Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
Samadhan Chandrika
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(क) सम्पादकीय वक्तव्य गतवर्ष सोनगढ़ से श्रीकानजी महाराज बम्बई इंदौर फीरो- जाबाद कानपुर बनारस मादि में घूमते हुए संघ सहित श्री सम्मेदशिखर जी एवं ईशरी भी पधारे थे, उस समय तक बहु- भाग समाज को यह आशा हो गई थी, की पूज्य वर्णी १०५ श्री गणेश प्रसाद जी एवं श्री कान जी महाराज के सुवर्णमयसुयोग तत्त्वनिर्णय हो जायगा। इसी आशा से सारी उपस्थित समाज ने भगीरथ प्रयत्न भी किया, परन्तु श्री कानजी महाराज आशावान् समाज को निराशदशा में ही छोड़कर टाटानगर चितरंजन कलकत्ता दिल्ली आदि की शैर करते हुए स्वल्प काल में ही स्वस्थानासीन हो गये। मधुवन मधुर भाषणों से साधारण जनता उनके प्रभाव में भावुक न हो जाय और समीचीन दि० जैन सिद्धान्त की अनुयायी बनी रहकर ही आत्मकल्याण करती रहे। इस सद्भावना से प्रेरित कलकचा निवासी श्री पं० बाबू लाल जी शास्त्री ने पाँच प्रश्न उक्त वर्णीजी महोदय के पास भेजे। परन्तु अस्वस्थता के कारण वे स्वयं उत्तर नहीं लिख सके, इसी से श्रीमान् पं० शिखर चंद्र जी शास्त्री को आदेश दिया कि भाप इन का विशद उत्तर लिखो। वर्णीजी की आज्ञानुसार शास्त्री ने यह समाधान- चंद्रिका लिखकर वर्णी के सामने उपस्थित कर दी। प्रसंग वश हमें वर्णी की जी वंदना का सुयोग मिला और वहाँ ही यह आदेश भी मिला कि आप इसको छपा कर जैन के के समाज
.
फलतः उन
से
(ख)
सामने उपस्थित कर दो।
इस आदश का संदेश हमने
प्रकाशक महोदयों से किया।
की
सहायता यह
प्रकाश में आसकी। इसकी सफलता तभी समझी जायगी
जब कि समाज इसका अनुभव पूर्ण स्वाध्याय करके अपना
आत्महित साधन करे। और भ्रान्त विचारों को छोड़कर
अनेकान्त सिद्धान्त के अनुसार अपने गृहस्थोचित षट्कों के
पालन में दत्त चित्त रहे।
विनीत :-
शिवजी राम जन पाठक
ता०२०-१२-५७
-
रॉची
(ग) लेखक का, आद्य निवेदन गर कलकत्ता निवासी श्रीमान् पण्डित बाबूलालजी शास्त्री पूज्य वर्णी जी के पास पाँच प्रश्न भेजे थे, और वर्णी जी से प्रार्थना की थी कि आप इन प्रश्नों का आगमानुसार उत्तर देकर कृतार्थ करें । परन्तु श्रीवर्णीजी महाराज शारीरिक असमर्थता के कारण स्वयं उत्तर देने की इच्छा रहते हुए भी उत्तर नहीं दे सके। इधर कलकत्ता वालों की अधिक प्रेरणा थी। इस लिये मुझे वर्णीजी ने आज्ञा दी, कि तुम इन प्रश्नों का उत्तर संक्षेप में लिखो तदनुसार जैसा कि मैंने आज तक श्रोवर्णीजी के निकट में श्रवण, पठन और मनन किया है, वैसा ही आगम प्रमाणों के साथ समाधान लिखा है.। वस्तुतः यह समाधानचन्द्रिका पूज्य वर्णीजी श्रीगणेशप्रसादजी महाराज की है, जैसा कि अन्त में दिये हुए उनके प्रवचन से स्पष्ट होता है, मैने तो केवल लिखा मात्र ही है। अतः श्राशा की जाती है कि जिज्ञासु भन्य जीवों को इसके द्वारा वस्तुस्वरूप को निर्णय करने में यथेष्ट सहायता मिलेगी । और वास्तविक जैन सिद्धान्तों की गहरी छाप शंकितवृत्ति का अभाव कर आत्म- कल्याण की प्रेरक होगी। अात्मगेवषी:- शिखरचन्द्र जैन ईशरी।
(घ)
'प्रकाशक के दो शब्द
गत आषाढ़ में चिलं महावीरप्रसाद के विवाहार्य
हम डालटनगञ्ज गये थे । वहाँ पर रॉची निवासी
श्रीमान् पण्डित शिवजीरामजी जैन
पाठक ने हमें
यह समाधानचन्द्रिका दिखाई, और हमें प्रकाशित करने
के लिये प्रेरित किया, तदनुसार हमने इसे प्रकाशित किया
है। श्रीमान् पण्डित शिखर चन्द्र जी शास्त्री ईशरी बालों
ने इसको लिखकर और उक्त पाठक जी ने इसका सम्पादन
करके श्रीकानजी महाराज के अभिभाषणों से दिग्भ्रांत
भव्य जीवों को जो जैन आगमानुकूल आत्म कल्याण का
मार्ग सुझाया है वह अनुपम और ग्राह्य है। हमें आशा
है कि इसको पढकर लोग जैन धर्म के अनेकांतसिद्धान्त
पर ध्यान पूर्वक दिव्यदृष्टि से शुद्धचैतन्य स्वरूप पर श्रद्धा
रखते हुए यथाशक्ति एवं यथावकाश व्यवहार धर्मस्वरूप
अपने कर्तव्यों पर दृढ़ रहेंगे, ताकि वर्तमान अशुद्ध पर्याय
से छुटकारा पाकर क्रमश. शुद्धात्मस्वरूप की प्राप्ति हो जाय ।
हम उक्त विद्वानों के हृदय से आभारी हैं कि इनकी कृपा
से हम अपने कर्तव्य में कुछ सफल हुए हैं।
हजारीबाग
ता० २० -१२५७
मांगीलाल कन्हैयालाल जैन!
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श्रीवीरें सन्मति नत्वा गुरुवर्णिप्रकाशिता ॥ व्यक्ता शिखरचन्द्रय सुसमाधानचन्द्रिका ।। श्री १०५ पूज्य गुरुवर्य श्रीगणेशप्रसादजी क्षुल्लक के द्वारा मैंने दो अक्षरों का सुबोध प्राप्त किया है, उस गुरुऋण को चुकाने में अपने को असमर्थ पाकर मैं इस पुस्तिका के रूप में श्री गुरुदेव के करकमलों में भपनी श्रद्धाञ्जलि समर्पण करता हूँ। पो० ईशरी बाजार (हजारीबाग) आषाढ़ी गुरु पूर्णिमा संवत् २०१४ श्रद्धावनत चरण चंचरीक शिखरचन्द्र जैन । श्री पण्डित शिखरचन्द्र जी ने उपादान निमित्तादि के ऊपर सप्रमाण लेख लिखा है। आशा है कि विद्व- द्वर्ग इस पर विचार कर अपनी सम्मति लिखेंगे। -~-गणेश वर्णी ।
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Pal ॐ श्रीवीतरागायः नमः 'वामानंदन कलपतरु जयो जगत हितकार ॥ मुनिजन जाकी प्राश करि जाचे शिवफल सार ॥१॥ प्रथम प्रश्नः-सोनगढ़ के प्रकाशित मोक्षमार्ग प्रकाशक की किरणें भाग २ में पृष्ठ २२ पर यह लिखा है कि "कर्म के कारण विकार होता है-ऐसा जो मानता है, वह मिथ्या दृष्टि है। वह वस्तु के पणिमन स्वभाव को नहीं जानता है”। तथा पत्र २५ पर लिखा है कि "रागादिभाव तू स्वतंत्र करे वो होते हैं किन्तु कर्म के कारण नहीं होते"। पत्र २६ पर लिखते हैं कि 'जो ऐसा मानता है कि कर्म के निमित्त से विकार होता है, वह निश्चय और व्यवहार दोनों का आभासी है"। एवं हिन्दी आत्मधर्म नं० १३८ टाइटिल पेज ३ पर चरित्र पाहुड़गाथा ५ के प्रवचन में लिखा है कि "कहीं ऐसा नियम नहीं है, कि जितने प्रमाण में कर्मों का उदय हो, उतने ही प्रमाण में डिगरी टू डिगरी विकार हो। अतः उदयानुसार विकार होता है-यह मान्यता विलकुल विपरीत है”। क्या उपयुक्त अभिप्राय आगमानुकूल है ? कर्मोदय व विकारी भावों में क्या सम्बन्ध है ? समाधान:-इस प्रश्न पर विचार करते हुये यह सोचना है कि आत्मा स्वतंत्र होकर रागादि करता है या अन्य कारण है ?
तथा
( २ )
विकार को जो ऐसा मानते हैं, कि वह अपने आप होता है।
इस प्रकार की मान्यता मे यह सिद्ध करना कैसे बनेगा कि
वह इस परिमाण (तीन मंद धादि) में इस शुभ अशुभ सुख
दुख आदि के फल वाला होता है ? यह तो निर्विवाद है कि
रागद्वेपादि भाव तर तमरूप से हैं। एक प्रकार के नहीं।
इन्हें विकार ही सर्वत्र कहा है। कहीं भी इनका स्वभावरूप
से कथन नहीं मिलता है। क्योंकि स्वभाव मे तरतमता
नहीं होती है। विकार को जीव स्वतंत्र होकर नहीं करता है-
ऐसा आगम में प्रश्न उठाकर उत्तर दिया गया है-
रागादयो बंधनिदानमुक्तास्ते शुद्ध चिन्मात्रमहोऽतिरिक्ताः ।
आत्मा परो वा किमु तन्निमित्तमिति प्रणुन्नाः पुनरेवमाहुः ।
कलश १७४ समयसार बंध०
जह फलिहमणी सुद्धो ण सयं परिणमइ रायमाईहिं ।।
रंगिजदि अण्णेहि दुसो रत्तादिएहिं दव्वेहिं । २७८ ।।
एवं णाणी सुद्धो ण सयं परिणमइ रायमाईहिं ।।
राइजदि अण्णेहिं दुसो रागादीहिं दोसेहिं ।।२७६।। समयसार
कलश अर्थः-रागादिको वंध का कारण कहा है और उन्हें
शुद्ध चैतन्यमात्र ज्योति से (आत्मा से) भिन्न कहा है, तब प्रश्न
होता है कि उस रागादिका निमित्त आत्मा है या कोई अन्य ?
इस प्रश्न से प्रेरित होते हुये आचार्य भगवान इस प्रकार
कहते हैं । ॥१७४||
गाथा-अर्थः-जैसे स्फटिकमणि शुद्ध होने से रागादि रूप से
(ललाई आदि रूप से) अपने आप परिणमता नहीं परन्तु अन्य
रक्तादि द्रव्यों से वह रक्त (लाल) आदि किया जाता है । उसी
( ३ )
प्रकार ज्ञानी अर्थात् आत्माशुद्ध होने से रागादिरूप अपने
आप परिणमता नहीं है परन्तु अन्य रागादि दोषों से वह
रागी आदि किया जाता है। २७८-२७६ ।।
इस प्रकार जीव को स्वतंत्र होकर कर्ता मानने में प्रत्यक्ष,
अनुमान तथा आगम प्रमाणों से विरोध आता है।
यदि रागादि होने में कोई कारण है तो क्या भगवान के
ज्ञान का प्रतिभास है या स्वयं द्रव्य है या उसी द्रव्य के अन्य
गुण, अथवा द्रव्यकर्म ? भगवान के ज्ञान का प्रतिभास कारण
कहें तो यह कहना ठीक नहीं है क्यों कि ज्ञान का ज्ञेय (अन्य
द्रव्य, गुण, पर्याय-विकार आदि) के साथ शेयज्ञायकसंबध है
कारण कार्य संबंध नहीं हैं। रागादि के जो तरतम भाव होता
है, अब उसी को देखना है कि उस समय आत्मा में भगवान के
ज्ञान के प्रतिभास
अनुसार
जो रागादि हुवे-तो क्या वे
भगवान के ज्ञान के प्रतिमास में तरतम रूप से आये,सो यहां भी
हमारी संसारी आत्मा में रागादि तरतम होगये। यदि ऐसा
माना जावे तो रागादिका तरतमभावरूप भगवान के ज्ञान के
आधीन हो जावेगा। और भगवान के ज्ञान के प्रतिभास के
निमित्त कर्तापने का प्रसंग आ जावेगा।
के
यदि स्वयं द्रव्य को रागादि कारण का माना जावे तो स्वयं
आत्मा अपने चारित्रगुण का घातक बन जावेगा। द्रव्य स्वयं
भाव का घातक होता नहीं है।
यदि रागादि उत्पन्न होने में आत्मा के अन्यगुणों को
कारण माने तो यह पक्ष भी नहीं बनता,क्यों कि एक गुण दूसरे
गुण का उत्पादक या घातक नहीं होता। यदि एक गुण दूसरे
गुणों का घातक हो तो वस्तु का अभाव हो जावेगा।
( ४ )
द्रव्यमर्म रागादि का कारण है यह बात उपर्युक्त कथन
से स्वयं सिद्ध हो जाती है फिर भी उसका खुलासा इस
प्रकार है :-
परपरिणतिहेतोोहनाम्नोऽनुभावा-
दविरतमनुभाव्यव्याप्तिकल्मापितायाः ।।
मम परमविशुद्धिः शुद्धचिन्मात्रमुर्ते-
भवतु समयसारव्याख्ययैवानुभृतेः ॥३॥ समयसार कलश
अर्थः-श्रीमत् अमृतचन्द्राचार्य देव कहते हैं कि इस समयसार
(शुद्धात्मा तथा ग्रन्थ) की व्याख्या (टीका) से ही मेरी
अनुभूति की अर्थात् अनुभवनरूप परिणति की परमविशुद्धि
(समस्त रागादि विभाव परिणति रहित उत्कृष्ट निर्मलता) हो।।
यह मेरी परिणति, परपरिणति का कारण जो मोह नामक
फर्म है, उसके अनुभव से (उदयरूप विपाक से) जो अनुभाव्य
(रागादिपारिणमों) की व्याप्ति है, उससे निरन्तर कल्माषित
(मैली) है और में द्रव्यदृष्टि से शुद्ध चैतन्यमात्र मूर्ति हूँ।
इस कलश में मोह कर्म को रागादि परिणति का कारण
बताया है। इसी प्रकार कथन करनेवाली समयसार में
२८२ गाथा यादि हैं।
जैसे अभी राग की उत्पत्ति का विचार किया उसी प्रकार
वीतरागता पर्याय के प्रतिबंधक का भी विचार करते है।
क्या वीतरागता का प्रतिबंधक अपना द्रव्य ही है या अपने
गुण या अन्य कोई।
( ५ )
यदि वीतरागता रूप पर्याय का श्रावारक (प्रतिबंधक) अपना
द्रव्य ही माना जावे तो राग का भी प्रतिबंधक उसी समय
अपना द्रव्य हो जावे, अपना द्रव्य अपने स्वभाव के लिये
प्रतिबंधक हो-ऐसा तो कहीं सिद्धान्त ही नहीं है। नहीं तो
कोई भी द्रव्य सत् रूप नहीं ठहर सकता।
तव वीत्तरागता का प्रतिबंधक अपनी आत्मा के अन्य
गुणों को कहा जाय जैसे ज्ञानादि, तव भी विवाद उपस्थित
होता है कि वे ज्ञानादि गुण कैसे दूसरे गुण के बाधक हो
सकते हैं? नहीं हो सकते। इसलिये अन्य कोई द्रव्यकर्म
कारण ही बाधक ठहरता है।
दो विरोधी (राग और वीतराग) बाते एक साथ देखी
नहीं जातीं। रागादि के प्रभाव से वीतरागता होती है। जैसे-
जैसे रागादि क्षीण होते हैं, वैसे-वैसे वीतरागभाव होते हैं ।
जैसे-जैसे प्रमाण में वीतरागभाव होते हैं, वैसे-वैसे रागादिका
अभाव परिचय में आता है। इस प्रकार अन्वय (उत्पाद) और
व्यतिरेक (प्रतिबंध ) दृष्टि द्वारा कथन किया है। इस कथन से
द्रव्यकर्म को ही कार्यकारणपना सिद्ध होता है। कहा भी है:-
अन्वयव्यतिरेकगम्यो हि कार्यकारणभावः ।
जब वस्तु को आश्रयकर अध्यवसान होते देखे जाते हैं,
तब द्रव्यकर्म को रागादि होने में निमित्त न मानना कितनी
बड़ी भारी भूल है।
-
दृष्टान्त-जैसे थर्मामीटर में डिगरी शरीर की गर्मी को
सूचित करती है। यदि शरीर की गर्मी निमित्त न होती तो
हम उसको गर्मी का मापक ही कैसे कहते ? तथा डिग्री के
( ६ ) हीनाधिकपना से गर्मी का होनाधिकपना भी क्योंकर मानते ? तथा उपचार भी थर्मामीटरका न कर शरीरका ही क्यों करते ? इन प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि विकार के होने मे कारण कोई पर ही है उस पर का नाम द्रव्यकर्म है । पर के प्रभाव का कथन समयसार मे इस प्रकार है:- टीका-उपयोगस्य हि स्वरसत एवं समस्तवस्तु स्वभावभूतस्वरूपपरिणामसमर्थत्वे सत्यनादिवस्त्वंतरभूतमोह- युक्तत्वान्मिथ्यादर्शनमज्ञानमविरतिरिति त्रिविधः परि- णामविकारः। स तु तस्य स्फटिकस्वच्छताया इन परतोऽपि प्रभवन् दृष्टः। यथा हि-स्फटिकस्वच्छतायाः स्वरूप परिणामसमर्थत्वे सति कदाचिन्नीलहरितपीततमाल कदलीकांचनपात्रोपाश्रययुक्तत्वान्नीलो हरितः पीत इति त्रिविधः परिणामविकारो दृष्टस्तथोपयोगस्यानादिमिथ्या दर्शनाज्ञानाविरतिस्वभाववस्त्वंतरभूतमोहयुक्तत्वात् मिथ्या दर्शनमज्ञानमविरतिरिति त्रिविधः परिणामविकारोव्यः .4 भावार्थ :-आत्मा के उपयोग में यह तीन प्रकार का परिणाम विकार अनादिकर्म के निमित्त से है। ऐसा नहीं है कि यह पहले शुद्ध ही था, अब इसमे नया परिणास विकार हो गया है। यदि ऐसा हो तो सिद्धों के भी नया परिणाम विकार होना चाहिये, किंतु ऐसा नहीं होता। इसलिये यह समझना चाहिये कि वह अनादि से ही है।
( ७ ) ऊपर के रेखाङ्कित पदों से स्पष्ट हो गया कि परनिमित्त का तथा परके प्रभाव का कथन कितना सत्य है। अतः उस द्रव्यकर्म की पड़ी हुई अनुभागशक्ति के तरतम उदय से विकार में तारतम्य मानना ही सम्यग्दृष्टिपना है। जो द्रव्यकर्म को कारण नहीं मानता है, वही सिथ्यादृष्टि है। यदि द्रव्यकर्म को न मानें तो सुखदुःख का दाता कौन बनेगा? आत्मा ने जिस समय शुभ अशुभ भाव किवे, तब वे तो दूसरे समय में नष्ट हो गये, अब आत्मा में बंध कैसे बना? तथा आगामी तारतम्यरूप फलकी व्यवस्था भी कैसे बनी ? ऐसा है नहीं कि तत्काल के शुभाशुभ आव ही आत्मा में आत्मा के लिये आगामी सुखदुःख के कारण हो जाय । समयसार के बंधाधिकार में साता असाता कर्म को सुख दुःख का कारण कहा है। तथा आयुकर्म के उदय और आयुकर्म के क्षयको जीवन मरण का कारण कहा है। इसके लिये गाथा २४७ से २६१ तक रेखें। सब का निचोड़ (सारांश) इस कलश में कह दिया है। सर्व सदैव नियतं भवति स्वकीय- कर्मोदयान्सरणजीवितदुःखसौख्यम् ।। अज्ञानमेतदिह यत्तुपरः परस्य । कुर्यात्पुमान्मरणजीवितदुःखसौख्यम् ।।१६८।। इस कलश में अपने कर्मोदय से सुखदुःखादि मानना (मिथ्यात्व) नहीं बताया, प्रत्युत नियत अर्थात् निश्चय (सम्यक्त्व) बताया है। अन्य दृष्टान्त: एक दृष्टान्त इसी विषय में याद आ गया है सकते। (८) कि वक्ता अपने अभिप्राय को वचनों से प्रकट करता और वे वचन रिकार्ड मशीन में रिकार्ड (अंकित) हो जाते हैं। जैसे तीव्र मंद कण्ठ तालु ओष्ठ जिह्वादि के संबंध से निकले वचन होते हैं वैसे ही मशीन में आ जाते हैं और वे फिर सुने जा सकते हैं परन्तु मशीन के अभाव में वे वचन नहीं पकड़े जाने से नष्ट हो जाते हैं तथा आगामी भी श्रवण नहीं किये जा उस मशीन के रिकार्ड से वक्ता को अपने वचन फिर स्वीकार करने पड़ते हैं कि मैंने ऐसे कहे हैं। अब दार्टान्त पर ध्यान दीजिये। इसी प्रकार द्रव्यकर्म हैं। द्रव्यकर्म में तीव्र मंदादि रागादि होने के समय में ही स्थिति अनुभाग पड़ जाता है। और वे अनुभाग युक्त द्रव्यकर्म जिस प्रमाण के होते हैं वैसे ही अपना फल देते हैं। यद्यपि मशीन वक्ता से भिन्न है तथापि वक्ता के पूर्व वचनों को निर्देशक है। इसी प्रकार द्रव्यकर्म भिन्न होते हुवे भी एक क्षेत्रावगाह रूप से स्थित हैं और वे ही आत्मा के विकार के उत्पादक हैं। समयसार गाथा २०४ निर्जरा अधिकार की टीका मे यही कहा और तारतम्य की सिद्धि का भी प्रमाण यही एक पुष्कल है। तथाहिः-यथात्र सवितुर्घनपटलावगुण्ठितस्य तद्विघटनानु- सारेण प्राकट्यमासदयतः प्रकाशनातिशयभेदा न तस्य प्रकाशस्वभावं भिंदंति । तथा-आत्मनः कर्मपटलोदया- वगुण्ठितस्य तद्विघटनानुसारेण प्राकट्यमासादयतो ज्ञाना-- तिशयमेदा न तस्य ज्ञानस्वभाव भिन्युः। किन्तु प्रत्युत. तमभिनन्देयुः।
(६ ) संसार की उत्पत्ति और उसके निरोध को समयसार के संवर अधिकार गाथा १९०-१६१-१९२ में इस प्रकार बताया है। तेसिं हेऊ भणिया अज्झवसाणानि सव्वदरिसीहि । मिच्छत अण्णाणं अविरयभावो य जोगो य ॥१०॥ हेउ अभाव णियमा जायइ णाणिस्स आसर्वाणरोहो । आसवभावेण विना जायइ कम्मस्स वि णिरोहो ॥१६॥ कम्मस्स अभावेण य णोकम्माणं पि जायइ हिरोहो । लोकम्मणिरोहेण य संसारणिरोहणं होई ॥१६२।। टीकाः-संति तावजोवस्य श्रात्मकमैकत्वाध्यासमूलानि मिथ्यात्वाज्ञानाविरतियोगलक्षणानि अध्यवसानानि । तानि रागद्वेषमोहलक्षणस्यास्रवभावस्य हेतवः । आस्त्र- वभावः कर्महेतुः । कर्म नोकर्महेतुः। नोकर्म संसारहेतु: इति। ततो नित्यमेवायमात्मा प्रात्मकर्मणोरेकत्वाध्यासेन मिथ्यात्वाज्ञानाविरतियोगमयमात्मानमध्यवस्यति । ततो रागद्वषमोहरूपमास्त्रवभावं भावयति । ततः कर्म आस्रवति । ततो नोकमै भवति । ततः संसारः प्रभवति । यदा तु श्रात्मकर्मणोर्मेदविज्ञानेन शुद्धचैतन्यचमत्कार मात्रमात्मानमुपलभते तदा मिथ्यात्वाज्ञानविरतियोग- लक्षणानां अध्यवसानानां आस्रवभावहेतूनां भवत्यभावः । तदभावे रागद्वेषमोहरूपासवभावस्य भवत्यभावः। तदभावे भवति कर्माभावः। तदभावे भवति नोकर्माभाव। तद ( १० ) भावे हि भवति संसाराभावः। इत्येष संवरक्रमः ।। अब देखिये निमित्तनैमित्तिकभाव की सिद्धि में प्रमाण:- रायम्हि य दोसम्हि य कसायकम्मेसु चेव जे भावा ।। तेहिं दु परिणमंतो रायाई बंधदि पुणो वि ॥२८१।। रायझि य दोसहि य कसायकस्मेसु चेव जे भावा ॥ तेहिं दु परिण मतो रायाई बंधदे चेदा ।।२८२॥ समयसार बंधाधिकार । टीका:-यथोक्तं वस्तुस्वभावमजानंस्त्वज्ञानी शुद्धस्वभा- वादासंसारं प्रच्युत एव । तत कर्मविपाकप्रभवै रागद्वेष मोहादिभावैः परिणभमानो ज्ञानी रागद्वपमोहादिभावानां कर्ता भवन् वध्यत एवेति प्रतिनियमः ॥२८१॥ य इमे किलाज्ञानिन पुद्गलकर्मनिमित्ता रागद्वपमोहादि- परिणामास्त एव भृयो रागद्वेपमोहादिपरिणामनिमित्तस्य पुगलकर्मणो बंधहेतुरिति ।।२८२।। इत्यादि प्रमाणों से समयसारादि सब ग्रंथ यही भाव सूचित करते हैं कि कर्म के कारण विकार होता है। रागादि विभाव आत्मा मे हुवे है। प्रात्मा को छोड़ अन्य द्रव्यों में नहीं पाये जाते । परन्तु आत्मा को सब अवस्थाओंसे नहीं पाये जाते अतः रागादि असाधारण भी नहीं है। इसलिये द्रव्यकर्मसे भावकर्मका निमित्तनैमित्तिक संबंधहै। ऐसा मानना मिथ्याष्टिाना नहीं है। किंतु सम्यक्त्व है। ऐसे द्रव्य कर्म के मानने से ही जैनागमों मे ईश्वरके कर्त्त त्व का संडन किया है। अन्यमतवालों ने ईश्वर को सदामुक्त ( ११ ) निमित्तकर्ता मानाहै। उसके निषेधका कथन स्पष्ट है । अन्यथा ईश्वर के इच्छा, शरीर तथा प्रयत्नादि मानने पड़ेंगे। इस तरह का ईश्वर स्वीकार नहीं किया गया है। अतः जैनशास्त्रों में ईश्वर के बजाय द्रव्यकर्म का सृष्टि का कारण माना है। जैसा कि उपयुक्त गाथावों के कथन से स्पष्ट है। अन्यथा द्रव्यकर्म के अभाव में आत्मा को पूर्ण विकास स्वरूप स्वतंत्र कहना पड़ेगा। संसार में आत्मा की विकार रूप परिणति परके संबंध से ही होती है। अकेला द्रव्य विकृत नहीं होता है। जैसे नेत्र में कम दीखने से या अन्यथा दीखने से अथवा न दीखने से विकार का निश्चय होता है। उस विकार के कारण अंतरंग बहिरंग दोनों होते हैं । अंतरंग तो प्रात्मा का परिणमन है तथा कर्म का उदय है तथा बहिरङ्ग उपकरणादि के दोष है । आवार्य-आवारकपने की सिद्धि इस तरह आत्मा की पर्यायों को आवार्य और द्रव्यकर्मों को आवारक मानना चाहिये। कर्म के उदय को निमित्त न मानने पर आगम आज्ञा का लोप का प्रसङ्ग उपस्थित होता है। समयसार में भाव्यभावक संकर दोष के परिहार से जितमोह शब्द ले स्तुति गाथा ३२ में की हैं- उसमें पहले भाव्यभावक का स्वरूप कहा है और फिर भेदविज्ञान के वल से भाव्यभावक का परिहार बताया है। देखो गाथा ३२ की टीका:- । यो हि नाम फलदान समर्थतया प्रादुर्भूय भावकत्वेन भवंत- मपि दूरत एव तदनुवृत्तेरात्मनो भाव्यस्य व्यावत नेन ( १२ ) हठान्मोहं न्यक्कृत्योपरतसमस्तभाव्यभावकसंकरदोष- वेनैकत्वे टंकोकीर्ण विश्वस्योपरि तरता प्रत्यक्षो- द्योततया नित्यमेवांतःप्रकाशमानेनानपायिना स्वतः सिद्धेन परमार्थसता भगवता ज्ञानस्वभावेन द्रव्यांनरस्वभाव भाविभ्यःसर्वेभ्यो भावांतरेभ्य: परमार्थतोऽतिरिक्तमात्मानं संचेतयते स खलु जितमोहो जिन इति द्वितीया निश्चय- स्तुतिः ॥३२॥ मोह कर्म फल देने की सामार्थ्य से प्रगट उदयरूप होकर भावकपने से प्रगट होता है तथापि तदनुसार जिसकी प्रवृत्ति है एसा जो अपना आत्मा भाव्य उसको भेद ज्ञान के बल द्वारा दूर से ही अलग करने से इस प्रकार वलपूर्वक मोह का तिरस्कार करके समस्त भाव्यभावक संकरदोप दूर हो जाने से एक्त्व से टंकोत्कीर्ण (निश्चल ) ज्ञानस्वभाव के द्वारा अन्य द्रव्यों के स्वभावों से होनेवाले सर्व अन्य भावों से परमार्थतया भिन्न अपने आत्मा को जो अनुभव करते हैं, वे निश्चय से जितमोह जिन हैं। अर्थ :- भावार्थ:- भावक मोह कर्म के अनुसार प्रवृत्ति करने से अपना आत्मा भाव्यरूप होता है, उस (भाव्य-रागादि ) को भेदज्ञान के बल से भिन्न अनुभव कहनेवाले जितमोह जिन हैं। यहां ऐसा आशय है कि श्रेणी चढते हुये जिसे मोह का उदय अनुभव मे न रहे और जो अपने बल से उपशमादि करके श्रात्मनुभव करता है उसे जितमोह कहा है।
श्रीअमृतचंद्र जी सूरि ने भावक मोह कर्म तथा भाव्य
रागादि को प्रगट स्पष्ट कर दिया है और उपशम क्षय रूप -
जीतने का वर्णन किया है। इससे ही भावार्य आवारकपने
की भी सिद्धि हो जाती है। ऐसी आगम की आज्ञा की रक्षा
करना हमारा कर्त्तव्य है। अतः विकार के होने में कारण
द्रव्यकर्म तथा अन्य वाद्य पदार्थों को स्वीकार करना चाहिये।
वस्तु की सीमा में वस्तु का परिणमन है तथापि सोपाधि होने
से आत्मा का त्रिविध प्रकार का परिणमन हो जाता है। यहां
उपाधि का अर्थ द्रव्यकर्म सिवाय दूसरा हो ही नहीं सकता।
देखो समयसार कर्ताकर्म अधिकार ।
एएसु य उवोगो तिविहो सुद्धो णिरंजणो भावो ।।
जं सो करेदि भावं उवोगो तस्स सो कत्ता ।।
इस गाथा में उपाधि के स्थान पर अंजन शब्द का
प्रयोग किया है।
दृष्टान्त-दान्ति
जैसे कांच में पीछे मसाला की उपाधि लगी रहने से मुख
दीखता है। नहीं तो कुछ न दीखै । इसा तरह आत्मा में
कर्मों की उपाधि लगी हे सो सांजन होने से नाना प्रकार
विकार भावों को प्राप्त होता है। इससे द्रव्यकर्म की सिद्धि
होती है।
सो समयसार के कथन को प्रमाण मानने वालातो
(अध्यवसानादिभावनिर्वर्त्तकमष्टविधमपि च कम समस्तमेव
पुद्गलमयमिति सकलज्ञज्ञप्तिः। तस्य तु यद्विपाककाष्ठा-
मधिरूढस्य फलत्वेनाभिलप्यते इत्यादि गाथा ४५ को टीका
- ( १४) देखो), मिथ्या दृष्टि हो और विकार को अहेतुक मानने वाला सम्यग्दृष्टि हो यह वात हमारी तो समझ में नहीं आती। देवल शुद्ध उपादान को ही न देखना चाहिये। कर्म को कारण न मानने से मतिज्ञान के •तथा श्रुतज्ञान के प्रावांतर भेद नहीं सिद्ध होंगे। मतिनानादि के भेदों के कारण श्री अकलकदेव राजवातिक में ऐसा लिखते हैं : कारणनानात्वात्कार्यनानात्वसिद्धः। यथा मृततुकारणभेदात् घटपटकार्यभेदस्तथा दर्शनज्ञानावरणक्षयोपशमकारणभेदात् तत्कार्यदर्शनज्ञानभेद इति ।..... तदावरणकर्मक्षयो- पशमविकल्पात् प्रत्येकसवग्रहादि ज्ञानावरणभेद इष्यते । कथं ? ज्ञानावरणमूलप्रकृतेः पंचोत्तरप्रकृतयस्तासामप्युत्त- रोत्तराः प्रकृतिविशेपा संति । ज्ञानावरणस्योत्तरप्रकतयः असंख्येयलोकाः इतिवचनात् ।। अध्याय १ सूत्र १५ की वार्तिक १४ इसी प्रकार प्रथम अध्याय सूत्र २० की वार्तिक ४-५ की व्याख्या भी देख लेना चाहिये । रागादि दोषों की उत्पत्ति में अन्य आगमप्रमाण:- दोपावरणयोहानिर्निशेपास्त्यतिशायनात् ।। क्वचिद्यथा स्वहेतुभ्यो बहिरन्तर्मलक्षयः॥४॥आप्तमीमांसा ।। टीका:-का पुनदोपो नामाक्र्णाद् भिन्नस्वभावः इति चेदुच्यते।
( १५ ) कार्यत्वान्माषपाकवत् । वचनसामर्थ्यादज्ञानादिदोष: स्वपरिणामहेतुः। न हि दोष एवावारणमिति प्रतिपादने कारिकाया दोषावरणयोरिति-- द्विवचनं समर्थम् । ततस्तत्सामर्थ्यादावरणात् पौद्गलिक- ज्ञानावरणादिकर्मणो भिन्नस्वभाव एवाज्ञानादिर्दोषोऽभ्यूह्यते । तद्धेतुः पुनरावरणं कर्म जीवस्य पूर्वस्वपरिणामश्च । स्वपरि- णामहेतुक एवाज्ञानादिरित्ययुक्तं तस्य कादाचित्कत्वविरोधा ज्जीवत्वादिवत् । परपरिणामहेतुक एवेत्यपि न व्यवतिष्ठते मुक्तात्मनोऽपि तत्प्रसंगात् । सर्वस्य कार्यस्योपादानसह-- कारिसामग्रीजन्यतयोपगमात्तथा प्रतीतेश्च । तथा च दोषो जीवस्य स्वपरपरिणामहेतुक नन्वेवं निश्शेषावरणहानौ दोषहानेः सामयंसिद्धत्वादोष- हानौ वावरणहानेरन्यतरहानिरेव निश्शेषतः साध्येति दोषावरणयोजी वपुद्गलपरिणामयोरन्योन्यकार्य कारणभावज्ञापनार्थत्वादुभयहानेनिश्शेषत्वसाधनस्य । दोषो हि तावदज्ञानं ज्ञानावरणस्योदये जीवस्य स्यात् । अदर्शनं दर्शनावरणस्य, यिथ्यात्वं दर्शनमोहस्य विविधमचारित्रमनेक प्रकारचारित्रमोहस्य, अदानशीलत्वादिर्दानाद्यन्तरायस्येति । तथा ज्ञानदर्शनावरणे तत्त्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासा- दनोपघातेभ्यो जीवमास्रवतः । केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवा दादर्शनमोहः, कषायोदयात्तीवपरिणामाचारित्रमोहः विघ्न- करणादन्तगय इति तत्त्वार्थे प्ररूपणात् । समर्थयिष्यते चेन्न, ( १६ ) चायं कार्यकारणभावो दोपावरणयोः “कामादिप्रभ- वश्चित्रः कर्मनन्धानुरूपतः" इत्यत्र ॥ ऐसा श्रीविद्यानन्दस्वामी ने अष्टसहस्त्री पृष्ठ ५१ पर उपर्युक्त ४ कारिका की व्याख्या में लिखा है। इससे श्री अकलङ्कदेव भी सहमत हैं। । अर्थ सरल होने से एवं विस्तार भय से नहीं लिखा है। इस कथन मे रागादि दोष सहेतुक ही सिद्ध किये हैं। अहेतुक या योग्यता मानने में आपत्ति सम्यग्दर्शन जब उत्पन्न हो गया, तो उसी समय पूर्ण सम्यग्ज्ञान तथा पूर्ण सम्यग्चारित्र भी होना चाहिये। क्यों कि आत्मा तो स्वतन्त्र है, कोई वाधक-प्रतिबंधक तो है ही नहीं। केवल अपनी योग्यता कहने से भी काम नहीं चलता। यदि योग्यता ही काम कर देती तो जब सम्यग्ज्ञान की योग्यता हुई तभी पूर्ण ज्ञान व चारित्र की योग्यता हो जावे। रत्नत्रय एक साथ होते है, फिर आगे समय की अपेक्षा क्यों रहती है। क्रमबद्ध पर्याय का भी खण्डन इसी से होजाता है, कि जब सम्यग्दर्शन के साथ अपूर्ण ज्ञान चारित्र क्यों सम्यक् कहलाये। सम्यग्दर्शन के साहचर्य से उनका नाम सम्यक् क्यों पड़ा। श्रव योग्यता क्या चीज रही। आत्मा तो भव्य है रत्न- त्रय का पात्र है स्वयं सम्यग्दर्शन हो जाना चाहिये। फिर सम्यग्दर्शन होने के लिये देशनालब्धि की क्या आवश्यकता रही। विशुद्धि की अर्थात् कषायमंदता की भी क्या जरूरत कषाय पर्याय अलग है, सम्यक्त्व पर्याय अलग है। परन्तु प्राचार्यो' ने देशना के पहिले विशुद्धि को लिखा है।
इससे कार्यकारण भाव की सिद्धि हो जाती है। ऐसे ही
द्रव्यकर्म और विकार में भी कार्यकारण भाव लगा लेना
चाहिये।
आवान्तर प्रश्न का समाधान
यदि यह जीव रागादि भावों को स्वतंत्र करता है जैसे
ज्ञानादि को करता है तो रागादिको यह जीव क्यों करता है?
