Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )

The Satkhandagama (vol -xvi)

Dr.jain Hiralal · 2010/09

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Front matter

प्रकाशकः
श्रीमन्त सेठ शितावराय लक्ष्मीचन्द्र
जैन-साहित्योद्धारक-फंड-कार्यालय
विदिशा (म०प्र०)
मुद्रका
पं० शिवनारायण उपाध्याय, बी० ए०
नया संसार प्रेस,
भदैनी, वाराणसी

THE
ŞATKHAŅDĀGAMA
OF
→
PUSPADANTA AND BHŪTABALI
WITH
THE COMMENTARY DHAVALĀ OF VIRASENA
VOL. XVI
The Last Fourteen Anuyogadyaras, Moksha etc.
Edited
with translation, notes and indc.es
BY
Dr. AIRALAL JAIN, M. A., LL. B., D. Litt.
Director, Prakrit Jain Institute, Vaishali
Assisted by
Pandit Phoolchandra,
Siddhanta Shastri.
Pandit Balchandra,
Siddhanta Shastri
With the cooperation of
Dr. A. N. Upadhye,
M. A., D. LITT.
Published by
Shrimant Seth Shitabrai Laxmichandra,
Jaina Sahitya Uadharaka Fund Karyalaya.
Vidisha ( M. P.)
1958
노
Price rupees twelve only.

Published by
Shrimant Seth Shitabrai Laxmichandra
Jaina Sahitya Uddharaka Fund Karyalaya
Vidisha ( M. P )
Printed by
Pt. SHIVA NARAYAN UPADHAYAYA, B. A.
Naya Sansar Press.
BHADAINI, VARANASI.

सम्पादकीय मुझे आज बड़ी प्रसन्नता है कि जिस पटखंडागम और उसकी टीका धवलाका सम्पादन प्रकाशन कार्य आजसे बीस वर्ष पूर्व सन् १६३८ में प्रारंभ हुआ था, वह आज प्रतुस्त भागके साथ संपूर्णताको प्राप्त हो रहा है। किन्तु ज्ञानकी दृष्टिसे यह कार्य केवल हमारे कर्तव्यकी प्रथम सीढ़ी मात्र है। इस प्रकाशनके द्वारा इस महान् शास्त्रीय रचनाका मूल पाठ, उसका मूलानुगामी अनुवाद, यत्र तत्र विशेष स्पष्टीकरण व तुलनात्मक टिप्पण तथा कुछ ऐतिहासिक विवेचन व पारिभापिक शब्दोंकी सूचियाँ मात्र प्रस्तुत की जा सकी हैं। हमारे विचारके अनुसार अभी इसके सम्बन्धमें विशेष रूपसे निम्न कार्य अवशिष्ट है:- १-इसके मूल पाठका एक बार सावधानीसे मूडविद्रीकी तीन उपलभ्य ताड़पत्रीय प्रतियोंसे मिलान व पाठभेदोंका अंकन। इस कार्यके लिये उक्त प्रतियोंके फोटोका भी उपयोग किया जा सकता है। २-इसके विषयका समस्त जैन कर्मसिद्धान्तसम्बन्धी दिगम्बर और श्वेताम्बर तथा वैदिक य बौद्ध साहित्यके साथ तुलनात्मक अध्ययन व पाश्चात्य दर्शन प्रणालीसे उसका विवेचन । ३-सूत्रों और टीकाका प्राकृत भापासम्बन्धी अध्ययन । मुझे आशा है कि वर्तमान युगकी बढ़ती हुई ज्ञानपिपासा तथा विशेष अध्ययनकी ओर अभिरुचि व प्रोत्साहन को देखते हुए उक्त प्रवृत्तियोंको हाथ लगानेमें विलम्व न होगा। यद्यपि प्रत्येक भागके साथ भूमिकामें ग्रन्थसम्बन्धी ऐतिहासिक विवरण व विपय परिचय दिया गया है एवं परिशिष्टोंमें शब्द सूचियाँ, तथापि मेरा विचार था कि प्रस्तुत अन्तिम भागमें उक्त समस्त सामग्रीका पुनरावलोकन सहित संकलन दे दिया जाय । तदनुसार पारिभापिक शब्दसूची संकलित करके इस भागके साथ प्रस्तुत की जा रही है। प्रस्तावनात्मक सामग्रीका भी संकलन कार्य चालू किया गया था। किन्तु इसी वीच मेरा स्वास्थ्य गिरने लगा और मुझे डाक्टरोंका आदेश मिला कि कुछ कालके लिये कठोर मानसिक व शारीरिक परिश्रम त्यागकर विश्राम किया जाय, नहीं तो प्रकृति और अधिक विगड़नेका भय है। इस कारण उस सुविस्तृत भूमिकाका विचार छोड़कर एवं इस प्रकाशनमें अधिक विलम्ब उचित न समझकर इस भागको प्रकाशित किया जा रहा है। यदि विधि अनुकूल रहा तो उक्त कार्य भविष्यमें कभी पूर्ण करनेका प्रयत्न किया जायगा। आवश्यक ऐतिहासिक व विपय-परिचयसम्बन्धी जानकारी भिन्न भिन्न भागोंमें संगृहीत है ही। इस समय स्वभावतः मेरी स्मृति इस सम्पादन प्रकाशनके गत वीस वर्षके इतिहास पर जा रही है। सफल और धन्य है वह श्रीमन्त सेठ सिताबराय लक्ष्मीचन्द्र जी, भेलसा, की सम्पत्ति जिसके थोड़ेसे दानसे यह महान् शास्त्रोद्धारका कार्य हो सका । वे गजरथ महोत्सव कराने जा रहे थे कि मेरे परम सुहृत् वैरिस्टर जमुनाप्रसाद जैनने इटारसी परिपके अधिवेशनके समय उनकी सद्बुद्धिको यह मोड़ दिया। गजरथ अाज भी चलाये जा रहे हैं और उनमें अपरिमित धन व्यय किया जा रहा है। पाठक विचार कर देखें कि आज दानकी प्रवृत्ति किस दिशामें सार्थक है। पञ्चात् भेलसानिवासी श्रीमान् स्वर्गीय सेठ राजमल जी व श्रीमान तखतमल जी ( वर्तमान मध्य प्रदेशी मंत्रि-मण्डलके सदस्य) ने सेठ लक्ष्मीचन्द जी की उस .( २ ) सद्बुद्धिको सुदृढ़ और व्यवस्थित करके दानकी रजिस्ट्री करा दी। सम्पादन कार्यके प्रारम्भमें अमरावती निवासी श्रीमान् स्वर्गीय सेठ पन्नालाल जीका साहाय्य व प्रोत्साहन कभी भूला नहीं जा सकता। उन्होंने मानो इसी कार्यके लिये अपने मन्दिर जीके शास्त्र भंडारमें इस आगमकी पूर्ण प्रतिलिपि कराकर मॅगा रखी थी। उसे तुरन्त उन्होंने मेरे सुपुर्द कर दिया। उनका यह कार्य उस समय कम साहसका नहीं था, क्योंकि भ्रान्तिवश हमारी विद्वत्समाजका एक दल इन ग्रन्थोंके प्रकाशन ही नहीं किन्तु किसी गृहल्थके द्वारा इनके अध्ययनका भी कट्टर विरोधी था और उस विरोधने क्रियात्मक रूप धारण कर लिया था। सेठ पन्नालालजी व अमरावती जैन पंचायतके अनुसार कारंजा जैन आश्रम तथा सिद्धान्त भवन, आरा, के अधिकारियोंने भी हमें उनकी प्रतियोंका उपयोग करनेकी सुविधा प्रदान की। प्रकाशन सम्बन्धी कागज, छपाई आदि विषयक कठिनाइयोंके हल करनेमें पं० नाथूराम जी प्रेमीका वरद हस्त सदैव हमारे ऊपर रहा। यही नहीं, बीचमें आर्थिक कठिनाईको दूर करने, मुद्रण कार्य बम्बईमें कराने व अपने घर पर इसका दफ्तर रखनेमें भी वे नहीं हिचकिचाये । मेरे सम्पादक सहयोगियोंमें से डा० ए० एन० उपाध्ये प्रारम्भसे अभी तक मेरे साथ हैं। पं० फूलचन्द्र जी शास्त्रीका सहयोग भी आदिसे, बीचमें कुछ वर्षों के विच्छेदके पश्चात् , अभी भी मुझे मिल रहा है। पं० बालचन्द्र जी शास्त्रीका भी जबसे सहयोग प्राप्त हुआ तबसे अन्त तक निरन्तर निभता गया। स्वर्गीय पं० देवकीनन्दन जी शास्त्रीका भी आदिसे उनके देहावसान होने तक मुझे पूर्ण सहयोग मिलता रहा। पं० हीरालाल जी शास्त्रीका सहयोग इस कार्यके प्रारम्भमें बहुमूल्य रहा। किन्तु खेद है वह सहयोग अन्त तक न निभ सका। मैंने इन सब व्यक्तियों और घटनाओंका केवल संकेत मात्र किया है। तत्तत् सम्बन्धी. आज सैकड़ों प्रिय- अप्रिय एवं साधक वाधक घटनाएँ मेरे स्मृति-पटल पर नाच रही हैं। किन्तु जिसका 'अन्त भला, वह सांग भला' की उक्तिके अनुसार उस समस्त इतिहासमें मुझे माधुर्य ही माधुर्यका अनुभव हो रहा है। जिन पुरुषोंका मैं ऊपर उल्लेख कर आया हूँ उन्हें किन शब्दोंमें धन्यवाद दूँ ? बस यही एक भावना और प्रार्थना है कि जिन-वाणीकी सेवामें उन्होंने अपना जैसा तन, मन, धन लगाया है, वैसा ही वे आजन्म लगाते रहें जिससे उनके ज्ञानावर्णीय कर्मोका क्षय हो और वे निर्मल ज्ञान प्राप्त कर पूर्ण आत्मकल्याण करने में सफल हों। १-५-१६५८] हीरालाल जैन विषय-परिचय कर्मप्रकृतिप्राभृतके कृति आदि २४ अनुयोगद्वारों में से प्रथम १० अनुयोगद्वारोंका संक्षिप्त परिचय यथास्थान कराया जा चुका है । यहाँ मोक्ष अनुयोगद्वारसे लेकर शेप १४ अनुयोगद्वारोंका परिचय कराया जाता है। ११ मोत-मोक्ष अनुयोगद्वारका विचार नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव इन चार निक्षेपों द्वारा करनेकी प्रतिज्ञा करके मात्र कमंद्रव्यमोक्षका विशेप विचार प्रकृतमें किया गया है और शेप निक्षेपोंके व्याख्यानको सुगम बतलाकर छोड़ दिया गया है। कर्मप्रकृतियाँ मूल और उत्तरके भेदसे दो प्रकारकी हैं, इसलिए कर्मद्रव्यमोक्षके दो भेद हो जाते हैं-मूलप्रकृतिकर्मद्रव्य- मोक्ष और उत्तरप्रकृतिकर्मद्रव्यमोक्ष । ये दोनों भी देशमोक्ष और सर्वमोक्षके भेदसे दो दो प्रकारके हैं। किसी मूल या. उत्तर प्रकृतिके प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशोंकी अपेक्षा एकदेशका अभाव होना देशमोक्ष है और किसी मूल या उत्तर प्रकृतिका प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशोंकी अपेक्षा सर्वथा अभाव होना सर्वमोक्ष है, इसलिए देशमोक्ष और सर्वमोक्ष ये दोनों ही प्रकृतिमोक्ष, स्थितिमोक्ष, अनुभागमोक्ष और प्रदेशमोक्ष इन चार भागोंमें विभक्त हो जाते हैं। खुलासा इस प्रकार है-विवक्षित प्रकृतिकी निर्जरा होना या उसका अन्य प्रकृतिरूपसे संक्रमित होना प्रकृतिमोक्ष कहलाता है। प्रदेशमोक्षका विचार प्रकृतिमोक्षके ही समान है। किसी भी प्रकृतिकी विवक्षित स्थितिका अभाव चार प्रकारसे होता है-अपकर्पण द्वारा, उत्कर्पण द्वारा, संक्रमणद्वारा और अधःस्थितिगलन द्वारा; इसलिए इन चारों से किसी एकके आश्रय विवक्षित स्थितिका अभाव होना स्थितिमोक्ष कहलाता है। स्थितिके जघन्यादि सब विकल्पोंमें स्थितिमोक्षका विचार इसी प्रकार कर लेना चाहिए। अनुभागमोक्ष भी स्थितिमोक्षके समान चार प्रकारसे होता है, इसलिए अनुभागके भी उत्कृष्टादि सब भेदोंमें उक्त प्रकारसे अनुभाग- मोक्षको घटित करके बतलाया गया है । यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक प्रतीत होता है कि कर्मद्रव्यमोक्ष अनुयोद्वारमें सम्यग्दर्शन आदि गुणोंके द्वारा जीवके बन्धनसे मुक्त होने मात्रका विचार न करके प्रति समय बन्धको प्राप्त होनेवाले कर्मों की प्रकृति आदिका प्रभाव किस किस प्रकारसे होता रहता है इसका भी विचार किया गया है। जीवका कर्मो से छूटनेका क्रम एक प्रकारका ही है। यदि सम्यग्दर्शनादि गुणोंके द्वारा कमसे छुटकारा मिलता है तो नवीन बन्ध न होनेसे वह सर्वथा मुक्तिका कारण होता है इतना मात्र यहाँ विशेष है। इसी अभिप्रायको ध्यानमें रखकर नोआगमद्रव्यमोक्षके मोक्ष, मोक्षकारण और मुक्त ये तीन भेद किये गये हैं। जीव और कर्मों का वियुक्त हो जाना मोक्ष है। सम्यग्दर्शन आदि मोक्षके कारण हैं और समस्त कर्मों से रहित अनन्त गुण युक्त शुद्ध बुद्ध आत्मा मुक्त है। मोक्ष अनुयोगद्वारमें इसका भी विस्तारके साथ विचार किया गया है। १२ संक्रम-संक्रमका छह प्रकारका निक्षेप करके उसके आश्रयसे इस अनुयोगद्वारमें विचार किया गया है। क्षेत्र संक्रमका निर्देश करते हुए बतलाया है कि एक क्षेत्रका क्षेत्रान्तरको -- (४) प्राप्त होना क्षेत्रसंक्रम है। इस पर यह शंका की गई कि क्षेत्र निष्क्रिय होता है, इसलिए उसका अन्य क्षेत्रमें गमन कैसे हो सकता है। इसका समाधान वीरसेनस्वामीने इस प्रकार किया है कि जीव और पुद्गल सक्रिय पदार्थ हैं, इसलिए आधेयमें आधारका उपचार करनेसे क्षेत्रसंक्रम बन जाता है। कालसंक्रमका निर्देश करते हुए बतलाया है कि एक काल गत होकर नवीन कालका प्रादुर्भाव होना. कालसंक्रम है। लोकमें हेमन्त ऋतु या ग्रीष्म ऋतु संक्रान्त हुई ऐसा व्यवहार भी देखा जाता है। यहाँ विवक्षित क्षेत्र और विवक्षित कालमें स्थित द्रव्यकी क्षेत्र और काल संज्ञा रख कर भी क्षेत्रसंक्रम और कालसंक्रम घटित कर लेना चाहिए, ऐसा वीरसेनस्वामीने सूचित किया है। इस प्रकार संक्षेपसे छह निक्षेपोंका विचार करनेके पश्चात् विवक्षित अनुयोगद्वारमें कर्म- संक्रमको प्रकृत बतलाकर उसके चार भेद किये हैं-प्रकृतिसंक्रम, स्थितिसंक्रम, अनुभाग- संक्रम और प्रदेशसंक्रम। एक प्रकृतिका अन्य प्रकृतिरूपसे संक्रान्त होना यह प्रकृतिसंक्रम है। इस विषयमें विशेष नियम ये हैं। यथा-किसी भी मूलप्रकृतिका अन्य मूलप्रकृतिरूपसे संक्रमण नहीं होता। उदाहरणार्थ, ज्ञानावरणका दर्शनावरणरूपसे संक्रमण नहीं होता । इसीप्रकार अन्य मूल प्रकृतियोंके विपयमें भी जानना चाहिए । उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा जिस मूल कर्मकी जितनी उत्तर प्रकृतियाँ हैं उनमें परस्पर संक्रमण होता है। उदाहरणार्थ, ज्ञानवरणकी पाँच उत्तर प्रकृतियाँ हैं, इसलिए उनका परस्परमें संक्रमण होता है। इसी प्रकार अन्य मूल प्रकृतियोंमेंसे. जिसकी जितनी उत्तर प्रकृतियाँ हों उनके परस्पर संक्रमणके विषयमें यह नियम जानना चाहिये । मात्र दर्शनमोहनीयका चारित्रमोहनीयमें और चारित्रमोहनीयका दर्शनमोहनीयमें संक्रमण नहीं होता तथा चार आयुओंका भी परस्पर संक्रमण नहीं होता इतना यहाँ विशेष जानना चाहिए। भागहारकी दृष्टिसे संक्रमके पाँच भेद हैं-अधःप्रवृत्तसंक्रम, विध्यातसंक्रम, उद्वेलना- संक्रम, गुणसंक्रम और सर्वसंक्रम। इनमें से प्रकृतमें इन अवान्तर भेदोंकी दृष्टिसे संक्रमका विचार न करके वीरसेन स्वामीने बन्धके समय होनेवाले इस संक्रमका स्वामित्व, एक जीवकी अपेक्षा काल, एक जीवकी अपेक्षा अन्तर, नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचय, काल, अन्तर और अल्पबहुत्व इन अनुयोगद्वारोंका आश्रय लेकर उत्तरप्रकृतिसंक्रमका विचार किया है। स्वामित्वका निर्देश करते हुए बतलाया है कि पाँच ज्ञानवरण, नौ दर्शनावरण, बारह कषाय और पाँच अन्तरायका अन्यतर सकषाय जीव संक्रामक होता है। असाताका बन्ध करने- वाला जीव साताका संक्रामक होता है और साताका बन्ध करनेवाला सकषाय जीव असाताका संक्रामक होता है। दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीयका परस्पर संक्रम नही होता यह तो स्पष्ट ही है। दर्शनमोहनीयके संक्रमके विषयमें यह नियम है कि सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव दर्शनमोहनीयका संक्रामक नहीं होता। सम्यक्त्व का मिथ्याष्टि जीव संक्रामक होता है। मात्र सम्यक्त्वका एक आव ल प्रमाण सत्कर्म शेष रहने पर उसका संक्रम नहीं होता। मिथ्यात्वका सम्यग्दृष्टि जीव संक्रामक होता है। मात्र जिस सम्यग्दृष्टिके एक आवलिसे अधिक सत्कर्म विद्यमान है ऐसा जीव इसका संक्रामक होता है। यही नियम सम्यग्मिथ्यात्वके लिए भी लागू करना चाहिए। पर इसका संक्रामक मिथ्यादृष्टि और सम्य- ग्दृष्टि दोनों होते हैं। स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका उपशम और क्षय क्रियाका अन्तिम समय प्राप्त होने तक कोई भी जीव संक्रामक होता है। पुरुपवेद और तीन संज्वलनका. उपशम और क्षयका प्रथम समय प्राप्त होने तक कोई भी जीव संक्रामक होता है। संज्वलन लोभका ऐसा जीव संक्रामक होता है जिस उपशामक और पकने संज्वलन लोभके अन्तरका अन्तिम समय नहीं प्राप्त किया है। तथा जो अक्षपक और अनुपशामक है वह भी इसका ( ५ ) संक्रामक होता है। चारों आयुओंका संक्रम नहीं होता ऐसा स्वभाव है । यशःकीतिको छोड़कर सब नामकर्मकी प्रकृतियोंका सकपाय जीव संक्रामक होता है। मात्र जिसके एक श्रावलिसे अधिक सत्कर्म विद्यमान हैं ऐसा जीव. इनका संक्रामक होता है। यशःकीर्तिका संक्रामक तव तक होता है जब तक पर भवसम्बन्धी नामकर्मकी प्रकृतियोंका वन्ध करता है । उच्चगोत्रका संक्रामक नीचगोत्रका बन्ध करनेवाला अन्यतर जीव होता है। मात्र एक श्रावलिसे अधिक सत्कमके रहते हुए उच्चगोत्रका संक्रामक होता है। नीचगोत्रका संक्रामक उच्च- गोत्रका बन्ध करनेवाला अन्यतर जीव होता है। इस प्रकार सब प्रकृतियोंके स्वामित्वको जान कर काल आदि अनुयोगद्वारोंका विचार कर लेना चाहिए। मूलमें इनका विचार किया ही है, इसलिए विस्तार भयसे यहाँ उनका अलग अलग निर्देश नहीं करते हैं। इस प्रकार प्रकृतिसंक्रमका विचार कर आगे प्रकृतिस्थानसंक्रमकी सूचना करते हुए बतलाया गया है कि ज्ञानावरणीय, वेदनीय, गोत्र और अन्तरायका एक एक ही संक्रमस्थान है। दर्शनावरणके नौ प्रकृतिक और छह प्रकृतिक ये दो संक्रमस्थान हैं। मोहनीयके संक्रमस्थानोंका विचार कपायप्राभृतमें विस्तारके साथ किया है। नामकर्मकी पिण्डप्रकृतियों के आश्रयसे स्थान- समुत्कीर्तना करनी चाहिए। इस प्रकार अलग अलग प्रकृतियोंके संक्रमस्थान जानकर उनके आश्रयसे स्वामित्व और काल आदि सव अनुयोगद्वारोंका विचार करनेकी सूचना करके यह प्रकरण समाप्त किया गया है। आगे स्थितिसंक्रमका निर्देश करके उसकी प्ररूपणा इस प्रकार की है। स्थितिसंक्रम दो प्रकारका है-मूलप्रकृतिस्थितिसंक्रम और उत्तरप्रकृतिस्थितिसंक्रम । स्थितिसंक्रम तीन प्रकारसे होता है। यथा-स्थितिका अपकर्षण होने पर स्थितिसंक्रम होता है, स्थितिका उकत्र्पण होने पर स्थितिसंक्रम होता है और स्थितिके अन्य प्रकृतिको प्राप्त कराने पर भी स्थितिसंक्रम होता है। अपकर्पण की अपेक्षा संक्षेपमें स्थितिसंक्रमका विचार इस प्रकार है- उदयावलि के भीतरकी सब स्थितियोंका अपकर्षण नहीं होता। उदयावलिके बाहर जो एक समय अधिक उदयावलिप्रमाण स्थिति है उसका अपकर्पण होता है। अपकर्पण होकर उसका एक समय कम आवलिके दो वटे तीन भागप्रमाण स्थितिको अस्थिापनारूपसे रखकर एक अधिक तृतीय भागमें निक्षेप होता है। इससे आगेकी स्थितियोंका अपकर्पण होने पर एक श्रावलिप्रमाण अतिस्थापना प्राप्त होने तक उसकी वृद्धि होती है और निक्षेप उतना ही रहता है। इससे आगे अतिस्थापना अवस्थितरूपसे एक आवलिप्रमाण ही रहती है और निक्षेप उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है । उत्कर्पणके विपयमें यह नियम है कि उदयावलिके भीतरकी सब स्थितियोंका उत्कर्पण नहीं होता। एक समय अधिक उदयावलिकी अन्तिम स्थितिका उत्कर्पण होता है। किन्तु उसका नहीं बंधनेवाली स्थितिमें निक्षेप न होकर बंधनेवाली जघन्य स्थितिसे लेकर ऊपरकी सब स्थितियोंमें निक्षेप होता है। यह विधि उत्कर्पणको प्राप्त होनेवाली नीचेकी स्थितियोंकी कही है। उपरकी स्थितियोंका उत्कर्पण किस प्रकार होता है इसका विचार करने पर यदि यह जीव सत्कर्मसे एक समय अधिक स्थितिका बन्ध करता है तो पूर्वबद्ध कर्मकी अन्तिम स्थितिका उत्कर्पना नहीं होता, क्योंकि यहाँ पर प्रतिस्थापना और निक्षेपका अभाव है। पूर्वबद्ध कर्मकी द्विचरम स्थितिका भी उत्कर्पण नहीं होता, क्योंकि यहाँ पर भी अतिस्थापना और निक्षेप सम्भव नहीं हैं। इस प्रकार पूर्वबद्ध कर्मकी एक प्रावलि और एक श्रावलिके असंख्यात्त भागप्रमाण स्थितिके नीचे जाने तक जितने भी स्थितिविकल्प हैं उनका उत्करण सम्भव नहीं। कारण वही है। हाँ उससे नीचे एक स्थिति के जाने पर जो स्थितिविकल्प स्थित है उसका उत्कर्पण हो सकता है और वैसी अवस्थामें एक प्रावलिप्रमाण अतिस्थापना होती है तथा - शेष आवलिका असंख्यातवाँ भाग निक्षेप होता है। इस प्रकार संक्षेपमें उत्कर्षणका निदें। करके आगे निक्षेप और अतिस्थापनाका अल्पबहुत्व बतलाया गया है । आगे उत्तरप्रकृतिसंक्रमके प्रमाणानुगमका निर्देश करते हुए वह उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन और अजघन्यके भेदसे चार प्रकारका बतलाया है। उदाहरणार्थ मतिज्ञानावरणका उत्कृष्ट स्थिति संक्रम दो आवलि कम तीस कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण होता है, क्योंकि किसी भी प्रकृतिका वन होने पर एक आवलि काल तक उसका संक्रमण नहीं होता, इसलिए एक आवलि तो यह कम है जाती है। इसके बाद उद्यावलिको छोड़कर शेष स्थितिका अन्य वन्धको प्राप्त होनेवाली प्रकृति संक्रमण होता है, इसलिए एक आवलि यह कम हो जाती है। इस प्रकार उक्त दो आवलियोंक छोड़कर शेप सब स्थिति संक्रमणसे प्राप्त हो सकती है, इसलिए मतिज्ञानावरणकी उत्कृष्ट संक्रमस्थिा दो श्रावलि कम तीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण कही है। पर उस समय उस कर्मकी स्थिति आवलि कम तीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण होती है, इसलिए उसका यस्थितिसंक्रम एक आवलि कम तीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण कहा है। इस प्रकार मूलमें मात्र मतिज्ञानावरणक उदाहरण देकर शेष कर्मों के विषयमें उत्कृष्ट स्थितिउदीरणाके समान उत्कृष्ट स्थितिसंक्रम जाननेकी सूचना की है और जिन कर्मों में उत्कृष्ट स्थितिउदीरणासे भेद है उनका अलग निर्देश कर दिया है सो विचार कर उसे घटित कर लेना चाहिए । 'स्वतन्त्ररूपसे विचार किय जाय तो उसका तात्पर्य इतना ही है कि जो बन्धसे उत्कृष्ट स्थितिवाली प्रकृतियाँ हैं उनक उत्कृष्ट स्थितिसंक्रम दो आवलिकम अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण प्राप्त होता है और उत्कृष्ट यस्थितिसंक्रम एक आवलि कम अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण प्राप्त होता है। परन्तु जे बन्धोत्कृष्ट स्थितिवाली प्रकृतियाँ न होकर संक्रमोत्कृष्ट स्थितिवाली प्रकृतियाँ हैं उनका उत्कृष्ट स्थितिसंक्रम तीन आवलि कम उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण प्राप्त होता है और उत्कृष्ट यत्स्थितिसंक्रमं दे आवलि कम उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण प्राप्त होता है। मात्र दर्शनमोहनीयकी तीन प्रकृतियोंसें तथा आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृतिमें जो विशेषता है उसे अलगसे जान लेना चाहिए। चारों आयुअोंका जो उत्कृष्ट स्थितिबन्ध है वही उनका उत्कृष्ट स्थितिसंक्रम है, क्योकि एक आयुका अन्य आयुमें संक्रम नहीं होता। मात्र इनकी यस्थिति एक आवलि कम उत्कृष्ट आवाधासहित अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण कही है। इनकी उत्कष्ट यस्थिति इतनी कैसे कही है इस विषयको श्वेताम्बर कर्मप्रकृतिकी टीका में स्पष्ट किया है। उसका भाव यह है कि आयुबन्ध होते समय बन्धावलिप्रमाण काल जानेपर आयुबन्धके प्रथम समयमें बंधे हुए कर्मका उत्कर्षण होने पर उसकी अवाधा सहित उत्कृष्ट यत्स्थिति उक्त कालप्रमाण प्राप्त होती है। यह एक समाधान है। तथा 'अथवा' कहकर दूसरा समाधान इसप्रकार किया है कि बन्धावलिके बाद आयुकी नियाधात- रूप अपवर्तना (अपकर्षण) भी सर्वदा सम्भव है, इसलिए उसकी अपेक्षा पूर्वोक्त प्रमाण यत्स्थिति जान लेनी चाहिए। अभिप्राय इतना ही है कि पूर्वकीटिकी आयुवाले मनुष्यके प्रथम त्रिभागमें परभवसम्बन्धी उत्कृष्ट आयुका बन्ध होने पर उसकी निषेक रचना तो नरकायु और देवायुकी तेतीस सागरप्रमाण तथा तिर्यञ्चायु और मनुष्यायुकी तीन पल्यप्रमाण ही रहती है। आवाधा- काल पूर्वकोटिका त्रिभाग इससे अलग है इसलिए इनका जो स्थितिबन्ध है वही स्थितिसंक्रम है । पर इनके बन्धके प्रथम समयसे लेकर एक प्रावलि काल जानेपर इन निपेकस्थितियों में बन्ध होते समय उत्कर्पण और बन्ध होते समय या बन्ध समयके बाद भी अपकर्षण होने लगता है। यतः इस उत्कर्षण और अपकर्षणमें एक स्थितिसे प्रदेश समूह उठकर दूसरी स्थितिमें निक्षिप्त होते समय स्थितिके परिमाणमें अबाधाकाल भी गर्भित है। पर यह उत्कर्पण और अपकर्पण वन्धके प्रथम समयसे लेकर एक आवलिकाल तक सम्भव नहीं है। यही कारण है कि आयुकर्मकी ( ७ ) यस्थिति कहते समय नरकायु आदिकी अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिमें एक आवलिकम उत्कृष्ट बाबाधाकाल भी सम्मिलित कर लिया है। इसप्रकार उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमके प्रमाणका अनुगम करनेके बाद जघन्य स्थितिसंक्रमके प्रमाणका निर्देश किया है। खुलासा इसप्रकार है-पाँच ज्ञानावरण, चक्षुदर्शनावरण आदि चार दर्शनावरण, सम्यक्त्व, संज्वलन लोभ, चार आयु और पाँच अन्तराय इनकी एक समय अधिक एक आवलिप्रमाण स्थिति शेप रहने पर उदयावलिसे उपरितन एक समयमात्र स्थितिका अपकर्पण होता है, इसलिए इनका जघन्य स्थितिसंक्रम एक स्थितिप्रमाण है और यत्स्थितिसंक्रम समयाधिक एक आवलिप्रमाण है। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, बारह कपाय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, नरकगतिद्विक, तिर्यञ्चगतिद्विक, एकेन्द्रिय आदि चार जाति, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण इनकी क्षपणा होनेके अन्तिम समयमें जघन्य स्थिति पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण होती है, इसलिए इनका जघन्य स्थितिसंक्रम उक्त प्रमाण कहा है। परन्तु क्षपणाके अन्तिम समयमें इनके उदयावलिमें स्थित निपेकोंका संक्रम नहीं होता, इसलिए उक्त कालमें उदयावलिके मिला देनेपर इनकी यस्थिति उदयावलि अधिक पल्यके असंख्यातवें :भागप्रमाण होती है। यहाँ इतना विशेप जानना चाहिए कि स्त्रीवेद और नपुंसकवेदकी यस्थिति उदयावलि अधिक न कहकर अन्तर्मुहूर्त अधिक कहनी चाहिए, क्योंकि इन दोनों प्रकृतियोंकी क्षपणाकी समाप्ति अन्तरकरणमें रहते हुए होती है और अन्तरकरणका काल उस समय अन्तर्मुहूर्त शेप रहता है. इसलिए यह स्पष्ट है कि अन्तरकरणमें इनके प्रदेशोंका अभाव होनेसे यत्स्थिति इतनी बढ़ जाती है। निद्रा और प्रचलाकी स्थिति दो आवलि और एक आवलिका असंख्यातवाँ भाग शेप रहनेपर इनकी मात्र उपरितन एक स्थितिका संक्रम होता है ऐसा स्वभाव है, इसलिए इनका जघन्य स्थितिसंक्रम एक स्थिति और यत्स्थितिसंक्रम आवलिका असंख्यातवाँ भाग अधिक दो आवलि होता है। हास्यादि छहकी क्षपणाके अन्तिम समयमें जघन्य स्थिति संख्यात वर्पप्रमाण होती है, इसलिए इनका जघन्य स्थितिसंक्रम संख्यात वर्ष- प्रमाण होता है। पर इनकी क्षपणाकी समाप्ति भी अन्तरकरणमें रहते हुए होती है और उस समय अन्तरकरणका काल अन्तर्मुहूर्त शेप रहता है, इसलिए इनकी यस्थिति अन्तर्मुहूर्त अधिक संख्यात वर्प होती है। क्रोधसंज्वलनका जघन्य स्थितिबन्ध दो महीना प्रमाण होता है, मान- संज्वलनका जघन्य स्थितिवन्ध एक महीनाप्रमाण होता है, मायासंज्वलनका जघन्य स्थितिबन्ध अर्धं मासप्रमाण होता है और पुरुषवेदका जघन्य स्थितिबन्ध आठ वर्पप्रमाण होता है। इन प्रकृतियोंके उक्त स्थितिवन्धमेंसे अलग अलग अन्तमुहूर्तप्रमाण अवाधाकालके कम कर देनेपर उनके जघन्य स्थिति संक्रमका प्रमाण आ जाता है जो क्रमशः अन्तर्मुहूर्त कम दो माह, अन्तर्मुहूर्त कम एक माह, अन्तमुहूर्त कम अधमास और अन्तर्मुहूर्त कम आठ वर्पप्रमाण होता है। तथा इनका यस्थितिसंक्रम क्रमसे दो आवलि कम दो माह, दो आवलि कम एक माह, दो प्रावलि कम अर्धमास और दो आवलि कम आठ वर्षप्रमाण होता है, क्योंकि अपना अपना जघन्य स्थितिबन्ध होनेपर उसका एक प्रावलि काल तक संक्रम नहीं होता, इसलिए अपने अपने जघन्य स्थितिवन्धमेंसे एक आवलि तो यह कम हो गई और संक्रम प्रारम्भ होने पर वह एक श्रावलि काल तक होता रहता है. इसलिए एक प्रावलि यह कम हो गई। अतः इन प्रकृतियोंके जघन्य यस्थितिसंक्रमका प्रमाण अपने अपने जघन्य स्थितिवन्धमेसे दो श्रावलि कम करने पर जो प्रमाण शेप रहे उतना प्राप्त होता है। अब रहीं शेप प्रकृतियाँ सो उनकी जवन्य स्थिति सोगि- केवलीके अन्तिम समयमें अन्तर्मुहूर्तप्रमाण होती है, इसलिए वहाँ पर उसमेंसे उद्यावलिप्रमाण स्थितिको छोड़कर शेप स्थितिका संक्रमण सम्भव होनेसे उनका जघन्य स्थितिसंक्रम उदयावलि -- (८) कम अन्तर्मुहूर्तप्रमाण और यस्थितिसंक्रम उदयावलिसहित अन्तर्मुहूर्तप्रमाण होता है। यहाँपर मूलमें इन प्रकृतियोंकी अत्स्थिति तथा स्त्यानगृद्धित्रिक आदि बत्तीस प्रकृतियोंकी यत्स्थिति नहीं बतलाई गई है। किन्तु वह सम्भव है, इसलिए हमने उसका अलगसे निर्देश कर दिया है । तथा मूलमें देवगति आदिका जघन्य स्थितिसंक्रम बतलाते समय जो प्रकृतियाँ परिगणित की गई हैं उनमें तीन आङ्गोपाङ्ग भी परिगणित किये जाने चाहिए, क्योंकि इनका जघन्य स्थितिसंक्रम भी सयोगिकेवलीके अन्तिम समयमें होता है। आगे जो जघन्य स्थितिसंक्रमका स्वामित्व कहा है उससे भी यह बात स्पष्ट हो जाती है। इस प्रकार प्रमाणानुगमका निर्देश करनेके बाद जघन्य और उत्कृष्ट भेदोंका आश्रयकर स्वामित्व, एक जीवकी अपेक्षा काल, एक जीवकी अपेक्षा अन्तर, नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्ग- विचय, नाना जीवोंकी अपेक्षा काल, नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर और अल्पबहुत्वका निर्देश करके भुजगार, पदनिक्षेप और वृद्धि इन अनुयोगद्वारोंका संक्षेपमें निरूपण किया है। इस प्रकार स्थितिसंक्रमका विचार कर आगे अनुभागसंक्रमका प्रकरण प्रारम्भ होता है। इसमें सब कर्मों को देशघाति, सर्वघाति और अघाति इन भेदोंमें विभक्तकर इनके आदि स्पर्धक परस्परमें किनके समान हैं और किनके किस क्रमसे प्राप्त होते हैं यह बतलाकर उत्कर्पणसे प्राप्त होनेवाला अनुभाग अनुभागसंक्रम है, अपकर्षणसे प्राप्त होनेवाला अनुभाग अनुभागसंक्रम है और अन्य प्रकृतियों में संक्रमण होकर प्राप्त होनेवाला अनुभाग अनुभागसंक्रम है इस अर्थपदका निर्देश किया गया है । यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि मूल प्रकृतियोंमें उत्कर्षण और अपकर्षण इन दो प्रकारोंसे और उत्तर प्रकृतियोंमें यथासम्भव तीनों प्रकारोंसे अनुभागसंक्रम होता है। आगे अपकर्षणसे प्राप्त होनेवाले अनुभागसंक्रमका निर्देश करते हुए बतलाया गया है कि आदि स्र्धकका अपकर्पण नहीं होता, क्योंकि इसके नीचे जघन्य निक्षेप और जघन्य अतिस्थापनाका अभाव है। इसीप्रकार जघन्य निक्षेप और जघन्य अतिस्थापनाके अन्तर्गत जितने स्पर्धक हैं उनका अपकर्षण नहीं होता । मात्र इनके ऊपर जो स्पर्धक अवस्थित हैं उनका अपकर्षण होता है क्योंकि इनकी अतिस्थापना और निक्षेप पाये जाते हैं। इतना निर्देश करनेके बाद यहाँ प्रकृत विषयमें उपयोगी अल्पबहुत्व दिया गया है। आगे उत्कर्षणके विषयमें यह नियम दिया है कि चरम स्पर्धक की स्थापना और निक्षेप का अभाव है, इसलिए जघन्य निक्षेप और जघन्य अतिस्थापनाप्रमाण स्पर्धक नीचे सरककर जो स्पर्धक अवस्थित है उसका उत्कर्षण होता है । इसके आगे अपकर्षण और उत्कर्पणकी अपेक्षा निक्षेप और अतिस्थापनाका अल्पबहुत्व देकर अर्थपद समाप्त किया गया है । आगे प्रमाणानुगम, स्वामित्व, एक जीवकी अपेक्षा काल, एक जीवकी अपेक्षा अन्तर, नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचयय, नाना जीवोंकी अपेक्षा काल, नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर, सन्निकर्ष, स्वस्थान अल्पबहुत्व और परस्थान अल्पबहुत्वका निर्देश करके कुछ अनुयोगद्वारोंका आश्रय लेकर भुजगार, पदनिक्षेप और वृद्धिका विचारकर अनुभागसंक्रमप्रकरण समाप्त होता है । आगे संक्रमस्थानोंको सत्कर्मस्थानोंके अनुसार जाननेकी सूचना कर प्रदेशसंक्रमके विपयमें कहा है कि एक उत्तर प्रकृतिके प्रदेशोंका अन्य सजातीय प्रकृतिमें संक्रमित होना प्रदेशसंक्रम कहलाता है । प्रदेशसंक्रम भी मूलप्रकृतियोंमें न होकर उत्तर प्रकृतियोंमें होता है। तदनुसार उत्तर प्रकृतिसंक्रमके पाँच भेद हैं-उद्वेलनसंक्रम, विध्यातसंक्रम, अधःप्रवृत्त संक्रम, गुणसक्रम और सर्व- संक्रम । आगे ये संक्रम किस अवस्थामें और कहाँ होते हैं तथा किन प्रकृतियों के कितने संक्रम होते हैं यह बतला कर इन संक्रमोंके अवहारकालके अल्पवहुत्वका निर्देश किया गया है। आगे ।

( ९ ) स्वामित्व आदि अनुयोगद्वारोंका आश्रय लेकर भुजगार, पदनिक्षेप और वृद्धिसंक्रमका निर्देश करते हुए इस प्रकरणको समाप्त किया गया है। १३. लेश्या-लेश्याका निक्षेप चार प्रकारका है-नामलेश्या, स्थापनालेश्या, द्रव्यलेश्या और भावलेश्या । यहाँ इन नामलेश्या आदि निक्षेपोंका स्पष्टीकरण करते हुए तद्वयतिरिक्त द्रव्यलेश्या के विपयमें लिखा है कि चक्षु इन्द्रियद्वारा ग्राह्य पुद्गलस्कन्धोंके कृष्ण आदि छह वर्णो की द्रव्यलेश्या संज्ञा है । यहाँ इनके उदाहरण भी दिये गये हैं। भावलेश्याके आगम और नोआगम ये भेद करके नोआगम भावलेश्याका वही लक्षण दिया है जो सर्वत्र प्रसिद्ध है । प्रकृतमें नैगमनयकी अपेक्षा नोआगमद्रव्यलेश्या और भावलेश्या प्रकृत है यह कहकर द्रव्यलेश्याके असंख्यात लोकप्रमाण भेद होने पर भी छह भेद ही क्यों किये गये हैं इसका स्पष्टीकरण किया गया है। आगे शरीरके आश्रयसे किन जीवोंके कौन लेश्या होती है यह बतला कर छह शरीरोंकी द्रव्य लेश्याओंका अलग अलग विचार किया गया है। यद्यपि कृष्णादि द्रव्यलेश्याओंमें एक एक गुणकी मुख्यतासे नामकरण किया जाता है पर इसका यह अभिप्राय नहीं है कि इनमेंसे प्रत्येको एक एक गुण ही होता है, इसलिए आगे किस लेश्यामें किस क्रमसे कौन कौन गुण होते हैं इसका स्पष्टीकरण तालिका द्वारा कराया जाता है - - लेश्या नाम १ ૨ ३ ५ कृष्णले . शुक्ल पीत लाल नील कृष्ण नीलले . जुक्ल पोत लाल कृष्ण नील कापोतले० शुक्ल पीत कृष्ण लाल नील कापोतले० शुक्ल कृष्ण पीत नीज लाल कागोतले० कृष्ण शुक्ल नील पीत लाल पीतले० कृष्ण नील शुक्ल पीत लाल पद्मले० कृष्ण नील शुक्ल लाल पीत पद्माले० कृष्ण नील लाल शुक्ल पीत पदाले० कृष्ण नील लाल पीत शुक्ल शुक्लले० कृष्णा नील लाल पीत शुक्ल इन लेश्याओंमेंसे जिसमें सर्व प्रथम गुणका निर्देश किया है वह उसमें सबसे स्तोक है और आगेके गुण उस लेश्यामें उत्तरोत्तर अनन्तगुणे हैं। कापोत और पद्मलेश्या तीन तीन प्रकारसे निष्पन्न होती हैं। शेप लेश्याएं एक ही प्रकारसे निष्पन्न होती हैं। तथा कापोत लेश्याम द्विस्थानिक अनुभाग होता है और शेप लेश्याओंमें द्विस्थानिक, त्रिस्थानिक और चतुःस्थानिक अनुभाग होता है। ।

( १० ) मिथ्यात्व, असंयम, कपाय और योगसे उत्पन्न हुए जीवके संस्कारविशेषका नाम भाव- लेश्या है। द्रव्यलेश्याके समान ये भी छह प्रकारकी होती हैं। उनमेंसे कापोत लेश्या तीव्र होती है, नीललेश्या तीव्रतर होती है और कृष्णलेश्या तीव्रतम होती है। पीतलेश्या मन्द होती है, पद्मलेश्या मन्दतर होती है और शुक्ललेश्या मन्दतम होती है। ये छहों लेश्याएं पदस्थानपतित हानि-वृद्धिको लिए हुए होती हैं। तथा इनमें भी कापोतलेश्या- द्विस्थानिक अनुभागको लिए हुए होती है और शेष पाँच लेश्याएँ द्विस्थानिक, त्रिस्थानिक और चतुःस्था नक अनुभागको लिए हुए होती हैं। इस प्रकार इस अधिकारमें लेश्यात्रोंका उक्त प्रकारसे वर्णन करके अन्तमें तीव्रता और मन्दताकी अपेक्षा अल्पबहुत्व बतला कर यह अधिकार समाप्त किया गया है। १४ लेश्याकर्म-कृष्णादि लेश्याओं से जिसके आलम्बनते मारण और विदारण आदि जिस प्रकारकी क्रिया होती है उसके अनुसार उसका वह लेश्याकर्म माना गया है । उदाहरणार्थ कृष्णलेश्यासे परिणत हुआ जीव निर्दय, कलहशील, रौद्र, अनुबद्धवैर, चोर, चपल, परस्त्रीमें आसक्त, मधु, मांस और सुरामें विशेष रुचि रखनेवाला, जिन शासनके सुनने में अतत्पर और असंयमी होता है। इसी प्रकार अन्य लेश्याओंका अपने अपने नामानुरूप कर्म जानना चाहिए । इस प्रकार इस अधिकारमें लेश्याकर्मका विचार किया गया है। १५ लेश्यापरिणाम-कौन लेश्या किस रूपसे अर्थात् किस वृद्धि या हानिरूपसे परिणत होती है इस बातका विचार इस अधिकारमें किया गया है। इसमें बतलाया है कि कृष्णलेश्यामें षट्स्थानपतित संक्लेशकी वृद्ध होने पर उसका अन्य लेश्यामें संक्रमण न होकर स्वस्थानमें ही संक्रमण होता है। मात्र विशुद्धिकी वृद्धि होने पर उसका अन्य लेश्यामें भी संक्रमण होता है और स्वस्थानमें भी संक्रमण होता है। इतना अवश्य है कि कृष्णलेश्यामेंसे नीललेश्यामें आते समय नियमसे अनन्तगुणहानि होती है। नीललेश्यामें संक्लेशकी वृद्धि होने पर स्वस्थान- संक्रमण भी होता है और नीलसे कृष्णलेश्यामें भी संक्रमण होता है। तथा विशुद्धि होने पर स्वस्थान संकमण भी होता है और नीललेश्यासे कापोतलेश्यामें भी संकमण होता है। मात्र नीललेश्यासे कृष्ण लेश्यामें जाते समय संक्लेशकी अनन्तगुणी वृद्धि होती है और नील से कापोत लेश्यामें आते समय संक्लेशकी अनन्तगुणी हानि होती है। इसी प्रकार शेष चार लेश्याओंमें भी परिणामका विचार कर लेना चाहिए। इस प्रकार इस अधिकारमें परिणामका विचार कर तीव्रता और मन्दताकी अपेक्षा संक्रम और प्रतिग्रहके अल्पबहुत्वका विचार.. करते हुए इस अधिकारको समाप्त किया गया है। १६ सातासात-इस अनुयोगद्वारका यहाँ पर पाँच अधिकारों के द्वारा विचार किया गया है वे पाँच अधिकार ये हैं-समुत्कीर्तना, अर्थपद, पदमीमांसा, स्वामित्व और अल्पबहुत्व । समुत्कीर्तनामें बतलाया गया है कि एकान्त सात और अनेकान्त सातके भेदसे सात दो प्रकारका है। तथा इसी प्रकार एकान्त असात और अनेकान्त असातके भेदसे असात भी दो प्रकारका है। अर्थपदका निर्देश करते हुए बतलाया है कि जो कर्म सातरूपसे बद्ध होकर यथावस्थित रहते हुए वेदा जाता है वह एकान्त सातकर्म है और इससे अन्य अनेकान्त सातकर्म है। इसी प्रकार जो कर्म असातरूपसे बद्ध होकर यथावस्थित रहते हुए वेदा जाता है वह एकान्त असात कर्म है और इससे अन्य अनेकान्त असातकर्म है। पदमीमांसामें इनके उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य पदोंके अस्तित्वकी सूचना मात्र की कई है। स्वामित्वमें इन उत्कृष्ट आदि भेद रूप एकान्त सात आदिके स्वामित्वका निर्देश किया गया है। तथा अन्तमें प्रमाणका विचार कर अल्पबहुत्वका निर्देश करते हुए इस अनुयोगद्वारको समाप्त किया गया है। - .. . ( ११ ) १७ दीर्घ-हस्व-इसमें दीर्घको प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशके भेदसे चार प्रकारका बतला कर उनका बन्ध, उदय और सत्त्वकी अपेक्षा विचार किया गया है। सर्व प्रथम मूलप्रकृतिदीर्घके प्रकृतिस्थानदीर्घ और एकैकप्रकृत्तिस्थानदीर्घ ये दो भेद करके प्रकृतिस्थानका विचार करते हुए बतलाया है कि आठ प्रकृतियोंका बन्ध होने पर प्रकृतिदीर्घ और उनसे न्यून प्रकृतियोंका बन्ध होने पर नोप्रकृतिदीर्घ होता है। इसी प्रकार उदय और सत्त्वकी अपेक्षा प्रकृतिदीर्घ और नोप्रकृतिदीर्घको घटित करके बतला कर उत्तर प्रकृतियोंमेंसे किस मूलकर्मकी उत्तर प्रकृतियोंमें बन्धादिकी अपेक्षा प्रकृतिदीर्घ सम्भव नहीं है और किसकी उत्तर प्रकृतियोंमें प्रकृतिदीर्घ और नोप्रकृतिदीर्घ सम्भव है यह बतलाया गया है। अागे स्थितिदीर्घ, अनुभागदीर्घ और प्रदेशदीर्घको भी बतलाया गया है । आगे दीर्घके समान ह्रस्वके भी चार भेद करके उनका विचार किया गया है । उदाहरणार्थ वन्धकी अपेक्षा प्रकृतिह्रस्वका निर्देश करते हुए बतलाया है कि एक एक प्रकृतिका बन्ध करनेवालेके प्रकृतिह्रस्व होता है और इससे अधिकका वन्ध करनेवालेके नोप्रकृतिह्रस्व होता है । इस प्रकार मूल और उत्तर प्रकृतियोंका आलम्बन लेकर वन्ध, उदय और सत्त्वकी अपेक्षा दीर्घ और ह्रस्वके विचार करनेमें इस अनुयोगद्वारकी प्रवृत्ति हुई है। १८ भवधारणीय-इस अनुयोगद्वारमें भवके ओघभव, आदेशभव और भवग्रहणभव ये तीन भेद करके बतलाया है कि आठ कर्म और आठ कर्मों के निमित्तसे उत्पन्न हुए जीवके परिणामको अोघभव कहते हैं। चार गति नामकर्म और उनसे उत्पन्न हुए जीवके परिणामको आदेशभव कहते हैं। इसके अनुसार आदेशभव चार प्रकारका है-नारक भव, तिर्यञ्चभव, मनुष्यभव और देवभव । तथा भुज्यमान आयु गलकर नई आयुका उदय होने पर प्रथम समय में उत्पन्न हुए व्यञ्जन संज्ञावाले जीवके परिणामको या पूर्वशरीरका त्याग होकर नूतन शरीरके ग्रहणको भवप्रहणभव कहते हैं। प्रकृतमें भवग्रहणभवका प्रकरण है। यद्यपि जीव अमूर्त है फिर भी उसका कर्मके साथ अनादि सम्बन्ध होनेसे संसार अवस्थामें वह मूर्तभावको प्राप्त हो रहा है, इसलिए अमूर्त जीवका मूर्त कर्मके साथ बन्ध बन जाता है। ऐसा यह जीव शेप कर्मों के द्वारा न धारण किया जाकर आयुकसके द्वारा धारण किया जाता है, अतएव भवधारणीय आयुकर्म ठहरता है। इसका पदमीमांसा, स्वामित्व और अल्पबहुत्वको आलम्बन लेकर विस्तारसे विचार वेदना अनुयोगद्वारमें किया है, इसलिए उस सब व्याख्यानको वहाँसे जान लेना चाहिए। इस प्रकार भवग्रहणभवके व्याख्यान करने में यह अनुयोगद्वार चरितार्थ है। १६ पुद्गलात्त-इसमें पुद्गलके चार निक्षेप करके प्रकृतमें नोआगमतद्वचतिरिक्त द्रव्यपुद्गतका विचार करते हुए बतलाया गया है कि पुद्गलात्त अर्थात् पुद्गलोंका आत्म- सात्कार छह प्रकारसे होता है-ग्रहणसे, परिणामसे, उपभोगसे, आहारसे, ममत्त्वसे और परिग्रहसे । इनका खुलासा करते हुए बतलाया है कि हाथ और पैर आदिसे ग्रहण किये गये दण्ड आदि पुद्गल ग्रहणसे आत्तपुद्गल हैं। मिथ्यात्व आदि परिणामोंसे अपने किये गये पुद्गल परिणामसे आत्तपुद्गल हैं। उपभोगसे अपने किये गये गन्ध और ताम्बूल आदि पुद्गल उपभोगसे आत्तपुद्गल । खान-पानके द्वारा अपने किये गये पुद्गल आहारसे आत्त- पुद्गल हैं। अनुरागसे ग्रहण किये गये पुद्गल ममत्त्वसे आत्तपुद्गल हैं और स्वाधीन पुद्गल परिग्रहसे आत्तपुद्ल हैं। इन सवका वर्णन इस अनुयोगद्वारमें किया गया है। अथवा पुद्गलात्तका अर्थ पुद्गलात्मा है। पुद्गलात्मासे रूपादि गुणवाला पुद्गल लिया गया है। अतः उसके गुणोंकी पट्स्थानपतित वृद्धि आदिका इस अनुयोगद्वारमें विचार किया गया है । हैं ( १२ ) २० निधत्त-अनिधत्त--इस अनुयोगद्वारमें बतलाया है कि जिस प्रदेशाग्रका उत्कर्षण और अपकर्षण तो होता है पर उदीरणा और अन्य प्रकृतिरूपसे संक्रमण नहीं होता उसकी निधत्त संज्ञा है। प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशके भेदसे निधत्त भी चार प्रकारका है और अनिधत्त भी चार प्रकारका है। इस विषयमें यह नियम है कि दर्शनमोहनीयकी उपशामना या क्षपणा करते समय मात्र दर्शनमोहनीय कर्म अनिवृत्तिकरणमें अनिधत्त हो जाता है अनन्तनाबन्धीकी विसंयोजना करते समय मात्र अनन्तानुबन्धीचतुष्क अनिवृत्तिकरणमें अनिधत्त हो जाता है और चारित्रमोहनीयकी उपशामना और क्षपणा करते समय अनिवृत्ति- करण गुणस्थानमें सब कर्म अनिवत्त हो जाते हैं। तथा अपने अपने निर्दिष्ट स्थानके पूर्व दर्शनमोहनीय, अनन्तानुबन्धीचतुष्क और शेष सब कर्म निधत्त और अनिधत्त दोनों प्रकारके होते हैं। यह अर्थपद है, इसके अनुसार चौबीस अनुयोगद्वारों ।। आश्रय लेकर इस अनुयोग- द्वारका कथन करना चाहिए। २१ निकाचित-अनिकाचित----इस अनुयोगद्वारमें बतलाया है कि जिस प्रदेशाग्रका न तो अपकर्पण होता है, न उत्कर्पण होता है, न अन्य प्रकृतिरूपसे संक्रमण होता है और न उदीरणा होती है। जिसके ये चारों नहीं होते उसकी निकाचित संज्ञा है। यह प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशके भेदसे चार प्रकारका है। इसके विषयमें भी यह नियम है कि पूर्वोक्त प्रकार से अनिवृत्तिकरणमें प्रवेश करने पर सब कर्म अनिकाचित हो जाते हैं। किन्तु इसके पूर्व वे निकाचित और अनिकाचित दोनों प्रकारके होते हैं । इन निक.चित और अनिकाचित प्रदेशायोंकी भी चौबीस अनुयोगद्वारोंके आश्रयसे प्ररूपणा करनी चाहिए। यहाँ उपशान्त, निधत्त और निकाचितके सन्निकर्षका कथन करते हुए बतलाया है कि जो प्रदेशाग्र अप्रशस्त उपशामनारूपसे उपशान्त है वह न निधत्त है और न निकाचित है। जो निधत्त प्रदेशाग्र है वह न उपशान्त है और न निकाचित है। तथा जो निकाचित प्रदेशाग्र है वह न उपशान्त है और न निधत्त है। आगे अधःप्रवृत्तसंक्रमके साथ इन तीनोंके अल्प बहुत्वका निर्देश करके यह अनुयोगद्वार समाप्त किया गया है। २२ कर्मस्थिति---इस अनुयोगद्वारके विपयमें दो उपदेशोंका निर्देश करके यह अनुयोगद्वार समाप्त किया गया है। पहला उपदेश नागहस्तिके मतके अनुसार निर्दिष्ट किया है और दूसरा उपदेश आर्यमंक्षुके मतका निर्देश करता है। नागहस्तिक्षमाश्रमणका कहना है कि कर्मस्थिति अनुयोगद्वारमें कर्मों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थितिके प्रमाणका कथन किया जाता है और आयमंचका कहना है कि इसमें कर्मस्थितिके भीतर सञ्चित हुए सत्कर्मकी प्ररूपणा की जाती है। २३ पश्चिमस्कन्ध-~-इस अनुयोगद्वारमें तीन भवोंमेंसे भवग्रहणभवको प्रकृत वतला कर चरम भवमें जीवके सब कर्मों की वन्धमार्गणा, उदयमार्गणा, उदीरणामार्गणा, संक्रममार्गणा और सत्कर्ममार्गणा इन पाँच मार्गणाओंका विचार किया जाता है यह बतलाया गया है। इसके आगे जो जीव सिद्ध होता है उसकी अन्तर्मुहूर्त आयु शेष रह जाने पर तेरहवें गुणस्थानमें कर्मों की और आत्मप्रदेशोंकी किस क्रमसे क्या क्या क्रिया होती है तथा चौदहवें गुणस्थानमें यह जीव किसरूपसे कितने कालतक अवस्थित रहकर कर्मों से मुक्त होकर सिद्ध होता है यह बतलाया गया है। इसप्रकार इन सब बातोंका विवेचन करनेके वाद यह अनुयोगद्वार समाप्त किया गया है।

। ( १३ ) २४ अल्पवहुत्व-इस अनुयोगद्वारके प्रारम्भमें यह सूचना की है कि नागहस्ति भट्टारक इसमें सत्कर्मका विचार करते हैं। वीरसेन स्वामीने इस उपदेशको प्रवृत्तमान बतला कर इसके अनुसार सत्कर्म के प्रकृतिसत्कर्म, स्थितिसत्कर्म, अनुभागसत्कर्म और प्रदेशसत्कर्म ये चार भेद करके सर्वप्रथम मून और उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा सत्कर्मका विचार किया है। उसमें भी मूल प्रकृतियों के स्वामित्वकी सूचनामानं करके उत्तरप्रकृतियोंके स्वामित्वको विस्तारसे बतला कर एक जीवकी अपेक्षा काल, एक जी की अपेक्षा अन्तर, नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचय, काल, अन्तर और स्वामित्वको स्वामित्वके बलसे जान लेनेकी सूचना करके स्वस्थान और परस्थान दोनों प्रकारके अल्पबहुत्वोंमें से परस्थान अल्पबहुत्वका ओघसे और चारों गतियों के साथ असंज्ञी मार्गणामें विचार किया है । भुजगार, पदनिक्षेप और वृद्धि यहाँ पर नहीं हैं, अतः इनके विषयमें इतनी मात्र सूचना देकर प्रकृतिस्थानसत्कर्मके विषयमें लिखा है कि मोहनीयका कषायप्राभृतके अनुसार जानना चाहिए और शेष कर्मों की प्रकृतिस्थानप्ररूपणा सुगम है। स्थितिसत्कर्मका विचार करते हुए मूलप्रकृतिस्थितिसत्कर्मका वर्णन सुगम कहकर उत्तर प्रकृतियोंके स्थितिसत्कर्मका जघन्य और उत्कृष्ट अद्धाच्छेद तथा जघन्य और उत्कृष्ट स्वामित्वका विस्तारसे विचार कर तथा एक जीवकी अपेक्षा काल आदि अनुयोगद्वारोंको स्वामित्वके बलसे जाननेकी सूचनामात्र करके अल्पबहुत्व दिया गया है यहाँ पर श्रद्धाच्छेदका विचार करते हुए 'जट्ठिदि' और 'जाओ द्विदीओ' ये शब्द आये हैं। प्रायः अनेक स्थानों पर 'जं ट्ठिदि' भी मुद्रित है। पर उससे 'जहिदि'का ही ग्रहण करना चाहिए। इन शब्दों द्वारा दो प्रकारकी स्थितियोंका निर्देश किया गया है। 'जहिदि' शब्द 'यस्थिति' का द्योतक है और 'जाओ द्विदीओ से स्थितिगत निषेकोंका परिमाण लिया गया । उदाहरणस्वरूप पाँच निद्राओंकी उत्कृष्ट यस्थिति पूरी तीस कोडाकोड़ी सागरप्रमाण बतलाई है और निषेकोंके अनुसार स्थितियाँ एक समय कम तीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण बतलाई हैं। अभिप्राय इतना है कि पाँच निद्राओंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध होते समय उदय नहीं होता, इसलिए पूरी स्थिति तीस कोड़ाकोड़ी सागर होकर भी उस समय सब निषेक एक कम तीस कोडाकोड़ी सागरप्रमाण होते हैं, क्योंकि अनुदयवाली प्रकृतियोंका एक निषेक उदय समयके पूर्व स्तिवुक संक्रमणके द्वारा अन्य प्रकृतिरूप परिणत होता रहता है, इसलिए इनकी यस्थिति तीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण होकर भी निषेकोंके अनुसार स्थिति एक समय कम होती है । यहाँ बन्धके समय आबाधा कालके भीतर प्राक्तनबद्ध कर्मों के निषेकका सत्त्व होनेसे एक समय कम तीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण निषेक बन जाते हैं इतना विशेप जानना चाहिए। यहाँ पर विशेष नियम इस प्रकार जानना चाहिए- १-जिन कर्मोंका स्वोदयसे स्थितिबन्ध होता है उनकी यस्थिति और निषेकोंके परिमाणके अनुसार स्थिति समान होती है। बन्धोत्कृष्ट स्थितिके समान ही उनका दोनों प्रकारका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म होता है। २-जिन कर्मों का परोदयमें उत्कृष्ट स्थितिबन्ध होता है उनकी उत्कृष्ट यस्थिति तो वन्धोत्कृष्ट स्थितिके ही समान होती है । मात्र निषेकोंके परिमाणके अनुसार उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म बन्धोत्कृष्ट स्थितिसे एक समय कम होता है। ३-जिन कर्मों का स्वोदयमें उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमसे उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म प्राप्त होता है उनकी उत्कृष्ट यत्स्थितिसत्कर्म और निषेकोंके परिमाणके अनुसार उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म तज्जातीय कर्मके उत्कृष्ट स्थितिबन्धसे एक आवलि कम होता है। मात्र सम्यक्त्वका उक्त दोनों प्रकारका Rher .

( १४ ) उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म अन्तर्मुहूर्त कम जानना चाहिए, क्योंकि मिथ्यात्व गुणस्थानमें मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध होकर अन्तर्मुहूर्तमें सम्यक्त्व प्राप्त होनेपर मिथ्यात्वकी अन्तर्मुहूर्त कम उत्कृष्ट स्थितिका सम्यक्त्वरूपसे संक्रमण होता है। ४-जिन कर्मों का परोदयमें उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमसे उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म प्राप्त होता है उनकी उत्कृष्ट यत्स्थिति तज्जातीय कर्मके उत्कृष्ट स्थितिबन्धसे एक आवलि कम होती है और निषेकोंके परिमाणके अनुसार उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म तज्जातीय कमके उत्कृष्ट स्थितिबन्धसे एक समय अधिक एक आवलि कम होता है। मात्र सम्थग्मिथ्यात्वका उक्त दोनों प्रकारका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म मिथ्यात्वके उत्कृष्ट स्थितिबन्धसे अन्तर्मुहूर्त कम जानना चाहिए। कारणका कथन स्पष्ट है। ५-चारों आयुओंका उत्कृष्ट अबाधा काल सहित उत्कृष्ट स्थितिबन्ध उत्कृष्ट यत्स्थिति- सत्कर्म होता है और अपने अपने निषेकोंके परिमाणके अनुसार निषेकगत उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म होता है। इसीप्रकार जघन्य स्थितिसत्कर्मके विषयमें भी अलग अलग प्रकृतियोंको ध्यानमें रखकर नियम घटित कर लेने चाहिए। अनुभागसत्कर्मका विचार करते हुए पहले क्रमसे स्पर्धकप्ररूपणा, घातिसंज्ञा और स्थान- संज्ञाका प्ररूपण करके जघन्य और उत्कृष्ट स्वामित्व और कुछ मार्गणाओंमें अल्पबहुत्वका विचार किया गया है। अनुभागसत्कर्मके पश्चात् प्रदेश उदीरणाके आश्रयसे अल्पबहुत्व बतलाते हुए मूल और उत्तर प्रकृतियोंका आलम्बन लेकर वह बतलाया गया है। आगे उत्तरप्रकृतिसंक्रम, महनीय सम्बन्धी प्रकृतिस्थानसंक्रम, जघन्य स्थितिसंक्रम, अनुभागसंक्रम, जघन्य और उत्कृष्ट स्थितिके आश्रयसे प्रदेशसंक्रम और स्वतन्त्ररूपसे प्रदेशसंक्रमके अल्पबहुत्वका विचार करके प्रदेशसंक्रम अधिकारको पूर्ण किया गया है । इसके पश्चात् पहले कहे गये लेश्या, लेश्यापरिणाम, लेश्याकर्म, सात-असात, दीर्घ-हस्व, भवधारण, पुद्गलात्त, निधत्त-अनिधत्त, निकाचित-अनिकाचित, कर्मस्थिति और पश्चिमस्कन्ध इन अनुयोगद्वारोंका पुनः पृथक्-पृथक् उल्लेख करके अलग अलग सूचनाएँ दी गई हैं। अन्तमें महावाचक क्षमाश्रमणके अभिप्रायानुसार अल्पबहुत्व अनुयोगद्वारके आश्रयसे सत्कर्मका विचार करते हुए उत्तरप्रकृतिसत्कर्म अल्पबहुत्वदण्डक, मोहनीय प्रकृतिस्थानसत्कर्म अल्पवहुत्व, उत्तर- प्रकृतिस्थितिसत्कर्म अल्पबहुत्व, उत्तरप्रकृतिअनुभागसत्कर्म अल्पबहुत्व और उत्तरप्रकृतिप्रदेश- सत्कर्म अल्पबहुत्व देकर अल्पबहुत्वके साथ चौबीस अनुयोगद्वार समाप्त करनेके साथ धवला समाप्त होती है।

विषय -सूची स्वरूपनिर्देश विषय पृष्ठ | विषय मोक्ष-अनुयोगद्वार ३३७-३३६ | उस विपयमें अर्थपद मल्लिंजिन की स्तुति अपकर्षणका स्वरूपनिर्देश ३३७ मोक्ष अनुयोगद्वार कहनेकी प्रतिज्ञा उत्कर्षणका ३३७ मोक्षका चार प्रकारका निक्षेप और उत्तरप्रकृतिके आश्रयसे प्रमाणानुगम उनकी व्याख्या स्वामित्वविचार ३३७ कमंद्रव्यमोक्षके चार भेद एक जीवकी अपेक्षा काल ३३७ प्रकृतिद्रव्यमोक्षके दो भेद तथा एक जीवकी अपेक्षा अन्तर प्रत्येक के दो दो उत्तर भेद नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचय ३३७ प्रकृतिमोक्षका अर्थपद नाना जीवोंकी अपेक्षा काल ३३७ नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर स्थितिमोक्षके दो भेद और अर्थपद ३३७ अनुभागमोक्षका अर्थपद अल्पबहुत्व ३३८ प्रदेशमोक्षका अर्थपद भुजगारसंक्रमविचार ३३८ एक जीवकी अपेक्षा काल नोकर्मद्रव्यमोक्षके तीन भेद और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर उनकी व्याख्या ३३८ अपबहुत्व संक्रम-अनुयोगद्वार ३३६-४८३ | पदनिक्षेप संक्रमकी सूचना मुनिसुव्रत नाथकी स्तुति ३३६ वृद्धिसंक्रम संक्रम अनुयोगद्वार कहनेकी प्रतिज्ञा अनुभागसंक्रमविचार ३३६ संक्रमका छह प्रकारका निक्षेप आदिस्पर्धकनिर्देश और उनकी व्याख्या अर्थपद ३३६ कर्मसंक्रमका प्रकरण है यह सूचित प्रकृतोपयोगी अल्पबहुत्व कर उसके चार भेदोंका निर्देश ३४० | प्रमाणानुगम प्रकृतिसंक्रमका अर्थपद ३४० स्वामित्व मूलप्रकृतिसंक्रमका निषेध एक जीवकी अपेक्षा काल ३४० उत्तरप्रकृतिसंक्रमका स्वामित्व ३४० एक जीवकी अपेक्षा अन्तर एक जीवकी अपेक्षा काल ३४२ | नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचय एक जीवकी अपेक्षा अन्तर ३४२ | नाना जीवोंकी अपेक्षा काल नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचय ३४४ | नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नाना जीवोंकी अपेक्षा काल ३४४ | सन्निकर्ष अल्पबहुत्व ३४४ | अल्पबहुत्व प्रकृतिस्थानसंक्रमका विचार ३४६ भुजगारसंक्रमका अर्थपद स्थितिसंक्रमके दो भेद ३४७ | एक जीवकी अपेक्षा काले ३४७ ३४८ ३४६ ३५२ ३५४ ३५६ ३६१ ३६२ ३६३ ३६४ ३६९ ३७० ३७१ ३७२ ३७३ ३७३ ३७४ ३७४ ३७६ ३७७ ३७७ ३८२ ३८७ ३८८ ३८९ ३६१ ३६२ ३६२ ३६८ ३६६ ५ ४८७ (१६) विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ अल्पबहुत्व छह द्रव्यलेश्याओंका वर्णन ४८५ पदनिक्षेपमें स्वामित्व ४०१ / किस लेश्यामें किस क्रमसे कितने अल्पबहुत्व ४०५ | प्रमाणमें कौन कौन रंग होते हैं वृद्धिसंक्रममें स्वामित्व ४०६ । इसका विचार एक जीवकी अपेक्षा काल ४०६ | भावलेश्याओंका विचार ४८८ एक जीवकी अपेक्षा अन्तर ४०६ लेश्याकर्म-अनुयोगद्वार ४६०-४६२ अल्पबहुत्व ४०७ कुंथुजिनकी स्तुति प्रदेशसत्कर्ममें अर्थपद ४६० ४०८ किस लेश्याका क्या कर्म है इसका विचार ४६० उत्तरप्रकृतिसंक्रमके पाँच भेद ४०८ कितनी प्रकृतियोंके कितने संक्रम लेण्यापरिणाम-अनुयोगद्वार. ४६३-४६७ होते हैं इसका विचार ४०६ | अभिनन्दनजिनकी स्तुति ४६३ उद्वेलनप्रकृतियोंके उद्वेलनक्रमका निर्देश ४१६ लेश्यापरिणाम अनुयोगद्वारके पाँच संक्रमभागहारोंका अल्पबहुत्व ४२१ | कथनकी सार्थकता ४६३ उत्तर प्रकृतियोंके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका छह लेश्याओंके परिणमनकी विधि ४६३ . स्वामित्व ४२१ । जघन्य और उत्कृष्ट संक्रम और जघन्य प्रदेशसंक्रमस्वामित्व ४३२ । प्रतिग्रहोंका तीव्र-मन्दताकी अपेक्षा उत्तरप्रकृतियोंके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका काल ४४१ | अल्पबहुत्व .४९५ जघन्य प्रदेशसंकम तथा अन्य अनुयोग- द्वारोंके जाननेकी सूचना ४४२ सातासात-अनुयोगद्वार ४६८-५०६ उत्तर प्रकृतियोंके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका अजितजिनकी स्तुति ४६८ 'अल्पबहुत्व ४४२ सातासातके पाँच अनुयोगद्वार ४९८. उत्तर प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशसंक्रमका समुत्कीर्तना ४६८ अल्पबहुत्व ४६८ भुजगारसंक्रममें स्वामित्व ४६८ एक जीवकी अपेक्षा काल ४६ ५०१ अल्पबहुत्व ४५६ / प्रमाणानुगम पदनिक्षेपमें स्वामित्व ४६१ / अल्पबहुत्व ५०२ अल्पबहुत्व ४७६ | दीर्घ-हस्व-अनुयोगद्वार ५०७-५११ वृद्धिसंक्रम ४८१ सम्भवजिनकी स्तुति ५०७ लेश्या-अनुयोगद्वार ४८४-४८६ । दीर्घके चार भेद : ५०७ अरजिनकी स्तुति ४८४ प्रकृतिदीर्घका विचार ૫ ૦૭ लेश्याका चार प्रकारका निक्षेप विचार ४८४ स्थितिदीर्घका विचार ५०८ तद्वयतिरिक्त द्रव्यलेश्याके छह अनुभागदीर्घ और प्रदेशदीर्घका विचार ५०९ भेदोंका विचार ४८४ । हस्वके चार भेद ५०६ प्रकृतमें नैगमनयकी अपेक्षा नोआगम प्रकृतिहस्वका विचार ५०६ द्रव्यलेश्या और नोआगम भावलेश्या स्थितिहस्वका विचार . : ५.१०. का प्रकरण है इसकी सूचना ४८५ | अनुभागह्रस्वका विचार ४४८ | अर्थपद ४५३ , पदमीमांसा ४५४ | स्वामित्व -- .

(१७) पृष्ठ | विपय पृष्ठ ho विषय प्रदेशह्रस्वका विचार : ५११ मार्गणाओंका विचार किया जाता भवधारणीय-अनुयोगद्वार ...५१६ इस वातका निर्देश: ५१२-५१३ सिद्ध होनेवाले जीवकी अन्य प्ररूपणा ५१६ सुमतिजिनकी स्तुति ५१२ | आवर्जितकरणके बाद केवलिसमुद्घातमें भवके तीन भेदोंका स्वरूपनिर्देश ५१२ होनेवाले कार्यविशेषका निर्देश ::५१९ अमूर्त जीवका मूर्त पुद्गलके साथ कैसे योगनिरोध आदि कार्य विशेषोंका निर्देश ५२० सम्बन्ध होता है इसका विचार ५१३ अपूर्वस्पर्धक करनेकी प्रक्रिया ५२० भवग्रहणभवका विशेष विचार ५१३ | कृष्टिकरणकी प्रक्रिया और क्षपणका प्रकार ५२१ पुद्गलात्त-अनुयोगद्वार ५१४-५१५ अल्पबहुत्व-अनुयोगद्वार ५२२-५६३ पद्मप्रभजिनकी स्तुति ५१४ नागहस्तिभट्टारकके अनुसार सत्कर्मका पुद्गलात्तका चार प्रकारका निक्षेप और विचार ५२२ उनका विशेष विचार ५१४ । सत्कर्मके चार भेद ५२२ पुद्गलात्तका स्पष्टीकरण और उसका पाँच प्रकृतिसत्कर्मके भेद करके उनमें स्वामित्वका प्रकारसे विचार ५१४ विचार ५२२ पुद्गलात्तका दूसरा अर्थ पुद्गलात्मा शेष अनुयोगद्वारोंकी सूचना करके करके विचार ५१४ अल्पबहुत्वका विचार ५२४ निधत्त-अनिधत्त-अनुयोगद्वार प्रकृतिसत्कर्मके भेद करके उत्तरप्रकृति- ५९६ सत्कर्मके अद्धाच्छेदका विचार सुपार्श्वजिनकी स्तुति ५१६ स्वामित्वविचार ५३१ निधत्तके चार भेद ५१६ | अल्पबहुत्वविचार ५६६ अर्थपद ५१६ अनुभागसत्कर्ममें आदिस्पर्धकका विचार ५३८ निधत्त और अनिधत्तका विशेष विचार ५१६ घातिसंज्ञा और स्थानसंज्ञाका विचार ५३६ ५४० निकाचित-अनिकाचित अनुयोगद्वार ५१७ स्वामित्वविचार अल्पबहुत्व चन्द्रजिनकी स्तुति ५१७, प्रदेशउदीरणामें मूलप्रकृतिदण्डक व अन्य निकाचितके चार भेद ५१७ प्रकृतियोंका अल्पबहुत्व ५५२ अर्थपद ५१७ | उत्तरप्रकृतिसंक्रममें अलरबहुत्व निकाचित-अनिकाचितका विशेष विचार ५१७ | मोहनीय प्रकृतिस्थानसंक्रमका अल्पबहुत्व ५५६ अल्पबहुत्व ५१७ जघन्य स्थितिसंक्रम अल्पंबहुत्व ५५.६ कर्मस्थिति-अनुयोगद्वार ५१८ जघन्य अनुभागसंक्रम अल्पवहुत्व पुष्पदन्तजिनकी स्तुति जघन्य व उत्कृष्ट स्थितिसंक्रम अल्पबहुत्व ५५६. ५१८ दो उपदेशोंका निर्देश लेश्या अनुयोगद्वार में आठ अनुयोग- ५१८ द्वारोंका निर्देश ५७१ पश्चिमस्कन्ध-अनुयोगद्वार ५१६-५२० लेश्यापरिणाम अनुयोगद्वारमें दस भवके तीन भेद करके भवग्रहणभव प्रकृत विस्तारपदोंका निर्देश ५७२ ५१६ | लेश्याकर्म अनुयोगद्वारमें पञ्चविधिक पश्चिमस्कन्धमें बन्धमार्मणा आदि पाँच पदोंका निर्देश ५७२ ५२८८ ५४४ ५५५ ५५७ है इसका निर्देश

पृष्ठ | विषय
५७७
( १८ .)
विषय
पृष्ठ
सातासात अनुयोगद्वारमें विशेष विचार ५७१ | कर्मस्थिति अनुयोगद्वारमें विशेष विचार ५७७
दीर्घ-हस्व अनुयोगद्वारमें विशेष विचार ५७५ । पश्चिमस्कन्धमें विशेष विचार
भवधारण अनुयोगद्वारमें विशेष विचार પૂ.
महावाचक क्षमाश्रमणके मतानुसार
पुद्गलात्त अनुयोगद्वारमें विशेष विचार ५७५ | सत्कर्मका अल्पबहुत्व
५७६
निधित्त-अनिधत्त अनुयोगद्वारमें विशेष मोहनीयके प्रकृतिस्थानसत्कर्मका
विचार
निकाचित-अनिकाचित अनुयोगद्वारमें उत्तरप्रकृतिस्थितिसत्कर्मका अल्पबहुत्व ५८१
विशेष विचार
५७६
५७६ अल्पबहुत्व
५८०

मोक्खादि-सेस-अणियोगद्दाराणि

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११ मोक्खाणियोगदारं महुवरमहुवरवाउलवियसियसियसुरहिगंधमल्लेहि । मल्लिजिणमच्चियूण य मोक्खणियोगो परूवेमो ॥१॥ मोक्खे त्ति अणियोगदारे मोक्खो णिक्खिवियन्यो- णाममोक्खो ढवणमोक्खो दव्यमोक्खो भावमोक्खो चेदि मोक्खो चउव्विहो । णाममोक्खो ढवणमोक्खो आगमदो दव्यमोक्खो आगम-णोआगमभावमोक्खो च सुगमो। जो सो णोआगमदो दव्य- मोक्खो सो दुविहो कम्ममोक्खो णोकम्ममोक्खो चेदि। णोकम्ममोक्खो सुगमो । कम्मदव्वमोक्खो चउबिहो पयडिमोक्खो द्विदिमोक्खो अणुभागमोक्खो पदेसमोक्खो चेदि । पयडिमोक्खो दुविहो मूलपयडिमोक्खो उत्तरपयडिमोक्खो चेदि । तत्थ एक्केको दुविहो देसमोक्खो सचमोक्खो चेदि । तत्थ अट्ठपदं-जा पयडी णिजरिजदि अण्णपयडि वा संकामिजदि एसो पयडिमोक्खो णाम । एसो पयडिमोक्खो सुगमो, पयडिउँदय-पयडिसंकमेसु अंतब्भावादो । ठिदिमोक्खो दुविहो उक्स्सो जहण्णो चेदि । एत्थ अट्ठपदं । तं जहा- ओकड्डिदा वि उक्कडिदा वि अण्णपयडिं संकामिदा मधुको करनेवाले भ्रमरोंसे व्याकुल ऐसे विकसित, धवल और सुगन्धित पुष्पोंके द्वारा मल्लि जिनेन्द्रकी पूजा करके मोक्ष-अनुयोगद्वारकी प्ररूपणा करते हैं ॥१॥ मोक्ष इस अनुयोगद्वार में मोक्षका निक्षेप करना चाहिये- वह मोक्ष नाममोक्ष, स्थापना- मोक्ष, द्रव्यमोक्ष और भावमोक्षके भेदसे चार प्रकारका है। इनमें नाममोक्ष, स्थापनामोक्ष, आगमद्रव्यमोक्ष, आगमभावमोक्ष और नोआगमभावमोक्ष, ये सुगम हैं। जो नोआगमद्रव्यमोक्ष है वह दो प्रकारका है- कर्ममोक्ष और नोकमेमोक्ष । इनमें नोकर्ममोक्ष सुगम है । कर्मद्रव्यमोक्ष चार प्रकारका है- प्रकृतिमोक्ष, स्थितिमोक्ष, अनुभागमोक्ष और प्रदेशमोक्ष । प्रकृतिमोक्ष दो प्रकारका है- मूलप्रकृतिमोक्ष और उत्तरप्रकृतिमोक्ष। उनमें प्रत्येक देशमोक्ष और सवमोक्षके भेदसे दो प्रकारका है। उनमें अर्थपद बतलाते हैं- जो प्रकृति निर्जराको प्राप्त होती है अथवा अन्य प्रकृति में सक्रान्त होती है, यह प्रकृतिमोक्ष कहलाता है। यह प्रकृतिमोक्ष सुगम है, क्योंकि, उसका अन्तर्भाव प्रकृति-उदय और प्रकृतिसंक्रममें होता है। स्थितिमोक्ष उत्कृष्ट और जघन्यके भेदसे दो प्रकारका है। यहां अर्थपद बतलाते हैं। वह इस प्रकार है- अपकर्षणको प्राप्त हुई, १ मप्रतिपाठोऽयम् । अ-का-ताप्रतिपु 'णोआगमवमोक्खो' इति पाठः । २ मप्रतिपाठोऽयम् । अप्रती 'णाम सो सुगमो पयडि', काप्रती 'णाम पयडि', ताप्रतौ ‘णाम एसो सुगमो, पयडि' इति पाठः । छ. से. ४३ ३३८ छक्खंडागमे संतकम्म -- वि अधद्विदीएं णिजरिदा वि द्विदी द्विदिमोक्खो । एदेण अट्ठपदेण उक्कस्साणुक्कस्स- जहण्णाजहण्णहिदिमोक्खो परूवेयव्यो । अणुभागमोक्खे अट्ठपदं । तं जहा- ओकड्डिदो उक्कड्डिदो अण्णपयडिं संकामिदो अघहिदि गलणाए णिजिण्णो वा अणुभागो अणुभाग- मोक्खो। एदेण अट्ठपदेण उक्कस्साणुकस्स-जहण्णाजहण्णअणुभागमोक्खी परूवेयव्यो। पदेसमोक्खें अट्ठपदं। तं जहा- अधढिदिंगलणाए पदेसाणं णिजरा पदेसाणमण्ण- पयडीसु संकमो वा पदेसमोक्खो णाम । एसो वि उक्कस्साणुकस्स-जहण्णाजहण्ण- भेदेण णेयव्यो। णोकम्मदव्यमोक्खो सुगमो । अधवा, णोआगमदो दव्यमोक्खो मोक्खो मोक्ख- कारणं मुत्तो चेदि तिविहो । जीव-कम्माणं वियोगो मोक्खो णाम ! णाण-दंसण-चर- णाणि मोक्खकारणं । सयलकम्मवजियो अणंतणाण-दसण-बीरिय-चरण-सुह-सम्मत्तादि- गुणगणाइण्णो णिरामओ णिरंजणो णिचो कयकिच्चो मुत्तो णाम । एदेसि तिणं पि णिक्खेव-णय-णिरुत्तिअणियोगद्दारेहि हेउगम्भेहि परूवणा कायव्वा । एवं कदे मोक्खणि- ओगद्दारं समत्तं होदि। उत्कर्षणको प्राप्त हुई, अन्य प्रकृति में संक्रान्त हुई, और अधःस्थितिके गलनेसे निर्जराको भी प्राप्त हुई स्थितिका नाम स्थितिमोक्ष है। इस अर्थपदके आश्रयसे उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अज- घन्य स्थितिमोक्षकी प्ररूपणा करना चाहिये । अनुभागमोक्षके सम्बन्धमें अर्थपदका कथन करते हैं। वह इस प्रकार है- अपकर्षणको प्राप्त हुआ, उत्कर्षणको प्राप्त हुआ, अन्य प्रकृति में संक्रान्त हुआ, और अधःस्थितिगलनके द्वारा निर्जराको भी प्राप्त हुए अनुभागको अनुभागमोक्ष कहा जाता है । इस अर्थपदके आश्रयसे उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य अनुभागमोक्षकी प्ररूपणा करना चाहिये । प्रदेशमोक्षके विषयमें अर्थपद कहते हैं। वह इस प्रकार है- अधःस्थितिगलनके द्वारा जो प्रदेशोंकी निर्जरा और प्रदेशोंका अन्य प्रकृतियों में संक्रमण होता है उसे प्रदेशमोक्ष कहा जाता है। इसको भी उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्यके भेदसे ले जाना चाहिये। नोकर्मद्रव्यमोक्ष सुगम है । अथवा नोआगमद्रव्यमोक्ष मोक्ष, मोक्षकारण और मुक्तके भेदसे तीन प्रकारका है। जीव और कर्मका पृथक् होना मोक्ष कहलाता है । ज्ञान, दर्शन और चरित्र ये मोक्षकारण हैं । समस्त कर्मों से रहित; अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्तवीर्य, चारित्र, सुख और सम्यक्त्व आदि गुणगणोंसे परिपूर्ण; निरामय, निरंजन, नित्य और कृतकृत्य जीवको मुक्त कहा जाता है । इन तीनोंकी ही प्ररूपणा हेतुगर्भित निक्षेप, नय और निरुक्ति अनुयोगद्वारोंसे करना चाहिये। ऐसा करनेपर मोक्ष-अनुयोगद्वार समाप्त होता है। , १ ताप्रतौ 'अवहिदा वि' इति पाठः। २ ताप्रतौ 'वि द्विदी ए (हि) दिमोक्खो' इति पाठः । ३ अ-काप्रत्योः 'अणुभागमोक्खो', ताप्रतौ 'अणुभागमोक्खो ( क्खे ) इति पाठः । ४ अ-ताप्रत्योः 'अवट्टिदि' इति पाठः । ५ काप्रतौ 'पदेसमोक्खो' इति पाठः । ६ अ-ताप्रत्योः 'अवहिदि' इति पाठः।

१२ संकमाणियोगदारं मुणिसुव्ययदेसयरं पणमिय मुणिसुव्ययं जिणं देवं । संकममणिओगमिणं जहासुझं जहासुझं वण्णइस्सामो ॥१॥ संकमे ति अणिओगद्दारे संकमो णिक्खिपियव्यो। तं जहा- णामसंकमो ढवणसंकमो दवियसंकमो खेत्तसंकमो कालसंकमो भावसंकमो चेदि छविहो संकमो। तत्थ संकमसदो णामसंकमो णाम। सोएसोत्ति अण्णस्स सरूवं बुद्धीए णिधत्तोढवणसंकमो णाम । दवियसंकमो दुविहो आगम-णोआगमदवियसंकमो चेदि । आगमदवियसंकमो सुगमो। णोआगमदवियसंकमो जाणुगसरीर-भविय-तन्यदिरित्तदवियसंकमभेदेण तिविहो। जाणुगसरीर-भवियदव्यसंकमा सुगमा। तव्यदिरित्तसंकमो दुविहो णोकम्मसंकमो कम्मसंकमो चेदि । णोकम्मसंकमो जहा मट्टियाए घडसरूवेण परिणामो। कम्म- संकमो थप्पो । एगक्खेत्तस्स खेत्तरगमणं खेत्तसंकमो णाम । किरियाविरहिदस्स खेत्तस्स कधं संक्रमो ? ण, जीव-पोग्गलाणं सकिरियाणं आधेये आधारोवयारेण लखेत्तववएसाणं संकमुवलंभादो। ण च खेत्तस्स संकमववहारो अप्पअिद्धो, उड्ढलोगो संकतो त्ति मुनियोंके उत्तम चरित्रका उपदेश करनेवाले मुनिसुव्रत जिनेन्द्रको नमस्कार करके श्रुतके अनुसार संक्रम-अनुयोगद्वारका वर्णन करते हैं ॥१॥ संक्रम इस अनुयोगद्वार में संक्रमका निक्षेप किया जाता है। वह इस प्रकारसे- नामसंक्रम, स्थापनासंक्रम, द्रव्यसंक्रम, क्षेत्रसंक्रम, कालसंक्रम और भावसंक्रमके भेदसे संक्रम छह प्रकारका है। उनमें 'संक्रम' यह शब्द नामसंक्रम कहलाता है । 'वह यह है' इस प्रकार अन्यके स्वरूपको बुद्धिमें स्थापित करना, यह स्थापनासंक्रम है। द्रव्यसंक्रम दो प्रकारका है- आगमद्रव्यसंक्रम और नोआगमद्रव्यसंक्रम । इनमें आगमद्रव्यसंक्रम सुगम है। नोआगमद्रव्यसंक्रम ज्ञायकशरीर, भव्य और तद्व्यतिरिक्त द्रव्यसंक्रमके भेदसे तीन प्रकार है। इनमें ज्ञायकशरीर और भव्य द्रव्यसंक्रम सुगम हैं। तद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यसक्रम दो प्रकारका है- नोकर्मसंक्रम और कर्मसंक्रम । नोकर्मसंक्रम-जैसे मिट्टीका घट स्वरूपसे परिणमनं। कर्मसंक्रमको अभी स्थगित किया जाता है। एक क्षेत्रके क्षेत्रान्तरको प्राप्त होनेका नाम क्षेत्रसंक्रम है। शंका-क्षेत्र तो क्रियासे रहित है, फिर उसका क्षेत्रान्तरमें गमन कैसे सम्भव है ? समाधान- नहीं, क्योंकि आधेयमें आधारका उपचार करनेसे सक्रिय जीव और पुद्गलोंकी 'क्षेत्र' संज्ञा सम्भव है और उनका संक्रम पाया ही जाता है। दूसरे, क्षेत्रके संक्रमका व्यवहार अप्रसिद्ध भी नहीं है, क्योंकि, ऊर्ध्वलोक संक्रान्त हुआ, ऐसा व्यवहार पाया जाता है। १ अ-काप्रत्योः 'बद्ध', ताप्रतौ 'ब (ल) द्ध' इति पाठः ।

३४० छक्खंडागमे संतकम्म चवहारुवलंभादो । कालस्सपुवस्स पादुभावो कालसंकमो णाम | ण च एसो असिद्धो, संकेतो हेमंतो तिं ववहारुवलंभादो। संपहि उप्पण्णस्स कथं संकमो ? ण, पोग्गलाणं उप्पाद-वय-धुवभावाणमुक्यारेण पत्तकालववएसाणं एयंतेण उप्पादाभावादो। अधवा, ए गक्खेत्तम्हि द्विददव्यस्स खेत्तरगषणं खेत्तसंकमो । एगकालमिम द्विददव्यस्स कालंतरगमणं कालसंकमो । कोधादिएगभावम्हि द्विददव्वस्स भावतरगमणं भावसंकमो । तत्थ कम्मसंकमे पयदं । सो चउबिहो पयडिसंकमो द्विदिसंकमो अणुभागसंकमो पदेससंकमो चेदि । तत्थ पयडिसंकमे अट्ठपदं-जा पयडी अण्णपयर्डि णिजदि एसो पय- डिसंकमो। एदेण अट्ठपदेण संकसे भण्णमाणे तत्थ मूलपयडिसंकमो णत्थि। कुदो? साभा- वियादो । उत्तरपयडिसंकमे सामित्तं- बंधे संकमो, अबंधे णत्थि । कुदो? साभावियादो । पंचण्णं णाणावरणीयाणं संकामओ को होदि ? अण्णदरो सकसाओ ? णवणं दसणावरणीयाणं पंचण्णमंतराइयाणं च णाणावरणभंगो। सादस्स संकामओ को होदि ? जो असादस्स बंधओ। असादस्स संकामओ को होदि ? जो सादस्स बंधओ अपूर्व कालके प्रादुर्भावका नाम कालसंक्रम है। यह असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि हेमन्त ऋतु संक्रान्त हुई, ऐसा व्यवहार पाया जाता है। शंका- उत्पन्नका संक्रम कैसे हो सकता है ? समाधान- नहीं, क्योंकि उपचारसे काल संज्ञाको प्राप्त हुए पुद्गलोंके उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यके एकान्ततः उत्पादका अभाव है। अथवा एक क्षेत्र में स्थित द्रव्यके क्षेत्रान्तर गमनको क्षेत्रसंक्रम, एक कालमें स्थित द्रव्यके कालान्तर गमनको कालसंक्रम, और क्रोधादिक एक किसी भाव में स्थित द्रव्यके भावान्तर गमनको सावसंक्रम समझना चाहिये। उनमें यहां कर्मसंक्रम प्रकृत है। वह चार प्रकारका है- प्रकृतिसंक्रम, स्थितिसंक्रम, अनुभागसंक्रम और प्रदेशसंक्रम । इनमेंसे प्रकृतिसंक्रमके विषयमें अर्थपदका कथन करते हैं: जो एक प्रकृति अन्य प्रकृतिस्वरूपताको प्राप्त करायी जाती है, यह प्रक्रतिसंक्रम कहलाता है । इस अर्थपदके अनुसार संक्रमका कथन ,करनेपर मूलाकृतिसंक्रम सम्भव नहीं है, क्योंकि, ऐसा स्वभाव है। उत्तरप्रकृतिसंक्रममें स्वामित्वकी प्ररूपणा की जाती है- बन्धके होनेपर संक्रम सम्भव है, बन्धके अभाव में वह सम्भव नहीं है, क्योंकि, ऐसा स्वभाव है । पांच ज्ञानावरणीय प्रकृतियोंका संक्रामक कौन होता है ? उनका संक्रामक अन्यतर सकषाय जीव होता है। नौ दर्शनावरणीय और पांच अन्तरायके संक्रमणकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है। सातवेदनीयका संक्रामक कौन होता है ? जो असाताका बन्धक है वह साताका संक्रामक होता है । असाताका संक्रामक कौन होता है ? जो सकषाय जीव साताका बन्धक होता १. कापतौ 'णाम एसो असिद्धो संकेतो होतो त्ति' इति पाठः । २ अ-काप्रत्योः 'संकमो', तापतौ 'संकमो ( मे ) इति पाठः । ३ अप्रतौ 'संकमओ', का-ताप्रत्योः 'संकमो' इति पाठः । ४ मप्रती 'संकमओ' इति पाठः। - ? ?

r संकमाणियोगदारे पयडिसंकमो ३४१ सकसाओ। दंसणमोहणीयं चरित्तमोहणीए ण संकमदि, चरित्तमोहणीयं पि दंसण- मोहणीए ण संकमदि। कुदो ? साभावियादो। सम्मामिच्छाइट्ठी दंसणमोहणीयस्स असंकामगो। एवं सासणो वि। सम्मत्तस्स णियमा मिच्छाइट्ठी संकामगो जस्स आवलिकावाहिरसंतकम्ममस्थि । मिच्छत्तस्स संकामओ को होदि ? सम्माइट्ठी जस्स आवलियबाहिरं मिच्छत्तस्स संतकम्ममत्थि । सम्मामिच्छत्तस्स संकामगो को होदि ? सम्माइट्ठो मिच्छाइट्ठी वा जस्त आवलियबाहिरं संतकम्ममत्थि । वारसणं कसायाणं णाणावरणभंगो। इत्थिवेदस्स संकामओ को होदि १ जाव इत्थिवेदो चरिम- समयअणुवसंतो चरिमसमयअक्खीणो वा । णqसयवेदस्स इस्थिवेदभंगो। पुरिसवेदस्स संकामगो को होदि ? जाब पुरिसवेदो पढमसमयउपसंतो पढमसमयखीणो वा । तिण्णं संजलणाणं पुरिसवेदभंगो। लोहसंजलणाए संकामओ को होदि ? उवसामया खवगा च, जाव अंतरं चरिमसयअकदं ति अक्खयय-अणुवसासओ च । चदुण्णमाउआणं संकमो णस्थि । कुदो १ साभावियादो । सबासि पि णामपयडीणं . है। दर्शनमोहनीय चारित्रमोहनीयमें संक्रान्त नहीं होती और चारित्रमोहनीय भी दर्शनमोहनीयमें सक्रान्त नहीं होती, क्योंकि, ऐसा स्वभाव है। सम्यग्मिथ्यावष्टि जीव दर्शनमोहनीयका असंक्रामक होता है। इसी प्रकार सासादनसम्यग्दृष्टि भी दर्शनमोहनीयका असंक्रामक होता है। सम्यक्त्व- प्रकृतिका संक्रामक नियमसे मिथ्यादृष्टि जीव होता है, जिसके कि उसका सत्कर्म आवलीके बाहिर होता है । मिथ्यात्वका संक्रामक कौन होता है ? उसका संक्रामक सम्यग्दृष्टि होता है, जिसके मिथ्यात्वका सत्कर्म आवलीके बाहिर होता है। सम्यग्मिथ्यात्वका संक्रामक कौन होता है ? उसका संक्रामक सम्यग्दृष्टि अथवा मिथ्यादृष्टि होता है, जिसके उसका सत्कर्म आवलीके बाहिर होता है। बारह कषायोंके संक्रमणकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है। स्त्रीवेदका संक्रामक कौन होता है ? स्त्रीवेदके अनुपशान्त रहने के अन्तिम समय तक अथवा उसके अक्षीण रहने के अन्तिम समय तक जीव उसका संक्रामक होता है। नपुंसकवेदके संक्रमणकी प्ररूपणा स्त्रीवेदके समान है। पुरुषवेदका संक्रामक कौन होता है ? पुरुषवेदके उपशान्त होनेके प्रथम समय तक अथवा उसके क्षीण होने के प्रथम समय तक जीव उसका संक्रामक होता है। तीन संज्वलनों- के संक्रमणकी प्ररूपणा पुरुषवेदके समान है। संज्वलन लोभका संक्रामक कौन होता है ? उसके संक्रामक उपशामक और क्षपक जीव होते हैं, अन्तर न किये जानेके अन्तिम समय तक अक्षपक व अनुपशामक जीव भी उसके संक्रामक होते हैं। चार आयु काँका संक्रम नहीं होता, क्योंकि, ऐसा स्वभाव है। यशकीर्तिको छोड़कर १ मोहदुगाउग-मूलपयडीण न परोप्परमि संकमण । संकम-बंधुदउध्वट्टणा (णव) लिगाईणकरणाई ।। क, प्र. २, ३. २ मप्रतिपाठोऽयम् । अ-का-ताप्रतिषु 'सामगो वि' इति पाठः । तथा सासादनाः सम्यग्मिथ्यादृष्टयश्च न किमपि दर्शनमोहनीयं कापि संक्रमयन्ति, अविशुद्धदृष्टित्वात् । बन्धाभावे हि दर्शनमोहनीयस्स संक्रमो विशुद्धदृष्टेरेव भवति, नाविशुद्धदृष्टेः । क. प्र. (मलय.) २, ३. ३ ताप्रतौ 'तिसंजल्याणं' इति पाठः । १ ३४२ छक्खंडागमें संतकम्म जसकित्तिवजाणं ताव संकमो जाव सकसाओ जाव आवलियबाहिरं च संतकम्ममत्थि जसकित्तीए ताव संकामगो जाव परभवियणामयपडीणं बंधदि । उच्चागोदस्स संकामओ को होदि ? जो णीचागोदस्स बंधओ जाव आवलियबाहिरं संतकम्ममत्थि। णीचागोदस्स संकामओ को होदि ? जो उच्चागोदस्स बंधओ सकसाओ। एवं सामित्तं समत्तं । एवजीवेण कालो-पंचणाणावरणीय-णवदंसणावरणीय-पणुवीसमोहणीय-अणुव्वेल्ल- माणसवणामपयडीणं' पंचंतराइयाणं च संकमो केवचिरं कालादो होदि ? अणादिओ अपञ्जवसिदो अणादिओ सपञ्जवसिदो सादिओ सपजरसिदो वा। जो सो सादिओ सपज्जवसिदो जहण्णेण अंतोमुहुत्तं, उक्क० उवड्ढपोग्गलपरियई। सादासादाणं जह० एगसमओ, उक्क० अंतोमुहत्तं । मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्ताणं जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० वेछावद्विसागरोवमाणि सादिरेयाणि । णवरि मिच्छत्तस्स छावद्विसागरो. सादिरेयाणि । सम्मत्तस्स जह० अंतोमुहुत्तं, उक्कस्सेण पलिदो० असंखे० भागो । णिरयगइ-देवगइणामाणं तदाणुपुयीणामाणं वेउब्धियसरीर-वेउब्धियसरीरअंगोवंग- वंधण-संघादाणं च जह० अवस्साणि सादिरेयाणि अंतोमुहुत्तं वा, उक्क० बेसागरोवम- सहस्साणि सादिरेयाणि । मणुसगइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुब्बीणं जह० अहवस्साणि शेष सभी नामप्रकृतियाँका तब तक संक्रम होता है जब तक कि जीव सकषाय है और जब तक उनका सत्कर्म आवली के बाहिर रहता है। यशकीर्तिका संक्रामक तब तक होता है जब तक पर- भविक नामप्रकृतियोंको बांधता है । उच्चगोत्रका संक्रामक कौन होता है ? जो नीचगोत्रका बन्धक होता है वह उच्चगोत्रका तब तक संक्रामक होता है जब तक उसका आवलीके बाहिर सत्कर्म रहता है। नीचगोत्रका संक्रामक कौन होता है ? जो सकषाय जीव उच्चगोत्रका बन्धक होता है वह नीचगोत्रका संक्रामक होता है । इस प्रकार स्वामित्व समाप्त हुआ। एक जीवकी अपेक्षा कालकी प्ररूपणा की जाती है- पांच ज्ञानावरणीय, नौ दर्शनावरणीय, पच्चीस मोहनीय, उद्वेलित न की जानेवाली सब नाम प्रकृतियां और पांच अन्तराय; इनका संक्रमण कितने काल होता है ? उनके संक्रमणका काल अनादि अपर्यवसित, अनादि-सपर्यवसित और सादि-सपर्यवसित भी है । इनमें जो सादि-सपर्यवसित है उसका प्रमाण जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपार्ध पुद्गलपरिवर्तन है। साता व असाता वेदनीयके संक्रमणका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे अन्तमुहूर्त मात्र है। मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्मके संक्रमणका काल जघन्यसे अन्तमुहूर्त और उत्कर्षसे कुछ अधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। विशेष इतना है कि मिथ्यात्वका वह काल साधिक छयासठ सागरोपम मात्र है। सम्यक्त्व प्रकृतिके संक्रमणका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। नरकगति, देवगति, नरकगत्यानुपूर्वी, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीरां- गोपांग, वैक्रियिकबन्धन और वैक्रियिकसंघात नामकर्मों के संक्रमणका काल जघन्यसे साधिक आठ-वर्प या अन्तर्मुहूर्त, और उत्कर्षसे साधिक दो हजार सागरोपम मात्र है। मनुष्यगति और मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी के संक्रमणका काल जघन्यसे साधिक आठ वर्षे या अन्तर्मुहूर्त और १ अ-काप्रत्योः 'पयडि' इति पाठः। - संकमाणियोगदारे पयडिसंकमो ३४३ सादिरेयाणि अंतोमुहत्तं वा, उक्क० असंखेजा पोग्गलपरियट्टा । उच्चागोदस्स जह० अंतो- मुहुत्तं, उक्क० तेत्तीसं सागरो० सादिरेयाणि । आहारससरीरे-आहारसरीरअंगोवंग-बंधण- संघादाणं जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० पलिदो० असंखे० भागो। तित्थयरणामाए जह० अंतोमुहुत्तं, उक० तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । णीचागोदस्स जह० अंतोमुहत्तं, उक्क० बेछावडिसागरोवमाणि तिहि पलिदोवमेहि अब्भहियाणि । एवं कालो समत्तो। अंतरं-जेसि कम्माणं तिभंगीयो कालो तेसिं जह० एगसमओ, उक्क० अंतोसुहत्तं । एवं सादासादाणं । वेउब्बियछक्कस्स जह० एगसमओ, उक्क० असंखेजा पोग्गल- परियट्टा । मणुसगइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुब्बी-उच्चा-णीचागोदाणं जह० एगसमओ, उक्क. असंखेजा लोगा । आहारसरीर-आहारसरीरअंगोवंग-बंधण- संघादाणं जह० एगसमओ, उक्क० उवड्ढपोग्गलपरियट्ट । तिथियरणामाए सादभंगो। सम्मत्त-मिच्छत्ताणं जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० उवडूढपोग्गलपरियट्ट । एवं सम्मामिच्छत्तस्स । णवरि जह० एगसमओ। अणंताणुबंधिचउक्क० जह० अंतोमु०, उक्क० वेछावढि सागरोत्रमाणि सादिरेयाणि । एवं अंतरपरूवणा समत्ता। उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। उच्चगोत्रके संक्रमणका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे साधिक तेतीस सागरोपम मात्र है। आहारकशरीर, आहारकशरीरांगोपांग, आहारकबन्धन और आहारकसंघातके संक्रमणका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है । तीर्थंकर नामकर्म के संक्रमणका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे साधिक तेतीस सागरोपम मात्र है। नीचगोत्रके संक्रमणका काल जघन्यसे अन्त- मुहूर्त और उत्कर्षसे तीन पल्योपम अधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। इस प्रकार कालका कथन समाप्त हुआ। अन्तर-जिन कर्मों के संक्रमका काल तीन भंग रूप है उनके संक्रमका अन्तरकाल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है । इसी प्रकार साता व असाता वेदनीयके विषयमें कहना चाहिये। वैक्रियिकषट्का प्रकृत अन्तरकाल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है । मनुष्यगति, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, उच्चगोत्र और नीच- गोत्रका वह अन्तरकाल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे असंख्यात लोक मात्र है । आहारशरोर, आहारशरीरांगोपांग, आहारशरीरबन्धन और आहारशरीरसंघातका अन्तरकाल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे उपार्ध पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। तीर्थंकर प्रकृतिका अन्तरकाल सातावेदनीयके समान है । सम्यक्त्व और मिथ्यात्वका वह अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपाध पुद्गलपरिवर्तन मात्र है । इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यात्वका भी अन्तरकाल जानना चाहिये । विशेप इतना है कि उसका वह अन्तरकाल जघन्यसे एक समय मात्र है। अनन्तानुबन्धिचतुष्कका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। इस प्रकार अन्तरप्ररूपणा समाप्त हुई। १ ताप्रतौ 'आहारसरीरस्स' इति पाठः।

क्खंडागमे संतकम्म णाणाजीवेहि भंगविचओ। अट्ठपदं- जेसिं संतकम्ममत्थि तेसु पयदं । एदेण अट्ठपदेण पंचणाणावरणीय-णवदंसणावरणीय-सम्मामिच्छत्त-सोलसकसाय-णवणोकसाय- तेरसणामपयडि-पंचंतराइयाणं च सिया सब्जे जीवा संकामया, सिया संकामया च असंकामओ च, सिया संकामया च असंकामया च । सादासाद-सम्मत्त-मिच्छत्त-सेस- णामपयडि-उच्च-णीचागोदाणं संकामया च असंकामया च णियमा अस्थि । एवं णाणाजीवेहि भंगविचओ समत्तों। णाणाजीवेहि कालो- सव्वकम्माणं संकामया सव्बद्धा । अंतरं णत्थि, गाणाजीवप्प- णादो। अप्पाबहुअं। तं जहा- आहारसरीरणामाए संकामया थोवा । सम्मत्तस्स असंखे० गुणा । मिच्छत्तस्स असंखे० गुणा । सम्मामिच्छत्तस्स विसेसा० । देवगइणामाए असंखे० गुणा । णिरयगइ० विसेसा० । वेउब्बिय० विसे० । णीचागोदस्स अणंतगुणा । असादस्स संखे० गुणा । सादस्स संखे० गुणा। उच्चागोदस्स विसे० । मणुसगइ० विसे० । अणंताणुबंधि०विसेसा० । जसकित्ति विसे० । अट्टण्हं पि कसायाणं विसे० । णिदाणिदा-पयलापयला-थीणगिद्धि-तेरसणामपयडीणं संकामया विसे० । लोहसं० विसे । नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचयका कथन करते हैं। उसमें अर्थपद-जिन कर्मोंका सत्कम है वे यहां प्रकृत हैं । इस अर्थपदके अनुसार पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, सम्यग्मिथ्यात्व, सोलह कषाय, नौ नोकषाय, तेरह नामप्रकृतियां और पांच अन्तराय; इन प्रकृतियोंके कदाचित् सब जीव संक्रामक होते हैं, कदाचित् बहुत संक्रामक व एक असंक्रामक, तथा कदाचित् बहुत संक्रामक व बहुत असंक्रामक भी होते हैं । साता व असाता वेदनीय, सम्यक्त्व, मिथ्यात्व, शेष नामप्रकृतियां, उच्चगोत्र और नीचगोत्र; इनके नियमसे बहुत संक्रामक व बहुत असंक्रामक भी होते हैं । इस प्रकार नाना जीवोंकी अपेक्षा अंगविचय समाप्त हुआ। नाना जीवोंकी अपेक्षा कालकी प्ररूपणा की जाती है-सब कोंके संक्रामकोंका काल नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्वकाल है। सब कर्मोंके संक्रामकोंका अन्तर नहीं होता, क्योंकि, नाना जीवोंकी विवक्षा है। अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा की जाती है। वह इस प्रकार है- आहारशरीर नामकर्मके संक्रामक स्तोक हैं। सम्यक्त्वके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। मिथ्यात्वके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामक विशेष अधिक हैं । देवगति नामकर्म के संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। नरकगति के संक्रामक विशेष अधिक हैं। चैक्रियिकशरीरके संक्रामक विशेष अधिक हैं। नीचगोत्रके संक्रामक अनन्तगुणे हैं । असातावेदनीयके संक्रामक संख्यातगुणे हैं । सातावेदनीयके संक्रामक संख्यातगुणे हैं । उच्चगोत्रके संक्रामक विशेष अधिक हैं। मनुष्यगतिके संक्रामक विशेप अधिक हैं । अनन्तानुबन्धोके संकामक विशेष अधिक हैं । यशकीर्तिके संक्रामक विशेष अधिक है। आठों भी कषायोंके संक्रासक विशेष अधिक हैं । निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि और तेरह नामप्रकृतियोंके संक्रामक विशेष अधिक हैं। संज्वलनलोभके संक्रामक विशेप अधिक है। . १ प्रतिषु णाणाजीवप्पमाणादो' इति पाठः ।

३४५ संकमाणियोगद्दारे पयडिसंकमो णउंसय० विसे । इस्थि० विसे० । छण्णोकसायाणं विसे० । पुरिस० विसे० । कोध० विसे० । माण. विसे० । माया० विसे० । पंचणाणावरण-णवदंसणावरण-सेसणामपयडि- पंचंतराइयाणं संकामया तुल्ला विसेसाहिया । एवमोघसंकमदंडओ समत्तो। णिरयगईए आहारसरीरणामाए संकामया थोवा । सम्मत्तस्स संकामया असंखे गुणा । मिच्छत्तस्स असंखे० गुणा । सम्मामिच्छत्तस्स विसेसा० । णीचागोदस्स असंखे० गुणा । असादस्स संखे० गुणा । सादस्स संखे० गुणा । उच्चागोदस्स विसे० । अर्णताणुबंधि० विसेसा० । सेसाणं कम्माणं संकामया तुल्ला विसेसा० । एवं णिरयोघ- संकमदंडओ समत्तो। तिरिक्खगईए आहारसरीरणामाए संकामया थोवा । सम्मत्तस्स असंखे० गुणा । मिच्छत्तस्स असंखे० गुणा । सम्मामिच्छत्तस्स विसेसा० । देवगई० असंखे० गुणा । णिरयगई० विसेसा० । वेउब्धियसरीर० विसे० । णीचागोदस्स अणंतगुणा । असादस्स संखे० ० गुणा । सादरस संखे० गुणा । उच्चागोदस्स विसेसा० । मणुसगई० विसे० । अणंताणुवंधि० विसे० । सेसाणं कम्माणं तुल्ला विसेसाहिया। एवं तिरिक्खगइ- दंडओ समत्तो। नपुंसकवेदके संक्रामक विशेष अधिक हैं । स्त्रीवेदके संक्रामक विशेष अधिक हैं । छह नोकपायोंके संक्रामक विशेष अधिक हैं। पुरुषवेदके संक्रामक विशेष अधिक हैं। [संज्वलन] क्रोधके संक्रामक विशेष अधिक हैं। मानके संक्रामक विशेष अधिक हैं। मायाके संक्रामक विशेष अधिक हैं। पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, शेष नामप्रकृतियों और पांच अन्तराय कर्मों के संक्रामक तुल्य व विशेष अधिक हैं। इस प्रकार ओघसंक्रमदण्डक समाप्त हुआ। नरकगतिमें आहारशरीर नामकर्म के संक्रामक स्तोक हैं । सम्यक्त्वके संक्रामक असंख्यात- गुणे हैं। मिथ्यात्वके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामक विशेष अधिक हैं। नीचगोत्रके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। असातावेदनीयके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। सातावेदनीयके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। उच्चगोत्रके संक्रामक विशेष अधिक हैं। अनन्तानु- बन्धिचतुष्कके संक्रामक विशेप अधिक हैं। शेष कर्मोंके संक्रामक तुल्य व विशेष अधिक हैं। इस प्रकार नरकगतिमें सामान्यसे संक्रमदण्डक समाप्त हुआ । तिर्यंचगतिमें आहारकशरीर नामकर्मके संक्रामक स्तोक हैं। सम्यक्त्वके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । मिथ्यात्वके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामक विशेप अधिक हैं। देवगतिके संक्रामक'असंख्यातगुणे हैं। नरकगतिके संक्रामक विशेष अधिक हैं। वैक्रियिकशरीरके संक्रामक विशेष अधिक हैं। नीचगोत्रके संक्रामक अनन्तगुणे हैं। असाता- वेदनीयके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। सातावेदनीयके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। उच्चगोत्रके संक्रामक विशेष अधिक हैं । मनुष्यगतिके संक्रामक विशेष अधिक हैं। अनन्तानुवन्धिचतुष्कके संक्रामक विशेप अधिक हैं। शेष कोंके संक्रामक तुल्य व विशेप अधिक हैं। इस प्रकार तियंचगति में संक्रमदण्डक समाप्त हुआ। छ. से. ४४ ३४६ छक्खंडागमे संतकम्म - । देवगईए णिरयगइभंगो । मणुस्सेसु आहारसरीरणामाए संकामया थोवा । मिच्छत्तस्स संकामया संखे० गुणा । सम्मत्तस्स संका० असंखे० गुणा । सम्मामिच्छत्तस्स विसेसा० । देवगई० असंखे० गुणा । णिरयगई० विसे० । वेउब्विय० विसे० । णीचा- गोदस्स असंखे० गुणा । असाद० संखे० गुणा । साद० संखे० गुणा । उच्चागोद० विसे । अणंताणुबंधि० विसे । उवरि ओघं । एवं मणुसगइदंडओ समत्तो । बेइंदिए सु आहार० संकामया. संखेजजीवा थोवा । सम्मत्तसंकामया असंखे० गुणा । सम्मामिच्छत्त० विसे० । देवगई० असंखे० गुणा । णिरयगई० विसे० । वेउब्धिय० विसे० । णीचागोद० असंखे० गुणा । असाद० संखे० गुणा । साद० संखे० ० गुणा । उच्चागोद० विसे० । सेसाणं कम्माणं तुल्ला विसेसा० । तेइंदिय- चउरिदिय-असणिपंचिंदियाणं वेईदियभंगो। भुजगारो पदणिक्खेवो वढिसंकमो च एगेगपयडिसंकमे णस्थि । पयडिट्ठाणसंकमे हाणसमुक्त्तिणा। तं जहा णाणावरणपयडिसंकमस्स एवं चेव हाणं । एदेण एक्केण हाणेण सव्वाणिओगद्दाराणि णेदव्याणि । दंसणावरणस्स बेहाणाणि । तं जहा- णवणं छण्णं संकमो चेदि । एदेहि बेहाणेहिं चवीसअणिओगद्दाराणि देवगतिमें संक्रमके अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा नरकगतिके समान है। मनुष्योंमें आहार- शरीर नामकर्मके संक्रामक स्तोक हैं। मिथ्यात्वके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। सम्यक्त्व के संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामक विशेष अधिक हैं। देवगतिके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । नरकगतिके संक्रामक विशेष अधिक हैं। वैक्रियिकशरीरके संक्रामक विशेष अधिक हैं। नीचगोत्रके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। असातावेदनीयके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। सातावेदनीयके संक्रामक संख्यातगुणे हैं । उच्चगोत्रके संक्रामक विशेष अधिक हैं । अनन्तानु- बन्धिचतुष्कके संक्रामक विशेष अधिक हैं। आगेकी प्ररूपणा ओघके समान है। इस प्रकार मनुष्यगतिमें संक्रमदण्डक समाप्त हुआ। द्वीन्द्रिय जीवोंमें आहारशरीरके संक्रामक जीव संख्यात हैं जो स्तोक हैं। सम्यक्त्वके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामक विशेष अधिक हैं। देवगतिके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । नरकगति के संक्रामक विशेष अधिक हैं। वैक्रियिकशरीरके संक्रामक विशेप अधिक हैं। नीचगोत्रके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। असातावेदनीयके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। सातावेदनीयके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। उच्चगोत्रके संक्रामक विशेप अधिक हैं। शेष कोंके संक्रामक तुल्य व विशेष अधिक हैं। त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों में संक्रमके अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा द्वीन्द्रिय जीवोंके समान है। भुजाकार, पदनिक्षेप. और वृद्धि- संक्रम एक एक प्रकृति के संक्रममें नहीं हैं। प्रकृतिस्थानसंक्रममें स्थानसमुत्कीर्तनाको प्ररूपणा करते हैं। वह इस प्रकार है- ज्ञाना- वरणके प्रकृतिसंक्रमका एक ही स्थान है। इस एक स्थानके द्वारा सव अनुयोगद्वारोंको ले जाना चाहिये । दर्शनावरणके दो स्थान हैं। यथा- नौ प्रकृतियोंका संक्रम और छह प्रकृतियोंका १ अप्रती 'एदेण बेहाणाणि' इति पाठः ।

संकमाणियोगद्दारे द्विदिसंकमो ३४७ भुजगार-पदणिक्खेव-बढिसंकमा च णेदव्या । मोहणीयस्स जहा कसायपाहुडे वित्थरेण ठाणसमुक्त्तिणा कदा तहा एत्थ वि कायव्या । वेयणीय-गोदंतराइयाणं एक्फेक्कं चेय ट्ठाणं। णामस्स पुध पुध पिंडणामट्ठाणसमुकित्तणा कायया । तं जहा- गदिणामाए एक्किस्से दोण्णं तिण्णं चतुण्णं संकमो । उव्वेल्लणं पडुच्च जासु जासु पिंडपयडीसु संकम- टाणाणि अस्थि तेहि सवअणियोगद्दाराणि णेयवाणि । एवं पयडिसंकमो समत्तो । ठिकिसकंमो दुविहो मुलपयडिटिदिसंकमो उत्तरपयडिविदिसंकमो चेदि । एत्थ अट्ठपदं । तं जहा- ओकड्डिदा नि हिदी डिदिसंकमो, उक्कड्डिदा वि द्विदी द्विदिसंकमो, अण्णपयडि णीदा वि द्विदी द्विदिसंकमो होदि । एत्थ ओकड्डणाए ताव किंचि सरूव- परूवणं कस्सामो। तं जहा- उदयावलियभंतरविदीयो ण सका ओकड्डेदु, उदया- वलियादो जा समउत्तरहिदी सा सक्का ओकड्डेदु । सा ओकड्डिजमाणिया आवलियाए समऊणाए बेत्तिभागे अधिच्छाविदूण रूवाहियतिभागे णिक्खिवदि । तदो समउत्तरियाए द्विदीए तत्तियो चेव णिक्खेवो, अधिच्छावणा बढदि । एवं ताव अधिच्छावणा बढदि संक्रम । इन दो स्थानोंके द्वारा चौबीस अनुयोगद्वारों, भुजाकार, पदनिक्षेप और वृद्धिसंक्रमको भी ले जाना चाहिये। मोहनीयकी स्थानसमुत्कीर्तना जैसे कसायपाहुड में विस्तारसे की गयो है वैसे यहां भी उसे करना चाहिये । वेदनीय, गोत्र और अन्तरायका एक एक ही स्थान है। नामकर्मकी पृथक् पृथकू पिण्ड नामग्रकृतियोंकी स्थानसमुत्कीर्तना करना चाहिये। वह इस प्रकारसे- गति नामकर्म सम्बन्धी एक, दो, तीन और चारका संक्रम होता है। उद्वेलनाके आश्रयसे जिन जिन पिण्ड प्रकृतियों में संक्रमस्थान हैं उनके द्वारा सब अनुयोगद्वारोंको ले जाना चाहिये। इस प्रकार प्रकृतिसंक्रम समाप्त हुआ। स्थितिसंक्रम दो प्रकार है-मूलप्रकृतिस्थितिसंक्रम और उत्तरप्रकृतिस्थितिसंक्रम। यहां अर्थपद इस प्रकार है- अपकर्षणप्राप्त स्थितिको स्थितिसंक्रम कहा जाता है, तथा उत्कर्षणप्राप्त और अन्य प्रकृतिको प्राप्त करायी गयी भी स्थितिको स्थितिसंक्रम कहा जाता है। यहां पहिले अपकर्पणके स्वरूपकी कुछ प्ररूपणा की जाती है। यथा- उदयावलीके भीतरकी स्थितियां अपकर्षणको प्राप्त नहीं करायी जा सकती, किन्तु उदयावलीसे जो एक समय अधिक स्थिति है वह अपकपणको प्राप्त करायी जा सकती है। अपकर्षणको प्राप्त करायी जानेवाली उस स्थितिका निक्षेप एक समय कम ऐसी आवलीके दो त्रिभागोंको अतिस्थापना करके एक समय अधिक आवलीके त्रिभागमें किया जाता है। आगे उत्तरोत्तर एक एक समय अधिक स्थितिका निक्षेप तो उतना मात्र ही होता है, किन्तु अतिस्थापना बढ़ती जाती है। इस प्रकार अतिस्थापना आवली प्राप्त होने १ क. पा. सु. पृ. २६०-३०९. २ ताप्रतौ 'हा [णा] णं' इति पाठः । ३ तापतौ 'एक्केक्किस्से इति पाठः । ४ हिदिसंकमो दुविहो मूलपयडिट्टिदिसंकमो उत्तरपडिट्ठिदिसंकमो च। तत्थ अट्टपदं- जा हिदी ओकड्डिनदि वा उक्कड्डिनदि वा अण्णपयडिं संकामिजइ वा सो हिदिसंकमो, सेसो हिदिअसंकमो । क. पा. सु. पृ. ३१०,१-२. ठिइसंकमो त्ति वुच्चइ मूलुत्तरपगई उ जा हि ठिई। उवट्टियाउ ओवटिया व पगई निया वाऽणं ॥ क. प्र. २, २८. ५ अप्रतौ 'संकामओकट्टेदु, काप्रतौ 'संका ओकड्डेदु' इति पाठः । ६ अ-कापत्योः 'संकामओकड्डेदु' इति पाठः । + - ३४८ छक्खंडागमे संतकम्म जाव आवलिया त्ति । तेण परं णिक्खेयो चेव चढदि । जहण्णओ णिस्खेवो थोवो । जहणिया अधिच्छावणा दोहि समएहि ऊणिया दुगुणा । उक्कस्सिया अधिच्छावणा असंखे० गुणा । उकस्सयं विदिखंडयं विसेसाहियं । उक्कस्सओ णिक्खेयो विसेसाहिओ, जेण कम्मद्विदी दोहि आवलियाहि समउत्तराहि ऊणिया। उक्कड्डणा णाम कधं होदि ? वुचदे। तं जहा- उदयावलियम्भतरद्विदी ण सका उक्कडेदं । कुदो ? साभावियादो। समउत्तरउदयावलियादिद्विदी उक्कड्डिजदि । सा उक्कद्धिजमाणिया वि अवज्झमाणीसु द्विदीसु ण णिक्खियदि, वज्झमाणियाणं जहण्ण- द्विदिमादि कादण उपरिमासु सव्वासु द्विदीसु णिक्खिवदि । एस विही हेडिमाणं द्विदीणं उक्कडिजमाणियाणं । संपहि उवरिमाणं द्विदीणं उकइणाविहाणं वुच्चदे । तं जहा-द्विदिसंतकम्मादो तक बढ़ती है। इसके पश्चात् निक्षेप ही बढ़ता है। जघन्य निक्षेप स्तोक है । जघन्य अतिस्थापना दो समयोंसे कम दुगुणी है। उत्कृष्ट अतिस्थापना असंख्यातगुणी है। उत्कृष्ट स्थितिकाण्डक विशेष अधिक है। उत्कृष्ट निक्षेप विशेष अधिक है, कारण कि वह एक समय अधिक दो आवलियोंसे हीन कर्मस्थितिके बराबर है। उत्कर्षण कैसे होता है ? इसका उत्तर देते हैं। यथा---उदयावलीके भीतरकी स्थिति उत्कर्षणको प्राप्त नहीं करायी जा सकती है, क्योंकि, ऐसा स्वभाव है। एक समय अधिक उदया- वली आदि रूप स्थितिका उत्कर्षण किया जा सकता है। उस उत्कर्षणको प्राप्त करायी जानेवाली स्थितिका भी निक्षेप अवध्यमान स्थितियों में नहीं किया जाता है, किन्तु बध्यमान स्थितियों में जधन्य स्थितिको आदि करके आगेकी सब स्थितियों में किया जाता है। यह विधान उत्कर्षणको प्राप्त करायी जानेवाली अधस्तन स्थितियों के लिये है। अब उपरिम स्थितियों के उत्कर्षणका विधान कहते हैं । यथा-स्थितिसत्कर्मसे समयाधिक १ तिस्से उदयादि जाव आवलियतिभागो ताव णिक्खेवो, आवलियाए वेत्तिभागा अइच्छावणा । उदए बहुअं पदेसगं दिजइ, तेण परं विसेसहीणं जाव आवलियतिभागो त्ति । तदो जा बिदिया हिदी तिरसे वि तत्तिगो चेव णिक्खेवो, अइच्छावणा समयुत्तरा । एवमइच्छावणा समयुत्तरा, णिक्खेवो तत्तिगो चेव उदयावलिय- बाहिरादो आवलियतिभागंतिमहिदि त्ति । तेण परं णिक्खेवो वड्डइ, अइच्छावणा आवलिया चेव । क. पा. सु. पृ. ३११, ५-९. उव्वदृतो य ठिइं उदयावलिबाहिरा ठिइविसेसा। निक्खिवइ तइयभागे समयहिए सेस- मइवईय ॥ वड्डइ तत्तो अतित्थावणा उ जावालिगा हवइ पुन्ना । ता निक्खेवो समयाहिगालिगदुगूणकम्मट्टिई ॥ क. प्र. ३, ४-५. २ तदो सव्वत्थोवो जहण्णओ णिक्खेवो। जहणिया अइच्छावणा दुसमयूणा दुगुणा । णिवाघादेण उक्कस्सिया अइच्छावणा विसेसाहिया। वाघादेण उक्कस्सिया अइच्छावणा असंखेनगुणा । उक्कस्सयं द्विदिखंडयं विसेसाहियं । उक्कस्सओ णिक्खेवो विसेसाहिओ। उक्कस्सओ हिदिबंधो विसेसाहिो। क. पा. सु. पृ. ३१५, १८-२३. ३ अ-कापत्योः '-वलियादि उक्कड्डिजदि', ताप्रतौ '-वलियादि ( यहिदि) उक्कहिनदि' इति पाठः । ४ अ-ताप्रत्योः 'ओकड्डिनमाणिया' इति पाठः । ५ तापतौ 'एसा' इति पाठः। ६ उबट्टणा ठिईए उदयावलियाए बाहिरठिईणं। होइ अबाहा अइत्थावणाउ जा वालिया हस्सा || क. प्र.३, १.

संकमाणियोगदारे ट्ठिदिसंकमो ३४९ समउत्तरहिदि बंधमाणम्स जा पुबबद्धस्स चरिमट्टिदी सा ण उक्कड्डिजदि, दुचरिम- द्विदी वि ण उक्कड्डिजदि । एवं जाव एगा आवलिया अण्णो आवलियाए असंखे० भागो च ओदिण्णो ति णेदव्यं । तदो जा हेडिमा अणंतर द्विदी सा उक्कड्डिजदि । तिस्से उक्क- डिजमाणियाए आवलिया अधिच्छावणा, आवलियाए असंखे० भागो णिक्खेवो । उक्कड्डिजमाणीणं द्विदीणं जहण्णओ णिक्खेवो थोयो । जहणिया अधिच्छावणा एगा- वलिया, सा असंखे० गुणा । उक्क० अधिच्छावणा संखेजगुणा। उकस्सओ णिस्खेवो असंखे० गुणो, जेण कम्मट्ठिदी उक्कस्सियाए आबाहाए समत्तराए आवलियाए च उणिया । एसा अट्ठपदपरूवणा ! एत्तो पमाणाणुगमो वुच्चदे- उत्तरपयडिसंकमे पयदं । सो चउव्यिहो उक्कस्सओ अणुक्कस्सओ जहण्णओ अजहण्णओ चेदि । मदिआवरणस्स उकस्सओ द्विदिसंकमो तीस स्थितिको वांधनेवाले के जो पूर्वबद्ध कर्मकी चरम स्थिति है उसका उत्कर्षण नहीं किया जाता है, द्विचरम स्थितिका भी उत्कर्षण नहीं किया जाता है, इस प्रकार एक आवली और अन्य आवलीके असंख्यातवें भाग नीचे आने तक ले जाना चाहिये। उससे नीचेकी जो अधस्तन अनन्तर स्थिति है उसका उत्कर्षण किया जाता है। उत्कर्पणको प्राप्त करायी जानेवाली उक्त स्थितिकी अतिस्थापना आवली प्रमाण और निक्षेप आवलीके असंख्यातवें भाग मात्र होता है। उत्कर्पणको प्राप्त करायी जानेवाली स्थितियोंका जघन्य निक्षेप स्तोक है । जघन्य अतिस्थापना एक आवली मात्र होकर उससे असंख्यातगुणी है । उत्कृष्ट अतिस्थापना संख्यातगुणी है। उत्कृष्ट निक्षेप असंख्यात- गुणा है, क्योंकि, वह उत्कृष्ट आबाधा और एक समय अधिक आवलीसे होन कर्मस्थिति प्रमाण है। यह अर्थपदकी प्ररूपणा हुई। यहां प्रमाणानुगमका कथन करते हैं- उत्तरप्रकृतिसंक्रमका अधिकार है। वह चार प्रकारका है- उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य । मतिज्ञानावरणका उत्कृष्ट स्थितिसंकम १ प्रतिषु 'उदिण्णो' इति पाठः । २ वाघादेण कधं ? जइ संतकम्मादो बंधो समयुत्तरो तिस्से विदीए णत्थि उक्कड्डणा । जइ संतकम्मादो बंधो दुसमयुत्तरो तिस्से वि संतकम्म अग्गद्विदीए णस्थि उक्कड्डणा । एत्थ आवलियाए असंखेजदिभागो जहणिया अइच्छावणा । जदि जत्तिया जह- णिया अइच्छावणा तत्तिएण अमहिओ संतकम्मादो बंधो तिस्से वि संत कम्मअग्गट्टिदीए णस्थि उक्कड्डणा । अण्णो आवलियाए असंखेजदिभागो जहण्णओ णिक्खेवो । जइ जहणियाए अइच्छावणाए जहण्णएण च णिक्खेवेण एत्तियमेत्तेण संत कम्मादो अदिरित्तो बंधो सा संतकम्मअग्गहिदी उकाड्डनदि । तदो समयुत्तरे बंधे णिक्खेवो तत्तिओ चेव, अच्छावणा वड्ढदि । एवं ताव अइच्छावणा वडइ जाव अइच्छावणा आवलिया जादा त्ति । तेण परं णिक्खेवो वड्डइ जाव उकस्सओ णिक्खेवो त्ति। क. पा. सु. पृ. ३१६, २८-३७. णिन्या- घाएणेवं वाघाए संतकम्महिगबंधो। आवलिअसंखभागादि होइ अइत्थावणा नवरं ।। क. प्र. ३, ३. xxx संप्रत्यल्पबहुत्वमुच्यते-- या जघन्याऽतीस्थापना यश्च जघन्यो निक्षेप एतौ द्वावपि सर्वस्तोकौ परस्परं च तुल्यौ । यतो द्वावप्येतो आवलिकासत्कासंख्येयतमभागमात्रौ, ताभ्यामसंख्येयगुणोत्कृष्टाऽतीस्थापना, तस्या उत्कृष्टाबाधारूपत्वात् । ततोऽप्युत्कृष्टो निक्षेपोऽसंखेयगुणः, यतोऽसौ समयाधिकालिकयाऽवाधया च हीना सर्वा कर्मस्थितिः। ततोऽपि सर्वा कर्मस्थितिर्विशेषाधिका । मलय, ३५० छक्खंडागमे संतकम्म सागरोवमकोडाकोडीयो दोहि आवलियाहि ऊणाओ, जडिदिसंकमो' आवलिऊणो । जहा उकस्सद्विदि उदीरणा तहा उक्कस्सद्विदिसंकमो सबकम्माणं पि काययो। तत्तो णाणत्तं वत्तइस्सामो-देवगइ-देव-मणुस्साणुपुब्धी-बेइंदिय-तेइंदिय-चउरिदियजादि-आदाव-सुहुम- अपजत्त-साहारणाणं उक्कस्समद्धच्छेदो वीसं सागरोबमकोडाकोडीओ बेहि तीहि आवलियाहि ऊणाओ। सामित्तं पि उक्कस्सद्विदि बंधिय पडिभग्गो होद्ण एदाओ णामपयडीओ चंधिय तदो आवलियादीदस्स । आदावस्स पुण बंधावलियादीदस्स उक्कस्सओ द्विदिसंकमो । एदं गाणत्तं उक्कस्सहिदिउदीरणादो। देव-णिरयाउआणं उकस्सट्ठिदिसंकमो तेत्तीसं सागरोवमाणि, जहिदिसंकमो आवलि- यणपुब्धकोडितिभागेणब्भहियतेत्तीसं सागरोवमाणि । मणुस्स-तिरिक्खाउआणमुकस्स- हिदिसंकमो तिण्णि पलिदोवमाणि, जट्ठिदिसंकमो आवलियूणपुब्धकोडितिभागेणब्भहिय- तिणिपलिदोचमाणि। जहण्णटिदिसंकमैपमाणाणुगमो। तं जहा-पंचणाणावरण-चत्तारिदसणावरण-पंच- तराइयाणं जहण्ण द्विदिसंकमो एगा द्विदी, जढिदिसंकमो समयाहियावलिया । णिद्दा-पय- लाणं जहण्णविदिसंकमो एगा द्विदी,जट्ठिदिसंकमो दोआवलियाओ आवलियाए असंखेजदि- दो आवलियोंसे हीन तीस कोड़ाकोडि सागरोपम मान होता है, जस्थितिसंक्रम एक आवलीसे हीन तीस कोडाकोडि सागरोपम मात्र होता है। पूर्व में जैसे उत्कृष्ट स्थितिउदीरणा कथन किया गया है वैसे ही सभी कर्मों के उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमका भी कथन करना चाहिये। उससे जो यहां जो कुछ विशेषता है उसे बतलाते हैं- देवति, देवानुपूर्वी, मनुष्यानुपूर्वी, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, आतप, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण; इनका उत्कृष्ट अद्धाच्छेद दो व तीन आलियोंसे होन बीस कोडाकोडि सागरोपम मात्र है। उसका स्वामी भी उत्कृष्ट स्थितिको बांधकर और प्रतिभन्न होकर फिर इन नामकर्मकी प्रकृतियोंको बांधने के पश्चात् आवली मात्र कालको वितानेवाला जीव होता है। परन्तु आतपका उत्कृष्ट स्थितिसंक्रम जिसने बन्धावलीको बिताया है उसके होता है। यह उत्कृष्ट स्थितिउदोरणाकी अपेक्षा यहां विशेषता है। देवायु और नरकायुका उत्कृष्ट स्थितिसंक्रम तेतीस सागरोपम और जस्थितिसंक्रम आवली कम पूर्वकोटिके त्रिभागसे अधिक तेतीस सागरोपम मात्र होता है । मनुष्यायु और तिर्यगायुका उत्कृष्ट स्थितिसंक्रम तीन पल्योपम और जस्थितिसंक्रम आवली कम पूर्वकोटिके त्रिभागसे अधिक तीन पल्योपम मात्र होता है। जघन्य स्थितिसंक्रमके प्रमाणानुगमका कथन करते हैं। यथा- पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तरायका जघन्य स्थितिसंक्रम एक स्थिति और जस्थितिसंक्रम एक समय अधिक आवली मात्र है। निद्रा और प्रचलाका जघन्य स्थितिसंक्रम एक स्थिति और १ अप्रतो 'जंठिदिससंकम्मो', ताप्रतौ 'जं हिदिसंकमो' पाठः । २ अप्रतौ 'आवलियादितस्स' इति पाठः । ३ अ-काप्रत्योः संकमो', ताप्रती 'संकमो (म)' इति पाठः । ४ आवरण-विग्ध-दसणच उक-लोभंत- वेयगाऊणं । एगा ठिई जहन्नो बहिई समयाहिगावलिगा । क. प्र. २, ३२.

संकमाणियोगदारे ट्ठिदिसंकमो ३५१ भागो च । णिहाणिद्दा-पयलापयला-थीणगिद्धि-मिच्छत्त-बारसकंसाय-सम्मामिच्छत्त- इत्थि-णqसयवेदाणं जहण्णहिदिसंकमो पलिदो० असंखे० भागों । सादासादाणं जहण्णहिदिसंकमो अंतोमुहुत्तं । सम्मत्त-लोहसंजलणाणं जहण्णविदिसंकमो एगा द्विदी। जहिदिसंकमो समयाहि- यावलिया। छण्णं णोकसायाणं जहण्हद्विदिसंकमो संखे० वस्साणि । कोहसंजलणाए जह० द्विदिसंकमो वे मासा अंतोमुहत्तणो, जट्ठिदिसंकमो बे मासा वेहि आवलियाहि ऊणा । माणसंजलणस्स जहण्णविदिसंकमो मासो अंतोमुहत्तणों, जडिदिसंकमो मासो वेहि आवलियाहि ऊणो। मायासंजलणाए जहण्णट्ठिदिसकमो अद्धमासो अंतोमुहुत्तणों, जहिदिसंकमो अद्धमासो दोहि आवलियाहि ऊणो। पुरिसवेदस्स जहणविदिसंकमो अट्ठवस्साणि अंतोमुहुत्तणाणि, जट्ठिदिसंकमो अदुवस्साणि दोहि आवलियाहि ऊणाणि । आउआणं जहा जहणहिदिउदीरणाए तहा कायव्वं । णिरयगइ-णिरयगइपाओ- ग्गाणुपुब्धी-तिरिक्खगइ-तिरिक्खगइपाओग्गाणुपुब्बी-एइंदिय-बेइंदिय-तेइंदिय- चउरि- दियजादि-आदावुजोव-थावर-सुहुम-साहारणसरीराणं जहण्णगो विदिसंकमो पलिदो० . - जस्थितिसंक्रम दो आवली और एक आवलीके असंख्यातवें भागसे अधिक है। निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, मिथ्यात्व, बारह कषाय, सम्यग्मिथ्यात्व, स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका जघन्य स्थितिसंक्रम पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। साता और असाता वेदनोयका जघन्य स्थितिसंक्रम अन्तर्मुहूर्त मात्र है। सम्यक्त्व और संज्वलन लोभका जघन्य स्थितिसंक्रम एक स्थिति मात्र है। इनका जस्थितिसंक्रम एक समय अधिक आवली मात्र है। छह नोकषायोंका जघन्य स्थितिसंक्रम संख्यात वर्ष मात्र है। संज्वलन क्रोधका जघन्य स्थितिसंक्रम अन्तर्मुहूर्त कम दो मास और जस्थितिसंक्रम दो आवलीसे कम दो मास प्रमाण है। संज्वलन मानका जघन्य स्थितिसंक्रम अन्तर्मुहूर्त कम एक मास और जस्थितिसंक्रम दो आवली कम एक मास प्रमाण है। संज्वलन मायाका जघन्य स्थितिसंक्रम अन्तर्मुहूर्त कम आधा मास और जस्थितिसंक्रम दो आवली कम आधा मास प्रमाण है। पुरुषवेदका जघन्य स्थितिसंक्रम अन्तर्मुहूर्त कम आठ वर्ष और जस्थितिसंक्रम दो आवली कम आठ वर्प है। आयु कर्मोकी जिस प्रकार जघन्य स्थितिको उदीरणा कही गयी है उसी प्रकारसे उनके जघन्य संक्रमको भी कहना चाहिये। नरकगति, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यग्गति, तिर्यग्गति- प्रायोग्यानुपूर्वी, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म १ निहादुगस्स एक्का आवलिदुगं असंखभागो य । जहिइ xxx क. प्र. २, ३३. २ मिच्छत्त- सम्मामिच्छत्त-बारसकसाय-इस्थि-णqसयवेदाणं जहण्णहिदिसंकमो पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो । क. पा. सु. ३१९, ४४, ३ क. पा. सु. पृ. ३१९, ४५. ४ क. पा. सु. पृ. ३१९ , ४९. ५ का-मप्रत्योः 'अंतोमुहुत्तूणो', अप्रतौ त्रुटितोऽत्र पाठः । क. पा. सु. पृ. ३१९, ४५. ६ क. पा. सु. पृ. ३१९, ४६. ७ क. पा. सु. पृ. ३१९, ४७. ८ का. पा. सु. पृ. ३१९, ४८. ९ ताप्रतौ 'आउआणं जहण्ण-' इति पाठः ।

३५२ छक्खंडागमे संतकम्म असंखे० भागो। देवगह-देवगइपाओग्गाणुपुब्बी-मणुसगइ-मणुसगइओग्गाणुपुच्ची-पंच- सरीर -पंचसरीरबंधण-पंचसरीरसंघाद - छसंठाण-छसंघडण- पसत्थापसत्थवण्ण- गंध-रस- फास-अगुरुअलहुअ-उवधाद- परघाद-उस्सास-पसत्थापसत्थविहायगइ- तस-चादर पञ्जत्ता- पज्जत्त-पत्तेयसरीर -थिराथिर - सुहासुह-सुभग- दूभग-सुस्सर-दुस्सर-आदेज-अणादेज-जस- कित्ति-अजसकित्ति-णिमिण-तित्थयर-णीचुच्चागोदाणं जहण्णहिदिसंकमो अंतोमुहुत्तं । एवं जहण्णुकस्सअद्धाच्छेदो समत्तो। एत्तो सामित्तं । तं जहा- जहा उक्कस्सियाए द्विदीए उदीरणाए सव्यकम्माणं पि सामित्तं परूपिदं तहा उकस्सहिदिसंकमे सव्वकम्माणं पि सामित्तं परूवेयव्यं । एवमुक्कस्स विदिसंकमसामित्तं समत्तं । जहण्णढिदिसंकमसामित्तं वत्तइस्सामो । तं जहा- पंचणाणावरण-चउदंसणावरण- पंचंतराइयाणं जहण्णहिदिसंकमो कस्स ? समयाहियावलियचरिमसमयछदुमस्थस्स । णिद्दा-पयलाणं जहण्णविदिसंकमो कस्स ? दोहि आवलियाहि आवलियाए असंखे० भागेण चरिमसमयछदुमत्थस्स । णिदाणिदा-पयलापयला-थीणगिद्धीणं जहण्णढिदिसंकमो और साधारणशरीर नामकर्मीका जघन्य स्थितिसंक्रम पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। देवगति, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, मनुष्यगति, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, पांच शरीर, पांच शरीरबन्धन, पांच शरीरसंघात, छह संस्थान, छह संहनन, प्रशस्त व अप्रस्त वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त व अप्रशस्त विहायोगति, त्रस, वादर, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, दुर्भग, सुस्वर, दुस्वर, आदेय, अनादेय, यशकीर्ति, अयशकीर्ति, निर्माण, तीर्थंकर, नीचगोत्र और उच्चगोत्र; इनका जघन्य स्थितिका संक्रम अन्तर्मुहूर्त मात्र है । इस प्रकार जघन्य व उत्कृष्ट अद्धाछेद समाप्त हुआ। यहां स्वामित्वका कथन करते हैं। वह इस प्रकार है-जिस प्रकार उत्कृष्ट स्थितिकी उदीरणामें सभी कर्मों के स्वामित्वकी प्ररूपणा की गयी है उसी प्रकारसे उत्कृष्ट स्थितिके संक्रम में भी सभी कर्मों के स्वामित्वको प्ररूपणा करना चाहिये । इस प्रकार उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमका स्वामित्व समाप्त हुआ। जघन्य स्थितिसंक्रमके स्वामित्वका कथन करते हैं। वह इस प्रकार है- पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तरायकी जघन्य स्थितिका संक्रम किसके होता है ? जिसके चरम समयवर्ती छद्मस्थ होने में एक समय अधिक आवली मात्र शेष है उसके उपर्युक्त प्रकृतियोंका जघन्य स्थितिसंक्रम होता है । निद्रा और प्रचलाका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? जिसके अन्तिम समयवर्ती छमस्थ होने में दो आवली और आवलीका असंख्यातवां भाग शेष रहा है उसके निद्रा और प्रचलाका जघन्य स्थितिसंक्रम होता है। निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धिका - १ सामित्तं । उक्करसहिदिसंकामयस्स सामित्तं जहा उक्कस्सियाए हिदीए .उदीरणा तहा णेदव्वं । क. पा. सु. पृ. ३१९, ५१-५२.

संकमाणियोगदारे हिदिसंकमो ३५३ कस्स ? खबगस्स अपच्छिमद्विदिखंडयचरिमसमए' वट्टमाणस्स । सादासादाणं जहण्ण- द्विदिसंकमो कस्स ? चरिमसमयसजोगिस्स । मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्ताणं जहण्णढिदिसंकमो कस्स ? दंसणमोहक्खवगस्स अप- च्छिमद्विदिखंडयचरिमसमए वट्टमाणस्से । अणंताणुबंधी [णं जहण्णहिदिसंक्रमो कस्स ?] विसंजोएंतस्स अणताणुवंधीणं अपच्छिमट्ठिदिखंडयचरिमसमए बट्टमाणस । अट्ठण्णं कमायाणं जहण्णहिदिसंकमो कस्स ? अट्ठकसायक्खवगस्स अपच्छिमहिदिखंडयस्स चरिमफालिं पादेतस्स। णबुंसयवेदस्स जहण्णहिदिसंकमो कस्स ? णqसयवेदेण खधगसेडिमुवट्टियस्स खवगस्स णqसयवेदचरिमढिदिखंडयचरिमफालिं संछुहमाणस । इस्थिवेदस्स जहण्ण- द्विदिसंकमो कस्स ? इथिवेदोदएण अणुदएण वा खवगसेडिमारूढस्स खवगस्स इत्थि- वेदचरिमद्विदिखंडयचरिमकालिं संकममाणसँ । छण्णोकसायाणं जहण्णढिदिसंकमो कस्स ? 'छण्णोकसायखवगस्स तेसिं चरिमद्विदिखंडयचरिमफालिं संकममाणसं । कोध-माण-मायासंजलणाणं जहण्णढिदिसंकमो कस्स ? तेसिं खवयस्स अपच्छिमसमय- जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? वह अन्तिम स्थितिकाण्डकके चरम समयमें वर्तमान क्षपक- के होता है। साता और असाता वेदनीयका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? वह अन्तिम समयवर्ती सयोगीके होता है। मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? वह अन्तिम स्थितिकाण्डकके चरम समयमें वर्तमान दर्शनमोहक्षपकके होता है । अनन्तानुबन्धी कषायोंका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? वह अनन्तानुवन्धी कषयोंके अन्तिम स्थितिकाण्डकके चरम समयमें वर्तमान ऐसे अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना करनेवाले जीवके होता है। आठ कषायोंका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? वह अन्तिम स्थितिकाण्डककी चरम फालिको नष्ट करनेवाले ऐसे आठ कपायोंके क्षपकके होता है। नपुंसक वेदका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? वह नपुंसक वेदसे क्षपकश्रेणिपर उपस्थित हुए उस क्षपकके होता है जो नपुंसकवेदके चरम स्थितिकाण्डककी चरम फालिका क्षेपण कर रहा है। स्त्रीवेदका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? जो क्षपक स्त्रीवेदके उदय अथवा उसके अनुदयके साथ क्षपकश्रेणिपर आरुढ़ होकर स्त्रीवेदके चरम स्थितिकाण्डककी चरम फालिका संक्रमण कर रहा है। छह नोकपायोंका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? वह उनके चरम स्थितिकाण्डककी चरम फालिका संक्रमण करनेवाले छह नोकषायोंके क्षपकके होता है। संज्वलन क्रोध, मान और मायाका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? वह उनके क्षपकके होता है १ क. पा. सु. पृ. ३२०, ५४-५५, ५८-५९. २ अणंताणुबंधीणं जहणद्विदिसंकमो कस्स ? विसंजो- एतस्स तेसिं चेव अपच्छिमहिदिखंडयचरिमसमयसंकामयस्स । क. पा. सु. पृ. ३२०, ६०-६१. ३ अट्ठण्ड कसायाणं जहण्णहिदिसंकमो कस्स ? खवयस्स तेसिं चेव अपच्छिमटिदिखंडयं चरिमसमयसंछुहमाणयस्स जहणं । क. पा. सु. पृ. ३२०, ६२-६३. ४ क. पा. सु. पृ. ३२१, ७१-७२. ५ इथिवेदस्स जहणहिदिसंक्रमो करस ? खवयस्स इस्थिवेदोदयक्खवयत्स तस्स अपच्छिमट्टिदिखंडयं संछुहमाणयत्स तरस जहणयं । क. पा. सु. पृ. ३२१, ६९-७०.६ क.पा.सु. पृ. ३२२, ७३-७४. छ. से. ४५ ३५४ छक्खंडागमे संतकम्म पबद्धं चरिमसमयसंछुद्धस्स । लोहसंजलणस्स जहण्णट्ठिदिसंकमो कस्स ? समयाहिय- आवलियचरिमसमयसुहुममापराइयखवगस्स । पुरिसवेदस्स जहण्णढिदिसंकमो कस्स ? पुरिसवेदखवयस्स सगअपच्छिमहिदिवंधो संछुहमाणो संछुद्धो ताधे । सम्मत्तस्स जहण्णो द्विदिसंकमो कस्स ? समयाहियावलियचरिमसमयअक्खीणदसणमोहणीयस्स । आउआणं जहण्णहिदिसंकमो कस्स ? समयाहियावलियचरिमसमयतब्भवत्थस्स । णिरयगइ-णिरयगइपाआग्गाणुपुच्ची - तिरिक्खगइ -तिरिक्खगइपाओग्गाणुपुची - एइंदिय- बीइंदिय-तीइंदिय- चउरिदियजादि-आदावुञ्जोव-थावर-सुहुम - साहारणसरीराणं जहण्णा- हिदिसंकमो कस्स ? अणियट्टिखवयस्स एदासि पयडीणमपच्छिमडिदिखंडयस्स चरिमफालिं संछुहमाणस्स । सेसाणं णामपयडीणं जहण्णहिदिसंकमो कस्स? चरिमसमय- सजोगिस्स । णीचुच्चागोदाणं जहण्णढिदिसंकमो कस्स ! चरिमसमयसजोगिस्स । एवं जहण्णडिदिसंकमसामित्तं समत्तं । एयजीवेण कालो-पंचणाणावरणीय-णवदसणावरणीय-असाद-मिच्छत्त-सोलसकसाय- णqसयवेद-अरदि-सोग-भय-दुगुंछाणं उकस्सहिदिसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? जह० जो अन्तिम समयप्रबद्धके क्षेपण करनेके अन्तिम समयमें वर्तमान है । संज्वलन लोभका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? जिसके अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक क्षपक होने में एक समय अधिक आवली मात्र शेष है। पुरुषवेदका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? वह पुरुषवेदके क्षपकके उस समय होता है जब निक्षिप्त किया जानेवाला अपना अन्तिम स्थितिवन्ध पूर्णतया निक्षिप्त हो जाता है । सम्यक्त्व प्रकृतिका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? जिसके अन्तिम समयवर्ती अक्षीणदर्शनमोह होने में एक समय अधिक आवली मात्र शेष है। आयु कर्मोका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? जिसके अन्तिम समयवर्ती तद्भवस्थ होने में एक समय अधिक आवली मात्र शेष है । नरकगति, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यग्गति, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारणशरीर; इनका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? वह इन प्रकृितयों के अन्तिम स्थितिकाण्डककी अन्तिम फालिका निक्षेप करनेवाले अनिवृत्तिकरण क्षपकके होता है। शेष नामप्रकृतियोंका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? वह अन्तिम समयवर्ती सयोगीके होता है । नीच और ऊंच गोत्रका जघन्य स्थितिसंक्रमण किसके होता है। वह अन्तिम समपवर्ती सयोगीके होता है । इस प्रकार जघन्य स्थितिसंक्रमका स्वामित्व समाप्त हुआ। एक जीवकी अपेक्षा कालकी प्ररूपणा की जाती है-पांच ज्ञानावरणीय, नौ दर्शनावरणीय,असाता- वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, नपुंसकवेद, अरति, शोक, भय और जुगुप्साके उत्कृष्ट स्थिति- १ कोहसंजलणस्स जहष्णट्टिदिसंकमो कस्स १ खवयस्स कोहसंजलणस्स अपच्छिमहिदिबंधचरिमसमयसंछुह- माणस्स तस्स जहण्णय। एवं माण-मायासंजलण-पुरिसवेदाणं । लोभसं जलणस्स जहणहिदिसंकमो कस्स ? आवलियसमयाहियसकसायस्स खवयरस । क. पा. सु. पृ. ३२१, ६४-६८.

