Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Sudarshancharitam

Dr.hiralal Jain · 2010/08

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Front matter

माणिकचन्द्र दि० जैन ग्रन्थमाला
ग्रन्थमाला सम्पादक
डॉ० हीरालाल जैन, डॉ० आ० ने० उपाध्ये
,
प्रकाशक
भारतीय ज्ञानपीठ
३६२०।२१ नेताजी सुभाष मार्ग, दिल्ली-६
प्रथम संस्करण
वीर निर्वाण सवत् २४९६
विक्रम संवत् २०२७
सन् १९७०
मूल्य तीन रुपये
मुद्रम
सन्मति मुद्रणालय,
g্যাণী

Mānikachandra D. Jauna Granthamala : No. 51
SUDARŠANACARITAM
of
Śri Vidyanandi
Edited by
Dr. Hira Lal Jain
M A, D Litt
Published by
BHARATIYA JNĀNAPITHA

Mānikachandra D. Jaina Granthamālā
General Editors :
Dr, H. L Jain, Dr. A N. Upadhye
Published by
Bhāratiya Jañānapitha
3620/21 Netaji Subhas Marg, Delhi-6
First Edition
V N S 2496
V.S 2027
AD. 1970
Price Rs. 3/-

विषयानुक्रमणिका GENERAL EDITORIAL ६ १० १० १. प्रस्तावना (क) सुदर्शन मुनिका जैन-परम्परामें स्थान (ख) नमोकार मंत्रका महत्त्व (ग) सुदर्शनचरित सम्बन्धो साहित्य (घ) ग्रन्थकार व रचना-काल (ड) आदर्श प्रतिका परिचय ११ १३ १७ प्रस्तावना पृष्ठ मूलपाठ पृष्ट १ १२ - १८ १८ १८ १९ १९ २० २९ ३९ २. विषय-परिचय अधिकार १. महावीर समागम २. तत्त्वोपदेश ३. सुदर्शन-जन्म-महोत्सव ४ सुदर्शन-मनोरमा विवाह ५ सुदर्शनकी श्रेष्ठि-पद-प्राप्ति ६. कपिलाका प्रलोभन तथा रानी अभयमतिका व्यामोह ७. अभया कृत उपसर्ग निवारण शील-प्रभाव-वर्णन ८ सुदर्शन व मनोरमाका पूर्वभव-वर्णन ९. द्वादश अनुप्रेक्षा वर्णन १० सुदर्शनका दीक्षा -ग्रहण ११. केवलज्ञानोत्पत्ति १२ सुदर्शन मुनिको मोक्ष-प्राप्ति २० ४८ 1 २० ५७ ८० और तप २१ २२ २३ २३ २४ ८९ १०१ १०९ GENERAL EDITORIAL The Sudarsana-caritam of Vidyānandı gives the biography of Sudarśana-muni According to the Jaina tradition, Sudarsana was the fifth Antakrta Kevalın of Mahavira, the 24th Tirthākara. He practised severe penances, endured many upasargas or oppressions and attained omniscience and Liberation or moksa The biographies of such saints are put together in the eighth Anga, namely, Antakyt-daśārga. An indication of this is available in the present text of the Ardhamăgadhi canon. The biography of Sudarśana is narrated to glorify the pajica-namaskāra-mantra This Namokāra Mantra is to Jainas what the Gayatrī is to the followers of the Vedic tradition. It stands accepted in all the schools and sects of the Jainas. It occupies the first place in meditation, ritual, recitation and religious rites In a short form it is found in the Khâravela inscription (2nd century B c), and as a mangala at the beginning, it occurs in the Şakhandāgamasutra of Puspadanta (2nd century AD) It is explained in details by- Virasena, It will be seen from the book : Mangala Mantra-Eka anılcintana by Dr NEMICHANDRA SHASTRI, how this Mantra is employed in mystic and miraculous contexts GENERAL EDITORIAL The career of Sudarsana is described in his five bhavas or births, which are described in details by the Editor in his Hindi Introduction. The soul of Sudarsana in the first Bhava was a Bhilla chief, Vyāghra by name, in the second, a dog in a gokula, 1 e., cowherds' colony, after hearing some religious instruction, the dog was reborn, in the third Bhava, as a man, a hunter's son, and in the fourth, a cowherd, Subhaga by name, who used to tend the cows of a banker, Jinadatta. Subhaga made his life fruitful by receiving and concentrating on the Namokāra Mantra from a pious saint Consequently, Subhaga was reborn as Sudargana in bankers' family He lived in plenty and faced many trials, but he was neither tempted by pleasures nor cowed down by calamities Following the highest ideal of Ātma-samyama, Self-restraint, he attained the higher status of non-attachment and omniscience followed by Mokşa 1 .. In earlier literature, so far available, Sudarśana's career is found illustrated in the (Bhagavati ) Aradhanā of Sıvārya (Gäthä No. 762) This illustration is expanded into a regular tale by Harisena (A D. 932–3) in his Byhat-Kathakośa (Singhi Jain Series, No 17, Bombay 1943), Story No. 60, the colophon of which runs thus ito śri-Jıra-riamaskāra-samanvita-Subhaga-gopala-kathāhakanı idam The next source is the Kahākosu (ed. by HL JAIN, Prakrit Texts Series, No. 13, Ahmedabad 1969 ) of Sricandra ( c. 1066) in Apabhramśa. Though it follows the Kathakośa of Harisena, it has its specialities of language, style and poetic qualities. The story of Sudarśana is found in 16 Kadavakas in the 22nd Samdhi सुदर्शनचरितम् Devoted to this very topic is the Sudagsagacarır (edited by Dr. H.L JAIN and published by the Vaishalı Institute in Apabhramba by Nayanandı who composed it in Dhara at the time of Bhoja in Sam 1100, i. e., C. A. D. 1043. Nayanandi shows remarkable skill in metres, a large variety of which he has employed in this work in a poetic style. It seems that he composed this poem as if to illustrate so many metrical forms. Rāmacandra Mumukṣu also gives the story of Sudarśana in his Punyaśrava-kathākoša to illustrate the efficacy of the Namaskāra Mantra, The present work in Sanskrit comes after all these and gives the biography of Sudarśana in details. The author is Vidyapandı about whom we know good many details (already given by the Editor in his Hindi Introduction). He hailed from a branch of the Prägvāta family; and the name of his father was Haritāja. He was initiated into the order by Devendra. kirti of the Surat branch of the Balātkāra-gana. He visited many places and was respected everywhere. He composed this Sudarsana-carıta in the vicinity of Surat, in c. 1456, say about the middle of the 15th century A. D. Dr. HIRALALAJI JAIN has edited this work from a single Ms. from his own collection As an experienced editor he has given us the text in an authentic form. His Introduction clearly marks out the place of Vidyānandi's Sudarśana-carita in the available material dealing with Sudarśana and brings to light some important details about Vidyānandı who, as a Bhattáraka, has played a significant role in the contemporary religious life of the community. Our sincere thanks are due to Dr. HIRALALAJI for kindly contributing this volume to the Mānikachandra Granthamālā.

GENERAL EDITORIAL ९ It is very generous of Shri SAHU SHANTI PRASADAJI and his enlightened wife Smt RAMA JAIN to have patronised the publication of this Granthamala which has brought to light many unpublished works. It is both an opportunity and a challenge to all earnest workers in the field of Jaina literature. Many small and big works in Sanskrit, Prākrit and Apabhramsa still lie neglected in Jaina Bhandāras; and we earnestly appeal to scholars to edit them and present them in a neat form , this is a duty which we owe to our Ācāryas who have left for us a great heritage in our literature A N Upadhye Kolhapur 22-4-1970 - -- प्रस्तावना सुदर्शन मुनि का जैन परम्परा में स्थान प्रस्तुत ग्रन्थ-रचना का विषय है सुदर्शन मुनिके चरित्रका वर्णन । ये मुनि जन परम्परामें महावीर तीर्थकरके पांचवें अन्तकृत् केवली माने गये हैं । ( ३, ३) इन मुनियोकी यह विशेषता है कि वे घोर तपस्या कर एवं नाना उपसर्गोको सहन कर उसी भवमें केवलज्ञान द्वारा संसारकी जन्म-मरण परम्पराका अन्त करके मोक्ष प्राप्त करते हैं। ऐसे मुनियोके चरित्र जैन द्वादशाग आगमके आठवें अंग अन्तकृत्-दशागमें संकलित किये गये थे। उनके संकेत वर्तमान अर्धमागधी आगम- में भी पाये जाते है। स नमोकार मन्त्र का महत्त्व प्रस्तुत काव्यका विशेष धार्मिक उद्देश्य है सुदर्शन मुनिके चरित्र द्वारा जन- धर्मके महामन्त्र पंच नमोकार मन्त्रकी महिमा प्रदर्शित करना। इसी कारण ग्रन्थके सभी अधिकारोंकी पुष्पिकामओमें उसे पंचनमस्कार माहात्म्य प्रदर्शक कहा गया है । पंच नमोकार मन्त्र जैनधर्मका प्राण है। उसका जैनधर्ममें वही स्थान है जो वैदिक परम्परामें गायत्री मन्त्रका है। जैनियोके सभी सम्प्रदायोमें इसकी समान रूपसे मान्यता है । जप व पूजा-पाठ आदि क्रियाओंमें इस मन्त्र को प्रथम स्थान दिया जाता है । इसका संक्षिप्त रूप खारवेलके शिलालेख ( ई० पू० द्वितीय शती ) में तथा पुष्पदंत कृत षट्खण्डागमसुत्रके आदि मंगलके रूपमें पाया जाता है। ( ई० द्वितीय शती )। और उसपर वीरसेनकृत विस्तृत टीका भी है। इस मन्त्रके आधारपर कैसी-कैसी मान्त्रिक और तान्त्रिक मान्यताएं विकसित हुई हैं, इनका विवरण पंडित नेमिचन्द्र जैन कृत 'मंगल मन्त्र नमोकार-एक अनुचिन्तन" शीर्षक अन्यमें देखा जा सकता है । ग्रन्थमें सुदर्शन मुनिके पांच भवान्तरोंका उल्लेख है । १ भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित प्रस्तावना वे प्रथम भवमें वे विन्ध्यगिरिमें व्याघ्र नामक भिल्लराज थे। दूसरे जन्ममें वे एक गोपालके कूकर हुए। उनके कानोमें कुछ धार्मिक उपदेशोकी ध्वनि पड जानेसे उन्होने तीसरे जन्ममें नर भव पाया । और वे एक व्याधके पुत्र हुए । चौथे जन्ममें सुभग नामक गोपाल हुए। वे चम्पापुरीके सेठ जिनदत्तकी गौएँ चराते थे। प्रसगवश उन्होने एक मुनिराजके प्रति श्रद्धा व्यक्त की और उन्होके मुखसे नमो- कार मन्त्रको पाकर उसे ही अपने जीवनकी आराधनाका विषय बना लिया। उसीके प्रभावसे वे अपने पांचवें भवमें श्रेष्ठी पुत्र सुदर्शनके रूपमें प्रकट हुए। उन्हें खूब वैभव भी मिला और घोर यातनाएँ भी सहनी पडी। किन्तु वे न तो वैभव और भोग-विलासके अवसरोंसे प्रलोभित हुए और न उसके निषेधसे उत्पन्न क्लेशो और पीडामोसे घबराये । आत्मसंयमके उच्चतम आदर्शका अनुसरण करते हुए उन्होने वीतरागता और सर्वज्ञताकी वह स्थिति प्राप्त कर ली जो ससारसे मुक्ति पानेके लिए आवश्यक होती है । (८ ४० आदि)। सुदर्शन चरित सम्बन्धी साहित्य उपलभ्य प्राचीन साहित्यमें सुदर्शन मुनिके जीवन चरित्रका संकेत हमें शिवार्य कृत मूलाराधना ( भगवती आराधना ) में मिलता है। यहां कहा गया है कि- - अन्नाणी वि य गोवो आराधित्ता मदो नमोक्कारं । चंपाए सेटिकुले जादो पत्तो य सामन्न ॥ (७६२) अर्थात् अज्ञानी होते हुए भी सुभग गोपालने नमोकार मन्त्रकी आराधना की। जिसके प्रभावसे वह मरकर चम्पानगरके श्रेष्ठिकुलमें (सुदर्शन सेठके रूप में ) उत्पन्न हुआ और वह श्रमण मुनि होकर श्रमणत्वके फलस्वरूप मोक्ष को प्राप्त हुआ। भगवती आराधनामें दृष्टान्तोके रूपसे सूचित कथामोको विस्तृत रूपसे वर्णन करनेवाली प्रमुख दो रचनाएं उपलब्ध हुई है। पहली रचना हरिषेणाचार्य रचित वृहत् कथाकोश है ( डॉ० मा० ने० उपाध्ये द्वारा सम्पादित सिंघी जैन ग्रन्थमाला -१७, बम्बई-१९४३ ) इसमें कुल १५७ कथानक है। जिनकी रचना सस्कृत- सुदर्शनचरितम् में हुई है। इसमें ६०वी कथा सुभग गोपाल शीर्पक है और वह १७३ पद्यों में पूर्ण हुई है। उसके अन्तमें कहा गया है : "इति श्रीजिननमस्कारसमन्वितसुभगगोपालकथानकमिदम्" इस ग्रन्थकी रचना उसकी प्रशस्तिके अनुसार विक्रम संवत् ९८९ तथा शक संवत् ८५३ में हुई थी। दूसरी रचना मुनि श्रीचन्द कृत कहाकोसु ( कथाकोश ) है जो हाल ही प्रकाश में आयी है (डॉ० ही० ला० जैन द्वारा सम्पादित । प्राकृत ग्रन्थ परिषद -१३ अहमदावाद, सन् १९६९)। इसकी रचना अपभ्रंश पद्योम हुई है और उसमें ५३ सधियाँ हैं। जिनमें १९० कथाओ का समावेश है । अधिकाश कथानक उपर्युक्त हरिषेण कृत कथाकोशके समान ही हैं। तथापि भापा, शैली एवं काव्य गुणोंके कारण इस रचनाकी अपनी विशेषता है । यहाँ सुभग गोपाल व सुदर्शन सेठका चरित्र २२वी सधिके १६ कडवकोमें सम्पूर्ण हुआ है । यद्यपि इस ग्रन्थमें उसकी रचना-कालका उल्लेख नहीं है तथापि इन्ही श्रीचन्द मुनिका एक दूसरा ग्रन्थ भी पाया जाता है जिसका नाम दंसणकहरयणकरंड ( दर्शनकथा रत्नकरंड) है और उसमें उसका रचनाकाल विक्रम संवत् ११२३ निर्दिष्ट है । अतएव उनका प्रस्तुत कथाकोश इसी समयके कुछ काल पश्चात् रचित अनुमान किया जा सकता है। इसी विषयकी तीसरी रचना नयनन्दि कृत सुदंसणचरिउ (सुदर्शन चरित) है। यह अपभ्रंश भाषाका एक महाकाव्य कहा जा सकता है। यह काव्य गुणोंसे भरपूर है । यो तो समस्त अपभ्रंश रचनाएं अपने लालित्य एवं छन्द-वैचित्र्यके लिए प्रसिद्ध हैं तथापि यह काव्य तो ऐसे अनेक विविध छन्दोंसे परिपूर्ण पाया जाता है कि जिनका अन्यत्र प्रयोग व लक्षण प्राप्त नहीं होते हैं। कही-कही तो महाकविने स्वयं अपने छन्दोके नाम निर्दिष्ट कर दिये हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कविने अपना छन्द कौशल प्रकट करने के लिए ही इसकी रचना की हो । यह काव्य १२ संघियोमें समाप्त हुआ है । और ग्रन्थकी प्रशस्तिके अनुसार ही उसकी रचना अवन्ति ( मालवा ) प्रदेश की राजधानी धारा नगरीके बडविहार नामक जैन मन्दिरमें राजा भोजके समय विक्रम संवत् ११०० में हुई थी। इस 1 प्रस्तावना १३ ३ प्रकार इस काव्यका रचनाकाल हरिषेण कृत कथाकोशके पश्चात् व श्रीचन्द्र कृत कघाकोशके लगभग २५-३० वर्ष ही पूर्व सिद्ध होता है । रामचन्द्र मुमुक्षु कृत पुण्यास्रव कथाकोशमें पच-नमस्कार मन्त्रकी आराधना- का फल प्रकट करनेवाली आठ कथाएँ हैं जिनमें सुदर्शन सेठके अतिरिक्त सुग्रीव वैल, वन्दर, विन्ध्यश्री, अर्घदग्ध पुरुप, सर्प-सर्पिणी, कीचडमें फंसी हस्तिनी और दृढसूर्य चोरके कथानक भी है । उक्त रचनाओंके पश्चात् संस्कृतमें सुदर्शन विपयक एक पूर्ण चरित ग्रन्थ प्रस्तुत रचना है, जिसके रचनाकालके सम्बन्धमें आगे लिखा जाता है। ग्रन्थकार व रचनाकाल प्रस्तुत संस्कृत सुदर्शन-चरितके कर्ताने अपना नाम-निर्देश तथा गुरु-परम्परा- का कुछ परिचय अपनी रचनाके आदिमें, प्रत्येक अधिकारको अन्तिम पुष्पिकामे तथा अन्तिम प्रशस्तिमें दिया है । आदिमें समस्त तीर्थकरो, सिद्धो, सरस्वती, जिनभारती व गौतम आदि गणघरोकी वन्दना करने के पश्चात् उन्होने कुन्दकुन्द, उमास्वाति, समन्तभद्र, पात्रकेसरी, अकलंक, जिनसेन, रत्नकीर्ति और गुणभद्रका स्मरण किया है, और तत्पश्चात् भट्टारक प्रभाचन्द्र और सूरिवर देवेन्द्रकी निको क्रमश नमन करके कहा है कि ये जो दीक्षा रूपी लक्ष्मीका प्रसाद देनेवाले मेरे विशेष रूपसे गुरु है, उनका सुसेवक मैं विद्यानन्दी भक्ति सहित वन्दन करता हूँ। ( १, ३१ ) इसके आगे उन्होने आशाधर सूरिका भी स्मरण किया है, तथा प्रत्येक पुष्पिकामें प्रस्तुत कृतिको मुमुक्षु-विद्यानन्दि-विरचित कहा है। ग्रन्थके अन्तिम पद्योमें ग्रन्थकारको गुरु परम्पराका और भी स्पष्ट व विस्तृत वर्णन पाया जाता है। वहां कहा गया है कि मूलसंघ, भारती गच्छ, बलात्कार गण व कुन्दकुन्द मुनीन्द्रके वंश, महामुनीन्द्र प्रभाचन्द्र हुए। उनके पट्टपर मुनि पद्मनन्दी भट्टारक और उनके पट्टपर देवेन्द्रकीर्ति मुनि चक्रवर्ती हुए, जिनके चरण-कमलोंकी भक्तिसे युक्त विद्यानन्दीने इस चरित्रकी रचना की। विद्यानन्दीके पट्टपर मल्लिभूपण गुरु हुए तथा श्रुतसागरसूरि सिंहनन्दी भी गुरु हुए। गुरुके उपदेशोंसे इस शुभ- चरित्रको नेमिदत्तव्रतीने भक्तिसे भावना की। ( १२, ४७, ५१ ) इस परसे इस सुदर्शन चरितके कर्ता विद्यानन्दीकी गुरु-परम्परा निम्न प्रकार पायी जाती है- १४ सुदर्शन चरितम् मूलसंघ सरस्वती गच्छ, बलात्कारगण, कुन्दकुन्दान्वय-प्रभाचन्द्र, पद्मनन्दी, देवेन्द्र- कीति और विद्यानन्दि ( अन्थकार); विद्यानन्दिके चार शिष्य मल्लिभूषण, श्रुत. गर, सिंसाहनन्दि और नेमिदत्त । इस पट्टावलिके अतिरिक्त ग्रन्थमें उसके रचनाकाल सम्बन्धी कोई सूचना नही पायी जाती । हाँ, जिस प्राचीन हस्तलिखित प्रतिपरसे प्रस्तुत संस्करण तैयार किया गया है उसकी ग्रन्थ-समाप्ति व अन्तिम पुष्पिकाके पश्चात् लिखा है "शुभं- भवतु" ॥ छ । ग्रन्थ संख्या श्लोक १३६२ ।। संवत् १५९१ वर्षे अखाड (आपाढ) मासे शुक्ल पक्षे ॥ यद्यपि यहाँ यह स्पष्ट सूचित नही किया गया कि उक्त काल निर्देश ग्रन्थ-रचनाका है या प्रति लेखनका तथापि अन्य उपलभ्य प्रमाणो परसे यही प्रमाणित होता है कि वह प्रति लेखन-काल है, रचना-काल नहीं। पूर्वोक्त परम्पराका उल्लेख अन्य अनेक ग्रन्यो तथा शिलालेखोमें भी पाया जाता है, जिनके लिए देखिए डॉ० जोहरापुरकर कृत भट्टारक सम्प्रदाय ( जीवराज जैन ग्रन्थमाला ८, शोलापुर, १९५८ )। इसमे वलात्कारगण संबन्धी मूल शिलालेखो व प्रशस्तियोके पाठ कालकमसे उद्धृत हैं, तथा उनपरसे ज्ञात गुरुपरम्पराओका परिचय भी व्यवस्थासे कराया गया है। इस सामग्रीके अनुसार बलात्कारगणका सबसे प्राचीन और स्पष्ट उल्लेख उत्तरपुराण टिप्पणमें किया गया है जहां विक्रमादित्य संवत्सर १०८० में भोज देवके राज्यमें बलात्कारगणके श्रीनन्दि आचार्यके शिष्य श्रीचन्द्र मुनि द्वारा उस टिप्पण के रचे जानेकी वात कही गयी है। धारवाड जिलेके गावरवाड नामक स्थानमे एक ऐसा भी शिलालेख मिला है जिसमें मूल संघ व नन्दिसंघके बलगार गणका उल्लेख है (जै० शि० सग्रह भाग चार १५४. मा० दि० ज० ग्र० ४८ भारतीय ज्ञानपीठ, वाराणसी १९६२) यह शक ९९३ ( वि० सं० ११२८ ) का है। किन्तु इसमें जो माठ आचार्योकी परम्पराका उल्लेख और उसोके समान एक अगले लेख क्र० १५५ में जो तीन आचार्योंका उल्लेख हुआ है उसपरसे अनुमान होता है कि इस गणका अस्तित्व कोई डेढ पौने दो सौ वर्ष पूर्व अर्थात् विक्रम संवत् ९५० के लगभग भी था । वलगार और बलात्कारगण एक ही प्रतीत होते हैं। कालान्तरमें इस गणकी x प्रस्तावना १५ अनेक शाखाएं स्थापित हुई जैसे कारंजा व जेरहट, सं० १५०० के लगभग, उत्तर भारत की कुछ शाखाएँ सं० १२६४ के लगभग, दिल्ली, जयपुर, ईडर व सूरत शाखा सं० १४५०, नागोर व अटेर सं० १५८०, भानपुर, सं० १५३० के लगभग तथा लातूरमें सं० १७०० के लगभग शाखाएं स्थापित हुई। प्रस्तुत ग्रन्यमें बलात्कारगणके जिन आचार्योंका उल्लेख पाया जाता है वे उत्तर भारत तथा मूरतको शाखा मे हुए पाये जाते हैं। उत्तरको शाखामें प्रभा- चन्द्रका काल सं० १३१० से १३८५ तक और पद्मनन्दिका सं० १३८५ से सं० १४५० तक प्रमाणित होता है । पद्मनन्दिके शिष्य देवेन्द्रकोतिने सूरतको शाखाका प्रारम्भ किया । उनका सबसे प्राचोन उल्लेख स० १४९९ वैशाख कृष्ण ५ का उनके द्वारा स्थापित एक मूत्तिपर पाया गया है। उन्होके पट्ट-शिष्य प्रस्तुत ग्रन्थके कर्ता विद्यानन्दि हुए, जिनके सम सामयिक उल्लेख उनके द्वारा प्रतिष्ठित करायी गयी मूर्तियो पर स० १४९९ से सं० १५३७ तक पाये गये हैं ( भट्टा० सम्प्र० क्र० ४२७-४३३ )। विद्यानन्दिके गृहस्थ जीवन सम्बन्धी कोई वृत्तान्त ग्रन्थ-प्रशस्तियो या अन्य लेखोमे नही पाया जाता। केवल एक पट्टावली (जै० सि० भास्कर १७ पृ० ५१ व भट्टा० सम्प्र० क्र० ४३९ ) में अष्टशाखा-प्राग्वाटवंशावतंस तथा 'हरिराज- कुलोद्योतकर' कहा गया है जिससे ज्ञात होता है कि वे प्राग्वाट (पौरवाड ) जाति के थे, तथा उन के पिता का नाम हरिराज था। पोरवाड जाति में अथवा उस के किसी एक वर्ग में आठ शाखो की मान्यता प्रचलित रही होगी, जैसा कि परवार जाति में भी पाया जाता है। प्राग्वाट जाति का प्रसार प्राचीन कालसे गुजरात प्रदेशमे पाया जाता है। इसी प्रदेश की प्राचीन राजधानी श्रीमाल (आधुनिक भीनमाल थी) जो आवूके प्रसिद्ध जन मन्दिर विमलवसहीके निर्माता प्राग्वाटवशीय मंत्री विमलशाहका पत्रिक निवास स्थान था। इस प्राग्वाटजातिमें विद्यानन्दिके गुरु भट्टारक देवेन्द्र- कीतिका विशेप मान रहा पाया जाता है। उन्होने पौरपाटान्वयको अष्टशाखावाले एक श्रावक द्वारा सवत् १९९३ में एक जिन मूर्तिकी स्थापना करायी थी ( भट्टा० सम्प्र० ४२५ ) संवत् १६४५ में धर्मकीति द्वारा प्रतिष्ठापित मूर्तिपर पौरपट्ट मुदर्शनचरितम् छितिरा मूर, गोहिल गोत्रके गृहस्थ साधु दीनूका उल्लेख है। (लेख ५२५ ) प्राग्वाट, पौरपाट व पौरवाड एक ही जातिके वाचक है । आश्चर्य नहीं जो मट्टा० देवेन्द्रकीर्ति भी इसी जातिमें उत्पन्न हुए हो और उन्हीके प्रभावसे विद्यानन्दि उनके द्वारा दीक्षित हुए हो। सं० १४९९ के मूर्तिलेखमें उन्हें मुनि देवेन्द्रकीतिके शिष्य मात्र कहा गया है। किन्तु स० १५१३ के मूर्तिलेखमें उनका श्री देवेन्द्र- कीति-दीक्षित आचार्य श्री विद्यानन्दि रूपसे उल्लेख हुआ है। सं० १५३७ के मूर्तिलेखमें वे 'देवेन्द्रकीर्तिपदे' विद्यानन्दि कहे गये है। अत उससे पूर्व ही वे अपने गुरुके पट्टपर अधिष्ठित हो चुके थे। विद्यानन्दिने भ्रमण भी खूब किया था। पट्टावलीके अनुसार उन्होने सम्मेदशिखर, चम्पा, पावा, ऊर्जयन्त ( गिरनार ) आदि समस्त सिद्ध क्षेत्रोकी तीर्थ-यात्रा की थी। तथा उनका सम्मान राजाधिराज महामण्डलेश्वर वज्राग-गंग- जयसिंह-व्यात्र-नरेन्द्र आदि द्वारा किया गया था। इन माण्डलिक राजामोकी ऐतिहासिक जानकारी उपलभ्य नही है। उनके द्वारा प्रतिष्ठित करायी गयी मूर्तियोमें हूमड जातीय श्रावकोके अधिक उल्लेख हैं। अन्य जाति व वर्ग सम्बन्धी उल्लेखोमें काष्ठासंव-हुवड वंश, सिंहपुरा जाति राइकवाल (रैकवाल ) जाति, गोलाअंगार (गोलसिंगारे ) वंश, पल्लीवाल जाति तथा अनोतक अन्वय ( अगरवाल ) के नाम आये हैं। अधिकाश लेख मूर्ति-प्रतिष्ठा सम्वन्धी होनेसे स्पष्ट है कि इस कालके भट्टारको द्वारा धर्मप्रचार हेतु यह कार्य विशेप रूपसे अपनाया गया था । उक्त समस्त उल्लेखोसे विद्यानन्दिके कार्य-कलापोका काल विक्रम सं०१४९९ से १५३८ तक पाया जाता है। इस कार्यकालके भीतर प्रस्तुत रचना कब और कहां की गयी इसका सकेत हमें प्रस्तुत ग्रन्थके अन्तिम अधिकारके ४२खें पद्यमें मिलता है। जहाँ कहा गया है कि इस पवित्र सुदर्शन चरित्रकी रचना उन्होने गंधारपुरीके छत्र-ध्वजा मादिसे सुशोभित जैन मन्दिरमें की थी। गंधारनगर या गंधारपुरीका उल्लेख सेन गणकी सूरत शाखाके भट्टारको सम्बन्धी अनेक लेखोमें प्राप्त होता है। महीचन्द्रके शिष्य जय-सागर द्वारा संवत् १७३२ मे रचित सीताहुणर नामके गुजराती रासमें गंधारनगरका उल्लेख है तथा इस ग्रन्थकी प्रस्तावना १७ रचना सूरत नगरके आदिनाथ मन्दिरमें हुई कही गयी है। गणितसारसंग्रह को एक प्रतिको दान प्रशस्तिमें कहा गया है कि वह प्रति आचार्य सुमतिकोतिके उपदेशसे हुंबड जातिके एक श्रावक द्वारा स० १६१६ में ( गधार शुभस्थानके आदिनाथ चैत्यालय ) में दो गयो यो । विद्यानन्दिके शिष्य श्रुतसागर कृत लक्ष्मण पंक्ति कथामें भी गधार नगरका उल्लेख है। स्वयं विद्यानन्दि द्वारा प्रतिष्ठापित एक मेरुमूर्तिपर लेख है कि उसे गाघार वास्तव्य हुंबड-जातीय समस्त श्रीसघने सं० १५१३ में प्रतिष्ठित करायी थी। इन उल्लेखोसे ज्ञात होता है कि यह गधारपुरी या तो सूरत नगरका ही नाम था, या उसके किसी एक भागका अथवा उसके समीपवर्ती किसी अन्य नगरका, और वही सं० १५१३ के लगभग विद्यानन्दि द्वारा प्रस्तुत ग्रन्थको रचना हुई थी। आदर्श प्रति का परिचय सुदर्शन चरितका प्रस्तुत सस्करण मेरे सग्रह को एक मात्र प्रति परसे किया गया है । यह इस कारण सभव हुआ है कि यह प्रति प्राय. शुद्ध है, तथा भापा संस्कृत होनेके कारण लिपिकारकृत वर्ण-मात्रादि सम्बन्धी अशुद्धियां सरलतासे शुद्ध की जा सकी है। प्रतिमें अनुनासिक वर्णोका प्रयोग अव्यवस्थित है, किन्तु उसे. मूर्तिदेवी ग्रन्थमाला सम्बन्धी पाठसशोधनके नियमोके अनुसार रखनेका प्रयत्न किया गया है । आदर्श प्रति १२ इंच लम्बी व ५ इच चौडी है । प्रत्येक पृष्ठपर ११ पक्तियां, तथा प्रत्येक पंक्ति में लगभग ४० अक्षर है पत्र संख्या ५७ है। प्रत्येक पृष्ठके दाये-बाये तथा नीचे-ऊपर एक इचका हासिया है, जिसपर गुजरातीमें टिप्पण लिखे गये हैं। ग्रन्थके आदिमें उ नम. सिद्धेभ्य. तथा अतिम पुष्पिकाके पश्चात् ॥श्रुभंभवतु।। || अथ सख्या श्लोक १३६२॥ ॥संवत् १५९१ वर्षे अखाड मासे शुक्ल पक्षे। इससे ज्ञात होता है कि प्रति संवत् १५९१ आषाढशुक्ल पक्षमें लिखी गयी थी।

१८ सुदर्शनचरितम् सुदर्शन-चरित : विपय-परिचय : अधिकार १-महावीर-समागम गुणभद्र, प्रभा- वृषभादि चौवीस तीर्थंकरोकी वन्दना (१-१५ ) त्रिकालवी अन्य जिनेन्द्रोसे शक्तिको प्रार्थना (१६) सिद्धोकी सस्तुति (१७) सरस्वतीकी सस्तुति (१८) जिन- वाणीकी स्तुति (१९) गौतम आदि गणधरोको नमस्कार (२०) कुन्दकुन्द, उमास्वामी, समन्तभद्र, पात्रकेसरी, अकलंक, जिनसेन, रत्नकीर्ति, गुणभद्र, चन्द्र, देवेन्द्रकीर्ति, आशाधर मुनियोका सस्मरण तथा ग्रन्थ रचनाको प्रतिज्ञा (२१-३३), आत्मविनय व सुदर्शन चरितका माहात्म्य (३४-३६), जम्बूद्वीप, भरतक्षेत्र, मगधदेश व राजगृह नगर (३७-५७), राजा श्रेणिक, रानी चेलना व वारिपेण आदि पुत्रोका वर्णन (५८-६८) विपुलाचलपर महावीर स्वामीका आगमन व उसका पर्वत तथा पशुओपर प्रभाव (६९-७७), वनपालका राजा श्रेणिकके सवाद व राजाका प्रजाजनो सहित चलकर समवसरण दर्शन (७८-८९), समवसरणमें मानस्तम्भ, सरोवर, खातिका, पुष्पवाटिका, गोपुर, नाटयशाला, उपवन, वेदिका सभा, रूप्यशाला, कल्पवृक्ष-वन, हावली, महास्तूप, स्फटिक- शाला तथा जिनेन्द्रके सभा-स्थानका त्रिमेखलापीठ दिव्य चमर, अशोक वृक्ष आदि- का वर्णन (९०-११७), श्रेणिक द्वारा जिनेन्द्रकी पूजा व स्तुति (११८-१३१) । अधिकार २-श्रावकाचार तत्त्वोपदेश जिनेन्द्र स्तुति (१), श्रेणिक नरेशका गौतमसे धर्म विषयक प्रश्न (२), दर्शन-ज्ञान-चारित्र, अणुव्रत-महाव्रत सप्ततत्त्व, एव कर्मवन्ध और मोक्ष (३-८८)। अधिकार ३-सुदर्शन-जन्म-महोत्सव राजा श्रेणिकका गौतम गणधरसे पचम अन्तकृत्केवली सुदर्शन मुनिके चरित्र वर्णनकी प्रार्थना (१-४), गौतम स्वामीका उत्तर । अग देशका वर्णन (५-३०), चम्पापुरी वर्णन (३१-४२), राजा घात्रीवाहनका वर्णन (४३-५१), रानी अभय- प्रस्तावना मतीका वर्णन (५२-५५), सेठ वृषभदासका वर्णन (५६-६२), सेठानी जिनवतोका वर्णन (६३-६७), सेठानीका स्वप्न तथा पतिसे निवेदन (६८-७२), सेठ वृषभदास द्वारा रानीके स्वप्न सुनकर प्रसन्नता । जिनमन्दिर गमन । ज्ञानी गुरुसे प्रश्न तथा मुनि द्वारा स्वप्नो का फल वर्णन (७३-८३), सेठानीको प्रसन्नता व गृहगमन (८४-८७), सेठानीका धर्मधारण व धर्मचर्या (८८-९२), पुत्र जन्म और उसका महोत्सव (९३-१०७)। अधिकार ४-सुदर्शन-मनोरमा-विवाह बालक सुदर्शनका संवर्धन व सौन्दर्य (१-२६), सुदर्शनका विद्या-ग्रहण (२७-३५), उसी नगरके सेठ सागरदत्त और सेठानो सागरमेनाकी पुत्री मनोरमा और उसका रूप वर्णन (३६.५८), सुदर्शनका अपने मित्र कपिलके साथ नगरका पर्यटन व पूजाके निमित्त जाती हुई मनोरमाके दर्शन (५९-६४) सुदर्शनका अपने मित्र कपिलसे उसके सम्बन्धमें प्रश्न, तथा कपिल द्वारा उसका परिचय (६५-८१), कुमारका मोहित होना। घर आकर शया-ग्रहण । अन्न-पान विस्मरण । मोहयुक्त प्रलाप (७२-७६), पिताकी चिन्ता तथा कपिलसे कुमारकी दशाके कारणको जानकारी (७७-७९), पिताका सागरदत्तके घर जाना। वहीं मनोरमाकी भी काम-दशा (८०-८८), सेठ वृपभदास और सागरदत्तका वार्तालाप । विवाहका प्रस्ताव व स्वीकृति, ज्योतिषीका आगमन एवं विवाह-तिथिका निर्णय । पूजा- अर्चन तथा विवाहोत्सव (८९-११७) । अधिकार ५-सुदर्शनकी श्रेष्ठिपद-प्राप्ति दम्पतिके भोगोपभोग व मनोरमाका गर्भधारण व पुत्र-जन्म (१-५) वृषभ- दास सेठका धर्माचरण । समाधिगुप्त मुनिका आगमन । वनपालका भूपतिसे निवेदन तथा भूपतिका वृपभादि नगरजनो सहित मुनिके दर्शनहेतु तपोवन गमन । मुनि- वन्दन एव मुनिका धर्मोपदेश (६-२३)। मुनि और श्रावकके भेदसे धर्माचरणका उपदेश (२४-६२), राजा तथा भव्यंजनो द्वारा व्रतग्रहण एव वृपभदास सेठकी वैराग्य-भावना (६३-७३)। सेठको मुनिसे दीक्षा देनेकी प्रार्थना तथा मुनिकी अमनुति । सेठ द्वारा राजासे सुदर्शनके पालनको प्रार्थना । राजाकी स्वीकृति एवं २० सुदर्शनचरितम् सेठका अपने बन्धु-बान्धवोंसे पूछकर दीक्षाग्रहण (७४-८६), सेठानी जिनमती द्वारा आर्यिका-व्रतग्रहण तथा दोनोको स्वर्ग-प्राप्ति (८७-१०), सुदर्शनका श्रेष्ठिपद पाकर सुखभोग और धर्माचरण (९१-१०१)। अधिकार ६-कपिलका प्रलोभन तथा रानी अभयमतिका व्यामोह सुदर्शनका नगर-भ्रमण । कपिला द्वारा दर्शन व मोहोत्पत्ति (१-६), कपिल के बाहर जानेपर सखीको भेजकर कपिलके ज्वर-पोडित होनेके वहाने सुदर्शन सेठको अपने पास बुलवाना और उससे काम-क्रीडाको प्रार्थना करना (७-३२), सुर्शदनका चकित होना। एकनारी व्रतका स्मरण एव नपुंसक होनेका वहाना बनाकर छुटकारा पाना (३३-४७) । वसन्तऋतुका आगमन । राजाका वन-क्रीडा हेतु नागरिकों सहित वनगमन (४८-५४), रानोका सुदर्शनके रूपपर मोहित होना तथा कपिला द्वारा उसे पुरुपत्वहीन बतलाना (५५-५८)। रानीका मनोरमाको पुत्र सहित देखकर कपिलाके वचनोका अविश्वास तथा सुदर्शनसे रमण करनेको प्रतिज्ञा (५९-६९), राजभवन आकर रानीका व्याकुल होना । पडिता धात्रीका उसे समझाना । रानीका हठ-आग्रह और पडिता द्वारा विवश होकर उसको अभिलापा पूर्ण करनेका वचन देना (७०-१०८)। अधिकार ७-असयाकृत उपसर्ग निवारण व शील-प्रभाव वर्णन सुदर्शन सेठका धर्म-पालन तथा अष्टमादि पर्वके दिनोमे उपवास और रात्रिमें श्मगानमें योग-साधन (१-३), यह जानकर पंडिता द्वारा कुंभकारसे सात पुरुषाकार पुतलियोका निर्माण तथा एक पुतलीको लेकर राजमहलके प्रवेशद्वारमें द्वारपालसे झगडा तथा उसपर रानीके व्रत भंग होनेका आरोप लगाकर उससे नमान्याचना कराना और इसी प्रकार एक-एक पुतली लेकर समस्त द्वारपालो को वशीभूत कर लेना ( ४-२० ) । अष्टमीके दिन पंडिताका श्मशानमें जाकर सुदर्शन सेठको लुभानेका प्रयत्न करना और उसके शीलमें अटल रहनेपर उमे बन्न पूर्वन रानोके शयनागारमें पहुँचाना (२१-६२) । अभयारानी द्वारा सुदर्शनको लुभानेका प्रयत्न किन्तु उसके प्रस्तावको अस्वीकार करने के कारण रानीका पश्चा- त्ताप । सेठको यथास्थान वापस भेजनेका विचार, किन्तु सूर्योदय समीप होनेसे प्रस्तावना पण्डिताको अस्वीकृति होनेपर रानी द्वारा सेठपर वलात्कारके दोषारोपणका प्रयत्न (६३-८७)। राजा द्वारा रानीको वात सुनकर सेठको राजद्रोही होनेका अपराधी ठहराना व श्मशानमें ले जाकर प्राणघातका आदेश । ( ८८-९१ )। राजसेवको- का संशय किन्तु राजादेशकी अनिवार्यताके कारण सेठको श्मशानमें ले जाना ( ९२-९८)। इस वातासे नगरमें हाहाकार व मनोरमाका श्मशान में जाकर विलाप (९९-११४) । सुदर्शनका ध्यानमें रहते हुए संसारकी अनित्यादि भावनाएं ( ११५-१२० ) । सेठपर खड्ग प्रहार किये जानेके समय यक्षदेवके आसनका कम्पन । प्रहारोका स्तम्भ तथा सेठपर पुष्पवृष्टि एवं नगरजनोका हर्ष ( १२१- १२६ )। राजा द्वारा अन्य सेवकोंका प्रेषण व उनके भी यक्ष द्वारा कीलित किये जानेपर सैन्य सहित स्वयं आगमन ( १२७-१२९)। राज-सेना व यक्षदेव द्वारा निर्मित मायामयी संन्यके बीच घोर संग्राम ( १३०-१३३)। राजाका पराजित होकर पलायन व यक्ष द्वारा उसका पीछा करना (१३४-१३७)। राजाका सुदर्शनकी शरणमें आना और सेठ द्वारा उसकी रक्षा करना ( १३८-१४२)। यक्षको सेना द्वारा सुदर्शनको पूजा कर यथास्थान गमन । शील प्रभाव वर्णन ( १४२-१४५ )। अधिकार ८-सुदर्शन व मनोरमाका पूर्वभव वर्णन अभया रानीने सेठ सुदर्शनके पुण्य प्रभाव सुनकर भयभीत हो फांसी लगाकर आत्मघात कर लिया और मरकर पाटलिपुत्रमें व्यन्तरी देवीके रूपमें उत्पन्न । पण्डिता चम्पापुरीसे भागकर पाटलिपुत्रमें देवदत्त नामक वेश्या के पास पहुंची और उसे अपना सव वृत्तान्त सुनाया। देवदत्तने अपनी चातुरीसे सुदर्शनको अपने वशमें करनेकी प्रतिज्ञा की ( १-१०), उधर राजा धात्रीवाहनने सच्ची बात जानकर पश्चात्ताप किया, सुदर्शन सेठसे क्षमा याचना की तथा आघा राज्य स्वीकार करनेकी प्रार्थना की ( ११-१७)। सुदर्शनने राजाको सम्बोधन किया । अपने दु.खको अपने ही कर्मोका फल बतलाया तथा मुनिदीक्षा लेनेका अपना निश्चय प्रकट किया। (१८-२३ ), सुदर्शन जिन मन्दिरमें गया । जिनेन्द्रकी पूजा व स्तुति की तथा विमलवाहन मुनिसे अपने पूर्वभव सुननेकी इच्छा प्रकट को ( २४-४०)। मुनिने उसके पूर्व भवका इस प्रकार वर्णन किया--भरत क्षेत्र- २२ सुदर्शनचरितम् - के विन्ध्य प्रदेशमें कौशलपुर । वहीं राजा भूपाल व रानी वसुन्धरा । उनका पुत्र लोकपाल शूरवीर और बुद्धिमान (४१-४४ ) । एक बार राजाके सिंहद्वार पर रक्ष-रक्षकी पुकार । मन्त्रीने जानकारी दी कि वहां से दक्षिण दिशामें विन्ध्य- गिरिपर व्याघ्र भील तथा कुरंगी भीलनीका निवास । व्याघ्रकी क्रूरता व प्रजा पीड़न । इस कारण प्रजाकी पुकार ( ४५-४९ )। राजाका उस भीलको पराजित करने हेतु सेनापतिको आदेश । भील राज्य द्वारा सेनापतिका पराजय । राजपुत्र लोकपाल द्वारा व्याघ्र भीलका हनन । व्यानका कूकर योनिमें जन्म और फिर कुछ पुण्यके प्रभावसे चम्पामें नर जन्म और फिर मरकर उसी नगरमें सुभग- गोपाल के रूप में जन्म व वृषभदास सेठ का ग्वाल होना ( ५०-६२), सुभग गोपालका वनमें मुनिदर्शन ( ६३-६७ )। मुनिके आधार व गुणोका विस्तारसे वर्णन ( ६८-८७)। कठोर शीतसे अप्रभावित ध्यानमग्न मुनिको देखकर गोपके हृदयमें आदर भावनाका उदय । अग्नि जलाकर मुनिकी शीतबाधाको दूर करनेका प्रयत्न व रात्रिभर गुरुभक्तिमें तल्लीनता ( ८८-९४ ) । प्रात काल सव कार्योका साधन सप्ताक्षर महामन्त्र गोपको देकर मुनिराजका आकाश मार्गसे विहार (९४- १०१ ) । गोपालका सदाकाल उस मन्त्रका उच्चारण व सेठ द्वारा पूछे जानेपर वृत्तान्त कथन । सेठ द्वारा उसकी धर्म बुद्धिको प्रशंसा व उसके प्रति अधिक वात्सल्य भावसे व्यवहार (१०१-१९१ )। एक बार गोपका वनमें गाय भैसो- को चराना। भैंसोंका नदी पार चले जाना, उनके लौटाने हेतु गोपालका नदीमें प्रवेश व एक ठूठसे टकराकर पेट फटनेसे मृत्यु । मन्त्रके स्मरण सहित निदान करनेसे उसका सुदर्शनके रूपमें सेठ वृषभदासके यहाँ जन्म । मन्त्रका प्रभाव वर्णन (११२-१२५ ), कुरंगी नामक भीलनीका बनारसमें भैसके रूपमें जन्म फिर घोवीकी पुत्रीके रूपमें और वहां किंचित् पुण्यके प्रभावसे मरकर मनोरमाके रूपमें जन्म । धर्मका माहात्म्य ( १२५-१३२ )। अधिकार ९-द्वादश अनुप्रेक्षा वर्णन मुनिराजसे अपना पूर्वभव सुनकर व ससारको क्षणभगुरताका विचार करते हुए अब्रुव, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचित्व, आस्रव, संवर, निर्जरा लोक, वाघि और धर्म इन वारह भावनाओंके स्वरूपका विचार (१-५१) ।

