडेबुवानी कबूल केलें आहे की, जी वस्तु परमेश्वरा- पुढे अर्पण केली ती वस्तु त्याने पुनः घेऊ नये असे जर आहे तर मग ती वस्तु त्याने दुसन्याम देता कशी येईल ? आपण घेणे काय आणि घेऊन दुसन्याला देणे काय सारखेच आहे. "न हरति यन्न च दत्ते तदकृशचौर्यादुपारमण ॥" में समतभद्रस्वामीचे अचौर्य अणुव्रताचे लक्षण आहे त्याप्रमाणे पाहिले झणजे आपण अदत्तादान घेऊ नये व घेऊन दुसन्याशाहि देऊ नये. कृत कारित हे सारखेच जैनधर्मात मानले आहे. श्रीयुत चोपडेवुवा अग्निकुंडात पूजन करण्याच्या संबंधाने व निर्मास्यद्रव्य जाळप्याच्या संबंधाने अडचण दाखवितात की, नारळ, फळे, नैवेद्य, अक्षत, ही अर्पण केलेली जाळता येतील, परंतु दोन हात आणि तिसरे मस्तक अर्पण केलेले त्याचे काय करणार? तेव्हा हे ही मोठेच को. श्रीयुत वुवानी पुढे टाकले आहे. परंतु याचे उत्तर एकाच अर्पण' शब्दात आहे अर्पण करावयाचे जे पदार्थ असतात - (६५) ते पुन्हां घ्यावयाचे नाहीत ही गोष्ट श्रीयुत चोपडेबुवा कबूल करून चुकले आहेतच व त्यापमाणे अक्षत, नैवेद्य, फळ वगैरे देवाला अर्पण केलेले अग्निकुंडांत भस्म होऊन जातात व जाळूनही टाकतां येतात धांत. श्रीयुत वुवाना अडचण वाटत नाही. अडचण काय ती फक्त दोन हात आणि तिसरे मस्तक अर्पण करणान्याची पहिली तेव्हा येथे श्रीयुत बुवांना असा प्रश्न करता येईल की, अर्पण ह्या शब्दाचा अर्थ आपण काय करता ? दाखवून परत घेणे असा अर्थ करता का जसें खिशांतून बदाम काढून किंवा तबकडात नैवेद्य टेवून तो देवा पुढे ठेवता तसा त्याचा सर्वस्वी वियोगपर क्रिया काण्याचा अर्थ करता? दाखवून परत घेणे असा अर्पण शब्दाचा अर्थ कोणीहि करणार नाही. कारण अशा क्रियेका फपवणूक झगडात. तेव्हां अर्पण झणजे त्या पदार्थाचा सर्वस्वी त्याग करणे असाच अर्थ ग्रंथकारानी केलेला आहे, त्याप्रमाणे दोन हात याणि तिसरे मस्तक अर्पण करणान्याने ते तिन्ही भवयव आपल्या घडापासून वेगळे करूनच देवापुढे ठेवावे लागतील तेव्हांच त्याला अर्पण केलें असें लणता येईल व असें ज्यावेळी वेगळे करून देवापुढे ठेवाल त्याच वेळी त्याला कोणीहि उपाध्याय अथवा गरीब मनुष्य घेण्यासाठी पुढे न येता त्या अवयवाना लवकर जाळून टाका असेंच ह्मणेल. इतकेच नाही तर बाकीचे उरलेले रक्तबाबाळ झालेले धडही देवळातून लवकर काढून टाका व जाळून टाका असेंच उपा- ध्याय लोक ह्मणतील. तेव्हां श्रीयुत बोवाच्या कोड्याचे उत्तर त्याच्या एका अर्पण शब्दामध्येच आहे की नाही ? पहा विचार करा, देवाला हात व मस्तक कोणी अर्पण करीत नसतो. हात जोडतो व मस्तक नमवितो. मस्तक अर्पण करण्याचे शब्द अन्यमती लोकात गपरले जा- तात व त्यांतून एखादा आपले मस्तक कापून देवाला अर्पण करतो. पांतु जैन से करीत नाहीत. असली आत्महत्येची भाक्त करणे महान पाप आहे' असें जैन समजतो. उपाध्याय वर्गाचे कूळ फार उंच असल्याबद्दल श्री? चोपडेबुवा - (१६) लिहितात. पत्र २०२ मध्ये ते लिहितात की,-" आज जैनांमध्ये सर्व क्रिया विधियुक्त क्षणने संध्या, मौजीबंधन, पूजा अर्चा, यज्ञोपवीत धारण करणे, पुनर्विवाह विरोधी, सोवळें शुचिर्भूनपणा इत्यादि सर्व गुण जैनां- मध्ये बहुतेक यांच्या इतके दुसरे ठिकाणी मिळणे कठीण पडेल. + + उपाध्यायाचें कुल नीच आहे असे कोणीच मणणार नाही." वगैरे वगैरे. आतां ज्या त्रैवर्णिकाचारग्रथाच्या आधाराने उपाध्यायलोक सद. रील सर्व क्रिया करीत असतात त्याच ग्रंथांत सांगितलेल्या पंक्तीमोजनाला घेण्यास अयोग्य माणसांमध्येच उपाध्यायाची गणना केली आहे. पहा.- पंक्तीला घेण्याला अयोग्य मनुष्ये- पंक्त्ययोग्यं ततोवक्ष्ये विजातीयो दुरात्मकः ।। मळयुक्ताम्बरोऽस्नाताश्च्छनांगः परिनिन्दकः ॥ १५४ ॥ श्वासी कासी व्रणी कुष्टी पीनसच्छादिरोगिणः ॥ मिथ्यादृष्टिर्विकारीच उन्मत्तः परिहासकः ।। १५५ ।। असंतुष्टश्च पाखण्डी लिंगीभ्रष्टः कुवादिकः ।। सप्तव्यसनसंयुक्तो दुराचागे दुराशयः ॥ १५६ ।। चतुष्कपायिको दीनो निघृणांगोऽभिमान्यपि ॥ अतिबालोऽति वृद्धश्चातिश्यामोऽतिमतिभ्रमः ॥ १५७ ।। पण्डश्व पश्चिमद्वारी पञ्चभिश्चबहिष्कृतः ।। देवार्चकश्च निर्माल्यभोक्ता जीवविनाशकः१५८ राजद्रोही गुरुद्रोही पूजापीडनकाकरः ।। वाचालोऽतिमृषावादी वक्रांगश्वातिवामनः ॥ १५९ ॥ इत्यादिदुष्टसंसर्ग सन्त्यजेत्पंक्तिभोजने ।। वानसूकरचाण्डालम्लेंच्छहिंसकदर्शनम् ।। १६०॥ ( सोमसेनकृत त्रैवर्णिकाचार सार्थ पृ. ३२६ । या श्लोकांचा अर्थ पं. कल्लष्पा निटवे यानी केला आहे तो असा- अर्थ:-आता पंक्तीस घेण्याला अयोग्य कोण कोण आहेत ते मांगतात-आपल्या नातीहून निरनिराळ्या जातीचा मनुष्य, दुष्टमनाना, .

. (६७) मळकटं वो अंगावर घेगारा, स्नान न केलेला, ज्याचा कोणता तरी भयब तुटलेला आहे मसा, लोकाची निंदा करणारा, श्वास, खोकला, व्रण, कुष्ट, पेनसी माणि ओकारी ह्यांपैकी कोणताहि रोग ज्याला मसेक तो, नेहमी रोगी असलेला, मिध्यादृष्टि, उगीच अंगहलविणारा, उन्मत्त मालेला, नेहमी थट्टा करणारा, असंतुष्ट मनाचा, पाखण्डी, अंगावर मुद्रा बगैरे चिन्हें धारण करणारा, भ्रष्ट झालेला, दुष्टवाद करणारा, सात प्रकारच्या व्यसनापैकी कोणतेंहि एखादें व्यसन ज्याला आहे असा, दुराचार करणारा, मनांत दुष्टमाव धरणारा, चार कषाय ज्याला आहेत असा, दरिद्री, निर्दय, अभिमानी अशा मनुष्याना पंक्तीस घेऊ नये. भगदी लहान मूर आणि अतिशय वृद्ध मनुष्य ह्याना पंक्तीस घेऊ नये. अतिशय काळा असलेला मनुष्य, ज्याच्या बुद्धीका भ्रम झाला आहे मसा मनुष्य पंक्तीस घेऊ नये. नपुंसक, गुदद्वाराला प्रतिबंध नसलेला, पंचांनी ज्याला बहिष्कृत केले आहे असा, नेहमी देवपूजा करून उदरनिर्वाह करणारा, निर्माल्य खाणारा, जीवाचा घात कर- णारा, राजद्रोह गुरुद्रोह करणारा, पूजेला विघ्न करणारा, उगीच बडबर. गारा, खोटे बोलणारा, ज्याचे अश्य वांकडे आहेत असा, आणि फारच गिडा असलेला, अशा मनुष्याना पंक्तीस घेऊ नये. भजनाच वेळी कुतरें कर, चाण्डाल, म्लेंच्छ आणि हिंसा करणारे ह्याचे दर्शन करू नये. ह्यावरून उपाध्यायाच्या कुळाचा विचार करताना हे श्लोकही विचारात घ्यावेत अशी आमची सूचना आहे. सोलापूर, वापूचंद जेठीराम ता. २०१२।