संकमाणियोगदारे हिदिसंकमो ३५५ एगसमओ, उक्क. अंतोमुहत्तं । पंचणाणावरण-णवदंसणावरण-मिच्छत्त-सोलसकसाय- असादावेदणीयाणं अणुकस्सट्ठिदिसंकमो जह० अंतीमुहुत्तं, उक० असंखेजा पोग्गल- परियट्टा । अधवा, मदि-सुदआवरणाणमणुकस्सटिदिसंकमकालो एगसमयमादि कादूण जाव असंखे० पोग्गलपरियट्टमेत्तो । कुदो ? मदि-सुदआवरणाणं संखेजपयडीसु अण्णदरपयडोए उक्कस्सविदि बंधिण विदियसमए सव्वासिमणुक्कस्सहिदि चंधिय तदियसमए अवराए पयडीए उकस्सविदि चंधिय आवलियादीदं संकममाणस्स अणुकस्सहिदीए एगादि- समयकालुवलंभादो। अरदि-सोग-भय-दुगुंछा-णqसयवेदाणं अणुक्कस्सट्ठिदिसंकमकालो जह० एयसमओ, उक्क० अणंतकालमसंखेजपोग्गलपरियट्टा । इत्थि-पुरिसवेद-साद-हस्स-रदीणं उकस्सटिदिसंकमकालो जह० एगसमओ, उक्क० आवलियो । अणुक्कस्सद्विदिसंकमकालो जह० एयसमओ, उक० अणंतकालमसंखेजा पोग्गलपरियट्टा । णवरि सादस्स जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० असंखे० पोग्गलपरियट्टा । देव-णिरयाउआणं उकस्सटिदिसंकमो णिसेयहिदिगो णियमा अंतोमुहुत्तो । अणुक्कस्सद्विदिसंकमो देव-णिरयाउआणं जह० अंतोमु०, उक्क० तेत्तीसं सागरोवमाणि संक्रमका काल कितना है ? वह जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। पांच ज्ञाना- वरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कपाय और असातावेदनीयके अनुत्कृष्ट स्थितिसंक्रमका काल जघन्यस अन्तर्मुहूत और उत्कषसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। अथवा मतिज्ञाना- वरण और श्रुतज्ञानावरणके अनुत्कृष्ट स्थितिसंत्रमका काल एक समयको आदि करके असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र तक है। इसका कारण यह है कि मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञानावरणकी संख्यात प्रकृतियोंमे किसी एक प्रकृतिकी उत्कृष्ट स्थितिको बांधकर, द्वितीय समयमें सब प्रकृतियोंकी अनुत्कृष्ट स्थितिको बांधकर, तृतीय समयमे अन्य प्रकृतिकी उत्कृष्ट स्थितिको बांधकर आलिका- तीत उसका संक्रमण करनेवाले के अनुत्कृष्ट स्थितिका एक आदि समय रूप काल पाया जाता है। अरति, शोक, भय, जुगुप्सा ओर नपुसकवेदकी अनुत्कृष्ट स्थिति के संक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवतन रूप अनन्त काल मात्र है। स्त्रीवेद, पुरुषवेद, सातावेदनाय, हास्य और रतिकी उत्कृष्ट स्थिातके संक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कषसे आवली मात्र है। इनकी अनुत्कृष्ट स्थितिके संक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कपसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र अनन्त काल है । विशेप इतना है कि सातावेदनीयका उक्त काल जघन्यस अन्तर्मुहूर्त और उत्कपैसे असंख्यात पुद्गल- परिवर्तन मात्र है। देवायु और नारकायुकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रमकाल निपेकस्थितिस्वरूप है जो नियमसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। देवायु और नारकायुकी अनुत्कृष्ट स्थिति के संक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त १ अप्रतौ 'भावलियाए' इति पाठः। २ अ-कापत्योः ‘णिसेयहिदि जो', ताप्रतौ 'णिसेयट्टिदिजो (गो) इति पाठः । ३ अप्रतौ 'णिरयाणुआणं' इति पाठः ।

३५६ छक्खंडागमे संतकम्म सादिरेयाणि । मणुस-तिरिक्खाउआणं णिसेयविदिगो' उक्कस्सविदिसंकमो जह० उकस्सेण च अंतोमुहुत्तं । अणुक्कस्सहिदिसंकमो जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० तिणि पलि- दोवमाणि सादिरेयाणि । उक्कस्सद्विदि बंधमाणगो जाओणमपयडीओ बंधदि तासि उकस्सटिदिसंकमकालो जह० एगसमओ, उक्क. अंतोमुहुत्तं । अणुकस्सटिदिसंकमकालो जह• अंतोमु०, उक्क. अणुवेल्लिजमाणियाणं असंखे० पोग्गलपरियट्टा, उव्वेल्लिजमाणियाणं बेसागरोवमसहस्साणि सादिरेयाणि । जासिं णामपयडीणमुक्कस्सहिदिसंकमो वीसं सागरोवमकोडाकोडीओ तीहि आवलियाहि ऊणाओ तासि पयडीणमुक्कस्सट्ठिदिसंकमकालो जह० एगसमओ, उक्क० एगावलिया। अणुक्कस्सडिदिसंकमकालो जह० अंतोमुत्तं, उक्क० अणुव्वेल्लिज्ज- माणियाणं असंखे० पोग्गलपरियट्टा, उव्वेल्लिजमाणियाणं वेसागरोवमसहस्साणि सादिरेयाणि । आहारसरीर-तदंगोवंग-बंधण-संघादाणं उक्कस्सद्विदिसंकमकालो जहण्णुक्कस्सेण एगसमओ। अणुक्कस्सट्ठिदिसंकमकालो जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० पलिदो० असंखे० भागो। तित्थयरणामाए उक्कस्सट्ठिदिसंकमकालो जहण्णुक्क० एगसमओ। अणुक्कस्स- द्विदिसंकमकालो जह० संखेजवाससहस्साणि, उक० तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । और उत्कर्षसे साधिक तेतीस सागरोपम प्रमाण है। मनुष्यायु और तिर्यगायुकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रमका काल निष्कस्थिति स्वरूप है जो जघन्य व उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। उनकी अनुत्कृष्ट स्थितिके संक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे साधिक तोन पल्योपम मात्र है। उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवाला जीव जिन नामप्रकृतियोंको बांधता है उनकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। उनकी अनुत्कृष्ट स्थिति के संक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूत और उत्कर्पसे अनुढेल्यमान प्रकृतियोंका असंख्यात पुद्गल- परिवर्तन तथा उद्वेल्यमान प्रकृतियोंका साधिक दो हजार सागरोपम है। जिन नामप्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिका संक्रम तीन आवलियोंसे हीन वीस कोड़ाकोडि सागरोपम प्रमाण है उन प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कृर्षसे एक आवली मात्र है । उनकी अनुत्कृष्ट स्थिति के संक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूत और उत्कर्पसे अनुढेल्यमान प्रकृतियोंका असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन तथा उद्वेल्यमान प्रकृतियोंका साधिक दो हजार सागरोपम है। आहारशरीर तथा उसके आंगोपांग, वन्धन और संघातकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रमका काल जघन्य व उत्कृपसे एक समय मात्र है। उनकी अनुत्कृष्ट स्थिति के संक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। तीर्थंकर नामकर्मकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रमका काल जघन्य व उत्कर्पसे एक समय मात्र है। उसकी अनुत्कृष्ट स्थितिके संक्रमका काल जघन्यसे संख्यात हजार वर्ष और उत्कर्षसे साधिक तेतीस सागरापम मात्र है। १ अ-काप्रत्योः 'णिसेयहिदीजो', ताप्रतौ 'णिसेयद्विदिनो' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे ट्ठिदिसंकमो ३५७ उच्चागोदस्स उकस्सद्विदिसंकमकालो जह० एगसमओ, उक्क० आवलिया। णीचागोदस्स जह० एगसमओ, उक्क० अंतो हुत्तं । उच्च-णोचागोदाणं अणुकस्सटिदिसंकमकालो जह. अंतोमुहुत्तं, उक्क० असंखे० पोग्गलपरियट्टा । एवमुकासकालो समत्तो । जहण्णद्विदिसंकमकालो । तं जहा- पंचणाणावरणीय- णवदंसणावरणीय- सादा- साद-मिच्छत्त-सोलसकसाय-णवणोकसाय-पंचंतराइयाणं जहण्णढिदिसंकमकालो जहण्णुक० एगसमओ' । अजहण्णडिदिसंकमकालो अणादिओ अपञ्जवसिदो अणादिओ सपञ्जवसिदो वा । णवरि सोलसकसाय-णवणोकसायाण अजहण्णस्स तिणि भंगा। जो सो सादिओ संपञ्जवसिदो तस्स जह• अंतोमुहुत्तं, उक्क० उचड्ढपोग्गलपरियढें । सम्मत्त-सम्मामिच्छ- ताणं जहण्णद्विदिसंकमकालो जहण्णुक्क० एगसमओ। अजहण्णहिदिसंकमकालो दोण्णं पि जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० बेछावद्विसागरोवमाणि सादिरेयाणि । चदुण्णमाउआणं जहण्णढिदिसंकमकालो जहण्णुक० एगसमओ। अजहणद्विदि- संकमकालो देव-णिरयाउआणं जह० दसवस्ससहस्साणि सादिरेयाणि, उक्क० तेत्तीसं सागरोवमाणि साहियाणि । मणुस-तिरिक्खाउआणं अजहणविदिसंकमकालो जह. उच्चगोत्रकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे आवली मात्र है। नीचगोत्रकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कृषसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। उच्चगोत्र और नीचगोत्रकी अनुत्कृष्ट स्थितिके संक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है । इस प्रकार उत्कृष्ट काल समाप्त हुआ। जघन्य स्थिति के संक्रमकालकी प्ररूपणा करते हैं । यथा-पांच ज्ञानावरणीय, नौ दर्शना- घरणीय, सातावेदनीय; असातावेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, नौ नोकषाय और पांच अन्तराय; इनकी जघन्य स्थितिके संक्रमका काल जघन्य व उत्कर्षसे एक समय मात्र है। इनकी अजघन्य स्थितिके संक्रमका काल अनादि-अपर्यवसित और अनादि-सपर्यवसित भी है। विशेष उतना है कि सोलह कपाय और नौ नोकषायोंकी अजघन्य स्थिति सम्बन्धी संक्रमकालके तीन भंग हैं। उनमें जो सादि-सपर्यवसित है वह जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपाधं पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी जघन्य स्थितिके संक्रमका काल जघन्य व उत्कर्षसे एक समय मात्र है। अजघन्य स्थिति के संक्रमका काल दोनोंका ही जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। चार आयु कर्मोंकी जघन्य स्थिति के संक्रमका काल जघन्य व उत्कर्पसे एक समय मात्र है। अजघन्य स्थितिके संक्रमका काल देवायु और नारकायुका जघन्यसे साधिक दस हजार वर्ष और उत्कर्षसे साधिक तेतीस सागरोपम मात्र है। मनुष्यायु और तिर्यंचआयुको अजघन्य स्थितिके १ अट्ठावीसाए पयडीणं जहण्णढिदिसंकमकालो केवचिरं कालादो होदि १ जहणुकरसेण एयसमओ । णवरि इस्थि-णसयवेद-छण्णोकसायाणं जहण्णष्टिदिसंकमकालो केवचिरं कालादो होदि १ जहण्णुक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । क. पा. सु. पृ. ३२२, ७८-८१. २ अ-काप्रत्योः 'जहण्ण-' इति पाठः । ३ प्रतिषु 'नहण्ण' इति पाठः।

३५८ छक्खंडागमे संतकम्म एगसमो, उके. अंतोमुहुत्तं । कुदो मणुसाउअस्स एगसमओ ? आउए आवलियाए असंखे० भागेणाहियदोआवलियावसेसे आउअस्स विणट्ठोकड्डणसंकरें अप्पमत्ते दुसमया- हियावलियावसेसपमत्तगुणं पडिवण्णे कयएगसमयअजहण्णसंकमे विदियसमए जहण्ण- संकमुवलंभादो । उक्क० तिण्णि पलिदोवमाणि सादिरेयाणि । णिरयगइ -णिरयगइपाओग्गाणुपुवी-तिरिक्खगइ-तिरिक्खगइपाओग्गाणुपुब्बी-एई- दिय-वेइंदिय-तेइंदिय - चउरिदियजादि-आदावुजोव - थावर-सुहुम-साहारणसरीरणामाणं जहण्णद्विदिसकमकालो जहण्णुकस्सेण एगसमओ। अजहण्णडिदिसंकमकालो अणुब्वे- ल्लिजमाणियाणं अणादियो अपञ्जवसिदो अणादियो सपञ्जवसिदो वा । उब्वेल्लिज- माणियाणं अजहण्णट्ठिदिसंकमकालो जहण्णेण अवस्साणि सादिरेयाणि, उक्क० बेसागरो- वमसहस्साणि साहियाणि । वुत्तसेसाणं णामपयडीणं जहण्णढिदिसंकमकालो जहण्णुक० एयसमओ । उब्वे- ल्लिज्जमाणियाणं अजहण्णद्विदिसंकमकालो जह० अवस्साणि सादिरेयाणि । उकस्सेण मणुसगइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुच्चीणं असंखेजपोग्गलपरियट्टा, देवगइ-देवगइपाओग्गाणु- 'संक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। शंका-- मनुष्यायुका एक समय मात्र उक्त काल कैसे बनता है ? समाधान- कारण यह कि आयुमें आवलीके असंख्यातवें भागसे अधिक दो आवली कालके शेष रहनेपर जिसके आयुका अपकर्षण व संक्रम नष्ट हो चुका है ऐसे अप्रमत्तसंयतके दो 'समय अधिक आवली मात्र शेष प्रमत्त गुणस्थानको प्राप्त होकर एक समय अजघन्य संक्रमके करनेपर द्वितीय समयमें जघन्य संक्रम पाया जाता है। उनकी अजघन्य स्थिति के संक्रमका काल उत्कर्षसे साधिक तीन पल्योपम मात्र है। नरकगति, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यग्गति, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारणशरीर नामकर्मोको जघन्य स्थिति के संक्रमका काल जघन्य व उत्कर्षसे एक समय मात्र है। अजघन्य स्थितिके संक्रमका काल अनुढेल्यमान प्रकृतियोंका अनादि-अपर्यवसित और अनादि सपर्यवसित भी है । उद्वेल्यमान प्रकृतियोंकी अजघन्य स्थितिके संक्रमका काल जघन्यसे साधिक आठ वर्ष और उत्कर्षसे साधिक दो हजार सागरोपम मात्र है। उपर्युक्त प्रकृतियों के अतिरिक्त जो शेष नामप्रकृतियां हैं उनकी जघन्य स्थिति के संक्रमका काल जघन्य व उत्कर्षसे एक समय मात्र है। उद्वेल्यमान प्रकृतियोंकी अजघन्य स्थितिके संक्रमका काल जघन्यसे साधिक आठ वर्ष मात्र है। उत्कपसे वह मनुष्यगति और मनुष्य- गतिप्रायोग्यानुपूर्वीका असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन तथा देवगति, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, वैक्रियिक- १ मप्रतौ 'उक' इति पदं नास्ति । २ अ-काप्रत्योः 'संकमो', ताप्रतौ 'संकमो (मे) इति पाठः । ३ अ-काप्रत्योः 'पडिवण्णो कयएगसमय', ताप्रतौ 'पडिवण्णो (ण) क (ए) यसमय' इति पाठः।

संकमाणियोगदारे द्विदिसंकमो ३५९ पुब्बीणं वेउब्बियसरीर-वेउब्वियसरीरअंगोवंग-बंधण-संघादाणं च बेसागरोवमसहस्साणि साहियाणि । आहारसरीर-आहारसरीरअंगोवंग-बंधण-संघादाणं जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० पलिदोवमस्स असंखे० भागो। तित्थयरणामाए जहण्णहिदिसंकमकालो जहण्णुक्क० एगसमओ । अजहण्णविदिसंकमकालो जह• संखेजाणि वस्ससहस्साणि, उक्क० तेत्तोसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । सेसाणं कम्माणं अजहण्णहिदिसंकमकालो अणादिओ अपज्जवसिदो अणादिओ सपञ्जवसिदो वा । उच्च-णीचगोदाणं जहण्णद्विदिसंकमकालो जहण्णुक्क० एगसमओ । अजहण्णविदि- संकमकालो अणादिओ अपञ्जवसिदो अणादिओ सपञ्जवसिदो वा। णवरि उच्चागोदस्स अजहण्णहिदिसंकमकालो जह० अहवस्साणि सादिरेयाणि, उक्क० असंखेजा पोग्गल- परियट्टा । एवं कालो समत्तो। एगजीवेण उक्कस्संतरं- मदि-सुदआवरणाणं उक्कासहिदिसंकामयंतरं जह० एग- समओ, उक्क० असंखे० पोग्गलपरियट्टा । तिण्णिणाणावरण-णवदंसणावरण-सादासाद- मिच्छत्त-सोलसकसाय-णवणोकसायाणमुक्कस्सद्विदिसंकामयंतरं जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० असंखे० पोग्गलपरियट्टा । णवरि णवणोकसायाणं उक्कस्सट्ठिदिसंकामगंतरं जह० एग- शरीर, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, वैक्रियिकबन्धन और वैक्रियिकसंघातका साधिक दो हजार सागरोपम मात्र है । आहारकशरीर, आहारकशरीरांगोपांग, आहारकबन्धन और आहारकसंघातका उक्त काल जघन्यसे अन्तर्महूर्त व उत्कर्षसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है । तीर्थंकर नामकर्मकी जघन्य स्थिति के संक्रमका काल जघन्य व उत्कर्षसे एक समय मात्र है। उसकी अजघन्य स्थितिके संक्रमका काल जघन्यसे संख्यात हजार वर्ष और उत्कर्षसे साधिक तेतीस सागरोपम मात्र है। शेष कर्मोंकों अजघन्य स्थिति के संक्रमका काल अनादि-अपर्यवसित और अनादि- सपर्यवसित भी है। उच्च और नीच गोत्रकी जघन्य स्थितिके संक्रमका काल जघन्य व उत्कर्पसे एक समय मात्र है। उनकी अजघन्य स्थितिके संक्रमका काल अनादि-अपर्यवसित और अनादि-सपर्य- वसित भी है। विशेष इतना है कि उच्चगोत्रकी अजघन्य स्थिति के संक्रमका काल जघन्यसे साधिक आठ वर्ष और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। इस प्रकार कालप्ररूपणा समाप्त हुई। • एक जीवकी अपेक्षा उत्कृष्ट स्थिति सम्बन्धी संक्रमके अन्तरकालकी प्ररूपणा की जाती है- मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञानावरणकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। शेप तीन ज्ञानावरण, नौ दर्शना- वरण, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकषायोंकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मान है। विशेष इतना है कि नौ नोकपायोंकी उत्कृष्ट स्थितिके. संक्रामकका अन्तरकाल १ अप्रतौ 'समयंतर, काप्रतौ 'सामयंतरं इति पाठः। २ अप्रतौ 'समयंतर, ताप्रती 'सं० अंतरं' इति पाठः। - ३६० छक्खंगमे संतकम्म समओ । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं उकस्सद्विदिसंकामयंतरं जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० उवड्ढ़- पोग्गलपरियदृ । पंचंतराइयाणं उकस्सट्ठिदिसंकामयंतरं जह• अंतोमुहुत्ते, उक्क० असंखे० पोग्गलपरियट्टा। देव-णिरयाउआणं उक्क० द्विदिसंकामयंतरं जह० अंतोमुहुत्तं । उक्क० देवाउअस्स उघड्ढपोग्गलपरियट्ट, णिरयाउअस्स असंखे० पोग्गलपरियट्टा । जट्ठिदि' पडुच्च देव- णिरयाउआणं उकस्सद्विदिसंकामयंतरं जह० समऊणपुव्यकोडी दसवस्ससहस्साणि च, उक्क० तं चेव । मणुस-तिरिक्खाउआणं उकस्सद्विदिसंकामयंतरं जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० असंखे० पोग्गलपरियट्टा । जहिदि पडुच्च जह० पुव्यकोडी समऊणा । उक्कस्संतरं तं चेव । उकस्मद्विदि बंधमाणो जाओ णामपयडीओ बंधदि तासिं णामपयडीणं उकस्स- द्विदिसंकामयंतरं जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० असंखे० पोग्गलपरियट्टा । सेसाणं णामपयडीणं उक्कस्सहिदिसंकामयंतरं जह० एयसमओ, उक० असंखे० पोग्गलपरियट्टा । आहार- सरोर-आहारसरीरंगोवंग-बंधण-संघादाणं उकस्सद्विदिसंकामयंतरं जह• अंतोमुहतं, उक्क० उवड्ढपोग्गलपरियट्ट । तित्थयरणामाए उकस्सट्ठिदिसंकामयंतरं णस्थि । जघन्यसे एक समय मात्र है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपाधं पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। पांच अन्तराय कर्मोंको उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गल परिवर्तन मात्र है। देवायु और नारकायुकी उत्ष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त है। उत्कर्षसे वह देवायुका उपाधं पुद्गलपरिवर्तन तथा नारकायुका असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। जस्थितिकी अपेक्षा देवायु और नारकायुकी उत्कृष्ट स्थिति के संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे एक समय कम एक पूर्वकोटि और दस हजार वर्ष तथा उत्कर्षसे भी उतना मात्र ही है। मनुष्यायु और तिर्यगायुकी उत्कृष्ट स्थिति के संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। जस्थितिकी अपेक्षा वह जघन्यसे एक समय कम पूर्वकोटि प्रमाण है । उत्कृष्ट अन्तरकाल भी उसका वही है। उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवाला जीव जिन नामकर्मकी प्रकृतियोंको बांधता है उन नाम- प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थिति के संक्रामकका अन्तर जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। शेष नामप्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। आहारशरीर, आहारशरीरंगोपांग, आहारकशरीरबन्धन और आहारकशरीरसंघातकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपाधै पुद्गलपरिवर्तन मात्र है । तीर्थंकर नामकर्मकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल सम्भव नहीं है। १ ताप्रतौ 'जं द्विदि इति पाठः । २ अप्रतौ 'सुणाम' इति पाठः ।

संकमाणियोगद्दारे द्विदिसंकमो ३६१ उच्च-णीचागोदाणं उक्क० डिदिसंकामयंतरं जह० अंतीमुहुत्, उक्क० असंखेजा पोग्गलपरियट्टा । एवमेयजीवेण उकस्सद्विदिसंकामयंतरं समत्तं । जहण्णटिदिसंफामयंतरं । तं जहा- आउअवजाणं कम्माणं जहण्णढिदिसंकामयंतरं पत्थेि । देव-णिरयाउआणं जहण्णहिदिसंकामयंतरं जह० दसवस्ससहस्साणि सादिरेयाणि, उक्क० पयडिअंतरं । तिरिक्ख-मणुस्साउआणं जह० हिदि० अंतरं जहण्णेण खुद्दाभव- ग्गहणं समऊणं, उक्क० पयडिअंतरं । अणंताणुबंधीणं जह० द्विदि० अंतरं जह० अंतोमुहत्तं, उक्क. उवढपोग्गलपरियट्ट । अवसेसाणं पयडीणं अजहण्णहिदिसंकामयंतरस पयडि- अंतरभंगो । एवं जहण्णहिदिसंकामयंतरं समत्तं । णाणाजीवेहि भंगविचओ दुविहो उक्कस्सपदभंगविचओ जहण्णपदभंगविचओ चेदि । तत्थ अट्ठपदं । तं जहा- जो उक्कस्सियाए हिदीए संकामओ सो अणुक्कस्सियाए द्विदीए असंकामओ। जो अणुकस्सियाए द्विदीए संकामओ सो उकस्सियाए द्विदीए असंकामगो। जेसि पयडिसंतमस्थि तेसु पयर्द, जेसिं णत्थि तेहि अव्यवहारो । एदेण अट्ठपदेण णाणावरणस्स उक्कस्सियाए द्विदीए सिया सव्वे जीवा असंकामया, सिया ऊंच और नीच गोत्रकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तर जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। इस प्रकार एक जीवकी अपेक्षा उत्कष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तर समाप्त हुआ। जघन्य स्थितिके संक्रामकके अन्तरकालकी प्ररूपणा की जाती है। यथा- आयु कर्मोको छोड़कर शेष कर्मोकी जघन्य स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल सम्भव नहीं है। देवायु और नारकायुकी जघन्य स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे साधिक दस हजार वर्ष और उत्कर्षसे प्रकृतिसंक्रमके अन्तरके समान है। तिर्यगायु और मनुष्यायुकी जघन्य स्थितिके संक्रामकका अन्तर जघन्यसे एक समय कम क्षुद्रभवग्रहण और उत्कर्पसे प्रकृतिसंक्रामकके अन्तर जैसा है। अनन्तानुबन्धी कपायोंकी जघन्य स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपाधै पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। शेप प्रकृतियोंकी अजघन्य स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल प्रकृतिसंक्रामकके अन्तर जैसा है। इस प्रकार जघन्य-स्थिति-संक्रामकके अन्तरकी प्ररूपणा समाप्त हुई। नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय दो प्रकार है- उत्कृष्ट पदविपयक भंगविचय और जघन्य पदविषयक भंगविचय । उनमें अर्थपद इस प्रकार है-जो उत्कृष्ट स्थितिका संक्रामक होता है वह अनुत्कृष्ट स्थितिका असंक्रामक होता है। जो अनुत्कृष्ट स्थितिका संक्रामक होता है वह उत्कृष्ट स्थितिका असंक्रामक होता है। जिन प्रकृतियोंका सत्त्व है वे यहां प्रकृत जिनका सत्त्व नहीं है वे यहां अव्यवहार्य हैं। इस अर्थपदके अनुसार ज्ञानावरणकी उत्कृष्ट, १ एत्तो जहणयमंतरं। सव्वासिं पयडीणं णस्थि अंतरं । क. पा. सु. पृ. ३२२, ८४-८५. २ अप्रती 'हिदिअंतरे' इति पाठः । ३ णवरि अणताणुबंधीणं जहण्णहिदिसंकामयंतरं नहणेग अंतोमुहुत्तं । उकस्सेण उवढपोग्गलपरियह । क. पा. सु. पृ. ३२२, ८६-८७. ४ अप्रती 'उवसेसाणं इति पाठः। ५ प्रतिषु 'जहण्ण- द्विदिभंगविचओ' इति पाठः । ६ अ-काप्रत्योः 'पदं' इति पाटः । छ. से. ४६ ३६० छक्खंगमे संतकम्म समओ । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं उक्कस्सहिदिसंकामयंतरं जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० उबडढ- पोग्गलपरियट्ट । पंचंतराइयाणं उक्कस्सट्ठिदिसंकामयंतरं जह० अंतोमुहुत्तं, उक० असंखे० पोग्गलपरियट्टा। देव-णिरयाउआणं उक्क० द्विदिसंकामयंतरं जह० अंतोमुहुत्तं । उक्क० देवाउअस्स उघड्ढपोग्गलएरियहूं, णिरयाउअस्स असंखे० पोग्गलपरियट्टा । जहिदि' पडुच्च देव- णिरयाउआणं उकस्सविदिसंकामयंतरं जह० समऊणपुव्यकोडी दसवस्ससहस्साणि च, उक्क० तं चेव । मणुस-तिरिक्खाउआणं उक्कस्सविदिसंकामयंतरं जह० अंतोमुहुर्त, उक्क० असंखे० पोग्गलपरियट्टा । जहिदि पडुच्च जह० पुव्वकोडी समऊणा । उकस्संतरं तं चेव । उकस्मद्विदि बंधमाणो जाओ णामपयडीओ बंधदि तासिं णामपयंडीणं उक्कस्स- विदिसंकामयंतरं जह० अंतोमुहत्तं, उक्क० असंखे. पोग्गलपरियट्टा । सेसाणं णामपयडीणं उक्कस्सहिदिसंकामयंतरं जह० एयसमओ, उक्क० असंखे० पोग्गलपरियट्टा । आहार- सरोर-आहारसरीरंगोवंग-बंधण-संघादाणं उक्कस्सविदिसंकामयंतरं जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० उवड्ढपोग्गलपरियट्ट । तित्थयरणामाए उकस्सविदिसंकामयंतरं णस्थि । जघन्यसे एक समय मात्र है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपार्ध पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। पांच अन्तराय कर्मोको उत्कृष्ट स्थिति के संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गल परिवर्तन मात्र है। देवायु और नारकायुकी उत्ष्ट स्थिति के संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त है। उत्कर्षसे वह देवायुका उपाधं पुद्गलपरिवर्तन तथा नारकायुका असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। जस्थितिकी अपेक्षा देवायु और नारकायुकी उत्कृष्ट स्थिति के संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे एक समय कम एक पूर्वकोटि और दस हजार वर्ष तथा उत्कर्षसे भी उतना मात्र ही है। मनुष्यायु और तिर्यगायुकी उत्कृष्ट स्थिति के संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। जस्थितिकी अपेक्षा वह जघन्यसे एक समय कम पूर्वकोटि प्रमाण है। उत्कृष्ट अन्तरकाल भी उसका वही है। उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवाला जीव जिन नामकर्मकी प्रकृतियोंको वांधता है उन नाम- प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थिति के संक्रामकका अन्तर जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। शेष नामप्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है । आहारशरीर, आहारशरीरंगोपांग, आहारकशरीरवन्धन और आहारकशरीरसंघातकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपाधै पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। तीर्थंकर नामकर्मकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकका अन्तरकाल सम्भव नहीं है। १ ताप्रतौ 'जं द्विदि' इति पाठः । २ अप्रतौ 'सुणाम' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे हिदिसकमो ३६३ बंधीणं च जहण्णविदिसंकमकालो जह० एगसमओ, उक्क० आवलि० असंखे० भागो'। तिरिक्खाउअस्स जहण्णद्विदिसंकामया केवचिरं० ? सनद्धा । परभवियं पडुच आवलि० असंखे० भागो । सेसाणं कम्माणं जह० हिदिसंकामया केवचिरं० १ जह० एगसमओ, उक० संखेजा समया । सव्यकम्माणं पि अजहण्णहिदिसंकामया केवचिरं० ? सञ्चद्धा । एवं णाणाजीवेहि कालो समत्तो। णाणाजोवेहि अंतरं । तं जहा- णिरयाउअस्स उकस्सहिदिसंकामयंतर जद्विदि- संकामया त्ति जह० एगसमओ, उक्क० पलिदो० असंखे० भागो। पंचणाणावरण-णव- दंसणावरण-सादासाद-सोलसकसाय-णवणोकसाय-मणुस-तिरिक्ख-देवाउआणं मिच्छत्त- सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं सव्वासिं णामपयडीणं उच्च-णीचगोद-पंचंतराइयाणं च उकस्स- द्विदिसंकामयंतरं जह० एगसमओ, उक० अंगुलस्स असंखे० भागो। णाणाजीवेहि जहण्णाडिदिसंकामयंतरं । तं जहा पंचणाणावरण-णवदंसदणावरण- सादासाद - मिच्छत्त - सम्मत्त - सम्मामिच्छत्त - अट्ठकसाय - छण्णोकसाय-लोहसंजलणाणं सन्यासिंणामपयडीणमुच्च-णीचागोद-पंचंतराइयाणं च जह० द्विदिसंकामयंतरं जाणाजीचे पडुच्च जह० एगसमओ, उक० छम्मासा । अणंताणुबंधीणं जह० द्विदिसंकामयंतरं जह. जघन्यसें एक समय और उत्कर्षसे आवलीके असंख्यातवें भाग मात्र है। तिर्यगायुकी जघन्य स्थिति के संक्रामकोंका कितना काल है ? सर्वकाल है । परमविककी अपेक्षा वह आवलीके असंख्यातवें भाग भात्र है। शेष कर्मोकी जघन्य स्थितिके संक्रामकोंका कितना काल है ? वह जघन्यसे एक समय और उत्कषसे संख्यात समय मात्र है। सभी कर्मोंकी अजघन्य स्थितिके संक्रामकोंका काल कितना है ? सर्वकाल है। इस प्रकार नाना जीवोंकी अपेक्षा कालकी प्ररूपणा समाप्त हुई। नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तरकी प्ररूपणा की जाती है। यथा- नारकायुको उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकोंका अन्तर, जस्थितिके संक्रामक रहने के कारण जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मान होता है। पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, सातावेदनीय, असातावेदनीय, सोलह कषाय, नौ नोकषाय, मनुष्यायु, तियगायु, देवायु, मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, सब नामप्रकृतियां, उच्चगोत्र, नीचगोत्र और पांच अन्तराय; इनकी उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामकोंका अन्तर जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे अंगुलके असंख्यातवें भाग मात्र होता है। नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य स्थिति के संक्रामकोंका अन्तर इस प्रकार है-पांच ज्ञाना- वरण, नौ दर्शनावरण, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, आठ कपाय, छह नोकषाय, संज्वलनलोभ, सब नामप्रकृतियां, उच्चगोत्र, नीचगोत्र और पांच अन्तराय; इनकी जघन्य स्थितिके संक्रामकोंका अन्तर नाना जीवों की अपेक्षा जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे छह मास प्रमाण होता है। अनन्तानुबन्धी कपायोंकी जघन्य स्थिति के संक्रामकोंका अन्तर १ णवरि अर्णताणुबंधीणं जहण्णहिदिसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? जहणेण एयसमओ । उक्कस्सेग आवलियाए असंखेजादभागो। क. पा. सु. पृ. ३२४, १०४-६. २ मप्रतौ 'सव्वसम्बद्धा' इति पाठः ।

३६२ छक्खंडागमें संतकम्म -- असंकामया च संकामओ चं, सिया असंकामया च संकामया च, एवं तिण्णिभंगा। अणुक्कस्सियाए हिदीए सिया सव्वे जीवा संकामया, सिया संकामया च असंकामओ च, सिया संकामया च असंकामया च । एवं सन्यासि पयडीणं णाणाजीवेहि भंगविचओ णाणावरणस्सेव णेयव्यो। जहण्णपदभंगविचयस्स उकस्सपदभंगविचयभंगो । णवरि तिरिक्खाउअस्स जहण्णा- जहण्णहिदिसंकामया णियमा अस्थि । णाणाजीवेहि कालो। तं जहा- सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं णिरयाउअस्स च जहिदिसंकामओ त्ति कादूण उकस्सद्विदिसंकमकालो जह० एगसमओ, उक्क० आवलि० असंखे० भागो। मणुस्स-तिरिक्ख-देवाउआणं आहारसरीर-आहारसरीरंगोवंग-बंधण- संघाद-तित्थयराणं उक्कस्सद्विदिसंकमकालो जह० एगसमओ, उक्क० संखेजा समया। सेसाणं कम्माणं उकस्सद्विदिसंकमकालो जह० एगसमओ, उक्क० पलिदोवमस्स असंखे० भागो। सव्यकम्माणं पि अणुक्करसहिदिसंकमकालो सबद्धा । णाणाजीवेहि जहण्णहिदिसंकमकालो । तं जहा णिरय-मणुस-देवाउआणं अणंताणु- स्थितिके कदाचित् सब जीव असंक्रामक होते हैं, कदाचित् बहुत असंक्रामक और एक संक्रामक होता है, कदाचित् बहुत असंक्रामक और बहुत संक्रामक होते हैं। इस प्रकारसे यहां तीन भंग हैं। ज्ञानावरणकी अनुत्कृष्ट स्थितिके कदाचित् सब जीव संक्रामक होते हैं, कदाचित् बहुत संक्रामक और एक असंक्रामक होता है, कदाचित् बहुत संक्रामक और बहुत असंक्रामक भी होते हैं। इस प्रकार नाना जीवोंकी अपेक्षा सब प्रकृतियों के भंगविचयको ज्ञानावरण के समान ही ले जाना चाहिये। जघन्य पदभंगविचयकी प्ररूपणा उत्कृष्ट पदभंगविचयके समान है। विशेप इतना है कि तिर्यगायुकी जघन्य व अजन्य स्थिति के संकामक नियमसे बहुत हैं । नाना जीवोंकी अपेक्षा कालकी प्ररूपणा की जाती है। यथा- सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और नारकायुकी जस्थितिके संक्रामक हैं, इस कारण उनकी उत्कृष्ट स्थितिका संक्रमकाल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे आवलीके असंख्यातवें भाग मात्र है। मनुष्यायु, तिर्यगायु, देवायु, आहारक- शरीर, आहारकशरीरांगोपांग, आहारकबन्धन, आहारकसंघात और तीर्थंकर; इनकी उत्कृष्ट स्थितिका संक्रमकाल जघन्यसे एक समय और उत्कपैसे संख्यात समय मात्र है। शेप कोंकी उत्कृष्ट स्थितिका संक्रमकाल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। सभी कर्मोंको अनुत्कृष्ट स्थितिका संक्रमकाल सर्वकाल है। नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य स्थितिके संक्रमकालकी प्ररूपणा की जाती है। यथा- नारकायु, मनुष्यायु, देवायु और अनन्तानुबन्धी कपायोंकी जघन्य स्थितिका संक्रमककाल १ ताप्रतौ 'असंकामओ च संकामया च' इति पाठः । २ प्रतिपु 'विचयपद्भगो' इति पाठः । ३ सव्वासिं पयडीणमुक्कसहिदिसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ जहणेण एयसमओ। उक्करसेण पलिदो- वमस्स असंखेजदिभागो। णवरि सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमुक्कस्सहिदिसंक्रमो केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णेण एयसमओ । उकसेण आवलियाए असंखेजदिभागो । क. पा. सु. पृ. ३२३, ९४-९९ .

संकमाणियोगक्षरे डिदिसंमो कसायाणं जाओ द्विदीओ ताओ तुल्लाओ। जहिदीओ विसे० ओ। सम्मत्त-सम्मा- मिच्छत्ताणं जाओ द्विदीओ ताओ विसे० ओ । जद्विदीओ विसे० ओ। मिच्छत्तस्स जाओ द्विदीओ ताओ विसे० ओ । जहिदीयो विसेसाहियाओ। णिरयगईए णेरइएसु मणुस-तिरिक्खाउआणं जाओ द्विदीओ ताओ थोवाओ। जद्विदीओ विसेसाहियाओ। णिरयाउअस्स जाओ द्विदीयो ताओ असंखे० गुणाओ। जद्विदीओ विसे० ओ। आहारसरीररस जाओ द्विदीओ ताओ संखे० गुगाओ । जहिदीयो विसे० ओ । देवगईए जाओ द्विदीओ ताओ संखे० गुणाओ । जहिदी० विसे० । मणुस- गइ-जसकित्ति-उच्चागोदाणं जाओ द्विदीओ ताओ विसे । जहिदीयो विसे० । णिरय- गई-वेउब्वियसरीर-णीचागोद-ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीर- अजसकित्तीर्ण जाओ द्विदीओ ताओ तत्तियाओ चेव । जद्विदीयो बिसे० ओ। सादस्स जाओ द्विदीओ ताओ विसे० ओ। जद्विदीयो विसे० । पंचणाणावरण-णवदसणावरण-असाद-पंचंतराइयाणं जाओ द्विदीओ ताओ तत्तियाओ चैव । जहिदीयो विसे० ओ। गवणोकसायाणं जाओ द्विदीओ ताओ पिसे० ओ। जद्विदीयो विसे० ओ। सोलसकसायाणं जाओ द्विदीओ ताओ तत्तियाओ चेव । जद्विदीयो पिसे । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं जाओ द्विदीओ सोलह कपायोंकी जो स्थितियां संक्रान्त होती हैं वे समान रूपसे तुल्य होकर उतनी मात्र ही हैं। जस्थितियां विशेप अधिक हैं। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी जो स्थितियां संकान्त होती हैं। वे विशेष अधिक हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं। मिथ्यात्वकी जो स्थितियां संक्रान्त होती हैं वे विशेष अधिक हैं। जस्थितियां विशेप अधिक हैं। नरकगतिमें नारकियोंमें मनुष्यायु और तिर्यगायुकी जो उक्त स्थितियां हैं वे स्तोक हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं । नारकायुकी जो उक्त स्थितियां हैं वे असंख्यातगुणो हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं । आहारशरीरकी जो उक्त स्थितियां हैं वे संख्यातगुणो हैं । जस्थितियां विशेप अधिक हैं। देवगतिको जो उक्त स्थितियां हैं वे संख्यातगुणी हैं। जस्थितियां विशेप अधिक हैं। मनुष्यराति, यशकीर्ति और उच्चगोत्रकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेप अधिक हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं। नरकति, वैयिकशरीर, नीचगोत्र, औदारिक, तैजस एवं कामणशरीर तथा अयशकीर्तिकी जो उक्त स्थितियां हैं वे उतनी मात्र ही हैं। जस्थितियां विशेष अधिक है। सातावेदनीयकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं। जस्थितियां विशेष अधिक है। पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, असातावेदनीय और पांच अन्तरायकी जो उक्त स्थितियां हैं वे उतनी मात्र ही हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं। नौ नोकषायोंकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेप अधिक हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं। सोलह कपायोंकी जो उक्त स्थितियां हैं वे उतनी मात्र ही हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी जो उक्त १ अप्रतौ 'जाओ हिदीयो', काप्रती 'ज० द्विदीयो' इति पाठः। २ ताप्रती 'विसे० संखे० गुणाओ। णिस्यगइ' इति पाठः। ३ अप्रतौ 'जहण्णविदीयो', का-ताप्रत्योः 'ज० द्विदीयो' इति पाठः । - ३६४ छक्खंडागमे संतकम्म " एगसमओ, उक्क० चदुवीसमहोरत्ताणि सादिरेयाणि । तिसंजलण-पुरिसवेदाणं जह. एयसमओ, उक्क० वस्सं सादिरेयं । इत्थि-णबुंसयवेदाणं जह० एगसमओ, उक्क० बास- पुधत्तं । तिरिक्खाउअस्स णत्थि अंतरं । तिण्णमाउआणं जह० एगसमओ, उक्क० वारस मुहुत्ता । एवमंतरं समत्तं। अप्पाउहुअं- उक० मणुस-तिरिक्खाउआणं जाओ द्विदीओ संकामिजंति ताओ थोवाओ। जहिदीयो विसेसी० । देव-णिरयाउआणं जाओ द्विदीयो संकामिजंति ताओ संखेजगुणाओ । जद्विदीओ विसेसाहियाओ । आहारसरीर० संखेजगुणाओ । जट्ठिदीओ विसे० । देव-मणुसगइ-जसकित्ति-उच्चागोदाणं जाओ द्विदीओ [संकामिजंति ताओ] संखे० गुणाओ। जट्ठिदीयो विसे० । णिरय-तिरिक्खगइ-अजसकित्ति-चदुसरीर-णीचागोदार्ण जाओ द्विदीओ ताओ तत्तियाओ चेव । जद्विदीयो विसेसाहियाओ। सादस्स जाओ द्विदीओ ताओ विसेसाहियाओ। जद्विदीयो विसे० ओ। पंचणाणावरण-णबदसणावरण- असाद-पंचंतराइयाणं जाओ द्विदीओ ताओ तत्तियाओ चेव । जद्विदीयो विसे० ओ। णवणोकसायाणं जाओ द्विदीयो.ताओ विसे० ओ । जद्विदीयो विसे० ओ। सोलसण्णं जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे साधिक चौबीस दिन-रात्रि प्रमाण होता है। तीन संज्वलन कपाय और पुरुषवेदकी जघन्य स्थिति के संक्रामकोंका अन्तर जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे साधिक एक वर्ष मात्र होता है । स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका उक्त अन्तर जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे वर्षपृथक्त्व मात्र होता है। तिर्यगायुका वह अन्तर सम्भव नहीं है। शेष तीन आयु कर्मोंका उक्त अन्तर जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे बारह मुहूर्त मात्र होता है। इस प्रकार अन्तरका कथन समाप्त हुआ। अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा की जाती है- उत्कर्षसे मनुष्यायु और तिर्यगायुकी जो स्थितियां संक्रमणको प्राप्त होती हैं वे स्तोक हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं । देवायु और नारकायुकी जो स्थितियां संक्रमणको प्राप्त होती हैं वे उनसे संख्यातगुणी हैं। जस्थितियां विशेप अधिक हैं। आहारशरीरकी संक्रमणको प्राप्त होनेवाली स्थितियां संख्यातगुणी हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं । देवगति, मनुष्यगति, यशकीर्ति और उच्चगोत्रकी जो स्थितियां संक्रान्त होती हैं वे संख्यात- गुणी हैं । जस्थियां विशेष अधिक हैं । नरकगति, तिर्यग्गति, अयशकीर्ति व चार शरीर नामकर्मोकी तथा नीच गोत्रकी जो स्थितियां संक्रमणको प्राप्त होती हैं वे उतनी मात्र ही हैं। जस्थितियां विशेप अधिक हैं। सातावेदनीयकी जो स्थितियां संक्रान्त होती हैं वे विशेष अधिक हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं । पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, असातावंदनीय और पांच अन्तराय; इनकी जो स्थितियां संक्रान्त होती हैं वे उतनी मात्र ही हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं । नौ नोकपायों की जो स्थितियां संक्रान्त होती हैं वे विशेष अधिक हैं । जस्थितियां विशप अधिक हैं। - १ अप्रतौ 'अप्पाबहुअ०' इति पाठः । २ अप्रती 'विसेसाहिओ' इति पाठः । ३ अप्रतौ 'संकामिजंत' इति पाठः।

संकमाणियोगद्दारे पयडिसंकमो ३६७ जहण्णएण पंचणाणावरणीय-छदसणावरणीय -सम्मत्त-लोहसंजलण- चत्तारिआउ- पंचंतराइयाणं जह० हिदिसंकमो एगा द्विदी। जद्विदीओ असंखेजगुणाओ। णिहा- पयलाणं जद्विदीओ संखे० गुणाओ । कुदो ? आवलि० असंखे० भाएणभहियदोआवलिये- पमाणत्तादो । देवगइ-वेउब्धियसरीर-आहारसरीर - अजसकित्ति- णीचागोदाणं जाओ हिदीओ ताओ संखे० गुणाओ। मणुसगइ-ओरालिय-तेजा- कम्मइ यसरीर- जसकित्ति- उच्चागोदाणं जाओ द्विदीओ ताओ विसेसा० । सयासि जद्विदीयो विसेसा० । सादासादाणं जाओ द्विदीओ ताओ विसेसा०। जदिदिसंकमो विसे । मायासंजलण जाओ द्विदीओ ताओ संखे० गुणाओ । जहिदी० विसे० । माणे विसे० । कोधे विसे० । पुरिस० संखे० गुणाओ। छण्णोकसाय० संखे० गुणाओ। इत्थि-णQमयवेद० असंखे० गुणाओं। थीणगिद्वितियस्स जहण्णद्विदी असंखे० गुणा । णिरय-तिरिक्खगईणं असं० गुणाओ। अडकसायाणं जाओ द्विदीओ ताओ असंखे० गुणाओ। सम्मामिच्छत्तस्स असंखे० गुणाओ। मिच्छत्तस्स असंखे० गुणाओ। अर्णताणुबंधीणं असंखेजगुणाओ । सयासि जद्विदीयो विसे० ओ। णिरयगईए णिरयाउअस्स सम्मत्तस्स य जहण्णहिदिसंकमो थोवो। जहिदी असंखे० जघन्य पदकी अपेक्षा पांच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, सम्यक्त्व, संज्वलन लोभ, चार आयु और पांच अन्तराय; इनका जघन्य स्थितिसंक्रम एक स्थितिस्वरूप है। जस्थितियां असं- ख्यातगुणी हैं । निद्रा और प्रचलाकी जस्थितियां संख्यातगुणी हैं, क्योंकि, वे आवलीके असं- ख्यातवें भागसे अधिक दो आवली प्रमाण हैं । देवगति, वैक्रियिकशरीर, आहारशरीर, यशकीर्ति और नीचगोत्र इनकी जो जघन्य स्थितियां संकान्त होती हैं वे संख्यातगुणी है । मनुप्यगति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, यशकीर्ति और उच्चगोत्र; इनकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं । सबकी जस्थितियां विशेष अधिक हैं । साता और असाता वेदनीयकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक है। जस्थितिसंक्रम विशेष अधिक है, संज्वलन मायाकी जो उक्त स्थितियां हैं वे संख्यातगुणी हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं। संज्वलन मानमें विशेप अधिक हैं। संज्वलन क्रोध में विशेष अधिक हैं। पुरुषवेदकी संख्यातगुणी हैं। छह नोकपायोंकी संख्यातगुणी हैं । स्त्रीवेद और नपुंसकवेदकी उक्त स्थितियां असंख्यातगुणी हैं । स्त्यानगृद्धि आदि तीनकी जघन्य स्थिति असंख्यातगुणी है । नरकगति और तिर्यग्गतिको उक्त स्थितियां असंख्यात- गुणी हैं। आठ कपायोंकी जो उक्त स्थितियां हैं वे असंख्यातगुणी हैं । सम्यग्मिथ्यात्वकी असंख्यातगुणी हैं । मिथ्यात्वकी असंख्यातगुणी हैं । अनन्तानुबन्धी कपायोंकी संख्यातगुणी हैं। सबकी जस्थितियां विशेप अधिक हैं। नरकगतिमें नारकायु और सम्यक्त्वका जघन्य स्थितिसंक्रम स्तोक है। जस्थिति असंख्यात- १ अप्रतौ 'भाएणव्वहियादोआवलिय', ताप्रतौ 'भागेणब्भहियादो आवलिय' इति पाटः । २ अप्रती 'जा' इति पाठः । ३ अ-काप्रत्योः 'गुणा' इति पाठः । ४ अ-काप्रत्योः अष्टकपाय-सम्यन्मिथ्यात्वसम्बन्धिसन्दर्भोऽयं त्रुटितोऽस्ति, मप्रतितः कृतसंशोधने च केवलमष्टकपायसम्बन्धिसन्दर्भो योजितो न तु सम्यग्मिध्यात्वसम्बन्धी ।

३६६ छक्खंडागमे संतकम्म ताओ विसे० ओ। द्विदीयो विसे० ओ। मिच्छत्तस्स जाओ द्विदीओ ताओ चिसे० । जद्विदीयो विसेसा०। तिरिक्खगईए मणुस्साउअस्स जाओ द्विदीओ ताओ थोवाओ। तिरिक्खाउअस्स जाओ द्विदीओ [ ताओ ] विसे० ओ । दोण्णं जट्ठिदीओ विसे० ओ । देवाउअस्स जाओ हिदीओ ताओ संखे० गुणाओ। जहिदीयो विसे० । णिरयाउअस्स जाओ द्विदीओ ताओ विसे० । जहिदी. विसे० । आहारसरीरस्स जाओ द्विदीओ ताओ संखेज- गुणाओ। जद्विदीओ विसे० ओ । मणुसगइ-देवगइ-जसकित्ति-उच्चागोदाणं जाओ द्विदीओ ताओ संखे० गुणाओ। जद्विदीओ विसे० । णिर यगइ-तिरिक्खगइ-चदुसरीर- अजसकित्ति-णीचागोदाणं जाओ द्विदीओ ताओ तुल्लाओ। जद्विदीओ विसे० ओ। सादस्स जाओ द्विदीओ ताओ विसे । जद्विदीओ विसे० ओ । तीसियाणं जाओ द्विदीओ ताओ तत्तियाओ चेव, जहिदीयो विसे० ओ। पावणोकसायाणं जाओ द्विदीओ ताओ विसे० ओ । जहिदीयो विसे० ओ। सोलसणं कसायाणं जाओ द्विदीओ ताओ तत्तियाओं चेव । जद्विदीयो विसे० ओ। सम्मत्त-सम्मामिच्छताणं जाओ द्विदीओ ताओ विसे० ओ। जद्विदीयो विसे० ओ। मिच्छत्तस्स जाओ द्विदीओ विसे० ओ। जद्विदी विसे० ओ। मणुस्सेसु देवेसु एईदिएसु च एदेण वीजपदेण णेयव्यं । स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं। मिथ्यात्वकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं। तिर्यंचति में मनुष्यायुकी जो स्थितियां संक्रमणको प्राप्त होती हैं वे स्तोक हैं । तिर्यगायुकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं। दोनोंकी जस्थितियां विशेष अधिक हैं। देवायुकी जो उक्त स्थितियां हैं वे संख्यातगुणी हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं। नारकायुकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं। आहारशरीरकी जो उक्त स्थितियां हैं वे संख्यातगुणी हैं । जस्थितियां विशेप अधिक हैं । मनुष्यगति, देवगति, यशकीर्ति और उच्चगोत्रकी जो उक्त स्थितियां हैं वे संख्यातगुणी हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं। नरकगति, तिर्यग्गति, चार शरीर, अयशकीर्ति और नीचगोत्रकी जो उक्त स्थितियां हैं वे तुल्य होकर उतनी मात्र ही हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं। सातावेदनीयकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं। तीस कोड़ाकोडि सागरोपम प्रमाण स्थितिवाले कर्मोंकी जो उक्त स्थितियां हैं वे उतनी मात्र ही हैं। जस्थितियां विशेप अधिक हैं। नौ नोकपायोंकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं। सोलह कपायोंकी जो उक्त स्थितियां हैं वे उतनी मात्र ही हैं। जस्थितियां विशेष अधिक है। सम्यक्त्व और सम्य- ग्मिथ्यात्वकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं। जस्थितियां विशेष अधिक हैं । मिथ्यात्वकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं । जस्थितियां विशेप अधिक है। मनुष्यों, देवों और एकेन्द्रियों में भी प्रकृतिअल्पवहुत्वको इस वीजपदसे ले जाना चाहिये। १ ताप्रतौ नास्तीदं वाक्यम् । २ अप्रतौ 'द्विदीओ तत्तियाओ' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे ट्ठिदिसंकमो ३६९ विसेसा० । तिरिक्खगई० विसेणीचागोदस्स विसे० । ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीराणं विसे० । सादस्स० विसे० । सेसाणं तीसियाणं विसे० । पुरिसवेदस्स० विसे० । इत्थिवेदस्स० विसे० । हस्स-रदीणं विसे० । अरदि-सोगाणं विसे० । णqसयवेदस्स० विसे० । भय-दुगुंछाणं० विसे० । बारसकसाय० विसेसा० । मिच्छत्तस्स विसे० । तिरिक्खजोणिणीणं' एकम्हि पदे णाणत्तं- सम्मत्तस्स जहण्णद्विदि० पलिदो असंखे० भागो । उव्वेल्लमाणियाणं णामपयडीणं उवरि संखेजगुणो सम्मामिच्छत्तादो विसेस- हीणो। एदं णाणत्तं । ओघभंगो मणुसगईए। णवरि तिसु आउएसु णाणत्तं । देवगईए णिरयगइभंगो। एत्तो भुजगारसंकमे अट्ठपदं भणियूण घेत्तव्यं । पंचणाणावरणीय-णबदसणावरणीय- सादासाद-मोहणिजाणं अस्थि भुजगार-अप्पदर-अवडियसंक्रमो, अवत्तव्यं णत्थि । णवरि अणंताणुबंधि-सम्मत्त-सम्मामिच्छत्त-बारसकसाय-णवणोकसायाणं अवत्तव्यसंकमो अस्थि । चदुण्णमाउआणं अत्थि चत्तारि पदाणि । णामपयडीणं उव्वेल्लिजमाणियाणं तित्थयर- उच्चागोदाणं च अस्थि अवत्तव्यसंकमो। सेसाणं णामपयडीणं णीचागोदंतराइयाणं च णत्थि अवत्तव्यसंकमो। विशेष अधिक हैं । तिर्यंचगतिकी विशेष अधिक हैं। नीचगोत्रकी विशेप अधिक हैं। औदारिक- शरीर, तैजसशरीर और कार्मणशरीरकी विशेष अधिक हैं । सातावेदनीयकी विशेष अधिक हैं। शेष त्रिंशिक प्रकृतियोंकी विशेप अधिक हैं। पुरुषवेदकी विशेष अधिक हैं। स्त्रीवेदकी विशेप अधिक हैं। हास्य व रतिकी विशेष अधिक हैं । अरति और शोककी विशेप अधिक हैं। नपुंसक- वेदकी विशेष अधिक हैं। भय और जुगुप्साकी विशेष अधिक हैं। बारह कपायोंकी विशेष अधिक हैं। मिथ्यात्वकी विशेष अधिक हैं । तिथंच योनिमतियों में एक पदमें विशेपता है-उनमें सम्यक्त्वका जघन्य स्थितिसंक्रम पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है । उद्वेल्यमान नामप्रकृतियोंका जघन्य स्थितिसंक्रम आगे संख्यातगुणा व सम्यग्मिथ्यात्वसे विशेष हीन है। यह यहां विशेषता है। मनुष्यगतिमें ओघके समान प्ररूपणा है। विशेप इतना है कि तीन आयुओंमें कुछ विशेपता है। देवगतिमें नरकगतिके समान प्ररूपणा है। यहां भुजाकारसंक्रममें अर्थपदको कह करके ग्रहण करना चाहिये। पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, सातावेदनीय, असातावेदनीय और मोहनीय कर्मोंका भुजाकार, अल्पतर और अवस्थित संक्रम होता है; अवक्तव्य संक्रम नहीं होता, विशेप इतना है कि अनन्तानुबन्धी, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, बारह कपाय और नौ नोकपाय; इनका अवक्तव्य संक्रम होता है। चार आयु कर्मों के चार पद हैं । उद्वेल्यमान नामप्रकृतियों, तीर्थंकर और उच्चगोत्रका अवक्तव्य संक्रम होता है । शेष नामप्रकृतियों, नीचगोत्र और अन्तरायका अवक्तव्यसंक्रम नहीं होता। १ अ-ताप्रत्योः 'तिरिक्खजोगीण' इति पाठः । से. छ. ४७ ३६८ छक्खंडागमे संतकम्म गुणा । मणुस-तिरिक्खाउआणं संखेजगुणाओ। जट्ठिदी बिसे० । अणंताणुवंधीणं असं- खेजगुणाओ। जहिदी विसे० । आहारसरीर० असंखे० गुणाओ । जद्विदीओ विसे० ओ। सम्मामिच्छत्तस्स असंखे० गुणाओ । देवगइ-णिरयगइ-वेउव्यियसरीर० असंखे० गुणाओ। उच्चागोदस्स विसे० ओ। मणुसगइ० विसे० ओ। जसकित्ति० विसे । अजसकित्ति. विसे. ओ। तिरक्खगई. विसे० ओ। ओरालिय-तेजा-कम्मइय० विसे० ० । सादस्स० विसे० । सेसाणं तीसियाणं विसे० । पुरिसवेद० विसेसा० । इत्थि- वेद० विसे० । हस्स-रदि० विसे० । णदुंसयवेद० विसे० । अरदि-सोग० विसे० । भय-दुगुंछाणं जाओ द्विदीओ ताओ विसे । बारसकसायाणं जाओ द्विदीओ ताओ विसे । मिच्छत्तस्स विसे० । सव्वासि पि जद्विदीयो विसेसाहियाओ । तिरिक्खगईए तिरिक्खेसु तिरिक्खाउअस्स सम्मत्तस्स य जो जहण्णढिदिसंकमो [सो थोयो । जढिदिसंकमो असंखेजगुणो। मणुस्साउअस्स संखे० गुणाओ । देवाउअस्स णिरयाउअस्स य संखेजगुणाओ । अणंताणुबंधीणं असंखे० गुणाओ। णिरयगइ-देवगइ- मणुसगइ-वेउब्धिय-आहारसरीर-उच्चागोदाणं जाओ द्विदीओ ताओ असंखे० गुणाओ। सम्मामिच्छत्तस्स० संखे० गुणाओ। जसकित्तीए असंखे० गुणा० । अजसगिचीए - गुणी है। मनुष्यायु और तिर्यगायुकी प्रकृत स्थितियां संख्यातगुणी हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं । अनन्तानुबन्धी कषायोंकी असंख्यातगुणी हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं । आहारशरीरकी असंख्यातगुणी हैं । जस्थितियां विशेष अधिक हैं । सम्यग्मिथ्यात्वकी असंख्यातगुणी हैं। देवगति, नरकगति और वैक्रियिकशरीरकी असंख्यातगुणी हैं। उच्चगोत्रकी विशेष अधिक हैं। मनुष्य- गतिकी विशेष अधिक हैं। यशकीर्तिकी विशेष अधिक हैं। अयशकीर्तिकी विशेप अधिक हैं। तिर्यंचगतिकी विशेष अधिक हैं। औदारिकशरीर, तैजसशरीर और कार्मणशरीरकी विशेप अधिक हैं। सातावेदनीयकी विशेष अधिक हैं। शेष त्रिंशिक प्रकृतियोंकी विशेष अधिक हैं। पुरुषवेदकी विशेष अधिक हैं । स्त्रीवेदकी विशेष अधिक हैं। हास्य व रतिकी विशेष अधिक हैं। नपुंसकवेदकी विशेष अधिक हैं। अरति व शोककी विशेप अधिक हैं । भय और जुगुप्साकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं। बारह कषायोंकी जो उक्त स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं। मिथ्यात्वकी जो उक्त स्थितियां हैं विशेष अधिक हैं। सभीको जस्थितियां विशेप अधिक हैं। तिर्यंचगतिमें तिर्यंचोंमें तिर्यंचआयु और सम्यक्त्वका जो जघन्य स्थितिसंक्रम है वह स्तोक है। जस्थितिसंक्रम असंख्यातगुणा है। मनुष्यायुकी उक्त स्थितियां संख्यातगुणी हैं । देवायु और नारकायुकी संख्यातगुणी हैं। अनन्तानुवन्धी कपायोंकी असंख्यातगुणी हैं। नरकगति, देवगति, मनुष्यगति, वैक्रियिकशरीर, आहारकशरीर और उच्चगोत्रकी जो उक्त स्थितियां हैं, वे असंख्यात- गुणी हैं । सम्यग्मिथ्यात्वकी संख्यातगुणी हैं। यशकीर्तिकी असंख्यातगुणी हैं। अयशकीर्तिकी १ अप्रतौ 'सिमाण०', काप्रतौ 'तिसाणं', ताप्रतौ 'तस (तीसि) याण', मप्रतौ 'तसयाणं०' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे द्विदिसंकमो ३७१ - बंधादो समउत्तरं पबद्धस्स जहिदि पडुच्च जहिदिसंकमो त्ति एत्थ घेत्तव्यं । देव-णिरयाउ- आणं अप्पदरसंकमस्स जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । तिरिक्ख-मणुस्साउआणं जह० अंतोमुहत्तं, उक्क० तिण्णि पलिदोवमाणि सादिरेयाणि । सव्वासिं णामपयडीणं णाणावरणभंगो। आहारसरीर-आहारसरीरंगोवंग-बंधण- संघाद-तित्थयराणं भुजगार-अवडियसंकमो गस्थि । तित्थयरअप्पदरसंक्रमस्स जह. संखेजाणि वस्ससहस्साणि, उक्क० तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । आहारचउक्स्स जह० अंतोमुहत्तं, उक्क० पलिदो० असंखे० भागो । पंचण्णं [ अंतराइयाणं] णाणावरण- भंगो। णवरि भुजगारस्स संखेजा समयो । एवं णीचुच्चागोदाणं । णवरि भुजगारस्स बे समया । एवं कालो समत्तो । एगजीवेण अंतरं कालादो साधेदूण णेयव्वो। णाणाजीवेहि भंगविचओ। पंच- णाणावरणीय-णवदंसणावरणीय-सादासाद-मिच्छत्त-सोलसकसाय-णवणोकसाय-तिरिक्खा- उअ-एइंदियबंधपाओग्गणामपयडीणं णीचुचागोद-पंचंतराइयाणं च भुजगार-अप्पदर- अवट्टिदसंकामया जीवा णियमा अस्थि । चारित्तमोहणीयस्स अवत्तव्य. भजियया । मात्र है । पूर्व बन्धसे एक समय अधिक बांधे गये आयु कर्मका जस्थितिकी अपेक्षा यहां जस्थिति- संक्रम ग्रहण करना चाहिये । देवायु और नारकायुके अल्पतर संक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे साधिक तेतीस सागरोपम मात्र है। तिर्यंचआयु और मनुष्यायुके अल्पतर संक्रमका काल जघन्यसे अन्तमुहूर्त और उत्कपैसे साधिक तीन तीन पल्योपम मात्र है। सब नामप्रकृतियोंके संक्रमकालकी प्ररूपणा ज्ञानोवरणके समान है। आहारकशरीर, आहारकशरीरांगोपांग, आहारकबन्धन, आहारकसंघात और तीर्थंकर इनके भुजाकारसंक्रम और अवस्थितसंक्रम नहीं होते। तीर्थंकर प्रकृति के अल्पतरसंक्रमका काल जघन्यसे संख्यात हजार वर्ष और उत्कर्षसे साधिक तेतीस सागरोपम मात्र है। आहारचतुष्कके अल्पतरसंक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। पांच [अन्तराय] प्रकृतियों के संक्रमकालकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है । विशेष इतना है कि उनके भुजाकार- संक्रमका काल संख्यात समय मात्र है। इसी प्रकार नाचगोत्र और ऊंचगोत्रके संक्रमकालकी प्ररूपणा करना चाहिये। विशेष इतना है कि उनके भुजाकारसंक्रमका काल दो समय मात्र है। इस प्रकार कालप्ररूपणा समाप्त हुई। एक जीवकी अपेक्षा अन्तरको कालसे सिद्ध करके ले जाना चाहिये। नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचयका कथन किया जाता है- पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, नौ नोकषाय, तिथंचआयु, एकेन्द्रियके बन्ध योग्य नामप्रकृतियां, नीचगोत्र, ऊंचगोत्र और पांच अन्तराय; इनके भुजाकार, अल्पतर और अवस्थित संक्रामक बहुत जीव नियमसे हैं। चारित्रमोहनीयके अवक्तव्य संक्रामक भजनीय हैं। तीन १ अ-ताप्रत्योः 'आहारसरीरस्स' इति पाठः ।२ अप्रतौ 'संखेजसमया' इति पाठः ।३ अप्रतौ 'अंतरकाले', का-ताप्रत्योः 'अंतरं कालो' इति पाठः। ।

३७० छक्खंडागमे संतकम्म एयजीवेण कालो-पंचणाणावरणाणं भुजगारस्स कालो जह० एगसमओ, उक्क० संखेजाणि समयसहस्साणि । अप्पदरस्स जह० एगसमओ, उक्क वेछावहिसागरोबमाणि सादिरेयाणि । अवडियस्स जह० एगसमओ, उक्क० अंतोमुहुत्तं । णवदंसणावरणाणं तिविहो जह० एगसमओ। उक्क० भुजगारस्स एकारस समया, सेसाणं णाणावरणभंगो । सादासाद-मिच्छत्ताणं भुजगारसंकमस्स जह० एगसमओ, उक० वे समया; अद्धासंकिलेस- खयप्पणादो। अप्पदर-अघटियाणं णाणावरणभंगो' । सोलसकसाय-णवणोकसायाणं भुजगार संकमस्स जह० एगसमओ, उक० सत्तारस समया। सोलसकसाय-णवणो- कसायाणमप्पदर-अवहिदाणं गाणावरणभंगो। सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं भुजगार-अवडिय- [अवत्तव्य] संकमाणं कालो जहण्णुक्क० एगसमओ । एदेसिमप्पदरस्स जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० बेछावहिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । चदुण्णमाउआणमवद्विद-भुजगारसंकमाणं कालो जहण्णुक्कस्सेण एगसमओ। पुव्व- . एक जीवकी अपेक्षा कालका कथन करते हैं-पांच ज्ञानावरण प्रकृतियों के भुजाकार संक्रम- का काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे संख्यात हजार समय है। अल्पतरका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। अवस्थितका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। नौ दर्शनावरण प्रकृतियोंके तीन प्रकार के संक्रमका काल जघन्यसे एक समय मात्र है। उत्कर्षसे वह भुनाकारका ग्यारह समय और शेष दोका ज्ञानावरणके समान है । सातावेदनीय, असातावेदनीय और मिथ्यात्वके भुजाकार संक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कषसे दो समय मात्र है; क्योंकि, अद्धाक्षय और संक्लेशक्षयकी प्रधानता है । इनके अल्पतर और अवस्थित संक्रमके कालकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है। सोलह कषाय और नौ नोकषायोंके भुजाकारसंक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे सत्रह समय मात्र है। सोलह कषाय और नौ नोकषायोंके अल्पतर और अवस्थित संक्रमके कालकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके भुजाकार, अवस्थित और अवक्तव्य संक्रमका काल जघन्य व उत्कर्षसे एक समय मात्र है। इनके अल्पतरसंक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। चार आयुकर्मों के अवस्थित और भुजाकार संक्रमोंका काल जघन्य व उत्कर्पसे एक समय १ मिच्छत्तम्स भुजगारसंकामगो केवचिरं कालादो होदि १ जहणेण एयसमओ। उक्कस्सेण चत्तारिसमया । अप्पदरसंकामगो केवचिरं कालादो होदि ? जहणेणेयसमओ । उक्कस्सेण तेवहिसागरोवमसद सादिरेयं । अवहिद- संकामओ केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णेणेयसमओ । उक्करसेणंतोमुहुत्तं । क. पा. सु. पृ. ३२९, १५६-६४. २ सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं भुजगार-अवहिद-अवत्तम्बसंक्रामया केवचिरं कालादो होति ? जहण्गेणुकस्सेणेय. समओ। अप्पदरसंकामओ केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णेण अंतोमुहुन् । उक्कस्सेण वे छावटिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । सेसाणं कम्माणं भुजगारसंकामओ केवन्चिर कालादो होदि १ जहण्णेयसमओ। उक्कस्मेण एगूणवीस समया । सेसपदाणि मिच्छत्तभंगो । णवरि अवत्तध्वसंकामया जहण्णुक्कस्सेण एगसमओ । क. पा. सु. पृ. ३३०, १६५-७४.

संकमाणियोगदारे विदिसंकमो ३७३ असंखे० भागपडिभागो। भुजगारसंकामया सव्यजीवाणमंतोमुहुत्तपडिभागो । अप्पदर- संकामया सबजीवाणं असंखेजा भागा। एदेण अप्पाबहुअंतिरिक्खाउअस्स साहेयव्यं । णिरयगईए अवत्तव्यसंकामया थोवा । भुजगार० असंखे० गुणा । अचट्ठिय० अप्पदर० असंखे० गुणा उव्वेल्लणकालसंचिदे पडुच । एवं देवगइणामाए । मणुसगइ- णामाए अवत्तव्य० थोवा । भुजगार० अणंतगुणा । अवट्ठिय० असंखे० गुणा । अप्पदर० असंखे० गुणा । तिरिक्खगइणामाए भुजगार० थोवा । अवडिय० असंखे० गुणा । अप्पदर० संखे० गुणा । चदुण्णमाणुपुत्रीणं सग-सगगइभंगो । ओरालिय-तेजा- कम्मइयाणं भुजगार० थोवा । अचट्ठिय० असंखे० गुणा । अप्पदर० संखे० गुणा । एवं अणादियसंतकम्मणामाणं । णीचागोद-पंचंतराइयाणं णाणावरणभंगो। उच्चागोदस्स मणुसगइभंगो । एवं भुजगारद्विदिसंकमो समत्तो। पदणिक्खेवस्स द्विदिउदीरणपदणिक्खेवभंगो । वडिढसंकमो-पंचणाणावरणीयाणं असंखेजगुणहाणीए संकमाया थोवा । संखेजगुणहाणीए असंखे० गुणा । संखेजभाग- हाणीए संखे० गुणा । संखेजगुणवड्ढीएं असंखे० गुणा । संखे० भागवड्ढीए संखे० गुणा। असंखे० भागवड्ढीए अणंतगुणा । अवद्विद० असंखे० गुणा । असंखे० भाग- संक्रामक सब जीवोंके अन्तर्मुहूर्त प्रतिभाग रूप हैं । अल्पतर संक्रामक सब जीवोंके असंख्यात बहुभाग मात्र हैं। इससे तिर्यगायुके अल्पबहुत्वको सिद्ध करना चाहिये। नरकगतिके अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं। भुजाकार संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अवस्थित व अल्पतर संक्रामक उद्वेलनकालसंचितोंकी अपेक्षा असंख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार देवगति नामकर्मके सम्बन्ध में अल्पबहुत्व कहना चाहिये। मनुष्यगति नामकर्म के अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं । भुजाकार संक्रामक अनन्तगुणे हैं। अवस्थित संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अल्पतर संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। तिर्यंचगति नामकर्मके भुजाकार संक्रामक स्तोक हैं। अवस्थित संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अल्पतर संक्रामक संख्यातगुणे हैं । चार आनुपूर्वी नाम- कर्मोका अल्पबहुत्व अपनी अपनी गतिके समान है । औदारिक, तैजस और कार्मण शरीरके भुजाकार संक्रामक स्तोक हैं । अवस्थित संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अल्पतर संक्रामक संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार अनादिसत्कर्मिक नामप्रकृतियोंका अल्पबहुत्व है। नीचगोत्र और पांच अन्तराय प्रकृतियोंका अल्पवहुत्व ज्ञानावरणके समान है। उच्चगोत्रका अल्पबहुत्व मनुष्यगतिके समान है। इस प्रकार भुजाकार स्थितिसंक्रम समाप्त हुआ। यहां पदनिक्षेपकी प्ररूपणा स्थितिउदीरणा सम्बन्धी पदनिक्षेपके समान है। वृद्धिसंक्रमकी प्ररूपणा की जाती है- पांच ज्ञानावरण सम्बन्धी असंख्यात गुणहानिके संक्रामक स्तोक हैं। संख्यातगुणहानिके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। संख्यातभागहानिके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। संख्यातगुणवृद्धिके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । संख्यातभागवृद्धिके संक्रामक संख्यातगुणे हैं । असंख्यातभागवृद्धि के संक्रामक अनन्तगुणे हैं। अवस्थित संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। १ ताप्रती 'असंखे० गुणवड्डीए' इति पाठः ।

- - ३७२ छक्खंडागमे संतकम्म तिण्णमाउआणं एइंदियबंधिदपाओग्गणामपयडीणं सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं च भुजगारं- अवविद-अवत्तव्यसंकामया भयणिज्जा । अप्पदरसंकामया णियमा अस्थि । णाणाजीवेहि कालो अंतरं च णाणाजीवभंगविचयादो साहेयव्यं । एत्तो अप्पाबहुअं- पंचणाणावरण-णवदंसणावरण-सादासाद-बावीसमोहणीयाणं [भुजगार] संकामया थोवा । अवहिदसंकामया असंखेजगुणा । अप्पदरसंकामया संखे० गुणा । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं अवविदसंकामया थोवा । भुजगारसंकामया असंखे० गुणा । अवत्तव्यसंकामया असंखे० गुणा । अप्पदर० असंखे० गुणा । अणंताणुबंधीणं अवत्तव्य० थोवा । भुजगार० अणंतगुणा । अवद्विद० असंखे० गुणा । अप्पदर० संखे० गुणौ । "णिरयाउअस्स अवडिय० थोवा । भुजगार० असंखे० गुणा । अवत्तव्यं० संखे० गुणा । अप्पदर० असंखे० गुणा । एवं देव-मणुस्साउआणं । तिरिक्खाउअस्स अवत्तव्य- संकामया पदरस्स असंखे० भागो । अवद्वियसंकामया सव्वजीवाणं पलिदो. आयुकर्म, एकेन्द्रियके बन्धयोग्य नामप्रकृतियों, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके भुजाकार, अवास्थत और अवक्तव्य संक्रामक भजनीय हैं । इनके अल्पतर संक्रामक बहुत जीव नियमसे हैं। नाना जीवोंकी अपेक्षा काल और अन्तरको नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचयसे सिद्ध करना चाहिये । यहां अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा की जाती है- पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, सातावेदनीय, असातावेदनीय और बाईस मोहनीय प्रकृतियोंके भुजाकार संक्रामक स्तोक हैं। इनके अवस्थित संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अल्पतर संक्रामक संख्यातगुणे हैं । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके अवस्थित संक्रामक स्तोक हैं । भुजाकार संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अवक्तव्य संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अल्पतर संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अनन्तानुबन्धी कषायोंके अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं । भुजाकार संक्रामक अनन्तगुणे हैं । अवस्थित संक्रामक असंख्यात- गुणे हैं । अल्पतर संक्रामक संख्यातगुणे हैं। नारकायुके अवस्थित संक्रामक स्तोक हैं । भुजाकार संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अवक्तव्य संक्रामक संख्यातगुणे हैं। अल्पतर संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार देवायु और मनुष्यायुके कहना चाहिये। तिर्यंच आयुके अवक्तव्य संक्रामक प्रतरके असंख्यातवें भाग हैं। अवस्थित संक्रामक सब जीवोंके पल्योपमके असंख्यातवें भाग प्रतिभाग रूप हैं। भुजाकार १ णाणाजीवेहि भंगविचओ। मिच्छत्तस्स सव्वजीवा भुजगारसंकामगा च अप्पयरसंकामया च. अवलिंद- संकामया च । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं सत्तावीसभंगा। सेसाणे मिच्छत्तभंगो । णवरि अवत्तव्यसकामया भजियया । क. पा. सु. पृ. ३३३, १९३-९७. २ अ-काप्रत्योः 'अवत्त० संखे० गुणा', ताप्रतौ 'अवत्तव्य० असंखे० गुणा' इति पाठः । ३ सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताण - सव्वत्थोवा अवद्विदसंकामया। भुजगारसंकामया असंखेनगुणा । अवत्तव्वसंकामया असंखेजगुणा । अप्पयरसंकामया असंखेजगुणा । अणताणुबंधीणं सव्वत्थोवा अवत्तव्वसंकामया। भुजगारसकामया अणंतगुगा । अवट्ठिदसंकामया असंखेजगुगा । अप्पयरसंकामया संखेजगुणा । एवं सेसाणं कम्माण । क, पा. सु. ५. ३३६, २२९-३७. ४ अ-का-ताप्रतिषूपलभ्यमानोऽयं नारकांयुःसम्बन्धी सन्दर्भो मप्रतितः कृतसंशोधने बहिष्कृतः । ५ ताप्रतौ 'अप्पदर० (अवत्तव्व०) संखे' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे हिदिसंकमो ३७५ अघादिकम्मफदएहि सह णिरंतरं गंतूण दारुसमाणम्हि देसघादिम्हि णिट्ठियाणि । सम्मत्वउकस्सफद्दयादो सम्मामिच्छत्तस्स पढमफयमर्णतगुणं । कुदो ? केवलणाणा- वरणादिफद्दयसमाणत्तादो। तदो णिरंतराणि अणंताणि सम्मामिच्छत्तफदयाणि गंतूण दारुसमाणफयाणसणंतिमभागे चेव णिविदाणि । तदो उपरिमाणंतरफद्दयं मिच्छत्तस्स जहण्णफयं होदि । तं च सम्मामिच्छत्तस्स उक्कस्सदारुसमाणकद्दयादो अणंतगुणं धादिकम्माणमादिफहएहि असमाणं । एवं सबकम्माणं पि आदिफद्दयपरूवणा कदा । एत्तो अट्ठपदं- ओकड्डिदो वि अणुभागो अणुभागसंकमो, उक्कड्डिदो वि अणुभागो अणुभागसंकमो, अण्णपयडि णीदो वि अणुभागो अणुभागसंकमो । आदिकद्दयं ण ओकड्डिजदि । आदिफयादो जत्तियो जहण्णओ णिक्खेवो एत्तियमेत्ताणि फद्दयाणि ण ओकद्विति । तदो उवरिमफद्दयं पि ण ओकड्डिजदि, अधिच्छावणाभावादो। तदो जत्तियाणि जहण्णणिक्खेवरुद्दयाणि जत्तियाणि जहण्णअधिच्छावणारुदयाणि च एत्तिय- मेवाणि फहयाणि पढमफद्दयप्पहुडि उवरिं चडियण द्विदं जं फद्दयं तमोकड्डिजदि, अघाति कर्मों के स्पर्धकोंके साथ निरन्तर जाकर दारु समान देशघातिमें समाप्त होते हैं। सम्य- क्त्वके उत्कृष्ट स्पर्धककी अपेक्षा सम्यग्मिथ्यात्वका प्रथम स्पर्धक अनन्तगुणा है, क्योंकि, वह केवलज्ञानावरणके आदि स्पर्धकके समान है। उसके आगे सम्यग्मिथ्यात्वके अनन्त स्पर्धक निरन्तर जाकर दारु समान स्पर्धकोंके अनन्तवें भागमें ही समाप्त हो जाते हैं। उसके आगेका अनन्तर स्पर्धक मिथ्यात्वका जघन्य स्पर्धक होता है। वह सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट दारु समान स्पर्धककी अपेक्षा अनन्तगुणा होकर घाती कर्मों के आदि स्पर्धकोंके समान नहीं होता। इस प्रकार सब कर्मों के ही आदि स्पर्धकोंकी प्ररूपणा की गयी है। यहां अर्थपद- अपकर्पणको प्राप्त हुआ भी अनुभाग अनुभागसंक्रम है, उत्कर्पणको प्राप्त हुआ भी अनुभाग अनुभागसंक्रम है, और अन्य प्रकृतिको प्राप्त कराया गया भी अनुभाग अनुभागसंक्रम है। आदि स्पधेकका अपकर्षण नहीं होता है। आदि स्पर्धकसे लेकर जितना जघन्य निक्षेप है, इतने मात्र स्पर्धकोंका भी अपकर्षण नहीं किया जाता है। उनसे ऊपरके स्पर्धकका भी अपकर्पण नहीं किया जाता है, क्योंकि, अतिस्थापनाका अभाव है। इसलिये जितने जघन्य निक्षेपस्पर्धक हैं और जितने जघन्य अतिस्थापनास्पर्धक हैं इतने मात्र स्पर्धक प्रथम स्पर्धकसे लेकर ऊपर चढ़कर जो स्पर्धक स्थित है उसका अपकर्पण किया जाता है, क्योंकि, उसके अतिस्थापनारूप व निक्षेपरूप स्पर्धकोंकी सम्भावना पायी जाती है। १ सव्वेसु देसघाईसु सम्मत्तं तदुवरिं तु वा मिस्सं । दारुसमाणसागनिमोति मिच्छत्तमुप्पिमओ || क. प्र. २, ४५. २ अणुभागो आकडिदो वि संकमो उक्कडिदो वि संकमो अण्णपयडिं णीदो वि संकमो। क. पा. सु. पृ. ३४५, १. तत्थट्ठपयं उबाया व ओवट्टिया व अविभागा | अणुभागसंकमो एस अन्नपगई निया वावि ।। क. प्र. २, ४६. ३ प्रतिषु 'आदिफद्दयार्ण ओकडिजदि' इति पाठः । ४ ताप्रती 'फड्डयाणि ओकटिजति' इति पाठः।

३७४ छक्खंडागमे संतकम्म हाणीएं संखे. गुणा । एवं णवदंसणावरणीय-सादासादाणं । एवं सेसाणं पि कम्माणं । णवरि सम्मत्त-सम्मामिच्छत्त-चत्तारिआउआणं च चत्तारिवढि-चत्तारिहाणीयो बत्तव्याओ । एवं द्विदिसंकमो समत्तो । अणुभागसंकमे पुवं गमणिजो कम्माणमादिफद्दयगिद्देसो-चत्तारिणाणावरणीय- तिष्णिदसणाचरणीय-चदुसंजलण-णवणोकसाय-पंचतराइयाणि देसघादीणि । सादासाद- आउचउक-सयलणामपयडि-उच्च-णीचागोदाणि अघादिकम्माणि । एदेसिमधादिकम्माण पुबिल्लदेसघादिकम्माणं च आदिफद्दयाणि सरिमाणि । केवलणाणावरणीय-छदसणा- वरणीय-बारसकासाय० सव्वघाइकम्माणि । एदेसि आदिफैयाणि परोप्परं सरिसाणि । सुधघादीणि दारुसमाणाणि देसघादीणमादिफद्दएहिंतो अणंतगुणाणि । सम्मत्तस्स आदिकद्दयं देसघादीणमादिफदएण सरिसं । तदो पहुडि सम्मत्तफहयाणि देसघादि- असंख्यातभागहानिके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकारसे नौ दर्शनावरण, सातावेदनीय और असातावेदनीयक सम्बन्धमें कथन करना चाहिये । इसी प्रकार शेष कर्मों के भी सम्बन्धमें कहना चाहिये । विशेष इतना है कि सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और चार आयु कार्मोकी प्ररूपणा में चार वृद्धियों और चार हानियोंको कहना चाहिये । इस प्रकार स्थितिसंक्रम समाप्त हुआ। अनुभागसंक्रमकी प्ररूपणामें पहिले कर्मों के आदि स्पर्धकोंका निर्देश ज्ञात कराने योग्य है- चार ज्ञानावरण, तीन दर्शनावरण, चार संज्वलन, नौ नोकषाय और पांच अन्तराय; ये देशघाती कर्म हैं । सातावेदनीय, असातावेदनीय, चार आयु, समस्त नामप्रकृतियां, उच्चगान और नीचगोत्र; ये कर्मप्रकृतियां अघाती हैं। इन अघातिया कर्मों के तथा पूर्वोक्त देशघाती कर्मों के आदि स्पर्धक सहश होते हैं । केवलज्ञानावरण, छह दर्शनावरण और बारह कषाय ये सर्वघाती कर्म हैं । इनके आदि स्पर्धक परस्परमें सहश हैं। सर्वघाति कर्मोके दारु समान स्पर्धक देशघाति कर्मों के आदि स्पर्धकोंकी अपेक्षा अनन्तगुणे हैं। सम्यत्तव प्रकृतिका आदि स्पर्धक देशघातियोंके आदि स्पर्धकके सहश है। उससे लेकर सम्यक्त्वके स्पर्धक देशघाति और १ कापतौ 'गमणिजे', तापतौ 'गमणिज-' इति पाठः । २ मति-श्रुतावधि-मनःपर्ययज्ञानावरण-चक्षुर- चक्षुरवधिदर्शनावरण-संज्वलनचतुष्टय-नवनोकषायान्तरायपंचकलक्षणानां पंचविशतिसंख्यानां देशघातिप्रकृतीनां देशधातोनि रसस्पर्धकानि भवन्ति । स्वस्य ज्ञानादेर्गुणस्य देशमेकदेशं मतिज्ञानादिलक्षणं घातयन्तीत्येवंशीलानि देशघातीनि । क. प्र. (मलय.) २-१. ३ वेदनीयायुर्नाम-गोत्राणं सम्बन्धिनः एकादशोत्तरप्रकृतिशतस्या- घातिनो रसस्पर्धकान्यघातीनि वेदितव्यानि । केवलं वेद्यमानसर्वघातिरसस्पर्धकसम्बन्धात्तान्यपि सर्वघातीनि भवन्ति । यथेह लोके स्वयमचौराणामपि चौरसम्बन्धाचौरता। उत्तं च-जाण न विसओ घाइत्तणम्मि ताणं पि सव्वघाइरसो । जायइ घाइसगासेण चोरया वेहऽचोराणं ॥ क. प्र. (मलय.) २-४४. ३ केवलज्ञानावरण - केवलदर्शनावरणाद्यद्वादशकषाय-निद्रापंचक-मिथ्यात्वलक्षणानां विंशतिप्रकृतीनां रसस्पर्ध- कानि सर्वघातीनि- सर्व स्वघात्य केवलज्ञानादिलक्षणं गुणं घातयन्तीति सर्वघातीनि | तानि च ताम्रभाजनवत् निश्छिद्राणि, धृतवत् स्निग्धानि, द्राक्षावत्तनुप्रदेशोपचितानि, स्फटिकाभ्रहारवच्चातीव निर्मलानि । उक्तं च- जो घायइ संविसयं सयलं सो होइ सव्वघाइरसो। 'सो निच्छिड्डो निद्धो तणुओ फलिहन्भहरविमलो || क. प्र. (मलय.) २-४४. ४ प्रतिषु 'घादि' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे अणुभागसंकमो ३७७ एदेण अट्ठपदेण पमाणाणुगमो वुचदे । तं जहा- धादिसण्णा ठाणसण्णा च एन्थ वि परूवेयव्वा । सम्मत्तस्स उक्करसओ संकमो देसघादी दुढाणियो। एवं मणुस-तिरि- क्खाउआणं। सम्मामिच्छत्तस्स आदावणामाए च सव्यघादी दुहाणियो अणुभागसंकमों। इत्थि-णqसयवेदाणमुकस्सओ सव्वधादी चदुढाणियो अणुभागसंकमो। सम्मत्त-चदु- संजलण-पुरिसवेदाणं जहण्णसंकमो देसघादी एयट्ठाणियो । सेसाणं कम्माणं जहण्णओ संकमो सव्वघादी दुहाणियो । णवरि मणुव-तिरियाउआणं देसघादी। सामित्तं- मदिआवरणस्स उक्कस्साणुभागसंकमो कस्स होदि ? जो उक्कस्साणुभागं बंधियूण आवलियादिवंतो सो एइंदियो वा अणेइंदियों' वा बादरो वा सुहुमो वा पञ्जत्तओ वा अपजत्तओ वा णियमा मिच्छाइट्ठी, असंखेजवस्साउअमणुस्से तिरिक्खे मणुस्सोववादियदेवे च मोत्तूण जो अण्णो, तस्स उक्कस्साणुभागसंकमो । एवं चदुणाणावरण - णवदंसणावरण-मिच्छत्त-सोलसकसाय - णवणोकसाय-असादावेदणीय- इस अर्थपदके अनुसार प्रमाणानुगमकी प्ररूपणा की जाती है। यथा-घाति संज्ञा और स्थान संज्ञाकी यहां भी प्ररूपणा करना चाहिये। सम्यक्त्वका उत्कृष्ट संक्रम देशघाती होता हुआ द्विस्थानिक है। इसी प्रकार मनुष्यायु और तिर्यगायुके सम्बन्धमें कहना चाहिये । सम्यग्मिथ्यात्व और आतप नामकर्मका अनुभागसंक्रम सर्वघाती होकर विस्थानिक है। स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम सर्वघाती चतुःस्थानिक है। सम्यक्त्व, चार संज्वलन और पुरुषवेदका जघन्य संक्रम देशघाती एकस्थानिक है। शेष कर्मों का जघन्य संक्रम सर्वघाती विस्थानिक है । विशेष इतना है कि वह मनुष्यायु और तिर्यगायुका देशघाती है। स्वामित्वकी प्ररूपणा की जाती है- मतिज्ञानावरणका उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम किसके होता है ? जो उत्कृष्ट अनुभागको बांधकर एक आवलीको विता चुका है। वह एकेन्द्रिय हो चाहे अनेकेन्द्रिय हो, बादर हो अथवा सूक्ष्म हो, पर्याप्त हो अथवा अपर्याप्त हो, नियमसे मिथ्याष्टि हो; तथा असंख्यातवर्षायुष्क मनुष्यों, तिर्यंचों और मनुष्योंमें उत्पन्न होनेवाले देवों ( आन- तादिक ) को छोड़कर जो अन्य हो, उसके मतिज्ञानावरणका उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम होता है। इसी प्रकार शेष चार ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, नौ नोकपाय, १ प्रतिषु 'घादिसंठाणसण्णा' इति पाठः । २ अप्रतौ 'उकस्सओ वि संकमो इति पाठः । ३ दुविहपमाणे जेट्टो सम्मत्तदेसघाइ दुट्ठाणा | नर-तिरियाऊ-आयव-मिस्से वि य सव्वघाइम्मि ॥ क. प्र. २, ४७. ४ तत्थ पुव्वं गमणिना घादिसण्णा च हाणसण्णा च । सम्मत्त-चदुसंजलग-पुरिसवेदाणं मोत्तूण सेसाणं कम्माणमणुभागसंकमो णियमा सव्वघादी, वेहाणिओ वा तिहाणिओ वा चउहाणिओ वा । णवरि सम्मामिच्छत्तस्स वेढाणिओ चेव । अक्खवग-अणुवसामगस्स चदुसंजलण-पुरिसवेदाणमणुभागसंकमो मिच्छत्तभंगो। खवगुवसामगाणमणुभागसंकमो सव्वघादी वा देसघादी वा, वेट्टाणिो वा एयहणिओ वा। सम्मत्तस्स अणुभागसंकमो णियमा देसवादी। एयटाणिओ वेढाणियाओ वा । क, पा. सु. पृ. ३४९, ३३-३९. सेसासु चउाणे मंदो सम्मत्त-पुरिस-संजलणे । एगट्टाणे सेसासु सव्वघाइम्मि दुट्ठाणे ॥ क. प्र. ३, ४८, ५ अ-काप्रत्योः 'सोइंदियो वा अणेइंदियो', ताप्रती 'सो इंदियो वा अणिंदियो' इति पाठः । छ. से. ४८ A ३७६ छक्खंडागमे संतकम्म तस्स अधिच्छावणा-णिक्खेवफयाणं संभवुवलंभादो। एस्थ अप्पाबहुअं- पदेसगुणहाणिहाणंतरं थोवो । जहण्णओ णिक्खेवो अर्णत- गुणो । जहणिया अधिच्छावणा अणंतगुणा । उक्क० अधिच्छावणा अणंतगुणा । उक्कस्सय- मणुभागखंडयं विसे । उक्कस्सओ णिक्खेवो विसेसाहिओ, ओकडणादो चरिमायस्स अधिच्छावणफय-णिक्खेवाणमभावादो। तदो जहष्णय णिक्खेवं जहण्णं च अविच्छावणं ओसकिऊण" जं फदयं चरिमफद्दयादो द्विदं तमोकडिआदि । ओकड्डणादो उक्कडणादो च जहण्णओ णिक्खेवो तुल्लो, सो थोवो। ओकडणादो जण्णिया अधिच्छावणा, उक्कड्डणादो च अणुकस्स-जहण्णाजहण्णअधिच्छायणाए चरिम- फद्दयसलागा वि, उक्कड्डणादो च उक्कस्सओ णिक्खेवो तुल्लो अणंतगुणों । यहां अल्पबहुत्व-प्रदेशगुणहानिस्थानान्तर स्तोक हैं। जघन्य निक्षेप अनन्तगुणा है। जघन्य अतिस्थापना अनन्तगुणी है । उत्कृष्ट अतिस्थापना अनन्तगुणी है । उत्कृष्ट अनुभागकाण्डक विशेष अधिक है। उत्कृष्ट निक्षेप विशेष अधिक है, क्योंकि, अपकर्षणकी अपेक्षा अन्तिम स्पर्धकका जो अतिस्थापना रूप स्पर्धक है और जिसका निक्षेप हुआ है, मात्र इन दोनोंका अभाव है। इसीलिये अन्तिम स्पर्धकसे जघन्य निक्षेप और जघन्य अतिस्थापनाको छोड़कर जो स्पर्धक स्थित है उसका अपकर्षण किया जाता है। अपकर्षण और उत्कर्षण दोनोंकी अपेक्षा जघन्य निक्षेप तुल्य होकर स्तोक है । अपकर्षणकी अपेक्षा जघन्य अतिस्थापना व उत्कर्षणकी अपेक्षा अनुत्कृष्ट, जघन्य और अजघन्य अतिस्थापना- की अन्तिम स्पर्धकशलाका भी, तथा उत्कर्षणकी अपेक्षा उत्कृष्ट निक्षेप तुल्य व अनन्तगुणा है। १ ओकड्डणाए परूवणा । पढमफद्दयं ण ओकड्डिजदि बिदियफद्दयं ण ओकड्डिनदि । एवमणंताणि फद्दयाणि जहणिया अइच्छावणा, तत्तियाणि फद्दयाणि ण ओकड्डिजति । अण्णाणि अणताणि फद्दयाणि जहणणिक्खेवमेत्ताणि च ण ओकड्डिजति । जहण्णओ णिक्खेवो जहणिया अइच्छावणा च ततियमेत्ताणि फद्दयाणि आदीदो अधि- च्छिदूण तदित्यफद्दयमोकड्डिनइ । तेण परं सव्वाणि फद्दयाणि ओकड्डिजति । क. पा. सु. पृ. ३४६, ४-१०. २ प्रतिषु 'थोवा' इपि पाठः । ३ एत्य अप्पाबहुअं। सव्वत्थोवाणि पदेसगुणहाणिहाणतरफद्दयाणि । जहण्णओ णिक्खेवो अणंतगुणो । जहणिया अइच्छावणा अर्णतगुणा। उक्कस्सयमणुभागकंडयमणेतगुणं । उक्कस्सिया अइच्छा. वणा एगाए वग्गणाए अणिया। उक्कस्सणिक्खेवो विसेसाहिओ। उकस्सो बंधो विसेसाहिओ। क. पा. सु. ३४६, ११-१८. थोवे पएसगुणुहाणिअंतरे दुसु जहन्ननिक्खेवो । कमसो अणतगुणिओ दुसु वि अइत्थावणा तुल्ला ॥ वाघाएणणुभागकंडगमेक्काए वग्गणाऊणं । उकोसो निक्लेवो ससंतबंधो य सविसेसो ॥ क. प्र. ३, ८-९. ४ तापतौ 'उक्कड्डणादो' इति पाठः । .५ अ-कापत्योः 'ओकड्डिऊण' इति पाठः । ६ प्रतिषु 'तमुक्क- डिजदि' इति पाठः । ७ उक्कड्डणाए परूवणा । चरिमफद्दयं ण उक्कड्डिनदि । दुचरिमफद्दयं पि ण उक्कडिनदि । एवमणताणि फद्दयाणि ओसक्किऊण तं फद्दयमुक्कड्डिजदि । सम्वत्थोवो नहाओ णिक्खेवो । जहणिया अइच्छावणा 'अणंतगुणा । उकरसओ णिखेको अर्णतगुणो। उकस्सओ बंधो विसेसाहिओ । ओकडणादो उक्कड्डणादो व नहणिया अइच्छावण तुल्ला। जहण्णो णिक्खेवो तुल्लो । क. पा. सु. पृ. ३४७, १९-२८, चरिमं नोबटिज जावाणताणि फड्डगाणि ततो । उस्सकिय ओकदुइ ( उव्वदृइ ) एवं उच्वट्टणाईओ ॥ क. प्र. ३, ७.

संकमां णियोगदारे अणुभागसंकमो ३७९ बादरेसु' पजत्तएसु अयजत्तएसु वा होदि । उज्जोवणामाए उकस्साणुभागसंकमो कस्स ? सत्तमाए पुढवीए दंसणमोहुवसामगतेण अधापवत्तकरणचरिमसमए जं बद्धमणुभागं आवलियादीदं संकममाणस्स । सो कत्थ होदि ? णेरइएसु तिरिक्खेसु मणुस्सेसु एइंदिएसु विगलिदिएसु सुहुमेसु वादरेसु पञ्जत्तएसु अपज्जत्तएसु वा होदि। णिर यगदीए सादस्स उकस्साणुभागसंकमो कस्स होदि ? चरिमसमयसुहुमसां- पराइएण उवसामएण जो बद्धो अणुभागो तमघादेदूण अण्णदरिस्से पुढवीए उववजेज तस्स उकस्सअणुभागसंकमो ! एवं सव्वत्थ वत्तव्यं । एव मुक्कस्ससामित्तं समत्तं । एत्तो जहण्णाणुभागसंकमस्स सामित्तं-- कसाए खवेंतस्स जाव अंतरं अकदं ताव अप्पसत्थाणं कम्माणं अणुभागसंतकम्मं सुहुमसंतकम्मादो उपरि होदि, अंतरं कदे सुहुमसंतकम्मादो हेढदो होदि । एदेण वीजपदेण जहण्णसामित्तं कायव्यं । पंचणाणा- वरण-छदसणावरण-पंचंतराइयाणं जहण्णाणुभागसंकामओ को होदि ? जो जहण्णविदि- संकामओ सो चेव जहण्णाणुभागस्स वि संकामओ । एवं सम्मत्त-लोहसंजलणाणं । सूक्ष्मोंमें, बादरोंमें, पर्याप्तकों में और अपर्याप्तकों में होता है। उद्योत नामकर्मका उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम किसके होता है ? सातवीं पृथिवीमें दर्शन- मोहका उपशम करनेवाले जीवके द्वारा अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें जो अनुभाग बांधा गया है, बन्धावलीके पश्चात् उसका संक्रम करनेवाले के उद्योतका उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम होता है । वह कहांपर होता है ? वह नारकियों में, तिर्यंचोंमें, मनुष्योंमें, एकेन्द्रियोंमें, विकलेन्द्रियोंमें, सूक्ष्मोंमें, बादरोंमें, पर्यातकों में और अपर्याप्तकों में होता है। नरकगति में सातावेदनीयका उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम किसके होता है ? अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्म साम्पराय उपशामकके द्वारा जो अनुभाग बांधा गया है उसका घात न करके जो अन्यतर पृथिवीमें उत्पन्न होनेवाला है उसके सातावेदनीयका उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम होता है। इसी प्रकारसे सर्वत्र प्ररूपणा करना चाहिये । इस प्रकार उत्कृष्ट स्वामित्व समाप्त हुआ। यहां जघन्य अनुभागसंक्रमके स्वामित्वका कथन किया जाता है- कषायोंका क्षपण करने- वाले जीवके, जब तक वह अन्तर नहीं करता है तब तक, अप्रशस्त कर्मोका अनुभागसत्कर्म सूक्ष्म एकेन्द्रियके सत्कर्मसे अधिक होता है। किन्तु अन्तर करनेपर वही सूक्ष्म एकेन्द्रियके सत्कर्मसे नीचे होता है। इस बीज पदके अनुसार जघन्य स्वामित्वको करना चाहिये। पांच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण और पांच अन्तरायके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन होता है ?. जो इनकी जघन्य स्थितिका संक्रामक है वही उनके जघन्य अनुभागका भी संक्रामक होता है। इसी प्रकार सम्यक्त्व और संज्वलन लोभके सम्बन्धमें कहना चाहिये। १ सव्वस्थायावुजोव-मणुसगइपंचगाण आऊणं । समयाहिगालिगा सेसग त्ति सेसाण नोगंता || क. प्र. २-५४. २ ताप्रतौ 'सामित्तं कस्स ? कसाए' इति पाठः । ३ अ-कापत्योः 'अंतरं कथं', ताप्रती 'अंतरं कद' इति पाठः। ४ खवगस्संतरकरणे अकए घाईण सुहुमकम्मुवरिं। क. प्र. २-५५. ५ अप्रती 'संकमओ', कान्ताप्रत्योः 'संको' इति पाठः। ६ ताप्रती 'लोहसंजणाण इति पाठः।

३७८ छक्खेडागमे संतकम्म अप्पसत्थणामपयडि-णीचागोद-पंचतराइयाणं । सादस्स उकस्साणुभागसंकमो कस्स ? चरिमसमयसुहुमसांपराइएण खवएण जं बद्धमणुभाग- आवलियादितं संकममाणस्स खीणकसायस्स सजोगिकेवलिस्स. वा । जसकित्ति-उच्चागोदाणं सादभंगो । णिरयाउअस्स उकस्सओ अणुभागसंकमो कस्स ? जो उकस्साणुभागं बंधिदूण . आवलियादिकतो सो ताव पाओग्गो जाव समय ाहियावलियचरिमसमयतब्भवत्थो त्ति । एवं सेसाणमाउआणं । जाओ पसस्थाओ परभवियणामबंधज्झवसाणस्स चरिमसमये चरिमसमये बज्झति तासिं बंधझवसाणवोच्छेदादो आवलियादिकंतमादि कादूण जाव चरिमसमयसजोगादों त्ति उक्कस्साणुभागसंकमो । मणुसगइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुब्बी-ओरालियसरीर-ओरालिय- सरीरअंगोवंग-बंधण-संघाद-बजरिसहसंघडणाणमुक्कस्सओ अणुभागसंकमो कस्स ? देवेण सयविसुद्धेण पबद्धाणुभागं आवलियादित संकममाणस्स । सो कत्थ होदि ? देवेसु पोरइएसु तिरिक्खेसु मणुस्सेसु एइंदिय-बेईदिय-तेइंदिय-चउरिदिय-पंचिदिए सु सुहुमेसु असातांवेदनीय, अप्रशस्त नामप्रकृतियों, नीचगोत्र और पांच अन्तराय प्रकृतियोंके भी उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका कथन करना चाहिये। सातावेदनीयके उत्कृष्ट अनुभागका संक्रम किसके होता है ? अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक क्षपकके द्वारा जो अनुभाग बांधा गया है आलिकांतिक्रान्त उसका संक्रमण करनेवाले क्षीणकषाय अथवा सयोगकेवलीके उसका उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम होता है। यशकीर्ति और उच्चगोत्रकी प्ररूपणा सातावेदनीयके समान है। नारकायुके उत्कृष्ट अनुभागका संक्रम किसके होता है ? जो उत्कृष्ट अनुभागको बांधकर बन्धावलीको विता चुका है वह अन्तिम समयवर्ती तद्भवस्थ होने में एक समय अधिक आवली मात्र कालके शेप रहने तक नारकायुके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमके योग्य होता है। इसी प्रकार शेष आयु कर्मोंकी प्ररूपणा है। जो प्रशस्त प्रकृतियां परभविक नामप्रकृतियों के बन्धाध्यवसानके अन्तिम समयमें वंधती हैं उनका बन्धाध्यवसानव्युच्छित्तिसे आवलिकातिक्रान्त समयको आदि लेकर अन्तिम समयवर्ती सयोगी तक उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम होता है। मनुष्यगति, मनुष्यगंतिप्रायोग्यानुपूर्वी, औदारिक- शरीर, औदारिकशरीरांगोपांग, औदारिकवन्धन, औदारिकसंघात और वज्रर्पमसंहननका उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम किसके होता है ? वह सर्वविशुद्ध देवके द्वारा वांधे गये अनुभागका बन्धावलीके पश्चात् संक्रम करनेवाले जीवके होता है। वह कहांपर होता है ? वह देवों में, नारकियों में, तिर्यंचोंमें, मनुष्यों में, एकेन्द्रियों में, द्वीन्द्रियों में, श्रीन्द्रियों में, चन्द्रियों में, पंचेन्द्रियों में, १ सामित्तं । मिच्छत्तस्स उकत्साणुभागसंक्रमो कस्स ? उक्कस्साणुभागं बंघिदूणावलियपडिभग्गरस अण्णदरस्स । एवं सत्वकम्माणं । णवरि सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमुक्करसाणुमागसंकमो ‘कत्स ? दसणमोहणीयखवयं मोत्तूण जस्स संतकम्ममथि त्ति तस्स उकरसाणुभागसंक्रमो। क. पा. सु. पृ. ३५१, ४०-४५. उकोसगं पबंधिय आवलियमइच्छिऊण उकोसं । नाव ण घाणइ तगं संकमइ य आ मुहुत्तंतो ॥ असुभाणं अन्नयरो सुहुम. अपजत्तगाइ मिच्छो य । पन्जिय . असंखवासाउए य मणुओववाए य॥ क. म. २, ५२-५३. २ प्रतिपु 'संजोगादो' इति पाठः । ३ तापतौ "वउरिदिएसु सुहुमेसु' इति पाठः ।

३८१ संकमाणियोगद्दारे अणुभागसंकमो सम्मामिच्छत्तखवगो अपच्छिमे अणुभागखंडए चट्टमाणओ सो होदि। पुरिमवेद- तिसंजलणाणं जहण्णाणुभागसंकामगो को होदि ? एदेसि खवओ एदेसि चेव अपच्छिम- समयपबद्धाणं चरिमफालीयो संछुहमाणओ। णवरि पुरिसवेदस्स पुल्लिंगेण उवविदो त्ति वत्त । णवंसयवेदस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होदि १ णqसयवेदक्खवगो णqसयवेदोदएणेच खबगसेडिमारूढो णQमयवेदचरिमकालिं संछुहमाणगो । इत्थिवेदस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होदि १ इत्थिवेदखबगो अण्णदरवेदोदएण खवगसेडिमारूढो इथिवेदचरिमाणुभागखंडयचरिमफालिं संछुहमाणओ । छण्णोकसायाणमिस्थिवेदभंगों। चदुण्णमाउआणं जहण्णाणुभागससंकामओ को होदि ? अप्पप्पणो जहणियाओ द्विदीओ णिव्बत्तेदूण आवलियमदिकतो। अर्णताणुबंधीणं जहण्णाणुभागसंकामओ को कौन होता है ? जो सम्यग्मिथ्यात्वका क्षपक अन्तिम अनुभागकाण्डकमें वर्तमान है वह उसके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है। पुरुषवेद और तीन संज्वलन कषायोंके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन होता है ? जो इन प्रकृतियोंका क्षपक इन्हींके अन्तिम समय- प्रबद्धोंकी अन्तिम फालियोंका क्षेपण कर रहा हो वह उनके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है। विशेष इतना है कि पुरुषवेदका संक्रामक पुल्लिंगसे उपस्थित हुआ जीव होता है, ऐसा कहना चाहिये । नपुंकसवेदके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन होता है ? नपुंसकवेदका क्षपक जो जीव नपुंसकवेदके उदयके साथ ही क्षपकश्रेणिपर आरूढ़ होकर नपुंसकवेदकी अन्तिम कालिका क्षेपण कर रहा हो वह उसके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है। स्त्रीवेदके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन होता है ? जो स्त्रीवेदका क्षपक जीव अन्यतर वेदोदयके साथ क्षपकश्रेणिपर आरूढ़ होकर स्त्रीवेदके अन्तिम अनुभागकाण्डककी अन्तिम फालिका क्षेपण कर रहा हो वह स्त्रीवेदके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता हैं। छह नोकपायोंके जघन्य अनुभागसंक्रामककी प्ररूपणा स्त्रीवेदके समान है। चार आयु कर्मों के जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन होता है ? अपनी अपनी जघन्य स्थितियोंको रचकर बन्धावलीको वितानेवाला जीव उनके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है। अनन्तानुबन्धी कषायोंके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन होता है ? विसंयोजना करके जो तेइंदियो वा चरिंदिओ वा पंचिंदिओ वा। एवमट्टणं कसायाणं । क. पा. सु. पृ. ३५१, ४७-५०. १ सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ १ चरिमाणुभागखंडयं संछुहमाणओ । क. पा. सु. पृ. ३५२, ५३-५४. xxx नियगचरमरसखंडे दिहिमोहदुगे ।। क. प्र. २, ५७. २ अ-काप्रत्योः 'खवदि', ताप्रतौ 'खवदि (ओ)' इति पाठः । ३ अप्रतौ 'एदासिं' इति पाठः । ४ कोहसंजलणस्स बणाणु- भागसंकामओ को होइ ? चरिमाणुभागबंधस्स चरिमसमयअणिल्लेवगो । एवं माण-मायासंजलग-पुरिसवेदाणं । क. पा. सु. पृ. ३५३, ५७-५९. ५ इस्थिवेदस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ ? इत्थिवेदक्खवगो तस्सेव चरिमाणुभागखंडए वट्टमाणओ । ण,सयवेदस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होह ?णसयवेदक्खवओ तस्सेव चरिमे अणुभागखंडए वट्टमाणओ। छण्णोकसायाणं जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ ? खवगो तेसिं चेव छण्णोकसाय- वेदणीयाणं चरिमे अणुभागखंडए वट्टमाणओ। क. पा. सु. पृ. ३५३, ६३-६७.

.३८० छक्खंडागर्म संतकम्म णिद्दाणिद्दा-पयलापयला-थीणगिद्धीणं जहण्णाणुभागसंकामओ को होदि'? सुहु- मेइंदियो कदेहदसमुप्पत्तियकम्मो. अण्णदरएइंदियो वेइंदियो तेइंदियो चउरिदियो पंचिदियो वा । कुदो ? जहण्णाणुभागेण सह सुहमेइंदियस्स बीइंदियादिसु उम्पत्ति- संभवादो। सम्माइट्टी पसत्थकम्माणुभागं ण हणदि। अप्पसत्थाणं भवोग्गहियाणं कम्माणमणुभागसंतकम्मं जिणे वट्टमाणं पि असण्णिसंतकम्मादो अणंतगुणं । एदेण कारणेण सादासादाणं णामस्स पयडीणं अणादियसंतकम्मियाणं णीचागोदस्स च कद- हदसमुप्पत्तियसंतकम्मियस्स सुहुमेइंदियस्स जहण्णसंतकम्मादो हेट्ठा बंधमाणस्स जहण्णा- शुभागसंकमो । एइंदियादिपंचिंदिएसु वि एदेसि जहण्णाणुभागसंकमो होदि, जहण्णाणु- भागसंतकम्मियसुहुमेइंदियस्स जहण्णाणुभागेण सह बेइंदियादिसुप्पत्तिदंसणादो। मिच्छत्त-अट्ठकसायाणं पि सुहुमेइंदियम्हि चेव कयहदसमुप्पत्तियकम्मम्हि जहण्णाणुभागसंकमो । सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागसंकामगो को होदि ? जो निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धिके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन होता ? जिसने हतसमुत्पत्तिक कर्मको किया है ऐसा सूक्ष्म एकेन्द्रिय, अन्यतर एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीव उनके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है। इसका कारण यह है कि जघन्य अनुभागके साथ सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवकी उत्पत्ति द्वीन्द्रिय आदि जीवों में सम्भव है। सम्यग्दृष्टि जीव प्रशस्त कर्मों के अनुभागका घात नहीं करता है। भवोपगृहीत अप्रशस्त कर्मोंका• अनुभागसत्कर्म जिन भगवान्में वर्तमान होकर भी असंज्ञीके सत्कर्मसे अनन्तगुणा होता है। इस कारण सातावेदनीय, असातावेदनीय, अनादिसत्कर्मिक नामप्रकृतियों और नीचगोत्रका जघन्य अनुभागसंक्रम हतसमुत्पत्तिकसत्कर्मिक होकर जघन्य सत्कर्मसे नीचे बांधनेवाले सूक्ष्म एकेन्द्रियके होता है। एकेन्द्रियको आदि लेकर पंचेन्द्रिय पर्यन्त जीवों में भी इनके जघन्य अनुभागका संक्रम होता है, क्योंकि, जघन्य अनुभाग- सत्कर्मिक सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवक्री जघन्य अनुभागके साथ द्वीन्द्रियादि जीवोंमें उत्पत्ति देखी जाती है। मिथ्यात्व और आठ कषायोंका भी जघन्य अनुभागसंक्रम हतसमुत्पत्तिककर्मको करने- वाले सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवके ही होता है। सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागका संक्रामक १ अ-काप्रत्योः 'संकमो होदि', ताप्रतौ 'संकमो [को-] होदि' इति पाठः । २ ताप्रतौ 'सुहुमेइंदियकद-' इति पाठः। ३ सम्मद्दिट्ठी न हणइ सुभाणुभागे... क. प्र. २-५६. ४ केवलिणो णंतगुणं असन्निओ सेस. असुभाणं ॥ क. प्र. २-५५. ५ सेसाण सुहुम हयसंतकम्मिगो तस्स हेढओ जाव । बंधइ तावं एगिदिओ व णेगिंदिओ वावि ।। क. प्र. २-५९. उक्तसेसाणं शुभानामशुभानां वा प्रकृतीनां सप्तनवतिसंख्यानां यः सूक्ष्मैकेन्द्रियो वायुकायिकोऽनिकायिको वा हतकर्मा-हतं विनाशितं प्रभूतमनुभागसत्कर्म येन स हतकर्मा- स तस्यात्म- सत्कस्यानुभागसत्कर्मणोऽधस्तात् ततः स्तोकतरमित्यर्थः । अनुमागं तावद् बध्नाति यावदेकेन्द्रियस्तस्मिन्नन्यस्मिन् वा एकेन्द्रियभवे वर्तमानोऽनेकेन्द्रियो वेति स एव हतसत्कर्मा एकेन्द्रियोऽन्यस्मिन् द्वीन्द्रियादिभवे वर्तमानो यावदन्यं बृहत्तरमनुभागं न बध्नाति तावत्तमेव जघन्यमनुभाग संक्रमयतीति । मलय. ६ मिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होह ? सुहुमरस हदसमुप्पत्तिकम्मेण अण्णदरो । एईदियो वा वेइंदियो वा संकमाणियोगद्दारे अणुभागसंकमो साद-जसकित्ति-उच्चागोदाणं . मणुसगइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुधी-ओरालियसरीर- ओरालियसरीरअंगोवंग-बंधण-संघाद-पढमसंघडण आदाबुजोवणामाओ मोत्तण सेसाणं पसत्थणामपयडीणं च उक्कस्साणुभागसंकामओ केचिरं०१.जह० अंतोमुहुत्तं, उक० पुय- कोडी देसूणा ।अणुकस्साणुभागसंकामओ केवचिरं० १ उव्वेल्लमाणपयडीओ मोत्तण सेसाण अणादिओ अपजवसिदो अणादिओसपञ्जवसिदो वा । उव्वेल्लमाणाणं पयडीणमणुकम्साणु- भागसंकामओ केवचिरं० १ जह० पंलिदो० असंखे० भागो, अधवा अहवस्साणि सादिरेयाणि । उकस्सेण जो जस्स पयडिसंतकालो तचिरं कालं'। आउआणं जहिदिबंधमाणगो जमणुभागं णिवत्तेदि जाव तहिदि ण ओवट्टेदि ताव तत्तियं कालं सो अणुभागं होदि । एदेण बीजेण देव-णिरयाउआणं उकस्साणु- कस्सअणुभागसंकामओ जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । मणुस-तिरिक्खाउआणं उक्कस्साणुक्कस्सअणुभागसंकमो केवचिरं० १ जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क तिष्णि पलिदोवमाणि सादिरेयाणि । णवरि तिरिक्स्वाउअअणुकस्सअणुभाग- संकमस्स उकस्सेण असंखेजा पोग्गलपरियट्टा । अप्पसत्थाणं णामपयडीणं णीचागोद-पंचंतराइयाणं च उकस्साणुभागसंकमी जह. सातावेदनीय, यशकीर्ति, उच्चगोत्र तथा मनुष्यगति, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, औदारिक- शरीर, औदारिकशरीरांगोपांग, औदारिकबन्धन, औदारिकसंघात, प्रथम संहनन, तथा आतप व उद्योतको छोड़कर शेप प्रशस्त नामप्रकृतियोंके भी उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे कुछ कम पूर्वकोटि मात्र है। इनके अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? उक्त काल उद्वेल्यमान प्रकृतियोंको (आहारकद्विक, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, देवद्विक, नारकचतुष्क, उच्चगोत्र और मनुष्यद्विक) को छोड़कर शेप प्रकृतियोंका अनादि-अपर्यवंसित और अनादि-सपर्यवसित भी है । उद्वेल्यमान प्रकृतियों के अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग अथवा साधिक आठ वर्ष मात्र है । उत्कर्पसे जो जिसके प्रकृतिसत्वका काल है उतना काल उनके अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका है। आयु कर्मोंकी जिस स्थितिको बांधनेवाला जिस अनुभागकी रचना करता है व जब तक उस स्थितिका अपवर्तन नहीं करता है तब तक उतने मात्र काल उसके वह अनुभाग होता है । इस बीजपदके अनुसार देवायु व नारकायुके उत्कृष्ट व अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे साधिक तेतीस सागरोपम मात्र है। मनुष्यायु और तिर्य- गायुके उत्कृष्ट व अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे साधिक तीन पल्योपम मात्र है। विशेप इतना है कि तिर्यंच आयुके अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रमका काल उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। अप्रशस्त नाम प्रकृतियों, नीचगोत्र और पांच अन्तरायके उत्कृष्ट अनुभागके संक्रमका ? १ अ-कापत्योः 'काल' इति पाठः। २ तापतौ'-क.म्मकालो। तचिरं कालं आउआणं ।' इति पाठः।

३८२ छक्खंडागमे संतकर्म होदि ? विसंजोएदूण जहण्णपरिणामेण पढमसमयसंजुत्तो । णिरयगइणामाए जहण्णाणु- भागसंकामओ को होदि ? पढमदाए संजोएमाणओ। जहा णिरयगइणामाए तहा सव्वासिमुवेल्लमाणणामपयडीणं । उच्चागोदस्स जहण्णाणुभागसंकामगो को होदि ? संजोजेमाणओ। एवं सामित्तं समत्तं । एयजीवेण कालो । तं जहा-पंचणाणावरणीय-णवदंसणावरणीय-असादावेदणीय- मिच्छत्त-सोलसकसाय-णवणोकसायाणं उकस्साणुभागसंकामगो जह. अंतोमुहु, उक- स्सेण वि अंतोमुहुत्तं । अणुक्कस्साणुभागसंकामओ केवचिरं० १ जह० अंतोमुहुत्तं, उक० असंखेजा पोग्गलपरियट्टा । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं उक्कस्साणुभागसंकामओ जह०, अंतोमु०, उक्क० बेछावहिसागरोवमाणि. सादिरेयाणि । अणुकस्साणुभागसंकामओ जहण्णुक्क० अंतोमुं० । जघन्य परिणामसे संयुक्त होने के प्रथम समय वर्तमान है वह उनके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है । नरकगति नामकर्म के जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन होता है ? सर्वप्रथम संयोजन करनेवाला जीव उसके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है । जैसे नरकगतिके जघन्य अनुभाग- संक्रामकका कथन किया है वैसे ही उद्वेल्यमान सभी नामप्रकृतियों के जघन्य अनुभागसंक्रामकोंका कथन करना चाहिये। उच्चगोत्रके जघन्य अनुभागका संक्रामक कौन होता है ? सर्वप्रथम संयोजन करनेवाला जीव उसका संक्रामक होता है। इस प्रकार स्वामित्वको प्ररूपणा समाप्त हुई। एक जीवकी अपेक्षा कालको प्ररूपणा की जाती है । यथा- पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शना. वरण, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय और नौ नोकषाय; इनके उत्कृष्ट अनुभाग- संक्रामकका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे भी अन्तर्मुहूर्त मात्र ही है। इनके अनुत्कृष्ट अनुभागसंक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे असंख्यात पुद्गल- परिवर्तन मान है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। उनके अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका काल जघन्य व उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। १ आऊण जहण्णठिई बंधिय जावस्थि संकमो ताव । उव्वलण-तित्थ-संजोयणा य पढमावलियं गंतुं ॥ क. प्र. २-५८ तथा नरकद्विक मनुजद्विक-वैक्रियसप्तकाहारसप्तकोच्चैगोत्रलक्षणामेकविंशत्युद्वलनप्रकृतीनां तीर्थकरस्थानन्तानुबन्धिनां च जघन्यमनुभागं बद्ध्वा प्रथमावलिकां वन्धावलिकालक्षणां गत्वातिक्रम्य, बन्धावलिकायाः परतः इर्थः । जघन्यमनुभागं संक्रमयति । कः संक्रमयतीति चेदुच्यते- वैक्रियिकसप्तक- देवद्विक-नरकद्विकानामसंशिपंचेन्द्रियः, मनुष्यद्विकोचैर्गोत्रयोः सूक्ष्मनिगोदः, तीर्थकरस्याविरतसम्यग्दृष्टिः, अनन्तानुबन्धिनां पश्चात्कृतसम्यक्त्वो मिथ्यादृष्टिः संक्रमयतीति । मलय. २ मिच्छत्तस्स उक्कस्साणुभागसंकामओ केचिरं कालादो होदि ? जहष्णुकस्सेण अंतोमुहुत्तं । अणुकरसाणु. भागसंकामओ केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेजा पोग्गलपरियट्टा । एवं सोलसकसाथ-णवणोकसायाणं । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमुक्कस्साणुभागसंकामओ केवचिरं कालादो होदि ? जहणेण अंतोमुहुत्तं । उक्कस्सेण वे छावहिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । अणुकस्साणुभागसंकामओ केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णुक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । क. पा. सु. पृ. ३५४, ६९-७९, आहारसप्तकस्याप्रमत्तः, - संकमाणियोगदारे अणुभागसंकमो ३८५ , - अजहण्णाणुभागसंकामओ चदुमंजलण-पुरिसवेदाणं अणादिओ अपञ्जवसिदो, अणादिओ सपज्जवसिदो, सादिओ सपञ्जवसिदो [वा] । तत्थ जो सो सादिओ सपज्जवसिदो तस्स जह० अंतोमुहुत्तं, उक० उवढपोग्गलपरियढें । सम्मत्तस्स जह० अंतोमु०, उक्क० बेछावद्धिसागरो० सादिरेयाणि । अणंताणुबंधीणं जहण्णाणुभागसंकामओ जह० एगसमओ, उक० चत्तारि समया । अजहण्णअणुभागसंकामओ अणादिओ अपज्जवसिदो, अणादिओ सपञ्जवसिदो, सादिओ सपन्जव सिदो च । तत्थ जो सो सादिओ सपज्जवसिदो तस्स जह० अंतोसु०, उक्कस्स- मुवइढपोग्गलपरियई । अढण्णं णोकसायाणं जहण्णाणुभागसंकामओ जहण्णुक्क० अंतो- मुहुत्तं । अजहण्ण० अणादिओ अएज्जवसिदो, अणादिओ सपञ्जवसिदो, सादिओ सपञ्ज- वसिदो च । तत्थ जो सो सादिओ सपञ्जवसिदो तस्स जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० उवढ- पोग्गलपरियट्ट । सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागसंकामओ केव० १ जहण्णुक० अंतोमु० । अजहण्णस्स जह० अंतोमु०, उक्क० वेछावहिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । आउआणं जहण्णाणुभागसंकामओ जह० एगसमओ, उक्क० चत्तारि समया । अजहण्ण. जह. अंतोमुहुत्त । देव-णिरयाउआणं अजहण्णाणुभागसंकमकालस्स कुदो मात्र है। चार संज्वलन और पुरुषवेदके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका काल अनादि- अपर्यवसित, अनादि-सपर्यवसित और सादि-सपर्यवसित भी है। उनमें जो सादि-सपर्यवसित है उसका प्रमाण जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपाधं पुद्गलपरिवर्तन है। सम्यक्त्वके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। अनन्तानुबन्धी कपायोंके जघन्य अनुभागके संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे चार समय मात्र है। उनके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका काल अनादि- अपर्यवसित, अनादि-सपर्यवसित और सादि-सपर्यवसित भी है। उनमें जो सादि-सपर्यवसित है उसका प्रमाण जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपाधं पुद्गलपरिवर्तन है। पुरुपवेदको छोड़कर शेष आठ नोकपायोंके जघन्य अनुभागके संक्रामकका काल जघन्य व उत्कर्पसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। उनके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका काल अनादि-अपर्यवसित, अनादि-सपर्यवसित और सादि-सपर्यवसित भी है। उनमें जो सादि-सपर्यवसित है उसका प्रमाण जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे उपाधं पुद्गलपरिवर्तन है । सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? यह जघन्य व उत्कर्पसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। उसके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। आयु कर्मों के जघन्य अनुभागके संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे चार समय मात्र है। उनके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। १ ताप्रतावतोऽने 'उक्क० वेछावहिसागरो' इत्यधिकः पाठः । छ. से. ४९ - ३८४ छक्खंडागमे संतकम्म उक्क० अंतोमुहुत्तं । अणुकस्सअणुभाग० केवचिरं० १ जह० अंतोमु०, उक० असंखेजा पोग्गलपरियट्टा । मणुसगइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुब्बी-ओरालियसरीर-ओरालियसरीर- अंगोवंग-बंधण-संघाद-पढमसंघडण-आदावुअोवाणं उक्कस्साणुभागसंकामगो केवचिरं० ? जह० अंतीमुहुत्तं, उक्क० बेछावहिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । एदेसि चेव अणुक्कस्स- संकामगो केवचिरं० १ जह० अंतोमुहुत्तं । उक० आदावणामाए असंखेजा पोग्गलपरियट्टा, मणुसगइणामाए सपरिवाराए असंखेजा पोग्लगपरियट्टा, ओरालियसरीरस्स सपरिवारस्स पढमसंघडणस्स उज्जोवणामाए च अणादिओ अपज्जवसिदो, अणादिओ सपञ्जवसिदो, सादिओ सपञ्जवसिदो वा। [तत्थ जो सादिओ सपजवसिदो] तस्स जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० उबड्ढपोग्गलपरियट्ट । एवमुक्कस्साणुभागसंकमकालो समत्तो । जहण्णाणुभागसंकमकालो । तं जहा-पंचणाणावरण-छदसणावरण-पंचतराइयाणं जहष्णाणुभागसंकमो केवचिरं०१ जहण्णुक्कस्सेण एगसमओ। अजहण्णाणुभागसंकामओ केवचिरं० १ अणादिओ अपज्जवसिदो, अणादिओ सपज्जवसिदो वा । णिदाणिदा-पयला- पयला-धीणगिद्धि-सादासाद-मिच्छत्त-अट्ठकसायाणं जहण्णाणुभागसंकामओ जहष्णुक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । अजहण्णाणुभागसंकामओ जह• अंतोमुहुत्तं, उक्क० असंखेज्जा लोगा। सम्मत्त-चदुसंजलण-पुरिसवेदाणं जहण्णाणुभागसंकामओ केव० १ जहण्णुक्क० एगसमओ। काल जघन्य व उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है । इनके अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रमका काल कितना है ? जघन्यसे वह अन्तर्मुहूत और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। मनुष्यगति, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, औदारिकशरीर, औदारिकशरीरांगोपांग, औदारिकबन्धन, औदारिक- संघात, प्रथम संहनन, आतप और उद्योतके उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। इन्हीं के अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। उत्कर्षसे वह आतप नामकर्मका असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन, सपरिवार मनुष्यगति नामकर्मका असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन, तथा सपरिवार औदारिकशरीर, प्रथम संहनन और उद्योत नामकर्मका अनादि- अपर्यवसित, अनादि-सपर्यवसित व सादि-सपर्यवसित भी है। उनमें जो सादि-सपर्यवसित काल है उसका प्रमाण जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त व उत्कर्षसे उपार्ध पुद्गलपरिवर्तन है। इस प्रकार उत्कृष्ट अनुभाग संक्रमका काल समाप्त हुआ। जघन्य अनुभागके संक्रमकालकी प्ररूपणा इस प्रकार है-पांच ज्ञानावरण, छह दर्शना- वरण और पांच अन्तरायके जघन्य अनुभागके संक्रमका काल कितना है ? वह जघन्य व उत्कर्षसे एक समय मात्र है। उनके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह अनादि-अपर्यवसित और अनादि-सपर्यवसित भी है। निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, साता- वेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व और आठ कषायोंके जघन्य अनुभागके संक्रामकका काल जघन्य व उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। उनके अजघन्य अनुभागके संक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे असंख्यात लोक मात्र है । सम्यक्त्व, चार संज्वलन और पुरुपवेदके जघन्य अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्य और उत्कर्पसे एक समय ३८७ संकमाणियोगद्दारे अणुभागसंकमो चत्तारि समया। अजहण्णाणुभागसंकामगो केव० १ जह० पलिदो० असंखे० भागो अहवस्साणि सादिरेयाणि, उक्क० अप्पप्पणों पयडिसंतस्स कालो। एवं जहण्णुकस्स- अणुभागसंकमकालो समत्तो । एयजीवेण अंतरं । [तं] जहा... पंचणाणावरणीय-णवदसणावरणीय-असादावेदणीय- मिच्छत्त-सोलसकसाय-णवणोकसाय-णिरय-तिरिक्ख-मणुस्साउआणं अप्पसत्थणामपयडीणं च णोचागोद-पंचंतराइयाणं च उकस्साणुभागसंकामयंतरं केव० १ जह० अंतोमुत्तं, उक्क० असंखेजा पोग्गलपरियङ्का । साद-जसकिति-उच्चागोदाणं जासिं च णामपयडीणं खबगे परमवियणामबंधज्झवसाणस्स चरिमसमए उकस्साणुभागो बज्झदि तासिं च उकस्साणु- भागसंकामयंतरं णस्थि । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं उक्कस्समणुभागसंकामयंतरं जहणं जहण्णपयडिअंतरं, उक० उबड्ढपोग्गलपरियट्ट । देवाउअस्स जह• अंतोमुहुत्तं, उक्क. उवड्ढपोग्गलपरियढें । मणुसगइ- मणुसगइपाओग्गाणुपुब्बी - बजरिसहसंघडण-उज्जोव- ओरालियचउकाणं देवाउअभंगो। आदावणामाए अप्पसत्थणामपयडिभंगो। एवमुक्क- संतरं समत्तं । जहण्णाणुभागसंकामयंतरं- पंचणाणावरणीय - छदसणावरणीय- सम्मत्त-सम्मा- मिच्छत्त-चदुसंजलण-णवणोकसायाणं पंचंतराइयाणं जहण्णाणुभागसंकामयंतरं णस्थि । संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे चार समय मात्र है। उनके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे पल्योपमके असं. ख्यातवें भाग और साधिक आठ वर्ष तथा उत्कर्षसे अपने अपने प्रकृतिसत्त्वके कालके समान है। इस प्रकार जघन्य व उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका काल समाप्त हुआ। एक जीवकी अपेक्षा अन्तरकी प्ररूपणा की जाती है । यथा-पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शना- वरण, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, नौ नोकषाय, नारकायु, तिर्यगायु, मनुष्यायु, अप्रशस्त नामप्रकृतियों, नीचगोत्र और पांच अन्तरायके उत्कृष्ट अनुभाग संक्रामकका अन्तरकाल कितना है ? वह जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है । साता- वेदनीय, यशकीर्ति और उच्चगोत्रका तथा जिन नामप्रकृतियोंका क्षपकके द्वारा परभविक नाम- कर्मों के बन्धाध्यवसानके अन्तिम समयमें उत्कृष्ट अनुभाग बांधा जाता है उनके भी उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका अन्तर नहीं होता। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकका जघन्य अन्तरकाल जघन्य प्रकृतिअन्तरके समान तथा उत्कृष्ट उपार्ध पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। उक्त अन्तरकाल देवायुका जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे उपाधै पुद्गलपरिवर्तन मात्र है । मनुष्यगति, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, वज्रपभसंहनन, उद्योत और औदारिकचतुष्कका उक्त अन्तरकाल देवायुके समान है। आतप नामकर्मके इस अन्तरकालकी प्ररूपणा अप्रशस्त नाम- प्रकृतियों के समान है। इस प्रकार उत्कृष्ट अन्तर समाप्त हुआ। जघन्य अनुभाग संक्रामकके अन्तरकी प्ररूपणा की जाती है- पांच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, चार संज्वलन, नौ नोकपाय और पांच अन्तराय; इनके ३८६ छक्खंडागमे संतकम्म , अंतोमु० १ तण्ण, अजहण्णाणुभागसंकमस्स आदि करिय पुणो अजहण्णाणुभागसंकमे अंतोमुहुत्तमच्छिय पुणो जहण्णाणुभागं मोत्तूण सेसाणुभागस्स घादं करिय एगसमय- जहण्णाणुभागं संकामिय विदियादिसमएसु आवलियादीदं पुव्यवद्धाणुभागं संकममाणस्स तदुवलंभादो। उक्कस्सेण देव-णिरयाउआणं तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि, तिरि- क्खाउअस्स असंखेजा लोगा। णामपयडीणं अणुध्वेल्लमाणियाणं सुहाणमसुहाणं वा जहण्णाणुभागसंकामओ केव० ? जह० उक्क० च अंतोमुहुत्तं । अजहण्णाणुभागसंकामगो केव० ? जह० अंतोमु०, उक्क० असंखेजा लोगा। एवं णीचागोदस्स। आहारसरीर-आहारसरीरअंगोवंग-बंधण-संघादाणं जहाण्णाणुभागसंकामओ केव० १ जह० एगसमओ, उक० चत्तारि समया । अज- हण्णाणुभागसंकामओ केवचिरं० १ जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० पलिदोवमस्स असंखें० भागो। तित्थयरणामाए जहण्णाणुभागसंकामओ केव० जह० एगसमओ, उक्क चत्तारि समया । अजहण्णाणुभागसंकामओ केवचिरं० १ जचिरं पयडिसंतकम्मं । सेसाणमुव्वेल्ल- माणणामपयडीणसुच्चागोदस्स जहण्णाणुभागसंकामओ केव० १ जह० एगसमओ, उक० शंका- देवायु और नारकायुके अजघन्य अनुभागके संक्रमका काल अन्तर्मुहूर्त कैसे है? समाधान- नहीं, क्योंकि अजघन्य अनुभागसंक्रमको आदि करके, फिर अजघन्य अनुभागसंक्रममें अन्तर्मुहूर्त रहकर, पुनः जघन्य अनुभागको छोड़कर शेष अनुभागका घात करके एक समय में जघन्य अनुभागका संक्रम करके द्वितीयादि समयों में आवलिकातीत पूर्वबद्ध अनुभागका संक्रम करनेवाले के उक्त काल पाया जाता है। उक्त काल उत्कर्षसे देवायु और नारकायुका साधिक तेतीस सागरोपम, तथा तिर्यगायुका असंख्यात लोक मात्र है। अनुद्वेल्यमान शुभ और अशुभ नामप्रकृतियोंके जघन्य अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्य व उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। उनके अजघन्य अनुभाग के संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे असंख्यात लोक मात्र है। इसी प्रकार नीचगोन के भी अनुभागसंक्रमकालका कथन करना चाहिये। आहारशरीर, अहारशरीरांगोपांग, आहारवन्धन और आहारसंघातके जघन्य अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे एक ससय और उत्कर्षसे चार समय मात्र है। इनके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। तीर्थंकर नासकर्मके जघन्य अनुभागके संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे चार समय मात्र है। उसके अजघन्य अनुभागके संक्रासकका काल कितना है ? जितना काल प्रकृतिसत्कर्मका है उतना ही काल उसके अजघन्य अनुभागके संक्रसका भी है। शेप उद्वेल्यमान नामप्रकृतियों और उच्चगोत्रके जघन्य अनुभागके १ अप्रतौ 'अणुव्वेम्माणियाण' इति पाठः ।

संकमाणियोगक्षरे अणुभागसंकमो ३८९ भंगा वत्त व्या । साद-जसकित्ति-उचागोदाणं उकस्साणुभागस्स णियमा अस्थि संकामया च असंकामया च । एदासिमणुकस्साणुभागस्स वि संकामया च असंकामया च णियमा अस्थि । सेसाणं कम्माणं छ भंगा। अपुचकरणे परभवियणामाणं बंधवोच्छेदम्मि जेसिं कम्माणं उकस्सबंधो भणिदो तेसिमुक्कस्सो वा अणुकस्सो वा बंधो तत्थ होदि, असंखेज- लोगमेत्तअणुभागबंधज्झवसाणहाणाणं तत्थ संभवादो । तेणेदेसि छ भंगा। एवमुक्कस्सपद- भंगविचओ समत्तो। जहण्णयस्स वि एदं चेव अहुपदं । एदेण अट्ठपदेण पंचणाणावरणीय-छदंसणा- वरणीय-सम्मत्त-सम्मामिच्छत्त-अणंताणुवंधीणं चदुक्क-चदुसंजलण- णवणोकसाय -आउत्ति- उव्वेल्लमाणणामपयडि-उच्चागोद-पंचंतराइयाणं जहण्णाणुभागसंकामयाणं छ भंगा । थीणगिद्धितिय - सादासाद-मिच्छत्त - अट्टकसाय-तिरिक्खाउअ-अणुव्वेल्लमाणणामपयडीणं णीचागोदस्स च जहण्णाणुभागस्स णियमा संकामया च असंकामया च । एवं णाणा- जावेहि भंगविचओ समत्तो । णाणाजीवेहि कालो। तं जहा- साद-जसकित्ति-उच्चागोदाणं उक्करसाणुभाग- संकामया केवचिरं० ? सव्वद्धा । सेसाणं कम्माणं उकस्साणुभागसंकामया जह० अंतो- मुहुत्तं, उक० अप्पसत्थाणं कम्माणं पलिदो० असंखे० भागो । आउआणमुक्कस्साणुभाग- तथा कदाचित् संक्रामक भी बहुत और असंक्रामक भी बहुत होते हैं । ) कहना चाहिये। सातावेदनीय, यशकोति और उच्चगोत्रके उत्कृष्ट अनुभागके नियमसे बहुत संक्रामक और बहुत असंक्रामक होते हैं । इनके अनुत्कृष्ट अनुभागके भी बहुत संक्रामक और वहुत असंक्रामक होते हैं। शेष कर्मों के छह. भंग हैं। अपूर्वकरण गुणस्थानमें परभविक नामकर्मोको बन्धव्यु- च्छित्तिके हो जानेपर जिन कर्मोका उत्कृष्ट बन्ध कहा गया है उनका वहां उत्कृष्ट व अनुत्कृष्ट बन्ध होता है, क्योंकि, वहां असंख्यात .लोक मात्र अनुभागबन्धाध्यवसानस्थानोंकी सम्भावना है। इस कारण इनके छह भंग होते हैं । इस प्रकार उत्कृष्ट-पद-भंगविचय समाप्त हुआ। जघन्य अनुभाग संक्रमके भी विषयमें यही अर्थपद है । इस अर्थपदके अनुसार पांच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, सम्यक्त्व; सम्यग्मिथ्यात्व, अनन्तानुवन्धिचतुष्क, चार संज्वलन, नौ नोकषाय, तीन आयु, उद्वेल्यमान नामप्रकृतियों, उच्चगोत्र और पांच अन्तरायके जघन्य अनुभाग संक्रामकोंके छह भंग होते हैं। स्त्यानगृद्धि आदि तीन, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, आठ कपाय, तिर्यगायु, अनुढेल्यमान नामप्रकृतियों और नीचगोत्रके जघन्य अनुभागके नियमसे संक्रामक बहुत और असंक्रामक भी बहुत होते हैं। इस प्रकार नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय समाप्त हुआ। नाना जीवोंकी अपेक्षा कालकी प्ररूपणा इस प्रकार है- सातावेदनीय, यशकर्ति और उच्चगोत्रके उत्कृष्ट अनुभाग संक्रामकोका काल कितना है ? नाना जीवोंको अपेक्षा उनका सर्वकाल है। शेष कर्मों के उत्कृष्ट अनुभाग संक्रामकोंका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे अप्रशस्त कर्मोंका पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। आयु कर्मों के उत्कृष्ट अनुभाग १ अ-काप्रत्योः 'सव्वद्धं' इति पाठः ।

३८८ छक्खंडागमे संतकम्म -- णिहाणिदा - पयलापयला - थीणगिद्धि - सादासाद - मिच्छत्त - अट्ठकसाय-तिरिक्खाउआणं अणुव्वेल्लमाणपसत्थापसत्थणामपयडीणं णीचागोदस्स च जहण्णाणुभागसंकामयंतरं जह• अंतोमुहुत्तं, उक्क० असंखेज्जा लोगा। अणंताणुबंधीणं जहण्णाणुभागसंकामयंतरं जह० अंतोमुहत्तं, उक्क. उवढपोग्गलपरियट्ट । णिरय-देव-मणुस्साउआणं जहण्णाणु० जह. अंतोमुहत्तं, उक० असंखेजा पोग्गलपरियट्टा । उव्वेल्लणपाओग्गाणं णामपयडीणं उच्चागोदस्स च जहण्णाणुभागसंकामयंतरं जह० पलिदो० असंखे० भागो, उक्क० मोत्तण संजदपाओग्गाओ अवसेसाणं असंखेजा पोग्गलपरियट्टा, संजदपाओग्गाणं उवढपोग्गल- परियट्ट । तित्थयरणामाए जहण्णाणुभागसंकामयंतरं णस्थि । एवं अंतरं समत्तं । णाणाजीवेहि भंगविचओ दुविहो उकस्सपदभंगविचओ जहण्णपदभंगविचओ चेदि । तत्थ अट्ठपदं-जे उकस्सअणुभागस्स संकामया ते अणुकस्स० असंकामया। जे अणुकस्सअणुभागस्स संकामया ते उकस्सस्स असंकामया। एदेण अट्ठपदेण सव्य- कम्माणं पि उकस्साणुभागस्स सिया सव्वे जीवा असंकामया, सिया असंकामया च संकामओ च, सिया असंकामया च संकामया च । अणुकस्सस्स वि विवरीएण तिण्णि- जघन्य अनुभाग संक्रामकका अन्तरकाल सम्भव नहीं है। निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, त्यानगृद्धि, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, आठ कषाय और तिर्यंच आयु तथा अनुद्वेल्यमान प्रशस्त व अप्रशस्त नामप्रकृतियों एवं नीचगोत्रके जघन्य अनुभागके संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे असंख्यात लोक मात्र है। अनन्तानुबन्धी कषायोंके जघन्य अनुभाग संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपाधं पुद्गलपरिवर्तन मान है। नारकायु, देवायु और मनुष्यायुके जघन्य अनुभाग संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन मात्र है । उद्वेलन योग्य नामप्रकृतियों और उच्चगोत्रके जघन्य अनुभाग संक्रामकका अन्तरकाल जघन्यसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग है। उत्कपैसे संयत योग्य प्रकृतियोंको छोड़कर शेष प्रकृतियोंका असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन तथा संयत योग्य प्रकृतियोंका उपाधं पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। तीर्थंकर नामकर्मके जघन्य अनुभाग संक्रामकका अन्तरकाल नहीं है । इस प्रकार अन्तरकालकी प्ररूपणा समाप्त हुई। नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय दो प्रकार है- उत्कृष्ट-पद-भंगविचय और जघन्य-पद- भंगविचय । उनमें अर्थपद कहते हैं- जो उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामक हैं वे अनुत्कृष्ट अनुमागके असंक्रामक होते हैं । जो अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामक हैं वे उत्कृष्ट अनुभागके असंक्रामक होते हैं । इस अथपदके अनुसार सभी कर्मों के उत्कृष्ट अनुभागके कदाचित् सब जीव असंक्रामक होते हैं, कदाचित् असंक्रामक बहुत और संक्रामक एक होता है, तथा कदाचित् असंक्रामक भी बहुत व संक्रामक भा बहुत होते हैं। अनुत्कृष्ट अनुभागके सम्बन्धमें भी विपरीत क्रमसे तीन भंग (कदाचित् सब जीव संक्रामक, कदाचित् संक्रामक बहुत और असंक्रामक एक, १ अप्रतौ 'वे' इति पाठः । २ ताप्रतौ 'उ (अणु) कस्साणुभागस्स' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे अणुभागसंकमो ३९१ बंधण-संघाद-तिस्थयराणं जहण्णाणुभागसंकामया जह० एगसमओ, उक्क० संखेजा समया । सेमाणमणुव्वेल्लमाणणामपयडीणं णीचागोदस्स जहण्णाणुभागसंकामयाण सव्वद्धा । एवं कालो समत्तो। णाणाजीवेहि अंतरं। तं जहा- पंचणाणाचरणीय-णवदसणावरणीय-असादा- वेदणीय-मिच्छत्त-सोलसकसाय-णवणोकसाय-आउचउकाणं जसकित्ति मोत्तूण सधणाम- पयडीणं णीचागोद-पंचंतराइयाणं च उकस्साणुभागसंकामयंतरं जह. एगसमओ, उक० असंखेजा लोगा। साद-सम्मत्त-सम्मामिच्छत्त-जसकित्ति-उच्चागोदाणं उक्कस्साणु- भागसंकामयंतरं णत्थि । एवमुक्कस्साणुभागसंकामयंतरं समत्तं । जहण्णाणुमागसंकामयंतरं । तं जहा--पंचणाणावरणीय-छदंसणावरणीय-सम्मत्त- सम्मामिच्छत्त-लोहसंजलण-इथिवेद- छण्णोकसाय-पंचतराइयाणं जहण्णाणुभागसंकाम- यंतरं जह० एयसमओ, उक्क० छम्मासा। तिण्णिसंजलण-पुरिसवेदाणमंतरं एवं चेव । णचरि उक० वस्सं सादिरेयं । एवं णबुंसयवेदस्स । णवरि उकस्समंतरं संखेजाणि वस्साणि । अणंताणुबंधीणं जह० एगसमओ, उक्क० असंखेजा लोगा। तिण्णमाउआण- मंतरं जह० एगसमओ, उक्क० असंखेजा लोगा। जाओ णामपयडीओ सादियसंत- कम्माओ तासि णामपयडीणं जहण्णाणुभागसंकामयंतरं जह० एगसमओ, उक्क० असं० आहारबन्धन, आहारसंघात और तीर्थंकरके जघन्य अनुभाग संक्रामकोंका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे संख्यात समय मात्र है। शेष अनुढेल्यमान नामप्रकृतियों और नीचगोत्रके जघन्य अनुभाग संक्रामकोका काल सर्वकाल है। इस प्रकार कालप्ररूपणा समाप्त हुई। नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तरकी प्ररूपणा की जाती है। यथा- पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, नौ नोकपाय और चार आयु कमों के तथा 'यशकीर्तिको छोड़कर सब नामप्रकृतियों, नीचगोत्र और पांच अन्तरायके उत्कृष्ट अनुभाग संक्रामकोंका अन्तरकाल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे असंख्यात लोक मात्र है। सातावेदनीय सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्य, यशकीर्ति और उच्चगोत्रके उत्कृष्ट अनुभाग संक्रामकोंका अन्तर नहीं होता। इस प्रकार उत्कृष्ट अनुभाग संक्रामकोंका अन्तरकाल समाप्त हुआ। जघन्य अनुभाग संक्रामकोंके अन्तरकालकी प्ररूपणा इस प्रकार है- पांच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, संज्वलन लोभ, स्त्रीवेद, छह नोकपाय और पांच अन्तरायके जघन्य अनुभाग संक्रामकोंका अन्तरकाल जघन्यसे एक समय और उत्कपसे छह मास मात्र है। तीन संज्वलन और. पुरुपवेदका भी अन्तरकाल इसी प्रकार ही है। विशेप इतना है कि इनका उक्त अन्तरकाल उत्कर्पसे साधिक एक वर्ष मात्र है। इसी प्रकार नपुंसक- वेदके सम्बन्ध में कहना चाहिये । विशेप इतना है कि उत्कृष्ट अन्तरकाल संख्यात व मात्र है। अनन्तानुवन्धी कपायोंका वह अन्तरकाल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे असंख्यात लोक मात्र है। तीन आयु कर्मोंका वह अन्तरकाल जघन्यसे एक समत्र और उत्कर्पसे असंख्यात लोक मात्र है। जो नामप्रकृतियां सादि सत्कर्मवाली हैं उन नामप्रकृतियोंके जघन्य अनुभाग संक्रामकोंका अन्तरकाल जघन्यसे .एक समय और उत्कसे असंख्यात लोक मात्र छक्खंडागसे संतकम्म , - संकामयाणं कालो जह० अंतोमु०, उक्क० अंगुलस्स असंखे० भागो। जासिं परमविय- णामाणं बंधज्झवसाणस्स चरिमसमए खवओ उकस्साणुभागं णिव्यत्तेदि तासिं णाम- पयडीणं उक्करसाणुभागसंकामयकालो जह० अंतोमुहुत्तं, उक० पुव्यकोडिपुधत्तं । पसत्थाणं शामपयडीणं अक्स्ववयपाओग्गाणं उकल्याणुभागसंकमकालो जह० अंतोमु०, उक्क० पलिदो० असंखेभागो एवमुक्कस्सकालो समत्तो। एत्तो णाणाजीवेहि जहण्णाणुभागसंकामयकालो। तं जहा- पंचणाणावरण-छ- दसणावरण-सम्मत्त-पुरिस वेद-चदुसंजलण-पंचतराइयाणं जहण्णाणुभागसंकामयाणं कालो जह० एगसंमओ, उक्क० संखेजा समया । अर्णताणुबंधीणं जहण्णाणुभागसंकामया जह० एगसमओ, उक्क० आवलि० असंखे० भागो। सम्मामिच्छत्त-अट्ठणोकसायाणं जपणाणुभागसंकामया जपणुकस्सेण अंतोमुहत्तं । तिण्णमाउआणं जहण्णाणुभागसंकाम- याणं जह० एगसमओ, उक० आवलि० असंखे० भागो। तिरिक्खाउस्स जहण्णा- जहण्णस्स सम्बद्धा । गिरय-देव-मणुसगइणामाणं तप्पाओग्गआणुपुयीणामाणं वेउन्धिय- सरीर-वेउब्धियसरीरंगोवंग-बंधण-संघादणामाणं जहण्णाणुभागसंकामयाणं० जह० एग- समओ,उक्क आवलि० असंखे०भागो । एवमुच्चागोदस्स । आहारसरीर-आहारेसरीरअंगोवंग- संक्रामकोंका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे अंगुलके असंख्यातवें भाग मात्र है । जिन परभविक नामकर्मों के बन्धाध्यवसानके अन्तिम समयमें क्षपक जीव उत्कृष्ट अनुभागकी रचना करता है उन नामप्रकृतियों के उत्कृष्ट अनुभाग संक्रामकोंका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे पूर्वकोटिपृथक्त्व प्रमाण है । अक्षपक योग्य प्रशस्त नामप्रकृतियोंके उत्कृष्ट अनुभाग संक्रामकोंका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। इस प्रकार उत्कृष्ट कालकी प्ररूपणा समाप्त हुई। यहां नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अनुभाग संक्रामकोंके कालकी प्ररूपणा की जाती है । यथा- पांच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, सम्यक्त्व पुरुषवेद, चार संज्वलन और पांच अन्तरायके जघन्य अनुभाग संक्रामकोंका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे संख्यात समय मात्र है। अनन्तानुबन्धी कषायोंके जघन्य अनुभाग संक्रामकोंका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे आवलीके असंख्यातवें भाग मात्र है। सम्यग्मिथ्यात्व और आठ नोकषायोंके जघन्य अनुभाग संक्रामकोंका काल जघन्य व उत्कपैसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। तीन आयु कर्मों के जघन्य अनुभाग संक्रामकोंका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे आवलीके असंख्यातवें भाग मात्र है। तियेंगायुके जघन्य व अजघन्य अनुभाग संक्रामकोंका काल सर्वकाल है। नरकगति, देवगति और मनुष्यगति नामकर्मों, तत्प्रायोग्य आनुपूर्वी नामकर्मों, वैक्रियिकशरीर वैक्रियिकशरीरांगोपांग, वैक्रियिकबन्धन और वैक्रियिकसंघात नामकोंके जघन्य अनुभाग संक्रामकोंका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे आवलीके असंख्यातवें भाग मान है। इसी प्रकार उच्चगोत्रके सम्बन्ध में कहना चाहिये । आहारशरीर, आहारशरीरांगोपांग, १ अप्रतौ 'आहारसरीरस्साहार', काप्रतौ 'आहारसरीरस्स आहार' इति पाठः ।

संकमाणियोगद्दारे अणुभागसंकमो ३९३ अणंतगुणहीणमिदि णिहावयाणि पदिदाणि कादव्याणि । एदं वदिरित्तं उकस्सबंधादो संकमे उकस्से। जहण्णेण सव्वमंदाणुभागों लोहसंजलणो । माया० अणंतगुणो। माणो अणंत- गुणो । कोधो अणंतगुणो । पुरिस० अणंतगुणो । सम्मत्ते० अणंतगुणो। सम्मामिच्छत्ते अणंतगुणो। मणपजव० दाणंतराइय० अणंतगुणो। ओहिणाणावरण० लाहंतराइय० अणंतगुणो। सुद० अचक्षुदं० भोगंतराइय० अणंतगुणो । चक्खु० अर्णतगुणो। मदि० परिभोगंतराइय० अणंतगुणो । केवलणाण-केवलदसणावरण-पीरियंतराइय० अणंतगुणो । पयला० अणंतगुणो। णिद्दा० अणंतगुणो। हस्स० अणंतगुणो। रदि० अणंतगुणो। दुगुंछा० अणंतगुणो । भय० अणंतगुणो। सोग० अर्णतगुणो । अरदि० अणंतगुणो। इत्थि० अणंतगुणो। णस० अर्णतगुणो। अणताणुबंधिमाणे० अणंतगुणो। कोधे० विसे साहियो । माया० विसे० । लोहे विसे । वेउव्वियसरीर० अणंतगुणो । तिरिक्खा- उअ० अणंतगुणो। मणुस्साउ० अर्णतगुणो। णिरयगई० अणंतगुणो। मणुसगई० अणंतगुणो । देवगई० अणंतगुणो। उच्चागोद० अणंतगुणो। णिरयाउ० अणंतगुणो। देवाउ० अणंतगुणो। ओरालिय० अणंतगुणो । तेजा० अणंतगुणो। कम्मय० अणंत- इस प्रकार निष्ठापक पतितोंको करना चाहिये, अर्थात् सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व इन दो अबन्ध प्रकृतियोंके भी अल्पबहुत्वको यहां अनन्तगुणहीनक्रमसे कहना चाहिये। यह उत्कृष्ट बन्धकी अपेक्षा उत्कृष्ट संक्रममें भेद है। जघन्य पदकी अपेक्षा संज्वलन लोभ सर्वमन्द अनुभागवाला है। संज्वलन माया अनन्तगुणी है। संज्वलन मान अनन्तगुणा है। संज्वलन क्रोध अनन्तगुणा है । पुरुषवेदमें वह अनन्तगुणा है । सम्यक्त्वमें अनन्तगुणा है । सभ्यग्मिथ्यात्वमें अनन्तगुणा है । मनःपर्ययज्ञानावरण और दानान्तरायमें अनन्तगुणा है। अवधिज्ञानावरण और लाभान्त- रायमें अनन्तगुणा हैं। श्रुतज्ञानावरण, अचक्षुदर्शनावरण और भोगान्तरायमें अनन्तगुणा है। चक्षुदर्शनावरणमें अनन्तगुणा है। मतिज्ञानावरण और परिभोगान्तरायमें अनन्तगुणा है। केवलज्ञानावरण, केवलदर्शनावरण और वीर्यान्तरायमें अनन्तगुणा है। प्रचलामें अनन्त- गुणा है। निद्रामें अनन्तगुणा है । हास्यमें अनन्तगुणा है। रतिमें अनन्तगुणा है। जुगुप्सामें अनन्तगुणा है। भयमें अनन्तगुणा है। शोकमें अनन्तगुणा है। अरतिमें अनन्तगुणा है। स्त्रीवेदमें अनन्तगुणा है । नपुंसकवेदमें अनन्तगुणा है। अनन्तानुबन्धी मानमें अनन्तगुणा है। अनन्तानुबन्धी क्रोधमें विशेष अधिक है। अनन्तानुबन्धी मायामें विशेप अधिक है । अनन्तानु- वन्धी लोभमें विशेप अधिक है। वैक्रियिकशरीरमें अनन्तगुणा है। तिर्यचआयुमें अनन्तगुणा है। मनुष्यायुमें अनन्तगुणा है। नरकगतिमें अनन्तगुणा है। मनुष्यगतिमें अनन्तगुणा है। देवगतिमें अनन्तगुणा है । उच्चगोत्र में अनन्तगुणा है। नारकायुमें अनन्तगुणा है । देवायुमें अनन्तगुणा है। औदारिक शरीर में अनन्तगुणा है। तैजसशरीरमें अनन्तगुणा है। कार्मण- १ ताप्रती 'उकस्से बहण्गेण । सव्वमंदाणुभागो' इति पाठः। छ. से, ५० ३९२ छक्खंडागमे संतकम्म लोगा। एवमुच्चागोदस्स वि । सेसाणं णामपयडीणं णीचागोद-तिरिक्खाउअ-मिच्छत्त- अडकसाय - सादासाद-णिद्दाणिद्दा - पयलापयला-थीणगिद्धीणं जहण्णाणुभागसंकामयाणं पत्थि अंतरं । एवमंतरं समत्तं । सण्णियासो । तं जहा–मदिआवरणस्स उक्कस्साणुभागसंकामगो सुंदावरणस्स । तं तु छट्ठाणपदिदौ । एवं जाणिदूण गेयव्वं । जहण्णसणियासो । तं जहा- मदिआवरणस्स जो जहण्णाणुभागसंकामगो सेसाणं चदुण्णं णाणावरणीयाणं णियमा जहण्णाणुभागस्स संकामओ, दसणावरणस्स चउविहस्स णियमा जहण्णाणुभागसंकामगो, णिहा-पयलाणं णियमा असंकामओ, पंचण्णमंतराइयाणं णियमा जहण्णा, सेसाणं जेसिं संतकम्ममत्थि तेसिं णियमा अज- हण्णसंकामओ । एवं सण्णियासो समत्तो। एत्तो अप्पाबहुगं दुविहं सत्थाणे परस्थाणे चेदि। चउसद्विवदियो जो दंडओ तेण पयदं । सो दुविहो उक्कस्सपदे जहण्णपदे चेदि । उक्स्सेण जहा अणुभागवंधे मणिदो तहा उकस्सए अणुभागसंकमे कायव्यो। णवरि सम्मामिच्छत्तादो सम्मत्ते है। इसी प्रकार उच्चगोत्रकी भी प्ररूपणा करना चाहिये। शेष नामप्रकृतियों, नीचगोत्र, तिर्यगायु, मिथ्यात्व, आठ कषाय, सातावेदनोय, असातावेदनीय, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धिके जघन्य अनुभाग संक्रामकोंका अन्तरकाल नहीं है। इस प्रकार अन्तरकालकी प्ररूपणा समाप्त हुई। संनिकर्षको प्ररूपणा की जाती है। यथा- मतिज्ञानावरणके उत्कृष्ट अनुभागका संक्रामक श्रुतज्ञानावरणके उत्कृष्ट अनुभागका संक्रामक होता है। वह षट स्थानपतित होता है। इस प्रकार जानकर आगे भी ले जाना चाहिये। जघन्य अनुभाग संक्रमके संनिकर्षकी प्ररूपणा इस प्रकार है- जो मतिज्ञानावरणके जघन्य अनुभागका संक्रामक है वह नियमसे शेप चार ज्ञानावरण प्रकृतियोंके जघन्य अनु- भागका संक्रामक होता है, वह चार प्रकार दर्शनावरणके नियमसे जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है , निद्रा और प्रचलाका नियमसे असंक्रामक होता है , पांच अन्तराय प्रकृतियोंके नियमसे जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है, शेष प्रकृतियों में जिनका सत्त्व है उनके नियमसे अजघन्य अनुभागका संक्रामक होता है। इस प्रकार संनिकर्पकी प्ररूपणा समाप्त हुई। यहां स्वस्थान और परस्थानके भेदसे अल्पवहुत्व दो प्रकारका है। चौंसठ पदवाला जो अल्पबहुत्वदण्डक है वह यहां प्रकृत है। वह दो प्रकार है- उत्कृष्ट पद विपयक और जघन्य पद विषयक । उत्कृष्ट पदकी अपेक्षा जैसे अनुभागवन्धके विपयमें उक्त अल्पबहुत्य- दण्डकका कथन किया गया है वैसे ही उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमके विपयमें भी उसका कथन करना चाहिये। विशेष इतना है कि सम्यग्मिथ्यात्वकी अपेक्षा सम्यक्त्वमें 'अनन्तगुणहीन' १ ताप्रती 'छहाणं पदिदा' इति पाठः । २ प्रतिपु 'अणुभागसंकमो' इति पाठः।

संकमाणियोगद्दारे अणुभागसंकमो ३९३ अणंतगुणहीणमिदि णिहावयाणि पदिदाणि कादवाणि । एदं वदिरित्तं उक्कस्सवंधादो संकमे उकस्से । जहण्णेण सव्वमंदाणुभागों लोहसंजलणो । माया० अणंतगुणो । माणो अणंत- गुणो। कोधो अणंतगुणो । पुरिस० अणंतगुणो । सम्मत्ते० अणंतगुणो। सम्मामिच्छत्ते अणंतगुणो। मणपजव० दाणंतराइय० अणंतगुणो। ओहिणाणावरण० लाहंतराइय० अणंतगुणो। सुद० अचक्षुदं० भोगंतराइय० अणंतगुणो । चक्खु० अणंतगुणो। मदि० परिभोगंतराइय० अर्णतगुणो । केवलणाण-केवलदंसणावरण-वीरियंतराइय० अणंतगुणो । पयला० अणंतगुणो। णिद्दा० अर्णतगुणो। हस्स० अणंतगुणो। रदि० अर्णतगुणो। दुगुंछा० अर्णतगुणो । भय० अणंतगुणो। सोग० अर्णतगुणो । अरदि० अर्णतगुणो । इत्थि० अणंतगुणो। णस० अणंतगुणो। अणंताणुबंधिमाणे० अणंतगुणो। कोधे० विसे साहियो । माया० विसे० । लोहे बिसे० । वेउव्वियसरीर० अणंतगुणो । तिरिक्खा- उअ० अणंतगुणो। मणुस्साउ० अणंतगुणो । णिरयगई० अणंतगुणो। मणुसगई० अणंतगुणो । देवगई० अणंतगुणो। उच्चागोद० अणंतगुणो। णिरयाउ० अणंतगुणो। देवाउ० अणंतगुणो। ओरालिय० अणंतगुणो । तेजा० अणंतगुणो। कम्मइय० अणंत- इस प्रकार निष्ठापक पतितोंको करना चाहिये, अर्थात् सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व इन दो अबन्ध प्रकृतियोंके भी अल्पबहुत्वको यहां अनन्तगुणहीनक्रमसे कहना चाहिये। यह उत्कृष्ट बन्धकी अपेक्षा उत्कृष्ट संक्रम में भेद है। जघन्य पदकी अपेक्षा संज्वलन लोभ सर्वमन्द अनुभागवाला है। संज्वलन माया अनन्तगुणी है। संज्वलन मान अनन्तगुणा है। संज्वलन क्रोध अनन्तगुणा है । पुरुषवेदमें वह अनन्तगुणा है । सम्यक्त्वमें अनन्तगुणा है । सम्यग्मिथ्यात्वमें अनन्तगुणा है । मनःपर्ययज्ञानावरण और दानान्तरायमें अनन्तगुणा है। अवधिज्ञानावरण और लाभान्त- रायमें अनन्तगुणा हैं। श्रुतज्ञानावरण, अचक्षुदर्शनावरण और भोगान्तरायमें अनन्तगुणा है। चक्षुदर्शनावरणमें अनन्तगुणा है। मतिज्ञानावरण और परिभोगान्तरायमें अनन्तगुणा है। केवलज्ञानावरण, केवलदर्शनावरण और वीर्यान्तरायमें अनन्तगुणा है। प्रचला में अनन्त- गुणा है। निद्रामें अनन्तगुणा है । हास्यमें अनन्तगुणा है। रतिमें अनन्तगुणा है। जुगुप्सामें अनन्तगुणा है। भयमें अनन्तगुणा है। शोकमें अनन्तगुणा है। अरतिमें अनन्तगुणा है। स्त्रीवेदमें अनन्तगुणा है । नपुंसकवेदमें अनन्तगुणा है । अनन्तानुबन्धी मानमें अनन्तगुणा है। अनन्तानुबन्धी क्रोधमें विशेष अधिक है। अनन्तानुबन्धी मायामें विशेप अधिक है । अनन्तानु- वन्धी लोभमें विशेप अधिक है। वैक्रियिकशरीरमें अनन्तगुणा है। तिर्यचआयुमें अनन्तगुणा है। मनुष्यायुमें अनन्तगुणा है । नरकगतिमें अनन्तगुणा है। मनुष्यगतिमें अनन्तगुणा है। देवगतिमें अनन्तगुणा है । उच्चगोत्र में अनन्तगुणा है। नारकायुमें अनन्तगुणा है । देवायुमें अनन्तगुणा है। औदारिक शरीर में अनन्तगुणा है। तैजसशरीरमें अनन्तगुणा है। कार्मण- १ ताप्रतौ 'उक्कस्सेः जहणेण । सव्वमंदाणुमागो' इति पाठः । छ, से, ५० ३९४ छक्खंडागम संतकम्म गुणो । तिरिक्खगई० अणंतगुणो। णीचागोद० अणंतगुणो । अजसकित्ति० अणंतगुणो । पयलापयला० अणंतगुणो । णिहाणिद्दा० अणंतगुणो। थीणगिद्धि० अणंतगुणो। अपच्च- क्खाणमाणे० अणंतगुणो । कोधे० विसेसाहिओ। माया० विसेसा० । लोभे० विसे० । पच्चरखाणमाणे अणंतगुणो। कोधे विसेसा० । मायाए० विसे० । लोमे० विसे० । असाद० अर्णतगुणो। जसकित्ति० अर्णतगुणो । साद० अर्णतगुणो । मिच्छत्त० अणंत- गुणो । आहार० अणंतगुणो । एवमोघो समत्तो। णिरयगईए सबमंदाणुभागं सम्मत्तं । सम्मामिच्छत्त० अणंतगुणो । अणंताणुबंधि- माणे० अणंतगुणो। कोधे० विसे० । माया० विसे० । लोभे० विसे० । तिरिक्खाउ० अणंतगुणो । मणुस्साउ० अर्णतगुणो । णिरयाउ० अणंतगुणो । ओरालिय० अणंतगुणो । वेउ० अणंतगुणो । तेजा० अणंतगुणो । कम्मइय० अणंतगुणो । हस्स० अणंतगुणो । रदि० अणंतगुणो । णिरयगई० अणंतगुणो । तिरिक्खगई० अणंतगुणो । मणुसगई० अणंतगुणो। देवगई० अणंतगुणो। णीचागोद० अणंतगुणो । अजसगिति० अणंतगुणो । पयला० अणंत- गुणो। णिद्दा० अणंतगुणो। पयलापयला० अर्णतगुणो। णिहाणिद्दा० अणंतगुणो। दुगुंछा० अणंतगुणो । भय० अणंतगुणो । सोग० अणतगुणो । अरदि० अणंतगुणो । पुरिसवेद शरीरमें अनन्तगुणा है। तिर्यग्गतिमें अनन्तगुणा है। नीचगोत्र में अनन्तगुणा है। अयश- कीर्ति में अनन्तगुणा है। प्रचलाप्रचलामें अनन्तगुणा है। निद्रानिद्रामें अनन्तगुणा स्त्यानगृद्धि में अनन्तगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें अनन्तगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण क्रोध में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण माया में विशेप अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है । प्रत्याख्यानावरण मानमें अनन्तगुणा है। प्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। असातावेदनीयमें अनन्तगुणा है। यशकीर्तिमें अनन्तगुणा है । साता- वेदनीयमें अनन्तगुणा है । मिथ्यात्वमें अनन्तगुणा है। आहारशरीरमें अनन्तगुणा है। इस प्रकार ओघ अल्पबहुत्व समाप्त हुआ है। नरकगति में सबसे मन्द अनुभागवाली सम्यक्त्व प्रकृति है। उससे सम्यग्मिथ्यात्व में वह अनन्तगुणा है। अनन्तानुबन्धी मानमें अनन्तगुणा है। अनन्तानुवन्धी क्रोधमें विशेष अधिक है। अनन्तानुवन्धी सायामें विशेष अधिक है। अनन्तानुवन्धी लोभमें विशेष अधिक है। तिर्यगायुमें अनन्तगुणा है। मनुष्यायुमें अनन्तगुणा है। नारकायुमें अनन्तगुणा है। औदारिकशरीर में अनन्तगुणा है। वैक्रियिकशरीरमें अनन्तगुणा है । तैजसशरीर में अनन्तगुणा है। कार्मणशरीरमें अनन्तगुणा है। हास्यमें अनन्तगुणा है । रतिमें अनन्तगुणा है । नरकगतिमें अनन्तगुणा है। तिर्यंचगतिमें अनन्तगुणा है। मनुष्यगतिमें अनन्तगुणा है। देवगति में अनन्तगुणा है। नीचगोत्र में अनन्तगुणा है। अयशकीर्तिमें अनन्तगुणा है। प्रचला में अनन्त- गुणा है । निन्द्रामें अनन्तगुणा है। प्रचलाप्रचलामें अनन्तगुणा है। निद्रानिद्रामें अनन्तगुणा है । जुगुप्सामें अनन्तगुणा है। भयमें अनन्तगुणा है। शोकमें अनन्तगुणा है। अरतिमें संकमाणियोगबारे अणुभागसंकमो ३९५ अणंतगुणो। इथिवेद० अणंतगुणो। ण_सय० अणंतगुणो। मणपज० अणंतगुणो । थीणगिद्धि० अर्णतगुणो । दाणंतराइये० अणंतगुणो। ओहिणाण. ओहिदंसण. लाहंतराइय० अणंतगुणो। सुदणाण. अचखुदंसण. भोगंतराइय० अणंतगुणो । चक्खु० अणंतगुणो । आभिणियोहिय० परिभोगंतराइय० अणंतगुणो । अपचक्खाणमायो० अगंतगुणो। कोहे० विसेसाहिओ। माया विसे० । लोमे० विसे० । पञ्चक्खाण- माणे० अणंतगुणो । कोहे० विसे० । माया० विसे० । लोमे० विसे० । संजलणमाणे अणंतगुणो । कोहे. विसे० । माया० विसे० । लोभे विसे० । केवलणाण० केवलदसण. असाद० बीरियं० अणंतगुणो। उच्चागोद० अणंतगुणो। अजस कित्ति० अणंतगुणो। साद० अर्णतगुणो । मिच्छत्त० अणंतगुणो । आहारसरीर० अणंतगुणो । एवं णिरयगईए जहण्णओ अणुभागसंकमदंडओ समत्तो । तिरिक्खगईए सव्वमंदाणुभागं सम्मत्तं । सम्मामिच्छत्त० अणंतगुणो । अणंताणु- बंधिमाणे अणंतगुणो। कोधे० विसे० । माया० विसे० । लोभे० विसे० । वेउब्बिय- सरीर.० अणंतगुणो । तिरिक्खाउ० अणंतगुणो। मणुस्साउ० अणंतगुणो ।. णिरयगई. अणंतगुणो । मणुसगई० अणंतगुणो । देवगई० अणंतगुणो। उच्चागोद० अणंतगुणो। अनन्तगुणा है। पुरुपवेदमें अनन्तगुणा । स्त्रीवेदमें अनन्तगुणा है। नपुंसकवेद में अनन्तगुणा है। मनःपर्ययज्ञानावरणमें अनन्तगुणा है। स्त्यानगृद्धि में अनन्तगुणा है। दानान्तरायमें अनन्तगुणा है। अवधिज्ञानावरण,. अवधिदर्शनावरण और लाभान्तरायमें अनन्तगुणा है। श्रुतज्ञानावरण, अचक्षुदर्शनावरण और भागान्तरायमें अनन्तगुणा है । चक्षुदशनावरणमें अनन्तगुणा है । आभिनिबोधिकज्ञानावरण और परिभोगान्तरायमें अनन्तगुणा है। अप्रत्या- ख्यानावरण मानमें अनन्तगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेष अधिक है। अप्रत्या- ख्यानावरण मायामें विशेप अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें अनन्तगुणा है। प्रत्याख्यानावरण क्रोध में विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मायामें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। संज्वलन मानमें अनन्तगुणा है। संज्वलन क्रोध में विशेष आंधक है। संज्वलन मायामें विशष अधिक है । संज्वलन लोभमें विशेष अधिक है। केवलज्ञानावरण, केवलदर्शनावरण, असाता- वेदनीय और वीर्यान्तरायमें अनन्तगुणा है । उच्चगोत्र में अनन्तगुणा है । अयशकीर्तिमें अनन्त- गुणा है । सातावेदनीयमें अनन्तगुणा है । मिथ्यात्वमें अनन्तगुणा ह । आहारशरारमें अनन्त- गुणा है । इस प्रकार नरकगति में जघन्य अनुभागसंक्रमदण्डक समाप्त हुआ। तियंचगतिमें सम्यक्त्व प्रकृति सबसे मन्द अनुभागवाली है। उससे सम्यग्मिथ्यात्व में वह अनन्तगुणा है। अनन्तानुबन्धी मानमें अनन्तगुणा है। अनन्तानुवन्धी क्रोधमें विशेप अधिक है। अनन्तानुवन्धो मायामे विशेष अधिक है। अनन्तानुबन्धी लाभमें विशेष अधिक है। वैक्रियिकशरीरमें अनन्तगुणा है। तियंगायुमें अनन्तगुणा है। मनुष्यायुमें अनन्तगुणा है। नरकगतिमें अनन्तगुणा है। मनुष्यगति में अनन्तगुणा है। देवगांतमें अनन्तगुणा है। १ अ-काप्रत्योः 'थीणगिदि० दाणंतराइय० इति पाठः।

३९६ छक्खंडागमे संतकम्म णिरयाउ० अर्णतगुणो। देवाउ० अणंतगुणो। ओरालिय० अणंतगुणो । तेजा. अणंतगुणो। कम्मइय० अणंतगुणो। हस्स० अणंतगुणो। रदि० अणंतगुणो । तिरिक्खगई० अर्णतगुणो। णीचागोद० अणंतगुणो। अजसगिति० अर्णतगुणो । पयला० अणंतगुणो। णिदा० अणंतगुणो। पयलापयला० अणंतगुणो। णिद्दा- णिद्दा अणंतगुणो। दुगुंछा० अणंतगुणो। भय० अणंतगुणो । सोग० अणंतगुणो । अरदि० अर्णतगुणो । पुरिसवेद० अर्णतगुणो । इस्थिवेद० अणतगुणो। णवूस० अणंत- गुणो । मणपज्जवणाण० अणंतगुणो । थीणगिद्धि ० अणंतगुणो । दाणंतराइये० अणंतगुणो। ओहिणाण. ओहिदंसण० लाहंतराइय० अणंतगुणो। सुदणाण० भोगंतराइय० अणंत- गुणो । चक्खु० अणंतगुणो । मदिणाण० परिभोगंतराइय० अणंतगुणो। अपञ्चक्खाण- माणे० अणंतगुणो । कोधे० विसे० । माया० विसे० । लोभे० विसे० । पचक्खाणमाणे० अणंतगुणो । कोधे० विसे० । माया० विसे० । लोभे० विसे० । संजलणमाणे० अणंत- गुणो। कोधे० विसे० । माया० विसे० । लोहे. रिसे० । केवलणाण० केवलदंसण. असाद० विरियंतराइय० अर्णतगुणो। जसगित्ति० अर्णतगुणो। साद० अणंतगुणो । उच्चगोत्रमें अनन्तगुणा है। नारकायुमें अनन्तगुणा है। देवायुमें अनन्तगुणा है । औदा- रिकशरीरमें अनन्तगुणा है। तैजसशरीरमें अनन्तगुणा है। कार्मणशरीर में अनन्तगुणा है। हास्यमें अनन्तगुणा है। रतिमें अनन्तगुणा है। तिर्यंचगतिमें अनन्तगुणा है। नीचगोत्र में अनन्तगुणा है । अयशकीर्ति में अनन्तगुणा है। प्रचलामें अनन्तगुणा है। निद्रामें अनन्तगुणा है । प्रचलाप्रचलामें अनन्तगुणा है। निद्रानिद्रामें अनन्तगुणा है। जुगुप्सामें अनन्तगुणा है । भयमें अनन्तगुणा है। शोकमें अनन्तगुणा है। अरतिमें अनन्तगुणा है। पुरुपवेदमें अनन्त- गुणा है। स्त्रीवेदमें अनन्तगुणा है। नपुंसकवेदमें अनन्तगुणा है। मनःपर्ययज्ञानावरणमें अनन्तगुणा है। स्त्यानगृद्धि में अनन्तगुणा है । दानान्तरायमें अनन्तगुणा है । अवधिज्ञानावरण, अवधिदर्शनावरण और लाभान्तरायमें अनन्तगुणा है। श्रुतज्ञानावरण और भोगन्तरायमें अनन्तगुणा है। चक्षुदर्शनावरणमें अनन्तगुणा है। मतिज्ञानावरण और परिभोगान्तरायमें अनन्तगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें अनन्तगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण क्रोध में विशेप अधिक है। अप्रत्यानावरण माया में विशेप अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें अनन्तगुणा है। प्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेप अधिक है। संज्वलन मानमें अनन्तगुणा है। संज्वलन क्रोधमें विशेप अधिक है। संज्वलन मायामें विशेप अधिक है। संज्वलन लोभमें विशेष अधिक है। केवलज्ञानावरण, केवलदर्शनावरण, असाता- वेदनीय और वीर्यान्तरायमें अनन्तगुणा है। यशकीर्तिमें अनन्तगुणा है। सातावेदनीयमें १ अ-काप्रत्योः 'णीचागोद० अजसगित्ति०' इति पाठः । २ अ.काप्रत्योः 'मणपजवणाण० थीणगिदि० दाणंतराइय०' इति पाठः।

संकमाणियोगद्दारे अणुभागसंकमो ३९७ मिच्छत्त० अणंतगुणो । एवं तिरिक्खगईए जहण्णाणुभागसंकमदंडओ समतो। तिरिक्खजोणिणीसु सव्वाणि पदाणि जहा तिरिक्खगदीए कदाणि तहा कायव्याणि । मणुसेसु ओघे अजहण्णाणुभागसंकमदंडयादो ताव णाणत्तं णत्थि जाब णिरयगइ त्ति । तदो णिरियगइणामादो देवगदि० अर्णतगुणो । णिरयाउ० अर्णतगुणो । देवाउ० अणंत- गुणो। मणुसगई० अणंतगुणो। उच्चागोद० अणंतगुणो। ओरालिय० अणंतगुणो । एत्तो अवसेसाणि पदाणि जहा ओघजहण्णदंडए कदाणि तहा कायव्याणि । एवं मणुस्सेसु जहण्णाणुभागसंकमदंडओ समचो । जहा मणुस्सेसु तहा मणुसिणीसु । जहा णेरइएसुं तहा देवेसु देवीसु च । जहा तिरिक्खगईए तहा बेइंदिय-तेइंदिय-चतुरिदिएसु । केण कारणेण जहा तिरिक्खगईए तहा विगलिंदिएसु ति भणिदं ? देवगइ-मणुसगइ-णिरयगइ-वेउब्वियसरीरचउक्क-उच्चा- गोदाणं संजुत्तपढमसमयजहण्णाणुभागसंतकम्मस्स विगलिंदिएसुवलंभादो, अणंताणु- बंधिणो पुव्वं विसंजोइदसासणसम्माइडिस्स दुसमयसंजुत्तस्स तस्स जहण्णाणुभागस्स विगलिदिएसुवलंभादो च । तेण जहा तिरिक्खगदीए तहा विगलिंदिएसु त्ति सुहासियं । अनन्तगुणा है। मिथ्यात्वमें अनन्तगुणा है। इस प्रकार तिर्यंचगतिमें जघन्य अनुभागसंक्रम- दण्डक समाप्त हुआ। जिस प्रकारसे तिर्यंचगतिमें सब पदोंकी प्ररूपणा की गयी है उसी प्रकारसे तिर्यंच योनि- मतियों में भी उक्त सब पदोंकी प्ररूपणा करना चाहिये। मनुष्यों में ओघनिरूपित अजघन्य- अनुभागसंक्रमदण्डककी अपेक्षा नरकगति नामकर्म तक कोई विशेपता नहीं है। तत्पश्चात् नरकगति नामकर्मकी अपेक्षा देवगति नामकर्ममें वह अनन्तगुणा । उससे नारकायुमें अनन्त- गुणा है। देवायुमें अनन्तगुणा है। मनुष्यगति नामकर्ममें अनन्तगुणा है। उच्चगोत्र में अनन्तगुणा है । औदारिकशरीरमें अनन्तगुणा है । यहां शेष पदोंको प्ररूपणा जैसे ओघ जघन्य दण्डकमें की गयी है वैसे करना चाहिये। इस प्रकार मनुष्योंमें जघन्य अनुभागसंक्रम- दण्डक समाप्त हुआ। उक्त प्ररूपणा जिस प्रकार मनुष्यों में की गयी है उसी प्रकार मनुष्यनियों में भी करना चाहिये । उक्त दण्डककी प्ररूपणा जिस प्रकार नारकियों में की गयी है उसी प्रकार देवों में और देवियों में भी करना चाहिये । द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवोंमें तिथंचगतिके समान प्ररूपणा करना चाहिये। शंका-विकलेन्दिय जीवोंकी वह प्ररूपणा तियंचगतिके समान किस कारणसे बतलायी है ? समाधान- इसका कारण यह है कि देवगति, मनुष्यगति, नरकगति, वैक्रियिकशरीर- चतुष्क और उच्चगोत्रका संयुक्त होनेके प्रथम समयवर्ती जघन्य अनुभागसत्कर्म विकलेन्द्रिय जीवों में पाया जाता है, तथा सासादनसम्यग्दृष्टि में पूर्व विसंयोजित अनन्तानुवन्धीका संयुक्त होनेके द्वितीय समयवर्ती वह जघन्य अनुभागसत्कर्म विकलेन्द्रिय जीवों में पाया जाता है। इस कारण विकलेन्द्रियोंकी जो वह प्ररूपणा तिथंचगतिके समान कही है, यह ठीक ही कहा गया है।

३९८ छक्खंडागमे संतकम्म एत्तो भुजगारसंकमे अट्ठपदं । तं जहा-जे एहि अणुभागस्य फया संकामिजंति ते जइ अणंतरविदिक्कते समए संकामिदफदएहितो बहुआ होति तो एसो भुजगारसंकमो। अह जइ तत्तो थोवा होंति तो एसो अपदरसंकमो। जदि तत्तियो तत्तियो चेव दोसु वि सपएसु फयाणं संकमो होदि तो एसो अवट्टियसंकमो । एदेण अट्ठपदेण सामित्तं-मदि- आवरणस्स भुजगारसंकमो कस्स ? जो संतकम्मस्स हेहुदो तेण समं वा बंधतो अच्छिदो सो तदो उपरिमाणुभागं वंधिय बंधावलियादिकंतं संकममाणस्स भुजगारसंकमो । अप्पदरसंकमो अणुभागखंडयघादेण विणा णत्थि । जेण अणुभागखंडयं उकीरिजमाण- मुकिण्णं सो से काले अप्पदरसंकामओ । अवडिदसंकामओ को होदि ? भुजगार-अप्पदर- अवत्तव्यवदि रित्तो । चत्तारिणाणावरणीय-णवदंसणावरणीय-सादासाद-मिच्छत्ताणं मदि- आवरणभंगो । एवं सोलसकसाय-णवणोकसायाणं । णवरि एत्थ अवत्तव्यसंकामओ वि अत्थि । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं अत्थि अप्पदर-अवविद-अवत्तव्यसंकमो, भुजगार- संकमो णत्थि । चदुण्णमाउआणं सादिय-संतकम्मियाणं णामपयडीणं उच्चागोदाणं च णाणावरणभंगो । णवरि अवत्तव्यसंकमो वि अत्थि । तित्थयरणामाए अत्थि भुजगार- यहां भुजाकार संक्रममें अर्थपदको प्ररूपणा की जाती है। यथा-- अनुभागके जो स्पर्धक इस समय संक्रमणको प्राप्त कराये जाते हैं वे यदि अनन्तर वीते हुए समयमें संक्रामित अनुभाग- स्पर्धकोंकी अपेक्षा बहुत हैं तो यह भुजाकार संक्रम कहलाता है। परन्तु यदि इस समयमें संक्रमणको प्राप्त कराये जानेवाले वे ही अनुभागस्पर्धक अनन्तरवीते हुए समयमें संक्रामित स्पर्धकोंकी अपेक्षा स्तोक हैं तो यह अल्पतर संक्रम कहा जाता है। यदि दोनों ही समयोंमें उतना उतना मात्र ही अनुभागस्पर्धकोंका संक्रम होता है तो यह अवस्थित संक्रम कहलाता है । [ पूर्वमें असंक्रामक होकर संक्रम करना, इसे अवक्तव्य संक्रम कहा जाता है। ] इस अर्थपदके अनुसार स्वामित्वका कथन करते हैं- मतिज्ञानावरणका भुजाकार संक्रम किसके होता है ? जो जीव सत्कर्मसे कम अथवा उसके बरावर ही अनुभागको वांधता हुआ स्थित है वह उससे अधिक अनुभागको बांधकर व बन्धावलीको विताकर जब उसको संक्रान्त कर रहा हो तव उसके मति- ज्ञानावरणका भुजाकार संक्रम होता है। अल्पतर संक्रम अनुभागकाण्डकघातके विना नहीं होता। उत्कीर्ण किये जानेवाले अनुभागकाण्डकको उत्कीर्ण कर चुका है वह अनन्तर समयमें उसका अल्पतरसंक्रामक होता है । अस्थितसंक्रामक कौन होता है ? भुजाकार, अल्पतर और अवक्तव्य संक्रामकसे भिन्न जीव अवस्थितसंक्रामक होता है। शेष चार ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, सातावेदनीय, असातावेदनीय, और मिथ्यात्वकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरण के समान है। इसी प्रकार सोलह कषाय और नौ नोकषायोंके सम्बन्धमें कहना चाहिये । विशेप इतना है कि यहां अवक्तव्य संक्रामक भी होता है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका अल्पतर, अवस्थित और अवक्तव्य संक्रम होता है; उनका भुजाकार संक्रम नहीं होता। चार आयु कर्मों, सादिसत्कर्मिक नामप्रकृतियों और उच्चगोत्रकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है। विशेप इतना है कि इनका १ अप्रतौ 'तेनइय अणंतर' इति पाठः । २ अप्रतौ 'थोवो' इति पाठः ।