प्रस्तावना - अधिकार १०-सुदर्शन का दीक्षाग्रहण और तप सुदर्शनका अपने पुत्र सुकान्तको अपने पदपर प्रतिष्ठित कर मुनिदीक्षा ग्रहण करना (१-७)। सुदर्शनके चरित्रसे प्रभावित हो राजा घात्रीवाहनका भी अपने पुत्रको राज्य दे मुनि होना । रानियोका भी तप स्वीकार करना तथा अन्य भन्यजनो द्वारा श्रावकके व्रत अथवा सम्यक्त्व ग्रहण करना ( ८-१९) । सुदर्शन द्वारा मुनिचर्याका पालन एवं नागरिको द्वारा सुदर्शन मनोरमा एव राजाके चरित्र- की प्रशंसा । आहारदान व भक्ति (२०-४५) । सुदर्शनका ज्ञानार्जन, गुरुभक्ति एवं मुनिव्रतोंका परिपालन ( ४६-४९) । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं परिग्रह त्याग इन पांच व्रतोका और उनकी पच्चीस भावनाओंका पांच प्रवचन, माताओ- का पंचेन्द्रिय संयम केशलोच, परिग्रह-जय तथा वन्दना सामायिक आदि गुणोका परिपालन ( ५०-१४८)। अधिकार ११-केवलज्ञानोत्पत्ति धर्मोपदेश करते हुए सुदर्शन मुनिका ऊर्जयन्तादि सिद्ध क्षेत्रोको वन्दना कर पाटलिपुत्र नगरमें आहार निमित्त प्रवेश (१-६) पण्डिता धात्रोके संकेतपर देवदत्ता गणिका द्वारा श्राविकाका वेश धारणकर मुनिराजका आमन्त्रण तथा अपने यौवन और वैभव द्वारा उनका प्रलोभन (७-१६) । मुनि द्वारा ससारके स्वरूप शरीरकी अपवित्रता और क्षणभंगुरता भोगोकी भयंकरता व वैभवकी चचलता आदिका उपदेश देकर स्त्री स्वभावका चिन्तन करते हुए ध्यानमें तल्लीनता (१७.३०) । देवदत्ताने मुनिको अपने यौवनादि द्वारा प्रलोभित करनेकी तीन दिन तक चेष्टा की और अन्तत निराश होकर मुनिराजको श्मशानमें लाकर छोड दिया (३१-३७) । जो अभया रानी आर्तध्यानसे मरकर व्यन्तरो हुई थी उसका विमान आकाश मार्ग- में स्खलित होनेसे उसने मुनिको देखा और उन्हें पहिचान कर बदलेको भावनासे घोर उपसर्ग करना प्रारम्भ किया। यक्षने आकर मुनिकी रक्षा को। व्यन्तरीने मुनिसे सात दिन तक युद्ध किया और अन्तत. परास्त होकर भाग गयी । (३८-४३) मुनिका निश्चल ध्यान । नाना गुणस्थानों द्वारा कर्मप्रकृतियोंका क्षय (४४-५७) । सुदर्शन मुनि द्वारा क्रमसे कर्म क्षय कर केवलज्ञान तथा वर्धमान तीर्थकरके तीर्थ में अन्तकृत केवली पदको प्राप्ति (५८-६०) । इन्द्रासनका कम्पायमान होना । देवोंका २४ सुदर्शनचरितम् आगमन, गन्वकुटी निर्माण, स्तुति तथा धर्मोपदेशकी प्रार्थना (६१-७६) । केवली द्वारा मुनि व श्रावक, आचार्यका तथा तत्त्वो, द्रव्यो व पदार्थका उपदेश (७७-८३) व्यन्तरीका कोप शमन और सम्यक्त्व ग्रहण (८४-८५) । सेठ सुकान्त व मनोरमाका आगमन व मनोरमा का आयिका व्रत धारण । पंडिताकी आत्मनिन्दा व व्रतग्रहण । केवलज्ञानकी महिमा (८६-९६) । अधिकार-१२ सुदर्शन मुनिकी मोक्षप्राप्ति सुदर्शन केवलीका मोक्ष विहार व धर्मोपदेश व आयुके अन्तमें छत्र चमरादि विभूतिका त्याग कर मौन ध्यान अयोग केवलो गुणस्थानकी प्राप्ति । अधाति कर्मोका क्रमश क्षय तथा सिद्ध बुद्ध व निरावाघ होकर शरीरका त्याग मोक्ष गमन (१-१७)। सिद्धोके गुण तथा पंचनमस्कार मंत्रका माहात्म्य (१८-३७) । सुदर्शन चरित्रको पढने-पढाने तथा लिखने एवं सुनने वालोको सुख एवं मोक्षको प्राप्ति (३८-३९)। गौतम स्वामीसे यह चरित्र सुनकर राजा श्रेणिक व अन्य नगरवासियोका राज- गृह लौटना (४०-४१) । गंधारपुरीके जैन मंदिरमें इस सुदर्शन चरित्रके रचे जानेको सूचना (४२)। सुदर्शन चरित्र तथा पंचपरमेष्ठीको महिमा (४३-४६) । मूलसघ भारतीय-गच्छ बलात्कार गणके मुनि कुन्दकुन्द के वंशमें प्रभाचन्द्र मुनि उनके पट्ट पर मुनि-पद्मनन्दि भट्टारक उनके पट्टपर देवेन्द्रकोर्ति मुनि उनके शिष्य विद्यानन्दि द्वारा यह चरित्र रचे जानेकी सूचना (४७-४९)। देवेन्द्रकीतिके पट्टपर मल्लिभूषण गुरु तथा श्रुतसागर-सूरि सिंहनन्दि गुरुका स्मरण और उसमें मंगल प्रार्थना (५०)। गुरुके उपदेशसे नेमिदत्तव्रती द्वारा इस चरित्रकी भावनाकी सूचना एवं ग्रंथ समाप्ति (५१)। ५ विद्यानन्दि-विरचित सुदर्शन-चरितम् प्रथमोऽधिकारः प्रणम्य वृपमं देवं लोकालोकप्रकाशकम् । अजितं जितशत्रुघ्नं जितशत्रुसमुद्भवम् ॥ १ ॥ संभवं भवनाशं च स्तुवेऽहमभिनन्दनम् । सर्वज्ञं सर्वदर्श च सप्ततत्त्वोपदेशकम् ॥ २॥ वन्दे सुमतिदातार चिदानन्द गुणाणवम् । पद्मप्रभं च तद्वर्ण प्रातिहार्यादिभूपितम् ।। ३ ।। सुपार्वं च सदानन्दं धर्मणीशं जगद्गुरुम् । धर्मभूषणसंयुक्तं स्तुवेऽहं जिनसप्तमम् ॥ ४॥ महासेनसमुद्भूतं चन्द्रचिह्न जिनं वरम् । चन्द्रप्रभं पुष्पदन्तं च श्वेतवर्ण स्तुवे सदा ॥ ५ ॥ शीतलं शीतलं वन्दे व्याधित्रयविनाशकम् । पञ्चसंसारदावाग्निशमनैकवनाधनम् ॥ ६ ॥ पावनं श्रेयसं वन्दे श्रेयोनिधिं सदा शुचिम् । वासुपूज्यं जगत्पूज्यं वसुपूज्यसमुद्भवम् ।। ७॥ विमलं विमलं वन्दे देवेन्द्रार्चितपङ्कजम् । अकलङ्क पूज्यपादं स्तुवे प्रारब्धसिद्धये ॥ ८॥ अनन्तं च जिनं वन्दे संसारार्णवतारकम् । धर्म धर्मस्वरूपं हि भानुराजसमुद्भवम् ।। ९ ।।

२
सुदर्शनचरितम्
[१,१०-
शान्तिनाथ जगद्वन्द्यं जगच्छान्तिविधायकम् ।
चक्राडकं मृगचिह्नं च विश्वसेनसमुद्भवम् ।। १० ॥
कुन्थुनाथमहं वन्दे धर्मचक्रान्वितं सदा ।
कुन्थ्वादिजीवसदयं हृदये करुणान्वितम् ।। ११ ।।
अरनाथमहं वन्दे रत्नत्रयसमन्वितम् ।
रत्नत्रयप्रदातारं सेवकानां सदाहितम् ।। १२ ।।
मल्लिं कर्मजये मल्लं स्तुवेऽहं मुनिसुव्रतम् ।
नमीशं श्रीजिनं नौमि भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।। १३ ।।
नेमिनाथं नमाम्युच्चैः केवलज्ञानलोचनम् ।
चन्दे श्रीपार्श्वनाथं च प्रसिद्धमहिमास्पदम् ।। १४ ।।
संस्तुवे सन्मतिं वीरं महावीरं सुखप्रदम् ।
वर्धमानं महत्यादि महावीराभिधानकम् ।। १५ ॥
एते श्रीमज्जिनाधीशाः केवलज्ञानसंपदः ।
अन्यकालत्रयोत्पन्नाः सन्तु मे सर्वशान्तये ॥ १६ ॥
संस्तुवेऽहं सदा सिद्धान् त्रिलोकशिखरस्थितान् ।
येषां स्मरणमात्रेण सर्वसिद्धिः प्रजायते ॥ १७ ॥
जिनेन्द्रवदनाम्भोजसमुत्पन्नां सरस्वतीम् ।
संस्तुवे त्रिजगन्मान्यां सन्मातेव सुखप्रदाम् ॥ १८ ॥
यस्याः प्रसादतो नित्यं सतां वुद्धिः प्रसर्पति ।
प्रभाते पद्मिनीवोच्चैः तां स्तुवे जिनभारतीम् ।। १९ ।।
नमामि गुणरत्नानामाकरान् श्रुतसागरान् ।
गौतमादिगणाधीशान संसाराम्भोधितारकान् ॥२०॥
कवित्वनलिनीग्रामप्रबोधनदिवामणिम् ।
कुन्दकुन्दाभिधं नौमि मुनीन्द्रं महिमास्पदम् ॥ २१ ॥
जिनोत्तसप्ततत्त्वार्थसूत्रकर्ता कवीश्वरः।
उमास्वामिमुनिर्नित्यं कुर्यान्मे ज्ञानसंपदाम् ॥ २२ ॥

-१, ३५] प्रथमोऽधिकारः स्वामी समन्तभद्राख्यो मिथ्यातिमिरभास्करः । भन्यपझौघशंकर्ता जीयान्मे भावितीर्थकृत् ॥ २३ ।। विप्रवंशाग्रणीः सूरिः पवित्रः पाप्रकेसरी। सजीयाजिनपादाब्जसेवनैकमधुव्रतः॥ २४ ॥ यस्य वाकिरणनष्टा बौद्धौद्याः कौशिका यथा । भास्करस्योदये स स्यादकलकः श्रिये कविः ॥ २५ ॥ श्रीजिनेन्द्रमताम्भोधिवर्धनैकविधूत्तमम् । जिनसेनं जगद्वन्द्यं संस्तुवे मुनिनायकम् ।। २६ ।। मूलसंघाग्रणीनित्यं रत्नकीर्तिर्गुरुमहान् । रत्नत्रयपवित्रात्मा पायान्मां चरणाश्रितम् ॥ २७ ।। कुवादिमदमातङ्गविमदीकरणे हरिः। गुणभद्रो गुरुर्जीयात् कवित्वकरणे प्रभुः ॥ २८ ॥ भट्टारको जगत्पूज्यः प्रभाचन्द्रो गुणाकरः । वन्द्यते स मया नित्यं भव्यराजीवभास्करः ।। २९ ।। जीवाजीवादितत्त्वानां समुद्योतदिवाकरम् । वन्दे देवेन्द्रकीर्ति च सूरिवयं दयानिधिम् ।। ३० ।। मद्गुरुयो विशेषेण दीक्षालक्ष्मीप्रसादकृत् । तमह भक्तितो वन्दे विद्यानन्दी सुसेवकः ॥ ३१ ॥ सूरिराशाधरो जीयात् सम्यग्दृष्टिशिरोमणिः । श्रीजिनेन्द्रोक्तसद्धर्मपद्माकरदिवामणिः ।। ३२ ।। इत्याप्तभारतीसाधुसंस्तुति शर्मदायिनीम् । मङ्गलाय विधायोच्चैः सच्चरित्रं सतां ब्रुवे ॥ ३३ ॥ तुच्छमेधोऽपि संक्षेपात् सुदर्शनमहामुनेः । वृत्तं विधाय पूतोऽस्मि सुधास्पर्शोऽपिशर्मणे ॥३४॥ मत्वेति मानसे भक्त्या तच्चरित्रं सुखावहम् । वक्ष्येऽहं भव्यजीवानां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥ ३५ ॥ 1

सुदर्शनचरितम्
[१,३६-
श्रुतेन येन संपत्तिर्भवेल्लोकद्वये
शुभा
शृण्वन्तु साधवो भव्यास्तवृत्तं शर्मकारणम् ॥३६॥
अथ जम्बूमति द्वीपे सर्वद्वीपाब्धिमध्यगे ।
मेरुः सुदर्शनो नाम लक्षयोजनमानभाक् ।। ३७ ।।
यच्चतुर्पु वनेपूच्चैश्चतुर्दिक्षु समुन्नताः ।
जिनेन्द्रप्रतिमोपेताः प्रासादाः सन्ति शर्मदाः ॥ ३८ ॥
तस्य दक्षिणतो भाति भरतक्षेत्रमुत्तमम् ।
जिनानां पञ्चकल्याणैः पवित्रं शर्मदायकैः ।। ३९ ।।
तत्रास्ति मगधो नाम देशो भुवनविश्रुतः ।
यत्र स्वपूर्वपुण्येन संवसन्ति जनाः सुखम् ।। ४० ॥
योऽनेकनगरग्रामपुरपत्तनकादिभिः ।
नानाकाविभात्युच्चैः सुराजेव सुखप्रदः ।। ४१ ।।
धनैर्धान्यैः जनैर्मान्यैः सपदाभिश्च संभृतः ।
राजते देशराजोऽसौ निधिर्वा चक्रवर्तिनः ॥ ४२ ॥
यत्र नित्यं विराजन्ते पद्माकरजलाशयाः ।
स्वच्छतोयाः सुविस्तीर्णा महतां मानसोपमाः ।। ४३ ।।
इक्षुभेदै रसैरन्यैः सरसैः सत्फलादिभिः ।
यो नित्यं दर्शयत्युच्चैः सौरस्यं निजसंभवम् ।। ४४ ॥
यत्र मार्गे वनादौ च सफलास्तुड्गपादपाः ।
सुछायाः सज्जना वोच्चैर्भान्ति सर्वप्रतर्पिणः ।। ४५ ॥
यत्र देशे पुरे ग्रामे पत्तनेसुगिरी वने ।
जिनेन्द्रभवनान्युच्चैः शोभन्ते सद्ध्वजादिभिः ।। ४६ ॥
भव्या यत्र जिनेन्द्राणां नित्यं यात्राभिरादरम् ।
प्रतिष्ठाभिर्गरिष्ठाभिः संचयन्ति महाशुभम् ।। ४७ ।।
पात्रदानमहामानः सज्जनः परिवारिताः ।
धर्म कुर्वन्ति जैनेन्द्र श्रावका ग्त्रतान्विताः ॥४८॥

-१, ६१] . प्रथमोऽधिकारः यत्र नार्योऽपि रूपाब्याः सम्यक्त्वत्रतमण्डिताः। पण्डिता धर्मकार्येषु पुत्रसंपद्विराजिताः ।। ४९ ।। सद्वस्त्राभरणः पुण्यानपूजादिभिर्गुणैः । नित्यं परोपकाराद्यैर्जयन्ति म्म सुरागनाः ।। ५० ।। पुण्येन यत्र भव्यानां नेतयोऽपि कदाचन । भास्करस्योदये सत्यं न तिष्ठति तमश्चयः ॥ ५१ ।। वनादौ मुनयो यत्र रत्नत्रयविराजिताः । तत्त्वज्ञानैस्तपोध्यानैर्यान्ति स्वर्गापर्वर्गकम् ।। ५२ ।। इत्यादि संपदासारे तस्मिन् देशे मनोहरे । पुरं राजगृहं नाम पुरन्दरपुरोपमम् ।। ५३ ।। नानाहावलीयुक्तं शालत्रयविराजितम् । रत्नादितोरणोपेत गोपुरद्वारसंयुतम् ॥ ५४॥ स्वच्छतोयभृता खाता समन्ताद्यस्य शोभते । पवित्रा स्वर्गगड्गेव पद्मराजिविराजिता ।। ५५ ॥ यत्पुरं जिनदेवादिप्रासादध्वजपङ्क्तिभिः । आह्वयत्यत्र वा स्वस्य शोभातुष्टान्नरामरान् ॥ ५६ ॥ नानारत्नसुवर्णाद्यैर्मणिमाणिक्यवस्तुभिः । सभृतं संनिधान वा सज्जनानन्ददायकम् ।। ५७ ।। तत्राभूच्छ्रेणिको राजा क्षत्रियाणां शिरोमणिः । राजविद्याभिसयुक्तः प्रजाना पालने हितः ।। ५८ ।। श्रीमन्जिनेन्द्रपादाजसेवनैकमधुव्रतः । सम्यक्त्वरत्नपूतात्मा भावितीर्थकराग्रणीः ।। ५९ ॥ अनेकभूपसंसेव्यो महामण्डलकेश्वरः। दाता भोक्ता विचारक्षः स राजा वादिचक्रभृत् ॥ ६०॥ सप्ताङ्गर,ज्यसपन्नः शक्तित्रयविराजितः। पड़वर्गारिविजेताऽभून्मन्त्रपञ्चाङ्गचञ्चुधीः।। ६१ ।।

। सुदर्शनचरितम् [१,६२- तस्य राज्ये द्विजिह्वत्वं सर्प नैव प्रजाजने। कृशत्वं स्त्रीकटीदेशे निर्धनत्वं तपोधने ॥६२॥ प्रजा सर्वापि तद्राज्ये जाता सद्धर्मतत्परा । सत्यं हि लौकिकं वाक्यं यथा राजा तथा प्रजा ।। ६३ ।। कराभिघातस्तिग्मांशौ पाति तस्मिन् महीं नृपे । आसीन्नान्यत्र सर्वोऽतो लोकः शोकविवर्जितः॥ ६४ ।। तस्यासीच्चेलना नाना राज्ञी राजोवलोचना। पतिव्रतापताकेव जिनधर्मपरायणा।। ६५ ।। तस्या रूपेण सादृश्यी नोर्वशी न तिलोत्तमा । अद्वितीयाकृतिस्तस्मात्सा बभौ गृहदीपिका ॥ ६६ ॥ तथा तयोजिनेन्द्रोक्तधर्मकर्मप्रसक्तयोः। वारिषेणादयः पुत्रा वभूवुर्धर्मवत्सलाः ॥ ६७ ॥ प्रायेण सुकुलोत्पत्तिः पवित्रा स्यान्महीतले । शुद्धरत्नाकरोद्भूतो मणिर्वा विलसदद्युतिः ॥ ६ ॥ एवं तस्मिन् महीनाथे प्राज्यं राज्यं प्रकुर्वति । कदाचित्पुण्ययोगेन विपुलाचलमस्तके ॥ ६९ ॥ चतुस्त्रिंशन्महाश्चर्यैः प्रातिहाविभूषितः । वीरनाथः समायातो विहरन् परमोदयः ।। ७० ।। तस्य श्रीवर्द्धमानस्य प्रभावेन तदाक्षणे । सर्वेऽवकेशिनो वृक्षा वभूवुः फलसंभृताः ।। ७१ ।। आम्रजम्बीरनारङ्गनालिकेरादिपादपाः। सछायाः सफला जाताः संतुष्टा वा जिनागमे ॥ ७२ ॥ निर्जलाः सजला जाताः सर्वे पद्माकरादयः । प्रशान्ताः कानने शीघ्र ज्वलन्तो वनवह्नयः ॥ ७३ ॥ क्रूराः सिंहादयश्चापि मुक्तवैरा विरेजिरे। प्रशान्ताः सज्जना वात्र दयारसविराजिताः॥ ७४॥ त -1, ८६ ] प्रथमोऽधिकार. सारडग्यः सिंहशावांश्च गावो व्याघ्रीशिशून मुदा । मयूर्यः सर्पजान् प्रीत्या स्पृशन्ति स्म सुतान् यथा ।। ७५ ।। अन्ये विरोधिनश्चापि महिपास्तुरगादयः। पशवोऽपि श्रावका जाता भिल्लादिषु च का कथा ।। ७६ ॥ सत्यं जिनागमे जाते सर्वप्राणिहितंकरे । किं वा भवति नाश्चर्य परमानन्ददायकम् ।। ७७॥ 'इत्येव जिनराजस्य प्रभाव सविलोक्य च । संतुष्टो वनपालस्तु समादाय फलादिकम् ।। ७८ ॥ शीघ्रं तत्पुरमागत्य नत्वा तं श्रेणिकप्रभुम् । धृत्वा तत्प्राभृतं चाग्रे सजगौ शर्मदं वचः ॥ ७९ ॥ भो राजन् भवतां पुण्यैः केवलज्ञानभास्करः। समायातो महावीरस्वामी श्रीविपुलाचले ।। ८० ॥ तत्समाकर्ण्य भूपालः परमानन्द निर्भरः। तस्मै दत्वा महादानं समुत्थाय च ता दिशम् ।। ८१ ॥ गत्वा सप्तपदान्याशु परोक्षे कृतवन्दनः । जय त्वं वीर गम्भीर वर्धमान जिनेश्वर ।। ८२ ।। आनन्ददायिनी भेरी दापयित्वा प्रमोढतः । हस्त्यश्वरथसंदोहपदातिजनसयुतः ।। ८३ ।। स्वयोग्ययानमारूढग्छत्रादिकविभूतिभिः। वन्दितुं श्रीमहावीरं चचाल श्रेणिको मुदा ।। ८४ ॥ तां भेरी ते समाकर्ण्य सर्वे भव्यजनास्तथा । पूजाद्रव्यं समादाय सस्त्रीका निर्ययुतम् ।। ८५ ।। युक्तं ये धर्मिणो भव्या जिनभक्तिपरायणाः । धर्मकार्येषु ते नित्यं भवन्ति परमादराः ।। ८६ ॥ + - सुदर्शनचरितम् [१,८७- एवं स श्रेणिको राजा भव्यलोकैः पुरस्कृतेः। भेरीमृदङ्गगम्भीरनादर्जितदिक्तटः ।। ८७ ॥ देवेन्द्रो वा सुरैः सार्द्ध विपुलाचलमुन्नतम् । समारुह्य ददर्शोच्चैः समवादिसृति विभोः ।। ८८ ॥ तां विलोक्य प्रभुश्चित्ते संतुष्टः श्रेणिकस्तराम् । यथा वृषभनाथस्य कैलासे भरतेश्वरः ।। ८९ ॥ चतुर्दिक्षु महामानस्तम्भैस्तुङ्गः समन्विताम् । येषां दर्शनमात्रेण मानं मुञ्चन्ति दुशः ।। ९० ॥ तेषां सरासि सर्वासु दिक्षु पोडश संख्यया । स्वच्छतोयैः प्रपूर्णानि सतां चित्तानि वा ततः ॥२१॥ खातिका जलसम्पूर्णा रत्नकूलविराजिताम् । तापच्छिदं सतां वृत्तिमिवालोक्य जहर्प सः ।। ९२ ॥ जातीचम्पकपुन्नागपारिजातादिसंभवैः । नानापुष्पैः समायुक्तां पुष्पवाटी मनोहराम् ।। ९३ ।। स्वर्णप्राकारमुत्तुङ्गं चतुर्गोपुरसंयुतम् । मानुपोत्तरभूधं वा वीक्ष्य प्रीतिमगात्प्रभुः ॥ ९४ ।। नाट्यशालाद्वयं रम्यं प्रेक्षणीयं सुरादिभिः । देवदेवाङ्गनागीतनृत्यवादित्रशोभितम् ॥९५ ॥ अशोकसप्तपर्णाख्यचम्पकाम्राभिधानभाक् । नानाशाखिशताकीर्णं सफलं बनचतुष्टयम् ॥ ९६ ।। वेदिकां स्वर्ण निर्माणां चतुर्गोपुरसंयुताम् । समवादिमृतेर्लक्ष्म्या मेखलां वा ददर्श सः ॥ ९७ ॥ १ प्रती 'परिस्कृत' इति पाठ ।

९ -1, ११०] प्रथमोऽधिकारः स्वर्णस्तम्भाग्रसंलग्नध्वजबातैर्मरुधुतैः। तां सभामाह्वयन्ती वा नाकिनो वीक्ष्य तुष्टवान् ॥ ९८ ।। रूप्यशालं विशालं च गोपुरै रत्नतोरणैः । यशोराशिमिवालोक्य जिनेन्द्रस्य मुदं ययौ ॥ ९९ ॥ ततः कल्पद्रमाणां च वनं सारसुखप्रदम् । समन्ताद्वीक्ष्य संतुष्टो भूपालो न ममौ हृदि ॥ १०० ॥ स्वर्णरत्नविनिर्माणां नानाहावली शुभाम् । विश्रामाय सुरादीनां दृष्ट्वा हृष्टो नृपस्तराम् ।। १०१ ॥ चतुर्दिक्षु महास्तूपान् पद्मरागविनिर्मितान् । जिनेन्द्रप्रतिमोपेतान् पत्रिंशसुमनोहरान् ।। १०२ ।। रत्नतोरणसंयुस्तान सुरासुरसमर्चितान् । प्रभुस्तान् पूजयामास वस्तुभिः सज्जनैर्युतः॥ १०३ ।। ततो मार्ग समुल्लड्घ्य स्फाटिक शालमुन्नतम् । चतुर्गोपुरसंयुक्तं निधानैर्मङ्गलैर्युतम् ।। १०४ ।। तन्मध्ये षोडशोत्तुङ्गभित्तिभिः परिशोभितम् । सभास्थानं जिनेन्द्रस्य द्वादशोरुप्रकोष्ठकम् ।। १०५ ॥ एवं श्रीमन्महावीरसमवादिसृर्ति प्रभुः । त्रिः परीत्य महाप्रीत्या संतुष्टः श्रेणिकस्तराम् ।। १०६ ॥ तत्र त्रिमेखलापीठे सिंहासनमनुत्तरम् । मेरुशृङ्गमिबोत्तुङ्गं स्वर्णरत्नैर्विनिर्मितम् ।।-१०७ ।। चतुर्भिरङ्गलमुक्ता स्थितं वीरजिनेश्वरम् । निधानमिव संवीक्ष्य पिप्रिये भूपतिस्तराम् ॥ १०८ ।। चतुःपष्टिमहादिव्यचामरैरामरैर्युतम् । विशुद्धनिर्झरोपेतं स्वर्णाचलमिवाचलम् ।। १०९ ।। सर्वशोकापहं देवं महाशोकतरुश्रितम् । सारमेघान्वितं चारु काञ्चनाभं महीधरम् ।। ११० ।। - सुदर्शनचरितम् [१, १११- नानासुगन्धपुष्पौधसुगन्धीकृतदिक्चयम् । इन्द्रादिकरनिर्मुक्तपुष्पवृष्टिविराजितम् ॥ १११।। कोटिभास्करसंस्पर्द्धिदेहभामण्डलान्वितम् । तत्र भव्याः प्रपश्यन्ति स्वकीयं जन्मसप्तकम् ॥ ११२ ॥ दुन्दुभीनां च कोटीभिर्योपयन्तीभिरायुतम् । मोहारातिजयं वोच्चरालुलोक जिनं प्रभुः ।। ११३ ।। मुक्तामालायुतेनोच्चैश्चारुछनत्रयेण वा। त्रिधाभूतेन सेवार्थं समायातेन्दुनाश्रितम् ॥ ११४ ॥ सुरासुरनरादीनां चित्तसंतोपकारिणा। दिव्येन ध्वनिना तत्त्वं घोतयन्तं जगद्धितम् ॥ ११५ ॥ अनन्तज्ञानहग्वीर्यसुखोपेतं गुणाकरम् । इन्द्रनागेन्द्रचन्द्रार्कनरेन्द्राद्यैः समर्चितम् ।। ११६ ॥ इत्यादि केवलज्ञानसमुत्पन्नविभूतिभिः । विराजितं समालोक्य सानन्दो मगधेश्वरः ॥ ११७ ॥ जय त्वं त्रिजगत्पूज्य महावीर जगद्धित । इत्यादि जयनिर्घोषैनमस्कृत्य पुनः पुनः ।। ११८ ॥ विशिष्टाष्टमहाद्रव्यर्जलगन्धाक्षतादिभिः । पूजयित्वा महाप्रीत्या जिनपादाम्बुजद्वयम् ॥ ११९ ।। चकार संस्तुतिं भक्त्या भव्यानामीशी गतिः । यत्सुपूज्येषु सत्पूजा क्रियते शर्मकारिणी ।। १२० ॥ जय त्वं त्रिजगन्नाथ जय त्वं त्रिजगद्गुरो। जय त्वं परमानन्ददानदक्ष क्षमानिधे ॥ १२१ ।। वीतराग नमस्तुभ्यं नमस्ते सन्मते सदा । नमस्ते भो महावीर वीरनाथ जगत्प्रभो ॥ १२२ ।। वर्धमान जिनेशान नमस्तुभ्यं गुणार्णव । महत्यादिमहावीर नमस्ते विश्वभापक ।। १२३ ।।

-१, १३१] प्रथमोऽधिकारः ११ रत्नत्रयसरोजश्रीसमुल्लासदिवाकर । स्याद्वादवादिने तुभ्यं नमस्ते घातिघातिने ॥ १२४ ॥ नमस्ते त्रिजगव्यतायिने मोक्षदायिने । नमस्ते धर्सनाथाय कामक्रोधाग्निवाच्चे ॥ १२५ ।। नमस्ते स्वर्गमोक्षोरुसौख्यकल्पद्रुमाय च । सिद्ध बुद्ध नमस्तुभ्यं संसाराम्बुधिसेतवे ।। १२६ ।। अनन्तास्ते गुणाः स्वामिन् विशुद्धाः पारवर्जिताः। अल्पधीर्माहगो देव कः क्षमः स्तवने तव ॥ १२७ ।। तथापि श्रीमतां सारपादपद्मद्वये सदा। मुक्तिमुक्तिप्रदा भक्तिर्भूयान्मे शर्मदायिनी ।। १२८ ।। इत्याप्तं श्रीजिनाधीश केवलज्ञानभास्करम् । स्तुत्वा नत्वा नमौवैः स नरकोष्ठे सुधीः स्थितः ॥ १२९ ।। गौतमादिगणाधीशान् संज्ञानमयविग्रहान् । नमस्कृत्य स चिन्मूर्तिः प्रेमानन्दनिर्भरः ॥ १३० ।। स जयतु जिनवीरो ध्वस्तमिथ्यान्धकारो विशदगुणसमुद्रः स्वर्गमोक्षकमार्गः। सुरपतिशतसेव्यो भव्यपचौघभानुः सकलदुरितहर्ता मुक्तिसाम्राज्यकर्त्ता ॥ १३१ ॥ इति श्रीसुदर्शनचरिते पञ्चनमस्कारमाहात्म्यप्रदर्शके मुमुक्षु- श्रीविद्यानन्दिविरचिते श्रीमहावीरतीर्थकरपरमदेव- समागमनव्यावर्णनो नाम प्रथमोऽधिकारः । t द्वितीयोऽधिकारः - 1 जयन्तु भुवनाम्भोजभानवः श्रीजिनेश्वराः । केवलज्ञानसाम्राज्याः प्रबोधितजनोत्कराः ॥ १ ॥ अथ श्रीश्रेणिको राजा विनयानतमस्तकः । नत्वा श्रीगौतमं देवं धर्म पप्रच्छ सादरम् ।। २ ॥ तदासौ सत्कृपासिन्धुगौतमो गणनायकः । संजगौ स स्वभावो हि तेषां यत्प्राणिनां कृपा ॥३॥ शृणु त्वं श्रेणिक व्यक्तं भावितीर्थकराग्रणीः । धर्मो वस्तुस्वभावो हि चेतनेतरलक्षणः ॥ ४ ॥ क्षमादिदशधा धर्मो तथा रत्नत्रयात्मकः । जीवानां रक्षणं धर्मश्चेति प्राहुर्जिनेश्वराः ॥ ५ ॥ जिनोक्तसप्ततत्त्वानां श्रद्धानं यच्च निश्चयात् । तत्त्वं सदर्शनं विद्धि भवभ्रमणनाशनम् ॥ ६ ॥ ज्ञानं तदेव जानीहि यत् सर्वजेन भाषितम् । द्वादशाड्गं जगत्पूज्यं विरोधपरिवर्जितम् ॥ ७ ॥ चारित्र च द्विधा प्रोक्त मुनिश्रावकभेदभाक् । महाणुव्रतभेदेन निर्मदं सुगतिप्रदम् ।। ८ ॥ हिसादिपञ्चकत्यागः सर्वथा यत्रिधा भवेत् । तच्चारित्रं महत् प्रोक्तं मुनीनां मूलभेदतः ।। ९ ।। तथा मूलोत्तरास्तस्य सद्गुणाः सन्ति भूरिशः । यैस्तु ते मुनयो यान्ति सुखं स्वर्गापवर्गजम् ।। १० ॥ श्रावकाणां तु चारित्र शृणु त्वं श्रेणिक प्रभो। सम्यक्त्वपूर्वकं तत्र चादो मूलगुणाष्टकम् ।। ११ ।। .

: -२,२४] द्वितीयोऽधिकारः पालनीयं बुधैर्नित्यं तद्विशुद्धी सुखश्रिये । रामठं चर्मसंमिश्रं वर्जनीयं जलादिकम् ।। १२ ॥ सप्तश्वभ्रप्रदायीनि व्यसनानि विशेषतः। संत्याज्यानि यकैश्चात्र महान्तोऽपि क्षयं गताः ॥ १३ ॥ त्रसानां रक्षणं पुण्यं सुधीः संकल्पतः सदा । मृपावाक्यं वुधैर्हेयं निर्दयत्वस्य कारणम् ॥ १४ ॥ अदत्तादानसंत्यागो भव्याना संपदाप्रदः । सतोषः स्वस्त्रियां नित्यं कर्त्तव्यः सुगतिश्रिये ॥ १५ ॥ संख्या परिग्रहेपूच्चैः सर्वेषु गृहमेधिनाम् । संतोषकारिणी कार्या पद्मिन्या वा रविप्रभा ॥ १६ ॥ निशाभोजनकं त्याज्यं नित्यं भव्यैः सुखार्थिभिः । यव्रतं श्रावकाणां हि मुख्यं धयं च नेत्रवत् ॥ १७ ॥ जलानां गालने यत्नो विधेयो बुधसत्तमैः । नित्यं प्रमादमुत्सृज्य सद्वस्त्रेण शुभश्रिये ॥ १८ ॥ दिग्देशानर्थदण्डाख्यं त्रिभेदं हि गुणव्रतम् । पालनीयं प्रयत्नेन भव्यानां सुगतिप्रदम् ।। १९ ।। कन्दमूलं च संधानं पत्रशाकादिकं तथा। यत्त्याज्यं श्रीजिनैः प्रोक्तं तत्त्याज्यं सर्वथा बुधैः ॥२० ॥ शिक्षात्रतानि चत्वारि श्रावकाणां हितानि वै । सामायिकत्रतं पूर्व चैत्यपञ्चगुरुस्तुतिः ॥ २१ ॥ त्रिसन्ध्यं समताभावैर्महाधर्मानुरागिभिः । कर्त्तव्या सा महामन्यैः शर्मणा जिनसूत्रतः ॥ २२ ॥ अष्टम्यां च चतुर्दश्यां प्रोषधः प्रविधीयते । कर्मणां निर्जराहेतुर्महाभ्युदयदायकः ।। २३ ।। भोगोपभोगवस्तूनामाहारादिकबाससाम् । संख्या सुश्रावकाणां च प्रोक्ता संतोपकारिणी ॥ २४ ॥ , सुदर्शनचरितम् [२, २५- तथा त्रिविधपात्रेभ्यो दानं देयं चतुर्विधम् । आहाराभयभैपज्यशाखसंबं सुखार्थिभिः ॥ २५ ॥ महाव्रतानि पञ्चोच्चैस्तिस्रो गुप्तीमनोहराः। समितीः पञ्च यः पाति स मुनिः पात्रसत्तमः ।। २६ ।। सदृष्टि यो गुरोर्भक्तः श्रावको व्रतमण्डितः । स भवेन्मध्यम पात्रं दानपूजादितत्परः ।। २७ ।। केवलं दर्शनं धत्ते जिन वर्मे महारुचिः। त्यक्तमिथ्याविपो धीमान् स पात्रं स्यात्तृतीयकम् ॥ २८ ॥ इति त्रिविधपात्रेभ्यो दानं प्रीत्या चतुर्विधम् । यैर्दत्तं भुवने भव्यस्तैः सिक्तो धर्मपादपः ॥ २९ ॥ तथा दयालुभिर्देयं दानं कारुण्यसंज्ञकम् । दीनान्धवधिरादीनां याचकानां महोत्सवे ॥ ३० ॥ त्यागो दानं च पूजा च कथ्यते जैनपण्डितः। ततः सुश्रावकै नं भक्तितो भवनं शुभम ॥ ३१ ॥ कारयित्वा तथा जैनीः प्रतिमाः पापनाशनाः । प्रतिष्ठाप्य यथाशास्त्रं पञ्चकल्याणकोक्तिभिः ॥३२॥ ध्यादिभिर्विधायोच्चैः स्नपनं शर्मकारणम् । विशिष्टाष्टमहादव्यैर्जलाद्यैर्नित्यचर्चनम् ।। ३३ ।। कर्त्तव्यं च महाभव्यैः स्वर्गमोक्षसुखश्रिये । सिद्धक्षेत्रे तथा यात्रा कर्तव्या दुर्गतिच्छिदे ॥ ३४ ॥ संस्तुतिं च विधायैव जिनेन्द्राणां सुखप्रदाम् । जाप्यमष्टोत्तरं प्रोक्तं शतं शर्मशतप्रदम् ॥ ३५ ॥ मन्त्रोऽयं त्रिजगत्पूज्यः सुपञ्चत्रिंशदझरः। पापसंतापदावाग्निशमनंकघनाघनः ।। ३६ ।। सुखे दुःखे गृहेऽरण्ये व्याधी राजकुले जले । सिंव्याघ्रादिके क्रूरे शत्रौ सर्पऽग्निदुर्भये ॥३७॥ .

१५
-२, ४९]
द्वितीयोऽधिकार.
ध्यायेन्मन्त्रमिमं धीमान् सर्वशान्तिविधायकम् ।
युक्तं दिवाकरोद्योते प्रयाति सकलं तमः ॥ ३८ ॥
तथा गुरूपदेशेन पञ्चश्रीपरमेष्ठिनाम् ।
षोडशाद्यक्षरै यो मन्त्रीघःशर्मसाधकः ॥ ३९ ।।
शुद्धस्फटिकसंकाशां जिनेन्द्रप्रतिमा शुभाम् ।
सम्यग्दृष्टिः सदा ध्यायेत् सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ ४० ॥
उक्तं च-
:
आप्तस्यासनिधानेऽपि पुण्यायाकृतिपूजनम् ।
तार्शमुद्रा न किं कुर्याद्विपसामर्थ्यसूदनम् ॥ ४१ ।।
यया जिनस्तथा जैनं ज्ञानं गुरुपदाम्बुजम् ।
सिद्धचक्रादिकं पूतं चर्चनीयं विचक्षणैः ॥ ४२ ॥
पूज्यपूजाक्रमेणैव भव्यः पूज्यतमो भवेत् ।
ततः सुखार्थिभिर्भव्यैः पूज्यपूजा न लड्ध्यते ।। ४३ ।।
यथामेरुगिरीन्द्राणामम्वुधीनां पयोनिधिः ।
तथा परोपकारेस्तु धर्मिणां महतां महान् ।। ४४ ।।
साधर्मिकेषु वात्सल्यं दानमानादिभिः सदा।
कर्त्तव्यं शल्यनिर्मुक्तः प्रीत्या सद्धर्मवृद्धये ॥ ४५ ॥
तथा सुश्रावकैनित्यं जैनधर्मानुरागिभिः ।
शास्त्रस्य श्रवणं कार्य गुरूणा सारसेवया ! ४६ ।।
इत्थं श्रीमज्जिनेन्द्रोक्तसप्तक्षेत्राणि नित्यशः।
शर्मसस्यकराण्युच्चैस्तर्पणीयानि धीधनैः ।। ४७ ॥
अन्ते च श्रावकैव्यैजैनतत्त्वविदांवरैः ।
मोहं सङ्गं परित्यज्य संन्यासः संविधीयते ॥४८॥
अनन्यशरणीभूय भाक्तिकैः परमेष्ठिषु ।
विधाय शरणं चित्ते रत्नत्रयमनुत्तरम् ॥ ४२ ॥

सुदर्शनचरितम् [२, ५०- कोऽहं शुद्धचैतन्य न्यस्वभावः परमार्थतः इत्यादितत्त्वसंकल्पैः कार्यः संन्याससद्विधिः ॥ ५० ॥ तथा त्वं भो सुधी राजन् शृणु श्रेणिक मद्वचः । जिनोक्तसप्ततत्त्वानां लक्षणं ते गदाम्यहम् ॥५१ ।। जीवतत्त्वं भवेत्पूर्वमनादिनिधनं सदा। सोऽपि जीवो जिनैः प्रोक्तश्चेतनालक्षणा ध्रुवम् ॥ ५२ ॥ उपयोगद्वयोपेतः स्वदेहपरिमाणभाक् । कर्ता भोक्ता च विद्वद्भिरमूत्तः परिकीर्तितः ।। ५३ ।। पुनर्जीवा द्विधा शेयो मुक्तः सासारिकस्तथा । सर्वकर्मविनिर्मुक्तो मुक्तः सिद्धो निरञ्जनः ।। ५४ ॥ निश्शरीरो निरावाधो निर्मलोऽनन्तसौख्यभाक् । विशिष्टाष्टगुणोपेतस्त्रैलोक्यशिखरस्थितः ।। ५५ ।। साकारोऽपि निराकारो निष्ठितार्थोऽखिलैः स्तुतः । अस्य स्मरणमात्रेण भव्याः सयान्ति तत्पदम् ।। ५६ ।। संसारी च द्विधा जीवो भव्याभव्यप्रभेदतः। भव्यो रत्नत्रये योग्यः स्वर्णपापाणहमवत् ।। ५७ ।। अभव्यश्चान्धपाषाणसमानो मुनिभिर्मतः । अनन्तानन्तकालेऽपि संसारं नैव मुञ्चति ॥ ५८ ।। भव्यराशेः सकाशाच्च केचिद् भव्याः स्वकर्मभिः। शुभाशुभैः सुखं दुःखं भुजानाः संमृतौ सदा ।। ५९ ॥ कालादिलन्धितः प्राप्य जिनेन्द्रः परिकीर्तितम् । द्विधा रत्नत्रयं सम्यक् समाराध्य तु निर्मलम् ।। ६० ।। शुक्लध्यानप्रभावेण हत्वा कर्माणि कर्मठाः । याता यान्ति च यास्यन्ति शाश्वतं मोक्षमुत्तमम् ।। ६१ ।। अजीवं पुद्गलद्रव्यं त्वं विजानीहि भूपते । पृथिव्यादिकपड्भेदं यथागमनिरूपितम् ।। ६२ ।। .

-२, ७३ ] द्वितीयोऽधिकार १७ उक्तं च- अइथूलथूल थूल थूलसुहुम च सुहमथूलं च । मुहुमं च सुहुमसुहुमं घराइयं होड छन्भेयं ॥ ६३ ॥ पुढवो जलं च छाया चउरिदियविसय कम्म परमाणू । छविहभेय भणियं पुग्गलदव्वं जिणिदेहिं ।। ६४ ॥ अष्टस्पर्शादिभेदेन पुद्गलं विंशतिप्रमं । तथा विभावरूपेण स्यादनेकप्रकारकम् ।। ६५ ।। पञ्चप्रकारमिथ्यात्वैरव्रतादशात्मभिः । कषायैः पञ्चविंशत्या दशपञ्चप्रयोगकैः ।। ६६ ।। उक्तं च- मिच्छत्तं अविरमण कसाय जोगा य आसवा होति । पण बारस पणवीसा पण्णरसा हुति तब्भेया ॥ ६७ ॥ कर्मणामानवो जन्तौ भवेन्नित्यं प्रमादिनि । भग्नद्रोण्यां यथा नित्यं तोयपूरो विनाशकृत् ।। ६८ ॥ कपायवशतो जीवः कर्मणां योग्यपुद्गलान् । आदत्ते नित्यशोऽनन्तान स बन्धः स्याच्चतुर्विधः।। ६९ ॥ आद्यः प्रकृतिवन्धश्च स्थितिबन्धो द्वितीयकः । तृतीयश्चानुभागाख्यः प्रदेशाख्यश्चतुर्थकः ।। ७० ।। पयडि-ट्ठिदि-अणुभाग-प्पदेसभेदा दु चदुविहो बंधो । जोगा पयडि-पदेसा ठिदि-अणुभागा कसायदो हुति ॥ ७१ ॥ वतैः समितिगुप्त्याद्यैरनुप्रेक्षाप्रचिन्तनैः । परीषहजयैर्वृत्तैरानवारिः स संवरः ।। ७२ ।। कर्मणामेकदेशेन क्षरणं निर्जरा मता। सकामाकामभेदेन द्विधा सा च प्रकीर्तिता ।। ७३ ।। . २ १८ सुदर्शनचरितम् [२,०४- यजिनेन्द्रतपोयोगैर्मुन्याचैः क्रियते बलात् । कर्मणां क्षरणं सा चाविपाकाभिमता बुधैः ।। ७४ ॥ या च दुःखादिभिः काले कर्मणां निर्जरा स्वयम् । सा भवेत्सविपाकाख्या संसारे सरतां सदा ।। ७५ ।। सर्वषां कर्मणां नाशहेतुर्यो भव्यदेहिनाम् । परिणामः स विज्ञेयो भावमोक्षो जिनैर्मतः।। ७६ ।। यः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रैर्जिनभाषितैः । शुक्लध्यानप्रभावेन सर्वेपां कर्मणां क्षयः ।। ७७ ।। द्रव्यमोक्षः स विज्ञेयोऽनन्तान्तसुखप्रदः । शाश्वतः परमोत्कृष्टो विशिष्टाष्टगुणार्णवः ॥७८ ॥ मुक्तिक्षेत्रं जिनैः प्रोक्तं त्रैलोक्यशिखराश्रितम् । प्रारभाराख्यशिलामध्ये छत्राकारं मनोहरम् ।। ७९ ॥ विस्तीर्ण योजनैः पञ्चचत्वारिंशत्प्रलक्षकैः। चन्द्रकान्तिपरिस्पर्धि विलसद्विमलप्रभम् ।। ८० ॥ अष्टयोजनवाहल्यं प्रारभारापिण्डसंमितम् । विशिष्ट मुद्रिकामध्यहीरकं वा निवेशितम् ॥ ८१ ॥ सनागूनैकगव्यूति मुक्ता तस्योपरि ध्रुवम् । तिष्ठन्ति तनुवाते ते सिद्धा वो मङ्गलप्रदाः ।। ८२ ।। भवन्तु कर्मणां शान्त्यै जरामरणवर्जिताः । पूजिता वन्दिता नित्यं समाराध्याः स्वचेतसि ।। ८३ ।। एतेषां सप्ततत्त्वानां श्रद्धानं दर्शनं शुभम् । मोक्षसौख्यतरोर्वी पालनीयं बुधोत्तमैः ।। ८४ ।। गुभो भावो भवेत्पुण्यं स्वर्गादिसुखसाधनम् । अशुभः परिणामोऽपि पापं शुभ्रादिदुःखदम् ॥ ८५ ॥ एवं तत्त्वार्थसद्भावं लोकस्थितिसमन्वितम् । गीतमस्वामिना प्रोक्तं श्रुत्वा श्रीश्रेणिकः प्रभुः ॥ ८६ ॥ 1 , .