क्या यह उसकी क्रीड़ा है, या स्वभाव है, या परोपकार के लिये
करता है ? ये तीनों ही वातें इस आत्मा के नहीं बनती हैं।
परोपकार तो स्वतन्त्रता में कोई चीज ही नहीं है। परोपकार
बनता भी नहीं है। एक बात्मा दूसरे का कुछ करती नहीं
है। क्रीड़ा कौतुक मानने से सिद्ध होता है कि पहले आत्मा
दुःखी था, तभी तो रागादि क्रीड़ा सूझी। इससे स्वतंत्रता
का घात होता है। राग से सुखी होना चाहिये। सुखी
होता नहीं है-राग को आग कहा
यह राग भाग दहे सदा तातें समामृत सेइये।
चिरभजे विषय कषाय अब तो त्याग निजपद बेइये ।।
अतः आत्मा का क्रीडा कौतुक रूप राग नहीं बनता।
यदि रागादि स्वभाव हैं तो इन्हें हेय क्यों कहे। इन बातों से
पता लगता है कि सम्यग्दृष्टि जीव जब राग को हेय मानता है,
राग को आत्मा नहीं मानता है, उसके वीतराग स्वभाव की श्रद्धा
है । स्वानुभव को कर रहा है। फिर राग की कणिका उस समय
कहां से आ जाती है। यदि द्रव्यकर्म को कारण न मानें, और
ज्ञान को ज्ञान रखना यही इस आत्माका स्वतंत्रपना कहा जाय
तो स्वानुभव के समय पूर्ण स्वतंत्रपना-सिद्धपना मानना अनिवार्य
बलात् आकर उपस्थित हो जावेगा।
है।
( १८ ) कर्मोदय की सिद्धि इससे यह वात भी सिद्ध होती है कि जैसा कर्म का उदय होता है वैसा ही रागादि विकार होता है। कामादिप्रभवश्चित्रः कर्मबंधानुरूपतः । तच कर्म स्वहे- तुल्यो जीवास्ते शुद्ध्यशुद्धितः ॥१६॥ देवागमस्तोत्र ॥ कामादि (रागादि) से उत्पन्न संसार कर्मबंध के अनुरूप से है और वह कर्म अपने कारणों से है। जीव शुद्ध अशुद्ध से दो प्रकार हैं। संसार में भेद विना कारण के नहीं होता। एको दरिद्र एका श्रीमानिति च कर्मणः ॥ ऐसा कर्म के निमित्त से दरिद्र श्रीमान् का भेद पंचाध्यायी में कहा है । सो इसका अपलाप करना ठीक नहीं है। प्रवचनसार में शुभोपयोग अशुभोपयोग का लक्षण अथ शुभोपयोगस्वरूपं प्ररूपयतिः- जो जाणादि जिणिंदं पेच्छदि सिद्धे तहेव अणगारे ॥ जीवेसु साणुकंपो उवोगो सो सुहो तस्स ॥१५७।। ज्ञेय. विशिष्ट क्षयोपशमदशा विश्रान्तदर्शनचारित्रमोहनीय- पुद्गलानुवृत्तिपरत्वेन परिगृहीतशोभनोपरागत्वात् परम- मट्टारकमहादेवाधिदेवपरमेश्वराहत्सिद्धसाधुश्रद्धाने समस्त- भूतग्रामानुकस्पाचरणे च प्रवृत्तः शुभ उपयोगः । अथाशुभपोगस्वरूपं प्रलयतिः- ( १६ ) विसयकसानोगाढ़ो दुस्सुदि दुञ्चित्त दुट्ठगोद्विजुदो ॥ उग्गो उम्मग्गपरो उवोगो जस्स सोअसुहो॥१५८॥ज्ञेय०॥ विशिष्टोदयदशा विश्रान्तदर्शनचारित्रमोहनीयपुद्गलानुवृत्ति- परिगृहीताशोभनोपरागत्वात् परमभट्टारकमहादेवाधिदेव- परमेश्वरार्हत्सिद्धसाधुभ्यो ऽन्यत्रोन्मार्गश्रद्धाने विषयकषाय- दुःश्रवणदुराशयदुष्टसेवनोग्रताचरणे च प्रवृत्तो शुभोपयोगः। अथ परद्रव्यसंयोगकारणविनाशमभ्यस्यतिः असुहोवोगरहिदो सुहोवजुत्तो ण अण्णदवियम्हि ।। होज् मञ्झत्थोऽहं णाणप्पगमप्पगं झाए ॥१५६।। ज्ञेय०॥ यो हि नामायं परद्रव्यसंयोगकारणत्वेनोपन्यस्तो शुद्ध उपयोगः स खलु मन्दतीव्रोदयदशाविश्रान्तपरद्रव्यानुवृत्ति- तन्त्रत्वादेव प्रवर्तते न पुनरन्यस्मात् । इत्यादि । प्रवचनसार इस टीका का अर्थः-जो यह (१५८ वीं गाथा में) पर द्रव्य के संयोग के कारणरूप में कहा गया अशुद्धोपयोग है, वह वास्तव में मन्द तीव्र उदय दशा में रहने वाले परद्रव्यानुसार परिणति के आधीन होने से ही प्रवर्तित होता है, किन्तु अन्य कारण से नहीं ।। इत्यादि। हां! रागादि का स्वामी बनना और बात है। मिथ्यात्व के सद्भाव में राग का यह स्वामी था, स्वरूप मानता था। मिथ्यात्व के अभाव में राग को हेय, दुःखरूप, दुःखफलवाला मानता है। उसका स्वामी नहीं बनता है। प्रज्ञा छैनी के द्वारा नियत स्वलक्षणों से विभक्त करता है। तथा अपने स्वरूप को ग्रहण करता है।
( २० .) समयसार मोक्षाधिकार गाथा २६४ की टीका मे स्वलक्षण ऐसे लिखते हैं:- श्रात्मनो समस्तशेपद्व्यासाधारणत्वाचैतन्यं स्वलक्षणं तत्तु प्रवर्त्तमानं यद्यदभिव्याप्य प्रवर्तते, निवर्तमानं च यद्यदुपादाय निवते, तत्तत्समस्तमपि सहप्रवृ क्रमप्रवृतं वा पर्यायजातमात्मेति लक्षणीय तदेकलक्षणलक्ष्यत्वात्, समस्तसहक्रमप्रवृत्तानंतपर्यायाविनाभावित्वाचैतन्यस्य चिन्मात्र एवात्मा निश्चेतव्यः, इति यावत् । बंधस्य तु आत्मद्रव्यसाधारणा रागादयः स्वलक्षणं । न च रागादयः आत्मद्रव्यासाधारणतां विभ्राणाः प्रतिभासते, नित्यमेव चैतन्यचमत्कारादतिरिक्तत्वेन प्रतिभासमानत्वात् । न च यावदेव समस्तस्वपर्यायव्यापि चैतन्यं प्रतिभाति, तावंत एव रागादयः प्रतिभांति रागादीनंतरेणापि चैतन्यस्यात्मलोभसं- भावनात् । यत्तु रागादीनां चैतन्येन सहैवोत्प्लवनं तच्चेत्यचेतकभावप्रत्यासोरेव नैकद्रव्यत्वात् इत्यादि इस कथन से सिद्ध होता है कि रागादि बंध आत्मा में होते हुवे भी आत्मा के नहीं हैं। सम्यग्दृष्टि जीव अपनी आत्मा में अनुभव कर रहा है। तभी तो उनको हेय मानता है। मिटाने का पुरुषार्थ करता है। तारतम्य से अतिशायनपना (हीनाधिकपना) देखा जाता है। इसीसे ग्रन्थों मे द्रव्यकर्म को कारण कहा है। ज्ञानी के भी रागादि विकार होते हैं, तथा स्वामीपना छूट जाने से यह भी कहते हैं कि ज्ञानी के विकार
( २१ )
नहीं हैं। इन दोनों तरह से यही निर्णय निकलता है कि द्रव्यकम
अंतरंग निमित्त अवश्य है। जिससे डिगरी टू डिगरी की
मान्यता ठीक है, आगम अनुकूल है। देखो समय सार गाथा:-
जम्हा दु जहरणादोणाणगुणादो पुणो वि परिणमदि ॥
अण्णत्तं णाणगुणो तेण दु सो बंधगो भणिदो ॥१७१।।
टीका:-ज्ञानगुणस्य हि यावजघन्यो भावः, तावत् तस्यां-
तर्मुहूविपरिणामित्वात् पुनः पुनरन्यतयास्ति परिणामः ।
स तु यथाख्यातचारित्रावस्थाया अधस्तादवश्यंभावि-
रागसद्भावात् बंधहेतुरेव स्यात् ।।१७१।।
अर्थ:-जबतक ज्ञान गुणक
जघन्यमाव (कषायसहित
क्षायोपशमिक भाव) है, तबतक वह (ज्ञान गुण) अंतर्मुहूर्त में
विपरिणाम को प्राप्त होता है। इसलिये पुनः पुनः उसका अन्य
रूप (रागादि रूप) परिणमन प्राप्त होता है। वह (ज्ञानगुण
का जघन्यभाव से परिणमन) यथाख्यात चारित्र अवस्था के
नीचे अवश्यम्भावी रागका सद्भाव होने से बध का कारण है।
जो केवल स्वतत्र आत्मा की परिणति को बताते हैं वे
एक व्यवहार नयको छोड़ देने से मिथ्यादृष्टि हैं। एकान्ती हैं।
अतः सभी तत्वों का विशेष कर आत्मा का दोनों नयों से
निर्णय करना चाहिये, ऐसा किया हुवा निर्णय ही सम्यग्दर्शन
है। सोही समयसार में कहा है:-
भूयत्थेणाभिगदा जीवाजीवा य पुरणपावं च ।।
आसवसंवरनिजरबंधो मोक्खो य सम्मत् ।।१३।।
( २२ ) टीका:- असूनि हि जीचादीनि नवत्तत्त्वानि भूतार्थेनाभि- गतानि सम्यग्दर्शनं सम्पयंत एव । अमीषु तीर्थप्रवृत्तिनि- त्तमभृतार्थनयेन व्यपदिश्यमानेषु जीवाजीवपुण्यपापास्रवसंवर निर्जराबंधमोक्षलक्षणेपु नवतत्त्वेष्वेकत्वद्योतिना भृतार्थनये- नैकत्वमुपानीय शुद्धनयत्वेन व्यवस्थापितस्यामनोऽनुभृते- रात्मख्यातिलक्षणायाः संपद्यमानत्वात्ततो विकार्यविकार- कोभयं पुण्य तथा पाप। आस्राव्यास्रावकोभयमास्रवः, संवार्यसंवारकोभयं संवरः, निर्जर्यनिर्जरकोभयं निर्जरा, बंध्यबंधकोभयं बंधः, मोच्यमोचकोमय मोक्षः। स्वयमेकस्य पुण्यपापासवसंवरनिर्जगचंधमोक्षानुपपत्तेः । तदुभय च जीवाजीवाविति । बहि प्ठ्या नवतत्वान्यमूनि जीवपुद्गल- योरनादिबंधपर्यायमुपेत्यैकत्वेनानुभूयमानतायां भूतार्थानि, अथवैकजीवद्रव्यस्वभावमुपेत्यानुभूयमानतायामभूता- नि । ततोऽमीघु नवतत्त्वेषु भूतार्थनयेनैको जीव एव प्रद्योतते । तथांतदृष्ट्या ज्ञायको भावो जीवो, जीवस्य विकाररेतुरजीवः। केवला जीवविकाराश्च पुण्यपापासव- संवरनिर्जराबंधमोक्षलक्षणाः, केवला जीवविकारहेतवः पुण्य- पापासवसंवरनिर्जरावधमोक्षा इति । नवतच्चान्यमृन्यपि जीवद्रव्यस्वभावमपोह्य स्वपरप्रत्त्ययैकद्वव्यपर्यायत्वेनानुभूयमान- तायां भूतार्थानि ततोऽभीष्वपि नवतत्वेषु भूतार्थनयेनैको ( २३ ) जीव एव प्रद्योतते । एवमसांवेकत्वेन द्योतमानः शुद्धाय- त्वेनानुभूयत एव । यात्वनुभूतिः साऽऽत्मख्यातिरेवात्म- ख्यातिस्तु सम्यग्दर्शनमेवेति समस्तमेव निवद्यम् ॥१३॥ चिरमिति नवतत्वच्छन्नमुन्नीयमान। कनकमिव निमग्नं वर्णमालाकलापे। अथ सततविविक्तं दृश्यतामेकरूपं । प्रतिपदमिदमात्मज्योतिरुद्योतमानम् ।।८।। अर्थः-जो जीवादि नौतत्व हैं वे भूतार्थनय से जाने हुये सम्यग्दर्शन ही हैं। यह नियम कहा है । क्यों कि जीव अजीव पुण्य पाप अस्त्रव संवर निर्जरा बंध मोक्ष लक्षण वाले व्यवहार धर्म की प्रवृत्ति के अर्थ ये जीवादि नवतत्व अभूतार्थ (व्यवहार) नयकर कहे हुवे हैं। उनमे एकपना प्रकट करने वाले भूतार्थ नयकर एकपना प्राप्त कर शुद्धनयपने से स्थापन किये गये आत्मा की ख्याति लक्षणवाली अनुभूति का प्राप्तपना है। क्यों कि शुद्धनयकर नवतत्त्व को जानने से आत्मा की अनुभूति होती है। उनमें से विकारी होने योग्य और विकार करनेवाला ये दोनों पुण्य भी हैं, पाप भी हैं तथा आस्राव्य व आस्रव करने वाले ये दोनों आस्रव हैं। संवार्य (संवररूप होने योग्य ) व संवारक (संवरकरनेवाले) ये दोनों संवर हैं। निर्जरने योग्य व निर्जरा करनेवाला ये दोनों निर्जरा हैं। बंधनेयोग्य व वंधन करनेवाला ये दोनों बंध हैं। और मोक्ष होने योग्य व मोक्ष करनेवाला ये दोनों मोक्ष हैं। क्यों कि एक के ही अपने आप पुण्य-पाप आस्रव संवर निर्जरा बंध मोक्ष की उपपत्ति (सिद्धि) नहीं बनती। तथा वे जीव और अजीव दोनों मिलकर सब नौतत्व ( २४ ) हैं। इनको बाह्य दृष्टि कर देखा जाय तब जीव पुद्गलकी अनादि वंधपर्याय को प्राप्तकर एकपने से अनुभव करने पर ये नौ भूतार्थ हैं, सत्यार्थ हैं। तथा एक जीव द्रव्यके ही स्वभाव को लेकर अनुभव किये गये अभूतार्थ हैं-असत्यार्थ हैं। जीवके एकाकार स्वरूप में ये नहीं हैं। इसलिये इन तत्वों मे भूतार्थ नयकर जीव एक रूप ही प्रकाशमान है । उसी तरह अंतईष्टि से देखा जाय तव नायकभाव जीव है और जीव के विकार का कारण अजीव है। अकेले जीवका विकार नहीं है। पुण्य आदि ये सातों पदार्थ केवल एक अजीव के विकार से जीवके विकार को कारण हैं। ऐसे ये नवतत्व हैं। वे जीव के स्वभाव को छोडकर आप और पर कारण वाले एक द्रव्यपर्यायपने से अनुभव किये तो भूतार्थ हैं। तथा सब काल में नहीं चिगते एक जीव द्रव्य के स्वभाव को अनुभव करने पर ये अभूतार्थ (असत्यार्थ) हैं इसलिये इन नौ तत्वों में भूतार्थ नय कर कर देखा जाय तव जीव तो एक रूप ही प्रकाशमान हैं। ऐसे यह जीव त । ऐसे यह जीव तत्व एकपने से प्रगट प्रकाशमान हुधा शुद्ध नयपने से अनुभव किया जाता है। यह अनुभव हो पात्माख्याति है। आत्मा का ही प्रकाश है। जो आत्माख्याति है वही सम्यग्दर्शन है। इस प्रकार यह सब कथन निर्दोष है। वाधा रहित है ॥१३॥ इस प्रकार नौ तत्वों में बहुत काल से छिपी हुई यह श्रात्मज्योति शुद्धनय से निकाल कर प्रकट की है। जैसे वर्णों के समूह में छिपे हुये एकाकार को निकालते हैं उसी तरह यह आत्मज्योति समझना। सो अब हे भव्यजीवो! इसको हमेशा अन्य द्रव्यों से तथा उनसे हुये नैमित्तिक भावों से (२५) भिन्न एक रूप देखो । यह हर एक पर्याय में एकरूप चिचमत्कार मात्र उद्योतमान है। इस प्रकार जीव और अजीव का विकारहेतुत्व नाम का अनादि संबंध है। कर्मोदय और विकारी भावों में व्यङग्यव्यञ्जक अर्थात् निमित्त नैमित्तिक संबंध है । जैसे माचिस पर सींक रगड़ने से अग्नि उत्पन्न हो जाती है वैसे ही आत्मा व कर्मका संयोगसबध है। यही बात समयसार में कही है- मोक्षहेतुतिरोधानाद् बंधत्वात् स्वयमेव च । मोक्षहेतुतिरोधायिभावत्वात्तन्निषिध्यते॥१०॥ इस कलश में द्रव्यकर्म के तीन कार्य लिखे हैं ? मोक्ष के कारण को ढांकना, २ द्रव्यकर्म स्वयं बंधरूप है, ३ मोक्ष के कारण ढांकने से विपरीत भावों को उत्पन्न करना। प्रथम मोक्ष के कारण ढांकने की गाथा :- वत्थस्स सेदभावो जह णासेदि मलमेलणासत्तो ।। मिच्छत्तमलोच्छएणं तह सम्मत्तं खु णायव्वं ॥१५७॥ वत्थस्स सेदभावो जह णासेदि मलमेलणासत्तो । अण्णाणमलोच्छएणं तह णाणं होदि णायव्वं ।।१५८।। वत्थस्स सेदभाको जह णासेदि मलमेलणासत्तो ॥ कसायमलोच्छएणं तह चारित्रं पि णादव्वं ॥१५६।। इनका अर्थ स्पष्ट ही है। द्वितोय द्रव्यकर्म स्वयं बंधरूप है, इसकी गाथा:- सो सव्वणाणदरिसी कम्मरयेण निएण बच्छराणो । संसारसमावण्णो ण विजाणदि सव्वदो सव्वं ॥१६॥ इसका भी अर्थ सुगम ही है। L ( २६ ) तृतीय मोक्ष के कारण ढांकने से विपरीतभावों को उत्पन्न करने वाली गाथा:- सम्मत्तपडिणिपद्धं मिच्छत्तं जिणवरेहिं परिकहियं । तस्सोदयेण जीवो मिच्छादिवित्ति णायव्यो ।१६१।। खाणास्स पडियिापद्धं अण्णाणं जिनवरेहिं परिकहियं ॥ तस्सोदयेण जीवो अण्णाणी होदि णायव्यो ।।१६२।। चारित्तपडिणिबद्ध कसायं जिणवरेहिं परिकहियं ॥ तस्सोदयेण जीवो अचरित्तो होदि णायब्वो ॥१६३ । टीका:-सम्यक्त्वस्य मोक्षहेतोः स्वभावस्य प्रतिबंधक किल मिथ्यात्व, तत्तु स्वयं, कर्मैव तदुदयादेव ज्ञानस्य मिथ्यादृष्टित्व । ज्ञानस्य मोक्षहेतोः स्वभावस्य प्रतिबंध- कमज्ञानं तत्तु, स्वयं फर्मैव तदुदयादेव ज्ञानस्याज्ञानत्वम् । चारित्रस्य मोचहेतोः स्वभावस्य प्रतिबंधकः किल कषायः । स तु स्वयं कमैव । यदुदयादेव ज्ञानस्याचारित्रत्वं । अतः स्वयं मोचहेतुतिरोधायिभावत्वात्कर्म प्रतिषिद्धं । यावत्पाकमुपैति कर्म विरतिर्ज्ञानस्य सम्यङ् न सा । कर्मज्ञानसमुच्चयोऽपि विहितस्तावन्न काचित्दातिः ।। किन्त्यत्रापि समुल्लसत्यवशतो यत्कर्मबंधाय त. मोक्षाय स्थितमेकमेव परमं ज्ञानं विमुक्तं स्वतः ॥२॥ पुण्यपापाधिकार गाथा १६३ के अंतर्गत ॥
(२७ ) कलशका अर्थः-जबतक कर्मका ,उदय है और ज्ञानकी सम्यक् कर्मविरति नहीं है, तब तक कर्म और ज्ञान दोनों का इकट्ठापन भी कहा गया है। तबतक इसमें कुछ हानि भी नहीं है। यहां पर यह विशेषता है कि इस आत्मामें कर्म के उदय की जबरदस्ती से आत्माके वशके विना कर्म उदय होता है, वह तो बंध के हो लिये है। और मोक्ष के लिये तो एक परमज्ञान ही है। वह ज्ञान कर्म से श्राप ही रहित है। भावार्थ:-कर्मके करने में अपने स्वामीपने रूप कर्त्तापने का भाव नहीं है। जबतक कर्मका उदय है, तबतक कर्म तो अपना कार्य करता ही है। और वहीं पर ज्ञान है, वह भी अपना कार्य करता है। एक ही आत्मा में ज्ञान और कर्म दोनों के इकट्ठ रहने में भी विरोध नहीं आता। जैसे मिथ्याज्ञान और सम्यर- ज्ञान का परस्पर विरोध है, उस तरह कर्मसामान्य के और ज्ञान के विरोध नहीं है। इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि जिनेन्द्र भगवान के वचन क्या हैं। अरे भैया ? मन लगाकर थोडास्वाध्याय करो। अपने भावों को जहाँ तक बने, बुरे चिंतन से बचावो। फिर स्वयं यह सब निर्णय हो जावेगा। किसी से कहने या पूंछने की भावश्यकता ही नहीं है। क्रमसे शास्त्रों का मनन न कर इधर उधर के ट्रेक्ट पढ़कर अपना सिद्धांत स्थिर करते हैं, और उसे भगवान् का उपदेश कहते हैं यह ठीक नहीं है। पानी में पैर न देना पड़े और तैरना आजाय यह कैसे हो सकता है । इन सब विषयों के निर्णय करने के लिये प्राचार्यों ने बड़ा परिश्रम किया है। उनका हमें उपकार मानना चाहिये। सती श्रीमैनासुंदरी का दृष्टान्त प्रसिद्ध है, कि उसने गुरुसे सम्यक अध्ययन किया था। अतः पिता द्वारा 'कि तूं किस का
( २८.)
दिया हुन्ना खाती है' पूंछे जाने पर यह उत्तर दिया कि मैं अपने
कर्मका दिया खाती हू। अन्य पुत्रियों ने कहा कि पिता का
दिया खाती हैं। विशेष क्या लिखें। इससे ही पाठक गण
समझ लेंगे। अब हम श्री पंडित टोडरमल्लजी मोक्षमार्ग प्रकाश
में क्या लिखते हैं इसी को दिखाते हैं-वधतत्व का विपरीत
श्रद्धान--पृष्ठ १२१
बहुरि इनि आस्त्रवभावनिकर ज्ञानावरणादि कर्मनिका
बंध हो है। तिनका उदय होते ज्ञानदर्शनका हीनपना
होना, मिथ्यात्वरूपायरूप परिणमन, चाह्या न होना,
सुखदुःखका कारण सिलना, शरीरसयोग रहना, गतिजा-
तिशरीरादि का निपजना, नीचा ऊंचा कुल पावना होइ
सो इनके होने विष मूलकारण कर्म है। ताकौं तो
पहिचान नाही, जाते वह सूक्ष्म है, याकौं सूझता नाहीं ।
अर आपकौं इनकार्यनि का कर्ता दीसैं नाही, तातै इनके
होने वि के तो श्रापकौं कर्ता माने, के काहू कौं कर्ता
मानै । श्रर आपका व अन्य का कर्तापन न भासै तो
महल रूप होय भवितव्य मान । ऐसें ही बंधतत्व का
अयथार्थ ज्ञान होत अयथार्थ श्रद्धान हो है।
मोक्षमार्गप्रकाश द्वितीय अधिकार पृष्ठ ३३
तातें कर्म का सम्बन्ध अनादि मानना । सो ही
प्रवचनसार शास्त्रकी तत्त्वप्रदीपिका व्याख्या विर्षे जो
सामान्यज्ञयाधिकार है तहां कहा है। रागादिक का
-
and
( २६ )
कारण तो द्रव्यकर्म है, अर द्रव्यकर्म का कारण रागादिक
हैं। अब उहां तर्क करी जो ऐसे इतरेतराश्रय दोष लागै, वह
चाकै आश्रय, वह वाकै आश्रय, कहीं थंबाव नाहीं है।
तब उत्तर ऐसा दिया है
नैवं,अनादिप्रसिद्धद्रव्यकर्मसंबंधस्य तत्र हेतुत्वेनोपादानात् ।
‘याका अर्थः- ऐसे इतरेतराश्रय दोष नाहीं है।
जात अनादिका स्वयंसिद्ध द्रव्यकर्मका संबंध है,
ताका तहां कारणपना करि ग्रहण किया है। ऐसे
आगम में कया है। बहुरि युक्ति” भी ऐसे ही संभव
जो कर्म निमित्त विना पहिले जीव के रागादिक कहिये
तौ रागादिक जीवका निजस्वभाव होय जाय । जाते
पर निमित्त विना होइ ताही का नाम स्वभाव है। ताते
कर्म का संबंध अनादि ही मानना । बहुरि इहां
प्रश्न ? जो न्यारे न्यारे द्रव्य, अर अनादित तिनिका
संबंध कैसे संभवें। ताका समाधान:-
जैसे ठेठिहीसूं जलथूध का वा सोनाकिट्टिक का वा
तुषकण का वा तैल तिलका संबंध देखिये है। नवीन इनका
मिलाप भया नाही।
बहुरि प्रश्न ? जो संबंध वा
संयोग कहना तो तन संभवे जब पहिले जुदे होयं पीछे
मिलें । इहां अनादि मिले जीवकर्मनिका संबंध कैसे
कह्या १ ताका समाधान :-
( ३० )'
अनादि तैं तौ मिले थे, परंतु पीछे जुदे भए तब
जान्या जुदे थे तौ जुदे भए । तातै पहिले भी भिन्न
ही थे। ऐसै अनुमान करि वा केवल ज्ञान करिप्रत्यक्ष भिन्न
भास है। तिसिकरि तिनिका बंधान होते भिन्नपणा पाइये
है । बहुरि तिस भिन्नपना की अपेक्षा तिनिका संबंध वा
संयोग कह्या है । जातें नए मिलौ वा मिले ही होहु भिन्न
द्रव्यनिका मिलाप विर्षे ऐसे ही कहना संभव है। ऐसे
इनि जीवनि का अर कर्मका अनादि संबंध है।
मोक्षमार्गप्रकाश सप्तम अधिकार पृष्ठ २६४
प्रश्नः-वहां कोऊ कह कि शास्त्रनिविर्षे आत्माको
कर्म नोकर्म से भिन्न अवद्धस्पृष्ट कैसे कह्या है ? ताका उत्तरः-
संबंध अनेक प्रकार है। तहां तादात्म्य संबंध अपेक्षा
आत्माकौं कर्म नोकर्मत भिन्न कह्या है। तहां द्रव्य
पलटिकरि एक नाही होय जाय है, इस ही अपेक्षा
अवद्धस्पृष्ट कह्या है। बहुरि निमित्त नैमित्तिक संबंध
अपेक्षा बंधन है ही। उनके निमित्त तैं आत्मा
अपनी अनेक अवस्था घर ही है। तातें सर्वथा निबंध
आपकौं मानना मिथ्यादृष्टिपना है।
पृष्ठ २६२-जो रागादि पर का मानि स्वच्छंद
होय, निरुद्यमी होय, ताकी उपादानकारण की मुख्यता
करि रागादि आत्मा का है ऐसा श्रद्धान कराया है।
बहुरि जो रागादिक आप का स्वभाव मानि तिनिके
( ३१ ) नाशका उद्यम नाही करै है, ताकौं निमित्तकारण की मुख्यता करि रागादिक परभाव हैं ऐसा श्रद्धान कराया है। दोऊविपरीत श्रद्धानतै रहित भए सत्यश्रद्धान होय तब ऐसा मान। ए रागादिक भाव आत्मा का स्वभावतो है नाही, कर्म के निमित्त ते आत्मा के अस्तित्वविर्षे विभाव पर्याय निपजै है। निमिच मिटे इनका नाश होतें स्वभाव भाव रहि जाय है। तातै इनके नाशका उद्यम करना । इस प्रकार मोक्षमार्ग प्रकाश के मूलशब्दों का अर्थ समझ कर पढ़ें तब कहीं भी किसी प्रकार का भ्रम नहीं रह सकता। सब कथन स्पष्ट है। इस प्रकार 'किरणें का कथन घटित नहीं होता है । समयसारकलश २०३ में रागको अकृत (अहेतुक पने) का निषेध किया है। कार्यत्वादकृतंन कर्म इत्यादि । अर्थः-जो कर्म (अर्थात् भावकर्म) है वह कार्य है,इसलिये वह अकृत नहीं हो सकता, अर्थात् किसी के द्वारा किये विना नहीं हो सकता, इत्यादि। इन ही रागादि अज्ञानभावों की गहन महिमा संसार है। प्रकृतियों से बंध है। इसी को समयसार सर्वविशुद्धज्ञाना- धिकार गाथा ३१२-३१३ में स्वयं प्राचार्यश्रीने स्पृष्टीकरण किया है:- चेया उ पयडीयट्ठ उप्पजइ विणस्सइ । पयडी वि चेययहं उप्पजइ विणस्सइ ॥३१२ ॥ एवं बंधो उ दुण्हं वि अण्णोएणप्पच्चया हवे ।। अप्पणो पयडीए य संसारो तेण जायए ॥३१३।।
( ३२ ) टीका:-अयं हि आसंसारत एवं प्रतिनियतस्व- लक्षणानिर्ज्ञानेन परात्मनोरेकत्त्वाध्यासस्य करणाकर्ता सन् चेतयिता प्रकृतिनिमित्तमुत्पत्तिविनाशावासादयति । प्रकृतिरपि चेतयितृनिमित्तमुत्पत्तिविनाशावासादयति । एव- मनयोरात्मप्रकृत्योः कर्तृकर्मभावेऽप्यन्योन्यनिमित्तनैमिशि- कभावेन द्वयोरपि चंधो दृष्टः । ततः संसारः । तत एव च तयोः कर्तृकर्मव्यवहारः ॥ भावार्थ:-आत्मा के और ज्ञानावरणादि कर्मोंकी प्रकृतियों के परमार्थ से क कर्म भावका अभाव है, तथापि परस्पर निमित्तनैमित्तिकभाव के कारण बध होता है। इससे संसार है और कर्ताकर्मपने का व्यवहार है। जबतक यह आत्मा प्रकृति के निमित्तसे उपजना विनशना न छोड़े तबतक वह अज्ञानी मिथ्यादृष्टि असंयत है। श्रीशुभचन्द्राचार्य ने ज्ञानार्णव में स्पष्ट कहा है कि आत्मा को कर्मों की साम्यसीमा से पृथक् करे। साम्यसीमानमालम्ब्य कृत्वात्मात्मन्यात्मनिश्चयम् ।। पृथक्करोति विज्ञानी संश्लिष्टे जीवकर्मणी ।। जहाँ तक समताभावों को सीमा है, वहां तक मात्मा है। इस प्रकार आत्मा मे आत्मा का निश्चय करके विज्ञानी आत्मा अनादि से मिले जीव और कर्मों को पृथक पृथक कर लेता है। जहां समता भाव नहीं है-वहां आत्मा नहीं है, कर्म है ।। इस प्रकार संक्षेप से कर्मोदय और विकारी भावों के संबंध का विवेचन किया है। विस्तार रुचिवालों को सभी अनुयोगों का स्वाध्याय कर अपने स्वरूप की श्रद्धा दृढ़ बनानी चाहिये।
( ३३ ) । - द्वितीय प्रश्न :- निमित्तनैमित्तिक संबंध का खुलाशा क्या है ? कार्य के उत्पादन में निमित्त सहायक होता है या केवल उपस्थित मात्र रहता है। उपर्युक्त मोक्षमार्ग प्रकाशकी किरणें में पत्रनं०३७८ पर श्री कानजी स्वामी लिखते हैं कि "अपनी योग्यतानुसार परिणाम होता है। निमित्त का बिलकुल प्रभाव नहीं होता" क्या यह कहना सिद्धान्त के अनुसार ठीक है। बाहरी पदार्थ का आत्मा पर असर होता है या नहीं ? समाधान :- निमित्त नैमित्तिक भाव की चर्चा वर्तमान में जोरों पर है। जितने भी छोटे बड़े बहुज्ञानी अल्पज्ञानी पुरुष वा महिलाएं हैं वे भी सब इसी के चक्र में हैं। जबकि यह बहुत ही, सीधी सरल सी बात है कि सम्बन्ध का कार्य सम्बन्ध से, होगा तथा अकेले का कार्य अकेले से होगा। अशुद्ध शब्द ही पर निनित्तत्वपने को सूचित करता है । इसलिये ये सब व्यर्थ की चर्चा है। तथापि कुछ (संक्षेप में) निमित्त उपादान का ठीक कथन इस प्रकार है:- जितने भी पदार्थ हैं वे अपने ही परिणमन के लिये उपादान हैं। तथा अन्य के परिणमन के लिये निमित्त हैं। किसी विशेष द्रव्य पर्याय का नाम उपादान हो अथवा निमित्त हो ऐसा नहीं है। दोनों के मिलने पर भी वही द्रव्य विव- क्षासे निमित्त तथा उपादान है। तथा एक ही द्रव्य में गुण परस्पर में निमित्त उपादान होते हैं। निमित्त का प्रभाव उपादान पर पड़ता है। अतः निमित्त की सहायता के विना उपादान नहीं परिणम सकता। आप्तमीमांसा में कहा है:- - ( ३४ ) अद्वैतैकान्तपक्षेऽपि दृष्टो भेदो विरुध्यते ॥ कारकाणां क्रियायाश्च नैक स्वस्मात् प्रजायते ।। २४ ॥ कर्मद्वैतं फलद्वैतं लोकद्वैतं च नो भवेत् ॥ विद्याऽविद्याद्वयं न स्यात् बन्धमोक्षद्वयं तथा ॥२॥ अर्थः-अद्वैत एकान्त पक्ष में भी कारकों का और क्रिया का देखा हुआ भेद विरोध को प्राप्त होता है। क्योंकि एक कारण अपने से नहीं उत्पन्न होता है। एक अद्वैत में कर्म द्वैत (शुभशुभ) फलद्वैत (सुखदुःख) लोकद्वैत (इह लोक परलोक) विद्याऽविद्या (ज्ञान और अज्ञान) तथा बंधमोक्ष ये जोड़ा नहीं बनसकते हैं। अतः अनेक कारण चाहिये। कार्य की उत्पत्ति अनेक सामग्रियों से होती है। एक कारण से नहीं होती है। कार्यस्य जनिका सामग्री नैकं कारणम् ।। इसी को मोक्ष- मार्ग प्रकाश में कहते हैं । २७८ पृष्ठ ७ वा अधिकार । यहां प्रश्नः-जो कर्मका निमित्त त ए हो हैं, तो कार्यका उदय रहै तावत् विभाव दूरि कैसे होय। ताते याका उद्यम करना तौ निरर्थक है। ताका उत्तर :- एक कार्य होने विर्षे अनेक कारण चाहिये हैं। तिनिविर्षे जे कारण बुद्धिपूर्वक होय, तिनिकौं तौ उद्यम करि मिलावै भर अबुद्धिपूर्वक कारण स्वयमेव मिलैं, तब कार्य सिद्धि होय । जैसे पुत्र होने का कारण बुद्धिपूर्वक तौ विवाहादिक करना है, और अबुद्धिपूर्वक भवितव्य है। तहां पुत्र का अर्थी विवाहा- दिकका तौ उद्यम करै अर भवितव्य स्वयमेव होय, तब पुत्र होय । तैसें विभाव दूरि करने के कारण बुद्धिपूर्वक तौ तत्वविचारादिक हैं, अर अवुद्धिपूर्वक मोह कर्मका उपशम आदिक हैं। सो ताका अर्थी तत्वविचारादिक का तौ उद्यम करें, और मोहकर्म का उपशमादिक स्वयमेव होय, तब रागा. दिक दूर होय ॥ यदि निमित्त का तथा बाह्यपदार्थों का प्रभाव न पड़ता होता तो सत्संग को विधेय क्यों कहते। सज्जनों की संगति (चाहे वह गुणाधिक से हों अथवा गुणसम से, जो मोक्षमार्ग में स्थित हों) अवश्य करनी चाहिये । सोही प्रवचन सार चारि- त्राधिकार गाथा २७० में कहा है:- तम्हा समं गुणादो समणो समणं गुणेहिं वा अहियं ॥ अधिवसदु तम्हि णिचं इच्छदि जदि कम्म परिमोक्खं ॥२७॥ टीका:--- यतः परिणामस्वभावत्वेनात्मनः सप्ताचिःसंगतं तोयमिवावश्यंभाविविकारत्वाल्लौकिकसंगात्संयतोऽप्यसंयत एव स्यात् । ततो दुःखमोक्षार्थिना गुणैः समोऽधिको वाश्रमण:श्रमणेन नित्यमेवाधिवसनीयः। तथाऽस्य शीता- पवरककोणनिहितशीततोयवत्समगुणसंगात गुणरक्षा, शीत- तरतुहिनशर्करासंपृक्तशीततोयवत् गुणाधिकसंगात् गुणवृद्धिः मर्थः-लौकिकजन के संग से संयत भी भसंयत होजाता है। इसलिये यदि श्रमण दुःखसे परिमुक्त होना चाहता हो तो वह समानगुण वाले श्रमणों के अथवा अधिक गुणवाले श्रमणों के संग में सदा निवास करो।
( ३६ )
क्योंकि आत्मा परिणाम स्वभाववाला है इसलिये
अग्नि के संग में रहे हुवे पानी की भांति (संयतके भी)
लौकिक संगसे विकार अवश्यंभावी होने से संयत भी असंयत
ही हो जाता है। इसलिये दुःखों से मुक्ति चाहनेवाले
श्रमणको (१) समानगुणवाले श्रमण के साथ अथवा (२)
अधिक गुणवाले श्रमण के साथ सदा ही निवास करना
चाहिये। इसप्रकार उस श्रमण के (१) शीतल घरके कोने
में रखे हुये शीतल पानी की भांति समान गुणवाले की
संगति से गुणरक्षा होती है। और (२) अधिकशीतल
हिम (वरफ) के संपर्क में रहनेवाले शीतल पानी की भांति
अधिक गुनवाले के सगसे गुण वृद्धि होती है।
इस में जल का दृष्टान्त दिया है। तो विचारो कि
जल स्वभावतया शीतल है उस को मिट्टी के घड़े में भरकर
घर के कोने मे वालू पर रखा जावे तथा फिर भी तुहिन
(बर्फ) शर्करा एला आदि डाल देवें तो शीतविशेष हो जाता
है। इससे पता लग जावेगा कि निमित्त कितना सहायक
होता है। यदि कोई कहें कि जल को ऐसा ही होना था
निमित्त ने कुछ नहीं किया तो इसका उत्तर यही है कि फिर
मिट्टी का घड़ा वर्फ शर्करा को पृथक् रखदेवे तथा जल को अन्य
पात्र में पृथक् रख देवे, तो उपस्थिति तो बनगई, और जलको
शीतल होना ही है सो सयोग विना ही विशेष शीतल होजाय
इसलिये मोक्षमार्ग में शुभ-निमित्तों की बहुत आवश्यकता है।
।
अन्य दृष्टान्त
पीनो देवदत्तो दिवा न भुक्ते । इस कथन में देवदत्त का
मोटापन विना खाये नहीं हो सकता। अर्थापत्ति से यही