- संकमाणियोगदारे अणुभागसंकमो ३९९ अवडिय-अवत्तव्यसंकमो, अप्पदरसंकामगो णत्थि । अणादिसंतकम्मियाणं णामपयडीणं णीचागोद-पंचंतराइयाणं णाणावरणभंगो। एयजीवेण कालो- णाणावरणस्स भुजगारसंकामओ जह० एगसमओ, उक० अंतोम हुत्तं । अप्पदरसंकामयाणं कालो जहण्णुक्कम्सेण एगसमओ । अवट्ठियसंकामयाणं जह० एयसमओ, उक्क० वेछावद्विसागरोवमाणि सादिरेयाणि । णवदंसणावरणीय- सादासाद-मिच्छत्त-सोलसकसाय- णवणोकसाय - सव्वणामपयडीणं उच्च-णीचागोद-पंच- तराइयाणं च णाणावरणभंगो। णवरि आहारचउक० अवडियस्स पलिदो० असंखे० भागो । एवं सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं । णवरि अवट्टिदस्स जह० अंतोमुहुत्तं । तित्थयर- णामाए भुजगार० जह० एगसमओ, उक० अंतोमुहुत्तं । अवट्टिय० जह० एगसमओ, उक्क० तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । चदुण्णमाउआणं भुजगार० जह० एगसमओ, उक्क० अंतोमुहुत्तं । अप्पदर० जहण्णुक्कस्सेण एगसमओ । अवट्टिय० जह० एगसमओ। उक्क० देव-णिरयाउआणं तेत्तीसं सागरो० सादिरेयाणि, मणुस-तिरिक्वाउआणं तिण्णिपलिदो० सादिरेयाणि । कालादो अंतरं णेयव्यं । णाणाजीवेहि भंगविचओ कालो अंतरं च साहेदूण णेयव्वं । अवक्तव्यसंक्रम भी होता है। तीर्थंकर नामकर्मका भुजाकार, अवस्थित और अवक्तव्य संक्रम होता है; किन्तु उसका अल्पतर संक्रामक नहीं होता। अनादिसकर्मिक नामप्रकृतियों, नीचगोत्र और पांच अन्तरायकी प्ररूपणा ज्ञानाचरणके समान है। एक जोवको अपेक्षा कालको प्ररूपणा की जाती है- ज्ञानावरणके भुजाकारसंक्रामकका काल जघन्यसे एक ससय व उत्कर्षसे अन्तर्मुहूत मात्र है। अल्पतरसंक्रामकोंका काल जघन्य व उत्कपैसे एक समय मात्र है । अवस्थितसंक्रामकोंका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मान है। नौ दर्शनावरण, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, नौ नोकषाय, सब नामप्रकृतियों, उच्चगोत्र, नीचगोत्र और पांच अन्तरायकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है । विशेप इतना है कि आहारचतुष्कके अवस्थितसंक्रामकका काल पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। इसी प्रकार सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके भी सम्बन्ध में कहना चाहिये । विशेप इतना है कि इनके अवस्थितसंक्रामकका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। तीर्थंकर नामकर्मके भुजाकारसंक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे अन्तर्मुहूर्त मान है। उसके अवस्थितसंक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे साधिक तेतीस सागरोपम मात्र है। चार आयु कर्मों के भुजाकारसंक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है । इनके अल्पतरसंक्रामकका काल जघन्य व उत्कर्पसे एक समय मात्र है । अवस्थितसंक्रामकका काल जघन्यसे एक समय है। उत्कर्षसे वह देवायु और नारकायुका साधिक तेतीस सागरोपम तथा मनुष्य व तिथंच आयुका साधिक तीन पल्योपम मात्र है। कालके आश्रयसे अन्तरको भी ले जाना चाहिये। नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय, काल और अन्तरको भी सिद्ध करके ले जाना चाहिये । १ अप्रतौ 'देवणेरड्याणं आउअं' इति पाठः ।

४०० छक्खंडागमें संतकम्म एत्तो अप्पाबहुअं- णाणावरणस्स अप्पदर० थोवा । भुजगार० असंखे० गुणा | अवडिय० असंखे० गुणा । एवं णवदंसणावरणीय-सादासाद-मिच्छत्त-सोलसकसाय- णवणोकसायाणं । णवरि सोलसक० - णवणोकसायाणं अवत्तव्य. थोवा । अप्पदर० अणंतगुणा । भुजगार० असंखे० गुणा । अवडिय० संखे० गुणा । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं अप्पदर० थोत्रा । अवत्तव्य० असंखे० गुणा । अवट्ठिय० असंखे० गुणा । णिरयाउअस्स अप्पदर० थोवा । अवत्तव्व० संखे० गुणा । भुजगार० असंखे० गुणा । अवट्ठिय० असंखे० गुणा । देवाउअस्स णिरयाउअभंगो । मणुसाउअस्स अप्पदर० थोवा । अवत्तव्य विसेसा० । भुजगार० असंखे० गुणा । अवडिय० संखे० गुणा । रक्खाउअस्स अवत्तव्य० थोवा । अप्पदर० अणंतगुणा । भुजगार० असंखे० गुणा । अवडिय० संखे० गुणा। णिरयगईए अवत्तव्ब० थोवा । भुजगार० असंखे० गुणा । अप्पदर० असंखे० गुणा । अवडिय० असंखे० गुणा। देवगइ-वेउब्वियसरीराणं णिरयगइभंगो । मणुसगइ० अवत्तव्य० थोवा । अप्पद० अणंतगुणा । भुजगार० असंखे० गुणा । अवविद० संखे० गुणा । अल्पवहुत्वकी प्ररूपणा की जाती है-ज्ञानावरणके अल्पतर अनुभाग संक्रामक स्तोक हैं । भुजाकार अनुभाग संक्रामक्र असंख्यातगुणे हैं। अवस्थित अनुभाग संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार नौ दर्शनावरण, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकषायोंके भी प्रकृत अल्पबहुत्वका कथन करना चाहिये। विशेष इतना है कि सोलह कषाय और नौ नोकषायके अवक्तव्य अनुभाग संक्रामक स्तोक हैं। अल्पतर अनुभाग संक्रामक अतन्तगुणे हैं। भुजाकार अनुभाग संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अवस्थितः अनुभाग संक्रामक संख्यातगुणे हैं। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके अल्पतर अनुभाग संक्रामक स्तोक हैं। अवक्तव्य अनुभाग संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अवस्थित अनुभाग संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। नारकायुके अल्पतर अनुभाग संक्रामक स्तोक हैं । अवक्तव्य अनुभाग संक्रामक संख्यात- गुणे हैं । भुजाकार अनुभाग संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अवस्थित अनुभाग संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । देवायु के इस अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा नारकायुके समान है। मनुष्यायुके अल्पतर अनुभाग संक्रामक स्तोक हैं । अवक्तव्य अनुभाग संक्रामक विशेष अधिक हैं । भुजाकार अनुभाग संकामक असंख्यातगुणे हैं । अवस्थित अनुभाग संक्रामक संख्यातगुणे हैं। तिर्यगायुके अवक्तव्य अनुभाग संक्रामक स्तोक हैं । अल्पतर अनुभाग संक्रामक अनन्तगुणे हैं। भुजाकार अनुभाग संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अवस्थित अनुभाग संक्रामक संख्यातगुणे हैं। नरकगतिके अवक्तव्य अनुभाग संक्रामक स्तोक हैं । भुजाकार अनुभाग संक्रामक असंख्यात- गुणे हैं । अल्पतर अनुभाग संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अवस्थित अनुभाग संक्रामक असं- ख्यातगुणे हैं। देवगति और वैक्रियिकसरीरकी प्ररूपणा नरकगतिके समान है। मनुष्यगतिके अवक्तव्य अनुभाग संक्रामक स्तोक हैं। अल्पतर अनुभाग संक्रामक अनंतगुणे हैं। भुजाकार अनुभाग संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अवस्थित अनुभाग संक्रामक संख्यातगुणे हैं। उच्चगोत्रकी संकमाणियोगदारे अणुभागसंकमो ४०१ उच्चागोदस्स मणुमगइभंगो। अणादियसंतकस्मियाणं णामपयडीणं णीचागोद-पंच- तराइयाणं च णाणावरणभंगो। आहारसरीरस्स अवत्तब० थोवा । भुजगार० संखे० गुणा । अप्पदर ० संखे० गुणा । अवडिय० असंखे० गुणा । तित्थयरस्स आहारभंगो। एवमणुभागभुजगारसंकमो समत्तो। एत्तो पदणिक्खेवो- णाणावरणस्स उकस्सिया वड्ढी कस्स ? जो तप्पाओग्गेण जहण्णाणुभागसंतकम्मेण उकस्ससंकिलेसं गदो' तदो उकस्सओ अणुभागो पबद्धो आवलियादिकंतस्स उक्कस्सिया अणुभागसंक्रमवड्ढी अवट्ठाणं च । उक्कस्सिया हाणी कस्स १ जो उकस्सादो अणुभागसंतकम्मादो उकस्समणुभागधादं करेदि तस्स अणु- भागखंडए घादिदे सेसाणुभागसंतकम्मं से काले संका मेंतस्स उक्कस्सिया हाणी अणु- भागसंकमस्स । एवं सव्वेसिमप्पसत्थाणं कम्माणं । सादस्स उक्कस्सिया वड्ढी कस्स ? समयाहियावलियअकसायस्स खवयस्स । उक्क० हाणी कस्स ? जो उवसामयचरिम- समयसुहुमसापराइएण बद्धसादाणुभागं मिच्छत्तं गंतूण उकस्सएण अणुभागखंडएण घादिय सेसं संकामेमाणओं तस्स उकस्सिया हाणी। उकस्समवट्ठाणं वइडीए । जसकित्ति-उच्चागोदाणं सादभंगो। प्ररूपणा, मनुष्यगतिके समान है। अनादिसत्कर्मिक नामप्रकृतियों, नीच गोत्र और पांच अन्त- रायोंकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है। आहारशरीरके अवक्तव्य अनुभाग संक्रामक स्तोक हैं । भुजाकार अनुभाग संक्रामक संख्यातगुणे हैं। अल्पतर अनुभाग संक्रामक संख्यातगुणे हैं। अवस्थित अनुभाग संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। तीर्थंकर नामकर्मको प्ररूपणा आहारशरीरके समान है। इस प्रकार अनुभागभुजाकारसंक्रम समाप्त हुआ। यहां पदनिक्षेपकी प्ररूपणा करते हैं-ज्ञानावरणकी उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमवृद्धि किसके होती है ? जो तत्प्रायोग्य जघन्य अनुभागसत्कर्म के साथ उत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त हुआ है और तत्पश्चात् जिसने उत्कृष्ट अनुभागका वन्ध किया है उसके आवली मात्र कालके वीतनेपर उसकी उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमवृद्धि और अवस्थान भी होता है। उसकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मसे उत्कृष्ट अनुभागका घात करता है उसके अनुभागकाण्डकका घात कर चुकने- पर अनन्तर काल में शेप अनुभागसत्कर्मका संक्रम करते समय उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमकी हानि होती है । इस प्रकार सब अप्रशस्त कर्मों के सम्बन्ध में कहना चाहिये। सातावेदनीयकी उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमवृद्धि किसके होती है ? वह एक समय अधिक आवली मात्र कालवी अकपाय क्षपकके होती है। उसकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो चरम समयवर्ती सूक्ष्म- साम्परायिक उपशामकके द्वारा बांधे गये सातावेदनीयके अनुभागको मिथ्यात्वको प्राप्त हो उत्कृष्ट अनुभागकाण्डक द्वारा घातकर शेप अनुभागका संक्रम कर रहा है उसके उसकी उत्कृष्ट हानि होती है। उसका उत्कृष्ट अवस्थान वृद्धि में होता है। यशकीर्ति और उचगोत्रक्री प्ररूपणा साता- वेदनीयके समान है। १ अप्रतौ 'संकिलेसादो' इति पाठः। २ तापतौ 'पबद्धो [ तस्स-] आवलियादिकंतत्स' इति पाठः । ३ अप्रतौ 'घादे', तापतौ 'घादेदि' इति पाठः । ४ अप्रतौ 'से संकामेमाणओ' इति पाठः । छ. से, ५१ ४०२ क्खंडागमे संतकम्म एस्थ अट्ठपदं- सादस्स उक्कस्सेण अणुभागघादं मिच्छाइट्ठी मज्झिमपरिणामो चेव कुणदि-सुविसुद्धो ण हणदि, अइसंकिलिट्ठो वि ण हणदि। कुदो ? साभावियादो। एवं सव्वेसिं पसत्थकम्माणं । अभवसिद्धियपाओग्गउक्कस्ससादाणुभागस्स अणते भागे मज्झिमपरिणामेहि मिच्छाइट्ठी हणदि । जेत्तियमेत्तफयाणि अभवसिद्धियपाओग्ग- उक्कस्साणुभागादो मज्झिमपरिणामेहि घादेदि सुहमसापराइएण णिवत्तिदउक्कस्साणु- भागं पि घादेमाणो तत्तियमेत्ताणि चेव फद्दयाणि घादेदि । एदेण कारणेण भव- सिद्धिएण वा अभवमिद्धिएण वा णिव्यत्तिदउक्कस्साणुभागे अणुभागखंडएण मिच्छा- इहिणा मज्झिमपरिणामेण घादिदे अणुभागसंकमस्स उक० हाणी होदि । एवं सव्वेसि पसत्थकम्माणं । एवमुकस्ससामित्वं समत्तं । मदिआवरणस्स जहणिया अणुभागसंकमबड्ढी कस्स ? जो सुहुमेइंदियो हद- समुप्पत्तियकमेण कदजहण्णाणुभागसंकमो अपणो जहण्णसंतकम्मादो पक्खेवुत्तरं बंधिय आवलियादिकंतं संकामेदि तस्स जहणिया बड्ढी । जह० हाणी कस्स ? समयाहियावलियचरिमसमयछदुमत्थस्स । जहण्णमवठ्ठाणं जहण्णबड्डीए दादव्यं । एवं चउणाणावरण-चउर्दसणावरणाणं पि वत्तव्यं । णिहा-पयलाणं पि मदिणाणावरणभंगो । यहां अर्थपद- उत्कर्षसे सातावेदनीयके अनुभागघातको मध्यम परिणामवाला मिथ्या- दृष्टि ही करता है, उसका घात न अतिशय विशुद्ध जीव ही करता है और न अतिशय संक्लिष्ट भी। इसका कारण स्वभाव ही है। इस प्रकार सब प्रशस्त कर्मों के सम्बन्धमें कहना चाहिये। अभव्य योग्य सातावेदनीयके उत्कृष्ट अनुभागके अनन्त बहुभागको मिथ्यादृष्टि जीव मध्यम परिणामों के द्वारा घातता है। अभव्य योग्य उत्कृष्ट अनुभागमेंसे जितने मात्र स्पधकोंको वह मध्यम परिणामों के द्वारा घातता है, सूक्ष्मसाम्परायिक द्वारा रचे गये उत्कृष्ट अनुभागका भी घात करनेवाला जीव उतने मात्र ही स्पर्धकोंको घातता है। इस कारण भव्य अथवा अभव्यके द्वारा रचित उत्कृष्ट अनुभागका मध्यम परिणाम युक्त मिथ्याष्टिके द्वारा अनुभागकाण्डक स्वरूपसे घात कर चुकनेपर अनुभागसंक्रमकी उत्कृष्ट हानि होती है। इसी प्रकार सब प्रशस्त कमों के सम्बन्ध में कथन करना चाहिये । इस प्रकार उत्कृष्ट स्वामित्व समाप्त हुआ। मतिज्ञानावरणकी जघन्य अनुभागसंक्रमवृद्धि किसके होती है ? हतसमुत्पत्तिकक्रमसे जघन्य अनुभागसत्कर्मको कर चुकनेवाला जो सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव अपने जघन्य सत्कर्मकी अपेक्षा प्रक्षेप अधिक बांधकर आवली अतिक्रान्त उसका संक्रम करता है उसके मतिज्ञानावरणकी जघन्य अनुभागसंक्रमवृद्धि होती है। उसकी जघन्य हानि किसके होती है ? वह जिसके चरम समयवर्ती छद्मस्थ होने में एक समय अधिक आवली मात्र काल शेप रहा है उसके होती है । जघन्य अवस्थान जघन्य वृद्धि में देना चाहिये । इसी प्रकार चार ज्ञानावरण और चार दर्शनावरणके भी कहना चाहिये। निद्रा और प्रचलाकी भी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके १ ताप्रतौ 'कम्माणं अभव- इति पाठः । २ ताप्रती 'घादेदि' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे अणुभांगसंकमो ४०३. णवरि जहणिया हाणी जत्थ जहणहिदिसंक्रमो तस्थ वत्तव्यों। पंचण्णमंतराइयाणं मदिणाणावरणभंगो। णिहाणिद्दा-पयलापयला-थीणगिद्धीणं जह० अणुभागड्ढी कस्स ? सुहुमेइंदियस्स हदसमुप्पत्तियकमेण कदजहण्णाणुभागसंत- कम्मस्स पक्खेवुत्तरं वंधिय आवलियादीदं संकातस्स । तं चेव वढिदाणुभागं अंतो- मुहुत्तेण घादिय संकातस्स जह० हाणी। एगदरत्थावट्ठाणं । सम्मत्त० जहणिया हाणी कस्स ? समयाहियावलियचरिमसमयअक्खीणदंसमोहणीयस्स । जहण्णयड्ढी णस्थि । जहण्णमवट्ठाणं कस्स ? चरिमाणुभागखंडयविदियफालीए वट्टमाणस्स । सम्मामिच्छत्तस्स जहणिया हाणी कस्स ? चरिमसमयअणुभागखंडयस्स पढमसमए वट्टमाणस्स जह० हाणी । तस्सेव से काले जहण्णमवहाणं । जहण्णवढी णस्थि । अणंताणुवंधि० जहणिया वड्ढी कस्स ? अणंताणुवंधिचउकं विसंजोजिय दुसम- याहियावलियसंजुत्तस्स । हाणी अवठ्ठाणं च कस्स ? अंतोमुहुत्तसंजुत्तस्स । तं जहा- अणंताणुवंधिणो विसंजोजिय संजुत्तो जदि वि उक्कस्सियाए वढीए चड्ढदि तो वि जाय अंतोमुहत्तं कालं ताव सुहमेइंदियजहण्णाणुभागसंतकम्मादो हेढदो चेव अर्णताणुबंधीण- मणुभागो होदि । सो तत्तो हेढदो अच्छमाणो घादं पि गच्छदि । तदो तेण ही समान है। विशेप इतना है कि जहांपर जघन्य स्थितिसंक्रम है वहांपर उसकी जघन्य हानि कहना चाहिये। पांच अन्तराय कर्मों की प्ररूपणा भतिज्ञानावरणके समान है। निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धिकी जघन्य अनुभागसंक्रमवृद्धि किसके होती है ? वह हतसमुत्पत्तिकक्रमसे. जघन्य अनुभागसत्कर्मको कर चुकनेवाले सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवके प्रक्षेप अधिक बांधकर आवली अतिक्रान्त उसका संक्रम करते समय होती है। उसी वृद्धिंगत अनुभागको अन्तर्मुहूर्तमें घातकर संक्रम करनेवालेके उसकी जघन्य हानि होती है। दोनोंमेंसे किसी भी एक में जघन्य अवस्थान होता है। सम्यक्त्व प्रकृतिकी जघन्य अनुभागसंक्रमहानि किसके होती है ? वह जिसके चरम समयवर्ती अक्षीणदर्शनमोह होने में एक समय अधिक आवली मात्र काल शेप है उसके होती है। उसकी जघन्य अनुभागसंक्रमवृद्धि नहीं है। उसका जघन्य अवस्थान किसके होता है ? वह अन्तिम अनुभागकाण्डककी द्वितीय फालिमें वर्तमान जीवके होता है। सम्यग्मिथ्यात्वको जघन्य हानि किसके होती है ? चरम अनुभागकाण्डकके प्रथम समयमें वर्तमान जीवके उसकी जघन्य हानि होती है। उसीके अनन्तर समयमें उसका जघन्य अवस्थान होता है। उसकी जघन्य वृद्धि नहीं है। अनन्तानुबन्धिचतुष्ककी जघन्य वृद्धि किसके होती है ? अनन्तानुवन्धिचतुष्ककी विसंयोजना करके दो समय अधिक आवली संयुक्त जीवके अनन्तानुवन्धिचतुष्ककी जघन्य अनुभागसंक्रमवृद्धि होती है। उनकी जघन्य हानि और अवस्थान किसके होते हैं ? वे उनकी विसंयोजना करके अन्तर्मुहूर्त संयुक्त जीवके होते हैं। यथा- अनन्तानुवन्धीकी विसंयोजना करके उससे संयुक्त जीव यद्यपि उत्कृष्ट वृद्धिके द्वारा वृद्धिंगत होता है, तो भी उसके अन्तर्मुहूर्त काल तक सूक्ष्म एकेन्द्रियके जघन्य अनुभागसत्कर्मकी अपेक्षा हीन ही अनन्तानुबन्धी कपायोंका ४०४ छक्खंडागसे संतकम्म - अंतोमुहुत्तसंजुत्तेण तस्स अणंतभागे घादिदे जह० हाणी होदि त्ति सिद्धं । जहण्णमवट्ठाणं जहण्णहाणीए दादव्यं । तिणं संजलणाणं जह० हाणी कस्स ? खवयस्स चरिमसमयजहण्णाणुभागबंध संकातस्स जहणिया हाणी । वड्ढी अवट्ठाणं च कस्स ? हुमेइंदियस्स जहण्णाणु- भागसंतकम्मियम्हि वत्तव्यं । पुरिसवेदस्स तिसंजलणभंगो। लोहसंजलणस्स जह० हाणी कस्स ? समयाहियावलियचरिमसमयसुहमसांपराइयस्स । वड्ढी अवठ्ठाणं च कस्स ? सुहुमेइंदियस्स जहण्णसंतकम्मादो पश्खेवुत्तरं बंधमाणस्स । अटणं णो- कसायाणं जह० हाणी कस्स ? अपच्छिसअणुभागखंडयस्स पढमसमए वट्टमाणस्स जह० हाणी । वड्ढी अवट्ठाणं च कस्स ? सुहुमेइंदियस्स सगजहणाणुभागसंतकम्मादो पक्खेवुत्तरं बंधमाणस्स। णामाणं सादिसंताणं वड्ढी कस्स ? संजोजिदबिदियसमए जं बद्धं तमावलिया- दिक्वंतं संका मेंतस्स जह० चड्ढी । हाणि-अवट्ठाणाणं अणंताणुबंधिभंगो । अणादियणाम- पयडीणं वढि-हाणि-अवट्ठाणाणि कस्स ? सुहुमेइंदियस्स सगजहण्णाणुभागसंतकम्मादो अनुभाग होता है। वह उससे हीन रहकर घातको भी प्राप्त होता है। इसीलिये अन्तर्मुहूर्त संयुक्त उक्त जीवके द्वारा उसके अनन्त बहुभागका घात कर चुकनेपर उनकी जघन्य अनुभाग- संक्रमहानि होती है, यह सिद्ध है। जघन्य अवस्थान जघन्य हानिमें देना चाहिये। तीन संज्वलन कषायोंकी जघन्य हानि किसके होती है ? उनकी जघन्य हानि जघन्य अनुभागबन्धका संक्रमण करते हुए उसके अन्तिम समयमें वर्तमान क्षपकके होती है। उनकी जघन्य वृद्धि और अवस्थान किसके होता है ? उनकी जघन्य वृद्धि और अवस्थानका कथन सूक्ष्म एकेन्द्रियके जघन्य अनुभागसत्कर्म में करना चाहिये । पुरुपवेदकी प्ररूपणा उपर्युक्त तीन संज्वलन कषायोंके समान है। संज्वलन लोभकी जघन्य अनुभागसंक्रमहानि किसके होती है ? वह अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक होने में जिसके एक समय अधिक आवली मात्र काल शेष है उसके होती है। उसकी जघन्य वृद्धि और अवस्थान किसके होता है ? जघन्य सत्कर्मकी अपेक्षा प्रक्षेप अधिक बांधनेवाले सूक्ष्म एकेन्द्रियके उसकी जघन्य वृद्धि व अवस्थान होता है । आठ नोकपायोंकी जघन्य हानि किसके होती है । अन्तिम अनुभाग- काण्डकके प्रथम समयमें वर्तमान जीवके उनकी जघन्य हानि होती है। उनकी जघन्य वृद्धि और अवस्थान किसके होता है ? अपने जघन्य अनुभागसत्कर्मसे प्रक्षेप अधिक अनुभाग- को बांधनेवाले सूक्ष्म एकेन्द्रियके उनकी जघन्य वृद्धि और अवस्थान होता है। सादि सत्त्ववाली नामप्रकृतियोंकी जघन्य अनुभागसंक्रमवृद्धि किसके होती है ? संयोजन- के द्वितीय समयमें जो अनुभाग बांधा गया है आवली अतिक्रान्त उसका संक्रम करनेवाले के उनकी जघन्य अनुभागसंक्रमवृद्धि होती है। उनकी हानि और अवस्थानको प्ररूपणा अनन्तानु- वन्धी कषायके समान है। अनादि सत्त्ववाली नामप्रकृतियोंकी जघन्य अनुभागसंक्रमवृद्धि, हानि और अवस्थान किसके होते हैं ? अपने जघन्य अनुभागसत्कर्मसे प्रक्षेप अधिक N 4 - संकमाणियोगदारे अणुभागसंकमो ४०५ पक्खेवुत्तरं बंधिय आवलियादिकंतं संकमेंतस्स जह० वड्ढी । तं पक्खेवमंतोमुहुत्तेण घादिय संकातम्स जह० हाणी। एगदरत्थ अवठ्ठाणं । णीचागोदरस अणादियणाम- पयडीणं भंगो । उच्चागोदस्स अणंताणुवंधिभंगो । एवं सामित्तं समत्तं । अप्पाबहुअं । तं जहा- णाणावरणस्स उक्क० हाणी थोबा । चड्ढी अवठ्ठाणं च विसेसाहियं । णवदंसणावरणीय-असाद-मिच्छत्त- सोलसकसाय-णवणोकसाय-अप्पसत्थ- णामपयडीणं णीचागोद-पंचंतराइयाणं च णाणावरणभंगो। सादस्स उक्कस्सिया हाणी थोवा । वड्ढी अवठ्ठाणं च अणंतगुणं । सन्यासिं णामपयडीणं पसत्थाणं उच्चागोदस्स च सादभंगो। आदावणामाए णाणावरणभंगो। आउआणं उक्कस्सिया हाणी थोवा । वड्ढी अवठ्ठाणं च विसेसाहियं । एवमुक्कस्सप्पाबहुअं समत्तं । जहण्णपदणिक्खेवप्पावहुअं। तं जहा. मदिआवरणस्स जह० हाणी थोवा । वड्ढी अवट्ठाणं च अर्णतगुणं । चदुणाणावरण-छदसणावरण-चदुसंजलण-णवणोकसाय- पंचतराइयाणं मदिआवरणभंगो । थीणगिद्धितिय-सादासाद -मिच्छत्त - अढक्कसायाणं वाड्ढ-हाणि-अवढाणाणि तिणि वि तुल्लाणि । अणताणुबंधाणं वड्ढी थोवा । हाणि-अव- हाणाणि अणंतगुणाणि । सम्मत्तस्स हाणी थोवा । अवट्ठाणमणंतगुणं । सम्मामिच्छत्तस्स अनुभागको बांधकर आवली अतिक्रान्त उसका संक्रम करनेवाले सूक्ष्म एकेन्द्रियके उक्त प्रकृतियोंकी जघन्य वृद्धि होती है। उस प्रक्षेपको अन्तर्मुहूर्त में घातकर संक्रम करनेवाले के उनकी जघन्य हानि होती है। दोनों मेंसे किसी भी एकमें उनका जघन्य अवस्थान होता है। नीचगोत्रकी प्ररूपणा अनादिक नामप्रकृतियों के समान है। उच्चगोत्रकी प्ररूपणा अनन्तानुवन्धीके समान है। इस प्रकार स्वामित्व समाप्त हुआ। अल्पवहुत्वकी प्ररूपणा की जाती है। यथा- ज्ञानावरणकी उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमहानि स्तोक है । वृद्धि और अवस्थान विशेष अधिक हैं। नौ दर्शनावरणीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, नौ नोकपाय, अप्रशस्त नासप्रकृतियों, नीचगोत्र और पांच अन्तरायके प्रकृत अल्पवहुत्वकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है। सातावेदनीयकी उत्कृष्ट हानि स्तोक है। वृद्धि और अवस्थान अनन्तगुणे हैं। सब प्रशस्त नामप्रकृतियां और उच्चगोत्रकी प्ररूपणा साता- वेदनीयके समान है। आतप नामकर्सकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है । आयु कर्मों की उत्कृष्ट हानि स्तोक है । वृद्धि व अवस्थान विशेप अधिक है। इस प्रकार उत्कृष्ट अल्पबहुत्व समाप्त हुआ। जघन्य पदनिक्षेप विषयक अल्पवहुत्वकी प्ररूपणा करते हैं। यथा- मतिज्ञानावरणकी जघन्य हानि स्तोक है । वृद्धि और अवस्थान अनन्तगुणे हैं। चार ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, चार संज्वलन, नौ नोकपाय और पांच अन्तरायकी प्ररूपणा भतिज्ञानावरणके समान है। स्त्यानगृद्धित्रय, सातावेदनीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व और आठ कपायोंकी वृद्धि, हानि और अवस्थान तीनों ही तुल्य हैं । अनन्तानुबन्धी कषायोंकी वृद्धि स्तोक है । हानि व अवस्थान अनन्त- गुणे हैं। सम्यक्त्व प्रकृतिकी हानि स्तोक है। अवस्थान अनन्तगुणा है। सम्यग्मिथ्यात्वकी १ ताप्रतौ 'एवमप्पाबहुगे' इति पाटः ।

४०६ छक्खंडागमे संतकम्म हाणि-अवट्ठाणाणि दो वि तुल्लाणि । चदुण्णमाउआणं बढि-अवट्ठाणाणि दो वि तुल्लाणि थोवाणि । हाणी अणंतगुणा । सादियणामपयडीणं उच्चागोदस्स च आउचउकभंगो। अणादियणामपयडीणं णीचागोदस्स च सादभंगो। तित्थयरस्स हाणी णत्थि। वड्ढी अवट्ठाणं च दो वि तुल्लाणि । एवं पदणिक्खेवो समत्तो। बढिसंकमे सामित्तं- छव्यिहाए बड्ढीए को सामी ? अण्णदरो संकामो । छबिहाए हाणीए को सामी ? अण्णदरो घादेतवो । आउअवजाणं कम्माणं ठिदिघादेण विणा वि अणुभागा हम्मंति, चदुण्णमाउआणं पुण द्विदिधादेण विणा णत्थि अणुभाग- घादो। एवं सामित्तं समत्तं । एयजीवेण कालो- सव्यकम्माणं छबिहाए हाणीए संकमस्स जहणुकस्सेण एगसमओ । णवरि जासि कम्माणं अणुसमओवट्टणा अस्थि, तेसिमर्णतगुणहाणिसंकमस्स जह० एगसमओ, उक्क० अंतोमुहुत्तं । पंचण्णं वढिसंकमाणं जह० एगसमओ, उक्क० आवलि० असंखे० भागो । अणंतगुणवढिसंकमस्स जह० एगसमओ, उक्क. अंतोमुहुत्तं । अवट्ठियसंकमस्स भुजगारअवट्ठिय संकमभंगो । एवं वढिकालो समत्तो। एयजीवेण अंतरं- पंचवढि-पंचहाणीणमंतरं केवचिरं० ? जह० एगसमओ हानि और अवस्थान दोनों ही तुल्य हैं। चार आयु कर्मों की वृद्धि और अवस्थान दोनों ही तुल्य व स्तोक हैं । हानि अनन्तगुणी है । सादिक नामप्रकृतियों और उच्चगोत्रकी प्ररूपणा आयुचतुष्क- के समान है। अनादिक नामप्रकृतियों और नीचगोत्रकी प्ररूपणा सातावेदनीयके समान है। तीर्थंकर प्रकृतिकी हानि नहीं है। वृद्धि और अवस्थान दोनों ही तुल्य हैं। इस प्रकार पदनिक्षेप समाप्त हुआ। वृद्धिसंक्रममें स्वामित्वकी प्ररूपणा की जाती है-छह प्रकारकी वृद्धिका स्वामी कौन है ? उसका स्वामी अन्यतर संक्रामक है । छह प्रकारकी हानिका स्वामी कौन है ? घात करनेवालोंमें अन्यतर जीव उसका स्वामी है। आयुको छोड़कर शेप कर्मों के अनुभाग स्थितिघातके विना भी घाते जाते हैं । परन्तु चार आयु कर्मों के अनुभागोंका घात स्थितिघातके विना नहीं होता। इस प्रकार स्वामित्व समाप्त हुआ। एक जीवकी अपेक्षा कालकी प्ररूपणा की जाती है- सब कर्मों की छह प्रकारकी हानिके संक्रमका काल जघन्य व उत्कर्पसे एक समय मात्र है । विशेप इतना है कि जिन कर्मों की प्रति- समय अपवर्तना होती है उनकी अनन्तगुणहानिसंक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। उनके पांच वृद्धिसंक्रमोंका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे आवली- के असंख्यातवें भाग मात्र है। अनन्तगुणवृद्धिसंक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कपैसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है । अवस्थितसंक्रमका काल भुजाकार अवस्थित संक्रमके समान है। इस प्रकार वृद्धिकाल समाप्त हुआ। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर-पांच वृद्धियों और पांच हानियोंका अन्तरकाल कितना । १ ताप्रतौ 'अणुभागादो' इति पाठः । २ प्रतिषु 'संकमभागो' इति पाठः ।

४०७ संकमाणियोगद्दारे अणुभागसंकमो अंतोमुहुत्तं', उक्क० असंखेज्जा लोगा। अणंतगुणवड्ढि-हाणि-अवठ्ठाणाणं भुजगारसंकम- भंगो । एवं वढिअंतरं समत्तं । णाणाजीवेहि भंगविचओ कालो अंतरंच भाणिदव्याणि । एत्थ अप्पाबहुअं । एदस्स साहणटुं इमा परूवणा । तं जहा- एयम्मि बंधट्ठाणे असंखेजा लोगा घादवाणाणि । एत्तो पंचविहहाणीयो साहेयूण समाणिय अणंतभाग- वढिसंकामयाणं गुणगारो असंखेजा लोगा त्ति वत्तव्यो । मदिआवरणस्स अणंतभाग- हाणिसंकामया थोवा । असंखेजमागहाणिसंकामया असंखे० गुणा । संखे० भागहाणिक संखे० गुणा । संखे० गुणहाणि० संखे० गुणा । असंखे० गुणहाणि० असंखे० गुणा । अणंतभागवड्ढि० असंखे० गुणा। असंखे० भगवढि० असंखे० गुणा। संखेजभाग- वढिसंकामया संखेजगुणा । संखे० गुणवड्ढि० संखे० गुणा । असंखे० गुणवढि० असंखे० गुणा । अयंतगुणहाणि० असंखे० गुणा । अणंतगुणवढि० असंखे० गुणा । अवट्टिद० संखे० गुणा । एवं चदुणाणावरण-णबदसणावरण-सादासाद अणादिय- णामकम्माणं णीचागोद-पंचंतराइय-मिच्छत्ताणं च । सोलसकसाय-णवणोकसायाणं अवत्तव्यसंकामया थोवा । अणंतभागहाणिसं० अणंत- है ? जघन्यसे वह एक समय और अन्तर्मुहूर्त तथा उत्कर्पसे असंख्यात लोक मात्र है। अनन्त- गुणवृद्धि, हानि और अवस्थानकी प्ररूपणा भुजाकार संक्रमके समान है। इस प्रकार वृद्धिअन्तर समात हुआ। नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय, काल और अन्तरका भी यहां कथन करना चाहिये। यहां अल्पबहुत्वका प्रकरण है। इसको सिद्धि के लिये यह प्ररूपणा है। यथा- एक बंधस्थानमें असंख्यात लोक प्रमाण घातस्थान होते हैं। यहां पांच प्रकारकी हानियोंको सिद्ध करके समाप्त कर अनन्तभागवृद्धि संक्रामकोंका गुणकार असंख्यात लोक मात्र है, ऐसा कहना चाहिये। मतिज्ञानावरणके अनन्तभागहानिसंक्रामक स्तोक हैं। असंख्यातभागहानिसंक्रामक असंख्यात- गुणे हैं । संख्यातभागहानिसंक्रामक संख्यातगुणे हैं । संख्यातगुणहानिसंक्रामक संख्यातगुणे हैं। असंख्यातगुणहानिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अनन्तभागवृद्धिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं असंख्यातभागवृद्धिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं। संख्यातभागवृद्धिसंक्रामक संख्यातगुणे हैं। संख्यातगुणवृद्धिरक्रामक संख्यातगुणे हैं। असंख्यातगुणवृद्धिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अनन्तगुणहानिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अनन्तगुणवृद्धिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अवस्थितस्क्रामक संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार शेप चार ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, सातावेदनीय, असातावेदनीय, अनादिक नामकर्मों, नीचगोत्र, पांच अन्तराय और मिथ्यात्वके भी विपयमें प्रकृत अल्पबहुत्वका कथन करना चाहिये । सोलह कपाय और नौ नोकपायोंके अवक्तव्यसंक्रामक स्तोक हैं । अनन्तभागहानिसंक्रामक १ मप्रतिपाठोऽयम् । अ-का-ताप्रतिषु 'जह० अंतोमुत्त' इति पाठः । २ ताप्रती 'अवठ्ठाणाणि' इति पाठः।

४०८ छक्खंडागसे संतकल्स गुणा । सेसाणं गाणावरणभंगो। मणुसगइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुब्बी-उच्चागोदाणं णोकसायसंगो । देवगइ-देवगइ- पाओग्गाणुपुच्ची - णिरयगइ - णिरयगइपाओग्गाणुपुब्बी - वेउब्वियसरीर - वेउब्वियसरीर- अंगोवंग-बंधण-संघादाणं असंखे० भागहाणिसंकामया थोवा । संखे० भागहाणि संखे० गुणा । संखे० गुणहाणि० संखे० गुणा । असंखे० गुणहाणि० असंखे० गुणा । अणंत- भागवड्ढि० असंखे० गुणा । असंखे० भागवड्ढि० असंखे० गुणा । संखेजभागवढि० संखे० ० गुणा । संखे० गुणवढिसं० संखे० गुणा । असंखे० गुणवड्ढि० असंखे० गुणा । अवत्तव्य असंखे०गुणा । अणंतगुणहाणि० असंखे०गुणा । अर्णतगुणवढि० असंखेन्गुणा । अणंतभागहाणि असंखे० गुणा । अवडिय०असंखे० गुणा । एवं वढिसंकमो समत्तो । जहा संतकम्मट्ठाणाणि तहा संकमट्ठाणाणि । पदेससंकमे अठ्ठपदं- पदेस गं अण्णपयढि संकामिजदि एसो पदेससंकमो। एदेण अट्ठपदेण मूलपयडिसंकमो णस्थि । उत्तरपयडिसंकसे पयदं । उत्तरपयडिसंकमो पंचविहो- उव्वेलणसंकमो विज्झादसंकमो अधापमत्तसंकमो गुणसंकमो सव्वसंकमो चेदि । वुत्तं च-- उव्वेल्लण विज्झादो अधापसत्तो गुणो य सव्यो य । अनन्तगुणे हैं। शेष पदोंकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है। मनुष्यगति, मनुष्यगतिप्रयोग्यानुपूर्वी और उच्चगोत्रकी प्ररूपणा नोकपायोंके समान है। देवति, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, नरकगति, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिक- शरीरांगोपांग, वैक्रियिकबन्धन और वैक्रियिकसंघातके असंख्यातभागहानिसंक्रामक स्तोक हैं। संख्यातभागहानिसंक्रामक संख्यातगुणे हैं। संख्यातगुणहानिसंक्रामक संख्यातगुणे हैं । असंख्यात- गुणहानिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अनन्तभागवृद्धिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं। असंख्यात- भागवृद्धिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं। संख्यातभागवृद्धिसंक्रामक संख्यातगुणे हैं। संख्यातगुण- वृद्धिसंक्रामक संख्यातगुणे हैं । असंख्यातगुणवृद्धिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अवक्तव्यसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अनन्तगुणहानिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अनन्तगुणवृद्धिसंक्रामक असं- ख्यातगुणे हैं । अनन्तभागहानिसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अवस्थितसंक्रामक असंख्यातगुणे हैं । इस प्रकार वृद्धिसंक्रम समाप्त हुआ। संक्रमस्थानोंकी प्ररूपणा सत्कर्मस्थानों के समान है। प्रदेशसंक्रममें अर्थपद-जोप्रदेशाग्र अन्य प्रकृति में संक्रान्त किया जाता है इसका नाम प्रदेशसंक्रम है। इस अर्थपदके अनुसार मूलप्रकृतिसंक्रम नहीं है। उत्तरप्रकृतिसंक्रम प्रकरणप्राप्त है । उत्तरप्रकृतिसंक्रम पांच प्रकारका है- उद्वेलनसंक्रम, विध्यातसंक्रम, अधःप्रवृत्तसंक्रम, गुणसंक्रम और सवसंक्रम । कहा भी है- परिणाम वश जिनके द्वारा जीवोंका कर्म संक्रमणको प्राप्त होता है वे संक्रम पांच हैं: १ ताप्रती ‘-पाओग्गाणुपुट्वि-वेउब्वियसरीरंगोवंग-' इति पाठः । २ अ-काप्रत्योः 'अस्थि', ताप्रती 'अ (ण) त्थि' इति पाठः । बंधे संकामिजदि णोबंधे गस्थि मूलपयडीणं । गो. क, ४१०.३ जं दलियमनपगई निजइ सो संकमो पएसस्स । उचलणो विज्झाओ अहापवत्तो गुणो सव्वो || क. प्र. २-६०, ४ प्रतियु 'गुगे' इति पाठः । - -- संकमाणियोगद्दारे अणुभागसंकमो ४०९ संकमई जेहि कम्मं परिणामवसेण जीवाणं ॥१॥ काओ पयडीओ केत्तिएहि संकमंति त्ति जाणवणहूँ परूवणाए कीरमाणाएं एसा गाहा होदि- बंधे अधापमत्तो विज्झाद अबंध अप्पमत्तंतो । गुणसंकमो दु एत्तो पयडीणं अप्पसत्थाणं ॥२॥ 'बंधे अधापवत्तो' जत्थ जासि पयडीणं बंधो संभवदि तत्थ तासिं पयडीणं बंधे संते असंते वि अधापमत्तसंकमो होदि । एसो णियमो बंधपयडीणं, अबंधपयडीणं णस्थि । कुदो ? सम्मत्त-सम्मामिच्छत्तेसु वि अधापमत्तसंकमुवलंभादो। 'विज्झाद अवंधे जासि पयडीणं जत्थ बंधसंभवो णियमेण णत्थि तत्थ तासिं विज्झादसंकयो । एसो वि णियमो मिच्छाइटिप्पहुडि जाव अप्पमत्तसंजदो त्ति तावदेव धुव चेत्र होदि । 'गुणसंकमो दु एत्तो' अप्पमत्तादो उवरिमगुणहाणेसु बंधविरहिदपयडीणं गुणसंकमो सव्यसंकमो च होदि । सन्मसंकमो होदि त्ति कधं णबदे ? तु-सदादो । 'अप्पसत्थाणं उद्वेलनसंक्रम, विध्यातसंक्रम, अधाप्रवृत्तसंक्रम, गुणसंक्रम और सर्वसंक्रम ॥ १ ॥ कौन प्रकृतियां कितने संक्रमणोंके द्वारा संक्रमणको प्राप्त होती हैं, यह जतलाने के लिये को जानेवाली प्ररूपणामें यह गाथा है- बन्धके होनेपर अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है। विध्यातसंक्रम अवन्ध अवस्था में अप्रमत्त गुणस्थान पर्यन्त होता है। यहांसे अर्थात् अप्रमत्त गुणस्थानसे लेकर आगेके गुणस्थानों में वन्धरहित अप्रशस्त प्रकृतियोंका गुणसंक्रम और सर्वसंक्रम भी होता है ॥२॥ 'बंधे अधापवत्तो' का स्पष्टीकरण करते हुए बतलाते हैं कि जहां जिन प्रकृतियोंका वन्ध सम्भव है वहां उन प्रकृतियों के बन्धके होनेपर और उसके न होनेपर भी अध प्रवृत्तसंक्रम होता है। यह नियम वन्धप्रकृतियोंके लिये है, अनन्धप्रकृतियोंके लिये नहीं है; क्योंकि, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दो अवन्ध प्रकृतियों में भी अधःप्रवृत्तसंक्रम पाया जाता है। 'विज्झाद अवंधे' का अर्थ करते हुए कहते हैं कि जिन प्रकृतियोंका जहां नियमसे बन्ध सम्भव नहीं है वहां उन प्रकृतियोंका विध्यातसंक्रम होता है। यह भी नियम मिथ्याष्टिसे लेकर अप्रमत्त गुणस्थान तक ही ध्रुव स्वरूपसे है। 'गुणसंकमो दुः एत्तो' अर्थात् अप्रमत्त गुणस्थानसे आगेके गुगस्थानों में बन्धरहित प्रकृतियों का गुणसंक्रम और सर्वसंक्रम भी होता है। शंका- सवैसंक्रम भी होता है, यह कहांसे जाना जाता है ? समाधान- यह उपर्युक्त गाथा में प्रयुक्त 'तु' शब्दसे जाना जाता है। १ अप्रतौ 'संकमिय', काप्रती 'संकमय' इति पाठः । २ गो. क. ४०९. ३ अ-काप्रत्योः 'परूवणा कीरमाणा', ताप्रती 'परूवणाए कीरमाणा' इति पाठः। ४ बंधे अधापवत्तो विझादं सत्तमो ति दु अबंधे । एत्तो गुणो अबंधे पयडीणं अप्पसत्याणं | गो. क. ४१६. ५ मिच्छे सम्मित्साणं अधापत्तो मुहुत्तअंतो त्ति ॥ गो. क. ४१२. ६ जासि न बंधो गुण भवपच्चयो तासि होइ विशाओ। क. प्र. २, ६८. ७ तापतौ 'ताव देवधुव चेव' इति पाठः। छ. से. ५२ ४१० छक्खंडागमे संतकम्म एसा पावणा अप्पसंस्थपयडीणं कदा, ण पसत्थाणं; उसम-खवगसेडीसु वि बंध- विरहियपसत्थपयडीणमधापवत्तसंकमदंसणादो। एदाओ पयडीओ एत्तिएहि भाग- हारेहि संकमंति त्ति जाणावणडं एसा गाहा- उगुदाल तीस सत्त य वीसं एगेग बार तियचउकं । एवं चदु दुग तिय तिय चदु पण दुग तिग दुगं च बोद्धव्यं ।।३॥ ३५/३०/७२०/११ एदीए गाहाए वृत्तपयडीणं भागहाराणं च एसा संदिट्ठी- १/४/२/३/३/४ २३३२३)। एवं ठविय एदिस्से गाहाए अत्थो युचदै । तं जहा- पंचणाणावरण- चत्तारिदसणावरण-सादावेयणीय - लोहसंजलण-चिंदियजादि - तेजा-कम्मइयसरीर-सम- चउरससंठाण-पसत्थवण्ण-रस-गंध-फास-अगुरुअलहुअ - परघाद-उस्सास- पसत्थविहायगइ- तस-बादर-पजत्त-पत्तेयसरीर-थिर-सुभ-सुभग-सुस्सर-आदेज-जस कित्ति-णिमिण-पंचंतराइ- याणं अधापवत्तसंकमो एको चेवे । कुदो ? पंचणाणावरण-चउदंसणावरण-पंचंतराइयाणं मिच्छाइटिप्पहुडि जाव सुहुमसांपराइयचरिमसमयो त्ति बंधो चेव । तेणेव एदासि- 3 .. यह प्ररूपणा 'अप्पसत्थाणं' अर्थात् अप्रशस्त प्रकृतियोंकी गयी है, न कि प्रशस्त प्रकृतियोंकी; क्योंकि, उपशम श्रेणि और क्षपक श्रेणिमें भी बन्धरहित प्रशस्त प्रकृतियोंका अधःप्रवृत्तसंक्रम देखा जाता है। ये प्रकृतियां इतने भागहारोंसे संक्रमणको प्राप्त होती हैं, यह बतलाने के लिये यह गाथा है- उनतालीस, तीस, सात, बीस, एक, एक बारह और तीन चतुष्क (४, ४, ४); इन प्रकतियोंके क्रमसे एक, चार, दो, तीन, तीन, चार, पांच, दो, तीन और दो; ये भागहार जानने चाहिये ॥३॥ इस गाथा में कही गयी प्रकृतियों और भागहरोंकी यह संदृष्टि है- प्रकृति |३|३०७|२०|१|१|१२|४|४|४]। इसे इस प्रकारसे स्थापित करके इस भागहार |१|४|२३।३४/५/२/३/२ गाथाका अर्थ कहते हैं। यथा- पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, सातावेदनीय, संज्वलन लोभ, पंचेन्द्रिय जाति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त वर्ण रस गन्ध व स्पर्श, अगुरुलघु, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, ब्रस, वादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशकीर्ति, निर्माण और पांच अन्तराय; इन उनतालीस प्रकृतियोंका एक अधःप्रवृत्तसंक्रम ही होता है, क्योंकि, पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तरायका मिथ्याष्टिसे लेकर सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानके अन्तिम समय तक १ उगुढाल-तीस-सत्तय-वीसे एक बार तिचउक्के । इगि-चदु-दुगु-तिग-तिग-चदु-पण-दुग-दुग-तिणि- संकमणा ॥ गो. क. ४१८. २ सहुमस्स बंधघादी सादं संजलणलोह-पंचिंदी। तेजदु-सम-वण्णचऊ अगुरुग- परघाद-उत्सासं || सत्थगदी तसदसयं णिमिणुगदाले अधापवत्तो दु । गो, क, ४१९-२०.३ ताप्रती 'गाणावरण- पंचतराइयाण' इति पाठः । ४ अप्रतौ ' इस्थि' इति पाठः ।

संकमाणियोगद्दारे अणुभागसंकमो मधापवत्तसंकम मोत्तण णत्थि अण्णसंकमो। बंधवोच्छेदे जादे वि संकमो णस्थि, पडिग्गहा- भावादो। पंचिंदियजादि-तेजा-कम्मइयसरीर-समचउरससंठाण-पसत्थवण्ण-गंध-रस-फास- अगुरुअलहुअ-परघादुस्सास-पसत्थविहायगइ-तस- बादर-पज्जत्त - पत्तेयसरीर -थिरादिछक्के- णिमिणाणं बंधवोच्छेदे संते विज्झादो गुणसंकमो वा किण्ण जायदे १ ण एस दोसो, पसत्थत्तादो। लोहसंजलणस्स अधापवत्त संकमो चेव, बंधे संते चेव आणुपुब्धिसंकमेण ओसारिदसकमत्तादो। एदासि पयडीणं सबसंकमो किण्ण होदि ? ण, परपयडिसंछोह- णेण विणासाभावादो। थीणगिद्धितिय-चारसकसाय-इस्थि-णqसयवेद-अरदि-सोग-तिरिक्खगदि -एइंदिय- बेईदिय-तेई दिय-चउरिंदयजादि-तिरिक्खगइपाओग्गाणुपुब्बी -आदावुञ्जोव -थावर-सुहुम- साहारणाणं तीसण्णं पयडीण उव्वेल्लणेण विणा चत्तारि संकमा होति । तंजहा-थीणगिद्धि- बन्ध ही है। इसीलिये इन प्रकृतियोंके अधःप्रवृत्तसंक्रमको छोड़कर अन्य संक्रम नहीं होते। बन्धव्युच्छित्तिके हो जानेपर उनका संक्रम नहीं होता, क्योंकि, प्रतिग्रह (जिनमें विवक्षित प्रकृतियां संक्रान्त होती हैं ) प्रकृतियोंका यहां अभाव है। शंका- पंचेन्द्रिय जाति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त वर्ण गन्ध रस व स्पर्श, अगुरुलघु, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, बस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर आदि छह और निर्माण ; इनकी बन्धव्युच्छित्ति हो जानेपर विध्यात अथवा गुणसंक्रम क्यों नहीं होता? समाधान- यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, वे प्रशस्त प्रकृतियां हैं। संज्वलन लोभका एक अधःप्रवृत्तसंक्रम ही होता है, क्योंकि, वन्धके होनेपर ही आनु- पूर्वीसंक्रम (संज्वलन क्रोधका संज्वलन मान आदिमें, संज्वलन मानका संज्वलन माया आदिमें, इत्यादि) द्वारा उनका संक्रम होता है। शंका-इन प्रकृतियोंका सर्वसंक्रम क्यों नहीं होता ? समाधान- नहीं, क्योंकि अन्य प्रकृतियों में क्षेपण करके इनका विनाश नहीं होता। स्त्यानगृद्धि आदि तीन, बारह कपाय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, अरति, शोक, तिर्यग्गति, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारणशरीर; इन तीस प्रकृतियोंके उद्वेलनके विना चार संक्रम होते हैं। १ प्रतिषु 'थिरादिओजोछक' इति पाठः । २ अंतरकरणम्मि कए चरित्तमोहे णुपुन्निसंकमण । अन्नस्थ सेसिगाणं च सत्यहिं सव्वहा बंधे ॥ क. प्र. २, ४. xxx चरित्रमोहे पुरुपवेद-संज्वलनचतुष्टयलक्षणे । अत्र हि चरित्रमोहनीयग्रहणेनैता एव पंच प्रकृतयो गृह्यन्ते, न शेषाः; बन्धाभावात् । तत्रानुपूर्वी (ा) परिपाट्या संक्रमगं भवति, न त्वनानुपूर्व्या । तथा हि- पुरुषवेदं संज्वलनकोधादावेव संक्रमयति, नान्यत्र । संज्वलनक्रोधमपि संज्वलनमानादावेव, न तु पुरुषवेदे । संज्वलनमानमपि संज्वलनमायादावेव, न तु संज्वलन- क्रोधादौ । संज्वलनमायामपि संज्वलनलोभ एव, न तु संज्वलनमानादाविति । मलय. ३ थीगति-बारकसाया संदित्थी अरइ सोगो य || तिरियेयारं तीते उन्बेलणहीणचत्तारिसंकमगा । गो. क. ४२०-२१.

४१२ छक्खंडागमे संतकम्म तिय - इत्थिवेद - तिरिक्खगइ - तिरिक्खगइपाओग्गाणुपुच्ची-उजोव-अणताणुचंधिचउकाणं मिच्छाइटिप्पहुडि जाव सासणसम्माइडि चि अधापवत्तसंकमो, तस्थ बंधुवलंभादो । सम्मा- मिच्छाइटिप्पहुडि जाव अप्पमत्त संजदोत्ति ताव विज्झादसंकयो, तत्थ बंधाभावादो । सग- सगअपुव्वखवगपढमसमयप्पहुडि जाव चरिमहिदिखंड यदुचरिमफालि त्ति ताव गुण- संकमो। चरिमफालीए सव्वसंकलो। णउंसयवेद-एइंदिय-बेइंदिय-तेइंदिय-चउरिदियजादि-आदाव- थावर-सुहुम- साहार- णाणं मिच्छाइडिम्हि अधापवत्तसंकभो, तत्थ एदासि बंधुवलंभादो। सासणसम्माइडि- प्पहुडि नाव अप्पमत्तसंजदो त्ति ताव विज्झादसंकमो, अप्पसत्थत्ते संते बंधाभावादो। रईदिय-बेईदिय-तेइंदिय-चउरिदिय-आदाव-थावर-सुहुम- साहारणाणं देव-णेरइयमिच्छा- इट्ठीसु विज्झादसंकमो, तत्थ एदासि बंधाभावादो। .णवरि एइंदिय-आदाव-थावराणं ईसाणंता देवा अधापवत्तेण संकामया, तत्थ एदासिं बंधदसणादो। अपुचकरण पढम- समयपहुडि जाव चरिमद्विदिखंडयदुचरिमकालि ति ताव एदासि पयडीणं गुणसंकमो, अप्पसत्थत्ते तेसिं' बंधाभावादो। चरिमफालीए सब्यसंकमो, संछोहणेण णहत्तादो । अपञ्चक्खाणचउकस्स मिच्छाइटिप्पहुडि जाव असंजदसम्माइडि त्ति ताव अधा- यथा- स्यानगृद्धित्रय, स्त्रीवेद, तिर्यग्गति, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, उद्योत और अनन्तानु- बन्धिचतुष्क का सिथ्यादृष्टि से लेकर सासादनसम्यग्दृष्टि तक अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है, क्योंकि, वहां इनका वन्ध पाया जाता है। सम्यग्मिथ्याष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक उनका विध्यातसंक्रम होता है, क्योंकि, वहां उन के बन्धका अभाव है। अपूर्वकरण क्षपकके प्रथम समयसे लेकर अपने अपने अन्तिम स्थितिकाण्डककी द्विचरम फालि तक उनका गुणसंक्रम होता है। अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है। नपुंसकवेद, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, आतप, स्थावर, सुक्ष्म और साधारणशरीरका मिथ्याष्टि गुणस्थानमें अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है, क्योंकि, वहांपर इनका बन्ध पाया जाता है। सासादनसम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्तसंयत तक उनका विध्यातसंक्रम होता है, क्योंकि अप्रशस्तताके होनेपर वहां बन्धका अभाव है। एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, श्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, आतप, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण; इनका देव व नारक मिथ्याष्टियों में विध्यातसंक्रम होता है; क्योंकि, उनके इनका वन्ध नहीं होता। विशेप इतना है कि एकेन्द्रिय, आतप और स्थावर इनके ईशान कल्प तकके देव अधःप्रवृत्तसंक्रमके द्वारा संक्रामक हैं; क्योंकि, उनमें इनका वन्ध देखा जाता है। अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर अन्तिम स्थितिकाण्डककी द्विचरम फालि तक इन प्रकृतियोंका गुणसंक्रम होता है, क्योंकि, अप्रशस्तताके होनेपर उनके बन्धका अभाव है, इनकी अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है, क्योंकि, उसका विनाश निक्षेपपूर्वक होता है। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कका मिथ्याष्टिसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक अधःप्रवृत्तसंक्रम १ अ-काप्रत्योः 'अप्पंसस्थत्ते सिंते इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे अणुभागसंफमो पवत्तसंक्रमो, तत्थ बंधदसणादो। उवरि जाव अप्पमत्तसंजदचरिमसमओ ताव विज्झाद- संक्रमो । उवरिमपुव्यकरणपढमममयप्पहुडि जाव चरिमद्विदिखंडयदुचरिमसालि त्ति ताव गुणसंक्रमो । कारणं सुगम । चरिमफालीए सब्यसंकमो, परपयडिसंयोहणेण विणद्वत्तादो। पञ्चक्खाणचदुक्कस्स अपनाखाणचदुक्कभंगो। णवरि संजदासंजदो त्ति एदेसि- मधापयत्तसंकमो। अरदि-पोग्गाणं मिच्छाइटिप्पहुडि जाव पमत्तसंजदो त्ति ताव अधापमत्तसंकमो, वस्थ एदासि बंधुवलंभादो। अप्पमत्तसंजदम्हि विज्झादसंकमो, तत्थ बंधाभावादो। अपुन्यकरणपढमसमयप्पहुडि जाय अप्पणो चरिमविदिखंड यदुचरिमफालि ति ताव गुणसंक्रमो, अप्पसत्था त्ति बंधाभावादो । चरिमफालीए सव्यसंकमो । कारणं सुगुमं । णिहा-पयला-अप्पसत्/वण्ण-गंध-रस-फास-उवधादाणं अधापवत्तसंकमो गुणसंकभो चेदि दो चेव संकमा । तं जहा-णिदा-पयलाणं मिच्छाइटिप्पहुडि जाव अपुव्य- करणस्स पढम-सत्तमभागो त्ति ताव अधापवत्तसंकमो, एत्थ एदासिं बंधुवलंभादो। उवरिं जाव सुहुमसांपराइयचरिमसमओ त्ति ताव गुणसंकमो, बंधाभावादो। अप्पसत्थ- वण्णचदुक्कस्स मिच्छाइटिप्पहुडि जाव अपुयकरणस्स छ-सत्तमभागा ति अधापवत्तसंकमो । होता है, क्योंकि, वहां इनका बन्ध देखा जाता है। आगे अप्रमत्तसंयतके अन्तिम समयं तक उनका विध्यातसंक्रम होता है। ऊपर अपूर्वकरके प्रथम समयसे लेकर अन्तिम स्थितिकाण्डकको द्विचरम फालि तक उनका गुगसंक्रम होता है। इसका कारण सुगम है। अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है, क्योंकि, वह अन्य प्रकृति में प्रक्षिप्त होकर नष्ट होती है। प्रत्याख्यानावरणचतुष्ककी प्ररूपणा अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कके समान है। विशेप इतना है कि संयतासंयत गुणस्थान तक इनका अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है। अरति और शोकका मिथ्याष्टिसे लेकर प्रमत्तसंयत तक अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है, क्योंकि, उनमें इनका बन्ध पाया जाता है। अप्रमत्तसंयत में इनका विध्यातसंक्रम होता है, क्योंकि, वहां इनका बन्ध नहीं है। अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर अपने अन्तिम स्थितिकाण्डकको द्विचरम फालि तक उनका गुणसंक्रम होता है, क्योंकि, वहां अप्रशस्तता होनेपर उनका बन्ध नहीं है। उनकी अन्तिम फालिका सवैसंक्रम होता है । इसका कारण सुगम है। निद्रा, प्रचला तथा अप्रशस्त वर्ण, गन्ध, रस व, स्पर्श और उपघातके अधःप्रवृत्तसंक्रम दो ही संक्रम होते हैं। यथा-निद्रा और प्रचलाका मिथ्यादृष्टिसे लेकर अपूर्वकरणके प्रथम सप्तम भाग तक अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है, क्योंकि, यहां इनका वन्ध पाया जाता है । आगे सूक्ष्मसाम्रायिकके अन्तिम समय तक उनका गुणसंक्रम होता है, क्योंकि, यहां उनका बन्ध नहीं है। अप्रशस्त वर्णादि चारका मिथ्यादृष्टिसे लेकर अपूर्वकरणके सात भागोंमेंसे छठे भाग १ अ-कामत्योः 'अप्पमत्तसंजदेहि' इति पाठः। २ अ.काप्रत्योः 'पयलायअप्पसत्थ' इति पाठः । ३ अ-कापत्योः 'संकमो' इति पाठः । गिद्दा पलया असुहं वण्णचउकं च उवधादे ॥ सत्तणहं गुणसंकम- मधापवत्तो य xxx गो. क. ४२१-२२. और गुणसंक्रम छरखंडागमे संतकस्म उवरि जाव सुहुमसांपराइयचरिमसमओ त्ति ताव गुणसंकमो। तत्तो' उवरि संकमो णत्थि, बंधाभावेण पडिग्गहामावादो। उवधादस्स चण्णचदुकभंगो। एदासि सत्तणं पयडीणं विज्झादसंकमो णस्थि, खवग-उव सामियसेडीसु बोच्छिण्णबंधत्तादो। उव्वेल्लणसंक्रमो णस्थि, अणुव्वेल्लणपयडि- चादो। सव्यसंकमो णस्थि, परपयडिसंछोहणेण अविणहत्तादो। असादावेदणीय-पंचसंठाण - पंचसंघडण-अप्पसत्थविहायगइ-अपजत्त- अथिर-असुह- दुर्भग-दुस्सर-अणादेज-अजसगित्ति-णीचागोदाणं वीसण्णं पयडीणं अधापवत्तसंकमो, विज्झादसंकमो गुणसंकमो चेदि तिपिणसंकमा । तं जहा- असादावेदणीय-अथिर- असुहाणं मिच्छाइद्विपहुडि जाच पमत्तसंजदो त्ति ताव अधापमत्तसंकमो, एत्थ एदासि बंधुवलंभादो । अप्पमत्तसंजदम्मि विज्झादसंकमो, बंधामावादो। उवरि गुणसंकमो जाव सुहुमसांपराइयचरिमसमयो त्ति, अप्पसत्थत्तादो। उवरि संकमो णत्थि, पडिग्गहा- भावादो। हुंडसंठाण-असंपत्तसेवसंघडणाणं मिच्छाइडिम्हि अधापवत्तसंकमो, तत्थ एदासिं बंधुवलंभादो । उवरि जाव अप्पमत्तसंजदो त्ति विज्झादसंकमो, बंधाभावादो । तक इनका अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है। आगे सूक्ष्मसाम्परायिकके अन्तिम समय तक उनका गुणसंक्रस होता है। इसके आगे उनका संक्रम नहीं है, क्योंकि, बन्धके न होनेसे उनकी प्रतिग्रह प्रकृतियोंका वहां अभाव है। उपघातकी प्ररूपणा वर्णचतुष्कके समान है। इन निद्रा आदि सात प्रकृतियोंका विध्यात- संक्रस नहीं होता, क्योंकि, क्षपक और उपशासक श्रेणियों में इनकी बन्धव्युच्छित्ति होती है। इनका उद्वेलनसंक्रम भी नहीं होता, क्योंकि, वे उद्वेलन प्रकृतियोंसे भिन्न हैं। सर्वसंक्रम भी उनका सम्भव नहीं है, क्योंकि, अन्य प्रकृतियों में प्रक्षिप्त होकर उनका विनाश नहीं होता। असातावेदनीय, पांच संस्थान, पांच संहनन, अप्रशस्त विहायोगति, अपर्याप्त, अस्थिर, अशुभ, दुभंग, दुखर, अनादेय, अयशकीर्ति और नीचगोत्र ; इन बीस प्रकृतियोंके अधःप्रवृत्त- संक्रम, विध्यातसंक्रम और गुणसंक्रस ये तीन संक्रम होते हैं। यथा- असातावेदनीय, अस्थिर और अशुभ इनका मिथ्यादृष्टिसे लेकर प्रमत्तसंयत तक अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है; क्योंकि, यहां इनका वन्ध पाया जाता है। अप्रमत्तसंयत में उनका विध्यातसंक्रम होता है, क्योंकि, वहां इनका वन्ध नहीं होता। आगे सूक्ष्मसाम्परायिकके अन्तिम समय तक उनका गुणसंक्रम होता है, क्योंकि, वे अप्रशस्त प्रकृतियां हैं। इससे आगे उनका संक्रम नहीं होता, क्योंकि, प्रतिग्रह प्रकृतियोंका अभाव है। हुण्डकसंस्थान और असंप्राप्तासृपाटिकासंहननका मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है, क्योंकि, वहांपर इनका वन्ध पाया जाता है। आगे अप्रमत्तसंग्रत तक इनका विध्यात- १ अ-काप्रत्योरेतस्य स्थाने 'तत्य इति पाठः। २ अ-काप्रत्योः तिगिसंकमो' इति पाठः। दुक्ख. मसुहगदी। संहदि-संठाणदसं णीचापुणथिरउफ च ॥ वीसण्हं विज्झादं अधापवत्तो गुणो य xxx गो. क. ४२२-२३.

संकमाणियोगहारे अणुभागसंफमो ४१५ असंखेजवासाउअतिरिक्ख-मणुसमिच्छाइट्ठीसु वि विज्ञादसंकमो चेव, बंधाभावादो। अपुवकरणपढमसमयप्पहुडि जाच सुहुमसांपराइयचरिमसमयो ति ताच गुणसंकमो, बंधाभावादो । उवरि असंकमो, पडिग्गहाभावादो। चदुसंठाण-चदुसंघडण - दूसग-दुस्सर-अणादेज - णीचागोद- अप्पसत्थविहायगदीणं मिच्छाइटिप्पहुडि , जाव सासणसम्माइहि त्ति ताव अधापवत्तसंकमो। उवरि जाव अप्पमत्तसंजदचरिमसमयो त्ति ताव विज्झादसंकमो, बंधाभावादो। अपुल्च- करणपढमसमयप्पहुडि जाय सुहुमसांपराइयवरिमसमयो ति ताव गुणसंक्रमो, अप्प- सत्थत्तादो । उपरि असंकमो, पडिग्गहाभावादो । एवमपज्जत्तस्स वि । णवरि मिच्छा- इद्विम्हि चेव एदस्त अधांपवत्तसंकमी । अजसकित्तीए अपजत्तभंगो । णवरि मिच्छाइटिप्पहुडि जाव पमत्तसंजदो ति एदिस्से अधापवत्तसंकमो, एदेसु गुण- हाणेसु बंधुवलंभादो। मिच्छत्तस्स विज्झादसंकमों गुणसंकमो सव्यसंक्रमो चेदि तिणि संकमा । तं जहा- पढमसमयप्पहुडि जाव अंतोमुहुत्तकालं उवसमसम्माइडिम्हि मिच्छत्तस्स गुणसंकमो । खवणाए वि अपुब्धकरणपढमसमयप्पहुडि जाव चरिमविदिखंडयदुचरिमफालि त्ति गुण- संक्रम होता है, क्योंकि, वहां इनका बन्ध नहीं होता। असंख्यातवर्पायुष्क तिर्यंच व मनुष्य मिथ्यादृष्टियों में भी उनका विध्यातसंक्रम ही होता है, क्योंकि, उनके इनका वन्ध नहीं होता। अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर सूक्ष्मसाम्परायिकके अन्तिम समय तक उनका गुणसंक्रम होता है, क्योंकि, वहांपर इनके बन्धका अभाव है। आगे उनका संक्रम नहीं होता, क्योंकि, प्रतिग्रह प्रकृतियोंका अभाव है। चार संस्थान, चार संहनन, दुर्भग, दुस्वर, अनादेय, नीचगोत्र और अप्रशस्त विहायोगति; इनका मिथ्याष्टिरसे लेकर सासादनसम्यग्दृष्टि तक अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है। आगे अप्रमत्त- संयतके अन्तिम समय तक उनका विध्यातसंक्रम होता है, क्योंकि, आगे उनका वन्ध नहीं होता। अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर सूक्ष्मसाम्पराथिकके अन्तिम समय तक उनका गुणसंक्रम होता है, क्योंकि, वे अप्रशस्त प्रकृतियां हैं। आगे उनका संक्रस नहीं है, क्योंकि, प्रतिग्रह प्रकृतियोंका अभाव है। इसी प्रकार अपर्याप्त नामकर्म के भी विपयमें कहना चाहिये । विशेप इतना है कि इसका अधःप्रवृत्तसंक्रम केवल मिथ्याइष्टि गुणस्थान में ही होता है। अयशकीर्तिकी प्ररूपणा अपर्याप्तके समान है। विशेप इतना है कि मिथ्याष्टिसे लेकर प्रमत्तसंयत तक इसका अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है, क्योंकि, इन गुणस्थानों में उसका बन्ध पाया जाता है। मिथ्यात्व प्रकृतिके विध्यातसंक्रम, गुणसंक्रम और सर्वसंक्रम ये तीन संक्रम होते हैं। यथा- प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त काल तक उपशमसम्यग्दृष्टि जीवके मिथ्यात्वका गुण- संक्रम होता है । क्षपणामें भी अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर अन्तिम स्थितिकाण्डककी १ अ-काप्रत्योः 'तिणिसंकमो' इति पाटः । मिच्छत्ते । विज्झाद-गुगे सव्वं xxx || गो, क. ४२३, ४१६ छक्खंडागमें संतकम संकमो। चरिमफालीए सव्यसंकमो। उवसमसम्माइडिम्हि य मिच्छत्तस्स विज्झादसंकमो। वेदगसम्मत्तस्स चत्वारि संकमा अधापवत्तसंकमो उज्वेल्लणसंकमो गुणसंकमो तव्य- संकमो चेदि । तं जहा--मिच्छत्तं गदसम्माइडिम्हि जाव अंतोमुत्तकालं ताव अधा- पवत्तसंकमो । तदो पहुडि जाव पलिदो० असंखे० भागमेत्तकालं ताव उव्वेल्लणसंकमो अंगुलस्स असंखे० भागपडिभागिगो । उव्वेलणचरिमखंडयपढमसमयप्पहुडि ताब गुणसंकमो जाव तस्सेव दुचरिमफालि त्ति । चरिमफालीए सव्वसंकमो । सम्मामिच्छत्तै-देवगइ-देवगइपाओग्गाणुपुत्री-णिरयगइ - णिरयगइपाओग्गाणुपुव्धी- वेउब्वियसरीर -वेउब्धियसरीरंगोवंग - मणुसगइ - मणुसगइपाओग्गाणुपुयी-आहारसरोर- आहारसरीरंगोवंग-उच्चागोदाणं वारसण्णं पयडीणं पंच संकाँ। तं जहा-- मिच्छत्तं गदसम्माइडिम्हि अंतोमुहुत्तकालं सम्मामिच्छत्त० अधापवत्तसंकमो। तदो उवरि पलिदो. असंखे० भागमेत्तकालं सम्मामिच्छत्त० उव्वेल्लणसंकमो। चरिमखंडए गुणसंकमो जाव तस्सेव दुचरिमकालि ति। चरिमकालीए सव्यसंक्रमो। दसणमोहक्खवगअपुवकरणपढम- समयप्पहुडि ताव सम्मामिच्छत्तस्स गुणसंकमो जाव चरिमविदिखंडयस्स दुचरिम झालि त्ति । चरिमफालीए सव्यसंकमो । उवसम-वेदगसम्माइट्ठीसु विज्झादसंकमो द्विचरम फालि तक उसका गुणसंक्रम होता है। अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है। उप- शमसम्यग्दृष्टिके ही मिथ्यात्वका विध्यातसंक्रम भी होता है। वेदकसम्यक्त्वके अधप्रवृत्तसंक्रम, उद्वेलनसंक्रम, गुणसंक्रम और सर्वसंक्रम ये चार संक्रम होते हैं। यथा- मिथ्यात्वको प्राप्त हुए सम्यग्दृष्टिके सम्यक्त्वप्रकृतिका अन्तर्मुहूर्त काल तक अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है। उसके आगे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र काल तक अंगुलके असंख्यातवें भाग प्रतिभागवाला उसका उद्वेलनसंक्रम होता है। उद्वेलन के अन्तिम काण्डकके प्रथम समयसे लेकर उसको ही द्विवरम फालि तक उसका गुणसंक्रम होता है। उसकी अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है। सम्यग्मिथ्यात्व, देवगति, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, नरकगति, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, मनुष्यगति, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आहारकशरीर, आहारकशरीरांगोपांग नामकर्म और उच्चगोत्र इन बारह प्रकृतियोंके पांच संक्रम होते हैं । यथा- मिथ्यात्वको प्राप्त सम्यग्दृष्टिके अन्तमुहूर्त काल सम्यग्मिथ्यात्वका अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है । उसके आगे पल्योरमके असंख्यातवें भाग मान काल तक सम्यग्मिथ्यात्वका उद्वेलनसंक्रम होता है। अन्तिम काण्डक में उसकी ही द्विचरम फालि तक गुणसंक्रम होता है। चरम फालिका सर्वसंक्रम होता है। दर्शनमोहक्षपक अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर अन्तिम स्थितिकाण्डकी द्विचरम फालि तक सम्य- ग्मिथ्यात्वका गुणसंक्रम होता है । उसकी अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है । उपशमसम्यग्दृष्टि १ अ-काप्रत्योः 'चत्तारिसंकमो' इति पाठः । सम्मे विज्झादपरिहीणा || गो. क. ४२३. २ ताप्रती 'उब्वे- ल्लणसंकमो । अंगुलस्स असंखे० भागपडिभागिगो उब्वेल्लण-' इति पाठः। ३ य-काप्रत्योः 'मिच्छत्त', ताप्रती [ सम्मा ] मिच्छत्त' इति पाठः । ४ सम्मविहीणुबेल्ले पंचेव य तत्य होति संकमगा | गो. क. ४२४. - संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो ४१७ १ अंगुलस्स असंखे० भागपडिभागियो। देवगइ-देवगइपाओग्गाणुपुच्चीणं मिच्छाइटिप्पहुडि जाव अपुव्वकरणछसत्तभागे त्ति अधापवत्तसंकमो, तत्थ एदासिं बंधुवलंभादो। तत्तो उचरि पि बंधाभावे वि अधा- पमत्तसंकमो चेव, पसत्थत्तादो। देव-णेरइएसु विज्झादसंकमो, बंधाभावादो । एइंदिय- विगलिदिएसु उव्वेल्लणसंकसो जाव उव्वेल्लणचरिमखंडयमपत्तो ति। चरिमखंडए गुणसंकमो जाव तस्सेव दुचरिमफालि त्ति । चरिमफालीए सव्यसंकमो। वेउन्चियसरीर-वेउव्यिसरीरंगोवंगाणं देवगइभंगो। णिरयगइ-णिरयगइपाओग्गाणु- पुवीणं पि देवगइभंगो। णवरि मिच्छाइद्विम्हि चेव अधापवत्तसंकमो। सासणसम्मा- इटिप्पहुडि जाव अप्पमत्त संजदो त्ति विज्झादसंकमो। देव-णेरइएसु वि विज्झादसंकमो, बंधाभावादो। अपुवकरणप्पुहुडि जाव सगचरिमट्ठिदिखंडयदुचरिमफालित्ति गुणसंकमो। चरिमफालीए सव्यसंकमो। एइंदिय-विगलिदिएसु उब्वेल्लणसंकमो। उच्वेल्लणचरिम- खंडए गुणसंकमो । तस्सेव चरिमफालीए सनसंकमो । एवं पंच संकमा होति । मणुसगइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुवीणं मिच्छाइटिप्पहुडि जाव असंजदसम्मादिहि और वेदकसम्यग्दृष्टिके उसका अंगुलके असंख्यातवें भाग प्रतिभागवाला विध्यातसंक्रम होता है। देवगति और देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वीका मिथ्याप्टिसे लेकर अपूर्वकरणके सात भागों में से छठे भाग तक अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है, क्योंकि, वहां इनका बन्ध पाया जाता है। उसके आगे भी बन्धका अभाव होनेपर भी अधःप्रवृत्तसंक्रम ही होता है, क्योंकि, वे प्रशस्त प्रकृतियां हैं। देवों व नारकियों में उनका विध्यातसंक्रम होता है, क्योंकि, उनके इनका बन्ध नहीं होता। एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीवोंमें उद्वेलनके अन्तिम काण्डकके प्राप्त न होने तक उनका उद्वेलनसंक्रम होता है। अन्तिम काण्डकमें उसीकी द्विचरम फालि तक गुणसंक्रम होता है। अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है। वैक्रियिकशरीर और वैक्रियिकशरीरांगोपांगकी प्ररूपणा देवगतिके समान है। नरकगति और नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वीकी भी प्ररूपणा देवगतिके समान है। विशेप इतना है कि मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें ही इनका अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है। सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक उनका विध्यातसंक्रम होता है। देवों और नारकियों में भी उनका विध्यात- संक्रम होता है, क्योंकि, उनके इनका बन्ध नहीं होता । अपूर्वकरणसे लेकर अपने अन्तिम स्थिति- काण्डककी द्विचरम फालि तक उनका गुणसंक्रम और अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है। एकेन्द्रियों और विकलेन्द्रियों में उनका उद्वेलनसंक्रम होता है। उद्वेलनके अन्तिम काण्डकमें [द्विचरम फालि तक ] उनका गुणसंक्रम और उसीकी अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है । इस प्रकार उक्त दो प्रकृतियोंके पांच संक्रम होते हैं। मनुष्यगति और मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वीका मिथ्यादृष्टि से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक १ ताप्रतौ 'भागो' इति पाठः। छ. से. ५३ ४१८ छक्खंडागमे संतकम्म त्ति अधापवत्तसंकमो, तत्थ बंधुवलंभादो। संजदासजदप्पहुडि जाव अप्पमत्तसंजदो त्ति विज्झादसंकमो । असंखेजवासाउअतिरिक्ख-मणुस्सेसु विज्झादसंकमो, बंधाभावादो। तेउ-वाउकाइएसु उव्वेल्लणसंकमो जाब दुचरिमुव्वेल्लणकंडयो ति । चरिमुवेल्लणखंडए गुणसंकमो । तस्सेव चरिमफालीए सव्यसंकमो । आहारसरीर-आहारसरीरंगोवंगाणं अप्पसत्तसंजद पहुडि जाव अपुब्धकरणो त्ति ताव अधापवत्तसंकमो, तत्थ बंधुवलंभादो । हेडिमगुणट्ठाणेसु विज्झादसकमो, बंधाभावादो। असंजमं गदो आहारसरीरसंतकम्मियो संजदो अंतोमुहुत्तेण उव्वेल्लणमाढवेदि जाव असंजदो जाव असंतकम्मं च अस्थि ताव उध्वेल्लेदि। संपहि सव्वुव्वेलणपयडीणमुब्वेल्लणकमो वुच्चदे । तं जहा- अधापयत्चट्ठिदिखंडयं पलिदो० असंखे० भागो। तासिं द्विदीणं पढमसमए जमुक्कीरिजदि पदेसग्गं तं थोवं । विदियसमए जमुक्कीरिजदि पदेसग्गं तमसंखेजगुणं । तदियसमए जमुक्कीरिजदि पदे- सग्गं तमसंखेजगुणं । एवमसंखेजगुणवड्ढीए णेयव्यं जाव अंतोमुहुत्तं त्ति । एत्थ गुणगारपमाणं पलिदो० असंखे० भागो। परपयडीसु जं पदेसग्गं दिज्जदि तं थोवं । जं सत्थाणे दिञ्जदि तमसंखेजगुणं । अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है, क्योंकि, वहां इनका बन्ध पाया जाता है। संयतासंयतसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक उनका विध्यातसंक्रम होता है। असंख्यातवर्पायुष्क तिर्यंचों और मनुष्यों में उनका विध्यातसंक्रम होता है, क्योंकि, उनमें इनका बन्ध नहीं होता। तेजकायिकों और वायु- कायिकों में द्विचरम उद्वेलन काण्डक तक उनका उद्वेलनसंक्रम होता है। अन्तिम उद्वेलनकाण्डकमें [द्विचरम फालि तक ] गुणसंक्रम और उसीकी अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है। आहारकशरीर और आहारकशरीरांगोपांग नामकोका अप्रमत्तसंयतसे लेकर अपूर्व- करण तक अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है, क्योंकि, वहां इनका बन्ध पाया जाता है। अधस्तन गुण- स्थानों में उनका विध्यातसंक्रम होता है, क्योंकि, वहां इनका वन्ध नहीं होता। आहारशरीर- सत्कर्मिक संयत असंयमको प्राप्त होकर अन्तर्मुहूर्तमें उद्वेलना प्रारम्भ करता है, जब तक वह असंयत है और जब तक सत्कर्मसे रहित है तब तक वह उद्वेलना करता है। अब सब उद्वेलनप्रकृतियोंकी उद्वेलनाके क्रमकी प्ररूपणा की जाती है। यथा- अधःप्रवृत्तस्थितिकाण्डक पल्योपमके असंख्यातवें भाग प्रमाण है। उन स्थितियोंका जो प्रदेशाग्र प्रथम समयमें उत्कीर्ण किया जाता है वह स्तोक है। द्वितीय समयमें जो प्रदेशाग्र उत्कीर्ण किया जाता है वह असंख्यातगुणा है। तृतीय समयमें जो प्रदेशाग्र उत्कीर्ण किया जाता है वह असंख्यात- गुणा है । इस प्रकार अन्तर्मुहूर्त काल तक असंख्यातगुणी वृद्धिके क्रमसे ले जाना चाहिये । यहां गुणकारका प्रमाण पल्योपमका असंख्यातवां भाग है। अन्य प्रकृतियों में जो प्रदेशाग्र दिया जाता है वह स्तोक है। स्वस्थानमें जो प्रदेशाग्र दिया जाता है वह असंख्यातगुणा है। जो प्रदेशाग्र स्वस्थानमें दिया जाता है वह गुणश्रेणिक्रमसे १ अ-काप्रत्योः 'दुचरिममुवेलणकंड़यो' इति पाठः ।

संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो ४१९ जं सत्थाणे तं गुणसेडीए दिआदि, जं परत्थाणे तं पदेसग्गं बिसेसहाणीए दिआदि । एस विही पढमस्स हिदिकंड यस्स । जो विहो पढमस्स द्विदिखंडयस्स परूविदो सो चेव विही विदियखंडयप्पहुडि जाव दुचरिमखंडओ त्ति ताव सव्वखंडयाणं परूवेयव्यो। चरिमविदिखंडयपमाणं पलिदो० असंखे० भागो। तस्स पदेसगं सव्यं परत्थाणे चेव दिञ्जदि असंखेजगुणाए सेढीए । पढमट्ठिदिखंडयस्स द्विदीओ बहुगाओ। विदियस्स विसेसहीणाओ । तदियस्स द्विदिखंडयस्स द्विदीओ विसेसहीणाओ। एवमणतरोवणिधाए यव्वं जाव दुचरिमडिदिखंडओ त्ति । दुचरिमद्विदिखंडयहिदीहिंतो चरिमद्विदिखंड- यस्स द्विदीओ असंखे० गुणाओ। परंपरोवणिधाए पढमद्विदिखंडयमुवणिहाय अस्थि काणिचि द्विदिखंडयाणि संखेज- गुणहीणाणि काणिचि असंखे० गुणहीणाणि । तत्थ जं दुचरिमट्टिदिखंडयमाहारदुगस्स तस्स जं चरिमसमए संकमदि पसेसग्गं परत्थाणे सो जहण्णओ उव्वेल्लणसंकमो । तेण संकममाणेण तिस्से पयडीए ताधे जं सेसयं कम्मं तं पलिदोवमस्स असंखे० भागेण अवहिरिजदि । सव्वकम्मं पुण अंगुलस्स असंखे० भागेण अवहिरिजदि । संपहि पयदं परूवेमो--- आहारदुगस्स उव्वेल्लणकालभंतरे उव्वेल्लणसंकमो । चरिमविदिखंडए गुणसंकमो । तत्थेव चरिमफालीए सव्यसंकमो। दिया जाता है और जो प्रदेशाग्र परस्थानमें दिया जाता है वह विशेषहानिके क्रमसे दिया जाता है । यह विधि प्रथम स्थितिकाण्डककी है। जो विधि प्रथम स्थितिकाण्डककी कही गयी है वही विधि द्वितीय काण्डकसे लेकर द्विचरम काण्डक तक सब काण्डकोंकी कहना चाहिये । अन्तिम स्थितिकाण्डकका प्रमाण पल्योपमका असंख्यातवां भाग है। उसका सब प्रदेशाग्र असंख्यात- गुणित श्रेणिसे परस्थानमें ही दिया जाता है। प्रथम स्थितिकाण्डकको स्थितियां बहुत हैं। द्वितीय स्थितिकाण्डककी स्थितियां विशेप हीन हैं। तृतीय स्थितिकाण्डककी स्थितियां विशेप हीन हैं। इस प्रकार अनन्तरोपनिधासे द्विचरम स्थितिकाण्डक तक ले जाना चाहिये। द्विचरम स्थितिकाण्डककी स्थितियोंसे चरम स्थितिकाण्डककी स्थितियां असंख्यातगुणी हैं। परम्परोपनिधाकी अपेक्षा प्रथम स्थितिकाण्डक उपनिधामें कितने ही स्थितिकाण्डक संख्यातगुणे हीन हैं और कितने ही असंख्यातगुणे हीन हैं। उनमें जो आहारद्विकका द्विचरम स्थितिकाण्डक है उसका जो प्रदेशाग्र अन्तिम समयमें परस्थानमें संक्रान्त होता है वह जघन्य उद्वेलनासंक्रम है। उसके द्वारा संक्रान्त होता हुआ उक्त प्रकृतिका जो उस समय शेप कर्म है वह पल्योपमके असंख्यातवें भागसे अपहृत होता है। परन्तु सब कर्म अंगुलके असंख्यातवें भागसे अपहृत होता है। अव प्रकृतको प्ररूपणा करते हैं- आहारद्विकका उद्वेलनकालके भीतर उद्वेलनसंक्रम होता है । अन्तिम स्थितिकाण्डको गुणसंक्रम होता है। उसमें ही अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है। १ अ-काप्रत्योः 'सद्दे', तापतौ 'सई (व्वं), इति पाठः । २ प्रतिषु 'चट्टिदिखंडयरस' इति पाठः । ३ ताप्रती 'खंडयमुवणिहा य अस्थि । काणिचि' इति पाठः ।

४२० छक्खंडागमे संतकम्म उच्चागोदस्स मिच्छाइटिप्पहुडि जाव सासणसम्माइट्ठि त्ति अधापवत्तसंकमो । उवरि असंकमो, पडिग्गहाभावादो। सत्तमपुढविणेरइएसु विज्झादसंकमो । तेउ-बाउ- काइएसु उव्वेल्लणसंकमो, तत्थ उव्वेल्लणपाओग्गपरिणामाणमुवलंभादो। चरिमुव्वेल्लणखंडए गुणसंकमो । तस्सेव चरिमकालीए सव्वसंकमो। तिण्णिसंजलण-पुरिसवेदाणमधापवत्तसंकमो सव्यसंकमो चेदि दोणि संकमा होति । तं जहा-तिणं संजलणाणं पुरिसवेदस्स मिच्छाइटिप्पहुडि जाव अणियट्टि त्ति अधापवत्तसंकमो । चरिमखंडयचरिमफालीए एदासि सव्यसंकमो। हस्स-रदि-भय-दुगुंछाणं अधापवत्तसंकमो गुणसंकमो सम्बसंकमो चेदि तिण्णि- संकमा होति । तं जहा- मिच्छाइटिप्पहुडि जाव अपुब्धकरणचरिमसमयो ति एदासिमधापयत्तसंकमो। उवरि गुणसंकमो जाव चरिमद्विदिखंडयदुचरिमफालि त्ति । चरिमफालीए सव्वसंकमो । ओरालियसरीर-ओरालियसरीरंगोवंग-जरिसह-तिस्थयराणमधापवत्तसंकमो विज्झाद- संकमो चेदि दोणि संकमा । तं जहा ओरालियदुग-पढमसंघडणाणं मिच्छाइटि- प्पहुडि जाव असंजदसम्मादिहि ति अधापवत्तसंकमो, तत्थ बंधदसणादो । असंखेज- वासाउअतिरिक्ख-मणुस्सेसु विज्झादसंकमो, तत्थ एदासिं बंधाभावादो । तित्थयरस्स उञ्चगोत्रका मिथ्यादृष्टिसे लेकर सासादनसम्यग्दृष्टि तक अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है। आगे उसका संक्रम नहीं होता है, क्योंकि, प्रतिग्रह प्रकृतिका अभाव है। सातवीं पृथिवीके नारकियोंमें उसका विध्यातसंक्रम होता है । तेजकायिक और वायुकायिक जीवोंमें उसका उद्वेलन- संक्रम होता है, क्योंकि, वहां उद्वेलनके योग्य परिणाम पाये जाते हैं । अन्तिम उद्वेलनकाण्डकमें गुणसंक्रम होता है । उसीकी अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है। तीन संज्वलन और पुरुषवेदके अधःप्रवृत्तसंक्रम और सर्वसंक्रम ये दो संक्रम होते हैं। यथा- तीन संज्वलन कषायों और पुरुषवेदका मिथ्याष्टिसे लेकर अनिवृत्तिकरण तक अधःप्रवृत्त- संक्रम होता है । इनके अन्तिम काण्डककी अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है। हास्य, रति, भय और जुगुप्साके अधःप्रवृत्तसंक्रम, गुणसंक्रम और सर्वसंकम ये तीन संक्रम होते हैं । यथा- मिथ्यादृष्टि से लेकर अपूवकरणके अन्तिम समय तक इनका अधःप्रवृत्त- संक्रम होता है । आगे अन्तिम स्थितिकाण्डकको द्विचरम फालि तक गुणसंक्रम होता है । अन्तिम फालिका सर्वसंक्रम होता है। औदारिकशरीर, औदारिकशरीरांगोपांग, वज्रर्पभनाराचसंहनन और तीर्थंकर प्रकृतिके अधःप्रवृत्तसंक्रम और विध्यातसंक्रम ये दो संक्रम होते हैं। यथा- औदारिकद्विक और प्रथम संहननका मिथ्याष्टिसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है, क्योंकि, वहां- पर उनका बन्ध देखा जाता है । असंख्यातवर्पायुष्क तिर्यंचों और मनुष्यों में इनका विध्यातसंक्रम होता है, क्योंकि, उनमें इनका बन्ध नहीं होता। तीर्थंकर प्रकृतिका असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर , १'अ-काप्रत्योः 'दोणिसंकमो' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४२१ असंजदसम्मादिहिप्पहुडि जाव अपुचकरणो त्ति ताव अधापवत्तसंकमो । मिच्छाइद्विम्हि विज्झादसंकमो, तत्थ बंधाभावादो। गुणसंकमेण संकममाणस्स अवहारकालो थोत्रो। अधापवत्तसंकमेण संकामयंतस्स अवहारकालो असंखेजगुणो। विज्झादसंक्रमेण संकामयंतस्स अवहारकालो असंखे. गुणो । एदमप्पाबहुअं उक्कस्सपदेससंकमभागहाराणं, ण सव्वेसि; विज्झादसंकमभाग- हारादो अधापवत्तभागहारस्स विसेसहोणत्तुवलंभादो । एदं कुदो णयदे ? पचखाण- लोभजहण्णसंकमदव्वादो केवलणाणावरणजहष्णसंकमदच्वं विसेसाहियं ति उवरिम- अप्पाबहुगादो। उव्वेल्लणसंकमेण संकामयंतस्स अवहारकालो असंखे० गुणो । एदमप्पा- बहुरं एत्थ अवहारेयव्यं । एवं परूवणा समत्ता । एत्तो सामित्तं । तं जहा- मदिआवरणस्स उकस्सओ' पदेससंकमो कस्स ? जो गुणिदकम्मसियो सत्तमादो पुढवीदो मदो तिरिक्खो जादो तदो तस्स आवलियतब्भव- स्थस्स उकस्सगो मदिआवरणस्स पदेससंक्रमो। चदुणाणावरण-चदुदंसणावरण पंचंत- राइयाणं मदिणाणावरणभंगो । णिद्दा-पयलाणं उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स-१ गुणिद- अपूर्वकरण तक अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है। मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में उसका विध्यातसंक्रम होता है, क्योंकि, वहां उसका बन्ध नहीं होता। गुणसंक्रमके द्वारा संक्रान्त होनेवाले प्रदेशाग्रका अवहारकाल स्तोक है। अधःप्रवृत्त- संक्रमके द्वारा संक्रान्त होनेवाले प्रदेशाग्रका अवहारकाल असंख्यातगुणा है। विध्यातसंक्रमके द्वारा संक्रान्त होनेवाले प्रदेशाग्रका अवहारकाल असंख्यातगुणा है। यह अल्पबहुत्व उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमभागहारोंका है, न कि सब भागहारोंका; क्योंकि, विध्यातसंक्रमभागहारसे अधः- प्रवृत्तसंक्रमभागहार विशेष हीन पाया जाता है। शंका- यह कहांसे जाना जाता है ? समाधान- वह प्रत्याख्यानावरणलोभके जघन्य संक्रमद्रव्यसे केवलज्ञानावरणका जघन्य संक्रमद्रव्य विशेप अधिक है, इस आगे कहे जानेवाले अल्पबहुत्वसे जाना जाता है। उसकी अपेक्षा उद्वेलनसक्रमसे संक्रान्त होनेवाले द्रव्यका अवहारकाल असंख्यातगुणा है । इस अल्पबहुत्वका यहां अवधारण करना चाहिये । इस प्रकार प्ररूपणा समाप्त हुई। यहां स्वामित्वकी प्ररूपणा की जाती है। वह इस प्रकार है-- मतिज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकर्माशिक सातवीं पृथिवीसे मरकर तिर्यंच हुआ है उसके आवली कालवर्ती तद्भवस्थ होनेपर मतिज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है । शेप चार ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तराय प्रकृतियों के उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमके स्वामित्वकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है। निद्रा और प्रचलाका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम १ ताप्रतौ 'तत्थ बंधाभावादो' इत्येतावानयं पाठो नास्ति । २ अप्रतौ 'आवरणउक्कत्सओ' इति पाठः । ३ तत्तो उव्वहित्ता आवलिगासमयतम्भवस्थत्स । आवरण-विग्धचोदसगोरालियसत्त उकोसो | क.प्र. २-७९, ४२२ छक्खंडागमे संतकम्म कम्मंसियस्स चरिमसमयसुहुमसांपराइयस्स खचगस्स । थीणगिद्धितियस्स उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? गुणिदकम्मंसियस्स अणियट्टिखवयस्स सव्वसंकरीण थीणगिद्धि- तियचरिमफालिं संकामेंतस्से । सादस्स उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जो गुणिद- कम्मसियो सत्चमादो पुढवीदो मदो तिरिक्खो जादो, ताधे चेव सादं पवद्धं, तप्याओग्ग- उक्कस्सियाए सादबंधगद्धाए गदो, पुणो असादं पवद्धं, तस्स आवलियादिकंतस्स उकस्सओ पदेससंकमों । असादस्स णिहाभंगो । मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्ताणं उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? गुणिदकम्मंसियस्स सव्वलहुं ईसणमोहणीयं खतस्स अणियट्टिकरणे सव्यसंकमेण मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्ताणं चरिमफालीयो संकासेतस्स । सम्मत्तस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स १ जो सत्तमाए किसके होता है ? वह गुणितकर्माशिक चरम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक क्षपकके होता है । स्त्यानगृद्धित्रयका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? वह सर्वसंक्रम द्वारा स्त्यानगृद्धित्रयकी अन्तिम फालिको संक्रान्त करनेवाले गुणितकर्माशिक अनिवृत्तिकरण क्षपकके होता है। साता- वेदनीयका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकर्माशिक सातवीं पृथिवीसे मरकर तिथंच हुआ है, जिसने उसी समयमें सातावेदनीयका बन्ध किया है, तथा जिसने तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट सांताबन्धककालको विताकर फिर असातावेदनीयका बन्ध किया है, उसके बन्धावलीके वीतनेपरं उसका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। असातावेदनीयके प्रकृत स्वामित्वकी प्ररूपणा निद्राके समान है। मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? वह सबलघु- कालमें दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करते हुए अनिवृत्तिकरणमें सर्वसंक्रम द्वारा मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अन्तिम फालियोंको संक्रान्त करनेवाले गुणितकर्माशिकके होता है। सम्यक्त्व प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो सातवीं पृथिवीका नारकी गुणितकर्माशिक १ अप्रतौ 'चरिमफाली संकमेतरस', काप्रतौ 'चरिमफालिसकमोतस्स', ताप्रती 'चरिमफालि (लिं) संकामेंतस्स' इति पाठः । कम्मचउक्के असुभाण बज्झमाणीण सुहुम (खवग) रागते। संछोभणम्मि नियगे चउवीसाए नियट्टिस्स ॥ क. प्र. २-८०. कर्मचतुष्के दर्शनावरण-वेदनीय-नाम-गोत्रलक्षणे या अशुभाः सूक्ष्मसंपरायावस्थाया- मवध्यमानाः प्रकृतयो निद्राद्विकासातावेदनीय-प्रथमवर्जसंस्थान-प्रथमवर्जसंहननाशुभवर्णादिनवकोपघाताप्रशस्त- विहायोगत्यपर्याप्तास्थिराशुभ-दुर्भग-दुःस्वरानादेयायशःकाति-नीचे!त्रलक्षणा द्वात्रिंशत् प्रकृतयस्तात गुणितकौशस्य क्षपकस्य सूक्ष्मसंपरायस्यान्ते चरमसमये उत्कृष्टः प्रदेशसंक्रमो भवति । तथाऽनिवृत्तिवादरस्य गुणितकोशस्य क्षपकस्य मध्यमकषायाष्टक-स्त्यानगृद्धित्रिक-तिर्यग्द्विक-द्वि-त्रि-चतुरिन्द्रियजाति-सूक्ष्म-साधारण- नोकषायषटकरूपाणां चतुर्विंशतिप्रकृतीनां (२४) आत्मीय आत्मीये चरमसंछोभे चरमसंक्रमे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमो भवति । ( मलय ). २ तत्तो अणंतरागयसमयादुक्कस्स सायबंधद्धं । वंघिय असायबंधालिगंतसमवम्मि मायरस || क. प्र. २-८१. ततो नरकभवादनन्तरभवे समागतः ....। मलय, ३ मिच्छत्तत्स उकस्सपदेससंकमो कस्स ? गुणिदकम्मंसिओ सत्तमादो पुढवीदो उबहिदो दो तिप्गि - । - 1.

संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो ४२३. पुढवीए णेरइयो गुणिदकम्मंसियो अंतोमुहत्तसेसे सम्मत्तं पडिवण्णो, उकस्सेण गुणसंकमकालेण सम्मत्तमावूरिय मिच्छत्तं गदो, तस्स पढमसमयमिच्छाइद्विस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो'। अणंताणुवंधीणं उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? सत्तमपुढविणेरइयस्स गुणिद- कम्मंसियस्स सव्वजहण्णमंतोमुहुत्तमेत्तमाउअं अत्थि ति अणंताणुवंधिचउक्कविसंजोजण- माढविय सवसंकमेण अर्णताणुवंधिचउक्कचरिमफालि संकामेंतस्स । अट्ठकसायाणमुक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? गुणिदकम्मंसियस्स सव्वलहुँ खवणाए अब्भुट्टियस्स अणियट्टि- आयुमें अन्तर्मुहूत शेप रहनेपर सम्यक्त्वको प्राप्त हो उत्कृष्ट गुणसंक्रमकालमें सम्यक्त्वको पूर्ण करके मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है उस प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टिके सम्यक्त्व प्रकृतिका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। अनन्तानुबन्धी कषायोंका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो सातवीं पृथिवीमें स्थित गुणितकौशिक नारकी जीव सर्वजघन्य अन्तर्मुहूर्त मात्र आयुके शेष रहनेपर अनन्तानु- वन्धिचतुष्ककी विसंयोजनाको प्रारम्भ करके सर्वसंक्रमण द्वारा अनन्तानुबन्धिचतुष्ककी अन्तिम फालिको संक्रान्त कर रहा है उसके उनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। आठ कषायोंका. उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकर्माशिक अनिवृत्तिकरण क्षपक सवैलघु कालमें क्षपणामें उद्यत होकर आठ कषायोंकी अन्तिम फालिको सर्वसंक्रम द्वारा.संक्रान्त कर रहा है उसके भवग्हणाणि पंचिंदियतिरिक्खपजत्तएसु उववष्णो अंतोमुहुत्तेण मणुस्सेसु आगदो । सव्वलहुं दसणमोहणीयं खवेदु- माढत्तो, जाधे मिच्छत्तं सम्मामिच्छत्ते संछुभमाणं संछुद्धं ताधे तस्स मिच्छत्तरस उक्करसओ पदेससंकमो । क. पा. सु. पृ ४०१, १९-२३. सम्मामिच्छत्तस्स उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जेण मिच्छत्तस्स उक्कस्सपदे- सन्गं सम्मामिच्छत्ते पक्खित्तं, तेणेव जाधे सम्मामिच्छत्तं सम्मत्ते संपक्खित्तं ताधे तस्स सम्मामिच्छत्तस्स उकस्सओ पदेससंकमो । पृ. ४०२, २७-२८. संछोभणाए दोण्हं मोहाणं वेयगस्स खगसेसे । उप्याइय सम्मत्तं मिच्छत्तगए तमतमाए ॥ क. प्र. २-८२. क्षपकस्य द्वयोमोहनीययोमिथ्यात्व सम्यग्मिथ्यात्वरूपयोरात्मीयात्मीयचरमसंछोभे सर्वसंकमणोत्कृष्टः प्रदेशसंक्रमो भवति । १ सम्मत्तस्स उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? गुणिदकम्मंसिएण सत्तमाए पुढवीए णेरइएण मिच्छत्तस्स उकस्स- पदेस संतकम्ममंतोमुहुत्तेण होहिदि त्ति सम्मत्तमुप्पाइदं, सबुक्कस्सियाए पूरणाए सम्मत्तं पूरिदं । तदो उवसंतद्धाए पुण्णाए मिच्छत्तमुदीरयमाणस्स पढमसमयमिच्छाइहिस्स तस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो। सो वुण अधापवत्त- संकमो । क. पा.सु. पृ. ४०२, २४-२६.xxx वेयगस्स खणसेसे । उप्पाइय सम्मत्तं मिच्छत्तगए तमतमाए॥ क. प्र. २, ८२. तथा क्षणशेषेऽन्तर्मुहूर्तावसेसे आयुषि तमस्तमाभिधानायां सप्तमपृथिव्यां वर्तमान औपशमिकं सम्यक्त्वमुत्पाद्य दीर्येण च गुणसंक्रमकालेन वेदकसम्यक्त्वपुञ्ज समापूर्य सम्यक्त्वात्प्रतिपतितो मिथ्यात्वं च प्रतिपद्य तत्प्रथमसमय एव वेदकसम्यक्त्वस्य मिथ्यात्वे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमं करोति । (मलय). २ क. पा. सु. पृ. ४०३, २९-३०. भिन्नमुहुत्ते सेसे तच्चरमावरसगाणि किच्चेत्थ । संजोयणा विसंजोयगरस संछोभणा एसि ॥ क. प्र. २-८३, ४२४ छक्खंडागमे संतकम्म खवगस्स अट्टकसायचरिमफालीए सव्यसंकमेण संकामेंतस्से णवुपयवेदस्स उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? ईसाणे गुणिदकम्मंसियस इत्थि- वेदेण पुरिसवेदेण वा सव्वलहुं खवणाए अब्भुट्ठियस्स णqसयवेदचरिमफालि सव्वसंक्रमण संकामेंतस्स । इथिवेदस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो असं- खेजवासाउएसु उववण्णो, सव्वरहस्सेण कालेण पलिदो० असंखे० भाएण पूरिदइस्थिवेदो तदो मदो जहणियाए देवहिदीए उबवण्णो, तदो चुदो सव्वरहस्सेण कालेण खवणाए अब्भुट्ठिदो, तदो तस्स जा इस्थिवेदचरिमफाली सव्वसंकमेण पुरिसवेदे संकमदि ताओ इत्थिवेदस्स उकस्सओ पदेससंकमों। पुरिसवेदसं उकस्सओ पदेससंकमो , ? उक्त आठ कषायोंका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकर्माशिक देव ईशान कल्पमें [संक्लेश परिणामसे एकेन्द्रिय प्रायोग्य बन्ध करता हुआ नपुंसकवेदको बार बार बांधकर वहांसे च्युत हो स्त्री अथवा पुरुष उत्पन्न होता है और तत्पश्चात् मासपृथक्त्व अधिक आठ वर्षों के बीतनेपर] स्त्री या पुरुषवेदके साथ सर्वलघु कालमें क्षपणामें उद्यत हो सर्वसंक्रम द्वारा नपुंसकवेदकी अन्तिम फालिको संक्रान्त करता है उसके नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकौशिक असंख्यातवर्पायुष्क जीवों में उत्पन्न होकर सर्वलघु काल स्वरूप पल्योपमके असंख्यातवें भागमें स्त्रीवेदको पूर्ण करके मृत्युको प्राप्त होता हुआ जघन्य देवस्थिति ( दस हजार वर्षे ) के साथ देव उत्पन्न हुआ है, तत्पश्चात् वहांसे च्युत होकर सर्वलघु कालमें क्षपणामें उद्यत होकर जब वह स्त्रीवेदकी अन्तिम फालिको सर्वसंक्रम द्वारा पुरुषवेदमें संक्रान्त करता है तब उसके स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है ? विशेषार्थ- यद्यपि तत्त्वार्थसूत्र आदि अधिकांश ग्रन्थोंमें भोगभूमियोंमें अकालमृत्यु कदलीघातमरण) का प्रतिषेध किया गया है, तथापि कुछ आचार्य वहां अकालमरणको भी स्वीकार १ अट्टण्हं कसायाणमुक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स १ गुणिदकम्मंसिओ सबलहुं मणुमगइमागदो अवस्सिओ खवणाए अभुहिदो। तदो अट्टण्हं कसायाणमपच्छिमहिदिखंडयं चरिमसमयसंछुहमाणयरस तस्स अट्टण्हं कसायाणमुक्कस्सओ पदेससंकमो । क. पा. सु. पृ. ४०३, ३१-३२. २ अ-काप्रत्योः 'ईसाणे गुणियस्स', ताप्रतौ 'ईसाणे गुणि [ दकम्मंसि ] यस्स' इति पाठः । ३ ण,सयवेदस्स उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? गुणिदकम्मंसिओ ईसाणादो आगदो सव्वलहुँ खवेदुमाढत्तो। तदो णQसयवेदस्स अपच्छिमहिदिखंडयं चरिमसमयसंछुभमाणयस्स तस्स णसयवेदस्स उक्करमओ पदेससंकमो । क. पा. सु. पृ. ४०४, ३८-३९. ईसाणागयपुरिसस्स इस्थियाए य अहवासाए । मासपुत्तन्महिए नपुंसगे सव्वसंकमणे ॥ क. प्र. २-८४. ४ अ-काप्रत्योः 'तदो वुच्चदे सव्वरहस्सेण, तापतौ 'तदो वुच्चदे (चुदो) सबरहस्सेण' इति पाठः । ५ इस्थिवेदत्स उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? गुणिदकम्मंसिओ असंखेजवत्सा. उएसु इस्थिवेदं पूरेदूण तदो कमेण पूरिदकम्मंसिओ खवणाए अन्भुट्टिदो तटो चरिमट्टिदिखंडयं चरिमसमयसंछुह- माणयस्स तस्स इस्थिवदेस्स उक्करसओ पदेससंकमो। क. पा. सु. पृ. ४०४, ३४-३५. इत्थीए भोगभूमिसु जीविय वासाणसंखियाणि तओ। हस्सठिई देवत्ता सव्वल हुं सव्वसंछोभे || क. प्र. २-८५. ६ अ-काप्रत्योः 'पुरिसवेदयस्स' इति पाटः ।

संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो ४२५ " कस्स ? जेण ईसाणदेवेसु ण,सयवेदो पूरिदो, तदो असंखेजवासाउएसें इथिवेदो पूरिदो, तदो मदो जहण्णाए देवद्विदीए उववषणो, तदो मदो मणुस्सो जादो, सब्बलहुं अण्णदरेण लिंगेण खवणाए अब्भुट्टिदो, तेण जाव सव्वसंकमेण पुरिसवेदो संकामिदो ताव तस्स उकस्सओ पदेससंकमों। छण्णोकसायाणमुक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जो गुदिणकम्मंसियो सव्वलहुं खवणाए अब्भुट्टिदो, तेण जाधे सव्वसंकमेण छण्णोकसायाणं चरिमफाली संकामिदा ताधे तेसिमुक्करसओ पदेससंकमो । कोधसंजलणाए उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जो ईसाणदेवेसु णयुसयवेदं करते हैं। इसी मतभेदके अनुसार यहां भोगभूमियोंमें अपमृत्युको स्वीकार कर उपर्युक्त स्त्रीवेदके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमको घटित किया गया है। यहां चूर्णिसूत्रकार यतिवृषभाचार्यका क्या अभिमत रहा है, यह ज्ञात नहीं होता; कारण कि उन्होंने 'असंखेज्जवस्साउएसु इथिवेदं पूरेदूण' इतना मात्र निर्देश किया है- पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र सर्वलघु कालका निर्देश नहीं किया। कर्मप्रकृति आदि श्वेताम्बर ग्रन्थों में यह अभिमत अवश्य पाया जाता है.। वहां प्रसिद्ध टीकाकार आचार्य मलयगिरिने बतलाया है कि स्त्रीवेदका यह उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम इसी युक्तिसे वन सकता है, अतः इसी युक्तिका अनुसरण करना चाहिये; क्योंकि, इसके अतिरिक्त अन्य युक्तियां चिरन्तन ग्रन्थों में देखी नहीं जाती। यथा- इहैवमेव स्त्रीवेदस्योत्कृष्टमापूरणमुत्कृष्टश्च प्रदेशसंक्रमः केवलज्ञानेनोपलब्धो नान्यथेत्येपैव युक्तिस्त्रानुसतव्या, न युक्त्यन्तराणि; युक्त्यन्तराणां चिरन्तनग्रन्थेष्वदर्शनतो निर्मूलतयाऽन्यथापि कर्तुमशक्यत्वात् । क. प्र. २, ८५. पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जिसने ईशान कल्पके देवों में नपुंसक वेदको पूर्ण किया है, तत्पश्चात् असंख्यातवर्पायुष्कोंमें स्त्रीवेदको पूर्ण किया है, तत्पश्चात् मरणको प्राप्त होकर जो जघन्य देवस्थितिसे उत्पन्न हुआ है, और तत्पश्चात् मरणको प्राप्त होकर मनुष्य होता हुआ सर्वलघु कालमें अन्यन्तर लिंगके साथ क्षपणामें उद्यत होता है उसके जब तक सर्वसक्रम द्वारा पुरुषवेद संक्रान्त होता है तब तक पुरुपवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। छह नोकपायोंका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणिकर्माशिक सर्वलघु कालमें क्षपणामें उद्यत होकर जब सर्वसंक्रम द्वारा छह नोकपायोंकी अन्तिम फालिको संक्रान्त करता है तब उसके उनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। संज्वलन क्रोधका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो ईशान फल्पके देवोंमें नपुंसक १ अ-काप्रत्योः 'वासाउएसो' इति पाठः। २ पुरिसवेदस्स उक्करसओ पदेससंकमो कस्स १ गुणिदकम्मंसिओ इस्थि-पुरिस-गqसयवेदे पूरेदूण तदो सव्वलहुं खवणाए अन्भुट्टिदो, पुरिसवेदस्स अपच्छिपट्टिदिखंडयं चरिमसमयसंछुहमाणयत्स तस्स पुरिसवेदत्स उकस्सओ पदेससंकमो। क. पा. सु. पृ. ४०४, ३६-३७. वरिसवरित्थि पूरिय सम्मत्तमसंखवासिये लहियं । गंता मिच्छत्तमओ जहन्नदेवटिई भोच्चा ॥ आगंतु लहुं पुरिसं संछुभमाणस्स पुरिसवेयस्स । क. प्र. २, ८६-८७. "वर्षवरो नपुंसकंवेदः । मलय. छ. से. ५४ ४२६ छक्खंडागमे संतकम्म पूरिय, असंखेजवासाउएसु इत्थिवेदं पूरिय, पुणो इत्थिवेदे पडिवुण्णे सम्मत्तं लहिय तदो पुरिसवेदो पूरिदो, पुणो पुरिसवेदे पडिवुण्णे मिच्छत्तं गदो, तदो मदो जहणियाए देवहिदीए उववण्णो, तदो चुदो मणुस्सेसु अट्ठवस्सिएसु उववण्णो, अवस्सिएण जादेण संजमो पडिवण्णो, अंतोमुहुत्तेण खवणाए अब्भुद्विदो, तदो तेण जावे कोधो सव्वसंकमेण संकामिदो ता तस्स उकस्सओ पदेससंकमो। एदेणेव जीवेण सव्यसंकमेण माणे संकामिदे माणसंजलणाए उकस्सओ पदेससंकमो । [एदेणेव जीवेण सव्वसंकमेण मायाए संकामिदाए मायासंजलणाए उकस्सओ पदेससंकमो । ] लोहसंजलणाए. उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जेण गुणिदकम्मंसिएण सव्वरहस्सेण कालेण चत्तारिवारं कसाओं उपसामिदो, तेण सव्वलहुएण कालेण खवणाए अब्भुद्विदेण चरिमसमयअक्दअंतरेण वेदको पूर्ण करके. असंख्यातवर्षायुष्कों में स्त्री वेदको पूर्ण करता है, फिर स्त्रीवेदके. पूर्ण हो जानेपर जो सम्यक्त्वको प्राप्त करके तत्पश्चात् पुरुषवेदको. पूर्ण करता है, फिर पुरुषवेद के पूर्ण हो जानेपर मिथ्यात्वको प्राप्त होकर तत्पश्चात् मृत्युको प्राप्त होता हुआ जघन्य देवस्थितिसे उत्पन्न होता है, वहांसे च्युत होकर जो अष्टवर्षीय मनुष्यों में उत्पन्न हो आठ वर्षका होता हुआ संयमको प्राप्त होकर अन्तर्मुहूर्त कालमें क्षपणामें उद्यत होता है, उसके जब संज्वलन क्रोध सर्वसंक्रम द्वारा संक्रमको प्राप्त होता है तब उसका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। यही जीव जव सर्वसंक्रम द्वारा संज्वलन मानको संक्रान्त करता है तब उसके संज्वलन मानका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। [यही जीव जब सर्वसंक्रम द्वारा संज्वलन मायाको संक्रान्त करता है तब उसके संज्वलन मायाका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। ] संज्वलन लोभका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकर्माशिक सहस्व कालमें चार वार कषाओंका उपशम करके सर्वलघु कालमें क्षपणामें उद्यत होता हुआ जब अकृतअन्तरकरण रहने के अन्तिम समयमें संज्वलन लोभको संक्रान्त १ प्रतिषु 'पडिवणे' इति पाठः । २ अप्रतौ 'तदोः वुच्चदो' इति पाठः। ३ काप्रतौ 'तेणेव जाव', ताप्रतौ 'तेण जावे' इति पाठः । ४ का-ताप्रत्योः 'तावे' इति पाटः । ५ कोहसंजलणस्स उक्कस्सओ पदेससंकमोकस्सी जेण पुरिसवेदो उक्स्सओ संछुद्धो कोधे तेणेय जाधे माणे कोधो सव्वसंकमेण संछुहदि ताधे तस्स कोधस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो। एदरस चेव माण- संजलणस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो काययो, णवरि जाधे माणसंजलणो मायासंजलगे संछुभइ ताधे । एदत्स चेव मायासंजलणस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो कायव्वो, णवरि जाधे मायासंजलगो लोमसंजलगे संछुभइ ताधे । क. पा. सु. पृ. ४०४, ४०-४३. तस्सेव सगे कोहस्स माण-मायाणमवि कसिणो ॥ क. प्र. २-८७. तथा तस्यैव पुरुषवेदोत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमस्वामिनः संज्वलनक्रोधस्य संसारं परिभ्रमता उपचितस्य क्षपणकाले प्रकृत्यन्तरदलिकानां गुणसंक्रमेण प्रचुरीकृतस्य स्वके अत्मीये चरमसंछोभे उत्कृष्टः प्रदेशसंक्रमो भवति । अत्रापि बन्धव्यवच्छेदादर्वाक् आवलिकाद्विकेन कालेन यद् बद्धं तन्मुक्त्वा शेषस्य चरमसंछोभे उत्कृष्टः प्रदेशसंक्रमो दृष्टव्यः । एवं मान- माययोरपि वाच्यम् । मलय. ६ अकाप्रत्योः 'कसाय', तापतौ 'कसायं' इति पाठः । ७ अ-काप्रत्योः 'अकड़.' इति पाटः ।

संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४२७ ४ जावे लोभो संकामिदो ता तस्स उकस्सओ पदेससंकमो । आउआणं चदुण्णं पि णत्थि पदेससंकमो। णिरयगइ-णिरयगइपाओग्गाणुपुब्बीणं उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जो गुणिदकम्म्मंसियो पुत्रकोडिपुधत्तं मणुस्स-तिरिक्खे बंधंतो अच्छिदी, पच्छा खवणाए अब्भुट्टिदो, तदो तेण जाधे सव्वसंकमेण णिरय- गइ-णिरयगइपाओग्गाणुपुवीणं चरिमफालीयो संकामिदाओ ताधे तेसिमुक्कस्सओ पदेससंकमों। तिरिक्खगइ-तिरक्खगइपाओग्गाणुपुचीणं उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जो गुणिदकम्मंसिओ सत्तमादो पुढवीदो उव्यट्टिदो, समयाविरोहेण मणुस्सेसु उववण्णो, - करता है तब उसके संज्वलन लोभका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। चारों ही आयुकर्मों का प्रदेशसंक्रम नहीं होता। नरकगति और नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वीका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकर्माशिक पूर्वकोटिपृथक्त्व काल तक बन्ध करता हुआ मनुष्य व तिर्यंचोंमें स्थित रहता है, पश्चात् क्षपणा में उद्यत होकर जब वह सर्वसंक्रम द्वारा नरकगति और नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वीको अन्तिम फालियोंको संक्रान्त करता है तब उसके उन दोनों प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। तिर्यग्गति और तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वीका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकांशिक सातवीं पृथिवीसे निकलकर और समयांविरोधसे मनुष्योंमें उत्पन्न होकर १.का-ताप्रत्योः 'जावे' इति पाठः। २ कापतो तावे' इति पाठः । ३ लोभसंजलणस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स १ गुणिदकम्मंसिओ सव्वलहुँ खवणाए अन्भुद्विदो अंतर से काले कादूण लोहस्स असंकामगो होहिदि त्ति तस्स लोहस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो.। क. पा. सु. पृ. ४०५, ४४-४५. चउरुवसमितु खिप्पं लोभ-जसाणं ससंकमस्संते । क. प्र. २, ८८. अनेकभवभ्रमणेन चतुरो वारान् यावन्मोहनीयमुपशमय्य, चतुर्थोपशमनानन्तरं शीघ्रमेव क्षपकश्रेणिं प्रतिपन्नस्य तस्यैव गुणित- कौशस्य स्वसंक्रमस्यान्ते चरमसंछोभे इत्यर्थः, संज्वलनलोभ-यशाकीयोरुत्कृष्टः प्रदेशसंक्रमो भवति । इहोप- शमणि प्रतिपन्नेन सता प्रकृत्यन्तरदलिकानां प्रभूतानां गुणसंक्रमेण तत्र प्रक्षेपात् द्वे अंपि संज्वलनलोभ-यशः- कीर्तिप्रकृती निरन्तरमापूर्येते, तत उपशमश्रेणिग्रहणम् । आसंसारं च परिभ्रमता जन्तुना मोहनीयस्य चतुर एव वारान् यावदुपशमः क्रियते, न पंचममपि वारम्, ततश्चतुरुपशमय्येत्युक्तम् । तथा संज्वलनलोभस्य चरमसंयोभोऽ न्तरकरणचरमसमये दृष्टव्यः, न परतः; परतस्तस्य संक्रमाभावात् , "अंतरकरणम्मि कए चरित्तमोहे णु (णं). पुट्विसंकमण" इति वचनात् । मलय, ४ अ-काप्रत्योः 'मणुरसमणुस्सतिरिक्खे, ताप्रती [ मणुस ] मणुस-तिरिक्खे इति पाठः । ५ पूरित्तु पुवकोडीपुहुत्त संछोमगरस निरयदुगं। क, प्र. २-९०. पूरित्तुत्ति-नरकद्विक नरकगति- नरफानुपूर्वीलक्षणं पूर्वकोटिपृथक्त्वं यावत्पूरयित्वा, सससु पूर्वकोट्यायुष्क तिर्यग्भवेषु भूयो भूयो बध्वेत्यर्थः । ततोऽष्टमभवे मनुष्यो भूत्वा क्षपकणिं प्रतिपन्नोऽन्यत्र तन्नरकद्विकं संक्रमयन् चरमसंक्षोभे सर्वसंक्रमेण तस्योत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमं करोति । मलय. ६ अ-काप्रत्योः 'उवट्टिदो', तापतौ 'उपट्टिदो' इति पाठः । , ४२८ छक्खंडागमे संतकम्म - सबलहुं खवणाए अब्भुट्टिदो, जाधे तेण एदासिं चरिमफाली सव्यसंकमेण संकामिदा ताधे तस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो । मणुसगइ-मणुसगइ-पाओग्गाणुपुब्बीणमुक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जो गुणिद- कम्मंसिओ सत्तमाए पुढवीए अंतोमुहुत्तेण सम्मत्तं पडिवण्यो सच्चणिरुद्ध सेसे मिच्छत्तं गदो, उच्चट्टिदो', तिरिक्खेसुबवण्णो, तस्स पढमसमयतिरिक्खस्स उकस्सी पदेससंकमो । देवगइ-देवगइपाओग्माणुपुच्ची-वेउब्वियसरीर-वेउब्वियसरीरंगोवंग-बंधण-संघादाण- मुक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो मणुस्स-तिरिक्खेसु एदाओ पयडीओ पुव्वकोडिपुधत्तं बंधिय खवणाए अन्भुद्विदो, तस्स जाधे परभवियणामाणं बंधवोच्छेदो जादो, तदो उवरि बंधावलियाए अदिकंताए एदासि पयडीणं उक्कस्सओ पदेससंकमो । सर्वलघु कालमें क्षपणामें उद्यत होता है, वह जब इनकी अन्तिम फालिको सर्वसंक्रम द्वारा संक्रान्त करता है तब इसके उनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। मनुष्यगति और मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वीका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकर्माशिक सातवीं पृथिवीमें प्रारम्भिक अन्तर्मुहूर्त में सम्यक्त्वको प्राप्त होकर सर्वनिरुद्ध अर्थात् आयुमें अन्तर्मुहूर्त शेष रहनेपर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है, फिर वहांसे निकलकर जो तिर्यंचोंमें उत्पन्न हुआ है उसके तिर्यंच होनेके प्रथम समयमें मनुष्यगति और मनुष्यगति- प्रायोग्यानुपूर्वीका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। देवगति, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, वैक्रियिकवन्धन और वैक्रियिकसंघातका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है? जो गुणितकौशिक जीव मनुष्यों व तियंचोंमें इन प्रकृतियोंको पूर्वकोटिपृथक्त्व तक बांधकर क्षपणामें उद्यत होता है, उसके जव परभविक नामकर्मोंकी बन्धव्युच्छित्ति हो जाती है तब उसके पश्चात् बन्धावलीके व्यतीत हाने- पर इन प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदशसंक्रम होता है। १ अ-काप्रत्योः 'उवहिदो' इति पाठः । २ अ-काप्रत्योर्नोपलभ्यते पदमिदम् । ३ सव्वचिरं सम्मत्तं अणुपालिय पूरइत्तु मणुयदुगं । सत्तमखिइनिग्गइए पढमे समए नरदुगरस ।। क. प्र. २-९१. सव्वचिरं ति- सव्वचिरं सर्वोत्कृष्टं कालं अन्तर्मुहूर्तानानि त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणीत्यर्थः । सम्यक्त्वमनुपाल्य नारकः सप्तमक्षितौ वर्तमानः सम्यक्त्वप्रत्ययं तावन्तं कालं मनुजद्विकं मनुजगति-मनुजानु- पूर्वीलक्षणमापूर्य बद्ध्वा चरमेऽन्तर्मुहूर्ते मिथ्यात्वं गतः । ततस्तन्निमित्तं तिर्यग्द्विकं तस्य बनतो गुणित कौशस्य सप्तमपृथिव्याः सकाशाद् विनिर्गतस्य प्रथमसमये एव मनुजद्विकं यथाप्रवृत्तसंक्रमेण तस्मिन् तिर्थन्द्विके बध्यमाने संक्रमयतस्तस्य मनुजदिकस्योत्कृष्टः प्रदेशसंक्रमो भवति । मलय. ४ देवगईनवगस्स य सगबंधतालिगं गंतुं ॥ २ क. प्र. २-९०. तथा देवगतिनवकं देवगति-देवानुपूर्वी- वैक्रियिकसप्तकलक्षणं यदा पूर्वकोटिपृथक्त्वं यावदापूर्याष्टमभवे क्षपकश्रेणिं प्रतिपन्नः सन् स्वकयन्धान्तात् स्वबन्ध- व्यवच्छेदादनन्तरमावलिकामानं कालमतिक्रम्य यशःकीर्ती प्रक्षिपति तदा तस्योत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमो भवति । तदानीं हि प्रकृत्यन्तरदलिकानामपि गुणसंक्रमेण लब्धानां संक्रमावलिकातिकान्तत्वेन संक्रमः प्राप्यत इति कृत्वा । मलय. - संकमाणियोगक्षरे पदेससंकमो ४२९ आहारसरीर-आहारसरीरंगोवंग-बंधण-संघादाणं उकस्सओ पदेससंक्रमो कस्स ? जेण गुणिदकम्मंसिएण एदाहि चदुहि पयडीहि चिरसंचिदाहि चत्तरिवारं कसायो उवसामिदा, तदो तस्स खवणाए असुवियस्स परभवियणामाणं बंधे वोच्छिण्णे आवलिया- दिकंतस्स उकस्सओ पदेससंकमों। ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीर-तदंगोवंग-बंधण-संघादाणं मदिआवरणभंगो। पसत्थ- संठाण-संघडण-सुभगादेज-सुस्सराणमुक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जो गुणिदकस्मंसिओ वेछाबडीयो सम्मत्तमणुपालेयण चदुक्खुत्तं कसाए उत्सामिय खवणाए अन्भुडिदो, तस्स परमवियणामाणं बंधवोच्छेदादो आवलियादिकंतस्स उकस्सओ पदेससंकमो । णवरि वञ्जरिसहसंघडणरस चरिमदेवभवचरिमसमए उक्कस्सओ पदेससंकमो। आहारशरीर, आहारशरीरांगोपांग, आहारशरीरबन्धन और आहारशरीरसंघातका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जिस गुणितकर्माशिक जीवने चिरसंचित इन चार प्रकृतियों के साथ चार वार कपायोंका उपशम किया है और तत्पश्चात् जो क्षपणामें उद्यत हुआ है उसके परभविक नामकर्मोंकी बन्धव्युच्छित्ति हो जानेके पश्चात् आवली मात्र कालके बीतनेपर उक्त चार प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। औदारिक, तैजस व कार्मण शरीर तथा उनके आंगोपांग, बन्धन और संघातकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है । प्रशस्त संस्थान, प्रशस्त संहनन, सुभग, आदेय और सुस्वरका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकर्माशिक दो छयासठ सागरोपम काल तक सम्यक्त्वका पालन करके और चार बार कपायोंको उपशमा करके क्षपणामें उद्यत हुआ है, उसके परभविक नामकर्मोकी बन्धव्युच्छित्ति हो जाने के पश्चात् आवली मात्र कालके वीतनेपर उनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है । विशेष इतना है कि वज्रर्पभनाराचसंहननका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम अन्तिम देवभवके अन्तिम समयमें होता है। १ अ-काप्रत्योः 'कसाय', ताप्रतौ 'कसायया' इति पाठः । २ आहारग-तित्थयरं थिरसममुक्कस्स सम (ग) कालं ॥ क. प्र. २-९२. इयमत्र भावना- आहारसप्तकं तीर्थकरनाम चोत्कृष्टं स्वबन्धकालं यावदापूर्य तत्राहारसप्तकस्य स्वबन्धकाल उत्कृष्टो देशोनां पूर्वकोटी यावत्संयममनुपालयतो यावानप्रमत्तताकालस्तावान् सर्वो वेदितव्यः । मलय, ३ सम्मदिट्टित्स सुभधुवाओ वि। सुभसंघयणजुयाओ बत्तीससयोदहिचियाओ॥ क. प्र.२-८९. सम्यग्दृष्टया शुभध्रुवबन्धिन्यः पंचेन्द्रियजाति-समचतुरस्रसंस्थान-पराघातोच्छ्वास-प्रशस्तविहायोगति-बस-बादर-पर्याप्त-प्रत्येक- सुभग-सुस्वरादेयलक्षणा द्वादशप्रकृतयः शुभसंहननयुता वज्रर्पभनाराचसंहननसहिताः | xxx तथाहि- षट्षष्ठिसागरोपमाणि यावत्सम्यक्त्वमनुपालयन् एता बध्नाति । ततोऽन्तर्मुहूर्त कालं यावत् सम्यग्मिथ्यात्वमनुभूय पुनरपि सम्यक्त्वं प्रतिपद्यते । ततो भूयोऽपि सम्यक्त्वमनुभवन् पट्षष्टिसागरोपमाणि यावदेताः प्रकृतीः बध्नाति । तदेवं द्वात्रिंशदभ्यधिकं सागरोपमशतं यावत् सम्यग्दृष्टिधुंवा आपूर्य, वज्रर्पभनाराचसंहननं तु मनुष्यभवहीनं यथासंभवमुत्कृष्ट कालमापूर्य, ततः सम्यग्दृष्टेधुंवा अपूर्वकरणगुणस्थानके बन्धव्यवच्छेदानन्तर- मावलिकामानं कालमतिकम्य यशाकीर्ती संक्रमयतस्तासामुत्कृष्टः प्रदेशसंक्रमः । मलय.

४३० छक्खंडागमे संतकम्म पसत्थाणं धुवबंधिणामाणं' सम्मत्तद्धा सत्वरहस्सा कायव्या, अण्णहा गुणिदत्तो- णुववत्तीदो। चदुक्खुत्तं कसाए उवसामेदूण खवणाए अब्भुढिदो तस्स परभविय- णामबंधवोच्छेदादो आवलियादिकंतस्स उकस्सओ पदेससंकमो । एवं थिर-सुभाणं । परघादुस्सास-पसत्थविहायगइ-तस-बादर-पजत्त-पत्तेयसरीराणे सुहणामभंगो। जसकित्तीए सुहणामभंगो। णवरि परमवियणामाणं बंधवोच्छेदस्स चरिमसमए उकस्सओ पदेस- संकमो मायव्यो। एइंदिय-आदाव-थावरणामाणं उक्कस्सओ पदेससंकयो कस्स ? जो गुणिदकम्मंसिओ ईसाणदेवे पच्छायदो साई पि अणुवसामिदकसाओ सव्यलहुं खवणाए अन्भुद्विदो, तस्स चरिमसमयसंछुहमाणयस्स उकस्सओ पदेससंकमो। उजोवणामाए वि ईसाणदेव- पच्छायदे खरगे सव्यसंकमेण संकातए उक्कस्ससामित्तं दादव्वं । किं कारणं ? तसजादि- णामाओ बहुआओ पयडीओ बंधदि, एइंदियजादिणामाओ थोवाओ बंधदि । तदो गेरइयो तसजादिणामपडिभागं बंधदि उज्जोवणाम, ईसाणंदेवा पुणे तं चेव एइंदिय- प्रशस्त ध्रुवबन्धी नामकोका सम्यक्त्वकाल सबसे ह्रस्व करना चाहिये, क्योंकि, इसके विना गुणितत्व बन नहीं सकता । चार बार कषायोंको उपशमा कर जो क्षपणामें उद्यत होता है उसके परभविक नामकर्मोंकी बन्धव्युच्छित्तिके पश्चात् आवली मात्र कालके वीतनेपर उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। इसी प्रकार स्थिर और शुभ प्रकृतियोंके विषयमें कहना चाहिये। परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, बस, बादर, पर्याप्त और प्रत्येकशरीकी प्ररूपणा शुभ नामकर्मके समान है। यशकीर्तिकी भी प्ररूपणा शुभ नामकर्मके समान है। विशेषता इतनी है कि उसका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम परभविक नार्मोको बन्धव्युच्छित्तिके अन्तिम समयमें करना चाहिये। एकेन्द्रिय, आतप और स्थावर नामकर्मोंका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकर्माशिक ईशान देव देवपर्यायसे पीछे आकर एक बार भी कपायोंको न उपशमा कर सर्वलघु कालमें क्षपणामें उद्यत होता है उसके निक्षेपण करते हुए अन्तिम समयमें उनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है । ईशानकल्पगत देवपर्यायसे पीछे आकर सवसंक्रमके द्वारा उद्योत नामकर्मका संक्रमण करनेवाले क्षपकके उसके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका स्वामित्व देना चाहिये । शंका-इसका करण क्या है ? समाधान-सजाति नामकर्मोको बहुत बांधता है और एकेन्द्रियजाति नामकर्माको स्तोक बांधता है । इसलिये नारक जीव उद्योत नामकर्मको सजाति नामकमके प्रतिभाग रूप वांधता है, परन्तु ईशान देव उसको ही एकेन्द्रियजाति नामकर्मके प्रतिभाग रूप वांधते हैं। १ प्रतिषु 'धुवबंधविणामाणं इति पाठः । २ अप्रतौ 'शुणदत्ता', ताप्रतौ 'गुण (णि) दत्ता-', इति पाठः । ३ थावर-तजा-आयावुजोयाओ नपुंसगसमाओ। क. प्र. २, ९२. ४ ताप्रती 'पयडिभाग' इति पाठः। ताप्रतौ 'बंधदि, उज्जोवणामं ईसाणदेवा, पुण' इति पाठः ।

3 संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४३१ जादिणामपडिभाग बंधदि । एदेण कारणेण ईसाणदेवपच्छायदे उकस्ससामित्तं दादव्वं । अप्पसत्थसंठाण - अप्पसत्थसंघडण - अप्पसत्थवण्ण-गंध-रस-फास - उपधाद-अप्प- सत्थविहायगइ-णीचागोद-अथिर - असुह-दूभग-दुस्सर-अणादेज-अजसगित्तीणं उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जो परइयो गुणिदकम्मसियो सत्तमादो पुढवीदो उच्चट्टिदो, सव्वरहस्सेण कालेण खवणाए. अब्भुट्टिदो, तस्स चरिमसमयसुहुमसांपराइयस्स उकस्सओ पदेससंकमो' । वेइंदिय-तेइंदिय-चउरिदिय-सुहुम-अपजत्त-साहारणाणं उके० कस्स ? तिरिक्ख-मणुस्सेसु पुब्बकोडिपुधत्तं वियट्टिदूण कसाए अणुवसामिय सव्वलहुं जो खवेदि, तस्स चरिमसमयसंछोहयस्स उकस्सओ पदेससंकमो। णवरि अपजत्तयस्स सुहुमसांपराइय- चरिमसमए। उच्चागोदस्स उकस्सओ पदेससंकमो कस्स ? जो गुणिदकम्मंसिओ चदुक्खुत्तं कसाए उवसामेऊण मिच्छत्तं गदो, तदो चरिमस्स णीचागोदबंधयस्स पढमसमए रहस्सेण कालेण सिज्झिहिदि ति उच्चागोदस्स उकस्सओ पदेससंकमों । एवमुक्कस्स- सामित्तं समत्तं इस कारण ईशानगत देवपर्यायसे पीछे आये हुए जीवके उद्योत नामकर्मके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका स्वामित्व देना चाहिये। अप्रशस्त संस्थान, अप्रशस्त संहनन, अप्रशस्त वर्ण, गन्ध, रस व स्पर्श, उपघात, अप्रशस्त विहायोगति, नीचगोत्र, अस्थिर, अशुभ, दुभंग, दुस्वर, अनादेय और अयश कीर्ति; इनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकांशिक नारकी जीव सातवीं पृथिवीसे निकलकर सर्वलघु कालमें क्षपणामें उद्यत होता है उस अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिकके उक्त प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है । द्वीन्द्रिय, ब्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण नामकर्मोका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो तिर्यंचों और मनुष्यों में पूर्वकोटिपृथक्त्व तक विचरण करके कपायोंको न उपशमा कर सर्वलघु कालमें क्षपणा करता है उसके संक्रम करते हुए अन्तिम समयमें उनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। विशेप इतना है कि अपर्याप्त नामकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम सूक्ष्मसाम्परायिकके अन्तिम समयमें होता है । उच्चगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकांशिक चार वार फपायोंको उपशमा कर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है, तत्पश्चात् [ नीचगोत्रको वांधता हुआ नीचगोत्रकी वन्धुव्युच्छित्तिके पश्चात् ] थोड़े ही काल में सिद्धिको प्राप्त होनेवाला है उस अन्तिम समयवर्ती नीचगोत्रबन्धके उक्त अल्प सिद्धिकालके प्रथम समयमें उच्चगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। इस प्रकार उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रस स्वामित्व समाप्त हुआ। १ कामचउक्के असुभाण बज्झमागीण सुहुम (खवग) रागते । क. प्र. २, ८०. २ काप्रतौ 'साहारणाणं कुदो उक्क०' इति पाठः । ३ अ-काप्रत्योः 'चदुक्खेत्ते', ताप्रती 'चदुक्खे (खु) तं इति पाठः । ४ च उरुवसमित्तु मोहं मिच्छत्तगयरस नीयधंतो। उच्चागोउक्कोसो तत्तो | उच्चागोउक्कोसो तत्तो लहु सिज्झओ होइ ।। क, प्र. २, ९३. चतुष्कृत्वश्च. मोहोपशमः किल भवद्वयेन भवति । ततस्तृतीये भवे मिथ्यात्वं गतः सन् नीचेगोत्र बन्नाति । तच्च बध्नन् तत्रोचैर्गोत्रं संक्रमयति । ततः पुनरपि सम्यक्त्वमासाद्योच्चैगोत्रं बध्नन् तत्र ?

४३२ छक्खंडागर्म संतकम्म एत्तो जहणयं पदेससंकमस्स सामित्तं । तं जहा- मदिआवरणस्स जहण्णपदेस- संकामओ को होदि ? जो अभवसिद्धियपाओग्गेण सव्वजहण्णसंतकम्मेण चदुक्खुत्तो कसाए उवसामेदूण संजमासंजमं संजमं च बहुसो लभ्रूण उप्पण्णोहिणाणो संतो खवेदि, तस्स चरिमसमयसुहुमसांपराइयस्स जहण्णओ पदेससंकमो । सुद-मणपञ्जव-केवल- णाणावरणाणं मदिआवरणभंगो । एवं ओहिणाणावरणस्स वि । णवरि खर्वतस्स ओहि- णाणं णत्थि तिवत्त व्यं चक्खु-अचक्खु-केवलदसणावरणाणं मदिआवरणभंगो। ओहिदसणावरणस्स ओहि- णाणावरणभंगो । णिहा-पयलाणं सुदावरणभंगो। णवरि णिहा-पयलाणं जहण्णसंकमो ओहिणाणिस्स चेव होदि त्ति णियमो णस्थि । णिद्दा-पयलाणं बंधवोच्छेदस्स चरिमसमए चेव जहण्णसंकमो दायन्यो । थीणगिद्धितियस्स जहण्णपदेससंकमो कस्स ? जो खविद- अब यहां जघन्य प्रदेशसंक्रमके स्वामित्वकी प्ररूपणा की जाती है। यथा- मतिज्ञाना- वरणका जघन्य प्रदेश संक्रामक कौन होता है ? जो अभव्यसिद्धिक प्रायोग्य सर्वजघन्य सत्कर्मके साथ चार वार कषायोंको उपशमा कर और बहुत बार संयमासंयम एवं संयमको प्राप्त करके उत्पन्न हुए अवधिज्ञानसे संयुक्त होता हुआ क्षपणा करता है उस अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्म- साम्परायिकके मतिज्ञानाबरणका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। श्रुतज्ञानावरण, मनःपर्ययज्ञानावरण और केवलज्ञानावरणकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है। अवधिज्ञानावरणकी भी प्ररूपणा इसी प्रकार ही है। विशेष इतना है कि क्षपणा करते हुए उसके अवधिज्ञान नहीं होता, यह कहना चाहिये। चक्षु, अचक्षु और केवलदर्शनावरणकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है। अवधिदर्शनावरणकी प्ररूपणा अवधिज्ञानावरणके समान है। निद्रा और प्रचलाकी प्ररूपणा श्रुतज्ञानावरण के समान है। विशेप इतना है कि निद्रा और प्रचलाका जघन्य संक्रम अवधि- ज्ञानीके ही होता है, ऐसा नियम नहीं है । निद्रा और प्रचलाके जघन्य संक्रमको बन्धव्युच्छेदके अन्तिम समय में ही देना चाहिये । स्त्यानगृद्धित्रयका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसक होता नीचैर्गोत्रं संक्रमयति । एवं भूयो भूय उच्चैर्गोत्रं नीचैर्गोत्रं च बनतो नीचैर्गोत्रबन्धव्यवच्छेदानन्तरं शीघ्रमेय सिद्धिं गन्तुकामस्य नीचैर्गोत्रबन्धचरमसमये उच्चैर्गोत्रस्य गुणसंक्रमणेन वन्धन चोपचितीकृतस्योत्कृष्टः प्रदेश- संक्रमो भवति । मलयगिरि. १ आवरणमत्तगम्मि उ सहोहिणा तं विणोहिजुयलम्मि । क.प्र.२, ९७.२ अ-काप्रत्योः 'ओहिदसणाचरण- भंगो' इति पाठः । ३ मप्रतिपाठोऽयम् | अ-काप्रत्योः 'वोच्छेदो हस्स', तापतौ 'वोच्छेदे हस्स' इति पाटः । ४ निद्दादुगंतराइय-हासचउक्के व वर्धते ॥ क. प्र. २, ९७. निद्राद्विकं निद्रा-प्रचलारूपं, अन्तरायपंचकं हास्यचतुष्कं हास्य-रति-भय-जुगुप्सालक्षणं, एतासामेकादशप्रकृतीनां (११) स्वबन्धान्तसमये यथाप्रवृत्तसंक्रमण जघन्यः प्रदेशसंक्रमो भवति । निद्राद्विक-हात्यचतुष्टययोर्वन्धव्यवच्छेदानन्तरं गुणसंक्रमेण संक्रमो जायते । ततः प्रभूतं दलिकं लभ्यते । अन्तरायपञ्चकस्य (तु) बन्धव्यवच्छेदानन्तरं संक्रम एव न भवति, पतद्ग्रहाप्राप्तः, ततो वन्धान्तसमयग्रहणम् । मलय, संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४३३. ? कम्मंसियलक्खणेणागतूण संजम पडिवण्णो, सव्वजहण्णमंतोमुहुत्तावसेसे संसारे चरिम- समयअधापवत्तकरणो जादो, ताधे तस्स जहण्णगो पदेससंकमो। सादस्स जहण्णपदेससंकमो कस्स ? जो अभवसिद्धियपाओग्गेण जहण्णेण संत- कम्मेण कसाए अणुवसामेदूण खवेदि, तस्स जाधे चरिमो असादवंधो तस्स बंधस्स चरिमसमए सादस्स जहण्णओ पदेससंकमो । असादस्स जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? जो जहण्णेण संतकम्मेण चदुक्खुत्तो कसाए उवसामयूण खवेदि, तस्स अधापवत्तकरण- चरिमसमयम्हि जहण्णगो पदेससंकमो । मिच्छत्तस्स जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? जो जहण्णेण संतकम्मेण वेछावट्ठीओ सम्मत्तमणुपालेयूण, चदुक्खुत्तो कसाए उत्सामिय, संजमं संजमासंजमं च बहुसो लभ्रूण, सव्वमहंति सम्मत्तद्धमणुपालेण अंतोमुहुत्तेण सिज्झिहिदि त्ति दंसणमोहणीयं खवेदि, तदो दंसणमोहक्खवगअधापवत्तकरणस्स चरिमसमए जहण्णओ पदेससंकमो । सम्मत्त- है ? जो क्षतिकर्माशिक स्वरूपसे आकर संयमको प्राप्त हो सर्वजघन्य अन्तर्मुहूत मात्र संसारके शेप रहनेपर अन्तिम समयवर्ती अधःप्रवृत्तकरण हुआ है उसके उस समय स्त्यानगृद्धित्रयका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। सातावेदनीयका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो अभव्यसिद्धिक प्रायोग्य जघन्य सत्कर्म के साथ कपायोंको न उपशमा कर क्षय करता है, उसके जब असातावेदनीयका अन्तिम बन्ध होता है तब उस बन्धके अन्तिम समयमें सातावेदनीयका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है । असातावेदनीयका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो जघन्य सत्कर्म के साथ चार वार कषायोंको उपशमा कर क्षय करता है उसके अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें असातावेदनीयका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो जघन्य सत्कर्मके साथ दो छयासठ सागरोपम तक सम्यक्त्वका पालन कर, चार वार कपायोंको उपशमा कर, संयम और संयमासंयमको बहुत वार प्राप्त कर, तथा सबसे महान् सम्यक्त्वकालका पालन करके अन्तर्मुहूर्त फाल में सिद्ध होनेवाला है, इसीलिये जो दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करता है, उस दर्शनमोहक्षपकके अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। सम्यक्त्व और १ अ-काप्रत्योः 'गंतूण णा संजमं', ताप्रतौ 'गंतूण [णा] संजमं' इति पाठः । २ अयरछावद्विदुगं गालिय थीवेय-थीणगिद्धितिगे । सगखवणहापवत्तस्संत (ते)xxx॥ २,.९९. ३ सायरस णुवसमित्ता असायबंधाण चरिमबंधते । क. प्र. २, ९८. ४ अट्टकसायासाए य असुभधुववधि अस्थिरतिगे य । सव्वलहुँ खवणाए अहापवत्तस्स चरिमम्मि ॥ क. प्र.२,१०२. ५ मिच्छत्तस्स जहणओ पदेससंकमो कस्स ? खविदकामंमिओ एइंदियकम्मेण जहण्णएण मणुसेसु आगदो सव्वलहुं चेव सम्मत्तं पडिवण्णो संजमं संजमासंजमं च बहुसो लभिदाउगो चत्तारिवारे कसाए उवसामित्ता वे छावद्वि-सागरोवमाणि सादिरेयाणि सम्मत्तमणुपालिदं । तदो मिच्छत्तं गदो अंतोमुहुत्तेण पुणो तेण सम्मत्तं लद्धं । पुणो सागरोवमधत्तं सम्मत्तमणुपालिदं । तदो दसणमोहणीयक्खवणाए अन्भुट्टिदो | तस्म चरिमममयअघापवत्त- करणरस मिच्छत्तस्स जहष्णो पदेससंकमो। क. पा. तु. पृ. ४०५, ४८-४९. 'एमेव मिच्छत्त इति' एवमेव छ. से. ५५ ?

४३४ छक्खंडागमे संतकम्म सम्मामिच्छत्ताणं जहण्णओ पदेससंक्रमो कस्स ? जेण जहणणेण मिच्छत्तसंतकम्मेण सम्मत्तमुप्पाइदं, जहण्णण गुणसंकरण जहण्णपूरणकालेण च सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणि पूरिदाणि, तदो बे-छावट्ठीयो सम्मत्तमणुपालेदण मिच्छत्तं गदो, सचमहंतेण उब्वेल्लण- कालेण उव्वेल्लेदि, तदो दुचरिमस्स उव्वेल्लणखंडयस्स चरिमसमए सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं जहण्णाओ पदेससंकमो'। अणंताणुबंधीणं जहण्णगो पदेससंकमो कस्स ? अभवसिद्धियपाओग्गेण जहण्णेण संतकम्मेण चदुक्खुत्तो कसाए उवसामेदूण तदो अणताणुबंधिविसंजोइदं संजोइदं कादूर्ण सचमहति सम्मत्तद्धमणुपालेदूण तदो विसंजोयणं गदो, विसंजोयणाए अधापवत्तकरणस्स चरिमसमए अणंताणुबंधीणं जहण्णओ पदेससंकमो । अट्टण्णं कसायाणं जहण्णओ 'सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जिसने मिथ्यात्वके जघन्य सत्कर्मके साथ सम्यक्त्वको उत्पन्न कर लिया है तथा जघन्य गुणसंक्रम और जघन्य पूरणकालके द्वारा सम्यक्त्व एवं सम्यग्मिथ्यात्वको [मिथ्यात्वके प्रदेशाग्रसे] पूर्ण किया है, तत्पश्चात् जो दो छयासठ सागरोपम काल तक सम्यक्त्वका परिपालन करके मिथ्यात्वको प्राप्त होता हुआ सबसे महान् उद्वेलनकालके द्वारा उद्वेलना करता है उसके द्विचरम उद्वेलनकाण्डकके अन्तिम समयमें सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। अनन्तानुबन्धी कषायोंका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? अभव्यसिद्धिक प्रायोग्य जघन्य सत्कर्मके साथ चार वार कपायोंको उपशमा कर तत्पश्चात् [मिथ्यात्वको प्राप्त होकर अल्प काल तक विसंयोजित ] अनन्तानुबन्धीको संयोजित करके जो सवसे महान् सम्यक्त्वकालका पालन करते हुए विसंयोजनको प्राप्त हुआ है, उसके विसंयोजन करते हुए अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें अनन्तानुवन्धी कषायोंका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है । आठ कपायोंका जघन्य पूर्वोक्तप्रकारेण मिथ्यात्वस्य जघन्यप्रदेशसंक्रमोऽवगन्तव्यः । तद्यथा- द्वे षट्षष्टी सागरोवमाणां यावत्सम्यक्त्व- मनुपाल्य तावन्तं कालं मिथ्यात्वं गालयित्वा किंचिच्छेषस्य मिथ्यात्वस्य क्षपणाय समुद्यतस्य स्वकीययथाप्रवृत्त- करणान्तसमये वर्तमानस्य विध्यातसंक्रमेण मित्थात्वस्य जघन्यः प्रदेशसंक्रमो भवति, परतो गुणसंक्रमः प्रवर्तते, तेन स न प्राप्यते । क. प्र. (मलय.) २, ९९. १ सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? एसो चेव जीवो मिच्छत्तं गदो। तदो पलिदो- वमस्स असंखेनदिमागं गंतूण अप्पप्पणो दुचरिमद्विदिखंडय चरिमसमयउव्वेल्लमाणयरस जघण्णयो पदेससंकमो । क. पा. सु. पृ. ४०७, ४९-५०हस्सगुणसंकमद्धाए पूरयित्ता समीस-सम्मत्तं । चिरसंमत्ता मिच्छत्तगयरसुव्बलग- थोगो सिं ॥ क. प्र. २, १००, २ तापतौ 'अर्णताणुबंधिविसंजोइदं कादूण' इति पाठः । ३ अणताणुबंधीणं जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? एइंदियकम्मेण जहण्णएण तसेसु आगदो । संजमं संजमा. संजमं च बहुसो लभ्रूण चत्तारि वारे कसाए उत्सामित्ता तदो एइंदिए सु पलिदोवमस्स असंखेनदिमागमच्छिद जाव उवसामयसमयपत्रद्धा णिग्गलिदा ति । तदो पुणो तसेसु आगदो सबलहुं सम्मत्तं लद्धं अणताणुबंधिणी च संकमाणियोगद्दारे पदेससंक्रमो ४३५ पदेससंकमो कस्स १ जो जहण्णसंतकम्मेण चदुक्खुत्ते कसाए उवसामेयूण खवेदि, तदो खवणाए अधापवत्तकरणस्स चरिमसमए वट्टमाणस्स तेसिं जहण्णओ पदेससंकमो । एवमरदि-सोगाणं । हस्स-रदि-भय-दुगुंछाणं पि एवं चेव । णवरि आवलियअपुब्ध- करणस्स । तिणि संजलण-पुरिसवेदाणं जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? उवसामयस्स अपच्छिमसमयपबद्धं घोलमाणजहण्णजोगेण बद्धं अपच्छिमसंकामयंतस्स जहण्णओ पदेससंकमो । लोहसंजलणाएँ जहण्णओ पदेससंकमो] कस्स ? जो जहण्णएण संतकम्मेण कसाए अणुवसामेपूण खवेदि तस्स अपुन्यकरणस्स आवलियपवितुस्स लोभसंजलणाए प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो जघन्य सत्कर्मके साथ चार वार कषायोंको उपशमा कर क्षपणा करता है और तत्पश्चात् क्षपणा करते हुए जो अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें वर्तमान है उसके उनका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। इसी प्रकार अरति और शोकके जघन्य प्रदेशसंक्रमका कथन करना चाहिये। हास्य, रति, भय और जुगुप्साके भी जघन्य प्रदेशसंक्रमकी प्ररूपणा इसी प्रकार करना चाहिये । विशेष इतना है कि इनका जघन्य प्रदेशसंक्रम आवली कालवर्ती अपूर्वकरणके होता है। तीन संज्वलन और पुरुषवेदका जघन्य प्रदेसंक्रम किसके होता है ? जो घोलमान जघन्य योगके द्वारा वांधे गये अन्तिम समयप्रवद्धका संक्रम कर रहा है ऐसे उपशामक जीवके संक्रमके अन्तिम समयमें उन चार प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। [ संज्वलन लोभका जघन्य प्रदेशसंक्रम] किसके होता है ? जो जघन्य सत्कर्म के साथ कपायांका उपशम न करके क्षय करता है उस आवली विसंजोइदा । पुणो मिच्छत्तं गतूण अंतोमुहुत्तं संजोएदूण पुणो तेग सम्मत्तं लद्धं । तदो सागरोवमवेछावट्ठीओ अणुगलिदं । तदो विसंजोएदुमाढत्तो। तस्स अधापवत्तकरणचरिमसमए अणंताणुबंधोणं जहण्णओ पदेससंकमो । क. पा. सु. पृ. ४०७, ५१-५२. संजोयणाण चतुरुवसमित्तु संजोजइत्तु अप्पद्धं । अयरच्छावहिदुगं पालिय सकहप्पवत्तंते ॥ क. प्र. २, १०१. १ अट्ठण्हं कसायाणं जहण्णमओ पदेससंकमो कस्स ? एइंदियकम्मेण जहण्णएण तसेसु आगदो संजमा- संजमं संजमं च बहुसो गदो । चत्तारि वारे कसाए उवसामित्ता तदो एइंदिएसु गदो । असंखेनाणि वस्साणि अच्छिदो जाव उवसामयसमयपबद्धा णिग्गलंति । तदो तसेसु आगदो संजमं संबलहुं लद्धो। पुणो कसाय- क्खवणाए उवहिदो । तस्स अधापवत्तकरणस्स चरिमसमए अट्टण्हं कसायाणं जहण्णओ पदेससंकमो । क. पा. सु. पृ. ४०८, ५३-५४. अढकसायासाए य असुमधुवनंधि अथिरतिगे य । सव्वलहुं खवणाए अहापवत्तस्स चरिमम्मि ॥ क.प्र. २, १०२. २ असारण समा अरई य सोगो य ॥ क, प्र. २, १०३. ३ हस्स-रइ-भय-दुगुंछाणं पि एवं चेव, णवरि अपुवकरणस्सावलियपविठ्ठरस । क. पा. सु. पृ. ४०७, ५६. ४ कोहसंजलणरस जहण्णओ पदेससंकमो करस ? उवसामयस्स चरिमसमयपबद्धो जाधे उवसामिजमाणो उपसंतो ताधे तस्स फोहसंजलणस्स जहण्गओ पदेससंकमो । एवं माण-मायासंजलग-पुरिसवेदाणं । क. पा. तु. पृ. ४०८, ५७-५९. पुरिसे संजलगतिगे य घोलमाणेग चरमबद्धस्स । सगअंतिमे xxx ॥ क. प्र. २, १०३. ५ तापतो 'बद्धं अपच्छिमसंकामयंतस्स । [लोभसंजलगाए' इति पाठः ।

४३६ छक्खंडागमें सन्तकम्म जहण्णओ पदेससंकमो'। इस्थिवेदस्स जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? जो जहण्णसंतकम्मेण बे-छावडीओ सम्मत्तमणुपालिय चदुक्खुत्तो कसाए उत्सामिय तदो खतस्स अधापवत्तकरणस्स चरिमसमए इस्थिवेदस्स जहण्णओ पदेससंकमा । णqसयवेदस्स इथिवेदभंगो। णवरि पुव्वं चेव तिपलिदोवमिएसु उप्पाइय अवसाणे सम्मत्तं घेत्तूण वे-छावट्ठीयो हिंडावेयव्यो । आउआणं णत्थि संकमो। णिरयगइणामाए जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ! जो उच्वेल्लिदेण कम्मेण अंतोमुहत्तं संजोएदूण सत्तमपुढविं गदो, तदो उव्यट्टिदो संतो अणंताणुबंधीणं एत्तदो(१) तदो एइंदिएसु जीवेसु महंतेण उव्वेल्लणकालेण उव्वेल्लमाणस्स जं दुचरिमद्विदिखंडयं तस्स चरिमसमए णिरयगइणामाए जहण्णओ पदेससंकों । देवगईए णिरयगइभंगो । कालवर्ती अपूर्वकरणके संज्वलन लोभका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। स्त्रीवेदका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो जघन्य सत्कर्मके साथ दो छयासठ सागरोपम काल तक सम्यक्त्वको पालकर और चार वार कषायोंको उपशमा कर फिर क्षय करने में प्रवृत्त होता है उसके अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें स्त्रीवेदका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है । नपुंसकवेदकी प्ररूपणा स्त्रीवेदके समान है । विशेष इतना है कि पहिले ही तीन पल्योपम आयुवालों में उत्पन्न कराकर अन्त में सम्यक्त्वको ग्रहण करके दो छयासठ सगरोपम तक घुमाना चाहिये। आयु कोका संक्रम नहीं होता । नरकगति नामकर्मका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो उद्वेलित कर्मके साथ अन्तर्मुहूर्त काल संयुक्त होकर सातवीं पृथिवीको प्राप्त हुआ है, तत्पश्चात् वहांसे निकलकर [ पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में उत्पन्न हो अल्प काल उसका बन्ध करके ] फिर एकेन्द्रिय जीवों में महान उद्वेलनकाल द्वारा उद्वेलना कर रहा है उसका जो द्विचरम स्थितिकाण्डक है उसके अन्तिम समयमें नरकगति नामकर्मका जघन्य प्रवेशसंक्रम होता है। देवगति नामकर्मकी प्ररूपणा नरकगतिके समान है। १ लोहसंजणस्स जहण्णो पदेससं कमो कस्स १ एइंदियकम्मेण जहण्णएण तसेसु आगदो संजमासंजमं संजमं च बहुसो लळूण कसाएसु किं पि णो उवसामेदि । दीहं संजमद्धमणुपालिदूण खवणाए अन्भुहिदो तरस अपुवकरणस्स आवलियपविट्ठस्स लोहसंजलगस्स जहण्णओ पदेससंकमो। क. पा. सु. पृ. ४०९, ६०-६१. खवणाए लोमस्स वि अपुरकरणालिगाअंते ॥ क. प्र. २, ९८. २ क. पा. स. पृ. ४१०, ६४. ३ अप्रतौ 'वेछावडिं', काप्रतौ 'वेछावटि' इति पाठः। ४ क. पा. सु. पृ. ४०९, ६२-६३. ५ अप्रतौ 'उवहिदो', काप्रतौ 'उज्वेलिदो' इति पाठः । ६ अप्रती 'जीवेसु हत्तेण, काप्रती 'जीवेसु सुहत्तेण', ताप्रती 'जीवेसु हत्तेण ( महंतेण )' इति पाठः । ७ वेउन्वि(वे)कारसगं उवलियं वंधिऊग अप्पद्धं । जिटिई निरयाओ उघट्टित्ता अघित्त । थावरगवरस चिरउन्बलगो(a)xxxक.प्र.२, १०४-५, वेउविचि- देवद्विक-नरकद्विक-वैक्रियिकसप्तकलक्षणं वैक्रियका- दशकं एकेन्द्रियभवे उद्वर्तमानेनोद्वलितं पुनरपि पंचेन्द्रियत्वमुपागतेन सताल्पाद्धमल्पकालं अन्तर्मुहूर्त कालं संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४३७ मणुसगइणामाए जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? जो तेउकाइओ वाउचाइओ वा उव्वेल्लिदमणुमगइणामकम्मो जहणणेण कम्मेण तेउ-बाउवज्जेसु सुहुमेसु खुद्दाभव- गहणमच्छिण संजुत्तो, पुणो तेउजीवे वा वाउजीवे वा गदो तस्स सचमहंतेण उव्वेलण- कालेण मणुमगई उच्वेल्लमाणस्स जं दुचरिमुवेल्लणखंडयं तस्स चरिमसमए जहण्णओ पदेससंकमो'। तिरिक्खगइ-उज्जोवणामाणं जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? जो जहण्णएण संत- कम्मेण मणुसगई गदो, तिपलिदोवमिएसु उववण्णो, अंतोमुहुत्ते सेसे सम्मत्तं लभ्रूण पलिदोवमिओ देवो जादो, तदो अपरिवडिदेण सम्मत्तेण मणुसगदि गदो, पुणो वि अपरिवडिदेण एकत्तीससागरोवमिओ देवो जादो, अंतोमुहत्तववण्णो मिच्छत्वं गदो, तदो तस्स देवभवस्स अंशोमुहुत्तसेसे सम्मत्तं लद्धं, तदो वै-छावद्विसेसा सम्मत्तमणुपालिय, मनुष्यगति नामकर्मका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? मनुष्यगति नामकर्मकी उद्वेलना करनेवाला जो तेजकायिक अथवा वायुकायिक जीव जघन्य कर्मके साथ तेजकायिक और वायुकायिकको छोड़कर शेप सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवोंमें क्षुद्रभवग्रहण काल रहकर उसको बांधता है, फिर तेजकायिक अथवा वायुकायिक जीवोंमें जाकर सबसे महान् उद्वेलनकालके द्वारा मनुष्य- गतिकी उद्वेलना कर रहा है, उसका जो द्विचरम उद्वेलनकाण्डक है उसके अन्तिम समयमें उसका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। तिथंचगति और उद्योत नामकर्मका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो जघन्य सत्कर्म के साथ मनुष्यगतिको प्राप्त होकर तीन पल्योपम प्रमाण आयुवालोंमें उत्पन्न हुआ है, वहां अन्तर्मुहूर्त आयुके शेप रहनेपर सम्यक्त्वको प्राप्त कर पल्योपम प्रमाण आयुवाला देव हुआ, तत्पश्चात् अप्रतिपतित सम्यक्त्वके साथ मनुष्यगतिको प्राप्त हुआ, फिरसे भी अप्रतिपतित सम्यक्त्वके साथ इकतीस सागरोपम प्रमाण आयुवाला देव हुआ, वहां उत्पन्न होनेके पश्चात् . अन्तर्मुहूर्तमें मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ, पश्चात् उस देवभवके अन्तर्मुहूर्त शेप रहनेपर सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ, पश्चात् जो शेष दो छयासठ सागरोपम तक सम्यक्त्वका परिपालन करके चार यावदित्यर्थः । बध्वा, ततो ज्येष्ठस्थितिरुत्कृष्टस्थितिस्त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमस्थितिक इत्यर्थः । सप्तमनरकपृथिव्यां नारको जातः । ततस्तावन्तं कालं यावत् यथायोगं तद्वैकियैकादशकमनुभूय ततो नरकादुद्धृत्य पंचेन्द्रिय- तिर्यक्षु मध्ये समुत्पन्नः। तत्र च तद्वैक्रियकदशकमवध्वा स्थावरेष्वेकेन्द्रियेषु मध्ये समुत्पन्नः। तस्य चिरोद्वलनया पल्योपमासंख्येयभागमात्रेण कालेनोद्वलनया तदुलयतो यत् द्विचरमखण्डस्य चरमसमये प्रकृत्यन्तरे दलिक संक्रामति, स तस्य वैक्रियैकादशकस्य जघन्यः प्रदेशसंक्रमः । मलय. १xxx एयस्स एव उच्चस्स । मणुयदुगस्स य तेउसु वाउसु वा सुहुमबद्धाणं ॥ क. प्र. २, १०५. xxx इयमत्र भावना- मनुजद्विकमुच्चैर्गोत्रं च प्रथमतरतेजोवायुभवे वर्तमानेननोदलितम् , पुनरपि सूक्ष्मैकेन्द्रियभवमुपागतेनान्तर्मुहूर्त यावद् बद्धम्, ततः पंचेन्द्रियभवं गत्वा सप्तमनरकपृथिव्यामुत्कृष्ट स्थितिको नारको जातः । तत उद्धृत्य पंचेद्रियतिर्यक्षु मध्ये समुत्नः। एतावन्तं च कालमबध्वा प्रदेशसंक्रमेण चानुभूय तेजोवायुषु मध्ये समागतः । तस्य मनुजद्विकोच्चैर्गोत्रे चिरोद्वलनयोदल्यतो द्विचरमखण्डस्य चरमसमये परप्रकृती यद्दलं संक्रामति स तयार्जघन्यः प्रदेशसंक्रमः । मलय.