१९ .. -२, ८८] द्वितीयोऽधिकारः द्वादशोरुसभाभव्यैः साधं संतोषमाप्तवान् । यत्र श्रीगणभृद्वक्ता कः संतोषं प्रयाति न ।। ८७ ॥ इत्थं श्रीगणनायकेन गदितं श्रीगौतमेनोत्तमम जीवाजीवसुतत्त्वलक्षणमिदं श्रीमजिनेन्द्रोदितम् । श्रुत्वा श्रीमगधेश्वरो गुणनिधिः श्रीश्रेणिको भक्तितः स्तुत्वा तं मुनिनायकं हितकरं भव्यैर्ननामोच्चकैः॥ ८८ ॥ इति श्रीसुदर्शनचरिते पन्चनमस्कारमाहात्म्यप्रदर्शके मुमुक्षु- श्रीविद्यानन्दिविरचिते श्रावकाचारतत्त्वोपदेशव्यावर्णनो नाम द्वितीयोऽधिकार ।

तृतीयोऽधिकारः
अथ प्रमुर्गुरुं नत्वा पुनः प्राह कृताञ्जलिः ।
अहो स्वामिन् जगद्वन्धुस्त्वं सदा कारणं विना ॥ १ ॥
मेघो वा कल्पवृक्षो वा दिव्यचिन्तामणिर्यथा
तथा त्वं त्रिजगद्धव्यपरोपकृतितत्परः ।।२।।
अन्तकृत्केवली योऽत्र वीरनाथस्य पञ्चमः ।
सुदर्शनमुनिस्तस्य चरित्रं भुवनोत्तमम् ॥ ३ ॥
तदहं श्रोतुमिच्छामि श्रीमतां सुप्रसादतः ।
विधाय करुणां देव तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ४ ॥
तन्निशम्य गणाधीशश्चतुर्ज्ञानविराजितः।
संजगाद शुभां वाणी परमानन्ददायिनीम् ।। ५ ॥
श्रुणु त्वं भो सुधी राजन्नत्रैव भरताह्वये ।
क्षेत्रे तीर्थशिनां जन्मपचित्रे परमोदये ॥ ६ ॥
अङ्गदेशोऽस्ति विख्यातः संपदासारसंभृतः ।
नित्यं भव्यजनाकीर्णपत्तनाद्यैर्विराजितः ॥ ७॥
विशिष्टाष्टादशप्रोक्तधान्यानां राशयः सदा।
यत्रोन्नता विराजन्ते सतां वा पुण्यराशयः ॥ ८ !!
यत्र श्रीमजिनेन्द्राणां धर्मः शर्मशतप्रदः ।
दशलाक्षणिको नित्यं वर्तते भुवनोत्तमः ॥९॥
खलाख्या यत्र सस्यानां निष्पत्तिस्थानकेऽभवत्।
नान्यः कोऽपि खलो लोकः परपीडाविधायकः ॥ १० ॥
व्रतानां पालने यत्र योषिता च कुचद्वये ।
काठिन्यं विद्यते नैव जनानां पुण्यकर्मणि ॥ ११ ॥

३, २४]
तृतीयोऽधिकार
२
,
कज्जलं लेखने यत्र नारीणां लोचनेषु च ।
वर्तते न पुनर्यत्र कुले गोत्रे च देहिनाम् ॥ १२ ॥
म्लानता श्यते यत्र भुक्तपुष्पप्रदामसु ।
प्रजानां न मुखेपूच्चः पूर्वपुण्यप्रभावतः ॥ १३ ।।
दुण्डशब्दोऽपि यत्रास्ति छत्रे नैव प्रजाजने।
न्यायमार्गप्रवृत्तित्वाद्राज्ञां निर्लोभतस्तथा ॥ १४ ॥
गजादौ दमनं यत्र तपस्येव तपस्विनाम् ।
इन्द्रियेषु च विद्येत दुष्टबुद्धया न कस्यचित् ।। १५ ॥
चन्द्रे दोषाकरत्वं च वर्तते न प्रजासु च ।
वन्धनं यत्र पुष्पेषु रुन्धनं दुर्मनस्यलम् ॥ १६ ।।
मित्थात्वं सुपरित्यज्य क्षात्वा हालाहलोपमम् ।
प्रजा यत्र प्रकुर्वन्ति सद्धर्म जिनभाषितम् ।। १७ ॥
पात्रदान जिनेन्द्रार्चा व्रतं शीलं गुणोज्ज्वलम् ।
सोपवासं विधायोच्चैः साधयन्ति प्रजा हितम् ॥१८॥
यत्र पुष्पफलनम्रसद्वनानि धनानि च ।
राजन्ते सर्वतीणि भन्यानां सुकुलानि वा ॥ १९ ॥
स्वच्छा जलाशया यत्र पद्माकरसमन्विताः।
विस्तीर्णास्तापहन्तारस्ते सतां मानसोपमाः ॥२०॥
यत्र क्षेत्राणि शोभन्ते सर्वसस्यभृतानि च ।
दारिद्रयछेदकान्युच्चैर्भव्यवृन्दानि वा भुवि ॥ २१ ॥
सरांसि यत्र शोभन्ते चेतांसीच सतां सदा।
सुवृत्तानि विशालानि तृपातापहराणि च ॥ २२ ॥
यत्र भव्या वसन्त्येवं पूर्वपुण्यप्रसादतः ।
धनैर्धान्यैर्जनैः पूर्णा जिनधर्मपरायणाः ॥ २३ ॥
नार्यो यत्र विराजन्ते रूपसंपद्गुणान्विताः ।
कुर्वन्त्यो जैनसद्धर्म चतुर्विधमनुत्तरम् ॥ २४ ॥

२२ [३, २५ सुदर्शनचरितम् यत्र सर्वत्र राजन्ते पुरग्रामवनादिपु । जिनेन्द्रप्रतिमोपेताः प्रासादाः सुमनोहराः ।। २५ ।। अनेकभव्यसंदोहजयनिर्घोपसंचयः। गीतवादिनपूजादिमहोत्सवशतैरपि ।। २६ ।। तोरणध्वजमाङ्गल्यैः स्वर्णकुम्भप्रकीर्णकैः । शोभन्ते सर्वभव्यानां परमानन्ददायिनः ।। २७ ।। वनादौ यत्र सर्वत्र मुनीन्द्रा जानलोचनाः । स्वच्छचित्ताः प्रकुर्वन्ति तपोध्यानापदेशनम् ।। २८ ।। वापीकूपप्रपा यत्र सन्ति पान्थोपकारिकाः । सतां प्रवृत्तयो वान दानमानासनादिभिः ।। २९ ।। दानिनो यत्र वर्तन्ते शक्तिभक्तिशुभोक्तयः । सत्यं त एव दातारो ये वदन्ति प्रियं वचः॥३०॥ तस्याङ्गविषयस्योच्चैमध्ये चम्पापुरी शुभा। वासुपूज्यजिनेन्द्रस्य जन्मना या पवित्रिता ॥ ३१ ॥ नानाहावली यत्र भव्यनामावली यथा । सारसंपद्धृता नित्यं शोभते शर्मदायिनी ॥ ३२ ।। जिनेन्द्रभवनान्युच्चैर्यत्र कुम्भध्वजोत्करैः । आह्वयन्तीव पूजार्थ नित्यं सर्वनरामरान् ।। ३३ ॥ साररत्नसुवर्णादिप्रतिमाभिर्विरेजिरे । भव्यानां शर्मकारीणि मेरुशृङ्गानि वावनौ ॥ ३४ ॥ घण्टाटड्कारवादित्रनिर्घोषैर्भव्यसंस्तवैः । पूजोत्सवैर्हरन्त्यत्र यानि भव्यमनांस्यलम् ।। ३५ ।। प्राकारखातिकाट्टालतोरणाथै विभूपिता । पुरी या राजराजस्य रेजे वा सुमनोहरा ।। ३६ ।। अनेकरत्नमाणिक्यचन्दनागुरुवस्तुभिः । पट्टकूलादिभिर्योच्चैर्जयति स्म निधीनपि ॥ ३७ ।। 1 my ,

२
-३, ५०]
तृतीयोऽधिकार.
यत्र भन्या धनैर्धान्यैः पूर्वपुण्येन नित्यशः ।
सम्यक्त्वव्रतसंयुक्ताः सप्तव्यसनदूरगाः॥३८ ।।
जैनीयात्राप्रतिष्ठाभिर्गरिष्ठाभिर्निरन्तरम् ।
पात्रदानजिनार्चाभिः साधयन्ति निजं हितम् ॥ ३९ ।।
यत्र नार्योऽपि रूपाढ्याः संपदाभिर्मनोहराः।
सम्यक्त्वव्रतसद्वस्त्ररत्नभूपाविराजिताः ।। ४० ।।
सत्पुत्रफलसंयुक्ता दानपूजादिमण्डिताः।
कल्पवल्लीर्जयन्त्युच्चैः परोपकृतितत्पराः ॥ ४१ ।।
यत्र देवेन्द्रनागेन्द्रनरेन्द्राद्यैः प्रपूजितः ।
वासुपूज्यो जिनो जातः सा पुरी केन वर्ण्यते ॥ ४२ ॥
तत्र चम्पापुरीमध्ये बभौ राजा प्रजाहितः ।
प्रतापनिर्जितारातिर्धात्रीवाहननामभाक. ।। ४३ ॥
समन्ताद्यस्य पादाब्जद्वयं परमहीमुजः।
सेवन्ते भक्तितो नित्यं पग वा भ्रमरोत्कराः ॥ ४४ ॥
नीतिशास्त्रविचारज्ञो रूपेण जितमन्मथः ।
धर्मवान् स बभौ राजा वित्तेन धनदोपमः॥ ४५ ॥
राजविद्याभिरायुक्तः सप्तव्यसनवर्जितः ।
दाता भोक्ता प्रजाभीष्टो मदमुक्तो विचक्षणः ॥ ४६॥
सप्ताङ्गराज्यसंपन्नः सुधीः पञ्चाङ्गमन्त्रवित् ।
वैरिषड्वर्गनिर्मुक्तः शक्तित्रयविराजितः ।। ४७ ।।
स्वाम्यमात्यसुहृत्कोषदेशदुर्गबलाश्रितम् ।
सप्ताङ्गराज्यमित्येष प्राप्तवान् जिनभाषितम् ।। ४८ ।।
सहायं साधनोपायं देशकोषबलावलम् ।
विपत्तेश्च प्रतीकारं पश्चाङ्गं मन्त्रमाश्रयन् ॥ ४२ ॥
कामः क्रोधश्च मानश्च लोभो हर्पम्तथा मदः ।
अन्तरङ्गोऽरिषड्वर्गः क्षितीशानां भवन्त्यमी ॥ ५० ॥

२४ सुदर्शनचरितम् [३, ५१. प्रमुशक्तिर्भवेदाधा मन्त्रशक्तिद्धितीयका । उत्साहशक्तिराख्याता तृतीया भूभुजा शुभा ।। ५१ ।। इत्यादिभूरिसंपत्ते पतेस्तस्य भामिनी । नाम्नाभयमती ख्याता रूपलावण्यमण्डिता ।। ५२ ।। शची शक्रस्य चन्द्रस्य रोहिणीव रवेर्यथा। रण्णादेवी च तस्येष्टा साभवत् प्राणवल्लभा ।। ५३ ॥ कामभोगरसाधारकूपिका कमलेक्षणा । भूपतेश्चित्तसारङ्गवागुरा मधुरस्वरा ।। ५४ ।। तया सार्ध यथाभीष्टं भुञ्जन् भोगान मनःप्रियान । स राजा सुखतस्तस्थौ लदम्या वा पुरुपात्तमः ।। ५५ ।। श्रेष्ठी वृपभदासाख्यस्तयासीत्सर्वकावित् । उत्तमश्रेष्ठिना राज्यं स्थिरीभवति भूपतेः ।। ५६ ।। श्रीमज्जिनेन्द्रपादाब्जसेवनकमधुव्रतः । सद्दृष्टिः सद्गुरोर्भक्तः श्रावकाचारतत्परः ।। ५७ ।। जिनेन्द्रभवनोद्धारप्रतिमापुस्तकादिषु । चतुःप्रकारसंघेषु वत्सलः परमार्थतः ॥ ५८ ।। एवं श्रीमज्जिनेन्द्रोक्तं शर्मसम्यप्रदायकम् । स्वचित्तामृतधाराभिस्तर्पयामास शुद्धधीः ॥ ५९ ।। यो जिनेन्द्रपदाम्भोजचर्चनं चित्तरञ्जनम् । करोति स्म सदा भव्यः स्वर्गमोक्षककारणम् ।। ६० ॥ यः सदा नवभिपुण्यातृसप्तगुणान्वितः । पात्रदानेन पूतात्मा श्रेयांसो वापरो नृपः ॥ ६१ ॥ स श्रेष्ठी याचकानां च दयालुनमण्डितः । संजातः परमानन्ददायको वा सुरद्रुमः ।। ६२ ।। तत्प्रिया जिनमत्याख्या रूपसौभाग्यसंयुता। सतीव्रतपताकेव कुलमन्दिरदीपिका ॥ ६३ ।।

२५ -३, ७६] तृतीयोऽधिकार श्रीजिनेषु मतिस्तस्याः संजातातीव निर्मला ततोऽस्या जिनमत्याख्याभवत्सार्था शुभप्रदा ॥ ६४ ॥ यद्रूपसंपदं वीक्ष्य जगत्प्रीतिविधायिनीम् । जाता देवाङ्गना नूनं मेषोन्मेषविवर्जिताः ॥ ६५ ॥ सद्दानकल्पवल्लीव परमानन्ददायिनी । पूजया जिनराजस्य शची वा भक्तितत्परा ।। ६६ ।। श्रावकाचारपूतात्मा पवित्रीकृतभूतला । दयाक्षमागुणैर्नित्यं सा रेजे वा मुनेर्मतिः ।। ६७ ॥ एवं स्वपुण्यपाकेन श्रेष्ठिनी गुणशालिनी । एकदा सुखतः सुप्ता मन्दिरे सुन्दराकृतिः ।। ६८ ॥ निशायाः पश्चिमे यामे स्वप्ने संपश्यति स्म सा । मेहं सुदर्शनं रम्यं दिव्यं कल्पद्रुम मुदा ॥ ६९ ॥ स्वर्विमानं सुरैः सेव्यं विस्तीर्णं च सरित्पतिम् । प्रज्वर. 'तं शुभं वह्नि प्रध्वस्तध्वान्तसंचयम् ॥ ७० ॥ संतुष्टा प्रातरुत्थाय स्मृतपञ्चनमस्कृतिः । प्राभातिकक्रियां कृत्वा जिनमातेव सन्मतिः ॥ ७१ ।। वस्त्राभरणमादाय विकसन्मुखपङ्कजा । सुनम्रा श्रेष्ठिनं प्राह स्वस्वप्नान् शर्मसूचकान् ॥ ७२ ।। श्रेष्ठी वृषभदासस्तु तान्निशम्य प्रहृष्टवान् । शुभं श्रुत्वा सुधीः को वा भूतले न प्रमोदवान् ॥ ७३ ॥ जगौ श्रेष्ठी शुभं भद्रे तथापि जिनमन्दिरम् । गत्वा गुरु प्रपृच्छावो ज्ञानिनं तत्त्ववेदिनम् ।। ७४ ।। ततस्तो वन्धुभिर्युक्तौ पूजाद्रव्यसमन्वितौ । जिनेन्द्रभवनं गत्वा परमानन्ददायकम् ॥ ७५ ॥ पूजयित्वा जिनानुच्चैर्विशिष्टाष्टविधार्चनैः । सस्तुत्वा नमतः स्मोच्चव्यानामीशी मतिः ।। ७६ ।।

सुदर्शनचरितम् [३, ततः सुगुप्तनामानं मुनीन्द्रं धर्मदेशकम् । प्रणम्य परया प्रीत्यापृच्छत्स्वप्नफलं वणिक् ।। ७७॥ तदा ज्ञानी मुनिः प्राह परोपकृतितत्परः। शृणु श्रेष्ठिन् गिरीन्द्रस्य दर्शनेन सुदर्शनः ॥ ७८ ॥ पुत्रो भावी पवित्रात्मा त्वत्कुलाम्भोजभास्करः । चरमाङ्गो महाधीरो विशुद्धः शीलसागरः ।। ७९ ।। दर्शनाद्देववृक्षस्य पुत्रो लक्ष्मीविराजितः । दाता भोक्ता दयामूर्तिर्भविष्यति न संशयः ।। ८० ।। सुरेन्द्रभवनस्यात्र दर्शनेन सुरैर्नतः। जगन्मान्यो विचारज्ञः सज्ञेयः परमोदयः ।। ८१ ।। जलधेवीक्षणादेव गम्भीरः सागरादपि । श्रावकाचारपूतात्मा जिनभक्तिपरायणः॥ ८२ ॥ अग्नेर्दर्शनतो नूनं पुत्रस्ते गुणसागरः । घातिकर्मेन्धनं दग्ध्वा केवली संभविष्यति ।। ८३ ॥ इत्यादिकं समाकर्ण्य श्रेष्ठी भार्या दिसंयुतः। स्वप्नानां स फलं तुष्टः प्राप्तपुत्रो यथा हृदि ।। ८४ ।। नान्यथा मुनिनाथोक्तमिति ध्यायन सुधीर्मुदा। विश्वासः सद्गुरूणां यः स एव सुखसाधनम् ।। ८५ ॥ ततः श्रेष्ठी प्रियायुक्तः सज्जनः परिवारितः । नत्वा गुरुं परं प्रीत्या समागत्य स्वमन्दिरम् ।। ८६ ॥ कुर्वन् विशेषतो धर्म पवित्रं जिनभाषितम् । दानपूजादिकं नित्यं तस्थौ गेहे सुखं मुदा ।। ८७ ।। अथ सा श्रेष्ठिनी पुण्यात् तदाप्रभृति नित्यशः। दधती गर्भचिह्नानि रेजे रत्नवतीव भूः ॥ ८८ ॥ पाण्डुत्वं सा मुखे दधे महाशोभाविधायकम् । भाविपुत्रयशो वोच्चैः सज्जनानां मनःप्रियम् ।। ८९ ।।

-३, १०२]
तृतीयोऽधिकार.
२७
।
स्वोदरे त्रिवलीभङ्गं तदा सा वहति स्म च ।
भाविपुत्रजराजन्ममृत्युनाशप्रसूचकम् ।। ९० ॥
कार्यादौ मन्दतां भेजे सा सती कमलेक्षणा।
तत्तुजः क्रूरकार्येषु मन्दतां वात्र भाषिणीम् ॥ ९१ ।।
सा सदा सुतरां पुण्यवती चापि तदा क्षणे ।
पात्रदाने जिनार्चायां विशेपादौदं दधौ ॥ ९२ ।।
नवमासानतिक्रम्य सुतं सासूत सुन्दरी ।
पुण्यपुञ्ज मिवोत्कृष्टं शुभे नक्षत्रवासरे ।। ९३ ।।
चतुर्थ्यां पुप्यमासस्य सिते पक्षे सुखाकरम् ।
तेजसा भास्करं किं वा कान्त्या जितसुधाकरम् ।। ९४ ॥
श्रेष्टीवृषभदासस्तु सज्जनैः परिमण्डितः ।
पुत्रजन्मोत्सवे गाढं परमानन्द निर्भरः ।।९५ ।।
कारयित्वा जिनेन्द्राणां भवने भुवनोत्तमे।
गीतवादित्रमाङ्गल्यैः स्नपनं पूजनं महत् ।। ९६ ॥
याचकानां ददौ दानं सुधीर्वाञ्छाधिकं मुदा ।
सारस्वर्णादिकं भूरि मृष्ट वाक्यसमन्वितम् ।। ९७ ॥
कुलाङ्गना महागीतगानैमानैर्मनोहरैः ।
गृहे गृहे तदा तत्र वादित्रध्वजतोरणैः ।। ९८ ।।
चक्रे महोत्सवं रम्य जगज्जनमनःप्रियम् ।
सत्यं सत्पुत्रसंप्राप्तौ किं न कुर्वन्ति साधवः ।। ९९ ।।
वान्धवाः सज्जनाः सर्वे परे भृत्यादयोऽपि च ।
वस्त्रताम्बूलसद्दानैर्मानितास्तेन हर्पतः ।। १०० ।।
इत्थं श्रेष्ठी प्रमोदेन नित्यं दानादिभिस्तराम् ।
कतिचिद्वासरै रम्यैः पुनः श्रीमजिनालये ॥ १०१ ।।
विधाय स्नपनं पूजां सज्जनानन्ददायिनीम् ।
भाविमुक्तिपतेस्तस्य पुत्रस्य परमादरात् ।। १०२ ।।

२८ सुदशनचरितम् [३, १०३- शोभनं दर्शनं सर्वजनानामभवद्यतः । ततो नाम चकारोच्चैः सुदर्शन इति स्फुटम् ।। १०३ ।। पूर्वपुण्येन जन्तूनां किं न जायेत भूतले । कुलं गोत्र शुभं नाम लक्ष्मीः कीर्तिर्यशः सुखम् ।। १०४ ।। तस्माइन्या जिनैः प्रोक्तं पुण्यं सर्वत्र शर्मदम् । दानपूजात्रतं शीलं नित्यं कुर्वन्तु सादराः ॥ १०५ ।। पुण्येन दूरतरवस्तुसमागमोऽस्ति पुण्यं विना तदपि हस्ततलात्प्रयाति । तस्मात्सुनिर्मलधियः कुरुत प्रमोदात् पुण्यं जिनेन्द्रकथितं शिवशर्मवीजम् ।। १०६ ।। पुण्यं श्रीजिनराजचारुचरणाम्भोजद्वये चर्चनं पुण्यं सारसुपात्रदानमतुलं पुण्यं व्रतारोपणम् । पुण्यं निर्मलशीलरत्नधरणं पोपवासादिक पुण्य नित्यपरोपकारकरणं भव्या भजन्तु श्रिये ॥ १०७ ।। इति श्रीसुदर्शनचरिते पञ्चनमस्कारमाहात्म्यप्रकाशके मुमुक्षुश्रीविद्यानन्दिविरचिते सुदर्शनजन्ममहोत्सव- व्यावर्णनो नाम तृतीयोऽधिकारः ॥

चतुर्थोऽधिकारः । अथासौ वालको नित्यं पितुर्गेहे मनोहरे । वृद्धि गच्छन् यथासौख्यं लालितो वनिताकरैः ।।१।। द्वितीयेन्दुरिवारजे जनयन प्रीतिमुत्तमाम् । सत्यं सुपुण्यसंयुक्तः पुत्रः कस्य न शर्मदः ।।२।। दिव्याभरणसद्वस्त्र पितोऽभात्स बालकः। सतामानन्दकृन्नित्यं कोमलो वा सुरद्रुमः ।।३।। नित्यं महोत्सवैर्दिव्यैः स बालः पुण्यसंबलः । प्रौढार्भको विशेषेण शोभितो भुवनोत्तमः ।।४।। पुत्रः सामान्यतश्चापि सज्जनानां सुखायते । मुक्तिगामी च यो भव्यस्तस्य किं वर्ण्यते भुवि ।। ५ ।। 'मस्तके कृष्णकेशौधैः स रेजे पुण्यपावनः । अलिभिः संश्रितो वात्र विकसच्चम्पकद्रुमः ॥ ६ ॥ विस्तीर्ण निर्मलं तस्य ललाटस्थानमुन्नतम् । पूर्वपुण्यनरेन्द्रस्य वासस्थानमिवारुचत् ।। ७ ।। नासिका शुकतुण्डाभा गन्धामोदविलासिनी। उन्नता संबभौ तस्य सुयशःस्थितिशंसिनी ॥ ८ ॥ चक्षुषी तस्य रेजाते सारपद्मदलोपमे । तस्य तद्वर्णनेनालं यो भावी केवलेक्षणः ॥ ९॥ संलग्नौ तस्य द्वौ कर्णौ रत्नकुण्डलशोभितौ । सरस्वतीयशोदेव्योः क्रीडान्दोलनकोपमौ ॥ १० ॥ चन्द्रो दोषाकरो नित्यं सकलङ्कः परिक्षयी। पद्मं जडाश्रितं तस्मात्तदास्यं जयति स्म ते ।। ११ ।। . .

[१, १२- . सुदर्शनचरितम् तत्कण्ठः संवभौ नित्यं रेखात्रयविराजितः। लक्ष्मीविद्यायुषां प्राप्तिसूचको विमलध्वनिः ॥ १२ ॥ कण्ठे मुक्ताफलैदिव्य रेजेऽसौ वालकोत्तमः । तारागणैर्यथा युक्तस्तारेशो राजतेतराम् ।। १३ ॥ मुजांसौ प्रोन्नतौ तस्य शोभिती शर्मकारिणौ । लोकद्वयमहालक्ष्मीसत्क्रीडापर्वताविव ।। १४ ॥ हृदयं सदयं तस्य विम्तीर्ण परमोदयम् । व्यजेष्ट सागरं क्षारं सारगम्भीरतास्पदम् ।। १५ ।। तारेण दिव्यहारेण मुक्ताफलचयेन च । हृत्पङ्कजं वभौ तस्य तद्गुणग्रामशंसिना ॥ १६ ॥ आजानुलम्विनी वाह रेजाते भूपणान्वितौ ।। दृढौ वा विटपौ तस्य सदानौ कल्पशाखिनः ।। १७ ।। पाणिपद्मद्वये तस्य कटकद्वयमुद्वभौ । कनत्कनकनिर्माणमुपयोगद्वयं यथा ।। १८ ।। तस्योदरं विभाति स्म सुमानं नाभिसंयुतम् । निधानस्थानकं वोच्चैः सर्वदोषविवर्जितम् ।। १९ ।। कटीतट कटीसूत्रवेष्टितं सुदृढं बभौ। जम्बूद्वीपस्थलं वात्र स्वर्णवेदिकयान्वितम् ।।२०।। ऊरुद्वयं शुभाकारं सुदृढं तस्य संवभी। सारं कुलगृहस्योच्चैःस्तम्भद्वयमिवोत्तमम् ।। २१॥ जानुद्वयं शुभं रेजे तस्य सारततं तराम् । वज्रगोलकयुग्मं वा कारातिविजित्वरम् ।। २२ ।। जंघाद्वयं परं तस्य सर्वभारभरक्षमम् । भन्यानां सुकुलं किं वा तस्य रेजे सुखप्रदम् ।। २३ ।। १. राशिना इति पाठ. । .

३१ -१, ३६ ] चतुर्थोऽधिकार द्वौ पादौ तस्य रेजाते स्वङ्गलीभिः समन्वितौ । सपत्रं कमलं जित्वा लक्षणश्रीविराजितौ ॥ २४ ।। इत्यादिकं जगत्सारं तस्य रूपं मनःप्रियम् । किं वर्ण्यते मया योऽत्र भावीत्रैलोक्यपूजितः ॥ २५ ।। वाणी तस्य मुखे जाता सज्जनानन्दायिनी । तस्याः किं कथ्यते याने सर्वतत्त्वार्थभापिणी ।। २६ ।। ततो महोत्सवैः पित्रा जैनोपाध्यायसंनिधौ। पाठनार्थ स पूतात्मा स्थापितो धीमता सुतः ।। २७ ।। पुरोहितसुतेनामा स कुर्वन् पठनक्रियाम् । कपिलाख्येन मित्रेण विनय रञ्जिताखिलः ।। २८ ।। पूर्वपुण्येन भव्योऽसौ सर्व विद्याविदांवरः । संजातः सुतरां रेजे मणिर्वा संस्कृतो बुधैः ।। २९ ।। अक्षराणि विचित्राणि गणितं शास्त्रमुत्तमम् । तर्कव्याकरणान्युच्चैः काव्यच्छन्दांसि निस्तुषम् ।। ३० ।। ज्योतिष्क वैद्यशास्त्राणि जैनागमशतानि च श्रावकाचारकादीनि पठति स्म यथाक्रमम् ॥ ३१ ।। विद्या लोकद्वये माता विद्या शर्मयशस्करी । विद्या लक्ष्मीकरा नित्यं विद्या चिन्तामणिहितः ॥ ३२ ॥ विद्या कल्पद्रुमो रम्यो विद्या कामदुहा च गौः । विद्या सारधनं लोके विद्या स्वर्मोक्षसाधिनी ।। ३३ ।। तस्माद्भव्यैः सदा कार्यो विद्याभ्यासो जगद्धितः । त्यक्त्वा प्रमादकं कष्टं सद्गुरोः पादसेवया ।। ३४ ।। एवं विद्यागुणनिर्मान व्यानुरञ्जनः। स रेजे यौवनं प्राप्य सुतरां सज्जनप्रियः ।। ३५ ।। अथ तत्र परः श्रेष्ठी सुधीः सागरदत्तवाक् । पत्नी सागरसेनाख्या तस्यासीत्प्राणवल्लभा ॥ ३६ ।।

३२ सुदर्शनचरितम् [४,३७- श्रेष्ठी सागरदत्ताख्यः स कदाचित्प्रमोदतः । जगी वृषभदासाख्यं प्रीतितो यदि मे सुता ॥ ३७ ।। भविष्यति तदा तेऽस्मै दास्ये पुत्राय तां सुताम् । नाम्ना सुदर्शनायाहं यतः प्रीतिः सदावयोः ॥ ३८॥ युक्तं सतां गुणिप्रीतिर्वल्लभा भवति ध्रुवम् । विदुषां भारतीवात्र लोकद्वयसुखावहा ।। ३९ ।। ततः समीपकाले च तस्य पत्नी स्वमन्दिरे। सती सागरसेनाख्या समसूत सुतां शुभाम् ॥ ४० ॥ साभून्मनोरमा नाम्ना नवयौवनमण्डिता । रूपसौभाग्यसंपन्ना कामदेवम्य वा रतिः ।। ४१ ।। वस्त्राभरणसंयुक्ता सा रेजे सुमनोरमा । कोमला कल्पवल्लीव जनानां मोहनौषधिः ।। ४२ ॥ तस्या द्वौ कोमलौ पादौ सारनू पुरसंयुतौ । साङ्गुल्यो लक्षणोपेतौ जयतः स्म कुशेशयम् ॥ ४३ ॥ तस्या जडघे च रेजाते सारलक्षणलक्षिते । पादपङ्कजयोर्नित्यं दद्धत्यौ नालयोः श्रियम् ।। ४४ ।। सदर्पचारुकन्दर्पभूपतेयूँहतोरणे । रम्भाम्तम्भायितं तस्याश्चोरुभ्यां यौवनोत्सवे ।। ४५ ॥ नितम्बस्थलमतस्या जैत्रभूमिमनोभुवः । यत्सदैवात्र वास्तव्यं पाति लोकत्रयं रतम् ।। ४६ ।। मध्यभागो बलिष्ठोऽस्याः कृगोदर्याः कृशोऽपि सन् । यो वलित्रितयाक्रान्तोऽप्यधिकां विदधौ श्रियम् ॥ ४७ ।। तस्याश्च हृदयं रेजे कुचद्वयसमन्वितम् । सहारं तोरणद्वारं सकुम्भं वा स्मरप्रभोः ।। ४८ ।। एतस्याः सरला काला रोमराजी तरां वभौ। कन्दर्पदन्तिनो विभ्रत्यालानस्तम्भविभ्रमम् ।। ४९ ।।

-४, ६२] चतुर्थोऽधिकार तद्बाहू कोमली रम्यौ करपल्लवसंयुतौ । सद्रत्नकङ्कणोपेतौ जयतो मालतीलताम् ।।५० ।। कण्ठः ससुस्वरस्तस्यास्त्रिरेखो हारमण्डितः। -कम्बुशोभा वभारोच्चैः सज्जनानन्ददायिनीम् ।। ५१ ।। मुखाम्बुजं वभौ तस्या नासिकाकर्णिकायुतम् । सुगन्धं रदनज्योत्स्नाकेसरं कोमलं शुभम् ॥ ५२ ॥ चक्षुपी कर्णविश्रान्ते रेजाते भ्रसमन्विते । कामिनां चित्तवेध्येषु पुष्पेषोः शरशोभिते ॥ ५३ ॥ कर्णी लक्षणसंपूर्णी कुण्डलद्वयसुन्दरौ । तस्या रूपश्रियो नित्यमान्दोलश्रियमाश्रितौ ॥५४॥ कपोलौ निर्मलौ तस्या वर्तुंलाकारधारिणौ । जगच्चेतोहरौ नित्यं सोमवत्संवभूवतुः ।।५५ ।। ललाटपट्टकं तस्या निर्मलं तिलकान्वितम् । चन्द्रविम्बं कलङ्कत्वाज्जयति स्म सदाशुभम् ॥५६॥ तस्याः सुकेश्याः कवरीवन्धः केनोपमीयते । यस्तूच्चैः कामराजस्य कामिनां पाशवद् बभौ ॥५७॥ इत्यादिरूपसंपत्त्या वस्त्राभरणशोभिता। गुणैः सुराङ्गनाः सापि जयति स्म मनोरमा ॥५८॥ अथैकदा पुरीमध्ये विनोदेन सुदर्शनः । कन्दर्पकामिनीरूपसर्पदर्पस्य जाङ्गुली ।।५९।। मित्रेण कपिलेनामा दिव्याभरणवस्त्रभाक् । पर्यटन कल्पवृक्षो वा याचकप्रीणनक्षमः ॥६०॥ सर्वलक्षणसंपूर्णः कलागुणविशारदः । सर्वस्त्रीजनसंदोहनेत्रनीलोत्पलश्रियः ॥६१।। पूर्णेन्दुः पुण्यसंपूर्णः स्वकान्तिज्योत्स्नयान्वितः । क्वचिद् गच्छन् स्वसौभाग्यान्मोहयन् सकलान् जनान् ॥६२।। ३ . सुदर्शनचरितम् [४, ६३- तस्य सागरदत्तस्य पुत्रिकां कुलदीपिकाम् । वस्त्राभरणसंदोहर्मण्डितां तां मनोरमाम् ॥६३।। सखीभिः संयुतां पूतां पूजार्थं निजलीलया। जिनालयं प्रगच्छन्ती समालोक्य सुविस्मितः ॥६४|| स प्राह कपिलं मित्र किमेषा सुरकन्यका । किमेषा किन्नरी रम्भा किं वा चैपा तिलोत्तमा ॥६५|| कि वा विद्याधरी रम्या किं वा नागेन्द्रकन्यका । आगता भूतले सत्यं हि त्वं मे विचक्षण ॥६॥ तं निशम्य सुधीः सोऽपि जगाद कपिलो द्विजः । शृणु त्वं मित्र ते वच्मि वचः संदेहनाशनम् ।।६७॥ अत्रैव पत्तने रम्ये श्रेष्ठी सागरदत्तवाक् । श्रीजिनेन्द्रपदाम्भोजसेवनकमधुव्रतः ।।६।। श्रावकाचारपूतात्मा दानपूजाविराजितः। सती सागरसेनाख्या तत्प्रिया सुमनःप्रिया ॥६९॥ सत्यं स एव लोकेऽस्मिन् गृहवासः प्रशस्यते । यत्र धर्मे गुणे दाने द्वयोर्मेधा सदा शुभा ।।७०।। तयोरेषा सुता सारकन्यागुणविभूपिता। पुण्येन योवनोपेता कुलोद्योतनदीपिका ।।७।। तदाकर्ण्य कुमारोऽपि मानसे मोहितस्तराम् । लक्ष्मी वात्र हरिवीक्ष्य संजातः कामपीडितः ॥७२।। स्वमन्दिरं समागत्य शय्यायां संपपात च । तां चित्ते देवतां वोच्चैः स्मरति स्म स्मराकुलः ।।७३।। तच्चिन्तया तदा तस्य सर्वकार्यसमन्वितम् । अन्नं पानं च ताम्बूलं विस्मृतं धिक् स्मराग्निकम् ।।७४॥ चन्दनागुरुकर्पूरपुष्पशीतोपचारकः । तस्य कामाग्निकुण्डे च संप्रजाता घृताहुतिः ।।७५||

३५
-४, ६८]
चतुर्थोऽधिकार
एहि त्वमेहि संजल्पन्तिष्ठ कामिनि सांप्रतम् ।
उत्सङ्गे मृगशावाक्षि मम तापं व्यपोहय ।।७६||
इत्यादिकं वृथालापं जल्पन पित्रादिभिस्तदा।
पृष्टस्ते पुत्र किं जातं ब्रूहि सर्व यथार्थतः ॥७॥
स पृष्टोऽपि यदा नैव ब्रूते पित्रा तदा द्रुतम् ।
संपृष्टः कपिलः प्राह सर्व वृत्तान्तमादितः ॥७॥
युक्तं प्रच्छन्नकं कार्य किंचिद् वा शुभाशुभम् ।
मित्रं सर्वं विजानाति सत्सखा शर्मदायकः ॥७९॥
पुत्रस्यार्तिमथाकर्ण्य तद्व्यथापरिहानये ।
गृहं सागरदत्तस्य चचाल वणिजांपतिः ॥८॥
भवन्त्यपत्यवर्गस्य पितरस्तु सदा हिताः।
यथा पद्माकरस्यात्र भानुर्नित्यं विकासकृत् ॥८॥
यावत्तस्य गृहं याति श्रेष्ठी वृषभदासवाक् ।
तावत्तस्य गृहे सापि पुत्री नाम्ना मनोरमा ।।८।।
सुदर्शनं समालोक्य विद्धा मदनशायकैः ।
गत्वा गृहं गृहीता वा पिशाचेन सुविह्वला ॥८॥
क्वासि क्वासि मनोऽभीष्ट मदीयप्राणवल्लभ ।
त्वद्विना मे घटी चापि याति कल्पशतोपमा ॥८४||
मासायते निमेपोऽपि गृहं कारागृहायते ।
देहि मे वचनं नाथ मदीयप्राणधारणम् ॥८५।।
स एव नरशार्दूलो भुवने परमोदयः।
यो मां दर्शनमात्रेण पीडयत्यत्र मन्मथः॥८६॥
इत्यादिकं प्रलापं च करोति स्म निरन्तरम् ।
भोजनादिकमुत्सृज्य तदा संसक्तमानसा ।।८।।
युक्तं दुष्टेन कामेन महान्तोऽपि महीतले ।
रुद्रादयोऽपि संदग्धा मुग्धेष्वन्येषु का कथा ॥८॥

नुदर्शनचरितम् [४, ८९- तावत्तत्र समायातः स श्रेष्ठी तं विलोक्य च । सुधीः सागरदत्तोऽपि समुत्थाय कृतादरः ।।८।। स्थानासनशुभैर्वाक्यैश्चक्रे संमानमुत्तमम् । स स्वभावः सतां नित्यं विनयो यः सन्ननेष्वलम् ।।९।। ततः कुशलवार्ता च कृत्वा साधार्मिकोचिताम् । जगौ कन्यापिता प्रीतो भो श्रेष्ठिन् सज्जनोत्तम ।।२१।। पवित्र मन्दिर मेऽद्य संजातं सुविशेपतः । यद्भवन्तः समायाताः पवित्रगुणसागराः ।।१२।। कृत्वा कृपां तथा प्रीत्या कार्य किमपि कथ्यताम् । ततो वृपभदासोऽपि प्रोवाच स्वमनीपितम् ॥२३॥ मनोरमा शुभा पुत्री त्वदीया पुण्यपावना । त्वया सुदर्शनायाशु दीयतां परमादरात् ॥१४॥ तं निशम्य सुधीः सोऽपि तुष्टः सागरदत्तवाक् । जगौ श्रेष्ठिन् सुधीः सारसुवर्णमणिसंभवः ।।१५।। संयोगः शर्मदो नित्यं कस्य वा न सुखायते । अतः कन्या सया तस्मै दीयते त्वत्तुजे मुदा ॥१६॥ शृणु चान्यद्वचो भद्र गदतो मम साम्प्रतम् । ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं कुलम् ।।६७|| तयोमैत्री विवाहश्च न तु पुष्टाविपुष्टयोः। श्लोकोऽयं सत्यमापन्नः संवन्धादावयोरपि ।।६८॥ गदित्वेति समाहूय श्रीधराख्यं विचणक्षम् । ज्योतिष्कशास्त्रसंपन्नं दत्वा मानं वणिग्जगौ ।।१९।। ब्रूहि भो त्वं शुभं लग्नं विवाहोचितमुत्तमम् । व्यवहारः सतां मान्यो यः शुभो भव्यदेहिनाम् ॥१०॥ १ 'दीयते' इति पाठ । - ३७ -४ ११३ ] चतुर्थोऽधिकारः सोऽवोचन्निकटश्चास्ति लग्नो मासे वसन्तके । सर्वदोपविनिर्मुक्तः पञ्चम्यां शुक्लपक्षके ॥१०॥ संपूर्णायां तिथी धीमान् यः करोति विवाहकम् । गृहं पूर्णं भवेत्तस्य पुत्ररत्नसमृद्धिभिः ॥१०२।। तदा तौ परमानन्दनिर्भरी वणिजां पती। पूर्व कृत्वा जिनेन्द्राणां मन्दिरे शर्ममन्दिरे ॥१०३।। पञ्चामृतैर्जगत्पूज्यजिनेन्द्रस्नपनं महत् । चक्रतुश्च महापूजां जलाद्यैः शर्मकारिणीम् ॥१०४|| ततस्ती खञ्जनेयुक्तो विशिष्टैश्चित्तरञ्जनः । विधाय मण्डपं दिव्यं महास्तम्भैः समुन्नतम् ॥१०५।। सारवस्त्रादिभिर्युक्तं पुष्पमालाविराजितम् । सतां चेतोहरं पूतं लक्ष्म्या वासमिवायतम् ।।१०।। सदीपूर्णकुम्भायः संयुतं विलसद्ध्वजम् । कामिनीजनसंगीतध्वनिवादित्रराजितम् ॥१०७॥ महादानप्रवाहेण जनानां वा सुरद्रुमम् । रम्भास्तम्भर्युतं चारुतोरणः प्रविराजितम् ।।१०८|| मङ्गलस्नानकं दत्वा कुलस्त्रीभिर्मनोहरम् । वस्त्राभरणसंदोहैः स्रक्ताम्बूलादिभिर्युतम् ॥१०९।। महोत्सवः समानीय तत्र पूतं वधूवरम् । शचीशक्रमिवात्यन्तसुन्दरं पुण्यमन्दिरम् ॥११०॥ वेद्या संस्थाप्य पुष्पार्द्रतन्दुलाद्यैः सुमानितम् । जैनपण्डितसंप्रोक्तमहाहोमजपादिभिः॥१११।। शुभे लग्ने दिने रम्ये कुलाचारविधानतः । भोजनादिकसदानैर्मानश्चेतोऽभिरजनैः ॥११२।। तदा सागरदत्ताख्यः श्रेष्ठी भार्यादिभिर्युतः । पूर्ण शृङ्गारमादाय सुदर्शनकरे शुभे ॥११३।।

३८ सुदर्शनचरितम् [४, ११४- चिरं जीवेति संप्रोक्त्वा पुण्यधारामिवोज्ज्वलाम् । एषा तुभ्यं मया दत्ता जलधारां ददौ मुदा ।।११४।। सोऽपि तत्पाणिपङ्केजपीडनं प्रमदप्रदम् । चक्रे सुदर्शनो धीमान् सर्वसजनसाक्षिकम् ।।११५।। एवं तदा तयोस्तत्र सज्जनानन्दकारणम् । विवाहमगलं दिव्यं समभूत्पुण्ययोगतः ॥११६।। इत्थं सारविभूतिमङ्गलशतैर्दानैः सुमानैः शुभैः नित्यं पूर्णमनोरथैश्च नितरां जातो विवाहोत्सवः । सर्वेपां प्रचुरप्रमोदजनकः संतानसंवृद्धिकः सत्पुण्याच्छुभदेहिनां त्रिभुवने संपद्यते मङ्गलम् ॥११७|| इति सुदर्शनचरिते पञ्चनमस्कारमाहात्म्यप्रदर्शके मुमुक्षु- श्रीविद्यानन्दिविरचिते सुदर्गनमनोरमाविवाह- मङ्गलव्यावर्णनो नाम चतुर्थोऽधिकार. ॥ मी ।

पञ्चमोऽधिकारः
अथातो दम्पती गाडं पूर्वपुण्यप्रभावतः।
महास्नेहेन संयुक्तौ शचीदेवेन्द्रसंनिभौ ॥१॥
भुञ्जानी विविधान् भोगान् स्वपञ्चेन्द्रियगोचरान् ।
सुस्थितौ मन्दिरे नित्यं परमानन्दनिर्भरौ ।।२।।
तदा कालक्रमेणोच्चैः संजाते सुरतोत्सवे ।
मनोरमा स्वपुण्येन शुभं गर्भ बभार च ॥३॥
अभ्रच्छाया यथा मेघ प्रजानां जीवनोपमम् ।
मासान्नव व्यतिक्रम्य सासूत सुतमुत्तमम् ।।४।।
सर्वलक्षणसंपूर्ण सुकान्ताख्यं जनप्रियम् ।
रत्नभूमिर्यथा रत्नसंचयं संपदाकरम् ।।५।।
एवं वृषभदासाख्यः स श्रेष्ठी पुण्यपाकतः।
तारागणैर्यथा चन्द्रः पुत्रपौत्रादिभिर्युतः ।।६।।
श्रीमजिनेन्द्रचन्द्रोक्तधर्मकर्मणि तत्परः ।
श्रावकाचारपूतात्मा दानपूजापरायणः ॥७॥
यावत्संतिष्ठते तावन्मुनीन्द्रो ज्ञानलोचनः ।
समाधिगुप्तनामोच्चैराजगाम वनान्तरम् ।।८।।
संघेन महता सार्द्ध रत्नत्रयविराजितः ।
श्रीजिनेन्द्रमताम्भोधिवर्धनेकविधुः सुधी ।।९।।
तपोरत्नाकरो नित्यं भव्याम्भोरुहभास्करः ।
जीवादिसप्ततत्त्वार्थसमर्थनविशारदः ॥१०॥
धर्मोपदेझपीयूपवृष्टिभिः परमोदयः ।
सदा संतर्पयन भव्यचातकौघान् दयानिधिः ॥११॥

[५, १२- सुदर्शनचरितम् तदागमनमात्रेण तद्वनं नन्दनोपमम् । सर्वर्तुफलपुष्पौधैः संजातं सुमनोहरम् ।।१२।। जलाशयास्तरां स्वच्छाः संपूर्णा रेजिरे तदा । जनतापच्छिदो नित्यं ते सतां मानसोपमाः॥१३॥ ऋराः सिंहादयश्चापि बभूवुस्ते दयापराः । साधूनां सत्प्रभावेण किं शुभं यन्न जायते ॥१४॥ तत्प्रभावं समालोक्य बनपालः प्रहर्पतः। फलादिकं समानीय धृत्वाने भूपति जगौ ।।१५।। भो राजन् भुवनानन्दी समायातो वने मुनिः । संघेन महता सार्ध पवित्रीकृतभूतलः ॥१६॥ तन्निशम्य प्रमुस्तस्मै दत्वा दानं प्रवेगतः । दापयित्वा शुभां भेरी भव्यानां शर्मदायिनीम् ॥१७|| सर्वैर्वृषभदासाद्यैः पौरलोकः समन्वितः। गत्वा वनं मुनि वीक्ष्य त्रिःपरीत्य प्रमोदतः ॥१८॥ मुनैः पादाम्बुजद्वन्द्वं समभ्यर्च्य सुखप्रदम् । कृताञ्जलिनमश्चक्रे भव्यानामित्यनुक्रमः॥१९॥ मुनिः समाधिगुप्ताख्यो दयारससरित्पतिः । धर्मवृद्धि ददी स्वामी हृष्टास्ते भूमिपादयः ॥२०॥ ततस्तैविनयेनोच्चैः संपृष्टो मुनिसत्तमः । धर्म जगाद भो भन्याः श्रूयतां जिनभाषितम् ।।२।। धर्म शर्माकर नित्यं कुरुध्वं परमोदयम् । प्राप्यन्ते संपदो येन पुत्रमित्रादिभिर्युताः ॥२२॥ सुराज्यं मान्यता नित्यं शौयौदार्यादयो गुणाः। विद्या यशः प्रमोदश्च धनधान्यादिकं तथा ।।२३।। स्वर्गो मोक्षः क्रमेणापि प्राप्यते भन्यदेहिभिः । स धर्मो द्विविधो शेयो मुनिश्रावकभेदभाक् ||२४|| . -५, ३७ ] पञ्चमोऽधिकार मुनीना स महाधर्मो भवेत्स्वर्गापवर्गदः । सर्वथा पञ्चपापानां त्यागो रत्नत्रयात्मकः ।।२५।। श्रावकाणां लघुः ख्यातस्तत्रादौ दोषवर्जितः । देवोऽहन केवलज्ञानी गुरुर्निर्ग्रन्थतामितः ॥२६॥ दशलाक्षणिको धर्मः श्रद्धा चेति सुखप्रदा। पालनीया सदा भव्यैर्दुर्गतिच्छेदकारिणी ।।२७।। जिनोत्तसप्ततत्त्वानां श्रद्धानं यच्च निर्मलम् । सम्यग्दर्शनमाम्नातं भवभ्रमणनाशनम् ।।२८।। तथौपशमिकं मिश्रं क्षायिकं च तदुच्यते । सप्तानां प्रकृतीनां हि शममिश्रक्षयोक्तिभिः ॥२९॥ तेन युक्तो भवेद्धर्मो भव्यानां स्वर्गमोक्षदः । यथाधिष्ठानसंयुक्तः प्रासादः प्रविराजते ॥३०॥ मद्यमांसमधुत्यागः सहोदुम्बरपञ्चकैः । अष्टौ मूलगुणानाहुर्गृहिणां श्रवणोत्तमाः ॥३१॥ तथा सत्पुरुपनित्यं द्यूतादिव्यसनानि च । संत्याज्यानि यकैः कष्टं महान्तोऽपि समाश्रिताः ॥३२॥ सप्तव्यसनमध्ये च प्रधानं द्यूतमुच्यते । कुलगोत्रयशोलक्ष्मीनाशकं तत्त्यजेद् बुधः ।।३३।। कितवेषु सदा रागद्वेषासत्यप्रवञ्चनाः । दोपाः सर्वेऽपि तिष्ठन्ति यथा सर्पपु दुर्विपम् ॥३४॥ अत्रोदाहरण राजा श्रावस्त्या सुमहानपि । सुकेतुस्तेन राज्यं च हारितं घृतदोपतः ॥३५।। युधिष्ठिराऽपि भूपालो घतेनात्र प्रवश्चितः । कष्टा दशा तरा प्राप्तस्तस्माइल्यान्त्यजन्तु तत् ॥३६।। श्रूयते च पुरा कुम्भनामा भूपः पलाशनात् । काम्पिल्याधिपतिर्नष्टः सूपकारेण संयुत्तः ।।३७।।

१२
[५, ३०-
-
सुदर्शनचरितम्
तथा पापी वका राजा पलासक्तः प्रणष्टधीः ।
लोकानां बालकाना च भक्षको निन्दितो जनः ॥३८||
भक्षित्वा विप्रपुत्रं च त्यक्तः पौरैविचक्षणः ।
स मृत्वा दुर्गति प्राप पापिनामीशी गतिः ॥३९॥
मद्यपस्य भवेन्नित्यं नष्टबुद्धिः स्वपापतः।
तत्पानमात्रतः शीघ्र हटान्तश्च निगद्यते ॥४॥
एकपान्नामभागेको विप्रपुत्रोऽपि चैकदा ।
परिव्राजकवेपेण गङ्गास्नानार्थनिर्गतः ।।४।।
अटव्यां मत्तमातङ्र्मद्यमांसप्रभक्षकैः।
चाण्डालीसंगतैङ्कृत्वा स प्रोको रे द्विजात्मज ॥४२||
मद्यमांसप्रियाणां च मध्ये यद्रोचतेतराम् ।
तदेकं स्वेच्छया भुक्त्वा याहि त्वं स्नानहेतवे ।।४।।
अन्यथा जाह्नवी माता दुर्लभा मरणावधि ।
तन्निशम्य द्विजः सोऽपि चिन्तयामास चेतसि ॥४४||
पापलेपकरं मांसं श्वभ्रदुःखनिवन्धनम् ।
कथं वा भक्ष्यते विप्रैः कुलगोत्रक्षयंकरम् ॥४॥
उक्तं च-
तिलसर्षपमात्रं च मासं खादन्ति ये द्विजाः ।
तिष्ठन्ति नरके तावद्यावञ्चन्द्रदिवाकरौ ।।४।।
चाण्डालीसंगमे जाते कचिद्भ्रान्त्यापि पापतः ।
प्रायश्चित्तं जगुविप्रैः काष्ठलक्षणसंज्ञकम् ।।४।।
धातकीगुडतोयोत्थं मह्यं सूत्रामणौ द्विजैः।
गृहीतं चेति मूढात्मा वेदमूढः स विप्रकः ॥४८॥
पीत्वा मद्यं प्रमत्तोऽसौ त्यक्तकोपीनकः कुधीः ।
विधाय नर्तनं कष्टं क्षुधासंपीडितस्ततः ॥४२॥