( ३७ ) सिद्ध होता है कि वह रात्रि में खाता है। तथा खाने मात्र से मोटापन नहीं होता, निश्चिन्त होकर खाने से, उसको उदराग्नि द्वारा पचाकर रसादि बनालेने से पीनपना हो जाता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो सर्वत्र भरे पड़े हैं। इसीसे सोचिये कि निमित्तने कितनी सहायता की। यदि निमित उपस्थित होने से कहा जाता है, तो डब्वे मे (कटोर- दान में) पूड़ी रखने से पेट के समीप हाजिर रहने से मोटापन हो जावे। ऐसा उपस्थितिमात्र से होता देखा नहीं जाता। अतः निमित्तका अर्थ उपथित रहना मात्र कहना ठीक नहीं है। तीसरा दृष्टान्त लीजिये कि सूर्यकान्तमणि है, वस्त्र है- उपस्थित दोनों हैं, छाग्निउत्पन्न हो जावे । सूर्य के निमित्त विना अग्नि नहीं होती। सो ही कलश में कहा है। नजातु रागादिनिमिचभावमात्मात्मनो याति यथार्ककान्तः।। तस्मिन्नमित्र परसंगएव वस्तुस्वभावोऽयमुदेति तावत् ।। अर्थः-सूर्यकान्तमणिकी भाँति (जैसे सूर्यकान्तमणि स्वतः से ही अग्निरूप परिणमन में सूर्य का बिम्ब निमित्त होता है उसी प्रकार) आत्मा अपने को रागादिक का निमित्त कभी भी नहीं होता। उसमें निमित्त परसंग ही (परद्रव्य का संबंध ही) है। ऐसा प्रकाशमान है (सदा वस्तु का ऐसा ही स्वभाव है, इसे किसी ने बनाया नहीं है) ऐसे वस्तुस्वभावको जानता हुवा ज्ञानी रागादिको निजरूप नहीं करता ॥१७५।। बाह्य पदार्थोंका प्रभाव वाह्य पदार्थों का भी आत्मा पर असर होता है। क्योंकि " - ।
( ३८ ) घात्मा वर्तमान में सर्वथा अमूर्त नहीं है, बधनबद्ध आत्मा सूर्त है । यदि अकेली आत्मा होती तो अन्य पदार्थों का कोई प्रभाव आत्मा पर नहीं पड़ता । परन्तु अनादि से अकेली अत्मा अमूर्त नहीं है । अतः द्रव्य क्षेत्रकाल भाव सहित आत्मा संसारी है। सोही समयसार गाथा २७ में कहा है ववहारणो भासदि जीवो देहो य हवदि खलु इक्को । ण दु णिच्छयस्स जीवो देहो य कदा वि एकट्ठो ॥२७॥ इह खलु परस्परावगादावस्थायामात्मशरीरयोः समवर्तिताव- स्थायां कनककलधौतयोरेकस्कंधव्यवहारवद्व्यहारमात्रेणैवै- कत्वं न पुनर्निश्चयतः । ततो व्यवहारनयेनैव शरीरस्तवने- नात्मस्तवनमुपपन्नम् ।।२७॥ भावार्थ:-व्यवहारनय तो आत्मा और शरीर को एक कहता है, और निश्चयनय भिन्न भिन्न कहता है। इसलिये व्यवहार नय से शरीरका स्तवन करने से आत्माका स्तवन माना जाता है। इस विषय की एक प्राचीन गाथा श्रीपूज्य- पादस्वामीने सर्वायसिद्धि में लिखी है: वध पडि एयचं लक्खणदो हवइ तस्सणाणत्त तम्हा अमुत्तिभावोऽणेयंतो होइ जीवस्य । मात्मा का अमूर्तिभाव अनेकांत से है। बंधकी अपेक्षा एकत्व है-मूर्तिक है। लक्षण से (नानात्त्व अमूर्तिक) है। यह सब कथन व्यवहार नयका है। अशुद्ध-निश्चयनय भी व्यवहार है। इसका स्पष्टी करण आगे के के समाधान से होगा। देखो कलश २१० प्रश्न ३९ ) व्यावहारिकदशैव केवलं, कर्तृ कर्म च विभिन्नमिष्यते ॥ निश्चयेन यदि वस्तु चिन्त्यते, कर्तृकर्म च सदैकमिष्यते ॥२१० सोही समयसार की गाथा ३५० की टीका में कहा है:- व्यवहार नय का कथन:- तथाऽऽत्मापि पुण्यपापादि पुद्गलपरिणामात्मकं कर्म करोति । कायवाङ्मनोभिः पुद्गलद्रव्यपरिणामात्मकैः करणैः करोति । कायवाङ्मनांसि पुद्गलद्रव्यपरिणामा- मकानि करणानि ग्टह्नाति । सुखदुःखादिपुद्गलद्रव्यपरि- णमात्मकं पुण्यपापादि कर्मफलं भुङ्क्ते च। नत्वनेक- द्रव्यत्वेन ततोऽन्यत्वे सति तन्मयो भवति । ततो निमित्त- नैमित्तिकभावमात्रेणैव तत्र कर्तृकर्म भोक्तृभोग्यत्वव्यवहारः॥ बाह्यपदार्थों का आत्मापर यह प्रभाव पड़ना मंत्र प्रयोग से स्पष्ट है कि मंत्रप्रयोग करनेवाला कहीं है, तथा जिसका वशी- करण हो जाता है (वंधन टूट जाते हैं) वह कहीं है। देखो समयसार कतृकर्म अधिकार गाथा ११ की टीकाः आत्मा ह्यात्मना तथापरिणमनेन यं भावं किल करोति तस्यायं कर्ता स्यात्साधकवत् । तस्मिन्निमित्ते सति पुद्गलद्रव्यं कर्मत्वेन स्वयमेव परिणमते । तथाहिः- यथा साधकः किल तथाविधध्यानभावेनात्मना परिणम- मानो ध्यानस्य कर्त्ता स्यात् । तस्मिंस्तु ध्यानभावे सकल- साध्यभावानुकूलतया निमित्तमात्रीभूते सति साधकं कार- मन्तरेणापि स्वयमेव वाध्यते विपव्याप्तयो,विडंब्यंते योपितो, - ( ४० ) ध्वस्यंते वधास्तथायमज्ञानादात्मा मिथ्यादर्शनादिभावेना- त्मना परिणममानो मिथ्यादर्शनादिभावस्य कर्चा स्यात् । तस्मिंस्तु मिथ्यादर्शनादौ भावे स्वानुकूलतया निमित्तमात्री- भृते सत्यात्मान करिमंतरेणापि पुद्गलद्रव्यं मोहनीयादि- कर्मत्वेन स्वयमेव परणिमते ॥९॥ इसी प्रकार शीत उपण पुद्गलों के निमित्त से आत्मा शी- तोष्ण का अनुभव करता है। नहीं तो शीत से बचने के उपाय क्यों करे,तथा गर्मीसे क्यों भागे। देखो गाथा ६२ की टोकाः- तथाहिः-तथाविधानुभवसंपादनसमर्थाया रागद्वप- सुखदुःखादिरूपायाः पुद्गलपरिणामावस्थाया:शीतोष्णानु- भवसंपादनसमर्थायाः शीतोष्णाया पुद्गलपरिणामाव- स्थाया इव पुद्गलादभिन्नत्वेनात्मनो नित्यमेवात्यतभिन्नाया स्तन्निमिचतथाविधानुभवस्य चात्मनोऽभिन्नत्वेन पुद्गला- न्नित्यमेवात्यंतभिन्नस्याज्ञानात्परस्परविशेपानिर्ज्ञाने सत्ये- कत्वाध्यासात् शीतोष्णपेणैवात्मना परिणमितुमशक्येन राग पसुखदुःखादिरूपेणाज्ञानात्मना परिणममानो ज्ञानस्याज्ञानत्व प्रकटीकुर्वन् स्वयमज्ञानमयीभूत एषोऽहं रज्ये इत्यादिविधिना रागादेः कर्मणो ज्ञानविरुद्धस्य कर्ता प्रतिभाति ॥१२॥ इस टीका मे आये हुये तन्निमित्ततथाविधानुभवस्य पद से निमित्तनैमित्तक व्यवहार संबंध स्पष्ट होजाता है। फिरभी जो हठ करते हैं कि निमित्त मात्रउपस्थित रहता है, बाह्यद्रव्य कुछ नहीं करते। ऐसी मान्यता बड़ी भारी भूल है ।
( ४१ ) ज्ञानज्ञेय व्यवहार ज्ञान अपने को ही जानता है। निश्चयनय से परको जानता ही नहीं है। यहाँ यही विचार करना है कि निश्चयनय से अन्यज्ञयों के आकार रूप ज्ञान ही तो परिणमा, तब क्या निश्चयनय से ज्ञय ज्ञान के विषय नहीं हुये। व्यवहारनय का विषय अन्य शेयों को बताना ठीक नहीं है। स्व-पर दोनों शेयोंको जानना ऐसा ज्ञायकस्वभाव निश्चयनय का ही विषय है इस तरह ज्ञान ज्ञेयाकार होता है। सिद्धभगवान् का ज्ञान सदैव निरन्तर ज्ञेयाकार है। यदि इसप्रकार ज्ञानका शेयोंके निमित्तों से परप्रकाशकत्व धर्म न माना जाय, तो ज्ञान अन्य गुणों के समान जड़ हो जावेगा, अर्थात् स्वज्ञेयका भी ज्ञाता न रहेगा। प्रवचनसार गाथा ४१ की टीका में इन्द्रियज्ञान अतीन्द्रियज्ञान की व्याख्या स्पष्ट रूप से की है:- इन्द्रियज्ञानं नामोपदेशान्तःकरणेन्द्रियादीनि विरूपकारण- त्वेनोपलब्धिसंस्कारादीन्, अन्तरङ्गस्वरूयकारणत्वेनोपादाय प्रवर्तते । प्रवर्तमाने च सप्रदेशमेवाध्यवस्यति स्थूलोपल- म्भकत्त्वान्नाप्रदेशम् । मूर्तमेवावगच्छति तथाविधविषय- निवन्धनसद्भावान्नामूर्त्तम् । वर्तमानमेव परिच्छिनति विषयविषयिसन्निपातसद्भावान्न तु वृत्तं वय॑च्च । यत्त पुनरनावरणमनिन्द्रियं ज्ञानं तस्य समिद्धधूमध्वजस्येवाने- कप्रकारतालिङ्गितं दाह्यं दाह्यतानतिक्रमणाादह्यमेव यथा, तथाऽऽत्मनः अप्रदेशं सप्रदेशं मूर्तममूर्त्तमजातमतिवाहितं च पर्यायजातं ज्ञेयतानतिक्रमात्परिच्छेद्यमेव भवतीति ।।४१॥ - - या , ((४२) इन्द्रियज्ञान में अन्तरङ्ग बहिरङ्ग दोनों ही प्रकार के निमित्त घताये हैं। तभी कारण के वश से नेयों में प्रवर्तता है। सो शेयों में व्यवहार से पाविष्ट भो,तथा निश्चय से 'अनाविष्ट भी है (देखो प्रवचनसार मे गाथा २६ की टोका) ज्ञेयाथै परिणमन क्रिया इस तरह संसारी जीवन मे जो शेयार्थ परिणयनक्रिया (रागद्वेपादि) मानी है। उसमें भो कारण बाह्य पदार्थ हैं, स्वतः स्वभाव है ? स्वतः स्वभाव मानने पर केवल ज्ञान में भी होना चाहिये । इससे सिद्ध होता है कि शेयों का असर भी जान पर पडता है। तदनुसार रागद्वेप करके बंधता है। प्रमाणके लिये देखो प्रवचनसार को गाथा ४२-४३ की टीकाः यतः प्रत्यर्थपरिणतिद्वारेण मृगतृष्णाम्भोभारसंभावना- करणसानसः सुदुःसहं कम भारमेवोपभुजानः स जिनेन्द्र- रुग्दीतः ॥४२॥ संसारिणो हि नियमेन तावदुदयगताः पुद्गलकर्माशाः संत्येव । अथ स तेषु संचेतयमानो मोहरागद्वेपपरिणतत्वात् ज्ञेयार्थपरिणमनलक्षणया क्रियया युज्यते । तत एव च क्रियाफलभूतं बन्धमनुभवति । अतो मोहोदयात् क्रिया- क्रियाफले न तु ज्ञानात् ।।४३।। इस प्रकार शेयार्थपरिणति से इष्ट अनिष्ट कल्पना तथा मैं इसका हूँ यह मेरा है इत्यादि रूप से विकल्प उत्पन्न होने में अन्तरंग कर्मोदय कारण है तथा बहिरंग कारण शेय हैं।
जैसे दूध में डाली हुई इन्द्रनील मणि अपनी प्रभा द्वारा, सफेदी को मिटाती हुई दूध को नीलरूप कर देती है। प्रवचन- सार गाथा ३० में ऐसा हो कहा है। रयणमिह इंदणीलं दुद्धज्झसियं जहा सभासाए । अभिभूय तंपि दुद्धं वदि तह णाणमत्थेसु ॥३०॥ टीका का अर्थ:-जैसे दूध में पड़ा हुवा इन्द्रनीलमणि रत्न अपने प्रभासमूह से दूध में व्याप्त होकर वर्त्तता हुवा दिखाई देता है, उसी प्रकार संवेदन. (ज्ञान) भी आत्मा से अभिन्न होने से कर्ता अंश से आत्मता को प्राप्त होता हुआ ज्ञान रूप करण अंश के द्वारा कारणमत पदार्थों के कार्यभत समस्त ज्ञेयाकारों में व्याप्त हुवा वर्तता है । इसलिये कार्य में कारण का । (ज्ञेयाकारों में पदार्थोंका) उपचार करके यह कहने में विरोध नही आता कि ज्ञानपदार्थों में व्याप्त होकर वर्तता है। ऐसे ही बाह्यपदार्थों में इष्ट अनिष्ट कल्पना निमितवश, करता हुवा जीव बंधता है। इस तरह व्यवहार से निश्चय निमित्तनैमित्तिक संबंध सिद्ध हुवा ।। मूर्तिपूजा और निमित्तनैमित्तिकसंबंध मूर्तिपूजा का यही तो सिद्धान्त है कि मूति के दर्शन से आत्माकी वीतरागता सर्वज्ञता का स्मरण हो आवे। यथार्थ। श्रद्धा होने से सम्यग्दर्शन बना रहे। मूर्त्या पूजा मूर्तिपूजा इसतरह तृतीया तत्पुरुष समास से करणपना (साधकतमपना) सूचित किया है। कहीं मूर्ति पूजा को सामायिक भी कहा है। आर्त रौद्र ध्यान का परित्याग होने से धर्मध्यान कहना बिलकुल . 1 , - ..
( ४४ ) ठोक है। कहा भी है:-प्रातरौद्रपरित्यागस्तद्धि सामायिक ब्रतम् ॥ यदि निमित्तनैमित्तिक माव न माना जाय तो मूर्ति- पूजा स्वाध्याय दान उपवासादिक व्यर्थ सिद्ध होते हैं। श्री धवलाजी पुस्तक ६ चूलिका अधिकार २२ सूत्रसे पृष्ठ ४२७ में कहा है कि जिनबिम्ब सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिका कारण है:- तीहिं कारणेहिं पढमसम्मत्तमुप्पादंति,केई जाइस्सरा,केई. सोऊण, केई जिणनिबं दट्ठण ।।२२।। कथं जिणबिंबई- सणं पढ़मसम्मत्तुप्पत्तीए कारणं ? जिणविंवदंसणेण णिवत्तणिकाचिदस्सवि मिच्छचादिकम्मकलावस्स खयदं- सणादो। तथा चोक्तं- दर्शनेन जिनेन्द्राणां पापसंघातकुञ्जरम् ।। शतधाभेदमायाति गिरिर्वजहतो यथा ।। शंका:-जिनबिम्बका दर्शन प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्ति का कारण किस प्रकार होता है ? समाधान:--जिनबिम्बके दर्शन से निधत्त और निकाचित रूप भी मिथ्यात्वादि कर्मकलाप का क्षय देखा जाता है। जिससे जिनबिम्बका दर्शन प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्तिका कारण होता है। कहा भी है कि जिनेन्द्रों के दर्शन से पापसघातरूपी कुंजर के सौ टुकड़े हो जाते हैं, जिस प्रकार कि वज्रके आघात से पर्वत के सौ टुकड़े हो जाते हैं। यही कथन त्रिलोकप्रज्ञप्ति सर्वार्थसिद्धि तत्वार्थराजवाति- कादि से स्पष्ट रूप से आया है। अतः निमित्तिनैमित्तिकसबंध उपचारमात्र नहीं है,यथार्थ है । पं० आशाधरजी ने इस पंचम- काल में देवदर्शन की अत्यावश्यकता बताई है।
( ४५ ) -- घिङ दुःषमाकालरात्रिं यत्र शास्त्रदृशामपि ।। चंत्यालोकाते न स्यात्प्रायो देवविशामतिः।। मनोयोग के कालसे निमित्तनैमित्तकसंबंधकी सिद्धि मनोयोग का काल अन्तर्मुहूर्त कहा है तथापि व्याघात और मरण की अपेक्षा एक समय भी कहा है। क्रोध मान माया लोभ कषायों का काल भी व्याघात के कारण एक समय वर्णन किया है। अर्थात् व्याघात होने से मनोयोग और कषायें बदल जाती हैं। पद्मपुराण में इस आघात से लक्ष्मण के मरण का दृष्टांत प्रसिद्ध है। ध्यान की सिद्धि के लिये एकांत स्थान का निर्देश किया है क्योंकि अन्यत्र लौकिक जनों के या तिथंचों के संसर्ग से मन चंचल हो जाता है। ध्यान का वर्णन ज्ञानार्णव तथा तत्वानुशासन ग्रन्थ में विस्तार से लिखा है। ऐसा द्रव्य क्षेत्र- काल भावों का निमित्तनैमित्तिक संबंध प्रसिद्ध है। इच्छा का निमित्तनैमित्तिकपना समयसार के निर्जराधिकार गाथा २१० से २१४ तक इच्छा के त्याग का उपदेश दिया है। इच्छा आत्मा के लोभ कषाय की परिणति बताई है। उस इच्छा के अनेक विशेषण लगाये हैं। खाने की इच्छा, पाने की इच्छा, पुण्य की इच्छा, पाप की इच्छा ऐसी इच्छावों का संबंध बाह्य पदार्थों से है। बाह्य परिग्रह हिंसा के आयतन बताये हैं। अतः बाह्य परिग्रहत्याग का उपदेश दिया है । हिंसायतननिवृत्तिः परिणामविशुद्धये तदपि कार्या ।। आदि यह पुरुषार्थसिद्ध्यु पायका श्लोक है । रत्नकरण्डश्रावकाचार -- + विशेष रूप से -- - ( ४६ ) में परिग्रहपरिमाणाणुव्रतका दूसरा नाम इच्छापरिमाणवत भी कहा है। धनधान्यादि ग्रन्थं परिमाय ततोऽधिकेषु निस्पृहता। परिमितपरिग्रहः स्यादिच्छापरिमाणनामापि ।। इस तरह बाह्य पदार्थों का भी प्रभाव आत्मा पर पड़ता है। यह भी स्पष्ट है। वाह्य पदार्थोंका निमित्तनैमित्तिक संबंध यदि बाह्य पदार्थों का प्रभाव न पड़ता होता तो कोई भी रोगादि से न डरता, तथा ओषधि आदि का प्रयोग क्यों करता, सभी निःशङ्क रहते। अतः निमिच का प्रभाव न मानना ठीक नहीं है खमयसार वधाधिकार गाथा २८३ से २८७ में निमित्तनैमित्तिकभाव का उदाहरण इस प्रकार बताया है:- आधाकम्माईया पुग्गलदव्वस्स जे इसे दोसा ।। कह ते कुबइ णाणी परदत्रगुणा उ जे णिचं ॥२८६॥ आधासम्म उद्देसियं च पुग्गलमयं इमं दव्यं ।। कह तं मम होई कयं जं णिच्चमचेयणं बुच ।।२८७।। ठीक्षा:-यथाऽधःकर्मनिष्पन्नमुद्देशनिष्पन्नंच पुद्गल- द्रव्यनिमित्तभूतमप्रत्याचक्षाणो नैमित्तिकसूतं बंधसाधक भावं न प्रत्याचप्टे,तथा समस्तमपि परद्रव्यमप्रत्याचक्षाणस्त निमित्तकं भावं न प्रत्याचष्टे । यथा चाधाकर्मादीन् पुद्गल द्रव्यदोपान्न नाम करोत्यात्मा परद्रव्यपरिणामत्वे सति आत्मकार्यत्वाभावात् । ततोऽध:कम्मोदेशिकं च पुग्दल-
(४७' )
द्रव्यं न मम कार्य नित्यमचेतनत्वे सति मत्कार्यत्वाभावात्
इति । तत्वज्ञानपूर्वकं पुद्गलद्रव्यं निमित्तभूतं प्रत्याचक्षाणों
नैमित्तिकभूतं बंधसाधकं भाव प्रत्याचष्टे तथा समस्तमपि
परद्रव्य प्रत्याचक्षाणस्तनिमित्तं भावं प्रत्याचष्टे । एवं
द्रव्यभावयोरस्ति निमित्तनैमित्तिक भावः ।।
भावाथ:-यह द्रव्य पार भाव का निमित्तनैमित्तिकपना
उदाहरण से दृढ़ किया है। जैसे लौकिक जन कहते हैं कि जैसा
अन्न खाय वैसी हा बुद्धि हो जाता है । उसो तरह शास्त्र में
उदाहरण है कि जो पापकर्म कर आहार उत्पन्न हो उसे अधः
कर्मनिष्पन्न कहते हैं। तथा जो आहार किसी के निमित्त वना
हुवा हो उसे उद्देशिक कहते है। ऐमा आहार जो पुरुष
सेवन करे उसके वैसे ही भाव होते है। इस तरह द्रव्य भाव
का निमित्तनैमित्तिक भाव है। उसी तरह समस्त द्रव्यों का
निमित्तनैमित्तिक भाव जानना। ऐसा होने पर जो पर
द्रव्य को ग्रहण करता है, उसके रागादि भाव भी होते हैं।
उनका कर्ता भी होता है, तब कर्म का वंध भी करता है और
जब ज्ञानी हो जाता है तब किसी के ग्रहण करने का राग
नहीं, रागादि रूप परिणमन भी नहीं, तब आगामी कर्मबंध
भी नहीं।
इस तरह ज्ञानी परद्रव्य का कती नहीं है।
पर द्रव्य और अपने भाव का निमित्तनैमित्तिक आव जान
कर समस्त परद्रव्य को त्यागे, तव समस्त रागादि भावों की
संतति कट जाती है, उस समय आत्मा अपना ही अनुभव
करता हुवा कर्म के बधन को काट कर आप में हो प्रकाश रूप
प्रकट होता है। इसलिये जो अपना हित चाहते हैं वे
,
ऐसे करो॥
४८
निष्कर्ष
जो पर द्रव्यों को नहीं त्यागता वह उसके निमित्त से
हुये भावों को भी नहीं त्यागता। जो समस्त पर द्रव्योंको
त्यागता है वह उस परद्रव्य के निमित्त से हुये भावों को भी
त्यागता है।
रागादिक भी पुद्गल के विकार हैं
द्रव्यराग तो पुग्दल ही है उस के उदय से जायमान
भावराग भी पुद्गल है। ऐसा निमित्तनैमित्तिक भाव से कहा
जाता है। स्वरूप में रागादिक नहीं हैं। अतः शुद्धनिश्चय-
नय से जीव के रागादिक नहीं है। परन्तु इस समय तो
रागादिक हैं ही।
उदयविवागो विविहो कम्माणं वरिणी जिणवरेहिं ।।
रण दु ते मझ सहावा जाणगभावो दुःअहमिको ॥१६८
पुग्गलकम्मं रागो तस्स विवागोदो हवदि एसो।।
ण दुएस मज्झ भावो जाणगभावोदु अहमिको ॥१६६।।
टीका:-ये कर्मोदयविपाकप्रभवा विविधा भावा न ते मम
स्वभावाः । एष टंकोत्कीर्णंकज्ञानस्वभावोऽहं ॥ १७८ ।।
अस्ति किल रागो नाम पुद्गलकर्म तदुदयविपाकप्रभवोऽयं
रागरूपो भावः। न पुनर्मम स्वभावः । एष टंकोत्कीर्ण
ज्ञायकस्वभावोऽहं । एवमेव च रागपदपरिवर्तनेन
देपमोहकोधमान इत्यादि ॥१६॥
(४६ )
अर्थः-निश्चय कर रागनामा पुग्दलकर्म है, उस पुग्दल
कर्म के उदय के विपाक कर उत्पन्न यह प्रत्यक्ष अनुभवगोचर
रागरूप भाव है, वह मेरा स्वभाव नहीं है। मैं तो टड्कोत्कीर्ण
एक ज्ञायक स्वभाव हूं "ऐसे सम्यगृहष्टि आप को परको
जानता है ॥ १६६ ।। गाथा ३७१ में जीव के रागादिभाव
कहे हैं :-
रागो दोसो मोहो जीवस्सेव य अणण्णपरिणामा ।।
एएण कारणेण हु सदादिसु गस्थि रागादि ।।
कलश ४४ में तथा ३६ में रागादि को पुद्गल विकार कहा
है। इससे अच्छी तरह स्पष्ट होजाता है कि भावराग पुद्गल के
भी हैं, जीव के भी हैं। यहां व्यवहारनय का कथन
(निमित्तनैमित्तिक का कथन) प्रमाण जानना। इसी दृष्टि
में संसार और मोक्ष हैं। शुद्ध अकेला जीवका स्वभाव न
राग हैं न वीतराग है। (जातादृष्टा) जो है सो है। ऐसे
शुद्धनय की दृष्टि में बंध मोक्ष हो नहीं है। इसतरह नयविवक्षा
को ध्यान में रखकर अर्थ करना चाहिये ।।
तृतीय प्रश्न :-शरीर की हलन-चलन आदि क्रिया, मात्र
अपनी योग्यता से होती है या आत्मा की सहायता से होती है ?
आत्मधर्म अंक १ पृष्ठ ७ में लिखा है कि हाथ तो जड़ है,
चमड़ा है, वह आत्मा नहीं है। आत्मा और हाथ दोनों भिन्न
पदार्थ हैं। आत्मा हाथ का कुछ नहीं कर सकता। क्या यह
ठीक है ? आत्मा और शरीर का क्या सम्बन्ध है ?
समाधान:-योग के मन वचन काय के व्यापार क्या
विना जीव के मुर्दे में भी हो सकते हैं ? इसलिये बिना चेतन
के
कहना प्रत्यक्ष विरुद्ध है।
( ५० ) शरीर और आत्मा का एक क्षेत्रावगाह रूप संयोगसंबंध है। इसी को प्रवचनसार मे असमान जातीय विभावपर्याय कहा है :- यथैव चानेककौशेयककापसिमयपटात्मको द्विपटिका- त्रिपटिकेत्यसमानजातीयो द्रव्यपर्यायः । तथैव चानेक- जीवपुद्गलात्मको देवो मनुष्य इत्यसमान जातीयो द्रव्यपर्यायः। गाथा ९३ की टीका का अर्थः-जैसे अनेक रेशमी और सूती पटों के बने हुए द्विपटिक त्रिपटिक ऐसी असमान जातीय द्रन्यपर्याय है। उसी प्रकार अनेक जीवपुदगलात्मक देव मनुष्य ऐसी असमान जातीय द्रव्यपर्याय है। संसारी जीव चार प्राणों सहित हैं-इन्द्रिय, वल, आयु और श्वासोच्छ्वास । देखो प्रवचनसार गाथा १४६-१४७ । शरीर कायवल प्राण मे गर्भित है तथा सभी प्राण पुद्गलकर्म से निवृत्त हैं, अतः पौद्गलिक हैं। पुद्गलकर्म के कार्य हैं। पुद्गलकर्म के कारण हैं। पुद्गलप्राणों को सन्तान रूप प्रवृत्ति के कारण हैं। तो क्या संसार मे जीव से भिन्न शरीर है ? स्वरूप-लक्षण की अपेक्षा भेद् अवश्य है। नहीं तो मुक्ति में भिन्न कैसे होते ? इसी से कहना पड़ता है कि पहले भी भिन्न थे। परिणति भिन्न-भिन्न होते हुए परस्पर आयुकर्म से जोड़ा हुआ जीवकर्म का सम्बन्ध है। कहा है :- जीवो पाणणिबद्धो बद्धो मोहादिएहिं कम्महि ।। उपझुंज कस्मफलं नज्झदि अण्णेहिं कम्मेहिं ।।१४८।। प्रवचनसार टीका:-यतो मोहादिभिः पौद्गलिकर्मभिर्वद्धत्वा- से , ( ५१ ) ज्जीवः प्राणनिबद्धो भवति । यतश्च प्राणनिबद्धत्वात्पौद ग- लिककर्मफलमुपभुजानः पुनरप्यन्यैः पौद्गलिककर्मभिर्ब- श्यते। ततः पौद्गलिककर्मकार्यत्वात्पौद्गलिककर्मकारण- त्वाच्च पौद्गलिका एव प्राणा निश्चीयन्ते । इन प्राणों का जीव से सम्बन्ध है अतः जीवके, क्षयोपशम से प्रगट हुए ज्ञान ( इन्द्रियाँ ) बल आदि भाव प्राण हैं। इस तरह मिलकर द्रव्यप्राण, भावप्राण रूप असमान पर्याय हो रही है। कर्मों के तीव्र उदय में जीव अपने स्वरूप की तरफ लक्ष्य ही नहीं देता। तभीतो सम्यक्त्व की उत्पत्ति होने के पूर्व अन्तः- कोडा कोडीसागरप्रमाण स्थितिबन्ध और स्थितिसत्व कहा है। सागारधर्मामृतमें कहा है :- आसन्नभव्यताकर्महानिसंज्ञित्वशुद्धिभाक् । देशनाद्यस्तमिथ्यात्वो जीवः सम्यक्त्वमश्नुते ॥ इससे सत्तामें पड़े हुवे कर्मों का भी आत्मा पर प्रभाव पड़ता है। उदयागत का तो होता ही है। नहीं तो उपशम- सम्यक्त्व और क्षायिकसम्यकत्व की श्रद्धागुण की निर्मलता एकसी हो जाय । निर्जरा में भी अंतर पड़ा है। उपशम सम्यक्त्व क्षपक श्रेणी नहीं चढ़ता। इसी से आत्मा के साथ कर्मनो- कर्म का बंध प्रतीत होता है। केवलज्ञानावरण में केवल ज्ञान को घात करने की शक्ति बताई है। स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा में कहा है :- कापि अपुव्वा दीसई पुग्गलदव्वस्स एरिसी सत्ती ।। केवलणाणसहावो जेण विणासिदो होई ॥ इसलिये समगुणयर्यायं द्रव्यं इसवचन से जीव तथा से -- - ( ५२ ) पुद्गल आदि द्रव्य समान गुणवाले हैं। ऐसा होते हुए भी जीव, अनादि से अपनी भूल से व कर्मों के संबंध से निर्बल है । जव यह जीव काललब्धि प्राप्तकर तत्वज्ञान के अभ्यास से करणल- ब्धिद्वारा मिथ्यात्व को खण्ड करता है। तव जीव सबन होता है और कर्म कमजोर होते हुए नष्ट हाते चले जाते हैं। शरीर की अशुचिता का वर्णन अशुचिभावना में किया है। इसलिये गृहस्थ तो स्नानकर लौकिक शुद्धि शरीर की कर लेते हैं। मुनिराज स्नान नहीं करते फिर भी जीवकी रत्नत्रयरूप पर्यायसे उनका शरीर पवित्र है। सोही श्रीसमंतभद्रस्वामी ने रत्नकरण्डश्रावकाचार में कहा है :- स्वभावतोऽशुचौ काये रत्नत्रयपवित्रिते ॥ निर्जुगुप्सा गुणप्रीतिर्मता निर्विचिकित्सिता ।। यदि आत्मा और शरीरका सबंध नहीं होता तो रत्नत्रय पवित्रिते नहीं कहते । रत्नत्रय तो आत्माका स्वभाव है। व्यवहार रत्नत्रय भी तो आत्माश्रित ही है। व्यवहार का अर्थ जब भेद रूप करते हैं। तब भेद तो अभेद सापेक्ष ही होता है। भेद विना अभेद नहीं-अभेद विना भेद नहीं। इस तरह भेदा- भेद रूप ही रत्नत्रय एक साथ रहते हैं। ऐसा निर्णयकर आत्मा और शरीर की सापेक्ष पूज्यता और शुद्धि जानना। श्रीविद्यानद स्वामी प्राप्तपरीक्षा में कहते हैं: परतंत्रोऽसौ हीनस्थानवत्वात् । हीनस्थानं हि शरीरं । इस प्रकार शरीर के संबंध से आत्मा को पराधीन बताया है। शरीर को कारागृहका भी दृष्टांत दिया है। समयसार में वर्णादि गुणस्थानांत भावों को निश्चय से निषेध किया है। वहां व्यवहार से शरीरादि आत्मा के बताये (५३) । - -- t --- हैं। जीव अजीवाधिकार:- चवहारेण दु एदे जीवस्स हवंति वएणमादीया । गुणठाणंता भावा ण दु केई णिच्छयणयस्स ||५६।। एएहिं य संबंधो जहेव खीरोदयं मुरणेदव्यो । णय हुंति तस्स ताणि दु उवोगगुणाधिगो जम्हा।।५७।। गाथा ६१ की टीका में लिखा है कि:-संसारावस्थायां कथंचि- द्वर्णाद्यात्मकत्वव्याप्तस्य भवतो वर्णाद्यात्मकत्वव्याप्तिशून्य- स्याभवतश्चापि || इत्यादि ।। इससे भी सयोगसंबंध सिद्ध होता है। व्यवहार से शरीर की स्तुति से आत्मा की स्तुति बताई है। ववहारणो भासदि जीवो देहो य हवदि खलु इक्को ।। ण दुणिच्छयस्स जीवो देहो य कदावि एकठो ॥२७॥ जीवाजीव० ० गाथा ६७ भावार्थ:-व्यवहारनय तो आत्मा और शरीर को एक कहता है, और निश्चयनय से भिन्न हैं। इसलिये व्यवहारनय से शरीर के स्तवन करने से प्रात्माका स्तवन माना जाता है। और यहां कोई प्रश्न करै, कि व्यवहारनय को असत्यार्थ कहाहै, और शरीर जड़ है। तब व्यवहाराश्रित जड़ की स्तुति का क्या फल है ? उसका उत्तर यह है कि व्यवहारनय सर्वथा असत्यार्थ नहीं है। उसे निश्चय को प्रधान करके असत्यार्थ कहा है। छन्मस्थको अपना पर का आत्मा साक्षात् दिखाई नहीं देता, शरीर दिखाई देता है। उसकी शान्तरूप मुद्राको देखकर अपने भी शांतभाव होते हैं। तथा शांत मुद्रा को देखकर अंतरंग में -- ( ५४ ) वीतरागभाव का निश्चय होता है। ऐसी नयविवक्षा से शरीर और आत्माका परस्परावगाढ सवध सिद्ध होता है। यदि कोई कहै कि:- आत्मा और शरीर तो निश्चयनय से भिन्न भिन्न पदार्थ हैं-एक नहीं हो सकते। उनकी क्रियाएँ भी भिन्न भिन्न होंगी । अतः संबंध कहना ठीक नहीं है ? उसका समाधान यह है कि आप निश्चयनय कौन सा लेते हैं शुद्ध यो अशुद्ध । अशुद्ध शब्द ही आत्माके कर्सनोकर्मके संबंधको द्योतित करता है। इसलिए इस विवक्षा में अशुद्ध निश्चयनय व्यवहारनय दोनों एक ही हैं। तब संबंध सिद्ध हो ही गया। यदि शुद्ध- निश्चयनय से कहते हो, तो शुद्ध निश्चयनय तो कथन मात्र है। अभी वर्तमानमे अत्माकी शुद्धपर्याय तो है ही नहीं। वर्तमानमें बद्धस्पष्ट आत्मा है । आगामी जैसी सिद्धपर्याय होगी, उसी वस्तु स्वरूपका स्वभाव से कथन करने वाला शुद्ध निश्चयनय है। व्यवहारनय से बद्धस्पष्टपना आत्माका हो रहा है, ऐसा गाथा १४१ समयसार मे कहा है। वर्तमान में शरीर और आत्मा का कोई भेद नहीं है । व्यवहार से बद्धस्पष्टपना भूतार्थ है । निश्चयसे अभूतार्थ है ऐसा गाथा १४ की टीका में कहा है तथाऽत्मनोऽनादिबद्धस्य बद्धस्पृष्टत्वपर्यायेणानुभूयमान- तायां बद्धस्पृष्टत्वं भूतार्थमप्येकांततः पुद्गलास्पृश्य- सात्मस्वभावसुपेत्यानुभूयमानतायामभूतार्थम् ॥ अतः जब तक संसार है, तब तक हमें व्यवहारनय कथन प्रमाण (सत्यार्थ) मानकर आत्मा, शरीर को कथंचित, एक ही कहना चाहिये । यदि हम व्यवहारनय को का ( ५५ ) छोड़ देते हैं, तो केवली भगवान के स्थान विहारादि क्रियाएँ नहीं बनेंगी। तथा समस्त संसारी जीवों के कर्मोदय से स्वभाव का घात नहीं बनेगा। देखो प्रवचनसार की गाथा ४५-४६ की टीका : उस में स्पष्ट कर दिया है, कि केवली भगवान् की क्रियाएँ औदायिको हैं । मोह के अभावसे नवीन बंध न करने से क्षायिकी भी हैं। इससे सिद्ध होता है कि अभी कर्मनोकर्म का संबंध अर्हत के भी है, तभी तो वे नोसंसारी बने हुए आयुपर्यन्त शरीरके साथ ठहरते हैं। वायु के निमित्तसे समुद्र के उत्तरंग होने का दृष्टांत मात्मा की कर्म विपाक से सभव संसारावस्था के दाष्टांत कथन में दिया है। उससे भी आत्मा शरीरी सिद्ध होता है। समय- सार कर्त्ताकर्मअधिकार ८३ गाथा:- टीका:-दार्टान्तः-तथा संसारनिःसंसारावस्थयोः पुद्गलकर्मविपाकसंभवासंभवनिमित्तयोरपि पुद्गलकर्मजी- वयोर्व्याप्यव्यापकभावाभावात् कर्तृकर्मत्वासिद्धौ जीव एव । स्वयमंतापको भूत्वादिमध्यान्तेषु ससंसारनिःसंसारावस्थे व्याप्य ससंसारं निःसंसारं वात्मानं कुर्वन्नात्मानमेकमेव कुर्वन् प्रतिभातु मा पुनरन्यत् । भावार्थ:-आत्मा के परद्रव्य-पुद्गल कर्म के निमित्त से संसारयुक्त और संसाररहित अवस्था हैं । अवस्था रूप से स्वयं ही परिणत होता है। यहा स्वयं शब्द से यही अर्थ लेना कि निमित्तमंतरेण न परिणमते। परन्तु निमित्त को उपादान नहीं बना लेता। -- - आत्मा उस '( ५६ ) उपादान दोनों हो जावे तो चेतन अचेतन हो जावे, अथवा अचेतन चेतन हो जावे। कोई सीमा ही न रहे। यदि इन कर्म नोकर्म रूप निमित्तों को छोड़ दिया जावे, और आत्माको सर्वथा अबंध अमूर्तिक ही मानें, तव मतिज्ञा. नादिक की सिद्धि ही नहीं होगी। क्योंकि मतिज्ञानादिक क्षयोपशम से प्रगट होनेवाले विभावरूप आत्मा के निजतत्व हैं। विभाव का अर्थ अपूर्ण लेना। मिथ्या नहीं लेना । सम्यग्दर्शन हो जाने पर मतिज्ञा- नादि सम्यक हो जाते हैं। ज्ञान तो आत्मा का स्वभाव है, तथापि तारतम्य क्षयोपशम विना नहीं बन सकता। क्षयोपशम ने ज्ञायकस्वभाव आत्मा को नहीं बनाया। ज्ञायकस्वभाव तो स्वयसिद्ध है। फिर क्षयोपशम ने क्या दे दिया ? गुण, द्रव्य, या पर्याय । ऐसा बहुत लोग पूछा करते हैं। सो स्वाभाविक नियम तो ऐसा ही है, कि कोई द्रव्य के गुण पर्याय कोई द्रव्य में नहीं जाते । देखो गाथा १०३, तथापि परस्पर के निमित्त के कारण जो शक्ति कर्मोदय से आवृत थी, सो क्षयोपशम के निमित्त से एक देश व्यक्त हो जाती है। कर्म का आवरण आत्मा पर सिद्ध ही किया है। अतः क्षयोपशम भी मानना चाहिये । समयसार गाथा ८० में परस्पर निमित्त नैमितिक- पना कहा है:- जीवपरिणामहेदु कम्मत्त पुग्गला परिणमंति ।। पुग्गलकम्मणिमित्त तहेव जीवो वि परिणमई ।।८०॥ णवि कुव्वइ कम्मगुणे जीवो कम्म तहेव जीवगुणे ।। अएणोएणणिमित्तेण दु परिणाम जाण दोण्हं पि॥१॥ एएण कारणेण दु कत्ता आदा सएण भावेण ॥