४३८ छक्खंडागमें संतकम्भ चदुक्खुत्तो कसाए उवसामिय, तिस्से उकस्सियाए सम्मत्तद्वाए अंतोमुहुत्ते सेसे खवणाए अब्भुद्विदो, तदो अधापवत्तकरणस्स चरिमसमए तिरिक्खगइ-उजोवणामार्ग जहण्णओ पदेससंको। जहा गईणं तहा तासिमाणुपुब्बीणं पि बत्तव्वं । वेउब्धियसरीर-वेउब्धियसरीर- अंगोवंग-बंधण-संघादाणं णिरयगइभंगो । आहारसरीर-आहारसरीरंगोवंग-बंधण-संघादाणं जहण्णपदेससंकमो कस्स ? जो अभवसिद्धियपाओग्गाणं जहण्णेण कम्मेण पढमदाए जहणियं संजमद्धमणुपालेयूष मिच्छत्तं गदो, तदो तस्स उक्कस्सउज्वेलणकालस्स जं दुचरिममुव्वेल्लणखंडयं तस्स चरिमसमए तेसिं जहण्णओ पदेससंकमो । ओरालियसरीर-ओरालियसरीरंगोवंग-बंधण-संघादाणं जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? जो जहण्णएण कम्मेण तिपलिदोवमिएसु मणुस-तिरिक्खेसु उववण्णो तस्स चरिम- वार कषायोंको उपशमा कर उस उत्कृष्ट सम्यक्त्वकालमें अन्तर्मुहूर्त शेष रहनेपर क्षपणामें उद्यत हुआ है, उसके अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें तिर्यंचगति और उद्योत नामकर्मका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। जैसे गतियों के जघन्य प्रदेशसंक्रमकी प्ररूपणा की गयी है वैसे ही उनकी आनुपूर्वियोंकी भी प्ररूपणा करना चाहिये । वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, वैक्रियिकबन्धन और वैक्रियिक- संघातकी प्ररूपणा नरकगतिके समान है। आहारकशरीर, आहारकशरीरांगोपांग, आहारक- बन्धन और आहारकसंघातका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो अभव्यसिद्धिक प्रायोग्य उक्त प्रकृतियोंके जघन्य सत्कर्म के साथ प्रथमतः जघन्य संयमकालका पालन कर फिर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है, उसके उत्कृष्ट उद्वेलनकालका जो द्विचरम उद्वेलनकाण्डक है उसके चरम समयमें उक्त प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। औदारिकशरीर, औदारिकशरीरांगोपांग, औदारिकबन्धन और औदारिकसंघातका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो जघन्य सत्कर्मके साथ तीन पल्योपम आयुवाले १ तेवढिसयं उदहीणं स चउपल्लाहियं अबंधित्ता। अंते अहप्पवत्तकरणस्स उजोव-तिरियदुगे || क. प्र. २,१०७.xxx कथं त्रिषष्ट्यधिकं सागरोपमाणं शतं चतुःपल्याधिकं च यावद् बध्वेति चेदुच्यते- स क्षपितकर्माशस्त्रिपल्योपमायुष्केषु मनुजेषु मध्ये समुत्पन्नस्तत्र देवद्विकमेव बध्नाति, न तिर्यद्विकं नाप्युद्योतम् । तत्र चान्तर्मुहूर्ते शेषे सत्यायुषि सम्यक्त्वमवाप्य ततोऽप्रतिपतितसम्यक्त्व एव पल्योपमस्थितिको देवो जातः । ततोऽप्यप्रतिपतितसम्यक्त्वो देवभवाच्च्युत्वा मनुष्येषु मध्ये समुत्पन्नः । ततस्तेनैवाप्रतिपतितेन सम्यक्त्येन सहित एकत्रिंशत्सागरोपमस्थितिको अवेयकेषु मध्ये देवो जातः । तत्र चोत्पत्त्यनन्तरमन्तर्मुहूर्तादूचे मिथ्याध्य गतः । ततोऽन्तर्मुहूर्तावशेषे आयुषि पुनरपि सम्यक्त्वं लभते । ततो द्वे पट्पष्टी सागरोपमाणां यावन्मनुष्यानुत्तर- सुरादिषु सम्यक्त्वमनुपाल्य तस्याः सम्यक्त्वाद्धाया अन्तर्मुहूर्ते शेघे शीघ्रमेव क्षपणाय समुद्यतः । ततोऽनेन विधिना त्रिषष्ट्यधिकं सागरोपमाणां शतं चतुष्पल्याधिकं च यावत्तिर्यद्विकमुद्योतं च बन्धरहितं भवतीति । मलय. २ काप्रती 'जेसिं' इति पाठः। ३ हसं कालं बंधिय विरओ आहारसत्तगं गहुँ । अविरह महुव्वलंतरस जा योव उन्चलणा ॥ क. प्र. २, १०६. ।

संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो ४३९ समयतब्भवस्थस्स एदासि पयडीणं जहण्णओ पदेससंकमो'। तेजा-कम्मइयसरीर-तब्बंधण-संघाद-पसत्थवण्ण - गंध-रस - फास-अगुरुअलहुअ- पर. घाद-उवघाद पसस्थविहायगइ-तस-बादर-पञ्जत्त-पत्तेयसरीर-थिर-सुभ-सुभग-सुस्सर-आदेज- जसकित्ति-णिमिणणामाणं जहण्णओ पदेससंकमो कस्सै ? जो कसाए अणुवसामेदूर्ण सेसेहि पयारेहि जहण्णयं संतकम्मं कादूग तदो खवणाए अमुहिदो तस्स आवलिय- अपुवकरणस्स एदासि पयडीणं जहण्णओ पदेससंकमो । पसत्थसंठाण-संघडणाणं कम्मइयभंगो । अप्पसत्थवण्ण-गंध-रस-फास-उबघाद- अथिर-असुह-अजसकित्तीणं जहण्णओ पदेससंकमो कस्स जो जहण्णेण कम्मेण चदु- क्खुत्ते कसाए उवसामेयूण गुणसेडीहि गालिय सबलहुं खवणाए अब्भुढिदो तस्स चरिमसमयअधापवत्तकरणे वट्टमाणस्स जहण्णओ पदेससंकमो। अप्पसत्थसव्वसंठाण- संघडणाणं अप्पसस्थविहायगइ-दूभग-दुस्सर-अणादेज-णीचागोदाणं णqसयवेदभंगों । आदाव-थावर-सुहुम-अपजत्त-साहारणसरीराणं तिरिक्खगइभंगो। णवरि छट्ठीए पुढवीए मनुष्यों या तिर्यंचों में उत्पन्न हुआ है उसके तद्भवस्थ होनेके अन्तिम समयमें इन प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। तैजस व कार्मण शरीर तथा उनके बन्धन व संघात, प्रशस्त वर्ण गन्ध रस व स्पर्श, अगुरुलघु, परघात, उपघात, प्रशस्त विहायोगति, बस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ सुभग, सुस्वर, आदेय, यशकीर्ति और निर्माण नामकर्मोका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो कपायोंका उपशम न करके शेप प्रकारों द्वारा जघन्य सत्कर्म करके तत्पश्चात् क्षपणामें उद्यत हुआ है; उस आवली कालवर्ती अपूर्वकरणके इन प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेश- संक्रम होता है। प्रशस्त संस्थान और प्रशस्त संहननकी प्ररूपणा कार्मणशरीरके समान है। अप्रशस्त वर्ण, गन्ध, रस व स्पर्श, उपघात, अस्थिर, अशुभ और अयशकीर्तिका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो जघन्य सत्कर्मके साथ चार वार कषायोंको उपशमा करके गुणश्रेणियोंके द्वारा गलाकर सर्वलघु कालमें क्षपणामें उद्यत हुआ है, उसके अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें वर्तमान होनेपर उक्त प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। अप्रशस्त सब संस्थानों और संहननोंका तथा अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुस्वर, अनादेय और नीचगोत्रकी प्ररूपणा नपुंसक- वेदके समान है। आतप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणशरीरकी प्ररूपणा तिर्यंचगतिके १ नर-तिरियाण तिपल्लरसते ओरालियस्स पाउग्गा । क. प्र. २, १११.२ काप्रती 'सरीर बंधण', ताप्रती 'सरीर २-बंधण' इति पाठः । ३ 'अ-काप्रत्यो!पलभ्यते पदमिदम् । ४ अप्रती उक्सामेदूग' इति पाठः। ५ छत्तीसाए सुभाणं सेढिमणारुहिय सेसगविहीहिं । कटु जहन्नं खवणं अपुवकरणालिया अंते ॥ क. प्र. २, १०९, ६ अ-काप्रत्योः 'जे' इति पाठः। ७ सम्मद्दिहिअजोग्गाण सोलसण्हं पि असुभपगईणं । थीवेएण सरिसगं नवरं पदमं तिपल्लेतु ॥ क. प्र. २, ११०, ४४० छक्खंडागमे संतकम्म अंते सम्मत्तं घेत्तूण सम्मत्तेण सह णिग्गदो, पुणो सव्वं पिपंचासीदिसागरोवमसदं पूरेदव्वं । एसो तिरिक्खगदीदो एदासिं विसेसो। विगलिंदियजादिणामाणं साहारणसरीरभंगो। उच्चागोदस्स मणुसगइभंगो। तित्थयरणामाए जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? जहण्ण- एण कम्मेण पढमदाए जहण्णजोगेण जो बद्धो समयपबद्धो तमावलियादीदं संकामेंतस्स जहण्णओ पदेससंकमो, चरिमसमयमिच्छाइद्विस्स वा विज्झादेण जहण्णसंकमो । एवं सामित्तं समत्तं । समान है । विशेपता इतनी है कि छठी पृथिवीमें अन्तमें सम्यक्त्वको ग्रहण करके और सम्यक्त्वके साथ निकलकर फिर सभीको एक सौ पचासी सागरोपम तक पूरा करना चाहिये। यह इन प्रकृतियोंके तिर्यंचगतिसे विशेषता है। विशेपार्थ- तिर्यंचगतिके जघन्य प्रदेशसंक्रमकी प्ररूपणामें १६३ सागरोपम और ४ पल्योपम तक उसके वन्धका अभाव निर्दिष्ट किया गया है। परन्तु इन आतप आदि प्रकृतियों के वन्धका अभाव १८५ सागरोपम और ४ पल्य तक रहता है। वह इस प्रकारसे-कोई क्षपित- कौशिक जीव छठी पृथिवीमें २२ सागरोपम आयुवाला नारकी उत्पन्न हुआ। वहां वह आयुमें अन्तर्मुहूर्त शेष रहनेपर सम्यक्त्वको प्राप्त होकर उस अविनष्ट सम्यक्त्व के साथ मनुष्य होता है और वहांपर सम्यक्त्वके साथ संयमासंयमको पालकर फिर सौधर्म स्वर्गमें चार पल्योपम आयुवाला देव उत्पन्न होता है । वहां भी अविनष्ट सम्यक्त्वके साथ देवभवसे च्युत होकर मनुष्य भवको प्राप्त होता हुआ यहां संयमको पालता है और तव मृत्युको प्राप्त हो |वेयकोंमें ३१ सागरोपम प्रमाण आयुवाला देव उत्पन्न होता है। यहां उत्पन्न होनेके अन्तर्मुहूर्त पश्चात् वह मिथ्यात्वको प्राप्त होकर आयु में अन्तर्मुहूर्त शेष रहनेपर पुनः सम्यक्त्वको प्राप्त कर लेता है। तत्पश्चात् दो च्यासठ (१३२ ) सागरोपम काल तक सम्यक्त्वको पालकर और चार वार कपार्योको उपशमा कर इस उत्कृष्ट सम्यक्त्वकालमें अन्तर्मुहूर्त शेप रहनेपर क्षपणामें उद्यत होता है। उस समय अधः- प्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें उसके उपर्युक्त आतप आदि प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। इस प्रकार सौधर्म देवकी आयुके ४ पल्योपमोंके साथ १८ ५ (२२+३१ + १३२) सागरोपम काल तक इन प्रकृतियोंके बन्धका अभाव रहता है जब कि तिर्यंचगतिके वन्धका अभाव ४ पल्योपमोंसे अधिक १६३ सागरोपम काल तक ही रहता है। यही उससे इन प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशसंक्रम में विशेषता है। विकलेन्द्रिय जाति नामकोंकी प्ररूपणा साधारणशरीर नामकर्मके समान है। उच्चगोत्रकी प्ररूपणा मनुष्यगतिके समान है। तीर्थकर नामकर्मका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जघन्य सत्कर्मके साथ प्रथमतया जघन्य योगके द्वारा जो समयप्रवद्ध बांधा गया है बन्धावलीके पश्चात् उसका संक्रम करनेवालेके तीर्थंकर प्रकृतिका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है । अथवा, अन्तिम समयवर्ती मिथ्यादृष्टिके विध्यातसंक्रमके द्वारा उसका जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। इस प्रकार स्वामित्वकी प्ररूपणा समाप्त हुई। १ इग-विगलिंदियजोग्गा अट्ठ पजत्तगेण सह ते(ता)सिं । तिरियगइसमें नवरं पंचासीउदहिसयं तु ॥ क, प्र. २, १०८. २ तित्थयरस्स य बंधा जहन्नओ आलिगं गंतु ॥.क. प्र. २, १११.

संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो ४४१ मदिआवरणस्स उक्कस्सपदेससंकामओ केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णुकस्सेण एगसमओ । अणुक्कस्सपदेससंकमो केवचिरं० १ जह• अंतोमुहुत्तं, उक्क० अणंतकालं । चदुणाणावरण-चदुदंसणावरण-पंचंतराइयाणं मदिआवरणभंगो । सबकम्माणं पि उकस्सपदेससंकमस्स जहण्णुक्कस्सेण एगसमओ। अणुक्कस्सपदेस- संकमस्स कालो पंचण्णं दसणावरणीयाणं अणादिओ अपज्जवसिदो, अणादिओ सपज- वसिदो, सादिओ सपज्जवसिदो वा । जो सो सादिओ सपज्जवसिदो सो जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० उवड्ढपोग्गलपरियई । सादासादाणमणुकस्सपदेससंकमो केवचिरं० १ जहण्णेण एगसमओ, उक० अंतोमुहुत्तं । मिच्छत्तस्स जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० छावहिसागरोपमाणि सादिरेयाणि । सम्मामिच्छत्तस्स जह० अंतोमुहुत्तं, उक० वे छावहिसागरोवमाणि पलिदोवमस्स असंखे० भागेण सादिरेयाणि । सम्मत्तस्स जहण्णण अंतोमुहुत्तं, उक० पलिदो० असंखे० भागो। अणंताणुवंधीणं अणादियो अपज्जवसिदो, अणादियो सपज- वसिदो, सादियो सपञ्जवसिदो वा । जो सो सादिओ सपञ्जवसिदो तरस जहण्योण अंतोमुहत्तं, उक्क उवड्ढपोग्गलपरियट्ट । सेसाणं चरित्तमोहणीयपयडीणमणंताणुवंधिभंगो। सादियसंतकम्माणं णामपयडीणं जह० उक्क० जचिरं पयडिसंकमकालो तचिरं अणुक्कस्सपदेससंकमकालो। अणादियसंतकम्मियासु पयडीसु जासिं पयडीणं भवसिद्धिओ , -- भतिज्ञानावरणके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका काल कितना है ? जघन्य और उत्कर्पसे वह एक समय मात्र है। उसके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका काल कितना है ? वह जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे अनन्त काल प्रमाण है । शेप चार ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तराय; इनके प्रकृत कालकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है। सब कर्मों के ही उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका काल जघन्य और उत्कर्पसे एक समय मात्र है। अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका काल पांच दर्शनावरण प्रकृतियोंका अनादि-अपर्यवसित, अनादि- सपर्यवसित और सादि-सपर्यवसित भी है। इनमें जो सादि-सपर्यवसित है वह जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कपैसे उपार्ध पुद्गलपरिवर्तन मात्र है । साता और असाता वेदनीयके अनुत्कृष्ट प्रदेश- संक्रमका काल कितना है ? वह जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है । मिथ्यात्व प्रकृतिका वह काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे साधिक छयासठ सागरोपम मात्र है। प्रकृत काल सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे पल्योपमके असंख्यातवें भागसे अधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। सम्यक्त्व प्रकृतिका यह काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। अनन्तानुबन्धी प्रकृतियोंका यह काल अनादि-अपर्यवसित, अनादि-सपर्यवसित और सादि-सपर्यवसित भी है। जो सादि-सपर्यवसित है उसका प्रमाण जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे उपाधं पुद्गलपरिवर्तन मात्र है। शेष चारित्र- मोहनीय प्रकृतियोंके उपर्युक्त कालकी प्ररूपणा अनन्तानुवन्धीके समान है। सादि सत्कर्मवाली नामप्रकृतियोंका जघन्य व उत्कर्पसे जितना प्रकृतिसंक्रमकाल है उतना ही उनका अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमकाल भी है। अनादि सत्कर्मवाली प्रकृतियों में भव्यसिद्धिक जिन छ. से. ५६ ४४२ छक्खंडागमे संतकम्म + उकस्सं करेदि तासिमणुकस्सपदेससंकमकालो अणादिओ अपञ्जवसिदो, अणादिओ सपञ्जवसिदो, सादिओ सपञ्जवसिदो वा । तत्थ जो सो सादिओ सपज्जवसिदो तस्स जह• अंतोमुहुत्तं, उक्क. उवइपोग्गलपरियट्ट । इदरासि पयडीणं णाणावरणभंगो । उच्चागोदस्स अणुकस्सपदेससंकमो जह० अंतोमुहुत्तं एगसमओ वा, उफ० तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । णीचागोदस्स जह० एगसमओ, उक्क० वेछावहिसागरो- वमाणि सादिरेयाणि । एवमुक्कस्सपदेस संकमकालो समत्तो। जहण्णपदेससंकमकालो सामित्तादो साहेयूण वत्तव्यो । एयजीवेण अंतरं पि सामित्तादो सायव्यो। णाणाजीवेहि भंगविचओ कालो अंतरं च सामित्तादो साहेदूण भाणियध्वं । पुणो एत्थ सण्णियासो वत्तव्यो । एत्तो अप्पाबहुअं। तं जहा- उकस्सपदेससंकमो सम्मत्ते थोवो। केवलणाणा- वरणे असंखेजगुणो । केवलदसणावरणे विसेसाहिओ । पयलाए असंखेजगुणो। णिहाए विसेसाहिओ । अपचक्खाणमाणे असंखे० गुणो । कोहे विसेसाहिओ । माया० विसे० । लोभे विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोभे पिसे० । अणंताणुवंधिमाणे विसे० । कोधे विसे० । मायाए विसे । लोभे विसे० । मिच्छत्ते प्रकृतियोंके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमको करता है उनके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका काल अनादि- अपर्यवसित, अनादि-सपर्यवसित और सादि-सपर्यवसित भी है । उनमें जो सादि-सपर्यवसित है उसका प्रमाण जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे उपाधं पुद्गलपरिवर्तन है । अन्य प्रकृतियों के प्रकृत कालकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है। उच्चगोत्रके अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त व एक समय और उत्कर्षसे साधिक तेतीस सागरोपम मात्र है। उक्त काल नीचगोत्रका जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। इस प्रकार उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमकाल समाप्त हुआ। जघन्य प्रदेशसंक्रमकालका कथन स्वामित्वसे सिद्ध करके करना चाहिये। एक जीवफी अपेक्षा अन्तरकी भी प्ररूपणा स्वामित्वसे सिद्ध करके करना चाहिये । नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय, काल और अन्तरको भी स्वामित्वसे सिद्ध करके कहना चाहिये । फिर यहां संनिकर्पका कथन करना चाहिये। अब यहां अल्पबहुत्वका कथन करते हैं । यथा- उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम सम्यक्त्व प्रकृति में स्तोक है। केवलज्ञानावरण में असंख्यातगुणा है। केवलदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। प्रचलामें असंख्यातगुणा है । निद्रामें विशेप अधिक है । अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेप अधिक है। माया में विशेष आधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेप अधिक है। क्रोधमें विशेप अधिक है। माया में विशेप अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। अनन्तानुवन्धी मानमें विशेप अधिक है। क्रोधमें विशेष अधिक है। मायामें विशेप अधिक है । लोभमें विशेष अधिक है। मिथ्यात्वमें - ४४३ संकमाणियोगदारे पर्देससंकमो विसे० .। सम्मामिच्छत्ते विसे० । पचलापचलाए असंखे० गुणो । णिहाणिदाए विसे० । थीणगिद्धीए विसे० | आहारसरीरणामाए अणंतगुणो। जसकित्तीए अर्णतगुणो । वेउब्वियसरीरणामाए असंखे० गुणो.। ओरालिय० विसे० । तेजइय० विसे० । कम्मइय? विसे० ० । देवगइणामाए असंखेजगुणो। मणुसगइणामाए विसे० । साद० संखे० गुणो । लोहसंजलणाए संखे० गुणो। दाणंतराए विसे० । लाहंतराए विसे० । भोगंतराए विसे । परिभोगंतराए विसे० । वीरियंतराए विसे० । मणपजवणाणावरणे विसे० । ओहि- णाणावरणे विसे० । सुदणाणावरणे विसे० । मदिणाणावरणे विसे० । ओहिदंसणावरणे विसे । अचक्खुदंसणावरणे विसे । चक्खुदं. विसे० । उच्चागोदे संखे० गुणो । णिरयगइणामाए असंखे० गुणो। अजसकित्ति० असंखे० गुणो । असादे संखे० गुणो। णीचागोदे विसे० । तिरिक्खगइणामाए असंखे० गुणो। हस्से संखे० गुणो । रदीए विसे० । इत्थिवेदे संखे० गुणो । सोगे विसे० । अरदीए विसे० । णqसयवेदे विसे० । दुगुंछाए विसे० । भय० विसे० । पुरिसवेदे संखे० गुणो । कोहसंजलणाए संखे० गुणो। माणसंजलणाए विसेसा० । मायासंजलगाए विसेसाहियो । एवमोघुक्कस्सपदेस- संकमदंडओ समत्तो। विशेप अधिक है। सम्यग्मिथ्यात्व में विशेष अधिक है। प्रचलाप्रचला में असंख्यातगुणा है । निद्रानिद्रा में विशेप अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। आहारशरीर नामकर्ममें अनन्तगुणा है। यश कीर्तिमें अनन्तगुणा है। वैक्रियिकशरीर नामकर्ममें असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीर नामकर्ममें विशेष अधिक है। तैजसशरीर में विशेष अधिक है । कार्मणशरीर में विशेष अधिक है। देवगति नामकर्ममें असंख्यातगुणा है। मनुष्यगति नामकर्ममें विशेष अधिक है । सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । संज्वलन लोभ में संख्यातगुणा है । दानान्तरायमें विशेष अधिक हैं। लाभान्तरायमें विशेष अधिक है। भोगान्तरायमें विशेष अधिक है। परिभोगान्तरायमे विशेष अधिक है। वीर्यान्तरायमें विशेप अधिक है। मन:पययज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनांवरणमें विशेष अधिक है। अचक्षु- दर्शनावरणमें विशेष अधिक है । चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। उच्चगोत्र में संख्यात- गुणा है । नरकगति नामकर्ममें असंख्यातगुणा है। अयशकीर्ति में असंख्यातगुणा है । असाता- वेदनीयमें संख्यातगुणा है। नीचगोत्र में विशेप अधिक है । तिर्यग्गति नामकर्म में असंख्यातगुणा है । हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेप अधिक है। स्त्रीवेद में संख्यातगुणा है। शोकमें विशेप अधिक है। अरतिमें विशेष अधिक है। नपुंसकवेद में विशेष अधिक है। जुगुप्सामें विशेप अधिक है। भयमें विशेष अधिक है। पुरुषवेदमें संख्यातगुणा है। संज्वलन क्राधमें संख्यातगुणा है । संज्वलन मानमें विशेष अधिक है। संज्वलन मायामें विशेष अधिक है । इस प्रकार ओघ उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमदण्डक समाप्त हुआ। - ४४४ छक्खंडागमे संतकम्म णिरयगईए सव्वत्थोवो सम्मत्ते उकस्ससंकमो । सम्मामिच्छत्ते असंखे० गुणो। अपञ्चक्खाणमाणे असंखे० गुणो । कोहे विसे० । मायाए विसे । लोभे विसे० । पञ्चक्खाण- माणे विसे० । कोहे विसे० । मायाएं विसे० । लोभे विसे । केवलणाणावरणे विसे० पयलाए विसे० । णिदाए विसे० । पयलापयलाए विसे० । गिद्दाणिद्दाए विसे० । थीणगिद्धीए विसे । केवलदसणावरणे विसे | मिच्छत्ते असंखे० गुणो। अर्णताणु- बंधिमाणे असंखे० गुणो। कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोभे विसे० । णिरयगइ- णामाए अर्णतगुणो। वेउब्वियसरीरणामाए असंखे० गुणो । देवगइ० संखे० गुणो । आहारसरीर० असंखे० गुणो। जसकित्ति० असंखे गुणो। ओरालिय० संखे० गुणो । तेजइय० विसे० । कम्मइय० विसे । अजसकित्ति० असंखे० गुणो। तिरिक्खगइ० विसे० • । मणुसगइ० विसे० । हस्से संखे० गुणो । रदि० विसे० । सादे संखे० गुणो । इत्थिवेदे संखे० गुणो। सोगे विसे० । अरदि० विसे० । णस० विसे० । दुगुंछा० विसे० । भय० विसे० । पुरिसवे. विसे० । संजलणमाणे विसे० । कोधे विसे० । मायाए विसे० । लोभे विसे० । दाणंतराइए विसे० । लाहंतराइए विसे० । भोगंतरा० विसे० । परिभोगंतरा० विसे० । चीरियंतराइए विसे० । मणपञ्जवणाणावरणे नरकगति में सम्यक्त्व प्रकृति में उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम सबसे स्तोक है। सम्यग्मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोध में विशेष अधिक है। माया में विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है। क्रोधमें विशेष अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। केवल. ज्ञानावरणमें विशेष अधिक है । प्रचलामें विशेष अधिक है । निद्रा में विशेष अधिक है । प्रचला. प्रचलामें विशेष अधिक है । निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है । स्यानगृद्धि में विशेप अधिक है। केवलदर्शनावरण में विशेष अधिक है। मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानुबन्धो मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेष अधिक है। माया में विशेप अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। नरकगति नामकर्ममें अनन्तगुणा है। वैक्रियिकशरीर नामकर्ममें असंख्यातगुणा है। देवगति नामकर्म में संख्यातगुणा है। आहारकशरीर नामकर्ममें असंख्यातगुणा है । यशकीर्ति में असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीर नामकर्म में संख्यातगुणा है। तैजसशरीर नामकर्म में विशेष अधिक है। कार्मणशरीर नामकर्ममें विशेप अधिक है। अयश कीर्तिमें असंख्यातगुणा है। तिर्यंचगति नामकर्म में विशेष अधिक है। मनुष्यगति नामकर्ममें विशेष अधिक है। हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेष अधिक है। सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । स्त्रीवेदमें संख्यातगुणा है। शोक में विशेप अधिक है। अरतिमें विशेष अधिक है। नपुंसकवेद में विशेष अधिक है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेष अधिक है। पुरुपवेद में विशेष अधिक है। संज्वलन मान में विशेप अधिक है। क्रोध में विशेष अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेप अधिक है। दानान्तरायमें विशेप अधिक है। लाभान्तरावमें विशेष अधिक है। भोगान्तरायमें विशेष अधिक है। परिभोगान्तरायमें विशेष अधिक है। वीर्यान्तरायमें विशेष अधिक है। मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेष अधिक है।

४४५ संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो विसे० । ओहिणाणवरणे विसे० । सुदणाणा० विसेसा० । मदिणाणावरणे विसे । अचक्खुदंसणावरणे विसे० । चक्खुदंस० विसे० । असादे संखे० गुणो। उच्चागोदे विसे० । णीचागोदे विसे० । एवं णिरयगईए उकस्सओ पदेससंकमदंडओ समत्तो । तिरिक्खगईए उकस्सओ पदेससंकमो सम्मत्ते थोवो । सम्मामिच्छत्ते असंखे० गुणो । अपच्चक्खाणमाणे असंखे० गुणो । कोधे विसे० । माया. विसे० । लोभे विसे । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । कोधे विसे० । माया० विसे० । लोभे विसे० । केवलणाणावरणे विसे० । पयलाए विसे० । णिहाए विसे० । पयलापयला० विसे० । णिहाणिद्दाए विसे० । थीणगिद्धीए विसे० । केवलदंसणावरणे विसे० । मिच्छत्ते असंखे० गुणो । अणंताणुवंधिमाणे असंखे० गुणो। कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोभे विसे० । णिरयगइणामाए अणंतगुणो। आहारसरीर० असंखे० गुणो। जसकित्ति० असंखे० गुणो। वेउब्धिय० संखे० गुणो। ओरालिय० विसे० । तेजा० विसे० । कम्मइय० विसे० । अजसकित्ति० संखे० गुणो । देवगदीए विसे० । तिरिक्खगईए विसे० । मणुस- गई. विसे० । हस्से० संखे० गुणो। रदीए विसे० । सादे संखे० गुणो। इत्थिवेदे अवधिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है । अचक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। उच्चगोत्रमें विशेष अधिक है। नीचगोत्र में विशेष अधिक है । इस प्रकार नरकगति में उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमदण्डक समाप्त हुआ। तिर्यंचगतिमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम सम्यक्त्व प्रकृति में सबसे स्तोक है। सम्वग्मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है । अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेष अधिक है। माया में विशेप अधिक है । लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है। क्रोधमें विशेष अधिक है । मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। केवल- ज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। प्रचला में विशेष अधिक है। निद्रामें विशेष अधिक है। प्रचलाप्रचलामें विशेष अधिक है। निद्रानिद्रामें विशेष अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। केवलदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है । अनन्तानु- बन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेप अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। नरकगति नामकर्ममें अनन्तगुणा है। आहारकशरीर नामकर्ममें असंख्यातगुणा है। यज्ञकीर्ति में असंख्यातगुणा है। वैक्रियिकशरीर में संख्यातगुणा है। औदारिकशरीर में विशेष अधिक है। तैजसशरीरमें विशेष अधिक है। कार्मणशरीर में विशेष अधिक है। अयशकीर्ति में संख्यातगुणा है । देवगति में विशेष अधिक है। तियंचगति में विशेष अधिक है । मनुष्यगतिमें विशेप अधिक है। हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेष अधिक है । सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । स्त्रीवेदमें संख्यातगुणा है। शोकमें विशेष अधिक है। १ अ-काप्रत्योः 'असादयो', ताप्रतौ 'असादाए' इति पाठः । २ अ-काप्रत्योनोंपलभ्यते पदमिदम् ।

४४६ छक्खंडागमे संतकम्म संखे० गुणो । “सोगे विसे० । अरदि० विसे० । णस० विसे० । दुगुंछा० विसे० । भय० विसे० । पुरिस० विसें० । संजलणमाणे विसे० । कोधे विसे० । मायाए विसे । लोमे विसे० । दाणंतराइए विसे० । लाहंतराइए विसे० । भोगंतराइए विसे० । परि- भोगंतराइए विसे० । विरियंतराइए विसे० । मणपज्जवणाणावरणे विसे० । ओहिणाणावरणे विसे० । सुदणा० विसे० । मदिणा० विसे० । ओहिदंसणावरणे विसे० । अचक्खुदंस० विसे० । चक्खुदंस० विसे० । असादे संखे० गुणो। उच्चागोदे विसे । णीचागोदे विसेसाहिओ । एवं तिरिक्खगदीए उकस्सओ पदेससंकमदंडओ समत्तो जहा तिरिक्खगदीए तहा तिरिक्खजोणिणीसु । मणुस्सेसु मणुसिणीसु च मूलोघं । देवाणं देवीणं च णेरइयभंगो । असण्णीसु सम्मत्ते उक्कस्सपदेससंकमो थोवो। सम्मामिच्छत्ते असंखे० गुणो । अपञ्चक्खाणमाणे असंखे० गुणो। कोधे विसे० । मायाए विसे० । लोभे विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । कोधे विसे० । मायाए विसे० । लोभे विसे० । अणंताणु- बंधिमाणे विसे० । कोधे विसे० । मायाए विसे० । लोभे विसे० । केवलणाणावरणे विसेसा० । पयलाए विसे० । णिहाए विसे० । पयलापयलाए विसे० । णिहाणिदाए अरतिमें विशेष अधिक है। नपुंसकवेदमें विशेष अधिक है । जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेष अधिक है। पुरुषवेदमें विशेष अधिक है। संज्वलन मानमें विशेष अधिक है। क्रोधमें विशेष अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। दानान्तरायमें विशेष अधिक है। लाभान्तरायमें विशेष अधिक है। भोगान्तराय में विशेष अधिक है। परिभोग रायमें विशेष अधिक है। वीर्यान्तरायमें विशेष अधिक है। मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिज्ञानावरण में विशेष अधिक है। श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है । मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। अचक्षु- दर्शनावरणमें विशेष अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। उच्चगोत्र में विशेष अधिक है। नीचगोत्रमें विशेष अधिक है। इस प्रकार तिथंचगतिमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमदण्डक समाप्त हुआ। जैसे तिर्यंचगति में प्रकृत अल्पबहुत्वका कथन किया गया है वैसे ही तियंच योनिमतियोमें भी समझना चाहिये । मनुष्यों और मनुष्यणियों में इस अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा मूलोधके समान है । देवों और देवियों का यह प्ररूपणा नारकियों के समान है। असंज्ञी जीवों में उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम सम्यक्त्व प्रकृति में सबसे स्तोक है। सम्यग्मिथ्यात्व में असंख्यातगुणा है । अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेप अधिक है। माया में विशेप अधिक है । लोभमें विशेप अधिक है। प्रात्याख्यानावरणं मानमें विशेप अधिक है। क्रोधमें विशेष अधिक है। माया में विशेप अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। अनन्तानुबन्धा मानमें विशेप अधिक है । क्रोध में विशेप अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। केवलज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। प्रचलामें विशेप अधिक है। निद्रा में विशेष अधिक है। प्रचलाप्रचलामें विशेष अधिक है। निद्रानिद्रामें विशेष अधिक संकमाणियोगबारे पदेससंकमो ४४७ विसे० । थीणगिद्धीए विसे० । केवलदसणावरणे विसे० । णिरयगई० अणंतगुणो। आहारसरीरे असंखे० गुणो । जसकित्ति० असंखे० गुणो। वेउब्धियसरीरे संखे० गुणो। ओरालिय० विसे० । तेजा० . विसे० । कम्मइय० विसे० । अजसकित्ति० संखे० गुणो । देवगदिणामा० विसे० । तिरिक्खगई० पिसे० । मणुस्सगई० विसे० .। हस्से संखे० गुणो । रदी० विसे० । सादे संखे० गुणो। इत्थिवेदे संखे० गुणो । सोगे विसे० । अरदि० विसे० । णसयवेदे विसे० । दुगुंछा० विसे० । भय० विसे० । पुरिसवेदे. विसे । संजलणमाणे विसे० । कोधे विसे० । मायार विसे० । लोमे विसे० । दाणंतराइए विसे० । लाहंतराइए विसे० । भोगंतराइए विसे । परि- भोगंतराइए विसे० । विरियंतराइए विसे० । मणपजवणाणावरणे विसे० । ओहिणाणाo विसे । सुदणाणा० विसे० । मदिणा० विसे० । ओहिदंसणाव० विसे० । अचक्खु- दंसं० विसे० । चक्खुदंस० विसे० । असादे संखे० गुणो। उच्चागोदे बिसे० । णीचा- गोदे विसे० । एवं असण्णीसु उक्कस्सओ पदेससंकमदंडओ सभत्तो । जहासण्णीसु तहा एइंदिय-विगलिंदिएसु । - है। स्त्यानगृद्धि में विशेप अधिक है। केवलदर्शनावरणमें विशेप अधिक है । नरकगतिमें अनन्तगुणा है । आहारशरीरमें असंख्यातगुणा है । यशकीर्तिमें असंख्यातगुणा है । वैक्रियिक- शरीरमें संख्यातगुणा है। औदारिकशरारमें विशेप अधिक है । तैजसशरीरमें विशेप अधिक है। कार्मणशरीरमें विशेष अधिक है। अयशकीर्ति में संख्यातगुणा है। देवगति नामकर्ममें विशेप अधिक है । तिर्यंचगति नामकर्म में विशेष अधिक है । मनुष्यगति नामकर्ममें विशेप अधिक है । हास्यमें संख्यातगुणा है । रतिमें विशेप अधिक है। सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । स्त्रीवेदमें संख्यातगुणा है । शोकमें विशेप अधिक है । अरतिमें विशेप अधिक है । नपुंसकवेद में विशेप अधिक है । जुगुप्सा में विशेप अधिक है । अयमें विशेप अधिक है। पुरुपवेदमें विशेप अधिक है। संज्वलन मानमें विशेप अधिक है। क्रोधमें विशेप अधिक है। मायामें विशेप अधिक है। लोभमें विशेप अधिक है। दानान्तरायमें विशेप अधिक है। लाभान्तरायमें विशेप अधिक है। भोगन्तरायमें विशेप अधिक है। परिभोगन्तरायमें विशेप अधिक है। वीर्यान्तरायमें विशेष अधिक है । मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। अवधि- ज्ञानावरणमें विशेष अधिक है । श्रुतज्ञानावरणमें विशेप अधिक है । मतिज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेप अधिक है । अचक्षुर्शनावरणमें विशेप अधिक है। चक्षुदर्शनावरण में विशेप अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। उच्चगोत्रमें विशेप अधिक है । नीचगोत्रमें विशेष अधिक है । इस प्रकार असंज्ञी जीवों में उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमदण्डक समाप्त हुआ। जैसे असंज्ञी जीवोंमें यह प्ररूपणा की गयी है वैसे ही एकेन्द्रियों और विकलेन्द्रियोंके विषयमें भी जानना चाहिये । - १ अ-कामत्योः 'मणुस्सिणासु', तातो 'मणुसिणीतु ( असणीसु)' इति पाठः ।

४४८ छक्खंडागमे संतकम्म एतो ओघजहण्णपदेससंकमदंडओ कायव्यो । तं जहा- सव्वत्थोवो सम्मत्ते जहण्णओ पदेससंकमो। सम्मामिच्छत्ते असंखे० गुणो । मिच्छत्ते असंखे० गुणो । अणंताणुवंधिमाणे असंखे० गुणो । कोधे बिसे० । मायाए विसे० । लोभे विसे० । पयला- पयला० असंखे० गुणो। णिहाणिदाए विसे० । थीणगिद्वीए विसे० । अपचक्खाणमाणे असंखे० गुणो । कोधे विसे० । मायाए विसे । लोभे विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे । कोधे विसे० | मायाए विसे० । लोभे विसे० । केवलणाणावरणे विसे० । कुदो विसेसाहियत्तं ? विज्झादभागहारादो चरिमसमयसुहुमसांपराइयअधापवत्त- भागहारस्स विसेसहीणतादो। ण च अधापवत्तभागहारो अवढिदो, एदम्हारो चेव तदणवद्विदत्तावगमादो । ण च पुचिल्लभागहारप्पावहुएण सह विरोहो, सव्वजहण्णा- भागहारे पडुच्च तदुप्पत्तीदो। पयलाए विसे० पयडिविसेसेण । णिहाए विसे० । केवलदंस० विसे० । णिरयगइ- णामाए अणंतगुणो। देवगइणामाए असंखे० गुणो। वेउब्वियसरीर० संखे गुणो । आहारसरीर० असंखे० गुणो। मणुसगइ० संखे० गुणो। उच्चागोदे संखे० गुणो । तिरिक्स्वगइ० असंखे० गुणो । कुदो ? उव्वेल्लणभागहारादो तेवद्धिसागरोवमसदण्णोण्ण- । अब यहां ओघ जघन्य प्रदेशसंक्रमदण्डक करते हैं । वह इस प्रकार है- जघन्य प्रदेश- संक्रम सम्यक्त्व प्रकृति में सबसे स्तोक है । सम्यग्मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है। मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है । अनन्तानुबन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेप अधिक है। माया में विशेष अधिक है। लोभमें विशेप अधिक है। प्रचलाप्रचलामें असंख्यातगुणा है। निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है। त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेप अधिक है। माया में विशेप अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है । प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेप अधिक है। क्रोधमें विशेप अधिक है। मायामें विशेप अधिक है। लोभमें विशेप अधिक है। केवलज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। शंका- उसमें विशेप अधिक क्यों है ? समाधान- इसका कारण यह है कि विध्यातभागहारकी अपेक्षा अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिकका अधःप्रवृत्तभागहार विशेप हीन है। और यह अधःप्रवृत्तभागहार कुछ अवस्थित नहीं है, क्योंकि, इसीसे उसकी अनवस्थितता जानी जाती है। पूर्वोक्त भागहारके अल्पबहुत्वके साथ इसका विरोध होगा, यह भी कहना ठीक नहीं है; क्योंकि, उसकी उत्पत्ति सबसे जघन्य भागहारके आश्रित है। केवलज्ञानावरणकी अपेक्षा वह प्रचलामें प्रकृतिविशेपसे विशेप अधिक है। निद्रामें विशेष अधिक है। केवलदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। नरकगति नामकर्म में अनन्तगुणा है। देवगति नामकर्ममें असंख्यातगुणा है । वैक्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है । आहारकशरीर- में असंख्यातगुणा है। मनुष्यगति नामकर्ममें संख्यातगुणा है। उच्चगोत्र में संख्यातगुणा है। तिर्यंचगति नामकर्ममें असंख्यातगुणा है, क्योंकि, उद्वेलनभागहारकी अपेक्षा एक सौ तिरेसठ संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४४९ भत्थरासिगुणिदविज्झादभागहारस्स असंखे० गुणहीणत्तादो। ण,सयवेद० असंखे० गुणो। णीचागोद० संखेजगुणो। इथिवेद० असंखे० गुणो। ओरालिय० असंखे. गुणो । कोधसंजलण० असंखेगुणो । माणसंजल० विसे० । पुरिस० विसे० । मायासं० विसे० । जसकित्ति० असंखे० गुणो। तेजइय० संखे० गुणो, धुववंधित्तादो । कम्मइय० विसे० । अजसकित्ति० संखे० गुणो। हस्से संखे० गुणो। रदी० विसेसा० । सादे संखे० गुणो । सोगे संखे० गुणो। कुदो अधापवत्तभागहारादो विज्झादभागहारस्स संखेजगुणहीणतं णबदे ? एदम्हादो चेव सुत्तादो । अरदो० विसे० । दुगुंछा० विसे० भय० विसे० । लोहसंजल० विसे० । दाणंतराइय. विसे० । लाहंतरा० विसे । भोगंतरा० विसे० । परिभोगंतरा० विसे० । विरियंतरा० विसे० । मणपजव० विसे० । ओहिणा० विसे० ! सुदणाणावरणे विसे० । आभिणियोहियणाणाव. विसे० । ओहि- दसणाव० विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । असादे संखेजगुणो । एवमोघेण जहण्णओ पदेससंकमदंडओ समत्तो। णिरयगईए सव्वत्थोवो सम्मत्ते जहण्णओ पदेससंकमो । सम्मामिच्छत्ते असंखे० सागरोपमोंकी अन्योन्याभ्यस्त राशिसे गुणित विध्यातभागहार असंख्यातगुणा हीन है। तिर्यंचगतिसे नपुंसकवेदमें असंख्यातगुणा है। नीचगोत्र में संख्यातगुणा है। स्त्रीवेदमें असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीरमें असंख्यातगुणा है। संज्वलन क्रोधमें असंख्यातगुणा है। संज्वलन मानमें विशेप अधिक है। पुरुषवेदमें विशेष अधिक है। संज्वलन माया में विशेष अधिक है। यशकीर्तिमें असंख्यातगुणा है। तैजसशरीर में संख्यातगुणा है, क्योंकि, वह ध्रुववन्धी है। फर्मणशरीरमें विशेप अधिक है। अयशकीर्तिमें संख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेष अधिक है। सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । शोकमें संख्यातगुणा है। शंका- अधःप्रवृत्तभागहारकी अपेक्षा विध्यातभागहार संख्यातगुणा हीन है, यह कहांसे जाना जाता है ? समाधान- वह इसी सूत्रसे जाना जाता है। उससे अरतिमें विशेप अधिक है । जुगुप्सा में विशेप अधिक है। भयमें विशेष अधिक है। संज्वलन लोभमें विशेष अधिक है। दानान्तरायमें विशेप अधिक है। लाभान्तरायमें विशेष अधिक है। भोगान्तरायमें विशेप अधिक है। परिभोगान्तरायमें विशेप अधिक है। वीर्यान्तरायमें विशेप अधिक है । मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है । श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। आभिनिवोधिकज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेप अधिक है । असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । इस प्रकार ओघसे जघन्य प्रदेशसंक्रमदण्डक समाप्त हुआ। नरकगतिमें जघन्य प्रदेशसंक्रम सम्यक्त्व प्रकृति में सबसे स्तोक है। सम्यग्मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है। मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानुबन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। छ. से, ५७ ४५० छक्खंडागसे संतकम्म गुणो । मिच्छत्ते असंखे० गुणों । अणंताणुवंधिमाणे असंखे० गुणो । कोधे विसे० । मायाए विसे० । लोमे विसे० । पयलापयला० असंखे० गुणो। णिहाणिद्दा० विसे० । थीणगिद्धीए विसे। अपञ्चक्खाणमाणे असंखे० गुणो। कोधे विसे० । मायाए विसे० । लोभे विसे० । पञ्चखाणमाणे विसे० । कोधे विसे० । मायाए विसे० । लोभे विसे० । केवलणाणावरणे विसे० । पयलापयलाए विसे० । णिहाए विसे० । केवलदसणावरणे विसे० । आहार० अणंतगुणो । देवगइ० असंखे० गुणो । मणुसगइ० संखे० गुणो। वेउन्धिय० संखे० गुणो। णिरयगइ० संखे० गुणो । उच्चागोदे संखे० गुणो । तिरिक्खगइ० असंखे० गुणो । इत्थिवेद० संखेजगुणो । णीचा- गोदे संखे० गुणो । जसकित्ति० असंखे० गुणो । ओरालिय० संखे० गुणो । तेजइय० विसे० । कम्मइय० विसे० । अजसकित्ति० संखे० गुणो । पुरिसवेदे संखे० गुणो । हस्से संखे० गुणो। रदि० विसे० । सादे संखे० गुणो। सोगे संखे० गुणो । अरदि० विसे० । दुगुंछा. विसे० । भय० विसे० । संजलणमाणे विसे० । कोधे विसे० । मायाए विसे० । लोमे विसेसाहिओ। दाणंतराए विसे० । लाहंतराए विसे० । भोगतराए विसे० । परिभोगंतराए विसे० । वीरियंतराए विसे० । मणपजवणाणावरणे विसे० । ओहिणा० विसे० । सुदणा० बिसे० । मदिणा० विसे० । ओहिदंस० विसे० । क्रोधमें विशेष अधिक है । मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है । प्रचलाप्रचलामें असंख्यातगुणा है। निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्याना- वरण मानमें असंख्यातगुणा है । क्रोधमें विशेष अधिक है । माया में विशेप अधिक है । लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है। क्रोधमें विशेप अधिक है। माया- में विशेष अधिक है । लोभमें विशेप अधिक है । केवलज्ञानावरणमें विशेप अधिक है । प्रचला- प्रचलामें विशेप अधिक है। निद्रा में विशेष अधिक है। केवलदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। आहारशरीर में अनन्तगुणा है। देवगतिमें असंख्यातगुणा है। मनुष्यगति में संख्यात- गुणा है। वैक्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है। नरकगतिमें संख्यातगुणा है। उच्चगोत्र में संख्यातगुणा है। तिर्यचगतिमें असंख्यातगुणा है। स्त्रीवेदमें संख्यातगुणा है। नीचगोत्रमें संख्यातगुणा है। यशकीर्तिमें असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीरमें संख्यातगुणा है । तेजस- शरीरमें विशेष अधिक है। कार्मणशरीर में विशेष अधिक है। अयशकीर्तिमें संख्यातगुणा है। पुरुषवेदमें संख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेप अधिक है। सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। शोकमें संख्यातगुणा है। अरतिमें विशेष अधिक है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है । भयमें विशेष अधिक है। संज्वलन मानमें विशेष अधिक है। क्रोधमें विशेष अधिक है । मायामें विशेप अधिक है । लोभमें विशेप अधिक है । दानान्तरायमें विशेष अधिक है। लाभान्तरायमें विशेप अधिक है। भोगान्तरायमें विशेप अधिक है। परिभोगान्तरायमें विशेष अधिक है। वीर्यान्तरायमें विशेप अधिक है। मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक १ अप्रतौ 'मिच्छत्तअणंतगुणो' इति पाठः।

संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४५१ अचक्खु. विसे० । चक्खु० विसे० । असादे संखे० गुणो । एवं णिरयगदीए संकमदंडओ समत्तो। तिरिक्खगदीए तिरिक्खेसु जावुच्चागोद ति मूलोघं । तदो उच्चागोदादोओरालिय. असंखे० गुणो । 'तिरिक्खगइ० संखे० गुणो इत्थि० संखे० गुणो। णQस० संखे० गुणो । णीचागोद० संखे० गुणो । जसकित्ति० असंखे० गुणो। तेजा० संखे गुणो। कम्मइय० विसे० । अजसकित्ति० संखे० गुणो। पुरिस० संखे० गुणो । हस्से संखे० गुणो । रदि० विसे० । सादे संखे० गुणो। सोगे संखे० गुणो। अरदि० विसे० । दुगुंछा० विसे० । भय० विसे० । एत्तो उचरि गेरइयभंगो जाव असादं ति । एवं तिरिक्खगदीए जहण्णसंकमदंडओ समत्तो। एवं तिरिक्खजोणिणीसु । मणुसगदीए मणुस्सेसु जाव आहारसरीरं ति मूलोघो। तदो तिरिक्खगदीए असंखे० गुणो। णबुंस० असंखे० गुणो। णीचागोदे संखे० गुणो। इस्थिवेदे असंखे० गुणो। मणुसगई० असंखे० गुणो। ओरालिय० असंखे० गुणो। कोधसंजलण० असंखे० गुणो। माणे विसे० । पुरिस० विसे० । माया० विसे० । उच्चागोद० असंखे० गुणो। जसकित्तिः असंखे० गुणो। सेसाणि है। मतिज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। अचक्षु- दर्शनावरणमें विशेप अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। इस प्रकार नरकगतिमें जघन्य प्रदेशसंक्रसदण्डक समाप्त हुआ। तिर्यंचति में तिर्यंचोंमें प्रकृत अल्पवहुत्वकी प्ररूपणा उच्चगोत्र तक मूल-ओघके समान है। तत्पश्चात् उक्त जघन्य प्रदेशसंक्रम उच्चगोत्रकी अपेक्षा औदारिकशरीरमें असंख्यातगुणा है । तिर्यंचगतिमें संख्यातगुणा है । स्त्रीवेदमें संख्यातगुणा है। नपुंसकवेदमें संख्यातगुणा है । नीचगोत्र में संख्यातगुणा है। यशकीर्तिमें असंख्यातगुणा है। तैजसशरीरमें संख्यातगुणा है । कार्मणशरीर में विशेष अधिक है। अयशकीर्तिमें संख्यातगुणा है । पुरुपवेदमें संख्यातगुणा है । हास्यमें संख्यातगुणा है । रति में विशेष अधिक है। सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। शोकमें संख्यातगुणा है। अरतिमें विशेष अधिक है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेप अधिक है। इसके आगे असातावेदनीय तक उक्त प्ररूपणा नारकियोंके समान है। इस प्रकार तियंचगतिमें जघन्य प्रदेशसंक्रमदण्डक समाप्त हुआ। इसी प्रकार तिर्यंच योनिमतियोंमें भी प्रकृत संक्रमदण्डककी प्ररूपणा है। मनुष्यगतिमें मनुष्योंमें यह प्ररूपणा आहारकशरीर तक मूल-ओघके समान है। तत्पश्चात् वह जघन्य प्रदेशसंक्रम आहारकशरीरकी अपेक्षा तियंचगतिमें असंख्यातगुणा है । नपुंसफवेदमें असंख्यातगुणा है। नीचगोत्रमें संख्यातगुणा है। स्त्रीवेदमें असंख्यातगुणा है। मनुष्यगतिमें असंख्यातगुणा है । औदारिकशरीरमें असंख्यातगुणा है। संज्वलन क्रोधमें असंख्यातगुणा है। मानमें विशेष अधिक है। पुरुषवेदमें विशेप अधिक है। मायामें विशेप अधिक है। उच्चगोनमें १ अप्रतौ कोधसंखे०', काप्रती 'कोधसं० असंखे०' इति पाठः । । ।

४५२ छक्खंडागमे सन्तकम्म पदाणि ओघियाणि । एवं मणुसिणीसु । देवेसु जाव केवलदसणाचरणं ति मूलोघो । तत्तो आहार० अर्णतगुणो। णिरयगई० असंखे० गुणो। तिरिक्गई० असंखे० गुणो। णस० असंखे० गुणो। णीचागोद० संखे० गुणो। इत्थि० असंखे० गुणो। देवगई० असंखे० गुणो। वेउवि० संखे. गुणो । मणुसगइ० असंखे० गुणो। ओरालि असंखे० गुणो। उच्चागोदे असंखे० गुणो । जसकित्ति० असंखे० गुणो । तेजइय० संखेजगुणो। एत्तो उवरि ओरइयभंगो। एवं देवेसु जहण्णसंकमदंडओ समत्तो । असण्णीसु सव्वत्थोवो सम्मत्ते जहण्णसंकमो । सम्मामिच्छत्ते असंखे० गुणो । अणंताणुवंधिमाणे असंखे० गुणो। कोधे विसे० । मायाए विसे० । लोमे विसे० अपचक्खाणमाणे असंखे० गुणो० । कोधे विसे० । माया० विसे० । लोमे विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । कोधे विसे० । माया० विसे० । लोभे विसे । केवलणाणावरणे विसे० । पयलाए विसे० । णिदाए विसे० । पयलापयलाए विसे० । णिदाणिहाए विसे० । थीणगिद्धीए विसे० । केवलदंस० विसे० । णिरयगई० अणंतगुणो। देवगई० असंखे० गुणो। वेउवि० संखे० गुणो। आहार० असंखे० गुणो। मणुसगइ० संखे० गुणो । असंख्यातगुणा है। यशकीर्तिमें असंख्यातगुणा है। शेष पद ओघके समान हैं। इसी प्रकार मनुष्यनियोंमें भी प्रकृत प्ररूपणा करना चाहिये। देवोंमें केवलदर्शनावरण तक मूल-ओधके समान प्ररूपणा है । उससे उक्त जघन्य प्रदेश- संक्रम आहारशरीरमें अनन्तगुणा है। नरकगतिमें असंख्यातगुणा है । तिथंचगतिमें असंख्यात. गुणा है । नपुंसकवेदमें असंख्यातगुणा है। नीचगोत्रमें संख्यातगुणा है। स्त्रीवेदमें असंख्यात- गुणा है। देवगतिमें असंख्यातगुणा है। वैक्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है । मनुष्यगतिमें असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीरमें असंख्यातगुणा है। उच्चगोत्रमें असंख्यातगुणा है। यशकीतिमें असंख्यातगुणा है। तैजसशरीरमें संख्यातगुणा है। इसके आगे यह प्ररूपणा नारकियोंके समान है। इस प्रकार देवोंमें जघन्य प्रदेशसंक्रमदण्डक समाप्त हुआ। असंज्ञी जीवोंमें जघन्य प्रदेशसंक्रम सम्यक्त्व प्रकृतिमें सबसे स्तोक है। सम्यग्मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानुवन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेप अधिक है। मायामें विशेप अधिक है । लोभमें विशेप अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेष अधिक है। मायामें विशेप अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है। क्रोधमें विशेप अधिक है। मायामें विशेप अधिक है। लोभमें विशेप अधिक है। केवलज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। प्रचलामें विशेप अधिक है। निद्रा में विशेप अधिक है । प्रचलाप्रचलामें विशेप अधिक है। निद्रानिद्रामें विशेप अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेप अधिक है। केवलदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। नरकगतिमें अनन्तगुणा है । देवतिमें असंख्यातगुणा है। वक्रियिकशरीर में संख्यातगुणा है। आहारक- शरारमें असंख्यातगुणा है। मनुष्यगतिमें संख्यातगुणा है। उच्चगोत्रमें संख्यातगुणा है।

संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४५३ उच्चागोदे संखे० गुणो । जसकित्ति० असंखे० गुणो । ओरालिय० संखे० गुणो । तेजा. विसे० । कम्मइय० विसे० । तिरिक्खगदीए संखे० गुणो । अजसकित्तिः विसे० । पुरिसवेदे संखे० गुणो। इत्थिवेदे संखे० गुणो। हस्से संखे० गुणो । रदी० विसे । सादे० संखे० गुणो । सोगे संखे० गुणो । अरदी० विसे० । णवंस० विसे० । दुगुंछ. विसे० । भय० विसे० संजलणमाणे विसे० । कोधे विसे० । मायाए विसे० । लोमे विसे० । दाणंतराइए विसे० । लाहंतराइए विसे० । भोगंतरा० विसे० । परिभोगंतरा० विसे० । वीरियंतरा० विसे० । मणपजव० विसे० । ओहिणाणावरण विसे० । सुदणा० विसे० .। मदिणाणाव० बिसे० । ओहिदंसणाव० विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० • । असादे असंखे० गुणो। णीचागोदे विसेसाहिओ । एवमसण्णीसु जहण्णओ पदेससंकमदंदओ समत्तो। जहा असण्णीसु तहा एइंदिय-बेईदिय-तेइंदिय-चउरिदिएसु वि वत्तव्यं । एत्तो भुजगारसंकमो उच्चदे- भुजगारे अट्ठपदं कादूण सामित्तं कायव्वं । तं जहा- मदिआवरणस्स भुजगार-अप्पदर-अवहिदसंकामगो को होदि ? अण्णदरो। अवत्तव्य को होइ ? अण्णदरो उवसंतकसाओ परिवदमाणओ। चदुणाणावरणीय- यशकीर्तिमें असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीरमें संख्यातगुणा है। तैजसशरीरमें विशेष अधिक है। कार्मणशरीरमें विशेष अधिक है। तिर्यंचगतिमें संख्यातगुणा है। अयशकीर्तिमें विशेष अधिक है। पुरुपवेदमें संख्यातगुणा है । स्त्रीवेदमें संख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेष अधिक है। सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । शोकमें संख्यातगुणा है। अरतिमें विशेष अधिक है । नपुंसकवेदमें विशेप अधिक है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेष अधिक है । संज्वलन मानमें विशेप अधिक है। क्रोधमें विशेप अधिक है। मायामें विशेप अधिक है। लोभमें विशेप अधिक है। दानान्तरायमें विशेप अधिक है। लाभान्तरायमें विशेप अधिक है। भोगान्तरायमें विशेष अधिक है। परिभोगान्तरायमें विशेष अधिक है। वीर्यान्तरायमें विशेष अधिक है। मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिज्ञानावरण में विशेप अधिक है । श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। चक्षुदर्शना- वरणमें विशेष अधिक है। असातावेदनीयमें असंख्यातगुणा है। नीचगोत्र में विशेष अधिक है। इस प्रकार असंज्ञी जीवोंमें जघन्य प्रदेशसंक्रमदण्डक समाप्त हुआ। जिस प्रकार असंज्ञियोंमें यह प्ररूपणा की गयी है उसी प्रकार एकेन्द्रियों, द्वीन्द्रियों, श्रीन्द्रियों और चतुरिन्द्रियोंमें भी उसे करना चाहिये। अव यहां भुजाकारसंक्रमका कथन करते हैं-भुजाकारके विषयमें अर्थपद करके स्वामित्वकी प्ररूपणा की जाती है । यथा- मतिज्ञानावरणका भुजाकार, अल्पतर और अवस्थित संक्रामक कौन होता है ? उसका संक्रामक अन्यतर जीव होता है। अवक्तव्य संक्रामक कौन होता है ? उसका संक्रामक परिपतमान अर्थात् उपशमश्रेणिसे गिरनेवाला अन्यतर उपशान्तकपाय ४५४ छक्खंडागमें संतकम्म , णवदंसंणावरणीय-मिच्छत्त-सोलसकसाय-भय- दुगुंछा- पुरिसवेद-पंचतराइयाणं सम्मा- इट्ठीसुवा मिच्छाइट्ठीसु वा धुववंधिणामपयडीणं च मदिआवरणभंगो। सादासाद- सम्मत्त-सम्मामि०-हस्स-रदि-अरदि-सोग-इस्थि-णqसयवेद-उच्च-णीचागोद-परियत्तमाण- णामपयडीणं पि एवं चेव । णवरि अवद्विदसंकमो णत्थेि । एवं सामित्तं समत्तं । एयजीवेण कालो । तं जहा- मदिआवरणस्स भुज० जह० एगसमओ, उक० पलिदो० असंखे० भागो। अप्पदरकालो जह० एगसमओ, उक्क० पलिदो० असंखे० भागो। अवडियस्स जह० एगसमओ, उक्क० संखेजा समया । एवं चउणाणा- वरण-णवदंसणावरण-पंचंतराइयाणं । सादस्स भुजगारसंकामओ केव० १ जह० एग- समओ, उक० आवलिया समयूणा । अप्पदरसंकामओ केव० ? जह० एगसमओ, उक्क० अंतोमुहुत्तं । [अंसादस्स भुजगार-अप्पदरसंक० केव० ? जह. एगसक, उक० अंतोमुहुत्तं । मिच्छत्तस्स भुज० जह० एगस० । उक० अंतोमुहुत्तं, ] आवलिया समऊणा । होता है। शेष चार ज्ञानावरणीय, नौ दर्शनावरणीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, पुरुष- वेद और पांच अन्तराय इनकी सम्यग्दृष्टियों एवं मिथ्यादृष्टियोंमें तथा ध्रुववन्धी नामप्रकृतियोंकी भी यह प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है। साता व असाता वेदनीय, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, हास्य, रति, अरति, शोक, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, उच्चगोत्र, नीचगोत्र और परिवर्तमान नाम- प्रकृतियोंकी भी प्रकृत प्ररूणा इसी प्रकार ही है। विशेषता इतनी है कि इनका अवस्थित संक्रम नहीं है। इस प्रकार स्वामित्व समाप्त हुआ। एक जीवकी अपेक्षा कालकी प्ररूपणा करते हैं। यथा- सतिज्ञानावरणके भुजाकार संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। इसके अल्पतर संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। अवस्थित संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे संख्यात समय मात्र है। इसी प्रकार शेष चार ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण और पांच अन्तराय प्रकृतियोंके सम्बन्ध कहना चाहिये । सातावेदनीयके भुजाकर संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे एक समय कम आवली प्रमाण है। उसके अल्पतर संक्रामकका काल कितना है ? वह जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। असातावेदनीयके भुजाकार और अल्पतर संक्रामकोंका काल कितना है ? वह जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। मिथ्यात्वके भुजाकार संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त १ मिच्छत्तत्स भुजगार-अप्पदर-अवहिद-अवत्तव्यसंकामया अस्थि । एवं सोलसकसाय-पुरिसवेद-भय- दुगुंछाणं । एवं चेव सम्मत्त-सम्मामिच्छत्त-इत्थि-णबुंसयवेद-हस्स-रइ-अरइ-सोगाणं | गवरि अवहिंदर्सकामगा णस्थि । क. पा. सु. पृ. ४२३, २६४-६७. २ कोष्ठकस्योऽयं पाठ अ-का-ताप्रतिष्वनुपलभ्यमानो मप्रतितोऽत्र योजितः । , संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४२५ अप्पदर० जह० एगसमओ, उक्क० छावद्विसागरोवमाणि सादिरेयाणि । अवद्विद० जह० एगसमओ, उक्क० संखेजा समयो । सम्मत्तस्स भुजगार० जहण्णेण एगसमओ, उक्क० अंतोमुहुत्तं । अप्पदर० जह. अंतोमुहुत्तं, उक्क० पलिदो० असंखे० भागो। अवविद- संकमो जत्थेि । सम्मामिच्छत्तस्स भुजगार० जह० एगसमओ, उक० अंतोमुहुत्तं । अप्प- दर० जह, अंतोमु०, उक्क० वे-छावद्विसागरोवमाणि सादिरेयाणि । अणताणुबंधीणं भुजगारकालो जह० एगसमओ, उक्क० पलिदो० असंखे० भागो। अप्पदर० जह० एगसमओ, उक्क० वे-छापहिसागरो० सादिरेयाणि । अवद्विद० जह. एगसमओ, उक्क० संखेजा समयौं । वारसकसाय-भय-दुगुंछाण मदिआवरणभंगों। अथवा एक समय कम आवली मात्र है। अल्पतर संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे साधिक छयासठ सागरोपम मात्र है। अवस्थित संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे संख्यात समय मात्र है । सम्यक्त्व प्रकृतिके भुजाकार संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। अल्पतर संक्रामकका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। उसका अवस्थित संक्रम नहीं होता। सम्य- ग्मिथ्यात्वके भुजाकार संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। अल्पतर संक्रामकका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्पसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। अनन्तानुवन्धिचतुष्टयके भुजाकार संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है । अल्पतर संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। अवस्थित सॅक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे संख्यात समय मात्र है। बारह कपाय, भय और जुगुप्साकी प्ररूपणा १ मिच्छत्तस्स भुजगारसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णेण एयसमओ उकस्सेण आवलिया समयूणा, अघवा अंतोमुहुत्तं । अप्पयरसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? एक्को वा समयो जाव आवलिया दुसमयूणा, अधवा अंतोमूहुत्तं । तदो समयुत्तरो जाव छावहिसागरोवमाणि सादिरेयागि । अवट्टिदसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? जहण्गेण एयसमओ । उक्करसेण संखेजा समया । अवत्तव्यसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ जहष्णुकस्सेण एयसमओ। क. पा. सु. पृ. ४२७, २९९-३११. २ सम्मत्तस्स भुजगारसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ जहण्णेण एयसमओ। उक्करसेण अंतोमुहुत्तं । अप्पयरसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । उक्कस्सेण पलिदोवमत्स असंखेजदिभागो। अवत्तव्यसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ जहणुकस्सेण एयसमयो । क. पा. सु. पृ. ४२९, ३१२-१७. ३ सम्मामिच्छत्तस्स भुजगारसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ एको वा दो वा समया । एवं समयुत्तरो उकास्सेण जाव चरिमुवेल्लणकंडयुकीरणा ति। अधवा सम्मत्तमुप्पामागयस्स वा तदो खवेमाणयत्स वानी गुणसंकमकालो सो वि भुजगारसंकामयस्स कायवो। अप्पदरसेकामगो केवचिरं कालादो होदि १ जहणेग अंतोमुहुत्तं । एयसमभो वा । उफस्सेण छावहिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । अवचटवसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ जहण्गुकस्सेण एयसमओ । क. पा. सु. पृ. ४२९, ३२१-२८. ४ अणंताणुबंधीणं भुजगारसंकामगो केवचिरं कालादो होदि १ जहण्येण एयसमयो । उकारसेण पलिदोवमत्त ४५६ क्खंडागमे संतकम्म हस्स-रदि-अरदि-सोग-इत्थि - णqसयवेदाणं भुजगार-अप्पदरसंकमणकालो जह० एग- समओ, उक्क० अंतोमुहुत्त । अवट्टिय० णत्थि । णवरि इत्थिवेद० अप्पदर० उक्क० वे-छा- वहिसागरो० सादिरेयाणि । णस० अप्पदर० सतिपलिदोवमाणि वे-छावद्विसागरो- वमाणि । पुरिसवेदस्स मदिआवरणभंगो। णिरयगइणामाए भुजगार० जहण्णुक्क० अंतोमुहुत्तं । अप्पदर० जह० अंतोमुहुत्तं, उक्क० बे-छावद्विसागरोवमाणि सादिरेयाणि । अवट्ठिदसंकमो णत्थि । तिरिक्खगइणामाए भुजगारसंकमो हेदुणा उवएसेण च जहण्णुक्क० अंतोमुहुत्तं । अप्पदर० तिरिक्खगइणामाए जह० अंतोमुत्तं, उक्क० तेवद्विसागरोवमसदं सादिरेयं । अवडिय० णस्थि । मणुसगइ- मतिज्ञानावरणके समान है । हास्य, रति, अरति, शोक, स्त्रीवेद और नपुंसकवेद; इनके भुजाकार व अल्पतर संक्रामकोंका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। इनका अवस्थित संक्रम नहीं होता। विशेष इतना है कि स्त्रीवेद के अल्पतर संक्रामकका काल उत्पपैसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है, तथा नपुंसकवेदके अल्पतर संक्रामका उत्कृष्ट काल तीन पल्योपमोंसे सहित दो छयासठ सागरोपम मात्र है। पुरुषवेदकी प्ररूपणा मतिज्ञाना- वरणके समान है। नरकगति नामकर्मके भुजाकार संक्रामकका काल जघन्य और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। अल्पतर संक्रामकका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे साधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। अवस्थित संक्रम उसका नहीं होता। तिर्यंचगति नामकर्मके भुजाकार संक्रमका जघन्य व उत्कृष्ट काल हेतु और उपदेशसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। तिर्यंचगति नामकर्मके अल्पतर संक्रमका काल जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्षसे साधिक एक सौ तिरेसठ सागरोपम मात्र है। अवस्थित संक्रम उसका नहीं होता। मनुष्यगति नासकर्मके भुजाकार संक्रमका काल असंखेजदिभागो। अप्पदरसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? जहणेण एयसमओ। उक्कस्सेण वेछावहिसागरो- वमाणि सादिरेयाणि । अवढिदसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णेण एयसमभो । उक्कस्सेण संखेजा समया । अवत्तव्यसंकामगो केवचिरं कालादो होदि १ जहण्णुक्कस्सेण एयसमओ । क. पा. सु. पृ. ४३०, ३२९-३९. ५ ताप्रती 'वारसकसाय-दुगुंछाणं' इति पाठः । ६ बारस कसाय-पुरिसवेद-भय दुगुंछाणं भुजगार-अप्पदरसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ जहणेगेयसमभो। उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेनदिभागो। अवविदसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णेण एयसमओ। उकस्सेण संखेना समया। अवत्तध्वसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णुकस्सेण एयसमओ । क. पा. सु. पृ. ४३१, ३४०-४७. १ हस्स-रइ-अरइ-सोगाणं, भुजगार-अप्पयरसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? जहण्गेण एयसमओ । उपारसण अंतोमुहुत्तं । क. पा. सु. पृ. ४३२, ३६०-६२. २ अप्पयरसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णेण एगसमओ। उकस्सेण वे छावहिसागरोवमाणि संखेजवस्सन्भहियाणि । क. पा. सु. पृ. ४३१, ३५१-५३. ३ णqसयवेदस्स अप्पयरसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? नहण्गेण एयसमओ। उफारसेण वे छावहि- सागरोवमाणि तिणि पलिदोवमाणि सादिरेयाणि । तेसागि इस्थिवेदभंगो । क. पा. सु. पृ. ४३२, ३५६.५९.

संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो ४५९ एगजीवेण अंतरं णाणाजीवेहि भंगविचओ कालो अंतरं च सामित्तादो एयजीवेण कालादो च साधेदुण भाणियव्वं । अप्पाबहुअं । तं जहा- मदिआवरणस्स अवत्तव्यसंकामया थोवा । अवडिय० अणंतगुणा । अप्पदर० असंखे० गुणा । भुजगार० संखे० गुणा । सेसचगुणाणावरण- णवदंसणावरण-पंचंतराइयाणं मदिआवरणभंगो । सादासादाणं अवत्तव्ब० थोवा । भुजगार० असंखे० गुणा । अप्पदर० संखे० गुणा, एगापलियसंचिदभुजगार संकामय- जीवेहितो अंतोमुहत्तसंचिदअप्पदरसंकामयजीवाणं संखेजगुणत्तसिद्धीए णिव्वाहमुवलंभादो। सोलसकसाय-भय-दुगुंछाणं मदिआवरणभंगो । हस्स-रदीणमवत्त० थोवा । भुज० अणंतगुणा । अप्पदर० संखे० गुणा । एवमित्थिवेदस्स । अरदि-सोगाणमवत्त० थोवा । अप्पदर० अणंतगुणा । भुजगार० संखे० गुणा । एवं णqसयवेदस्सँ । पुरिसवेदस्स - एक जीवकी अपेक्षा अन्तर एवं नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय, काल और अन्तरका कथन स्वामित्वसे तथा एक जीवकी अपेक्षा कालसे भी सिद्ध करके करना चाहिये। अल्पवहुत्वकी प्ररूपणा की जाती है। यथा-मतिज्ञानावरणके अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं। अवस्थित संक्रामक अनन्तगुणे हैं। अल्पतर संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। भुजाकार संक्रामक संख्यातगुणे हैं। शेप चार ज्ञानावरण नौ, दर्शनावरण और पांच अन्तराय प्रकृतियोंका यह अल्पबहुत्व मतिज्ञानावरणके समान है। साता और असाता वेदनीयके अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं। भुजाकार संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अल्पतर संक्रामक संख्यातगुणे हैं, क्योंकि, एक आवली में संचित भुजाकार संक्रामक जीवोंकी अपेक्षा अन्तर्मुहूर्त संचित अल्पतर संक्रामक जीवोंके संख्यातगुणत्वकी सिद्धि- निर्बाध पायी जाती है। सोलह कपाय, भय और जुगुप्साकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है। हास्य और रतिके अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं। भुजाकार संक्रामक अनन्तगुणे हैं। अल्पतर संक्रामक संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार स्त्रीवेदके सम्बन्धमें कहना चाहिये । अरति और शोकके अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं। अल्पतर संक्रामक अनन्तगुणे हैं। भुजाकार संक्रामक संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार नपुंसकवेदके सम्बन्धमें कहना चाहिये । पुरुषवेदके अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं। १ प्रतिषु 'संकामिय' इति पाठः। २ सोलसकसाय-भय-दुगुंछाणं सध्वयोवा अवत्तव्यसंकामया । अवलिंदसंकामया अर्गतगुगा । अपयर- संकामया असंखेनगुणा । भुजगारसंकामया संखेनगुणा । क. पा. सु. पृ. ४४३, ५०४-७. ३ इस्थिवेद-हस्स-रदीणं सबत्योवा अवत्तव्यसंकामया । भुजगारसंकामया अर्णतगुगा । अप्पयरसंफामया संखेजगुणा । क. पा. सु. पृ. ४४३, ५०८-१०. ४ णqसयवेद-अरइ-सोगाणं सव्वत्थोवा अवत्तव्यसंकामया। अप्पदरसफामया अर्गतगुगा । भुजगारसंकामया संखेजगुगा । क, पा, सु. पृ. ४४४, ५१५-१७.

४५८ छक्खंडागमे संतकम्म चदुण्णमाणुपुवीणं सग-सगगइभंगो । पंचसंठाण-पंचसंघडण-आदावुञ्जोब-अप्प- सत्यविहायगइ-थावर-सुहुम-अपजत्त-साहारणसरीर-थिराथिर- सुहासुह-अजसकित्ति-भग- दुस्सर-अणादेजाणं भुजगार० जह० एगसमओ, उक्क० अंतोमु० । अप्पदर० जह० एगसमओ । उक० थिराथिर-सुहासुह-अजसकित्ति० अंतोमुहुत्तं, उज्जोवस्स तिपल्लाहियं तेवहिसागरोवमसदं, आदाव-थावर-सुहुम-अपञ्जत्त-साहारणाणं पंचासीदिसागरोवमसद, पंचसंठाण-पंचसंघडण- अप्पसत्थविहायगइ- दूभग-दुस्सर-अणादेजाणं तिपलिदोवमाहिय- बे-छावद्विसागरोबमाणि । अवडिय० णस्थि । परघाद-उस्सास-पसत्थविहायगइ-तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-सुभग-आदेज-सुस्स- राणं समचउरससंठाणभंगो। उच्चागोदस्स भुजगारसंकमो जह. एगसमओ, उक० आवलिया । अप्पदर० जह० एगसमओ, उक्क० तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । उच्चागोदस्स उव्वेल्लणाएं अपच्छिमे द्विदिखंडए भुजगारो अंतोमुहुत्तं । अवट्ठिय० णत्थि। णीचागोदस्स भुजगार० खवण-उवसामणाहि विणा आवलिया, खवण-उवसामणाहि अंतोमुहुत्तं । अप्पदरजह. एगसमओ, उक्क० बे-छावद्धिसागरो. सादिरेयाणि । अवडिय० णस्थि । एवमेयजीवेण कालो समत्तो। चार आनुपूर्वी प्रकृतियोंकी यह प्ररूपणा अपनी अपनी गतिके समान है । शेप पांच संस्थान, पांच संहनन, आतप, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारणशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, अयशकीर्ति, दुर्मंग, दुस्वर और अनादेय; इनके भुजाकार संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त मात्र है। उनके अल्पतर संक्रामकका काल जघन्यसे एक समय है। उत्कर्षसे वह स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ और अयशकीर्तिका अन्तर्मुहूर्त; उद्योतका तीन पल्योंसे अधिक एक सौ तिरेसठ सागरोपम; आतप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणशरीरका एक सौ पचासी सागरोपम; तथा पांच संस्थान, पांच संहनन, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुस्वर और अनादेयका तीन पल्योपमोंसे अधिक दो छयासठ सागरोपम मात्र है। उनका अवस्थित संक्रम नहीं होता। परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, सुभग, आदेय और सुस्वरकी प्ररूपणा समचतुरस्रसंस्थानके समान है। उच्चगोत्रके भुजाकार संक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कपसे आवली मात्र है। उसके अल्पतरसंक्रामकका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्पसे साधिक तेतीस सागरोपम मान है। उच्चगोत्रकी उद्वेलनाके अन्तिम स्थितिकाण्डकमें भुजाकार संक्रमका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है। इसका अवस्थित संक्रम नहीं है। नीचगोत्रके भुजाकार संक्रमका काल क्षपणा व उवशामनाके विना एक आवली तथा क्षपणा व उपशामनाके साथ अन्तर्मुहूर्त मात्र है। अल्पतर संक्रमका काल जघन्यसे एक समय और उत्कर्षसे साधिक छयासठ सागरोपम मात्र है। अवस्थित संक्रम नहीं है। इस प्रकार एक जीवकी अपेक्षा कालकी प्ररूपणा समाप्त हुई। १ अप्रतौ 'उच्चागोदउव्वेल्लगाए' इति पाठः ।

संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो ४६१ सेवट्टसंघडणाणं अवत्तव्य० थोवा । अप्पदर० अणंतगुणा । भुजागार० संखे० गुणा । णीचुच्चागोदाणं सादासादभंगो । एवं भुजगारसंकमो । समत्तो। एत्तो पदणिक्खेवो। सामित्तं । तं जहा- मदिआवरणस्स उक्कस्सिया वड्ढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो तप्पाओग्गउक्कस्सियाए वड्ढीए बड्ढिदो तदो तं बढि वढिदूर्ण आवलियादिकंतं पुन्यकम्मं च संकातस्स सत्तमाए पुढवीए णेरइयस्स उक्क० वड्ढी । उक० हाणी कस्स ? गुणिदकम्मंसियस्स सव्वुक्कस्सेण कम्मेण खवयस्स चरिम- समयसुहुमसांपरइयस्स तस्स उक्कस्सिया हाणी । उक्कस्समवट्ठाणं कत्थ ? वढीए । चदुणाणावरण-चदुदंसणावरण-पंचंतराइयाणं मदिणाणावरणभंगो। णिद्दा-पयलाणं उक्क० वड्ढी कस्स ? गुणिदकम्मंसियस्स चरिमसुहुमसांपराइयस्स खवगस्स । उक० हाणी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो पढमदाए उवसमसेटिं चढिय चरिमसमयसुहुमसांपराइयो होदूण मदो, तस्स पढमसमयदेवस्स उक्क० हाणी । उकस्स- मवहाणं मदिआवरणअवट्ठाणतुलं । थीणगिद्वितियस्स उक्क० चड्ढी कस्स ? गुणिद- कम्मंसियस्स सव्यसंकमेण संकामेंतस्स । उक्क. हाणी अवट्ठाणं च जहा णिहाए हैं। हुण्डसंस्थान और असंप्राप्तासृपाटिकासंहननके अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं । अल्पतर संक्रामक अनन्तगुणे हैं । भुजाकार संक्रामक संख्यातगुणे हैं। नीच और उच्च गोत्रको प्ररूपणा साता व असाता वेदनीयके समान है। इस प्रकार भुजाकार संक्रम समाप्त हुआ। यहां पदनिक्षेपमें स्वामित्वकी प्ररूपणा करते हैं। वह इस प्रकार है- मतिज्ञानावरणकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकौशिक जीव तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट वृद्धिके द्वारा वृद्धिको प्राप्त हुआ है, पश्चात् उस वृद्धिसे वृद्धिंगत होकर आवली अतिक्रान्त उसका तथा पूर्व कर्मका भी संक्रम कर रहा है उस सातवीं पृथिवीके नारकीके मतिज्ञानावरणकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक सर्वोत्कृष्ट कर्मके साथ क्षपणा करता हुआ सूक्ष्मसाम्परायिकके अन्तिम समयमें वर्तमान है उसके मतिज्ञानावरणकी उत्कृष्ट हानि होती । उसका उत्कृष्ट अवस्थान कहांपर होता है ? उसका उत्कृष्ट अवस्थान वृद्धि में होता है। शेप चार ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तरायकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है। निद्रा और प्रचलाकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? वह गुणितकांशिक अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक क्षपकके होती है। उनकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक जीव प्रथमतः उपशमश्रेणिपर आरूढ होता हुआ अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्म- साम्परायिक होकर मरणको प्राप्त हुआ है उसके प्रथमसमयवर्ती देव होनेपर उनकी उत्कृष्ट हानि होती है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके अवस्थानके समान है। स्त्यानगृद्धित्रिककी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होतो है ? वह सर्वसंक्रम द्वारा संक्रान्त करनेवाले गुणितकर्माशिकके होती है। उनकी उत्कृष्ट हानि और अवस्थानकी प्ररूपणा निद्राके समान ? १ अप्रतौ 'तं वद्विदूण' इति पाठः ।

४६० छक्खंडागमे संतकम्म अवत्तव्य० थोवा । अवडिय० असंखे० गुणा । भुजगार० अगंतगुणा । अप्पदर० संखे० गुणा। मिच्छत्तस्स अवविदसंकामया थोवा । अवत्तव्य असंखे० गुणा । भुजगार०असंखे० गुणा । अप्पदर० असंखे० गुणा । सम्मत्तस्स अवतन्त्र० थोवा । भुजगार० असंखे० गुणा । अप्पदर ० असंखे० गुणा । सम्मामिच्छत्तस्स सम्मत्तभंगो । णिरयगइ० अवत्तव्यया थोवा । भुजगार० असंखे० गुणा । अप्पदर० असंखे० गुणा । तिरिक्खगइणामाए अवत्त० थोवा । अप्पदर० अणंतगुणा । भुजगार० संखे० गुणा । मणुसगइणामाए अवविद० थोवा । अवत्तव्य. असंखे० गुणा । भुजगार० अणंत- गुणा । अप्पदर० संखे० गुणा । देवगइणामाए अवद्विद० थोवा । अवत्तव्ब० असंखे० गुणा । भुजगार० असंखे० गुणा । अप्पदर० असंखे० गुणा । ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीराणं मदिआवरणभंगो। सव्वासि धुवबंधिणामपयडीणं णाणावरणभंगो । पढमसंठाण-पढमसंघडणाणं मणुसगइभंगो। चदुसंठाण-चदुसंघडणाणं अवत्तव्य० थोवा । भुजगार० अणंतगुणा । अप्पदर० संखे० गुणा । हुंडसंठाण-असंपत्त- अवस्थित संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। भुजाकार संक्रामक अनन्तगुणे हैं। अल्पतर संक्रामक संख्यातगुणे हैं। मिथ्यात्वके अवस्थित संक्रामक स्तोक हैं। अवक्तव्य संक्रामक असंख्यात. गुणे हैं। भुजाकार संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अल्पतर संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। सम्यक्त्व प्रकृति के अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं । भुजाकार संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अल्पतर संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । सम्यग्मिथ्यात्वकी प्ररूपणा सम्यक्त्व प्रकृतिके समान है। नरकगति नामकर्मके अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं। भुजाकार संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । अल्पतर संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। तिर्यंचगति नामकर्म के अवक्तव्य संक्रामक स्तोक है। अल्पतर संक्रामक अनन्तगुणे हैं। भुजाकार संक्रामक संख्यातगुणे हैं। मनुष्यगति नामकर्मके अवस्थित संक्रामक स्तोक हैं। अवक्तव्य संक्रामक असंख्यातगुणे । भुजाकार संक्रामक अनन्त- गुणे हैं। अल्पतर संक्रामक संख्यातगुणे हैं । देवगति नामकर्म के अवस्थित संक्रामक स्तोक है। अवक्तव्य संक्रामक असंख्यातगुणे हैं । भुजाकार संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। अल्पतर संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। औदारिक, तैजस और कार्मण शरीरोंके प्रकृत अल्पवहुत्वकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है। सब ध्रुववन्धी नामप्रकृतियोंकी यह प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है। प्रथम संस्थान और प्रथम संहननकी प्ररूपणा मनुष्यगतिके समान है। चार संस्थानों और चार संहननोंके अवक्तव्य संक्रामक स्तोक है । भुजाकार संक्रामक अनन्तगुणे हैं । अल्पतर संक्रामक संख्यातगुणे १ पुरिसवेदस्स . सव्वत्थोवा अवत्तव्यसंकामया । अवदिसंकामया असंखेजगुणा । भुजगारसंकामया अणतगुणा । अप्पयरसंकामया संखेञ्जगुणा । क पा. सु. पृ. ४४३, ५११-१४. २ सम्वत्थोवा मिच्छत्तस्स अवढिदसंकामया । अवत्तव्यसंकामया असंखेनगुणा । भुजगारसंकामया असंखेन. गुणा 1 अप्पयरसंकामया असंखेजगुणा । क, पा. सु. पृ. ४४२, ४९७-५००. ३ सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं सध्वयोवा अवत्तन्वसंकामया । भुजगारसंकामया असंखेनगुगा। अप्पयर- संकामया असंखेनगुगा । क. पा. सु. पृ. ४४३, ५०१-५०३.

संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो ४६१ सेवट्टसंघडणाणं अवत्तव्ब० थोवा । अप्पदर० अणंतगुणा । भुजागार० संखे० गुणा । णीचुच्चागोदाणं सादासादभंगो । एवं भुजगारसंकमो । समत्तो । एत्तो पदणिस्खेवो। सामित्तं । तं जहा- मदिआवरणस्स उक्कस्सिया वड्ढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो तप्पाओग्गउक्कस्सियाए वड्ढीए वढिदो तदो तं वइिंढ वढिदूर्ण आवलियादिकंतं पुन्चकम्मं च संकातस्स सत्तमाए पुढवीए णेरड्यस्स उक्क० वड्ढी । उक्क० हाणी कस्स १ गुणिदकम्मंसियस्स सव्वुकस्सेण कम्मेण खवयस्स चरिम- समयसुहुमसांपरइयस्स तस्स उक्कस्सिया हाणी । उकस्समवट्ठाणं कत्थ ? वड्ढीए । चदुणाणावरण-चदुदंसणावरण-पंचंतराइयाणं मदिणाणावरणभंगो। णिद्दा-पयलाणं उक० वड्ढी कस्स ? गुणिदकम्मंसियस्स चरिमसुहुमसांपराइयस्स खवगस्स । उक्क० हाणी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो पढमदाए उवसमसेढिं चढिय चरिमसमयसुहुमसांपराइयो होदूण मदो, तस्स पढमसमयदेवस्स उक्क० हाणी । उकस्स- मवट्ठाणं मदिआवरणअवट्ठाणतुलं । थीणगिद्धितियस्स उक० वढी कस्स ? गुणिद- कम्मंसियस्स सव्यसंकमेण संकामेंतस्स । उक्क० हाणी अवट्ठाणं च जहा णिहाए ? हैं। हुण्डसंस्थान और असंप्राप्तास्पाटिकासंहननके अवक्तव्य संक्रामक स्तोक हैं । अल्पतर संक्रामक अनन्तगुणे हैं । भुजाकार संक्रामक संख्यातगुणे हैं। नीच और उच्च गोत्रकी प्ररूपणा साता व असाता वेदनीयके समान है। इस प्रकार भुजाकार संक्रम समाप्त हुआ। यहां पदनिक्षेप में स्वामित्वकी प्ररूपणा करते हैं। वह इस प्रकार है- मतिज्ञानावरणकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकौशिक जीव तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट वृद्धिके द्वारा वृद्धिको प्राप्त हुआ है, पश्चात् उस वृद्धिसे वृद्धिंगत होकर आवली अतिक्रान्त उसका तथा पूर्व कर्मका भी संक्रम कर रहा है उस सातवीं पृथिवीके नारकीके मतिज्ञानावरणकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकांशिक सर्वोत्कृष्ट कर्मके साथ क्षपणा करता हुआ सूक्ष्मसाम्परायिकके अन्तिम समयमें वर्तमान है उसके मतिज्ञानावरणकी उत्कृष्ट हानि होती है। उसका उत्कृष्ट अवस्थान कहांपर होता है ? उसका उत्कृष्ट अवस्थान वृद्धि में होता है। शेप चार ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तरायकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है। निद्रा और प्रचलाकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? वह गुणितकमांशिक अन्तिम- समयवर्ती सूक्ष्म साम्परायिक क्षपकके होती है। उनकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक जीव प्रथमतः उपशमश्रेणिपर आरूढ होता हुआ अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्म- साम्परायिक होकर मरणको प्राप्त हुआ है उसके प्रथमसमयवर्ती देव होनेपर उनकी उत्कृष्ट हानि होती है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके अवस्थानके समान है। स्त्यानगृद्धित्रिककी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होतो है ? वह सर्वसंक्रम द्वारा संक्रान्त करनेवाले गुणितकर्माशिकके होती है। उनकी उत्कृष्ट हानि और अवस्थानकी प्ररूपणा निद्राके समान १ अप्रतौ 'तं वविदूण' इति पाठः ।

४६२ छक्खंडागमे संतकम्म तहा बत्तन्छ । सादस्स उक्कस्सिया वड्ढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो कसाए तिखुत्तमुवसामे- दूण चउत्थवारमुवसामेंतो चरिमसमयसुहुमसांपराइयो जादो, तदो मदो देवो जादो, तस्स आवलियतब्भवत्थस्स देवस्स उक० वड्ढी। एदिस्सेब से काले उक० हाणी । अवठ्ठाणं णत्थि । असादस्स उक० वड्ढी कस्स जो गुणिदकम्मंसियो खवग- सेडिमारुहिय चरिमसमयसुहुमसांपराइयो जादो तस्स उक्क० वड्ढी । उक्क० हाणी कस्स ? जो गुणिदकमंसियो उवसमसेडिमारुहिय सुहुमसांपराइयो जादो से काले मदो तस्स पढमसमयदेवस्स उक० हाणी । अवट्ठाणं णत्थि । मिच्छत्तस्स उक्क० वड्ढी कस्स ? जो गुणिदकम्मसियो मिच्छत्तस्स चरिमफालिं सव्यसंकमेण सम्मत्त-सम्मामिच्छत्तेसु संकामेंतओ तस्स उक्क० चड्ढी । उक० हाणी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो गहिदपढमसम्मत्तो सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणि उक्कस्स- गुणसंकमेण पूरिय से काले विज्झादसंकर्म गदो तस्स उक्क० हाणी । उकस्समवट्ठाणं कस्स ? जो पुवाइदेण सम्मत्तेण गुणिदकम्मंसियो उक्कस्साएँ जोगवड्ढीए वढिदण से काले जो समयपबद्धो तदो विसेसुत्तरे जोगट्ठाणे पडिवदिदो, तदो से काले सम्म करना चाहिये। सातावेदनीयको उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकौशिक कपायोंको तीन वार उपशमा कर चौथे वार उपशमाता हुआ अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक होकर मरणको प्राप्त हो देव हुआ है, उस आवली कालवर्ती तद्भवस्थ देवके उसकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। इसीके अनन्तर काल में उनकी उत्कृष्ट हानि होती है। अवस्थान नहीं होता। असातावेदनीयकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकांशिक क्षपकश्रेणिपर आरूढ होकर अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक हुआ है उसके उसकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकांशिक उपशमश्रेणिपर आरूढ होकर सूक्ष्मसाम्परायिक होता हुआ अनन्तर समयमें मृत्युको प्राप्त हुआ है उसके प्रथम समयवर्ती देव होनेपर असाता- वेदनीयकी उत्कृष्ट हानि होती है। अवस्थान उसका नहीं होता। मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक मिथ्यात्वकी अन्तिम फालिको सर्वसंक्रम द्वारा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व में संक्रान्त रहा है उसके मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकमांशिक प्रथम सम्यक्त्वको ग्रहण कर सम्यक्त्व प्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वको उत्कृष्ट गुणसंक्रमके द्वारा पूर्ण करके अनन्तर काल में विध्यातसंक्रसको प्राप्त हुआ है उसके उसकी उत्कृष्ट हानि होती है । उसका उत्कृष्ट अवस्थान किसके होता है ? जो गुणितकांशिक पूर्व आगत सम्यक्त्यके साथ उत्कृष्ट योगवृद्धिसे वृद्धिको प्राप्त होकर अनन्तर कालमें जो समयप्रबद्ध है उससे विशेषाधिक योगस्थानमें गिरता है, पश्चात् जो अनन्तर काल में सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ है, १ अ-काप्रत्योः 'उकत्सए' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४६३ पडिवण्णो, तस्स जाधे उक्कस्सिया वढी आवलियमइक्ता ताधे उकस्सिया मिच्छत्तस्स पदेससंकमवढी । तिस्सेव से काले उक्कस्समवट्ठाणं । सम्मत्तस्स उक्क० वड्ढी कस्स ? जो उक्क० कम्मेण मिच्छत्तं गदो, तदो सच- रहस्सेण उव्वेल्लणकालेणं सम्मत्तमुव्वेल्लेदि, तस्स अपच्छिमहिदिखंडयस्स चरिमसमए उक्क० चड्ढी । उक्क० हाणी कस्स ? जो उक्स्सएण कम्मेण मिच्छत्तं गदो तस्स दुसमय- मिच्छाइद्विस्स उक्क० हाणी । अवट्ठाणं णत्थि त्ति । सम्मामिच्छत्तस्स उकस्सबढि-हाणीणं मिच्छत्तस्स वढि-हाणिभंगो। अब- हाणं णत्थेिं । अणंताणुवंधीणं उकस्सिया कस्स ? गुणिदकम्मंसियस्स सव्यसंकमेण चरिमफालिं संकामेंतस्स । उक० हाणी कस्स ? जो गुणिदकम्मसियो सम्मत्तं पडिवण्णो उसके जव उत्कृष्ट वृद्धि आवली अतिक्रान्त होती है तब मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमवृद्धि होती है। उसीमें उसका अनन्तर कालमें अवस्थान होता है। सम्यक्त्व प्रकृतिकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो उत्कृष्ट सत्कर्म के साथ मिथ्यात्वको प्राप्त होकर पश्चात् सबसे थोड़े उद्वेलनकालमें सम्यक्त्वकी उद्वेलना करता है उसके अन्तिम स्थितिकाण्डकके अन्तिम समयमें उसकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो उत्कृष्ट सत्कर्म के साथ मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है उस द्वितीय समयवर्ती मिथ्याष्टिके उसकी उत्कृष्ट हानि होती है। अवस्थान उसका नहीं है। सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट वृद्धि और हानिकी प्ररूपणा मिथ्यात्वकी वृद्धि और हानिके समान है। अवस्थान उसका नहीं है। अनन्तानुबन्धी फपायोंकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? उसकी उत्कृष्ट वृद्धि सर्वसंक्रम द्वारा अन्तिम फालिको संक्रान्त करनेवाले गुणितकमांशिकके होती है। उनकी उत्कृष्ट हानि १ मिच्छत्तस्स उक्कस्सिया वही कस्स १ गुणिदकम्मंसियस्स मिच्छत्तक्खवयस्स सव्वसंकामयस्स | उकास्सिया हाणी कस्स १ गुणिदकम्मंसियस्स सम्मत्तमुप्पाएदूण गुणसंकमेण संकामिदूण पदमसमयविझादसंकामयस्स । उक्कस्सयमवट्टाणं कस्स ? गुणिद कम्मंसिओ पुव्वुप्पण्णेण सम्मत्तेण मिच्छत्तादो सम्मत्तं गदो तं दुसमयसम्माइटिमादि कादूण जाव आवलियसम्माइटि त्ति एत्य अण्णदरम्मि समये तप्पाओग्गउपसण वढि कादूण से काले तत्तियं संकामयमाणस्स तस्स उकस्सयमवट्टाणं । क. पा. सु. पृ. ४४५, ५२६-३१. २ ताप्रती 'उवेलणकाले [ण] इति पाठः। ३ सम्मत्तस्स उक्कस्सिया बहो करस ? उज्वेल्लमाणयत्त चरिमसमए । उकस्सिया हाणी फस्स ? गुगिद- कम्मसियो सम्मत्तमुप्पाएदूण लहुं मिच्छत्तं गओ । तस्स मिच्छाइहित्स पढमसमए अवत्तव्वसंफमो, विदियसमए उफस्सिया हाणी। क. पा. तु. पृ. ४४६, ५३२-३५, ४ सम्मामिच्छत्तत्स उक्कस्सिया वही करस १ गुणिदकम्मंसियत्स सव्वसंफामयस्स । उक्कस्सिया हागी कसा ? उप्यादिदे सम्मत्ते सम्मामिच्छत्तादो सम्मत्तेजं संकामेदितं पदेसगमंगुललासंखेनभागपटिमागं । गुगिदकम्मंसिओ सम्मत्तमुप्पाएदूग लहुं चेव मिच्छत्तं गदो महग्गियाए मिच्छत्तदाए पुगाए सम्मत्तं पडियष्णो । तत्म पढमसमयसम्माइटिरस उफस्सिया हाणी | क. पा. तु. पृ. ४४६, ५३६-४०.

छक्खंडागमें संतकम्म तस्स पढमसमयसम्माइडिस्स उक० हाणी । उकस्समवट्ठाणं मदिआवरणउकस्साव- द्वाणतुल्लं'। अट्टणं कसायाणं उक्क० बढी कस्स ? जो गुणिदकमंसियो सव्वसंकमेण चरिम- फालिं संकातओ तस्स उक्क० वड्ढी । दुविहस्स कोहस्स उक्क० हाणी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो उवसमसेढिमारुहिय दुविहे कोहे चरिमसमयअणुवसंते तदो से काले मदो तस्स पढमसमयदेवस्स उक्क० हाणी । दुविहमाण-माया-लोहाणं हाणीए दुविह- कोहभंगो । अट्ठण्णं कसायाणमुक्कस्समवट्ठाणं मदिआवरणअवठ्ठाणतुल्लं । कोहसंजलणाए, उक्क० वइढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो सव्वसंकमेण चरिमकालिं संकातओ तस्स उक्क० वड्ढी । तस्सेव से काले उक० हाणी । उकस्समवहाणं हाणीए किसके होती है ? जो गुणितकौशिक सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ है उस प्रथम समयवर्ती सम्यग्दृष्टिके उनकी उत्कृष्ट हानि होती है। उनके उत्कृष्ट अवस्थानका कथन मतिज्ञानावरणके उत्कृष्ट अवस्थानके समान है। आठ कषायोंकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक सर्वसंक्रम द्वारा अन्तिम फालिको संक्रान्त कर रहा है उसके आठ कषायोंकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। दो प्रकार ( अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण ) क्रोधकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक उपशमश्रेणिपर आरूढ होकर दो प्रकारके क्रोधके अनुपशान्त रहनेके अन्तिम समय पश्चात् अनन्तर काल में मरणको प्राप्त हुआ है उस प्रथम समयवर्ती देवके उसकी उत्कृष्ट हानि होती है। दो प्रकारके मान, माया और लोभकी हानिकी प्ररूपणा दो प्रकार के क्रोधके समान है। आठ कषायोंके उत्कृष्ट अवस्थानको प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके अवस्थानके समान है। संज्वलन क्रोधको उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकांशिक सर्वसंक्रम द्वारा अन्तिम फालिको संक्रान्त कर रहा है उसके उसकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसीके अनन्तर काल में उसकी उत्कृष्ट हानि होती है। उत्कृष्ट अवस्थान हानिमें करना चाहिये । जैसे संज्वलन क्रोधको १ अर्णताणुबंधीणमुक्कस्सियावडी कस्स ? गुणिदकम्मंसियस्स सव्वसंकामयस्स । उक्कस्सिया हाणी करस ? गुणिदकम्मंसिओ तप्पाओग्गउकस्सयादो अधापवत्तसंकमादो सम्मत्तं पडिवजिऊण विज्झादसंकामगो जादो। तस्स पढमसमयसम्माइहिस्स उक्कस्सिया हाणी । उक्कस्सयमवट्टाणं कस्स ? जो अधापवत्तसंकमेण तप्पाओग्गु- कस्सएण वह्रिदूण अवढिदो तस्स उकत्सयमवहागं । क. पा. सु. पृ. ४४७, ५४१-४६. २ अट्ठकसायाणमुक्कस्सिया वड्डी कस्स १ गुणिदकम्मंसियत्स सव्यसंकामयस्स । उक्कस्सिया हाणी करस ? गुणिदकम्मंसियो पढमदाए कसायउवसामणद्धाए जाधे दुविहस्स कोहस्स चरिमसमयसंकामगो जादो। तदो से काले मदो देवो नादो । तस्स पढमसमयदेवत्स उक्कस्सिया हाणी । एवं दुविहमाण-दुविहमाया-दुविहलोहाण । णवरि अप्पप्पणो चरिमसमयसकामगो होदूण से काले मदो देवो नादो। तत्स पढमसमयदेवस्स उपस्सिया हाणी । अट्टण्हं कसायाणमुक्कसयमवहाणं करस ? अधापवत्तसं कमेण तप्पाभोग्ग उक्कत्सएण वट्टियूण से काले अवहिदसकामगो जादो । तस्स उफस्सयमवहाणं । क. पा. सु. पृ. ४४७, ५४७-५४.

संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४६५ कायचं' । जहा कोहसंजलणाए तहा माण-माया-पुरिसवेद-छण्णोकसायाणं कायव्यं । णवरि छण्णोकसायाणं उक्कस्सिया हाणी चरिमसमयअणुवसंते से काले मदो देवो जादो तस्स पढमसमयदेवस्स उक्क० हाणी। चगुणोकसायाणमवट्ठाणं णत्थि । भय-दुगुंछाण- मवट्ठाणं मदिआवरणभंगो। इत्थि-णसयवेदाणमुक्क० चड्ढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो सव्यसंकमेण चरिम- फालिं संकातओं तस्स उक्कस्सिया वड्ढी । उक० हाणी कस्स ? जो गुणिदकमंसियो प्ररूपणा की गयी है उसी प्रकार संज्वलन मान, माया, पुरुपवेद और छह नोकपायोंकी प्ररूपणा करना चाहिये । विशेषता इतनी है कि छह नोकपायोंकी उत्कृष्ट हानि उनके अनुपशान्त रहने के अन्तिम समयके पश्चात् अनन्तर कालमें (जहां वे उपशान्त होनेवाले थे ) जो मरणको प्राप्त होकर देव हुआ है, उस प्रथम समयवर्ती देवके होती है। चार नोकपायोंका ( हास्य, रति, अरति और शोक ) का अवस्थान नहीं है। भय और जुगुप्साके अवस्थानकी प्ररूपणा मति. ज्ञानावरणके समान है। विशेपार्थ- यहां संज्वलन लोभके स्वामित्वकी प्ररूपणा नहीं की गयी है ( सम्भव है प्रतिलिपिकारकी असावधानीसे वह लिखनेसे रह गयी हो)। उसकी प्ररूपणा कसायपाहुड (चूर्णिसूत्र ) में इस प्रकार की गयी है- संज्वलन लोभकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जिस गुणितकौशिक जीवने अल्प कालमें चार वार कपायोंको उपशान्त किया है, तथा जो अन्तिम भवमें दो वार कपायोंको उपशान्त कर क्षपणामें उद्यत हुआ है, उसके जब अकृतअन्तरकरण अवस्थाका अन्तिम समय प्राप्त होता है तब उसकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकांशिक तीन चार कपायोंको उपशान्त कर चौथी बार उनके उपशान्त करने में प्रवर्तमान है वह जब अन्तिम समयवर्ती अकृतअन्तरकरण रहनेके अनन्तर समयमें मरणको प्राप्त होकर देव होता है तब उसके देव होने के पश्चात् एक समय अधिक आवली मात्र कालके वीतनेपर उसकी उत्कृष्ट हानि होती है। उसके उत्कृष्ट अवस्थानकी प्ररूपणा अप्रत्याख्यानावरणके समान है। ( देखिये क. पा. सु. पृ. ४४९, ५६३-६७ ) स्त्रीवेद और नपुंसकवेदकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक सर्व- संक्रमण द्वारा अन्तिम फालिको संक्रान्त कर रहा है उसके उनकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उनकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकांशिक अन्तिम समयवर्ती उपशामक होकर १ कोहसंजलणस्स उकास्सिया वड्डी कस्स ? जस्स उकत्सओ सध्वसंकमो तस्स उपस्सिया वझी। तरसेव से काले उकास्सिया हाणी। णवरि से काले संकमपाओग्गा समयपबद्धा जहण्या कायना । तं जहा-जेसि से काले आवलियमेत्ताणं समयपबद्धाणं पदेसगं संकामिजाहिदि ते समयपबद्धा तप्पाओग्गजहणा । एदीए परूवणाए सध्वसंकमं संछुहिदूण जत्स से काले पुवपरूविदो संकमो तस्स उपस्सिया हागी कोहनजलगत्स । तरसेव से काले उकत्सयमवट्टाणं । क. पा. सु. पृ. ४४८, ५५५-६१. २ ताप्रती 'माण माय....."पुरिसवेद-' इति पाठः । ३ जहा कोहसंजलणस्स तहा माण-मायासंजलग-परिसवेदागं । क. पा. नु. पृ. ४४९, ५६२. ४ अ-काप्रत्योः 'दुगुंछावाणं' इति पाठः । छ, से. ५९ ४६६ क्खंडागमे संतकस्म चरिमसमयउवसामओ संतो मदो तस्स पढमसमयदेवस्स उक० हाणी । अवट्ठाणं णत्थि । किमटुं छण्णोकसायाणं णावहाणं ? वुचदे-बंधाभावकाले ण ताव अवठ्ठाणसंकमो अस्थि, अद्धढिदिगलणाए परपयडिसंकमेण चे पडिसमयं झिजमाणकम्मपदेसाए पयडीए बंधाभावेण अपडिग्गहेण अण्णपयडीहितो आगच्छमाणकम्मपोग्गलविरहियाए हाणिसंकम मोत्तणे अवट्ठाणाणुववत्तीदो । बंधकाले वि णस्थि, पयादो असंखेजगुणायदसणादों। ते जहा- छण्णोकसाएसु अप्पिदपयडीए गलमाणदव्यमेगसमयपवद्धस्स संखेजदिभाग- मेत्तं संखेजा भागा वा होदि, आगच्छमाणदव्यं पुण कम्मइयवग्गणादो एग- समयपबद्धमत्तं बंधविरहिदमोहपयडीहितो अधापवत्तसंक्रमेण असंखेजसमयपबद्धमत्तं च दव्यमागच्छदि । तेण बंधकाले वढिसंकमो चेव, णापट्टियसंकमों। सगदव्यमधापवत्तसंकमेण वज्झमाणपयडीसु गच्छंतमस्थि ति वओ वि असंखेज- समयपबद्धमत्तों अस्थि ति किण्ण बुच्चदे ? ण, बंधपयडीदो बंधपयडीसु गच्छंतदब्ब- मरणको प्राप्त हुआ है उस प्रथम समयवर्ती देवके उनकी उत्कृष्ट हानि होती है। उनका अवस्थान नहीं है। शंका छह नोकषायोंका अवस्थान किसलिये नहीं होता ? समाधान- इस शंकाके उत्तर में कहते हैं कि [ यदि उनका अवस्थान सम्भव है तो क्या वह बन्धके अभावकालमें होता है या बन्धकालमें ? बन्धके अभावकालमें तो उनका अवस्थानसंक्रम सम्भव नहीं है, क्योंकि, अद्धस्थितिगलनसे और परप्रकृतिसंक्रमणसे भी प्रतिसमयमें क्षीण होनेवाले कर्मप्रदेशसे संयुक्त तथा बन्धाभाव के कारण प्रतिग्रह ( अन्य प्रकृतिके द्रव्यका ग्रहण) रहित होनेसे अन्य प्रकृतियोंसे आनेवाले कर्म-पुद्गलोंसे विरहित विवक्षित प्रकृतिके हानिसंक्रमको छोड़कर अवस्थानसंक्रम वनता नहीं है। वन्धकालमें भी वह सम्भव नहीं है, क्योंकि, उस समय व्ययकी अपेक्षा आय असंख्यातगुणी देखी जाती है। वह इस प्रकारसे- उक्त छह नोकपायोंमें विवक्षित प्रकृतिका गलनेवाला द्रव्य एक समयप्रबद्धके संख्यातवें भाग मात्र अथवा संख्यात बहुभाग मात्र होता है, परन्तु उसका आनेवाला द्रव्य कार्मण वर्गणासे एक समयप्रवद्ध मात्र तथा वन्धरहित मोहप्रकृतियोंसे अधःप्रवृत्तसंक्रम द्वारा असंख्यात समय- प्रवद्ध मात्र द्रव्य आता है। इस कारण वन्धकालमें वृद्धिसंक्रम ही होता है, अवस्थान- संक्रम नहीं होता। शंका- चूंकि अपना द्रव्य अधःप्रवृत्तसंक्रम द्वारा वध्यमान प्रकृतियोंमें जा रहा है, अतएव व्यय भी उनका असंख्यात समयप्रवद्ध मात्र है; ऐसा क्यों नहीं कहते ? समाधान- नहीं, क्योंकि वन्धप्रकृतियोंसे वन्धप्रकृतियों में जानेवाले द्रव्यके समान ही १ मप्रतिपाठोऽयम् । अ-का-ता प्रतिपु 'अद्विदि' इति पाठः। २ अप्रतावस्य स्थाने 'वि' इति पाटः । ३ अप्रतौ 'छिनमाण' इति पाठः । ४ अ-काप्रत्योः 'घेत्तूण' इति पाठः । ५ प्रतियु 'असंखेजगुणपदसणादो' इति पाठः । ६ तापतौ 'मेत्तं च [दव्वं ] आगच्छदि' इति पाठः । ७ मप्रतौ ‘णोवट्टियसंकमो' इति पाठः । ८ अ-काप्रत्योः 'मेत्ता' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४६७ समाणदव्बस्स तेहिंतो आगच्छमाणस्स उवलंमेण वयाभावादो। पदेससंतभुजगाराभावे वि परिणामवसेण संकमभुजगारस्सेव तव्वसेण अवट्ठाणसंकमो अस्थि ति किषण बुच्चदे ? ण, पडिसेहस्स दवणिवंधणावद्विदसंकमापडिसेहफलत्तादो । पुरिसवेदस्स कधमवहिदसंकमो ? ण, सम्माइट्ठीसु इस्थि-णवंसयवेदेसु बंधाभावेण विज्झादसंकमेण पुरिसवेदे संकातेसु अधडिदिगंलणाए गलमाणदन्वेण समाणं इस्थि- णसय वेदेहितो आगच्छमाणदव्यादो असंखेजगुणं बंधतेसु तदुवलंभादो। अबज्झ- माणमोहपयडिदव्वं पुरिसवेदस्स किण्णागच्छदे १ ण, तस्स सदो णिग्गददवाणुसारेणेव आगमुवलंभादो। एवं णामस्स सबधुवबंधिपयडीणं पि अवठ्ठाणपरूवणा कायया । अण्णेण उवएसेण पुण सव्वणामपयडीणं णत्थि अवट्ठिदसंकमो । कुदो ? जसकित्ति-अजसकित्तीण- मागम-णिग्गमविसमदाए। तं जहा- जसकित्तीए तुल्लसंतकम्मे णिग्गमादो णिग्गमो तुल्लो वा विसेसुत्तरो वा । आगमो पुण णिग्गमादो संखे० गुणो। अजसकित्तीए वि तुल्लसंतकम्मे णिग्गमादो णिग्गमो तुल्लो वा असंखेजदिभागुत्तरो वा । आगमो पुण णिग्गमादो द्रव्य चूंकि उनसे आनेवाला भी पाया जाता है, अतएव व्ययकी वहां सम्भावना नहीं है। शंका- प्रदेशसत्त्वभुजाकारके अभावमें भी परिणामोंके वशसे जैसे भुजाकारसंक्रम होता है, वैसे ही परिणामोंके वशसे अवस्थानसंक्रम होता है, ऐसा क्यों नहीं कहते ? समाधान- नहीं, क्योंकि इस प्रतिपेधका फल द्रव्यनिवन्धन अवस्थितसंक्रमका प्रतिषेध नहीं है। शंका-पुरुपवेदका अवस्थितसंक्रम कैसे होता है ? समाधान- नहीं, क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीवों में बन्धकी सम्भावना न होनेसे स्त्री और नपुंसक वेदोंके विध्यातसंक्रम द्वारा पुरुपवेद में संक्रान्त होनेपर चूंकि वे अधस्थितिगलनसे गलने- वाले द्रव्यके समान स्त्री और नपुंसक वेदोंसे आनेवाले द्रव्यकी अपेक्षा असंख्यातगुणे द्रव्यको वांधनेवाले होते हैं, अतएव उक्त सम्यष्टि जीवों में पुरुपवेदका अवस्थित संक्रम पाया जाता है। शंका- अवध्यमान मोहप्रकृतियोंका द्रव्य पुरुषवेदमें क्यों नहीं आता ? समाधान- नहीं, क्योंकि उसके अपने मेंसे जानेवाले द्रव्यके अनुसार ही उनसे आनेवाला द्रव्य पाया जाता है। इसी प्रकार नामकर्मकी सब ध्रुववन्धी प्रकृतियोंके भी अवस्थानकी प्ररूपणा करना चाहिये। परन्तु अन्य उपदेशके अनुसार सव नामप्रकृतियोंका अवस्थितसंक्रम नहीं होता। इसका कारण यशकीर्ति और अयशकीतिके आने व जानेवाले द्रव्यकी विषमता है। वह इस प्रकारसे- यशकीर्तिके समान सत्कर्म में निर्गमकी अपेक्षा निर्गम तुल्य अथवा विशेप अधिक होता है। परन्तु आगमन निर्गमनकी अपेक्षा संख्यातगुणा होता है। अयशकीर्ति के भी समान सत्कर्ममें निर्गमसे निर्गम समान अथवा असंख्यातवें भागसे अधिक होता है। परन्तु १ अ-काप्रत्योः 'अवहिदि', ताप्रती 'अवहिद' इति पाठः ।

४६८ छक्खंडागमे संतकम्म असंखे० भागुत्तरो । तदो धुवबंधीणं णामपयडीणं जदा जसकित्ती बज्झदि तदा आगमो थोवो, णिग्गमो बहुओ। जदा जसकित्ती ण बज्झदि तदा णिग्गमो थोवो, आगमो बहुओ । एदेण कारणेण णामस्स पयडीणं णत्थि अवठ्ठाणं । एदेणेव हेदुणा पुरिसवेद- भय-दुगुंछाणं पि अबढाणाभावो परूवेयव्यो। एदेहि दोहि उवदेसेहि भुजगार-पद- णिक्खेव-बढिसंकमेसु सामित्तमप्पाबहुगं कायच्वं । णिरयगइणामाए उक्कस्सिया वड्ढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो सव्यसंकमेण चरिमफालिं संकातओ तस्स उक्कस्सिया वड्ढी । उक्क० हाणी कस्स ? जो गुणिद- कम्मसियो पढमवारं चेव उवसमसेडिमारूढो चरिमसमयसुहुमसांपराइयो संतो मदो देवो जादो तस्स पढमसमयदेवस्स डक० हाणी । अवठ्ठाणं णस्थि । तिरिक्खगदिणामाए णिरयगइभंगो । मणुसगइणामाए उक्कस्सिया चड्ढी कस्स ? जो सत्चमाए पुढवीए पोरइयो गुणिदकम्मंसियो तेत्तीसं सागरोवमाणि सम्मत्तमणुपाले दूण सव्वणिरुद्धकाले सेसे मिच्छत्तं गदो, तदो उबट्टियस्से पढमसमयतिरिक्खस्स उक्कस्सिया पदेससंकम- वड्ढी । मणुसगइणामाए उक्कस्सिया हाणी कस्स ? जो णेरइयो गुणिदकम्मंसियो तेत्तीसं सागरोवमाणि सम्मत्तमणुपालेयूण सव्वणिरुद्धकाले सेसे मिच्छत्तं गदो तस्स पढमसमयमिच्छाइहिस्स उक० हाणी । अवट्ठाणं णस्थि । आगम निर्गमकी अपेक्षा असंख्यातवें भागसे अधिक होता है। इस कारण ध्रुवबन्धी नाम- प्रकृतियोंका जब यशकीर्ति वंधती है तब आगम स्तोक और निर्गम बहुत होता है। तथा जब यशकीर्ति नहीं बंधती है तव निर्गम स्तोक ओर आगम बहुत होता है। इस कारण नामप्रकृतियोंका अवस्थान नहीं है। इसी हेतुसे पुरुपवेद, भय और जुगुप्साके भी अवस्थानके अभावकी प्ररूपणा करना चाहिये। इन दो उपदेशोंके अनुसार भुजाकार, पदनिक्षेप और वृद्धिसंक्रममें स्वामित्व व अल्पवहुत्वका कथन करना चाहिये। नरकगति नामकमकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक सर्वनक्रम द्वारा अन्तिम फालिको संक्रान्त कर रहा है उसके उसकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसको उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकांशिक प्रथम वार ही उपशम श्रेणिपर आरूढ होकर अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसास्परायक हाता हुआ मरणको प्राप्त होकर देव हुआ है उस प्रथम समयवर्ती देवके उसका उत्कृष्ट हानि होतो ह । अवस्थान उसका नहीं है। तियेग्गति नामकर्मकी प्ररूपणा नरकगतिक समान है। मनुष्यगोत नामकमकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो सातवीं पृथिवीका गुणितकमाशिक नारकी तेतोस सागरोपम काल तक सम्यक्त्वका पालन कर सर्वनिरुद्ध कालके शप रहनेपर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है, तत्पश्चात् वहांसे निकलकर जो तियंच हुआ है, उस प्रथम समयवर्ती तिर्यंचक उसको उत्कृष्ट प्रदशसंक्रमाद्ध हातो है। मनुष्यगति नामकमका उत्कृष्ट हानि किसक हाता है ? जानारका गुणितकमाशिक तेतीस सागरोपम काल तक सम्यक्त्वका पालन कर सर्वनिरुद्ध कालके शेप रहनेपर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है उस प्रथम समयवर्ती मिथ्याष्टिके उसकी उत्कृष्ट हानि होती है। अवस्थान उसका नहीं है। १ अ-काप्रत्योः 'उवाहियरस', ताप्रती 'उवाहियरस' इति पाठः ।

संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो मणुमगइणामाए सत्तमपुढविणेरइयसम्माइट्ठीहि तेत्तीसं सागरोवमाणि णिरंतरं बद्धाए किमिदि णावट्ठाणं ? जेसिमाइरियाणं णिग्गमाणुसारी आगमो तेसिमहिप्पाएण अस्थि अवविदसंकमो। जेसि पुण आइरियाणं-णिग्गमाणुसारी आगमो ण होदि, किंतु संकामिजमाणपयडिपदेसाणुसारी, तेसिमहिप्पारण सव्यणामपयडीणं णस्थि अवठ्ठाणं । देवगइणामाए [ उक्कस्सिया ] वढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो असंखेज- वस्साउएसु पूरेदण दसवस्ससहस्सिएसु देवेसु उववण्णो, तदो चुदो'तिरिक्खेसु मणुस्सेसु उववष्णो, तस्स तेसिं पढमसमए चट्टमाणस्स उक० वढी । उक्क० हाणी कस्स ? जो गुणिदकम्मसियो असंखेजवस्साउएसु पूरेदूण मदो देवो जादो तस्स पढमसमयदेवस्स देवगदिणामाए उक. हाणी । जेण उवदेसेण अवठ्ठाणं तेण उवदेसेण तिपलिदोवमियस्स तप्पाओग्गउक्कस्सियाए वड्ढीए बढिदूण अवट्ठिदस्स उकस्समवट्ठाणं । मणुसगइणामाए वि णिर यगदीए तेत्तीसं सागरोवमाणि सम्मत्तमणुपालेयूण तत्थ तप्पाओग्गउक्कस्सियाए वड्ढीए वढिद्ण अवट्ठिदस्स उकस्समवट्ठाणं । एवं तिरिक्खगदीए सत्तमपुढविणेरइएसु तिरिक्खगदि चेव णिरंतरं बंधमाणेसु अवठ्ठाणं वत्तव्यं । शंक- सातवीं पृथिवीके नारकी सम्यग्दृष्टियों के द्वारा तेतीस सागरोपम काल तक निरन्तर मनुष्यगतिके बांधे जानेपर उसका अवस्थान क्यों नहीं होता ? समाधान-जिन आचार्यों के मत में निगम के समान आगम होता है उनके अभिप्रायके अनुसार उसका अवस्थितसंक्रम होता है। परन्तु जिन आचार्यों के मतमें निर्गमके अनुसार आगम नहीं होता, किन्तु संक्रान्त की जानेवाली प्रकृतियों के प्रदेशके अनुसार आगम होता है; उनके अभिप्रायके अनुसार सब नामप्रकृतियोंका अवस्थानसंक्रम नहीं होता। देवगति नामकर्मकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकांशिक असंख्यात- वर्पायुष्कोंमें उसको परिपूर्ण करके दस हजार वर्षकी आयुवाले देवोंमें उत्पन्न हुआ है और फिर वहांसे च्युत होकर तिर्यंचों व मनुष्यों में उत्पन्न हुआ है उसके उक्त भवोंके प्रथम समयमें वर्तमान होनेपर उसकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक असंख्यातवर्षायुष्कोंमें उसे पूर्णकर (बांधकर) मरणको प्राप्त हो देव उत्पन्न हुआ है उस प्रथम समयवर्ती देवके देवगति नामकर्मकी उत्कृष्ट हानि होती है। जिस उपदेशके अनुसार अवस्थान होता है उस उपदेशके अनुसार तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट वृद्धिके द्वारा वृद्धिंगत होकर अवस्थानको प्राप्त हुए तीन पल्योपम आयुवाले जीवके उसका उत्कृष्ट अवस्थान होता है। नरकगतिमें तेतीस सागरोपम काल तक सम्यक्त्वको पालकर और वहां तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट वृद्धि के द्वारा वृद्धिंगत होकर अवस्थानको प्राप्त हुए जीवके मनुष्यगति नामकर्मका भी उत्कृष्ट अवस्थान होता है। इसी प्रकार तिर्यंचगतिको ही निरन्तर बांधनेवाले सातवीं पृथिवीके नारकियों में तियंचगति नामकर्मके उत्कृष्ट अवस्थानका कथन करना चाहिये । १ ताप्रती 'तदो [उ चुदो' इति पाठः ।

४७० छक्खंडागमे संतकम्म ओरालियसरीरणामाए उक० हाणी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो सत्तमादो पुढवीदो उबट्टिदो' सण्णिमिच्छाइट्ठीसु उववण्णो, सबलहुँ सम्मत्ते लद्धे विज्झादसंकमो जादो, तस्स पढमसमयसम्माइहिस्स उक्कस्सिया हाणी । सो चेव जहणियाए सम्मत्त- द्धाए अंतो देवलोगं गच्छेज, देवलोगं गदस्स ओरालियसरीरस्स अधापवत्तसंकमो जादो, तस्स सबरहस्सेण कालेण देवलोगं गदस्स पढ मसमयदेवस्स उक्क० वड्ढी । अवट्ठाणं जहा मणुसगदीए कदं तहा कायव्यं । वेउब्धियसरीरस्स देवगइभंगो। आहारसरीर- णामाए उक्क० बड्ढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो आहारसरीरं सवचिरं पूरेदूर्ण चदुक्खुत्तो कसाए उवसामेदूण खवेमाणस्स परभवियवंधवोच्छेदेण आवलियं गंतूण उकस्सिया वड्ढी । तस्स चेव से काले उक्क० हाणी । अवठ्ठाणं व अस्थि । एक्सद्देण उवदेसा वि पडिसिद्धा। तेजा-कम्मइयाणं उक्कस्सिया बडूढी कस्स ? जो गुणिदकम्म- सियो चदुक्खुत्तो कसाए उवसामेदूण खवेमाणओ, तस्स परभवियणामाणं बंधवोच्छेदादो आवलियं गदस्स उक्क० वड्ढी । तस्सेव से काले उक० हाणी । अवट्ठाणं" उवदेसेण जहा मणुसगइणामाए कदं तहा कायव्यं । पढमसंठाण-पढमसंघडणाणं उक० वड्ढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो बे-छा- औदारिकशरीर नामकर्मकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक सातवीं पृथिवीसे निकल कर संज्ञी मिथ्यादृष्टियों में उत्पन्न हुआ है तथा जिसके सर्वलघु कालमें सम्यक्त्वको प्राप्त कर लेनेपर विध्यातसंक्रम हुआ है उस प्रथम समयवर्ती सम्यग्दृष्टिके उसकी उत्कृष्ट हानि होती है। वही जघन्य सम्यक्त्वकालके भीतर देवलोकको प्राप्त होता है, देव- लोकको प्राप्त होनेपर उसके औदारिकशरीरका अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है, सर्वलघु कालमें देवलोकको प्राप्त हुए उस प्रथम समयवर्ती देवके उसकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। अवस्थानका कथन जैसे मनुष्यगतिके सम्वन्धमें किया है वैसे यहां भी करना चाहिए। वैक्रियिकशरीरकी प्ररूपणा देवगतिके समान है। आहारशरीर नामकर्मकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणित- कौशिक सबसे दीर्घ काल में अहारकशरीरको पूर्ण कर चार चार कपायोंको उपशमा कर क्षपणामें उद्यत है उसके परभविक नामप्रकृतियोंकी बन्धव्युच्छित्तिसे आवली मान काल जाकर आहारक- शरीरकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है । उसीके अनन्तर काल में उसकी उत्कृष्ट हानि होती है । अवस्थान नहीं है । 'एव' शब्दसे यहां उपदेशोंका भी प्रतिपेध किया गया है । तैजस और कार्मण शरीरोंकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकौशिक चार वार कपायोंको उपशमा कर क्षपणामें उद्यत है उसके परभविक नामप्रकृतियोंकी बन्धव्युच्छित्तिके पश्चात् आवली मात्र कालके वीतने- पर उनकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसीके अनन्तर कालमें उनकी उत्कृष्ट हानि होती है। अवस्थानकी प्ररूपणा उपदेशके आश्रयसे मनुष्यगति नामकर्मके समान करना चाहिये । प्रथम संस्थान और प्रथम संहननकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकांशिक १ अ काप्रत्योः 'उवहिदो, ताप्रतौ 'अवट्टिदो' इति पाठः । २ अप्रतौ 'पूणेदूण' इति पाठः । ३ ताप्रती खवेमाणस्स (खवेमाणओ तत्स ) इति पाठः । ४ अ-काप्रत्योः 'बंधवोच्छेदो', तामती 'बंधवोच्छे [दा.] दो' इति पाठः। ५ ताप्रती नोपलभ्यते पदमिदम्। ६ ताप्रती 'कर्य (द) इति पाठः | संकमाणियोगबारे पदेससंकमो ४७१ वट्ठीयो सम्मत्तमणुपालेयूण कसाए चंदुक्खुत्तो उवसामेण तदो खवेतस्से बंधवोच्छादादो आवलियं गदस्स उक्क० वड्ढी । तस्सेव से काले उक्कस्सिया हाणी। अवठ्ठाणं जहा मणुसगइणामाए तहा कायव्यं पंचसंठाण-पंचसंघडणाणं उक्क० वड्ढी कस्स वड्ढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो कसाए अणुवसामेदूण सबलहुं खतओ तस्स चरिमसमयसुहुम- सांपराइयस्स उक० चड्ढी । उक्क० हाणी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो उवसमसेडिमारुहिय चरिमसमयसुहुमसांपराइयो होदूण मदो देवो जादो तस्स पढमसमयदेवस्स उक्कस्सिया हाणी । अवट्ठाणं णेव अस्थि । जहा तेजा-कम्मइयसरीराणं उकस्सवढि-हाणीयो कदाओ तहा सव्वासि सत्थाणं धुवबंधीणं कायच्वं । अप्पसस्थाणं धुवबंधीणं णामपयडीणं उक्कस्सिया वड्ढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो कसाए अणुवसामेदूण सव्वलहुं खवेदि तस्स चरिमसमयसुहुमसांपराइयस्स उक्क० वड्ढी । उक्क० हाणी कस्स ? जो गुणिद- कम्मसियो पढमवारं चेव कसाए उवसामेदि सो चरिमसमयसुहुमसांपराइयो होण मदो देवो जादो तस्स पढमसमयदेवस्स उक० हाणी। अवट्ठाणं जहा मणुसगइणामाए तहा कायव्यं । चटुण्णमाणुपुब्बीणामाणं वड्ढि-हाणि-अवट्ठाणाणं सग-सगगइभंगो। अप्पसत्थाण- दो छयासठ सागरोपम काल तक सम्यक्त्वका पालन कर व चार वार कपायोंको उपशमा कर क्षपणामें तत्पर है उसके बन्धव्युच्छित्तिसे आवली मात्र कालके वीतनेपर उनकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसीके अनन्तर कालमें उनकी उत्कृष्ट हानि होती है। अवस्थानकी प्ररूपणा मनुष्यगति नामकर्मके समान करना चाहिये। शेप पांच संस्थानों और पांच संहननोंकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक कपायोंको न उपशमा कर सर्वलघु कालमें क्षपणा करता हुआ अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक होता है उसके उनकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उनकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक उपसमश्रेणिपर आरूढ होता हुआ अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक होकर मरणको प्राप्त हो देव हो जाता है उस प्रथम समयवर्ती देवके उनकी उत्कृष्ट हानि होती है। अवस्थान नहीं है। जिस प्रकारसे तैजस और कार्मण शरीरोंकी उत्कृष्ट वृद्धि और हानिको किया है उसी प्रकारसे सब प्रशस्त ध्रुववन्धी नामप्रकृतियोंकी भी वृद्धि और हानिको करना चाहिये । अप्रशस्त ध्रुवबन्धी नामप्रकृतियोंकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकौशिक कपायोंको न उपशमा कर सर्वलघु कालमें उनका क्षय करता है उस अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिकके उनकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उनको उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकांशिक प्रथम वार ही कपायोंको उपशमाता है वह अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसास्परायिक होकर मरणको प्राप्त हो जब देव होता है तब उस प्रथम समयवर्ती देवके उनकी उत्कृष्ट हानि होती है। अवस्थानका कथन मनुप्यगति नामकर्म के समान करना चाहिये। चार आनुपूर्वी नामप्रकृतियोंकी वृद्धि, हानि और अवस्थानकी प्ररूपणा अपनी अपनी १ ताप्रती खर्वतस्स (खतो तस्स)' इति पाठः । २ तापतौ 'तहा' इत्येतत्पदं नास्ति । ३ अ-काप्रत्योः 'सापराइयो जादो तत्स', तापतौ 'सांपराइयो जादो [मदो-] तस्स' इति पाठः।

४७२ छक्खंडागमे संतकम्म मद्भुवयं धिणामपयडीणं अप्पसत्थधुवबंधिणामपयडिभंगो। णवरि अवट्ठाणं णस्थि । परघाद- उस्सास-पसत्थविहायगइ-तस-चादर-पजत्त- पत्तेयसरीर - सुभगादेज - सुस्सराणमुकस्सिया बड्डी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो बे-छावडीओ सम्मत्तमणुपालेदूण चदुक्खुत्तो कसाए उवसामेण तदो खतस्स परभवियणामाणं बंधवोच्छेदादो आवलियं गदस्स उक्कस्सिया वड्ढी । तस्सेव से काले उक्क० हाणी । अवठ्ठाणं जहा मणुसगइणामाए तहा कायव्यं । आदावुजोवणामाणं उक्क० वड्ढी सव्यसंक्रमे दादव्या । उक० हाणी कस्स ? जो गुणिद- कम्मंसियो पढमदाए [ कसाए ] उवसामेदूण चरिमसमयसुहुमसांपराइयो संतो मदो तस्स पढमसमयदेवस्स उक० हाणी। अबढाणं णेव अस्थि । अप्पसत्थविहायगइ- अथिर-असुभ-अजसकित्तीणं उक्क० चड्ढी हाणी वा जहा अप्पसत्थाणं संठाणाणं कदा तहा कायव्वा । थिर-जसकित्ति-सुभाणं एदासि तिण्णं णामपयडीणं उक० वड्ढी कस्स ? जो गुणिदकम्मंसियो चदुक्खुत्तो कसाए उवसामेदूण तदो खवेदि तस्स खवेमाणस्स परभवियणामाणं बंधादों आवलियमदिकंतस्स उक्क० चड्ढी। तस्सेव से काले उक्क० हाणी । णवरि जसकित्तीए परभविवंधवोच्छेदचरिमसमए उक्क० वड्ढी । चउत्थीए गतिके समान है। अप्रशस्त अध्रुवबन्धी नामप्रकृतियोंकी प्ररूपणा अप्रशस्त ध्रुववन्धी नाम- प्रकृतियोंके समान है। विशेषता इतनी है कि उनका अवस्थान नहीं है। परघात, उच्छवास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, वादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, सुभग, आदेय और सुम्बर; इनको उत्कृष्ट वृद्धि किसके होतो है ? जो गुणितकर्माशिक दो छयासठ सागरोपम काल तक सम्यक्त्वका पालन कर व चारवार कषायोंको उशमा कर पश्चात् क्षपणा में प्रवृत्त होता है तव उसके परभविक नामकोकी वन्ध- व्युच्छित्तिसे आवली मात्र काल जाकर उक्त प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसके ही अनन्तर काल में उनकी उत्कृष्ट हानि होती है । अवस्थानकी प्ररूपणा मनुष्यगति नामकर्मके समान करना चाहिये । आतप और उद्योत नामकर्मों की उत्कृष्ट वृद्धिको सर्वसंक्रम में देना चाहिये। इनको उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो गुणितकर्माशिक प्रथमतः कपायोंको उपशमा कर अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक होता हुआ मरणको प्राप्त हो [ देव होता है ] उस प्रथम समयवर्ती देवके उनकी उत्कृष्ट हानि होती है । अवस्थान है ही नहीं। अप्रशस्त विहायोगति, अस्थिर, अशुभ और अयश- कीर्ति इनकी उत्कृष्ट वृद्धि और हानिकी प्ररूपणा जैसे अप्रशस्त संस्थानोंकी की गयी है वैसे करना चाहिये । स्थिर, यशकीर्ति और शुभ इन तीन नामप्रकृतियोंको उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? जो गुणितकौशिक चार वार कपायोंको उपशमा कर तत्पश्चात् क्षपणा करता है उस क्षपणा करनेवाले के परभविक नामकर्मों के वन्धसे आवली मात्र काल जाकर उनकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उसीके अनन्तर कालमें उनकी उत्कृष्ट हानि होती है। विशेप इतना है कि यशकीर्तिकी उत्कृष्ट वृद्धि परभविक नामप्रकृतियोंके बन्धव्युच्छेदके अन्तिम समयमें होती है। चतुर्थ उपशामनामें १ ताप्रती 'खर्वतस्स (खतओ तत्स)' इति पाठः । २ मप्रतिपाठोऽयम् । अ-का-ताप्रतिषु 'बंधवोच्छेदाभावादो' इति पाठः ।

संकमाणियोगारे पदेससंकमो ४७३ उवसामणाए मदचरिमसमयसुहुमसांपराइयस्स देवेसुप्पन्जिय समयाहियावलियादिकस्स उक्कस्सियो हाणी । अबढाणं णेव अस्थि । णीचागोदस्स उक्कस्सिया वड्ढी कस्स ? चरिमसमयसुहुमसांपराइयस्स खवयस्स । उक० हाणी कस्स ? उवसामओ चरिमसमयसुहुमसांपराइयो मदो संतो जो देवो जादो तस्स पढमसमए उक ० हाणी । अवट्ठाणं णेच अस्थि । उच्चागोदस्स बढि-हाणि- अवट्ठाणाणं मणुसगइभंगो । एवमुक्कस्ससामित्तं समत्तं । मदिआवरणस्स जहणिया वड्ढी कस्स ? जो जहण्णएण संतकम्मेण चदुक्खुत्तो कसाए उवसामेदूण एइंदिएसु गदो तत्थ जाधे बंधो च णिजरा चव हुसमो तस्स ताधे जहण्णिया चड्ढी अबढाणं वा होदि । सेसचदुणाणावरण-णवदंसणावरण-पंचंतराइयाणं मदिणाणावरणभंगो। सादस्स जह० वड्ढी कस्स ? जो जहण्णेण संतकम्मेण कसाए अणुवसामेदूर्ण संजमासंजम-संजमगुणसेडीहि बहुक्खुत्तो कर्म खवेदण एईदिएसु गदो, तत्थ सव्वचिरं कालं जोगजवमज्झस्स हेवा चंधिद्ण सव्वमहंतीयो असादबंध- गद्धाओ कादूण तदो जं तं सवचिरं कालं जोगजवमज्झस्स हेडा बंधिदाओ तस्स कालस्स पञ्जवसाणवंधगद्धाए तिस्से अपच्छिमाए सादबंधगद्धाए समऊणाए आवलिया- सेसाए णिजरादो किंचि विसेसुत्तरो बंधो जादो, तदो जाधे असादबंधो तदो विदियसमए मरणको प्राप्त हुए अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिकके देवोंमें उत्पन्न होकर एक समय अधिक आवली मात्र कालके वीतनेपर उसकी उत्कृष्ट हानि होती है । अवस्थान है ही नहीं । नीचगोत्रकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? वह अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक क्षपकके होती है। उसकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? जो अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक मरणको प्राप्त होकर देव हो जाता है उसके प्रथम समयमें उसकी उत्कृष्ट हानि होती है। अवस्थान है ही नहीं । उच्चगोत्रकी वृद्धि, हानि और अवस्थानकी प्ररूपणा मनुष्यगतिके समान है । इस प्रकार उत्कृष्ट स्वामित्व समाप्त हुआ। मतिज्ञानावरणकी जघन्य वृद्धि किसके होती है ? जो जघन्य सत्कर्मके साथ चार वार कषायोंको उपशमा कर एकेन्द्रियों में गया है उसके वहां जब बन्ध और निर्जरा दोनों समान होते हैं तब उसकी जघन्य वृद्धि और अवस्थान होता है। शेप चार ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण और पांच अन्तराय प्रकृतियों की प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है। सातावेदनीयकी जघन्य वृद्धि किसके होती है ? जो जघन्य सत्कर्म के साथ कपायोंको न उपशमा कर संयमासंयम और संयम गुणश्रेणियों द्वारा बहुत वार कर्मका क्षयकर एकेन्द्रियों में गया है और वहांपर सबसे दीर्घ काल तक योगयवमध्यके नीचे वांधकर सबसे बड़े असातवन्धककालोको करके पश्चात् जिस सर्वचिर कालके द्वारा योगयवमध्यके नीचे बन्ध किया है उस कालके अन्तिम बन्धककालमें उस अन्तिम सातबन्धककालमें एक समय कम आवलीके शेप रहनेपर निर्जराकी अपेक्षा बन्ध कुछ १ अ-काप्रत्योः 'समयाहियावलियादिउक्कत्सउक्कस्सिया', ताप्रती 'समयाहियावलियाहि [ उपस ] उकस्सिया' इति पाठः। २ मप्रतिपाठोऽयम् । अ-का-ताप्रतिषु 'उक्सामेदण' इति पाठः । ३ कापतो 'चदुक्खुत्तो' इति पाठः ।

छक्खंडागमे संतकम्म जहणिया वड्ढी सादस्स । जिस्से असादवंधाए जह० वड्ढी णिफण्णा तं चेव असादस्स बंधद्धं दीहं बंधिऊण तिस्से चरिमसमए जह० हाणी सादस्स । अवट्ठाणं णेव अस्थि । जहा सादस्स तहा असादस्स । णवरि चदुक्खुत्तो कसाया उवसामेयव्या । जाओ च सादं जहणं कुणमाणेण असादवंधगद्धाओ कदाओ, ताओ चेव असादस्स जहण्णं कुणमाणेण सादवंधगद्धाओ कायव्याओ । मिच्छत्तस्स जहणिया वड्ढी कस्स ? जस्स तप्पाओग्गजहण्णमिच्छत्तसंतकम्मस्स अवट्ठाणं होज तस्स मिच्छत्तस्स जह० वड्ढी हाणी वा अवट्ठाणं वा होज । सम्मत्तस्स जह० वड्ढी कस्स ? जो जहण्णएण कम्मेण सम्म लहिदूण वे-छावट्ठीयो अणुपालिदृण पडिवदिदो, सचमहंतेण उव्वेल्लणकालेण उव्वेल्लमाणस्स अपच्छिमस्स विदिखंडयस्स पढमसमए जहणिया वड्ढी । दुचरिमट्ठिदिखंडयस्स चरिमसमए जहणिया हाणी । अवट्ठाणं णेच अस्थि । सम्मामिच्छत्तस्स सम्मत्तभंगो। अणंताणुबंधीणं जहणिया चड्ढी कस्स ? अभवसिद्धियपाओग्गेण जहण्णेण कम्मेण जो आगदो संजमासंजम-संजमगुणसेढीहि कम्मं खवेदूण कसाए अणुवसामेदूण एइंदिएसु गदो, तस्स जम्हि योगासेसकम्मस्स (१) अवट्ठाणं होदि तम्हि जहणिया वड्ढी हाणी अवट्ठाणं [वा] होज। एसो ताव एक्को उवदेसो । अण्णेण उवएसेण अणताणुवंधोणं विशेष अधिक हो जाता है, तत्पश्चात् जब असाताका बन्ध होता है तब उसके द्वितीय समयमें सातावेदनीयकी जघन्य वृद्धि होती है। जिस असातबन्धककालमें जघन्य वृद्धि उत्पन्न हुई है उसी दीर्घ असातवन्धककालमें वांधकर उसके अन्तिम समयमें सातावेदनीयकी जघन्य हानि होती है। सातावेदनीयका अवस्थान नहीं है । जैसे सातावेदनीयकी प्ररूपणा की गयी है वैसे ही असाता- वेदनीयकी भी प्ररूपणा करना चाहिये। विशेष इतना है कि चार वार कपायोंको उपशमाना चाहिये । इसके अतिरिक्त सातावेदनोयको जघन्य करनेवाले जीवके द्वारा जो असाताबन्धककाल किये गये हैं वे हो असातावेदनीयको जघन्य करनेवाले के द्वारा सातावन्धककाल कराने चाहिये । मिथ्यात्वकी जघन्य वृद्धि किसके होती है ? तत्प्रायोग्य जघन्य मिथ्यात्वसत्कर्म युक्त जिस जीवके अवस्थानसंक्रम होता है उसके मिथ्यात्वको जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान होता है। सम्यक्त्व प्रकृतिकी जघन्य वृद्धि किसके होती है ? जो जघन्य सत्कर्मके साथ सम्यक्त्वको प्राप्त कर व उसका दो छयासठ सागरोपम काल तक पालन करके च्युत होता हुआ सबसे महान् उद्वेलन फालके द्वारा उद्वेलना कर रहा है उसके अन्तिम स्थितिकाण्डकके प्रथम समय में उसकी जघन्य वृद्धि होती है। द्विचरम स्थितिकाण्डकके अन्तिम समयमें उसकी जघन्य हानि होती है । अवस्थान नहीं है। सम्यग्मिथ्यात्वकी प्ररूपणा सम्यक्त्वके समान है। अनन्तानुवन्धी कपायोंकी जघन्य वृद्धि किसके होती है ? जो अभव्यसिद्धिक प्रायोग्य जघन्य कर्म के साथ आकर संयमासंयम व संयम गुणश्रेणियों के द्वारा कर्मका क्षय कर तथा कपायोंको न उपशमा कर एकेन्द्रियों में गया है उसके जिस जघन्य योगमें सत्कर्मका अवस्थान होता है उसमें उनकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान होता है। यह एक उपदेश है । दूसरे उपदेशक 1 संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो ४७५ जह० हाणी कस्स ? जो जहण्णएण कम्मेण चदुक्खुत्तो कसाए उवसामेऊण तदो संजोएदूण वे-छावट्ठीयो सम्मत्तमणुपालिय अणंताणुबंधीणं विसंजोयणाए उवद्विदो तस्स अधापवत्तकरणस्स चरिमसमए जहणिया हाणी । एरिसो चेव वे-छावट्ठीयो अणुपालेदृण मिच्छत्तं गदो तस्स पढमसमयमिच्छाइटिस्स जह० वड्ढी । अवठ्ठाणं णत्थि । एसो विदियो उपदेसो। वारसण्णं कसायाणं जेण उवएसेण अवट्ठाणमत्थि तेण उबदेसेण उच्चदे---जहणियाणि संतकम्माणि काऊण एइंदियं गदरस जम्हि जहण्णयस्स संतकम्मस्स अवठ्ठाणं होदि तम्हि जहपिणया वड्ढी हाणी अवट्ठाणं वा होज । एवं भय-दुगुंछा-पुरिस- वेदाणं । हस्स-रदि-अरदि-सोगाणं जहण्णवड्ढि-हाणीयो जहा सादासादाणं कदाओ तहा कायव्याओ। इत्थिवेदस्स जहणिया हाणी करस जो जहण्णएण कम्मेण चदुक्खुत्तो कमाए उवसामेयूण वे-छावट्ठीयो सम्मत्तमणुपालेद्ण से काले मिच्छत्तं गाहदि ति तस्स जहपिणया हाणी । तस्स चेव से काले पढमसमयमिच्छाइहिस्स जहणिया वड्ढी । अवठ्ठाणं णेव अत्थि । णqसयवेदस्स इथिवेदभंगो । णवरि पुल्चमेव तिण्णि पलिदोवमाणि तिपलिदो- वमेसु अच्छिय तदो पच्छा वे-छावडीओ सम्मत्तमणुपालेदव्यो । अनुसार अनन्तानुबन्धी कषायोंकी जघन्य हानि किसके होती है ? जो जघन्य सत्कर्मके साथ चार वार कपायोंको उपशमाकर फिर संयोजन कर दो छयासठ सागरोपम काल तक सम्यक्त्वका पालन करके अनन्तानुवन्धी कषायोंकी विसंयोजनामें उद्यत होता है उसके अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें उनकी जघन्य हानि होती है। ऐसा ही जो जीव दो छयासठ सागरोपम काल तक सम्यक्त्वका पालन कर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है उस प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टिके उनकी जघन्य वृद्धि होती है । अवस्थान उनका नहीं है । यह दूसरा उपदेश है। जिस उपदेशके अनुसार अवस्थान है उस उपदेशके अनुसार बारह कपायोंकी प्ररूपणा करते हैं- जघन्य सत्कोको करके एकेन्द्रिय भवको प्राप्त हुए जीवके जहांपर जघन्य सत्कर्मका अवस्थान होता है वहां उनकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान होता है। इसी प्रकार भय, जुगुप्सा और पुरुषवेदकी प्ररूपणा करना चाहिये । हास्य, रति, अरति और शोकको जघन्य वृद्धि और हानि जैसे साता व असाता वेदनीयकी की गयी हैं वैसे करनी चाहिये। स्त्रीवेदकी जघन्य हानि किसके होती है ? जो जघन्य सत्कर्मके साथ चार वार कपायोंको उपशमा कर व दो छयासठ सागरोपम काल तक सम्यक्त्वका पालन कर अनन्तर काल में मिथ्यात्वको प्राप्त होनेवाला है उसके उसकी जघन्य हानि होती है । अनन्तर फाल में मिथ्यात्वको प्राप्त हुए उसी प्रथम समयवर्ती मिथ्याष्टिके उसकी जघन्य वृद्धि होती है। अवस्थान नहीं है। नपुंसकवेदकी प्ररूपणा स्त्रीवेदके समान है। विशेष इतना है कि पहिले ही तीन पल्योपमकाल तक तीन पल्योपम प्रमाण आयुवाले जीवोंमें रहकर पीछे दो छयासठ सागरोपम तक सन्यक्त्वका पालन कराना चाहिये।

४७६ छक्खंडागमे संतकम्म . णिरयगइणामाए जह० हाणी कस्स ? एई दियकम्मेण जहण्णएण णिरयगइणाम- मंतोमुहत्तं संजोएदूण तदो वावीससागरोवहिदिणिरयं गदो, बावीससागरोवमाणं अंतो- मुहुत्ते सेसे सम्मत्तं पडिवण्णो, मदो मणुसो जादो, एकत्तीसंसागरोवमट्ठिदि देवगदि गदो, अंतोमुहुत् उववण्णो मिच्छत्तं गदो, एकत्तीससागरोवमेसु अंतोमुहुत्ते सेसेसे सम्मत्तं पडिवण्णो, बे-छावट्ठीयो अणुपालेदूण सोधम्मकप्पम्हि मिच्छत्तं गदो संतो एइंदिए गदो, तदो सचमहंतेण उव्वेल्लणकालेण उव्वेल्लमाणस्स दुचरिमउव्वेलणखंडयस्स चरिमसमए जहणिया हाणी । तस्सेव से काले जह० वड्ढी । मणुसगइणामाए जह० वड्ढी कस्स ? जो एइंदियकम्मेण वस्सपुधत्तेण अणुत्तर- वेमाणिएसु देवेसु उबवण्णो, तस्स तप्पाआग्गजहण्णसंतकम्मस्स जम्हि अवट्ठाणं होदि तम्हि जह. वड्ढी हाणी अवट्ठाणं वा होदि । देवगइणामाए जहण्णवढेि-हाणि- अवठ्ठाणाणि कस्स ? [ जो ] एइंदियकम्मेण तिपलिदोवमिएसु उववण्णो तस्स जाधे तप्पाओग्ग- जहण्णएण कम्मेण अवट्ठाणं होज तम्हि जह० वढी हाणी अवट्ठाणं वा । तिरिक्खगइ- णामाए जहणिया हाणी कस्स ? जो जहण्णएण कम्मेण तिपलिदोवमिएसु उववण्णो, अंतोमुहुत्ते सेसे सम्मत्तं पडिवण्णो, तदो देवेसु पलिदोवमपुत्ताउद्विदिएसु उववण्णो, नरकगति नामकर्मकी जघन्य हानि किसके होती है ? जो जघन्य एकेन्द्रिय योग्य कर्म के साथ अन्तर्मुहूर्त काल तक नरकगति नामकर्मका संयाजन करके पश्चात् वाईस सागरोम आयुवाले नरकको प्राप्त हुआ है, वाईस सागरोपमोंमें अन्तर्मुहूर्त शेप रहनेपर सम्यक्त्वको प्राप्त होकर मरा व मनुष्य हुआ है, पञ्चात् इकतीस सागरोपम स्थितिवाली देवगतिको प्राप्त होकर उत्पन्न होने के पश्चात् अन्तर्मुहूर्तमें मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है, फिर इकतीस सागरोपमों में अन्तर्मुहूर्त शेप रहनेपर सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ है, दो छयासठ सागरोपम काल तक सम्यक्त्वका पालन कर सौधर्म कल्प में मिथ्यात्वको प्राप्त होता हुआ एकेन्द्रियमें गया है, और तत्पश्चात् जो सबसे महान उद्वेलनकाल द्वारा उद्वेलना कर रहा है, उसके द्विचरम उद्वेलनकाण्डकके अन्तिम समयमें नरकगति नामकमकी जघन्य हानि होती है । उसीके अनन्तर कालमें उसकी जघन्य वृद्धि होती है। मनुष्यगति नामकमको जघन्य वृद्धि किसके होती है ? जो एकेन्द्रिय योग्य कर्म के साथ वर्षपृथक्त्वमें अनुत्तर विमानवासी देवोंमें उत्पन्न हुआ है उसके तत्प्रायोग्य जघन्य सत्कर्मका जहां अवस्थान हाता है वहां उसकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान होता है। देवगति नामकर्मकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान किसके होते हैं ? जो एकेन्द्रिय योग्य सत्कर्म के साथ तीन पल्योपम आयुवालों में उत्पन्न हुआ है उसके जव तत्प्रायोग्य जघन्य सत्कर्म के साथ अवस्थान होता है तब उसकी जघन्य वृद्धि हानि और अवस्थान होता है । तिर्यग्गति नामकर्मकी जघन्य हानि किसके होती है ? जो जघन्य सत्कर्म के साथ तीन पल्योपम आयुवालों में उत्पन्न होकर अन्तर्मुहूर्त शेष रहनेपर सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ है, तत्पश्चात् पल्योपमपृथक्त्व आयुस्थिति- १ काप्रती 'अंतोमुहुत्तेतु सेसेसुर, ताप्रती 'अंतोमुहुचसेसेतु' इति पाठः । २ भ-कामत्योः 'गामार दीहणवट्टी', तामती 'गामाए वट्टि' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४७७ अपडिवदिदेण सम्मत्तेण मणुस्सेसु गदो, तदो अपडिवदिदेण एकत्तीससागरोवमिएसु देवेसु उववण्णो, अंतोमुहुत्तमुववण्णो मिच्छत्तं गदो, अंतोमुहुत्तावसेसे सम्मत्तं पडिवण्णो, वे-छावट्ठीयो' अणुपालेदूण जाधे चरिमसमयसम्माइट्ठी ताधे जहणिया हाणी। तस्सेव से काले जहणिया बड्ढी। तिरिक्खगइणामाए अवट्ठाणं णेव अत्थि । बे-छावट्ठीयो सम्मत्तमणुपालिय तदो खवणाए अहिमुहचरिमसमयअधापबत्तकरणं मोत्तण जहणिया हाणी केणे कारणेण चरिमसमयसम्माइडिस्स कीरदि त्ति वुत्ते चुचदे-वे-छावट्ठीयो सम्मत्तमणुपालेदूण जो तत्तो खवेदि तस्स उकस्सिया सम्मत्तद्धा थोवा, वे छावट्ठीयो सम्मत्तमणुपालेदूण जो मिच्छत्तं गच्छदि तस्स सम्मत्तद्धा विसेसाहिया । एदेण कारणेण चरिमसमयसम्माइद्विस्स जाष्णिया तिरिक्मणामाए हाणी कदा, चरिमसमयअधा- पवत्तकरणे ण कदा। सव्वेसि धुववंधियाणं णामाणं जहण्णवड्ढि-हाणि-अवट्ठाणाणि कस्स ? तप्पाओग्ग- जहण्णाणि कम्माणि कादूण जम्हि अवट्ठाणं कम्मस्स होज तम्हि बड्ढी हाणी अवट्ठाणं वा जहण्णयं होदि । वेउब्वियसरीर-पढमसंठाण-पढमसंघडण-परघाद-उस्सास-पसत्थ- विहायगइ-तस-चादर-पजत्त-पत्तेयसरीर -सुभग-आदेज- सुस्सरणामाणं जहण्णिया वड्ढी वाले देवों में उत्पन्न हुआ है, पुनः अप्रतिपतित सम्यक्त्वके साथ मनुष्यों में गया है, तत्पश्चात् अप्रतिपतित सम्यक्त्वके साथ इकतीस सागरोपम प्रमाण आयुवाले देवोंमें उत्पन्न हुआ है, वहां उत्पन्न होने के पश्चात् अन्तर्मुहूर्त में मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है, अन्तर्मुहूर्त शेष रहनेपर पुनः सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ है, तथा जो दो छयासठ सागरोपम काल तक उसका पालन कर जब अन्तिम समयवर्ती सम्यग्दृष्टि होता है तब उसके तिर्यग्गति नामकर्मकी जघन्य हानि होती है। उसीके अनन्तर कालमें उसकी जघन्य वृद्धि होती है। तिर्यग्गति नामकर्मका अवस्थान नहीं है। शंका-दो छयासठ सागरोपम काल तक सम्यक्त्यका पालन कर तत्पश्चात् क्षपणाके अभिमुख अन्तिम समयवर्ती अधःप्रवृत्तकरणको छोड़कर अन्तिम समयवर्ती सम्यग्दृष्टिके किस कारणसे उसकी जघन्य हानि की जाती है ? समाधान-दो छयासठ सागरोपम तक सम्यक्त्वका पालन कर पश्चात् जो क्षपणा करता है उसका उत्कृष्ट सम्यक्त्वकाल स्तोक होता है, परन्तु दो छयासठ सागरोपम तक सम्यक्त्वका पालन कर पश्चात् जो मिथ्यात्वको प्राप्त होता है उसका सम्यक्त्वकाल विशेप अधिक होता है। इस कारण अन्तिम समयवर्ती सम्यग्दृष्टिके तिर्यग्गति नामकर्मकी जघन्य हानि की गयी है और अन्तिम समयवर्ती अधःप्रवृत्तकरणके वह नहीं की गयी है। सब ध्रुवबन्धी नामप्रकृतियोंकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान किसके होते हैं ? तत्प्रायोग्य जघन्य फर्मोको करके जहांपर कर्मका अवस्थान होता है वहां पर उनकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान होते हैं। वैक्रियिकशरीर, प्रथम संस्थान, प्रथम संहनन, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, बस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, सुभग, आदेय और सुस्वर नामकोकी १ ताप्रतौ 'पडिवण्यो, [मि ] वे छावट्टीयो' इति पाठः । २ ताप्रती 'हाणी । केण इति पाठः । ३ तापतौ 'करणेग इति पाठः ।

४७८ छक्खंडागमें संतकम्मं कस्स ? जत्थ एदेसि कम्माणं तप्पाओग्गजहण्णाणं जहण्णमवट्ठाणं होज तत्थ जहणिया वड्ढी हाणी अबढाणं वा होज । अप्पसत्थविहायगइ-थावर-सुहुम-अपजत्त-साहारण- सरीर-दूभग-अणादेज-दुस्सराणं णबुंसयवेदभंगो । णीचागोदस्स वि णवंसयवेदभंगो । उच्चागोदस्स मणुसगइभंगो । एवं जहण्णसामित्तं समत्तं । अप्पाबहुअं । तं जहा- मदिआवरणस्स उक्कस्समवट्ठाणं थोवं। वड्ढी विसेसाहिया, भिण्णसामित्तादो। हाणी असंखेजगुणा । सेसचदुणाणावरण-चदुदंसणावरण-पंचंत- राइयाणं मदिणाणावरणभंगो। णिदा-पयलाणं उक्कस्समवट्ठाणं थोवं । हाणी असंखेज- गुणा । वड्ढी असंखेजगुणा । थीणगिद्धितियस्स णिहाभंगो । सादस्स उक्कस्सिया हाणी थोवा । वड्ढी विसेसाहिया । असादस्स उक्कस्सिया हाणी थोवा । वड्ढी असंखे० गुणा । मिच्छत्तस्स उक्कस्समवट्ठाणं थोवं] । हाणी असंखे० गुणा.। वड्ढी असंखे० गुणा । सम्मत्तस्स उक० वड्ढी थोवा, उव्वेलणकंडयचरिमसमए जादत्तादो। उक्क० हाणी असंखे० गुणा, दुसमय मिच्छाइद्विस्स जादत्तादो। अबढाणं णस्थि । सम्मामिच्छत्तस्स उक्कस्सिया हाणी थोवा । वड्ढी असंखे० गुणा । अणंताणुबंधीणं उक्कस्समवट्ठाणं थोवं । हाणी असंखे० गुणा । वड्ढी असंखे० गुणा । अढण्णं कसायाणमुक्कस्समवट्ठाणं थोवं । हाणी असंखे० गुणा । वड्ढी असंखे०गुणा । तिण्णं संजलणाणं पुरिसंवेदस्स य उक्क० जघन्य वृद्धि किसके होती है ? जहाँपर इन तत्प्रायोग्य जघन्य कर्मोका जघन्य अवस्थान होता है वहांपर उनकी जघन्य वृद्धि, हानि व अवस्थान होता है। अप्रशस्त विहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण शरीर, दुर्भग, अनादेय और दुस्वर प्रकृतियोंकी प्ररूपणा नपुंसकवेदके समान है । नीचगोत्रकी भी प्ररूपणा नपुंसकवेद के समान है। उच्चगोत्रकी प्ररूपणा मनुष्यगतिके समान है । इस प्रकार जघन्य स्वामित्व समाप्त हुआ। अल्पबहुत्वका कथन करते हैं। वह इस प्रकार है- मतिज्ञानावरणका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है । वृद्धि विशेष अधिक है, क्योंकि, उसका स्वामी भिन्न है। हानि असंख्यातगुणी है। शेप चार ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तराय प्रकृतियोंकी प्ररूपणा मतिज्ञानावरणके समान है। निद्रा और प्रचलाका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है। हानि असंख्यातगुणी है। वृद्धि असंख्यातगुणी है। स्त्यानगृद्धि आदि तीनकी प्ररूपणा निद्राके समान है। सातावेदनीयकी उत्कृष्ट हानि स्तोक है। वृद्धि विशेष अधिक है। असाताको उत्कृष्ट हानि स्तोक है। वृद्धि असंख्यातगुणी है। मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक हैं। हानि असंख्यातगुणी है । वृद्धि असंख्यातगुणी । सम्यक्त्व प्रकृतिकी उत्कृष्ट वृद्धि स्तोक है, क्योंकि, वह उद्वेलनकाण्डकके अन्तिम समयमें होती है । उत्कृष्ट हानि असंख्यातगुणी है, क्योंकि, वह द्वितीय समयवर्ती मिथ्यादृष्टिके होती है। अवस्थान नहीं है । सम्यग्मिथ्यात्वको उत्कृष्ट हानि स्तोक है। वृद्धि असंख्यातगुणी है । अनन्तानु पन्धी कपायोंका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है। हानि असंख्यातगुणी है। वृद्धि असंख्यातगुणी है । आठ कपायोंका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है। हानि असंख्यातगुणी है। पृद्धि असंख्यातगुणी है संकमाणियोगद्दारे पदेससंकमो ४७९ वड्ढी थोवा । उक० हाणी अवट्ठाणं च विसेसाहियं । लोभसंजलणाए उकस्समवट्ठाणं थोवं । हाणी असंखे० गुणा । वड्ढी विसेसा० । छण्णं णोकसायाणमुकहाणी थोवा । वड्ढी असंखे० गुणा० । अवट्ठाणं णत्थि । इस्थि-णवूमयवेदाणं हस्स-रदिभंगो। णिरयगइणामाए उक्क० हाणी थोवा । बड्ढी असंखे०गुणा । एवं तिरिक्खगइणामाए। दोण्णमवट्ठाणं णत्थि । मणुसगइणामाए उकस्समवट्ठाणं थोवं । वड्ढी असंखे० गुणा । हाणी विसेसा० । देवगइणामाए उकस्समवट्ठाणं थोवं । वड्ढी असंखे० गुणा । हाणी विसेसा० । जहा देवगइणामाए तहा जादिणाम-आणुपुच्चीणामाणं च । ओरालियसरीर- णामाए उक्कस्समवट्ठाणं थोवं । वड्ढी असंखे० गुणा । हाणी विसेसा० । वेउब्धियसरीर- वेउब्वियसरीरअंगोवंग-बंधण-संघादाणं देवगइभंगो। आहारसरीरणामाए उक. हाणी थोवा । वड्ढी विसेसा। तेजा-कम्मइयसरीराणं सव्वासिं चेव धुवबंधिणामाणं उक्कस्समवहाणं थो । हाणी असंखे० गुणा। चड्ढी विसेसा० । वारिसहणारायणसंघडणणामाए उक्कस्समवट्ठाणं थोवं । वड्ढी असंखेजगुणा । हाणी विसेसा० । समचउरससंठाण-परघाद- उस्सास-पसत्थविहायगइ-तस-वादर पजत्त-पत्ते यसरीर-सुभगादेज-सुस्सराणमुक्करसमवट्ठाणं थो । हाणी असंखे० गुणा । वड्ढी विसेसा० । पंचसंठाण-पंचसंघडण-अथिर-अजस- कित्ति-असुभ-दूभग-दुस्सर-अणादेज-अप्पसत्थविहायगदीणं उक्क० हाणी थोवा । वड्ढी है। तीन संज्वलन कपायों और पुरुपवेदकी उत्कृष्ट वृद्धि स्तोक है। उत्कृष्ट हानि और अवस्थान विशेप अधिक हैं। संज्वलन लोभका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है । हानि असंख्यातगुणी है । वृद्धि विशेप अधिक है। छह नोकपायोंकी उत्कृष्ट हानि स्तोक है। वृद्धि असंख्यातगुणी है । अवस्थान नहीं है । स्त्रीवेद और नपुंसकवेदकी प्ररूपणा हास्य और रतिके समान है। नरकगति नामकर्मकी उत्कृष्ट हानि स्तोक है। वृद्धि असंख्यातगुणी है। इसी प्रकार तिर्यंचगति नामकर्मकी प्ररूपणा है। अवस्थान दोनोंका नहीं है। मनुष्यगति नामकमका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है । वृद्धि असंख्यातगुणी है । हानि विशेष अधिक है । देवगति नामकर्मका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है । वृद्धि असंख्यातगुणी है । हानि विशेष अधिक है। जैसे देवगति नामकर्मकी प्ररूपणा की गयी है वैसे ही जाति नामकर्मों और आनुपूर्वी नामकर्मोंकी भी करना चाहिये। औदारिकशरीर नामकर्मका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है। वृद्धि असंख्यातगुणी है। हानि विशेप अधिक है। वैक्रियिकशरीर व उसके आंगोपांग, बन्धन एवं संघात नामकर्मोकी प्ररूपणा देवगतिके समान है। आहारकशरीर नामकर्मकी उत्कृष्ट हानि स्तोक है। वृद्धि विशेष अधिक है । तैजस व कार्मण शरीरों तथा सब ही ध्रुववन्धी नामप्रकृतियोंका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है। हानि असंख्यातगुणी है। वृद्धि विशेष अधिक है। वज्रपंभनाराचसंहनन नामकर्मका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है । वृद्धि असंख्यातगुणी है। हानि विशेप अधिक है। समचतुरस्त्र- संस्थान, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, सुभग, आदेय और इनका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है। हानि असंख्यातगुणी है। वृद्धि विशेष अधिक है। पांच संस्थान, पांच संहनन, अस्थिर, अयशकीर्ति, अशुभ, दुभंग, दुःस्वर, अनादेय और अप्रशस्त विहायोगति; इनकी उत्कृष्ट हानि स्तोक है। वृद्धि असंख्यातगुणी है। अवस्थान नहीं ४८० छस्खंडागसे संतकम्म असंखे० गुणा । अबढाणं णस्थि । अप्पसत्थाणं धुवबंधीणमुक्कस्समवट्ठाणं थोवं । हाणी असंखे० गुणा । वड्ढी असंखे० गुणा । णिरयगइ-तिरिक्खगइपाओग्गणामाणं आदा- वुजोवाणं च उक० हाणी थोवा । वड्ढी असंखे० गुणा । णीचागोदस्स गुणसंकमेण उक्क० हाणी थोवा । वड्ढी असंखे० गुणा । उच्चागोदस्स उक्क० हाणी सत्तमाए पुढवीए पढमसमयणेरइयस्स हाणी' थोवा । तस्स चेव उव्यट्टियस्से पढमसमयतिरिक्खस्स णीचागोदस्स बंधमाणयस्स उक्क० वड्ढी विसे, णेरइयस्स सम्माइट्ठीसु संचिदत्तादो । उच्च-णीचाणमवट्ठाणं णस्थि । एवमुक्कस्सप्पाबहुअं समत्तं । णाणावरणपंचयस्स जहण्णवढी हाणी अबढाणं सरिसं । णवदंसणावरण-मिच्छत्त- सोलसकसाय-भय-दुगुंछा-पुरिसवेद-पंचतराइयाणं जह० वड्ढी हाणी अवठ्ठाणं च तिणि वि तुल्लाणि । सादस्स जह० हाणी थोवा । वड्ढी विसेसाहिया । अवठ्ठाणं णत्थि । असादस्स सादभंगो । सम्मत्तस्स जह० हाणी थोवा । वड्ढी असंखे० गुणा । सम्मा- मिच्छ० सम्मत्तभंगो । हस्स-रदि-अरदि-सोगाणं जह० हाणी थोवा । वड्ढी विसेसा० । अवट्ठाणं णत्थि । इस्थि-णqसयवेदाणं जह० हाणी थोवा । बड्ढी असंखे० गुणा । अवट्ठाणं णस्थि । णिरयगइणामाए जह० हाणी थोवा । वड्ढी असंखे० गुणा । तिरिक्खगइणामाए है । अप्रशस्त ध्रुववन्धी प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अवस्थान स्तोक है। हानि असंख्यातगुणी है। वृद्धि असंख्यातगुणी है। नरकगति और तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्मों तथा आतप और उद्योत नामकर्मोंको भी उत्कृष्ट हानि स्तोक है। वृद्धि असंख्यातगुणी है। नीचगोत्रकी गुणसंक्रमके द्वारा उत्कृष्ट हानि स्तोक है। वृद्धि असंख्यातगुणी है। उच्चगोत्रकी उत्कृष्ट हानि सातवीं पृथिवीके प्रथम समयवर्ती नारकीके होती है, जो स्तोक है । वहांसे निकलकर नीचगोत्रको बांधनेवाले उसी प्रथम समयवर्ती तिर्यंच के उसकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है, जो हानिसे विशेष अधिक है; क्योंकि, वह नारक सम्यग्दृष्टियों में संचित है। उच्च और नीच गोत्रोंका अवस्थान नहीं है। इस प्रकार उत्कृष्ट अल्पबहुत्व समाप्त हुआ। पांच ज्ञानावरण प्रकृतियोंकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान सहश हैं। नौ दर्शना- वरण, मिथ्यात्व, सोलह कपाय, भय, जुगुप्सा, पुरुपवेद और पांच अन्तराय प्रकृतियोंकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान तीनों ही तुल्य हैं । सातावेदनीयकी जघन्य हानि स्तोक है । वृद्धि विशेप अधिक है। अवस्थान नहीं है। असातावेदनीयके प्रकृत अल्पबहुत्वको प्ररूपणा सातावेदनीयके समान है। सम्यक्त्व प्रकृतिकी जघन्य हानि स्तोक है और वृद्धि उससे असंख्यातगुणी है। सम्यग्मिथ्यात्वकी प्ररूपणा सम्यक्त्व प्रकृति के समान है। हास्य, रति, अरति और शोक इनकी जघन्य हानि स्तोक व वृद्धि उससे विशेप अधिक है। अवस्थान नहीं है। स्त्री और नपुंसक वेदोंकी जघन्य हानि स्तोक व वृद्धि असंख्यातगुणी है। अवस्थान नहीं है। नरकगति नामकर्मकी जघन्य हानि स्तोक व वृद्धि असंख्यातगुणी है। तियंचगति १ ताप्रती [हाणी]' इति पाठः । २ प्रतियु 'उवद्वियत्स' इति पाठः ।

संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४८१ जह० हाणी थोवा । वड्ढी असंखे० गुणा । मणुसगइणामाए जह० चड्ढी हाणी अवट्ठाणं च तुलं । एवं देवगदीए । ओरालिय-वेउव्यिय-तेजा-कम्मइयसरीर-तप्पाओग्ग- बंधण-संघाद-अंगोवंग-वण्ण-गंध-रस-फास - अगुरुअलहुअ-उबघाद-परघाद-उस्मास-पसत्थ- विहायगइ-तस-वादर-पजत्त-पत्तेयसरीर-सुभग-सुस्सर-आदेज-णिमिणणामाणं जह० वड्ढी हाणी अवठ्ठाणं च तुल्लं । णीचागोदस्स जह० हाणी थोत्रा । वड्ढी असंखे० गुणा । अवट्ठाणं णत्थि । उच्चागोदस्स जह० हाणी थोवा । चड्ढी असंखे० गुणा । अवठ्ठाणं णस्थि । एवं पदेससंक्रमे पदणिक्खेवो समत्तो। पदेमसंकमो चड्ढिसंक्रमो कायव्यो । तं जहा- मदिणाणावरणस्स अत्थि असंखेजभागवड्ढि-असंखेजभागहाणि-अवट्ठाण-अवत्तव्यसंकमा । सेसपदाणि णत्थि । सेसचदुणागावरणीय-चदुदंसणावरणीय-पंचंतराइयाणं मदिणाणावरणभंगो। णिहा-पलयाणं अत्थि असंखेजभागवड्ढि-हाणि-असंखेजगुणवड्ढि-असंखेजगुणहाणि-अट्ठाण-अवत्तच्च- संकमा । थोणगिद्धितियस्स अस्थि असंखेजभागवड्ढि-असंखेजभागहाणी। संखेज- भागवड्ढि-संखेजगुणवड्ढीयो वि अस्थि, मिच्छत्तं गदसम्माइविम्मि थीणगिद्धितिय- संतादो अण्णपयडीहिता आगयदव्यस्स संखेजभाग-गुणब्भहि यस्स वि उवलंभादो । अस्थि नामकर्मको जघन्य हानि स्तोक और वृद्धि उससे असंख्यातगुगी है। मनुष्यगति नामकर्मकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान तीनों समान हैं । इसी प्रकार देवगतिके सम्बन्ध में भी कहना चाहिये । औदारिक, वैक्रियिक, तैजस व कामण शरीर, उनके योग्य वन्धन, संघात व आंगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगन्ति, बस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, सुभग, सुस्वर, आदेय और निर्माण; इन नामप्रकृतियोंकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान तीनों तुल्य हैं। नीचगोत्रकी जघन्य हानि स्तोक व वृद्धि असंख्यातगुणी है । अवस्थान नहीं है । उच्चगोत्रकी जघन्य हानि स्तोक व वृद्धि असंख्यातगुणी है। अवस्थान नहीं है। इस प्रकार प्रदेशसंक्रममें पदनिक्षेप समाप्त हुआ। प्रदेशसंक्रममें वृद्धिसंक्रमका कथन करते हैं। यथा- मतिज्ञानावरणके असंख्यात- भागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, अवस्थान और अवक्तव्य ये चार संक्रमपद हैं। शेष पद नहीं हैं । शेप चार ज्ञानावरणीय, चार दर्शनावरणीय और पांच अन्तराय कोंकी प्ररूपणा मतिज्ञाना- वरणके समान है। निद्रा और प्रचलाके असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, असंख्यात- गुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि, अवस्थान और अवक्तव्य ये संक्रमपद है। स्त्यानगृद्धित्रिकके असंख्यातभागवृद्धि और असंख्यातभागहानि संक्रम हैं। संख्यातभागवृद्धि और संख्यात्तगुणवृद्धि पद भी हैं, क्योंकि, मिथ्यात्वको प्राप्त हुए सम्यग्दृष्टि में स्त्यानगृद्धि आदि तीनोंके सत्त्वकी अपेक्षा अन्य प्रकृतियोंसे आया हुआ द्रव्य संख्यातभाग अधिक व संख्यातगुणा अधिक भी पाया १ अ-काप्रत्योः 'पदेससंकमो' इति पाठः । २ ताप्रती 'संतादो । अण्णपयडीहिंतो' इति पाठः। छ, से, ६१ ४८२ छक्खंडागमें संतकम्म असंखे० गुणवढि-हाणि-अबढाण-अवत्तव्यसंकमा । सादस्स अस्थि असंखे० भागवढि- असंखे० भागहाणि-अवत्तव्यसंकमा । सेसाणि पदाणि णत्थि । असादस्स असंखे०भागवढि- असंखे० भागहाणि-असंखे० गुणवड्डी- असंखे० गुणहाणि-अवत्तव्यसंकमा अस्थि । सेस- पदाणि' णस्थि । मिच्छत्तस्स असंखे० भागवड्ढि-हाणि-असंखेजगुणवड्ढि-असंखे० गुणहाणि-अबढाण-अवत्तव्यसंकमा अस्थि । सेसाणि पदाणि णत्थि । सम्मामिच्छत्तस्स अत्थि असंखे० भागवड्डि-हाणि-असंखे० गुणवड्ढि-असंखे० गुणहाणि-अवत्तव्य संकमा । सेसाणि पदाणि णस्थि । सम्मत्तस्स असंखे० भागहाणि-असंखे० गुणवड्ढि-हाणि- अवत्तव्यसंकमा अस्थि ! सेसपदाणि णत्थि । अणंताणुवंधीणं अस्थि असंखे० भागवड्ढि- असंखे० भागहाणि-संखे० भागवड्ढि-संखे० गुणवड्ढि-असंखे० गुणवढि-असंखे० गुणहाणि-अवहाण-अवत्तव्यसंकमा । सेसाणि पदाणि णस्थि । अट्टणं कसायाणं अस्थि असंखे० भागवड्ढि-असंखे० भागहाणि-असंखे० गुणवड्ढि-असंखे० गुणहाणि-अवट्ठाण- अवत्तव्यसंकमा । सेसपदाणि णत्थि । तिण्णं संजलणाणं अत्थि असंखे० भागड्ढि- असंखे० भागहाणि-संखे० भागवढि-संखे० भागहाणि-संखे० गुणवड्ढि-संखे० गुणहाणि- असंखे० गुणपड्ढि-असंखे० गुणहाणि-अवट्ठाण-अवत्तव्यसंकमा । लोभसंजलणाए अस्थि असंखे० भागवड्ढि -असंखे० भागहाणि-अवट्ठाण-अवत्तव्यसंकमा । सेसाणि पदाणि णस्थि । जाता है। उनके असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि, अवस्थान और अवक्तव्य संक्रम हैं। सातावेदनीयके असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि और अवक्तव्य संक्रम हैं । शेप पद नहीं हैं। असातावेदनीयके असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्य संक्रस हैं। उसके शेप पद नहीं हैं। मिथ्यात्वके असंख्यात- भागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि, अवस्थान और अवक्तव्य संक्रम हैं। शेष पद नहीं हैं। सम्यग्मिथ्यात्वके असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यात. भागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्य संक्रम हैं। शेप पद नहीं हैं। सम्यक्त्व प्रकृतिके असंख्यातभागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्य संक्रम हैं । शेप पद नहीं हैं। अनन्तानुवन्धी क्रोधादिकों के असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि, अवस्थान और अवक्तव्य संक्रम हैं। शेप पद नहीं हैं । आठ कपायों के असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि, अवस्थान और अवक्तव्य संक्रम हैं। शेप पद नहीं हैं। तीन संज्वलन कपायोंके असंख्यातमागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागहानि, संख्यात- गुणवृद्धि, संख्यातगुणहानि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि, अवस्थान और अवक्तव्य संक्रमपद हैं। संज्वलन लोभके असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, अवस्थान और १ अप्रती 'वितेसपदाणि', काप्रती त्रुटितोऽत्र पाटः, ताप्रती [वि.] सेसपदाणि' इति पाठः । २ ताप्रती 'अवत्तम्व अवतागसंकमा' इति पाठः।

संकमाणियोगदारे पदेससंकमो ४८३ हस्स-रदि-अरदि-सोगाणं अमादभंगो। पुरिसदस्म कोधसंजलणभंगो। इत्थि- णबुपयवेदाणं अस्थि असंखे० भागबड्ढि-असंखे० भागहाणि-संखे० भागवड्ढि-संखे० गुणवड्ढि-असंखे० गुणवड्ढि-असंखे० गुणहाणि-अवत्तव्यसंकमा । सेसपदाणि णस्थि । भय-दुगुंछाणं अस्थि असंखे० भागवड्ढि-असंखे० भागहाणि-असंखे० गुणवढि-असंखे. गुणहाणि-अवहाण-अवत्तव्यसंकमा । सेसपदाणि णस्थि' । णिरयगइणामाए अस्थि असंखे० भागवढि-संखे० गुणवड्डि-असंखे० गुणवड्ढि- असंखे० भागहाणि-असंखे० गुणहाणि-अवत्तव्यसंकमा । तिरिक्खगइणामाए अत्थि असंखे० भागवड्ढि-संखे० भागवड्ढि-संखे० गुणवढि-असंखे० गुणवढि-असंखे० भागहाणि- असंखे० गुणहाणि-अवत्तव्यसंकमा । मणुस्सगइणामाए अस्थि असंखे० भावगड्ढि-संखे० भागवड्ढि-संखे० गुणपड्ढि-असंखे० गुणवड्ढि-असंखे० भागहाणि-असंखे० गुणहाणि- अवत्तव्यसंकमा । सेसपदाणि णस्थि । देवगइणामाए अस्थि असंखे० भागवड्ढि-संखे० भागवड्ढि-संखे० गुणवड्ढि-असंखे० गुणवड्ढि-असंखे० भागहाणि-संखेगुणहाणि- अवट्ठाण-अत्तव्यसंकमा । सेसं जाणिदूण वत्तव्यं । एवं संकमे त्ति समत्तमणि योगद्दारं । अवक्तव्य संक्रम पद हैं। शेप पद नहीं हैं। हास्य, रति, अरति और शोककी प्ररूपणा असातावेदनीयके समान है। पुरुपवेदकी प्ररूपणा संज्वलन क्रोधके समान है। स्त्री और नपुंसक वेदोंके असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यात- भागहानि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्य संक्रमपद हैं । शेप पद नहीं हैं । भय और जुगुप्साके असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यात- भागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणहानि, अवस्थान और अवक्तव्य संक्रमपद हैं। शेप पद नहीं हैं। नरकगति नासकर्म के असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यात- भागहानि, असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्य संक्रमपद हैं। तियग्गति नामकर्म के असंख्यातभाग- वृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातभागहानि, असंख्यातगुण- हानि और अवक्तव्य संक्रमपद हैं । मनुष्यगति नामकमके असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातभागहानि असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्य संक्रमपद हैं। शेप पद नहीं हैं। देवगति नामकर्मके असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातभागहानि, संख्यातगुणहानि, अवस्थान और अवक्तव्य संक्रमपद हैं । शेप कथन जानकर करना चाहिये । इस प्रकार संक्रम अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। १ क. पा.सु. पृ. ४५६, ६२५-३१.