- -५, ६२] पञ्चमोऽधिकार भक्षित्वा च पलं तस्मात् प्रज्वलन्कामवह्निना। चाण्डालीसंगमं कृत्वा दुर्गतिं सोऽपि संययौ ॥५०॥ तस्मात्तत्त्यज्यते सद्भिर्मचं दुःखशतप्रदम् । संगतिश्चापि संत्याज्या मद्यपानविधायिनाम् ॥५१॥ गणिकासंगमेनापि पापराशिः प्रकीर्तितः । मद्यमांसरतत्वाच्च परस्त्रीदोपतस्तथा ॥५२।। पापा ब्रह्मदत्ताद्याः क्षितीशाश्व क्षयं गताः। चौर्येण शिवभूत्याद्या रावणाद्याः परस्त्रिया ।।५३।। तस्मादाखेटकं चौर्य परस्त्री श्वभ्रकारणम् । दौर्जन्यं च सदा त्याज्यं सद्धिः पापप्रदायकम् ॥५४।। अणुव्रतानि पञ्चोच्चैस्त्रिप्रकारं गुणव्रतम् । शिक्षात्रतानि चत्वारि पालनीयानि धीधनः ॥५५।। सारधर्मविदा नित्यं संत्याज्यं रात्रिभोजनम् । अगालितं जलं हेयं धर्मतत्त्व विदांवरैः ।।५६।। मांसव्रतविशुद्धयर्थ चर्मवारिघृतादिकम् । संधानकं सदा त्याज्यं दयाधर्मपरायणः ।।५७॥ भोजनं परिहर्तव्यं मद्यमांसादिदर्शने । श्रावकाणां तथा हेयं कन्दमूलादिकं सदा ।।५८।। पात्रदानं सदा कार्य स्वशक्त्या शर्मसाधनम् । आहाराभयभैषज्यशास्त्रदानविकल्पभाक् ॥५९॥ पूजा श्रीमजिनेन्द्राणा सदा सद्गतिदायिनी । संस्तुतिः सन्मतिर्जापे सर्वपापप्रणाशिनी ।।६।। शास्त्रस्य श्रवणं नित्यं कार्य सन्मतिरक्षणम् । लक्ष्मी क्षेमयशःकारि कास्रवनिवारणम् ।।६।। अन्ते सल्लेखना कार्या जैनतत्त्वविदांवरैः । परिग्रहं परित्यज्य सर्वशर्मशतप्रदा ॥६२।। ।

४४ सुदर्शनचरितम् [५, ६३- इत्यादि धर्मसद्भावं श्रुत्वा ते भूमिपादयः । सर्वे तं सुगुरुं नत्वा परमानन्दनिर्भराः ॥६३।। केचिद्गव्या व्रतं शीलं सोपवासं जिनोदितम् । सम्यक्त्वपूर्वकं लात्वा विशेपेण वृषं श्रिताः ॥६४॥ तदा वृषभदासस्तु श्रेष्ठी वैराग्यमानसः। चित्ते संचिन्तयामास संसारासारतादिकम् ॥६५।। यौवनं जरसाक्रान्तं सुखं दुःखावसानकम् । शरदभ्रसमा लक्ष्मीलॊकेन स्थिरतां ब्रजेत् ॥६६।। अहो मोहमहाशत्रुवशीभूतेन नित्यशः । वृथा कालो मया नीतो रामाकनकतृष्णया ॥३७॥ पुत्रमित्रकलनादि सर्व बुद्बुदसंनिभम् । भोगा भोगीन्द्रभोगाभाः सद्यः प्राणप्रहारिणः ॥६८।। यमः पापी खलः क्रूरः प्राणिनां प्राणनाशकृत् । समीपस्थोऽपि न ज्ञातो मया मुग्धेन तत्त्वतः ॥६९।। कांश्चिद्गृह्णाति गर्भस्थान बालकान् योवनोचितान् । सस्वान् निःस्वान् गृहे वासान् वनस्थांस्तापसानपि ॥७० हन्ति दण्डी दुरात्मात्र सर्वान् दावानलोपमः । मन्यमानस्तृणं चित्ते ये जगद्वलिनो भुवि ।।७१।। रूपलक्ष्मीमदोपेताः परिवारैः परिष्कृताः। तानपि क्षणतः पापी क्षयं नयति सर्वथा ॥७२॥ तस्माद्यावदसौ कायः स्वस्थः पटुभिरिन्द्रियैः । यावदन्तं न यात्यायुः करिष्ये हितमात्मनः ।।७।। चिन्तयित्वेति पूतात्मा श्रेष्ठी निर्वेदतत्परः । समाधिगुप्तनामानं तं प्रणम्य कृताञ्जलिः ||७४॥ प्रोवाच भो मुने स्वामिन् भव्याम्भोरुहभास्करः। त्वं सदा श्रीजिनेन्द्रोक्तस्याद्वादाम्बुधिचन्द्रमाः ।।७।।

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-५, ८७ ]
पञ्चमोऽधिकारः
शारदेन्दुतिरस्कारिकीर्तिव्याप्तजगत्त्रयः ।
सारासारविचारज्ञः पञ्चाचारधुरंधरः ॥७६।।
पडावश्यकसत्कर्म शिथिलीकृतवन्धनः ।
परोपकारसंभारपवित्रीकृतभूतलः ।।७७||
देहि दीक्षां कृपां कृत्वा जैनी पापप्रणाशिनीम् ।
सोऽपि भट्टारकः स्वामी मत्वा तन्निश्चयं ध्रुवम् ॥७८।।
यथाभीष्टमहो भव्य कुरु त्वं स्वात्मनो हितम् ।
इत्युवाच शुभां वाणी ज्ञानिनो युक्तिवेदिनः ॥७२।।
गुरोराज्ञां समादाय श्रेष्ठी वृषभदासवाक् ।
पुनर्नत्वा जिनान सिद्धान् गुरोः पादाम्बुजद्वयम् ।।८।।
सुदर्शनं नरेन्द्रस्य समर्प्य विनयोक्तिभिः ।
एतस्य पालनं राजन् भवद्विः क्रियते सदा ॥८१||
श्रीमतां सारपुण्येन करोमि हितमात्मनः ।
इत्याग्रहेण तेनापि सोऽनुज्ञातः प्रशस्य च ||८२।।
श्रेष्ठिन् संसारकान्तारे धन्यास्तेऽत्र भवादृशाः ।
ये कुर्वन्ति निजात्मानं पवित्रं जिनदीक्षया ॥८३।।
ततः श्रेष्ठी प्रहृष्टात्मा जिनस्नपनपूजनम् ।
कृत्वा वन्धून समापृच्छय विनयैर्मधुरोक्तिभिः ॥८४||
वाह्याभ्यन्तरसंभूतं परित्यज्य परिग्रहम् ।
दत्वा सुदर्शनायाशु धनं धान्यादिकं परम् ।।८५।।
निजं श्रेष्ठिपदं चापि क्षमां कृत्वा समन्ततः ।
दीक्षामादाय निःशल्यो मुनिर्जातो विचक्षणः । ८६||
श्रेष्ठिनी जिनमत्याख्या तदा तद्गुरुपादयोः ।
युग्मं प्रणम्य मोहादिपरिग्रहपराङ्मुखा ।।८७॥

४६ सुदर्शनचरितम् [५,८८- वस्त्रमानं समादाय लात्वा दीक्षां यथोचिताम् । संश्रिता भक्तितः कांचिदार्यिकां शुभमानसाम् ।।८८|| एवं तौ द्वौ जिनेन्द्रोकं तपः कृत्वा सुनिर्मलम् । समाधिना ततः काले स्वर्गसौख्यं समाश्रितो ||८|| स्थितौ तन्त्र स्वपुण्येन परमानन्दनिर्भरौ। जिनेन्द्रतपसा लोके किमसाध्यं सुखोत्तमम् ॥२०॥ इतः सुदर्शनो धीमान प्राप्य श्रेष्टिपदं शुभम् । राज्यमान्यो गुणयुक्तः सत्यशौचक्षमादिभिः॥२१|| पितुः सत्संपदां प्राप्य स्वार्जितां च विशेषतः । मुखन भोगान् मनोऽभीष्टान् विपुण्यजनदुर्लभान् ॥२२॥ मनोरमाप्रियोपेतः सज्जनः परिवारितः। इन्द्रो वात्र प्रतीन्द्रेण स्वपुत्रेण विराजितः ॥२३॥ श्रीजिनेन्द्रपदाम्भोजपूजनैकपवित्रधीः। सम्यग्दृष्टिजिनेन्द्रोक्तश्रावकाचारतत्परः ।।९४|| पात्रदानप्रवाहेण श्रेयो राजाथवापरः दयालुः परमोदारो गम्भीरः सागरादपि ॥१५॥ मनोरमालतोपेतः पुत्रपल्लवसंचयः । कुर्वन् परोपकारं स कल्पशाखीव संबभौ ॥९॥ जिनेन्द्रभवनोद्धारं प्रतिमाः पापनाशनाः। तत्प्रतिष्ठां जगत्प्राणितर्पिणी वा धनावलीम् ॥२७॥ कुर्वन् जिनोदितं धर्म राज्यकार्येषु धीरधीः । त्रिसन्ध्यं जिनराजस्य वन्दनाभक्तितत्परः ॥२८॥ तस्थौ सुखेन पूतात्मा सज्जनानन्ददायकः । शृण्वन् वाणीं जिनेन्द्राणां नित्यं सद्गुरुसेवनात् ।।९९|| -५, १०० पञ्चमोऽधिकारः ४७ तस्य कि वर्ण्यते धर्मप्रवृत्ति वनोत्तमा । यां विलोक्य परे चापि वहवो धर्मिणोऽभवन् ॥१००॥ इत्थं सारजिनेन्द्रधर्मरसिकः सदानमानादिभि- नित्यं चारुपरोपकारचतुरो राजादिभिर्मानितः । नानारत्नसुवर्णवस्तुनिकरैः श्रीसजनैर्मण्डितः श्रेष्ठी सारसुदर्शनो गुणनिधिस्तस्थौ सुखं मन्दिरे ॥१०१॥ इति सुदर्शनचरिते पञ्चनमस्कारमाहात्म्यप्रदर्शक मुमुक्षु- श्रीविद्यानन्दिविरचिते सुदर्शनश्रेष्ठिपदप्राप्ति- व्यावर्णनो नाम पञ्चमोऽधिकार ॥

षष्ठोऽधिकारः
अर्थकदा स्वपुण्येन रूपसौभाग्यसुन्दरः ।
श्रेष्ठी सुदर्शनो धीमान् स्वकार्यार्थ पुरे क्वचित् ॥१॥
संव्रजन् शीलसंपन्नः परस्त्रीपु पराङ्मुखः ।
श्रावकाचारपूतात्मा जिनभक्तिपरायणः ॥२॥
कपिलस्य गृहासन्ने यदा यातो नताननः ।
हष्टः कपिलया तत्र रूपरञ्जितसज्जनः ॥३॥
तदा सा लम्पटा चित्ते कामवाणकरालिता।
चिन्तयामास तद्रूपं भुवनप्रीतिकारकम् ॥४॥
यदानेन समं कामक्रीडां कुर्वे निजेच्छया ।
तदा मे जीवितं जन्म यौवनं सफलं भुवि ।।५।।
अन्यथा निष्फलं सर्वं निर्जने कुसुम यथा ।
चिन्तयित्वेति विप्रस्त्री कपिला स्मरविह्वला ॥६॥
कार्यार्थ कपिले क्वापि गते तस्मिन्निजेच्छया ।
स्वसखीं प्राह भो मातः सुदर्शनमिमं शुभम् ॥७॥
त्वं समानीय मे देहि कामदाहप्रशान्तये ।
नो चेन्मां विद्धि भो भद्रे संप्राप्तां यममन्दिरम् ।।८।।
अयं मे सर्वथा सत्यमुपकारो विधीयते ।
त्वदन्या मे सखी नास्ति प्राणसंधारणे ध्रुवम् ।।९।।
यथा ताराततौ व्योस्नि चन्द्रज्योत्स्ना तमःप्रहा।
सत्यं कामातुरा नारी चञ्चला किं करोति न ॥१०॥
तदाकर्ण्य सखी सापि प्रेरिता पापिनी तया ।
गत्वा द्राग्वचने चञ्चुस्तत्समीपं प्रपञ्चिनी ॥११॥

-६, २४] पष्टोऽधिकार. ४९ कृत्वा हस्तपुटं प्राह शृणु त्वं शुभगोत्तम । सखा ते कपिलो विप्रो महाज्वरकथितः ।।१२।। वालमित्रं भवानुच्चै गतोऽसि कथं किल । तन्निशम्य सुधीः सोऽपि सुदर्शनवणिग्वरः ॥१३॥ तां जगौ शृणु भो भद्रे न जानेऽहं च सर्वथा। इदानीमेव जानामि तवोक्त्या शपथेन च ।।१४|| गदित्देति तया सार्द्ध चलितो मित्रवत्सलः । हा मया जानता कैश्चिद्वासरैः सुहृदुत्तमः ॥१५|| प्रमादाद्वीक्षितो नैव चिन्तयन्निति मानसे । यावत्तद्गृहमायाति तावत्सा कपिला खला ॥१६॥ कामासक्ता स्वशृङ्गारं कृत्वा स्रक्चन्दनादिभिः । भूमावुपरि पल्य) कोमलास्तरणान्विते ॥१७॥ कच्छपीव सुवस्त्रेण स्वमाच्छाद्य मुखं स्थिता । लम्पटा स्त्री दुराचारप्रकारचतुरा किल ॥१८॥ यथा देवरते रक्ता यशोधरनितम्बिनी। अन्या वीरवती चापि दुष्टा गोपवती यथा ॥१९॥ दुष्टाः किं किं न कुर्वन्ति योषितः कामपीडिताः। या धर्मवर्जिता लोके कुबुद्धिविपदूषिताः ।।२०।। तदा प्राप्तः सुधीः श्रेष्ठी जगौ भद्रे व मे सखा। तयोक्तं चोपरिस्थाने मित्रं ते तिष्ठति दृतम् ।।२१।। एकाकिना त्वया श्रेष्ठिन् गम्यते हितचेतसा। तन्निशम्य सुधीः सोऽपि मित्रं द्रष्टुं समुत्सुकः ।।२२।। श्रेष्टी सहागतान् सर्वान् परित्यज्य विचक्षणः । गत्वा तत्र च पल्यङ्के स्थित्वा प्राह पवित्रधीः ॥२३॥ क तेऽनिष्टं शरीरेऽभूद् ब्रूहि भो मित्रपुङ्गव । कियन्तो दिवसा जाताः कथं नाकारिता वयम् ।।२।।

सुदर्शनचरितम्
[६, २५-
औपचं क्रियते किं वा वचो मे देहि शर्मदम् ।
को वा वैद्यः समायाति कराव्ज मित्र दर्शय ॥२५॥
एवं यावत्सुधीमित्रस्नेहेन वदति द्रुतम् ।
तावत्सापि करं तस्य गृहीत्वा हृदये ददो ॥२६॥
तां विलोक्य तदा सोऽपि कस्पितो हृदये तराम् ।
सुधीः शीघ्र समुत्तिष्ठन् पुन त्वा तयोदितम् ।।२७॥
शृणु त्वं प्राणनाथात्र वचो मे जितमन्मथ ।
सुभोगामृतपानेन कामरोगं व्यपोहय ॥२८॥
त्वदन्यो नास्ति मे वैद्यश्चिकित्साकर्मकोविदः ।
तवाधरसुघाधारां देहि मे साम्प्रतं द्रुतम् ।।२९।।
यतः कामाग्निशान्तिर्मे संभवेत्प्राणवल्लभ ।
स्मरवाणवणे देहे पट्टे वालिङ्गनं कुरु ॥३०॥
इदं चूर्ण तवैवास्ति यद्देहि मुखचुम्बनम् ।
प्राणान् मे गत्वरान् स्वामिन् रक्ष त्वं सुभगोत्तम ॥३१॥
यन्मयालपितं नाथ कामवाणप्रपीडया।
तत्त्वं सर्वप्रकारेण मदाशां पूरय प्रभो ॥३२॥
इत्यादिकं समाकर्ण्य तद्वाक्यं पापकारणम् ।
तदा सुदर्शनः श्रेष्ठी स्वचित्ते चकितस्तराम् ।।३३।।
चिन्तयामास पूतात्मा गृहीतन्तु तया दृढम् ।
मनोरमां परित्यज्य परनारी स्वसा मम ॥३४॥
धर्महरज्ञानसद्वृत्तरत्नचोरणतस्करी।
अस्मात् कथं मया शीघ्रं गम्यते शीलसागरः ||३५||
अधोमुखः क्षणं ध्यात्वा मानसे चतुरोत्तमः ।
तदोवाच वचः शीघ्र कामाग्निज्वलितां प्रति ॥३६||
भो भद्रे त्वं न जानासि वचस्ते निःफलं गतम् ।
किं करोमि विशालाक्षि पण्डत्वं मयि वर्तते ॥३७॥

-६, ५०]
षष्ठोऽधिकारः
कर्मणामुदयेनान बहीरम्यं वपुश्च मे ।
इन्द्रवारुणिकं वात्र फलं मेऽस्ति शरीरकम् ॥३८॥
अस्माकं च कदाप्यत्र वार्ता मित्रेण नोदिता।
तवाने सर्व विप्राणां कुलाम्भोरुहभानुना ॥३९॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य मानसोद्वेगकारकम् ।
हताशा स्वमुखं कृत्वा कृष्णवर्णं सुदुःखिता ॥४०॥
मानभङ्गं तरां प्राप्य कपिला कुलनाशिनी ।
स्वकरात्तं विमुच्याशु स्थिता सा चाप्यधोमुखी ।।४।।
अस्थाने येऽत्र कुर्वन्ति भोगाशां पापवञ्चिताः।
ते सदा कातरा लोके मानभङ्गं प्रयान्ति च ॥४२॥
सोऽप्यगात्स्वगृहं शीघ्रं व्याध्यास्त्रस्तो मृगो यथा ।
मत्वेति दुष्टयोषित्सु विश्वासो न विधीयते ॥४३॥
ये सन्तो भुवने भव्या जिनेन्द्रवचने रताः ।
येन केन प्रकारेण शीलं रक्षन्ति शर्मदम् ॥४४॥
ये परस्त्रीरता मूढा निकृष्टास्ते महीतले ।
दुःखदारिद्रयदुर्भाग्यमानभङ्गं प्रयान्ति ते ॥४५॥
ज्ञात्वेति मानसे सत्यं जिनोक्तं शर्मदं वचः ।
शीलरत्नं प्रयत्नेन पालनीयं सुखार्थिभिः ॥४६॥
ततः श्रेष्ठी विशुद्धात्मा स भव्यः श्रीसुदर्शनः ।
स्वशीलरक्षणे दक्षो यावत्संतिष्ठते सुखम् ।।४७॥
कुर्वन् धर्म जिनप्रोक्तं सर्वप्राणिसुखावहम् ।
तावन्मधुः समायातो मासो जनमनोहरः॥४८॥
वनस्पतिनितम्विन्याः प्रियो वा प्रमदप्रदः।
कामिनां सुतरां रम्यो महोत्सवविधायकः ॥४९॥
जलाशयानपि व्यक्तं सुविरजीकुर्वस्तराम् ।
विरेजे स मधुर्नित्यं संगमो वा सतां हितः॥५०॥

५२
सुदर्शनचरितम्
वस्त्राभरणसंयुक्तान् प्रमोदभरनिर्भरान ।
जनान् कुर्वन् सुखोपेतान् स सुराजेव संवभौ ॥५१||
चम्पकाम्रवसन्तादीन पादपान् पल्लवान्वितान् ।
फलपुष्पादिसंपन्नान् वितन्वन् सज्जनो यथा ॥५२॥
मधोरागमने तत्र प्रमोदभरिताशयः ।
धात्रीवाहनभूपालः परिच्छदपरिष्कृतः ॥५३।।
छत्रचामरवादित्रैः सर्वस्वान्तःपुरादिभिः ।
सर्वैः पौरजनैर्युक्तः क्रीडनार्थं वनं ययौ ॥५४॥
तत्राभयमती राज्ञी गच्छन्ती संविलोक्य सा।
रूपं सुदर्शनस्योचैर्महाप्रीतिविधायकम् ॥५५||
अहो रूपमहो रूपं भुवनक्षोभकारणम् ।
मोहिता मानसे गाढं चक्र तस्य प्रशंसनम् ।।५६||
तन्निशम्य तदा प्राह कपिला ब्राह्मणी वचः।
अहो देवि प्रषण्ढोऽयं मानवो रूपवानपि ॥५७॥
किमस्य रूपसंपत्त्या पुरुषत्वेन हीनया ।
वल्या निष्फलया वात्र महाकोमलया भुवि ॥५८||
अमागेऽथ रथारूढां राज्ञी वीक्ष्य मनोरमाम् ।
सुपुत्रां रूपलावण्यमण्डितां परमोदयाम् ।।५९।।
प्राहेयं वनिता कस्य सपुत्रा गुणभूषणा ।
सफला कल्पवल्लीव कोमला शर्मदायिनी ॥६०॥
तदाकर्ण्य सुधीः काचित्तहासी तां च संजगौ ।
अहो देवि सुपुण्यात्मा राजश्रेष्ठी सुदर्शनः ॥६१॥
गुणरत्नाकरो भव्यः सज्जनानन्ददायक ।
तस्येयं कामिनी दिव्या सपुत्रा कुलदीपिका ॥२॥
अभया तत्समाकर्ण्य दासीवाक्यं मनोहरम् ।
विश्वासकारणं तत्र हसित्वा कपिलां जगौ ॥६३॥

५३ ३ -६, ७६] पष्टोऽधिकार मन्येऽहं वञ्चिता त्वं च विप्रे तेन महाधिया। पुण्यवांल्लक्षणोपेतः स किं तादृग्विधो भवेत् ॥६॥ यस्य पुत्रो मया दृष्टः सर्वलक्षणमण्डितः । अतस्त्वं ब्राह्मणी लोके सत्यं पश्चिमबुद्धिभाक् ॥६५॥ हसित्वा कपिला प्रोक्त्वा स्ववृत्तं यत्पुराकृतम् । राजपत्नी पुनः प्राह शृणु त्वं देवि मद्वचः ॥६६॥ सौभाग्यं च सुरूपत्वं चातुर्य च तथापि ते । अस्यानुभवनान्मन्ये साफल्यं नान्यथा भुवि ॥६॥ ऊचे सा भूपतेर्भार्याभयाख्या पापनिर्भया । यद्येनं नैव सेवामि म्रियेऽहं सर्वथा तदा ॥६८॥ कुस्त्रियः साहसं कि वा नैव कुर्वन्ति भूतले । कामाग्निपीडिताः कष्टं नदी वा कूलयुक्क्षया ॥६९॥ प्रतिज्ञायेति सा रात्री कृत्वा क्रीडां वने ततः । आगत्य मन्दिरं तल्पे पपातानगपीडिता ||७०।। स्मराग्निज्वलिता गाढं प्रलपन्ती यथा तथा । निद्रासनादिभिर्मुक्ता कामिनां क्वास्ति चेतना ॥७॥ ताशी तां समालोक्य कामवाणैः समाकुलाम् । प्रोवाच पण्डिता धात्री किं ते जातं सुते वद ।।७२।। महिषी धात्रिका प्राह स्ववार्ता चित्तसंस्थिताम् । रतिः सुदर्शनेनामा यदि स्यान्मे च जीवितम् ॥७३॥ लज्जादिकं परित्यज्य राजी कामातुरा जगौ। सर्वे पापप्रदं वाक्यं कामिनां क्व विवेकिता॥७४|| तं निशम्य पुनः प्राह पण्डिता पापभीरता। कर्णी पिधाय हस्ताभ्यां स्वशिरो धूनती मुहुः ॥७५|| शृणु त्वं देवि वक्ष्येऽहं तावद्धर्मो यशः सुखम् । यावञ्चित्ते भवेन्नित्यं शीलरत्नं जगद्धितम् ।।६।। . - ६, ७७- सुदर्शनचरितम् स्त्रियश्चापि विशेषेण शोभन्ते शीलमण्डिताः। अन्यथा विषवल्लों रूपाद्यः संयुता अपि ॥७७॥ कामाकुलाः स्त्रियः पापा नैव पश्यन्ति किंचन । कार्याकार्ये यथान्धोऽपि पापतो विकलाशयः ॥७८॥ स्वेच्छया कार्यमाधातुं विरुद्धं योषितां भवेत् । यथामृतमहादेवी कुजकासक्तमानसा ।।७।। पति समातृकं हत्वा संप्राप्ता नरकक्षितिम् । तथा ते कथमुत्पन्ना कुबुद्धिः पापपाकतः ॥८॥ सुखी दुःखी कुरूपी च निर्धनो धनवानपि । पित्रा दत्तो वरो योऽसौ स सेव्यः कुलयोषिताम् ।।८१॥ भर्ता ते भूपतिर्मान्यो रूपादिगुणसंचयैः। तस्य कि क्रियते देवि वञ्चनं पापकारणम् ॥८२॥ भद्रं न चिन्तितं भद्रे त्वयेदं कर्म निन्दितम् । तस्मात्स्वकुलरक्षार्थ स्वचित्तं त्वं वशीकुरु ॥८३॥ तथा त्वं स्मर भो पुत्रि सुशीलाः सारयोषितः । तीर्थेशां जननी सीताचन्दनाद्रौपदीमुखाः ॥८४|| नीली प्रभावती कन्या दिव्यानन्तमतीमुखाः। याः स्वशीलप्रभावेन पूजिता नृसुरादिभिः ।।८५|| परस्त्रीः परभतश्च परद्रव्यं नराधमाः । ये वाञ्छन्ति स्वपापेन दुर्गतिं यान्ति ते खलाः ॥८६॥ सुदर्शनोऽपि पूतात्मा परस्त्रीषु पराड्मुखः। श्रावकाचारसंपन्नो जिनेन्द्रवचने रतः ॥८॥ म्वयोपित्यपि निर्मोहः सेवनं कुत्तेऽल्पकम् । कथं स कुरुते भव्यः परस्त्रीस्पर्शनं सुधीः ॥८८|| तथा कुलस्त्रिया चापि परित्यज्य निजं पतिम् । सर्वथा नैव कर्तव्या परपुंसि मतिभ्रुवम् ॥८९॥ 4 -६, १०२] पष्टोऽधिकारः इत्यादिकं शुभं वाक्यं पण्डितायाः सुखप्रदम् । तस्याश्चित्तेऽभवत्कष्टं सज्वरे वा घृतादिकम् ।।९०॥ कोपं कृत्वा जगौ राज्ञी सर्व जानामि साम्प्रतम् । किं तु तेन विना शीघ्रं प्राणा मे यान्ति निश्चितम् ।।९॥ परोपदेशने नित्यं सर्वोऽपि कुशलो जनः । अहमेवंविधोपायान् वहून वक्तुं क्षमा भुवि ॥१२॥ येनाकर्णितमात्रेण चित्तं मे भिद्यतेतराम् । तेन स्याद्यदि संवन्धः सौख्यं मे सर्वथा भवेत् ॥१३॥ कामतुल्योऽस्ति मे भर्ता गुणवानपि भूतले । तथापि मे मनोवृत्तिस्तस्मिन्नेव प्रवर्तते ॥१४॥ व्रजन्त्या च मयोद्याने सख्या कपिलया समम् । प्रतिज्ञा विहिता मातः सुदर्शनविदा सह ॥१५॥ चेदहं न रतिक्रीडां करोम्यत्र तदा म्रिये । अतो भ्रान्ति परित्यज्य मानसे प्राणवल्लभे ॥१६॥ त्वया च सर्वथा शीघ्रं यथा मे वाञ्छितं भवेत् । निर्विकल्पेन कर्तव्यं तथा कि बहुजल्पनैः ॥१७॥ इत्याग्रहं समाकर्ण्य तयोक्तं पण्डिता तदा । स्वचित्ते चिन्तयामास हा कष्टं स्त्रीदुराग्रहः ॥२८॥ 'यथा प्रेतवने रक्षः कश्मले मक्षिकाकुलम् । निम्बे काको वको मत्स्ये शूकरो मलभक्षणे ॥२९॥ खलो दुष्टस्वभावे च परद्रव्येषु तस्करः । प्रीतिं नैव जहात्यत्र तथा कुस्त्री दुराग्रहम् ।।१००॥ अथवा यद्यथा यत्रावश्यंभावि शुभाशुभम् । तत्तथा तत्र लोकेऽस्मिन् भवत्येव सुनिश्चितम् ॥१०॥ अहं चापि पराधीना सर्वथा किं करोम्यलम् । इत्याध्याय जगौ देवीं भो सुते शृणु मद्वचः॥१०२।। ।

सुदर्शनचरितम् [६, १०३- एकपत्नीव्रतोपेतो दुःसाध्यः श्रीसुदर्शनः । अगम्यं भवनं पुंसां सप्तप्राकारवेष्टितम् ।।१०३।। यद्यप्येतत्तव प्राणरक्षार्थ हृदि वर्तते । दुराग्रहो ग्रहो वात्र तदुपायो विधीयते ॥१०४|| यावत्तावत्त्वया चापि मुग्धे प्रागविसर्जनम् । कर्तव्यं नैव तद् वाले कुर्वेऽहं वाञ्छितं तव ॥१०५।। इत्यादिकं गदित्वाशु पण्डिता तां नृपप्रियाम् । समुद्धीर्य तदा तस्यास्तत्कार्य कर्तुमुद्यता ॥१०॥ युक्तं लोके पराधीनः किं वा कार्य शुभाशुभम् । कर्मणा कुरुते नैव वशीभूतो निरन्तरम् ।।१०७॥ स जयतु जिनदेवो योऽत्र कर्मारिजेता सुरपतिशतपूज्यः केवलज्ञानदीपः । सकलगुणसमग्रो भव्यपद्मौषभानुः परमशिवसुखश्रीवल्लभश्चिन्मयात्मा॥१०८।। इति सुदर्शनचरिते पञ्चनमस्कारमाहात्म्यप्रदर्शके मुमुक्षु- श्रीविद्यानन्दिविरचिने कपिलानिराकरणामयमती- व्यामोहविजृम्मणव्यावर्णनो नाम षष्टोऽधिकार ॥

सप्तमोऽधिकारः
अथ श्रीजिननाथोक्तश्रावकाचारकोविदः।
श्रेष्ठी सुदर्शनो नित्यं दानपूजादितत्परः ॥१॥
अष्टम्यादिचतुःपर्वदिनेषु बुधसत्तमः ।
उपवासं विधायोच्चैः कर्मणां निर्जराकरम् ।।२।।
रात्रौ प्रेतवनं गत्वा योगं गृह्णाति तत्त्व वित् ।
धौतवस्त्रान्वितश्चापि मुनिर्वा देहनिस्पृहः ॥३॥
तन्मत्वा पण्डिता सापि तमानेतुं कृतोद्यमा।
कुम्भकारगृहं गत्वा कारयित्वा च मृण्मयान् ॥४॥
सप्त पुत्तलकान् शीघ्र नराकारान् मनोहरान् ।
ततः सा प्रतिपद्यस्ते संध्यायां धृष्टमानसा ।।५।।
एक स्कन्धे समारोप्य वस्त्रेणाछाद्य वेगतः।
भूपतेर्भवनं यावत्समायाति मदोद्धता ॥६॥
तावत्प्रतोलिकां प्राप्तां प्रतीहारस्तु तां जगौ।
किं रे स्कन्धे समारोप्य नरं वा यासि सत्वरम् ॥७॥
सा चोवाच महाधूर्ता किं ते रे दुष्ट साम्प्रतम् ।
अहं देवीसमीपस्था कार्ये निश्शकमानसा ॥८॥
स्वेच्छया सर्वकार्याणि करोम्यत्र न संशयः।
कस्त्वं वराकमात्रस्तु यो मां प्रति निषेधकः ।।९।।
तदा तेन धृता हस्ते प्रतीहारेण पण्डिता।
क्षिप्त्वा तं पुत्तलं शीघ्र शतखण्डं विधाय च ॥१०॥
पश्चात्कोपेन तं प्राह रे रे दुष्ट प्रणष्टधीः ।
पूर्वं केनापि राज्येऽस्मिन् प्रतिपिद्धा न सर्वथा ॥११॥

[७, १२- । सुदर्शनचरितम् त्वयायं नाशितः कष्टं राज्ञीपुत्तलको वृथा। न ज्ञायते त्वया मूढ राज्ञी कामव्रतोद्यता ।।१२।। करिष्यति दिनान्यष्टी पूजां मृन्मयपूरुपे। रात्रौ जागरणं चापि तदर्थ प्रेपितास्म्यहम् ।।१३।। सेयं मूर्तिस्त्वया भग्ना नाशो जातः कुलस्य ते । नित्यं मायामया नारी किं पुनः कार्यमाश्रिता ॥१४॥ तदाकर्ण्य प्रतीहारः स भीत्वा निजचेतसि । भो मातस्त्वं क्षमां कृत्वा सेवकस्य ममोपरि ॥१५॥ मूढोऽहं नैव जानामि व्रतपूजादिकं हृदि ! अद्य प्रभृति यत्किचित्त्वया चानीयते शुभे ॥१॥ तदानीय विधातव्यं यत्तुभ्यं रोचते हितम् । न मया कथ्यते किंचिनिःशडका धेहि सर्वदा ॥१७॥ गदित्वेति स तत्पादद्वये लग्नो मुहुर्मुहुः । कृते दोषे महत्यत्र साधवो दीनवत्सलाः ॥१८॥ भवन्त्येव तथा मातस्त्वया संक्षम्यतां ध्रुवम् । तेनेति प्रार्थिता धात्री क्षान्त्वा स्वगृहमागता ॥१९॥ दिने दिने तया सर्वे द्वारपाला वशीकृताः। स्त्रीणां प्रपञ्चवाराशेः को वा पारं प्रयात्यहो ॥२०॥ अथाष्टमीदिने श्रेष्ठी सोपवासो जितेन्द्रियः । मुनीन्नत्वा तथारम्भं परित्यज्य च मौनभाक् ।।२।। प्रतस्थे पश्चिमे यामे श्मशानं प्रति शुद्धधीः । उत्तिष्ठतस्तदा तस्य विलग्नं वसनं क्वचित् ॥२२॥ ब्रुवद्वा तस्य तद्व्याजान्न गन्तव्यं त्वयाच भो। सुदर्शनोपसर्गस्य न त्वं योग्यो भवस्यहो ।।२३।। पुनर्गच्छति पन्यानं तस्मिन्मार्गे बसूव च । दुनिमित्तगणो निन्द्यो दक्षिणो रासभो रटन् ॥२४||

-
-७, ३७]
सप्तमोऽधिकारः
कुष्ठी कृष्णमुजङ्गोऽपि सम्मुखः पवनोऽभवत् ।
नानाविधोपशब्दश्च बभूवातिदुरन्तकः ।।२५।।
शृगाल्यो दुःस्वरं चक्रुरुपसर्गस्य सूचकम् ।
तथापि स्वव्रते सोऽपि दृढचित्तः सुदर्शनः ॥२६॥
गत्वा प्रेतवनं घोरं कातराणां सुदुस्तरम् ।
प्रज्वलच्चितिकारौद्रपावकेन भयानकम् ।।२७||
रटत्पशुभिराकीर्णं दण्डिनो मन्दिरोपमम् ।
प्रोच्छलद्भस्मसंघातं समलं दुष्टचित्तवत् ।।२८||
तत्र सोऽपि सुधीः कायोत्सर्गेणास्थात्सुराद्रिवत् ।
निर्जिताक्षो जिताशको जितमोहो जितस्पृहः ॥२९॥
श्रीजिनोक्तमहासप्ततत्त्वचिन्तनतत्परः।
अहं शुद्धनयेनोच्चैः सिद्धो बुद्धो निरामलः ॥३०॥
सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तः सर्वक्लेशविवर्जितः।
चिन्मयो देहमानोऽपि लोकमानो विशुद्धिभाक् ॥३१॥
मुक्त्वा कर्माणि संसारे नास्ति मे कोऽपि शत्रुकः।
धर्मो जिनोदितो मित्रं पवित्रो भुवनत्रये ॥३२॥
दशलाक्षणिको नित्यं देवेन्द्रादिप्रपूजितः ।
येन भव्या भजन्त्युच्चैः शाश्वतस्थानमुत्तमम् ॥३३॥
शरीरं सुदुराचारं पूतिबीभत्सु निघृणम् ।
पोपितं च क्षयं याति क्षणार्द्धनैव दुःखदम् ॥३४||
अस्थिमांसवसाचर्ममलमूत्रादिभिर्भूतम् ।
चाण्डालगृहसंकाशं संत्याज्यं ज्ञानिनां सदा ॥३५।।
तत्राहं मिलितश्चापि क्षीरनीरवदुत्तमः।
शुद्धनिश्चयतः सिद्धस्वभावः सद्गुणाष्ठकः ॥३६।।
इत्यादिकं सुधीश्चित्ते वैराग्यं चिन्तयंस्तराम् ।
यावदास्ते वणिग्चर्यस्तावत्तत्र समागमत् ॥३७॥

६० . सुदर्गनचरितम् [७, ३८- पापिनी पण्डिता प्राह तं विलोक्य कुधीर्वचः। त्वं धन्योऽस्ति वणिगवर्य त्वं सुपुण्योऽसि भूतले ॥३८॥ यदत्र भूपतेर्भार्याभयादिमतिरुत्तमा। त्वय्यासक्ता वभूवात्र रूपसौभाग्यशालिनी ॥३९।। कन्दर्पहस्तमल्लिा जगच्चेतोविदारणी । अतस्त्वं शीघ्रमागत्य तदाशां सफलां कुरु ॥४०॥ यद् भुज्यते सुखं स्वर्गे ध्यानमौनादिकश्रमैः । तत्सुखं मुडक्ष्व भो भद्र तया सार्द्ध त्वमत्र च ॥४१॥ किमेतैस्ते तपःकष्टैः कार्य कष्टशतप्रदैः। इदं सर्व त्वयारब्ध परित्यज्यैहि वेगतः ॥४२॥ इत्यादिकैस्तदालापैः स श्रेष्ठी ध्यानतस्तदा । न चचाल पवित्रात्मा किं वातैश्चाल्यतेऽद्रिराट् ।।४३।। तदास्तं भास्करः प्राप्तो वान्यायं द्रष्टुमक्षमः । सत्यं येऽत्र महान्तोऽपि ते दुायपराङ्मुखाः॥४४॥ तदा संकोचयामासुः पद्मनेत्राणि सर्वतः । पद्मिन्यो निजवन्धोश्च वियोगो दुस्सहो भुवि ॥४५|| आनी चास्तं गते तत्र चाम्बरे तिमिरोत्करः । जजृम्भे सर्वतः सत्यं स्वभावो मलिनामसौ ॥४६|| रेजे तारागणो व्योस्नि तदा सर्वत्र वर्तुलः । नभोलक्ष्म्याः प्रियश्चारुमुक्ताहारोपमो महान् ॥४७॥ गृहे गृहे प्रदीपाइच रेजिरे सुमनोहराः । सस्नेहाः सद्दशोपेताः सुपुत्रा वा तमश्छिदः ॥४८॥ ततः स्ववेश्मसु प्रीता भोगिनो वनितान्विताः। नानाविलासभोगेषु रताः संसृतिवर्द्धिनः ।।४।। योगिनो मुनयस्तत्र वभूवुानतत्पराः । स्वात्मतत्त्वप्रवीणास्ते सस्मृतिच्छेदकारिणः ॥५०॥ Ph "-७, ६३ ] सप्तमोऽधिकार. ततोऽम्बरे सुविस्तीर्णे चन्द्रमाः समभूत् स्फुटः। स्वकान्त्या तिमिरध्वंसी संम्फुरन् परमोदयः ।।५१।। जनानां परमाह्नादी जैनवादीव निर्मलः । मिथ्यामार्गतमास्तोमविनाशनपटुर्महान् ।।५२।। एवं तदा जनैः स्वस्वकर्मसु प्रविजृम्भिते अर्द्धरात्रौ तदा चन्द्रमण्डले मन्दतामिते ॥५३॥ कालरात्रिरिवोन्मत्ता पण्डिता पुनरागता। यत्रास्ते स महाधीरो ध्यायन् श्रीपरमेष्ठिनः ॥५४॥ तं प्रणम्य पुनः प्राह त्यक्तकायं सुनिश्चलम् । जीवानां ते दयाधर्मो विख्यातो भुवनत्रये ॥५५|| ततः कामग्रग्रस्तां महीपति नितम्बिनीम् । त्वदागमनसद्वाञ्छां चातकी वा धनागमे ॥५६|| कुर्वती शीघ्रमागत्य तत्र तां सुखिनी कुरु । अद्यैव सफलं जातं ध्यानं ते वणिजांपते ॥५७।। तया सार्द्ध महाभोगान् स्वर्गलोकेऽपि दुर्लभान् । कुरु त्वं परमानन्दात् किं पश्चिन्तनादिभिः ॥५८॥ गदित्वेति पुनानाच्चालनाय पुनश्च सा। नानासरागगीतानि सरागवचनैः सह ।।५९।। चक्रे तथापि धीरोऽसौ यावद् ध्यानं न मुञ्चति । तावत्सा पापिनी शीघ्र साहसोद्धतमानसा ।।६०|| तं समुद्धृत्य धृष्टात्मा श्रेष्ठिनं ध्यानसंयुतम् । स्वस्कन्धे च समारोप्य वस्त्रेणाच्छाद्य वेगतः ॥६॥ समानीय च तत्तल्पे महामौनसमन्वितम् । पातयामास दुष्टात्मा किं करोति न कामिनी ॥२॥ अभयादिमती वीक्ष्य तं सुरूपनिधानकम् । संतुष्टा मानसे मूढा धन्याहं चाद्य भूतले ।।६३।।

६२ [७,६४- सुदर्शनचरितम् दुष्टस्त्रीणां स्वभावोऽयं यद्विलोक्य परं नरम् । प्रमोदं कुरुते चित्ते कामबाणप्रपीडिता ।।६४|| तथाभयमती सा च दुर्मतिः पापकर्मणा । शृङ्गारं सुविधायाशु कामिनां सुमनोहरम् ॥६५॥ हावभावादिकं सर्वं विकारं संप्रदय च । जगौ लज्जां परित्यज्य वेश्या वा कासपीडिता ॥६६॥ मत्प्रियोऽसि मम स्वामी प्राणनाथस्त्वमूर्जितः । जाता त्वद्रपसौन्दर्य वीक्ष्याहं तेऽनुरागिणी ॥६७|| वल्लभस्त्वं कृपासिन्धुः प्रार्थितोऽसि मयाधुना। देहि चालिङ्गनं गाढं मह्यं शान्तिकरं परम् ॥६८॥ इत्यादिकं प्रलापं सा कृत्वा कामाग्निपीडिता। निस्त्रपा पापिनी भूत्वा खरी वा भूपभामिनी ॥६६॥ मुखे मुखार्पणैर्गाढमालिङ्गनशतैस्तथा । सरागैर्वचनैः कामवह्निज्वालाप्रदीपनैः ॥७०॥ अन्यैर्विकारसंदोहः कटिस्थानादिदर्शनैः। दर्शयित्वा स्वनाभिं च तं चालयितुमक्षमा ॥७॥ संजाता निर्मदा तत्र निरर्था सुतरां मुवि । चञ्चला सुचला चापि न शक्ता काञ्चनाचले ।।७२।। स भव्यो ध्यानसच्छैलात्स्वव्रते मेरुवढः । नैव तत्र चचालोच्चैर्जिनपादाब्जषट्पदः ।।७३॥ ततो भीत्वा जगी शीघ्र पण्डितां सा निरर्थिका। यस्मादसौ समानीतस्तत्रायं मुच्यतां त्वया ।।७४।। तयोक्तं क्व नयाम्येनं प्रातःकालोऽभवत्तराम् । पश्य सर्वत्र कुर्वन्ति पक्षिणोऽपि स्वरोत्करम् ।।७५|| तदाभया स्वचित्ते सा महाचिन्तातुराभवत् । किं करोमि क्व गच्छामि पश्चात्तापेन पीडिता ॥७६|| ६३ + - - -७, ८९] सप्तमोऽधिकारः हा मया सेवितो नैव सुरूपोऽयं सुदर्शनः । सोऽपि धीरः स्मरति स्म स्वचित्ते संसृतेः स्थितिम् ॥७॥ अभया चिन्तयामास भुक्ता भोगा न साम्प्रतम् । सुदर्शनोऽपि सद्धर्म निर्मलं जिनभापितम् ।।७८।। चिन्तयत्यभया चित्ते प्राप्तं मे मरणं ध्रुवम् । सुदर्शनोऽपि शुद्धात्मा शरणं जिनशासनम् ।।७।। पश्चात्तापं विधायाशु सा पुनः पण्डितां प्रति । प्राहैनं प्रापय स्थानं यत्र कुत्रापि वेगतः ।।८।। सोद्विन्ना संजगौ धात्री दिवानाथः समुद्गतः। न शक्यते मया नेतुं यद्युक्तं तत्समाचर ॥८१॥ तदाकाभया भीत्वा मृत्युमालोक्य सर्वथा । नखैविदार्य पापात्मा स्वस्तनौ हृदयं मुखम् ।।८२॥ शीलवत्याः शरीरं मे श्रेष्ठिनानेन दुर्धिया । कामातुरेण चागत्य ध्वस्तं चक्रे च पूत्कृतिम् ।।८।। किं करोति न दुःशीला दुष्टनी कामलम्पटा। पातकं कष्टदं लोके कुललक्ष्मीक्षयंकरम् ॥४॥ तत्पूत्कारं समाकर्ण्य तत्रागत्य च किङ्कराः। तत्र स्थितं तमालोक्य श्रेष्ठिनं विस्मयान्विताः॥८५|| राजानं च नमस्कृत्य जगुस्ते भो महीपते । देवीगृहं समागत्य रात्रौ धृष्टः सुदर्शनः ॥८६॥ कामातुरोऽभयादेव्याः शरीरं चातिसुन्दरम् । पापी विदारयामास किं कुर्सस्तस्य ओ प्रभो ॥७॥ दुःसहं तत्प्रमुः श्रुत्वा चिन्तयामास कोपतः । अहो दुष्टः कथं रात्री मन्दिरेऽत्र समागतः॥८॥; परस्त्रीलम्पटः श्रेष्ठी पापण्डी परवञ्चकः । इत्यादिक्रोधदावाग्निसंतप्तो मूढमानसः ॥८९॥ - - सुदनचरितम् ६४ -- [७, ९०- विचारेण विना जानन् स्वराजीपापचेष्टितम् । हन्यतां हन्यतां शीघ्र तान जगौ पापपातकः ॥२०॥ हन्यः सामान्यचौरोऽत्र किं मया दुष्टमानसा। राजद्रोही न हन्तव्यो मम प्राणप्रियारतः ।।९।। तदाकर्ण्य च कष्टास्ते किङ्करा निष्ठुरस्वराः । तत्रागत्य द्रुतं पापास्तं गृहीत्वा च मस्तके ॥२॥ निष्काश्य भूपतेर्गेहान्नयन्ति स्म श्मशानकम् । अविज्ञातस्वभावा हि किं न कुर्वन्ति दुर्जनाः ।।३।। तत्र कष्टशते काले सोऽपि धीरः सुदर्शनः । स्वचित्ते भावयामास ममैत्कर्मजृम्भितम् ॥२४॥ किं कुर्वन्ति वराका मे पराधीनास्तु किङ्कराः । शीलरत्नं सुनिर्मूल्यं तिष्ठत्यत्र सुखावहम् ॥१५॥ किमेतेन शरीरेण निस्सारेण मम ध्रुवम् । धर्मोऽहतां जगत्पूज्यो जयत्वत्र जगद्धितः ।।९।। एवं सुनिश्चलो धीमान्मेरुवन्निजमानसे । नीतः प्रेतवने चापि तस्थौ ध्यानगृहे सुखम् ॥२७॥ अहो सतां मनोवृत्तिर्भूतले केन वर्ण्यते । प्राणत्यागोपसर्गेऽपि निश्चला या जिताद्रिराट् ॥९८॥ तदा पुरेऽभवद्धाहाकारो घोरो महानिति । केचिद्वदन्ति धर्मात्मा श्रेष्ठी श्रीमान् सुदर्शनः ॥२९|| किं करोति कुकर्मासौ श्रावकाचारकोविदः । कि वा भानुर्नभोभागे प्रस्फुरन् कुरुते तमः ॥१०॥ एष श्रीमजिनेन्द्रोक्तसच्छीलामृतवारिधिः । प्राणत्यागेऽपि सच्छीलं त्यजत्येव न सर्वथा ।।१०१।। अन्ये पौरजनाः प्राहुरहो केनापि पापिना। केन वा कारणेनापि कृतं किं वा भविष्यति ॥१०२।।

