Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Sangitaraghunandanam
Front matter
राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
राजस्थान - राज्य द्वारा प्रकाशित
सामान्यतः अखिल भारतीय तथा विशेषत. राजस्थान-प्रदेशीय पुरातनकालीन
सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश, हिन्दी, राजस्थानी आदि भाषा-निवद्ध
विविधवाडमयप्रकाशिनी विशिष्ट ग्रन्थावली
प्रधान सम्पादक
दशरथ शर्मा, एम ए , डी.लिट.
निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
-
ग्रन्थाङ्क ११६
श्रीविश्वनाथदेवप्रणीतम्
सङ्गीतरघुनन्दनम्
[व्यङ्गयार्थचन्द्रिकाख्यया स्वोपशव्याख्यया सवलितम]
प्रकाशक
राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर (राज.)
१६७४ ई०
।
प्रधानसम्पादकीय वक्तव्य ११६ वें 'सङ्गीतरघुनन्दनम्' को "राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला" के पुष्प के रूप मे प्रस्तुत करते हुए हमे अत्यन्त प्रसन्नता है। उससे पूर्व महाराजा श्रीविश्वनाथसिंह ने भगवद्भक्ति से ओतप्रोत अनेक ग्रन्थ सहृदय जनता के सम्मुख प्रस्तुत किये थे। किन्तु, देववाणी-प्रेमी जनता की मांग थी कि महाराजा संस्कृत में भी अपनी कृति और विचारों को उसके समुख रखें । महाराजा से अब तक अनेक उत्तम ग्रन्थों की भेंट देवी सरस्वती को मिल चुकी थी। अब प्रावश्यकता थी एक उत्तमोत्तम काव्य की-ऐसे काव्य की जिसे वे भगवत्कृति तक मान सकें और उसे प्रस्तुत करते समय अपने आपको केवल साधनमात्र समझें। काव्य की सहचरी 'व्यङ्गयार्थचन्द्रिका" नाम की टीका को रचना भी स्वय महाराजा विश्वनाथ ने की है। ग्रन्थ के अर्थ-गौरव को समझने के लिए यह विशेष रूप से पठनीय है। दशरथ शर्मा निदेशक राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर। वसत पञ्चमी, संवत् २०३० ।
- বিলাল - --- पत्राणि १-१२ १३-२७ २८ १.२४ २५-३० ३०.४० ४१-४८ ४६-५६ ५७-६२ विषय १ प्रास्ताविक २. सर्गात्मक समालोचना ... ... ३. कुछ और शब्द ... ... ४ मङ्गलाचरण नाम प्रथम सर्ग. ... ५ रासक्रीडासमारम्भो नाम द्वितीय सर्गः .... ६ वसन्तरासवर्णन नाम तृतीय सर्ग ७ जानक्यन्त नवर्णन नाम चतुर्थः सर्ग -- ८ कामवासन्तिकागमन नाम पञ्चम. सर्गः .... ६. चारुशीलाकृतमनुनयनवर्णन नाम षष्ठ• सर्गः १० जानकीसमागमो नाम सप्तम सर्गः ११ जानकीभूषणविधान नामाऽष्टम सर्ग. १२ दोलावर्णनं नाम नवम सर्ग. १३ जानक्या सर्वाङ्गशोभावर्णन नाम दशम सर्ग १४ जानकीरघुनन्दनयोर्गीतनृत्यवर्णन नामैकादश सर्गः १५ विरहवर्णन नाम द्वादश सर्गः -- १६ प्रादुर्भूत रघुनन्दनकर्तृ कसरयूवर्णन नाम त्रयोदशः सर्गः १७ सरयूतट्टिहारवर्णन नाम चतुर्दश. सर्ग १८ सखीस्थितिनामसख्यावर्णन नाम पञ्चदशः सर्ग १६. ग्रन्थमाहात्म्यवर्णनपूर्वकप्रणामादिविधान नाम पोडा सर्गः २० परिशिष्ट १ २१ परिशिष्ट २ २२ गुद्धिपत्र ६३-६७ ६८-७३ ७४-८२ ८२-६५ १६-१०३ १०३-१११ १११.११७ ११७.११६ १२०-१२३ १२४-१२७ १२८-१३१ १३१ १३२ ... .. ... ... - प्रास्ताविक भारत मे काव्यधारा अनेक रूप में प्रवाहित हुई है। उसने अनेक रसो का माश्रय लिया है और अपनी अनेकरूपा अभिव्यक्ति से उसे समृद्ध किया है । ऐसा कोई रस नही, कोई ऐसी भाषा नही, जिसमे भारतीय कवि की प्रतिभा न स्फुरित हुई हो; और न कोई ऐसा समुदाय ही है जो भारती के इस प्रसाद से वचित रहा हो । राजा और रक, ब्राह्मण और शूद्र, स्त्री और पुरुष, बालक और वृद्ध सभी पर इसकी कृपा हुई है। हाँ, यह अवश्य है कि देश, काल और प्राश्रय के भेद से यह कृपा विभिन्न रूप धारण करती रही है । मध्यकाल मे जब हिन्दू-मुस्लिम- सघर्ष जोरो पर था, इसने चन्द्र वरदाई, श्रीधर और पद्मनाभ के काव्य को ओजस्विता प्रदान की। मलिक मुहम्मद जायसी के हाथो यह सूफी रग से रजित हुई । अकबर बादशाह के शान्ति और समृद्धि के युग मे यही भक्ति- प्रवणा हुई । भगवान् मे अनुराग भक्ति का मुख्य लक्षण है. और भगवत्सान्निद्धय ही भक्त का परम पुरुपार्थ । उसे मोक्ष की भी कोई लालसा नही। किन्तु भक्त भगवान् को एक ही रूप मे नही देखते। कोई उसे सखा, तो कोई उसे स्वामी, कोई उसे बालक, तो कोई उसका प्रेमी के रूप मे दर्शन करता है। इसी दृष्टि- वैविध्य के कारण भक्तिभाव मे भी विविधता हुई है । सूरदास, तुलसीदास और मीराँ तीनो ही भगवद्भक्त थे। सूरदास और मीराँ ने भगवान् को कृष्ण के रूप मे देखा; तुलसीदास ने राम को परब्रह्म मानते हुए उनकी भक्ति की। किन्तु यह ध्यान रहे कि तुलसीदास ने राम के जिस रूप की अभिव्यक्ति को, वह परम्परा के अनुकूल थी. वह कोई नयी वस्तु नही । हजारो वर्ष पूर्व आदि कवि वाल्मीकि के सामने देवर्षि नारद ने उसे विवृत किया था।' यही रामायणीय परम्परा प्राचीन रामकाव्यो और नाटको मे रक्षित है, चाहे लेखक कालिदास हो या परतर कोई अन्य कवि । योगवासिष्ठ और अध्यात्म- रामायण मे भी राम का उदात्त स्वरूप प्रदर्शित है और यह उदात्त स्वरूप उस कोटि तक पहुँचता है जिसमे भक्त राम को केवल पुरुषोत्तम के रूप में ही नहीं, भगवान् के रूप मे देखता है। १. देखें परिशिष्ट-।
गलीतरपुनन्दनम् २ ] 222222228Berar-e80112/ eMENTERPREPPERT कृष्णपरक भक्तिधारा प्रारम्भ से ही राम-धाग मे भिन्न यो। श्रीमद्भागवत के कृष्ण गोपीयलम, केशि-कम-निपूदन एवं युवाप्रणयी हैं। गोपियो को जीव का प्रतीक मान कर कृष्णलीला को समझना सम्भव है, परन्तु प्राकत पुरुप अधिकतर ऐसा नहीं करते; और जो म्बयं उस तथ्य से ज्ञाता है, उन्हें इस तत्व को समझाने की अावश्यकता ही क्या है ? उस प्रष्ट भत्ति मे प्रभावित गौरांग महाप्रभु चैतन्य अपने पुत्र को सर्वया भूलकर कह उठते हैं "प्रादिलप्य वा पादरता पिनप्टु मा- मदर्शनात् ममहता करोतु वा । यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु म एव नाऽपरः ।। ब्रह्मवैवर्तपुराण में शृगारिता अपने उत्कर्पविन्दु पर पहुँची है । उसकी रासक्रीडा में राधा और सुशीलादि तैतीस सखियां सम्मिलित हुई थी । मुशीला और चन्द्रमुखी के साथ सोलह-सोलह हजार; कदम्बमाला और माधवी के साथ तेरह और ग्यारह; यमुना और कुन्ती के साथ चौदह और दया जाह्नवी और पद्ममुखी के साथ नौ-नौ; सावित्री और पारिजाता के साथ पन्द्रह और दश; सुधामुखी और स्वयप्रभा के साथ चौदह और सात हजार; सर्वमगला के साथ सोलह और गौरीपना के साथ चौदहा कलिका और कमला के साथ सोलह और तेरहा दुर्गा और सरस्वती के साथ सोलह और तेरह; भारती भोर अर्पणा के साथ दश और चौदहः रति और गगा के साथ दश और चौदह; अम्बिका और सती के साथ सोलह और तेरहा नन्दिनी और सुन्दरी के पीछे चौदह और तेरहा कृष्णप्रिया और सुन्दरी के साथ सोलह-सोलहा और चम्पा एव चन्दना के पीछे तेरह और सोलह हजार गोपियाँ आई (श्रीकृष्ण-जन्मखण्ड, अध्याय २८) । इसके वाद का वर्णन अत्यन्त शृगारपूर्ण है। सम्भव है कि ऐसे ही वर्णनो के आधार पर मध्यकालीन मन्दिरो की भित्तियो पर उत्कीर्ण अश्लील मूर्तियां बनी हो । रीतिकाल मे तो नख-शिख और शृ गारवर्णन की मानो बाढ ही प्रा गई। फिर रामकाव्य उससे किस तरह अछूता रहता ? तुलसी-काल में रचित भी अनेक ऐसे छोटे-मोटे ग्रन्थ हैं जिनमे इस नवीन धारा की छाप स्पष्ट रूप से वर्तमान है । उनके बाद के ग्रन्थो का तो कहना ही क्या है । इनकी संख्या तो इतनी अधिक है कि कुछ विद्वानों का मत है कि तुलसी अपने समकालीन भक्ति के क्षेत्र में शृगारी रामभक्ति के एक अपवाद से प्रतीत 1 प्रस्ताविका Erare-මහ-a-arrele-erarre-පිටස,විජErearrears, होते हैं । यदि इन ग्रन्थों का हमें विशेष ज्ञान नही है, तो इसका यही कारण हो सकता है कि इन सिद्धान्तो को गोपनीय रखा जाता था और प्राचार्यगण केवल योग्य एव अधिकारी साधकों को ही इनका उपदेश देते थे । इसलिए यह साहित्य विपुल राशि मे होता हुआ भी प्रकाशन के अभाव मे जनसामान्य के समक्ष न आ सका । साम्प्रदायिक रामसाहित्य मे यह माधुर्य-भक्ति की धारा पाँच नामो से अभिहित है-जानकीसम्प्रदाय, रहस्यसम्प्रदाय, रसिकसम्प्रदाय, जानकीव- ल्लभसम्प्रदाय और सियारामसम्प्रदाय । इनमे 'रसिकसम्प्रदाय' नाम का प्रचलन ही सर्वाधिक हुआ । इसका कारण यह दिया जाता है कि इस धारा के प्रवर्तक अग्रदास को इस धारा के अनुयायियों ने रसिक-नाम से ही अभिहित किया है । कृष्णभक्ति मे प्राय. शृ गारी भक्तो को ही रसिक कहा गया है, किन्तु रामभक्ति मे अन्य प्रकार के भक्तो के लिए भी रसिक-शब्द प्रयुक्त होता है। प्राचार्य बाल अली ने वात्सल्य, दास्य, सख्य और शृगारी भाव से सीताराम की उपासना करने वालो को रसिक माना है और इन भक्तो में भी सखीभाव से भगवान् की उपासना करने वालो को सबसे ऊँचा स्थान दिया है। फिर भी अपने भावसम्बन्ध के अनुसार ये एक दूसरे से परमस्नेहयुक्त व्यवहार करते थे। सखाभावना वाले सन्त रामसखे की तो स्पष्ट घोषणा थी कि सीता और राम के विवाह से निमिवशी सब उनके साले थे । रसिकसाधना के प्रवर्तन का श्रेय ध्यानमञ्जरी ग्रादि ग्रन्थो के रचयिता स्वामी अग्रदास को है। हिन्दीसाहित्य मे भक्तिमार्ग के प्रथम लेखक नाभादास इन्ही के शिष्य थे । अपनी माधुर्यभक्ति के ही कारण ये नाभा अली के नाम से भी प्रसिद्ध हैं । नाभाजी ने सीता-राम की चारुशीला और चन्द्रकला नाम की दो सखियो को मुख्य स्थान दिया है । आगे जाकर इन्ही के नाम से रसिक-सम्प्रदाय की दो मुख्य शाखाएं स्थापित हुईं। अकबर और जहांगीर के समय भक्ति-सम्प्रदाय की रसिकधारा फलती-फूलती रही, किन्तु शाहजहाँ के समय से हिन्दुओ पर अत्याचार होने लगे और औरगजेब जब गद्दी पर बैठा, तो हिन्दुप्रो की दशा और भी खराब हो गई । अयोध्या पर तो इनकी कठोर दृष्टि विशेष रूप से थी । इसके अतिरिक्त साम्प्रदायिक सघर्ष का भी रामभक्तो को सामना करता पडा ।
४] सङ्गीतरघुनन्दनम् Peeeeeeerererevererrerererrerareerendraprerarer मुगल-साम्राज्य के पतन के बाद हिन्दू किसी अंश तक जागृत हुए । दिल्ली के परवर्ती मुगल-शासकों और अवध के नवाबो का उनसे व्यवहार अच्छा था । मन्दिरो का जीर्णोद्धार और निर्माण हुआ और अन्बाटो की स्थापना हुई । उन्नीसवी शताब्दी में रसिक-प्राचार्य रामचरणदास जी के नेतृत्व मे रसिकसम्प्रदाय का अत्यधिक प्रसार हुमा । पूर्वाचार्यों के समान इन्होने भी कहा:- "सखि सखा अरु दास जो, भाव विना नहिं होई ! तीनो को अधिकार यह, भाव भावमय सोई ॥" कृष्णभक्ति का भी रामभक्ति पर प्रभाव इस समय विशेष रूप से द्रष्टव्य है । इसी को ध्यान में रखते हुए डॉ. भगवतीप्रसादसिंह ने लिखा है- "दोनों माधुर्यप्रधान सम्प्रदायो मे सखाप्रो और सखियो के भेद, यूथेश्वरियो को कल्पना एव युगल-विलासलीलाप्रो के वर्णनो में प्राप्त एकरूपता से इसका समर्थन होता है । सखीभाव के उपासक सन्तो ने अपने आचार्यों को 'युगल सरकार' एव उन षोडश मुख्य सखियो का अवतार माना है, जो सीताजी की बाल सखियां और महाराज जनक तथा उनके भाइयो की पुत्रियां थी । वे अपने आत्म- स्वरूप को यूथेश्वरियो की बहिनो अथवा निमिवशी कुमारियो से अभिन्न मानते हैं और सीताजी के साथ ही स्वय को राम की परिणीता समझते हैं, किन्तु स्वामी से उनका सम्बन्ध सीधा न होकर सीताजी के माध्यम से होता है, कारण कि उनका सीता अलग कोई स्वतन्त्र अस्तित्व ही नही है । दार्शनिक दृष्टि से वे सीताजी की अशभूता तथा अगभूता हैं अत एव जार, परकीया तथा सपत्नीभाव की कल्पना रामभक्ति की इस रागात्मिका धारा में न हो सकी ।" - महाराजा विश्वनाथसिंह इसी भक्ति-धारा के प्रमुख व्यक्तियो मे महाराजा विश्वनाथसिंह की भी गणना की जा सकती है । महाराजा विश्वनाथसिंह रामभक्ति की इस रसिक- धारा के सहायकमात्र ही नहीं थे, प्रत्युत इनको विधिपूर्वक दीक्षित साधकता के भी प्रमाण मिलते हैं । रसिकभक्ति का प्रकार एक नहीं है, अपि तु विभिन्न उपासको ने इस धारा की विविध विधामो का प्राश्रय लिया है-यह रसिक- साहित्यपरम्परा के अवेक्षण से स्पष्ट प्रतीत होता है । अतः रसिकभक्ति के 4 प्रस्ताविका ५ ] සිරසිසිස,සිසි,සිසි,සිසිසිසි,දිවුලපි-ප-ස.වි'පියවි,සිසි,සිසිලි දිකළ प्राचार्यों की जीवन गाथा के साथ उनकी भक्तिविधा भी विशिष्ट महत्त्व रखती है । वस्तुतः रसिक कवि स्वसम्मत भक्तिविधा से प्रेरित होकर तदनुकूल भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए काव्य को माध्यम बनाता है। किसी भी व्यक्ति की कृति- विशेष वह स्वच्छ आदर्श है जिसमे उसके व्यक्तित्व की प्रतिकृति स्पष्ट रूप में प्रतिबि- म्बित होती है । अतः महाराजा विश्वनाथसिंह का जीवनपरिचय प्रस्तुत करते समय उनकी वैयक्तिक भक्तिविधा का अनुसन्धान हमारे लिए आवश्यक हो जाता है । इनके विषय में कहा जाता है कि वे श्रीसीताराम की अष्टयाम-भावना सखी- रूप मे किया करते थे। मानव को प्रत्येक क्षेत्र मे प्रारम्भिक प्रवेश करते समय गुरु की आवश्यकता रहती है। कुछ जन्मजात प्रतिभाओ के विषय मे यह अपवाद भी हो सकता है. परन्तु गुरु का जीवन मे अपरिहार्य महत्त्व होता है । महाराजा विश्वनाथसिंह को भी शृगारी साधना के रहस्यों का सम्यक् ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु की आवश्यकता हुई और तदनुसार उन्होने महात्मा प्रियादास से 'षडक्षर राममत्र' का उपदेश ग्रहण किया था। इनके पुत्र महाराजा रघुराजसिंह ने इनकी सखीभावना से युक्त भक्ति एव षडक्षर राममन्त्र की प्राप्ति के विषय मे रामरसिकावली मे कहा है- करे भावना ध्यानहिं माँही । सखीरूप सियरामहि काही। एक समय विशनाथ को, स्वप्ने शकर प्राय । राम षडक्षर मन्त्र को, तेहि एकान्त ले जाय ॥ . - 3 विश्वनाथसिंह ने प्रारम्भ मे रसिकभक्ति की सखीरूप विधा को अपनाया, परन्तु यह अनुश्रुति है कि एक बार वे चित्रकूट के नित्यरास मे सखीरूप में सम्मिलित हुए थे और इसके बाद वे जीवनपर्यन्त स्वयं को दिव्यदम्पती का पार्षद मानकर उनकी उपासना मे तल्लीन हो गये। जैसा कि- आयो पुनि रीवा नगर, राम रंग महँ छाकि । पार्षद वपु मानत निजै, प्रभु उस समय से कवि की रासलीला मे बहुत श्रद्धा हो गई और वे राम' का सर्वत्र 'रासबिहारी' के रूप में दर्शन करने लगे। प्रस्तुत ग्रन्थ 'सगीतरघुनन्दन' मैं हमे सर्वत्र रसिक राम के रसमय चरित्र के दर्शन होते हैं । वास्तव में रासविहारी राम के रसमय चरित्र मे रमण करना ही कवि को अभिप्रेत है । यथा- रहन लगो ताकि ।।
ri .] सङ्गीतरघुनन्दनम् විදි දිවිපිළිසිදිසුවිධවූදිසිසුසිසිදිසිසිසි2 T . यदधिकरति रसपतिरपि कुरुते पश्यन्ननिनिवासम् । विश्वनाथनाथोऽपि ससीतस्तनुते रासविलासम् ।।४।। (द्वि० सर्ग) प्रस्तुत श्लोक के उद्धरण से स्पष्ट है कि कवि के राम सीता के साथ रासविलास में रात-दिन तल्लीन है. रसपति शृगार का वहाँ सदैव प्रावास है । कवि ने राम को 'विश्वनाथनाथ' पद से सम्बोधित किया है और यह पद कवि के दास्यभाव (सेवकभाव) की ओर इगित करता है। सगीतरघुनन्दन के प्रायः प्रत्येक सर्ग के अन्त मे कवि ने 'श्रीरामचन्द्र कृपापात्राधिकारी' शब्द प्रयुक्त कर भी राम के प्रति अपने दास्यभाव को अभिव्यक्त किया है । अत इस काव्य में कवि की भक्तिविधा सखीरूप या अन्य प्रकार की नही कही जा सकती। कवि ने सेवकभाव के माध्यम से राम अतिरसिक स्वरूप को प्रस्तुत करने का भरसक प्रयत्न किया है । टीका मे भी यत्र-तत्र कवि की 'तेन च श्रीरघुनन्दनस्यातिरसिकत्वमिति', इत्यादि उक्तियो द्वारा यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है । 'सगीतरघुनन्दन' को विशिष्टता प्रस्तुत रचना से पूर्व कवि ने सस्कृत में कृतियाँ नही लिखी थी . 'रामरसिकावली' के अनुसार सगीतरघुनन्दन ही उनका सस्कृत मे रचित प्राद्य महाकाव्य है और उन्हे सस्कृत-कृति के निर्माण के लिए किस प्रकार प्रेरणा प्राप्त हुई, उसका भी इसमे उल्लेख किया गया है - स्वप्न माहि प्रभु शासन दीन्हो । क्यो नहि ग्रन्थ सस्कृत कीन्हो ।। तब सगीतरघुनन्दन ग्रन्था । रच्यो राम-सिया-रासु-सुपन्था ।। बहुरि राम पाह्निक निर्माण्यो । निशि दिन चरित राम जो ठान्यो ।। वस्तुत. महाराजा विश्वनाथसिंह की काव्य प्रतिभा विलक्षण है, उन्होने विविध प्रकार के काव्यो की रचना की है । यद्यपि कवि की समस्त रचनायो की निश्चित संख्या का उल्लेख तब तक नही किया जा सकता जब तक कि इस पर पूर्ण शोध न की जावे, फिर भी उपलब्ध जानकारी के अनुसार महाराजा विश्वनाथसिंह ने पचास से भी अधिक काव्य एव काव्येतर ग्रन्थो' का प्रणयन कर अपनी उत्कृष्ट कवित्वशक्ति का परिचय दिया है, साथही सगीतप्रधान . - १ देखें परिशिष्ट-२।
प्रस्ताविका [७ Re-erereeerereareer-8-08-2-2-area-errere . प्रस्तुत काव्य को रचना कर उन्होने अपनी सङ्गीतशास्त्र की विशिष्ट मर्मज्ञता का भी प्रदर्शन किया है । एक शासक द्वारा ऐसी विलक्षण काव्य-प्रतिभा का प्रदर्शन उसका विशिष्ट भूषण है । यह भारतीय संस्कृति की अद्वितीय परम्परा है कि यहा शासक कवित्वशक्ति एव विद्वत्ता से सम्पन्न होते थे। जो स्वय कवि न होते थे, वे कवियों का हृदय से आदर करते थे एवं उनको सरक्षण भी प्रदान करते थे। अतः महाराजा विश्वनाथसिंह एवं भोजादि केवल राजनीतिप्रवण कुशल शासक ही नही थे, प्रत्युत अपनी निसर्गसिद्ध कवित्व-शक्ति के लिए प्रख्यात हैं। कवि और उनके गुरु प्रियादास रामभक्ति और साहित्यप्रेम की विशिष्ट परम्परा के लिए रीवा-राजवश प्रसिद्ध है । महाराजा विश्वनाथसिंहजू देव का जन्म इसी ऐतिहासिक वश में चैत्र शुक्ल १४ सवत् १८४३ (१७८६ ई०) मे हुआ था। इनके पिता महाराजा जयसिंह कवि होने के साथ ही अनन्य साहित्यानुरागी भी थे । पितृगुणानुरूपता को यदि ध्यान मे रखा जाए तो महाराजा विश्वनाथसिंह अपने पिता की तरह कुशल प्रशासक ही नही, कवि के रूप मे भी उत्कृष्ट कवि भी थे। यह उनकी राजवशपरम्परा की समुन्नत एव सुसस्कृत दशा का बहुत अच्छा प्रमाण है। महाराजा विश्वनाथसिंह के जन्म के विषय मे इनके पुत्र रघुराजसिह ने कहा भी है- लियो जन्म मो पितु विशुनाथा । रीवां नगर महामुदगाथा ॥ महाराजा विश्वनाथसिंह के पिता की साहित्यसाधना के विषय में पर्याप्त सामग्री प्राप्त है, किन्तु अन्य विषयों की अपेक्षा इसका विस्तृत विवेचन यहाँ अपेक्षित नही है। इनके पिता का नाम जयसिंहदेव ही था, इस बात की पुष्टि विश्वनाथसिंह के प्रस्तुत ग्रन्थ से भी हो जाती है। विन्ध्ये रिपुगजसिंहो जयसिंहो रार्जासहोऽस्ति । तनुते तस्य तनूजो ग्रन्थ सगीतरघुनन्दनाख्यम् ।। (प्रथम सर्ग) कवि ने कई ग्रन्थो मे हरिरूप प्रियादासगुरु अथवा प्रियादास नाम से अपने गुरु का उल्लेख किया है । प्रस्तुत काव्य मे गुरुवन्दना करते हुए प्रियादास का उल्लेख इस प्रकार किया है- यथा- - । ८] सङ्गीतरघुनन्दनम् සිපිලි-සිළreererarrඩිවිඩිසිංrළිවිළි වළreer सीतारामरहस्य मा बोधयन्ति हृदम्बुजे । स्थितास्तान् हरिरूपाञ्छ्रीप्रियादासगुरून् भजे ॥ (प्रथमसर्ग पृष्ठ-१) । जयति सच्चिदानन्दधनवरदवरसर्वगुणशालिशृगाररसपालिमूत्तिः, सर्वजनवत्सल प्रविगलितमत्सर-प्रेमपाथोधि-पुरूषार्थपूतिः । सर्वगत-सर्वमत-सर्ववन्दितचरण-सर्वशरणागतोद्धतिविहारी, गुरुरूपरघुवर श्रीप्रियादास इह विश्वनाथान्तरे गीतकारी ।।५।। (प्रथम सर्ग) युवराज विश्वनाथसिंह ने इन्ही से गुरुदीक्षा ग्रहण की। श्रीप्रियादास कौन थे, कहा के निवासी थे- प्रादि का सङ्कत न तो श्रीविश्वनाथसिंह ने ही किया है और न अन्यत्र भी प्राप्त होता है ; फिर भी यह कहा जासकता है कि श्रीप्रियादास नाभाकृत भक्तमाल के टीकाकार प्रियदास से भिन्न, उच्चकोटि के तत्कालीन महात्मा एव धुरन्धर विद्वान् अवश्य रहे होंगे। - सम्पादन तथा प्रतिपरिचय . प्रस्तुत काव्य का यह सम्पादन दो हस्तलिखित प्रतियो (Manuscripts) पर आधारित है । एक प्रति दूसरी की अपेक्षा लम्बाई और चौडई मे बडी है। दोनो प्रतियो में अन्तिम सर्ग की टीका के पश्चात् सवत्, तिथि एव वार का निर्देश किया गया है, अत. इनके समय के विषय मे ऐतिहासिक परिकल्पनाओ के लिए अवकाश एव अावश्यकता नहीं रहती । बड़ी प्रति का समय सवत्- १८६१ है और छोटी का सवत् १६२६ है। पाठान्तरो को प्रदर्शित करने की सुविधा के लिए दोनो प्रतियों के नाम प्रकल्पित कर लिए गये हैं । बडी प्रति का नाम 'क' है और दूसरी का नाम 'ख' है । 'क' 'ख' दोनो प्रतियो के अन्त में समय-निर्देश क्रमशः इस प्रकार किया गया है- 'आषाढ कृष्णा ७ सवत् १८६१, संवत् १६३६ माघ शुक्ला अष्टमी कुज ।" १ यद्यपि प्रस्तुत ग्रन्थ प्रोर रघुराजसिंह के प्रनुसार तो श्रोप्रियादास ही विश्वनाथ के गुरु ये किन्तु डॉ० भगवतीप्रसादसिंह ने 'रतिकप्रकाश भक्तमाल' के अनुसार रसिकाचार्य रामचरणदासको को इनके 'रसिकदीलागुरु' होने का भी उल्लेख किया है ।
प्रास्ताविका සු----=-=-=-=-=-=-=-=-=-care-22-e-සිස, සි, ළපීr 'क' प्रति का माप ३६४१६ सेन्टीमीटर है। इस प्रति मे मूलभाग एव टीका के लिये लम्बा २८ से. मी. एव चौड़ा १० से. मी. स्थान ग्रहण किया गया है। यह प्रति ६३ पत्रो मे सम्पूर्ण होती है। प्रति के प्रत्येक पृष्ठ मे पक्तियो की न्यूनतम सख्या १० एव अधिकतम १६ है तथा प्रत्येक पृष्ठ मे शब्दों की सख्या लगभग १५० से २०० तक है। यह प्रति राजभवन पुस्तकशाला, अलवर ( सन् १६०१ एव सवत् १६५७ ) की मुद्रा से मुद्रित है। अलवर- महाराजा की पुस्तकशाला से इसकी प्राप्ति के विषय मे इस प्रति के मुखपृष्ठ पर लिखित यह निर्देश भी प्रमाण-स्वरूप है 'सगीतरघुनन्दन पुस्तकशालाया महाराजाधिराज महारावराजा-सवाई विनयसिंहवर्मणाम्"। इसी प्रकार 'ख' प्रति का माप २८x१५ सेन्टीमीटर है। इस प्रति में मूल एव टीका के लिये २३ से. मी. लम्बा और १०.३ से. मो. चौडा स्थान काम मे लिया गया है । इस प्रति का समापन ६० पत्रो मे होता है। प्रति के प्रत्येक पृष्ठ मे अधिकतम -१६ पङ्क्तियाँ और न्यूनतम ६ या १० पक्तियाँ है। वैसे अन्तिम पृष्ठ पर ७ पडक्तियाँ लिखित है, परन्तु यह ग्रन्थ की समाप्ति के कारण है । इस प्रति के प्रत्येक पृष्ठ मे शब्दो की संख्या लगभग २०० से २५० तक है । यह प्रति "श्रीविद्याभूषण-पुस्तकालय, जयपुर" की मुद्रा से अङ्कित ही मे यह राजस्थान प्राच्यविद्याप्रतिष्ठान, जयपुर, शाखा की मुद्रा से भी सवलित है । अतः ऐसा प्रतीत होता है कि 'राजस्थान प्राच्यविद्याप्रतिष्ठान की जयपुर- शाखा ने इसे 'श्रीविद्याभूपण-पुस्तकालय' से प्राप्त किया है । साथ पाठप्रस्तुति की विधि- दोनो हस्तलिपियो मे पाठप्रस्तुति की विधि प्रायः एक जैसी है। प्रत्येक पृष्ठ के मध्यस्थल मे मूलभाग प्रस्तुत किया गया है और मूल दोनो तरफ टीका से सवलित है । पाठप्रस्तुति मे आधुनिक व्यवस्था का अभाव है । प्राय एक पृष्ठ मे ३, ४ या ५ श्लोको को समूहरूप मे प्रस्तुत किया गया है, न कि पृथक् रूप मे । यदि कोई एक ही श्लोक दीर्घकाय है, तो उसे विवशतया दूसरे श्लोको से असम्पृक्त रखा गया है । श्लोको के ऊपर और नीचे दोनो तरफ टीका लिखी गई है। प्रत्येक श्लोक की टीका की समाप्ति के पश्चात् श्लोकसख्या दी गई है जिससे विशेष काठिन्य नही होता । मूलभाग और टीका मे कुछ स्थानावकाश भो रखा गया है: मूल भाग को टीका की अपेक्षा अधिक बड़े अक्षरो मे लिखा गया है - , १० । सङ्गीतरघुनन्दनम् වැr Ererෂ්ඨrඩr Erළිපි-Err rrerer වියවුල, සිසුළිළිසිඳීrerer जिससे सम्मिश्रण की समस्या नहीं पाती। कही-कही स्थान न छोडते हुए मूल की पक्ति से ही टीका का समारम्भ कर दिया गया है। प्रत्येक सर्ग की समाप्ति की सूचना के लिये मूल और टीका दोनो के नीचे पृथक्तया प्रस्तुत करने की विधि अपनाई गई है । श्लोको के लेखन का ढग विशेष सुव्यवस्थित नही है क्योकि चरणविभाजन कर प्रस्तुत करने में पूरी अनवधानता बरती गई है। प्राय. गद्य की तरह उन्हे एक पक्ति मे ही लिख दिया गया है । टीका मे प्रति- पाद्य के विशदीकरण के लिये अन्य ग्रन्थो के प्रस्तुत श्लोको को भी व्यवस्थित रूप से नही लिखा गया है । उक्त दोनो प्रतियों में लिपि की दृष्टि से 'क' प्रति अधिक सुवाच्य एव सुन्दर अक्षरो मे लिखित है और द्वितीयसर्गपर्यन्त तो यह प्रति अतीव सुवाच्य है, जव कि 'ख' प्रति अवान्तरकाल में लिखित होने पर भी उसमे 'क' प्रति जैसी सुवाच्यता का अभाव है। यद्यपि दोनो पाण्डुलिपियो मे पदो की पृथक्ता का विशेष ध्यान न रखते हुए यत्र-तत्र उन्हे अन्य पदो के साथ मिला दिया गया है, कही-कही पर सन्विच्छेद की त्रुटियाँ भी प्राप्त होती हैं और सयुक्ताक्षर वाले पद कही-कही पर अस्पष्ट हो गये हैं फिर भी 'क' प्रति 'ख' प्रति से अपेक्षाकृत अधिक शुद्ध एव सुवाच्य है । क्योकि ख. प्रति मे य, प, म अक्षरो की जगह पर 'म' का ही प्रयोग अधिकत. पाया जाता है । श और स मे भी बहुत कम अन्तर है अर्थात् श की जगह पर स का तथा स की जगह पर ग का प्रयोग मिलता है जव कि द की जगह पर द्य और घ ही लिखा मिलता है। इसी प्रकार न, त, द, इ, द्र, दू आदि ऐसे भी अक्षर है जिनका निर्णय करना पाठक की सन्दर्भानुसार बुद्धि एव विवेक पर निर्भर करता है। पाठान्तर एवं पाठवैषम्य- दोनो प्रतियो के सम्यगवलोकन से यह तो स्पष्ट ही है कि 'ख' प्रति 'क' प्रति की अनुकृति नहीं है अतः इन में पाठान्तरो एव पाठवैषम्य का पाया जाना स्वाभाविक है। जो पाठ 'क' प्रति में नहीं हैं वे 'ख' प्रति मे उपलब्ध हैं। इसी प्रकार 'स' प्रति में अनुपलव्य पाठ 'क' प्रति मे विद्यमान हैं। इस तथ्य की पुष्टि के लिये कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं । जैसे-क. प्रतिस्थित 'नि शेषच्युतचन्दन' के स्थान पर ख. प्रति में 'नि.शेषच्युतवदन', 'मूर्च्छन्मोह० की जगह 'नछुन्मोह०' और 'ध्वनिभिर्ध्वनीनामुद्भवाद' के स्थान पर 'ध्वनि- प्रास्ताविका [ ११ ආපසy) -2-ErZr202-2-4-4-2--Bra-ක-සංසිදවස වන විට- निर्वनोनाद्भवात्' आदि पाठ मिलते हैं । इसी प्रकार क. प्रति मे विद्यमान प्रथम सर्ग के २५ वे श्लोक की व्याख्या के "अमितकोटिब्रह्माण्डवलितत्वे प्रमारणम्"" "विराजो अधिपूरुष इति तस्मात्" इस षट्पक्त्यात्मक अश के स्थान पर ख. प्रति मे 'तस्येच्चस्तत्कारणभूत पूर्णब्रह्म तस्मात्" केवल यह अश ही प्राप्त है। इसी प्रकार तृतीय सर्ग के प्रारम्भ मे सर्वाधिक पाठवैषम्य उपलब्ध होता है। तृतीय सर्ग का मूल गद्यमय है । इस सर्ग के प्रारम्भ मे "मालती- लवङ्गदल्लय...'मागा इति" यह गद्यभाग केवल 'ख' प्रति मे ही विद्यमान है 'जब कि इस. गद्यभाग की टीका दोनो प्रतियो मे उपलब्ध है; किन्तु- इस गद्यभाग की टीका के पश्चात् “इति अस्याऽर्थोऽपि-..."मता इति' यह सात स्वरो की विस्तृत व्याख्या केवल 'क' प्रति मे ही प्राप्त है, ख. प्रति मे नहीं। वैषम्यो के अतिरिक्त भी अन्यस्थलो मे अनेक पाठान्तर प्राप्त होते हैं, किन्तु यहाँ पर संक्षेप की दृष्टि से इतने थोडे ही उदाहरण दिये गये है जिससे-कि उपरिकथित तथ्य की सच्चाई का भान हो सके । उक्त पाठ पाठ की सुग्राह्यता- उपर्युक्त प्रतियों के विवेचन से यह तो सुस्पष्टत कहा ही जा सकता है कि 'ख' प्रति की अपेक्षा 'क' प्रति लिपि-की-सुस्पष्टता. सुत्राच्यता तथा शुद्धता की दृष्टि से अधिक मान्य है एव प्राचीनता तथा सुमगत अधिकपाठोपलब्धि की दृष्टि से भी क. प्रति की सुग्राह्यता स्वत स्पष्ट है। यही कारण है कि हमने इसी प्रति का पाठ आदर्शरूप मे प्रस्तुत कर 'ख' प्रति के पाठान्तरों को पाद- टिप्पणी के रूप मे नीचे उद्धृत किया है । हाँ, जहाँ दोनो ही प्रतियो के पाठ हमे अशुद्ध प्रतीत हुए हैं वहाँ शुद्ध पाठ ऊपर में देकर नीचे क. ख. प्रतियो के पाठ अङ्कित किये गये है । इसी प्रकार यदि ख प्रति का पाठ क. प्रति से उपयुक्त प्रतीत हुआ है तो उसे ऊपर और क. प्रति का पाठ नीचे पादटिप्पणियो मे अविकल रूप से उद्धृत कर दिया गया है। किन्तु, जैसा कि ऊपर सङ्केत किया गया है कि जिन अक्षरो का निर्णय करना पाठक की मन्दर्भानुसार बुद्धि एव विवेक पर निर्भर करता है, ऐसी स्थिति वाले पाठान्नरो को अधिकतर लिपिका की स्वाभाविक लिपि समझकर बाहुल्य भय से यहां पर स्थान देना समुचित नही समझा गया है।
१२] सङ्गीतरघुनन्दनम् earළිපි-ඇසිපිළිවිදිළි,e-e-e-e-e--=-=-=-=,a eee සිසි වැසී प्राभारदर्शन- अन्त मे इस कार्य की सम्पन्नता के लिये अनेक विद्वानो को धन्यवाद देना मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूँ। प्राच्य विद्याप्रतिष्ठान के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ० फतहसिंह ने मुझे यह काम सौपने की कृपा की थी। समय-समय पर इसके बारे में पूछते भी रहे । प्रेस कॉपी तैयार करने मे श्रीगणेशीलाल सुथार से मुझे सहायता मिली जिसके लिये वे धन्यवादाह हैं। श्रीलक्ष्मीनारायण गोस्वामी ने प्रतियो के शुद्ध पाठ के विषय मे मेरे से विमर्श किया है। रीवां-नरेश श्रीमार्तण्डसिंहजी ने 'सङ्गीतरघुनन्दन' के रचयिता अपने पूर्वज श्रीविश्वनाथसिंहजी के विषय मे कुछ सूचनाएं दी हैं। उनके लिए भी मैं कृतज्ञ हूँ। प्रतिष्ठान ने इस ग्रन्थ की हस्त- लिखित प्रतियाँ मुझे दी । अन्य प्रकार से भी उसके अधिकारियो से मुझे अच्छा सहयोग मिला है । प्रतिष्ठान के प्रथम निदेशक पुरातत्वाचार्य मुनि श्रोजिन- विजयजी को हम विशेष रूप से धन्यवाद देते हैं जिनके प्रयत्न से मागधी, अर्धमागधी, सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और राजस्थानी का यह सुन्दर सग्रह यहाँ एकत्रित हुआ है। प्राशा है कि सभी काव्य एव सगीतप्रेमी विज्ञजन इस मुद्रित प्रति मे प्रेस-दोष एव दृष्टिदोषवश रही हुई त्रुटियो को 'समादधति सज्जना:' की दृष्टि से सुधारते हुए प्रस्तुत काव्यरस का मानन्द उठाएगे। दशरथ शर्मा १७ सितम्बर, १९७३ राजस्थान प्राच्यविद्याप्रतिष्ठान, जोधपुर - + सर्गात्मक समालोचन संस्कृतग्रन्थो मे महाराजा विश्वनाथसिंह द्वारा विरचित 'संगीतरघुनन्दन' काव्य की प्रेरणा सभवत: गीतगोविन्द से मिली हो । कवि ने १६ सगों में इस रामकाव्य की सर्जना की है । इस काव्य के सभी सर्ग विस्तार की दृष्टि से समान नहीं हैं। कुछ लघुकाय हैं, तो कुछ दीर्घकाय भी । जिस प्रकार कवि द्वारा विरचित 'यानन्दरामायण' नामक नाटक रामभक्ति के रसिक साहित्य का एक रत्न है, उसी प्रकार 'सगीतरघुनंदन' भी । + कवि ने ग्रन्य के प्रारम्भ मे 'श्रीमते रामानुजाय नमः' इस नमस्कारोक्ति के पश्चात् ७ श्लोको में श्रीराम, निमिराजपुत्री एवं रासेश्वरी सीता, भगवती शारदा, गणनायक, गुरु श्रीप्रियादास एवं भगवान् शकर की क्रमशः वन्दना प्रस्तुत की है । यद्यपि काव्यप्रकाश मे उत्तम-मध्यम अधम भेद से काव्य के ३ भेद किये गए है; और इन से तथा अन्य अनेक काव्यों से रचयिता परिचित है, तो भी इस काव्य को उन्होने परमोत्तम माना है । इस सम्बन्ध मे कवि का कहना है कि- - 'तथाप्यत्र प्रतिश्लोक ध्वनिभिर्ध्वनीनामुद्भवात् परमोत्तमत्वमिति' ।' मर्थात् इस काव्य के प्रत्येक श्लोक मे ध्वनियो के द्वारा अन्य अनेक ध्वनियो का उद्भव होता है अतः यह काव्य परमोत्तम है । इसकी सम्पुष्टि मे 'अलङ्कार-कौस्तुभ' का लक्षण भी प्रस्तुत किया है- 'ध्वने न्यन्तरोगारे तदेव ह्युत्तमोत्तमत्वम्' इति । इसके लिए दो कारण है, एक तो काव्य का विषय और दूसरा कवि की यह मान्यता कि यह काव्य भगवान् की ही कृति है । वे कहते है- "मन्दस्य मम कथमीदृशग्रन्थकरणसामर्थ्य, रघुनन्दन एव मदन्तः प्रविश्य निज चरितमुचरितवान् अतस्तत्कृतस्य ग्रन्थस्य प्रशसा कृता ।' २ १. सगीतरघुनन्दन-स्यास्था, पृष्ठ २ । ३. सगीतरघुनन्दन- व्याख्या, पृष्ठ ३ । सगीतरघुनन्दन-व्याख्या, पृष्ठ २ ।
-- 1 १४ 11 सङ्गीतरघुनन्दनम् 222-22ree2222222222-228rer2222ere अर्थात् मुझ मन्द मे ऐसे ग्रन्थ की रचना की शक्ति कहाँ कहाँ ? स्वयं भगवान राम ने ही मेरे अन्तःकरण में प्रवेश कर अपने चरित का उच्चारण किया है। अतः उनके द्वारा रचित ग्रन्थ राम के प्रति समर्पण की अतिशयता का सूचक है और साथ ही यह प्रात्मश्लाघा के विषय मे उत्थापित शका को भी निरस्त कर देता है । प्रथमा सर्ग एक प्रकार से मगलाचरण-मात्र है। इस सर्ग मे कही अवधेश राम की स्तुति, है, तो कही रासेश्वरी. सीता के प्रति निवेदन । कही भगवान् शकर की वन्दना है, तो कही विघ्नविनाशन गणनायक की। कही गुरुवर के चरणो मे प्रणति है, तो कही भगवती शारदा की सस्तुति प्रस्तुत है । श्रीरामचरितवर्णन मे अनेकशः विघ्नविनाशक होने के कारण महावीर हनुमान की स्तुति करना भी नितान्त उचित समझा गया है । इसके पश्चात् कवि ने मीनसुरूप, कमठसुरूप, शूकररूप, नरहरिरूप, वामनरूप, कपिलसुरूप, हलधर- रूप, कृष्णसुरूप, तापसरूप, वरहरिरूप, भृगुवररूप, मोहिनीरूप, बुद्धसुरूप, कल्किसुरूप, वैद्यसुरूप, यज्ञसुरूप, हयगलसुरूप, पृथुनुपरूप, ऋषभरूप, नारदरूप, शुकपितृरूप, हससुरूप, वालसुरूप, इत्यादि विविध दीनोद्धारक रूपो मे राम की अत्यन्त श्रद्धापूर्वक स्तुति प्रस्तुत कर अपने काव्य की सफलता एव प्रेमलक्षणा भक्ति के वरदान-की-प्राप्ति के लिए मगलाचरण किया है। कवि ने स्वोपन 'व्यग्यार्थचन्द्रिका' मे यह भी उद्घोषित किया है कि इनके अतिरिक्त जो अन्य अवशिष्ट अवतार है, उनको राम ने ग्रहण कर इस भूतल के विभिन्न विघ्नो का विनाश किया है। उपर्युक्त विभिन्न अवतारो के रूप मे राम के वर्णन का कवि ने पद्मपुराण, वाल्मीकीय रामायण, शिवसहिता आदि शास्त्रो के उद्धरणो द्वारा समर्थन भी किया है। इतना ही नहीं, 'देवानां पूरयोध्या' इत्यादिक श्रुति को भी उद्धृत किया है। इस प्रकार कवि ने अपनी नवनवोन्मेष- शालिनी प्रज्ञा के बल से राम की विविध प्रकार से स्तुति कर राम के प्रति अपनी अनन्य भक्ति को प्रदर्शित किया है । काव्य का वास्तविक प्रारम्भ तो दूसरे सर्ग से है जैसा कि कवि.ने स्वय द्वितीय सर्ग की टीका के प्रारम्भ में लिखा है- "एव मगलाचरण विघाय सगीतरघुनन्दन काव्य प्रकटयति ।" अर्थात्- इस प्रकार मगलाचरण का विधान कर सगीतरघुनन्दन-काव्य + समालोचन [ १५ are;ළErr සිංrrerer, දිසංrer'සු සිසු-සිසු-සිසු-සි- සිසිලස ද, සිසිල - को प्रकट करता है । इस सर्ग मे रामरासक्रीडा का वर्णन करते समय कवि ने 'गीतगोविन्द' का अनुसरण कर अनुप्रासच्छटा का भी प्रदर्शन किया है । यथा-- मलयजलेपितललितकलेवरवलितवेगुवनमाली । चलदलकालिविलोकनपुलकितसकलालीगणशाली ॥७॥ इसी प्रकार गीतगोविन्द की उत्कृष्ट अनुप्रासच्छटा अवलोकनीय है- ललितलवङ्गलतापरिशीलनकोमलमलयसमीरे । मधुकरनिकरकरम्बितकोकिलकूजितकुञ्जकुटीरे ।। गीतगोविन्द में सर्वत्र अनुप्रासच्छटा में कोमलकान्तपदावली प्रयुक्त हुई है, परन्तु सगीतरघुनदन मे अनुप्रासच्छटा की उतनी उत्कृष्टता नही है । कोरकेकिकोकिलकोलाहलऋतुकुलललितविलासे । कुरवकवकुलकेतकीकरवकुन्दकदम्बविकासे ॥२॥ यद्यपि गीतगोविन्द की-सी अनुप्रासच्छटा की मधुरिमा एव कोमलकान्त पदा- वली यहाँ नहीं है, तो भी रासलीला मे तल्लीन सखियो की सम्मिलित मधुर गानध्वनि को इन विविध उपवन-पक्षियो के समस्वर के समान वरिणत करना सुमनोज्ञ कल्पना है । सीतारामसहित रासलीला करती हुई सखियों की विविध रासक्रीडायो को भी सुन्दर रूप मे उपस्थित किया है- गायति काचन नृत्यति काचन, रमयति काचन रामम् । काऽपि च नृत्यति काऽपि च घटयति, काऽपि च पश्यति कामम् ॥४॥ वस्तुतः इस सर्ग का वर्णन पाठक के समक्ष रासक्रीडा का शब्दचित्र-सा उपस्थित कर देता है । तृतीय सर्ग में वसन्तरास का वर्णन किया गया है । इस सर्ग मे 'होलाखेला' शब्द के लिए प्रचलित लौकिक शब्द 'होली' का 'होरीति लोकप्रसिद्धा' द्वारा निर्देश किया गया है । इसी प्रकार साभ्रकारुण चूर्ण एव नारगफलाकार लाक्षापात्र के लिए प्रचलित लौकिक शब्द अबीर और 'कुमकुम' क्रमश. प्रयुक्त किये गये हैं । उन्नीसवी शताब्दी की होली का यह अच्छा सजीव वर्णन है । चतुर्थ सर्ग में सीता के समाधिस्थ होकर रासविलास का आनन्द -
१६ ]
सङ्गीतरघुनन्दनम्
සුසුදුසුදුසසුළිසිසිපිසිවිසියදිවිළිබිළිදිවැදිළි දිළිසින් එrer
लेने के लिए अन्तहित होने पर सीता के विरह मे राम की करुण स्थिति का
अत्यन्त हृदयहारी चित्रण प्रस्तुत है ।
रासविलाससमाधिसुखाय समन्तरधादस्मिन्किल काले ।
प्रललापेह पतिः प्राणप्रियतमे ! गता भवती क्व नु बाले ।।२।।
तव मुखनलिननिरीक्षणरहितो नयनमधुकरो मुद न लभते,
अनलमलयानिलो गले मम माल्यं व्यालसाम्यमारभते ॥३।।
कवि ने विप्रलम्भ गार के चित्रण मे अपनी काव्यकला का प्रदर्शन किया
है । भगवान् राम के लिए हिमाशु चन्द्रमा अति शीतल एव मन्द होने पर भी
दिवसदीप सूर्य की तरह देहदाहक बन गया है । मल्ली, वल्ली, वासन्ती आदि
लताओ के वृक्षो के साथ सानन्द श्लिष्ट होने पर भी सीता के अन्तर्धान के
कारण राम को अन्तर्वह्नि पीडित करती है । सीता के नेत्रो के समान मनोरम
कमल राम के लिए 'हृदयखनित्र' बन गया है । ऐसी विरहपीडितावस्था मे
राम सीता के प्रति करुण निवेदन करते है-
-
'मिल मिल मैथिलि ! मामव मित्रम् ॥६॥
इस प्रकार सीता के अन्तर्धान से सम्बद्ध होने के कारण इस सर्ग का
'जानक्यन्तर्धान' नामकरण उचित है।
पञ्चम सर्ग मे सीता की शाटी (साडी), कचपाश आदि का अत्यन्त
मनोरम वर्णन किया गया है । इसी प्रसग मे सीता के भाल पर शोभायमान
नीलमणि की छविच्छटा का वर्णन कितना सुरम्य बन पड़ा है-
प्रभापुञ्जपरिभासितभाले लसति नीलमणिराजः ।
अर्द्धचन्द्रसिंहासनगत इव रसराजो विसमाज. ॥३॥
इस सर्ग में कामा और वसन्तिका सीता को लौटा लेने का प्रयत्न करती है ।
कवि की काव्यशैली के निरीक्षण के लिए सरलतम, किन्तु चित्ताकर्षक भाषा
मे प्रस्तुत दो-तीन श्लोको को उद्धृत करना उचित होगा-
परमहसपरजनको जनकः सर्वसहैव जननी ।
रसघायकरघुनायकनायफप्रारणसमा या रमरणी ॥२॥
तल्या भाति नवीनं चरित मच्चित्तेऽपि विचित्रम् ।
मिल मिल मनोमोहन मोहिनि । जहि जहि मानममित्रम् ॥३॥
। समालोचना [. යස-සැප-සිසpe22-ක-සංසි--විසිසිසිසංrer-geeසිසංස-විසි मा कुरु मुनिमनन मम वचनं मानय मानय धीरे । विश्वनाथनाथ रघुनाथं कुरु कुरु करे गभीरे ॥४॥ -- पञ्चम सर्ग का नामकरण 'कामा-वसन्तिकागमन' उपयुक्त है । r 'चारुशीलाकृतमनुनयन' शीर्षक इसी प्रकार षष्ठ सर्ग के विषय का निर्देश करता है । इसके कतिपय अवलोकनीय उदाहरण प्रस्तुत है- त विना न सुख तवाऽपि न चाऽन्यथा तव चिन्तनम् । विश्वनाथसुनाथचरित वरिणत कलिकृन्तनम् ॥४॥ प्रस्तुत सर्ग मे कवि ने सूक्तिरूप मे भी श्लोक निबद्ध किये हैं । यथा- सेवयव प्रसाद्यते कविता लता वनिता धनी । विश्वनाथसुनाथमिति वद गच्छ सम्मतिसाधनी ॥२॥ इस काव्य मे यत्र-तत्र कवि के लिए 'राजा बहादुर' एव रामचन्द्र कृपापात्रा- धिकारी' शब्दो का भी प्रयोग किया है । इनमे पहली पक्ति कवि की राजपदवी है और दूसरी भगवान् रामचन्द्रपरक है । 'जानकीसमागम' नामक सप्तम सर्ग मे कवि ने राम द्वारा मानिनी सीता के प्रति विविध निवेदनपूर्ण वचन कहलाए हैं । राम सीता को मानवि- मोचन कर वचनामृतो से परिषेचन के लिए निवेदन करते है- - मानमवमुञ्च परिषिञ्च वचनामृत- रिति वदन्हरिरवतु विश्वनाथम् ॥४॥ पुनश्च- - वाञ्छितदे कलगीते सीते, तव शृगारविधावभिलाष पूरय मयाऽनुगीते ॥१॥ अष्टम सर्ग मे कवि ने सीता' द्वारा शरीर पर धारण किये जाने वाले विविध आभूषणो की छटा का सुरम्य निरूपण किया है । 'दोलावर्णन' नामक नवम सर्ग मे दोलान्दोलन का वर्णन भी निखर उठा है- १८ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् लसति श्रीरघुनन्दनदोला सुतरां लोला । शृङ्गाररचिमरकतमरिगप्राकारसुपमामण्डिता । श्रादर्शसममणिमेदिनीप्रतिबिम्बवृन्दालम्विता ॥२॥ दशम सग मे पृथक् पृथक् श्लोको मे सीता के प्रत्येक अग का सुन्दर उपमानो के साथ वर्णन प्रस्तुत किया गया है । अतः इस सर्ग का 'सर्वागगोभावर्णन' नाम भी उचित प्रतीत होता है । कवि की सरस, सरल एवं प्रसादमयी दौली में निम्नलिखित प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण अवलोकनीय है- w- चल दयिते वरसरयूतटमनुभाति । पिफरमरणी शिखिरमरपी यत्र च याति ||१|| नितान्तमोक्षणेक्षणे क्षणे क्षणे विलक्षणा । अतुच्छगुच्छकक्षवृक्षलक्षलक्ष्यलक्षणा ॥२॥ इस सर्ग में कवि ने 'वारी' अर्थात् 'वाडी' के लिए 'पालिनी' एव 'पायजामा' के लिए 'अध कञ्चुक' गन्दो का प्रयोग किया है । इसी प्रकार अन्यत्र भी 'काछनी' एव 'जामा' आदि वस्त्रो के लिए क्रमश 'कटिवन्धन' एव 'अमण- कञ्चुक' शब्दो को प्रयुक्त किया है । सीता का सर्वागवर्णन अतीव सुमनोहर वन पडा है । वास्तव मे, 'यथा नाम तथा गुण!' इस उक्ति के अनुसार प्रस्तुत सर्ग का नाम सार्थक है । प्रत्येक अग का वर्णन सहज, स्वाभाविक विशेषणो द्वारा प्रस्तुत किया गया है । यथा-सीता की नासिका शुकतुण्ड का भी अतिक्रमण कर जाती है- - नासिका नागमणिसहिता, सफलशुफतुण्डजयविहता ॥१७॥ अपि च, सीता की स्मितमरीचि सुधानिधि की तरंग को विनिन्दित कर देती है । उसका चार चिवुकतल लघु रसालफल की सुषमा से भी वढकर सुन्दर है । उपरि प्रस्तुत श्लोक जमे ३४ लघुकाय श्लोको में सारे अगो व आभूषणो का हृदयहारी वर्णन किया गया है । एकादश सर्ग मे जानकी एव रघुनन्दन के गीत व नृत्य का वर्णन किया गया है । इस सर्ग के प्रारम्भ मे ताम्बूलपेटी, मरिणपतद्ग्राह, आतपत्र, प्रासून --
समालोचना
[ १६
“එසේයළි-සිසිදිසු-සසිසු-සිසු-
සිසු-සිසු- ; දිවි පිදවු:විස්සි
स्नेहपात्र, स्वर्णपात्र आदि विभिन्न पात्रो को धारण करती हुईं सखियों का
चित्रण किया गया है । तदनन्तर सीता के चारुचमत्कारपूर्ण नृत्य का
उल्लेख किया गया है । यथा---
पदयुगलेन लिखति शिखिकारिणौ लघु नृत्यन्ती भावगामिनी ।
सुचमत्कृतियतिगतिचलचित्ता चिबुक चुम्बति चारुकामिनी ॥२॥
अपि च, राम के चित्ताकर्षक रास का अवलोकन कीजिए-
नोराजयति मुकुटरुचिराजिभिरासामाननचन्द्रम् ।
करचलनेन चालयति चेत. पदगतेन क मन्दम् ।।२।।
वस्तुत सखियों के साथ सीता व राम के सगीतपूर्ण रास का अति मनोरम
चित्रण किया गया है ।
द्वादश सर्ग मे राम के विरह का मार्मिक वर्णन किया गया है । राम
के अन्तर्हित हो जाने पर 'व्याकुलास्ता विचेरु.' अर्थात् सीतामहित सखियाँ
मार्ग-मार्ग मे राम को पाकुलता से ढूंढती फिरती है । अशोकादि कामोद्दीपक
पुप्पो को सम्बोधन करती हुई सखियो एव सीता की विरहपीडितावस्था का
अत्यन्त करुण चित्रण भी द्रष्टव्य है-
प्रमोदवनकुञ्जषु मृगयन्त्यो रघूहम् ।
मार्गे मार्ग रमण्यस्ताः पृच्छन्ति स्म लतातरूर ।।२।।
मन्मथबारणमथितमुव्यथित खलु से हृदयं,
कलयाऽशोकमशोक
.
