Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Pakarn Ratnakar-nagbijo

Bhim Singh · 2011/08

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

SVE

No text on this page.

प्रस्तावना. श्रा पंचमकाल समाप्तिना धवसरे ठेला दुप्पसहनामा थाचार्य थो. तेमना नि णिसुधी जिनधर्मरुप मानससरोवरना साधु, साध्वी, श्रावक तथा श्राविका ए चतु बंध संघरूप चार धारा खुला रहेवा जोयेठे. एवं परमेश्वरनु वचन दे. कदाचित काल प्रवल प्रनावथी कोई समये कोई थारो न्यूनता पाम्या जेवू थाय तोपण वाकीना चालु हेला वीजा थाराने प्रनावे समय पाम्याथी ते पारो पण सुधरी जाय वे. धा समयमा पूर्वना समयना करतां घणी न्यूनता थई गएली दीगमा धावे. च विधसंघमां साधु तथा साध्वी तो क्वचितजदीतामांधावेठे थने श्रावक तथा श्राविकायो पण थप अस्तित्व ते. तेयोनी कपरज धर्मवृद्धि थाधार राखे ते. धर्म वृदिशाननी र थी थायवे. माटे ज्ञान वृद्धि अवश्य करवीजोयेते. ज्ञाननी वृद्धि ज्ञानना साधनोनी दि कपर आधार राखेडे. ज्ञाननांसाधनो पूर्वाचार्य कृत ग्रंथोनो जीर्णोद्धार तथा य लोकन, विद्यान्यास, उत्सुकता, धर्मप्रीति, अनिरुचि, तथा उद्योग प्रमुख . पूर्वाचार्योकत ग्रंथोनो जीर्णोद्धार कस्वाथी ते समयना पंमितो, पांमित्य जाण्या गां थावेठे ; मनुप्योनी धर्मऊपर केवी रुचि हती ते जणायवे. नूत कालथी ते था वर्तमान कालसुधी वचगालामां धर्म तथा वित्ता प्रमुखनी केटली अधिक न्यूनता यह ते दीवामां थावेठे. पूर्वाचार्यों यति श्रम वेठी विद्यान्यास करी मोटा मोटा ग्रंथोनी रचना करता हता तेनो हेतु मात्र धर्मवृद्धिथथवा ज्ञानवृद्धि विना वीजो कोई ह तो के झुं ते वात स्पष्ट देखाई थावेते. ग्रंथनीरचना कस्यामां केवल परोपकार विना बीजो कांई पण स्वार्थ होयवे के छु? ते कलाय . पूर्व कालना करतां हालना वखतमा विद्यान्यासनो उद्योग केटलो अधिक यथवा न्यून थयोठे ? ते जणाई यावेठे. इत्यादि क वीजा पण घणा हेतु दीनामां यावे. माटे अवश्य प्राचीन ग्रंथोनो नीचार करचो जोते. केमके, ए ज्ञानवृधिनु मुख्य साधन . जो पुरातन ग्रंथोनो जीर्णोधा र नही थाय, तो कालांतरे विवेद थई जवानो संनव वे. थने तेवू थएखं हाल दीनामा यावेठे,जुचों के हरिनसरिए चौद शे ने चुमालीश ग्रंथो कस्या , तेवधानो जीर्णोधा र नही थयाथो तेउमांना केटलाएक ग्रंथोनो हाल पत्तो पण मलतो नथी, एवा वी जा पण अनेक सुविहित प्राचार्योना करेला ग्रंथोनो शोध मलीशकतो नथी तेनुं कारण पण एल वे. ते केटलुं लखियें ! यद्यपि मार्स एम कहेवु नथी के थाज दिवससुधी को ए ग्रंथोनो जीर्णोद्धार कखोज नथी, मोटा राजा तथा सद्रुकारो बगैरे घा न नमारा करी गयाने ते अद्यापि विद्यमान ने, थने तेथीज हाल केटलाएक पुरातन अयोनु थापणने दर्शन थाय तथापि मात्र दर्शन करवाथीज कोई वलनानु नथी, प ण योग्यरीते उपयोग करयाथी कार्यसिदि थवानो सनव जेम पूर्व धर्मानिमानी रा जा वगैराउए शान नमारा कखाले तेम पाठल थयु नथी ए मोटी दिलगीरीनी यात ने जो एवो चालज पडी गयो होत तो एके ग्रथ विछेद गयो न होत थने थाटली झाननी न्यूनता पण थई न होत जुवोके, देरासरनो जीर्णोद्धार करवानो चाल पड़ी गयो तो तेनी सतति विजेद गएली देखाती नथी तेमज ग्रथोविपे चाल पडवो जोये केमके ग्रथोनो जीर्णोधार तो ज्ञाननी वृधिनु एक मुख्य कारण हालना समयमा ग्रथोनो जीर्णोधार करवाना जेवांसाधनोमलीथावे तेवां थाग ल कोई वखते पण नहोतो पहेलो प्रथम ग्रथोनो जीर्णोधार तालपत्र कपर थएलो देखाय, ने त्यार पनी कागल कपर थयो ते थद्यापि सिम ले परतु ते हस्तक्रिया विना यंत्रादिकनी सहायताथी थएलो नथी ने हाल तो मुझयंत्रनी थति उलट स हायता मली थावे, तेनो उपयोग करवानु मूकी दईने बालस करी वेशी रहेगु तो ग्रयो केम कायम रहेशे ? हाल विद्यान्यास करीने नवा नवा अयोनी रचना करवी तो एक कोरे रही, पण उतीशक्तिये पुरातन ग्रथोनी रक्षा करवानो यत्न नही कर तो थापणेज ज्ञानना विरोधी परशु केमके जे जेनी रक्षा करे नही ते तेनो विरोधी थथवा अहितकर होयरे ए साधारण नियम थापणी कपर लागु पडशे श्रावक नाईयो, पुरातन ग्रथोनो जीर्णोधार कयाथी ते ग्रथोनु अवलोकन थशे. प्रयाशविना केटलोएक विद्यान्यास थशे, रस उत्पन्न थईने ज्ञान सपादन फरवानी थत करणमा उत्कता थशे शुरू धर्म मपर प्रीति वधशे, थनिरुचि एट ले पुन पुन झान मेजयवानी श्छा थशे, धने उद्योग प्रमुख सर्व ज्ञानना साधनोनो सहज प्राप्त थशे उद्योग ए सर्व पदार्थ मेलवयानु थथवा दि करवानु मुख्य साधन वे, परंतु थमस्ता उद्यमयीज काई थई शकतु नथी तेनी साथे इव्यनी पण सहायता जोयेठे इव्य जे ते सर्वोपयोगी पदार्थ ठे माटे इव्यवान पुरुपोए थव श्य ए काम ऊपर लद देयो जोयेठे केमके, तेउनी ए फरज ने के, जेम बने तेम झाननी वृद्धि करवी जोयेठे ते याप्रमाणे-सारा सारा पमित्तोनी मारफते प्राचीन यथो सुधारी लखावी यथवा उपावीने प्रसिद्ध करवा तेनो नाविक लोकोने थन्या स कराववो इत्यादिक शास्त्रोमा कह्या प्रमाणे सर्व प्रकारे ज्ञाननी वृद्धि करवी एवा. हेतुथीज में था ग्रयो उपायवानु काम हाथमां लीधु , परतु कोईनी सहायता विना सतंत्र मारी मरजी प्रमाणे दु ग्रथो उपाची शकु एवी मारीपाशे इध्यनी शक्ति नहीं ३ होवाने लीधे था 'प्रकरण रत्नाकर' नाम, मोटुं पुस्तक कहामवानीथागमन मारा स्व धर्मी नाश्योनी मने मदत लेवी पडीवे. सारा जाग्यजोगे योग्य ते मदत पण मली धावी, तेथी या पुस्तकनो प्रथम नाग समाप्त करी ते गया जेष्ट मासमां प्रसिद्ध करयो यने था बीजो नाग पण हमणा पूर्ण थयो । तेथी हुँ मने कतरुत्य तमखं दु. आ ग्रंथ प्रसिद्ध करवाने मुख्य मदत करनार शेव. केशवजी नायको. हरेक पदार्थने सम योग्यतावान वा अधिक योग्यतावान रक्षण करी केठे एवं बद्या दीवामां थावे. जेम ग्रीष्म ऋतुना तापथी तप्त थएला पर्वतने मेघज रक्षण करते, तेम ज्ञान- रक्षण ते उत्तम योग्यतावान पुरुपचीज थई शके. यद्यपि सकल चतुर्विध संपने ज्ञाननी रदा करवानो अधिकार है, तथापि सर्वने तेवू सामर्थ्य होतुं नथी. माटे योग्यतावानज रक्षण करी शके वे. तेवी योग्यता कोई विरलानेज होय वे, केमके, वाह्य सर्व लदम्यादि समृदिठतां यंतरनेविपे जिन वचन श्रधानरूप समृ ६ पण जोये ठे. तेमांनी बाह्य समृद्धि तो घणायोने होय तेम उतां जिनवचन प्रधान होतुं नथी तो तेनाथी कोई पण एवं शुन कल्य थई शकतुं नथी. तेथी वाह्य संपत्ति सहित प्रवचनश्रधान पण जोये . बाह्य उत्तम संपदा धने अंतर स्वधर्म निष्टा ए उत्कृष्ट पुण्यानुबंधीपुल्यफल वे. तेवु कोईएकनेज होय छे. एर्नु प्रत्यद उ दाहरण था वर्तमान शितकरुप कासनेविपे श्रेष्ट केशवजी नायक वे. केमके, एवी योग्यतावान वीजो कोई पुरुप हाल दीवामां थावतो नथी. एयो वाह्य लदम्यादि सं पत्तियुक्त उतां थांतर धर्म सम्यक्त्व श्रमानरूप थत्युत्तम संपत्तिए करीने पण युक्त वे. जेनेविपे पंच प्रतिरूप यंतराय कर्मनो क्योपशम थाधुनिक सर्व संघ जनोना कर्नाथ धिक दीठामां थावे; एमना जेवू थातप नाम कर्म तो कोई नूपने पण क्वचित् उदय थय दृष्टि गोचर थो तेमज थादेय नामकर्म, थंगोपांग नाम कर्म, यशः कीर्तिनाम कर्म,प्रमुख छुन प्रतियो- एमणे एवो तो उत्कटवंध करयोठे के, तेवो हाल दानरत्ता ईमां कोईवीजानेविपे क्वचित् टीनामां थावसे एवा पुरुषने शुं शक्य होय? थने कीयुं कार्य करवाने समर्थन थाय ! अर्थात् सर्व कार्य करवाने शक्तिमान ठे. पूर्व थगिएला सं प्रति राजा तथा वस्तुपात तेजपाल अने कुमारपाल प्रमुख महत् प्रनाविक पुरुषोनी पठे एमणे पण वर्तमान कालानुसार धर्म दीपनार्थ तथा खत्रज्ञान दर्शनार्थ श्रीधर्हदेवा लयो तथा अंजन शनाका प्रमुख उत्तम धर्म कृत्यो कखां वे; ते वधायोथी पण य ---- Ammar ४ त्युत्तम दानदिनी उत्क्ता पूर्वक तयुक्त पुरुपोने अतिशय थाश्रय दियेठे, माटे नि भय स्री एमने पूर्वनूत धर्म श्रमावान कुमारपाल राजा प्रमुखनी पक्तिमा शासा न गणय स्तुि तेमनी तुलना करे तेवाज ने था लखाणमा कोईए थतिशयोक्ति र महतो नही, पण निर्परूपाप्त बुदिथी विचार करो जोवु के, होठ केशवजी नायक सा उपमान योग्य ते के नहीं। जुयो के थमे थकित करवाने थारन करेला था। क सह सव्याक महत् चतुर्नागात्मक पुस्तकना थकनीय खर्चनेविपे एवी युक्तिय याप्रय धान्याने के जेथकी केटलाएक समयोरित पूर्व गीतार्थोए करी रचित प्रक पान एररुप पुन जीशार यई शकशे माटे एमने जेटली उपमादये तेटली थोडी गउपदादूर यामाहेव लदमीपति सिदजी पत्रपति सिहजी शेवगाजी नायररिपे लसता था प्रसगे श्रीमादावाद निवासी स्वप्रति । रामान, दम्यादि वाघ यमित सममि युक्त, उत्तम यश कीर्ति नाम कर्मोदयवान 174पुरावागन थतिय, प्रतापी, स्वधर्म दीपक, पूर्वोक्त पक्ति थनिराजनीय, र mfTI नन तया पारस गुण साहित्यादि थपूर्व रुल्यालकार नूषित राउबहा- मानिदण पदर पारक यानुसाहेन रानीपति सिहजी उत्रपति सिहजी पोताना न मापन पापतागन दोगगयो अधुना थनुपमेयज ठे अशिप कोरपि पीगाग्य नृपतिदन पदक धारक शेठ केशवजी नायक तथा परागय नृपतिदन पदर धारक शेत लक्ष्मीपतिसिहजी उत्रपतिसिहजी जेया शिप दीना पुरा भार माननेरिपे हमेग उत्पन्नथता रहो, थने थापा ६ कार धर्मस्यों कमा रदो एपो थमारो थत करण पूर्वक थाशिर्वाद दे मानविन वनम स्यने सारा याश्रय थापनार प्रनाविक पुरुषोनी पनि तयातया टपक्ष नदिन, सारासार याहक, परम रहस्य, परोपका निमाल, का, दया, कग तया गानादि शुनगुण युक्त, श्री वीतरागपद कमन दजनगर गपमान महात्मा महा मुनीमहिमा सागरजी तथा सुमति र ग. मनो यन्त प्रार्थना पूर ययुपकार पुक्त नाम स्मरण यत्र गुपित कर श्रीमुना मार मनमाना श्रेष्ट दग्नम नरमिद, श्रेष्ट पेना गाई पदा भेट दमन पुनमी अट नांगन देमन, एमणे झान दि पियक पोतानी सपना दी माटे नेमना टायर पूर्वर टु नाम गुथित रु श्रीमक्दावाद निवासी परम ज्ञान प्रसारोयुक्त मतिमान सज्येष्ट नाता तुल्प ल ची तथा गुण युक्त नूप दत्तक रायबाहादूर पद धारक वाबुसाहेव धनपति सिंहनी त्रपति सिंहजी एमने पण पोतानी उत्कृष्ट ज्ञान वृद्धिक सत्यने सारी उदारता दर्शावी है तेथी तथा वीजो पण ज्ञान वृधिने यर्थे पुस्तक अंकित करवानो हमेश उद्योग बालु राखेवे तेथी यति सत्कार पूर्वक तथा मान्यता युक्त नामस्मरण गुंधित करुं. श्री मुंबईना आवक मंडलमांना शेउ परवत सधा, शेत मूलजी देवजी, शेत जादव जी परवत, सा. नोजराज नरपाल, तथा शेठ कोकानाई फूलचंद तथा शा. ठाकरसी देवजी एयोए पण यथाश्रधान प्रमाणे या ज्ञानवृधिना कत्यने याश्रय धाप्योठे तेथी तेयोनुं उपकार सहित नामस्मरण {थित करुं बुं. श्री अहमदावादना श्रावक मंमल माहेला शेठ दलपत नाई ननाई, तथा शेठ मयाना प्रेमानाई, एनी ज्ञाननी प्रशस्ति थवानेवि अति उत्कंठा जोश्ने मोटा आनार सहित नामस्मरण गुंथित करुं हुं श्री साणदवाला होत साकलचंद दुकमचंद तथा श्री नरूचवाला शेव थनूपचंद मनु कचंद, एरोए पोतानी धर्मननावना थधिक दर्शाववाने थर्थे झाननी वृद्धि थवा सारु जे उत्सुकता बतावी ते ते जोईने मोटा उपकार साये नामस्मरण गुंथित करुं हुं. श्री कन्ठ मुदराना रहेवाशी शेत कस्तुरचंद सिंघजी पारेख एमनी अभुत धर्म श्री ति, वैराग्यता तथा ज्ञानवृधिनी थतिशय चाहना जोईने मोटा थादर पूर्वक था पु स्तकनी साथे नाम {थित करुं बु. साधुमंगल मार्गमार्गित संवेगी साधु वर्य, थति विवेकी, ज्ञान पीयूष चुलत्सुक जिनप्रवचन श्रवण श्रद्धावान श्रावक जन मन कर्णने परमामृत रहस्य पान कराव नार; साधु गुण नूपणालंकृत; ज्ञानवृद्धि कत्ती पुरुपरूप वृदोने मेघदृष्टि समान थत्यु कृष्ट साधन नूत, महाराज श्री मूलचंइजी तथा जवेर सागरजीना, नामस्मरण प्रेम पूर्वक ऍथित करुं दु. साधु मंगलमां साधु गुण संपन्न, ज्ञानरूप सूर्यना प्रकागने थावरण करनारा जे नाना प्रकारना संशयो, कुतकों, केप, मान, ईसी तथा कुसंग प्रमुख वाटल समूहरूप पनपटानो सम्यक् प्रकारे विध्वंश करवाने बलवान पवन तमान ; धर्म तथा धर्माग कानादिकनो हि करवाने पूर्वना अत्युत्तम सुविहित शास्त्रपारग धावायर्यादि धार्य जन तुल न्या ज्ञाद सलीना जाण वद्या पंजाबारव्य देश निवासी संदेगी माधु श्री धारमाराम समान थात्मारामजीएमथति नारपूर्वक नामन्मरण गुथित कई.

an * संपेगी साधु श्री नितीविजयजी महाराज एननो ज्ञान मिअर्थे सारो उद्योग होवायी प्रथम नागनो पठे नामस्मरण शुथित करु बु, संरेगी साधु माध्य वस्तु साधनोयुक्त युक्त मतिभान, जिनपचन समुश्माथी जलद पतग्रहीत धर्माकाशस्थित जनष्टिवत् ज्ञान वृद्धि कर्ता, सवेगी साधु शुक्ष सम्यक्त्व पदारथ, परम सुविहित सुमाधु ममल माल प्रोहीत, ज्ञानादि शुद्ध जिनधर्मागवृद्धि प्रयत्नान श्रीनाति सागरजी महाराजनु नामस्मरण गुथित करुवं, जन व वय थचन गमाचार्य नहारक श्रीविवेक सागर सूरि, एमनु पूर्वनागनी पठे नाम म्मरण गुंचित क्रूं हूं, मनुष्य पुज प्रज्म तप गमाधिपति नहारक श्री धरणेसरि, एमनु नाम स्मरण मुषित कर श्री दुकमवाजी महाराजनु में प्रथम नागमा नाम स्मरण गुथन कस्यु ले तेमज घने पण गुपित करु बु प्रापन रहस्य ज्ञाता, कापिद मतिमान, अनुत्त चपत वक्तृत्वशक्तियुक्त, स्वरूपसा गररित् श्रीपसागरजीनु नाम स्मरण गुपित करु तु, १९ वीतराग परपित, जिनधर्म पिनूति युक्त श्रीथदमदावाद नगर निवाशी एवं पावर समज नन भूप समान थत्यंत लादिम सपत्तिवान पूर्वज परपरा श्रेणियामत श्रीमान उनम प्रधान सदवर्तमान तथा धर्मदीपक श्रेष्ट मयालाई प्रे मागास्नु नामस्मरण पुन गुपित करूं पीता पण जे जे सहक्षिमान पुस्पाए धर्म प्रनायना दर्शावया निमित्ते स्वसामा जुगार दानादि हेनुपी पे उदारता दर्शायी वे तेथोना नामस्मरणार्थ पुस्तकना थत नरिपे पित्त पशे क्षमापना अपम नाग मापे मानिदोस्यो तन्वानुवोर नामनो यथ जे दृष्ट ३३१ यी ४५६ सुधीमो नारसवाम थायुठे ते म्यानकवासी रतनबदनो करेलो वतां सवेनी मतमा संबुन पापी जूनयो पाई गपो एटला माटे दुसर सुनुश्विान वाचको पाशे पीएमा म कयक्ति अयना मुम घटमां सुपिहित गीतार्थ रचित ग्रंयो जनामगनी में प्रनिशा जी ते तेने को दृपण थापगो नही केम के, हरेक काम नूलथी थाय. ते दमा करवा योग्य ते ढुंढिया यद्यपि जिनधर्मी नामधरावना रा तो वे पण जाते मूर्खज होय वे तेथी ते जिनोक्त मार्गनी विपरीत परुपणा कर तादरता नथी एवात सर्व सुज्ञ जनोने सम्मत दे माटे ते मूर्ख होवाथीगोतार्थ कहेवा य नही तेथी ए ग्रंथ अवश्य जैन सैलीथी विपरीतजवे एवं जाणी त्याग करवा यो ग्य ठे; कोईए सुविहित गीतार्थकत जाणीने वांचवो जावो नही ए वात हूं श्री ना वनगरमां साधु श्री यात्मारामजी महाराजने मलवा गयो हतो त्यारे तेमणे,मारी पागे कही ए रतनचंद थानकवासी साये यात्मारामजी महाराजनो मताप यलो हतो इत्यादिक बदुवातो मे एमना मुखथी सांजलीने तेथी में घणो पश्चात्ताप कस्यो पण पठी थाय गुं? माटे मूलथी मारी प्रतिज्ञामां में नूल कीधी तेनी मुनि श्री थात्माराम जी महाराजना उपकार सहित सर्व सलानो पाशेयी मापना मा . शा. नीमसिह मायक. . विनती. समस्त जैन धर्म रागी, नाना ग्रंथ विचार वुनुत्सुक, जिनवचन पीयूपपान की, श रल चित्तवाला जनोने यति प्रार्थना पूर्वक विनति करुं तुं के, जेम जननी अथवा जनक स्वपुत्रना दोपविपे रंचमात्र विचार न करता मात्र गुणनुज ग्रहण करे. तेम याअंकित पुस्तकनेविपे कोऽने कांई दोप दृष्टिगोचर थाय तोमऊ कपर रंचमात्र रोप कर को नही. केमके, सर्व प्रकारे निर्दोपता एक केवलीविना वीजा कोनविपे पण संनवे नही एटला माटेज पूर्वे थई गयला महत् थाचार्य प्रमुख श्रुतझान पारग थत्युत्त ट पंमितो पण स्वरचित ग्रंथोमां बुद्धि टोपनेविपे क्षमा मागी गयला दीनामांथावे; त्यारे याधुनिक साधारण जननी वात झुं कहेवी? था पुस्तक शोधन करता मत्ति दोप यथवा दृष्टिदोप थवश्य दीनामां धावशे; ते जोड़ने रोप न करतां क्षमा करवी. किमके, वाचता यथवा सखतां नूल थायज वे एवो नियम ते. एविपे जे गर्व करे ते मूर्ख कहेवाय. माटे ए विपेढुं सर्व सत्पुरुपोनो विनय करुंनु के,थापनी हंसना चंचू नेवी मतिथी सारासार विचार पूर्वक जलरूप टोपर्नु निवारण फरीने पपप गुणर्नु दहण कर. थने धनत् पुस्पोनो पण यधिक विनय करुं हुं के, थापनी चंचू जेवी मतिवटे गुण तजीने दोपर्नु ग्रहण करीने ते सुखेची प्रतिम करवो;

D
३२
अध्यात्मकल्पधुम.
यत्कपायजनितं तव सौख्य यत्कपायपरिदाणिभवति ॥
तदिशेपमधवैतटर्क सविनाव्य नज धीर विशिष्ट॥६॥
श्रयाविनीमकारांतरे कपायत्यजवु उपदेशेवे हेयात्मा तुजनेकपायथा उपनुजेसु
ख अनेकपायना परित्यागथी उपनुजेसुख एवेनु विशेपजे अधिकपणु तथा नदके
निदानो विपाकजेफज तेसम्यक प्रकारे विचारीने पडे हेधीरपमित एमाजेतुजने विशि
एवत्तमजायरामायावे तेनेनुश्रादरथगीकारकर ॥६॥
मुखेन साध्या तपसा प्रत्ति यथातथा नैव तु मानमुक्ति ॥
आद्या न दत्तेपि शिव परा तु निदर्शनाहादुलबले प्रदत्ते॥॥
मम्यग् विचार्यति चिदाय मान रतन जरापाणितपास यत्नात्॥
मुदा मनीपी सढतेऽनिनूती शूर कमायामपिनीचजाति ॥Gl
अपहातपायी मानत्यागनी उफरता देखाडेठे हेयात्मा जेम तपनीप्रद
मितसमापन तेममानमुक्तिजे माननुत्यजवु तेसुखेसाध्यनथी तो थाद्याफे पहेनी)
पीजे नपारमितेमुनिथापया समर्थनयोथने वीजोजेमानमुक्ति तेयद्यपि साध्य
तापणते मुनिथापगने समर्थने वादनजनेदृष्टाते जेमबाहुबलने मानमुक्तिविना मात्र
नपपरीनशनदान पनुनही अनेमानमुफ्यु तेवारे तत्कालझानपर्नु एधुसम्यम् ।
जिगरी मानन्यनीनेयत्ने वरीपनि एहयोजेतप तेनेराखतोयको क्षमानेचिपे शूर
पाजे मनीरी पंमित ते नीच जननो करेलो थनिनूति जेपरानव तेनेपण मुद्रा
के करीगरने ॥ ॥ ७॥ एपेकायनोथएफठोने
परानिनृत्याल्पियापि कुप्यस्य(रपीमा प्रतिकर्तुमिन् ॥
नवैम्मिनियंड्नरकादिपु ताम्तैरनंतास्त्वतुला नवित्री ॥५॥
य। बीएपरिमद सहेगयाश्रीज उपदेशेने हेथात्मातु थोडीपण परनीकर
जीरे अनिनि पीडादिक तेणेस्थनिनृतिना करनारजे पुरुपतेवपर कोपेने थन
दनी पारीन तहना प्रतिकारने यांने एटले पूर्वजन्मातरना पापविपाकयकीय
गनपामे बनेग्नीनेहनी प्रनिशरपण पापकरीनेज वानवे परतुतेपापेरीन तु
परिपीटायो तेनिपचनाकादिक गनिनपिप थनततथाथतुज मोहोटी एवि
रजोरहेना पीडापागे एकनियोताणतो ॥ ७ ॥

कपायत्यागाधिकार. ३३ धत्से कृतिन् यद्यपकारकेपु क्रोधं ततो धेारिपट्टएव ।। अयोपकारिप्वपि तभवातिकतकर्महन्मित्रवदिपित्सु ॥ १० ॥ अर्थ ।।हवेकोधकरवो तेवैरीनेज वियुक्त तेकहे। हेपंमितधात्मा जोतुं अपकारक शत्रुनेविप क्रोधधरेवेतो तेनेबदलेताहरा अंतरंगनाजे क्रोध मान माया लोन राग अनेक्षेप मलीलगत्रु तेहनेविपेज क्रोधधर केमकेएशत्रुथी बीजोको तुमने वघारेकुःखटाइनथी अथवा उपकारक मित्रनेविपे जोतुंक्रोधधरतोनथी तेवारतुं सं सारमा अर्तिकारी एहवाझानावर्णादिक कर्म तेनोहरणकरनाराजे उपसर्गाटिकना करनार शत्रु तेनाउपसर्गकरवेकरी वाह्यदृष्टियेंतोते ताहरागत्रूठे पणकर्मक्यकर वामां अनेपरलोकना अनंतसुखनीप्राप्तिकरवामां साह्यकारीथया माटे तत्वदृष्टिये जोतां अन्यंतरपणे तेमित्रनावेज परिणम्या तेथी उपसर्गकारकशत्रुने तत्वदृष्टीये मित्रतुल्य जोड्ने तेमित्रने विपे क्रोधनधरवो एनावार्थठे ॥ १० ॥ अधीत्यनुष्ठानतपःशमाद्यान् धर्मान् विचित्रान् विदधत्समायान् ॥ न लप्स्यसे तत्फलमात्मदेहल्लेशाधिकं तांश्च नवांतरेपु ॥ ११ ॥ अर्थ ॥ हवेमायात्यजवा याश्रीउपदेशेठे हेअत्मातुंअधीतिकेजण तथाथ नुष्टानजे कियाघावश्यकादिक तथातपउपशमादिक नानाविधधर्म ते मायाके० कपटसहित करतोथको मात्र पोतानादेहने कष्टजापेठे पणतेथी व्यतिरिक वीजूफलकां5 नवांतरनेविपे पामीसनही वली नवांतरनेविपे तेधर्मनेपणपामीसन ही केमकेमायावीनं बोधीपामवी नहोय ॥ ११ ॥ सुखाय धत्से यदि लोनमात्मनो ज्ञानादिरत्नत्रितये विधेदि तत् ॥ अखाय चेदन परत्र वा कृतिन् परिग्रहे तबहिरांतरेपि च ॥ १३ ॥ अर्थ ॥ हवेलोनत्यजवाथाश्री उपदेशकरेठे हेयात्माजोतुं पोतानासुखनेत्र ये लोनकरे तोझानादिक जे ज्ञानदर्शनअनेचारित्र एव्रणरत्ननेविपे लोनकर बी जीवनधान्याटिक असारवस्तुथी काहिसुखनथाय माटेहेचतुरयात्मा तुंथालोके उखनेश्रर्थे बाह्यथाधनधान्यादिक यने अंतरंगथी क्रोधमानाटिक परिग्रहनेविपे लोन करिसनही ।। १२ ॥ करोपि यत्प्रेत्य दिताय किंचित्कदाचिदल्पं सुकृतं कथंचित् ॥ माजीहरस्तन्मदमत्सरायविना च तन्मी नरकातिथिः ॥ १३ ॥ अर्थहवेजीवने सुरूतराखवाथाश्रयी उपदेशे हेयात्मातुं कोकाले कथंचित्य ३२ अध्यात्मकल्पडम. यत्कपायजनितं तव सौख्य यत्कपायपरिदाणि नवति ॥ तदिशेपमयवैतदर्क सविनाव्य जज धीर विशिष्ट॥६॥ यथावलीप्रकारातरे कपायत्यजवु उपदेश देवात्मा तुजनेकपायथी उपजेसु ख अनेकपायना परित्यागथी उपनुजेसुख एवेनुविशेषजे अधिकपणु तथा उदर्कके० निदानो विपाकजेफल तेसम्यक प्रकारे विचारीने पठे हेधीरपमित एमाजेतुजने विशि एउत्तमजाणवामाआवे तेनेतुश्रादरअंगीकारकर ॥६॥ सुखेन साध्या तपसा प्रत्ति यथातथा नैव तु मानमुक्ति ॥ आया न दत्तेपि शिव परा तु निदर्शनाहागुलबले प्रदत्ते॥७॥ सम्यग विचार्येति विहाय मान रहन पुरापाणितपासि यत्नात्॥ मुदा मनीपी सहतेऽनिनूती शूर हमायामपिनीचजाति ॥७॥ यथाहवेतपकरवाथी मानत्यागनी पुष्करता देखाडे हेयात्मा जेम तपनीर नितेसुखेसाध्य तेममानमुक्तिजे माननुत्यजवु तेसुखेसाध्यनथी तो थायाके० पदेनी कहीजे तपप्रवृत्तितेमुक्तियापवा समर्थनाथने बीजोजेमानमुक्ति तेयद्यपि साप्यते | तोपणते मुक्तिथापवाने समर्थने बाबलनेदृष्टातें जेमबाहुबलने मानमुक्तिविना,मात्र तपयकीज केवलज्ञान उपनुनहीथनेमानमुफ्यु तेवारे तत्कालज्ञानचपर्नु एवुसम्यग | विचारीने मानत्यजीनेयत्ने करीनन एहवोजेतप तेनेराखतोथको मानेविषे शूर एवोजे मनीपीते पमित ते नीच जननो करेलो थनिनूति जेपरानव तेनेपण मुद्रा के० हपेकरीनेसहेते ॥ ॥७॥ एवेकाव्यनोथथएकोले पराजिनूत्याल्पिकयापि कुप्यस्यधैरपीमा प्रतिकर्तुमिचन् ॥ नयेसि तिर्यड्नरकादिकेषु तास्तैरनतास्त्वतुला नवित्री ॥५॥ थर्थ ॥ वजीएपरिसह सहेवाथाश्रीज उपदेशेने हेयात्मातु थोडीपण परनीको सीजे थनिनूति पीडादिक तेणेकरी घनिभूतिना करनारजे पुरुषतेउपर कोपेने धने बजी पापफरीने तेहना प्रतिकारने यांनने एटले पूर्वजन्मांतरना पापविपाकथकी प रानापामे थनेवलातेहनो प्रतिकारपण पापेकरीनेज वाले परततेपापेफरीने तु | थनिनतिजेपीडायो तेतिर्यचारकादिक गतिनेवि बनततथाथतुल मोहोटी एदि नवित्रीकहेता पीडाथाशे एबुकानथीजाणतो ॥ ए॥

कपायत्यागाधिकार. ३ धत्से कृतिन् यद्यपकारकेपु क्रोधं ततो धेह्यरिपट्टएव ।। अयोपकारिप्वपि तभवातिककर्महन्मित्रबदिहिपत्सु ॥१०॥ अर्थ हवेकोधकरवो तेवैरीनेज वियुक्तवे तैकहे। हेपंमितयात्मा जोतुं अपकारक शत्रुनेविप क्रोधधरेवेतो तेनेवदलेताहरा अंतरंगनाजे क्रोध मान माया लोन राग अनेक्षेप मलीउशत्रु तेहने विपेज कोषधर केमकेएशत्रुथी बीजोको तुमने वधारेजःखदाश्नथी अथवा उपकारक मित्रनेविपे जोतुंकोषधरतोनथी तेवारतुं तं तारमा अर्तिकारी एहवाझानावर्णादिक कर्म तेनोहरणकरनाराजे उपमर्गादिकना करनार शत्रु तेनाउपसर्गनेकरवेकरी वाह्यदृष्टियतोते ताहराशत्रूठे पणकर्मक्ष्यकर वामां अनेपरलोकना अनंतसुखनीप्राप्तिकरवामां साह्यकारीयया माटे तत्वदृष्टिये जोनां अन्यंतरपणे तेमित्रनावेज परिणम्या तेथी उपसर्गकारकशत्रने तत्वदृष्टी मित्रतुल्य जोने तेमित्रनेविपे कोधनधरवो एनावार्यते ॥ १० ॥ अधोत्यनुष्टानतपःशमाद्यान् धर्मान् विचित्रान् विधत्समायान् ।। न लप्स्यसे तत्फलमात्मदेवल्लेशाधिकं तांश्च नवांतरेपु ॥ ११ ॥ अर्थ ।। हवेमायात्यजवा पाश्रीउपदेशोने हेअत्मातुंअधीतिकेजण तथाथ नुष्टानजे क्रियाधावत्यकादिक तथातपउपगमादिक नानाविधधर्म ते माया कपटसहित करतोयको मात्र पोतानादेहने कष्टजयापेठे पणतेथी व्यतिरिक वीफलकांश नवांतरनेविपे पामीसनही वली नवांतग्नेविप तेधर्मनेपणपामीनन दी कमकमायावीन वोधीपामवीजनहोय ॥ ११ ॥ मुग्वाय धत्मे यदि लोनमात्मनो झानादिरत्नत्रितये विधेहि नत् ।। पुरवाय चत्र परत्र वा कृतिन् परिग्रदे नाहिरांतरपि च ॥1॥ अर्थ ॥ हवेजीनन्यजवाधाश्री उपदेगकन्ने हंयान्माजोतुं पोनानासुगनंथ थे सोनकरेने तोड़ानाटिक जे छानटीनयनेचाग्नि एनागरत्ननेविपे लोनरूर बी जीधनधान्याटिक बनारवस्तुथी कांहिमुग्यनयाय माटेचतुग्धान्मा तुंबातोके इन्दनेधये वाह्यघीधनधान्यादिक धन धनग्गधी क्रोधमानाटिक परिग्रनपि सोन कग्मिनही ॥ १२ ॥ करोपि यत्प्रेत्य दिताय किंचित्कदाचिदल्पं मुन कयंचित् ॥ माजीदरम्मन्मदमत्सराविना च नन्मां नरकानिधिनः ॥१३॥ अपाहवेजीवने मुस्तरावायाची उपदेन दद्यान्मा को कचित्य ३ ३२ अध्यात्मकल्पाम. यत्कपायजनितं तव सौख्य यत्कपायपरिदाणिनवति ॥ तविशेपमयवैतज्दर्क सविनाव्य नज धीर विशिष्ट॥६॥ यथावली प्रकारातरे कपायत्यजवु उपदेडोठे हेप्रात्मा तुजनेकपाययी उपनुजेस ख अनेकपायना परित्यागथी उपनुजेसुख एवेनुविगेपजे यधिकपणु तथा उढर्कके० निदानो विपाकजेफल तेसम्यक प्रकारे विचारीने पचे हेधीरपमित एमाजेतुजने विधि एउत्तमजाणवामाश्रावे तेनेतुथादरअगीकारकर ॥ ६ ॥ सुखेन साध्या तपसा प्रत्ति यथातथा नैव तु मानमुक्ति ॥ आया न दत्तेपि शिव परा तु निदर्शनाहागुलबले प्रदत्ते॥७॥ सम्यग् विचार्येति विहाय मान रदान् रापाणि तपासि यत्नात्॥ मुदा मनीपी सहतेऽनिनूती शूर मायामपिनीचजाति ॥७॥ ययाहवेतपकरवाथी मानत्यागनी ष्करता देखाउने हेयात्मा जेम तपनोप्रा तितेसुखेसाध्यने तेममानमुक्तिजे माननुत्यजवु तेसुखेसाध्यनथी तो याद्याके. पहेन कहीजे तपप्रवृत्तितेमुक्तिश्रापवा समर्थनथीथने बीजोजेमानमुक्ति तेयद्यपिड साथ- तोपणते मुक्तियापवाने समर्थठे वाहुबलनेदृष्टातें जेमवादुबलने मानमुक्तिविना,मा तपथकीज केवलझान उपनुनही यनेमानमुक्युं तेवारे तत्कालज्ञानउपनु एबुसम्प विचारीने मानत्यजीनेयत्ने करीनन एहवोजेतप तेनेराखतोथको दमाने विषेश एवोजे मनीपीके पमित ते नीच जननो करेलो यनिनूति जेपरानव तेनेपण मुन के० हपेकरीनेसहेने ॥ ॥ ७॥ एबेकाव्यनोथथएकोले परानिनूत्याल्पिकयापि कुप्यस्यघेरपीमा प्रतिकर्तुमिचन् ॥ नवेसि तिर्यड्नरकादिकेपु तास्तैरनतास्त्वतुला नवित्री ॥५॥ थर्थ ॥ वजीएपरिसह सहेवाथाश्रीज उपदेशेने हेयात्मातु थोडीपण परनीक सीजे थनिनूति पीडादिक तेणेकरी थनिनूतिना करनारजे पुरुपतेउपर कोपेने अ वजी पापकरीने तेहना प्रतिकारने वाले एटले पूर्वजन्मातरना पापविपाकथकी रानापामेवे थनेवलातेहनो प्रतिकारपण पापेकरीनेज वा परतुतेपापेकरीने थनिनूतिजेपीडाथो तेत्तिर्यचनरकादिक गतिनेविषे थनततथाथतुल मोहोटी ए। नपित्रीकहेता पीडायागे एबुकानथीजाणतो ॥ ए॥