-७, ११५] सप्तमोऽधिकार इत्यादिकं तदा पोराः पश्चात्ताप प्रचक्रिरे । सन्तो येऽत्र परेपां हि ते दुःखं सोढुमक्षमाः ॥१०३।। तथा केनापि तद्वार्ता कष्टकोटिविधायिनी । शीनं मनोरमायाश्च प्रोक्ता ते प्राणवल्लभः ॥१०४|| राजपत्नीप्रसङ्गेन शीलखण्डनदोपतः । राजादेशेन कप्टेन मार्यते च श्मशानके ।।१०।। मनोरमा तदाकये कम्पिताखिलविग्रहा। रुदन्ती ताडयन्ती च हृदयं शोकविह्वला ॥१०॥ वाताहता लतेवेयं कल्पवृक्षवियोगतः । चचाल वेगतो मार्गे प्रस्खलन्ती पदे पदे ॥१०७॥ हा हा नाथ त्वया चैतत्किं कृतं गुणमन्दिर । इत्यादिकं प्रजल्पन्ती तत्रागत्य उमशानके ॥१८८|| दुष्टैः संवेष्टितं वीक्ष्य सर्वा चन्दनद्रुमम् । तं जगाद धचो नाथ किं जातं ते विरूपकम् ।।१०९।। हा नाथ केन दुष्टेन त्वय्येवं दोषसंभवः । पापिना विहितश्चापि कष्टकोटि विधायकः ।।११०॥ त्वं सदा शीलपानीयप्रक्षालितमहीतलः । श्रीजिनेन्द्रोक्तसद्धर्मप्रतिपालनतत्परः ॥११॥ कि मेरुश्वलति स्थानात् किं समुद्रो विमुश्चति.। मर्यादा त्वं तथा नाथ किं शीलं त्यजसि ध्रुवम् ।।११।। हा नाथ स्वप्नके चापि नैव ते व्रतखण्डनम् । सत्यं नोदयते भानुः पश्चिमायां दिशि क्वचित् ।।११३।। अहो नाथात्र किं जातं ब्रूहि मे करुणापर । वाक्यामृतेन मे स्वास्थ्यं कुरु त्वं प्राणवल्लभ ||११४|| इत्यादि प्रलपन्ती सा यावदास्ते पुरः किल । तदा सुदर्शनो धीरः स्वचित्ते चिन्तयत्यलम् ॥११५॥ ५ ६६ सुदर्शनचरितम् [७, ११६- कस्य पुत्रो गृहं कस्य भार्या वा कस्य वान्धवाः । संसारे भ्रमतो जन्तोनिजोपार्जितकर्मभिः ॥११६|| अस्थिरं भुवने सर्व रत्नस्वर्णादिकं सदा। संपदा चपला नित्यं चञ्चलेव क्षणार्धतः ॥११७॥ भवेऽस्मिन् शरणं नास्ति देवो वा भूपतिः परः । देवेन्द्रो वा फणीन्द्रो वा मुक्त्वा रत्नत्रयं शुभम् ॥११८।। अत्र कर्मोदयेनोच्चैर्यद्वा तद्वा भवत्वलम् । अस्तु मे शरणं नित्यं पञ्चश्रीपरमेष्ठिनः ॥११९।। एवं सुदर्शनो धीमान्मेरुवन्निश्चलाशयः । यावदास्ते सुवैराग्यं चिन्तयंश्चतुरोत्तमः॥१२०।। यावत्तस्य गले तत्र कोऽपि गाढं दुराशयः । प्रहारं कुरुते खाझं तावत्तच्छीलपुण्यतः ।।१२१।। कम्पनादासनस्याशु जैनधर्मे सुवत्सलः । यक्षदेवः समागत्य जिनपादाजषट्पदः ॥१२२॥ स्तम्भयामास तान् सर्वान् दुष्टान भूपतिकिङकरान् । सुदृष्टिः सहते नेव मानभङ्गं सधर्मिणाम् ॥१२३।। एवं देवो महाधीरः परमानन्दनिर्भरः। उपसर्ग निराचक्रे तस्य धर्मानुरागतः ॥१२४|| पुष्पवृष्टि विधायाशु सुगन्धीकृतदिड्मु खाम् । श्रेष्ठिनं पूजयामास सुधीः सज्जनभक्तिभाक् ॥१२५।। तथा तत्र स्थिता भव्याः परमानन्दनिर्भराः। जयकोलाहलं चक्रुः सज्जनानन्ददायकम् ॥१२६।। तत्समाकर्ण्य भूपालो धात्रीवाहनसंज्ञकः। प्रेपयामास दुष्टात्मा पुन त्यान सुनिष्ठुरान् ।।१२७।। यक्षदेवश्च कोपेन तानपि प्रस्फुरत्प्रभः । सुधीः संकीलयामास स्वशक्त्या परमोदयः॥१२८|| -७, १४१] सप्तमोऽधिकार ६७ ततः सैन्यं समादाय चतुरङ्गं स्वयं नृपः । प्रागसत्तद्वधायाशु कोपकम्पितविग्रहः ॥१२९॥ समर्थो यक्षदेवोऽपि कृत्वा मायामयं बलम् । हस्त्यश्वादिकमत्युच्चैः संमुखं वेगतः स्थितः ।।१३०॥ तयोस्तत्र महायुद्धं कातराणां भयप्रदम् । समभूत्सुचिरं गाढं चमत्कारविधायकम् ॥१३१॥ शूराशूरि तथान्योन्यमश्वाशिव च गजागजि । दण्डादण्डि म्हातीव्र खड्गाखड्गि क्षयंकरम् ।।१३२।। तस्मिन् महति संग्रामे भूपतेश्छत्रमुन्नतम् । अछिनत्सध्वजं देवो यशोराशिवदुज्ज्वलम् ॥१३३।। तदा भीत्वा नृपो नष्टः प्राणसंदेहमाश्रितः । सिंहनादेन वा त्रस्तो गजेन्द्रो मदवानपि ।।१३४।। यक्षस्तत्पृष्ठतो लग्नस्तर्जयन्निष्ठुरैः स्वरैः। मदग्रतः क्व यासि त्वं वराकः प्राणरक्षणे ।।१३५।। रे रे दुष्ट वृथा कष्टं श्रेण्ठिनो व्रतधारिणः । कारितश्वोपसर्गस्तु त्वया स्त्रीवञ्चितेन च ॥१३६।। जीवितेच्छास्ति चेत्तेऽत्र श्रेष्ठिनः शरणं व्रज । जिनेन्द्रचरणाम्भोजसारसेवाविधायिनः॥१३७॥ तदा सुदर्शनस्यासौ शरणं गतवान्नृपः । रक्ष रक्षेति मां शोनं शरणागतमुत्तम ।।१३८॥ त्यजन्ति मार्दवं नैव सन्तः संपीडिता ध्रुवम् । ताडितं तापितं चापि काञ्चनं विलसच्छवि ।।१३९॥ तत्समाकर्ण्य स श्रेष्ठी परमेष्ठिप्रसन्नधीः । स्वहस्तौ शीघ्रमुद्धृत्य समाश्वास्य भूपतिम् ।।१४०॥ तस्य रक्षां विधातुं तं यक्षं पप्रच्छ को भवान् ।। यक्षदेवस्तदा शीघ्र श्रेण्ठिनं संप्रणम्य च ।।१४।। तं ६८ सुदर्शनचरितम् गदित्वागमनं स्वस्य तथाभयमतीकृतम् । उत्थाप्य तबलं सर्व स्वस्य सारप्रभावतः ॥१४॥ सुदर्शनं समभ्यर्च्य दिव्यवस्त्रादिकाञ्चनैः । प्रभावं जिनधर्मस्य संप्रकाश्य ययौ सुखम् ॥१४३|| सत्यं श्रीमजिनेन्द्रोक्तधर्मकर्मणि तत्पराः । शीलवन्तोऽत्र संसारे कर्न पूज्याः सुरोत्तमैः ।।१४४|| शीलं दुर्गतिनाशनं शुभकरं शीलं कुलोद्योतकं शीलं सारसुखप्रमोदतनकं लक्ष्मीयशःकारणम् । शीलं स्वव्रतरक्षणं गुणकरं संसारनिस्तारणं शीलं श्रीजिनभाषितं शुचितरं भव्या भजन्तु श्रिये ॥१४५|| इति सुदर्शनचरिते पञ्चनमस्कारमाहात्म्यप्रदर्शकं मुमुक्षु- श्रीविद्यानन्दिविरचिते अभयाकृतोपसर्गनिवा- रण-गीलप्रमावव्यावर्णनो नाम सप्तमोऽधिकार ।

अष्टमोऽधिकारः
:
अथ श्रेष्ठीमहाशीलप्रभावं पुण्यपावनम् ।
श्रुत्वा राज्ञी भयत्रस्ता भूपतेः पापकर्मणा ॥१॥
गले पाशं कुधीः कृत्वा मृत्वा सा पाटलीपुरे।
संजाता व्यन्तरी देवो दुष्टात्मा पापकारिणी ॥२॥
पण्डिता धात्रिका सापि चम्पापुर्याः प्रणश्य च ।
पाटलीपुरमागत्य तत्रस्थां देवदत्तिकाम् ॥३॥
वेश्यां प्रतिजगौ स्वस्य वृत्तकं धृष्टमानसा।
रूपाजीवापि तच्छत्वा धात्रिकां प्राह गर्वतः ॥४॥
कपिला किं विजानाति ब्राह्मणी मूढमानसा ।
साभया च भयत्रस्ता चातुरी किं च वेत्त्यलम् ॥५॥
अहं सर्व विजानामि कन्दर्परसकूपिका ।
कामशास्त्रप्रवीणा च जगद्वञ्चनतत्परा ॥६॥
मत्कटाक्षशरवातैर्हता हर्यादयोऽपि ये ।
त्यक्त्वा व्रतादिकं यान्ति कस्ते धीरो वणिक् सुतः ॥७॥
उर्वशीव च ब्रह्माणं सुदर्शनमनुत्तरम् ।
सेवेऽहं स्वेच्छया गाढं तदा स्यां देवदत्तिका ॥८
प्रतिज्ञामिति सा चक्रे तदने गणिका कुधीः ।
सत्यं कामातुरा नारी न वेत्ति पुरुषान्तरम् ।।२।।
जन्मान्धको यथा रूपं मत्तो वा तत्त्वलक्षणम् ।
तथान्योऽपि न जानाति कामी शीलवतां स्थितिम् ॥१०॥
अथातो नृपतिः श्रुत्वा यक्षेणोक्तं सुनिश्चितम् ।
दुराचारं स्त्रियः स्वस्य पश्चात्तापं विधाय च ॥११॥

[ ८, १२- सुदर्शनचरितम् हा मया मूढचित्तेन दुष्टस्त्रीवञ्चितेन च । विचारपरिशून्येन चक्रे साधुप्रपीडनम् ।।१२।। इत्यादिकं विचार्याशु स्वचित्ते च सुदर्शनम् । भक्तितस्तं प्रणम्योच्चैर्जगौ भो पुरुषोत्तम ||१३|| मयाज्ञानवता तुभ्यं दत्तो दोषो वधादिकृत् । तथापि क्षम्यतां मेऽत्र दुराचारविजृम्भणम् ॥१४॥ त्वं सदा जिनधर्मज्ञस्त्वं सदा शीलसागरः। त्वं सदा प्रशमागारं त्वं सदा दोपवर्जितः ॥१५॥ यथा मेरुगिरीन्द्राणामिह मध्ये महानहो । क्षीरसिन्धुः समुद्राणां तथा त्वं भव्यदेहिनाम् ॥१६॥ अतस्त्वं मे कृपां कृत्वा दयारससरित्पते । अर्धराज्यं गृहाणाशु वणिग्वंशशिरोमणे ।।१५ तन्निशम्य स च प्राह भो राजन् भुवनत्रये । प्राणिनां च सुखं दुःखं शुभाशुभविपाकतः ।।१८|| अत्र मे कर्मणा जातं यद्वा तद्वा महीतले। कस्य वा दीयते दोपस्त्वं च राजा प्रजाहितः ॥१२॥ शृणु प्रभो मया चित्ते प्रतिक्षा विहिता पुरा । एतस्मादुपसर्गाच्चेदुद्धरिष्यामि निश्चितम् ॥२०॥ ग्रहीष्यामि तदा पञ्चमहाव्रतकदम्बकम् । भोजनं पाणिपात्रेण करिष्यामि सुयुक्तितः ॥२१॥ ततो मे नियमो राजन् राज्यलक्ष्मीपरिग्रहे । इत्याग्रहेण सर्वेषां क्षमा चक्रे त्रिशुद्धितः ॥२२॥ युक्तं सतां सदा लोके क्षमासारविभूषणम् । यथा सर्वक्रियाकाण्डे दर्शनं शर्मकारणम् ॥२३॥ ततो जिनालयं गत्वा पवित्रीकृतभूतलम् । पूजयित्वा जिनांस्तत्र शक्रचक्रिसमर्चितान् ।।२४।।

-८, ३७ ]
अप्टमोऽधिकारः
तथा स्तुतिं चकारोच्चैर्जय त्वं जिनपुङ्गव ।
जय जन्मजरामृत्युमहागदभिपग्वर ।।२५।।
जय त्रैलोक्यनाथेश सर्वदोपक्षयंकर ।
जय त्वं त्रिजगभव्यपद्माकरदिवाकर ॥२६॥
जय त्वं केवलज्ञानलोकालोकप्रकाशक ।
जय त्वं जिननाथात्र विघ्नकोटिप्रणाशक ॥२ ।।
जय त्वं धर्मतीर्थेश परमानन्ददायक ।
जय त्वं सर्वतत्त्वार्थसिन्धुवर्धनचन्द्रमाः ॥२८॥
जय सर्वज सर्वेश सर्वसत्त्वहितंकर ।
जय त्वं जितकन्दर्प शीलरत्नाकर प्रभो ॥२९॥
त्वं देव त्रिजगत्पूज्यस्त्वं सदा त्रिजगद्गुरुः।
त्वं सदा त्रिजगद्वन्धुस्त्वं सदा त्रिजगत्पतिः ॥३०॥
कर्मणां निर्जयादेव त्वं जिनः परमार्थतः ।
त्वमेव मोक्षमार्गो हि साररत्नत्रयात्मकः ॥३१।।
त्वं पापारिहरत्वाञ्च हरस्त्वं परमार्थवित् ।
भव्यानां शंकरत्वाच्च शंकरस्त्वं शिवप्रदः ॥३२॥
ज्ञानेन भुवनव्यापी विष्णुस्त्वं विश्वपालकः ।
त्वं सदा सुगतेर्नेता त्वं सुधीर्मतीर्थकृत् ॥३३॥
दिव्यचिन्तामणिस्त्वं च कल्पवृक्षस्त्वमेव हि ।
कामधेनुस्त्वमेवात्र वाञ्छितार्थप्रपूरकः ॥३४॥
सिद्धो बुद्धो निराबाधो विशुद्धस्त्वं निरञ्जनः।
देवाधिदेवो देवेशसमर्चितपदाम्बुजः ॥३५।।
नमस्तुभ्यं जगद्वन्द्य नमस्तुभ्यं जगद्गुरो ।
नमस्ते परमानन्ददायक प्रभुसत्तम ।।३६।।
अस्तु मे जिनराजोच्चैर्भक्तिस्ते शर्मदायिनी ।
लोकद्वयहिता नित्यं सर्वशान्तिविधायिनी ॥३७॥

७२
सुदर्शनचरितम्
[ ८,३८-
इत्यादि संस्तुतिं कृत्वा जिनानां संपदाप्रदाम् ।
पुनः पुनर्नमस्कृत्य ततो भव्यशिरोमणिः ॥३८॥
ज्ञानिनं गुरुमानम्य नाम्ना विमलवाहनम् ।
शुद्धरत्नत्रयोपेतं कुमतान्धतमोरविम् ।।३।।
संजगाद मुने स्वामिन् सर्वसत्त्वहितंकर ।
पूर्वजन्मप्रसंवन्धं मम त्वं वक्तुमर्हसि ॥४||
सोऽपि स्वामी कृपासिन्धुव्यवन्धुर्जगौ मुनिः ।
शृणु त्वं भो महाभव्य सुदर्शन मदीरितम् ॥४१॥
अत्रैव भरतक्षेत्रे पवित्रे धर्मकर्मभिः ।
विन्ध्यदेशे सुविख्याते पुरे कौशलसंज्ञके ||४२||
भूपालाख्यो नृपस्तस्य राज्ञी जाता वसुन्धरा ।
लोकपालस्तयोः पुत्रः शूरो वीरो विचक्षणः ।।४।।
एवं स पुत्रपौत्रादिपरिवारैः परिष्कृतः ।
भूपालो निजपुण्येन कुर्वन् राज्यं सुखं स्थितः ।।४४||
एकदा तस्य भूपस्य सिंहद्वारे सनोहरे ।
रक्ष रक्षेति भो देव पूत्कारं चक्रिरे जनाः ॥४५||
तमाकर्ण्य नृपोऽनन्तबुद्धिमन्त्रिणमाजगौ।
किमेतदिति स प्राह मन्त्री शृणु महीपते ।।४।।
अस्मादक्षिण दिग्भागे गिरौ विन्ध्ये महावली ।
व्याघ्रनामा च भिल्लोऽस्ति कुरङ्गी नाम तत्प्रिया ।।४॥
स व्याघ्रो व्याववत्रो दुष्टात्मा वा चमोऽधमः।
अहंकारमदोन्मत्तो नित्यं कोदण्डकाण्डभाक् ।।४।।
स पापी कुरुते देव प्रजानां पीडनं सदा ।
तस्मादियं प्रजा गाढं पूत्कारं कुरुते प्रभो ॥४९||
श्रुत्वा भूपालनामा च मन्त्रिवाक्यं नृपो रुपा।
जगों कोऽचं कुधीभिल्लो मत्प्रजादुःखदायकः ॥५०॥

-८, ६३] अष्टमोऽधिकारः तथादेशं ददौ सेनापतये याहि सत्वरम् । जित्वा भिल्लं समागच्छ दर्पिष्ठं शत्रुकं मम ॥५१॥ सत्यं प्रसिद्धभूपालाः प्रजापालनतत्पराः। ये ते नैव सहन्तेऽत्र प्रजापीडनमुत्तमाः ॥५२॥ सेनापतिस्तदा शीघ्रं सारसेनासमन्वितः। गत्वा युद्धे जितस्तेन भिल्लराजेन वेगतः ॥५३।। मानभङ्गेन संत्रम्तः पश्चात्स्वपुरमागतः। पुण्यं विना कुतो लोके जयः संप्राप्यते शुभः ।।५४।। ततः कोपेन गच्छन्तं भूपालाख्यं स्वयं नृपम् । लोकपालः सुतः प्राह नत्वा शृणु महीपते ।। ५५।। सेवके मयि सत्यत्र किं श्रीमद्भिः प्रगम्यते । गदित्वेति ततो गत्वा सर्वसारवलान्वितः ।।५।। युद्धं विधाय त हत्वा भिल्लं स्वपुरमागमत् । दुःसाध्य स्वपितुलॊके साधयत्यत्र सत्सुतः ।।५७॥ व्याघ्रो भिल्लपतिः सोऽपि मृत्वा कर्मवशीकृतः। गोकुले कुर्कुरो भूत्वा कदाचित्स कृतज्ञकः ।।५८॥ गोपस्त्रीभिश्च कौशाम्बी सहागत्य जिनालयम् । समालोक्य समाश्रित्य किंचिच्छुभयुतोऽभवत् ।। ५९॥ मृत्वा ततश्च चम्पायां नरजन्मत्वमाप सः । सिंहप्रियाभिधानस्य कस्यचिल्लुब्धकस्य च ॥६०॥ सिंहिन्यां तनयो भूत्वा मृत्वा तत्र पुनः स च । चम्पायां सुभगा नाम गोपालः समजायत ॥६१।। श्रेष्ठिनस्ते पितुः सोऽपि गोपालो मन्दिरेऽभवत् । गवां वृपभदासस्य पालकः प्रौढवालकः ॥६२।। गवां संपालनत्वाच्च सुराजेव जनप्रियः । कवेः काव्योपमश्छन्दोगामी सर्वमनोहरः॥६३।।

[८,६४- ७४ सुदर्शनचरितम् हरिवी कानने क्रीडन् कपिर्वा तरुषु भ्रमन् । अलिवा कुसुमास्वादी सुस्वरो वा सुरोत्तमः ।।६४॥ निःशड्को मानसे नित्यं सदृष्टि, स्ववृत्तिषु । अप्रमादी च कार्येषु भटो वा बालकोऽपि सन् ॥६५।। एकदा सुभगः सोऽपि माघमासे सुदुःसहे। पतच्छीतभराक्रान्तप्रकम्पितजगज्जने ॥६६॥ संध्याकाले समादाय श्रेष्ठिनो गोकदम्बकम् । समागच्छन् वने रम्ये मुनीन्द्रं वीक्ष्य चारणम् ॥६७।। तारणं भववाराशौ भव्यानां शर्मकारणम् । एकत्वभावनोपेतं सङ्गद्वयविवर्जितम् ।।६८॥ रत्नत्रयसमायुक्तं चतुर्ज्ञानसमन्वितम् । पञ्चाचारविचारजं पञ्चमीगतिसाधकम् ॥६॥ महाभक्तिभरोपेतं पञ्चाप्तेषु निरन्तरम् । षडावश्यकसत्कर्मप्रतिपालनतत्परम् ।।७०।। षटसुजीवदयावल्लीप्रसिञ्चनधनाधनम् । षड्लेश्यासुविचारझं सप्ततत्त्वप्रकाशकम् ।।७१॥ सप्तपातालदुःखौघनिवारणविदांवरम् । कर्माष्टकक्षयोद्युक्तं मदाष्टकहरं परम् ॥७२॥ नवधा ब्रह्मचर्याव्यं पदार्थनवकोविदम् । जिनोक्तदशधाधर्मप्रतिपालनसंविदम् ॥७३॥ एकादशप्रकारोक्तप्रतिमाप्रतिपादकम् । द्वादशोक्ततपोभारसमुद्धरणनायकम् ||७४॥ द्वादशप्रमितव्यक्तानुप्रेक्षाचिन्तनोद्यतम् । त्रयोदशजिनेन्द्रोक्तचारुचारित्रमण्डितम् ।।७।। चतुर्दशगुणस्थानप्रविचारणमानसम् । प्रमादेः पञ्चदशभिर्विनिर्मुक्तं गुणाम्बुधिम् ॥७६|| ८ ७५ -८, ८९] अप्टमोऽधिकारः पोडगप्रमितव्यक्तभावनाभावकोविदम् । प्रोक्तसप्तदशासंयमकैनित्यं विवर्जितम् ।।७।। अष्टादशासम्परायक्षातारं करुणार्णवम् । एकोनविंशतिप्रोक्तनाथाध्ययनान्वितम् ।।७८|| प्रोक्त-विंशति-संख्यानासमाधिस्थानवर्जितम् । एकविंशतिमानोक्तसबलानां विचारकम् ॥७९॥ द्वाविंशतिमुनिप्रोक्तपरीषहजयक्षमम् । त्रयोविंशतिजेनोक्तश्रुतध्यानपरायणम् ।।८।। चतुर्विंशतितीर्थेशसारसेवासमन्वितम् । भावनापञ्चविंशत्याराधकं विश्ववन्दितम् ।।८।। ज्ञातारं पञ्चविंशत्याः क्रियाणा धर्मसंपदाम् । पड्विंशतिक्षमाणां च वेत्तारं नयकोविदम् ॥८२।। सप्तविंशत्यनागारगुणयुक्तं गुणालयम् । अष्टाविंशतिविख्यातसारमूलगुणान्वितम् ।।८३॥ एकोनत्रिंशदाप्रोक्तपापसगक्षयंकरम् । प्रोक्तत्रिंशन्मोहनीयस्थानभेदप्रभेदकम् ॥८४|| एकत्रिंशत्प्रमाणोक्तकर्मपाकप्रवेदिनम् । द्वात्रिंशद्वीतरागोपदेशेषु कृतनिश्चयम् ॥८५|| त्रयस्त्रिंशत्प्रमात्यासादनानां क्षयकारकम् । चतुस्त्रिशत्प्रमाणातिशयसंपत्तिदर्शिनम् ॥८॥ ध्यायन्तं परमात्मानं मेरुवन्निश्चलाशयम् । गुणैरित्यादिमिः पूतमन्यैश्चापि विराजितम् ॥८॥ स्वचित्ते चिन्तयामास तदा बालो दयापरः। एतेन तीव्रशीतेन तरवोऽपि महीतले ॥८८|| केचिच्च प्रलयं यान्ति कथं स्वामी च तिष्ठति । दिगम्बरो गुणाधारो वीतरागोऽतिनिस्पृहः ।।८।।

सुदर्शनचरितम् [८, ९०- अस्मादशाः सवस्त्राद्याः कम्पन्ते शीतवातकैः। दन्तेषु संकटं प्राप्ताः पशवोऽपि सुदुःखिताः ॥२०॥ इत्येवं चिन्तयन् गत्वा गृहं गोपो दयाधीः । काष्ठादिकं समानीय वह्नि प्रज्वाल्य सादरम् ।।२१।। समन्तान्मुनिनाथस्य नातिदूरं न दुःसहम् । उष्णीकृत्य निजौ पाणी तन्मुनेः पाणिपादयोः ।।१२।। पार्वे परिभ्रमन्नुच्चर्भक्तिभावभरान्वितः। शरीरे मर्दनं कृत्वा स्वास्थ्यं चक्रे प्रमोदतः॥२३॥ एवं रात्रौ महाप्रीत्या सेवां कुर्वन् सुधीः स्थितः । सत्यमासन्नभव्यानां गुरुभक्तौ रतिर्भवेत् ॥१४॥ मुनीन्द्रोऽपि सुखं रात्रौ ध्यानं कृत्वा सुनिस्पृहः । सूर्योदये दयासिन्धुर्योगं संहृत्य मानसे ॥२५॥ अयमासन्नभव्योऽस्ति मत्वेति प्रमदप्रदम् । सप्ताक्षरं महामन्त्रं दत्वा तस्मै जगाद सः ॥२३॥ अनेन मन्त्रराजेन भो सुधीः शृणु निश्चितम् । सिद्धयन्ति सर्वकार्याणि यान्ति कष्टानि संक्षयम् ॥२७॥ सर्वे विद्याधरा देवाश्चक्रवादयो मुवि । इमं मन्त्रं समाराध्य प्रापुः स्वर्गापवगकम् ।।६८॥ त्वया सर्वत्र कार्येषु गमनागमनेषु वा । भोजनादौ सुख दुःखे समाराध्यो हि सन्त्रराट् ॥६६॥ णमो अरहंताणं इत्युक्त्वा च मुनिः स्वामी तस्मै परमपावनः । स्वयं तमेव सन्मन्त्रं गदित्वागान्नभोऽङ्गणे ॥१०॥ तन्मन्त्रेण मुनेर्वीक्ष्य नभोगमनमुत्तमम् । मन्त्रे श्रद्धा तरां तस्य तदाभूदु धर्मदायिनी ।।१०।। - -८, १४] अप्टमोऽधिकारः ७७ अथ गोपालकः सोऽपि निधानं वा जगद्धितम् । मन्त्रं तं प्राप्य तुष्टात्मा संपठन् परमादरात् ॥१०२।। भोजने शयने पाने यानेऽरण्ये घने वने । पशूनां रक्षणे प्रीत्या वन्धने मोचनेऽपि च ।।१०३।। अन्यत्र सर्वकार्येषु पठनुचैः प्रमोदतः । घेनूनां दोहने काले मन्त्रमुच्चारयंस्तथा ॥१०४|| श्रेष्ठिना तेन संपृष्ठो गोपो भो ब्रूहि केन च ! मन्त्रोऽयं प्रवरस्तुभ्यं दत्तः शर्मशतप्रदः ।।१०५।। सुभगस्तं प्रणम्याशु तत्प्राप्तेः कारणं जगौ। तन्निशम्य सुधीः श्रेष्ठी तं प्रशंसितवान् भृशम् ॥१०६।। धन्यस्त्वं पुत्र पुण्यात्मा त्वमेव गुणसागरः । यत्त्वया स मुनिईष्टः प्राप्तो मन्त्रो जगद्धितः ॥१०७|| उद्धृतोऽयं त्वया जीवः स्वकीयो भवसागरात् । त्वमेव प्रवरो लोके त्वमेव शुभसंचयः ॥१०८।। उद्वर्तितो यथादर्शो भवत्येव सुनिर्मलः । तथा सन्मन्त्रयोगेन जीवो निर्मलतां व्रजेत् ॥१०९।। इति प्रशस्य तं श्रेष्ठी सम्यग्दृष्टिः सुधार्मिकः । वस्त्रभोजनसद्वाक्यस्तोपयामास गोपकम् ।।११०।। तदाप्रभृति पूतात्मा विशेषेण स्वपुत्रवत् । नित्यं पालयति स्मोच्चैधर्मी धर्मिणि वत्सलः ॥१११।। अथैकदागतोऽटव्यां गोमहिष्यादिवृन्दकम् । स लात्वा चारयंस्तत्र गङ्गातीरे मनोहरे ॥११२।। अर्हतां प्रनपन्नाम शर्मधाम जगद्धितम् । सावधानस्तरोर्मूले पवित्रे परमार्थतः ॥११३।। स्थितो यावत्सुखं तावदन्यो गोपः समागतः । तं जगादात्र भो मित्र महिष्यस्ते परं तटम् ॥११४॥ - सुदर्शनचरितम् [८, . . यान्ति शीघ्र समागत्य ताः समानय साम्प्रतम् । श्रुत्वेति वचनं तस्य सुभगोऽपि प्रवेगतः ॥११५।। गङ्गातटं सुधीर्गत्वा महासाहससंयुतः। मन्त्रं तमेव भव्यात्मा समुच्चार्य मनोहरम् ॥११६॥ ददौ झम्पां जले तत्र तीक्ष्णकाष्ठं दुराशयैः । मत्स्यवन्धिभिरारब्धं कष्टदं वर्तते पुरा ॥११७॥ तस्योपरि पपाताशु स भिन्नो जठरे तदा । काष्ठेन तीक्ष्णभावेन दुर्जनेनेव पापिना ॥११८॥ तत्र मन्त्रं स्मरन्तुच्चैर्निदानं मानसेऽकरोत् । श्रेष्ठिनोऽस्य सुपुण्यस्य मन्त्रराजप्रसादतः ॥११९|| पुत्रो भवाम्यहं चेति दशप्राणैः परिच्युतः। जातो वृषभदासस्य जिनमत्याः शुभोदरे ॥१०॥ त्वं सुदर्शननामासौ सुपुत्रः कुलदीपकः । चरमागधरो धीरो जैनधर्मधुरंधरः ॥१२१॥ दाता भोक्ता विचारज्ञः श्रावकाचारतत्परः। परमेष्ठिमहामन्त्रप्रभावात् किं न जायते ॥१२२।। शत्रुमित्रायते येन सर्पो दामयते तराम् । सुधायते विषं शीघ्रं समुद्रः स्थलतायते ॥१२३।। वह्निर्जलायते येन मन्त्रराजेन भूतले। कि वर्ण्यते प्रभावोऽस्य स्वर्गा मोक्षश्च संभवेत् ।।१२।। स प्रत्यक्षं त्वया दृष्टः प्रभावः परमेष्ठिनाम् । महामन्त्रस्य भो भव्य भुवनत्रयगोचरः ॥१२५|| पूर्व था भिल्लराजस्य कुरङ्गी नाम ते प्रिया । सा हित्वा स्वतनुं पापात् काशीदेशे स्वकर्मणा ॥१२६।। वाणारसीपुरे जाता महिपी तृणभक्षिका। सा पश्वी च ततो मृत्वा श्यामलाख्यस्य कस्यचित् ॥१२७।।

-८, १३२]
अप्टमोऽधिकार
रजकस्य यशोमत्या गर्भे पुत्री च वत्सिनी ।
जाता तत्रार्यिकासगं समासाद्य स्वशक्तितः ॥१२८।।
किंचित्पुण्यं तथोपाय॑ संजातेयं मनोरमा।
रूपलावण्यसंयुक्ता प्रीता ते प्राणवल्लभा ॥१२९।।
सतीमतल्लिका नित्यं दानपूजाव्रतोद्यता ।
जैनधर्म समाराध्य जन्तुः पूज्यतमो भवेत् ।।१३०।।
इत्यादि भवसंवन्धं गुरोविमलवाहनात् ।
श्रुत्वा सुदर्शनः श्रेष्ठी संतुष्टो मानसे तराम् ।।१३१।।
स जयतु जिनदेवो देवदेवेन्द्रवन्धो
भवजलनिधिपोतो यस्य धर्मप्रसादात् ।
कुगविगमनमुक्तः प्राणिवर्गो विशुद्धो
भवति सुगतिसगो निर्मलो भव्यमुख्यः ॥१३२।।
इति सुदर्शनचरिते पञ्चनमस्कारमाहात्म्यप्रदर्शके मुमुक्षु-
श्रीविद्यानन्दिविरचिते सुदर्शन-मनोरमा-मवावली-
वर्णनो नामाप्टमोऽधिकारः ।

नवमोऽधिकारः
अथ श्रेष्ठी विशिष्टात्मा श्रुत्वा स्वभवविस्तरम् ।
वैराग्यं सुतरां प्राप्यानुप्रेक्षाचिन्तनोद्यतः ॥१॥
संसारे भगुरं सर्वं धनं धान्यादिकं किल ।
संपदा सर्वदा सर्वा चञ्चला चपला यथा ॥२॥
पुत्रमित्रकलत्रादिबान्धवाः सज्जना जनाः ।
सर्वेऽपि विपयाः कष्टं क्षयं यान्ति क्षणार्धतः ॥३॥
रूपसौभाग्यसौन्दर्ययौवनं वा करे वनम् ।
हस्त्यश्वरथभृत्योघो मेघनद्यौघवञ्चलः ||४||
शक्रचापसमा लक्ष्मीर्जायते पुण्ययोगतः।
तत्क्षये सा क्षयं याति न केनापि स्थिरा भवेत् ।।५।।
चक्रित्वं वासुदेवत्वं शक्रत्वं धरणेन्द्रता ।
अशाश्वतमिदं सर्वे का कथा चाल्पजन्तुषु ॥६॥
सर्वदा पोषितः कायः सर्वो मायामयो यथा ।
शरन्मेघः प्रयात्याशु वायुना स्वायुषः क्षये ॥७॥
भोगोपभोगवस्तूनि विनाशीनि समन्ततः।
गेहस्वर्णविभूतिया कालवढेर्विभूतिवत् ।।८।।
अन्येऽपि ये पदार्थास्ते दृष्टनष्टाः क्षणार्धतः ।
अतोऽत्र चिन्तयेद्धीमान्निर्ममत्वं स्वसिद्धये ॥९॥
इत्यध्रुवानुप्रेक्षा
भवेऽस्मिन् सर्वजन्तूनां शरणं नास्ति किचन ।
माता पिता स्वसा भ्राता मित्रं वा मरणक्षणे ॥१०॥

८१ -९, २२] नवमोऽधिकार. स्वर्गो दुर्गः सुरा भृत्या वज्रमायुधमुत्कटम् । ऐरावणो गजो यस्य सोऽपि कालेन नीयते ॥१॥ निधयो नव रत्नानि चतुर्दश पडङ्गकम् । सैन्यं सवान्धवं सर्व चक्रिणः शरणं न हि ॥१२॥ जन्ममृत्युजरापायं रत्नत्रयमनुत्तरम् । शरण्यं भव्यजीवानां संसारे नापरं क्वचित् ।।१३।। इत्यशरणानुप्रेक्षा। पञ्चप्रकारसंसारे द्रव्ये क्षेत्रे च कालके । भवे भावे चतुर्भेदगतिगर्तासमन्विते ॥१४॥ अनादिकालसंलग्नकर्मभिः संवशीकृतः। जीवो नित्यं भ्रमत्यत्र लोहो वा चुम्बकेन च ॥१५॥ छेदनं भेदनं कष्टं शूलाधारोहणं चिरम् । मिथ्याकपायहिंसाद्यैर्नारका नरकेषु च ॥१६॥ मुञ्जन्ते क्षुत्पिपासाद्यैर्दुःखं ते पशवः-खरम् । मायापापादिदोपेण ताडनं तापनं घनम् ।।१७।। मनुष्येषु च दुःखौघो जायते पापकर्मणा । इष्टमित्रवियोगेनानिष्टसंयोगतस्तथा ॥१८॥ पापेन दुःखदारिद्रथजन्ममृत्युजरादिजम् । पराधीनतया नित्यं दुःखं संजायते नृणाम् ।।१९।। देवानां च भवेदुःखं मानसं परसंपदाम् । समालोक्य तथाचान्ते प्राप्ते मिथ्यादृशान्तरम् ॥२ ॥ श्रीमजिनेन्द्रसद्धर्मविहीना बहवो जनाः। एवं संसारकान्तारे दुःखभारे भ्रमन्त्यहो ॥२१॥ उक्तंच- एकेन पुद्गलद्रव्य यत्तत्सर्वमनेकश । उपयुज्य परित्यक्तमात्मना द्रव्यसंसृतौ ॥२२॥ ६

८२
सुदर्शनचरितम्
[९, २३-
लोकत्रयप्रदेशेषु समस्तेषु निरन्तरम् ।
भूयो भूयो मृतं जात जोवेन क्षेत्रसमृतौ ।।२३।।
उत्सपिण्यवसपिण्यो. समयावलिकानता ।
यासु मृत्वा न सजातमात्मना कालसंसृतौ ॥२४॥
नरनारकतिर्यक्षु देवेष्वपि समन्तत ।
मृत्वा जीवेन संजात वहुशो भवससृतौ ॥२५॥
असंख्येयजगन्मात्रा भावा. सर्वे निरन्तरम् ।
जीवेनादाय मुक्ताश्च बहुशो भवससृतौ ॥२६॥
इति संसारानुप्रेक्षा।
एकः प्राणी करोत्यत्र नानाकर्म
शुभाशुम्।
पुत्रमित्रकलत्रादेः कारणं संप्रतारणम् ।।-७॥
तत्फलं सर्वमेकाकी मुनक्ति भवसंकटे ।
श्वभ्रे वा पशुयोनौ वा नरे वात्र सुरालये ।।२८।।
अतो जीवो ममत्वं च प्रकुवन्मूढमानसः।
कुटुम्बादौ न जानाति स्वात्मनस्तु हिताहितम् ।।२९।।
एको भव्यो विनीतात्मा जिनभक्तिपरायणः ।
गुरोः पादाम्बुजं नत्वा दीक्षामादाय निस्पृहः ॥३०॥
रत्नत्रयं समाराध्य तपस्तप्त्वासुनिर्मलम् ।
शुक्लध्यानेन कारीन् हत्वा याति शिवालयम् ।।३।।
इत्येकत्वानुप्रेक्षा।
जीवोऽयं निश्चयादन्यो देहतोऽपि निरन्तरम् ।
शरीरे मिलितश्चापि नीरक्षीरमिव ध्रुवम् ।।३२॥
का वार्ता भुवने पुत्रमित्रस्नीबान्धवादिषु ।
यत्सर्वे ते प्रवर्तन्ते वहिर्भूता विशेषतः ॥३३॥

४३
-९, १३]
नवमोऽधिकारः
यथा कनकपापाणे सुवर्ण मिलितं सदा ।
तथापि स्वस्वरूपेण भिन्नमेवाधितिष्ठते ॥३४॥
जीवोऽपि सर्वदा तद्वच्छक्तितो ज्ञानदृष्टिभाक् ।
शरीरे वर्तते नित्यं स्वस्वरूपो गुणाकरः ॥३५||
इत्यन्यत्वान्प्रेक्षा
कालोऽयमशुचिनित्यं मांसास्थिरुधिरैर्मलैः ।
वीभत्सः कृमिसंघातः प्रक्षयी क्षणमात्रतः ॥३६॥
मत्वेति पण्डितैधीरैः श्रीजिनश्रुतसाधुषु ।
भक्तितः सुतपोयोगैर्ऋतैर्नानाविधैः शुभैः ॥३०||
प्रमादं मदमुत्सृत्य सावधानैर्जिनोक्तिषु ।
सत्कुलं प्राप्य कालस्य फलं ग्राह्यं सुखार्थिभिः ॥३८॥
इत्यशुच्यनुप्रेक्षा।
मिथ्यात्रतप्रमादेश्व कषायैर्योगकैस्तथा ।
कर्मणामात्रवो जन्तोर्भग्नद्रोण्यां यथा जलम् ।।३९।।
सापि द्विधास्रवः प्रोक्तः शुभाशुभविकल्पतः।
परिणामविशेषेण विनेयो धीधनैर्जनैः॥४०॥
इत्यास्रवानुप्रेक्षा।
सम्यक्त्वत्रतसंयुक्तसत्क्षमाध्यानमानसैः।
मनोमर्कटकं रुध्वा दयासंपत्तिशालिभिः ।।४।।
संवरः क्रियते नित्यं प्रमादपरिवर्जितः।
कर्मणा वा महाम्भोधौ जलानां पोतरक्षकैः ।।४।।
इति सवरानुप्रेक्षा।
t
निर्जरा द्विविधा ज्ञेया सविपाकाविपाकजा ।
कर्मणामेकदेशेन हानिर्भवति योगिनाम् ॥४३॥

[९, ४१- सुदर्शनचरितम् दत्वा दुःखादिकं जन्तोः कर्मणामुदये सति । हानिः क्रमेण सर्वत्र साविपाका मता वुधैः ।।४।। जिनेन्द्रतपसा कर्महानियां क्रियते बुधः । अत्रिपाका तु सा ज्ञेया निर्जरा परमोदया ।।४५|| इति निर्जरानृप्रशा। विलोक्यन्ते पदार्था हि यत्र जीवादयः सदा । स लोको भण्यते तज्ज्ञैर्जिनेन्द्रमतवेदिभिः ||४|| स केन विहितो नैव लोको रुद्रादिना ध्रुवम् हर्ता नैव तथा तस्य चास्ति कालत्रये मतः ॥४७॥ अनादिनिधनो नित्यमनन्ताकाशमध्यगः । अधोमध्योलभेदेन विधासौ परिकीर्तितः ॥४८|| चतुर्दशभिरुत्सेधो रज्जुभिः प्रविराजते । रजनां त्रिशतान्येव त्रिचत्वारिंशता घनः ॥४९॥ प्रोक्तः सप्नेकपञ्चकरजुभिः पूर्वपश्चिमे । अधोमध्योरुब्रह्मान्ते लोकान्ते क्रमतो जिनः ।।५०॥ दक्षिणोत्तरतः सोऽपि सर्वतः सप्तरजुभाक् । वृक्षो वा छल्लिभिवति स्त्रिर्मिनित्यं प्रवेष्टितः ॥५॥ रत्नप्रभापुराभागे खरादिवह्लाभिधे । योजनानां सहस्राणि वाहल्यं षोडशोक्तितः॥५२॥ पवादिबहले भागे द्वितीये चतुरुत्तरा। अशीतिस्तु सहस्राणि बाहल्यं च प्रकीर्तितम् ।।५।। तस्मिन् भागद्वये नित्यं भावनामरपूजिताः। कोटयः सप्त लक्षाश्च द्वासप्ततिरनुत्तराः ॥५४|| प्रासादाः श्रीजिनेन्द्राणां प्रतिमाभिविराजिताः । शाश्वताः सध्वजाद्यैश्च परमानन्ददायिनः ।।५५|| -९, ६७] नवमोऽधिकारः - व्यन्तराणां विमानेषु तत्र संख्याविवर्जिताः । हेमरत्नमया सन्ति तान् वन्दे श्रीजिनालयान् ॥५॥ योजनानां सहस्राणि त्वशीति परिमाणकम् । जलादिवहलं भागमादिं कृत्वा क्रमाद्धः ॥२५॥ सप्तपातालभूमीषु यत्र तिष्ठन्ति नारकाः । मिथ्याहिंसामृषास्तेयाब्रह्मभूरिपरिग्रहैः ।।५८|| कष्टदुष्टकषायाद्यैः पापैः पूर्वभवार्जितैः । सहन्ते विविधं दुःखं छेदनैर्भेदनादिभिः ।।५९।। ताडनैस्तापनैः शूलारोहणैः कुहनैर्घनैः । स्वोत्पत्तिमृत्युपर्यन्तं कविवाचामगोचरम् ॥६ना एकरज्जुसुविस्तीर्णो मध्यलोकोऽपि वर्णितः । द्विगुणद्विगुणस्फारैरसंख्यद्वीपसागरैः ।।६।। जम्बूद्वीपे तथा धातकीद्वीपे पुष्करार्द्धके । मेरवः सन्ति पञ्चोच्चैः प्रोत्तुङ्गाः सुमनोहराः ॥६॥ संवन्धीनि च मेरूणा तेपां क्षेत्राणि सन्ति वै । शतं वै सप्ततिश्चापि तीर्थेशा जन्मभूमयः ॥६३।। यत्र भव्याः समाराध्य जिनधर्म जगद्धितम् । स्वर्गापवर्गज सौख्य प्राप्नुवन्ति स्वशक्तितः ।।६४॥ मेर्वादौ यत्र राजन्ते प्रासादाः श्रीजिनेशिनाम् । चतुःशतानि पञ्चाशदष्टौ चापि जगद्धिताः ।।६५।। नित्यं हेममयान्तुङ्गाः शाश्वताः शर्मकारिणः । रत्नाना प्रतिमोपेता. पूजिता नृसुराधिपः ।।६।। व्यन्तराणा विमानेषु ज्योतिष्काणा च सन्ति वै । जिनेन्द्रभवनान्युञ्चेरसंख्यातानि नित्यशः ॥६॥ .