शरणमितं वनितामण्डलमिह रक्षसि किं न स्तोक,
अहह बत रक्षसि कि न स्तोक ! ॥२॥
कुसुमनखेन विदीर्ण बहुमो भवता हृदय,
खिचति विगतत्रास ! ।
रहितत्रयं कानने विलससि, विरहिपलाश पलाश ! ।।२।।
विश्वनाथचलनाथविरहित चत्तदल हृदय,
भूषितविटपिसमाज
प्रिय निवेदय तब बनलीन पाहि पाहि तराज
॥४॥
- २० ] Beeeeeee282rererrerareerevere सङ्गीतरघुनन्दनम् मिल नाथ अए ! हा हा नयनाञ्जन तापविभञ्जन रमरगीरञ्जन ! तव विरहे। सम्भवति कराला ज्वलनज्वाला सुमनोमाला किमु विषहे ।।१।। यन्मुखचन्द्रचकोरी नयने ते सततम् । सा सहते तव विरहमहो निर्दय । विततम् ।।३।। गतविग्रहवर्णा च्युतमुखवर्णाऽतिवधिरकर तव प्रिया । न रसायनरक्ष्या धिक्कृतभक्ष्या त्वयैव लक्ष्या गतक्रिया ॥५॥ अवितप्रेमाकर दोनदयाकर । हृदयशया स्मर भूमिशयाम् । अलमधिकविरत्या त्वमिहाऽऽगत्याऽनुपरतगत्या तनुहि दयाम् ।।१०।। त्रयोदश सर्ग मे अन्तहित राम के विरह से विह्वल सखीसमूह की राम के प्रादुर्भाव के कारण आनन्दातिरेकमयी स्थिति का सुरम्य चित्रण हुआ है । राम के दर्शनानन्द से उन सखियो के अग इतने खिल उठे हैं कि विरहकाल में जिनसे कृशता के कारण आभूषण परिच्युत हो गये थे, उन्ही पर अव वे आभूषण यत्नपूर्वक धारण करने पर भी शोभित नही होते । यथा- या वियोगकृशतापरिच्युता भूषणालिनिखिलाङ्गके पुन । न स्म भाति परमोदमासले यत्नतोऽपि परिधारिता मुह ।।३।। रघुनदन के आने पर सखियो की विभिन्न चेष्टाओ का वर्णन भी अवलोकनीय है- काऽपि चुचुम्ब सुरुचिर चिबुक चन्द्रमुखी । काचिदुवाच देवदोषो मे त्वमकलुषी ॥१॥ फाचित्परिरेभे पदरमण मोदवती । काचिदबघ्नान्निनपतिवसने भीतिमती ॥२॥ काऽपि वीरगया जगौ रमरणगुरणमतिहीदम् । अकृत भृकुटितर्जन काचन पतिभीदम् ।।३।। काचिदासनेऽवदन्निषोद प्रिय ससुखम् । विश्वनाथनायोऽसि कथय न: कि कलुषम् ॥४॥ अन्तर्धान का कारण बतलाते हुए राम कहते हैं कि पहले सीता ही अन्तहित हुई थी, अत उसे अन्तर्वानजनित विरहपीडा का सवेदन करवाने के लिए वे भी अन्तहित हो गये । अन्तत प्रिय के अपराधकथन का अनौचित्य बतलाते हुए समालोचना [ २१ විසුළිසුළreter දිළි දිළිඳසිවිලිමංrerberg राम अपने-अपने अपराध की भी गुणपक्ष मे गणना करने के लिए यह कह कर सरयू नदी की रमणीयता की ओर जानकी का ध्यानाकर्षण करते हैं:- प्रिये पश्य सरयूरिह विलसति कोमलशैवलकमला । ललितकाकलीकलितखगालीसकुलालिकुलकमला । १॥ सरयूनदी की रमणीयता के बोधक अन्य श्लोक भी प्रस्तुत हैं:- कुमुदवृन्दमकरन्दविशदबहुबिन्दुचारुचन्द्रकिता । अनिलसमाकुलकूललताकुलकुसुमावलिपरिकलिता ॥२॥ . तव नाभीसुषमानुकरणकरललितावर्त्तविशाला । विश्वनाथमानसपरिषेवितसुमरिणतीर्थरुचिशाला ॥३॥ - सरयू के प्रावों की सीता की नाभि से समता प्रस्तुत कर उनकी लघुता और गम्भीरता को व्यक्त किया गया है । 'सुमरिणतीर्थरुचिशाला' इस पद से नदी के दोनो किनारो पर मरिणजटित शिलाखण्डो की सुषमा की अभिव्यक्ति की गई है, अत एव रात्रि मे तटो पर विहरण की अयोग्यता भी स्वतः अभिव्यक्त है । 'सरयूतटविहारवर्णन' नामक चतुर्दश सर्ग अत्यन्त सक्षिप्त है । सखी- समुदाय के साथ राम जिस समय सरयू नदी मे अवगाहन करने के लिए चलते हैं, तो उसका वर्णन करते हुए कवि कहते है.- सहचरीसमुदायसमन्वित. शयसरोजगृहीतधरासुतः । सुखदसारववारि विगाहितुम् प्रचलति स्म ततो रघुनन्दन ॥१॥ पुनवच- सरयूजले जानकोजानि, विहरति रमणीगरणकृतरतिरिह, सवसिंधुरुचिहानि: ॥१॥ जलावगाहनक्रीडा का कोई विस्तृत वर्णन प्रस्तुत नही किया गया है। सखियो से परितः प्रावृत राम की शोभा ४-५ श्लोको मे निरूपित है । यथा- कुण्डल-सम-ललनालिमण्डितो घन इव चपलामाल. । विश्वनायनाथोऽतिकौतुक कुरुते परमविशाल ॥४॥ -- २२ } "සිසිපිළිසිවැrerrerer විසිවැrer - පරිදිළිදිළිසුළිසුළිසිදer सङ्गीतरघुनन्दनम् - पन्द्रहवां सर्ग स्नान के पश्चात् सीतासहित राम के आगमन से प्रारम्भ होता है। उत्थाय रामो जनकात्मजाया पारिंग गृहोत्त्वा परमादरेण । शुभ्राऽऽतपत्रेरणं विरोचमानो निकेतन-प्रांगणमाजगाम ॥२॥ तत्पश्चात् स्वर्णमयी वेदिका से युक्त, वह्निमण्डल, सूर्यमण्डल एव चन्द्रमण्डल की शोभा से युक्त परम सुन्दर प्रागार का निरूपण किया गया है, जहाँ राम सदैव रासविधान मे तल्लीन रहते हैं- अथ निजपरमागारे विकसित-कमलालयाकारे । रामो रासविधान मुदा सखीभिः सनातनुते ॥१॥ प्रमुख सखियो का नामोल्लेख करते हुए कविं कहते हैं कि इसके पश्चात् सौ सखियो का मण्डल, उसके परित दशशत सखिमण्डल, इस प्रकार लाख, दश लाख और करोडो की संख्या मे सखियाँ दिग्विदिक् मे विद्यमान हैं। अर्थात् इस रासविधान मे राम करोडो सखियो द्वारा कुण्डलित हैं, परावृत है । इस सर्ग में न केवल प्रमुख सखियो का नामनिर्देश किया गया है, प्रत्युत उनकी कुण्डलाकार स्थिति का भी निरूपण प्रस्तुत है; अत एव प्रकृत सर्ग का 'सखी- स्थिति और सख्यावर्णन', जो यह नामकरण किया गया है, वह उचित ही है। अन्तिम सर्ग १६वे मे कवि-ने इस ग्रन्थ के माहात्म्य को प्रदर्शित करते हुए 'अतिदुस्तरदु खाकरभवसागरतारिन्' 'अमलयश प्रसारिन्' 'भूतिविबर्द्धन' आदि विभिन्न समासबहुल विशेपणपदो द्वारा राम के चरणकमलो मे प्रणति समर्पित करते हुए अघोलिखित मनोवाञ्छा के साथ इस काव्य की इतिश्री की है- एषा माधुर्यधारा धररिणतलगता विश्वनाथप्रचारा, भास्वत्सन्तानतारा परिवृढविशध्यानसन्धानसारा । पापौघोदचदाराभवजलधिसमुत्तारणे नौरुदारा, शृङ्गारकप्रसारा जयति परगुणग्राहकस्वान्तकारा ।। सगोतरघुनन्दन का प्रेरणास्रोत-इस काव्य के प्रेरणास्रोत के विषय मे जयदेवकृत 'गीतगोविन्द' का प्रारम्भ मे भी उल्लेख किया गया है। प्रधान रूप से समालोचना [२३ 20-220222222252202522-222322 इस कृति का प्रेरणास्रोत गीतगोविन्द रहा है और इस तथ्य को परिपुष्ट करने वाले प्रबल प्रमाण भी विद्यमान हैं। हो सकता है कि गौरणरूप से कवि ने अन्य कृतियो से भी यत्किञ्चित् प्रेरणा ग्रहण की होगी । काव्यचारुत्व एव कविकर्म- कुशलता की दृष्टि से इस काव्य को हम गीतगोविन्द की समकक्ष कोटि मे नही रख सकते, तथापि इसे सर्वथा अनुकृति भी नही कह सकते, क्योकि कवि ने यत्र-तत्र अपनी नैसर्गिक प्रतिभा का भी प्रदर्शन किया है। एक उत्कृष्ट काव्य का अनुकरण करना एव उससे प्रेरणा ग्रहण करना काव्यजगत् मे स्वाभाविक है । यह कोई दूषण नही है । हा, यदि अबुद्धिमत्ता के साथ अन्धानुकरण किया जाता है, तो वह दूषण अवश्य है । अन्यथा, पूर्ववर्ती श्रेष्ठकाव्य परवर्ती काव्यों के लिए प्रेरणास्रोत होते ही है। जिस प्रकार जयदेव ने कृष्णरासक्रीडापरक उपकाव्य की रचना की है, उसी प्रकार कवि विश्वनाथसिंह ने रामरासक्रीडापरक संगीतरघुनन्दन की सर्जना की है । गीतगोविन्द के प्रेरणास्रोत होने की प्रामाणिकता इस काव्य के प्रथम सर्ग में ही सिद्ध हो जाती है, जहाँ कविवर विश्वनाथसिह जयदेव को पद्धति का अनुसरण करते हुए अष्टपदियो द्वारा श्रीराम की स्तुति करते हैं । अपि च, काव्य का नामकरण भी 'गीतगोविन्द' के अाधार पर किया गया है। 'गीत' के स्थान पर सगोत कर दिया गया है और गोविन्द के स्थान पर रघुनन्दन कर दिया गया है, जो कि विपयभेद की दृष्टि से सर्वथा आवश्यक है । 'सगीत- रघुनन्दन' की अष्टपदियो मे 'गीतगोविन्द' के अनुकरुणसाम्य के कतिपय स्थल अवलोकनीय हैं--- प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम्, विहितवहिनचरित्रमखेदम्, केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ।। ध्रुवम् ॥१॥ (गीतगोविन्द) इसी प्रकार 'सगीतरघुनन्दन' मे भी- नृपबोधददक्षितिपालनकारी, प्रलयपयोधिसलिल-संचारी, श्रीरघुवर सोनसुरूप जय जगदीश पते ॥१॥ (सगीतरघु०) - २४ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् e-are-Ê2 re-errer - - -සිවකු සිසු-සැසසිසyer සීසීසීr पुनश्च वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना, शशिनि कलडकलेव निमग्ना, केशव धृतशूकररूप जय जगदीश हरे ॥३।। (गीतगोविन्द) रदशिखरे धरणी तव लसति विशाला, गिरिशगिरा विवधन धनमाला, श्रीरघुवर शूकररूप जय ।।३।। (सगीतरघुनन्दन) और भी- वेदानुद्धरते जगन्निवहते भूगोलमुद्विभ्रते, दैत्यान्दारयते बलि छलयते क्षत्रक्षय कुर्वते । पौलस्त्य जयते हल कलयते कारुण्यमातन्वते, म्लेच्छान्मूर्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्य नम ॥ (गीतगोविन्द) इसी प्रकार सगीतरघुनन्दन मे भी राम की विविध लीलाओ से सम्बन्धित उदाहरण देखिए- मोनाद्या दधते तनूर्दलयते दैत्यान् सतो रक्षते, घर्मानाचरते स्मृती रचयतेऽधर्म निराकुर्वते । भक्तान् भावयते यशो जनयते बारणान् धनुबिभ्रते, साकेतप्रमदावने विहरते रामाय तुभ्य नमः ।।१०।। गीतगोविन्द के इस सर्ग मे अष्टपदियो द्वारा कवि ने जिस क्रम से कृष्ण के विभिन्न रूपो का वर्णन किया है, कवि विश्वनाथसिंह ने भी सगीतरघुनन्दन, में राम के उन रूपो का वर्णन उसी क्रम से प्रस्तुत किया है । किन्तु, विश्वनाथसिंह इतने रूपो से संतुष्ट न रहकर आगे राम के कुछ और रूपो का भी निरूपण करते हैं, जो कवि की मौलिकता का परिचायक है । गीतगोविन्द के आधार पर कवि ने श्रीराम के स्वरूप का ध्रुवपदो द्वारा भी निरूपण किया है। द्वितीय सर्ग मे भी जयदेव की काव्य-कला के साम्य के उदाहरण प्राप्य है। काऽपि विलासविलोलविलोचनखेलनजनितमनोजम्, काऽपि कपोलतले मिलिता लपितु किमपि श्रुतिमूले । श्लिष्यति कामपि चुम्बति कामपि कामपि रमयति रामाम् ।। (गीतगोविन्द) A 1 - समालोचन [ २५ =-=-=-=-=-=re ,e-2-ස,විවිද විවිව-ව-ව-ක-ව-සවියළි-ව-ව-ව-ප- सगोतरघुनन्दन मे भी इसी तरह के उदाहरण हैं । गायति काचन नृत्यति काचन रमयति काचन रामम् । कापि चे नृत्यति कापि च धटयति कापि च पटयति कामम् ।। इतना होने पर भी रामसम्बन्धी रसिक काव्यो की परम्परा मे कवि विश्वनाथसिंह की विशिष्ट देन है । कृष्णरासक्रीडापरक काव्यो की सुलभता एव अनुकूलता सब को ग्राह्य है, परन्तु रामरासक्रीडापरक काव्यो का स्वरूप इतना विकसित व सर्वजनज्ञात नही है, क्योकि राम का मर्यादापुरुषोत्तम के रूप मे ही प्रायशः चित्रण हुआ है। कृष्णसाहित्य की इस परम्परा का रामसाहित्य मे भी निर्वाह करना कवि विश्वनाथ को अमूल्य देन है। कवि ने जयदेव के गीतगोविन्द से प्रेरणा ग्रहण कर अपनी मौलिकता के द्वारा गीतगोविन्द की अपेक्षा इसे विस्तृत रूप दिया है अर्थात् सर्गों की संख्या अधिक है और कुछ सर्ग गीतगोविन्द की अपेक्षा नूतन भी हैं । जहाँ तक साहित्यिक कसौटी का प्रश्न है सब काव्य समकक्ष नही हो सकते, तथापि रामसाहित्य की मर्यादापुरुषोत्तम' के रूप मे परम्परा के धन- पटल मे रसिकशिरोमणि के रूप मे परम्परा की विद्युत् उसकी शोभाधायक ही है । काव्य मे रामसाहित्य के एक अविकसित स्वरूप के विकास मे योगदान है, अतः यह दूषण न होकर भूषण ही है । . काव्यविधाः-गीतगोविन्द के अवलोकन से इस काव्य की विधा का प्रश्न भी हल हो जाता है । अन्यथा विभ्रम की सी स्थिति हो जाती है कि यह महाकाव्य है या खण्डकाव्य, गीतिकाव्य है या दण्डक । वस्तुत यह न तो महाकाव्य है और न खण्डकाव्य, न यह गीतिकाव्य है और न अन्य ही, अपितु गीतगोविन्द की भाँति यह भी एक 'उपकाव्य' है । अलङ्कारप्रयोगः- इस काव्य में प्रयुक्त विभिन्न अलङ्कारो के कतिपय उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं। प्रस्तुत काव्य में प्रयुक्त विविध अलङ्कारो के कारण कवि विश्वनाथसिंह के काव्यशास्त्रविषयक पाण्डित्य का आभास प्राप्त होता है । वस्तुस्थिति यह है कि प्रस्तुत कृति के आलोचन से विश्वनाथ सिंह मे कविजनोचित सहज प्रतिभा के साथ अलङ्कारशास्त्र का पाण्डित्य अधिकमात्रा में प्रतीत होता है । शब्दकोश की दृष्टि से वे धनपति कुवेर के समान अक्षय्य निधि- वाले हैं। इनके द्वारा प्रतिसर्ग में प्रयुक्त नूतन समृद्ध शब्दावली उनके श्रमसाध्य - २६ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् සිදුළමිළදි සිසුවිළිඅවිදerළි සිදුවූ සිසුසිසිලස"-සි गहन पाण्डित्य की परिचायिका है । प्रस्तुत काव्य मे कवि द्वारा उपमा, रूपक, सहोक्ति 5-तद्गुण, उत्प्रेक्षा, प्रतीप, सन्देह, काव्यलिङ्ग, श्लेपानुप्राणित रूपक श्रादि विभिन्न अलङ्कारो का प्रयोग किया गया है । कतिपय उदाहरण प्रस्तुत है- १ उपमा- "प्रस्फुट सुन्दर साम्यमुपमेत्यभिधीयते"। उदाहरण- प्रचुरपरागपूरपरिपूरितकटिमितसलिलसुललिता। मिलितमीनमीनाककेतुसमतुंगतरगतरलिता ॥ २ रूपक- तद्रूपकमभेदोय उपमानोपमेययोः । उदाहरण- हरिचन्दनघनसारस्पर्शी विरहशिखी। दहति रश्मिभिस्तनुं दिनेशश्चन्द्रमिषी ॥ (दशम सर्ग) ३. सहोक्ति-अलड्डार- सा सहोक्तिः सहार्थस्य बलादेक द्विवाचकम् । उदाहरण- रघुनन्दनगुणगानाइद्भुतप्रभाव जनकपुत्री च । युगपद्विलोक्य ससुख वसन्तिका सजगादेदम् । (५ सर्ग) ४ काव्यलिङ्ग- काव्यलिङ्ग हेतोर्वाक्यपदार्थता । यथा- कापि मेघरमरणीयरागतो वर्षात्व दर्शयते । नायकनयननवीनघनेन च सुखनीर वर्षयते ॥५॥ ५ प्रतीपालटार- प्राक्षेप उपमानस्य प्रतीपमुपमेयता । तस्यैव यदि वा कल्प्या तिरस्कारनिवन्धना || “यथा दम्पतिच्छविसम्पतिवलितविभोत्पत्तिसुखेक्षरणम् । उत्तुंगतरलतरङ्गयुतगङ्गादिजलधिविलक्षणम् ।। (नवम सर्ग) बहुरङ्गमरिणमयहसकीरककपोतपोतकशोभिता । सङ्कुलितकल्पलतादिरचना विवुधवनवयोतिता ।।
. समालोचन [ २७ 2Êසිසි,සිසි,සිසි, 2,22222222- සු-සිසු2- ६. उत्प्रेक्षा- यथा- सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत् । वरतारतोरणवलितवरणद्वारवारविमोचिता। मरिगजटितहाटकमयकपाटोदारदीप्तिसमञ्चिता ॥३॥ समग्रतया, कविवर विश्वताथसिंह की प्रतिभा बहुमुखी है, यह उनकी विविध रचनाओ से ही प्रमाणित हो जाता है। कवि ने अपनी प्रतिभा द्वारा हिन्दी व सस्कृत दोनो साहित्यिक क्षेत्रों मे विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है । कवि विश्वनाथसिंह के साहित्यिक क्षेत्र मे दो रूप है-एक कवि और दूसरा टीका- कार । इनके द्वारा रचित टीकाग्रन्थो की भूयसी सख्या है। संगीतरघुनन्दन काव्य मे कविवर अपने दोनो रूपो मे उपस्थित होते है । सगीतरघुनन्दन के मूलभाग के साथ-साथ कवि ने व्यग्यार्थचन्द्रिका-नामक टीका द्वारा अपने प्रति- पाद्य को विशदरूपेण स्पष्ट कर पाठक की कल्पना के लिए अवकाश कम कर दिया है । सस्कृतसाहित्य मे ऐसे कविवर विरले एव अगुलिगण्य ही हैं जिन्होने अपनी मूल रचना के साथ-साथ उसकी टीका भी प्रस्तुत की हो । एक दृष्टिकोण से यह कवि के लिए भूषण स्वरूप है क्योकि ऐसी टीका से सामान्य अध्येता उसे सहजतया समझ सकता है। अन्यथा सौभाग्य से यदि तत्तत्शास्त्रविज्ञ अधिकारी विद्वान् की मूल को सही रूप मे समझाने वाली टीका मिल जाती है, तो उसका सहारा लिया जाता है। परन्तु ऐसे ग्रन्थ, जिन पर न तो मूल लेखक की टीका प्राप्त है और न अन्य प्रामाणिक विद्वान् की टीका उपलब्ध है, कठिन स्थलों को प्राथमिक अध्येता के लिए अधिकारी विद्वान् की सहायता के बिना उसे समझना एक दुष्कर कार्य हो जाता है । अतः सगीतरघुनन्दन की व्यग्यार्थ- चन्द्रिकानामक टीका के लिए पाठको की ऋणता सदैव बनी रहेगी। प्रस्तुत काव्य की टीका मे यत्र-तत्र 'श्रीमते रामानुजाय नम.' यह उक्ति प्राप्त होती है । जिससे प्रायः निश्चित है कि टीका का प्रतिलिपिक विशिष्टाद्वैत के प्रबल समर्थक श्री रामानुजाचार्य के भक्तवर्ग से कोई था । - - है कुछ और शब्द मूल ग्रन्थ को हमने प्रस्तावना, समालोचन एव अनेक परिशिष्टादि से भूषित किया है । कविरचित व्यड्यार्थकौमुदी-टीका भी ऐसे अनेक सन्दर्भो से कुछ कम शोभित न थी। टीका का अन्तिम श्लोक सुनते ही बनता है एषा माधुर्यधारा धरणितलगता विश्वनाथप चारा, भास्वतसन्तान-तारा-परिवृढविशदध्यानसन्धानसारा । पापौधोदञ्चदारा भवजलधिसमुत्तारणे नौरुदारा, शृङ्गारकप्रसारा जयति परमुखद्रावकस्वान्तकारा ।। फिर भी सुधार के लिये स्थान सदा रह ही जाता है। कुछ नये गंधो के समिश्रण से कस्तूरिकामोद को जैसे एक नया मोड दिया जा सकता है, उसी तरह सङ्गीतरघुनन्दन को भी । गीतगोविन्द मे गले की गीति अत्यन्त मोहक है । सङ्गीतरघुनन्दन मे चरणचालन द्वारा उत्पन्न रणन श्रोता को मुग्ध करता है। साथ ही अलङ्कारो के सार्थक प्रयोग भी ध्येय है। सरयू का किनारा सजीव हो उठता है । एक नवीन जीवन उसे स्फुरित करना है । कही उसमें श्रीमद्भागवत की, तो कही, गीतगोविन्द की ध्वनि निकलती है । ये तथ्य प्राया सबको ज्ञात हैं । पाटन के स्वामी, चौलुक्य राजा सगीत के प्रेमी थे । पराजित होकर जब वे रीवा-प्रदेश मे पहुचे तो सरस्वती ने उनका साथ दिया। कहा जाता है कि तानसेन रीवा के दरबार मे रहा था और श्रीरामचन्द्रसिंह भी अच्छे रामभक्त और सगीतप्रेमी थे। विश्वनाथ सदा अपने को श्रीरामचन्द्र-कृपा का अधिकारी लिखते हैं. इससे यह सम्भावना होती है कि विश्वनाथसिंह राम भक्त वन चुके थे। किसी अश मे यह भक्ति उन्हे अपने पिता जयसिंह से विरासत. मे मिली होगी और इसी कारण वे हिन्दी और संस्कृत के अच्छे विद्वान थे। यह भी कहा जाता है कि ये षडक्षर राम-मत्र के साधक थे। यह भी सम्भव है कि आगे जा कर इन्होने भगवान् के निर्गुण- स्वरूप पर लिख कर उसे भी प्रकाशित किया हो। यह भी कहना ठीक हो सकता है कि यह विश्वनाथसिंह के आध्यात्मिक विकास की एक सीढी थी। इन्होने भगवान् के निर्गुण और सगुण इन दोनो रूपो की अनुभूति की होगी। यह विकास की धारा लगातार चली और चल रही है और इसी के प्रभाव से बाघेल-वश मे श्री रघुराजसिंह, गुलाबसिंह, मार्तण्डसिंह आदि वीर एव अध्यात्म-प्रेमी महाराजानो की उत्पत्ति हुई है । श्रीविश्वनाथ का आनन्दरघुनन्दन नाटक यदि विश्वनाथसिंह की सबसे प्रसिद्ध कृति है तो सस्कृत सङ्गीतरघुनन्दन भी आकार मे कुछ छोटा नही, अनेक रचनायो से गुणत. बडा ही है । आशा है कि विद्वान् इसे समुचित प्रतिष्ठा प्रदान करेंगे। दशरथ शर्मा - -- - श्रीविश्वनाथदेवप्रणीतम् सङ्गीतरघुनन्दनम् व्यङ्गवार्थचन्द्रिकाख्यया स्वोपज्ञव्याख्यया संवलितम् । MARKALAR प्रथमः सर्गः [ मङ्गलाचरणम् ] ॥ श्रीमते रामानुजाय नम ॥ उपल - बन्दे तत्पदकमल यस्य मकरन्द पुनाति जगदखिलम् । परागलेशश्चेतनतां शीघ्रमानयति ॥१॥ राजेन्द्रनन्दनविलोचनचञ्चरीक- ससेव्यमानवदनाम्बुरुहां सखीभि । स्वीयप्रभाजितरमारुचिभि परीतां, रासेश्वरी हृदि भजे निमिराजपुत्रीम् ॥२॥ अशेषाज्ञानतिमिरविध्वसनदिवाकरम् । श्रीरामरासरसिक जगत्प्रारणसुत नुम. ॥३॥ शारदाम्भोजवदनां शारदेन्दीवरेक्षणाम् । नमामि शारदान्देवी शारदेन्दुकरप्रभाम् ॥४॥ सिन्दूरपूरादरुणकलाधरकलाधरम् । सध्याम्बरमिवावन्दे गाणेश्वरमहं वपुः ॥५॥ सीतारामरहस्य मां बोधयन्ति हृदम्बुजे । स्थितांस्तान्हरिरूपाञ्छीप्रियादासगुरून् भजे ॥६॥ नत्वा गौरीशपादाब्ज टीका व्यंग्यार्थचन्द्रिका। श्रीरामरासरसिकविनोदाय विधीयते ॥७॥ - - १. ख. गणेश्वरमहा । २. क. हृदाम्बुजे ।
२] सङ्गीतरघुनन्दनम् अस्य व्याख्येयग्रन्थस्य परमोत्तमत्वम्, यद्यपि काव्यप्रकाशे उत्तममध्यमाधम- भेदात्काव्यस्य त्रैविध्यमेवोक्तम् । तथा हि- इदमुत्तममतिगयिनि व्यग्ये वाच्याद् ध्वनिर्बुधै कथितः । अताहगि गुणीभूतव्यग्ये' व्यग्य' तु मध्यमम् । शब्दचित्र वाच्यचित्रमव्यग्य त्ववर स्मृतम् । इति । तदुदाहरणानि च- नि शेपच्युतचन्दन स्तनतट निम॒ष्टरागोऽधगे नेत्रे दूरमनञ्जने पुलकिता तन्वी तवेय तनु । मिथ्यावादिनि ! दूति । बान्धवजनस्याज्ञातपीडागमे । वापी स्नातुमितो गतासि न पुनस्तस्याधमस्यान्तिकम् ॥११॥ ग्रामतरुण तरुण्या नववजुलमञ्जरीमनाथकरम् । पश्यन्त्या भवति मुहुनितरा मलिना मुखच्छाया ॥२॥ स्वच्छन्दोच्छलदच्छकच्छकुहरच्छातेतगम्वुच्छटा- "मूछन्मोहमहर्षिहपविहितस्नानाह्निकाह्नाय व । भिद्या दुद्यदुदारदर्दुरदरीदीर्घारिद्रद्रुम, 'द्रोहोद्रेकमहोमिमेदुरमदा मन्दाकिनी. मन्दताम् ॥३॥ विनिर्गत मानदमात्ममन्दिराद्, भवत्युपश्रुत्य यदृच्छयापि यम् । ससभ्रमेन्दुद्रुतपातितार्गला, निमीलिताक्षीव १ मियामरावती'२॥४॥ तथाप्यत्र प्रतिश्लोक ध्वनिभिर्वनीनामुद्भवात् १३ परमोत्तमत्वमित्युक्तम् । तदुक्तमलद्वारकौस्तुभे- 'वनेर्वन्यन्त रोद्गारे तदेव ह्य त्तमोत्तमत्वम् । इति । अथ चमत्कृतरामायणादिभाषाग्रन्थेष सर्वसिद्धान्तादिसस्कृतग्रन्थेषु १५ च यथा मया व्यग्यार्थो भावश्च रक्षितस्तथा न श्रूयतेऽत इद सङ्गीतरघुनन्दननाम स्वल्प । १ क व्यन्यं । २. क व्यग्ये । ३ क. मध्यम् । ४. के वदन। ५ क नववजुल० । ६ स च्छातेतरी वृच्छटा। ७ ख मच्छन्मोह-स्नानाह्निकालाय च । ८ ख ०दरिद्रुमा । ६ ख द्रोहद्रिक० । १०. ख पदच्छयापि । ११ स्व निमिलितोक्षीव। १२ ख नियामरावती । १३. व्यनिन्निव नीनाद्भवात् । १४ ख. परमोत्तमत्त । १५.स सर्वसिद्धांदि० ।
प्रथमः सर्गः ३ nii - च । ग्रन्थमवगत्य ग्रन्थविस्तरभयादलङ्कारादिविवेचनमपहाय सक्षेपतो गूढमगूढमिति द्विविध व्यंग्यं भाव च दर्शयन्नर्थमात्र करोमि । अनयैव रीत्या अन्येष्वपि ग्रन्थेषु व्यंग्यादि सद्भिर्विलोकनीयम् । ननु क्थ स्वमुखेन स्वकृत ग्रन्थ प्रशससीति चेच्छृणु । मन्दस्य मम कथमीदृशग्रन्थकरणसामर्थ्य, रघुनन्दन एव मदन्तः प्रविश्य निज 'चरितमुच्चरितवानतस्तत्कृतस्य [ग्रन्थस्य प्रगसा कृता । नन्वस्य ग्रन्थस्य रधुनाथप्रणीतत्वे तत्र-तत्र विश्वनाथकृतत्वोत्कीर्तनविरोध- स्तस्य] विघ्नशङ्काभयान् मङ्गलाचरणाऽसगतिश्चेति, चेन्न, मन्मुखोद्गतत्वेन' मत्कृतत्वोत्कीर्तनसगते. मन्मुखोद्गतत्वनिर्विघ्नत्वाय शिष्टाचारप्रदर्शनाय च मङ्गलाचरणोपपत्तेश्च । अथ ग्रन्थस्य प्रकटन चिकीर्षुर्मङ्गलमाचरति । ॥ श्रीजानकीवल्लभाय नम ॥ रामप्रेमपयोधिवर्द्धनविधु शृङ्गारसारास्पद , ससारार्पवदासतारपतरिर्मायातमोदीपिका । विद्युद्भा सुखवृन्दवर्षरणकरो कादम्बिनो काप्यसौ, मद्धृत्कञ्जनिवासिनी विजयतां श्रीजानकी सर्वदा ।।१।। रामप्रेमेति । रामस्य प्रेमैव पयोधि. समुद्रस्तस्य वर्द्धने विधुश्चन्द्र , शृङ्गारस्य यः सारस्तस्यास्पदं निवासस्थान, ससार एवार्णव समुद्रस्तस्माद्दासस्य तारणे तरिका, मायैव तमोऽन्धकारस्तस्य दीपिका, यथा दीपिका प्रसिद्धमन्धकार नाशयति, तथेयमपि माया नागयतीत्यर्थ । विद्युत्तद्वद् भा यस्या. सा, सुखवृन्दस्य वर्पणकरी, मद्धृत्कञ्जनिवासिनी मम हृदयकमले निवसनशीला, कापि प्रसिद्ध- कादम्बिनीतो विलक्षणा कादम्बिनी मेघमाला, एवम्भूता असौ श्रीजानकी सर्वदा विजयता निजोत्कर्ष प्रकटयत्वित्यर्थ. । अत्र मद्धृत्कजनिवासिनीति पदेन मद्धृदये निवसन्त्येतद्गुणविनिष्टा श्रीजानकी मदहृदयोद्गत" काव्यमप्येतद्गुणविशिष्ट करोत्विति व्यज्यते । तेन चैतद् ग्रन्थस्य परमोत्तमत्वम् । अत्र वक्तृवोद्धव्य- वैशिष्टयजन्यपदप्रधानार्थशक्त्युद्भववस्तुना१२ वस्तुध्वनि:१३ । अत्र वक्ता कविस्तत्र वैशिष्टय च सीताराम रासविषयकप्रेमरूप प्रमाणान्तरवेद्य १४ तत् तस्मात्तथा च - १० १ ख त्वरितमुच्चरिवान् । [-] कोष्ठबद्धोंश ख पुस्तके नाऽस्ति । २. ख विघ्नसकाभान् । ३. ख मन्मुखोद्गततेन । ४. ख. शिष्टाचार प्रदर्शनाय । ५. ख शन्मुखोद्गतत्वनिर्विघ्नत्वाय । ६ ख. चरणोपपलेश्च । ७. ख. सारस्पद । ८. ख० तारणारि। ६ ख. विद्युत इव । १० ख मम हृदये। ११. ख. मम हदयो० । १२. व. ०शतुद्भववस्तुना । १३. ख. वास्तुचनि । १४ ख प्रमारणान्तवेद्य ।
४ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् । कविना बोद्धव्या प्रतिपादनीया श्रीजानकी । तत्र प्रमाणान्तरवेद्यमभीष्टदा- तृत्वरूप वैशिष्टय, तस्मात्तज्ज्ञानवता श्लोको यातस्यार्थस्य मम काव्यमेतद्गुण- विशिष्ट कुवित्यन्यार्थबुद्धिहेतुव्यापारो व्यञ्जनावृत्तिः ।।१।। कोा. कोतिरथो भुवोऽपि च तथा भू श्री श्रियश्चोत्तमा, ल्लादिन्यादिसुशक्तिसेवितपदा मायादिकस्वासिनी । सर्वेषामपि कामदो रघुपतिस्तस्यापि या कामदा, सा सीता नयतां मदीयरिणति रासेश्वरी चारुताम् ।।२।। 'कीतिरिति । कीर्त्या लीलादेव्या अपि कीत्तिः लीलादेवी तथा भुव. भूदेव्या अपि भूः भूदेवी तथा श्रियः श्रीदेव्या अपि उत्तमा श्रीदेवी तथा च वाल्मीकीये "श्रिय. श्रीश्च भवेदग्या कीर्त्या' कोत्ति ३ क्षमा क्षमेति'। तथा ह्लादिन्यादयो या सुशक्तयश्चतन्यशक्तयस्ताभि सेविते पदे चरणे यस्या. सा, माया आदिर्यासा ता मायादिका जडाक्त यस्तासा स्वामिनी प्रवर्तनकी । सर्वेषामपि कामदो रघुपति श्रीरामचन्द्रस्तस्यापि सर्वकामप्रदम्यापि, या कामदा कामदात्री सा रासेश्वरी सीता मदीयभरिणति चारुता माधुर्यादिगुणसम्पन्नतां नयता प्रापयतु । अत्र सीतापदस्यायमर्थ सा च लक्ष्मी. प्रकीतिता। अकारो वासुदेव स्वादाकारश्च पितामाह , ऐकार स्यान्महेश्वर। इति एकाक्षरकोशात् । सा च अश्च प्राश्च ऐश्च-एषा समाहार 'सि' लक्ष्मी- वासुदेवपितामहमहेश्वरम्, तदिता [अन्तर्यामितया प्राप्ता सीतेति सीतापदस्येद व्यग्यम् । सर्वान्तर्यामिविष्णोरप्यन्तर्यामितयासर्वा] ऽन्तर्यामित्वमिति । तेन च हृदि मा प्रेरयित्वेम ग्रन्थ प्रादुर्भावयत्विति व्यज्यते । अत्र वक्तृवैशिष्टयजन्यपद- प्रधानशब्दशक्त्युद्भववस्तुना प्रार्थनारूपवस्तुध्वनि' । अत्र कीर्त्याः कीत्तिरित्यादि- विशेषणस्तत्प्रेरितमन्मुखप्रक्रटितकाव्यमपि कीर्तिकर्तृ तथा भूप्रद तथैश्वर्यप्रद तथा निवृत्तिकारि तथा कामप्रद करोत्विति व्यज्यते । तेन च ग्रन्थस्य जगदुपकारक- त्वमिति । रासेश्वरीति पदेन च मदीयहृदये रास प्रकटयत्विति व्यज्यते ॥२॥ सर्वक्लेशमृगालपाटनपटुर्मत्तेभराजो बली, सीतारामवियोगवह्निशमन सावर्त्तको वारिद । १ स कोा कीत्तिरिति । २. ख कीर्ताः। ३ ख प्रशोऽय नास्ति। ४ ख प्रवर्तनकश्री। ५ ख नास्त्यमशः । [-] कोष्टकगतोश ख पुस्तके नाऽस्ति । ६ ख प्रादुर्भावविति । ७ प ०काव्यमयी।
प्रयम सर्गः [५ सौमित्रिक्षतराजरोगदमनो धन्वन्तरिर्वद्यराट्, नाम्ना श्रीहनुमान्सुरासरसिको मां सर्वतो रक्षतात् ॥३॥ श्रीरामचरितवर्णने मुख्यं विघ्नविनाशन हनुमन्त प्रार्थयति सर्वक्लेशति । सर्वे ये क्लेशाः अथवा सर्वेषां ये क्लेशा. त एव मृणालानि कमलमूलानि तेषां पाटने उन्मूलने पटुः प्रवीण , बली मत्तेभराजः मत्तगजराजः । सीतारामयोर्यो वियोग., स एव वह्निः तस्य शमनः गान्तिकर्ता, सावर्त्तकः प्रलय- कालिक, वारिदो मेघ । सौमित्रिलक्ष्मणस्तस्य क्षत रावणप्रहृतशक्तिजनित तदेव राजरोग राजयक्ष्मा तस्य दमनः, वैद्यराट् धन्वन्तरि. । एवम्भूत. नाम्ना श्रीहनुमान हनुविद्यते यस्य स हनुमानत्र प्राशस्त्यार्थे मतुप्, दृढहनुरित्यर्थ । सुरासरसिक: सुन्दरो रासस्य रसिकः सर्वतो मां रक्षतात् । अत्र सकलक्लेशाना हनुमत्सा- मपिक्षया कमलमूलवत्' कोमलत्वं व्यज्यते । तेन च तन्नाशने हनुमतोऽत्यनाया- सतेति । मृगगालोन्मूलने लघवोऽपि जीवा. समर्थाः भवन्ति, तत्र गजराजः, सोऽपि मत्त , स पुनर्बलवान् समर्थो भवतीति किमु वक्तव्यमिति भावः । किञ्च गजो यावन्मात्रस्थल करेण प्राप्नोति, तावन्मात्रस्यैव मृणालान्युन्मूलयति न तु सकलतडागस्य । भवांस्तु यदीच्छेत्तदा सबलससारस्य क्लेशान् युगपदेव निर्मूलये- दिति पटुताविशिष्टविलक्षणगजराजरूपकतया व्यज्यते । यतो भवानस्मत्स्वामिनोः सीतारामयोवियोगवह्नि शमितवानतस्तद्दासस्य ममापि तयो साक्षादर्शनरूप- वियोग गमयेति सीतारामेत्यादिवाक्येन व्यज्यते । पुरा शक्तिविद्वलक्ष्मणरक्षणात् श्रीरामस्त्वयि परमप्रसन्नोऽभूत, सम्प्रति तस्यैव दासोऽहमपि हृदयलग्नयाऽज्ञान - रूपशक्त्या मोहितस्ता दूरीकुर्याश्चेत्तहि पुनरुपकारेण श्रीरामस्त्वय्यतिप्रसन्नो भविष्यतीति सौमित्रीत्यादिना व्यज्यते । हनुमानित्यनेन वीराङ्कयुक्त , तेन च स्वामिनो वीरयोद्धास्तीति व्यज्यते ।।३।। -- २ - वीणापुस्तकहस्तमस्तकविधु. शुक्लाम्बुजन्मासना, चन्द्रोद्धासविलासहासवदना विद्वज्जनन्दिता । शालव्यस्तसमस्तवेदविदिता विध्वस्तविश्वाज्ञता, दत्तोद्दामधि मामकीनवदने वर्वर्तुं वागीश्वरी ॥४॥ - , १ ख कमललवत् । २ ख यदीक्षेतदा । ३ ०स्तद्दशस्य । ४ ख रक्षतात् । ५ ख ०ज्ञान-1 ६. ख. मोहितास्ता ।
. - । ६ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् mm अथ वागधिष्ठातृत्वात् सरस्वती प्रार्थयति- वीणापुस्तकेति । वीणापुस्तके हस्तयोर्यस्याः सा, मस्तके विधुर्यस्या सा, वीणापुस्तकहस्ता चासौ मस्तकविधुश्चेति कर्मधारय । शुक्लाम्बुजन्म पुण्डरीकम् आसन यस्या सा, चन्द्रस्य उद्भास प्रकाशः तस्येव विलासो यस्य स चाऽसौ हासश्च वदने यस्या सा, विद्वज्जनैर्वन्दिता शास्त्रायादिभिर्व्यस्तैऋगादिरूप समस्तै- यत्र्यादिमन्त्ररूप. प्रणवादिवीजरूपैदैश्च, "वेद प्रणव एवाग्र” इति भागवतोक्ते, विदिता ज्ञाता ब्रह्मस्वरूपिणीत्यर्थ । विध्वस्ता विनाशिता विश्वस्य अज्ञता यया सा, एवम्भूता वागीश्वरी वाचामीश्वरी सरस्वती, दत्तोद्दामा महती धीर्बुद्धिस्मि- कर्मण्येव मामकीनवदने मम मुखे वर्वर्तुं अतिगयेन वर्त्तताम् । वीणापुस्तकहस्तेत्यनेन गाने काव्यादिसकलशास्त्रे च प्रवीणता, तेन च ममाऽकाव्य मधुरता-पदसाधुता- सालङ्कारता-सरसतासम्पन्न करोत्विति व्यज्यते । मस्तकविधुरिति कमलासनेति- विशेषगद्वयेन आह्लादकत्व तापनिवर्तकत्व च यथा त्वय्यस्ति मदीये काव्येऽपि ते कुविति प्रार्थना व्यज्यते । हासवदनेति विशेपणेन तस्या सदा प्रसन्नता व्यञ्जिता। तया च य. प्रसन्नो भवति स प्रार्थनामात्रेणैव मनोरथं पूरयतीति व्यज्यते । विद्वज्जनवन्दितेति विशेषणेन विद्वासस्त्वत्प्रसादेनैव पाण्डित्य लभन्त इति व्यज्यते। विध्वस्तविश्वाज्ञतेत्यत्र त्वमेव विश्वस्याज्ञान नाशयस्यहमपि विश्वस्मिन्नेवा- स्म्यतो मे न काऽपि चिन्तेति भाव । वागीश्वरीत्यत्राय भाव -वाच सरस्वत्या ईश्वरी रामरासस्था सरस्वती मया प्रार्थिता सती मम मुखे स्थित्वा रामरास- वर्णनचिकीर्षु मामुत्तमवर्णन कारयत्विति रामरासे 'सरस्वत्याः स्थितिरुक्ता सुदर्शनसहितायां तयाहि- वाणी नित्यसखीव्यूहाद्वीणापारिण. समाययो । इति ॥४॥ जयति सच्चिदानन्दघनवरदवरसर्वगुणशालिशृङ्गाररसपालिमूत्ति , सर्वजनवत्सल प्रविगलितमत्सर-प्रेमपाथोधि-पुरुषार्थपूत्ति । सर्वगत-सर्वमत-सर्ववन्दितचरण-सर्वशरणागतोद्धृतिविहारी, गुरुरूपरघुवर श्रीप्रियादास इह विश्वनाथान्तरे गीतकारी ॥५॥ अथ ज्ञानप्रदत्त्वाद् गुरु स्तीति-जयतीति । इह विश्वनाथस्य मम अन्तरे हृदये, गीतकारी गीत सङ्गीतरघुनन्दन नाम काव्यरूपं तत्करणशील., श्रिया । १. प तस्यद । २. रू दक्षोद्दामा । ३ ख प्रवीता। ४. ममापि काव्यं । ५ फ. उत्ता। ६.प. विश्वनायतरे।
प्रयम सर्ग: [ ७ ७ - अथवा सः युक्त प्रिय. अर्थात् सर्वेषां न दासः अदासः स्वतन्त्र इति यावत् । श्रीप्रियश्चासा- वदासश्चेति' कर्मधारय., श्रीप्रियादासनामा गुरुरूपरघुवर. रघुश्रेष्ठः श्रीरामचन्द्रः जयति सर्वोत्कर्पण वर्तते, अर्थान्निजोत्कर्ष प्रकटयति । सच्चिदानन्दघनवरदेषु वरा श्रेष्ठा सर्वगुणशालिनी सकलकल्याणगुणशोभिता शृङ्गाररस: प्रियता भक्तिरूप- स्तस्य पालिनी 'स्वस्मिन्नाचरणेन अन्यत्र प्रचारकरणेन च पालनशीला एवम्भूता मूत्तिर्यस्य स । सर्वजनवत्सल. सर्वेषु जनेषु वत्सल. जनेषु वत्सल. प्रीतियुक्त. अथवा सर्वे जना वत्सलाः प्रीतियुक्ता यस्मिन् स. समदर्शीत्यर्थ. । प्रविगलितमत्सरः प्रकर्षण विगलितो मत्सर. परोत्कर्षासहनं यस्य सः, प्रेम्ण: पाथोधिः समुद्रः प्रेम्ण, पाथोधिर्यस्मात् स. यत्सगाजन' प्रेमसमुद्रो भवतीत्यर्थः, पुरुषार्थाना धर्मार्थकाममोक्षाणां पूतिर्यस्मात् तेपां दातेत्यर्थः, प्रविगलितमत्सरश्चासी प्रेमपाथोधि स च पुरुपार्थपूर्तिश्चेति कर्मधारयः । सर्वगतः सर्वव्यापी, 'सर्वमत. सर्वेपा सम्मतः, सर्ववन्दिते चरणे यस्य सः, सर्वे ये शरणागतास्तेपामुद्धृत्यै विहरणशील । सर्वगतेत्यादिचतुर्णा विशेषणानां कर्म- धारय । वरदवरेत्यस्यायमर्थ - अन्ये वरदातार. सेवातो वर ददति, अयन्तु स्वयमेव तत्र-तत्र गत्वा वर ददातीति, एतेन तस्यातिसौलभ्य व्यज्यते । तेन च दयालुतातिगय इति । एप भक्तावतार धृत्वा मामन्याश्च कृतार्थानकरोदिति कथा लोके प्रसिद्धैव । सर्वजनवत्सलेति विशेपणेन एष कृतेऽप्यपकारे उपकारमेव- करोतीति व्यज्यते, तेन चास्य वैषम्याभाव इति । प्रविगलितमत्सर इति विशेषणेन एप विपक्षस्यापि दोपाननालोच्य प्रसन्नो' भवतीति व्यज्यते । तेन चास्य गुण- ग्राहकत्वमिति । प्रेमपाथोधीत्यनेन मेघा यथा समुद्रान्जलमादायान्यत्र वर्पन्ति तथास्मात् प्रेमाणमादायान्येऽन्यानपि कृतार्थयन्तीति व्यज्यते । पुरुपार्थपूत्तिरिति- विगेषणेन एष एव रचयिताऽतो मम का व्यमपि पुरुपार्थचतुष्टयदायक करिष्यतीति व्यज्यते, तेन च विपयिणामप्यस्य प्रियत्वमिति । सर्वगतेत्यादिना सर्वस्यान्तरे ममैव प्रतिपादने तात्पर्यमस्तीति सर्वगतत्वादपगत्य सर्वतो विरोध परिहृत्य सर्वमत'° स्वीकरोति तत्तद्देवताद्वारफल च ददाति तत एव कोऽपि कस्यापि वन्दन करोतु तत्तस्यैव भवति । उक्तञ्च भारते- -- - ११ आकागात्पतित तोय यथा गच्छति सागरम् । सर्वदेवनमस्कार केशव प्रति गच्छति ॥ + १ ख वदाश्वेति । २. ख. स्विस्मिन्ना० । ३. ख. एतेन च । ४. विपक्षास्यापि । ५ ख. प्रशन्नो । ६. ख च पर । ७. क मेघ । ८. ख पुरुषार्थपूर्ति-1 ६. ख. नम । १०. ख. सर्वमेत । ११ ख. तक्षदेवताद्वारा फल ।
L- ८ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् इति । तत एव कोऽपि कमपि शरण यातु, तत्रोद्धरणसामर्थ्य तस्यैवेति' व्यज्यते । तदुक्तम्- - कर्तृत्व करणत्व च स्वभावश्चेतना वृति । यत्प्रसादादिमे सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया इति। विश्वनाथेत्यादिना यस्य गीत स एव मदन्त.२ प्रविश्य करोत्यतो यथार्थ भविष्यतीति व्यज्यते । सर्वत्र गीते प्रथमचरण ध्रुवपदम । तत्कचिदधिकमात्र क्वचिन्न्यून- मात्र क्वचित्सममात्र सर्वाचार्यकृतौ दृश्यतेऽतोऽत्र दण्डके प्रथमपदे मात्रा- त्रयाधिक्यमदूप्यम् ॥५॥ । शिव हरिचरितसरोवरव्यङ्गकमलरसभृङ्ग । शरण तव चरण भजे ध्यानाश्रितगिरिशृङ्ग ।।६।। अथ श्रीरामलीलापरमरसिक स्वादिगुरु श्रीशिव स्तौति- शिवेति । हरेश्वरित रामायणादिरूप तदेव सरोवर तत्र व्यग्यार्थ एव कमलं, तत्र यो रस आस्वादविशेषस्तत्र भृङ्ग भ्रमरसदृश. श्रीरामचरितव्यग्यार्थरसा- स्वादनेऽतिनिपुण.। ध्यानाय आश्रित गिरे कैलागस्य शृङ्ग शिखर येन एवम्भूत हे गिव । गरण रक्षक तव चरण भजे । ध्यानेत्यादिविगेपणेन एकान्तमास्थाय श्रीरामचरितमेव सर्वस्व ज्ञात्वा तदनुभव करोषीति व्यजितम् । तेनाहमपि सङ्गीतरघुनन्दन करोमि । हे शिव । तदप्यास्वादयेति प्रार्थना व्यज्यते । तेन च ग्रन्थस्य गुरुसमर्पण,x तेन च ग्रन्थस्य कविमनसि सिद्धत्वमिति ॥६॥ गोविन्दगुरुगुरणालीश्रुतिशर्मभवाश्रुमालतीमाल । धृतचन्दिर गुरणमन्दिर लम्बोदर तावक पद वन्दे ॥७॥ 10 । अथ विन्नविवसाय स्वप्नमन्त्रप्रदगुरुपुत्र गणेशं वन्दते-गोविन्देति । गोविन्द- स्येन्द्रियप्रवर्तकस्य श्रीरामचन्द्रस्य गुरवो रामसम्वन्धिनो नृत्यगीतादयो ये गुणा- स्तेपामाल्यः परम्परास्तासा या श्रुति. श्रवणं तस्या यच्छर्म सुख तेन भवानि जातानि यान्यश्रूणि तान्येव मालत्य मालतीपुष्पाणि तासां माला यस्य तत्सम्बुद्धिः। धृतश्चन्दिरश्चन्द्रो येन तत्सम्बुद्धिः । हे गुणाना मन्दिर, गुणनिवास- स्थान, अत एव लम्बोदर, तावक पद बन्दे । अय भाव -गोविन्दगुरुगुणपर- १. इ. तस्यैव वेति । २. ख मदतं । ३. ख. 5 पद । ख. पुस्तके । ४. ख. राससम्बन्धिनो। X-X चिह्नान्तर्गताशस्याभाव.