कपायत्यागाधिकार. धत्से तिन यचपकारकेपु क्रोधं ततो धेारिपट्टएव ।। अथोपकारिप्वपि तनातिकतकमहन्मित्रवदिपित्सु ॥ १७ ॥ अर्थ वेकोधकन्वा तेवगनेन वियुक्तने तेकहने पंमितवात्मा जोतुं अपकारक शत्रुनविषे क्रोधधरनेतो तनेवदलेताहग यंतरंगनाजे क्रांय मान माया लोन गग धनोप मतीनशत्रुचे तेदनेविपेज क्रोधयर केमकेएलगत्रुथी बीजोको तुमने बधारेमुग्यदानी अथवा उपकारक मित्रनविपे जोतुंशोधधरतोनयी तेवारतुं तं नारमा अतिकारी एदवाडानावर्णादिक कर्म तेनोहरणकग्नाराजे उपनगादिकना करनार शत्रु तेनाउपसर्गने करवेकरी वाह्यदृष्टियेतोते ताहराशत्रूचे पणकर्मदयकर वामां घनेपरलोकना अनंतमुखनीप्राप्तिकरवामां साह्यकारीयया माटे तत्वदृष्टि जोता अन्यतरपणे तमित्रनावेज परिणम्या तेथी उपसर्गकारकत्रने तत्वदृष्टीयें मित्रनुष्य जोड्ने तमित्रनेविप क्रोधनधरवो एनावार्थने ॥ १० ॥ अधीत्यनुष्टानतपःशमाद्यान् धर्मान् विचित्रान् विदधत्समायान् ॥ न लप्स्यसे तत्फलमात्मदेवलेशाधिकं तांश्च नवांतरेपु ॥ ११ ॥ अर्थ ॥ हवेमायात्यजवा यात्रीउपदेशेने हेयमातुंअधीतिकेजगई तथाथ नुष्टानजे क्रियायावत्यकादिक तथातपउपगमादिक नानाविधधर्म ते मायाके कपटसहित करतोयको मात्र पोतानादेहने कप्टजयापेठे पणतेथी व्यतिरिकके। वीफलकांनवातरनेविपे पामीसनही वली नवांतरनेविपे तेधर्मनेपणपामीसन दी कैमकमायावीन वोधीपामवी नहोय ॥ ११ ॥ मुरवाय धसे यदि लोनमात्मनो झानादिरत्नत्रितये विधेदि तत् ।। उखाय चेदन परत्र वा कृतिन् परिग्र तहद्रिांतरेपि च ॥ २॥ अर्थ ॥ हवेलोनत्यजवायाश्री उपदेगकरे। यात्माजोतुं पोतानासुखनेत्र थे लोनकरते तोज्ञानाटिक जे ज्ञानदर्शनयनेचारित्र एत्रणरत्ननेविपे लोनकर वी जीवनधान्यादिक असारवस्तुथी काहिमुखनथाय माटेहेचतुरयात्मा तुंचालोके रखनेबर्वे वाह्यथीवनधान्यादिक अने अंतरंगथी कोधमानादिक परिग्रहनेविपे लोन करिसनही ॥१२॥ करोपि यत्प्रेत्य हिताय किचित्कदाचिदल्पं सुकृतं कथंचित् ॥ माजीदरम्तन्मदमत्सराविना च तन्मी नरकातिथिः ।। १३ ॥ यादवजीवने सुरुतराखवायाश्रयी वपदोते हेयात्मा कोश्काने कथंचित्य ५ ३४ अध्यात्मकल्पडम. ऐकष्टेकरीने काइएक अल्पके० थोपणसुरूत जेदानादिक तथातपसयमादिकते प्रेत्यके परलोकना हितनेयर्थफरेने तेसुरुतने मद मत्सर कोष सोनाटिके करीने हारिसनही यनेवली तेसुरुतविना सातनरकनो अतिथिके परोयो थशनही एटले तेसुस्त खोयाथी नरकगतियो तेमाटे मदमत्सरादिकने निवारीनेसुस्तराखजे॥१३ पुरापि पापै पतितोसि ससृतो दधासि रे कि गुणिमत्सर पुन ॥ न वेत्सि कि घोरजले निपात्यसे नियत्र्यसे शृंखलया च सर्वत ॥२४॥ अथवली मत्सरत्यजवाधाश्री उपदेशेठे हेात्मातु पूर्वेपण पापेफरीने ससारमा पडयो अनेरलीगुणवतने विपे शुमत्सरधरेने एमकानथीजाणनोजे एमत्सरतोम जने घोरके अगाधड खरूपियु जेमा जलबे एहवा ससाररूपीया समुइमानाखेने थनेवली ताहरा सर्वांगने निकाचित कर्मरुप साफलेकरीवाधेठे ।। १४ ।। कटेन धो लवशो मिलत्यय दय कपायैर्युगपत्प्रयाति च ॥ अतिप्रपन्नार्जितमर्जुन तत किमझ ही दारयसे ननस्वता ॥१५॥ थथहवेयात्माने कटेउपजितधर्म राखवानो उपदेशकहे हेयात्मातुधर्मनु एकन वलेशमात्रपण कटेंकरीने सचयकर केजेथकीताहरो कपायेकरीने युगपतके समकाने घणाकालनो सचित करेलुजेक्लेगते एफवारेज झ्यपामे तेमाटेहेमूर्ख घणाग्द्यमे उपा ज्युएहनु थर्जुनजे सुवर्ण ते वायुएकरीने हाइतिखेदे शुहारी जायचे एटलेसुवर्णरत वायुये हायानीपरे करेनपायोजेधर्म तेनेकपायरुपवायुये हरावेठेतेयुक्तनथी ११५ शनवति सुहृद कलपीनवति धर्मा यशासि नि चिता यशसीनवंति॥स्निह्यति नैव पितरोपि च बाध वाश्च लोकक्ष्येपि विपटो नविना कपाये ॥ १६ ॥ अर्थ हवेकपायथी श्याश्याअवगुणयाय तेकहेले ससारीजीवने कपायेंकरी ने मित्रतेशJथाय बजीपमजे तपदानादिक तेमेजाथाय वलीचिरकालनोसचेलोयश तेपण थपयशसरखोथाय वलीमातापिता तण बीजासजनादिक तेपणको स्नेह | नको तेमाटेप्राणीने करायकरी थालोके वनेपरलोकेपण थापदाथाय ॥१६॥ रुपलानकुलविक्रमविद्या श्रीतपोवितरणप्रनुताये ॥ कि मद वदसि वेसिन मूढानतश स्वनृशलाघव ख ॥२७॥ श्रये ॥ हवेजीपने मदनिवारगयाश्री उपदेशकहेठे हेयात्मातुं रूप लानक ज पराक्रम विद्या लक्ष्मी तप दान ऐश्वर्य तथाथादिशब्दथी जाति परिवार स्त्रीम कपायत्यागाधिकार. ३५ - : इत्यादिके करीने मद अहंकार मुंवहेठे? हेमूर्खधनंतिवार पोताना अतिशये घवपणानुजे सःख तेकेमनथी विचारतो ? तुंपोज अनंतिवार कुरुप लानरहि हीनकुल निर्वल मूर्व दरिड़ी तपकरवाने श्रगत कृपण दास किकर एडवो पतयो हतो लापणसर्ववाते हीनपणुं यनुनव्युं तोयाजहां शुमदकरेठे ॥१७॥ विना कपायान्ननवार्तिराशि नवेनवे देव च तेपु सत्सु ।। मूलं दि संसारतरोः कपायास्ततान् विदायैव सुखी भवात्मन् ॥२७॥ अर्थ ॥ वलीफरीने कपायनुत्यजबुज पढेते. हेयात्मासंसारमा कपायविना संसार बंधीनी धार्तिनोसमूह होयजनहीं अनेतेकपायेंकरी विद्यमानठते नवार्तिनीराशि यज केमके संसाररुपीया वृदनुमूल तेकपायजवे. माटेतेकपायनेठांमीनेसुखीया. तिसुखनेपाम. ॥ १७ ॥ समीदय तिर्यङ्नरकादिवेदनाः श्रुतेदाणेईमरापतां तथा ॥ प्रमोदसे यक्षिपयैः सकौतुकै स्ततस्तवात्मन् विफलैव चेतना॥१९॥ थर्थ ॥ हवेजेविषयने त्यजीशक्तोनयी तेप्राणीने शास्त्रनण्यो तेपणयफलवे ते श्रीकहे देयात्मा श्रुतजेसिक्षांत तेनेजोवेकरीने तिर्यंच नरक प्रमुखनी वेदनाने थासर्वकनापित धर्मउर्जनपणुंठे एमतेसम्यक्प्रकारेंजाणीने पणजोतुं कौतुकस हतयको विषयमांराचे तेवारें ताहारो चेतनाजे ज्ञानदृष्टि तेनिस्फल केमके तुंन कादिकनाडखने जाणतोढतोपण उनिधर्मपामिने धर्मकरतोनथी ।। १५ ॥ चौरेस्तथा कर्मकरेगहीते टेः स्वमात्रेप्युपतप्यसे त्वं ॥ पुष्टैः प्रमादेन्तनुनिश्च पुण्यधनं न किंवेत्स्यसि लुग्यमानं ॥ ३० ॥ थये। हवेधर्मरूपधन तेजुटानयी तथाश्रीजीवने उपदेशकहेठे हेयात्माचार को तथा उटकुलदणकर्मकर जटासादिकतेणे स्वमात्रके मात्रबाह्यधनने अप खावतां तुंपरितापकरेते पणपोतानापोया एवाजेप्रमाद तथा तनुके शरीर तेणेची नीपेठे सुटयु एहजे ताहरु पुण्यरूप धन तेसर्वबुंटाऽजायठे माटेतेहनी रक्षाकर जेथीतुं नवांतरेंमुखीयाय !! 201 मृत्योः कोपिन रहितो न जगतो दारिद्यमुत्रासितं रोगास्तेनन्पादि ना न च नियोनिर्णाशिताः पोडश। विध्वस्ता नरका न नापि मुखिता चमैत्रिलोकी सदा तत्कोनाम गुणोमदश्च विजुता का तेस्तुतीचा च का ३६ अध्यात्मकल्पप. थर्थ ॥ वलीयात्माने गुणरहितपणुदेखाडी मदोमवा उपदेशकरेठे हेात्मा जोतें मृत्युनामुखथी कोप्राणीराख्योनथी तथा जगतजे विश्वतेनु दारिइनाशपमा उधुनथी वलीसोलेरोगजे कासादिक तथाराजायने चोरप्रमुखनालय तेनाशपमाडया नथी वलीसातजेनरक तेपणनिवाखानथी तयाधर्मकरीने त्रिनुवनने सदासुखीकीधुन थी इत्यादिकगुणमाहेलो एकगुणजोताहरामानथी तेवारताहारोगुणतेम्यो, थनेतेगु णविना मदतेश्यो, तथा विजुताके मोहोटाश्तेशी, तथास्तुति प्रगसानीवाला तेप पशी, एटलेपूर्वोक्त तथाविध कोश्गुणजोताहामाहोयतो मदकरयोपणघटेवे पण तेविना तोजेमदकरवीतेसवै निर्थको तेमाटे मदमत्सरादिकत्यजया २१ इतिश्री थध्यात्मकल्पामेविषयकपायाद्यवशताधिकार सप्तम सपूर्णम्म ॥ अथशास्त्राण्यानित्योपदेश ॥शिलातलाने हदि ते वहति विशति सिक्षात रसा न चात ॥यदन्न नो जीवदयाऽता ते न भावनाकूरततिश्च लन्या॥१॥ अर्थ ॥ दवेयाठमेथधिकारे शास्त्रगुणकेहेठे त्यांप्रथमनपमानेशिदातरेचित्तनुरू विणपणुदेखाडेते देशास्माशिलाना तलियासरखा ताहराहृदयमा सिक्षातरूपिया रसवहे पणतेथीतारोपत करण लिगारेनेदातोनी केमकेएहृदयमा जीवदयाप णीकोमलता तथानावनाजे अनित्यत्वादिक तेरुपीयाकूरनी श्रेणी देखाती न थी कोमलप्टथ्वी जेम जलप्रवाहनेयोगे थाईतापामे तथात्या अनेकअंकुरादिप्रगने तेमवासनसिद्धिकजीवने सिक्षांतनायोगथी हृदयमा कोमलताथाय तथानावनार मुख शुनपरिणामपणउपजे थनेरसिधिकजीवने तोए शिसातलनुदृष्टांतजाएबु यस्यागमानोदरसैन धौत प्रमादपक स कथ शिवेच्छु ॥, रसायनेर्यस्य गदा दता नो सुलन जीवितमस्य नून ॥२॥ थर्थ ॥ हवेउक्तिविशेपेकरी सिक्षातनु माहात्म्यकहे जेप्राणिने बागमसिद्धांत तेरूपीया मेघनेरसेकरी प्रमादरुपीयो पकजेकचरो तेधोवाणोनथी तेवाप्राणिमुक्ति भुवावेने एटले जेने सिक्षातजाणवाथीपण प्रमादमट्योनही तेप्राणिपत्रे श्याची मादरहितय मुक्तिपामगे केमो सिमांतयोथधिक बीजोको प्रमाद परिहारनो उपायनची तेवपरदृष्टांतकहे जेपुरुषने रसायनजेपारदादिक तेथीपण रोगक्ष्यन पाम्यो तेनेजिवतव्य तेयषुजलन एमहापणजे सिक्षांतजाणीने प्रमादरहितन | पाप तोतेनेमुक्तिपामवी पणीज उर्जन ॥२॥ -

शास्त्रगुणाधिकार.
३७
अधीतिनो दिकृते जिनागमः प्रमादिनो ऽर्गतिपापतेर्मुधा॥
ज्योतिर्विमूढस्य दि दीपपातिनो गुणाय कस्मे शलनस्य चक्लुपी॥३॥
अर्थ ॥ हवेजेपुरुपतिक्षांतनणिनेपण प्रमाढवंतवे तोतेहनणदुं त्यावेते कहे
ने जेपुरुषप्रमाढवंत सर्वथा उर्गतिनोपंडनार तेयादिके केवलपूजासत्कारादिक
नेजवर्थे सिमांतनणे एवोहोयतेहनु नस्यु मुधाके निष्फलजाणवू तेउपर दृष्टां
तकहे ज्योतिके प्रकाशंकरीनेज मुंफाणोथकोदीवामानश्पडे एवोजे गलनके
पतंग तेहनांच एजेनेत्र तेकेवागुणनाअहोय एतोउलटाअवगुणकारीजयाय तेमप्र
मादिनीवरूपजे पतंगते अर्चासत्कारादिक ज्योतिमां मुंफाणोथको उर्गतिरूप टीप
ज्वालामांपडेठे त्यांसिक्षांतरूपचहुतेकांईकामनधावे सामोमोहकारीयाय ॥ ३ ॥
मोदंते बहुतर्कतर्कणचणाः केचिजयाघादिनां काव्यैः केचन कल्पि
तार्थघटनैस्तुष्टाः कविख्यातितः ॥ ज्योतिर्नाटकनीतिलहणधनुर्वे
दादिशास्त्रैःपरे ब्रूम.प्रेत्य दिते तु कर्मणि जडान कुदनरीनेव तान्॥४॥
अर्थ ॥ हवेतत्वज्ञान विना घऍनस्योपण व्यर्थठे तेदेखाउने केटलाएकपुरुष घ
गातर्कजेप्रमाण प्रमेयादिन्याय तेहनातर्कविचारनेविपे चपके प्रतिष्टित एवाठतां प
रवादिने जीपवायकी हर्पपामेठे तथावलोकेटलाक चिंतव्याअर्थनी रचनाएरच्यां
एहवेकाव्येंकरीने कवीपणानीप्रसिध्यिकी संतोषपामेठे वलीकेटलाएक ज्योतिप नाट
क नीतिके व्यवहार शास्त्र लक्ष्पके सामुहिक तयाधव गजलदाणादिक धनुवै
टकेण्यायुध श्रन्यासनांगास्त्र यादिशब्दयी शकुन गारुमि इत्याटिक शास्त्रेकरीने सं
तोपपामेवे पणपरलोकनेविपे हितकारीएवाजे तंयमादिककर्मतेने विपेजो जडके
अहानतोतेसर्वेने थध्यात्मशास्त्रने धनुसारे अमेपेटनरा कहियें ये एटलेअध्या
त्मगारनेमूकीबीजासर्वजे पापश्रुतादिशात्र तेपेटनराऽनाजवे ॥ ४ ॥
किं मोदसे पंडितनाममात्रात् शास्त्रेप्वधीतीजनरंजकेपु ॥ तल्कि
चनाधीप्य कुरुप्व चाशु न ते नवेचन नवाब्धिपातः॥५॥
थर्थ ॥ वलीतेहिजढेने हेपंमिततुं जनके० लोकनेरंजनना करनार एदवाजे
श्रृंगार नाटककाव्यादिशास्त्र तेहनेविपेप्रवीणयको नाममात्रपंमितपणायी शृंदर्पपा
मैठे एलोकरंजकशास्त्रथी कांथात्मार्थनीतिदिनथी पणतुंगास्त्रनेजाणिने शीध्रपणे
कांइकएहवीकरणीकर केजेणेकरीने तुलनेसंमार समुहमा चुमनयाय एटलेजिनाग
मनणिने तेहनेअनुसारें संयमधाराध ॥ ७ ॥

गानयी कुपिक.मग ऽपित एटलेका पूजासत्ताई मनादिरंथासक्तपणेकरी कृषिफल्पचितवे एटलेहिनी परीग्रहमेनवु एरीक्ष्यि रात्रदिवस खितयारह अध्यात्मकल्पद्यम धिगागमेर्माद्यसि रजयन् जनान् नोद्यसि प्रेत्य हिताय सयमे॥ दधामि कुदिनरिमात्रता मुने व ते क्वतत् क्वैप च ते नवातेर ॥६॥ थर्थ ।। हवैक्रियाविना केवल यागमनुनणवु तेपण अर्थसाधकनयी तेकरे। हेमुनितनेरिकारने केमकेतु यागमतिकात तेणेकरीने लोकने रीकवे पणपरन कना हितनेमाटे सयमनपिउद्यमवत नथीयातो तेमाटेतुकेवल पेटनराइजकरे, पणताहयादगपयुके नतिरनेरि तेजिनागमकिहा अनलोकनुरीमववुपणकिर तयासयमपणकिहाँ एटले नवातरेएवीगतिपामिग केजिहाएमाहेलोएकेतुजनेनहोग धन्या केप्यनीतिनोपि सदनुष्ठानेषु बचादरा उसाध्ये पु परोपदे गलत अज्ञानशुक्षाशया ॥ केचिवागमपाग्निोपि दधतस्तन्यु मकान येऽसमा अत्रामुत्र हितेषु कर्मसु कय ते नाविन प्रेत्यदा ॥ यर्थ ॥ यादोनणागयोपण किहा क्रियानो उत्कर्षदेखामे केटलाकर लीयापारसनापण अक्षानजे सम्यकतेणेकरीने गुवाशपके० निम मागपतोपग मातेपारका उपदेगना लेशमात्रथीपण पुरवसाध्य ननायनुटान तपमयमादिक्रियापिगप तेहनेपिपे यादरवत हाति कारता यागमना नणनारलता तथाधागमना पुस्तकधरताठतांपण थालोक पाजोग्नपि हितराम जेमयमादिक तेहनेपिप निरादरकरेने ते पुरुनने५. चिरापाश एटमेग्नतेनी शीगतीयानो थर्थात् ते माहाज खपामशे ॥ ७ ॥ धन्य ममुग्धमतिरप्युदितार्ददाझारागेण य. सृजति पुग्यमरिकल्प पनि फि व्यसनतोस्य तु विकल्पे पाघम्यितात्र सदनुष्ठितिषु प्रमादी॥॥ऽतिवापार ॥ चनीयात एहिजश्ने जेथ.पश्रुतपतयको पणफदाग्रहरहितहोप ने का मलाहिये तेपणनजाण मोजे नदितके० सिक्षातोक्त एहयोजे । जनन गरीने रोजिनाझानोनगाय एवीबुध्येि कुविक परहित सपा मुनिनेपनियोपण दामयम्तहोयतो तेनेघपुनस्येपण शागत . ज

चतुर्गत्याश्रीतोपदेश.
३ए
ग्नेनलाअनुष्टान जेगुनक्रियातेनेविपे प्रमादवंतने तोतेहनुनण्युपण निष्फल श्रा
गव्यपेहेलाकाव्यर्नु पाठांतर ॥ ७ ॥
अधीतिमात्रेण फलंति नागमाः समीदित वसुखेनवांतरे ॥
स्वनुष्ठितेः किनु तदीरितैः खरो न यत्सिनाया वनश्रमात्सुख॥५॥
अर्थ ॥ वलीतेजढकरे हेात्मा केवलनण्यामात्रथकीज आगमसिहांतते
नवांतरनेविपे वांवितसुखेकरी फलेनही इटफलदायकनहोय पणतेसिक्षांतनेविपे
ह्यांजे स्वनुष्टितके नलाअनुष्टान तपसंयमादिक तेनेयाराध्ये ते बागमफलदायक
होय तेउपरदृष्टांतकहे जेमखरजेरासन तेसाकरनोनार नपाडवामात्रथी सुखोई
होय साकरनापरिनोगर्नु सुखनपामे तेम आगमनणवामात्रथीज आगमोक्त क्रिया
जनित फलपामेनहीएवाइतिश्रीअध्यात्मकल्पद्रुमे शास्त्रगुणाधिकारोऽप्ठमःसंपूर्णः॥
अथचतुर्गत्याश्रितोपदेशः॥धतो यदणुतोपि पुरस्य मृत्युरायूं
पिसागरमितान्यनुपक्रमाणि ॥ स्पर्शः खरः क्रकचतोतितमामित
श्व उ.खावनंतगुणितो नृशशैत्यतापौ॥१॥तीवा व्यथाःसुरकृता
विविधाश्च यत्राक्रंदारवः सततमभ्रनृतोप्यमुष्मात् ॥ कि नाविनो
न नरकान् कुमते विनेपि यन्मोदसे दाणसुखेविपयैः कपाय॥शायुग्मं
अथ॥हवे एपूर्वोक्तशास्त्रधारांतर्गत चतुर्गत्याश्रीतउपदेशकहे तेमांप्रथम शास्त्रोक्त
नरकगतिनाउःखकहे निश्चेकरी नरकना एकपरमाणुमात्रना दुर्गधयी पुरवासिस
मस्तलोकनुं मृत्युथाय एहवामहाधमय नरकनापुजल वलीजिहां निरुपक्रमके
थपवर्तनरहित निकांचित् अने सागरोपमेप्रमित एकसागरोपमयी मामीने तेत्रीत
सागरोपम पर्यंत एदवायाऊपाठे केमके देवतायने नारकीनाबानपा सदाइ निरु
परुमहोय वलीजिहां स्पर्शतेपण करवतनीधाराथी कर्कश वलीइहायकी अनंत
गुणऽ खदायी महाशीत तथा महातापठे एमत्रवेदनाकहीने हवेपरमाधामीनी
करेलीवेदनाकहे वलीजिहां देवताजे पन्नरने परमाधामीतेहुनीकरेली यतितीव
कठोरजे वेदना तेविविधप्रकारना वेदन विदारणादिकहोय एप्रकारे निरंतर थाक्रंट
रुदनने गन्देकरी थाकागनेपुरतो एहवोजे नविष्यमाण नरफ तेहथकी हेकुमतिवं
तथात्मातुं केमनथीविहितो जेमाटे कपायसहितयको क्षणमात्रसुखनाफारक एह
वाविषयजे अदादिक तेणेकरी हर्पनेपामेने एवेकाव्यनो अर्थएकोले ॥ १॥ ७ ॥

४०
अध्यात्मकल्पद्यमा
वधोऽनिश वाहनताडनानि तृटामातपशीतवाता ॥
निजान्यजातीयनयापमृत्य खानि तिर्यवितिऽ सदानि॥३॥
अर्थ ॥ दवेतिर्यंचगतिधाश्री 5 खदेखाडे थनिशके नित्यबधन तथा वाहन
के नारनुउपाडवु तथापराणादिकना प्रहारेकरी ताडन बली कृधा तृषा रामके।
कुष्टरोग यातप तडको तथाटाढ्य वायुइत्यादिक तथावलीस्वजातीनोन्य जेमम
हिपने महिपनोनय तयाहस्तिने हस्तिनोनय तयायन्यजातीयनय ते जेम मृगारि
कने व्याघ्रादिकनोनय तथाअपमृत्युजे कुमरण सम्गप्रहारथी तयायाहेडीप्रमुख
थी तथाजल दावानल विपमादिकयोगथी क्रुधातृपादिक गाढवेदना थाक्रातपणे
यकालमृत्यु इत्यादिकप्रकारे तिर्यचगतिमा जयकरकठीन 5 खहोयठे ॥ ३ ॥
सुधान्यदास्यानिनवान्यसूया नियोतगर्नस्थितगतीना ॥
एव सुरेप्वप्यसुखानि नित्य किंतत्सुखैर्वा परिणामउ खै ॥४॥
श्रयं ॥ हवेदेवगतिथाश्री खकहे नित्यप्रतें मुगाके फोकट थन्यके पारकी
सेवा करवी केमकेमनुष्यतो धननालोने तथाआजीविकादिक कारणथी परनीभवा
को थनेदेतानेतो तेवोकोशनिमित्तनथी तोपणसदाकालें इशदिकनीसेवाकरवीत
थाथानवजमहारादिकनी पीडा थने थनिसूयाके परस्परे ईर्षा संपादिकमा बनि
श्रतके चाननुनय केमके सरवार्थसिदिना देवतानेपण चवननुनय तथागना
वासनुनय पजीबुर्गतिजे चांमाजादिककुलें अथवा तिर्यचनुअवतारले तेसबधीनय
इन्यादिक प्रकारें देवतानानवमापण घणाप्रकारे असुख तेमाटेपरिणामेंड खकारी
वाजे देवतासरचीसुग्य तो तेसुग्वेंसुथाय माटेतेसुरखनेपण असुरखकरीजाणवा॥४॥
सप्तनीयनिनोटविश्वानिष्टयोगगददु सुतादिचि ॥
म्याचिर विरमता नृजन्मन पुण्यत सरसता तदानय ॥४॥

चित्तदमनाधिकार. ४ पनि चतुर्गतिःस्वतनीः कृतिन्ननिनयास्त्वमनंतमनेहन ॥ हदि विनाव्य जिनोतकतांततः कुरु तया न ययास्युरिमास्तव ॥६॥ अथे। दवेपनंहारकंदल दर्गमितमात्मा एप्रकारे अनंतकालसुधी अतिगय नयनीकग्नार एहवीचाग्गतिनंबंधीजे अम्बनी श्रेणी तेरते जिनान श्रीमर्वज्ञमणि त तांतजेनिहत तंधकीन्ददायमा विचागेने जेम ए चारगतिना इखनीश्रेणीयो नुजने कोश्यारे प्रासनथाय तेवो उपाय कर ॥ ६ ॥ आन्मन् पररत्वमसि साहसिकः श्रुतादय माविनं चिरचतुर्गतिउःखराशि।। पश्यन्नपीद न बिनपि ततो न तस्य विञ्चित्तये च यतसे विपरीतकारी॥७॥ अर्थ ।। दवेयात्मा चारगतीना अखजाणतोयकोपण धर्मनेविपे तत्परथातुं नथी तेवान्तपग्मयविचारीपणुं देखाडे हेयात्मातुंधविचारमाहेमुख्यठो केमके थानंसारमा चिरकाललगें नावीएहवाजे चारगतिनाउ.खनोतमूहतेदने श्रुततिक्षांत कपनेत्रेकरी देखतोत्तोपण वीकपामतोनयी वलीतेज खना समूहनोविवेद करवा नेपण उजमालयातुनथी माटेतुं उपराठांकर्मनुकरनारतो केमके उ.खचेट कर्मकर वानेबदले ग्यवृद्धिकारीकर्मकरे। इति शास्त्रोपदेशांतरगतचतुर्गत्याधिकारसमात कर्मजालैः कुविकल्पसूत्रनै निवज्य गाढं नरकाग्निनिश्चिरी। जीव दे मनः कैवर्तकस्वामिति मास्य विश्वसीः ॥१॥ अमन नामानवनमोहार कहे तेमांध्यम यात्माने मनरूपशत्रु रे जीवतुजने मनरूपी धीवर तेकुविकल्परूप सगुंय्या ए सो तेणेकरीगाढांवांधीने नरकरूप यनिकरी मत्सोनीपरें चि मधीवरपण मत्लने सूत्रनीजाले गाढोबांधीनेपवे यमीमांप उपनयजाणवू माटेताहरामनरुप धीवरनोविश्वासकरीननहीं सोवरनावनावना कुकर्मरूपजालमांपडेनही एवीरीतेवर्तजे ॥ १ ॥ चिरत्नसख प्रसीद कि इविकल्पनिकरःक्षिपसे नवे मांग कुरु कृपांनज सविकल्पान् मंत्री कृतार्थय यतोनरकाहिनेमिश् हवेयात्माबीहितोथको मनरुपमित्रने विनंतीकरते देचिरकालनामित्रतुं माहे हेवणाकालना सहचारीतुं महाराउपर प्रसादकरीने एमाता विकल्पने करीने मुजने यासंसारमा सुनमावेठे तुजनेदं हाथजोमीने कहूँई जेतुंमहारा कना सोनेनण्ययकुं रेनेमोहपमाटुं केमका जेलोकन विपे यूतादिव्यं । थको पुण्यकरेचे अनेक हने मुग्धमतिका रिहंतनी थाझातेन hesh ४२ अध्यात्मकल्पद्रुम. उपर रूपाफरीने शुनविकल्पजे धर्मध्यानलदण तेहनीनजनाकरीथापणीमत्रीस फलकर केमकेदु दवे नरकना उ खथी बीहुंड ॥२॥ स्वर्गापवौ नरक तथातर्मुहूर्त्तमात्रेण वशावश यत् ॥ ददाति जतो सतत प्रयत्नाश तदत करण कुरुप्प ॥ ३ ॥ अर्थ ॥ हवेयात्माने मनवशकरगाथाश्री उपदेशयापेने हेयात्माजे अत करण वशतथा अशथको जीरने अतरमुहूर्नमात्रमाज स्वर्गमोदादिकना सुखमतेथाये थनेनरकनी प्राप्तिपणकरावे एटलेमनवगथको जीर्णशेठ तथाप्रश्नचदराजर्षि न्या दिकनीपरे स्वर्गमोक्षादिकथापे थने मनपशथको तलमत्स्यादिफनीपरे थतर मुहूर्नमात्रमा नरकप्रतेयापे तेमाटेतुताहरायत करणनेज सर्वथाप्रकारेवशकर ॥३॥ सुखाय खाय च नेव देवा न चापि काल सुहृदोरयो वा ॥ नवेत्पर मानसमेव जतो ससारचक्रभ्रमणेकहेतु ॥४॥ अर्थ ॥ हवेतेहिजकहेठे जीपने देवता तथा वा गीत ग्रीष्मादिकका तया मित्र शत्रुतेकोऽपण सुखदायी तयाटु खदाइनहोय पणएकमन तेहिजजीवने सुग्व दायी तथा खदायीहोय हवे तेमनकहेषुळे तेकहेते समुश्मा - न्ममरणादिक तेहनुएकहेतुडे एवचन सझीपर्चही थी मनना बनावें पण ससारमा भ्रमण देखायठे॥४ ४३ चित्तदमनाधिकार. -- अर्थ ॥ जीवनेएक मनवशथयाविना ढानतया श्रुतसिक्षांतनणवु तथाध्यान तथा अर्चनजे देवपूजा आदिशब्दथी प्रासाद देवप्रतिष्ठादिक किया तेसर्वत्थाजा णवी पण तेमोक्ष्फलनी देनारनथाय केमके कपायजेकोधादिक तेसंबंधीनीचिंता थकी उपनीजे असाता तेणेकरीरहित एहजेमन तेहनुवशवर्तिपणुं तेहिजपरम योग अने तेहिज अष्टांग योगर्नु सर्वखते ॥ ६ ॥ जपो न मुक्त्यै न तपोधिनेदं न संयमो नापि दमो न मौनं ॥ न साधनायं पवनादिकस्य किं वेकमंतःकरणं सुदांतं ॥७॥ श्रर्थ ॥ जीवने नवकाराटिमनोजप तथा वाह्य अन्यंतर वेप्रकारनंतप तथासंयम चारित्र तथा दमजे इंडियदमन तथामौनजे वचननुसंवर तथा पवनादिकनुंसाधन श्रादिशब्दथी चोरासी योगासनप्रमुख तेकांमुक्तिना देवावाला थायनही तेवारे तुजने किंतुके मुक्तिप्राप्तिनो शोउपाय तेकहे जेणेरुडीरीते पोता,अंतःकरणजे मनतेदने वशकयुं तोतेहिज एकमुक्तिनुं दातार होय ॥ ७ ॥ लब्ध्वापि धर्म सकलं जिनोदितं सुदुर्लनं पोतनिनं विहाय च ॥ मनःपिशाचग्रदिलीकृतः पतन् नवांबुधौ नायतिहग्जमो जनः॥G श्रर्थ ॥ जडके० देवज्ञानीप्राणी अतिशयेंकरीपामवुलन प्रवहणसरिखो एक वोएसर्वप्रणीत संपूर्णधर्म तेप्रतेपामिने वलीतेहनेवामिने मनरूपियो पिशाचके नूततेणेघहेलोकरयोथको संसारसमुश्मांपमता आयतिहग्के उत्तरकालनो विचार करतानथी एटलेएमनयी विचारतोजे प्रवहणरूप धर्मनेठांमी संसारसमुश्मा जंपाप तरखाउँहुँ तेथी यागले हवे महारी शोगति थासे ॥ ७ ॥ सुदुर्जयं दी रिपवत्यदोमनो रिपूकरोत्येव च वाक्तनू अपि ॥ त्रिनितस्तड्पुिनिः करोतु किं पदीनवन्तर्विपदा पदे पद॥ ॥ श्रर्थ ॥ हेयात्मायतिशय उर्जयएहजे ताहरुमन तेपोतेंशत्रुपणुं याचरेठे नेवली वचनतथाकायानेपण शत्रुकरे। मन थके वचनतथा कायानाव्यापार उष्टथाय तेकारणमाटे मन वचन तथाकाया एत्रणेशत्रुयें परानव्यो एहवोतुंपगेंपगें विपदा जे नरकाटिक तेहतुं नाजनथातोयको तुसुकेरे एटलेताहरोकांचालतुं नर्थ रे चित्त वैरि तव किं नु मया ऽपराछ यहुर्गती दिपसि मां कुविकल्पजाले नासि मामयमपास्य शिवेस्तिगंता तत्किन संति तव वासपदह्यसंख्या

४६
अध्यात्मकल्पजुमा
अथ सामान्यतो वैराग्यधर्मोपदेश ॥ किं जीव मायसि ढसस्य
यमीहान् कामाश्च खेलसि तथा कुतुकैरशकः ॥ चिक्ति
प्सु घोरनरकावटकोटरे वा मन्यापंतल्लयु विनावय मृत्युरत ॥१॥
थर्थ ॥ दवेसामान्यथी वैरागोपदेशनामा दसमोयधिकारकहे तेमांप्रथमजीव
ने मरणसबधीनयदेखाडे हेजीवतु मदशानोकरे तथासुहोने चली थर्थजेसुव
रुपादिक तेहनेसुवाउने तथावली निकटतो कीतुकेकरीने कामजे शब्दादिक
विपय तेप्रतेसुरमे तुजनेतो जयकर नरकरुपजे खाइ तेमानाखवावाटतो एवो मृ
त्युरुपजे राक्षस तेउतावलु तारेसन्मुखथावतु सनिलीने नि गकरहिशनहीं॥१॥
आलवन तव लवादिकुगरघाताश्विदति जीविततरु न
हि यावदात्मन् । तावद्यतस्व परिणामहिताय तस्मि
न छिन्ने हि क क्वच कथ नविता स्वतंत्र ॥ ३ ॥
थर्थ ॥ दवेयाम्पुविद्यमानबते जीवनेधर्मकरवु उपदेशेठे हेयात्माताहरो था
जबनसाधारनूत एहवोजे जीवितव्यरुपद तेप्रते लवादिकजे लव लेश कृण घ
डी मुहूर्तप्रमुखकालमान तेरूपीया कुहामानापाव जाहालगेदेनदी तेहथी पहेलो
ज परिणामहितजे निदानहितकारी तपसयमादिक तेहनेवग्यमकर जेष
कोताहरो जीवतव्यरूप दृवेद्यापछि फरीतेहने नवपल्लवकरवाने किहाक कोकर
कारें पण मत्रपायथासे जेणेकरीतु जीवतव्यरुपतरुने नवपन्नवकरीस एटलेद
शेक्षणे जीवतव्यरूप ददातुजायचे तेवेदाइगयापठि फरीसऊकरवानु कोइउपा
यनथी तेमाटे यात्महितनेविपे तत्परथावु एहिजश्रेटउपाय ॥ ५॥
खमेव माग्धा मतिमान् समात्मन्नेष्टाप्यनेष्टा सुखदु खयोस्त्व ॥
दाता चनोक्ता च तयोस्वमेव तच्चेष्टसे कि न यथादिताप्ति ॥३॥
थर्थ ॥ दवेसर्वकरणीते थात्मानेथाधीन एहबुकहिने विशेपेंप्रेरे हेयात्मातु
मोग्धाके मूढतासहित यने मतिमान्के ज्ञातापणतुठो वलीमुरखनु वांचक थ
नेपु खनुअविकपणतुठो तथासुखथने खनुदाता थनेनोक्तापणतुजनो केमके सु
पड खते स्वरुतकर्मथीजयायठे यउक्त श्रीउत्तराध्ययने थप्पान वेयरणि थप्पामे
कूमसामली थप्पाकामध्याघेणु थप्यामेनदणवण थापाकत्ताविकनाय इत्यादिक
माटे जेरीते ताहरीयात्माने हितनीपजे तेमजकानथीफरतो ॥३॥

४ वैराग्योपदेशाधिकार, कस्ते निरंजन चिरंजनरंजनेन धीमन् गणोस्ति परमार्थहशेति पश्य ।। त रंजयाशु चरितैर्विशदेवाब्धी यस्वां पतंतमवलं परिपातुमीटे॥४॥ अर्थ ।। हवेलोकनेरीजवतोयको आत्मापोतानुं हितकांकरतोनथी तेधाश्रयीन पदेशेठे निरंजन देनिरलेपत्रात्मा हेवुद्धिवंत देहिताहितविवेकनाजाण चिरकाल जावजीवलगें लोकनुरीजव एटलेमलीनवस्त्र धारणकरी वाह्यक्रिया देखामीने यू न्यचित्तें वामेतामें उपदेशयापीने लोकनुमनरीजवq तेथीतुनने गोगुणवे एटझुंत खटे विचारी परमार्थदृष्टीयेलोतां लोकरीजव्याथी आत्माने अर्थलिक्षिकांनी तेमाटे लोकरंजनत्यजीने उतावलोययी विशदके निर्मलजे चारित्र तपतंयमादिक आचरण तेणेकरीने श्रीवीतराग तयातेमनानापेलाधर्मनेरीजव जेथकानुजने य वसंके० परनवे तंवरहित संसारतमुडमांपडताथका राखवानेसमर्थथाय केमके संसारमांपडता एकधर्मजाधार थापो पल्लोकको अाधारधापशेनहीं ॥४॥ विधानदं सकललब्धिरदं नृपोदं दातादमनुतगुणोदमदं गरीयान्। इत्याग्रकृतिवशात् परितोपमेपि नो वेत्सि किं परनवे लघुतां नवित्रीय अर्थ ।। हवेअहंकारनिवारवा उपदेशेठे हेयात्मा ढुंपंमिततुं दुसर्वलक्ष्मीचे स हितद्वं हूंराजाबु ढुंदातारडं दुंयनुतगुणवंतर्बु तथाढुंमहोटोडे इत्यादिकजे पोता नामनकल्पित यहंकार तेहनावशथकी तुं परितोपके० हर्पपामेठे पणजन्मांतरें नाविनी एवीतेपदार्थोनी लघुताप्रते कांविचारतोनयी जेजेपदार्थनेतुं थानवमां दुपदेकरे तेतेपदार्थनीतुं परनहीनतापामिस ऽतिनावःयक्त योगशास्त्रे ॥जाति लानकुतश्वर्य वतरुपतपःश्रुतः।। कुर्वन् मदं पुनस्तानि हीनानि लन्यतेजन इति ।।५।। वेत्सि स्वरुपफलसाधनबाधनानि धर्मस्य तं प्रनवसि स्ववशश्च कर्तु।।तम्मिन् यतस्व मतिमन्नधुनेत्यमुत्र किचित्त्वया दिनदि सेत्स्यति नोत्स्यते वा ॥ ६ ॥ अर्थ ॥ हवेथात्माने हिनधर्मकरवानी प्रेग्णाकरे हेक्षितप्राणी तुंधर्मर्नु स्वरूपजे क्षात्यादिकटाविध लक्षण तथाधर्मनुंफलजे मोक्षादिक तयाधर्मनुंसाधन जे मनुष्यजन्म थार्यक्षेत्रादिक तयाधर्मना बाधकजे कुजन्म कुटेत्र प्रमाद मिच्या ल यादिकमर्वप्रकारने वेत्तिके जाणेने यनेवती स्ववनके पोतानेवायको ध मकरवाने समर्थपणठो पणतिर्वच नारकीनीपरें पविग तयाधर्मक्ग्याने असमर्थ ४त अध्यात्मकल्पद्यम नथी तेमाटे थानवमाज धर्मनेविपे उद्यमकर केमकेफरी परनौते कोइ सीजेनही तथा तुजने तेवा धर्मनु फरीकांइ जाणपणुपण नहीयागे माटे ॥ ६ ॥ धर्मस्यावसरोस्ति पुजलपरावतैरनतैस्तथा यात संप्रति जीव दे प्रम हतो दु खान्यनतान्ययम् ॥स्वल्पाहः पुनरेप उतनतमश्चास्मिन् य तस्वाईतो धर्म कर्नुमिम विना हि नहि ते उखदय कार्दचित् ॥७॥ अर्थ ॥ हवेथात्माने धर्मनुअवसरजणावे हेजीवयनंताऽख सहित तुजने थनंते पुजलपराव ससारमानटकता सप्रतिके दमणा थानवमा धर्म करवानुश्रव सस्थाध्यो अनतवत्सर्पिणी अने अवसपिणी प्रमाण एफपुगनपरावर्त थाय ते हनुस्वरूप ग्रथातरथीजाणवु एधर्मनुअवसरते थोडाजदिवसलगणवे फरीपामबुध णुउर्जन तेमाटेएयवसरे श्रीजिनोक्तधर्म करवाने उद्यमकर केमके एजिनोक्तधर्म विना ताहरे किवारेपण जन्ममरणादिकना उखनो क्ष्यथवानुनथी माटेजोड व नु अतकरवाने वाढतोहोयतो एअवसर पामिने धर्मकरवाने तत्परथा ॥ ४ ॥ गुणस्तुतिवासि निर्गुणोपि सुखप्रतिष्ठादि विनापि पुष्प ॥ अष्टागयोग च विनापि सिवितलता कापि न वा तवात्मन् ॥ अर्थ ॥ हवेअयुक्तवाठकपणाथीजीवनुवादुलापणुदेखाडेठे हेयात्मातुशानदर्शन चारित्रादिकगुणेरहितथकोपण गुणस्तुतिजे पोतानीप्रशसा लोकनामुखथी कीर्तिना वरणनने वाले तथापुस्यविनापण सुखने तथा प्रतिष्ठाके गौरवपणानेवांवेने ली अष्टांगजेयोग यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि एयातयोगविना पण सिदियष्टकर्मक्ष्यलण सिघनायाग्गुण अथवा सिदित अष्टमहासिदि लघिमा वशिता ईगिता प्राकाम्य महिमा अणिमा यनकामावसायि ता प्राप्ति तेप्रतेतुवानेचे माटेदेथात्मा एताहरो बादुलापणुते कोश्यपूर्वनबुजदेखा यवे केमके कारणनी सामग्रीविनाज कार्य नीपजाववानी यनितापाकरे ॥ ७॥ पदे पदे जीव परामिनूती पश्यन् किमीर्यस्यधम परेय ॥ अपुण्यमात्मानमपि कि न तनोपि किंवा न हि पुण्यमेव ॥ अर्थ ॥ हदेवीजानाकरेला अपमानथी जीवईपकिरे तेधाश्रीउपदेशकरे हे जीवतु पुरयरहितपणाथी थधमके नीचयवस्थापाम्योथकोपण पगेपगे बीजानी करेली जे थनिनूतिके थपमान थाकोशादिकते देखीने परेय के तेलोकउपरें सुशंके क्रोधकरे यणपोताना यात्मानेज पुल्यहीन केमजाणतोनथी जेपुरयर व वैराग्योपदसाधिकार. ताए हितदाय तंदनेता पगेंपग पगलवयाय तमांग महोटीवात एमकांविचारतानवीय थवा निधी वाग्यजकमारतोनयी केजेयकी कोऽपरानवनधाय ए ॥ किमर्दयनिर्दयमंगिनो लवून विचेष्टसे कर्मसु दि प्रमोदतः ।। यदेकशोप्यन्यकनार्दनः मदत्यनंतगोप्यंग्ययमदनं नवे ॥10॥ अर्थ ॥ दवेयात्मानने पग्नेपाडानु फलकहते हयात्मातुं निर्दयपणेकरी तारा यकी सबुक निर्वत एडवाजे अंगीक प्राणी तेदनपीडतोयको तु प्रमोदतःके टकरी पापकर्मवियें नुप्रवर्नेने कमक एकवारपण जेप्राणियें अन्यजीवन पीडान पजावीदीय नेप्राणीधनंनिवार संमाग्मांपीडामहं यह निवयउपउने सवगुणि उनयनहस्नकोडिगुणा ।। कोडाकोडिगुणोवाइल विवागो बहुतगे वा इति ॥१७॥ यया सर्पमुखस्योपि नेको जंतूनि नदयेत् ॥ तया मृत्युमुखस्योपि किमात्मन्नार्दसंऽगिनः ॥ ११ ॥ अत्रं ॥ दवनेउपर दृष्टांतकहते जम नकजे मॅडको तसर्पनामुखमा रह्याय-ग्रसित थको पण जंतुजेन्हाना तुइजीवतेप्रतेखाय तेम हंघात्मा तुंपणमृत्युना मुखमा र ह्याथको पण अन्यप्राणीयाने मुंपीडायापेठे ॥ ११ ॥ आत्मानमल्पग्दि वंचयित्वा प्रकल्पितर्वा तनुचित्तसोल्यैः ।। जवाधमे कि जन सागराणि मांढासि दी नारकड खराशीत् ॥1॥ अर्थ ॥ हवेऽहनवे दिनाजनित अपमात्रमुग्वथा परनवें अनंताङख सहेवा पडा तेकहन हंजन हेमंता प्राणी प्रकल्पितक तंतारी कल्पनामात्रधी उख नेज सुरखकरीमान्या तंपणवली अल्प तुच ण स्थायी एड्वाजे मनवचनकाया नंबंधीनुग्व तरणको इनवे तुंनगायावतो हाहाऽनिन्वद नवज चारगतिल्पतंतार तमा अधमज नरकहनविय घणाक सागरोपमधी नाकीनाजेडखसमूह तेसह वाने मुंतत्पग्यायने ए विषय मुग्वते 5 बजते पणकल्पनामात्रयी एनजीवनृग्व करीमानेने ॥१॥ यदाह नर्तृहरिः ॥ तृपा गुप्यल्यान्य पिबति सजिन वाउ सुरनि हुधान. लन् शालीन् कवलयनि मांसायकवतान् ॥ प्रटी रागाला सुदृटतरमा प्रिलपति वधू प्रतीकागे व्यायः मुखमिति विपर्यस्यति जन ॥ १ ॥ नरचकाकिण्युदविंदुकान वणिकवयीशाकटनितुकायः ॥ निदर्शनारितमत्त्यजन्मा फुःखी प्रमादवढु गोचिताऽसि ॥१३॥ 3 ծ अध्यात्मकल्पाम अर्थ ॥ वलीतेहिजयर्थ उत्तरा ययनसूत्रना दृष्टातेकरी ढकने हेयान्मातुं प्र मादजे मद्यादिकपांच तेनावगथकी मनुष्यययतारहारीने पनेपरनोवीश्रोयका चरनजेबोकडो कागिणी उदकबिड थाम्रपातकीराजा पणिकत्रयीजे वणव्यापारी शाकटजे गामावाहक निकुकजेराक इत्यादिकोनादृष्टांतेतुपण घणुशोचनारीम॥३ इहासपिथी उरत्रादिकना दृष्टातनिग्येने तेमाप्रथम चरननुदृष्टाताहेने जम | | कोगाममा कोझनाघरमव्ये एफबोकडोहतो तेको प्रादुणोयामे तेवार ए हनुमास काममायावशे एमचितवीने तेघरनामाणसो तेवोकडाने यन्नादिकपात्रे अनुक्रमेंते वोकडो घणुपुष्टगारोथयो हवेतेहनेतेहगोदेखीने एकगाउडो मनमाग्वेद पाम्योयको क्रोधवरीने दोहतारोपरत्युजे पोतानीमातानुन तेहनेपानही तेबारे माताये क्रोधनुंकारण थके कहेवालागो हेमाताजूयोने श्राबोकडो यथेष्ट य नादिकरवायचे तेथीकहेवो पुष्टयरह्यो एहने पुत्रनीपरेपानेने नानाप्रकारना अ लकारपहेरावे अनेमुजनेतो पोतानोमातानुरुप तेपणकोऽ पीगदेतोनथी तथाका तृणतेपण वखतपर पूरामलतानथी एहसानली मातायेकायु थाउरचिणा] पया जाश्चरसिनदिजासुकतिणेहलांहि एय दोहाग्लररकण वत्स जेमगेगी मरवापड्योहोय तेहनेजेकाइ खावामागे तेश्रापे तथाफुजनीमाता प्रमुखपहरावे तेम | एबोकडानेपण वयममननीपरे शृगारादिककरे पोपेने पणकोऽपाहुणायावसे तवा रेपरीक्षाजपासे तेसानली वत्सवानोरह्यो पढेकोऽकदिवशे तेहनेग्मादुणाव्या तेवारतेबोकडानेवाधी उचूकररी घणुतडफडतो जीनकाढतो दीनस्वरे आरडतो मत्युप माडयो तेहनामासने खडोखडकरी पचावीने प्रागुणासहितसकुटुवे घरपणियेनद कीधु तेवनातदेखीने वागडो नयपाम्योथको चरख्योतरम्योथकोपण मातानुपपीये नही तेवारेमाताये पुथके वत्सबोयो हेमातामे बोकडानीएहवी नूमीयास्थादीनी तेथीमुजने धाववानीपण वाठायातिनथी एमश्हापणएनपनय जोमवो जेमतबोक डोजीवतव्यनीवाठाये निर्नयपणे ययेटपुष्टथातुथको प्रादुणायावे मृत्युपाम्यो तेमहेयात्मातुपण प्रमादे पुष्टयको यथावायेविचरेते पणमृत्युवावेथके मनुष्य जन्महारीनरकादिकना उखपामि घणुशोचपामीस दवेबीजुकांगणीनुदृष्ठातफहे जेमकोऽफराक परदेशेजइ मजूरी करीने एकहजार सौनया कमायो पत्रेपोतानादेश तरफचाल्यो तेपारेरस्तामाखरचीसारु एफरूपकवटा वी तेहनी (८०) कागणीसाथेराखी बीजासर्वव्यनी वासजीनरी सीबीने राखी एक दिवसे किहाकमार्गमा विश्रामस्थानके एफमागणीवीसरी ते सथवारासायें श्रागर्ने राग्योपदेमाधिकार. U जानानांजनी नवागंकरित्रानं एककांगपीनीवाट नवनवीमु-पक वटावयुपडे इमविको नवागमृती इयनीवांनतो विहांकगोपीन तकांगणीजवा पानव व्यो धावानेजुएटतो कांगणीकांकजागयुं अनेयाफनिएना यांनजीरलको इजेग पनिगायो अनांवर ततांब्रयतं यगोच रयाली नेता के एकांगीनालीनयी जाग्नीनयानीवांनी अनंतकांगली वेन्हें खोइन य पाशोचननाजनयचो तेमयात्माषणपूर्व यातकामनोगयको बहुमूलवास्त्रिपा मिने वजर्नुकांगलीतुत्र कामनांगनीजानतायें चाविन्यजीने कामनोगगवेपतोयो कामनागययनपामें अनचाग्निपाणनपामे एमच्यन्त्रष्टययोयको तंगंकनीपरंप गुगोत्रयांम इहां कांगणी ते एक मानानुं चीयांनाग अयवाचीनतमी अथवा पपया (७०) मुंनागजाणवां. दात्री उदाविष्टांगरने कोकवनमां कोतूपानुग्ने कोऽकदेवनायें क समान चीनमुनकांतजामुत्य नेमूननिहापाणीपीवुनही अनंदवतानका हवानि मद्रागगाननीनीनमांकु नपक्षांत माननयवमान एकजनदि झं नवर्गपडनं मांदमुजननिद्रांकांना विध्यांपी नलांजती नदननूर्वनिनांग्य जानी बनायनिहांसक्यो देवनाताने त्यानरंगयां पतविंश्योपण खरीपटयां नंदवीतन्त्र उन्नयनटव्यो वन नोचकरवाजागी नमनापानुन्तंजीवदीग्नमु चान्त्रि देवनानमन जलविंधारप कामनोगनानुष एम उपनयजाई. देवेचायुयानदृष्टांतकदने कोरगजानं यांबानासलवणुज बदनदता एकदिव यातायाजनान्यावायकी अजीर्णवित्रिकाव्या पवद्ययनक यापयनीष जीनिनीकी वजवंद्य वंज्ञायात्रफलवानांनो मापामनो एमन्दी नववावायां गजापापोतानादगमांची नांवानानवनवंदावीनाच्या स्वरक विचगजा छानिन्गं निहांस्य अपदयां एडवाटयान अनंगलाबंदुनाए ri विहांयत्वीमांजामहांना मन्यनवपादनाएं गजानवान बना হল সানীরা নানা নদী বাহিন निज्ञापयो प्रयानेगवान् नार गजबांधु पटनकाल मृत्ययवस्णय यांदको बायोचबानागां मनंगा यात्रनाम्दाबुब्योर्ग प्रवानेवायोयोप जलाल गजा जीचन्दनीबानी मातामहामोरमाननादावण दिपकुम्वर जीव विषय पवाय जिनाहायागनको कान्नागाननदी न्यन अनंन्नुभजन्म बंदुवारीने पत्रं पयागार पो.