पुग्गलकम्मकयाणां ण दु कत्ता सव्वभाकाणां ।८२॥ णिच्छयणयस्स एवं श्रादा अप्पाणमेव हि करेदि ।। वेदयदि पुरणे तं चेव जाण अत्ता दु अत्ताणां ॥८३॥ ववहारस्स दु आदा पुग्गल कम्मं करेई णेयविहं ।। तंचे व पुणो वेयई पुग्गलकम्मं अणेयविहं ॥४॥ इस तरह दोनों का कधन स्पष्ट है । यहां शरीर के संबंध का कथम या क्षयोपशम का कथन व्यवहारनय से ही प्रमाण करना चाहिये। अतः आत्मा को वद्धस्पष्ट मानना चाहिये । आगे ८५ वी गाथा में जो दोष हिया गया है वह दोप उपादान की दृष्टि की अपेक्षा से है, न कि एक उपादान और एक निमित्त की दृष्टि से इस प्रकार न मानने पर चरणानुयोगादि का अभाव अन्यथो चरणानुयोग करणानुयोग रूप आगम का अभाव ही मानना पड़ेगा। क्योंकि इन अनुयोगों का कथन तथा पर्याप्ति संज्ञा, योग, गुणस्थान,-आदिका कथन शरीर के संवध से है। विना शरीर के गति के भाव भी नहीं बन सकते। इन में से गुणस्थान को ही देखिये। जीवकाण्ड मे उसका स्वरूप लिला है कि गुणसरणा सा च मोहजोगभवा। मोह और योग आत्मा के हैं, इसमें किसी को विवाद नहीं है । द्रव्यमोहसे होनेवाले औदयिकादि भावरूप मोहसे यहां प्रयोजन है, सो ही कहा है :- जेहिं हु लक्खिज्जंते उदयादिसु संभवेहिं भावेहि जीवाते गुणसण्णा णिहिट्ठा सव्वद रिसीहिं ॥५॥ - ( ५८ ) स्थान अतः आत्मा के भावों का ही नाम गुणस्थान है मतलब यह है, कि रत्नत्रय की अशुद्धावस्था और शुद्धावस्था ही गुण हैं। मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कपाय तथा अशुद्ध योग ही तो रत्नत्रय की अशुद्धावस्था है। संसारी जीवों के ही गुणस्थान होते हैं। सिद्धजीव गुणस्थानातीत हैं। समयसार क कर्माधिकार गाथा ६८ मे कहा है :- मोहणकस्मस्सुदयादु वरिणया जे इमे गुणटाणा । ते कह हवंति जीवा जे णिचमचेदणा उत्ता॥ ६८॥ सामगणपञ्चया खलु चउरो भएणति बंधकत्तारो ॥ मिच्छत्तं अविरमणं कसाय जोगा य बोद्धव्वा ॥१०॥ तेसिं पुणो वि य इमो भणिदो भेदो दु तेरसवियप्पो॥ मिच्छादिठी आदी जाव सजोगिस्स चरमंतं ।११० । एदे अचेदणा खलु पुग्गलकम्मुदय संभवा जम्हा ।। ते जदि करंति कम्मं णवि तेसिं वेदगोआदा ।।१११|| गुणसरिणदा दु एदे कम्मं कुब्वंति पञ्चया जम्हा ॥ तम्हा जीवोऽकत्ता गुणा य कुवंति कम्माणि ॥११२॥ इस कथन में और जीवकाण्ड के कथन में कोई सिद्धान्त- विरोध नहीं है। यहां जो गुणस्थानों को नित्य अचेतन कहा है, वह निमित्तप्रधान दृष्टि से कहा है, तथा जीव के शुद्ध- स्वरूप बताने की दृष्टि से है। शुद्धस्वरूप किसी अन्य का न कर्त्ता होता है न कर्म। अतः पुद्गलकर्मका कर्तापना गुण- स्थानों को अचेतन होने से ठीक बन गया । जब निन्य शब्द को छोड़कर क्षणिक पर्याय का अर्थात् अशुद्ध उपादानका विचार
(५९)
करते हैं नच जीवके गुगल्यान सिद्ध होते हैं। माही श्री
धवन शान्त्र प्रथम पुन्नक के गुणयान स्वर में कहा है।
नहीं तो नागादि कभी भी जीव विद्ध नहीं होगा तब
जीव माध्यमद की वह अकता हो जायगा ! अतः इन ऋथन
का समन्वय व्यवहार तथा अगढ़ निश्चयनय श्री टिम कर
लेना चाहिये । इस ये थामा के नाकबंब उभयचंव
की मिट्टि हानी है। इसका निमाय श्रान्त्रवाधिकार में होना
है। वहाँ वानी को भी जयन्यपरिणाम में बंधक ऋहा है।
द्रव्यमंत्रह में अहन का न्वकप इन्न प्रकार बताया है :-
गववाहकम्मा अर्गतमुहगागदंभुगी नियमईयो ।
मुहदवन्यो अग्या मुट्ठी अग्हिी विचिंतिती ॥
इस गाथा में केवली भगवान श्री गुमंददाय हिन्द्रा है।
इसमें शुगर की तथा ग्रामा की पकना मिद्ध होती है,
भगवान का शरीर परसौदाम्कि होना है। बिमार में
हमका कथन स्पष्ट है। श्री श्रीमदनि यात्रा मानायिक
पाठ में कहते हैं।
शरीरतः कर्तुमनन्तगति। मिन्नमान्यानमपानदीपम् ।
जिनेन्द्र कोषादिव नुनयष्टिं । नत्र प्रसादन समाप्नु शक्तिः ॥
इससे सिद्ध होता है, किद गर्गर श्रामा श्रीगना
न होनी नी मिन्न करने के लिये शक्ति की प्रार्थना क्यों करने।
दृष्टान्त भी नन्दवार वा स्थान का दिया है।
पुगयउदयमे वाद्यसामग्री
जब पुण्यदय में जीव के सब प्रकार श्री बहिरङ्ग सामग्री
लुट्ट जानी है. दब शरीर का संबंध आत्मा से न हो, यह दो
बड़े श्राश्चर्य की बात है।
( ६०' ) । श्री पं० बुधजनजी ने शरीर सम्बन्ध को एक भजन में लिखा है :- और ठौर क्यों प्यारा। तेरे ही घट में जानन हारा ।।टेक।। हलन चलन थलवास एकता जात्यन्तर ते न्यारा न्यारा ॥१॥ मोहउदयरागी द्वेषी हवै क्रोधादिक का सरजनहारा ॥२॥ भ्रमत फिरत चारोंगति भीतर जनम मरन भोगत दुखभारा ||३|| गुरु उपदेश लखै यह आपा तर्हि विभाव करै परिहारा । हबै एकाकी बुधजन निश्चल, पावै शिवपुर सुखद अपारा।। इससे आत्मा शरीर है, बद्ध है, मूर्तिक है। ऐसा सभी अन्थों में कहा है। अथवा समयसार में जहाँ घटपदादि का कर्ता श्रात्मा के योग और उपयोग को बताया है। वहां आत्मविकल्प और आत्मव्यापार ये हो तो उपयोग योग के लक्षण बताये हैं। क्या ये शुद्ध अमूर्तिक आत्मा के हो सकते हैं ? नहीं । सशरीर आत्मा ही इनका आधार है। यहाँ शरीर सहित आत्मा का ही नाम जीव या आत्मा है। मरण-जीवन-सुख-दुःख आत्मा ही मरण जीवन सुख दुःख को प्राप्त होता है। 'बन्धाधिकार में इस सब का विस्तार से निरूपण है । 'कर्मेन्द्रियान्मरणजीवितदुःखसौख्यम् आदि १६८ वें कलश में सबका निचोड़ कर दियाहै। इसी से दश प्राणधारी संसारी प्रात्मा की सिद्धि होती है। शरीर विना जीवन मरण बन ही नहीं सकते। आत्मा भूताविष्टावस्था में अमानुषोचितव्यवहार करता (गाथा ६६ कर्ता कर्माधिकार) ऐसा कहा है तो क्या sto ( ६१ ) - मानुषपना आत्मा का अमूर्तिक धर्म है। शरीर से भिन्न आत्मा का श्रद्धान तथा ज्ञान एवं उसी प्रकार का उपदेश करने से क्या प्रात्मा एक शुद्ध पदार्थ है। श्रद्धान ज्ञान का काम तौ वस्तु स्वरूप को जैसा का तैसा श्रद्धान करना व जानना है तथा फिर शरीर और आत्मा को एक न मानना है। परन्तु शरीर का सम्बन्ध नहीं छूटा है। अतः श्रात्मा शरीर में एक क्षेत्रावगाह सम्बन्ध से ठहरा हुआ है। वैराग्यकी सामर्थ्य दिखलातेहुये निर्जरा अधिकारमें कहते हैं:- जह मज्जं पित्रमाणो अरदिभावेण ण मज्जदि पुरिसो ।। दव्बुवभोगे अरदो णाणीवि ण वज्झदि तहेव ॥ १९६॥ टीका :-यथा कश्चित्पुरुषो मैरेयं प्रति प्रवृत्तती- बारतिभावः सन् मैरेयं पिबन्नपि तीव्रारतिभावसामान्न माद्यति तथा रागादिभावानामभावेन सर्वद्रव्योपभोगं प्रति प्रवृत्ततीव्रविरागभावःसन् विषयानुपझुंजानोऽपि तीव्रविरागभावसामान्न वध्यते ज्ञानी ।। ६६ ।। तोत्र अरतिभावसे मदिरापान करनेवाला पुरुष मतबाला नहीं होता है। उसी प्रकार यह तीव्र वैराग्यकी सामर्थ्य है कि ज्ञानी विषयों का सेवन करता हुआ भी कर्मो से नहीं बधता। इस गाथामे अत्माको मदिरापानी बताया है। वह भी आत्मा सशरीर ही हो सकता। क्या यह केवल अमूर्तिक आत्मा का कथन है। यह बात श्री अकलंकदेव तत्त्वाथराजवात्तिक द्वितीयाध्याय जीवभव्याभव्यत्वानिचसूत्र की टीका की वार्तिक में लिखते हैं कि सुरासे (मदिरासे) अभिभव (नशा) देखा जाता है। वह ( ६२ ) स्या अचेतन शरीर का ही है। यदि वह अमिभव अचेतन शरीर का ही हो तो मदिरा के भाजन में (बोत्तलमें) भी होनेलगे। सो शरीर मे केवल होता नहीं देखा जाता। इंद्रियों को कहो तो क्या इंद्रियां जो शरीर से भिन्न हैं अर्थात् प्रात्मा की है या द्रव्येन्द्रियां जो शरीर से भिन्न है, जरूप हैं। जड़रूप इंद्रियोंको कहो तो वर्तमान में द्रव्येन्द्रिय भावेन्द्रिय दोनों एक साथ हैं। अतः मदिरा से नशा दोनों पर होता है। केवल जड़ पर ही कहना ठीक नहीं है । यदि अमूर्तिक आत्मामें कहो तो ऐसा आत्मा मदिरापान करता ही नहीं है। इस से ही आत्मा सशरीर सिद्ध होता है। कर्म वा देह सहित होने से ही आत्मा के औदयिकादि पांचभावों की सिद्धि होती है। वार्तिक २६ :-करणमोहकर मद्यमिति चेन्न तद्विविध- कल्पनायां दोषोपपत्तेः । स्यादाकृतं चक्षुरादीनां करणानां व्यामोहकारणं मद्यं पृथिव्यादिभूतप्रसादात्मकत्वादिद्रियाणां नात्मगुणस्यामूर्तित्वादिति । तन्न किं कारणं तद्विविध- कल्पनायां दोषोपत्तेः । इदमिह संप्रधार्य-तानि करणानि चेतनानि वास्युरचेतनानि वा। यद्यचेतनानि, अचेतन- स्वात्तेषां न मदकरं मद्य । यदि स्यात्प्रागेव स्वभाजनानां सदकरं स्यात् । अथ चेतनानि पृथगनुपलब्धचैतन्य- स्वभावानां पृथिव्यादीनां चेतनाद्रव्यसंबंधत्वादेव- चैतन्यव्यपदेश इत्यात्मगुणस्यैव मोहकरत्वं सिद्ध । वार्तिक २८:-सुराभिभवदर्शनात्-मदमोहविभ्रमकरी सुरां पीत्वा नष्टस्मृतिर्जनःकाष्ठवदपरिस्पंद उपलभ्यते ।
( ६३ ) तथा कर्मेन्द्रियाभिभवादात्मा नाविभूतस्वलक्षणो मूर्त इति निश्चीयते । वार्तिक २७ :- अमूर्तत्वादभिभवा- नुपपत्तिरितिचेन्न तद्विशेषसामोपलब्धेश्चैतन्यवत् । अथ मतमेतदमूर्तिरात्मा कर्मपुद्गलैर्नाभिभूयते ततस्तत्परिणामा- भाव इति । तन्न किं कारणं ? तद्वद्विशेषसामोपलब्धः। सोऽस्यानादिकर्मबंधसंतानोऽस्तीति तद्वांस्तद्वतो विशेषसा- मर्थ्य । कथं १ चैतन्यवत् । यथा अनादिपारिणादिक- चैतन्यवशीकृत आत्मा तद्वान् । तस्य तद्वतश्चैतन्यवतः नारकादिमादिपर्यायविशेषवृत्तिरपि चेतना। तथाऽनादि- कार्माणशरीरासक्तत्वात्कर्मवत आत्मनो मूर्तिमत्वाद् गत्यादि- पर्यायविशेषसामोपलब्धिरपि मूर्तिमतीत्येवं सति नामूर्तिरात्मा । चार्तिक २५:- औपशमिकाद्यात्मतत्वानुपपत्तिरतद्भावादिति चेन्न, तत्प- रिणामात् । स्यान्मतं य एते औपशमिकादयो भावा एतेषा- मात्मतत्वव्यपदेशो नोपपद्यते कुतोऽतद्भावात् । सर्वे हि ते- पौद्गलिकाः कर्मबंधोदयनिर्जरापेक्षत्वादिति । तन्न किं कारणं तत्परिणामात् । पुद्गलद्रव्यशक्तिविशेषवशीकृत आत्मा तद्रंजनः संस्तनिमित्तं यं परिणाममास्कंदति यदा तदा तन्मयत्वा तल्लक्षण एव भवति । गति के संबंध से सशरीरत्व की सिद्धि - २४ - गति का लक्षण गोम्मटसार जीवकाण्ड में ऐसा कहा है:- गदिउदयजपज्जाया चउगइगमणस्स हेउ वा हु गई । गति नाम कर्म के उदय से उत्पन्न जीव की पर्याप को गति कहते हैं। अथवा चारों गति में जीव के गमन के कारण को गति कहते हैं। इससे यही अर्थ प्रतीत हुआ कि गति क्या है ? गति नामकर्म के संबंध से प्रगट हुए सशरीर अत्मिा के भाव ही हैं। जैसे एकेन्द्रियादि पर्यायों को धारण करता है, वैसा हो खान पान वाणी शारीरिक क्रियायें भी वह जीव विना सिस्नाये करता है। ऐसा हो गतिकर्म का उदय है। इसके कारण यह जीव संसार में पराधीन हुवा नवीन शरीर को धारण करने के लिये लोक मे सब जगह ऊपर नीचे यथायोग स्थान पर जाता है। यदि शरीर से पराधीन न होता तो सीधा स्वभाव से ऊर्ध्वगमन ही करता। क्योंकि ऊर्ध्वगमनस्वभाव तो इस जीव का निश्चित है। उसे तो कौन रोक सकता है। परन्तु संसार में ऊर्ध्वगमन- स्वभाव देखा नहीं जाता। इसी से मालूम पड़ता है कि उसका प्रतिवधक कर्म है। कर्म सहित आत्मा सशरीर है। तथा शरीर के सबंध से आत्मा के प्रदेशों का संकोच विस्तार होता है। लोकप्रमाण होते हुवे भी शरीरप्रमाण आत्मा है। यदि ऐसा न मानें तो आगम का लोप होता है। क्योंकि द्रव्य- संग्रह में सदेहपरिमाणो शब्द से कहा है । तथा सिद्धों को चरम देह से किञ्चिदून कहा है। किंचूण चरमदेहदो सिद्धा। महाप्रमाण या मध्यमपरिमाण या वटकणिका मात्र कही भी आगम में उपलब्ध नहीं होता। ज्ञान की अपेक्षा लोक प्रमाण है, तथा केवलिसमुद्धात के चौथे समय मे लोकपूर्ण होता है। फिर पाचवे आदि समयों मे प्रतर कपाट दंड आकार (६५ होता हुवा मूलशरीर में प्रवेश कर जाता है। एक बार लोकपूर्ण होकर सदा ही वैसा नहीं बना रहता । तथा शरीर रहित हो जाने पर फिर प्रदेशों का विस्तार भी नहीं होता है। इसका कारण कर्मनिमित्त का अभाव ही बताया है। न कि योग्यता। योग्यता का विचार योग्यता या ऐसा ही होना था, कहना अथवा ऐसी ही क्रमबद्धपर्याय है, यह कहना निर्णय पर न पहुंचनेवालों का वचन है। योग्यता क्या चीज है ? पूर्वकृत कर्म है अथवा वर्तमान परिणति। यदि पूर्वकृत कर्म को कहें तो कर्म निमित्त सिद्ध ही हो गया। शथवा वत्तमान परिणति को कहते हो तो चौदहवें गुणस्थान में शरीर का उदय तो है नहीं ? ढांचा मात्र है, तथा केवलज्ञानादि स्वभाव परिपूर्ण है। तो केवलज्ञानादि रूप वर्तमान परिणति नाम की योग्यता विद्यमान है, जिससे आत्मा को लोकालोकव्यापी कहा है। फिर क्यों नहीं प्रदेश फैल जाते। ऐसी योग्यता क्या काम की ? जो स्वयं कार्य न करे। अन्य की अपेक्षा करे। यह बात समझ में नहीं पाती है। प्रवचनसार गाथा २६ में भगवान् को सर्वगत कहा है:- सव्वगदो जिणवसहो सव्वे वि य तग्गया जगदि अट्ठा ।। णाणमयादो य जिणो विसयादो तस्स ते भणिया ॥२६॥ टीका :-ज्ञानं हि त्रिसमयावच्छिन्नसर्वद्रव्यपर्यायरूप- व्यवस्थितविश्वज्ञ याकारानाक्रामत् सर्वगतमुक्तं । तथा भूतज्ञानमयोभूय व्यवस्थितत्वाद् भगवानपि सर्वगत एव । इत्यादि।
( ६६ ) अर्थ:-ज्ञान को त्रिकालके सर्व द्रव्य पर्यायरूप प्रवर्तमान समस्त ज्ञयाकारों को पहुँच जाने से (जानना होने से) सर्वगत कहा है और ऐसे (सर्वगत ) ज्ञानमय होकर रहने से भगवान् भी सर्वगत ही हैं, इत्यादि । यह कथन व्यवहारनयका है। निश्चयन से आत्मस्थ भगवान् हैं। अब यहां यह विचारना है कि यह व्यवहारनय का कथन बिलकुल ही (अभूतार्थ) है। तब व्यवहारनय का माना हुवा सर्वज्ञपने का सिद्धांत भी झूठा हो जायगा। ज्ञानका स्वरूप स्वपर को जानना नहीं बनेगा। इसलिये व्यवहार नय से व्यापकज्ञान से अभिन्न होने के कारण जैसे आत्मा को सर्वगत कहा। ऐसी सर्वगत रूप ज्ञानकी योग्यता से लोक प्रमाण श्रात्मा के प्रदेश फैल जाना चाहिये। यदि योग्यता को निश्चयनय का विषय मानो तो द्रव्यसंग्रह के "णिञ्चयणयदो असखदेसो वा" इस सूत्रार्थ के अनुसार भी असंख्यात प्रदेशी आत्मा हो जाना चाहिये। अतः योग्यता का अर्थ वर्तमान, परिणति नहीं बनता। योग्यता को परीक्षामुख में सांव्यवहा- रिक प्रत्यक्ष के प्रकरण में स्वावरणका क्षयोयशम कहा है। सूत्रः-स्वावरणक्षयोपशमलक्षणयोग्यतया हि प्रतिनियतमर्थ व्यवस्थापयति । मुख्य प्रत्यक्ष (पारमार्थिक) के लक्षण में कहा सामग्रीविशेषश्विश्लेषिताखिलावरणमतीन्द्रियमशेषतो मुख्यम् ॥ अर्थ :-सामग्री विशेष का अर्थ रत्नत्रय की पूर्णता है। इससे अखिलावरण दूर हो जाते हैं। ऐसी दूर होने रूप योग्यता से ही ज्ञान अतीन्द्रिय सर्वज्ञ सर्वगत होता है। मुख्यप्रत्यक्ष में ज्ञानावरणादि के क्षयरूप योग्यता है। अतः इससे भिन्न कोई ( ६७ ) योग्यता हो तो वह नही बनती। सब जगह सामर्थ्य अप्रतिबंध तथा कारणान्तरों की अविकलता ही कार्य की जननी है। ऐसा निर्णय करना। का यदि ऐसा ही होना था, ऐसा कहा जाय तो ऐसा ही होना निष्कारण नहीं हो सकता। कारण मानना ही पड़ेगा। पूर्वभव के भावों को (रागादिक भावकम) ही यदि मानियेगा तो वे किसके आधार हैं। आत्मा के या शरीर के या दोनों के। आत्मा के अधार कहो तो शुद्ध आत्मा में तो रागादि रूप पूर्वभवके भाव रागादि या द्रव्यकर्म संभव ही नहीं हैं। वे तो नष्ट ही हो चुके। रागादि भावों की पर्यायतो क्षणिक होती है। अतः अशुद्ध आत्मा में मा पूर्वभव के भी वेकर्म नहीं है। द्रव्यकर्म कहो तो आत्मा के शरीर की सिद्धि होती है। शरीर के अकेले आधार भावों को या द्रव्यकर्मों का कहना ठीक नहीं है। ऐसा सिद्धान्त में कथन ही नहीं है। दोनों के आधार हैं ऐसा मानने पर सशरीर आत्मा की कारणपने से सिद्धि हो जाती है। अतः ऐसा ही होना था यह कहना ठीक नहीं है। क्रमबद्ध पर्याय कहो तो भी अर्थ सुसङ्गत नहीं बैठता। ऐसा ही क्रम किसने बांधा, कहां बांधा, क्यों बांधा किस विधान से बांधा, इत्यादि अनेक बाधएं आ उपस्थित होती हैं। बद्ध का अर्थ नियमित कहो तो, और नियमित का अर्थ निश्चित कहो तो क्रम से होना ही पर्यायों का निश्चित स्वरूप है। एक साथ दो पर्यायें नहीं होती यह सामान्य नियम है। विशेष रूप से पर्यायें असंख्यात गुणी निर्जराकी अपेक्षा तथा संक्रमण उत्कर्षण अपकर्षण को अपेक्षा कषायों के मभाव में आत्मा की विशुद्धि के तारतम्य से अक्रम रूप हैं।
( ६८ ) अस्तु, मूर्तिक विषय में प्रवचनसार गाथा ५५ में भी ऐसा ही कहा है :- जीवो सयं अमुत्तो मुत्तिगदो तेण युत्तिणा मुत्तं । प्रोगेरिहत्ता जोग्गं जाणदि वा तण्ण जाणादि ॥५॥ टीका:-इन्द्रियज्ञानं हि मूर्तोपलम्भक मृतोपर.भ्यं च तद्वान् जोवः स्वयममूर्तोऽपि पञ्चेन्द्रियात्मकं शरीरं मूर्तमुपागतस्तेन ज्ञप्तिनिष्पत्तौ बलाधाननिमित्ततयोपलम्भकेन मूर्तेन मूर्त स्पर्शादि प्रधानं वस्तूपलभ्यतामुपागतं योग्यमवगृह्य कदाचित्तदुपर्युपरि शुद्धिसंभवादवगच्छति परोक्षत्वादिति ॥ अर्थ.-स्वयं अमूर्त जीव मूते शरीर को प्राप्त होता हुआ उस मूर्त शरीर के द्वारा योग्य मूर्तपदार्थ को अवग्रह करके उसे जानता है अथवा नहीं जानता है। इत्यादि । इस कथन से आत्मा शरीर संबंध को प्राप्त मूर्त हो रहा है। शरीर की क्रिया आत्मा के अस्तित्व का ज्ञान बताती है कि इस शरीर मे विद्यमान कोई चैतन्यशक्तिवाला आत्मा है। इसीका समर्थन श्री धकलङ्कदेव पचमाध्याय तत्वार्थ वार्तिक के सूत्र १६ की वार्तिक ३९ मे कहते हैं :- अत आत्मास्तित्वसिद्धिः प्राणापानादिकर्मणः तत्कार्य- त्वात् । अत आत्मनोऽस्तित्वं प्रासिधत् । कुतः १ प्राणा- पानादिकर्मणः तत्कार्यत्वात् । यथा यंत्रप्रतिमाचेष्टितं प्रयोक्तुस्तित्वं गमयति । तथा प्राणापानादिकर्मापि ( ६६ ) क्रियावंतमात्मानं साधयति । असति तस्मिन्नप्रवृत्तेः । नाकस्मात् नियमदर्शनात् । ऐमाही सर्वार्थसिद्धि में श्री पूज्यपाद स्वामी ने भी लिखा है मोक्षमार्ग प्रकाशक में काना (पौडा) सांटा की उपमा शरीर को दी है। उस शरीर को विषय भोग में न लगाकर धर्मसाधनों के उपयोग में लगाने की प्रेरणा की है। श्रीपद्मनंदिपंचविंशतिका में शरीर को कडवी तुमड़ी की उपमा दी है। कहा है कि जैसे कड़वी तुमड़ी भक्ष्य नहीं है उसका कार्य एक अवश्य है कि उसे जल में डालकर समुद्र से पार हो सकते है, वह डूबने नहीं देगी। परन्तु उसमें क्षिद्रादि नहीं होना चाहिये। इसी तरह यह शरीर है। इसके अवलंवन से यह ज्ञात्मा रत्नत्रय को साधन कर संसार समुद्र से पार हो सकता है। परन्तु उस शरीर में वृद्धत्वादि रोग नहीं होने चाहिये। इस तरह शरीर की रक्षा करना भी संयमी को बताया है। लौकिक व्यवहार में-शरीरमाचं खलु धर्मसाधन कहा है । समयसार गाथा ४०८-४०९ की टीका में कहते है :- केचिदव्यलिंगमज्ञानेन मोक्षमार्ग मन्यमानाः संतो मोहेन द्रव्यलिंगमेवोपाददते । तदप्यनुपपन्नं सर्वेषां भगताम- हदेवानां शुद्धज्ञानमयत्वे सति द्रव्यलिंगाश्रयभूतशरोरम- मकारत्यागात् । तदाश्रितद्रव्यलिंगत्यागेन दशनज्ञान- चारित्राणां मोक्षमार्गत्वेनोपासनस्य दर्शनात् ॥ यहां द्रव्यलिंग शरीर के ममकार के त्याग को द्रव्यनिंग शरोर का त्याग कहा है, नहीं तो शरीर का त्याग वन ही नहीं सकता। इससे शरीर की हलन चलन आदि क्रियाएँ भी प्रमाद सहित होने से बंध का कारण चतुर्ग्यः ।" इस तत्वार्थ ( ७० ) सिद्ध होती है। प्रतिक्रमण आलोचना प्रत्याख्यान के ४७ भंगों में शरीर के अंग भी लगाये हैं। कर्मचेतना कर्मफलंचेतना का संबंध शरीर से है। "तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्या सूत्र में एक साथ एक ही आत्मा के ४ शरीर तक कहे हैं। इस तरह स्वाध्याय करने से आप को स्वयं ही यह विदित हो जायगा कि शरीर और आत्मा का क्षीरोदक की तरह सबंध है। यदि ऐसा संबंध जो नहीं स्वीकार करते हैं उनको श्रीअमृतचंद्र स्वामी समयसार गाथा ४६ की टीका में समझाते हैं :- तमंतरेण तु शरीशजीवस्य परमार्थतो भेद दर्शनात् त्रस- : स्थावराणां भस्मन इव निःशंकमुपमर्दनेन हिंसाऽभावाभव- त्येव बंधस्याभावः॥ इस तरह से इस प्रश्न का समाधान स्वयं होजाता है। तब भी जो शरीर को जड़ चमड़ा आदि कहते रहेंगे तो रागद्वेषादि को भी परमार्थ से भिन्न कहना पड़ेगा तो मोक्ष का भी प्रभाव हो जायगा। La , श्री वर्णीजी का दृढ़ निश्चय मैं दूसरों की बात क्या कहूं , मुझे तो स्वयं अपने पक्व- पान के सदृश वृद्धं शरीर से दृढनिश्चत हो गया कि निमित्त भी कोई चीज है। मेरी योग्यता (पुरुषार्थ) जैसा कि पहले खाता पीता था-बोलता था- मीलों चला जाता था, वैसा ही करने को कहती है। परन्तु शरीर रोकता है-एक रोटी भी पचाने की शक्ति घटती जाती है। घंटों बोलने की शक्ति थी अव ह्रास हो गई है। थोड़ा बोलते ही खांसी परेशान -- 4 .
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कर देती है। १०० हाथ चलते ही श्वास चलने लगती है।
चक्कर आ जाता है। शरीर की अवस्था ही ढीली पड़ गई।
रक्त कम हो गया। इन सब बातों से मुझे यह निर्णय हो
गया कि कर्म और देह कोई चीज है। कायवाङ्मनः कर्मयोगः
सूत्र में काययोग भी तो एक आत्मा की काय के संबंध से चेष्टा
विशेष है।
अतः संसार का प्रारंभ देह ही से है। देह से इंद्रियां
इंद्रियों से विषयकषाय, कषाय से कर्म बंध, कर्म से नोकर्म
शरीरादि तथा शरीर से इंद्रियां। इसी तरह का चक्र चल
रहा है। अब आत्मा और शरीर के संबंध में कोई संदेह को
स्थान नहीं रह जाता है। इस मनुष्य देह को पाकर ब्रह्मचर्य
संयम की आराधना शीघ्र कर लेनी चाहिये । वक्त्रं वक्ति हि
मानसम् यह नीति भी शरीर और आत्मा के संबंध में चरितार्थ
है। समाधिशतक में तो स्पष्ट हो कहाहै:
प्रयत्नादात्मनो वायुरिच्छाद्वेषप्रवर्त्तितात् ॥
चायोः शरोरयंत्राणि वर्तन्ते स्वेषु कर्मसु ॥
इसी से यह भी सिद्ध है कि शरीर से ग्रहण किया हुवा
अहार जीव के द्वारा उदराग्नि से सात धातु उपधातु रूप
परिणमा दिया जाता है। ऐसा ही समयसार में कहा
जीव संबंध विना यह कार्य नहीं हो सकता। इस विषय को
प्रवचनसार की ११७-१७४ गाथायें स्पष्ट बता रही है। अतः
जीवाश्रित शरीर है। शरीराश्रित जीव है। लक्षणोंसे भिन्न
भिन्न है। एक होते हुवे भी भेदरूप ही श्रद्धान करना चाहिये,
वही ज्ञान मोक्षका कारण है।
चतुर्थ प्रश्न :-क्या व्यवहार निरपेक्ष निश्चयनय पूर्ण
वस्तुका प्रतिपादन करने में समर्थ है ? और क्या व्यवहारनय से
ror
द
न
( ७२ ) किया हुवा प्रतिपादन सर्वथा असत्यार्थ है ? समाधान: जैनागम का अनेकान्त ही प्राण माना गया है। अनेकान्तको जड़ (मूल) द्रव्यार्थिक ओर पर्यायार्थिक नय दोनों हैं। द्रव्यार्थिकनय के निश्चयनय और व्यवहारनय दोनों ही प्रतिपादक हैं। इसी प्रकार पर्यायाथिकनय के निश्चयनय और व्यवहारनय दोनों ही प्रतिपादक है। वस्तुका स्वरूप द्रव्यपर्यायमय है। इन्हीं नयोंके भेदों प्रभेदों से वस्तु- स्वरूपका प्रतिपादन होता है। नयों का कथन करना श्रुतज्ञान का विकल्प ही तो है। एक नयका सापेक्ष प्रतिपादन ही वस्तु स्वरूप का ज्ञापक है । निरपेक्ष प्रतिपादन ही एकान्त है। वह अप्रमाण है- मिथ्या है। सो ही कहा है-तत्कथमिति चेदुच्यते-प्रमाण- नयापणाभेदादेकांतो द्विविध :-सम्यगेकांतो मिथ्यकांत इति। अनेकांतो द्विविध :-सम्यगनेकांतो मिथ्याने- कांत इति ॥ तत्र सम्यगेकॉतो हेतुविशेषसामर्थ्यापेक्षा प्रमाणप्ररूपिताथै कदेशादेशः । एकात्मावधारणेन अन्याशेषनिराकरणप्रवणप्रणिधिमिथ्यकांतः । तद- तत्स्वभाववस्तुशून्यं परिकल्पितानेकात्मकं केवलं वाग्विज्ञानं मिथ्यानेकांतः। तत्र सम्यगेकांतो नय इत्युच्यते । सम्यगने- कांतः प्रमाणं । नयार्पणादेकांतो भवत्वेकनिश्चय- प्रवणत्वात् । प्रमाणार्पणादनेकांतो भवत्यनेकनिश्चया- विकरणत्वात् । यद्यनेकांतोऽनेकांत एव स्यान्नैकांतो भवेत् । एकांताभावात्तत्समूहात्मकस्य तस्याप्यभाव: स्यात् । शाखाद्यभावे वृक्षावभाववत् । तदविनाभावि- विशेषनिराकरणादात्मलोपे सर्वलोपः स्यात् । ऐसा श्रीअकलंकदेव तत्वार्थवर्तिक की प्रमाणनयैरधिगमः सूत्रकी व्याख्यामें कहते हैं। इसका संक्षेप अर्थ यह है कि, एकांत अनेकांत दोनों ही दो दो प्रकार के हैं। सम्यग् व मिथ्या। सम्यगेकांत तो नय है। हेतुविशेषरूप सामर्थ्य की अपेक्षा रखनेवाला प्रमाण प्ररूपित अथे के इकदेशका कथन करने वाला सम्यग एकांत है। एकस्वरूपके निश्चय करने से अन्यसपूर्ण धर्मों के निराकरण करने में समर्थ मिथ्या एकांत है । एक वस्तु में सप्रतिपक्ष अनेक धर्मस्वरूपोंका निरूपण करनेवाला युक्ति आगमों से अविरुद्ध सम्यग् अनेकांत है। तत् अतत् स्वभाव रूप परमार्थ से शून्य कल्पित अनेकात्मक वचनों का विज्ञान सोही मिथ्या अनेकांतहै। सम्यक् अनेकांत प्रमाण हैं । नय की विवक्षा से अनेकांत एकांत होता है। एकनिश्चय करने में समर्थ होने से। प्रमाण की अपेक्षा से अनेकांत अनेकांत होना है अनेक निश्चय का आधार होने से। अनेकांत अनेकांत हो हो। कथंचिद् एकान्त न हो (अर्थात् सप्तभगी न बनै) तो एकांत के अभाव से एकांतसमूहात्मक अनेकांत का भी अमाव हो जावेगा। शाखादि के अभाव में वृक्षादि के अभाव की तरह। एकांत के अविनाभावी विशेषों के निराकरण से उस एकांत का लोप होजानेसे सर्व लोप होजावेगा। इसतरह सम्यक् एकांत ज्ञापकपन ही मिटजाने से वस्तुस्वल्प ज्ञाप्य नहीं ठहरता। ज्ञापक ज्ञाप्यसवध भी निमित्तनैमित्तिक संबन्ध है। नय ज्ञापक हेतु हैं। इनमे से यदि एक भी नय को छोड़ देते हैं तो निरपेक्षपने का प्रसङ्ग आताहै। व्यवहारनय निश्चय- नयसे भिन्न है। ऐसा नहीं है कि निश्चयनय का प्रतिपाद्य भेदरूप कथन ही व्यवहारनय हो, शेष सब व्यवहाराभास । । - ( ७४ ) हो। इस लक्षण में तो दोनों नय एक ही सिद्ध हो जाते हैं। इसीको यहां निर्णय करना है। श्री अमृतचंदस्वामी पुरुषार्थ सिद्ध्युपाय में लिखते हैं- परमागमस्य जीवं निषिद्धजात्यंधसिन्धुरविधानम् ॥ सकलनयविलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ॥२॥ अनेकांत सकलनयों के दुरभिप्राय के विरोध को दूरकरने वाला है। परमागमका प्राण है। जैसे जन्मांधों ने हस्ती के एक एक अङ्ग मे हस्ती की कल्पना की वह ठीक नहीं है। ऐसे यथार्थ. वस्तुके प्रतिपादक अनेकांत को मैं प्रणाम करता हूँ। इस अनेकात का निर्णय श्रीसमतभद्रस्वामी ने आप्तमीमांसा आदि स्तोत्र अन्थों में अच्छी तरह से किया है। बहुधा प्राणियों ने आजतक अनेकांत का स्वरूप यथार्थ जाना ही नहीं। अनादिकाल से एकेन्द्रियादिपर्यायों में निवास किया अतः नयका स्वरूप जाना ही नहीं। असैनी तक तो सामर्थ्य ही नहीं थी। जब सैनी पंचेन्द्रिय हुये उस पर्यायमें भी देशना नहीं पाई। अतः वस्तुस्वरूप का नयसापेक्ष कथन सुना ही नहीं। मिथ्यात्व में अब तक अनन्तकाल वीत गया। झान मिथ्याज्ञान ही रहा। अब कोई शुभयोग पाया है यह मनुष्यपर्याय, उच्चकुल, इन्द्रियों को पूर्णता, सुबुद्धि आदि शुभ मिमित्त आकर मिले हैं। अब काललब्धि के आने से देशनालब्धि पाई है। सद्गुरु का उपदेश श्रवण किया, कालकी देशना से स्वयंप्रबुद्ध हो गया, उन्हीं जीवों के करणलब्धि होने से सम्यग्दर्शन प्रगट होता है। ऐसा ही समयसार गाथा १७-१८ की टीका में कहते हैं :- ननु ज्ञानतादात्म्यादात्माज्ञानं नित्यमुपास्त एव कुतस्तदु- पास्यत्वेना नुशास्यते इतिचेन्न, यितो न खल्वात्मा , है . ( ७५ ) ज्ञानतादात्म्येऽपि क्षणमपि ज्ञानमुपास्ते स्वयंबुद्ध-बोधित- बुद्धत्वकारणपूर्वकत्वेन ज्ञानस्योत्पत्तेः । तर्हि तत्कारणा- पूर्वमज्ञान एवात्मा नित्यमेवाप्रतिवुद्धत्वादेवमेतत् ।१७-१८ सोया हुआ यह जीव यातो स्वयं जग जावे अन्यथा कोई दूसरा जगावे तब जागे। इसीतरह यह जीव स्वयं (पूर्व संस्कारों से) ज्ञानी बन जावे अथवा गुरूपदेशादि कारणों से ज्ञानी बन जावे, तब सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान एक साथ होवे । उसी सम्यग्ज्ञान से वस्तुस्वरूप को समझा तब नय सम्यग् हुवे, एकान्त का अभाव हुआ । वही भेदज्ञान संवर निर्जरा मोक्ष का साधक है। भेदनान से तात्पर्य रत्नत्रय से है। जिनके सम्यग्दर्शन नहीं है उनका ज्ञान मिथ्या ज्ञान है। अतः एकान्तरूप है। व्यवहारामास-निश्चयाभास है। ऐसे मिथ्या दृष्टि पुरुष जिनवाणी का कथन करते हैं, स्वाध्याय करते हैं, तो आगम के अनुसार सापेक्षनय द्वारा वस्तुस्वरूप का प्रतिपादन करने से उनके वचन दूसरों के लिये सम्यग्ज्ञान के करण हो जाते हैं। परन्तु वह वक्ता द्रव्यलिंगी एकान्ती मिथ्याज्ञानी ही है। अतः अभी तक हमने नय- सामान्य को ही नहीं समझा, विशेष का तो कहना ही क्या है। इस लिये जो ऐसा कहते है कि व्यवहार नय तो सबके अनादि से है, यह बात कितनी मिथ्या है । पंचाध्यायी में "अनयोमैत्री प्रमाणम्" से दोनो के कथन को ठीक बताया है। हॉ! पक्ष दोनों ही है । ज्ञानी जीव दोनों ही पक्षों को जानता है, ग्रहण (हठ) नहीं करता है। दो नय दो नेत्र प्रवचनसार में दोनों नयों को नेत्रों की उपमा दी है। झेयाधिकार ११४ गाथा की टीका में लिखते हैं :- ( ७६ ) सर्वस्य हि वस्तुनः सामान्यविशेषात्मकत्वात् तत्स्वरूप- मुत्पश्यतां यथाक्रमं सामान्यविशेषौ परिच्छिन्दती द्वे किल- चक्षुषी, द्रव्यार्थिकं पर्यायार्थिक चेति । तत्रैकचक्षुरवलोकनमेकदेशावलोकनं । द्विचक्षुरवलोकनं सर्वावलोकनं। ततः सर्वावलोकने द्रव्यस्यान्यत्वानन्यत्वं च न विप्रतिषिध्यते ॥११४॥ सम्पूर्ण वस्तु सामान्य विशेषात्मक है। उन दोनों को देखने के लिये दो नेत्र हैं। एक द्रव्यार्थिक-दूसग पर्या- याथिक । उनमें से एक चक्षु का अवलोकन एक देशावलोकन (नय) है। दो चक्षु का अवलोकन सर्वावलोकन (प्रमाण) है। इसलिये सर्वावलोकन में द्रव्य के अन्यत्व अनन्यत्व में कोई विरोध नहीं है। यहाँ निश्चयनय व्यवहारनय ये दोनों नेत्र हैं। इनसे आत्मा का अवलोकन करना चाहिये। तभी पूर्ण वस्तुम्वरूप के अनुभवी बन सकते हैं। जैसे मुख मे दो नेत्र होते हैं। एक नेत्र को वन्द कर लेने से वस्तु स्वरूप पूरा नहीं हो सकता। दोनों नेत्र खोल कर जानना देखना चाहिये। श्रीअमृतचंद्र स्वामी उक्तं च करके प्राचीन गाथा को लिखते हैं :- जइ जिणमयं पवजह तो मा ववहारणिच्छये मुयह ।। एकेन विणा छिजइ तित्थं अण्णण पुण तच्चं ॥ यदि जिन मत को धारण करना चाहते हो तो व्यवहार निश्चय दोनों नयों को मत छोड़ो। व्यवहार के विना तीर्थ (उपदेश) छूट जाता है। निश्चयनय के विना तत्व छूट जाता है।