प्रथम सर्ग. म्परयान्तःकरण पूर्ण 'सुखाश्रुमालतीमालाभिर्वक्षःस्थल पूर्णमस्ति । चन्द्रधार- कत्वेन सकलकल्याणगुणाश्रयत्वेन च ऐहिकपारलौकिकतापनिवर्त्तकस्त्वमसीति । गोविन्देत्यादिविशेपणेन गणेशस्य रासवर्णनश्रवणरसिकत्व व्यजितम् । तेन च तद्विषयकस्य मम ग्रन्थस्यापि श्रवणं कुर्विति प्रार्थनेति ॥७॥ विन्ध्ये रिपुगसिहो जयसिंहो रार्जामहोऽस्ति । तनुते तस्य तनुनू)जो ग्रन्थ सङ्गीतरघुनन्दनाख्यम् ।।८।। अथ ग्रन्थविस्तरण प्रतिजानीते-विन्ध्य इति । रिपव एव गजास्तेपा सिह इव, जयसिंहः जयसिंहदेवनामा, राजमिह राजश्रष्ठो विन्ध्ये गिरी अस्ति', अथवा विन्ध्ये विन्ध्यगिरिसदृशे तमोगहने ससारे रिपवः कामादय एव गजास्तेषा सिंह सिंहसदृश , यमादिभि. राजन्ते इति राजानस्तपस्विनस्तेषु सिंह. श्रेष्ठो जयसिंहोऽस्ति, तस्य तनुज. पुत्रः विश्वनाथसिंहदेवनामा, सम्यगीतो रघुनन्दनो यस्मिन्स सगीत- रघुनन्दन इति श्राख्या नाम यम्य त, ग्रन्थ प्रानुपूर्वीविगिष्टपदसन्दर्भ तनुते विस्तारयति । विस्तारो हि पूर्व सिद्ध म्यैव भवत्यतस्तनुत' इति क्रिययास्य' ग्रन्थस्य पूर्वसिद्धत्व व्यजितम् । तेन चैतदरीत्या रघुनन्दनो रास करोतीति व्यज्यते ॥८॥ . चिरमननसमनुभूतश्रीसीतारामराससंयुक्त.। सद्यो रसिकजनाना हृदयानन्दी भवत्वयं सुचिरम् ।।६।। अथ ग्रन्थकर्त काशीर्दानपूर्वकमनुबन्धचतुष्टय' दर्शयति- - चिरमननेति । अगस्त्यसहिताशुकसहिताहनुमत्सहिताशिवसहिताकोशलखण्ड- ब्रह्मरामायणादीनां श्रीमध्वाचार्यकृतवाल्मीकीयरामायणसन्दर्भस्य च यच्चिरमनन तेन सम्यगनुभूतो यः श्रीसीतारामयोः रासस्तेन सयुक्तस्तद्दर्शनसयुक्त इत्यर्थ । अथ ग्रन्थः रसिकजनाना सद्यो हृदयानन्दी सुचिर बहुकालं भवतु । अत्राधिकारी रसिकोपासकः, विषयो रास सम्बन्धश्च' प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव: प्रयोजन प्रेमलक्षणा भक्तिः ।।६। -- १. ख 'सुखामालती० । २. ख. नास्त्ययमशः । ३. ख असि । ४ ख. तनन । ५ ख. ०स्तनु । ६. ख. निक्रियया० । ७. ख. ०जना । ८. ख. ग्रन्थकर्तृकर्ताशी० । ९. ख. वाल्मीकीरामा० । १०. ख अय । ११. ख. सबश्च । , १०] सङ्गीतरघुनन्दनम् १ ५ - नृपबोधद वेदक्षितिपालनकारी, प्रलयपयोधिसलिलसञ्चारी। श्रीरघुवर मीनसुरूप ! जय जगदीशपते ॥१॥ तत्तदवतार कतलीला' वर्णयन्नवतारिण स्तौति-नृपेति नृपाय सत्यव्रतनाम्ने बोध ज्ञान ददातीति नृपवोधद तत्सम्बुद्धि है, नृपवोषद ' मीनस्य सुष्ट रूप यस्य तत्सम्बुद्धिः, हे मीनसुरूप जगता य ईशस्तेपा" पते श्रीरघुवर वेदक्षित्यो पालनकारी प्रलयपयोघे. सलिलसञ्चरणशीलस्त्व जय निजोत्कर्ष प्रकटय । भक्तिज्ञानाभ्या रहिताय त्वमेव ते दत्वा तदुद्धार करोषीति भावः । नृपवोधदेत्यादिनाऽकरणोपकारकत्व व्यज्यते । तेन च तादृशाय मह्यमपि ते देहीति प्रार्थना व्यज्यते । जयेत्यनेन यस्य तव चरितानि कथयित् शेषादिका असमर्था', स त्वमेव मन्दमतेर्मम हृदम्बुजे स्थित्वा निजगुणवर्णनसमर्थ मा कुविति व्यज्यते । दर्शितप्रलयो मीनरूपभगवान् सत्यव्रतनामान राजान महीमय्यां' नौकायामारोप्य, ताञ्च निजशृङ्गे बन्धयित्वा प्रलयपयोधिसलिले सञ्चचारेति कथा भागवते प्रसिद्धा ॥१॥ जलधिमथनबहुखिन्नसुरासुरपाता, जलतलयातमन्थनगधाता। श्रीरघुवर कमठसुरूप | जय जगदीशपते ॥२॥ जलधिमथनेति'२ । हे कमठसुरूप श्रीरघुवर ! जलधिमथने बहुखिन्ना ये सुरा- सुरास्तेषा पाता ४ रक्षक , जलतल यात प्राप्तो यो मन्थनगो मन्दराचलस्तस्य धाता धारणकर्ता त्व जय । अत्रेद व्यग्यम् -हे भगवन्, परमदयालुम्त्व स्वभक्तानां हि क्लेश स्वयमङ्गीकृत्य तत्कार्यं करोषीति । तेन च ममापि सङ्गीत- रघुनन्दनग्रन्थविधानरूपकार्य कुर्विति ॥२॥ १० रदशिखरे धरणी तव लसति विशाला, गिरिशगिराविव घनघनमाला श्रीरघुवर शूकररूप जय जगदीशपते ॥३॥ रदेति। गिरिगगिरौ कैलाशे, घना निविडा चासो घनानां मेघाना या माला पक्ति , सेव तव रदम्य दन्तस्य शिखरेऽग्र भागे विशाला विस्तीर्णा धरणी लसति शोभते । हे जगदीगपते शूकररूप श्रीरघुवर | त्व जय । गूकररूपेण हिरण्याक्ष१६ १. स नृपवोघ । २ ख लोला । ३ ख. स्तोत्य । ४ ख सुख । ५ पश्य । ६ ०स्वरूप । ७ ख ईशास्तेषां । ८. क. पानमाकारी । ६. न शक्ति० । १० मनरूपो० । ११. ख महीपम्या । १२ ख. नलघ० । १३ ख सुमुरा० । १४ ख याता। १५ स धुनघन० । १६. ख हि हिरणाक्ष ।
प्रथम. सर्गः [ ११ हत्वा धरण्युद्धनेति' कथा प्रसिधैव । अत्रेद व्यग्यम् - हे भगवस्त्व हि सागरमग्नानुद्धृत्य निजाङ्गे शोभयस्यतस्त्व सदा दोनोद्धाररसिक इति । तेन च ससारसागरे मग्न मामप्युद्धृत्य निजागसङ्गिन विधेहीति ।।३।। तव भुजभीमभुजङ्गो नखरदधारी, कनककशिपुमण्डूकविदारी। श्रीरघुवर नरहरिरूप ! जय जगदीशपते ॥४॥ . तव भुजेति । नखा एव रदा दन्तास्तान् धरति तच्छीलः, तव भुज एव भोमो भयानको भुजङ्गः, कनककशिपुहिरण्यकशिपुनामा दैत्यः स एव मण्डूकस्तस्य विदारी त विदारितवान् । हे जगदीशपते नरहरिरूप नृसिंहरूप श्रीरघुवर त्व जय । एतेन जिघृक्षोः कालभेकात्कोटरूप मा रक्षेति' प्रार्थना व्यज्यते । तेन च तस्य कालकालत्वमिति ।।४।। छलितोऽनुच्छलयन् बलिमवसि द्वारम्, पदपयसाऽपनयसि भवभारम् । श्रीरघुवर वामनरूप ! जय जगदीशपते ॥५॥ ६ - म छलित इति । बलम मुच्छलयन् स्वयमेव छलितस्तस्य द्वारमवसि रक्षसि । किञ्च पदपथसा ५ चरणजलेन गङ्गारूपेण, भवस्य ससारस्य भारमपनयसि दूरीकरोपि । पापिन एव भवभारम्तेषा गङ्गादर्शनादिना पापानि ह्रियन्ते इति भाव. । हे वामनरूप श्रीरघुवर | त्व जय । अह तवाशश्शक्तिर्वा', त्वद्विषयक- सख्यदास्यादिभावोचित मा स्वमायया छलयित्वा बद्ध्वा च कर्मरज्जुभिरनेक- योनिपु नर्त्तयसि । वलि सकृच्छलयित्वा तद्द्वारमवसीति श्रूयते । बहुशश्छलनेन मम नेत्रद्वारतो न दूरीभवेति । छलित इत्यादिवाक्येन प्रार्थना व्यज्यते । तेन च तव वियोगस्यातिदु.सहत्वम् । 'वाम सघर्षे' इति धातु , वामयति'' पराभावयति निजभक्तवत्सलतयेतरभक्तवत्सलानिति वामनः, यतोऽपकर्तुं गत्वा बले परमो- पकार कृतवानिति । 'खो ह्रस्वश्च' वामन' इत्यमराभिधानाद् वामनशब्दस्या- यमाशयः । ईश्वरोऽपि लघुकार्यं कुर्वन् लघुरूपो भवति । अथवा 'टुवम् उगिरणे' इति धातुः, वामयत्युद्गारयति बलिना पृथ्वीमिति वामनपदेनानेकविषयवासना मम मनस उद्गारयेति प्रार्थना व्यज्यते ।।५।। . १ क घरपस्युद्धता । २ ख. विदारि । ३. ख.-विदारितवन् । ४. ख. ररक्षेति । ५. ख. ०पयशा । ६. भवभारास्तेषां । ७. ख. पायानि । ८. ख. द्रियन्ते । ६. ख तवाशश शक्तियोत । १०. ख वामइति । ११. ख. ह्रस्व ।
१२]] सङ्गीतरघुनन्दन 'सुखदसांख्यरचनातिचतुरमुनिमूर्ते, देवहूतिसुमनोरथपूत । श्रीरघुवर कपिलसुरूप ! जय जगदीशपते ॥६॥ सुखदेति । सुखद मोक्षप्रदं यत्साख्य तस्य रचनायामतिचतुरा मुनिमूत्तिर्यस्य तत्सम्वुद्धि., देवहूते सुन्दरमनोरथाना पूत्तिर्यस्मात्तत्सम्बुद्धि., जगदीगपते कपिलसुरूप श्रीरघुवर । त्व जय । सुखदेत्यवाय भाव नास्तिकप्रगंस्या- दग्निवेशप्रणीतमाख्याद् भक्तिमिश्र कपिल प्रणीत सास्य पृथगिति । अनेद व्यग्यम् - हे मननशील | त्वमेव विचारय, सर्वो लोके निजजननीमनोरथं पूरयत्यतो लोकसदृश एव त्व जात इति । तेन च मम मनोरथमापूयं निजेश्वर-3 त्वमुद्घाटयेति प्रार्थना व्यज्यते ।।६।। धृतहलमुशलनिहतखलनपनिकुरुम्बम् प्रणमति यममरमनुजकुटुम्वम् । श्रीरघुवर हलधररूप ! जय जगदीशपते ॥७॥ धृतेति । धृताभ्या हलमुशलाभ्या निहत खलाना नृपाणा निकुरुम्ब समूहो येन स. त, अमराणा मनुजाना च कुटुम्ब परिवार. य प्रणमति, स हे जगदीशपते हलधररूप श्रीरघुवर | त्व जय । अत्रेद व्यग्यम्-हे भगवन् । सपरिवारसुरनर- प्रणताद् भवत इतरो रक्षक. कोऽपि न लक्ष्यतेऽतो नानादु.खदेभ्य. कलियुगखलेभ्यो मा रक्षेति । तेन कलौ खलबाहुल्येन निजग्रन्थप्रचारादिशङ्केति ।।७।। केलिकुतूहलकरमुनिमानसकर्षी, रोसोल्लासमहासुखवर्षो । श्रीरघुवर कृष्णसुरूप ! जय जगदीशपते ॥६॥ केलिकुतूहलेति । हे जगदीशपते कृष्णसुरूप श्रीरघुवर । केली क्रीडाया कुतूहलस्य कौतुकस्य [कर्ता स चाऽसौ मुनीना मानसस्य]५ कर्षणशील , पुनश्च रासोल्लासे महासुखवर्पणशीलस्त्व जय। मुनिमानसेत्यादिवाक्येन सर्वोपासनाभ्यो रासोपासनस्य परत्वम् । तेन च हे भगवन् । ममापि मानसमन्यत आकृष्य निजरास एवासक्त ६ कुर्विति । तेन च यथायोग्य रासवर्णन कुर्यामिति प्रार्थना व्यज्यते ।।८।। - जनहिततपसि निरतिमुपयासि सुधामा, परतर ! नरनारायणनामा । श्रीरघुवर तापसरूप जय जगदीशपते ॥ १ ख. सुखदमाख्य० । २ ख ०स्वरूप । ३ ख तिजेज्वर ---| ४. ख यममरकुटुम्बम् । ५ [-] कोष्टान्तोऽश फ पुस्तके नास्ति । ख. एवाशक्त ।
[ १३ प्रयमः सर्ग main जनहितेति । शोभन धाम तेजो यस्य सः, हे परतर ! अतिश्रेष्ठ, नर इति नारायण इति च नाम यस्य सः, यद्वाऽतिशयेन पर नर-नारायण इति नाम यस्य सः, त्व जनाना हिताय तपसि निरति प्रीतिमुपयासि प्राप्नोषि । अत्र नर-नारायण इति नामद्वय एकावताराभिप्रायेण । हे जगदीशपते तापसरूप श्रीरघुवर । त्व जय । अत्रेद व्यग्यम्- जनहिताय स्वयमेव तप: करोषि । अत. परमदयालुस्त्वमतो तव तप.फलमहते मह्यमपि' स्वभक्ति देहीति । तेन च स्वस्य तपः करणाद्यसामर्थ्य मिति । यद्वा पक्षे रघुवरनाम्न २ परमत्व व्यज्यते ।।६।। हे भगवन् - । शापमकरहरिगायनसुरतनुदाता, शरणागतगजयूथपपाता । श्रीरघुवर वरहरिरूप ! जय जगदीशपते ॥१०॥ गापमकरेति । हे जगदीशपते | वर श्रेष्ठ हरिसज्ञक रूप यस्य स. तत्सम्बुद्धिः, हे रघुवर | शापेन मकरो यो हरेरिन्द्रस्य गायनो गन्धर्वस्तस्य सुरतनोर्दाता, शरणागतस्य गजयूथपस्य गजराजस्य पाता रक्षकस्त्व जय । अत्रेद व्यग्यम्- हे भगवन्ननेकजन्मदुष्कृतहरण तव नामगुणकीर्तन कुर्वन्त मामज्ञानमकर.' कुतो ग्रसितवान् जन्मान्तरे कस्यचिच्छापाच्चेत्तमपि त्वमेव निवाऱ्याऽज्ञानमकरात्तरसो- दुधरस्वेति । तेन च स्वस्यानन्यशरणागतत्वमिति ॥१०॥ क्षत्रियमुण्डविगुम्फितवरतरहारम्, गिरिशगल गमयसि बहुवारम् । श्रीरघुवर भृगुवररूप ! जय जगदीशपते ॥११॥ क्षत्रियेति । क्षत्रियाणां मुण्डैविगुम्फित स चासौ वरतरहारश्च स त, बहुवार गिरिशस्य शिवस्य गल गमयसि प्रापयसि । हे जगदीशपते भृगुवररूप परशुराम- स्वरूप श्रीरघुवर ! त्व जय। ये रणे सम्मुखीभूय म्रियन्ते तच्छिरोमाला महादेवो धारयतीति प्रसिद्ध.। अत्रेद व्यग्यम्-हे भगवस्त्व श्रीशिवस्य स समर्थ- शिष्य । स्वप्ने स एव मन्त्र मह्यमपि दत्तवान्, पश्चान्मया श्रीहरिगुरुप्रियादास- मुखाच्छ तोऽत. सतीयं ज्ञात्वा मयापि सख्य कुर्विति । तेन मामपि समानशील कुविति च ।।११॥ वितरसि विबुधचयाय नवोदितममृतम्, चिरचिन्तनमश्चितमिव सुकृतम् । श्रीरघुवर मौहिनरूप' ! जय जगदीशपते ॥१२॥ - १ के मह्यम । २ ख नाम्ना। ३ ख मामज्ञान । ४. ख ०मकराक्षरसो ५ ख खस्यानन्य० । ६ ख समुखीभय । ७ ख सतीर्थ । ३ क मोहिनरूप । ।
१४ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् वितरसीति । विबुधाना देवाना चयाय' ममूहाय, चिर तव चिन्तनेन मश्चित सुकृतमिव नवोदित नवमुत्पल समुद्रातिशेप अमृत वितरसि ददासि । हे जगदीशपते, मोहिन्या इद मौहिन तद्रूप यस्य तत्मम्बुद्धि, हे मोहिनरूप श्री रघुवर | त्व जय । अत्रेद व्यग्यम् - भक्तेषु हरेर्ममत्वमस्तीति । तेन च मय्यपि ममत्व कृत्वा मामपि प्रेमामृत पाययस्वेति ।।१२।। -- - rhia पशुहिंसाविधिपरमवगरणयसि निगमम्, प्रकटितबहुपाखण्डाधिगमम् । श्रीरघुवर बुद्धसुरूप! जय जगदीशपते ॥१३॥ पशुहिंसेति । पशुहिंसाविधिपर यजप्रतिपादक, निगम वेद, प्रकटितो बहूना पाखण्डानामधिगम प्राप्तिर्यस्मिन् कर्मणि तद्यथा भवति तथाऽवगणयसि निन्दसि । हे जगदीशपते बुद्धसुरूप श्रीरघुवर । त्व जय । अत्राय भाव भगवन् । भवानमुरमोहनाय पारखण्डमत प्रतिपादयन् वेदमपि पहिसाप्रतिपादक दर्शयित्वैव निन्दितत्वान् वेदार्थ तु न प्रकटितवानिति । तथा च साक्षात्पशुबलि प्रतिपादयता देवानामिष्टपशु प्रतिपादयद्भिर्मुनिभि सह' विवादे मध्यस्थो गजा उपरिचरनामा, पुष्टदेवा वर्षणेन मम राज्य समृद्ध करिष्यन्तीति विचारयन् देवानामेव पक्ष रक्षितवानिति पश्चरात्रीया कथा महाभारते मोक्षधर्मे भीमोक्ता प्रसिद्धा । अत्रेद व्यग्यम्-१ ईदृक्प्रवीणस्त्वमन्येषा भ्रममुत्पाद्य स्वभक्तरक्षण करोपीति । तेन च मामपि रक्षेति ।।१३।। । ११ अधगरणभवनयवननिधनदवरबाहु , कलिविधुकवलीकरणे राहु श्रीरघुवर कल्किसुरूप२ ! जय जगदीशपते ॥१४॥ - अघगणेति । हे जगदीशपते कल्किसुरूप3 श्रीरघुवर अघगणाना पापसमूहाना भवनानि ये यवना१४ म्लेच्छास्तेपा१५ निधनदः१६ मरणप्रदो वरः श्रेष्ठो बाहुर्यस्य स , कल्किरेव विधुस्तस्य कवलीकरणे राहुसशस्त्व जय । अत्र कलिग्रसनेन सत्ययुगप्रवर्तकत्व प्रतीयते। अत्रेद व्यग्यम्-निजराज्ये कलिं नाश- यित्वा सत्ययुगप्रवृत्ति कुर्विति । तेन च मुचेतीभूय तव भजन कुर्यामिति ॥१४॥ १ ख चपाप । २ क पायस्वेति । ३ ख प्रतिपन् ४. ख दर्शयत्वव । ५ निन्दितवन् । ६ ख यया । ७ ख ०पिष्टपशु। ८ ख स । ६. ख पुष्टा देवा । १० ख इदच्प्रवीण। ११. स प्रघारगयमन० । १२-१३. ख ०स्वरूप । १४ क यमना। १५ ख म्लेक्षा० । १६.क निघदः।
प्रथमः सर्गः [ १५ - धन्वन्तरिरिति नाम गदघ्न त्वरितम्, भवदुदित किमु भेषजमशितम् । श्रीरघुवर वैद्यसुरूप ! जय जगदीशपते ॥१५॥ - धन्वन्तरिरिति । धन्वन्तरिरिति नाम त्वरित गदघ्न रोगनागकमस्ति । भवदुदित भवता कथित, भेषजमौषध, अगित भक्षित सत् शीघ्र रोग नाशयतीति किमु वक्तव्यम् । हे जगदीगपते वैद्यसुरूप श्रीरघुवर | त्व जय । अत्रेद व्यग्यम्-हे भगवन् । भगवद्भजने मा रोगा बहु व्याकुलयन्ति' । तद्यथाऽहमगद स्यान्तथा कृपा विधेहीति । तेन च भवत्कीर्तनमनारत कुर्यामिति ।।१५।। रुचिररुची रुदितनयोऽसुररिपुलोकम्, सुखयसि शमितसकलभवशोकम् । श्रीरघुवर यज्ञसुरूप ! जय जगदीशपते ॥१६॥ रुचिररुचिरिति । रुचिरा रुचिर्दीप्तिर्यस्य स , रुचे रुचिनामप्रजापतेस्तनयः पुत्रस्त्व, असुररिपुलोक देवलोकं, शमित. शान्ति नीत. सकलस्य भवस्य ससारस्य शोको यस्मिन्कर्मणि तद्यथा भवति तथा सुखयसि सुखिन करोषि । हे. जगदीश- पते यजसुरूप श्रीरघुवर | त्व जय । अत्रेद व्यग्यम् - ससारशोकनागनसमर्थस्त्वं ससारगतरय ममापि शोक दूरीकुविति । अनया च प्रार्थनया ससारतापभय- व्याकुलता व्यज्यते ।।१६।। . सागरसमरदरासुरहृदयविदारक, वेदोधारक वनसञ्चारक । श्रीरघुवर हयगलरूप ! जय जगदीशपते ॥१७॥ - सागरेति । सागरे समुद्रे, समरे युद्धे, दरासुरस्य गखासुरस्य, हृदय विदारयतीति स तत्सम्बुद्धि , वेदानुद्धरतीति स , वने जलेऽरण्ये वा सञ्चरतीति स. तत्सम्बुद्धि., हे जगदीशपते हयगलरूप हयग्रीवरूप श्रीरघुवर | त्व जय । अत्रेद व्यग्यम्-भवतो वेद-यातिप्रियत्वमिति । तेन चेदानी कलिखलैरन्यार्थकथनेन3 लोपित वेदार्थ मदन्त. स्थित्वा मन्मुखाद्यथा स्थितार्थं प्रकटयेति । तेन च सङ्गीतरघुनन्दनस्य “यथावस्थितवेदार्थसारत्वमिति ।।१७।। नगरमूलनगरादिकबहुरचनो ही, गिलितवीजगोतनुगोदोही । श्रीरघुवर पृथुनृपरूप ! जय जगदीशपते ॥१८॥ १. स. व्य कुलयेति । २ ख वचन० । ३ ख कथिनेन । ४ ख यथास्थिति० ।
सङ्गीतरघुनन्दम् rwrrrrrrrrrranwrrrrra १ - नगरेति । हे जगदीशपते पृथुनृपरूप श्रीरघुवर ! नगर प्रसिद्ध मूलनगर, यस्मिन् बहुग्रामा लगन्ति' तत्, अादिपदेन पुरग्रामव्रजादीना सग्रहः, तेषा या बह्वी रचना, तस्या ऊहस्तर्को यस्य स., गिलित बीज यया सा गोस्तनुर्यस्या. सा, सा चासो सा चेति कर्मधारय । गिलितबीजगोतनुश्चासौ' गौश्चेति सा, तादृशपृथिव्या दोहो दोह्नशीलस्त्व जय । अत्रेद व्यग्यम् - हे भगवन्ममापि त्वत्समर्पितराज्ये कलियोगाद् बबन्नमनुत्पादयन्त्या. पृथ्व्या प्रचुरमन्नमुत्पादयेति । तेन च राज्य- शासनप्रवीणेन भवतैव वडा राजमर्यादा, तदिदमपि राज्य समर्याद विधेहीति । तेन चाऽहमपि सुचेतीभूय भवच्चरितवर्णन करवाणीति ।।१८।। पर हितपरमहसपथदिचलनशील ६, भूसञ्चरणापरिमितलील. । श्रीरघुवर ऋषभसुरूप ! जय जगदीशपते ॥१६॥ परहितेति । हे जगदीशपते ऋषभसुरूप श्रीरघुवर परेपामन्येषा हिताय परम- हसाना पथि मार्गे विचलनशील , भूसञ्चरणेऽपरिमिता लीला यस्य स , त्व जय । अत्रेद व्यग्यम्-हे भगवन्नानन्दरूप परहितपरमहसमार्गवार्य्यपरिमितलीलस्त्व भवदत्त(दात्त हत्त' ) राज्यवास्तव्याना>लोकभीतस्य भवच्छरणागतस्य ममापि परमहसकरणरूपामेकलीला: कुविति । तेन च ससागस्वस्य वैराग्यवत्तेति । तेन च ससारे क्लेशाधिक्यमिति ।।१६।। गुरुगणनामिविमुषितभुवनातोष.", अवधूतो जननुतोऽपरोषः। श्रीरघुवर दत्तसुरूप । जय जगदीशपते ॥२०॥ गुणगणनेति'' हे जगदीशपते दत्तसुरूप श्रीरघुवर | गुरूणा गणनाया मिषेरण१३ छलेन, विमुषितः हृत भुवनस्य अतोषो येन स , अपगतः१४ रोषः क्रोधो यस्मात्स., जनैर्नुत स्तुतोऽवधूतस्त्व १५ जय । अत्रेद व्यग्यम्-हे भगवस्त्व हि निजाचरणप्रचारेण भुवनस्यासन्तोष हत्वाऽनेकगुरूकरणच्छलेन स्वस्मिन्नेव त रक्षितवानतो भुवनान्तर्वत्तिनो ममाप्यन्यविषयकमसन्तोष हत्वा स्वपरिचर्यायामेवा ६ऽसन्तोष विधेहीति । तेन च भगवत्परिचर्याया१७ ज्ञानादप्युत्कृष्टत्वमिति ।।२०।। १ क लागति। २ ख. ऊदहस्तों। ३. ख ०गोततु० । ४ ख त्वत्ममीतराये । ५ ख °नुत्पादयन्याह । ६ ग्व. विचलशील । ७ ख भवदक्षः । ८ क ०रूपमेक० । ६ ख तस्य । १० ख ०मिषिविमुषितभुवनातोपा । ११ क गुरुगरोनिति । ख गुरुगननेति। १२ ख गणाया । १३ मिषिरण । १४. अधगत । १५ ख अवभूतस्त्व । १६. ०चार्याया० । १७ ख. चर्याय ।
- ( प्रथमः सर्गः [ १७ - प्रकटिनपरमभक्तिपृथिवीसुखदायो', करवरवीरगाहरिगुरणगायी । श्रीरघुवर नारदरूप ! जय जगदीशपते ॥२१॥ प्रकटितेति । हे जगदीशपते नारदरूप श्रीरघुवर । प्रकटिता परमा भक्तिर्येन चाऽसौ पृथिवीसुखदायी च पृथिवीसुखदानशील , करे वरवीणया हरेभक्तात्ति- रकमत्स्यादिनिजरूपस्य गुणाना गायी गानशीलस्त्व जय । अत्रेद व्यङ्गयम्- रह्यमपि प्रेमलक्षणा भक्ति देहीति । तेन च रासानुभावकग्रन्थकरणोत्कण्ठा ध्यज्यते । तेन च ग्रन्थस्य प्रेमसाध्यत्वमिति ॥२१॥ ऋतुकलनाय कलावपि विभजसि वेदम्, कृतपुराणधृतभावविभेदम् । श्रीरघुवर शुकपितृरूप | जय जगदीशपते ॥२२॥ ' पूर्वमृषभाज्ज्ञानप्रार्थन, तदनन्तर प्रेमभक्ते रिदानी ज्ञानसहितप्रेमभक्ति प्रार्थयत्राह-~-क्रतुकलनायेति । त्व कलौ कलियुगेऽपि, ऋतूनां कलनाय रचनाय, कृतेषु पुराणेषु धृतो भावस्याभिप्रायस्य विभेदो यत्र कर्मणि तद्यथा तथा, वेद विभजसि । शुकस्य पितुः व्यासस्य रूप यस्य तत्सम्बुद्धिः हे श्रीरघुवर । त्व जय । अत्र ज्ञानभक्तिसहितशुकजनकत्वेन व्यासस्य ज्ञानभक्तिप्रदानसामर्थ्य व्यज्यते। तेन च मद्यपपि तदुभय देहीति ॥२२॥ ६ सारासार दियुजमवयन्ति यमेकम्, 'परिहतजलजनिजनुरविवेकम् । श्रीरघुवर हससुरूप जय जगदीशपते ॥२३॥ सारासारेति । हे जगदीश्पते हससुरूप श्रीरघुवर | परितो हृतो दूरीकृतो जलजनेः कमन्नाजनुर्यस्य तस्य ब्रह्मणोऽविवेको येन स त, सारासारयोवियुज पृथक्कर्तारं, यमेक मुख्यमवयन्ति जानन्ति ज्ञानिन इति शेष । स त्व जय । एतेन हे भगवन् ! ब्रह्मा मम' मताचार्यों भवति, तदज्ञाननाशकत्वेनाचार्यस्याप्याचार्यस्त्व- मिति' व्यज्यते । तेन च ममाऽप्यज्ञान दूरीकृत्य मद्धृदये रघुनन्दनरासवर्णन शोधयित्वा प्रकटयेति ।।२३।। १. स. वाई । २. ख ०गाई । ३. ख हरेर्भक्ताी० । ४. ख गाए० । ५. ख. क्रतना। ६ स. समथ्यं। ७ •विधुजमव० । ८ ख. परिजल० । ६. ख. गर्नु पश्य स । १... तरज्ञानिनाशकरवेन चार्यस्यास्थाचार्यस्त्वमिति ।
५ १८ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् कृतमनकादिकनामनिहतभवजाल , भजननिवन्धनवोधविशाल' । श्रीरघुवर बालसुरूप ! जय जगदीशपते ॥२४॥ कृतति । कृत सनक आदिपा तैर्नामभि सनकमनन्दनमनात नसनत्कुमा- ररूपै निहतो नाशितो भवजाल ससारजालो येन स , भजनम्य निवन्धनस्तद्रीति- प्रवर्तक.3 वोवेन ज्ञानेन विशाल. विगेपेण शोभमान , ईदृगवाल मुम्प श्रीरघुवर त्व जय। भजननिवन्धनेत्यनेन पूर्व चतुर्विगत्यवतारवर्णनरूप तव भजन मया यथायथ क्रियमाण न भवेतहि त्वमेव स्वप्रापक कश्चिदुपाय बोधय । भवति' चेन्मत्प्रार्थित सफलयेति व्यज्यते । तेन च भजने कृतेऽपि स्वस्य हयं जातिगद्देति । तेन च त्वयैव सर्व कार्य्य मिति । तेन च स्वस्य पारतन्त्र्यमिति' । and + ईशमहेश्वरपर साकेतविहारी, दरविविधावतारविस्तारी । जनविश्वनाथहृदि राम ! जय जगदीश पते ॥२५॥ ईशेति । ईशा प्रतिब्रह्माण्ड ब्रह्मविष्णु शिवास्तेषामाश्रयतया मह पूज्यो- ऽमितकोटिब्रह्माण्डवलितो" महाविराट् [अमितकोटिब्रह्माण्डवलितत्वे प्रमाणम् - ब्रह्माण्डासस्यनाथो यो ददर्शीर्दध्वमनाथवत् । स्यूलात् स्यूलतम. सोऽपि नाम्ना देवो महाविराट् ॥१॥ प्रत्येकलोमकूपेषु विश्वानि निखिलानि च । तस्याऽपि तेपा सस्या च कृप्णो वक्तु न हि क्षम. ॥२॥ इति । ब्रह्मवैवर्ते । तस्येश्वरस्तत्कारणभूत पूर्णब्रह्म तत्र प्रमाणम् - "ततो विराडजायत विराजो अधिपूरुप" इति, तस्मा] ' त्तनुप्रभारूपात् पूर्णब्रह्मरणः पर श्रेष्ठप्रकागिन्, हे जगदीशपते हे राम ! वरविविधावताराणा विस्तारी, साकेतविहारी अयोध्या- विहारी, त्व जनविश्वनाथहृदि जय निजोत्कर्ष प्रकटय । अत्र ब्रह्मणस्तनु- प्रभारूपत्वे प्रमाण 'यदद्वैत ब्रह्म यस्य तनुभेति' ब्रह्मोपनिषत् श्रुति । एक चाऽपि पर समस्तजगता११ ज्योतिर्मय कोरण, प्रागन्ते च विकारशून्यमगुण १२ निर्नामरूपञ्च यत् । १ ख दिशाला । २ ख ०जाले । ३ ख ०स्तद्गीतिप्र० । ४. ख भयति । ५. ख यासवत्र्यमिति । ६ ख ईश। ७. ख. मितिकोटि । ८ [-कोष्ठबद्धाशस्याने ख पुस्तके 'तस्येच्चस्तत्कारण मूत पूर्णव्र ह्म तरमा' इत्ययमश एव दृश्यते । ६ ख. चत्र । १०. ख. ब्रह्मनेस्तनु-। ११ ख जगत । १२. ख विकारशन्य० । । .
प्रयमः सर्ग [ १६ तच्छीरामपदारविन्दनखरप्रान्तस्य तेजोऽमल, प्रज्ञावेदविदो वदन्ति परम तत्त्व पर नाऽस्त्यत । इति । 'पारमहस्यपरमसिद्धान्तसहितायाम् । नखेन्दुकिरणश्रेणीपूर्णब्रह्म ककारणम् । केचिद् वदन्ति तस्याश ब्रह्म चिद्रूपमव्ययम् ।। तदशाशरे महाविष्णु प्रवदन्ति मनीषिण. । 3 इति पदापुराणीयवृन्दावनमाहात्म्ये च । अत्रेद व्यङ्गचम् - हे भगवन्ननिर्वचनीयतयाऽन्यैरकथनीया निजरहस्यलीला मद्धदये विद्यमानः स्वयमेव · मन्मुखेन वर्णयेति । तेन च तल्लीलाया अपि सर्वोत्कृष्टत्वमिति । वरविविधावतारविस्तारीति विशेषणेऽनुक्तानामपि विशेपणेऽनुक्तानामपि नारायणादीनामवतारी रघुनन्दन इति भावः । प्रमाण चाऽत्र पद्मपुराणस्य वाल्मीकीयरामायणस्य च वचन यथाक्रम बोध्यम् । तथाहि- "पुरा महर्षयः सर्वे दण्डकारण्यवासिन । दृष्ट्वा राम हरि तत्र भोक्तुमैच्छन् सुविग्रहम् ।। ते मर्वे स्त्रीत्वमापन्ना समुद्भूताश्च गोकुले । हरि सम्प्राप्य कामेन ततो मुक्ता भवार्णवात् ।। इति । "स्वय नारायणो भूत्वा वैकुण्ठ याति राघव" इति पुनरेव मया दृष्टो रामो रमता वरः। विप्णुरेव स्वय भूत्वा तस्मिन्नास्ते वरासन !" इति च । ननु सर्वे नित्याः शाश्वताश्च देहास्तस्य परमात्मन इति नैव प्रकृतिजाः क्वचिदिति 'पूर्णमदः पूर्णमिदमि'त्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः । मीना- धक्तारा नारायणादयश्च सर्वे नित्या पूर्णा एवाऽतो विविधावतारविस्तारीति पदस्य रघुनन्दन एव मीनाद्यवतारो भूत्वा तत्तत्कार्य विधाय स्वस्मिल्लीयत इत्यर्थोऽभिप्रेतश्चेत्तहि मत्स्यादीनामष्टभुजाना चतुर्भुजाना द्विभुजाना चाऽभिन्नांश- रूपाणामनित्यताप्रसङ्ग स्यात् । अन्यच्च-एक एव रामो भावुकैर्भावनानुगुणरूपो दृश्यत इति चेत्तर्हि तद्रूपस्य काल्पनिकत्व स्यात् । किञ्च विविधशव्देन' सूचिताना ब्रह्मदुर्गाभैरवादीनां भिन्नाशानामपि वेदपुराणतन्त्रेषु नित्यत्व , १ स. परमसस्य० । २. ख. तदशास । ३. ख ०रकथनी । ४. ख. भोक्त० । ५. ख. विपर्यशब्देन । ६. ख. मूचिता ।
२० ] सङ्गोलरघुनन्दनम् परत्व जगदुत्पत्तिस्थितिलयकतृ त्व चोक्तम्' । कृते परिकार्य विधाय श्रीरघुनन्दन- लीना भवेयुस्तहि तेषामनित्यतया वेदादीनामपि मिथ्याकथनप्रसङ्गः स्यादिति चेत्सत्यम् । यत: साकेते श्रीरघुनाथ एव मीनाद्यवताराणा नारायणादीना च रूपेण स्वकीय द्विभुज राजरूप सेवतेऽत एव तेऽभिन्नागा साकेतनिवासिश्रीरघु- नन्दनसेवकत्वेन भिन्नागाः ब्रह्मदुर्गाभैरवा [दयो] देवता अपि नित्या, तम्माद वरविविधावतार विस्तारीत्यत्राऽयमाशय । माकेते श्रीरघुनन्दन. स्वावरणगतान- वतारानाशाप्य', कार्य कारयित्वा पुनस्तदेवावरण प्राप्य, ते मेवा कारयति अथवा त एवावतारा. श्रीरघुनाथाज्ञया स्वेन स्वेताशेन तत्तद्ब्रह्माण्ड गत्वा तत्तत्- कार्य विदधति । तदुक्त शिवसहितायां हनुमन्त प्रत्यगस्त्यवचनम्- - आसीन तमयोध्याया सहस्रस्तम्भमण्डिते । मण्डपे रत्नसशे च जानक्या सह राघवम् ॥ मत्स्य कूर्म. किरिनको नारसिंहोऽप्यनेकपा । वैकुण्ठोऽपि हयग्रीवो हरि केशववामनी ॥ यज्ञो नारायणो धर्मपुत्रो नरवरोऽपि च, देवकीनन्दन कृष्णो वासुदेवो वलोऽपि च ॥ वृष्णिगर्भो मघून्माथी गोविन्दो माधवोऽपि च । वासुदेवोऽपरोऽनन्तः सङ्कषण इरापतिः ।। प्रद्युम्नोऽप्यनिरुद्धश्च व्यूहा सर्वेऽपि सर्वदा । राम सदोपतिष्ठन्ते रामादेशव्यवस्थिता ॥ एतरन्यैश्च ससेव्यो रामो नाम महेश्वर । ५°तेपामैश्वर्यदातृत्वात् तन्मूलत्वान्निरीश्वर ११ इन्द्रनामा स इन्द्राणा पति. साक्षी गति. प्रभु । विष्णु स्वय स विष्णूना पतिर्वेदान्तकृद्विभु ॥ ब्रह्मा- स ब्रह्मणा१२ कर्ता३ प्रजापतिपतिर्गति । रुद्राणास पती रुद्रो रुद्रकोटिनियामक. ।। चन्द्रादित्यसहस्राणि रुद्रकोटिशतानि च । अवतारसहस्राणि शक्तिकोटिशतानि च ॥ ॥ - १ क नास्ति । २. ख म यदि कार्य । ३. ख रघुवरनाथ। ४ ख स्वकीयं। ५ ख स्ववरग० । ६ न मण्डप । ७ ख. पृष्णिगर्भो। ८. क. प्रद्युम्नोऽनिरुद्धश्च । ६ ख. सद्योतिष्ठते । १०. ख तेषामैसूर्य० । ११. तन्मूत्रत्वा० । १२. ख ब्राह्मण । १३ ख. कर्त।
[ २१ प्रथम. सर्गः imr mrsmi ब्रह्मकोटिसहस्राणि दुर्गाकोटिशतानि च । महाभैरवकालादिकोट्यव॑दशतानि च ।। गन्धर्वाणां सहस्राणि देवकोटिशतानि च । सभा' यस्य निपेवन्ते स श्रीराम इतीरितः ।। J इति । श्रुतिश्च 'देवाना पूरयोध्या' तत्सद्ब्रह्ममया दिव्यरत्नकोशाढया तस्यां नित्यमेव सीतारामयोविहारस्थलमस्तीति अथवर्ण उत्तरार्द्ध ॥२५।। मीनाद्या दधते तनर्दलयते दैत्यान् सतो रक्षते, धर्मानाचरते स्मृती रचयतेऽधर्म निराकुर्वते । भक्तान भावयते यशो जनयते बाणान् धनुबिभ्रते, साकेतप्रमदावने विहरते रामाय तुभ्य नमः ।।१०॥ 7 1 - उक्तावताराणामवतारिणश्च वर्णनमुपसहरति मीनाद्या इत्यादिना । मनाद्यास्तनूर्दवते पोषयते । शेष स्पष्टम् । मीनाद्या दधते तनूरिति विशेषणेनाऽव- तारा उक्ता । शेषविशेपणे काण्युतानि । अत्र वर्तमानकालबोधकशतृप्रत्ययेन नामरूपलीलादीना नित्यता व्यञ्जिता । तेन च तेपामपि तद्रूपत्वमिति ॥१०॥ ललितालीगरणमण्डित रसपण्डित हे चपलचटुलमणिमाल जय जय राम हरे ॥१॥ ३ 1 -- . अथाऽवतारिण श्रीरघुनन्दन स्तौति ललितेति । ललिताः या. पाल्यः सख्य- स्तासां यो गण: समूहस्तेन मण्डितः भूषित. तत्सम्वुद्धि', रसे प्रकृतत्वाच्छृङ्गारे पण्डितस्तत्सम्बुद्धि , चपला चटुला मनोहरा च मणीना माला यस्य तत्सम्बुद्धि. । एतेन रास कुर्वतो रघुनन्दनस्येय स्तुतिरिति व्यज्यते । तेन च कविमानसेऽन्य- लीलाभ्यो रामलीलाया.६ प्राधान्यम् । ईदृश हे हरे ! भक्ताना रासाननुभवरूप- क्लेशनाशनेत्थः । हे राम । रमन्ते मख्योऽस्मिन्निति राम. । एतेनाऽनेककोटि- सखीरमणशीलत्व व्यज्यते । तेन च तस्य दक्षिणनायकत्वम् । अथवा रमन्ते ब्रह्माण्डानि यत्र अनेककोटिब्रह्माण्डाधारेत्यर्थः । त्व जय जय निजोत्कर्ष प्रकटय । जय जयेत्यादरे वीप्सा । अत्र पूर्वगीतध्वनि य ॥१॥ F १ ख. समा। २. ख. उत्ताउत्तरारणा० । ३ ख वरीयान० । ४. ख. प्रकृतत्वाच्छरे । ५. ख० ऽत्यलीभ्यो। ६. ख. राशलीलाया ।
२२ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् - क्षितितृपमण्डलमण्डन खलखण्डन है ! समुद्दण्डकोदण्ड जय जय राम हरे । ॥२॥ क्षितीति । क्षितौ नृपाणा मण्डल समूह मण्डयति भूपयति तत्सम्बुद्धि , सलान् दुष्टान् खण्डयतीति तत्मम्वुद्धि , मम्यगुद्दण्ड: कोदण्डो धनुर्यस्य तत्सम्बुद्र. । क्षितिनृपमण्डलमण्डनेत्यनेन हे भगवन् | ममाऽपि खलव्यतिरिक्तनृपान्तर्गतत्वेन मण्डन करिष्यस्येवेति । तेन च मन्मुखोद्गतग्रन्यमण्डन कुर्विति व्यज्यते । [समुद्दण्डकोदण्ड इत्यत्र रघुनन्दनस्य सदा रक्षोयुक्तत्वम् । तेन च ममाऽपि पर्वया रक्षा विधेहीति प्रार्थना व्यज्यते] ' ।।२।। 3 भवस्य ससारस्य ६ शुद्धिर्न हतदूषण खरदूषण भवभूषरण हे 'दशमुखगजमृगराज जय जय राम हरे ! ॥३॥ हतेति । हतौ दूपरणदोपरूपी खरदूषणनामानी राक्षसी येन तन्सम्वुद्धि , भूषणमलबारस्तत्सम्बुद्धि., दशमुखो रावण स एवं गजस्तत्र यो मृगराजः सिंहस्तत्सम्बुद्धि,, ईदृश । अत्रेद व्ययम् - यथा रावरणसम्बन्धिनो दूपणादीन् हत्वा, दिव्यरूपं दत्वा रावणो निजसेवको विहित- स्तथा खरदूपणमदृशान्मम मनसो भ्रमादिदोपान्नाशयित्वा दशेन्द्रियाणि मुखानि निर्गमद्वाराणि मुक्तिद्वाराणि वो यस्य तद्दिव्यरूप विधाय निजरूपासक्त कुविति । तेन च वहुमाधनसम्पत्ती सत्यामपि भवत्कृपा विना मनस जायत इति ॥३॥ सकलचराचररोचन हतशोचन हे ! मुनिकुलकुशलनिदान जय जय राम हरे ! ॥४॥ सकलेति । सकल यच्चराचर स्थावरजङ्गमात्मक जगत् तद् रोचयति प्रकागयति इति स तत्सम्वुद्धि , अथवा सकलम्य चराचरस्य रोचनमभिप्रीतिर्य- स्मिन्, हृतं गोचन शोको येन तत्सम्बुद्धि , मुनीना मननशीलाना' यत्कुल समूहस्तस्य कुशलस्य भुक्तिमुक्तिरूपस्य निदान आदिकारण, ईदृश । अत्र सकलेत्यादिपदेन हे भगवन सकलचराचरप्रकाशकस्य तव मद्धृदये ज्ञान- प्रकाशनमतिसुकरमिति । तेन च मया स्वीयरहस्यवर्णन कारयेति व्यज्यते ।।४।। १ [-] कोष्ठान्तर्गतोऽशो नाऽस्ति ख पुस्तके । २ एतत्पादस्थाने क.पुस्तके 'मुनिकुल- कुशलनिदान जय जय राम हरे !' इत्यस्ति । ३. ख दूषणे दोषरूपी । ४. क गतस्तत्र । ५ ख ०शक्त । ६ ख मानस' । ७ ख. मुनाना । ८ ख मुनन० । T - - प्रयमः सर्गः [ २३ 1 सान्तानकजनचन्दन रघुनन्दन हे ! वहुकृतललितविलास जय जय राम हरे ! ॥५॥ सासानकेति । सान्तानके साकेते' ये जनास्तेषा चन्दन आह्लादक, यथा चन्दनो मलये स्वममीपस्थान्२ वृक्षाश्चन्दनीकरोति तथा त्वमपि साकेतजनान् स्वमशान करोपीति भावः ! हे रघुनन्दन वहव. कृता ललिताः मनोहराः विलासा: येन तत्सम्बुद्धि । अत्र प्रथमविशेषणद्वयेन यथाक्रम गुप्तप्रकटलीले व्यज्यते । तेन च तयोरानन्दरूपतेति चरमविशेपणेन च हे भगवन्निद मत्कृत काव्यमपि ललितविलासवद् विवेहीति व्यज्यते ।।५।। वरविलसितनखचदिर सुखमन्दिर हे ! श्रीमुखकमलमिलिन्द जय जय राम हरे ॥६॥ वरेति । वरा श्रेष्ठा. विलसिता. शोभिता नखरूपिणश्चन्दिराश्चन्द्रमसो यस्य तत्सम्बुद्धि , नखचन्द्राणा वरत्व च निष्कलङ्कत्वेन ज्ञातव्यम्, सुखस्य मन्दिर अथवा सुख सुखरूप ब्रह्म नदेव मन्दिरमयोध्यारूप निवासस्थान' यस्य तत्सम्बुद्धि, तत्र प्रमाणम् -- 'अयोध्या च पर ब्रह्मति' । श्रियो जानक्या मुखमेव कमल तत्र मिलिन्द । अय भावः - यथा मधुकर. कमल सेवते तथा भवाननवरतावलोकनेन जानकीवदन मिति । 'श्रिय श्रीश्च भवेदग्न्येति' वाल्मीकीयरामायणोक्तेः श्रीपद जानकीवाचकम् । अथ प्रथमेन विशेषणेन ध्यानिना हृदयान्धकारनिवर्तकत्वं, द्वितीयेन त्वन्निवासाद्धृदयस्य सुखरूपत्वं, तृतीयेन तदनुकूलत्व रसग्राहकत्व च । तेन च मम काव्यकुसुमस्य रस गृहाणेति व्यज्यते ॥६॥ पदपझे प्रणतानव जितदानव हे ! परमानन्दसुरूप जय जय राम हरे ! ॥७॥ पदपद्म इति । हे जितदानव । तव पदपमे प्रणतानस्मान् भक्तानव रक्ष । परमानन्द एव शोभन रूप यस्य, ईदृश हे हरे राम | जय । अत्र प्रथमेन विशे- पणेन रघुनन्दनस्य त्रैलोक्यरक्षणसामर्थ्यम् । तेन च हे भगवन् ! तव चरितवर्णने दानवसदृशान् विघ्नान् ° विनाशय मा रक्षेति व्यज्यते । द्वितीयेन ममोक्तिमपि परमानन्दरूपं विधेहीति व्यज्यते ॥७॥ ह १. ख ते। २ व स्यसमी० । ३. ख. ०प्रगटलीले । ४. ख. विष्कल० | ५ ख निसल्यान । ६ ख त्वन्निवामा हृदयस्य । ७. क गृहरोति । ८ ख. परमान । ६. ख. वर्णनि । ख विधान् । -
२४ ]
सङ्गीतरघुनन्दनम्
risors namen
विश्वनाथजनरक्षरणसुविचक्षण हे
समनिगमागमगीत जय जय राम हरे ॥
विश्वनाथेति । विश्वनाथनामा चाऽसौ जनस्तव भक्तस्य रक्षणे मुविचनोति
निपुणस्तत्सम्बुद्धि , अथवा विश्वनाथाश्च ते जना ब्रह्मादयश्च तेपा रक्षणे मुविच-
क्षण, समे सर्वे ये निगमा वेदा., नागमाः गालागि, तैर्गीतस्तत्सम्बुद्धिः । अत्र
काव्ये समेत्यादिना सकलनिगमागमाविन्द्वमेव मन्मुखेन कथयिप्यसीति । तेन
ग्रन्थस्य मर्वादरणीयत्व व्यज्यते । इहाऽपद्याऽस्य नायकस्य मुनिचक्षणेत्यनेन
रक्षणेऽनायासता व्यज्यतेऽत्र गुणा अप्युक्ता. । तथाहि-ललितालीगणमण्डितेति
पदेन काकुत्वम्, रसपण्डितेति पदेन वैदग्ध्यम्, क्षितिनृपेत्यादिपदेन महाभाग्यत्व-
मर्थवत्त्वञ्च, दगमुखेत्यादिपदेन तेजस्विता, भवभूपणेति पदेन सौन्दर्यम्, हृतगोचनेति
पदेन धार्मिकत्वम्, रामेति पदस्य द्वितीयार्थेन धुरन्धरता, मुनिकुलत्यादिपदेनो-
दारता, रघुनन्दनेति पदेन महाकुलीनता, समनिगमेत्यादिपदेन कीतिरिति ।।८।।
अतिचञ्चलकामिनीकटाक्षाकलनाकूतकलाकुलस्वरूपा ।
पररासविलासभासिनो वोऽभिमत दाशरथेददातु दृष्टि. ॥११॥
इति श्रीमन्महाराजकुमार-श्रीविश्वनाथसिंहविरचिते सङ्गीतरघुनन्दने
मङ्गलाचरण नाम प्रथम सर्ग ॥१॥
अतिचम्बलेति । परैरुत्कृप्ट रासविषयकविलास सिनः४ शोभमानस्य
दाशरथेः श्रीरघुनन्दनस्य दृष्टि व. युष्मभ्यमभिमत ददातु । कीदृशी दृष्टि. ?
अतिचञ्चलाः । ये कामिनीनां कटाक्षास्तेषामाकलनाया स्वीकारे याकूतकलया
शृङ्गाररसीयचेष्टाविशेषेण प्राकुल स्वरूप यस्या. सा रधुनाथप्रकाशकत्व
रासस्य परत्वे हेतु । अत्राऽतिचञ्चलेत्यादिना रघुनन्दनस्य सखीना च रासोत्कण्ठा
व्यज्यते । तेन च पूर्णशृङ्गाररसोव्य इति ।।११।।
इति: सिद्धिश्रीमहाराजाधिराजश्रीमहागज-श्रीराजावहादुररामचन्द्रकृपापात्राधिकारि-
विश्वनाथसिंहदेवकृत्तायां व्यग्यार्थचन्द्रिपाभिधायां
सङ्गीतरघुनन्दनटीकायां मङ्गलाचरण नाम प्रथम सर्ग ।।६।।
१. क पुस्तकेऽन्तिमेयमष्टमपदी नैव दृश्यते, नाऽस्ति च तब तट्टीका । २ स ०दातु ।
३ स. भीमहाराजकुमार श्रीवाबू साहेब श्रीविश्वनासिहदेवकृते । ४. ख भासिना ।
५ स शोभमनस्य । ६ ख. रामस्य । ७ ख. इति सिघ श्रीमहाराजाधिराजश्रीमहाराजा-
वाहावुररामचन्द्रक्रपापात्राधिकारविश्वनाथसिंहजूदेवकृतायां व्यग्यार्थचन्द्रिकानामिन टीका
सहीतरघुनन्दन प्रथम सां. ॥१॥
द्वितीयः सर्ग. [ २५ naar + [ अथ द्वितीयः सर्गः] -- - - ? सुखदसमोरे सरयूतीरे विलसति ललितनिलयनम् । काञ्चनशाल मणिमयजाल मन्ये मदनमुदयनम् ॥१॥ एवं मङ्गलाचरण विधाय सङ्गीतरघुनन्दन काव्य प्रकटयति' । सरयूतीरे भवन रास वर्णयिष्यन् सक्षेपतो भवनवर्णन करोति सुखदेत्यादिना । सुखदः समीरो वायर्यत्र तत्र सरयूतीरे यललितनिलयनं सुन्दरभवन, विलसति शोभते, तन्मदनस्य कामस्य मुदयनमानन्दगृह मन्ये । कोश तत् काञ्चनस्य सुवर्णस्य शाल: प्राकारो यस्य तत्, पुनश्च मणिमयानि जालानि गवाक्षा. अथवा धीवर- जालाकारचित्ररचनाविशेषा यत्र तत् । अत्र विलसतीति वर्तमानक्रियया धानो नित्यत्वम् । तेन च रासलीलाया नित्यता व्यञ्जिता । सुखदपदेन गीतलत्व' मन्दत्व सुगन्धित्व च पवनस्य व्यञ्जितम् ।।१।। चन्दन चतकुसुमसचितमहोपरमरमरणीयम् । चन्द्रसुचुम्बितचन्द्रकान्तचयचलितसलिलकमनीयम् ।।२।। चन्दनेति । पुनः कीदृश तत् ? चन्दनेन चचिता लिप्ता कुसुमैः सम्यगचिता पूजिता पास्तीर्णेति यावत्, सा चाऽसौ मही च तया परमरमणीयम्, पुनश्च कीदृशम् ? चन्द्रेण सुष्ठु चुम्बितः स चाऽसौ चन्द्रकान्तमणीना चयः समूहस्तस्माच्चलितेन वहता सलिलेन कमनीयम् । अत्र कुसुमसमचितपदेन तत्र कोमलास्तरणनैरपेक्ष्य" व्यज्यते । तेन च रासकृतियोग्यतेति । चन्द्रसुचुम्बितेत्यादिपदेन आसेकनरपेक्ष्य- मास्तीर्णकुसुमानामम्लानत्व" च व्यजितम् ।।२।। मरकतगोमुखनलिकानिर्गतकुल्याकुलजललाभम् । सुखसदन श्रमकदन सरसोकलितकमलललिताभम् ।।३।। मरकतेति । पुनः कीदृशम् ? मरकतस्य हरिन्मणेर्या गोमुखनलिका गोमुखा- काराणि जलयन्त्राणि ताभ्यो निर्गतस्य कुल्याकुलेषु त्रिमाल्यसरित्समूहेपू जलस्य लाभो यस्मिस्तत्, पुनः कीदृशम् सुखसदन सुखस्य निवासस्थान अथवा -- - ? - १. ख. प्रफटयन् । २. ख. नास्ति । ३. ख. शाला । ४ प्रकारो । ५. ख. शोलत्व । ६. ख. चन्दने । ७. ख कोमलारण । ८. ख. ०फुसुमानामलानत्वं । ६. क.स फुल्माकुलजल० । ~ - - - २६ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् ? सुखरूपमेव सदन, पुन. कीदृशम् ? सरसीषु तत्र विहारार्थे निर्मिततडागेषु कलितानि व्याप्तानि कमलानि तैललिता प्राभा गोभा यस्य तत् । कुल्याजले- त्यादिना तत्र भवने वाटिका व्यज्यते, तेन च तस्य समस्तशृङ्गारोद्दीपनविभावा- धिकरणत्वमिति ॥३॥ - यदधिकरतिरसपतिरपि कुरुते पश्यन्ननिश निवासम् । विश्वनाथनाथोऽपि ससीतस्तनुते रासविलासम् ।।४।। यदिति । रसपति शृङ्गारोऽपि यद्गृह पश्यन्नधिका रतिः प्रीतियस्मिन्कर्मणि तद्यथा भवति तथा, अनिशनिवास निरन्तरवास कुरुते । विश्वनाथस्य महादेवस्य मम वा नाथ. श्रीरघुनन्दनोऽपि यद्गृह पश्यन् सीतया • सहित रासविलास तनुते विस्तारयति । यदधिकेत्यादिनाऽस्य शृङ्गारगृहादप्याधिक्य तेन चाऽनुपमत्व व्यज्यते । विश्वनाथेत्यादिना कदाचिदनिच्योरपि श्रीरघुनन्दनस्य रासकारयितृत्व' भवनस्य व्यज्यते । तेन चाऽस्याऽन्येभ्योऽपि रघुनाथगृहेभ्य आधिक्यमिति ||४|| गृहे तत्र स्वैर सह सहचरीभिश्च रमया, चिर रासक्रीडाप्रगयिनि रमेशे विहरति । सखी काचिन्नत्यश्रममपनितीषु स्थितवती, बहिर्वासावारादवददपरामात्मसदृशीम् ॥१॥ गृहे इति । तत्र गृहे रासक्रीडाया प्रणयिनि प्रीतिमति, रमेशे श्रीरघुनन्दने, सहचरीभि. सखीभि., रमया श्रीजानक्या च सह, चिर बहुकाल, स्वैर विहरति विहार कुर्वति सति, नृत्यस्य श्रममपनिनीषुरपनेतुमिच्छु , वामावारात्' वनिता- समूहाद्, वहिः स्थितवती काचित् सखी, आत्मसदृशी श्रमितामपरा सखीमवदत् । रमयेतिपदेन रमेश इति पदेन च विहारे सन्तोपाभावो व्यज्यते । तेन च सामर्थ्या- तिशय इति ।।१।। रासे विलसति रसिकशिरोमरिगरवलोकय मृगनयने ! 'रतपतिमण्डितरोचिरखण्डितरसपण्डितसुखचयने ॥१॥ १ ईदृशानन्दजनकरासत, श्रमो मा नि सारितवान् इति श्रमनिन्दा व्यञ्जयन्ती १ ख विहारार्थ । २ ख ०रविकुरुते । ३ ख रासकारपितृत्व । ४. फ. ०अममनिनीषु । ५. ख. प्रणयिमि । ६. ख श्रोतिमति । ७. क. नृपस्य । ८ ख वामाचारात् । ६ क. ०मपरा. । १०. क. रसपण्डितमण्डितः ।
. - द्वितीयः सर्गः [ २७ -- यद्वा यदि श्रमो मा नि.सारयेत्तदा सम्पूर्णरासस्याऽपूर्वशोभा कथ पश्येयमिति श्रमस्तुति व्यञ्जयन्ती सखी वर्त्तमानरास मङ्गुलीनिर्देशेन वर्णयति-रास इत्या- धष्टपद्या रास इति । हे मृगनयने । त्व विलोकय, रसिकाना शिरोमणिः श्रीरघुनन्दनो रासे विलसति शोभते । कीदृशे रासे ? रसपतिना शृङ्गारेण मण्डितः स चाऽसौ रोचिषा दीप्त्या अखण्डितश्च स., रसपण्डितस्य श्रीरघुनन्दनस्य अथवा रासे ब्रह्म तत्र पण्डितानामर्थाद् ब्रह्मनिष्ठाना सुखचयन सुखसमूहो यस्मिन्स', रसपतिमण्डितरोचिरखण्डितश्चासौ रसपण्डित. सुखचयनश्चसः तस्मिन् । रसपती- त्यादिपदे द्वितीयविशेषणेऽय भाव: अनेकविधुवदनाना प्रकाशच्छटाभिर्मणीना प्रकाशाधिक्यमिति२ । रसपण्डितेत्यादिविशेषणेन ब्रह्मनिष्ठा अपि ब्रह्मानन्द त्यक्त्वा रासस्मरणानन्द प्राप्नुवन्तीति व्यज्यते । तेन च रामस्य ब्रह्मानन्दाद- प्यधिकत्वम् । अत्र कविनिबद्धवक्तृवैशिष्टय -जन्यपदप्रधानार्थशवत्युद्भबबस्तुना वस्तुध्वनिः । रासलक्षण भागवतसन्दर्भ- - "नटैगृहीतकण्ठीनामन्योन्यात्तकरश्रियाम् । नर्तकीना भवेद् रासो मण्डलीभूय नर्तनम् ॥” इति स्कन्दपुराणीयकोशलखण्डे च- तासा मनोमानविदासहाभिस्तेनेह तेने५ भुवि हर्षकारी। श्रीरङ्गभेदो भुवि रासनामा रामेण तासा सुमनोहरेण ॥ यत्राऽऽस रामो रणरङ्गमूति स रासनामा भुवि केलभेद" ॥इति॥१। कोरकेकिकोकिलकोलाहलऋतुकुलललितविलासे । कुरबकबकुलकेतकीकैरवकुन्दकदम्बविकाश ॥२ रासशोभाया अनिर्वचनीयत्वेऽपि यथामति वस्तुमात्रं कथयति कीरेति । कीराश्च पालिता. शुकाः केकिनश्च तथा मयूरा: कोकिलाश्च ते तेषा कोलाहलो यस्मिन् अथवा तेषां कोलाहल इव कोलाहलो यस्मिन् स तस्मिन् ऋतुकुलस्य ऋतुषट्कस्य ललितो विलासो यस्मिन् स तस्मिन्; कुरबकाश्च बकुलाश्च केतक्यः कैरवाणि च कुन्दानि च कदम्बाश्च ते तेषा विकासः फुल्लन यस्मिन् स तस्मिन् । एते तरवोऽन्येषां चोपवनतरूणामुपलक्षकाः । कीरादीनां कोलाहलस- १, ख. दीसा । २. ख ०मति । ३. ख. सत्यत्वा । ४. क ख. वक्तवैशिष्य । ५. नास्ति ।
२८ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् aarne दृशस्तु तत्र सखीना मधुग्गानवाद्यभूपरणकोलाहलो भवति । ऋतुकुलत्यादिविशेष- णेन यदृतुगेय रागमालपति स एवर्तुरुदेतीति व्यज्यते ! तेन च सखीना गाने प्रावीण्यातिशयो व्यज्यते ।।२।। 1 विलसितविपुलपुलकविधुवदनावल्गुविनोदविचित्रे । चकितचकोरचक्षुरिह चन्द्र चुम्बति चारुचरित्रे ॥३॥ विलसितेति । विशेपेण लसिताना विपुलाः' पुलका रोमायचा यासा विधुवदनाना बल्गुभिर्मनोहरैः विनोद. क्रोटाभि. विशेषेण चित्रे आश्चर्यभूते, चाणि चरित्राणि यस्मिस्तस्मिनिह रासे, चकितमाश्चयित च तच्चकोराणा चक्षुश्चन्द्र चुम्वति अत्यादरेण पश्यतीत्यर्थ । विलसितेत्यादिपदेन तत्र कस्याश्वि- दपि सापत्न्य नास्तीति व्यञ्जितम् । तेन चाऽत्यानन्द इति । तत्राऽनेकविधुवदना विलोक्य चकितश्चकोर इत्यर्थः । चुम्वतीति पदेन हे मित्र | भवता' कलङ्क साधु धृत । स न धृतश्चेत्तींह तव परिचय कथ स्यादिति व्यज्यते । तेन च सखी- वदनाना पूर्णचन्द्राच्छोभातिशय इति । अत्र कविनिवद्धप्रौढोक्तिजन्यलक्षणमूल- कोऽर्थशक्त्युद्भवो वस्तुना वस्तुध्वनि ।।३।। - गायति काचन नृत्यति काचन रमयति काचन रामम् । काऽपि च नटयति काऽपि च घटयति काऽपि च पटयति कामम् ।।४।। गायतीत्यादि । काऽपि च सखी राम नटयति नर्तयति, काऽपि च सखी घट- यति, तेन नृत्यविषयिणी चेष्टा कारयति । अय भावः-हे प्रियतम | रासक्रीडायां तव स्वाम्य न भवति, त्वयाऽप्यस्मत्सङ्गे नृत्यतामिति । काऽपि च काम यथेच्छं पटयति प्रवीण्यतीत्यर्थः । शेप स्पष्टम् । एतेन सर्वासा स्वाधीनपतिकात्व व्यज्यते । तेन च श्रीरघुनन्दनस्याऽतिरसिकत्वमिति ॥४॥ । जितविधुरघुवरवदनविकाशितवदना काऽपि नटन्ती। अकलि कलानिधिदर्शनमुद्रितमुखकमलानि हसन्ती ।।५।। जितेति । जितो विधुर्येन तत्, तच्च तद्रघुवरवदन तत्, तेन विकाशित वदनं यस्या सा, काऽपि सखी नटन्ती नृत्यन्ती सती, कलानिधिदर्शनेन मुद्रितानि मुखानि येपा तानि कमलानि हसन्तीव, अकलि विचारिता सखीभिरिति शेष. । अत्र हसन्तीवेत्युत्प्रेक्षया हे कमलानि । यनिरीक्ष्य यूय मुद्रितानि भवथ । स .3 PA १ ख भता २, धता ३. क. नास्ति। " द्वितीयः सर्ग [ २६ चन्द्रोऽपि येन रामचन्द्रमुखचन्द्रेण जितो मुद्रितो भवति, त' निरीक्ष्य विकासिता- नामस्मदीयमुखकमलाना समतेच्छा युष्माक वृथवेति तस्या अभिप्रायो व्यज्यते। तेन च सखीनां चातुर्यातिशय इति । अत्र वाच्यवैशिष्ट्यजन्य: पदप्रधानोऽर्थ- शक्त्यु द्भव उ-प्रेक्षालङ्कारेण वस्तुध्वनि. ॥५॥ -- रमरणोमण्डलमिह कुण्डलितं मृत्यति गतिसङ्गीतम् । गायति सरति सोतया साक श्रीरामो रसगीतम् ।।६।। रमणीमण्डल मिति । इह रासे, कुण्डलित हस्तेन हस्त गृहीत्वा कुण्डलवदा- चरित, रमणीमण्डल गत्या सङ्गीत नृत्यति, श्रीरामः सीतया साकं सरति, सप्रीति यथा भवति तथा रसस्य शृङ्गारस्य गीत शृङ्गाररसानुभावकं गीतमित्यर्थः, गायति । अत्र सीतया साकमिति वाक्येन रघुनन्दनेन सह विहरन्तीरन्याः सखीरालक्ष्याऽपि श्रीजानक्या. मत्सराभावो व्यज्यते। तेन च तस्या उत्तम- स्वकोयात्वमिति ।।६।। - मलयजलेपितललितकलेवरवलितवेणुवनमाली । चलदलकालिविलोकनपुलकितसकलालीगणशाली ॥७॥ अथ श्रीरघुनन्दनं विशिनष्टि मलयजलेपितेत्यादिना । मलयजेन लेपितं ललित सुन्दर कलेवर देहो यस्य स., वलित. सप्तस्वरमूच्छितो वेणुर्यस्य सः, च स स चाऽसौ वनमाली चेति विशेपणत्रयस्य कर्मधारयः । वेणुधारणमुक्त लघुकोशलखण्डे- स . "आजुहाव स सीतेश. सर्वास्ता. जगदीश्वरः । गानेन वेणुना साक सर्वचित्तापहारणेति । पुनश्च कीदृश ? चलन्ती या अलकानां चूर्णकुन्तलानामालि पक्ति , तस्या विलोकनेन पुलकितो रोमाञ्चितो य ालीना सखीना गणः समूहस्तेन शाली शोभित । मलयज- पितेनि पदेन माधवमासिकरासो व्यञ्जित.। तेन च मासि मासि रासो भवतीति । उक्तञ्च वृहत्कोशलखण्डे- . हेमन्तः शिशिरः शरच्च नितरा रामस्य नित्यप्रिया, सीतायाश्च वसन्त आत्मविभवैः प्रावृण्निदाघोऽपि च । हेमन्तादिषु सम्भवन्ति विविधा रासाश्च रामप्रिया, सीतायाः कुसुमाकरादिपु च ते स्वेच्छानिवद्धा अपि ॥इति।। . १ ख नास्ति । २. ख. मत्सरभावो। ३. क. तस्य । ४. ख. पुलिकिता।
1 ३० ] सङ्गीतरघुनन्दनम् अत्र चलदलकालोत्यादिपदेन कस्याश्चिद् गोप्यक्रियाया-१ स्मरण व्यजितम् । तेन तस्याऽतिसामर्थ्य मिति ॥७॥ वीरगामिलितरेणुरणितश्रुतिरघुवरगीतसुवर्णे । विश्वनाथ इति वदति कामिनी नुह्यति निपतति करणे ॥८॥ वीणेति । वीणासु मिलित वेणो रणित शब्द. श्रुनयश्च सङ्गीतगास्त्रप्रसिद्रा यस्मिन्, स चाऽसौ रघुवरगीतस्य सुवर्ण शोभनोऽभरश्च तस्मिन्, कर्णे निपतति सति कामिनी मुह्यतीति । विश्वनाथो महादेव. कविर्वाऽनुभूय वदति । कामिनीकर्ता वर्णे इति जातावेकवचनम् । मुह्यतीत्यनेन हे सखि | त्वमपि मोह प्राप्ता, किंवा मदुक्ति शृणोषीति व्यज्यते । विश्वनाथ इति यदतीत्यनेन श्रीरघुनन्दनरामीय- सख्युक्त्येद सङ्गीतरघुनन्दन नाम काव्य यदा-यदा लुप्त भवति तदा-तदा श्रीरघु- नन्दन एव मन्मुखात्प्रकटयतीति व्यज्यते । तेन चाऽस्य काव्यस्याऽनादिसिद्ध- त्वमिति ॥८॥ इति सिद्धिश्रीमन्महाराजाधिराजश्रीविश्वनाथसिंह-कृताया व्यग्यार्थचन्द्रिकानाम्नि टीकाया द्वितीय सर्ग ॥२॥२ [अथ तृतीयः सर्गः [मालतीलवङ्गवल्लय., कुसुमिता. किशलयसम्भारनता कूजन्मधुमत्तकोकिला गुञ्जत्षडज्रिनिकरा शीतलमन्दसुगन्धिसमीरणोल्लासिता. पादपालिङ्गनोत्सुका नितान्तकान्ताभिसरणोद्यता वनिता इव लता यत्र विलसन्ति तस्मिन् वसन्तागमे वनोपवनवाटिकासु विहरति वलयितवधूव्रजवलितविलाससमुल्लासितमानसे मान- शोकापनोदनचतुरे मनोनन्दन इव जनकनन्दिनी [ सहिते ] श्रीरघुनन्दन आलपति युगलप्रेमपरिपूर्णो विश्वनाथो वसन्तरागमिमम् - स स नि नि ध ध गम धध नि सास ग ग रि ससनिधमनी धा प मागा इति ।।१॥] 3 4 १. ख. गोन्यप्रियाया । २. ख इति सिद्ध. श्रीमन्महाराजाधिराजा श्रीमहाराजानीराजा- बहादुरसीतारामचन्द्रकृपापात्राधिकार-विश्वनाथसिंहकृताया व्यंग्यार्थचन्द्रिकानाम्नि टोकाया द्वितीय सर्गः ॥२॥ श्रीमते रामानुज । ३ [-] कोष्ठबद्धोऽयमश. क. पुस्तके नाऽस्ति ।