अध्यात्मकल्पाप हवेपाचमुंगणिकनु दृष्टातकहे। एकवणिकनेत्रणपुत्रहता तेत्रणेनेहजार हजार सीनेया थापणयापीनेकलुजे एटलाइव्यतमेव्यापारकरीने अवधिउपरेंयावद् हवे तेत्रणेजण नीमे नीमे मूललेग्ने जुदेजदेनगरेचाल्या तेमापहेलोनाइसर्वव्यसनरहित थ-पव्ययकरतो यको व्यापारकरवालागोतेमा घणोकमाणु थनेबीजो हजारसान पाशयमराखीने लानयावेतेवावरे एरीतेंते मूलभव्यनेरास्वीरयु थनेत्रीजेव्यापारकी धुनही अनेवेश्यादिकनाव्यसनमा सर्वमूलव्यवावरीनायु अनुक्रमेंतेत्रणेजण पो तानावरेयाव्या तेहोनुव्यतिकरजाणीने त्रीजापुत्रने मूलनामेपणनराव्योमाटे पि तायें घरयीचारकामीमूम्यो लोकमानिदनिकथयो दामपणुपाम्यो जेमतेत्रीजोपुत्र नीमेमृननेहारीने निंदायवस्थापाम्यो तेमयात्माविपयलुब्धथको पूर्वजन्मपुण्यरूप मृज नीमेदारीने जन्मातरर्गतिनाउ खपाम्योथको घणुशोचपामेले होतोशाफटनु दृष्टातफहेने जेमकोक गामानुवाहक सम पिम मार्गजाणतो परी पण पिममार्गे गामानेजेगयो पधुसरूजागेथके शोचकरवामामधु तेमइ होपण जीरापपापादित मार्गनेजाणतोयको पण प्रमादना परवशपपाथकी छ मागें पाननो गतीमापममे तेवारगोच पामसे होगातमु निटस्नु दृष्टांतकहे। कोरुगामडीयानो रहेवासी पुरुषदालिउपरा जोपरा देगनरेंना निष्दामांगे पण पुण्यरहितपणायको निदानपाम्यो तेवारी फरीगानां पताफचाननिस्यो मार्गमांकोझगामे पाण पाटकपागे एकदेवनने तेमांगोजानो तेदेवाायी कमिचिनेनुफामकुनहायमाले निकल्यो पत्रेएक' पारसनाही घडानेरहेगानागो देकुनश्हामदिरकर एटनेतिहा मदिरथयु एम निगपादिर नोगमाममोगरफीरी पोखीमहित रात्रेनोगनोगवी प्रनातेसर्व ह रए नेहमीने निकोविनयं जेथाजनगणटु फोकट पृथ्वीमानम्यो हवेजोदुएनि निवुनी मागीमीयादयाफले एमचितवीत पाणनीमेगाफरी एकदिवशेते पाणन मनपाचां जेनुसमागने तेरानिष्टवायु जेताहरापशाययीदुपण एहवोनोगपासू पारिपुतुनने गमेनो एफुननेता थनेगमेतो एकुनप्रतिष्टानी विद्यालेजा ते यारे शिवायो नेहेमामीविद्यातो कटारीमातु तेगरेफले तेमाटेवियामिक्ष गते तेहिनमने या तोरटरियाग्निान जोगसिदिपामु पनेतेपाणेघमोथाप्या । देने मदीयोग्टनेने परथायर्या घटनेत्रना अवजारनापजाविधनोगसामग्री मेनरी तानामऋष्ट्रामहित मनोवालिन रितास नोगवाजागो पोताना सक ने पेनाराजीविकाना उपाय सर्वमृकाथ्या टोरप्रमुखचतुष्पद सर्वदो वैराग्योपदेशाधिकार. ५३ डोमृक्या एकदिवशे ते ग्रामीणमद्यपाने ठाकटोथाने मनमांहर्षधरतो तेविद्याकुंन खांनाउपरजेशने नाचबालागो मद्यपानना परवशपणाथकी घटपडीने नांगीगयो तेथी विद्याये करेलुं वनव सर्वमटीगयो पवेग्रामीणकुटुंबमहित याजीविकायें ग्वीययोथको शोचकरवालागोके दादातिवंदे जोमेवटमिहिनी विद्यालीधीहती तोरवीयात एरीते जेमतेयामिकनिकु परिघटनकरतां दैववशात् कामकृलपामिने बलीमद्यपाननी परवशतायकी कुननागीनाखीने विद्यानुशोचपाम्यु तेमएजीवपण कुलन जिनधर्म पामिने प्रमादपरवगताथी धर्महारीने कुगतीवेगयोथको धर्मसा मग्रीविना गोचपामे एसातदृष्टांतना संबंधजाणवा तेमांपहेलापांचदृष्टांततो श्रीन तराय्ययनना सातमां अध्ययनयी तथादृष्टांत पांचमांअध्ययनधी श्रने सा तमोदृष्टांत अध्ययनथी लरव्युचे श्लोकमां श्राद्यगदकह्योवे तेथीबीजापण ट रिश्कुिटुंबादिक एहवादृष्टात घणारे तेयंथांतरथी जाणवा. पतंगमुंगेणखगादिमीनदिपहिपारिप्रमुखाः प्रमादैः ॥ शोच्या यया स्युम॒तिबंधःखेश्चिरायनावी तमपीति जंतो ॥ १४ ॥ यथ।हवेवली यंथकार प्रमाटीजीवने दृष्टांतेफरी नावी खदेखाडेवे देयात्मा जेम पतंगीयो तथा जमरो मृग तथा खगके पारेवाप्रमुखपदी तथासर्पयने माठलो तथा हस्तिव्याघ्रत्यादिक सर्वजीवते प्रमाटजे शब्दाटिकविपय तेहनावशयकी मरणतंवं धी.खेकीने शोचनीययायचे तेमांपतंगते नेत्रनाविपरथी टीपशिखायेंमोहोयको मृत्युपामेने अने जमरोघाणेश्यिनाविषयथकी कमलमध्येमुत्राश्मरेठे मृगशब्दविप यथा नाट्नुमोह्यो पाराधीयकी मरणपामेछे पदोशालप्रमुखकएनेलोनें रसनॅश्यिना बाथकी जालमापने सर्पकाननाविपयथीमदुधरनानादनोमोझो बंधनपामे थने मत्स वडिशनामांसनीलालचे रसनेश्यिना वशीमरेचे हस्तिहस्तणीनामोहथी स्प शेनेचिनावगे बंधनमरणादिपामेने व्याघ्रपिंजरामारहेला वोकडानामांसनीला लचे रसनेंश्यिनावोमृत्यु बंधनादिकपामेवे इत्यादिकवीजापण चित्राप्रमुखना ह टातजाएवा तेमाटेहेत्रात्मा तुंपणतेपनंगादिकनीपरें प्रमादनावशयकी चिरकालस गें शोचनीय थाइस. ॥ १४ ॥ पुरापि पापैः पतितोसि उःखराशो पुनर्मूढ करोपि तानि ॥ मऊ न्मदापंकिलवारिपूरे शिला निजे मूनि गले च धसे ॥ २५ ॥ यर्थ ॥ हवेप्रमादनु पापरुपपणुंदेखाडी तेहनोपरिहारकरे। हेमूर्खतुंपूर्वपण पा अध्यात्मकल्पडम. पेकरीनेजड खसमूहापडयोठे अनेफरीपण तेहिजपापनेफरेवे तेथीतुमणाकदिवस हितजलनापूरमा बुडतोयको पोतानामस्तकनेचिपे श्रने गजानेविपे शिजाधरेने॥१५ पुन पुनर्जीव तवोपदिश्यते विनेपि उखात् मुखमीदसे चेत् ॥ कुरुप्य तत्किचन येन वाग्ति नवेत्तवास्तेऽवसरोयमेव यत॥१६॥ थर्थ ॥ दवेजीवने प्रमादपरिहारनुएहिजयवसर तेकहे। हेजीतुजने फरीफ रीने उपदेशकढुंबु केजोतुड खथीबीहेले अनेसुखनेगाने तोतु एकाइक सुरून करके जेथकीताहरु वालेखुसुख तुजनेमिले थनेतेसुरुतकरयानो थवसर एहिज हाफरीनेउपदेशदीधो माटेपुनरुक्तदोपनही यमुक्त सनायकाणतव सहेसुठवएम धुपियाणेसु ॥ सतगुणकित्तणेसु न दुति पुणरुत्तदोसा॥ ६ ॥ धनागसौख्यस्वजनानसनपि त्यज त्यजेक न च धर्ममार्दत ॥ नवति धर्माविनवे नवेथिता न्यमन्यमी नि पुनरेप उर्लन ॥१७॥ श्रथादवेधर्मनीऽर्लनतादेखाडीने धर्मावसरनेज दृढकरेहेनीवतु धनतथाशर थनेसुख तथास्वजनकुटुब तथाप्राणजे जीवितव्यपणु तेसर्वनोत्यागकर पणएकत्रीत झप्रणीतजे धर्म तेहनेकोश्वारेपण त्यजीशनही केमकेएधनादिक सर्ववस्तुतेपर्मयकी जतुजनेनवनवने विपे वानितमलो पणधनादिकेकरी जिनोक्तधर्ममलव उतनो दुख यया बदुविध सदसेप्यऽकाम काम तथा सहसि चेत्करुणादिनी ॥ अल्पीयसापि तव तेन नवातरेस्या दात्यतिकी सकलदु खनिरत्तिरेव व थाहयात्माने थकाम खनासहेवाने बदले सकाम खसहेवुते ननुएमकहे वे हेयात्मातुजेम थकामकेवारहित परवशथको वदुविध सुख तृमा वध वधनादि का खप्रतेसहे। तेमज जोकरुणादिक जेमैत्री प्रमोद कारुण्य माध्यस्य एपरिणामेकर ने सफामके निर्धारानीक्षिये तु खसहनकरे तो तेवायोडापण्ड रखने सहवेकरीने तेकीके० पुन प्राविरहित एदवी समस्त खनी निवृतिते नि पद पामे ॥ १७ ॥ कर्मसु पापफेवरे यदाशया शर्म न तदिनानित ॥ च विनश्वर कृतं विनेपिकि दुर्गतिद खतो नहि जाने यात्मापापकर्ममा निपुणताकरे तेथाश्रीकहेले थरेमू गायेंकरी पापनाउत्पादकजेकर्म तेहनेविपे प्रगत्नसेके माहा जिनादिकनासुख तो प्राणितकेजीस्तव्यविना जोगवायनही - वराग्यापदेशाधिकार. यने ताहरो जीवतव्यतो गीघ्रके उतावद्धं विनाशशीलठे एवीरीतेजाणतोयकोपण तुं उगतीना.खथी केमबीहितोनथी ॥ १० ॥ कर्माणि रेजीव करोपि तानि येस्ते नवित्र्यो विपदो ह्यनंताः॥ तान्यो लिया तहधसे ऽधुना किं संभावितान्योपि नशाकुलराणा अथवलीप्रकारांतरेतेहिजकहे हेजीवजोतुं तेहवाज हिंसा मृपावादादिककर्म करे जेकर्मकरीतुजने अनंतियापदायोथाशे तेवारेहमपाजते यापदाओसंनारेयके रण अतिगेनयेकरीने याकुलताकेमपामेठे जोपापनाफलजाणतोयकोपण तुंपापक करवानेप्रवत्तवे तेवारेवती नरकादिकना.खसांनतीनेसावास्ते नयपामेवे निवेतु जनेतेउखनोगवाजपडशे एमांसंशयसूत्रे एनावार्यते ॥ २० ॥ ये पालिता दृझिमिताः सदैव स्निग्धा नृशस्नेतपदं च ये ते ॥ यमेन तानप्यदयं गृहीतान् शाखापि कि न बरसे हिताय॥२॥ अर्थ ।। वलीजीवने हीतार्थनेविपेप्रेरेठे हेनीवजेस्वजन मित्रादिक तथापुत्रादिक तेपाल्यापोप्या तथाजे तुजमायडिपाम्या महोटाथया वलीतेताहरा अतिशयस्नेह पात्रथया तेहुनेपण यमगजायें निर्दयपणेयस्या तेजाणीनेपणतु यात्महितकरवानेके मउजमालयतुंनथी केमके तेहुनेजो यमेंयम्यतो तुगीरीतेस्थिररहिस एनावार्य ॥१॥ यैः क्लिश्यसे वं धनवंध्वपत्य यश:अनुवादिनिराशयस्यैः॥ कियानिद प्रेत्य च तैर्गुणस्ते साध्यः किमायुश्च विचारयैवं ॥श्शा अर्थ ॥ दवजेतुलेगसहेने तेहथीनुजने कागुणनयी तेकहे। हंधात्मन्तुं या गयस्थके० केवलकल्पिनमात्र एहवाजेधन वधु वजन अपत्यके० संतान तथा य ग कीनि धने प्रनुत्व स्वामिपा' इत्यादिकनिमित्तंकरी क्लियसके कष्टनोगवे ते धनस्वजनादिकंग तुजनऽहन तथा परनवे केटमुंक गुणसाधबुंठेएटले ते तुजने सुंगुणफरसे अनेयाजपोते केटबुंकने एमविचारी धनाटिकनुं ममत्व करता करतांज थायुष पुगेथाजाने बने नवांतकोऽपण ताहरेकामेधावसनही ॥ १० ॥ किमु मुह्यमि गवरः पृथक् कृपणेवधुवपुःपरिग्रदैः॥ विमृग स्व हितोपयोगिनो ऽवसरेऽस्मिन् परलोकपांय रे ॥ २३ ॥ श्रथ। हेपरलोफेजनार पंचाजीव तुं रूपण दीन सग्णदेवाने अमर्य एवाय ने प्रयगत्वरके जूदाजुदावेगजामे एड्वाजे बंधु वजन तथा वपुजेभर तथा थ नधान्यादिक परिग्रह नेणारी मुंजाय एकोऽपण ताहगनाये अध्यात्मकल्पडम. पने माटेएधर्मकरवायोग थवसरनेविपे पोतानाहितोपयोगी परलोकना सहायनूत एहपाजे झानादिकगुण तेहोने चित्तमाराख ॥ २३ ॥ सुखमाम्से सुखं शेपे नुदे पिबसि खेलसि ॥ न जाने त्वग्रत पुण्यैविना ते कि नविष्यति ॥२४॥ थर्थ॥ हवे दमणातुमुग्वेचिलो पण श्रागसताहरी सीगतिथासे तेकहेते देवा रमात दमणापूर्णपार्जित पुण्यफलना उपायथी सुसुखेबेशीरहेठे तथासुग्वेनोजनक ग्ने सुग्नेमयादिकपानफरेचे सुग्यूतादिकरमे पणयागल परनवे तुजनेपुण्यविना सुयगनुने तसुनयीनाणतो एटलेपुण्यपिना घणुजऽखोयश्स ॥ २४ ॥ गीतातापान्मठिकाफत्तणादि स्पर्शाद्यत्यात्कटतोपाहिनेपि॥ता मनायनि कमनि स्वीकरोपि श्वभ्रादीना वेदना धिग धिय ते॥३॥ अबोपोडारष्टया बीदतोयको घणुफष्टयगीकारकरे तेकहेठे हेयात्मातु गाठपी नापयी नपामाचीवमुप तृण मानप्रमुखना स्पर्शादिकथी उपमुंजे थप मारट पीतारेत सापग्यायचे थनएपापापफर्मेकरोने वनके नरकादिकना प्र वाग्नीज मादनायो तेप्रतेयगीकारकरेने ताताहरीदिने विकारचे ॥२५॥ पिकपाप कचन प्रमादे कायदे कापि च मत्सराये ॥आ मानमाग्मन कलपीकरोपि पिनपि घिद नो नरकाढधी ॥६॥ पर्प । उनीनगिनाने देयान्मातु सिंक परोपहादिकमा कपायकरीने बनी Frir frपानागादिनिषि प्रमादारीने वनीफिदांक उपदेशादिकमा कदायहरू Rafreननी अनुमादनानेपिणे मन्मादिककरीने पोतानीयात्माने मरीन नेपाहिलय नाम्योतीदिनीनयी माटेनुजने धि कारने ॥२६॥ श्रीयमामे मामान्यतो गायोपरेशाग्यो दशमोधिकार समात प्रयामाध्यपदा ॥नीवापायविनाशनाय तमझधर्म कलुपीकरोपि रिप्रमा दमानोपचिममगटिनिन मिश्रित ह्यापधमामयापदं ॥१॥ य होगदपना ग्याग्मा यतिको विहांप्रथम धर्मनीय हर पले मत नवरे ममामयी पायजे जन्ममरणादिक तेहना । मायने ममयाय दामने मृर्णयान्मा प्रमादजे मयादिक तयामान दर वर काट नयाममा न्यादिगिने म मनीनको होतेउपा टा नादेत निदामा मिश्रिताप यामयापटनम्यात् ण्टने स्तिमिश्रित इनि

-
धर्मशुध्युपदेशाधिकार.
जे श्रौपद्य तेकांगेगनिवारकनहोय अनेतेमजतेयोपधनीपरें धर्मपणजोप्रमादादि
के मिश्रितहोयतो संसाग्ना अपायजे दु:खतेनो निवारकनहोय ॥ १ ॥
यतः॥ शैथिल्यमात्सर्यकदायक्रुधोनुतापदंनाविधिगौरवाणि च ॥
प्रमादमानो कुगुरुः कुसंगतिः श्लाघार्थिता वा सुकृते मला इमे ॥शा
श्रये ॥ हवेधर्मनेविपे मलसरिवाजेटलाटोपने तेटलापूर्वाचार्यना वचनथीदेखाडे
वे सुरुतजेधर्मकार्यतेमां शयित्य धर्मनेविपे धनादरता मात्सर्यके गुणवंतनेविषे
पथग्दु तथाकटायहके जूनावचन-हत कुधके कोष वली थनुतापके सुरु
तकरी नेपठे हाइतिग्वेदमें फोकटदानदी, फोकटतपस्याकीवी इत्यादिकपश्चात्तापर्नु कर
बुं तथादनके कपट अने अविधिक शास्त्रोक्तविधियें रहित कियानुकरबुं तथागौर
वके ढुंमहाधर्मिष्ट इत्यादिक महोटाइनुचितवद् वलीप्रमादजे धर्ममा यसावधा
नपाणुं घने मानजेअहंकार वलीकुगुरुजे लोदगिलातुल्य अने कुसंगतिजे कृत्सूत्र
नापी एवामिय्यात्वी प्रमुखनोसंग तथा श्लाघार्थिताके लोकनामुखथी पोतानी
कीर्तिवांत एटलाप्रकारेकरी धर्ममलीनथाये धर्म,पयोक्तफलनथाय ॥ २ ॥
यथा तवेटा स्वगुणप्रशंसा तथा परेपामिति मत्सरोजी॥
नेपामिमां संतनु यल्लनेयास्तां नेटदानादिविनेष्टलानः॥३॥
अर्थ ॥ हवेथात्मापोतानागुणनी प्रशंसावांठेठे यात्रीउपदेश देयात्माजेम
तुलने पोतानागुणनी प्रशंसावल्लन तेमपरजे अन्यजन तेहपताना गुपनीम
गंसावत्रनवे एहजाणीने मत्सररहितयको तेश्रन्यजननीऽमांके गुणनीप्रशंसाप्र
ते विस्तारीनेकहे जेमतुपणतेप्रशंसाप्रतेपामें केमके कोने वांवितदानढोयाविनापोता
नेपण वांछितलाननथाय एटलेपारकागुणनी प्रशंसाकरीतो पोतेपण प्रशंसनीयथये
जनेषु गृत्सु गुणान् प्रमोदसे ततो नवित्रीगुणरिक्तता तवायत्सु
दोपान् परितप्यसे चरे भवंतु टोपास्वयि सुस्थिरास्ततः ॥४॥
अर्थ ॥ हवेकेटलाक काव्यनेविपे गुणप्रशंसानीवांठायकी अवगुणदेखामेने हे
यात्माजोताहरागुण लोकेंग्रहणकखायका तुंहर्पपामेले तोतेहर्पपामवाथी ताहरे
गुणनी रिक्तताथासे थनेजोलोक अवगुणवोलतेवते तुं परितापके० खेटपामेवे तो
तेखेदपामवाथी ताहराविपे यवगुणते निश्चलयरहेसे तेमाटे गुणकह्याथी हर्प श्र
नेदोषकह्याथी खेद एवेढुवाना तुकरीसनही ॥४॥

कते मलीमसके० महाभारनादिके दूपत एह एकोणनीकरता थर्थातमिथ्यात्वीलोकपण सर्वपो एG अध्यात्मकल्पद्रुमः प्रमोदसे स्वस्य यथाऽन्यनिर्मिते संवेस्तथा चेप्रतिपंथिनामपि ॥ विगर्दणे स्वस्य यथोपतप्यसे तथा रिपूणामपि चेत्ततोसि वित् अर्थ ।। हेात्मातु जेमलोकनामुग्वें पोतानागुण स्तवसांजलीने प्रमोदपामेने तेम शत्रुनापण गुणस्तवसानतीने जोप्रमोदपामें थने पोताने विगर्हण के थवर्णवारे करीने जेमपरीतापकरेचे तेमजजो शत्रुनापण वर्णवाद सानजीने तुपरीनाप करे तेवारे एम जाणियेजे तुज्ञातागे ॥ ५॥ अथवा ॥स्तवैर्यथा स्वस्य विगणैश्च प्रमोदतापो नजसे तथा चेत्॥ इमी परेपामपि तैश्चतुर्वप्युदासतो वासि ततोऽर्थवेदीक्षा तिवापाउ- अर्थ ॥ चली पाठातरेकरी एहिजथर्थकहेठे हेयात्मातुजेम पोतानीस्ततिक्री ने तथापोतानेविगर्हणेकरीने प्रमोदतापीके दर्पधनेशोकप्रतेनजे तेमज पोतानी स्तवना तथा निंदा बने परनीस्तवना तथा परनीनिदा एचारेनेविपेजो उदात ताके मध्यस्थनावनेनजे तेवारेतु अर्थवेदीके० परमार्थनुजाणगे एमजाणिय एफाव्य पहेलाकाव्यनु पानातरजाणवु ॥ ६ ॥ जवेन कोपि स्तुतिमात्रतो गुणी ख्यात्या न बव्ह्यापि हित परन च ॥ तदिनुरीयातिनिरायति ततो मुग्धानिमानग्रहिलो निदसि कि पथ ॥ देयात्माकेरल एकजीस्तुतिमात्रथीज कोइगुणवतनयाय धनेवली आग पतिकीर्तिजोधणीहोय तोपण तेथी कांपरनयनु हितनयाय तेमाटेपरचे एक एहवुजेतुते मुगाके फोकट थनिमानेकरी पहेलोथयो थको भी बजे उत्तरकाल तेहने सावास्ते बगाडे एटलेईप करवाथी ताहरो सायठे इतिनाव ॥ ७ ॥ हिर्मुखा जना प्रमादमात्सर्यकुबोधविप्लुता ॥ मान्यमू न्युपेदशुई सुकृतं चराएवपि ॥ राजीनकरेने तेहनेकहे। हेयात्मा प्रमादजे मया पारकीसपदानी थदेखा तथाकुबोधजे मि १० परानव्या एहवा बहिरमुखजे स्वचित्त

No text on this page.

६० अर्प। दवेचारमेंथधिकार देव गुरु धर्म एत्रणतत्वनीयधिकहेसे तिहाप्रथमतो अध्यात्मकल्पद्यम. मत्रप्रनारत्नरसायनादि निदर्शनादल्पमपीदि शुद्धं ॥ दाना चनावश्यकपोपधादि महाफल पण्यमितोन्यथाऽन्यत् ॥२॥ थर्थ ॥ वलीप्रकारातरे तेहिजकहेते ऽहाश्रीजिनशासनमा दान देवपूजा अावश्य क पोसहप्रमुग्वजे पुस्य तेथोनुपण शुद्ध दोपरहितको गोहोयतो मनजे जागुनी मुख तथा रत्नजे सूर्यकात चकातादिक तथा रसायनजे पारादिक तेहनीपर म हाफलकारीयाय जेममत्रथोडायनुहोय तोपण विषप्रहारादिकनेरी महागुणक रे तथासूर्यकातादिक रत्नन्हानुहोयतोपण महाप्रकाशकरे थने रसायणयामुपण म होटारोगहरे तेमदोपरहितपुण्यजो थोमुहोयतोपण महाफलदायकयाय अनेतेहगी विपरीतजे अशुचपुण्यकार्य तेधन्यथाकेण् घणुहोयतोपण अल्पफलदायकथाय॥१३॥ दीपो ययाल्पोपि तमासि इति लवोपि रोगान् दरते सुधाया ॥ तृण ददत्याशु कणोपि चाग्नेर्धर्मस्य लेशोप्यमलस्तथा ॥१३॥ थर्थ ॥ जेमदीपक थपके० न्हानोहोयतोपण थधकारटाले वलीजेम थम तनो एकविउमात्रतेपण सर्वरोगनेहरे वलीजेम थनीनुएककणीयुमात्रतेपण तृष्णा नेवालीनाखे तेमनिर्मलदोपरहित एहयोधर्मनु लेशमात्रतेपण पापनेटाले ॥१३॥ नावोपयोगशून्या कुर्वन्नावश्यकी क्रिया सर्वा ॥ देडक्लेश लनसे फलमाप्स्यसि नैव पुनरासा ॥१४॥ थर्थ ॥ दवेसर्व क्रियानी सफलताते नावसहितकरवायोजहोय तेकहेले हेत्रा स्मातु नावजे अक्षा तेहनाउपयोगेकरी शून्यके० रहित एहवासर्वए यवश्यकरवा योग्य जे पडिकमणु पडिजेहणप्रमुख क्रिया तेप्रते करतोयको पणतेथीकेवल शरीरने नेशमात्रउपजावतु तेहिजफलपामेने पणतक्रियान मुख्यफलजे मोक्षलक्षण तेतात पानहीजपामे कैमरे नावयको शून्यक्रियाजो घणोकरीतोपण नि फलथाय । १३ इतिश्रोथध्यात्मक पहमे धर्मशुध्युपदेशारख्य एकादशोधधिकार समाप्त ॥ ११ ॥ अय श्रीदेवगुरुधर्मशुझिमधिकृत्य किचिदुपदेश ॥ तत्वेषु सर्वेषु गुरु प्रधान हितार्थधर्माहितजक्तिसाध्या॥ श्रयस्तमेवेत्यपरीढय मूढ धर्मप्रयासान् कुरुपे यैव ॥१॥ जो सहगुरुमले तोज शुभदेव तयायुधधर्मपामि तेमाटेप्रथम गुरुतत्वनी शनि कोरे देवात्मासर्वतत्वमा मुल्यतत्वते गुरुले केमके हितार्थक मोदनेथर्थे धर्म ६१ देवगुरुधर्मशुध्यधिकार. धवोहोयतो ते गुरुनावचनथकीतधाय तेमाटेतुं मूढयको परीक्षाकस्याविनाज गु ने श्राश्रयतोथको धर्मनेनिमित्तेजे प्रयासकरेते तेस्थाके फोकटवे ॥ १ ॥ नवी न धर्मेरविधिप्रयुक्त र्गमी शिवं येषु गुरुर्न शुधः॥ रोगी दिकल्पो न रसायनस्ते पांप्रयोक्ता निपगेव मूढाशा अर्थ ॥ हवेगुरुनगुमहोयत्तोधर्मपण अगुझ्थाय तेकहेते नवाजे संसारीजीव तेणे थविधियेकीधाएहवाजे दानादिकधर्म तेहथीजीव मोगामीनथाय केमकेजे धर्मनेविपे गुरुके निर्दीपपणुं नथी तेधर्मवृथा तेउपरदृष्टांत कहे जेमरसायनर्नु करनार वैद्यते गुणागुणर्नु अजाणमूर्खहोयतो रोगीपुरुप ते रसायनेकरी निरोगीन थाय तेमहारोगी तेयात्मा योपयतेधर्म मूर्खवैद्य ते. कुगुरु जाणवो ॥ २ ॥ समाश्रितस्तारकबुचितो यो यस्यास्वदो मङयिता स एव ॥ ओघं तरीता विपमं कयं स तयेव जंतुः कुगुरोर्नवाब्धिं ॥३॥ अर्थ ॥ हवेकुगुरुयने कुतारकदृष्टांतकहे जेप्राणिये तारकवुझिकरीने तार हनेथाश्रयोठे अनेतेतारकज घाश्रीतप्राणीने माडनारहोय तोतेप्राणी विपमऊ स्तर एहवो उघजे तमुनापाणीनो प्रवाह तेशीरीतेतरसे तेमज जेथकी तरवानीया शाराखिये तेहिज जेवारें वोडे तिवारे समुनु पारते केमपामि तेमज कुगुरुथी जवसमुश्पण जाणवू केमके जेगुरुप्रतें तारकजाणीने संसारसमुह तरवानी घाशा ये तेहने थायियें थनेतेगुरुतो उन्मार्गने देखाडवेकरी थाश्रीतप्राणीने संसारसमु इमां बोडे तेवारे ते प्राणी संसारसमुश्नो पारकेमपामे एनावार्थठे ॥ ३ ॥ गजाश्वपोतोदरथान् ययेष्ठपदाप्तये न निजान् परान् वा ॥ नजति विज्ञाः सुगुणान् नवं शिवाय शुञान् गुरुदेवधर्मान्॥४॥ थर्थ ॥ तेमाटेगुइदेवगुरुधर्मने थाटरवुतेकहे जेमविज्ञजे निपुणपुरुप तेवा हितस्थानके पहोचवानेयर्थ पोताना यथवापारका हाथी घोडा तथा वाहण उत व सद रथ तेथापयापणेगुणेसहितसुलक्षणाजोइने थाढरे केमकेजो निर्लक्षण वाहन होयतो तेहथीवांवित स्थानकेपहोचायनही माटेहेसरलप्राणी एरीतेतुंपण मोक्षस्था नक पामवानेयर्थे शुक्षगुणोपेत एवाजे देव गुरु धर्मतेप्रतेनज जेथकीमोक्षपदपामे फलाध्था स्युः कुगुरूपदेशतः कृतादि धर्मार्थमपीद सूद्यमाः॥ तदृष्टिरागं परिमुच्य ना दे गुरुं विशुई नज चेचितार्थ्यसि ॥५॥ वर्ष ।। हवेकुगुरुनाउपदेश्याधर्म फलदायकनहोय तेकहे इहांत्रीजिनशासन 1 ३० वर्षे ॥ ददेवारमंथरिकार देव गुरु धर्म एवणतत्वनीक्षिकहेसे तिहाप्रथमता अध्यात्मकल्पद्यम. मत्रप्रनारत्नरसायनादि निदर्शनादल्पमपीदि शुद्धं ॥ दाना चनावश्यकपोपधादि महाफल पुष्यमितोन्यथाऽन्यत् ॥२॥ थर्थ॥ वलीप्रकारातरे तेहिजकहे ऽहाश्रीजिनशासनमा दान देवपूजा यावश्य क पोसहप्रमुखजे पुख्य तेयोनुपण गुरु दोपरहितको मोहोयतो मत्रजे जागुनी मुख तथा रत्नजे सूर्यकात चकातादिक तथा रसायनजे पारादिक तेहनीपर म हाफलकारीयाय जेममत्रथोडायरनुहोय तोपण विपप्रहारादिकनेरी महागुणक रे तथासूर्यकातादिक रत्नन्दानुहोयतोपण महाप्रकाशकरे अने रसायणयोकुपण म होटारोगहरे तेमदोपरहितपुण्यजो थोमुहोयतोपण महाफलदायकथाय थनेतेदपी विपरीतजे अशुभपुण्यकार्य तेथन्यथाके घणुहोयतोपण अटपफलदायकथाय।।१२।। दीपो यथाल्पोपि तमासि इति लवोपि रोगान् दरते सुधाया ॥ तृण ददत्याश कणोपि चाग्नेधर्मस्य लेशोप्यमलस्तथा ॥१३॥ थर्थ ॥ जेमदीपक अपके न्हानोहोयतोपण थबकारटाले वलीजेम अमृ तनो एफविमात्रतेपण सर्वरोगनेहरे बलीजेम अमानुएककणीयुमात्रतेपण तृष्णा नेगाजीनाग्वे तेमनिर्मलदोषरहित एहयोधर्मनु लेशमात्रतेपण पापनेटाले ॥१३॥ नावोपयोगशून्या कुर्वन्नावश्यकी क्रिया सर्वा ॥ देवक्लेश उनसे फलमाप्स्यसि नैव पनरासा ॥२४॥ थर्थ ॥ हवेसर्वकियानी सफलताते नावसहितकरवायोजहोय तेकहे हेत्रा स्मातु नायजे अक्षा तेहनाउपयोगेकरी शून्यके० रहित एहवासर्वए थवश्यकरवा पोग्य जे पहिक्मणु पडिलेहणप्रमुख किया तेप्रते करतोयको पणतेथी केवल शरीरने | फ्रेशमात्रमपजाय तेहिजफजपामेले पणतेफियानु मुख्यफलजे मोक्षजण तस पानहीनपामे केमके नापयको शून्यक्रियाजो घणोकरीतोपण नि फलयाय ॥ १३ इतिश्रीयध्यात्मफटपमे धर्मशुध्युपदेगारव्य एकादशोथधिकार समाप्त ॥ ११ ॥ प्रय श्रीदेवगुरुधर्मशुक्ष्मिधिकृत्य किचिदुपदेश ॥ तत्वेषु मर्वेषु गुरु प्रधान हितार्थवर्मा हि तक्तिसाध्या ॥ श्रयस्तमेवेत्यपरीटय मूढ धर्मप्रयासान कुरुपे स्यैव ॥१॥ जो सगुस्मजे तोज शुरदेव तयागुमधर्मपामि तेमाटेप्रथम गुरुतत्वनी शनि ने देवारमासर्वतन्दमा मुख्यतत्वते गुरुने केमके हितार्थक मोक्नेथर्थे धर्म .

देवगुरुधर्मशुध्यधिकार. ६१ साधवोहोयतो ते गुरुनावचनथकीलधाय तेमाटेतुं मूढयको परीक्षाकस्याविनाज गु रुने याश्रयतोयको धर्मनेनिमित्तेजे प्रयासकरेठे तेस्थाके फोकटठे ॥ १ ॥ भवी न धर्मेरविधिप्रयुक्त र्गमी शिवं येषु गुरुर्न शुधः ॥ रोगी हि कल्पो न रसायनस्ते उँपांप्रयोक्ता निपगेव मूढ॥॥ अर्थ ॥ हवेगुरुअगुवहोयतोधर्मपण अगुथाय तेकहेते नवाजे तंसारीजीव तेणे थविधि-कीधाएहवाजे दानादिकधर्म तेहथीजीव मोगामीनथाय केमकेजे धर्मनेविषे शुभके निर्दोपपणुं नथी तेधर्मवृथाने तेउपरदृष्टांत कहे जेमरसायननु करनार वैद्यते गुणागुणर्नु अजाणमूर्सहोयतो रोगीपुरुप ते रसायनेकरी निरोगीन थाय तेमश्हारोगी तेश्रात्मा यौपधतेधर्म मूर्खवैद्य ते कुगुरु जाणवो ॥ २ ॥ समाश्रितस्तारकबुझितो यो यस्यास्वहो मङयिता स एव ॥ ओघं तरीता विपमं कथं स तथैव जंतुः कुगुरोर्नवाब्धिं ॥३॥ अर्थ ॥ हवेकुगुरुधने कुतारकनुंदृष्टांतकहे जेप्राणियें तारकवुझिकरीने तार कनेयाश्रयोठे धनेतेतारकज धाश्रीतप्राणीने धुमाडनारहोय तोतेप्राणी विपमड स्तर एहवो उघजे समुनापाणीनो प्रवाह तेशीरीतेतरसे तेमज जेथकी तरवानीया शाराखिये तेहिज जेवारें वोडे तिवारें समुइनु पारते केमपामिये तेमज कुगुरुथी जवसमुश्पण जाणवु केमके जेगुरुप्रतें तारकजाणीने संसारसमुह तरवानी भाशा ये तेहने थायियें अनेतेगुरुतो उन्मार्गने देखाडवेकरी धाश्रीतप्राणीने संसारसमु इमां बोडे तेवारे ते प्राणी संसारसमुनो पारकेमपामे एनावार्थठे ॥३॥ गजाश्वपोतोदरथान् यथेष्टपदाप्तये न निजान् परान् वा ॥ नजति विज्ञाः सुगुणान् नजैवं शिवाय शुझान् गुरुदेवधर्मान्॥४॥ श्रर्थ ।। तेमाटेगुदेवगुरुधर्मने यादरवुतेकहे जेमविज्ञजे निपुणपुरुष तेवां हितस्थानके पहोचवानेअर्थ पोताना अथवापारका हाथी घोडा तथा वाहण उत व सद रथ तेथापयापणेगुणेसहितसुलक्षणाजोइने थादरे केमकेजो निर्लक्षण वाहन होयतो तेहथीवाठित स्थानकेपहोचायनही माटेहेसरलप्राणी एरीतेंतुंपण मोक्षस्था नक पामवानेयर्थे शुक्ष्गुणोपेत एवाजे देव गुरु धर्मतेप्रतेंनज जेथकीमोपदपामे फलावृथा स्युः कुगुरूपदेशतः कृतादि धर्मार्थमपीद सूयमाः॥ तदृष्टिरागं परिमुच्य ना हे गुरुं विशुचनज चेचितार्थ्यसि ॥५॥ अर्थ ।। हवेकुगुरुनाउपदेश्याधर्म फलदायकनहोय तेकहे इहांत्रीजिनलासनने । । ६४ अध्यात्मकल्पजुम यवाविरुध्यमिते मिथ्यात्वी कुमतिप्रमुख तेहनी मित्राइते विवाहव्यापार प्रमुखेंकरी परिचयकरवु तथापिताप्रमुखनी अवगणना अनेपरने कुमालेख कुमानामा का माप कुडातोलप्रमुखेंकरीने उगवु एटलासर्वप्रकारेकरी पुरुपनेआपदाउपजे ॥१॥ नत्येव नार्चसि जिन सुगुरोश्च धर्म नाकर्णयस्यविरत विरतिर्न धत्से। सार्थ निरर्थमपि च प्रचिनोप्यघानि मूल्येन केन तदमुत्र समीदसे श१३ थय॥ बजीप्रकारातरेकहेने हेयात्मातु नक्तियेकरी जिनपूजाकरतोनथी अनेकदा पिपूजेठेतोपण कुजफर्मादिक परवशपणायकी पूजेते पणनक्तिथीपूजतोनथी तपास गुस्पासेथी धर्मसानजतोनथी तथानिरतर बढारपापस्थानक पन्नरकर्मादान प्रमु खथीमवरनुफरवु इत्यादिकविरतीपणु तेपणनीयादरतो तथासार्थककेम्पोताने व पटुवादिकने यथै श्रनेनिरर्थककेस्वार्थविनापण थपथ्य थनाचरित पापोपदेश हितामदान प्रमादाचरित एपाचप्रकारेकरी कारणविना पापनेमेलवे तोपरनों तुं शामृजेंसी सुम्पनी वानाकरेचे इहा मूलरूपते पुण्यजाणवु ॥ १३ ॥ चतुष्पदे सिढम्य स्वजात्यैमिल निमास्तारयतीहि कश्चित्॥ सदय तैमजति कोपिउँगै शृगालवच्चेत्यमिलन् वर स ॥२४॥ थर्प ।। दयेसुगुरुनेसिहनीनपमा थनेगुरुने सीयालनीउपमाकहीने उपदेशेने। पोतानीजातीनाजे चतु पदमृगप्रमुस तेसाथेमय सिहनीपरे ससारमाजे सद्गुरु नेपांतानी जातीना नव्यपश्यिसझीमनुष्यइत्यादिकसाये मल्योथको थाश्रीतजीव | नेनार जेमसिहनिजाभितरतु पदने कृपगतीदिकथीतारे तेममुगुरुपण निजाश्रितन प्पजीन समाग्ममुश्चीतारे बनेकुगुरुतेसीयालनीपरे सजातीयजे मनुष्यादिकथ नेविजातीपजे पनु पद तेहनमायनेजश्ने गजेनरकप्रमुख बलीपुर्णजे कृपादिकते । मापुमाई नेमाजगुरुतेनमयोयरोजसारा जेमपचाख्यानमां कोशनमा वीना वायमिहादिक्नुनपटानाने अयं सर्वचतु पर्नेमती एकाजवतसिहने गजाकरी पायो यनेमाचतु पद तेहनीमेगावाजागा एकदिवमेतेवनमा थनीजागी तेवार लेमाचनु पद मिहनेमापोगया तैमनमिहेपोताने पुनडेवलगामी एकफालेकरी को महानदी उतरी रहेने पार पहोचाडया वजीफेटताकदिवसे दावानलमिटयो बन्न | नरायपु नेगारतमर्वचतु पदने पानापोतानेतामे पहोचादया हयात सिहनोप गम्मदमोगरक्षिमीयापण कंटलाफ हीनसत्व निनग्य ससलाप्रमुखजीवन पोतनवको वनीशनात दयनागो तेगारे सोयाने निजाश्रित सर्वचतु पदने