( ७७ ) दोनों नयों के परस्पर विरोध को परिहार करने के लिये स्यात्पद समर्थ है। सो ही कलश में कहते हैं :- उभयनयविरोधध्वंसिनि स्यात्पदाङ्के । जिनवचसि रमन्ते ये स्वयं वान्तमोहाः। सपदि समयसारं ते परं ज्योतिरुच्चै- रनवमनयपक्षाचण्णमीक्षन्त एव ॥४॥ अर्थ:-निश्चय और व्यवहार इन दो नयों में विषय के भेद से परस्पर विरोध है, उस विरोध का नाश करने वाला स्यात्पद' से चिह्नित जो जिन भगवान का वचन है, उसमें जो पुरुष रमते हैं, अभ्यास करते हैं, वे अपने आपही मिथ्यात्व कर्म के उदय का वमन करके इस अतिशयरूप परमज्योति प्रकाशमान शुद्ध आत्मा को तत्काल ही देखते हैं। वह समय- सार रूप शुद्ध पारमा नवीन उत्पन्न नहीं हुआ किन्तु पहले कर्मो से अच्छादित था सो वह प्रगट व्यक्तरूप हो गया है और वह सर्वथा एकान्त रूप कुनय के पक्ष से खण्डित नहीं होता, निर्बाध है। दोनों नयों का एक साथ कथन तथा क्रम से कथन कैसा होता है इसी को १६, १७, १८ कलश में कहते हैं- दर्शनज्ञान चारित्रस्त्रित्वादेकत्वतः स्वयं । मेचकोऽमेचकश्चापि सममात्मा प्रमाणतः ॥ दर्शनज्ञानचारित्रस्त्रिभिः परिणतत्वतः । एकोऽपि निस्वभावत्वाद् व्यवहारेण मेचकः ।। परमार्थेन तु व्यक्तज्ञातृत्वज्योतिपैककः । सर्वभावांतरध्वंसिस्वभावत्वादमेचका ।। - सब के ( ७८ ) अर्थ: :-आत्मा दर्शन ज्ञान चारित्र तीन स्वभावों से अनेक तथा स्वयं एक अखण्ड होने से मेचकामेचकरूप एकानेकरूप एक साथ प्रमाण दृष्टि से है, दर्शनज्ञानचारित्र तीनों से परिणत होने से एक ही आत्मा अनेक मेचक व्यवहारनय से है। तथा व्यक्त एक ज्ञायक ज्योतिसे सर्व विभावों के दूर होने से अमेचक परमार्थनयसे है। इस प्रकार समयसार में सब प्रकरणों में निश्चयनय और व्यवहारनय का कथन स्वयं श्राचार्य स्पष्ट करते ही गये हैं। कहीं भी विरोध व संदेह को जगह नहीं रहने दी है। निचोड़ रूप अंत में २७२-२७३-२७४ कलश इन्हीं उभयनयों के एकसाथ प्रमाण कथन के वाचक हैं। अंत में जहां उपायो- पेयभाव का दिग्दर्शन कराया है, वहांभी स्पष्ट रूपसे व्यवहार निश्चय का कथन किया ही है । तद्यथा :~अतोऽस्यात्मनो अनादिमिथ्यादर्शनज्ञानचारित्र: स्वरूपाच्यवनात्संसरत : सुनिश्चलपरिग्टहीतव्यवहारसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रपाक- प्रकर्षपरंपरया क्रमेण स्वरूपमारोप्यमाणस्यांतर्मग्न- निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचरित्रविशेषतया साधकरूपेण तथा परमप्रकर्षयकरिकाधिरूढरत्नत्रयातिशयप्रवृत्तसकल- कर्मक्षयप्रज्वलितास्वलितविमलस्वभावभावतया सिद्धरूपेण च स्वयं परिणममान ज्ञानमात्रमेकमेवोपायोपेयभावं साधयति ।। अर्थ .-इसलिये अनादिकालसे मिथ्यादर्शन ज्ञान चारित्र द्वारा स्वरूपसे च्युत होने के कारण संसार में भ्रमण करते हुए सुनिश्चलतया ग्रहण किये गये व्यवहार सम्यग्दर्शनज्ञान- ( ७९ ) चारित्र के पाक के प्रकर्ष की परंपरा से क्रमशः स्वरूप में स्थापन किये जाते आत्माके अन्तर्मग्न जो निश्चय सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र रूप विशेषता द्वारा साधकपने से परिणत होता हुवा तथा परमोत्कृष्ट दशा को प्राप्त रत्नत्रय को अतिशयता से हुये सकल कर्म के क्षय होने से प्रज्वलित हुवे अस्खलित निर्मल स्वभाव भावपने से सिद्धरूप से स्वयं परिणमता हुवा एक ज्ञानमात्र ही उपाय उपेय भावको साधता है। इतना उभयनयों का स्पष्ट कथन होने पर भी शंकाकार का यह कहना कि व्यवहारनय का प्रतिपादन असत्यार्थ है, यह कथन ठीक नहीं है। ये शब्द उच्चारण करना ही गलत है व्यवहाग्नय असत्यार्थ है, परन्तु उसका प्रतिपादन असत्यार्थ नहीं है। निश्चयनय की अपेक्षा व्यवहार असत्यार्थ है, परन्तु निश्चयनय का प्रतिपादक व्यवहारनय ही है। यदि वचन या भेदकी दृष्टि न हो तो निश्चयस्वरूप अभेदरूप ही मिट जावे । जैसा कि कहा है :- जह णवि सक्कमणज्जो अणज्जभासं विणा दु गाहेउ।। तह ववहारेण विणा परमत्थुव एसणमसक्कं ॥ ८॥ अर्थ:-जैसे अनार्य (म्लेच्छ) जनको अनार्यभाषा के विना किसी भी वस्तुका स्वरूप ग्रहण कराने के लिये कोई ससर्थ नहीं है। उसी प्रकार व्यवहारके विना परमार्थका उपदेश देना अशक्य है। इमा अर्थ को श्रुतकेवुली के अर्थ करते हुवे कहा है कि जो सब श्रुाज्ञान को जानता है सो श्रुतकेवली है। ऐमा व्यवहार- नय नौज न ही है। वह ज्ञान क्या आत्मा को छोट वर अन्य- पदार्थ है ? अज्ञान नहीं है। इस तरह व्यवहार का प्रतिपाद्य भी यात्मा ही है। देखो गाथा ६-१० की टीका :- टिप्पण:-असत्यार्थ का या व्यहार का अर्थ है कि दो द्रव्यों के सबंध से उत्पन्न हुवा भाव । यह भाव अकेले में नहीं होता।
: (८० व्वहारनय प्रयोजनवान है। अथ च केषांचित्कदाचित्सोऽपि प्रयोजनवान् । यतः- सुद्धो सुद्धादेसो णायन्बो परमभावदरिसीहि ।। ववहारदेसिदो पुण जेदु अपरमेद्विदा भावे ॥१२।। अर्थ :-जो शुद्ध परमभावके देखने वाले हैं, उन्हे तो शुद्ध आत्मा का उपदेश करने वाला शुद्धनय जानने योग्य है। और जो जीव अपरमभाव में अर्थात् श्रद्धा तथा ज्ञान चारित्रके पूर्णभाव को नहीं पहुँच सके है (साधक अवस्था में ही स्थित है) वे व्यवहारनय के द्वारा उपदेश करने योग्य हैं। यहा अपरमभाव से तात्पर्य चौथा पांचवॉ छठा गुणस्थान- वर्ती जीवों से है। हम अभी अपरमभाववालों की श्रेणी में ही तो हैं। इससे हम सब को व्यवहार नय जानना प्रयोजन- वान है। सो ही कलश में कहा है :- व्यवहरणनयः स्याद्यद्यपि प्राक्पदव्या - मिह निहितपदानां हन्त हस्तावलम्बः। तदपि परममर्थं चिच्चमत्कारमात्र । परविरहितमंतः पश्यता नैष किंचित् । ॥५॥ अर्थ :-यद्यपि व्यवहारनय पहली पदवी में अपना पैर रखने वालों को हस्तावलम्बन है, यह खेद की बात है, तथापि परमार्थ पररहित चिञ्चमत्कार का अंतरंग में अवलोकन करने वालों को यह व्यवहार नय कुछ प्रयोजनवान नहीं है। यह कथन तो जीवा जीवाधिकार की गाथा का है, सो तो शुद्ध अतः - ( ८१ जीवाजीव के स्वरूप को कथन करने वाला है। इस कचन का प्रतिपादक भी व्यवहारनय है। परन्तु इतना ही मात्र तो जीव अजीव द्रव्य नहीं हैं, पुन्य पाप रूप भावों से विशिष्ट कर्ता कमे रूप का ज्ञान से परिणमन करनेवाला, आस्रव बंधावस्था को प्राप्त, फिर कैसा संवर निर्जरा को धारण करता हुवा, मोक्ष को प्राप्त होता हुआ, सर्वविशुद्ध ज्ञान को धारण करता है । सभी अधिकार व्यवहारनय और निश्चयनय के द्वारा हम अपरमभाववालों को समझाते हैं। ऐसी वस्तु की व्यवस्था है। इस समयसार की रचना भी समयसार को न जाननेवाले अथवा जाननेवाले पुरुषों के लिये "स्व परयोरनादिमोहप्रहा- णाय" हुई है। इस तरह इस ग्रंथ का बहु भाग व्यवहारनय का कथन करने वाला है। अतः व्यवहारनय असत्यार्थ होने से बहु भाग रूप गाथायें भी असत्यार्थ हो जावेगी । तो आचार्यश्री का परिश्रम ही व्यर्थ हो जावेगा। अन्तिम अधिकार में गाथा ३४९ से ३५३ तक की शिल्पी के दृष्टांत की व्यवहारनय की दृष्टि से कर्ताकर्म-भोक्ताभोग्य का कथन करने वाली तथा अन्य भी गाथायें निष्प्रयोजन हो जावेगी। गाथाएं यथार्थ ठीक कथन को कर रही हैं। यदि इन गाथाओं को छोड़ देवें तो एकान्त कथन हो जाय, जो कि प्रेक्षावानों को अनादरणीय होगा। परिणति ही सुधारना है। ज्ञान से परिणति सुधरती है। अतः रागद्वेषपरिणति को मिटाने के लिये हमें व्यवहारनय- व निश्चयनय से कथित साधक अवस्था की बहुत जरूरत है। रागद्वेष परिणति के मिटाने का क्रम इह आत्मा जव तक स्वयं भेदविज्ञान रूप परिणति नहीं करता, तब तक वह दुःखों से निवृत्ति नहीं पा सकता। चाहे जितना बाध में पाठ पढ़े, चाहे जितना गुरु उपदेश श्रवण करे। भेदविज्ञान रूप परिणति का नाम व्यवहार तथा निश्चय दोनों ( ८२ ) ही सम्यग्दर्शन है। क्योंकि देव शास्त्र गुरु तथा सात तत्वों के एवं स्वपर के श्रद्धान में आत्मश्रद्धान गर्मित है, तथा आत्म- श्रद्धान में देव शास्त्र गुरु का श्रद्धान अतर्भूत है । ऐमा सम्यग्दर्शन हो जाने पर भेदविनान के ही बल से पाप प्रवृत्ति को छोड़कर पुण्य प्रवृत्ति स्वीकार कर श्रद्धा मे दोनों को एक समान मानता हुआ दोनो ही परिणतियों को छोड़े। अतः अव्रतों का प्रथम त्याग कर व्रती वनकर परमपद मे स्थित होने पर व्रतादिक के विकल्प भी छूट जाते हैं। यही परमात्मा बनने का उपाय है। इसी तरह के क्रम से अनंतानु- बंधी अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यान आदि का त्याग होता चला जाता है। इस से व्यवहार निश्चय दोनों एक साथ हैं। सोही समाधितत्रशतक से श्रीपूज्यपादस्वामी ने कहा है:- शृण्वन्नप्यन्यतः कामं वदन्नपि कलेवरात् ।। नात्मानं भावयेद्भिन्नं यावत्तावन्न मोक्षभाक् ॥१॥ तथैव भावयेदेहाव्यावृत्त्यात्मानमात्मनि ।। यथा न पुनरात्मानं देहे स्वप्नेऽपि योजयेत् ॥८२ ॥ अपुण्यमव्रतैः पुण्यं व्रतैर्मोक्षस्तयोय॑यः ।। अव्रतानीव मोक्षार्थी व्रतान्यपि ततस्त्यजेत् ।।३।। अव्रतानि परित्यज्य व्रतेषु परिनिष्ठितः ।। त्यजत्तान्यपि सम्प्राप्य परमं पदमात्मनः ॥८४ यदन्तर्जल्पसंपृक्तमुत्प्रेक्षाजालमात्मनः ।। मूलं दुःखस्य तन्नाशे शिष्टामिष्टं परं पदम् ।।८।। अव्रती व्रतमादाय व्रती ज्ञानपरायणः ।। परात्मज्ञानसंपन्नः स्वयमेव परो भवेत् ।।८६॥
( ८३ ) ऐसा ही कथन ज्ञानार्णव में, पद्मनंदिपंचविंशतिका आदि ग्रन्थों में आया है। इसलिये अपनी बुद्धि को आगम के अनुकूल बनाओ। कहा भी है:- आगमचेट्ठा तदो जेट्ठा । आगमचक्खू साहू आदि निश्चय व्यवहार दोनों एक साथ है। इसका खुलाशा :- जैसे कालद्रव्य है सो निश्चय से पृथक् पृथक् अणुमात्र है, असख्यात है। उसी काल के व्यवहार में भूत, भविष्यत् , वर्तमान ये भेद करते हैं। जब ये भेद होते हैं, तभी यह निश्चय होता है कि इन भेदों का आधारभूत एक स्वतंत्र कालद्रव्य । इस तरह कालद्रव्य में निश्चय व्यवहार एक साथ हैं। उसी तरह सभी स्थानों पर एक साथ हैं। अथवा दूसरा दृष्टान्त लीजिये कि एक संग्रहनय है : संग्रह नय सामान्य से एक है। परन्तु विषय के भेद से दो भेद रूप है। परसंग्रह, अपरसंग्रह, । भेदों का अभेद ग्रहण परसंग्रह है। उसी परसंग्रह में अविरोध से भेद करना अपरसंग्रह है। यही अपरसंग्रह व्यवहार है। भेद करना तो व्यवहार ही है। परन्तु भेदों में जब फिर भेद करते हैं। तब भेदों का आधार भेदसंग्रह बन जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यवहारनय ही तो संग्रह बनता गया। अतः भेदों का नाम व्यवहार तथा आगे के भेदों की अपेक्षा वे ही संग्रहनय कहलाते हैं। यह सिद्धांतग्रन्थों में स्पष्ट विधान है। इसी कथन से यह निर्णय हो जाता है कि निश्चयनय (संग्रह) और व्यवहारनय भेद दोनों एक साथ हैं। तथा भेददृष्टि ही तो विशेषात्मक व्यवहार है। एवं अभेद- दृष्टि तो सामान्यात्मक निश्चय है। इस तरह दोनों नयों का प्रमेय सामान्य विशेषात्मक भेदाभेदात्मक तदतद्रूप नित्या- ( ८४ ) है। इन के नित्यात्मक एकानेकात्मक वस्तु युगपत् द्वारा कथन क्रम से होता है। प्रमाणदृष्टि से युगपत् भी कथन हो जाता है। "सममात्मा प्रमाणत:" कलश मे कहा ही है। प्रमाण सप्तमंगी भी श्रीप्रकलंकदेव ने वताई है, वह सब धर्मों को एक साथ ग्रहण व कथन करती है। इसका कथन श्री राजवार्तिक में विस्तार से लिखा है। निश्चयनय प्रथम तथा व्यवहारनय पश्चात् यह सब विवक्षा भेद है। विवाद का विषय नहीं है। इस तरह से ही है ऐसा एकान्त सिद्धांत भी नहीं बना लेना चाहिये । जब हम पराश्रित व्यवहार कहते हैं एवं स्वाश्रित निश्चय कहते हैं तब भी दोनों एक साथ हैं । द्रव्यदृष्टि से आत्मा न कार्य है, न कारण है, स्वाश्रित है। उसी एक समय मे शुद्ध या अशुद्ध पर्याय अनेक निमित्तकारणों की अपेक्षा कार्य भी है, कारण भी है। अतः पर्यायष्टि से पराश्रित है। इसमें कोई संदेह की बात नहीं है। पर्याय क्षणिक है, कार्य है । शुद्ध पर्याय में स्वयं अनंतर पूर्वपर्याय उपादान कारण तथा अगुरुलघुगुण काल, द्रव्य, क्षेत्र,भाव, वीर्य आदि अनेक गुण सहकारी कारण हैं। अशुद्ध पर्याय में भी स्वयं अनंतर पूर्वपर्याय उपादान कारण तथा अगुरुलघुगुण काल द्रव्य क्षेत्र भाव वीर्य आदि अनेक गुण तथा कर्म एवं वाह्य पदार्थ भी निमित्त कारण हैं। ऐसा भी कथन यही पुष्ट करता है कि निश्चय व्यवहार एक साथ है। जब व्यवहार का अर्थ कारण करते हैं एवं निश्चय का अर्थ कार्य करते हैं तब भी साध्य साधन रूप से एक साथ भी है तथा प्रथम व्यवहार फिर निश्चय ऐसा क्रम भी है। "जो सत्यारथ रूप से निश्चय कारण सो विवहारो" " ऐसा छहढाला में स्पष्ट उल्लेख है। हां स्वानुभव में दोनों नय दूर चले जाते हैं। वस्तु ( ५ ) निर्विकल्प स्वसहाय है। अतः इन नयों के विकल्पों में अपने ज्ञान को अटकाना ठीक नहीं है। इसी चर्चा में समय न गमा कर आगे लक्ष्य की तरफ उपयोग शुद्ध बनाने का उद्यम करना चाहिये। अतः ये सापेक्ष नय मोक्ष के प्रतिपादक हैं। हे भैया, सर्वत्र एक ही भेद रूप अर्थ व्यवहार का मानकर विवाद न करना। व्यवहार नय अभूतार्थ है। अभूतार्थ शब्द का भी हमें एक बार विचार कर लेना चाहिये, क्योंकि जिस से व्यवहार का ठीक अर्थ समझ में आ जाय। और उसकी पक्ष से बचें। तथा आगे हेय समझ कर अपने स्वरूप पर आरूढ़ होवें। समयसार गाथा ११ की टीका में स्पष्ट लिखा है। व्यवहारनयो हि सर्व एवाभूतार्थ- स्वादभूतमर्थं प्रद्योतयति । शुद्धनय एक एव भूतार्थत्वात् भूतमर्थ प्रद्योतयति । तथा हि यथाप्रबलपंकसंबलनतिरोहित- सहजैकाच्छभावस्य पयसोऽनुभवितारः पुरुषाः पङ्कपयसो- विवेकमकुर्वतो वहवोऽनच्छमेव तदनुभवंति । केचित्तु स्वकरविकीर्णकतकनिपातमात्रोपजनितपंकपयसोविवेकतया स्वपुरुषाकाराविर्भावितसहजैकाच्छस्वभावत्वादच्छमेव तदनु- भवंति । तथा प्रबल कर्मसंवलनतिरोहितसहजैकज्ञायक- भावस्यात्मनोऽनुभवितारः पुरुषा आत्मकर्मणोविवे- कमकुर्वन्तो व्यवहारविमोहितहृदया:प्रद्योतमानभाववैश्वरूप्यं तमनुभवंति । भूतार्थदर्शिनस्तु स्वमतिनिपातितशुद्ध- नयानुवोधमात्रोपजनितात्मकर्मविवेकतया स्वपुरुषाकारा- ( ८६ ) विर्भावितसहजैकज्ञायकस्वभावत्वात् प्रद्योतमानकज्ञायक- भावं तमनुभवंति । तदत्र ये भूतार्थमाश्रयंति त एव सम्यक् पश्यंतः सम्यग्दृष्टयो भवंति, न पुनरन्ये कतकस्थानीयत्वात् शुद्धनयस्यातः प्रत्यगात्मदर्शिभिर्व्यवहारनयो नानुसतव्यः ॥११॥ अथ च केषांचित्कदाचित्सोऽपि प्रयोजनवान् । यतः- अभूतार्थ शब्द की व्युत्पत्ति भूधातु से भूतकाल का त प्रत्यय करके व निषेधवाची अ जोडने से अभूत बना। अभूत है अर्थ ( अभिधेय) जिसका ऐसा अभूतार्थ नय है । अर्थात् द्रव्य ऐसा कभी नहीं हुवा जैसा हो रहा है। द्रव्य (आत्मा) तो एक शुद्ध बुद्ध ज्ञाय फस्वभाव निर्मम टड्वोत्कीर्ण है। पर्याय में अनेक अशुद्ध अबुद्ध ममत्ववाला वैश्वरूप्य हो रहा है। सो जिन्होंने प्रत्यक् (साक्षात् ) आत्मदर्शनकर लिया है उनके लिये व्यवहार नय प्रयोजनवान नहीं है। परन्तु (परपरा) जिन्होंने आत्मदर्शन किया है। अथवा नहीं किया है (आगे करेंगे) उनके लिये प्रयोजनवान् है। यहा टीका मे व्यवहारनय के साथ सर्व शब्द लगाया है। तथा शुद्धनय के साथ एक शब्द लगाया है। इन से ही अर्थ निकल आता है कि व्यवहार नय अकेला नहीं है, सब का मिश्रण है। अशुद्ध स्वरूप लिये स्वयं अशुद्ध का वाचक है। निश्चयनय अकेला है एक है मिश्रण नहीं है, अतः शुद्धस्वरूप लिये स्वय शुद्ध का (यथार्थका) वाचक है। जहा अभूत अशुद्ध का कथन है अर्थात् वस्तु (द्रव्य) स्वभाव से वैसी नहीं है जैसा का कथन है। इसलिये व्यवहार असत्यार्थ-अभूतार्थ है । पर्याय से मिश्रणरूप सत्य है। वैसा ही असमान जातीयरूप परिणमन है। वह पर्याय भी आगे पूर्ण शुद्ध हो जाती है अतः
( ८७ )
उस दृष्टि से मिश्रण असत्यार्थ है । परन्तु पुन. शुद्ध का अशुद्ध,
नहीं होता अतः निश्चय से किसी भी रूप में अभूतार्थ नहीं है।
और भी दृष्टान्त से खुलासा समझिये। तृपातुर कुछ पुरुप
पिपासा शांत करने को जल के पास गये । वह जल कीचड़
मिश्रित मलिन था सो उन्होंने बहुतों ने कीचड़ पृथग न कर
उस अस्वच्छ जल ही को पी लिया, कष्ट पाया। कोई चतुर
थे, उन्हों ने चतुराई से कतक को चूर्णकर जल में डाल
दिया-उससे पंक तत्काल नीचे बैठ गया। स्वच्छ जल
कर्दम रहित हो गया।
इस तरह अपने पुरुपार्थ से सहज
स्वच्छभावव्यक्त जल को ही वे पीकर पिपासा शांत करते है,
निरोग होते हैं। इसी तरह प्रवल कर्म से तिरोहित सहज
एक ज्ञायक स्वाभाव वाली आत्मा के अनुभवी पुरुष आत्मा
और कर्म का विवेक न कर व्यवहार में ही मोहित (अनान)
हृदय वाले चमकते हुए नानाभाव वाले अशुद्ध आत्मा को ही
अनुभव करते हैं। यथार्थदर्शी पुरुष अपनी बुद्धि से डाली हुई
शुद्धनय के अनुसारी ज्ञान से उत्पन्न आत्मा और कर्म के
भेदपने से स्वपुरुप का आकार जिस में प्रगट है ऐसे सहज
एक स्वभाव से चमकते हुए एक ज्ञायक भाव वाले शुद्धात्मा
को ही अनुभव करते हैं, वे ही सम्यग्दृष्टि है।
यहाँ दृष्टांत दान्ति दोनों ही अभूतार्थ का अर्थ प्रगट
करते हैं। दृष्टान्त में अनच्छ पद है तथा अच्छ पद हैं।
दार्टान्त में प्रद्योतमानभाववैश्वरूप्य पद है तथा प्रद्योतमा-
नेकज्ञायकभाव पद है।
जल में अस्वच्छता मिश्रण से आई है। अतः ऐसा
'परिणमन अभूतार्थ है। अभूतार्थ माने यह नहीं कि अस्वच्छ
जल कोई चीज ही न हो । तथा स्वच्छता जल की
तथा
सहजावस्था है, एक रूप है, वह भी कतक डालने से पक के
अभाव से उसी में से उसी मे आई है। वह सत्यार्थ है।
भूतार्थ है।
इसी प्रकार प्रद्योतमानभाववैश्वरूप्य कर्मों के मिश्रण से
तिरोहित आत्मस्वभाव के हो जाने से हुआ है। वह
परिणमन अभूतार्थ है। ऐसी बात नहीं कि भाववैश्वरूप्य
परिणमन कुछ भी तत्काल सत् न हो, सत् है ही।
शुद्धनय से जब कर्म के विवेक (भेद) से सहज एक ज्ञायक
स्वभाव के हो जाने से प्रद्योतमानैकज्ञायकभाव सत्यार्थ है,
भूतार्थ है। वह कभी फिर मिटता नहीं है। सहज एक
ज्ञायकस्वभावता कर्मों के भेद से उसी में से उसी में आई है।
सो निश्चय करना । ऐसा अभूतार्थनय भी अपरम भाव में
स्थितों के लिये प्रयोजनवान् है। ऐसा व्यवहारनय आप ही
स्वयं छूटता जाता है। परिणति तो आगे शुद्ध हो। शुद्ध
होने न पावे और छोड़ देवे तो फिर ज्यों को त्यों अज्ञानी ही
रहा। अतः श्री निर्विरण गुरु दया करके बार-बार समझाते
हैं कि तू इस व्यवहार में मोहित मत रहना ।
जाना-तेरा स्वरूप तो और ही है, उसी को समझ । ऐसे
पात्र की अपेक्षा यह कथन ठीक, बैठ जाता है। इस तरह
बुद्धिमान् वही है जो इन में न अटके।
निश्चय-निश्चयनय व्यवहार-व्यवहारनय ।
निश्चय और निश्चयनय दो चीज हैं। निश्चय तो वह है
कि जिस समय जो वस्तु का परिणमन है, उस समय उसी
रूप वस्तु का कथन करना निश्चय है। तथा वस्तु का कभी
न मिटने वाले सत् रूप अनादि अनंत स्वभाव का कथन
करने वाला निश्चयनय है। इसी तरह व्यवहार और
मत अटक
1 है ( 8 ) व्यवहारनय दो चीजें हैं। वस्तु किसी भी रूप परिणम रही है। उस के अन्य के संबन्ध से अन्य स्वरूप परिणमन वताने को व्यवहार करते हैं। तथा पर का आश्चय करके वस्तु के कुछ परिणमनों (पर्यायों) को वस्तुस्वरूप कथन करने वाला व्यवहारनय है। तथा व्यवहारनय शब्दों के द्वारा निश्चय का भी प्रतिपादन करता है। व्यवहारनिरपेक्ष निश्चयनय अर्थात् निरपेक्ष नय नयाभास । उस से वस्तु स्वरूप का कथन नहीं हो सकता। वस्तु, स्वरूप दोनों नयों का विषय है तथा अनुभव उन से भी अतीत है। पंचास्तिकीय गाथा २० की टीका में लम्बे बॉस का दृष्टान्त दिया है :- किं चः-यथा द्राधीयसि वेणुदण्डे व्यवहिताव्यवहित- विचित्रकिम्मीरिताधस्तनार्घभागे एकान्तव्यवहितसुवि- शुद्धोर्वार्द्धभागेऽवतारिता दृष्टिः समन्ततो विचित्र- चित्रकिर्मीरिता व्याप्तिं पश्यन्ती समनुमिनोति तस्य सर्वत्राविशुद्धत्वम् । तथा क्वचिदपि जीवद्रव्ये व्यवहिता- व्यवहितज्ञानावरणादिकर्मकिरिताखचिताधस्तनार्द्ध- भागे एकान्तव्यवहितसुविशुद्धबहुतरो| भागेऽ वतारिता बुद्धिः समन्ततो ज्ञानावरणकर्मकिर्मीरता- व्याप्ति व्यक्स्यन्ती समनुमिनोति तस्य सर्वत्राविशुद्धत्वम् । यथा च तत्र वेणुदण्डे व्याप्तिज्ञानाभासनिबन्धनविचित्र- किरितान्वयः । यथा च क्वचिज्जीवद्रव्ये ज्ञानावरणादि- ( ६० ) कर्मकिर्मीरतान्वयः । यथैव च तत्रैव वेणुदण्डे विचित्र- चित्रकिरिताऽभावात्सुविशुद्धत्वम् । यथैव च क्वचि- ज्जीवद्रव्ये ज्ञानावरणादिकर्मकिर्मीरितान्वयाभावादाप्ता- गमसम्यगनुमानातीन्द्रियज्ञानपरिच्छिन्नासिद्धत्वमिति ॥ इस लम्बे बॉस में आधा भाग चित्रित है, तथा आधा बॉस शुद्ध है, परन्तु आवृत है । इन दोनों भागों में से भिन्न रंग के चित्रों से चित्रित भाग मात्र ही को वॉस कहना ठीक नहीं है। क्योंकि इसमें ऊर्ध्वभाग छूट गया। यदि ऊध्र्वभाग का कथन किया जाता है तब अधोभाग छूट जाता है तब भी पूरे बॉस का प्रतिपादन नहीं हुआ। इस दृष्टान्त का अर्थ स्पष्ट ही हैं। इसी प्रकार सभी द्रव्य खासकर जीवद्रव्य त्रिकाल की गुणपर्यायों का समूह है। जीव की संसारपर्याय मात्र का वर्णन अधूरा है। आगे की सिद्धपर्याय का कथन भी अधूरा है । अथवा द्रव्य दृष्टि का ही कथन करना पर्याय को छोड़ देना ठीक नहीं है। पर्याय का ही कथन करना द्रव्य स्वरूप को छोड़देना भी ठीक नहीं है। ये सब आभास हैं। जहाँ निश्चय है वहीं व्यवहार है। जहाँ व्यवहार है वहीं इन का परस्पर वाच्यवाचक या द्योत्यद्योतक अथवा साध्यसाधक सबन्ध है। व्यवहारनय-उपचार। न्यायशास्त्रों मे कहा है कि "प्रयोजने निमित्ते च सति उपचारः प्रवर्तते"। व्यवहार को उपचार भी कहते हैं। व्यवहारनय सर्वथा असत्यार्थ नहीं है। यदि सर्वथा असत्यार्थ निश्चय है।
६१ ) माना जावे तब वेदांतमत के समान संसार स्वप्नवत् मिथ्या हो जावेगा। आत्मा को सांख्य के समान पुष्करपलाशव- निर्लेप कहना पड़ेगा। परंतु आत्मा ऐसा है नहीं । आत्मा की दो धारा हों, ऐसा भी नहीं (१) सामान्य धारा, (२) विशेष धारा। विशेषों से सामान्य कोई अलग नहीं है, सामान्य अनुगताकार उन विशेषों में पाया जाता है । निरपेक्ष सामान्य अभावरूप है । निर्विशेष हि सामान्यं भवेच्छशविषाणवत। सामान्यमात्र से कोई काम भी नहीं चलता । जैसे किसी ने कहा कि मनुष्य को लाओ। सुनते ही विचार उत्पन्न होता है कि यह किस मनुष्य का आह्वान है । कोई भी विशेष पुरुष के आजाने से सामान्य मनुष्य का भी आगमन सिद्ध हो जाता है । सामान्य विशेष दोनों का सवन्ध उसी एक पुरुष के आधार से लगा है। यदि निश्चयनय को सामान्य माना जाय तो व्यवहारनय विशेष ठहरता है। तब व्यवहारनय की अपेक्षा स्वयं सिद्ध हो गई। व्यवहारनय में ही निश्चयनय का विषय सामान्य को शवलोकन करना चाहिये। जैसे नवतत्त्वों में गत होने पर भी जीव अपने एकत्व को नहीं छोड़ता है । जीव एकानेकात्मक स्वयं है । इन कथनमात्र दोनों नयों की विवक्षा रूप एकानेकात्मक जीव हो, ऐसी बात नहीं है। अतः अनेकात्मकपना भी स्वभाव है। परन्तु मिश्रण से, अशुद्धता से आये हुए विकारीभावों को जीव कहने रूप प्रयोजन को देखकर उपचार शब्द से कहा जाता है। तथा विकार- भाव जीव में कहाँ से आये हैं, इसकी जब खोज करते हैं, तब हमें दृष्टि को निमित्त प्रधान बनाना पड़ता है। उस निमित्त के होने पर जीवद्रव्य वैसा विकारी होता है। अतः
( ९२ )
निमित्ताधीन कथन करने वाला ही व्यवहारनय उपचार है।
इस तरह प्रयोजन निमित्त दोनों ही दृष्टि अशुद्ध कथन में
काम आती हैं। अशुद्ध कथन जीवद्रव्य में आचार्यों ने
बताया ही है। अभी बाँस के दृष्टान्त से स्पष्ट कर ही चुके
हैं। इससे वस्तुरूप अशुद्धता है ।
. इस वस्तुरूप अशुद्धता को कथन करने वाला व्यवहारनय
उपचार है। तथा उपचार भी सर्वथा असत्यार्थ हो या
अनादि से हमारी प्रतीति में आ रहा हो, ऐसा नहीं है।
अनादि से तो हमने समझा ही नहीं। एकान्त अज्ञानी ही
रहे। अब वस्तुस्वरूप को पहचाना तब असत्यार्थ वा सत्यार्थ
जाना। उसमे सत्यार्थ को उपादेय जाना और असत्यार्थ
को हेय जाना। हेय जानने से स्वप्नवत् मिथ्या नहीं है।
इसलिये प्रयोजन निमित्त की दृष्टि में उपचार भी सत्यार्थ है.।
ऐसा कथंचित् निर्णय करना ही सम्यग्ज्ञान है। व्यवहारनय
को हेय किस दृष्टि से बताया है, उसका खुलासा समयसार
बंधाधिकार में कहा है:
एवं ववहारणो पडिसिद्धो जाण णिच्छयणयेण ।।
णिच्छयणयासिदा पुण मुनिणो पावंति निव्वाणं ॥
आत्माश्रितो निश्चयनयः, पराश्रितो व्यवहारनयः ।
तत्रैवं निश्चयनयेन पराश्रितं समस्तमध्यवसानं बंधहेतुत्वेन
मुमुक्षोः प्रतिषेधयता व्यवहारनय एव किल प्रतिषिद्धः
तस्यापि पराश्रितत्वाविशेषात् । प्रतिषेध्य एव चायं,
आत्माश्रितनिश्चयनयाश्रितानामेव मुच्यमानत्वात, परा--
श्रितव्यवहारनयस्यैकांतेनामुच्यमानेनाभव्येनाप्याश्रियमाण
त्वाच॥
( ६३ )
।
भावार्थ:-आत्मा के पर के निमित्त से जो अनेकभाव
होते हैं वे सब व्यवहारनय के विषय हैं, इसलिये व्यवहारनय
पराश्चित है । और जो एक अपना स्वाभाविक भाव है,
वही निश्चयनय का विषय है। इसलिये निश्चयनय श्रात्माश्रित
है। अध्यवसान भी व्यवहारनय का ही विषय है। इसलिये
अध्यवसान का त्याग व्यवहारनय का ही त्याग है । और जो
पूर्वोक्त गाथाओं में अध्यवसान के त्याग का उपदेश है
वह व्यवहारनय के ही त्याग का उपदेश है। इस प्रकार
"निश्चयनय को प्रधान करके” व्यवहारनय के त्याग का
उपदेश किया है। उसका कारण यह है कि जो सापेक्ष
निश्चयनय के आश्रय से प्रवर्तते हैं, वे ही कर्मों से मुक्त होते
है और जो "एकान्त से व्यवहारनय के ही आश्रय से प्रवर्तते
हैं।" वे कर्मों से कभी मुक्त नहीं होते।
यहाँ पर पराश्रितपना त्याग का कारण बताया है ।
एकान्त से जो इस पराश्रित व्यवहार को ही पकड़ते हैं
वे अभव्य हैं । मुमुक्षु नहीं हैं । संसारी है । परन्तु जो
मुमुक्षु अनेकांत से व्यवहारनय को जानते हैं, उनके लिये
सर्वथा हेय नहीं है। यह तात्पर्य यहाँ निकला ।
सापेक्ष साधक व्यवहारनय का निषेध नहीं है। वह तो
साध्य सिद्ध होने पर स्वय ही छूट जावेगा। ऐसी दृष्टि को