२२. सोलापूर. - निर्माल्यद्रव्यावर अनेकांच्या वेगवेगळ्या उज्या. निर्माल्यद्रव्य देवसेवा करणान्या पूजाग्यांनी प्यावे असे पं. बनसीधरजी.मणतात. श्रीयुत चवरे वकीक होणतात की,- ते जैनाला . ( ६८) देण्यांत पाप आहे मजैन असलेल्या माळ्याला द्यावे. श्रीयुत कतिनकार चोपडे बुवा मणतात. निर्माल्य खाल्ल्याने पोटांतील रोग बरे होती. परंतु ते श्रीमंतानी खाऊ नये गरीधाने व उपाध्यायाने खावें वाप्रमाणे निर्मात्यद्रव्यावर अनेकांच्या वेगवेगळ्या उध्या दिसतात. त्यावरून एक दृष्टांत माठवतो तो असा- एका स्वरूपवान वेथे प्रेत स्मशानांत आणलें होते तेथे एक कुतरें, एक शामी पुरुष आणि एक धार्मिक मनुष्य असे उभे होते कुतन्याने त्या प्रेताकडे पाहून मनांत झटले की, हे प्रेत मला खावयास मिळाले तर माझी भूक शमून मला आनंद: होईल. कामी पुरुष मंगाना की, अशी स्वरूपवान लो भोगण्यास , मिळाली तर केवढी बहार होईल तो धार्मिक मनुष्य मणाला की, असे उत्तम शरीर हा स्त्रीला मिळाले असून तिने त्याचा तपश्चरणादि सत्कार्यात उपयोग न करिता ते व्यर्थ घाकवि, जाळून टाका. अशा तन्हेनें आपआपल्या कल्पनेपमाणे त्यानी वेगवेगळे अभियाय दिले. तसेच हल्लीही निर्मात्यद्रव्य छोणाला तरी देऊन बदला त्याचाकडून देवाच्या पूजेची अथवा देवळातील झाडलोट करण्याची कामगिरी करून ध्याची, निदान रोग बो करण्यासाठी औषध झणून त्याचा उपयोग भरावा अशा सूचना होत आहेत. अशा कसना सुचण्या कारण अन्यमती लोकांत निर्मास्यद्रव्य खाण्यात पाप काहीं मानीत नसून ते प्रसाद धणून खाण्यांत येते. तामा जेनानीच ते खाण्यांत पाप शासाठी मानावे ? असा समज बहुसंख्येच्या सहवासाने होणे साह. जिक आहे. परंतु जैनानी लक्षात ठेवावं की, जैनाचार्यांनी निर्मात्य महग करण्याचे फार पातक सांगितश्यामुळेच जैनांची देव व्यवस्थाप कांच्या मालकीची झाली नाहीत व वडवे, सेवाधारी, पुजारी बगैरे सारखे देवळांचे तटेबखेडेहि कोटीत गेले नाहीत. सोलापूर आपला, ता०२८/२।२२ शंकर पंढरीनाथ रणदिवे - 4 ime . . T प्रतिमा पूजन । १ १ . - ३.... १ . " ८ १ ३ 11 aur ह.आ. किं. रु. मा. श्रीसमंत मद्रा०परित्र ४ चोवीस तीर्थकरपूजा ० १२ विषया विवाह खटन. १ भाषापूजा संग्रह ८ ४ नित्यनेम पूजा बिनधर्माचे प्राचीनत्व ८ द्रव्यसंग्रह जैनधर्माचा प्राचीन इतिहास १रत्नकरंड धर्मपरीक्षा मराठी ८ जनपद-संग्रह भाग१. स्वयंमस्तोत्र सार्थ .... २.८ जनपदसंग्रह भाग २..... ४ पापपुण्याची कारणे भशाचनिर्णय पर्चा शासनदेवतापूजन चर्क' ४] भूधर जैनशतक सुभाषितावर्ण १ ४ क्रियाकोश ८ हिंदी भाषाके ग्रंथ हिराचंद अमेलिनची पदे भगवती माराधना दर्शनकथा छंदबंदी ज्ञानार्णव - अकलंफस्तोत्र गोम्मटसार कर्मकांड, २ जिनशतक हिं. मर्थ...... पद्मपुराण 'वृतावन पूजा हरिवंशपुराण पार्श्वनाथ चरित्र छंदबंदी १ पारवपुराण ...