-
-
।
।
देवगुरुधर्मशुष्यधिकार.
पुंठडेवनगामी फालनरीनदी उतरवा लागो तेवारे सर्वजीवसहित पोतेपण अ
गाथजजमायुमो ऽहांसिंहते सुगुरु अनेसीयालते कुगुरु महानदीते ऽर्गति धने
याश्रितजीवते धर्मार्थी मनुष्य एमउपनयलेवो ॥ १४ ॥
पूर्ण तटाके पितः सदेव नृतेपि गेहे हुधितः स मूढः ॥ क
ल्पद्रुमे सत्यपि दी दरिजो गुर्वादियोगेपि दियः प्रमादी ॥१॥
अर्थ ॥ दवेगुर्वाटिकनुं योगठतेप्रमाद करवूनही तेदृष्टांतदेऽनेकहे। निथेंकरीजे
प्राणो देवगुरुधर्मनुं योगठतेपण प्रमादवतयायवे तो हाहाइतिखेदेतेप्राणी नस्यातला
बंपण सदाश्तरस्यो वली ते पुरुप सुरखडी प्रमुखे नखायका घरमां पण नुख्यो
वती घरमांठते कल्पवृ पण टरिशीने तेमाटे गुर्वाटिकनो योगरते प्रमादत्यजीने
धर्मसाधनकरवु तेहिजसार्थकठे ॥ १५ ॥
न धर्मचिंता गुरुदेवनक्ति येपांन वैराग्यलवोपि चित्ते॥तेपां
प्रमूळेशफलः पशूना मिवो भवः स्यादरंनरीणां ॥१६॥
अर्थहवेप्रकारांतरेंतेहिजकहेते याजमेंगुं धर्मकीयोयनेहवे नित्य प्रत्यशोधर्म
करवानुंठे एहवीजेने विचारणानथी यमुक्तं नत्यायोत्थाय चितेयं किमद्य सुकृत कृत।
आयुष खममादाय रविरस्तमयं गतः ॥१॥ तथा जेने गुरुयने देवनानक्तिनथी वली
रागनुलेशमात्रपणनथी एहवाजेपेटनराप्राणी तेहोर्नुजन्मते पशु तुम कुतराप्रमु
खनीपर केवल माताने गर्नधारणादिकक्लेश करवामात्रज फलहोय ॥ १६ ॥
नदेवकार्य न च संघकार्ये येपांधनं नश्वरमाशु तेपां॥ तदर्ज
नाद्यैर्टजिनेवांधो पतिप्यतां किं लवलंवनं स्यात् ॥ १७ ॥
अर्थ ॥ हवेप्रकारांतरें सुपात्रेधनवावरवानी सफलतादेखाडे जेधनवतप्राणीनुं
धन देवकार्यजे प्रासादकराववा अथवाजीर्णोधार विवप्रतिष्टा इत्यादिकनेविपे तथा
संवकार्यजे चतुर्विधसंघ,पोपवू तथासामिनीवत्सलताते हीन बने टीनजे साधर्मि
कहोयतेनीचिताकरवी तथा पुस्तकलरखववा इत्यादिक कार्योमांउपयोगीनहोय तेमा
गीतुं विनाशशील एहQजेधन तेनपार्जनादिकनापापेकरी संसारकूपमांपडताने तेधन .
सुंका याधारनूतथाय अर्थातकाइनथाय एट सुपात्रेव्ययविना अन्यथाकोकामेना
वे॥१७॥ति श्रीयध्यात्मकल्पमेदेवगुरुधर्मयुद्धीनामा द्वादशोधिकारः समाप्त॥१॥

६६
अध्यात्मकल्पजुम.
तेतीशी नववारिधि मुनिवरास्तेन्यो नमस्कुर्महे येपानो विपयेपु निय
ध्यति मनो नो वा कपाये प्लुत ॥ रागपिविमुग् प्रशातक लुपं साम्याप्त
शर्माक्ष्य नित्य खेलति चाप्तसयमगणाकी नजनावना ॥१॥
थर्य ॥ दवेयतिशिदोपदेशनामा तेरमोथधिकारकहे तेमाप्रथमयतिनु स्वरूपक
देने जेमुनीनुमन विषयमा श्रासक्तपामतुनथी तथाकोधादिककपायमा व्याप्तुं
नथी एडयाजेमहानुनार ससारसमुस्थीतखा तेहनेनमस्कारकरियेंये जेमुनिराज
गगईरहित थाने कनुपताजे पापाचरणतेहने शातपमाडचोले वलीसमतायेंकरी व
नुपमसुखपाम्यांठे एहवुथश्ने पाचमहानतनी पचवीसनावना तथा थनित्यादिक
वारनापनानेनजेचे वजी जिनप्रणीतजे सयमनागुण हमादिकरूप उद्याननेविचे
पेजेते पहजेहनुमनहोय तेदनेज तत्वथको मुनिकहियें एनावार्थः ॥ १ ॥
स्वाध्यायमादित्मसि नो प्रमादे शुश न गुप्ती समितीश्च धत्से॥त
पाध्धिा नामि देहमीदा दल्पे दि देतो दधसे कपायान् ॥शाप
रीमहनी महसे न चोप मर्गान शीलागधरोपि वाऽसितिन्मोदमा
गोपि नगाधिपार मुने कय यास्यविशेषमात्रात् ॥३॥ युग्मं ॥
गर्ष । माधुनापेषमात्रयकीज अर्थसिदिनथाय तेकहे। हेमुनितुंप्रमावेक
नापमानाया नितीनथी तथागुफनिर्मज मनादिकत्रणगुप्ति थने इर्यादि
पायएमनीने धारणागतोनथी वजीगरीरनामाही बायथन्यंतर वैप्रकारेतपप
प करतानपी नयापीमोपण कपायनुकारणउपनाथी कपायघरेठे ॥ ५॥ तयाधा
दिस यारीमपसिन यने देवता प्रमुग्वनाफरेला उपसर्ग तेप्रतेनथीसदेतो तथा थ
हारमहकर मौनांगरथने पाणवतानची अनेज वेपमाथीज मोक्नेवाले
पालनातु मगारगमुश्नांपामपामीम ॥ ३ ॥ एबेकायनोयर्थ एकतोले
भाषिकायमिह ययतिवेपमेव धत्मे चरित्रममल न तु कटनीरु ॥त
मिकिं न न पिनेति जगजिवृद्धमृत्यु कुनोपि नरकच न वेपमात्रात्।
वारनीहिनरहने देमाधुतुथाममाग्मा श्राजीपिकानेय जे यतिनाथ
ने धरावाची बोहिताया निर्मनिरतिचार चारित परतानयी तो
सेवा न मानपीनापती जगतनुग्रामनार एहजेमृत्युते कोऽथीचीहतोन
पी दीनानोवेरमात्र धनायकी तो नरमपणवाहितोनयी पटले मृत्यु थने नरक
वरना मईया नुसनेयावतं पण तादागयी डरमेनही तिनार ॥ ४ ॥

यतिशिदोपदेशाधिकार. ६७ वेपेण माद्यसि यते चरणं विनात्मन् पूजां च वांसि जनादहुधोपधिं च।। मुग्धप्रतारणनवे नरके ऽसि गंता न्यायं विन्नपि तदजागलकर्तरीय॥४॥ अर्थ ॥ हेअत्मातुंचारित्रविना यतिनेवेपेकरीहर्पपामेठे अनेलोकथकी वदुप्रकार नीपूजा वदन सत्कारप्रमुख तथाउपधिजे वस्त्रपात्र पुस्तकादिकप्रतेंवांते पणपठेतुं एमुग्धलोकने प्रतारणके कपट क्रियाये उगाकरी तेहथीउपायोजेनरकत्तिहांज रहीश तेमाटेतुं धजागने कतरीना न्यायप्रतेंधवे जेमको साटकिये एकवकरीक्षण वानेयर्थ वधकरवानेस्यानकेाणी कातीधारचडावी सङ्गकरी तेवकरीनेपासेका तिमूकी एटलामांकोऽकामनेर्थे पोतेवरमांगयो पठवाडेवकरी पोतानापगेंकरीनू मीवोदितेमाकातिदाटी नेविचारयंजे रखेखाटकीयावेतिवारदेखे एमजागीतेहनाज परसुती देवयोगयी कंवतकातीनीधारयावी तेथीगढुंदवाइगयुं धनेमृत्युपामि तेमहे श्रात्मानुपण तेवकरीनीपरें अज्ञानीयाने कातीरूपनरकने ढांकिराखेठे पणतेयवश्य जाविपणाची उदयश्राव्याविना रहेसेजनही तेमाटेप्रथमथीज अज्ञानत्यजीने साव धानरहेजे एन्याययंथातरें वीजेप्रकारेपण लरव्युंठे ॥ ५ ॥ जानेऽस्ति संयमतपोनिरमीनिरात्मन्नस्यप्रतिग्रनरस्य न निष्क्रियोपि ॥ किंगतो निपततः शरणं तवास्ते सौख्यं च दास्यति परत्र किमित्यवेदि। अर्थ ॥ हेयात्माएलोकरंजन निमितेंजे संयमतथातप तेणेकरीने गृहस्थोपा सेंथी यहार थापध वस्त्रपात्रादिकनुले ते तो संयमतपाटिकना समूहद् वक्रयके मूलपणनथयुं तेवारेंतुजने जुर्गतिमांपमतां शरणतेमुंडे अनेपरलोके सुखते कोणा पस तेविचारीजो एतोलोकोनाप्रतिग्रहनुं मूलमात्रपण ताहरुसुरुतनथी माटेतुजने नरकेपडतां नहार बनेपरलोकनेविपे सुखतेशायकीयासे एनावार्थठे ॥ ६ ॥ कि लोकसत्कृतिनमस्करणार्चनायै रे मुग्ध तुप्यसि विनापि विशुध्योगान् कृतन् नवांधुपतने तव यत्प्रमादो बोधिद्रुमाश्रयमिमानि करोति पश्न्॥ अर्थ ।। हवेलोकसत्कारादिकदेखी राचवूनहीतेकरे हेमूटयात्मा शुक्षनिर्मल दोपरहित एहवाजे मनवचनकायानायोग तेविनालोकोनो सत्कारजे अन्युत्थाना दिक तथानमस्कारवंदना यर्चना जेनवांगपूजा विलेपनादिक तेणेकरीने सुंदर्पपामे दे केमकेएप्रमादते ताहरेसंसारकूपमा पडतांवोधरूप वृदनायालंबनने वेदवाने ए लोकसत्कारते कुहाडारूपवे एटलेताहरोप्रमादरूपवैरीते तुजने संसाररूपकुवामा अध्यात्मकल्पडम नाखवासा वोधयालंबनरूपवृक्ने लोकसत्काररुप कुहाडेकरीनेदेने एटलेहमणा तो सत्कारपामिमनमा दर्पधरेचे पणयागले बोधपामयो उर्जनयासे ॥ ७ ॥ गुणास्तवाश्रित्य नमत्यमी जना ददत्युपध्यालयनेहशिप्यकान् ॥ विना गणान् वेपमृपेविनपि चेत् त तष्टकाना तव नाविनी गति ॥७॥ अथासाधो धर्माथिलोकतो तदारागुणयाश्रीने तुजनेनमेवे तथा उपवि वस्त्र पात्रादिक थालय वस्ति नेपज थन्नपानादिक यनेशिष्य तुजनेयापेने थनेतुजोगुण विनाज मात्र वेपवरेठे तेवारे ताहरीधूर्तनी गति यागे जेमगाग रुत्रिम नवानका वेष करीलोकना धनगीलिये पवेकोदिवसे तेहनाधिपाकथी वर वधनादिकपा मे तेम ताहरा हवालपण तेहनीपरे थासे ॥ ७ ॥ नाजीविकाप्रणयिनीतनयादिचितानो राजनीश्च नगवत्समय च वे सि॥ नो राजनीधरसि वाऽ गमपुस्तकानिइत्यपि पा ॥शु तथा पिचरणे यतसे न निदो तत्ते प्रतिग्रहनरो नरकार्थमेव ॥॥ थर्थ ॥ हवेसाधुपणानु सुखदेखाडे हेनिलकतेंघरवारपरिग्रहतोमूम्या थाजीविका तथापुत्रादिकनी चितानथी तेमराजासबधीनयपणनथी वलीजिनप्रशी त सिमांतपणजाणे अथवाजेनसिखातना पुस्तकधरे तोपणगुपचारित्रनेविष उद्यमकरतोनयी तेवारेताहरु वस्त्रपात्रादिकनुलेवु तेहनुनारते नरकनेय/जडे ॥ शास्त्रझोपि दृढव्रतोपि गृहिणीपुत्रादिवधोज्जितोप्यंगी यद्यतते प्रमादवशगो न प्रेत्य सौख्यश्रियो|तन्मोदहिपतस्त्रिलोकजयिन ढार काचित् परा उष्टता बञ्चायुप्कतया स वा नरपशन गमीगतो॥१० गएरार्थ ॥ हवेठतेयोगेपणजीव धर्मकरतोनथी तेहनावेकारणदेखाडे लौकिका आजीनरशास्त्रने जाणतोयको तथा पचमहावतधारीयको तथास्त्रीपुत्रादिकना सिनियको पण जेप्राणीप्रमादवशे पमयोथको परलोकनामुखनीसपदारूप ध थयोवलीताम करतोनथी तोतिहां त्रणलोकनुं जीपनारजे मोहरूपशत्र तेहनी रेते थनेकष्टकरवारमहाअष्टताजाणवी यथवाते नररूपपयुवापडो पूर्वनरकादिकना तेवारे तु एमकानीकी पुर्गतिमाज जनार एमजाणीतये ॥१०॥ घी बनीसाधुनोवेषमात्र न करोमि सर्व सायद्यमित्यसकृदेतदयो करोपि ॥ एवेवाना सर्वथा तुजनेयावचनानारिता तसावयतो नरकमेव विनावये ते२१ माटे -memastar यतिशिदीपदंशाधिकार वपेण माद्यसि यते चरणं विनान्मन पूजां च बांटमि जनादीगंधा मुग्धप्रतारणनवे नरके ऽसि गंना न्यायं चिनपि नवजागला!! अर्थ ॥ हेयमातुंचारित्रविना यतिनेपेकवर्षपाने नारी नीपूजा वंदन सत्कारप्रमुख तथा उपधिजे वनपात्र पुनसविस्तर एमुग्धलोकने प्रतारण के कपटक्रियायं उगाइन नंबनीमानाम: रहीश तेमाटेतुं अजागने कतरीना न्यापधरेने जेमmarti वानेयर्थ वधकरवानेस्थानकैयाणी कातीधारचटानी महान तिमूकी एटलामाकोकामनेध पीतेवग्मांगयो पनवारंवानी पोनाना मीखोदितेमांकातिदाटी नेविचारांजे रग्वेरवाटकोचावनिनाद मानना परसती देवयोगी कंवत्तकातीनीधारयाची तेथीगलंदवाग बनेपामिनमरे प्रात्मातुंपण तेवकरीनीपरे श्रानीयश्ने कातीरुपनरकनं दागिनने पर नाविपणाथी उदयाव्याविना रहेसेजनदी तेमाटेप्रथमधीजयानन्यजीना धानरहेजे एन्यायग्रंथातरें बीजेप्रकारेंपण लघु ॥ ५ ॥ जानेऽस्ति संयमतपोनिरमीनिरात्मन्नस्यप्रतिग्रदानरस्य न निस्क्रियापि ।। किंगतो निपततः शरणं तवास्ते सोख्यं च दास्यति परत्र किमित्यादि। अर्थ ॥ हेयात्माएलोकरंजन निमित्तेजे संयमतथातप तेणेकरीने गृहस्योरा सेंथी यहार औपध वस्त्रपात्रादिकनुलेवु ते तो संयमतपादिकना समृदनु चक्रायो। मूलपानथ{ तेवाःतुजने उर्गतिमापमतां शरणतेमुंठे श्रनेपरलोक मुंग्यतं कोणया॥ पसे तेविचारीजो एतोलोकोनाप्रतिग्रह मूलमात्रपण तादमंसुरतनी माटनातेसं नरकेपडतां उधार धनेपरलोकनेविपे सुरखतेशायकीयासे एनावार्थने ॥ ६ प्राणियें तु कि लोकसत्कृतिनमस्करणाचनाये रे मुग्ध तुप्यसि विनापि विमरने एमांशो कृतन् नवांधुपतने तव यत्प्रमादो बोधिद्रुमाश्रयमिमानि करोति अर्थ ॥ दवेलोकसत्कारादिकदेखी राचनदीतेकहे। मनवान्यष्यसि ॥त्र दोपरहित एहवाजे मनवचनकायानायोग तेविनालोकोनो सन्तुप्यसेंऽढ्सा॥२॥ दिक तथानमस्कारवंटना अर्चना जेनवांगपूजा विलेपनादिकानितजे सेवफलोक तेने के केमकेएप्रमादते ताहरेसंसारफूपमा पडताबोधरूप मलजे मोक्षार्थिलोक ते लोकसत्कारते कुहाडारूपले एटलेताहरोप्रमादम्पयंगते- अध्यात्मकल्पद्यम हनेवचतोयको तुफरेवे एटलेपोताना प्रमादाचरणथी थनेबीजोजोकने वगवायी एबन्नेप्रकारना पापेकरीने तुलोपायवे ॥ १५ ॥ गृहासि शय्याहतिपुस्तकोपधीन सदा परेभ्यस्तपसस्त्रियं स्थिति ॥ तत्ते प्रमादारिताप्रतिग्रह झणार्णमग्नस्य परत्र का गति ॥१६॥ अर्थ ॥ हे वेपना धरनारयति तु लोकोपासेथी शय्या वस्ति यहार तथापुस्तक झानोपकरण तथाउपधि वस्त्रपात्रादिकजे नित्यलिये तेतो तपसीलोकनी स्थिति वे परतु तुतो प्रत्यक्षमादमा मन्मथको काइपणतपस्यादिक करतोनथी तेमाटे प्र तिग्रहने नियवेकरी नारीययु एहबुजेप्रमाद तेथकीचपायजे लेण ते लेणानेविषे मनथको खुतोटोएहवुनतो ताहरीपरनवे सीअवस्थायासे एटलेप्रथमतु चारित्रने इने प्रमादसेवेवे तेलेणोकरेते तेवारपत्रे तपसयमादिकविना लोकोपासयोगव्यादि क प्रतेलीये तेबीजोलेणो एमएवेप्रकारना सणामागुतोथको ताहरीसी धव स्यायासे अर्थात उष्टयवस्थाज पामीस इतिनाव ॥ १६ ॥ न कापि सिनि च तेतिशायि मुने क्रियायोगतप श्रुतादि ॥ तथा प्यढकारकथितस्त्व ख्यातीच्या ताम्यसि धिड मुधा कि॥१७॥ थर्थ ॥ हवेतथाविधगुणविना कीर्तिनेसुवावे हेमुनिताहरेविकोई विद्यामत्रा दिक सिदिनथी वलीवादणा खमासमणाप्रमुख उत्कृष्ट क्रियानथी तथामनवचन कायाना योगनी शुनप्रवृत्तिनथी तथाबाह्यान्यतरतपनीकरतो तथाश्रुतज्ञान था दिशब्दथी प्रनाविकपणु राजाप्रमुखनु प्रतिबोचवु इत्यादिकगुणतेपणनथी तोपणतु | थहकारे कदथितयको ख्यातिजे प्रसिधितेहनी वागयेकरीने फोकटशोपरीतापकर ने माटेतुजन विकारयाताहरामा जो कोथतिशयगुणहोय तेवारतो ख्यातिनी ठिापणयुक्त थनेतेविनाज प्रख्यातीनेवांछेले माटेतु धिक्कारवायोग्यठो ॥ १७॥ हीनोप्यरे भाग्यगुणैर्मुधात्मन् वास्तवार्चाद्यनवाप्नुवश्च ॥ ईर्यन् परेन्यो लनसेऽतितापमिदापि यातो कुगतिं परत्र॥२॥ थर्थ ॥ फरोहिजकहेने थरेनिनोग्य नि पुण्यकथात्मातु गुणरहितथको फो कटस्तवनापूजाप्रमुग्यने वाढतो जोपूजास्तवनानथायतो क्लोजोकोउपरकोधकरता थको इहलोकैपण थतिशय तापसतापपामेवे अनेपरलोकेपणहतियेजश्शा॥१ गुणविहीनोपि जनानतिस्तुति प्रतिपदान यन्मदित प्रतीचसि ॥ तुलायगोश्योष्ट्रखरादिजन्मनि विना ततस्ते नविता ननिष्क्रय ॥णा G॥

यतिशिदोपदेशाधिकार. अर्थ ॥ हवेकुगनिमांपडवाविपे उपदेशकरीने प्रतिबोधले हेचतिवेषनाधारक तुं गुपारहितयको पणदर्पवतथयीने लोकथी नमस्कागतिक स्तवना वस्त्रपात्रअन्नादि कलेवावांने तेहथीनुजने लुलायजे पामोपाणीवहेवायोग्य अथवागोजेवनदीयो इल गाडा यंत्र कोस प्रमुख बहेवायोग्य अथवाधवते अस्वागकरवायोग्य तथा उंट खरगसन अनेकविधनारवहेवायोग्य इत्यादिकवतार पाम्याविना तेप्रतिग्रहाटि कनु मूलनधाय केमकेगुणविनापण लोकोपासेथी प्रतिग्रहाटिक कश्पेठे तेहनुलेको पामाप्रमुग्वना अवतारपामि नारवहीनेतूटबुंठे एनावार्थ ॥ १ ॥ गुणेषु नोबच्चसि चेन्मुने ततः प्रगीयसे वैरपि बंद्यसेऽच॑साजु गुप्सितां प्रेत्य गतिं गतोऽपि तैसिप्यसे चाऽनिनविप्यसेऽपि वाणा दानमाननुतिवंदनापरै मादसे निकृतिरंजितर्जनैः ।। नववैपि सुकृतस्य चल्लव. कोपि सोपि तव लुच्यते हितैः॥२२॥ अर्थ ॥ वलीतहिजप्रकारांतरेकहे। हेमुनिजोतुंगुणनेविपे उद्यमकरतोनथी ते वारेश्हनजे तुजने श्रावकादिक गीननासप्रमुखेकरीगाय तथावलीबादशावर्त वां दपायेंकरीबांदवे सुगंधलेपनाटिकेंकरीपूजेते तेतुंपरनवें निंदनीक कुरुप दरिश्तादि क पाम्याथका तेहिजताहराउपर इससे तथानानाप्रकारनीपीमा उपजावसे एटले ते स्वामिपणे अवतरसे अनेतुंदासपणेथाइत तिहां लातो लाठीप्रमुखना प्रहारेकरी तुजनेपीडने ॥ २० ॥ हेमुनितुं कपटक्रियायेंकरी लोकरीजवीने तेहोने टानसन्मान स्तवन वंदनानेविपे तत्परदेखीने हर्षपामेठे पण एम नथीजाणतो जे ताहरो लेश मात्ररुत तेहनेएलोकलुटेठे ॥ २१ ॥ नवेजुपी मुग्धकतैनदि स्तवे न ख्यातिदानार्चनवंदनादिनिः॥वि ना गुणान्नो नवजःखसंदय स्ततोगुणानर्जय किं स्तवादिभिः॥२ अथीहवेस्तवनादिकनी वांटामूकीने गुण पोषकरवुतेकहेठे हेमुनितुं विशेपाविडो पनायजाण एहवामुग्धलोकनीकरेलीजे स्तुतितयाख्याति प्रासादिक तेणेकरीगुणवं तनथाय बलीगुणजे ज्ञानादिक तेहनीप्रातिविना संसारनोविनाश यनेमुक्तिनीप्राप्तिन थाय तेमाटेकेवल गुणनेजउपार्जनकर पपस्तुतिकराववाथी कांऽअर्थसिदिनथी२२ अध्येपि शास्त्रं सदसविचित्रा लापानिनिस्ताम्यसि वा समा चायेपां जनानामि रंजनाय नवांतरे ते क मुने क्व च वा३॥ अर्थ ॥ हवेलोकरीजववामाटेतुं शास्वनणेने पणनवांतरेतकिहां बनेरीजनारलो ७३ अध्यात्मकल्पडम. ककिहा तेदेखाडेठे हेमुनितुजे लोफरीजववानिमितें सत्के० जनोजिनागम तथा यसत्के० विरुष्बोक्षादिकनुशास्त्रते प्रतेनणे थनेवली कपटसहित नानाप्रकार नाबालापसलापादिक तेणेकरीने घणुप्रयासफरेने पणनवांतरे तेलोककिदागतिमा जशे थनेतु केइंगतियेजश एटलेथानचे जावजीपयुद्धीजे जीव तें रीजव्याह तेपरनवेकोऽपण ताहरे कामेथावेसेनही ॥ २३ ॥ परिग्रह व व्यजहाहादे स्तत्कि न धर्मोपकृतिबलात्त ।। करोपि शय्योपधिपुस्तकादे गरोपि नामातरतोपि दता॥३॥ अर्थ । हरेपरिग्रहत्यजवा थाश्रीउपदेशेने हेमुनितेंपूर्व घरप्रमुखनुपरिग्रहना ड्यु अनेवली धर्मोपकरणने मीसकरीने शय्या वस्ति उपपि वस्त्र पात्रादिक पुस्ल क यादिशब्दयी पाना चाबखी पोथी बांधणा जपमाला प्रमुखउपकरणनो परिग्रह संकरे धर्मोपफरणजेकाइ बहुमूनो ममतानावशयकी वधारेराखियेते परिग्रहजना यो केमके गरके पि तेहननामातरकस्यायको एटलेनामफेरवीनाख्याथीप ण हताके मृत्युकारकहोयज जोविपने साकर यमृत इत्याटिककहियेतोपण खाइ थकु प्राणहरणकरे तेमपरियहने धर्मोपकरण निमित्त राज्योथकोपण मुर्गतिश्रापे परिग्रहात्स्वीकृतधर्मसाधनानिधानमात्राकिम मूढ तुप्यसि॥ न वेत्सि हेनाप्यतिनारिता तरी निमज्जयत्यगिनमबुधौ द्रुत ॥२५॥ थर्थ आपलीते हिजकहेठे हेमूर्वसाधोतु स्वीकृतके प्रमाणकि, धर्मसाधनके० धर्मोंपकरण एहवुनाममात्रजेहनु एहवोपरिग्रह पाम्याथी मुहर्षपामेळे हेमूर्खतुन थीजाणतोजे थतिशयनारी एहयोजेसुवर्ण तेणेकरीनरी एहवीतरीजे होडी तेजेम श्रगीनके० वेशनारमनुष्यने वोडे तेमनुजनेपण धर्मोपकरणनेमीसे मल्योएहयो जे थतिपरिग्रहतेनवसमुश्मा बोडो इतिनाव ॥ २५ ॥ यह कपायफलिकर्मनिवधनाजन स्यु पुस्तकादिनिरपीहितधर्मसाधनै॥ तेपा रसायनवरैरपि सर्पदामये रात्मिना गदहते सुखकृत्तु कि नवेत् थर्थ ॥ जेमुनिये हितके वायुचे धर्मसाधनजेथको एहवाजे पुस्तकाविकते करीनेपण थहजेपाप तथाकपायजे कोधादिक तथा कलिजेकलहतेना करवा थकी कर्मजे ज्ञानावरणियादिक तेनानिका चित्वधनुनाजनथाय तेहनेबीजोको मुग्यकार्य निवृत्तिनुकरनारनयाय एटलेजेहनेधर्मापकरणतेहिज ममत्वनावशथकी परिग्रहपणे परिणम्याने तोतेहनेश्रय क्लेशपायादिकने करवेकरीकर्मवृद्धिकरने यतिशिदापदेशाधिकार. ३ तोतेहनेसंतोपते पठे फरीबीजाशायकीयाते एनावार्थ तेहदृष्टांतकहे जेम रसा चनजे मृगांगपारादिक तेहनोसेवनकरवाथीज उलटोमांटापडयो एटलेरसायनय कीपण जेहनेरोगवध्यो तोपत्रेतेहनारोगर्नु निवारकवीजोसुखकारी कोइनथी ॥२६॥ रहार्य खलु संयमस्य गदिता येऽर्या यतीनां जिने सि.पुस्तकपात्र कप्रनृतयो धर्मोपकृत्यात्मकाः॥ मूठन्मोवशात्त एव कुधिया संसा रपाताय धिक् स्वं स्वत्यैव वधाय शस्त्रमधियां यहःप्रयुक्तं भवेत्।। श्रयं ।। निश्चकरीनेजे वस्त्रपुस्तकप्रमुख पदार्थतेत्रीजिनेश्वर साधुनेसंयमनीरदा नेवर्थ धर्मोपकरण स्वरुपेकह्याने तोहाहा इतिखेदे तेहिजपदार्थ कुबुदिनाधणीने अतिशय मोहनावशयकी उलटातंसारमांबूडावनारनाकारण थपडेठे तेहदृष्टां त जेम बुद्धिहीनपुरुपर्नु पोतानु अस्वजेखड्गादिक तेविपरीतपणे राज्युहोय तोपो तानेजवधकारीयाय तेहनीपरे जाए ॥ २७॥ संयमोपकरणवलात्परान् नारयन् यदसि पुस्तकादिनिः॥ गोखरोष्ट्रमदिपादिरूपनृत्तचिरं त्वमपि नारयिप्यसे॥श्ना यूथ । हेमुनितुंजे परप्राणीनारवाहक पोटी बलट उंटप्रमुखने संयमनाउपकरण नेमीसेकरी पुस्तकादिकनुं नारवहेवरावे तेमाटेतेप्राणीतुजनेपण बलद उंट रास न पामाप्रमुग्वना अवतारपाम्यायका चिरकाललगें नारवहेवरावशे ॥ २० ॥ वस्त्रपात्रतनपस्तकादिनः शोनया न खलु संयमस्य सा॥ आदिमा च ददते नवं परा मुक्तिमाश्रय तदिव्यकिकाागणी श्रर्थ ॥ हवेवम्वपात्रादिकथा संयमनीगोनानथीनेक मुनि वस्त्रपात्रतथा रोर पुस्तकऽत्यादिकनी गोनाकीधेयक निश्वकरी यमनीगोनानथाय एटजेववादि फ्नीशोनाते मंयमने अगोनाकारणीने तेमांपणवतीयादिमक पहेलीज ववाटि क्नीगोनाते नवनमजयापे श्रने परके बीजीजे तंवमनीगोनाते मोहजयापे ते माटेजोसंसारनी बांटाहोयनो वयादिस्नी शोनाघाटर थनेजो मुक्तिीवाना तुजने होय तो नंयमनीयोनायादर ॥ ॥ वस्त्रपात्रतनुपुम्कादिनः शोनया न खलु मंयमस्य मा। तां तदत्र प रिक्षाय संयम कि यनेन यतमे शिवाथ्यपि ॥ निचोनगईशान ॥३॥ अर्थ ॥ वरूपात्रेनि एपाठांतर ए जोत्नुपदांठ पूर्वनोपजाणई धनंटनगईनी १४ अध्यात्मकल्पद्रुम व्याख्याकहे। तस्मात्कारणात् तेकारणमाटेदेसाधो ते वस्त्रादिकनी शोनाजामीने जोमुक्तिनोथर्थीठोतो जिनप्रणीत चारित्रनविपे केमउद्यमकरतोनथी । ३० ॥ शीतातपाद्यान्नमनागपीह परीपताश्चेदमसे विसोटु ॥ कथ ततोनारकगर्नवास खानिसोढासि नवातरे व ॥३॥ थर्थ॥होपरीपह सहेवाथाश्री उपदेशथापेने हेमुनिजोतु सयमनेविपे टाहाड़ तापप्रमुग्य थोडापणपरीपह सहेवानेसमर्थनथी अनेकायरथाय तोनवातरेनेविष नरकतथा गर्नवासना ख केम सहीस एटले नरकादिकना उ खसहेवाथीतो परीर हनाड रखनुं सहेवुनजुरे एमजाण ॥ ३१ ॥ मुने न कि नश्वरमस्वदेद मृप्तिंडमेन सुतपोव्रताये ॥ निपी ड्य नीतीनवदुखराशे हित्वात्मसाठेवसुख करोपि ॥३२॥ थर्थ ॥ दोसाधुने तपप्रमुखनु उद्यमकरवुकहने हेसाधु एविनाशशील तथा था रपरपोतानुनही एहवोजेदेहरूप माटिनुपिम तेहने नलाजिनाझासहित तपनतप्रमुख फ्री दीने ससारनाउ खसबधी सर्वनयटामिने मुक्तिसवधी मुखतें पोतानेवश मनयीकरतो ॥ ३२॥ यदत्र कष्ट चरणस्य पालने परत्र तिर्यड्नरकेपु यत्पुन ॥तयोमि यसप्रतिपक्तता स्थिता विशेपदृष्ट्यान्यतरं जदीदि तत् ॥३३॥ अर्थ ॥ देमाधुजेश्हा श्रीजिनशासनेपिपे चारित्रपालवानीकट अनेपरनवे ति यग्नगादिस्नेपिजे कटने तेयेदुकटने परस्पर प्रतिपक्ष्पगुरहे। एटलेजिहां चा स्त्रियष्टने निहातिपंपनरक्नु कष्टनयी अनेजिहा तिर्यचनरकादिकना कष्टने तिहां धान्ति पटनथी तेमाटेविशेषदृष्टिये रिचारी तेवेमाथी एककष्टनेमूक ॥ ३३ ॥ शमत्र यद्विज्जरिव प्रमादज परत्र यच्चाब्धिरिव द्युमुक्तिग ॥ तयोमि य मप्रतिपकता स्थिता विशेपदृष्ट्यान्यतरदाण तत् ॥३४॥ अर्य ॥ हवेमुग्मनुग्रहबुकहे। हेमायोऽहा चारित्रमांप्रमादकरवायोजे सुग्य विंटने घनेमपमना पाजवायकीजे देवजीकमुक्तिनासुख तेसमुश्मरसाने तेवन्दमुग्ने परमप्रनिपक्षपणुने जिहांप्रमादसुखतिहा मुक्तिमुखनयी थने जिहां मुभिमुगनिहाप्रमादसुम्पनीमाटेविशेपेपिचारी बेमाथी सारजागतेने थावर॥३४॥ ते यतिशितोपदेशाधिकार. जय -- --- । अग्रवाशनियंत्रणायाचरणेऽत्र तिर्यक् स्त्रीगर्नकुंजीनरकेपुया च ॥ नयोमिधः सप्रतिपदानावा हिशेपदृष्ट्याऽन्यतरां गृहाण ॥३॥ श्रर्थ ।। दवेगुरुपारनत्रयाश्रयीकहेठे देसाधुऽहांजिनशासनमां चारित्रनेविपेजे गुरुपारनंच्यादिकत्रणप्रकारनो परवशपा'ने अने तिर्यंचनाअवतारमा तथास्त्रीनागर्न मां तथा कुंनीतेषणोजसांकमामुरखनुनारकीने उपजवानुस्थानकतेमा उपनाजेनार कीते खंडोखंडथयी वाहेरनिकले तेहनेविपेजे परवशतापणु तेवेदुने परस्परप्रति पदीपषुवे एटले जिहांचारित्रनी नियंत्रणाहोय तिहांतियच स्त्रीधने नरकादिकनी नियंत्रणानहोय यनेजिहां तिर्यचस्त्रीनरकादिकनी नियंत्रणाहोय तिहां चारित्रनी नियंत्रणानहोय माटेविशेपदृष्टिविचारीने तेवेमाथी एकनियंत्रणानेश्रादर ॥३॥ सदतपोयमसंयमयंत्रणां स्ववशतासढ्ने दि गुणो मदान्॥शिवं गुण इति वा पावः ॥ परवशस्वतिनूरिस दिप्यसे न च गुणं वदुमाप्स्यसि कं च न ॥ ३६ ॥ । यर्थ ॥ हवेपरवशेडःखसहेवाकरता पोतानावशेउरवसहेवूनखंचे तेकहे हेसा धुतुं चोथप्रमुखतप तथा नियमथानियदादिक ते यम तथासत्तरनेदें संयमसंबंधी एत्रण नियंत्रणाउँछेतेनुसदनकर केमके एत्रण नियंत्रणायोते पोताने स्वाधीनपणे सहनकरवीते महोटो गुण तथापानांतरे एथकी शिवगुणके० मुक्तिरूपीयोगुण होय घने जे यतिपरवशपणे एकेझ्यिादिकमां पराधीनथको घणीजनियंत्रणायो सहीस तिहां थकामनिर्धारासिवाय अधिकुंगुणमात्र कांइपणापामीसनही ।। ३६ ॥ अणीयसासाम्यनियंत्रणानुवा मुनेऽत्र कप्टेन चरित्रजेन च॥ यदि दयो उतिगर्नवासगा सुखावलेस्तत्किमवापिनार्थितं ॥ ३ ॥ थर्थ ॥ वलीप्रकांतरेतेहिजकहे साधो थाजन्ममां समतारूपनियंत्रणातेसं बंधीकष्ट तथाचारित्रसंबंधीजे अल्पमात्रकष्ट तेणेकरी पुर्गति यने गर्नावाससंबंधी असुखनासमूह क्यथायले तोतेथी सुवांवितपणुंतुनपाम्यो अर्थात्पाम्योज ॥३॥ त्यज स्पृदा स्वः शिवशर्मलाने स्वीकृत्य तिर्यड्नरकादि खं ॥ सुखाणुनिश्चेदिपयादिजातैः संतोप्यते संयमकटनीरुः ॥ ३० ॥ अर्थ ॥ हवेप्रमादवंतने रीसेकरीकहे। हेसाधुतुं जो विषयादिकधीउपनोजे सुरव नोलेश तेणेकरी संतोषपामेले थने संयमनाकरथीबीहेठे एरीतेतो ते तिर्यच तथा ६ अध्यात्मकल्पाम नरकनुऽ खम्बुनकरीने स्वर्गमोदनासुखपामवाना वांठामूकीदीधी एटलेधणुमात्र मुख उपर राज्योयको स्वर्गमोदनुं यतुल्यसुखहारेठे एनावार्थठे ॥३०॥ समग्रचितार्तिहतेरिदापि यस्मिन् सुख स्यात्परम रताना॥ परत्र चेादिमहोदयश्री प्रमायसीहापि कथ चरित्रे॥३णा थर्थ ॥ हरेचारित्रथी इहलोकेतथा परलोकेसुखचे तेकहे चारित्रमारक्तथयना । एहवाजेनावसाधु तेहने सर्वचिताना निवारवाथकी इहलोकेपण परमअनुपमहल होय थनेपरलोकैपण शादिकनीसपदा तथा मोक्नीसपदाहोय तोहेसाधो एहबुजे चारित्रतेनेपिपे रह्योथकोतु सुप्रमादकरे। यत देवलोकसमाणोथ परियामहेति ए । रयाणथरयाणच महापरयसारिसा ॥ १॥ पुन नच राजनय नच चोरनयन चरनिनपं न वियोगनयं॥ह लोकसुख परलोकहितं श्रमणत्वमिद रमणीयत॥२॥ महातपोध्यानपरीपदादि न सलमाध्य यदि धर्तुमीश ॥तभावना कि समितीश्च गप्ती धत्से शिवार्थिन् न मन प्रसाध्या ॥४०॥ अनित्यनाद्या नजनावना सदा यतस्वसाध्यगणेऽपिसयमोजि घत्मया ते वरते ह्यय यम श्रयन् प्रमादान नवाहिनेपि कि॥४॥ चर्पकोजेनगुरष्टहरीशनिहीतोते सुखसाध्यधर्मफरे तेकहे। देसाधु तु पराक मयत पुग्ने साधयायोग्य एहवाजे मासखमणप्रमुख महातप तथा प्राणायामादिक प्पान तपादधादिरपरिसद धरवानेसमयनयी तोहेमोक्ष्नावावक केवलमनेरीज सापिसीएडीजे यानित्यादिकनावनातेनुसेवनकर ॥ ४० ॥ तथावलीप्रकारात रस्ते माधोतुयनित्यताप्रमुख बारनायना ने सदानज थनेष्ठ खे साधवायाग्य मोनरगुणने जेना एडवासयमनेपिपेपण सुकुमानपणुगामीउद्यमकर केमो मृ स्यते नुतने मासापानीठायें उतावनुयायचे दिनदिनप्रतं टुकयावेने मा देशमादवनोपशेषण मनेकरीमनारयकी वीहितोरहेजे ॥ ४१ ॥ टन मनम्ने कुविकल्पजाले वैचोप्यवद्यैश्च वपु प्रमादे ॥ लब्धी शमितीश्च तयापियांगन् मनोरयरेव ददा ढतोसि॥४॥दग्व मनो मे पिकल्पनाले बचाप्यवद्यैश्च वपु प्रमादे लब्धीश्च मि हीच तयापियांउन् मनोरये रेव दहा विढन्ये ।।इतिवापान ॥४॥ या हवेमामविनापण महोटामोटा मनोग्यारया अफल कहेने हे

यतिशिदोपदेशाधिकार.
10
साधुताहरोमनतें माताविकल्पनासमूहें विणसाड्युं अनेवचनपण मृपानापणादि
क पापेकरीविणसाडयु वलीशरीरपण प्रमादजेमद्यादिकतेणेकरी विणसाडघु एरीतें
मनवचनकायारूप त्रणगुप्तिविणसाडी तोपण आमोलहीप्रमुखलब्धि तथामंत्रधि
द्यादिकसिधिने वांठे माटे हाइतिखेदे मनोरथेकरीज पीडायवे जेमशाली उथ खां
मप्रमुख सामग्रीविनापण कोश्मूखदारनानोजननु मनोरथधरतो अहर्निशविकल्प
ज पीडाय तेमतुंपणपीडायते ॥३२॥ तथावलीपावांतरें माहरुमन कुविकल्पजालें
विणान्यु तथा अवद्यके मृपानापणादिकपा– वचनविणास्युं अनेप्रमादेकरीशरीर
विपास्युं तोपण लब्धि भने सिदि प्रतें वांठतो थको हाइतिखेदे हुँ मनोरथमात्र
ज सुपीमाउनु इत्यादिक पहेलाकाव्य, पाठांतर काव्यजाणवु ॥ ४३ ॥
मनोवरास्ते सुखःखसंगमो मनो मिलेयैस्तु तदात्मकं भवेत् ॥
प्रमादचारैरिति वार्यतां मिलतीलांगमित्रैरनुपंजयानिशं ॥४४॥
अर्थ ॥ हवेमननेसतसंगमांजोड तेकहेठे हेसाधुताहरे सुखअने फुःखनोजे मि
लाप तेमननेवशवे केमकेमनजेदनीसाफैमिले तेरूपीथाय जेम तलने जेहवाफलनो
संगमिले तेवीवासनामयथाय माटेमननेप्रमादरूपचोरसाग्रॅमलतो वारीने नित्ये मी
सांगरथरूपजेमित्र तेनीसायेंमेलव जेथकीतुजने सर्वथासुखसार्थेज मिलापथाय ॥ ४४
ध्रुवः प्रमादेनंववारिधौ मुने तव प्रपातः परमत्सरः पुनः। गले
न वोसशिलोपमोस्ति चे कयं तदोन्मजनमव्यवाप्स्यसि॥४॥
अर्थ ॥ हवेयुकिविशेषेकरी प्रमादनोपरिहारकहे। देसाधुप्रमादनाहेतुयेंकरी तु
जनेसंसारमांपडतो निश्चय थकीते केमकेप्रमाद थनेसंसारने थनिधुमादिकनीपर्ने
नित्यबंधवे थनेवलीजो गलेबांधिमोटी शिलासरिखं परप्राणीउपरमत्सरतुजने तेवा
रे संसारसंमुड्मांधी तरीनिकलवं केमपामिस माटेप्रमाटयने मत्सरवेदुत्यज।।४।।
मदर्पयः केपि सदंत्युदीया प्युग्रातपादीन्यदि निर्जरार्थ ।।
कष्टं प्रसंगागतमप्यणीयोपीचन् शिवं किं सबसे न निहो॥ ४६॥
थर्थ ॥ हवेकप्टसहेवाथाश्री उपदेशधापेवे केटलाकमदापी तेनश्वादुस्सा
मी दीक्षितचार व्यवहारीपुत्रनीपरें शीतादिक परिसहनासहनारा बली उपके घ
पोकतिण थातपके तडकाप्रमुख काटने उदरीनेपण निर्जगनेर्थन हे तेवाग्है
साधुहूं मुक्तिनेतोवांते तेवारें प्रतंगथी उदयधाव्यु एडवोसल्पमात्र कष्टमतेकांन
थीसहेतो थनेकष्टसह्याविना मुनिकेमपामिस एनावार्थ ॥ ४ ॥