तृतीय सर्गः 30 -- अयं गद्यप्रवन्ध इति । प्रवन्धलक्षण सङ्गीतशास्त्रे ज्ञेयम् । प्रादरेण शृण्वन्त ज्ञात्वा पुनराह-मालतीत्यादीना' सञ्जातानि' कुसुमानि यासु ताः, किशलयाना सम्भारेण नता: नम्राः, जन्तो मधुना मकरन्देन मत्ता. 'कोकिलाः यासु ताः गुञ्जन्तः पडघ्रीणा भ्रमराणा निकराः समूहा यासु ता., शीतलो मन्दः सुगन्धिः म चाऽसौ समीरणो वायुस्तेनोल्लासिताः, पादपाना वृक्षाणामालिङ्गनायोत्सुका" उत्कण्ठि ना. नितान्तमत्यर्थ कान्तानामभिसरणायोद्यता वनिता इव मालतीनां लवङ्गानां च वल्लय., अन्याश्च लता यत्र विलसन्ति शोभन्ते, तस्मिन् वसन्तागमे बनोपवनवाटिकासु वलयितेन वल वदाचरितेन वधूना ब्रजेन समूहेन वलितो वृद्धि गतो यो विलासस्तेन समुल्लासितमुत्साहित मानस यस्य तस्मिन्, मानशोकस्याऽप- नोदन दूरीकरण तत्र चतुरे, मनोनन्दन. कन्दर्पस्तत्सदृशे, जनकनन्दिन्या सहिते, श्रीरघुनन्दने विहरति सति, युगलरय श्रीजानकीरघुनन्दनरूपयुगलस्य प्रेम्णा परि- पूर्णो विश्वनाथ: सखोरूपेण प्राप्तो महादेव , अथवा रासगतरघुनन्दनसेवायोग्य- शरोरेण रासमण्डलस्थित. कवि , इम वसन्तरागमालपति । इम कमित्याकांक्षाया-६ माह---गगनिनिधध गमधनिशाश ग गरि शशनि धमनी धापमागा इति । [अम्यार्थोऽपि-सेन सह स्वरा. ससास्तेषा नो बन्धोऽस्त्यस्मिन्निति, 'नः पुमान् सुगते बन्चे' इति मेदिनी, ससनी रासस्तमिन् धो धर्मो गानादिप्रावीण्य, 'घो ना धर्मे कुबेरे च क्लीवन्त वसुनि त्रिपु। घो धा च ब्रह्म नि ख्यातो धातु स्याद्धारकेऽपि च ॥' इति मेदिनी । त धरतीति धधः सखीगणस्त गच्छति प्रवर्तकत्वेन प्राप्नोतीति धध प्राचार्य जानकी त प प्राप सः धमनो गीतज्ञः धमन. शब्दः । अत्रयु प्रत्य- यस्य गित्व निपात्यते, सोऽस्याऽस्तीति प्रशस्तगीतवान् श्रीरघुनन्दनः । अत्र यत्तच्छब्दयोरध्याहारः। कीदृशः ? इधा-इ काम धुनोति स्वच्छविच्छटया तिरस्क- रोतीति इधा कामजेता श्रीरामचन्द्रः, औरणादिकोऽन्, यद्वा इ कामं दधाति योजयतीति इधा-सखीकामपूरक इत्यर्थः; कन्; पुन की० मागा माया जानक्या ग गीत, ग च गा तस्मिन्नित्यनेकार्थध्वनिमञ्जरी, तेन अनिति चेष्टते नृत्यति मागा; यहा मा च ग च मागे, ताभ्यां सहाऽनिति चेष्टते इति मागा; अना दन्तादयेति कि । अधधनिसासगरिससनिप स्यात्तथा अ. विष्णुस्त धरतीति अव. श्रीरघुनन्दन., अनेकविष्ण्वाश्रयत्वात्- न १ स मालतीत्यादिना । २ ख सुजापानि । ३. '--' ख अयमग क पुस्तके नाऽस्ति । ४. क. पादयादपान । ५ क. वृक्षामालि० । ६. क. ०कांश्यामाह ।
३२] सङ्गीतरघुनन्दम् -- 'ततो विष्णुमय देव पूजयन्ति मा देवता' इति श्रीमद्रामायणे विष्णुमय विष्णुप्रचुरमित्यर्थः । तस्य बनि. गब्द धनरत्रे, शासन शास. स गम्यतेऽनेनेति बाहुलकत्वान्न-विशेषणम्य पूर्वनिपात: । सामग शब्द: श्रीरघुनन्दनसम्बन्धी सखीजनशिक्षारूपो गानगव्दस्त गिति श्रवणा- नन्तरमन्त.करणे धान्यतीति स सखीरूपस्तस्य मो गण. 'सो गगा: परकीत्तिन' इत्यनेका०, तस्य सनि अध्येपणा प्राचार्य प्रति प्रार्थना । 'सनिस्त्वध्येपणे' त्यमरः । सा यस्मिन् कर्मणि तत् अधवनिगासगगरिसमनि, अथवा विष्ण्वाश्रय- रघुनन्दनसम्बन्धिशब्दशासनरूपगानधारकसखीसमुदाय कृतप्रार्थना यस्मिन् प्राप्ति- रूपे कर्मणीति । अत्र षड्जर्पभयोरादी मूर्धन्यम्वरयो सत्वात् कथ दन्त्यसकारे- कारविशिष्टरकारयोरर्थ कृत इति न शङ्कनीय, तयो. सनाशब्दत्वात् । तदुक्त सङ्गीतरत्नाकरे- ? श्रुतिभ्यस्तु स्वरा पड्जषभगान्धारमध्यमा । पञ्चमो चैवतश्चाऽथ निपाद इति सप्तम ॥ तेपा सज्ञा सरिगमपधनीत्यपरा मता । इति ] एते हि स्वरा वसन्तरागे भवन्ति । शिवस्य सखीत्वमुक्तम् - कोशलखण्डे- - 3 व्यज्यते । "रुद्रोऽपि तस्मिन् रमणीस्वस्पो भूपेन्द्र सूनो परिरम्भणाय । तेनादृतश्चागत एव कस्मादेपेन्दुमुख्यत्र विमृश्यतेति ॥" अत्र पादपालिङ्गनोत्सुका इत्यनेन जडेष्वपि चेतनधर्माचरणम् । तेन च वसन्त- स्याघटितघटनापटुत्व यत्र वसन्तसमये अचेतनानामीदृशो चेप्टा नत्र चेतनाना का कथेति भाव ॥१॥ विजयेते दम्पती परस्पर सङ्केतभाव सूचयन्तौ, चारुचञ्चलकुन्तलौ, साजननिरजनलोचनखञ्जनमीनमानगञ्जनौ, निजागरङ्गेण रङ्गभूमि भूषयन्ती, होलाखेलाकुतूहलिनौ, कनकमयपत्रभृतरङ्गद्रवसाभ्रकारुणचूर्णपूर्णजतुपात्रक्षेपरण- तत्परौ, नृत्यन्तौ, जडताकम्पिततनू, सुगीतिसहचरीसन्ताडितपटहप्रोत्साहिती सस्मितमुखौ, विश्वनाथीयमानसमानसे हसाविवेमौ विचरन्तौ ।।२।। - १. [-] 'अस्याऽर्योऽपोत्यारभ्य सरिगमपधनीत्यपरा मता इती'त्यन्त. कोष्ठगोऽयमशो नाऽवलोक्यते ख पुस्तके । २ जनेप्वपि । ३ ख. वशतस्या. घटितटतघटना० ४ +-+ चिह्नान्तर्गतो नास्त्ययमश ख. पुस्तके ।
। . तृतीयः सर्ग [ ३३ ३ . - साजनाभ्या निरञ्जनाभ्या च लोचनाभ्या खञ्जनमीनयोर्मानस्य' गञ्जनौ; अत्र साञ्जने लोचने जानक्या निरञ्जने रघुनन्दनस्येति ज्ञेयम्, होला नाम खेला होरीति लोके प्रसिद्धा तस्या कुतूहलिनौ, कनकमययन्त्रे' भृतस्य रङ्गद्रवस्य साभ्रकेणा- ऽरुणचूर्णेन अवीर इति लोके प्रसिद्धेन पूर्णानि तानि जतुपात्राणि चीनारङ्गफला- कारलाक्षापात्राणि कुमकमा इति लोके प्रसिद्धानि तेपा क्षेपणे तत्परौ, जडतया- sकम्पिते तनू ययोस्तौ, संगीतिसहचरीभिः सन्ताडितेन पटहेन डफ इति लोके प्रसिद्धेन प्रोत्साहितो, विश्वनाथस्य शिवस्य कवेर्वेद विश्वनाथीय मानसमेव मानस मानसनाम सरस्तत्र हसाविव विचरन्ताविमौ जानकीरघुनन्दनौ विजयेते । परस्पर सङ्केतभाव सूचयन्तावित्यनेन मिथो गालिदान व्यज्यते । साञ्जनेत्यादि- पदेन मियो मुष्टिक्षिप्तरङ्गचूर्णवञ्चन व्यज्यते । तेन च खेलनेऽतिचातुर्यमिति । निजागरङ्गेणेत्यादिना खेलने यतः श्रीरघुनन्दनो धावति ततो मरकतमणिमयीव, यतश्च जानकी धावति तत. सुवर्णमयीव भूमिर्भवतीत्युत्प्रेक्षा व्यज्यते । अत्र वस्तुनाऽलवारध्वनि । सगीतीत्यादेरय भावः -यदा सख्यो'° गीतौ पटहमातोद्य पराजितोऽसीति गायन्ति तदा पराजयमसहमान श्रीरघुनन्दन प्रकर्षेणोत्साहयुक्तो भवति, एव जानक्यपीति । विश्वनाथीयमानसेत्यादिवाक्येन शिवस्याऽपि शृङ्गार- प्रधानवोपासना व्यज्यते ।।२।। भृश विभ्रारणानां सुखमधिविहार विषयिरगां, श्रुतो त्वेतत्काव्यश्रवरराजनितानन्दमधिकम् । समीहेते ज्ञात्वा जनव नकदुहितुर्भावनमिद, वयस्या व्याहारै श्रवणपथमापूरितवती ।।१।। एतावत्कथनेन श्रमं निवार्य रास प्राप्ताया सख्या काचिदन्या सखी जगादेत्याह भृशमिति । विहारे इत्यधिविहारमिति १ विभक्त्यर्थेऽव्ययीभाव । भृश सुख बिभ्रा- गाना१२ विषयिणामिन्द्रयाणां मध्ये श्रुती श्रवणे तु एतत्काव्यश्रवणजनितानन्द- मधिक यथा तथा समीहेते इच्छतः । इद जनकदुहितुर्भावनमभिप्राय' वयस्या सखी व्याहारैर्वक्ष्यमाणैर्वचोभिस्तस्याः श्रवणपथमापूरितवती । एतेन सख्या वाग्मित्वम् । तेन च तस्या. समयज्ञत्व व्यज्यते ।।१।। - 4 J ज्ञात्वा rand - १ फ. खजनीनयो० । २. ख. कनकमयपात्रे । ३. ख चनारंग० । ४ ख जातयाकपिते । ५ क. हंसावि । ६. ख संकेभावं । ७. ख. मुष्टिक्षितरण चूर्ण० । ८. ख. जतः । ६. स. भूमिभवाती० । १०. फ. लख्यो । ११. क इत्यधिहारमिति । १२. क. विभ्राण । १३. ख. •भावना० ।
F . ३४] सलीतरघुनन्दनम् namaina ? विहरति रघुपतिरिह ऋतुराजे, किशलय कुसुमसमाकुलतरकुन्दकोफिलकीसमाजे ॥१॥ विहरतीति । इह ताजे ऋतळे बगल इति यावत्, पतिविहति । कीदृशे ऋतुगजे ? किगलयं कुमुमैश्च रामावुलगु व्याप्तेप नम्णा कुलप समहेष कोकिलाना कीग गुकास्तेपा च समाज: नमूहो यरिमन् । अत्र रघुपतिमनुराज- पदा-या ममानगोलत्वम् । तेन च विहारयोग्यता व्यज्यने । अवाऽष्ट्रपद्या वाच्यार्यतो वसन्तसम्पत्तिवर्णन व्यङ्गयार्थतश्च रघुराजराज्यवर्णन करोति । रघुपतिराज्ये धनधान्य सम्पन्ने प्रजा अपि नगरादिप गमाज कुर्वन्नीति । एतेन व्यङ्गयार्थेन तासा हर्षातिशय इति ||१|| विलसितमञ्जुलबजुलपुञ्जनिकुञ्जमहोज्ज्वलभासे । विकसितसारसलखगसकुलसरसीसरसोल्लाने ।।२।। तथा हि विनसितेति । विलसितेषु शोभितेपु मञ्जुलवजुलपुञ्जाना' सुन्दरागोक- समूहाना कुजेषु लतादिपिहिनोदरेपुरे महानुज्ज्वलस्य शृङ्गारस्य भासो यस्मिन् स तस्मिन्, विकसितै फुल्ल सारसकुलै कमल समूहै खगे. पसिभिश्च सङ्कुलाना सरसीना सरम रस शृङ्गारस्तेन सहित उल्लासो यस्मिन्स. तस्मिन् । अत्र पूर्वा इद व्यङ्गयम् - रघुपतिराज्ये मजुलवञ्जुलकुञ्जसमानि कामोपचारसहितानि भवनानि सन्तीति । तेन च तेपा विहारयोग्यतेति । उत्तरार्द्ध इद व्यङ्गयम् - रघुपति राज्येऽपि प्रतिभवन विहारार्थ निर्मिता. गृहदीधिकादयो गृहपक्षिणश्च सन्तीति । तेन चोद्दीपनाधिक्यमिति । 'तरलतरङ्गतरणलतिकाततिलीलासुखदसमीरे । तरुपरिरम्भरणवलितलतावलिवनविकलीकृतधीरे ॥३॥ तरलेति । तरलाश्चञ्चला ये तरङ्गास्तेपा तरणेन लतिकाना ततिषु पक्तिपु लीलया' च मुखद. समीरो यस्मिन् । तरलेत्यादिना वायोत्र विध्य व्यजितम् । तरूणा परिरम्भरणेन वलिताना युक्ताना लतानामवलियस्मिन् तेन वनेन विकलोकृता धीरा यस्मिन् स तस्मिन् । तरङ्गत्यादाविद व्ययम्- १ क मजलपुजाना । २ ख लतादिहितो। ३ मजुलबुज०। ४ ख. तरसतरङ्ग । ५ ख लीलाया। ६. ख यस्निन् स तस्मिन् । ७ ख. तरलतरङ्ग ।
तृतीयः सर्गः | ३५ रघुपतिराज्येऽपि प्रतिभवन क्रीडातडागेषु क्रीडन्तीना लतासदृशवनिताना समूहेषु समीरणस्य 'वस्त्रालकादिचालनरूपा लीला भवतीति । तेन च सखीसमूहनिर्गत- त्वान्मन्दत्व तदङ्गसङ्गात्सुगन्धित्व जलसम्पर्काच्छीतलत्व चेति । तरुपरिरम्भरणे- त्यादाविद व्यड्यम् - रासादिपू वनिताजनकृतनायकपरिरम्भरणश्रवणेन स्मरणेन च धीरा अपि मुनिजना ईल्यो भूत्वा वयमपि रासे श्रीरघुनाथालिङ्गनानन्द कदा लभेमेति व्याकुलीभवन्तीति । तेन च मुनिजनस्य रासप्राप्तिरेव मुख्य फल- मिति ॥३॥ . * पवनबिसारिपरागपटलपटघटितानेकविताने । मनसिजमत्तयुवतिजनसङ्गतयुवजनमोदनिदाने' ।।४।। पवनेति । पवनविसारिणो विसरणशीलस्य परागस्य पुष्परजस पटल समूह एव पटस्तेन घटितानि रचितानि अनेकवितानानि येन तस्मिन्, मनसिजेन कामेन मत्तैयुवतिजनैः सङ्गतानां मिलिताना युवजनाना मोदस्याऽऽनन्दस्य निदाने प्रथमकारणे । पूर्वार्दधे इद व्यड्यम्- श्रीरघुपतिराज्येऽपि कुसुमरज सदृक्षा अति- सूक्ष्मसुगन्धिपीतादिवस्त्रवितानभूषितानि भवनानि सन्तीति । तेन चोत्सवाधिक्य- मिति । उत्तरार्दुधे पुत्विदम् - रघुपतिराज्ये स्वीयाभि६ स्वच्छन्दविहरता स्वास्थ्यकारण रघुपतिरेवेति । तेन च तेपा विहारे प्रतिबन्धकाभाव इति ।।४।। "विगतपलाशपलाशकुसुमकृतविरहिवह्निसन्ताने । पुजितमधुकरगुञ्जितगजितमालवतीगुरुमाने ।।५।। विगतेति । विगतानि पलाशानि पत्राणि येपा' तेषां पलाशाना कुसुमै. कृतो विरहिणा वह्नः सन्तानो विस्तारो यस्मिन् , किंशककुसुमानि वीक्ष्य विर- हिणामन्तहो भवतीति भाव, यत्र च जडा अपि पत्रवस्त्राणि त्यक्त्वा निरपत्रपा' जाता., का कथा चेतनानामिति भाव. । पुजिताना'१ बद्धसमूहाना मधुकराणा गुजितेन शब्देन गञ्जितो नाशितो मानवतीना गुरुः पादपतनापनेयो मानो यस्मिन् स तस्मिन् । भ्रमरगुजित श्रुत्वा मानिन्यो मान विहाय स्वत एव पतीनालिङ्गन्तीति भावः । पूर्वार्दध इद व्यङ्गयम् - रघुपतिराज्येऽपि -- १. ख. वस्त्रालकालिकादि० । २. ख. सुगन्धिजत्व । ३. ख रसादिषु । ४ क. मुनिमनस्य । ख मुनिमननस्य। ५. ख. युवगणमोद० । ६ ख स्वीयानि । ७. ख. विगतपलाशकुसुम० । ८. ख. येषां ते । ६ ख यस्मिन् तस्मिन् तस्मिन् । १०. क ख निरपत्रया । ११. ख. पुजितां । १२. ख रघुपतिऽपि ।
३६] सङ्गीतरघुनन्दनम् प्रतिभवन चित्रलिखितकुसुमितकिंशुक निरीक्ष्य मारणास्तेऽपि चित्रलिविता एव विकलाकृतयो निरीक्ष्यन्त इति । तेन च तत्र दम्पत्यो परस्परमनुरागाधिक्यमिति । उत्तरार्धे चेदम् - रघुपतिराज्येऽपि सङ्कुचितावयवा मधुकरा इव रसास्वादका ये नायकास्तेषा गुञ्जिनमिवोद्दीपक वचनमाकर्ण्य मानिन्यो मान मुञ्चन्तीति ।।५।। मलयानिलपरिमलितदिशावलिकिशलयललितदुकूले । अतिसुकु मारकुसुमशरमारकमारजगजयमूले ।।६।। मलयानिलेति । मलयानिलेन परिमलिता मुगन्धयो दिशावले * प्राच्या- दिदिक्पड्क्तेः किशलया एव ललितानि वस्त्राणि यस्मिन् स तरिमन्, अतिसुकु- माराणामतिकोमलाना कुमुमरूपशराणा सारकस्य प्रक्षेपकस्य मारस्य कन्दर्पस्य यो जगज्जयस्तस्य मूले कारणे । कुसुमगराणामतिकोमलत्वान्नगज्जयाक्षमेगा कामेन वसन्त एव जगज्जाययतीति भाव । पूर्वाध इद व्यङ्गयम्-- महागज- रघुपतिराज्येऽपि वनिताना सुगन्धीनि किशलयवत्कोमन्नानि दुक्कलानि सन्तीति । तेन च तत्र दारिद्रयाभाव इति । उत्तरार्दधे त्विदम् - महाराजो रघुपतिरपि स्वभटाना जगज्जयमूलमस्तीति । तेन च पराक्रमातिशय इति ॥६।। मुनिमनसोऽपि मदनमदमादिनि मोदमहोदधिमाले । अशकलचन्द्रचन्द्रिकाचन्दनचितदिगन्तराले ॥७॥ मुनिमनस' इति । मुनिमनसोऽपि मदनमदेन मादिनि मदकारिणि, मोदमहोदधीनामानन्दसमुद्राणा माला यस्मिन्स तस्मिन्, अशकलस्य पूर्णचन्द्रस्य चन्द्रिका एव चन्दन तेन चर्चित लिप्त दिशामन्तराल मध्य येन स तस्मिन् । पूर्वार्दध इद व्यङ्गयम्-रघुपतिराज्येऽपि ६उद्दीपनीकरणानन्दातिशय इति । तेन च तत्रैश्वर्यातिगय इति । उत्तरार्दुधे त्वेतत् - रघुराजराज्येऽपि प्रजायशश्चन्द्रि- कया दिडमण्डली चचिनेति । तेन च सर्वेषा सुकृतित्वमिति ।।७।। अखिलमहीमण्डलमण्डनकरसडू लविविधविलासे । विश्वनाथकथिता पदशाथा विलसतु रसिकविलासे ।।८।। . १ ८. सुगन्छियो। २ क दिशावलेय । ३ क मनिमनस । ४. क. मनिमनसोऽपि । ५ ख महोदधीमानन्दे समु० । ६ ख उद्दीपनो कर० । ७ ख सुकृतीत्व० । ० मडलमनकरमफु विविध० ।
1 तृतीयः सर्ग. [ ३७ - वसन्तवनिमुपसहरति अखिलेति । अखिलस्य सम्पूर्णस्य महीमण्डलस्य मण्डनकरा: भूषका. सकुला विविधा विलासा यस्मिन्' ऋतुराजे । इद व्यङ्गयम्-श्रीरघुपतिराज्येऽपि विविधविलासै प्रजा. पृथिवीमण्डल भूपयन्तीति । तेन चाऽनयाभाव इति । विश्वनाथेन कविना वा कथिता पदगाथा,२ रसिकाः श्रीरघुनन्दनलीलानातारस्तेषा निवासे गोष्ठ्या विलसतु । अत्र रसिकगोष्ठीविला- सेनाऽस्य गीतस्याऽपि वसन्तसमानशीलत्वम् । तेन चाऽत्र शृङ्गाराधिक्यं व्यज्यते ॥८॥ नृत्यति नवललनागरणमण्डितरसपण्डितनवरामः। यल्लावण्यलेशमपि न लभेदमितरतिर्यदि कामः ।।१।। - विहरतीत्यनेन प्रतिज्ञात विहार वर्णयति नृत्यतीति । नवाना ललनाना गणेन मण्डित स चाऽसौ रसे शृङ्गारे पण्डितः स चाऽसौ नवो रामः नृत्यति । यदि काम अमिता अपरिमिता रतयो यस्य ईदृश. स्यात्तदाऽपि यस्य श्रीरघु- नन्दनस्य लावण्यस्य लेशमपि न लभेत् । अत्रोपमेये नृत्यस्योक्तत्वादुपमानेऽपि तदाक्षेप प्रथमतः स रमणशीलस्तत्राऽपि रसप्रवीणस्तत्राऽपि नवललनागण- मण्डितस्तत्राऽपि नृत्यम् । एतेन रासे परमरसाधिक्यम् । तेन च रमणीनामुत्सा- हातिशयो व्यज्यते ।।१॥ तावता-वतत्थ-इत्थ-इतत्य-इ-निनदापूरितदावम् । वीरगानादसुसङ्गतसिञ्जितमधिकव्यञ्जितभावम् ।।२।। नृत्यतीत्युक्त नृत्य वर्णयति । तावतावेत्यादिना । क्षण सुप्रीतः सुप्रसन्न इव, क्षण भीत इव, क्षण ह्रीतो लजित इव, क्षणमह्रीतो घृष्ट इव, क्षणमनुनीतो मुक्तमान इव श्रीरघुनन्दनस्तावता वतत्थइत्थइ' -इत्याकारक- निनदेन’ सङ्गीतसज्ञकनृत्यसम्बन्धिशब्देन आपूरितो ढावो वन यस्मिन् कर्मणि तद्यथा स्यादेवम् । तावता वेत्यादेरर्थस्त्वेवम्-इ सम्बोधने ' हे श्रीरघुनन्दन इथे कामोत्सवे, वताऽऽमन्त्रणे हर्षे वा, ता. स्त्रियस्त्वमव रक्ष । कीदृशस्त्व ? तत्थ ताभ्यस्य मङ्गल यस्य सः, यद्वा तासा मङ्गल यस्मात् सः, कीदृशे इत्थे ? १ ख यस्मिन् स तस्मिन् । २. ख पादगाया । ३ ख लभेदमितिः । ४ . स्तत्रापि नवस्तवाऽपि । ५ ख क्षणनुननीतो। ६. ख वतत्यइ तथइ थइ । ७ स हर्ष । ८ क स्तममव । ६ ख लक्ष । - ३८ ] ३ सङ्गीतरघुनन्दनम् इतत्थे इ-भेदस्त तनोतोति इतत्, ताशस्थ,क्षणोऽवकाशो यस्मिन् स तस्मिन्, प्रमाग चाऽत्र- 'थ क्षणे मङ्गले च स्यादिति' मेदिनी। इभेदे चोभयत्र, वीणानादेन सुसङ्गत सिञ्जित भूषणशब्दो यस्मिन् कर्मणि, अधिक व्यजितः प्रकटितो भावो यस्मिन् कर्मणि, तद्यया स्या- देवम् ।।२।। सड्गीत नृत्यति सङ्गीत सुप्रीतो रमणीयम् । क्षरणभीतो होतोऽहोत ' क्षरणमनुनीतो मननीयम् ।।३।। सङ्गीत सम्यग्गीत सङ्गीतशास्त्रेऽत्युत्तममित्यर्थः । रमणीयम् मनोहर, मननीय मननयोग्य, सङ्गीत नृत्यविगेष, नृत्यतीति द्वयोः सम्बन्धः । प्रत्येक- मण्डले स्थितयैकया प्रवीणया सख्योच्चारितास्तावता'-वेत्यादिशब्दान् नृत्यन्ती सखी पदगत्या वादयन्ती च मृदङ्गेन नि सारयतीति भाव. । अत्र सुप्रीत इत्यनेन स्वकीयाया, भीत इत्यनेन मुग्धाया, ह्रीत इत्यनेन मध्याया,, अह्रीत' इत्यनेन प्रगल्भायाः, अनुनोत इत्यनेन गतमानमानिन्याश्च भाव सूचयतीति व्यज्यते । तेन च तस्य नर्त्तनेऽधिकप्रवीणतेति । तेन च हे स्वामिनि ! एकम्वभावेन 'तादृशरसाधिक्य नोत्पद्यतेऽत. श्रीरघुनन्दन इयतो भावान् दर्शयस्त्वा शिक्षयतीति सख्यभिप्रायो व्यज्यते । तेन च रघुनन्दनप्रिय मान कुर्विति ।।३।। वाद्यमिलितमजोरधीररवसुललितगतिततिसङ्गम् । अनुगततालविशालभेदगरणमुखरितमधुरमबङ्गम् ॥४॥ पुनः सङ्गीत विगिनष्टि वाद्येति । वाद्येषु रासोपयोगिचतुर्विधवाद्येपू मिलितो मञ्जीराणा धीरो रवो यस्मिस्तञ्च सुललितगतिततीनामतिसुन्दरपदचलन- परम्पराणा सजो यस्मिस्तच तत्, अनुगतास्तालाना विशाला भेदगणा यस्मिन्नेव मुखरिता वादिता मधुरा मनोहरा मृदङ्गा यस्मिस्तत् । वाद्यमिलितेत्यादिना नूपुरगुटिकाना समानस्वरत्वम् । तेन च तद्धवने स्वरमसुखदत्व व्यज्यते ॥४॥ अतिरमणीयो रमणोऽविषम प्रतिराम सरमते । सितेतरेतरकरनयन बहु रासमण्डले क्रमते ।।५।। - १.स.जोतोऽज्ञीत । २. क. चारितोंस्तवता । ३. ख. अज्ञीत ४ ख. प्रगएभाया। ५. स. नेदगुरणमुसरित । ६ क. समो। ७. ख. नाऽस्ति । + . तृतीय सर्गः [ ३६ immo अतिरमणीयो रमणो रघुनन्दनः अविषम सम यथा स्यादेव प्रतिराम रामा रामां प्रति सरमते सम्यक् क्रीडति । तस्य सखीषु नृत्यप्रेमकटाक्षादिलीला न्यूनाधिका न भवतीति सखीमण्डल तिर्यङ् भवतीति भावः । सित बद्ध परस्परकरनयन यस्मिन्कर्मण्येव यथा स्यात्तथा, रासमण्डले बहु क्रमते बहु चलति । रासमण्डले सखीना रघुनन्दनस्य बहुत्वाल्लोलनृत्य भवतीति । एक एव रघुनन्दनोऽतिनतनजवेन सकलसखीनिकटे दृश्यत इति भावः । सितेतरेतरकर- नयनमिति क्रियाविशेषणेन परस्परालोकने तृप्तिमलभता मनोऽपि बद्ध भवतीति व्यञ्जितम् । तेन च रासेऽत्यासक्तिरिति ।।५।। मिथो दर्शनस्पर्शनपुलकितवपुर्विजयते पनसम् । स्वेदसलिलकरणसहितवदनमपि पयोनिधिजचन्द्रमसम् ।।६।। - मिथ इति । मिथो दर्शनस्पर्शने पुलकितं च तद्वपुश्च तत्, पनस विजयते । स्वेदसलिलकरणसहितवदनमपि पयोनिधिजचन्द्रमस विजयते । पयोनिधिज इति विशेषणेन चन्द्रस्य सजलकणत्वम् । तेन च तत्कालोत्पन्नत्वम् । तेन चाऽरुणत्वम् । तेन च तदुपमया वदनेऽप्यारुण्यम् । तेन चाऽनुरागातिशय इति व्यजितम् ।।६।। प्रसरत्पदतलशोसिमकबरीकालिमनखभाश्रेणीम् । मणिमयरासस्थल इह मन्ये शतशश्चलत्रिवेणीम् ।।७।। प्रसरदिति । इह मणिमय रासस्थले यः प्रसरत्पदतलस्य शोणिमा च कवर्या केशविन्यासस्य कालिमा च नखानां भाश्च तास्तासा श्रेणी राजिस्तां, शतशश्चलन्ती त्रिवेणी गङ्गायमुनासरस्वतीसङ्गम मन्ये । निजनिकटमागतस्या- ऽर्थिजनस्य मनोरथानां पूरयन्त्याः प्रयागेकदेशस्थिताया: वेण्या आसा रासमण्ड- लीयचञ्चलवेणीना दर्शने चैव पूर्णकामस्याऽपि रघुनन्दनस्य हृदये मनोरथान् वर्द्धयन्तीनां वैलक्षण्य व्यज्यते । तेन च तासामतिशयितरसोत्पादकत्वमिति ।।७।। - ब्रह्मानन्दविजयि युञ्जानो ध्यान यतिभिरगम्यम् । विश्वनाथ उत्थाय ततोऽपि हि नृत्यति रासे रम्यम् ॥७॥ १ ख वा भाव । २ क पुनस । ३ ख शोरिणमलकरी० । ४. ख मरिणयये र ५. ख पतिभिः । - ४०] सङ्गीतरघुनन्दनम् ब्रह्मानन्देति । यतिभिर्योगिभिरगम्यमप्राप्य ब्रह्मानन्दस्य विजयि, रम्य श्रीरामरासलीलाविषयक ध्यान युञ्जानम्ततोऽपि हि उत्थाय, तदपि ध्यान त्यक्त्वा विश्वनाथ सखीरूपो महादेव, श्रीरघुनन्दनसेवायोग्यशरीरेण रासस्थितः' कविळ नृत्यति । ब्रह्मानन्देत्यादिना रासस्य सर्वथा ध्यानागम्यत्व' व्यज्यते । नेन च रासस्याऽनुक्षरणनूतनत्वमिति । इति गान विधाय सखी मौनमासीत् ।।७।। अमृतमधुरतामधो नयन्ती भरिणतिमिमामभिपीय साधु सीता । दरचलितशिरा स्वया वयस्यामलकृताऽगुलिमुद्रया द्रुत ताम् ।।१।। इति श्रीमहाराजकुमारश्रीविश्वनामिहविरचिते सङ्गीतरघुनन्दने विसन्तरासवर्णन नाम तृतीयः सर्गः । अमृतेति । सीता अमृतमधुरतामधो नयन्ती नीचीकुर्वन्ती, इमा सखी गीतवसन्तादिवर्णनरूपा भरिणति, साधु यथा भवत्येवमभिपीय सादर श्रुन्वा, दरमीषच्चलित शिरो यस्याः सा, ता वयस्या स्वया अडगुलिमुद्रया द्रुत शीघ्र अलड्कृता' अलड्कृतवती । अत्र द्रुतमिति पदेन जानक्या प्रसादस्याऽचिरकाल- फलप्रदत्वम् । तेन च महाराजलक्षणवतीत्व व्यज्यते। अयमाशय -निजगाने ललना- मण्डितेति विशेषणेन रघुनन्दनस्य सर्वासु सखीपु सम प्रेम । प्रनुनीत इति विशेषणेन रसवर्द्धकत्वेन तस्याभिप्रेत स्वस्मिन्प्रेमाधिक्यजनकमानविधान च व्यजितवतीय मध्येवाधिकप्रेमवतीति विज्ञाय जानक्याऽड गुलीयकेन सा परि- तोषिता ॥१॥ इति सिद्धिश्रीमन्महाराजाधिराजश्रीरामचन्द्रकृपापात्राधिकारि. श्रीविश्वनाथसिंहकृताया व्यग्यार्थचन्द्रिका- नाम्नि टोकाया तृतीय सर्ग ॥३॥ १. ख रागस्थित 1 २. ख. पानागम्यत्वं । ३. ख रास्यानुक्षणा० । ४. ख. भरिणतीममा. मभियीय । ५ रख दरचलति । ६. ख. पुष्पिकेयं नास्ति । ७. स्व. द्गम । ८. ख अलपकृत । है. ०श्रीसीताराम चतुर्थः सर्गः [ ४१ . [अथ चतुर्थः सगै] रमणं रासरतं सम्पश्यन्ती पतिप्रेम दर्शयितुम् । सीता गाने सखीगरण नमयन्ती ॥१॥ रासविलाससमाधिसुखाय समन्तरधादस्मिन्किल फाले । प्रललापेह पतिः प्राणप्रियतसे ! गता भवतो क्व नु बाले ॥२॥ - रमणमिति । रमणं श्रीरघुनन्दन, रासरत रासासक्त, पश्यन्ती, : प्रेम, स्वस्मिन् दर्शयितु , गाने सखीगणं नमयन्ती नम्र विदधती सती, 7 रासविलासस्य समाधिसुखाय ध्यानानन्दाय, अस्मिन् काले वर्तमानसुख- थे, किल समन्तरधात् अन्तहिता बभूव । पतिप्रेम दर्शयितुमित्यनेन 'वय जानकीतुल्या एव रघुनन्दनस्य प्रिया' इत्यभिमानः सखीनां माभूदिति तासा | कर्तुमिति व्यज्यते । तेन च तस्या. सौहार्दातिशय इति । गान इत्यादिना सख्यो | भवतीभ्यो न केवलमह रूपाधिका किन्तु गुणाधिकाऽपि, यतो गीतमोहितो रघुनन्दनो मामन्तर्दधती न ज्ञातवानिति तस्याः गुणगवितात्व ज्यते । रासविलासेत्यादिपदेन प्रत्यक्षरासमण्डले रघुनन्दनान्तरितसखी सख्य- रितरघुनन्दन प्रत्येकरासमण्डलमवलोकयितु न शक्यतेऽतस्तदवलोकनसुख धुमन्तहितेत्येककार्यसाधनेनाऽनेककार्यसाधनात् तस्या. परमचातुर्य व्यजितम् । जानक्यामन्तहितायामिह पतिः श्रीरघुनन्दनः प्रललाप । ह-हे प्राणप्रियतमे । हे बाले । भवती क्व नु गता ? मम तु त्वमेव प्राण- जयतमाऽसि यदन्तहिताऽतो बालाऽसीति भावः ॥१-२॥ तव मुखनलिननिरीक्षणरहितो नयनमधुकरो मुद न लभते । अनलति मलयानिलो गले मम माल्यं व्यालसाम्यमारभते ॥३॥ प्रलापप्रकार- . ६ तवेति । मम नयनमधुकरः तव मुखनलिननिरीक्षणरहितः सन् मुद हर्ष लभते । एतेन रसविशेषज्ञो मम नयनमधुकर. त्वद्वदनकमलादन्यत्कमलमेव न जानात्यतोऽन्यत्र मम प्रेमशङ्का मा कुर्विति व्यज्यते । तेन च सकलसखीतो २. क. रासतर । २. ख. पश्यति । ३. ख श्रीरघुनन्दनं एव । ४. ख रसत । २. ख. मुखनिलनिरी०। ६. ख. अनल । ७ क नाऽस्ति ।
- ४२ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् . १ जानक्याः सौन्दर्यातिशयो व्यज्यते । किञ्च मलयानिलो मम अनलवदाचरति । अय भाव. -यो मलयसम्बन्धी पवनस्त्वत्सङ्ग परमसुखदोऽभूत्, स इदानी त्वा विना वह्निरिव मा दहतीति । मलयसम्बन्धाद् वायो शीतलत्व मन्दत्व सुगन्धित्व' व्यञ्जितम् । मलयानिलस्य बसन्ते वणितत्वाद् वसन्तकालो व्यज्यते । किन माल्य मम गले व्याल साम्यमारभने । प्रारभत इति क्रियया इदानीमेव दर्शन देहि । यदेय माला व्यालीभूय दक्ष्यति तदा भवत्यागत्याऽपि किं विधास्यतीति व्यज्यते ।।३।। - - मम तनुविजितमूढमन्मथ इह मुन्थति निशितशरैरस्नेहन् । अतिमतिमन्दो दिवसदीप इत्र हिमकिरणोऽपि दहति मम देहम् ॥४॥ ममेति । मम तन्वा शरीरेण विजित स चाऽसौ मूढो मूर्यो मन्मथः कामः, मम देह, निशितं. तीक्ष्णैः शरै, न स्नेहः प्रीतिर्यस्मिन् कमरिण तद्यथा स्यादेव मुन्थति पीडयति । हे प्रिये । य. पूर्व त्वया सहितस्य मम शरीरशोभा- धिक्येन परास्त स एव काम इदानी त्वद्वियोगेन मम शरीर शोभाहान्या जिगोष- तीति भाव । अथ मूढपदेन दु.खिते प्रहारो वीराणामनुचित इति व्यज्यते ! तेन च तस्य निर्बलत्वम् । अतिमतिमन्दो हिमकिरणश्चन्द्रोऽपि दिवसदीप इव सूर्य इव मम देह दहति । कामस्तु' स्वकान्तिहारकत्वेनाऽपराधिन मा पीडयतु नाम । अयन्तु [निजस्वभाव व्यक्त्वा निरपराध पीडयतीत्यतोऽतिमतिमन्द इति भावः] 3 ॥४॥ इह मल्लीवल्ली वासन्ती शिलण्यन्ती विटप सानन्दम् । त्वयि हृदि सत्यां पुरो लसत्यामपि वर्द्धयति वेदनावृन्दम् ॥५॥ इहेति । त्वयि हृदि सत्या हृदये वर्तमानायामपि,५ पुरोऽग्ने अग्ने विलसन्त्या सत्यामपीह स्थाने मल्ली नाम वल्ली वासन्ती नाम वल्ली, विटपोऽस्यास्तीति विटपः । अत्र विटपशब्दादर्श' 'प्राद्यच', त विटप वृक्ष, सानन्द यथा भवति तथा श्लिष्यन्ती आलिड्गन्ती सती वेदनावृन्द पीडासमूह वर्दधयति । एतेन अन्तर्वह्निर्वर्तमाना त्वम् मम जानन्त्यपि' कथ न सहस इति । तेन च त्व प्रकटीभूय मामानन्दयेति प्रार्थना व्यज्यते । १ ख. नाऽस्ति । २. ख. कामतुख । ३. [-] ख. पुस्तके तु केवल 'निजस्वरहेति' इति पाठ । ४ ख. नास्ति । ५. क ख वर्तमायामपि । ६ क ख सत्यामयीह । ७. ख. विटप- सददर्श नायच। ८. ख. न जानत्यपि ।
marina चतुर्थः सर्ग. ...............[ ४३ तव रोचनलोचनसमपनं सञ्जात सम हृदयखनित्रम् । अवलोकय रिपुरतिपतिचरित मिल मिल मैथिलि मामब मित्रम् ॥६॥ तवेति । तव रोचनेन सुन्दरेण लोचनेन' सम तुल्य यत्पद्म हृदयस्य खनित्र सञ्जातम् । हे मैथिलि | इदानी पीडाकरत्वाद्रिपुर्यो रतिपतिस्तस्य चरितम- वलोकय । मिल, मिल, मित्र मामव रक्ष । अत्रेद व्ययम्-त्वा विना भ्रान्तस्य ममानन्ददायिनो भेदयित्वा कामेनाऽस्त्रीकृता इति । तेन च त्वया शीघ्र मित्रस्य साहाय्य करणीयमिति व्यज्यते ।।६।। विलसति सौदामिनी वारिदे त्व न हि पश्यसि महद्विचित्रम् । ज्ञात ज्ञात ध्यानगता त्वं नोचितमिदमन्यथा चरित्रम् ॥७॥ . विलसतीति । सौदामिनी वारिदे विलसति शोभते, त्व न हि पश्यसीति महद्विचित्रमाश्चर्यम् । यदि पश्येस्तहि पीडिता सती मा प्राप्नुया एवेति भावः । अत्र प्रलापदशातो वियोगे सयोगस्फूति. । पुनर्विचार्याऽऽह ज्ञात ज्ञात त्व ध्यान- गताऽसीति, अन्यथतादृशी सौदामिनी वीक्ष्येद ममाऽनालिङ्गनरूपमनुचित चरित तव न भवेत् । अत्र ध्यानगतेत्यनेन त्व तु सुखिताऽहमेव दुखित इति व्यज्यते । तेन च त्व मामेव ध्यायसीति व्यडयम् ।।७।। 1 रघुनन्दनजनकेन्द्रनन्दिनीचरितरसाम्बुधिभवनवनीतम् । मोद दिशतु सतामिह नित्य विश्वनाथगीत बरगीतम् ॥८॥ रघुनन्दनेति । रघुनन्दनजनकेन्द्रनन्दिन्योश्चरितरसस्य लीलारसस्य अम्बु- घेर्भवं नवनीत, विश्वनाथेन महादेवेन कविना वा, गीत वरगीत, इह जगति, सतां साधूना, नित्य मोदमानन्द दिशतु ददातु । यद्यपि रघुनन्दनस्य सकल चरित- मानन्दप्रद, तथाऽपि विशेषरसज्ञानामिद शृङ्गारलीलारूपचरित सर्वाधिकानन्द- दायीति भावः । अत्राऽम्बुधिपदेन श्रीरघुनन्दनचरितानामानन्त्यम् । तेन च तत्- सारस्याऽप्यानन्त्यमिति व्यज्यते ॥८॥ रत्नादिकुञ्ज तव वल्लभाऽस्ति प्रोवाच राम प्रति योगिनोति । कामा सखीयं सवसन्तिका चेद गायेद् गुणांस्ते प्रकटीभवेत्सा ॥१॥ १. स, लोचलेन । २. ख, रविति । ३. ख ०दशति ।
४४ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् रत्नादिकुञ्ज इति । तव वल्लभा रत्नादिकुजेऽस्ति । तत्र वसन्तिकया' सख्येय कामा' नाम सखी चेद् यदि तव गुणान् गायेत्तदा सा प्रकटीभवेदिति । योगिनी नाम काचित्सखी राम प्रति प्रोवाच-ग्रह योगवलेन जानामीति योगिनी- पदेन व्यज्यते । तत्र रास ध्यायन्त्या जानक्या एते एव काममुद्दीप्य, मनःक्षोभ जित्वा भवद्वियोग स्मारयिष्यत इति कामावसन्तिकापदाम्या व्यजितम् । तेन च शीघ्र मानभङ्ग इति गुणगानसमनन्तरप्राकटयादि व्यड यम्-~-जानकीप्रकटीकारे यादृक्सामर्थ्य भवदीयगुणाना तादृगन्येषा नाऽस्तीति । तेन च जानक्या रघुनन्दन- गुणाधीनत्व व्यज्यते ॥१॥ स योगिनीसम्प्रतिवेदितार्थो दिदेश कामां सवसन्तिकां ताम् । जगाम सेय रघुनन्दनेन प्रादेशिता प्राप्य जगौ गुणालीम् ।।१।। स इति । योगिन्या सम्यक्प्रतिवेदितो ज्ञापितोऽर्थो जानकीप्राप्तिरूपो यस्मै स राम ५ सवसन्तिका ता योगिनीनिर्दिष्टा कामा सखी दिदेश प्राज्ञापयामास । रघुनन्दनेन प्रादेशिता आज्ञप्ता सा इय वसन्तिका कामा सखी जगाम रत्नाद्रि- कुञ्जमितिगेष । प्राप्य च रघुनन्दनस्य गुणाली जगौ । योगिनीत्यादिना ज्ञानसाधनेषु योगस्य श्रेष्ठत्वम् । तेन च योगिन्युक्तोपायस्य रघुनाथमन.पतित्व' व्यज्यते । अत्र योगशब्देन भक्तियोगो ज्ञेयः ॥२॥ जय जय करुणाकरपर रघुदर ! विना हेतुमुपकारी। जनरक्षणसुविचक्षरण वीक्षरणतीक्ष्णतापसहारी ||१|| ७ जानकीकृतमानमोचनाय कामाकृतरघुनन्दनगुणस्वरूपवर्णनरूपगान- माह-जय जयेत्यादिना । अत्रोक्तिस्तु रघुनन्दन प्रतिबोधन जानकी प्रति । करुणा- करेभ्यः परः श्रेष्ठ. हे रघुवर । हेतु कारणं विनोपकारकरणशीलस्त्व जय जय निजोत्कर्ष प्रकटय । जय जयेत्यादरे वीप्सा । जनाना रक्षणे सुविचक्षण, वीक्षणेन तीक्ष्णतापस्य सहारी स च सः । एतेन नैतादृशोऽपराध करोतीति रघुनन्दनस्य निरपराधत्वम् । तेन च है जानकि ! तव मानकरणानौचित्य व्यज्यते । अत्रा- ऽन्यसन्निविवैशिष्टयजन्यार्थगक्त्युद्भवो' वस्तुना वस्तुध्वनिः ।।१।। १ फ. वसन्ति मा । २. फ. काम । ३ ख. स । ४. क. प्राकटये द । . प्राक् कोद । ५ क, गस । ६. फ. रघुनद्य० । ७ ख जानकीकृतामान० । ८ व अत्रोक्ति । ६ ब. विज्यने । १० ख वैशिष्टयन्यार्थ ।
. J धतुर्थः सर्गः [ ४५ mini नित्यक्षण सुविलक्षणलक्षण नरशिक्षणससारी । यत्सलतादिसकलगुणसागर नागरवर शृङ्गारी ! ॥२॥ + । । नित्यक्षणेति । नित्यः क्षण: उत्सवो यस्य तत्सम्बुद्धि., सुविलक्षणानि इतर- लक्षणेभ्यो लक्षणानि यस्य तत्सम्बुद्धिः, नराणा शिक्षणाय ससारीव संसारी, वत्सलतादीना सकलगुणाना सागर अगाधप्रेमनिवासस्थान; अश्रितदोषमोचकत्व- वत्सलता-प्रादिना सौशील्यादीनां परिग्रहः । नागरः वर प्रवीणः श्रेष्ठः, शृङ्गारी शृङ्गाररसास्पदम्, उचितोत्तमाभूषणधारको' वा। अस्मत्स्वामिनीं विना व्यथितो भवान् स्वस्य नित्योत्सवलक्षणप्रतिपादक सामुद्रिकशास्त्र किं मृषा करिष्यतीति सुविलक्षणलक्षणेति पदेन व्यज्यते । तेन च हे जानकि ! भवत्यपि सामुद्रिकशास्त्रवैयर्थ्यकारण मा भूदिति । नरशिक्षणाय योऽवतरति त वय स्त्रियः किं गिक्षयाम इति नरगिक्षणससारीति पदेन व्यज्यते । तेन च हे स्वामिनि ! त्वमपि तथैव पतिव्रतशिक्षणायाऽवतरसीति । परमप्रवीणे त्वय्यस्माक शिक्षावचन- मनुचितमिति नागरवरेति पदेन व्यज्यते । तेन च हे प्रवीणे । त्वमेव प्रकटीभूय रघुनन्दन शिक्षयेति । शृङ्गारिण. पुरुषाः सापराधा अपि वनिता लालयन्तीति शृङ्गारीति पदेन व्यज्यते । तेन च हे राजकिशोरि२ ! निजान्तर्दधाना- पराधशड्का मा कुर्विति ॥२॥ 1 - . . लोचनवदनबाहुवारिजविधुविषधरमदपरिहारी । कण्ठोर.स्थलकम्बुनीलमणिशिलाचारुतादारी ॥३॥ लोचनेत्यादि । लोचनेन च वदनेन च बाहुना च क्रमेण वारिजस्य विधोश्च विषधरस्य च मदस्य गर्वस्य परिहारी दूरकर्ता, कण्ठेन च उरःस्थलेन च कम्बोश्च शखस्य नीलमणिशिलायाश्च चारुतादारी सौन्दर्य्यनाशक: जल- जचन्द्रयोस्तापनिवारकताह्लादकतयोः, सर्प आकारविशेषस्य गर्व', शखे रेखात्रय- वदाकारस्य, नीलमणिशिलाया विस्तारकान्तिस्निग्धताना चारुतेति ॥३॥ उदरजितोज्ज्वलजलधित्रिवलीतल्लहरीधिकारी । "सुकेटिसविघपदहरिकटिकरिकरनवकिशलयलघुकारी ॥४॥ - -- १ ख प्रचित्तं त्तमा० । २. ख. किशोर । ३ ख. निजान्तह्माना० । ४ क. प्रकार० । ५ स विरमार० । ६ ख च चारुतेति । ७. ख सुकठिसविथ० । -- ४६ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् m उदरेति । उदरेण जित उज्ज्वलस्य शृङ्गारस्य जलधिर्येन स चाऽसौ त्रिवलिभिस्तस्य' समुद्रस्य लहरीणां धिकारी निन्दक', यथाक्रम सुकटिसविध- पदेन' हरिकटि-करिकर-नवकिशलयान् लघून् करोतीति सः, शृङ्गारसमुद्रे गाम्भीर्यसौदर्ये तल्लहरीष्वाकृतिशोभे सिंहकटौ सूक्ष्मता, शुण्डायामाकार., नव- पल्लवेषु वर्णकोमलते इति । एतेन तवैतादृशरूपदर्शन त्यक्तु न कोऽपि शक्नोति । सुषमावधिरूपादर्शनासहिष्णुर्जानकी कथमन्तहितेति बोधयति । तेन च हे जानकि । रघुनन्दन प्राप्नुयाश्चेतहि तव रूपादर्शनासहिष्णुत्वहानि- भविष्यतीति ॥४॥ स्मितयुवतीजनविस्मितकारक रसनायकविस्तारी। सरसदर्शनस्पर्शसमेधितसुखसुषमापरिसारी ।।५।। या स्मितेति । स्मितेन युवतीजन विस्मित करोतीति तत्सम्बुद्धिः, यदा स्मयते तदा सुधावृष्टिर्भवतीति, तरुण्यो विस्मयन्त इति भावः । रसनायकस्य शृङ्गारस्य विस्तारी विस्तारकर्ता, रससहिताच्या दर्शनस्पर्शाभ्या समेधित सद्धित सुख येन तत्सम्बुद्धि , सुषमाया परमशोभायाः परिसारी। यत्र यत्र चलति तत्र तत्र सुषमा छटा प्रसरतीति भावः । 'सरसेत्यादावय' भाव.७ काममुद्दीपयन् सकटाक्ष निरीक्षसे, या च त्वा स्पृशति, अथवा या सखी त्वा कटाक्षेण पश्यति, तस्या. परमसुखावधिर्नाऽस्तीति । स्मितेत्यादौ च स्मितमात्रे- व युवतिजनविस्मयजनकत्वात्तासा मध्यगुरुमानयो सम्भावनैव नाऽस्तीति । अत्र रसनायकेत्यादिना शृङ्गारस्य रघुनन्दनाधीनत्वम् । तेन च रघुनन्दनस्य- रसराजत्वम् । तेन च तवाऽपि रसराजस्वामिनीत्वम् । तेन चाऽऽलम्बनभूतयोः प्रतिकूलाचरणेन तद्धानिर्भविष्यतीति । तेन च मिल मिलेति व्यज्यते ॥५॥ वसनविभूषरणकलितकलेवर मौलिसुकुटमरिणधारो। अदभुतकेलिकुतूहलकोविद नित्यराससञ्चारी ।।६।। वसनेति । वसनः विभूषणैश्च कलित कलेवर यस्य तत्सम्बुद्धिः, मौलो मुकुटमरिंण मुकुटश्रेष्ठ धरति तच्छीलः । सहजा यस्य' सुपमामवलोक्य काऽपि १ ख. त्रिवल्लीमि० । २. स. सविथपदेन । ३. क सोदर्य । ४. क वर्णकोमले । ५. न. चोधयेति । ६. स. रघुनन्दनं न । ७. .' ख. नास्त्ययमश: । ५. ख. स्मितामागव । ६ ख युवतिजनकत्वात्तासां । १०. ख. जस्य ।
- [ ४७ + - चतुर्यः सर्गः त्यवनु न शक्नुयात्, किम्पुनर्वसनादिभूपितस्येति भावः । अद्भुतासु केलिषु यत्कुतूहल तत्र कोविद ! यस्या यथा मनो भवति तया सह तथैव क्रीडसीति भावः । नित्यराससञ्चरणशीलः । एतेन रघुनन्दनस्य क्षणवियोगासहत्वम् । तेन च विरहदु खातिशयः । तेन च हे जानकि । यावद् रघुनन्दनो विवर्णो न भवेत्तावदेव प्रकटीभूय रघुनन्दनं 'पश्याऽन्यथैतादृशरूपदर्शन तव दुर्लभ भविष्यतीति व्यज्यते ।।६।। कोककलाकलनाकुशलाऽल्पकजल्प' प्रियानुसारी । मानविमोचन ललनालोचनसुखमयकायविहारी ।।७।। कोकेति । कोके कामशास्त्रे या. कलास्तासां कलनाया रचने कुशलः, नव-नवकोककला: कत्तुं समर्थ इत्यर्थः । अल्पको जल्पो यस्य तादृशः । कदाचिद् भयेन कठोरवचन न निस्सरेदिति स्वल्पमेव जल्पसोति भावः । प्रियामनुस रति तच्छील., सर्वथा प्रियानुकूल इत्यर्थ अथवा कोक- कलाकलनाकुगलाल्पकजल्पप्रियामनुस रतीति । हे मानविमोचन ! ललनालो- चनाना सुम्बमयेन कायेन विहरतीति । मानविमोचनेत्याद्येक पद वा । एतेन यदि कदाचित्किाचिद्रसाधिक्याय मानमपि कुर्यात्तर्हि त्वत्स्वरूपदर्शनादेव मानस्य स्मृतिरेव भवतीति । तेन च हे मानिनि । दृष्टे रघुनन्दने तव मानो "यास्यत्येवाऽतस्त्व स्वत एव कथ न प्राप्नोषीति व्यज्यते ।।७।। ईदृशि रमणे दृग्गोचर इह किमु विहरति वरनारी । विश्वनाथगीते गीतेऽस्मिन्मिलतु विदेहकुमारी ॥८॥ इति श्रीमन्महाराजकुमार श्रीविश्वनाथसिंहकृते रघुनदने'' जानक्यतर्धानवर्णन नाम चतुर्थः सर्गः ॥४॥ अथ श्रीरघुनन्दनस्य निरपराधता'१ स्वरूपगुणांश्च वर्णयित्वा जानकी- मानयोग्यता १२ व्यञ्जयन्ती गीत सहरति-ईदृशीति । ईदृशि रमणे त्वयि दृग्गोचरे सति इह वरनारी विशेषरसामिज्ञा किमु विहरति विहार करोति, 1 - । १ ख. यस्या० । क यश्यान्यथैभावशवे । २ ख कलनाकुलाल्पक० । ३ ख. कामारणास्त्रे। ४ क सरेदिति । ५. क. यतेन । ६. ख. कचादित्० । ७ ख भभवतीति । । ८ क. यास्यात्ये० । ६. ख. सिंहकृतायां । १० ख सगीतरघु० । ११ ख निरपराधाता। १२ ख. ०योयता।
४८ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् अपि तु नैव करोतीत्यर्थः । एतेन रघुनन्दनस्य नायकोत्तमत्वम् । तेन च हे जानकि त्वमुत्तमनायिकाऽसि'; इदानीमपि मानं न त्यजेश्चेत्तदा रहसि सख्यस्त्वामज्ञां कथयिष्यन्तीति: । तेन च ज्ञानिकन्यायामज्ञानिनीति कथन महती लज्जेति व्यज्यते । अस्मिन् गीते विश्वनाथेन महादेवेन कविना वा गीते, अथवा विश्वनाथस्य श्रीरघुनाथस्य गीत गान यस्मिस्तस्मिन् गीते सनि, विदेहकुमारी मिलतु प्राप्नोतु रघुनन्दनमिति शेष. । , इति सिद्धि'श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीरामचन्द्रकृपापात्राधिकारी श्रीविश्वनासिह-कृतायांव्यग्यार्थचन्द्रिकानाम्नि" टीकाया चतुर्थ सर्गः ॥४॥ . [अथ पञ्चमः सर्गः] रघुनन्दनगुरणगानाद्भुतप्रभाव जनकपुत्री च । युगपद् विलोक्य ससुख वसन्तिका सञ्जगादेदम् ॥१॥ एतेन रघुपतिगुणगानस्याऽतिसद्य.फलदातृत्वम् । तेन च तस्य सर्वा- धिक्य व्यज्यते । 'अत्र सहोक्त्यलङ्कारध्वनिजवस्तुना वस्तुध्वनिः ॥१।। पश्य पश्य कामे सखि पुरतो राजति जनककिशोरी । ध्यानगतान्तर्धानप्रकटितपतिमुखचन्द्रचकोरी ॥१॥ रासरत रमण ध्यायन्तीमेव जानकी मानिनी मत्वा, श्रीजानकीमान- करणमनुचित विचार्य मानो मया न कृतोऽपि तु ध्यानमेव कुर्वती स्थितेत्यूरीकृत्य श्रीरघुनाथ पायादित्यभिप्रायेण ध्यानमारोपयन्त्याह-पश्येति । हे कामे सखि । पश्य पश्य, तव पुरतो जनककिशोरी राजति । ध्यानगता सा चाऽसौ १ अन्त- र्धानात्प्रकटिता च सा चाऽसौ पत्यु: १२ श्रीरघुनन्दनस्य मुखमेव चन्द्रस्तत्र चको- १ ख तुमुत्तमः । २ ख. हरसि । ३. ख. फथापिण्यन्तीति । ४ ख. प्राप्नोति । ५. स्व. सिद्धः। ६ ख पात्राधिकार । ७ ख. विज्ञार्थ० । ८. ख. सुख । [६. इत पूर्वमयमशो विशेष ख पुस्तके-'रघुनन्दनेति स्पष्टम्' । १०." चिह्नान्तर्गाऽज्ञो नास्ति ख. पुस्तके । ११. ख अन्तर्वानात् । १२ ख. पत्य । J पञ्चमः सर्गः [ ४६ - रीव । पश्य पश्येति सम्भ्रमे वीप्सा । पतिमुखेत्यादाविदं व्यड यम्- सखि ! । पश्याऽस्या अद्भुतप्रीति, मानवती हि प्रत्यक्षेऽपि प्रिये तिर्यमुखी भवति । एषा तु ध्यानेऽपि श्रीरघुनन्दनमुखमेवावलोकयतीति । तेन च नेय मानिनीति ॥११॥ सुमनःस्नेहसुगन्धितशाटी कुसुमकलितकचपाशा । भाति सुरद्रुपरागपरीतो यस्या' निशि वाऽऽकाश: ॥२॥ सुमनःस्नेहेत्यादि । सुमनसा पुष्पाणा स्नेहः 'अतर' इति लोके प्रसिद्धः, तेन सुगन्धिता सा चाऽसौ शाटी तथा कुसुमैश्च कलितो युक्तः कचपाशः केश- पाशः, निशि सुरद्रुमः कल्पतरुः तस्य परागेण कुसुमरजसा परीतो व्याप्तः प्राकाशो वा आकाशसहशो भाति । "वा यथा तथैवैवं साम्य"मरः । अत्र निशिपदेन आकाशस्य सनक्षत्रता व्यज्यते । तेन च नक्षत्राणा कुसुमसादृश्यम् । परागसादृश्येन शाट्याः सूक्ष्मताकोमलते व्यञ्जिते ॥२॥ प्रभाजपरिभासितभाले लसति नीलमणिराजः । अर्द्धचन्द्रसिंहासनगत इव रसराजो विसमाजः ॥३।। प्रभापुञ्जति । यस्या. प्रभापुञ्जपरिभासितभाले नीलमणिराजः, अर्द्ध- चन्द्र एव सिंहासनं तद्गतः, समाजरहितः रसराजः शृङ्गार इव लसति । अत्र भालस्य चन्द्रोपमया दर्शनादेवाऽऽह्लादजनकत्व व्यज्यते । नीलमणेः शृङ्गारोप- मयाऽद्वितीयत्वम् । तेन च सौन्दर्यातिशयो' व्यज्यते ।।३।। मोदसदनवदने लोचनयुगमञ्जनयुतमिति शड्के । मिलितमिलिन्दकोकनदयुगल विलसति विधौ निरके ।।४।। मोदसदनेति । यस्याः मोदसदनवदने अञ्जनयुतं लोचनयुग, निरङ्के निष्कलङ्के विधौ चन्द्रे, मिलितौ मिलिन्दी भ्रमरौ यस्मिस्तच्च तत् कोकनद- युगल विलसतीति शङ्के । अत्र मुखप्रशस्त्या कोपाभावो व्यज्यते. । तेन च मानानवकाश. । कोकनदपदेन नयनयोः सानुरागत्वं व्यज्यते ॥४॥ अलकावलिकमनीये कर्णे सभमचलितताटङ्कम् । यमुनाफूलसुवर्णसुतीर्थे मन्ये रवि सशङ्कम् ॥५।। -- १. स. पश्या । २. ख. तन्या। ३. ख. सामा इत्यमरः । । ४. ख. चन्द्रोपमद्या। ५. ख. सौदातिशयो। ६. क. मानानकाशः ।
. ५० ] सङ्गीतरघुनन्दनम् अलकावलौति । अलकावल्या कमनीये, यस्याः कर्णे, सभ सप्रकाश, अचलितताटङ्क, यमुनाया: कूले सुवर्णस्य सुतीर्थे, सशक रवि मन्ये । अत्र सममिति पदेन सूर्यस्य पूर्व कन्याजलस्नानागमन भ्रमेणेति व्यज्यते । तेन च चकितत्वेन स्थिरत्वम् ॥५॥ ललितविभषणकलितनासिका नयनकुतूहलचरिता । विलसति विजितकीरवदनाकृतिनटनस्थिरशिखिरुचिता ।।६।। । ललितेति । विजिते कीरवदनाकृतिश्च नटनाय स्थिरस्य शिखिनो मयूरस्य रुचिता शोभा च यया सा, आकृत्या शुकतुण्डस्य, भूपणेन मयूरस्य' शोभा जितेत्यर्थ । नयनयो. कुतूहलाय चरितं यस्याः सा, यस्या. ललितेन विभूपणेन कलिता सा चाऽसौ नासिका विलसति शोभते । अत्र नटनस्थिरेति पदेन भूपणस्य भाविचञ्चलत्व व्यज्यते । तेन च रघुनाथसङ्गमाय गत्यादि- व्यापार. ॥६॥ कण्ठाभरणविभूषितकण्ठो विजितसमरिणदर एष.५ ॥ भूषणभूषितभुज. कुसुमयुतकल्पलतावरवेष.६ ॥७॥ कण्ठाभरणेति । यस्याः एष. कण्ठाभरणेन विभूपितः स चाऽसौ कण्ठः, मरिणभिः सहितो मरिणजटित इति यावत् दर शङ्खो येन स राजतीति, शेष । एतेन त्वया' कण्ठशोभयेव तादृशमूक. शङ्को जितः, सम्प्रति सध्वनिमपि त जयेति व्यज्यते । भूषणेति-यस्याः भूषणभूषितो भुजः, कुसुमैर्युतायाः कल्पलताया. वरो वेषो यस्य स शोभते । एतेन त्वया स्वभुजेन स्वरूपतः कल्प- लता जितेदानी कथन विनवाऽस्मन्मनोरथपूरणेन तस्याः कामदातृत्वमपि जीयतामिति । तेन च झटिति° रघुनन्दन मिलेति१ प्रार्थना व्यज्यते ॥७॥ कृष्णकञ्च कीवृतकुचमध्ये विलसति मुक्ताहारः । विजितमुदिरयुतमेरुशिखरयुगमध्यसुरधुनीधारः ।।८।। कृष्णेति । कृष्णवर्णया कञ्चुक्या वृतयोः यस्याः कुचयोर्मध्ये, मुक्ता- हारः, विजिता मुदिरेण मेधेन युतस्य मेरो. कनकगिरेः शिखरयुगस्य मध्ये १. ख सक । २. ख. विभूनकलित०। ३. ख. मपरस्य । ४. ख. नयनो। । ख. येष. । ६ ख कुसुमजुत० । ७ ख. एषा.. ८. क त्वाप्रा । ६. ख.. मथो- रय० । १० क. द्रटिति । ११ क मिलिति ।
पञ्चमः सर्गः [ ५१ है. w 1 वर्तमाना सुरधुन्या गङ्गायाः धारा येन सः, विलसति । हारशोभया तु तादृश- गङ्गाशोभा जिता, सम्प्रति चलित्वा, श्रीरघुनन्दन मिलित्वा गङ्गायास्तापहारित्व- शक्तिरपि त्वया जीयतामिति जितेत्यादिना व्यज्यते । तेन च त्वां विना रघुनन्दनस्याऽस्माकं च ताप हर्तुं न कोऽपि समर्थ इति ।।८।। ललितत्रिवलियुतलोमावलिकृशतरमुदरमसङ्गम् । जेतु हरौ त्रिदण्डशक्तिधरमिह मन्येऽहसनड्गम् ।।६।। ललितेति । ललितत्रिवलियुता लोमावलियस्मिस्तत् कृशतरमतिसूक्ष्म यस्या उदरमह हरौ शिवौ जेतु त्रिदण्डाना शक्तेश्च धरमिह असङ्गमनङ्ग मदन मन्ये । एतेन सखि जानकि ! पलायस्व पलायस्व, कुचशम्भू रघुनन्दनोरसा संवमय; कामः शत्रु शम्भु जेत् सज्जीभूत इति सखीपरिहासो व्यज्यते । तेन * च तस्या अतिनिकटवत्तित्वम् ।।६।। शङ्करपरपाशितदिनकरकरमपि' पश्येयुर्लोके । तदपि न सरशनकटिमुपमातुं' कवयः शक्ताः श्लोके ॥१०॥ शङ्करेति । शङ्करस्य परेण शत्रुणा कामेन पाशितः पाशविषयीकृतः स चाऽसौ दिनकरस्य करः किरणस्तमपि लोके पश्येयुस्तदपि यस्या. श्लोके रश- नया सहितं कटिमुपमातु कवयः शक्ताः समर्था न भवन्ति । शिवस्याऽष्ट- मूर्तिषु सत्त्वात् सूर्योऽपि कामशत्रुरिति भावः । एतेन कटिई ढ बद्ध इति व्यज्यते । तेन च कुचभारभङ्गभय त्यक्त्वा शीघ्र रघुनन्दन प्रति चलेति ।।१०।। कनकतन्तुगुम्फितमरिणगजमणिवरघर्घरपरिधानम् । नयनविषयमुपनीय तरणिरपि रहयति निजमभिमानम् ॥११॥ . - कनकेति । कनकतन्तुभिर्गुम्फिता मणयो गजमणयो गजमुक्ता यस्मि- स्तच्च तद्वर घर्घराख्यपरिधान च 'घाघरे' ति लोके प्रसिद्धम्, तत् नयन- विषयमुपनीय प्राप्य, तरणिः सूर्योऽपि निजमभिमान रहयति त्यजति । अस्या- ऽग्रेऽह कियत्प्रकाशवानिति लज्जितो भवतीति भावः । एतेन हे सखि । 15 १. क. ख. ०परपासित० । २. क. ख. सरसन० । ३. क रसनया । ख रसनाय । ४. ख भवन्ति । ५. क. निनिजममान । ख. निजमपिमान ।
- ५२ ] समीतरघुनन्दनम् www एतावन्तमीदृशघर्घरभार' सोढा तब कटि: किश्चलन एव श्रुटिष्यतीति व्यज्यते । तेन च नि.शङ्कतया गमन कुर्विति ।।११।। राजितरत्नाभरणविराजितपादपराजितममलम् । सजलविन्दु नखराकृतिमिन्दु वीक्ष्य विमुद्रति कमलम् ।।१२।। राजितेति । यस्या राजित रत्नाभरणविराजितेन पादेन पराजित, जल- बिन्दुभिः सहितममल कमल नखराकृतिमिन्दु चन्द्र वीक्ष्य विमुद्रति । एतेन जितकमलस्स चरणस्य सन्तापहारिप्रभाव परमप्रिये रघुनन्दने एव किं न दशयसीति व्यज्यते । तेन च तव चरणादेव रघुनन्दनो निस्तापो भविष्य- - तीति ।।१२।। कोटित्रयनिजसखीसवृता कान्तिचकासितकाया । यामवलोक्य लोक्यते मलिना सोडुसुधाशुच्छाया ॥१३॥ - यस्याः। कोटित्रयेति । कोटित्रयनिजसखीभि. सवृता, प्रादुर्भूता जानकी श्रुत्वा तस्यात्रिकोटय. सख्योऽपि समायाता इति भावः । कान्त्या चकासितः कायो :, सा, या 'जानकीमवलोक्य उडुभिर्नक्षत्रैः सहितस्य सुधाशोश्छाया कान्तिमलिना लोक्यते' तां जानकी पश्येति पूर्वेणाऽन्वयः । अत्रेद व्यङयम्- हे सखि जानकि ! तव शोभातः पराजितश्चन्द्रस्ताप कार कारं तापमय. सजात- स्ततोऽधिक ताप करोतीति । तेन च तत्र गत्वा त्वमेव रघुनन्दनस्य ताप हरेति ॥१३॥ ईशवनिताविरहविषण्ण कथ जीचिमनुते । विश्वनाथकृतगीते गीते'° रामो मुदमातनुते ।।१४।। H ? ईदृशेति । ईदृश्या वनिताया विरहेण विषण्णा'', जीवितु कथ मनुते न कथमपीत्यर्थ:१२ । विश्वनाथेन कृते गीते, गीते सति जनैरिति शेषः, १. स भार । २. ख .सोढी । ३. क एष । ४. ख. विति । ५. ख. विराजत० । ६. ख दशपतीति । ७. ख. त्रिकोटिय । ८. .' एतदशस्थाने ख. पुस्तके केवलमयमंश एव दृश्यते-'जानकीमवलोक्यते । ६. ख. विरदविपरण. । १०. ख. नाऽस्ति । ११. क ख विषण. । १२. ०मगीत्यर्थ । - .