सन्मुख रखना चाहिये, नहीं तो परिणति शुद्ध करने का पुरुषार्थ
बन ही नहीं सकता। अशुद्ध से ही अशुद्ध को शुद्ध करना
है। शुद्ध से शुद्ध क्या होगा । वह तो शुद्ध है ही।
प्रत्येक जीव के पर्याय भोग्य होती है, द्रव्य भोग्य नहीं
होता हे। तब जहाँ पर्याय में अशुद्धि आई है, उसी को
दूर करने का पुरुषार्थ करना कर्त्तव्य है। पर्याय की अशुद्धि
को जानना व अपेक्षा से भिन्न करना ही व्यवहार है।
अतः
( ४ ) रूप से अथवा जिस समय अशुद्धता जिस कारण से हो रही है, उसका कथन भी निश्चय है। यहाँ निश्चय का अर्थ दृढ़ता है। यदि अशुद्धि को अपना दोप न माने अर्थात् विभाव को हेय न समझे, तव उसे छोड़ें कैसे ? যুক্তি স্বত্তি इसलिये अनादि काल से सामान्य वस्तु स्वरूप ही विशेष अशुद्ध हो रहा है। यह नहीं है कि वस्तु की सामान्य धारा त्रिकाल शुद्ध हो। द्रव्यशुद्धि का अर्थ दूसरे द्रव्य का तादात्म्य न होना ही है। यदि तादात्म्य हो जावे तो जीव पुद्गल का या अन्य द्रव्यों का भेट ही मिट जावे। दो द्रव्यों के सयोग का तथा परस्पर निमित्तनैमित्तिकपने का कहीं भी आगम ने निषेध नहीं है। यथा:-अणु से अणु मिलकर द्वयणुक बन जाता है। जीव और कर्मनोकर्म मिलकर असमान जातीय द्रव्य पर्याय बन जाती है । इसका कथन पहले भी लिख चुके हैं। विशेष कथन पंचास्तिकाय गाथा ६५-६७ मे देखना चाहिये। प्रवचनसार मे गाथा १७५-१८० तक बंध का कथन स्पष्ट है। समयसार, मूलाचार, अष्टपाहुड, भगवतीअराधना, कर्मपाहुड, कषायपाहुड तथा गोम्मटसारादि मे आत्मा की संदेहावस्था तथा अशुद्धता का वर्णन स्पष्ट है । अकेला निश्चयनय यदि निश्चयनय पूर्ण शुद्ध ही माना जावे, तो भी श्री अमृतचद्रसूरि ने यही बताया है, कि मतिज्ञान श्रुतज्ञान को विकल्पों से हटाकर आत्मस्वरूप की अनुभूति मे लगावे । ये ही हमारे पास दो साधन हैं, जिनके द्वारा हम वस्तुस्वरूप के निकट पहुंचते हैं (समयसार गाथा १४३-१४५)। केवल- (६५) ज्ञानरूप साधन तो अभी हमारे पास हैं ही नहीं। तथा केवलज्ञान भी तो स्वयं साध्य है। अव श्राप ही विचारें- कि मतिज्ञान श्रुतज्ञान व्यवहार हैं या निश्चय, तथा मतिज्ञान श्रुतज्ञान का फल स्वानुभूतव्यवहार है या निश्चय । यदि व्यवहार कहते हैं तो साधन व्यवहार सिद्ध हुवा । अभी निश्चय को सिद्ध करना शेष है। यदि निश्चय कहते हो तो फिर इसका फल आगे क्या होगा। यहाँ ज्ञान की विका- सावस्था पूर्ण हो जानी चाहिये सो होती नहीं है। वह साध्य अभी बहुत दूर है। अतः अकेला निश्चयनय कार्य- कारी नहीं है। सापेक्ष कथन का करना वा जानना ही वा उन से भी आगे निर्विकल्प बनना ही समयसार बनना. है। यही स्वाध्याय का फल है। कहा भी है। बुद्धेः फलं स्वात्महितप्रवृत्तिः ॥ निष्फल ज्ञान-कुछ नहीं आत्मा के ५ विशेषण (अबद्धस्पृष्ट, असंयुक्त, अनन्य, अविशेष नियत) कथन मात्र हैं, या स्वयं खिद्ध अनादि व्यक्त हैं, या अभी व्यक्त होना है। यदि कथन मात्र है, तो फिर कौन निष्फल पुरुषार्थ करेना। प्रयोजनमनुद्दिश्य मंदोऽपि न प्रवर्तते । प्रयोजन फल कुछ न कुछ अवश्य होना चाहिये। न्याय शास्त्रों में कहा है, ज्ञान इष्ट प्रयोजनवाला होना चाहिये, ज्ञान विना फल के कुछ भी चीज नहीं है। अज्ञाननिवृत्ति . तथा ( रागादि दोषों का अभाव रूप) उपेक्षा को ज्ञान का फल बताया है। तभी वचन की प्रमाणता होती है। यदि उन में असिद्धादि दोष न हों, तभी वे लोकों के और बुद्धिमानों के आदरणीय (ग्राह्य) होते है एवं धारण किये जाते हैं । आज
( ९६ )
वचनों के बल से ही श्रीधवलशास्त्रको देखकर कहना पड़तो
है कि कोई सर्वज्ञ भी होगा ? जब श्रीवीरसेनाचार्य ने
इतने विस्तार से सब विषयों को लिखा है, जिससे उनकी
विद्वत्ता तो प्रतीत होती ही है। साथ में सर्वज्ञता पर भी
श्रद्धान दृढ हो जाता है कि ऐसा गूढकथन करने वाला परम्परया
सर्वज्ञ होना ही चाहिये। सर्वज्ञ विना कौन इतना विवेचन
कर सकता है। इसलिये शास्त्र भी प्रमाण है। तथा ज्ञान में
निमित्त सदैव है, जब उस द्रव्यश्रुत को पढे, तभी अज्ञान निवृत्ति
रूप फल विद्यमान है। यदि द्रव्यश्रुत का निमित्तपना भी
मिटजाय तो उस का आदर कौन करे। तद्वचनमपि तद्धेतु-
त्वात् प्रमाणं कहा है। प० आशाधर जी कहते हैं:-
ये यजन्ते श्रुतं भत्तया ते यजन्तेऽञ्जसा जिनं ॥
न किश्चिदन्तरं प्राहुराप्ता हि श्रुतदेवयोः । सागार धर्मामृत ।
यद्यपि शास्त्र ज्ञान नहीं है, विलकुल भिन्न है तथापि श्रुत के
पठन का फल हेयोपादेयतत्त्व की व्वस्था बताई है। और ज्ञान
का फल बता ही चुके हैं। फलविप्रतिपत्ति का निराकरण करते
हुये परीक्षामुख मे कहा है कि अज्ञाननिवृत्तिानोपादनोपेक्षाश्च
फलम् । इसका कर्थ स्पष्ट ही है । ज्ञान (प्रमाण) की ज्ञप्ति तथा
प्रमाणता के विषयमे ऐसा कहा हैः-तत्प्रामाण्यं स्वतःपरतश्च ।
ज्ञान में प्रमेय का ज्ञान अभ्यास दशामें स्वतः होता है । अन-
भ्यास दशा में परतः होता है । तथा ज्ञान की प्रमाणता (सच्चाई)
पर से ही होती है।
बुद्धिशब्दप्रमाणनं बाह्यार्थेसति नासति ।
सत्यानृतव्यवस्थैवं युज्यतेऽर्थापत्यनाप्तिषु ॥८७॥
( ९७ ) . ऐसा प्राप्तमीमांसा में कहा है। श्री विद्यानंदस्वामी ने अष्ट- सहस्त्रो में पर का अर्थ सुनिश्चितासंभवद्वाधकत्वेन किया है। अविसंवादित्वेन, प्रवृत्त्या सामयन तथा निर्दोषत्वेन का खण्डन किया है। ऐसा जो सांख्य, मीमांसक, बौद्ध आदि मानते हैं, सो पर का अर्थ ठीक नहीं है। इस प्रकार ज्ञापक तत्त्व भी पर की अपेक्षा रखता है। पर की अपेक्षा का अर्थ परतंत्रता करना या स्वतंत्र शक्ति का विनाश करना ठीक नहीं है। शक्तियाँ अपनी सत्ता में पर की अपेक्षा नहीं करतीं परन्तु विकास मे- व्यक्त होने में अवश्य पर की अपेक्षा रखती हैं। नहीं तो श्रीअकलङ्कदेव तत्त्वार्थ राजवार्तिक मे सब जगह उभय-निमित्तवशात् क्यों लिखते । उत्पत्ति तो पर्याय की होती है-द्रव्य की होनी नहीं है। पर्याय है सो कार्य है। कार्य की उत्पत्ति अनेक उपकरणों से होती है, सो ही अकलङ्कदेव पंचमाध्याय सूत्र १७ की वार्तिक ३१ में धर्म अधर्म द्रव्यों की सिद्धि करते हुए कहते हैं। कार्यस्यानेकोपकरणसाध्यत्वात् तत्सिद्धेः । इह लोके कार्यमनेकोपकरणसाध्यं दृष्टं यथा मत्पिण्डो घट- कार्यपरिणामप्राप्तिं प्रति गृहीताभ्यंतरसामर्थ्यः बाह्यकुला- लदंडचक्रसूत्रोदककालाकाशाबनेकोपकरणापेक्षः घटपर्याये- णाविर्भवति । नैक एव मृत्पिण्डः कुलालादिबाह्यसाधन- सन्निधानेन विना घटात्मनाऽविर्भवितुं समर्थः । तथा पतन्त्रिप्रभृतिद्रव्यं गतिस्थितिपरिणामप्राप्तिं प्रत्यभिमुखं नांतरेण बाह्यानेककारणसन्निधिं गतिं स्थिति वा प्राप्तु- मलमिति तदुपग्रहकारणधर्माधर्मास्तिकायसिद्धिः। भावार्थः- इस लोक में कार्य अनेक उपकरणों से ( ९८ ) (कारणों से) साध्य देखा जाता है। जैसे मिट्टी का पिण्ड घटकार्य रूप परिणमन प्राप्ति के प्रति अभ्यंतर सामर्थ्य को ग्रहण किये हुवे भी बहिरङ्ग कुंभकार दंड चक्र सूत्र जल काल आकाश आदि अनेक उपकरणों की अपेक्षा वाला घटपर्याय से प्रगट होता है। अकेला ही मृत्पिण्ड कुम्हार आदि वाह्य- साधनों की निकटता विना घटरूप से उत्पन्न होने को समर्थ नहीं हैं। उसी तरह पक्षी आदि द्रव्य गति स्थिति परिणाम प्राप्ति के सन्मुख वाह्य अनेक कारणों की निकटता के विना गति स्थिति प्राप्त करने को समर्थ नहीं है। यह आगमोक्त कथन है। यह कथन सफल होना ही चाहिये । अतः ५ विशेपणों का कथन कथनमात्र ही नहीं है, सार्थक है । यदि कहो कि ये स्वयं सिद्ध अनादि से व्यक्त हैं तो यह भी कथन ठीक नहीं है। वे वर्तमान पर्याय में उपलब्ध होना चाहिये । उपलब्ध होते नहीं हैं। वर्तमान मे बद्धस्पृष्ट, संयुक्त, अन्य, विशेष अनियत परिणमन देखे जाते हैं। उन उपर कहे हुए अबद्धस्पृष्ट आदि का प्राप्त करना पुरुषार्थ है। भी (व्यवहार-निश्चय) नय क्या काम का जिसका कुछ भी विशेष फल न हो। शक्ति रूप से केवल ज्ञान सदा ही है परन्तु सुमतिज्ञान सुश्रुतज्ञान के द्वारा अनुभूति करके ही निर्विकल्प बनकर केवलज्ञान की प्रकटता कर सकते हैं, पहले नहीं। जैसे धान है उसका छिलका दूर न होने पर वह उपभोग्य नहीं है। उसको भोग्य बनाने के पहले भी चावल विद्यमान है। ऐसी श्रद्धा से भी तो काम नहीं चलता । अतः हमे व्यवहार की परम आवश्यकता है। कहना भी ठीक नहीं है कि अनादि से स्वय सिद्ध व्यक्त हैं। यदि कहो कि अभी व्यक्त होना है, तो ऐसा निश्चय साध्य । । अतः ऐसा । अतः यह । ही बना। साधन हैं सो ही व्यवहार हैं। अभी विशेषणों का पर्याय से अव्यक्तपना है और द्रव्य से भूतार्थापन्न है। इन ही सब का विशेष कथन इसी गाथा की टीका में देखें उससे सब विषय स्पष्ट हो जावेगा। देखो समयसार की गाथा १४। षट् कारकों का वर्णन षट कारकों का वर्णन भी दो तरह से है। भेदरूप और अभेदरूप। भेदरूप (व्यवहार) कारण (कारक) कमनोकमे की अपेक्षा से बनते हैं। अभेदरूप केवल आत्मा में ही लगाते हैं। फिर वे भी लुप्त हो जाते है। पंचास्तिकाय गाथा ४६ की टीका में तथा ६० की टीका में लिखा है :- यथा देवदत्तस्य गौरित्यन्यत्वे षष्ठीव्यपदेशः तथा वृक्षस्य शाखा द्रव्यस्य गुणा इत्यनन्यत्वेऽपि । यथा देवदत्तः फलमङ्कुशेन धनदत्ताय वृक्षाद्वाटिकायामवचिनो- तोत्यन्यत्वे कारकव्यपदेशः तथा मृत्तिका घटभावं स्वयं स्वेन स्वस्मै स्वस्मात् स्वस्मिन् करोतीत्याऽत्माऽत्मानमात्म- नाऽऽत्मने आत्मन आत्मनि अात्मनि जानातीत्यनन्यत्वेऽपि इत्यादि ॥४६॥ जैसे देवदत्त फल को अंकुश के (बाण के) द्वारा धनदत्त के लिये वृक्ष से बगीचे में तोड़ता है ऐसे भिन्नपने में कारकों का कथन है। तथा मिट्टी घटभाव को स्वयं अपने द्वारा अपने लिये अपने से अपने में करती है। इसी प्रकार आत्मा आत्मा को आत्मा के द्वारा आत्मा के लिये आत्मा से आत्मा में ( १०० " जानता है ऐसा अभेदपने में कारक व्यपदेश है। अब भिन्न वा अभिन्न कर्त्तापने को दिखाते हैं:- व्यवहारेण निमित्तमात्रत्वाजीवभावस्य कर्म कर्तु, कर्मणोऽपि जीवभावः कर्ता । निश्चयेन तु न जीवभावा- नां कर्म कर्तु, न कर्मणो जीवभावः। न च ते कर्तारम- तरेण संभूयन्ते । यतो निश्चयेन जीवपरिणामानां जीवः कर्ता। कर्मपरिणामानां कर्म कर्तृ इति ॥६॥ इसी तरह गाथा ६८ पंचास्तिकाय की टीका में कतृत्व गुण का उपसहार करते हुए उभयनयों के कथन को ही यथार्थ सिद्ध किया है। भोक्ता तो जीव ही है, पुद्गल नहीं है, चैतन्यपूर्वक अनुभूति न होने से। गाथा ८ की टीका में कहा है:- इति सर्वमनवद्यम् । सामान्यविशेषप्ररूपणप्रत्रणनय- द्वयायत्तत्त्वात् तद्देशनायाः ॥८॥ भगवान की देशना दोनों नयों के कथन के आधीन कही है। केवल एक ही नय का प्रयोग ठीक नहीं है। अन्त मे स्वानु- भूतिपूर्ण निर्विकल्प होने पर स्वयमेव षट्कारकों का भेद, अभेद व्यपदेश ही मिट जाता है। समयसार गाथा २९७- २९८-२६६ की टीका मे स्वष्ट विवेचन है। इसलिये हमे पहले व्यवहार सापेक्ष निश्चयनय का ही ग्रहण करना चाहिये, अर्थात् जानना चाहिये। न कि पक्ष की ही हठ बना लेना चाहिये। ज्ञानी जीवों के तो एक ज्ञान की पक्ष होती है। शंका-गाथा २७२ से २७६ तक समयसार में व्यवहारनय को प्रतिपेध्य बताया है तथा निश्चयनय को प्रतिषेधक बताया
( १०१ )
है। कलश १७३ में कहा है कि:- "तन्मन्ये व्यवहार एव
निखिलोऽप्यन्याश्रयस्त्याजितः" यह पराश्रित व्यवहार ही पूर्ण
छुड़ाया है तथा एक निश्चल निश्चय पर आरूढ़ होने की प्रेरणा
की है। यहाँ पर आप दोनों नयों को आवश्यक बताते है।
सो किस तरह ? समाधान:-पहले भी अच्छी तरह से उत्तर
आ ही गया है। यदि आप खरतर दृष्टि से या तत्त्व दृष्टि से
विचारेंगे तो आपको स्वयं २७६ गाथा के अर्थ से बोध हो
जायगा कि व्यवहाराभास को छुड़ाया है या व्यवहार को
ही छुड़ाया है। अभव्य की अपेक्षा यह व्यवहार प्रतिषेध्य
। अनैकांतिक का अर्थ करते हुए खुलाशा किया है ।
तथा हिः-नाचारादि शब्दश्रुतं एकांतेन ज्ञानस्याश्रयः,
तत्सद्भावेऽप्यभव्यानांशुद्धात्माभावेन ज्ञानस्याभावात् । न च
जीवादयः पदार्थाः दर्शनस्याश्रयाः, तत्सद्भावेऽप्यभव्यानां
शुद्धात्माभावेन दर्शनस्याभावात् । न च षटजीवनिका-
याश्चारित्रस्याश्रयाः, तत्सद्भावेऽप्यभव्यानां शुद्धात्माभावेन
चारित्रस्याभावात् । शुद्ध आत्मैव ज्ञानस्याश्रयः, आचा-
रादिशद्वश्रुतसद्भावेऽसद्भावे वा तत्सद्भावेनैव ज्ञानस्य
सद्भावात् । इत्यादि।
शुद्ध आत्मा ही ज्ञान दर्शन चारित्र का आश्रय है, व्यवहार
से आचारादि शब्दश्रुत का सद्भाव हो या न हो। जीवादि-
पदार्थ हो या न हो, षट् जीवनिकाय हो या न हो, एक शुद्धात्मा
के
सद्भाव
में तीनों होते हैं। परन्तु व्यवहार में यह बात
नहीं है कि ज्ञान दर्शन चारित्र हो ही जाय । अतः अनेकांतिक
है।
है
( १०२ ) अनैकातिक का अर्थ है कि कोई जीव के प्राचारादि शब्द श्रुतज्ञान के होने से जीवादि पदार्थों के श्रद्धान से तथा पट् जीवनिकाय की रक्षा से ज्ञान दर्शन चारित्र हो जाते हैं। यह भव्य जीव की अपेक्षा होने का कथन है। अभव्य के नहीं होते हैं। अतः अभव्य अतः अभव्य की अपेक्षा निषेध का कथन है। सो व्यवहार का निपेध्यपना न होने का अपेक्षा जानना (होने की अपेक्षा न जानता)। श्री वीरसेन स्वामी ने वेदना खड के कृतिअनुयोगद्वार मे (पुस्तक ६ धवला टीका पृष्ट ५) मगला- चरण का अनैकातिकपना परिहार करते हुए कहा है कि शकाः-मगल करके प्रारम्भ किये गये कार्यो के कहीं पर विघ्न पाये जाने से और उसे न करके भी प्रारम्भ किये गये कार्यों के कहीं पर विघ्नों का अभाव देखे जाने से जिनेन्द्र नमस्कार विघ्नविनाशक नही है। समाधान:-यह कोई दोप नहीं है क्योंकि जिन व्याधियों की औपध की गई है उनका अविनाश, और जिनकी औषध नहीं की गई है उनका विनाश देखे जाने से व्यविचार (अनेकातिक) ज्ञात होने पर भी मारिच (काली- मिरच) आदि औपधि द्रव्यों मे औपधित्व गुण पाया जाता है । यदि कहा जावे कि औपधियों का श्रीपधित्ल (उनके सवत्र अचूक न होने पर भी) इस कारण नष्ट नहीं होता कि असाध्य व्याधियों को छोड़कर के केवल साध्य व्याधियों के विपय मे ही उनका व्यापार माना गया है। उसी तरह जिनेन्द्र नमस्कार भी विघ्न विनाशक है। उसका भी व्यापार असाध्य विघ्नों के कारण भूत कर्मों को छोड़कर साध्य विघ्नों के कारण भूत कर्मों के विनाश में देखा जाता है। यहाँ साध्य असाध्यव्याधि की तरह भव्य अभव्य जानना चाहिये । इस तरह दोनों ही नय आवश्यक हैं ( १०३ ) संसार (आस्रवबंध) का भी स्वरूप यथार्थ जानना जरूरी है। केवल हेय कह देने से. या होगा कैसे, भी मात्र कह देने से ज्ञान नहीं हो सकता। क्योंकि हमें अब तो सम्यक् पुरुषार्थ करके आस्रववध को मिटाना है। श्रास्त्रवबंध का स्वरूप भूता- र्थनय से जानने का नास सम्यकत्व कहा है। (समयसार गाथा १३) इसलिये सापेक्ष व्यवहारनय का प्रतिपादन भी पूर्ण है। पंचास्तिकाय गाथा १५६ की टीका में कहा है:- यत्तु पूर्वमुद्दष्टिं तत्स्वपरप्रत्ययपर्यायाश्रितं भिन्नसाध्य- साधनभावं व्यवहारनयमाश्रित्य प्ररूपितम् । न चैतद् विप्रतिषिद्धं निश्चयव्यवहारयोः साध्यसाधनभावत्वात्सुवर्ण- सुवर्णपापाणवत् । अत एवोभयनयायत्ता पारसेश्वरी तीर्थप्रवर्तनेति ॥ सो ही आगे १६० गाथा में कहा । यही समर्थन, समय- सार गाथा ५६ से ६० तक की टीका में किया गया है। सो भी अवश्य समझने का विषय है। सो वही ग्रथ से स्वाध्याय कर निर्णय कर लेना। जो ऐसा निर्णय नहीं करते हैं, केवल द्रव्य की स्वतंत्रता को ही निश्चय का कथन मानते हैं। वे भी स्वतंत्रता का अर्थ नहीं समझे है। स्वतंत्रता का अर्थ है अपना परिणमन करना, किसी अन्य गुण से या अन्य द्रव्य से मिल नहीं जाना चाहे वह परिगमन निमित्त से विभाव रूप या स्वभाव रूप हो दोनों ही अवस्था में स्वतंत्रता है। ऐसी स्वतंत्रता आत्मा की सदैव है। इस में कोई नय का कथन वाधक नहीं है। अतः हमें कथन मात्र पर प्रसन्न न हो जाना चाहिये। अपनी परिणति को अविरामगति से विशेष शुद्ध बनाने की सदैव चेष्टा करनी चाहिये। यही दोनों नयों के ज्ञान का sho ( १०४ ) फल है। जिसने मात्र चर्चा में ही समय बिताया, उसने अपने समय को सफल नहीं किया । इन नयों का विपय अपनी आत्म- परिणति को बनाना चाहिये, इसी का नाम सम्यग्दर्शन है। कहा भी है:- प्रत्यहं प्रत्यवेक्षेत नरश्चरितमात्मनः ।। किं नु मे पशुभिस्तुल्यं किं नु सत्पुरुपैरिति । इस प्रकार के प्रत्यवेक्षण से ही आत्मा की शुद्धि होगी। ।। शुद्धचिद्रूपाय नमः ।। पंचम प्रश्न:-सर्वज्ञकथित तत्त्वों से युक्त शुभोपयोग श्रावक के लिये मोक्ष का कारण है या मात्रबंध का ही कारण व्यवहार रत्नत्रय निश्वय रत्नत्रय का साधन है या नहीं ? व्यवहाररत्नत्रय पहले होता है कि निश्वयरत्नत्रय ? आत्म- धर्म नं० १३४ पत्र न० ३६ पर लिखा है कि "निश्चयरत्नत्रय वह मोक्षमार्ग है । और व्यवहाररत्नत्रय उससे विपरीत अर्थात् बधमार्ग है। व्यवहार से निश्चयरत्नत्रय हो जायेगा, ऐसा जो मानता है, उसने विपरीत का परिहार नहीं किया। इस विषय में आपकी मान्यता क्या है ? समाधान:-आप श्रावक के विषय में पूछते हो या साधु के ? दिगम्बर जैनागम में कथन दो प्रकार से है, १ करणानुयोग की दृष्टि से २ चरणानुयोग की दृष्टि से । जब हम करणानुयोग की दृष्टि से विचार करते है तो हमे भावों का पता तो है नहीं। परन्तु जैसा कि आगम मे कथन है, तद्रप ही वर्तमान में दर्शनमोहनीय का उपशम या क्षयोपशम तथा अनंनानुबंधी आदि का क्षयोपशम होता है।
( १०५ ) तभी सागार अनागार संज्ञा आगम में कहीं है। उसकी परीक्षा स्वानुभव तथा आगम में बताये हुये अनुमानों से प्रशम संवेगादि भावों से होती है। ऐसे श्रावक की या साधु की जितनी भी क्रियाएँ हैं, चाहे वे शुभ हां या अशुभ, सभी सम्यग्दर्शन के सद्भाव से निर्जरा की निमित्त होती हैं । समयसार निर्जराधिकार गाथा १९३-१६४ मे ऐसा ही कहा है- उवभोगमिदियेहिं दब्वाणमचेदणाणमिदराणं ॥ जं कुणदि सम्मदिट्ठी तं सव्वं णिज्जरणिमिचं ॥१६३।। दव्वे उवभुंजते णियमा जायदि सुहं व दुक्खं वा ।। तं सुहदुक्खमुदिण्णं वेददि अंह निज्जरं जादि ॥१६४॥ भावार्थ:-सम्यग्दृष्टि को ज्ञानी कहा है और ज्ञानी के रागद्वेष मोह का अभाव कहा है। इसलिये सम्यग्दृष्टि विरागी है। यद्यपि उसको इंद्रियों के द्वारा भोग दिखाई देता हो, तथापि उसे भोग की सामग्री के प्रति राग नहीं है। वह जानता है कि “यह भोग की सामग्री पर द्रव्य है, मेरा और इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। कर्मोदय के निमित्त से इसका और मेरा संयोग वियोग है। उसी प्रकार जब तक इसे चारित्रमोह का उदय आकर पीड़ा करता है और स्वयं बलहीन होने से पीड़ा को सहन नहीं कर सकता है तब तक जैसे रोगी रोग की पीड़ा को सहन नहीं कर सकता, तब उसका औपधि इत्यादि के द्वारा उपचार करता है। इसी प्रकार भोगो-पभोग सामग्री के द्वारा विषयरूप उपचार करता हुवा दिखाई देता है; किन्तु जैसे रोगी रोग को या औषधि को. भच्छा नहीं मानता। उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि चारित्र मोह - .
( १०६ ), - के उदय को या भोगोपभोग सामग्री को अच्छा नहीं मानता है। और निश्चय से तो ज्ञातृत्व के कारण ही विरागी सम्यग्दृष्टि उदयागत कर्मों को मात्रजान ही लेता है । उन के प्रति उसे रागद्वेष मोह नहीं है। इस प्रकार रागद्वेष मोह के विना ही उनके फल को भोगता हुवा दिखाई देता है । तौभी उसके कर्म का आस्त्रव नहीं होता। कर्मास्रव के विना आगामी वध नहीं होता । और उदयागत कर्म तो अपना रस देकर खिरही जाते हैं। क्योंकि उदय मे आने के बाद कर्म की सत्ता रह ही नहीं सकती। इस प्रकार उसके नवीन बंध नहीं होता और उदयागत कर्म की निर्जरा हो जाने से उसके केवल निर्जरा ही हुई । इसलिये विरागी सम्यग्दृष्टि के भोगोपभोग को निर्जरा का ही निमित्त कहा गया है। पूर्व कर्म उदय में आकर उसका द्रव्य खिर गया सो वह द्रव्य निर्जरा है ॥१६॥ परद्रव्य भोग में आने पर कर्मोदय के निमित्त से जीव के सुखरूप अथवा दुःखरूप भाव नियम से उत्पन्न होते हैं। इसलिये उसे निर्जरित नहीं कहा जा सकता। अतः मिथ्यादृष्टि को परद्रव्य के भोगते हुये बंध ही होता है। सम्यग्दृष्टि के अनंतानुबंधी कषाय संबंधी रागादिक न होने से आगामी अनत संसार का बंध किये विना ही वह भाव निर्जरित हो जाता है। इसलिये उसे निर्जरित कहा जाता है। अतः सम्यग्दृष्टि के परद्रव्य भोगने में आने पर भी निर्जरा ही होती है। इस प्रकार सम्यग्दृष्टि के भाव निर्जरा होती है। सम्यग्दृष्टि के विषयभोग निर्जरा के हेतु हैं । क्या ये विषयभोग शुभ परिणाम हैं । क्या ये अबुद्धि ।
( १०७ ) पूर्वक (स्यामित्व) नहीं हैं। हैं, तो ये शुभ ही क्रियाएँ, तथापि श्रद्धा की अपेक्षा विषयों में राग नहीं है। अतः द्रव्यानुयोग से निर्बन्ध है परन्तु करणानुयोग से सबन्ध है। तथापि निर्जरा असंख्यातगुणी अधिक अधिक है। स्वामित्व मिट जाने से सभी क्रियाएँ सम्यग्दर्शन के सन्निधान में संवर निर्जरा की कारण हैं, यह कहना युक्ति युक्त है। श्रद्धा यथार्थ हो जाने से सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र स्वतः सिद्ध हो जाते हैं । सम्यक्चारित्र की परिणति कषाय के सद्भाव से जघन्य रूप रहती है। अतः बंध का कारण होते हुये भी वह संवर निर्जरा का प्रधान हेतु है। हम जब सम्यक्चारित्र का लक्षण विचारते हैं, तब करणा- नुयोग के अनुसार यही सिद्ध होता है कि जितने अंशों में रागादि नही हैं उतना ही सम्यक्चारित्र है। ज्ञानगुण का परिणाम बध का कारण कैसे है ? इस प्रश्न का उत्तर समयसार गाथा १७१-१७२ की टीका में दिया है:-यो हि ज्ञानी स बुद्धिपूर्वकरागद्वेषयोहावभावाभावात् किन्तु सोऽपि यावज्ज्ञानं सर्वोत्कृष्टभावेन दृष्टुं ज्ञातुमनुचरितुं वाऽशक्तःसन् जघन्यभावेनैव ज्ञानं पश्यति जानात्याचरति तावत्तस्यापि जघन्यभावान्यथानुपपत्याऽनुमीयमानावुद्धि- पूर्वककर्मकलङ्कविपाकसद्भावात् पुद्गलकर्मबंधः स्यात् । इससे ऐसा अनुमान बनता है कि ज्ञानिनः अबुद्धि- पूर्वककर्मकलङ्कविषाक सद्भावः (रागादयः) संति जघन्य- भावान्यथानुपपत्तेः । ज्ञानी सबंधः अबुद्धिपूर्वककर्मकलङ्क- विपाकसद्भावात् ।' ज्ञानिनः बुद्धिपूर्वकरागादयो न संति निरालव एव, १०८ ) सम्यग्दृष्टित्वान्थानुपपत्तेः । ज्ञानी निरास्रवः बुद्धिपूर्वक- रागद्वेषमोहास्रवभावाभावात् ॥ इस तरह ज्ञानी के एक ही परिणाम से प्रास्रव बध सवर निर्जरा चारों ही तत्त्व होते हैं। सारांश यह है कि ज्ञानी को मोक्षमार्ग में सदा सावधान जागृत रहना चाहिये। जो ऐसा उपदेश (उपभोग से ज्ञानी को बंध नहीं होता है। गाथा २२१ समयसार) सुनकर उपभोग की इच्छा करने लगता है तब अज्ञानी हो जाता है। उपभोग विना इच्छा के होना और उपभोग की इच्छा करना यही ज्ञानी अज्ञानीपने का महान् अतर है । इच्छा रहित उपभोग होना परापराध है। तथा उपभोग की इच्छा करना स्वापराध है। ऐसा ही कलश १५१ में कहा है:- बंधः स्यादुपभोगतो यदि न तत्किं कामचारोऽस्ति ते । ज्ञानं सन्वस बंधयेण्यस्यपरथा स्वस्यापराधाद्धृवं ॥ इसलिये ज्ञानी को आचार्य ने और भी सावधान किया है कि तुम स्वच्छद मत बनना। स्वच्छदता ही बध का कारण है। सोही कलश १६६ में कहा है :- तथापि न निरर्गलं चरितुमिष्यते ज्ञानिनां तदायतनमेव सा किल निरर्गला व्यापृतिः । अकामकृतकर्म तन्मतमकारणं ज्ञानिनां द्वयं न हि विरुध्यते किमु करोति जानाति च ॥१६६॥ अर्थ-तथापि अर्थात् लोक आदि कारणों से बंध नहीं कहा और रागादिक से ही बंध कहा है तौभी ज्ञानियों को मर्यादा रहित स्वच्छद प्रवर्तना योग्य नहीं कहा, क्योंकि निरर्गल (स्वच्छद)
( १०९ )
प्रवर्तना बंध का ठिकाना है। ज्ञानियों के विना वाञ्छा कार्य
होता है। वह बंध का कारण नहीं कहा क्योंकि जानता भी
है और करता भी है ये दोनों क्रियाएँ क्या विरोधरूप
नहीं हैं ? करना और जानना तो विरोध रूप ही हैं।
ऐसे एक भाव से चारों तत्त्व जान कर स्वच्छंद मत
बनना। जघन्य (कषायों के सद्भाव) भावों से उत्कृष्ट भाव
बनाने की सदा ही चेष्टा करना।
शुभ शब्द का प्रयोग
सम्पक शब्द का प्रयोग तो श्रद्धा की यथार्थता से है।
तथा चारित्र का प्रयोग कषाय के अभाव से होता है। तब
बीच में शुभोपयोग किसके आश्रित रहा। सर्वज्ञ कथित
तत्त्वों में हो श्रद्धा ज्ञान तथा परिणति ज्ञानी का शुभोपयोग
। अतः जैसे कि सम्यग्दर्शन के प्रभाव से असंयम संयम
हो गया। उसी प्रकार क्या अनंतानुबंधी आदि कषाय के
क्षयोपशम के प्रभाव से शुभोपयोग का कार्य संसारवृद्धि
होगा ? तथा शुभोपयोग का अंश क्या अशुभ कषायनि-
वृत्ति से भिन्न है ? एक साथ दोनों प्रवृत्ति निवृत्ति अंश रूप में हैं।
तब एक अंश बंध का कारण हो और एक अंश मोक्ष का कारण
हो यह कथन शोभा नहीं देता। कारणानुपयोग में यद्यपि
शुभमाव बंध का कारण कहा है, तथापि विशुद्धि से अल्प-
स्थिति ही तो बंधी, तथा उसी अल्पस्थिति में विशेष अनुभाग
क्या अनंत संसार का कारण होगा? गो. कर्मकाण्ड में स्थिति-
बंध और अनुभागबंध की गाथा ऐसी कही है:-
सवद्विदीणमुक्कस्सो दु उक्कस्ससंकिलेसेण ।।
विवरीदेण जहएणो आउगतियवज्जियाणं तु ॥१३४॥
( ११० ) अर्थ-तीन श्रायुविना ११७ प्रकृतियों का उत्कृष्टस्थितिबंध यथासंभव उत्कृष्ट संक्तश परिणामों से होता है और जघन्य- स्थितिबंध उत्कृष्ट विशुद्ध परिणामों से होता है। सुहपयडीण विसोही तिव्यो असुहाण संकिलेसेण ॥ विवरीदेण जहरणो अनुभागो सव्वपयडीणं ॥१६३।। अर्थ-सातावेदनीयादिक शुभ प्रकृतियो का अनुभागवंध विशुद्ध परिणामों से उत्कृष्ट होता है। असातावेदनीयाटिक अशुभ प्रकृतियों का अनुभागवंध संक्लेशरूप परिणामों से उत्कृष्ट होता है। और शुभ प्रकृतियों का संक्लेश परिणामों से तथा अशुभ प्रकृतियों का विशुद्ध परिणामों से जघन्य अनुभागबंध होता है। स्थितिबंध ही सब से अधिक संसार का कारण है। सो ही कहा है:-(गो कर्मकाण्ड) सव्वाश्रो दु ठिदीओ सुहासुहाणं नि होति असुहाओ। माणुसतिरिक्खदेवाउगं च मोत्तण सेसाणं ॥१५४॥ अर्थ-मनुष्य तिथंच देवायु के सिवाय वाकी सव शुभ तथा अशुभ प्रकृतियों की स्थितियाँ अशुभरूप ही हैं, क्योंकि संसार का कारण हैं। विशुद्धि की वृद्धि होते-होते स्थिति अधिक-अधिक अल्प अन्तर्मुहूर्त अन्तर्मुहूर्त मे होती जाती है। तथा उसी शुभोप- योग की विशेषता से असंख्यातगुणी २ निर्जरा भी प्रति समय होती ही रहती है। समयसार की गाथा १९३ "तं सव्वं णिजरणिमित्तं" क्या मोक्ष मार्ग को सूचित नहीं करती है ? शंका-चारित्र गुण की एक समय में एक ही पर्याय तो होगी,
( १११ )
-
तब क्या वह एक ही पर्याय संसार का भी कारण है, और मोक्ष
का भी कारण है।
यहाँ अनेकांत दृष्टि से विचारिये, तभी आप इसका निर्णय
कर सकते हैं। एक साथ दोनों ही अस्ति नास्ति रूप उत्तर
हैं। वह अल्पस्थितिरूप बंध साक्षात् संसार होते हुए भी
परंपरा मोक्ष का अर्थात् स्थितिच्छेद का कारण होता है।
ज्ञानी की दृष्टि में वही अबंध भी है। ऐसे शुभोपयोग को
मात्रबंध का ही कारण कहना, या अधर्म शब्द से कहना यह
कारणानुयोगादि के ज्ञान न होने को सूचित करता है। जैसे
केवली भगवान् को आयुकर्म के सद्भाव होने पर भी नोसंसारी
या जीवन्मुक्त कहते हैं। संसारी शब्द का अर्थ उनमें घटित
नहीं होता। ऐसा संसारिणो मुक्ताश्च सूत्र में पड़ा हुआ च
शब्द सूचित करता है। शंका-यदि आप कहें कि 'च' शब्द
तो समुच्चयार्थक है, यहाँ कैसे
सूत्र यह
समाधान-तो इसका निर्णय यही है कि यहाँ सूत्र में पड़े हुए
च शब्द का अन्वाचय अर्थ निकालना चाहिये। सहजयोग्ता-
सङ्केतवशाद्धि शब्दादयो वस्तुप्रतिपत्तिहेतवः इस (परीक्षामुख)
न्यायसूत्र के अनुसार नोसंसारी अर्थ आचार्यों ने किया है।
पाठकगण के सामने सदैव कानून की दृष्टि ही न रहनी
चाहिये। कहीं कानून तो कहीं कानून की राय । कानून
तो कहता है कि कषाय बंध का कारण है। रागी बध्नाति
कर्माणि वीतरागो विमुच्यते । श्रादि ।।
रत्तो बंधदि कम्मं मुंचदि कम्मेंहि रागरहिदप्या ।।
एसो बंधसमासो जीवाणं जाण निच्छयदो।
[१७६ प्रवचनसार]
से
अर्थ निकला ?