. सुदर्शनचरितम् [९,६८- कृत्रिमाणि तथा सन्ति जिनसद्मानि यत्र च तिर्यग्लोके यथा सूत्रं नृपश्चादिकसंभृते ।।६८|| सौधर्मादिषु कल्पेपु त्रिपष्टिपटलेवलम् । लक्षाश्चतुरशीतिस्ते प्रासादाः श्रोजिनेशिनाम् ।।९।। सहस्त्राणि तथा सप्तनवतिः प्रविराजिताः । त्रयोविंशतिसंयुक्ता रत्नविम्वैर्मनोहराः ॥७०|| सर्वदेवेन्द्रदेवोधैरहमिन्द्रः सुभक्तितः । पूजिता वन्दिता नित्यं शान्तये तान् भजाम्यहम् ॥७१।। त्रैलोक्यमस्तके रम्ये प्रारभाराख्यशिलातले । सिद्धक्षेत्रं सुविम्तीर्ण छत्राकारं समुज्ज्वलम् ॥७२।। तस्योपरि मनागूनगन्यूतिप्रमितान्तरे । तनुवाते प्रतिष्टन्ते सदा सिद्धा निरञ्जनाः ।।७।। येषां स्मरणमात्रेण रत्नत्रयपवित्रिताः। मुनयस्तत्पदं यान्ति ते सिद्धाः सन्तु शान्तये ॥४॥ इत्यादिकं जगत्सर्व पडू द्रव्यैः संभृतं सदा। चिन्तनीयं महाभव्यः संवेगार्थ जिनोक्तिभिः ।।५।। इति लोकानुप्रेक्षा । बोधी रत्नत्रयप्राप्तिः संसाराम्भोधितारिणी। स्वर्मोक्षसाधिनी नित्यं सा वोधिः सेव्यते सदा ॥७६।। रत्नत्रयं द्विधा प्रोक्तं व्यवहारेण निश्चयात् । व्यवहारेण तद्यत्र जिनोक्ते तत्त्वसंग्रहे ।।७।। श्रद्धानं भव्यजीवानां व्रतसंदोहभूषणम् । स्वर्गादिसुखदं नित्यं दुर्गतिच्छेदकारणम् ।।८।। निःशंकितादिभिर्युक्तमष्टा स्तद्धि दर्शनम् । क्षालितं वा महारनं भाति भव्ये मदोज्झिते ॥७९||

-९, ९०]
नवमोऽधिकार
ज्ञानमष्टविधं नित्यं समाराध्यं मुमुक्षुभिः ।
केवलज्ञानदं जैन विरोधपरिवर्जितम् ।।८०||
चारित्रं च द्विधा ज्ञेयं मुनिश्रावकभेदभाक् ।
आद्यं त्रयोदशो भेद्यं परं चैकादशप्रभम् ।।८।।
निश्चयेन निजात्मा च शुद्धो बुद्धो यथा शिवः ।
सेव्यते यन्महाभव्यैर्दुराग्रह विवर्जितैः ।।२।।
रत्नत्रयं भावशुद्धं परमानन्दकारणम् ।
इत्यादि बोधिराराध्या सतां सारविभूषणम् ।।८३॥
इति वोधिप्रेक्षा।
संसारसागरे जीवान् पततः पापकर्मणा ।
यः समुद्धृत्य संधत्ते पदे स्वर्गापवर्गजे ||४||
स धर्मो जिननाथोक्तो दशलाक्षणिको मतः।
रत्नत्रयात्मकश्चापि दयालक्षणसंज्ञकः ।।५।।
संसारे सरतां नित्यं जन्तूनां कर्मशत्रुभिः ।
दुर्लभं तं समासाद्य यन्न कुर्वन्तु धीधनाः ॥८६॥
सोऽपि धर्मो द्विधा प्रोक्तो मुनिश्रावकगोचरः।
आद्यो दशविधो धर्मो दानपूजावतैः परः ॥७॥
धर्मेण विपुला लक्ष्मीधर्मेण विमलं यशः ।
धर्मेण स्वर्गसत्सौख्यं धर्मेण परमं पदम् ।।८८॥
इत्यादि धर्मसद्भाव मत्वा भव्यैः सुखार्थिभिः ।
श्रीमजिनेन्द्रसद्धर्मो नित्यं संसेव्यते मुदा ॥२॥
इति धर्मानुप्रेक्षा।
एवं सुदर्शनो धीमान् महाभव्यशिरोमणिः ।
अनुप्रेक्षास्तरां ध्यात्वा दीक्षां लातुं समुद्यतः ॥२०॥

८८
सुदर्शनचरितम्
इत्युचैर्जिनधर्मकर्मचतुरः श्रेष्ठी निजे मानसे
संध्यात्वा शुभभावनां गुणनिधिवराग्यरत्नाकरः ।
क्षात्त्वा सर्वजनान् क्षमापरिकरो भूत्वा स्वयं भक्तितो
नत्वा तं विमलादिवाहनगुरुं दीक्षाथमुद्युक्तवान् ।।१।।
इति सुदर्शनचरिते पञ्चनमस्कारमाहात्म्यप्रदर्शके मुमुक्षु-
श्रीविद्यानन्दिविरचिते द्वादशानुप्रेक्षाव्यावर्णनो
नाम नवमोऽधिकारः ॥

।
दशमोऽधिकारः
अथ श्रेष्ठी विशुद्धात्मा भूत्वा निःशल्यमानसः ।
दत्वा सुकान्तपुत्राय सर्व श्रेष्ठिपदादिकम् ।।१।।
भक्तितस्तं गुरुं नत्वा सुधोविमलवाहनम् ।
जगी भो करुणासिन्धो देहि दीक्षा जिनोदिताम् ।।२।।
श्रीमत्पादप्रसादेन करोमि हितमात्मनः ।
मुनीन्द्रः सोऽपि संज्ञानी मत्वा तनिश्चयं दृढम् ।।३।।
मुनीनां सारमाचारविधि प्रोक्त्वा सुयुक्तितः ।
त तरा सुस्थिरीकृत्य यथाभीष्टं जगाद च ।।४।।
तदा सुदर्शनो भव्यस्तदादेशरसायनम् ।
संप्राप्य परमानन्ददायकं त प्रणम्य च ।।५।।
वाह्याभ्यन्तरकं सङ्गं परित्यज्य त्रिशुद्धितः ।
कृत्वा लोच व्रतोपेतां जैनी दीक्षा समाददे ॥६॥
सत्यं सन्त प्रकुर्वन्ति संप्राप्यावसरं शुभम् ।
श्रेयो निजात्मनो गाढं यथा श्रीमान् सुदर्शनः ॥७॥
तदा तत्सर्वमालोक्य धात्रीवाहनभूपतिः ।
पुनः स्वयोषितः कष्टं कर्म सर्व विनिन्द्य च ॥८॥
चिन्तयामास भव्यात्मा स्वचित्ते भीतमानसः ।
अहो सुदर्शनश्चायं जिनभक्तिपरायणः ।।९।।
लघुत्वेऽपि सुधीः शीलसागरः करुणानिधिः ।
इदानों च परित्यज्य सर्व जातो मुनीश्वरः ॥१०॥
अहं च विषयासक्तो नारीरक्तोऽतिमूढधीः ।
न जानामि हितं किंचिवथा धत्तरिको जनः ॥१२॥

सुदर्शनचरितम् [१०, १२- अधुनापि निजं कार्यं कुर्वेऽहं सर्वथा ध्रुवम् । कथं संसारकान्तारे दुःखी तिष्ठामि भीपणे ॥१॥ इत्यादिकं समालोच्य राज्यं दत्वा सुताय च । सुकान्तं श्रेष्ठिनः पुत्रं धृत्वा श्रेष्ठिपदे मुदा ।।१३।। कृत्वा स्नपनसत्पूजां जिनानां शर्मदायिनीम् । दत्वा दानं यथायोग्यं सर्वान् संतोप्य युक्तितः ॥१४|| सेवकैवहुभिः साधं क्षत्रियः सत्त्वशालिभिः । तमेव गुरुमानम्य मुनिर्जातो विचक्षणः ।।१५।। • सत्यं ये भुवने भव्या जिनधर्मविचक्षणाः । ते नित्यं साधयन्त्यत्र सुधियः स्वात्मनो हितम् ।।१६।। अन्तःपुरं तदा तस्य त्यक्तसर्वपरिग्रहम् । वस्त्रमानं समादाय स्वीचक्रे स्वोचितं तपः ॥१७॥ तथान्ये वहवो भव्या जैनधर्मे सुतत्पराः। श्रावकाणां व्रतान्युच्चैर्गृहन्तिस्म विशेषतः ॥१८॥ केचिच्च सुधियस्तत्र भवभ्रमणनाशनम् । शुद्धसम्यक्त्वसद्रत्नं संप्रापुः परमादरात् ।।१९।। पारणादिवसे तत्र चम्पायां मुनिसत्तमाः। मुक्त्वा मानादिकं कष्टं जैनीदीक्षाविचक्षणाः ॥२०॥ मत्वा जैनेश्वरं मार्ग निर्ग्रन्थ्यं स्वात्मसिद्धये । ईर्यापथमहाशुद्धया भिक्षार्थं ते विनिर्ययुः ।।२१।। तत्रासी सन्मुनिः स्वामी सुदर्शनसमाह्वयः। मत्वा चित्ते जिनेन्द्रोक्तं मुनेर्मार्ग शिवप्रदम् ॥२२॥ मानाहंकारनिर्मुक्तो भिक्षार्थ निर्गतस्तदा। महानपि पुरीमध्ये स्वरूपजितमन्मथः ।।२३।। दयावल्लीसमायुक्तो जंगमो वा सुरद्रुमः । ईर्यापथं सुधीः पश्यन् निःस्पृहो मानसे तराम् ।।२४॥

-१०,३७ ]
दशमोऽधिकारः
९१
।
लघून्नतगृहानुच्चेः समभावेन भावयन् ।
तदा तद्रूपमालाक्य समस्ताः पुरयोषितः ।।२५।।
महाप्रेमरसैः पूर्णाः सरितो वा सरित्पतिम् ।
तं द्रष्टुं परमानन्दात्समन्तान्मिलिता द्रुतम् ॥२६॥
कामेन विह्वलीभूताः प्रस्खलन्त्यः पदे पदे ।
गृहकार्य परित्यज्य तदर्शनसमुत्सुकाः ।।२७||
काश्चिद्पमहो रूपं वदन्त्यश्च परस्परम् ।
धावमानाः प्रमोदेन भ्रमर्यो वाम्बुजोत्करम् ॥२८॥
काचिदूचे तदा नारी सखी प्रति शृणु प्रिये ।
धन्या मनोरमा नारी ययासो सेवितो मुदा ॥२९॥
काचित्प्राह सुधीः सोऽयं सुदर्शनसमाह्वयः ।
राजश्रेष्ठी जगन्मान्यः श्रियालिङ्गितविग्रहः ॥३०॥
वञ्चिता येन सा विप्रा प्रोन्मत्ता कपिलप्रिया।
येन त्यक्ता महीभर्तुर्भामिनीकामकातरा ॥३१॥
सोऽयं स्वामी समादाय जैनों दीक्षां शिवप्रदाम् ।
जातो महामुनिर्धीमान् पवित्रः शीलसागरः ॥३२॥
काचित्प्राह महाश्वर्य येन पुत्रान्विता प्रिया ।
मनोरमा महारूपवती त्यक्ता महाविया ॥३३॥
काचिजगी जिनेन्द्राणां धर्मकर्मणि तत्परा।
शृणु त्वं भो सखि व्यक्तं मद्वचः स्थिरमानसा ॥३४॥
येऽत्र स्त्रीधनरागान्धा भोगलालसमानसाः ।
तपोरत्नं जिनेन्द्रोक्तं कथं गृह्णन्ति दुर्दशाः ॥३५||
अयं जैनमते दक्षः परित्यज्य स्वसंपदाम् ।
मोक्षार्थी कुरुते घोरं तपः कातरदुःसहम् ॥३६॥
काचिदूचे सखीं मुग्धे त्वं कटाक्षनिरीक्षणम् ।
वृथा किं कुरुषे चायं मुक्तिरामानुरञ्जितः ॥३७॥

९२
सुदर्शनचरितम्
[१०,३८-
धन्यास्य जननी लोके ययामी जनितो मुनिः।
मुक्तिगामी दयासिन्धुः पवित्रीकृतभूतलः ॥३८॥
काचित्प्राह पुरे चास्मिन् स धन्यो भव्यसत्तमः।
आहारार्थ क्रियापात्रं यद्गृहं यास्यतीत्ययम् ।।३९।।
इत्यादिकं महाश्चर्य संप्राप्ता निजमानसे ।
ब्रुवन्ति स्म यदा नार्यः परमानन्दनिर्भराः॥४०॥
तदा तत्र पुरे कश्चिन्महापुण्योदयेन च ।
तं विलोक्य मुनि तुष्टो निधानं वा गृहागतम् ॥४१॥
श्रावकाचारपूतात्मा प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः ।
नमोऽस्तु भो मुने स्वामिस्तिष्ठ तिष्ठेति संब्रुवन् ।॥४२॥
प्राशुकं जलमादाय कृत्वा तत्पादधावनम् ।
इथं सुनवभिः पुण्यैर्दातृसप्तगुणैर्युतः ।।४३ ॥
तस्मै दानं सुपात्राय दावाहारमुत्तमम् ।
स्वर्ग मोक्षसुखोत्तुङ्गफळपादपसिञ्चनम् ॥४४॥
सर्वेऽपि मुनयस्तद्वत्पारणां चक्रुरुत्तमाः ।
समागत्य निजं स्थानं स्वक्रियासु स्थिताः सुखम् ॥४५॥
अतः सुदर्शनो धीमान् शुद्धश्रद्धानपूर्वकम् ।
गुरोः पाश्र्वे जिनेन्द्रोक्तं सर्वशास्त्रमहार्णवम् ।।४।।
स्वगुरो तितो नित्यं ग्रन्थतश्वाथतो मुदा ।
सुधीः संतरति स्मोचैर्गुरुभक्तिः फलप्रदा ॥४७||
भव्यास्ता गुरोर्भक्तिं कुर्वते शर्मदायिनीम् ।
त्रिशुध्यति महाभव्या लभन्ते परमं सुखम् ॥४८॥
ततोऽसौ सर्वशास्त्रज्ञो भूत्वा तत्त्व विदांवरः।
सर्वसत्त्वेषु सर्वत्र सद्दया प्रतिपालयन् ॥४६॥
त्रसस्थावरकेषञ्चैर्मनॊवाकाययोगतः ।
या सर्वः समादिष्टा धर्मद्रोर्मूलकारणम् ॥५०॥

-१०, ६३ ] दशमोऽधिकारः ९३ सत्यं हितं मितं वाक्यं विरोधपरिवर्जितम् । नित्यं जिनागमे प्रोक्तं भजति स्म त्रिधा सुधीः ॥५१॥ तञ्च जीवदयाहेतुः कथितो जैनतात्त्विकैः । येन लोकेऽत्र सत्कीर्तिः सुलक्ष्मीः सद्यशो भवेत् ॥५२॥ अदत्तविरतिं स्वामी सर्वथा प्रत्यपालयत् । यो गृह्णाति परद्रव्यं तस्य जीवदया कुतः ॥५३॥ ब्रह्मचर्य जगत्पूज्यं सर्वपापभयंकरम् । सभेदैवभिनित्यं सावधानतया दधे ॥५४॥ त्यक्तनीषण्ढपश्वादिकुसङ्गो ढमानसः। निर्जने सुवनादो च विरागी सोऽवसत्सुखम् ॥५५॥ सर्वेषां मण्डनं तद्धि यतीनां च विशेषतः । आजन्म मोक्षपर्यन्तं स दधे तज्जगद्धितम् ।।५।। यथा रूपे शुभा नासा वले राजा जवो हरी । धर्मे जीवदया चित्ते दानं शीलं व्रते तथा ॥५७॥ शीलं जीवदयामूलं पापदावानले जलम् । शीलं तदुच्यते सद्भिर्यञ्च स्वत्रतरक्षणम् ।।५८|| एवं मत्वा स पूतात्मा शीलं सुगतिसाधनम् । पालयामास यत्नेन सावधानो मुनीश्वरः ।।५९।। क्षेत्रं वास्तु धनं धान्यं द्विपदं च चतुष्पदम् । यानं शय्यासनं कुप्यं भाण्डं चेति वहिर्दश ॥६॥ अत्यजत्पूर्वतः स्वामी मनोवाकाययोगतः ! शरीरे निस्पृहश्वापि कथं सगरतो भवेत् ।।६।। विरुद्धं यजिनेन्द्रोक्तेस्तन्मिथ्यात्वं च पञ्चधा। स्वामी सम्यक्त्वरक्षार्थ वान्तिवदूरतोऽत्यजत् ॥६२|| स्त्रीपुन्नपुंसकं चेति वेदत्रयमथोत्कटम् । तद्वत्संगमपि त्यक्त्वा तदुञ्चैर्निरवासयत् ।।६३॥ 1

९४
[१०, ११-
सुदर्शनचरितम्
हास्यं रत्यरती शोकं भयं सप्तविधं त्रिधा।
त्यजति स्म जुगुप्सां च मुनि नवलेन सः ॥६४||
उक्तं च-
इह परलोयत्ताणा अगुत्तिभय मरण वेयणक्कस्सम् ।
सत्तविहं भयमेय णिद्दिळं जिणवरिदेण ॥६५॥
क्षमासलिलधाराभिः पुण्यसाराभिरादरम् ।
चतुःकषायदावाग्नि स्वामी शमयति स्म सः ॥६६॥
एषो मे वान्धवो मित्रमेषो मे शत्रुकः कुधीः ।
इति भावं परित्यज्य स्वतत्त्वे समधीः स्थितः ॥६७||
चतुर्दशविधं चेति परिग्रहमहाग्रहम् ।
अभ्यन्तरं हि दुस्त्याज्यं त्यजति स्म महामुनिः ।।६८।।
तेपां पञ्चवतानां च भावनाः पञ्चविशतिः ।
पञ्चपञ्चप्रकारेण मातरो वा हितकराः ।।६९।।
मनोगुप्तिवचोगुप्तीर्यादानक्षेपणं तथा ।
संविलोक्यानपान च प्रथमव्रतभावनाः॥७॥
क्रोधलोभत्वभीरुत्वहास्यवर्जनमुत्तमम् ।
अनुवीचीभापणं च पश्चैताः सत्यभावनाः ॥७॥
आचार्यभावनाः पञ्चशून्यागारविमोचिता ।
वासवर्जनमन्येषामुपरोधविवर्जनम् ।।७२।।
भैक्ष्यशुद्धिस्तथा नित्यं सधर्मणि जने तराम् ।
विसंवादपरित्यागो भाषिता मुनिपुङ्गवैः ॥७३॥
स्त्रीणां रागकथा कर्णे तद्रूपप्रविलोकने ।
पूर्वरत्याः स्मृतौ पुष्टाहारे वाञ्छाविवर्जनम् ।।४।।
त्यागः शरीरसंस्कारे चतुर्थवतभावनाः ।
पश्चैता मुनिभिः प्रोक्ताः शीलरक्षणहेतवः ॥७॥

९५
-१०, ८८]
दशमोऽधिकारः
इष्टानिष्टेन्द्रियोत्पन्नविषयेषु सदा मुनेः ।
रागद्वेषपरित्यागाः पञ्चमव्रतभावनाः ॥७॥
इत्येवं भावनाः स्वामी पञ्चविंशतिमुत्तमाः।
तेषा पञ्चवतानां च पालयामास नित्यशः ॥७॥
तथा दयापरो धीरः सर्यापथशोधनम् ।
करोति स्म प्रयत्नेन निधान वा विलोक्यते ॥७८॥
यद्विना न दयालक्ष्मीर्भवेन्मुक्तिप्रसाधिनी।
यथा रूपयुता नारी शीलहीना न शाभते ।।७।।
जिनागमानुसारेण ब्रुवन् स्वामी वचोऽमृतम् ।
भाषादिसमितिं नित्यं भजति स्म प्रशर्मदाम् ॥८॥
श्रावकयुक्तितो दत्तमन्नपानादिकं शुभम् ।
संविलोक्य मुनिश्चकवार संतोषपूर्वकम् ।।८।।
तपोवृद्धिनिमित्तं च मध्ये मध्ये तपश्चरन् ।
एषणासमिति नित्यं सवभार मुनीश्वर. ८२॥
आदाने ग्रहणे तस्य प्रायो नास्ति प्रयोजनम् ।
सर्वव्यापारनिर्मुक्तेनिस्पृहत्वं विशेषतः ॥८३।।
तथापि पुस्तकं कुण्डी कदाचित् किंचिदुत्तमम् ।
मृदुपिच्छकलापेन स्पृष्ट्वा गृह्णाति सयमी ॥४॥
क्वचिन्मलादिकं किंचित्प्रासुकस्थानके त्यजन् ।
प्रतिष्ठापनिका युक्त्या समिति स सुधीः श्रितः ।।८५।।
इत्येवं पञ्चसमितीर्दयाद्रुमघनावलीः ।
पालयामास योगीन्द्रः सावधानो जिनोदिते ॥८६॥
स्पर्शनं चाष्टधा नित्यं स्निग्धकोमलकं सुधीः।
परित्यज्य पवित्रात्मा तदिन्द्रियजयोद्यतः ॥८७॥
जिह्वेन्द्रियं त्रिधा स्वामी स्वेच्छाहारादिवर्जनात् ।
जयति स्म सदा शूरः कातरत्वविवर्जितः ॥८॥

सुदर्शनचरितम् [१०,८९- इन्द्रियाणां जयी शूरो न शूरः सङ्गरे मरन् । अक्षशूरस्तु मोक्षार्थी रणे शूरः खलंपटः ||८६|| चन्दनागुरुकर्पूरसुगन्धद्रव्यसंचये। वाञ्छामपि त्यजन् स्वामी तदिन्द्रियजयेऽभवत् ।।९०|| चतुरिन्द्रियमत्यन्तविरक्तः स्वीविलोकने । सुधीनिजितवान्नित्यं सर्ववस्तुस्वरूपवित् ॥११॥ श्रोत्रेन्द्रिय सरागादिगीतबार्तामपि ध्रुवम् । परित्यज्य जिनेन्द्रोक्तौ प्रीतितः श्रवणं ददौ ॥१०॥ इति प्रपञ्चतः स्वामी स्वपञ्चेन्द्रियवञ्चकान् । वञ्चयामास चातुर्थ्याच्चतुरः केन वञ्च्यते ॥९॥ मस्तके लुञ्चनं चक्र मुनीन्द्रः प्रार्थनोज्झितम् । परीपहजयार्थ च परमार्थविदांवरः ॥२४॥ त्रिसन्ध्यं श्रीजिनेन्द्राणां वन्दनासक्तितत्परः। समताभावमाश्रित्य सामायिकमनुत्तरम् ॥१५॥ करोति स्म सदा दक्षस्तहोपौविवर्जितम् । चैत्यपञ्चगुरुणा च भक्तिपाठक्रमादिभिः ॥२६॥ चतुर्विंशतितीर्थेशा संतनोति स्म संस्तुतिम् । सर्वपापापहां नित्यं महाभ्युदयदायिनीम् ॥२७॥ वन्दनामेकतीर्थेशो ज्ञानादिगुणगोचराम् । तद्गुणप्राप्तये नित्यं चक्रेऽसौ चतुरोत्तमः ॥२८॥ प्रतिक्रमणमत्युच्चैः कृतदोषक्षयंकरम् । करोति स्म परित्यज्य प्रमाई सर्वदा सुधीः ।।१९।। वलनानन्तरं नित्यं प्रत्याख्यानं सुखाकरम् । देवगुर्वादिसाक्षं च गृह्णाति स्म विचक्षणः ॥१००॥ अन्यो यस्तु परित्यागो यस्य कस्यापि वस्तुनः । म्वशक्त्या क्रियते धीरैः प्रत्याख्यानं च कथ्यते ।।१०।।

९७
.
-१०, ११४]
दशमोऽधिकारः
कायोत्सर्ग सदा स्वामी करोति स्म स्वशक्तितः।
कायेऽति निस्पृहो भूत्वा कर्मणां हानये बुधः ॥१०२॥
षडावश्यकमित्यत्र मुनीनां शर्मराशिदम् ।
आवासं वा शिवप्राप्त्य साधयामास योगिराट् ॥१०३॥
कौशेयकं च कार्पासं रोमजं चर्मजं तथा।
वाल्कलं च पटं नित्यं पञ्चधा त्यजति स्म सः ॥१०४॥
जातरूपं जिनेन्द्राणां परं निर्वाणसाधनम् ।
रक्षणं ब्रह्मचर्यस्य मत्वा नग्नत्वमाश्रितः ॥१०५॥
अस्नानं संविधत्ते स्म दयालू रागहानये ।
क्षितौ शयनमत्युच्चैः स भेजे धृतिकारणम् ॥१०६।।
दन्तानां धावनं नैव करोति स्म महामुनिः ।
प्रत्याख्यानप्ररक्षार्थ मुनिमार्गस्य तत्ववित् ॥१०॥
मुक्तिपानप्रवृत्तेश्च मर्यादाप्रतिपालकम् ।
ऊर्बीभूय यथायोग्यमेकवारं स्वयुक्तितः ॥१८॥
संतोषभावमाश्रित्य श्रावकाणां ग्रहे शुभम् ।
आहारं स्वतपःसिद्ध्यै करोति स्म महामुनिः ॥१०९॥
कृतकारितनिर्मुक्त पवित्रं दोषवर्जितम् ।
अन्तरं पादयोः कृत्वा चतुरङ्गुलमात्रकम् ॥११०।।
सूर्योदये घटीषट्कमपराले तथा त्यजन् ।
तन्मध्ये प्राशुकाहारं स लाति स्म मुनिः शुभम् ॥१११॥
एतान् मूलगुणानुच्चैर्मुनीनां मोक्षसाधकान् ।
दधेऽष्टाविंशतिं शुद्धान् धर्मध्यानपरायणः॥११२॥
तथा श्रीमजिनेन्द्रोक्तं दशधा धर्ममुत्तमम् ।
उत्तमक्षान्तिसन्मुख्यं स प्रीत्या प्रत्यपालयत् ॥११३॥
गुप्तित्रयपवित्रात्मा सर्वशीलप्रभेदभाक् ।
द्वाविंशतिप्रमाणोक्तपरीषहसहिष्णुकः ॥११४॥

सुदर्शनचरितम्
[-१०, ११५ -
कर्मणां निर्जराहेतुं मत्वा चित्ते समग्रधीः ।
उपवासतपश्चक्रे तपसां मुख्यमुत्तमम् ।।११५||
यथाष्टाङ्गशरीरेषु मस्तकं मुख्यकारणम् ।
तथा द्वादशभेदाना तपसां स्यादुपोसनम् ॥११६।।
आमोदयं तपः स्वामी प्रमादपरिहानये।
स्वाध्यायसिद्धये चक्रे कर्मचक्र निवारणम् ॥११॥
वृत्तिसंख्यानकं नाम तपः संतोषकारणम् ।
वस्तुगेहवनोवृक्षसंख्यानैः कुरुते स्म सः ॥११८॥
जिनवाक्यामृतास्वादविशदीकृतमानसः ।
रसत्यागतपोधीरः स तेपे परमार्थवित् ॥११९।।
विविक्तायनं नित्यं विविक्तं चासनं क्षितौ ।
भजति स्म सुधीः शीलदयापालनहेतवे ।।१२०॥
त्रिकालयोगसंयुक्त्या कायक्लेशतपोऽभवत् ।
तस्य तत्त्वप्रयुक्तस्य रतिनाथप्रवैरिणः ॥१२॥
इत्येवं पविध वाह्यमभ्यन्तरविशुद्धये ।
तपः संतप्तवान् गाढं कातराणां सुदुःसहम् ।।१२२।।
तस्य शुद्धचरित्रस्य कदाचिच्चेत्प्रमादता ।
प्रायश्चित्तं यथाशास्त्र तपोऽभूच्छल्यनाशकम् ॥१२३॥
विनयं भक्तितश्चक्रे सर्वदा धर्मवत्सलः।
रत्नत्रयपवित्राणां मुनीनां परमार्थतः ॥१२४॥
रत्नत्रये पराशुद्धिर्विनयादस्य चाभवत् ।
विद्या विनयतः सर्वाः स्फुरन्ति स्म विशेषतः ॥१२५।।”
सत्यं पद्माकरे नित्यं भानुरेव विकाशकृत् ।
ततः साधर्मिकेपूच्चैर्विधेयो विनयो बुधैः ।।१२६।।
आचार्यपाठकादीनां दशधा सत्तपस्विनाम् ।
वैयावृत्त्यं स्वहस्तेन करोति स्म स संयमी ॥१२७॥

-१०, १३९] दशमोऽधिकारः तथा यञ्च सुपात्रेभ्यो दीयते भव्यदेहिभिः । आहारौषधशाखादि वैयावृत्यं तदुच्यते ॥१२८।। वैयावृत्यविहीनस्य गुणाः सर्वे प्रयान्त्यलम् । सत्यं शुष्कतडागेऽत्र हंसास्तिष्ठन्ति नैव च ।।१२९॥ स्वाध्यायं पञ्चधा नित्यं प्रमादपरिवर्जितः। वाचना प्रच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मदेशनैः ॥१३०॥ जिनोक्तसारशास्त्रेषु परमानन्दनिर्भरः । कर्मणां निर्जराहेतुं मत्वासौ संचकार च ॥१३१।। स्वाध्यायेन शुभा लक्ष्मीः संभवेद्विमलं यशः। तत्त्वज्ञानं स्फुरत्युच्चैः केवलं च भवेदलम् ॥१३२॥ उक्तंच- ज्ञानस्वभाव स्यादात्मा स्वस्वभावाप्तिरच्युति । तस्मादच्युतिमाकाङ्क्षन् भावयेद् ज्ञानभावनाम् ॥१३३॥ स संवेगपरो भूत्वा मुनीन्द्रो मेरुनिश्चलः । प्रदेशे निर्जने कायोत्सर्ग विधिवदाश्रयत् ॥१३४|| निर्ममत्वमलं चित्ते संध्यायन् सर्ववस्तुषु । एकोऽहं शुद्धचैतन्यो नापरो मेऽत्र कश्चन ॥१३५।। इति भावनया तस्य कर्मणां निर्जराभवत् । सुतरां भास्करोद्योते सत्यं याति तमश्चयः ॥१३६।। इष्टप्राप्तिस्मृते चित्ते त्वनिष्टक्षयचिन्तनात् । वेदनाया निदानाञ्च भवेदात चतुर्विधम् ।।१३७॥ ध्यानं पश्वादिदुःखस्य कारणं धर्मवारणम् । चतुःपञ्चोरुपष्ठाख्यगुणस्थानावधि ध्रुवम् ॥१३८॥ हिंसातृतोद्भवं स्तेयविपयारक्षणोद्भवम् । आपञ्चमगुणस्थानं नरकादिक्षितिप्रदम् ॥१३९॥ .

१०० सुदर्शनचरितम् [१०, १४०- रौद्रमेतद्वयं स्वामी दुर्गतेः कारणं ध्रुवम् । परित्यज्य दयासिन्धुः सर्वद्वन्द्वविवर्जितः ॥१४०॥ आज्ञापायविपाकोत्थं संस्थानविचयं तथा । धर्मध्यानं चतुर्भेदं स्वर्गादिसुखसाधनम् ।।१४१।। ध्यायन्नित्यं स मोक्षार्थी पड्विधं चेति सत्तपः । आभ्यन्तरं जगत्सारं करोति स्म सुखप्रदम् ॥१४२।। शुलध्यानं चतुर्भेदं साक्षान्मोक्षस्य कारणम् । तदने कथयिष्यामि भवभ्रमणवारणम् ॥१४३।। एवं तपस्यतस्तस्य संजाता विविध यः। अनेकभव्यलोकानां परमानन्ददायिकाः ॥१४४|| तथा चोक्तम्- बुद्धि तमो वि य लद्धी विउत्रण लद्धी तहेव मोसहिया। मणवचिअरकीणा वि य लद्धीओ सत्त पण्णत्ता ।।१४५।। ग्रीष्मकाले महाधीरः पर्वतस्योपरि स्थितः । शीतकाले वर्हिदेशे प्रावृट्काले तरोरधः ॥१४६।। कुर्वन्महातपः स्वामी ध्यानी मौनी मुनीश्वरः। शैथिल्यं कर्मणां शक्तिं नयति स्म महामनाः ॥१४॥ इत्येवं स मुनीश्वरो गुणनिधिमूलोत्तरान् सद्गुणान् संसाराम्बुधितारणैकनिपुणान् स्वर्गापवर्गप्रदान् । सद्रत्नत्रयमण्डितोऽतिनितरां वृद्धि नयन्नित्यशो निर्मोहः परमार्थपण्डितनुतश्चक्रे जिनोक्तं तपः ॥१४८॥ ॥ इति सुदर्शनचरिते पञ्चनमस्कारमाहात्म्यप्रदर्शके मुमुक्षु- श्रीविद्यानन्दिविरचिते सुदर्शनतपोग्रहणमूलो- त्तरगुणप्रतिपालनव्यावर्णनो नाम दामोऽधिकार ॥

एकादशोऽधिकारः
-
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अथासो सन्मुनिः स्वामी जैनतत्त्वविदांवरः ।
धर्मोपदेशपीयूषैर्भव्यजीवान् प्रतर्पयन् ।।१।।
श्रीमजिनेन्द्रचन्द्रोक्तधर्म संवर्द्धयन् सुधीः ।
नानांतीर्थविहारेण प्रतिष्ठाद्युपदेशनैः ।।२।।
अनेकवतशीलाद्यनपूजागुणोत्करैः ।
मार्गप्रभावना नित्यं कारयन् परमोदयः ॥३॥
स्वयं कर्मक्षयार्थी च पञ्चकल्याणभूमिः ।
जिनानामूर्जयन्तादिसिद्धक्षेत्रेषु सर्वतः ||४||
वन्दनाभक्तिमातन्वन् विहारं मुनिमार्गतः ।
कुर्वन् विशुद्धचित्तः सन् सर्वजीवदयापरः ।।५।।
पारणादिवसे स्वामी पाटलीपुत्रपत्तनम् ।
ईर्यापथं सुधीः पश्यंश्वर्यार्थं स समागमत् ।।६।।
तदा तत्पत्तने पापा पण्डिता धात्रिका स्थिता।
आगतं तं समाकर्ण्य मुनीन्द्रं जितमन्मथम् ॥७॥
देवदत्तां प्रति प्राह शृगु त्वं रे मदीरितम् ।
सोऽयं सुदर्शनो नूनं मुनिभूत्वा समागतः ।।८।।
निजां प्रतिजा सा स्मृत्वा वेश्यामायाशतान्विता।
श्राविकारूपमादाय महाकपटकारिणी ॥९॥
नत्वा तं स्थापयामास गतविक्रियमादरात् ।
रुद्धाशयं गृहस्यान्तं नयति स्म दुराशया ॥१०॥
भूपतेर्भामिनी यत्र लोके कन्दर्पपीडिता ।
दुराचारशतं चक्रे वेश्यायाः किं तदुच्यते ॥११॥

१०२
सर्व
सुदर्शनचरितम्
[११, १२-
तत्र सा मदनोन्मत्ता तं जगाद मुनीश्वरम् ।
भो मुने तव सद्र पं यौवनं चित्तरञ्जनम् ॥१२॥
एतै गैर्मनोऽभीष्टैः सफलीकुरु साम्प्रतम् ।
बहुद्रव्यं गृहे मेऽस्ति नानाजनसमागतम् ।।१३।।
चिन्तामणिरिवाक्षय्यं कल्पद्रमवदुत्तमम् ।
गृहाण दासीत्वं करिष्यामि तवेप्सितम् ।।१४।।
मन्दिरे मेऽत्र सर्वत्र सर्ववस्तुमनोहरे ।
मस सङ्गेन ते स्वर्गः सुधीरत्र समागतः ।।१५।।
कि ते तपःप्रकप्टेन सदाप्राणप्रहारिणा ।
मुक्त्वा भोगान् मया साध सर्वथा त्वं सुखी भव ॥१६॥
ततस्तां स मुनिः प्राह धीरवीरैकमानसः।
रे रे मुग्धे न जानासि त्वं पापात् संसृतेः स्थितिम् ।।१७।।
शरीरं सर्वथा सर्वजनानामशुचेर्गृहम् ।
जलवुद्बुद्वबाढं क्षयं याति क्षणार्धतः ॥१८॥
भोगाः फणीन्द्रमोगाभाः सद्यः प्राणप्रहारिणः ।
संपदा विपदा तुल्या चञ्चलेवातिचञ्चला ।।१९।।
शीलरत्नं परित्यज्य शर्मकोटिविधायकम् ।
येऽधमाश्चात्र कुर्वन्ति दुराचारं दुराशयाः ॥२०॥
ते मूढा विषयासक्ताः श्वभ्रं यान्ति स्वपापतः।
तत्र दुःखं प्रयान्त्येव छेदनं भेदनादिकम् ॥२१॥
जन्मादिमृत्युपर्यन्तं कविवाचामगोचरम् ।
तस्मात् सुदुर्लभं प्राप्य मानुष्यं क्रियते शुभम् ॥२२॥
इत्यादिकं प्रजल्प्योच्चैस्तस्याः स मुनिपुङ्गवः।
द्विधा संन्यासमादाय मेरुवन्निश्चलाशयः ॥२३॥
चित्ते संचिन्तयामास स्वामी वैराग्यवृद्धये ।
अमेध्यमन्दिरं योपिच्छरीरं पापकारणम् ॥२४॥

.११, ३७]
एकादशोऽधिकारः
१०३
बहिर्लावण्यसंयुक्तं किंपाकफलवत् खरम् ।
कामिनां पतनागारं निःसारं संकटोत्करम् ॥२५॥
दुष्टस्त्रियो जगत्यत्र सद्यः प्राण प्रहाः किल ।
सर्पिण्यो वात्र मूढानां वञ्चनाकरणे चणाः ॥२६॥
पातिन्यः श्वभ्रगर्तायां स्वयं पतनतत्पराः ।
प्रमुग्धमृगसार्थानां वागुराः प्राणनाशकाः ॥२७||
कामान्धास्तत्र कुर्वन्ति वृथा प्रीतिं प्रमादिनः ।
स्वतत्त्वं नैव जानन्ति यथा धात्तूरिकाः खलाः ॥२८॥
ते धन्या भुवने भव्या ते स्त्रीसंगपराङ्मुखाः ।
परिपाल्य व्रतं शीलं संप्रापुः परमोदयम् ॥२९॥
मयापि श्रीजिनेन्द्रोक्ते तत्त्वे चित्तं विधाय च ।
मोक्षसौख्यं परं साध्यं सर्वथा शीलरक्षणात् ।।३०॥
एवं यदा मुनिर्धारः स्वचित्ते चिन्तयत्यलम् ।
तावत्तया समुद्धृत्य पापिन्या मुनिसत्तमम् ।।३१।।
स्वशय्यायां चकाराशु स तदापि मुनीश्वरः ।
काष्ठवच्चिन्तयामास मौनस्थो निश्चलस्तराम् ॥३२॥
सर्वथा शरणं मेऽत्र परमेष्ठी पितामहः ।
एकोऽहं शुद्धबुद्धोऽहं नान्यः कोऽपि परो भुवि ॥३३॥
तदा तया च पापिन्या गाढमालिङ्गनैर्घनैः।
मुखे मुखार्पणैर्हस्तस्पर्शनै रागजल्पनैः ॥३४॥
नग्नीभूय निजाकारदर्शनैर्मदनैस्तथा ।
इत्थं दिनत्रयं स्वामी पीडितोऽपि तथा स्थितः॥३५॥
निश्चलं तं तरां मत्वा देवदत्ता तदा खला।
निरर्था मुनिमुद्धृत्य गत्वा शीघ्र श्मशानकम् ॥३६।।
धृत्वा कृष्णमुखं लात्वा पापिनी स्वगृहं गता।
दुष्टाः स्त्रियो मदोन्मत्ताः किं न कुर्वन्ति पातकम् ॥३७॥

१०४ सुदर्शनचरितम् [११, ३८- तत्र प्रेतवने स्वामी कायोत्सर्गेण धीरधीः । यावत्सतिष्ठते दक्षस्तत्त्वचिन्तनतत्परः ।।३।। तावत्सा व्यन्तरी पापा व्योममार्गे भयातुरी। पर्यटन्ती विमानस्य स्खलनाद्वीक्ष्य तं मुनिम् ।।३९|| जगौ रे हं तवार्तेन मृत्वा जातास्मि देवता। त्वं च केनापि देवेन रक्षितोऽसि सुदर्शन ॥४॥ इदानी कः परित्राता तव त्वं ब्रूहि मे शठ । गदित्वेति महाकोपादुपसर्ग सुदारुणम् ।।४।। कतु लग्ना तदागत्य मुनेः पुण्यप्रभावतः । सोऽपि यक्षः सुधीभक्तो वारयामास तां सुरीम् ।।१२।। सापि सप्तदिनान्युच्चैयुद्धं कृत्वा सुरेण च । मानभङ्ग तरां प्राप्य रात्रिर्वा भास्कराद्गता ॥४॥ तदा सुदर्शनः स्वामी तस्मिन् घोरोपसर्गके । ध्यानाचासे स्थितस्तत्र मेरुवन्निश्चलाशयः ॥४४॥ कर्मणां क्षपणे शूरः सावधानोऽभवत्तराम् । क्रमस्तु प्रकृतीनां च मया किंचिनिरूप्यते ॥४५॥ सम्यग्दृष्टिगुणस्थाने चतुर्थे भुवनोत्तमे । पञ्चमे च तथा पष्ठे सप्तमे वा यतीश्वरः॥४६|| धर्मध्यानप्रभावेन तेषु स्थानेषु वा क्वचित् । मिथ्यात्वप्रकृतीस्त्रेधा चतस्रो दुःकषायजाः॥४७॥ देवायुर्नारकायुश्च पश्वायुः पापकारणम् । दशैताः प्रकृतीहत्वा पूर्वमेव मुनीश्वरः ॥२८॥ अष्टमे च गुणस्थाने आपकश्रेणिमाश्रितः । अपूर्वकरणो भूत्वा स्थित्वा च नवमे सुधीः ॥४९॥ शुक्लध्यानस्य पूर्वेण पादेन परमार्थवित् । नाम्नां पृथक्त्ववीतर्कवीचारेण विचारवान् ॥५०॥ .

-११, ६३ ] एकादशोऽधिकार समातपचतुर्जातित्रिनिद्राश्वभ्रयुग्मकम् । स्थावरत्वं च सूक्ष्मत्वं पशुद्वयुद्योतकं तथा ॥५१॥ अनिवृत्तगुणस्थानपूर्वभागे च पोडश । क्षयं नीत्वा द्वितीये च कषायाष्टकमुच्चकैः ॥५२।। क्लैव्यं परे ततः स्त्रैणं चतुर्थे भागके ततः । परे हास्यादिपटकं च षष्ठे पुर्वेदकं तथा ।।५।। क्रोधं मानं च मायां च त्रिभागेषु पृथक् पृथक । पत्रिंशत्प्रकृतीहत्वा नवमे चैवमादिकम् ||१४|| सूक्ष्मसांपरायकेऽपि सूक्ष्मलोमं निहत्य च । क्षीणमोहगुणस्थाने द्वितीयशुक्लमाश्रितः ।।५।। निद्रा सप्रचलां हित्वा चोपान्त्यसमये सुधीः । अन्तिम समये तत्र चतस्रो दृष्टिघातिकाः॥१६॥ पञ्चधा ज्ञानहाः पञ्चप्रकृतीः पञ्च विघ्नकाः। इत्येवं प्रकृतीः प्रोक्तास्त्रिषष्टिं घातिकर्मणाम् ॥५॥ हत्वाभूत्तत्क्षणे स्वामी केवलज्ञानभास्करः । सयोगाख्यगुणस्थानवर्ती सर्वप्रकाशकः ।।५८॥ संयत सर्वदर्शी च वीर्यमानन्त्यमाश्रितः । अनन्तसुखसंपन्नः परमानन्ददायकः ॥५६॥ अन्तकृत्केवली स्वामी वर्द्धमानजिनेशिनः । स जीयाद्' भव्यजीवाना शर्मणे शरणं जिनः ॥६॥ केवलनानसंपत्तिं मत्वा स्वासनकम्पनात् । सर्वे देवेन्द्रनागेन्द्रचन्द्रार्काद्याः सुरेश्वराः ।।६।। चतुर्निकायदेवौधैः स्वागनाभिः समन्विताः। समागत्य महाभक्त्या कृत्वा गन्धकुटी शुभाम् ॥६२।। सिंहासनं लसत्कान्ति सच्छत्रचामरद्वयम् । पुष्पवृष्टिं प्रकुर्वन्ति परमानन्दनिर्भराः ॥६३॥ 1 - १०६ सुदर्शनचरितम् [११, ६४- जलगन्धाक्षतेः पुष्पैः पीयूपै रत्नदीपकैः । कृष्णागरुलसळूपैः फलैर्नानाप्रकारकैः ॥३४॥ गीतनृत्यादिवादित्रसहोः पापनाशनः । पूजयित्वा जगत्पूज्यं तं जिनं श्रीसुदर्शनम् ।।६।। वीतरागं क्षणार्धन लोकालोकप्रदर्शिनम् । स्तुति कर्तुं प्रवृत्तास्ते सारसंपत्तिदायिनीम् ।।६६।। जय देव दयासिन्धो जय त्वं केवलेक्षण । जय त्वं सर्वदर्शी च जयानन्तप्रवीर्यभाक् ॥६॥ अनन्तसुखसंतृप्त जय त्वं परमोदयः। जय त्वं त्रिजगत्पूज्य दोषदावाग्नितोयदः ॥६८॥ सर्वोपसर्गजेता त्वं सर्वसदेहनाशकः । भव्यानां भवभीरूणां संसाराम्भोषितारकः ॥३॥ सद्ब्रह्मचारिणां घोरब्रह्मचारी त्वमेव हि । तपस्विनां महातीव्रतपःकर्ता भवानहो ।।७०|| हितोपदेशको देव त्वं भव्यानां कृपापरः । प्रतापिनां प्रतापी त्वं कर्मशत्रुक्षयंकरः ।।७१।। वन्धूनां त्वं महावन्धुर्भव्यसंदोहपालकः । लोकद्वयमहालक्ष्मीकारणं त्वं जगत्प्रभो ।।७।। स्वामिस्ते गुणवाराशेः पारं को वा प्रयाति च । किं वयं जडतां प्राप्ताः स्तुति कतु क्षमाः क्षितौ ।।७।। तथापि ते स्तुतिदेव भव्यानां शर्मकारिणी । अस्माकं संभवत्वत्र संसाराम्भोधितारिणी ॥७४|| इत्यादिकं स्तुतिं कृत्वा सर्वे शक्रादयोऽमराः। सर्वराजप्रजोपेता नमस्कृत्य पुनः पुनः ॥७५|| स्वहस्तौ कुड्मलीकृत्य धर्मश्रवणमानसाः। स्वामिनस्ते मुखाम्भोजे दत्तनेत्राः सुखं स्थिताः ।।७।।

, -११, ८९] एकादशोऽधिकार तदा स्वामी कृपासिन्धुः स्वभावादेव संजगौ। स्वदिव्यभाषया भव्यान् परमानन्दमुगिरन् ।।७।। यत्याचारं जगत्सारं मुनीनां शर्मकारणम् । मूलोत्तरैर्गुणैः पूतं रत्नत्रयमनोहरम् ॥७८॥ दानं पूजां व्रतं शीलं सोपवासं जगद्धितम् । सारसम्यक्त्वसंयुक्तं श्रावकाणां सुखप्रदम् ।।७।। नित्यं परोपकारं च धर्मिणां सुमनःप्रियम् । धर्म जगौ गुणाधीशः सर्वसत्त्वहितंकरम् ।।८।। तथा स्वामी जगादोच्चैः सप्त तत्त्वानि विस्तरात् । पड् द्रव्याणि तथा सर्वत्रलोक्यस्थितिसंग्रहम् ॥८१॥ पुण्यपापफलं सर्व कर्मप्रकृतिसंचयम् । यं कंचित्तत्त्वसद्भावं तं सर्व जिनभाषितम् ।।८।। श्रुत्वा ते भव्यसंदोहाः परमानन्दनिर्भराः । जयकोलाहलैरुच्चैस्तं नमन्ति स्म भक्तितः ॥३॥ तदा तस्य समालोक्य केवलज्ञानसंपदाम् । व्यन्तरी सा तमानम्य सारसम्यक्त्वमाददे ।।४।। सत्यं ये पापिनश्चापि भूतले साधुसंगमात् । तेऽत्र श्रद्धा भवत्युच्चैरयः स्वर्णं यथा रसात् ॥८५।। तथातिशयमाकये केवलज्ञानसंभवम् । सुकान्तपुत्रसंयुक्ता सज्जनैः परिवारिता ॥८६॥ मनोरमा समागत्य तं विलोक्य जिनेश्वरम् । धर्मानुरागतो नत्वा संमभ्यर्च्य सुभक्तितः ॥८७॥ संसारदेहभोगेभ्यो विरक्ता सुविशेषतः । सुकान्तं सुतमापृच्छय क्षान्त्वा सर्वान् प्रियोक्तिभिः ॥८॥ त्रिधा सर्व परित्यज्य वस्त्रमात्रपरिग्रहा। तत्र दीक्षां समादाय शर्मदा परमादरात् ।।८।। १ [१२, १२- ११० सुदर्शनचरितम् वेद्यं चान्यतरच्चै वं द्वासप्ततिमिति प्रभुः। उपान्त्यसमये तत्र समुच्छिन्नक्रियाख्यतः ॥१॥ सुध्यानात्प्रकृतीः क्षिप्त्वा तथासी चरमक्षणे। आदेयत्वं च भानुष्यगतिगत्यानुपूर्विके ।।१३।। स पञ्चेन्द्रियजातिं च यशाकीर्तिमनुत्तरान् । पर्याप्तिं च त्रसत्वं च वादरत्वं च यन्मतम् ॥१४॥ सुभगत्वं मनुष्यायुरुच्चैर्गोत्रं च वेद्यकम् । श्रीमत्तीर्थकरत्वं च प्रकृतीः स त्रयोदश ।।१५।। हत्वैताः समयेनाशु संप्राप्तो मोक्षमक्षयम् । सिद्धो बुद्धो निराबाधो निष्क्रियः कर्मवर्जितः ॥१६॥ किंचिन्न परित्यक्तकायाकारोऽप्यकायकः । त्रैलोक्यशिखरारूढस्तनुवाते स्थिरं स्थितः ॥१७॥ प्रसिद्धाष्टगुणैर्युक्तः क्तः सम्यक्त्वाद्यैरनुत्तरैः। कर्मबन्धननिर्मुक्तश्चोर्ध्वगामी स्वभावतः ॥१८॥ एरण्डबीजबद्वह्निशिखावच्च तदा द्रुतम् । निर्मलालाबुवत् स्वामी गत्वा त्रैलोक्यमस्तके ॥१९|| वृद्धिहासविनिर्मुक्तस्तनुवाते प्रतिष्ठितः। अनन्तसुखसंतृप्तः शुद्धचैतन्यलक्षणः ॥२०॥ काले कल्पशते चापि विक्रियारहितोऽचलः । अभावाद्धर्मद्रव्यस्य नैव याति ततः परम् ॥२१॥ त्रिकालोत्पन्नदेवेन्द्रनागेन्द्रखचरेन्द्रजम् । भोगभूमिमनुष्याणां यत्सुखं चक्रवर्तिनाम् ॥२२॥ अनन्तगुणितं तस्मात्सुखं भुङ्क्ते च नित्यशः । समयं समयं स्वामी योऽसौ मे शर्म संक्रियात् ॥२३॥ अन्ये सर्वेऽपि ये सिद्धाः प्रबुद्धा गुणविग्रहाः । कालत्रयसमुत्पन्नाः पूजिता वन्दिताः सदा ॥२४|| - - १११ - -१२, ३७] द्वादशोऽधिकारः शुद्धचैतन्यसद्भावा जन्ममृत्युजरातिगाः । सन्तु ते कर्मणां शान्त्यै समाराध्या जगद्धिताः ॥२५॥ धात्रीवाहनभूपाद्या ये तदा मुनयोऽभवन् । ते सर्वे स्वतपोयोगैः प्राप्ताः स्वर्गापवर्गकम् ॥२६॥ यं सुमन्त्रं समाराध्य गोपालोऽपि जगद्धितः । एवं सुदर्शनो जातस्तत्र किं वय॑ते परम् ॥२७॥ अन्येऽपि वहवो भव्याः परमेष्ठिपदान्यलम् । समुच्चार्य जगत्सारं सुखं प्रापुर्निरन्तरम् ॥२८॥ तथा यं मन्त्रमाराध्य परमानन्ददायकम् । कुर्कुरोऽपि सुरो जातः का वार्ता भव्यदेहिनाम् ॥२९॥ तेषां सारफलं लोके कोऽत्र वर्णयितुं क्षमः । इन्द्रो वा धरणेन्द्रो वा विना श्रीमन्जिनेश्वरैः ॥३०॥ अन्योऽपि यो महाभव्यो मन्त्रमेतं जगद्धितम् । आराधयिष्यति प्रीत्या स भविष्यति सत्सुखी ॥३१॥ तस्माद्भव्यैः सुखे दुःखे मन्त्रोऽयं परमेष्ठिनाम् । समाराध्यः सदासारस्वर्गमोक्षककारणम् ।।३२।। निशि प्रातश्च मध्याह्ने सन्ध्यायां वात्र सर्वदा। मन्त्रराजोऽयमाराध्यो भव्यैर्नित्यं सुखप्रदः ।।३३।। अस्य स्मरणमात्रेण मन्त्रराजस्य भूतले । सर्वे विघ्नाः प्रणश्यन्ति यथा भानूदये तमः ॥३४॥ यथा सर्वेषु वृक्षेषु कल्पवृक्षो विराजते । तथायं सर्वमन्त्रेषु मन्त्रराजो विराजते ॥३५।। इत्यादिकं समाकर्ण्य मन्त्रस्यास्य प्रभावकम् । सर्वकार्येषु मन्त्रोऽयं स्मरणीयः सदा वुधैः ॥३०॥ येन सर्वत्र भव्यानां मनोवाञ्छितसंपदाः। धनं धान्यं कुलं रम्यं भवन्त्यत्र सुनिश्चितम् ॥३७॥ --- - .