१३ लेस्साणियोगदारं -- असुर-सुर-णरवरोरग-मुणिंदविंदेहि दिए चलणे'। णमियूण अरस्स तदो लेस्सणियोगं परूवेमो ॥१॥ एत्थ लेस्मा णिक्खिविदव्या, अण्णहा पयदलेस्सायगमाणुववत्तीदो। तं जहा-- णामलेस्सा दुवणलेस्सा दबलेस्सा भावलेस्सा चेदि लेस्सा चउनिहा । लेस्सा-सद्दो णामलेस्सा । सब्भावासम्भावट्ठवणाए दृविदबं द्वषणलेस्सा । दव्वलेस्सा दुविहा आगम- दन्चलेस्सा णोआगमदव्वलेस्सा चेदि। आगमदव्वलेस्सा सुगमा । णोआगमदव्वलेस्सा तिविहा जाणुगसरीर भविय [ -तव्यदिरित्तणोआगमदव्वलेस्साभेएण । जाणुगसरीर- भविय ] नोआगमदव्यलेस्साओ सुगमाओ। तब्बदिरित्तदव्यलेस्सा पोग्गलक्खंधाण चक्खिदियगेज्झो वण्णो । सो छबिहो किण्णलेस्सा णीललेस्सा काउलेस्सा तेउलेस्सा पम्मलेस्सा सुक्कलेस्सा चेदि । तत्थ भमरंगार-कजलादीणं किण्णलेस्सा । णिव-कदली- दावपत्तादीणं णीललेस्सा । छार-खर-कवोदादीणं काउलेस्सा । कुंकुम-जवाकुसुम-कुसुंभा- दीणं तेउलेस्सा । तडबड-पउमकुसुमादीणं पम्मलेस्सा । हंस-बलायादीणं सुक्कलेस्सा । वुत्तं च- असुरेन्द्र, सुरेन्द्र, नरेन्द्र, नागेन्द्र और मुनीन्द्र इनके समूहोंके द्वारा वन्दित ऐसे अर जिनेन्द्र के चरणोंको नमस्कार करके लेश्या अनुयोगद्वारकी प्ररूपणा करते हैं ॥ १ ॥ यहां लेश्याका निक्षेप करना चाहिये, क्योंकि, उसके विना प्रकृत लेश्याका अवगम नहीं हो सकता । उसका निक्षेप इस प्रकार है- नामलेश्या, स्थापनालेश्या, द्रव्यलेश्या और भावलेश्या इस प्रकार लेश्या चार प्रकारकी है। उनमें 'लेश्या' यह शब्द नामलेश्या कहा जाता है। सद्भावस्थापना और असद्भावस्थापना रूपसे जो लेश्याकी स्थापना की जाती है वह स्थापनालेश्या है। द्रव्यलेश्या दो प्रकारकी है- आगमद्रव्यलेश्या और नोआगमद्रव्यलेश्या । इन में आगमद्रव्यलेश्या सुगम है। नोआगमद्रव्यलेश्या ज्ञायक्रशरीर, भावी और तद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यलेश्याके भेदसे तीन प्रकारकी है। इनमें ज्ञायकशरीर और भावी नोआगम- द्रव्यलेश्यायें सुगम हैं । चक्षु इन्द्रिय के द्वारा ग्रहण करने योग्य पुद्गलस्कन्धोंके वर्णको तद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यलेश्या कहते हैं। वह छह प्रकारकी है- कृष्णलेश्या, नीललेझ्या, कापोतलेश्या, तेजलेश्या, पद्मलेश्या और शुक्ललेश्या । उनमें कृष्णलेश्या भ्रमर, अंगार और कजल आदिके होती है । नीम, कदली और दाबके पत्तों आदिके नीललेश्या होती है। छार, खर और कबूतर आदिके कापोतलेश्या जानना चाहिये। कुंकुम, जपाकुसुम आर कसूम कुसम आदिकी लेश्या तेजलेश्या कहलाती है । तडवडा और पद्म पुष्पादिकांक पद्मलेझ्या हाता है । हंस और वलाका आदिकी शुक्ललेश्या अनुभूत है। कहा भो है- १ ताप्रती 'चरणे' इति पाठः।२म-काप्रत्योः 'भावासम्भाव' इति पाठः। . ।

लेस्साणियोगदारे णोआगमव्वलेस्सा ४८५ किण्णं भमरसवण्णा णीला पुण णीलिगुणियसंकासा। काऊ कवोदवण्णा तेऊ तवणिज्जवण्णाभा ॥१॥ पम्मा पउमसवण्णा सुक्का पुण कासकुसुमसंकासा। किण्णादिदव्वलेस्सावण्णविसेसा मुणेयव्वा ॥२॥ भावलेस्सा दुविहा आगम-गोआगमभेएण । आगमभावलेस्सा सुगमा । णोआगम- भावलेस्सा मिच्छत्तासंजम - कसायाणुरंजियजोगपवुत्ती कम्मपोग्गलादाणणिमित्ता, मिच्छत्तासंजम-कसायजणिदसंसकारो त्ति कुत्तं होदि । एत्थ पणेगमणयवत्तव्यएण णो- आगमदव्य-भावलेस्साए पयदं । तत्थ ताव दव्यलेस्सावण्णणं कस्सामो-जीवेहि अपडि- गहिदपोग्गलक्खंधाणं किण्ण-णील-काउ-तेउ-पम्म-सुक्कसण्णिदाओ छलेस्साओ होति । अणंतभागवढि-असंखे०भागवढि-संखे०भागवढि - संखेगुणबढि-असंखे०गुणवढि- अणंतगुणवाड्ढकमेण असंखे० लोगमेत्तवण्णभेदेण पोग्गलेसु विदेसु किमटुं छच्चेव लेस्साओ त्ति एत्थ णियमो कीरदे ?ण एस दोसो, पञ्जवणयप्पणाए लेस्साओ असंखे०- लोगमेत्ताओ, दहियणयप्पणाए पुण लेस्साओ छच्चेव होति । संपहि एदासिं छण्णं लेस्साणं सरीरमस्सिदूण परूवणं कस्सामो। तं जहा- तिरिक्खजोणियाणं सरीराणि छलेस्साणि-काणिचि किण्णलेस्सियाणि काणिचि णील- - कबूतर जैसे कृष्णलेश्या भ्रमरके सदृश, नीललेश्या नील गुणवाले के सदृश, कापोतलेश्या वर्णवाली, तेजलेश्या सुवर्ण जैसी प्रभावाली, पद्मलेश्या पद्मके वर्ण समान, और शुक्ललेश्या कांसके फूलके समान होती है। इन कृष्ण आदि द्रव्यलेश्याओंको क्रमसे उक्त वर्णविशेपों रूप जानना चाहिये ।। १-२॥ आगम और नोआगमके भेदसे भावलेश्या दो प्रकारकी है। इनमें आगम- भावलेश्या सुगम है। फर्म-पुद्गलोंके ग्रहणमें कारणभूत जो मिथ्यात्व, असंयम और कपायसे अनुरंजित योगप्रवृत्ति होती है उसे नोआगमभावलेश्या कहते हैं। अभिप्राय यह है कि मिथ्यात्व, असंयम और कषायसे उत्पन्न संस्कारका नाम नोआगमभावलेश्या है। यहां नेगम नयके कथनकी अपेक्षा नोआगम द्रव्यलेश्या और भावलेश्या प्रकृत हैं। उनमें पहिले द्रव्यलेश्याका वर्णन करते हैं-जीवों के द्वारा अप्रतिगृहीत पुद्गलस्कन्धोंकी कृष्ण, नील, कापात, तेज, पद्म और शुक्ल संज्ञावाली छह लेश्यायें होती हैं। शंका- अनन्तभागवृद्धि, असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि और अनन्तगुणवृद्धिके क्रमसे असंख्यात लोक प्रमाण वर्गों के भेदसे पुद्गलोंके स्थित रहनेपर 'छह ही लेश्यायें हैं। ऐसा नियम किसलिये किया जाता है ? समाधान- यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यद्यपि पर्यायार्थिक नयकी विवक्षासे लेश्यायें असंख्यात लोक मात्र हैं, परन्तु द्रव्यार्थिक नयकी विवक्षासे वे लेश्यायें छह ही होती है। अव शरारका आश्रय करके इन छह लेश्याआंको प्ररूपणा करते हैं। वह इस प्रकार है- तिर्यंच योनिवाले जीवोंके शरीर छहों लेश्यावाले होते हैं-कितने ही शरीर कृष्गलेश्यावाले, - ४८६ छक्खंडागमे संतकम्म लेस्सियाणि काणिचि काउ० काणिचि ते उ० काणिचि पम्म० काणिचि सुकलेस्सियाणि ति। तिरिक्खजोणिणीणं मणुस्साणं मणुसिणीणं च छच्चेव लेस्साओ । देवाणं मूलणिव्यत्तणादो तेउ-पम्म-सुक्काणि त्ति तिलेस्साणि सरोराणि, उत्तरणिव्यत्तणादो छलेस्साणि सरीराणि । देवीणं मूलणिवत्तणादो तेउलेस्साणि सरीराणि, उत्तरणिव्यत्तणादो छलेस्साणि । रइयाणं किण्णलेस्साणि । पुढविकाइयाणं छलेस्साणि । आउकाइयाणं सुक्कलेस्साणि । अगणिकाइयाणं तेउलेस्साणि । वाउकाइयाणं काउलेस्साणि । वणपफदिकाइयाणं छलेस्माणि । सम्वेसि सुहुमाणं सरीराणि काउलेस्साणि । जहा बादरपजत्ताणं तहा बादर- अपञ्जत्ताण । ओरालियसरीराणि छलेस्साणि । वेउब्धियं मूलणिव्यत्तणादो किण्णलेस्सियं तेउले० पम्मले. सुकले. वा। तेजइयं तेउले० । कम्मइयं सुकलेस्सियं । सरीरेसु सन्यवण्णपोग्गलेसु संतेसु कधमेदस्म सरीरस्स एसा चेव लेस्सा होदि ति णियमो ? ण एस दोसो, उकट्ठवणं पडुच तण्णिदेसादो। तं जहा-कालयवण्णुकडं जं सरीरं तं - कितने ही नीललेश्यावाले, कितने ही कापोतलेश्यावाले, कितने ही तेजलेश्यावाले, कितने ही पद्मलेश्यावाले, और कितने ही शुक्ललेश्यावाले होते हैं। तियंच योनिमतियों, मनुष्यों और मनुष्यनियोंके भी छहों लेश्यायें होती हैं । देवोंके शरीर मूल निर्वर्तनाकी अपेक्षा तेज, पद्म और शुक्ल इन तीन लेश्याओंसे युक्त होते हैं । परन्तु उत्तर निर्वतनाकी अपेक्षा उनके शरीर छहों लेश्याओंसे संयुक्त होते हैं । देवियों के शरीर मूल निवर्तनाकी अपेक्षा तेजलेश्यासे संयुक्त होते हैं, परन्तु उत्तर निर्वर्तनाकी अपेक्षा वे छहों लेश्याओं में से किसी भी लेश्यासे संयुक्त होते हैं। नारकियों के शरीर कृष्णलेश्यासे युक्त होते हैं। पृथिवीकायिकों के शरीर छहाँ लेश्याओं में किसी भी लेश्यासे संयुक्त होते हैं। अप्कायिक जावोंके शरीर शुक्ललेश्यावाले होते हैं । अग्निकायिक जीवोंके शरीर तेजलेश्यासे युक्त होते हैं। वायुकायिकों के शरीर कापोत- लेश्यावाले तथा वनस्पतिकायिकों के शरीर छहों लेश्यावाले होते हैं। सब सूक्ष्म जीवों के शरीर कापोतलेश्यासे संयुक्त होते हैं । बादर अपर्याप्तों के शरीर बादर पर्यानों के समान लेश्यावाले हाते हैं। औदारिकशरीर छह लेश्या युक्त होते हैं । वैक्रियिकशरीर मूलनिवर्तनाकी अपेक्षा कृष्णलेश्या, तेजलेश्या, पद्मलेश्या अथवा शुक्ललेश्यासे संयुक्त होता है। वैजसशरोर तेजलेश्यावाला तथा कार्मणशरीर शुक्ललेश्यावाला होता है। शंका-शरीर तो सब वर्णवाले पुद्गलोंसे संयुक्त होते हैं; फिर इस शरीरको यही लेश्या होती है, ऐसा नियम कैसे हो सकता है ? समाधान- यह कोई दोप नहीं है, क्योंकि उत्कृष्ट वर्णकी अपेक्षा वैसा निर्देश किया १ अप्रतौ 'सुकलेस्सिया ति' इति पाठः । २ गिरया किण्हा कप्पा भावाणुगया हु तिसुर-गर-तिरिये । उत्तरदेहे एक भौगे रविचंद-हरिदंगा ।। बादर- आउ तेऊ तुका तेज व वाउकायागं ! गोमुत्त-मुग्गवण्णा कमसो अवतवणो य ॥ सम्बेसि सुहुमागे कायोदा सम्वविग्गहे सुका । सम्वो मिस्सो देहो कवोदवणो हये णियमा ॥ गो. नी. ४९५-१७, ३ तातो तेउलेसियं तेजइय' इति पाठः ।

लेस्साणियोगदारे किण्णलेस्सादिदव्वगुणाणं अप्पावहुअं - - किण्णलेस्सियं । णीलवण्णुकढुजं तं णीललेस्सियं । लोहियवण्णुकटु जं सरीरं तं तेउलेस्सियं। हालिद्दधण्णुक्की पम्मलेस्पियं । सुकिल्लाण्णुक्कडं सुक्कलेस्सियं । एदेहि वण्णेहि वजिय वण्णंतरावणं काउलेस्सियं । संपहि य लेस्सावंतचक्खुप्पासव्यस्स गुणाणमप्पावहुअं कीरदे। तं जहा- किण्णलेस्सच्चस्स सुकिलगुणा थोवा, हालिया अर्णतगुणा, लोहिदया अणंतगुणा, णीलया अणंतगुणा, कालया अणंतगुणा । णीललेस्सदव्यस्स सुकिलगुणा थोवा, हालिया अणंत- गुणा, लोहिदया अर्णतगुणा, कालया अणंतगुणा, णीलया अणंतगुणा । काउलेस्सिए तिण्णिवियप्पा । तं जहा- सुकिला थोवा, हालिद्दया अणंतगुणा, कालया अणंतगुणा, लोहिदया अणतगुणा, णीलया अणंतगुणा । विदियवियप्पो उच्चदे-सुकिला थोवा, कालया अणंतगुणा, हालिया अणंतगुणा, णीलया अणंतगुणा, लोहिदया अणंतगुणा । तदियवियप्पो उच्चदे-कालया थोवा, सुकिला अणंतगुणा, णीलया अणं० गुणा, हालिया अणंतगु०, लोहिदया अणंतगुणा । तेउलेस्सिएसु कालगुणा थोवा, णीलया अणंतगुणा, सुकिला अणंतगुणा, हालिया अणंतगुणा, लोहिदया अणंतगुणा । पम्माए तिण्णिवियप्पा । त जहाँ-कालया थोवा, णीलया अणंतगुणा, सुकिलया अणंतगुणा, गया है। यथा- जिस शरीर में श्याम वर्णकी उत्कृष्टता है वह कृष्णलेश्या युक्त कहा जाता है। जिसमें नील वर्णकी प्रधानता है वह नीललेश्यावाला, लोहित-वर्णकी प्रधानता युक्त जो शरीर है वह तेजलेश्यावाला, हरिद्रा वर्णकी उत्कर्षता युक्त शरीर पद्मलेश्यावाला, तथा शुक्ल वर्णकी प्रधानता युक्त शरीर शुक्ललेश्यावाला कहा जाता है । इन वर्गों को छोड़कर वर्णान्तरको प्राप्त हुए शरीरको कापोतलेश्यावाला समझना चाहिये । अब चक्षुसे ग्रहण किये जानेवाले लेश्यायुक्त द्रव्यके गुणों के अल्पबहुत्वको बतलाते हैं। यथा- कृष्णलेश्यायुक्त द्रव्यके शुक्ल गुण स्तोक, हारिद्र गुण अनन्तगुणे, लोहित गुण अनन्तगुणे, नील गुण अनन्तगुणे, और श्याम गुण अनन्तगुणे होते हैं। नीललेश्यायुक्त द्रव्यके शुक्ल गुण स्तोक, हारिद्र गुण अनन्तगुणे, लोहित गुण अनन्तगुणे, श्यास गुण अनन्त- गुणे, और नील गुण अनन्तगुणे होते हैं। कापोतलेश्यावाले के विषयमें तीन विकल्प हैं । यथा-उसके शुक्ल गुण स्तोक हैं, हारिद्र गुण अनन्तगुणे हैं, श्याम गुण अनन्तगुणे हैं, लोहित गुण अनन्तगुणे हैं, और नील गुण अनन्तगुणे हैं। द्वितीय विकल्पका कथन करते हैं- शुक्ल गुण स्तोक हैं, श्याम गुण अनन्तगुणे है, हारिद्र गुण अनन्तगुणे हैं, नील गुण अनन्तगुणे हैं, और लोहित गुण अनन्तगुणे हैं ! तृतीय विकल्पका कथन करते हैं-श्याम गुण स्तोक हैं, शुक्ल गुण अनन्तगुणे हैं, नील गुण अनन्तगुणे हैं, हारिद्र गुण अनन्तगुणे हैं, और लोहितगुण अनन्तगुणे हैं। तेजलेश्यावालोंमें श्याम गुण स्तोक, नील गुण अनन्तगुणे, शुक्ल गुण अनन्तगुणे, हारिद्र गुण अनन्तगुणे, और लोहित गुण अनन्तगुणे होते हैं। पद्मलेश्यावाले के विषयमें तीन विकल्प हैं । यथा- प्रथम विकल्पके अनुसार श्याम गुण स्तोक, नील गुण अनन्तगुणे, शुक्ल १ अ-काप्रत्योः 'वियप्पा लहा' इति पादः।

४८८ छक्खंडागमे संतकम्म , लोहिया अणंतगुणा, हालिया अणंतगुणा, विदियवियप्पो उच्चदे-कालया थोया, णीलया अणंतगुणा, लोहिदया अणंतगुणा, सुकिलया अणंतगुणा, हालिया अणंत- गुणा । तदियवियप्पो वुच्चदे । तं जहा- कालया थोवा, णीलया अणंतगुणा, लोहिदया अणंतगुणा, हालिया अणंतगुणा, सुकिला अणंतगुणा । णादिविकत्येण गारेण एसा सुक्कुक्कदो पम्मा (१)। सुक्काएँ एक्को वियप्पो, तं जहा-कालया थोवा, णीलया अणंतगुणा, लोहिदया अणंतगुणा, हालिया अणंतगुणा । सुकिला वियद्वेण अणंतगुणा। एवं किण्णाए एक्को वियप्पो, णीलाए एको, काऊए तिण्णि, तेऊए एको, पम्माए तिण्णि, सुक्काए एको । काउलेस्सा णियमा दुढाणिया, सेसाओ लेस्साओ दुट्ठाण-तिहाण-चदुट्ठाणि- याओ। एवं दबलेस्सा परूविदा। संपहि भावलेस्सा बुच्चदे । तं जहा मिच्छत्तासंजम-कसाय - जोगजणिदो जीवसंसकारो भावलेस्सा णाम । तत्थ जो तिव्यो सा काउलेस्सा। जो तिव्वयरो सा णीललेसा । जो तिव्बतमो सा किण्णलेस्सा । जो मंदो सा तेउलेस्सा। जो मंदयरो सा पम्मलेस्सा। जो संदतमो सा सुक्कलेस्सा । एदाओ छप्पि लेस्साओ अणंतभागवड्ढि - असंखे०भागवड्ढि-संखे०भागवड्ढि - संखे गुणवड्ढि-असंखेजगुणवड्ढि- गुण अनन्तगुणे, लोहित गुण अनन्तगुणे, और हारिद्र गुण अनन्तगुणे होते हैं। द्वितीय विकल्पके अनुसार श्याम गुण स्तोक, नील गुण अनन्तगुणे, लोहित गुण अनन्तगुणे, शुक्ल गुण अनन्तगुणे, और हारिद्र गुण अनन्तगुणे होते हैं। तृतीय विकल्पके अनुमार श्याम गुण स्तोक, नील गुण अनन्तगुणे, लोहित गुण अनन्तगुणे, हारिद्र गुण अनन्तगुणे, और शुक्ल गुण अनन्त- गुणे होते हैं । अन्तमें गौर वर्णकी विशेपता होनेसे तीसरे विकल्प में इसे शुक्टोत्कृष्ट कहते हैं। शुक्ललेश्याके विपयमें एक विकल्प है। यथा-श्याम गुण स्तोक हैं, नील गुण अनन्त- गुणे हैं, लोहित गुण अनन्तगुणे हैं, हारिद्र गुण अनन्तगुणे हैं, और शुक्ल उत्कटगुण अनन्तगुणे हैं । इस प्रकार कृष्णलेश्या के एक, नीललेश्या के एक, कापोतके तोन, तेजके एक, पद्म के तीन और शुक्लके एक; इतने इन द्रव्यलेश्याओंके विपयमें अल्पवहुत्व के विकल्प हैं। कापोतलेश्या नियमसे द्विस्थानिक तथा शेप लेश्यायें द्विस्थानिक, विस्थानिक व चतुः- स्थानिक हैं । इस प्रकार द्रव्य लेश्याकी प्ररूपणा की गयी है। अव भावलेश्याका कथन करते हैं। यथा-- मिथ्यात्व, असंयम, कपाय और योगसे उत्पन्न हुए जीवके संस्कारको भावलेश्या कहते हैं। उसमें जो तीव्र संस्कार है उसे कापोतलेझ्या, उससे जो तीव्रतर संस्कार है उसे नीललेश्या, और जो तीव्रतम संकार है उसे कृष्णलेश्या कहा जाता है । जो मन्द संस्कार है उसे तेजलेश्या, जो मन्दतर संस्कार है उसे पद्मलेश्या, और जो मन्दतम संस्कार है उसे शुक्ललेश्या कहते हैं। इन छहों लेश्याओं में से प्रत्येक अनन्तभाग- वृद्धि, असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि और अनन्त. -- १ काप्रती 'सुशिला वियद्वेण अगंतगुणा' इति पाठः । २ मप्रती 'सुक्कुकदा' इति पाठः । ३ ताप्रती 'मुक्कुक्कदा ! पम्मा-सुन्काए' इति पाठः ।

लेस्साणियोगदारे लेस्साहाणाणुभागप्पाबहुअं ४८९ अणंतगुणवड्ढिकमेण पादेक्कं छहाणपदिदाओ। काउलेस्सा णियमा दुट्ठाणिया, सेसाओ लेस्साओ दुट्ठाण-तिट्ठाण-चदुढाणियायो। एत्य तिव्य-मंददाए अप्पाबहुअं । तं जहा-- सच्चमंदाणुभागं जहण्णय काउट्ठाणं । णीलाए जहण्णयमणंतगुणं । किण्णाए जहण्णयमणंतगुणं । तेऊए जहण्णय- मणंतगुणं । पम्माए जहण्णयमणंतगुणं । सुझाए जहण्णयमणंतगुणं । काऊए उकस्सय- मणंतगुणं । णीलाए उक्कस्सयमणंतगुणं । किण्णाए उकस्सयमणंतगुणं । तेऊए उक्कस्सय- मणंतगुणं । पम्माए उक्कस्सयमणंतगुणं । सुक्काए उकस्सयमणंतगुणं । एवं लेस्से त्ति समत्तमणियोगद्दारं। गुणवृद्धिके क्रमसे छह स्थानों में पतित है। कापोतलेश्या नियमसे द्विस्थानिक तथा शेप लेश्यायें द्विस्थानिक, निस्थानिक व चतुस्थानिक हैं। यहां तीव्रता और मन्दताका अल्पबहुत्व इस प्रकार है-कापोतका जघन्य स्थान सबसे मन्द अनुभागसे संयुक्त है। नीललेश्याका जघन्य स्थान उससे अनन्तगुणा है । कृष्णलेश्याका जघन्य स्थान अनन्तगुणा है। तेजलेश्याका जघन्य स्थान अनन्तगुणा है। पद्मलेश्याका जघन्य स्थान अनन्तगुणा है। शुक्ललेश्याका जघन्य स्थान अनन्तगुणा है । कापोतका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है । नीलका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है । कृष्णका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है। तेजका उत्कृष्ट स्थान अनतगुणा है । पद्मका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है । शुक्लका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणाहै। इस प्रकार लेश्या-अनुयोद्वार समाप्त हुआ। १ प्रतिषु 'पादेक' इति पाठः । छ. से. ६२ १४ लेस्साकम्माणियोगदारं कुंथुमहंतं संथुवमर्णतणाणं' अणाइ-मझंतं । णमिऊण लेस्सयमं अणियोगं वण्णइसामो ॥१॥ [लेस्साओ] किण्णादियाओ', तासि कम्मं मारण-विदारण-चूरणादिकिरिया- विसेसो, तं लेस्सायम्मं वत्तइस्सामो। तं जहा- किण्णलेस्साए परिणदजीवो णियो कलहसीलो रउद्दो अणुवद्धवेरो चोरो चप्पलओ पारदारियो महु-मांस सुरापसत्तो जिणसासणे अदिण्णकण्णो असंजमे मेरु व्य अविचलियसरूवो होदि । वुत्तं च- चंडो ण मुवइ वेरं भंडणसीलो य धम्मदयरहिओ। दुट्ठो ण य एइ वसं किण्णाए संजुओ जीवो ॥१॥ दावण्णादिसु पादयविवजियं णिव्यिण्णाणं णिब्बुद्धिं माण-मायबहुलं णिद्दालुओं सलोहं हिंसादिसु मज्झिमझवसायं कुणइ णीललेस्सा। वुत्तं च- मंदो बुद्धीहीणो णिविण्णाणी य विसयलोलो य । माणी मायी य तहा आलस्सो चेव भेज्जोय ॥२॥ इन्द्रादिकोंसे संस्तुत, अनन्तज्ञानी, महान् और आदि मध्य व अन्तसे रहित ऐसे कुंथु जिनेन्द्रको नमस्कार करके लेश्याकर्म अनुयोगद्वारका कथन करते हैं ॥१॥ लेश्यायें कृष्णादिक हैं; उनका कर्म जो मारण, विदारण और चोरी आदि क्रियाविशेष रूप है वह लेश्याकर्म कहलाता है ; उस लेश्याकर्मका कथन करते हैं। वह इस प्रकार है-कृष्ण- लेश्यासे परिणत जीव निर्दय, झगडालु, रौद्र, वैरकी परम्परासे संयुक्त, चोर, असत्यभापी, पर- दाराका अभिलाषी, मधु मांस व मद्यमें आसक्त, जिनशासनके श्रवणमें कानको न देनेवाला, और असंयममें मेरुके समान स्थिर स्वभाववाला होता है। कहा भी है- कृष्णलेश्यासे संयुक्त जीव तीव्रक्रोधी, वैरको न छोड़नेवाला, गाली देने रूप स्वभावसे सहित, दयाधर्मसे रहित, दुष्ट, और दूसरोंके वश में न आनेवाला होता है ॥१॥ नीललेश्या जीवको दावण्ण आदिकों में पादवसे रहित (?), विवेक रहित, बुद्धिविहीन, मान व मायाकी अधिकतासे सहित, निद्रालु, लोभसंयुक्त, और हिंसादि कर्मों में मध्यम अध्यवसायसे युक्त करती है । कहा भी है- जीव नोललेश्याके वशमें होकर मन्द, बुद्धिविहीन, विवेकसे रहित, विषयलोलुप, .. १ प्रतियु 'संथुवमणतगुणाणं' इति पाठः । २ ताप्रती 'किणदियाओ' इति पाठः । ३ प्रतिषु 'कम्माण' इति पाठः । ४ मप्रतिपाठोऽयम् । अ-का-ताप्रतियु 'चोरणादि' इति पाठः । ५ प्रतिषु 'पारारियो' इति पाठः । ६ गो. नी. ५०८. ७ अ-काप्रत्योः 'णिविण्णाग', ताप्रती 'णिविणाणी' इति पाठः । ८ अ-काप्रत्योः णिन्बुदि', तामती 'मिन्बुद्धी' इति पाठः। ९ मप्रतिपाठोऽयम् । अ-का-ताप्रतियु 'चेव भुजी' इति पाठः ।

लेस्साकम्माणियोगदारे किण्णादिलेस्साकम्भ ४९१ णिहावंचणबहुलो धणधण्णे' होइ तिव्वसण्णाओ णीलाए लेस्साए वसेण जीवो हु पारंभो ॥३॥ किण्णलेस्साए वृत्तसत्रकज्जेसु जहण्णुजम काउलेस्सा कुणइ । वुत्तं च- रूसइ जिंदइ अण्णे दूसइ बहुसो य सोय-भयबहुलो। असुअइ परिहवइ परं पसंसइ य अप्पयं बहुसो ॥४॥ ण य पत्तियइ परं सो अप्पाणं पि व परे वि मण्णतो। तूसई अहित्थुवंतो ण य जाणइ हाणि-वड्ढीयो ॥५॥ मरणं पत्थेइ रणे देइ सुबहुअंपि थुव्वमाणों दु। ण गणइ कजमकजं काऊए पेरियो जीवो ॥६॥ अहिंसयं महु-मांस-सुरासेवावजियं सचमई चत्तचोरिय-परयारं एदेसु कज्जेसु जहण्णुजमं जीवं तेउलेस्सा कुणइ । वुत्तं च जाणइ कजमकर्ज सेयमसेयं च सव्वसमपासी । दय-दाणरओ मउओ तेऊए कीरए जीवो ॥७॥ अभिमानी, मायाचारी, आलसी, अभेद्य, निद्रा (या निन्दा) व धोखेवाजीमें अधिक, धन-धान्यमें तीव्र अभिलाषा रखनेवाला, तथा अधिक आरम्भको करनेवाला होता है ॥२-३॥ कापोतलेश्या जीवको कृष्णलेश्याके सम्बन्धमें ऊपर कहे गये समस्त कार्यों में जघन्य उद्यमशील करती है। कहा भी है- यह जीव कापोतलेश्यासे प्रेरित होकर रुष्ट होता है; दूसरोंकी निन्दा करता है, उन्हें बहुत प्रकारसे दोष लगाता है, प्रचुर शोक व भयसे संयुक्त होता है, दूसरोंसे असूया (ईपी) करता है, परका तिरस्कार करता है, अपनी अनेक प्रकारसे प्रशंसा करता है, वह अपने ही समान दूसरोंको भी समझता हुआ अन्यका कभी विश्वास नहीं करता है, अपनी प्रशंसा करने- वालोंसे संतुष्ट होता है, हानि-लाभको नहीं जानता है, युद्ध में मरणकी प्रार्थना करता है, दूसरोंके द्वारा प्रशंसित होकर उन्हें बहुतसा पारितोषिक देता है, तथा कर्तव्य और अकर्तव्यके विवेकसे रहित होता है॥४-६॥ तेजलेश्या अहिंसक, मधु मांस व मद्यके सेवनसे रहित, सत्यबुद्धि तथा चोरी व परदाराका त्यागी; इन कार्यों में जीवको जघन्य उद्यमवाला करती है। कहा भी है- तेजलेश्या जीवको कर्तव्य-अकर्तव्य तथा सेव्य-असेव्यका जानकार, समस्त जीवोंको समान समझनेवाला, दया-दानमें लवलीन, और सरल करतो है ॥७॥ , १ प्रतिधु 'वणषप्यो' इति पाठः । ३ अ-काप्रत्योः 'जहण्णुजुर्म' इति पाठः । ५ अ-काप्रत्योः 'धुवमाणो' इति पाठः । ७ ताप्रती 'मांससेवासुराधजिय' इति पाठः। ९ गो, ली. ५१४. २ गो. जी. ५०९-१०. ४ अप्रतौ 'तूसहि' इति पाठः । ६ गो. नी. ५११-१३. ८ प्रतिषु 'सच्चमइच्चत्तंचोरिय' इति पाठः । ..

४९२ छक्खंडागमे संतकम्म अहिंसादिसु कज्जेसु जीवस्स मज्झिमुञ्जम पम्मलेस्सा कुणइ । वुत्तं च- चाई भद्दो चोक्खो उज्जुवकम्मो य खमइ बहुअंपि। साहु-गुरुपूजणरओ पम्माए परिणओ जीवों ॥८॥ अहिंसाइसु कजेसु तिव्वुञ्जमं सुकलेस्सा कुणइ । वुत्तं च- ण य कुणइ पक्खवायं ण वि यं णिदाणं समो य सव्वेसु । णत्थि य राग-दोसा हो वि य सुकलेस्साएँ ॥ ९ ॥ एवं दव्यलेस्साए वि कजाणं परूवणा जाणिदूण कायया । एवं लेस्सायम्मे ति समत्तमणियोगद्दारं। पद्मलेश्या जीवको उपर्युक्त अहिंसादि कार्यों में मध्यम उद्यम करनेवाला करती है। कहा भी है- पद्मलेश्यामें परिणत जीव त्यागी, भद्र, चोखा (पवित्र ), ऋजुकर्मा (निष्कपट ), भारी अपराधको भी क्षमा करनेवाला तथा साधुपूजा व गुरुपूजामें तत्पर रहता है ॥८॥ शुक्ललेश्या उक्त अहिंसादि कार्यों में तीव्र उद्यमशोल करती है । कहा भी है- शुक्ललेश्याके होनेपर जीव न पक्षपात करता है और न निदान भी करता है, वह सब जीवों में समान रहकर राग, द्वेष व स्नेहसे रहित होता है ॥९॥ इसी प्रकार द्रव्यलेश्याके कार्योंकी भी प्ररूपणा जानकर करना चाहिये। इस प्रकार लेश्या- कर्म अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। १ अ-काप्रत्योः 'मज्झिमुज्जुमं' इति पाठः। २ अ-काप्रत्योः 'भंडो' इति पाठः। ३ गो. नी. ५१५. तत्थ 'खवह' इत्येतस्य स्थाने 'खमदि' इति पाठः। ४ अ-काप्रत्योः 'ण रिय' इति पाठः । ५ अ-काप्रत्योः 'राग दोसा', ताप्रती 'राग दोसो' इति पाठः । ६ गो. नी. ५१६.

१५ लेस्सापरिणामाणियोगदारं अहिणंदणमहिवंदिय अहिणंदियतिहुवणं सुहत्तीए । लेस्सपरिणामसण्णियमणियोगं चण्णइस्सामो ॥१॥ लेस्सापरिणामे त्ति अणियोगदारं काओ लेस्साओ केण सरूवेण काए वड्डीए हाणीए वा परिणमंति त्ति जाणावण?मागयं । किण्णलेस्साए ताच परिणमणविहाणं वुच्चदे । तं जहा- किण्णलेस्सियो संकिलिस्समाणो ण अण्णं संकमदि, सहाणे चेव छटाणपदिदेण ठाणसंकमणेण वड्ढदि । किं छहाणपदिदत्तं ? जत्तो ठाणादो संकिलिट्ठो तत्तो हाणादो अणंतभागब्भहिया असंखेजभागभहिया संखेजभागन्भहिया संखेजगुणब्भहिया असंखेज- गुणब्भहिया अर्णतगुणब्भहिया वा लेस्सा होज, एदं छट्ठाणपदिदत्तं । विसुज्झमाणो सवाणे अणंतभागहाणि-असंखे०भागहाणि-संखे० भागहाणि-संखे० गुणहाणि-असंखे० गुणहाणि-अर्णतगुणहाणि त्ति छट्ठाणपदिदेण हायदि, णीललेस्साए अर्णतगुणहीणेण संकमदि। एवं किण्णलेस्सस्स संकिलेसमाणस्स एको वियप्पो किण्णलेस्सवड्ढीए । तीनों लोकोंको आनन्दित करनेवाले अभिनन्दन जिनेन्द्रकी अतिशय भक्तिपूर्वक वन्दना करके 'लेश्यापरिणाम' संज्ञावाले अनुयोगद्वारका वर्णन करते हैं ॥ १॥ कौन लेश्यायें किस स्वरूपसे और किस वृद्धि अथवा हानिके द्वारा परिणमन करती हैं, इस बातके ज्ञापनार्थ 'लेश्यापरिणाम' अनुयोगद्वार प्राप्त हुआ है। उनमें पहिले कृष्णलेश्याके परिणमनविधानका कथन करते हैं। यथा- कृष्णलेश्यावाला जीव संक्लेशको प्राप्त होता हुआ अन्य लेश्यामें परिणत नहीं होता है, किन्तु षट्स्थानपतित स्थानसंक्रमण द्वारा स्वस्थानमें ही वृद्धिको प्राप्त होता है शंका-घटस्थानपतितका क्या स्वरूप है ? समाधान-जिस स्थानसे संक्लेशको प्राप्त हुआ है उस स्थानसे अनन्तभाग अधिक, असंख्यातभाग अधिक, संख्यातभाग अधिक, संख्यातगुणी अधिक, असंख्यातगुणी अधिक और अनन्तगुणी अधिक लेश्याका होना; इसका नाम पदस्थानपतित है। उक्त कृष्णलेश्यावाला जीव विशुद्धिको प्राप्त होता हुआ अनन्तभागहानि, असंख्यातभाग- हानि, संख्यातभागहानि, संख्यातगुणहानि, असंख्यातगुणहानि और अनन्तगुणहानि; इस प्रकार षट्स्थानपतित स्वरूपसे स्वस्थानमें हानिको प्राप्त होता है। वही अनन्तगुणहानिके द्वारा नीललेश्यारूपसे परिणत होता है। इस प्रकार संक्लेशको प्राप्त होनेवाले कृष्णलेश्या युक्त १ ताप्रती 'काउलेस्साओ' इति पाठः ।२ संकमणं सट्टाग-परहाण होदि किग-सुकाणं । षट्ठीसु हि सट्टाणं उमय हाणिम्मि सेस उभये वि ॥ लेस्साणुफरसादो वरहाणी अपरगादवरवट्ठी। सहाणे अवरादो हाणी णियमा परहाणे ॥ संफमणे छहागा हाणिसु वही होति तण्यामा। परिमाणं च य पुवं उत्तकम होदि सुदणागे । गोभी: ५०३.५०५ ।।

उक्खंडागमे संतकम्म विसुज्झमाणस्स दो वियप्पा-किण्णलेस्सहाणीए एको, गीललेस्ससंकमे विदियो' चेव । एवं किण्णलेस्सस्स परिणमणविहाणं समत्तं । संपहिणीललेस्सस्स वुचदे-णीललेस्सादो संकिलिस्संतो णीललेस्सं छट्ठाणपदिदेण वड्ढिसंकमट्ठाणेण संकमेई, अधया किण्णलेस्सं अणंतगुणवढिकमेण परिणमदि । एवं संकिलेसंतस्स दो वियप्पा । णीललेस्सादों विसुझंतो णीललेस्साए छट्ठाणपदिदाए हाणीए हायदि, काउलेस्साए अणंतगुणहीणहाणीएँ वि हायमाणो परिणमदि । एवं णीललेस्सादो विसुज्झमाणस्स दो वियप्पा । एवं णीललेस्सस्स परिणमणविहाणं समत्तं । काउलेस्सस्स वुचदे । तं जहा- काउलेस्सियो संकिलिस्संतो सट्टाणे अणियमेणे छहाणपदिदाए बड्ढीए वड्ढदि, णीललेस्साए अणंतगुणवड्ढीए णियमेण परिणमदि । एवं संकिलिस्संतस्स दो वियप्पा । काउलेस्सियो विसुज्झमाणो सट्टाणे छट्ठाणपदिदाए हाणीए हायदि, तेउलेस्सिए अर्णतगुणहीणहाणीए परिणमदि । एवं विसुज्झमाणस्स दो वियप्पा । काउलेस्सस्स संकमणविहाणं समत्तं । तेउलेस्सिओ संकिलिस्संतो सत्थाणे छट्ठाणपदिदाए हाणीए हायदि, काउलेस्साए जीवका कृष्णलेश्याकी वृद्धि द्वारा एक विकल्प होता है। उसीके विशुद्धिको प्राप्त होनेपर दो विकल्प होते हैं- कृष्णलेश्याकी हानिसे एक, और नीललेश्याके संक्रममें दूसरा विकल्प होता है। इस प्रकार कृष्णलेश्यावाले जीवका परिणमनविधान समाप्त हुआ। अब नीललेश्यावाले जीवके परिणमनविधानका कथन करते है-नीललेश्यासे संक्लेशको प्राप्त होता हुआ पट्स्थानपतित वृद्धिसंक्रमस्थानके द्वारा नीललेश्यामें ही संक्रमण करता है। अथवा वह अनन्तगुणवृद्धिके क्रमसे कृष्णलेश्या में परिणत होता है। इस प्रकार संक्लेशको प्राप्त होनेपर दो विकल्प होते हैं । नीललेश्यासे विशुद्धिको प्राप्त होनेवाला पदस्थानपतित हानिके द्वारा नीललेश्याकी हानिको प्राप्त होता है । वही अनन्तगुणहीन हानिके द्वारा हानिको प्राप्त होता हुआ फापोतलेश्या रूपसे परिणत होता है। इस प्रकार नीललेश्यासे विशुद्धिको प्राप्त होनेवाले के दो विकल्प हैं। इस प्रकार नीललेश्यावालेका परिणमनविधान समाप्त हुआ। कापोतलेश्यावालेके परिणमनका विधान कहते हैं । यथा-कापोतलेश्यावाला संक्लेशको प्राप्त होता हुआ अनियमसे पट्थानपतित वृद्धिके द्वारा वृद्धिंगत होता है। वही अनन्तगुण- घृद्धिके द्वारा नियमसे नीललेश्या में परिणत होता है। इस प्रकार संक्लेशको प्राप्त हुए फापोत- लेश्यायुक्त जीवके दो विकल्प है। कापोतलेश्यावाला विशुद्धिको प्राप्त होता हुआ पट्स्थानपतित हानिके द्वारा स्वस्थानमें हानिको प्राप्त होता है। वही अनन्तगुणहीन हानि द्वारा तेजलेश्यामें परिणत होता है। इस प्रकार विशुद्धिको प्राप्त होते हुए कापोतलेश्यावाले के दो विकल्प है। फापोतलेश्यावालेके संक्रमणका विधान समाप्त हुआ। तेजलेश्यावाला जीव संक्लेशको प्राप्त होकर पस्थानपतित हानिके द्वारा स्वस्थानमै १ अ-काप्रत्योः 'विदिया' इति पाठः । २ अ-काप्रत्योः 'संकमे' इति पाठः। ३ अ-काप्रत्योः 'जील. लेस्ता' इति पाठः । ४ य-काप्रत्योः 'होणाहाणीए' इति पाठः। ५ ताप्रती 'अगियमेण इति पाठः। ६ अ-फामत्योः 'तेउलेस्सिए' इति पाठः ।

लेस्सापरिणामाणियोगहारे किण्णादीणं परिणमणविहाणं ४९५ अणंतगुणहीणहाणीए परिणमइ । एवं तेउलेस्सस्स संकिलिस्संतस्स दो वियप्पा। तेउ- लेस्सिओ विसुज्झमाणो सत्थाणे छट्ठाणपदिदाए वड्ढीए वड्ढदि, पम्मलेस्साए अणंत- गुणवड्ढोए परिणमइ । एवं तेउलेस्सस्स परिणमणविहाणं समत्तं । संपहि पम्मलेस्साए बुच्चदे। तं जहा- पम्मलेस्सियो विसुज्झमाणो सत्थाणे छट्ठाणपदिदाए चड्ढीए वड्ढदि, सुक्कलेस्साए अणंतगुणवड्ढीए परिणमदि । संकिलिस्समाणओ पम्मलेस्सिओ सहाणे छट्ठाणपदिदाए हाणीए हायदि, तेउलेस्साए अणंतगुणहाणीए हायदि । एवं पम्मलेस्सस्स परिणमणविहाणं समत्तं । सुक्कलेस्साए उच्चदे । तं जहा-सुक्कलेस्सियो संकिलिस्समाणो सत्थाणे छट्ठाण- पदिदाए हाणीए हायदि, पम्मलेस्साए अणंतगुणहीणहाणीए परिणमइ । एवं संकिलिस्संतस्स दो वियप्पा । सुक्कलेस्सियो विसुज्झमाणो सहाणे छहाणपदिदाए वड्ढीए वड्ढदि, अण्णलेस्ससंकमो णत्थि । सुक्कलेस्सस्स विसुज्झमाणस्स एक्को चेव वियप्पो । एवं सुक्कलेस्साए परिणमणविहाणं समत्तं । संकम-पडिग्गहाणं जहण्णुकस्सयाणं तिव्य-मंददाए एत्थ अप्पावहुरं कायच्वं । हीनताको प्राप्त होता है, वही अनन्तगुणहीन हानिके द्वारा कापोतलेश्यासे परिणत होता है। इस प्रकार संक्लेशको प्राप्त होनेवाले तेजलेश्या युक्त जीवके दो विकल्प हैं। तेजलेश्यायुक्त जीव विशुद्धिको प्राप्त होता हुआ षट्स्थानपतित वृद्धिके द्वारा स्वस्थानमें वृद्धिको प्राप्त होता है, वही अनन्तगुणवृद्धिके द्वारा पद्मलेश्यासे परिणत होता है। [इस प्रकार विशुद्धिको प्राप्त होनेवाले तेजलेश्यायुक्त जीवके दो विकल्प हैं। इस प्रकार तेजलेश्यायुक्त जीवके परिणमनका विधान समाप्त हुआ। अब पद्मलेश्याके परिणमनविधानका कथन करते हैं। यथा- पद्मलेश्यायुक्त जीव विशुद्धिको प्राप्त होता हुआ पदस्थानपतित वृद्धिके द्वारा स्वस्थानमें वृद्धिको प्राप्त होता है, वही अनन्तगुणवृद्धिके द्वारा शुक्ललेश्यासे परिणत होता है। संक्लेशको प्राप्त होनेवाला पद्मलेश्या संयुक्त जीव पदस्थानपतित हानिके द्वारा स्वास्थानमें हीनताको प्राप्त होता है, वही अनन्तगुणी हानिके द्वारा तेजलेश्यामें जाकर हीनताको प्राप्त होता है । इस प्रकार पद्मलेश्यावाले के परिणमन- का विधान समाप्त हुआ। शुक्ललेश्याके परिणमनविधानका कथन करते हैं । यथा-शुक्ललेश्यावाला संक्लेशको प्राप्त होता हुआ पदस्थानपतित हानिके द्वारा स्वास्थानमें हानिको प्राप्त होता है, वही अनन्तगुणहीन हानिके द्वारा पालेश्यासे परिणत होता है । इस प्रकार संक्लेशको प्राप्त होते हुए शुक्ललेश्यायुक्त जीवके दो विकल्प हैं । शुक्ललेश्यायुक्त जीव विशुद्धिको प्राप्त होता हुआ पट्स्थानपतित वृद्धिके द्वारा स्वास्थानमें वृद्धिको प्राप्त होता है, उसका अन्य लेश्यामें संक्रम नहीं होता। विशुद्धिको प्राप्त होते हुए शुक्ललेश्यावालेका एक ही विकल्प है। इस प्रकार शुक्ललेश्याका परिणमनविधान समाप्त हुआ। यहां तीव्र-मंदताकी अपेक्षा जघन्य व उत्कृष्ट संकम और प्रतिमहके अल्पयत्वका कथन करते ४९६ छक्खंडागमे संतकम्म तं जहा- ताणि किण्ण-णीललेस्साओ पडुच्च बुचदे। णीलाए जहण्णय लेस्सट्ठाणं थोत्र । किण्णादो जम्हि णीलाए पडिघेप्पदि तं णीलाए जहण्णयं पडिग्गहट्ठाणमणंतगुणं । किण्णाए जहण्णयं संकमट्ठाणं जहण्णयं च किण्णट्ठाणं दो वि तुल्लाणि अणंतगुणाणि । गीलाए जहण्णयं संकमट्ठाणमणंतगुणं । किण्णाए जहण्णय पडिग्गहढाणमर्णतगुणं । णीलाए उक्करसयं पडिग्गहवाणमणतगुणं । किण्णाए उकस्सयं संकमट्ठाणमर्णतगुणं । णीलाए उकस्सयं संकमट्ठाणं उकस्सयं णीलहाणं च दो वि तुल्लाणि अणंतगुणाणि । किण्णाए उकस्सयं पडिग्गहट्ठाणमर्णतगुणं । उक्कस्सयं किण्णलेस्सहाणमणंतगुणं । एवं किण्ण-णीलाणं संकम-पडिग्गहेप्पावहुअं समत्त । एत्तो णील-काऊणं संकम-पडिग्गहाणमप्पावहुअं बुच्चदे । तं जहा- जहा किण्ण-णीलाणं तहा काउ-णीलाणं वत्तव्यं । णवरि काउलेस्समादि कादूण वत्तव्यं । एवं णील-काउसंकम-पडिग्गहप्पाबहुअं समत्तं । संपहि काउ-तेउलेस्साओ पडुच्च अप्पाबहुअं बुच्चदे। तं जहा- काऊए जहण्णओ संकमो जहण्णहाणं च दो वि तुल्लाणि थोवाणि । तेऊए जहण्णयं ठाणं जहण्णो च संकमो तुल्लो अणंतगुणो। काऊए जहण्णयं पडिग्गहट्ठाणमणंतगुणं । तेऊए जहण्णओ पडिग्गहो अणंतगुणो । काऊए उकस्सयं संकमट्ठाणमणंतगुणं । तेऊए उकस्सयं संकम- हैं। वह इस प्रकार है-- उनका कथन कृष्ण व नील लेश्याओंके आश्रयसे करते हैं। नीललेश्या- का जघन्य लेश्यास्थान स्तोक है। नीललेश्याके जिस स्थानमें कृष्णलेश्यासे प्रतिग्रहण होता है वह नीललेश्याका जघन्य प्रतिग्रहस्थान उससे अनन्तगुणा है । कृष्णका जघन्य संक्रमस्थान और जघन्य कृष्णस्थान दोनों ही तुल्य व अनन्तगुणे हैं। नीलका जघन्य संक्रमस्थान अनन्तगुणा है । कृष्णका जघन्य प्रतिग्रहस्थान अनन्तगुणा है। नीलका उत्कृष्ट प्रतिग्रहस्थान अनन्तगुणा है। कृष्णका उत्कृष्ट संक्रमस्थान अनन्तगुणा है। नीलका उत्कृष्ट संक्रमस्थान और उत्कृष्ट नीलस्थान दोनों ही तुल्य व अनन्तगुणे हैं । कृष्णका उत्कृष्ट प्रतिग्रहस्थान अनन्तगुणा है। उत्कृष्ट कृष्णलेश्यास्थान अनन्त- गुणा है । इस प्रकार कृष्ण और नील लेश्याओं के संक्रम और प्रतिग्रहका अल्पवहुत्व समाप्त हुआ। यहां नील और कापोत लेश्याओं के संक्रम और प्रतिप्रहके अल्पबहुत्व कथन करते हैं। यथा- जैसे कृष्ण और नील लेश्याओंके सम्बन्धमें कथन किया है वैसे ही कापोत और नील लेश्याओंके सम्बन्धमें भी कथन करना चाहिये । विशेषता इतनी है कि कापोतलेश्याको आदि करके यह कथन करना चाहिये। इस प्रकार नील और कापोत लेश्याओं के संक्रम-प्रतिग्रहका अल्पवहुत्व समाप्त हुआ। अव कापोत और तेज लेश्याओंके आश्रयसे उक्त अल्पबहुत्वका कथन करते हैं । यथा- कापोतलेश्याका जघन्य संक्रम और जघन्य स्थान दोनों ही तुल्य व स्तोक हैं। तेजलेश्याका जघन्य स्थान और जघन्य संक्रम दोनों तुल्य व उनसे अनन्तगुणे हैं। कापोतका जघन्य प्रतिप्रह- स्थान अनन्तगुणा है। तेजका जघन्य प्रतिग्रहस्थान अनन्तगुणा है । कापोतका उत्कृष्ट संक्रम- स्थान अनन्तगुणा है। तेजका उत्कृष्ट संक्रमस्थान अनन्तगुणा है। कापोतका उत्कृष्ट प्रति- १ अ-काप्रत्योः 'संकमदिपडिगह' ताप्रती संकम [दि] पटिगह इति पाठः । - ४९७ लेस्सापरिणामाणियोगदारे संकम-पडिगहाणं अप्पाबहुअं हाणमणतगुणं । काऊए उकस्सओ पडिग्गहो अणंतगुणो । तेऊए उकस्सओ पढिग्गहो अणंतगुणो। काऊए उकस्सयं हाणमणंतगुणं । तेऊए उकस्सयं हाणमणंतगुणं । एवं तेउ-काऊणं संकम-पडिग्गहप्पाबहुअं समत्तं । तेउ-पम्माणं संकम-पडिग्गहप्पावहुअं वुचदे। तं जहा- तेऊए जहण्णयं द्वाणं थोवं । तेऊए जहण्णओ पडिग्गहो अणंतगुणो। पम्माए जहण्णयं द्वाणं संकमो च दोणि वि तुल्लाणि अणंतगुणाणि । तेऊए जहण्णयं संकमट्ठाणमणंतगुणं । पम्माए जहण्णो पडिग्गहो अणंतगुणो । तेऊए उकस्सओ पडिग्गहो अणंतगुणो । पम्माए उक्कस्मओ संक्रमो अणंतगुणो। तेऊए उकसओ संकमो उकस्सयं च हाणमणंतगुणं । पम्माए उकस्सओ पडिग्गहो अणंतगुणो । पम्माए उकस्सयं हाणमणंतगुणं । एवं तेउ- पम्माणं संकम-पडिग्गहप्पाबहुअं समत्तं । संपहि पम्म-सुकाणं वुञ्चदे । तं जहा पम्माए जहएणयं ठाणं थोवं। पम्माए जहण्ण ओ पडिग्गहो अणंतगुणो । सुक्काए जहण्णओ संकमो जहण्णयं ठाणं च दोण्णि वि तुल्लाणि अणंतगुणाणि । पम्माए जहण्णओ संकमो अणंतगुणो । सुक्काए जहण्णओ पडिग्गहो अर्णतगुणो। पम्माए उक्कस्सओ पडिग्गहो अणंतगुणो। सुक्काए उकस्सओं संकमो अणंतगुणो । पम्नाए उक्स्सयं ठाणं संकमो च अणंतगुणो । सुकाए उकस्सओ पडिग्गहो अणंतगुणो । उक्स्सयं सुक्कलेस्मट्ठाणमणंतगुणं । एवं ति-चदु-पंच-छसंजोगाणं पि जाणिदूण अप्पाबहुअं कायव्यं । एवं लेस्सपरिणामे त्ति समत्तमणियोगदारं । ग्रहस्थान अनन्तगुणा है। तेजका उत्कृष्ट प्रतिग्रह अनन्तगुणा है। कापोतका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है । तेजका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है । इस प्रकार तेज और कापोत लेश्याओंके संक्रम और प्रतिग्रहका अल्पबहुत्व समाप्त हुआ। तेज और पद्म लेश्याओंके संक्रम व प्रतिग्रहके अल्पबहुत्वका कथन करते हैं। यथा- तेजका जघन्य स्थान स्तोक है। तेजका जघन्य प्रतिग्रह अनन्तगुणा है। पाका जघन्य स्थान और संक्रम दोनों ही तुल्य व अनन्तगुणे हैं। तेजका जघन्य संक्रमस्थान अनन्तगुणा है । पद्मका जघन्य प्रतिग्रह अनन्तगुणा है। तेजका उत्कृष्ट प्रतिग्रह अनन्तगुणा है। पद्मका उत्कृष्ट संक्रम अनन्तगुणा है । तेजका उत्कृष्ट संक्रम और उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है । पद्मका उत्कृष्ट प्रतिग्रह अनन्तगुणा है। पद्मका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है। इस प्रकार तेज और पद्म लेश्याओंके संक्रम-प्रतिग्रहका अल्पबहुत्व समाप्त हुआ। अब पद्म और शुक्ल लेश्याओं के प्रकृत अल्पबहुत्वका कथन करते हैं । यथा--- पद्मका जघन्य स्थान स्तोक है । पद्मका जवन्य प्रतिग्रह अनन्नगुणा है । शुक्लका जघन्य संक्रम और जघन्य स्थान दोनों ही तुल्य व अनन्तगुणे हैं। पद्मका जघन्य संक्रम अनन्तगुणा है । शुशका जघन्य प्रतिग्रह अनन्तगुणा है । पद्मका उत्कृष्ट प्रतिग्रह अनन्तगुगा है। गुल्लका उत्कृष्ट संक्रम अनन्तगुणा है । पद्मका उत्कृष्ट स्थान और संक्रम अनन्तगुणा है । शुक्लका उत्कृष्ट प्रतिग्रह अनन्तगुणा है। उत्कृष्ट शुक्छलेश्यास्थान अनन्तगुणा है। इस प्रकार तीन, चार, पांच और छह संयोगों के भा अल्पबहुत्वका कथन जानकर करना चाहिये । इस प्रकार लेश्यापरिणाम अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। छ. से. ६३ १६ सादासादाणियोगद्दारं अजियं जियसयलविभुं परमं जय-जीयबंधवं णमिउं । सादासादणियोगं समासदो वण्णइमामो ॥१॥ सादासादे ति अणियोगदारस्स पंच अणियोगद्दाराणि । तं जहा- समुक्त्तिणा अपदं पदमीमांसा सामित्तं अप्पाबहुअं चेदि । समुक्त्तिणा तिजं पदं तस्स विहासा । तं जहा- एयंतसादं अणेयंतसादं एयंतअसादं अणेयंतअसादं च अस्थि । समु- कित्तणा गदा। अदुपदं । तं जहा- कम्मं सादत्ताए बद्धं असंछुद्धं अपडिच्छुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तमेयंतसादं । तव्यदिरि अणेयंतसादं । जं कम्मं असादत्ताए बद्धं असंछुद्धं अपडिच्छुद्धं असादत्ताए वेदिञ्जदि तमेयंतअसादं । तव्यदिरित्तमणेयंतअसादं । एवं अपदं गदं । पदमीमांसा । तं जहा- एयंतसादमस्थि उक्कस्सयमणुक्कसयं जहण्णमजहण्णयं च । एवं सेसाणं पि वत्तव्यं । पदमीमांसा' गदा । जिन्होंने समस्त विभुओंपर विजय प्राप्त कर ली है और जो जगत् के जीवोंके हितेपी है उन उत्कृष्ट अजित जिनेन्द्रको नमस्कार करके संक्षेपमें सातासातअनुयोगद्वारका वर्णन करते हैं ॥ १॥ 'सातासात' इस अनुयोगद्वारके पांच अवान्तर अनुयोगद्वार हैं। यथा- समुत्कीर्तना, अर्थपद, पदमीमांसा, स्वामित्व और अल्पबहुत्व । समुत्कीर्तना यह जो पद है उसकी विभाषा बतलाते हैं। यथा- एकान्तसात, अनेकान्तसात, एकान्तअसात और अनेकान्तअसात है। समुकीतना समाप्त हुई। अर्थपदका कथन इस प्रकार है- सातास्वरूपसे वांधा गया जो कर्म संक्षेप व प्रतिक्षेपसे रहित होकर सातास्वरूपसे वेदा जाता है उसका नाम एकान्तसात है । इससे विपरीत अनेकान्त- सात है । जो कर्म असातास्वरूपसे बांधा जाकर संक्षेप व प्रतिक्षेपसे रहित होकर असातास्वरूपसे वेदा जाता है उसका नाम एकान्तअसात है। इससे विपरीत अनेकान्तअसात कहा जाता है। इस प्रकार अर्थपद समाप्त हुआ। पदमीमांसाका कथन इस प्रकार है- एकान्तसात उत्कृष्ट है, अनुत्कृष्ट है, जघन्य है और अजघन्य भी है । इसी प्रकार शेष अनेकान्तसात आदिके सम्बन्ध में भी कहना चाहिये । इस प्रकार पदमीमांसा समाप्त हुई। १ ताप्रती एवं मीमांसा' इति पाठः ।

४९९ सादासादाणियोगद्दारे सामित्तं सामित्तं । तं जहा- उकस्समयमेयंतसादं कस्स होदि ? अभवसिद्धियपाओग्गे पयदं । जो सत्तमाए पुढवीए गेरइयो गुणिदकम्मंसियो तत्तो उबट्टिदो संतो सबलहुं एकत्तीसंसागरोवमद्विदियं देवलोगं गच्छिहिदि । किं कारणं ? तस्स सादवेदयद्धाओ सव्वमहंतीयो बहुआओ च भविस्संति । तदो जो एवं देवलोगे भविस्सो सत्तमाएं पुढवीए णेरइयो तस्स चरिमसमयणेरइयस्स उक्कस्सयमेयंतसादं । अणेयंतसादमुक्कस्मयं कस्स ? जो सत्तमाए पुढवीए मेरइयो चादरपुढविकाइएसु तसकाइएसु च कम्म गुणेदृण आगदो, तस्स पुण जो अधापवत्त संकमेण असंकमस्स अवहारकालो तत्तिय- मेत्तं जीविदव्यस्स सेसं, सो च तं जीविदव्वसेसं सव्यममादो भविस्सदि, तस्स पलिदो- वमस्स असंखेजदिभागसेसाउअस्स परहयस्स उकस्सयमणेयंतसादं । उकस्सयमेयंत- असाद कस्स ? जारिसस्स णेरइयस्स उक्कस्सयमणेयंतं सादं कदं तारिसस्से णेरइयस्स उकस्सयमेयंतअसादं। णवरि णाणत्तं वादकाइएसु अच्छिदो वा ण वा । उकस्सयमणेयंतअसादं कस्स ? जस्स उकस्सयमेयंतअसादं तस्सेव उक्कस्सयमणेयंत- असादं । णवरि वादरकाइएसु तसकाइएसु च कम्मं गुणेण णिरयगई पवेसेदव्यो । तस्स देवलोगभाविस्स चरिमसमयणेरइयस्स उकस्सयमणेयंतं असादं । 3 . स्वामित्वका कथन किया जाता है। यथा- उत्कृष्ट एकान्तसात किसके होता है ? यहां अभव्यसिद्धिकप्रायोग्य प्रकृत है। जो सातवीं पृथिवीका नारकी गुणितकमांशिक वहां से निकल कर सर्वलघु कालमें इकतीस सागरोपम आयुस्थितिवाले देवलोकको प्राप्त होगा उसके होता है। शंका-इसका कारण क्या है ? समाधान- इसका कारण यह है कि उसके सातावेदककाल सबसे महान् और वहुत होंगे। इसलिये जो इस प्रकारके देवलोकमें होनेवाला सातवीं पृथिवीका नारकी है उस अन्तिम समयवर्ती नारकीके उत्कृष्ट एकान्तसात होता है। उत्कृष्ट अनेकान्तसात किसके होता है ? जो सातवीं पृथिवीका नारकी वादर पृथिवीकायिकों और त्रसकायिकों में कर्मको गुणित करके (गुणितकांशिक होकर ) आया है, उसका जो अधः प्रवृत्तसंक्रमसे असंक्रमका अवहारकाल है उतना मात्र जीवन शेष है, वह उस शेप सब जीवन पर्यन्त सातासे रहित होगा, उस पल्योग्मके असंख्यातवें भाग मात्र शेष आयुवाले नारकीके उत्कृष्ट अनेकान्तसात हाता है । उत्कृष्ट एकान्त- असात किसके होता है ? जिस प्रकारके नारकीके उत्कृष्ट अनेकान्तसात किया गया है उसी प्रकारके ही नारकीके उत्कृष्ट एकान्तअसात होता है। विशेष इतना है वह वादरकायिकों में रह भी सकता और नहीं भी । उत्कृष्ट अनेकान्तअसात किसके होता है ? जिसके उत्कृष्ट एकान्तअसात होता है उसीके उत्कृष्ट अनेकान्तअसात होता है । विशेष इतना है कि बादरकायिकोंमें और त्रसकायिकों में फर्मको गुणित करके उसे नरकगति में प्रविष्ट कराना चाहिये । देवलोक में उत्पन्न होनेवाले उसी अन्तिम समयवर्ती नारकीके उत्कृष्ट अनेकान्तअसात होता है। - । १ प्रतिषु 'उवहिदो' इति पाठः। २ अ-काप्रत्योः 'गेयंतसाद' इति पाठः । ३ अप्रतौ 'जाविसस', ताप्रती 'नावि (रि) सत्स' इति पाठः। ४ अ.काप्रत्योः 'जागत्तबादरं इति पाठः ।

५०० क्खंडागमे संतकम्म जहण्णयमेयंत सादं कस्स ? जो पढमसमयो हेरइयो सव्यजहण्णएण जोगेण सादं बंधदि, जत्तियमेत्तो अघापवत्तसंकमेण असंकमस्स अवहारकालो उकस्सओ तत्तो समऊणं कालं असादो होहिदि ति तदो जं तस्स तइया पढमसमयसादस्स अधाहि- दियमुदयमेहिदि तप्पढमसमयणेरड्यस्स जहिण्णयमेर्यंतसादं। जहण्णयमणेयंतसाद कस्स ? जो सुहुमसंतकम्मेण जहण्णएण तसेसु उपवण्णो, तत्थ पढमसमयतब्भवत्थमादि कादृण सवचिरमशादं वंधिदूण तस्स चरिमसमयअसादबंधयस्स जहण्णयमणेयंत- सादं । सो च पुण तं चरिमसमयअसादबंधमादि कादूण सव्वरहस्सेण कालेण एकत्तीसं- सागरोवमाउट्ठिदिदेवगदिं गाहिदि । तत्थ सव्यमहंतीओ सबबहुगीओ च साद- वेदगद्धाओ भविम्संति । जहण्णयं एयंत असादं कस्स ? जस्स जहण्णयं अणेयंतसादं तस्स चेव जहण्णयमेयंतअसादं भाणिदव्यं । णवरि असादेण जहण्णएण तसेसु उबवण्णो, तत्थ च सादबंधयद्धसुक्कस्सयं बंधिदूण चरिमसमयसादबंधगो जादो, तस्स जहण्णय- मेयंतअसादं । जहण्णयमणेयंतमसादं कस्स ? एदस्स चेव, सुहुमेहि जहण्णएण असाद- कम्मेण आगदो तसेसु उववण्णो, उक्स्सयं सादवंधयद्धं वंधिदूण जो चरिमसमयसाद- बंधओ जादो, तस्स जहण्णयमणेयंतअसादं । सो च पुण सव्वलहुं गिरयं गाहिदि, तत्थ पलिदोवमपुधत्तं वा चिरयरय वा असादो होहिदि, तदो तारिसस्स तिस्से पढम- जघन्य एकान्तसात किसके होता है ? जो प्रथम समयवर्ती नारकी सर्वजघन्य योगसे साताको बांधता है, जितना मात्र अधःप्रवृत्तसंक्रमसे असंक्रमका उत्कृष्ट अवहारकाल है उससे एक समय कम काल साता रहित होगा, इसलिये उस प्रथम समयवर्ती असातके उस समय जो अधःस्थिति उदयप्राप्त होगी उसके प्रथम समयवर्ती नारकीके जघन्य एकान्तसात होता है। जघन्य अनेकान्तसात किसके होता है ? जो जघन्य सूक्ष्म सत्कर्म के साथ त्रसोंमें उत्पन्न हुआ है, वहां प्रथम समयवर्ती तद्भवस्थको आदि करके सचिर काल असाताको बांधता है उस अन्तिम समयवर्ती असातवन्धकके जघन्य अनेकान्तसात होता है। वह भी उस अन्तिम समय रूप असातबन्धको आदि करके सर्वलघु कालमें इकतीस सागरोपम आयुस्थितियुक्त देवगतिको प्राप्त होगा। वहां सबसे महान् और सबसे अधिक सातवेदककाल होंगे। जघन्य एकान्तअसात किसके होता है ? जिसके जघन्य अनेकान्तसात होता है उसीके जघन्य एकान्त- असात कहना चाहिये । विशेप इतना है कि जघन्य असातके साथ त्रसों में उत्पन्न हुआ है और वहां उत्कृष्ट असातवन्धककाल तक उत्कृष्ट बन्ध करके अन्तिम समयवर्ती असातबन्धक हुआ है उसके जघन्य एकान्तअसात होता है । जघन्य अनेकान्तअसात किसके होता है ? वह इसाके होता है- सूक्ष्म योग्य जघन्य असातकर्म के साथ आकर, बसों में उत्पन्न होकर व उत्कृष्ट सातबन्धक काल तक बन्ध करक जो अन्तिम समयवर्ती सातवन्धक हुआ है उसके जघन्य अनेकान्तअसात होता है । वह सर्वलघु कालमें नारक भवको प्राप्त करेगा, वहां पल्योपमपृथक्त्व काल अथवा चिरतर काल तक साता रहित होगा, इसलिये उक्त प्रकारके जीवके उस प्रथम सातबन्धक कालके १ ताप्रती मेयंतसाद' इति पाठः । २ तापती 'समऊग कालं' इति पाठः। ३ अ-काप्रत्योः 'यया. विदिय-' इति पाठः । ४ अ-काप्रत्योः 'नहग्गिया.' इति पाठः। ५ ताप्रती विरवरयं इति पाठः।

सादासादाणियोगद्दारे पदेसग्गपमाणाणुगमो ५०१ सादबंधगद्धाए चरिमसमए जहण्णयमणेयंतअसादं । एवं अभवसिद्धियपाओग्गे सामित्तं गदं । भवसिद्धियपाओग्गे एयंतसादमुक्कस्सयं कस्स ? जो सत्तमादो पुढवीदो सव्वलहुँ मणुसगइमागदो, सव्वलहुं खवणाए अब्भुडिदो, चरिमसमयभवसिद्धियो वि संतो सादवेदगो होहिदि, तस्स चरिमसमयसुहुमसांपराइयस्स उकस्सयमेयंतसादं । उका- स्सयमेयंतमसादं कस्स ? एरिसयस्सेव चरिमभवमणुस्सस्स चरिमे असादधे च चरिम- समयअसादबंधयस्स । सो च पुण चरिमसमयभवसिद्धियट्ठाणे असादवेदओ होदि । उक्कस्सयमणेयंत सादं कस्स ? चरिमसमयभवसिद्धियस्स सादवेदयस्स । उकस्सयमणे- यंतं असादं कस्स १ गुणिदकम्मंसियस्स चरिमसमयभवसिद्धियस्स असादवेदयस्स । जहण्णयाणि' सामित्ताणि जहा अभवसिद्धियस्स तारिसाणि चेव । एवं सामित्तं गदं । पदेसग्गस्स' पमाणाणुगमो- अभवसिद्धियस्स उकस्सं पि एयंतसादं एयंतअसादं वा समयपवद्धस्स असंखेजपलिदोवमवग्गमूलभागो। भवसिद्धियस्स उक्कस्सयमेयंतसादं एयंतअसादं च समयपवद्धा अंतोमुत्तमेत्ता, जवमज्झसमयपवद्धा च अवहारकाल- मेत्ता । एवं पमाणपरूवणा गदा । अन्तिम समयमें जघन्य अनेकान्तअसात होता है। इस प्रकार अभव्यसिद्धिक प्रायोग्यके आश्रयसे स्वामित्वका कथन समाप्त हुआ। भव्यसिद्धिकप्रायोग्यके आश्रयसे उत्कृष्ट एकान्तसात किसके होता है ? जो सातवीं पृथिवीसे सर्वलघु कालमें मनुष्यगतिमें आकर और सर्वलघु कालमें क्षपणामें उद्यत होकर अन्तिम समयवर्ती भव्यसिद्धिक भी होता हुआ सातवेदक होगा उस अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्प. रायिकके उत्कृष्ट एकान्तसात होता है। उत्कृष्ट एकान्तअसात किसके होता है ? वह ऐसे ही अन्तिम भववाले (चरमशरीरी ) मनुष्यके अन्तिम असातवन्धमें अन्तिम समयवर्ती असात- बन्धक होनेपर होता है। वह भी अन्तिम समयवर्ती भव्यसिद्धिक स्थानमें असातवेदक होता है। उत्कृष्ट अनेकान्तसात किसके होता है ? वह सातवेदक अन्तिम समयवर्ती भव्यसिद्धिकके होता है । उत्कृष्ट अनेकान्तअसात किसके होता है ? वह गुणितकमांशिक अन्तिम समयवर्ती भव्यसिद्धिक असातवेदकके होता है । जघन्य स्वामित्व जैसे अभव्यसिद्धिकके कहे गये हैं वैसे ही भव्यसिद्धि के भी हैं । इस प्रकार स्वामित्व समाप्त हुआ। प्रदेशाग्रके प्रमाणानुगमकी प्ररूपणा की जाती है- अभव्यसिद्धिकका उत्कृष्ट एकान्तसात और एकान्तअसात समयप्रवद्धके असंख्यात पल्योपम वर्गमूल प्रमाण है। भव्यसिद्धिकके उत्कृष्ट एकान्तसात और एकान्तअसात समयप्रबद्ध अन्तर्मुहूर्त मात्र हैं। यवमध्यसमयप्रवद्ध अवहारकाल मात्र हैं । प्रमाणप्ररूपणा समाप्त हुई । १ ताप्रती 'जहण्णयावि (णि )' इति पाठः । ३ ताप्रती 'एयंत असादं इति पाठः। २ तातो 'पदेसत्स' इति पाठः ।

५०२ छक्खंडागमे संतकस्म एत्तो अभवसिद्धियपाओग्गे अप्पाबहुअंकायचं । तं जहा- सव्वत्थोषमुकस्सय- मेयंत सादं । एयंतं असादं असंखेजगुणं । अणेयंतं असादं असंखे० गुणं । णिरयगईए तिरिक्खेसु तिरिश्खिणीसु मणुरसेसु मणुस्सिणीसु देवेसु देवीसु एईदिय-बीइंदिय-तीइं दिय-चउरिदिएसु उक्कस्सअप्पाबहुअस्स ओघमंगो। सव्वत्थोवं जहण्णयमेयंतसादं। एयंतअसादमसंखेजगुणं । अणेयंतसादं असंखे. गुणं । अणेयंतअसादं संखे० गुणं । सव्यासु गदीसु सव्वेसु एइंदिएसें ओघभंगो । एवमभवसिद्धियपाओग्गे अप्पाबहुअं समत्तं । भवसिद्धियपाओग्गे उकस्सए अप्पाबहुअं। तं जहा- सव्वत्थोवमुक्कस्सयं एयंतसादं । एयंतअसादं संखेजगुणं । अणेयंतअसादं असंखे० गुणं । अणेयंतसाद विसेसाहियं । णिरयगईए उकस्सयमे यंतसादं थोवं । एयंतअसादं संखेजगुणं । अणेयंतसादम- संखे० गुणं । अणेयंतअसादं संखे० गुणं । मणुसगइवज्जासु सव्यासु गदीसु एइंदिएसु च णिरयगहभंगो। मणुस्सेसु सणुसिणीसु ओघभंगो। जहा अभवसिद्धियपाओग्गे जहण्णयं तहा' भवसिद्धियपाओग्गे वि जहष्णय कायव्वं । यहां अभव्यसिद्धिकप्रायोग्यके आश्रयसे अल्पबहुत्व करते हैं । यथा--- उत्कृष्ट एकान्त- सात सबसे स्तोक है। एकान्तअसात उससे असंख्यातगुणा है। अनेकान्तअसात असंख्यात- गुणा है नरकगतिमें, तिर्यंचोंमें, तिर्यंचनियों में, मनुष्यों में, मनुष्यनियों में, देवों में, देवियों में, तथा एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, नोन्द्रिय व चतुरिन्द्रिय जीवोंमें उत्कृष्ट अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा ओघके समान है। जघन्य एकान्त सात सवसे स्तोक है। एकान्तअसात उससे असंख्यातगुणा है । अनेकान्तसात असंख्यातगुणा है। अनेकान्तअसात संख्यातगुणा है । सब गतियों और सब एकेन्द्रियोंमें जघन्य अल्पबहुत्वको प्ररूपणा ओघके समान है। इस प्रकार अभव्यसिद्धिक प्रायोग्यके आश्रित अल्पवहुत्व समाप्त हुआ। भव्यसिद्धिकप्रायोग्यके आश्रयसे अल्पवहुत्वका कथन करते हैं। वह इस प्रकार है- उत्कृष्ट एकान्तसात सबसे स्तोक है। एकान्तअसात संख्यातगुणा है। अनेकान्तअसात असंख्यातगुणा है। अनेकान्तसात विशेप अधिक है। नरकगतिमें उत्कृष्ट एकान्तसात सबसे स्तोक है। एकान्तअसात संख्यातगुणा है। अनेकान्तसात असंख्यातगुणा है। अनेकान्तअसात संख्यातगुणा है। मनुष्यगतिको छोड़कर शेप सब गतियों में और एकेन्द्रियों में नरकगतिके समान प्ररूपणा है । मनुष्यों और मनुप्यनियों में ओघके समान प्ररूपणा है। जघन्य अल्पवहुत्व जैसे अभव्यसिद्धिकप्रायोग्यके विपयमें किया गया है वैसे ही भव्यसिद्धिक प्रायोग्यके विपयमें भी करना चाहिये। १ ताप्रती 'सतु इंटिएनु' इति पाटः । २ म-कामयोः 'मणुमगाईए' इति पाठः। ३ अप्रती 'तम्हा' इति पाठः।

सादासादाणियोगदारे अप्पाबहुअं ५०३ - एत्तो अट्ठहि पदेहि अप्पाबहुअं कायव्यं । तं जहा- सादत्ताए बद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं जं सादत्ताए वेदिजदि तं थोवं । जं सादत्ताए बद्धं असंछुद्धं अपडि- संछुद्धं असादत्ताए वेदिजदि तं विसेसाहियं । विसेसो पुण संखे० भागो। जमसाद- ताए बद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं सादत्ताए चेदिजदि तं संखेजगुणं । जमसादत्ताए बद्धं असंछुद्धं अपडि संछुद्धं असादत्ताए वेदिदि तं विससाहियं । जं सादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तमसंखेजगुणं । जं सादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडि- संछुद्धं असादादत्ताए वेदिजदि तं विसेसाहियं । जमसादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । जमसादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं असादात्ताए वेदिजदि तं विसेसाहियं । अविपच्चिदासे सव्वासु गदीसु एइंदिएसु च ओघभंगो। अध विपच्चिदे कधं भवदि ? णिरयगदीए समुद्विदं जणिरयगदीए चेव विपच्चदि एदं विपच्चिदं णाम । एदेण अहुपदेण विअंचिदस्स अप्पागहुरं बुच्चदे । तं जहा-णिरयगईए ताव जं यहां आठ पदोंके द्वारा अल्पबहुत्व करते हैं। वह इस प्रकार है-(१) सातस्वरूपसे वांधा गया जो असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होकर सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह स्तोक है। (२)जो सातस्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह विशेष अधिक है । विशेपका प्रमाण उसका संख्यातवां भाग है । (३) जो असात- स्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है । (४) जो असातस्वरूपसे वांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह विशेप अधिक है। (५) जो सातस्वरूपसे वांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह असंख्यातगुणा है। (६) जो सातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह विशेष अधिक है। (७) जो असातस्वरूपसे वांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होकर सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है । (८) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातत्वरूपसे वेदा जाता है वह विशेष अधिक है। अविपच्चित अर्थात् विपाक रहित सब गतियों और एकेन्द्रियों में प्रकृत अल्पबहुत्वको प्ररूपणा आघके समान है। शंका- विपचित में अल्पबहुत्व किस प्रकार है ? समाधान- नरकगति में उत्पन्न हुआ जो नरकगति में ही विपाकको प्राप्त होता है उसका नाम विपच्चित है । इस अर्थपदके अनुसार विपच्चितका अल्पबहुत्व कहते हैं। वह इस प्रकार है- (१) नरकगतिमें जो सातस्वरूपले बांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ १ अ-काप्रत्योः 'अधियंत्रिदासु', ताप्रती अधिवंचिदानु (अविच्चिदानु ) इति पाठः । २ अ. कापत्योः 'विचिदे', ताप्रती 'वियं (पच्चि ) चिदे' इति पाठः। ३ फाप्रती विचदिः इति पाठः। ४ प्रतिपु 'विपंचिदं' इति पाठः ।

५०४ छक्खंडागमें संतकम्स सादत्ताए पद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं सव्वत्थो । जमसादत्ताए वद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखे० गुणं० । जं सादत्ताए पद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं असादत्ताए वेदिजदि तमसंखेजगुणं । जमसादत्ताए बद्धं असंछुद्धमपडिसंछुद्धमसादत्ताए वेदिजदितं संखे० गुणं । जं सादत्ताए वद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखे० गुणं । जं असादत्ताएं बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं सादत्ताएं वेदिजदि तमसंखे० गुणं । जमसादत्ताए पद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धमसादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । जं सादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं असादत्ताए वेदिदि तमसंखे० गुणं । एवं णिरयगईए परूवणा गदा । एत्तो मणुसगदीए विपचिदेणे अप्पाबहुअसाहणत्थं एसी परूवणा करिदे । तं जहा- मणुमगईए असादवेदयद्धा थोवा । सादवंधगद्धा संखेजगुणा । असादवंधगद्धा संखेजगुणा । सादवेदगद्धा संखेजगुणा । जहा मणुमगईए तहा णिरयगईए वजाणं सव्वेसिं तसाणं । एइंदिएसु सादवंधगद्धा सादवेदगद्धा च दो वि तुल्लाओ थोवाओ । असादवेदगद्धा असादबंधगद्धा च दो वि तुल्लाओ असंखेजगुणाओ। सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह सबसे स्तोक है। (२) जो असातस्वरूपसे वांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है । (३) जो सातस्वरूपसे वांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह असंख्यातगुणा है । (४) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (५) जो सातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है । (६) जो असातस्वरूपसे वांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह असंख्यातगुणा है। (७ ) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (८) जो सातस्वरूपसे वांधा जाकर संक्षिप्त च प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह असंख्यातगुणा है। इस प्रकार नरकगति में प्रकृत प्ररूपणा समाप्त हुई। यहां मनुष्यगतिमें विपच्चित स्वरूपसे अल्पबहुत्वको सिद्ध करनेके लिये यह प्ररूपणा की जाती है । यथा- मनुष्यगति में असातवेदककाल स्तोक है । सातबंधककाल संख्यातगुणा है। असातबन्धककाल संख्यातगुणा है। सातवेदककाल संख्यातगुणा है। जिस प्रकार मनुष्य- गतिमें यह क्रम है उसी प्रकार नरकगतिको छोड़कर शेष सब बसों के भी यही क्रम समझना चाहिये । एकेन्द्रियों में सातबन्धककाल और सातवेदककाल दोनों ही तुल्य व स्तोक हैं । असात. वेदककाल और असातवन्धककाल दोनों ही तुल्य व उनसे असंख्यातगुणे हैं। १ अ-काप्रत्योः 'सादत्ताए', ताप्रती [अ-] सादत्ताए' इति पाठः । २ तामती [अ] सादत्तार', मप्रती 'सादत्ताए' इति पाठः। ३ अ-काप्रत्योनोपलभ्यते वाक्यमेतत् । ४ अप्रती अंचिदेण, का-ताप्रत्याः 'विचित्रण' इति पाठः । ५ लापती 'अप्पाबनं साहणाथमेमा' इति पाठः । ६ अप्रती 'घसादयधगद्रा' इति पाठः । ७ अप्रती 'सादधगद्धा' इति पाठः। ८ ताप्रती गिरगहना, इति पाठः। .

सादासादाणियोगद्दारे अप्पाबहुअं ५०५ एदेण अट्ठपदेण मणुसगईए ताव अप्पाबहुअं। तं जहा- सादत्ताए बद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं असादत्ताए जं' वेदिजदि तं थोवं । जमसादत्ताए वद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं असादत्ताए वेदिञ्जदि तं संखेजगुणं । जं सादत्ताए बद्धं असंछुद्धं अपडि- संछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । असादत्ताए जं बद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । सादत्ताए जं बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं असादत्ताए वेदिजदि तमसंखेजगुणं । जमसादत्ताए पद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं असादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । सादत्ताए पद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । जमसादत्ताए पद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । जहा मणुस्सेसु तहा मणुसिणीसु पंचिंदियतिरिक्खेिसु तिरिक्खिणीसु देवेसु देवीसु च कायव्वं । एइंदिएसु विपचिदेण- जं सादत्ताए बद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं थोवं । ज सादत्ताए बद्धं अमंछुद्धं अपडिसंद्धं असादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । असादत्ताए पद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं जं सादत्ताए वेदिजदि [तं ] तत्तियं चेव । जमसादत्ताए पद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं असादत्ताए इस अर्थपदके अनुसार मनुष्यगतिमें अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा की जाती है । यथा- (१) जो सातस्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह स्तोक है। (२) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होकर असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (३) जो सातस्वरूपसे वांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होकर सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (४) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है । (५) जो सातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह असंख्यातगुणा है। (६) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (७) जो सातस्वरूपसे वांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (८) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। जिस प्रकार मनुष्योंमें अल्पबहुत्व किया गया है उसी प्रकार मनुष्यनियों, पंचेन्द्रिय तिर्यंचों, तिर्यचनियों, देवों और देवियों में भी करना चाहिये। एकेन्द्रियों में विपश्चितस्वरूपसे उक्त अल्पवहुत्वको प्ररूपणा की जाती है- (१) जो सातस्वरूपसे वांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रति- संक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह स्तोक है। (२) जो सातस्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (३) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह उतना ही है । (४) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त १ तापतो 'ज' इत्येतत्पदं नास्ति । २ प्रतिषु 'विचिदेग' इति पाठः । ३ अप्रती 'जा' इति पाठः । छ. से, ६४ ५०६ छक्खंडागमे संतकम्म वेदिजदि तं संखेजगुणं । जं सादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तमसंखेजगुणं । जं सादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्ध असादत्ताए वेदिञ्जदि तं संखेज- गुणं । जमसादत्ताए पद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं तत्तियं चेव । जमसादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं असादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । बेइंदिएसु विपच्चिदेण'। तं जहा- सादत्ताए पद्धं संछुद्धं पढिसंछुद्धं असादत्ताए वेदिदि तं थोवं । जमसादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं असादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । जं सादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । जमयादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । जं सादत्ताए बद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं असादत्ताए वेदिजदि तमसंखेजगुणं । जमसादत्ताए पद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं असादत्ताए वेदिञ्जदि तं संखेजगुणं । जं सादत्ताए बद्धं असंछुद्धं अपडिसंछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । जमसादत्ताए बद्धं असंछुद्धं अपडि- संछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं । जहा बीइंदिएसु तहा तीइंदिएसु चउरि- दिएसु च । एवं सादासादे त्ति समत्तमणियोगदारं । होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (५)जो सातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातखरूपसे वेदा जाता है वह असंख्यातगुणा है । (६) जो सातस्वरूपसे वांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (७) जो असातस्वरूपसे वांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह उतना मात्र ही है। (८) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। द्वीन्द्रियोंमें विपच्चितस्वरूपसे अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा इस प्रकार है- (१) जो सात- स्वरूपसे वांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह स्तोक है । (२) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (३) जो सातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपले वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (४) जो असातस्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त व प्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है । (५) जो सातस्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह असंख्यातगुणा है। (६) जो असातस्वरूपसे वांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रति- संक्षिप्त होता हुआ असातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (७ ) जो सातस्वरूपसे चांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होकर सातखरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। (८) जो असातस्वरूपसे वांधा जाकर असंक्षिप्त व अप्रतिसंक्षिप्त होता हुआ सातस्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। जिस प्रकार द्वीन्द्रियों में यह प्ररूपणा की गयी है उसी प्रका त्रीन्द्रियों और चतुरिन्द्रियों में भी समझना चाहिये । इस प्रकार सातासात यह अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। १ प्रतियु 'विचिदेण' इति पाटः । २ का-ताप्रत्योः 'तीइंदिय-च उरिदिएमु एवं इति पाठः। ।

दीह-रहस्साणियोगदारं संभवमरणविवजियमहिवंदिय संभवं पयत्तेणे । दीह-रहस्सणियोगं वोच्छामि जहाणुपुबीए ॥१॥ दीह-रहस्से ति अणियोगद्दारं भण्णमाणे तत्थ दीहं चउन्विहं पयडिदीहं ठिदिदीहं अणुभागदीहं पदेसदीहं चेदि । तत्थ पडिदीहं दुविहं मूलपयडिदोहं उत्तरपयडिदीहं चेदि । तत्थ मूलपयडिदीहं दुविहं पयडिहाणदीहं एगेगपयडिट्ठाणदीहं चेदि । तत्थ पयडिट्ठाणं पडुच्च अस्थि दीहं । तं जहा-- अट्ठसु पयडीसु बज्झमाणियासु पयडिदीहं, तदूणासु वज्झमाणियासु णोपयडिदीहं । संतं पडुच्च अट्ठसु पयडीसु संतासु पयदिदीहं, तणासु णोपयडिदीहं । उदयं पडुच्च अट्ठसु पयडीसु उदिण्णासु पयडिदीहं, तदूणासु णोपयडि- दीहं । एगेगपयडिं पडुच्च णत्थि पयडिदीहं । उत्तरपयडीसु पंचणाणावरणीय-पर्चतराइयाणं णत्यि पयडिदीहं । दसणा- वरणीयस्स णव पयडीयो बंधमाणस्स अस्थि पयडिदीहं, तदूर्ण बंधमाणस्स णत्थि पयडि- दीहं । एवं संतोदयमस्सिदूण वि वत्तव्यं । वेयणीयस्स बंधोदयमस्सिदूण णस्थि पयडिदीहं । संतं पडुच्च अस्थि, अजोगिचरिमसमए एयपयडिसंतं पेक्खिदूण तस्सेव जन्म और मरणसे रहित ऐसे सम्भव जिनेन्द्रकी वन्दना करके प्रयत्नपूर्वक आनुपूर्वीके अनुसार दीर्घ-हस्वानुयोगद्वारको प्ररूपणा करता हूं ॥१॥ दीर्घ-हस्वानुयोगद्वारका कथन करने में वहां दीर्घ चार प्रकारका है-प्रकृतिदीर्घ, स्थितिदीर्घ, अनुभागदीर्घ और प्रदेशदीर्घ । उनमें प्रकृतिदीर्घके दो भेद हैं- मूलप्रकृतिदीर्घ और उत्तर- प्रकृतिदीर्घ । इनमें मूलप्रकृतिदीर्घ दो प्रकारका है- प्रकृतिस्थानदीर्घ और एक-एकप्रकृतिस्थान- दीर्घ। उनमें प्रकृतिस्थानकी अपेक्षा दीर्घ सम्भव है। वह इस प्रकारसे- आठ प्रकृतियोंका वन्ध होनेपर प्रकृतिदोघे और उनसे कमका वन्ध होनेपर नोप्रकृतिदीर्घ होता है। सत्त्वकी अपेक्षा आठ प्रकृतियांके सत्त्वके होनेपर प्रकृतिदीर्घ और उनसे कमका सत्त्व होनेपर नोप्रकृति- दीर्घ होता है। उदयकी अपेक्षा आठ प्रकृतियोंके उदीणे होनेपर प्रकृतिदीर्घ और उनसे कमके उदीणे होनेपर नोप्रकृतिदीर्घ होता है । एक एक प्रकृतिको अपेक्षा प्रकृतिदीर्घ सम्भव नहीं है। उत्तर प्रकृतियों में पांच ज्ञानावरण और पांच अन्तराय प्रकृतियों में प्रकृतिदीर्घ सम्भव नहीं है। दर्शनावरणको नौ प्रकृतियांको बांधनेवाले के प्रकृतिदीर्घ है, उनसे कम वांधनेवालेके प्रकृतिदोघे नहीं है। इसी प्रकारसे इनके सत्त्व और उदयका आश्रय करके भी कथन करना चाहिये। वेदनीयके वन्ध और उदयका आश्रय करके प्रकृतिदीर्घ नहीं है। सत्त्वकी अपेक्षा उसकी सम्भावना है, क्योंकि, अयोगकेवलीके अन्तिम समयमें एक प्रकृतिके सत्त्वकी अपेक्षा १ तापती 'पत्तएग' इति पाठः। २ ताप्रती तत्थमपडिद्धाणं अत्यि' इति पाठः।

छक्खंडागमे संतकम्म दुचरिमादिसमएसु दोपयडिसंतस्स दीहत्तुवलंभादो। मोहणीयस्स संतं पडुच्च अट्ठावीस- पयडीयो पयडिदीहं, तदूर्ण णोपयडिदीहं। बंधं पडुच्चे यावीस पयडीयो बंधमाणस्स पयडिदीहं, तदूर्ण बंधमाणस्स णोपयडिदीहं । उदयं पडुच्च दस पयडीयो पयडिदीह, तदूर्ण णोपयडिदीहं। आउअस्स बंधोदयं पडुच णत्थि पयडिदीहं। संतं पड्डुच्च अस्थि, परभवियाउए बद्धे दोणं पयडीणं संतदंसणादो । णामस्स एकत्तीसपयडीओ बंधोदयं पड्डच्च पयडिदीहं, तदूर्ण णोपयडिदीहं । संतं पडुच्च तिणउदिपयडीयो पयडिदीह, तदूर्ण णोषयडिदीहं । गोदस्स बंधोदयं पडुच्च णत्थि पयडिदीहं। संतं पडुच्च अस्थि, अजोगिचरिमसमए पयडिसंतं पेक्खिदूण दुचरिमादिसमयसंतस्स दीहत्तुवलंभादो । एवं पयडिदीहं समत्तं । ठिदिदीहं दुविहं मूलपयडिविदिदीहं उत्तरपयडिद्विदिदीहं चेदि । तत्थ मूलपयडि- द्विदिदीहं बुच्चदे । तं जहा-णाणावरण-दंसणावरण-वेयणीय-अंतराइयाणं तीसंसागरो- वमकोडाकोडीयो बंधमाणस्स विदिदीहं, तणं बंधमाणस्स णोडिदिदीहं । मोहणीयस्स सत्चरिसागरोवम कोडाकोडीयो बंधमाणस्स द्विदिदीहं, तदणं बंधमाणस्स णोडिदिदीहं । आउअस्स तेत्तीसंसागरोवमाणि बंधमाणस्स विदिदीहं, तदूर्ण बंधमाणस्स णोडिदिदीहं । उसीके द्विचरम-त्रिचरम आदि समयों में वेदनीयकी दो प्रकृतियों के सत्त्वकी दीर्घता पायी जाती है । मोहनीयके सत्त्वकी अपेक्षा अट्ठाईस प्रकृतियोंकी सत्तावालेके प्रकृतिदीर्घ है, उनसे कमकी सत्तावाले के नोप्रकृतिदीर्घ है। बन्धकी अपेक्षा बाईस प्रकृतियोंको बांधनेवाले के प्रकृतिदीर्घ है, उनसे कमको बांधनेवाले के नोप्रकृतिदीर्घ है। उदयकी अपेक्षा दस प्रकृतियोंके उदयबालेके प्रकृतिदीर्घ है, उनसे कम उदयवाले के नोप्रकृतिदीर्घ है। आयु कर्मके बन्ध और उदयकी अपेक्षा प्रकृतिदीर्घ नहीं है। किन्तु सत्त्वकी अपेक्षा है, क्योंकि, परर्भावक आयुका वन्ध होनेपर दो आयु प्रकृतियोंका सत्त्व देखा जाता है। नामकर्मकी इकतीस प्रकृतियोंके बन्ध और उदयकी अपेक्षा प्रकृतिदीर्घ है, उनसे कमका वन्ध व उदय होनेपर नोप्रकृतिदीर्घ है । सत्त्वको अपेक्षा तेरानवै प्रकृतियोंकी सत्तावाले के प्रकृतिदीर्घ है, उनसे कमकी सत्तावाले के नोप्रकृतिदीर्घ है। गोत्र के वन्ध और उदयकी अपेक्षा प्रकृतिदीर्घ नहीं है। किन्तु सत्त्वकी अपेक्षा उसके प्रकृतिदीर्घ है, क्योंकि, अयोगकेवलीके अन्तिम समय सम्बन्धी प्रकृति- सत्त्वकी अपेक्षा करके द्विचरम आदि समय सम्वन्धी सत्त्वके दीर्घता पायी जाती है । इस प्रकार प्रकृतिदीर्घ समाप्त हुआ। स्थितिदीर्घ दो प्रकारका है- मूलप्रकृतिस्थितिदीर्घ और उत्तरप्रकृतिस्थितिदीर्घ । उन में मूल- प्रकृतिस्थितिदीर्घकी प्ररूपणा करते हैं। यथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अन्तराय; इनकी तीस कोड़ाकोडि सागरोपम प्रमाण स्थितिको बांधनेवाले स्थितिदीर्घ है, उससे कम स्थितिको यांधनेवालेके नोस्थितिदीर्घ है । मोहनीयकी सत्तर कोड़ाकोडि सागरोपम स्थितिको बांधनेवालेके स्थितिदीर्घ है, उससे कम वांधनेवाले के नोस्थितिदीर्घ है। आयुको तेतीस सागरोपम स्थिनिको वांधनेवाले के स्थितिदीर्घ है, उससे कम स्थितिको बांधनेवालेके नोस्थितिदीर्घ है। नाम व गोत्रकी १ अप्रती 'आउअत्स बंघोदय पडुच्च' इति पाठः ।

दोह-रहस्साणियोगदारे पयडिरहस्सं ५०९ णामा-गोदाणं वीसंसागरोवमकोडाकोडीयो बंधमाणस्स द्विदिदीह, तदृणं बंधमाणस्स णोद्विदिदीहं । एवमुत्तरपयडीणं पि जाणिण विदिदीहपरूवणा कायव्या । अप्पप्पणो उकस्साणुभागहाणाणि बंधमाणस्स अणुभागदीहं, तदणं बंधमाणस्स णोअणुभागदीहं । सव्यासिं पयडीणं सग-सगपाओग्गउकस्सपदेसे बंधमाणस्स पदेस- दीहं, तदूर्ण बंधमाणस्स णोपदेसदीहं । एवं दीहं ति समत्तं । रहस्से पयर्द-तं चउबिहं पयडिरहस्सं ट्ठिदिरहस्सं अणुभागरहस्सं पदेसरहस्सं चेदि । तत्थ पयडिरहस्सं दुविहं मूलपयडिरहरसं उत्तरपयडिरहस्सं चेदि । मूलपयडि- रहस्सं दुविहं पयडिट्ठाणरहस्सं एगेगपयडिरहस्सं चेदि । पयडिट्ठाणे अस्थि रहस्सं । तं जहा- एगेगपयडिं बंधमाणस्स पयडिरहस्सं, तदुवरि बंधमाणस्स णोपयडिरहस्सं । संतं पडुच्च चत्तारिसंतकम्मियस्स पयडिरहस्सं, तदुवरि णोपयडिरहस्सं । एगेगपयडि- रहस्सं णत्थि । उत्तरपयडीसु पयदं-पंचणाणावरण-पंचतराइयाणं णत्थि पयडिरहस्सं । दंसणावरणीए चत्तारि पयडीयो बंधमाणस्स पयडिरहस्सं, तदुवरि बंधमाणस्स णोपयडिरहस्सं । मोहणीए एयं बंधमाणस्स पयडिरहस्सं, तदुवरि णोपयडिरहस्सं । आउअस्स बंधं पडुच्च पयडिरहस्सं णस्थि, दोण्णमाउआणमक्कमेण बंधाभावादो । संतं पड्डुच्च अस्थि पयडिरहस्सं, अवद्धपरभवियाउअम्मि एकस्स चेव आउँअस्स उवलंभादो। वीस कोडाकोडि सागरोपम स्थितिको बांधनेवालेके स्थितिदीर्घ है, उससे कम वांधनेवाले के नो- स्थितिदीर्घ है। इसी प्रकार उत्तर प्रकृतियों के भी स्थितिदीर्घकी प्ररूपणा जानकर करना चाहिये। अपने अपने उत्कृष्ट अनुभागस्थानोंको वांधनेवाले के अनुभागदीर्घ है, उनसे कम बांधने- वाले के नोअनुभागदीर्घ है। सब प्रकृतियों के अपने अपने योग्य प्रदेशोंको बांधनेवालेके प्रदेशदीर्घ है, उससे कम बांधनेवालेके नोप्रदेशदीर्घ है । इस प्रकार दीघका कथन समाप्त हुआ ! ह्रस्वका प्रकरण है- वह प्रकृतिहख, स्थितिहस्व, अनुभागहस्व और प्रदेशहस्तके भेदसे चार प्रकारका है। उनमें प्रकृतिहस्व दो प्रकारका है- मूलप्रकृतिह्रस्व और उत्तरप्रकृतिहस्व । मूल- प्रकृतिहस्व दो प्रकारका है- प्रकृतिस्थानहस्व और एक-एकप्रकृतिहख । प्रकृतिस्थानमें हस्ख है। यथा- एक एक प्रकृतिको वांधनेवाले के प्रकृतिहस्व है, उससे अधिक चांधनेवालेके नोप्रकृतिहस्व है। सत्त्वकी अपेक्षा चार कर्मोकी सत्तावालेके प्रकृतिहत्व है, उनसे अधिक प्रकृतियोंकी सत्तावालेके नोप्रकृतिहस्व है। एक-एकप्रकृतिद्वस्व नहीं है। उत्तर प्रकृतियोंका प्रकरण है-पांच ज्ञानावरण और पांच अन्तराय प्रकृतियों के प्रकृति- हस्व नहीं है। दर्शनावरणकी चार प्रकृतियोंको वांधनेवाले के प्रकृतिहस्व है, उनसे अधिक वांधनेवालेके नोप्रकृतिहस्व है। मोहनीयकी एक प्रकृतिको बांधनेवाले के प्रकृतिहस्व है, अधिक बांधनेवालेके नोप्रकृतिहस्व है। आयुके बन्धकी अपेक्षा प्रकृतिह्रस्व नहीं है, क्योंकि, आयुकी दो प्रकृतियोंका युगपत् वन्ध सम्भव नहीं है। सत्त्वकी अपेक्षा प्रकृतिहस्त्र सम्भव है, क्योंकि, १ तामती 'पदेस'इति पाठः । २ अ-काप्रत्यो 'पर्य' इति पाठः । ३ ताप्रती 'वद्ध-' इति पाठः । - छक्खंडागमे संतकम्म णामस्स जसकित्ति बंधमाणस्स पयडिरहस्सं, तदुवरि णोपयडिरहस्सं । गोद-वेयणीयाणं बंधं पडुच्च णत्थि पडिरहस्सं, उच्च-णीचागोदाणं सादासादवेदणीयाणं च अकमेण बंधाभावादो। एवं पडिरहस्सं गदं। हिदिरहस्सं दुविहं मूलपयडिहिदिरहस्सं उत्तरपयडिडिदिरहस्सं चेदि । तत्थ मूलपयडिडिदिरहस्से चे पयदं- णाणावरणीय-दसणावरणयी-मोहणीय-आउअ-अंत- राइयाणं अंतोमुहुत्तहिदि बंधमाणस्स द्विदिरहस्सं, तदुवरि बंधमाणस्स गोडिदिरहस्सं । वेदणीयस्स बारसमुहुत्तं द्विदिं बंधमाणस्स द्विदिरहस्सं, तदुवरि णोद्विदिरहस्सं । णामा-गोदाणमट्ठमुहुत्तं द्विदिं बंधमाणस्स विदिरहस्सं, तदुवरि णोडिदिरहस्सं । संत पडुच्च सव्वासिं पयडीणमेयट्ठिदिसंतकम्मस्स हिदिरहस्सं, तदुवरि णोद्विदिरहस्सं । उत्तरपयडीसु पयर्ड-बंधं पडच द्विदिरहस्से भण्णमाणे जहा जीवट्ठाणचूलियाए उत्तरपयडीणं जहणद्विदिपरूवणा कदा तहा कायव्या । संपहि संतं पडुच्च पुच्चदे । तं जहा- पंचणाणावरणीय - णवदंसणावरणीय - सादासाद - सम्मत्त-मिच्छत्त-सम्मा- परभविक आयुके वन्धसे रहित जीवके एक ही आयुका सत्त्व पाया जाता है। नामकमकी यशकीर्तिको बांधनेवाले के प्रकृतिहस्व है, उससे अधिक बांधनेवाले के नोप्रकृतिहस्व है । गोत्र और वेदनीय कमों के बन्धकी अपेक्षा प्रकृतिहख नहीं है, क्योंकि, उच्च व नीच गोत्रोंका तथा साता व असाता वेदनीयोंका युगपत् बन्ध सम्भव नहीं है । इस प्रकार प्रकृतिह्रस्व समाप्त हुआ। स्थितिह्रस्व दो प्रकारका है- मूलप्रकृतिस्थितिहस्व और उत्तरप्रकृतिस्थितिह्रस्व । इनमें मूलप्रकृतिस्थितिह्रस्वका प्रकरण है- ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय, आयु और अन्त- रायकी अन्तर्मुहूर्त स्थितिको बांधनेवाले के स्थितिहख है; इससे अधिक स्थितिको बांधने- वालेके नोस्थितिहस्व है। वेदनीयकी बारह मुहूर्त मात्र स्थितिको वांधनेवालेके स्थितिहस्व है, उससे अधिक स्थितिको बांधनेवालेके नोस्थितिहस्व है। नाम और गोत्रकी आठ मुहूर्त मात्र स्थितिको बांधनेवालेके स्थितिहस्य है, उससे अधिक बांधनेवाले के नोस्थितिहख है। सत्त्वको अपेक्षा सब प्रकृतियोंके एक स्थितिसत्कर्म सहितक स्थितिहस्व है, उससे अधिक सत्कर्मवालेके नोस्थितिहस्व है। उत्तर प्रकृतियोंका प्रकरण है- वन्धकी अपेक्षा स्थितिहस्वका कथन करनेपर जैसे जीव- स्थानकी चूलिकामें उत्तर प्रकृतियोंकी जघन्य स्थितिका कथन किया गया है वैसे ही यहां उसका कथन करना चाहिये। अब सत्त्वकी अपेक्षा स्थितिहस्वका कथन करते हैं। यथा- पांच ज्ञानावरणीय, नो दर्शनावरणीय, साता व असाता वेदनीय, सम्यक्त मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, तेरह कपाय, १ ताप्रती रहत्सेहच' इति पाठः । २ प्रतियु 'तं' इति पाठः। ३ प्रतियु 'सतकम्मं सेसहिदिरहस' इति पाठः ।

दीह-रहस्साणियोगद्दारे अणुभागरहस्सं मिच्छत्त-तेरसकसाय-इत्थि-णqसयवेद-चत्तारिआउअ-सवणामपयडि- णीचुचागोद-पंच- तराइयाणमेया द्विदी ट्ठिदिरहस्सं, तदुवरि णोडिदिरहस्सं । कोधसंजलणाए अंतोमुहुत्तूण- वेमासा हिदिरहस्सं, तदुवरि णोडिदिरहस्सं । माणसंजलणाए अंतोमुत्तणमासो द्विदि- रहस्सं । मायासंजलणाए पक्खो देसूणो द्विदिरहस्सं। पुरिसवेदस्स अट्ठवासा देसूणा हिदिरहस्सं । तदुवरि णोडिदिरहस्सं । छण्णोकसायाणं संखेन्जाणि वस्साणि हिदिरहस्सं, तदुवरि णोडिदिरहस्सं । एवं द्विदिरहस्से ति समत्तं । अणुभागरहस्से पयदं । तं जहा- सव्यासि पयडीणं अप्पप्पणो जहण्णाणुभागहाणं बंधमाणस्स अणुभागरहस्स, तदुवरि बंधमाणस्स णोअणुभागरहस्सं । पदेसरहस्से पयदं । तं जहा- सव्यासि पयडीणं सग-सगजहण्णपदेसे बंधमाणस्स पदेसरहस्सं । संत' पडुच्च खविदकम्मंसियलक्खणेणागतूण गुणसेडिणिजरं काऊण सवजहण्णीकयपदेसस्स पदेसरहस्सं, तदुवरि णोपदेसरहस्सं । एवं दोह-रहस्से त्ति समत्तमणियोगद्दारं। स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, चार आयु, सब नामप्रकृतियां, नीच व उच्च गोत्र तथा पांच अन्तराय; इनकी एक स्थिति स्थितिहख है, उससे अधिक नोस्थितिहख है। संज्वलन क्रोधकी अन्तर्मुहूर्त कम दो मास स्थिति स्थितिहस्व है, उससे अधिक नोस्थितिहख है। संज्वलन मानकी अन्तर्मुहूर्त कम एक मास स्थिति स्थितिहस्व है। संज्वलन मायाकी कुछ कम एक पक्ष स्थिति स्थितिहस्व है। पुरुपवेदकी कुछ कम आठ वर्ष स्थिति स्थितिहस्व है। उससे अधिक स्थिति नोस्थितिहख है। छह नोकपायोंकी संख्यात वर्प स्थिति स्थितिहस्व है, उससे अधिक स्थिति नोस्थितिहस्व है। इस प्रकार स्थितिहस्व समाप्त हुआ। अनुभागह्रस्वका प्रकरण है। यथा- सब प्रकृतियोंके अपने अपने जघन्य अनुभाग- स्थानको बांधनेवालेके अनुभागहस्व है, उससे अधिक अनुभागस्थानको बांधनेवाले के नोअनुभागह्रस्व है। प्रदेशहस्व अधिकारप्राप्त है। यथा- सब प्रकृतियों के अपने अपने जघन्य प्रदेशको बांधनेवालेके प्रदेशहस्व है। सत्त्वकी अपेक्षा क्षपितकर्माशिक स्वरूपसे आकर गुणश्रेणि- निर्जराको फरके जिसने प्रदेशको सबसे जघन्य कर लिया है उसके प्रदेशह्रस्व है, उससे अधिकके नोप्रदेशहस्व है। इस प्रकार दीर्घ-हस्व यह अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। १ प्रतियु 'तं' इति पाठः। म १८ भवधारणीयाणियोगदारं तिहुवणसुरिंदबंदियमहिबंदिय तिहुवणाहियं सुमदि। भवधारणीयममलं अणियोगं वण्णइस्लामो ॥१॥ भवसंधारणदाएँ ति अणियोगद्दारे अत्थि भयो तिविहो । तं जहा- ओघभयो आदेसभवो भवग्गहणभवो चेदि । तत्थ ओघभवो णाम अट्टकम्माणि अट्ठकम्मजणिद- जीवपरिणामो वा । आदेसभवो णाम चत्तारि गइणामाणि तेहिं जणिदजीवपरिणामो वा । सो आदेसभवो चउबिहो णिरयभवो तिरिक्खभवो मणुसभवो देवभवो चेदि । भवग्गहणभवो णाम गलिदभुञ्जमाणाउअस्स उदिण्णअपुल्याउकम्मस्स पढमसमए उप्पण्ण- जीवपरिणामो बंजणसण्णिदो पुब्बसरीरपरिचाएण उत्तरसरीरगहणं वा भवग्णहणभवो णाम । तत्थ भवग्गहणभवेण पयदं-कधममुत्तस्स जीवस्स मुत्तेण सरीरेण सह बंधो ण एस दोसो, मुत्तट्टकम्मजणिदसरीरेण अणाइणा संबद्धस्स जीवस्सं संसारावस्थाए सव्वकालं तत्तो अपुधभूदस्स तस्संबंधेणं मुत्तभावमुवगयस्स सरीरेण सह तीन लोकके देवों व इन्द्रों वन्दित ऐसे तीन लोकके स्वामी सुमति जिनेन्द्रकी वन्दना करके निर्मल भवधारणीय नामक अनुयोगद्वारका वर्णन करते हैं ॥१॥ 'भवसंधारणता' इस अनुयोगद्वार में भव तीन प्रकारका है । यथा- ओघभव, आदेशभव और भवग्रहणभव । इनमें आठ कर्मों अथवा आठ कर्मजनित जीवके परिणामका नाम ओघभव है। चार गतिनामकर्मों और उनसे उत्पन्न जीवपरिणामको आदेशभव कहते हैं। वह आदेश- भव चार प्रकारका है- नरकभव, तिर्यंचभव, मनुष्यभव और देवभव । भुज्यमान आयुको निर्जीर्ण करके जिसके अपूर्व आयु कम उदयको प्राप्त हुआ है उसके प्रथम समय में उत्पन्न 'व्यंजन' संज्ञावाले जीवपरिणामको, अथवा पूर्व शरीरके परित्यागपूर्वक उत्तर शरीरके ग्रहण करनेको भवग्रहणभव कहा जाता है। उनमें यहां भवग्रहणभव प्रकरणप्राप्त है- शंका- अमूर्त जीवका मूर्त शरीरके साथ कैसे बन्ध होता है ? समाधान- यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, मूर्त आठ कर्मजनित अनादि शरीरसे संबद्ध जीव संसार अवस्थामें सदा काल उससे अपृथक रहता है। अतएव उसके सम्बन्धसे मूर्तभावको प्राप्त हुए जीवके शरीरके साथ सम्बन्ध होने में कोई विरोध नहीं है। १ अ-काप्रत्योः 'तुमहिं' इति पाटः । २ अ-काप्रत्योः भववारणीय-', ताप्रती 'भक्या (घा) रणीय-' इति पाठः। ३ अ-काप्रत्योः 'भवसंवारणदाए', ताप्रती 'भवसंवा (घा) रणदाए' इति पाठः । ४ मप्रतिपाटोऽयम् । अ-काप्रत्योः 'अगाइणा अगाणा', ताप्रती 'भगाहणा [ गाइगा ) इति पाठः । ५ तामती 'जीवत्स' इत्येतत्पदं नोपलभ्यते । ६ प्रति 'तरस घेग' इति पाटः । - भवधारणीयाणियोगदारे भवधारयपरूवणा ५१३ 3 संबंधस्स विरोहाभावादो। कदमेण धारिजदि १ कम्मेण धारिजदि । कुदो १ अण्णस्सा- संभवादो। तत्थ णाणावरण-दंसणावरण-वेयणीय-मोहणीय-णामा-गोद-अंतराइएहि णो धारिजदि, तेसिमण्णत्थ वावारुचलंभादो। केण पुण धारिजदि ? आउएणेक्केण चेव धारिजदि, अण्णहा आउअकम्मस्स वज्जियकजस्स अभावप्पसंगादो। कघमण्णत्तो उप्पण्णकजस्स अण्णं धारयं ? ण एस दोसो, वट्टीदो समुप्पण्णपईवस्स तेल्लेणं धारिजमाणस्स उवलंभादो। इहभविएण आउएण धरेदि भवं, ण परभविएणे त्ति भावत्यो। जेण पदेसग्गेण भवं धारेदि तस्स पदेसग्गस पदमीमांसा सामित्तमप्पाबहुगं च जहा वेवणाए परूविदं तहा परूवेयव्यं । एवं भवधारणीए त्ति समत्तमणियोगदारं । शंका-किसके द्वारा वह धारण किया जाता है ? समाधान- कर्मके द्वारा धारण किया जाता है, क्योंकि, अन्यकी सम्भावना नहीं है। उसमें ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, नाम, गोत्र और अन्तरायके द्वारा तो वह धारण नहीं किया जाता है; क्योंकि, इनका व्यापार अन्य कार्यों में पाया जाता है। शंका- तो फिर वह किसके द्वारा धारण किया जाता है ? समाधान- वह केवल एक आयु कर्मके द्वारा धारण किया जाता है। कारण कि इसके विना आयु कर्मका अन्य कार्य न रहनेसे उसके अभावका प्रसंग प्राप्त होता है। शंका-अन्यके निमित्तसे उत्पन्न कार्यका अन्य धारक कैसे हो सकता है ? समाधान- यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, वत्तीसे उत्पन्न प्रदीप तेलके द्वारा धारण किया जानेवाला देखा जाता है। भावार्थ यह है कि इस भव सम्बन्धी आयु कर्म के द्वारा भव धारण किया जाता है, पर- भव सम्बन्धी आयु कर्म के द्वारा नहीं धारण किया जाता । जिस प्रदेशाग्रके द्वारा भवको धारण करता है उस प्रदेशाग्र सम्बन्धी पदमीमांसा, स्वामित्व और अल्पवहुत्वकी प्ररूपणा जैसे वेदना अनुयोगद्वार में की गयी है वैसे करना चाहिये । इस प्रकार भवधारणीय यह अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। १ अ-काप्रत्योः 'कदमेण वारिजदि', ताप्रती 'कदमेण वा (घा) रिजदि' इति पाठः । २ अ-कामत्योः 'वारिज्जदि', तापतौ वा (धा) रिजदि' इति पाठः। ३ 'अ-कापत्योः 'कथमणंतो', ताप्रती 'कथमण्णतो (मण्णदो)' इति पाठः। ४ ताप्रती वटी (ही) दो' इति पाठः । ५ अ-काप्रत्योः तुल्लेण', ताप्रती 'तु (ते) ल्लेण' इति पाठः ।

१६ पोग्गल-अत्ताणियोगदारं पउमदलगभगउरं देवं पउमप्पहं णमंसित्ता। पोग्गलअत्तणिओअं समासदो वण्णइसामो ॥१॥ पोग्गल-अत्ते त्ति अणियोगद्दारे पोग्गलो णिक्खिविदव्यो । तं जहा- णामपोग्गलो ढवणपोग्गलो दव्यपोग्गलो भावपोग्गलो चेदि चउनिहो पोग्गलो । णाम-ढवणा- पोग्गला सुगमा। दव्यपोग्गलो आगम-णोआगमदव्यपोग्गलभेदेण दुविहो । आगमपोग्गलो सुगमो। णोआगमपोग्गलो तिविहो जाणुगसरीर-भविय-तव्यदिरित्तं चेदि । जाणुग- सरीर-भवियं गदं । तव्यदिरित्तपोग्गलो थप्पो । भावपोग्गलो दुविहो आगम-णोआगम- भावपोग्गलभेएण । आगमो सुगमो । णोआगमभावपोग्गलो रूब-रस-गंध-फासादिभेएण अणेयविहो । तत्थ णोआगमतव्यदिरित्तदव्यपोग्गले पयदं । णेगमणयस्स बत्तव्यएण सम्बदव्वं पोग्गलो । आतंणाम गृहीतम् । आत्ताः गृहीताः आत्मसात्कृताः पुद्गलाः पुद्गलात्ताः । ते च पुद्गलाः पड्भिः प्रकारात्मसात् क्रियन्ते । तं जहा- गहणदो परिणामदो उवभोगदो आहारदो ममत्तीदो परिग्गहादो पद्मपत्रके गर्भके समान गौर वर्णवाले पद्मप्रभ जिनेन्द्रको नमस्कार करके पुद्गलात्त अनुयोगद्वारका संक्षेपसे वर्णन करते हैं ॥१॥ 'पुद्गलात्त' इस अनुयोगद्वार में पुद्गलका निक्षेप किया जाता है । यथा- नामपुद्गल, स्थापनापुद्गल, द्रव्यपुद्गल और भावपुद्गलके भेदसे पुद्गल चार प्रकारका है। इनमें नाम- पुद्गल और स्थापनापुद्गल सुगम हैं। द्रव्यपुद्गल आगमद्रव्यपुद्गल और नोआगमद्रव्य- पुद्गलके भेदसे दो प्रकारका है। आगमद्रव्यपुद्गल सुगम है । नोआगमद्रव्यपुद्गल तीन प्रकारका है- ज्ञायकशरीर, भावी और तद्व्यतिरिक्त। ज्ञायकशरीर और भावी अवगत हैं। तव्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यपुद्लगको अभी छोड़ते हैं। आगम और नोआगम भावपुद्गरफे भेदसं भावपुद्गल दो प्रकारका है। उनमें आगमभावयुद्गल सुगम है। नोआगमभावपुद्गल रूप, रस, गन्ध और स्पर्श आदिके भेदसे अनेक प्रकारका है। उनमें यहां तद्व्यतिरिक्त नोआगम- द्रव्यपुद्गल प्रकृत है। नैगम नयके विषय स्वरूपसे सब द्रव्य पुद्गल हैं। आत्त शब्दका अर्थ गृहीत है । अतएव 'आत्ताः पुद्गलाः पुद्गलात्ताः' इस विग्रह के अनुसार यहां पुद्गलात्त पदसे आत्मसात किये गये पुद्गलोंका ग्रहण है। वे पुद्गल छह प्रकारसे आत्मसात किये जाते हैं। यथा- ग्रहणसे, परिणामसे, उपभोगसे, आहारसे, ममत्वसे और परिग्रहसे । इनकी विमाषा इस प्रकार है- १ अ-फाप्रत्योः 'दव्यपोगला' इति पादः । - पोग्गल-अत्ताणियोगद्दारे पुग्गलात्तत्तपरुवणा ५१५ चेदि । विहासा । तं जहा- हत्थेण वा पादेण वा जे गहिदा दंडादिपोग्गला ते गहणदो अत्ता पोग्गला । मिच्छत्तादिपरिणामेहि जे अप्पणो कदा ते परिणामदो अचा पोग्गला । गंध-तंबोलादिया जे उवभोगे अप्पणो कदा ते उपभोगदो अत्ता पोग्गला । असण- पाणादिविहाणेण जे अप्पणो कदा ते आहारदो अत्ता पोग्गला।जे अणुराएण पडिग्गहिया ते ममत्तीदो अत्ता पोग्गला । जे सायत्तो ते परिग्गहादो अत्ता पोग्गला। अधवा, पोग्गलाणमत्ता रूव-रस-गंधफासादिलक्खणं सरूवं पोग्गलअत्ता णाम । तेसिं च अणंतभागवढि-असंखेजभागवइिढ-संखेजभागवड्ढि - संखेजगुणवडि-असंखेज- गुणवड्ढि-अणंतगुणवड्ढि त्ति रूवादीणं छविहाओ वइडीओ होति । तासिं परूवणा जहा भावविहाणे कदा तहा कायव्वा । सट्ठाणस्स वि असंखेजलोगमेत्ताणि हाणाणि होति । तेसि पि एवं चेव परूवणा कायव्या । एवं पोग्गलात्ते' त्ति समत्तमणियोगद्दारं । जो दण्ड आदि पुद्गल हाथ अथवा पैरसे ग्रहण किये गये हैं वे ग्रहणसे आत्त पुद्गल कहलाते हैं। मिथ्यात्व आदि परिणामोंके द्वारा जो.पुद्गल अपने किये गये हैं वे परिणामसे आत्त पुद्गल कहे जाते हैं । जो गन्ध और ताम्बूल आदि पुद्गल उपभोग स्वरूपसे अपने किये गये हैं उन्हें उपभोगसे आत्त पुद्गल समझना चाहिये। भोजन-पान आदिके विधानसे जो पुद्गल अपने किये गये हैं उन्हें आहारसे आत्त पुद्गल कहते हैं । जो पुद्गल अनुरागसे गृहीत होते हैं वे ममत्वसे आत्त पुद्गल हैं । जो आत्माधीन पुद्गल हैं उनका नाम परिग्रहसे आत्त पुद्गल हैं। अथवा, 'अत्त' का अर्थ आत्मा अर्थात् स्वरूप है । अतएव 'पोग्गलाणं-अत्ता पोग्गल- अत्ता' इस विग्रहके अनुसार पुद्गलात्त (पुद्गलात्मा ) पदसे पुद्गलोंका रूप, रस, गन्ध व स्पर्श आदि रूप लक्षण विवक्षित है। उन रूपादिकोंके अनन्तभागवृद्धि, असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि और अनन्तगुणवृद्धि ये छह वृद्धियां होती हैं। उनकी प्ररूपणा जैसे भावविधानमें की गयी है वैसे करना चाहिये । स्वस्थानके भी असंख्यात लोक मात्र स्थान होते हैं। उनकी भी इसी प्रकारसे प्ररूपणा करना चाहिये । इस प्रकार पुद्गलात्त यह अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। १ ताप्रतौ 'पोग्गलत्ते' इति पाठः ।

. णिवत्तमणिधत्ताणियोगद्दार णमियूण सुपासजिणं तियसेसरवंदियं सयलणाणि । वोच्छं समासदो हं णिधत्तमणिधत्तमणियोगं ॥ १ ॥ णिवत्तमणिधत्ते ति अणियोगद्दारे अत्थि पयडिणिवत्तं द्विदिणिवत्तं अणुभाग- णिधत्तं पदेसणिवत्तं चेदि । तत्थ अट्ठपदं-जं पदेसग्गं णिधत्तीकयं उदए दादु णो सक, अण्णपयडि संकामिदुं पि णो सक्क, ओकडिदुमुक्काडतुं च सक; एवंविहस्स पदे- सग्गस्स णिवत्तमिदि सण्णा । इममण्णं साहणं । उक्सामयस्स वा खवयस्स वा सब- कम्माणि अणियट्टिटाणं पहिस्स अणिधत्ताणि, तेसु णिवत्तलक्खणाणं सव्वेसि विणासादो। अणंताणुबंधिणो विसंजोएतस्स अणियट्टिकरणम्हि अणवाणुवंधिचदुका- मणिधत्तं, सेसाणि कम्माणि णिधत्ताणि अणिधत्ताणि च । दसर्णमोहणीयउवसामयस्स अणियट्टिकरणम्हि दंसणमोहखवगस्स अणियट्टिकरणे च दंसणमोहणीयं चेव अणिधत्तं , सेसाणि कम्माणि णिवत्ताणि अणिवत्ताणि च । एदेण अट्ठपदेण चउवीसअणियोगदारेहि णिवत्तस्स अणिधत्तस्स च मूलुत्तरपयडीओ अस्सिदण परूवणा कायया । एवं णिवत्त- मणिधत्ते त्ति समत्तमणियोगद्दारं । त्रिदशेश्वर अर्थात् इन्द्रोंसे वन्दित और पूर्णज्ञानी ऐसे सुपार्श्व जिनको नमस्कार करके मैं संक्षेपमें निधत्तमनिधत्त अनुयोगद्वारका कथन करता हूं ॥१॥ निधत्तमनिधत्त अनुयोगद्वार में प्रकृतिनिधत्त, स्थितिनिधत्त, अनुभागनिधत्त और प्रदेश- निधत्त हैं। उनमें अर्थपद-जो प्रदेशाग्र निधत्तीकृत है अर्थात् उदयमें देने के लिये शक्य नहीं है, अन्य प्रकृति में संक्रान्त करने के लिये भी शक्य नहीं है, किन्तु अपकर्पण व उत्कर्षण करने के लिये शक्य है; ऐसे प्रदेशाग्रकी निधत्त संज्ञा है। यह अन्य साधन है । अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें प्रविष्ट हुए उपशामक अथवा क्षपक जीवके सब कर्म अनिधत्त हैं, क्योंकि, उनमें सब निधत्तलक्षणोंका अभाव है। अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना करनेवालेके अनिवृत्तिकरण में अनन्तानुबन्धिचतुष्क अनिधत्त और शेप कर्म निधत्त व अनिधत्त भी हैं। दर्शनमोहउपशामकके अनिवृत्तिकरणमें और दर्शनमोहक्षपकके अनिवृत्तिकरणमें केवल दर्शनमोहनीय ही अनिधत्त है, शेप कर्म निधत्त व अनिधत्त भी हैं। इस अर्थपदके अनुसार मूल और उत्तर प्रकृतियोंका आश्रय करके निधत्त और अनिधत्तको प्ररूपणा चौवीस अनुयोगद्वारोंके द्वारा करना चाहिये । इस प्रकार निधत्तमनिधत्त अनुयोगद्वार समाप्त हुआ १ देसोवसमतुल्ला होइ निहत्ती निकाइया नवरं । संकमण पि निहत्तीए नस्थि सेसाण वियरस || क प्र. ५, ७२. २ ताप्रती 'इमं सण साहणं' इति पाठः । ३ अ-काप्रत्योः 'खंघयरस', ताप्रती 'खंघ (ख) यस्स' इति पाठः। ४ अप्रती 'अणिवत्तागिर, काप्रती 'अणिवत्ताणि' इति पाठः । ५ अप्रती 'चदुक. मणिवण्णसेसाणि, काप्रती 'चदुकमणिवगसेसाणि' इति पाठः। ६ यमती 'णिघत्ताणि अगिधताणि अगिदत्तागि च देसग', काप्रती 'गिधत्ताणि अगिधत्तागि दंसण', तामती, 'गिवत्ताणि [अणिधचागि] अगिधचागि च मन इति पाठः । ७ अप्रती 'अगिधणन', तामती 'अगिध [ ] त्' इति पाठः ।

२१ णिकाचिदमणिकाचिदाणियोगदारं तं हसमिव धवलममलं जम्मण-जर-मरणयजियं चंदं । वोच्छामि भावपणओ णिकाचिदणिकाचिदणियोगं ॥ १ ॥ णिकाचिदमणिकाचिदमिदि अणियोगदारे अस्थि पयडिणिकाचिदं ठिदिणिकाचिदं अणुभागणिकाचिदं पदेसणिकाचिदं चेदि । तत्थ अट्ठपदं-जं पदेसग्गं ओकड्डिदु णो सकं, उक्कडिदु णो सकं, अण्णपयडिं सकामिदुं णो सकं, उदए दादु णो सकं, तं पदेसगं णिकाचिदं णाम । अणियट्टिकरणं पविहस्स सव्यकम्माणि अणिकाचिदाणि, हेटा णिकाचिदाणि अणिकाचिदाणि च । एदेण अट्ठपदेण णिकाचिदाणिकाचिदाणं चउवीसअणियोगदारेहि परूवणा कायया । उवसंत-णिवत्त-णिकाचिदाणं सण्णियासो। तं जहा- अप्पसत्थउवसामणाए जसुवसंतं पदेसरगं ण तं णिधत्तं ण तं णिकाचिदं' वा । जणिवत्तं ण त उवसंतं णिकाचिदंवा । जणिकाचिदं ण तं उवसंतं णिवत्तं वा । एदेसिमप्पाबहुरं। जहा जिस्से वा तिस्से वा एकिस्से पयडीए अधापवत्त- संकमो थोवो । उवसंतपदेसग्गमसंखेजगुणं । णिधत्तमसंखेजगुणं । णिकाचिदमसंखेज- गुणं । एवं णिकाचिदमणिकाचिदं ति समत्तमणियोगद्दारं । हंसके समान धवल, निर्मल तथा जन्म जरा और मरणसे रहित ऐसे चन्द्रप्रभ जिनको भावपूर्ण प्रणाम करके मैं निकाचित-अनिकाचित अनुयोगद्वारकी प्ररूपणा करता हूं ॥१॥ निकाचितमनिकाचित अनुयोगद्वार में प्रकृतिनिकाचित, स्थितिनिकाचित, अनुभाग- निकाचित और प्रदेशनिकाचित हैं। उनमें अर्थपद-जो प्रदेशाग्र अपकर्पण करने के लिये शक्य नहीं है, उत्कर्पणके लिये शक्य नहीं है, अन्य प्रकृतिमें संक्रान्त करने के लिये शक्य नहीं है, तथा उदयमें देने के लिये भी शक्य नहीं है; उस प्रदेशाग्रको निकाचित कहते हैं। अनिवृत्ति- करणमें प्रविष्ट हुए जीवके सब कम अनिकाचित हैं। उसके नीचे निकाचित भी हैं और अनिकाचित भी हैं । इस अर्थपदके अनुसार निकाचित और अनिकाचितकी चौवीस अनुयोग- द्वारोंके द्वारा प्ररूपणा करना चाहिये। उपशान्त, निधत्त और निकाचितका संनिक इस प्रकार है-अप्रशस्त उपशामना द्वारा जो प्रदेशाग्र उपशमको प्राप्त है वह न निधत्त है और न वह निकाचित भी है। जो प्रदेशाग्रनिधत्त है वह उपशान्त और निकाचित नहीं है । जो प्रदेशाग्र निकाचित है वह उपशान्त और निधत्त नहीं है। इनका अल्पबहुत्व इस प्रकार है-जिस किसी भी एक प्रकृतिका अधःप्रवृत्तसंक्रम स्तोक है। उससे उपशान्त प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे निधत्त प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। उससे निकाचित प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। इस प्रकार निकाचितमनिकाचित अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। १ ताप्रती 'पदेसगं तं णित्तं शिकाचिदं' इति पाठः । २ अप्रतौ नं गिधगत्तं णं तं', काप्रती 'ज णिधगत्तं ण तं, तापतौ 'जं गिध [ण ] तंग तं' इति पाठः । ३ गुणले दिपएसन्गं योवं पत्तेगसो असंखगुणं । उक्सामणाइ-तिसु वि संकमगेहप्पयत्ते च ॥ क. प्र. ५, ७३.

२२ कम्मट्ठिदिअणियोगद्दार णमियूण पुप्फयंतं सुरहियधवलिद्धपुप्फअंचियञ्चलणं'। कम्मढिदिअणियोगं वोच्छामि समासदो पयत्तेणे ॥ १ ॥ कम्मविदि ति अणियोगद्दारम्हि भण्णमाणे बे उबदेसा होति- जहण्णुकस्स- द्विदीर्ण पमाणपरूवणा कम्मद्विदिपरूवणे ति गागहत्थिखमासमणा भणंति । अञ्जमखु- खमासमणा पुण कम्मट्ठिदिसंचिदसंतकम्मपरूवणा कम्मद्विदिपरूवणे ति भणंति । एवं दोहि उवएसेहि कम्महिदिपरूवणा कायव्या । एवं कम्महिदि त्ति समत्तमणिओगद्दारं । सुगन्धित, धवल और समृद्ध पुष्पों द्वारा जिनके चरणोंकी पूजा की गयी है उन पुप्प. दन्त लिनेन्द्रको नमस्कार करके मैं प्रयत्नपूर्वक संक्षेप में कर्मस्थिति अनुयोगद्वारका कथन करता हूं ॥१॥ कर्मस्थिति अनुयोगद्वारके निरूपण करने में दो उपदेश हैं- जघन्य और उत्कृष्ट स्थितियों के प्रमाणकी प्ररूपणा कर्मस्थितिप्ररूपणा है, ऐसा नागहस्ती क्षमाश्रमण कहते हैं । परन्तु आर्यमा क्षमाश्रमण कहते हैं कि कर्मस्थितिसंचित सत्कर्मकी प्ररूपणाका नाम कर्मस्थितिप्ररूपणा है। इस प्रकार दो उपदेशोंके द्वारा कर्मस्थितिकी प्ररूपणा करना चाहिये। इस प्रकार कर्मस्थिति अनुयोग- द्वार समाप्त हुआ। १ अ-काप्रत्योः 'अवियचलणे', ता-मप्रत्योः 'अंचियचलणं' इति पाटः। २ अतोऽने प्रतिवत्र 'अहं' इत्येतदधिकं पदं समुपलभ्यते । ३ प्रतिषु 'अणियोगद्दारेहि' इति पाठः ।

२३ पच्छिमक्खंधाणियोगदारं सीयलजिणमहिवंदिय तिहुयणजणसीयलं पयत्तेण । वोच्छं- समासदो हं जहागमं पच्छिमक्खंध ॥१॥ पच्छिमभवक्खंधे ति अणियोगद्दारे ओघभवो ओदसभवो भवग्गहणभवो चेदि तिविही भवो । तत्थ भवग्गहणभवेण पयदं । जो चरिमो भवो तम्हि भवे, तस्स जीवस्स सव्यकम्माणं बंधमग्गणा उदयमग्गणा उदीरणमग्गणा संक्रममग्गणा संतकम्ममग्गणा चेदि एदाओ पंच मग्गणाओ पच्छिमक्खंधाणियोगद्दारे कीरंति । पयडि-द्विदि-अणुभाग- पदेसग्गमस्सिदूण एदासु पंचसु परूवणासु कदासु तदो पच्छिमे भवग्गहणे सिज्झमाणस्स इमा अण्णा परूवणा कायव्या । तं जहा- आउअस्स अंतोसुहृत्तसेसे तदो आवजिदकरणं करेदि । आवजिदकरणे कदे तदो केवलिसमुग्धादं करेदि । पढमसमए दंड करेदि। तत्थ द्विदीए असंखेजभागे हणदि । अप्पसत्थाणं कम्माणं अणुभागस्स अणंतभागे हणदि । तदो विदियसमए कवाडं करेदि । तत्थ सेसियाए द्विदीए असंखेजमागे हणदि, सेसाणुभागस्स च अणते भागे हणदि । तदो तदियसमए मंथं करेदि । तत्थ वि द्विदि-अणुभागे तहेवें हणदि । तदो चउत्थसमए लोगं पूरेदि । लोगं पूरमाणे मि तीन लोकके जीवोंको शीतल करनेवाले ऐसे शीतल जिनेन्द्रकी वन्दना करके मैं संक्षेपसे आगमके अनुसार पश्चिमस्कन्ध अनुयोगद्वारको प्ररूपणा करता हूं ॥१॥ 'पश्चिमभवस्कन्ध अनुयोगद्वार में भव तीन प्रकारका है- ओघ भव, आदेश भव और भवग्रहण भव । इनमें भवग्रहण भव प्रकरणप्राप्त है। जो अन्तिम भव है उस अन्तिम भव में उस जीवके सब कर्मोंकी बन्धमार्गणा, उदयमार्गणा, उदीरणामार्गणा, संक्रममार्गणा और सत्कर्म- मार्गणा ये पांच मार्गणायें पश्चिमस्कन्ध अनुयोगद्वार में की जाती हैं। प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशाग्रका आश्रय करके इन पांच मार्गणाओंकी प्ररूपणा कर चुकनेपर तत्पश्चात् पश्चिम भवग्रहणमें सिद्धिको प्राप्त होनेवाले जीवकी यह अन्य प्ररूपणा करना चाहिये । यथा-आयुके अन्तर्मुहूर्त मात्र शेष रह जानेपर तब आवर्जितकरणको करता है । आवर्जितकरणके कर चुकनेपर फिर केवलिसमुद्घातको करता है । प्रथम समयमें वह दण्डसमुद्घातको करता है। उसमें स्थितिके असंख्यात बहुभागको घातता है। अप्रशस्त कर्मों के अनुभागके अनन्त वहुभागको घातता है। तत्पश्चात् द्वितीय समयमें वह कपाटसमुद्घातको करता है। उसमें शेप स्थिति के असंख्यात बहुभागको घातता है और शेप अनुभागके अनन्त बहुभागको घातता है । पश्चात् तृतीय समयमें मंथसमुद्भातको करता है। उसमें भी स्थिति और अनुभागका उसी प्रकारसे घात करता है। तत्पश्चात् चतुर्थ समयमें लोकको पूर्ण करता है अर्थात् लोकपरणसमुद्घातको करता है । लोक- १ अ-काप्रत्योः 'पच्छिमक्खंड', तापतौ 'पच्छिमक्खंडं (घं) इति पाठः । २ अ-फाप्रत्योः 'पच्छिमभव. खंडेत्ति', तापतौ 'पच्छिमभवक्खंडे (घे) त्ति' इति पाठः। ३ मप्रतिपाटोऽयम् । अ-का-ताप्रतिषु 'फरेंति' इति पाठः । ४ अ-काप्रत्योः 'मद्ध' इति पाठः । ५ प्रतियु 'तत्येव' इति पाठः । ६ फ. पा. तु. पृ. ९००, २... ! -- छक्खंडागमे संतकम्म विदि-अणुभागे तहेब हणदि । ठिदिसंतकम्ममंतोमुहुत्तं ठवेदि संखेजगुणमाउआदो। एदेसु चदुसु समएसु अप्पसत्थकम्माणमणुभागस्स अणुसमयमोवट्टणा, एयसमइयो च द्विदिखंडयस्स घादो। एत्तो सेसाए हिदीए संखेजभागे हणदि । सेसस्स अणुभागस्स अप्पसत्थस्स अणते भागे हणदि । एत्तो पाए द्विदिखंडयस अणुभागखंडयरस च अंतोमुहुत्तमुक्कीरणद्धा । एत्तो अंतोमुहुत्तं गंतूण वचिजोगं णिरंभदि । तदो अंतीमुहुत्तं गंतूण मणजोगं णिरंभदि अंतोगहुत्तेण । एत्तो अंतोमुहुत्तं गंतूण उस्सास-णिस्सासं णिरंभदि अंतोमुहुत्तेण। तदो अंतोमुहत्तं गंतूण कायजोगं णिरंभदि। अंतोमुहुत्तं कायजोगं णिरुंभमाणो इमाणि करणाणि करेदि- पढमसमए अपुव्यफदयाई करेदि पुव्यफद्दयाणं- हेढदो । आदिवग्गणाविभागपडिच्छेदाणं असंखे० भागमोबद्वेदि । जीवपदेसाण- मसंखे० भागमोवदे॒दि । एवमंतोमुहुत्तमपुच्चफद्दयाणि करेदि । असंखेजगुणहीणाए सेडीए जीवपदेसाणं च असंखे० गुणाए सेडीए । अपुब्यफद्दयाणि पमाणदो सेडीए असंखेजदि- भागो सेडिवग्गमूलस्स वि असंखेजदिभागो । एवमपुवफयाणि समत्ताणि । पूरणसमुद्धात करते समय भी स्थिति और अनुभागको उसी प्रकारसे घातता है। स्थितिसत्कर्म- को अन्तर्मुहूर्त मात्र स्थापित करता है जो आयुसे संख्यातगुणा होता है । इन चार समयों में अप्रशस्त कर्मों के अनुभागकी प्रतिसमय अपवर्तना और एक समयवाले स्थितिकाण्डकका घात होता है। यहां उतरते समय शेप स्थितिके संख्यात बहुभागका घात करता है। शेप अप्रशस्त अनुभागके अनन्त वहुभागका घात करता है। यहां स्थितिकाण्डक और अनुभागकाण्डकका अन्तर्मुहूर्तवाला उत्कीरणकाल प्रवृत्त होता है । यहां अन्तर्मुहूर्त जाकर वचनयोगका निरोध करता है । तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर अन्तर्मुहूर्त में मनयोगका निरोध करता है। यहांसे अन्तर्मुहूर्त जाकर अन्तर्मुहूर्त में उच्छास-निःश्वासका निरोध करता है । तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर काययोगका निरोध करता है। अन्तर्मुहूर्त में काययोगका निरोध करता हुआ इन करणोंको करता है- प्रथम समयमें पूर्वस्पर्धकोंके नीचे अपूर्वस्पर्धकोंको करता है। आदिम वर्गणाके अविभागप्रतिच्छेदोंके असंख्यातवें भागका अपवर्तन करता है। जीवप्रदेशोंके असंख्यातवें भागका अपवर्तन करता है। इस प्रकार अन्तर्मुहूर्त काल अपूर्वसर्धकों को करता है। इन अपूर्व स्पर्धकोंको असंख्यातगुणहीन श्रेणिके क्रम तथा जीवप्रदेशोंके असंख्यातगुणी श्रेणिक क्रमसे करता है । अपूर्वस्पर्धकोंका प्रमाण श्रेणिके असंख्यातवें भाग और श्रेणिवर्गमूलके भी असंख्यात भाग मात्र है। इस प्रकार अपूर्वस्पर्धकॉका कथन समाप्त हुआ। १ क. पा. सु. पृ. ९०२, १३-१९. २ पखंडागम पु. ६, पृ. ४१४; पु.१० पृ. ३२१. एत्ती अंतोमुहुनं गंतूण बादरकायनोगेश बादरमगजोगं णिमह । तदो अंतोमुटुत्तेग बादरकायजोगेण बादरवचिनोगं मिरमा । तदो अंतोमूहुत्तेग बादरकायजोगेग बादरउत्सासगित्सा गिभइ । तदो अंतीमुहुत्तेश यादरकायोगेण तमेव बादरकायजोगं गिरंभइ । तदो अंतोमुहुर्त गंण मुटुमकायनोगेण मुहुममगजोगं मिह । तदा अंतामुन मुहुमकायबोगेण सुदुमवचिजोगं गिदंमद । तदो अंतोमुहुनेग नुदुमकायजोगग मुहमउस्मारी मिद । क. पा. मु. पृ. ९०४, २०-२६. ३ तामती 'करेटि, अपुखपट्टयागं हेदी आदि.' इति पाठः। ४ कपा. सु.पृ. ९०४, २३.३४.

पच्छिमक्खंधाणियोगद्दारे किट्टिकरणादिविहाणं ५२१ एत्तो अंतोमुहुत्तं किट्टीयो करेदि। अपुयफयाणमादिवग्गणाए अविभागपडि- च्छेदाणमसंखे० भागमोवद्वेदि। जीवपदेसाणमसंखे० भागमोघट्टेदि । एत्तो अंतोमुहुत्तं किट्टीओ करेदि असंखेजगुणहीणाए सेडीए, जीवपदेसाणं च असंखे० गुणाए सेडीए ओवटेदि । किट्टीदो किट्टिगुणगारो पलिदो० असंखे० भागो । किट्टीओ सेडीए असंखे० भागो, अपुव्यकद्दयाणं च असंखे० भागो। किट्टिकरणे णिहिदे तदो से काले अपुन्च- फद्दयाणि पुचफद्दयाणि च णासेदि । अंतोमुहुत्तं किट्टिगदजोगो होदि । सुहुमकिरिय- मप्पडिवादिझाणं झायदि । किट्टीणं चरिमसमए असंखे० भागे णासेदि । जोगम्हि णिरुद्धम्हि आउअसमाणि कम्माणि करेदि । तदो अंतोमुहुत्तं सेलेसिं पडिवजदि, समुच्छिण्णकिरियमणियझिाणं झायदि । सेलेसिअद्धाए ज्झीणाए सन्चकम्मविप्पमुक्को एयसमएण सिद्धिं गच्छदि त्ति । एवं पच्छिमक्खंधे ति समत्तमणियोगद्दारं । यहांसे लेकर अन्तर्मुहूर्त काल कृष्टियोंको करता है। अपूर्वस्पर्धकोंकी आदिम वर्गणाके अविभागप्रतिच्छेदोंके असंख्यातवें भागका अपवर्तन करता है। जीवप्रदेशोंके अविभागप्रति- च्छेदोंके असंख्यातवें भागका अपवर्तन करता है। यहांसे अन्तर्मुहूर्त काल असंख्यातगुणहीन श्रेणिके क्रमसे कृष्टियोंको करता है, जीवप्रदेशोंका असंख्यातगुणित श्रेणिके क्रमसे अपवर्तन करता है । कृष्टिसे कृष्टिका गुणकार पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र है। कृष्टियां श्रेणिके असंख्यातवें भाग तथा अपूर्वस्पर्धकोंके भी असंख्यातवें भाग मात्र होती हैं। कृष्टिकरणके समाप्त होनेपर तत्पश्चात् अनन्तर समयमें अपूर्वस्पर्धकों और पूर्वस्पर्धकोंको भी नष्ट करता है । पश्चात् अन्तर्मुहूर्त काल कृष्टिगतयोग होता है और सूक्ष्मक्रिया-अप्रतिपातिध्यानको ध्याता है। कृष्टियोंके अन्तिम समयमें असंख्यात बहुभागको नष्ट करता है । योगका निरोध हो जानेपर फर्मोको आयुके समान करता है। तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्तमें शैलेश्यभावको प्राप्त करता है और समुच्छिन्नक्रिया अनिवृत्ति ध्यानको ध्याता है। शैलेश्यकालके क्षीण होनेपर सब कर्मों से मुक्त होकर एक समयमें सिद्धिको प्राप्त होता है। इस प्रकार 'पश्चिमस्कन्ध' यह अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। १ कसायपाहुडसुत्ते तु 'किट्टीदो किहिगुणगारो' इत्येतस्य स्थाने 'किट्टी गुणगारो' इति पाठः । २ प्रतिपु 'किट्टीए' इति पाठः। ३ अप्रतौ 'अपुवफद्दयाणि अपुटवफद्दयागि' इति पाठः । ४ अ-काप्रत्योः 'गासेडि' इति पाठः। ५ क. पा. सु. पृ. ९०५, ३६-५२. ६ प्रतिषु 'खंडे' इति पाठः । Bas-- Co- -- छ, से. ६६ २४ अप्पाबहुआणियोगद्दारं णमिऊण वड्ढमाणं अणतणाणाणुवट्टमाणेमिसि । वोच्छामि अप्पबहुअं अणियोग बुद्धिसारेण ।। १ ॥ अप्पाबहुगमणियोगद्दारे णागहत्थिभडारओ संतकम्ममग्गणं करेदि । एसो च उवदेसो पवाइजदि । संतकम्मं चउब्धिहं पयडिसंतकम्मं ठिदिसंतकम्म अणुभागसंतकम्म पदेससंतकम्मं चेदि । तत्थ पयडिसंतकम्मं दुविहं मूलपयडिसंतकम्मं उत्तरपयडिसंतकम्म चेदि । तत्थ मूलपयडीहि सामित्तं णेदूण उत्तरपयडीहि सामित्तं कायव्यं । तं जहा-पंच- गाणावरणीय-चउदंसणावरणीय-पंचंतराइयाणं संतकम्मस्स को सामी १ सयो छदुमत्थो । एवं णिहा-पयलाणं । णवरि चरिमसमयछदुमत्थस्स णत्थि संतकम्म । थीणगिद्धितिय- संतकम्मस्स को सामी ? सन्यो छदुमत्थो। णवरि खयगस्स अणियट्टिकरणमंतोमुहुत्तं पविट्ठस्स संतकम्मं बोच्छिण्णं ति कटु उवरिमेसु छदुमत्थेसु णस्थि संतकम्म। सादासादाणं संतकम्मं कस्स ? संसारिणो सबस्स । णवरि जस्स उदओ णस्थि अनन्तज्ञानसे अनुवर्तमान वर्धमान ऋपिको नमस्कार करके बुद्धिके अनुसार अल्पवहुत्य अनुयोगद्वारफी प्ररूपणा करता हूं ॥१॥ नागहस्ती भट्टारक अल्पवहुत्व अनुयोगद्वार में सत्कर्मकी मार्गणा करते हैं । और यह उपदेश प्रवाहस्वरूपसे आया हुआ परंपरागत है । सत्कर्म चार प्रकारका है -प्रकृतिसत्कर्म, स्थितिसत्कम, अनुभागसत्कर्म और प्रदेशसत्कर्म। इनमें प्रकृतिसत्कर्म दो प्रकारका है- मूलप्रकृतिसत्कर्म और उत्तरप्रकृतिसत्कर्म । इनमें मूल प्रकृतियों के साथ स्वामित्वको ले जाकर फिर उत्तर प्रकृतियों के साथ स्वामित्वकी प्ररूपणा करते हैं। वह इस प्रकार है-पांच ज्ञानावरणीय, चार दर्शना- वरणीय और पांच अन्तराय प्रकृतियों के सत्कर्मका स्वामी कौन है ? इनके सत्कर्मके स्वामी सब छद्मस्थ जीव हैं। इसी प्रकार निद्रा और प्रचलाके सत्कर्मके सम्बन्ध में जानना चाहिये। विशेप इतना है कि अन्तिम समयवर्ती छद्मस्थके उनका सत्कर्म नहीं रहता। स्यानगृद्धि आदि तीन दर्शनावरण प्रकृतियों के सत्कर्मका स्वामी कौन है ? उसके स्वामी सब छद्मस्थ हैं। विशेष इतना है कि अनिवृत्तिकरणमें प्रविष्ट हुए क्षपकके अन्तर्मुहूर्त जाकर इनके सत्कर्मकी व्युच्छित्ति हो जाती है, अतएव इसके आगे छद्मस्थोंके उनका सत्कर्म नहीं रहता। साता और असाता वेदनीयका सत्कर्म किसके होता है ? उनका सत्कर्म सब संसारी जीवोंके रहता है। विशेप इतना है कि उक्त दो प्रकृतियों से जिसका उदय नहीं है उसका १ ताप्रती 'गायेग वट्टमाण' इति पाठः । २ छउमर्थता चउट्स दुचरममममि अस्थि टो निता। क. प्र. ७, ३. ३ तापतो त्यानदिवयसम्बद्धोऽयं सन्दर्मत्रुटितोऽस्ति । ४ सयगानिपहिला मंखिग होति अह वि फसाया । निरय-तिरिसवेरमा निहा-निहातिगेगुवरि ।। रु. प्र.७, ६.

अप्पाबहुआणियोगदारे उत्तरपयडिसंतकम्म ५२३ तस्स चरिमसमयभवसिद्धयम्मि णत्थि संत'। मोहणीयसंतकम्मस्स सामित्तं जहा कसायपाहुडे कदं तहा कायच्वं । णिरयाउअसंतकम्मं कस्स ? णेरइयस्स वा मणुस-तिरिक्खस्स वा। मणुस- तिरिक्स्वाउआण संतकम्म कस्सै ? अण्णदरस्स देवस्स णेरड्यस्स तिरिक्खस्स मणुस्सस्स वा । देवाउअसंतकम्मं कस्स १ देवस्स मणुसस्स तिरिक्खस्स वा । णिरयगइ-तिरिक्खगइ-तप्पाओग्गाणं च जादि-आणुपुषिणामाणं आदायुञ्जोव- थावर-सुहुम-साहारणसरीरणामाणं च संतकम्मस्स सामिओ को होदि ? अण्णदरो जाव णिरय-तिरिक्खणामाणं चरिमसमयसंछोहओ त्ति । देवगइ-पाओग्गाणुपुन्चि-वेउबिय- सरीर-आहारसरीर-तप्पाओग्गअंगोवंग-बंधण-संघादाणं च संतकम्मं कस्स ? अण्णदरस्स अणुव्वेल्लिदसंतकम्मियस्स जाव दुचरिमसमयभवमिद्वियो ति। मणुमगइ-मणुसगइ- पाओग्गाणुपुब्धि-तप्पाओग्गजादिणामाणं संतकम्मं कस्स ? अण्णदरस्स अणुव्वेल्लिदसंत- कम्मियस्स जाव चरिमसमयभवसिद्धयो त्ति । णवरि मणुसगहपाओग्गाणुपुषिणामाए जाव [दु]चरिमसमयभवसिद्धियो त्ति । ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीराणं तप्पाओग्ग- सत्कर्म अन्तिम समयवर्ती भव्यसिद्धिकके नहीं रहता। मोहनीयके सत्कर्मके स्वामित्वका कथन जैसे कपायाभृतमें किया गया है वैसे ही यहां भी करना चाहिये । नारकायुका सत्कर्म किसके होता है ? उसका सत्कर्म नारकी, मनुष्य और तियंचके होता है । मनुष्यायु और तिर्यगायुका सत्कर्म किसके होता है ? उनका सत्कर्म अन्यतर देव, नारकी, तिर्यंच और मनुष्यके होता है। देवायुका सत्कर्म किसके होता है ? उसका सत्कर्म देव, मनुष्य और तिर्यंचके होता है। नरकगति, तिर्यंचगति और तत्प्रायोग्य जाति एवं आनुपूर्वी नामकोका तथा आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारणशरीर नामकर्मों के सत्कर्मका स्वामी कौन होता है ? उसका स्वामी नरकगति और तिर्यंचगति नामकर्मों के अन्तिम समयवर्ती संक्रामक तक अन्यतर जीव होता है। देवगति, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर व आहारकशरीर तथा उनके योग्य आंगोपांग, बन्धन और संघात नामकोका सत्कर्म किसके होता है ? उनका सत्कर्म सत्कर्मको उद्वेलना न करनेवाले द्विचरम समयवर्ती भव्यसिद्धिक तक अन्यतर जीवके रहता है। मनुष्यगति. मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी और तत्प्रायोग्य नाति नामकर्मका सत्कर्म किसके होता है ? उनका सत्कर्म सत्कर्मकी उद्वेलना न करनेवाले अन्तिम समयवर्ती भव्यसिद्धिक तक अन्यतर जीवके रहता है। विशेप इतना है कि मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामफर्मका सत्कम द्विचरन समयवर्ती भव्यसिद्धिक तक रहता है। औदारिक, तेजस और कार्मण शरीर तथा तत्प्रायोग्य १ मणुयगइ-जाइ-तस-बायरं च पजत्त-सुभग-आएवं । जसफित्ती तित्ययरं वेयगि-उच्च च मणुयाणे ॥ भव- चरिमत्समयम्मि उ तम्मग्गिलसमयम्मि सेसाउ। आहारग-तित्थयरा मजा दुसु नत्यि तित्यरं || क, प्र. ७, ८-९. २ ताप्रती [णिरयगइ ] तिरिक्ख [गह]-मणुस्साउआगं' इति पाठः । ३ अ-काप्रत्योः 'संतकम्मत्स' इति पाठः । ४ बद्धाणि ताव आऊगि वेहयाई ति ना कसिंग क. प्र.७, ३. ५ प्रतिषु 'सामित्तओ' इति पाठः । ६ अ-काप्रत्योः 'सिद्धया' इति पाठः।

छक्खंडागमे संतकम्म अंगोवंग-बंधण-संधादाणं च छसंठाण-छसंघडण-वण्ण-गंध-रस-फास-अगुरुअलहुअ-उप- पाद-परघाद-उस्सास-पसत्थापसत्यविहायगइ - अपञ्जत्त - पत्ते यसरीर-थिराथिर - सुहासुह- भग-दुस्सर-अणादेज-अजसकित्ति-णिमिण-णीचागोदाणं संतकम्मं कस्स ? चरिमसमय- भवसिद्धियं मोत्तण संसारत्थस्स सबस्स । तस-बादर-पजत्त-सुभगादेज-जसकित्ति- उच्चागोदाणं संतकम्मं कस्स ? अण्णदरस्स संसारावत्थस्स । तित्थयरणामाए संतकम्म कस्स ? सम्माइद्विस्स मिच्छाइद्विस्स वा जाव चरिमसमयभवसिद्धियादो त्ति । एवं सामित्तं समत्तं । एयजीवेण कालो अंतरं, णाणाजीवेहि भंगविचओ कालो अंतरं, सण्णियासो च सामित्तादो साहेदूण भाणियन्यो । एत्तो अप्पाबहुअं दुविहं सत्थाण-परत्थाणप्पाबहुअभेएण । तत्थ परत्थाणप्पावहु- अम्मि पयदं-सब्बत्थोवा आहारसरीरसंतकम्मिया। सम्मत्तसंतकम्मिया असंखे० गुणा । सम्मामिच्छत्तस्स संतकम्मिया विसेसाहिया। मणुस्साउअस्स संतक० असंखे० गुणा । णिरयाउअस्स संतक० असंखे० गुणा । देवाउअस्स संतक० असंखे० गुणा । देवगइ- णामाए संतक० असंखे० गुणा। णिरयगइणामाए संतक० विसेसा० । वेउब्वियसरीर- णामाए संतक० विसेसा० । उच्चागोदस्स संतक० अर्णतगुणा । मणुसगइणामाए संतक० आंगोपांग, बन्धन और संघातका, छह संस्थान, छह संहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त व अप्रशस्त विहायोगति, अपर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशकीर्ति, निर्माण और नीचगोत्र; इनका सत्कर्म किसके होता है ? इनका सत्कर्म अन्तिम समयवर्ती भव्यसिद्धिकको छोड़कर सय संसारी जीवोंके रहता है। ब्रस, वादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, यशकीर्ति और उच्चगोत्रका सत्कर्म किसके होता है ? इनका सत्कर्म अन्यतर संसारी प्राणीके होता है। तीर्थकर नाम- कर्मका सत्कर्म किसके होता है ? उसका सत्कर्म अन्तिम समयवर्ती भव्यसिद्धिक तक सम्यग्दृष्टि और मिथ्याष्टिके भी होता है । इस प्रकार स्वामित्व समाप्त हुआ। एक जीवकी अपेक्षा काल और अन्तर तथा नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय, काल, अन्तर और संनिकर्पका कथन स्वामित्वसे सिद्ध करके फरना चाहिये । यहां अल्यवहुत्व दो प्रकारका है- स्वस्थान अल्पबहुत्व और परस्थान अल्पवहुत्य । उनमें परस्थान अल्पवहुत्व प्रकृत है- आहारशरीरसत्कर्मिक जीव सबसे स्तोक हैं। सम्यक्त्य- प्रकृतिसत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। सम्यग्मिथ्यात्व के सत्कार्मिक विशेष अधिक है। मनुप्यायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। नारकायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। देवायुके सत्कार्मिक असल्यातगुणे हैं। दवगति नामकर्मक सत्कार्मिक असंख्यातगुणे हैं। नरकगति नामकरके सत्कमिक विशेष अधिक हैं। वीयिकशरीर नामकर्मके सत्कार्मिक विशेप अधिक हैं। उगगीत्र के सत्कर्मिक अनन्तगुणे हैं। मनुष्यगति नामक के सत्कार्मिक विशेष अधिक हैं। तियंगायुके १. प्र. ७, ८.९.