១ पीर मावानांनपी पणमनपी माश्यचिंतवे यनेवचनथी साक्यकर्मप्र मनपी नपा बननपी मुमुदनथी मात्रापायीन मुमुहले एनावार्थ हांवर अध्यात्मकल्पऽम. योदानमानस्तुतिवदनादिनिन मोदतेऽन्यैर्न त धर्मनायते॥अला जलानादिपरीपदान् जयन् यति सतखादपरो विम्बक ॥४॥ अर्थ ॥ हवेयसाधुपणा तथा साधुपणानो देखाडे जेलानथलानादिक र रिपहनेजीपतोथको ग्रहस्थनुयाप्यो यहारनपधिप्रमुखदान तयासत्कारस्तुतिप्रम समान इत्यादिकेकरी हर्पपामेनही थनेयमान अपमान प्रहारादिके हवापनहीं तेहिजपरमार्ययी यतिजाणवो थने थपरके बीजाजेदान वदनादिकथी हर्षपामे तथा थलाननदादिकथा उहवाय तेयतिनावेपे विडवकके नटरुपजाणवा ॥134 दधगृहस्येपु ममत्वबुद्धि तटीय तप्त्या परितप्यमान ॥ अ निरतात करण सदा स्वे स्तेपा च पापैर्धमिता नवेसिाधना अर्थ ॥ हवेमनोगुप्तिराखवानेथर्थ यति ग्रहस्थनी बिताकरवीनही तेकडे देगाधुनुपरस्थनेपिपे ममत्वनीवुद्धिरतोथको थनेग्रहस्थनीचितायें तपतोषको पोतानापा तथापनस्थनापा निरतरव्याकुलचित्तवतथको ससारमानमीसाधता त्यक्त्वा गृह स्व परगेदचिता तप्तस्य को नाम गुणस्तव ॥ श्राजीवि काऽम्ने यतिवेपतोऽत्र सुर्गति प्रेत्य तु निवारा वर्ष ॥ साधु पोतानुपरमूकीने वलीपारका श्रावकादिकनाघरनी चिंताकरी नुतागागुणने एरपरमूकी पावरनीचितायें कोगुणनथी थानवांतोतुजने यति दानापथी याजी पिराचानेने पणपरनवेंतो तुजने अतिशयमुर्गतिपुर्निवारक एग नादिरने पणपरनों गतिनोगारनारकोश्नथी एनावार्थ ॥ ४ ॥ वन मापयमिति प्रतिज्ञा बदन्नकुर्वन्नपि देवमात्रात् ॥ शय्या दिन्येषु नुदन गृदम्यान् हृदा गिरा वाऽमि कय मुमुद ॥ ५॥ वर्ष। देवनुशपामात्रयीमाधुनों पणमनपचनयीमाधुनया कहे। हेमुक्तिवा बरमाधुनु नित्याने यापयाकरता सब सापडाजोगपखामि जाजीपाए तिविद विपि मागेल गपाए काएण यादिकपाठकहीने दुसर्वसावधकरुनही एहवीत्र तोपरी मारमा रोग्याज यणारतीयकोथयोपणाच्या जेउपात्र पर मापनेविष महायोग्तीयकोती तो तमामनयी थनेवचनथी मुमुक्षु तेश नरेटने मन वचन कापाकी सावधमूक तहने मुमुकहिये थनेतुतोगयामा यतिशितोपदेशाधिकार. जए पाते यादेशदेवामात्रजजाणवी वीजीप्रवर्तनरूपप्रकरण इत्यादिकप्रेरणीय एटले पूर्वेपणाव एकतकरयां लाननुकारण इत्यादिकप्रेरणाकस्सातो साधुनेव्यवहा रटेज यथाश्रीरायप्रश्नीयसूत्रे जुत्तमेयंसुरियाना पुराणमेयंसुरियाना किच्चमेयंसुरिया ना करणिकमेयंचरियाना थारुणमेयंसुरियाना थप्ननायमेयंसुरियाना इत्यादिक विधिवाक्यदेखायो तेप्रेरणाजाणवी ॥ ७ ॥ कयं ममलाय ममत्वतोवा सावधमिवस्यपि संघलोके ।। न दे ममध्यप्युटरे दि शस्त्री दिप्ताहिणोति दपतोप्यसून् किए अर्थ ॥ वलीतहजकहे हेसाधोतु साधुसाध्वी श्रावक श्राविकारूप चतुर्विधसंव मां थमुकागीतार्थनावखतमां थाचत्यकराव्यं एहवीमहोटापामवानेयर्थ तथाथा अमारागठनो चत्य उपाश्रयाटिकवे इत्यादिकममत्वथकी सुंसावद्यकर्मवांठेठे संसा रीनीपरे सारंनकार्यतर्वमाथेलेग्ने करवामुंवांठे थथवासंघमा महत्वपामवानेयर्थ तथाममत्वयकीज सावयले धनप्राप्ति प्रमुखतेसुंवाठेठे जेमाटे सोनानीतुरीपण पे टमांचापीयको इंप्राणहरणनीकरतीके. एटलेसोनानीतुरीपण पेटमांमारीयको प्रा पहरे तेमतंयनिमित्तपण यविवियें सावद्यकमकीते संयमरूपप्राणनेहरेवे५१॥ रंकः कोपि जनानिनूतिपदवीं त्यक्ता प्रसादा शुरोपं प्राप्य यतेः कथंचन किंयनास्त्रं पद कोपि च ।। मौखर्यादिवशीकृतर्जुजनतादा नार्चनैर्गर्वना गात्मानं गणयन्नरेमिव धिग्गंता जुतं उगतो॥५॥ अर्थ ॥ हवेद्यात्माने उतपऍनिवारवा उपदेशेने कोकपुस्पपूर्व ग्रहस्थाव सतायें रांकहोय घनेलोकोने उपदाम्यकरवायोग्य निंदाकरवायोग्य विविधप्रकारनी लोकोनीसेवा करवायोग्यहोय पवेगुरुनापशाययी तेधवस्यात्यजी यतिनोवेपपा मीतथावणाकटे कांकशास्त्रनुनणदुंपामी तयातेमांवली कोऽकथाचार्यउपाध्याया दिकपदीपामिने वाचालपणा प्रमुखकजायें नोलालोकोनेवशकरी तेहनाकरेला जे दानपूजा सत्कारादिक तेणेकरीने अहंकारधरतो थको पोताना यात्माने रानातु व्यगणे पण एमनजाणेजे ढुंते शीगणतिमा एसर्व दानपूजादिक जे थायठे तेतो श्रीजिनेश्वरना मार्गने यायचे तेमाटेहाइतिखेटे तेप्राणी उतावलुंऊर्गतिजे नरकादिक तेमांजा माटेगर्वनकर, ॥ ५ ॥ प्राप्यापि चारित्रमिदं जरापं स्वदोपजेश्वेदिपयप्रमादेः॥नवां वुधो धिक् पतितासि निदो हतोऽसि मुखैस्तदनंतकालय३॥ -- 7 मनने सवरे रहित एवुजे तउलमत्स्य तेउतावलु थोडाफालमाज सातमानरकप्टथ्वीर अण्णात्मकल्पडम. त्यदृश्यमान जेहनु महाफलश्रनुनमायने एकगार सयमति तु कांउद्यम नथी । करतो सर्वथा उद्यमफरयोज युक्तते ॥uel इति श्री श्रयात्मक पध्मे यतिति कानिधानोनाम त्रयोदशोधिकार सपूर्ण । अथ सामन्यतो यतीन् विशेषधर्मस्यगृहिणश्चाश्रित्य मिश्यातादिम वरोपदेश मिथ्यातयोगा विरतिप्रमादानात्मन्सटा सण सारख्य मिन् ॥ असंरता यमयतापमंते सुमरना मुक्तिरमा च दद्य ॥२॥ अर्थ। दवे यतिने तथासम्यक्तमूलवारवृत्तवारक श्राफने साधारण मिथ्यात्वावनि कपाय योग निरोधोपदेश तथा सबरोपदेश नामाचादमो अधिकारकहेने तिहांप्रथमक मबधनाहेतुजे मिथ्यात्वादिकतेहसपरकहे देशात्मातु सुम्पनेतितो होयतामिण्या खजे अनियहिकादिकपाच तेमायनिग्रहिक तेपोतानागास्वादिफनाममन्वयी कहान हकरवो तेकुतीधिपाखडादिक बीजुयनानिग्रहिक ते सर्व देवा सर्व गुरुव सोधमा श्रश्राराध्या एहवोयनिप्राय जेसामान्यप्रारुतजोकोनोते त्रीजुयानिनिवेशिक ते व स्तुनु यथास्थित स्वरुपजाणेयके पण कोऽऽष्टानिनिवेशना वगथी पोतानु मनथा पवानेयर्थ गोष्टीमाहिलादिकनीपेठे यसत्यापणानुफरवु चोयोसायिक त देवादि कतत्वनेपिपे श्रासाचूके अासाचू एमसदेहधरवो पाचमु थनानोगिकतेथिनाना नावशयको एकेडियादिकनेविषे जीवादिकतत्वनु अपजाणवु । एपांचमिप्याद तथा अगुनमनोयोगादिकत्रण अनेयविरतिते प्राणातिपातादिकपाच तथाप्रमाद मद्यादिक पाच एचारेनेसदाकाललगे सवरवुमके एचारेने अणसवस्याथका सता रनातापप्रत्ये थापे अने सवस्खायका मुक्तिरूपिणी लक्ष्मीनेापे ॥१॥ मन सणु दे विनर्सरतमना यत । याति तलमत्स्यो डाक सप्तमी नरकावनी॥२॥ श्रथे । हवेप्रथम मननुसवरउपदेशेने हेपमितथात्मा तुतारामननेसवर केमो जअवतरे एमत्स्यसमुहमाहेला महोटामत्स्योनी पाखनीपापणमाहे सूक्ष्ममलित गर्ने सातमीनरकथीचवीनेयवतरेले तेमस्य तलप्रमाण जथाय पतेमहार रस्यना मुखनाफाडमा पेसतानिकलता एहवाअनेकन्हाना मत्स्यादिकदेखीने तेता मत्स्यएदवुचितवेजे हाहाइतिखेदेजो माहारी थावडीमोहोटी कायायश्होततो हुध सर्वजीवनाकोजियाकरु पणएमाथीएफेनेजावानापु एवमहापुर्धान चितवत्तोपा श्रतर्मुहूर्नप्रमाण थापुनोगवीने एकमुहूर्तने थतरेवलो सातमीनरकप्पथ्वीये जा । म - - मिथ्यावादिनिरोधोपदेशाधिकार. 13 बतरे एरीजीवते वचन तयाकायायें अशक्तयकोहोचतो पण मात्रएकमननाज थ संवरथकी तंडनमल्यनीपे कुर्गतिगामीवाय ॥ १ ॥ प्रसन्नचंजराज मनःप्रसरसंवरी। नरक स्य शिवस्यापि देतुभूती दाणादपि ॥ ३ ॥ अर्थ ॥ वतीते उपरज दृष्टांनकहे प्राणि मननुप्रसरजे उर्थ्याननीप्रवृत्तियने सं वरजे उनिथीनिवृत्ति तेबेहु एकक्षणमात्रमांजेम प्रसन्नराजज्ञपिनेनरकनां श्रने मुक्तिनापण कारणथया कमकतने मननाउऱ्यांनथी एकदणमात्रमा सातमांनरकनुंद लमेजयुं अने तेजमनना संचरथी एकदणमां केवलज्ञानपण उपायं. ॥ ३ ॥ हवेनदेपथीतेप्रश्नचंगजपिनोमबंधनखीठये दितिप्रतिटितपुरमा प्रसन्नवं राजा राज्यकरताहता धन्यदातिहां श्रीवीरस्वामी समोसम्या प्रसन्नचंराजा मह परिवारें वांदवायाच्यो देशनानांनती वैराग्यपाम्यो पुत्रनेगज्येस्यापी श्रीवीरपामे पोतेटीहालीधी अनुक्रमेगीतार्यययो अन्यदाविहारकरतो गजगृहनगन्याव्यो नि हाजिनकल्पीनी तुल्यनानेधये स्मशानमा काउलग्गधरीरह्यो। एटलामांश्रीवीरम्या मीगजगृहनगरेसमोसयाठे नगग्लोकसर्व जगवतने वांढवाजायठे एटनामांकोsए क वेचणिक तेक्षितिप्रतिष्टितनगरथीयाच्याने तमाथीएकवणिक-प्रसन्नवंशराजर्पिने जोडबोल्यो केयन्यवेद्यापणागजाने गन्यतचीतृणनीमाफकत्यजीने व्यानाधिरुटय को उग्रतपको तेमांनजीवीजीवणिकवोव्यो कंधोधिःकाग्वेएनातपने एनुंमुखजी वायोग्यनयी कमकएबापटाबालक पुत्रने राज्यधापी मूढयानिकव्यो नेपावलतो सीमाडेबीजागजायेंधावीनेवालकनुराज्यदरी नेवानगर नगरतयादानाजीकम घनाथययायका बटुतनपेचे माटेदेशनांगने घाणंयनर्थयागे तेथीएतें'धर्मधागधनं ते मानतीप्रमन्नचंशजर्षि ध्यानयीनृतीने चिनववालागो संयन्दोमुजवेता मादार गन्यने एवोकोणने एमगध्यानमा व्याप्तथग्ने मननायेंज महानंग्रामकरवामांमयो तेममणिगजा श्रीवीग्ने वांदवाजातांमार्गमा नेकाननग्गवरलायुदेवी नकि पूर्वकचांदी तदनीउग्रतपन्याने अनुमाढता ममानणेपहोतो न्यांत्रीबीग्नेवादिन जन्यामीरप्रसन्नचंगजपि ध्यानापियवन्यामा वाद्यो यवन्याने समय काज तो शोगनिपामें नगवतका नातमीनपा तेनाननिणिरनंद्रानवर यो दयेमनन्नराजर्षि मनधीनंयामकरता सर्वात्रुदण्या अनेक कामदोटा नीमायेपना धायुधननष्टययाने न्याजाने मानोदनोटांपपदमां ने तन्नेगनेमा मिचिनवी माहापनाच्या एटमनरतराज लोरिनमंटेली ननेज यण्टरवरीने कोणकोणएकेश्यिादिक तथा पचड़ियमापण रोगविग डदेवालागो एवामाफरीश्रेणीके वीरने पुन्यु हेस्वामीयासमये राजर्पिकातकरतोत्रीन तिपामे नगवतेयनुत्तरविमानका तेसानजीविस्मितथइने श्रेणिके पुथु कहोस्खा मी पहेलेपश्तोतमे नरककह्यो तेएतपस्वीने केमसनवे यनेएक्मुहर्तनेथातरे अनु । तरविमानका तेपणयसमजस अथवा नातेकरीनेमे अन्यथासानायु तेवारेन गवते यथास्थित सर्ववृत्तातेकरी श्रेणिकनोसदेह टात्यो एटलामा देवउडनिना नादसानलीने श्रेणीके पुत्यु हेस्वामि थामहोत्सवक्याथाय जगवतेकह्युजे प्रत नवराजर्पिने केवलज्ञानउपनु त्यादेवता महोत्सवकरे एमएप्रसन्नचरानपिने एकमुहूर्तनेयतरे मननोव्यापार नरकहेते अनेमुक्तिहेतेपणथयो । मनोऽप्रवृत्तिमात्रेण ध्यानं नैकेडियादिपु ॥धर्म्य शुछमन स्थैर्य नाजस्तु ध्यायिन स्तुम ॥ ४॥ अर्थ ॥ दोपवनसाधनादिकथा मननोरोगनिरर्थक तेकडे केवलार्मननीय निजे मनोयापाररहितपणु तेणेफरीने एकेडियादिकजे एकेश्यि वेदिय तश्यि ही रोश्य श्रसक्षिपचेश्यि तेहनेविपेव्यानजे मनोरोध लक्षण तेगुनथी एदेलेपवनसा धनादिक मनोरोधारवाथी जोध्यानथायतो एकेश्यिादिकनेविपेयाय केमकेतहनेम नावपीन मननेयनावकरी मनोव्यापारनीप्रवृत्तिनथी तेथीपवनसाधनादिकतेकोश्त माधिजण ध्याननोउपयोगीनथी श्वासरोधादिक क्लिष्टकर्मथो साहमु मनथातिय प्याकुनयाय पणजेधर्म यान अनेयुक्तध्यान तेणेकरीने मननीस्थिरतानेनजे एवाने ध्याननारग्नार तेनेज स्तपिठयें एटलेल्यानते तेनुजप्रमाणवे इतिनाव ॥ ४॥ सार्य निरर्थक वा यन्मन सुध्यानयत्रित ॥ विरत पुर्विकल्पन्य पारगास्ता स्तवे यतीन् ॥ ५॥ वर्ष ॥ दोध्यानेकरी जेहनुमनसार्थक सफलने अथवानिरर्थकके निष्फनने तोपण गुनध्यानेपरियत्रित एटने सारथक पुफिटपजे श्रनकार्यनामनोरयत एपीविरम्पत्तोतेमदा यानज एवाजे ससारनापारगामी साधुतेहने दुस्तबुबु ५५ वोऽप्रवृत्तिमात्रेण मौन के के न विभ्रते॥निर वय वचा येपा वर्चागुप्तास्तु तास्तुवे ॥६॥ वर्ष ।। हवेवचनोगनु सारउपदेशेने केवलचननीयप्रवृत्ति एटलेमात्र यत्र उU. मिथ्यावादिनिरोधोपदेशाधिकार. पथी तथामनुप्यमांपण मुंगावोबडाप्रमुखप्राणीमानपणानेनवावरतासु एटलेतेसमी नपणाजधरे तोतेथी तेहने वचनगुतिवंतनकहिये पण जेहनुबचन निरवद्यके पाप रहितहोय एटनेवचनवोठ्यानीशक्तिठतांपण सर्वथातावद्यवचननबोले तेनेवचनगुप्ति वंतकहिये तेवानेढुंस्तबुंढे पणमात्रानपणोज धयाथी वचनगुप्तिवंतनकहिये॥६॥ निरवचं वचो ब्रूहि सावधवर्चनर्यतः ॥ प्रया ता नरकं घोरं वसुराजादयोद्रुतं ॥ ७॥ अर्थ ॥ हवेदृष्टांतेकरीने सावधवचन अनिष्टफलदेखाडेने हेप्राणितुं पापरहि तवचनबोल केमके सावधवचनेकरीने वसुराजा प्रमुख ते घोररी एहवोजे नरक तेन पाम्यां तेवनुगजानोतंबंध श्रीहेमाचार्यकृत रामचरित्रमाथी विस्तारेंजोग्नेवो ए मजापी असल्यवचन सावधवचननो परिहारकरवो ॥ ७ ॥ इहामुत्र च वैराय ाचो नरकाय च ॥अग्निद ग्धा. प्ररोहंति वागदग्धाः पुनर्नदि ॥ ॥ अर्थ ॥ वलीत हिजकहे जेवचनो तेयानवमां अनेपरनवमांपण वैरकारीया व अनेवनीनग्कदाऽपण्थाय जेमाटेअग्नियेंकरीदाबाजेदादिक तेफरीनवपल्लवथा य पण पुर्वचननाटाधाजेमनुष्य तेनवपल्लवनयाय एटलेनेहांकुर तेनेप्रगटेनही केम के पुरवचनथी उपनोजे वैरनाव तेजन्मांतरेपणनमटे ऽनिनावः ॥ ७ ॥ अतएव जिना दीदा कालादाकवलोनवं ।। अव वादिनिया ब्रूयु झानत्रयनृतोपि न ॥ ए ॥ अय। एटलामाटे दीवालीपापलं केवलज्ञानउपजेतिहांलगें जिनजेतीर्थकरदेव तेमति श्रुत अवधि एत्रणानना धारकवतांपण अवद्यजेपाप तथाधादिगदथी वचनते ध्यान विवातादिकने एमजाणी तेहनाजयथी वोजेनही यद्यपि नगवंतने व यस्थपणे मनपर्यवहाननी सनाहोय तथा पिहांत्रणानना धारककह्या तेजाणि वेयजे मनपर्यवज्ञान तो मात्र मननो पर्यायजाणवानुज साम्ययेते तेमाडेया चार्य ऽहांकानही थनेउपाध्यायश्री रत्नचंगपिरत एजयंयनी टीकामांपण एम जलव्युने वस्तीविशेपवुद्धिवंतेविचारवू ॥ ए॥ कृपया मंटणु स्वांगं कूर्मा ज्ञाननिदर्शनात् ।। सं हतासंस्तांगा यत् सुख.खान्यवामुयुः॥ १० ॥ अर्थ ॥ हवेकायसंवरकहे। हेप्राणि तुंकरपायेंकरीने कांचवानादृष्टांतनानि ចុច अध्यात्मकल्पद्यम जेमहापुरुपये ते तो पियादिकनो योगवतापण रागप थने मनयोगना अनावधी एटलेजेमनथकी रागवेपरहितपणे सवरवत तेयोनेढुंस्तबुलु ॥ १७ ॥ कपायान् सवृणु प्राज्ञ नरक यदसंचरात्॥ महातपस्विनोप्यापु करटोत्करटाटय ॥१॥ अर्थ ॥ एमयिथाश्रित संवरकहीने हवेकपाययाश्रितकहेठे प्राइके देवि वेकीप्राणी कपायजे क्रोधादिक तेनुतुसवरकर केमोएकपायना थसवरथकी करक यने चक्करम प्रमुख महातपस्वी महानुनाव तेपणनरकनेपाम्या एफरड यनेटकरड बे ब्राह्मणमासीयाइ नाश्हता ते वैराग्यथकी दीक्षाला उग्रतपफरी श्रन्यदाकुणानान गरियें कोटनाघरनालामा चोमासुरह्या तिहानगरना जलप्रवाहनेपूरे साधुरग्वेतण इजाय एमजाणीदेवताये कुणालानगरीउपर बरसादयनाव्यो कुणालाशिवायबीजे सर्वत्रवर्पावरस्यु केटलेक दहाडे तेगतजाणी नगरलोके ताडनातजनाकरी तेसाधु नेकाढ्या तेवारे क्रोधोखर करमबोल्यो वर्षमेघकुणलाया तेवारे करमबो यो दि नानि दश पच च वलीकरमबोयो मुशलप्रमाणधारानि वलीउक्करमबोयो ययारात्रा तया दिवा तेवचनथी अहोरात्रमुशलधाराये कुणालानगरीउपर मेघालो तेहपीक पालानगरी लोकसहिततणाग महायनर्यथयो तेवारपर्नु त्रीजेवर्ष साकेतपूरत पापनेप्रणालोवेठते करमअनेनकरडवेमरीने सातमीनरके कालनामा नरकाबात मां वत्रीससागरोपमनेयायुपे नारकीपणे यवतस्या एमजाणी कपायनोसवरकरयो यस्यास्ति किंचिन्न तपोयमादि ब्रूयात् स य त्तत्तुदता परान् वा॥य स्यास्तिकप्टाप्तमिदं तु कि न त शनी सटपुते स योगान् ॥३॥ था।हवेवलीमनोयोगादिकनो सवरकहे। जेप्राणिनेका तपसयमादिकनयाय विरति तेप्राणिजेमतेम असबधबोले तयायन्यजीवनपीडाकरे एटले थाती जेजेय सत्यकरे तेतेघटे पणपिरतिवत्तप्राणितो एतपसयमादिक घणुजकटेंप्राप्तियायः ए मजाणी तशनी के रखेमहारांतपसयमनो विनाशयाय एमबीहातोथको मनोयो गादिकने केमनसवरे एटलेविरतिवतने सर्वथासवरकरवुज एनावार्थडे ॥ २० ॥ नवेत्समग्रेष्वपि सवरेपुपर निदान शिवसपदा य ॥ त्यजन् कपायादिजार्विकल्पान् कुर्यान्मन संवरमिश्धीस्त ॥१॥ थर्थ ॥ वेवलीमननासवरन थाधिक्यतापणुकहे जेमननो सवर ते बीमा जेटला सवरले तेसर्वमा मोक्ष्सपदानु परमकारण ते माटे विशेषबुदिधत शुनप्रतिशिदोपदेशाधिकार. तए पुरुपतो कपायादिकथीउपनाजे कुविकल्पते त्यजतोयको मननोसंवरकरे एटले मु क्तिनुं मुख्यकारणजाणीने विवेकीपुरुचे प्रथममननु संवरकर इतिनावः ॥ २१ ॥ तदेवमात्मा कृतसंवरः स्यात् निःसंगतानाक् सततं सुखेन।। निःसंगनावादध संवरस्तद्वयं शिवार्थी युगपमजेत ॥श्शा अथीहवे ए अधिकारनो उपसंहारकहे तेमाटे एमपूर्वोप्रकारे कृतसंवरके संव रवंतजे श्रात्मा तेसदाकालें सुखेकरीने नि.संगपणानेनजे अथवा वली निःसंगपणाथी संवरयाय एटले एवेदुनो अन्योन्यकार्यकारण नावजाणवो केमके कोकनेनिःसंग पणाथी संवरधावे अनेकोइनेसंवरथी नि.संगतापणुंधावे माटेमोक्षार्थीपुरुष तेसंव र अनेनिःसंगता एवेनेसमकालेसेवे ।। २२ ॥ इति श्रीअध्यात्मकल्पधुमे मिथ्यात्वादि संवरोपदेशाख्य चतुर्दशोअधिकार समाप्त ॥ १४ ॥ अथ शुभत्तिशिदोपदेशः।आवश्यकेप्वातनु यत्नमाप्तौ दितेषु शुक्षेषु त मोपदपु॥ न ह्त्यनुक्तं हि न चाप्यशुद्धं वैद्योक्तमप्यौपधमामयापद।२।। अर्थ हवेगुनप्रवृत्तिशिदा एहवेनामे पन्नरमोअधिकारकहेडे एअधिकारमा य तियोग्य शिक्षा यतीनेजाणवी अनेश्रावकयोग्य शिक्षा श्रावकनेजाणवी इहांप्रथमश्रा वश्यक करवायोग्यजाणीने आवश्यकथाश्रयी उपदेशेकहे हेसाधु तथा हेश्रावक तुं पापनानिवारक अनेसर्वज्ञनापित एवांजेगु-हनिर्मल आवश्यक सामायिकादिक तथाअवश्यकरणीय पोसह उपवास बालोयणादिक तेहनेविपेउद्यमकर तेनाउपर दृष्टांतकहे जेम वैद्यनुकाजेऔषध तेनखाधुंथकुं तथाअगुजेकाचुं हरितालप्रमुख तेखा,थकुंपण रोगनिवारक नथाय तेम सर्वज्ञनापित आवश्यकजाणीनेपण तेह नीक्रियानकरीयें अथवायशुम क्रियाकरियें तोतेहथीकर्मदयनथाय तेमाटेदोषरहित शुक्रियायेंकरीयावश्यकादिकनोउघमकरवो एउपनयठे शहाप्रसंगी सामायिकना दोपलखिये वैये १ वस्त्रेतथानुजायेकरीने पलाठीबांधे २ थासनधाधुपाईंफेरवे ३ चपलपणेसर्वदिशायेंजोवे । गृहसंबंधीलावद्यकर्मकरें ५ निंतीस्थंनादिकोठंगीचे से ६ अंगोपांगमोडे घालसमोडे तथाधर्मकार्ययालसकरे हाथपगेंकरकडा व जाडे ए शरीरनोमेलनतारे १० खाजिखणे ११ विसामणकरावे १२ निझकरे ए वारदोपकायथकोजाणवा तथा १ कुवचन कोऽनुमर्मनिंदादिकबोले १ सहसात्कारे थविचारांबोले ३ आर्तिमयविसंस्थलवचनबोले । थापठंर्देवोले ५ सूत्रनातो थ १२

श्रर्थ ।। हवेशीजवतने मनस्थिरकरवानिमित्त जेसिद्धांतादिकनु स्वाध्याय नण
एक
अध्यात्मकरूपजुम.
थवानवकारगुणतो वचनसदेपकरे ६ कलहविवादकरे । राजकथादिकविकथाकर
हाम्यनावचनकहे ए सपदारहितसूत्रनणे १० जावाधावानाधादेश थापे एर
गदोपवचनीजाणवा वली निर्विवेकीमनेकरे २ यशकीर्तिनीयांठायेफरे ३ धनना
जनेयर्थकरे । गर्वथोकरे । नयथीफरे ६ धनपुत्रादिनयथनियाणुफरे । सामायि |
कनाफलनो सदेहकरे रीसधरीसामायिककरे ए पिनयरहितसामायिकककरे १५
नक्तिरहितसामायिककरे एदशदोपमनयीउपजे एम मन वचन थने कायाना मनीने
वत्रीशदोपसामायिकनात्यजवा तथावांदणाना ३१ दोष थने काउसग्गना १९ दो
पते नाप्यादिक ग्रथथी जाणीने त्यजवा ॥१॥
तपासि तन्याधिविधानि नित्य मुखे कटून्यायतिसुदराणि ॥ वि
घ्नति तान्येव कुकर्मराशि रसायनानीव उरामयान् यत् ॥७॥
थर्थ॥ हवेतपप्रवृत्तियाश्रयी उपदेशेने मुखके प्रथमकरतीवेलायेतो सुरवतृषादि
कसहेवापडे तेमाटे कडबाठे पण थायतिके उत्तरकालें सुखनाकरनार एहवाजेति
विधप्रकारना न थम्म दशमादिक तप तेनित्येकरवा केमकेतेतपज कर्मनासमूहले
निवारेचे तेचपरदृष्टातकहे जेमरसायन पारो हरिताल सुवर्णादिक थोपधिना
तेहिज ज्वरथनेकृयादिक उएरोगोनेनिवारे तेम श्हापण उपनयलेषु ॥ २ ॥
विशुशीलागसहस्रधारी नवानिश निर्मितयोगसिद्धि ॥
सोपसस्तिनुनिर्मम सन् नजस्व गुप्ती समितीश्च सम्यक्॥५॥
थर्थ ॥ हवेतपकरनार प्रायेशीजवतजोऽये तेमाटेशीलयाश्रयीउपदेशेने हेसाधु |
तुविसुक्षनिर्मजएवाजे थढारसहस्त्र शीनांगरथतेने परतोयको नित्ये निर्मित याग |
सिदिके निपजावी थष्टांगयोगनीसिधिजेणे अथवायोगजे मनोयोगादिक तह
नाउ प्रणिधानना निवारवारूप समाधिनी सिद्धिकर एटलेशीलागधरतोथको मनव
चनकायाना योगवशकर एनावार्थडे वलीदेहनेविपे ममत्वरहितथको देवादिकनाक
रेना उपसर्ग तेनेसहनकर थनेपांचसमिति तथात्रगुणगुप्ती तेहनेजज ॥ ३ ॥
स्वाध्याययोगेपु दधस्व यत्न मध्यस्थत्यानुसरागमार्थान ॥
अगारवो नेहमटापिपादी देतो विशुधे वशितेभियोघ ॥४॥

S शुनप्रतिशिक्षापदशाधिकार. जणावई तेहनुं योगजे मनवचनकायायेंकरी नित्यअन्यास करवानेविपे उद्यमकरे वलीप्रागमनाजे अर्थ तेमध्यस्थवृत्तिये कदाग्रहरहितपणे अनुसरे एटने कदाग्रहें करीने जिनवचननाथर्थनी परुपणाजुतीनकरे वली अगारवके सदिगारव रसगा रव सातागारव तेरोरहितयकुं अनेविगुझिनिर्मलहेतुजे मोदसायन तेहनेविषे वि पादरहित थकुं एटलेशुक्रियाकरतां अविपिन्नचित्तयकुं धनेवलीवशकीधा इंडिय नोसमूहजेणे एहqयकुं नैदेजेउंचनीचकुल शुक्ष्मानबाहारतेहनी गवेषणाकरे ॥ ददस्व धर्माथितयैव धान् सदोपदेशान् स्वपरादिसाम्यात् ॥ जगचितैपी नवनिश्च कल्पे ग्रामे कुले वा विदराप्रमत्तः ॥५॥ श्रर्थ ॥ हवेसनायतुंफलते शुनउपदेश तेमाटेगुनोपदेशबाश्रीकहेठे हेसाधो तुं पोताना अनेपारकानेविपे समानपणे उपदेशकर एटले यामाहारोनक्त दाताले धनाढय एहवानेधर्मकर्बु अथवा था मिथ्यात्वी कपणदरिडी एहवानेउपदेशको एकहे इत्यादिककल्पना त्यजी केवलधर्मार्थीपणेकरीनेज पण आहारवस्त्रादिकने अर्थनही एप्रकारे नित्यधर्मसंबंधीपाजे उपदेशते कहेतोरहे अनेवाली सर्वसंसारीजी बने हितवांवतोयको नवकल्पेकरीने ग्रामनगराटिकनेविपे गुन उपदेशकरतोरहे त थाविहारकरवानी अशक्त कुनके ग्रामनगरादिकनो एकप्रदेशतेनेविपे प्रमादरहित थकुं विहारकर इहांकल्पते मागसिरप्रमुख थाउमास जेरुतुबदकाल तेहनाश्रावकल्प अनेश्रावणादिक चारमास चोमासना तेनोएकल्प एरीते सर्वमलीने नवकल्प जाणवा कृताकृतं स्वस्य तपोजपादि शक्तीरशक्तीः सुकृतेतरे च॥ सदा समीतस्व हृदाऽय साध्ये यतस्व देयं त्यज चाव्ययार्थी ॥६॥ अर्थ ॥ हवेगुनोपदेशनाकहेनारने कत्यारूत्यनोविचारजोयें तेमाटेतेयाश्रयीकहे वे हेसाधु तथाहेश्रावक तुंपोतानु तप जप प्रमुखजेकर्म ते कृत्याहत्यकहेतां एटलुमेको धुं एटलुमेनीकीयं एहविवेचन तथाशक्ति थनेयशक्ति तयापोतानुगुरुत अनेः रुत एटलांवाना पोतानामनसासदायविचारीने तेवारपठे मोक्षार्थीयकं साध्यजे साधवायोग्य तपोनुष्टानादिक तेहविपेउद्यमकर अनेवली हेयकहेतां त्यजवायोग्य जेविषयकयायादिक तेहनेत्यज सत्पुरुपने चित्तरूपिणीनूमिनेविपे गुरुपदेश तेबीज वृद्धिरूपदोय पोतेमा विचाररुप जलनानिंचवाथी सुरुतरूपवृद्ध विस्तारपामेते माटे मोक्षार्थिये हेयउपादेयझेपना विचारपूर्वक धर्माद्यमकरवो ॥ ६ ॥ -- ए२ अध्यात्मकल्पद्रुम परस्य पीमापरिवर्जनात्ते त्रिधा त्रियोग्यप्यमला सदाऽस्तु ॥ साम्यैकलीन गतर्विकल्प मनोवचश्चाप्यनघप्रवृत्ति ॥ ७॥ अर्थ। हवेजेविचारवतहोयते त्रियोगी निर्मलजोऽये तमाटेतेश्राश्रयीकहेने हेया त्मात्रियोगीजे मनवचनकायानात्रणेयोगतेणेकरी सदाहनिर्मजथा एटलेसर्वजीवटए रे हितबुधिराखीने मनवचनकायानायोग निर्मलकर एनावार्थठे केमके पग्नेपीडाव जवाथकी काययोगतो निर्मलथयोजथनेतेकाययोगनी निर्मलताथी मनपणसमता येलीन अनेडार्विकल्परहितयाय तथावचनपण पापव्यवहाररहितथाय इहाथाचा र्य काययोग सुगम माटे जुदोकरीने नकयो ॥ ७ ॥ मैत्री प्रमोद करुणा च सम्यक् मध्यस्थताचानय साम्यमात्मन् ॥ सभावनास्वात्मलय प्रयत्नात् कृताविराम रमयस्व चेत ॥G॥ थर्थ ॥ दवेएत्रियोगीनेनिर्मलताते मैत्र्यादिनावनायीथाय तेमाटेतेकहे। हेवा रमातु मैत्रीतथाप्रमोद तथाकारुण्य अनेमध्यस्थता ए चारनावना तेयात्मानेविषे थाण थनेवलीतेनावनायेंकरी सम्यक्प्रकारे समताथाण वली प्रयत्नातके पनि तवीर्यफोरववाथी चित्तने यात्मलयके ध्यानलीन अनेध्यानी अविपिन्न एहनु थयु थक शुननावनाजे अनित्यादिक तेहनेविपेरमाड ॥ ७॥ कुर्यान्न कुत्रापि ममत्वनाव न च प्रनो रत्यरती कपायान् ॥ इदापि सौख्य लनसेप्यनीहो ह्यनुत्तरामर्त्यसुखानमात्मन् ॥ ५ ॥ थर्थ ॥ हवेएनावनाओते ममत्वनात्यागथीहोप तेमाटेतेयाश्रयीकहे। हेसमर्थ धात्मा जोतुकोश्वस्तुनेविपे ममत्वनकरे थनेवली रति धरति अनेकपाय नको ए द्योतु वाटनारहितयको रहेतो धानवेंज अनुत्तरविमानवासी देवतानाजेनु सुखपा में केमके यनुत्तरवासी देवतामा स्वामिसेवकनो व्यवहारनथी तेमाटे ससारिक सुन्दर जोतो यनुत्तरविमाननो सुखते सर्वोत्कृष्टजाणवु ॥ ९ ॥ इति यतिवरशिदा योऽवधार्य व्रतस्थश्चरणकरणयो गानेकचित्त श्रयेत ॥ सपदि नवमहाधिक्लेशराशि सतीा विलसति शिवसौख्यानत्यसायुज्यमाप्य॥१७॥ अर्थ ।। हवेएअधिकारनो उपसहारकहेने एप्रकार यतिवरजे नलासाधु उपल .