( ११२) परन्तु कानून की राय में वह कषाय शुभोपयोग निवृत्ति अंश के संपर्क से निर्जरा का कारण और अल्पवंध का कारण है सो ही प्रवचनसार गाथा २५४ में कहा है:- एसा पसत्थभूदा समणाणं वा पुणो धरत्थाणं ॥ चरिया परेति भणिदाता एव परं लहदि सोक्खं ॥२५४॥ टीकाः-एवमेष शुद्धात्मानुरागयोगिप्रशस्तचर्यारूप उपवर्णितः शुभोपयोगः। तदयं शुद्धात्मप्रकाशिकां सम- स्तविरतिमुपेयुषां कषायकणसद्भावात्प्रवर्त्तमानः शुद्धात्मवृत्ति- विरुद्धरागसंगतत्वाद्गौणः श्रमणानां, गृहिणां तु समस्त- विरतेरभावेन शुद्धात्मप्रकाशनस्याभावात् कषायसद्भावात्प्र- वर्तमानोऽपि स्फटिकसंपर्केणार्कतैजस इवैधसा रागसंयोगेन शुद्धात्मनोऽनुभवात्क्रमतः परमनिर्वाणसौरव्यकारणत्वाच- मुख्यः ॥२५४॥ भावार्थ-दर्शनापेक्षा से तो श्रमण कोतथा सम्यग्दृष्टिगृहस्थ को शुद्धात्मा का ही आश्रय है। परन्तु चारित्रापेक्षा से श्रमण के मुनियोग्य शुद्धात्म परिणति मुख्य होने से शुभापयोग गौण है, और सम्यग्दृष्टि गृहस्थ के मुनियोग्य शुद्धात्मपरिणति को प्राप्त न हो सकने से अशुभवंचनार्थ शुभोपयोग मुख्य है। के अशुभ से (विशेष अशुद्ध परिणति से) छूटने के लिये प्रवर्तमाम जो यह शुभोपयोग का पुरुपार्थं है, -वह भी शुद्धि का ही मन्द पुरुषार्थ है। क्योंकि शुद्धात्म द्रव्य के मन्द आलंबन से अशुभपरिणति बदल कर शुभपरिणति होती है। और शुद्धात्मद्रव्य के उग्र आलंबन से शुभपरिणति भी बदल कर शुद्धपरिणति हो जाती है ।। २५४ ।। ऐसा ही सम्यग्दृष्टि गृहस्थ - ( ११३ ) गाथा २५६ तथा २६० में तथा पंचास्तिकाय की गाथा १७१ १७२ आदि में निरूपण किया है। श्रीजयधवला प्रथम पुस्तक में पृष्ठ ६ में भी शुभोपयोग को निर्जरा का भी कारण माना है। अब इस विषय में श्री अमृतचन्द्र स्वामी पुरुषार्थ सिध्यु- पाय में भी यही कहते हैं:- असमग्रं भावयतो रत्नत्रयमस्ति कर्मवन्धो यः । सविपक्षकृतोऽवश्यं मोक्षोपायोन बन्धनोपायः।।२१।। अपूर्ण रत्नत्रय को धारण करते हुए जो कर्मबंध होता है, वह अवश्य विपक्ष (शुभोपयोग) कृत है, मोक्ष का उपाय है, बन्धन का उपाय नहीं है ।।२११॥ अपूर्ण रत्नत्रय का खुलासा राग के अंश सद्भाव और असद्भाव से आदि श्लोक २१२ से २२२ तक किया है। २२२वें श्लोक में निश्चय व्यवहार मोक्ष- माग आत्मा को परमपद को पहुंचाता है। मुख्योपचाररूपः प्रापयति परं पदं पुरुषं ऐसा कहा है। अब हमको अपनी दृष्टि- ज्ञान की श्रद्धा की महिमा पर लगानी चाहिये जिससे शुभोपयोग धर्म कहलावे, न कि पहले शुभोपयोग को ही मुख्यदृष्टि से देखें, पीछे शुद्धोपयोग को। जिससे कि शुभोपयोग अधर्म ही हो। पूर्वाचार्यों द्वारा निर्दिष्ट दृष्टिकोण को समझेगे तो हमारी शुभ या शुद्ध परिणति से ही हमारा कल्याण होगा। बंध का अर्थ जो बंध का अर्थ कर्म का संबन्ध कर्म में तथा आत्मा में क्षणिक विकारी भाव होने का निरूपण करते हैं। उनके मत में विकारी भाव तो क्षण भर में होकर नष्ट हो गया, और कर्म से कर्म बंध कर भी श्रात्मा से जब कोई प्रकार का संयोग ( ११४ ) नहीं हुआ, तव आप ही बताइये कि आत्मा के बंध तत्त्व का व्याख्यान भूतार्थनय से क्या हुवा ? कोई भी आगे को संस्कार नहीं चला, तब यह पूर्वकृतकर्म- विपाक है यह कथन मिथ्या हो जावेगा। जैसा कि समयसार कलश १४६ में कहा है- पूर्वबद्धनिजकर्मविपाकाद् ज्ञानिनो यदि भवत्युपभोगः ।। तद्भवत्वथ च रागवियोगानूनमेति न परिग्रहभावम् ।। भावार्थः-पूर्व बाँधे हुए कर्मों का जब उदय आये, उपभोग सामग्री प्राप्त होवे । उसको अज्ञानमय रागभाव कर भोगे, तब तो वह परिग्रहभाव को (बध को) प्राप्त होवे। परंतु ज्ञानी के अज्ञानमय रागभाव नहीं है। उदय आया है, उसे भोगता है। यह जानता है कि पूर्व में बाँधा था, वही उदय आ गया। सो पीछे का छूटा, आगामी की बाछा नहीं करता हूँ। इस तरह ज्ञानी के उन कर्मोदय रूप उपभोगों से रागरूप इच्छा नहीं है। तब वे उसके परिग्रह भी नहीं है। इसीका खुलासा आगे की २१५ गाथा मे किया है। पर्याय क्षण भर से अधिक रह नहीं सकती है। सो ही गो० जीवकाण्ड में कहा है:- पजायावट्ठाणं पुण खणमेत्तं होदिति णिद्दिट्ट अतः जो सज्जन राग को क्षणिक मानते हैं, या संसार को क्षणिक बताते हैं, उनके यहाँ पुण्य पाप की व्यवस्था तथा उक्त ज्ञानी के उपभोग की व्यवस्था नहीं बन सकती। फिर तो चार्वाक जैसा सिद्धान्त हो गया, अथवा बौद्ध मत का प्रसङ्ग आ जावेगा।
( ११५ ) श्रात्मा चाहे शुभोपयोग करे या अशुभोपयोग, कोई प्रकार बंधता ही नहीं है। ऐसी क्षणिक संसार की मान्यता का खडन श्री अमृतचन्द्रसूरि स्वयं कलश में कर गये हैं। हमें अधिक चिन्ता करने से क्या लाभ होगा सो ही समयसार गाथा ३४८ की टीका में कहा है:- क्षणिकत्वेऽपि वृत्यंशानां वृत्तिमतश्चैवैतन्यचमत्कारस्य टंकोत्कीर्णस्यैवांतः प्रतिभासमानत्वात् । आत्मानं परिशुद्धमीप्सुभिरतिव्याप्तिं प्रपद्यांधकः । कालोपाधिवलादशुद्धिमधिको तत्रापि मत्वा परैः ।। चैतन्यं क्षणिक प्रकल्प्य पृथुकै शुद्धर्जुसूत्रेरितै- रात्माव्युज्झित एव हारवदहो निस्सूत्रमुक्तक्षिभिः ॥२०८।। कत्तुर्वेदयितुश्चयुक्तिवशतो भेदोऽवभेदोऽपि वा। कावेदयिता च मा भवतु वा वस्त्वेव संचिन्त्यताम् ।। प्रोता सूत्र इवात्मनीह निपुणैर्तुं न शक्या क्वचिच् । चिचिंतामणिमालिकेयमभितोऽप्येका चकास्त्येव नः ।२०६॥ अर्थ-आत्मा को समस्तपने से शुद्ध इच्छुक जो बौद्धमती, उन्होंने उस आत्मा में काल की उपाधि के बल से अधिक अशुद्धता मानकर अतिव्याप्ति पाकर तथा शुद्ध ऋजुसूत्रनय के प्रेरे हुए चैतन्य को क्षणिक कल्प कर अन्धों ने आत्मा को छोड़ दिया। क्योंकि आत्मा तो द्रव्य पर्याय स्वरूप था, वह सर्वथा क्षणिक पर्याय स्वरूप मान छोड़ दिया, उनको आत्मा की प्राप्ति नहीं हुई। यहाँ हार का दृष्टान्त है-जैसे मोतियों की हार नामा वस्तु है, उसमें सूत्र में जो मोती पिरोये ( ११६ ) हुवे हैं वे भिन्न-भिन्न दिखते हैं। जो हार नामा वस्तु को सूत्र सहित मोती पिरोये हुवे नहीं देखते है, सूत्र रहित मोतियों को ही जुदे-जुदे ग्रहण करते हैं, उनको हार की प्राप्ति नहीं होती । उसी तरह जो आत्मा के एक नित्य चैतन्य भाव को नहीं ग्रहण करते तथा समय-समय वर्तना परिणाम रूप उपयोग की प्रवृत्ति को देख उसको सदा नित्य मान काल का उपाधि से अशुद्धपना मान ऐसा जानते हैं कि नित्य माना जाय तो काल की उपाधि लगने से आत्मा के अशुद्धपना आता है, तब अतिव्याप्ति दूषण लगता है। इस दोष के भय से ऋजुसूत्रनय का विषय जो शुद्ध वर्तमान समय मात्र क्षणिक- पना मान आत्मा को छोड़ दिया। कर्त्ता मे और भोक्ता में युक्ति के वश से भेद हो अथवा अभेद हो, अथवा कर्ता भोक्ता दोनों ही न हों, वस्तु का ही चितवन करो क्योंकि चतुर पुरुषोंकर सूत्र में पोई हुई मणियों की माला जैसे भेदी नहीं जाती, तैसे आत्मा मे पोई हुई चैतन्य रूप चिंतामणि की माला भी कभी किसी कर भेदी नहीं जा सकती। ऐसी यह आत्मारूपी माला समस्तपने से एक हमारे प्रकाश रूप प्रगट हो ॥२०८-२०६॥ इस तरह वध के क्षणिक होने पर भी न तो आत्मा ही क्षणिक है, और न आत्मा का वद्धपना ही क्षणिक है। उदय सत्व का वर्णन ग्रथों में स्वाध्याय कर समझाने की बहुत प्यावश्यकता है। जब बंध की ही व्यवस्था नहीं बनी, तब मोक्ष की भी व्यवस्था क्या वनेगी । फिर शुद्धापयोग की भी कोई आवश्यकता नहीं रहती। अथवा मोक्षपर्याय भी क्षणिक रहेगी। सादि अनन्त नहीं कह सकते । बध ( ११७ ) इस तरह संसार पद्धति का और मोक्ष पद्धति का वर्णन आगम में मिलता है। वह कथन खंडित हो जाने से द्रव्यानु- योग करणानुयोग का ही लोप हो जावेगा। संसार पद्धति और मोक्ष पद्धति का वर्णन प्रवचनसार में इस प्रकार है:- यो हि नामैव कर्तारं करणं कर्म कर्मफलं चात्मानमेव निश्चित्य न खलु परद्रव्यं परिणमति, स एव विश्रान्तपरद्रव्यसंपर्क द्रव्यान्तःप्रलीनपर्याय च शुद्धमात्मानमुपलभते न पुनरन्यः । तथा हि। यदा नामानादिप्रसिद्धपौद्गलिककर्मबन्धनोपाधिसंनि- घिप्रधावितोपरागरंजितात्मवृत्ति पापुष्पसंनिधिप्रधावितो- परागरजितात्मवृत्तिः स्फटिकमणिरिव परारोपितविकारोऽ हमासं, संसारो तदापि न नाम मम कोऽप्यासीत्, तदाऽ प्यहमेक एवोपरक्तचित्स्वभावेन स्वतन्त्रः कर्ताऽसम्, अह- मेक एवोपरक्तचित्स्वभावेन साधकतमः करणमासम् , अहमेक एवोपरक्तचित्परिणमनस्वभावेनात्मना प्राप्यः कर्मा- सम्, अहमेक एवोपरक्तचित्परिणमनस्वभावस्य निष्पाचं सौख्यं विपर्ययस्तलक्षणं दुःखाख्यं कर्मफलमासम् ,।इदानीं पुनरनादिप्रसिद्धपौद्गलिककर्मबन्धनोपाधिसन्निधिध्वंस विस्फुरितसुविशुद्धसहजात्मवृत्ति पापुष्पसंनिधिध्वंसविस्फु- रितसुविशुद्धसहजात्मवृत्तिः स्फटिकमणिरिव विश्रान्तपरारो- पितविकारोऽहमेकान्तेनास्मि मुमुक्षुः इदानीमपि न नाम मम कोऽप्यस्ति। इदानीमप्यहमेक एव सुविशुद्धचित्स्वभावेन ( ११८ ) स्वतन्त्रःकर्ताऽस्मि, अहमेक एव च सुविशुद्धचित्स्वभावेन साधकतमः करणमस्मि, अहमेक एव च सुविशुद्धचित्परि- रणमनस्वभावेनात्मना प्राप्यः कर्मास्मि । अहमेक एव च सुविशुद्धचित्परिणमनस्वभावस्य निष्पाद्यमनाकुलत्वलक्षणं सौरच्याख्य कर्मफलमस्मि । एवमस्य वन्धपद्धतौ मोक्ष- पद्धतौ चात्मानमेकमेव भावयतः परमाणोरिकत्वभाव- नोन्मुखस्य परद्रव्यपरिणतिर्न जातु जायते । परमाणुरिव भावितैकत्वश्च परेण नो सपृच्यते । ततः परद्रव्यासंपृक्तत्वात् सुविशुद्धो भवति । कर्तृकरणकर्मकर्मफलानि चात्मत्वेन भावयन् पर्यायैर्न संकीर्यते ततः पर्यायासंकीर्णत्वाच्च सुविशुद्धो भवतीति ॥१२६।। इस व्याख्या में आये हुये अनादि प्रसिद्ध पौद्गलिक कर्म- बन्धनोपाधि, परारोपितविकार, उपरक्तचित्स्वभाव, उपरक्कचि. त्परिणमनस्वभाव तथा स्फटिकमणि के दृष्टान्त पर विचार करेंगे तो शीघ्र ही स्वयं आप को बोध हो जायगा कि संसारी प्रात्मा कैमा है, और मोक्ष मे आत्मा कैसा है । आत्मा कैसा है । एकत्व दोनों पद्धति मे है। यथापि संसार का एकत्व उपाधि से मिला उपरक्त है। मोक्ष का एकत्व उपाधि के ध्वंस से सुविशुद्ध है। यदि बंध का स्वरूप विस्तार से जानना हो तो प्रवचनसार ग्रंथ की १७५ गाथा से लेकर १८० गाथा तक पढ़ लीजिये । स्वयमेव सब निर्णय हो जायगा । इस ऊपर लिखित टीका का अर्थ भी ग्रन्थ मे से देख लेवें वा समझ लेवे। तब क्षणिक संसार न कह कर अनादि का संसार संतति की अपेक्षा
( ११६ )
वध के
बीजवृक्षवत् कहना पड़ेगा। कथंचित् नवीन नवीन बंध की
अपेक्षा सादि भी है। विस्तारभय से यहां नहीं लिखा है।
ब'धमार्ग-मोक्षमार्ग
यदि कदाचित् बंध भी स्वीकार कर लेवे, तब भी यदि
पूर्वपर्याय उत्तरपर्याय में कारण कार्यपना न मानेंगे तब भी
बंधमार्ग वा मोक्षमार्ग का स्वरूप नहीं बन सकता ।
कारण अर्थात् उपायों का नाम बंधमार्ग है, तथा मोक्ष के कारण
अर्थात् उपायों का नाम मोक्षमार्ग है। बंध और मोक्ष कार्य
हैं। तथा बंधमार्ग और मोक्षमार्ग कारण हैं । अब हम
फिर मूल विषय पर आते हैं। हमें मिथ्यादृष्टि जैनाभासी
के शुभोपयोग का विचार नहीं करना है, यद्यपि श्री धवलशास्त्र
करणानुयोग में शुक्ललेश्यावाले द्रव्यलिङ्गा के शुभोपयोग को
तीव्रवध का कारण नहीं कहा है, उससे केवल अंतःकोडाको-
डीसागरप्रमाण ही स्थितिबंध होता है। तथा ग्रैवेयकों में
जन्म लेने पर अंतःकोडाकोडीसागार प्रमाण हो स्थितिसत्व
रह जाता है। इस शुभोपयोग ने ही तो मिथ्याष्टि द्रव्यलिंगी
को उच्चस्थानों पर पहुंचाया है। तब क्या शुभोपयोग ने
कुछ कार्य नहीं किया। अथवा भावलिंगी के शुभोपयोग क्षणिक
होता है, इसी तरह द्रव्यलिगो का शुभोपयोग क्षणिक है, तो
नाश होने की अपेक्षा तो अन्तर दीखता नहीं है। तब फिर
कदाचित् (नीचे की भूमिका में) ज्ञानो के भी शुभोपयोग
होता है, ऐसा उपदेश कैसे दिया। पंचास्तिकाय गाथा
१३६ में इस प्रकार कहा है:-
अरंहतसिद्धसाहुसु भची धम्मम्मि जा य खलु चेहा ॥
अणुगमणं पि गुरूणं पसत्थरागो ति बुचंति ॥१३६॥
( १२० ) टीका:-अर्हत्सिद्धसाधुषु भक्तिधर्मे व्यवहारचारित्रानुष्ठाने वासना प्रधाना चेष्टा । गुरूणामाचार्यादीनां रसिकत्वे- नानुगमनं । एपः प्रशस्तो रागः प्रशस्तविषयत्वात् । अयं हि स्थूललक्ष्यतया केवलभक्तिप्राधान्यस्याज्ञानिनो भवति । उपरितनभूमिकायामलब्धास्पदस्यास्थानराग- निषेधार्थं तीव्ररागज्वरविनोदार्थ वा कदाचिज्ज्ञानिनोऽपि भवतीति ॥१३६॥ अर्थ-अरहंत, सिद्ध, साधुओं में भक्ति, धर्म अर्थात् व्यवहार- चारित्र के आचरण मे वासना (प्रधान चेष्टा) तथा गुरु अचार्यादिक के रसिकपने से अनुगमन करना, यह प्रशस्त राग है इस राग के विषय प्रशस्त होने से। यह स्थूल लक्ष्यपने से केवल भक्ति को ही प्रधान करने वाले अज्ञानी के होता है। उपरितन भूमिका (क्षीणमोहादि गुणस्थान) नहीं प्राप्त करने वाले ज्ञानी के भी कदाचित् अस्थान (कुदेवा दि) में रागनिषे- धार्थ तथा (विषय भोगसंवधी) तीव्ररागज्वर के लिये होता है ॥१३६॥ नीचे की भूमिका मे (चतुर्थ गुणस्थान से यथाख्यातचारित्र से नीचे तक) विहार करते हुवे ज्ञानी के संसार समुद्र में डूबे हुए संसारी जीवों के किंचित् मन को खेद अर्थात् अनुकंपा होती है । भावार्थ-संसारी जीवों के उद्धार करने की इच्छा होती है, और उपदेश तथा शास्त्ररचना द्वारा ससारी जोवों का तथा निज का कल्याण करते हैं ।। १३७ ।। कपायोदय के अनुसार संपूर्ण नहीं बदला है (पूर्ण शुद्ध नहीं हुवा है ) उपयोग जिनका ऐसे ज्ञानी के भी कदाचित् नीचे की भूमिकाओं में शुभोपयोग होता है। श्री तत्वार्थराजवार्तिक के प्रारंभ में श्री अकलंक स्वामी कहते हैं :- नात्र शिष्याचार्यसंबंधो विवक्षितः । किन्तु संसार- दूर करने के
( १२१ )
-
सागरनिमग्नानेकपाणिगणाभ्युजिहीर्षाप्रत्यागूनॊन्तरेण
मोक्षमार्गोपदेश, हितोपदेशो दुष्प्राप्य इति निश्चित्य
मोक्षमार्ग व्याचिख्यासुरिदमाह :-
अर्थः-यहां शिष्य अचार्य का सबंध विवक्षित नहीं है।
किन्तु संसार समुद्र में डूवे हुवे अनेक प्राणि समूह के उद्धार
करने की इच्छा के प्रति उद्यत मोक्षमार्ग के उपदेश के विना
हितका उपदेश दुर्लभ है ऐसा निश्चय करके मोक्षमार्ग के
व्याख्यान करने की इच्छावाले आचाये यह सूत्र कहते हैं।
इस तरह ज्ञानी आचार्यों के भी उद्धार करने की इच्छा
रूप तथा मोक्षमार्ग की व्याख्या की इच्छारूप शुभोपयोग की
परिणति बताई है। श्रीविद्यानंदस्वामी प्राप्तपरीक्षा के प्रारंभ
में कहते है :-
श्रेयोमार्गस्य संसिद्धिः प्रसादात्परमेष्ठिनः ।।
इत्याहुस्तद्गुणस्तोत्रं शास्त्रादौ मुनिपुङ्गवाः ।।
प्रसबेन मनसोपास्यमानो भगवान् प्रसन्न इत्यभिधीयते ।
अर्थ-परमेष्ठी के प्रसाद से श्रेयोमार्ग की सम्यक् सिद्धि
होती है। इसलिये मुनिश्रेष्ठ शास्त्र की आदि में परमेष्ठी के
गुणों के स्तवन को कहते हैं। प्रसन्न मन से उपासना
किये जाते हुवे भगवान् 'प्रसन्न' कहे जाते हैं।
इससे मंगल की आवश्यकता बताई है। यह भी स्तोत्र
ज्ञानी के होता है। पूजा के अंत में शांति पाठ में कहते हैं:-
तव पादौ मम हृदये मम हृदयं तव पदद्वये लीनं ।।
तिष्ठतु जिनेन्द्र तावद्यावनिर्वाणसंप्राप्तिः।।
( १२२ ) - शास्त्राभ्यासो जिनपतिनुतिः संगतिः सर्वदाय्यः, सद्वृत्तानां द्ष्टगुणगणकथा दोषवादे च मौनम् ।। सर्वस्यापि प्रियहितवचो भावना चात्मतत्त्वे, संपद्यतां मम भवभवे यावदेतेऽपवर्गः ॥ इन पद्यों का अर्थ स्पष्ट ही है यह ज्ञानी जीव की शुमो- पयोग परिणति का जीता जागता चित्र है। समयसार में भी गाथा १७१ की टीका मे यथाख्यातचारित्र के नीचे अव- श्यंभावी रागसद्भाव बताया है। शुभोपयोग जो सम्यग्दृष्टि के होता है, उसका स्वरूप ही ऐसा है, सो ही प्रवचनसार गाथा १५७ में कहा है:- जो जाणादि जिणिंदे पेच्छदि सिद्धे तहेव अणगारे । जीवेसु साणुकंपो उवोगो सो सुहो तस्स ।। १५७ ।। टीका :- विशिष्टक्षयोपशमदशाविश्रान्तदर्शनचारित्र- मोहनीयपुद्गलानुवृत्तिपरत्वेन परिगृहीतशोभनोपरागत्वात् परमभट्टारकमहादेवाधिदेवपरमेश्वराह सिद्धसाधुश्रद्धाने समस्तभूतग्रामानुकम्पाचरणे च प्रवृत्तः शुभ उपयोगः ।१५७। अर्थ-विशिष्ट क्षयोपशमदशा में रहने वाले दर्शनमोहनीय और चारित्र मोहनीय रूप पुद्गलों के अनुसार परिणति में नगा होने से शुभ उपराग के ग्रहण किये हुए होने से जो उपयोग परमभट्टारक महादेवाधिदेव परमेश्वर अहत सिद्ध की और साधु की श्रद्धा करने में तथा समस्त जीव समूह की अनुकम्पा का आचरण करने में प्रवृत्त है वह शुभोपयोग है ॥१५७। यह भावलिंगी का शुभोपयोग है, यह कैसे जाना ? टीका में ( १२३ ) में पड़े हुवे क्षयोपशम शब्द से जाना। यह द्रव्यलिंगी के नहीं होता है। श्रीपूज्यपाद स्वामी ने इष्टोपदेश में भी शुभोपयोग करने की ही प्रेरणा की है :- वरं व्रतैः पदं दैवं नाव्रतैर्वत नारकम् ॥ छायातपस्थयोर्भेदः प्रतिपालयतोर्महान् ।। ३ ।। अर्थ-व्रतों से दैव पद उत्तम है और अव्रतों से नारक पद उत्तम नहीं है। जैसे मित्र की प्रतीक्षा करने वाले मार्ग में छाया वा धूप में बैठे हुये दो पुरुषों में महान भेद है। उसी तरह व्रत (शुभोपयोग) और अव्रत (अशुभोपयोग) में महान् भेद है। चरणानुयोग के प्रसिद्ध ग्रंथ मूलाचार इस शुभोपयोग को ही समाधि काल में विशेषरूप से समर्थित किया है: जिणवयणे अणुरत्ता गुरुवयणं जे करंति भावेण ।। असवल असंकिलिहा ते होंति परित्तसंसारा ॥ ७२ ।। टीका:- जिनप्रवचने येऽनुरक्ताः (सुष्टु सक्ताः) गुरु- वचनं च भावेन (भक्त्या) कुर्वन्ति, अशवला (मिथ्यात्व- रहिता) असंक्लिष्टाः सन्तस्ते परित्यक्तसंसारा भवन्तीति । ॥ ७२ ॥ जा गदी अरहंताणं णिद्विदट्ठाणं च जा गदी ।। जा गदी वीदमोहाणं सा मे भवदु सस्सदा ॥ १०७ ।। अर्थ-जो जिन प्रवचन में अनुरक्त हैं (अच्छी तरह भक्त हैं।) और गुरुवचन को भाव से (भक्ति से करते हैं) पालते हैं। वे मिथ्यावरहित संक्लेश परिणाम रहित संसार से पार होते हैं। -
जिनेन्द्र ! गुणसंस्तुतिस्तव मनागपि प्रस्तुता ।
भवत्यसिल कर्मणां प्रदतये परं कारणम् ॥
इति व्यवसितामतिर्मम ततोऽहमत्यदारात् ।
स्फुटार्थनयपेशला सुमत ! गंविधास्ये स्तुनिम् ॥
( १२५ ) अब मैं हे जिनेन्द्र ! आपकी थोड़ी सी भी की गई गुणों की स्तुति कर्मों के संपूर्ण क्षय के लिये कारण होती है। भाप की अर्थ पूर्ण स्तुति अवश्य करूंगा। ऐसी मेरी बुद्धि सुनिश्चित हो गई है। सो ही निन्दारूप में इस प्रकार स्तुति की है :- व्रतेषु परिरज्यसे निरुपमे च सौख्ये स्पृहा । विभेष्यपि च संसृतेरसुभृतां वधं द्वेक्ष्यपि ॥ कदाचिददयोदयो विगतचित्तकोऽप्यजसा । तथाऽपि गुरुरिष्यसे त्रिभुवनैकबन्धुर्जिनः॥३॥ अर्थ-आप व्रतों में रागी हो, निरूपम सुख के अभिलाषी हो। तथा ससार से डरपोक हो, प्राणियों की हिंसा के द्वेषी हो, विरोधी हो। कदाचित् अदता (असाता) का उदय श्रापके है और धन रहित दरिद्री हो अथवा चित्त (होश-लक्ष्य) रहित हो, तथापि परमार्थ से गुरु (महान ) त्रिभुवन के एक बंधु (मित्र), जिन (विजेता) माने जाते हो ।। ३।। ऐसी यह स्तुति भी चर्मघट में (फुटबॉल वा ट्यूब मे) भरी हुई अन्तर्वायु के समान संसार समुद्र से पार होने के लिये कारण होती है। अतः नीचे की भूमि में इस शुभोपयोग को नहीं छोड़ना चाहिये । सो ही पं० भागचन्द्र जी ने ण्द में कहा है । परनति सब जीवन की तीन भांति वरनी ॥ एक पुण्य, एक पाप, एक रागहरनी ॥ परनतिः ॥ टेक ॥ तामें शुभ अशुभ अंघ, दोय करै कर्मबंध, वीतराग परनति ही, भवसमुद्र तरनी ॥१॥ जावत शुद्धोपयोग, पावत नाहीं मनोग, तापत ही करन जोग, कही पुण्य ( १२३ ) - करनी ॥ २॥ त्याग शुभ क्रियाकलाप, करो मत कदा च पाप, शुभमें न मगन होय, शुद्धता न विसरनी ॥३॥ ऊंच ऊंच दशा धारि, चितप्रमाद को विडारि, ऊंचली दशात मति, गिरो अघो धरनी ॥ ४ ॥ भागचन्द या प्रकार, जीव लहै सुख अपार, याके निरधार स्याद्वाद की उचरनी ॥ ५ ॥ परनति० ॥ द्वितीय पद ॥ अति संक्लेश विशुद्ध शुद्ध पुनि त्रिविध जीव परिनाम वखाने ॥ अति० ।। टेक ।। तीव्र कपाय उदयते भावित, दवित हिसादिक अघ ठाने ।। सो संक्लेश भावफल, नरका- दिक गति दुःख भोगत असुहाने ।। अति० ।। शुध उपयोग कारनन में जो, राग कपाय मंद उदयाने । सो विशुद्ध तसु फल इंद्रादिक, विभव समाज सकल परिमाने । अति० ।। २ ।। परकारन मोहादिक तँ च्युत, दरसन ज्ञान चरन रसपाने || सो है शुद्धभाव तसु फलत, पहुंचत परमानंद ठिकाने ।। अति संक्ले श० ।। ३ ।। इन में जुगल बंध के कारन परद्रव्याश्रित हेय प्रमाने || भागचंद स्वसमय निजहित लखि, तामें रम रहिये भ्रमहाने ।। अति० ॥ ४ ॥ इति ।। इन पदों का भाव स्पष्ट ही है, शुभोपयोग को हेय कहते हुए भी शुद्ध उपयोग का कारण बताया है। और जब त शुद्धोपयोग प्राप्त नहीं हो तबतक उपादेय भी बताया है, ऐसे शुभो- पयोग का भी फल इस पंचमकाल में लौकांतिक देव तथा इंद्रपद की प्राप्ति वताई है। षट्पाहुड (मोक्षपाहुड) मे ऐसा कहा है :-
( १२७ )
। तिनिको शुभ अशुभ
अजवि तियरणशुद्धा अप्पाणं ज्झाइऊण जंति सुरलोये ॥
लोयंतियदेवत्तं तत्थ चुया णिव्वुदि जंति ।। ७७ ।।
आज भी तीन करण (मन, वचन, काय) से शुद्ध जीव
आत्मा को ध्यान करि सुरलोक में जाते हैं वा लोकांतिक
देवपद को पाकर वहाँ से च्युत हुवे निर्वाण को जाते हैं।
श्री मोक्षमार्ग प्रकाश के ७ वें अधिकार में" पंडित टोडरमल्ल
जी" ने भी स्पष्ट लिखा है:-
शंका-शास्त्रविषै शुभ अशुभको समान कह्या है ताते
हमकौं तो विशेष जानना युक्त नाहीं। ताका समाधान-जे
जीव शुभोपयोगको मोक्ष का कारण मानि उपादेय मानें है,
शुद्धोपयोग क्यों नाहीं पहचानै
दोऊनि क अशुद्धता की अपेक्षा वा बंधकारण की अपेक्षा
समान दिखाइये हैं। बहुरि शुभ अशुभनि का परस्पर विचार
कीजिये तो शुभ भावनि के बिर्षे कषायमंद हो है तातें बंधहीन
हो हैं। अशुभ भावनि विषै कषाय तीव्र हो है तातै वंव बहुत
हा है। ऐसे विचार किये अशुभ की अपेक्षा सिद्धान्त बिर्षे
शुभकौ भला भी कहिये। जैसे रोग तौ थोरा वा बहुत बुरा
ही है। परंतु बहुत रोग की अपेक्षा थोरा रोग कू भला भी
कहिये । तातै शुद्धोपयोग नाहीं होय,
शुभ विर्षे प्रवर्त्तना युक्त है। शुभकौं छोरि अशुभवि प्रवर्तना-
युक्त नाहीं। ज्ञानी के चाहि नाहीं, अर शुभोपयोग चाहि किये
होय सो जैसें पुरुष किंचिन्मात्र भी अपना धन दिया चाहै
नाही, परतु जहाँ बहुत द्रव्य जाता जानै तहाँ चाहि करि स्तोक
द्रव्य देने का उपाय करै है। तैसें ज्ञानी किचिन्मात्र भी
कषायरूप कार्य किया चाहै नाहीं। परंतु जहाँ बहुत कषायरूप
अशुभ कार्य होता जानै तहाँ चाहि करि स्तोक कषायरूप शुभ
तब अशुभ
तें छूटि
( १२८ ) कार्य करने का नद्यम करै। ऐसें यह बात सिद्ध भई कि जहाँ शुद्धोपयोग होता जानै तहाँ तौ शुभ कार्य का निषेध ही है। अर जहाँ अशुभोपयोग होता जानै तहाँ शुभकौ उपाय करि अंगीकार करना युक्त है। शुभोपयोगते स्वर्गादि होय वा भली वासनात वा भला निमित्त तै कर्म की स्थिति अनुभाग घटि जाय तो सम्यक्त्वादिक की भी प्राप्ति हो जाय । इत्यादि ।। इस कथन से नीचे की दशा मे शुभोपयोग की अवश्यकता दिखाई है। परतु कोई इसी मे अटक जाय, उसको शुभ का निपेव भी पचास्तिकाय में करते हैं:- जस्स हिदयेणुमत्तं वा परदवम्हि विज्जदे रागो ।। सो णवि जाणदि समयं सगस्स सव्वागमधरो वि॥१६७|| यस्य खलु रागरेणुकणिकापि जीवति हृदये, न नाम स समस्त सिद्धान्तसिन्धुपारगोऽपि निरुपरागशुद्धस्वरूपं स्व- समयं चेतयते । ततः स्वसमयसिद्धयर्थ पिजनलग्नतूल- न्यातन्यायमभिदधताहदादिविपयेऽपि क्रमेण रागरेणुर- पसारणीय इति ।। १६७ ।। अर्थ-जिसने में रागधूल की कणिका भी जीती है वह पुरुप समस्त सिद्धान्त शास्त्र का पारगामी भी वीतराग शुद्धस्वरूप वाले स्वसमय को नहीं चेतता है। इसलिये स्वसमय की मिद्धि के लिये पिज्जन में लग्न रुई के त्याग न्याय को कहते हुए प्राचार्य ने अहंत आदि विषय मे क्रम से रागांश हटाना चाहिये ऐसा कहा है ।। १६७ ॥ यहाँ क्रम से अहंदादि भक्ति का भी त्याग बताया अतः कहाँ किस दृष्टि से व्याख्यान है ऐसा समझ कर निर्णय कर ग्रहण करना चाहिये। जो ऐसा नहीं करेंगे, वे अपना हृदय tho ( १२६ ) सर्वस्त्र खो देवेंगे। इस विषय में एक कथा याद आ गई है, "हिसाब ज्यों का त्यों, कुनबा डूबा क्यों ?" एक गणितज्ञ नदी पार कर रहा था, साथ में स्त्री और बच्चे भी थे। नाव थी नहीं। नदी में प्रवेश कर उस पुरुष ने जल को अपनी दृष्टि से नापा कि कमर भर पानी है। बच्चों की दृष्टि से विचार नही किया। जब वे बच्चों को बीच में कर हाथ पकड़ कर नदी पार करने लगे तब बीच धारा में बच्चे बह गये और स्त्री भी बह गई। वह पुरुष उसपार जाकर पश्चाताप करता हुवा कहता है, कि हिसाब ज्यों का त्यों, कुनबा डूबा क्यों ? सारांस यह है इन नयों का प्रयोग खूब समझ कर करना चाहिये। प्रयोजन इस तरह अस्थानमें रागनिषेधार्थ भावलिंगी के शुभोपयोग करने का उपदेश दिया है। उपदेश का प्रयोजन मोक्षमार्ग को पुष्ट करना ही है। भावलिंगी के शुभोपयोग को विशेषरूप से सूक्ष्मरूप से विचारते हैं तो हमें यही प्रतिभास होता है कि सम्यक्त्व के होने पर ज्ञानी का शुभोपयोग नीचे की ४१ प्रकृतियों का प्रबंधक ही है। तथा अंतःकोडाकोडी सागर रूप अल्पस्थिति वाला बंध करने से बंध का मार्ग नहीं है। क्योंकि शुभोपयोग का लक्षण परमेष्ठी की आराधना रूप है, वीतरागता में राग करना है। अतः बंध की परंपरा नहीं बनती है। मोक्षमार्ग सहज बन जाता है। क्योंकि कषाय निवृत्ति का अंश प्रधान है। प्रकृति अंश का स्वामी नहीं होने से मोक्ष का उपाय ही साक्षात् कर रहा है। अतः बंध भी बंध नही है। जैसे कटुक औषधि की प्रवृत्ति रोगविनाशार्थ है। युक्त्यनुशासन में कहा है :
- ( १३० ) न रागान्नः स्तोत्रं भवति भवपाशच्छिदि मुनौ । न चान्येषु द्वेषादपगुणकथाभ्यासखलवा ॥ किमु न्यायान्यायप्रकृतगुणदोषज्ञमनसां । हितान्वेषोपायस्तव गुणकथासङ्गगदितः ॥ ६४ ॥ भव की पाश (रागादि)छेदनेवाले मुनि श्राप में हमारा स्तोत्र राग से नहीं होता है। और अन्यों में द्वेष से दोषों के कथा- भ्यास की खलता भी नहीं है। न्याय अन्याय के प्रकृत गुण दोषों के जानने के मनवालों के हित ढूंढने का उपाय क्या है ? यह तुम्हारी कथा के संबंध से कह दिया है। अतः राग में राग नहीं है। वीतरागता में राग है। प्रवचनसार गाथा २२७ में यही कहा है कि सम्यग्दृष्टि युक्ताहार विहार वाला साक्षात् अनाहार विहार है। अर्थात् खाता हुवा भी नहीं खाता है, जाता हुवा भी नहीं जाता है। इसी तरह बोलता हुवा भी नहीं बोलता है। भोगता हुवा भी नहीं भोगता है। श्री १०८ कुंदकुंद स्वामी ने समयसार निर्जराधिकार गाथा १९७ में वही बात कही है:- सेवंतो विण सेवह असेबमाणो वि सेवगो कोई ।। पगरणचेठा कस्सवि णय पायरणोति सो होई ।। अर्थ सेवन करता हुवा भी कोई सेवक नहीं होता है (स्वामीपना नहीं होने से) तथा (स्वामीपना होने से) नहीं सेवन करता हुवा भी सेवक होता है। प्रकरण (पंगत-उत्सव) आदि की के चेष्टा है तथापि प्राकरणिक स्वामी नहीं होता है, और चेष्टा नहीं है तोभी स्वामी होता है । यह तो ज्ञानी के शुभोपयोग की बात हुई ।।
( १३१ )
।
अब अशुभोपयोग की बात भी देखिये। ज्ञानी कषाय तीव्र
करता है, दुर्ध्यान करता है, विषय भोगता है, ईर्षा भी करता
परन्तु उस समय भी ज्ञान स्वभाव में श्रद्धा रखने से
मोक्षपथ से विचलित नहीं होता है। और उस अशुभोपयोग
के काल में भी ४१ प्रकृतियों का बंध भी नहीं करता किंतु
असंख्यातगुणी निर्जरा करता है। संवर निर्जरा तत्त्व दोनों
ही ज्ञानी के सिद्ध हो गये। अभी ज्ञानी आत्मा चारित्र
मोहनीय कर्मोदय से निर्वल है, वेदना सहने में असमर्थ है।
तव अशुभोपयोग करता हुवा भी अज्ञान के अभाव से उसका
कर्त्ता नहीं है। और भोक्ता भी नहीं है, सोही समय खार
गाथा ३१८ में कहा है-वैराग्यसहित ज्ञानी जीव बहुत प्रकार
उदित मधुर (शुभ) कटुक (अशुभ) कर्मफल को जानता है।
अतः प्रकृति स्वभाव में विरक्त होने से वह अवेदक (अभोक्ता)
होता है। इस तरह ज्ञानी अवेदक ही है ऐसा नियम है।
इस प्रकार बंधका मार्ग और बंध में बहुत अंतर है।
आशा है इससे बंध का निर्णय हो जायेगा।
चरणानुयोग से विचार
चरणानुयोग से शुभोपयोग "शुभनिवृत्ति रूप है। तथा
शुभोपयोग सहित आत्मपरिणति ही सम्यक्चारित्र है।
असुहादो विणिवित्ती सुहे पवित्तीय जाण चारित्तं ॥
(द्रव्यसंग्रह)
कोई ऐसे चारित्र को देहाश्रित व्यवहार चारित्र कह कर हेय
बताते हैं, यह भूल है । उपयोग तो आत्मा है। शुभ
अशुभ परिणति आत्मा है। तव क्या ज्ञानी की क्रिया में
देहाश्रितपना हुवा, सो तो बिलकुल ही समझ में नहीं आता।