अप्पावहुआणियोगदारे परत्याणप्पाबहुअं विसे० । तिरिक्खाउअस्स संतक० विसे० । अणंताणुवंधिचउक्कसंतक० विसे० । मिच्छत्त- संतक० विसे० । अट्ठकसायसंतक० विसे० । तिरिक्खगइ-णिहाणिद्दा-पयलापयला-थीण- गिद्धीणं च संतक० तुल्ला विसेसाहिया। णQसयवेदस्स संतक० विसे० । इत्थिवेयस्स संतक० विसे० । छण्णोकसायाणं संतक० विसे० । पुरिसवेस्स संतक० विसे० । कोह- संजलणाए संतक. विसे० । माण. विसे० । माया० विसे० । लोभ० विसे० । णिहा- पयलाणं संतक० विसे०। पंचणाणावरण-चउदंसणावरण-पंचंतराइयाणं संतक० तुल्ला विसेसाहिया। ओरालिय-तेजा-कम्मइय-अजस कित्ति-णीचागोदाणं संतक. विसे० । असादस्स संतक० विसे० । सादस्स संतक० विसे० । जसकित्तीए संतकम्मिया विसे- साहिया । एवं ओघमप्पावहुअदंडओ समत्तो। णिरयगईए सव्वत्थोवा मणुस्साउअस्स संतकम्मिया। आहारसरीरणामाए संत- कम्मिया असंखेजगुणा । सम्मत्तस्स संतक० असंखे० गुणा । सम्मामिच्छत्तस्स संतक० विसेसा० । तिरिक्खाउअस्स संतक० असंखे० गुणा । अणंताणुवंधीणं संतक० संखे० गुणा । मिच्छत्तस्स संतक० विसे० । सेसाणं कम्माणं सव्वेसिं संतकम्मिया तुल्ला विसेसा० । एवं णिरयगइदंडओ समत्तो । तिरिक्खगदीए आहारसंतकम्मिया थोवा। सम्मत्तसंतक० असंखे० गुणा । सत्कर्मिक विशेष अधिक हैं । अनन्तानुबन्धिचतुष्कके सत्कर्मिक विशेप अधिक है। मिथ्यात्वके सत्कर्मिक विशेप अधिक हैं। आठ कपायोंके सत्कर्मिक विशेष अधिक हैं। तिर्यंचगति, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धिके सत्कर्मिक तुल्य व विशेष अधिक हैं। नपुंसकवेदके सत्कर्मिक विशेप अधिक हैं। स्त्रीवेदके सत्कर्मिक विशेष अधिक हैं। छह नोकपायोंके सत्कर्मिक विशेप अधिक हैं । पुरुषवेदके सत्कार्मिक विशेष अधिक हैं। संज्वलन क्रोधके सत्कर्मिक विशेष अधिक हैं। संज्वलन मानके सत्कार्मिक विशेष अधिक है। संज्वलन मायाके सत्कार्मिक विशेष अधिक हैं। संज्वलन लोभके सत्कर्मिक विशेष अधिक हैं। निद्रा और प्रचलाके सत्कर्मिक विशेप अधिक हैं। पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तरायके सत्कर्मिक तुल्य व विशेप अधिक हैं । औदारिक, तैजस व कार्मण शरीर, अयशकीर्ति और नीचगोत्रके सत्कर्मिक तुल्य व विशेष अधिक हैं। असातावेदनीयके सत्कर्मिक विशेप अधिक हैं। सातावेदनीयके सत्कर्मिक विशेप अधिक हैं। यशकीर्ति के सत्कर्मिक विशेप अधिक हैं। इस प्रकार ओघअल्पवहुल दण्डक समाप्त हुआ। नरकगतिमें मनुष्यायुके सत्कर्मिक सबसे स्तोक है। आहारकशरीर नामकर्म के सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। सम्यक्त्व प्रकृतिके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं । सम्यग्मिथ्यात्वके सत्कार्मिक विशेष अधिक हैं। तिर्यगायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं । अनन्तानुवन्धिचतुष्टयके सत्कार्मिक संख्यातगुणे हैं। मिथ्यात्वके सत्कर्मिक विशेष अधिक है। शेष सब कमों के सत्कर्मिक तुल्य प विशेप अधिक है। इस प्रकार नरकगतिदण्डक समाप्त हुआ। तियंचगतिमें आहारसत्कर्मिक स्तोक है। सम्यक्त्व प्रकृति के सत्कर्मिक असंख्यातगुणे ५२६ छक्खंडागमे संतकम्म सम्मामिच्छत्तसंतक० विसेसा० । मगुस्साउअस्स संतक० असंखे० गुणा । णिरयाउअस्स संतक० असंखे० गुणा । देवाउअस्स संतक० असंखे० गुणा । देवगदीए संतक० असंखे० गुणा । णिरियगदीए संतक० विसे० | वेउब्धियसरीरसंतक० विसे० । उचागोदसंतक. अणंतगुणा। मणुसगइसंतक० विसे० । अणंताणुवंधीणं संतक० विसे० । मिच्छत्तस्स संतक० विसे० । सेसाणं कम्माणं संतकम्मिया तुल्ला विसेसाहिया। एवं तिरिक्खगइ- दंडओ समत्तो। तिरिक्खजोणिणीसु सव्वत्थोवा आहार सरीरणामाए संतकम्मिया । सम्मत्तसंतक० असं० ० गुणा । सम्मामिच्छत्तसंत० विसे० । मणुस्साउअस्स संत० असं० गुणा । णिरयाउसंतक० असं० गुणा । देवाउ० संत० असंखे० गुणा । अणंताणुवं० संत० सं० गुणा । सेसाणं कम्माणं संतकम्मिया तुल्ला विसे० । एवं तिरिक्खजोणिणीसु दंडओ समत्तो। मणुसगदीए सव्वत्थोवा आहार सरीरणामाए संतक० । णिरयाउअस्स संतक० संखे० गुणा । देवाउअस्स संतक० संखे० गुणा । सम्मत्तस्स संतक० असंखे० गुणा। सम्मा- मिच्छत्तस्स संतक० विसे० । देवगइणामाए संतक० असंखे० गुणा । णिरयगइणामाए संतक. विसे । वेउब्वियसरीरणामाए संतक०. विसे० । तिरिक्खाउअस्स संतक० असंखे० गुणा । अणंताणुवंधिसंतक० संखे० गुणा । मिच्छत्तसंतक० विसे० । सेस- हैं। सम्यग्मिथ्यात्वके सत्कर्मिक विशेष अधिक है। मनुष्यायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। नारकायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। देवायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। देवगतिके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। नरकगतिके सत्कर्मिक विशेष अधिक हैं। वैक्रियिकशरीरके सत्कर्मिक विशेष अधिक है। उच्चगोत्र के सत्कर्मिक अनन्तगुणे हैं। मनुष्यगति के सत्कार्मिक विशेप अधिक हैं । अनन्तानुबन्धिचतुष्टयके सत्कर्मिक विशेप अधिक है । मिथ्यात्वके सत्कर्मिक विशेप अधिक है। शेप कर्मों के सत्कर्मिक तुल्य व विशेप अधिक है। इस प्रकार तिर्यग्गति- दण्डक समाप्त हुआ। तिथंच योनिमतियों में आहारशरीर नामकर्मके सत्कर्मिक सबसे स्तोक हैं। सभ्यपत्य प्रकृतिके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। सम्यग्मिथ्यात्व के सत्कार्मिक विशेप अधिक है। मनुष्यायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। नारकायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। देवायुके सत्यमिक असंख्यातगुणे हे । अनन्तानुवन्धिचतुष्टय के सत्कर्मिक संख्यातगुणे हैं। शेप कर्मों के सत्कर्मिक तुल्य व विशेष अधिक है । इस प्रकार तियंचयोनिमतियों में प्रकृत दण्डक समाप्त हुआ। मनुष्यगतिमें आहारशरीर नामकर्मके सत्कर्मिक सबसे स्तोक है। नारकायुके सत्कर्मिक संख्यातगुणे हैं । देवायुके सत्कर्मिक संख्यातगुणे हैं। सम्यक्त्य प्रकृतिके सत्कार्मिक असंख्यात- गुणे हैं। सम्यग्मिध्यात्वके सत्कर्मिक विशेष अधिक हैं। देवगति नामकमेके सत्कार्मिक असंख्यातगुणे हैं। नरकगति नामकर्म के सत्कार्मिक विशेष अधिक है। फियिकशरीर नामकर्म के सत्कर्मिक विशेष अधिक हैं। लियंगायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। अनन्तानु बन्धि चतुष्टयके सत्कर्मिक संन्यातगुणे हैं। निध्यात्वके सत्कर्मिक विशेष अधिक है। शेष ५२७ अप्पाबहुआणियोगद्दारे परस्थाणप्पाबहुअं मोघं । णवरि जसकित्तीए सह मणुस्साउअ-मणुस्सगईओ बत्तवाओ। एवं मणुसगइ- दंडओ समत्तो। मणुसिणीसु सव्वत्थोवा आहारसरीरणामाए संतकम्मिया। सम्मत्तस्स संतक० संखेजगुणा । सम्मामिच्छत्तस्स संतक० विसे० । णिरयाउअस्स संतक० असंखे० गुणा । देवाउअस्स संतक० संखे० गुणा । तिरिक्खाउअस्स संतक० संखे० गुणा अणंताणुवंधीणं संतक० संखे० गुणा । मिच्छत्तसंतक० विसे० । सेसं मणुसगइभंगो। णवरि छण्णोकसाएहि सह पुरिसवेदो भाणियव्यो । एवं मणुसिणीसु दंडओ समत्तो। जहा णिरयगदीए तहा देवगदीए । असण्णीसु सन्चथोवा आहारसरीरणामाए संत रुम्मिया। सम्मत्तस्स संतक० असंखे० गुणा । सम्मामिच्छत्तसंतक० विसे० । मणुस्साउअस्स संतक० असंखे० गुणा । णिरयाउअस्ससंतक० असंखे० गुणा । देवाउअस्स संतक० असंखे० गुणा । देवगइणामाए संतक० संखे० गुणा । णिरयगइणामाए संतक० विसे० । वेउन्धियसरीरणामाए संतक० विसे० । उच्चागोदसंतक० विसे० । मणुसगइ- णामाए संतक० विसेसा० । सेसाणं पयडीणं संतकम्मिया तुल्ला विसेसाहिया। एवं असंण्णिदंडओ समत्तो। भुजगारो पदणिक्खेवो वड्ढी च णस्थि । पयडिट्ठाणसंतकम्मं मोहणीयस्स जहा कथन ओघके समान है। विशेष इतना है कि यशकीर्ति के साथ मनुष्यायु और मनुष्यगतिको भी कहना चाहिये । इस प्रकार मनुष्यगतिदण्डक समाप्त हुआ। मनुप्यनियों में आहारकशरीर नामकर्मके सत्कर्मिक सवसे स्तोक हैं । सम्यक्त्व प्रकृति के सत्कर्मिक संख्यातगुणे हैं। सम्यग्मिथ्यात्वके सलर्मिक विशेष अधिक है । नारकायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। देवायुके सत्कर्मिक संख्यातगुणे हैं। तिर्यागायुके सत्कर्मिक संख्यातगुणे हैं । अनन्तानुबन्धिचतुष्टयके सत्कर्मिक संख्यातगुणे हैं। मिथ्यात्वके सत्कर्मिक विशेप अधिक हैं। शेप कर्मों की प्ररूपणा मनुष्यगतिके समान है। विशेप इतना है कि छह नोकपायोंके साथ पुरुपवेदको कहना चाहिये । इस प्रकार मनुष्यनियोंमें दण्डक समाप्त हुआ। जैसे नरकगतिमें प्ररूपणा की गई है वैसे ही देवगतिमें भी जानना चाहिये। असंज्ञी जीवों में आहारशरीर नामकमके सत्कर्मिक सबसे स्तोक हैं। सम्यक्त्वके सत्कर्मिक असंख्यात- गुणे हैं। सम्यग्मिथ्यात्वके सत्कर्मिक विशेष अधिक है। मनुष्यायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। नारकायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। देवायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। देवगति नामकर्मके सत्कर्मिक संख्यातगुणे हैं। नरकगति नामकमैके सत्कर्मिक विशेष अधिक है। वैक्तियिकशरीर नामकर्म के सत्कर्मिक विशेप अधिक है। उच्चगोत्रके सत्कर्मिक विशेष अधिक है। मनुष्यगति नामकर्मके सत्कर्मिक विशेष अधिक है। शेप प्रकृतियोंके सत्कर्मिक तुल्य व विशेप अधिक हैं। इस प्रकार असंज्ञिदण्डक समाप्त हुआ। भुजाकार, पदनिक्षेप और वृद्धि नहीं है । मोहनीयका प्रकृतिस्थानसत्कर्म जैसे कपायाभृतमें - ५२८ छक्खंडागमे संतकम्म कसायपाहुडे कदं तहा कायच्वं । सेसाणं' कम्माणं पयडिट्ठाणमग्गणा सुगमा। एवं पयडिसंतकम्ममग्गणी समत्ता । एत्तो द्विदिसंतकम्मं दुविहं मूलपयडिट्ठिदिसंतकम्मं उत्तरपयडिविदिसंतकम्म चेदि । तत्थ मूलपय डिविदिसंतकम्मं सुगमं । उत्तरपयडिहिदिसंतकम्मे अद्धाच्छेदो । तं जहा- मदिआवरणस्स उकस्सडिदिसंतकम्मं तीसं सागरोवमकोडाकोडीयो पडिवुण्णाओ, जाओ द्विदीयो वि एतियाओ चेव । जहा मदिआवरणस्स उक्कस्सद्विदिसंतकम्मरस अद्धाच्छेदो कदो तहा सेसचदुणाणावरण-चदुदंसणावरण-पंचंतराइयाणं कायव्यो । पंचण्णं दंसणावरणीयाणं जहिदिसंतकम्मं तीसं सागरोवमकोडाकोडीयो पडिचुण्णाओ, जाओ द्विदीओ समऊणाओ। सादस्स जहिदिसंतकम्मं जाओ द्विदीओ च तीसं सागरो- वमकोडाकोडीओ आवलियूणाओ । जहिदिसंतकम्मं जाओ द्विदीओ च. असादस्स तीसं सागरोवमकोडाकोडीओ पडिवुण्णाओ। मिच्छत्तस्स जंडिदिसंतकम्मं जाओ द्विदीओ च सत्तरिसागरोवमकोडाकोडीओ पडिवुण्णाओ। सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं सत्तरिसागरोवमकोडाकोडीओ अंतोमुहत्तणाओ। सोलसणं कसायाणं चचालीसं सागरोबमकोडाकोडीओ पडिवुण्णाओ। णवणं णोकसायाण किया गया है वैसे करना चाहिये। शेप कर्मोकी प्रकृतिस्थानमार्गणा सुगम है। इस प्रकार प्रकृतिसत्कर्ममार्गणा समाप्त हुई। यहां स्थितिसत्कर्म दो प्रकारका है- मूलप्रकृतिस्थितिसत्कर्म और उत्तरप्रकृतिस्थिति- सत्कर्म । इनमें मूलप्रकृतिस्थितिसत्कर्म सुगम है। उत्तरप्रकृतिस्थितिसत्कर्म में अद्वाछेदका कथन इस प्रकार है- मतिज्ञानावरणका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म सम्पूर्ण तीस कोड़ाकोडि सागरोपम प्रमाण तथा जस्थितियां भी इतनी मात्र ही हैं। जैसे मतिज्ञानावरणके उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्मका अद्धाच्छेद किया है वैसे ही शेप चार ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तराय प्रकृतियोंका भी करना चाहिये। निद्रादिक पांच दर्शनावरण प्रकृतियोंका जस्थितिसत्कर्म परिपूर्ण तीस कोड़ाकोडि सागरोपम तथा जस्थितियां एक समय कम तीस कोड़ाकोडि सागरोपम मात्र हैं । सातावेदनीयका जस्थितिसत्कर्म और जस्थितियां आवलीसे हीन तीस कोड़ाकोड़ि सागरोपग प्रमाण हैं। असातावेदनीयका जस्थितिसत्कर्म और जस्थितियां परिपूर्ण तीस कोडाकोहि सागरोपम प्रमाण है। मिथ्यात्वका जस्थितिसत्कर्म और जस्थितियों परिपूर्ण सत्तर कोड़ाकोड़ि सागरोपम मात्र हैं। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतियोंका जस्थितिसत्कर्म और जस्थितियां अन्तर्मुहूर्त कम सत्तर कोड़ाकोडि सागरोपम प्रमाण हैं। सोलह कपार्योका जस्थिविसकर्म और अस्थितियां परिपूर्ण चालीस कोड़ाकोडि सागरोपम प्रमाण है। नौ नोकपायोंका जस्थितिसत्कर्म और १ अ.फाप्रत्योः 'विसेसाण', ताप्रती [वि.] सेसा' इति पाठः । २ तामती 'पयदिसंकम (मंत मग्गा' इति पाठः। ३ अप्रती 'पडिग्याओ' इति पाठः। ४ अ-कामयोः 'परिवनाओ' इति पाठः । ५ प्रतियु 'महिदीओ' इति पाठः ।

अप्पाबहुआणियोगदारे ठिदिसंतकम्मपमाणाणुगमो ५२९ जं विदिसंतकम्मं जाओ द्विदीओ च चत्तालीसं सागरोवमकोडाकोडीओ आवलियूणाओ। देव-णिरयाउआणं जं द्विदिसंतकम्मं तेत्तीसं सागरोवमाणि पुव्यकोडीए तिभाएण- भहियाणि, जाओ द्विदीओ तेत्तीसं सागरोवमाणि पडिवुण्णाणि । मणुस-तिरिक्खाउआणं जं द्विदिसंतकम्म तिणिपलिदोवमाणि पुचकोडीए तिभाएणभहियाणि, जाओ द्विदीओ तिणिपलिदोवमाणि पडिवुण्णाणि । णिरयगह - तिरिक्खगइ -पंचिंदियजादि -ओरालिय-वेउब्धिय-तेजा-कम्मइयसरीर- तप्पाओग्गअंगोवंग-बंधण-संघाद - असंपत्तसेवट्टसंघडण - हुंडसंठाण-वण्ण-गंध-रस-फास- णिरयाणुपुन्धि - अगुरुगलहुग- उबघाद-परघाद-आदावुजोव-उस्सास-अप्पसत्थविहायगइ- तस-थावर-बादर-पजत्त-पत्ते यसरीर -अथिर - असुभ-दूभग - दुस्सर-अणादेज- अजसकित्ति- णिमिणणामाणं जं द्विदिसंतकम्मं जाओ द्विदीओ च वीसं सागरोवमकोडाकोडीओ पडिवुण्णाओ । णवरि णिरयगइ-तिरिक्खगहणामाणं तप्पाओग्गजादि-आणुपूधिणामाणं च एइंदिय-ओरालिय- तप्पाओग्गअंगोवंग-बंधण - संघादणामाणं असंपत्तसेवट्टसंघडण- आदाव-थावरणामाणं च उक्कस्सयंज हिदिसंतकम्मं वीसं सागरोवमकोडाकोडोओ पडि- वुण्णाओ, जाओ द्विदीओ समऊणाओ। मणुसगइ-जादि-पंचसंठाण-पंचसंघडण-थिर- सुह- सुहग-सुस्सर-आदेज-जसकित्तीणं जं विदिसंतकम्मं जाओ द्विदीओ च वीसं सागरो- वमकोडाकोडीओ आवलियूणाओ । मणुस्साणुपुन्वि-सुहुम-अपजत्त-साहारणाणं जं द्विदि- जस्थितियां आवलीसे हीन चालीस कोड़ाकोडि सागरोपम प्रमाण हैं। देवायु और नारकायुका जस्थितिसत्कर्म पूर्वकोटिके तृतीय भागसे अधिक तीस सागरोपम तथा जस्थितियां परिपूर्ण तेतीस सागरोपम मात्र हैं। मनुष्यायु और तिर्यगायुका जस्थितिसत्कर्म पूर्वकोटिके त्रिभागसे अधिक तीन पल्योपम तथा जस्थितियां परिपूर्ण तीन पल्योपम प्रमाण हैं। नरकगति, तिर्यग्गति, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक, वैक्रियिक, तैजस व फार्मण शरीर तथा तत्प्रायोग्य आंगोपांग, बन्धन व संघात, असंप्राप्तास्पाटिकासंहनन, हुण्डसंस्थान, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, नारकानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास, अप्रशस्त विहायोगति, बस, स्थावर, वादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशकीर्ति और निर्माण; इन नामकर्मोका जस्थितिसत्कर्म और जस्थितियां परिपूर्ण चीस कोड़ाकोडि सागरोपम मात्र है । विशेपता इतनी है कि नरकगति व तिर्यग्गति नामको, तत्प्रायोग्य जाति एवं आनुपूर्वी नामकर्मों, तथा एकेन्द्रिय जाति, औदारिकशरीर एवं तत्प्रायोग्य अंगोपांग, वन्धन और संघात नामकर्मोका, तथा असंप्राप्तासपाटिकासंहनन, आतप और स्थावर नामकोका जस्थितिसत्कर्म परिपूण वीस कोड़ाकोड़ि सागरोपम तथा जस्थितियां एक समय फम बीस कोड़ाकोडि सागरोपम मात्र हैं। मनुष्यगति, तत्प्रायोग्य जाति, पांच संस्थान, पांच संहनन, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय और यशकीर्तिका जस्थितिसत्कर्म और जस्थितियां आवलीसे हीन वीस कोडाकोड़ि सागरोपम मात्र हैं। मनुष्यानुपूर्वी, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणशरीरका जस्थिति- १ अ-फाप्रत्योः 'पुचकोडीओ' इति पाठः । २ ताप्रती 'बादर-पत्यसरी' इति पाठः । ३ अ.फामत्योः 'जाओ हिदीओ हिदिसतफम्मच इति पाठः । छ, से, ६७ - उत्कृष्ट .

५३० छक्खंडागमे संतकम्म संतकम्मं वीसं सागरोवमकोडाकोडीओ' आवलिऊणाओ, जाओ द्विदीओ चीसं सागरो- वमकोडाकोडीओ समयाहियाए आवलियाए ऊणाओ । जहा मणुसगइणामाए तहा पसत्यविहायगइणामाए । आहारणामाए अंतोकोडाकोडीओं, जाओ द्विदीओ सम- ऊणाओ। एवं तित्थयरस्स वि । उच्चागोदस्स जाओ द्विदीओ जंडिदिसंतकम्मं च वीसं सागरोवमकोडाकोडीओ आवलिऊणाओ। णीचागोदस्स वीसं सागरोवमकोडाकोडीयो पडिवुण्णाओ । एवमुफस्स- द्विदिसंतकम्म ससत्तं । जहण्णहिदिसंतकम्मपमाणाणुगमो। तं जहा- पंचणाणावरण-चउर्दसणावरण- सादासाद-सम्मत्त-लोहसंजलण-दोवेद-आउचउक-मणुसगइ-जादि-तस-वादर-पजत्त-जस- कित्ति-सुभग-आदेज-तित्थयर-पंचंतराइय-उच्चागोदाणं जहण्णहिदिसंतकम्मं एयसमय- हिदियं एया द्विदी। पंचदंसणावरण-मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्त-वारसकसायाणं जहण्णयं विदिसंतकम्मं दुसमयकालद्विदियं एया द्विदी । मायासंजलणाए जं द्विदिसंतकम्मं अद्ध- मासो दोहि आवलियाहि समऊणाहि ऊणो, जाओ द्विदीओ अंतोमुहत्तूणअद्धमासमेत्ताओ। माणसंजलणाए जंहिदिसंतकम्मं मासों दोहि आवलियाहि समऊणाहि ऊणओ," जाओ सत्कर्म आवलीसे हीन वीस कोड़ाकोड़ि सागरोपम तथा जस्थितियां एक समय अधिक आवलीसे हीन बीस कोड़ाकोडि सागरोपम प्रमाण हैं । प्रशस्त विहायोगति नामकर्मका अद्धाछेद मनुष्यगति नामकर्म के समान है। आहारशरीर नामकर्मका जस्थितिसत्कर्म अन्तःकोडाकोडि सागरोपम और जस्थितियां एक समय कम अन्तःकोड़ाकोड़ि सागरोपम मात्र हैं। इसी प्रकार तीर्थकर प्रकृतिकी भी प्ररूपणा है। उच्चगोत्रकी जस्थितियां और जस्थितिसत्कर्म आवलीसे हीन वीस कोड़ाकोड़िसागरोपम मान है। नीचगोत्रका जस्थितिसकर्म और जस्थितियां परिपूर्ण वीस फोडाकोडि सागरीपम मात्र हैं। इस प्रकार उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म समाप्त हुआ। जघन्य स्थितिसत्कर्मप्रमाणानुगमकी प्ररूपणा करते हैं। यथा- पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, साता व असाता वेदनीय, सम्यक्त्व, संज्वलन लोभ, दो वेद, चार आयुकर्म, मनुष्यगति, तत्प्रायोग्य जाति, स, वादर, पर्याप्त, यशकीर्ति, सुभग, आदेय, तीर्थकर, पांच अन्तराय और उच्चगोत्र; इनका जघन्य स्थितिसत्कर्म एक समय स्थिति रूप एक स्थिति मात्र है पांच दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व ओर बारह कपायोंका जघन्य स्थितिसत्कम दो समय काल स्थितिवाली एक स्थिति रूप है। संज्यटन मायाका जघन्य स्थितिस कर्म एक समय कम दो आवलियोंसे होन आधा मास तथा जस्थितियां अन्तमुहर्त कम आधा मास प्रमाण हैं। संज्वलन मानका जघन्य स्थितिसत्कर्म एक समय फम दो आवलियोंसे हीन एक मास तथा १ ताग्रतावतोऽग्रेऽग्रिम 'कोटाकोडीओ' पर्यन्तः पाठन्त्रुटितोऽस्ति । २ तामतावतोऽने जाओ हिदी। जहा मगुनगइगामार तहा पसत्यविहागणामाए अंतो कोटाकोडीओ' इत्यधिकः पाठः समुपलभ्यते । १ . काप्रयोः 'दोहि', तामती 'दोहि (लोह)' इति पाठः । ४ अप्रती 'टो माया' इति पाटः । ५ मतामयोः 'ऊनाओ' इति पाठः अंपावहुआणियोगद्दारे ठिदिसंतकम्मसामित्तं ५३१ द्विदीओं अंतोमुहुत्तूणमासमेत्ताओ' । कोधसंजलणाए जं हिदिसंतकम्मं दो मासा दोहि आवलियाहि समऊणाहि ऊणा, जाओ द्विदीओ अंतोमुहुत्तणदोमासमेत्ताओ। पुरिस- वेदस्स जं द्विदिसंतकम्मं अहवस्साणि दोहि आपलियाहि सम [ऊणाहि] ऊणाणि, जाओ द्विदीओ अट्टवस्साणि अंतोमुहुत्तूणाणि । छण्णोकसायाणं जाओ द्विदीओ जंहिदोओ च संखेजाणि वस्साणि। णिरयगइ-तिरिक्खगइ-देवगइ- तप्पाओग्गजादि - आणुपुन्धि - मणुसगइ-पाओग्गाणु- पुब्धि-पंचसरीर-तदंगोवंग-बंधण-संघाद-छसंठाण- छसंघडण-घण्ण-गंध-रस-फास-अगुरुग- लहुग-उवघाद-परघाद-उस्सास-आदावुजोव-दोविहायगइ - थावर- सुहुम-अपजत्त-पत्तेय- साहारणसरीर-थिराथिर - सुहासुह-दूभग - दुस्सर-अणादेज-अजसकित्ति-णिमिण - णीचा- गोदाणं जहण्णयं हिदिसंतकम्मं दुसमयकालद्विदियं एक्किरसे हिदीए । एवं पमाणाणु- गमो समत्तो। सामित्तं । तं जहा- पंचणं णाणावरणीयाणं उक्कस्सद्विदिसंतकम्मं कस्स ? णियमा उक्कस्सियं द्विदि बंधमाणस्स। एवं दसणावरणच उक्कस्स । पंचण्णं दंसणा- वरणीयाणं उक्कस्सयं द्विदिसंतकम्मं कस्स ? जो उक्कस्सियं द्विदि बंधदि जो च समऊणं वेदयदि । सादस्स उकस्सविदिसंतकम्म कस्स ? असादउकास्सविदिसंतकम्म जस्थितियां अन्तर्मुहूर्त कम एक मास मात्र हैं। संज्वलन क्रोधका जघन्य स्थितिसत्कर्म एक समय कम दो आवलियोंसे हीन दो मास तथा जस्थितियां अन्तर्मुहूतै कम दो मास मात्र हैं। पुरुपवेदका जघन्य स्थितिसत्कर्म एक समय कम दो आवलियोंसे हीन आठ वर्प और जस्थितियां अन्तर्मुहूर्त कम आठ वर्ष मात्र हैं। छह नोकषायोंकी जस्थितियां और जघन्य स्थितिसत्कर्म संख्यात वर्ष मात्र है। नरकगति, तिर्यग्गति, देवगति तथा तन्प्रायोग्य जाति व आनुपूर्वी नामकर्म, मनुष्यगति, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, पांच शरीर, तीन आंगोपांग, पांच बन्धन, पांच संघात, छह संस्थान, छह संहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, आतप, उद्योत, दो विहायोगतियां, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, प्रत्येकशरीर, साधारणशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशकीर्ति, निर्माण और नीचगोत्र; इनका जघन्य स्थितिसत्कर्म दो समय काल स्थितिवाली एक स्थिति रूप है । इस प्रकार प्रमाणानुगम समाप्त हुआ। स्वामित्व अधिकार प्राप्त है। यथा-पांच ज्ञानावरणीय प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह नियमसे उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवाले के होता है। इसी प्रकार चार दर्शनावरणीय प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म जानना चाहिये। निद्रा आदि पांच दर्शना- वरणीय प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? जो जीव इनकी उत्कृष्ट स्थितिको बांधता है और जो एक समय कम उसका वेदन करता है। सातावेदनीयका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह असातावेदनीयके उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्मका संक्रम करनेवाले सातावेदक - १ ताप्रती 'द्विदीओ मासमेताओ' इति पाठः ।

५३२ छक्खंडागमे संतकम्म संकातस्स सादावेदयस्स । असादस्स उकस्सहिदिसंतकम्मं कस्स ? असादवेदयस्स तस्सेव उक्कस्सियं हिदि बंधमाणस्स । मिच्छत्त-सोलसकसायाणं उकस्सविदिसंतकम्मं कस्स ! पयडिवेदयस्स उक्कस्सियं द्विदि बंधमाणस्स । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं उकस्सयं हिदिसंतकम्मं कस्स ? उक- स्सियाए सम्मत्तद्विदीए सह पढमसमयसम्माइहिस्स । हस्स-रदि-अरदि-सोग-भय-दुगुंछा- तिण्णिवेदाणमुक्कस्सयं द्विदिसंतकम्मं कस्स १ अप्पिदपयडिं बंधंतो वेदयंतस्स कसायाण- मुक्कस्सद्विदि णोकसायाण संकातस्स । णिरय-देवाउआणं उकस्सहिदिसंतकम्मं कस्स ? पुन्चकोडीए तिभागस्स पढमसमए उक्कस्सहिदि बंधमाणस्स । जाओ द्विदीओ उक्कस्सियाओ कस्स ? उक्कस्सियं द्विदि बंधिदूण जाव पढमसमयतब्भवत्थो त्ति ताव । एवं मणुस्स-तिरिक्खाउआणं । णिरयगइणामाए उकस्सयं द्विदिसंतकम्मं कस्स ? उक्कस्सियं द्विदि बंधमाणयस्स। उकस्सियाओ जाओ द्विदीओं कस्स ? तस्स चेव वा, उक्कस्सियं द्विदि चंधिदृणुववण्ण- पढमसमए णेरइयस्स वा । तिरिक्खगइणामाए उक्कस्सियं द्विदिसंतकम्मं कस्स ? देवस्स णेरइयस्स चा उक्कस्सियं द्विदि बंधमाणयस्स । जाओ द्विदीओ उक्कस्सियाओं कस्स ? जीवके होता है । असातावेदनीयका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह उसकी ही उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवाले असातावेदक जीवके होता है। मिथ्यात्व और सोलह कपायोंका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह विवक्षित प्रकृतिका वेदन करते हुए उसकी उत्कृष्ट स्थितिको वांधनेवाले जीवके होता है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह सम्यक्त्वकी उत्कृष्ट स्थितिके साथ प्रथम समयवर्ती सम्यग्दृष्टिके होता है। हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा और तीन वेद; इनका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह विवक्षित प्रकृतिको बांधकर वेदन करते हुए कपायोंकी उत्कृष्ट स्थितिको नोकपायोंमें संक्रान्त करनेवालेके होता है। नारकायु और देवायुका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह पूर्वकोटिके तृतीय भागके प्रथम समयमें उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवालेके होता है। उनकी उत्कृष्ट जस्थितियां किसके होती हैं ? वे उस्कृष्ट स्थितिको बांधकर जब प्रथम समयवर्ती तद्भवस्थ होता है तब हाती हैं। इसी प्रकार मनुष्यायु और तिर्यगायुकी प्ररूपणा करना चाहिये। नरकगति नामकर्मका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है? वह उसकी उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवालेके होता है। उसकी उत्कृष्ट जस्थितियां किसके होती है ? उसके ही होती अथवा उत्कृष्ट स्थितिको बांधकर उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें नारकी जीयक होती हैं। तियग्गति नामकर्मका उत्कृष्ट स्थितिसकर्म किसके होता है ? उसकी उत्कृष्ट स्थितिको वांधनेवाले देव अथवा नारकोके उसका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म होता है। उसकी उत्कृष्ट जस्थितियां १ अ-काप्रत्योः 'उत्सव' इति पाठः । २ अ-कामयोः 'कस घमागयरस'इति पाटः । ३ अ.कामन्यो मोपसम्पते पदामियन् | ४ तामती 'सकास्सियामो हिदीओ जाओ' इति पाठः ।

13 अप्पाघहुआणियोगद्दारे ठिदिसंतकम्मसामित्तं ५३३ तस्स चेव वा देवस्स उकस्सियं द्विदि बंधिण एइंदिएसु उववण्णस्स पढमसमय- तम्भवत्थरस वा, देव-पोरइयपच्छायदपंचिंदियतरिक्खस्स वा । मणुसगइणामाए उक्कस्सियं हिदिसंतकम्मं कस्स १ मणुसगई बंधमाणस्स उकस्सहिदि संकामयस्स मणुस्सस्स । उक्कस्सियाओ जाओ द्विदीओ कस्स १ एरिसस्स चेव मणुस्सस्स । देवगइणामाए उक्कस्सयं हिदिसंतकामं कस्स ? देवगई बंधमाणस्स उकस्साहिदिसंकामगस्स । जाओ द्विदीओ एरिसस्सेव । एवं जादिणामाणं । वेउब्धियसरीरणामाए णिरयगइभंगो । णवरि समऊणं ण होदि । ओरालियसरीरणामाए तप्पाओग्गवंधण-संघादाणं च तिरिक्खगइभंगो । ओरालियसरीरअंगोवंग-असंपत्तसेवट्टसंघडणाणं उक्कस्सयं हिदिसंतकम्मं कस्स ? गेरइयस्स सणकुमार-माहिंददेवस्स वा उकस्सियं द्विदि बंधमाणस्स । एदेखि दोणं कम्माणं जाओ द्विदीओ उक्कस्सियाओ कस्स ? एदेसिं चेव देव-णेरइयाणं तप्पच्छायदस्स पढम- समयतिरिक्खस्स वा। पंचसंठाण-पंचसंघडणाणं उक्कस्सियं द्विदिसंतकम्मं कस्स ? एदासि पयडीणं बंधमाणस उक्कस्सियंद्विदिसंकमे वट्टमाणस्स । जाओ द्विदीओ उकास्सियाओ कस्स एदस्स चेव । णवरि अप्पिदपयडीए वेदओ कायन्यो । हुंडसंठाणस्स उकस्सहिदिसंतकम्म किसके होती हैं ? वे उसके ही होती हैं, उत्कृष्ट स्थितिको वांधकर एकेन्द्रियों में उत्पन्न हुए प्रथम समयवर्ती तद्भवस्थ देवके होती हैं, अथवा देव-नारकियों में से पीछे आये हुए पंचेन्द्रिय तियंचके होती हैं । मनुष्यगति नामकर्मका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह मनुष्यगतिको बांधते हुए उसकी उत्कृष्ट स्थितिको संक्रान्त करनेवाले मनुष्यके होता है। उसकी उत्कृष्ट जस्थितियां किसके होती हैं ? वे ऐसे ही मनुष्यके होती हैं। देवगति नामकर्मका उत्कृष्ट स्थिति- सत्कर्म किसके होता है ? देवगतिको बांधते हुए उसकी उत्कृष्ट स्थितिका संक्रम करनेवाले के उसका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म होता है। ऐसे ही जीवके उसकी उत्कृष्ट जस्थितियां होती हैं। इसी प्रकारसे जाति नामकर्मोकी प्ररूपणा करना चाहिये । क्रियिकशरीर नामकमकी प्ररूपणा नरकगतिके समान है। विशेष इतना है कि यहां एक समय कम नहीं है। औदारिक- शरीर और तत्प्रायोग्य वन्धन व संघात नामकर्मोकी प्ररूपणा तिर्यग्गतिके समान है । औदारिक- शरीरांगोपांग और असंप्राप्तासृपाटिकासंहननका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवाले नारकी अथवा सनत्कुमार व माहेन्द्र कल्पवासी देवके होता है। इन दोनां कर्मोंकी उत्कृष्ट जस्थितियां किसके होती है। वे इन्हीं देव-नारकियोंके अथवा उनमेंसे पीछे आये हुए प्रथम समयवर्ती तिर्यचके होती है। पांच संस्थान और पांच संहनन नामकर्मीका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह इन प्रकृतियोंको घांधते हुए उत्कृष्ट स्थितिसंकसमें धर्तमान जीवके होता है। उनकी उत्कृष्ट जस्थितियां किसके होती है? वे इसी जीवके होती हैं । विशेप इतना है कि विवक्षित प्रकृतिका वेदफ फरना चाहिये । हुण्डासंस्थानका उत्कृष्ट १ ताप्रती 'उपासप हिदि इति पाठः। २ भ-काप्रत्योः 'मणुत्स' इति पाठः । तातो 'सफरिस इति पाठः।

छक्खंदागमें संतकम्म कस्स ? गेरइयेतिरिक्ख-मणुसस्स उत्तरविउविददेवस्स वा । सन्यासि धुवयंधिपयडीणं णाणावरणभंगो। तिण्णमाणुपुचिणामाणं उकस्सयं हिदिसंतकम्मं कस्स ? आणुपुषिणामाए अप्पिदाए बंधमाणस्स उकस्सहिदिसंकामयस्स ! जाओ द्विदीओ उक्कस्सियाओ कस्स ? एदस्स चेव । णवरि तिरिक्खाणुपुब्धिणामाए उक्कस्सियं द्विदि बंधयाणस्स । णिरयाणुपुब्धिणामाए उकस्सयं ट्टिदिसंतकम्म कस्स ? उकस्सयं द्विदि वंधमाणस्स | जाओ द्विदीओ कस्स ? एदस्स चे विग्गहगदीए वट्टमाणस्स पढमसमयणेरड्यस्स या । उस्सास-तस-वादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीराणमुकास्सयं द्विदिसंतकम्मं जाओ हिदीओ च कस्स ? जस्स वा तस्स वा तसकाइयस्स उकस्सहिदि बंधमाणस्स। उजोवणामाए उकस्सयं जं हिदिसंतकम्मं जाओ द्विदीओ च कस्स ? देवस्स उज्जोवणामाए वेदयस्य उकस्सहिदि बंधमाणस्स । आदाव-थावरणामाए उकस्सयं जं विदिसंतकम्म कस्स ? सोहम्मदेवस्स ईसाणदेवस्स चा उकस्सयं द्विदि बंधमाणस्स जाओ द्विदीओ उकस्सियाओ कस्स १ एरिसस्सेव । णवरि थावरणामाए देवपच्छायद- पढमसमयएइंदियस्स सोहम्मीसाणदेवस्स वा । एदेण वीजपदेण सेसपयडीणं पि सामित्तं स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह नारकी, तिथंच, मनुष्य और उत्तर शरीरकी विक्रियायुक्त देवके होता है। सब ध्रुवबन्धी प्रकृतियोंकी प्ररूपणा ज्ञानावरणके समान है। तीन आनुपूर्वी नामकोका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह विविक्षित आनुपूर्वी नामकर्मको बांधनेवाले उत्कृष्ट स्थिति संक्रामकके होता है। इनकी उत्कृष्ट जस्थितियां किसके होती हैं ? वे इसीके होती हैं। विशेप इतना है कि तिर्यगानुपूर्वी नामकर्मकी उत्कृष्ट जस्थितियां उसकी उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवाले जीवके होती हैं । नारकानुपूर्वी नामकमका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह उसकी उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवालेके होता है। उसकी जस्थितियां किसके होती हैं.? वे विग्रहगति में वर्तमान इसीके अथवा प्रथम समयवर्ती नारकी जीवके होती हैं। उच्छ्यास, बस, बादर, पर्याप्त और प्रत्येकशरीर नामकाँका उत्कृष्ट स्थितिसत्वर्म और जस्थितियां किसके होती है ? वे इनकी उत्कृष्ट स्थितिको वांधनेवाले जिस किसी भी उसकायिक जीवके होती है। उद्योत नामकर्मका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म और जस्थितियां किसके होती हैं? वे उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवाले उद्योत नामकर्मके वेदक देवके होती हैं। आतप और स्थावर नामकर्मका उत्कृष्ट जस्थितिसत्कर्म किसके होता है ? यह इनकी उत्कृष्ट स्थितिको बांधनेवाले सौधर्म और ऐशान फाल्पवासी देवके होता है। इनकी उत्कृष्ट जस्थितियां किसके होती हैं? वेसे ही जीवके होती हैं। विशेष इतना है कि स्थायर नामकर्मकी जस्थितियां देवों में से पीछे आये हुए प्रथम समयवर्ती एकेन्द्रिय जीवके अथवा सौधर्म ऐशान फल्पवासी देवके होती है। इस वीज. १ तामती धात्मट्टिदिसंत कामं तय इति पाठः 1२ फायती 'यामि टिदित इति पाठः । ३.कामयोः 'उमरस हिदि घरमा ति पाठः।

अप्पावहुआणियोगदारे ठिदिसंतकम्मसामितं ५३५ वत्तव्यं । एवमुक्कस्सविदिसंतकम्मसामित्तं समत्तं । जहण्णाडिदिसंतकम्मसामित्तं कस्सामो । तं जहा-पंचणाणावरण-चउर्दसणावरण- पंचतराइयाणं जहण्णयं द्विदिसंतकसं कस्स ? चरिमसमयछदुमत्थस्स । णिद्दा-पयलाणं जह० कस्स ? दुचरिमसमयछदुमत्थस्स । थीणगिद्धितियस्स जह० कस्स ! अणियट्टि- करणे वट्टमाणस्स थीणगिद्वितियं संछुहिय समऊणावलियमइकंतस्स । सादासादाणं जहण्णहिदिसंतकम्मं कस्स ? चरिमसमयभवसिद्धियस्स अप्पिद- पयडिवेदयस्स । मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्त-वारसकसायाणं जह० कस्स ? अप्पिदकम्मसु संछुद्धेसु समऊणावलियमइकंतस्स । सम्मत्त-लोहसंजलणाणं जहण्णहिदिसंतकम्मं कस्स ? खवयस्स सम्मत्त-लोहसंजलणाणं चरिमसमयवेदस्स । तिण्णिसंजलण-पुरिसवेदाणं जह० कस्स ? खत्रयस्स संछुद्धासु पयडीसु समऊणदोआवलियं गदस्स। इत्थि-णसय- वेदाणं जह० कस्स ? खवयरस चरिमसमयवेदयस्स । मणुस-तिरिक्खाउआणं जह० कस्स ? जस्स णस्थि तदाउअबंधों तस्स चरिम- पदसे शेप प्रकृतियों के भी स्वामित्वकी प्ररूपणा करना चाहिये। इस प्रकार उत्कृष्ट स्थिति- सत्कर्मका खामित्व समाप्त हुआ। जघन्य स्थितिसत्कर्म के स्वामित्वका कथन करते हैं। यथा-- पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तरायका जघन्य स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह अन्तिम समयवर्ती छद्मस्थ जीवके होता है। निद्रा और प्रचलाका जघन्य स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह द्विचरम समयवर्ती छद्मस्थ जीवके होता है। स्त्यानगृद्धि आदि तीनका जघन्य स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह अनिवृत्तिकरणमें वर्तमान जीवके होता है जिसने कि स्त्यानद्धित्रिकका निक्षेप करके एक समय कम आवली कालको विताया है। साता और असाता वेदनीयका जघन्य स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह विवक्षिव प्रकृतिका वेदन करनेवाले अन्तिम समयवर्ती भव्यसिद्धिक जीवके होता है। मिथ्यात्व, सम्य. ग्मिथ्यात्व और बारह झपायोंका जघन्य स्थितिसत्कर्स किसके होता है ? विवक्षित कमों के निक्षिप्त हो जानेपर जिसने एक समय कम आवली कालको विता दिया है उसके उनका जघन्य स्थिति- सत्कर्म होता है। सम्यक्त्व प्रकृति और संज्वलन लोभका जघन्य स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह ऐसे क्षपक जीवके होता है जो सम्यक्त्व और संज्वलन लोभका अन्तिम समयवर्ती वेदक होता है। शेप तीन संज्वलन और पुरुपवेदका जघन्य स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह उस रूपक जीवके होता है जो इन प्रकृतियोंके निक्षिप्त हो जानेपर एक समय कम दो आवलियों को विता चुका है। स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका जघन्य स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? यह उस क्षपक जीवके होता है जो इनका अन्तिम समयवर्ती वेदक है। मनुष्यायु और तिर्यगायुका जघन्य स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? जिसके उन आयुओंका वन्ध नहीं हो रहा है उस अन्तिम समयवर्ती तद्भवस्थके उक्त दोनों आयु काँका जघन्य १ अप्रती 'समऊगादो' इति पाठः । २ मप्रतिपाठोऽयम् । अ-का-ताप्रति 'तदायो' इति पाठः ।

५३६ क्खंडागमे संतकम्म - समयतव्भवत्थस्स । देव-णिरयाउआणं जहण्णहिदिसंतसम्म कस्स ? चरिमसमय- तभरत्थस्स । णिरयगइ-तिरिक्खगइ - तप्पाओग्गजादि - णिरयगइ-तिरिक्खगइपाओग्गाणुपुचि- आदाधुजोर-थावर-सुहुम-साहारणसरीराणं जह• कस्स ? संछोहणादो समयूणमायलिय गदस्त । मणुसगइ-पंचिंदियजादि-तस -बादर-पजत्त-जसकित्ति- सुभग-आदेज-तित्थयर- णामाणं जह० कस्स ? चरिमसमयभवसिद्धियस्सः । सेसाणं णामाणं णीचागोदरस य जहण्णविदिसंतकम्म कस्स ? दुचरिमसमयभवसिद्धियस्स । उच्चागोदस्स चरिमसमय- भवसिद्धिया सामी । एवं सामित्तं समत्तं । एयजीवेण कालो अंतरं, णाणाजीवेहि भंगविचओ कालो अंतरं सण्णियासो च सामित्तादो साहेदूण भाणियब्यो । एत्तो अप्पाबहुअं । तं जहा उकस्सए पयदं । मणुस्साउअस्स तिरिक्खाउअस्स य जाओ द्विदीओ ताओ थोवाओ । जं हिदिसंतकम्म विसेसाहियं । देव-णिरयाउआणं जाओ द्विदीओ संखेजगुणाओ। जं हिदिसंतकम्मं विसेसाहियं । आहारसरीरणामाए जाओ द्विदीओ ताओ संखे० गुणाओ। जंटिदिसंतकम्म विसे साहियं । देवगइणामाए जाओ हिदीओ ताओ संखे० गुणाओ । जं हिदिसं० विसे० । मणुसगइ-उच्चागोद-जसकित्तीणं स्थितिसत्कर्म होता है । देवायु और नारकायुका जघन्य स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह अन्तिम समयवर्ती तद्भवस्थ देव और नारकीके होता है। नरकगति, तिर्यग्गति, तत्प्रायोग्य जाति, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिचंगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारणशरीरका जघन्य स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? इनका निक्षेप करने के पश्चात् जिसने एक समय कम आवली कालको विता दिया है उसके उनका जघन्य स्थितिसत्कर्म होता है । मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, नस, बादर, पर्याप्त, यशकीर्ति, सुभग, आदेव और तीर्थंकर इन नामकोका जघन्य स्थितिसत्कर्म किसके होता है ? वह अन्तिम समयवर्ती भव्यसिद्धिक जीवके होता है। शेप नामकर्मोका और नीचगोत्रका जघन्य स्थिति- सत्कर्म किसके होता है ? वह द्विचरम समयवर्ती भव्यसिद्धिक जीवके होता है। उयगोत्र के जघन्य स्थितिसत्कर्म के स्वामी अन्तिम समयवर्ती भव्यसिद्धिक जीव होते हैं । इस प्रकार स्वामित्व समाप्त हुआ। एक जीवकी अपेक्षा काल और अन्तर तथा नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय, काल, अन्तर और संनिकर्पका कथन स्वामित्वसे सिद्ध करके करना चाहिये। वहां अल्पवहुत्व । यथा- उत्कृष्ट अल्पबहुत्यका प्रकरण है। मनुष्यायु और नियंगायुको जस्थितियां स्तोक हैं। उनका जस्थितिसत्कर्म विशेप अधिक है। दवायु और नारकायु- की जस्थितियां संख्यातगुणी हैं। जस्थितिसत्कम विशेष अधिक है। आहारशरीर नामकर्मकी जस्थितियां संख्यातगुणी हैं। जस्थितिसत्कर्म विशेष अधिक है। देवगति नामकमकी जस्थितियां संख्यातगुणी हैं। जस्थितिसत्कर्म विशेष अधिक है। मनुष्यगति, उद्योग और अप्पावहुआणियोगदारे ठिदिसंतकम्मप्पाबहुअं ५३७ जाओ द्विदीओ ' हिदिसंतकम्मं च तत्तियं चेव । णिरयगइ-तिरिक्खगइ-ओरा- लियसरीराणं जाओ द्विदीओ ताओ विसेसाहियाओ। एदेसिं चेव कम्माणं जं विदि- संतकम्मं तेजा-कम्मइय-अजसगित्ति-णीचागोदाणं जाओ द्विदीओ जं विदिसंतकम्मं च विसे० । सादस्स जाओ द्विदीओ जंडिदिसंतकम्मं च दो वि तुल्लाणि विसेसाहियाणि । पंचण्हं दसणावरणीयाणं जाओ द्विदीओ ताओ विसेसाहियाओ । एदेसिं जं विदिसंतकम्म सेसाणं तीसियाणं जाओ द्विदीओ जं द्विदिसंतकम्मं च तुलं विसेसाहियं । णोकसायाणं जाओ द्विदीओ जं द्विदिसंतकम्मं च विसे० । सोलसकसायाणं जाओ द्विदीओ जं हिदि- संतकम्मं च तुल्लं विसे० । सम्मामिच्छत्तस्स जाओ द्विदीओ ताओ विसे० । एदस्स चेव जं द्विदिसंतकम्मं सम्मत्तस्स जाओ द्विदीओ जं हिदिसंतकम्मं विसे० । मिच्छत्तस्स जाओ द्विदीओ जं द्विदिमंतकम्मं विसेसाहियं । एवमोघुक्कस्सटिदिसंतकम्मदंडओ समत्तो । एदमणुमाणियगदीसु णेयध्वं । जहण्णए पयदं । तं जहा-पंचणाणावरण-वउदंसणावरण-सादासाद-सम्मत्त- लोहसंजलण-इत्थि-णमयवेद-आउचउक्क-मणुसगइ-जस कित्ति-उच्चागोद-पंचंतराइयाणं च जहणियाओ जाओ द्विदीओ जं.द्विदिसंतकम्मं तुलं थोत्रं । पंचदंसणावरणीय-मिच्छत्त- सम्मामिच्छत्त-वारसकसाय-तिमिणगइ-पंचसरीर-अजसकित्ति-णीचागोदाणं जाओ द्विदीओ यशकीर्तिकी जस्थितियां और जस्थितिसत्कर्म उतना मात्र ही है। नरकगति, तिर्यग्गति और औदारिकशरीरकी जो स्थितियां हैं वे विशेष अधिक है। इन्हीं कर्मोका जस्थितिसत्कर्म तथा तैजसशरीर, कार्मणशरीर, अयशकीर्ति और नीचगोत्रकी जस्थितियां एवं जस्थितिसत्कर्म विशेप अधिक है। सातावेदनीयकी जस्थितियां और जस्थितिसत्कर्म दोनों ही तुल्य व विशेप अधिक है। पांच दर्शनावरणीय प्रकृतियोंकी जो स्थितियां हैं वे विशेष अधिक है। इनका जस्थिति- सत्कर्म तथा शेष तीस कोड़ाकोडि सागरोपम स्थितिवाले कर्मोकी जस्थितियां और जस्थितिसत्कर्म तुल्य व विशेष अधिक है। नोकषायोंकी जस्थितियां और जस्थितिसत्कर्म विशेप अधिक है। सोलह कपायोंकी जस्थितियां और जस्थितिसत्कर्म तुल्य व विशेष अधिक है । सम्यग्मिथ्यात्वको जो स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं। इसीका जस्थितिसत्कर्म और सम्यक्त्व प्रकृतिकी जस्थितियां व जस्थितिसत्कर्म विशेप अधिक है । मिथ्यात्वको जस्थितियां और जस्थितिसत्कर्म विशेष अधिक है। इस प्रकार ओघ उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्मदण्डक समाप्त हुआ । इसी प्रकारसे अनुमानित गतियों में ले जाना चाहिये। अव जघन्य अल्पबहुत्वका प्रकरण है। यथा- पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, साता व असाता वेदनीय, सम्यक्त्व, संज्वलन लोभ, स्लोवेद, नपुंसफवेद, चार आयु, मनुप्यगति, यशकीर्ति, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इनकी जघन्य जस्थितियां और जस्थितिसत्कर्म तुल्य व स्तोक है। पांच दर्शनावरणीय, मिथ्यात्व, सम्यग्मिध्यात्व, बारह फपाय, तीन गति. पाच शरीर, अयशकीर्ति और नीचगोत्रको जस्थितियां उतनी मात्र ही हैं। इनका जस्थितिसत्कर्म १का-ताप्रत्योः 'जसफित्तीर्ण ज इति पाठः। से. छ. ६८ एक्खंडागमे संतकम्म तत्तियाओ चेव । जं विदिसंतकम्मं संखेजगुणं । मायासंजलणाए जाओ द्विदीओ ताओ असंखे० गुणाओ । जं विदिसंत० विसे० । माणसंजलणाए जाओ द्विदीओ ताओ विसे । जं हिदिसंत० विसे० । कोधसंजलणाए जाओ द्विदीओ ताओ विसे० । जं द्विदिसंत. विसे० । पुरिसवेद स्स जाओ द्विदीओ ताओ संखे० गुणाओ । जं विदिसंत० विसे । हस्स-रदि-अरदि-सोग-भय-दुगुंछोणं जाओ द्विदीओ ताओ संखेजगुणाओ । जं विदिसंत- कम्म विसेसाहियं । एवमोघजहण्णढिदिसंतकम्मदंडओ समत्तो। गदीसु वि जहण्णहिदिसंतकम्मअप्पावहुगं कायव्वं । तं जहा-णिरयगदीए सम्मत्तस्स जहण्णद्विदी थोवा, एगसमयकालए गहिदित्तादो । उव्वेल्लमाणियाणं जहण्ण- हिदी तत्तिया चेव । जं द्विदिसंतकम्मं संखेजगुणं । उवरि अप्पप्पणो जहण्णढिदिसंतकम्म- पमाणं जाणिदूण अप्पाबहुगं कायव्यं । एवं णिरयगइदंडओ समत्तो । जहा णिरयगदीए तहा इयरासु वि गदीसु णेयव्वं । भुजगारो पदणिक्खेवो वड्डी च एदाणि तिण्णि अणियोगद्दाराणि जहा द्विदिसंकमे णीदाणि तहा णेयव्याणि । एवं द्विदिसंतकम्मं समत्तं । अणुभागसंतकम्मे पुच्वं गमणिजा आदिफद्दयपरूवणा कीरदे। जहा- केवलणाणा- वरण-केवलदंसणावरण-णिहाणिद्दा-पयलापयला-थीणगिद्धि-णिद्दा-पयला - बारसकसायाणं संख्यातगुणा है। संज्वलन मायाकी जो स्थितियां हैं वे असंख्यातगुणी है। जग्थितिसत्कर्म विशेप अधिक है। संज्वलन मानकी जो स्थितियां हैं वे विशेष अधिक हैं। जस्थितिसत्कर्म विशेप अधिक है। संज्वलन क्रोधको जो स्थितियां हैं वे विशेप अधिक हैं। जस्थितिसत्कर्म विशेष अधिक हैं। पुरुपवेदकी जो स्थितियां हैं वे संख्यातगुणी हैं। जस्थितिसत्कर्म विशेष अधिक है। हास्य. रति, अरति, शोक, भय, और जुगुप्साकी जो स्थितियां हैं वे संख्यातगुणी हैं। इनका जस्थितिसत्कर्म विशेष अधिक है। इस प्रकार ओघ जघन्य स्थितिसत्कर्मदण्डक समाप्त हुआ। गतियों में भी जघन्य स्थितिसत्कर्मका अल्पवहुत्व करते हैं। यथा- नरफगति में सम्यक्त्वकी जघन्य स्थिति स्तोक है, क्योंकि, वह एक समय फालवाली एक स्थिति रूप है। उद्वेलित की जानेवाली प्रकृतियोंकी जघन्य स्थिति एतनी ही है। उनका जस्थितिसत्कर्म संख्यातगुणा है। आगे अपने अपने जघन्य स्थितिसत्कर्मके प्रमाणको जानकर प्रकृत अल्पबाटुत्वको फरना चाहिये । इस प्रकार नरकगतिदण्डक समाप्त हुआ। जिस प्रकार नरकगति में अल्पवहुत्व किया गया है उसी प्रकारसे अन्य गतियों में भी ले जाना चाहिये । भुजाकार, पदनिक्षेप और वृद्धि इन तीन अनुयोगद्वारोंको जैसे स्थितिसंक्रममें लिया गया है वैसे यहां भी ले जाना चाहिये । इस प्रकार स्थितिसत्कर्म समाप्त हुआ। अनुभागसत्कर्ममें सर्वप्रथम जतलाने योग्य आदि स्पर्धकांकी प्ररूपणा की जाती है । यथा-- केवलज्ञानावरण, केवलदर्शनावरण, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानद्धि, निद्रा, प्रचला और १ अप्रती हिदिसंकमेगा, ताप्रती 'हिदिमतकम्मे' इति पाटः ।

- अप्पाबहुआणियोगद्दारे अणुभागसंतकम्म ५३९ पदेसगं जहण्योण सव्वधादिफदायाणमादिवग्गणाए जुत्तं, उकस्सेण अप्पप्पणी उकस्साणुभागफदएण संजुत्तं। सम्मत्तस्स आदिफद्दयं देसघादीणमादिफहएण समाणं, उकस्सफद्दयं देमघादी। सम्मामिच्छत्तरस आदिफद्दयं सव्वधादिफयाणमादिफद्दएण समाणं, तस्सेब उकस्सफद्दयं दारुसमाणअणंतिमभागे जम्हि सम्मामिच्छत्तं समर्च। तदो अणंतरउवरिमफद्दयं मिच्छत्तस्स आदिफद्दयं होदि, उचाम्समप्पणो चरिमफयं । सेसाणं कम्माणमादिफद्दयं देसघादीणमादिकद्दएण समाणं, उक्कस्समप्पणो चरिमफदयं । एत्तो उपरि घादिसण्णा द्वाणसण्णा च कायव्या- उक्कस्साणुभागसंतकम्मस्स घादिसण्णा द्वाणसण्णा च सुगमा, पुव्वं परविदत्तादो । संपहि जहण्णाणुभागसंतकम्मस्स धादि-ट्ठाणसण्णाओ वत्तहस्सामो । तं जहा- मदि-सुदावरण-चक्खु-अचस्खुदंसणा- वरण-सम्मत्त-चदुसंजलण-तिण्णिवेद-पंचतराइयाणं जहण्णाणुभागसंतकम्मं देसघादि- एयवाणियं । ओहिणाणावरण-ओहिदंसणावरणाण पि जहण्णाणुभागसंतकम्मं देसघादि- एयवाणियं । मणपजवणाणावरणस्स जहण्णाणुभागसंतकम्मं देस धादि-दुढाणियं । वारह कपाय, इनका प्रदेशाग्र जघन्यतः सर्वघाति स्पर्धकोंकी आदि वर्गणासे युक्त तथा उत्कर्पतः अपने अपने उत्कृष्ट अनुभागस्पर्धकसे संयुक्त होता है । सम्यक्त्व प्रकृतिका आदि स्पर्धक देश- घातियोंके आदि स्पर्धकके सदृश तथा उत्कृष्ट स्पर्धक देशघाती होता है। सम्यग्मिथ्यात्वका आदि स्पर्धक सर्वघाति स्पर्धकोंके आदि स्पर्धकके समान होता है तथा उसीका उत्कृष्ट स्पर्धक दारु समान अनन्तं- भागमें अवस्थित है जहां सम्यग्मिथ्यात्व समाप्त होता है। उससे आगेका अनन्तर स्पर्धक मिथ्यात्वका आदि स्पर्धक होता है और उत्कृष्ट अपना अन्तिम स्पर्धक होता है। शेप फर्मोंका आदि स्पर्धक देशघातियोंके आदि स्पर्धकके समान तथा उत्कृष्ट अपना अन्तिम स्पर्धक होता है। आगे यहां घातिसंज्ञा और स्थानसंज्ञा की जाती है-उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मकी घातिसंज्ञा और स्थानसंज्ञा सुगम है, क्योंकि, उनकी प्ररूपणा पहिले की जा चुकी है। अब यहां जघन्य अनुभागसत्कमकी घाति और स्थान संज्ञाओंका कथन करते हैं । यथा- मतिज्ञानावरण, श्रुत- ज्ञानावरण, चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, सम्यक्त्व, चार संज्वलन, तीन वेद और पांच अन्तरायफा जघन्य अनुभागसत्कर्म देशघाति व एकस्थानिक है । अवधिज्ञानावरण और अधि- दर्शनावरणका भो जघन्य अनुभागसत्कर्म देशघाति व एकस्थानिफ है। मनःपर्ययज्ञानावरणका जघन्य अनुभागसत्कम देशघाति व द्विस्थानिक है । शेष सब फीका जघन्य अनुभागसत्कर्म (?) १ अ-काप्रत्योः 'सम्मत्त', ताप्रतौ 'सम्म (म) तं' इति पाठः । २ अ-काप्रत्योः 'मजायरइति पाठः । ३ संकमसममणुभागे नवरि जहन्नं तु देसघाईन । उसोकसावजाग (4) एमहामि देना ॥ मग्नागे दुटाणे देसहर सामिगो य सम्मत्ते | आवरण-विग्यसोलस-फिटिवेएसु य सगते । फा. प्र. ७, २१.२२.xxx नवरमय विशेषो यदुत देसघातिनीनो हात्यादिपकडितानां मति-स्तावधियानावण-भुचक्षुरवविदर्शनt- वरण-संज्वलनचतुष्टय वेवत्रिकान्तरायपंचकल्पागामष्टादशप्रकृतीनां जयन्यानुभागमाफर्मस्थानमधिकृय एक- स्थानीयम्, धातिसंसामधिकृत्य देशहरं देशघाति वेदितव्यम् । मनःपपानावरले पुनधन्वानुमागस ५४० छक्खंडागमे संतकम्म •३ सेसाणं सव्यकम्माणं जहण्णाणुभागसंतकम्म'(१) सव्वघादिफद्दएण समाणत्तादो केवल- दसणाणुभागसंतकम्मस्स उकस्सस्स उकस्साणुभार्ग चडिदृण जाव ण घादेदि ताव उकस्साणुभागसंतकम्मिओ। सो इदाणी को होज ? एइंदियो वेइंदियो तीइंदियो चउरिदियो च सण्णी असण्णी पजत्तओ अपजत्तओ सुहुमो बादरो वा होज । सव्वेसि कम्माणं उकस्साणुभागसंतकम्मं जहा मदिआवरणस्स वुत्तं तहा बत्तव्यं । सादस्स उक्कस्साणुभागसंतकम्मं कस्स ? चरिमसमयसुहुमसांपराइयस्स खवयमादि कादूण जाव दुचरिमसमयभवसिद्धियादो त्ति । उच्चागोद-जसकित्तीणं सादभंगो। मणुस- गइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुच्ची-ओरालियसरीर - ओरालियसरीरअंगोवंग - बञ्जरिसहवइर- णारायणसरीरसंघडणाणं उक्कस्साणुभागसंतकम्मं कस्स ? देवेण सव्वविसुद्धेण बद्धाणु- भागमघादेदृणमण्णदरगदीएं वट्टमाणस्स । जाओ पसत्थाओ णामपयडीओ तासि- मुक्कस्साणुभागसंतकम्मं कस्स ? खवयस्स परभवियणामाणं चेव बंधमाणाणं चरिम- सर्वघाति स्पर्धकके समान होनेसे केवलदर्शनावरणके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मका उत्कृष्ट अनुभाग चढ़कर जब तक नहीं घातता है तब तक वह उसके उत्कृष्ट अनुभाग सत्कर्मसे संयुक्त होता है। शंका- वह इस समय कौन हो सकता है ? समाधान- वह एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, संज्ञी च असंजी पंचेन्द्रिय, पर्याप्त, अपर्याप्त, सूक्ष्म और वादर हो सकता है। सब काँका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म, जैसे मतिज्ञानावरणका कहा गया है, वैसे कहना चाहिये। सातावेदनीयका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? वह अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्म- साम्परायिक क्षपकको आदि करके द्विचरम समयवर्ती भव्यसिद्धिक तक होता है। उचगोत्र और यशकोर्तिके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मके स्वामीकी प्ररूपणा सातावेदनीयके समान करना चाहिये। मनुष्यगति, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, औदारिकशरीर, औदारिकशरीररांगोपांग और वज्रपभ- वज्रनाराचशरीरसंहननका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? जो सर्वविशुद्ध देवके द्वारा वांधे गये अनुभागको न घातकर अन्यतर गति में वर्तमान है उसके इनका उत्कृष्ट अनुभाग- सत्कर्म होता है। जो प्रशस्त नामप्रकृतियां हैं उनका उत्कुष्ट अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? वह परविक नामकोंको ही वांधनेवाले क्षपकके अन्तिम समयको आदि करके द्विचरम स्थानमधिकृत्य द्वित्यानम्, घातिसंज्ञामधिकृत्य देशहरं देशघाति । इहोत्कृष्टानुभागसत्कर्मस्वामिन उत्कृष्टा- नुमागसंक्रामत्वामिन एव वेदितव्याः । जघन्यानुभागसत्कर्मस्वामिनः पुनराह- 'सामिगो येत्यादि गुम्यक्त्व- शानावरणपंचक-दर्शनावरणपटकान्तरायपंचकरूपप्रकृतिषोडशक-विहिरूपसंज्वलनलोभ-वेदत्रयाणा स्य-स्थान्तिम समये वर्तमाना जघन्यानुभागसत्कर्मस्वामिनो वेदितव्याः । मलय, १ प्रतियु स्खलितोऽत्र प्रतिभाति पाठः, मतिज्ञानावरणत्योत्कृष्टानुभागमकर्मप्ररूपणाचा अभावात् । २ ताप्रती 'समाग (i) चा (त) दो' इति पाठः । ३ काप्रती 'कम्मरस उफरसाणुभार्ग', 'ताप्रती 'कम्मरण उकसं, उफत्सागुमागे' इति पाठः । ४ अ.फापत्योः 'अपजत्त' इति पाठः। ५ तानियोः 'मयादेद्ग चरिमगदीए' इति पाठः । ६ अप्रती 'यहमागरमा, का तापत्योः 'यहमागा; इति पाठः।

अप्पाबहुआणियोगदारे अणुभागसंतकम्म ५४१ समयमादि काण जाव दुचरिमसमयभवसिद्धयो त्ति । आउअस्स उकस्साणुभागसंतकम्मं कस्स ? खवयस्स बद्धेतदुकस्साणुभागस्स बंधपढमसमयप्पहुडि जाव तव्भवत्थस्स दुचरिमसमयादो ति उकस्साणुभागसंतकम्मिओ होज । एवमोघसामित्तं समत्तं । गदीसु अप्पसत्थाणं कम्माणं उक्कस्साणुभागसंतकम्मं जहा ओघेण कदं तहा काय । णिरयगदीए सादस्स उकस्साणुभागसंतकम्मं कस्स ? जेण कसाए उवसामेंतेण चरिमसमयसुहुमसांपराइएण जं बद्धं सादाणुभागसंतकम्मं तमघादेवण जो णिरयगदीए उववण्णो तस्स उक्कस्सयं सादाणुभागसंतकम्म । जहा सादस्स तहा जसकित्ति-तित्थयर- णामकम्माणं उपसामएण बद्धाणुभागमधादेवण गिरयगदीए उप्पण्णस्स उक्कस्सं वत्तव्यं । एवं सन्यासु गदीसु णेयव्वं । एवमुक्कस्ससामित्तं समत्तं । मदि-सुदावरण-चक्खु-अचक्खुदंसणावरणाणं जहण्णाणुभागसंतकम्मं कस्स ? चोद्दसपुब्वियदुचरिमसमयछदुमत्थस्स उकस्सलद्धियस्स । ओहिणाणावरण-ओहिदसणा- वरणाणं जहण्णाणुभागसंतकम्मं कस्स ? चरिमसमयछदुमत्थस्स परमोहियस्स उकस्स- समयवर्ती भव्यसिद्धिक तकके होता है। आयुका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? जिसने उसके उत्कृष्ट अनुभागका चन्ध किया है उसके बन्धके प्रथम समयसे लेकर तद्भवस्थ रहने के द्विचरम समय तक उसका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म होता है। इस प्रकार ओघ स्वामित्व समाप्त हुआ। गतियों में अप्रशस्त कर्मोका उत्कुष्ट अनुभागसत्कर्म जैसे ओघ रूपसे किया गया है वैसे फरना चाहिये । नरकगतिमें सातावेदनीयका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? कपायोंका उपशम करनेवाले जिस अन्तिम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिकके द्वारा जो सातावेदनीयका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म बांधा गया है उसको न घातकर जो नरकगति में उत्पन्न हुआ है उसके साता- वेदनीयका उत्कृष्ट अनुभागसत्कम होता है। सातावेदनीयके समान यशकीर्ति और तीर्थकर नामंकमों के उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मके स्वामी उपशामकके द्वारा बांधे गये अनुभागको न घातफर नरकगति में उत्पन्न हुए जीवको कहना चाहिये । इसी प्रकार सब गतियों में ले जाना चाहिये। इस प्रकार उत्कृष्ट स्वामित्व समाप्त हुआ। मतिज्ञानावण, श्रुतज्ञानावरण, चक्षुदर्शनावरण और अचक्षुदर्शनावरणका जघन्य अनु- भागसत्कर्म किसके होता है ? वह चौदह पूर्वो के धारक उत्कृष्ट श्रुतार्थलब्धि युक्त द्विचरम समयवर्ती छमस्थके होता है। अवधिज्ञानावरण और अवधिदर्शनावरणका जघन्य अनुभागसत्कम किसके होता है ? यह परमावधिके धारक उत्कृष्ट लब्धि युक्त अन्तिम समयवर्ती छंगस्थके होता है। ': १ ताप्रती 'करत १ खवयत्त परभवियबद्ध' इति पाठ। २ म-कामत्योः 'समयदो' इति पाठः । ३.अ-काप्रत्योः 'कदा तहा कायदा हति पाठः। ४ अ-फापत्योः 'उकत्सयसादाग संतकम् इति पाठः । ५ मप्रतिपाठोऽयम् । अ-का-तामति मियादेमा, इति पाठः। ६ अ-काप्रत्यो। 'दसणावरण' इति पाठः।

५४२ छक्खंडागमें संतकम्म लद्धियस्स । मणपजवणाणावरणस्स जहण्णाणुभागसंतकम्मं कस्स ? चरिमसमयछदु- मत्थस्स विउलमइस्स उक्कस्सलद्धियस्से । केवलणाणावरण-केवलदसणावरण-पंचंतराइयाणं जहण्णाणुभागसंतकम्मं कस्स ? जस्स वा तस्स या चरिमसमयछदुमत्थस्स । एवं णिहा- पयलाणं। णवरि दुचरिमसमयछदुमत्थस्स सव्वस्स । णिदाणिद्दा-पयलापयला-धीणगिद्दीणं जहण्णाणुभागसंतकर्म कस्स १ सुहुमसंत- कम्मेण हदसमुप्पत्तिएण वट्टमाणस्स । अण्णदरों एइंदियो इंदियो तेइंदियो चउरिदियो असण्णी सण्णी सुहुमो वादरो पञ्जत्तो अपजत्तो वा जहण्णाणुभागसंतकम्मिओ होज । सादासादाणं जहण्णाणुभागसंतकम्म कस्स ? चरिमसमयभवसिद्धियस्स जहण्णए उदयट्ठाणे वट्टमाणस्स। सम्मत्तस्स जह• संतकम कस्स १ चरिमसमयअक्खीणदसणमोहणीयस्स । सम्मामिच्छत्तस्स जह० संत० कस्स १ चरिमाणुभागखंडए वट्टमाणस्स । मिच्छत्तस्स जह० संत० कस्स १ सुहुमेइंदियस्स हदसमुप्पत्तियकम्मेण कयजण्णाणुभागस । मनःपर्ययज्ञानावरणका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? वह उत्कृष्ट लब्धि युक्त विपुल- मतिमनःपर्ययज्ञानके धारक अन्तिम समयवर्ती छामस्थ के होता है। केवलज्ञानावरण, केवल दर्शनावरण और पांच अन्तरायका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? वह जिस किसी भी अन्तिम समयवर्ती छद्मस्थके होता है। इसी प्रकार निद्रा और प्रचलाका भी जघन्य अनुभागसत्कर्म कहना चाहिये। विशेप इतना है कि वह द्विचरम समयवर्ती सव छद्मस्थके होता है। निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धिका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? हतसमुत्पत्तिक सत्कर्मस्वरूपसे जो सूक्ष्म एकेन्द्रिय वर्तमान है उसके उनका जघन्य अनुभाग सत्कर्म होता है। अन्यतर एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, संजी व असंझी पंचेन्द्रिय, सूक्ष्म, चादर, पर्याप्त और अपर्याप्त जीव उनके जघन्य अनुभागसत्कर्मसे संयुक्त होता है। साता व असाता वेदनीयका जघन्य सत्कर्म किसके होता है ? वह जघन्य उदयस्थानमें वर्तमान अन्तिम समयवर्ती भव्य जोक्के होता है। सम्यक्त्व प्रकृतिका जघन्य सत्कर्म किसके होता है ? वह अन्तिम समयवर्ती अक्षौण- दर्शनमोहक होता है। सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य सत्कर्म किसके होता है ? वह उसके अन्तिम अनुमागकाण्डक में वर्तमान जीवके होता है । मिथ्यात्वका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? जिसने हतसमुत्यत्तिककम स्वरूपसे उसके अनुभागको जघन्य कर लिया है ऐसे सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवके उसका जघन्य अनुभागसत्कर्म होता है? २ मेह-तुप पर्ख-अचक्सूग सुयममत्तस्त हलदिस | परमोहिम प्रोहिंदर्ग मनना: विउपनामरम् ।। क, प्र. ७, २३.२ अ-काप्रत्याः 'सबेमि', ताप्रती 'सवेलिं, मप्रती 'सबुक' इति पाठः । ३ तातो 'हमागरम' इति पाठः । ४ प्रतियु 'अंगदुकत्सा इति पाठः । ५ कामती बरतक, तामो 'पाणहिदि (अणुभाग) संतकम्म' इति पाटः। ६ तांप्रती एकदाजुमागरम इति पाठः ।

अपायहुआणियोगहारे अणुभागसंतफम्म अणताणुवंधीणं जह० संत. कस्स ! विसंजोएदण संजोएमाणसे जहण्णबंधे वट्टमाणस्स । अट्टण्णं कसायाणं जह० संत.० कस्स ? सुहुमस्स हदसमुप्पत्तियकम्मेण जहण्णीकदाणुभागस्स । हस्स-रदि-अरदि-सोग-भय-दुगुंछाणं जह० संत० कस्स ? चरिमअणुभार्गखंडए चट्टमाणस्स । णसयवेद० जह० संत० कस्स ? चरिमसमय- णqसयवेदखवयस्स । इत्थिवेदस्स जहण्णुक्कस्सदो पुण चरिमसमयइत्थिवेदोदयस्स । पुरिसवेदस्स जह० संत० कस्स ? पुरिसवेदोदयखवयस्स अवगदवेदो होदूण चरिम- समयपवर्द्धचरिमसमयसंकामयस्स । कोहसंजलणाए जहण्णाणुभागसंतकम्मं कस्स ! कोधेण उवह्रिदस्स खवयस्स चरिमसमयपवद्धचरिमसमयसंकामयस्स। माणसंजलणाणं जहण्णाणुभागसंतकम्म णत्यि । मायासंजलणाए जह० संत० कस्स ? मायाए उवाद्विदस्स खवयस्स चरिमसमयपबद्धस्स । लोहसंजलणाए जह० संत० कस्स ? तिन्चयरहदसमुप्पत्ति यचरिमसमयसंकाममस्स । एवं जहण्णसामित्तं समत्तं । अनन्तानुबन्धी फपायोंका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? वह उनका विसंयोजन फरके पुनः संयोजन करते हुए जघन्य बन्धमें वर्तमान जीवके होता है । आठ कपायोंका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? वह हतसमुत्पत्तिककर्म स्वरूपसे अनुभागको जघन्य फर लेनेवाले सूक्ष्म जीवके होता है । हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्साका जघन्य अनुभाग सत्कर्म किसके होता है ? वह उनके अन्तिम अनुभागकाण्डकमें वर्तमान जीवके होता है। नपुंसकवेदका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? वह अन्तिम समयवर्ती नपुंसकवेदके क्षपकके होता है । स्त्रीवेदका जघन्य व उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म अन्तिम समयवर्ती स्त्रीवेदवेदक के होता है। पुरुपवेदका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? जो अपगतवेदी होकर अन्तिम समयप्रबद्धका अन्तिम समयवर्ती संक्रामक है ऐसे पुरुषवेदोदययुक्त क्षपकके उसफा जघन्य अनुभागसत्कर्म होता है। संज्वलन क्रोधफा जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? वह क्रोधसे उपस्थित क्षपकके होता है जो कि उसके अन्तिम समयप्रबद्धका अन्तिम समयवर्ती संक्रामक है । संज्वलन मानका जघन्य अनुभागसत्कर्म नहीं होता। संज्वलनमायाका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? यह मायासे उपस्थित हुए उसके अन्तिम समयप्रपद्धके क्षपकके होता है। संज्वलन लोभका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? वह तीव्रतर हतसमुत्पचिक अन्तिम समयवर्ती संक्रामकके होता है। इस प्रकार जघन्य स्वामित्व समाप्त हुआ। १ तापतौ 'विसंजोएणूणसंजोएमाणस्स' इति पाठः । २ तापतौ 'परिमसमयअणुमाग' इति पाठः। ३ मप्रतिपाठोऽयम् । अ-काप्रत्योः 'इस्थिवेदस्स जहणुकसजहणचरिमसमयो इत्यि', ताप्रती 'इस्थिवेदस्स मा० करस १ जइगदरिमसमय इत्मि-' इति पाठः। ४ का-तापत्योः 'समयबदः इति पाठः। ५ फाप्रती 'समयपरिमसमयसंकामवत्स', तामती 'समयपद्धस्स च संकामयत्स' इति पाठः।

५४४ छक्खंडागमे संतकम्म णिरयगईए णेरइएसु सव्वतिन्वाणुभागं सादं । उच्चागोद-जसकित्तीओ अणंत- गुणाओ'। कम्मइय० अर्णतगुणो। तेजइय० अणंतगुणो । वेउब्धिय० अर्णतगुणो। मिच्छत्त० अणंतगुणो । ओहिणाण-ओहिदसणावरणाणं अणंतगुणो'। सम्मामिच्छत्ते । अणंतगुणो। दाणंतराइय० अणंतगुणो। लाहंतराइय० अणंतगुणो। भोगंतराइय० अणतगुणो । परिभोगतराइय० अणंतगुणो। अचक्खुदंसणावरण० अणंतगुणो । चक्खुदंस० अणतगुणो । वीरियंतराइय० अणंतगुणो । सम्मत्त० अणंतगुणो । तिरिक्खगदीए तव्यतिव्याणुभागं उच्चागोद-जसकित्तीणं । कम्मइय० अणंतगुणं । तेजइय० अर्णतगुणं । वेउब्विय० अर्णतगुणं । मिच्छत्त० अणंतगुणं । केवलणाण-केवल- दसणावरणाणं अणतगुणं । अण्णदरो अणताणुवंधि० अर्णतगुणो। अण्णदरी संजलण. अणंतगुणो। अण्णदरो पञ्चक्खाण० अणंतगुणं । अण्ण० अपञ्चक्खाण० अणंतगुणं । मदिआवरण. अणंतगुणं । सुदावरण. अणतगुणं । ओहिणाण-ओहिदंसणावरणाणं अणंतगुणं । मणपजवणाणावरण० अर्णतगुणं । थीणगिद्धि० अणंतगुणं । णिहाणिदा० अणंतगुणं । पयलापयला० अणंतगुणं । णिद्दा० अणंतगुणं । पयला अणंतगुणं । रदि० अणंतगुणं । हस्स० अणंतगुणं । ओरालिय० अर्णतगुणं । तिरिक्खाउ० अणंतगुणं । नरकगतिमें नारकियों में सातावेदनीय सबसे तीव्र अनुभागवाली प्रकृति है। उससे उच्चगोत्र और यशकीर्ति अनन्तगुणी हैं। कार्मणशरीर अनन्तगुणा है । तैजसशरीर अनन्तगुणा है। वैक्रियिकशरीर अनन्तगुणा है । मिथ्यात्व अनन्तगुणा है । अवधिज्ञानावरण और अवधि- दर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। सम्यग्मिथ्यात्व अनन्तगुणा है। दानान्तराय अनन्तगुणा है। लाभान्तराय अनन्तगुणा है। भोगान्तराय अनन्तगुणा है। परिभोगान्तराय अनन्तगुणा है। अचक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है । चक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है । वीर्यान्तराय अनन्तगुणा है। सम्यक्त्व अनन्तगुणा है। तिथंचगतिमें उच्चगोत्र और यशकीर्ति सबसे तीव्र अनुभागवाली प्रकृतियां हैं। फार्मण- शरीर अनन्तगुणा है । तैजसशरीर अनन्तगुणा है। वैक्रियिकशरीर अनन्तगुणा है। मिथ्यात्व अनन्तगुणा है। केवलज्ञानावरण और केवलदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं । अनन्तानुबन्धिचतुष्कमें अन्यतर अनन्तगुणा है। अन्यतर संज्वलन अनन्तगुणा है । अन्यतर प्रत्याख्यानावरण अनन्तगुणा है। अन्यतर अप्रत्याख्यानावरण अनन्तगुणा है। मतिज्ञानावरण अनन्तगुणा है। श्रुतज्ञानावरण अनन्तगुणा है। अवधिज्ञानावरण और अवधिदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। मनःपर्ययज्ञानावरण अनन्तगुणा है। स्त्यानगृद्धि अनन्तगुणा है। निद्रानिद्रा अनन्तगुणी है। प्रचलाप्रचला अनन्तगुणी है। निद्रा अनन्तगुणी है। प्रचला अनन्तगुणी है। रति अनन्तगुणी है। हास्य अनणगुणा है । औदारिकशरीर अनन्तगुणा है । तिर्यगायु अनन्तगुणा है । असातावेदनीय - । १ प्रतियु 'अगंतगुमहीगाओ' इति पाटः । २ ताप्रती 'मिच्छत्त० आदिमाग प्राक्टिसमारण. सतगुण' इति पाठः । ३ असतो 'सम्मामिच्छचा.इति पाठः 1 ४.अ-ताप्रत्योः 'पयला.' इत्येतस्य माने 'सुद०, काप्रती 'मुदमाग०' इति पाट:।

अप्पाबहुआणियोगदारे अणुभागसंतकम्म असाद० अर्णतगुणं । णसय० अणंतगुणं । इत्थि० अर्णतगुणं । पुरिस० अर्णतगुणं । अरदि० अणंतगुणं । सोग० अणंतगुणं । भय० अणंतगुणं । दुगुंछा० अणंतगुणं । णीचागोद० अजसकित्ति० अणंतगुणं । तिरिक्खगइ० अर्णतगुणं । चक्खु० अणंतगुणं । सम्मामिच्छत्त० अणंतगुणं । दाणंतराइय० अणंतगुणं । लाहंतराइय० अणंतगुणं । भोगंतराइय० अणंतगुणं । परिभोगंतराइय० अणंतगुणं । अचक्खु० अणंतगुणं । वीरि- यंतराइय० अणंतगुणं । सम्मत्तं अणंतगुणं । मणुस्सेसु सव्यतिव्वाणुभागमुच्चागोद-जसकित्तीणं । कम्मइय० अणंतगुणं । तेजइय० अणंतगुणं । आहार० अणंतगुणं । वेउब्बिय० अणंतगुणं । मिच्छत्त. अणंतगुणं । केवलणाण-केवलदसणावरणाणं अर्णतगुणं । कसायाणमोघमंगो। तदो मदिआवरण. अणंतगुणं । सुदावरण. अणंतगुणं । ओहिणाण-ओहिदंसणावरणाणमणंतगुणं । मणपजव० अणंतगुणं । थीणगिद्धि० अणंतगुणं । णिहाणिद्दा अणंतगुणं । पयलापयला० अर्णतगुणं । णिद्दा० अणंतगुणं । पयला० अणंतगुणं । साद० अणंतगुणं । रदि० अणंतगुणं । हस्स० अणंतगुणं । मणुसगइ० अणंतगुणं । ओरालिय० अणंतगुणं । मणुसाउ० अणंतगुणं । असाद० अणंतगुणं । णस० अणंतगुणं । इस्थि०अणंतगुणं । पुरिस० अणंतगुणं । अरदि० अणंतगुणं । सोग० अणंतगुणं । भय० अर्णतगुणं । दुगुंछा अनन्तगुणा है । नपुंसकवेद अनन्तगुणा है । स्त्रीवेद अनन्तगुणा है। पुरुपवेद अनन्तगुणा है अरति अनन्तगुणी है। शोक अनन्तगुणा है । भय अनन्तगुणा है। जुगुप्सा अनन्तगुणी है। नीचगोत्र और अयशकीर्ति अनन्तगुणे हैं। तिर्यग्गति अनन्तगुणी है। चक्षुदर्शनावरण अनन्त- गुणा है । सम्यग्मिथ्यात्व अनन्तगुणा है । दानान्तराय अनन्तगुणा है। लाभान्तराय अनन्तगुणा है। भोगान्तराय अनन्तगुणा है । परिभोगान्तराय अनन्तगुणा है। अचक्षुदर्शनावरणअनन्तगुणा है। वीर्यान्तराय अनन्तगुणा है । सम्यक्त्व अनन्तगुणा है। मनुष्योंमें उच्चगोत्र और यशकीर्तिका अनुभाग सबसे तीव्र है। कार्मणका अनन्तगुणा है। तैजसशरीरका अनन्तगुणा है। आहारशरीरका अनन्तगुणा है । वैक्रियिकशरीरका अनन्तगुणा है। मिथ्यात्वका अनन्तगुणा है। केवलज्ञानावरण और केवलदर्शनावरणका अनन्तगुणा है । कपायोंका अल्पवहुत्व ओघके समान है। उनसे आगे मतिज्ञानावरणका अनुभाग अनन्तगुणा है। श्रुतज्ञानावरणका अनुभाग अनन्तगुणा है। अवधिज्ञानावरण और अवधि- दर्शनावरणका अनन्तगुणा है। मनःपर्ययज्ञानावरणका अनन्तगुणा है। स्त्यानगृद्धिका अनन्त- गुणा है । निद्रानिद्राका अनन्तगुणा है । प्रचलाप्रचलाका अनन्तगुणा है। निद्राका अनन्तगुणा है । प्रचलाका अनन्तगुणा है । सातावेदनीयका अनन्तगुणा है । रतिका अनन्तगुणा है । हास्यका अनन्तगुणा है। मनुष्यगतिका अनन्तगुणा है । औदारिकशरीरका अनन्तगुणा है। मनुष्यायुका अनन्तगुणा है। असातावेदनीयका अनन्तगुणा है। नपुंसकवेदका अनन्तगुणा है । खीवेदका अनन्तगुणा है। पुरुषवेदका अनन्तगुणा है। अरतिका अनन्तगुणा है । शोकका अनन्तगुणा है। १ प्रतिषु 'चखु० इति पाठः । २ ताप्रती 'तुदावरण-ओहिदसणावरणागं अगंतगुर्ग इति पाठः।

५४६ छक्खंडागमे संतकम्म अणतगुणं । णीचागोद-अजसकित्तीणं अणंतगुणं । सम्मामिच्छत्त० अणंतगुणं । चदुण्ण- मंतराइयाणमोघमंगो। अचक्खु० अणंतगुणं । चक्खु० अणंतगुणं । वीरियंतराइय० अणंतगुणं । सम्मत्त० अणंतगुणं । देवगईए सव्वतिव्वाणुभागं सादं । उच्चागोद-जस कित्तीओ अणंतगुणाओं'। मिच्छत्त० अणंतगुणं । केवलणाण-केवलदंसणावरणाणं अणंतगुणं । अण्णदरो अणंताणु- बंधि० अणंतगुणं । सेसाणं कसायाणमोघभंगो । तदो मदिआवरण० अर्णतगुणं । सुदआवरण० अणंतगुणं । मणपजव० अणंतगुणं । णिद्दा० अणंतगुणं । पयला अणंतगुणं । देवगइ अणंतगुणं । रदि० अणंतगुणं । हस्स० अणंतगुणं । कम्मइय० अणंतगुणं । तेजा० अणंतगुणं । वेउव्विय० अणंतगुणं । देवाउ० अणंतगुणं । असाद० अणंतगुणं । इथि० अणंतगुणं । पुरिस० अणंतगुणं । अरदि० अणतगुणं । सोग. अणंतगुणं । भय० अणंतगुणं । दुगुंछा० अणंतगुणं । अजसकित्ति० अणंतगुणं । ओहिणाण-ओहिदंसणा- वरणाणं अणंतगुणं । सम्मामिच्छत्त० अर्णतगुणं । चदुण्हमंतराइयाणमोधभंगो । अचक्खु० अणंतगुणं । चीरियंतराइय० अणंतगुणं । सम्मत्त ० अणंतगुणं । भवणवासिएसु सचतिव्याणुभागं मिच्छत्तं । केवलणाण-केवलदसणावरणाणं अणंत- गुणं । कसायाणमोधभंगो । मदिआवरण अणंतगुणं । सुदआव० अर्णतगुणं । मणपञ्जव० भयका अनन्तगुणा है । जुगुप्साका अनन्तगुणा है । नीचगोत्र और अयशकीर्तिका अनन्तगुणा है। सम्यग्मिथ्यात्वका अनन्तगुणा है। चार अन्तराय प्रकृतियोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है। अचक्षुदर्शनावरणका अनन्तगुणा है। चक्षुदर्शनावरणका अनन्तगुणा है। वीर्यान्तरायका अनन्तगुणा है । सम्यक्त्वका अनन्तगुणा है । देवगतिमें सबसे तीव्र अनुभागवाला सातावेदनीय है। उससे उचगोत्र और यशकीर्ति अनन्तगुणे हैं । मिथ्यात्व अनन्तगुणा है। केवलज्ञानावरण और केवलदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं । अन्यतर अनन्तानुबन्धी अनन्तगुणी है । शेप कपायोंका अल्पवहुत्व ओघके समान है। आगे मतिज्ञानावरण अनन्तगुणा है। श्रुतज्ञानावरण अनन्तगुणा है। मनःपर्ययज्ञानावरण अनन्तगुणा है। निद्रा अनन्तगुणी है । प्रचला अनन्तगुणो है। देवगति अनन्तगुणी है। रति अन्तगणी है। हास्य अनन्तगुणा है । कार्मणशरीर अनन्तगुणा है । तेजसशरीर अनन्तगुणा है। वैफ्रियिकशरीर अनन्तगुणा है । देवायु अनन्तगुणी है । असातावेदनीय अनन्तगुणा है । स्त्रीवेद अनन्तगुणा है पुरुषवेद अनन्तगुणा है । अरति अनन्तगुणी है। शोक अनन्तगुणा है। भय अनन्तगुणा है। जगुप्सा अनन्तगुणी है । अयशकीर्ति अनन्तगुणी है। अवधिज्ञानावरण और अवधिदर्शनायरण अनन्तगुणे हैं । सम्यग्मिथ्यात्व अनन्तगुणा है। चार अन्तराय प्रकृतियोंका अल्पग्रहुल्य ओघके समान है। अचक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है । वीर्यान्तराय अनन्तगुणा है। सम्यक्त्य अनन्तगुणा है। भवनवासी देवोंमें मिथ्यात्व सबसे तीव्र अनुभागवाला है। केवलशानावरण और केवल दर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। फपायोंका अल्पवहुत्व ओघके समान है । मतिज्ञानायरण अनन्त. १ प्रतियु 'अांतगुगहीगाओ' इति पाठः। - अप्पावहुआणियोगद्दारे अणुभागसंतकम्म अणंतगुणं । णिहा० अणंतगुणं । पयला० अणंतगुणं । थीणगिद्धि० अणंतगुणं । उच्चा- गोद० जसकित्ति० अणंतगुणं । देवगइ० अर्णतगुणं । रदि० अर्णतगुणं । हस्स० अणंत- गुणं । उवरि देवोधभंगो। एईदिएसु सव्यतिव्याणुभागं मिच्छत्तं । केवलणाणावरण-केवलदंसणाचरणाणं' अणंतगुणं । कसायाणमोघभंगो । तदो मदिआवरण० अणंतगुणं । चक्खु० अणंतगुणं । सुदआवरण अणंतगुणं । ओहिणाण-ओहिदसणावरणाणं अर्णतगुणं । मणपञ्जव० अणंत- गुणं । थीणगिद्धि० अणंतगुणं । णिहाणिद्दा० अणंतगुणं । पयलापयला० अणंतगुणं । णिद्दा० अणंतगुणं । पयला० अणंतगुणं । असाद० अणंतगुणं । णqसय० अणंतगुणं । अरदि० अणंतगुणं । सोग० अणंतगुणं । भय० अणंतगुणं । दगुंछा० अर्णतगुणं । णीचा- गोद० अणंतगुणं । अजस कित्ति ० अणंतगुणं । तिरिक्खगइ० अणंतगुणं । साद० अणंतगुणं । जसकित्ति० अणंतगुणं । रदि० अणंतगुणं । हस्स० अणंतगुणं । कम्मइय० अणंतगुणं । तेजइय० अणंतगुणं । वेउब्धिय० अणंतगुणं । ओरालिय० अणंतगुणं । तिरिक्खाउ० अणंतगुणं । चदुण्णमंतराइयाणमोघो। अचक्खु० अर्णतगुणं । विरि- यंतराइय० अणंतगुणं । एवं विगलिंदिएसु वि । णवरि पसत्थकम्मंसा उवरि कायया । एवमुक्कस्सदंडओ समत्तो। गुणा है । श्रुतज्ञानावरण अनन्तगुणा है । मनःपर्ययज्ञानावरण अनन्तगुणा है। निद्रा अनन्तगुणी है । प्रचला अनन्तगुणी है । स्त्यानगृद्धि अनन्तगुणी है। उच्चगोत्र और यशकीर्ति अनन्तगुणे हैं। देवगति अनन्तगुणी है । रति अनन्तगुणी है। हास्य अनन्तगुणा है । आगेको प्ररूपणा देव ओघके समान है। एकेन्द्रिय जीवों में मिथ्यात्व सबसे तीव्र अनुभागवाला है । केवलज्ञानावरण और केवल. दर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। कपायोंका अल्पबहुत्व ओषके समान है। आगे मतिज्ञानावरण अनन्त- गुणा है । चक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है। श्रुतज्ञानावरण अनन्तगुणा है। अवधिज्ञानावरण और अवधिदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। मनःपर्ययज्ञानावरण अनन्तगुणा है । स्त्यानगृद्धि अनन्त- गुणी है । निद्रानिद्रा अनन्तगुणी है। प्रचलाप्रचला अनन्तगुणी है । निद्रा अनन्तगुणी है। प्रचला अनन्तगुणी है । असातावेदनीय अनन्तगुणा है । नपुंसकवेद अनन्तगुणा है । अरति अनन्तगुणी है । शोक अनन्तगुणा है। भय अनन्तगुणा है। जुगुप्सा अनन्तगुणी है। नीचगोत्र अनन्त- गुणा है। अयशकीर्ति अनन्तगुणी है। तिर्थरगति अनन्तगुणी है। सातावेदनीय अनन्तगुणा है। यशकीर्ति अनन्तगुणी । रति अनन्तगुणी है। हास्य अनन्तगुणा है। कार्मणशरीर अनन्तगुणा है। तेजसशरीर अनन्तगुणा है। क्रिषिक शरीर अनन्तगुणा है। औदारिक शरीर अनन्तगुणा है। तिर्थगायु अनन्तगुणी है। चार अन्तराय प्रकृतियोंका अल्पवहुत्व ओघके समान है । अचक्षु- दर्शनावरण अनन्तगुणा है। वीर्यान्तराय अनन्तगुणा है। इसी प्रकार विकलेन्द्रिय जीवों में भी उपर्युक्त अल्पवहुत्व जानना चाहिये । विशेष इतना है कि प्रशस्त कर्माशोंको आगे करना चाहिये । इस प्रकार उत्कृष्ट दण्डक समाप्त हुआ। १ ताप्रती 'मनलगाणावरणाण' इति पास। -- ROR ५४८ छक्खंडागमे संतकम्म जहण्णए पयदं- सव्वमंदाणुभागं लोहसंजलण० । माया अणंतगुणा । माणो अणंतगुणो। कोधो अणंवगुणो। पीरियंतराइय० अणंतगुणो। सम्मत्त० अणंतगुणं । चक्खु० अणंतगुणं । सुदआवरण. अणतगुणं । [मदि० अर्णतगुणं । ] अचक्खु० अणतगुणं । ओहिणाण-ओहिदसणाव० अणंतगुणं । परिभोगंतराइय० अणंतगुणं । भोगंतराइय० अणंतगुणं । लाहंतराइय० अणंतगुणं । दाणंतराइय० अणंतगुणं । पुरिस० अणतगुणं । इत्थि० अणंतगुणं । णवूस० अर्णतगुणं । रदि० अणंतगुणं । हस्स० अणंतगुणं । अरदि० अणंतगुणं । दुगुंछ० अणंतगुणं । भय० अणंतगुणं । सोग० अणंत- गुणं । केवलैणाण-केबलदंसणाय० अर्णतगुणं । पयला० अणंतगुणं । णिद्दा० अणंतगुणं । पयलापय० अणंतगुणं । णिदाणिद्दा० अणंतगुणं । थीणगिद्धि० अणंतगुणं । अण्णदरो पञ्चक्खाणकसाओ अणंतगुणो । अण्णदरो अपञ्च० कसाओ अणंतगुणं । अण्ण० अणंताणु- बंधि० अर्णतगुणं । संजलण० अणंतगुणं । मिच्छित्त० अर्णतगुणं । ओरालिय० अर्णत- गुणं । वेउब्धिय० अणंतगुणं । तिरिक्खाउ० अणंतगुणं । मणुस्साउ० अणंतगुणं । आहार अणंतगुणं । तेजा० अणंगुणं । कम्मइय० अणंतगुणं । तिरिक्खगइ० अणंतगुणं । णिरयगइ० अणंतगुणं । मणुसगइ० अणंवगुणं । देवगइ० अर्णतगुणं । अजसकित्ति० अणंतगुणं । असाद० अणंतगुणं । उच्चागोद० अणंतगुणं । जसकित्ति ० अणंतगुणं । साद० अणंत- अब जघन्य अनुभागसत्कर्मदण्डक प्रकृत है-सबसे मंद अनुभागवाला संज्वलन लोभ है। संग्लन माया अनन्तगुणी है। संज्वलन मान अनन्तगुणा है। संज्वलन क्रोध अनन्तगुणा है। वीर्यान्तराय अनन्तगुणा है । सम्यक्त्व अनन्तगुणा है । चक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है । श्रुतज्ञाना- वरण अनन्तगुणा है। मतिज्ञानावरण अनन्तगुणा है।] अचक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है । अवधि- ज्ञानावरण और अवधिदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। परिभोगान्तराय अनन्तगुणा है। भोगान्तराय अनन्तगुणा है। लाभान्तराय अनन्तगुणा है । दानान्तराय अनन्तगुणा है। पुरुपवेद अनन्तगुणा है । स्त्रीवेद अनन्तगुणा है । नपुंसकवेद अनन्तगुणा है । रति अनन्तगुणी है । हास्य अनन्तगुणा है। अरति अनन्तगुणी है । जुगुप्सा अनन्तगुणी है । भय अनन्तगुणा है। शोफ अनन्तगुणा है । केवलज्ञानावरण और केवलदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। प्रचला अन्तगुणी है । निद्रा अनन्त- गुणी है । प्रचलाप्रचला अनन्तगुणी है। निद्रानिद्रा अनन्तगुणी है। स्त्यानगृद्धि अनन्तगुणी है । अन्यतर प्रत्याख्यानावरण कपाय अनन्तगुणी है। अन्यतर अप्रत्याख्यानावरण कपाय अनन्त- गुणी है । अन्यतर अनन्तानुबन्धी कपाय अनन्तगुणी है। संचलनचतुष्कमें अन्यतर अनन्त- गुणा है। मिथ्यात्व अनन्तगुणा है । औदारिकशरीर अनन्तगुणा है । क्रियिकशरीर अनन्त. गुणा है । तियेगायु अनन्तगुणी है। मनुष्यायु अनन्तगुणी है। आहारकशरीर अनन्तगुणा है। तेजसशरीर अनन्तगुणा है। कार्मणशरीर अनन्तगुणा है। तिर्यगति अनन्तगुणी है। नरक गति अनन्तगुणी है। मनुष्यगति अनन्तगुणी है । देवगति अनन्तगुणी है। अयशकीर्ति अनन्त- गुणी है । असातावेदनीय अनन्तगुणा है । यगोत्र अनन्तगुणा है । यशकीर्ति अनन्तगुणी है। १ अप्रती 'सोग अतगुगं अरदि अनंतगुणं केवल', ताप्रती 'मोग[भरदि०] फेयर' इति पाठः ।

अप्पाबहुआणियोगद्दारे अणुभागसंतकम्म गुणं । गिरयाउ० अणंतगुणं । देवाउ० अणंतगुणं । एत्य ओघजहण्णदंडओ समत्तो। णिरयगईए सव्यमंदाणुभागं सम्मत्तं । चक्खु० अणंतगुणं । अचक्खु० अणंतगुणं । हस्स० अणंतगुणं । रदि० अणंतगुणं । दुगुंछा० अणंतगुणं । भय० अणंतगुणं । सोग अणंतगुणं । अरदि० अणंतगुणं । अबगदवेदो (2) एवं तिव्वयरसचमंदाणुभागं णेयध्वं जाय दाणंतराइयं ति] । ओहिणाण-ओहिदंसणावरणाणं अणतगुणं । मणपजव० अणंतगुणं । सुदा- वरण० अणंतगुणं । मदिआ० अणंतगुणं । अण्णदरो पञ्चक्खाणकसाओ अणंतगुणो। अण्णदरो अपञ्चक्खाणकसाओ अणंतगुणो। केवलणाण-केवलदसणावरणाणं अणंतगुणं । पयला० अणंतगुणं । णिद्दा अणतगुणं । सम्मामिच्छत्त० अणंतगुणं । अण्णदरो अणंताणुबंधि- कसाओ अणंतगुणौ। अण्णदरो' संजलणाणं णस्थि । मणुसगईए णिरयगइभंगो। वेउनिय० अणंतगुणं । कम्मइय० अणंतगुणं । णिरयगइ० अणंतगुणं । णीचागोद० अणंतगुणं । अजसकित्तीए अणंतगुणं । असाद ० अणंतगुणं । साद० अपंतगुणं । णिरयाउ० अणंतगुणं । एवं दोचाए । णवरि वीरियंतराइयस्त परिभोगंतराइयस्स च मज्झे सम्मत्तं कायव्यं । एवं णिरयगइदंडओ समत्तो। तिरिक्खगईए सव्वमंदाणुभागं सम्मत्तं । चक्खु० अणंसगुणं । अचक्खु० अणंतगुणं । सातावेदनीय अनन्तगुणा है। नारकायु अनन्तगुणी है । देवायु अनन्तगुणी है। यहां ओघ जघन्य दण्डक समाप्त हुआ। नरकगतिमें सबसे मंद अनुभागवाली सम्यक्त्व प्रकृति है । चक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है । अचक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है। हास्य अनन्तगुणा है । रति अनन्तगुणी है । जुगुप्सा अनन्तगुणी है । भय अनन्तगुणा है। शोक अनन्तगुणा है। अरति अनन्तगुणी है । अपगत. वेद (?) इस प्रकार तीव्रतर सर्वमन्दानुभाग दानान्तराय तक ले जाना चाहिये । अवधिज्ञाना- वरण और अवधिदर्शनावरणका अनन्तगुणा है। मनःपर्ययज्ञानावरणका अनन्तगुणा है। श्रुतज्ञानावरणका अनन्तगुणा है । मतिज्ञानावरणका अनन्तगुणा है । अन्यतर प्रत्याख्यानावरण फपाय अनन्तगुणी है। अन्यतर अप्रत्याख्यानावरण कपाय अनन्तगुणी है। केवलज्ञानावरण और केवलदर्शनावरणका अनन्तगुणा है। प्रचलाका अनन्तगुणा है । निद्राका अनन्तगुणा है। सम्यग्मिथ्यात्वका अनन्तगुणा है । अन्यतर अनन्तानुबन्धी कपायका अनन्तगुणा है। अन्यतर संज्वलन कपायोंके नहीं है । मनुष्यगतिकी प्ररूपणा नरकगतिके समान है। वैक्रियिकशरीरका अनन्तगुणा है । कार्मणशरीरका अनन्तगुणा है । नरकगतिका अनन्तगुणा है। नीचगोत्रका अनन्त- गुणा है । अयशकीर्तिका अनन्तगुणा है । असातावेदनीयका अनन्तगुणा है । सातावेदनीयका अनन्तगुणा है । नारकायुका अनन्तगुणा है। इसी प्रकार दूसरी पृथिवीमें जानना चाहिये। विशेप इतना है कि वीर्यान्तराय और परिभोगान्तरायके मध्य में सम्यक्त्वको करना चाहिये। इस प्रकार नरकगतिदण्डक समाप्त हुआ। तिचगतिमें सम्यक्त्व प्रकृति सबसे मंद अनुभागवाली है। चक्षुदर्शनावरण अनन्वगुणा १ फाप्रती 'अण.', ताप्रती 'अण्णदग' इति पाठः ।

उक्खंडागमे संतकम्म ओहिणाण-ओहिदंसणावरणाणं अर्णतगुणं । हस्स० अणंतगुणं । रदि० अणंतगुणं । दुगुंछा अणंतगुणं । भय० अणंतगुणं । सोग० अर्णतगुणं । अरदि० अणंतगुणं । पुरिस० अणंत- गुणं । इत्थि० अणंतगुणं । णस० अणंतगुणं । अण्णदरसंजलण० अणंतगुणं । वीरियंतराइय० अणंतगुणं । एवं णेदव्यं जाव दाणंतराइयं' ति अणंतगुणकमेण । मणपजव० अणंतगुणं । सुदावरण० अणंतगुणं । मदिआ० अणंतगुणं । अण्णदरो अपञ्च- क्खाणकसाओ अणतगुणो । अण्णदरो पचक्खाणाणं केवलणाण-केवलदसणावरणाणं अणंतगुणं । पयला० अणंतगुणं । णिद्दा० अणंतगुणं । पयलापयला० अणंतगुणं । णिद्दा- णिद्दा० अणंतगुणं । थीणगिद्धि० अणंतगुणं । सम्मामिच्छत्त० अणंतगुणं । अण्णदरो अणंताणुवंधिकसाओ अर्णतगुणो । मिच्छित्त० अणंतगुणं । ओरालिय० अणंतगुणं । वेउब्बिय० अणंतगुणं । तिरिक्खाउ० अणंतगुणं । तेजा० अणंतगुणं । कम्मइय० अणंतगुणं । तिरिक्खगइ ० अणंतगुणं । णीचागोद० अणंतगुणं । अजसकित्ति० अणंत- गुणं । असाद० अणतगुणं । जस कित्ति० अणंतगुणं । साद० अणंतगुणं । उच्चागोद० अणतगुणं । एवं तिरिक्खगई० चउण्णमंतराइयाणमोघो (?) मणुसेसु ओघभंगो। देवगईए सव्वमंदाणुभागं सम्मत्तं । चक्खु० अणंतगुणं । है । अचक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है। अवाधज्ञानावरण और अवधिदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं । हास्य अनन्तगुणी है । रति अनन्तगुणी है । जुगुप्सा अनन्तगुणी है । भय अनन्तगुणा है। शोक अनन्तगुणा है । अरति अनन्तगुणी है। पुरुपवेद अनन्तगुणा है। स्त्रीवेद अनन्तगुणा है । नपुंसकवेद अनन्तगुणा है। अन्यतर संज्वलन कपाय अनन्तगुणी है। वीर्यान्तराय अनन्त- गुणा है । इस प्रकार अनन्तगुणितक्रमसे दानान्तराय तक ले जाना चाहिये । मनःपर्ययज्ञाना- वरण अनन्तगुणा है । श्रुतज्ञानावरण अनन्तगुणा है । मतिज्ञानावरण अनन्तगुणा है। अन्यतर अप्रत्याख्यानावरण कपाय अनन्तगुणी है। अन्यतर प्रत्याख्यानावरण कपाय, केवलज्ञानावरण और केवलदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। प्रचला अनन्तगुणी है । निद्रा अनन्तगुणी है। प्रचलाप्रचला अनन्तगुणी है। निद्रानिद्रा अनन्तगुणी है। स्यानगृद्धि अनन्तगुणी है । सम्य- ग्मिथ्यात्व अनन्तगुणा है। अन्यतर अनन्तानुवन्धी कपाय अनन्तगुणी है। मिथ्यात्व अनन्त- गुणा है । औदारिकशरीर अनन्तगुणा है। वैक्रियिकशरीर अनन्तगुणा है। तिर्यगायु अनन्तगुणी है । तेजसशरीर अनन्तगुणा है। कामणशरीर अनन्तगुणा है। तियग्गति अनन्तगुणी है। नीचगान अनन्तगुणा है। अयशकीर्ति अनन्तगुणी है । असातावेदनीय अनन्तगुणा है । यशकीर्ति अनन्तगुणी है । सातावेदनीय अनन्तगुणी है । उचगोत्र अनन्तगुणा है। इस प्रकार तियरगति- दण्ड समाप्त हुआ। चार अन्तराय प्रकृतियांका अल्पबहुत्व ओष के समान है। मनुष्योंमें उक्त अल्पवहुत्वको प्ररूपणा ओघ के समान है । देवगतिमें सबसे मन्द अनु- भागवाली सम्यक्त्व प्रकृति है । चक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है । श्रुतज्ञानावरण अनन्तगुणा है। -- १ ताप्रती बार मंतराइय' इति पारः।

अप्पायहुआणियोगदारे अणुभागसंतकम्म सुदणाणावरण० अणंतगुणं । मदिआ० अणंतगुणं । अचक्खु० अणंतगुणं । ओहिणाण- ओहिदसणावरणाणं अणंतगुणं । हस्स० अणंतगुणं । रदि० अणंतगुणं । दुगुंछा० अणंतगुणं । भय० अणंतगुणं । सोग० अणंतगुणं । अरदि० अणंतगुणं । पुरिस० अणंत- गुणं । इस्थि० अणंतगुणं । अण्णदरसंचलण० अणंतगुणं । कम्मइय० अणंतगुणं । एवं णेदव्वं अणंतगुणकमेण जाव दाणंतराइयं ति । मणपजवणाणावरण० अणंतगुणं । अण्णदरो अपचक्खाणकसाओ अणंतगुणो । अण्ण० पञ्चक्खा० अणंतगुणो । केवलणाण- केवलदंसणावरणाणं अणंतगुणं । पयला० अणंतगुणं । णिद्दा अणंतगुणं । सम्मामिच्छत्त० अणतगुणं । अण्णदरो अणंताणुवंधिकसाओ अणंतगुणो । मिच्छत्त० अर्णतगुणं । ओरा- लिय० अणंतगुणं । कम्मइय० अणंतगुणं । देवगइ ० अणंतगुणं । अजसकित्ति० अणंत- गुणं । असाद० अणंतगुणं। उच्चागोद० अणंतगुणं । जसकित्ति० अणंतगुणं । साद. अणंतगुणं । देवाउ० अणंतगुणं । एइंदिएसु सव्वमंदाणुभाग। हस्स० अणंतगुणं । रदि० अणंतगुणं । दुगुंछ० अणंत- गुणं । भय० अणंतगुणं । सोग० अणंतगुणं । अरदि० अणंतगुणं । णउंस० अणंतगुणं । अण्णदरसंजलण० अणंतगुणं । बीरियंतराइय० अणंतगुणं । अणताणुवंधि० अणंतगुणं । भोग- तराइये० अणंतगुणं । लाहंतराइय० अणंतगुणं । दाणंतराइय० अणंतगुणं । मणपज्जव- मतिज्ञानावरण अनन्तगुणा है। अचक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है । अवधिज्ञानावरण और अवधिदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। हास्य अनन्तगुणा है। रति अनन्तगुणी है। जुगुप्सा अनन्तगुणी है । भय अनन्तगुणा है । शोक अनन्तगुणा है। अरति अनन्तगुणी है। पुरुषवेद अनन्तगुणा है । स्त्रीवेद अनन्तगुणा है । अन्यतर संज्वलन फपाय अनन्तगुणी है। कार्मणशरीर अनन्तगुणा है । इस प्रकार अनन्तगुणितक्रमसे दानान्तराय तक ले जाना चाहिये।मनःपर्ययज्ञाना- वरण अनन्तगुणा है। अन्यतर अप्रत्याख्यानावरण कपाय अनन्तगुणा है। अन्यतर प्रत्या- ख्यानावरण कपाय अनन्तगुणा है। केवलज्ञानावरण और केवलदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। प्रचला अनन्तगुणी है। निद्रा अनन्तगुणी है। सम्यग्मिथ्यात्व अनन्तगुणा है । अन्यतर अनन्तानुवन्धी कपाय अनन्तगुणी है। मिथ्यात्व अनन्तगुणा है । औदारिकशरोर अनन्तगुणा है। फार्मणशरीर अनन्तगुणा है। देवगति अनन्तगुणी है। अयशकीर्ति अनन्तगुणी है। असातावेदनीय अनन्तगुणा है । उच्चगोत्र अनन्तगुणा है। यशकीर्ति अनन्तगुणी है । सातावेदनीय अनन्तगुणा है। देवायु अनन्तगुणण है। एकेन्द्रियों में सबसे मंद अनुभागवाली प्रकृति है। हास्य अनन्तगुणा है। रति अनन्तगुणी है। जुगुप्सा अनन्तगुणा है। भय अनन्तगुणा है। शोक अनन्तगुणा है। अरति अनन्तगुणी है। नपुंसकवेद अनन्तगणा है। अन्यतर संज्वलन कपाय अनन्त. गुणी है। वीर्यान्तराय अनन्तगुणा है। अन्यतर अनन्तानुवन्धी फपाय अनन्तगुणी है। भोगान्तराय अनन्तगुणा है। लाभान्तराय अनन्तगुणा है। दानान्तराय अनन्तगुणा है। १ तामती 'भणताणुनधी सोग (1) भोगतरायः' इति पाठः । .

५५२ छक्खंडागमे संतकम्म णाणा० अणंतगुणं । ओहिणाणा० ओहिसणावरण० अणंतगुणं । सुदणाणाव० अणंतगुणं । चक्षु० अणंतगुणं । मदिआव० अणंतगुणं । अण्णदरअपचक्खाणकसाओ अणंतगुणो । अण्ण० पञ्चक्खो० अणंतगुणो। अण्ण० अणताणुबंधि० अर्णतगुणं । केवलणाण-केवल- दसणावरणाणं दुव्य तुल्लाणि अणंतगुणाणि । मिच्छत्तमणतगुणं । पयला० अर्णतगुणं । णिद्दा० अर्णतगुणं । पयलापयला अणंतगुणं । णिहाणिदा० अणंतगुणं । थीणगिद्धि० अणंतगुणं । ओरालि० अणंतगुणं । वेउव्जिय० अणंतगुणं । तिरिक्खाउ० अणंतगुणं । आहार० अणंतगुणं । तेजा० अणंतगुणं । कम्मड्य० अर्णतगुणं । तिरिक्खगई० अणंत- गुणं । णीचागोद० अणंतगुणं । अजस कित्ति० अणंतगुणं । असाद० अणंतगुणं । जसकित्ति० अणंतगुणं । साद० अणंतगुणं । एवमणुभागउदीरणी समत्ता । पदेसउदीरणाए उकस्सओ मूलपयडिदंडओ। तं जहा- उकस्सेण जं पदेसग्ग- मुदीरिजदि तमाउअम्मि थोवं । वेयणीए असंखेजगुणं । मोहणीए असंखेजगुणं । णाणावरण-दसणावरण-अंतराइएसु तुल्लमसंखेजगुणं । 'णाम-गोदेसु तल्लमसंखेजगुणं । एवमोघदंडओ समतो। णिरयगईए मणुसगई" (१) संकामिजदि तं थोत्रं । णामा-गोदेसु असंखेजगुणं । । मनःपर्ययज्ञानावरण अनन्तगुणा है । अवधिज्ञानावरण और अवधिदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। श्रुतज्ञानावरण अनन्तगुणा है । चक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा हे। मतिज्ञानावण अनन्तगुणा है। अन्यतर अप्रत्याख्यानावरण कपाय अनन्तगुणी है। अन्यतर प्रत्याख्यानावरण कपाय अनन्त- गुणी है । अन्यतर अनन्तानुबन्धी कपाय अनन्तगुणी है। केवलज्ञानावरण और केवलदर्शनावरण ये दोनों तुल्य व अनन्तगुणे हैं । मिथ्यात्व अनन्तगुणा है । प्रचला अनन्तगुणी है । निद्रा अनन्त- गुणी है । प्रचलाप्रचला अनन्तगुणी है। निद्रानिद्रा अनन्तगुणी है । स्त्यानगृद्धि अनन्तगुणी है। औदारिकशरीर अनन्तगुणा है । क्रियिकशरीर अनन्तगुणा है । तिर्यगायु अनन्तगुणी है। आहारशरीर अनन्तगुणा है । तेजसशरीर अनन्तगुणा है। कार्मणशरीर अनन्तगुणा है। तिर्यग्गति अनन्तगुणी है। नीचगोत्र अनन्तगुणा है। अयशकीर्ति अनन्तगुणी है। असाता- वेदनीय अनन्तगुणी है। यशकीर्ति अनन्तगुणी है। सातावेदनीय अनन्तगुणी है। इस प्रकार अनुभागउदीरणा समाप्त हुई। प्रदेशउदीरणामें उत्कृष्ट मूलप्रकृतिदण्डक इस प्रकार है- उत्कर्पसे जो प्रदेशाग्र बदीर्ण होता है वह आयु कर्म में सबसे स्तोक है । वेदनीयमें असंख्यातगुणा है। मोहनीयमें असंठ्यात- गुणा है । ज्ञानावरण, दर्शनादरण और अन्तराय इन प्रकृतियों में वह तुल्य व असंख्यातगुणा है। नाम और गोत्र में तुल्य व असंख्यातगुणा है । इस प्रकार ओघदण्डक समाप्त हुआ। नरकगतिमें जो प्रदेशाग्र आयुमें संक्रान्त होता है वह स्तोक है। नाम और गोत्र में १ ताप्रती 'अप्नदरी पचरखाकमाओ० या अपयशामक इति पात्रः । २ तापती 'ए मंदा. भागउदीरणा' इति पाठः । ३ ताप्रती पात्सए' इति पाठः। ४ ताप्रती नालीद वारयन् । ५ अ.कामन्यो: निरयगई देवगई' इति पाठः ।

. अप्पाबहुआणियोगद्दारे पदेसोदओ पाणावरण-दसणावरणअंतराइएसु विसेसाहियं। मोहणीए विसे० । वेदणीए विसे०' । एवं सव्वासु गदीसु । णवरि मणुसगदीए मूलोधभंगो । जहण्णए पयदं- आउअम्मिजं तं थोवं। णामा-गोदेसुदेव-णेरइयाणं असंखेजगुणं । णाणावरण-दसणावरण-अंतराइएसु विसेसाहियं । मोहणीए विसे० .! एवं सव्वासु गदीसुः। एवं णाणावरण-दसणावरण-पंचंतराइयं ति (?) 'मणपजव० विसेसाहियं । सुद० विसे० । मदि० विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । उच्चागोदे विसे० । सादासादे विसे० । एवं देवगइदंडओ समत्तो। 'मणुमगदीए जं पेदसग्गं वेदिदि मिच्छत्ते तं थोवं । सम्मामिच्छत्ते असंखे० गुणं । सम्मत्ते असंखे० गुणं । अण्णदरअणंताणुवंधिकसाए असंखे० गुणं । केवल- णाणावरणे असंखे० गुणं । पयला. विसे० । णिद्दा० विसे० । पयलापयला० विसे० । 'णिहाणिद्दा० विसे० । थीणगिद्धीए विसे० । केवलदंसणाव० विसे० । अण्णदरअपञ्च- 'क्खाणकसाए विसे० । पञ्चक्खाण. विसे० । ओहिणाणाव० अणंतगुणं । ओहिदंस० विसे० ॥ मणुसाउअम्मि असंखे० गुणं । ओरालिय० असंखे० गुणं । तेज० विसे० । असंख्यातगुणा है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायमें विशेप अधिक है। मोहनीयमें विशेप अधिक है। वेदनीयमें विशेप अधिक है। इस प्रकार सव गतियों में जानना चाहिये। विशेप इतना है कि उसकी प्ररूपणा मनुष्यगतिमें मूल ओधके समान है। जघन्यामूलप्रकृतिदण्डक अधिकारप्राप्त है-- जो प्रदेशाग्र [ वेदा जाता है ] वह आयुमें स्तोक है। उससे नाम और गोत्र कर्मों में देवों व नारकियोंके असंख्यातगुणा है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायमें विशेष अधिक है । मोहनीयमें विशेप अधिक है। इसी प्रकार सप गतियों में जानना चाहिये । इस प्रकार ज्ञानावरण, दर्शनावरण और पांच अन्तराय तक (?) मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। मनिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। चक्षुदर्शनावरण में विशेष अधिक है। उच्चगोत्र में विशेष अधिक है। साता और असाता वेदनीय में विशेप अधिक है। इस प्रकार देवगतिदण्डक समाप्त हुआ। मनुष्यगति में जो प्रदेशाग्र वेदा जाता है वह मिथ्यात्वमें स्तोक है। सम्यग्मिथ्यात्व में अमंख्यातगुणा है। सम्यक्त्वमें असंख्यातगुणा है। अन्यतर अनन्नानुबन्धी कपायमें असंख्यातगुणा है । केवलज्ञानावरणमें असंख्यातगुणा है । प्रचलामें विशेष अधिक है। निद्रामें विशेष अधिक है। प्रचलानचला में विशेष अधिक है। निद्रानिद्रा में विशेप अधिक है। स्त्यान. गृद्धि में विशेष अधिक है । केवलदर्शनावरण में विशेष अधिक है । अन्यतर अप्रत्याख्यानावरण फपायमें विशेष अधिक है। अन्यतर प्रत्याख्यानावरण कपायमें विशेष अधिक है। अवधि- मानावरणमें अनन्तगुणा है । अवधिदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। मनुष्यायुमें असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीरमें असंख्यातगुणा है। तेजस शरीर में विशेष अधिक है। १ ताप्रती 'मोडणीए० वेयणीए. दिसाहि' इति पाठः । २ का-तापत्योः 'जयलदंगा इति पाटः | ३ काप्रती 'असंखे० गुणा' इति पाठः । . 3.

५५४ उक्खंडागमे संतकम्म कम्मइय० विसे० । वेउन्चिय० विसे० । मणुसगई० संखे० गुणं । जसकित्ति-अजस- कित्तीसु दुगुंछी० संखे० गुणं । भय० विसे० । हस्स० विसे० । सोगे विसे० । रदि- अरदि० विसे० । अण्णदरचेद० विसे० । दाणंतराइए विसे० । एवं विसेसाहियकमेण णेदवं [जाय] चीरियंतराइयं ति । मणपजव० विसे० । सुदणा० विसे० । मदि० विसे० । अचक्खु० विसे० । अण्णदरसंजलणकसाए विसे० । [ उच्च ] णीचागोदेसु ० विसे० । सादासादे० विसे० । आहार० असंखे० । एवं मणुसगइदंडओ समत्तो। एइंदिएसु में पदेसग्गं वेदिजदि मिच्छत्ते तं थोवं । अण्णदरअणंताणुबंधिकसाए असंखे० गुणं । केवलणाणाव० असंखेजगुणं । पयला विसेसाहियं । णिदा० विसेसाहियं । पयलापयला. विसे० । णिहाणिद्दा० विसे० । थीणगिद्धि० विसे० । केवलदंसण. विसे० । अण्णदरअपचक्खाणकसाए विसे० । अण्ण पच्चक्खा० विसे । तिरिक्खाउअम्मि अणंतगुणं । ओरालिय० संखेजगुणं । तेज० विसेसाहियं । कम्मइय० विसे० । वेउबिय० विसे । तिरिक्खिगई० संखेजगुणं । जसकित्ति-अजस कित्तीसु विसे० । दुगुंछाए० संखे० गुणं । भए० पिसे० । हस्स-सोगे० विसे० । णिदा० विसे । रदि-अरदासु० विसे० । फार्मणशरीर में विशेष अधिक है। बैंक्रियिकशरीरमें विशेष अधिक है। मनुष्यगतिमें संख्यातगुणा है। यशकीर्ति और अयशकीर्ति में [ संख्यातगुणा ] है। जुगुप्सामें संख्यात- गुणा है। भयमें विशेष अधिक है। हास्यमें विशेष अधिक है। शोक में विशेष अधिक है । रति और अरतिमें विशेप अधिक है। अन्यतर वेदमें विशेष अधिक है। दानान्तरायमें विशेष अधिक है। इस प्रकार वीर्यान्तराय तक विशेष अधिक क्रमसे ले जाना चाहिये । आगे मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेप अधिक है । श्रुतज्ञानावरण में विशेष अधिक है । मतिज्ञानावरण में विशेष अधिक है । अचक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है । अन्यतर संज्वलन कापायमें विशेष अधिक है। ऊंच और नीच गोत्रों में विशेप अधिक है। साता और असाता वेदनीयमें विशेष अधिक है । आहारकशरीरमें असंख्यातगुणा है । इस प्रकार मनुष्यगतिदण्डक समाप्त हुआ। एकेन्द्रिय जीवों में जो प्रदेशाग्र वेदा जाता है वह मिथ्यात्वमें स्तोक है । अन्यतर अनन्तानु. वन्धी कपायमें असंख्यातगुणा है। केवलज्ञानावरणमें असंख्यातगुणा है। प्रचलामें विशेष अधिक है । निद्रा में विशेष अधिक है । प्रचलाप्रचलामें विशेप अधिक है। निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है । स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है । केवलदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। अन्यतर अप्रत्याख्यानावरण कपायमें विशेप अधिक है। अन्यतर प्रत्याख्यानावरण कपायमें विशेष अधिक है। तिर्यगायुमें अनन्तगुणा है। औदारिकशरीरमें संख्यातगुणा है। तेजस शरीरमें विशेप अधिक है। कार्मणशरीर में विशेष अधिक है। वैक्रियिकगरीर में विशेष अधिक है। तिर्यग्गतिमें संख्यातगुणा है। यशकीर्ति और अयशकीर्ति में विशेष अधिक है। जुगुप्सा में संख्यागुणा है । भयमें विशेष अधिक है। हास्य और शोकमें विशेष अधिक है। निद्रा में १ काप्रती 'समित्तिधनसकित्तनु दुगुठ०', नापती 'दसमितिः अजगकिनीम, दुगंटा० इति पाठः । २ अ-काप्रत्योः इत्येतत्वदं नास्ति ।

अप्पाबहुआणियोगद्दारे संकमप्पाबहुअं णस० घिसे० । दाणंतराइए विसे० । एवं विसेसाहियकमेण णेदव्यं जाब विरियंतराइयं ति । मणपजव० विसे० । ओहिणा० विसे० । सुद० विसे० । मदि० विसे० । ओहि- दंस० विसे० । अचखु. विसे० । खु० पिसे० । अण्णदरसंजलणकसाए विसे० । णीचागोदे० विसे० । सादासादे० विसे० । एवमेइंदियदंडओ समत्तो। एवमुदओ समत्तो। जा विपरिणामेणोपकमेण मग्गणों सा चेव मोक्खाणिओगद्दारे कायया । उत्तर- पयडिसंकमे आहार० संकामया थोवा । सम्मत्ते० असंखे० गुणा । मिच्छचे असंखे० गुणा । सम्मामिच्छत्ते० विसेसा० । देवगदीए० असंखे० गुणा । णिरयगदीए० विसे० । वेउब्धिय० विसे० । णीचागोदस्स० अणंतगुणं । असाद० संखे० गुणं । सादस्स० संखे० गुणं । उचागोदस्स० विसे । मणुसगदीए० विसे० । अणताणुवंधिचउकस्स० विसे० । जसकित्तीए विसे० । अट्ठकसायाणं० विसे० थीण- गिद्धितियस्स० तिरिक्खगदीए० विसे० । लोहसंजलणाए विसे० । णस० विसे० । इत्थि. विसे० । छण्णोकसायाणं विसे । पुरिसवेद० विसे० । कोहसंजलण विसे । विशेष अधिक है। रति और अरतिमें विशेष अधिक है। नपुंसकवेदमें विशेष अधिक है। दानान्तरायमें विशेप अधिक है। इस प्रकार विशेप अधिक क्रमसे वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये । मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। श्रुतज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेपअ धिक है। अन्यतर संज्वलन कपायमें विशेष अधिक है। नीचगोत्र में विशेप अधिक है। साता और असाता वेदनीयमें विशेष अधिक है। इस प्रकार एकेन्द्रियदण्डक समाप्त हुआ। इस प्रकार उदय समाप्त हुआ। जो विपरिणामोपक्रमसे मार्गणा है वह मोक्ष अनुयोगद्वार में की जावेगी। उत्तर प्रकृतिसंक्रममें आहारशरीरके संक्रामक स्तोक हैं। सम्यक्त्व प्रकृति के संक्रामक असंख्यातगुणे है। मिथ्यात्वके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामक विशेप अधिक है। देवगतिके संक्रमक असंख्यातगुणे हैं। नरकगति के संक्रामक विशेप अधिक है। वैक्रियिक- शरीरके संक्रामक विशेष अधिक हैं। नीचगोत्रके संक्रामक अनन्तगुणे हैं। असातावेदनीयके संक्रामक संख्यातगुणे हैं । सातावेदनीयके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। उच्चगोत्रके संक्रामक विशेष अधिक हैं । मनुष्यगतिके संक्रामक विशेष अधिक हैं । अनन्तानुबन्धिचतुषकके संक्रामक विशेप अधिक है। यशकीर्ति के संक्रामक विशेष अधिक है। आठ फपायोंके संक्रामक विशेप अधिक है । स्थानगृद्धित्रिकके संक्रामक ..(?)| तिर्यगतिके संक्रामक विशेष अधिक हैं। संज्वलन लोभके संक्रामक विशेप.अधिक है। नपुंसकवेदके संक्रामक विशेष अधिक है। स्त्रोवेदके संक्रामक विशेष अधिक हैं। छह नोकपायोंके संक्रामक विशेष अधिक है। पुरुषवेदके १ ताप्रती 'विपरिणामगोपामेण' इति पाठः । २ अ-का-ताप्रतियु 'गम्पया', मप्रती 'कम्मगा' इति पाठः।

५५६ छक्खंडागमे संतकम्म साण विसे० । साया० विसे० । पंचणाणावरण-छदंसणावरण-पंचंतराइय-ओरालिय- तेजा-मम्मइय-अजसफित्तीणं विसेसाहियं । एवमोघदंडओ समत्तो। मोहणीयस्स पयडिट्ठाणसंकमेण णवण्हं संकमया थोवा । छण्णं: संकामया बिसे- साहिया। चोद्दयण्णं. संखेजगुणं । पंचण्हं संखे० गुणं । अढण्हं. विसेसाहियं । अट्ठा- रसण्हं विसे० । उणवीसणं विसेसाहियं । चदुहं संखे० गुणं । सत्तहं विसे० । वीसहं विसे० । एकिस्से संस्खे० गुणं । दोण्हं विसे० । दसह विसे० । एकारसण्हं विसे० । धारसह बिसे० । तिण्ह संखे० गुणं । तेरसण्हं संखेजगुणं । छब्बीसह असंखे० गुणं । एकवीमण्हं असंखे० गुणं । तेवीसह असंखे० गुणं । सत्तवीसण्हं असंखे० गुणं । पणुधीसण्हं. अतणंगुणं । एवमोघदंडओ समत्तो। उकस्म हिदिसंकमो सुगमो । जहण्णद्विदिसंकमे पयदं-पंचणाणावरण-चउदंसणा- वरण-सम्मत्त-लोहगंजलण-आउचउक्क पंचतराइयाणं जाओ द्विदीओ संकामिजदि ताओ थोवाओ। णिशा-पयलाणं तत्तिओ चेव । जद्विदी' असंखेजः । णिहा-पयलाणं जंद्विदी संक्रामक विशेप अधिक है। संज्वलन क्रोधके संक्रामक विशेप अधिक है। संज्वलन. मानके संक्रामक विशेष अधिक हैं । संज्वलन मायाके संक्रामक विशेष अधिक है। पांच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, पांच अन्तराय, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर और अयशफीति के संक्रामक विशेष अधिक है। इस प्रकार ओघदण्डक समाप्त हुआ। प्रकृतिस्थानसंक्रमकी अपेक्षा मोहनीयको नौ प्रकृतियों के संक्रामक स्तोक है। उसफो छह तियों के संक्रामक विशेप अधिक है। चौदह प्रकृतियों के संक्रामक संख्यातगुणे हैं। पांच प्रकृतियोंके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। आठ प्रकृतियोंके संक्रामक विशेप अधिक है। अठारह प्रकृतियों के संक्रामक विशेप अधिक है। उनीस प्रकृतियोंके संक्रामक विशेष अधिक है। चार प्रकृतियों के संक्रामक संख्यातगुणे हैं। सात प्रकृतियों के संक्रामक विशेप अधिक है। बीस प्रकृतियों के संक्रामक विशेप अधिक है । एकके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। दोके संक्रामक विशेष अधिक हैं । दसके संकामक विशेप अधिक हैं। ग्यारहके संक्रामक विशेष अधिक हैं ।. बारह के संक्रामक विशेष अधिक है। तीनके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। तेरहके संक्रामक संख्यातगुणे हैं। छब्बीसके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। इक्कीसके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। तेईसके संक्रामय, असंख्यातगुणे हैं। सत्ताईसके संक्रामक असंख्यातगुणे हैं। पचीस के संक्रामक अनन्तगुणे हैं । इस प्रकार ओवदण्डक समाप्त हुआ। उत्कृष्ट स्थितिसंक्राम सुगम है। जघन्यः स्थितिसंक्रम अधिकार प्राप्त है-पांच शाना- वरण, चार दशनावरण, सम्यक्त्व, संज्यलन लोभ, चार आयु कर्म और पांच अन्तराय इनकी जो स्थितियां संमान्त होती हैं वे स्तोक हैं । निद्रा और प्रचलाफी उतनी मात्र ही हैं। उनकी स्थिति १ अ-कामयो: 'कबीस' इति पाठः। २ मप्रतिपाटोऽयम् । अ-का-ताप्रति महिदी' इति पाठः । भोज्य पात: 1३ ताप्रती 'सन्सज इति पा| - अप्पावहुआणिंयोगद्दारे संफमप्पाबहुअं ५५७ संखेंजगुणं । देवगइ-वेउनिय-आहार-णीचागोद-अजस कित्तीणं जाओ द्विदीओ ताओं संखे० गुणाओ । ओरालिय-तेजा-कम्मइय-उच्चागोद-जसकित्ति-मणुसगदीणं जाओ द्विदीओ ताओ. विसेसाहियाओं। सव्वासि जट्टिदीओ बिसे० । सादासादाणं जह० विसे० । जद्विदी विसे । मायासंजलणाए जह० संखे० गुणं । जहिदि० विसे० । माणसंजल- जाए जह० विसें० । जहिदि विसे० । कोहसंलणाए. जह० वि० । जहिदि० विसे० । पुरिस० जह. संखे० गुणं । जहिदि विसे० । इस्थि-णचुंसयवेदाणं जह. असंखे० गुणं । थीणगिद्धितियस्स जह० असंखे० गुणं । जहिदि० विसे० । णिस्यगइ-तिरिक्ख- गइणामाणं जह० असं० गुणं । जहिदि० विसे० । अट्ठण्हं. कसायाणं जह० असं० गु० । जहिदि विसे० । सम्मामिच्छत्तस्स जह० संखे०। जहिदि. विसे० । मिच्छत्त जह. असंखें० । जहिदि०. विसे० । अणंताणुवंधिचउकस्स जह० असंखें० गुणं । जट्ठिदि० विसे० । एवमाघदंडओ समतो। जहणेण सव्वमंदाणुभागं लोहसंजलणं । मायासंज० अर्णतगुणं । माणसंज० अणंतगुणं । कोहसंज. अणंतगुणं । सम्मत्त० अणंतगुणं । पुरिस० अणंतगुणं । सम्मामिच्छत्त० अणंतगुणं । मणपजव० अणंतगुणं । दाणंतराइय० अणंतगुणं । असंख्यातगुणो है ।. निद्रा और प्रचलाकी जस्थिति संख्यातगुणी है। देवगति, वैक्रियिक शरीर, आहारकशरीर, नीचगोत्र और अयशकीर्ति; इनकी जो स्थितियां संक्रान्त होती हैं वे संख्यात- गुणो हैं। औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, उच्चगोत्र, यशकीति और मनुष्यातकी- जो स्थितियां संक्रान्त होती हैं वे विशेष अधिक है। इन सबकी जस्थितियां विशेप. अधिक हैं। साता और असाता वेदनीयकी जो जघन्य स्थितियां संक्रान्त होती है वे विशेष. अधिक हैं । जस्थिति विशेष अधिक है। संज्वलन मायाकी उक्त जघन्य स्थितियां संख्यातगुणी है। जस्थिति विशेप अधिक है। संज्वलन मानकी वे जघन्य स्थितियां विशेप अधिक है। जस्थिति विशेप अधिक है। संज्वलन क्रोधकी वे जघन्य स्थितियां विशेष अधिक है। जस्थिति. विशेष अधिक है। पुरुपवेदकी वे जघन्य स्थितियां संख्यातगुणी हैं। जस्थिति विशेप अधिक है। स्त्रीवेद और नपुंसकवेदको वे जघन्य स्थितियां असंख्यातगुणी हैं । स्त्यानद्धित्रयको वे जघन्य स्थितियां असंख्यातगुणी हैं । जस्थिति विशेप अधिक है। नरकगति और तिर्यग्गति नामकर्माको वें जघन्य स्थितियां असंख्यातगुणी हैं। जस्थिति विशेप अधिक है । आठ कपायोंकी वे जघन्य स्थितियां असंख्यातगुणी हैं । स्थिति विशेप अधिक है। सम्यग्मिध्यात्वको वे जघन्य स्थितियां संख्यातगुणी हैं । जस्थिति विशेष अधिक है। मिथ्यात्वकी वे जघन्य स्थितियां असंख्यातगुणी हैं। जस्थिति विशेष अधिक है। अनन्तानुबन्धिचतुष्ककी वे जघन्य स्थितियां असंख्यातगुणी है। जस्थिति विशेप अधिक है। इस प्रकार ओघदण्डक समाप्त हुआ। जघन्यकी अपेक्षा सबसे मंद अनुभागवाला संज्वलन लोभ है । संज्वलन माया अनन्तगुणी है। संज्वलन मान अनन्तगुणा है । संज्वलन क्रोध अनन्तगुणा है । सन्यक्त्व अनन्तगुणा है पुरुपवेद अनन्तगुणा है । सम्यग्मिथ्यात्व अनन्तगुणा है । मनःपर्ययज्ञानावरण अनन्तगुणा है। १ अ-ताप्रत्योः 'वितेसाहिओ' इति पाठः ।

५५८ छक्खंडागमे संतकम्म ओहिणाण० अणंतगुणं । ओहिदंस० अणंतगुणं । लाहंतराइयाणं अणंतगुणं' । सुद० अचक्षु० भोगंतराइयाणं अणंतगुणं । चक्खु० अर्णतगुणं । मदिआवरण-परिभोग- तराइयाणं अणंतगुणं । केवलणाण-केवलदंसणावरण-वीरियंतराइयाणं अणंतगुणं । पयला० अणंतगुणं । णिद्दा० अणंतगुणं । हस्स० अणंतगुणं । रदि० अणंतगुणं । दुगुंछ० अर्णतगुणं । भय० अर्णतगुणं । सोग० अर्णतगुणं । अरदीए. अणंतगुणं । इत्थि० अणंतगुणं । णस० अणंतगुणं । अणंताणुवंधिमाणे० अणंतगुणं । कोहे० विसेसा- हियं । मायाए० विसे । लोहे. विसे । वेउब्धिय० अणंतगुणं । तिरिक्खाउअम्मि० अणंतगुणं । मणुसाउ० अणंतगुणं । णिरयगइ० अणंतगुणं । मणुसगइ० अणंतगुणं । देवगइ० अणंतगुणं । उच्चागोद० अणंतगुणं । णिरयाउ० अर्णतगुणं । देवाउ० अणंत- गुणं । ओरालिय० अणतगुणं । तेजइय० अणंतगुणं । कम्मइय० अर्णतगुणं । तिरिक्ख- गह० अणंतगुणं । णीचागोद० अजसकित्तीओ अणंतगुणं । पयलापयला० अणतगुणं । णिहाणिद्दा० अणंतगुणं । थीणगिद्धि० अर्णतगुणं । अपञ्चक्खाणमाणे. अणतगुणं । कोहे. विसेसाहियं । मायाए० विसे । लोहे. विसे । पञ्चक्खाणमाणे० अणंतगुणं । कोहे. विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । असाद० अणंतगुणं । दानान्तराय अनन्तगुणा है। अवधिज्ञानावरण अनन्तगुणा है। अवधिदर्शनावरण अनन्तगुणा है। लाभान्तराय अनन्तगुणा है। श्रुतज्ञानावरण, अचक्षुदर्शनावरण और भोगान्तराय अनन्तगुणे हैं। चक्षुदर्शनावरण अनन्तगुणा है। मतिज्ञानावरण और परिभोगान्तराय अन्तगुणे है। केवलज्ञानावरण, केवलदर्शनावारण और वीर्यान्तराय अनन्तगुणे हैं। प्रचला अनन्तगुणी है। निद्रा अनन्तगुणी है। हास्य अनन्तगुणा है। रति अनन्तगुणी है । जुगुप्सा अनन्तगुणी है। भय अनन्तगुणा है। शोक अनन्तगुणा । अरति अनन्तगुणी. है। स्त्रीवेद अनन्तगुणा है। नपुंसकवेद अनन्तगुणा है । अनन्तानुबन्धी मान अनन्तगुणा है । अनन्तानुबन्धी फ्रोध विशेष अधिक है। अनन्तानुबन्धी माया विशेप अधिक है । अनन्तानुबन्धी लोम विशेप अधिक है। वैक्रियिकशरीर अनन्तगुणा है । तिर्यगायु अनन्तगुणी है। मनुष्यायु अनन्तगुणी है। नरकगति अनन्तगुणो है। मनुष्यगति अनन्तगुणा है। देवगति अनन्तगुणी है । उच्चगोत्र अनन्तगुणा है। नारकायु अनन्तगुणी। देवायु अनन्तगुणी है । औदारिकशरीर अनन्तगुणा है। तेजस शरीर अनन्तगुणा है । कार्मणशरीर अनन्तगुणा है। तियंग्गति अनन्तगुणी है। नीचगोत्र और अयशकीर्ति अनन्तगुणे हैं। प्रचलाप्रचला अनन्तगुणी है। निद्रानिद्रा अनन्तगुणी है। स्त्यानगृद्धि अनन्तगुणी है । अप्रत्याख्यानावरण मान अनन्तगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण फ्राध विशेप अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण माया विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण लोभ विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मान अनन्तगुणा है। प्रत्याख्यानावारण क्रोध विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण माया विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोम विदोष अधिक १ ताप्रती 'मागसंजलग० कोदसंबला० सम्मत्त० पुरिग० सम्मामिछत्त० मणपश्य दातुमाया ओहिनाम० ओहिदसमल लाई तराइयाण मांतगुन । इति पाठः !