साम्यसर्वस्वाधिकार. ए३ पथी जलाधावकपणालेवा तेनंबंधीनीजे शिक्षा तेनेचित्तमांधरीने एकाग्रचित्तथकुं चर एकरणयोगजे चरणनित्तरी अनेकरणसित्तरोनागुण तेनेजेसेवे तेसाधु तथा ते श्रावक शीघ्रके० उतावलु क्लेश.रखना समूहरु पजे संसारमहासमुश् तेथकीतरीने मोदन खनु अनंतपणं तेनु सायुज्यके ० जेसहचारीपणुं तेपामीने वलीमोदनायविनागोतु खनीपरे पोतेपणत्यां अविनाशीनावपामी विलसतिके सर्वदासुखनेअनुनये ॥१०॥ इति श्रीअध्यात्मकल्पडुमेऽगुनप्रवृनिशिदोपदेशारख्या पंचदशोधधिकारसमाप्त. अय ग्रंथोपसंहाराय साम्यसर्वस्वं ॥ एवं सदान्या सवशेन सात्म्यं नयस्व साम्यं परमार्थवेदिन ॥ यतः करस्थाः शिवसंपदस्ते नवंति सयो नवनीतिनेत्तुः॥१॥ थर्थ ॥ हवेग्रंथनाउपसंहारनेयर्थे साम्यसर्वस्वनामें सोलमोथधिकारकहते हेप रमार्थनाजाण विवेकीपुरुप तुंएमपूर्वोक्तप्रकारे यन्यासवशंकरीने साम्पजेसमता ते हने सात्म्यकदेता थात्मासाथे ऐक्यपमाड जेसमताथी नवनीतजे संसारसंबंधी नय तहनेनेदवावांठतो एवोजेतु तेतुजने मोदनी संपदाथो ते तत्कालमात्र करस्था कहेता हस्तप्राप्तथाय ॥ १ ॥ त्वमेव फुःखं नरकस्तमेव खमेव शर्मापि शिवं खमेव ॥ व मेव कर्माणि मनस्वमेव जहीह्यवझा मवधेहि चात्मन् ॥॥ थर्थ ॥ हवेत्रात्माने थविद्यानोपरिहार यनेसमतानुंधरवु कहेते हेयात्मातुंः खनेकारणे प्रवत्यो माटे 5 खतेतुंजवे एमयागलपण सगलीवस्तुनुं थात्माजकार गरूपजाणवू वलीनरककारणतेपणतुंनठे वलीसुरखपणतुंठे अनेमुक्तिपणतुंठे व लोकर्मपणतुंठे अने मनोव्यापारना प्रकाशकपणाथीमनपणतुंठे कारणमाटे अव झाजेधर्मकार्यनेविपे अनादरकरवो एटलेहमणा धर्मनीथातो तोपवेकरीश इत्यादि क कल्पना त्यजाने अवधैहिकहेतां धर्मकार्यनेविपे सावधानरहे ॥ ५ ॥ निःसंगतामेदि सदा तदात्मन्नर्येप्वशेष्वपि साम्यन्नावात्॥ अवेदि विन्ममतैव मूलं शुचां सुखानां समतैव चेति ॥ ३॥ थर्थ ॥ हवेसर्वत्रपणे निःसंगपणानुं प्राध्यान्यपणुंकहे देशात्मा तेकारणमाटे सकलपदार्थनेविपे समतानावथी सदाय निःसंगपणाने पामथनेवली हेनिपुणमाणि नमेममा ननाने धर्मगार तेम्पीयो जेमहासमु तेहथीग्धस्युजे एसमतारिख पुरागरे अमृतग्मनेप्रत्य तुम पीयतांकहेता थादरसहितसानो तयानणा चीनमयानोपण मुनिनामुपनी वर्णिमहेता वानगीनेपामो केमोसमताग्न बर्ष म दोनपनेरे याचापपानानुनाम थनेययनुनाम जणाववारस ୯୪ अध्यात्मकल्पडम. सकजगोकनुमूल ते ममताज थनेसकलसुखनुमूलते समताज एहवु नागि मताने त्यज श्रने समताने आदर इतिनाव ॥ ३ ॥ स्त्रीपु धूलिपु निजे च परे वा सपदि प्रसरदापदि चात्मन् ॥त त्वमेदि समता ममतामुक् येन शाश्वतसुखाध्यमेपि ॥ ४ ॥ श्रर्थ ॥ जेनि सगताते ममत्वमुकवायोजथाय तेमाटेममतात्यजवानु उपदेश ने देयात्मा ते पूर्णतकारणथी तुममतारहितयको स्त्रीनेविषे अनेधूजिनेविषे बनी। मजननेविषे थनेपरगनेपिप तथा वजि सपत्तिनेविपे अने विस्तारपामतीयापदान वि समतानेपामोकरीने सरखोपरिणामराखजे एटलेमोक्सुखनोनोक्ताया। तमेव सेवस्व गुरु प्रयत्नादधीप्प शास्त्राण्यपि तानि विछन् ।नदे यतत्व परिनावयात्मन् येभ्यो नंवत्साम्यसुधोपनोग ॥५॥ वर्ष ॥ होसमतातेज सकलपदार्थनो सारकरीनेउपदेगे देविक्षन् हेात्मन् तुमयमरणीने तेहिजगुरुनेसेव थनेगुरुसेवनाकरीनेशास्त्रपण तेहिजनण तथाशास्त्र नलीने तत्वग्हायपण तेजचिनमांचितव केजेगुरुथी अनेशास्त्रथी तथाजेतवयीन नारूपी' नेयमृत तेनोउपनोग थासादपामे एटलेजेजेपदार्थनेतु समतानुकारणना अंततेपदापनुमपर फेमफेबीजासर्वपदार्थ तेनिरर्थक ॥ ५ ॥ ममग्रमनाम्बमहाणेपन्य समुघृत साम्यसुधारसोऽय ॥निपी पना द पियुधा सनेय मिढापि मुक्ते सुसवर्णिका यत् ॥६॥ या दयेयाचार्यप्रयने उपमहरतो ग्रयनीनपादेयतादेखाउने हेपमितनना मस चीदने यानारपण मुनिसुपने यनुनवे ॥ ६ ॥ बातम्मनारनामा मुनिसुदरसूरिनि कृतो ग्रय ॥ ब्रह्मम्पृटया ध्येय म्बपरहितोध्यात्मकल्पतरुरेप ॥७॥ सम साम्यसर्वस्वाधिकार. ए त्मकल्पामनामेग्रंथ तेतपगबाधिराज श्रीमुनिसुंदरसूरियेंकीधी ते एग्रंथ पंमितेंद्र मजेडान तेहनी वांधायें नणद् अथवा ब्रह्मजे मुक्ति तेहनीवांठायें चिंतववु.॥ ७ ॥ इममिति मतिमानधीत्य चित्ते रमयति यो विरमत्ययं नवाजाक्स च नियतमतो रमेत चास्मिन् सहनववैरिजयश्रिया शिवश्रीG॥ अर्थ ॥ हवेफलोपदर्शनधारें मंगलगनित उपसंहार वाक्यकहे जेमतिवंत पुरुष अध्यात्मकल्पडुमनामे ग्रंथनेनणि पोताना चित्तनेविपेरमाडे रात्रदिवसचिंतवे तेपुरुप संसारथकी थोडाकालमां विरक्तथाय अनेवलीएहनाज चितनथी तेपुरुषनेविपे सं साररूपीया शत्रुनीजे जयलक्ष्मी तेणेसहित शिवश्रीजेमोरलक्ष्मी तेमा रमिकेण्या योनेरहे एटलेतेतंसाररूप शत्रनेजीतीने मोपलक्ष्मीपामे. इतिश्रध्यात्मकल्पमे साम्यसर्वस्वनामा पोडशोधिकारः समाप्तः॥ १६ ॥ ए श्रीअध्यात्मकल्पद्रुमनामे ग्रंथनो बालावबोधार्थ उपाध्याय श्री रत्नचंगणिकत तथाउपाध्यायश्री विद्यासागरगणिकृत एवेटीकाजोऽने में महारीवुझिने अनुसारें मुज सरखा स्वल्पवुद्धिवंत प्राणिना उपकारने अर्थ लेशमात्र लज्योते तेमां बनानोगथी तथाश्रज्ञानथी तथाघ्रांतिथी जेकांस्त्रना तथाटीकाना अनुसारथी ओकुंअधकुं श्रयुक्त लवाणुहोय तेह मिठामोडक्कम अथवाकिहांएक सुगमपणानेअर्थे किहाएक साहचर्यथी किहाएकरूढिथी जेकांश विनति वचन लिंग कारक धन्वय प्रमुखनो विपर्यास कीयो होय तेथपराध वहुश्रुत गीताथैखमवो तथा उपकार यशुम टालिने गुरुकरबु. अथ प्रशस्तिः।। श्रीमत्तपगएगगनां गणनासनतरुणतरणिनिनः॥श्रीगजविजयसू रिबनूव नुवि नूरि वितानयशा॥१॥योत्यादीहिनवं घनं सुविहितानुष्टानव-मादरो लोक कोकमिव प्रवोधमनयोनिश्च गोस्वामिवत विवाटी किटदर्पमुज्वलपटांचक वि शंपोज्वलान् यो वाचालितमालवेश्वरसितचत्रमनावोज्वलः ॥शा रत्नत्रयप्रथिततंय मन्नटीय पट्टेवरत्नविजयाव्हयमुग्गिसीत् ।। येन प्रशांतरजसा प्रशमार्णवेन रत्ना फरायितमनल्पगुणोघरंनः ॥ ३ ॥ तन्यान्वये निखिलनूतलगीतकीर्तिः श्रीहीररत्न इतिसग्विरो विरेजे। स्वर्ग गतोप्यन्विलनक्तसमीहितानि योद्यापि पुग्यति नव्य वाम रहः ॥४॥ तत्पनूषणमणिजयरत्नसरिः सर्वाग्रणी णिपु नूरिगुणाश्रयोऽनून् । श्री नावरत्न इति नावविदां वरेण्य म्नत्पनृङयति तंनि सरिराजः।।। श्रीहीरत्रन ए६ तृपनतुयगनि तृपद सदा व्यजितदर्पकदर्पकनेदक ॥ अमितशनवनीतिविवर्जित जिनमह प्रणमामि सुशीतल ॥ १ ॥ दृढरथारख्यकुनागनिनदन सुमतिधाम विवह | विशदचश्मनाननवधुर ।। सुविधिरजितनव्यजनवज जिन ॥३॥ विषुधमोदकशि तेविताननिपादक वृतशम फिल कुस्थमनिदितं ॥ विगतको जिन ॥७॥ विततधर्मरथांगकनेमिक निखिनविष्टर निधाने ।। श्रीगीरचश्स्य मनूकच नाना विनेयेन वर्मा अध्यात्मकल्पजुम मुंख्या शिष्या सुनिर्मलानिख्या ॥श्रीलब्धिरत्नविबुधा शास्त्रार्णवपारवान ॥६॥ श्रीसिधिरत्ननाम्ना पाठकवर्यास्तदन्वये तदनु ॥ श्रीहर्षरत्नवाचक, वरा वरीयोगुणैव या ॥ ७ ॥ समीरनगणीशा थासन् उदिदनुजलदमीशा ॥ श्रीज्ञानरत्नगणयन दाश्रवा साप्रतं जयंतु चिर ॥ तचरणकमलसेवा गस्तत्संगसमयतरग ॥ सुहि तकल्याणविमल गणिवरविहितार्थिनीनुन्न ॥ ए ॥ वालावबोधवार्ता मध्यात्म माख्यशास्त्रस्य ॥ मुनिहसरत्न एता मतनोत्तनुबुधिसत्वहिता ॥१०॥ शोध्य सुतत्वाव निर्मयो ऽयं धीपने प्रवाच्यमानश्च॥ सनावसपदाढय राचशर्क चिर जयतात्॥११॥ इति श्रीमुनिसुदरसूरिकतयऽध्यात्म कल्पद्रुमो बालावबोधसहित मपूर्ण ॥ अथ श्री सीतलनाथटक ।। एपुगव ॥ पिपिनिर्जितपद्मप्रन वर जिनमह ॥२॥ तलवाग्नास- फामकुटोपम॥ सुवसुपूज्यपद शिवदायक जिन० ॥ ४ ॥ गृहमनतगुणस्य कृपापर ॥ सदयधर्मप्रवृत्ति प्ररूपक ॥६॥युगकपायजयप्रतिमनन कनकवर्णधर मुनिसुव्रत। नाशनवीरक | जिन ॥ ॥ इति स्तुत नीतलनायाख्यदशमतीर्याधिपतेरटक समाप्तम् ॥ यमसुपाश्र्वविनूपितविग्रह श्रीजिनशीत - स्तोत्र, ए ॥ अथ श्री कल्याणसागरसूरिकृत माणिक्यस्वामिस्तवनप्रारंजः॥ नमाति-वेन्यः॥स्त्रग्धरादः॥स्वामी माणिक्यपूर्वत्रिनुवनतिलकचिंतितश्रीसुरादि स्त्र लोकोद्योतकर्ता प्रथिततरयशा चित्रगन्नाममंत्रः ॥ श्रीमनानानिनूपान्वयगगनरवि मंजुकल्याणकांती राष्ट्र तहदिपाख्य निरुपममहिमा ख्यातिकारिप्रतापः॥ १ ॥ जुत वितंचितवंदः॥ प्रवरधर्मधनार्पणकामगौ रमृतवाग्गुणरंजितनागरः॥रिपुसमूहनिवार तमो वृपनचिन्हितपादकुशेशयः॥शा हरिणीलंदः। शुनमतिकरश्वशादित्याधिको तरनास्वर स्त्रिनुवनमणि विश्वाधारो धरेश्वरकीर्तितः ॥ उपशमरसासक्तस्वांतोप्यनंत चतुष्टयी गुणमणिखनिनटारिष्टामयाधिजराव्यथः ॥ ३ ॥ पंचचामरवंदः ॥ थखर्व देहरा जिनो यतीश्वरो घृणाप्रशीतमानसः कलाधरः ॥ अनेकलब्धिमंडितो कृपाकरः शिवाब्धिचिश्मा नतातुरः ॥४॥ भुजंगप्रयातवंदः ॥ प्रनुमरुिदेवश्विदाल्हादली नः सदाचारलीनाविलासातिशाली ॥महामोहमातंगपंचास्यकदो हितार्थी कलामि ल्पविज्ञाननापी ॥ ॥ मालिनीनंदा जलधिनिजगन्नीरः मारसारंगधोपो जितविप यविकारो ज्ञानयुक्षिप्रदातो।। खललमिरप्टदाकुर्देवदेवाधिराजः समवसरणगोनासिंधु पूगेपमेयः ॥६॥ नाराचदः ॥ श्वेतातपत्रचामरैर्युक्तो मनोज्ञपुगतः ॥ नव्यांगिराशि वंदितो धर्मार्थमोदताधक. ॥ ॥ श्रादिंदः। देवयंयो विमलः सुंदरवंशो नृपूत्तरा मापि ॥ मान्य. सतामजलं सहोदयो वरातिशयधरः ॥ गीतिबंदः ॥ त्रैलोक्या वातविनु. समन्तगुणरत्नकलितसाधुमनाः ॥ एनम्तमोनिशेशः मुलोर्कर्धचलिता घाबादः ।। ५ ।। नगस्वरूपिणीद. ॥ सदार्यमार्गदेशको प्यमेयनाग्यधारकः ॥ अनूतसत्वपालको विवेकनीतिकारकः ॥१७॥ माणवफलंदः।। ऽ खहरो नाकिनुत स्त्य कमहादोयनर. ।। पारगतस्तोर्यकरः शीलगाती झानधनः ॥११॥ तोटकछंदः।। कम जाननमाहिततन्यजन. समयार्यनिरूपणरम्यानुधीः ।। नृगितीमुखखेजनतामरस पु रूपोत्तमपुस्य निधिर्वग्द ॥ १२॥ मणिमध्यवंदः॥ लक्षणपंतया सारतनु निर्जितमा चालोनकति ॥ याहतलावाचाररतिः साटरटेवाधीगपतिः ॥ १३ ॥चंपकमाला दः। केवलयुग्मानोफितलोका लोकविनाग. तंबमितेव्यः ॥ इश्यिवाणानेदितचेता भंपकमालामंडितगात्र.॥१४॥इंतानंद.॥ प्रातानंटो सुवनमुकुट स्तीथस्वामी विस्तृत नयन. ॥ मत्रीकात्मा सुरुतनिलयो योगीशे व विजितकपटः ॥ १५ ॥ शालिनी द॥ थान्याख्यो मुकिजस्कारसारख्या विश्वोतना अटकारिहंता ॥ चक्रेश्वर्याराधिनी गोमुग्वेदाः कांताकाग्भोगधमाधिकारः॥१३॥ ककोरवयंट.जगनीपज्यो जयताकि -- हनविनवितर ॥ सुविरिनापनि नयनामत सुविधिनाथ जिन महिमान। बरं हारिदिनापजिन नवई परं । मुविपिनायजिन घतिकीर्तिद सुविधिनायजिन UG स्तोत्र नेश कुशलार्यवनोततिवारिधार ॥ विशटावदातावलिचित्तनामा नववादिपोत ।। लपाकनाय ॥१॥ कुजका।इश्ववाद ॥एव मया सस्तुत श्रादिदेवो नूयात् तदा सघगणम्य नूयं ॥ देमकरो विश्वजगत्सुदीप कल्याएमागत्यकलापकोश ॥ १७॥ ॥ अथ सूर्यपुरीयश्रीसनवजिनस्तवनप्रारन ॥ वसततिजकाठद ॥ काम नमोऽस्तु सततं जिनसनवाय चाननाय कमनामन लोचनाय ॥ देहप्रनास्थगितलोकचमत्कराय ऽर्थ्यानपादपविनेदनसिं चुराय ॥१॥ देर म्नुताय नवसागरपारगाय कीर्तिप्रसूनसुरनीरुतविष्टपाय ॥ सन्मूर्तिकातिततिरे नितमानपाप सेनागकुक्षिवरशुक्तिकमौक्तिकाय ॥ ॥थब्जोपमाय जिनशासनवम गाय रोल्पवदरमनोरममडनाय ॥ नव्यान्जकानन विनासननास्कराय नानार्थ दानचिदनसन्निनाय॥३॥थादेयनामकजिताय शुनाशयाय सिध्यंगनामिज़नसादर जोडपाय ॥ गतिहाईकथनोत्तरकोपिदाय तेज प्रनावयशसामवनीश्वराय ॥ ५ ॥ यानमोहनपसमरनेपजाय सानाग्यनाग्यगुणरत्नकरडकाय ॥ अष्टापदानननुन निगमिताप नितीनहसरतिखेजनमानसाय ॥५॥ श्राव्हानमत्रविनिवारितपातका पफमाणमागरतरंगरजाघराय ॥ पुष्टारिचालवणायुधरोपमाय वाचासुधाश्रवणर तिनागगया। ॥ समर्ममार्गनिधिदेशनदेशिकाय दु वाघवारणमृगेऽपराकमाया। नोमानिनापिमहिमायतनूषणाप गर्वजउनसुगोनितपत्कजाया सस्यापदिक पाप निश्पिाप गुमान्यपोन्नतिकराय रुपालयायामिथ्यात्वतापशशिचइनपादपा प.पुरामंगपुनुनगाप नरार्चिताया सकटपकपनविजितमानसा गानायर प्पमलिगनगहणाप सहानयुक्षियरदाय गुणाकराय काशयानपरिवहनमडपा प॥ ॥ नाद || नात्र चतुर्पतविनतिसयुन ध्यायति ये सनवदयरान निनि तानि गुना समृदय कल्याणसपादनकामना ॥ १० ॥ निशिदिन नयीक निगृह सदावनित श्रीमनवाय जिन सन्मार्तडपुरा मनादानी नानी तटा देवाधीशनरेशनपटने ससक्ति कामह मुनिश्मी सपनोरमनिश मेरे मुदा मिश्ये॥११॥ ॥ अय श्रीमविधिजिनस्तवनप्रारन ॥ मनपरितनरंतन सुनिश्निाथ जिन परकेवर विधिनायपिन र स्तोत्र. एए सुविधिप्रदं ॥ २॥ सुविधिनाथजिनं रजतववि सुविधिनाथजिनं जडतापहं ॥ सुवि धिनायजिनं मकरांकितंसुविधिनाथ जिनं जगदंचितं ।। ३ ।। सुविधिनाथ जिनं रजता हितं विधिनायजिनं परमेश्वरं । सुविधिनाथ जिनं श्रुतसूरिणं सुविधिनाथनिनं शि वपारगं ॥ ४ ॥ सुविधिनायजिनं गुनदर्शनं सुविधिनायजिनं जनतानन विधिना थजिनं वरद विउँ सुविधिनाथ जिनं नमितासुरं ।। ५ ।। अनुष्टप्वंदः ॥ सितेतरपुरा धीशः सुविधिनवमो जिनः ॥ संघम्य सुखदो नूयात् कल्याणसूरिणा स्तुतः ॥६॥ ॥ अथ श्रीशांतिनायजिनस्तवनप्रारंनः ॥ पुतविलवितवंदासकलदेवनरेश्वरवदितं विवुधमानवसंस्तुतपूजित।कमललोचनरंजि तनागरं नविकपातकतामसनास्करं ।।१।। निखिलवांठितदानसुरागमं विदितशास्त्र विचा रनयागम।कतिनकर्मदवानलनीरदं परमशांतिरदामृतशांतिदंशा विविधलदारंजित संचरं सुविधिमार्गप्रकाशनतत्पर॥चपलमत्तमतगजगामिनं कमलकोमलमांसलपाणि नं॥३॥ दलितदनमहाधृतिविग्रहं विहितमोहमहाबलिनिग्रहं ।। दृढपरीपहवायुचुजंग मं किन गुनंयुमनीटसमागमं ॥ ४ ॥ नविचकोरसुखाय कलानिधि विनयधैर्यगुणो करोवधि ।। मुनिपडन्दिनिवासकुशेशयं विधुसुधामधुसारतराशयं ॥ ५ ॥ कुसुमस निनदंतविराजितं सुनगनाग्यसुग्वाकरगोनिनं ॥ निजनुजावलसाधित्तराष्ट्रकं जित विपदगणं नतराजकं ॥ ६ ॥ कुशलकेलिविलासनुवं परं विगदकीनिविका शिदिगंत गंगाकुमतसिंधुरसिंधुरवरिणं सुमतिकामितसमतिकारणं ॥७॥ वरसुवर्णसवर्णसुवर्णकं जितहपीकमधर्मनिवारकं ॥ हरिणसे वितपादकजं जिनं हितकरं स्तुतनिरसङ नं ॥ ७ ॥ प्रवरवार्षिकदानगुणवरं हतदरिइपर परमेश्वरं ॥ समधरी रुतमेरुमुरमैः प्रचुरसर्वगुणादधिकोनमः ॥ ए ॥ विकटर्जयमन्मयशंकर जनकलापिघनं विगतां तर ॥ सपननिर्जितचश्मसं नृशं विगतदोपकलिं च महौजसं ॥ १० ॥ यशिवविघ्न धनाधनमारुतं विपयतापवगं जनतामत ॥ शिववधूपरिरनपलोलुपं विमलकेवलि साधुकुलाधिपं ॥ ११ ॥ नजत शांतिजिनं तु शिवंकरं कुगलसागरवृद्धिकलाधरं ॥थ तुलरूपवशीरुतमानवं प्रणतसादरकिन्नरदानवं ॥ १५ ॥ दशनिः कुलकम् ॥ मा सिनोदः।।जुवननलिननानोः शांतिदेवस्य नर्तुनवजलनिधिसेतो ई.वटारिश्यहर्नु.॥ निजहदयविगुझ्या स्तोत्रमेतत्पति प्रतिदिनमपि ये ते संपदः प्राप्नुवति ॥१३॥ ।। अथ श्रीशांतिजिनस्तवनप्रारंनः ।। स्रग्धराउँदः ।। दद्याद्रीशांतिदेवो वरकनकतनुः सारसौरव्यानि ।। 7 सनितिकाव्यपं ॥ शिखरिणीउद् ॥ सदा ध्यान शातेरखिलगुणधार गुनवतो। कार सुमतिमतिकार नयहरं ॥ नरा नव्या शतया विगतमदता श्रुता) मादाश्रायुप्मतस्तुटयानद रुत्वाकला शक्ति कुरुष्व सततं विपुनामुदारी। २०० स्तोत्र. नाजा त्रिनुवननगरे स्फारकोटीरहीर ॥ चार्याकारे प्रणेता प्रणतहितकर - यो मारिवार सर्वज्ञाख्यातनामा प्रकटितमहिमा प्राप्तकर्मारिपार |तोटकर सुरमानवपूजितपाणिकज कमजोदयकारकधर्मधन ॥गितामयपणनन्मनति शुनसागरसोमनिनो विमल ॥ २॥ इति प्रयातश्नितिकाव्यपुग्म । जुजगप्रयान पद | अजपं विनु विश्वपूज्यं प्रसन्न जिन सत्प्रन गफर देवदेव ॥ सदाज्ञानर नीतती मेचमेक स्तुवे गातिनाथ की कामकुन॥३॥ हरिणीद ॥ कम नादन था सानद नताशुनचचन गजपतिगति विश्वाधार सुरेश्वरवदिनासयहदयं त्यक्तातक नि निर्जितशोचन परमपदद ज्ञातार्थोप त्रिकाल पिदाचित ॥ ॥ गाठद ॥ श्रव ति देवा नवपारग जिन कल्याणकार मुनिदसेपित ॥ त्रादिसलक्षणचिन नि तावानदसदोहकर सुधामय ॥ ५॥ इति दितीयांतचिनक्तिमाव्यत्रिक । शानिनीत द ॥ प्राज्यं राज्य चक्रवर्निवसग त्यक्त्वा दत्या स्वर्णरुप्यादिटाना।श्रुत्वा वास्य ब्रह्म लोकांतिकानां येनावात सयम मुक्तियोग्य ॥ ६ ॥ द्रुतविजवित उद ॥ थमितपुत्र वता जनतावता कुगतिवारणतत्परसजिरा ॥ नतनरामर किन्नरशातिना जगवता विशम विधायिना॥७॥इति तृतीयतिचिनक्तिकाव्यपायजाद श्रीशातिदेवाय नमोऽस्तु नेत्रे विनीपहा शिवमार्गदात्रे ॥ चक्रांकहस्ताय समस्तन खेपुहारो च उद्युक्तको ।। ७ ॥ रथोताठ ॥ दर्शनामृत्तनितीनजत विश्वशास्त्रनयनीतिहेत | वेलोनसागरसुवेलसेतवे वापरावजितमिस्रनानवे ॥ इति चतुर्थी विनक्तिकाय ग्म ।। उपेंड्वन्नावद ॥ अघानि नश्पति पुरारुतानि प्रशस्तनानातिशयप्रसन्न । अनेकससारनिवधितानि प्रगाढवधस्थितिसचितानि ॥ १०॥ मालिनीद ॥ नन | ति सुखमनतं शांतिनाथप्रसादाक्षरिणशरणदातुर्विश्वसेनांगजातात् ॥ नतनविन जाना प्रातिराजाकाम निरवधिजिनरागे लमसन्मानसानां ॥ ११ ॥ इति परम्य मनाचल सुखरंगलीन सध्यान प्रबलतरजाग्योद ॥१२॥ विद्युन्मालावद ॥शाते शति नत्वा सश्रीका म्यु॥ विनक्तिकाव्यरिक ॥ द्रुतविलंबित मंद पनपता कि गांति, काबद ॥ तोस्ति चैनवपयोनिधि सुविधिनाथ जिन नररंजनोपजन्यं । १४ सुविधिनापजिन नपरदशवसु की र ॥ उतिसागरपतिसमुनि निरजनचिने - । ॥१५॥ना स्तोत्र. १०३ पीतेदः॥ अमृतरसताधिक्यानीटानरोत्तमसंगतानुवनसुनगात्पानिख्यादिनयति पातकं ॥ प्रसरति च वै कोनिर्दिक प्रसूनवजञ्चला प्रनवत्ति पुनः शीवं लोतानयो नतिवईनं ॥ ॥ शार्दूलविक्रीडितवेदः ॥ याकृत्या नरदेवदेवमनुपां संतुष्टिकर्तुस्सदा चतोवननकामसार्थदढतः कारिहर्तुनुंगं ॥ आनंदोघसरःप्रधिकरणे पानीयदा तुर्मुदा पावस्यास्ति नतिःसमृदिजननी कल्याण विस्तारिणी॥तोटकवंदानरत दणनूपितवस्युपुरे मुखनीरजरजितविश्वजने॥श्रुतदेशनदर्शितधर्मपथे जिननेतरि ति प्रति जाग्यरमाणानुजंगप्रयातबंदः। सुराधीशचकैः स्तुत ज्ञानसिंधो जगन्नाथ नेतः रुपालोकबंधो ॥ विनो पाहि मां सर्वदा नक्तिनाजं स्मरं तं चिरं त्वत्पदांनोज→गं ॥ ए ॥ शार्दूलविक्रीडतद्वंदः ॥ स्तोत्रं पार्वजिनेश्वरस्य सततं ये प्राणिनो ना वतः सद्यःक्ष्यापि पति हृद्यमनसस्तेषां गृहे संपदः ॥ स्युनित्यं स्थिरनावशोन नतरा धम्मानिष्पादिकाः कल्याणार्णवतरिनिर्विरचितं मांगल्यमालाकरं ॥१॥ शिखरिणादः।। सदा धाय॑ चित्ते स्तवनमनवा जयहरं नरैनं तिश्यै कुशलवन राजी बननिनं ।। यवंध्यं नक्तानां जिनगुणरतानां स्मृतिमतां समेषां नव्यानां प्रमु दकरणं कामितकरं ॥१२॥ ॥अथ श्रीदादापार्श्वनाथस्तवनप्रारंनः।। ॥ श्ववादः ॥ कल्याणगहं गुणरत्नराजं सद्देहकात्याजितनीतरत्नं ॥स्तोप्ये मुदागकरमंगिवंद्यं दादानि श्रीवरपार्वनाथं ॥ १ ॥ समर्मलीनाशयमाशु विज्ञ कम्माष्टदावानलवारिधार ॥ संसारपायोनिधिकर्णधारं दादा० ॥ २ ॥ याचारव लोततिधिनार सत्कीर्तिपुप्पतवासितागं ॥ नानाथराधांत विचारददं दाद ॥ ॥ ३ ॥ गग्यरगार्पितवारचित्तं सहोधिटातारमनीहसव्यं ॥ नागेश्सवि तपादपद्मं दादा० ॥ त्रिलोक्यचूडामणिमृडियोनं सोनाग्यनाग्यावनिपूर्ण दहं ।।. जयाघराजीवदिनमेकं ॥ दादा० ॥ ५॥ सर्वागिनेतारमनीष्टवाचं विधे श्वर रजितसयलोकं लोकार्निचिंतानयखवारं दादा० ॥६॥ हृद्यारुति कत्तजरा विदोष नरामरेई स्तुतमर्त्य तवं ॥ तन्नागचिन्हं कुशलार्थकारं दादा ॥७॥ सर्वत्र वि ख्याततरप्रतापं कारुप्पसत्रं वि शिष्टगोत्रं ॥ थज्ञानमिप्यावतमिनदीपं दादा० ॥ ॥ यष्टनिः कुलकं ॥ शार्दूलविक्रीडितलंद. ॥श्रीमतीवटपश्ननगरे शृंगार हारोपमं कल्याणांधुजनानुवंशमसमं वामांगजातं परं ॥ दादारन्यं जिनपार्वदेवमन घं ध्यायति ये नित्यस्तेषां धानि रमा निवासमनिशं कुर्वति कल्याणतः ॥ ए॥

| शिवशर्मविधापिने ॥थमितशीर्यतिरस्कृतमेरवे शुनदशेरकमडलमीलये ॥५॥ हरि || सिमच विहितगुनहितं विष्टपे चैत्रपूर्वे।सानदोलासलटा कुशलगविवुधा सर्वलाके स्रग्धराउद ॥ श्रीपार्श्व गोडिकाव्य नजत नविगणे कदपटद सुगोत्र नानादेशेषु ल धातिशयमहितताव्यूहवार सुमूनि ॥ श्रीमतं नीलरत्नाधिकतरवपुप स्फारलावस्यमा | विवेकरत्नरोहण दयाकर ॥३॥ वसततिलकावद ॥ करीरुत व्रतमनुत्तरमगिनेत्राद ति पामगिनो नरालसा धृतातपत्रचामरै सुरै स्तुतं । धनतशक्तिमालिन गताम/ खाऽशु येन वरवार्षिकदानराशि ॥ वामोहेन मुनिनायकनायकेन कल्याणकेनिनि | लयेन शुनाशयेन ॥ ४ ॥ जुत्तविलवितछद ॥ मम नमोस्त्ववते परमात्मने जगवते । २०३ स्तोत्र. ज्वलं श्रीमची ॥शासंपनेणिसुदानकामकलशं त्रैलोक्यचितामणि सहावामृतराज तामरनर समर्मबोधप्रद ॥ सीनाग्याभुतकातकीनियशसा सपूरिताशात श्रीम ती ॥३॥ मार्गे चातरनीतिवारिनिचिते केमकर सर्वदा दारिद्याइिनिपातनानकुनि श चितानिरोगापह ॥ 5 खत्राससमीरणाघनुजग नागाफमहोमथ श्रीमती॥ ३॥ कारुण्याचितचारु चित्तकमल सत्वेषु ससारिपुसयादिगुणरतस्ततनु जावस्य नोना स्पद ॥ ससारार्णवपीतवारिधिसम मुक्त्यगनावान श्रीमती० ॥ ५ ॥ जाये ति लकायितं निरुपम नव्यैर्ननि पूजितं उष्टानां निजसत्वदर्शनपर विप्र सता कामद।। नाना ध्वस्तसमस्तवैरिनिचर्य राक्षांतनिर्देशक श्रीमती० ॥ ६ ॥ नूयिष्टामननकि शक्तिकलितर्देवेश्चतुर्की नतं सर्वाशाकरणैककटपफलद सर्वांगियूडामणि ॥ शिष्टान तचतुष्टयीवरतर श्रीमेरुतुग जिन श्रीमन्त्री० ॥ ७ ॥ स्फाराकारनिराजितांगमतुन म वर्णपहेमाकर विश्वव्याप्ततर प्रवाससदन गनीरतासागर नासोद्योतितविश्वविश्वम बनी कल्याणसिधी विधु श्रीमती अनि कुजक ॥ अनुष्टुप्लद ॥ जिन्न माले सदाश्रेष्ठे गुणवदनूपिते।पुष्पमालेऽतरानिरपे नेकवीहारसयुते ॥ ६ ॥ श्री मत पार्श्वनाथस्य स्तवन जगतोऽवनाकल्याणसागराधीश सूरिनी रचित मुदा॥१०॥ ॥स्रग्धरावद ॥ध्येय श्रीपार्श्वदेव जत किल ना गोमियामराज शश्वत्सर्वार्थ विशिष्टानिःपाचारपुष्टा जिनपपतिषु रताप्राप्तकल्याणतुष्टा ॥११॥ ॥ अथ श्रीगोमीपार्श्वनाथस्तवनप्रारन॥ माजिनीवद ॥जयति जगति चद्र पार्श्वनामा जिनो विकचकमलदृष्ट्या नदिताम य॑मर्त्य ॥ अकलितमहिमीपस्तोर्णससारसिधु जगकलितपाद पुस्यपीयूपपुष्ट । ल मोहानोराशिकुनोनवममरनुतं पार्श्वयार्चिताहि ॥ २॥ पचचामरछद ॥नम ॥ ॥

म्तोत्र.
२०३
पीवंद ॥ अमृतरसताधिक्यानीटानरोत्तमसंगतानुवनसुनगात्पानिया हिनश्यति
पातकं ।। प्रसरति व वै कोतिर्दिा प्रसूनवउज्वला प्रनवति पुनः शी लीताजयो
नतिवईनं ॥६॥ शार्दूलविक्रीडितवंद. ॥ श्राकृत्या नरदेवदेवमनुपां संतुष्टिकर्तुस्सा
चेतोवाचनकामसार्थटतः कारिदर्जुनूगं ॥ श्रानंदायमरःप्रधिकरणे पानीयदा
तुर्मटर पार्वन्यास्ति नतिः समृधिजननी कल्याणविम्तारिणी॥॥तोटकवंदः।नरल
कणनूपितवध्युपुरे मुखनीरजरंजितविश्वजने।।श्रुतदेशनदर्शितधर्मपथे जिननेतरिति
एति नाग्यरमानानुजंगप्रयातवंटः॥ सुराधीमचकः स्तुत ज्ञानसिंथो जगन्नाथ नेतः
रुपालोकबंधो । विनो पाहि मां सर्वदा नकिनाजं स्मरं तं विरं त्वत्पदांजोजशृंगं
॥ ॥ ॥ गार्दूलविक्रीडतछंदः ॥ स्तोत्रं पार्वजिनेश्वरस्य सतत ये प्राणिनो ना
वत. सहव्यापि पति हृद्यमनसस्तेषां गृहे संपदः ॥ स्युनित्यं स्थिरनावशोन
नतरा धमार्थनिप्पादिकाः कल्याणार्णवसृरिनिविरचितं मांगल्यमालाकरं ॥१॥
शिखरिणीदः।। सदा धाय॑ चिने स्तवनमनवयं नयहरं नरैनूनं सिधै कुशलवन
राजी धननिनं । थवंध्यं जनानां जिनगुणरतानां स्मृतिमतां समेपो जव्यानां प्रमु
दकरण कामितकरं ॥ १३ ॥
॥ अथ श्रीदादापार्श्वनाथस्तवनप्रारंजः॥
॥ इंश्चजाउंटः ॥ कल्याणगेहं गुणरत्नराज सद्देहकात्याजितनीलरत्नं ॥स्तोप्ये
मुदाशकरमंगिवा दादानिधं श्रीवरपार्श्वनाथं ॥ १ ॥ सर्मलीनाशयमाशु विज्ञ
काप्टदावानलवारिधारं ॥ संसारपायोनिधिकर्णधारं दादा० ॥ २ ॥ याचारव
नीततिधिनीर सत्कीर्तिपुप्पत्तवासिताशं ॥ नानार्थराक्षांतविचारददं टाढ॥
॥ ३ ॥ वैराग्यरंगार्पितचारुचित्तं सदोघिटातारमनीहसेव्यं ॥ नागेश्तंसेवि
तपादपद्मं दादा० ॥ ४ ॥त्रैलोक्यचूडामणिमृद्धिशोनं सोनाग्यनाग्यावतिपूर्ण
देहं ॥ नव्याघराजीवदिनेगमेकं ॥ टादा ॥ ५॥ सर्वागिनेतारमनीटवाचं विश्वे
श्वर रजितसन्यलोकं ॥ लोकार्तिचिंतानयाखवारं दादा ॥६॥ हृद्यारुति कृत्तजरा
विदोष नरामरेंई स्तुतमर्त्यसपं ॥ सन्नागचिन्हं कुशलार्थकारं दादा०॥७॥ सर्वत्र वि
रख्याततरप्रतापं कारुण्यसत्रं भुवि शिष्टगोत्रं ॥ अज्ञानमिथ्यात्वतमिस्रदीपं दादा०
॥ ॥ यष्टनिः कुलकं ॥ शार्दूलविक्रीडितछंद. ॥ श्रीमतीवटपननगरे शृंगार
हारोपमं कल्याणांवुजनानुश्मसमं वामांगजात परं ॥ दादारव्यं जिनपार्श्वदेवमन
घं ध्यायति ये नित्यशस्तपां धानि रमा निवासमनिशं कुर्वति कल्याणतः ॥ ५ ॥