[ ५३ t पञ्चमः सर्गः मुदमातनुते विस्तारयति । ईदृशेत्यादिना बह्वीषु वनितासु सतीष्वपि त्वां विना रघुनन्दनस्य न सन्तोष इति व्यज्यते। तेन च जानक्या प्रेमातिशय इति ।।१४।। । प्रतिक्षणातुच्छसमुच्छलच्छवि- च्छटावलोकस्थगितेन्द्रियनजाम् । विलोक्य कामा स्वसखी वसन्तिकां, प्रगल्भवाग्बोधयति स्म जानकीम् ॥१॥ प्रतिक्षणेति । प्रतिक्षणमतुच्छायाः समुच्छलन्त्याश्च छवेश्छटावलोकेन स्थगित इन्द्रियव्रजो यस्याः सा तां', वसन्तिका स्वसखी विलोक्य, प्रगल्भा वाग् यस्या. सा, कामा नाम सखी जानकी बोधयति स्म । पूर्व श्रीजानकीमवलोक- यितुमुत्कण्ठितां सम्प्रति तस्या रूपदर्शनेन स्थितामिव वक्तुमशक्तवती' वसन्ति- कामवगत्य कामा स्वयमाहेति । स्थगितेन्द्रियव्रजामिति विशेषणेन जानक्या बोधनेऽसामयं व्यज्यते । तेन च प्रेमाधिक्यमिति ॥१॥ सुरभि सखीसमुदय यौवनमपि नायकमनुकूलम् । दुर्लभमेकमेकमाकलये किमु सकल सुखमूलम् ॥१॥ एतावताऽपि मानमत्यजन्त्यां जानक्यामीषत्कुपिता कामाऽऽह-सुरभि- मिति । सुरभि वसन्तं, सखीनां समुदयं समूह, नवयौवनं, अनुकूल नायकमपि, एकमेकं सुखमूल दुर्लभमाकलये; सकल दुर्लभमिति किमु वक्तव्यम् ? एतेन सुलभे° सकले सुखमूले मान कृत्वैका त्वमेवाऽनभिज्ञेति व्यज्यते । तेन च सुखे दुखकारिणी त्वमेवेति ॥१॥ परमहसपरजनको जनकः सर्वसहैव जननी । ११रसघायकरघुनायकनायकप्रारणसमा या रमरणी ॥२॥ तस्या भाति नवीन चरित मच्चित्तेऽतिविचित्रम् । मिल मिल मनोमोहन मोहिनि ! जहि जहि मानममित्रम् ।।३॥ परमहसेति । परमहसेषु पर उत्कृष्टः स चाऽसौ जनकः, यस्या जनकः पिता, सर्वसहा भूमिरेव जननी । रसस्य शृङ्गारस्य धायकः धारणकर्ता पोषको वा स । 8 - १. क सं। २. क. स्थगिताविव । ३ क. वक्तमशकु । ख. वक्तुवतीं । ४. मा कामा । ५ ख नाऽस्ति । ६ ख मनुकूलकूलम् । ७. ख. कामा प्राह । ८ ख. सुखमूले । ६.१०. ख एतन सुलभ । ११. ख, रसद्यायक० ।
५४] सङ्गीतरघुनन्दनम् नायकः चाऽसौ रघुनायकः स चाऽसौ तस्य प्रासमा, रमणी या त्वम्, तस्यास्तव मानरूप नवीन चरित मच्चित्तेऽतिविचित्र प्रत्यद्भुत भाति । अपराध्नुयादपि' रघुनन्दन , तथापि तव मानो नोचित इति परमहसेत्यादिपदद्वयेन व्यज्यते । तेन च मातापित्रोरिवाऽऽर्यमनुवर्त्तम्वेति । नवीनमित्यादिवाक्येनेदानी त्वं विक्षिप्ता जाताऽसीति व्यज्यते । प्राणसमेत्यनेन न हि कश्चित्स्वप्राणे भ्योऽपराघ्नोतीति । तेन च रघुनन्दनस्याऽपराधसम्भावनैव नास्तीति व्यज्यते । हे मोहिनि । मनोमोहन श्रीरघुनन्दन मिल मिल । एतेन हे सखि ! यदि त्व मान करोषि तदा रघुनन्दने मोहनता कथम्, यदा च रघुनन्दनोऽन्यानुरक्तो भवति तदा त्व मोहिनी कयमिति ? तेन च माने सत्युभयोर्मोहनत्वमपयातीति व्यज्यते; तेन चाऽकीत्तिर्भविष्यतीति उत्तमस्वभाव उत्तमस्वभाव त्याजयति । स एव शत्रुस्तस्मान्मानरूपममित्र जहि जहि नाशय नाशय ॥२-३।। मा कुरु मुनिमनन मम वचनं मानय मानय धीरे । विश्वनाथनाथं रघुनाथ कुरु कुरु करे गभीरे ।।४।। मा कुर्विति । मुनीनामिव मनन मा कुरु । धीरे । मम वचन मानय । कि ते वचनमित्यत्राऽह-विश्वनाथस्य शिवस्य कवेर्वा नाथ, हे गभीरे ! रघुनाथ करे कुरु कुरु । मननेन श्रीरघुनन्दनो मुनीनामेव प्रसन्नो भवति न तवेति मा कुविति वाक्येन व्यज्यते । तेन च परधर्मग्रहणस्याऽनौचित्यमिति । कुरु कुर्विति द्विरुक्त्या कालविलम्वतो यथाऽन्याधीनो रघुनन्दनो न भवेदिति व्यज्यते । रघुनाथस्यवाऽपराधः केनचिन्मियैव कथितो वा तर्हि मनस्येव त रक्ष । यदा अवसर आपतिष्यति तदा यन्मनसि आयास्यति तत्करणीयमिति गभीरपदेन व्यज्यते ||४|| प्रगल्भत्वं तस्याः प्रकटमनुभूयोद्गतरुषाम्, परीहार सम्यग् वचनरचनाया विदधतो। सखीनां जानक्या प्रियसहचरी काऽपि चतुरा, वचांसि व्याजहें विशदपदभावार्थघटनम् ॥१॥ १ ख. अपराघुपादसि । २. क मातापित्रोरिवर्यवमनु० । ३ फ. स्वभाव्य । ४. स ०ममिरं । ५ क. मान ! ६ स. दुरफ्त्या । ७ फ. ख कालविलंतो। ८. ०मिव । ६ क प्रापति । १०. क स्व. यन्मसि । ११. स्त्र. परिहारं।
पञ्चमः सर्गः [५५ प्रगल्भत्वमिति' । उद्गता उत्पन्ना रुट कोपो यासा ताः तासां, जानक्याः सखीनां मध्ये काऽपि चतुरा प्रियसहचरी तस्याः कामायाः प्रगल्भत्व प्रकटमनु- भूय ज्ञात्वा, वचनरचनायाः परिहार तिरस्कार, सम्यग्विदधती सती, विशदा पदस्य' भावार्यघटना यस्मिन्कर्मणि तद्यथा भवति तथा, वचांसि व्याजह भाषित वती। प्रियसहचरीति जानक्या अभिप्रायज्ञेति व्यज्यते। तेन च तद्दत्तो- तरे जानक्याः प्रीति. । चतुरेति-यादृशवचनरचनया कामावचनतिरस्कारो भवेत्, जानक्या अभिप्रायो न प्रकाशेत तादृशवचनरचनाप्रवीणेति भावः ॥१॥ अनभिज्ञाय भूमिजाभाव प्रवदसि मूढे पण्डितमानिनि ! यौवनादि यदि गदसि दुर्लभ तन्नित्ये सभवति न भामिनि ! ।।१।। अनभिज्ञायेति । हे मूढे पण्डितमानिनि । त्वं भूमिजायाः श्री- जानक्या. भावमभिप्रायमनभिज्ञाय प्रवदसि । मूढत्वे हेतुमाह यौवनादीति-हे भामिनि ! कोपनशोले । यदि यौवनादि दुर्लभ गदसि तत्कयन नित्ये यौवनादी न सम्भवति । अस्याः सहनशीलत्वाद्यत् तव मनसि आयायात् तत्कथय; अन्यथा कथ कथयेरिति भूमिजाशब्देन व्यंज्यते । भामिनीति पदेन युक्तायुक्तकथनाविचारः । तेन च बोधनानधिकारो व्यज्यते । मूढे पण्डितमानिनीति सम्बोधनपदाभ्या मूढतातिशयो व्यज्यते ॥१॥ एषा विगतमानमदमत्सरमदनोत्थितमानससन्तापा । न हि कुपिता प्रियतमतनुचिन्तनजनितमानसानन्दकलापा ॥१॥ एषेति । विशेपेण गतः मानश्च मदश्च मत्सरश्च मदनोत्थितो मानसे सन्तापश्च यस्याः सा, एषाऽस्ति । ईदृशी चेन्मान कथ कृतवतीत्यत्राऽऽह-न हि कुपितेति । तर्हि रासं कुतस्त्यक्तवतीत्यत्राऽऽह-प्रियतमेति । प्रियतमस्य तनोश्चि- न्तनेन स्मरणेन जनित. मानसे आनन्दस्य कलाप; समूहो यस्याः सा, एता- दृगस्ति । विगतेत्यादिविशेषणेन सापत्न्याभावो व्यञ्जित । तेन च जानक्य उत्तमस्वीयात्व व्यज्यते । यर्मुखारुण्याश्रुपातादिभिः कोप शङ्कसे ते ध्यानानन्दा- नुभावाः । कुपिता चेत्तहि तव वचनानि श्रुत्वा सरोषं निरीक्षेत एवेति न हि . कुपितेत्यादौ भावः ।।२।। १ ख प्रागल्मिमिति । २. ख यदश्य । ३. ख. तद्वत्तरे । ४. क भूमियायाः । ५. नन्दनकलापा ६.ख चिन्मान ।
५६ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् ana अविखण्डितरतिरसपतिमण्डितदम्पतिभेदकरं सङ्कल्पम् । जाने जाने जनय न विफल जल्पमनल्पमनेकविकल्पम् ।।३।। अविखण्डिता रतिर्ययोरत एव रमपतिना शृङ्गारेण परस्परप्रेमातिशया- वस्थया मण्डितयोर्दम्पत्योर्जानकीरघुनन्दनयोर्भेदकर सङ्कल्प तव जाने जाने: अतोऽनेके विकल्पाः यस्मिन्स त, जल्प वाक्याडम्बर विफल न जनय । यदि तव सङ्कल्प न' जानीयात्, तदा भेदो भवेत् । ज्ञाते सङ्कल्पे कथंत व भेदविधाना- वकाश इति भावः । अविखण्डितेत्यादिवाक्येन त्व वचनभेदेन दम्पती प्रतारयसीति व्यज्यते । तेन चाऽहमेव रघुनन्दनेन विहरिष्यामीति तवाऽभिप्राय इति ॥२॥ पाहि पाहि नोचितमासितमिह गदितुमनुचितं न हि सड़कुचिता। विश्वनाथनाथ प्रति कथयति प्रेष्या या प्रेषणविहिता ॥४॥ इति श्रीमन्महाराजकुमारश्रीविश्वनाथसिंहकृते सगीतरघुनदने कामावसन्तिकागमनं नाम पचमः सर्गः ॥५॥ पाहि पाहीति । पाहि पाहि', इह तवाऽऽसितमासनमुचित नाऽस्ति । कुत इति चेत्तत्राऽऽह-यत अनुचितं गदितु सड्कुचिता नाऽसि, अतो गत्वा या प्रेषणे विहिता योग्या सा भवता प्रेष्येति, विश्वनाथस्य शिवस्य कवेर्वा नाथ रघुनाथं प्रति कथय । विश्वनाथमित्यादिना रघुनाथमप्यबोधविषयः करोतीति व्यज्यते । तेन च मम पक्षो बुद्धिमत्तर इति ॥४॥ . इति सिद्धि श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीरामचन्द्रकृपापात्राधिकारि- श्रीविश्वनाथसिंहकृतायां व्यग्यार्थचन्द्रिका- नानि टीकायां पञ्चम. सर्ग ॥५॥ । १ स. नास्ति । २. स्व. जानीयां । ३. व. ०भेवन । ४. ख. त्वेन । ५ ख. पाही । ६. ख. तवासितवासितयासनमुचित । ७. ख. संकुचित । ८. ख. भावता। ६. ०मय्पवोध०। १.. स. सिदः।
ज - - षष्ठः सर्ग: [ ५७ [अथ षष्ठः सर्गः] अमृतमधुरवारणी भेदभेदे कृपारणो, सकलगुणनिधान सर्व विद्यानिदानम् । विहितपतिनिदेश प्राप्य सीताप्रदेश, विदितरमरणशीला चारुशीला ललाप ।।१।। । अथ च कामया तत्र गत्वा कथिते वृत्तान्ते किं जातमित्याकाक्षाया- माह-अमृतेति । अमृतान्मधुरा वाणी यस्याः सा, भेदस्य भेदे नाशने कृपा- रणीव, सकलगुणाना निधान सर्वासां विद्याना निदानम्, विदित रमणस्य श्रीरघुनन्दनस्य शीलं स्वभावो यया सा, चारुशीला नाम सखी, सीतायाः प्रदेश, प्राप्य, विहितः कृतः पत्युः रघुनन्दनस्य निदेश अाज्ञा यस्मिन् कर्मणि तद्यथा भवति तथा, ललाप भापितवती । श्रीरघुनन्दनसन्तापसन्तप्तहृदयत्वादर्थतोऽपि चारुशीलोच्चैरवोचदिति भावः । अमृतमधुरेत्यादिविशेषणश्चारुशीलाया. जानकी- समीपगमनयोग्यता । तेन च तत्प्रेषितरघुनन्दनस्याऽभिज्ञता व्यज्यते ।।१।। प्राप्तराससुखक्षरणोऽपि विलक्ष्यवत्पतिरीक्षणे । त्यज विचिन्तनमिह विलक्षणसाशु गच्छ सुलक्षणे ।।२।। एषा रघुनन्दनसन्ताप श्रुत्वोत्थाय चलिष्यतीति सन्ताप निवेदयति-प्राप्त- रासेत्यादिना । प्राप्तः राससुखस्य क्षणो यस्य एतादृशोऽपि पतिः श्रीरघुनन्दनः, ईक्षणे दर्शने सखीनामिति शेषः, विरुद्ध लक्ष्य लक्षणीय यस्य स तद्वत् भ्रान्त इवेति यावत्, दृश्यत इति शेषः । यद्यपि प्राप्तः सखीसमूहस्तथाऽपि त्वा विना क्वचिद् विलपति, क्वचिल्लता प्रति त्वा पृच्छति, क्वचित्त्वा' ° समागता मत्वा किमपि कथयतीति भावः । अत. हे सुलक्षणे ! इह विलक्षण चिन्तन त्यज, आशु गच्छ च, श्रीरघुनन्दनसमीपमिति शेषः । अत्र विलक्षणमिति पदेन प्रत्यक्षस्य ध्यानमनुचितमिति । तेन च ध्यानं प्रियस्य सुखकारि नेति व्यज्यते । सम्प्रति विक्षिप्तसदृशः यदा विक्षिप्त एव भविष्यति तदा चलित्वा कि करिष्यसीति आशु ट गच्छेत्यस्य व्यङ्गयम् ॥१॥ १ क वाणीभेदने । २. क. भेदने । ३. ख, वियाना । ४. ख. ०माशुग । राससुमुखस्य । ६. ख. क्षणे । ७. ख. विरुध्यं । ८. स. प्राप्ति ६. ख. कुचिल्लताः । ५.ख. १०.स. कुचित्वां।
५८ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् winnr L पाणिगतमपहाय मणिमङ्गीकरोपि' सुकाचकम् । लक्षसे न हि यत्समक्षमपि प्रिय प्रियदाचकम् ॥२॥ इति कथितेऽप्यनुत्थिता' दृष्ट्वाह-पारिगगनमिति । यत्प्रियवाचक प्रियवक्तार, प्रिय श्रीरघुनन्दन, समक्ष न लक्षसे, तत्पाणिगत मणिमयहाय सुकाचकमङ्गीकरोपि । यथा काश्चिन्मणि' त्यक्त्वा स्वबुद्धिकल्पनया मांग- त्वेन काच गृह्णन्ति तथा प्रत्यक्ष प्रियवक्तार प्रिय व्यक्त्वा स्वकल्पित ध्यानगतमेव प्रत्यक्षत्वेन मन्यस इति भाव । अत्रेद व्यङ्गचम्-प्रत्यक्षमपि श्रीरघुनन्दन न पश्यसि तहि ध्याने कथ पश्यरिति ? तेन च त्व वृथवाऽक्षिणों निमीलयसीति ।।२।। प्रियसुदे प्रियपादचिन्तनमस्ति किं प्रियतापदम् ! मुञ्च मुञ्च गश्चल मृगलोचनेऽपहराऽऽपदम् ।।३।। अह तमेव चिन्तयामि, मदुपरि प्रसन्न एव भविष्यतीति चेत्तयाऽऽह-प्रिय- मुद इति । प्रियस्य तापदं, प्रियस्य पादयोश्चिन्तन किं प्रियस्य मुदे प्रीतयेऽन अपि तु नैवाऽस्ति, नहि कश्चित् तापदानेन प्रमीदति इति भावः । अतो हे मगलोचने दृगञ्चल मुश्च मुञ्च, आपद श्रीरघुनन्दनस्य विरहतापमपहर दूरी- कुरु । त्वया हगञ्चले मोचिते स प्रापन्मुक्तो भविष्यतीति भावः । अत्र मृग- लोचने इति सम्बोधनेन निजेन्द्रियाणि पूर्वस्वभावे स्थापयेति व्यज्यते । तेन च ध्यानशैथिल्य व्यक्त्वा रघुनन्दन सुखयेति ॥३॥ ] त विना न सुख तवाऽपि न चाऽन्यथा तव चिन्तनम् । विश्वनाथसुनाथचरित वरिगत कलिकृन्तनम् ॥४॥ त विनेति । यथा त्वा विना श्रीरघुनन्दनस्य सुख नाऽस्ति तथा रघु- नन्दन विना तवाऽपि सुख नाऽस्ति । अन्यथा तव चिन्तन त्वत्कर्तृक ध्यान न सम्भवति । एतेनोभयोर्दु.खद ध्यान त्यजेति व्यज्यते । विश्वनाथस्य शिव- स्य कवेर्वा सुनाथयोर्जानकीरघुनन्दनयोश्चरित वरिणत सत्कलेः कलहस्य कृन्तन छेदक भवति । एतेन यदि युवामेव'' कलह कलयथ. तदा युवयोश्चरित'' वर्णयता कलहनाश कथ घटेतेति व्यज्यते । तेन च कलहाद्विरमेति ॥४॥ १ १. ख मडिम० । २. ख. ०प्यनुत्यितो। ३ ख. कच्चि मरिंग । ४. क गृह्वा । रव गृह्वाति । ५. स सुकल्पित । ६. क प्रीतिय० । ७. क. प्रसीद । ८. क, सुखधेति । ६. क. प्र.याथा । १०. क. युवामे। ११. F युवश्चरितं । - [ ५६ षष्ठः सर्गः mainan । - - भाव जनक्षसुताया ज्ञात्वा वचन चारुशीलाया। साभिप्राय कमला स्मितानना तानुवाचेदम् ।।१।। भावमिति । ता चारुशीला इद वक्ष्यमाण यद्यपि श्रीजानक्या ध्यान- मेव जानाति तथापि मानचरिते रसातिशय: स्यादिति जानकीरघुनन्दनयोरभि- प्राय ज्ञात्वा मान व्यञ्जयन्ती चारुशीला ध्यान त्याजयतीति स्मिताननत्वे हेतुः । आश्चर्यमस्याश्चातुर्यमिति स्मिताननेति पदेन व्यज्यते । तेन च तद्रीत्यैवाऽस्या' वितरिति ॥५॥ - - वेत्सि नर्म न देवयोस्त्व सखि वृथा श्रम एष ते । काक्षसे दूतीयशस्त्वयि तन्न लक्षरणमीक्ष्यते ॥१॥ वेत्सिीति । हे सखि ! देवयो. श्रीजानकीरघुनन्दनयोर्नर्म रहस्य न वेत्सि । अतस्ते एप वार्त्तारूप. श्रमो वृथा । त्व मानिन्यनुनयनरूप दूती- यश:' काक्षसे, तस्याः [दूत्या लक्षण त्वयि नेक्ष्यते । अत्र वृथा श्रम इत्यनेन वचनाडम्बर कुविति व्यज्यते । तेन च तस्याः अनभिज्ञत्वम् । इद तावद्भूती- लक्षणं सति मा] ११ ने यन्मानमस्थापयित्वैव१२ त्याजयति, "असति माने ईदृग्व- चनमनुचितमिति काड्क्षसे इत्यादिना व्यज्यते"१३ ॥१॥ यत्कृते स्थितयाऽनया ध्यान न मोक्तु तस्य वेत्ता विश्वनाथप्रियेतरो१५ न विलोक्यते ।।२।। यत्कृत१६ इति । यस्य कृते स्थितया अनया' ७ जानक्या ध्यान मोक्तु न शक्यते, तस्य वेत्ता विश्वनाथस्य शिवस्य कवेर्वा प्रियात् श्रीरघुनन्दनादितरो न विलोक्यते । अत्रेद व्यङ्गयम्-जानन्नपि१६ जानक्यभिप्राय श्रीरघुनाथस्त्वा- शीमनभिज्ञा२ सखी२१ प्रेषितवान्२२ इति । तेन च तस्मै२३ अपि मानिन्यनु- १४ शक्यते । - नयनमेव२४ रोचत इति । २. ख. भेनमिति । २ ख. रसातिशया । ३. ख. रघुनन्दयो० । ४. ख. तइत्य० । ५. ख. उक्तरिति । ६. ख, इतियशत्वयि । ७. क वेदयोः। ८. क ख अस्ते । ६. ख. मानिम्यनुन । १०. ख इतियशः। ११. [-] कोण्ठस्थोऽश. क पुस्तके नाऽस्ति । १२ ख ०मख्यापयित्वैव । १३. "-" चिह्नान्तस्थोऽशोऽपि फ पुस्तके नाऽवलोक्यते । १४ ख. मोस्तु। १५. क. विश्वनायतरो। क अपत्कृत । १७ १८.ख. मोक्षं । १६. ख. जान्नपि । २०. ०स्त्यादशीमनभिज्ञा । २१. फ. ख. सखो। २२. क. प्रोषितवान् । २३. ख. तस्य । २४ ख. मानिन्यतुनयन० । क ख प्रतया। 1 ६० ] सङ्गीतरघुनन्दनम् १ अभिभवमिव मत्वा स्वस्य मध्ये सखीना- मिति निगदितमस्या.' साधु नाऽऽकण्यं सम्यक् । प्रकटितदरकोपा स्वीयनामार्थशानात्, पुनरदिदितभाव चारशीला जगाद ।।१।। न अभिभवमिति । सखीना मध्ये स्वस्याऽभिभवमनादरमिव मत्वा अस्याः कमलाया इति पूर्वोक्त, साधु निगदितं सम्यक् नाऽऽकर्ण्य, स्वीयस्य चारुशीले ति नाम्नः अर्थस्य मानात्प्रकटितो दर ईषत्कोपो यया सा 'चारुगीला नाम सखी, विदिता भावोऽभिप्रायो यस्मिन्कर्मणि तद्यथा तथा, पुनर्जगाद । चारुशीलेति- श्रीजानकीरघुनन्दनौ मम चारु शील ज्ञात्वा चारुशीलेति मा कथयत. । इयन्तु मा तिरस्करोतीति दरकोपवतीति भाव । रघुनन्दन एवाऽऽयात्विति कमलाभि- प्रायमनभिज्ञाय जगादेत्यनेन रसातिशयाय जानक्या तथैव मान स्थापितवतीति: व्यज्यते । तेन च श्रीरघुनन्दनस्य मानिन्यनुनयनाभिरुचिर्मया ज्ञातवेति । प्राप्य मुग्धामिनेमामसि' सखी भेदयितुम्प्रियो । सन्दधासि न दम्पती यदिमा समागतविक्रियौ ॥१॥ - प्राप्येति । इमा जानकी मुग्धामज्ञामिव प्राप्य प्रियो श्रीजानकीरघु- नन्दनी भेदयितु सख्यसि । इति कुतो ज्ञातमिति चेत्तत्राऽऽह-यत् यतः, समागता विक्रिया विकारो ययोस्तो, इमौ दम्पती जानकीरघुनन्दनी, न सन्दधासि । एषा मुग्धा नाऽस्ति, यदा त्वत्कर्म ज्ञास्यति तदा कोपमेव करिष्यतीति मुग्धामिवेत्यत्र व्यङ्गयम् । तेन च त्वं सखीमध्ये न स्थास्यसीति [पूर्वपदेन यदुक्त रघुनाथा- दन्यो जानक्यभिप्राय न जानातीति तर्हि त्व च जानासि चेत्कथमिति] कथयसि । जानक्यभिप्राय जानन्त्यपि तौ न सन्दधती त्वमेव तो विजयसीतिसन्दधासि ने- त्यादिवाक्येन व्यज्यते । तेन च त्वमेवाऽपराध्यन्ती'१ मां प्रतारयसीति ॥१॥ - मानलाभ मानिनी'२ त्व मानखण्डनपण्डिता। विश्वनाथसुनाथसभा द्विकोटिवनिता मण्डिता ॥२॥ । । १. फ. ०मस्या। २. ख. स्वीयनामर्थ। ३. क. स्थापिवतीति । ४. फ. ०रुचिरर्णया । ५. ख. मिसामसि । ६. ख. गतविक्रियो। ७. क. स्थाप्यसीति । ख स्थाससीति । ८ [-] कोष्ट्रगाशस्याऽभाव ख. पुस्तके । ६ ख. नौ। १०. ख वियोजयसीति । १९. स. ०ऽपराध्यति । १२ ख माननी। १३. ख. विश्वन सुना० ।
[६१ षष्ठ. सर्गः - भयमन्तरा न जायते प्रीतिरिति विचार्याऽऽह-मानलाभ इति । मान- स्य सन्कारस्य लाभे सति मानिनी भवतीति शेषः । त्व मानस्य खण्डने पण्डिताऽसि, तदेव शिक्षयसि, येन मानभङ्गः स्यादिति भावयतः२ विश्वनाथस्य शिवस्य कवेर्वा सुनाथस्य रघुनाथस्य सभा द्विकोटिवनिताभिर्मण्डिता । एतेन त्वा विना किं रघुनाथस्य सभा रिक्ता भविष्यतीति व्यज्यते । तेन च मयि गताया न काऽप्यागमिष्यतीति ॥२॥ . - - एकेन पूर्वमवदत् कमला पदेन, गीते द्वितीयचरणेन च चारुशीला । अस्या विशीर्णमवलोक्य सुवाक्यमान, सिद्धान्तमेव कमला सकलेन पश्चात् ।।१।। एकेनेति । गीते पूर्व मेकेन पदेन कमला अवदत्, ततो द्वितीयचरणेन चारुशीला अवदत्,तत अस्याश्चारुशीलाया. सुवाक्यस्य मान विशीणं नष्टमव- लोक्य कमला पश्चात् सकलेन गीतेन सिद्धान्तमेव जगाद ।।१।। युध्यते किमु गम्यतामसमञ्जस विदधासि किम् । कथय सखि कमले त्वमेव विचार्य समुचितमस्ति किम् ॥१॥ कमला चारुशीलां प्रति वदति-युध्यत इति । त्वया युध्यते किमु इतो गम्यताम्, किमसमञ्जस विदधासि ? अत्रेद व्यङ्गत्रम्-त्व दूत्यपि सम- यानभिज्ञाऽसीति । तेन च नाऽय भवद्दर्शनकाल , किन्तु विनयकाल एवेति व्यज्यते । इति श्रुत्वा चारुशीला विवाद वर्द्धमानमालक्ष्य श्रीरघुनन्दनकार्य- सिद्धय मृद्भूय' कमलामाह-कथयेति । हे सखि कमले । त्वमेव विचार्य कथय सम्यगुचित किमस्ति ? एतेन स्वस्मिन्मानापमानविचाराभावो'१ व्यज्यते । तेन च उत्तमदूतीत्वमिति । श्रीरघुनन्दनगतजानकीविरहदुःखदर्शनसन्तप्तहृदयाया. मम' कर्तव्ये उचितमनुचित च न भासते इति भाव. । सेवयैव प्रसाचते कविता लता वनिता धनी । विश्वनाथसुनाथमिति वद गच्छ सम्मतिसाधनी ॥२॥ T - १२ , १. ख. त्कारस्य । २. ख. भाव: यत. ३. ख. समा। ४. क एथेने पूर्वति । ५ ख. नसमतस । ६. क सरसि । ७. व क्म् । ८ ख भयदर्शन० ६ ख. वर्चमानं० । १० क मस्य । ११ ख.. माताऽपमान० । १२. क सम ।
६२ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् nima इति श्रुत्वा कमलोपायमाह-सेवयेति' । कविता तथा लता तथा वनिता तथा धनी सेवयैव प्रसाधते इति विश्वनाथ' सुनाथ श्रीरघुनाथ वद । सम्मतेः साधनी उभयोरैक्यविधायिनीति यावत् । श्रीरघुनन्दनानयनमन्तरा जानकी ध्यान न त्यक्ष्यतीति सेवयेत्यादौ व्यङ्गयम् । तेन च तेनैव त्वदभीष्ट- सद्धिर्भविप्यतीति व्यज्यते ॥२॥ श्रुत्वा वाक्य रमाया मधुरमतिहित चारुशीलासुवाचा, वाचा सन्तोषयिष्यन् प्रचुरचतुरताचारुमाधुर्यभाजा । "भाजालोल्लासिताङ्गी प्रियनुतिमतुलप्रेमसञ्जातकामो- ऽकामो य वीक्ष्य कामी भवति जनकजामेत्य रामोऽध्यगासीत् ।।१।। इति श्रीमन्महाराजकुमारश्रीविश्वनाथसिंहविरचिते सगीतरघुनन्दने चारुशीलाकृतमनुनयनवर्णन नाम षष्ठः सर्गः ।।६।। श्रुत्वेति । अकामो मुनिरपि जातावेकवचन, य वीक्ष्य कामी काम- युक्तो भवति । स रामः चारुशीलाया सुवाचा, रमायाः कमलायाः मधुरमति- हित वाक्य श्रुत्वा अतुलेन प्रेम्णा सञ्जात. कामो जानकीदर्शनाभिलाषो यस्य' स,, प्रचुरचतुरताचारमाधुर्यभाजा वाचा सन्तोषयिष्यन्, भाजालेन प्रभासमू- हेनोल्लासिताङ्गी, प्रिया नुतिर्यस्या: सा'° ता", जनकजा एत्य प्राप्य अध्यगासीत् गान कृतवान् । अत्र प्रियनुतिमिति पदेन जानक्या आगुतोषता'२ व्यजिता । तद्भजनेन 3 च स्तुत्या प्रसन्ना रघुनाथापराध न गणयिष्यतीति१५ स्वाभीष्टामेव श्रीजानकीसेवां कमला कथितवतीति अतिहितमिति पदेन व्यज्यते । तेन च प्रहर्पणालडकार इति । इतिसिद्ध१६श्रीमहाराजाधिराजश्रीमहाराजाश्रीराजावहादुरसिंह- श्री रामचन्द्रकृपापात्राधिकारि८श्रीविश्वनासिंहकृतायां व्यंग्यार्थचन्द्रिका नाम टोकायां पष्ठ.२° सर्ग ॥६॥ -- १. न. सेवति । २. ख. विश्वनाथस्य । ३. ख पद । ४. फ.व भाजालोल्लोसि । ५. क. नास्ति 1 ६. क. प्राकामो । ७ क. प्रम्णा । ८. व. रास्य । ६ ख ०चतुरताचारुता० १०. ख.रणा । ११. रख तं । १२ ख. पाटतोषता । १३ क. ख. तध्वननेन । १४. फ, व स्तुत्प्रा । १५ न. गरिमष्यतीति । १६. ख. सिद्ध. । १७. श्रीमन्महाराजाधिराज- सोता। १८. ख. पात्राधिकार । १६. ख. नाम्नि । २०. क. पट ख. षष्ट. ।
[६३ सप्तमः सर्गः J J [ अथ सप्तमः सर्गः] जयति तव रमरिण ! चरणकमलम्, विधिमहेशमाधवमानसमधुकरसेवितममलम्' ॥१॥ जयतीति । विधिमहेशमाधवानां मानसान्येव मधुकरास्तैर्मण्डित भूषित- ममल, हे रमणि । तव चरणमेव कमल जयति सर्वोत्कण वर्तते । एतेन ब्रह्मादीना साक्षाद्दर्शनदुर्लभता व्यजिता । दुर्लभतया च नित्यं तद्दर्शनवानह' , धन्य इति व्यज्यते ॥१॥ . धारण यदरजसः सुकृतम्, रोमरोमजगदण्डमण्डल पवते मदनगतम् ॥२॥ ६ ५ - -- धारणमिति । यस्य चरणकमलस्य रजस धारण सुकृत, धारणरूप पुण्य कत्तं मपि अनुगत प्राप्त रोमरोमसु जगदण्डमण्डल पवते पवित्रयति । अत्र ग्वस्य विराजः शरीरितयेत्थमुक्तिः । एतेन त्वच्चरणरजःपूतप्रतिरोमब्रह्माण्ड- मण्डले* मय्यपराधगडाभावान्मान त्यजेति प्रार्थना । तया च ब्रह्मादिपर- श्रीरघुनन्दनसेवितचरणरजस्कत्वात्तस्या सर्वतः परत्व' व्यज्यते ।।२।। सरसयावकमरन्दवलितम्, वरतलललितान्तस्कामदरेखाकेशरकलितम् ॥३॥ सरसेति । सरस यद्यावकं तदेव मरन्दस्तेन वलित युत, वरं सुन्दरं तलमेव ललितमन्तरं कमलमध्य११ तत्र कामदरेखा एव केशरास्तैः कलितम् । अत्र कामदपदेन तव चरणरेखास्तावकं१२ मां पूर्णमनोरथ करिष्यन्त्येवेति व्यज्यते । तेन च तव मानकरण निष्फलमिति ।।३।। नखरजलपृषदड्गुलोदलम्'3, विश्वनाथमानसमरालवरपरिषेवितमचलम् ॥५।। नखरेति । नखरा एव जलस्य पृषन्ति १५ विन्दवो यस्मिस्तत्, अडगुल्य 1 १. स्व. ०मधुकरमण्डित० । २ क. हरे । ३ क तदर्शनवाहं । ४ ख यद्रतसः ५ ख. जस । ६. रस. धारणरयं । ७ ख शरीरतये । ८. क. पूतप्रतिरोष० । ६. फ. सरत्वं । १० ख, ललितान्तरकामद० । ११. क कमल मध्य । १२. स. चरणरेषा० । १३. नख रजत० । १४. क. परिषेचितः । १५ फ धूपात ।
६४ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् एव दलानि यत्र तत्, विश्वनायमानसमेव मरालवरो हसश्रेष्ठस्तेन परिषेवितम्, अचल स्थिरम् । विश्वनाथेत्यादिना सदा मम मनस्त्वच्चरणासक्तमेवेति' व्य- ज्यते । तेन च प्रसीदेति । अचलमिति पदेन सम्प्रति सर्वथा कमलसमतया शोभित चरणं स्वगतिविलासेनाऽधिक विधेहीति व्यज्यते ।।४।। जयसि सर्वेशमरिणमुकुटवन्ये स्ववशरसमयतनो ! विमलमुन्मयमनो बहुलविबुवेन्द्रवनिताभिनन्छे ! ॥१॥ जयसीति । सर्वेशा: ब्रह्मादयस्तेषा मणिः श्रेष्ठ परनारायणः तस्याऽपि मुकुट. श्रेष्ठोऽह तेन वन्द्ये । त्व जयसीत्यन्वयः । एतेन सकलेशप्रणतपदार- विन्देन' मयाऽपि स्तूयमाना मानिनी त्वामन्यः को नु प्रसादयिष्यतीति व्यज्यते । तेन चाऽनुनयस्याऽवधिरिति । स्ववगा स्वाधीना रसमयी प्रानन्द- रूपा तनुर्यस्याः सा तत्सम्बुद्धि., स्वतन्त्रा भवन्ती किमहमाज्ञापयामि, स्वयमेव जानीहीति स्ववनि पदेन व्यज्यते । रसमयतनो इति विशेषणेन आनन्दमय- शरीरेण मह्य दुःखदान तव नोचितमिति व्यज्यते । विमलो मुन्मय आनन्दरूपो मनुमन्त्रो'' यस्या. सा तत्सम्वुद्धि. । एतेन त्वदानन्दमयनामरूपमन्त्रजपकर्तृ- मम कुतो न विरहताप दूरीभवतीति चित्रमिति व्यज्यते । बहुलाभिविबुधेन्द्राणां ब्रह्मादीनां वनिताभिरभिनन्छे'१ एतेन पातिव्रत्ये श्लाघमाना. सकलपतिव्रताः सम्प्रति मानमजहन्ती त्वा हसिष्यन्तीति व्यज्यते । तेन च तासा सख्यमिति । विबुधेन्द्रा अत्र ईशमहेश्वरेत्यादिपदव्याख्योक्ता. साकेतवासिनो विवक्षिता.१२ ॥१॥ इन्दिरामन्दिरारुणचरणपङ्कजे भूक्रियावदनदर्परगनखाली । सद्गुरणालड्कृते केलिविधिपण्डिते प्रिये ! मम मञ्जुमानसमरालो ॥२॥ इन्दिरामन्दिरेति१३ । इन्दिरायाः श्रीदेव्या: मन्दिर निवासस्थान अरुण- चरणमेव पङ्कज यस्याः सा तत्सम्बुद्धि , भूक्रिययो. भूदेव्या लोलादेव्याश्च५४ वदनस्य दर्पणे १५ नखाली नखपक्तिर्यस्या. सा, एतेन एताभिस्तिसृभिर्मम' मुख्यशवितभिः सेवितपदारविन्दा सापल्याभाववती त्व कुतो मान कृतवतीति -- १. फ. व चरगाशत० । २ ख. स्वागति० । ३. ४ ख, वधे। ५ ख शकलेश० । ६. स्व मद्यापि । ७.क रवाघीना। ५ ख. फिमहप्राज्ञा० । ६ ख रसमयततो। १०. क. मनमंत्रो। ११. क. नद्या । १२. स्व. विविक्षिता। १३. क. नास्ति । १४. ख तोलायाश्च । १५. स. दर्पणो । १६. ख. तिसृमिर्म । - - - " सप्तमः सर्गः । ६५ mmmmm १ व्यज्यते । सद्गुणेत्यनेन पत्या स्तूयमानायास्तवाऽक्षिणी' निमील्योपवेशन नोचितमिति व्यज्यते । केलिविधिपण्डितेत्यनेन तवाऽविधिकरण नोचितमिति व्यज्यते । तेन च त्वया लोलार्थमेव मानः कृत इति । मञ्जुमानस मरालोत्यनेन मम कश्चिदपराधो न वेति त्वमेव विवेचयेति व्यज्यते ।।२।। न . - सततमनमषिरणी रसराजवर्षिणी, रतिमानकषिरणी दीप्तिराशेः । जलधिनिमिराजकुलजनितसुकलानिधे, ज्वलितमदनानलज्वरविनाशे | ॥३॥ - . -- । " सततमिति । अनमर्षिणी कोपशून्या, एतेनेदानी त्वयि कोप कुत आगत इति व्यज्यते । रसराजस्य शृङ्गारस्य वर्षिणी, एतेन त्वयि विद्यमानायामपि कुतस्ताप' इति रसशब्दश्लेपमहिमा व्यज्यते । रतेनिस्याऽभिमानस्य कर्षिणी, एतेन मत्प्रीतिपात्र त्वदन्या नाऽस्त्येवेति व्यज्यते । तेन च मानानौचित्यमिति । दीप्त : छवे: राशेर्जलधिरिव यन्निमिराजकुल तत्र जनित ' सुकलानिधिस्तत्सम्बु- घि, । एतेनेदृगकुले जातायास्तवेदृश चरित नोचितमिति व्यज्यते । ज्वलितस्य मदनानलज्वरस्य विनाशो यस्यास्नत्सम्बुद्धिः । एतेन जानक्या' सन्ताप- नाशकस्वभावत्वम् । तेन च मामालिङ्गय सुखयेति व्यज्यते ।।३।। चित्रमिदमत्र यद्दहति तनुमतनुरिह तव समीपेऽपि मामिवानाथम् । मानमवमुञ्च परिषिञ्च वचनामृतरिति वदन्हरिरवतु विश्वनाथम् ।।४।। चित्रमिति । इह तव समीपे अतनुः११ काम , अनाथमिव तनु कृश' मां यद्दहति- इदमत्र चित्रम् । अतो मानमवमुञ्च त्यज । वचनामृत परि- षिञ्चेति वदन् हरिभक्तात्तिहर्ता श्रीरघुनन्दन विश्वनाथमवतु । चित्रमित्यादि- वाक्येन त्वादृशसमर्थनाथसमीपे१५ मम तथा मदनकृतदाहस्य विषादो न भवति यया' तव सामर्थ्यहानेरिति व्यज्यते । तेन च रवि कर्त्तव्येति । परिपिञ्च -- १२ १३ - + १ तवाक्षिरिण। २. ख. विचारयेति । ३. ख, सततमण । ४ क विद्यमानयामपि । ५. क ०स्तापे । ६. ख..श्लषुमहिम्ना । ७ ख. क्षेवः। ८ जानिता। ६. ख सकुलामिघि० । १०. ख. मृतौरिति । ११ ख प्रतनः । १२ ख नास्ति। १३ ख. फुसं। १४. ख. परिपिचति । १५ ख वाहसमर्थ । १५. क. तथा ।
-- सङ्गीतरघुन दनम् . वचनामृतरित्यनेन त्वद्वचनेनैव मम जीवनमिति व्यज्यते । स्वरक्षणप्रार्थनेने- दृशविरहस्य वर्णने कवे(तित्व' व्यज्यते ॥४॥ वाञ्छितदे कलगीते सीते ! तव शृङ्गारविधावभिलाष पूरय मयाऽनुगीते ।।१।। एतावताऽप्यनपगते माने एपा ध्यानमेव करोतीति विचार्य प्रार्थयन्नाह- वाञ्छितदे इति । हे वाञ्छितदे, कलगीते ! कलगीत गानं यस्यास्तत्सम्बुद्धिः, मयाऽनुगीते तव शृङ्गारविधौ ममाभिलाष पूरय । अत्र कलगीते इति विशेप- णेन गीतजोऽन्यगीत श्रुत्वा मौनो न भवतीति व्यज्यते । तेन च मम गीत सदमद्वेति कथयेति । सिनोति बध्नाति जीवानिति सिनोतेर्विच्प्रत्यये कृते 'सि' ससारवन्धन तत्' इत गत यस्या सा मीता, मसारबन्धननिर्मुक्तिहेतुरित्यर्थः । एतेन यस्यास्तव नामव ससारबन्धन मोचयति, सा त्व स्वकीय ध्यान बन्धन न मुश्चसीति चित्रमिति व्यज्यते । स्यति हन्ति दुःखानि स्वभक्तानामिति स्यतेरौणादिक ईतक्प्रत्यये सीता, स्वीयदु.खहन्त्रीत्यर्थ.' । एतेन मानसम्भावनया दुखिताना सखीना दुख यदि ध्यान त्यक्त्वा न दूरीकरोषि तदा तव' नाम्नो वैयर्थ्यं भवेदिति व्यज्यते । एन विष्णुना सहित मा समुद्र , विष्णोः समुद्र- शायित्वात् तस्यापत्यं स्त्री सी लक्ष्मी तद्वदिता प्राप्त ति सीता, यथा विष्णुना लक्ष्मीः प्राप्ता तथा श्रीरघुनन्दनेन सीतेत्यर्थ १० । एतेन लक्ष्म्यास्तु एतादृशं ध्यानं न श्रुत, त्व कथ करोषीति व्यज्यते । यद्वा इना सहित सि सकाम श्रीराम- चन्द्राभिध ब्रह्म तदिता १ प्राप्तत्यर्थः । श्रीरामचन्द्रः कामपूरक इति यावत् । एतेनेदानी ध्यान त्यक्त्वा मम कामान् कथ न पूरयसीति व्यज्यते ॥१॥ विलसितमृदुतरपदंपनं ते मुनिमनसामनुमेयम् । तदुपलम्भन शयस्य भविता किमतः पर विधेयम् ।।२।। शृङ्गारविधाने तव को लाभ इति चेत्तत्राह-विलसतीति । मुनिमन- सामनुमेय अनुमातु योग्यम्, ते मृदुनरपदपद्म विलसति शोभते । तस्य तव- चरणकमलस्य उपलम्भन स्पर्शो मे शयस्य करस्य भविता१२ भविष्यति । अतः पर किं विधेयम् ? न किमपीत्यर्थ. । तव चरणसेवातोऽधिक. कोऽपि पदार्थों १ ख. ०ीतत्व । २ ख. वाक्षितदे । ३ ख श्रृङ्गाविधौ । ४ ख गीतज्ञाऽनन्यगीत । ख ०वन्धनकर्तृ अज्ञान । ६. ख. नत् । ७. ख. मोक्षयमि । ८ ख स्वीयदुःख- श्रीन्यर्थ । ६.ख. नि । १०. सीत्यर्थ । ११. क. नदिता । १२ ख भाविता ।।
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सप्तमः सर्गः
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[ ६७
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नास्तीति भावः । विलसतीत्यादिना १ ज्ञानेन्द्रियसाक्षात्कारेऽपि न कामिना
कामसंन्तापहानि., किन्तु कर्मेन्द्रियव्यापारादेवेति व्यज्यते । तेन च मद्दर्शना-
: देवाऽय सुखीति त्वया न विचारणीयमिति । किमतः पर विधेयमित्यनेन
त्वत्प्रसादो भविष्यत्येवेति व्यज्यते । तेन च मम तापहानिर्भविष्यत्येवेति ।।२।।
न समाधि मुञ्चसि न च कलयसि मामुपगतमुपकण्ठम् ।
स्वेदसुगन्धितनिजगलमालामुपगमये तव कण्ठम् ॥३॥
स्ववचनाश्रवणात् ध्याने समाधि सम्भाव्याऽऽहरे न समाधिमिति । त्व
समाधि न मुश्चसि, न च उपकण्ठ समीपमुपागत प्राप्त मा कलयसि जानासि ।
स्वेदेन सुगन्धिता चाऽसौ निजगलस्य माला च तां, तव कण्ठमुपगमये प्रापये ।
अत्र पतिताया मालायां समाधिर्न स्थास्यतीति श्रावणे सखीना दौश्चित्यहरण-
: माशयः । एतावताऽपि यदि समाधिं न मुञ्चसि तदा तदिद ध्यान सत्य मस्ये
ज्ञास्यामीति । विश्वनाथनाथस्य निगदित सरस रसरूपभक्तिसहित सौमत्य
सुमतिभाव, रसरूपभक्तिसहित ज्ञान दिशतु ददातु इत्यर्थः । एतेन शुष्कज्ञान
वर्ण्य मिति व्यज्यते । तेन च समाधिमित्यादिचरणत्रयेण प्रियोपभुक्तवस्तु-
ससर्गस्याऽतिमनःक्षोभकत्वम् । तेन च समाधिसङ्गमसुखात् साक्षात् सङ्गमसुख-
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धिकमिति व्यज्यते ।।३।।
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निमिराजसुता विचिन्तयन्तो रमण रासपरायण हृदब्जे ।
समवाप्य सुमालिकासुगन्ध सहजस्नेहसमाकुलाऽऽलिलिङ्ग' ॥१॥
इति श्रीमन्महाराजकुमारश्रीविश्वनाथसिंहविरचिते सगीतरघुनदने
श्रीजानकीसमागमो नाम सप्तमः सर्गः ।।७।।
निमिराजेति स्पष्टम् । अत्र सहजस्नेहेत्यनेन यथापूर्वमिति व्यज्यते । तेन
च मानात्यन्ताभाव इति ॥१॥
इति सिद्धिश्रीमन्महाराजाधिराजश्रीविश्वनाथसिंहकृताया व्यग्यार्थचन्द्रिका-
नाम्नि टोकाया पश्चमः सर्ग. ॥७॥
' विलसीत्यादिना । २ ख. समावाह । ३. फ. जानसि ४ ख खेदेन ।
५. ल. मसे । । ६. स्व. ज्ञास्यामि इति ७
क. ससर्गस्यातिमन क्षीपफ्त्व ।
८. स.ललिग । १. ख. इति सिद्ध. श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीमहाराजश्रीराजा.