अप्पाबहुआणियोगद्दारे संफमप्पाबहुअं मिच्छत्ते. अणंतगुणं । जस० अर्णतगुणं । साद० अणंतगुणं । आहार० अणंतगुणं । एवमोघदंडओ समत्तो। जहण्णहिदिसंकमे उक्कस्से वा जं पदेसगं सम्मत्ते' संकामिजदि तं थोयं । केवलणाणावरणे असंखेजगुणं । केवलदसणावरणे विसेसाहियं । पयला० असंखे०. गुणा । णिहा० विसे० । अपञ्चक्खाणमाणे असंखे० गुणं । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० | कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । मिच्छत्ते विसे० । सम्मामिच्छत्ते विसे० । पयलापयला० संखे० गुणं । णिदाणिद्दा० विसे० । थीणगिद्धि० विसे० | आहार० अणंतगुणं । जसकित्ति० असंखे० गुणं । वेउव्यिय० संखे० गुणं । ओरालिय० विसे० । तेज० विसे० । कम्मइय० विसे । देवगइ० संखे० गुणं । मणुसगइ० विसे० । साद० संखे० गुणं । लोभसंजलण. संखे० गुणं । दाणंतराइय० विसे० । एवं विसेसाहियं ताव णेदव्वं जाव विरियंतराइयं ति । मणपजव० विसे । ओहिणाण. विसे० । सुद० विसे० । मदि० विसे । है । असातावेदनीय अनन्तगुणा है। मिथ्यात्व अनन्तगुणा है। यशकीर्ति अनन्तगुणी है। है। सातावेदनीय अनन्तगुणा है। आहारशरीर अनन्तगुणा है। इस प्रकार ओघदण्डक समाप्त हुआ। जघन्य स्थितिसंक्रम अथवा उत्कृष्ट स्थितिसंक्रममें जो प्रदेशाग्र सम्यक्त्व प्रकृति में संक्रान्त फराया जाता है वह स्तोक है। केवलज्ञानावरणमें असंख्यातगुणा है। केवलदर्शनावरण में विशेप अधिक है। प्रचलामें असंख्यातगुणा है। निद्रा में विशेप अधिक है। अप्रत्याख्याना- वरण मानमें असंख्यातगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेष अधिक है । अप्रत्याख्याना- वरण माया में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्याना- वरण मानमें विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण क्रोध में विशेष अधिक है । प्रत्याख्याना- वरण मायामें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभ में विशेप अधिक है। मिथ्यात्वमें विशेष अधिक है। सम्यग्मिथ्यात्वमें विशेष अधिक है। प्रचलाप्रचलामें संख्यातगुणा है। निद्रानिद्रा में विशेप अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। आहारशरीर में अनन्तगुणा है। यशकीर्ति में असंख्यातगुणा है। वैक्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है। औदारिकशरीर में विशेष अधिक है। तेजसशरीर में विशेप अधिक है। कार्मणशरीर में विशेष अधिक है। देवतिमें संख्यातगुणा है। मनुप्यति में विशेप अधिक है। सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। संज्वलन लोभमें संख्यातगुणा है। दानान्तरायमें विशेष अधिक है। इस प्रकार वीर्यान्तराय तक विशेष अधिक क्रमसे ले जाना चाहिये । आगे मनःपर्ययज्ञानावरण में विशेप अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। श्रुतज्ञानावरण में विशेष अधिक है। मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शना- १ अ.काप्रत्योः 'सम्मत्त' इति पाटः। २ अप्रतावतः प्राक् 'अपच्चरखागमाणे विते, फोहे विने, मायाए विसे०, लोहे विते' इत्यधिकः पाठोऽस्ति, तामतावपि सः [ ] कोष्टकान्तर्गतोऽस्ति ।

१५६० छक्खंडागमें संतकम्म ओहिदंसण० विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । उच्चागोद० संखेजगुणं । णिरयगइ० असंखे० गुणं ! जसकित्ति० असंखे० गुणं । असादे० संखे० गुणं । णाचा- गोदे० विसे० । तिरिक्खगदीए० असंखे० गुणं । हस्से० संखे० गुणं । रदोए. विसेसा- हियं । इत्थि संखे'० । सोगे. विसे० । अरदि० विसे० । ण,स० विसे० । दुगुंछ. विसे० ० । भय० विसे० । पुरिस० संखे० गुणं । कोह० संखे० गुणं । लोह० संखे० गुणं । माण० विसे० । माय० विसेसाहियं । एवमोघदंडओ समत्तो । णिरयगदीए जं पदेसग्गं संकामिजदि सम्मत्ते तं थोवें । सम्मामिच्छत्ते असंखे. गुणं । अपञ्चक्खाणमाणे० असंखे० गुणं । कोहे० विसे० । मायाए० बिसे० । लोहे. विसे० ० । पञ्चकमाणमाणे० विसे० । कोहे० विसे० । मायाए० विसे० । लोहे० रिसे। केवलणाणा० विसे० । पयला० विसे० । णिद्दा० विसे० । पयलापयला. विसे० ! 'णिहाणिदा० विसे० । थीणगिद्धि० विसे० । केवलदंस० विसे० । मिच्छत्ते० असंखे० गुणं । अणंताणुवंधिमाणे० असंखे० गुणं । कोहे. विसे० । मायाए० विसे० । लोहे. विसे० । णिरयगदीए० अणंतगुणं । वेउविय० असंखे० गुणं । देवगइ० संखे० गुणं । वरण में विशेष अधिक है। अनक्षुदर्शनावरण में विशेष अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है । उच्चगोत्र में संख्यातगुणा है। नरकगतिमें असंख्यातगुणा है। यशकीर्तिमें असंख्यात- गुणा है। अमानावेदनीयमें संख्यातगुणा है। नीचगणेत्र में विशेष अधिक है। तियेग्गनिमें अमंख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यातगुणा है । रतिमें विशेप अधिक है। स्त्रीवेद में संख्यातगुणा है । शोक्में विशेष अधिक है। अरतिमें विशेष अधिक है। नपुंसकवेदमें विशेष अधिक है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेष अधिक है । पुमपत्रेद में संख्यातगुणा है । क्रोधमें संख्यानगुणा है । लोभमें संख्यातगुणा है। मानमें विशेप अधिक है। माया में विशेप अधिक है। इस प्रकार ओघदण्डक समाप्त हुआ। नरकगति में जो प्रदेशाग्र सम्यक्त्व प्रकृति में संक्रान्त होता है वह स्तोक है। सम्यग्मिध्याव्य में उससे असंख्यातगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेप अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्याना- वरण लोभमें विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण क्रोध में विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभ में विशेष अधिक है । केवलज्ञानावरण में विशेप अधिक है। प्रचलामें विशेष अधिक है। निद्रा में विशेप अधिक है। प्रचलाप्रचला में विशेप अधिक है। निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है। स्त्यान- गृद्धि में विशेपं अधिक है। केवलदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। मिथ्यात्व में असंग्यातगुणा है। अनन्तानुबन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानबन्धी शोध में गिदोप अधिक है। अनन्नानुबन्धी माया में विशेष अधिक है । अनलानुवन्धी लोममें विशेष अधिक है। नरकनिमें अनन्तगुणा है। वैफियिकशरीर में असंख्यातगुणा है। देवगनिमें संख्यानगुणा है। आहार- कामप्रतिपाठोऽयम् । अताप्रत्योः 'विसे इति पाठः ।

अप्पाबहुआणियोगद्दारे संक्रमप्पाबहुअ ५६१ आहार० असंखे० गुणं । ओरालिय० संखे गुणं । तेज० विसेसाहियं । कम्मइय. विसे० । अजसकित्ति० संखेज्जगुणं । तिरिक्खगई० विसे० । मणुसगई. विसे० । हस्से० संखे० गुणं । रदि० विसे० । साद० संखे० गुणं । इथि० संखे० गुणं । सोग० विसे० । अरदि० विसे० । णबुंस० विसे० । दुगुंछ० विसे० । भय० विसे० । पुरिस० विसे० । माणसंजलण विसे० । कोह० विसे० । मायाए० पिसे । लोह. विसे० । दाणंतराइय० विसे० । एवं विसेसाहियक्रमेण णेदव्वं जाव पिरियंतराइयं ति । मणपज. विसे० । ओहिणाण. विसे० । सुद० विसे० । मदि विसे० । ओहिदसण. विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । असाद० संखे० गुणं । उच्चागोद० विसे । णीचागोद० विसे० । एवं णिरयगइदंडओ समत्तो । एवं देवगदीए वि०'। तिरिक्खगदोए विसेसो-'उक्कस्सेण जं पदेसग्गं संकामिजदि सम्मत्तेत थोवं। सम्मामिच्छत्ते० संखे० गुणं । अपच्चस्खाणमाणे० असंखे० गुणं । कोहे. विसे० । मायाए० विसे० । लोहे. विसे० । पच्चक्खाणमाणे० विसे० । कोहे० विसे० ० । मायाए० विसे० । लोहे० विसे० । केवलणाण. विसे० । पयला० विसे० । शरीरमें असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीरमें संख्यातगुणा है। तैजसशरीर में विशेप अधिक है। कार्मणशरीर में विशेष अधिक है। अयशकीतिमें. संख्यातगुणा है। तियग्गतिमें विशेष अधिक है। मनुष्यगतिमें विशेष अधिक है । हास्यमें संख्यातगुणा है। रति में विशेप अधिक है । सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। स्त्रीवेदमें संख्यातगुणा है। शोकमें विशेष अधिक है। अरतिमें विशेष अधिक है । नपुंसकवेदमें विशेप अधिक है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेष अधिक है। पुरुपवेदमें विशेप अधिक है। संज्वलन मानमें विशेष अधिक है। संज्वलन क्रोधमें विशेष अधिक है। संज्वलन माया में विशेप अधिक है। संज्वलन लोभमें विशेप अधिक है। दानान्तरायमें विशेष अधिक है। इस प्रकार वीर्यान्तराय तक विशेषाधिक- क्रमसे ले जाना चाहिये । मनःपर्य यज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेप अधिक है । श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है । मतिज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। अवधि- दर्शनावरणमें विशेप अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है । असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । उच्चगोत्र में विशेष अधिक है । नीचगोत्रमें विशेष अधिक है । इस प्रकार नरकगतिदण्डक समाप्त हुआ। इसी प्रकार प्रकृत प्ररूपणा देवगतिमें भी करना चाहिये । तिर्यग्गति में विशेषता है-उत्कर्पसे जो प्रदेशाम सम्यक्त्व में संक्रान्त होता है वह स्तोक है। सम्यग्मिथ्यात्वमें संख्यातगुणा है । अप्रत्या- ख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण क्रोध में विशेष अधिक है। अप्रत्या- ख्यानावरणमाया में विशेप अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्याना- वरण मानमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण क्रोध में विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। केवलज्ञानापरणमें विशेष १ फाप्रती 'वि' इति पाठः । २ अ-तापत्योः 'वि०' इति पाठः। छ, से. ७१ ५६२ छक्खंडागमे संतकस्म णिद्दा० विसे० । पयलापयला० विसे० । णिहाणिद्दा० विसे० । थीणगिद्धि० विसे । केवलदंसगा० विसे० । मिच्छत्ते. असंखे० गुणं । अणंताणुवंधिमाणे० असंखे० गुणं । कोहे. विसे० । मायाए० विसे० । लोहे० विसे० । णिरयगईए० अर्णतगुणं । आहार० असंखे० गुणं । जसगित्ति० असंखे० गुणं । वेउनिय० संखे० गुणं । ओरालिय० विसे० । तेज. विसे० । कम्मइय. विसे । अजस कित्ति० संखे० गुणं । देवगइ० विसे० । तिरिक्खगइ० विसे० । मणुसगइ० विसे० । हस्स० संखे० गुणं । रदि० विसे० । साद० संखे० गुणं । णवंसयवेद० संखे० गुणं । सोगे० विसे० | अरदि० विसे० । णवूस० (१) विसे० । दुगुंछ० विसे० । भय० विसे० । पुरिस० विसे० । माण- संजलण० मिसे० । कोह० विसे । माया० विसे० । लोह० विसे० । दाणंतराइय० विसे । लाहंतराइय० बिसे० । एवं विसेसाहियकमेण णेदव्यं जाव विरियंतराइयं ति । मणपज० विसे० । ओहिणाण० विसे० । सुद० घिसे० । मदि० विसे० । ओहिदसण० विसे० ० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । साद० संखे० गुणं । उचागोदे० विसे० । णीचागोद० बिसे० । एवं तिरिक्खगइदंडओ समत्तो । मणुसेसु ओघ- अधिक है । प्रचला में विशेष अधिक है। निद्रा में विशेष अधिक है । प्रचलाप्रचला में विशेष अधिक है। निद्रानिद्रा में विशेप अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेप अधिक है । केवलदर्शनावरणमें विशेष अधिक है । मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानुवन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानुबन्धी क्रोधमें विशेष अधिक है । अनन्तानुबन्धी मायामें विशेष अधिक है। अनन्तानु- वन्धी लोभमें विशेष अधिक है। नरकगति में अनन्तगुणा है। आहारशरीर में असंख्यातगुणा है। यशकीर्ति में असंख्यातगुणा है। क्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है। औदारिकशरीर में विशेप अधिक है। तेजस शरीर में विशेप अधिक है। कार्मणशरीरमें विशेप अधिक है। अयशकीर्ति में संख्यातगुणा है। देवगति में विशेष अधिक है । तियेग्गति में विशेष अधिक है। मनुप्यगति में विशेष अधिक है । हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेष अधिक है। साता. वेदनीयमें संख्यातगुणा है । नपुंसकवेदमें संख्यातगुणा है। शोकमें विशेष अधिक है । अनिमें विशेप अधिक है । नपुंपकवेद में विशेप अधिक है। जुगुप्सामें विशेप अधिक है। भय में विशेप अधिक है। पुरुपवेदमें विशेप अधिक है। संज्वलन मानमें विशेप अधिक है। संध्यटन क्रोधमें विशेष अधिक है। संज्वलन माया में विशेप अधिक है। संज्वलन लोभमें विशेष अधिक है । दानान्तरायमें विशेष अधिक है । लाभान्तरायमें विशेष अधिक है । इस प्रकार विशेषाधिकरामसे वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये। मनःपर्ययज्ञानावरण में विशेष अधिक है । अवधिमानावरणमें विशेष अधिक है । श्रुतज्ञानावरण में विशेष अधिक है । गतिमानावरणमें विशेष अधिक है । अवधिदर्शनावरण में विशेष अधिक है। अचक्षुदर्शनायरणमें विशेष अधिक है । चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिफ है । सातावेदनीयमें संग्ल्यातगुणा है। उगोत्र में विशेष अधिक है । नीचगोत्र में विशेष अधिक है। इस प्रकार तियगतिदण्टक समाप्त हुआ। मनुष्यों में - १ तामती 'मय (दषि ) पेटः' इति पाठः।

अप्पाबहुआणियोगद्दारे संकमप्पाबहुअं ५६३ दंडओ समत्तो (1)। एइंदिएसु उकस्सेण जं पदेसग्गं संकामिजदि सम्मत्ते तं थोवं । सम्मामिच्छत्ते० असंखे० गुणं । अपञ्चक्खाणमाणे० असंखे० गुणं । कोहे. विसे० । मायाए० विसे० । लोहे. विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । कोहे. विसे० । मायाए० पिसे० । लोहे. विसे। केवलणाण. विसे० । पयला० पिसे। णिद्दा० विसे । पयलापयला विसे० । णिद्दाणिद्दा० विसे० । थीणगिद्धि० विसे० । केवलदंस० विसे। णिरयगइ० अर्णतगुणं । आहार० असंखे० । जसकित्ति ० असंखे० गुणं । वेउव्यिय० संखे० गुणं । ओरालिय. विसे । तेज० विसे० । कम्मइय० विसे । अजसकित्ति० संखे० गुणं । देवगइ० विसे० । तिरिक्खगइ० विसे० । मणुसगइ० विसे० । हस्स-भये ० संखे० गुणं । रदि. विसे० । साद० संखे० गुणं । इथि० संखे० गुणं । सोगे० विसे० । अरदि० विसे० । णस० विसे० । दुगुंछ० विसे० । भय० विसे० । माणसंजलण. विसे० । कोहे. विसे० । मायाए० विसे० । लोहे. विसे० । दाणंतराइय० विसे० । एवं विसेसाहिय- कमेण धणेदव्वं जाव विरियंतराइयं ति । मणपजव० विसे० । ओहिणाण विसे० । सुद० ओघदण्डकके समान प्ररूपणा है। एकेन्द्रिय जीवों में उत्कर्पसे जो प्रदेशाम सम्यक्त्व प्रकृति में संक्रान्त होता है वह स्तोक है। सम्यग्मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है । अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेप अधिक है। केवलज्ञानावरण में विशेप अधिक है । प्रचला में विशेप अधिक है । निद्रा में विशेष अधिक है। प्रचलाप्रचलामें विशेष अधिक है। निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है । स्त्यानगृद्धि में विशेप अधिक है। केवलदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। नरकगति में अनन्तगुणा है । आहारकशरीर में असंख्यातगुणा है। यशकीर्तिमें असंख्यातगुणा है । क्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है। औदारिकशरीरमें विशेप अधिक है। तेजसशरीरमें विशेष अधिक है। कामणशरीरमें विशेष अधिक है । अयशकीर्तिमें संख्यातगुणा है । देवगनि में विशेप अधिक है । तियेग्गतिमें विशेष अधिक है। मनुष्यगतिमें विशेप अधिक है। हास्य और भयमें संख्यातगुणा है। रति में विशेष अधिक है। सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । बीचेद में संख्यातगुणा है । शोकमें विशेष अधिफ है। अरतिमें विशेष अधिक है। नपुंसक वेद में विशेष अधिक है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेष अधिक है । संज्वलन मानमें विशेष अधिक है। संज्वलन क्रोधमें विशेष अधिक है। संज्वलन माया में विशेष अधिक है। संचलन लोभमें विशेष अधिक है। दानान्तरायमें विशेष अधिक है। इस प्रकार वीर्यान्तराय नक विशेष अधिक झमसे ले जाना चाहिये। आगे मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अधि. १ ताप्ती 'सेलिगमाणे (पश्चरसाणमाणे) इति पाठः। २ अतोऽमे अफापत्योः 'मलयाने बिल कोहे। विसे ० मायाए० (से० लोहे० विसेक इत्येतावनाधिकः पाठोऽस्ति । ३ कामती से भयल, तामती दिसे [भय.]' इति पाठः। - ५६४ छक्खंडागमे संतकम्म विसे० । मदि० विसे० । ओहिदंसण० चिसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । असाद० संखे० गुणं । उच्चागोदे० विसे० । णीचागोदे विसे० । एवमेइंदियदंडओ समत्तो। जहण्योण जं पदेसग्गं सम्मत्ते संकामिजदि तं थोवं । सम्मामिच्छते. असंखे. गुणं । मिच्छत्ते० असंखे० गुणं । अणंताणुवंधिमाणे० असंखे० गुणं । कोहे० विसे० । मायाए० विसे० । लोहे० विसे० । पयलापयला० असंखे० गुणं । णिहाणिद्दा० वि० । थीणगिद्धि० विसे० । अपञ्चक्खाणमाणे असंखे० गुणं । कोहे० विसे० । मायाए० विसे० ० । लोहे. विसे० । पञ्चस्खाणमाणे० विसे० । कोहे. विसे० । मायाए० विसे० । [ लोहे० बिसे०]। पयला० विसे० । णिद्दा० विसे० । केवलदसण० विसे० । णिरयगइ० अणंतगुणं । देवगइ० असंखे० गुणं । वेउब्धिय० संखे० गुणं । आहार. असंखे० गुणं । मणुसगइ० संखे० गुणं । उच्चागोद० संखे० गुणं । तिरिक्खगइ० असंखे गुणं । णस० असंखे० गुणं । णीचागोद० संखे० गुणं । इत्थि० असंखे० गुणं । ओरालिय० असंखे० गुणं । कोहसंजल० असंखे० । माण० विसे० । पुरिस० विसे० । माय० विसे० । जसकित्ति० असंखे० गुणं । तेज० संखे० गुणं । कम्मइय० विसे० । ज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। श्रुतज्ञावरणमें विशेष अधिक है। मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। उच्चगोत्रमें विशेष अधिक है। नीचगोत्रमें विशेप अधिक है। इस प्रकार एकेन्द्रियदण्डक समाप्त हुआ । जघन्य रूपसे जो प्रदेशाग्र सम्यक्त्व प्रकृति में संक्रान्त होता है वह स्तोक है। सम्य. ग्मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है। मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है । अनन्तानुबन्धी मानमें असंख्यातगुणा है । अनन्तानुवन्धो क्रोधर्म विशेष अधिक है। अनन्तानुवन्धी मायामें विशेष अधिक है। अनन्तानुवन्धी लोभमें विशेष अधिक है। प्रचलाप्रचलामें असंख्यातगुणा है। निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानायरण माया में विशेप अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है । प्रत्याख्यानावरण गानमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है। [ प्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। ] प्रचलामें विशेष अधिक है। निद्रामें विशेष अधिक है। केवलदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। नरकनिमें अनन्तगुणा है । देवगतिमें असंख्यातगुणा है । बैंक्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है । आहारशरीर में असंगयात. गुणा है । मनुष्यगतिमें संख्यातगुणा है । उच्चगोत्रमें संख्यातगुणा है। तियगनिमें अमंग्यान. गुणा है । नपुंसकवेदमें असंख्यातगुणा है । नीचगोत्र में संग्ल्यातगुणा है । स्रीवेदमें अग्यानगुणा है। औदारिकशरीरमें असंख्यातगुणा है । संचलन क्रोधर्म अमन्यात गुणा है। संयलन मानमें विशेष अधिक है। पुन्यवेद में विशेष अधिक है। संघलन माया में विशेष अधिक है। योनिमें असंख्यातगुणा है। तेजसशरीरमें संन्यातगुणा है। फार्मणशरीर में विशेष अभियः । -- अप्पाबहुआणियोगदारे संकमप्पावहुअं ५६५ अजसकित्ति० संखे० गुणं । हस्स० संखे० गुणं । रदि० विसे० । साद० संखे० गुणं । सोगे० असंखे० । अरदि० विसे० । दुगुंछा. विसे० । भय० विसे०। लोहसंजल. विसे० । दाणंतराइय० विसे० । एवं विसेसाहियकमेण णेदव्यं जाब विरियंतराइयं ति। मणपजव० विसे । ओहिणाण. विसे० । सुद० विसे० । मदि० विसे० । ओहिदसण० विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । असादे० संखेजगुणं । एवमोपदंडओ समत्तो । णिरयगदीए जं पदेसग्गं संकामिजदि सम्मत्ते तं थोवं । सम्मामिच्छत्ते० असंखे० गुणं । मिच्छत्ते० असंखे० गुणं । अणंताणुवंधिमाणे० असंखे० गुणं । कोहे० विसे० । मायाए० विसे० । लोहे० विसे० । पयलापयला० असंखे० गुणं । णिहाणिद्दा० विसे० । थीणगिद्धि० विसे० । अपचक्खाणमाणे असंखे० गुणं । कोहे० विसे० । मायाए० विसे । लोहे. विसे० । पच्चक्खाणमाणे विसे० । कोहे विसे० । मायाए विसे । लोहे विसे० । केवलणाण विसे० । पयला० विसे० । गिद्दा विसे० । केवलदसण. विसे० । आहार० असंखे० गुणं' । देवगइ० असंखे० गुणं । मणुसगइ० संखे० गुणं । वेउव्यिय० संखे० गुणं । णिरयगइ० संखे० गुणं । अयशकीर्तिमें संख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेष अधिक है। साता. वेदनीयमें संख्यातगुणा है । शोकमें असंख्यातगुणा है । अरतिमें विशेप अधिक है। जुगुप्सामें विशेप अधिक है। भयमें विशेप अधिक है। संज्वलन लोभमें विशेष अधिक है । दानान्तरायमें विशेप अधिक है। इस प्रकार विशेपाधिकक्रमसे वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये । मनः पर्ययज्ञानावरणमें विशेष अधिक है । अवधिज्ञानावरणमें विशेप अधिक है । श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है । मतिज्ञानावरणमें विशेप अधिक है । अवधिदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है । चक्षुदर्शनावरणमें विशेप अधिक है । असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। इस प्रकार ओघदण्डक समाप्त हुआ। नरकगति में जो प्रदेशाग्र सम्यक्त्वमें संक्रान्त होता है वह स्तोक है । सम्यग्मिथ्यात्व में असंख्यातगुणा है। मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानुवन्धी क्रोधमें विशेप अधिक है। अनन्तानुबन्धी माया में विशेप अधिक है अनन्तानु- यन्धी लोभमें विशेष अधिक है। प्रचलाप्रचलामें असंख्यातगुणा है । निदानिद्रा में विशेष अधिक है। स्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है । अप्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है अप्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है प्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मायामें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। केवलज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। प्रचलामें विशेप अधिक है । निद्रा में विशेप अधिक है। केवलदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। आहार- शरीरमें असंख्यातगुणा है। देवतिम असंख्यातगुणा है। मनुष्यगतिमें संख्यातगुणा है। वैक्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है। नरकगतिमें संख्यातगुणा है। गोत्रमें संन्यातगुणा है। १ ताप्रती 'अर्णतगुणा' इति पाठः । - ૧૬૬ छक्खंडागमे संतकम्म । उच्चागोद० संखे० गुणं । तिरिक्खगइ० असंखे० गुणं । इत्थि संखे० गुणं । णबुंस० संखे० गुणं । णीचागोद० संखे० गुणं । जसकित्ति० असंखे० गुणं । ओरा- लिय० संखे० गुणं । तेज० विसे० । कम्मइय० विसे० । अजस कित्ति संखे० गुणं । पुरिस० संखे० गुणं । हस्स संखे० गुणं । रदि० विसे० । अरदि०संखे० गुणं । सोगे० संखे० गुणं । दुगुंछा० विसे० । भय० विसे० । माणसंजलण विसे० । कोहसंजलण. विसे० ० । मायाए० विसे० । [लोहे. विसे० । ] दाणंतराइए. विसे० । एवं विसेसाहिय- कमेण णेदव्यं जाब विरियंतराइयं ति । मणपजव० विसे० । ओहिणाण० विसे० । सुद. विसे० । मदि० विसे० । ओहिदंस० विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । असादे० खे० गुणं । एवं णिरयगइदंडओ समत्तो । तिरिक्खेसु जं पदेसग्गं संकामिजदि सम्मत्ते तं थोवं। सम्मामिच्छत्ते. असंखे० गुणं । 'मिच्छत्ते० असंखे० गुणं । अणंताणुवंधिमाणे० असंखे० गुणं । कोहे. विसे० । मायाए० विसे० । लोहे० विसेसा० । पयलापयला असंखे० गुणं । णिहाणिदा० विसे० । थीणगिद्धि० विसे० । अपचक्खाणमाणे० असंखे० गुणं । कोहे० विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे. तिर्यग्गतिमें असंख्यातगुणा है। स्त्रीवेदमें संख्यातगुणा है । नपुंसकवेदमें संख्यातगुणा है। नीचगोत्रमें संख्यातगुणा है। यशकीर्ति में असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीर में संख्यातगुणा है । तैजसशरीर में विशेष अधिक है । कामर्णशरीर में विशेप अधिक है । अयशनीति में संख्यात- गुणा है। पुरुपवेदमें संख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेप अधिक है। अरतिमें संख्यातगुणा है। शोक संख्यातगुणा है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेप अधिक है। संचलन मानमें विशेष अधिक है। संज्वलन क्रोधमें विशेष अधिक है। संज्वलन मायामें विशेष अधिक है। [संज्वलन लोभमें विशेष अधिक है। ] दानान्तरायमें विशेप अधिक है। इस प्रकार विशेषाधिककमसे वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये। आगे मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। भूतनाना. चरगमें विशेप अधिक है। मतिज्ञानावरण में विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेष अधिक है । अचक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । इस प्रकार नरकगतिदण्डक समाप्त हुआ। तियंचों में जो प्रदेशाग्र सम्यक्त्वमें संक्रान्त होता है यह स्तोक है। सम्यग्मिथ्यात्य में असंख्यातगुणा है । मिथ्यात्वमें असंख्यागुणा है। अनन्तानुबन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानुवन्धी क्रोध विशेष अधिक है । अनन्तानुबन्धी माया विशेष अधिक है। अनन्नानु. पन्धो लोभमें विशेप अधिक है । प्रचलाप्रचला असंख्यातगुणा है। निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। अप्रत्याख्याना. घरण मोघमें विशेष अधिक है। अप्रत्यास्यानायरणमाया विशेष अधिक है। अप्रत्यागानावरण लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानापरण मानमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण कायमें ताप्रती नालीद वाक्यम् इति पाठः ।

अप्पावहुआणियोगदारे संकमप्पायहुअं ५६७ विसे । केवलणाणावरण विसे० । पयला० पिसे० । केवलदसण विसे० । णिरयगइ० असंखे० गुणं । देवगइ० असंखे० गुणं । वेउन्विय० संखे० गुणं । आहार० असंखे० गुणं । मणुसगइ० संखे० गुणं । उच्चागोद० संखे० गुणं । ओरालिय० असंखे० गुणं । तिरिक्खगई० संखे० गुणं । इथि० संखे. गुणं । णस० संखे० गुणं । णीचागोद० संखे० गुणं । जसकित्ति० असंखे० गुणं । तेज० संखे० गुणं । कम्मइय० विसे० । अजसकित्ति० संखे० गुणं । पुरिस० संखे० गुणं । हस्स० संखे० गुणं । रदि० विसे० । सादे० संखे गुणं । सोगे० संखे० गुणं । अरदि० विसे० । दुगुंछा० विसे० । भय० विसे | माणसंजलण विसे० । कोहे० विसे० । मायाए० विसे० । लोहे० विसे० । दाणंतराइए. विसे० । एवं विसेसाहियकमेण णेदव्वं जाव विरियंतराइयं ति । मण- पज्जव० विसे० । ओहिणाण. विसे० । सुद० विसे० । मदि० विसे० । ओहिदसण. विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । असादे० संखे० गुणं । एवं तिरिक्ख- गइदंडओ समत्तो। मणुसगदीए जं पदेसग्गं संकामिजदि सम्मत्ते तं थोवं । सम्मामिच्छत्ते० असंखे. गुणं । मिच्छत्ते. असंखे० गुणं । अणंताणुवंधिमाणे० असंखे० गुणं । कोहे. विसे । विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण माया में विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेप अधिक है। केवलज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। प्रचलामें विशेष अधिक है। केवलदर्शना- वरणमें विशेष अधिक है। नरकगतिमें असंख्यातगुणा है। देवगतिमें असंख्यातगुणा है। वैक्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है । आहारशरीरमें असंख्यातगुणा है । मनुष्यगतिमें संख्यातगुणा है । उच्चगोत्रमें संख्यातगुणा है । औदारिकशरीरमें असंख्यातगुणा है। तियग्गतिमें संख्यातगुणा है । स्रोवेदमें संख्यातगुणा है । नपुंसकवेदमें संख्यातगुणा है। नीचगोत्रमें संख्यातगुणा है। यशकीर्तिमें असंख्यातगुणा है। तेजसशरीरमें संख्यातगुणा है । कामणशरीरमें विशेप अधिक है। अयशकीर्तिमें संख्यातगुणा है। पुरुपवेद में संख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेष अधिक है । सतावेदनीयमें संख्यातगुणा है। शोकमें संख्यातगुणा है । अरतिमें विशेष अधिक है । जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेप अधिक है । संज्वलन मानमें विशेष अधिक है। संज्वलन क्रोधमें विशेष अधिक है। संज्वलन मायामें विशेष अधिक है। संज्वलन लोभमें विशेष अधिक है। दानान्तरायमें विशेष अधिक है । इस प्रकार विशेषाधिकक्रमसे वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये । मनःपर्ययज्ञाना- वरणमें विशेष अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। भूतज्ञानावरणमैं विशेष अधिक है। मतिज्ञानाचरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेप अधिक है । चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है । आसातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। इस प्रकार तिर्यग्गतिदण्डक समाप्त हुआ। मनुष्यगतिमें जो प्रदेशाग्र सम्यक्त्वमें संक्रान्त होता है वह स्तोक है । सन्यग्मिध्यात्वमें असंख्यातगुणा है। मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है । अनन्तानुवन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। तापतौ 'अर्गतगुणा' इति पाठः । २ ताप्रती 'उभागोद० संखे० । पुरिस० संखे । ओरालि' इति पाठः ક૬૮ छक्खंडागमे संतकम्म मायाए० बिसे० । लोहे० विसे० । पयलापयला० असंखे० गुणं । णिहाणिद्दा० विसे । थीणगिद्धि० विसे० । अपञ्चक्खाणमाणे० असंखे० गुणं । कोहे० विसे० । मायाए. विसे० • लोहेविसे० । पंचक्खाणमाणे० विसे० । कोहे० विसे । मायाए० विसे० । लोहे० विसे० । केवलणाण० विसे० । पयला० विसे० । णिहा. विसे० । केवलदसण. विसे० । णिरयगइ० अणंतगुणं । देवगइ० असंखे० गुणं । वेउब्धिय० संखे० गुणं । आहार० असंखे० गुणं । तिरिक्खगइ० असंखे० गुणं । णबुंस० असंखे० गुणं । उच्चागोद० संखे० गुणं । इत्थि० असंखे० गुणं । मणुमगइ० असंखे० गुणं । ओरालि. असंखे गुणं । कोहसंजलण० असंखे० गुणं । माण० विसे० । पुरिस० विसे० । माया० विसे० । उचागोद० असंखे० गुणं । जसकित्ति० असंखे० गुणं । तेज० संखे० गुणं । कम्म० पिसे० । अजसकित्ति० संखे० गुणं० । हस्स० संखे० गुणं । रदि० विसे० । सादे० असंखे० गुणं । सोगे० संखे० गुणं । अरदि० पिसे० । दुगुंछा० विसे ० । भय० विसे० । लोहसंजलण. विसे० । दाणंतराइय० विसे । एवं विसेसाहियकमेण णेदव्यं जाब विरियंतराइयं ति । मणपज. विसे० । ओहिणाण. अनन्तानुबन्धी क्रोधमें विशेष अधिक है । अनन्तानुवन्धी मायामें विशेप अधिक है। अनन्तानु वन्धी लोभमें विशेष अधिक है। प्रचलाप्रचलामें असंख्यातगुणा है। निद्रानिद्रामें विशेष अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण क्रोधमे विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मान में विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण क्रोध में विशेष अधिक है। प्रत्याख्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेप अधिक है। केवलज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। प्रचला में विशेष अधिक है। निद्रा में विशेप अधिक है। केवलदर्शनावरण में विशेष अधिक है। नरकगति में अनन्तगुणा है । देवगति में असंख्यातगुणा है। वैक्रियिक शरीर में मंख्यातगुणा है। आहारक शरीर में असंख्यातगुणा है। तिर्यग्गतिमें असंख्यातगुणा है। नपुंसकवेद में असंख्यात. गुणा है। उसगोत्र में संख्यातगुणा है । लोवेद में असंख्यातगुणा है। मनुष्यगति में असंख्यातगुणा है । औदारिक शरीर में असंख्यातगुणा है। संज्वलन क्रोध में असंख्यानगुणा है। संज्वलन मानमें विशेप अधिक है। पुरुपवेदमें विशेष अधिक है। संचलन माया में विशेष अधिक है। उच्चगोत्र में असंख्यातगुणा है। यशकीति में असंख्यातगुणा है । तेजसशरीरमें संख्यातगुणा है। कामणशरीर में विशेप अधिक है । अयशकीर्ति में संख्यातगुणा है। हास्यमें संन्यातगुणा है । रतिमें विशेष अधिक है । सातावेदनीयमें असंन्यातगुणा है। शोक में मंख्यातगुणा है। अरतिमें विशेष अधिक है। जुगुप्सा में विशेष अधिक है । भय में विशेष अधिक है। संचलन लोभमें विशेष अधिक है। दानान्तरायमें विशेप अधिक है। इस प्रकार विशेषाधिक मामले वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये । मनःपयज्ञानावरणमे विशेष अधिक है। अधिशानावरणमें १ ताप्रतायतः प्राय पपायला असे. गुगा"लो विसे' इत्यतापान पाठः पुनदिनी फोरम:। -- - ५६९. अप्पाबहुआणियोगद्दारे संकमप्पाबहुअं विसे । सुद० विसे० । मदि० विसे० । ओहिदंसण. विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । असाद० संखेजगुणं । एवं मणुसगइदंडओ समत्तो । देवगदीए जं पदेसग्गं संकामिजदि सम्मत्ते तं थोवं । सम्मामिच्छत्ते. असंखे०. गुणं । मिच्छत्ते असंखे० गुणं । अणंताणुवंधिमाणे० असंखे० गुणं । कोहे. विसें० । मायाए० विसे० । लोहे. विसे० । पयलापयला० असंखे० गुणं । णिहाणिदा० विसे० । थीणगिद्धि० विसे० । अपचक्खाणमाणे० असंखे० गुणं। कोहे० विसे । मायाए० विसे । लोहे. विसे० । पञ्चक्खाणमाणे० विसे० । कोहे० विसे० । मायाए० विसे० । लोहे० विसे० । केवलणाण विसे० । पयला० विसे० । णिद्दा० विसे० । केवलदसण विसे० । आहार० अणंतगुणं । णिरयगइ० असंखे० गुणं । तिरिक्खगइ० असंखे० गुणं । णवूस० संखे० गुणं । उच्चागोद० संखे० गुणं । इत्थि० असंखे० गुणं । देवगइ० असंखे० गुणं । वेउन्चिय० संखे० गुणं । मणुसगइ० असंखे० गुणं । ओरा- लिय० असंखे० गुणं । उच्चागोद० असंखे० गुणं । जसकित्ति० असंखे० गुणं । तेज० संखे० गुणं । कम्मइय० विसे० । अजसकित्ति० संखे० गुणं । पुरिस० संखे० गुणं । विशेष अधिक है। श्रुतज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। चक्षुदर्शना- वरणमें विशेप अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। इस प्रकार मनुष्यगतिदण्डक समाप्त हुआ। देवगतिमें जो प्रदेशाग्र सम्यक्त्वमें संक्रान्त होता है वह स्तोक है। सम्यग्मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है । मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानुबन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानुबन्धी क्रोधमें विशेप अधिक है। अनन्तानुवन्धी मायामें विशेप अधिक है । अनन्तानु- बन्धी लोभमें विशेप अधिक है। प्रचलाप्रचलामें असंख्यातगुणा है। निद्रानिद्रामें विशेप अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेप अधिक है । अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। अप्रत्या. ख्यानावरण क्रोधमें विशेष अधिक है । अप्रत्याख्यानावरण माया में विशेप अधिक है। अत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है । प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण क्रोधमें विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण माया में विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेप अधिक है। केवलज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। प्रचला में विशेष अधिक है । निद्रामें विशेष अधिक है । केवलदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। आहारक- शरीरमें अनन्तगुणा है। नरकगतिमें असंख्यातगुणा है। तिर्यग्गतिमें असंख्यातगुणा है। नपुंसकवेदमें संख्यातगुणा है। उच्चगोत्र में संख्यातगुणा है। स्त्रीवेदमें असंख्यातगुणा.है। देवगतिमें असंख्यातगुणा है । वैक्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है। मनुष्यगति में असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीरमें असंख्यातगुणा है। उच्चगोत्र में असंख्यातगुणा है । यशकीर्ति में असंख्यातगुणा है । तैजसशरीरमें संख्यातगुणा है । फार्मणशरीर में विशेप अधिक है । अयश. फीति में संख्यातगुणा है। पुरुपवेदमें संख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यातगुणा है । तिमें छ. से. ७२ ।

५७० छक्खंडागमे संतकम्म हस्स० संखे० गुणं । रदि० विसे० । साद० संखे० गुणं । सोगे० संखे० गुणं । अरदि० विसे० । दुगुंछ० विसे० । भय० विसे० | कोहे० विसे० । माणे० विसे० । लोहे. विसे० । मायाए० विसे० । दाणंतराइए० विसे० । एवं विसेसाहियकमेण णेदव्वं जाव विरियंतराइयं ति । मणपजव० विसे० । ओहिणाण. विसे० । सुद० विसे । मदि० विसे० । ओहिदसण. विसे० । अचक्खु० पिसे० । चक्खु० विसे । असाद० संखे० गुणं । एवं देवगइदंडओ समत्तो। [एईदिएसु] जं पदेसग्गं संकामिजदि सम्मत्ते तं थोवं । सम्मामिच्छत्ते असंखे० गुणं । अणंताणुवंधिमाणे० असंखे० गुणं । कोहे० विसे० । मायाए० विसे० । लोहे. विसे० ० । अपर्चक्खाणमाणे० असंखे० गुणं । कोहे० विसे० । मायाए० विसे० । लोहे. विसे० । पञ्चक्रवाणमाणे० विसे० । कोहे० विसे० । मायाए विसे० । लोहे० विसे । केवलणाण. विसे० । पयला. विसे० । णिद्दा०२ विसे० । पयलापयला० पिसे० । णिहाणिद्दा० बिसे० । थीणगिद्धि० विसे० । केवलदसणा० विसे । णिरयगई० अर्णत- विशेष अधिक है । सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । शोकमें संख्यातगुणा है । अरतिमें विशेप अधिक है। जुगुप्सामें विशेप अधिक है। भयमें विशेप अधिक है। [ संज्वलन ] कोधमें विशेप अधिक है। संज्वलन मानमें विशेप अधिक है। संज्वलन लोभमें विशेप अधिक है। संज्वलन माया में विशेप अधिक है। दानान्तरायमें विशेप अधिक है। इस प्रकार विशेपाधिक- क्रमसे वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये। मनःपर्ययज्ञानावरण में विशेप अधिक है। अवधि- ज्ञानावरणमें विशेप अधिक है । श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । इस प्रकार देवगतिदण्डक समाप्त हुआ। [एकेन्द्रिय जीवोंमें ] जो प्रदेशाग्र सम्यक्त्वमें संक्रान्त होता है वह सोक है। सम्य- ग्मिथ्यात्व में असंख्यातगुणा है। अनन्तानुवन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। अनन्तानुबन्धी मोधमें विशेष अधिक है । अनन्तानुबन्धी मायामें विशेष अधिक है। अनन्तानुबन्धो लोभमें विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण कोधमें विशेप अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण मायामें विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानायरण मानमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानायरण प्रोध में विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण माया में विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण लोभमें विशेष अधिक है। केवलज्ञानावरणमें विशेप अधिक है । प्रचलामें विशेप अधिक है। निद्राम विशेष अधिक है । प्रचलामचलामें विशेष अधिक है। निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है। स्त्यानदिमें विशेष अधिक है। केवलदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। नरकगति में अनन्त गुणा है। देवाति में १ ताप्रती 'लोहे दिने सेवनाने विमा पलादिसायनि पाता कि पमा विसे । पातानमाने वि०, फोहे बिले, माया दिने, योगिन' पाठः।

अप्पाबहुआणियोगद्दारे लेस्साणियोगद्दार गुणं । देवगई० असंखे० गुणं । वेउन्चिय० संखे० गुणं । आहार० असंखे० गुणं । मणुसगई० असंखे० गुणं । उच्चागोदे० संखे० गुणं । जसकित्ति० असंखे० गुणं । ओरालिय० संखे० गुणं । तेज० विसे० । कम्म० विसे० । तिरिक्खगई० संखे० गुणं । अजसकित्ति० संखे० गुणं । णीचागोद० संखे० गुणं । हस्स० संखे० गुणं । रदि० विसे० । सादे० संखे० गुणं । सोग० संखे० गुणं । अरदि० विसे० । णस० विसे० । दुगुंछ० विसे० । भय० विसेसा० । माणसंलण विसे० । कोहे० विसे० । मायाए० विसे० । लोहे विसे० । दाणंतराइए. विसे । एवं विसेसाहियकमेण णेद जाव विरियंतराइयं ति । मणपज० विसे० । ओहिणाण. विसे० । सुद० विसे० । मदि० विसे० । ओहिदंस० विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । असादे० संखे० गुणं । णीचागोदे० विसेसाहियं । एवमेइंदियदंडओ समत्तो । एवं पदेससंकमो समत्तो। लेस्सा ति णियोगद्दारे तत्थे इमाणि अट्ठ पदाणि । तं जहा- लेस्साणिक्खेवे १ लेस्साणयपरूवणा २ लेस्साणिरूवणा ३ सेस्सासंकमणणिव्यत्ती ४ लेस्सावण्णसमोदारो ५ लेस्सावण्णचउरंसे ६ लेरसाहाणपरूवणा ७ लेस्सासरीरसमोदारो चेदि ८ । एवं लेस्सा- णिक्खेवेत्ति समत्तमणियोगहारं । असंख्यातगुणा है। वैक्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है । आहारकशरीरमें असंख्यातगुणा है। मनुष्यगतिमें असंख्यातगुणा है। उच्चगोत्रमें संख्यातगुणा है। यशकीर्तिमें असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीर में संख्यातगुणा है। तैजसशरीरमें विशेष अधिक है। फार्मणशरीरमें विशेष अधिक है। तिर्यग्गति में संख्यातगुणा है। अयशकीर्तिमें संख्यातगुणा है। नीचगोत्र में संख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेष अधिक है। सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। शोकमें संख्यातगुणा है। अरतिमें विशेप अधिक है। नपुंसफवेदमें विशेष अधिक है । जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेप अधिक है। संज्वलन मानमें विशेष अधिक है। संज्वलन क्रोधमें विशेप अधिक है। संज्वलन माया में विशेष अधिक है। संज्वलन लोभमें विशेष अधिक है। दानान्तरायमें विशेष अधिफ है। इस प्रकार विशेष अधिक क्रमसे वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये। आगे मनःपर्ययज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरण में विशेष अधिक है। अचक्षु- दर्शनावरणमें विशेष अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। नीचगोत्रमें विशेप अधिक है। इस प्रकार एकेन्द्रियदण्डक समाप्त हुआ। इस प्रकार प्रदेशसंक्रम समाप्त हुआ। लेश्या अनुयोगद्वारमैं वहां ये आठ पद हैं। वे ये हैं- १ लेश्यानिक्षेप, २ लेश्यानय- प्ररूपणा, ३ लेश्यानिरूपणा, ४ लेश्यासंक्रमणनिर्वृत्ति, ५ लेश्यावर्णसमवतार, ६ लेश्या- वर्णचतुरंश, ७ लेश्यास्थानप्ररूपणा और ८ लेश्याशरीरसमवतार । इस प्रकार लेश्यानिक्षेप अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। १ ताप्रती 'तरस' इति पाठः। २ ताप्रती 'लेस्साअंतरविहाणे' इति पाठः ।

५७२ छक्संडागमे संतकम्म 3 लेस्सापरिणामे त्ति मणिोगद्दारे दस वित्थरपदाणि । तं जहा- लेस्सापरिणामे १ लेस्सापचयविहाणे २ लेस्सापद विहाणे ३ लेस्सासामित्त विहाणे ४ लेस्साकालविहाणे ५ लेस्साअंतरविहाणे ६ लेस्सातिब्ध-मंददाए ७ लेस्साहाणपरूवणा ८ लेस्साहाणाणं अप्पा- बहुअं ९ लेरसागइसमोदारो १० । एवं लेस्सापरिणामे ति सम्मत्तमणिओगद्दारं । लेस्साकम्मे त्ति अणिओगद्दारे पंचविधियपदाणि । तं जहा- लेस्सासंकमे १ लेस्साट्ठाणसंकमे २ लेस्साहाणप्पाचहुए ३ लेस्साअद्धासमोदारे ४ लेस्साशद्धासंकमे ५ । किण्हलेस्सादो संकिलेसंतो अण्णलेसं ण संकमदि, विसुज्झतो सट्टाणे उट्ठाणपदिदाणि ओसरदि, णीलेलस्सं वा संकमदि', ठाणे अर्णतगुणहीणे पददि । णीलादो संकिलिस्संतो सट्टाणे छहाणपदिदाणि ओसरदि, किण्णलेस्सं संकमदि ठाणे अणंतगुणे; तदो विसुझंतो सट्ठाणे उट्ठाणपदिदाणि ओसरइ, काउं वा संकमदि ठाणे अणतगुणहीणे । काउलेस्सादों संकिलेसंतो सट्ठाणे छट्ठाणपदिदाणि ओसरई, णीललेस्सं वा संकमदि" ठाणे अर्णतगुणे; विसुज्झतो सहाणे ओसरदि छट्ठाणपदिदाणि, तेउं वा संकमदि हाणे अणंतगुणहीणे । तेउलेस्सादो संकिलेसंतो सट्ठाणे छट्ठाणपदिदाणि ओसरदि, काउं वा संकमदि हाणे लेश्यापरिणाम अनुयोगद्वार में दस विस्तारपद हैं। वे ये हैं- १ लेश्यापरिणाम, २ लेश्या- प्रत्ययविधान, ३ लेश्यापदविधान, ४ लेश्यास्वामित्वविधान,५ लेश्याकालविधान, ६ लेश्याअन्तर- विधान, ७ लेश्यातीत्र मंदता, ८ लेश्यास्थानप्ररूपणा, ९ लेश्यास्थानोंका अल्पवहुत्य और १० 'लेश्यागतिसमवतार । इस प्रकार लेश्यापरिणाम अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। लेश्याकर्म अनुयोगद्वार में पंचविधिक पद हैं । वे ये हैं-१ लेश्यासंकाम, २ लेश्यास्थान- संक्रम, ३ लेश्यास्थानअल्पबहुत्व, ४ लेण्याद्धासमवतार' और ५ लेश्याद्धासंगम । कृष्णलेश्यासे संक्लेशको प्राप्त हुआ जोव अन्य लेश्यामें संक्रमण नहीं करता, उससे विशुद्धिको प्राप्त होकर स्वस्थान में छह स्थानों में पड़ता है अथवा नीललेझ्यामें संक्रमण करता है- अर्थात् अनन्तगुणे हीन नीरलेश्या रूप परस्थान में जाता है। नीललेश्यासे संक्लेशको प्राप्त होकर स्वस्थानमें छा, स्थानों में नीचे गिरता है अथवा अनन्तगुणे परस्थान में कृष्णलेश्या में संक्रमण करता है। इससे विशुद्धिको प्राप्त होता हुआ स्वस्थान में छह स्थानों में गिरता है, अथवा अनन्तगुणी हीन परस्थान. भूत कापोतलेश्या में संक्रमण करता है । कापोतले झ्यासे संक्लेशको प्राप्त होकर स्वस्थान में छह स्थानों में नीचे पड़ता है. अथवा अनन्तगुणे परस्थानमें नीललेझ्या में संक्रमण करता है। उससे विद्धिको प्राप्त होता हुआ स्वस्थान में छह स्थानों में गिरता है, अथवा अनन्तगुणी हीन परस्थान- भूत तेजलेश्यामें संक्रमण करता है। तेजलेश्यासे संक्लेशको प्राप्त होकर स्वस्थान में छह स्थानों में नीचे गिरता है, अथवा अनन- गुणे परस्थानमें कापोतलेचामें संक्रमण करता है। इससे विशुद्धिको प्राप्त होता हुआ बलान में १ तामती 'लेसायचरो' इति पाठः। २ अकाली: रमेश पाठ। it गादो', कामती 'मामादो', तामती 'उस्लाटो ( काहाटी)' इति पाठः । ४ -कामनाइस इति पाठः। ५ भाकामयोः 'संशामटर प्रति पाठः। ६ अमात्यो समयमा', हामी देवकर (लेमादो) लगती' ति पाठः। ७ तामसी पाउनासापारः।

अप्पाबहुआणियोगद्दारे लेस्साकम्माणियोगदारं .५७३ अर्णतगुणे; विसुझंतो सट्ठाणे छट्ठाणपदिदाणि अहिसरदि, पम्माए वा संकमदि ठाणे अणंतगुणे । पम्मादो संफिलिस्संतो मट्ठाणे छहाणपदिदाणि ओसरइ, ते वा संकमदि ट्ठाणे अणंतगुणहीणे; विसुझंतो सट्टाणे छहाणपदिदाणि' ओसरदि, सुकं वा संकमइ ठाणे अणंतगुणे । सुक्कादो संकिलिस्संतो सहाणे छहाणपदिदाणि ओसरइ, पम्मं वा संकमदि हाणे अणंतगुणहीणे; विसुझंतो ण कहिं पि संकमदि । किण्ह-णीलाओ अप्पिदाओ कटु णीलाए हाणं जहण्णयं थोवं, पडिग्गहवाण णीलाए जहण्णयमणंतगुणं । किण्हाए जहण्णयमणंतगुणं । किण्हाए जहणयं द्वाणं संकमट्ठाणं च अणंतगुणं । णीलाए जहण्णयं संकमट्ठाणमणंतगुणं । किण्हाए जहण्णयं पडिग्गहट्ठाणमणंतगुणं । णीलाए उक्कस्सयं पडिग्गहट्ठाणमणंतगुणं । किण्हाए उकस्सयं पडिग्गहट्टाणमणतगुणं । णीलाए उक्कस्सयं संकमट्ठाणं उक्कस्सयं संकिलेसट्ठाणं च अणंतगुणं । किण्हाए उकस्सयं पडिग्गहट्ठाणमणंतगुणं । किण्हाए उक्कट्ठाणमणंतगुणं । लेम्सट्ठाणाणि छटाणपदिदाणि असंखेजा लोगा । तत्थ काऊए हाणाणि थोवाणि । णीलाए हाणाणि असंखेजगुणाणि । किण्हाए हाणाणि असंखेजगुणाणि । तेऊए हाणाणि असंखेजगुणाणि । पम्माए हाणाणि असंखेजगुणाणि । सुकाए हाणाणि असंखेजगुणाणि । एवमेसो समत्तो दंडओ। छह स्थानों में ऊपर जाता है, अथवा अनन्तगुणे पद्मलेश्या के परस्थानमें संक्रमण करता है। पद्मलेश्यासे संक्लेशको प्राप्त होकर स्वस्थानमें छह स्थानामें नीचे गिरता है, अथवा अनन्तगुणी हीन परस्थानभूत तेजलेश्या में संक्रमण करता है। उससे विशुद्धिको प्राप्त होता हुआ स्वस्थान में छह स्थनोंमें ऊपर जाता है, अथवा अनन्तगुणी परस्थानभून शुक्ललेश्या में संक्रमण करता है। शुछलेश्यासे संक्लेशको प्राप्त होकर स्वस्थानमें छह स्थानों में नीचे गिरता है, अथवा अनन्तगुणी हीन परस्थानभूत पद्मले श्यामें संक्रमण करता है। उससे विशुद्धिको प्राप्त होता हुआ कहींपर भी संक्रमण नहीं करता है। कृष्ण और नील लेश्याओंकी विवक्षा करके नीलका जघन्य स्थान स्तोक है। नीलका जघन्य प्रतिग्रहस्थान उससे अनन्तगुणा है। कृष्णका जघन्य स्थान अनन्तगुणा है । कृष्णका जघन्य स्थान और संक्रमस्थान अनन्तगुणा है। नीलका जघन्य संक्रमस्थान अनन्तगुणा है। कृष्णका जघन्य प्रतिग्रहणस्थान अनन्तगुणा है । नीलका उत्कृष्ट प्रतिग्रहस्थान अनन्तगुणा है । कृष्णका उत्कृष्ट प्रतिग्रहस्थान अनन्तगुणा है । नीलका उत्कृष्ट संक्रमस्थान और उत्कृष्ट संक्लेशस्थान अनन्त- गुणा है। कृष्णका उत्कृष्ट प्रतिग्रहस्थान अनन्तगुणा है। कृष्णका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है। छह स्थान पतित लेश्यास्थानोंका प्रमाण असंख्यात लोक है। उनमें कापोतलेश्याके स्थान स्तोक हैं । नीललेश्याके स्थान असंख्यातगुणे है । कृष्णलेश्या के स्थान असंख्यातगुणे हैं। तेजलेश्याके स्थान असंख्यातगुणे हैं। पद्मलेश्याके स्थान असंख्यातगुणे हैं। शुक्टलेझ्याके स्थान असंख्यातगुणे हैं। इस प्रकार यह दण्डक समाप्त हुआ। १ ताप्रती 'हाणपदाणि' इति पाठः । २ अ-काप्रत्योः 'पोग्गाहाग', तामती 'रभो (दि) गह- हार्ण' इति पाठः । ३ ताप्रती किण्हार उमा० मतगुणं, किण्हाए० अर्गतगुर्ग' इति पाठः।

छक्खंडागमें संतकम्म तिव्य-मंददाए दंडओ- सव्वत्थो काऊए जहण्णयं द्वाणमणंतगुणं (१)। णीलाए जहण्णयं हाणमणंतगुणं । किण्हाए जहण्णयं हाणमण्तगुणं । तेऊए जहण्णयं द्वाणमणत- गुणं । पम्माए जहष्णयं हाणमणंतगुणं । सुक्काए जहण्णयं ठाणमणंतगुणं । काऊए उकस्सयं ठाणमणंतगुणं । णीलाए उकस्सयं द्वाणमणंतगुणं । किण्हाए उक० द्वाण- मणतः । तेऊए उकस्सयं हाणमणंतगुणं । पम्माए उकस्सयं द्वाणमणंतगुणं । सुकाए उकस्सयं द्वाणमर्णतगुणं । एवं तिव्य-मंददाए दंडओ समचो । लेस्साकम्मे' ति समत्त- मणिओगद्दारं । सादमसादे त्ति अणिओगद्दारे सव्वत्थोवमेयंतसादं । एयंतअसादं संखेजगुणं । अणेयंतसादं असंखेजगुणं । अणेयंतअसादं विसेसाहियं । एसो ताव एको पयारो। इमो विदिओ दंडओ । तं जहा- सादत्ताए पद्धं असंछुद्धं अपडिछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं विसेसाहियं । जं सादचाये बद्धं असंछुद्धं असादचाये वेदिदि तं विसेसाहियं । जमसादत्ताये बद्धं असंछुद्धं सादत्ताये वेदिजदि तं संखेजगुणं । नमसादत्ताए पद्धं असंछुद्धं अपडिछुद्धं असादत्ताये वेदिजदि तं विसेसाहियं । जं तीव-मंदताका दण्डक- कपोतलेश्याका जघन्य स्थान सबमें स्तोक है। नीललेश्याका जघन्य स्थान अनन्तगुणा है। कृष्णलेश्याका जघन्य स्थान अनन्तगुणा है। तेजलेश्याका जघन्य स्थान अनन्तगुणा है। पदुमलेश्याका जघन्य स्थान अनन्तगुणा है। शुक्ललेझ्याका जघन्य स्थान अनन्तगुणा है । कपोतलेश्याका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है । नोललेश्याका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है। कृष्णलेश्याका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है। तेजोले श्याका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है। पद्मलेश्याका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है। शुक्ललेश्याका उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है। इस प्रकार तीव-मंदताका दण्डक समाप्त हुआ। लेश्याफर्म अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। सात-असात अनुयोगद्वार में एकान्तसात सबमें स्तोक है । एकान्तअसात संख्यातगुणा है। अनेकान्तसात असंख्यातगुणा है। अनेकान्तअसात विशेष अधिक है। यह एक पहला प्रकार है। यह दूसरा दण्डक है जो इस प्रकार है- जो सात स्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त और अप्रतिक्षित होता हुआ सात स्वरूपसे वेदा जाता है वह विशेप अधिक है। जो सात स्वरूपसे वांधा जाकर असंक्षिप्त [ और अप्रतिक्षिप्त होता हुआ असात स्वरूपसे वेदा जाता है यह विशेप अधिक है। जो असात स्वरूपसे बांधा जाकर असंक्षिप्त [ और अप्रतिक्षित ] होता हुआ मात स्वरूपसे वेदा जाता है यह संख्यातगुणा है । जो असातस्वरूपसे घांधा जाकर अमंक्षिप्त और अप्रतिक्षित होता हुआ असात स्वरूपसे वेदा जाता है यह विशेष अधिक है। जो सात स्वरूपसे - १ प्रतिषु 'लेमारय.' इति पाठः । २ मामयोः कोतमा का इति पाठः। ३ लामो TE [अरदिन्दु अगादचार। इति पाठः । ४ तामती 'युद्ध [ अादियुद्ध- ] गादला नि पाठः ।

अप्पाबहुआणियोगद्दारे पोग्गलअत्ताणियोगद्दारं सादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तमसंखेजगुणं । जं सादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिछुद्धं असादत्ताए वेदिजदि तं विसेसाहियं । [ जमसादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिछुद्धं सादत्ताए वेदिजदि तं संखेजगुणं ] । जमसादत्ताए बद्धं संछुद्धं पडिछुद्धं असादत्ताए वेदिजदि तं विसेसाहियं । एवं सादासादे त्ति समत्तमणियोगद्दारं । दीहे रहस्से त्ति अणियोगद्दारे इमा मग्गणा । तं जहा- पयडिदीहं द्विदिदीहं अणुभागदीहं पदेसदीहं ति चउन्विहं दीहं । एवं रहस्सं पि चउन्विहं । एदेसिमट्टण्हं पि अप्पाबहुअपरूवणाए कदाए दीहे रहस्से त्ति अणिओगद्दारं समत्तं होइ । भवधारणे ति अणिओगद्दारे इमा मग्गणा । तं जहा- कदरेण कम्मेण भवो धारिजदि ? आउएण कम्मेण धारिजदि । एत्थ अप्पाचहुअपरूवणा कायया । एवं भवधारणे त्ति समत्तमणिओगदारं । पोग्गलअत्ते त्ति अणिओगद्दारे इमा गाहा मग्गिदव्या-ममत्ति० आहारे परिभोयं परिग्गहग्गय तहा च परिणामा । आदेसपमाणत्ता (?) पुण अट्ठविहा पोग्गला अत्ता ॥१॥ अत्ता मत्ति परिभोग परिग्गहणे तथा च परिणामे । आहारे गहणे पुण चव्विहा पोग्गला अत्ता ॥२॥ बांधा जाकर संक्षिप्त और प्रतिक्षिप्त होकर सात स्वरूपसे वेदा जाता है वह असंख्यातगुणा है। जो सात स्वरूपसे बांधा जाकर संक्षिप्त और प्रतिक्षिप्त होता हुआ असात स्वरूपसे वेदा जाता है वह विशेष अधिक है। [जो असात स्वरूपसे वांधा जाकर संक्षिप्त और प्रतिक्षिप्त होता हुआ सात स्वरूपसे वेदा जाता है वह संख्यातगुणा है। ] जो असात स्वरूपसे वांधा जाकर संक्षिप्त और प्रतिक्षिप्त होता हुआ असात स्वरूपसे वेदा जाता है वह विशेप अधिक है। इस प्रकार सातासात अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। दीर्घ-हस्व अनुयोगद्वार में यह मार्गणा है। यथा- प्रकृतिदीर्घ, स्थितिदोघ, अनुभागदीर्घ और प्रदेशदीर्घ इस प्रकार दीर्घ चार प्रकारका है। इसी प्रकार से हस्व भी चार प्रकारका है। इन आठोंके अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा करनेपर दीर्घ-हस्त्र अनुयोगद्वार समाप्त होता है। भवधारण अनुयोगद्वार में यह मार्गणा है । यथा- किस कर्म के द्वारा भव धारण किया जाता है ? आयु कर्मके द्वारा धारण किया जाता है । यहां अल्पवहुत्वको प्ररूपणा करना चाहिये इस प्रकार भवधारण अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। पुद्गलात्त अनुयोगद्वार में इस गाथाकी मार्गणा करना चाहिये- ममत्ति० आहार, परिभोग, परिग्रहगत तथा परिणामस्वरूपसे पुद्गल ग्रहण किये जाते हैं। परन्तु आदेशप्रमाणकी अपेक्षा (?) आठ प्रकारके पुद्गल ग्रहण किये जाते हैं ।। १ ।। ममत्व, परिभोग, परिग्रहण तथा परिणाम रूपसे चार प्रकार के पुद्गल ग्रहण होते हैं। तथा आहार और ग्रहणमें चार प्रकारके पुद्गल ग्रहण किये जाते हैं ।।२।। १ ताप्रती 'दीहरहस्से' इति पाठः । २ अ-काप्रत्योः 'अप्याबहुअं परूवणाए कदाए दीए', ताप्रती 'अप्पाबहुभं परूवगाए कदा । एवं दीहे' इति पाठः । ३ ताप्रती 'मग्गिदम्बा ममति० । इति पाठः ।

ઉ૭૬ खंडागमे संतकम्म एत्य एदेसिमप्पाबहुअं का यव्यं । एवं पोगलअत्ते त्ति समत्तमणियोगद्दारं । णिवत्तमणिधत्ते ति अणिोगद्दारे इदमपदं । तं जहा- जमोकहिदि उपट्टि आदि, पर पयडि ण संकामिजदि उदये ण दिजदि पदेसग्गं तं णिधत्तं णाम | तन्धिव. रीयमणिधत्तं । णितं पुण पयडीए केवडिभायेण अवणिजदि ? पलिदोयमस्स- असंखेजदिभाएण पलिदोवमनग्मूलस्स असंखेजदिभाएण | आ उअसामणाये मग्गणा सा चेव एत्य वि कायव्या। एत्थतणपदाणमप्पाबहुअपरूवणा च जाणिदूण कायव्या । एवं णिवत्तमणिधत्ते ति समत्तमणियोगद्दारं । णिकाचिदमणिकाचिदं ति अणिओगद्दारे कधमपदं जं पदेसरगंण विओकहिनदि [ण वि उकहिजदि ] ण वि संकामिञ्जदि ण वि उदए दिजदि तं णिकाचिदं णाम । तचिरीयमणिकाचिदं। तं पयडीए पलिदोवमस्स असंखे० भाग-पडिभागियं । जा उवसामणाए मग्गणा सा चेव एदेसु दोसु कायव्या। जं पदेसग्गं गुणसेडोए दिदि तं थोवं । [5] उवसामिजदि पगेसग्गं तं असं० गुणं । जं णिधतिजदि तमसंखे० गुणं । जं णिकाचिजदि तमसंखे० गुणं । जमघापवत्तसंकमेण संकामिजदि तमसंखे० गुणं । - यहां इनका अल्पबहुत्व करना चाहिये । इस प्रकार पुद्गलात्त अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। निधत्त अनिधत्त अनुयोगद्वार में यह अर्थपद है। यथा जो प्रदेशाम अपकर्षको प्राप्त फराया जाता है और उत्कर्षको भी प्राप्त कराया जाता है, किन्तु न तो परप्रकृति रूपमें संक्रान्त किया जाता है और न उदय में दिया जाता है उसका नाम निधत्त है। इससे विपरीत अनिधत्त होता है। निधत्त प्रकृति के कितने भागसे अपनीत किया जाता है ? वह पल्योपमके असंख्यात भाग व पल्योपमके वर्गमूलके असंख्यातवें भागसे अपनीत किया जाता है। जो उपशामना में मागेणा है वही यहां भी करना चाहिये। यहांके पदों के अल्पयत्यकी प्ररूपणा भी जानकर करना चाहिये। इस प्रकार निधत्त-अनिधत्त अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। निकाचित-अनिकाचित अनुयोगद्वार में अर्थपद कैसा है ? जो प्रदेशाग्र न अपकृष्ट किया जाता है, न उत्कुष्ट किया जाता है, न संमान्त किया जाता है, और न उमय में भी दिया जाता है उसे निकाचित कहते हैं। इससे विपरीत अनिकाचित है। वह प्रकृति के पल्यो. पमके असंख्यान भाग प्रतिभागवाला है। जो अझामनामें मागेगा है उसे ही इन दोनों में फरना चाहिये। जो प्रदेशाय गुगश्रेणि रूपसे दिया जाता है यह लोक है। जो प्रदेशाप्रा. शान्त किया जाता है वह असंख्यातगुणा है। जो प्रदेशात निघत स्वरूप दिया जाता है या असंख्यातगुणा है । जो निकाचित अवस्थाको प्राप्त कराया जाता है वह असंख्यात गुणा है। जो अधःप्रवृत्तसंकमसे संबामणको प्राप्त कराया जाता है यह असंख्यातगुणा है। - १ मशिगु 'मोहिनदि इति पाठः । ९ प्रति 'पदेय दतिपाः। प्रजा पाठः। ४ अ-कामयः 'प्रोटिन, ताप्रती 'श्रीमद, [कवि शाइटि-] पाटः | अ मामयोः पहिचानियोगदारान्त 'वानर' पर्वतीय दम पर ५७७ अप्पावहुआणियोगद्दारे पच्छिमक्खंधाणियोगहारं महावाचयाणं खमासमणाणं उवदेसेण सव्वत्थोवाणि कसाउदयट्ठाणाणि । ठिदिबंधअझवसाणवाणाणि असं० गुणाणि । पदेसउदीरयअज्झवसाणट्ठाणाणि असंखे० गुणाणि । पदेससंकमणाअज्झवसाणाणि असंखे० गुणाणि । उवसामयअज्झवसा० असं० गुणाणि । णिधत्तमज्झवसाणाणि असं० गुणाणि । णिकाचणज्झवसा० असं० गुणाणि । एत्थ अणंतराणंत[२]गुणगारो असं० लोगा । एवं णिकाचिदं ति समत्तमणियोगद्दारं । कम्महिदि ति अणियोगद्दारे एत्थ महावाचया अजणंदिणो संतकम्मं करेंति' । महावाचया ट्ठिदिसंतकम्मं पयासंति । एवं कम्महिदि ति समत्तमणियोगद्दारं । पच्छिमक्खंधे त्ति अणियोगद्दारे तत्थ इमा मग्गणा- आउअस्स अंतोमुहुत्ते सेसे तदा आवजिदकरणं करेदि । आवजिदकरणे कदे तदो केवलिसमुग्घाद करेदि- पढमसमए दंडं करेदि । ठिदीए असंखेजे भागे हणदि । अप्पसत्थकम्मं सव्यं अणंतभागे अणुभागखंडएण हणदि। तदो विदियसमए कवाडं करेदि । तत्थ सेसियाए द्विदीए असंखेजे भागे हणदि । सेसस्स च अणुभागस्स अर्णतभागे हणदि । तदो तदियसमए मंथं करेदि । तत्थ वि सेसियाए द्विदीए असंखेले भागे हणदि । सेसस्स च अणुभागस्स अणंतभागे हणदि । तदो चउत्थसमए लोगं पूरेदि । लोगे पुण्णे एगा महावाचक क्षमाश्रमणके उपदेशके अनुसार फपायउदयस्थान सबसे स्तोक हैं। स्थिति. वन्धाध्यवसानस्थान असंख्यातगुणे हैं। प्रदेशउदीरक अध्यवसानस्थान असंख्यातगुणे हैं। प्रदेशसंक्रम अध्यवसानस्थान असंख्यातगुणे हैं । उपशामक अध्यवसानस्थान असंख्यातगुणे हैं। निधत्त अध्यवसानस्थान असंख्यातगुणे हैं। निकाचन अध्यवसानस्थान असंख्यातगुणे । यहां अनन्तर-अनन्तर गुणकारका प्रमाण असंख्यात लोक है । इस प्रकार निकाचित अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। फर्मस्थिति अनुयोगद्वार में यहां महावाचक आर्यनन्दी सत्कर्मकी परूपणा करते हैं और महावाचक [ नागहस्ती ] स्थितिसत्कर्मको प्रकाशित करते हैं। इस प्रकार कर्मस्थिति अनुयोग- द्वार समाप्त हुआ। पश्चिमस्कन्ध इस अनुयोगद्वार में वहां यह मार्गणा है- आयुके अन्तर्मुहूर्त मात्र शेप रहनेपर तब आवर्जित करणको करता है। आवर्जित करणके कर चुकनेपर फिर केवलिसमु- द्घातको करता है। इसमें प्रथम समयमें दण्डसमुद्घातको फरता है । स्थितिके असंख्यात बहुभागको नष्ट करता है। सब अप्रशस्त कर्मके अनन्त बहुभागको अनुभागकाण्डक द्वारा नष्ट करता है। पश्चात् द्वितीय समयमें कपाटसमुद्घातको करता है। उसमें शेप स्थिति के असंख्यात बहुभागको नष्ट करता है। शेप अनुभागके भी अनन्त बहुभागको नष्ट करता है। तत्पश्चात् तृतीय समयमें मंथ समुद्घातको करता है। उसमें भी शेप स्थिति के असंख्यात बहुभागको नष्ट करता है। शेष अनुभागके भी अनन्त बहुभागको नष्ट करता है। तदनंतर १ अ-काप्रत्योः 'करेंति कति', ताप्रती 'करेंति [ करेंति ]' इति पाठाः । २ ताप्रती [आउअरस-] अंतोमहत्तसेसे' इति पाठः। ३ प्रतिषु 'सेसं च' इति पाठः । ४ अ-काप्रत्योः 'मत्थं' इति पाठः । ५ अ- कामत्योः 'लोगो परेदि', ताप्रती 'लोगो च (पू) रेदि' इति पाठः । ६ प्रतियु 'एटा' इति पाठः । छ. से. ७३ ५७८ छक्खंडागमे संतकम्म जोगवग्गणा । सेसियाए द्विदीए असंखेजे भागे हणदि, सेसस्स च अणुभागस्स अणंते भागे हणदि। महाबाचयाणमजमखुममणाणमुबदेसेण लोगे पुण्णे आउअसमं करेदि । महावाच- याणमजणंदीणं उवदेसेण अंतोमुहुत्तं हवेदि संखेजगुणमाउआदो। एदे चत्तारिसमए अप्पसत्यस्स अणुभागस्स अणुसमओवट्टणा एयसमइयो चरिमखंडयघादो। एत्तो सेसियाये द्विदीए संखेजभागो द्विदिखंडयं हणदि । सेसस्स च अणुभागस्स अणंतभागे हणदि । एत्तो पाये अंतोमुहुत्तिया द्विदिखंडयस्स अणुभागखंडयरस उक्कीरणद्धा । तदो अंतोमुहत्तं गंतूण वचिजोगं णिरंभदि अंतोमुहुत्तेण । एत्तो अंतोमुहुत्तं गंतूण मणजोगं णिरंभदि अंतोमुहुत्तेण । तदो अंतोमुहुत्तं गंतूण उस्सास-णिस्सासं णिरुभदि अंतोमुहुत्ते ण । तदो अंतोमुहुत्तं गंतूण कायजोगं णिरुभदि अंतोमुहुत्तेण । कायजोगं च णिरुंभ- माणो इमाणि करणाणि करेदि- पढमममए अपुयकद्दयाणि करेदि पुष्यफयाणं हेढदो । आदिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदाणमसंखेजदिभागमोकहदि । जीवपदेसाणम- संखेजदिभागमोकडदि । अंतोमुहुत्तेण कायजोगपुव्यफद्दयाणि करेदि असंखेजगुणहीणाए सेडोए, जीवपदेसाणमसंखेजगुणाए सेडीए । अपुव्यफद्दयाणि सेडीए असंखेझदिभागो, सेडिवग्गमूलस्स वि असंखेजदिभागो। पुव्वफद्दयाणमसंखेजदिभागो अपुब्ब- चतुर्थ समयमें लोकपूरणसमुद्घातको करता है। लोकके पूर्ण होनेपर एक योगवर्गणा होती है। यहां शेप स्थिति के असंख्यात बहुभागको और शेप अनुभागके अनन्त बहुभागको नष्ट करता है। महावाचक आर्यमंक्षु श्रमणके उपदेशके अनुसार लोकके पूर्ण होनेपर [ शेप अघाति कर्माको ] आयु कमेके समान करता है। किन्तु महावाचक आर्यनन्दीके उपदेश के अनुसार आयु कम से संख्यातगुणी अन्तर्मुहूर्त मात्र स्थितिको स्थापित करता है। इन चार समयों में अप्रशस्त अनुभागको प्रतिसमय अपवर्तना और एक समयरूप अन्तिम स्थितिकाण्डकका घात होता है। यहां शेप स्थिति के संख्यात बहुभागको नष्ट करता है। शेप अनुभागके भी अनन्त बहुभागको नष्ट करता है। यहां स्थितिकाण्डक और अनुभागकाण्डकका अन्तमुहर्त मात्र उत्कीरणकाल होता है । तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर अन्तमहतं कालके द्वारा वचनयोगका निरोध करता है। यहांसे अन्तर्मुहर्त जाकर अन्त हृत कालके द्वारा मनयोगका निरोध करता है। तत्पश्चात अन्तर्मुहर्त जाकर अन्तर्मुहूर्त कालके द्वारा उच्छ्वास निःश्वासका निरोध करता। पश्चात् अन्तमुहूर्त जाकर काययोगका अन्त मुंहत काल के द्वारा निरोध करता है। फाययोगमा निरोध करता हुआ इन फरणों को करता है- प्रथम समय में पूर्वस्पर्धकों के नीचे अपृयमों को करता है। आदि वर्गगाके अविभागप्रतिच्छेदोंके असंख्यान भागका अपकर्पण करना है। जीवप्रदेशोंके संख्यातवें भागका अपकर्पण करता है। अन्त मुहून में काययोगक अपूर्वस्मयकों को असंख्यातगुणहीन श्रेणिसे और जीवप्रदशोंके असंन्यातगुणी श्रेणिसे करता है। अपूर्यस्पर्मक श्रेणिके असंख्यातवें भाग और श्रेणिवर्गमूल के भी असंन्यात भाग होते हैं। 'अपूयस्पोक १ तामती 'मजोरि सादिनद मिभदि इति पाठः। २७.कापली मत पाठः। ३ अमती मूलग टि अमेयेक मागो', का-तामी मूलग अगानि पाठः।

अप्पाबहुआणियोगद्दारे उत्तरपयडिसंतकम्मदंडओ फद्दयाणि । एवमपुवकद्दयकरणं समत्तं । एत्तो अंतोमुहत्तं किट्टीओ करेदि । अपुवफयाणमादिवग्गणाए अविभागपडि- च्छेदाणमसंखेजदिभागमोकड्डदि' । जीवफद्दयपदेसाणं असंखेजदिभागमोकड्डिजदि । अंतोमुहुत्तं किट्टीओ करेदि असंखेजगुणहीणाए सेडीए । जीवपदेसे असंखेजगुणाए सेडीए ओकडदि । किट्टीदो किट्टीए गुणगारो पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो। किडीओ सेडीए असंखेजदिभागो, अपुब्बफयाणमसंखेजदिभागो। किट्टिकरणे णिढिदे तदो से काले अपुव्वफयाणमसंखेजदिभागो णस्सेदि । अंगोमुहुत्तं किट्टिगदजोगो सुहुमकिरियं अपडियादिझाणं झायदि । किट्टीणं चरिमसमए असंखेजा भागा णस्संति । जोगम्हि णिरुद्धम्हि आउअसमाणि कम्माणि [करेदि] । तदो अंतोमुहुत्तं सेलेसिं पडिवजदि, समुच्छिण्णांकरियं अणियदिशाणं झादि । सेलेसि पडिवजदि त्ति कम्मविप्पमुको सिद्धि गच्छदि । एवं पच्छिमक्खंधे ति समत्तमणिओगद्दारं । अप्पावहुए चि जमणिओगद्दारं एत्थ महावाचयखमासमणा संतकम्ममग्गणं करेदि । उत्तरपयडिसंतकम्मेण दंडओ । तं जहा- सव्वत्थोवा आहारसंतकम्मियाँ। सम्मत्तस्स संतकम्मिया असंखेजगुणा । सम्मामिच्छत्तस्स संतकम्मिया विसेसाहिया । पूर्वस्पर्धकोंके असंख्यातवें भाग होते हैं । इस प्रकार अपूर्वस्पर्धककरण समाप्त हुआ। यहां अन्तर्मुहूर्त कृष्टियोंको करता है- अपूर्वस्पर्धकोंकी आदि वर्गणाके अविभाग- प्रतिच्छेदोंके असंख्यातवें भागका अपकर्पण करता है । जीवस्पर्धकप्रदेशोंके असंख्यातवें भागका अपकर्पण करता है। अन्तर्मुहूर्त काल असंख्यातगुणी हीन श्रेणिसे कृष्टियोंको करता है । जीव- प्रदेशोंका असंख्यातगुणित श्रेणिसे अपकर्पण करता है। कृष्टिसे कृष्टिके गुणकारका प्रमाण पल्योपमका असंख्यातवां भाग है। कृष्टियां श्रेणिके असंख्यातवें भाग और अपूर्वस्पर्धकोंके असंख्याता भाग मात्र होती हैं । कृष्टिकरणके समाप्त होनेपर तदनन्तर काल में अपूर्वस्पर्धको [और पूर्वस्पर्धकों ] के असंख्यातव भाग का नाश करता है । अन्तर्मुहूर्त कृष्टिगतयोग होकर सूक्ष्म- क्रियाप्रतिपाती ध्यानको ध्याता है । कृष्टियोंके अन्तिम समयमें असंख्यात बहुभाग नष्ट हो जाता है। योगके निरुद्ध हो जानेपर फर्मोको आयुके वरावर करता है। तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त में शैलश्य- भावको प्राप्त होता है व समुच्छिन्नक्रियानिवृत्ति ध्यानको ध्याता है। शैलेश्यभावको प्राप्त हुआ कि कर्मोसे रहित होकर सिद्धिको प्राप्त होता है । इस प्रकार पश्चिमस्कन्ध अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। जो अल्पबहुत्व अनुयोगद्वार है यहां महावाचक क्षमाश्रमण (नागहस्ती ) सत्कर्ममार्गणाको करते हैं। उत्तरप्रकृतिसत्कर्मदण्डककी प्ररूपणा इस प्रकार है- आहारसत्कमिक सबसे स्तोक हैं। सम्यक्त्व के सत्कमिक असंख्यातगुणे हैं। सम्यग्मिध्यात्वके सत्कमिक विशेष अधिक है। १ प्रतिषु 'मोवदि' इति पाठः।२ अ-काप्रत्योः '-भागो', ताप्रती -भागो मत्सदि-]।' इति पाठः । ३ प्रति 'कदं' इति पाठः । ४ अ-काप्रत्योः 'पडिवादि' इति पाठः । ५ अप्रती 'मति, काप्रती 'सति' इति पाठः। ६ अ-कापत्योः 'संतकम्म मग्गण' इति पाठः । ७ अ-काप्रत्योः 'सम्वत्यो आहार संतकमिय' इति पाठः ।

छक्खंडागमे संतकम्म मणुस्साउअस्स संतकम्मिया असंखेजगुणा । णिरयाउअस्स संतकम्मिया असंखेजगुणा । देवाउअस्स संतकम्मिया असंखेजगुणा । देवगइसंतकम्मिया असंखेजगुणा' । णिरय- गइसंतकम्मिया विसेसाहिया। वेउव्यिय० अणंतगुणा । उच्चागोद० अणंतगुणा । मणुसगइ० विसे० । तिरिक्खाउअस्स० विसे० । अणंताणुवंधिउका० [विसे०] । मिच्छत्त० विसे० । अट्ठकसायाणं० विसे० । थीणगिद्धितिय० तिरिक्खगइणामाए। विसे० । ण_सयवेद० विसे० । इत्यि० विसे० । छण्णोकसाय० विसे० । पुरिस० विसे० । कोहसंजल० विसे० । माणसंज० ० | माणसंज० विसे० । मायासंज० विसे० ० । लोभसंज० विसे । णिहा-पयलाणं विसे | पंचणाणावरण-चउर्दसणावरण-पंचंतराइयाणं तुल्ला विसेसाहिया । ओरालिय-तेजा-कम्मइय-अनसकित्ति-णीचगोदाणं विसे० । असादस्स० विसे० । साद० विसे० । जसकित्तीणं (१) विसे० । एवमोघदंडओ समत्तो । मोहणीयस्स पयडिवाणसंतकम्मेण सव्वत्थोवा पंचसंतकम्मियो । एकिस्से विसे- साहिया। दोण्हं विसेसा० । तिण्हं विसे० । एकारसण्हं विसे० । चउण्ह तेरसहं संखेजगुणं । वावीसाए संखे० गुणं । तेवीसाए संखे० गुणं । पंचवीसाए असंखे० मनुष्यायुके सत्कार्मिक असंख्यातगुणे हैं। नारकायुके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। देवायुके सत्कमिक असंख्यातगुणे हैं। देवगति नामकमके सत्कर्मिक असंख्यातगुणे हैं। नरकगति नामकर्मके सत्कर्मिक विशेप अधिक है। वैक्रियिकशरीर नामकर्मके सत्कर्मिक अनन्तगुणे हैं। उचगात्रके सत्कर्मिक अनन्तगुणे हैं। मनुष्यगति नामकर्म के सत्कर्मिक विशेष अधिक हैं। तिर्यगायुके सत्कर्मिक विशेष अधिक हैं। अनन्तानुबन्धिचतुष्कके सत्कार्मिक विशेष अधिक है। मिथ्यात्यके सत्कार्मिक विशेष अधिक हैं। आठ कपायोंके सत्कर्मिक विशेष अधिक है। स्त्यानद्धिन्त्रिक और तिर्यग्गति नामकर्मके सत्कर्मिक विशेप अधिक है। नपुंसकवेदक सत्कमिक विशेप अधिक है। नोवेदके सत्कार्मिक विशेप अधिक है। छह नोकपायों के सत्कार्मिक विशेष अधिक हैं। पुरुषवेद के सत्कर्मिक विशेप अधिक हैं। संज्वलन क्रोध के सत्कार्मिक विशेष अधिक हैं । संचलन मानके सत्कार्मिक विशेप अधिक है। संज्वलन मायाके सत्कार्मिक विशेष अधिक हैं। संज्वलन लोभके सत्कर्मिक विशेष अधिक है। निद्रा और प्रचलाके सत्कर्मिक विशेष अधिक हैं। पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पांच अन्तरायके सत्कर्मिक तुल्य य विशेप अधिक हैं । औदारिकशरीर, तेजसशरीर, कार्मणशरीर, अयशकोनि और नीनगोत्रक सत्कार्मिक विशेष अधिक हैं। असातावेदनीयके सत्कार्मिक विशप अधिक है। सातावेदनीयक सत्कार्मिक विशेष अधिक है। यशकीर्ति के सत्कार्मिक विशेष अधिक है । इस प्रकार ओपदण्टक समाप्त हुआ। माहनोयके प्रकृतिस्थानसत्कर्मकी अपेक्षा पांच प्रकृनिरूप न्यानके, सर्मिक सबमें लोक हैं । एकक सत्कार्मिक विशेष अधिक है। दोके विशेष अधिक है। तीनके विशेष अधिक। ग्यारह के विशेष अधिक है। पारके विशेष अधिक है। तरह के संन्यानगुगे । प्राईसक १ अकाययोनीमायते वापपमिदम् । २ असामापी: 'पंचमम्मनमिया', तामा paint (६मत कामपा) पाठः ।

अप्पाबहुआणियोगद्दारे उत्तरपयडिसंतकम्मदंडओ ५.१ गुणं । एक्कवीसाए असंखे० गुणं । चउचीसाए असंखे० गुणं । अट्ठवीसाए असंखे. गुणं । छब्बीसाए अणंतगुणं । एवमोघदंडओ समत्तो । उत्तरपयडिडिदिसंतकम्मेण जहण्णेण पंचणाणावरण-चउर्दसणावरण-सादासाद- सम्मत्त- लोहसंजलण-इस्थि- ण,सयवेद- आउचउक्क-मणुसगइ-जसकित्ति- उच्चागोद-पंच- तराइयाणं जहण्णहिदी थोवा । जट्टिदी तत्तियों चेव । जत्तिया [णिहाणिहा-] पयला- पयली-थीणगिद्धि-णिदा-पयला-मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्त-चारसकसाय-णिर यगइ-तिरिक्ख- गह-देवगह-पंचसरीर-अजकित्ति-णीचागोदाणं जहणिया द्विदी तत्तिया चेव । जद्विदी संखेजगुणा । मायासंज० जह० असंखेजगुणा। माणमंजल० विसे० । कोहसंज विसे० । पुरिसवेद० संखे० गुणा । छण्णोकसायाणं असंखे० गुणा । जट्ठिदी विसे० । एवमोघदंडओ चेव। उत्तरपयडिअणुभागसंतकम्मेण जहणणेण सव्यमंदाणुभागं लोहसंजलणं । माया० अणंतगुणा । माण० अर्णतगुणं । कोह० अर्णतगुर्ण । विरियंतराइय० (१) अणंतगुणं । सम्मत्त० अणंतगुणं । चक्खु० अणंतगुणं । सुदाणुभागं अगंतगुणं । मदिणाण० अर्णत- गुणं । अचक्खु० अणंतगुणं । ओहिणाण० अणंतगुणं । ओहिदंसण० अर्णतगुणं । संख्यातगुणे हैं । तेईसके संख्यातगुणे हैं। पच्चीसके असंख्यातगुणे हैं। इफीस के असंख्यातगुणे हैं। चौबीसके असंख्यातगुणे हैं। अट्ठाईसके असंख्यातगुणे हैं । छब्बीसके अनन्तगुणे हैं। इस प्रकार ओघदण्डक समाप्त हुआ। उत्तरप्रकृतिस्थितिसत्कर्म की अपेक्षा जघन्यसे पांच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, साता व असाता वेदनीय, सम्यक्त्व, संज्वलन लोभ, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, चार आयु कम, मनुष्यगति, यशकीर्ति, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इनकी जघन्य स्थिति स्तोक है। ज-स्थिति उतनी मात्र ही है । निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, निद्रा, प्रचला, मिथ्यात्व, सम्बन्मिथ्यात्व, वारह कपाय, नरकगति, तिर्यग्गति, देवगति, पांच शरीर, अयशकीर्ति और नीचगोत्र; इनकी जघन्य स्थिति उतनी मात्र ही है। ज-स्थिति संख्यातगुणी है। संज्वलन मायाको जघन्य स्थिति असंख्यात- गुणी है। संज्वलन मानकी जघन्य स्थिति विशेष अधिक है। संज्वलन क्रोधको जघन्य स्थिति विशेष अधिक है। पुरुपवेदकी जघन्य स्थिति संख्यातगुणी है। छह नोकपा की जघन्य स्थिति असंख्यातगुणी है। इन सबकी जस्थिति क्रमशः विशेष अधिक है । इस प्रकार ओघदण्टक ही है। उत्तर प्रकृतिसत्कर्मकी अपेक्षा जघन्यतः सबसे मद अनुभागवाला संध्यलन लोभ है। संज्वलन माया उससे अनन्तगुणी है। संज्वलन मान अनन्तगुणा है। संज्वलन मोध अनन्तगुणा है। वीर्यान्तराय (१) अनन्तगुणा है । सम्यक्त्व प्रकृति अनन्तगुणी है। चतुदर्शना- वरण अनन्तगुणा है । श्रुतज्ञानावरण अनन्तगुणा है। मतिज्ञानावरण अनन्तगुणा है । अचक्षु- दर्शनावरण अनन्तगुणा है। अवधिज्ञानावरण अनन्तगुणा है। अवधिदर्शनायरण अनन्तगुणा १ प्रतिपु 'सम्मत्त मणुसगहनामाए इस्थि' इति पा 1 २ ताप्रती 'तचियाए' इति पाठः। अ-कामत्या 'अचिया पयलापयला', ताप्रती 'जतिया ( गिद्दाणिहा ) पयलापपला' इति पाठः । Yat 'माग काप्रती 'मदमंदाणुभाग', ताप्रती 'मंद०' इति पाठः ।

खंडागमे संतकम्म परिभोग० अर्णतगुणं । [ भोग० अर्णतगुणं । ] लाहंतराइय० अणंतगुणं । दाणंत- राइय० अणंतगुणं । चीरियंतराइय० (१) अर्णतगुणं । [ पुरिस० अणंतगुणं । ] इस्थि- वेद० अणंतगुणं । णबुंस० अणंतगुणं । मणपज० अणंतगुणं । सम्मामिच्छत्त० अणंत- गुणं । केवलणाण. केवलदंसणावरण. अर्णतगुणं । पयला० अणंतगुणं । णिहा० अणंतगुणं । हस्स० अणंतगुणं । रदि० अणंतगुणं । दुगुंछा० अणंतगुणं । भय० अणंतगुणं । सोग० अणंतगुणं । अरदि० अर्णतगुणं । अर्णताणुवंधिमाण० अणंतगुणं । कोह. विसे० । मायाए विसे० । लोह० विसे० । वेउ० अणंतगुणं । तिरिक्खाउ अणंतगुणं । तिरिक्खाणुपुच्चि० अणंतगुणं । णिरयगइ० अणतगुणं । मणुसगइ० अणंतगुणं । देवगइ० अणंतगुणं । उच्चागोद० अणंतगुणं । असाद० अणंतगुणं । गिरयाउ० अणंतगुणं । ओरालिय० अणंतगुणं । तेज० अणंतगुणं । कम्मइय०अणंतगुणं । तिरिक्खगइ० अणंतगुणं । णीचागोद० अणंतगुणं । अजसकित्ति० अणंतगुणं । अणादेज० अणंतगुणं । पयलापयला अणंतगुणं । णिहाणिदा० अणंतगुण । थीणगिद्धि० अणंतगुणं । अपचक्खाण माण० अणंतगुणं । कोह. विसे० । माया० विसे० । लोह. विसे० । मिच्छत्त० अणंतगुणं । जसकित्ति० अणंतगुणं । एवमोघदंडओ समत्तो। है। परिभोगान्तराय अनन्तगुणा है । [ भोगान्तराय अनन्तगुणा है। लाभान्तराय अनन्तगुणा है। दानान्तराय अनन्तगुणा है। वीर्यान्तराय (?) अनन्तगुणा है। पुरुषवेद अनन्तगुणा है । स्त्रीवेद अनन्तगुणा है। नपुंसकवेद अनन्तगुणा है। मनःपर्ययज्ञानावरण अनन्तगुणा है। सम्यग्मिथ्यात्व अनन्तगुणा है। केवलज्ञानावरण और केवलदर्शनावरण अनन्तगुणे हैं। प्रचला अनन्तगुणी है। निद्रा अनन्तगुणी है। हास्य अनन्तगुणा है। रति अनन्तगुणा है । जुगुप्सा अनन्तगुणी है । भय अनन्तगुणा है । शोक अनन्तगुणा है । अरति अनन्तगुणी है । अनन्तानु- वन्धी मान अनन्तगुणा है। अनन्तानुवन्धी क्रोध विशेष अधिक है। अनन्तानुबन्धी माया विशेष अधिक है। अनन्तानुबन्धी लोभ विशेष अधिक है। वैक्रियिक शरीर अनन्तगुणा है। तिथंगायु अनन्तगुणो है । तियंगानुपूर्वी अनन्तगुणी है। नरकगति अनन्तगुणी है। मनुष्यगति अनन्तगणी है । देवगति अनन्तगुणा है। उच्चगात्र अनन्तगुणा है। असातावेदनीय अनन्तगुणा है। नारकायु अनन्तगुणी है। औदारिकशरीर अनन्तगुणा है। तेजस शरीर अनन्तगुणा है। * कार्मणशरीर अनन्तगुणा है । तियेग्गति अनन्तगुणो है। नीचगोत्र अनन्तगुणा है। अयशकार्ति अनन्तगुणी है। अनादेय अनन्तगुणा है । प्रचलाप्रचला अनन्तगुणी है। निद्रानिद्रा अनन्तगुणी | स्त्यानगृद्धि अनन्तगुगी है। अप्रत्याख्यानावरण मान अनन्तगुणा । प्राच यशार अधिक है। माया विशेष अधिक है। लाभ विशेष अधिक है। मिथ्यात्व अनन्तगुणा है। यसकार्ति अनन्तगुणों है। इस प्रकार ओघदण्डक समाप्त हुआ। - - . ? फाप्रती परिमोर्गतगइया नगु । माइत प्राण ! टागायत चरितगम मोरगुइयर', तामती पनिंग लाईनगइय० विम्बित गायक परिमोद पाठः ।

५८३ . अप्पायहुआणियोगदारे उत्तरपयडिसंवकम्मदंडओ उत्तरपय डिसंतकम्मेण उकस्सपदेसग्गेण सन्यत्यो अपञ्चक्खाणमाणे उकस्सपदे- सरगं । कोहे] अणंतगुणं । मायाए० विसे० । लोहे. विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । कोहे० विसे० | मायाए. विसे० । लोहे. विसे० । अणंताणुवंधिमाणे० विसे० । कोहे० विसे० । मायाए. विसे० । लोहे० विसे० । सम्मामिच्छत्ते० विसे० । सम्मत्ते. विसे० । मिच्छत्ते विसे० । केवलणाणावरणे संखे० गुणं । पयला० विसे० । गिद्दा विसे० । पयलापयला. विसे० । णिहाणिद्दा० विसे० थीणगिद्धि केवलदसणावरण० विसे० । णिरयाउअम्मि अणंतगुणो। देवाउअम्मि तत्तिया चेव । तिरिक्खाउअम्मि विसे० । मणुस्साउअम्मि विसे० । णिर यगइ० असंखे० गुणा । आहार० असंखे० गुणा । ओरालिय० विसे० । तेज० विसे० । कम्मइय० विसे० । अजसकित्ति० संखे० गुणा । देवगइ० विसे० । मणुसगइ० विसे० । हस्म० संखेजगुणं । रदि० विसेसाहियं । इत्थि० संखे० गुणं । सोग० विसे० । अरदि० विसे० । णस० विसे० । दुगुंछ विसे० । भय०विसे० । एवं विसेसाहियकमेण णेदव्यं जाब विरियंतराइ ति । ओहिणाण. विसे० । मणपजव० विसे० । ओहिदसण. विसे० । चक्खु० - । - उत्तरप्रकृतिसत्कर्म रूप उत्कृष्ट प्रदेशाग्रकी अपेक्षा अप्रत्याख्यानावरण मानमें उत्कृष्ट प्रदेशाग्र सबसे स्तोक है। क्रोधमें अनन्तगुणा है। मायामें विशेप अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है। क्रोधमें विशेष अधिक है। माया में विशेप अधिक है । लोभमें विशेष अधिक है । अनन्तानुबन्धी मानमें विशेष अधिक है । क्रोध में विशेष अधिक है। माया में विशेप अधिक है। लोभमें विशेप अधिक है । सम्याग्मथ्यात्व में विशेप अधिक है। सम्यक्त्वमें विशेप अधिक है। मिथ्यात्व में विशेष अधिक है। केवलज्ञानावरणमें संख्यात- गुणा है । प्रचला में विशेष अधिक है। निद्रा में विशेष अधिक है । प्रचलाप्रचलामें विशेष अधिक है। निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। केवलदर्शनावरण में विशेष अधिक है। नारकायुमें अनन्तगुणा है । देवायुमें उतना हो है । तियंगायुमें विशेप अधिक है। मनु यायुमें विशेप अधिक है। नरकगति में असंख्यातगुणा है। आहारक शरीर में असंख्यात- गुणा है । औदारिकशरीर में विशेष अधिक है । तेजसशरीर में विशेष अधिक है। फार्मणशरीरमें विशेष अधिक है । अयशकीर्ति में संख्यातगुणा है। देवगति में विशेष अधिक है । मनुष्यगति में विशेप अधिक है। हास्यमें संख्यातगुणा है । रति में विशेष अधिक है। सीवेदमें संख्यातगुणा है। शोकमें विशेष अधिक है। अरतिमें विशेष अधिक है। नपुंसकवेद में विशेष अधिक है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेष अधिक है। इस प्रकार विशेषाधिक विशेषाधिक- क्रमसे वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये। अवधिज्ञानावरण में विशेष अधिक है। मनःपयंय. ज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें १ तापतौ नोपलभ्यते वाक्यमिदम् । २ अ-काप्रत्योः 'मव० वि एवं दिवंगादिया र एवं विलसाहिया', ताप्रती 'भय० विसे०, विसेसाहिओ, एवं विसेसाहियः' इति पाठः ।

छक्खंडागमे संतकम्म विसे० । अचक्षु०विसे० । कोहसंजलविसे० । माणसंज० विसे । मायासंज०विसे । जसकित्ति० विस० । णीचागोद० विसे० । उच्चागोद० विसे० । लोहसंजलण मिसेसा- हियं । एवमोवदंडओ समत्तो। णिरयगदीए उक्कस्से सम्मामिच्छत्ते' पदेसगं थोवं । अपचक्खाणमाणे असंखे० गुणं । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । अणंताणुवंधिमाणे विसे० । कोहे विसे० । मायाए बिसे० । लोहे विसे० । सम्मत्ते विसे० । मिच्छत्ते पिसे० । केवलणाण विसे० । पयला० विसे० । णिहा. विसे० । पयलापयला० विसे० । णिहाणिहा० विसे० । थीणगिद्धि० विसे० । केवलदसण. विसे० । अण्णदरे आउए अणंतगुणं । णिरयगइ० असंखे०गुणं । आहार० असंखेन्गुणं । जस कित्ति० संखे० गुणं । वेउन्चियः विसे० । ओरालिय० विसे० । तेज० विसे० । कम्मइय० विसे० । अजस कित्ति० संखे० गुणं । देवगइ० विसे० । तिरिक्खगइ० विसे० । मणुसगइ. विसे० । हस्स० संखेज- गुणं । रदि० विसे० । साद० संखे० गुणं । इत्थि० संखेजगुणं । सोग० संखे० गुणं । विशेप अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेप अधिक है । संज्वलन क्रोध में विशेष अधिक है। संज्वलन मान में विशेप अधिक है। संज्वलन मायामें विशेप अधिक है। यशकीर्तिमें विशेष अधिक है। नीचगोत्र में विशेप अधिक है। उच्चगोत्र में विशेष अधिक है। संचलन लोभ में विशेप अधिक है। इस प्रकार ओघदण्डक समाप्त हुआ। नरकगति में उत्कर्षसे सम्यग्मिथ्यात्वमें स्तोक प्रदेशाग्र है। अप्रत्याख्यानावरण मान में असंख्यातगुणा है। क्रोध में विशेष अधिक है। मायामें विशेष अधिक है । लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है । क्रोध में विशेष अधिक है। मागामें विशेप अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। अनन्तानुबन्धी मानमें विशेष अधिक है। क्रोधमें विशेष अधिक है । माया में विशेष अधिक है । लोभ में विशेप अधिक है । सम्यक्त्व में विशेष अधिक है। मिथ्यात्व में विशेष अधिक है। केवलज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। प्रचला में विशेष अधिक है। निद्रा में विशेप अधिक है । प्रचलाप्रचलामें विशेष अधिक है। निद्रानिद्रामें विशेप अधिक है । त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। केवदर्शनावरण में विशेष अधिक है। अन्यतर आयुकर्म में अनन्तगुणा है। नरकगति नामकर्म में अगंदगानगुणा । आहारक शरीर में असंख्यातगुणा है । यशकीर्ति में संग्यानगुणा है। योजयिक शरीर में विशेष अधिक है। औदारिफशरीर में विशेष अधिक है । जसशरीर में विशेष आभा है। कार्मणशरीर में विशेष अधिक है। अयश ति में संख्यानगुणा है। देवनि में विशेष अधिक है। तियंगति में विशेष अधिक है। मनुष्यगति में विशेष अधिक है। हास्य में संख्यातगुगा है। रति में विशेप अधिक है । मातायेदनीयमें मंन्यानगुणा है। न्यौवेद में १ प्रति मानिन्छने प्रति पाठः। २ तामती तगुना नि पाठः । श्रो', '. ममत्वोः भाटिय.. तानी टच' इति पाया।

अप्पाबहुआणियोगदारे उत्तरपयडिसंतकम्मदंडओ ५८५ अरदि० विसे० । णQसय० विसे० । दुगुंछ० विसे० । भय० विसे० । पुरिस० विसे । माणसंजल विसे० । कोहे विसे० । मायाए बिसे० । लोहे विसे० । पुणो पुणो विसे- साहियं, एवं विसेसाहियकमेण पणेदव्यं जाय विरियंतराई ति । मणपज्जय० विसे० । ओहिणाण. विसे । सुद० विसे० । मदि० विसे० । ओहिदसण. विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । सादे० संखे० गुणं । उच्चागोदे० विसे० । णीचागोदे० विसे० ० । एवं णिरय इदंडओ समत्तो। जहण्योण पदेससंतकम्मेण सम्मत्ते थोवं संतकम्मं । सम्मामिच्छते असंखेजगुणो। अणंताणुवंधिमाणे असंखे० गुणं । कोहे विसे० । मायाए विसे० | लोहे विसे० । मिच्छत्ते असंखे० गुणं । अपञ्चक्खाणमाणे असंखे० गुणं । कोहे० विसे० । मायाए. विसे० । लोहे० विसे । पञ्चक्खाणमाणे विसेसाहिओ। कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे. विसे० । पयलापयला० असंखे० गुणा । णिहाणिद्दा० विसे० । थीणगिद्धि० विसे० । केवलणाण० असंखे० गुणं । पयला० विसे० । णिद्दा० विसे० । केवलदंसण. संख्यातगुणे संख्यातगुणा है। शोकमें संख्यातगुणा है । अरतिमें विशेप अधिक है । नपुंसफ- वेदमें विशेप अधिक है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेप अधिक है। पुरुप. वेदमें विशेप अधिक है। संज्वलन मानमें विशेप अधिक है। संज्वलन क्रोधमें विशेप अधिक है। संज्वलन मायामें विशेष अधिक है। संज्वलन लोभमें विशेष अधिक है। पुनः पुनः विशेप अधिक, इस प्रकार विशेप अधिक क्रमसे वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये। मनः- परी यज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। श्रुतज्ञानावरण में विशेप अधिक है। मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। अचक्षुदर्शनावरण में विशेष अधिक है। चक्षुदर्शनावरण में विशेष अधिक है। साता- वेदनीयमें संख्यातगुणा है। उच्चगोत्रमें विशेष अधिक है। नीचगोत्र में विशेष अधिक है। इस प्रकार नरकतिदण्डक समाप्त हुआ। जघन्य प्रदेशसत्कर्मकी अपेक्षा सत्कर्म सम्यक्त्व में स्तोक है। सम्यग्मिथ्यात्व में असंख्यातगुणा है। अनन्तानुवन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोध में विशेष अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेप अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है। क्रोध में विशेष अधिक है। माया में विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। प्रचलाप्रचला में असंख्यातगुणा है। निद्रानिद्रामें विशेष अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। फेवल- ज्ञानावरणमें असंख्यातगुणा है। प्रचलामें विशेप अधिक है। निद्रा में विशेष अधिक है। १ अप्रती 'रदि०', काप्रती त्रुटितोऽत्र पाठः, ताप्रती [-] रदि०' इति पाठः । २ अरती ' गिरयाउजिरयगई.', काप्रती गिरयाउणिरयगई-', ताप्रती जिरयाउ० । गिरयगा' इति पाठः । ३ मतिः 'सम्मत' इति पाठः। छ. से, ७४ ५८६ हक्संहागमे संतकम्म विसे० । ओहिणाण. असंखे० गुणं' । ओहिदंसण० विसे० । णिरयगइ० असंखे गुणं । देवगइ० असंखे० गुणं । वेउब्बिय० संखे० गुणं । आहार० असंखे० गुणं । मणुमगइ० संखे० गुणं । उचागोद० संखे० गुणं । णिरयाउअम्मि असंखे० गुणं । देवाउअम्मि विसेसाहियं । तिरिक्खाउअम्मि विसे० । मणुम्साउअम्मि विसे० । कोह- संजलण० असंखे० गुणं । माणसंजल० विसे० । पुरिस० पिसे० । मायासंजल० विसे० । तिरिक्सगइ० असंखे० गुणा । इस्थि० असंखे० गुणा। णस० विसे० । णीचागोद. असंखेजगुणं । ओरालिय० असंखे० गुणं । जसकित्ति० असंखे० गुणं । तेज० विसे० । कम्मइय० विसे० । अजसकित्ति० संखेजगुणं । हस्स० संखे० गुणं । रदि० विसे० । सादे संखे० गुणं । सोगे संखे० गुणं । अरदि० विसे० । दुगुंछ० विसे० । भय० विसे० । लोहसंजलणं विसेसाहियं । एवं विसेसाहियकमेण णेदव्यं जाव पिरियंतराइयं ति । मणपजव० विसेसाहिगं । सुद० विसे० । मदि० विसे० । अचक्खु० विसे० । चक्खु० विसे० । असादे संखेजगुणं । एवमोघदंडओ समतो। णिरयगदीए सव्यत्यो सम्मत्ते जहणणयं पदेसग्गं संतकम्मं । सम्मामिच्छत्ते असंखेजगुणं । अणंताणुवंधिमाणे असंखे० गुणं । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे केवलदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। अवधितानावरणमें असंख्यातगुणा है । अयधिदर्शना- वरणमें विशेष अधिक है। नरकगति में असंख्यातगुणा है। देवति में असंख्यातगुणा है। वैक्रियिकशरीर में संख्यातगुणा है । आहारकशरीरमें असंख्यातगुणा है। मनुष्यगतिमें संख्यात. गुणा है। उसगोत्र में संख्यातगुणा । नारकायुमें असंख्यातगुणा है । देवायुमें विशेष अधिक है। तिर्यगायु में विशेष अधिक है। गनुष्यायुमें विशेष अधिक है। संज्वलन कोच में असंख्यातगुणा है। संचलन मान में विशेष अधिक है। पुरुपवेद में विशेष अधिक। संचलन माया में विशेप अधिक है। तिर्यग्गनिमें असंख्यातगुणा है। त्रीवेदमें असंख्यातगुणा है। नपुंसकवेदमें विशेष अधिक है। नीचगोत्र में अमंख्यातगुणा है । औदारिक शरीर में असंख्यातगुणा है। यशकीर्ति में असंख्यानगुणा है । तेजस शरीर में विशेष अधिक है। कामण शरीर में विशेष अधिक है। अयशकीर्तिमें संख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यानगुणा । रतिमें विशेष अधिक है। साता वेदनीयमें संग्यातगुणा है । शोक में संख्यातगुणा ! अरनिमें विशेष अधिक है । जुगुप्सा में विशेष अधिक है। भगमें विशेष अधिक है। संचलन लोभमें विशेष अधिक है। इस प्रकार विशेषाधिक प्रमसे धीयान्तराग तक ले जाना चाहिये। आगे मनापानावरणमें विशेष अधिक है। अनावरणमें विशेष आय: है। मनिशानावरण में विशेष अधिकः । अनदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। पक्षांना वरणमें विशेष अधिक है। असातावदनीय में संग्चातगुणा है। इस प्रकार औरण्ट्रक समाप्त हुआ। नरकगति में जघन्य प्रदेशमको सन्याय प्रकृति में सबसे लोक। सम्बग्मिध्यात्य में असंख्यातगुणा है। अनन्तानुबन्धी कान में असंगानगुणा है। शोध में गिप अधिक है। १ तामती '' इति पादः। +-+UIRAHARAN ५८७ अप्पाबहुआणि योगदारे उत्तरपयडिसंतकम्मदंडओ विसे० • । अचक्खु० असंखे० गुणं । पयलापयला० असंखे० गुणं । णिवाणिद्दा० विसे० । थीणगिद्धि० विसे० । अपचक्खाणमाणे० असंखे० गुणं । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । [कोहे विसे० 1 ] मायाए विसे० । लोहे विसे० । केवलणाण. विसे० । पयला० विसे० । णिहा० विस० । केवलदसण. विसे० • | आहार० अणंतगुणं । णिरयाउअम्मि असंखे० गुणं । देवगदीए असंखे० गुणं । मणुसगई० असंखे० गुणं । तिरिक्खगई० संखे० गुणं । णिरयगई० संखे० गुणं । उच्चागोद० संखे० गुणं । इस्थि० संखे० गुणं । गqस० संखे० गुणं । णीचागोद० संखे० गुणं । जसकित्ति० असंखे० गुणं | ओरालिय० संखे० गुणं । तेज० विसे० । कम्मइय. विसे० | अजसकित्ति ० संखे० गुणं । पुरिस० संखे० गुणं । हस्स० संखे० गुणं ।रदि० विसे० । सादे० संखे० गुणं । सोगे० संखे० गुणं । अरदि० विसे० । दुगुंछ. विसे । भय विसे० । माणसंजलण० विसे० । कोहसंज० विसे० । मायाए विसे० । लोहसंजलण विसे । दाणंतराइय० विसे । लाहंतराइय० पिसे । भोगतराइय. विसे० । परिभोगंतराइय० विसे० । विरियंतराइय० विसे० । मणपजव० पिसे । माया में विशेष अधिक है। लोभमें विशेप अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें असंख्यातगुणा है। प्रचलाप्रचलामें असंख्यातगुणा है। निद्रानिद्रा में विशेप अधिक है । स्यानगृद्धि में विशेष अधिक है । अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है । क्रोध में विशेष अधिक है । मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है। [क्रोधमें विशेष अधिक है।] मायामें विशेष अधिक है ।लोभमें विशेष अधिक है | कंवलज्ञाना- वरण में विशेष अधिक है। प्रचला में विशेप अधिक है। निद्रामें विशेष अधिक है। केवल दर्शनावरणमें विशेष अधिक है। आहारकशरीरमें अनन्तगुणा है। नारकायुमें असंख्यात- गुणा है। देवति में असंख्यातगुणा है। मनुष्यगति में असंख्यातगुणा है । तिर्यग्गति में संख्यातगुणा है। नरकगति में संख्यातगुणा है । उच्चगोत्र में संख्यातगुणा है। वीवेद में संख्यातगुणा है। नपुंसकवेद में संख्यातगुणा है। नीचगोत्रमें संख्यातगुणा है। यशकीति में असंख्यातगुणा है । औदारिकशरीरमें संख्यातगुणा है । तैजसशरीरमें विशेष अधिक है । कार्मणशरीरमें विशेप अधिक है । अयशफीति में संख्यातगुणा है । पुरुपवेदमें संख्यातगुणा है । हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेष अधिक है। सातावेदनीय में संख्यान- गुणा है । शोकमें संख्यातगुणा है। अरतिमें विशेप अधिक है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेप अधिक है। संज्वलन मानमें विशेष अधिक है । संचलन क्रोध में विशेष अधिक है । संज्वलन मायामें विशेप अधिक है। संज्वलन लोभमें विशेप अधिक है। दानान्तरायमें विशेप अधिक है । लाभान्तरायमें विशेष अधिक है। भोगान्तरायमें विशेष अधिक है। परि- भोगान्तराय विशेष अधिक है। वीर्यान्तरायमें विशेष अधिक है। मनःपर्वयानावरण, १ अतोऽये प्रतिषु 'तिरिक्खगई: असंखे० गुण' इत्पदधिकं वाक्यमुपलभ्यते । २ अप्रतो रोल इति पाठः।

उपखंडागमे संतफम्म ओहिणाण० विसे० । सुद० विसे० । मदि० विसे० । ओहिदंसण० विसे० । अचक्नु० विसे० । चक्खु० विसे० । असादे० संखेजगुणा । एवं णिरयगइदंडओ समत्तो। तिरिक्खगदीए सव्वत्यो सम्मत्ते जहष्णपदेससंतकम्म। सम्मामिच्छचे अगसेश- गुणं । अणंताणुवंधिमाणे असंखेजगुणं । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । मिच्छत्ते असं० गुणं । पयलापयला० असंखे० गुणं । णिहाणिद्दा० संखे० गुणं । थीण- गिद्धि० विसे० । अपञ्चक्खाणमाणे असंखे० गुणं । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । पचखाणमाणे विसे० । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे० विसे० । ओहिणाण. विसे० । केवलणाण. विसे० । पयला. विसे० । णिद्दा० विसे० । केवल. दंसण. विसे० । णिरयगदीए अगतगुणं । देवगदीए असंखे० गुणं । वेच्चिय० संसे० गुणं । आहार० असंखे० गुणं । मणुमगदीए संखेजगुणं । उच्चागोद० संखे० गुणं । तिरिक्खाउअम्मि असंखे० गुणं । मणुस्साउअम्मि असंखे० गुणं । देव-णिर याउअम्मि असंखे० गुणं । ओरालिय० असंखे० गुणं । तिरिक्खगदीए संखे० गुणं । इस्थि० संखे. गुणं । णबुंसय० संखे० गुणं । पुरिस० विसे० । जसकित्ति० असंखे० गुणं । तेज. संखे० गुणं० । कम्मइय० विसे० । अजस कित्ति० संखे० गुणं । हस्स० विसे० । रदि० विशेष अधिक है । अवधिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। मतिज्ञानावरण में विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरण में विशेप अधिक है। अचक्षुदर्शना. वरणमें विशेप अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। असातावेदनीयमें संन्यात. गुणा है । इस प्रकार नरकगतिदण्डक समाप्त हुआ। तियेग्गति में जघन्य प्रदेशसत्कर्म सम्यक्त्व में सबसे म्तोक है । सम्यग्मिध्यात्व में असंख्यान- गुणा है। अनन्तानुबन्धी मान में असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेष अधिक है । गाया में विशेष अधिक है।लोभमें विशेप अधिक है । मिथ्यात्व में असंख्यागुणा है। प्रचलाप्रथलामें अमंग्यातगुणा है। निद्रानिद्रामें संझ्यातगुणा है । स्त्यानगृद्धि में विशेप अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण माना असंख्यातगुणा है। क्रोध में विशेष अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें यिोग अधिक है। प्रत्याख्यानायरण मानमें विशेष अधिक है। शोध में विशेष अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। अवधिज्ञानावरण में विशेष अधिक है। पल ज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। प्रचला में विशेष अधिक है। निद्रा विशेष अधिक है। केवलदर्शनावरण में विशेष अधिक है। नरकगति में अनन्तगणा है। देवर्गात में अमंगानगुणा है। वैकियिकशरीर में संख्यातगुणा है। आहारकशरीरमें अमंग्यातगुणा है। मनुष्यान में संख्यातगुणा है। उच्चगोत्र में संख्यानगुणा है। तिर्यगायुमें असंगातगुणा है। मनुष्यालु असंख्यातगुणा है । देवायु और नारकायुमें असंख्यातगुणा । श्रीमारियशरीर में यान. गुणा है । नियंतिमें मंग्यातगुणा है।न्त्रीवेद में मंग्यातगुणा । नरपवेद में गायागु है। पुनपवेद में विशेष अधिक। यशकीनिमें अमेजयानगुणा ने जमकर गारमा है । काजशरीर में विशेष अधिक है। अयोनि में मंग्यानाहायमें विशेष अधिक - ५८९ अप्पायहुआणियोगधारे उत्तरपयउिसंतकम्मदडओ विसे । सादे संखे० गुणं । सोगे संखे० गुणं । अरदि० बिसे० । दुगुंछ० विसे० । भय० विसे० । माणसंजल० विसे० । कोहसंज० विसे० । मायासंज० विसे० । लोहसं० विसे० । दाणंतराइय० विसे० । एवं विसेसाहियकमेण णेदव्यं जाव विरियंतराइयं ति । मणपजव० विसे० । ओहिणाण० विसे० । सुदणा० विसे० । मदि० विसे० । ओहिदसण० विसे० । 'अचक्खु० विसे० । चम्खु० विसे० । असादे० संखेजगुणं । एवं तिरिक्खगइदंडओ समत्तो। देवगदीए जहण्योण सम्मत्ते पदेससंतकम्मं थोवं। सम्मामिच्छत्ते पदेससंतकम्म असंखेजगुणं । अर्णताणुवंधिमाणे असंखे० गुणं । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । मिच्छत्ते असंखे० गुणं । पयलापयला० असंखे० गुणं । णिहाणिहा० विसे० । थीणगिद्धि ० विसे० । अपञ्चक्खाणमाणे असंखे० गुणं । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । केवलणाण. विसे । पयला० विसे। णिद्दा. विसे० । केवलदंसण. विसे० । आहार० अणंतगुणं । देवाउअम्मि असंखे० गुणं । तिरिक्ख-मणुसाउअम्मि है । रतिमें विशेष अधिक है। सातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। शोकमें संख्यातगुणा है। अरतिमें विशेप अधिक है । जुगुप्सामें विशेष अधिक है । भय में विशेष अधिक है । संज्वलन मानमें विशेष अधिक है। संज्वलन क्रोधमें विशेष अधिक है। संज्वलन माया में विशेष अधिक है । संज्वलन लोभमें विशेष अधिक है । दानान्तरायमें विशेष अधिक है । इस प्रकार विशेषाधिकक्रमसे वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये। आगे मन:पर्ययज्ञानावरण में विशेप अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। श्रुतज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। अचक्षुदर्शनावरण में विशेप अधिक है । चक्षुदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है । इस प्रकार तिर्यग्गतिदण्डक समाप्त हुआ। देवगतिमें जघन्यसे प्रदेशसत्कर्म सम्यक्त्व में स्तोक है। सन्यग्मिथ्यात्व में प्रदेशसत्कर्म असंख्यातगुणा है। अनन्तानुवन्धी मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेष अधिक है। माया में विशेप अधिक है । लोभमें विशेप अधिक है। मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है । प्रचला- प्रचला में असंख्यातगुणा है । निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेष अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है । क्रोध में विशेष अधिक है । माया में विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। केवलशानावरणमें विशेष अधिक है । प्रचलामें विशेष अधिक है। निद्रा में विशेष अधिक है। केवलदर्शनावरण- में विशेप अधिक है। आहारकशरीरमें अनन्तगुणा है। देवायुमें असंख्यातगुणा है। तिवंगायु और १ तापतौ नस्तीदं वाक्यम् ।

खंडागमे संतकमा असंखे० गुणं । णिरयगदीए असंखेजगुणं । तिरिक्खगदीए असंखे० गुणं । णम० असंखे० गुणं । णीचागोदे० संखे० गुणं । इत्यि. अखेजगुणं । देवगईए असंसे० गुणं । चेउब्धिय० संखे० गुणं । मणुमगदीए असंखे० गुणं । उच्चागोदे असंखे० गुणं । जमकित्ति. असंखे० गुणं। ओरालिय० संखे० गुणं । तेज० विसे० । कम्मइय० विसे । अजसमित्ति० संखे० गुणं । पुरिस० संखे० गुणं । हस्म० संखे० गुणं । रदि० विसे० । सादे० संखे० गुणं । सोगे० संखे० गुणं । अरदीए विसे० । दुगुंछ. विसे० ० । भय० विसे० । माणसंजलण. विसे० । कोहसंज० विसे । मायासंज० विसे० । लोहसं० विसे० । दाणंतराइए विसेसाहियं । एवं विसेमाहियकमेण णेदव्यं जाय विरिवंतराइयं ति। केवलणाण० विसे० । मणपज० विसे० । ओहिणाण. विसे० । सुद० विसे० । मदि० विसे० । भोहिदंसण. विसे० । अचक्खु० मिसे० । चक्षु० विसे० । असादे० संखे० गुणं । एवं देवगइदंडओ समत्तो । मणुसगदीए सव्यत्थोवं सम्मत्ते पदेससंतं जहण्णयं । सम्मामिच्छचे असंखे० गुणं । अर्णताणुवंधिमाणे असंखेगुणं । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । मिच्छत्ते असंखे० गुणं । अपचक्खाणमाणे असंखे० गुणं । कोहे विसे० | मायाए विसे० । लोहे विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । कोहे विसे० । मनुप्यायुमें असंख्यातगुणा है । नरकगतिमें असंख्यातगुणा है। तिर्यग्गतिमें असंख्यातगुणा है। नपुंसकवेदमें असंख्यातगुणा है। नीचगोत्र में संख्यातगुणा है। नोवेदमें असंख्यातगुणा है। देवगतिमें असंख्यातगुणा है। वैक्रियिकशरीरमें संख्यातगुणा है। मनुष्यगति में असंख्यात- गुणा है । ज्यगोत्रमें असंख्यातगुणा है। यशकीर्ति में असंख्यातगुणा है। औदारिफशरीर में संख्यातगुणा है । तैजस शरीर में विशेष अधिक है। कार्मणशरीर में विशेप अधिक है। अयश- कीर्ति में संख्यातगुणा है। पुरुपवेदमें संख्यातगुणा है । हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेष अधिक है। सानावेदनीयमें संख्यातगुणा है। शोकमें संख्यातगुणा है। अरनिमें विशेष अधिक है । जुगुप्सामें विशेप अधिक है। भयमें विशेष अधिक है। संज्वलन मानमें विशेष अधिक है। संज्वलन क्रोध में विशेष अधिक है। संज्वलन माया में विशेप अधिक है। मंचलन लोभमें विशेष अधिक है। दानान्तरायमें विशेष अधिक है। इस प्रकार विशेषाधिकारसे वीर्यान्तराय तक ले जाना चाहिये । केवललानावरणमें विशेष अधिक है। मनःपर्यशाना- वरणमें विशेष अधिक है। अधिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। भूतज्ञानावरण में विशेष आधक है। मतिनानावरणमें विशेष अधिक है। अवधिदर्शनावरण में विशेष अधिक है। अचक्षुदर्शनावरण में विशेष अधिक । चक्षुदशनावरण में विशेष अधिक है। असाना- वेदनाय में संदयातगुणा है । इस प्रकार देवगतिदण्टक समाप्त हुआ। गनुप्यगति में जघन्य प्रदेशसवम सम्यक्त्यमें सबसे तोक। सम्यग्मिध्यात्य में असंन्यातगुणा है। अनन्तानुबन्धी मानमें असंन्यातगुणा है। शोध में विशेष अधिक है। माया में विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। मिध्यान्य में भगवान गुणा अप्रत्यागानावरण मानमें अमन्यातगुणा है। मोघमें विशेष अधिक है। माया विशेष अधिक है। टीम में विदोष अधिक है। प्रत्याग्यानावरण मानमें विशेष अधिक। प्रोप अप्पावहुआणियोगद्दारे उत्तरपयडिसंतकम्मदंडओ ५९१ मायाए विसे० | लोहे विसे० । पयलापयला० असंखे० गुणं । णिवाणिदा० विसे० • थीणगिद्धि० विसे० । केवलणाणा० असंखे० गुणं । पयला. विसे० । णिद्दा० विसे० । केवलदंसण. विसे० । ओहिणाण० अणंतगुणं । ओहिदसण० विसे० । णिरयगइ० असंखे० गुणं । वेउव्जिय० संखे० गुणं । आहार० असंखे० गुणं । मणुसाउअम्मि असंखे० गुणं । तिरिक्खाउअस्मि असंखे० गुणं । कोह- संजलण. असंखे० गुणं । मायासंज. विसे० । पुरिस० विसे० । माणसं. विसे० । णिरय-देवाउअम्मि विसे० । तिरिक्खगईए असंखे० गुणं । इत्थि० असंखे० गुणं । णस० विसे० । णीचागोदे० असंखे० गुणं । मणुसगइ० असंखे० गुणं । ओरालिय० असंखे० गुणं । उच्चागोदे असंखे० गुणं । जसमित्ति० असंखे० गुणं । तेज० संखे० गुणं । कम्मइय० विसे । अजसगित्ति० संखे० गुणं । हस्स० संखे० गुणं । रदि० विसे० । सादे संखे० गुणं । सोगे संखे गुणं । अरदि० विसे० • । दुगुंछ० विसे० । भय० विसे० । लोहसंजल० विसे० । दाणंतराइय० विसे० । लाहंतराइय० विसे । भोगंतराइय० विसे । परिभोगंतराइय० विसे । विरियंतरा- विशेप अधिक है। माया में विशेप अधिक है। लोभमें विशेप अधिक है। प्रचलाप्रचलामें असंख्यातगुणा है। निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेप अधिक है। केवल- ज्ञानावरणमें असंख्यातगुणा है। प्रचलामें विशेष अधिक है। निद्रा में विशेप अधिक है। केवलदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। अवधिज्ञानावरण में अनन्तगुणा है। अवधिदर्शना. वरणमें विशेष अधिक है। नरकगतिमें असंख्यातगुणा है। वैक्रियिक शरीर में संख्यातगुणा है। आहारकशरीरमें असंख्यातगुणा है। मनुष्यायुमें असंख्यातगुणा है। तिर्यगायुमें असंख्यातगुणा है। संज्वलन क्रोधमें असंख्यातगुणा है। संज्वलन मायामें विशेष अधिक है। पुरुपवेद में विशेष अधिक है। संज्वलन मानमें विशेप अधिक है। नारकायु और देवायुमें विशेष अधिक है। तियंग्गतिमें असंख्यातगुणा है। स्त्रीवेदमें असंख्यातगुणा है। नपुंसकवेद में विशेष अधिक है। नीचगोत्र में असंख्यातगुणा है। मनुष्यगति में असंख्यातगुणा है। औदारिकशरीरमें असंख्यातगुणा है। उगोत्रमें असंख्यातगुणा है। यशकीति में असंख्यातगुणा है। तैजस शरीरमें संख्यातगुणा है। कार्मणशरीर में विशेष अधिक है। अयशफीतिमें संख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यातगुणा है। रतिमें विशेष अधिक है । साता- वेदनीयमें संख्यातगुणा है। शोकमै संख्यातगुणा है । अरति में विशेष अधिक है । जुगुप्साने विशेप अधिक है। भयमें विशेप अधिक है। संज्वलन लोभने विशेष अधिक है। दानान्तरायमें विशेष अधिक है। लाभान्तरायमें विशेष अधिक है। भोगान्तरायमें विशेष अधिक है । परिभोगान्तरायमें विशेष अधिक है । वीर्यान्तरायमें विशेष अधिक है । मनःपर्यय- १ तामती 'कोहमजलण० असंखे० गुणा । मागसं० दिसे । पुरिता विमापा इति पाठः।

५९२ छक्खंडागमे संतकम्म विसे० इय० विसे० । मणपज्जय० विसे० । सुद० विसे० । मदि० विसे० । अचक्खु० विसे० ० । चक्खु० विसे० । असादे संखे० गुणं । एवं मणुसगइदंडओ समत्तो । एइंदिएसु जहण्णेण सव्वत्थोवं सम्मत्ते जहण्णपदेससंतकम्मं । सम्मामिच्छत्ते असंखे० गुणं । मिच्छत्ते असंखे० गुणं । अणंताणुवंधिमाणे असंखे० गुणं । कोहे .। मायाए विसे० । लोहे विसे०। अपञ्चक्खाणमाणे असंखे० गुणं० । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । पञ्चक्खाणमाणे विसे० । कोहे विसे० । मायाए विसेसा० । लोहे विसे० । केवलणाण. विसे० । पयला. विसे० । णिद्दा० विसे० । पयलापयला० विसे०। 'णिदाणिद्दा० विसे०। थीणगिद्धि० विसे० । केवलदंसण. विसे । णिरयगइ० अणंतगुणं । देवगइ० अर्णतगुणं । वेउब्धिय० संखे० गुणं । आहार० असंखे० गुणं । मणुसगइ० संखे० गुणं । उच्चागोदे संखे० गुणं । मणुसाउअम्मि असंखे० गुणं । जसकित्ति ० असंखे० गुणं । ओरालिय० संखे० गुणं । तेज० विसे० । कम्मइय. विसे० । तिरिक्खगई० संखे० गुणं । अजसकित्ति विसे० । पुरिस० संखे० गुणं । इत्थि० संखे० गुणं । हस्स० संखे गुणं । रदि विसे० । सोग० संखे० गुणं । सादे विसे० । ज्ञानावरणमें विशेष अधिक है । श्रुतज्ञानावरण में विशेष अधिक है । मतिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। इस प्रकार मनुष्यगतिदण्डक समाप्त हुआ। एकेन्द्रियों में जघन्यसे जघन्य प्रदेशसत्कर्म सम्यक्त्व में सबसे स्तोक है । सम्यग्मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है । मिथ्यात्वमें असंख्यातगुणा है । अनन्तानुबन्धी मानमें असंख्यात- गुणा है । क्रोध में विशेष अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण मानमें असंख्यातगुणा है। क्रोधमें विशेष अधिक है। मायामें विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मानमें विशेष अधिक है । क्रोध में विशेष अधिक है । माया में विशेष अधिक है। लोभमें विशेष अधिक है। केवलज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। प्रचलामें विशेष अधिक है। निद्रा में विशेष अधिक है। प्रचलाप्रचला में विशेष अधिक है । निद्रानिद्रा में विशेष अधिक है। स्त्यानगृद्धि में विशेष अधिक है। केवल- दर्शनावरणमें विशेप अधिक है। नरकगतिमें अनन्तगुणा है। देवगति में अनन्तगुणा है । वैक्रियिकशरीर में संख्यातगुणा है । आहारकशरीरमें असंख्यातगुणा है । मनुष्यगति में संख्यात- गुणा है । उच्चगोत्र में संख्यातगुणा है। मनुष्यायुमें असंख्यातगुणा है। यशकीति में असंख्यात- गुणा है । औदारिकरीर में संख्यातगुणा है। तैजसशरीर में विशेप अधिक है। कामणशरीर में विशेष अधिक है। तिर्यग्गतिमें संख्यातगुणा है । अयशकीति में विशेष अधिक है । पुरुपवेदमें संख्यातगुणा है । स्त्रीवेदमें संख्यातगुणा है। हास्यमें संख्यातगुणा है । रतिमें विशेप अधिक है। शोकमें संख्यातगुणा है। सातावेदनीयमें विशेष अधिक है। अरतिमें विशेष १ ताप्रतौ नास्तीदं वाक्यम् । २ ताप्रतौ 'असंखे० गुणा' इति पाठः । ३ अस्य स्थाने अ-ताप्रत्योः 'पदेस०, काप्रतौ 'पुरिस०' इति पाठः ।

अप्पाबहुआणियोगद्दारे उत्तरपयडिसंतकम्मदंडओ ५९३ अरदि० विसे० । णवूस० विसे० । दुगुंछ० विसे० । भय० विसे० । माणसंजल. विसे० । कोह. विसे० । माया. विसे० । लोह. विसे० । दाणंतराइए विसे० । लाहंत विसे० । भोगंत० विसे० । परिभोगंत. विसे । विरियंतरा० विसे० । मणपजव० विसे० । ओहिणाण. विसे० । सुद० विसे० । मदि० विसे० । ओहिदंस० विसे० । अचक्खु० विसे । चक्खु० विसे० । असादे संखेजगुणं । णीचागोदे जहण्णयं पदेससंतकम्मं विसेसाहियं । एवमेइंदियदंडओ समचो । एवं चउवीसदिमअणियोगद्दारं समत्तं । अधिक है। नपुंसकवेदमें विशेष अधिक है। जुगुप्सामें विशेष अधिक है। भयमें विशेष अधिक है। संज्वलन मानमें विशेप अधिक है। संज्वलन क्रोधमें विशेष अधिक है। संज्वलन माया में विशेष अधिक है। संज्वलन लोभमें विशेष अधिक है। दानान्तरायमें विशेष अधिक है । लाभान्तरायमें विशेप अधिक है । भोगान्तरायमें विशेष अधिक है। परिभोगान्तरायमें विशेप अधिक है। वीर्यान्तरायमें विशेष अधिक है। मनःपर्यय- ज्ञानावरणमें विशेप अधिक है। अवधिज्ञानावरणमें विशेष अधिक है। श्रुतज्ञानावरणमें विशेप अधिक है । मतिज्ञानावरणमें विशेप अधिक है । अवधिदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। अचक्षुदर्शनावरणमें विशेप अधिक है। चक्षुदर्शनावरणमें विशेष अधिक है। असातावेदनीयमें संख्यातगुणा है। नीचगोत्र में जघन्य प्रदशसत्कर्म विशेप अधिक है। 'इस प्रकार एकेन्द्रियदण्डक समाप्त हुआ। इस प्रकार चौबीसवां अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। . -- छ. से. ७५ धवलाकार-प्रशस्तिः जस्साएसेण' मए सिद्धंतमिदं हि अहिलहुदं । महु सो एलाइरियो पसियउ वरवीरसेणस्स ॥१॥ वंदामि उसहसेणं तिउवणजियवंधवं सिवं संतं । णाणकिरणावहासियसयल-इयर-तम-पणासियं दिढें ॥२॥ अरहंता भगवंतो सिद्धा सिद्धा पसिद्धयारिया। साहू साहू य महं पसियंतु भडारया सव्वे ॥३॥ अज्जज्जणंदिसिस्सेणुज्जुवकम्मस्स चंदसेणस्स । तह णत्तुवेण पंचत्थुहण्णयंभाणुणा मुणिणा ॥४॥ सिद्धत-छंद-जोइस-वायरण-पमाणसस्थणिवुणेण । भट्टारएण टीका लिहिएसा वीरसेणेण ॥५॥ अकृत्तीसम्हि सासियविकमरायम्हि एसु संगरभो । पासे "सुतेरसीए भावविलग्गे धवलपक्खे ॥६॥ जगतुंगदेवरज्जे रियम्हि कुंभम्हि राहुणा कोणे । सूरे तुलाए संते गुरुम्हि कुलविल्लए होते ॥ ७ ॥ चावम्हि वरणिवुत्ते सिंघे सुक्कम्मि में ढिचंदम्मि" (?)। कत्तियमासे एसा टीका हु समाणिआ धवला ॥ ८ ॥ वोद्दणरायणरिंदे णरिंदचूडामणिम्हि भुंजते । सिद्धतगंधमत्थिय गुरुप्पसाएण विगत्ता सा ॥९॥ पुस्तकप्रदातृ-प्रशस्तिः शब्दब्रह्मेति शाब्दैर्गणधरमुनिरित्येवं राधान्तविद्भिः, साक्षात्सर्वज्ञ एवेत्यवहितमतिभिः सूक्ष्मवस्तु- प्रणीतौ । यो दृष्टो विश्वविद्यानिधिरिति जगति प्राप्तभट्टारकाख्यः, स श्रीमान् वीरसेनो जयति परमतध्वान्त- भित्तन्त्रकारः ॥ १ ॥ श्रीचारित्रसमृद्धि मिक्क विजयश्रीकर्मविच्छित्तिपूर्वकज्ञानावरणीयमूलनिर्नाशनं । भूचक्रं वेसकेरये संद मुनिवृंदाधीश्वरकुंदकुंदाचार्यर् धृतधैर्यरायतेयिनेनाचार्यरोळ वयंरो ॥ २ ॥ जितमदर्विगतमलचतुरंगुलचारणद्धिनिरतणेगळ्दर् । कीर्तिगे गुणगणधरयतिपतिगणधरायेनिसि कुंद- कुंदाचार्यर् ॥ ३ ॥ अवरन्वयदोळ सिद्धांतविदाकरणवेदिगळ पटतर्कप्रवर्द्वि सिद्धिसंस्तुतरवरय्य गृद्भपिच्छाचार्य्यवर्य्यर् ॥ ४ ॥ धैर्यपरणेगळद गांभीर्यगुणोदधिगळु चित्तशमदमयमताप्तयरेने गृद्र- पिच्छाचार्यरशिप्यर् बलाकपिच्छाचार्यर् ॥ ५॥ गुणनंदिपंडितैनिजगुणनंदिपंडितजनंगळ मेचिसि मैगुणद पेसरेसेये विद्वद्गणतिलकर् सकलमुनींद्र शिष्यर् ॥ ६॥ पदार्थदोळर्थशास्त्रदोळ् जिनागमदोळ हयतंत्रदोळ महाचरितपुराणसंततिगळोळ परमागमदोळ पेरर्समंदोरे सरि पाटि पासटि समानमेनळ कृतविद्यरारेनुत्तिरे बुधकोटि संदरवनीतलदोळ ॥ ७ ॥ गुणनंदि पंडितशिष्यर् विहितविदर्ग सूनुर्वराशिप्यरोळ तत्त्वेच्छर् सिद्धांतपरायणरेणिकेगोळ केयदि वर्तयो विच्छिन्नानंगेरंवो महिमेयिनेसेदर्वाधितंतुदारर् १ प्रतिपु 'जस्स सेसाएण' इति पाठः । २ प्रतिपु 'अहिलहुंदी' इति पाठः । ३ प्रतिषु 'अरिहंतपदो' इति पाठः । ४ कापतौ 'सामिय' इति पाठः । ५ ताप्रती 'पा(पो)म' इति पाठः । ६ अ-काप्रत्योः 'संत' इति पाठः । ७ का-ताप्रत्योः 'सिंग्घे, मप्रतौ 'सिध्धे' इति पाठः । ८ अ-काप्रत्योः 'सुकम्मि णेमिचंदम्मि', ताप्रती 'सुक्काम्मि मिणे चंदम्मि' इति पाठः । ९ प्रतिपु 'समाणिला इति पाठः । ।

पुस्तकप्रदान-प्रशस्तिः (२) स्वच्छर् दिनकरकिरणमेनेगले देवेंद्रसिद्धांतर् ॥ ८ ॥ अंतु नेगत्तेंवेत्त वरशिध्यकदंबकदोळ समस्त- सिद्धांतमहापयोनिधियेनिसि तदंबरेगं तपोवला. । क्रांतमनोजरागि मदर्जितरागि पोगर्तवेत्तराशांत- भनेटदे कीर्ति वसुनंदिमुनींद्ररुदात्तवृत्तियं ॥ ९ ॥ उदधिगेकलाधरं पुट्टिदनेवंतवर्ग शिष्यरादर् गुण- दोळोदवे रविचंद्रसिद्धांतदेवरेंवर्जगद्विशेपकचरितर् ॥ १० ॥ अंतुदयावनीधरकृतोदयनाद शशांकनिंदे शारिकपराधिगित्तु धरातलमंते दुर्णयध्वांतविघातभागिरे तदुद्भवरि सले पूर्णचन्द्रसिद्धांतमुनींद्र- निगदितांतप्रतिशासनं जैनशासनं ॥११॥ इंदु शरददवेळिंदंगळे पुदिदुदु देसेदेसेयोनिप जसदोल्यं ताळिद दामनंदिसिद्धांतदेवरवरप्रशिण्यरधिगततस्वर् ॥१२॥ शांततेवेत्त चित्तजनोळाद विरोधमिदेत्त निस्पृहर् स्वांततेवेत्तकांक्षे परमार्थदोलिंतु नेराळतेवेत्तिदानींतनरिन्मरारेने जयजिनेंद्र वीरनंदिसिद्धांत- मुनींद्ररे सुचरितक्रमदोळ विपरीतवृत्तरो ॥१३॥ बोधितभव्यरचित्तवर्धमान श्रीधरदेवरेंबरवर्गणतनूभवरादरा यशःश्रीधरर्गादशिष्यरवरोळ नेगळ्दर् मलधारिदेवरु श्रीधरदेवलं ॥१॥ नतनरेंद्रतिरीटतटाचिंतकमर । भनुवशनागि वर्पनेनगंबुरुहोदरनोंदे पूविनं । विनोलेवसक्के वंदनभवं जलजासन मीनकेतनमनेक तत्तदेवप्रकरकरींद्रमदोद्धतनप्पचित्तजन्मनेतले दोरलमनेमेच्चदरार मलधारिदेवरं ॥१५॥ श्रुतधरवलित्ति- नेमेय्यनोम्मैयुं तुरिसुवुदिल्ल नि देवरमगुलनिकबुदिल्लवागिलं- । किरुत्तेरेयर्बुदिलु गुर्बुदिल्ल महेंद्र नेरे भोण चण्णिसल गुणगणावलियं मलधारिदेवरं ॥१६॥ आ मलधारिदेवमुनिमुख्यर शिप्यरोळग्रगण्यरु वर्जितकपायक्रोधलोभमानमायारमदवर्जितर्णेगर्दरिंदुमरीचिगळंदर्भ यशः श्रीचंद्रकीर्तिमुनिनाथरुदात्तचरित्र- वृत्तियं ॥ १७ ॥ मलधारिदेवरिंदं वेळगिदुदु जिनेंद्रशासनं मुन्नं निर्मलमागि मत्तभीगल वेळगिदपुदु चंद्रकीर्ति भट्टारकरिं ॥१८॥ वेळगुव कीर्तिचंद्रिके मृदूक्तिसुधारसासरितमूर्तियोळ् । वेन्दमल पोदलदसित- लांछनमागिरे चंदनंदमं तळेदु जनं मनंगोळे दिगंतरविकासितोज्वलि-शुभचंद्रकीर्तिमुनिनाथरि विबुधाभि- बंद्यरो ॥१९॥ इंतु प्रसरकिरणारातीय चंद्रकीर्तिमुनींद्रराशांतर्वर्तितकीर्ति- गळन् मुनिवृंदवंदितरादरा शांतचित्तर शिष्यरात्तदय दिवाकरणंदि सिद्धांतदेवरि जिनागमवार्धिपारगरादरो ॥ २०॥ इतिदावु- दरिदिल्लिफेयुटु सिद्धांतवारिधियनलुकदे बंदिरेंदोडानेंतु पण्णिसुवेनण्ण दिवाकरणदिसिद्धांतदेवरखिला- गमभक्तर मार्गभं ॥२१॥तिभसुधांबुप्रचुरपूरनिकर व्याख्यानघोपं मरुञ्चलितोत्तुमन्तरंगघोषमेनेमिफौदार्य- दिदोप्पि निर्मलधर्मामृतदिंदलंकरिसि गंभीरत्वमं ताब्दी भूवलयफेटदे पवित्ररागि नेगदर् सिद्धांतरला- कर ॥२२॥ अवरप्रशिण्यर् । मरेदुमदोम्म लौकिकदवातेयनाढद केत्तवागिलं तेरेयद भानुवस्तमितमागिरे पोगद मेश्यनौम्मयुं तुरिसदकुक्कुटासनके सोलद गंडविमुक्तवृत्तियं मरेयदघोरदुस्तरतपश्चरितं मलधारि- देवर ॥२३॥ अवरप्रशिष्यर् । श्रीदेशीगणवार्धिवर्द्धनकरश्चन्द्रावदातोल्वणः, स्थेयात् श्रीमलधारिदेवयमिनः पुत्रः पवित्रो भुवि । सद्ध कशिखामणिर्जिनपतेर्भव्यैकचिन्तामणिः, स श्रीमान् शुभचन्द्रदेवमुनिपः सिद्धान्तविद्यानिधिः । । । शब्दाधिष्ठितभूतले परिलसत्तकोलससस्तंभके (तर्कोल्लसत्स्तंभके), साहित्यस्फटिकाश्मभित्तिचिरे ज्योतिर्मये मण्डले । सदनन्नयनूनरलकलशे स्याद्वादहम्य मुदा, यो देवेन्द्रसुराचितैर्दिविपदेस्सद्धिविरेजुस्तु तत् ॥ २ ॥ देवेन्द्रसिद्धान्तमुनीन्द्रपाद-पकेजभृगः शुभचन्द्रदेवः । यदीयनामापि विनेयचेवोजातं वमो हतुंमलं समर्थः ॥ ३ ॥ परमजिनेश्वरविरचितवरसिद्धान्ताम्बुराशिपारगरेदी । धरे घण्णिसुगुं गुणगणधररं शुभचन्द्र- देवसिद्धान्तिकरं ॥ ५ ॥ श्रीमजिनेन्द्रपद-पद्म-परागतुङ्गः, श्रीजैनशासनसमुद्गतवादिचन्द्रः । सिद्धान्त- शास्त्रविहिताहित्तदिव्यवाणी, धर्मप्रयोधमुकुरः शुभचन्द्रसूरिः ॥ ५॥ चित्तोद्भूतमदेभकन्ददलनमोस्कण्ठ- कण्ठीरवो भन्याम्भोजकुलप्रबोधनकृते विद्वजनानन्दकृत् । स्येयारकुन्दहिमेन्दुनिर्मलयशोवल्लीसमालम्पनस्तम्भः श्रीशुभचन्द्रदेवमुनिपः सिद्धान्तरलाकरः ॥ ६॥ कुवलयकुलवन्धुध्वस्तमीहामिले विकसितमुनितस्ये सजनानन्दकृत्ते । विदितविमलनानासकलान्वीतमूर्तिः शुभमतिशुभचन्द्रो राजवदानतेऽयम् ॥ ७ ॥ दिग्दन्तिदन्तान्तरवर्तिकीतिः रसग्रयालंकृतचारमूर्तिः । जीयाविरं श्रीशुभचन्द्रदेवो भन्याजिनीनाजन- . + परिशिष्ट ( राजित )राजहंसः ॥ ८॥ श्रीमान् भूपालमौलिस्फुरितमणिगणज्योतिरुयोतितांघ्रिः, भव्याम्भोजात- जातप्रमदकरनिधिस्त्यक्तमायामदादिः । दृश्यत्कन्दर्पदर्पप्रवलितगिलितस्तूर्णितश्चार्यशश्वजीयाजैनाजभास्वा. ननुपमविनयो नूतसिद्धान्तदेवः ॥ ९॥ जीयादसावनुपमं शुभचन्द्रदेवो भावोद्भवोद्भवविनाशनमूलमंत्रः । निस्तन्द्रसान्द्रविबुधस्तुतिभूरिपानं त्रैलोक्य-गेहमणिदीपसमानकीर्तिः ॥१०॥ मूर्तिः शमस्य नियमस्य विनूतपानं क्षेत्रं श्रुतस्य यशसोऽनघजन्मभूमिः । भूविश्रुतश्रि(श्रु)तवतां सुरभूजकल्पानल्पान्युधा निव. सताच्छुभचन्द्रदेवः ॥११॥ स्वस्ति श्री समस्तगुणगणालंकृतसत्य -शौचाचारचारुचरित्र-नय-विनय-सुशीलसम्पन्नेयु विवुधप्रसन्नेयु आहाराभय-भैषज्य-शास्त्रदानविनोदेयुं गुणगणाल्हादेयुं जिनस्नपनसमयसमुच्छलितदिव्यगन्धबन्धुरगन्धोदक- पवित्रगात्रेयुं गोत्रपवित्रेयुं सम्यक्त्वचूडामणियुं मंडलिनाड-श्रीभुजबलगंगाडिदेवरत्तेयरुमप्पेडवि-देमियकं. श्रुतपंचमियं नोतुज्जवणेयनाड-बन्नियकेरेयुत्तुङ्गचैत्यालयदाचार्यरुं भुवनविख्यातरुमेनिसिद तम्म गुरुगळ श्रीशुभचन्द्रसिद्धान्तदेवगै श्रुतपूजेयं माडिवरेयिसि कोट्टधवलेय पोस्तकं मंगलमहा । श्री ३ । श्रीकुपणं प्रसिद्धपुरमापुरदाणेगवंशवार्द्धिशो. भाकरमूर्जितं निखिलसाक्षरिकास्यविलासदर्पणं । नाकजनाथवंद्यजिनपादपयोरुहभृङ्गनेन्दुभू- लोकमिदुवर्णिपुदु जिन्नमनं मनुनीतिमारर्गनं ।। जिनपद-पद्माराधकमनुपमविनयाम्बुराशिदानविनोदं । मनुनीतिमार्गनसतीजनदूरं लौकितार्थदानिग जिन्नं ।। वारिनिधियोळगे मुत्तं नैरिदवं कोंडकोरेदु वरुणं मुददि । भारतियकोरळोळिक्किदहारमननुकरिसलेसेवरेवों जिन्नं ॥ श्रीधवलं समाप्तम् । • .

.. १ अवतरण-गाथासूची :- गाथा गाथा " १४ " २७६ ॥ ४४० ४०८ क्रमसंख्या पृष्ठ अन्यत्र कहां क्रमसंख्या पृष्ठ अन्यत्र कहां १[७ २] अगुरुलघु-परुवघादा १३ २५[१४-९] ण य कुणइ पक्खवायं ४९२ गो.जी.५१६ २[२४-२] अत्ता मवृत्ति परिभोग- ५७५ २६[१४.५] ण य पत्तियइ परं सो ४९१ ५१२ ३[८-१४] अभावैकान्तपक्षेऽपि ३० आ. मी. १२ २७[१४-३] णिद्दावनणबहुलो ४[८-१] असदकरणादुपादान १७ सां. का. ९ २८[७-५] दाणं तराइयं दाणे ५[८-२०] आउअभागो योवो ३५ २९[८१०] न सामान्यात्मनोदेति २८ आ. मी. ५७ . ६[२४.१] आहारे परिभोयं ५७५ ३०८-२] नित्यत्वैकान्तपक्षे पि १९ ७[१२-३] उगुदाल तीस सत्त य ४१० गो. क. ४१८ | ३१[१३-२] पम्मा पउमसवण्णा ४८५ ८[९-४] उदए संकम-उदए ३२[८-९] पयोवतो न दध्यत्ति २७ आ. मी. ६० ९[१२-१] उज्वेल्लण विज्झादो ४०९ १०[९-१] एक य छक्के कारस ८२ जयध. अ. प. ३३[७-१] पंच य छत्ति य छप्पं च १३ ७५८ (उद्धृत) ३४[९-३] पंचादि अट्टणिइणा ८२ जयध.अ.प.७५९ ११[८-१९] एयरखेत्तोगाट ३५ गो. क. १८५ | ३५[८-४] पुण्य-पापक्रिया न स्यात् २० आ. मी. ४० १२[८-१६] कथंचित्ते सदेवेष्टं ३१ आ. मी. १४ । ३६[१२-२] बंधे अधापमत्तो ४०९ गो. क. ४१६ १३[८-१७] कम्मं ण होदि एयं ३२ ३७[८.११] भावैकान्ते पदार्थानां २८ आ. मी. ९ १४[८-१२] कार्यद्रव्यमनादि स्यात् २९ आ. मी. १० | ३८[१४-६] मरणं पत्थेइ रणे ४९१ गो. जी. ५१३ १५[१३-१] किणं भमरसवण्णा ८४५ ३९[१४-२] मंदो बुद्धिविहीणो ४९० ५०९ १६[८-७] क्षणिकैकान्तपक्षेऽपि २६ आ. मी. ४१ | ४०[८-३] यदि सत्सर्वथा कार्ये २० आ. मी. ३९ १७[१०-६] खवए य खीणमोहे २९६ ष.ख.पु. १२, | ४१८-५] यद्यसत्सर्वथा कार्य २१ ४२ पृ.७८; क.प्र.६, ९ ४२[८-१८] राग-द्वेषायूप्मा १८[७-३] गदि-जादी उत्सासो १३ १९[८-८] घट-मौलि-सुवर्णार्थी २७ आ. मी. ५९ ४४६८-१५] विरोधान्नोभयेकात्म्य ३० आ. मी. १३ ४३[१४-४] सइ गिदइ अण्णे ४९१ गो. जी. ५११ २०[७-४] चत्तारि आणुपुब्बी २१[१४-१] चंडो ण मुवइ वेरै ४५[९-२] सत्तादि दसुपरसं ८२ जयध.अ.प.७५९ २२[१४-८] चाई भद्दो चोक्खो ४९२ गो.जी.५१५ ४६[१०-५] सम्मत्तुप्पत्तीए २९६ प. खं. पु. १२, २३[१४-७] लाणइ कजमकर्ज पृ.७८ क.प्र.६,८ २४[८-६] जातिरेव हि भावानां २६ क.पा. १, पृ. ४७[८-२३] सर्वात्मकं तदेकं स्या- २९ आ. मी. ११ २२७ (उद्धृत) ४८[८-२१] सन्युवरिवेदणीए २ ग्रन्थोल्लेख १४ ४९० ४९१ ५१४ १ कर्मप्रवाद २७५ १सा कम्मपवादे सवित्थरेण परूविदा । २ कषायप्राभूत १ एसा सव्वकरणुवसामणा फसायपाहुडे परूविजिहिदि । २७५ (५) परिशिष्ट ३४७ ५२३ ५२७ २ मोहणीयस्स जहा कसायपाहुडे वित्थेरण ठाणसमुक्त्तिणा कदा तहा एत्थ वि कायव्वा । ३ मोहणीयसंतकम्मस्स सामित्तं जहा कसायपाहुडे कदं तहा कायव्वं । ४ पयडिट्ठाणसंतकम्मं मोहणीयस्स जहा कसायपाहुडे कदं तहा कायव्वं । ३ जीवस्थान-चूलिका १ बंधं पडुच्च हिदिरहस्से भण्णमाणे जहा जीवट्ठाणचूलियाए उत्तरपयडीणं जहण्णहिदिपरूवणा कदा तहा कायव्वा । ४ तत्त्वार्थसूत्र १ ओहिणाणो [ दाव्वदो ] मुत्तिदव्वाणि चेव जाणदि नामुत्तधम्माधम्म-काला- गास-सिद्धजीवद्रव्याणि, "रूपिष्ववधेः” इति वचनात् । २ किं च-ण जीवदव्यमस्थि, "रूपिणः पुद्गलाः” इच्चेदेण लक्खणेण जीवाणं पोग्गलेसु अंतभावादो। ५ भावविधान १ तासिं परूवणा जहा भावविहाणे कदा तहा कायव्वा । ६ महाबन्ध १ जहा महाबंधे परूविदं तहा परूवणा एत्थ किण्ण कीरदे । ८ ३३ ५१५ ७ वेदना ४ १ जेण पदेसग्गेण भवं धारेदि तस्स पदेसग्गस्स पदमीमांसा सामित्तमप्पा- बहुगं च जहा वेयणाए परूविदं तहा परूवेयव्वं । ८ सत्कर्मप्रकृतिप्राभृत १ एत्थ एदेसिं चदुण्णमुवकमाणं जहा संतकम्मपयडिपाहुडे परूविदं तहा परवेयव्वं । ९ सूत्र विशेष १ कुदो अधापवत्तभागहारादो विज्झादभागहारस्स संखेजगुणहोणतं णव्वदे ? एदम्हादो चेव सुत्तादो। ३ ग्रन्थकारोल्लेख ४४९ ५७७ ५७८ १ आर्यनन्दी १ कम्महिदि त्ति अणियोगदारे एत्थ महावाचया अजणंदिणो संतकम्मं करेंति । २ महावाचयाणमजणंदीणं उवदेसेण अंतोमुहुत्तं हवेदि संखेनगुणमाउआदो। २ आयमंक्षु १ अज्जमखुखमासमणा पुण कम्महिदिसंचिदसंतकम्मपरूवणा कम्मट्टिदिपरूवणे त्ति भणंति। २ महावाचयाणमन्जमखुसमणाणमुवदेसेण लोगे पुण्णे आउअसमं करेदि । ५१८ ५७८ उपदेशभेद (६) ३२७ ५१८ ५२२ ३ नागहस्ती १ एसुवदेसो णागहत्थिखमणाणं । २ जहण्णुकस्सहिदीणं पमाणपरूवणा कम्महिदि त्ति णागहत्थिखमासमणा भणति । ३ अप्पाबहुगअणियोगद्दारे णागहत्थिभडारओ संतकम्ममग्गणं फरेदि । ४ निक्षेपाचार्य १ एसो णिक्खेवाइरियउवएसो। ५ भूतवली भट्टारक १ भूतवलभिडारएण जेणेदं सुत्तं देसामासियभावेण लिहिदं तेणेदेण सुत्तेण सूचिदसेसअट्ठारसअणियोगहाराणं किंचि संखेवेण परूवणं कस्सामो। ६ महावाचक क्षमाश्रमण १ महावाचयाणं खमासमणाणं उवदेसेण सव्वत्थोवाणि कसाउदयट्ठाणाणि । २ महावाचया हिदिसंतकम्म पयासंति । ३ अप्पाबहुए त्ति जमणिओगद्दारं एत्थ महावाचयखमासमणा संतकम्म- मगणं करेदि । ४ परम्परागत उपदेश १ ५७७ " ५७९ १ पवाइजतेण उवएसेण हस्स-रदिवेदएहितो सादवेदया जीवा विसेसा०। २ पवाइज्जतेण उबदेसेण संखेज्जजीवमेत्तेण विसे । ३ एयजीवेण अंतरं पवाजतेण उवएसेण वत्तइस्सामो। ४ एदं पुणो हेदुणा अप्पाबहुअंण पवाइजदि । ५ एसो च उपदेसो पवाइजदि । ५ उपदेशभेद २८८ २८९ २९३ ३३२ ५२२ १ उदयावलियमेत्तहिदिविसेसो त्ति जे आइरिया भणंति तेसिमहिप्पाएण उदीरणकालो जहण्णओ एगसमयमेत्तो। जे पुण दोणि समए जहण्णेण उदोरेदि त्ति भणति तेसिमहिप्पारण वे समया त्ति परविदं ४५ २ खीणकसायम्मि णिहा-पयलाणमुदीरणा णत्थि त्ति भणताणमभिप्पारण णिहाणिहा-पयलापयला-थीणगिद्धीहि सह जहण्णसामित्तं वत्तव्यं । ११० ३ कुदो ? एदस्साइरियस्स उवदेसेण खीणकसायन्हि जहण्णट्टिदिउदीरणाभावादो। १३७ ४ केसि पि आइरियाणं अहिप्पाएण सव्वासिमाणुपुत्रीणमुकासकालो तिण्णि समया, तिरिक्खगइपाओगाणुपुम्चीए चत्तारि समया। १९८ ५ अधवा, ओहिणाण-ओहिदसणावरणाणं वड्डीए वि मदिणाणावरणमंगो होदि त्ति केसि पि आइरियाणमुवदेसो। २६४ ६ अण्णेसिमुपदेसेण एदे पुवुत्ता अवेदया होदूण असंखेजयासाउआ च उत्तरविम्विदतिरिक्स-मणुस्सा भ अवेदया। २८५ (७) परिशिष्ट ७ अण्णेण उवदेसेण असंखे० भागमेत्तेण विसे०। २८९ ८ अण्णेण उवएसेण सदिआवरणस्स भुजगारवेदओ तेत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि सबढे। ३२८ ९ एदम्हि उवदेसे जाणि कम्माणि ण भगिदाणि तेसिं कम्माणं णस्थि दो उवदेसा, पढमेण चेव उवदेसेण ताणि णेयवाणि। ३२९ १० अण्णेण उवएसेण पुण सव्वणामपयडोणं णत्थि अवट्ठिदसंकमो। ४६७ ११ एदेहि दोहि उवदेसेहि भुजगार-पदणिक्खेववड्ढिसंकमेसु सामित्तमप्पा- वहुगं कायव्वं । ४६८ १२ जेसिमाइरियाणं णिग्गमाणुसारी आगमो तेसिमहिप्पाएण अत्थि अव- ट्ठिदसंकमो। जेसिं पुण आइरियाणं णिग्गमाणुसारी आगमो ण होदि, किंतु संकामिन्जमाणपयडिपदेसाणुसारी, तेसिमहिप्पाएण सव्वणामपयडीणं णत्थि अवठ्ठाणं। ४६९ १३ जेण उबदेसेण अवट्ठाणं तेण उवदेसेण तिपलिदोवमियस्स तप्पाओग्ग- उक्कस्सियाए वड्ढीए वढिदूण अवट्टिदस्स उक्कस्समवट्ठाणं । ४६९ १४ एसो ताव एक्को उवदेसो। अण्णेण उवएसेण अणंताणुबंधीणं जण्णिया हाणी कस्स ? १५ बारसण्णं कसायाणं जेण उवएसेण अवठ्ठाणमत्थि तेण उवएसेण उच्चदे- ४७५ ६ पारिभाषिक-शब्द-सूची ४७४ २ शब्द पृष्ठ शब्द पृष्ठ अ अनादिक नामप्रकृति ४०४ अकरणोपशामना २७५ अनादिसत्कर्म नामकर्म ३७३ अगुणप्रतिपन्न १७४,२८८ | अनादिसत्कर्मिकनामप्रकृति अगुणोपशामना -३९९ अघाति १७१,३७४ अनादिसत्कर्मिक प्रकृति ४४१ अचक्षुदर्शन ९ अनावर्जितक १८९ अचित्तप्रक्रम १५ अनिकाचित ५७६ अतिस्थापना ३४७,३७५ - | अनिधत्त अद्धाक्षय ३७० अनुदीर्णोपशामना २७५ ३३ अनुपशान्त २७६ अधःप्रमत्तगुणश्रेणि २९७ अनुभागदीर्घ ५०९ अधःप्रवृत्त भागहार ४४८ अनुभागमोक्ष ३३८ अधःप्रवृत्तसंक्रम ४८९ अनुभागविपरिणामना २८२ अधःस्थितिगलनं २८३ / अनुभागसत्कर्म ५३८ अनन्तजीविय २७४ अनुभागसंक्रम ३७५ अनन्तानुवन्धिविसंयोजना अनुभागहव ५११ २७६ अनुमानित गति ५३७ शब्द पृष्ठ अनेकान्तं २५ अनेकान्तअसात ४९८ अनेकान्तसात अन्तर ३७९ अपर्याप्त निवृत्ति १८५ अपूर्वस्पर्धक ५२०,५७८ अप्रशस्तोपशामना २७६ अभिधाननिवन्धन अर्थनिबन्धन २ अल्पतर उदय ३२५ अल्पतर उदी०५०,१५७,२६० अल्पतर संक्रम ३९८ अवक्तव्य उदय ३२५ अवक्तव्य उदीरणा ५१,१५७, अवग्रह अवधिलंभ १७६,२३८ ३२५ अधर्म द्रव्य अवस्थित उदय .

१७४,५३९ गुणसंक्रम अशुभ प्रकृति ३७४,५३८ । ओघभव २७५ ३ १५ ज पारिभापिक-शब्द-सूची (८) अवस्थित उदीरणा ५,१,१५७ ए गुणश्रेणिशोर्प २९८, ३३३ अवस्थित संक्रम ३९८ एकस्थानिका १७६ एकस्थिति १०१ गुणितकांशिक २९७ आ एकान्तअसात ४९८ गुणोपशामना २७५ आकाश द्रव्य एकान्तभवप्रत्ययिक १७३ ग्रहणतः आत्त पुद्गल ५१५ आगमभावलेश्या ४८५ एकान्तसात ४९८ घ आदिवर्गणा घातस्थान ओ आदिस्पर्धक घातिसंज्ञा १७१,३७७,५३९ ५१२ आदेशभव घोलमान जघन्य योग ४३५ ५१२ आनुपूर्वीसंक्रम ४११ करणोपशामना २७५ , चक्षुदर्शन आयुष्कघातक २८८ आर्यनन्दी कर्मउपक्रम ४१,४२ । चतुर्दशपूर्वधर २४४ ५७७, ५७८ आर्यमंक्षु कर्मउपशामना चतुर्दशपूर्वी ५४१ ५१८, ५७८ अवर्जित करण २५९,५१९,५७७ कर्मनिवन्धन चतुःस्थानिक १७४ कर्मप्रक्रम चारित्र १२ आवासक कर्ममोक्ष ३३७ आहारतःआत्तपुद्गल ५१५ कर्मसंक्रम ३३९ जीवगुणहानिस्थानान्तर ३२८ उ कपायउदयस्थान ५२७ जीवद्रव्य ३३ उत्कीरणद्धा ५२० कापोतलेश्या४८४,४८८,४९१ । जीवनिवद्ध ७,१४ उत्तर निर्वर्तना ४८६ कालउपक्रम ४१ जीवविपाकी १३ उत्तरप्रकृतिविपरिणामना२८३ । कालद्रव्य ३३ / तद्व्यतिरिक्त द्रव्यलेश्या'४८४ उत्पाद १९ कालनिवन्धन २ तीसिय उदय २८९ कालप्रक्रम १६ तेजोलेश्या ४८४,४८८,४९१ उदयगोपुच्छ २५३ कालसंकम त्रिस्थानिक १०४ उदयमार्गणा ५१९ कृतकरणीय २५३ द उदीरणा ४३ ३३८ दर्शन कृतकृत्य ५,६ उदीरणाउदय ३०४ कृष्टि ५२१, ५७९ दानान्तराय १४ उदीरणामार्गणा ५१९ कृष्णलेश्या ४८४,४८८,४९० दारुसमान ३७४,५३९ उद्वेलनकाण्डक ४७८ क्षपितकांशिक ३०८, ३२१ दुःख उद्वेलनभागहार ४४८ क्षेत्रउपक्रम ४१ देशकरणोपशामना २७५ उद्वेलनसंक्रम ४१६ क्षेत्रनिबद्ध ७,१४ । देशघाति १७१,३७४,५३९ उद्वेल्यमान प्रकृति ३८३ क्षेत्रनिवन्धन देशप्रकृतिविपरिणामना २८३ उपक्रम ४१,४२ क्षेत्रप्रक्रम देशमोक्ष ૨૭ उपभोगतःआत्त पुद्गल ५१५ क्षेत्रसंक्रम ३३९,३४० देशविपरिणामना २८३ उपभोगान्तराय १४ ग दोगुणप्रेणिशीर्प उपशमसम्यक्त्वगुणश्रेणि २९७, गुण १७४ द्रव्य उपशान्त गुणप्रतिपन्न द्रव्य उपक्रम उपशामना गुणश्रेणि द्रव्यम्पशासना २७५ उपशामकअध्यवसान ५७७ गुणश्रेणिनिर्जरा इन्यनिवन्धन २ ३३९, ३४० ६ १५ २ ध्रुव उदयप्रकृति प (९) परिशिष्ट द्रव्यप्रक्रम १५ नोकर्मउपशामना २७५ प्रकृतिसंक्रम ३४० द्रव्यमोक्ष ३३७ नोकर्मप्रक्रम १५ प्रकृतिस्थानउपशामना २८० द्रव्यलेश्या ४८४ नोकर्ममोक्ष ३३७ प्रकृतिहस्व ५०९ द्रव्यसंक्रम ३३९ नोकर्मसंक्रम ३३९ प्रक्रम १५,१६,४२ द्रव्यार्थिक नय ४८५ नोप्रकृतिदीर्घ ५८७ प्रतिग्रह ४११,४१४,४९५ द्विस्थानिक १७४,५३९ नोप्रकृतिहस्व ५०९ प्रत्ययनिबन्धन ध नोप्रदेशदीर्घ प्रदेशउदीरकअध्यवसान- धर्मद्रव्य नोप्रदेशहस्व ५११ स्थान ५७७ ११९ नोस्थितिदीर्घ ५०८ । प्रदेशगुणहानिस्थानान्तर३७६ ध्रुव उदीरक १०८ नोस्थितिहस्व प्रदेशदीर्घ ५०९ ध्रुवउदीरणाप्रकृति १०९ प्रदेशमोक्ष ३३८ ध्रुवबन्धप्रकृति १४५,३२८ पद्मलेश्या ४८४,४८८,४९२ प्रदेशविपरिणामना २८३ ध्रुवोदयप्रकृति१५९,१६२,२३३ पयदकरण २७६,२७७ प्रदेशसंक्रम ४०८ परमविक ३६३ प्रदेशसंक्रमणाध्यव- न परभविक नामप्रकृति ३४२ सानस्थान ५७७ नागहस्ती ३२७,५१८५२२ परमविकनामबन्धा- प्रदेशहस्व नामउपक्रम ४१ ध्यवसान ३८७ प्रयोगशः उदय २८९ नामउपशामना २७५ परिग्रहतः आत्त पुद्गल ५१५ प्रशस्तोपशामना २७५ नामनिबन्धन २ परिणाम १७२ प्रसज्य नामप्रक्रम १५ परिणामतःआत्तपुद्गल ५१५ नाममोक्ष ३३९ परिणामप्रत्ययिक १७२,२४२, बन्धनउपक्रम ४२ नामलेश्या ४८४ २६१ बन्धमागंणा ५१९ नामसंक्रम ३३९ परिन्तजीविय २७४ भ निकाचनअध्यवसान ५७७ परिवर्तमान २३४ भव ७,५१२,५१९ निकाचित ५१७,५७६ परिवर्तमान नामप्रकृति १४६ भवग्रहणभव ५१२ निक्षेपाचार्य पर्याप्त निवृत्ति १८० भवप्रत्ययिक १७२,२६१ निक्षेप ३४७ पर्यायार्थिक नय ४८५ भवोपगृहीत १७२,१७५,३८० निधत्त ५१६,५७६ पर्युदास २५ भंग निधत्तअध्यवसान ५७७ पायदकरण २७८ भावउपक्रम ४१ निवन्धन पिण्डप्रकृति ३४७ भावनिबन्धन निपेकगुणहानि- पुद्गलद्रव्य ३३ भावप्रकम १६ स्थानान्तर ३२८ पुद्गलनिबद्ध भावमोक्ष २३७ नीललेश्या ४८४,४८८,४९० पुद्गलात्त भावलेश्या ४८५,४८८ नेगम २४ पुद्गलात्मा ५१५ भावसंक्रम ३३९,३४० नोअनुभागदीर्घ ५०९ पूर्वधर २३८ भुजाकार नोअनुभागह्रस्व पूर्वस्पर्धक ५२०,५७८ भुजाकार उदय नोआगमभावउपशामना २७५ | प्रकृतिदीर्घ ५०७ भुजाकारउदीरणा १५७,२६० नोआगमभावलेश्या. ४८५ प्रकृतिमोक्ष ३३७ भुजाकारउपशामक ३७७ नोकर्मउपक्रम ४१ प्रकृतिसत्कर्म ५२२ भुजाकारसंक्रम ३९८ व २३ १ ३ ७,१३ .

१ । wr ५१०.. पट्र्पष्ठिपद सेचीयादो उदय य.. ल पारिभापिक-शब्द-सूची (१०) भूतवली भट्टारक श संयोग २४ भोगान्तराय १४. शुक्ललेश्या ४८४,४८८,४९२ साकारक्षय २३८,२६४ म शुभ प्रकृति १७६ । सादिसान्त नामकर्म ४०४ ममत्तीतः आत्त पुद्गल ५१५ . शैलेश्य ५२१,४७९ सामान्य मनुष्य ९३ महावाचकक्षमाश्रमणं ५७७ सुख मार्गणा सुहदुहपंचय १६४ २८२ मिश्रक्रम १५ षट्स्थानपतितत्व सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती५२१,५७९ ४९३ मुक्त ३३८ २८९ स मूलनिवर्तना ४८६ स्थासंज्ञा १७१,३७७,५३९ मोक्ष ३३७,३३८ सचित्तप्रक्रम १५ स्थापनाउपक्रम ४१ सत्कर्ममार्गणा. ५१९ स्थापनाउपशामना २७५ सत्कर्मस्थान ४०८ योगयवमध्य ४७३ स्थापनानिवन्धन २ सत्कर्मिक २७७ स्थापनापक्रम १५ लाभान्तराय १४ २४ स्थापनामोक्ष ३३७ ४८४ समुच्छिन्न क्रियानिवृत्ति ५२१ स्थपनालेश्या ४८४ लेश्याकर्म ४९० समुच्छिन्नक्रियाप्रतिपाती५७९ स्थापनासंक्रम ३३९ सम्यग्दर्शन १२. स्थितिक्षयजनित उदय २८९ विध्यातभागहार ४४८ सर्वकरणोपशामना २७५ स्थितिदीर्घ ५०८ विध्यातसंक्रम ४०९ सर्वघाति १७१,३२४ । स्थितिवन्धाध्यवसान ५७७ विनाश १९ सर्वमोक्ष ३३७ स्थितिमोक्ष ३३७,३३८ विपच्चिद '५०३ सर्वविपरिणामना २८३. स्थितिविपरिणामना २८३ विपरिणामिता २८३ सर्वसंक्रम. ४०९ स्थितिसत्कर्म ५२८ विपरिणामोपक्रम २८२,५५५ संक्रम ४९५ स्थितिसंक्रम ३४७ संक्रममा णा ५१९ । स्थितिहस्व ५१० विशेषविशेषमनुष्य संक्रमस्थान - ४०८ वीतरागछद्मस्थ संक्लेशक्ष्य ३७० वीर्यान्तराय: १४ संप्राप्तितः उदय २८९ । हतसमुत्पत्तिक ११८,५४२ वैक्रियिकपटक २७९ संयतासंयतेगुणश्रेणि २९७ हतसमुत्पत्तिककर्म . . १११ व्यञ्जन ५१२ संयमभवग्रहण ३०५ हतसमुत्पत्तिकक्रम४०२,४०३ समवाय । : लेश्या . विशेप मनुष्य for .

पटखंडागम सूत्र व धवला टीकाके सोलहों भागोंकी सम्मिलित पारिभाषिक शब्द-सूची मोटे टाइपके अंक भागके और उसके आगेके अंक उसी भागके पृष्ठोंके सूचक हैं। -सूचना- अ ६-४३३ अचित्तगुणयोग अचित्ततद्व्यतिरिक्तद्रव्यान्तर - श्रकरणोपशामना १५-२७५ अकर्मभाव ४-३२७ अकर्मभूमि ११-८६ अकषाय १-३५१ अकषायत्व ५-२२३ अकषायी ७-८३, अकायिक १-३६६ अकृतयुग्मजगप्रतर ४-१८५ अकृत्रिम ४-११, ४७६ अक्ष १३-६,१०,४१, १४-६ अक्षपकानुपशामक ७.५ अक्षपरावर्त ७.३६ अक्षपाद '१३-२८८ अक्षयराशि ४.३३६ अक्षर १३.२४७,२६०,२६२ अक्षरगता १३-२२१ अक्षरज्ञान १३.२६४ अक्षरवृद्धि ६-२२ अक्षरभुत ६.२२ अक्षरच तज्ञान १३-२६५ अक्षरसमास ६-२३,१२-४७६ अक्षरसमास श्रु तज्ञान १३-२६५ अक्षरसमासावरणीय १३-२६१ अक्षरसंयोग १३२४७,२४८ अक्षरावरणीय १३-२६७ अक्षिण ९-१५२ श्रक्षिप्र अवग्रह ६-२० अक्षिा प्रत्यय १३-२३७ अक्षीण महानस ९-१०१ अक्षीणावास ९-१०२ अक्षेम १३.२३२,२३६,२४१ अक्षौहिणी ९-६२ अगति ७-६,८-८ अगुणप्रतिपन्न १६-१७४, २८८ अगुणोपशामना १६-२७५ যুলন্ত ६-५८; ८-१०, १३-३६३, ३६४ अगृहीत ग्रहणद्धा ४-३२७,३२६ अग्निकायिक १२-२०८ अग्र १४-३६७ अगस्थिति १०-११६ अग्रस्थितिप्राप्त १०-११३, १४२ अग्रस्थितिविशेष १४.३६७ अंग्रहणद्रव्यवर्गणा १४-५६, ६०, ६२, ६३, ५४८ अग्रायणीपूर्व ९-१३४, २१२ अग्रायणीय १-११५ अग्रय १३-२८०, २८८ अघातायुष्क अघाति १६-१७१, ३७४ अघातिकम ७६२ अघोरगुणब्रह्मचारी ९-६४ अचक्षुदर्शन १-३८२, ६-३३, ७.१०१, १०३,१३.३५५, १६-६ अचतुदर्शनस्थिति ५-१३७, अचित्तद्रव्यभाव १२-२ अचित्तद्रव्यवेदना १०-७ अचित्तद्रव्यस्पर्शन ४-१४३ अचित्तनोकर्मद्रव्यबन्धक ७-४ अचित्त प्रक्रम १६.१५ अचित्त मङ्गल १.२८ अच्युत १३.३१८ अच्युतकल्प ४.१६५, १७०, २०८, २३६,२६२, १३.३१८ अजीव १३-८,४०, २०० अजीवद्रव्य ३-२ अजीवभावसम्बन्ध १४.२२, २३, २५ अज्ञान १-३६३, ३६४,४-४७६; १४.१२ अज्ञान मिथ्यात्व ८-२० अज्ञानिक दृष्टि ९-२०३ अणिमा .९-७५. अणुव्रत ४.३७८ अतिचार ८-८२ अतिप्रसंग ४-२३,२०८:५-२०६, २०६, ६-६०७.६६,७५, ७६,९-६, ५६,६३, १२-१४२ अतिवृष्टि १३-३३२,३३६,३४१ अतिस्थापना ६२२५, २२६, २२८% १०.५.३, ११० १६-३४७, ३७५. अचक्षुदर्शनावरणीय ६-३१,३३ अचनुदर्शनी ७-६८८-३१८, १३-२५४ ग्रचित्तकाल १०.७६ धवलासहितसमग्रपटखंडागमस्य पारिभापिक-शब्द-सूची (१२) है प्रतिस्थापनावली ६-२५०, ३०६, १०-२८१, ३२० १२-८५ अतीतकाल विशेषित क्षेत्र४-१४५ प्रतीतपर्याप्ति १-४१७ ग्रतीतप्रस्थ ३-२६ यतीतप्राण १-४१६ प्रतीतानागत वर्तमानकाल विशिष्ट क्षेत्र ४-१४८, अतीन्द्रिय ४-१५८ व्यत्यन्ताभाव "६-४२६ अत्यन्तायोग व्यवच्छेद ११-३१८ ग्रत्यासना १०-४२ अदत्तादान १२-२८१ प्रद्धा, ४-३१८ अद्धाकाल ११-७७ यद्धाक्षय १६-७० यद्धानिपेकस्थितिप्राप्त १०-११३ अद्धाशस १०.५०,५५ प्रदेत ९-१७० . अध्यात्म विद्या १३-३६ अधस्तन राशि ५-२४६, २६२ अधस्तनविकल्प ३-५२, ७४; ४-१८५ अधस्तन विरलन ३-१६५,१७६ ८८,३१ ३-३, १३-४३, ८.८% ३१ अधोलोक क्षेत्रफल ४-१६ अंधःकर्म १३-३८, ४६, ४७ अधःप्रमत्त गुणणि १६-२६७ अधःप्रवृत्त ७.१२ अधःप्रवृत्तकरण ४-३३५, ३५७; ६-२१७, २२२, २४८, २५२; १०-२८०, २८८ अधःप्रवृत्तकरण विशुद्धि ६-२१४ अधःप्रवृत्त भागहार १६-४४८ अधःप्रवृत्त विशोधि ६-३३६ अधःप्रवृत्त संक्रम ६-१२६,१३०, २८६, १६-४०६. अधःस्थितिगलन ६-१७० १३-८०१६-२८३ अध्यात्म विद्या १३-३६ अध्वान श्रध्रुव ८-८, १३-२३६ श्रध्रुव अवग्रह १-३५७, ६-२१ अध्रुव प्रत्यय ९-१५४ अनक्षरगता १२-२२१ নত্ব त ९-१८८ श्रनध्यवसाय ७-८६ अनध्यात्म विद्या १३-३६ अननुगामी ६-४६६; १३-२६२, २६४ अनन्त ३-११,१२,१५९४-३३८ अनन्तकाल ४-३२८ अनन्तगुण ३-२२,२६ अनन्तगुण विहीन ३-२१, २२, ६१ अनन्तगुणवृद्धि ६२२, १६६; १०-३५१ अनन्त जीवित १६.२७४ श्रनन्त जान अनन्त प्रदेशिक अनन्तरल ९.११८ अनन्त भागवृद्धि ६२२,१६६, १०.३५१ अनन्तव्यपदेश ४.४७८ भनन्तरक्षेत्र अनन्तरक्षेत्र स्पर्श १३-३,७,१६ अनन्तराम १२.३७० अनन्तरोपनिधा ६-३७०,२७१ ३८६, ३२८; १०-११५, ३५२; १२-२१४,१४-४६ अनन्तानन्त ३-१८, १६ अनन्तानुतन ६-४२ अनन्तानुबन्धि विसंयोजन ७-१४; १०.२८८ अनन्तानुबन्धि विसंयोजना ६.२८९ १६-२७६ अनन्तानुवन्धी ४-३३६:६-४१; ८.६ १२.६६० श्रानन्तावधि ९-५१,५२ अनन्तावधि जिन अनन्तिम भाग ३-६१,६२ श्रनर्पित ४.३६३, २६८ ५.४५, ५-६ अनवस्था ४-३२०, ६-३४, ५७ ६४,१४४, १६४, ३०३; ७.६६९-२६१, १०-६, ४३, २२८,४०३:१२-२५७ श्रनवस्थान ट्रानवस्थाप्य १३-६२ अनवस्याप्रसंग ४.१६३ अनवस्थित १३.२६२, २६४ ग्रनवस्थित मागहार १०-१४८ अनस्तिकाय अनाकारोपयोग ४-३६१ ६.२०७; १३.२०७ अनागत (काल) ३.२६ यानागतप्रस्थ अध्वान अधर्म-द्रव्य अधर्मास्तिद्रव्य १०-४३६ अधर्मास्तिकायानुभाव १३-३४६ अधिकार ७.२ अधिकार गोपुन्छा १०.३४८, ३५७, ३६६ अधिकार स्थिति १०-३४८ अधिगम ३-३६ ঋঘিাল १-५७ अधोलोक अधोलोक प्रमाण ४-३२, ४१, नागमद्रव्य नारक ४६, २५६ अनाममायभूत धनात्मस्वरूप अनादि अनादि अपवनितन्य ७५. अनादिक (१३) परिशिष्ट ६-२०६ - . १-७६ अनावृष्टि ... अनादिक नामप्रकृति १६-४०४ अनुक्त प्रत्यय .९.१५४ अनुभागवृद्धि ६-२१३ अनादिकशरीरबन्ध १४-४६ अनुगम ३. ४-६, ३२२, अनुभागवेदक : ६.२१३ अनादिक सिद्धान्तपद ९-१३८ ९-१४२, १६२ अनुभागसत्कर्म १६-५२८ अनादि पारिणामिक ५-२२५ अनुगामी ६-४६६; १३-२६२, अनुभागसत्कर्मिक अनादि मिथ्यादृष्टि ४-३३५, : २६४ अनुभागसत्वस्थान १२-११२ ६-२३१ अनुग्रहण १४-२२८ अनुभागसंक्रम १२-२३२, अनादि बादरसाम्परायिक ७-५ : | अनुच्छेद १४-४३६ १६-३७५ अनादि सत्कर्मनामकर्म१६-३७३. | अनुत्तर १३-२८०, २८३, ३१६ अनुभागहस्व. १६-५११ अनादि सत्कर्मिक नामप्रकृति अनुत्तर विमान ४-२३६, ३८६ अनुमान ६-१५१ १६-३६६ अनुत्तर विमानवासी । ९-३३ अनुमानित गति १६-५३७ अनादि सत्कर्मिक प्रकृति अनुत्तरौपपादिकदशा १-१०३ अनुयोग ६-२४; १२-४८० १६-४४१ अनुत्तरौपपादिकदशांग ९-२०२ अनुयोगद्वार १३-२,२३६,२६६ अनादि सपर्यवसित बन्ध ७-५ अनुत्पादानुच्छेद. १२-४५८, अनुयोगद्वार श्रु तज्ञान १३-२६६ अनादि सिद्धान्तपद अनुयोगद्वारसमास १३-२७० : ४६४ अनांदेय ६-६५, ८-६: अनुद्योपशम अनुयोगद्वार समासावरणीय ५-२०७ अनादेयं नाम १३-३६३, ३६६ १३-२६१ अनुदिशविमान ४-८१, १३६, अनावर्जितक १६-१८६, अनुयोगद्वारावरणीय १३-२६१ १२४०, ३८६ १३-३३२, ३३६ अनुदीर्णोपशामना १६-२७५ अनुयोगसमास ६-२४, १२-४८० अनाहार .१-१५३, ७-७,११३ अनुलोमप्रदेशविन्यास १०-४४ अनुपयुक्त १३-२०४ अनाहारक ४-४८७८-३६१ अनुपयोग १३.२०४ अनुसमयापवर्तना १२-३२ अनिकाचित अनुपशान्त १६-२७६ अनुसमयापवर्तनाघात १२-३१ अनिधत्त १६-५७६ अनुप्रेक्षण १४-६ अनुसारी ९-५७,६० अनिन्द्रिय १-२६४६७-६८, ६६ अनुप्रेक्षणा ९-२६.३, १३-२०३ अनुसंचिताधर ४-३७६ अनिवृत्ति १-१८४ अनुभांग ७.६३, १२-६१; अनृजुक १३-३३० अनिवृत्तिकरण ४.३३५, ३५७; १३-२४३, २४६ अनेक क्षेत्र १३-२६२,२६५ '६:२२१, २२२, २२६, २४८, अनुभागकाण्डक ६-२२२, अनेकस्थानसंस्थित १३-२६६ १२-३२ अनेकान्त ६-११५:८-१४५ अनिवृत्तिकरण उपशामक ७५. अनुभागकाण्डकघात . ६-२०६ ९-१५६; १६-२५ अनिवृत्तिकरण क्षपक ७५ अनुभागकाण्डकोत्कीरणद्धा अनेकान्त असात १६.४९८ अनिवृत्तिकरण विशुद्धि ६-२१४ ६-२२८ अनेकान्तं सात १६-४६८ अनिवृत्ति क्षपक अनुभागघात ६-२३०, २३४ अनेषण १३-५५ अनिवृत्तिवादरसांम्पराय १-१८४ | अनुभागदीर्घ. १६-५०६ अनेकान्तिक ७.७३ अनिःसरणात्मक १४.३.२८ अनुभागबंध ६-१६८, २००, । अन्तर ,५-३, ६-२३१, २३२, अनिःसृत ९-१५२ ८-२ २६०, ८-६३, १३.६१ अनि.मृत अवग्रह ६-२० | अनुभागबंधस्थान १२-२०४ १६-३७६ अनिःसृत प्रत्यय १३-२३७ अनुभागबंधाध्यवसायस्थान अन्तरकरण ६-२३१,३००, अनुकम्पा .६-२००, १२-२०४ ७-१८-५.३ अनुकृष्टि ४.३५५, ६-२१६, अनुभागमोक्ष १६-३३८ ४.१७६ अन्तरकाल ११-३४६ अनुभाग विपरिणामना अन्तरकृत प्रथम समयं ३-३२५, अनुक्त अवग्रह ३५.८ ६-२०. १६-२८२ १६-५७६ २५२८-४; १०-२८० .