धरणेपावित सशुपकेजिपाल शुनलणालरुतवर्यगात्र ॥ कुजनूषण शत्रतणीधदात्र कति पादयुग्म कलिः ॥ ७॥ शुनसिंधुवःसी.शशिन वरेण्य वचसा सुधानेन सद ज्यं ॥ श्रुतसृरिण पुस्यविराजमान कलिक ॥ ॥ अष्टनि कुलक, वजाबर ॥ श्वनाउद ॥ देवाधिदेव रुतपार्श्वसेव नागाधिराजेन नतान्हिप बै मेवे०॥ ३ ॥सन्नीलनासा दसितेंड्नील सत्कांतकात्या रमणीयरूप ॥ प्रावी नातिशय प्रधान सेवे० ॥ ४ ॥ सनीतिहतरिमनतसौरव्य विश्वेश्वर यातित लोक ॥ पद्मायंदाने सुररत्नद संवे० ॥ ५ ॥ यज्ञान मिथ्यात्वतमिस्त्रनानु | मनानस्तमोजिएट ॥ वाणीसुधामोदितसन्यसंघ सेवे० ॥६॥ कौशव्यांग | अनि कुनका मालिनीनंद । यसवरपुररत्न रावण पाश्वदेव प्रपतन कामद देवरेन ॥ थमितगुणनिधाना ये नर सस्तुवति जगति विदिततः १०४ स्तोत्र ॥ अथ श्रीकलिकुंडपार्थाष्टकप्रारंन । ॥ विबुधादिराजनतपादपद्म बहुनाग्यसामाग्यलतापमेयं ॥ कमोपसगार धर्यनित्ति कलिकुमपार्श्व सुचिर नजेऽह ॥ ॥ कमलाप्रदाने हरिचदना सपयोविदेशानुतलब्धकीर्ति ॥ सचिरारुती रजितविश्वविश्व कनिकुम० ॥३॥ महिमावदातोत्तमनाममनं समता निराम मानने थनिजापद सिद्धि विज्ञासपत्र कलि सुरिताकारुणसानकाग करुणाशय उ सक्ने पु दाव ॥ नरदेवपूज्य सुखद सुमति कति ॥ ॥ कनकादिदातारमनताके वरनीजरत्नाधिकदेहवर्ण ॥ शिवशर्मराज जनतानिवद्य कतिः ॥ ५ ॥ अनव तर ॥ ६ ॥ जगतीवर कर्मविमुक्तसग विपमायुधालममन स्वरूप ॥ पति तानि लक्ष्मीविलसत्यवश्य ॥ए । ॥ अथ श्रीरावणपाचीटकप्रारन ॥ पद्मावतीमस्तुतनामधेय सेवे सटा रावणपार्श्वनाथ ॥ ? क्षिमेव मेध्यनिध्यानविशेषराज ॥ जितारिखद विगताधिमोह सेवे० ॥ वामांगजात कुजनदिकार ध्वस्तोपसर्गोत्कटमुराग ॥ प्रख्यातिमतं जुवने सगेहं पूर्णस्तानीटपदार्थराशि जोक्पी वरसिदिनाज सेवे० ॥ . रनारपानपात्र नि पदांपोभितधर्ममार्ग॥थादेयसीलाग्ययश सुपात्र ग्पवती नवति ॥ ए॥ ॥धानदका स्तोत्रः १०॥ - ॥ अथ श्री गोडीपुरपार्श्वजिनस्तवनप्रारंनः ॥ रागेणगीयत।।गौडिपुरप्रचपाउर्वममंदं दर्शनदर्शनपरमानंद नमितसुरासुरवृंद॥१॥ श्रीजिनशासनचारुशंगार अंतरंगरिपुदकुतारं सकलजगदाधा।शानिरुपमरूपविरा जितदेहं विदलितनानाजनतंदेहं अमितगुणधनगेह॥३॥रितकानननेदनदात्रं रुचि रलदाविनूपितगात्रं वारितकुमतकुपात्रं ॥४॥ अनघजिनवरगोत्रसुगोत्रं कामकुंनम णिनिर्जरगोत्रं संयमदृढतागोत्रं पादितनवनयमरणारिष्टं प्रकटितमहिमातिशयव रिष्ठं जगर्दैश्वर्यगरिष्टं ॥६॥ विहिताखिलनविजनकल्याणं पालितयथारख्यातकल्याएं दत्तमार्गणकल्याणं ॥ ७ ॥ आधिवंधवधगदहारं वांछितकुगलसौख्यकर्तारं भुव नत्रयनारं ॥ ७॥ विकटकष्ट निवारणशूरं बागमनयप्रकाशनसूरं भारतीगंगापू रं ।। ए ॥ धृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्मीगणविश्वं केवलयुगलालोकित विश्व प्राप्तजनेप्सित विश्व ।। १० । सेवकमनोनीष्टदातारं रंजितदेवनरनेतार अनुनूतकुलत्रातारं ॥ ११ ॥ नीलमणिवर्णसुवर्ण निखिलदेशविख्यातसुवर्ण वाक्सुधासारसुवर्ण ॥ १२ ॥ मु क्तिसीमंतिनीसंगमलुब्धं चंचल विषयसुखसंगालुब्धं कर्मपरा विप्रलुब्धं ॥१३॥ वदि तामग्मी लिकुटीर विपमकपायदवानलनीर उत्कटपरीपहबीर ॥१॥ थंचलगणनी रधिसारंग कीर्तिलतावईनमाग्गं उर्जनगलनसारंगं ॥ १५ ॥ वदेऽनंतचतुष्टयिराज पूजितसुरपतिमानवगर्ज प्रवरतीर्थाधिराज ॥१६॥ पोडशनि. कुलका शिवतातिपार्व वग्दवरपाच मोहतमिस्त्रसवितारं नागराजराजं त्रिनुवनपूज्यं लब्धनवोदधिपारं ।। शुनसागरनित्यप्रथितगरिमाणं ये ध्यायंति वितुं मुदा लम्भीस्तान् समुपैति सखर मतुला सर्वार्थसिद्धिप्रदा ॥ १७ ॥ ॥ अथ श्रीपार्श्वजिनस्तवनप्रारंजः॥ तोटकलंदः ॥ नविकांबुजनानननानुनिनं नवतापसमावनवारिधरं ॥ रचितागम शास्त्रविचारनयं जय मंगलकीर्तियशोनिचयं ॥ १ ॥ कमलामसतिगृहं विमल लसदाशयमुभितसंतमतं । शुनमागरवईनचंइमसं सकलामरपूजितपादकजं ॥२॥ विकटोत्कटकर्ममृगेनरिपुं खगनागनरेश्वरदेवनत ॥ तरसा जितमोहरिपुं विनयं यमनंवरसंहितसाहित ॥ ३ ॥ शुनलालदिनहस्तयुगं गनराजगति गतविघ्न स्ज ॥ जडतामयनेयजमोगवरं दशनद्युतियोतितचारमुखं ॥३॥ कनकाचलधारम नोटतरं रसनारसरंजितसर्वसनं ।।नुवनत्रयमंडलमोघत सचिरारुतिमाहितदेवजनं IUायरिदंतमनुत्तरतीर्थकर रचित वरवुविधनं जिनपं ।पुरुषोत्तममम्मरमयनिधि धृ विलसन्यजने रुतवदन नजत पार्वजिन महुरानिध ॥१॥ युगजकौशिकमा अरुणकोटिपिनाधिकनास्वर कुमुदबाधवगुव्रतरानन ॥ वरगनीरगुणात्तमसागर नजत॥३॥ नविकपद्मपिनासननास्कर जगति नावप्रकाशनदीपक।नयनपान कर्मसमोरणनोगिन नजत ॥ ५ ॥ कमननिर्मितपाशुरुदव स्थिरतरात्कटनाव शिराजित ॥ जगति उर्जनसर्प विषापह नजत॥६॥ प्रशमनूपरानूपानूयन सुना नाग्यगुणावनिमदिर ॥ पालकीर्तियशोवरघासित नजतम् ॥७॥सकलसघसमीहि जीनद ॥ मदुरजिनप नित्य वदे शिवोदधिचईन शशिनमनिग किएवध्याते दिन महादप ॥ स्तमननपने चित्ताल्हाद रुतादरसेरकेविधिधनद विश्व विश्वे निश त्वममि ग्वग्नास्निरस्तुतस्त्वमसि रूपवशीरुतपिष्टप ॥१॥ त्वमसि योगिजन मि मिहिपशातिमोहित ॥ २॥ त्वमसि नश्कर करुणालयस्त्वमसि नकवको निगार त्वममि दर्शनदम्तिमानवस्त्वमप्ति ससृतिसागरपोतक ॥ ३ ॥ त्वमा २०६ • स्तोत्र निकातिनिकेतनमगिनुत ॥६॥ निजवशवतसकमातिहर ग्वनिजितमेघनद शिया दायितं जुधि विग्वजनीनतम नतनूतगण जितलोननटं ॥ ७ ॥ शरणाश्रितपानक क्तिपद वधन वरशातरस नवम ॥ महसेइमणिप्रनदेव पर धरणेनिपेवितपाईयुज जा थमम नुतपार्वजिन सतत तपसा हतसिक्षमनतबल ॥ ललनाजनमगविग्न मज मनवर्जितमुत्तरसौख्यधर नवनि कुलक । सुरराजखेचरनागपुरदरधरसिरा जसुसेपित श्रीपार्यजिनेश्वर नमितसुरेश्वरपद्मावतीसस्तुत॥ येऽनतनत्या विजुऊन नया सस्तुवति जिन मुदा शुनसागरपन्नानविकरमासमेत ते लनति सुख सदा॥१॥ ॥ अथ श्रीमदुरपाॉप्टकपारन । दृतविजवितवद ॥ विवुधमानवमानसनदन विनवदानविधी हरिचदन । नि म्यतरागय नुबननानुनियासपनाश्रय ॥ पियिवारणकेसरिसन्निन नजता पाचनतत्रक नजत रचितकामपारिदसयरखियसमन्वितचेतसाविक तक तक निचितविनापरानपहर्तक ॥ अतिशयातचारुचरित्रक नजत० ॥ ७ ॥ नतानने ॥ [तविनवितघद ॥ मदुरपार्वजिनेश्वरसस्तव पठति य नित्यश । यसति तम्य गृहे कमऽग्विता स्थिरतरासुमता वरदायिनी ॥ १७ ॥ ॥ अथ सत्यपुरीय श्रीमहावीरस्तवनप्रारज ॥ द्रुतरिचितष्ठद ॥ त्वमनि सपनदनमदरस्त्वमसिमेरुलतावनिममप घनिर्गमणिस्त्वममि कांतिविकाशितदिगण मसिनापितरजितनागर स्व सुप्रियापरि मोरमहोम्मुनमन्वममि धर्मग्नो धनकामद ॥ त्वमसि सशयानुन म्तोत्र. 109 . . रत्वममि दर्शिनजीवदयापथः ॥ ४ ॥ त्वमसि धारितगीनविनूपणस्त्वमसि कामि तदाममुरहमः ॥ त्वममि देवनराधिपवंदितस्त्वमसि जाड्यतमिस्रननोमणिः ॥ ५॥ त्वमनि कर्मवनावनिपावफस्त्वमग्नि सेवकपूजितपंकजः ॥ त्वममि जन्मजरामृतिवा रणम्त्वमसि शाश्वतमादपदस्थिनः ॥ ६ ॥ त्वमसि मंजुनमन्कुलदीपकस्त्वम मि सर्वपदार्थविशारद. ॥ त्वममि लोकनतो नतवत्सन स्त्वममि देवशिलीमुग्व पुफ्फर. ॥ ७ ॥ त्वमसि नाथमनोहरलक्षणस्त्वममि समतजीवगणः सदा ॥ त्वमसि मंवरमार्गविधायकस्त्वमनि दानगुणापितकल्पकः ॥ ७ ॥ त्वमति चित्रफराति गयांचितस्त्वमनि सरितती वरमवित.॥ त्वमग्नि मुविजनावनतत्परस्त्वमति हारनि न. दितिमंटले ॥ ५ ॥ त्वमसि शिष्टनरामरसंगतस्त्वमसि लोकचमत्कृतनिर्म मः ॥ त्वमसि केवलिसाधुनतो मुढा त्वमसि कुग्रहदोषनिवारकः ॥ १० ॥ त्वमग्नि सतनारपोपमस्त्वमसि वीतमदो विशदागय. ॥ त्वमसि तीर्थपते रु चिगव्हयस्त्वमसि गुप्तिपवित्रितमानसः ।। ११ ॥ त्वमनि बुद्धिपराजितगी.प ति स्त्वमसि हाटकरसन्निनविग्रहः ॥ त्वमसि जाग्यविनाशनिकेतनस्त्वमसिलोन महीधरवजकः ॥ १२ ॥ त्वमसि सप्तनयार्णवतारकस्त्वमसि उर्घटसत्यनयाध्व गः ॥ त्वमसि सम्मदसंततिकारकस्त्वमसि सिदिकरो वरदायकः॥१३॥त्वमसि विश्व जगडानवदन्ननस्त्वमसि रहितनूतकदंवकः ॥ त्वमति उर्जगस्थहरोनिशं त्वमसि वि स्तृतलोचनरजक. ॥१४॥ त्वमसि विश्वपति. श्रितवांधवस्त्वमसि वऋतिरस्कृतचं मा. ॥ त्वमसि वैग्निमुघटोद्रवस्त्वमसि तीर्थकरः प्रतिबोधटः ॥ १५ ॥ त्वमनि नव्यशिखंडिबलाहकस्त्वमसि बंधुरमूर्तिधरोऽजरः ॥ त्वमसि सर्वविविंग तातुरस्त्वमति संयममंडनमंडितः ॥ १६ ॥ त्वमसि शांतरसाश्रितचेतनस्त्वमसि पौरूपनिहितकार्मणः ॥ त्वमसि उर्जनबोधिनिबंधनस्त्वमसि कामयाधिकदानदः ॥ १७ ॥ त्वमति संचितपुण्यनिति परस्त्वमसि विघ्नसरीसृपगारुडः ॥ त्वमति शु जयशोनरमंदिरस्त्वमसि संघजयोन्नतिहर्पदः ॥ १७ ॥ त्वमसि सत्वहितो मतिव ईनस्त्वमसि धर्मसगेजसर समः ॥ त्वमसि चक्रिनतो नविडोखरस्त्वममि पारग तः परमेश्वरः ॥ १५ ॥ त्वमसि सत्यपुरामलनूपणस्त्वमसि संश्रितपादमृगाधि पः ॥ त्वमनि केवलयुग्मविराजितस्त्वमति वीरजिनो जिननायकः ॥ २० ॥ त्वमसि गासनपोतनियामकस्त्वमसि साधुटयालुलनामक.॥त्वमप्ति सौख्यकर रिश लांगजस्वमसि विश्वगुरुः शुनालागरः ॥ २१॥ हरिणीलंदः।। जयति सततं वीरः शं मुर्नवोदधिपारगो जगति तिलक. पापध्वांते गनस्तिरनुत्तरः ॥ कुशलनिलयस्तीर्थस्वा A | तनव्यजनागयाय तुन्य नमो निखिरासशयगारकाय ॥ तुल्य नम प्रथितकोनिय । | शोन्विताय तुन्य नमो जितहषीमुनी-वराय ॥ ७ ॥ तुल्य नमोममितपुननिाम नमधरणनदायकाय ॥ 6 ॥कुनकम् ॥ पाराष्टक पति य सतन त्रिसध्य त्य ॥ रत्वा सदा प्रबलमीहजउ प्रमाद । तदानि मनु कुरुते कमता निवास कल्याणमा | दमागारं रूपापात्र गताधिच्याधिदृषण ॥क तु सर्यकायपु श्रीप्रद दलितामपाशा | धनधान्यकर तोके रमाकेजिपद पर ।। मर्मतामदमानीयमूर्खतादोपवर्जिते ॥ ३॥ ? ២៨ स्तोत्र मी सुरासुरसंस्तुतो विदितमदिना विश्वे रिश्वेश्वगतिपकज ॥रशा गरया कुमारनस यतिधर्मदेगक फलविकापागमगिपात || मनीमिची मानिद वित वद मनोर्थसपावनकामना ॥ २२ ॥ नजंगप्रयाताद || प्रर्नु देवाय जिनपि वनाथं जगशारुचूडामणि धीरनाथ || तु जितारि नतमागिनाय सदा प्रति कारं नरेशाधिनाथ ॥ २५ ॥रग्धराएद श्रीगन नाना प्रणतमुग्मणि दवभन्यो। धिराज कल्याणांनोधिएको विमागगधा नाग्यमानाग्यकार | ये नया मान्न ति प्रतिदिनमनरं चारुलत्या त्रिमध्य प्रग्याति ने विवानिदितां कीनिया) ग्नारकीं ।। २५ ।। तुन्य नम समयधर्मनिोदकाय तुन्य नममिनुग्नशान राय ।। तुन्य नम सूरनरामरसेविताय तुन्य नमो जिनजनानितपकनाय ।।१४ न्य नमोऽनितपते दरिचदनाय तुन्य नमो वरफुलांचरनाम्फगयानुन्यं नम प्राणना वनराधिपाय तुन्यं नम प्राररूपमनोहराय ॥ वन्य नमो गणनायकनाप काय तुन्य नमो यतिततिप्रतिपालकाय ॥ तुच्य नमो किचनीरजजोचनाप तुन नमस्तनितनादविराजिताय॥ ३ ॥ नुन्य नम गुगलमारियायकाय तुन्य नमात्रि कटकष्टनिषेधकाय ॥ तुन्य नमो पुरितरोगचिकिन्समाय तुन्य नमनिजगता हरि नृपणाय ॥ ४ ॥ तुन्य नमो दलितमोहतमोगराय तुन्य नम कनकसन्निननृपना य ॥ तुन्य नमोप्यखिलसद्गुणमदिराप तुन्य नमो मुखकज्ञादिऽतचकिाय ॥ ५, तुन्य नमोऽतिशयराजिविनूपिताय तुन्य नम कुमतितापसुनजनाय मो मुरयपयोधिपत्रिकाय तुन्य नमो विगततयमसराया तुन्य नमा विधि ताय तुन्य नम सक्तवाड्मपपारगाय ॥ तुन्य नमो नरिकचातकनीरदाय तुम गर नुवामसतामनीट || 0 | ॥ अथ श्रीलोडणपार्श्वनाथस्तवनप्रारन ॥ श्रीकर फटहार विधिवादप्रकाशक ॥ पिया तजितवानी परमात्मानमन्वद ।।१।। श्रासितापनेनार सरिणिशिरोमणि। रिपुसारंगसारंग भगिनाथनिपेचित ॥ ३ ॥ ॥ तुल्यन स्तोत्र. १० तेजसा मंदिरं रम्यं वारितारोपउर्जनं ॥ निःमीम सर्वगोत्राणां श्रीमंनं गुणसागरं ॥ ॥ ॥ कथिताचारमागाचं कल्याणकमले विधु ॥ प्रणतारोपदेवेशं गासनं कांतनूध नं ॥ ८ ॥ गदितागमनंदोहं रसनामृतसुंदरं ॥ सूराधिकप्रतापानि रिक्थदं दमितेहि यं ॥ ७॥ नागेइविबुधः सव्यं लोकानां मांतिकारक।। जडताया विवेत्तारं नयनाल्हा दकारणं ||| पालक सर्वसत्वानां पार्वण पूजिनं । नाकिमानववंद्यांहिं नाय नाथं जगत्प्रनं ।। ए ॥ क्रियासंतनिनेतारं त्रासितानेकदोपकं ॥ कृतांतार्थ विचार तारतासण्यगजिन ।। १०॥ संसारसागरे पोन घस्मगविविवर्जिन ॥ सर्वज्ञ मेवगंनी रदिन विश्वन्य सर्वदा ॥ ११ ॥ तेजोनिविं मुटा पाश्र्व नवीमि लोमणानिधं ॥ क व्याणमागगरज्येन नंन्तुनं ह्यादिमारे. ॥ १२ ॥ बादशनिः कुलकं । श्रीमल्लोडण पाटवनाथमवनी विख्यातगोत्रानिधे ये नव्या वरनावनक्तिसहिताः पूजंति सौख्या थिनः॥ ते सत्वा मुखमानकीनिकजिताः कल्याणतुंगाः परा जायंते नुवने प्रतापस चिरा श्रादेयवाचः सदा ॥ १३ ॥ ॥अथ श्रीसेरीशपार्थाष्टकप्रारंनः॥ कामोधकर्तारमशेपदेवाधीगैससदाचर्चितपाटपा। कल्याणकारं वरनीलवर्ण सेरी गपावै नुथ लोडणारख्यं ॥ १ ॥ सत्पुण्यवानीवनवारिधार निःशेषनव्यावतिपूरिता गं॥ त्रैलोक्यठत्रं नुवनाधिनाथं सेरी ॥॥ सारंगवाणजितचित्तदाढय सारगगंनी गनिनाटकांन || सारंगसारांवकयुग्मराजं सेरी ॥३॥ विश्वेषु सत्वेषु रुपानिधानं स म्यक्त्वरत्नानरणांकितांगं ॥ःस्वांगपशु दलितारिवर्ग सेरी० ॥४॥ अपारसंसारसमुह पोर्न सर्वङमाचारपवित्रवंगाराक्षांतगास्त्रार्यरहस्यददं सेरी या वाणीरसानंदितवि श्वविश्व तीर्थकरं नागपुरेशपूज्यं ॥ सर्वत्र विख्यातयशोनिराम सेरी ॥६॥ तेजोनिधि कामितकामकुंनं सौजन्यसाहादविलासपात्रं ॥ कल्याणसूर्यादिवितानहेतुं सेरी ॥ ॥ ७॥ आदित्यचंाधिकदेहनासं सत्यातिहाच्याटफराजिराजं ॥ स्फारारुती मोहि तदेवदेव सेरी ||G| कलशः॥ एवं कल्याणवद्यं त्रिनुवनतिलकं लोडणाह सुपार्य रुत्वैकाम्यं स्वचिने नवसफलरुते ज्ञानसंपत्तिसिध्यनित्यं ध्यायति नव्याजिनसमय रता शुन्लेश्यानिरामास्तेषां हत्प्रकामं नवति च सदने मंजुपद्मानिवासः ॥ ५ ॥ ॥अथ श्रीसंनवनाथाष्टकप्रारंनः।। लावाम्यगेहं कलहेमवर्ण उद्मोभिनं सुंदरवाहचिन्हें ॥ लक्ष्मीकलापार्णवधि म्यनाथं देवन्तं संनवनाथमीहे ॥१॥ इयेनांगजं दारुणकर्मगत्री वीरं वरं पू तचरित्रशोनं ॥ मास्पदं सजुणरत्नखानि देवैः ॥शा इक्ष्वाकुवगं वरतिग्मरश्मि ११० सूक्तमुक्तावली राकेडयन गतवक्रमाय ॥ श्रज्ञानवश्वानरशांतिनीर दे० ॥ ३ ॥ 5 खोदधौ पीन समुमि ॥ सत्तातितार्याष्टकरा जिराज ॥ क्षमानिषि विस्तृतपुण्यमूनि ॥ वै० ॥ ४ ॥ नव्यर्मुदा से पितपादपद्मं सजानराजाहतमोहनू परं ।। ससाग्दावाकुन मर्त्यमेघ देवैः॥सित्कीर्तिपात्र उरितारिसेव्य जगङनानदकर गरय ॥ कारुण्यम युक्तपवित्रचित्त देवैः ।।६।। कुदाईदत कजलोचन । पु श्रियातर्जितसूर्यकांति ॥ पापाधकारे ऽमलदीपक त देवैः ॥ ७ ॥ प्रसादनातत्परसेपस्येमितार्यदाने सुर देववृद्ध ॥ सुखरनेकर्यंतचारुदेह देवैः ॥। कजश ॥ इत्यष्टक श्रीजिनसनवम्य पति ये मजुननावयुक्त्या।।तेपा गृहे पुण्यनिधाननव्या कल्याणकाराच नवति क य इति श्रीमतिननायकस्य श्रोसूर्यपुरनूपणस्य श्रीसनानाथस्याष्टक सपूर्णी। ।। अथ श्रीसूक्तमुक्तावली प्रारन ॥ मालिनी उद ॥ सकलसुरुतवल्लोवृदजीमूतमाला निजमनसि निधाय श्रीजि नड्म्य मूति ॥ ललितवचनलीलालोकनापानिवरिद कतिपयपद्ये सूक्तमाना तनोमि ॥ १ ॥ अथक्रमसग्रहकाव्य ॥ शार्दूलविक्रीडितठद ॥ तत्त्वज्ञानमनुष्य सङनगुणान्यायप्रतिक्षामा चित्ताद्य च कुज विवेकग्नियो विद्योपकारोधमा । दानक्रोधदयादितोपपिपया सादात्प्रमादस्तथा साधुश्रावकधर्मवर्गविषये कया प्रसगाह्यमी ॥ २ ॥ अथदेवतत्वचिपे मालिनीठद ॥ सकत करमपारी मोहमार्गा धिकारी ॥ त्रिनुवन उपगारी केवलज्ञानधारी जनपिजन नित सेवो देव ए नक्तिना वे ॥ इहिज जिन नजता सर्व सपत्ति थावे ॥ ३ ॥ जिनवरपदसेवा सर्वसपनिदा ६॥ निशिदिन सुखदाई कटपवनी सहाई ॥नमि बिनमि सहीजे सर्व विद्या बाई रुपन जिनह सेवा साधता तेह पाई ॥ ४ ॥ श्रथगुरुविपे ॥ स्वपरसमयजाणे ध मेवाणी वरवाणे ॥ परम गुरुकह्याथो तत्व नीशक माणे॥ नविककज विकाशे जा नुग्यू तेज नासे ॥ इहज गुरु नजो जे गुह्मार्ग प्रकाशे ॥ ५ ॥ निस्तरेजीवरगे ॥ निरमल नर थाए ओम गगाप्रसगे ॥ सुणिय सुगुरु केशी । वाणि रायप्रदेशी ॥ सहि सुरनव वासी जे हसे मोदवाशी ॥ ६॥ अथधर्मविषे ॥ जलानि घि जनवेला चथी जेम वाधे ॥ सकल चिनवलीजा धर्मथी तेम साधे । मनु जनमकेरो सार ते धर्म जाण ॥ नजिनजि नवि नावे धर्म ते सारख्य खाणी ॥७॥ इह धरम पसाये विक्रमे सत्य साध्यो ॥ इह धरम पसाये शातिनो साक वाथ्यो। जस नर गज वाजी मृनिकाना जिकै ॥ रणसमय थया तेजीव साचा तिकेई ।। ॥ ७ ॥ श्रथज्ञानविपे ॥ तन धन उकुराई सर्व जीवनेठे ॥ पण इक मुहित सुगुरुवचनसगे यूं सूक्तमुक्तावली. २२१ ज्ञान संसारमा ॥ नवजलनिधि तारे सर्व जे उख वारे ॥ निजपरहित हेते झान ते कां न धारे ॥ ॥ ॥ यवज्ञपिक गाथा बोधथी निवारयो । क पदथि चिलातीपुत्र संसार बास्यो । श्रुतनणत सुझानी मास तुंतादि थावे ।। श्रुतथि अन य हाये रोहिस्यो चोर नावे ॥ १०॥ अथमनुष्यजन्मविपेः ॥ नवजलनधि नमंतां कोइ वेला विशेपे ॥ मनुजजनम लाधो उल्लहो रत्न लेखे ॥ सफल कर सुधर्मा ज न्म ते धर्मयोगे । परनवमुख जेथी मोदलक्ष्मी प्रनोगे ॥ ११ ॥ मनुजजनम पा मी श्रालले जे गमे ॥ शशिनृपतिपरे ते शोचनायी जमेरे ॥ सुलह दश कथा मानुखोजन्म ए ने ॥ जिनधरम विशेपे जोडतां सार्थ ते वे ॥ १५ ॥ अथसहान विपेः ॥ सदयमन सटाई 5 खियां जे सहाई ॥ परहित मतिदा जास वाणी मि गई ॥ गुणकरि गहराई मेरुज्यू धीरता । सुजनजन सदा तेह यानंदढाई ॥१३॥ जा उग्जन लोके दूहव्या टोप टे । मनमलिन न थाए सज्जना तेह ते ॥ उप दजनकपुत्री यंजना कष्टयोगे । कनकजिम कशोटी ते तिसो गोल नोगे ॥ १४ ॥ अयगुणविपः । गुणगहि गुण जेमां ते बहू मान पाये ॥ नर सुरनिगुणे ज्यू फूल भीगे चढ़ावे ॥ गुणकरि बहु माने लोक ज्यू चश्माने यति कश जिम माने पू र्णने यूं न माने ॥ १५॥ मजयगिरि कडे जे जबुलिंबादि सोई॥ मलयजतरु संगे चंदना तेइ होई ॥ म लहिय वडाइयूं कीजिये संग रगे । गजशिरचडि बेटी ज्यूं यजा सिंहसंगे ॥ १६ ॥ श्रयन्याय विपे ॥ जग सुजस मुवाने न्यायसही उपागे ।। व्यसन रित नान न्यायधी लोक वास ॥ इम जदय विमानो न्याय अंगी करी जायनय परिहरीजे विश्वने वन्य कीजे ॥ १ ॥ पशु पण तस सेवे न्यायथी जे न चूके । धनयपथ चले जे नाइ ने तान मृकं ॥ कपिकुन मिति सेव्यो गमने सीस नामी ॥ धनयकरि तज्यो ज्यू लाइए लंफवामी ॥१॥ दय गय न सहाई यु कीनी सदाई ॥ रिपुविजय वाई न्याय ते धर्मदासा धरमनय धरे जे ते सुख वरि जीपे ॥ धरमनय विहूणा तेहने वरि कोपे ॥ १ ॥ धरमनय पसाये पामया पंच नेई । करि युधं जय पाम्या गचलीता लहे ॥ धरमनय विहाणा कारवा गर्व माता रणसमय विगृता पांझवा तेह जीत्या ॥ २० ॥ अथप्ननिहाविः ।। शुन थान जिका यादव जे निवाहे ॥ रवि पण तस जोवा योम जाणी वगाहे ॥ कन्गिहन निवाहे ताल निरनंत श्रापे ॥ मलिन ननु पखाने सिंधुमां तर श्रापे ॥१॥ पुस्परयाग मोटा जगणी धग ॥ जिण जिम प दिवज्यूं ते न बांडे पगये ॥ निन्दिा विष धन्यो जे ने न अद्यापि नारन्यो ॥ हर - ॥ उपशम दिन ति प्रयुज्ये विद्यये कोन गजे ॥ रिपु दल बल नजे विद्ययें विश्व रजे ॥ धनथि | या उपासे ॥ जिणकरि नृप रज्यो नोज बाणे मयूरे ॥ जिकरि कुमारंदा ११२ सूक्त मूक्तावली गति नर सेई विक्रमादित्य राख्यो ॥ २२ ॥ थय उपशमपिपे कारी सर्वदा लोकमाही ॥ उपशम धर प्राणी ए समो सौख्य नांही ॥ तरज प सुर सेवा सर्व जे थादरे ते ॥ उपगमपिण जे ते चारि मया करे ते ॥ २३ ॥ उपशम रस लोता जास चिने विराजी ॥ किम नर ना केरी रिधिमा तह ग जी॥ गज मुनिवर जेहा धन्य ते ज्ञान गेहा ॥ तपरि रुम देहा शानि पीयू प मेहा ॥२॥ अथ त्रिकरणशुक्षिपिपे ॥ जग जन सुखदाई चित्त एवु सदाई मुखे अति मधुराई साच वाचा सुहाई ॥ वपु परहित हेते त्रय ए शुभ नने ॥ तप जप व्रत सेवा तीये ते सर्व तेने ॥ २५ ॥ मण बच तनु वय गगन्यू शुक्ष जेने ॥ निज घर निवसता निर्जरा धर्म तेने ॥ जिम त्रिकरण गुदे ज्ञाप दी थब वाव्यो ॥ घर सफल फलतो शीत धर्म सुहाव्यो ॥ २६ ॥ थथ कुनचित्र सहज गुण वशे ज्यू शखमा श्वेतताई ॥ थमृत मधुरताई चश्मा शीतना कुवलय सुरनाई इतुमा ज्यू मिठाई ॥ कुज मनुजकैरी त्यू सुनावे ननाई । ॥२७॥ जिण घर वर विद्या जो दुवे तो न a जण घर य लाने ता न सौजन्य वृद्धि ॥ सुकुन जनम योगे ते त्रणे जो लहीजे ॥ श्रनय कुमर च तो जन्म साफल्य कीजे ॥ २८ ॥ थथ विवेकविपे ॥ हृदय घर विवेके प्राणि जो दीप वासे | सकल नव तणो तो मोह अधार नागे ।। परम धरम वस्तु त्व प्रत्यद नासे ।। करम नर पतंगा स्वाग तेने विधसे |॥ २५ ॥ किन नर कहीजे जे विवेके पिहीना || सकल गुण नया जे ते विवेके विलीना ।। जिम मुम ति पुरोधा नूमि गेहे वसते ॥ उगति जुगति कीवी जे विवेके उगते ॥ ३ ॥ थथ पिनय विपे ॥ निशिविण शशि सोहे ज्यू न शोले न सोहे त्यू न विद्या वाई ॥ विनयवहि सदाई जेह विद्या सहाई विण न कोई लोकमा उच्चताई ॥३१॥ विनय गुण वहीजे जेहथी श्री वरीजे ॥ सुर नर पति लोता जेह हेला नहीजे ॥ परतणय शरीरे पेशवा जे सुविद्या ।। विनय गुणथि लाधी विक्रमे तेह विद्या ॥ ३२ ॥ अथ विद्याविषे ॥ थगम ॥ ३३ ॥ सुर नर सुप्रससे विद्यये वार नाशे ॥ जगि सुजस सुवासे जेह दि राजयो हैम मरे || श्रियपकारवि नरुणाई या एचचला । त जाई ॥ विनयविण ॥ विनय सूक्तमुक्तावली. ११३ परहित करि ले जे ताहरो ए समे वे ॥ जब जनम जरा जां लागगे साई ॥ कहि न तिण समे तो कोण याशे सहाई ॥ ३५ ।। नहि त रु फल खावे ना नदी नीर पीवे || जस धन परअर्थ सो जाने जीव जीवे ।। नल करण नरिदा विक्रमा राम जेवा ।। परहित करवा जे उद्यमी दर तेवा ॥३६॥ ॥अथ उद्यम विपे ॥रयण निहितरी ने उद्यमे सहि प्राणे । गुरु नगति हरीने उ द्यमे शास्त्र जारो ॥ उख समय सहाई उद्यमे वे जलाई ॥ यति अलस तजी ने उद्यमे लाग नाई ॥३७॥ नृपगिर निपतंती वीज जात्कारकारी ॥ उढम क रि सुबुद्धी मंत्रिए ते निवारी ॥ तिम निज सुतकेरी पावती दुर्दशाने ॥ उटम करि निवारी ज्ञानगर्न प्रधाने ॥ ३८ ॥ थय दानविपे ॥ थिर नहि धन राख्यो तेम नारख्यो न जाए ॥ इणि पर धन जोतां एव गत्या जगाए ॥ इह सुगुण सु पात्रे जेह दे नक्ति नावे ॥ निधि जिम धन आगे साय तेहीज पावे ॥ ३ ॥ नल बलि हरिचंदा नोज जे जे गवाए ॥ प्रह समय सदा ते दानकेरे पसाए । इम त्हढय विमासी सर्वथा दान टीजे ॥ बन सफल करीजे जन्मनो सादु ती जे ॥ ४० ॥ अथ शीतविपे॥अगुन करम घाले शीत शोना दिखाले ॥ गुणगण अजुयाले आपदा सर्व टाले ॥ तस नर बहु जीवी रुप सावस्य देई व होई मील पाने जिकर्ड ।। ४१ ॥ Sण जग जिनदास श्रेष्ट शीले सुहायो ॥ ति म निरमल गीले गीत गंगेव गायो॥ कति करण नरिदा ए समां ने जिकोई ॥ परनव शिव पामे गीत पाने तिको ॥ ४२ ॥ अथ तपचिपे ॥ तरणि किरणथी ज्यूं सर्व अंधार जाए॥ तपकरि तपथी यूं 5 ख ते दूर थाए ॥ वति मलिन थ यूं जे कर्मचमाल तीरे ॥ किम तनु न परवाले ते तपस्वर्ण नीरे. ॥ ४३ ॥ तपविण नवि याए नाश कर्म केरो॥ तपविण न टले जे जन्म संसार फेरो ॥ तप व लिलहि लब्धी गोतमे नंदिखेणे ॥ तप बलि वपु की\ विष्णु वैकीय जेणे॥४४॥ अथ नावविपे ॥ मनविण मिलवो ज्यूं चाववो दंतहीणे ॥ गुरुविण जावो ज्यूं जीमवो ज्यू असूणे ॥ जसविण बदु जीवी जीव ते ज्यू न सोहे ।। तिम धरम न सोहे नावना जो न होते. ॥ ४५ ॥ नरत नृप इजाची जीरणश्रेष्टि नावे ।। वलि वलकल चोरी केवल ज्ञान पावे ॥ वलनद हरिणो जे पंचमे स्वर्ग जाए । ऽहज गुण पसाये तास निम्तार थाए ॥ ४६॥ अथ क्रोधविपे ॥ तृण दहन द हंतो वस्तु ज्यूं सर्व वाले ।। गुण करण नरी यू कोध काया प्रजाले ॥ प्रसमज लद धारा वन्हि ते क्रोध वारी । तप जप व्रत सेवा प्रीतिवन्नी वधारो. ॥ ४ ॥ ॥ परनव गि सूक्तमुक्तावली कीजे ॥ मन तनह वरीजे लोन तुला न ठीजे ॥ ५० ॥अथ दयाविपे। सुस्तक गुण जलेरी जे दया जीव केरी ॥ निज त्दृदय धरी ते साधिए मुक्ति सेरी ॥ ५५॥ जे ॥ ५६ ॥ थथ सत्यविपे ॥ गरत अमृत वाणी साचथी अग्नि पापी मन |त्रिण थनिक तजीजे साचवाणी वदीजे ॥ ५७ ॥ जग अपजश वाधे कूडवाणी समअहिराणी साच विश्वास खाणी ॥सुपसन सुर कीजे साचथी ते तरीजे ॥ वदतां ॥ वसु नृपति कुगत्ये सारख कृडी नरतां । थसत वचन वारी साचने चि त धार। ॥ वद वचन विचारी जे सदा सौख्यकारी ॥ ५७॥ यथ चोरीविषे ॥ पर १२४ धरणि परशुरामे कोधि निक्षत्रि कोधी ॥ धरणि सुनुमराये कोधि निमिता धी ॥ नरकगति सहायी कोष ए 5 ख दाई ॥ वरज बरज नाई प्रीति दे जे क्या ॥ ॥ श्रथ मानचिपे ॥ विनय बनतपी जे मूल शारखा रिमोडे ।। सुगुण र नककेरी शृंखलाबंध तोडे । मनमद करि दोडे मान ते मन हाथी । निनवन करि ले जे अन्यथा दूर एथी॥ ४५ ॥ विपद विष समो ए मान ते सर्प जाणा मनुज विकल होवे एण के जडाणो ॥ इह न परिहयो जो मान ज्याधने तो ३ निज कुज विणताडयो मानने जे वहतो ॥ ५० ॥ थथ मायाविपे ॥ नितुरपण निवारी हीयडे हेज धारी। परिहर दल माया जे थसतोपकारी ॥ मधुर मधुर बोले तोहि विश्वास नाणे॥ यहि गिलण प्रमाणे मायिने लोक जाणे ।। ५१॥ म कर म कर माया दन दोपट्ठ गया ॥ नरय तिरिय केरा जन्म दे जेह माया । बलि नृप उलवाने विनु माया वहता ॥ सयपण ला जे वामनारूप लेता ॥ ५२ ॥ अथ लोनविपे ॥ सुण वयण सयाणे चित्तमा लोन माणे॥ सकन सनकेरो मार्ग ए लोन जाणे ॥क विण पण एने सग रगे म लागे ॥ नव नव उरख दे ए लोनने दूर त्यागे ॥ ३ ॥ कनकगिरि कराया लोनयी नदराये ॥ निज थरथ न आया ते हया देवताये॥ सयल मिपि नही जे स्वाय ते विश्व लप वेली सनि विद्या सहेली ॥ विरतिरमण केली शाति राजा महेली ॥ सक्न ज्यो । तिह ददय धरीने जो दया धर्म को नजला राजे उख दूरे की धन अपहारे स्वार्थ चोर हारे । कुल बस वार बध घातादि धारे। पर धन तिण देते सर्प ज्यू दूर वारी ॥ जग जन हितकारी होय सतोप धारी ॥ २९॥ निशिदिन नर पामे जेहया ख कोही चोरी ना जेह थोरी। पर विनव हरतो रोहिणी चोर रगे ॥ इह थनय कुमारे ते ग्रह्यो बुद्धि सगे॥ ६ सूक्तमुक्तावली. ११५ अथ कुशीतविपे ॥ श्रयश पमह वागे लोकमां जीह नागे ॥ ऽरजन बहु जागे जे कुले लाज लागे ॥ सजन पण विरागे मां रमे एण रागे॥ परतिय रस रागे दो पनी कोडि जागे ॥ ६१ || परतिय रसरागे नाश लंकेश पायो । परतिय रस त्या गे गीत गंगेव गायो । दृपद जनक पुत्री विश्व विश्व विदीती। सुर नर मिलि सेवी शोलने जे धरती ॥६५॥ अथ परिग्रहविपे ॥ शशिउदय वधे ज्यूं सिंधु वेला नप्लेरी। धनकरि मन साए तेम वाधे घणेरी ॥ रित नरग सेरी यूँ करे ए परेरी ॥ ममकर श्रधि केरी प्रीति ए अर्थकेरी ॥ ६३ ॥ मनुज जनम हारे ॥ .खनी कोडि धारे ॥ परिय ह ममता ए स्वर्गना सोरव्य वारे ॥ अधिक धरणि सेवा धातकी खंग केरी । सुनुम कुगति पामी चकिराये घणेरी ॥ ६ ॥ अथ संतोपविपे ॥ सकल सुख नराए विश्व तावश्य थाए ॥ नवजलधि तराए 5 ख दूरे पलाए ॥ निज जनम सुवारे आपदा वारे ॥ निज धरम वधारे जेह संतोष धारे ॥ ६५ ॥ सकल सुरवतणो ते सार संतोप जाणे ॥ कनक रमणिकेरी जेह हा न थाणे ॥ रजनि कपिल वांध्यो स्व भनी लोलताए ॥ नमर कमल बांध्यो ते असंतोपताए॥६६॥व्यय विपयविपे । शिवपद यदि वांठे जेह आनंद दाई॥ विपतम विषया तो मि दे उ.खदाई ॥ मधुर थमृत धारा दूधनी जो सहीजे ॥ थति विरस सदा तो कांजिका संग्रही जे ॥ ६ ॥ विषय विकल ताणी कीचके नीम नार्या ।। दामुख थपहारी जा नकी रामनार्या ॥ रति धरि रहनेमी कीडवा नेमि नार्या ॥ जिण विषय न वा तेद जाणो धनार्या ।। ६७ ॥ अथ इंख्यिविपे ॥ गज मगर पनंगा जेद मुंगा कुर गा | sक क विषयार्थ ते लहे मुख चंगा ॥ जस परवश पावे तेहतुं यूं कही जे ।। म त्दृदय विमासी शिपांचे दमीजे ॥ ६॥ विषय वन चरंतां डि जे उंटडा ए । निज वश नवि गग्वे तेह दे उखडा एाथवश करण मृत्यू न्यू यगुप्ते कि पामे ॥ सवा सुख लह्या ज्यं कर्म गुतीदि नामे ॥ ७० ॥ यथ प्रमाधि सदु मन सुख वांठे 5 ग्यने को न वां। नहि धरम विना ते नौरव्य ए संपजे ॥ इह मुधरम पामी का प्रमाद गमीजे ॥ यति थना तजीने उद्यमे धर्म की जे ॥ ३१ ॥ इह दिवा गया जे नेह पाठा न थावे ॥ धरम समय थाने का प्र मादे गमावे ।। धरम नवि को जे थायु वाले वहावे ।। शनि नृपनिपरे त्युं सोच ना अंत पावे ॥ ७ ॥ अथ साधुधर्मविपे । शार्दुल विक्रीटितदः ॥ जे पंच प्रत मेरु नार निवहे. नि.नंग गे रहे ।। पंचाचार घरे प्रमाद न फो, जे परिस्ता सं॥ पांचे इंदि तुरंगमा या करे. मोक्षार्थने तंग ॥ एवो कर नाघु धर्म पन ते,जे उपाजी। कुपणज उपजतो थर्थ ते दूर वजा ॥३॥ श्रथ हित चितनवि | प्रति हित परथी ते जे न पांडे कदाई ॥ पुरुप रयण सोई वदिए सो सदा ॥४॥ समि विण विरूपी सनु निहून सोहे ॥ लखमि लहिय राके जे शिलादित्य नो ज्यो ।। जबमिलहिय शाके विक्रमे विश्व रज्यो ॥ ७ ॥ श्रथ रुपणविषे ॥ कण | ११६ सूक्तमुक्तावली ज्यू ग्रहे त्यू वहे ।। ७३ ।। मानिनीट ॥ मयण सरय मोमी कामिनी सग लोमा तजिय कनक कोडी मुक्तिसू प्रीति जोडी ॥ ना ना नय वामी गुव चारित्र पामी ।। इह जग शिवगामी ते नमो जवु स्वामी ॥ ४ ॥ अथ श्रावधर्म विषे ॥ शा दूलविक्रीडितबद ॥ जे सम्यक्त सही सदा व्रत धरे, सर्वज्ञ सेवा करे । सव्या वदप | के थादरे गुरु नजे, दानादि धर्माचरे ॥ नित्ये सद्गुरु सेवना मनधरे वो जि. नाधीशरे ॥ नारख्यो श्रावकधर्म दोय दगमा जे श्रादरे ते तरे ॥ ७५॥ मानिनी । तूद ॥ निशिदिन जिनकेरी जे करे गुझ सेवा ॥श्रा व्रत परि जे ते काम थानद देवा ।। चरम जिन परिदे जे सुधर्मे सुवास्या ॥ समकित सतवता श्रावरा ते प्रत स्या ॥ ७६ ॥ ऽम अरथ रसाला जे रची सक्तमाला ॥धरम नृपति बाना मानि नी उद गाजा ॥ धरम मति धरता एइहा पुण्य वाव्यो। प्रथम धरम केरा सार ए वर्ग सायो॥ ७७ ॥ इति श्रीमत्सूक्त मुक्तावल्या धर्मवर्ग प्रथम समाप्त ॥१॥ ॥अथ अर्थवर्ग प्रारन ॥ उपजावद ॥ अथार्थवर्गे हितचितन श्रीमितपचार्यस्व महीगसेवा ! खलादिमैत्री व्यसनादि चय, मिहावधार्या कतिचित्तसगा ॥ १ ॥ अथ अर्थ विपे मालिनी उद ॥ थरथ अरजि जेणे स्वायते विश्व दोये ॥ जिण विषय ण विद्या रुपने कोण जोरे ॥ थनिनव सुखकरो सार ए अर्थ जाणी ॥ सक्न धरम एथी साधिए चित्त थाणी ॥ ॥ थरथ विण कानो जेह वेश्या ना रज्यो । थरथ पिण वसिष्टे राम जातो वेख्यो । सुरुत सुजस कारी अर्थ ते ए। ॥ परहित करया जे चित्त उवाद पारे । परत हितहीये जे न कोई यिसारे॥ निज उप न गणीने पारक सुख वारे ॥ तिहताण बलिहारे जाइए कोडिया रे ॥ जिम रिपनर जेणे मफ पीडा सहीने ॥ विषधर जिनवीरे ॥ ५॥ थय लक्ष्मीपेि ॥हरि सुत रति रगे जे रमे रात सारी ॥ शिवतनय कुमा रो ब्रह्म पुत्री कुमारी ॥ हितकरि गतीला जेहने लछि जोवे ॥ सकल सुस है सो सोहि विख्यात होरे ॥ ६ ॥ लखमि बनि यशोदा नदने विश्व मोहे ॥ बूजव्या ते वहीन सूक्तमुक्तावलो. ११७ काण जिम मंचे कीटिका धान्यकरो ॥ मधुकर मधु संचे नोगवे को अनेगे । ति म धन रुपणकेगे नोपकारे दिवाये । महि विलय जाए अन्यया धन्य खाए । G || रुपण पणु धरंतां जे नवे नंद राया ॥ कनक गिरि कराया ते तिहां अर्य नाया । इम मनत करंतां उःख वागे वमीजे ॥ रुपण पषु तजीजे मेवज्यू दा न दीजे ॥ ॥ अथ याचनविपः ॥ निग्मल गुण गजी त्यां लगे लोक राजी॥ तब लग कहि जीजी त्यां लगे प्रीति माजी ॥ सुजन जन सनेही त्यां लगे मि त्र तेही ।। मुग्व यकि न कहीजे ज्यां लगे देहि देही ॥ १० ॥ जज बडपण वांचे मांगजे तो न का॥ लदु पण जिण होवे केम कीजे निका॥ जिम लघु थऽ सोने बीरथी दान ली५ ॥ हरि वन नूप आगे वामना रुप की५ ॥ ११ ॥ अथ नि धनविपः ॥ धनविण निज बंधू तेहने दूर ठंडे ॥ धनविण ग्रह नार्या तेह सेवा न मंडे ॥ निरजल सरजेवा देह निर्जीव जेवो ॥ निरधन तृण जेवो लोकम ते गणे वो ॥ १२ ॥ सरवर जिम मोहे नीर पूरे नरायो ॥ धन करि नर सोहे तेम नीते उपायो । धनकग्यि मुंहतो माघ जे जाण दूतो। धनविण पग सूजी तेह दीतो मरं तो ॥ १३ ॥ अथ राज सेवाविपेः॥ सुजनसं हित कीजे उर्जना सीख दीजे ।। जग जन वा कीजे चित्त वांठा वरीजे । निज गुण प्रगटीजे विश्वना कार्य कीजे ॥ भन्नु मम विचरीजे जो प्रनूमेव कीजे ॥ १४॥ नगतिकरि वडानी सेव कीजे जिकाई ॥ अधिक फल न थापे कर्मयी ते तिकाई ॥ जलधि तरिय लंका सीत संदेस लावे ॥ हनुमत करमे ते राम कबोट पावे ॥ १५ ॥ अथ खलताविपे॥ रस विर स नजे ज्यू अंव निव प्रसंगे ॥ खत मिलए दुवे यूं अंतरग प्रसंगे ॥ सुण सु ए ससनेही जाणि ले रीति जेही । खल जन निसनेही तेहगूं प्रीति केही ॥१६ मगर जल वसंतो ते कपीगय दीठो । मधुर फल चरखावी ते कयो मित्र मीगे | कपि कलिज नम्वेवा मत्स खेली खलाई। जलमाहिं कपि बुद्धी तामि दे ते नला ॥ १७ ॥ अथ अविश्वाशविपे ।। उपजाति ठंद ॥ विश्वासिसाथै नवले रमीजेन चैरि विश्वास कदापि कीजे ॥ जो चित्त ए धीर गुरणे धरीजे ॥ तो लचिलीला ज गमा वरीजे॥१॥श्वजाळंद। चाणायके ज्यूं निज काज सायो । जे राज नागी नृप तेह माखो । जो घूयडे काक विश्वास कीयो। तो वायसे घूकने दाह दीयो ।।१।। अथ मैत्रीविपे । मालिनीठंद ॥ करि कनक सरीसी साधु मंत्री सदा ॥ धनि कति तप वेधे जास वाणी सवाई | अहव करहि मैत्री चंमा सिंधु जेही ॥ घट घट वध वाधे सारखा वे सनेही ॥ २० ॥ ऽह सहज सनेह जे वधे मित्रताई ॥ रवि प

No text on this page.

सक्तमुक्तावली. १२ए वचन नियाहे साज ग्युगज्य वाने । व्रत नय कुलगते मातज्यूं लाज पाले ॥ सक ल गुण सुहावे लाजधी नावदेवे ॥ व्रत नियम लह्यो जे ना सजा प्रनावे ॥३४॥ शालिनी ठंट ॥ एवा जे जे रुपडा नाव गजे । एणेविश्व अर्थथी तेह बाजे ।। एवं जाणी सार ए सौख्य केगे। ते धोरा जे अर्थ अजें नलेरो ।। ३५ ॥ इतिश्री सक्त मुक्तावल्या अर्थवर्गो वित्तीय समाप्त ॥ २ ॥ ।। अय कामवर्ग प्रारंनः॥ मुपजाति वंदः॥ ग्राह्याः कियंतः किल कामवर्गे कामो नृनार्यों गुणदोपनाजः ॥ सुनदर्ण योगवियोगयुक्तः समातृपितृप्रमुखा प्रसंगाः ॥ १ ॥श्रथ कामविपेः ।। कंदर्प पंचानन तेज आगे ॥ कुरंग जेवा जगजीव नागे ।। स्त्रीशस्त्र क्षेई जग जे व दीता ॥ तिएण देवा जनवृंद जीता ॥ २ ॥ मालिनी ठंदः॥ मनमथ जगमाहे 5 जयीजे अद्यापी ॥ त्रिनुवन सुरराजी जासशस्त्रे सतापी ॥जलज विधि उपासे वा विजा विष्णु मेवे ॥ हर हिम गिरिजाने जेण अर्धाग देवे ॥ ३ ॥ शार्दूलविक्रीडित छंदः ॥ निन्नीनाव चल्यो महेश उमया, जे काम रागे करी ॥ पुत्री देखि चल्यो चतुर्मु व हरी, श्रादेरिका श्रादरी ।। गोतमनी त्रिया विलसिने, संजोग ते योलव्या॥ कामे एम महंत देव जग जे, ते नोलव्या रोलव्या ॥४॥ मालिनी ठंद. ॥ नल न पद वदंती देखि चारित्र चाले । अरह नरहनेमी ते तपस्या विटाले ॥ चरम जिन मुनी ते चिलणारुप मोहे ॥ मयण सर व्यथाना एह उन्माद सोहे ॥ ५॥ अथ गुणदोपोनावनविपे ॥ रथोताछंद. ॥ उत्तमा पण नरा न संनवे ।। मध्यमा तिम न योपिता दुवे ॥ एह उनमिक मध्यमी पणो ॥ वेदुमाहि गुणदोपनो गिणो ॥६॥ तत्र पुरुषगुणा यथा ॥ शार्दूलविक्रीडितलंद ॥ जे नित्ये गुण वृंद ले परतणा, दोषां न जे दाखवे ॥ जे विश्वे उपगारिने उपकरे, वाणीसुधा जे लवे ।। पूरा पूनिम चंद जेम सुगुणा, जे धीर मेरुसमामा जेह गंनीर सायर जिस्या, ते मानवा उत्तमा ॥७॥ थनुष्टुप् छंद।रूप सौनाग्य संपन्नाः सत्वादिगुणशोजनाः ॥ ते लोके विरला धीराः श्रीराम सदृशा नराः॥ ॥ अथ पुरुष दोपा यथा ॥ शार्दूलविक्रीडितलंदः ।। संकासामि हरंति राम तजि जे,शीतातणी एवकी ॥ स्त्रीवेची हरिचंद पांमव नृपे, रु प्पा नराखी सको ॥ रात्रै ठामि निज स्त्रिया नल नृपे, ए दोप मोटा नणी जोवो उत्तम मांहि दोष गणना, का वात वीजातणी॥ ए॥ यथ स्त्रीगुणा यथा ॥ उपजा तिछंदः ॥ सुसीख थाले प्रिय चित्त चाले । जे शील पाले गृह चिंत टाले ॥ दाना से नेत्र रगे ॥ हसित मुरव शशीज्यु सर्व रोमाच अगे॥ कुच इक मुफ वैरी नम्रता जे न दाखे ॥ प्रिय मिलण समे जे अतरो तेह राखे ॥ १५॥ अथ वियोगविर। ॥१६॥थथ माताविपे। इश्वजावद ॥जे मातनो बोल कदा न लापे॥जे विश्वमा ह। रज जेम योपे ॥ ज्या धर्म चर्या वदुधा परीवी ॥ त्या मातपूजा सदुमा सरीसी/ ॥१॥ जे मात मोह जिन एम कीमो ।। गने वसता व्रत नेमलीधो ॥ जे मातना वे सुतने रमाहे॥ विद्या नणावे सरस जमाडेते तातनो प्रत्युपकार एही॥जे तेह। मात तातपद पकज सेवा ॥ जे करे तस सुपुत्र कहेवाजेह कीति कुजलाज वधा ॥ सूर्य जेम जगि तेज सधारे॥ २१ ॥ शालिनीठद ॥ गगापुत्रे विश्वमा कति पो।। थाझा जेणे तातरीनलोपी॥ ते धन्या जे श्रजनापुत्र जेवां ॥ जेणे की। जानकी नाय संपा॥ २२॥तोटकठद ॥ इम काम विलास ननास तए ।) दिन घरस समाणे रणि कल्पांत जाणे ॥ हिम रज कदलीजे तेह जाना प्रमाणे नीनक्तिहिये वही॥१७॥ मानिनीद ॥ निपध सगर राया जे हरीना व गनि हदे यनुनावतए ।निमचदन थग पिलेप तए ॥ हिय होय सदा सुन २२० सूक्तमुक्तावली दि जेणे गृहधर्म होई ।। ते गेहि नित्ये घरनधि सोई॥१०॥ अथ स्त्रीदोप- ॥ उपजातिवंद ॥ ना हरायो जे पति मारकाये । नारख्यो नदीमा शुक मा ये ॥ सुदर्शनश्रेष्टि सुशील राख्यो । ते थाल देई थनयाय दारख्यो ॥ ११ ॥ ततिलका उद ॥ मायो प्रदेशि मुरिकाति विपयावलीए ॥ राजा यशोपर हम यनावलीए ॥ 5 खी करयो स्वसुर नूपुर पडिताए ॥ दोपी त्रिया इम ना शण दोपताए ॥ १२ ॥ अथ सुनदणी स्त्रीपिपे -शार्दूलविक्रीडितद ॥ रूपवती सुशीन सुगुणी, लावण्य अगे लसे ॥ लकालु प्रियवादिनी प्रियतणे, चिन सदा जे वसे ॥ लीला यौवन उनसे उरवसी, जाणे नृलोके वशी ॥ एवी पुण्यनणे पसाय लहिये, रामे रमा सारशी ॥१३॥ उपजातिद । सीता सुना नानराय। णी ॥ जे झोपदी शीलवती वखाणी ॥ जे एहवी शोजगुणे समाणी ॥ सुनकृष्णा ते जगमाही जाणी ॥१॥ अथसयोगविपे ॥ मातिनी द प्रियसखि प्रिययोगे उल्ल ॥ ॥ शशिरसिकरसो जे सरसो सोइ लागे ॥ प्रिय विरह प्रियाने पुरख शू शून जा ा वयणे प्रबुद्धो । शीना तपते अरहन्न सीयो जाप्रथपिताविषे ॥ जे वान जा ॥तिम दशरथ गया जे प्रसन्ना मुनि मन जनक जेते पुत्रने मोह ना खा ॥ ससुत हित करीते तेहना काज साया ॥२०॥ श्रथ पुत्रविषे स्वागताउन तए ॥ २३ ॥ इति श्रीसूक्त मुक्तावां काम वर्गस्तृतीय समाप्त ॥