[११, ९० १०० सुदर्शनचरितम् भूत्वार्यिका सती पूता जिनोक्तं सुतपः शुभम् । संचकार जगच्चेतोरञ्जनं दुःखभञ्जनम् ।।६०॥ सत्यं कुलस्त्रियो नित्यं न्यायोऽयं परमार्थतः । स्वस्वामिना धृतो मार्गो ध्रियते यच्छुभोदयः ।।२१।। पण्डिता धात्रिका सा च देवदत्ता च सा किल । पुण्याङ्गना तमानम्य निन्दां कृत्वा निजात्मनः ॥२२॥ स्वयोग्यानि व्रतान्याशु स्वीचक्राते गुणाश्रिते। अहो सतां प्रसङ्गेन किं न जायेत भूतले ॥२३॥ इत्येवं परमानन्ददायिनी भव्यतायिनी । केवलज्ञानसंपत्तिः सुदर्शनजिनेशिनः ॥१४॥ सर्वदेवेन्द्रनागेन्द्रखेचरायः सचिता। अस्माकं कर्मणां शान्त्यै भवत्वत्र शुमोदया ॥२५॥ इति विततविभूतिः केवलज्ञानमूर्तिः सकल-सुखविधाता प्राणिनां शान्तिकर्ता । जयतु गुणसमुद्रोऽनन्तवीयैकमुद्र- स्त्रिभुवनजनपूज्यः श्रीजिनो भव्यवन्धुः ॥६६॥ इति श्रीसुदर्शनचरिते पञ्चनमस्कारमाहात्म्य प्रदर्शक मुमुक्षुश्रीविद्या- नन्दिविरचिते श्रीसुदर्शनकेवलज्ञानोत्पत्तिव्यावर्णनो नाम एकादशोऽधिकार ।

द्वादशोऽधिकारः : अथ श्री केवलज्ञानी सुदर्शनसमाह्वयः । सत्यनामा जगद्वन्धुर्लोकालोकप्रकाशकः ॥१॥ स्व-स्वभावेन पूतात्मा भव्य पुण्योदयेन च । अनिच्छोऽपि जगत्स्वामी स्ववाक्यामृतवर्पणैः ॥२॥ भव्यौघांस्तर्पयन्नित्यं सुरासुरसमर्चितः। विहारं सुविधायोंच्चैः परमानन्ददायकः ॥३॥ अन्ते च स्वायुपः स्वामी शेपकर्मक्षयोद्यतः । विभूतिं तां परित्यज्य छत्रचामरकादिजाम् ॥४॥ निरालम्बं जिनः स्थित्वा शुभे देशे क्वचित्प्रभु । मौनी स्वामी समासाद्य पञ्चलध्वक्षरस्थितिम् ॥५॥ अयोगिकेवली देवो द्वौ गन्धी रसपञ्चकम् । पञ्चवर्णाश्रिताः पञ्च प्रकृतीः स यतीश्वरः ॥६॥ पञ्चधा वपुषां स्वामी बन्धनानि तथा मुनिः । पञ्चधा च शरीराणि संघातान् पञ्च कीर्तितान् ॥७॥ संहननपटकं चापि संस्थानानि च तानि पट्। देवगत्यानुपूज्यश्च विहायोगतियुग्मकम् ।।८।। परं घातोपघातौ चोच्छवासं चागुरुलाघवम् । अयशाकीर्तिमनादेयं शुभं चाशुभमेव च ॥९॥ सुस्वरं दुःस्वरं चापि स्थिरत्वं चास्थिरत्वयुक् । स्पर्शाष्टकं च निर्माणमेकं स्थानप्रमाणवाक् ॥१०॥ अगोपाझमपर्याप्तिं दुर्भगत्वं च दुःखदम् । सप्रत्येकशरीरं च नीचैर्गोत्रं च पापकृत् ।।११॥

११२ सुदर्शनचरितम् [१२, ३८- सुदर्शनजिनस्योच्चैश्चरित्रं पुण्यकारणम् । पठन्ति पाठयन्त्यत्र लेखयन्ति लिखन्ति ये ॥३८॥ ये शृण्वन्ति महाभव्या भावयन्ति मुहुर्मुहुः । ते लभन्ते महासौख्यं देवदेवेन्द्रसंस्तुतम् ।।३९|| श्रीगौतमगणीन्द्रेण प्रोक्तमेतन्निशम्य च । सच्चरित्रं तमानम्य संतुष्टः श्रेणिकप्रभुः ॥४०॥ अन्यभूरिजनैः सार्धं परमानन्दनिर्भः। प्राप्तो राजगृहं रम्यं स सुधी वितीर्थकृत् ॥४१॥ गन्धारपुर्या जिननाथगेहे छत्रध्वजाचैः परिशोभतेऽन्न । कृतं चरित्रं स्वपरोपकारकृते पवित्रं हि सुदर्शनस्य ।।४२॥ नन्दत्विदं सारचरित्ररत्नं भव्यैर्जन वितमुत्तमं हि । सत्केवलज्ञानिसुदर्शनस्य संसारसिन्धौ वरयानपात्रम् ॥४३ . स श्रीकेवललोचनो जिनपतिः सर्वेन्द्रवृन्दाचितो भव्याम्भोरुहभास्करो गुणनिधिमिथ्यातमोध्वंसकृत् । सच्छीलाम्युधिचन्द्रमाः शुचितरो दोपौघमुक्तः सदा नान्ना सारसुदर्शनोऽत्र सततं कुर्यात् सतां मङ्गलम् ।।४४॥ अई सिद्धगणीन्द्रपाठकमुनिश्रीसाधबो नित्यशः पञ्चैते परमेष्ठिनः शुभतराः संसारनिस्तारकाः । कुर्वन्वत्र सुखं चिनाशचिमुखं भव्यात्मनां निर्मलं यन्मन्नोऽपि करोति वाञ्छितसुखं कीर्ति प्रमोदं जयम् ॥४५|| श्रीसारदासारजिनेन्द्रवन्त्रात्समुद्भवा सर्वजनकचक्षुः । कृत्वा क्षमा मेऽत्र कवित्वले मातेव बालस्य सुखं करोतु ॥४६॥ श्रीमूलसङ्घे वरभारतीये गच्छे वलात्कारगणेऽतिरम्ये । श्रीकुन्दकुन्दाख्यमुनीन्द्रवंशे जातः प्रमाचन्द्रमहामुनीन्द्रः ।।४७॥ पट्टे तदीये मुनिपद्मनन्दी भट्टारको भव्यसरोजभानुः । जातो जगत्रयहितो गुणरत्नसिन्धुः कुर्यात्सतां सारसुखं यतीशः।४८) ११३ -१२, ५१] द्वादशोऽधिकार. तत्पट्टपद्माकरभास्करोऽत्र देवेन्द्रकीर्तिर्मुनिचक्रवर्ती । तत्पादपङ्केजसुभक्तियुक्तो विद्यादिनन्दीचरितं चकार ॥४२॥ तत्पादपट्टेजनि मल्लिभूषणगुरुश्चारित्रचूडामणिः संसाराम्बुधितारणकचतुरश्चिन्तामणिः प्राणिनाम् । सूरिश्रीश्रुतसागरो गुणनिधिः श्रीसिंहनन्दी गुरुः सर्वे ते यतिसत्तमाः शुभतराः कुर्वन्तु वो मङ्गलम् ।।५०॥ गुरूणामुपदेशेन सच्चरित्रमिदं शुभम् । नेमिदत्तो व्रती भक्त्या भावयामास शर्मदम् ॥५१॥ । इति श्रीसुदर्शनचरिते पञ्चनमस्कारमाहात्म्यप्रदर्शके मुमुक्षुश्रीविद्या- नन्दिविरचिते सुदर्शनमहामुनिमोक्षलक्ष्मीसंप्राप्ति- व्यावर्णनो नाम द्वादशोऽधिकारः समाप्तः । ॥शुभं भवतु॥ ग्रन्थ संख्याश्लोक १३६२॥ संवत् १५९१ वर्षे अषाढमासे शुक्लपक्षे ।

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परिशिष्ट १ उद्धृतकारिकादीनामनुक्रमणिका ५।४६ अइथूलथूल थूल असंख्येयजगन्मात्रा आप्तस्यासंनिघानेऽपि २०६३ तिलसर्षपमात्रं च ९।२६ २।४१ घातकीगुडतोयोत्थम् ५।४८ इह परलोयत्ताणा नरनारकतिर्यक्षु १०.६५ ९।२५ उत्सपिण्यवसपिण्योः ९।२४ पयडि-ट्ठिदि-अणुभाग पुढवी जल च छाया २०७१ २०६४ एकेन पुद्गलद्रव्यम् ९.२२ बुद्धि तओविय लद्धो १०।१४५ चाण्डालीसंगमे जाते ५४७ मिच्छत्तं अविरमणम् २०६७ ज्ञानस्वभाव' स्यादात्मा १०.१३३ लोकत्रयप्रदेशेषु ९४२३ ।

परिशिष्ट २ श्लोकानुक्रमणिका २।२ ८१ १०११ ९.१ ३।८८ [अ] अंगदेशोऽस्ति विख्यातः अग्नेदर्शनतो नूनम् अङ्गोपाङ्गमपर्याप्तिम् अक्षराणि विचित्राणि अजीवं पुद्गलद्रव्यम् अत्यजत्पूर्वत. स्वामी अतस्त्वं मे कृपा कृत्वा अतो जीवो ममत्वं च मत. सुदर्शनो धीमान् अत्र कर्मोदये नोच्च. अत्र मे कर्मणा जातम् अत्रैव पत्तने रम्य अव भरतक्षेत्रे अत्रोदाहरणं राजा अथ गोपालक सोऽपि अथ जम्वूमति द्वीपे अथ तत्र पर. श्रेष्ठी अथ प्रभुर्गुरु नत्वा अथवा यद्यथा यत्र अथ श्रोकेवलज्ञानी अथ श्रीजिननायोक्त- अथ श्रीश्रेणिको राजा ३७ अथ श्रेष्ठीमहाशील- ३.८३ मथ श्रेष्ठी विशुद्धात्मा १२।११ अथ श्रेष्ठी विशिष्टात्मा ४।३० अथ सा श्रेष्ठिनी पुण्यात् २।६२ अथातो दम्पती गाढम् १०६१ अथातो नृपतिः श्रुत्वा ८1१७ अथाष्टमीदिने श्रेष्ठी ९।२९ अथासो बालको नित्यम् १०॥४६ अथासौ सन्मुनिस्वामी ७।११९ अर्थकदागतोऽटव्याम् ८।१९ अर्थकदा पुरीमध्ये ४।६८ अर्थकदा स्वपुण्येन ८।४२ अदत्तादानसंत्यागो ५।३५ अदत्तविरतिं स्वामी ८।१०२ अधुनापि निज कार्यम् ११३७ अधोमुख क्षण ध्यात्वा ४१३६ अनन्तगुणितं तस्मात् ३६१ अनन्तसुखसंतृप्त- ६।१०१ अनन्तज्ञानदृग्वीर्य १२।१ अनन्तास्ते गुणा स्वामिन् ७११ अनन्तं च जिनं वन्दे ८।११ ७।२१ ४।१ ११११ ८.११२ ४।५२ ६.१ २०१५ १०.५३ १०११२ ६३६ १२।२३ ११।६८ १४११६ १।१२७ ११९ श्लोकानुक्रमणिका ११७ ५१५५ ७७८ अमार्गेऽथ रथारूढाम् - अनन्यशरणीभूय अनादिकालसंलग्न- अनादिनिधनो नित्यम् अनिवृत्तगुणस्थान- अनेकभव्यसंदोह अनेकव्रतशोलाद्यः अनेकरत्नमाणिक्य- अनेकभूपसंसेव्यो अनेन मन्त्रराजेन अन्तकृत् केवली योऽत्र. अन्तकृत्केवली स्वामी अन्ते च स्वायुषः स्वामी अन्ते च श्रावकभव्य अन्ते सल्लेखना कार्या अन्त पुरं तदा तस्य अन्यत्र सर्वकार्येषु अन्यथा जाह्नवी माता अन्यथा निष्फलं सर्वम् अन्येऽपि यहवो भव्या अन्येऽपि ये पदार्थास्ते अन्य पौरजना. प्राहु अन्ये विरोधिनश्चापि अन्ये सर्वेऽपि ये सिद्धा अन्यभूरिजन. सार्धम् अन्यैर्विकारसंदोह. अन्योऽपि यो महाभन्यो अन्यो यस्तु परित्याग अटव्या मत्तमातङ्ग. २१४९ अणुव्रतानि पञ्चोच्च. ९।१५ अभया चिन्तयामास ९.४८ अभया तत्समाकय १११५२ अभयादिमती वीक्ष्य ३१२६ अभव्यश्चान्धपाषाण- ११०३ अभ्रच्छाया यथा मेघम् ३१३१ ११६० अयं जैनमते दक्ष. ८.९७ अयं मे सर्वथा सत्य- ३१३ अयमासन्नभव्योऽस्ति १११६० अयोगकेवली देवो १२।४ अर्हत्सिद्धगणीन्द्रपाठकमुनिः २०४८ अर्हता प्रजपन्नाम ५।६२ अरनाथमहं वन्दे १०।१७ अशोकसप्तपर्णाख्य- ८।१०४ अष्टम्यादिचतु पर्व ५.४४ अष्टम्यां च चतुर्दश्याम् ६।६ अष्टमे च गुणस्थाने . १२।२८ अष्टयोजनवाहल्यम् ९.९ अष्टस्पादिभेदेन ७११०२ अष्टादशासम्पराय- १७६ अस्तु मे जिनराजोच्च १२।२४ अस्थाने येऽत्र कुर्वन्ति १२।४१ अस्थिमासवसाचर्म ७७१ अस्थिरं भुवने सर्वम् १२।३१ अस्तान सविधत्ते स्म १०११०१ अस्माक च यदाप्यत्र ५।४२ अस्मादृशा सवस्त्राद्याः ६१६३ ७६३ २१५८ ५१४ ६५९ १०.३६ ६।९ ८1९६ १२।६ १२।४५ ८/११३ १।१८ १२९६ ७।२ २।२३ १११४९ २०७१ २०६५ ८७८ ८।३७ ६१४२ ७.३५ ७।११७ १०११०६ ६३९ ८१९० - ११८ सुदर्शनचरितम् ८।४७ ७.४३ २।१०६ ९७५ ४।२५ ७।१०३ १११२३ ४१८७ ७.६९ अस्माइक्षिणदिग्भागे अस्य स्मरणमात्रेण अहं च विषयासक्तो अहं चापि पराधीना अहं सर्व विजानामि मोनाथात्र कि जातम् अहो मोहमहाशत्रु अहो रूपमहो रूपम् अहो सता मनोवृत्तिः आचार्यपाठकादीनाम् आचौर्यभावना पंच आज्ञापायविपाकोत्थम् आजानुलम्विनी वाहू आद्य प्रकृतिवन्धश्च आदाने ग्रहणे तस्य आनन्दक्षायिनी भेरीम् आमोदर्य तप स्वामी आम्रजम्बीरनारङ्ग- १०।४० १२।३४ १०।११ ६४१०२ ८।६ ७.११४ ५।६७ ६५६ ७.९८ १०।१२७ १०७२ १०।१४१ ९।१७ २०७० १०।८३ १९८३ १०।११७ ११७२ ४॥७७ ८।१३ इत्यादिकैस्तदालापै. इत्यादिकं गदित्वाशु इत्यादिकं जगत्सर्वम् इत्यादिकं जगत्सारम् इत्यादिकं तदा पौराः इत्यादिकं प्रजल्प्योच्चै. इत्यादिक प्रलापं च इत्यादिकं प्रलापं सा इत्यादिक महाश्चर्यम् इत्यादिक वृथालापम् इत्यादिकं विचार्या इत्यादिक शुभं वाच्यम् इत्यादिकं स्तुति कृत्वा इत्यादिकं समालोच्य इत्यादिकं समाकर्ण्य इत्यादिकं समाकर्ण्य इत्यादिक समाकर्ण्य इत्यादिक सुधीश्चित्ते इत्यादि धर्मसद्भावम् इत्यादि धर्मसद्भावम् इत्यादि प्रलपन्ती सा इत्यादि भवसवन्धम् इत्यादिभूरिसंपत्ते. इत्यादि रूपसंपत्त्या इत्यादि संस्तुति कृत्वा इत्यादि संपदासारे इत्याप्सभारतीसाधु इत्यासं श्रोजिनाघोशम् ६१९० १११७५ १०११३ १२।३६ ३१८४ ७।३७ ९६८९ [३] इलुभेदे रसरन्यः इत्यं सारजिनेन्द्रधर्मरसिक रघं साविभूतिमंगलगत इन्य प्रोगणनायवेन गदितम् प्रत्यं श्रीमजिनेन्द्रोक्त दो प्रमोदेन इन्यामहं समाशय इत्यादि बलशान- ११४४ ५।१०१ ४|११७ २१८८ २०४७ ३।१०१ ६१४८ १।११७ ५२६३ ७१११५ ८1१३१ ३१५२ ४।५८ ८१३८ ११५३ १1३० १११२९ श्लोकानुक्रमणिका ११९ ४॥२१ ६१६८ ७.६ ८.४५ ८।६६ ८८५ इत्युक्त्वा च मुनि. स्वामी इत्युक्तजिनधर्मकर्मचतुर इत्येव चिन्तयन् गत्वा इत्येव जिनराजस्य इत्येवं पञ्चसमितीः इत्येवं परमानन्द- इत्येवं भावना स्वामी इत्येवं षड्विध बाह्य इत्येव स मुनीश्वरो इति त्रिविधपात्रेभ्यः इति प्रपञ्चत. स्वामी इति प्रशस्य तं श्रेष्ठी इति भावनया तस्य इति विततविभूतिः इति श्रुत्वा वचस्तस्य इत सुदर्शनो धीमान् इदं चूर्ण तवैवास्ति इदानी कः परित्राता इन्द्रियाणा जयी शूरो इष्टानिष्टेन्द्रियोत्पन्न- इष्टप्राप्तिस्मृते चित्ते ६.१०३ ५४१ ९१६१ ९।२७ ६२२ ८७४ ८1१०० [ऊ] ९.९१ ऊरुद्वयं शुभाकारम् ८.९१ ऊचे सा भूपतेर्भार्या ११७८ [ए] १०१८६ एक स्कन्धे समारोप्य ११९४ एकदा तस्य भूपस्य १०॥७७ एकदा सुभग. सोऽपि १०११२२ एकत्रिंशत्प्रमाणोक्त- १०११४८ एकपत्नीव्रतोपेतो २।२९ एकपान्नामभागेको १०९३ एकरज्जुसुविस्तीर्णः ८।११० एक प्राणी करोत्यत्र १०॥३६ एकाकिना त्वया श्रेष्ठिन् ११२९६ एकादशप्रकारोक्त- ६.४० एकोनत्रिंशदाप्रोक्त ५।९१ एको भन्यो विनीतात्मा ६१३१ एतस्या सरला काला ११२४१ एतान् मूलगुणानुच्च- १०.८९ एतेषा सप्ततत्त्वानाम् १०.७६ एते श्रीमज्जिनाधीशाः १०११३७ एतै गैर्मनोऽभीष्ट. एव तत्त्वार्थसद्भावम् एव तदा तयोस्तत्र एव तदाजन. स्वस्व- ८।१०८ एवं तस्मिन् महीनाथे ८।१०९ एव तपस्यतस्तस्य २।५३ एवं तो द्वौ जिनेन्द्रोवतम् ८1८ एवं देवो महाघोर. ८1८४ ९।३० ४४९ १०।११२ २।८४ [उ ] १११६ ११११३ २।८६ ४।११६ ७१५३ ११६९ १०११४४ ५।८९ ७।१२४ उद्धृतोऽय त्वया जीव. उद्वतितो यथादर्शी उपयोगद्वयोपेत. उर्वशीव च ब्रह्माणम् १२० सुदर्शनचरितम् २०२० ७४० ४/२० ४|१३ ४१५१ ८.५ एवं मत्वा स पूतात्मा एवं यदा मुनि/र. एवं यावत्सुघोमित्र एवं वृपभदासाख्य. एव विद्यागुणैनि एवं श्रीमज्जिनेन्द्रोक्तम् एव श्रीमन्महावीर- एवं रात्री महाप्रीत्या एवं स्वपुण्यपाकेन एवं स पुत्रपौत्रादि- एवं स श्रेणिको राजा एवं सुदर्शनो धीमान् एवं सुदर्गतो धीमान् एवं सुनिश्चलो धीमान् एरण्डबीजवह्नि- एप श्रीमज्जिनेन्द्रोक्त- एपो मे वान्धवो मित्र एहि त्वमेहि सजल्प औषवं क्रियते किंवा ६।३ ४।५५ ७११२२ श२१ २१३४ १११४२ ४१५४ ६.३८ १०१५९ : कन्दमूलं च सवानम् ११।३१ कन्दर्पहस्तभल्लिा ६।२६ कटीतटे कटीसूत्र- ५।६ कण्ठे मुक्ताफले दिव्य ४।३५ कण्ठ. ससुस्वरस्तस्याः ३१५९ कपिला कि विजानाति १११०६ कपिलस्य गृहासन्ने ८/९४ कपोलो निर्मलो तस्या ३१६८ कम्पनादासनस्याशु ८.४४ कवित्वलिनीग्राम- ११८७ कर्तव्य च महाभव्य. ९.९० कर्जा लग्ना तदागत्य ७।१२० कर्णी लक्षणसंपूर्णी ७.९७ कर्मणामुदयेनात्र १२।१९ ७।१०१ कर्मणा निर्जयाद्देव १०.६७ कर्मणां निर्जराहेतुम् ४॥७६ कर्मणामेकदेशेन ६.२५ कर्मणामानवो जन्ती कराभिघातस्तिग्मांशी करिष्यति दिनात्यष्टो ४।९३ करोति स्म सदादक्ष- १०।१४ कष्टदुष्टकषायाद्यैः ६.१२ कपायवशतो जीव. १०।११० कस्य पुत्रो गृहं कस्य ९६८ काचिज्जगी जिनेन्द्राणाम् ६१८ काचित्प्राह पुरे चास्मिन् ३।१२ काचित्प्राह महाश्चर्यम् कर्मणा क्षपणे शूरः ११।४५ ८।३१ १०१११५ २०७३ २०६८ [क] कृत्वा कृपा तथा प्रोत्या कृत्वा स्नपनसत्पूजाम् कृत्वा हस्तपुटं प्राह कृतकारितनिर्मुक्तम् कृत्रिमाणि तथा सन्ति कच्छपीव सुवस्त्रेण कज्जलं लेखने यत्र ११६४ ७१३ १०.९६ ९॥५९ २०६९ ७।११६ १०॥३४ १०१३८ १०.३३ श्लोकानुक्रमणिका १२१ ७।५७ ५।९८ ६१४८ ७1८७ काचित्प्राह सुधी. सोऽयम् काचिदूचे तदा नारी काचिदूचे सखो मुग्ध कामतुल्योऽस्ति मे भर्ता कामभोगरसाधार- कामाकुलाः स्त्रिय. पापा कामातुरोऽभयादेव्या. कामान्धास्तत्र कुर्वन्ति कामासक्ता स्वशृङ्गारम् कामेन विह्वलीभूता. कामः क्रोधश्च मानश्च कायोत्सर्ग सदा स्वामी कार्यादौ मन्दता भेजे कार्याथं कपिले क्वापि कारयित्वा तथा जैनी कारयित्वा जिनेन्द्राणाम् कालरात्रिरिवोन्मत्ता कालादिलन्वित प्राप्य काले कल्पशते चापि कालोऽयमशुचिनित्यम् का वार्ता भुवने पुत्र काश्चिद्रूपमहो रूपम् कितवेपु सदा राग किमस्य रूपसपत्त्या किमेतेन शरीरेण -किमेतैस्ते तप कष्ट कुन्युनाथमहं वन्दे कुवादिमदमातङ्ग- १०१३० कुर्वती शीघ्रमागत्य १०।२९ कुर्वन् जिनोदितं धर्मम् १०।३७ कुर्वन् धर्म जिनप्रोक्तम् ६।९४ कुर्वन्महातप स्वामी ३३५४ कुर्वन् विशेषतो धर्मम् ६७८ कुलाङ्गना महागीत- कुष्ठो कृष्णभुजङ्गोऽपि ११।२८ कुस्त्रिय. साहसं किं वा ६।१७ केचिच्च प्रलयं यान्ति १०।२७ केचिच्च सुधियस्तत्र ३३५० केचिद्भव्या व्रतं शीलम् १०११०२ केवलज्ञानसपत्तिम् ३७१ केवलं दर्शन घत्ते ६१७ कोऽहं शुद्धचैतन्य- २१३२ कोटिभास्करसंस्पद्धि [९६ कोपं कृत्वा जगी राज्ञो' ७१५४ कौशेयक च कासिम् २०६० काश्चिद् गृह्णाति गर्भस्थान् ११२।२१ कि करोति कुकर्मासो "९।३६ किं करोति न दु शीला ९।३३ कि कुर्वन्ति वराका मे १०।२८ किंचित्पुण्यं तथोपार्य ५।३४ किचिन्न परित्यक्त ६।५८ कि ते तप प्रकप्टेन ७.९६ ७१४१ कि वा विद्याधरी रम्या ११११ क्वचिन्मलादिक किंचित् १२८ क्व तेऽनिष्ट शरीरेऽभूत् १०।१४७ ३१८७ ३१९८ ७.२५ ६१६९ ८1८९ १०११९ ५०६४ ११॥६१ २।२८ २१५० ११११२ ६१९१ १०११०४ ५७० ७.१०० ७१८४ । ७१९५ 1 कि मेरुश्चलति स्थानात् ८1१२९ १२।१७ ११।१६ ७।११२ ४।६६ १०.८५ ६।२४ ,

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श्लोकानुक्रमणिका १२३ ३/७४ १११४० ७११० १११२२ ९।१३ ७१५२ ९।६२ ८।२७ ११२१ ११११८ ८/२८ चतुर्दशगुणस्थान- चतुनिकायदेवोप. चतुरिन्द्रियमत्यन्त- चतुभिरगुलर्मुक्ता चतुर्विंशतितीर्थेश- चतुर्विंशतितीर्थेशाम् चतुस्त्रिशन्महाश्चर्ये. चन्दनागुरुकर्पूर- चन्दनागुरुकर्पूर- चन्द्र दोषाकरत्वं च चन्द्रो दोषाकरो नित्यम् चम्पकाम्रवसन्तादीन् चारित्रं च द्विधा ज्ञेयम् चारित्र च द्विधा प्रोक्तं चित्ते संचिन्तयामास चिन्तयत्यभया चित्ते चिन्तयामास भव्यात्मा चिन्तयामास पूतात्मा चिन्तयित्वेति पूतात्मा चिन्तामणिरिवाक्षय्यम्' चिरंजीवेति सप्रोक्त्वा चेदहं न रतिक्रीडाम् [छ ] छत्रचामरवादिन. ८७६ जगी श्रेष्ठी शुभं भद्रे १११६२ जगी देहं तवातन १०।९१ जन्मान्धको यथा रूपम् १४१०८ जन्मादि मृत्युपर्यन्तम् ८८१ जन्ममृत्युजरापायम् १०॥९७ जनाना परमालादी १७० जम्बूद्वीपे तथा १०.९० जय त्वं केवलज्ञान- ४/७५ जय त्व त्रिजगन्नाथ ३।१६ जय त्व त्रिजगत्पूज्य ४।११ जय त्वं धर्मतीर्थेश ६१५२ जय त्रैलोक्यनाथेश ९८१ जय देव दयासिन्धो २।८ जयन्तु भुवनाम्भोज- ११२४ जय सर्वज्ञ सर्वेश ७१७९ जलगन्धाक्षतैः पुष्पैः १०१९ जलधेर्वीक्षणादेव ६३४ जलाना गालने यत्नो ५।७४ ११११४ जलाशयास्तरा स्वच्छाः ४।११४ जातरूप जिनेन्द्राणाम् ६।९६ जातीचम्पकपुन्नाग- जानुद्वयं शुभ रेजे जिनवाक्यामृतास्वाद- ६१५४ जिनागमानुसारेण ९.१६ जिनेन्द्रतपसा कर्म जिनेन्द्रभवनोदार- ४।२३ जिनेन्द्रभवनान्युच्च- जलाशयानपि व्यक्तम् ८।२६ १११६७ २।१ ८।२९ १११६४ ' ३१८२ २०१८ ६५० ५।१३ १०।१०५ ११९३ ४।२२ १०१११९ १०.८० ९।४५ ३१५८ ३१३३ छेदन भेदनं कष्टम् [ज] जपाद्वयपरं तस्य १२४ सुदर्शनचरितम् . जिनेन्द्रभवनोद्धारम् जिनेन्द्रवदनाम्भोज- जिनोक्तसप्ततत्त्वाना जिनोक्तसततत्त्वार्थ- जिनोक्तसप्ततत्त्वानाम् जिनोक्तसारशास्त्रेषु जिह्वन्द्रियं त्रिधा स्वामी जीवतत्त्वं भवेत्पूर्वम् जीवतेच्छास्ति चेत्तेऽत्र जीवाजोवादितत्त्वानाम् जीवोऽयं निश्चयादन्यो जीवोऽपि सर्वदा तद्वत् जैनी यात्रा प्रतिष्ठाभिः ज्योतिक वद्यशास्त्राणि ज्ञात्वेति मानसे सत्यम् ज्ञातारं पञ्चविंशत्या. ज्ञानमष्टविध नित्यम् ज्ञानिनं गुरुमानम्य ज्ञानेन भुवनव्यापो ज्ञान तदेव जानीहि ५।९७ तच्च जीवदयाहेतुः १०१५२ ११८ तत्कण्ठः सबभी नित्यम् ४।१२ ५।२८ तत्पट्टपद्माकरभास्करोऽत्र १२।४९ १।२२ तत्पादपट्टेर्जान मल्लिभूषण- १२१५० २।६ तत्प्रभाव समालोक्य ५।१५ १०११३१ तत्प्रिया जिनमत्याख्या ३१६३ १०।८८ तत्पूकार समाकर्ण्य ७.८५ २०५२ तत्फल सर्वमेकाको ९।२८ ७.१३७ तत्समाकर्ण्य भूपाल ७११२७ ११३० तत्समाकर्ण्य भूपाल १२८१ ९।३२ तत्समाकर्ण्य स श्रेष्ठी ७११४० ९।३५ तत कल्पद्रुमाणा च १११०० ३१३१ ततः कामग्रहनस्ताम् ७१५६ ४१३१ तत. कुशलवार्ता च ४।९१ ४।४६ ततः कोपेन गच्छन्तम् ८1५५ ८1८२ तत. श्रेष्ठी प्रहृष्टात्मा ५।८४ ९८० ततः श्रेष्ठी विशुद्धात्मा ४१४७ ८.३९ तनः स्ववेश्मसु प्रीता “७१४९ ८.३३ ततः समीपकाले च ४।४० २२७ तत. सुगुप्तनामानम् ३७७ ततः सैन्यं समादाय ७।१२९ ततस्तां स मुनिः प्राह ११।१७ ४.६७ ततस्तविनयेनोच्च. ५.२१ ४१९५ ततस्तो खञ्जनयुक्ती ४।१०५ ६७५ ततस्तो बन्धुभिर्युक्ती ३७५ ७१५५ ततोऽम्बरे सुविस्तीर्णे ७१५१ ७१६१ ततोऽसौ सर्वशास्त्रज्ञः १०१४९ ४/७४ ततो जिनालयं गत्वा ८.२४ १ [ त] तं निशम्य सुधी. सोऽपि त निशम्य सुधी. सोऽपि तं निशम्य पुन प्राह तं प्रणम्य पुन प्राह तं समुद्धृत्य घृष्टात्मा तच्चिन्तया तदा तस्य श्लोकानुक्रमणिका १२५ ४।२७ १११०४ ८॥२२ ७/७४ ततो महोत्सवैः पित्रा ततो मार्ग समुल्लङ्घ्य ततो मे नियमो राजन् ततो भीत्वा जगी शीघ्रम् तत्र कष्टशते काले तत्र चम्पापुरीमध्ये तत्र त्रिमेखलापीठे तत्र प्रेतवने स्वामो तत्र मन्त्र स्मरन्नुच्च तत्र सा मदनोन्मत्ता तत्र सोऽपि सुघी कायो- तत्राभयमती राज्ञी तत्राभूच्छेणिको राजा तत्रास्ति मगधो नाम तत्रासौ सन्मुनि स्वामी तत्राह मिलितश्चापि तथा कुलस्त्रिया चापि तथा केनापि तद्वार्ता तथा गुरूपदेशेन तथा त्वं भो सुघी राजन् . तथा त्व स्मर भो पुत्रि तथा तत्रस्थिता भव्या. तथा तयोजिनेन्द्रोक्त- तथातिशयमाकर्ण्य तथा त्रिविधपात्रेभ्यः तथा दयापरो धोर. तथा दयालुभिर्देयम् तथादेशं ददो सेवा ७१९४ ३२४३ १११०७ १११३८ ८।११९ ११११२ ७/२९ ६५५ १.५८ ११४० -९।२२ ७.३६ ६।८९ तथान्ये बहवो भव्या. तथा पापी वको राजा तथापि ते स्तुतिर्देव तथापि पुस्तक कुण्डी तथापि श्रीमता सार- तथाभयमती सा च तथा मूलोत्तरास्तस्य तथा यच्च सुपात्रेभ्यो तथा य मन्त्रमाराध्य तथा श्रीमज्जिनेन्द्रोक्तम् तथा श्रेष्ठी प्रियायुक्त तथा स्तुतिं चकारोच्च तथा स्वामी जगादोच्च तथा सत्पुरुषनित्यम् तथा सुश्रावकैनित्यम् तथीपशमिक मिश्रम् तदहं श्रोतुमिच्छामि तद्वाहू कोमली रम्यो तदाकर्ण्य कुमारोऽपि तदाकर्ण्य च कष्टास्ते तदाकर्ण्य प्रतीहार. तदाकर्ण्य सखी सापि तदाकर्ण्य सुधी काचित् तदाकभिया भीत्वा तदा कालक्रमेणोच्च तदागमनमात्रेण तदा ज्ञानी मुनि. प्राह तदा तत्पत्तने पापा १०११८ ५।३८ ११७४ १०१८४ १११२८ ७.६५ २।१० १०।१२८ १२।२९ १०।११३ ३१८६ ८२५ १११८१ ५।३२ २।४६ ५१२९ ३१४ ४/५० ४।७२ ७१९२ ७।१५ ६।११ ६१६१ ७।८२ ७.१०४ २।३९ २०५१ ६१८४ ७.१२६ ११६७ १११८६ २।२५ १०७८ २२३० ८1५१ ५।३ ५।१२ ३७८ १११७ १२६ सुदर्शनचरितम् घृता हस्ते ८1१०१ १०१८२ ८०४६ ७।५८ ३२५५ ७७५ ५।१० ४।९८ ४/७१ ७।१३१ ५१९९ ५।५१ तयोस्तत्र महायुद्धम् ५।५४ तदा तत्सर्वमालोक्य तदा तत्र पुरे कश्चित् तदा तया च पापिन्या तदा तस्य समालोक्य तदा तेन तदा ती परमानन्द तदानीय विधातव्यम् तदा प्रभृति पूतात्मा तदा प्राप्त सुधी. श्रेष्ठी तदा पुरेऽभवद्धाहा- तदा वृषभदासस्तु तदाभया स्वचित्ते सा तदा भीत्वा नृपो नष्ट. तदास्तं भास्कर. प्राप्तो तदा स्वामी कृपासिन्धुः तदा सागरदत्ताख्यः तदा सा लम्पटा चित्ते तदा मुदर्शनस्यादौ तदा सुदर्शनो भव्य- तदा सुदर्शन. स्वामी तदासौ सत्कृपासिन्धः तदा संकोचयामामुः तन्निशम्य गणाधीश. तन्निराम्य तदा प्राह तन्निशम्य प्रमुस्तस्मै सन्निशम्य स च प्राह तन्मन्या पण्डिता सापि सन्मध्ये पोडशोत्तुन १०८ तन्मन्त्रेण मुनेर्वीक्ष्य १०॥४१ तपो वृद्धिनिमित्त च १११३४ तमाकर्ण्य नृपोऽनन्त- १११८४ तया साद महाभोगात् ७११० तया साधं यथाभीष्टम् ४११०३ तयोक्तं क्व नयाम्येनम् ७११७ तपो रत्नाकरो नित्यम् ८।१११ तयोमैत्री विवाहश्च ६।२१ तयोरेषा सुता सार ७.९९ ५।६५ तस्थौ सुखेन पूतात्मा ७७६ तस्मात्तत्यज्यते सद्धिः ७।१३४ तस्मादाखेटकं चौर्यम् ७।४४ तस्माद्भव्या जिन. प्रोक्तम् १११७७ तस्माद्भव्य सदा कार्यो ४।११२ तस्माद्भव्यः सुखे दु खे ६।४ तस्माद्यावदसौ कायः ७।१३९ तस्मिन् भागद्वये नित्यम् १०१५ तस्मिन् महति संग्रामे १११४४ तस्मै दानं सुपात्राय २।३ तस्य किं वर्ण्यते धर्म- ७१४५ तस्य दक्षिणतो भाति- ३१५ तस्य शुद्धचरित्रस्य ६५७ तस्य सागरदत्तस्य ५।१७ तस्य रक्षां विधातुं तम् ८.१८ तस्य राज्ये द्विजिह्वत्वम् तस्य श्रीवर्द्धमानस्य १११०५ तस्याः सुकेश्या. कवरी ३।१०५ ४।३४ १२।३२ ५७३ ९.५४ ७/१३३ १०१४४ ५११०० ११३९ १०११२३ ४१६३ ७११४१ ११६२ १७१ ४१५७ श्लोकानुक्रमणिका १२७ तस्याङ्गविषयस्योच्च. तस्या जधे च रेजाते तस्या द्वो कोमलो पादी तस्या रूपेण सादृश्यो तस्याश्च हृदयं रेजे तस्यासीच्चेलना नाम्ना तस्योदरं विभाति स्म तस्योपरि पपाताशु तस्योपरि मनागून- 4 तां जगौ शृणु भो भद्रे तां भेरी ते समाकर्ण्य ता विलोक्य तदा सोऽपि ता विलोक्य प्रभुश्चित्ते ताडनस्तापन. शूला तादृशी ता समालोक्य तावत्तत्र समायात. तावत्प्रतोलिका प्राप्ताम् तावत्सा व्यन्तरी पापा तारण भववाराशी तारेण दिव्यहारेण तुच्छमेघोऽपि संक्षेपात् ते धन्या भुवने भव्या तेन युक्तो भवेद्धर्म ते मूढा विषयासक्ता. तेपा पञ्चवताना च तेषा सरासि सर्वासु तेपी सारफलं लोके तोरणध्वजमागल्य. ३।३१ त्यत्तस्त्रीषण्ढपश्वादि ४॥४४ त्यजन्ति मार्दवं नव ४।४३ त्यागो दान च पूजा च ११६६ त्याग शरीरसंस्कारे ४॥४८ त्वया च सर्वथा शीघ्रम् १०६५ त्वदन्यो नास्ति मे वैद्य. ४।१९ त्वयायं नाशित कष्टम् ८।११८ त्वया सर्वत्र कार्येषु ९०७३ त्वं देवं त्रिजगत्पूज्य ६।१४ त्व पापारिहरत्वाच्च १९८५ त्वं सदा जिनधर्मज्ञः ६/२७ त्वं सदा शीलपानीय १८९ त्वं समानीय मे देहि ९.६० त्वं सुदर्शननामासो ६७२ त्रयस्त्रिशत्प्रमात्यासा- ४।८९ त्रसस्थावरकेषूच्चैः ७/७ साना रक्षण पुण्यम् १११३९ त्रिकालयोगसयुक्त्या ८।६८ त्रिकालोत्पन्नदेवेन्द्र ४।१६ त्रिधा सर्व परित्यज्य ११३४ त्रिसन्ध्य श्रीजितेन्द्राणा ११।२९ त्रिसन्ध्य समताभावै. ५।३० त्रैलोक्यमस्तके रम्ये ११।२१ [द] १०॥६९ ११९१ दक्षिणोत्तरत. सोऽपि १२।३० दण्डशब्दोऽपि यत्रास्ति ३२२७ दत्वा दुःखादिकं जन्तोः १०१५५ ७।१३९ २।३१ १०७५ ६.९७ ६।२९ ७/१२ ८.९९ ८.३० ८.३२ ८।१५ ७।१११ ६१८ ८1१२१ ८1८६ १०.५० २।१४ १०११२१ १२।२२ ११३८९ १०.९५ ૨૨૨ ९७२ - ९।५१ ३११४ ९.४४ सुदर्शनचरितम् २।८७ ८१८० ४।२ ददी झम्पां जले तत्र दध्यादिभिविघायोच्चः दन्तानां धावनं नैव दयावल्लीसमायुक्तः दर्शनाद्देववृक्षस्य दशलाक्षणिको धर्मश्चेत् दशलाक्षणिको नित्यम् दाता भोक्ता विचारज्ञ. दानिनो यत्र वर्तन्ते दानं पूजा व्रत शीलम् दिग्देशानर्थदण्डाख्यम् दिने दिने तया सर्वे दिव्यचिन्तामणिस्त्व च दिव्याभरणसहस्त्र. दुन्दुभीना च कोटीभि. दुष्टस्त्रियो जगत्यत्र दुष्टस्त्रीणा स्वभावोऽयम् दुष्टा. किं किं न कुर्वन्ति दुष्टै. सवेष्टित वीक्ष्य दुसह तत्प्रभु श्रुत्वा देवदता प्रति प्राह देवाना च भवेदु.खम् देवायुनारकायुश्च देवेन्द्रो वा सुरै सार्टम् देहि दीनां कृपा कृत्वा हो पादौ तस्य रंजाते द्रव्यमोक्षः स विज्ञेयो द्वादसममितव्यकानु- ८।११७ द्वादशोरुसभाभव्यः २।३३ द्वाविंशति मुनिप्रोक्त १०।१०७ द्वितीयेन्दुरिवारेजे १०।२४ [ध] ३.८० ५।२७ धृत्वा कृष्णमुखं लात्वा ७।३३ ध्यानं पश्वादिदु खस्य ८1१२२ ध्यायन्तं परमात्मानम् ३.३० ध्यायन्नित्यं स मोक्षार्थी १११७९ ध्यायेन्मन्त्रमिमं घीमान् २०१९ धन्यस्त्वं पुत्र पुण्यात्मा ७।२० धन्यास्य जननी लोके ८॥३४ धनन्यि जनान्यः ४।३ धर्मदृग्ज्ञानसद्वृत्त- १०११३ धर्मव्यानप्रभावन ११।२६ धर्मेण विपुला लक्ष्मीः ७.६४ धर्मोपदेशपीयूप- ६।२० धर्मशर्माकरं नित्यम् ७११०९ घात्रावाहनभूपाद्या ७१८८ १११८ [न] ९.२० नग्नीभूय निजाकार- १११४८ नत्वा त स्थापयामास ११८८ नन्दत्विदं सारचरित्ररत्नम् ५.७८ नमस्तुभ्य जगद्वन्ध ४।२४ नमस्ते त्रिजगद्धन्य २१७८ नमस्ते स्वर्गमोक्षोरु ८.७५ १११३७ १०११३८ ८1८७ १०११४२ २।३८ ८।१०७ १०॥३८ ११४२ ६।३५ ११।४७ - ९।८८ ५।११ ५॥२२ १२।२६ ११।३५ ११११० १२।४३ ८३६ १११२५ १११२३ ११२० नमामि गुणरत्नानाम् - श्लोकानुक्रमणिका १२९ ७१९३ ९७९ ८१६५ ३२४५ ६५८५ १११४ [प] पड्कादिवहले भागे ९॥५३ १११५७ १२।७ २०६६ ९।१४ नवधा ब्रह्मचर्याढ्यम् नवमासानतिक्रम्य नाट्यशालाद्वय रम्यम् नान्यथा मुनिनाथोक्त नानारत्नसुवर्णाद्यः नानाहावली यत्र नानाहावलीयुक्तम् तानासुगन्धपुष्पौध- नार्यों यत्र विराजन्ते नासिका शुकतुण्डामा निज श्रेष्ठिपदं चापि , निजा प्रतिज्ञां स स्मृत्वा, नित्यं परोपकार च, नित्य महोत्सवैदिव्यः नित्यं हेममयास्तुङ्गा नितम्बस्थलमेतस्या निद्रा सप्रचलां हित्वा निधयो नव रत्लानि निर्जरा द्विविधा ज्ञेया निर्जला. सजला जाता.. निर्ममत्वमलं चित्ते निरालम्ब जिन. स्थित्वा निश्चयेन निजात्मा च निश्चल तं तरी मत्वा निश्शरीरो निरावाघो निशाभोजनक त्याज्यम् निशाया. पश्चिमे यामे निशि प्रातश्च मध्याह्न ८/७३ निष्काश्य भूपतेर्गेहात् ३१९३ नि शङ्कितादिभिर्युतम् ११९५ नि शड्को मानसे नित्यम् ३८५ नीतिशास्त्रविचारज्ञ ११५७ नीली प्रभावती कन्या ३३२ नेमिनाथं नमाम्युच्चै ११५४ १११११ ३।२४ ४८ पञ्चधा ज्ञानहा. पञ्च ५।८६ पञ्चधा वपुषा स्वामी १११९ पञ्चप्रकारमिथ्यात्वै. १११८० पञ्चप्रकारसंसारे ४।४ पञ्चामृतैर्जगत्पूज्य ९।६६ पट्टे तदीये मुनिपद्मनन्दी ४।४६ पण्डिता धात्रिका सा च १११५६ पण्डिता धात्रिका सापि ९/१२ परस्त्रीलम्पट श्रेष्ठी ९।४३ परस्त्री परभत श्च ११७३ परोपदेशने नित्यम् १०११३५ पर घातोपघातो च १२१५ पवित्र मन्दिरं मेऽद्य ९.८२ पश्चात्कोपेन तं प्राह १११३६ पश्चात्ताप विधायाशु २०५५ पति समातृकं हत्वा २०१७ पातिन्य. श्वभ्रगर्तायाम् ३१६९ पात्रदानप्रवाहेण १२।३३ पात्रदानैर्महामान. ४।१०४ १२।४८ १११९२ . ८३ ७।८९ ६ ६६८६ ६९२ १२।९ ४।९२ ७।११ - ७.८० ६१८० ११।२७ ५.९५ ११४८ ।

१३० सुदर्शनचरितम् ४॥२८ ७।१२५ २०४३ ३१७६ ५।६० ४॥६२ ३१०४ ४॥२९ पात्रदानं जिनेन्द्रार्चाम् ३११८ पुरोहितसुतेनामा पात्रदानं सदा कार्यम् ५।५९ पुष्पवृष्टिं विधायाशु पाण्डुत्वं सा मुखे दधे ३३८९ पूज्यपूजाक्रमेणव पाणिपद्मद्वये तस्य ४।१८ पूजयित्वा जिनानुच्चः पापा ब्रह्मदत्ताद्याः ५.५३ पूजा श्रीमज्जिनेन्द्राणा पापलेपकरं मांसम् ५।४५ पूर्णेन्दु. पुण्यसंपूर्णः पापिनी पण्डिता प्राह ७१३८ पूर्वपुण्येन जन्तूनाम् पापेन दुखदारिद्रय ९।१९ पूर्वपुण्येन भव्योऽसौ पावनं श्रेयस वन्दे १७ पूर्व या भिल्लराजस्य पावें परिभ्रमन्नुच्चैः ८1९३ प्रजा सर्वापि तद्राज्ये पारणादिवसे तत्र १०॥२० प्रतस्थे पश्चिमे यामे पारणादिवसे स्वामी ११।६ प्रतिक्रमणमत्युच्चैः पार नीय बुनित्यं २।१२ प्रतिज्ञामिति सा चक्ने पितुः सत्संपदां प्राप्य ५।९२ प्रतिज्ञायेति सा राज्ञी पीत्वा मद्यं प्रमत्तोऽसौ ५।४९ प्रणम्य वृषभं देवम् पुत्रमित्रकलत्रादि ९।३ प्रभुशक्तिर्भवेदाज्ञा पुत्रमित्रकलत्रादि ५।६८ प्रमादाद्वीक्षितो नैव पुत्रस्यातिमयाकर्ण्य ४१८० पुत्रो भवाम्यहं चेति ८/१२० प्रसिद्धाष्टगुणर्युक्त पुत्रो भावी पवित्रात्मा ३।११ प्राकारखातिकाट्टाल- पुत्रः सामान्यतश्चापि ४॥५ प्रायेण सुकुलोत्पत्तिः पुनर्गच्छति पन्यानम् ७/२४ प्राशुकं जलमादाय पुनर्जीवो द्विधा ज्ञेयो २१५४ प्रासादा श्रीजिनेन्द्राणाम् पुण्यपापफलं सर्वम् १११८२ प्राहेमं वनिता कस्य पुण्येन दूरतरवस्तुसमागतोऽस्ति ३३१०६ प्रोक्तविंशतिसंख्याता पुण्येन यत्र भव्यानाम् १५१ प्रोक्तः सप्तकपञ्चैक- पुण्यं श्रीजिनराजचारुचरणाम्भोज प्रोवाच भो मुने स्वामिन् द्वये चर्चनम् ३११०७ वन्धूनां त्वं महावन्धुः ८1१२६ श६३ ७.२२ १०.९९ ८1९ ६७० १११ ३१५१ ६.१६ ९।३८ १२।१८ ३।३६ श६८ १०1४३ ९.५५ प्रमादं मदमुत्सृत्य ६६० ८७९ ९.५० ५३७५ ११/७२ श्लोकानुक्रमणिका वान्धवा. सज्जनाः सर्वे वालमित्रं भवानुच्च. बाह्याभ्यन्तरक सङ्गम् बाह्याभ्यन्तरसभूतम् वोधी रत्नत्रयप्राप्तिः ब्रह्मचर्य जगत्पूज्यम् ब्रुवद्वा तस्य तव्याजान् ब्रूहि भो त्वं शुभं लग्नम् ४।१४ १०।१०८ १११९० १११११ ८।४३ १०१७३ ९५८ . गुरु नत्वा ३।१०० भुजासौ प्रोन्नती तस्य ६।१३ भुक्तिपानप्रवृत्तेश्च १०६ भूत्वार्यिका सती पूता ५।८५ भूपते मिनी यत्र ९७६ भूपालाख्यो नृपस्तस्य १०.५४ भक्ष्यशुद्धिस्तथा नित्यम् ७१२३ भागोपभोगवस्तूनि ४।१०० भोगोपभोगवस्तूनाम् भोगा. फणीन्द्रभोगाभाः भोजने शयने पाने १०।२ भोजन परिहर्तव्यम् ५.५० भो भने त्वं न जानासि ५१३९ भो राजन् भवता पुण्य ६१८३ भो राजन्, भुवनानन्दी १।२९ २०५९ [म] ११४७ १२।३ मृत्वा ततश्च चम्पायाम् ४।८१ म्लानता दृश्यते यत्र ७११९ मङ्गलस्नानक दत्वा २१८३ 'मत्प्रियोऽसि मम स्वामी ४/३८ मत्वा जनेश्वर मार्गम् ७।११८ मत्वेति पण्डित/र. ९।१० मत्वेति मानसे भक्त्या ६८२ मद्गुरुयों विशेषेण ७/४६ मद्यपस्य भवेन्नित्यम् ९.१७ मद्यमासप्रियाणा च - ५२ मद्यमासमधुत्यागः २।२४ ११११९ ८।१०३ ५।५८ ६.३७ ११८० ५।१६ [भ] भक्तितस्तं भक्षित्वा च पलं तस्मात् भक्षित्वा विप्रपुत्रं च भद्र न चिन्तितं भद्रे भट्टारको जगत्पूज्यः भव्यराशे. सकाशाच्च भव्या यत्र जिनेन्द्राणाम् भव्यौघास्तर्पयन्नित्यम् भवन्त्यपत्यवर्गस्य भवन्त्येव तथा मात. भवन्तु कर्मणा शान्त्यै भविष्यति तदा तेऽस्मै भवेऽस्मिन् शरणं नास्ति भवेऽस्मिन् सर्वजन्तूनाम् भर्ता ते भूपतिर्मान्यो भानी चास्तं गते तत्र भुञ्जन्ते क्षुत्पिपासाद्य. भुजानौ विविधान् भोगान् १० ८॥६० ३११३ ४/१०९ ७.६७ १०।२१ ९।३७ ११३५ ११३१ ५६४० ५।४३ ५।३१ .