यहादुरसीतारामचंद्र पापात्राधिकारविश्वनायसिंहकृताया व्यग्यार्यचद्रिकानाम्नि टोकापां
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सतमः सर्ग. ॥७॥
. ६८ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् [अथ अष्टमः सर्गः] - - ३ 1 परस्पर तावतिविभ्रमेण भूश विषक्तादभिवीक्ष्य कान्ती । रह सखी कामपि काऽपि काम समुद्गतानन्दभर बभाषे' ॥२॥ परस्परेति । रह सखी एकान्तसखी, विभ्रम आनन्दजनितः परस्परमि- लनयोरातुरतातिशयस्तेन२ विपक्ती गाढमिलितौ। एतेनोभौ परस्परमेकीभवन- मिच्छत इति व्यज्यते । तेन च प्रेम्ण. परा काष्ठेति । रह.सखीत्यनेन जानकीरघुनन्दनयोस्ततो लज्जाभावो व्यज्यते ।।२।। 5 ܝܐ M पश्येमी सुखसिन्धुनिमग्नौ रूपराशिसम्भरणासक्ती, न हि तृप्तौ मनसा सलग्नौ ॥१॥ पश्येति । हे सखि | इमौ जानकीरघुनन्दनौ पश्य । सुखसिन्धुनिमग्नी, रूपराशे सम्भरणे यासक्तौ, तथाऽपि न हि तृप्तौ, मनसा सलग्नौ । न हि तृप्तावित्यनेनोभयोर्नवनवच्छवेरालोकन व्यज्यते । तेन च तयोरुत्कण्ठाधिक्य- । 1 मिति ।।१॥ "बिम्बतनुप्रतिबिम्बितविनिमिषदम्पतिहग्विगलासुखनीरम् । मन्येऽतनुकृतविश्वनाथहितमन्दिरदेवस्नपनक्षीरम् ।।२।। विम्वेति । विम्बाभ्या तनुभ्या प्रतिबिम्बिते इतरेतरशरीरप्रति- विम्बशोभिते विनिमिपे निनिमेपे ये दम्पत्योर्जानकीरघुनन्दनयोई शौ' नेत्रे ताभ्या विगलत्सुखनीर, अतनुना' कामेन कृत च तत् विश्वनाथहितयो- मन्दिरदेवयोर्जानकीरघुनन्दनप्रतिमयोः [ स्नपनस्य क्षीर च तत्, अह मन्ये । स्नपनजल दृश्यते, स्नापायिना न दृश्यतेऽतोऽतनुरित्युक्तम् । मन्दिरदेवोपमया प्रतिबिम्बस्य निश्चलत्व व्यज्यते । तेन चोभयो. स्तम्भ इति ] '° ॥२॥ दम्पतिमिलने प्रमदागरणकृतजयजयशब्दकदम्बम् । बहुजगदण्डभाण्डसश्रयरुचिगोभुवने लभते नाऽऽलम्बम् ॥१॥ 4 १ ख वभावे । २. क. सरस्पर० । ३ ख रूपिरास० । ४. ख. विवतनुप्रतिधिवतूतू । ५ ख ०शोभित । ६ ख. निमिमेपे । ७. ख. पे। ८. ख दृशं । ६ ख. अतनुता । १०. [-] कोप्ठगतोऽशो नाऽस्ति ख पुस्तके ।
[६६ अष्टमः सर्गः १ 1 'दम्पतीति । दम्पत्योर्जानकीरघुनन्दनयो' मिलने', प्रमदागणेन कृत जय-जयेति शब्दस्य कदम्ब, बहूनां जगदण्डभाण्डाना सश्रया आधारभूता रुक् प्रकाशो यस्य तस्मिन् गोभुवने गोलोके, आलम्बमाधार. न लभते न प्राप्नोति, गोलोकाद्वहिनिर्गत इत्यर्थ. । अत्र वह्वित्यादिविशेषणेन गोलोकस्याऽति- महत्त्व व्यज्यते । तेन च ध्वनेरत्याधिक्यमिति ॥१॥ 11 . वोरणातीयतरङ्गमृदङ्गध्वनिरवगम्यत इह सुविचारे । मन्दीकृतानाहतारावो विश्वनाथसम्मदविस्तारे ॥२॥ वीणेति । विश्वनाथस्य शिवस्य कवेर्वा, सम्मदस्याऽऽनन्दस्य विस्तारो यत्र, तत्रेह दम्पतिमिलने६ मन्दीकृतोऽनाहतारावोऽनाहतध्वनिर्येन स, वीणा- च ध्वनि., शोभने विचारे सति अवगम्यते ज्ञायते । यथाऽनाहतशब्दे वीणादिशब्दा: एकाग्रमनसा सूक्ष्मविचारमन्तरा न ज्ञायते तथाऽत्राऽपीत्यर्थः । मन्दीकृतेत्यादिना वीतरागानपि अनाहताराव- सुग्वादपकृष्य स्वस्मिन्नुत्कण्ठतीति व्यज्यते । तेन चाऽस्य ध्वनेर्घनानन्दजनक- यास्तोयतरङ्गस्य मृदङ्गस्य त्वम् ।।२।। ५ ३ 'पूर्णानन्दपयोधिमग्नहृदयां सस्थाप्य सिंहासने, मुक्तादाममहार्हचैलनिचयं सम्भ्राम्य दास्यै ददौ । तां सस्नाप्य महोपचारनिकरैर्नीराज्य'१ पुष्पाञ्जलिम्, दत्वाऽऽस्तूय विनम्य नम्रशिरसा रामो रमामार्चयत्१२ ॥१॥ पूर्णानन्देति । रामः पूर्णानन्दपयोधौ मग्नं हृदय यस्याः सा ता3 जानकी, सिंहासने सस्थाप्य, मुक्तादाम्ना महार्हाणा बहुमूल्याना चलाना च निचयं सम्भ्राम्य, दास्य इति जातावेकवचन १४ दासीभ्य'५ इत्यर्थ , ददौ । ता सस्नाप्य, नीराज्य१७, पुष्पाञ्जलिं दत्वाऽऽनम्य प्रणम्य" पुष्पाञ्जलिं दत्वाऽऽनम्य प्रणम्य'१८ विनम्रशिरसा आस्तूय अतिशयेन स्तुत्वा, महतामुपचाराणां निकरैः प्रार्चयत् अर्चितवान् । १६ - , १. '--' विहान्तःस्थितांशस्याऽभाव. ख पुस्तके । २. न. मिलिते । ३. ख. च । ४. ख. गोलोकादध्यू ध्व निर्गत । ५. ख बहित्यादि० । ६ ख. ०मिलिने । ७. स्व. रुक्ष्मविचारमंतग । क मदिकृतेः । ६. क. पूर्णानंदपयोधिमय० । ख पूर्णानदयोधिमग्नः । १०. क. दास्य । ११. क. !राज्य। १२. ख रामामा० । १३ स्व. जा। १४ क. वचनो। १५ ख दासीत्य । १६ ख. तासा । १७. ख तीराज । १८. '_' चिह्नगोऽशो नैव दृश्यते क पुस्तके । १६. ख नम्रशिरसा ।
[ ७० सङ्गीतरघुनन्दनम् अत्र विधेय॑तिक्रमेण प्रेमातिशयो व्यज्यते । तेन च प्रेमवता विधिवैगुण्य न दोषमावहतीति ॥१॥ पूजितसोतां वीक्ष्य सुमानिस्वामिना', समवर्षन् कुसुमानि मनोहरपाणिना' । समगायन् गीतानि गलेन सुनादिना, विश्वनाथवनिताश्च पिकध्वनिवादिना ।।१।। अथ किं जातमित्याकाक्षायामाह-पूजितेत्यादि । विश्वनाथस्य रघु- नन्दनस्य वनिताः सख्य , अथवा विश्वनाथ एव वनिताः सखीरूपेण रासप्राप्ताः ब्रह्मादयः, सुमानिस्वामिना श्रीरघुनन्दनेन, पूजिता सीता वीक्ष्य, कुसुमानि समवर्षन्, पिकध्वनिना वदति तच्छीलेन, सुनादिना शोभननादवता गलेन, गीतानि च समगायन् । समगायन्नित्यादिपदेन सख्यो जानकीरघुनन्दनयो. कामोद्दीपनमकुर्वन्निति व्यज्यते । तेन च तासा रासकरणोत्कण्ठातिशय इति । चारुशीला विश्वनाथसभा द्विकोटिवनितामण्डितेति वाक्येन एका जानकी विना यस्य लीलाहानेरभाव य्य जितवती, स एव रघुनन्दन इदानी स्वेष्टदेवता- मिव पूजयतीति सख्यो निजस्वामिनीविजयं मन्यन्त इति सुमानिस्वामिनेति पदेन व्यज्यते ॥१॥ अथ सीतां सुप्रीतां समीक्ष्य रामोऽकरोत्तदङ्गषु । पादादिषु सस्कार यावकपादाङ्गदादिविन्यासै " ॥५॥ ५ अथ सीतामिति । अथ पूजनानन्तर, रामः सीता सुप्रीता अतिप्रसन्ना समीक्ष्य, पादादिषु तस्या अङ्गेषु, यावको लाक्षारस , पादाङ्गद नूपुर एतदा- दीनां सकलाभरणाना विन्यासै. सस्कारमकरोत् । सुप्रीतामित्यादिना श्रीरघु- नन्दनो ममः चरण स्पृशतीति स्मृतिरेव नाऽभवदिति व्यज्यते । तेन चाऽऽनन्द- सम्मोह इति ॥१॥ रघुनन्दनो जनकात्मजाचरणारविन्दसुकोशयोः । चित्रे विधायाऽलक्तकेन चकार संशयमेतयोः ॥१॥ - १. फ. स्वमानिमा । २ क, मतोहर० । ३ फ. रासकरणोत्कंठाशिशय । ५. क, एका जानकी। ६. क. •रभावन । ७. ख. विन्यासे । ८. ख लाक्षारसं ।
min + - ५ । r भाति किमु ? २ विशेषलेखं, शुचेः शृङ्गारस्य सुमङ्गलशातकुम्भककुम्भयो ' मङ्गलकनककलशयो- अष्टमः सर्गः [ ७१ शृङ्गाररचनामेव गीतेन निरूपयति रघुनन्दन इति । रघुनन्दनः जनकात्मजाचरणारविन्दसुकोशयोरलक्तकेन चित्रे' विधाय, एतयोश्चित्रयोः सहजे- त्यादिना वक्ष्यमाण सशय चकारेत्यर्थ.२ ।।१।। सहजारुणच्छविसन्ततिः शयशोणता किमु सङ्गता । अनुरागविचरणपद्धति. किमु भाति यावकरक्तता ॥२॥ सशयमेवाऽऽह-सहजेति । सहजा स्काभाविकी चरणस्याऽरुणच्छवे। सन्तति. पक्ति: भाति किमु ? मम गयस्य हस्तस्य शोणता सङ्गता लग्ना' अनुरागस्य तस्यां मम प्रीतेः विचरणक्रियायाः पद्धतिः मार्गो भाति, अथवा अन्तवर्द्धमानस्य चरणद्वारा निःसरतो जानक्याः अनुरागस्य विचरणपद्धतिर्भाति । किमु यावकस्य रक्तता भाति । रघुनन्दनेत्यादिगीतद्वयेन' जानक्या अगानि स्वच्छविभिरेव सालवाराणि इति व्यज्यते । तेन च सौभाग्य- अतिनीलमरिणमयनूपुरभ्रमरावलिविनिवेशिता । कुचभारभङ्गुरमध्यभङ्गभियेव रसनाऽऽरोपिता ।।३।। अतिनीलेति । किञ्च श्रीरघुनन्दनेन तस्याश्चरणकमलयोः अतिनील- मणिमयो नूपुर एव भ्रमरावलिविशेषेण निवेशिता, कुचभारेण भगुरस्य नम्रस्य मध्यस्य कटेः भङ्गभियेव, रसना क्षुद्रघण्टिका, आरोपिता । अतिनील- मणिमयेति विशेषणेन भ्रमराणा तारुण्यम् । तेन च मत्तत्वम् । तेन चाऽधिक- मधुरध्वनिजनकत्व व्यजितम् ॥३॥ मृगनाभिमकरीपत्रभड्गविशेषलेखमुरोजयो । अकृतार्हरणामिव शुचिसुमङ्गलशातकुम्भककुम्भयो ॥४॥ मृगनाभीति । उरोजयोः कुचयोः, मृगनाभेः कस्तूर्या मकरीपत्रभङ्गस्य द्योतनाय तकरणमिति ॥२॥ - क . 4 - । - १. स. चित्र । २. क. कारेत्यर्थः ३. क शयशोशोणता॥ ४-५. फ. संगलग्ना । ६ क. ख. वर्द्धमाननि । ७. ख. नि.सुरतो। ६..क. शातकुंभकयोः । ८. क. त्यादिमितद्वयेन ।
७२ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् २ रहणा' पूजामिव अकृत । अत्र सुमङ्गलेत्यादिना शृङ्गारलीनाया. पूर्वच्छेदो मा भूदिति रघुनन्दनाभिप्रायो व्यज्यते । तेन च रासादिलीलायामतिप्रीतिरिति । तेन च तद्वियोगासहिष्णुत्वम् ।।४।। काश्मीरजकस्तूरीकई मसङ्कलनेन कपोलम् । चित्रयति स्म विचित्रचमत्कृतिमारमुकुरमिव गोलम् ।।५।। अत्र . काश्मीरेति । विशेषेण चित्रा आश्चर्यजनका चमत्कृतिर्यत्र स चाऽसौ मारमुकुरः कामस्याऽऽदर्श. तमिव, गोल कपोल, काश्मीरजकस्तूर्योः कुडकुम- मृगमदयोः कई मस्य सङ्कलनेन सम्यग्रचनेन, चित्रयति स्म चित्रीचकार । विचित्रचमत्कृतीत्यनेन कपोलः स्वकान्ताकेशप्रतिविम्बकान्त्या च स्वयमेव चित्रित इति व्यज्यते । तेन च चित्ररचनावैयर्थ्यम् । तेन च तत्करण कपोल- स्पर्शनार्थमिति ॥५॥ अलिके न्यधित हीरक तिलक मृगमदमयमतिविमलम् । अवधूक यदपि तदुपमामङ्कितु शशिशक लम् ।।६।। - अलिके न्यधितेति । अलिके ललाटे, अतिविमल हीरक, मृगमेदमय तिलक च न्यधित धृतवान् । ललाटमध्ये हीरकबिन्दु 'वेदीति' लोके प्रसिद्ध- माधाय तत्परितः कस्तूरी बिन्दुश्चकारेत्यथ । अङ्के क्रोडे वधूर्यस्य तत्, अडि कलङ्कसहित, ईदृश शशिकल चन्द्रखण्ड यदपि स्यात् तथाऽपि तस्य ललाटस्य उपमा सादृश्य' नेतु न प्राप्नोतु । अत्राऽर्द्धचन्द्रसादृश्याभावात् तस्य सर्वाधिक्य व्यज्यते । तेन च सौन्दर्यातिशय इति ।।६।। । अञ्चति स्म कवरीमिभमुक्तासमुदायेन सकामम् । कालिन्दोमिव विशदकलिन्दजकुन्दचयरभिरामम् ।।७।। . अञ्चति स्मेति । इभमुक्तासमुदायेन गजमुक्तासमूहेन, सकाम अभि- राम च यथा तथा', कवरीकेशपागमञ्चति स्म पूजयामास । कैः कामिव, १. स. ०कनककलयो० । २ ख. पूर्वाद्धच्छेदो । ३ क ०सकलेन । ख ०वई मसकलनेन । ४ क. स्वकान्त्या० 1 ५. क ते। ६ क करण । ७. ख. चन्द्र खड। ८ क. सादृश । ६.स यया । १०. न. कवरी केश।
-- प्रष्टमः सर्ग [७३ -- १ I विशदैरुज्ज्वलः कलिन्दजैः कलिन्दपर्वतोद्भवः कुन्दचयः कालिन्दी यमुनामिव । यथा स्वमनोरथसिद्धये कश्चिद्यमुनामर्चयति तथा रासोत्सवसिद्धये अञ्चति स्मेत्यर्थः । अत्र कालिन्दोमिवेत्यनेन केशेषु श्यामता गम्भीरता च व्यज्यते । तेन च छविच्छटालहरीति ।।७।। चूडामरिण शिरसि सिन्दूरं न्यदधादधिसीमन्तम् । किं तनुघरसुखरतिरधियमुन भजति विश्वनाथ तम् ।।८।। चूडामणिमिति । शिरसि चूडामणि, अधिसीमन्तं सीमन्ते' सिन्दूर च न्यदधात् । तत्रोत्प्रेक्षते-किं अधियमुन यमुनाया, तनुधरसुखेन सहिता रति , त विश्वनाथ श्रीरघुनाथ भजति । अत्रैतव्यङ्गयम्-तपस्विना" महादेव.' प्रसीदति, एतयोरपि श्रीरघुनाथ. प्रसन्नो भविष्यतीति व्यज्यते । तेन च . प्रसादात्प्रथमत:प्रीतेश्च शरीरलाभ इत्यन्तातिशयोक्त्यलङ्कार' इति ॥८॥ , । → स भूषयित्वा१ निखिलाङ्गभूषणः विधाय तस्या सुदृशोः शुभाञ्जनम् । महाहवस्त्र परिधाप्य सत्तनौ'२, ताम्बूलवीटों प्रददौ प्रियामुखे ।।१।। इति श्रीमन्महाराजकुमार' 3- श्रीविश्वनाथसिंहविरचिते सगीतरघुनदने श्रीजानकीभूषणविधान १४ नामाऽष्टमः सर्गः ।।८।। स भूषयित्वेति स्पष्टम् । भूपणादिविधाने प्राणप्रियागस्पर्शजातकम्पेनाऽ- सामर्थ्य मिति१५ प्र-पदेन व्यज्यते । तेन च वीटिकादाने अतिप्रयास'६ इति ।।१।। इति सिद्धि१७श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीविश्वनाथसिंहकृतायां व्यंग्यार्थचन्द्रिकानामिन१८ टीकायामष्टम सर्ग ॥८॥ - १. क यया । २. ख. फालिमिवे० । ३. ख. शिर । ४. ख. चूडामणिः । ५ ख सीमन्त । ६. ख. न्यदद्यात् । ७ ख. तपस्विना । ८ ख. महादेवा । ६ क ०प्रथम. । १० ख. इत्यत्यनातिशयोक्तलकार । ११. क. भूषयित्या । १२ ख सोभनौ । १३ ख श्रीमहाराजकुमार । १४ भूषन विधान । १५ ख पेन सामर्थ्यमिति । १६. क अतिप्रायास । १७. ख. सिद्ध । १८ ख. ०नाम ।
७४ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् [अथ नवमः सर्गः] कमलनालगुरणग्रथितरथो सुरभिभिः कुसुम दुभिर्युतम् । मदनमानसनिर्मितसन्निभ सदनमायतमुत्तममाययौ ॥१॥ कमलनालेति । अथो विभूपण विधानानन्तर सुरभिभि मृदुभि कमल- नालस्य गुणेन विससूत्रेण ग्रथितैः कुसुमैर्युत, मदनेन मानसेन निर्मित यद गृह तेन सन्निभ सदृश, उत्तम श्रेष्ठमायत सदनमाययौ । दोलाचलने कुसुमानि पतेयुरिति सदनरचयितुरभिप्रायः कमलनालगुण ग्रथितैरिति विशेषणेन व्यज्यते । तेन च शिल्पेऽतिनिपुणतेति ॥१॥ दोलामनेकविधरत्नविचित्ररूपां, तत्राऽऽसनादिरचनाचिरा विलोक्य । प्रारोप्य मैथिलसुतामिह चाऽऽदरेरण, गीत विधाय रुचिर प्रजगी स राम. ॥२॥ . दोलामिति । स राम तत्र कुसुमसदने अनेकविधै रत्नविचित्र रूपं यस्यास्ता, आसनादेरुपकरणस्य रचनया रुचिरा नवीना दोला विलोक्य, इह दोलाया च मैथिलसुतामारोप्य, रुचिर गीत" विधाय, नवीन रचयित्वा प्रजगी । एतेन प्रथमतो नव वस्तु निजेष्टदेवतायै समर्योपभोक्तव्यमिति व्यज्यते । तेन च तयो. १°परस्पराभीष्टदातृत्वात्परस्परेष्टदेवतात्वमिति । सुप्रीते दोलन्ती सीते कुरु मे गीत श्रवणानीतम् । सरवकिङ्किणी हरति मनो मे मदनादनया किमु समधीतम् ॥१॥ सुप्रीते इति । हे सुप्रीते, हे सीते ! दोलन्ती सती त्व मम १ गीत श्रवणानीत निजश्रव प्राप्त १२ कुरु । अत्र श्रवणानीत कुवित्यनेन गीतश्रवणे दोलनसुखादप्यधिक सुख प्राप्स्यसीति । तेन च तस्य गानगर्व इति । १ ख ०र्थतन् । २. क. ०मुक्तमाययो। ३. क. ख. विशसूत्रेण । ४ ख. सनसेन । ५ ख. नेफविधि । ६ ख यस्यारणां। ७. ख. गीते । ८. क ०देवता। ६ क ०पयोक्तमिति । १० क परस्परभीष्ट । ११. ख. म। १२. ख निजश्चरणप्राप्त। १३ ख इति व्यज्यते ।
- नवमः सर्गः [ ७५ wow है 1 गीतमेवाऽऽह-सरवेति । रवेण शब्देन सहिताऽसौ' किङ्किणी मे मनो हरति, अतोऽनया, किमु इति वितर्के, मदनात्समधीत सम्यक्पठितम् । ईदृक्को नु मन्त्र: पठितः, यतो मदनस्याऽपि मदनस्य मे मनो हरतीति भावः । अथवा काक्वा मदनाकि समधीतं, न समधीतमित्यर्थः । एतेन मदनमन्त्रा: मम ज्ञाता एव । एषा ममाऽपि मनोहारकमपूर्ववीजमुच्चरतीति व्यज्यते । तेन च किङ्किणी- शब्दस्याऽतिचित्रत्वमिति ॥१॥ यदा दोलने तिर्यग्दोला भवति तदा स्मितरुचिमातनुषे । मन्ये विरहपिशाचो गत इति पयसा स्तपयसि मा शुचिमाजनुषे ॥२॥ यदेति । दोलने यदा दोला तिर्यग्भवति तदा स्मितरुचिमातनुषे सम- न्ताद् विस्तारयसि, तन्मन्ये पिशाचसम्बन्धाच्छरीरमशुचि भवत्यतो मम विरहरूपः पिशाचो गत इति हेतोः शुचिजनुषे पवित्रतोत्पत्य मा मा पयसा क्षीरेण स्नपयसीति । यद्वा विरहपिशाचेन सम्भोगशृङ्गारो मन्दो बभूव इदानी स गत इति सम्भोगशृङ्गारवृद्धय क्षीरेण स्नपयसि", स्मितेन सम्भोगशृङ्गार- मुद्दीपयसीत्यर्थ:१२ । अत्रेद व्यङ्गयम्-अान्दोलने मम' प्रवीणता ज्ञात्वा'3 'अप्रवीणता वा ज्ञात्वा'१४ स्मयसे इति मे मनो विचिकित्ससीति १५ व्यज्यते । तेन च किञ्चिद् वदेति ।।२। दोलाचलनादतिचलमचलमिह मम करणाचञ्चलकरणम् । कलयसि यन्न हि न होति मन्त्ररिति कि वशीकरणविस्तरणम् ।।३।। दोलेति । इह दोलाचलानाद्धेतोः,१६ अतिचल अतिशयेन चलमश्चल मम करणानामिन्द्रियाणामचञ्चलकरण१८ स्थिरकरण भवतीति१६ शेषः । एतेन त्वया वार वार ध्रियमाणमप्यञ्चलं चार चार ममेन्द्रियाणि२° स्तम्भयत्सदान्दोलन रहयतीति व्यज्यते । तेन च भवदीयमनोरथसिद्धिरेवेति । पत्युर्नहि२१ नहीति' २३ विस्तरण कलयसि इति किं किमर्थमित्यर्थ. ॥३॥ 1 4 - १७ - -मन्त्रैर्मम वशीकरणस्य १. ख. ० चाऽसौ। २ ख रुद्रको। ३. क मदनमदनमत्रा। ४ ख स्मितरुमातनुषे । ५ स्व. ०जनषे। ६ क पावित्रतो० । ७ ख ममा । ८ क मपसा। ह. ख चीरेन । १० ख. शृंगार वृद्ध । ११. ख न स्नपयसि । १२ ख सभोवा,गासुतद्वीपयसीत्यर्थः । १३. ख. वो ज्ञात्वा । १४ '--' चिह्नस्थोऽशो नास्ति ख. पुस्तके । १५, स्व विचिकित्सभीति । १६. क दोलादलनाद्धनो' । ख. दोलाचलद्धतो । १७ क चलपचल । १८ क ०मच चल । १६. क भवती। २० क. मनद्रिय रिण । २१. क. पत्युन हि । ख. पत्युनर्वहिं । २२: क नाहीति । २३. वशीकरस्य ।
७६ ] सङ्गीत रघुनन्दनम् सञ्चलनादन्तरकण्डूयनमीलन्नयननलिनमिति' चित्रम् । विश्वनाथनाथस्य हृदम्बुजमुन्मीलयति सजाति सुमित्रम् ॥४॥ सञ्चलनेति । दोलाया सञ्चलनाद्धेतोः, अन्तरकण्डूयनेन मीलत् तव नयनमेव नलिन, विश्वनाथनाथस्य मम, कमलत्वेन सजाति समानजातीय, हृदम्वुजमुन्मीलयति विकाशयतीति चित्रमाश्चर्यम् । अत्राऽ तरकण्डूयनेत्याधुवाया श्रीरघुनन्दनेन यो भावो जानक्या उद्घाटित स तदेककथनीय इति व्यज्यते । तेन च त्वमान्दोलयसि, विशेषानन्दस्तु मां प्राप्नोतीति, असङ्गत्यलड्कारो व्यज्यते ॥४॥ प्रियेण प्राक् प्रेम्णा समुपगमितान्दोलनविधौ', सुख तस्मै स्वस्य प्रवितरितुकामा जनकजा । समादातु तस्य स्वयमपि तमभ्यर्च्य विधिवत्, तथैवोद्गायन्ती तमतिरसमान्दोलितवती ॥१॥ प्रियेणेति । प्राक् प्रियेण प्रेम्णा, आन्दोलनविधौ सुखं समुपगमिता सम्यक्प्रापिता", जनकजा स्वस्यात्मन.८ सुख तस्मै प्रियाय प्रवितरितुकामा सती, तस्य प्रियस्य सुख स्वयमपि समादातु विधिवदभ्यर्च्य यथा प्रियोऽगायत् तथैवोच्चैयन्ती सती, अतिरस यथा तथा त प्रियमान्दोलितवती । यद्गान श्रुत्वा पूजितः श्रीरघुनन्दनोऽपि प्रतिमेवाऽऽन्दोलित पासीदिति अतिरसमिति पदेन व्यज्यते । तेन च रघुनन्दनान्दोलनाजानक्यान्दोलनमतिचाविति ।।१।। - दोलासन्दोलने कपोले विलसति नीला चलदलकाली। कमलालयप्रान्त इव लग्ना लहरीविलुलितशैवलपाली ॥१॥ दोलेति । दोलाया सम्यग्दोलने, नीला, चलन्ती चाऽसावलकावली, कपोले कमलालयस्य कमलस्य प्रान्ते लग्ना लहरीविलुलिता चाऽसौ शैवलाना' पाली पङ्क्तिरिव विलसति शोभते । अत्र कमलालयेति पदेन कपोलस्य साधारणनीलकमलेभ्योऽधिककान्तिमत्त्व' अत्रोपमालङ्कारेण१२ . १ व्यज्यते । १. क. ०कडूयन० । २. ख कडयनेन । ३ त्यमादोलयसि । ४ रन, प्रेम्ण । ५ ख. समुमितादोलनविधी। ६. ख. ०वोद्गचायति । ७ ख. सम्यक्वापिता। ८ ख स्वस्यात्मान । ६. ख प्रमेवादोलित । १०. ख. शवाला। ११ क. ०काकिमत्त्वं । १२ ख. ०लकारेव । -- । नवमः सर्गः [७७ mana H शब्दशक्युद्भवो वस्तुध्वनिः । लहरीविलुलितशैवाल सादृश्येनाऽलकेषु कुसुम- स्नेहार्द्रता व्यञ्जिता । तेन च श्रीरघुनाथः परमशृङ्गारी लोके 'छयलचिकमोजा" इति प्रसिद्ध इति ॥१॥ 1 अधररागयुक्ता नसि मुक्ताकनकगुरणयुता राजति दोला। चित्रा यदारूडवनिताहग्वनिनाततिर्दोलयति लोला ॥२॥ , - दोलाऽप्यस्तीति । 8 ११ [नसि नासिकाया. लोला चश्चला, अधरस्य रागेण वर्णेन युक्ता, मुक्ता- कनकगुणेन युक्ता, चित्रा] दोलेव राजति । यस्यामारूढा वनितानां दृशो दृष्टय एव वनितास्तासा ततिः पक्ति दोलयति । अन्यस्या दोलायामेका सखी दोलयति, द्वे वा सख्यो दोलयन. । एतस्या नासामौक्तिकदोलायां सखीसमूहो दोलयतीत्यस्या वैचित्र्यमित्यर्थः । चित्रेति निसर्ग-( शुक्ल मौक्तिक श्रीरघुनन्दन- नासास्थित्या हरित, तत्पुनरधररागेण शोणित, तत् पुनः सखोदृष्टिभिः श्याम- मित्यनेक ) -वर्णमयी नासामौक्तिकदोलेति भावः । तथैवाऽनेकवर्णमणिजटित- अत्र रूपकतद्गुणालङ्काराभ्या प्रशसनरूपवक्रोक्त्या' विपरीतारोपेण परिहासो व्यज्यते । तेन च लज्जाराहित्यम् । तेन चाऽऽनन्दमदमत्ततेति ॥२॥ मृगमदमण्डितगण्डमण्डले चलति ललितकुण्डलमतिगोलम्'२ । यथाऽनङ्गमरकतमरिणरङ्गे,१३ नृत्यति मजु नर्तको लोलम् ॥३॥ मृगमदेति । मृगमदेन मण्डित यद् गण्डमण्डल'४, एतेन शृङ्गाररचना- स्थलात्परस्परगलनिहितबाहुभ्यां' दोलयितु पादचारेण गच्छद्भ्यामुभाभ्या क्वचित्परस्परकपोलमेलन कृतमिति । तेन ६ मकरिकापत्रलग्नमिति । तेन च रसाधिक्य मिति व्यज्यते । तत्राऽतिगोलमतिवर्तुल कुण्डल चलति । यथाऽनङ्ग- मरकतमणिरङ्गे रङ्गभूमौ तत्राऽपि चतुष्करचना भवतीति नर्तकः लोल- चपल - १. छयलचिकनिया। २. ख. ०करणकगुण । ३. ख. हग्धनिता० । १. [-] कोष्ठान्तर्गोऽश. ख. पुस्तके नाऽस्ति । ५ ख. प्रदोलव। ६. ख. राजिति । ७. (-) कण्डिकान्तःस्थांशस्याऽभावः ख. पुस्तके । ८. ख. शुर्णमयी । ६ ख. रूपतगुरगा० । १०. ख ०बक्रोक्षमा। ११. क विपरीतारोपेरण परितारोपेरा । १२ क. कुण्डलि० । १३. क. ययानंगमरिगरगे। १४. ख गगमण्डल । १५ ख गलविहतः । १६. ख. तेन च ।
७८ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् मञ्जु मनोहर नृत्यति तथा नर्तकोऽपि चपल नृत्यन्नलातचक्रवर्तुलाकारो' भवतीति भावः ॥३॥ निलयननिपतत्कुसुमसहतिविलसति मुखरमिलिन्दमण्डली । विश्वनाथनाथ वशयितुमिव किरतोमामशरीरयामली ॥४॥ निलयनेति । मुखरा मिलिन्दानां६ मण्डली यस्यां सा, निलयने सदने निपतन्ती चाऽसौ कुसुमाना सहतिविलसति । तत्रोत्प्रक्षते--अशरीरः काम, स एव यामली यामलवेत्ता ऐन्द्रजालिक इति यावत्, विश्वनाथस्य शिवस्य नार्थ श्रीरघुनाथ, वशयितुमिव', इमा तादृशकुसुमसहति किरति । मुखरेत्यादिविशेपणेन' मदनः 'स्ववैरिणो नाथ जेतु ११ मन्त्र पठित्वा दिव्यास्त्र- प्रयोगं करोतीति व्यज्यते । तेन शोभाभ्या मिलित्वा दोलयितव्यमिति । तेन च जानक्या: श्रम इति । तेन च सौकुमा-तिशय इति ॥४॥ परस्परप्रेमरसानुसारिणी परस्परान्दोलनहर्ष विह वली । परस्परालोकनकौतुकान्वितावुभौ समालोक्य जगाद काचन ॥१॥ - परस्परेति स्पष्टम् । परस्परान्दोलनेति । अयं भावः एकतः रघुनन्दन- सम्मुखे स्थित्वा जानकी पदाभ्यां चालयति तदा रघुनन्दनदिशि दोला चलति । यदा रघुनन्दनचालयति तदा जानकीदिशि चलतीति । परस्परालोकनकौतुका- स्वितावित्यनेन जानकीछविच्छटाभी'२ रघुनन्दनो गौरवर्ण., तस्य च ताभि- निकी श्यामवर्णा दृश्यते इति व्यज्यते । तेन च तयोराश्चर्यमग्नत्वम् । अत्र वस्तुना तद्गुणालङ्कारो ध्वनिः । तेन च वस्तुध्वनि.१४ लसति श्रीरघुनन्दनदोला सुतरां लोला । श्रृङ्गाररुचिमरकतमरिणप्राकारसुषमामण्डिता । प्रादर्शसममणिमेदिनीप्रतिबिम्बवृन्दालम्बिता ।।२।। १. क. चवद्वलाकारों। २ क व्यव । ३ क ख वसयितुमिव । ४. क नीलमयेति । ५ क. मुखर । ६ क, मिलिदामा । ७, क नीपतन्ती। ८ क. ८ क. याम्लेवेत्ता। ६. फ वसुयितुमिव । १०. त्यादिशेषरणेन । ११ ख. निजविजयन रघुनंदनं हंतु । १२. ख. ०च्छटाभो। १३ ख ०श्चर्यमानत्वम् । १४. स. वस्तुध्वनिरिति ।
" 1 ३ नवमः सर्गः [ ७६ लसतीति' । वक्ष्यमाण विशेषणविशिष्टा लोला चञ्चला श्रीरघुनन्दनयो- र्दोला, सुतरा लसति शोभते । दोलाजटितानेकवर्णमणिषु पतितायां जानकी प्रभायां तथैव रघुनन्दनप्रभाया च काचिदन्यवर्णव दोलायाः प्रभाववतीति सुतरामिति पदेन व्यज्यते । तेन च शोभातिशयत्वमिति । शृङ्गारेति-शृङ्गार- स्येव रुचिर्येषां तेषा मरकतमणीना प्राकारस्य सुषमयारे परमशोभया मण्डिता, मरकतमणिप्राकारप्रभायतनेन कुसुममन्दिरहरितकुञ्ज इव लक्ष्यते । तदन्तरे दोलाऽतिशोभिताऽस्तीति३ भाव । आदर्श ति-प्रादर्शन समा तुल्या सा चाऽसौ मणिमेदिनी च सा तस्या प्रतिबिम्बवृन्दैरालम्बिता युता । दोलायाः प्रतिबिम्बानि मणिमयमे दिन्यां पतन्ति तानि च प्रतिबिम्बानि दोलाजटितमणिषु पतन्तीति भावः । दोलयननेकरूपेण रघुनन्दनो रासमिव करोतीति प्रतिबिम्बवृन्दालम्बिते- त्यनेन व्यज्यते । तेन च कौतुकातिशय इति । अत्र वस्तुनोत्प्रेक्षालङ्कारध्वनिः । तेन च वस्तुध्वनिः ॥२॥ वरतारतोरगवलितवरणद्वारवारविरोचिता । भरिंगजटितहाटकमयकपाटोदारदीप्तिसमन्चिता ।।३।। - वरतारतोरणेति । वरेण ताराणा शुद्धमौक्तिकाना तोरणेन वन्दन- मालया५ वलिताना शोभिताना वरणस्य प्राकारस्य द्वाराणां वारेण समूहेन विरोचिता विशेषेण शोभितो। मणिजटितेति-मरिणभिर्जटिताना हाटकमय- कपाटाना उदारदीप्त्या समश्चिता व्याप्ता । अत्रेद व्यङ्गयम्-पतितया ईदृशद्वार- प्रभया दोलाऽपि सकपाटद्वारवतीव दृश्यते इति । तेन चेय रहस्यकर्मयोग्येति सखीपरिहासोक्तिरिति । वस्तुना उत्प्रेक्षालङ्कारध्वनिः । तेन च वस्तुध्वनिः ॥३॥ मणिमाल्यमुक्ताजालवरप्रवालराजिविराजिता । अतिविमलधवलसमृद्धशोभध्वजनिबन्धभ्राजिता ॥४॥ मणिमाल्येति । मणीनां माल्यमुक्ताना जालैश्च वरप्रवालाना राजिभिश्च विशेषेण१° राजिता । मणिमाल्यादयस्तथा प्रवीणतया सन्जिता अत्र .. १. क. सतीति । २. क. सुखमया। ३ ख. ०शोभीतास्तीति । ४. ख ०लंकारसध्वनिस् । ५. क, वदनमालया। ६. ख. वनितानां । ७. क. मरिणजटि०। ८ ख समांचित्ता। ६ क. वरवालानां। १०. ख विशेषन । - .
८० ] सङ्गीतरघुनन्दनम् यथा सचित्ररचनेव दृश्यत' इति विराजितेत्यनेन व्यज्यते । अतिविमलेति- अतिविमलानां धवलाना च समृद्धा शोभा येपा तेपा ध्वजाना निवन्धेन भ्राजिता । अत्र ध्वजनिवन्वेति पदेन निजशोभयाऽन्यशोभां जितवतीति । तेन चाऽद्वितीय- त्वमिति व्यज्यते ॥४॥ दम्पतिच्छविसम्पतिवलितविभोत्पत्तिसुखेक्षणा । उत्तुगतरलतरङ्गयुतगङ्गादिजलघिविलक्षणा ॥५॥ दम्पतीति । दम्पत्योर्जानकीरघुनन्दनयोर्या छवेः सम्पतिः तया वलिताया युताया विभाया उत्पत्या सुख सुखजनकमीक्षण यस्यासा, उत्तुङ्गैस्तरलैस्तग्ग- युता गङ्गादयो नानावर्णा नद्यो यस्मिन् तस्माज्जलधेविलक्षणा । सुखेक्षरो- त्यनेन अभिप्रकाशेन' प्रकाशिनो दर्शन सुखेन न भवति, कोटिसूर्यप्रकाशी जानकीरघुनन्दनौ यत्राऽऽन्दोलयतस्तस्या परमप्रकाशयुतायां दोलाया श्रीजानकी- रघुनन्दनयोर्दर्शनविक्षेपाभाव इत्याश्चर्य व्यज्यते। जलधिविलक्षणेत्यनेन ध्यातृ णा तापहारकत्व व्यज्यते । तेन च रसरूपतेति । अत्र प्रतीपालङ्कारध्वनितवस्तुना वस्तुध्वनिः ॥५॥ बहुरङ्गमरिगमयहसकीरकपोतपोतकशोभिता । सफुलितकल्पलतादिरचना विबुधवनवयोतिता ॥६॥ वहुरङ्गेति । बहुरङ्गमणिमय. हसाना कीराणा कपोताना च पोतक: शावकः शोभिता । सङ्कलितेति -सङ्कलिता कल्पलतादीनां रचना यस्या सा', विवुधा देवास्तेषा वनं नन्दन तद्वद् द्योतिता । अत्र बहुरङ्गेत्यादिना तत्र कृत्रि- मानामपि वाञ्छापूरकत्व व्यज्यते । तेन च दोलाया नन्दनवनादप्यधिकत्वमिति । अत्र व्यञ्जितवस्तुना प्रतीपालङ्कारध्वनि ॥५॥ कलधौतकोलककलितमरिणकुलदीपदीधितिभासिनी' सुरचापमध्यनिबद्धजलधरचञ्चलारुचिसादिनी 3 ॥७॥ १. ख दस्यत । २. ख. पट्टेन । ३ ख चाद्वितीययात्वमिति । ४ क. सपत्ति । ५ क नाऽस्ति । ६. ख उत्तगै०। ७. ख जलिये। ८ ख अतिप्रकाशन । ६. ख प्रानदरूपतेति । १०. स. ०वनवयोता । ११. स्व. स । १२. ख ०कुलदीघितप्रतिभासिनी। १३. ख. रुचसादिनी।
- नवमः मर्ग: [ ८१ कलधौतेति । कलधौतकीलकयोः सुवर्णस्तम्भयो. कलितस्य लग्नस्य मणीना, कुलस्य दीधित्या प्रकागेन प्रतिभासिनी प्रतिभासनशीला, सुरचापस्येन्द्र- धनुषो मध्ये 'निवद्धयोर्जलघरचञ्चलयो. रुचि सादयति' तिरस्करोति तथा सुरचापोपमया अनेकवर्णा मणय अायाता । अत्र 'सुरचापोऽनेकवर्णमणिजटितो 'हिन्दोलः', चञ्चला जानकी, विद्युत्साहचर्यात् सजलमेघो रघुनन्दन इति ज्ञेयम् । एतेनाऽऽनन्दरमवर्णन व्यज्यते । तेन च तद्दर्शनानन्दिताना नृत्यन्तीना गायन्तीना अत्र प्रतीपालङ्कारव्यजितवस्तुना उपमालङ्कार- च सखीना मयूरोपमेति । ध्वनि ॥७॥ वैकुण्ठवेश्मविनोदकुण्ठनकिङ्किणीगरणजिता । कृतपरस्परविलासहासविकामसुधासुमाजिता ||८|| वैकुण्ठेति । वैकुण्ठवेश्मसु विनोदस्य कुण्ठन किडिणीगणस्य गजित यस्या सा, अथवा वैकुण्ठवेश्मविनोदकुण्ठनस्य किङ्किणीगणे गजित यस्या सा' वैकुण्ठवेश्मविनोदकुण्ठनाऽहमिति गर्जतीति यावत् । अत्यपूर्वरागसरिगमसहित- किङ्किणीगणरणित वैकुण्ठेऽपि पतित्वा निजानन्दजनकतया तत्रत्यं विनोद मन्दीकरोतीति भाव. । एतेन सुखजनकशब्दस्याऽतिशयत्व व्यज्यते । तेन चाऽलौकिकत्वमितिः । कृतेति-कृतो यः परस्परयोविलासे हासस्तस्य विकास एव सुधा तया सुतरां मार्जिता गोधिता, निर्मलीकृतेति यावत् । एतेनोभौ किमपि रहोभावे सूचयत इति व्यज्यते । तेन चाऽऽन्दोलनलीलाया रहस्यस्मारक- त्वमिति ॥१८॥ कि नोऽत्र नेत्रानन्दकन्दश्चित्रतनुभृद् दृश्यते । वरविश्वनाथसनायमपि सुखयत्यसाविति मृश्यते ।।६।। इति श्रीमन्महाराजकुमारश्रीविश्वनाथसिंहविरचिते सगीतरघुनदने दोलावर्णन नाम नवमसर्ग:११ किं न इति । न. अस्माक सखीना नेत्रयोरानन्दस्य कन्द किमत्र स्थले चित्रतनुभृत् चित्रशरीरधारी दृश्यते ? एतेन दोलाया अानन्दजनकतातिशयो 1180 १ ख सादवति । २ ख. सुरचापयोऽ---जटिते । ३ ख एतेनानदस्तवर्षण । ४. ०गरणेन । ५ ख वलान,। ६ क सो। ७. क निजन प्तया । ८ ख गीताविनोद । ६. ख. चालोकफत्वमिति । १० ख रणे भाव । ११ ख. नवम सर्ग ।
८२ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् व्यज्यते । वरेति-असी दोला वरविश्वनाथसुनाथमपि सुखयतीति' विमृश्यते विचार्यते । अत्राऽपिना श्रीरघुनन्दनस्य पूर्णसुखरूपत्व व्यज्यते । तेन च तदानन्ददायिन्या दोलाया पाश्चर्यरूपतेति ।।६।। इति श्रीमन्महागजाधिराजश्रीविश्वनाथसिंहकृताया व्यग्याथ- चन्द्रिकानाम्निटीकाया' नवम.५ सर्गः ॥६॥ 1 [अथ दशमः सर्गः ] दोलान्दोलनलीलया प्रियतमामित्थ समुल्लासय- न्यासामपि मानसे मृगशामानन्दमापूरयन् । क्रीडित्वा सुचिर विहारमपर कत्तुं समुत्कण्ठयन्, रामाश्चारुतर चकार वचसामुच्चारण राघवम् ॥१॥ ६ दोलान्दोलनेति स्पष्टम् । अत्र चारुतरमित्यनेन यस्मिन्वने विहारः सखीना वाञ्छितस्तदेव वन कथितवानिति व्यङ्गयम् । तेन च याचन विनव 'श्रीरघुनन्दनस्य स्वभक्तानामभिलापपूरकत्वम् । अत्र वस्तुव्यञ्जितप्रहर्षणा- लङ्कारेण वस्तुध्वनि. ॥१॥ चल दयिते । वरसरयूतटमनुभाति पिकरमरणी२° शिखिरमरणी यत्र च याति ॥१॥ १ ख. सुखयास्मिति । २. ख इति सिद्ध । ३. क ०चद्रिकायाम्नि । ४. क. टोकाया । ५. क. नवम । ६. ख क्रीडीत्वा । ७. ख तिन । ८ ...' ८ '-' चिह्नान्तर्गाशस्थाने ख पुस्तकेऽयमंश - 'स्वक्ताना श्रीरघुनन्दनस्याभिलाषपूरकत्वम् । ६ ख. वरसरजू० । १०. क पिकरक।
दशमः सर्गः [ ८३ 1 - रघुनन्दनवचनमेवाऽऽह-चलेति । हे दयिते जानकि ! वर श्रेष्ठ रयूतटमनुभाति शोभते, तत्र चल । पिकी वसन्त ज्ञात्वा, मयूरी तु प्रावृष नात्वा यत्र याति । एतेनोपलक्षणेन यत्र षडपि ऋतवो' वसन्तीति व्यज्यते । न च एकस्मिन्नेव काले पड्ऋतुविहारयोग्यतेति। अत्र देशवैशिष्टयजन्यवस्तु- व्यङ्गयेन वस्तुध्वनिः ॥१॥ नितान्तमीक्षणक्षरणे क्षणे क्षरणे विलक्षणा । अतुच्छगुच्छकक्षवृक्षलक्षलक्ष्यलक्षणा ।।२।। नितान्तमिति । ईक्षणयोनॆत्रयो ईक्षणे दर्शने, क्षणे क्षणेऽनुक्षरण नितान्त विलक्षणा । अत्राऽनुक्षणवलक्षण्येन तत्रत्यो विहारोऽपि च विलक्षण इति । तत्रत्याऽऽनन्दस्याऽपि विलक्षणता व्यज्यते । तेन च अतुच्छा६ महान्तो गुच्छा कुसुमस्तबका येपा ते ते च कक्षवृक्षाश्च तेषा लक्षमेव लक्ष्य दर्शन- योग्य लक्षण चिन्ह यस्या. सा। यत्र सर्वे वृक्षा न्यूनाधिक्यरहिताः शोभासहिता दर्शनीया. सन्तीत्यर्थः । एतेन तस्या. सौन्दर्यातिशयो व्यज्यते ।।२।। प्रियालतालमालतीतमालपालिपालिनी । सदालवालवल्लताविशालशालशालिनो'° ॥३।। प्रियालेति । प्रियालादीना पालिः पक्तिरेव पालिनी 'वारी' ति लोके प्रसिद्धा यस्या. सा, एतेन यस्या. पालिनी कण्टकितवृक्षरहिता, तन्मध्ये कण्ट कितवृक्षाः१ कथ भवेयुरिति व्यङ्यम् । तेन च पादचारे शङ्का न कार्येति । सन्तः समीचीना ालवाला विद्यन्ते येषां ते सदालवालवन्तः ते लताश्च, विशाला विस्तीर्णा वृक्षाश्च ते तैः शालिनी शोभिता । सदालवालेति- विशेषणेनाऽतिसरसहरितता व्यजिता । तेन च तद्दर्शनस्य नेत्रतापहारक- त्वमिति१२ । ईदृशलतावृक्षेति पुरुषकथनेन तस्या अभ्युद्दीपनता' व्यजिता ।।३।। परागपुञ्जपूरिता पलाशपुष्पपिङ्गला । सनीरधीरगन्धवत्समीरसेवितोज्ज्वला ॥४॥ 11 - १. क. वातवी। २ ख. ईक्षणईक्षणयोनॆत्रयो.। ३. ख नितान्त विलक्षणा । ४ ख तत्र यो। ५. ख. विहारेअपि । ६. ख अतुच्छ । ७ ख स्तकका । ८ ख. कक्षे० । ६. ख ०पालपालिनी। १०. ख ०शास्ससालिनी। ११ ख कण्टकिता वृक्षाः । १२. स. नेत्रानंदजनकत्वमिति । १३. ख. प्रत्युद्दीपनता । .
८४] सङ्गीतरघुनन्दनम् परागेति । परागपृञ्ज न पूरिता, पलाशपुष्प पिङ्गला इति विशेषणद्वयेन तस्या अतिकोमलता व्यज्यते । तेन च रासयोग्यतेति' । सनीरेति-सनीरेण धीरेण च गन्धवता च समीरेण सेविता उज्ज्वला निर्मला त्रिविधगुणसमीर- सेवितेति यावत् । एतेन तस्या विहारजन्यश्रमहारकत्व व्यज्यते ।।४।। मरन्दबिन्दुचित्रिता मिलिन्दवन्दनादिता । वरस्थली२ विभाति यत्र विश्वनाथवन्दिता ॥५॥ मरन्देति । मरन्दस्य कुसुमरसस्य बिन्दुभिश्चित्रिता पततां मकरन्दबिन्दूना महत्त्वाल्पत्वपरिमाणवैचित्र्येण तस्याश्चित्रितत्वमिति वोध्यम् । एतेन यत्र रासोत्नवसूचकनानावर्णचतुष्कानीव रचितानि सन्तीति व्यज्यते । अत्र वस्तुना उ-प्रक्षालङ्कारध्वनि । मिलिन्दवृन्देत्यादिविशेषणेन यत्राऽऽलयो रासोत्सव- मङ्गलगानमिव कुर्वन्तीति व्यज्यते । तेन च पूर्वरासस्थलीभ्यस्तस्या अति- रमणीयतेति । विश्वेषा सर्वेपा नाथा ये ब्रह्मविष्णुमहेश्वरास्तैवन्दिता । एतेन तस्या सर्वोत्कृष्टता व्यञ्जिता । ईदृशी वनस्थली यत्र सरयूतटे विभाति । अत्र वाच्यवैशिष्टयजन्यव्यङ्गयम् ॥५॥ गलमञ्जुलवजुलमाल्यचयो, मधुपावलिलालितकञ्जशयो । अतिपीतपरागलसवसनौ, विलसद्वदनौ दरसद्धसनौ ॥१॥ गलेति । गले मञ्जुलाना वञ्ज लमाल्याना चय समूहो ययोस्तौ येव सुप्रीतिमाला विरच्याऽप्यायाति तस्या एव माला धत्त' इति माल्यचये व्यङ्गयम । तेन च सर्वासु समानप्रीतिमत्वम् । मधुपावल्या लालित का कमल गये हस्ते ययोस्तौ । अत्र भ्रमराणा लालनासम्भवाद्वाधे गुजारो लक्ष्यते । तेन च तेषा मधुपानाभिलाषित्व' व्यज्यते । अतिपीतेन परागण लसती वमने ययोस्तौ । एतेन विकचे कुठे गमन व्यज्यते । तेन च वनिका मार्गशोभातिशयः दर मन्द सत्सुन्दर हसन ययोस्ती, अत एव विलसत् . १ . १ स राक्षयोग्यतेति । २ ख वनस्थली । ३. ख मजुलषजुल० । ४ ख विश्वयियति । ५. ख. छत । ६ क व्य । ७. क लालनां सभवाहा । ८. ख. मधुप. नाभिलात्व । ६. स. लसती। १०. क. मार्गशोभीतिशय ।
[ ८५ t दशमः सर्गः w शोभमानं वदनं ययोस्ती । दरसद्धसनावित्यनेन परस्परं किमप्यपूर्व रहस्य सूचयत इति व्यज्यते ॥१॥ व्यजनादिकवीजितकान्ततनू वचनामृतनिन्दितकाममनू । ललनावलिमण्डितमोदभरौ ययतुश्च परस्परपाणिधरौ ।।२।। . व्यजनादिकेन आदिना बामग्ग्रह 3, वीजिते कान्ते मनोहरे तनू ययो- म्नी । अनिसुकुमारसुन्दरशरीरतया गमने श्रम ज्ञात्वा सख्य परितो व्यजन- चामराणि त्रालयन्तीति भाव. । वचनामतेन निन्दिता कामस्य मनवो मन्त्रा याभ्या तौ । यो काममन्त्रैर्न वशीभूतौ तौ परस्परवचनेन वशीभूताविद व्ययम् । तेन च वचनेऽपूर्वतेति । ललनागणेन मण्डितौ मोदस्य भरः समूहो ययोस्तौ तौ च तौ। मोदभरधारकत्वेन तयोर्मन्यरगामित्व' व्यङ्गयम् । ईदृशौ श्रीजानकीरघुनन्दनौ परस्परपाणिधरौ ययतु.६ । एतेन चलनेऽप्यतिप्रीत्याऽन्तरा- सहिष्णुत्व व्यङ्गयम् ।।२।। २ . ~ युग्मम् विश्वनाथनुतचरणौ गत्वा तत्र । शुशुभाते तो रसिकौ रङ्गो यत्र ॥१॥ विश्वनाथेति । विश्वनाथेन शिवेन कविना वा नुतौ चरणौ ययोस्तो । पत्र रसिकपदेन नानाशृङ्गारकेलिक्लानिपुणत्व व्यज्यते । तेन चाऽपूर्वरास- करणोत्साह इति । समुद्यताभिद्युतिभिर्नवाभिविरोचमान रमण विलोक्य । स एव वाऽन्योऽयमिति भ्रमन्ती कयाऽपि काचिजगदे वयस्या ॥१॥ - ११ समुद्यताभिरिति' । भ्रमन्ती भ्रम कुर्वन्ती अनुक्षण नवतां दधतो रघुनन्दनस्य रूप दृष्टवत्यपीदानी रूपदर्शनानन्दमदमत्ता जातेति भ्रान्तिमद- लङ्कारेण वस्तुव्यङ्गयम् । तेन च रघुनाथरूप तत्कालेऽत्यपूर्वमिति ॥१॥ . १. ख शोभामानं। २. ख व्यंजनादिक० । ३ क. चामरत्रहः । ४. क तौ । ५ ख तयोर्मन्दगामित्वं । ६. क ययुतु । ७. ख. रसिरसिको । ८. क. समुद्यताभिः । ६ ख स ऐवान्योऽयमिति । १०. रु. समुद्यतानिरतिः। ११. ख रघुनन्दस्य । - .