२ १२ भाषापूजा तेहरद्वीपविधान १२ चोवीसठाण चर्चा मात्मख्याति समयसार वृहद्रव्यसंग्रह सर्वार्थसिद्धि सिद्धातप्रवेशिका स्वाद्वादमंजरी. मृत्युमहोत्सव प्रदुम्नचरित्र २.१२ यशोधर चरित्र हि. अर्थ.... समयसार नाटक ....२ नरकचित्रादर्श पार्वधर्मसंग्रह २. १ नित्यपाठसंग्रह हिंदी प्रवचनमार प्ररमागम "रलकरंड श्रावकाचार धर्मसंग्रह श्रावकचार ....२ बनारसिविलाम छंद १ १२ शिखरजी महात्म्य अणिक चरित १२ आलोचना सामायिक भक्तामरकथा यंत्रमंत्रकी छहढाला पुरुषार्थ ,सिद्धयुपाय - निर्वाणकार स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा १ ८. पंचकल्याणिक रूपचंदकृत चरचा,शतक • १२ पर्मविकास ८ ६ १ २ । १ . . . + ३ ००० मोक्षमार्ग प्रकाश r an १ १ r - किं. ह. भा. स्वाहाद मंजरी -- 4 २ . जैनशतक जैनसिद्धांत संग्रह षट्पाहूड उपमिति भवप्रपष धर्मपरीक्षा भद्रबाहूचरित ज्ञानसुर्योदय नाटक मजना सुंदरी नारक समाधिमरण आवफवनिताबोधिनी नागकुमार चरित्र १ १ १ १ क.क. भास्पपरीक्षा समपपामृत कुंदकुंदा- चार्यकृत समयमाभृत द्वितीयस्वर समयपाभूत चतुर्भखर धर्मरत्नोद्योत, अलंकार चिंतामणी . । ८ . ८ देवशास्त्रगुरुपूजा पंचस्तोत्र मूळ. नित्यपाठ साह o ६ ६ ८ . पशुन्न चरित्न 77 ० नंदीश्वर भक्ति सनातन जैन ग्रंथमाला. पचाध्यायी पाचीभ्युदय काम- गोम्मटसार मूलगाया १ . ३ ६. परीक्षामुख सृष्टिकर्तृत्व भीमांसा आराधनाकथासार झोश स्वानुमवदर्पण अनुभव प्रकाश भट्टाररू-बचर्चा सार्वधर्म सप्तत्त्व विचार जैनधर्माचे सौंदर्य जैनधर्माची माहिती जैनार्णव धर्मप्रश्नोतर संस्कृत पुस्तके कातंत व्याकरण दशलाक्षणिक पूजा जैनकथाद्वाविंशति प्रमेयकमसमातेर आत्ममीमांसा समंतभद्राचार्य विश्वलोचन कोश भक्तामरमून न्यायदीपिका नैनप्रक्रिया संमह २ सागारधर्मामृत १ ४ रानवार्तिक... गुजरायी-पुस्तक समविधी S LA " सुकमाळ चरित्र सल्लेखनी मृत्युमहोत्सव भनित्यपचाशत् . बैनीमम इन्टॉस्कशन इ.. 1 - -

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Nirmalyadravya - Charcha Volume - Ii

Author
Doshi, Heerachand Nemachand
Title
Nirmalyadravya - Charcha Volume - Ii
File name
Nirmalyadravya - Charcha Volume - Ii
Text
OCR done
Citation
1922
Published
2009/11
Publisher
Solapur, Sacchaidanand Press
Language
Sanskrit
Pages
98
Library
Sanmati Library
Classification
Jain sahitya
DLI number
344309
Barcode
99999990234181.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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Copyright permitted
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