धवलासहितसमग्रपटखंडागमस्य पारिभाषिक-शब्द-सूची (१४) ... १०-४० ५-४४, ७४ अन्तरकृष्टि ६-३६०,३६१ अन्तरघात ६-२३४ अन्तरद्विचरमफालि ६-२६१ अन्तरद्विसमयकृत ६-३३५,४१० अन्तर प्रथम समयकृत ६-३०३, ३०४ अन्तरस्थिति “६-२३२,२३४ अन्तरात्मा १-१२० अन्तरोनुगम. ५-१७; १३-१३२ अन्तराय ६-१४८-१० १३-२६,२०६,३८६ अन्तराय कर्मप्रकृति १३-२०६ अन्तरिक्ष ९-७२,७४ अन्तमुहूर्त ३-६७,७०,४-३२४, ३८०, ५-६, ७-२६७, २८७,२८६ अन्धकाकलेश्या ११-१६ अन्यथानुपपत्ति ५-२२३ अन्ययोगव्यवच्छेद ११-२४५, ३१८ अन्योन्यगुणकारशलाका ३-३३४ अन्योन्याम्यस्त ४-१५६,१६६, २०२ अन्योन्याभ्यरतराशि १०-७६, १२१ अन्योन्याभ्यास ३-२०,११५, १६६ अन्वय ७-१५; १०-१० अन्वयमुख ६-६५; १२-६८ अपकर्षण ४-३३२, ६-१४८, १७१; १०-५३, ३३० अपकर्षणभागहार ६-२२४,२२७ अपक्रमपटकनियम ४-१७६ ४-२६५ अपगतवेद १-३४२, ७-८० ८-२६५,२६६ अपगतवेदना. ५-२२२ अपनयन (राशि) ३-४८; ४.२००१०-७८ अपनयंनभ्रु वराशि ४.२०१ अपनेय ३-४६ अपर्याप्त १-२६७,४४४,३-३३१; :: ४-६१, ६-६२, ४१६, ८-६ अपराजित ४.३८६. अपर्याप्त नाम १३-३६३, ३६५ अपर्याप्त निवृति. १६-१८५ अपर्याप्ति १-२५६, २५७ अपरिवर्तमान परिणाम १२-२७ अपरीत संसार ४-३३५ अपवर्तना ४-३८, ४१, ४३, ४७, १०३, २१६, २३० अपवर्तनाघात ४:४६३:७-२२६; १०-२३८, ३३२; १२-२१ अपवर्तनोद्वर्तनकरण ६-३६४ अपवादसूत्र अपश्चिम अपहृत ३-४२ अपायविचय १३-७२ अपिण्डप्रकृति १३-३६६ अपूर्वकृष्टि ६-३८५ अपूर्वकरण १.१८०, १८१, १८४; ४-३३५, ३५७; ६-२२० २२१, २४८, २५२;८-४; १०-२८०, २८० अपूर्वकरण उपशामक ७-५ अपूर्वकरणकालं ७.१२ अपूर्वकरणक्षपक ४-३३६, ७५ अपूर्वकरणगुणस्थान ४-३५३ अपूर्वकरणविशुद्धि ६.२१४ अपूर्वस्पर्धक ६-३६५, ४१५; १०-३२२, ३२५; १३८५ १६-५२०, ५७८ अपूर्वस्पर्धकशलाका ६-३६८ अपूर्वाद्धा ५.५४ अपोहा १३-२४२ अप्कायिक १-२७३७-७१, ८-१६२ अप्रणतिवाक् अप्रतिपात अप्रतिपद्यमान स्थान ६-२७६, २७८ अप्रतिपाति १३-२६२, २६५ अप्रतिपाती ९-४१ अप्रतिहत १४-३२७ अप्रत्यख्यान ६-४३, १३-३६० अप्रत्यख्यानावरणदण्डक ८-२५१. २७४ अप्रत्यख्यानावरणीय ६-४४ अप्रत्यय अप्रदेश १४-५४ ग्रप्रदेशिक ३-३. अप्रदेशिकानन्त ३-१२४ अप्रदेशिकासंख्यात ३-१५, १६ अप्रधानकाल . ११-७६ अप्रमत्त ७-१२ अप्रमत्तसंयत १-१७८; ८-४ अप्रमाद १४-८६ अप्रवद्यमानोपदेश १०-२६८ अप्रवीचार १-३३६ प्रशस्त तैजसशरीर ४-२८ ७.३०० अप्रशस्त विहायोगति ६-७६ अप्रशस्तोपशामना ६-२५४, १६-२७६ अप्रशस्तोपशामनाकरण ६-२६५, ३३६ ग्रवद्धप्रलाप १-११७ अवद्धायुष्क ६-२०८ प्रबंधक अभव्य १-३६४, ७-२४२ १०-२२, १४-१३ अभव्य समान भव्य ७.१६२, १७१, १७६:२०-२२ अभव्यरिद्धिक ७.१०६,८-३५६ ग्रभाग “७.४६५ अभिजित अभिधान अभिधाननिवन्धन १६-२ + अपकमणोपक्रमण (१५) परिशिष्ट . श्रभिधेय ८-१ अभिन्नदशपूर्वी ९-६६ अभिनिबोध ६-१५ अभिशुख अर्थ १३-२०६ अभिव्यक्तिजनन ४-३२२ अभीक्ष्ण अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग युक्तता ८-७६, ६१ अभेद ४-१४४ श्रभ्याख्यान १-११६,१२-२८५ श्रभ्र १४-३५ श्रमूर्त ४-१४४ श्रमूर्त्तत्त्व ६-४६० अमूर्त द्रव्यभाव . १२-२ अमृतसवी प्रयन ४-३१७, ३६५, १३-२६८, ३००; १४-३६ श्रयशःकीर्ति श्रयशःकीर्ति नाम १३-३६३, ३६६ श्रयोग १-१६२, ७-१८ श्रयोगकेवली १-१६२ अयोगवाह १३-२४७ अयोगव्यवच्छेद ११-२४५ ३१७ अयोगिकेवली श्रयोगी १-२८०, ४-३३६, ७८,७८; १०-३२५ परति ६-४७,८-१०; १३-३६१ अंरतिवाक् १-११७ अरहःकर्म १३-३४६, ३५० श्ररहन्तभक्ति ८-७६, ८६ अरिहन्त १-४२, ४३ अरुण ४-३१६ ग्ररूपी १४-३२ अरूपी अजीव द्रव्य ३-२, ३, अरंजन १३-२०४ अर्चना ५-६२ अर्चि १३-११५,१४१ अर्चिमालिनी १३-१४१ अर्थ ४-२००, ५-१६४; १३२, १४-८ अर्थका .९-१२७ अर्थनिया ९-१४२ अर्थनय १-८६,९-१८१ अर्थनिबन्धन १६-२ अर्थपद : ४-१८७; ९-२६६,. १०-१८,३७१, १२-३; १३-३६६ अर्थपरिणाम ६-४६० अर्थपर्याय ९-१४२, १७२ अर्थसम ९-२५६, २६१, २६८; १३-२०३, १४-८ अर्थाधिकार ९-१४० अर्थापत्ति ६-६६,६७, ७-८, ८-२७४; ९-२४३, १२-१७, अर्थावग्रह १-३५४, ६-१६; ९-१५६, १३-२२० अर्थावग्रहावरणीय १३-२१६ २२० अर्धच्छेद ३-२१, १०-८५ अर्धच्छेदशलाका अर्ध नृतीयक्षेत्र ' ४-३७, १६६ अर्धनृतीयद्वीपसमुद्र ४-२१४ अर्धनाराचशरीरसंहनन ६-७४ अर्धनराचसंहनन ८-१०७ १३-३६६, ३७० अर्धपुद्गलपरिवर्तन ५-११; अल्पतर उदीरणा १६-५०, १५७, २६० अल्पतरकाल १०-२६१, २६२ अल्पतरसंक्रम १६.३६८ अल्पबहुत्व (अनुयोग) १,१५८ अल्पबहुत्व ३.११४, २०८; ४-२५; १०-१६, १३-६१, १७५, ३८४, १४-३२२ अल्पबहुत्वप्ररूपणा १४-५० अल्पान्तर अलाभ १३-३३२, ३२४, ३४१ अलेश्य १-३६० अलेश्यिक ७.१०५, १०६ अलोक १०.२ अलोकाकाश ४-६, २२ श्रवक्तव्य उदय १६-३२५ अवक्तव्य उदीरणा१६-५१,१५७ अंवतव्यकृति ९-२७४ अवक्तव्यपरिहानि १०-२१२ अवक्रमणकाल १४.४७६ अवगाहनलक्षण ४-८ श्रवगाहमान ४.२३ अवगाहना ४-२५, ३०, ४५; ९-१७ १३-३०१ अवगावनागुणकार ४-४४,६८ अवगाहनादंडक ११-५६ अवगाहनाविकल्प ४-१७६; १३-३७१, ३७६, ३७७, ३८३ अवग्रह.१-३५४, ३७६, ६-१६, १८, ९-१४४,१३-२१६, २४२; १६५ अवग्रह जिन ९-६२ अवग्रहावरणीय १३-२१६,२१६ यवदान १३.२४२ अवधि १.३५६८-२६४ १३-२१०, २६० अवधिक्षेत्र ४-३८, ७६ अवधिजिन १२-४. अवधिज्ञान १-६३, ३५८; ६-२५, ४८४,४८६,४८८ ९-१३ ८-४ अर्धपुद्गलपरिवर्तनकाल. ३-२६, २६७ अर्धमण्डलीक १-५७ अर्धमास १३-३०७ अर्पणास्त्र ८-१६२,१६६,२०० अर्पित. ४-३६३, ३६८; ५-६३; ८-५ ४-३१८ अर्हत् अल्प १३-४८ अल्पतर उदय १६-३२५ अर्यमन . + धवलासहितसममपट्खंगमस्य पारिभाषिक-शब्द-सूची (१६) अवधिज्ञानावरणीय ६.२६, १३-२०६, २८६ श्रवधिज्ञानी ७-८४,८-२८६ अवधिदर्शन १.३८२, ६-३३; ७.१०२, १३-३५५ अवधिदर्शनावरणीय ६.३१, ३३, १३-३५४ अवधिदर्शनी ७-६८, १०३; ८-३१६ अवधिलम्भ १६-१७६, २३८ अवधिविषय १३-३१५ अवगमन १३-८९ अवरोध ४-३२२ अवमौदर्य १३-५६ अवयव ९-१३६ अवयवपद अवर्जितकरण १५-२५६, १६-५२६,५७७ अवलम्बना २३-२४२ अवस्थित १३-२६२, २६४ अवस्थित उदय १५-३२५ अवस्थित उदीरणा १५-१, ५, १५७ अवस्थित गुणकार ९.४५ अवस्थित गुणश्रेणी ६-२७३ अवस्थितगुणभणी निक्षेप अवहारकाल ३.१६४, १६७; ४-१५७, १८५; ५.२४६ ६-३६६; १०.८८ श्रवहारकालप्रक्षेपशलाका ३-१६५, १६६. १७१ यवहारकालशलाका ३.१६५ अवहारविशेष ३.४६ यवहारशलाका १०८० श्रवहारार्थ ३.८७ अवहित् ७२४७ ग्रवाल १३-२१० शवारा १४.२२६ अवाय १.३५४, ६.१७, १८, ९.१४४; १३-२१८, २४३ अवायजिन ९-६२. अवितथ १३.२८०. २८६ अविभाग प्रतिच्छेद ४-१५ ९-१६६, १० १४१, १२.६२, १४.४३१ अविभागप्रतिच्छेदान ६.३६६ अविरति ७-६ अविरदत्त १४.१२ अविवाग १४-२० अविसंवाद ४.१५८ अविहत १३.२८०, २८६ श्रवेदवकाल १०.१४३ अव्यक्तमनस १३.३३७ ३४२ अव्ययीभाव समास ३-७ अव्यवस्थापत्ति ६.१०६ प्रशन्दलिङ्गज १३.२४५ গী १४-२३८,२३६ अगुद्ध जुसुन्न ९-२४४ अशुद्धनय अशुद्धपर्यायार्थिक १३-१६६ अशुभ ८-१०१४-३२८ अशुभनाम १३-३६३, ३६५ अष्ट महामङ्गल ९-१०६ श्रष्टरूपधारा (धनधारा) ३-५७ अष्टस्थानिक अएम पृथिवी ४-३०.१६४ अष्टाका अष्टाङ्गमहानिमित्त ९.७२ अष्टाविंशतिसत्कर्मिक मिथ्याटि ४-३४६, ३५६, ३६२, ३६६, ३७०, ३७५, ३७७. ४३६, ४४३, ४६१ असत्यमन १-२८२ असत्यमोपमनोयोग १-२८१ असद्भावस्थापनबंध १४-५, ६ असद्भावस्थापना १-२० १३.१०, ४२ श्रसद्भावस्थापना काल ४.३१४ सद्भावस्थापनान्तर सद्भावस्थापनामाव ५.१८४ असनावस्थापनावेदना १०.७ सद्भूतप्ररूपणा १०-१३१ असचन १२.२७६ ग्रसपत्न १३.३४५ असातबंधक नातनमयपरदा १२-४८९ असातादण्डक ८.२४६, २७४ असाताद्धा सातावेदनीय १३.३५६, ३५७ अमाम्परायिक ५.९८८१४१३ प्रमुर असंक्षेपाक्षा ६-१६७, १७० अत्यात ३.१२१: १२.३०४, अवस्थित प्रक्षेप ६-२०० अवस्थित भागहार १०-६६; १२-१०२ अवस्थितवेदक अवस्थित संक्रम १६.३६८ अवस्थितोग्रतप श्रवसनासन्न अवसर्पिणी ३.९८४.३८९ ९-११६ अवहरणीय १०८४ अवहार ३.४६,४७, ४८ १०.४.१४.० ९.८७, ८८ अशुभनामकर्म अशुभ प्रकृति अधकरणद्धा अश्वकर्णकरण খানকি सयालगानी ९.३, श्रसंशनभागवृद्धि-२५१ (१७) परिशिष्ट असंख्यातवर्षायुष्क ७-५५७ अहोरात्र ६-६३ ८-११६, १०-२३७ आ असंख्यातासंख्यात ३-१२७ ग्राकार १३-२०७ असंख्येयगुण ३-२१,६८ अाकाश ४.८, ३१६ असंख्येयगुणवृद्धि ६२२,१६६ अाकाशगता १-११३,९-२१० असंख्येयगुणश्रेणी ७.१४ असंख्येयगुणहीन ३-२१ आकाशगामी ९-८०.८४ असंख्येयप्रदेशिक ३.२, ३८ ग्राकाशचारण ९-८०, ८४ असंख्येयभाग ३.६३, ६८ आकाश द्रव्य . ३-३, १३-४३; असंख्येयभागवृद्धि ६-२२,१६६ १५-३३ असंख्येयराशि ४-३३८ आकाशप्रदेश ४-१७६ असंख्येयवर्षायुष्क ११-८६,९० आकाशास्तिकायानुभाग असंख्येयाद्धा (असंक्षेपाद्धा '१३.३४३ १०-२२६, २३. आकाशास्तिद्रव्यं १०.४३३ असंग्रहिक १३-४ आक्षेपणी १-१७५; ९.२७२ असंज्ञिस्थिति ५-१७२ अागति १३-३३८, ३४२..३४६. असंज्ञी ७-७, १११, ८-३८७ पागम ३-१२, १२३, ६-१५१ असंप्राप्तस्पाटिकाशरीर- १३-७ संहनन ६-७४ श्रागमद्रव्यकाल ४-३१४ असंप्राप्तसूपाटिकासंहनन ८-१० आगमद्रव्यक्षेत्र ४-५ असंप्राप्तासपाटिकासंहनन बागमद्रव्यनारक ७-३० १३-३६६, ३७० : पागमद्रव्यप्रकृति १३-२०३: असंयत १-३७३, ७-६५, २०४ ८-३१२; १४-११ ग्रागमद्रव्यबंध: १४-२८ असंयतसम्यग्राष्टि १-१७१, अागमद्रव्यबंधक ७-४ ४-३५८, ६-४६४, ४६७; प्रागमद्रभाव '५.१८४; ८-४ १२-२ असंयम ४-४७७; ५-१८८७-८ प्रागमद्रव्यमंगल १-२१ १३,८-२, १६, ९-११७ आगनद्रव्यवर्गणा १४-५२ असंयमप्रत्यय ८-२५ ग्रागमद्रव्यवेदना १०-७ असंयमबहुलता ४-२८, पागमद्रव्य स्पर्शन ४-१४२ १४-३२६, ग्रागमद्रव्यानन्त ३.१२ अस्तिकाय ९-१६८ प्रागमद्रव्यान्तर ५.२ अस्तिनास्तिप्रवाद १-११५, अागमद्रव्याल्पबहुत्व ५-२४२ ९-२१३ श्रागमद्रव्यसंख्यात ३-१२३ अस्थिर ६-६३,८-१० श्रागमभावकाल अस्पृष्ट काल ११-७६ अहमिन्द्रत्व ६-४३६ यागमभावक्षेत्र ४.७, ग्रहोदिम ९.२७२ ११-२ ग्रागमभावजघन्य. ११.१२ बागमभाव नारक अागमभावप्रकृति १३-३६० आगमभावबंध ७-५, १४-७, ६ आगमभावभाव ५.१८४; १२.२ अागमभावलेश्या १६-४८५ प्रागमभाववर्गणा १४.५२ अागमभावस्पर्शन ४-१४४ ग्रागमभावान्तर प्रागमभावानन्त ३-१२३ आगमभावाल्पबहुत्त्व ५.२४२ अागमभावासंख्यात ३-१२५ प्रागाल ६-२३३, ३०८ याचारगृह १४-२२ प्राचाराङ्ग १-६६, ९-१६७ प्राचार्य १-४८, ४६८-७२,७३ अाज्ञा १३-७०,१४-२२६,३२६. अाज्ञाकनिष्ठता ४-२५,१४-३२६ श्राज्ञावान् १४-२२६ श्राज्ञाविचय १३-७१ ग्रातप ६-६० अातपनाम १३-३६२, ३६५ याताप यात्मप्रवाद १-११८, ९-२१६ ग्रात्मन् १३-२८०,२८२,३३६, ४४२ 1-..-5-६, २०० । यात्मा १-१४८ यात्माधीन ११३-८८ यादानपद १-७५, ९-१३५, १३६ आदि १०-१५०, १६०,४७५ यादि (धन) ३-६१,६३,६४; १०.६६० यादिकर्म १३-३४६, ३५० श्रादित्य ४-१५०, १३-११५ अादिवर्गणा ६-३६६:१६-५३२ श्रादिस्पर्द्धक १६-३७४, ५३८ • धवलासहितसमग्रपटखंडागमस्य पारिभाषिक शब्द सूची (१८) यावश्यक यावश्यक परिहीनता ८८६, . श्रादेश उत्कृष्ट ग्रावारक ६-६ श्रावास ४.७८; १४८६ ग्रावासक १५-२०३ श्रावृतकरण उपशामक६-३०३ श्रावृतकरण संक्रामक ६-३५८ श्रानियमान ६-८ ग्राशीविष ९८५, ८६ अाशंकासूत्र श्रासादन ५.२४ श्रासादना १०.४३ पारितक्य ७.७ ग्रासव ७३ याहार १-१५२, २६२, ७-७, ११२, १४-२२६, ३३६ अाहाराहारशरीरबंध१४-४३ याहारकार्मणशरीरबंध श्रादेशः ३.१,१० ४.१०, ६-१५, २१,१३-२०६, २१६ १४४, ३२२, ५-२, २४३; २४१, २४४ ५-६३, १४-२३७ ग्राभिनिवोधिकज्ञानी ७-८४ ११-१३ ८.२८६,१४-२० अादेश जघन्य ११-१२ ग्राभ्यन्तर तर ८८६ श्रादेशकाल जघन्य ११-१२ . ग्राभ्यन्तर निवृत्ति ग्राभ्यन्तर निवृत्ति १-१३२ अादेश निर्देश ४-१४५, ३२२ ग्रामर्षीषधि प्राप्त ९-६५ यादेश भव श्रामुण्डा १३.२४३ ११-५१२ ग्राम्लनाम १३.३७० श्रादेय ६-६५,८-११ ग्राम्लनामकर्म ६-७५ श्रादेयनाम १३-३६३, ३६६ यायत. यादोलकरण ४.११, १७२ .६-३६४ अायतचतुरस्र क्षेत्र ४-१३ -श्राधार ४-८; १४-५०२ ग्रायतचतुरस्रलोक संस्थान श्राधेय ४.१५७ श्रानतं १३-३१८ यायाम ३.१६६,२००,२४५, श्रानप्राणपर्याप्ति ७.३४ . अनापानपर्याप्ति ४-१३, १६५ १६१ १-२५५ ग्रायु'. ६.१२ श्रानुपूर्वी ६-५६८-६९-१३४; यायु ग्रावास १०-५१ १३-३७१ आयुबंधप्रायोग्यकाल १०-४२२ श्रानुपूर्वी नाम १३.३६३ आयुष्क १३-२६, २०६. ३६२ आनुपूर्वी नामकर्म ४.३० ग्रायुप्कघातक १६-२८८ श्रानुपूर्वीप्रायोग्य क्षेत्र ४-१६१ आयुष्कर्मप्रकृति.. १३-२०६ अनुपूर्वीविपाकाप्रायोग्य क्षेत्र श्रारण ४-१६५, १७०,१३६ ४.१७७ श्रारम्भ १३-४६ श्रानुपूर्वीसंत्रम ६-३०२,३०७; श्रआर्यनन्दी १६-५७७. ५७८ १६-४११ अार्यमंक्षु १२-२३२; १६-५१८ याप्त ३-११ ५७८ श्राबाधा ४-३२७, ६-१४६, बालापन बंध १४-३७, ३८, १४७, १४८; १०-१६४; ३६,४० १२:६२, २०२,२६७ यालोचना १३.६० श्राबाधा काण्डक६-१४८,१४६; ग्रावन्ती १३-३३५ ११-६२, २६६ श्रावर्जित करण i०-३२५, आवाधास्थान११-१६२, २७१ ३२८, १५-२५६, १६-५१६ नाभिनियोधिक १३-२०६, २१० श्रावलिका ३-६५, ६७४-४३ श्राभिनियोधिकज्ञान १-६३, श्रावलिप्रथक्त्व. २५६, ६.१६,४८४,४८६, श्रावली४.३१७ ६५०. ३६१; ४८८ •५.५ ६-२३३,३०८: श्राभिनियोधिकज्ञानावरणीय १३-२६८,३०४ आहारतजसकार्मणशरीरबंध १४.४४ याहारतजसशरीरबंध १४-४३ श्राहारद्रव्यवर्गणा १४-५:४६, ५४७,५४६,५५.१, ५५२ श्राहारपर्याप्ति १-२५४ आहारमिश्रकाययोग १-२६३, श्राहारवर्गमा आहारशरीर ६-६६१४४८, थाहारशरीरानोपान ६.४३ श्राहारशरीत्वंधन ६.३० श्राहारशरीरमंधान प्राहारसमुदयात श्राहारलंदा श्राहाल. १-२६४८.६, आहारक ऋदि (१९) परिशिष्ट ईशित्त्व ईषत्प्राग्भार ७.३५१ ईषत्प्राग्भार पृथिवी ४-१६२ ईहा.१-३५४६६.१७, ९-१४४, १४६; १३.२१७, २४२ ईहाजिन ९६२ ईहावरणीय १३-२१६, २३१ उत्तर १०-१५०, १६०, ४७५ उत्तर (धन) ३-६१,६३, ६४ उत्तरकुरु ४.३६५ उत्तरनिर्वत ना १६-४८६ उत्तरप्रकृति उत्तरप्रकृतिबंध द.२ उत्तरप्रकृतिविपरिणामना १५.२८३ उत्तरप्रतिपत्ति ३-६४,६६; उ उक्त अवग्रह ग्राहारककाययोग १-१६२ ग्राहारककाययोगी ८.२२६ ग्राहारककाल ५-१७४ याहारकमिश्रकाययोगी ८-२२६ ग्राहारकशरीर ४.४५ पाहारकशरीरद्विक ८-६ श्राहारकशरीरनाम १३-३६७ आहारकशरीरबन्धस्पर्श १३.३० श्राहारकशरीरबन्धननाम १३३६७ श्राहारकशरीरसंघातनाम १३.३८७ आहारकशरीराङ्गोपाङ्ग १३३६६ श्राहारकसमुद्घात ४-२८ ग्राहारतः अत्तिपुद्गल १६-५१५ इ इङ्गिनीमरण १-२४ इच्छा ( राशि) ३.१८७, १६०, १६१ इच्छाराशि ४.३७,७१, १६६, ३४१ इतरेतराश्रय ९.११५ इन्द्र ४-३१६ इन्द्रक ४.१७४, २३४ इन्द्रायुध १४३५ इन्द्रिय १-१३६, १३७, २३२, २६०, ७-६, ६१ इन्द्रियपर्याप्ति १-२५५ १४-५२७ इन्द्रियासंयम इघुगति १-२६६ उत्तर प्रत्यय -२० उत्तराध्ययन १.६७ उत्तराभिमुख केवली ४-५० उतरोत्तरतंत्रकर्ता ९-१३० उत्तान शैय्या ४-३७८: ५-४७ उत्पत्तिक्षेत्र ४-१७६ उत्पत्तिक्षेत्र समान क्षेत्रान्तर ४१७६ उत्पन्नज्ञानदी १३.३४६ उत्पन्नलय ६-४८४,४८६, ४८७, ४८८ उक्त १३२३६ ६२० उक्त प्रत्यय ९.१५४ १४.३५ उक्तावग्रह १-३५७ उग्रतप. ९-८७ उग्रोग्रतप ९८७ उच्चगोत्र ६७७; ८-११ उच्चारणा १०४५ उच्चारणाचार्य १०.४४ उच्चैोत्र १३-३८८, ३८६ उच्छेद उच्छ्रेणी ४८० उच्छ्वास' ३-६५, ६६, ६७ ६.६०.८-१० उच्छ्वासनाम १३-३६३, ३६४ 'उत्कीरणकाल ५.१०. १०.३२१ उत्कीरणद्धा १६-५२० उत्कीरणादा १० २६२ उत्कृष्ट दाह ११-३३६ ६-२२६ उत्कृष्ट पद १४-३६२ उत्कृष्टपद अल्पबहुत्त्व १०.३८५ उत्कृष्टपदमीमांसा १४-३६७ उत्कृष्ट स्थिति संक्लेश ११-६१ १०.३१ उत्कृष्ट सान्तर वक्रमणकाल १४-४७६ उत्कर्षण ६-२६८,१७१, ६-२१३, १०-५२ उत्कृष्ट निक्षेप उत्पाद ४-३३६, १५.१६. उत्पादपूर्व १-११४, ९-२१२ उत्पादस्थान ६-२८३ उत्पादानुच्छेद (परिशिष्ट भाग १)१२८ १२.४५७ उत्सर्गसूत्र १०.४० उत्सर्पिणी ३-१८४.३८६; ९-११६ उत्सेध ४.१३, २०, ५७, १८१ उत्सेधकृति ४.२२ उत्सेधकृतिगुणित ४.५१ उत्सेधगुणकार उत्सेधयोजन उत्सेधांगुल ४-२४,१६०,१८५ ८२१ उत्कृष्टपद स्वामित्व ई ईर्यापथकम ईर्यापथबंध ईशान १३.३८, ४७ ७५ ४-२३५, १३-३१६ उत्सेधांगुलप्रमाण धवलासहितसमग्रपट्खंडागमस्य पारिभापिक-शब्द-सूची उपरिम निक्षेप ६-२२६ उपरिम राशि ५-२४६, २६२ उपरिमवर्ग ३-२१, २२. ५२ उपरिम विकल्प ३-५४, ७७ ४-१८५ उपरिमविरलन ३-१६५, १७६ उपरिमस्थिति ६-२२५, २३२ उपलक्षण ९-१८४ उपवास १३-५५ उपशम १-२११, ५.२००, २०२, २०३; २११, २२०, ७-६,८१ उपशमश्रेणी ४.३५१, ४४७; ५-११, १५१, ६-२०६,३०५; उदय ६-२०१, २०२, २१३, ७८२, १५-२८८ उदय अनुयोगद्वार ९.२३४ उदयगोपुच्छ १५-२५३ उदयमार्गणा १६-५१६. उदयस्थान ७.३२ उदयस्थितिप्राप्त १०-११४ उदयादिअवस्थितगुणश्रेणी ६-२५६ उदयादिगुणश्रेणी ६-३१८, ३२०, १०-३१६; १३-८० उदयादिनिपेक ४३२७ उदयावलिप्रविशमान- अनुभाग ६.२५६ उदयावलि बाहिर ६-२३३ उदयावलिबाहिरअनुभाग ६-२५६ उदयावलिवाहिरसर्वह्रस्व- स्थिति ६-२५६ उदयावली ६-२२५, ३०८; १०-२८० उदीर्ण १२-३०३ उदीरणा ६-२०१, २०२,२१४ ३०२, ३०३, १५-४३ उदीरणाउदय १५.३०४ उदीरणामार्गणा १६-५१६ उद्योत ६-६०, ८-६ २०० उद्योतनाम १३-३६३, ३६५ उद्वर्तन •४-३८३ उहार्तितसमान ६-४४६,४५१, ४५२, ४८४,४८५ उद्वेध ४.१७ उद्वेलनकाएटक १६-४७८ उझेलनकाल ५-३४७.२३३ उद्वेलनभागहार १६-४४८ उद्वेलनसंझम १६-४१६ उदेलना उद्वेलनाकाण्डक ५-१०, १५ उद्वेल्यमानप्रकृति १६-२८३ उद्वेलिम ९-२७२, २७३ उपकरण १-२३६ उाक्रम १-७२, ९-१३४; १५-४१, ४२ उपक्रमअनुयोगद्वार ९-२३३ उपक्रमणकाल ४-७१, १२६ ५-२५०, २५१ २५५; १४-४७६ उपक्रमणकालगुगकार ४-८५ उपघात ६-५६, ८-१० उपघातनाम १३-३६३.३६४ उपचार ४.२०४, ३३६; ७.६७, ६८ उपदेश ५.३२ उपद्रावण १३-४६ उपधि १२-२८५ उपधिवाक १-११७ उपनय ९-१८२ उपाद ४-२६, १६६. २०५; ७-३००, १३-३४६,३४७ उपपादकाल उपपादक्षेत्र उपपादक्षेत्रप्रमाण ४.१६५ उपपादक्षेत्रायाम ४-७६ उपपादभवनसम्मुखवृत्तक्षेत्र ४-१७२ उपपादयोग ४.३३२, १०-४२० उपपादराशि ४-३१ उपयादरपर्शन ४.१६५ उपभोगतः यात्तपुद्गल १६-५१५ उपभोगान्तराय १५.१४ उपमालोक ४-१८५ उपयुक्त १३-३९० उपयोग १.२३६, २-४१३ उपरिमउपरिमन वेयक ९८० उपशमसम्यक्त्व ७.१०७ उपशमसम्यक्त्वगुण ४-४४ उपशमसम्यक्त्वगुणश्रेणि १५-२६७ उपशमसम्यक्त्वाद्धा ४-४४, ३३६, ३४१, ३४२, ३७४, ४८३,५-१५, २५४ उपशमसम्यग्दर्शन -३६५ उपशमसम्यग्दृष्टि १.१७१; ७.१०८;८-३७२, १०.३१५ उपशमक ८-२६५ उपशमिकन्यविपाकप्रत्ययजीव- भावबंध १४-१४ उपशमिकचारित्र १४.१५ उपशमिकसम्यक्त्व १४-१५ उपशान्त १२-३०३, १५-२७६ उपशान्तकपाय १-१८८,१८९% ७.५,१४,८-४ उपशान्तमयायवीतरागछ दस्थ TA ५.१६ उपशान्तकृपायादा उपशान्तकाल उपशान्तमोध उपशान्तदोष १४.१४ परिशिष्ट अवलोकप्रमाण ४-३२, ४१, ५१ ऊर्ध्ववृत्त ४-१७२ ऊहा १३-२४२ उपशान्तमान १४-१४ उपशान्तमाया १४-१४ उपशान्तराग १४-१४ उपशान्तलोभ १४-१४ उपशामक ४-३५२, ४४६, ५-१२५, २६०, ६-२३३, ७-५ उपशामकयध्यवसान १६-५७७ उपशामकाद्धा ५-१५६, १६० उपशामनवार १०-२६४ उपशामना १०-४६; १५-२७५ उपशामनाकरण १०-१४४ उपसंहार ८५७; १०-१११, २४४,३१० उपादानकारण ७-६६; ९-११५; १०-७ उपादेय ७.६६ उपादेयछेदना १४-४३६ उपाध्याय १-५० उपार्धपुलगपरिवर्तन ४-३३६, ७-१७१, २११. उपासकाध्ययन १-१०२; ९-२०० उभय १३-६० उभयसारी ९-६० उभयान्त ३.१६ उभयासंख्यात ३-१२५ उराल १४-३२२, ३२३ उलुश्वन १३-२०४ उश्वास ४-३६१ उष्णनाम १३-३७० उथ्णनामकर्म ६-७३ उष्णस्पर्श १३.२४ ऋजुक १३-३३० ऋजुगति ४.२६, २६, ८० ऋजुमति ४-२८; ९-६२ ऋजुमतिमनःपर्ययज्ञाना- वरणीय १३-३२८,३२६, ३४० ऋजुवलन ४-१८० ऋजुसूत्र :९-१७२, २४४; १३- ६, ३६, ४०, १६६ ऋजुसूत्रनय ७-२६ मृण १०.१५२ ऋतु ४-३१७, ३६५; १३- २६८, ३०० ऋद्धि १३-३४६, ३४८; १४-३२५ ए एक १३-२३६ एक-एकमूलप्रकृतिबंध ८-२ एकक्षेत्र १३-६. २६२, २६५ एकक्षेत्रस्पर्श १३-३, ६, १६ एकक्षेत्रावगाढ़ ४-३२७ एकत्वविचारयविचार १३-७६ एकत्ववितर्कयविचार- शुक्लध्यान ४-३६१ एक दण्ड ४-२२६ एकनारकावासविष्कम्भ ४-१८० एकप्रत्यय ९.१५१ एक्प्रादेशिकपुद्गल- द्रव्यवर्गणा १४-५४ एकप्रादेशिकवर्गणा १२१.१२२ एकबन्धन १४४६१ एकविध ९-१५२, २३:२३७ एकविध अवग्रह ६-२० एकविंशतिप्रकृतिउदयस्थान ७.३२ एकस्थान ११.३१३ एकस्थानदण्डक ८-२७४ एकस्थानिक ८-२४६ एकस्थानिका १५-१७४ १६-५३६ एकस्थिति १५-१०१ एकानन्त ३-१६ एकान्त असात १६-४६८ एकान्तभवप्रत्ययिक १५-१७३ एकान्तसात १६-४६८ एकान्तमिथ्यात्व ८-२० एकान्तानुवृद्धि ६-२७३, २७४ एकान्तानुवृद्धियोग १०-५४, ४२० एकावग्रह ६-१६ एकासंख्यात ३-१२५ एकेन्द्रिय १.२४८,२६४ ७-६२, ५-६ एकेन्द्रियजाति ६-६७ एकेन्द्रियजातिनाम १३-३६७ एकेन्द्रियलब्धि १४-२० एवंभूत १-६०; ७-२६ एवंभूतनय ९.१८० एषण १३.५५ ऐन्द्रध्वज ऐरावत ८.६२ ४.४५ ग्री ऊ योघ उत्कृष्ट अर्ध्वकपाट १३-३७६ ऊर्ध्वकपाटच्छेदनकनिष्पन्न ४-१७६ ऊर्ध्वलोक ४-६, २५६ ऊर्ध्वलोकक्षेत्रफल ४-१६ अोष ४-६, १४४, ३२२,५.१, २४३, १४.२३७ ११-१३ योधनवन्य १२-१२ ग्रोधनिर्देश ३-१,६४. १:८५,३२२ ग्रोवप्ररूपणा ४.२५४ योधभत्र २६-५.१२ धवलासहितसमग्रपटखंडागमस्य पारिभापिक-शब्द-सूची २२ ग्रौदारिकशरीरस्थान १४-४३२, ४३३ यौदारिकशरीराङ्गोपाङ्ग ८१०१३-३६६ ग्रौपचारिक नोकर्म द्रव्यक्षेत्र ४-७ ग्रौपशमिक . १-१६१,१७२; ७.३०; १३.२७६ ग्रौपशमिकभाव ५-१८५, २०४ अं अंक १३-११५ अंग ९-७२, १३-३३५ अंगमल १४-३६ अंगुल ४-५७; १३-३०४,३७१ अंगुलगणना ४-४० अंगुल-थकत्व १३-३०४ अंडर १४-८६ अंशांशिभाव ५-२०८ क योज (राशि) ३.२४६ योज १०-१६ ग्रोम १०-१६ योवेल्लिम ९-२७२,२७३ श्री श्रौत्पत्तिकी ९-८२ श्रौदयिक १-१६१,७-६, ३००, ९-४२८; १२-२७६ औदयिकभाव ५-१८५, १६४ औदारिक १४-३२३ औदारिकग्रौदारिक- शरीरबन्ध १४-४२ श्रौदारिककाययोग १-२८६, ३१६, ग्रौदारिककाययोगी ८-२०३ औदारिककार्मणशरीर- वन्ध १४-४२ यौदारिकतैजसकार्मण शरीरबंध १४-४३ श्रौदारिकतैजसशरीर बन्ध १४-४२ यौदारिकमिश्रकाययोग १-२६०, ३१६ यौदारिकमिश्रकाययोगी ८-२०५४ औदारिकशरीर ४-२४ ६-६६८-१०, १४-७८ श्रौदारिफशरीरअंगोपांग ६-७३ श्रौदारिकशरीरकायत्व १४.२४२ औदारिकशरीरनाम १३.३६७ औदारिकशरीरबन्धन ६-७० श्रौदारिकशरीरबन्धननाम १३.३६७ प्रौदारिफशरीरवन्धस्पर्श १३-३०, ३१ औदारिकशरीरसंघात ६-७० औदारिकशरीरसंघातनाम १३-३६७ कटक १४-४० कटुकनाम १३-३७० कटुकनामकर्म ६-७५ कणभक्ष १३.२८८ कणय १४-३५ कदलीधात ६-१७०, ७-१२४; १०-२२८, २३७, २४० कदलीधातक्रम १०.२५० कथन ४.१४४, ३२२ कन्दक १३.३४ कपाट ९-२३६; १०-३२१, १३-१४ कपाटगतकेवली ४-४६ कपाटपर्याय ५.६० कपाटसमुद्घात ४-२८, ४३६; करणिगच्छ १०-१५५ करणिगत १०-१५२ । करगिगतराशि १०-१५२ करणिशुद्धवर्गमूल १०-१५१ करणोपशामना १५-२७५ करुणा १३-३६१ कर्कशनाम १३-३७० कर्कशनामकर्म ६-७५ कर्कशस्पर्श १३-२४ कर्ण ४.१४ कर्णक्षेत्र कर्णाकार ४.७८ कर्ता १-११६, ९-१०७ कर्म ४-२३; १३-३७, ३२८; १४-४३३ कर्मअनन्तरविधान १३-३८ कर्मअनुयोगद्वार ९.२३२ कर्मयल्पबहुत्व १३-३८ कर्मउपक्रम १५-४१, ४२ कर्मउपशामना १५-२७५ कर्म-कर्मविधान १३-३८ कर्मकारक १३-२७६ कर्मकालविधान १३-३८ कर्मक्षेत्रउत्कृष्ट ११-१३ कर्मक्षेत्रजघन्य ११-१२ कर्मक्षेत्रविधान १३-३८ कर्मगतिविधान १३.३८ ९-८२ कर्मत्व ६.१२ कर्मद्रव्य कर्मद्रव्यक्षेत्र कर्मद्रव्यमाव १२-२ कमद्रव्यविधान १३-३८ कर्मधारय १०.२३६ कर्मधारयसमास कर्मनयविभापणता कर्मनामविधान कर्मनारक कर्मनिक्षेप कर्मजा प्रज्ञा कपिल ६-४०० १३-२८८ ४-३३५५.११ करणकृति फरगागाथा ४-२०३ \ २३ परिशिष्ट कलासवर्ण ७-४, ५ कर्मनिवन्धन १५.३ कर्मनिर्जरा ७.१४ कर्मपरिमाणविधान १३-३८ कर्मपुदगल ४-३३२, २२५ कर्मपुद्गलपरिवर्तन ४-३२२, ३२५ कर्मप्रकृति १३-२०४, २०५, ३६२ कर्मप्रक्रम १५-१५ कर्मप्रत्ययविधान १३-३८ कर्मप्रवाद १-१२१, ९-२२२ कर्मबन्ध ४-४७६; १४.४६ कर्मवन्धक कर्मभागाभागविधान १३-३८ कर्मभावविधान १३-३८ कर्मभूमि ४-१४,१६६; ६-२४५ कर्मभूमिप्रतिभाग ४-२१४; ११-८६ कर्ममोक्ष १६-३३७ कर्ममङ्गल १-२६ कर्मवर्गणा १४-५२ कर्मवेदना १०-७ कर्मसन्निकर्षविधान १३-२८ कर्मस्थिति ४-३६०, ४०२, ४०७; ७.१४५ कर्मस्थितिअनुयोग ९-२३६ कर्मस्थितिकाल ४-३२२ कर्मस्पर्श १३-३, ४,५ कर्मासव ४-४७७ कर्मसंक्रम १६-३३६. कर्मानुयोग १३-३७ कीट ७-६, १३.३३५ कर्बटविनाश १३-३३२, ३३५, ३४१ कल १३-३४६, ३४६ कल्प ४.३२०:१२-२०६ कल्यकाल ३.१३१,३५६ कल्पवासिदेव ४-२३८ कल्पवृक्ष ८-३२ कल्प्यव्यवहार १-९८९-१६० कल्प्याकल्य १-६८, ९-१६० कल्याणनामधेय १.१२१; ९-२२३ कलश १३-२६७ कलह १२-२८५ कला ६-६३ ९-२७६ कलिअोज १०२३, १४-१४७ कलियोजराशि ३.२४६ कलिङ्ग १३-३३५ कवल १३-५६ कपाय १-१४१, ४-३६१ ५-२२३, ६-४७, ७-७, ८;८-२, १६; १३-३५६. कषायउदयस्थान १६-५२७ कषायनाम १३-३७० ६-७५ कपायप्रत्यय ८-२१, २५ कषायवेदनीय १३.३५६,३६० कायसमुद्घात ४.२६, १६६; ७.२६६ कायोपशामना १०-२६४ काकजघन्य ११-८५ ११-१६ काण्डक ४.४३५ काण्डकघात ६-२३५ ४-७८, २१६ ४-२३५ काप.तलेश्या १-२८९७-१०४; ८.३२०, ३३२, १६-४८४ काययोग १-२७६, ३०८; ४.३६१; ७.७८; १०.४३८ कायस्थितिकाल ४२३२ कायोत्सर्ग ४-५० १३.८८ कारक कारण ३-४३, ७२, ७२४७ कार्मण १-२६५; १४.३२२,३२६ कार्मणकाय १-२६६ कामणकाययोग १.२६५ कार्मणकाययोगी ८-२३२ कामणकार्मणशरीरबन्ध १४-४४१ कामणवर्गणा ४.३३२ काम णशरीर ४-२४, १६५ ६-६६, ८-१०, ९.३५ १३-३०; १४.७८, ३२८, ३२६ कामणशरीरबन्धस्पर्श १३.३० कामणशरीरबन्धन ६-७० कामणशरीरबन्धननाम १३-३६७ कामणशरीरसंघात ६-७० कामणशरीरसंघातनाम १३.३६७ काल ४.३१८, ३२१:१३-६१, ३०८, ३०६, १४.३६ कालउपक्रम १५.४१ कालंगतसमान कालगतउत्कृष्ट ११.१३ कालद्रव्य ३-३, १०.४३६; १३-४३, १५.३३ कालद्रव्यानुभाग १३.३४६ कालनियन्धन १५.२ कालपरिवर्तन ४-३८५ कालपरिवर्तनकाल कालपरिवर्तनवार कालमावप्रमाण कषायनामकर्म - काकलेल्या काएडजुगति कापि ४८८, ६४१ कामरूपित्य काय १.१३८, ३०८ ७.६ कायक्लेश १३-५८ १३:४४ कायवली ९-६६ कायप्रयोग कालप्रकम धवलासहितसमग्रपटखंडागमस्य पारिभापिक-शब्द-सूची केवलज्ञान कृष्णादिमिध्यात्यकाल ४-३२४ केवल ८.९६४ केवलकाल १-६५, १६१, ३५६, ३६०,३८५ ४.३६१:६.२६,३, ४८६. ४६२ १०.३१६ १३.२१२, २४५. १४.१७ केवलज्ञानावरणीय १३:२०६, कालमङ्गल १-२६ कुलविद्या ९-७७ कालयवम १०-६८:१२-२१२ । कुलशेल ४.१६३, २१८ कालयुति १३.३४९ कूट १३.२, ३४; १४-४६, काललब्धि ६-२५०,९१२१ कूटस्थानादि ७.७३ कालवर्गणा १४-५२ कृत १३.३४६ ३५० कालस्पर्शन ४.१४१ कृतकृत्य ६.२४७, २६२ कालसंप्रयुक्त १३-३३२ कालसंक्रम १६-३३६, ३४० कृतकृत्यकाल ६-२६३, २६४ कालसंयोग कृतकरणीय ५-१४ १५,१६, कालसंसार ६६, १०५, १३६, २३३, कालागु ४-३१५१३.११ ७.१८१; १०.३१५, १५- कालानुगम ४-३१३, ३२२, २५३ १३-१०७ कृतक णीयवेदकसम्यग्दृष्टि कालानुयोग १-१५८ ६-४३८, ४४१ कालोदकसमुद्र ४-१५०, कृतयुग्म ४-१८४, ७.२५६; १६४, १६५ १०-२२; १४-१४७ काशी १३-३३५ कृतयुग्मराशि ३-२४३ काष्ठकर्म ९-२४६; १३-६. कृति ४-२३२,८-२, ४१, २०२ ९-१३४, २३२, २३७, काष्ठपोतलेप्यकर्मादि २७४, ३२६ ३५६ काष्ठा ४-३१७, ६-७५३ कृतिक १-६७, ९-६१, किंनर १३-३६१ :६, १८९ किंपुरुष १३३६१ ९.पू कृतिकमसूत्र कीर १३-२२३ कृतिवेदनादिक ७.१ कील कशरीरसंहनन ६-७४ कृष्टि ६-३१३, १०-३२४, कीलितसंहनन ८-१०, १३- ३२५; १३८५ ३६६,३७० १६-५२१, ५७६ कुट्टिकार कृष्टि अन्तर ९-२७६ डव १३-५६ कृष्टिकरण्डा ६-३७४, २८२ कुड १४-४० कृष्टिवेदकाद्धा ६-३७४, ३८४ कुण्डलपर्वत ४.१६३ कृष्टीकरण ४-३६१ कुब्जकशरीरसंस्थान कृष्ण ६-२४७ ६-७१ कृष्णनीलकापोततंजपद्म- कुञ्जकशरीरसंस्थाननाम शुक्सलेश्या १४-११ १३.३६८ कृष्णलेश्या १-३८८७.१०४ कुमाणा १३.२२२ ८-३२०१६-४८४, केवलज्ञानी ७-८८८-२६६: ९-११८ केववदर्शन १-३-१,४-३६१ ६-३३, ३४: १०.३१६ १३-३५५; १४-१७ केवल दर्शनी ७-६८, १०३ ८-३१६,९-११८ केवललब्धि केवलिसमुद्घात ४-२८,६-४१२; ७.३०० केवली ६-२४६:७.५ केशव ६.८८६,४६२, ४६५, ४६६ कोटाकोटी ३-२५५.४-१५.२ कोटि १३.३१५. कोटी १.१४ कोष्ठबुद्धि काष्ठा कमवृद्धि १०.४५२ क्रमहानि १०.४५६ किया १-१८:१३ क्रियाकम १३-८,८८ क्रियावादहर हियाविशाल १-१६, २.६ ४८८, ४६० कुराक १३-२७० भोपाल मापवावाला दोधमानमायामननाय १४ १३-२२२ १३-६३ पागणवर्णनाम कृष्णवर्णनामकम २५ परिशिष्ट ७-३०, क्षायिकसम्यक्त्वाद्धा ५-२५४ क्षायिकसम्यग्दृष्टि १-१७१; ४-३५७, ६-४३२, ४४१ क्षायिकसंज्ञा ५-२०० क्षायोपशमिक १-१६१, १७२; ५-२००, २११, २२०; ६१ क्षायोपशमिकभाव ५-१८५, ११८ क्षिप्र ९-१५२ क्षिप्रप्रत्यय १३-२३७ क्षीणक्रोध १४-१६ क्षीणदोष १४-१६ क्षीणमाया १४-१६ क्षीणमोह १४-१६ क्षीणराग १४.१६ क्षीणलोभ १४-१६ क्षेत्र १४-३६ क्षेत्रवर्गणा १४-५२ गणनकृति ९-२७४ गणनानन्त ४-१५, १८ गणनासंख्यात ३-१२४,१२६ गणित ४-३५, २०६ गणी १४.२२ गति ६-५०, ७-६; १३-३३८, ३४२, ३४६ गति ग्रागति गतिनाम १३-३६३, ३६७ गतिनिवृत्ति ९.२७६ गतिमार्गणता १३-२८०, २८२ गतिसंयुक्त गन्ध ६-५५, ८-१० गन्धनाम १३.३६३ ३६४,३७० गन्धर्व १३-३६१ गरुड १३-३६१ गौपक्रान्त ४-१६३ गर्भोपक्रान्तिक ६-४२८,७५५५, ५५६ क्रोधसंज्वलन १३.३६० क्रोधाद्धा ४-३६१ क्रोधोपशामनाद्धा ५-१६० क्षण ४-३१७; १३-२६५,२६६ क्षणलवप्रतिबोधनता ८-७६ ८५ क्षणिकैकान्त ९-२४७ क्षपक ४-३५४, ४४७,५-१०५, १२४, २६०, ७-५, ८-२६५; ९-१० क्षपकश्रेणी ४-३३५, ४४७, ५-१२, १०६; १०-२६५ १२-३० क्षपकश्रेणीप्रायोग्यविशुद्धि ४-३४७ क्षपकदश ५-१५६, १६० क्षपण १-२१६ क्षपित ९-१५ क्षपितकर्माशिक ६-२५७; ९-३४२, ३४५; १०-२२, २१६, १२-११६,३८४ ४२६ क्षपितघोलमान १०-३५, २१६ १२-४२६ क्षय ५.१६८, २०२, २११, २२०; ७.६; ९-८७ ६२ क्षयोपशम ७-६२ क्षयोपशमलब्धि ६-२०४ क्षायिक १-१६१, १७२; ७-३०, ९-४२८. क्षायिकचारित्र १४-१६ क्षायिकारिभोगलब्धि १४-१६ नायिकभोगलब्धि १४-१७ क्षायिकलब्धि ७-६० क्षायिकलाभलब्धि १४-१७ क्षायिकविपाकप्रत्ययिक- जीवभावबंध १४-१५, १६ क्षायिकसम्यक्त्व १-३६५ ७.२०७; १४.१६ खगचर ११-६०, ११५, १३-३६० खण्ड ७-२४७ खण्डित ३-३६, ४१ खातफल ४-१२, १८१,१८६ खेट ७-६; १३-३३५ खेटविनाश १३-३३२, ३३५, खेलौषधि ९-६६ गलस्थ १३.१६ गलितशेषगुणश्रेणी ६-२४६, २५३, ४५, १०-२८१ गवेपणा १३-२४२ गव्यूति गव्यूतिप्रथक्त्व १३-३०६, ३३८ गान्धार १३.३३५ गारव •९-४१ गिल्ली १४.३८ गुण १-१७४९४-२००,९-१३७; १५-१७४ गुणकाल ५८९ गुणकार .४.७६,५-२४७, २५७, २६२. २७४ गुणकारशलाका ४.१६६ गुणकारशलाकासंकलना ४.२०१ বিনা १४.३२१ गुणघरमट्टारक १२.२३२ गुमनाम ग गगन ४.८ गच्छराशि गच्छ४-१५३; २०१:१०-५०; १३-६३ ४.१५४ गच्छसमीकरण ४-१५३ गड्डी १४-३८ गरण १३-६३ गाधर ९-३, ५८ म धवलासहितसगमपखंडागमस्य पारिभापिक-शब्द-सूची २६ अहणप्रायोग्य ग्राम ७.६: १३.३६६ अवेयक ४.२६६: १३.६१८ १३-६३, २२१ ग्लान घ घट १३-२०४ घटोत्पादानुभाग २३.२४६. घन १३-२२१ घनपल्य ३-८०,८१ घनकल ४-२० घनरमु ४.१४६ घनलोक. १.१८, १८४ २५६ घनलोकप्रमाण घनहस्त १३.३०६ घनामुल ३.१३२, १३६% ४-१०,४३, ४४,४५,१७८ गुणपरावृत्ति ४.४०६ ४७०, गृहकर्म ९-१५० २.९, ४७१ १०, ४१, २०२, १४६ गुणप्रतिपन्न १५-१७४ गृहटली ९-१०७, १०८ गुणप्रत्यय १३.२६०, २६२ गृहीत ३:५४,५७ गुणप्रत्यययवधि ६-२६ गृहीत अगृहीत १३-५१ गुणप्रत्यासत्तिकृत १४-१७ गृहीतकरण १०-४४१ गुणयोग १०-४३३ गृहीतगुणाकार ३-५४, ६१ गुणश्रेणि ६२२०, २२४,२२७; गृहीतगृहणारा ४.३२८ १२-८०; १५-२६६ गृहीतगृहणाद्धाशलाका ४-३२६ गुणश्रेणिनिक्षेप ६-२२८. २३२ गृहीतगृहीत ३-५४,५६ गुणश्रेणिनिक्षेपाग्राम ६.२३२ १०.२२२ गुणश्रेणिनिर्जरा १०.२६६; गृहीतगृहीताणत ७.४६८ १५.२६६ गोत्र ६-१३, १३-२६, २०६ गुणश्रेणिशीर्ष ६-२३२; गोत्रक १३.३८८ १५-२६८, ३३३ गोत्रक प्रकृति १३.२०६ गुणश्रेणिशीर्षक १०-२८१ ३२० गोधूम १३-२०५ गुणसंक्रम ६-२२२,२३६,२४६; गोपुच्छद्रव्य ६.२६० १०-२८०. १६-४०६ गोपुच्छविशेष गुणस्थानपरिपाटी १०-१२२ गुणस्थितिकाल ४.३२२ गोपुच्छा १०.१०६ गुणहानि ६-१५१,१६३, १६५ गोपुर १४.३६ गुणहानियध्वान १०.७६ गोमूत्रिकगति ४.२६ गुणाद्धा ५.१५.१ गोमत्रकागति गुणान्तरसंक्रमण गोम्हिक्षेत्र गुणान्तरसंक्रान्ति ५-८६,१५४ गोवरपीट १४-४० १७१ गोड १३.१२२ गुणित. ९-१५ गौणभाव ४-१४५. गुणितकमांशिक ६-२५६,२५८. | गौण्य १०.२१, २१५, १२-११६, गोण्यपद १-७४:२.१३८ ३८२, ४२६: १५-२६७ गौतम गुणितक्षपितघोल रान ६-२५७ गौतम स्थविर गुणितयोलमान १०-३५,२१५ १२-४२६ प्रत्यकर्ता गुगोपशामना १५-२७५ अन्यकृति गुरुकनामक ६-७५ गुरुनाम १३-३७० गुरुपर्श १३.२४ गुणाकाचरित गृह १४-१६ ग्रहणत: नानपुदगल १६-११५ घनागुलगुणकार घनामुलप्रमाण ४-२३ घनाजुलभागहार ४-१८ घनारनधारा घातमाहरण १-२६२, ७-१२६, १३६, १४.३६६ घातन्तद्रमहामानकाल ७.१८३ घातपरिणाम १२-२२०,२२५ बातम्यान १२-१३०, २२१, घातायुष्य íទ្ធ पातिनमा १५.१७१:२६-३७ घरमान पोरगुणा ឃុំ घोलनानगर ।

परिशिष्ट घोषसम ९-२६१, २६६ १३-२०३:१४-६ प्राणनिति १-२३५ घ्राणेन्द्रिय ४-३६१७-६५ घ्राणेन्द्रिय अर्थावग्रह १३-२२८ प्राणेन्द्रिय अवाय १३-२३२ घ्राणेन्द्रिय ईहा १३-२३२ प्राणेन्द्रिय व्यञ्जनावग्रह १३-२२५ चतुरमलचुद्धि ९.५८ चतुरिन्द्रिय १-२४४, २४८; ७.६५, ८-६ चतुरिन्द्रियजाति ६-६८ चतुरिन्द्रियजातिनाम १३-३६७ चतुरिन्द्रियलब्धि १४-२० चतुर्गति निगोद १४.२३६ चतुर्थपृथिवी ४-८६ चतुर्थस्थान चतुर्थस्थान अनुभागबन्ध . चित्रकर्म ९.२४६; १३-६, ४१, २०२, १४-५ चित्रा ४-२१७ चिन्ता १३-२४४, ३३२, ३३३, ३४१ चिरन्तन अनुभाग १२.३६ चुन्द १४-३८ चूर्ण ९-२७३ चूर्णाचूर्णि १२-१६२ चूर्णि १२.१६२ चूर्णिसूत्र ८-६; १२-२३२ चूलिका ७-५७५, ९-२०६; १०-३६५, ११-१४० १४-४६६ चैतन्य १-१४५ चैत्यवृक्ष ९-११० . चक्रवर्तित्व ६-४८२, ४६२, ४६५, ४६६ चतुदर्शन ६-३३; ७-१०१; १५-१० चक्षुदर्शनस्थिति ५-१३७, १३६ चक्षुदर्शनावरणीय ६-३१, ३३ चक्षुदर्शनी ७-६८; ८-३१८ चक्षुरिन्द्रिय १-२६४; ४-३६१; ७.६५ चक्षुरिन्द्रिय अविग्रह १३.२२७ चतुदर्श १-३७६,३८२; १३३५५ चक्षुदर्शनावरणीय १३-३५४ ३५५ १४-२३८ चतु:शिरस् १३-८६ चतुःपष्ठिपदिकदण्डक १२-४४ चतुःसामयिकअनुभागस्थान १२-२०२ चतुःसामयिकयोगस्थान १०-४६४ चतु स्थानबन्धक १५-१७४ चतुःस्थानिकयनुभागबन्धक ६-२१० चतुःस्थानिकयनुभागवेदक ६-२१३ चतुःस्थानिकअनुभागसत्कार्मिक ६-२०६ चतु:शरीर चतुर्थसमुद्रक्षेत्र ४-१६८ चतुर्दशगुणस्थाननिवद्ध ४-१४८ चतुर्थपूर्वधर १५-२४४ चतुर्दशपूर्वी ९-७०; १६.५४१ चतुर्विंशतिस्तव १-६६, ९-१८८ चतुष्पद १३-३६१ चन्द्र. ४-१५०,३१६ चन्द्रप्रज्ञप्ति १-१०६, ९-२०६ चन्द्रबिम्बशलाका ४-१५६ चयन १३-३४६, ३४७ चयनलब्धि १-१२४, ९-२२७; • १३-२७० च्यावित १-२२ च्यावितदेह ९-२६६ च्युत १.२२ च्युतदेह ९-२६६ । चरमफालि ६-२६१ चरमवर्गणा ६-२०१ चारण चारित्र ६-४०, १५-१२ चारित्रमोहक्षपण चारित्रमोहनीय ६-६७, ४० १३-३५७, ३६ चारित्रमोहोपशामक ७.१४ चारित्रविनय ८-८०, ८१ चार्वाक १३-२८८ चालनासून १०६ छमस्थ १-१८८, १६०, ७-५ छद्मस्थकाल ९-१२० छद्मस्थवीतराग १३-४७ छवि १४.४०१ छह द्रव्य प्रक्षित राशि ३-१६, २६, १२६ छिन्न ९-७२, ७३, १२-१६२ छिन्नस्वप्न ९-७४ छिन्नाछिन्न १२.१६२ छिन्नायुष्ककाल ४-१६३ छेद १३-६१, १४-४०१ छेदगुणकार ११-१२८ छेदना १४-४३५,४३६ छेदभागहार १०.६६, ७२, २१४, ११-१२५,१२-१०२, छेदराशि १०.१५१ छेदोपस्थापक छेदोपस्थापनशुद्धि संयम १-३७० चतु स्थानिक जगप्रतर ३.१३२,१४२ ४-१८,५२,१५.०,१५१,१५५., १६६, १८०,२८४, १९६, २०२, २०६, २६३ धवलासहितसमग्रपटखंडागमस्य पारिभापिक-शब्द-सूची २८ . जगश्रेणी ३-१३५, १४२,१७७; ४१०, १८, २८४,७.३७२ जघन्य १३-३०१, ३३८; जघन्यअनन्तानन्त ३.११ जघन्यउत्कृष्टपद १४.३६२ जघन्यकृष्टिअन्तर ६-३७६ जघन्यद्रव्यवेदना १२-१८ जघन्यपद १४-३६२ जघन्यपदअल्पबहुत्व १०-१८५ जघन्यपदमीमांसा १४-३६७ जधन्यपदस्वामित्व जघन्यपरीतानन्त ३२१ जघन्यपरीतासंख्य १०-८५ जघन्य बन्ध ११-३३६ जघन्य योगस्थान १०-४६३ जघन्य वर्गणा ६-१०१ जघन्य स्थान १२-९८ जघन्य स्थिति ६-१८०११-३५० जघन्य स्थितिबंध ११-३३६ जघन्य स्पर्धक ६-२१३ जघन्यावगाहना ४.२२, ३३ जघन्यावधि १३-३२५, ३२७ जघन्यावधिक्षेत्र १३-३०३ जनपद १३-३३५ जनपदविनारा १३-३३५, जलचारण ९-७६ जल्लौषधिप्राप्त ९-६६ जहत्स्वार्थवृत्ति ९-१६० जाति १-१७; ३-२५० ४-१६३, ६-५१ जातिनाम १३-३६३, ३६७ जातिविद्या ९-७७ जातिस्मरण ३-१५७, ६-४३३ जित ९-२६२, २६८ १३-२०३, १४८ जिन ६-२४६, ९-२, १० जिनपूजा १०-१८६ जिनवृषभ १३-३७ जिहन्द्रिय ४-३६१, ७.६४ जिह्वन्द्रिय अर्थावग्रह १३-२२८ जिहन्द्रिय ईहा १३-२३१ जिहन्द्रिय व्यखनावग्रह १३-२२५ ज्योतिष्क १३-३१४ ज्योतिष्क जीवराशि ४-१५५ ज्योतिष्कसासादनसम्य- दृष्टिस्वस्थानक्षेत्र ४-२५० ज्योतिष्कस्वस्थानक्षेत्र ४-१६० ज्योतिषी ८-१४६ जीव १-११६, १३-८, ४० जीवगुणहानि १०.१०६ जीवगुणहानिस्थानान्तर १०-९८; १५-३२८ जीवत्व १४-१३ जीवद्रव्य ३-२; १३-४३; जीवयुति १३-३४८ नीवविपाकित्व जीवविपाकी ५-२२२, ६.११४; १२-४६:१५.१३ जीवस्थान १-७६ ७.२,३:८-५. १३-२६६ जीवसमास १.१३९:४-३१: ६-२८-४ जीवसमुदाहार १०-२२१, २२३ जीवानुभाग १३.६४६ जीवित १३३३२, ३३३, ३४१ जुग १९-३८ जुगुप्सा ६-४८; ८.१०ः १३-३६१ जैमिनी १३-२८८ जंघाचरगा ६-७० ज्ञातृघर्मकथा ९-२०० ज्ञान १-३५३, ३६३, ३८४; ५.७, ६,८४, १४२, १८६; १३-९६; १४-३८ ज्ञानकार्य ५.२२४ ज्ञानप्रवाह २-२४२, १४३. १४६, १४७, ३६४,९.२१६ ज्ञानविनय ज्ञानावरण ज्ञानावरणीय ६:६,६:८-१७ १३-२६, २५६, २५७ ज्ञानावरणीयकर्मप्रकृति १३.४६५. ज्ञानावरणीयवेदना १०-१४ ज्ञानोपयोग जायकशरीर १-११०७ जनपदसत्य १.११८ जन्तु १-१२० जम्बूद्वीप ३-१४.१५० १३-३०७ जम्बूद्वीपक्षेत्र ४-१६४ जम्बूद्वीपच्छेदनक ४.१५५ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति ९.२०६ जम्बूद्वीपशलाका ४-१६६ नयन्त ४-३८६ नया ४.३१६ जलगता जलचर ११-६०, ११५: १३.३६१ मल्लरी संस्थान ४.५१, २१ जीवनिबद्ध १५-७, १४ जीवपुद्गलबन्ध १३-३४७ जीवपुद्गलमोन १३.३४८ जीवपुद्गलयति १३.३४८ जीवप्रदेशसंज्ञा १३.४३६ जीवभाव १४-१३ जीवमावबन्ध १४.६ जीवमोन ३.३४८ जीवयवमध्य १०.६०:१२-२१२ १४.४ दहरकाल ५४२,४४,४७,५६ २६ परिशिष्ट त तटच्छेद १४-४३६ तत् १३-२२१ तत्पुरुषसमास ३-७; १०-१४ तत्त्व १३-२८०, २८५ तत्त्वार्थसूत्र १३-१८७ तद्भवस्थ १४.३३२ तद्भावसामान्य ४-३, १०.१०, . ४८८, ४६१ तर्क १३.३४६, ३४६ तीर्थ करनामकर्म ६-६७ तर्पण १३-२०५ तीर्थकरनामगोत्रकर्म ८-७६, तलवाहल्य ४-१३ तवली १०-२०, ४४, २४२, तीर्थंकरसन्तकर्मिक ८-३३२ २७४ तीवकषाय १०-४३ तारा ४-१५१ तीव्रमन्दभाव ५-१८७ तार्किक ६-४६०,४६१ तृतीय पृथिवी तालप्रमाण ४-४० तृतीय पृथिवी अधस्तनतल तालप्रलम्बसूत्र ६.२३० -४.२२५ तालवृक्षसंस्थान ४-११, २१ तृतीय स्थान ११-३१३ तिक्तनाम १३-३७० तृतीय संग्रहकृष्टिअन्तर ६-३७७ तिक्तनामकर्म ६-७५ तृतीयाक्ष ७.४५ तिथि ४-३१६ तेज ८-२०० तिर्यक् १३-२६२, ३२७, ३६१ तेजकायिक ८.१६२ तिर्यकक्षेत्र तेजसकायिक ७-७१ तिर्यक्लोक ४-३७, १६६,१८३ तेजोलेश्या १-३८६; १६-४८४, तिर्यक्लोकप्रमाण ४-४१. १५० तिर्यग्गति १-२०२८-६ तेजोज १०.२३, १४-१४७ तिर्यग्गतिनाम १३-३६७ तेजोज़मनुष्यराशि ७-२३६ तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी ४-१७६; | तेजोजराशि ३२४६ ६-७६; १३-३७१, ३७५ तैजस १४-३२७ तिर्यप्रतर ४.२११, १३.३७१, तैजसकाय १-२७३ ३७३ तैजसकार्मणशरीरबन्ध १४.४४ तिर्यग्योनि १३-३२५ तैजसद्रव्यवर्गणा १४-६०, ५४६ तिर्यग्स्वस्थानस्वस्थानक्षेत्र तैजसशरीर ४.२४,६६६ ४-१६४, २०४ ७.३००८-१०१३-३१० तिर्यगायु १४-३२८ ६-४६८-६ तेजसशरीरनाम १३.३६७ तिर्यगायुष्क १३.३६२ तिर्यञ्च तेजसशरीरबन्धस्पर्श १३-३० ४-२२०;८१६२; तैजसशरीर बन्धन ६.७० १४-२३६ तैजसशरीरबन्धननाम १३-३६७ तिर्यञ्चभाव १४-११ तेजसशरीरलम्ब १३-३२५ तीर्थ ८-६२, ९-१०६, ११६ तीर्थकरत्व ६-४८६,४६२,४६५, तैजसशरीरसमुद्घात ४.२७ ४६६ तेजसशरीरसंघात ६-७० तीर्थकर १-५८५.१६४, ३२३; तेजसशरीरसंघातनाम १३.३६७ ६-२४६,७-५५:८-११, तोरण ४.१६५, १४-३६ त्यक्त १.२६ ७२,७३, ९-५७, ५८; १०.४३ त्यक्तदेह तीर्थकरनाम १३-३६३, ३६६ त्वकस्पर्श १३.३.१६ तदुभयप्रत्ययित अजीवभावबन्ध १४-२३, २६, २७ तदुभयप्रत्ययित जीवभावबन्ध १४-१०, १८, १६ तदुभयवक्तव्यता १-८२ तद्वयतिरिक्त ७-४ तद्वयतिरिक्त अल्पबहुत्व ५-२४२ तद्वयतिरिक्तकर्मानन्त ३-१६ तद्वयतिरिक्तकर्मासंख्यात३-१२४ तद्व्यतिरिक्तद्रव्यलेश्या १६.४८४ तद्वयतिरिक्तद्रव्यवर्गणा १४-५२ तद्वयतिरिक्तद्रव्यानन्त ३-१५ तयतिरिक्तद्रव्यासंख्यात ३-१२४ तद्वयतिरिक्तनोभागमद्रव्य ४-३१५ तद्वयतिरिक्तनोग्रागमद्रव्यभाव ५-१८४ तयतिरिक्तनोबागमद्रव्य- स्पर्शन ४-१४२ तद्वयतिरिक्तनोकर्मानन्त ३-१५ तयतिरिक्तनोकर्मासंख्यात ३-१२४ तद्वयतिरिक्तस्थान ६-२८३ तन्तुचारण ९-७६ तपोविद्या ९-७७ तपःकर्म १३-३८, ५४. तपस् १३-५४, ६१ तप्ततप ९-६१ .

धवलासहितसमग्रपटखंडागमस्य पारिभाषिक शब्द सूची त्वगिन्द्रिय १३-२४ वस ६-६१८-११ वसकाय १-२७४ वसकायिक ७-५०२ सनाम १३.३६३ ३६५ असपर्याप्तस्थिति ५-८४, ८५ वसस्थिति ५-६५,८१ त्रिकच्छेद ३-७८ त्रिकरण ६-२०४ त्रि:कृत्वा १३-८६ त्रिकोटिपरिणाम ९.१६२, २२८ २४७; १०.४३५ त्रिकोण क्षेत्र ४-१३ त्रिखएड धरणीश १-५८ त्रिरत्न ९.११ त्रिशरीर १४-२३८ त्रिंशत्क ६-१८६; १०-१२१, १६-५३७ त्रिसमयाधिकावली ४.३३२ त्रिस्थानबन्धक ११-३१३ त्रिस्थानिक १५-१७४ त्रीन्द्रिय १-२४२, २४८, २६४; ७.६५, ५-६ जीन्द्रियजाति ६-६८ जीन्द्रियलब्धि १४-२० त्रुटित १२-१६२ शुटिताच टित १२-१६२ राशिक ३-६५,६६; १०-६३, १२० राशिकक्रम अंश ४-१७८ दण्डसमुद्घात ४-२८, ६-४१२ दन्तकर्म ९-२५०; १३६, १०, ४१, २०२, १४-६ दर्शन १-१४५, १४६, १४७, १४८, १४६, ३८३, ३८४, ३८५, ६-६, ३२, ३३, ३८; ७.७, १००, १३-२०७. २१६,६५८; १५-५,६ दर्शनमोहक्षपण ७.१४ दर्शनमोहक्षपणानिष्ठापक ६-२४५ दर्शनमोहक्षपणाप्रस्थापक ६-२४५ दर्शनमोहनीय ४-३३५,६-३७, ३८; १०-२६४,१३-३५७, ३५८ दर्शनविनय दर्शनविशुद्धता ८-७९ दर्शनावरण ९.१०८ दर्शनावरणकर्म प्रकृति १३.२०६ दर्शनावरणीय ६-१०,८-१० १३-२६, २०८, ३५३ दर्शनोपयोग ‘दलित १२-१६२ दलितदलित १२.५६२ दशपूर्वी ९.६६ दशवैकालिक १-६७; ९-१६० दान १३-३८६ ८-८० दिवसपृथक्त्व ५.६८, १०३, ६-४२६ दिवसान्त १३.३०६ दिव्यध्वनि ५-१६४, ९-१२० दिशा ४-२२६ दिशादाह दीप्सतप ९-६० दीप्तशिखा १०-२६५:१२-४२८ दीर्घ १३:२४८ दीर्घहस्वअनुयोगद्वार ९-२३५. दीर्घान्तर ५-११७ दुरभिगन्ध ६-७५ दुरभिगन्धनाम १३-३७० दुर्नय दुर्भग ६-६५८-६ दुर्भगनाम १३-३६३, ३६६ दुर्भिक्ष १३-३३२,३३६ ३४१ दुर्वृष्टि १३-३३२,३३६,३४१ दुस्वर ६.६५,८-१० दुस्वरनाम १३-३६३, ३६६ दुःख ६-३५, १३-३३२, ३३४ ३४१, १५.६ दुःषमकाल ९-१२६ दुःपमतुषम ९-११६ दूरापकृष्टि ३.२५.१, २५.५. दृश्यमान द्रव्य दृष्टमार्ग ५.२२.३८ दृष्टान्त ४.२२ दृष्टिअमृत दृष्टिप्रवाद दृष्टिवाद १-१०६ दृष्टिविष ९-८६,६४ देय देव १-२०३; १३.२६१,२६२ देवकुरु देवगति १-२०३: ६-६ देवगतिनाम देवक्षेत्र दानान्तराय ६-७८; १३-३८६ १५-१४ दान्ति ४.२१ दासमान १६-३७४, ५३६ दारुसमानयनुभाग १२-११७ दारुकरमान "दक्षिण प्रतिपत्ति ३-६४,६८ दण्ड ४.३०९.२३६: १०-३२०:१३-८४ दण्डक्षेत्र ४.४८ दएटगत दएटगतफेवली ४.४८ दाहस्थिति दिवस ३-६७४-३१७, ३६५ १३-२६८,६०० ३१ परिशिष्ट - देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी ६-७६; १३-३७१ ३८२ देवता ४३१६ देवपथ ४.८ देवभाव १४-११ देवर्द्धिदर्शन ६.४३४ देवर्द्धिदर्शननिबन्धन ६-४३३ देवलोक ५-२८४ देवायु ६-४६८-६ देवायुष्क १३-३६२ देश १३-११ देशकरणोपशामना १५-२७५ देशघातक ७६३ देशघाति १५-१७१; १६-३७४, ५३६ देशघातिस्पद्धक ५-१६६७-६१ देशघाती ६-२६६, ७.६४; १२-५४ देशजिन ६-२४६, ९-१० देशप्रकृतिविपरिणामना १५-२८३ देशप्रत्यासंत्तिकृत १४-२७ देशमोक्ष १६-३३७ देशविनाश १३-३३२, ३३५, ३४१ देशविपरिणामना १५-२८३ देशव्रत ५-२७७ देशव्रती ८२५५,३११ देशसत्य १-११८ देशसिद्ध .९.१०२ देशसंयम ५.२०२, ७-१४ देशस्पर्श १३-३, ५, १७ देशना ६-२०४ देशामर्शक ४-५७ देशावधि ६.२५, ९-१४ देशावरण ७.६३ देशोन लोक ४.५६ देशोपशम ६-२४१ दत्य ४-१८ दोष १४-११ द्रव्यविष्कम्भसूची ५-२६३ द्रव्य १-८३, ३८६, ३-२, द्रव्यवेदना १०.७ ५, ६,४-३३१, ३३७; द्रव्यश्रुत ८-६१ १३-६१, २०४, ३२३; द्रव्यसूत्र १५-३३ द्रव्यस्पर्श १३-३, ११, ३६ द्रव्य उत्कृष्ट ११-१३ द्रव्यस्पर्शन ४१४१. द्रव्य उपक्रम १५-४१ द्रव्यसंक्रम १६-३३६ द्रव्य उपशामना १५-२७५ द्रव्यसंयम ६-४६५, ४७३ द्रव्यकर्म १३-३८ ४३ ७.६१ द्रव्यकाल द्रव्यसंयोग ९-१३७ द्रव्यकृति ९.२५० द्रव्यसंयोगपद ९-१३८ द्रव्यक्रोध ७.८२ द्रव्यान्तर द्रव्य क्षेत्र द्रव्यानन्त ३-१३ द्रव्य छेदना १४-४३५ द्रव्यानुयोग १-१५८; ३-१ द्रव्यार्थता द्रव्य जधन्य ११-१२, ८५ १३-६३ द्रव्यार्जन द्रव्यार्थिक १-८३, ४-१४१; द्रव्यतः आदेश जघन्य ११-१२ ९-१६७, १७० द्रव्यार्थिक नय ४-३, १४५, १७०, द्रव्यत्व ४-३३६ द्रव्यनिवन्धन १५-२ ३२२, ३३७,४४४, ७-३, द्रव्यपरिवर्तन ४.३२५ १३८-३१०-२२, ४५० द्रव्यप्रकृति १३.१६८, २०३ १६-४८५ द्रव्यप्रक्रम १५-१५ द्रव्यार्थिकप्ररूपणा ४.२५६ द्रव्यप्रमाण ३-१० द्रव्याल्पबहुत्व ५.२४१ द्रव्यप्रमाणानुगम ३-१,८ द्रव्यासंख्यात १३-६३ द्रव्येन्द्रिय १-२३२ द्वन्द्वसमास द्रव्यवन्ध १४.२७ द्वादशाङ्ग ९.५६ ५८ द्रव्यवन्धक ७.३ द्विगुणश्रेणिशीर्ष १५-२६७ द्रव्यभावप्रमाण ३-३६ द्विगुणहानि ६-१५.३ द्रव्यमन १-२५६ द्विगुणादिकरण ३-७७, ८१, द्रव्यमल ११८ द्रव्यमोक्ष द्विगुसमास द्रव्यमंगल १-२०, ३२ द्विचरमसमानवृद्धि द्रव्ययुति १३-३४८ द्वितीय दण्ड ७.३१३, ३१५ द्रव्यलिंग ४-२०८ द्वितीय दण्डस्थित द्रव्यलिंगी ४-४२७, ४२८; द्वितीय पृथिवी ४-८४ ५.५८, ६३, १४६ द्वितीय संग्रहकृष्टियन्तर ६-३७७ द्रव्यलेश्या १६.४८८ द्वितीय स्थान -११-११६ द्रव्यवर्गणा १४-५२ द्वितीय स्थिति ६२३२, २५.३ धवलासहितसमग्रपखंडागमस्य पारिभापिक-शब्द-सूची ३२ ध्रु वशन्यवर्गणा धनुष ४.४५,५७ धरणी १३-२४३ घरणीतल धर्म ४.३१६८-६२ धर्मकथा ९-२६३, १३-२०३; ध्रु वस्थिति ध्र वस्कन्धद्रव्यवर्गणा १४.६३ ११-६५० ध्रुवावग्रह ध्रुवोदय ध्र वोदयप्रकृति १५-१५६.१६२, द्वितीयान ७.४५ द्विपद १३-३६१ द्विप्रदेशीय परमाणु पुद्गल द्रव्यवर्गणा १४-५५ द्विप्रदेशीय वर्गणा १४.१२२ द्विमात्रा १४.३२ द्विरूपधारा ३-५२ द्विसमयाधिकावली ४-३३२ द्विस्कन्ध द्विवाहु क्षेत्र ४-१८७, २१८ द्विस्थान दण्डक ८-२७४ द्विस्थान बन्धक ११-३१३ द्विस्थानिक १५-१७४, १६-५३६ द्विस्थानिक अनुभागबन्धक ६-२१० विस्थानिक अनुभागवेदक ६-२१३ द्विस्थानिक अनुभाग सत्कर्मिक ६.२०६ द्विस्थानी ८-२४५, २७२ द्वीन्द्रिय १-२४१, २४८, २६४; ७.६४:८-६; १४-३२३ वीन्द्रियकार्मणशरीरबन्ध १४.४३ द्वीन्द्रियजाति ६-६८ द्वीन्द्रिय जातिनाम १३-३६७ द्वीन्द्रियतैजसकार्मणशरीरबन्ध १४.४३ द्वीन्द्रियतेजसशरीरबन्ध १४४३ दीन्द्रिय-त्रीन्द्रियशरीरबन्ध १४-४३ द्वीन्द्रियशरीर १४-७८ दीप १३-३०८ द्वीपसागरप्रज्ञप्ति १-११० धर्मद्रव्य ३-३, १३-४३, १५.३३ धर्मास्तिद्रव्य १०-४३६ धर्मास्तिकायानुभाग १३-३४६ धर्म्यध्यान १३-७०,७४, ७७ धर्म्यध्यानफल १३-८०, ८१ धातकीखण्ड ४-१५०,१९५ धान १३.२०५ धारणा १.३५४, ६-१८. ९-१४४, १३.३१६, २३३, २४३ धारणाजिन ९.६२ धारणावरणीय १३-२१६,२१६ नन्दावर्त धुर्य ४-३२६ धूमकेतु १४.३५ ध्यात १३-६६ ध्यान १३-६४, ७४, ७६.८६ ध्यानसन्तान १३.७६ ध्येय १३-७० ध्रुव वयवग्रह ६-२१ ध्र वउदयप्रकृति १५.११६ १५-१०८ ध्रुवउदीरणाप्रकृति १५-१०६ ४-१४१ ध्रुवप्रत्यय ९-१५४ धू ववन्ध ८-११७ ध्रुवबन्धप्रकृति ८-१७:१५-१४५, ३२८ ध्रुवबन्धी ६८६, ११८:४-१७ ध्रु वराशि ३.४१, १०.१६८, नक्षत्र ४-१५१ नगर ७-६; १३.३३४ नगरविनारा १३.३३४ नन्दा १३.२६७ नपुसक १-३४१, ३४२: ४.४६ नपुसकवेद ६-४७७-७६; ८.१० १३.३६५ नपुसकवेदभाव १४-११ नपुंसकवेदोपशामनासा ५-१६० नमंसन E-६२ नय १-८३, ३.१८७६०ः ९-१६२, १६६: १३.६८, २९८,२८७ नयवाद १३.९८०, २८७ नयविधि १३-२८०, २८४ नयविमापणता १३.२ नयान्तरविधि १३.२८०, २८८ नरक १३.३३५: १४-४६५ नरकति १.२०१, ६०२ ध्रुवउदीरक ध्रु वत्व नरफगतिप्रायोग्यानुएवों ४.१७५ १६.१ ६.७६:१३.३.१ नरकगतिमान नरकथिवी जीपायन देष वर्धगुणहानि १२-२१ १२-२८३ ६.१५२ नववेक विमान বিজি ९.१०६,११ ध ध्रु वशुन्यद्रव्यवर्गणा १४.८३, ४-१५६ १०-१५० परिशिष्ट निधत्त अध्यवसान निःसृत अवग्रह नागहस्ती १२-२३२, १५-३२७; नामानन्तर ५-१, नित्यनिगोद १०-२४; १४-२३६ १६.५१८, ५२२ नामाल्पबहुत्व ५-२४१ नित्यैकान्त ९.२४७ नाथधर्मकथा १-१०१ नामासंख्यात ३-१२३ निदर्शन नानागुणहानिशलाका ६-१५१; ५-६, १५.३२ नामेय १३-३८८ निदान ६-५०१, १२-२८४ १५२, १६३, १६५ नामोपक्रम ९-१३५ निद्रा ६-३१, ३२,८१०, नानात्व ६-३३२, ४०७ नारक ४-५७; १३-२६२, ३६१, १३-३५४ नानाप्रदेशगुणहानिस्थानान्तर- ३६२ निद्रादण्डक ८.२७४ शलाका १०-११६. नारकगति निद्रानिद्रा नानाश्रेणि १-२०१ ६-३१, ८.६; १४-१३४ नारकभाव १४-११ १३-३५३, ३५४ नाम ६-१३, १३-२६,२०६ नारकायु ६-४८; ८-६ निधत्त ६-४२७१६-५१६,५७६ नामउपक्रम १५.४१ नारकसर्वावास ४-१७६ १६-५७७ नामउपशामना १५-२७५ नारकावास निधत्त-अनिधत्त नामकर्म १३-३८, ४०. २६३ ४-१७७ ९-२३५ नामकर्मप्रकृति नाराचशरीरसंहनन निधत्तिकरण १३-२०६ ६-७४ ६-२६५, ३४६ नाराचसंहनन निन्ह १४-३२७ नामकारक ८-१० ७-२६ नालिका ३-६५ निपुण १४-३२७ नामकाल ४-३१३ नाली निबन्धन ३.६६,४-३१८ नामकृति १५-१ ९-२४६ नामक्षेत्र निःसूचिक्षेत्र निबन्धन अनुयोगद्वार ९-२३३ ४-१२ निःसृत निमिष नामछेदना ९१५३ ४-३१७ १४-४३६ निरतगति नामजिन ६-२० १-१०१ निःसृत प्रत्यय १३.२३८ निरतिचारता नामनिबन्धन ८-८२ १५-२ निकाचन अध्यवसान १६-५७७ निरन्तर ५-५६, २५७, ८-८ नामनिरुक्ति १४-३२२ निकाचना . १०-४६ निरन्तरअवक्रमणकालनिःशेष नामपद १-७७; ९-१३६ निकाचनाकरण ६-२६५,३४६ १४-४७८ नामप्रकृति १३-१६८ निकाचित ६-४२८; १२-३४; ८-१७ नामप्रक्रम १५-१५ १६:५१७, ५७६ निरन्तरबन्धप्रकृति नामबन्ध १४-४ निकाचित-अनिकाचित ९.२३५ निरन्तरवेदककाल १०-१४२, नामबन्धक निकृति १२-२८५ १४३ नामभाव ५.१८३ १२-१ निकृतिवाक् १-१२७ निरन्तरसमयअवक्रमणकाल नाममोक्ष १६-३३६ निक्खेदिम १४.४७४, ४७५ ९-२७३ नाममंगल १-१७, १६ निराधार रूप १०-१७१ नामलेश्या १६-४८४ निक्षेप १-१०, ३-२७; ४-२, निरिन्द्रिय १४-४२६ नामवर्गणा १४.५२ ४१,६-२२५, २२७, २२८; निरुक्ति ३-५१, ७३, ७.२४७ नामवेदना १०-५ ७-३, ६०, ९-६, १४०; निरुपक्रमायु नामसत्य १-११७ १३.३, ३८, १९८; निरुपक्रमायुप्क १०-२३४, २३८ नामसम ९-२६०, २६६ १४-५१, १६-३४७ निम्रन्थ १३-२०३, १४-८ निक्षेपाचार्य १५.४० निर्जरा ९-३,१३.३५२ नामसंक्रम १६-३३६ निगोद जीव ३.३५७, ४-४०६; निराभाव ५-१८७ नामस्पर्श १३-३,८; ७२०६;८-१६२ निर्जरित-श्रनिर्जरित १३-५४ नामस्पर्शन ४-१४१ निगोदशरीर ४-४७८:१४-८६ निर्देश ३.१,८,६४.६, १४८ . नामानन्त ३-११ निचितकर्म ३२२, १३-६३ निरन्तर बन्ध ९-३२३, ३२४ धवलासहितसमग्रपटखंडागमस्य पारिभाषिक शब्द-सूची ३-१६ नोग्रागमभावानन्त नोआगमभावाल्पबहुत्व निर्माण ८-१० निर्माणनाम १३-३६३, ३६६ निलेपन १४-५०० निर्लेपनस्थान १०-२६७, २६८; १४-५२९ निर्दर्गणा ६-३८५ निर्वर्गणाकाण्डक ६-२१५, ३१६, २१८; ११-३६३ निर्वाण ५-३५; १०-२६६ निवृति ६-४६७, ७-४३६; निवृत्यक्षर ५-२ १३-१६६; १५-२४ नैगमनय १-८४,८-६; १३.४, ११ नैयायिक ६-४२०, ९-३२३ नैसर्गिकप्रथमसम्यक्त्व ६-४३० नोअनुभागदीर्घ १६-५०६ नोअनुभागहस्व १६.५११ नोयागम ३-१३, १२३ नोयागमयचितद्रव्यभाव ५.१८४ नोग्रागमद्रव्यकाल ४.३१४ नोयागमद्रव्यप्रकृति १३.२०४ नोश्रागमद्रव्यभाव ५-१८४ नोयागमद्रव्यबन्ध १४.२८ नोग्रागमद्रव्यबन्धक नोयागमद्रव्यवर्गणा १४-५२ नोग्रागमद्रव्यवेदना १०-७ नोयागमद्रव्यस्पर्शन ४.१४२ नोयागमद्रव्यान्तर नोग्रागमद्रव्यानन्त ३-१३ नोश्रागमद्रव्याल्पबहुत्व ५-२४२ नोयागमद्रव्यासंख्यात ३-१२३ नोबागमभव्यद्रव्यभाव ५-१८४ नोयागमभावउपशामना १५.२७५ नोग्रागमभावकाल ४-३१६, ११-७७ नोयागमभावक्षेत्र ४-७; ११-२ नोश्रागमभावजघन्य ११-१३ नोग्रागमभावनारक ७.३० नोश्रागमभावप्रकृति १३-३६०, ३६१ नोग्रागमभावबंध १४-६ नोग्रागमभावबन्धक ७.५ नोग्रागमभावभाव नोयागमभावलेश्या १६-४८: नोत्रागमभाववर्गणा १४-५२ नोनागमभावस्पर्शन नोनागामभावान्तर निवृतिस्थान १४-३५८ १३-२६५ निवेदनी १:१०५, ९-२०२ निलेपन १४-५०० निलेपनस्थान १०-२६७, २६८ १४-५२७ निपिद्धिका १-६८; ९-१६१ निपेक ६-१४६, १४७, १५.०; ११-२३७ निपेकक्षुद्रभवग्रहण १४.३६२ निपेकगुणहानिस्थानान्तर १६-३२८ निपेकप्ररूपणा १४-३२१ ६-१५३ निपेकरचना १०-४३ निपेकस्थिति ६-१६६, १६७ निपेकस्थितिप्राप्त १०-११३ निस्सरणात्मक तैजसशरीर ४-२७ नीचगोत्र ६-७७, ८६ नीचंगोत्र १३-३८०, ३८६ नीललेश्या १-३८९७-१०४; ८-३२०,३३१:१६-४८४, ४८८.४६० नीलवर्ण ६.७४ नीलवर्णनाम १३.३७० नैनात गम ७-२८:९१७१, १८१: १०.१२ १२-३ ०३: नोश्रागमभावासंख्यात ३.१२५ नोग्रागममिश्रद्रव्यभाव ५-१८४ नोश्रागमवर्गणा १४.५२ नोग्रागमसचित्तद्रव्यभाव ५.१८४ नोइन्द्रियार्थावग्रह ५३.२२८ नोइन्द्रिय अर्थावग्रहावरणीय १३.२२६ नोइन्द्रियग्रवायावरणीय १३-२३२ नोइन्द्रिय ईहा १३.२३२ नोइन्द्रिय ईहावरणीय १३-२३२ नोइन्द्रियज्ञान नोइन्द्रियधारणावरणीय १२.२३३ नोइन्द्रियावरण नोकर्मउपक्रम १५.४१ नोकर्मउपशामना १५.२७५ नोकर्मक्षेत्रउत्कृष्ट नोकर्मक्षेत्रजघन्य ११-१२ नोकर्मद्रव्य नोकर्मद्रव्यनारक नोकर्मपर्याय नोकर्मयुद्गल नोकर्मपुद्गलपरिवर्तन ४-३२५. नोकर्मप्रकृति १३.२०५. नोकर्मप्राम १ः-१५ नोकर्मबन्धक नोकममोक्ष नोकर्मवेदना १०.४ नोकर्मसंक्रम नोकामयशं १३.४, ५. नोकपाय ६-४० ४१२३४६ गोगायवेदनीय १३.६५६, ३६१ गोषित निपेक भागहार ३५. परिशिष्ट परिग्रहतः अात्तपुद्गल १६-५१५ परिग्रह संज्ञा १.४१५ परिचित ९.२५२ परिजित ९-२६८; १३.२०३ परिणाम १-८०, १५.१७२ परिणामतःआत्तपुद्गल१६-५१५ परिणामप्रत्यय ६-३१७ परिणामप्रत्ययिक १५.१७२, २४२, २६१ नोगौण्य ९-१३५ नोगौण्यपद १-७४ नोजीव १२-२६६, २६७ नोत्वक १३-१६ नोप्रकृतिदीर्घ १६-५०७ नोप्रकृतिहस्व १६-५०६ नोपदेशदीर्घ १६-५०६ नाप्रदेशहस्व १६-५११ नोमनोविषिष्ट १०-१६ नोस्थितिदीर्घ १६-५०८ नोस्थितिहस्व १६-५१० न्यग्रोधपरिमण्डलशरीर संस्थाननाम १३-३६८ न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान ६-७१ न्याढ्य १३-२८६ न्याय १३-२८६ न्यास ३.१८ प पदाहिन १३.८६ पन्नग ४-२३२ पयदकरण १५-२७६, २७७ परघात ६-५६, ८-१० परघातनाम १३-३६३ परप्रकृतिसंक्रमण ६-१७१ परप्रत्यय ४-२३४ परभविक १६-३६३ परभविकनामकर्म ६-२६३ ३३०, ३४७ परभविकनामप्रकृति १६-३४२ परभविकनामबन्धाध्यवसान १६-३८७ परमाणु ४-२३, १३-११, १८, २१५, १४-५४ परमाणुपुद्गलद्रव्यवर्गणा १४-१२१ परमार्थ ५-७ परमार्थकाल ४-३२० परमावधि ६-२५; ९-१४,४१, १३, २६२, ३२२ परम्परापर्याप्ति १०-४२६ परम्पराबन्ध , १२-३७०, ३७२ परम्परा लब्धि १३.२८०, २८३ परम्परोपनिधा ६-३७८ १०.२२५, ११-३५२; १२-२१४, १४:४६ परवाद १३-२८०, २८८ परसमयवक्तव्यता १-८२ परस्थान (अल्पवहुत्व )३.२०८ ९-४२६, ४३८ परस्थानाल्पबहुत्व ५-२८६; १०४०६ परस्परपरिहारलक्षणविरोध ७४३६, १३-३४५. पराक्रम ९-१३ परिकर्म १३-१७, २६२, पक्ष ४-३१७, ३६५, १३.२६८, ३०० पक्षधर्मत्व १३-२४५ पक्षिन् १३-३६१ पट्टन १३-३३५ पट्टनविनाश १३-३३२, ३३५, परिणामयोग १०-५५ ४२० परित अपरितवर्गणा १४.५८ परित्तजीविय २७४ परित्तापन १३-४६ परिधि ४-१२, ४३, ४५, २०६. २२२ परिधिविष्कम्भ ४.३४ परिनिर्वृतभाव १४.१८ परिपाटी ५.२० परिभोग ६-७८; १३-३६० परिभोगान्तराय ६-७८,१३-३८६ परिमण्डलाकार ४-१७ परिवर्तन १४४ परिवर्तना ९.२६२, १३-२०३ परिवर्तमान १५-२३४ परिवर्तमाननामप्रकृति १५-१४६ परिवर्तमानपरिणाम १२.२७ परिवर्तमानमध्यमपरिणाम १२.२७ परिशातन कृति परिहाणि (रूप) ३.१८७ परिहार १३.६२ परिहारशुद्धिसंयत ३७१, ३७२, ७-६४,१६७, पद ६-२३, १०-२६; १२-३, ४८० १३.२६०, २६५ पदनिक्षेप ६-१५२ पद्मलेश्या १-१६०, ७-१०४; ८-३३३, ३४५; १६-४८४, ४८८, ४६२ पदमीमांसा ९-१४१, १०-२६; १२-३, १४५०, ३२२ पदश्रुतज्ञान १३२६५ पदसमास ६-२३, १२-४८० १३.२६७ पदसमासावरणीय १३.२६१ पदानुसारी ९-५६, ६० पदावरणीय १३.२६१ परिहारशुद्धिसंयम ७.१६७ परीतानन्त परोक्ष ६-२६, ९-५५, १४३; १३.२१२, २१४ २६३, २६४ परिग्रह १२-२८२ धवलासहितसमग्रपटखंडागमस्य पारिभापिक-शब्द-सूची -- ३६ 4 पुलविय 4 रोदय यन्त ४-८६,६६२ प्ति १-२५४, २६७, ३-३३१ ६.६२, ४१६, ८-११; १०-२४० प्तिनाम १३-२६३ याप्तनिवृत्ति १४-३५२; १५-१८० र्याप्ताद्धा १०-३७ ाप्ति १.२५७, ४-३६२, १०.२३६ र्याय १-८४, ४-३३७, ६-२२; ८-५, ६; १३-६० यज्ञान १३-३६३ यनय ४-३३७ यसमास ६२२ यसमासज्ञान १३-२६३ यसमासावरणीय १३१६१ यार्थिक १.८४, ९-१७० यार्थिक जन ४-१४६ यार्थिकनय ४-३,१४५, १७० ३२२, ४४४, ७-१३; ८.३, ७८; १०-४५१; १६-४८५ नयार्थिकप्ररूपणा ४-१४६, १७२, १८६ २०७, २५६ यावरणीय १३-२६१ दास १५-२५ दासप्रतिपेध ७-४७६, ४८० ४-३१७; १३-२६८, ३०० न्य. ४-६, १८५, ३८६ योपम ३-६३,४-५,७,६, ७७, १८५, ३१७, ३४०, ३७६; १३-२६८, ३०० न्योपमशतपृथक्त्व यंकासन ४-४६ चात्कृत मिथ्यात्व ४-३४६ चादानुपूर्वी १-७३; ९-१३५ १३-३६१ १४-१४३ पाणिमुक्तागति १-३००,४-२६ पुद्गलात्मा १६-५१५ पाप १३-३५२ पुद्गलानुभाग १३-३४९ पायदकरण १५.२७८ पुनरुक्तदोष १०-२६६; पारश्चिक १३-६२ १२-२०६ पारमार्थिक नोकर्मद्रव्यक्षेत्र पुरुष १-३४१, ६-४६ ४-७ पुरुषवेद ६-४७; ७-७६;८-१०; पारसिक १३-२२३ १३-३६१ पारिणामिक १-१६१, ७-६, पुरुपवेददण्डक ८-२७५ ३०; १२-२७६ पुरुष (पुरिस) वेदभाव १४-११ पारिणामिकभाव ५-१८५, पुरुषवेदोपशमनाला ५-१६० १६६, २०७, २३०;७-१४ १४-८६ पारिणामिकी ९-१८२ पुष्करद्वीप ४-१६५ पाव १३-१ पुष्करद्वीपार्ध ४.१५० पिठर १३-२०४ पुष्करसमुद्र ४-१६५ पिशुल १२-१५८ पुष्पोत्तरविमान ९-१२० पिशुलापिशुल १२-२६० पुडरीक १-६८, ९-१६१ पिंड ४-१४४, १४, १३-३६६ पुवेद १-३४१ पिंडप्रकृति ६-४६, ३-३६३, पूरिम ९-२७२, २७३ ३६६; १६-३४७ पूर्व ४-३१७, ६-२५:१२-४८०; पुच्छण १४-६, १३-२८०, २८९,३०० पुण्य १३-३५२ पूर्वकृत ९-२०६ पुद्गल १-११६; १४-३६ पूर्वकोटी ४-३४७, ३५०, ३५६, पुद्गलद्रव्य ३-३, १३-४३; ३६६ १५-३३ पूर्वकोटीपृथक्त्व ४-३६८, ३७३, पुद्गलनिबद्ध १५-७, १३ ४००, ४०८:५.४२ पुद्गलपरिवर्तन ४-३६४,३८८, ४०६,५-५७ पूर्वगत १-११२ पुद्गलपरिवर्तनकाल ४-३२७; पूर्वधर १५.२३८ पूर्वफल १३-३७२ पुद्गलपरिवर्तनवार ४-३३४ पूर्वश्रुतज्ञान पुद्गलपरिवर्तनसंसार ४-३३३ पूर्वसमास ६-२५; १२-४८० पुद्गलबन्ध १३-३४७ पूर्वसमास तज्ञान पुद्गलमोक्ष १३-३४८ पूर्वतमातावरणीय १३.२६॥ पुद्गल विपाकित्त्व ५-२२२, पूर्वपद्धक १०.३२२,३२५ ६.३६ १३५१६-५२०.५७८ पुद्गलविपाकी १३.२८० ५-२२६; पूर्वातिपूर्व ६.११४, १२-४६ १-७३:९.१३५ पूर्वानुपूर्वी १२.२२२ पुद्गलयुति पुद्गलात ६-२३५, १६-५१४ पूर्वाभिमुखफेवली ५२, ७२ I न्यमान ३७ परिशिष्ट ९-८१,८३ पूर्वावरणीय १३.२६१ पृच्छना ९-२६२, १३-२०३ पृच्छाविधि १३-२८०, २८५, पृच्छाविधिविशेष १३-२८० पृच्छासूत्र १०-६ पृथिवी ४-४६० पृथिवीकायिक ३.३३०७-७०; ८-१६२ पृथिवीकायिकनामकर्म ७-७० पैशुन्य १-१७ पोतकर्म ९.२४६; १३-६, ४१ २०२; १४-५ पंकबहुलपृथिवी ४-२३२ पंचच्छेद ३-७८ पंचद्रव्याधारलोक ४-१८५ पंचमक्षिति १३-३१८ पंचमपृथिवी ४-८९ पंचमुष्टि ९-१२६ पंचविधलब्धि ७.१५ पंचलोकपाल १३.२०२ पंचसामायिकयोगस्थान १०.४६५ पंचांश ४-१७८ पंचेन्द्रिय १-२४६, २४८,२६४; ७-६६ पंचेन्द्रियजाति १-२६४, ६-६८ . प्रकाशन ४-३२२ प्रकीर्णक ४-१७४, २३४ प्रकीर्णकाध्याय १३-२७६ प्रकृति १२-३०३, १३-१६७, २०५ प्रकृतिअनुयोगद्वार ९-२३२ प्रकृतिअल्पबहुत्व १३-१६७ प्रकृतिगोपुच्छा १०-२४१ प्रकृतिदीर्घ १६-५०७ प्रकृतिद्रव्यविधान १३-१६७ प्रकृतिनयविभाषणता १३-१६७ प्रकृतिनामविधान १३-१६७ प्रकृतिनिक्षेप १३-१६७,१६८ प्रकृतिबंध ८-२ ७;६-१६८, २०० प्रकृतिबंधन्युच्छेद प्रकृतिमोक्ष १६-३३७ प्रकृतिविकल्प ४-१७६ प्रकृतिविशेष १०.५१०,५११ प्रकृतिशब्द १३-२०० प्रकृतिस्थानउपशामना १५.२८० प्रकृतिस्थानबन्ध ८-२ प्रकृतिसत्कर्म १६-५२२ प्रकृतिसमुत्कीर्तना प्रकृतिसंक्रम १६-३४० प्रकृतिस्वरूपगलित १०-२४६ प्रकृतिह्रस्व १६-५०६ प्रकृत्यर्थता १२-४७८ प्रक्षेप ३-४८, ४६, १८७ ६-१५२; १०-३३७ प्रक्षेपप्रमाण १०-८८ प्रक्षेपभागहार १६-७६, १०१ प्रक्षेपराशि ३-४६ प्रक्षेपशलाका ३-१५६ प्रक्षेपसंक्षेप ५.२६४ प्रक्षेपोत्तरक्रम ६-१८२ ३.६४ प्रचला ६-३१,३२,८-१० १३-३५४ प्रचलाप्रचला ६.३१; ८-९ १३.३५४ प्रज्ञा ९-८२,८३, ८४ प्रज्ञाभावछेदना १४-४३६ प्रज्ञाश्रवण प्रतर ९-२३६; १०-३२० १३-८४ प्रतरगत ७.५५ प्रतरगतकेवलिक्षेत्र ४-५६ प्रतरगतकेवली ४-१६ प्रतरपल्य ३-७८ प्रतरसमुद्घात ४-२६, ४३६ प्रतराकार ४-२०४ प्रतरावली ४-३८६ प्रतरांगुल ३-७८, ७६, ८० ४-१०, ४३, ४४, १५१, १६०, १७२, ५-३१७, ३३५; ९-२१ प्रतरांगुलभागहार ४.६८ प्रतिक्रमण १-६७८-८३,८४, ९-१८८ प्रतिगुणकार ९-४५ प्रतिग्रह १६-४११,४१४,४६५ प्रतिपक्षपद १-७६,९-१३६ प्रतिपद्यमानस्थान ६-२७६,२७८ । प्रतिपत्ति ६-२४,१२-४८० १३-२६२ प्रतिपत्तियावरणीय १३-२६१ प्रतिपत्तिसमास ६-२४:१२-४८० प्रतिपत्तिसमासश्रुतज्ञान १३.२६६ प्रतिपत्तिसमासावरणीय १३-२६१ प्रतिपातस्थान '६-२८३;७.५६४ प्रतिपाती प्रतिपातीअवधि ६-५.०२ प्रतिभाग ४-८२,५-२७०, २६० प्रतिराशि प्रतिष्ठा १३.२४३ प्रतिमारी ९५७,६० पंचेन्द्रियजातिनाम १३-३६७ पंचेन्द्रियतिर्यमातिप्रायोग्यानुपूर्वी ४-१६१ पंचेन्द्रियतिर्यच ८.११२ पंचेन्द्रियतिर्य चअपर्याप्त ८.१२७ पंचेन्द्रियतिर्य चपर्याप्त ८.११२ पंचेन्द्रियतियंचयोनिमती ८-११२ पंचेन्द्रियलब्धि १४-२० पंजर १३.५, ३४ पंलिका ११-३०३ प्रचय.

धवलासहितसमग्रपखंडागमस्य पारिभाषिक शब्द सूची ३८ प्रपद्यमान उपदेश ३.६२ प्रवन्धन १४.४८०,४८५ प्रवन्धनकाल १४-१४,४८५ ग्रमा प्रतिसारी बुद्धि १३-२७१, २७३ प्रतिसेवित १३-३४६ प्रतिक्षण १४-६ प्रतीच्या १३-२०३ प्रतीच्छना ९-२६२ प्रतीतसत्य १-११८ प्रत्यक्ष १.१३५४-३३६, ६-२६,९-५.५, १४२ १३-२१२, २१४ प्रत्यक्षज्ञानी ८-५७ प्रत्यभिज्ञान ९-१४२ प्रत्यय ५-१६५ प्रत्ययनिवन्धन १५.२ प्रत्ययप्ररूपणा ७.१३ प्रत्ययविधि प्रत्याख्यान १-१२१, ६-४३, ४४,८८३,८५, १३-३६० प्रत्याख्यानदण्डक ८-२७४, ९-२२२ प्रत्याख्यानपूर्व ७.१६७ प्रत्याख्यानावरण प्रत्याख्यानावरणीय प्रत्यागाल ६-२३३, ३०८ प्रत्यामुण्डा १३-२४३ प्रत्यावली ६-२३३, २३४, ३०८ प्रत्यासत्ति ४-३७७ ८.६ प्रत्यासन्नविपाकानुपूर्वीफल ४.१७५ २-२७४ प्रत्येकनाम प्रत्येक मुद्ध ५-३२३ प्रत्येकशरीर १-२६८, ३-३३१, ३३३, ६-३२:८-१० १३-३८७, १४.२२५ प्रत्येकशरीरद्रव्यवर्गणा १४-६५ प्रथम त्रिभाग १४-५०१, ५०२ प्रथक्त्व ३८८ १३-१३,७७ प्रयास्ववितर्कवीचार१३-७७,८० प्रथनत्वनितर्कवीचारशुक्रध्यान ४.३६१ प्रथम दण्ड ७.३१३ प्रथम निपेक ६.१७३ प्रथम पृथिवी ४-८८ प्रथम पृथिवीस्वस्थानक्षेत्र ४-१८२ प्रथम सम्यक २६-३, २०४,२०६ २२३, ४१८, १०-२८५ प्रथम समय उपशमसम्यग्दृष्टि ६-२३५ प्रथम समय तद्भवस्थ १४-३३२ प्रथम संग्रहकृष्टिअन्तर ६-२७७ प्रथम स्थिति६-२३२,२३३,३०८ प्रथमाक्ष ७.४५ प्रथमानुयोग १-११२, ९-२०८ प्रदेश १३-११ प्रदेशउदीरकअध्यवसानस्थान १६-५७७ प्रदेशगुणहानिस्थानान्तर १६-३७६ प्रदेशघात ६-२३०, २३४ प्रदेशछेदना प्रदेशदीर्घ १६-५.०६ प्रदेशप्रमाणानुगम १४-३२१ प्रदेशवन्ध ६.१६८, २००८-२ प्रदेशबन्धस्थान १०-५०५,५११ प्रदेशमोक्ष प्रदेशविन्यासावास १०.५१ प्रदेशविपरिणामना १५-२८३ प्रदेशविरच १४-३५२ प्रदेशाविरचित अल्पयत्व १०-१२०, १३६ प्रदेशसंक्रम ६-२५६, २५८; १६४०८ प्रदेशसंकमणाध्यक्सानस्थान १६-५७७ प्रदेशहस्य १६.५१५ प्रदेशाम ६-२२४, २२५ प्रदेशार्थता प्रधानद्रव्यकाल ४.१८५ प्रभापटल प्रमत्तसंयत १-१७६:४ प्रमत्ताप्रमत्तपरावर्तनहत ४-३४७ प्रमाण ३-४, १८, ४-३६६; ७-२४७, ९.१३८, १६३ प्रमाण (परिणाम) ३.४०, ४२, ७२ प्रमाण (राशि) ३.१८७, १६४ प्रमाणकाल १२-०७ प्रमाणघनाङगुल प्रमाणपद १-७७,९-६०,१३६, १६६,१३.२६६ प्रमाणराशि ४.७१, ३४१ प्रमाण्लोक ४.१८ प्रमाणवाक्य ४-१४५. प्रमाणा गुल ४.४८,१६०१८५ प्रमाद ७.११ प्रमेय प्रमेयत्व ४-१४८ प्रमोन प्रयोग १२-२८६:१३-४४ प्रयोगकर्म १३.३८,४३,४४ ग्रयोगपरिणत १४.२३, २४ प्रयोगवन्ध १४.१७ प्रयोगशः उदय प्रयोजन प्ररूपया प्ररोदरा ५.७२, ३,६० १३.०, २३ प्रवचनमभावना प्रवननति प्रवचनकालता - प्रवचनाभिकई १३९८०२८ प्रत्येक अनन्तकाय .

३६ परिशिष्ट प्राभूतप्राभृतावरणीय १३-२६१ प्राभूतश्रुतज्ञान १३.२७० प्राभृतसमास ६-२५; १२-४८० प्राभृतसमासश्रुतज्ञान १३-२७० प्राभूतसमासावरणीय १३-२६१ प्राभृतावरण १३-२६१ प्रामाण्य ९-१४२ प्रायश्चित १३-५६ प्रायोग्यलब्धि ६-२०४ प्रायोपगमन १-२३ प्रावचन १३-२८० प्राशुकपरित्यागता ८८७, ८६ प्रासाद १४-३६ प्रेम १२-२८४ प्रेयस प्लुत १३-२४८ फ प्रवचनाद्धा १३-२८०, २८४ प्रवचनार्थ १३.२८०,२८२ प्रवचनी १३-२८०, २८३ प्रवचनीय १३-२८०, २८१ प्रवरवाद १३-२८०, २८७ प्रवाहानादि ७-७३ प्रवेध ४-१६१ प्रवेशन ४-५७ प्रश्नव्याकरण १-१०४,९-२०२ प्रशम ७-७ प्रशस्ततैजसशरीर ४-२८; ७.४०० प्रशस्तविहायोगति ६-७६ प्रशस्तोपशामना १५-२७५ प्रसज्य १५-२५ प्रसज्यप्रतिषेध ७८५, ४७६ प्रस्तार ४-५७ प्राकाम्य ९.७६, ७६ प्राकार १४-४० प्राण १.२५६,२-४१२, ३-६६, १२-२७६ प्राणत १३-३१८ प्राणातिपात १२-२७५, २७६ प्राणावाय १-१२२९-२२४ प्राणी १-११६ प्राण्यसंयम ८.२१ प्राधान्यपद १-७६; ९-१३६ प्रातार्थग्रहण ९-१५७, १५६ प्राप्ति ९.७५ प्रामृत ६-२५४९-१३४, १२-४८० . प्राभृतज्ञायक प्राभूतप्राभूत ६-२४१२-४८०; १३-२६० प्राभूतप्राभृतश्रुतज्ञान १३-२७० प्राभूतप्राभृतसमास १२-४८०; १३-२७० प्राभृतप्राभृतसमासावरणीय १३-२६१ फल (राशि) ३-१८७, १६० फलराशि ४-५७,७१. ३४७ फलाचारण ९-७६ वादर १-२४६, २६७२-३३० ३३१, ६-६१, ८.११ १३-४६, ५० बादरकर्म १.१५३ बादरकृष्टि १२.६६ बादरनिगोदद्रव्यवर्गणा १४-८४ बादरनिगोदप्रतिष्ठित ३-३४८; ४-२५२ बादरयुग्म १०-२३, १४.१४७ बादरयुग्मराशि ३.२४६ बादरसाम्परायिक ७-५ बादरस्थिति ४-३६०, ४०३ बाहल्य ४-१२, ३५, १७२ बाह्यतम ८-८६ बाह्यनिवृत्ति १-२३४ वाह्यपंक्ति ४-१५१ वाहा-वर्गणा १४-२२३, २२४ बाह्यन्द्रिय ७.६८ वीज १४.३२८ वीजचारण ९-७६ बीजपद ९-५६, ५७, ५६, ६०, १२७ वीजबुद्धि ९-५५ वुद्धभाव १४-१८ बुद्धि १३-२४३ बोधितबुद्ध ५-३२३ बौद्ध ६-४६७, ९-३२३ बंध ६-८३,८५,४६० ७.१, ८२,८-२,३,८; १३-७, ३४७; १४.१,२,३० बंधक ७-१८-२; १४.२ बंधकसत्वाधिकार ७.२४ बंधकारण बंधन ७.१८-२, १४-१ बंधन उपक्रम बंधनगुण १४-४३५. बंधनीय ७.२,८-२,१४.१ व बद्ध-अबद्ध १३-५२ बद्धायुष्क ६-२०८ बद्धायुष्कघात ४-३८३ वद्धायुष्कमनुष्य सम्यग्दृष्टि ४.६६ वध्यमान १२.३०३ वल ४-३१८ बलदेव १३-२६१ बलदेवत्व ६-४८६, ४६२, ४६५, ४६६ बहु ९-१४६; १३.५०; २३५ बहु-यवग्रह ६.१६ बहुव्रीहि समास ३-७ बहुविध ९.१५१, १३.२३७ बहुविध-अवग्रह ६-२० बहुश्रुत ८-७२,७३, ८९ बहुश्रुतभक्ति F-७६, बंधप्रकृति १२-८९५ धवलासहितसमग्रपखंडागमस्य पारिभाषिक शब्द-सूची ४० 4 बंधमार्गणा १६-५१६ बंधविधान ७.२,८-२, १४-२ बंधविधि धव्युच्छेद बंधसमुत्पत्तिकस्थान १२-२२४ बंधस्थान १३-१११, ११२ बंधस्पर्श १३.३, ४, ७ बंधाध्वान बंधानुयोगद्वार ९-२३३ वंधावली ४-३३२, ६-१६८, २०२; १०-१११, १६७ ब्रहा ४.२३५, १३.३१६ ब्रहोत्तर ४-२३५ भवपरिवर्तनवार ४-३३४ भवस्थिति ४-३३३, ३६८ भवस्थितिकाल ४-३२२, ३६६ भवाननुगामी १३-२६४ भवानुगामी १३.२६४ भवप्रत्यय १३.२६०, २६२ भवप्रत्ययअवधि ६-२६ भवप्रत्ययिक १५-१७२, २६१ भविष्यत् १३-२८०, २८६ भवोपगृहीत १५-१७२, १७५; १६-३८० भावकलक १४.२६४ भावकलङ्कल १४-२३४ मावकाल भावक्षेत्र भावक्षेत्रागम भावजघन्य ११-८३ भावजिन भावनिक्षेप १३-३६ भावनिवन्धन भावप्रकृति १३-१६८, ३६० भावप्रकम १५-१६ भावपरिवर्तन ४-३२५ भावपरिवर्तनकाल भावपरिवर्तनवार भावप्रमाण भावबंधक भावमन १-२५६ भावमल भावमोक्ष १५.२३७ भावमङ्गल १-२६,३३ भावयुति १३-३४६ भावलेश्या १-४३१, १६-४८५, ७.३, ५ भक्तप्रत्याख्यान १-२४ भगवत् १३-३४६ भजितव्य १३-३०६ भज्यमानराशि ३-४७ भद्रा ४-३१६ भय ६-४७७-३४, ३५, ३६; ८-१०; १३-३३२, ३३६, ३४१, ३६१ भरत ४-४५, १३.३०७ भव १०-३५, १४-४२५, १५-७; १६-५१२, ५१६ भवग्रहण १३-३६८, ३४२, १४-३६२ भवग्रहणभव १६-५१२ भवधारणीय ९.२३५ भवन १४-४६५ भवनवासिउपपादक्षेत्र ४.८० भवनवासिक्षेत्रं ४.७८ भवनवासिजगप्रणधि भवनवासिजगमूल ४-१६४ भवनवासिप्रायोग्यानुपू४ि-२३० भवनवासी ४-१६२८-१४६ भवन विमान ४.१६२ भवपरिवर्तन ४.३२५ भवपरिवर्तनकाल भव्य १-५५०, ७-४,७७ १३-४, ५, २८०, २८६ भव्यजीव १४-१३ भव्यत्व ४.४८०५-१८८ भव्यद्रव्यस्पर्शन ४-१४२ भव्यनोयागमद्रव्य १-२६ भव्यनोयागमद्रव्यकाल ४-३१४ भव्यराशि ४.३३६ भव्यसिद्ध १-३६२, ३६४ भव्यसिद्धिक ७-१०६; ८-३५८ भव्यस्पर्श १३-४, ३४ भव्यानन्त ३-१४ भव्यासंख्यात ३-१२४ भाग ७.४६५ भागलब्ध ३-३८,३६ भागहार ३-३६, ४८, ४.७१ भागहारप्रमाणानुगम १०-११३ भागाभाग ३-१०१, २०७ भाजित ३-३६, ४१७२४७ भाज्यशेष ३.४७ भानु ४-३५६ भार्य भामा १३.२६१ भाव १-२६, ५.१८६, ९.१६७, १२८१३-६१ भावउपक्रम १५.४१ भावकर्म १३.६६, ४०,६० , भाववर्गणा १४-५२ भाववेद ५-२२२ भाववेदना १०८ भावभुत ८-११ मावसत्य १-११८ भावरांकम १६-३३६, ३४० भावसंयम ६-४६५, ७.६१ भावसंयोग ९-१३७,१३८ भावतंसार भावस्थितिकाल ४-३२२ भावस्पर्श १३-३, ६,३४ भावस्पर्शन १.१४१ भावानन्त भावानुयोग भारानुवाद १३.१७२ १३.२२१, २२२ ४१ परिशिष्ट भाषागाथा १०-१४३ भाषाद्रव्य १३-२१०,२१२ भाषाद्रव्यवर्गणा १४-६१, ५५० भाषापर्याप्ति १-२५५, ७-३४ भावेन्द्रिय १-२३६ भित्तिकर्म ९.२५०१४-६. १०, ४१, २०२, १४-६ भिन्नदशपूर्वी ९-६६ भिन्नमुहुर्त ३-६६, ६७ १३-३०६ भीमसेन १३-२६१ भुक्त १३-३४६, ३५० भुज ४-१४ भुजगारवन्ध ८-२ भुजाकार(भूयस्कार १०-२६१; १५-५० भुजाकारउदय १५-३२५ भुजाकारउदीरणा १५-१५७, २६० भुजाकारउपशामक १६-३७७ भुजाकारबन्ध ६-१८१ भुजाकारसंक्रम १६-३६८ भुज्यमानायु ६-१६३१०-२३७ २४० भोग ६-७८:१३-३८६ भोगभूमि ४-२०६, ६-२४५ भोगभूमिप्रतिभाग ४-१६८ भोगभूमिप्रतिभागद्वीप ४-२११ भोगभूमिसंस्थानसंस्थित ४-१८६ भोगान्तराय ६-७८; १३-३८६; १५-१४ भंग ३-२०२, २०३, ४-३६६, ४११; ८-१७१; १०-२२५; १५.२३ भंगप्ररूपणा ४.४७५ भंगविधि १३-२८०, २८५ भंगविधिविशेष १३-२८०,२८५ म मनुष्यगतिनाम १३-३६७ मनुष्यपर्याप्त ८-१३० मनुष्यगतिप्रयोग्यानुपूर्वी ४-१७६, ६-७६; १३.३७७ मनुष्यभाव १४-११ मनुष्यलोक १३-३०७ मनुष्यलोकप्रमाण ४-४२ मनुष्यायु ५-४६, ८-११ मनुष्यायुष्क १३-३६२ मनुष्यनी ८.१३० मनोज्ञवैयांवृत्य १३-६३ मनोद्रव्यवर्गणा ९-२८, ६७ मनोबली ९-६८ मनोयोग १-२७६, ३०८ ४-३६१, ७-७७; १०-४३७ मनोद्रव्यवर्गणा १४-६२,५५१, ५५२ मन प्रयोग १३.४४ मनःप्रवीचार १.३३६ मनःपर्यय १-१६४, ३५८, ३६०; १३-२१२ मनःपर्ययज्ञान ६-२८,४८८, ४६२, ४६५, १३-२१२,३२८ मनःपर्ययज्ञानावरणीय ६-२६; १३-२१३ मनापर्ययज्ञानी ७-८४, ८-२६५ मनःपर्याप्ति १-२५५ ममत्तीतःयात्तपुद्गल १६-५.१५ मरण ४-४०६, ४७०, ४७१, १३-३३२, ३३३, ३४१ मस्कारी १३-२८८ महाकर्मप्रकृतिप्राभूत ७-१, २; ८-६; १०.२० १३.३६, १६६ महाकल्प १-६८९-२६१ महातप महाबन्ध ९-१०५ महापुण्डरीक १-९८ ९.१८९ महामण्डलीक १-५८ भुवन भूत ४.२३२, १३-२८०, २८६ भूतपूर्वनय ६-१२६ भूतवलि १३.३६, ३८१ भूतबलिभट्टारक १५-१ भूमि ४-८ भेंडकर्म ९-२५०; १३-६, १०, ४१ २०२,१४-६ भेद ४-१४४; १४.३०, १२१, १२६ भेदजनित १४१३४ भेदप्ररूपणा ४-२५६ भेदपद १०-१६ भेदसंघात १४.१२१ भोक्ता १-११६ मडंबविनाश १३.३३२, ३३५, ३४१ मति १३-२४४, ३३२, ३३३, ३४१ मतिअज्ञानी ७-८४; ८-२७६; १४.२० मतिज्ञान १-३५४, ७-६६ मत्यज्ञान १-३५४, ७-६६ मधुरनाम १३.३७० मधुरनामकर्म ६-७५ मधुसवी ९-१०० मध्यदीपक ९.४४; १०-४८, ४६६; १२-१४ मध्यमगुणकार ४-४१ मध्यमघन १०-१६० मध्यमत्रिभाग १४-५०२ मध्यमप्रतिपत्ति ४-३४० मध्यमपद ९-६०,१६५; १३.२६६ मध्यलोक ४.६ मनुज १३-३६१ मनुष्य १-२०३,१३-२६२ ३२७ ८.१३० मनुष्यगति १-२०२, ६-६७; ८-११ मनुष्य अपर्याप्त धवलासहितसमग्रपटखंडागमस्य पारिभापिक-शब्द-सूची ४२ ७.४ महामत्स्यक्षेत्र महामत्स्यक्षेत्रस्थान ४-६६ महामह ८.६.२ महावाचकक्षमाश्रमण १६-५७७ महाराज १-५७ महाराष्ट्र १३-२२२ महाव्यय १३-५१ महाव्रत ५-२७७, ९.४१ महाव्रती ८-२५५, २५६ महाशुक्र ४.२३५ महास्कन्धस्थान १४-४६५ महास्कन्धद्रव्यवर्गणा १४-११७ महिमा ९-७५ महोरग १३-३६१ मागध १३-२२२ मागधप्रस्थ ४-३२०. मादा १४.३०, ३२ मान १-३५०,६-४१:१२.२८३ १३-३४६ मानकषाय १.३४६ मानकषायी ७८२ मानदण्डक ८-२७५ मानस १३.३३२, ३४० मानसिक १३-३४६, ३५० मानसंज्वलन १३-३६० मानाद्धा ४-३६१ मानी १-१२० मानुष १३-३६१ मानुषक्षेत्र ३-२५५, २५६; ४.१७० मानुषक्षेत्रव्यपदेशान्यथानुपपत्ति ४-१७१ मानुषोत्तरपर्वत ४-२६३ मानुषोत्तरशैल ४-१५.०, २१६: १३-३४३ मानोपशामनादा ५-१६० माया १-३५०, ६-४१ १२-२८३ मायाकपाय १-२४६ मायाकपायी ७-८३ मायागता १-११३, ९-२१० मायाद्धा ४-३६१ मायासंज्वलन १३-३६० मायी १.१२० मायोपशामनाद्धा ५-१६० मारणान्तिककाल मारणान्तिकक्षेत्रायाम ४-६६ मारणान्तिकराशि मारणान्तिकसमुद्घात ४-२६ १६६, ७-३०० मार्ग १३.२८०२८८ मार्गण १-१३१ मार्गणा ७.७; १३-२४२, १६-५१० मार्गणास्थान मालव १३-२२२ मालास्वप्न ९-७४ मास ४-३१७, ३६५; १३-२६८, ३०० मासपृथक्त्व ५-३२, ६३ मासपृथक्त्वान्तर ५-१७६ माहेन्द्र ४-२३५; १३-३१६ मिथ्याज्ञान १२-२८६ मिथ्यात्व ४-३३६, ३५८,४७७; ५-६, ६-३६, ७८८-२, ६,१६९-११७, १०-४३; १३-३५८; १४-१२ मिथ्यात्वादिकारण ४-२४ मिथ्यात्वादिप्रत्यय ७.२ मिध्यादर्शन १२.२८६ मिच्यादर्शनवाक् १-११७ मिध्यादृष्टि ११६२, २६२, २७४ ६-४४६,४५२, ४५४ ७.१११;८०४, २८६; ९.१८२ मिश्र ७२ मिश्चक १३-२२३, १२४ मिश्नरहणाडा ४-२२६,३२८ मिश्रद्रव्यस्पर्शन मिश्रनोकर्मद्रव्यवन्धक मिश्रप्रकम १५१५ मिश्रमङ्गल १-२८ मिश्रवेदना मीमांसक ६-४६०६-३२३ मीमांसा १३.२४२ मुक्त १६-३३८ मुक्तजीवसमवेत १०-५ मुक्तमारणान्तिक ४-१७५, २३०, ७.३०७, ३१२ मुक्तमारणान्तिकराशि ४-७६, ३०७, ३१२ मुख ४.१४६; १३-३७१, ३८३ मुखप्रतरागुल ४-४८ मुखविस्तार ४-१३ मुनिसुव्रत १३.३७ मुहूर्त ३-६६:४३१७, ३६०; १३-२६८, २६६ मुहूर्तपृथक्त्व ५.३२, ४५ मुहूर्तान्त मृर्तद्रव्यभाव १२-२ मूल ४-१४६; १०.१५० मूलनिर्वर्तना १६-४८६ मूलतंत्र १३.६० मूलप्रकृति ६-५ मूलप्रकृतिबन्ध मूलप्रत्यय ८-२० मूलप्रायश्चित मूलाग्रसमान ४.३३, १०.१२३, १३४, २४६ १३-२६ मृतिका १२.२०५ मृदुक १३-५० मृदुकनामकर्म मृदुनाम १३.३७० मृदुलर्श मृदंगना मृदंगनुस दप्रमाण ४३ परिशिष्ट योगावलम्बनाकरण १०-२६२ योगावास १०-५१ योगाविभागप्रतिच्छेद १०.४४० योगी १-१२० योग्य ४-३१६ योजन १३-३०६, ३१४, ३२५ योजनपृथक्त्व १३-३३८ २३६ योजनायोग(जुजण) १०-४३३, योनिप्राभूत १३-३४६ र मृदंगसंस्थान ४-२२ मृदंगाकार ४-११, १२ मृपावाद १२-२७६ मेधा १३.२४२ मेरु ४-१६३ मेरुतल ४-२०४ मेरुपर्वत ४-२१८ मेरुमूल ४-२०५ मेह १४-३५ मैत्र ४-१८ मैथुन १२-२८२ मैथुनसंज्ञा १-४१५ मोक्ष ६-४६०९-६; १३.३४६, ३४८; १६-३३७,३३८ मोक्षअनुयोगद्वार ९-२३४ मोक्षकारण ७-६ मोक्षप्रत्यय ७-२४ मोषमनोयोग १-२८०, २८१ मोह १२-२८३, १४-११ मोहनीय ६-११, १३-२६, २०८, ३५७ मोहनीयकर्मप्रकृति १३-२०६ मंग मंगल १-३२, ३३, ३४, ९-२, १०३ मंगलदण्डक ९-१०६ मंडलीक १-५७ मंथ १०-३२१, ३२८ मंथसमुद्घात ६-४१३ मंद १३-५० मंदरमूल यश कीर्ति यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत १-३७१, ७.२४ यथातथानुपूर्वी १-७३; ९.१३५ यथानुपूर्व १३-२८० यथानुमार्ग १३-२८०, २८६ यथाशक्तितप ८-७६, ८६ यथास्वरूप १०-१७७, १८६, १६६, २३७, ४७६ यन्त्र १३.५, ५४ यम ४-३१६ यव १३-२०५ यवमध्य १०-५६, २३६; १२-२३१, १४-५०,४०२, ५०० यवमध्यजीव १०-६२ यवमध्यप्रमाण १०-८८ ८-११ यशःकीर्तिनाम १३-३६३,३६६ यादृच्छिक प्रसंग ४-१६ युक्तानन्त ३.१८ युग ४-३१७; १३-२६८, ३०० युग्म (राशि) ३.२४६ युग्म १०.१६, २२ युति १३-३४६, ३४८ योग १-१४०, २६६, ४-४७७; ५-२२६, ७-६,८८-२, २०; १०-४३६, ४३७; १२-३६७ योगकृष्टि १०-३२३ योगद्वार १३-२६०,२६१ योगनिरोध ४.३५६, १३-८४ योगप्रत्यय ८-२१ योगवर्गणा १०-३४३,४४६ योगपरावृत्ति ४-४०६ योगयवमध्य १०-५७,५६ २४२, १६-४७३ योगस्थान ६-२०१, १०-७६, ४३६, ४४२ योगान्तरसंक्रान्ति ३-३३, ४-११, १३, १६५, १६७ रज्जुच्छेदनक ४-१५५ रजुप्रतर ४-१५०. १६४ रति ६-४७, ८-१०, १३.३६१ रतिवाक् १-११७ रत्नि ४.४५ ६-५५,८-१०,३५७ रसननिति १-२३५ रसनाम १३-३६३, ३६४, ३७० रसपरित्याग १३-५७ १४.३८ राक्षस ४-२३२, १३-३६१ १२-२८३, १४-११ रागद्वेष ९-१३३ राजा १-५७ राजु ७.३७२ रात्रिभोजन १२.२८३ राशि ३-२४६ राशिविशेष ३-३४२ रिक्ता ४-३१६ रुचक १३-३०७ रुचकपर्वत ४.१६३ रुधिरनामकर्म ६-७४ रुधिरवर्णनाम १३.३७० रुक्षनाम १३-३७० रूतनामकर्म ६-७५ रुक्षस्पर्श १३-२४ य यक्ष यतिवृषभभट्टारक यथाख्यातसंयत १३-३६१ १२-२३२ १-३७३, ८-३०६ ५२-५१ यथाख्यातसंयम ववजासहित सम्प्रतंबागमत्व पारिपिकान्द-सूची पद २३६१६,३१,३२३ रूपात ताज ४-१५०, १६४ तकरयल तोरस्नाचारकात १६ तोकेरीकन २३२८०. २४१, ३ सर्वचार २४९, ३२ हाधिकारहार १०-६६,०० रूद रूपनमारहार २०६६, २२-२८२,२८१ तानन्दरा ६-१२-२२२ लोनदरक लेकिन २३-६, १०, ११,२००६ ९.२४९: १४५ तोनाक्षा ४-३ तरनता तेश्या -६४.३५९३६ २३-५ लोकमा तेश्याकोगद्वार ९-०६४ हरेकवाद १६-२८०, २- तेपानन तोलनावरकात १५-१६ तेश्यालयोगदार ९.२३४ सांगतात तेश्पदा तांतिका तेश्पतरस्कान्त तेश्मा राति १२.३०४ लेस्पारिएन रोग १३-२३२, ३२६. ३४३ हा सैन्द्र .. तर -२९-४२, ३ सविना व १२-२०१३.२३:२. नानकी तर तमन्नान्त्रतुनर १२-११४ नयोग ४-९:७-3-: संजनानी ४-२६-३.१८ २४.०४ पन्न बनवताविक ३-३५ -२ टोटतर लेकर रिहान तेकाल तभर तर ५५:९-२३६ शान्तर तमिर-२६-३६:२६ तक सचिनुनकर समित ५-६६ लोकमनार तपनन ९-२४३ १३२.४१, लेविन्दुन्नार १-२२२:६१: १९८८ ₹::२२८८१0-25 वराटक २३२२०२२-६ राहन्न बनारसंन्न ६-३, बहन बन्नासरीनन ४३ तर, ३-६६:४-१५०, १६४ १३-२८ २९ ४५ परिशिष्ट . वज्रवृषभनाराचसंहनन ८-१० वर्षसहस । ४-४१८ विकलादेश ९-१६५ वज्रवृषभवज्रनाराचशरीरसंहनन वल्लरिच्छेद १४-४३६ विकृतिगोपुच्छा १०-२४१, २५० ६-७३ वशित्व ९-७६ विकृतिस्वरूपगलित १०-२४६ वर्ग ४-२०, १४६; १०-१०३, वस्तु . १-१७४; ३-६, ६-२५; विक्रिया १-२६१ १५०, ४५०, १२-६३ ९.१३४; १२-४८०; विक्रियाप्राप्त ९.७५ वर्गण ४-२०० १३-२६० विक्षेपणी १-१०५, ९.२०२ वर्गणा ६-२०१, ३७०, ८-२; वस्तुंबावरणीय १३-२६० विक्षोभ ९-१०५, १०-४४२, ४५०, वस्तुश्रुतज्ञान १३-२७० विग्रह ४-६४, १७५, ५-१७३, ४५७; १२-६३, १४-५१ वस्तुसमान ६-२५; १२-४८० ११-२० वर्गणादेश १४-१३६ वस्तुसमासश्रुतज्ञान १२-२७० विग्रहगति १-२६६, ४-२६; वर्गणाद्रव्यसमुदाहार १४-४६; वस्तुसमासावरणीय .१३-२६० ३-४३,८०,५-३०० ५३-५४ वाइम ९-२७२ ८.१६० वर्गणानयविभाषणता १४-५२ वाक्प्रयोग ९.२१७ विग्रहगतिनामकर्म . ' ४-४३४ वर्गणानिक्षेप १४.५१ वांग्गुप्ति १-११६:९-२१६ विगूर्वणादिऋद्धिप्राप्त :४-१७० वर्गणाप्ररूपणा १४-४६ वागुरा १३-३४ विगूर्वमानएकेन्द्रियराशि ४-८२ वर्गमूल ३-१३३,१३४, ४-२०२; वाग्योग १-२७६, ३०८ विजय ४-३१८, २८६ ५-२६७, १०-१३१ वाचक १४.२२ विज्जू १४-३५ वर्गशलाका ३-२१, ३३५ वाचना ९.२५२, २६२, विज्ञप्ति १३-२४३ वर्गस्थान- ३-१६ १३-२०३, १४-८ वितत १३-२२१ वर्गसंचर्गित ३-३३५ । -वाचनोपगत९-२६८; १३२०३; वितर्क १३.७७ वर्गितसंवर्गितराशि ३-१६ १४-८ विद्याधर ९-७७, ७८ वर्ण । ६-५५, ८.१०; ९-२७३ वाच्यवाचकंशक्ति ४-२ विद्यानुवाद १-१२१, ९-७१, वर्णनाम १३-३६३, ३६४,३७० वातवलय ४-५१ ૨૨૨ वर्तमान १३-३३६, ३४२ वादाल ३-२५५ विद्यावादी ९-१०८, ११३ वर्तमानप्रस्थ ३-२६ वानव्यन्तर- ८-१४६; १३-३१४ विद्रावण १३-४६ वर्तमान विशिष्टक्षेत्र ४-१४५ वामनशरीरसंस्थान ९-७२ विदिशा ४-२२६ वर्धनकुमार वामनशरीरसंस्थाननाम विदेह ४.४५ ६-२४७ वर्धनकुमार मिथ्यात्वकाल १३-३६८ विदेहसंयंतराशि, ४-४५ वायु-: ४-३२४ ४.३१६ विधिनयं ६.६१ वर्धमान ९.११६, १२६, वायुकायिक . .१-२७३, ७-७१; विध्यातभागहारं १६-४४८ १३-२६२, २६३ ८-१६२ विध्यातसंक्रम ६-२३६, २८६; वर्धमानभट्टारक १२-२३१ वारुण ४-३१८ १६-४०६ वर्धितरांशि ४-१५४ वासुदेवत्व ६-४८६, ४६२, विनय. ८८० १३-६३ वर्वर १३-२२२ ४६५,४६६ विनयसम्पन्नता ८-७६,८० वर्ष ४.३२०, १३-३०७ विकल्प ३-५२, ७४, ५.१८६ विनाश , ४३३६, १५-१६ वर्षपृथक्त्व .४-३४८, ५-१८, ७.२४७ विन्यासक्रम ४.७६ ५३,५५, २६४, १३-३०७ विकलप्रक्षेप, १०-२३७, २४३ | विपक्षसत्व १३.२४५ वर्षपृथक्वान्तर ५.१८ २५६ विपच्चिद् १६-५०३ वर्षपृथक्त्वायु विकलप्रत्यक्ष ९-१४३ । विपरिणामता. १५.२८३ + धवलासहितसमग्रपखंडांगमस्य पारिभाषिक शब्द-सूची ܀ܬ विपरिणामोपक्रम '१५-२८२ १६-५५५ विपरीतमिथ्यात्व ८.२० विपाक १४-१० विपाकविचय १३-७२ विपाकविचयअजीवभावबन्ध १४-२३ विपाकविचयजीवभावबन्ध . १४-१०, ११ विपुलगिरि १२-२३१ विपुलमति ६-२८, ९-६६ विपुलमतिमनःपर्ययज्ञाना- वरणीय १३-३३८,३४० विभंगज्ञान १-३५८; १३.२६१ विभंगज्ञानी. ..७८४, ८-२७६; १४-२० विमाता १४-३० विमान ४-१७०, १४.४६५ विमानतल ४-१६५ विमानप्रस्तर १४-४६५ विमानशिखर. ४-२२७ विमानेन्द्रिय १४.४६५ विरचं १४-३५२ विरति ८-८२, १४-१२ विरलन ३-१६, ४-२०१७ .. १०-६६, ८२ विरलित ३-४०, ४२,७०२४७ ४-३६०; ५-३ विलेपन ९-२७३ विविक्त १३-५८ विविक्तंशय्यासन . .१३-५८ विविधभाजनविशेष . १३-२०४ १३-६० विलोमप्रदेशविन्यास । १०-४४ विशरीर १४-२३७ विशिष्ट .. १०-१६ विशुद्धता ... ११.३१४ विशुद्धि ६-१८०, २०४; .. ११-२०६ विशुद्धिस्थान ११-२०८,२०६ | विनसांसुवचयप्ररूपणता विशुद्धिलब्धि ६-२०४ १४.२२४ विशेष विस्रसोपचय ४-२५, ९-१४,६७; ४.१४५; १३-२३४ १०-४८; १३-३७१ विशेषमनुष्य ७-५२; १५-६३ विसंयोजन . ४-३३६, १२-५० विशेषविशेषमनुष्य ७:५२; विहायोगति ६-६१,८-१० १५-६३ विहायोगतिनाम १३-३६३, विष १३-१, ३४ ३६५ विष्कम्भ ४-११,४५,१४७ विहायोगतिनामकर्म ४-३२ विष्कम्भचतुर्भाग ४.२०६ विहारवत्स्वस्थान ४-२६, ३२, विष्कम्भवर्गगुणितरज्जु ४८५ १६६,७-३०० विष्कम्भवर्गदशगुणकरणी वीचार १३-७७ ४-२०६ वीचारस्थान ६-१८५, १८७, विष्कम्भसूची ३-१३१, १३३, • १६७; ११-१११ वीचारस्थानत्व ६-१५० १३८, १०-६४ वीतराग ९-११८ विष्कम्भसूचीगुणितश्रेणी ४८० वीतरागछद्मस्थ १५-१८२ विष्कम्भार्ध ४.१२ वीर्यप्रवाद ९-२१३ विष्ठौषधिप्राप्त वीर्यान्तराय "६-७८; १३-३८६ विष्णु १.११६ १५-१४ विषम १४-३३ वीर्यानुप्रवाद १-११५ विषय १३-२१६ वृत्त ४-२०६ विषयिन् १३-२१६ वृत्ति. १-१३७, १४८; १३-५७ विस्तार ४-१६५ वृत्तिपरिसंख्यान १३-५७ विस्तारानन्त ३-१६ वृद्धि ४-१६, २८ विस्तारांसंख्यात ३.१२५ वृद्धि ( रूप) ३.४६, १८७; विससापरिणतअवगाहना १३-३०६ १४-२५ वेत्रासन ४-११, २१ वेत्रासनसंस्थित ४-२० विससापरिणतगति १४.२५ वेद वित्रसापरिणतगन्ध १-११६, १४०, १४१, १४-२५ ७-७; १३-२८० विससापरिणतरस .. १४-२५ वेदक १-३६८ विससापरिणतवर्ण १४.२५ वेदकसम्यक्त्व १.३६५, ७-१०७ विससापरिणतस्कन्ध १४-२६ ८-२०; १०-२८८ विससापरिणतस्कन्धदेश. वेदकसम्यग्दृष्टि१-१७१,७-१०८ १४-२६ ८-३६४ विस्तसापरिणतशब्द १४-२५ वेदना ८-२९-२३२; १०-१६, वित्रसापरिणतस्पर्श . १४-२५ १७; ११-२, १२-३०२, विससापरिणतसंस्थान १४-२६ १३-३६, २०३, २१२, विससाबन्ध १४.२६ २६८, २६०, २६३, ३१० विससासुवचय १४-४३० विरह . विवेक : ३२५, ३२७ परिशिष्ट व्यवहारपल्य १३-३०० व्याख्यान ४-७६, ११४, १६५ व्याख्याप्रज्ञप्ति १.१०१, ११०, ९-२२०, २०७ व्याघात ४.४०६ व्यापक व्यास ४-२२१ व्युत्सर्ग ८-३, ८५, १३-६१ व्रज १३.३३६ व्रत ८-३ वेदनाकृत्स्नप्राभूत १-१२५ वेदनाक्षेत्रविधान ११-२ वेदनाखण्ड ९-१०४ वेदनावेदना १२-३०२ वेदनासमुद्घात ४-२६, ७६, ८७,१८६, ७.२६६ ११-१८ वेदनीय ६-१०८-११, १३-२६ २०८, ३५६ वेदनीयकर्मप्रकृति १३-२०६ वेदान्तरसंक्रान्ति ४.३६६, ३७३ वेदित-अवेदित १३-५३ वेदिम ९-२७२, २७३ वेध ४-२० वेलन्धर ४-२३२ वैक्रियिक १-२६१ वैक्रियिककाययोग १-२६१ वैक्रियिककाययोगी८-२१५,२२२ वैक्रियिकमिश्रकाययोग १-२६१, २६२ वैक्रियिकशरीर ६-६६ वैक्रियिकशरीरयाङ्गोपाङ्ग ६-७३, ८-६; १३-३६६ वैक्रियिकशरीरनाम १३-३६७ वैक्रियिकशरीरबन्धन ६-७० वैक्रियिकशरीरबन्धननाम १३-३६७ वैक्रियिकशरीरवन्धस्पर्श १३-३० वैत्रियिकशरीरसंघात ६-७० वैक्रियिकशरीरसंघातनाम १३-३६७ वैनियिकशरीरांगोपांग ५-६ वैक्रियिकंषटक १५-२७६ वैक्रियिकसमुद्घात ४-२६, १६६; ७.२६६ वैजयन्तं ४.३१६, ३८६ वैदिकभावश्रुतग्रन्थ ९-३२२ वैनयिक ९-१८६ वैनयिकदृष्टि ९.२०६ वैनयिकमिथ्यात्व ८-२० वैनयिकी ९८२ वैयावृत्य ८-८; १३-६३ वैयावृत्ययोगयुक्तता ८-७६, ८८ वैरोचन ४-३१८; १३.११५ वैशेषिक ६-४६०, ९-३२३ वैश्वदेव. ४-३१८ वंग १३.३३५ व्यञ्जन ९-७२. ७३; १३-२४७; १६-५१२ व्यञ्जननय १-८६ व्यञ्जनपर्याय ४-३३७; ३-१७८; ९-१७२,२४३, १०-११ १५ व्यञ्जनपरिणाम ६-४६० व्यञ्जनावग्रह १-३५५, ६-१६; ९-१५६, १३-२२० व्यञ्जनावग्रहावरणीय १३-२२१ व्यतिकर ९-२४० व्यतिरेक ७-१५, १२-६८ व्यतिरेकनय ६-६२ व्यतिरेकपर्यायार्थिकनय ६-६१ व्यतिरेकमुख ६-६५ व्यधिकरण १२-३१३ व्यन्तरकुमारवर्ग १३-३१४ व्यन्तरदेव ४-१६१ व्यन्तरदेवराशि ४.१६१ व्यन्तरंदेवसासादनसम्यग्दृष्टि- ‘स्वस्थानक्षेत्र ४-१६१ व्यन्तरावास ४.१६१, २३१ व्यभिचार ४-४६,३२०,५-१८८, २०८; ६-४६३, ४६५; ५-३०८; ९-२०७; १०-५१०, १२-२१, १३-७ व्यवस्थापद १०-१८; १२-३ व्यवसाय १३-२४३ व्यवहार १-८४, ७-२६; १३-४, ३६, १६६ व्यवहारकाल ४-३१७ व्यवहारनय७.१३,६७,९-१७१ शब्दलिङ्गज शककाल ९-१३२ शकट १४-३८ शक्तिस्थिति १०-१०६, ११० शक १३-१३१६ शत ४.२३५ शतपृथक्त्व ७.१५७ शतसहस्त्र ४-२३५ शतार ४.२३६ शव्दनय १८७; ७.२६; ९-१७६, १८१, १३-६, ७, ४०, २०० शब्दप्रवीचार १-२३६ १३-२४५ शरीर १४-४३४, ४३५. शरीरयांगोपांग ६-५४ १३-३६३, ३६४ शरीरनाम १३-३६३, ३६७ शरीरनामकर्म ६-५२ शरीरनिवृत्तिस्थान १४.५१६ शरीरपर्याप्ति १-२५.५. ७.३४; ૨૭ शरीरवन्ध १४-३७, ४१, ४४ शरीरबन्धन ६.५.३ शरीरवन्धनगुणछेदना १४.४३६ शरीरवन्धननाम १३-३६३,३६४ शरीरविससोपचयमरूपमा १४.२२४ धवलासहितसमग्रषटखंडागमस्थ पारिभाषिक-शब्द-सूची '. . घडंश:- - . . . १ शरीरसंघात ६-५३ शून्य १४-१३६ : षट्खण्ड. ९-१३३ शरीरसंघातनाम-१३:३६३,३६४ शैलकर्म ९-२४६; १३-६, १०, षट्पष्ठिपद् :१५-२८२ शरीरसंस्थान . ६-५३ ४१, २०२; १४-५ घटस्थान ६-२००, १२-१२०, शरीरसंस्थाननामः १३-३६३, शैलेश्य ६-४१७, ९-३४५ १२१, १४-४३४ ३६४ . .. १०.३२६; १६-४७६. ५२१ षट्स्थानपतितत्व . १६-४६३ -शरीरसंहनननाम. १३-३६३, 'शोक ६-४७, ८-१०; १३-३६१ घडवृद्धिः ६-२२, १६६ ....३६४ शंख ४-१७८ १३-२६७ --शंखक्षेत्र पएमास शरीरी.१-१२०, १४-४५,२२४ ४-३५ ५-२१ पएणोकषायोपशामनाद्धा ‘शरीरीशरीरप्ररूपणा १४-२२४ "श्यामा १४-५०३ , ५-१६० शलाका ३-३१,४-४३५,४८४; श्यामामध्य १४-५.०३ षष्ठवृद्धि ६-१५२ ४-१६० श्लक्षण १३-५०२ षष्ठोपवास शलाकाराशिः ३-३३५, ३३६ श्वेत ४-३१८ ९-१२४ शलाकासंकलना ४-२०० श्रद्धान १३-६६ स शशिपरिवार ४-१५२ 'श्रीवत्स १३-२६७ शाटिका ( साडिया ) १४-४१ सकल १३-३४५ श्रुत ९-३२२; १६-२८५ . शालभञ्जिका ४-१६५ सकलजिन ९-१० श्रुतअज्ञानी ७८४, ८-२७६ शाश्वतानन्त ३-१५ सकलप्रक्षेप १० २५६ १४.२० शाश्वतासंख्यात ३-१२४ सकलप्रक्षेपभागहार १०.२५५ श्रुतकेवली ८-५७९-१३० शिविका सकलप्रत्यक्ष ९-१४२ १४-३६ शीत श्रुतज्ञान १-६३, ३५७, ३५८, ६-७५ सकल तश्रुतज्ञान १२-२६७ ३५६, ६-१८, ४८४,४८६; १३-३७० सकलश्रुतधारक ९-१.३.० शीतस्पर्श ९-१६०; १३-२१०, २४५ १३.२४ सकलादेश ९-१६५ शील श्रुतज्ञानावरणीय ६-२१, २५; सचित्तकाल ११-७६ ८-८२ शीलवतेषु निरतिचारता ८-७६, १३-२०६, २४५ | सचित्तगुणयोग १०-४३३ श्रुतज्ञानी ७.८४,८-२८६ सचित्तंद्रव्यस्पर्शन ४-१४३ श्रेणिचारण : ९-८० सचित्तद्रव्यभाव १२.२ ४-२६५; १३-३१६ शुक्र: शुक्ल १०-७ ६-७४; १३-५० श्रेणिभागहार १०-६६ : सचित्तद्रव्यवेदना सचित्तनोकर्मद्रव्यबन्धक . ७-४ शुक्लत्व. १३-७७ श्रेणी -३-३३, १४२, ४-७६,८० शुक्लध्यान सचित्तप्रक्रम ५-१६६; १३-३७१, ३७५, ५३.७५,७७ १५:१५ सचित्तमंगल शुक्ललेश्या १-३६०.७-१०४; ३७७ १-२८ :: सचित्तान्तर ८-३४६; १६-४८४,४८८, श्रेणीबद्ध ४-१७४, २३४ १३-६१ ४६२ श्रोत्र. १-२४७ शुक्लवर्णनाम श्रोत्रन्द्रिय सत्कर्म १३-३५८ -१३-३७० ४-३६१, ७-६६ सत्कर्ममार्गणा शुद्ध १३.२२१ १६-५१६ १३-२८०, २८६ सत्कर्मस्थान १२-२२०, २२५, शुद्धऋजुसूत्र ९-२४४ : श्रोत्रेन्द्रियार्थावग्रह १३-२२७ २३१, १६-४०८ शुद्धनय. श्रोत्रेन्द्रियईहा ७.६७ १३.२३१ सत्कर्मिकः १५-२७७ शुभ ६-६४,८१० प शुभनाम सत्ता १-१२०, १३-१६ १३-३६२, ३६५ शुभप्रकृति षट्कापक्रमनियम ४-२१८,२२६ १५-१७६ १३-६१ सत्प्ररूपणा शीतिनाम.. . .. ८२ सत् 3 -- परिशिष्ट- समयप्रबद्धार्थता सत्यप्रवाद १-११६,९-२१६ सत्यभामा १३-२६१ सत्यमनं १-२८१ सत्यमनोयोग १-२८०, २८१ सत्यमोषमनोयोग १-२८०,२८१ सत्त्व ४-१-४४, ६-२०१; ७.८२ सत्त्वप्रकृति १२-४६५ सत्त्वस्थान १२-२१६ सदनुयोग १-१५८ सदुपशम ५-२०७; ७-६१ सदेवासुरमानुष १३-३४६ सद्भावक्रियानिष्पन्न १३-४३ सद्भावस्थानबन्ध १४-५, ६ सद्धावस्थापना १-२०, १३-१०, - ४२, ४.३१४; १४-५ सद्भावस्थापनाकाल सद्भावस्थापनान्तर ५-२ सद्भावस्थापनामाव ५.१८३ सद्भावस्थापनावेदना १०-७ सनत्कुमार १३-३१६ सन्निकर्ष १३-२८४ सन्निपातफल १३-२५४ सपक्षसत्त्व १३-२४५ सप्तभङ्गी ९-२१६ सप्तम पृथिवी ४.६० सप्तम पृथिवीनारक ४-१६३ सप्तेविधपरिवर्तन ६-३ सप्रतिपक्ष १३-२६२, २६५ ८-८८ - सममिरूद १-८६ ७.२६ सम्मूछिम ५-४१, ६-४२८ समभिरूढनय :. ९-१७६ सम्यक्त्व १-५१, ३६५, ४-३५८ समय ४-३१७, ३१८,१३-२६८ ५-६, ६-३६, ४८४,४८६, समयकाल १.३-३२२ ४८८७-७, ९-६, ११७ समयप्रबद्ध ६-१४६, १४८, १३-३५८ ..२५६, १०.१६४, २०१ सम्यक्त्वकाण्डक १०-२६६,२६४ १२-४७८ सम्यक्त्वलब्धि १४-२१ समयसत्य १-११८ । सम्यग्दर्शन ' . १-१५१; ७-७; समयोग १०.४५१ १५-१२ समवदानकर्म १३-३८, ४५ सम्यग्दर्शनवांक १-११७ समवशरण ९-११३, १२८ सम्यग्दृष्टि ६४५१; ७.१०७; समवाय १-१०१, १५-२४ ८.३६३, ९-६, १८२; समवायद्रव्य १-१८ १३-२८०, २८७ समवायाङ्ग ९-१६६ सम्यग्मिथ्यात्व ४.३५८, ५-७; समाचारकाल ११-७६ ६.३६, ४८५, ४८६ समाधि सम्यग्मिथ्यात्वलब्धि १४.२१ समानजातीय ४.१३३ सम्यग्मिथ्यादृष्टि १.१६६; समानवृद्धि ९-३४ ४-३५८; ६-४५०, ४६३, समास ३-६, १३:२६०, २६२ ४६७७-११०:८-४, ३८३ समास ( जोड़) ३-२०३ सयोग १-१६१, १६२ समीकरण .४-१७८; १०-७७ सयोगकेवली १-१६१; ७-१४; समीकृत ४-५१ समुच्छिन्नक्रियानिवृत्ति १६-५२१ सयोगिकाल ४३५७ समुच्छिन्नक्रियानिवृत्तिध्यान सयोगिकेवलिन् १३-४४, ४७ १०.३२६ सयोगी समुच्छिन्नक्रियानिवृत्तिशुक्ल सरागसंयम . १२-५१ ध्यान ६-४१७ सराव १३-२०४ समुच्छिन्नक्रियाप्रतिपाति १३-८७ १३-३१६ सर्वकरणोपशामना . १५-२७५ १६-५७६ सर्वघातक ७.६६ समुदाहार ११.३०८ सर्वघाति समुद्घात '४-२६ ५.१६६, २०२ समुद्घातकेवलिजीवप्रदेश ४-४५ १२-५३; १५-१७१, ३२४ सर्वघातित्व ५-१५८ समुद्र १३.३०८ सर्वघातिसक ५-१६६, २३७; समुद्राभ्यन्तरप्रथमपंक्ति ४-१५१ समोद्दियार १३-३४ सम्पूर्ण १३-३४५ सर्वनीव १३-३४६, ३५१ सम्प्रदायविरोधाशंका ४-१५८ सर्वज सर्वतोभद्र . ८.६२ सम्बन्ध सम्भवयोग १०-४३३, ४३४ सर्वदुःखान्तकृतमाव १४.१८ सर्व.. सम .. समकरण ३-१०७; १०-७७, १३५ 'समचतुरस्त्र ४८३ समचतुरससंस्थान ६-७१ ९-१०७ समचतुरशरीरसंस्थाननाम १३-३६८ समता ५-८३, ८४ समपरिमण्डलसंस्थित ४-१७२ समभागहार -१०-२१४, ११-१२७ ७.६१, ११० ८-१, २ धवलासहितसमग्रषट्खंडागमस्य पारिभाषिक शब्द-सूची ५० . .. ".. सात : ६-२१४ सर्वपरस्थान ३-११४,२०८ सर्वपरस्थानाल्पबहुत्व ५-२८९ सर्वभाव १३-३४६ सर्वमोक्ष : ६ १६-३३७ सर्वलोक १३.३४६ सर्वलोकप्रमाण ४-४२ सर्वविपरिणामना १५-२८३ सर्वविशुद्ध सर्वविशुद्धमिथ्यादृष्टि . . ६-३७ सर्वसिद्ध ९-१०२ सर्वसंक्रम ६-१३०, २४६; १६:४०६ सर्वस्पर्श :: १३-३, ५, ७, २१ सर्वह्रस्वस्थिति ६.२५६ सर्वाकाश ४-१८ सर्वाद्धा सर्वानन्तः ३-१६ सर्वार्थसिद्धि ४-२४०, ३८७; .. सागरोपम ४-१०, १८५,३१७, सान्तरवक्रमणकाल विशेष ... ३६०, ३८०, ३८७; ५-६; १४-४७७ -१३-२६८, ३०१ सान्तरसमयोपक्रमणकोल :: सागरोपमपृथक्त्व ५-१० १४-४७४ सागरोपमशतपृथक्त्व ४-४००, सान्तरसमयोपक्रमणकालविशेष ४४१, ४८५; ५-७२ १४-४७५ १३-३५७ सान्तरोवक्रमणजघन्यकाल सातबन्धक ११-३१२ साताद्धा १४-४७६ १०-२४३ साताम्यधिक सान्तरोपक्रमणवार ४-३४० १३-५१ सान्निपातिकमा सातावेदनीय १३-३५६, ३५७ ५-१६३ सामान्य १३:१६६, २३४ सांतासात ९-२३५ सातासांतबन्धपरावृत्ति ५-१३०, सामान्य मनुष्य ७.५२, १५.६३ सामायिक १४२ १-६६,९-१८८ सादिक सामायिकछेदोपस्थापन- ८-८ सादिविससाबन्ध शुद्धिसंयत १४-३४ ८-२६८ सादिशरीरबन्ध सामायिकछेदोपस्थापना- १४.४५ सादिसान्तनामकर्म .१६-४०४ शुद्धिसंयत . ७-६१ सादृश्यसामान्य ४-३, १०-१०; सामायिकभावश्रुत ११, १३-१६६ सामायिकशुद्धि संयत १-३७३ साधन ४-३६६ सामायिकशुद्धिसंयम १-३६६ साधारण ८६ ३७० साधारणजीव १४-२२७, ४८७ साम्परायिक ४-३६१ साधारणनाम १३-३६३, ३६५ साम्परायिकबन्धन ७.५ साधारणभाव ५.९६६ सारभट ४.३१८ साधारणलक्षण १४-२२६ सावित्र ४-३१६ साधारणशरीर १-२६६,३-३३.३ | सासादन १-३६३ ६-६३, १३-३८७, १४-२२५ सासादनगुण ५-७; ६.४८५ साधिकमासे १३.३०६ सासादनकाल ४-३५१ साधु १-५१,८-८७, ३६४ सासादनपश्चांदागत- साधुसमाधि मिथ्यादृष्टि : साध्य ४-३६६ सासादनमारणान्तिक- सान १३-२४२ क्षेत्रायाम ४-१६२ सानत्कुमार ४-२३५ सासादनसम्यक्त्व .. ६-४८७ सान्तर ५-२५७ ६-७ सासादनसम्यक्त्वपृष्ठायत सान्तरक्षेत्र १३-७ ४.३२५ सान्तरनिरन्तर सासादनसम्यग्दृष्टि १-१६६; सान्तरनिरन्तरद्रव्यवर्गणा१४-६४ ६४४६, ४५८, ४५६, सान्तरबन्धप्रकृति ८.१७ ::४६६, ४७१७७.१०६; सान्तरवक्रमणकाल १४.४४७ ८-४, ३८० सर्वार्थसिद्धिविमान .. ४-८१ सर्वावधि ६-२५, ९-१४. ४७; १३-२६२ सर्वावधिजिनं. ९-१०२ सर्वावयवं १३-७ सर्वावरण ७-६३ संसिंख्यात ३-१२५ सर्वोपशम ६-२४१ सर्वोषधिप्राप्त ९-६७ सहकारिकारण ७-६६ संहस.. ४-२३५ सहस्रारं ४-२३६; १३-३१६ सहानवंस्थान १३-२१३, ३४५ सहानवस्थानलक्षणविरोध : "....४-२५६, ४१२, ७.४३६ साकारउपयोग १३-२०७ साकारोपयुक्त ६.२०७ साकारक्षय १५-२३८, २६४ सागर ३-१३२, ४-१०, १८५ . ८-७६, ८८ 4 १२-३००० .. . : ..

५१ परिशिष्ट सासंयमसम्यक्त्व.. ५-१६ सूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिः १३८३; सांख्य ६-४६०, ९-३२३ १६-५२१, ५७६ सांशयिकमिथ्यात्व ५-२० सूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिध्यान सिद्ध १-४६,४.३३६, ६-४१६; १०-३२५ ... ४७७, ९-१०२, १४-१३ सूक्ष्मकर्म १-२५३ सिद्धगति ७-६ सूक्ष्मत्व १०-४३ सिद्धभाव १४-१७ सूक्ष्मनाम १३-३६३, ३६५ सिद्धसेने. ४-३१६ सूक्ष्मनिगोदजीव १३-३०१ सिक्थ्य मत्स्य ११-५२; १२-३६० | सूक्ष्मनिगोदवर्गणा सूक्ष्मनिगोदवर्गणा १४-११३ सिद्धयत्वकाल ५-१०४ सूक्ष्मप्ररूपणा : १२-१७४ सिद्धयमानभय - ७.१७३ सूक्ष्मसाम्पराय १-३७३ सिद्धांयतन .. ९.१०२ सूदमसांम्परायकृष्टि ६-३६६ सिद्धार्थ '४-३१६ सूक्ष्मसांम्परायंकादिक ७-५ सिद्धिगति १-२०३ सूक्ष्मसाम्परायसंयत ८.३०८ सिद्धिविनिश्चय १३-३५६ सूक्ष्म साम्परायशुद्धिसंयत १.१८६ सिंहल १३-२२२ ३७१; ७-६४ सुख ६-३५; १३-२०८, ३३२, | सूक्ष्मसाम्परायिक ७-५, ६-४ ३३४, ३४१, १४-३२८ सूक्ष्माद्धा ५-११६ १५-६ सूचीक्षेत्रफल ४-१६ सुखदुखपञ्चक १५-१६४ सूत्र १-११०;८-५७; ९-२०७, सुगन्धर्व ४-३१६ २५६, १४-८ सुचक्रधर १-५८ सूत्रकृतं १-६६ सूच्यंगुल ३-१३२, १३५, ४-१० सूत्रकृतोंग ९-१६७ २०३, २१२, ९-२१ सूत्रकंठग्रन्थ १३-२८६ ९-१८३ सूत्रपुस्तक १३-३८२ सुनयवाक्य १३.३६१ सूत्रसम .९-२५६, २६१, २६८; सुभग ६-६५, ८-११ १३-२०३, १४.८ सुभगनाम .. १३-३६३, ३६६ सूरसेन १३-३३५ सुभिक्ष १३-३३२,३३६ सूर्पक्षेत्र - ४.१३ सुर -.:., १३-३६१ ४-१५०, ३१६ सुरभिगन्ध ६-७५ सूर्यप्रज्ञप्तिः १-११०, ९-२०६ सुरभिगन्धनाम १३-३७० सेचिकररूप " ५.२६७ सुषमसुषमा: ९-१२६ सेचीयादो उदय १५-२८२ सुषिरः; १३-२२१ सेन . १३.२६१ सुस्वर- ६-६५:१० सोपक्रमायु : ९८४ सुस्वरनामः .१३-३६३, ३६६ सोपक्रमायुष्क १०-२३३, २३८ सूक्ष्मः १-२५०, २६.७, ३-३३१ सोम. १३-११५, १४१ ६-६२, ५-६ सोमरुचि १३-११५, १४१ सौद्धोदन १३.२८८ सौधर्मः ४-२३५ सौधर्मइन्द्र ९-११३, १२६ सौधर्मविमान ४.२२६, २३५ सौधर्मादि ४.८६२ संनमः ... १६-४६५ संक्रमण ५-१.७१, ६.१६८ संक्रममार्गणा १६:५१६ संक्रमस्थान १२.२३१,१६:४०० संकर ९-२४० संकरअनुयोगद्वार ९-२३४ संकलन ४-१४४,१६६; १०-१२३ संकलनसूत्रः .. ३-६१,६३ संकलनसंकलना १०-२०० संकलना ४-१५६; १३-२५६ संकुट १-१२० संक्लेश ६-१८०, ११-२०६, ३०६ संक्लेशक्षय १६-३७० संक्लेशस्थान ११-२०८ संक्लेशावास १०-५१ संख्या ३.७ संख्यात ३-२६७,१३.३०४,३०८ संख्यातगुणवृद्धि ११-३५१ संख्यातभागवृद्धि १.१-३५१ संख्यातयोजन संख्यातवर्षायुप्क -८-११६, १०-२३७ संख्यातीतसहस १३-३१५ संख्येयगुणवृद्धि ६६-२२, १६६ संख्येयभागवृद्धि ६-२२, १६६ संख्येय राशि संख्येयवर्घायुष्क ११-६ संग्रह १-८८ संग्रहकृष्टि ६-३७५. संग्रहनयं. ६-६६, १०१, १०४; ९-१७०, १३.४, ५, :'. संघवेयावृत्य १३-३१४ सुपर्ण : . सूर्य .. - . ३६,१६६ धवलासहितसमग्रषट्खंडागमस्य पारिभाषिक-शब्द-सूची ५२. .५-६६, ६८ 7 संघात ६-२३, १२-४८० १३-२६०; १४-१२१ संघातज १४-१३४ संघातनकृति ६-३२६ संघातनपरिशातन ६-३२७ संघातसमास ६-२३, १२-४८० संघातसमासश्रुताज्ञान १३-२६६ संघातसमासावरणीय १३-२६१ संघातावरणीय १३-२६१ संघातिम ९-२७२, २७३ संचय ५-२४४-२७३ संचयकाल ५-२७७ संचयकालप्रतिभाग ५-२८४ संचयकालमाहात्म्य ५-२५३ संचयराशि ५-३०७ संचयानुगम १०.१११ संज्वलन ६-४४; म-१० १३-३६० संज्ञ १-१५२ संज्ञा १३-२४४, ३३२, ३३३, ३४१ संज्ञी १-१५२, २५६, ७-७, १११,८-३८६ संदन १४-३६, संदृष्टि ३-८७, १६७ संनिकर्ष १२-३७५ संनिवेश १३.३३६ संपातफल १३-२५४ संप्राप्तितः उदय १५-२८६ संबंध १४.२७ संभव १४-६७ संमिनश्रोता ५-५६, ६१, ६२ संयत ७-६१८-२६८ संयतराशि ४.४६ संयतासंयत १.१७३, ७६४ ८-४,३१० संयतासंयतउत्सेध .४-१६६ संयतासंयतगुणश्रेणि १५-२६७ संयतासंयतस्वस्थानक्षेत्र ४-१६६ संयम - १-१४४, १७६, ३७४; ४-३४३, ५-६, ६-४८८, ४६२, ४६५७-७, १४, ६१;६.११७, १४-१२ संयमकांडक १०.२६४ संयमगुणश्रेणि १०२७८ संयमभवग्रहण १५.३०५ संयमासंयम ४-३४३, ३५० ५-६, ६-४८५,४८६,४८८ संयमासंयमकांडक १०-२६४ संयोग ४-१४४, ६-१३७ १३-२५०; १४-२७,१५-२४ संयोगद्रव्य १-१८ संयोगाक्षर १३-२५४, २५६ संयोजनासत्य १-११८ संवत्सर ४-३१७, ३६५ १३-२६८, ३०० संवर ७-६; १३-२५२ संवर्ग ४-१७; १०-१५३, १५५ संवाह १३-३३६ संवेग ७-७, ८-८६ संवेदनी १-१०५, ६-२०२ संवृतिसत्य १-११८ संश्लेषबन्ध १४-३७, ४१ संसार १३-४४ संसारस्थ १३-४४ संस्थान ८.१० संस्थानअक्षर १३-२६५ संस्थाननामकर्म ४-१७६ संस्थानविचय १३-७२ संस्थानविपाकी ४-१७६ संहनन ६-५४ स्कन्ध १३-११, १४-८६ स्तव ८-८३, ८४६-२६३, १३-२०३, १४-६ स्तिवुकसंक्रम १३-५३ स्तिवुकसंक्रमण ५.२१०,६-३११ ३१२, ३१६, १०-३८६ स्तुति ६-२६३, १३-२०३ १४-६ स्तूपतल . ४-१६२ स्तोक ३-६५ स्त्यानगृद्धि ६-३१, ३२, ८-९; १३-३५४ स्त्री १-३४०, ६-४६ स्त्रीवेद १-३४०, ३४१, ६-४७; ७.७६; ८-१०; १३-३६१ स्त्रीवेदभाव ११-११ स्त्रीवेदस्थिति स्त्रीवेदोपशामनाद्धा ५-१६० स्थलगता १-११३;९-२०६ स्थलचर ११-६०,११५ १३-३६१ स्थान ५-१.६९-२१७; १०-४३४, १२-१११, १३-३३६ स्थानांग १-१००, ९-१९८ स्थानांतर १२-११४ स्थापनबंध १४-४ स्थापनवर्गणा १४-५२ स्थापना ४-३, ३१४, ७-३, १३-२०१, १४.४३५ स्थापनाउपक्रम १५.४१ स्थापनाउपशामना १५-२७५ स्थापनाकर्म १३-४१, २०१, २४३ स्थापनाकाल स्थापनाकृति ९-२४८ स्थापनाक्षर १३-२६५ स्थापनाक्षेत्र स्थापनाजिन स्थापनानन्त ३-११ स्थापनानारक S૨૬. स्थापनानिवन्धन १५-२ स्थापनाप्रकृति १३.२०१ स्थापनाप्रक्रम १५.२५ स्थापनाबन्ध १४-६ A - स्थापनाबन्धक ५३ परिशिष्ट -७५ 4. स्पर्शअल्पबहुत्व स्थापनाभाव ५-१८३, १२-१ स्थापनामोक्ष १६-३३ स्थापनामङ्गल १-१४ स्थापनालेश्या ? -४४ स्थापनाल्पबहुत्व ५.२४१ स्थापनावेदना १०७ स्थापनाशन्द स्थापनासत्य १-११८ स्थापनासंक्रम स्थापनासंख्यात ३.१२३ स्थापनास्पर्श १३-६. स्थापनास्पर्शन ४-१४१ स्थावर ६-६१,८-६ स्थावरस्थिति ५८५ स्थिति ९-२५२, २६८; १३-२०३ १४-७ स्थितश्रुतज्ञान १४-६ स्थित ४-३३६, ६-१४६; १३-३४६, ३४८ स्थितिकांडक ६-२२२, २२४; १३-८० स्थितिकांडकघात ६-२०६; १०-२६२, ३१८ स्थितिकांडकचरमफ़ालि ६-२२८, २२६ स्थितिक्षयजनितउदय १५-२८६ स्थितिघात ६-२३०, २३४. स्थितिदीर्घ १६-५०८ स्थितिबंध ६-१६६, २६०८.२ स्थितिबंधस्थान ६-१६६ ११-१४२ १६२, २०५, २२५ स्थितिबन्धाध्यवसायस्थान ६-११६ स्थितिबन्धाध्यवसान ११.३१०, १६.५७७ स्थितिवन्धापसरण ६-२३०, २३४ स्थितिमोक्ष १६-३३७:३३८ स्थितिविपरिणामना १५.२८३ स्थितिसत्कर्म १६-५२८ स्पर्शभावविधान . १३-२ स्थितिसंक्रम ६.२५६, २५८; स्पर्शसन्निकर्षविधानः १३-२ १६.३४७ स्पर्शस्पर्श १३-३, ६, ८, २४ स्थितिहस्व १६-५१० स्पर्शस्पर्शविधान १३-२ स्थिर ६-६३, ८-१०, १३-२३६ स्पर्शस्वामित्वविधानं १३-२ स्थिरनाम १३-२६३, २६५ स्पर्शानुगम .१-१५८,४-१४४ स्थूलप्ररूपणा १२-१७४ | स्पर्शानुयोग १३-१, १६ स्निग्धनाम १३-३७० स्पृष्टयस्पृष्ट १३.५२ स्निग्धनामकर्म स्फटिक १३-३१५ स्निग्धस्पर्श १३-२४ स्मृति ९-१४२, १३-२४४, स्पर्द्धक ७.६१, १०-४६२, ३३२, ३३३, ३४१ १२.६५ स्याद्वाद ९-१६७ स्पर्द्धकान्तर १२-११८ स्वकर्म १३-३१६ स्पर्श ६५५, ८-१०, १३-१, ४, स्वकप्रत्यय ४-२३४ ५,७,८,३५ स्वक्षेत्र १३-३१६ स्पर्शअनुयोगद्वार ९.२३३, स्पप्न ९-७२, ७४ १३-२ स्वप्रत्यय स्पर्शअन्तरविधान स्वयंप्रभपर्वत ४-२२१ १३-२ स्वयंप्रभपर्वतपरभाग ४-२१४ १३-२ स्पर्शकालविधान स्वयंप्रभपर्वतपरभागक्षेत्र ४-१६८ १३-२ स्पर्शक्षेत्रविधान: स्वयंप्रभपर्वतोपरिमभाग ४.२०६ १३.२ स्पर्शगतिविधान १३.२ स्वयंभू १-१२० स्पर्शद्रव्यविधान १३-२ स्वयंभूरमणक्षेत्रफल ४.१६८ स्पर्शन १-२३७ स्वयंभ्रमणसमुद्र ४-१५१, १६४ स्पर्शनयविभाषणता १३-२, ३ स्वयंभूरमणसमुद्रविष्कम्भ ४-१६८ स्पर्शनानुगम १३-१०० स्वर ९-७२; १३-२४७ स्पर्शनाम १३-३६३, ३६४, स्वसमयवक्तव्यता १.८२ स्वसंवेदन ९.११४ ३७० स्पर्शनामविधान १३-२ स्वरितक १३-२६७ स्पर्शनिक्षेप १३.२ स्वस्थान ४-२६, ६२, १२१ स्पर्शनेन्द्रिय ४.३६१ स्वस्थानअल्पबहुत्व ३.२१४, स्पर्शनेन्द्रिय अर्थावग्रह १३-२२८ २०८:५२८९ ९-४२६ स्पर्शनेन्द्रियईहां १३-२३१,२३२ स्वस्थानक्षेत्रमेलापनविधान स्पर्शनेन्द्रियव्यञ्जनावग्रह ४-१६७ १३.२२५ स्वस्थानजयन्यस्थिति ११.३१६ स्पर्शपरिणामविधान १३.२ स्वथानस्वस्थान ४.२६, १६६: स्पर्शप्रत्ययविधान १३-२ स्पर्शग्रवीचार स्वस्थानस्वस्थानराशि ४-३१ सर्शभागाभागविधान १३.२ स्वातिशरीरसंस्थान ६-७१ : 1 धवलासहितसमग्रषटखंडागमस्य पारिभाषिक शब्द-सूची ५४ स्वाध्याय स्वामित्व १३-६४ ८-८; १०-१६ ६-४६१ हतहतसमुत्पत्तिक हर हरि हरिद्रवर्णनाम १२.६०,६१ १३-२८६ १३-२८६ १३.३७० ४-१६ हिरण्यगर्भ १३-२८६ हिंसा १४.८,६,६० हुण्डकशरीरसंस्थान ६-७२ हुण्डकशरीरसंस्थाननाम १३-३६८ स्वास्थ्य ८-७ स्वोदय हतसमुत्पत्तिक १०-२६२, ३१८, १५-११८; १६-५४२ हतसमुत्पत्तिकक्रम १६-४०२, ४०३ हतसमुत्पत्तिकर्म १२-२८, २६; १५-११२ हतसमुत्पत्तिकस्थान १२-२१६, २२० हानि ४-१६ हायमान १३-२६२, २६३ हायमानश्रवधि ६-५०१ हार ३.४७ हारान्तर ३.४७ हारिद्रवर्णनामकर्म ६-७४ हास्य ६-४७, ८-१०; १३-३६१ हुताशन ४-३१६ हेतु १३.२८७ हेतुवाद ४-१५८, १३-२८०, २८७ हेतुहेतुमद्भाव ५-३२२ हेमपाषाण ४-४७८ ह्रस्व १३-२४८ ! ।

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The Satkhandagama (vol -xvi)

Author
Dr.jain Hiralal
Title
The Satkhandagama (vol -xvi)
File name
The Satkhandagama (vol -xvi)
Text
OCR done
Citation
1958
Published
2010/09
Publisher
Hindi - Sahity - Sammelan, Prayag
Language
Sanskrit
Pages
338
Library
Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
DLI number
327397
Barcode
99999990002279.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
6RebQ4vluWc
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