सङ्गीतरघुनन्दनम् ८६ 1 anw पश्य' सखि | जानकीकान्तम् । सकलशुचिसारसुनिशान्तम् ॥१॥ पश्येति । सकलस्य शुचे शृङ्गारस्य य सारः दिव्यशृङ्गार तस्य सुनिशान्त शोभनभवन, एतेन शृङ्गार कदाचिदपि त' न मुञ्चतीति व्यज्यते । तेन च अन्यत्र शृङ्गाराभास एवेति । जानकीकान्तमिति पदेन तस्याः भ्रम निवारितवतीति व्यज्यते । तेन च तस्या रघुनाथरूपाभिजतेति ।।१। ललितकरकलितकमलवरम् । विलज्जितकुसुमबाणधरम् ॥२॥ -- ललितेति । ललिते करे कलित शोभित कमल वर यस्य त, अत एव विलन्जितो विशेषेण लज्जा प्रापित कुसुमवागधर १° कन्दर्पो येन त । एतेन मदन पञ्चवाणव्यापारेण'१ जगद् वशयति, रघुनन्दनस्त्वबागीकृतेनकेन १२ कमलेनैव तत्राऽपि दर्शनादेव वशयतीति व्यज्यते । तेन च न केवल कान्त्या मदनजेता 3 श्रीरघुनन्दन. किन्तु सामर्थ्यनाऽपीति । अत्र प्रतीपालबारेण वस्तुध्वनिरिति ॥२॥ लसन्नटराजवरवेषम् । प्रियामुखपश्यमनिमेषम्१४ ।।३।। प्रावीण्य,१६ लसन्नटराजेति । लसञ्छोभमान नटराजाहरो१५ वेषो यस्य तम् । नटराजस्य कला अवलोक्य निपुणता ज्ञायतेऽस्य तु रूपमेव दृष्ट्वा नृत्यगीतादिष ज्ञायत इति वरपदव्यङ्गयम् । तेन च तादृशवेणदेव१७ सर्वजन- मोहकत्वमिति । प्रियेति प्रियामुखस्य पश्य पश्यन्तमित्यर्थ निमेष रहितमित्यर्थ । श्रीजानकीछविरनुक्षण नवीना भवत्यतो निमेषयोश्चलि- तुमवकाश' एव न भवतीति अनिमेषपदव्यङ्गयम् ॥३।। । अनिमेष१८ १ क. स. पस्य । २. ख सखी । ३ ख. सुनिसान्त । ४. ख पस्येति । ५ ख नाऽस्ति । ६.क. म.। ७.क.स्या। ८ ख प्रति । ६ ख प्रापिता । १० स्व ० वागधराः । ११ क ० मापारेण । १२ क ० स्त्ववारणीकृते । १३. क. मदन जेता । १४ ख पस्य- "निमेषम् । १५ क. नटराजसेवलरो। १६ स्व. प्रावीण । १७. ख. त्वादृश० । १८ ख. अनिमिष । १६ ख.० श्चनितुमव ।
+ दशमः सर्गः [ ८७ 1 - षण्णत्यगुलोन्मानम्, । केवलानन्दमयभानम् ।।४।। षण्णवतिरडगुलानि उन्मान यस्य त, केवलानन्दमय इति भान' यस्य त केवलानन्दशरीरकमित्यर्थ. । एतेन रूपस्याऽनिर्वचनीयता व्यञ्जिता । तेन चाऽप्रतिद्वन्द्वत्वमिति२ ।।४।। विविधमणिमयमुकुटलसितम् । तारमञ्जरीयुगकलितम् ॥५॥ विविधति । विविधानेकरङ्गमणिमयेन' मुकुटेन लसित शोभितं, शिखिपिच्छचन्द्रकम्येनेव' मुकुटेन युतमिति भाव. । तारेति-तारमञ्जर्या लोके 'किलगी' ति प्रसिद्धाया युगेन कलित युक्त, यस्य मुकुटे उभयतो मौक्तिकमज- रीद्वय लोलतीति भावः । एतेन छयिल्लता व्यजिता । तेन च रमणीप्रसाद- ८ कत्वमिति ॥५॥ . अरुणकञ्चुककलितकायम् । विजितबालातपच्छायस् ।।६।। अरुणेति । अरुणेन कञ्चुकेन 'जामेति' लोके प्रसिद्धन कलितः कायो यस्य त, अत एव विजिता बालातपस्य छाया शोभा येन तम् । एतेन अकृत्रिम- • जयेन कृत्रिमजयस्सुतरा'• सिद्ध इति व्यज्यते । तेन च बृहत्कञ्चुकस्याऽपूर्वा- रुण्यमिति ॥६॥ भूयिष्ठवसनसुखिताशम्' । अमितसुरचापजयदक्षम् ।।७।। भूयिष्ठेति । भूयिष्ठवसनेन आगुल्फविलम्बिकञ्च कोपरिनिबद्धानेकवर्णा- नेकवसनरचितेन कटिबन्धनेन 'काछनी' ति लोके प्रसिद्धेन सुखिते अक्षिणी अव- लोकयतामिति 3 शेषः येन त, अत एवाऽमितस्य सुर चापस्य जये दक्ष चतुरम् । सुरचापस्तु भूत्वा नश्यति, भूयिष्ठवसन सदैकरसमानन्दवर्द्धकमिति जये हेतुः । १. क. भाव । २. ख. च प्रतिद्वत्वमिति । ३. ख. ०लशितं । ४. क. ०नेकिरग० । ५. क चन्द्रमयेनेव । ६. ख. कलगीता । ७. फ. ख. छपिल्लता । ८. ख कलिता । ६. फ. वालातस्य । १०. क. कृविजय० । ११. ख. ० सुखिताच्छम् । १२. ख. अमितसुचाप० । १३ ख. प्रवशोकय० । १४. ख ददम ।
१८] सङ्गीतरघुनन्दनम् एतेनाऽरुणकञ्च कस्य सन्ध्याकालिकमेघस्याऽप्युपमेति व्यज्यते । तेन च रघुनन्दन- शरीरवर्णस्याऽऽकाशोपमेति ।।७।। पटयुग प्रान्तमरिणमुक्तम् । दधतमतिचारतायुक्तम् ।।८।। पटयुगमिति । प्रान्त मणयो मुक्ताञ्च यस्य तत्, अतिचारतायुक्त, पटयोयुग दधतम् । पटयुगधारणेऽय हेतु - एक भूयिष्ठवसनोपरिबन्धनाय, द्वितीय भावससूचनाय स्कन्धेरे धरतीति । प्रान्तमणिमुक्तमिति पदेन पटयुगस्य प्रकाशवत्त्व व्यज्यते । तेन च तस्य विद्युत्सादृश्यमिति ।।८।। १ अध कञ्च ककलितजघम् । विजितशुचियूपरुचिसघम् ॥६॥ अध इति । अध कञ्चुकेन लोके 'पायजामे' ति प्रसिद्धेन कलिते आवेष्टिने जड्धे यस्य तम्, अत एव विजित शुचियूपस्य शृङ्गारजयस्तम्भस्य रचेः सङ्घ समूहो येन तम् । अत्र शुचियूपजयेन जड्घयो पादकञ्चुर पटपूजितत्वम् । तेन चाऽतिश्लाघनीयतेति व्यज्यते ।।६।। मञ्जुल यस्य मुखकमलम् । हसति विधुमुदितसकलकलम् ।।१०।। मञ्जुलमिति । यस्य मञ्जुल मुखकमल, उदिता सँकला. कला यस्य त, विधु चन्द्र हसति । एतेनाऽन्यत्कमल चन्द्रमबलोक्य निमीलितमुखकमल तु पूर्णकल' चन्द्र दृष्ट्वा विनिन्द्य हसतीत्यतोऽपूर्वमेतत् कमल मिति व्यज्यते । तेन च सदा विकाशित्वमिति । अत्र प्रतीपालङ्कारेण प्रतीपालद्वारध्वनि ॥१०॥ जयति सतिलकमलिकममलम् । सवशकरयन्त्रविधुशकलम् ॥११॥ १ क द्वितीय । २. क. स्कदे। ३ क सादृशमिति । ४. व ५ ख. पूर्णकमल।
दशमः सर्ग. [ ८६ aranan miño जयतीति । सतिलक अमल यस्य अलिक ललाट, वशकरयन्त्रण' सहित विधुशकल चन्द्रखण्ड जयति, अतोऽभूतोपमेयम् । एतेन केवलस्याऽलिकस्य चन्द्रादप्यधिकानन्दजनकता व्यज्यते । तेन च तद्दर्शनादेव वनिताना मानाप- नयनमिति३ ॥११॥ काकपक्षे स्वलकपाली। भाति जितफरिणफणतलव्याली' ।।१२।। . - काकपक्ष इति । जिता फणि फणस्य तले वर्तमाना व्याली सर्पिणी यया सा, स्वलकपाली गोभनाऽलकपक्ति यस्य काकपक्षे जयति । फरिणफरणा- घस्ताद वर्तमानत्वेन व्याल्याः सङ्कञ्चित व्यङ्गयम् । तेन च स्थिरत्व कुटिलत्व चेति व्याल्या'' दशनेन विषमारोहति, एतस्या दर्शनेनैव विषमारोहतीति पदेन 1 व्यज्यते ॥१२॥ भ्रमति भुग्ना' भृकुटिरेषा'२ । मनोभवचापजणिवेषा ।।१३।। भ्रमतीति । मनोभवचापस्य १३ जयो वेषो यस्याः सा, भुग्ना कुटिला, यस्य एषा भृकुटिः भ्रमति । जयिवेषेति पदेन धनु. कदाचिदवरोप्यते १५ कदाचिदवतार्यते । नित्यकिशोरस्य रघुनन्दनस्य भ्रस्तु सदाऽवरोपितैव१६ भवतीति व्यज्यते । अनुक्षण नवनवशोभावत्याः जानक्या. मुखदशने विनिमेषस्य रघुनन्दनस्येदमप्याश्चर्यमिदमप्याश्चर्यमिति भुग्नभृकुटिभ्रमणेन व्यज्यते । तेन च जानक्या सौन्दर्यातिशय इति ।।१३।। राजति श्रवणमतिरूपम् । हसितमरकतवलितकूपम् ।।१४॥ १. फ वशकर यत्रेण । २. क. चद्र खडं। ३ क. मानापवयनमिति । ४ क. जितफरिणतलव्यालो। ५. ख. काकपक्ष इति विजिता फाकपक्ष इति । ६ ख विजिता। ७. शोभनालपंक्ति । ८. क फरिणषणा० । ६ क. सकुषितत । १० ख. वाल्या । ११. फ. मुग्ना। १२ फ. भ्र कुटि० । ख. भ्रकुटि० । १३. फ मनोभाव० । १४. क. पिवति । १५. ख. कदाचिदरोप्यते । १६. स सदारोपितव । १७ क. पुस्तके 'इदमप्याश्चर्य'इ त्यस्य त्रिरावृत्ति । १८. ख. राजते ।
१०] सङ्गीतरघुनन्दनम् राजतीति । हसित. मरकतेन वलितो बद्धः कूपो येन' तत्, यस्याऽति- रूप श्रवण राजति । अत्र राजतीत्यनेनेद व्यङ्गयम् -कूपो जलेन पूर्यते, इदन्तु, सखीना वचनसुधामारै कदापि न पूर्यत इति । तेन च तासा वचनश्रवणेऽ- त्यासक्तिरिति 11१४11 श्रवणपर्यन्तशुभनयनम् । असमाराशरजयनम् ।।१५।। श्रवणेति । यस्य असमशरल्य3 कामस्य य. कञ्जरूप शरस्तस्य जयन जयकर्त, श्रवणपर्यन्त शुभ नयन राजतीति शेष । कामवाणा विपयिणा काममुद्दीपयन्ति, श्रीरघुनन्दननयन तु कामजयिना मुनीनामपि काममुद्दीपयतीति व्यङ्गयम् । तेन च ब्रह्मानन्दात् सखीभावेनोपासनायामानन्दाधिक्य मिति ।।१५।। ललितकुण्डलगण्डयुगलम् । नितमकरचित्रमुकुरतलम् ।।१६॥ ललितेति । जित मकरस्य चित्र यस्मिस्तन्मुकुरतल येन तत्, ललिते कुण्डले यस्मिस्तत् गण्डयुग यस्य शोभते इति शेष । अत्र मुकुरचित्रयुक्तादर्शस्य जितत्वोक्त्या गण्डयो. कुण्डलप्रतिविम्बयुक्तत्व व्यज्यते । तेन चाऽतिनिर्मल- त्वमिति ॥१६॥ नासिका नागमणिसहिता । सफलशुकतुण्डजयविहिता ॥१७॥ नासिकेति । सफलस्य फलसहितस्य शुकतुण्डस्य जयो विहितो' यया सा, नागमणिगजमुक्ता तेन सहिता, नासिका यस्य राजतीति शेपः । सफलेत्यनेन शुकस्य हर्पितत्व व्यज्यते । तेन च तत्तुण्डजयिन्या. नासायाः शोभातिशयो व्यज्यते ।।१७।। मृदुलमधुरे दशनवदने । मदनवनविम्बरुचिहरणे ॥१८॥ १ ख एन । २. ख. ना । ३ क. असमयशरस्य । ४. ख. कामवाण । ५. क. कामजायिना । स. कामजयिनां । ६ ख जितत्वोक्ता। ७. ख ०मिति व्यज्यते । ८. क. विहीतो । ६. ख हपिताघ । १० ख दशनवशने ।
दशम सर्गः [ ६१ , मृदुलेति । मदनवनबिम्बस्य रुचेहरणे', मृदुले च ते मधुरे च ते, यस्य दशनवदने शोभेते इति शेपः । अत्र मधुरपदेन तत्सखीकृताधरामृतपान व्यज्यते । तेन च त्वमप्यधरपान कुविति' ।।१८।। लसति सहजस्मितमरीचि । विनिन्दितसुधानिधिदीचिः ।।१६।। लसतीति । विनिन्दिता सुधानिधेरमृतसमुद्रस्य वीचयो यया सा, यस्य सहजा चाऽसौ स्मितमरीचिश्च लसति । अत्र सहजपदेन रघुनन्दनस्य नित्य- शृङ्गारानन्दरूपता व्यज्यत तेन च सर्वदा शृङ्गारसामग्रीसाहित्यमिति । तेन च रासादिलीलाया नित्यत्वमिति । वीची: पवन उत्थापयति, स्मित तु सहजमेवेति विनिन्दितपदे हेतुः ।।१६।। रोचते चारु चिबुकतलम्, विनिन्दितलघुरसालफलम् ॥२०॥ रोचत इति । विनिन्दित रसालस्याऽम्रस्य लघुफल येन तत्, यस्य चारु सुन्दरं चिबुकतल रोचते । अत्र रसालपदेन चिबुकस्य शृङ्गाररसपूर्णता व्यज्यते । तेन च तच्चुम्बने सखीना लालसाधिक्यमिति ॥२०॥ कलितमुक्तालिकण्ठवर. । विजितपरिणवलितललितदरः ॥२१॥ कलितेति । कलिता मुक्तावलि मौक्तिकमाल्य यस्मिन् स चाऽसौ कण्ठवर!, अत एव विजित. मरिणभिर्वलितो ललितो दर. शड्खो येन स शोभते इति शेपः । अत्र मणिवलितेत्यनेन शङ्खस्य पूजा व्यज्यते । तेन च गम्भीर- ध्वनिरिति । विजितेत्यनेन कण्ठो निजरोचिषा मुक्ता अपि मरकतयतीति - व्यज्यते ॥२१॥ ५ रत्नभूषणकलितदोषौ । समरिणफणिराजरुचिमोषौ ।।२२।। - १ क. रचेरणे। २ क. वसने । ख ०वशने । ३. ख कुर्वीति । ४ क. शख । ५, क. पूजिता। 1 १२] सङ्गीतरघुनन्दनम् रत्नेति । यस्य रत्नानां भूषणेन ललितौ च तो दोपी भुजौ च तो, मरिणभि सहितस्य फरिण राजस्य रुचेर्मोपौ चौरौ राजेत इति शेषः । साङ्गद- भुजमूले समणिफरिणन. शोभा दृश्यत' एवेनि' भाव. । अत्र चौरत्वोक्त्या याभ्या फणिनो भयमगणयित्वा तच्छोभासर्वस्व हृत तयोरवलामनोहण किमाश्चर्य- मिति व्यज्यते । तेन च वनिताना सर्वदैव तदालिङ्गनेच्छोज्जम्भत इति ॥२२॥ - 7 करौ काश्चनरचिरवलयौ । जितसरविकररमानिलयौ ।।२३ । कराविति । काञ्चनस्य रुचिरौ वलयौ ययोस्ती, अत एव जित रवि- करेण सहित रमानिलय' कमल याम्या तौ, यस्य करौ शोभते । सरविकरपदेन विकसित कमल व्यजितम् । जितपदेन कमलादविकतापहारकत्व व्यज्यते । तेन च कमलहृतस्ताप. पुनरपि भवति, एतत्करहततापस्तु समूल नश्यतीति ।।२३।। सुवक्ष कौस्तुभावासम् । हसति शशिसहितमाकाशम् ॥२४॥ मुवक्ष इति । कौस्तुभस्य श्रावासो यस्मिस्तत्, यस्य सुवक्ष शशि- सहितमाकाश हसति । आकाशस्य कलङ्किचन्द्रसहितत्व हसने हेतु । अत्राऽऽवास- पदेनाऽऽलम्बनस्य हृदयस्य सदोद्दीपनविभावसाहित्य व्यज्यते । तेन च मिलितावुभौ शृङ्गारमतिशयेनोभावयत' इति । कौस्तुभस्य चन्द्रोपमया माल्यस्थितमणिमुक्ताप्रभामन्दकत्तुं त्वम् व्यज्यते ॥२४॥ सलोमालिललितमुदरम् । सुनाभित्रिवलिदीप्ततरम् ॥२५॥ ", सवालावर्तवीचिम्। हसति सिन्धु मरिणमरीचिम् ।।२६।। सलोमेति । लोमावल्या सहित यत्तत्, ललित सुन्दर, शोभने नाभित्रिवल्यो यस्मिन् तत्, दीप्ततर प्रकाशबहुल' यस्य रघुनन्दनस्योदर, १ ८ १ क दृश्य । २ का. इति । ३. ख. चौरवोक्ता । ४. ख. ०रबलामहरन । ५ ख, मानिलय । ६. व. फोस्तुमवासम् । ७. स. सद्योद्दीपन० । ८. क. मतिमयोद्भावयत । ६. फनात् । १० व. बाहुल्य । ११. क. ०नन्दनस्योरं । .
E ३ दशम सर्गः [ ६३ ammin शेवालश्च आवर्तस्सलिल भ्रमिश्च वीचयश्च तास्त्रिभिः सह विद्यते स त, मरणीना' मरीचयो यस्मिन् स त, सिन्धु समुद्र हसति तिरस्करोतीत्यर्थः, ततोऽधिकतर शोभते इति यावत् । दीप्ततरमित्यनेन बृहत्कञ्चुकभूयिष्ठवसना- छन्नस्याऽप्युदरस्य छटा उपरि स्फुरतोति व्यज्यते । तेन च कञ्चुकभूयिष्ठ- वसनयोरातसूक्ष्मत्वमिति । एतेन सकलेन उदरस्य गम्भीरतातिशयो व्यज्यते । तेन च तदभिप्राय न कोऽपि जानातीति ॥२५॥२६।। 1 मध्यम जेतुमनपघनम् । बद्धपरिकरमिव सरशनम् ।।२७।। मध्यमिति १ । यस्य अणु सूक्ष्म, रशनया सहित, मध्य कटिः, न अपघनो। ङ्ग यस्य स , अनङ्ग इत्यर्थः । “अङ्ग प्रतीकोऽवयवोऽपधन'४" इत्यमरः । त जेतु बद्धपरिकरमिव१५ भातीति१६ शेष । एतेन कटौ सूक्ष्मता- वधिय॑ज्यते । तेन च पश्यन्तीना' कटिमद्भावासद्भावसशय इति । अत्र वस्तुना सन्देहालङ्कारध्वनि. । अत्र कविसम्प्रदायानुरोधेन कटिसूक्ष्मतातिशय- वर्णनमात्रमेव बोध्यम् ॥२७'। मञ्जुमञ्जीरपदमचलम् । हसितसुरतरुसुकुसुमदलम् ॥२८।। - मञ्जुमञ्जीरेति । यस्य'६ हसितानि सुरतरोः कल्पवृक्षस्य कुसुमैः सहितानि दलानि येन तत्, अचल स्थिर, मञ्जमस्त्रीरो° यस्मिन् तच्च तत्पदं च तत्, राजतीति शेष. । नटराजवेष विधायाऽपूर्वकेलिक्रिया विचारयन् रघुनन्दनः स्थित इत्यचलपदेन व्यज्यते । तेन क्रीडायामीहशशोभादर्शन दुर्लभमिति ॥२८॥ १, क. श्रावतरजलिल० । २. क. तारस्ताभि.। ख तास्तिभिः। ३. ख. सहि । ४ ख. मरिगना। ५. क. सति । ६. ख. दीप्तगर० । ७. ख. ०छन्नसाप्युदरस्य । ८. फ. ०रतिसूत्वमिति । ६. ख. मध्यमनु । १०. ख. जेतमनुयुधुनम् । ११ ख. मघमिति । १२. ख अनु। १३. क. ख. अपधनो। १४, ख. प्रतीयोक्यतो० । १५. क ०परिकमिव । १६. क. भक्तीति । १७ क व्याज्यते । ख व्यजिते । १८ क मश्यतीना । १६. फ. स्य । २०. क मजुर्मा जीरो । 1 ६४ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् wa नखरततिरिन्दुमन्दकरी। ध्यातृजनमनोध्वान्तहरी ।।२६।। नखरततिरिति स्पष्टम् । -यथा रविप्रकागेन चन्द्रो न प्रकागते तथैतस्या अपि । किञ्च चन्द्र केवल बाह्यमन्धकार दूरीकरोति । नखततिस्तु बहिरन्तरमयीति । अत्र ध्यातृजनेत्यादिना त्वमप्येता दृष्ट्वा चित्ते स्थिरीकुर्विति । तेन च तद्ध्यानेन तव भ्रमो विनक्ष्यतीति व्यज्यते ॥२६।। प्रय भाव करे चरणे च वररेखा । विषमशरवागुरलेखाः ।।३०।। कर इति । यस्य करे चरणे वररेग्बाः विषमशरस्य कामस्य 'वागुरा या लेखा.'४ शोभन्त इति शेष । ध्यात णा द्रष्ट णा च मनो यत्र बद्ध भवतीति वागुरपदेन व्यज्यते । तेन च रेखाना शोभातिशय इति ॥३०॥ - -- उरसि मातङ्गमणिहार । यथा खे तारकावार. । उरसीति । मातङ्गमणीना गजमुक्ताना हार , उरसि तथा शोभते यथा खे आकाशे, तारकाणां वारः समूह । अत्र तारकावारशब्देन शतभिषक्नक्षत्र व्यज्यते । तेन च हारमुक्ताना न्यूनाधिक्यराहित्यमिति ।।३१।। बैजयन्तीभासविशदम् । दाम वैकक्षिक सुखदम् ॥३२॥ वैजयन्तीति । आजानुलम्बिनी° पञ्चरङ्गमणिमयी माला वैजयन्ती- त्युच्यते, तस्या भासेन विशद सुन्दर, वैकक्षिक दाम सुखदमस्तीति शेष । उपवीतवदालम्बि पुष्पमाल्य वैकक्षिकमित्युच्यते। विशदमित्यनेन अनेकरङ्गमणिमयी- वैजयन्तीप्रभासम्पर्केण वैकक्षिकस्येन्द्रधनु,सादृश्य व्यज्यते । तेन च रघुनन्दनस्य मेघसादृश्यमिति ।।३२॥ १ फा. व । २ क. स. वितंक्ष्यतीति । ३ ख. विषमशरवागुणवेस्वा । ४. '--' प. पुस्तके 'वा गुण्याः वेस्वा' इति पाठ. । ५. ख. वरगुण्य० । ६. स. हामुक्ताना । फ नजानु । ८. क वैकक्षक । -- दशमः सर्ग. [ ६५ प्रलम्बापोडवनमाला. । लसन्त्यतिकान्तिकुलशाला: ॥३३॥ प्रलम्बेति । यस्य कण्ठे बद्धा पानाभिलम्बिनीमाला २ प्रलम्बाः3, शिरसि बद्धाः पुष्पमयीमाला. अापीडाः, आपादलम्बिनीपत्रपुष्पमयीमाला वनमालाः, इमा माला प्रतिकान्तिकुलस्य अतिशयितकान्तिसमूहस्य शालाः निवासस्थानभूताः, लसन्ति शोभन्ते । अतिकान्तिकुलशाला' इत्यनेन मुकुटभूषणानेकरङ्गमणि- प्रभाभो रघुनन्दनशरीरच्छविच्छटाभिश्च विचित्रवर्णा. लक्ष्यन्त इति व्यज्यते । तेन च काचिदपूवशोभा दृश्यत इति ।।३३।। विश्वनाथोदित गीतम् । कुरु श्री. | स्वश्रवणनीतम् ।।३४॥ इति श्रीमन्महाराजकुमारश्रीविश्वनाथसिंहविरचिते सगीतरघुनदने सर्वाङ्गशोभावर्णन नाम' दशमः सर्गः ।।१०।। विश्वनाथोदितमिति । हे श्री: । हे लक्ष्मी: । विश्वनाथेन उदितं, गीत स्वश्रवणनीत कुरु । एतेन'° मयेद११ स्वबुद्धया नोत्प्रेक्षितमिति व्यज्यते । तेन च नैतत् कवितामात्रं, किन्तु सत्यमिति । तेन चैतादृशो रघुनन्दन एव नाऽन्य इति ॥३४॥ इति सिद्धि१२श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीविश्वनाथसिंहकृतायां व्यग्यार्थचन्द्रिकानाम्नि टीकायां दशम. सर्गः ॥१०॥ J . 1 १. ख. लस्यन्त्यत्तिकांतिकुशला । २ क. अनःभि० । ३. फ. ख. प्रलम्बा ४,फ अपीडः । ५ क. फान्तिकुशाला। ६. क. ०च्छाटाभिश्च । ७. फ. लक्ष्यंत । ८ . वितिमित । ६ क लक्ष्मि । १०. ख. तेन । ११. क. सयेदं । १२. ख सिद्धः । -- ६६ ] ce सङ्गीतरघुनन्दनम् .६ r- [ अथ एकादशः सर्गः] काचित्ताम्बूलपेटीमधूत मरिणपतग्राहमन्याऽऽतपत्रम्,' प्रासूनस्नेहपात्र व्यजनमपि परा गन्धवन्नीरपात्रम् । रत्नाढ्य स्वर्णपात्र विमलजलयुत चामर काचिदन्या, तासां मध्ये स्म काचिद् वहति रसभराक्रान्तचित्ता सखी स्वाम् ।।१।। काचिदिति स्पष्टम् । अत्र रसभराकान्त चित्तेत्यनेन तदुक्तेरपि रसवत्ता व्यज्यते । तेन च तस्या उद्दीपनातिगय इति ।।१।। मोदविकाशे रासविलासे, रघुनन्दनसिथिलेशनन्दनी । स्वगुरगवता गायति गोतम्, सकन्दर्परतिदर्पकन्दनी ||१|| तदेवाऽऽह- मोदविकाश इति । कन्दर्पण सहिताया रतेर्दाम्पत्य सौन्दर्ययो- स्सकलगुणाना च दर्पस्य कन्दनी नाशयित्री, रघुनन्दनेन सहिता मिथिलेग- नन्दनी', स्वेन गुणेन गर्विता सञ्जातगर्वा सती, मोदस्य विकाशो यत्र तत्र, रासस्य विलासे, गीत गायति । रघुनन्दनमिथिलेशनन्दनीति पदद्वयेनोभयो समता व्यजिता । तया च शृङ्गाररसपूर्णतेति । स्वगुणगवितेति पदेन निजगानेन' रघुनन्दनगानविजिगीषा व्यजिता१ । तया च तद्गाने१२ माधुर्यातिशय इति ॥१॥ पदयुगलेन लिखति शिखिकरिणी,13 लघु नृत्यन्ती भावगामिनी । सुचमत्कृतियतिगतिचलचित्ता, चिबुक चुम्बति चारुकामिनी ॥२॥ पदयुगलेनेति । गाने यो भावस्तेनैव गामिनी गमनशीला, लघु शीघ्र , नृत्यन्ती सती, पदयुगलेन शिखिकरिणौ१४ लिखति । एकेन मयूरगत्या मयूरमित्यपरेण ५ गजगत्या गजमित्यर्थ । एते गती सङ्गीतशास्त्रप्रसिद्धे । य - १. स. मरिणयतमाह । २. क व्यजश्नः । ३ ख. ताप्तां । ४. व क्रान्तन्विता । ५ ख. रसमारा० । ६. क रसवक्ता । ७ क. सफदर्प० । ८ ख. नंदि । क विशो। १० स्व. निजनानेन । ११ ख. विजिता । १२. खः भक्ताने । ३. ख शिखिकरणो। १४ क ख. शिखिकरगी। १५. ख. मयूरमितिरेण ।
। - [ ६७ एकादश. सर्गः भावमन्या विलम्बनृत्ये महता परिश्रमेश सूचयेत्' सोऽनया तरलनृत्येऽपि न त्यज्यत इति भावगामिनीपदे' व्यडयम् । सुचमत्कृतिरिति:--- सुप्ठ शोभनाश्च- मत्कृतयो यासु ताश्च पत्यू रघुनन्दनस्य गतयश्च तासु चल चपल चित्त यस्याः सा, कामिनी श्रीजानकी, चारु यथा तथा चिबुक चुम्बति, पत्युरिति शेष । अत्र कामिनीपदेन तस्या रघुनन्दनगतिभ्योऽधिकचमत्कारवतीर्ग्रहीतुमभिलाषो व्यज्यते । तेन च नृत्ये रघुनन्दनस्य प्रवीणतातिगयो व्यज्यते ।।२।। . + 1 : मिलितसुमजीरध्वनिरशना', ध्वनिचालितसुरपुरविलासिनी । श्रमजलयुतचलकुन्तलकुण्डल- मुखमनोहरस्मितविकासिनी ।।३।। मिलितेति । कोहगी जानकी ? मिलितस्सुमजोरयोर्ध्वनिर्यस्मिन् स चाऽसौ रशनाध्वनिश्चय तेन चालिताः प्राकृष्टचित्ताः सुरपुरविलासिन्यो' देवाङ्गना. यया सा। ध्वनिचालितेत्यादिना तासां तन्नृत्यशिक्षोत्कण्ठातिशयो व्यज्यते । तेन च जनकनन्दन्या नृत्यनिपुणतातिशयो व्यज्यते । अत्र साकेतस्य परितो ब्रह्मादीना पूर्वावतारिकथनप्रस्तावे लिखिताना वासस्थानानि सन्त्यतस्तत्र- त्यदेवाङ्गना ज्ञातव्याः । श्रमेति-श्रमजल स्वेदस्तेन युत चलाश्चञ्चला: कुन्तला: कुण्डले च यत्र तच्च तन्मुख च तेन मनोहरस्मितस्य' विकासिनी । स्मितविकासिनीत्यनेन रघुनन्दनस्य नृत्यशैथिल्य ११ व्यज्यते । तेन च जानक्याः जय इति । - - तानविताननिरतरमरणीगरण- राजितरासे रमरणरजनी । विश्वनायकथिता पदगाथा, जयति सकलसन्तापभजनी ॥४॥ तानेति । तानानां विताने विस्तारे निरतेन रमणीनां गणेन राजिते रासे, रमणस्य रघुनन्दनस्य रञ्जनी रजनक: । अत्रेद व्यङ्गयम्-यास्तानान् .- १ क. सूयचयेत् । २. ख. भाभावगामि० । ३. ख. सुचमत्कृतीति । ४. ख. ०मभिलाषं । ३.६ क. ख. रसना० । ७. फ आकुचित्ता । ८. ख. विलान्यो । ६. फ. सत्यस्तत्र० । - १०. स. मोहरस्मि० । ११. ख मृत्य० ।
१८ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् सख्यो गृहोतवत्यस्तानेव स्वनूपुरघण्टिकास्वरावर्त्तन प्रकटितवतीति । तेन च तासा पराजय विस्तारितवतीति सकलस्य वक्तु श्रोतुश्च सन्तापस्य भञ्जनी, विश्वनाथन कथिता, पदगाथा जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते । जयतीति रासस्य सदातनत्वात् रासवर्णनगाथाया अपि तथात्वात् पूर्वसिद्धवपा पदगाथा, श्रीरघु- नन्दनो मन्मुग्वेन प्रकटितवानिति व्यज्यते ॥४॥ प्रकाशपरमानन्दपरमानन्दविग्रह ', रामो रमयते रामा राससङ्गीतनर्तन. ॥१॥ - प्रकागेति । रासे सङ्गीतनर्त्तनैर्नृत्यविशेष:, अथवा सङ्गीतैर्नर्तनैश्च । अत्र रामरामापदाभ्या रमणशीलत्व व्यज्यते । तेन च रासक्रीडासु तृप्त्यभाव इति ॥१॥ । मिलितेतरेतरस्वरगान धृतेतरेतरकण्ठस् । नृत्यति नर्तयते न विमुश्चति, जनकदुहितुरुपकण्ठम् ॥१॥ मिलित इति । मिलित इतरेतरयो. स्वरो यत्र तद्गान' यत्र कर्मणि. तद्यया भवति तथा, धृत इतरेतरयो. कण्ठो यत्र कर्मणि तद्यथा तथा स्वय नृत्यति, सम्वीश्च नर्तयते, तथाऽपि जनकदुहितुरुपकण्ठ समीप न विमुञ्चति । अब नृत्यति नत्तयत इति क्रियापदद्वयेन या गति गृहीत्वा स्वय नृत्यति तामेव गति नेप्रकरचेष्टया त्वमपीमा गति गृहाणेति सूचयतीति व्यज्यते । तेन चेत- रेनरनयनेऽपि मिलिते इति । न विमुञ्चतीत्यादिना नृत्ये तरलतातिशयो व्यज्यते । इत्य जानकीय हिताना सम्वीनामग्र नृत्यन्सखी रमयते इति भावः ॥१॥ नीराजयति मुकुटचिराजिभिरासामाननचन्द्रम् । करचलनेन चालयति चेतं. पदगतेन क मन्दम् ।।२।। नीगजयतीति । पासा सग्बीना श्राननमेव चन्द्रः, चन्द्रते.११ पचादित्वादच्१२, त, भुकुटम्बीना राजिभिर्नीराजयति । नर्त्तने मुकूटे चलति सति रत्नरोचिश्छटाभिः H - . ... मायपर० ३ २. स. नंत्यविशेष । ३. स सगीतते । ४ फ. तृप्यभावः । " ना ! ५. २. पान । ६ प अति । ७. स राहाणेति । ८ ख. रायनेऽपि । r, TAf.१. मोमो ममग्रे 1 १०, क. स. नीरायतीति । 18 R. । १२. पचाविन्याची १ -- 1 1. J एकादशः सर्गः [ ६६ सखीनामाननस्य' नीराजनमिव करोतीति स्पष्टार्थः । एतेन सखीनां वदनस्य पूर्णशरद्विधुविजयो व्यज्यते । तेन च रासे प्रकाशाधिक्यमिति । अत्र गम्यो- स्प्रेक्षाध्वनित प्रतीपालङ्कारेण वस्तुध्वनिः । करेति-करचलनेन सखीना चेतश्चालयति, पदस्य गतेन गत्या आसा क गिरः मन्द यथा तथा चालयति । भावसूचनायां करचलनवैलक्षण्यमवलोक्य सखीना चेतश्चलतीति भावः । तस्यो- त्तमगतीना प्रशसने किञ्चिच्छि रश्चलतीति भावः । करचलनेनेत्यादिवाक्येन भावसूचने कर चालयित्वा किञ्चिद्रहस्य सूचयतीति व्यज्यते । शिरश्चालनेन गतेः प्रशसा व्यज्यते ॥२॥ ६ भ्रमभृकुटिदरचललोचनेन कुरुते गीतनिरुक्तिम् , कान्ताकान्तकटाक्षाकलने कलयति कामपि युक्तिम् ॥३॥ भ्रमभृकुटीति । भ्रमन्तो भृकुटियस्मिन् कर्मणि तद्यथा तथा दरमीप- चलेन लोचनेन गीयमानस्य'° निक्ति निर्वचन कुरुते । अय भाव:- यत्र कोप- स्य' भाव आपतति तत्र तस्य नयनारुण्याद्यनुभाव, यत्र च मान आपतति तत्र तस्याऽश्रुपाताद्यनुभावं, यत्र च विरह आपतति तत्र तस्य मुखवैवाद्यनुभावमित्थ “यत्र यो भाव आपतति तत्र तस्याऽनुभाव नयनेन१२ सूचयतीति । कान्तेति' 3 कान्ताना कान्ता मनोहरा ये कटाक्षास्तेषामाकलने स्वीकारे कामप्यनिर्वचनीया युक्ति कलयति । युगपदापतत. सकलसखीकटाक्षान्१५ स्वीकृत्य प्रतिसखि'६. निजकटाक्षरेकदैवोत्तर१७ ददातीति भाव । एतेन विदग्धतातिशयो व्यज्यते । तेन च श्रीरघुनन्दनस्य नवनवालौकिकातिविचित्रशृङ्गार रसचमत्कारप्रकाशकत्व व्यज्यते ॥३॥ काचिद्वाद्यमिलन्मरिणनूपुरमानदानकलगानः । अतिप्रसन्न कुरुते रमण कोककलारसपानः ॥४॥ काचिदिति । काचित्मखी कोके कामशास्त्रे या. कलास्तासा रसस्य पान येपु तैः, वाद्यैमिलद्भिर्मणिनू पुरशब्दै १८ मानस्य सङ्गीतशास्त्र प्रसिद्धस्य P P १. ख. सखीनामानस्य । २. ख विज्य । ३ ख. गम्योत्प्रेच्छा० । ४. ख. ध्वनि । ५. ख चेतश्चतीति । ६. क. शिरश्चालनेगनेन । ७ क. ख. भ्रमभ्रकुटि० । ८ ख गीतिनि० । ६ क. तद्या। १० क गीतमानस्य । ११ ख कोप । १२ ख. नाऽस्ति । १३ क. कांक्तति । १४: ख मुक्ति । १५ क. कलसखी० । १६. क प्रतीसखि । १७. क. रैकदेवा । १८. ख. वाद्यमिलाद्धिर्म । 7 ५ १०० ] सङ्गीतरघुनन्दनम् मानस्य सङ्गीतशास्त्रे प्रसिद्धस्य भाषाया' च 'सम'शव्देन. प्रसिद्धस्य दानश्च कलैर्मधुरस्फुटध्वनिविशिष्टनिश्च रमण श्रीरघुनन्दनमति प्रसन्न कुरुते । वाद्य- मिलन्मणिनूपुरे निपादादिस्वराणा कलगप्तक मन्द्रसप्तक तारसप्तक च बद्धं तत्र यस्थ सप्तकस्य य स्वरो वीणादिषु नि सरति तत्स्वरशदिनीमेवरे नूपुरगुटिका शब्दायतीति भाव । एतेन रघुनन्दनाच्छिक्षित तत्क्षणमेव प्रदर्शितवतीति व्यज्यते । तेन च तस्या अतिमेधावतीत्वमिति । अत्राऽय भाव -मानदानेति-- 'व्याकरणे यथा अनुदात्तस्वरितोदात्ताः प्रसिद्धास्तथा सङ्गीतकशास्त्रे कलमन्द्र- कदाचिच्चरणेन, कदाचित्करेण, कदाचिन्नयनेन, कदाचिच्छिरश्चालनेन" मान ददातीति । कोकेत्यादि-कोककलाप्रतिपादकार्थवद्गानेन तत्तविहार- स्मरणतो रसपान भवतीति भाव. ।।४।। १४ तारा काऽपि मेघरमरणीयरागतो वर्षात्व दर्शयते । नायकनयननवानघनेन च सुखनीर वर्षयते । ५।। काऽपीति । काऽपि सखी मेघनामा यो रमणीयो राग. तत. तद्गाना- दित्यथ., वर्षात्व दशयते । तदेव दर्शयति-नायकस्य रघुनन्दनस्य नयनमेव नवीनो घन तेन सुखनीरमानन्दाश्रु वर्पयते ।। अत्रेद व्यङ्गयम् - कान्ताकान्त- कटाक्षेत्यादिव्यजितश्रीरघुनन्दनकृतवैदग्ध्यकर्मणः मेघरागेनेवोत्तर दत्तवतीति व्यज्यते । तेन च प्रथमसखीकृतस्य रघुनन्दनस्य शिक्षाप्रकटनरूपस्य कर्मणोऽना- दर इति । अत्र काव्यलिङ्गरूपकालङ्कारसकरध्वनितवस्तुना वस्तुध्वनि. ॥५ः दारा केदाराकलगाने. कुर्वन्त्यम्बरममलम् । विश्वनाथ इति वदति विकसित नवनायकहृत्कमलम् ॥६॥ मेघरागगानतो मेघाडम्बरेण रासविच्छेद मत्वा काश्चित्सख्यो जगुरि- त्याह-दारा इति । दारा: श्रीरघुनन्दनस्य सख्य , केदारायाः केदाराख्यरागिण्या. । कलगाने , अम्बरमाकाशममल कुर्वन्ति, मेघ दूरीकृत्य शरत्काल प्रवर्तयन्तीत्यर्थः । एतेन तस्या अप्युत्तरमेता. कृतवत्य इति व्यज्यते । तेन चाऽऽसां तस्या अपि ६ 7 १ ख साखायो। २. क. तत्स्वशन्दिनी० । ३. ख. शितपती० । ४ '' चिह्नान्तर्गा शस्याऽभाव क. पुस्तके । ५. क च्छिरश्चालेने । रस छिपश्चालेनेन । ६. ख दृश्यते । ७ ख मेघरागेवोतर । ८ ख. रूपकालकारध्वनित । ६. क. ख. विकशितम् । F TA :-30 ।
। एकादशः सर्गः [ १०१ । वंदग्ध्यातिशय इति । नवनायकस्य श्रीरघुनन्दनस्य हृत्कमल विकसितमिति । विश्वनाथो वदति विकसितमित्रस्प विधायिनीसखीमेता' अनायासेन जयन्तीति व्यज्यते । तेन च प्रसन्नताधिकतेति । नवनायकपदेनाऽधिकरासविधानाभिलाषो व्यज्यते ॥६॥ , नृत्यति रसिकशिरोमरिगरामः । यस्य चररगचरण विलोक्य । परिमुञ्चति मान कामः ।।१।। - .. क्रमेण जानकीरघुनन्दनयोनृत्य ततः सखीना नृत्य वर्णयित्वा रघुनन्दन- नृत्य वर्णयति-नृत्यतीति । रसिकशिरोमणिः स चाऽसौ रामो नृत्यति । यस्य रामस्य, 'चरगास्य चरण गतिविशेष' 3 विलोक्य कामः मान परिमुञ्चति । अन्यरसिकाना परकीयासु रसाधिक्य भवति, रघुनन्दनस्य स्वकीयास्वेवेति रसिक- शिरोमणिपदे' व्यङ्गयम् । तेन च रघुनन्दनस्य परकीयापराङ्मुखत्वमिति । चरणकमल मित्यादावय भाव.-यादृश' शीघ्रचारि जनवश्यकारि रघुनन्दनस्य चरणकमल तादृश मम बाणकमल नाऽस्तीति ।।१।। कुञ्चभृकुटिभावससूचनचेतश्चोरणचतुरः । सखीसमर्पितवीटीवितदरचलकुञ्चितचिकुरः ॥२॥ कुश्चभृकुटीति । कीदृश' कुञ्चन्त्या भृकुट्या भावस्य ससूचनेन चेतस- श्चोरणे चतुरः', सख्या समर्पिताया वीट्याश्चवितेन१ दरमीषच्चला.१२ कुञ्चिताश्च चिकुरा यस्य सः, अथ १३ प्रथमविशेषणेन चित्तचोरयित्रीणामपि निजगुणदिताना मनः यभृकुटिकुञ्चनमात्रेणव स्वाधीन भवतीति' व्यजितम् । तेन च तासा चित्तचोरणगर्यो मन्दीभवतीति व्यजितम् । द्वितीये१५ च वीटीचर्वणादेवाऽलकचलनेन कस्मिश्चिन्नृत्यविशेपे चरणमेव चलति, -१४ १ क. विफसिन मित्रत्ययस्पर्धा० । स विकसितमित्रस्पद ० । २. ख. चरणकमल । २. '-' विहितांशस्याने 'चरणकमल' इति पाठ ख. पुस्तके । ४ क. लोक । ५ क. रशिरोमणि । ६ फ. ०पराल्लुखत्वमिति । ७. ख. यदिशं ८. क. शोचारिजनः । ६ ग्य. समपितवोटो० । १०. ख. चतु । ११. ख. वीसाश्च० । १२. स. मीचल्ल्पला । १३ सप्रन। १४. स. न भवतीति । १५. ७ द्वितये । १६. मा. पिटीचर्वणा ।
१०२ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् arne भूषणानि अगानि च न चलन्तीति व्यज्यते । तेन च नानारीत्या नर्तन- मिति' ॥२॥ सङ्गीतकतरलिम्ना गविततडिद्गर्वपरिहारी । तरुणीरश्मिसितस्मितदर्शनवनिताविस्मितकारी ।।३।। । सङ्गीतको नृत्यविशेषस्तस्मिन् यस्तरलिमा चपलत्व तेन, गविताया- स्तडितो गवं परिहरतीति । एतेन चपलाया गतागत ज्ञायते, श्रीरघुनन्दनस्य तु न ज्ञोयते, किन्तु सर्वाभि. स स्वस्वपुरो नृत्यन् दृश्यत इति व्यञ्जितम् । तेन च चपलतावधिरिति । तरुणीति -तरुणीपु रश्मयः किरणा यस्य तत् 'तञ्च तत्" शुभ्र स्मितं च तत् तम्य दर्शनेन वनिताना विस्मित आश्चर्य करोतीति । यदा 'स्मयते तदा तरुणीषु पतिता हासच्छटा किं मुबावृष्टिर्जातेति तासा विस्मय जनयतीति भाव. ॥३॥ - ससखीसीतासङ्गीतक्षरगसुखितशिर सञ्चाली । विश्वनाथनिनदेन निन्द्यते समदमदननिनदाली ॥४॥ इति श्रीमन्महाराजकुमारश्रीविश्वनाथसिंहविरचिते सगीतरघुनदने श्रीजानकीरधुनदनयोगीतनृत्य वर्णन नामकादणस्सर्ग ॥११॥ ससखीति । सखीभि. सहिताया. सीताया. सङ्गीतकस्य ईक्षणेन सुखितः स चाऽसौ स च, ससखीत्यादिना तादृशजानकीकर्तृकनृत्यमुक्तम्, शिर सञ्चालीत्यनेन भावसूचने जानकीज्ञापितरहस्य विज्ञातृत्व व्य जितम् । विश्वनाथो रघुनन्दनस्तस्य'१ निनदो गानशब्द तेन, समदस्य मदनस्य निनदाली गानशब्दपरम्परा१२ निन्द्यते १३ । अत्र समदमदने [ ति पदेन रघुनन्दनस्य मदपान व्यज्यते । तेन च सखीसहितसीताया अपीति । श्रीरघु- नन्दने ]१४ सदा सरलस्वभावा१५ ससखीका१६ जानकी मदपानेनैव गर्व१७ मत्तस्य १. ख. नर्तनमि । २. ख. गवितातडि० । ३. ख सङ्गीतकं । ४. '-' अशोऽय नास्ति म्व पुस्तके । ५. क. ख प्रायं । ६ ख हाच्छटा । ७. क. गोननृत्य० । ८. ख ०कादशो सर्गः । ६ स. नाऽस्ति । १०. क विश्वो नाथो। ११ क नन्दनसास्य । १२ स मानशब्द० । १३ न. निदिते । १४ [-] कोष्ठगांशस्याऽभावः स. पुस्तके । १५ क. ०स्वभावस । १६ रन, सखी। १७. क । .
1 2 [ १०३ एकादशः सर्गः करिप्यनि, सोऽपि तस्यां 'ताहशस्तेनैवाऽन्तर्धास्यतीति तत्त्वम् । अत्र कविपक्षे विश्वनाथेति-विश्वनाथस्य सङ्गीतरघुनन्दनकाव्यरूपनिनदेन समदस्य मदपीन- मत्तस्य मदनम्य निनदाली निन्द्यते । 'अत्रेद व्यङ्गयम्'२-- एतेन कवेरपि रासवर्णनरसासवास्वादमत्तत्व व्यज्यते । तेन च मदनः प्राकृतमद पीत्वा कथनानीं प्राकृत बार्ता कथयति । अहन्तु श्रीजानकीरघुनन्दनस्य परमदिव्य- रासवर्णनरमासब निपीय कथनानहमपि विरहवर्णन करोमीति ॥४॥ इति सिद्धिश्रीमन्महाराजाधिराजश्रीविश्वनाथसिंहकृताया व्यग्यार्थ- चन्द्रकानामिन टोकायामेकादश. सर्गः ॥११॥ -- [अथ द्वादशः सर्ग] A - 1 'नृत्यन्ती रासमध्ये निजगुरणगुरुतागसम्भारभाजः, प्रेयांस प्रीयमारण स्ववशमुपगत निर्भर मन्यमानाः । रामा रामोऽवलोक्याऽभिमतिमुपचितां हत्तु कामस्तवानी, तासामन्तहितोऽभूत्प्रियतमविरहव्याकुलास्ता विचेरुः ॥१॥ नृत्यन्तीरिति । रामः रासमध्ये नृत्यन्तीः, निजगुणगुरुतागर्वसम्भारभाजः, निर्भर प्रीयमाण प्रेयास श्रीरघुनन्दन स्ववशमुपगत स्वाधीन मन्यमानाः, रामाः सखीरवलोक्य, तासामुपचितां वृद्धां, अभिमति अभिमान, हर्तुकामः सन्, तदानीमन्तहितोऽभूत् । प्रियतमविरहव्याकुलास्ताः सख्यो विचेरुः । अत्र राम इति पदेन रमणशीलत्वं व्यज्यते । तेन च झटिति प्रकटतेति । अत्राऽभिमान- हरण बाह्य प्रयोजन, अन्तर्धानेऽन्तरेऽयमाशय.- अन्त याऽऽविर्भूते६ सख्यो मयि प्रेमातिशय विधास्यन्ति तथा मिलिताया सीतायां ममानन्दोऽभूत्तथैवेति ॥१॥ १. व. दृशस्तेन । २. '-' नाऽत्ययमंश: ख पुस्तके । ३. फ. ०स्वादमत्तं । ४. क दातस्तु। ५ ख. सिद्ध०। ६. क. अन्त विभूते ।
[ १०४ सङ्गीतरघुनन्दनम् प्रमोदवनकुञ्जेषु मृगयन्त्यो रघूवहम् । मार्गे मार्गे रमण्यस्ता. पृच्छन्ति स्म लतास्तरून् ।।२।। प्रमोदेति स्पष्टम् । एतेन वनिताना विक्षिप्तता व्यज्यते । तेन च प्रमोद- वनस्याऽत्युद्दीपनत्वमितीद केवलकविसम्मतम् । प्रमोदवनीयकुञ्जत्वात्तासा' मार्गणस्मृतिरप्यासीदन्यथा का दशा भवेदिति को नु जानातीति व्यङ्गयम् । इद तु रसिकवैष्णवसम्मतमिति ।।२।। मन्मयबारगमथितमुव्यथित खलु मे हृदय, कलयाऽशोकमशोक ! शरणमित वनितामण्डलमिह रक्षसि कि न स्तोक, अहह बत 'रक्षसि कि न स्तोक !' ||१|| खलु निश्चयेन ? - तत्र काचिदशोक पृच्छति-मन्मथेति । हे अशोक । मन्मथस्य बाणैर्मथित अत एव उत्कृष्टा व्यथा जाता अस्मिन्निति तादृश में हृदय, अशोक कलय विधेहि । इति कथितेऽप्यदूरीभूतव्यथा पुनराह-शरण- मिति । हे स्तोक हे क्षुद्र । इह निर्जने वने, शरणमित गरण प्राप्त , वनिताना मण्डल समूह, किं न रक्षसि ? एतेन ये एतादृग् नामख्याति कृत्वा नामानुगुण" कर्म न -कुर्वन्ति ते लौकिकैरेव' कथनयोग्या एवेति व्यज्यते । तेन च राम प्रत्यु- पालम्भो व्यज्यते । अशोकोऽपि रक्षा न करोतीत्यहह बत अद्भुतखेद. । अहहे- त्यद्भुते, बतेति खेदे उव्यथितमिति । एकस्मिन्वाणे लग्ने महती व्यथा भवति, पञ्चभिर्वाणमंथिते'' हृदयेऽतिव्यथायुतैवेति'१ भाव । खल्विति-न हास्य करोमि न चाऽसत्य कथयामीति भावः । अशोक कलयेत्यनेन २ रघुनन्दन दर्शयेति व्यज्यते । वनितामण्डल शरणमितमिति-प्रथमतो जात्यैव दयनीया- स्तत्राऽपि निर्जने वने रक्षकरहितास्तत्राऽपि शरणागतास्ता अपि न रक्षस्यतः क्षुद्रतरोऽसीति भाव. । अहह बतेति ध्र वपदम् । 1 १. क कुंजत्वासां । २ फ. शा। ३ ख. भविष्यतीति । ४ '_' क पुस्तके चिह्नगतोऽशो नाऽस्ति । ५. क कय । ६ स्व ह । ७ क नामानुहूणं। ८.ख लोकरेव । ६ ख प्रयमिति । १० ख पचाभि० । ११ ख. मम हृयेऽतिव्यथायुक्त० । १२. क. लयेलयेत्यनेन । १३ ख स्तोभो गाने प्रतिपद्य चरणावत नार्थः । ।
. 4 द्वादशः सर्गः [ १०५ ง mann 1 A - " . कुसुमनखेन विदीर्ण बहुशो भवता हृदय, खिद्यति' विगतत्रास ! । रहितत्रप कानने विलससि, विरहिपलाश पलाश | ॥२॥ । + - - । ततः काचित्पलाश प्रत्याह-कुसुमनखेनेति । विरहिणा पल मास- मश्नाति तत्सम्बुद्धि., हे विरहिपलाश । हे पलाश | भवता कुसुममेव नखस्तेन बहुगो विदीर्णमस्माक हृदय खिद्यति । अतो हे विगतत्रास त्व रहितत्रप त्यक्तलज्ज यथा तथा, कानने विलससि । विरहिमासाशित्वात् त्वमेव हृदय विदारितवानतस्त्वत्कुसुमनखेष्वारुण्यमिति भाव' । अस्मद्रक्षक श्रीरघुनन्दन विनेदानी कस्मात्तव भयं२ भवेदिति विगतत्रासेत्यनेन व्यज्यते । तेन च विरहे दुःखदवृक्षेभ्योऽस्याऽतिधृष्टतेति । प्रथमतोऽबलास्तत्राऽपि' रक्षकरहिता अस्मान्न रक्षित्वा हृदयविदारणं कुर्वतस्तव सर्ववृक्षई श्यमानस्य लन्नाऽपि न भवतीति - + रहितत्रपमित्यत्र व्यङ्गयम् ।।२।। रसालयरमण दिश खिन्न बहु मे हदय, मञ्जरिकाकृतमाल । मुश्च मुञ्च शोकदतद्गुणमिह, विदितरसाल रसाल ॥३।। ततोऽन्या रसालमाह-रसालयमिति । रसेन पालते शोभते इति विदितश्चाऽसौ रसालश्च 'तत्सम्बुद्धि , हे विदितरसाल'६ | मञ्जरिकाभि. कृता" माला येन' त-सम्बुद्धिः ईदृश, हे रसाल हे आम्र ! मे मम हृदय बहु खिन्नं, अतस्त्वं रसस्य पालयमाधार रमणशील श्रीरघुनन्दन, दिश सूचय-इह शोकदश्चाऽसौ -तस्य रघुनन्दनस्य गुणश्च स: त, मुश्च मुश्च । समानशीलव्यसनेषु सख्यमिति । एतेन युवयोः सख्यं व्यज्यते । तेन च त्व जानासीति ।।३।। विश्वनाथचलनाथविरहितं चलदल हृदय, भूषितविट पिसमाज !। प्रिय निवेदय तव१२ वनलीनं, पाहि पाहि तरुराज ! ॥४॥ 1 १ क. षिचति । २ ख. नाऽस्ति । ३. क. प्रथमतोऽवस्त० । ४. क. हृदये। ५. ख. रसाल । ६.'' ख अयमशो नास्ति । ७ ख. कृत । ८. ख यन । ६. ख. हयं । १०. स सत्यमिति तन्यायाः । ११. क. नास्ति । १२. क. तत । .