( १३२ ) गुणस्थानों की परिपाटो मे चौथा, पॉचवॉ, सातवॉ, छट्ठा आदि गुणस्थान आत्माश्रित ही हैं। यदि एकदम पूर्ण शुद्ध सिद्धों के सदृश ज्ञानी की परिणति तथा शुद्धोपयोग को धर्म वा मोक्षमार्ग कहोगे तो वहाँ ता मोक्ष हो ही गया, कार्यरूप समयसार हो ही गया, फिर मार्ग कैसा? फेवली भगवान के भी उठना, बैठना, बोलना आदि क्रियाएँ हैं। उन्हें केवल देहाश्रित ही कहोगे तो भगवान् के शरीर से निकली हुई दिव्यध्वनि को पौद्गलिक होने से, भगवान् की है अतः प्रमाण है, ऐसा नहीं कह सकते। ध्वनि अलग रही, भगवान् अलग आत्मस्वरूप रहे। तव चरणानुयोग में कथित या अन्य अनुयोगों मे कथित सब बातें ऐसी ही ठहरती हैं जैसे कि वर्तमान में मशीन की सब बाते और क्रियाएँ। इस प्रकार वक्ता की प्रमाणता से वचन की प्रमाणता न होकर स्वयं वचन की प्रमाणता हो जावेगी. सो है नहीं। प्रमाणता परतः होती है, ऐसा पहले दिखा चुके हैं। वचनों से वक्ता की प्रतीति होती है, यह भी सभव नहीं होगा। श्री धवलशास्त्र की पुस्तक १ मे आत्मप्रवाद के लक्षण में पृष्ठ ११८ पर गाथा कही है, उसमें जीव का नाम पुद्गल भी कहा है। अत्रोपयोगी गाहा :- जीवो कत्ता वत्ता य पाणी भोत्ता य पोग्गलो ।। वेदो विण्हू सयंभू य सरीरी तह माणओ ॥८१ ॥ सत्ता जंतू य माणी य माई जोगी य संकड़ो। असंकड़ो खेत्तएहू अंतरप्पा तहेव य ॥ ८२ ॥ पुद्गल शब्द का अर्थ ऐसा कियाहै कि छविह संठाणं बहुविहदेहेहिं पूरदि गलदित्ति य पोग्गलो॥ (व्यवहारनय से) ( १३३ ) नाना प्रकार के शरीरों के द्वारा छः प्रकार के संस्थान को पूर्ण करता है और गलाता है, इसलिये पुद्गल है। और निश्चयनय से अपुद्गल है। इसी तरह शरीर भी जीव के साथ रहने से व्यवहारनय से जीव है। इस कथन में कोई विरोध नहीं है। इस प्रकार करणानुयोग चरणानुयोग में निमित्त- प्रधान कथन प्रमाणभूत है। व्यवहार रत्नत्रय प्रथम होता है तब निश्चय रत्नत्रय होता है। ऐसे क्रम से हाने पर दोनों व्यवहार व निश्चय एक साथ रहते हैं। आगे पीछे होने वाले व्यवहार निश्चय कारण काय रूप हैं। तथा एक साथ रहने वाले व्यवहार निश्चय भेदाभेद रूप हैं। यदि व्यवहार अपना कार्य निश्चय को उत्पन्न नहीं करे तो व्यवहाराभास है। तथा भेदरूप व्यवहार के विना भी निश्चय निश्चयाभास है। यदि कोई कहै कि व्यवहार को कारण क्यों कहा? समाधान:-मिथ्यात्व से जव कोई जोव सम्यक्त्वधारण कर चतुर्थ पंचम या सप्तम गुणस्थानी वनता है, तब आप ही बताइये कि देशनाल ब्धि आदि पॉचों लब्धि कहाँ हुई तथा भेद विज्ञान, तत्वचर्चा का अभ्यास कहाँ किया, क्योंकि मिथ्यात्व के साथ सब अज्ञान और असंयम है। आत्मा भी अशुद्ध है। कर्म चेतना, कर्मफल चेतना का स्वामो है, कर्ता है, भोक्ता है। होते ही लब्धि आदि आगम में कहीं निर्दिष्ट नहीं हैं। मिथ्यात्व और सम्यक्त्व के बीच कोई काल है नहीं, जिस में देशना तत्त्वचर्चा आदि वने। ये सब पूर्वावस्था ही का तो बात हैं। इसीलिये यह भी सिद्ध होता है कि सम्यक्त्व का उपादान मिथ्यात्व है, ज्ञान का उपादान अज्ञान है, संयम का उपादान असंयम है और वीतराग का उपादान राग है, इत्यादि । सम्यक्त्व तथा ( १३४ ) तब शंकाकार यह कहै कि ऐमा हो हो नहीं सकता कि मिथ्यात्व सम्यक्त्व हो जावे। अज्ञान ज्ञान हो जावे । असयम संयम हो जावे। राग वीतराग हो जावे। इत्यादि । समाधान संक्षेप मे यही है कि पूर्वपर्याय उत्तरपर्याय के लिये उपादान होती है, ऐसा आगम का वचन है। श्री समतभद्रस्वामी ने प्राप्तमोमासा में कहा है:- कार्योत्पादः क्षयो हेतोनियमाल्लक्षणात् पृथक् ॥ न तो जात्याद्यवस्थानादनपेक्षाः खपुष्पवत् ।। ५८ ।। उपादान कारण के क्षय को कार्य का उत्पाद कहते हैं। नियम से लक्षण की अपेक्षा दोनों उत्पाद व्यय पृथक् है। जाति आदि के अवस्थान से अर्थात् सामान्य की अपेक्षा उत्पाद व्यय दोनों नहीं हैं। निरपेक्ष खपुष्प की तरह शून्य हैं ॥५८॥ अभाव नाम का पदार्थ ६ द्रव्यों को छोड़ कर और कोई है नहीं। अभाव उत्तरपर्याय की सत्तारूप पडता है। अभावरूप उत्तरपर्याय कार्य है । एसा सर्वथा प्रसज्यपक्षरूप तुच्छाभाव अभाव का अष्टसहस्री प्रमेयकमलमार्तण्ड आदि जैन न्यायग्रन्थों में निषेध किया है। इसलिये अभाव को जो उपादान मानते हैं, वे बड़ी भूल में हैं। यदि सम्यक्त्व हो ही गया तब उपादान की चर्चा क्या ? मिथ्यात्व में ही मिथ्यात्व के नाश का उपाय होता है। कषाय से ही कषाय मिटती है । इत्यादि। कारण अनेक होते हैं। प्रत्येक पर्याय की उत्पत्ति में उपादान कारण और अनेक निमित्त कारण मानना चाहिये। इसी को मोक्षमार्ग प्रकाश में पं० टोडरमल्ल जी ने सातवें अधिकार में पृष्ठ २६३ पर लिखा है:-तब ऐसा
( १३५ )
मान ए रागादिक भाव आत्माका स्वभावतो है नाही,
कर्म के निमित्त आत्मा के अस्तित्व वि विभावपर्याय
निपजै है। निमिच मिटे इनका नाश होते स्वभाव
भाव रहि जाय है। तातै इनके नाश का उद्यम करना।
यहाँ प्रश्न-जो कर्म का निमित्त ते ए हो हैं, तो कर्म
का उदय रहै तावत् विभाव दूरि कैसे होय ? तात याका
उद्यम करना तो निरर्थक है। ताका उत्तर-एक कार्य
होने विर्षे अनेक कारण चाहिये हैं। तिनि विर्षे जे
कारण बुद्धि पूर्वक होय, तिनिकौं तो उद्यमकरि मिलावें
अर अबुद्धि पूर्वक कारण स्वयमेव मिलें, तय कार्य सिद्धि
होय । जैसें पुत्र होने का कारण बुद्धि पूर्वक तौ विवाहादि
करना है अर अबुद्धि पूर्वक भवितव्य है। तहाँ पुत्र का
अर्थी विवाहादिक का तो उद्यम कर, अर भवितव्य
स्वयमेव होय, तव पुत्र होय। तैसें विभाव दूरि करने
के कारण बुद्धि पूर्वक तौ तच्च विचारादिक हैं, अर
अबुद्धि पूर्वक मोह का उपशमादिक हैं। सो ताका
अर्थी तत्वविचारादिक का तो उद्यम करै अर मोह कर्म
का उपशमादिक स्वयमेव होंय, तब रागादिक दूर होय,
इस प्रकार अनेक कारणों का समर्थन किया है।
यदि अनेक कारणों से कार्य नहीं होता तो श्री कुंदकुंद
स्वामी पंचास्तिकाय में गाथा १२८ में संसार की उत्पत्ति के
,
( १३६ ) वर्णन में इंद्रिय कम नोकर्म आदि न लिखते, केवल रागद्वेष मोह रूप परिणाम ही लिखते। इसी को स्पष्ट करते हैं : जो खलु संसारत्थो जीवो तत्तोदु होदि परिणामो॥ परिणामादो कम्मं कम्मादो होदि गदिसु गदी ।। १२८ ।। गदिमधिगदस्स देहो देहादो इंदियाणि जायते ।। तेहिं दु विसयग्गहणं तत्तो रागो व दोसो वा ।। १२६ ॥ जायदि जीवस्सेवं भावो संसारचकवालम्मि ।। इदि जिणवरेंहि भणिदोअण्णादिणिधणो सनिधणोवा ॥१३॥ यह तो आस्रव के स्वरूप का वर्णन हुवा। अब संवर का स्वरूप समयसार मे इससे विपरीत दिखाते हैं :- तेर्सि हेऊ भणिदा अज्झवसाणाणि सव्वदरिसीहि ॥ मिच्छत्तं अण्णाणं अविरयभावो य जोगो य ।।१०।। हेउअभावे णियमा जायदि णाणिस्स पासवणिरोहो ।। आसवभावेण विणा जायदि कम्मस्स वि गिरोहो ॥१६॥ कम्मस्साभावेण य णोकम्माणं पि जायइ हिरोहो । नोकम्मणिरोहेण य संसारणिरोहणं होई ॥११२।। टीका:-संति तावजीवस्य आत्मकमैकत्वाध्यासमूलानि मिथ्यात्वाज्ञानाविरतियोगलक्षणानि अध्यवसानानि । तानि रागद्वेषमोहलक्षणस्यास्रवभावस्य हेतवः । आस्रव- भावः कर्महेतुः । कर्म नोकर्महेतुः। नोकर्म संसारहेतु इति :
( १३७ ) ततो नित्यमेवायमात्मा, आत्मकर्मणोरेकत्वाध्यासेन मिथ्या- वाज्ञानाविरतियोगमयमात्मानमध्यवस्यति। ततो राग- द्वेपमोहरूपमास्रवभावं भावयति । ततः कर्म आस्रवति । ततो नोकर्म भवति । ततः संसार:प्रभवति। यदा त्यात्मकर्म- पोर्मेदविज्ञानेन शुद्धचैतन्यचमत्कारमात्रमात्मान उपलभते, तदा मिथ्यात्वाज्ञानाविरतियोगलक्षणानामध्यवसानानामा- सवभावहेतूनां भवत्यभावः । तदभावे रागदपमोहरूपासव- भावस्य भवत्यभावः । तदभावेऽपि भवति कर्माभावः। तदभावेऽपि भवति नोकर्माभावः । तदभावेऽपि भवति संसारभावः । इत्येष संवरक्रमः। इसका अर्थ स्पष्ट ही है । आगे निमित्तकारण का भी निमित्तकारण इस प्रकार से निर्देश किया है, गाथा १६५ की टीका :- रागद्वषमोहा आस्रवाः । इह हि जीवे स्वपरिणामनिमित्ताः अजडत्वे सति चिदाभासाः,मिथ्यात्वाविरतिकपाययोगाः पुद्गलपरिणामाः, ज्ञानावरणादिपुद्गलकर्मास्त्रवणनिमित्तत्वात्किलास्त्रवाः। तेषां तु तदास्रवणनिमित्तत्वनिमित्तं । अज्ञानमया आत्म- परिणामा रागद्वेषमोहाः । तत प्रास्त्रवणानिमित्तत्वात् राग- द्वेपमोहा एवास्रवाः। ते च ज्ञानिन एव भवंतीति अर्थादेवापद्यते ।। (इसका अर्थ भी स्पष्ट सुगम है)। यहाँ कारण और कर्ता शब्द में कोई अंतर नहीं है । कारण का अर्थ कर्त्तापरक कई स्थानों पर किया है, जैसे-गुणा य कुव्वंति कम्माणि || ११२ ।। गुणस्थान निमित्त है, नन्हीं ( १३८ ) को कर्त्ता (कुव्वंवि) कहा है। अथवा कारीषाग्निरध्यापयति । दंडः घटं भिनत्ति | कबलवंतं न बाधते शीतः। निमित्तकर्ता, उपादानकर्ता ऐसे दो कर्ता कहने से कोई आगम विरोध नहीं है। गाथा २५-२६ में जो दो कर्त्ता का निषेध है, वह दो उपादान की अपेक्षा से है। १ उपादान और १ निमित्त की अपेक्षा से नहीं है। ५१-५२-५३-५४ कलशों से भी यही अर्थ स्पष्ट प्रगट होता है, सो यथार्थ समझ लेना चाहिये। अतः वास्तव मे उपादान कर्ता पूर्वपर्याय हुई। निमित्त- कर्ता उसी द्रव्य की अन्य पर्याय, तथा अन्य द्रव्यों की अनेक पर्याये हुई। इस से एक द्रव्य के दो कर्त्तापने की सिद्धि नहीं होती है। यदि दो उपादान कर्ता कहते तो आगम विरोध होता । इस प्रकार निश्चय व्यवहार रत्नत्रय दोनों ही मोक्षमार्ग हैं। व्यवहार कारण (साधक) है। निश्चय कार्य (साध्य) है । सम्यक्त्व के सन्मुख मिथ्यात्वावस्था का व्यवहार व्यवहाराभास नहीं है। विलक्षण व्यवहार है। उसी मिथ्यात्व की अतिक्षीण अनुभागवाली दशा सम्यक्त्व की उपादान है। इस तरह व्यवहार पूर्वक निश्चय होता है। यह कथन निर्वि- रोध है। इति विशेष्वल विस्तरेण ।। यहाँ विस्तार भय से कितने ही स्थानों पर अर्थ करना तथा प्रमाण स्वरूप गाथा देना रह गया है, सक्षेप करते-करते भी लेख का कलेवर बढ गया है, सो पाठकगण क्षमा करें । तथा इसमें उल्लिखित समाधानों से अपने चित्त को निःसन्देह और निर्विरुद्ध बनावेंगे तो अपना प्रयत्न सफल समझंगा। ज्ञानियों को तो इतना संकेत ही पर्याप्त है, इसी से अन्य प्रश्न भी समाधान हो जावेंगे। ऐसी आशा है ॥ जैनं जयतु शासनम् ॥
ॐ नमः सिद्धेश्यः मिती चैत्र कृष्णा ३० ता० ३१-३-५७ को दि० जैन उदासी- नाश्रम ईसरी में पूज्य श्री १०५ क्षुल्लक गणेशप्रसादजी वर्णी का श्री समयसार जी की गाथा नं० २७८, २७६ तथा कलश १७४, १७५ पर मध्याह्न में किया हुवा प्रवचन । रागादयो बंधनिदानमुक्तास्ते शुद्धचिन्मात्रमहोऽतिरिक्ताः । आत्मा परो वा किमु तन्निमित्तमिति प्रणुन्नाः पुनरेवमाहुः ॥ उन " यहाँ पर "रागादिक बंध के कारण हैं"-यह श्रीअमृत- चंद्रसूरि ने कहा है। रागादयो रागादिक कैसे हैं, शुद्ध- चिन्मात्रमहोऽतिरिक्ताः शुद्धचैतन्यमात्रमह (ज्योति) उससे अतिरिक्त है। यहाँ पर शुद्ध से तात्पर्य 'वेवल' का है । रागादिक के होने में 'आत्मा परो वा किमु तन्निमित्तं ऐसा किसी ने प्रश्न किया कि रागादिक होने में आत्मानिमित्त है या और कोई निमित्त है ? ऐसा प्रश्न करने पर आचार्य उत्तर देते है :- जह फलिहमणी सुद्धो ण सयं परिणमइ रायमाईहिं । रंगिजदि अण्णेहिं दु सो रत्तादीहिं दव्वेहि ॥ २७८ ॥ एवं णाणी सुद्धो ण सयं परिणमइ रायमाईहिं ।। राइजदि अण्णेहिंदु सो रागादीहिं दोसेहिं ॥ २७६ ॥ टीका-यथा खलु केवलः स्फटिकोपल. परिणामस्वभावत्वे सत्यपि स्वस्य शुद्धस्वभावत्वेन रागादिनिमित्तत्वाभावात् रागा- ( १४० ) दिभिः स्वयं न परिणमते । परद्रव्येणैव स्वयं रागादिभावापन्नतया स्वस्य रागादिनिमित्तभूतेन शुद्धस्वभावात्प्रच्यवमान एव रागा- दिभिः परिणम्यते। तथा केवलः किलात्मा परिणामस्वभावत्वे सत्यपि स्वस्य शुद्धस्वभावत्वेन रागादिनिमित्तत्वाभावात् रागा- दिभिः स्वय न परिणमते । परद्रव्येणैव स्वयं रागादिभावापन्न- तया स्वस्य रागादिनिमित्तभूतेन शुद्धस्वभावात्प्रच्यवमान एव रागादिभिः परिणम्यते, इति तावद्वस्तुस्वभावः । जैसे स्फटिक मणि केवल स्वयं शुद्ध है । रागादयो- रागादि रूप जो लाल परिणमन हैं, उनका स्वयं न परिणमन्ते परिणमते स्वयं ही हैं परन्तु निमित्तमंतरेण न परिणमन्ते इत्यर्थः । स्फटिक मणि स्वय रागादिक रूप न परिणमेगी, परतु स्वयं न परिणसते इसका अर्थ है- पर के संबन्ध विना स्वयं नहीं परिणमती। परिणमे स्वय परन्तु पर के निमित्त विना नहीं। यथा मृत्तिका स्वयं घटरूपेण परिणमते = मट्टी ही घटरूप परिणमती है। यह बात नहीं है कि मृत्तिका घटरूप परिणमन को प्राप्त नहीं होती परन्तु कुम्भकारादिव्यापार- मंतरेण स्वयं न परिणमते इत्यर्थः। कुम्भकारादि के व्यापार विना केवल अपने आप तद्रप परिणम जाय, यह बात नहीं है। एवं पाणी सुद्धो ण सयं परिणमइ रागमादीहिं ।। इसी तरह से आत्मा स्वयं रागादि रूप नहीं परिणमता । शुद्ध से तात्पर्य 'केवल' का है। ज्ञानी का यह अर्थ नहीं लेना कि चौथे गुणस्थान से सम्यग्ज्ञानी सो नहीं। स्वयं का अर्थ केवल आत्मा है जो अकेला एक । एक परमाणु मे बंध नहीं होता। एक आत्मा में स्वयं रागादिरूप परिणमन नहीं होता। रागादिभिः स्वयं न ( १४१ ) - परिणमते । स्वयं रागादिपरिणमन को प्राप्त नहीं होता। अर्थात् रागादिकर्मभिः संबंधमंतरा न स्वयं परिणमते । रागादि कर्म के संबंध के विना स्वयं केवल अकेला नहीं परिणमता। परिणमता स्वयं है परन्तु रागादिसंबंधमंतरा न परिणमते । उसी का श्रीअमृतचन्द्र स्वामी अर्थ करते हैं:- "न खलु केवलः स्फटिकोपलः परिणामस्वभावत्वे सत्यपि स्वस्य शुद्धम्वभावत्वेन रागादिनिमित्तत्वाभावात् रागादिभिः स्वयं न परिणसते ।" केवल स्फटिक, केवल माने अकेला शुद्ध पदार्थान्तर के सम्बन्ध के विना परिणामस्वभावे सत्यपि परिणमनशील है, परिणाम स्वभाव है। परन्तु स्वस्य माने केवल का शुद्ध- स्वभावत्वेन रागादिनिमित्तत्वाभावात रागादिनिमित्तत्व का अभाव होने से रागादिभिः स्वयं न परिणमते स्फटिक उपल रागादि करके स्वयं नहीं परिणमता। अर्थात् जपा पुष्पसंबंधमंतरेण जपापुष्प के संबंध के विना केवल नही परिणमता । जपापुष्प के संबंध से स्वयं स्फटिकोपलवत् तुम्हारे रागादि भी परिणमते हैं। परद्रव्येणैव स्वयं रागा- दिभावपरिणामतया परद्रव्य जपापुष्पादि, उनका स्वयं रागादि परिणमन स्वभाव है। स्वस्य रागादिनिमित्तभृतेन, स्वस्य स्फटिकोपल को रागादिक का निमित्तभूत होने पर शुद्ध- स्वभावत्वेन प्रच्यवमान एव शुद्धस्वभाव से च्युत होता हुवा ही रागादिभिः परिणम्यते स्फटिकोपल रागादिरूप परिणम जाता है। यह तो दृष्टान्त हुआ। अब दार्टान्त कहते हैं:- यथा स्फटिकोपल जपापुष्प संबंध से रागादि रूप परिणमता है, एवं किल आत्मा' ( १४२ ) परिणाम स्वभावत्वे सत्यपि यथा स्कटिकोपल परिणाम स्वभाव होने पर भी जपापुष्पमंतरेण रागादिरूप नहीं परिणमता। तथा देवल आत्मा शुद्ध परिणामस्वभाव होने पर भी स्वस्य शुद्धस्वभाव होने पर भी स्वयं परद्रव्य- निरपेक्षतया = रागादिकर्मनिरपेक्षतया स्वयं अपने आप रागादिरूप नहीं परिणमता । परद्रव्येणैव स्वयं रागादि- भावपरिणामतया पर द्रव्य जो है स्वयं रागादिभाव परिणमन होने से स्वस्य रागादिनिमित्तभूतेन स्वय को रागादि- निमित्तभूत होने पर शुद्धस्वभाव से च्युत होता हुवा रागा- दिभिः परिणम्यते रागद्वेषादिरूप परिणमन को प्राप्त हो जाता है। इति वस्तुस्वभावः। इस सब का निचोड श्री अमृतचंद्र स्वामी एक श्लोक में कहते हैं न जातु रागादिनिमित्तभावमात्मात्मनो याति यथार्ककांतः तस्मिन्निमितं परसंग एव वस्तुस्वभावोयमुदेति तावत् माने कदाचित् भी अपने आप रागादिक का निमित्त होकर परिगणमन को प्राप्त हो जाय सो बात नहीं है। यथा अर्ककान्तः = सूर्यकान्त मणि सूर्यकिरणसम्बन्ध- मंतरेण स्वयं अपने आप अग्निरूप परिणमन को नहीं प्राप्त होता है। सूर्यकिरणसंबंधं प्राप्तः सूर्यकिरण के सम्बन्ध को पाकर के अग्निरूप परिणम जाता है। इस तरह से आत्मा स्वयं केवल अकेला परसंबंधमन्तरेण रागादिक रूप स्वयं नहीं परिणमता। किन्तु तस्मिन्निनं परसंग एव उसके परिणमन आत्मा ।
( १४३ )
में निमित्त परसंग ही है। उसके निमित्त को पाकर के आत्मा
रागादि रूप परिणम जाता है।
यह वस्तुस्वभावः उदेति यह वस्तु का स्वभाव है। इस
प्रकार वस्तु के स्वभाव को जानते हैं, वो ज्ञानी है, वे अपनी
आत्मा को रागादिक नहीं करके कारक नहीं होते। और जो
ज्ञानी नहीं हैं, वे कारक होते हैं। इसका तो यही तात्पर्य है।
संसार के अन्दर पदार्थ दो हैं, जीव और अजीव ।
अजीव पदार्थ के पाँच भेद हैं, उसमें पुद्गल को छोड़ करके
शेष चार जो अजीव हैं, वे शुद्ध ही शुद्ध रहते हैं। दो जो
पदार्थ हैं, जीव और पुद्गल । इन पदार्थों में दोनों प्रकार
का परिणमन होता है। इनमें विभावशक्ति भी है।
दोनों पदार्थों में और अनन्त शक्तियाँ भी है।
वह विभाव शक्ति यदि न होती तो एक चाल ही होती।
विभावशक्ति ही एक ऐसी चीज है कि जिसके द्वारा आत्मा
में परिणमन होता है। परपदार्थ का सम्बन्ध रहता है।
पदाथे पदाथ का सम्बन्ध आज का नहीं है। अनादि काल
का है। अनादि काल का सम्बन्ध होने से आत्मा का वह
रागादिक रूप, द्वेषादिक रूप, क्रोध रूप, मान रूप, माया रूप,
लोभादिक रूप जितना भी परिणमन है, आत्मा का स्वभाव
नहीं है। विभावशक्ति का है। विभावशक्ति आत्मा के
अन्दर है। सो ऐसी परिणम जाय, परका निमित्त मिले तो
उस रूप परिणम जाय ।
इस वास्ते हम सब को उचित है कि निमित्त कारणों को उतना
ही आदर देवे जितना कि आदर देने की जरूरत है। उपादान
कारण को उतना ही आदर देवें जितनी कि जरूरत है।
उसको अधिक मानो या इसको अधिक मानो, यह तत्व
( १४४ ) नहीं है। दोनों अपने अपने में स्वतंत्र हैं। उपादान भी स्वतंत्र है, वह कहै कि मैं निमित्त विना परिणम जाऊँ, तो कोई ताकत नहीं। केवल उपादान की ताकत नहीं है कि निमित्त न मिले और वह परिणम जाय । सो परिणमेगा तो वो ही परन्तु निमित्त को पाकर के परिणमेगा। जैसे कुम्भकार घट को बनाता है। सब कोई जानता है कि कुम्भकार घट वो बनाता है। अगर कुम्भकार नहीं होय तो घटपरिणाम के सम्मुग्व भी है परन्तु कुम्भकारमन्तरेण कुम्भकार के विना नहीं परिणम सकता। कुम्भकारादि निमित्त हो और बालू का पुंज लगा हो तो घट का परिणमन हो जाय सो भी नहीं है। इस वास्ते उपादान और निमित्त दोनों अपने अपने में बराबर की चीजें हैं । कोई न्यूनाधिक उसमें माने सो नहीं है। उसका कार्य उसमे होता । इसका कार्य इसमें होता है। व्याप्य व्यापक भाव जो है, उपादान का अपनी पर्याय के साथ होता है। निमित्त की पर्यायों के साथ नहीं होता है। परन्तु ऐसा नहीं है कि उसका कुछ, भी सबंध न हो। यथा:--अन्तर्व्याप्यव्यापकभावेन मृत्तिकया घटे क्रिय- माणे मृत्तिका के द्वारा घट बनता है। अन्तर्भाव्यभावक- भावेन मृत्तिकयैवानुभूयमाने और मृत्तिका ही अनुभवन करती है । और मृत्तिका ही उसका तादात्म्यसम्बन्ध है। परन्तु बाह्य व्याप्यव्यापकभाव कुछ नहीं है सो बात नहीं है। बहिर्व्याप्यव्यापकभावेन घट के अनुकूल व्यापार कुम्भ- कार करेगा तो घट होगा। तो व्यापारं कुर्वाणः कुम्भकार जो है. वो घट को बनाने वाला है। और घट से जो तृप्ति
अगर
( १४५ )
हुई, जलादिक आकर जो तृप्ति हुई, उसको अनुभवन करने
वाला कौन है ? कुम्भकार। अगर निमित्त नैमित्तिक सबध
न होचे तो तुम्हारे यहाँ मृत्तिका में घट नहीं बन सकता ।
बहिर्व्याप्यव्यापकभावेन उसके साथ सम्बन्ध है ही।
बहिाप्यव्यापकभाव अस्वीकार करे तो घटोत्पत्ति नहीं हो
सकती
इसी तरह से प्रात्मा मे ज्ञानावरणादिक जो कर्म है,
सो पुद्गल द्रव्य स्वय ज्ञानावरणादिक कर्म रूप परिणमते
हैं और आत्मा के मोहादिक परिणामों के निमित्त को पाकर
के परिणमते है। अगर मोहादिक परिणाम निमित्त रूप
में न हों तो कभी भी तुम्हारे ज्ञानावरणादिक रूप पर्याय
को प्राप्त नहीं होते। इस वास्ते निमित्त कारण की भी
आवश्यकता है। उपादान कारण की भी आवश्यकता है।
प्रश्न-श्री पं० रतनचंद्र जी मुख्तार सहारनपुर बाले का।
ज्ञान में जो कमी हुई, जीव का स्वभाव तो केवल ज्ञान
है और वर्तमान मे जो हमारी संसारी अवस्था में जितने
भी जीव हैं, उनके ज्ञान मे जो कमी हुई, वह क्या कर्म के
उदय की वजह से कमी हुई या विना कर्म के उदय की
वजह से कमी हुई ?
उत्तर-इसमें दोनों कारण हैं। कर्म का उदय निमित्त
कारण है और उपादान कारण आत्मा है। कर्म का उदय
यदि न होगा तो कभी भी न्यूनाधिक परिणमन को प्राप्त नहीं
होगा। विभाव और बात है। यह तो ज्ञानावरणादिक
कर्म का इस प्रकार का क्षयोपशम है, उसके तरतमभाव से
मात्मा का हीनाधिक विकास होता है। जितना ज्ञानावरणा-
दिक कर्मका उदय होगा, उतना ही अज्ञान रहेगा। जितना
( १४६ ) ज्ञानावरणादिक कर्मका क्षयोपशम होगा, तना ज्ञान रहेगा। प्रश्न-श्री व्र. रतनचंद्र जी मुख्तार सहारनपुर बाले का । श्री कानजी स्वामी यह कहते हैं कि महाराज ! ज्ञानावरणा- दिक कर्म कुछ नहीं करते। अपनी योग्यता से ही ज्ञानमें कमी वेशी होती है। महाराज । ज्ञानमे कमी होती है, वह अपने वजह से होती है, अपनी योग्यता से होती है। श्री कानजी स्वामी यह कहते हैं कि ज्ञानावरणादिक कर्म कुछ नहीं करते, तो महाराज | क्या यह ठीक है ? उत्तर (पूज्यश्रीवर्णीजीद्वारा) क्या यह ठीक है ? आपही समझो, कैसे ठीक है ? यह ठीक नहीं है। कोई भी कहे, चाहे, हम तो कहते हैं कि अगधारी भी कहें तो भी ठीक नहीं है। प्रश्न-व्र. श्री सुरेन्द्रनाथजी का महाराज ! सम्यग्दृष्टि के पूजन, दान, व्रतादिक के आचरण ये मोक्ष के कारण हैं या नहीं? उत्तर- (श्री पूज्य वर्णीजी द्वारा) मेरी तो यह श्रद्धा है कि सम्यग्दृष्टि के चाहे शुभोपयोग हो चाहे अशुभोपयोग हो, केवल नहीं होता है, उसमें शुद्धोपयोग का अंश अनन्तानुबन्धी कषाय जाने से प्रकट हो जाता है। जहाँ शुद्धोपयोग का अंश प्रगट हुवा, तहाँ पूर्ण शुद्धोपयोग मोक्ष का कारण है, तो अल्प शुद्धोपयोग भी मोक्ष का कारण है। अर्थात् कारणता तो उसमें आ गई, पूर्णता आवो या न आवो। प्रवचनसार में श्रीअमृत- चंद्रस्वामी ने लिखा है कि सम्यग्दर्शन ज्ञानचरित्र जब पूर्णता को प्राप्त होते हैं, तब वीतरागता सहित सम्यग्दर्शन, ज्ञान वीतराग चारित्र सहित मोक्ष के ही मार्ग हैं। अतएव सराग अर्थात् इनके अंशमें जो राग मिलो है, सो वो राग बंधको कारण है।
( १४७ ) इस वास्ते जो गग है तथा सम्यग्दृष्टि का जो उपयोग है अर्थात् जितना शुभोपयोग है, वह वंधका कारण है । और जो शुद्धोपयोग है, वह निर्जरा और मोक्षका कारण है। सम्य- ग्यदृष्टि का शुभोपयोग सर्वथा ही बंध का कारण हो, सो बात नहीं है। प्रश्न--श्री न० रतनचंद्र जी मुख्तार सहारनपुर बाले का। महाराज! जिसे मोक्षमार्ग रुचता है, उसे जिनेन्द्रदेव की भक्ति रुचती है या नहीं? उत्तर-(श्रीपूज्यवर्णीजी) मेरा तो विश्वास है कि जिस को मोक्ष मार्ग रुचता उसको जिनेन्द्रदेव की भक्ति तो दूर रही। सम्यग्दृष्टी की जो बाते हैं, वे सब उसको रुचती हैं। श्री उमास्वामी प्राचार्य मोक्षमार्ग का निरूपण करते हुवे मंगलाचरण करते हैं:- मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम् । ज्ञातारं विश्वतत्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ॥ विश्वतत्वानां ज्ञातारं अहं वन्दे । काहे के लिये-तद्गुण- लब्धये, उन गुणों की लब्धि के लिये । तो उनमें जो भक्ति हुई अर्थात् भगवान् की जो भक्ति हुई, स्तवन हुवा, सोही भक्ति स्तवन वगैरह का वर्णन किया है। स्तुति क्या चीज है ? गुणस्तोकं सदुल्लध्य तद्बहुत्वकथा स्तुतिः ॥ श्री समं- तभद्वस्वामी ने लिखा है कि स्तुति वह कहलाती कि थोड़े गुण को उल्लंघन करके उसकी बहुत कथा करना। भगवान् के अनन्त गुण हैं, वक्तुं अशक्यत्वात्, उनके कथन को करने में अशक्त हैं, तो भी जैसे कोई अमृत के समुद्र का अंतस्तल स्पर्श करने में असमर्थ हैं। अगर उसका स्पर्श (१४८ ) , - । भी हो जाय तो शांति का कारण है। तो भगवान् के गुणों का वर्णन करना दूर रहा उसका स्मरण भी हो जाय तो हमको ससार विच्छित्ति का कारण है। इस वास्ते भगवान् का जो स्तवन है, वह गुणों मे अनुराग है। गुणों का अनुराग है उसी का नाम भक्ति है। गुणों मे अनुराग कौन सी कषाय को पोषण करने वाला है। जिस समय भगवान की भक्ति करोगे, अनन्त ज्ञानादिक गुणों का स्मरण ही तो होगा। अनन्तज्ञानादिक गुणों के स्मरण होने में कौन सी कषाय की पुष्टि हुई। क्या क्रोध पुष्ट हुवा या मान पुष्ट हुवा या माया की पुष्टि हुई या लोभ पुष्ट हुवा। तो मेरा तो यह विश्वास है कि उन गुणों का स्मरण करने से नियम से अरहंत को द्रव्य गुण पर्याय करके जो जानता है । वो परोक्ष में अरहत हैं, वह साक्षात् अरहत है। वह परोक्ष में वही गुण तो स्मरण कर रहा है । भगवान् की भक्ति तो सम्यग्ज्ञानी ही कर सकते हैं, मिथ्या- दृष्टि नहीं। परन्तु कब तक ? सोही :- पचास्तिकाय में कहा है कि भगवान की भक्ति मिथ्याष्टि भी करता है और सम्यग्दृष्टि भी करता है। परन्तु यह सम्यर- दृष्टि उपिरतन गुणस्थान चढने को असमर्थ है तथा अस्थान जो कुदेवादिक उनमे रागादिक न जाय अथवा तीव्र गग ज्वर मेरा चला जाय। अतः वह भगवान की भक्ति करता है। जो श्रेणी मांडते हैं। उनको तो वस्तुविचार रहता है । उनकी तो आत्मा की तरफ दृष्टि है, न जाने घटकी न पटकी। कोई पदार्थ चिन्तवन में आ जावो, वह बिषका जो बीज राग- द्वेष था, वह तो उनका चला गया। हमारा विषका बीज राग- द्वेष बैठा है। इस वास्ते भगवान की भक्ति, उनमें उनके गुणों । अतः ( १४६ ) । - , ये तो उदय से का चिन्तवन करने से रागद्वेष की निवृत्ति होती है। अतएव सम्यग्दृष्टि को भगवान की भक्ति करनी चाहिये। मिथ्यात्व का अश ही बुरा होता है। अरे हमारी बात रह जाय, वह बात काहे की है। जब पर्याय ही चली जाय, जिस पर्याय मे अहंवुद्धि है, तब वात काहे की है। तुम्हारा यह पर्याय सवधी ज्ञान, यह पर्याय संवधी चरित्र यह पर्याय सवधी सुन्दरता और आयु को अन्त । अरे सुन्दरता तो अब ही चली जाती है। द्रव्य से विचार करो, वह रखलेवे । अव जवान है। रखलेचे कि हम ऐसे ही बने रहें, नहीं रख सकते। क्यों? वह आकर खिर ही जायगी। इस वास्ते बात तो हम अभी भी यह कहते हैं कि सबके स्थितिकरण की आवश्यकता है। इस वास्ते हम तो कहते है कि स्थितिकरण सब से बढ़िया है, और आप लोग सब जानते है हम क्या कहें। एक बात हो जाती तो सब हो जाता । निमित्तकारण को निमित्त मान लेते तो सब हो जाता। शान्ति हो जाय । इस प्रवचन मे निमित्त नैसित्तक सवध तथा उपादान में निमित्त की सहायता और शुभोपयोग भी मोक्ष का साधन है इत्यादि श्रीकानजी स्वामी की विचारधारा के विपय में अच्छी तरह खुलाशा किया गया । पाठकों से निवेदन है कि इस प्रवचन को ध्यानपूर्वक पढे तथा श्रद्धा दृढ बना कर लाभ उठावें । यह प्रवचन खुलाशा कर दिया है अतः समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। है 1 ( I ) शुद्धि पत्र पृष्ठ पंक्ति স্বয় शुद्ध २ २ १० १४ १९ ३ ६ ७ & १५ ११ १८ ११ 8 शुद्ध रत्तादियेद्विं कारण का वीत्तरागता रेखें आस्त्रव ज्ञान परिणभ उपयुक्त टकोकीर्ण प्रकतयः वर्णाद् वारण यिथ्यात्व तीव सहस्त्री ५ १० ११ १२ १४ १४ १५ १५ १५ १६ २० २१ २२ २२ २२ २३ २४ ३२ २ १३ २१ २ १६ २० शुद्ध रत्तादीहिं का कारण वीतरागता देखें प्रास्त्रन ज्ञाता परिणम उपर्युक्त टंकोत्कीर्ण प्रकृत्तयः वरणाद् वरण मिथ्यात्व तीन सहस्री द्रव्यकर्म को कर्म स्यात्मनो हेतु द्रव्य शुद्धात्म आत्मख्याति कमों को ३ २० १ द्रव्यकर्म का ५ यात्मनों १६ १६ कम स्यामनो रेतु द्वव्य शुद्धाय आत्माख्याति कमों की १ १८ १५ ३३ C Aw १५ ३४ १३ ३४ ३७ १५ १८ निमित्तत्व सामग्री कर्म AS NS NSW १७ १८ १ ४० ४१ ४१ २० २० ६ ४२ ४२ ४५ ( II ) निनित्तत्व समग्री कार्य राकादिकाग अत्मा बंध जीवस्य दर्शव शीतोष्णपेने सम्ध्दि दह्य गयन रुग्दीतः शास्त्र पुग्दल कापसि गलिकर्म प्रत्मा बद्धस्पष्ट बद्धस्पष्ट भावारणां अप्षाण पुण्णे अत्ताणां कधन कथम बद्धस्पष्ट हिया रागादिका आत्मा बंधं जीवस्स शैव शीतोष्णरूपेणै ससिद्ध दाह्य गमन रुद्गीतः शास्त्र पुद्गल कापसि गलिककर्म १४ ४८ ५० ४ ५० २४ १२ ३ ५४ ५४ आत्मा १५ ५७ ५७ १ ५७ ३ ५७ ५७ बद्धस्प्टष्ट बद्धस्प्टष्ट भावाणं अप्पाण पुणो अत्ताणं कथन कथन बद्धस्प्टष्ट क्रिया ५७ ५७ ८ & ( III ) w ६० २० १ ६१ ६३ ६३ ६३ २० ३ ६४ १२ २२ ६४ ६६ ६६ ५ २१ २१ द ६७ ६७ वभिन्न क्यों प्यारा कमेन्द्रिया अत्मा कर्मेन्द्रिया पारणादिक तल्लक्षन पर्याप यथायोग किंचण निश्चयन सामग्री शिवश्लेषिता अधार आत्मा भा बाधऐ केचिदव्य निश्चित अहार भवत्वेक मिमित्त यितो करण चिह्नित ससर्थ व्यहार देसिदो मेद्विदा विभिन्न क्यों हेरत प्यारा कर्मोदयान आत्मा कर्मोदया पारणामिक तल्लक्षण पर्याय यथायोग्य किचूणा निश्चयनय सामग्री विश्लेषिता आधार आत्मा मे भी बाधाएं केचिद्रव्ये निश्चय आहार भवत्येक निमित्त यतो कारण चिह्नित समर्थ व्यवहार देसिदा मेट्ठिा ११ १९ ६७ ६६ ७० १९ १८ ७१ ७२ ७४ ७४ २० २६ १६ ७७ ७९ ७९ १६ २६ ८० ४ .८४ ४ पृष्ट पंक्ति (IV) २२ ८४ २५ ६ ९२ १३ १८ २ अशुद्ध शिष्यामि रूप से निश्चय आश्चय मुनिणो पराश्चित संदेहावस्था स्वानुभूत करेना सहस्त्री १६ ६५ ४ शुद्ध शिष्टमि रूप सो निश्चय आश्रय मुणियो पराश्रित सदेहावस्था स्वानुभूति करेगा सहस्री जानना व्यभिचार १८ ७ १०२ ७ १०२ १०३ १६ २ जानता व्यविचार कैसे, भी परिगमन निश्वय १०३ २० १०४ ११-१२ १०५ ४ १०५ कैसे भी परिणमन निश्चय शुभ हां १६ शुभ हों ur १०६ १०७ १०७ १ सामग्री पर आस्त्रव (स्वामित्व) ये शुभ ही विषाकसभ्दावः बंधयेष्यस्पपरथा १०७ २२ १०८ सामग्री पर आसव (स्वामित्व) ये अशुभ ही विपाकसद्भावाः बंधमेष्यपरथा १३ (V) १११ १६ ११२ २० कारणानुयोग पोग्ता धरत्याणं प्रवर्तमाम माग चैवैतन्य लणिक ११२ ११३ ११५ ११५ १४ करणानुयोग योग्यता घरस्थाणं प्रवर्तमान मार्ग चैतन्य क्षणिक भेदोऽस्त्व निपुणैर्भेत्तुं विपर्यस्त ६ २० ११५ १२.. भेदोऽत्व ११७ १७ अदया तावत २४ ११५ निपुणैभर्नु 'विपर्पयस्त १२५. १२ अदता १२५ तापत १२८ २०२४ पिज्जन १२४ २२. प्रकृति १३० १७ , सेवह १३० २२ आदि का के . पिजन प्रवृत्ति सेवइ आदि की
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