१३२ सुदर्शनचरितम् ४१८५ ५।५७ ४॥६० ३१७ ९॥३९ मुक्त्वा कर्माणि ससारे ७१३२ १११४ २१७९ ४/५२ ७७० ५.२० ८.९५ मध्यभागो बलिष्ठोऽस्याः मधोरागमने तत्र मन्दिरे मेऽत्र सर्वत्र मन्येऽहं वञ्चिता त्वं च मन्त्रोऽयं त्रिजगत्पूज्यः मनागूनकगन्यूतिम् मनुष्येपु च दुःखौघो मनोगुप्तिवचोगुप्ती मनोरमातदाकर्ण्य मनोरमाप्रियोपेतः मनोरमा लतोपेतः मनोरमा शुभा पुत्री मनोरमा समागत्य मया ज्ञानवता तुभ्यम् मयापि श्रीजिनेद्रोक्ते मल्लिं कर्मजये मल्लम् मस्तके कृष्णके शोध मस्तके लुञ्चनं चक्रे महादानप्रवाहेण महाप्रेमरस: पूर्णा. महाभक्तिभरोपेतम् महाव्रतानि पञ्चोच्च. महासेनसमुद्भूतम् महिपी धात्रिका प्राह महोत्सवै. समानीय मानमोन संत्रस्तः मानभङ्गं तरा प्राप्य मानाहंकारनिर्मुक्तो ४१४७ मासायते निमेपोऽपि ६.५३ मांसव्रतविशुद्धयर्थम् ११११५ मित्रेण कपिले नामा ६६४ मिथ्यात्वं सुपरित्यज्य २।३६ मिथ्यानतप्रमादश्च २।८२ ९।१८ मुक्तामालायुतेनोच्च. १०७० मुक्तिक्षेत्रं जिनः प्रोक्तम् ७।१०६ मुखाम्बुजं वभौ तस्या ५।९३ मुखे मुखार्पणंर्गाढम् ५।९६ मुनिः समाधिगुप्तास्यः ४॥९४ मुनीन्द्रोऽपि सुखं रात्री १११८७ मुनीना स महाधर्म: ८।१४ मुनीना सारमाचार- १११३० मुने. पादाम्बुजद्वन्द्वम् ११३ मूढोऽहं नैव जानामि ४१६ मूलसंघाग्रणी नित्यं १०१९४ मेघो वा कल्पवृक्षो वा ४।१०८ मेर्वादौ यत्र राजन्ते १०।२६ [य] ८७० २।२६ यक्षदेवश्च कोपेन ११५ यक्षस्तत्पृष्ठतो लग्न. ६।७३ यच्चतुर्पु वनेषूच्चः ४११० यजिनेन्द्रतपोयोग ८.५४ मत्कटाक्षशरतातैः ६.४१ यत्पुर जिनदेवादि १०१२३ यत्याचारं जगत्सारम् ५।२५ १०१४ ५।१९ ७।१६ ११२७ ३१२ ९।६५ ७।१२८ ७.१३५ ११३८ २०७४ ८७ १०५६ १११७८ श्लोकानुक्रमणिका . यतः कामाग्निशान्तिम या क्षेत्राणि शोभन्ते यत्र देवेन्द्र नागेन्द्र यत्र देशे पुरे ग्राम यत्र नार्योऽपि रूपाढ्याः यत्र नार्योऽपि रूपाढ्या यत्र नित्यं विराजन्ते यत्र पुष्पफलैनम्र- यत्र भव्या धनन्यि यत्र भव्या वसन्त्येवम् यत्र भव्या समाराध्य यत्र मार्गे वनादौ च यत्र श्रीमज्जिनेन्द्राणाम् यत्र सर्वत्र राजन्ते यथा कनकपापाणे यथा जिनस्तथा जैनम् यथा तारातरी व्योम्नि यथा देवरते रक्ता यथा प्रेतवने रक्ष. यथाभीष्टमहो भव्य- यथा मेरुगिरीन्द्राणाम् यथा मेरुगिरीन्द्राणाम् यथा रूपे शुभा नासा ययाष्टाङ्गशरीरेषु यथा सर्वेषु वृक्षेपु यदत्र भूपतेर्भार्या यद् भुज्यते सुख स्वर्गे यद्यप्येतत्तव प्राणरक्षार्थम् ११ . ६.३० यद्विना त दयालक्ष्मी. ३।२१ यद्रूपसंपदं दीक्ष्य ३।४२ यदानेन सम काम- ११४६ यन्मयालपितं नाथ ३१४० यम पापी खल क्रूर. ११४९ यस्य पुत्रो मया दृष्टः ११४३ यस्य वाविकरणनष्टा ३।१९ यस्या. प्रसादतो नित्यम् ३२३८ याचकाना ददो दानम् ३.२३ या च दु खादिभि काले ९।६४ यान्ति शीघ्र समागत्य २०४५ यावत्सतिष्ठते तावत् ३२९ यावत्तस्य गृह याति ३१२५ यावत्तस्य गले तय ९३४ यावत्तावत्त्वया चापि २०४२ युक्त दुष्टेन कामेन ६.१० युक्त प्रच्छन्नक कार्यम् ६.१९ युक्त ये धर्मिणो भव्या ६८९९ युक्त लोके पराधीन ५।७९ युक्तं सता गुणिप्रीति २१४४ युक्त सता सदालोके ८।१६ युद्ध विधाय तं हत्वा १०५७ युधिष्ठिरोऽपि भूपालो १०१११६ येऽत्र स्त्रीधनरागान्धा १२।३५ येन सर्वत्र भव्यानाम् ७१३९ येनाकर्णितमात्रेण ७४१ ये परस्त्रीरता मूढा ६।१०४ ये भव्यास्तां गुरोर्भक्तिम् १०७९ ३१६५ ६१५ ६.३२ ५।६९ ६१६५ ११२५ १११९ ३३९७ २७५ ८1११५ ५।८ ४।८२ ७।१२१ ६१०५ ४१८८ ४।७९ ११८६ ६।१०७ ४।३९ ८॥२३ ८1५७ ५।३६ १०३५ १२।३७ ६।९३ ६१४५ १०१४८ सुदर्शनचरितम् ५७२ ९।४ ७४७ ७.१३६ १०।१४० ये शृण्वति महाभव्या पा स्मरणमात्रेण ये उन्तो भुवने भव्या योनेपनगरग्राम- योगिनो मुनयस्तर योजनाना सहस्राणि यो जिनेन्द्रपदाम्भोज- पोरनं जन्मा क्रान्तम् सुमन्त रामाराध्य यः नदा नपभिपुण्यः य. मन्यग्दर्शनशान- १२।३९ रूपलक्ष्मीमदोपेता. ९७४ रूपसौभाग्यसौन्दर्य ६.४४ रेजे तारागणो व्योम्नि ११४१ रे रे दुष्ट वृथा कष्टम् ७५० रौद्रमेतदद्वयं स्वामी ९१५७ [ल] ३.६० ५।६६ लघुत्वेऽपि सुधीः शोल १२।२७ लघून्नतगृहानुच्चैः ३॥६१ लज्जादिक परित्यज्य २।७७ ललाटपट्टके तस्या . १०।१० १०।२५ ६७४ ४॥५६ मम पोमत्या मनोरणमंदगतात नागेश्रो रमाि प्रोपता [व] ८॥१२८ वञ्चिता येन सा विप्रा १११०३ वन्दनानतिमातन्वन् १३१२४ बन्दनामेकतीथेगो वन्दे नुमतिमातार- चनम्पतिनितबिन्याः १६९ बनादो मुनयो यत्र २०३१ पगादो या गर्वन १०३१२५ गर्षमान जिनशान ११५२ यमान नित्यम् मागि १०.३१ १११५ १०1९८ ११३ ६.४१ भायमुलम् मा १९५२ १०१९०० दि. मामागे Painita 10%Air grant ५1८८ २ riya reater पायाभरा पानामा माग श्लोकानुक्रमणिका १३५ वहिर्लावण्यसंयुक्तम् वाणारसीपुरे जाता वाणी तस्य मुखे जाते वाताहता लतेवेयम् वापीकूपप्रपा यत्र विचारेण विना जानन् विद्याकल्पद्रुमो रम्य विद्या लोकद्वये माता विनयं भक्तितश्चक्रे विवाय स्नपनं पूजाम् विप्रवंशाग्रणीः सूरिः विमलं विमलं वन्दे विविक्तशयनं नित्यम् विरुद्ध यज्जिनेन्द्रोक्ते विलोक्यन्ते पदार्था हि विशिष्टाष्टादशप्रोक्त- विशिष्टाष्टमहाद्रव्य. विस्तीर्ण निर्मलं तस्य विस्तीर्ण योजने पञ्च वीतराग क्षणार्धन वीतराग नमस्तुभ्यम् वृत्तिसल्यानक नाम वृद्धिहामविनिर्मुक्ति वेद्य चान्यतरच्चैवम् वेद्या संस्थाप्य पुष्पार्द्र- वेदिका स्वर्णनिर्माणम् वैयावृत्त्यविहीनस्य व्याघ्रो मिल्लपति. सोऽपि ११॥२५ व्यन्तराणा विमानेषु ९५६ ८।१२७ व्यन्तराणां विमानेपु ९५६७ ४।२६ व्रजन्या च मयोद्याने ६९५ ७।१०७ व्रताना पालने यत्र ३।११ ३।२९ वत. समितिगुप्त्याय २०७२ ७१६० [श] ४१३३ ४।३२ शक्रचापसमा लक्ष्मीः ९०५ १०।१२४ शत्रुमित्रायते येन ८1१२३ ३।१०२ शचीशक्रस्य चन्द्रस्य ३१५३ श२४ शरीरं सुदुराचारम् ७१३४ ११८ शरीरं सर्वथा सर्व- ११११८ १०११२० शान्तिनाथ जगद्वन्द्यम् १११० १०.६२ शारदेन्दुतिरस्कारि ५७६ ९।४६ शास्त्रस्य श्रवणं नित्यम् ५।६१ ३१८ शिक्षाव्रतानि चत्वारि २।२१ शीघ्र तत्पुरमागत्य १७९ ४१७ शीतलं शीतलं वन्दे १६ २१८० शील जीवदयामूलम् १०१५८ १११६६ शील दुर्गतिनाशन शुभकरम् ७।१४५ १११२२ शोलरत्नं परित्यज्य ११।२० १०।११८ शीलवत्या शरीरं मे ७१८३ १२।२० शुक्लध्यानं चतुर्भेदम् १०११४३ १२।१२ २०६१ ४१११ शुक्लध्यानस्य पूर्वेण १११५० ११९७ शुद्धचैतन्यसद्भावा १२।२५ १०।१२९ शुद्धस्फटिकसंकाशाम् २०४० ८1५८ शुभे लग्ने दिने रम्ये ४।११२ शुक्लध्यानप्रभावेण १३६ सुदर्शनचरितम् १२।४७ १२।४६ ३.६ ११३६ १११८३ ८1५० ५१३७ ५।८३ ८।१०५ ८।६२ ५४८७ शुभो भावो भवेत्पुण्यम् शूराशूरि तथान्योन्यम् शोभनं दर्शनं सर्व- शृगाल्यो दुस्वर चक्रुः शृणु चान्यद्वचो भद्र शृणु त्व देवि वक्ष्येऽहम् शृणु त्वं प्राणनाथान शृणु प्रभो मया चित्ते शृणु त्वं श्रेणिक व्यक्तम् श्रद्धानं भव्यजीवानाम् श्रावकाचारपूतात्मा श्रावकाचारपूतात्मा श्रावकाचारपूतात्मा श्रावकाणां तु चारित्रम् श्रावकाणा लघु. ल्यात श्रावकयुक्तितो दत्तम् श्रोगौतमगणीन्द्रेण श्रोजिनेन्द्रपदाम्भोज- श्रीजिनेन्द्रमताम्भोधि श्रीजिनेषु मतिस्तस्याः श्रीजिनोमहासप्त- श्रीमज्जिनेन्द्रचन्द्रोक्त श्रीमज्जिनेन्द्रचन्द्रोक्त- श्रीमज्जिनेन्द्रपादाब्ज- श्रीमज्जिनेन्द्रपादान्ज- श्रीमग्जिनेन्द्रसद्धर्म श्रीमत्पादप्रसादेन श्रीमता सारपुण्येन २१७५ श्रीमूलसड्धे वरभारतीये ७।१३२ श्रीसारदासारजिनेन्द्रवक्त्रात् ३।१०३ शृणु त्वं भी सुधी गजन् ७।२६ श्रुतेन येन सपत्तिः ४.९७ श्रुत्वा ते भव्यसंदोहा ६७६ श्रुत्वा भूपालनामा च ६।२८ श्रूयते च पुरा कुम्भ- ८.२० श्रेष्ठिन् संसारकान्तारे २।४ श्रेष्टिना तेन संपृष्ट. ९.७८ श्रेष्टिनस्ते पितु. सोऽपि ३.६७ श्रेष्ठिनी जिनमत्याख्या ४।६९ श्रेष्ठी वृपभदासाख्य. १०॥४२ २।११ ५।२६ श्रेष्ठी सागरदत्ताख्य. १०८१ श्रेष्ठी सहागतान् सर्वान् १२:४० श्रोत्रेन्द्रियं सरागादि ५.९४ [प] १।२६ ३१६४ · पटसुजीवदयावल्ली ७।३० पडावश्यकमित्यत्र १२॥२ पडावश्यकसत्कर्म ५७ षोडशप्रमितव्यक्त- ३१५७ [स] ११५९ ९/२१ संख्या परिग्रहेपच्च १०३ संघेन महता सार्द्धम् ५.८२ संजगाद मुने स्वामिन् श्रेष्ठी वृपभदासस्तु श्रेष्ठी वृपमदासस्तु ३।७३ ३३९५ ४/७ ६.२३ १०.९२ ८७१ १०११०३ ५७७ ८७७ २।१६ ५.९ ८१४० श्लोकानुक्रमणिका संजाता निर्मदा तत्र ७७२ सत्पुत्रफलसयुक्ता सतुष्टा प्रातरुत्थाय ३७१ सत्यं कुलस्त्रियो नित्यम् संतोषभावमाश्रित्य १०११०९ सत्यं जिनागमे जाते संध्याकाले समादाय ८.६७ सत्य पद्माकरे नित्यम् संपूर्णायां तिथी धीमान् ४।१०२ सत्य प्रसिद्धभूपाला सवन्धीनि च मेरुणाम् ९।६३ सत्य ये पापिनश्चापि संभवं भवनाशं च ११२ सत्यं ये भुवने भव्या संयतः सर्वदर्शीच १११५९ सत्यं श्रीमज्जिनेन्द्रोक्त- संयोग. शर्मदो नित्यम् ४।९६ सत्य स एव लोकेऽस्मिन् संलग्नौ तस्य द्वी कर्णी ४।१० सत्यं सन्त. प्रकुर्वन्ति संबर क्रियते नित्यम् ९.४२ सत्यं हितं मित वाक्यम् संवजन् शीलसंपन्न. ६।२ सदर्पचारुकन्दर्प- संसारदेहभोगेभ्य ११३८८ सद्वेदीपूर्णकुम्भाये. ससारसागरे जीवान् ९।८४ सद्ब्रह्मचारिणा घोर- संसारी च द्विधा जीवो २०५७ सदृष्टियों गुरोभक्तः संसारे भगुरं सर्वम् ९।२ सद्दानकल्पवल्लोव ससारे सरता नित्यम् ९।८६ सद्वस्त्राभरण पुण्यः सस्तुति च विधायैव २।३५ स धर्मों जिननाथोक्त संस्तुवे सन्मति वीरम् १११५ स पृष्टोऽपि यदा नैव सस्तुवेऽहं सदा सिद्धान् १११७ स पञ्चेन्द्रियजाति च संहननपट्कं चापि १२।८ स पापी कुरुते देव स एव नरशार्दूलो ४।८६ सप्ताङ्गराज्यसंपन्न स विहितो नैव ९।४७ सप्ताङ्गराज्यसंपन्न. ४।६४ सप्तपातालभूमीपु स जयतु जिनवीरो १११३१ सप्तपातालदु खोघ- स जयतु जिनदेवो देवदेवेन्द्रवन्धो ८।१३२ सप्त पुत्तलकान् शीघ्रम् स जयतु जिनदेवो ६११०८ सप्तव्यसनमध्ये च ८०१३० सप्तविंशत्यनागार- ३।४१ ११०९१ ११७७ १०११२६ ८1५२ १११८५ १०।१६ ७.१४४ ४७० १०१७ १०.५१ ४.४५ ४।१०७ ११६७० २।२७ ३।६६ १९५० ९८५ ४।७८ १२।१४ ८४९ 1 ३१४७ सखिभि संयुता पूताम् ५५८ ८७२ ७।५ ५१३३ ८1८३ सतीमतल्लिका नित्यम् सुदर्शनचरितम् ४१०६ सप्तश्वभ्रप्रदायोनि स प्रत्यक्षं त्वया दृष्ट स प्राह कपिलं मित्र स भव्यो ध्यानसच्छलात् समर्थो यक्षदेवोऽपि समन्ताद्यस्य पादाज- समन्तान्मुनिनाथस्य समातपचतुर्जाति- समानीय च तत्तल्पे सम्यग्दृष्टिगुणस्थाने सम्यक्त्वव्रतसंयुक्त- सरासि यत्र शोभन्ते सर्वशोकापहं देवम् सर्वेऽपि मुनयस्तद्वत् सर्व विद्याधरा देवाः सर्वेषभदासाद्य. सर्वोपसर्गजेता त्वम् सर्वदेवेन्द्रदेवो सर्वदेवेन्द्रनागेन्द्र- सर्वदा पोपित काय सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्त सर्वथा शरणं मेऽत्र सर्वलक्षणसम्पूर्णम् सर्वलक्षणसंपूर्ण. सर्वपा कर्मणा नाशे नर्वेषां मण्डनं तद्धि म व्याघ्रो व्याघ्रवत्क्रूरो २।१३ स श्रीकेवललोचनो जिनपतिः १२।४४ ८।१२५ स श्रेष्ठी याचकानांच ३२६२ ४१६५ सहस्राणि तथा सप्त ९७० ७७३ सहायं साधनोपायम् ३४९ ७११३० साकारोऽपि निराकारो २०५६ ३१४४ सा चोवाच महाधूर्ता ७८ ८९२ सामिकेषु वात्सल्यम् २।४५ १११५१ सापि द्विघात्रवः प्रोक्त ९.४० ७.६२ सापि सप्तदिनान्युच्च. १११४३ १११४६ साभून्मनारमा नाम्ना ४।४१ ९.४१ सारङ्ग्य सिंहशावांश्च १७५ ३।२२ सारधर्मविदा नित्यम् ५१५६ ११११० सारवस्त्रादिभिर्युक्तम् १०।४५ साररत्नसुवर्णादि ३१३४ ८/९८ सा सदा सुतरा पुष्प- ३२९२ ५।१८ सिंहिन्या तनयो भूत्वा ८१६१ ११४६९ सिंहासनं लसत्कान्ति १११६३ ९७१ सिद्धो बुद्धो निराबाधो ८१३५ १११९५ सुखी दुःखी कुरूपी च ६८१ ९१७ सुखे दुःखे गृहेऽरण्ये २।३७ ७.३१ सुदर्शनजिनस्योच्च १२।३८ ११।३३ सुदर्शनं नरेन्द्रस्य ५।८१ ५५ सुदर्शनोऽपि पूतात्मा ६१८७ ४॥६१ सुदर्शनं समभ्यर्य ७।१४३ २१७६ सुदर्शनं समालोक्य ४१८३ १०१५६ सुध्यानात्प्रकृती. क्षिप्त्वा १२।१३ ८१४८ सुमगत्वं मनुष्यायु- १२।१५ १०११३४ सुभगस्तं प्रणम्याशु ८1१०६ . स सवेगररो भूत्वा श्लोकानुक्रमणिका १३९ सुपाश्र्वं च सदानन्दम् सुराज्यं मान्यता नित्यम् सुरासुरनरादीनाम् सुरेन्द्रभवनस्यात्र सुस्वरं दु स्वरं चापि सूक्ष्मसापरायकेऽपि सूर्योदये घटीपट्कम् सूरिराशाघरो जीयात् सेनापतिस्तदा शीघ्रम् सेयं मूर्तिस्त्वया भग्ना सेवके मयि सत्यन सेवकर्वहुभिः सार्वम् सोद्विग्ना संजगी धात्री सोऽपि तत्पाणिपङ्कन सोऽपि धर्मो द्विधा प्रोक्तः सोऽपि स्वामी कृपासिन्धु सोऽप्यगात्स्वगृहं शीघ्रम् सोऽय स्वामी समादाय सोऽवोचन्निकटश्चास्ति सौधर्मादिपु कल्पेषु सौभाग्यं च सुरूपत्वम् स्वगुरो तितो नित्यम् स्वर्गो दुर्ग. सुरा भृत्या स्वर्गो मोक्ष क्रमेणापि स्वच्छतोयभृता खाता स्वच्छा जलाशया यत्र स्वचित्ते चिन्तयामास स्तम्भयामास तान् सर्वान् ११४ स्त्रियश्चापि विशेषेण ६७७ ५।२३ स्त्रीणा रागकथा कर्णे १०७४ ११११५ स्त्रीपुन्नपुंसकं च १०॥६३ ३८१ स्थानासनशुभैवविय. ४१९० १२।१० स्थितो यावत्सुखं तावत् ८.११४ १११५५ स्थिती तत्र स्वपुण्येन ५।९० १०११११ स्पर्शन चाष्टघा नित्य १०८७ ११३२ स्मराग्निज्वलिता गाढम् ६७१ ८1५३ स्वमन्दिर समागत्य ४।७३ ७.१४ स्वय कर्मक्षयार्थी च १११४ ८1५६ स्वयोग्यानि व्रतान्याशु ११।९३ १०.१५ स्वयोग्ययानमारूढ. ११८४ ७१८१ स्वयोपित्यपि निर्मोह. ६।८८ ४।११५ स्वर्णस्तम्मानसलग्न- ११९८ ९८७ स्वर्णप्राकारमुत्तुङ्गम् १।९४ ८.४१ स्वर्णरत्नविनिर्माणम् १११०१ ६१४३ स्वविमानं सुरै सेव्यम् ३७० १०॥३२ स्वेच्छया सर्वकार्याणि ७१९ ४।१०१ स्वशय्याया चकाराशु १११३२ ९.६९ स्व-स्वभावेन पूतात्मा १२।२ ६।६७ स्वहस्तौ कुड्मलीकृत्य १११७६ १०.४७ स्वामिसमन्तभद्राख्यो ११२३ ९।११ स्वामिस्ते गुणवाराशे १११७३ ५।२४ स्वाम्यमात्यसुहृत्कोष- ३१४८ ११५५ शुभा लक्ष्मी. १०११३२ ३२० स्वाध्यायं पञ्चधा नित्यम् १०११३० ८1८८ स्वेच्छया कार्यमाघातुम् ६७९ ७/१२३ स्वोदरे त्रिवली भङ्गम् ३।१० स्वाध्यायेन सुदर्शनचरितम् १४० ho ७.११३ ८1१२ ७/७७ हृदयं सदयं तस्य हृत्वाभूत्तत्क्षणे स्वामो हत्वता. समयेनाशु हा नाथ स्वप्नके चापि ४११५ हा मया मूढचित्तेन १११५८ हा मया सेवितो नैव १२।१६ हावभावादिक सर्वम् ५७१ हास्यं रत्यरती शोकम् ७.९१ हा हा नाथ त्वया चैतत् ८.६४ हितोपदेशको देव ६.६६ हिंसानृतोद्भवं स्तेय- ७१११० हिंसादिपञ्चकत्याग. ७१६६ १०॥६४ ७११०८ हन्ति दण्डी दुरात्मात्र हन्य. सामान्यचौरोऽत्र हरिर्वा कानने क्रीडन् हसित्वा कपिला प्रोक्त्वा हा नाथ केन दुष्टेन ११७१ १०११३९ ૨૬ MANIKACHANDRA D. J. GRANTHAMALA * The Serial Numbers marked with asterisk are out of print Laghiyastraya-ādi-sangrahaḥ : This vol. contains four small works 1) Laghi, astrayam of Akalanhadeva (c 7th century A. D.), a small Prakarana dealing with pramāna, naza and pradacana Akalanka is an eminent logician who deserves to be remembered along with Dharmabīrti and others His works are Here the very important for a student of Indian logic text is presented with the Si commentary of Abhayacandrasūri. 2) Svarūpa sambodhana attributed to Akalanka, a short yet brilliant exposition of alman in 25 verses 3-4) Laghu-Sarvajña-siddhik and Brhat-Sarvajñasiddhih of Anantahīrti These two texts discuss the Jajna doctrine of Sarvajñată Edited with some introductory notes in Sk on Akalaika, Abhayacandra and Anantakīrtı by PT, KALLAPPA BHARAUAPPA NITAVE, Bombay Samvata 1972, Crown pp 8-204, Price As 6!-. *2 Sāgāra-dharmāmptam of Āśadhara. Āsadhara is a voluminous writer of the 13th century A. D., with many Sanskrit works on different subjects to his credit This is the first part of his Dharmāmsta with his own commentary in Sk dealing with the duties of a layman PT, NATHURAM PREMI, adds an introductory note Āſādhara and his works. Ed by P1. MANOHARLAL, Bombay Samvat 1972, Crown pp 8 246, Price As 8/- ( 2 ) *3 Vikrantakauravam or Sulocanānāțakam of Hastimalla (AD 13th century): A Sanskrit drama in six acts. Ed. with an introductory note on Hastimalla and his works by PT. MANORARLAL, Bombay Samvat 1972, Crown pp. 4-164, Price As. 61-. *4 Pārsvarātha-caritam of Vădirājasūri Vádirāja was an eminent poet and logician of the 10th century A D This is a biography of the 23rd Tirthařkara in Sanskrit extending over 12 cantos Edited with an introductory note on Vādırāja and his works by Pr. MANOHARLAL, Bombay Saṁyat 1973, Crown pp. 18- 198, Price As 81- 35. Maithilikalyānam or Sitänātakam of Hastımalla : A Sk drama in 5 acts, see No 3 above Ed kvith an introductory note on Hastımalla and his works by PT MANOHARLAL, Bombay Samvat 1973, Crown PP 4-96, Price As 4!-. - 6. Aradhanására of Devasena A Prākrit work dealing with religio-didactic topics Prākrit text with The Sk commentary of Ratnakīrtideva, edited by PT. VAYOHARLAL, Bombay Samvat 1973, Crown pp 128, Price As. 4/6 7. Jinadattacaritam of Gunabhadra . A Sk. poem in 9 cantos dealing with the life of Jinadatta, edited by PT. MANOHALAL, Bombay samvat 1973, Crown Pp. 96, Price As. 5/-, 8. Pradyumnacarita of Mahasenācārya : A Sk. poem in 14 cantos dealing with the life of Pradyumna. It is composed in a dignified style Edited by . + ( 3 ) L 1 PTS. MANOHARLAL and RAMPRASAD, Bombay Samvat 1973, Crown pp. 230, Price As. 81- 9. Cáritrasăra of Cāmundarāya : It deals with the rules of conduct for a house-holder and a monk. Edited by PT. INDRALAL and UDAYALAL, Bombay Samvat 1974, Crown pp. 103, Price As 6/- *10. Pramāṇanirnaya of Vadırāja A manual of logic discussing specially the nature of Pramāpas. Edited by PTS INDRALAL and KAUBCHAND, Bombay Samvat 1974, Crown pp 80, Price A's 5/-. $11. Ācāra sāra of Viranandı A Sk. text dealing with Darśana, Jñāna etc Edited by PTS INDRALAL and MANOHARLAL, Bombay Samvat 1974, Crown pp 2-98, Price As 61- #12. Trilokasāra of Nemichandra · An important Prākrit text on Jaina cosmography published here with the Sk commentary of Madhavacandra. Pt. Premi has written a critical note on Nemicandra and Madhavacandra in the Introduction Edited with an index of Gāthās by PT. MANOHARLAL, Bombay Samvat 1975, Crown pp. 10-405-20, Price Rs 1/12)- *13 Tattvānuśāsana-ādi-samgrahaḥ : This vol contains the following works. 1) Tattvānušāsana of Nāgasena 2) Istopadeśa of Pujyapada with the Sk "commentary of Āſādhara. 3) Nittsāra of Indranandı 4) Mokşapaſicaśıka 5) Śrutāvatāra of Indranandi 6) Adhyatmatarangint of Somadeva 7) Brhat-paſcanamaskāra or Patrakesari-stotra of Pătrakesarī with a Sk commentary 8) Adhyatmaştaka of Vadirāja. 9) Doa- 1 ( 4 ) trimśrka of Amitagati 10) Vairügyamunimala of Sricandra. 11) Tatlvasāra (in Prākrit) of Devasena. 12) Śrutaskandha (in Prakriti of Brahma Hemacandra 13) Dhädasi-gåtha in Prakrit with Sk. chāyā 14) Jianosära of Padmasimha, Prakrit text and Sk, chāya. PT PREMI has added short critical notes on these authors and their works Edited by PT, MANOHARLAL, Bombay Samvat 1975, Crown pp 4-176, Price As, 14/-- *14. Anagara-dharmāmſta of Ašādhara : Second part of the Dharmāņrta dealing with the rules about the life of a monk Text and author's own commentary. Edited with verse and quotation Indices by Prs BANSI- DHAR and MANOHARLAL, Bombay Samvat 1976, Crown pp. 692-35, Price Rs. 3/8)-. *15 Yoktyanuśāsana of Samantabhadra A logical Stotra which has weilded great influence on later authors like Siddhasena, Hemacandra etc Text published with an equally important commentary of Vidyānanda There is an introductory note on Vidyananda by PI, PREMI. Ed by Prs by PSS INDRALAL and SHRILAL, Bombay Samvat 1977, Crown pp 6-182, Price As. 13). *16 Nayacakra-ādi-samgraha This vol tains the following texts 1) Laghu-Nayncakra of Devasena, Prakrit text with Sk chāyā 2) Nayacakra of Devasena, Prakrit text and Sk chāyā 3) Ālāpapaddhati of Devasena There is an introductory note in Hindi on Devasena and his Nayacakra by PT PREMI Edited by PT BANSIDHARA with Indices, Bombay Samvat 1977, Crown.pp. 42-148, Price As 15)- con- (5) Śrutasagara *17. Şaţprābhrtādi-samgraha : This vol. contains the following Prakrit works of Kundakunda of venerable authority and antiquity. 1) Darśana-pràbh[la, 2) Caritra-prabhrla, 3) Stilra-prābhyta, 4) Bodha-prabhrla, 5) Bhūna-prabhſła, 6) Mokşa-prabhsta, 7) Linga-prabhfla, 8) Šíla-prabhſia, 9) Rayanasāra and 10) Dvadašīnuprekşa. The first six are published with the Sk, coinmentary of Śrutasāgara and the last four with the Sk. chāyā only. There is an introduction in Hindi by Pr. PREMI who adds some critical information about Kundakunda, and their works Edited with an Index of verses etc by PT. PANNALAL SONI, Bombay Samvat 1977, Crown pp 12-442-32, Price Rs 3). #18 Prāgaścittadi-samgraha : The following texts are included in this volume 1) Chedapında of Indranandı Yogīndra, Prakrit text and Sk chāyā 2) Chedaśästra or Chedunacati, Prakrit text and Sk. chāyā and notes 3) Prðyaścıtta-cülika of Gurudāsa, Sk text with the commentary of Nandıguru. 4) Prāyaścittagrantha in Sk. verses by Bhattakalavka. There is a critical introductory note in Hindi by PT. PREMI. Edited by PT. PANNALAL SONI, Bombay Samvat 1978, Crown Pp 16-172-12, Price Rs. 1/2/- #19. Mülācāra of Vaţtakera, part I. An ancient Prakrit text in Jaina Śaurasent, Published with Sk. chāya and Vasunandi's Sk commentary A highly valuable text for students of Prakrit and ancient Indian monastic life Edited by Prs PANNALAL, GAJADH424- LAL and SHRILAL, Bombay Samvat 1977, Crown pp.516, Price Rs: 2/4/-. 1 (6) Sk chāyā 20 Bhāvasamgraba-adih: This vol contains the following works 1) Bhūtasangraha of Devasena, Prakrit text and Sk chāyā 2) Bhavasamgraha in Sk. verse of Vāmadeva Pandita. 3) Bhāva-tribhongī or Bhāvasamgraha of Śrutamuni, Prākrit text and Sh. chāyā. 4) Asravatribhngi of Śrutamuni, Prākrit text and There is a Hindi Introduction with critical remarks on these texts by PT PREMI. Edited with an Index of verses by PT PANNALAL SONI, Bombay Samvat 1978, Crown pp 8-284-28, Price Rs. 2/4/- 21. Siddhantasāra-adi-Samgraba : This vol contains some twentyfive texts 1) Siddhantasära of Jinacandra, Prakrit text, Sk chāyā and the commentary of Jñānabhūsaņa. 2) Yogasăra of Yogicandra, Apabhramſa text with Sk. chāyā. 3) Kallanāloyanā of Ajitabrahma, Prakrit text with Sh. chãy.. 41 Amștāśiti of Yogindradeva, a didactic work in Sanskrit 5) Rainamāla of Sivakoți 6) Šāstrasāsasamuccaya of Māghanandi, a Sūtra work divided in four lessons Achatpravacanom of Prabhācandra, a Sūtra work in five lessons 8) Aptasvarūpom, a discourse on the nature of divinity. 9) Jiiānalocanasiotra of Vadirāja (Pomarājasuta) 10) Samavasaranastotra of Vispusena 11) Sarvajíſastavana of Jayānandasûri 12) Pārsvanāthasamasya-stotra 13) Gilrabandhastotra 13) Gurabandhastotra of Guņabhadra 14) Maharşı-stotra (of Āſādhara). 15) Parsoanăthastotra or Laksmistotra with St commentary. 16) Neminatha stotra in which are used only two letters viz n & m -17) of Bhānukirti 18) Nyatmaştaka of Yogīndradeva in Prakrit. 19). Talivabhavana Šankhadevāştaka (7) or Sāmāyika-pātha of Amitagati 20) Dharmarasäjara of Padmanandı Prākrit text and Sk and Sk chāya chāyā- 21) Sarasamuccaya of Kulabhadra. 22) Amgapannaltı of Subhacandra- Prakrit text and Sk chāyā 23) Śrutădalära of Vibudha Sridhara Śalākānıksepananiskāsana-vidaranam 25) Kalyanamala of Aladhara Pr PREMI has added critical notes in the Introduction some of these authors Edited by PT. PANNALAL SONI Bombay Samvat 1979 Crown pp. 32-324, Price 24) on Rs 1/81- *22 Nitivākyāmptam of Somadeva · An important text on Indian Polity, next only to Kautilya-Arthaśăstra. The Sūtras are published here along with a Sanskrit commentary There is a critical Introduction by PREMI comparing this work with Arthaſastra. Edited by PT. PANNALAL SONI, Bombay Samvat 1979, Crown Pp 34-426, Price Rs 1/12/- *23. Mulācāra of Vațţakera, part II : Prākrit text, Sk cbaya and the commentary of Vasunandi, see No 19 above Bombay Samvat 1980, Crown pp. 332, Price Rs 1/8/- 1 24, Ratnakarandaka-śrāvakācāra of Samantabhadra With the Sanskrit commentary of Prabhācandra, There is an exhaustive Hindi Introduction by PT. JUGAL KISHORE MUKTHAR, extending over more than pp. 300, dealing with the various topics about Samantabhadra and his tyorks Bombay Samvat 1982, Crown pp. 2-84- 252-114, Price Rs 21- ( 8 ) 25. Pañcasamgrahaḥ of Amitagati : A good compendium in Sanskrit of the contents of Gummalasüra. Edited with a note on the author and his works by PT. DARBARILAL Bombay 1927, Crown pp. 8-240, Price As. 13/-, 26. Lāțisamhitā of Rājamalla : It deals with the duties of a layman and its author was a contemporary of Akbar to whom references are found in his compositions. There is an exhaustive Introduction in Hindi by PT. JUGALKISHORE Edited by PT. DARBARILAL, Bombay Samvat 1948, Crown pp. 24-136, Price As 8/-. 27. Parudeyacampū of Arhaddása A Campū work in Sanskrit written in a high-flown style Edited with notes by Pr JINADASA, Bombay Samvat 1985, Crown pp. 4-206, Price As 12 - 28. Jaina-Silalekha-samgraha : a handy volume living the Devanagarī version of Epigraphia Carnatica II (Revised ed.) with Introduction, Indices etc by PROF. HIRALAL JAIN, Bombay 1928, Crown pp. 16-164-428-40, Price Rs. 2/8- It 15 29-30-31. Padmacarita of Ravisena · This is the Jaina recension of Rāma's story and as such indispensable to the students of Indian epic literature. It was finished in A. D. 676, and it has close similarities with Paumcariu of Vimala (beginning of the Christian era). Edited by PT. DARBARILAL, Bombay Samvat' 1985, vol, i, pp 8-512 : vol is, pp 8-436'; vol. iji, pp. 8-446, Thus PP about 1400 in all, Price Rs 4/8/-.

(9) 32-33. Harivamsa-parāņa of Jinasena I: This is the Jaina recension of the Krsna legend These two volumes are very useful to those interested in Indian epics It was composed in A D. 783 by Jinasena of the Punnața-sangha There is a 'Hindi Introduction by PT PREMIJI. Edited by Pr DARBARILAL, Bombay 1930, vol i and i1, pp. 48-12-806, Price Rs 3/8/- - 34. Nitivākyāmộtam, a supplement to No 22 above. This gives the missing portion of the Sanskrit commentary, Bombay Samvat 1989, Crown pp. 4-76, Price As 41 ܫܚ 35. Jambūsvāmi-caritam and Adhyātma-kamalamärtanda of Rājamalla See No 26 above. Edited with an Introduction in Hindi by Pr.JAGADISHCHANDRA, M. A, Bombay Samvat 1993, Crown Pp 18-264-4, Price Rs 1/8/. 36 Trişasți-smộti-śāstra of Āſādhara : Sanskrit text and Marathi rendering Edited by PT. MOTILAL HIRACHANDA, Bombay 1937, Crown pp 2-8-166, Price As 8/- 37. Mahāparāņa of Puspadanta, Vol. I Ādiparāņa (Samdhıs 1-37). A Jaina Epic in Apabhraṁsa of the 10th century AD. Apabhramsa Text, Variants, explanatory Notes of Prabhăcandra A model edition of an Apabhramſa text, Critically edited with an Introduction and Notes in English by DR, P. L VAIDYA, M.-A., D Litt, Bombay 1937, Royal 8vo pp. 42-672, Price Rs. 101-. 7 ( 10 ) 37 (a). Rāmāyana portion separately issued, Price Rs. 2.50. 38 Nyāyakumudacandra of Prabhācandra Vol. I: This is an important Nyāya work, being an exhaustive commentary on Akalanka's Laghigastrajam with Vivrti (see No I above). The text of the commentary is very ably edited with critical and comparative foot-notes by PT. MAHENDRAKUMARA There is a learned Hindi Introduction exhaustively dealing with Akalanka, Prabhācandra, their dates and works etc written by Pt. KAILASCHANDRA. A model edition of a Nyāya text, Bombay 1938, Roval 8 vo pp 20-126-38-402-6, Price Rs 8). 39. Nyāyakumudacandra of Prabhācandra, Vol. II. See No 38 above. Edited by PT. MAHENDRAKUMAR SHASTRI who has added an Introduction Hindi dealing with the contents of the work and giving some details about the author. There is a Table of contents and twelve Appendices giving useful Indices Bombay 1941. Royal 8vo pp 20+94 +403-930, Price Rs. 8/8/- 40 Varāngacaritam of Jața-Sınıhanandı : A rare Sanskrit Kavya brought to light and edited with an exhaustive critical Introduction and Notes in English by PROF. A N. UPADHYE, M, A., Bombay 1938, Crown pp. 16+56+392, Price Rs. 3/-. 41. Mahāpurāņa of Puspadanta, Vol. II (Samdhis 38-80) · See No 37 above. The Apabhramsa Text critically edited to the variant Readings and Glosses, along with an Introduction and five Appendices by ( 11 ) Dr. P.L. VAIDYA, MA.,D.Litt, Bombay 1940 Royal Svo pp. 24+570 Price Rs 10/- 42. Mabāpurāņa of Puspadanta, Vol III (Samdhis 81-102) · See No 37 and 40 above. The Apabhrambas Text critically edited with variant Readings and Glosses by Dr PL VAIDYA, MA., D Litt. The Introduction covers a biography of Puspadanta, discussing all about his date, works, patrons and metropolis (Manyakheța) PT PREMI'S essay Mahakavi. Puspadanta' in Hindi is included here Bombay 1941. Royal 8vo pp 32+28+314. Price Rs 6/- 42(a) Harivamsa portion is separately issued Price Rs 250 43 , Ajanāpavanamjaya-nātakam and Subhadrānātikā of Hastımalla Tuo Sanskrit Dramas of Hastımalla (see also No 3 above) Critically edited by PROF M. V PATW ARDHAN The Introduction in English is a well documented essay on Hastimalla and his four plays which are fully studied There is an Index of stanzas from all the four plays. Bombay 1950. Crown PP 8+-68 +120+128. Price Rs 31- 44 Syādyādasiddhi of Vadībhasimha Edited by PT DARBARILAL with Introductions etc in Hindi-shed. ding good deal of light on the, author and contents of the work Bombay 1950 Crown pp. 26+32+34+80 Price Rs 1-50 45 Jaina Śilālekha-sangraha. Part II (see. No 28 above) The texts of 302- Inscriptions (following, A. Guerinot's order) are given in Devanā garī with summary' ( 12 ) in Hindī. There is an Index of Proper Names at the end. Compiled by PT, VIJAYAMURTI, M.A. Bombay 1952. Crown pp 4+520. Price Rs 8/- 46 Jaina śilālekha-sangraha, Part III (see Nos 28 & 45 above) : The texts of 303-846 inscriptions (following Guérinot's list) is given in Devanāgarī with summary in Hindi compiled by PT. VIJAYAMURTI, M.A There is an Index of Proper Names at the end The Introduction by SHRI G C CHAUDHARI is an exhaustive study of inscriptions. Bombay 1957. Crown pp. 8+178+592 +42. Price Rs 10/- 47. Pramāpapramcyakalikā of Narendrasena (A.D. 18th century) A Nyāya text dealing with Pramāpa and Prameya The Sanskrit test critically edited by Pt DARBARILAL The Hındı Introduction deals with the author and a number of topics connected with the -contents of this work, Bharatiya Jñānapītha Kashi, Varanası 1961. Price Rs. 1 50. 48 Jaina śilalekha-sangraha, Part IV (see Nos, 28, 45 & 46 above) This vol contains some 654 inscriptions along with 324 Pratima-lekhas of Nagpur in Appendix. Compiled by DR. VIDYADHAR JOHARA- PURKAR with an exhaustive study of the inscriptions in -the introduction and Indexes in the end Varanası Vira Nirvana Samvat-2491, Crown pp 10+34+506, Price Rs. 7/- 49 Ārādhanāsamuccayo-Yogasāra · Sangrah- -asca : This vol. contains two small sanskrit texts- 1) Aradhana samuccaya of Sri Ravicandra Munindra + ( 13 ) and 2) Yogasărasainuccaya of Sri Gurudas. Edited with indexes of verses and introductions by Dr. A. N. UPADHYL, Varanası 1967, crown pp 8+58. Price Re 1/. 50. śrgārārņavacandrikā of Vijayavarni A hitherto unpublished work on Sanskrit poetics Critically edited by Dr VM Kulkarni with Introduction, detailed table of contents and six valuable Appen dexes. Varanasi 1969, crown pp 12+66+176, Price Rs. 3/-. For copies please write 10- BHARATIYA JNANAPĪTHA 3620/21 Netaji Subhash Marg, Delhı-6 (India)

Sudarshancharitam

Author
Dr.hiralal Jain
Title
Sudarshancharitam
File name
Sudarshancharitam
Text
OCR done
Citation
1970
Published
2010/08
Publisher
Delhi, Bhartiya Gyanpith
Language
Sanskrit
Pages
176
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
325866
Barcode
99999990002349.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
6R0WETdc8u7
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