- १०६ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् तव । विश्वनाथेति । अस्माक हृदयं, विश्वनाथस्य चलेन चञ्चलेन' नाथेन विरहितमस्ति । अत २ भूषितः विटपिना समाजो येन ईदृश, हे चलदल वनलीन प्रिय निवेदय हे तरुराज । अस्मान् पाहि पाहि । एतेन त्व चलदल., स चञ्चलस्वभावस्तेन त्व तस्य धूर्ततां ज्ञास्यसि । त्व ससमाज. स एकाकी त्वद्वन एव लीनस्तरूनानाप्य तैश्च'. त गृहीत्वा प्रानय । त्व तरुराजस्त्वया नयानयविचारः कर्त्तव्य इति । तेन चेमा निरपराधास्त्यक्ता. सापराधा वेति पृच्छति व्यज्यते । एतद्गीतेन प्रमाददशोक्ता ।।४।। मिल नाथ अए । हा हा नयनाञ्जन तापविभञ्जन रमरपोरञ्जन! तव विरहे । सम्भवति कराला ज्वलनज्वाला सुमनोमाला किमु विषहे ॥१॥ मिलेति । अए'' इति कोमलायेऽन्यत्स्पष्टम् २ । अत्र नाथेति पदेन त्वय्यन्तहिते वयमनाथा स्म इति व्यज्यते । हा हेति खेदे१४ नयनयो- रजनमिवेति१५ तत्सम्बुद्धि , हे तापस्य विभञ्जन | हे रमणीना१६ रखन तव विरहे १"सुमनोमाला कराला ज्वलनस्य वह्नः ज्वाला संभवति, उ इति प्रश्ने, त्वमेव वद, ता किं विषहे, सा कथमपि न सह्यत इति भावः । पदेन निमेपोऽप्यावयोरन्तर न१८ कृतवानिति व्यज्यते । तेन च त्व प्रेमानभिज्ञ भवानन्तर्द्धाय ६ रमणीगंजयतीति तव नोचितमिति रमणीरञ्जनेन' व्यङ्गयम् । तापस्य विशेषेण भजनो भवास्तापदाता जात इत्याश्चर्यमिति तापविभख्खनेत्यनेन व्यङ्गयम् । सम्भवति करालेत्यादाविद व्यड्यम् --विरहा- ग्निदग्धान्तराणामस्माक शरीरमपि भवद्गुम्फितत्वात् त्यक्तुमशक्या सुमनोमाला दहतीति । किमु विषहे इत्यनेन प्रत्यक्षमिवाऽभिमुखीकृत्य कथनेनोन्मादावस्था १३ - .. नयनाञ्जन. . इति । व्यज्यते ॥१॥ मलयाचलपवनो विषधरवदनोपरचितगमनो दहतु कृशम् । कथमयमुपकारी जीवनधारी जीवनहारी भवति भृशम् ।।२।। 1 १. ख. नास्ति । २. क प्रातः । ३. क तुरुराज । ४. ख. स्तन्नाज्ञाप्य । ५ ख. तेश्च । ६ क गृहित्वा । ७. क मिलि । ८. क. अस । ६ क. विसहे। १० क. मिलिति । ११ क प्रर । १२. क कोमलायेऽन्यास्पष्टम् । १३ क. वयनाथा । १४. ख. स्वेद । १५ फ नययो० । ख ननययो० । १६ ख रमणी। १७ क विरहि । १८ क. नु । ६ क. नतीय । २० ख. रजनपदे ।
द्वादशः सर्गः . - - - -- + 2. -- 'स्याऽतिप्रियां जानकी मन्यते इति व्यज्यते। तेन च दुःखश्रवरणादय शीघ्र १ क जीवनधारि । २. क. प्रारणकर्ता। ३. क सयोगवियोगावेयोगावेव । [ १०७ whermana मलयाचलेति। विषधराणा सर्पाणां वदनादुपरचितं कृत गमन येन स मलयाचलसम्बन्धी पवनः, कृश दुर्बल दहतु । उपकारी अयं जीवनधारी', 'मेघ', जीवनस्य जलस्य अथवा प्राणधारणक्रियाया धारणशीलो, भृशमत्यर्थ, जीवनहारी प्राणहर्ता, कथ भवति । एतेन पूर्वभवत्सयोगानन्दपुष्टा अस्मान् . दुःखदा अपि सुखयन्ति स्मेदानी तु सुखदा अपि दु.खयन्तीति व्यज्यते। तेन च त्वत्सयोगवियोगावेव सुखदुःखकारण नाऽन्यदिति ।।२।। यन्मुखचन्द्रचकोरौं नयने ते सततम् । सा सहते तव विरहमहो निर्दय ! विततम् ।।३।। यन्मुखेति । ते तव नयने यस्या मुखमेव चन्द्रस्तत्र चकोरौ, सतत- मभूतामिति' शेष. हे निर्दय ! सा जानकी तव वितत विस्तृत विरहते इत्यहो पाश्चर्यम् । ता सकृदपि न पश्यसीति भावः । एतेन सखी रघुनन्दन- प्रकटो भविष्यतीति तस्या अभिप्राय इति ।।३।। हरिचन्दनघनसारस्पर्श विरहशिखी । दहति रश्मिभिस्तनु दिनेशश्चन्द्रमिषी ॥४॥ किश्चिदुपाय कुरुतेति चेत्तत्राऽऽह-हरिचन्दनेति । हरिचन्दनघनसारयो। स्पर्श, विरह एव शिखी वह्नि, तनु दहति, किं च चन्द्रमिषी चन्द्रव्याजवान्, दिनेशः सूर्यो, रश्मिभि. किरणः तनु दहति । एतेन प्रसिद्धवहविरहवह्न- तेन च तच्छान्त्युपायाभाव'' इति । अत्र रूपकालङ्कार- ध्वनितवस्तुना' वस्तुध्वनिः ।।४।। गतविग्रहवर्णा'२ च्युतमुखवर्णा' ऽतिबधिरकर्णा' तव प्रिया । न रसायनरक्ष्या धिक्कृतभक्ष्या ५ त्वयैव लक्ष्या गतक्रिया ॥५॥ जन्मुख °। ५. ख. •मभूतामि । ६. ख. विरह सहते । ७. ख वह्नी । ६. स्व. चन्द्र मिसी। 8. क. ख रस्मिभिः । १० ख. तेच्छान्त्युपाया० । ११ क. ०ध्वनितावस्तुना । १२. १३. ख. वर्ण । १४. ख. कर्ण । १५. ल. भक्षा । - है -- । - H लक्षण्य व्यज्यते । -- m - , ४.ख. H 5 । १०८] सङ्गीतरघुनन्दनम् गत- तव प्रिया ईदृगवस्थेत्याह-गतेति । गतो विग्रहस्य शरीरस्य वर्णो' यस्या सा, च्युता मुखाद् वर्णा अक्षराणि यस्या. सा, अतिवधिरौ कणों यस्याः सा, गता क्रिया यस्या सा, धिक्कृतानि तिरस्कृतानि भक्ष्यानि यया सा, ईदृशी तव प्रिया रसायनरक्ष्या न, किन्तु त्वयैव लक्ष्या द्रष्टव्या। च्युतमुखवणेत्या- दिना जानक्या व्याधिजडतावस्थे व्यज्यते । तेन च विरहपूर्णतेति । विग्रहवर्गात्यनेनाऽस्माभिर्न तथा परिचीयते इति व्यज्यते । तेन च त्वमेवाऽव- लोक्य परिचिनुहोति । प्रतिवधिरकणेत्यनेन बोधयितुमशक्येति 3 व्यज्यते । न रसायनरक्ष्येत्यनेन वैद्यदर्शनानहता व्यज्यत ।। ५ । तव नामनि कर्णे भरिणतेऽभ्यर्णे, तारसुवर्णे पतति चला। मुञ्चति नि श्वासानमितव्यासाननलनिकाशानतिविकला ॥६॥ तवेति । तारा अत्युच्चा शोभना वर्णा यस्मिस्तस्मिस्तव नामनि, चरमदशा ज्ञात्वा कर्णे अभ्यर्णे समीपे भरिणते सति, चला सती निपतति अपि च अमित. व्यासो विस्ताये. येषा तान्, अनल निकाशान् वह्निसदृशान्, नि श्वासान् मुञ्चति । अत्र पतति चलेत्यन्तेन पूर्वार्द्धन भवदागमनज्ञानभवद- दर्शने उत्यानपतनयोहि तु व्यज्यते। तेन च त्वदागमनमेव तस्या जीवनोपाय इति । उत्तरार्द्धन तदन्त करण" भवद्विरहवह्निरिव दग्धवान् । सम्प्रति तदीयभदिरहानलज्वालाभिः भवद्विहारवनमस्माक शरीर च प्रदह्यते । तत्र स्थितस्य तव ईषदपि सन्तापो न भवतीत्याश्चर्यमिति' ° व्यज्यते ।।६।। 1 ससलिलकरणनलिनीदलशयन तप्तमय । भवति सुधाकरकरनिकरोऽपि हि गरलमय ॥७॥ ससलिलेति । सलिलकणे सहित नलिनीदलाना शयन, सन्तप्तलोहो भवति । यथा तप्तलोहस्पर्शनाऽङ्गानि'२ दह्यन्ते तथैवेति भाव. । एतेन वह्निदाहस्य चिह्न नश्येदपि', लोहदाहस्य तु नैव नश्यत्यतो'४ भव- प्रियाया सौन्दर्यहानिर्भविष्यतीति व्यङ्गयम् । तेन च शीघ्र रक्षेति । तप्तमय - १ ख वरागे । २. ख रसाधनरक्ष्या। ३. ख मशश्येते । ४ क. तरा। ५ ख वहिसह । ६ क चलत्यतेन । ७. क तदतुस्करण । ६ क पिदह्यते । १० ख भवतित्या० । ११. ख इति व्यज्यते तेन च । १२ क झप्तलोह । १३ ख मश्येदपि । १४ ख. नयस्यतो। ८. क वह्निरेव ।
-- द्वादशः सर्गः [ १०६ mm सुधाकरस्य करनिकरः किरणसमूहोऽपि, हि निश्चित गरलमयो भवति । एतेना- ऽस्माभि. . कृतदाहशान्त्युपाया' विपरीता जाता इति । तेन चोपचार कत्तुं न शक्नुम इति । तेन च यदि विष व्याप्नुयात्तर्हि नृत्यगीतादिविस्मृत्या रास- हानिर्भविष्यतीति व्यङ्गयम् ।।७।। तां तनुतां तनुगतां वीक्ष्य नो हृद्दभीतम् । पवनस्पर्शोत्पतनमालिभिनिर्णीतम् ।।८।। तामिति । तनुगता, ता अनिर्वचनीया, तनुतां कृशतां, वीक्ष्य, नोऽ- स्माक हृद्भीतम् । यत प्रालिभि. सखीभि २, पवनस्य स्पर्शन उत्पतनं निर्णीतम् । एतेन मार्गणेऽपि सा न प्राप्स्यते इति व्यङ्गयम् । तेन च कृशताऽवधिरिति' ||८|| - अपनिमिषमधीर नयन नीर वहति शरीर धर्मरसम् । रहयति को रामाऽधिरजनि रामाजनमिह कामातुरमनसम् ॥६॥ 1 , अपनि मिषमधीर तस्या नयन नीर वहति, शरीर धर्मरस स्वेद वहति । धर्मरसमित्यत्राऽय भावः-शीतमागतमिति अपनिमिषमधीरमित्यादिना दशमावस्थापूर्वरूपो व्यज्यते । तेन च यदि सम्प्रति नाऽऽयासि, तर्हि तत्प्राप्तिन भविष्यतीति । रहयतीति-हे राम रमणशील । अधिरजनि रजन्या, इह निर्जने वने, कामेनाऽऽतुर मनो यस्य त, रामाजन रमणशील जन को रहयति त्यजति ? त्वां विना न कोऽपीत्यर्थः । रहयतीत्यनेन एतत्पश्चाद- स्माकमपीमामवस्था जानीहीति व्यज्यते । रामेत्यनेन रामा इत्यनेन च रामेति तव नाम अस्माभि सह रमणेनैव सिद्धमिति व्यज्यते । मम कोऽपराध इति चेत्तत्राऽऽह- कामातुरमनस्कतयेयमस्माकमवस्था जाताऽतस्तवाऽपराधो भविष्य- तीति भावः ॥६॥ अवितप्रेमाकर दीनदयाकर ! हृदयशयां स्मर भूमिशयाम् । अलमधिकविरत्या त्वमिहाऽऽगत्याऽनुपरतगत्या तनुहि दयाम् ॥१०॥ - १. ख सातुयाया। ख २. सखिभिः । ३ ख. पवन । ४ क प्राश्यते । ५. ख. शकताव० । ६ क अहनिमिषमेधीर० । ७. ख नाऽस्ति । ८. क सिद्धिमिति ।
११.] सङ्गीतरघुनन्दनम् , अवितेति । दीनेषु दया करोतीति तत्सम्बुद्धिः, अत एव अविता रक्षिताः प्रेम्ण आकरा' प्राश्रया येन स तत्सम्बुद्धि , हृदयशया ता जानकी भूमिशया स्मर। अधिकविरत्या अल, न उपरतिविश्रामो यस्या तया गत्या, त्वमिहाऽऽगत्य, दया तनुहि । अवितप्रेमाकरेत्यादिना जानकीतोऽधिक. को नु प्रेमवान्, सम्प्रति कश्च दीनतरः ? तद्यदीमा न रक्षसि तहि भक्त वत्सल इति दीनबन्धुरिति तव नामनी यास्यत इति व्यञ्जितम् । तेन च तवाऽपि महान- नर्थो भविष्यतीति । अनुपरतगत्येत्यनेन चेदाश नाऽऽयास्यसि तर्हि नेमां प्राप्स्यसीति व्यञ्जितम् । तनुहीत्यनेन भवदल्पदयया भवदागमन न ज्ञास्यति, तस्मात् कृपाकटाक्ष विधाय दया विस्तारय, येन सुखिता भवेदिति व्यञ्जितम् ।।११॥ दयालुता तव सहजा हा हा केन हृता । तत्सरभसपरिरम्भरणरुचिरपि कुत्र धृता ? ॥११॥ ? अपि कुत्र धृता ? दयालुतेति । हा हेति खेदे । हे नाथ तव सहजा स्वाभाविकी दयालुता केन' हृता ? तस्याः सरभसेषु सवेगेषु परिरम्भरणेषु रुचिः प्रीतिः भवतेति शेष.। एतेन रघुनन्दनस्याऽऽगमनविलम्बकारिता व्यज्यते । तेन च त्व कयाऽपि रममाणोऽसीति । दयालुतेत्यत्र भवानीदृशेऽपि खेदे स्वप्रेयस्यामस्या दया न करोषि, तेन ज्ञायते स्ववशीकृते जने तव दया- विधान केनचिद्धृतमिति भावः । तत्सरभसेत्यादौ परिरम्भणबहुत्वेन दयया भवानागत्य वारं वारमुत्थाप्यनामालिङ्गिष्यति, तदा सावधाना भवेद् वा न भवेदिति व्यङ्गयम् ।।११।। है अस्मिन् विषमे समये सुख तु पश्य पते । विश्वनाथनाथाऽऽगमन कुरु हे सुमते ! ॥१२।। इति श्रीमन्महाराजकुमार'°-श्रीविश्वनाथसिंहविरचिते सगीतरघुनदने विरहवर्णन नाम द्वादशस्सर्गः ।।१२।। १. स प्राकारा । २. ख प्रनुपरतगते० । ३. क. नायास्यति । ४. ख. दयालता। ५ क स्वाविकी। ६. ख के । ७. ख. ररभशेष । ८ ख. व । ६. ख. दययदा । १०. ख. श्रीमहाराजकुमार ।
त्रयोदशः सर्गः [ १११ पते । प्रास्तां परिरम्भरणमागत्य मुखमात्रमपि पश्येत्याह-अस्मिन्निति । हे अस्मिन्विषमे' समये मुखं तु पश्य । हे सुमते, विश्वनाथनाथ ! प्रागमन कुरु । "आश्रितरक्षण यधर्म" इत्युक्तम्, तदास्ताम् । सम्प्रत्या. गत्य मुख तु पश्येति भावः । कविपक्षे-विश्वनाथनाथेत्यनेन कविः प्रियामुख- मनवलोकमानस्य निजनाथस्य तव किं यशो वर्णयिष्यतीति व्यज्यते । तेन चैतावताऽपि नाऽऽगमिष्यसि तदा तवाऽयशो वर्णयिष्यतीति । शिवपक्षे-यो विश्वनाथो निजप्रियायै अर्द्धाङ्गमेव दत्तवान्, तस्य परमरसिकस्य स्वामिनस्तवे- यती निष्ठुरता किमुचितेति त्वमेव विचारयेति व्यज्यते । वयमेतावन्त' कालमिमा जीवन्ती ज्ञातवत्यः । सम्प्रति जीवति न वेति त्वमेव मुखमवलोक्य कथयेति सुमतेत्यनेन व्यज्यते ।।१२।। इति सिद्धि श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीरामचन्द्रकृपापात्राधिकारि- विश्वनाथसिंहकृतायां व्यग्यार्थचन्द्रिकानाम्नि टीकायां द्वादशः सर्गः ॥१२॥ 1 [अथ त्रयोदशः सर्गः 1 सत्कला स मृगराजसद्गतिः कुन्दपुष्पभसुमाल्यमण्डितः । दर्शनेन सुखवृन्दवर्द्धनो वन्यमञ्जुलपरागपिङ्गल. ॥१॥ सत्कल इति । सोऽन्तहितः रामचन्द्रः चन्द्रमा उदियाय । कीदृश सत्य. कला. चतुःषष्टिकलाः यस्य स , चन्द्रपक्षे-सत्यः कलाः षोडशकलाः यस्य १. स. विषमे । २ क. यासं धर्म । स्व यंत धर्म । ३.क तपमेतावंत। ४. स सिदः । ५ द्वादश । ६ स न दवंदनो। ७. ख. तत्कल । ८. स. सोंस्तहित ।
११२ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् स , पुनश्च मृगराज सिंहस्तस्येव सती गतिर्यस्य, चन्द्रपक्षे-मृगराजा' मृगश्रेष्ठा. तः सती गतिर्यस्य म , चन्द्ररथे मृगा योजिता इति प्रसिद्धि', पुनश्च कुन्दपुष्पारणीव' भानि नक्षत्राणि तेषां सुष्ठुमाल्येन मण्डितः, चन्द्रपक्षे-कुन्दपुष्पाणीवभानि नक्षत्राणि तेषा माल्येन समूहेन मण्डितः शोभित ; दर्शनेन सुग्ववृन्दवर्द्धन' इत्यु- भयत्र समानम्, पुनश्च वन्यमञ्जुलपरागपिङ्गल; चन्द्रपक्षे-वन्य: जलसम्भवः स चाऽसौ मञ्जुलपराग इव पिङ्गलश्च म. । अत्र वन्येत्यनेन कुसुमितनि- कटकुले निलीय स्थित इति व्यज्यते । तेन च वनितावचनश्रवणमिति ॥१॥ रामचन्द्र उदियाय चन्द्रमा सुस्मिताशुनिकरण तापहा । य निरीक्ष्य वनितौघवारिधि. सञ्चलन्नयनदोस्तरङ्गित. ॥२।। युग्मम् । भाव.। पुनश्च शोभनस्मिताशुनिकरेण तापहा, चन्द्र पक्षे-सुस्मितमिव योऽशूनां निकरः समूहस्तेन तापहा, य रघुनन्दन निरीक्ष्य, वनितानामोघः समूह एव वारिधि., सञ्चल द्भिर्नयनर्दोभिर्भुजैश्च तरङ्गित सजाततरङ्ग प्रासीदिति शेप' । अयमागतोऽयमागत इति परस्पर कथयन्त्यश्चञ्चलनयनवाहवोऽचला प्रासन्निति चन्द्र पक्षे-य चन्द्र निरीक्ष्य वनितीघ इव वारिधिः सञ्चलन्नयनदोष इव तरङ्गाः सखाता अस्येति स., यथा समुद्रश्चन्द्र वीक्ष्य वृद्धि प्राप्नोति, तथा रामचन्द्र वीक्ष्य सखीसमूहोऽप्यानन्द प्राप्तवानिति भावः । अत्र श्लेषानुप्राणित- रूपकालङ्कारेण सखीनामाह्लादजनकत्व तापहारकत्व च वस्तु ध्वन्यते ।।२।। या वियोगकृशतापरिच्युता भूषणालिरखिलाङ्गके पुन । न स्म माति परमोदमासले यत्नतोऽपि परिधारिता मुहु ॥३॥ या भूषणानामालि., वियोगे कृशतया परिच्युता, सा परे- णोत्कृष्टेन मोदेनाऽऽनन्देन मासले निखिलाङ्गके मुहुर्यत्नतः' परिधारिताऽपि पुनर्न माति स्म न ममे' इत्यर्थ १२ । एतेन पूर्वसङ्गमादिदानी रघुनन्दनदर्शनस्याऽ- धिकानन्द प्रदत्व व्यज्यते । तेन च विप्रलम्भशृङ्गारस्याऽतिशयितप्रीतिजनक- तेति । अत्राऽधिकालङ्कारध्वनिवस्तुना' वस्तुध्वनि. ॥३।। येति । - १ फ. कुंदपुष्पारणोपभानि । ख कुंदपुष्पारोभानि । २ ख. कु दपुष्पाणि च । ३ ख सुखदयद० । ४ ख. मन्यमजुल० । ५. ख ०कु जि । ६. ख. योशना । ७. क माग । ८ ख. विद्योगकशता० । ६. क. ख. ०रवलांगके । १०. ख. मुहूर्तयत्नतः । ११. ख मभा। १२ ख वित्यर्थ । १३. क. ०लकारध्वनित।
२ त्रयोदशः सर्गः [ ११३ काऽपि चुचुम्ब सुरुचिर चिबुक चन्द्रमुखी । काचिदुवाच देवदोषो मे त्वमकलुषी ।।१।। श्रीरघुनन्दनप्राप्ती सखीना चेष्टा वर्णयति-काऽपीति । काऽपि चन्द्रमुखी सुरुचिर चिबुक तस्येति शेष., चुचुम्ब। साधु साधु भवानेवेदृश कर्म करोतु इत्युक्त्वा चुचुम्बेति भावः अत्र चन्द्रमुखीत्यनेन दर्शनानन्दान्मुखप्रकाशो व्यज्यते । तेन च रघुनन्दनमुखकमलसङ्कोच इति । काचिदिति मे मम देवस्य भाग्यस्य दोष , यतस्तव वियोगो जातः, त्वमकलुषी निरपराध एवेति काचिदुवाच । एतेन यतो भवद्विरहेण मरणान्तक्लेशो२ जातोऽतो भवानेव कलुषीति व्यज्यते । तेन च तस्या अन्त.कोप इति ॥१॥ काचित्परिरेभे पटु रमरणं मोदवती । काचिदबध्नान्निजपतिवसने भीतिमती ॥२॥ - काचिदिति । काचिन्मोदवती रमण श्रीरघुनन्दन, पटु यथा तथा परिरेभे । अत्र परिरेभे इत्यनेनाऽल्पकालागतमपि रघुनन्दन चिरकालागत- मिवाऽमस्त इति व्यज्यते । तेन च प्रेमातिशय इति । अत्र ईदृशो हावभावा- न्वधाय परिरेभे। यथैष वशीभूय क्षणमपि मा न त्यजेदिति पटुपदेन तदाशयो६ व्यज्यते । तेन च तस्या गुणगवितात्वमिति । काचिदिति काचिद् भीतिमती, निजस्य पत्युश्च वसने अबध्नात्, एकग्रन्थ्या ग्रथितवती- त्यर्थ.। एतेनाऽय न पुनरन्यत्र गच्छेदिति तदाशयो व्यज्यते । तेन च तस्या अधर्यमिति ॥२॥ - काऽपि वीरगया जगौ रमणगुणमतिहीदम् । अकृत भृकुटितजन काचन पतिभीदम् ॥३॥ काऽपीति । काऽपि अतिह्रीदं अतिलज्जाप्रदं रघुनन्दनस्येति शेषः, रमणस्य तस्यैव गुण, वीणया जगौ। काचनेति-काचन पत्युीद, भृकुटया तर्जनमकृत । एतेन यतस्त्व पलायसेऽतः सर्वा वय आवृत्य कोष्ठागारे त्वा १. ख काचिदुचाल । २. क मरगमररणांत । ३. क. नाल्पकल्पकाला० । ४.क. विधा । ५ क. मान । ६ ख. तदापोयो । ७. क. अवध्वात् । ख. प्रवन्धात् । ८.ख.व्यज्य।
११४ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् रक्षिष्याम इति' व्यज्यते । तेन च तस्या , अतिसन्निकृष्टत्तित्वमिति काऽपीत्यादिना लज्जित रघुनन्दन दृष्ट्वेमा मान न कुर्यु रिति तदाशर व्यज्यते । तेन च तस्या. विहारविलम्बाऽसहिष्णुत्वमिति । अतिह्रीर मित्यत्राऽय भाव ~विरहविषयकस्य जानक्याः सखीना च क्लेशस्य गाने रघुनन्दन ललित चकारेति ।।३।। -- काचिदासनेऽवदन्निषोद प्रिय | ससुखम् । विश्वनाथनाथोऽसि कथय नः किं कलुषम् ॥४॥ अ काचिदिति । हे प्रिय ससुख' यथा तथा प्रासने निषीद ।' र विश्वनाथोऽसि, अतः कथय , नोऽस्माक कि कलुषमिति काचिदवदत् । कथयेत्यनेन स्वापराध'° वय न विद्म इति व्यज्यते । तेन च शरीरान्तसम् क्लेशरूपप्रायश्चित्तकारयिता त्वमेव जानासीति कटाक्षयतीति ॥४॥ अविदितविरहजपीडा पुरेयमद्धिमागता सीता । तामिह वेदयितु तामहमप्यन्तहितोऽभूवम् ।।१।। इमा ममोपर्यपराध स्थापयित्वा मन्मुखेनैव विकथयिष्यन्तीति विज्ञा परमप्रवीणो रघुनन्दन उत्तरयति-अविदितेति । न विदिता विरहजा पीर इय सीता, पुरा अन्तद्धिमन्तर्धान आगता प्राप्ता । अतोऽहमपि त सीता ता तादृशी पीडा१३ वेदयितुमन्तहितोऽभूवम् । एतेन यथेमा पीड स्मृत्वा कदाचिदपि पुनर्नाऽन्तर्दध्यादिति१४ व्यज्यते । तेन चाऽहमपि नाऽन्तर्हित भविष्यामीति१५ ॥१॥ यया सा मा वोचत१६ मा किमपि प्रिय प्रिया ! जातमेव यज्जातम् । सस्मितमुत्तरयित्वा सखोरिति प्राह जानकी रामः ॥२॥ . १. ख. नाऽस्ति । २. ख. विज्यते । ३. क. द । ४ क. ख कुर्यरिति-! ५. फ विषकस्य । ६. क सुखम् । ७ ख. विश्वनायोऽसि । ८ ख सुख । ६. क. कथ १० ६ स्वापरा । ११. ख व्रयाशरीरांतशमक्लेशल्पप्रायश्चित्तकारयित्वा । १२. ख मागत । १३. ख नाऽस्ति । १४ क. ख. पुर्ना तर्दध्यादिति । १५. क भविष्यमिति । १६. स्व. योचत । १७ फ. नाऽस्ति । १८, ख. रसखी० ।
त्रयोदशः सर्गः [ ११५ तां प्रसादयितु ' पुनराह-मा वोचतेति । हे प्रिया. । प्रिय मां किमपि मा वोचत मद्वचनस्योत्तर न कथयत, यन्नात तज्जातमेव सखीरिति सस्मितमुत्तरयित्वा, रामः जानकी प्राह । प्रियमितिपदेन यो यस्याः प्रियो भवति सा तस्याऽपराधमपि गुणतया गणयतीति व्यज्यते । [तेन च अपराधकथन- मनुचितमिति । सस्मितमित्यनेन निजस्मितसुधया तासामनुतापमपि विस्मा- रितवानिति व्यज्यते]२ ।।२।। प्रिये ! पश्य सरयूरिह विलसति कोमलशैवलकमला । ललितकाकलीकलितखगालीसडकुलालिकुलकमला ।।१।। अथ सरयू वर्णयन् जलविहारोत्साह वर्द्धयति--प्रिये पश्येति । हे प्रिये ! त्व पश्य, कोमल. शैवलो यस्मिस्तत्कमल जल यस्या सा, सरयूरिह विलसति । कीदृशी सरयूं -ललितया काकल्या सूक्ष्ममधुराव्यक्तध्वनिना कलितानि युक्तानि खगानामालि. पङ्क्तिः तया सकुलानि व्याप्तानि च अलोना भ्रमराणा कुलानि येषु तानि कमलानि यस्या सा। अत्र पक्षिणा विहारेण मकरादिदुष्टजीवभय नाऽस्तीति व्यज्यते । अत्र भ्रमरसमूहशब्देन न कमलाना- मीषद्विकसितत्व । व्यज्यते, तेन च प्रातः समय इति । अत्र सरयूविहाररूप- वाच्यस्य सकलविशेषणप्रतिपाद्यतया वैशिष्टयन वस्तुना वस्तुध्वनि ॥१॥ .५ प्रचुरपरागपूरपरिपूरितकटिमितसलिलसुललिता । मिलितमीनमीनाकेतुसमतुड्गतरगतरलिता ।।२।। O प्रचुरपरागेति । प्रचुरस्य परागस्य पूरेण परिपूरितेन कटिमितेन' सलिलेन सुललिता, मिलिता मीना येपु ते अत एव मीनाक. कामस्तस्य केतुना समास्तुल्या ये तुङ्गास्तरङ्गास्तैस्तरलिता चपलेत्यर्थः । प्रचुरेत्यादिना जले सौगन्ध्यं व्यज्यते । कटिमितेत्यादिना निमन्जनशङ्काऽभावो व्यज्यते । तेन च विहारयोग्यतेति । तुगतरङ्गेत्यादिना तत्र कामोद्दीपनं भवतीति व्यज्यते । अत्रोपमालङ्कारेण वस्तुध्वनि. ॥२॥ १. स प्रसादयतुं। २. [-] कोष्ठान्तर्गतोऽशो नाऽस्ति ख. पुस्तके । ३ स. यस्य । ४. क. खगामालि. । ५. स. विहारे । ६. फ प्राहः समय । ७. क. विहाररूपाच्यस्य । ८ ख वैशिष्टन। ६. ख. परागपूरपरित०। १०. ख. सटिमिते ।
११६ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् कुमुववृन्दमकरन्दविशदबहुबिन्दुचारचन्द्रकिता' । अनिलसमाकुलकूललताकुलकुसुमावलिपरिकलिता ॥३॥ कुमुदेति । कुमुदवृन्दमकरन्दस्य विशदवहुभिविन्दुभिश्चारु सम्यक् चन्द्रकिता सञ्जातचन्द्रकेत्यर्थः । अनिलेति-अनिलेन समाकुलाना कूललता- कुलाना कुसुमावलिभि परिकलिता व्याप्ता । कुसुमवृन्देत्यादिपदेन मकरन्द- बिन्दुपातात् कुमुदानामर्द्धनिमीलन व्यज्यते । कमलकुमुदयोरोन्मीलननिमीलनाम्या रात्रिदिनसम्धी द्वयोरपि समा शोभा व्यजिता । तया च राविन्दिवगोमातो- ऽधिका प्रात शोभा व्यजिता । अनिलेत्यादौ तीरस्थतरुलता अपि शोभातिशय दर्श दर्श पुष्पाञ्जलिमिव ददतीनि व्यडयम् । अत्र वस्तुनोत्प्रेक्षालबारध्वनिः । कूललताकुलेत्यादिना दिवाऽपि विहारयोग्यता व्यञ्जिता ॥३॥ तव नाभीसुषमानुकरणकरललितावर्तविशाला । विश्वनाथमानसपरिषेवितसुमरिणतीर्थरुचिशाला ॥४॥ तवेति । तव नाभीसुपमाया अनुक रणकरैललितगवत्तविशाला, विश्वनाथस्य मानसेन परिषेविता सा चामौ सुमरिणतीर्थरुचीनां शालेव शाला नाभीत्यादिनाऽऽवर्ताना लघुता गम्भीरता च व्यज्यते । पालङ्कारेण वस्तुध्वनिः । सुमरिणतीर्थरुचिशालेति पदेन उभयतटघटितमरिण- जटितघट्टरोचिश्छटा व्यज्यते । तेन च रात्रावपि विहारयोग्यता व्यजिता ॥४॥ उडुगरणखग[पा]लीतालिका' यत्कराली, घनहिमकरणपालीमौक्तिकालीमराली । विधकिरणमृणालीभक्षणोद्यद्गजाली", तिमिरमहिषकालो सोऽभ्युबेत्यशुमाली ॥१॥ इति श्रीमन्महाराजकुमारश्रीविश्वनाथसिंहविरचिते सगीतरघुनदने प्रादुर्भूतरघुनदनकर्तृ कसरयूवर्णन नाम त्रयोदशः सर्गः ॥१३॥ च सा। अत्र प्रती- १ ख कुमुदघट० । २. क कुदवृद० । ३. क ०विन्दुभिविभिश्चारु । ४. क. चद्रकिका । ५. क कुसुम दे० । ६ क रूयोरपि । ७ ख. रात्रेदिव० । ८. ख उभयतर० । है छ रात्राव । १० क. उडुगरगखपालो० । ख. उडुगरणखगाली० । ११ क ०किरणमृण्ली० ।
। चतुर्दशः सर्गः [ ११७ mumin उडुगणेति' । 'यस्य कराणा प्राली पक्तिः२, उडूनां नक्षत्राणां गण एव खगाना माला पक्तिस्तस्यास्तालिका, यथा तालीवादनेन खगा उड्डीयन्ते तथा किरणनक्षत्राणीति भावः । धनानां निबिडानां हिमकरणानां पाल्येव मौक्तिकाली तस्या मराली, यथा हंसी मौक्तिकानि कवलयति तथैवेयं हिमकणानीति भावः । विधुकिरणा एव मृणाल्यस्तासां भक्षणायोद्यन्ती गजाली गजपक्तिः, तिमिरमेव महिष. तस्य काली दुर्गा ईदृशी, यस्य कराणां किरणाना माली स अशुमालो सूर्यः अभ्युदेति । एतेन स्नानसमयो व्यज्यते । तेन च विलम्बो न कार्य इति । ४ इति सिद्धिश्रीमन्महाराजाधिराज श्रीविश्वनाथसिंहकृतायां व्यग्यार्थचन्द्रिकानाम्नि टीकाया त्रयोदशः सर्गः ॥१३॥ [अथ चतुर्दशः सर्गः] सहचरोसमुदायसमन्वितः, शयसरोजगृहीतधरासुतः । सुखदसारववारि विगाहितुम्, प्रचलति स्म ततो रघुनन्दनः ॥१॥ सहचरीति । शयसरोजेन करकमलेन गृहीता धरासुता जानकी येन स, सुखद सरय्वा इद सारव तच्च वारि च तत् । अत्र शयसरोजेत्यादिना जलविहारे जानक्या निषेधवचनं व्यज्यते । तेन च तस्या भीतात्वम्”, तेन च मुग्धात्वम्, तेन च रघुनन्दनानन्दजनकभावनाहिकात्वमिति ॥१॥ १. क. तदुगररोति । २. '_' अयमंशः ख पुस्तके नाऽस्ति । ३ ख. पाली । ४ क. भक्षणायोपती । ख. भक्षणांपोषती। ५. स. सिद्धिः श्रीमहाराजाधिराज ! ६. ख. नाम । ७. क. भीतत्वम् ।
११८ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् maana सरयूजले जानकोजानि., विहरति रमणीगणकृतरतिरिह, सवधुसिन्धुरुचिहानि ॥१॥ सरयूजले इति । रमणीगणे कृता रतिर्येन सः । अनेन रघुनन्दनस्य सर्वत्र प्रेमवत्ता व्यज्यते। तेन च दक्षिणनायकतेति । जानकीजानिरित्यनेन रघुनन्दनस्य जानक्यामधिकप्रेमेति' व्यज्यते । तेन चाऽनुकूलनायकतेति । सवघोर्वधूसहितस्य सिन्धोः रुचेः शोभायाः हानिर्यस्मात्स., यस्य शोभा निरीक्ष्य तादृशः समुद्रो मलिनो भवतीति भावः ।।१।। लक्षितकायविलक्षितललनाकौतुकविहसितवदनः । कृतचुम्बनपरिरम्भरणरञ्जनरमरणीसमुदितमदनः ॥२॥ लक्षितेति । लक्षितो दृष्ट. कायो यासा ताः, एतेन आर्द्रसूक्ष्मपटवनीत्व व्यज्यते । अत एव विलक्षिता लज्जिता या ललनास्तासा कौतुकेन विहसित वदनं यस्य सः, कृतानि चुम्बनपरिरम्भरण रञ्जनानि यासा ताश्च ता. रमण्यश्च तास्तासु समुदितः सम्यगुद्दीपितो मदनो येन स. । अत्र कौतुकपदेन वारं वारं कमलैर्गोप्यमानान्यप्यङ्गानि गुप्तानि न भवन्तीति व्यज्यते । तेन च रघुनन्दनस्य रसाधिक्यमिति । अत्र ग्रन्थे मदनपदेन रघुनन्दनविषयकसखीसम्बन्धिप्रेमा विवक्षितः । तथा चोक्त भक्तिरसामृतसिन्धौ "प्रेम गोपरामारणां काम इत्यगमत्पामिति । अथवा यथा साकेते सकलसामग्री सच्चिदानन्दरूपा तथा कामोऽप्यन्य इति । रमणीसमुदितमदन इत्यनेन सम्भोगाभावो व्यज्यते । तेन च धर्मशास्त्रज्ञत्वम्, तेन च रघुनन्दनस्य धैर्यातिशय इति' ॥२॥ कुचकुङ्कुमकस्तूरीकद्दमकलितकलेवरलसित.। जलधरसमये येन धातुयुतमरकतशैलो हसित. ॥३॥ कुचकुडकुमेति । कुचस्य कुडकुमकस्तूर्योः कई मेन कलितं युक्त यत्कलेवर तेन लसितः शोभितः, अत एव येन जलधरममये वर्षाकाले धातुभिर्ग- रिकादिभिर्युतः स चाऽसौ मरकतशैलश्च स. हसितो भवतीति शेष । . ख जानक्यामधिक । २. क सवेघोवंधू० । ख. सवद्योर्वद्य० । ३. ख. विहसतिवदनः । ख मम्यते । ५. ख. नाऽस्ति ।
चतुर्दशः सर्गः । ११६ मरकतशैलेत्यादिना रघुनन्दनस्य निश्चलता व्यज्यते । तेन च चुम्बनादिजन्यः स्तम्भ इति । अत्र प्रतीपालङ्कारध्वनितवस्तुध्वनिः ।।३। कुण्डलसमललनालिमण्डितो घन इव चपलामालः । विश्वनाथनाथोऽतिकौतुक कुरुते परमविशालः ॥४।। कुण्डलसमेति । चपलाया माला यस्य, तादृशघन इव, कुण्डलसमया ललनाल्या मण्डित सखीमण्डलमध्यस्थित इति यावत्, परमविशालो विश्वनाथ- नाथोऽतिकौतुक कुरुते । अत्र चपलोपमया क्रीडन्त्यः सख्यः उच्छलन्तीभिर्ल- हरीभिः कदाचिदाछाद्यन्ते, कदाचिदृश्यन्ते इति व्यज्यते । अत्रोपमालङ्कारेण वस्तुध्वनि. । कुण्डलेत्यादिना पलायितो मा भूदावृत्य जेष्याम इति सखीना- माशयो व्यज्यते । तेन रघुनन्दनोपरि परितो जलसेचनमिति ॥४॥ निर्गत्याऽथ प्रवाहादभिनववसनभूषणैरङ्गराग- रात्मान भूषयित्वा निजरुचिपटलोभासिताशान्तराले । स्थित्वा सिंहासने तो तटभुवि निहिते सादर मोदमाना- वन्योन्यालोकलीलारसमनुभवतो जानकीरामचन्द्रौ ॥१॥ इति श्रीमन्महाराजकुमार-श्रीविश्वनाथसिंहविरचिते सगीतरघुनदने सरजूतद्विहारवर्णन नाम चतुर्दशः सर्गः ॥१४॥ निर्गत्येति । अथ जलक्रीडानन्तर जानकीरामचन्द्रो प्रवाहान्निर्गत्य, अभिनववसनैर्भूपणरङ्गरागैश्चाऽऽत्मानं भूषयित्वा, तटभुवि निहिते, निजर चिपटलेनोद्भासित प्राशानां दिशामन्तराल मध्य येन तत् तस्मिन्, सिंहासने स्थित्वा, मोदमानौ अन्योन्यालोकलीलारसं सादर यथा तथा अनुभवतः । निजरुचीत्यादिना सिंहासन स्वरोचिश्छटाभिरुदितसूर्यप्रकाश मन्दयतीति व्यज्यते । तेन च सिंहानस्याऽलौकिकतेति । १॥ - [इति सिद्धिश्रीमन्महाराजाधिराजश्रीविश्वनाथसिंहकृतायां व्यग्यार्थ- चन्द्रिकानाम्नि टीकायां चतुई श. सर्गः ॥१४॥] । १ १ ख ०ध्वनितवस्तुना वस्तुध्वनि. । २ ख कुण्डलनामासमललनालियमण्डितो । ३. ख नाऽस्ति । ४. ख. ०विशाला । ५. ख. ललनानामाल्या । ६. ख श्रीमहाराजकुमार । ७ ख. प्रवाहनिर्गत्य । ८ [-] अयमशः ख. पुस्तके नाऽस्ति ।
१२० ] सङ्गीतरघुनन्दनम् [अथ पञ्चदशः सर्गः] उत्थाय रामो जनकात्मजाया., पाणि गृहीत्वा परमादरेण' । शुभ्रातपत्रेण विरोचमानो, निकेतनप्राङ्गणमाजगाम ॥२॥ उत्थायेति स्पष्टम् । अत्र प्रातःकाले आतपत्रदानेन रघुनन्दनस्य वालसूर्यस्याऽपि किरणासहिष्णुत्व' व्यज्यते । 'तेन च सुकुमारतातिशय इति' । विरोचमान इत्यत्र श्वेतमरिणजटितच्छत्रे पतिताभि सूर्यकिरणच्छटाभिमिलिता. श्रीजानकीरघुनन्दनयोरनेकवर्णमरिणभूषणापूर्वरोचिश्छटा. परितः प्रसरन्तीति भाव. ॥१॥ कल्पतरुतले कमनीयमन्दिर' वह्निरविचन्द्ररावृतम् । स्वर्णमयवेदिक सर्वतः सर्वत: सेन्दिरम् ॥१॥ [कल्पतरुतलेति । स्वर्णमयी वेदिका यस्मिस्तत्, वह्निरविचन्द्ररा- वृतम्, प्रथममावरण वह्निमण्डलस्य, द्वितीयं सूर्यमण्डलस्य, तृतीय चन्द्रमण्डलस्य, सर्वतः सेन्दिर इन्दिरा शोभा तया सहितम्, कमनीय' मन्दिर कल्पतरुतले वर्तते । वह्नीत्यादिपदेनैव'' वक्ष्यमाणरासो रामबीजान्तर्गत २ इति व्यज्यते । तेन चाऽस्याऽतिगुप्ततेति 3 ||१||] १४ ललितसकलोपकरणे १५ सशोभिते तत्र सिंहासने१६ परमरम्यौ । रेजतुर्जानकोजानकीनायको' विश्वनाथाचितौ भावगम्यौ ॥२॥ ललितेति । ललितेन सकलोपकरणेन छत्रचामरव्यजनासनादिसामग्र्या सशोभिते, तत्र मन्दिरे, भावगम्यौ भावेन भावनया गम्यौ प्राप्यौ, विश्वनाथेन अचिती पूजितो, परमरम्यौ जानकीजानकीनायको'८ सिंहासने रेजतु भावगम्यावित्यनेन येऽत्रैव वरिणतभावनया सर्वदा ध्यायन्ति त एवैवम्भूत १६ १ फ परंमासरेग । ख परमादरे । २. ख. किरणसहिष्णुत्वं । ३ -' ग्रंशस्याऽस्याऽभावः फ पुस्तके । ४. क ०मरिणभूषणा पूर्व० । ५ ख. कमनीमतमदिर । ६. स्व. रविचन्दिर । ७ स्व. सर्वतत । ८ पद्यमिदं नाऽस्ति क पुस्तके । ६. ख. रविचद्ररेरावृतम् । १० ख कमनीयत । ११. ख ०पदेनैष । १२. ख रामवोजान्तर्गत । १३ ख ०गुप्तति । १४. [-] कोष्ठकान्तर्गतोऽशो न विद्यते क पुस्तके । १५. फ. सकलोपकरण । १६ प्र. हिसासने । १७. स हेजतुर्जानफीनायको । १८. क रायको । १६ ख. जतुः ।
भ 1 वपदशः सर्ग: [ १२१ mom रघुनन्दनं प्राप्नुवन्तीति व्यज्यते । तेन च तत्राऽय ग्रन्थोऽन्तरङ्गोपासनाप्रद इति ॥२॥ प्रथ निजपरमागारे विकसितकमलालयाकारे । रामो रासविधान मुदा सखीभि समातनुत' ॥१॥ तत्रमन्दिरेति भावनायोग्य रासं विस्तरेण दर्शयन्नाऽऽह-अथेति । अथेति नित्यरासवर्णने मङ्गलार्थः । रामः विकसितस्य कमलालयस्य कमलस्येवाऽऽकारो यस्य तत्र, निजपरमागारे, सदा सखीभिः साक रासविधान समातनुत । अत्र कमलालयेत्यादिना मन्दिरस्य यन्त्ररूपता व्यज्यते । तेन च तत्र स्थिताना वीजरूपतेति ॥१॥ सोतासमेतप्रियरासलीलावलोकनानन्दभरालसाजी । नामानि कासाश्चिदुदाहरन्ती काचित्सखी कामपि सञ्जगाद ॥२॥ सीतासमेतेति स्पष्टम् । एतेनेमे सख्यौ रासदर्शनार्थ बहिनिस्सृते इति व्यज्यते । तेन च रासकरणानन्दाद् रासदर्शनानन्दस्याऽऽधिक्यमिति' ॥२॥ ~ 'विहरति सीतारामो मध्ये सखीनयनविश्राम । ध्रुवपदम् । विहरतीति । सखीना नयनयोविश्रामो यस्मिन् सः, सीतया सहितो राम:, मध्ये विहरति । तथा नृत्यति यथा सकलसख्य सम्मुखमेव त पश्यन्तीति" [सखीत्यादिपदेन व्यज्यते । तेन च नृत्यचमत्कार इति] । इह वर्त ले पद्मा १ च सेव्या २ ऽथो सुकेशी ३ सहजया ४ । 'तारा ५ वीराङ्गानुजा ६ च कमला ७ तथा कमलालया ८' ।।१। + इह वर्त्त ले कणिकामध्ये मण्डले अष्टसख्य । सहजयेति सहार्थे तृतीया ॥१॥+१° ख पश्य -- १ रन समातनुते । २. ख रति । ३. क मदि । ४ क कसकलस्येवाकरो। ५. क धिक्यमि । ६. ख ध्र पदम् । ७ । ४ [-] अस्याऽशस्याऽभाव ख. पुस्तके | ६ '-' श्लोकामिद क पुस्तके नाऽस्ति । १० +-+ चिह्नान्तर्गाशस्थाने ख पुस्तकेऽयमशो लभ्यते- 'कामध्यमडले प्रष्टसख्य' सहजयेतीति सखीत्यादिपदेन व्यज्यते । तेन च नत्यचमत्कार इति । इह वत्त लोकस्मि सहार्थे तृतीया' ।
[ १२२ सङ्गीतरघुनन्दनम् सखी केसरेषूर्वशो' १ रम्भा २ मेनका ३ मृगलोचना ४ । चन्द्रावलो ५ कर्पूरगन्धा ६ कलरवा ७ वरलोचना ८ ॥२॥ क्षेमा ६ च हेमा १० वरारोहा ११ पद्मगन्धा १२ गालिनी १३ सुरतोत्सवा १४ हरिणी १५ कमलिनी १६ रमा १७ राधा १८ हसिनी १६ । केसरेष्वेकोनविंशतिसख्य. ॥२॥३॥ षोडशसु दलेषु नृत्यति पद्महस्ता१ वृन्दयार सुप्रेयसी३ च मनोरमा४ विमला५ सुनयना६ नित्यया ॥४॥ असिताद सिताह शुकसम्भवा१० हरिवल्लभा११ सुविशारदा१२ पुनरुमा१३ प्रकृति१४ महामाया१५ वेदजातिविशारदा १६ ॥५॥ सख्युपदलेषु द्वादशालीमण्डली विलसति नता । क्षीरोद्भवा१ ऽपि च भद्ररूपा२ भद्रदा विद्युल्लता४ ॥६॥ सखिचारुशीला५ चारुरूपा६ सती७ हससुगामिनी । वरपद्मरेखा प्रेमदा१० सुस्मिता११ कुड्कुमगन्धिनी१२ ।।७।। षोडशदले शोभना१ शुभदा२ सुस्मिता३ शान्ता४ धरा५ । सन्तोषिका ६ सुखदा७ सुवर्णा८ क्षेमदा ६ क्षेमा१० परा ॥८॥ इह चारुदेहा११ रुचिररूपा१२ चारुहा १३ सुरसोत्सुका१४ । धात्री१५ सुधोरा१६ कमलमध्यस्थानगा रासोत्सुकाः ।।६।। वृन्दयेत्यत्र नित्ययेत्यत्र च सहार्थे तृतीया ।।।४॥५॥६॥७।।८।। उपदले रति १-रपि नति २-मती ३ कुशला ४ तथैव च मेदिनी माल्या ६ महार्हा ७ माधवी ८ कामदा ६ कामविमोहिनी १०॥ १ लोलाकला ११ प्रेमप्रदा १२ षोडशसु क'राङ्गिका १ । वरसुधामुख्यु २-ज्ज्वला ३ कनका ४ सुरभि ५-रपि चित्राङ्गिका ६॥१ १ स्व. सुवंशी । २ ख तत्र दलेषु ३ क. वेदजातिविशादा । ४ क. सख्युपदेषु ५ क भद्रपा । ६. ख सातापिका । ७. फ. क्षमदा । ८ न. प्रेमदा । ६. स. कपूरांगका ।
4. 1 पञ्च दशसर्ग: [ १२३ min शशिमुखी ७ हसी ८ वरश्रोणी' हे चित्ररेखा १० शशिकला १२ । विशदाक्षिका १२ शुभदन्तिका १३ माधुर्यका१४ च बरो१५ त्पला१६ ॥१२॥ तदनन्तरं शतसखोमण्डलमस्ति तदुपरि दशशतम् । प्रयुत ततस्तदनन्तर पुनरथो लक्ष सन्ततम् ।।१३।। पुनरालिनियुत भाति वितत कोटिरपि तदनन्तरम् । दशकोटिशो विलसन्ति सख्यो दिग्विदिक्षु निरन्तरम् ॥१४॥ नतिमत्योर्द्वन्द्व : ॥१०॥११॥१२।।१३।।१४।। सव्यजनचामरकादिसकलवरोपकरगलसत्करा । वीणामृदङ्गोपाङ्गतोयतरङ्गवादनतत्परा ।।१५।। । गायन्ति' गीतमनुत्तम विहितेतरेतरमोहनम् । सङ्गीतक नृत्यन्ति सकला विश्वनाथविनोदनम् ॥१६।। इति श्रीमन्महाराजकुमार-श्रीविश्वनाथसिंहकृते सगीतरघुनदने 'सखीस्थितिनाम' सख्यावर्णन नाम'८ पचदश सर्गः ।।१५।। सव्यजनचामरकादिभि सकलैर्वरैः श्रेष्ठ रुपकरगर्लसन्तः करा यासा ताः, वीणामृदङ्गोपाङ्गतोयतरङ्गाना' वादने' तत्पराः, एता. सकलाः सख्यः, विश्वनाथस्य श्रीरघुनन्दनस्य विनोदन'२ विनोदजनक उत्तम गीत, विहितमित- रेतरमोहन यस्मिन् कर्मणि तद्यथा तथा, गायन्ति सङ्गीतक च नृत्यन्ति ॥१५॥१६॥ १ इति श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीरामचन्द्रकृपापात्राधिकारिविश्वनाथसिंह- व्यग्यार्थचन्द्रिकानाम्नि'५ टीकाया पचदशः कृतायां१४ .१६सर्ग. ॥१५॥ -- १. ख वरश्री। २ ख कृशिकला। ३ ख. पुनथो । ४. ख. ०पाङ्गतोधतरङ्ग । ५ क गायती । ६ क विहितेस रेतर० । ७ क कला । ' '--' ख.सावीस्थितिनामटीकाया। ख. शद्वजनकचामरकादिभिः । १०. के सरगावां। ११. क वाच । १. क नास्ति । १३ क गायन्ती । १४ ख श्रीमहाराजाधिराज० । १५ ख नाम । १६ ख पचदशो । 7 + १२४ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् mananana अथ षोडशः सर्ग] । विधिहरिहरमुनिवरमानससञ्चारिन्, ! परतररघुवरचरितसुधारिन् ! रासरसिकसच्चेतोहारिन् ! मदुरश्चन्दन सङ्गीतरघुनन्दन । त्वामह नीराजयामि । t अतिदुस्तर खाकरभवमागरतारिन् !, सततप्रेमसुख्पोद्गारिन्न ज्ज्लरसविस्तारिन् ! । - रघुपतिमतिकारिन्नमलयश प्रसारिन् । श्रोतृवरणसुधाधारासन्धारिन् । शमनभवनगमनहरणपरणधारिन् ! भीतिविभजन सज्जनरञ्जन हृतमायाञ्जन कुत्सितगुरणगञ्जन सद्गुणगोवर्द्धन भूतिविवर्द्धन ! त्वामह प्रणमामि । --- टीका-विधिहरीति । विधिहरिहरमुनिवराणा मानसे सञ्चरणशील, परतररघुवरचरितस्य धारणशील, रासरसिकाना सच्चेतो हरणशील, ममोर- सश्चन्दन, चन्दनवत्सन्तापहरेत्यर्थ ,५ एवम्भूत हे सङ्गीतरघुनन्दन | त्वामहं नीराजयामि । अथ परमविशेपणेनाऽस्य रघुनन्दनसमानरूपता व्यञ्जिता । तेन च सर्वोत्कृष्टतेति । अतिदुस्तरो दु खानामाकरों" यो भवसागरस्त तारयतीति तत्सम्बुद्धि , सतत प्रेम्ण सुपूरभुगिरतीति तत्सम्बुद्धिः, रघुपतौ मतिं कारयतीति तत्सम्बुद्धि , श्रोतृ णा श्रवणयो' सुधाधारां सन्धरतीति तत्सम्बुद्धि. । श्रोतृश्रवणेत्यादिविशेषणेनाऽस्याऽतिमाधुय्यं व्यज्यते। हृत मार्यवाऽञ्जन येन' तत्सम्वुद्धि., सद्गुणा एव गावस्ता वर्द्धयतीति तत्सम्बुद्धि., यथा गोवर्द्धनः पर्वतो गा वद्धितवास्तथैवेति भाव.। शेषं स्पष्टम् । अतिदुस्तरेत्यादिविशेषणैरिहाऽमुत्र चाऽस्य सुखदातृत्व व्यज्यते । तेन चाऽवश्यधारणयोग्यतेति । . 1 १. ख सुच्चेतोहारिन् । २. ख. विस्तारन् । ३. ख भीतविभजन । ४ क. सगुणवद्धन । ५ ख. चन्दवत् । ६ ख प्रयमविशेषणे० । ७ ख ०माकारो। ६.ख. श्रवण । १०. क. वेन । ख स्पुररमुन्नि। T षोडशः सर्गः [ १२५ - रासप्रतिपादक' पञ्चपापबाधक २ सकलसिद्धिसाधक रसिकशिरोमरिण- मादकनृत्यगीतनादक सकलसत्कर्मभगवद्धर्मशर्मकर नर्मसञ्चरण जननमरणहरण सुमतिभरण हावभावविस्तारण जनशरणचरण वर्णवर्णदुरितदरण सकल- लोलाभरण शिवशुकस्मरण महामोहान्धतमसो हरणे तरणे' साकेतपरमसरणे निगमागमसिद्धान्तशिरोमणे शमदमयमनियमादिफलचतुर्वर्गफलितकल्पतरो ! त्वा- मह भावयामि । टीका-रासेति । पञ्चपापानि' ब्रह्महत्यादीनि बाधयतीति तत्सम्बुद्धिः, सकलानां सता कर्मणा च भगवतो धर्माणा च शर्मणा च कर कारकेत्यर्थः । नर्मणा जानकीरघुनन्दनयोरेकान्तरहस्याना' सश्चरण प्रचारो यस्मात् स तत्सम्बुद्धिः, जननमरणे १२ हरतीति, सुमतिं बिभत्ति पुष्णातीति, हावा लीलाविलासादयस्तेषा' 3 भावं भावना विस्तृरणातीति, जनाना शरण रक्षक चरण पद्यचतुर्थांशो यस्य तत्सम्वुद्धि', वर्णाना ब्राह्मणादीना वर्णरक्षरैर्दुरित दृणाति विदारयतीति, सकलाना लीलानामाभरण भूषणस्वरूप, शिवशकयोः स्म- रण जानकीरघुनन्दनचिन्तनस्वरूप, महामोह एवाऽन्धतम १५ तस्य हरण नाशन तत्र, तरणे'६ सूर्य, साकेतस्य परमसरणे उत्कृष्टमार्गस्वरूप, निगमा वेदा आगमाः शास्त्राणि तेषा सिद्धान्तशिरोमणे, तत्परम सिद्धान्तेत्यर्थः । एतेन सर्व त्यक्त्वा त्वमेव भावनीय इति व्यज्यते । तेन चैतदल्पायास महाफल मिति । चतुर्वर्ग- रर्थवर्मकाममोक्षः फलित स चाऽसौ कल्पतरुश्च तत्सम्बुद्धिः । विश्वनाथमानससरोजनि सृतछन्द कोकनदव्यङ्ग्यमकरन्दमिश्रित२° राग- रससम्भृत तालीवालवलित तानतरङ्गोच्छलित मूर्च्छनामीनसकुलित सप्तस्वरा- वर्तकलित' श्रुतिमरालकुलाकुलित लघुगुरुप्लुतादिभेदपुलिनोज्ज्वलित ज्ञानकर्म- कूलदलनोल्लसित२२ विविधवाद्यगतिकुमुदिनीदलहरित3 लयसत्त्वरितसच्छवरण- सागरमिलितसीतारामचरितचलितसरिद्रूप । त्वामह गायामि । १ क. प्रतिपादक । २. क. पापाबाधक । ३. क सकलसत्कूर्मः । ४. ख. जननशरण । ५. क. वणे वर्ण० । ६ क शिस्मरण । ७ ख महामोहान्धतमस । ८ क तरे । ६ क. मह । १० क ०पापीनि । ११. ख. नन्दनयोयेकान्त । १२ क. जन्ममणे । १२. क. लीलासादय० । १४ क महामह । १५ क एवांयतसमस । स्व एवापतम् । १६ ख तरणे हि । १७ क सेत । १८ ख दैतदराल्पाल्पायास । १६ क त्सबुद्धि । २० क व्यगममरद० । ख व्यगमकरद । २१ ख. सप्तसुरावर्त० । २२ क कूलद मनो० । २३. क तलयसत्वरितसच्छावनचलि; तसरद्रूप ।
१२६ ] सङ्गीतरघुनन्दनम् .. टीका-विश्वनाथेति । विश्वनाथः शिवः कविर्वा, तस्य मानसमेव सरस्तस्मान्नि.सृतछन्दांस्येव कोकनदानि रक्तकमलानि व्यङ्गयार्थ एव मकरन्दस्तै- मिश्रित., रागा भैरवादयस्त एव रसाः जलानि तैः सम्भृतः, ताला एव शैवा- लानि तैर्वलितः युक्तः, ताना एव तरङ्गास्तैरुच्छलितः, मूर्च्छना' एव मीनास्तैः सड कुलित , सप्तस्वेरा एवाऽऽवस्तैि २ कलितः, श्रुतयो द्वाविंशतिः सङ्गीतशास्त्र- प्रसिद्धास्ता एव मरालकुलानि तैराकुलितः, लघुगुरुप्लुतादिभेदा एव पुलिनानि तैरुज्ज्वलित., आदिपदेनाऽणुद्रुतादीना सङ्ग्रहः । सङ्ग्रहः । ज्ञानकर्मणी एव कूले तयोर्दलनेनोल्लसित. शोभित , विविधेषु वाद्येपु या गतयस्ता एव कुमुदिनीदलानि तहरित , लयेन सत्वरितः सता श्रवणमेव सागरस्तत्र मिलित -सीतारामचरित- मेव चलिता' सरित्तद्रूपः। सरिद्रूपत्वेनाऽस्य रसमयत्व व्यज्यते । अत्र रूप- कालङ्कारेण वस्तुध्वनि। विश्वनाथेत्यादिना साधनावस्थायामपि परमसुखद- सवमिति व्यज्यते । तेन च तव गानयोग्यतेति । एषा माधुर्यधारा धरणितलगता विश्वनाथप्रचारा, भास्वत्सन्तानतारापरिवृढविशदध्यानसन्धानसारा । पापौघोदञ्चदारा' भवजलधिसमुत्तारणे नौरुदारा, शृङ्गारकप्रसारा जयति परगुरणग्राहकस्वान्तकारा ॥१॥ इति श्रीमन्महाराजकूमारविश्वनाथसिंहविरचिते सगीतरघुनदने प्रथमाहात्म्यवर्णनपूर्वक प्रणामादिविधान नाम षोडश. सर्गः ॥१६॥ श्रीसीताराम राम राम ।। एषेति । भास्वत्सन्तानतारा''-परिवृढस्य चन्द्रमस. श्रीरामचन्द्रस्य विशदध्यानस्य सन्धानमेव सारो यस्या सा, या काश्चिदपि लीला कुर्वन् श्रीरघुनन्दनो रासमेव ध्यायतीति भाव. पापीघस्य उदञ्चन्ती पारा, भवजलचेः समुत्तारणे उदारा नौ, परगुणग्राहकाणा स्वान्तस्य' मनस. कारा बन्धनगृहम् । एतेन रामरासरसिका इम श्रुत्वा अन्य न २ स्मरिष्यन्तीति व्यज्यते । तेन च तेषामनन्यभक्तत्वमिति । शृङ्गारस्य एको मुख्यः प्रसारो १ क मूछना। २. ख. सप्तस्वारावावात्तस्ति । ३ ख. नाऽगुन्दुतादीना । ४, १. चिबुधेप । ५. क ख. पुस्तकद्वये 'मित' इति । ६ क. चलिलिता । ७. ख. पुस्तके- : गद्यवन्धटीकायां सन्ति प्रयनाविभक्तिकैकवचनान्ता सर्वेऽपि शब्दा ह्यविसर्गाः । पापोपोदंच० । ६ स. १६ सम्पूर्णम् शुभमस्तु मंगलं दद्यात् सम्वत् १६२६ माघ त ८ फुज । १०. स. भाश्वत्सजामतारा० । ११. ख. स्यातस्य । १२. स. ना। ।
- प पोडशः सर्गः [ १२७ minn यस्या सा, विश्वनाथाच्छिवात्कवेर्वा रघुनाथात्प्रचारो यस्याः सा । रघुनन्दन एवेम ग्रन्थ विचार्य मन्मुखेन प्रकटितवानिति भावः । धरणितलगता एषा माधुर्यधारा जयति सर्वातिशयतया' वर्तते । ईदृशोऽन्येषु ग्रन्थेषु माधुर्यरसो' नाऽस्तीति भावः । रासप्रेमचमत्कारप्रमोदाय महात्मनाम् । विन्ध्येशविश्वनाथेन कृता व्यङ्गयार्थचन्द्रिका ॥ इति सिद्धिश्रीमन्महाराजाधिराजश्रीमहाराजश्रीराजाबहादुर रामचद्रकृपापात्राधिकारि- श्रीविश्वनाथसिंहदेवकृतायां व्यंग्यार्थचद्रिकानाम्नि टीकायां षोडशः सर्गः ॥१६॥ "नाढ वदि ७ कह संवत् १८६१ के । १. क सर्वातियतया । २. क. माधुर्यरासो। ३. क. क्वाहात्सताम् ।- ४. ल. विधेश० । ५. ल. सिद्धिः श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीरामचंद्रकृपापात्राधिकारि. । 4 परिशिष्ट १ ? वाल्मीकि ने देवर्षि नारद से पूछा था' -- "हे मुने | इस समय इस संसार मे गुणवान्, वीर्यवान्, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्यवक्ता और दृढप्रतिज्ञ कौन है ? सदाचार से युक्त, समस्त प्राणियो का हितसाधक, विद्वान्, सामर्थ्यशाली और एकमात्र प्रियदर्शन (सुन्दर पुरुष) कौन है ? मन पर अधिकार रखने वाला, क्रोध को जीतने वाला, कान्तिमान् और किसी की भी निन्दा नही करने वाला कौन है ? तथा सग्राम मे कुपित होने पर किससे देवता भी डरते हैं ? महर्पे ! मैं यह सुनना चाहता हूँ, इसके लिए मुझे बडी उत्सुकता है, और आप ऐसे पुरुष को जानने में समर्थ है"। ? हैं इसके उत्तर मे नारद ने कहा-२ "मुने । आपने जिन बहुत से दुर्लभ गुणो का वर्णन किया है, उनसे युक्त पुरुष के विषय मे विचार करके कहता हूँ । श्राप सुनें । इक्ष्वाकु के वश मे उत्पन्न और राम-नाम से विख्यात एक पुरुष हुए है । एक वे ही मन को वश मे रखने वाले, महाबलवान्, कान्तिमान्, धैर्यवान्, और जितेन्द्रिय है । वे बुद्धिमान्, नीतिज्ञ, वक्ता, शोभायमान तथा शत्रुसहारक । उनके कन्धे मोटे और भुजाएँ बडी-बडी हैं। ग्रीवा शंख के समान और ठोढी मासल (पुष्ट) है" । १. को न्वस्मिन् साम्प्रत लोके गुरगवान् कश्च वीर्यवान् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥२॥ चारित्रेण च को युक्त सर्वभूतेषु को हित । विद्वान् क क समर्थश्च कश्चकप्रियदर्शनः ॥३॥ प्रात्मवान् को जितक्रोधो द्युतिमान् कोऽनसूयक । फस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य सयुगे ।।४।। एतदिच्छाम्यह श्रोतु पर कौतूहल हि मे। महर्षे त्व समर्थोऽसि ज्ञातुमेवविध नरम् ॥५॥ (वाल्मीकिरामायण-प्रथम सर्ग) २. बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुरणाः । मुने वक्ष्याम्यह बुद्ध्वा तैर्युक्त श्रूयतां नर. ॥७॥ इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनै श्रुत । नियतात्मा महावीर्यो धुतिमान् तिमान वशी ॥८॥ बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमाञ्छत्रुनिवर्हगः । विपुलांसो महाबाहु कम्युग्रीयो महाहनुः ।।६।। (वाल्मीकि रामायण-प्रयम सर्ग) परिशिष्ट १ [ १२६ "उनका वक्षस्थल विशाल तथा धनुष बड़ा है, गले के नीचे की हड्डी इसली) मांस से छिपी हुई है । वे शत्रुओ के दमनकर्ता हैं। उनकी भुजाएं घुटने क लम्बी है, मस्तक सुन्दर है, ललाट भव्य और चाल मनोहर है । उनका शरीर प्रधिक ऊँचा या नाटा न होकर) मध्यम और सुडौल है, देह का रग चिकना । वे बड़े ही प्रतापी हैं। उनका वक्षस्थल भरा हुआ है, अाँखे बड़ी बड़ी है। यशस्वी, ज्ञानी, पवित्र, जितेन्द्रिय और मन को एकाग्र रखने वाले है । प्रजापति समान पालक, श्रीसम्पन्न, वैरिविध्वसक और जीवों तथा धर्म के रक्षक है। वधर्म और स्वजनो के पालक, वेद-वेदांगो के तत्त्ववेत्ता तथा धनुर्वेद मे प्रवीण । वे अखिल शास्त्रो के तत्त्वज्ञ, स्मरणशक्ति से युक्त और प्रतिभासम्पन्न है । [च्छे विचार और उदार हृदय वाले वे श्रीरामचन्द्रजी बातचीत करने मे चतुर था समस्त लोको के प्रिय हैं।" २"जैसे नदियां समुद्र से मिलती है, उसी प्रकार सदा राम से साधु पुरुष मलते रहते हैं। वे आर्य एव सबके प्रति समान भाव रखने वाले हैं, उनका दर्शन सदैव प्रिय मालूम होता है । सम्पूर्ण गुणो से युक्त ये रामचन्द्रजी अपनी माता कौशल्या के आनन्द बढाने वाले हैं, गम्भीरता मे समुद्र और धैर्य में हिमालय के समान है।" १. महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिंदमः । प्राजानुबाहु सुशिरा. सुललाट सुविक्रम ॥१०॥ सम समविभक्ताङ्गः स्निग्धवर्ग. प्रतापवान् । पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवाञ्छुभलक्षणः ॥११॥ धर्मज्ञः सत्यसंघश्च प्रजानां च हिते रतः। यशस्वी ज्ञानसम्पन्न. शुचिर्वश्यः समाधिमान् ॥१२॥ प्रजापतिसम' श्रीमान् धाता रिपुनिषूदन. । रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ॥१३॥ रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च 'निष्ठित ॥१४॥ सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान प्रतिभानवान् । सर्वलोकप्रिय साधुरदीनात्मा विचक्षणः ॥१५॥ (वाल्मीकिरामायण-प्रथम सर्ग) २. सर्वदाऽभिगत: सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः । मार्यः सर्वसमश्चैव सदेव प्रियदर्शनः ॥१६॥ स च सर्वगुणोपेतः कोसल्यानन्दवर्धन. । समुद्र इव गाम्भीर्य धर्येण हिमवानिव ॥१७॥ (वाल्मीकिरामायण-प्रथम सर्ग) परिशिष्ट । कृतियाँ विश्वनाथसिंह के ग्रन्थो की निश्चित सख्या प्रस्तुत नहीं की ज सकती । ज्ञात कृतियो का विवरण इस प्रकार है: - । १ रामगीता-टीका २ तत्त्वमस्यर्थसिद्धान्तभाष्य ३. राधावल्लभी-भाष्य ४. सर्वसिद्धान्त ५ रामरहस्य टीका ६. राममत्रार्थनिर्णय-टीका ७. सुमार्गस्तोत्रटीका ८. वीजकटीका ६ विनयपत्रिकाटीका १०. वैष्णवसिद्धान्तटीका ११. धनुर्विद्या १२. रामचन्द्रिकाह्निकतिलक १३. रागसागराह्निक १४. सगीतरघुनंदन १५. भुक्तिमुक्ति सदानन्दसंदोह १६. दीक्षानिर्णय १७. व्यंग्यार्थचन्द्रिका १८. भागवत-एकादशस्कन्धटीका १६ सुमार्ग की ज्योत्स्नाटीका २०. रामपरत्व २१. व्यग्यप्रकाश २२ विश्वनाथप्रकाश २३. प्राह्निक अष्टयाम २४. धर्मशास्त्रत्रिंशत्श्लोकी २५. परधर्मनिर्णय २६. गान्तिशतक २७ विश्वनाथचंरित २८ ध्रुवाष्टक सतिलक २६. मृगयाशतक ३०. परमतत्त्व ३१ उत्तमकाव्यप्रकाश ३२. गीतारघुनदनशतिका ३३ आनन्दरामायण ३४ गीतारघूनदन प्रामाणिक ३५ सर्वसग्रह ३६ रामचन्द्र जू की सवारी ३७ भजनमाला ३८. आनन्दरघुनन्दन-नार्टक ३६. रागसागराह्निक ४०. वेदान्तपचशतिका ४१ उत्तमनीति चन्द्रिका ४२ अबाधनीति ४३. ध्यानमजरी ४४. चौरासी रमैनी - ४५. कहरा ४६. शब्द ४७. आदिमगल ४८. साखी ४६. बसन्त-चौंतीसो ५०. पाखण्डखण्डिनी
[ १३१
परिशिष्ट २
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उपर्युक्त रचनाओ की विपुल संख्या मे यह भी संभव है कि इनमें से
कुछ रचनाएँ अन्य दरबारी कवियो से सम्बद्ध हों । इन कृतियो के अतिरिक्त
महाराज विश्वनाथसिह के नाम से निम्नलिखित रचनाएँ भी राजस्थान
प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान को उदयपुर शाखा मे है ग्रन्थाङ्क पूर्व प्रकाशित सूचीपत्र के
दिए गए है।
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१. ११६/१६४० अयोध्यामाहात्म्य- (कुल पत्र-८)
२. ३२३/२१४४ अयोध्याजी के भजन-(कुल ७३ भजन)
३. ३२४/२१४५ शृगार के कवित्त (कुल ५० पद-१० पत्र)
४. २७८/२०६६ शिकार के कवित्त (१० पत्र)
५. ३२२/२१४३ वीरविजय (धनुर्वेद) (१६ पत्र)
६. ३२६/२१४७ विनमाल-रचनाकाल-१८७६ वि०
२७६/२१०० राजनीति के पद (अपूर्ण) (१७ पत्र)
११४/१६३५ गीतावली (८८ पत्र)
२८०/२१०१ हनुमानजी के कवित्त (रचनाकाल १८८६ वि०)
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शुद्धि-पत्र पृष्ठ ६ ४ ४ ५ ११ १ १ १४ १६ १७ २१ ३३ ३३ ४५ w पङ्क्ति अशुद्ध शुद्ध उपल उपलं वदुदाहरणानि तदुदाहरणानि १६ प्रकीतिता प्रकीर्तिता स्वादाकारश्च स्यादाकारश्च & प्राशस्त्यार्थे प्राशस्त्यर्थे १६ गीविन्द गोविन्द ससारसागरे संसारसागरे २१ यतोऽपकत्तु यतोऽपकर्तु १८ अधगण अघगरण १५ परमहस परमहस १५ मह्यपपि मह्यमपि २२ नाशनेर्थः नाशनेत्यर्थः ५ कुमकमा कुमकुमा श्रुतों श्रुती ५ अश्रित आश्रित कथत व कथ तव क्तिरिति उक्तिरिति स्वोय स्वीय ५ सद्धिर्भविप्य सिद्धिर्भविष्य १५ ललितान्तस्कामद ललितान्तरकामद १६ धिकमिति मधिकमिति १४ य्यजितवती व्यजितवती १४ बैकुण्ठे वैकुण्ठे वचनामतेन वचनामृतेन १६ केलिक्ला केलिकला १६ पश्यम पश्यन्न षण्णत्य षण्णवत्य १६ सुखिताशम् सुखिताक्षम् १२ नवोनघनेन नवीनघनेन २१ सुख मुखं १६ तद्विहार तटविहार २२ सिंहानस्य सिंहासनस्य पाठक अनुस्वार की अशुद्धियो को स्वप्रज्ञा से यथास्थान सुधार लेवें। ७ ५६ ५९ ६० ६२ ६३ ६७ ३ ७० ८१ ८५ ७ ८५ ८६ ८७ १ ८७ १०० ११० ११६ - 有 事