- सूक्तमुक्तावली. १० अथ मोक्तवर्ग प्रारंना उपजाति उंदः । ग्राह्या.फियंतः किल मोदवर्ग कर्मक्ष्यासंयमनावनायाः॥वि वैकनिर्वेद निजप्रबोधा इत्येवमेते प्रवरप्रसंगाः ॥ १ ॥ मोक्षार्थविपे मालिनी दः ॥ इह नब सुख हेते के प्रवत नसेरा ।। परनव सुग्वहेते जे प्रवतै अनेरा ॥ अव र अग्ध मी मुक्ति पंथा राधे ॥ परम पुरुप सोई जेह मोदार्थ साधे ॥ २ ॥ तजिय नरत केगे जेण वे खंड नूमी ॥ शिवपथ जिण साध्यो सोलमे सांति सामी। गजमुनि सुप्रसिक्षा नेम प्रत्येक बुक्षा ॥ अवर अर्थ वंडी धन्य ते मोद लु॥३॥ श्रथ कर्मविपे ॥ करम नृपति कोपे उ.ख थापे घणेरा। नरय तिरय केरा जन्म ज न्मे अनेग ।। गुल परिणति होवे जीवने कर्म तेवे ॥ सुरनरपतिकरी संपटासोई देवे ॥ ४ ॥ करम शशि कलंकी कर्म नितू पिनाकी ॥ करम बनि नरें प्रार्थना विष्णुरांकी ॥ करम वश विधाता २६ सूर्यादि होई ॥ सवल करम सोई, कर्म जेवो न कोई ॥ ५ ॥ अथ माविपे ॥रित नर निवारे जे दमा कर्म वारे ॥ सकल तप सधारे पुन्य सभी वधारे ॥ श्रुत सकल थराधे जे दमा मोद साधे जिए निज गुण वाधे ते मा कां न साधे ॥ ६ ॥ सुगति लहि खिमाए खंध सूरीस सीसा ॥ सुगति दृढ प्रहारे कूरग मुनीता ॥ गज मुनिस खिमाए मु क्ति पंथा धराधे ॥ तिम सुगति खिमाए साधु मतार्य साधे ॥ ७॥ अथ संयमविपे स्वागता रुंद । पूर्व कर्म सवि संयम वारे॥ जन्म वारिनिधि पार उतारे॥तेह संयम न केम धरीजे ॥जेण मुक्ति रमणी वश कीजे ॥ ७॥ तुंग शैल बलदेव सुहायो । जे ए सिंह मृग बोध बतायो । तेम संयमालहीय थरायो। जेण पंचम सुरालय पायो ।। ए ॥ अथ दादश नावनाविपे.॥तत्र प्रथम अनित्य नावना मालिनी बंदाधण कण तनु जीवी वीज जात्कार जेवी ॥ सुजन तरुण मैत्री स्वप्न जेवी गणेवी ॥ यहमत ममताए मूढता कांइ माचे ॥ अथिर अरथ जागी एणशू कोण राचे ॥ १० ॥ धरणि तरु गिरिंदा देखिए नाव जेई ॥ सुर धनुप परे ते नंगुरा नाव तेई इम दृदय विमासी कारमी देह वाया।तजिय जरतराया चित्त योगे लगाया ॥११॥ वितीय यसरण नावना ॥ परम पुरुष जेवा संहस्खा जे रुतांते ॥थवर सरण के नु लीजिये तेह यंते ॥ प्रिय सुत्द कुटंवा पाश वेता जिकोई ॥ मरण समय राखे जीवने ते न कोई ॥ १२ ॥ सुर गण नर कोडी जे करे जास सेवा ॥ मरण नय न लूटा तेह इंशादि देवा ॥ जगत जन हरतो एम जागी धनाथी । व्रत ग्रहिय वि तूटो जेह संसारमाथी ॥ १३ ॥ तृतीय संसार नावना ॥ शार्दूलविक्रीडितछंद ।।

जेह सराप ॥ तेनासुत परे शिव साधे ॥ धर्म नावन नही नविनावा ॥ राम मुनाइ जाए ॥ त्यू मगु सूर। पुरयद थाए ॥ १५ ॥ चतुर्थ एकत्लगवना ॥२१॥सप्तमीथाश्रवनावनामालिनीछद ॥ इह थविरति मिथ्या योग पापालिसा Sण उपनर जीपा श्राश्रये कर्म वाधे ॥ करम जनक जेन धाश्रवाजे न रुस नास्तणू तेवति राज्य सीतेऽख पाम्या नरके घोरा|तेहेतु एथाश्रवदोरका । थटमीसवरनावनाजे सर्वथाथाश्रवने निरूंधे। तेसवरीसवरनाव साधे॥ते नावना | छद पदस तपनेठे कर्म ए निर्जराए।उतपति थिति नाशे लोक नावानराएनन गुरुरज स्वामी जेणेत्रिया कचन कोडिवामी ॥२॥ नवमी निर्जरानावनामानिनी | जगबोधीननाधर्मबुनियहरणि विनावोनावना एहसुझ॥श्य/उपजानिबार | वे निर्जरा काम सकाम तेही॥थकामजे ते मरुदेपिजेही ॥ ते ज्ञानथी कर्मह निई रीने ॥ दृढ प्रहारी परि तो तरीजे ॥२६॥ दशमी लोकनावना॥ मानिनीवर तिम पुस्प पिनाये ए यथो सोक तेवो ॥ तिरिय पण विराजे थाल स्पोरन के या। उरथ मुरज जेवो लोकनाले प्रफास्यो । तिमज नवन नान केवनी ज्ञान नाग्यो ॥ २३ ॥ एकादशवोचिदुखननाचना ॥ स्वागताउद ॥बोषि वीनलाई १२२ सूक्तमुक्तावली तिर्यंचादि निगोद नारकिंतणी, जे योनि योनी रह्यां ॥जीवे दुख थनेक दुर्गतिर पो, कर्मप्रजावे लयां ॥ या सयोग वियोग रोग बढुवा, या जन्म जन्मे जूवी ।। ससार असार जाणि हवो, जे ए तजे सो सुखी ॥ १४ ॥ वजाउद ॥जे होस ते उत्तम जाति जाए ॥ जे ते म यम जाति थाए ॥ न्यू मोमेना पुण्ये अकेलो जिव स्वर्ग जाए ॥ पापे अकेलो जिव न जाए ॥ ए जीव नात्र व करेअकेलो । ए जाणिने ते ममता महेलो ॥१६॥ उपजाति छद ॥ए एक ना जो व कुटव योगे । मुखी उखी ते तस विप्रयोगे । स्त्री हाय देखी वलयो क्लास मी प्रबोध्यो तिणथी वहेलो ॥१॥ पचम यन्यत्वनावना ॥ जो आपणो दे। न होई ॥ तो अन्यको थापण मित्त कोई ॥ जे सर्व ते अन्य हा नणीने रिहा दो दर्ष विपाद कोजे ॥ १॥ देहाटि जे जीवथको अनेरा ॥ श्योपु ख कीजे नामकेरा ॥ ते जाणिने वाघणिने प्रबोधी । सुकोसले स्वागन सारकीपी अधिनायना । काया महा एह यशुचिताई ॥ जिहा नवधार वहे सदाई ॥ ॥ मराच जे ए मलमूत्र सेराए कारमा देह यसार देवाचतुर्थ चक्रिय पण ते उनकी मर समय यात्मा सवरी सो प्रबुदे ॥शचजाद जैकुडरीके अतठाडि दीप ॥

सूक्तमुक्तावली. २२३ संप्रति परे मुख पावो ॥ २७ ॥ अथ रागविपे ॥ इंश्वजा दंडः।। गगे म राचे नव बंध जाणी॥जे जाण ते राग वशे अनाणी॥गौरी तणे राग महेस रागअधांग देवा नि जवुद्धि जागी ॥ २५॥ अथ पविपे ॥ रेजीव विक्षेप मने म थाणे॥ विष संसार निदान जाणे ॥ सातू नणंदे मिति कूड कीबूं || जुन सुना शिर थाल दीवू ॥३०॥ अथ संतोपविपे ।। वसंततिलका लंदः ॥ संतोप तृप्त जनने सुख होय जेवू ॥ ते व्य खुब्ध जनने सुख नाहि तेवु ॥ संतोपवंत जनने सद् लोक मेवे ॥ राजेंड्रंक सरि खा करि जेह जोवे ॥३१॥ अथ विवेकविपे। उपजाति छंदः ॥जो जेह वित्ने सुवि वेक नाते ॥ तो माह अंधार विकार नागे । विवेक विज्ञानतणे प्रमाणे जीवादिजे वन्तु स्वनाव जाणे ॥ ३२ ॥ इंश्वजा दः ॥ वाला पणे संयम योग धारी । वर्षाकते काचति जेण तारी॥ श्रीवारकेरो ययमत्त तेई ।। सुझान पाम्यो सु अवेक जेई ॥ ३३ ॥ अथ निवेदविपेमार्दूलविक्रीडितबंदः॥जे बंधूजन कर्म वंधन जि ता. नोगा नुजंगा गिणे ॥ जाणंतो विषसारिखी विषयता, संसारता ते हणे ॥जे में सारह रागहेतु जनने, संमार नावा दुवे ॥ नावो तेऽ विरागवंत जनने, वैराग्यता दाखवे ॥ ३४ ॥ वसंततिलकादंदः॥ निर्वेद ते प्रवल उर्जर वदिखाणो ॥ गोडवा मनधरे वुध तेद जाणो। निर्वेदयी तजिय गज विवेक लीधो योगी नर्तृहरि नं यम योग लोयो ॥३॥ अथ यात्मबोधविपाए मोहनींद तजि केवत बोध हेते। ते ध्यान गुम इदि नावनि एक चिने ॥ ज्यूं नि प्रपंच निज ज्योति स्वरुप पावे।। निर्वाध जे थखय मोद मुखार्थ यावे ॥३६॥ मालिनी दानवि विपयतणा जे चंचला मौख्य जाणी ॥ प्रियतम प्रिय योगा नंग चिन थाणी ॥ करमदल ग्यपे 5 केवल ज्ञान ने ॥ धन धन नर ते मोक्ष साये जिकई ॥ ३५ ॥ इति मोदव गः चतुर्थः समाप्तः॥ उपनाति वृत ॥ इत्येवमुका किज मृक्तमाला विनृपिता वर्गचतुष्टयेन ॥ तनानु झोना मधिकं जनानां वंस्थिता माक्तिकमालिकेव ॥ ॥ शार्दूलविक्रीडिन टनं । धानीमापनिंधुपावणागी श्रीमनपागपः नृरिः श्रीविजयप्रनानियगुस्बुंध्या जित स्वर्गुरुः ॥ तत्पटोदयनूधगे विजयते नावानिवोद्यत्मनः नृरिश्रीविजयादिर नसुगुरुर्विज्ञानानंदनः ॥२॥ थायांवृनं ।। विग्यातान्तशाज्ये, प्राडाः श्रीमनिवि मलनामान ॥ तन्मोढग बनूवुः प्राज्ञा. श्रीकनकविमनाहा ॥३॥तेपामुने विनयाँ वि जान कल्याणविमन न्याव्हःतत्मोडगेखिनीयः कसरविमनानियों परज. 18 तेन चतुर्निवं ग.रविना नापानिवसन्यिं ॥ मृनानामिद माता. मनोविनोदाप !

अथ लाचरणफरेने हेनव्यो जेमा कोइनिइनथी एटलेनिकलवानो बारणोनथी वजीनमा | समस्तप्रकारे पाचयाश्रवरुप मेघ बरसीरघुठे तथानानाप्रकारना ज्ञानावरणीयादि । | क कर्मेनिीप्रतिरुप लियेकरीव्याप्त अनेमोहरूप अधकारेकरीयुक्त एहवोथास | साररुपवन तेमाफिरनाराजे प्राणीयो तेने स्थिरकरवानेयर्थे करुणाकरीपवित्रने । वर्ष ॥ दवेजेनांतसुधारसते नावनाथोविना स्फुरतोनथी तेकहे विधाननोरा यदिढ रोहति मोतिरोदितानुतगतिविदिता समतालता॥४॥ १२४ शातसुधारस. बालानां ॥५वेदेश्यिर्पिच,प्रमिते श्रीविक्रमाहते व ॥श्रग्रंथि सूक्तमाला केनर विमलेन विवुधेन॥६॥इति श्रीसूक्तमुक्तावली सपूर्ण ॥ श्री शखेश्वरपार्श्वनाथाय नमः ॥ श्री विनयविजयजी उपाध्यायरुत शांतसुधारस अथ अर्थसहित प्रारन शार्दूलविक्रीडितवद ॥नीरभ्रे नवकानने परिगलत्पचाश्र वानोधरे नानाकर्मलतावितानगहने मोहाधकारोघरे ॥ भ्रांतानामिद देहिना स्थिरकते कारुण्यपुण्यात्मन्निस्तीय शै प्रथितास्सुधारसकिरो रम्या गिर पातु व ॥१॥ श्रर्थ ॥ प्रथमग्रथकर्ना ग्रथनेयादें श्रीतीर्थकरदेवनी वाणीनी स्तुतिकरी मम श्रत करणजेहनो एहवा चतुर्विधसवरूप तानाश्वरजे श्रीतीर्थकरदेव तेणेउपर रोजी अमृतरसने वरसती एहवीरमणीयजेवाणी ते तमारु रणकरो ॥ १ ॥ द्रुतविलवित वृत्तत्रयास्फुरति चेतसि भावनया विना न वि ज्यामपि शातसुधारस ॥ न च सुख कशमप्यमुना विना जगति मोदविपादविपाकुले ॥२॥ यदि नवभ्रमखेदप राहमुख यदि च चित्तमनतमुखोन्मुख ॥ शृणुत तत्सुधि य शुननावनानृतरस मम शातसुधारस ॥ ३ ॥ सुम नमो मनसि श्रुतपावना निदधता घधिका दश नावना ॥

शांतसुधारस.
१२५
ना अंतःकरणमापण शांतिरूपथमतनोरत तेनाव विना स्फुरतोनथी यने मोह
तथा खेद तद्रूपविकरीव्याप्त एहवोजेजगत तेमां शांतसुधारसविना किंचित्मात्र
थोमोपणमुखनथी ॥ ॥ माटेश्रागांतसुधारसनामा ग्रंथमानलवानो उपदेशकरे।
हेक्षिमतो जोतमामन संसारभ्रमणकरवाना ग्वेडेकरी पराड्मुख उपरांतूं थयोहोय
अनजेमा थनंतसुखठे एहवोजेमोद तेनासुरवपामवानेविपे सन्मुखथयो होय तोजेमां
मनोहरनावनानो रतनरेलोठे एवोमारो थाशांतसुधारसनामा ग्रंथसांनलो ॥३॥
हवे नावनाथी समताप्रगटथावतेकहे। हेपंमितजनो थासंसारमा जेनुश्रवणमा
करवायीज पवित्रतानेकरनारी एहवीवारनावनाठे तो तेने धारणकरनारोजेजीव
तेनादयमा मोहजेयज्ञान तेने यानादितकरनारी अनेजेहनी अनुतगतिवे एहवी
प्रख्यात समतारूप वेलीप्रगटयो || ४ ||
रयोचतात्ताआर्तरोऽपरिणामपावक प्लुटनावुकविवेकसौष्ठवे॥
मानसे विपयलोलुपात्मना क प्ररोतितमा समांकुरः ॥ ५ ॥
अर्थ ॥ हवेसमतापामवाने जे अयोग्यहोयतेकहे जेनुमन पांडियंना त्रेवीत
विषयोनेविप लोलुप एहवाप्राणोयोने थान रोड्थ्यानेकरीने उत्पन्नथयेती एह
वीजे मागपरिणामरूप थग्नि तेणेकरीने नावनाना रतनेविपेजे चतुरपुरुषोते तेना
विचाररूप रुडापणुं जेमांधीवलीगगुंठे एहवामागीयोना मनमा समतानोथंकुर
किहांथी उत्पन्नथाय यातनजयाय ॥ ४ ॥
वसंततिलकावृत्तं यस्याशयं श्रुतकृतातिशयं विवेकपी
यूपवर्परमणीयरमं श्रयंते ॥ सभावना सुरलता नदि
तस्य दूरे लोकोत्तरप्रशमसौख्यफलप्रसूतिः ॥ ६ ॥
अर्थ ॥ हवेसमतापामवाने योग्यहोयतेकहे सिद्धांतश्रवणादिकेकरीने अत्यं
तपणे संपूर्ण नरेला वृधिपामेला तथा विवेकरूप अमृतवृष्टीनी रमणीयजेक्रीडा ते
ऐकरीने रम्यके मनोहर गोलायमान एहवांजेनां अंतःकरणठे तेवांअंतःकरणो
मां सजावनायो अयंतेके प्रवेशकरे तेथीतेपुरुपने लोकोत्तरजे प्रशमके० अांतर
सनासुख अर्थात्मोद्मुख तेनाफलने प्रसवनारी एवीजे सुरलताक कल्पलता
ते दूरनथी अर्थात् तेहने मोददरनथी ॥ ६ ॥

विचित्रमशरनी सपनियोने तेपण विपत्तिपॅरी पुतने थने समस्त रुपरमादित नजन थाजगतमा थनलीलानीपर हणनगर थनेजेहनो जयकरवो थत्यतकनी' पाने एहवो तरुण्यस्यायेंकरी उन्मत्त मदनजे कामदेव तेनाजेहबु सुदर एहा, अर्प। होवेकायकरी ससारनो थनित्यपणुदेरखामेळे हेप्राणी थाससारमा वा परेरी चवजययता एहसाजे पाणीनातरग तेहनीपरें यापुपपणचचजले वती' शांतसुधारस. अनुष्टुत्त ध्या। अनित्यताशरणते नवमेकत्वमन्यता ॥ अगोच माश्रव चात्मन् सवर परिनावय ॥॥ कर्मणो निर्जरा धर्म सुकृता लोकपञ्चति ॥बोधिलनतामेता नावयन्मुच्यसे नवात् ॥३॥ अर्थ ।। हवेवे श्लोकेकरी थाग्रथमानाववानी वारनायनायोनां नामकहेने । थनित्यनावना र यशरणनावना ३ ससारनावना ५ एकत्वनावना ५३ न्यत्वनावना ६ श्रचिनावना धाश्रवनावना सवरनावना।हेयात्मातु एव वनायोनो विचारकर ॥ ७ ॥ ए कर्मनिहरानावना १० धर्मनावना ११ रुडामा रनो लोकस्वरूप नावना १२ बोलिन नावनात्यात्मात एवारनावनायो नो वि चारकरतोयको ससारथकीमुक्तथइस ॥ ७ ॥ पुष्पिताग्रावृत्त ॥ वपुरवपुरिट विदभ्रलीलापरिचितमप्यतिनगुरं नरा णा ॥ तदतिनिउरयौवनाविनीत नवतिकथं विपा महोदयाय ॥ यर्थ ॥ हवेप्रथमश्रनित्यनावना नावतां शरीर अनित्यपणुदेखाडेठे देवित जे मनुष्योनुशरीरते विधान पमितलोक तेनापण महोटा उदयकरवानु भारत गोरोतेयाय थपितुनहीजथाय ॥ ए॥ शार्दूलविक्रीडित वृत्तघ्य॥ आयुवीयुतरत्तरगतरत लग्नाप द सपद सर्वपीज्यिगोचराश्च चटला सध्याघ्ररागादिवत्।। मित्रस्त्रीस्वजनादिमंगममुख स्वप्नेजालोपम तल्कि वस्तुन ये नदिढ मुदामालबन यत्सता॥१॥प्रातांतरिढाव दातरुचयो य चेतनाचेतना दृष्टा विश्वमन प्रमोदविज्राला वा स्वत सुदरा ॥तास्तत्रैव दिने विपाकविरमात् ढा नश्य त पश्यतश्चन प्रेतढत जाति ननवप्रेमानवध ममा।३॥

शांतसुधारस. २७ विषयने ते संध्याकालना आकाशजेवासुंदर एटले संध्याना अनरागनीपरें सुंदर तो पण अचरागनीपरें थोडीवारपति विनाशशील तथा मित्र स्त्री स्वजन इत्या दिकोनोजे समागम तेणेकरीने थयेटुंजेसुख तेस्वप्नसरी किंवाजालसरडे ते वारें आसंसारमा सत्पुरुषोने श्राश्रयकरवायोग्य कश्वस्तुरेवालं. अर्थात्कोजनथी सर्वविनाशगीत अनित्य इतिनाव ॥ १०॥ वली चातके हेनाई आजगतमा जे प्रनातसमयें स्वचकांतिवान तथा अत्यंतपणे जगतने आनंद आपनारा अने स्वतासुंदरजे चेतनपदार्थ अने अचेतनपटार्थना नावदीवाहोय तेपदार्थोनो काल परिपाक थयाथी तेहिदिवसे शोनायेंकरी हीन जायठे अने नाशपामे ए दवापदार्थोने जोनारो एहवो महारं हतके० नष्टथय_ जे अंतःकरण ते संसार संबंधने मूकतुनथी ए कहेवी महोटी खेदनीवातठे ॥ ११ ॥ ॥ प्रथमनावनाष्टकं रामगिरिरागण गीयते ।। मूढ मुह्यसि मुधा ॥ मूढ मुह्यसि मुधा ॥धुवपदं ॥ विनव मनुचित्य हदि सपरिवारं ॥ कुशशिरसि नीरमिव गलद निलकंपितं ॥ विनय जानीदि जीवितमसारं ॥ मू॥ १ ॥ अर्थ ॥ हवेवलीविशेषे थनित्यनावना जावतोथको संसार- अनित्यपणुं देखाडे ने हेमूर्खशिष्य तुं परिवारसहित पोतानीसंपत्तिनुं चितनकरीने गुव्यर्थमोहपामे वायुयें हलाव्योथको कंपायमानथयीने गलीजनारो एहवो दर्जनाअयनागें रहेना रोजे पाणीनु विडयो तेनीपरें देविनय था तहारुंजीवितव्य असार एमजाण एरीतें विनयविजयजीउपाध्याय पोतेपोताने प्रतिबोधकरतो वीजानेपण उपदेशकरे॥१॥ पश्य नंगुरमिदं विषयसुखसोह्रदं पश्यतामेव नश्यति सदासं ॥ एतदनुदति संसाररूपं रयाज्वलङलढवालिकारुचिविलासामूणार अर्थ ॥ वलीमित्रतु जो के आविपयसुखते हणनंगुर जेमकोई हायतालीदेई ने हसतांहसतांज नाशीजायवे तेनीपरें विषयसुखपण जोतांजोतांज नहता एह वार्थाजायवे वली या संसारनु स्वरूपते वेगेकरीने जनारी एहवीजे वीजली तेना जचुकानी कांतीनु यनुकरण करे। एटले एसंसारनु स्वरुपते वीजलीनीपरें चंचल दंत दतयौवनं पुनमिव शौवनं ॥ कुटिलमति तदपि लघु दृष्टनष्टं ॥ तेन बत परवशापरवशा दतधियः॥ कटुकमिद किं न कलयंति कष्टम्॥मू॥३ -~~ अपने तेसर्व जाज सरिखोने तो एहवा पदार्थोपर हेमूर्खप्राणीतु शूरीजपाम! थर्थ ॥ जोपण त्रणेलोकना प्राणीयो जेने जीतवाने यत्यतयसमर्थ एहवीजे | | जरायवस्था तेणेकरीने जेपुरुपर्नु सारके सत्वपए जतुरघुठे एटले जराकरी थर्थ ॥ जयोके पाचयनुत्तर विमानना घणाज पुष्टकारीसुख तेनीपण मर्यादा एवी पीजीऽवस्तुठे जेससारमा वधारेस्थिरीनूतथसे एवातनोतु महोटोविचारकरप ते पणकालेंफरी मर्यादापुरीथयाथी विरामपामे तो पाच अनुत्तर विमान करता, यै सम कीमिता ये च नृशमीमिता यै सदाकृष्मदि प्रीतिवादातान्) |पणे थत्यंत स्तुतिकरता थने जेनीसाथे आपणेप्रीतीयेकरी बोलताहता तेहिना पीने लस्मनूत थरंगयला देखीने पण जोथमे निशक रहियें ये तो वतइतिख | मां स्थावर थने जगमपदार्थाना नावठे एमजावुथने जगतमा इव्यादिकनोजेस असदुन्मिप्य निमिपति सिधूमिववेतनाचेतना सर्वनावा ॥ इजा थर्य ॥ जेम समुश्ना कमोल वारवार उत्पन्नथयीने नाशपामे तेमज जगत। लोपमा स्वजनधनसगमास्तेपु रज्यति मूढस्वनावा ॥म॥1॥ १२७ शांतसुधारस अर्थ ॥ था एकमहोटी खेदनीवात के पुष्टतारुण्यपणुंते कुतरानी पुनडीसरिसे वाको अने जेहने जोतावारज तुरतनहीएवोजाय अर्थात् नाशपामीनायने र वा तारुण्यपणाने परवशाके पराधीनथयला हतधियके नष्टयुक्ष्यितजे पुरुषो । ते ससारमा परवशाके स्त्रीयो ते कष्टकारी कडवाफलनीयापनारीने एहवु जाए तानथी माटे बतइतिखेदे एपणएकमहोटु खेदनोज कारण ॥ ३ ॥ यदपि पिण्याकतामगमिदमुपगत ॥ नुवन यजरापीतसार॥ ततपि गतलज्जमुमतिमनो नांगिना वितथमतिकुथितमन्मयविकाराामू शरीरकोणगडे एहवु एशरीर उर्बल थयु होय तोपण निलकप्राणीयोनां मन निष्फल बुद्धिथी उत्पन्नथयला कामविकारने मूकतानथी ॥ ४ ॥ सुखमनुत्तरसुरावधि यदतिमेरकालतस्ताप कलयति विराम। तरदितरत्तदा वस्तु सासारिकास्थिरतरं नवति चिंतय निकाम ॥ जनान्वीदय वत नस्मयगतान्निविशका स्म इति धिक्प्रमादाम थर्थ ॥ जेनीसाथे थापणे हरहमेस रमता खेलता क्रीमाकरता तथा एवोजे थमारो प्रमाद तेप्रमादने विकारहोजो ॥ ६ ॥ o जेनीया

-
शांतसुधारस.
२४ए
कवलयन्नविरतं जंगमाजंगम जगददो नैव तृप्यति कृतांतः ॥ मुखग
तान् खादतस्तस्य करतलगतैर्न कथमुपलप्स्यतेऽस्मानिरंतः ॥ मात॥
यर्थ ॥ वली स्थावर अने जंगमात्मक जगतने निरंतर नदणकरनारो एहवोजेक
तांतके यमते तृप्तथातोनी एमहोटोधाश्चर्य तोमुखमां अाव्याप्राणीनो नदणक
रनारोजे कालतेनाजहाथमा रहेनारा अमेये ते अमारोमृत्यु केवीरीतेनथाय॥७॥
नित्यमेकं चिदानंदमयमात्मनोरूपमनिरूप्यसुखमनुनवेयं ।
प्रशमरसनवसुधापानविनयोत्सवो नवतु सततं सतामिद न
वेऽयं ॥ ए॥ इतिमहोपाध्यायश्रीकीर्ति विजयगणिशिष्योपा
ध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते शांतसुधारसगेयकाव्ये
अनित्यनावनाविनावनो नाम प्रथमः प्रकाश. ॥
अर्थ ॥ तेमाटे नित्य एकचिदानंदमय जे महारोधात्मा तेहनुं स्वरूपजोईने सु
खनो अनुनव ढुंकरीश इहां विनयविजयजी उपाध्यायकहे के आ मनुप्यनवमां
शांतिरसरूपजे नूतनअमृत तेहनेपानकरवानो उत्साह सत्पुरुपोने निरतरदोजो॥
इतिश्रीमन्महोपाध्याय श्रीकीर्तिविजयगणिशिप्योपाध्याय श्रीविनय विजयगणि
विरचिते शांतसुधारसेगेयकाव्ये अनित्यनावनाविनावनोनाम प्रथमःप्रकागः ॥
शार्दूलविक्रीमितं वृत्त॥ये पखंडमदीमदीनतरसा निर्जित्य वनाजिरे ये च
स्वर्गनुजो नुजोर्जितमदा मेर्मुदामेराः ॥ तेपि क्रूरकृतांतवकरदनैर्निर्द
ल्यमाना गदत्राणाः शरणाय दा दश दिशः प्रैहंत दीनानना ॥१॥
अर्थ ॥ हवेवीजी अगरणनावना नावेजे थासंसारमा मृत्युआवेथकेकोईने को
नु शरणनथी एमदेखाडेठे हात्तिखेदे जेपुरुप महोटापराक्रमेकरी बखमष्टथवी
जीति शोनानेपाम्या एहवा चक्रवर्ती तथा जेहर्षकरीपुष्टथयला अने जेहनी नु
जायोमा उत्कृष्टवल एटले स्वर्गनासुरखनोगवीने आनंदपाम्याने एहवा देवताओ
नेपण जेवारे क्रूरहदयवत जे यम तेपोताना मुखमालेई दांतोनावलात्कारेकरी न
कणकरे तेवारे तेथशरण थयाथका दीनमुखकरी कोईनुशरणलेवानेअथ दशे
दिशायें जुएठे तोपणतेने कालनाटांतमाथी मूकाववाने कोई समर्थनथाय ॥ १ ॥
स्वागतासत्तं ॥ तावदेव मदविभ्रममाली तावदेव गुणगौरवशा
ली॥ यावदहमकृतांतकटाहदितो विशरणो नरकीट ॥ ७॥

थर्थ ॥ फिरि सम्यक्दृष्टीजीवें विशेपेकरी श्रशरणनावनाने थावीरीते नाववीत /
| कहे जेपोताना स्वजनलोकडे तेघणुज हितनावाठक तथा प्रीतिनाराखनार श्या ।
दिकरीते घणाप्रकारे रुडा पणतेसर्व स्वार्थनिमिनेजावा ए तात्पर्यवे परतु हेम |
स्पुरुपो जेवारें जीव मरणथवस्था पामवाने तैयारथयो तेवारतेनु सरक्षण करना
र कोनिथी॥१॥ तेमाटेग्रथनाका श्रीविनय विजयजी उपाध्यायकहे। के हेीि।
नय तु श्रीजिनधर्मनु शरणकर यने पवित्र एहबुजे चारित्रतेनु स्मरणकर ॥२॥
ति यमो नरपतिमपि दीनं मैनिकश्व लघुमीन ॥ वि० ॥३॥
यस्वजित बजने धारणकरनारो एटलेकोईकालें खलनापामेनही एहवो महापरा
कमवत राजा तेनेपण जेरीतें मैनिकके० मानलानोमारनार जटदेने लघुमी
130
शांतसुधारम
थर्थ ॥ माटेजेनो रक्षणकरनार कोऽनथी एडयो एमनुष्यरूपीयो की जेकीहीन
हनेनिहांसुधि सहनकरवाने उर्जन एहवोजेकात तेणे पोताना कटाकण नाणून
थी तिहासुधी मदजे थहंकार तेनापिलामेकरी शोनेने श्रने तिहामुनीज गुणोना
गौरवपणु धारणकरे ॥२॥
शिखरिणीरत्न ॥ प्रतापापन्न गलितमथ तेजोनिरुटितर्गत
धैर्योद्योगै लथितमथ पुष्टेन वपुपाप्ररत्न तद्रव्यग्रहणविषय
वाधवजनेर्जने कीनाशेन प्रसनमुपनीत निजवश ॥ ३ ॥
थर्थ ॥ पण जेप्राणीने जेवार यमराजाय पोताने साधीनकन्यो तेवारे तेप्राणी
नो प्रतापपण नाशपाम्यो थने उदितथयजेतेज हतु तेपणगलागयु तया धैर्य व
ने उद्योग पण जतुरघु वली शरीरपुष्टहतो तेपण शिथिलगपुथनेतेपुरुपर्नु एक
करेलु व्य सेवाने थर्थ बाधवजन जे नाईयो प्रमुख दता ते प्रवर्तयया ॥३॥
दीतीयनावनाटक मारुपीरागण गीयते
स्वजनजनो बहुधा हितकाम प्रीतिरसैरनिराम।मरणदशावशमुपगत
वत रति कोपि नसत ॥२॥ विनय विधीयता रे श्रीजिनधर्म शरणा
अनुसधीयता रे शुचितरचरणस्मरण ॥ वि० ॥ ॥ ध्रुवपद ।।
तुरगरथेननरारतिकलित दधत बलमस्खलित ॥ दर
नके 20 न्हाना दीनमाठलाथोने पकडीलिये तेरीतें यम पकमालिये॥ ३॥

शांतसुधारस. १३२ प्रविशति वजमये यदि सदने तृणमथ घटयति वदने । तदपि न मुंचति दतसमवर्ती निदेयपौरुपनी ॥ वि०॥४॥ श्री|जो वजमय एटले वजनाज परमाणु बनावेला घरमांप्रवेशकरे अथवा मुखमा तृणपलाधारणकरे परंतु निर्दय अने पराकमेंकरी नाचनारो तथाजेदनी सर्वेनेवि समानघातकरवानीजत्तिठे एहवोजेयम ते तेनेपण मूकतोनयी ॥४॥ विद्यामंत्रमदौपधिसेवां सृजतु वशीकृतदेवां ॥ रसतु रसायनमुपचयकरणं तदपि न मुंचति मरणं॥ वि०॥५॥ अर्थ ॥ हेप्राणी जो देवतानुसाधनकरी पोतानेस्वाधीनकरो अथवा महोटीम होटी विद्यायो साधनकरो मंत्रसाधनकरो तथा महोटी औपधियोसाधी शरीरपु ही करवानेप्रर्थे धारोगो तोपण मरण मूकतुंनथी ॥ ५ ॥ वपुपि चिरं निरुणद्धि समीरं पतति जलधिपरतीरं ॥ शिर सि गिरेरधिरोति तरसा तदपि स जीयति जरसा॥विण॥ अर्थ ॥हेनव्यो जो समाधीचडावी शरीरने घणाकालसुधी वायुनोरोधकरो अथ वा समुझ्ने पहेलाकांते जईवेशो थथवा बलात्कारें पर्वतनाशिखरउपर चढीवेशो तोपण जरायवस्थाथी दीपथएँ ते कांबिंधथतुनथी ॥ ६ ॥ सृजतीमसितशिरोरुहललितं मनुजशिरोवलिपलितं ॥ को विदधानां घनमरसं प्रनवति रोइंजरसं ॥ विण ॥७॥ अर्थ ॥ कालाकेशेंकरीने घणोजसुंदर एहवो मनुष्यनो कालोमस्तक तेने सपेतप पानी करनारी तथा शरीरना मांसनोनाशकरनारी खोखरासरीखोकरी नशोनसने लूदी करीदेरखाडनारी पृथवीउपर मेघसमान शरीरतेने शुष्कफरीनारवनारी एहवीजरा यवस्था जेवारे प्राणीने भावो तेवारे तेनोरोधकरवाने कोण सहायनृतथसे घ र्थात् कोऽपण वृक्षावस्थानो रोधकरवाने समर्थनथाय ॥ ३ ॥ न्यत नग्ररुजा जनकायः कः स्यात्तत्र सदायः ॥ एकोऽ नुनवति विधुरुपरागं विनजति कोपि न नागं । वि० ॥७॥ श्रर्थ ॥ हेयात्मा जैवखते तागरीर उमगेगेकरी व्याप्तथाडो तेवन्वते तुजने कोणसहायधागे! यो जेमचंश्मा एकलोपोतेज राहुना ग्रहणनी पीरानोगवेने प चरन थनेता दीनमाप्तथायवे एरीतेससारमा विपत्तिरुप खाईनापाणीनी घमरमा जे शातसुधारस तेनुपानकर ॥ ए ॥ इति श्री गातसुधारसगेयकाव्ये अगरणलना लसल्लानानोनि कथमपि न शक्य शमयितु ॥ तस्तृप्याऽता पा तुदति मृगतृष्णेव विफला कथ स्वस्ये स्येय विविधनयनी मनोवाक्काये दा विकृतिरतिरोपात्तरजस ॥ विपनविते रिति प्रचुरतरकप्टकमहत ॥ सुखानासर्यावस्पृशति कथमप्यतिवि रति जरा तावत्काय कवलयति मृत्यो सहचरी ॥3॥ श्रतनथी थनेदावानल सरिखो अर्थात् वनयमीसरखो एहवोजेलोन तेनेकोपिलारी ते उदयनेपामनारोजे लोनरूप थनोनि के उदकते शातकरी शक्तोनथी पणउरा फोनने उत्पन्नकरेठे पलीहां ससारमा मृगतृमा जेवीरीतेविफल तेवारीतेऽपिानी ६. प्रेरणाकरेठे तेपणविफल तोएहवा अनेकप्रकारना नानाविधनकरी विहा "णा सनत दयने तोफरी तेफरतापण अधिक बीजीचिताथाची उत्पन्नथायवे वनीम माररुप यरस्यमा गीरीत स्वस्थपणे रहिश किये ॥ १ ॥धाससारमा एक 'तामटिजाजा सायानाच्यापारकरी शिकारथायवे तथापत्यतकोधना योगकरीना २३२ शांतसुधारस रतु नत्र अथवा ताराकोईपण तेना समाविनागलेतानथी तेम तुज़नेपण जेवा रोगादिक उ खप्राप्तथशे तेवारे ताहरोकोईपण सबंधी तेड समाविनागनेनारनपी।। शुरणमेकमनुसर चतुरगं परिद ममतासग ॥ विनय रचय शिव सौख्यनिधान शातसुधारसपान ॥विण ॥॥ इति श्रीशातिसुधार स गेयकाव्ये अशरणनावनाविनावनो नाम वितीय प्रकाश । अर्थ ॥ माटे दान शील तपने नाव एचार श्रग जेहनाडे एहवाएक धर्मनु तु शरणकर अने ममत्वनो सग परिहर हेविनय तु शिवसुखनो निधान हर बना विनावनोनाम वित्तीय प्रकाश ॥ शिखरिणीदत्तत्रय ॥ तो लोन होन जनयति उरतो दववो मे नववने ॥१॥ गलत्येका चिंता नवति पतयालो प्रतिपद न जतो. ससारे नवति कथमप्यतिविरति ॥ ॥२॥ सहित्वा सतापानशुचिजननीकुद्धिकुहरे ततो जन्म प्राप्य पुनरन्या तनधिका . .

- शांतसुधारस. १३३ ले पडनारा प्राणीयोने कोचारेडरवनो अंतधावतोनथी ॥२॥ वली पहे पवित्रमाताना उटरनेवि नानाप्रकारना उदरसंबंधी संतापोने सहनकर नीपरंपरायेंकरी तामनतर्जनायेयुक्तथको रहेने अने जन्मपाम्याप जेटलामां म करवानेश्रर्थ कोऽपणपोताने थतीपीमायो दूरकरेते परतु एटलामांतो मृ हचारिणी एहवीजे जराघवस्था ते यावीने प्राणीनादेहनो ग्रासकरेने ते तारमा सुरवतेसुंचे अर्थात् काजनथी ॥ ३ ॥ जातिवृत्तं ॥ विभ्रांतचित्तो बत बंभ्रमीति पतीव रुचस्तनु रंगी ॥ नुन्नो नियत्याऽतनुकर्मतंतुसंदानितः सन्निहितां तुः ॥ ४ ॥ अनुष्टुव्वृत्तं ॥ अनंतान् पुलावर्ताननंतानं पनृत् ।। अनंतशो भ्रमत्येव जीवोऽनादिनवार्णवे ॥५॥ ॥ प्रारब्धं प्रेरणाकरेलो महोटाकर्मरुप तंतुयेंकरी बांधेलो कालरूप विना : वेलो एहवोप्राणी वतऽतिखेदे शरीररुप पिंजरामां पदोनीपरें रुध्योथ वंत चित्तेकरीफिरे ॥४॥ एरीतंयनंतानंत शरीरोनोधारणकरनारो एजी पार धनादिकालनो संसारसमुश्मा अनंता पुशलपरावर्नरूप पाणीनी व्र तिघ्रमण करतोयको फिरे ॥ ५॥ तीयनावनाष्टकं केदारारागण गीयते शांतसुधारसकुंमेमां एदेशी ।। कलय संसारमतिदारुणं जन्ममरणादिनयनीत रे ॥ मो हरिपुणेद सगलयाँ प्रतिपदं विपदमुपनीत रे॥कण॥१॥ ॥ वलीविशेषप्रकारे संसारनावनानावतो संसारनीबीकदेखाडे मोहरूप नोयोदेऽने पकडयंठे तेणेकरी पगले पगले विपत्तीनेपामेला अरेजीव था जन्ममरणाटिकना नयेंकरी अत्यंतनयंकरने एवं तुं जाण ॥ १ ॥ चजनतनयादिपरिचयगुणैरिद मुधा वध्यसे मूढरे ॥ प्रति दिं नवनवै रनुनवैः परिनवे रसकृउपगूढ रे ॥ क॥॥ । हेमूर्खयात्मातुं स्वजन बने पुत्र इत्यादिकोनां परिचयगुणेकरीने गुंया व्यर्थबंधायठे वली पगलेपगले नवानवा धनुनवेकरी यने नवानवा परा पारंवारतुं यालिगितठो एटले युक्तो ॥ २ ॥ में जपणाकानमा थनारायनं माननगर माहनाफानीमायायन सननननन्यप्रत मनापगमाहापामागना मा मनथप्न यप यानाा नमानापानमन नगामार कान/नननादायमा हो श्रने कामशाना तारग्यश्राम्याना मर नमनथायने वनीकारका ननरनिराठामि नन ॥ मानवटका समय र FM गातसुधारस घटयमि कचन मदमुन्नने चिढही दीननादीन रे ॥ प्र निनव रूपमपरापर वहमि बन कर्मणाधीन रे ।।० ॥३॥ थर्थ ॥ हेयान्मातु किदामना गननवमीप्रमुग मपनीनामदने धारण वलीकिहाफना दीननापामी गानीमारीय जनतापणाने धारणकोने वायाश्रर्य हजीवतु माधीनया जन्मजन्मप्रन अपग्यप नगनवाज पर गेले कोजवनीया कानागना माननियच कानानाकी पनीएकनवमापत्र रानारपाणुप्रमुग्य अनकाप पारणकरना या महाटा ग्वदनाहतुने ॥ ३ ॥ जातु शगवदगापरवशो ॥ जान तामण्यमदमन रे ।। जातु जयजगजनेरी ।। जान पितृपतिकरायनर ॥ ॥ ४ ॥ श्रर्थ ॥ अग्नीपतु एजनामापाण मानवाना बानमयाम्याने श्राधीन पुनय नग याम्याय का पानयाय UTETar यमग गाना दायमा सन राजायन ही व्यवस्थाधान पामन ।। ४ ।। बजनि नन नोपि नन जनकता ॥ ननरता ब्रजनि पुनरंपरे ॥ नाव यन वित्रिमिति नगन । म्यजनमा ननवगुनगप गाकणा! মুখ । গামা স্যানমালা Fলানা *ন নাথ नाम' शापन ग पारन ही ममा पुपानी गनियान। कनीनाऽन मनु । पर ममा उना यशपायान हा तु थाममाग्न माप ।। " यत्र मानिगरदनचरनदिन दह्यमं जीप गाहन त्रा रचमिवर मालमटिंगमदतीव ॥ ॥ ६ ॥ স্বৰ। কাৰমান্না নগ্ধা অনিৰবিনা মন সহ তার दवा न ममप ममपना ॥ मनानन्य समय । पोवीनवीय तम ननिय भानगतमा माना पाया बहार' 7 a Aminer शातसुधारस. २३५ तुजने कांकसुख ऐश्वर्यादिक देखाडीने अकस्मात् तेसुरखने जाणेनजहता तेवा करीनाखेडे एम ठोकराने उगवानी रीतें कालरूपबटुक लोकोने उगेठे ॥ ७ ॥ सकल संसारनयनेटकं ॥ जिनवचो मनसि निवधान रे॥ विनय परिण मय निःश्रेयसं ॥विदितशमरससुधापान रे ॥७॥ प्रति श्री शांतसुधारस गेयकाव्ये संसारभावना विनावनो नाम तृतीयः प्रकाशः ॥ थर्थ ॥ तेमाटे श्ररेविनयतुं शांतिसुधारसपानकरी समस्तसंसारिकनयना नागकरनार एदवा जिन श्री वीतरागनावचनने मनमांधारणकर अने मोदपाम एरोते विनयविजयजीउपाध्याय पोतेजपोताना यात्मानेसीखामण यापते ॥ इतिश्रीशांतसुधारसगेयकाव्ये संसारनावना विनावनोनाम तृतीयःप्रकाशः ॥ ३ ॥ स्वागताटत्ताएक एव नगवानयमात्मा ज्ञानदर्शनतरंगसरंगः ॥ सर्वमन्यउपकल्पितमेतत् व्याकुलीकरणमेव ममत्वम् ॥ ॥ प्रथा हवेचोथी एकत्वनावना नावे एकजनगवानतेयाधात्मा धने शानदर्श न तथा चारित्ररुप तरंगेकरीने सरगके विलासोते पणतेयात्मासिवाय वीजाजे कोई कल्पितपुजनाटिकने तेसर्व ममतास्पदमांज व्याकुनकरनाराठे ॥ १ ॥ प्रबोधतावृत्तत्रय।अबुधैः परजावलालसालसदकानदशा वशात्मनिः॥ परवस्तुपु दा स्वकीयता विपयावशवशाद्धि कल्प्यते ॥ ॥ कृतिनां दयितेति चितनं परदारेषु यथा विपतये।विविधानियावढं तथा परनावेपु ममत्वनावन।। ॥अधुना परनावसंरति दर चेतः परितोवगुंनि क्षण मात्मविचारचंदनद्रुमवातोमिरमाः स्पृशंतु मां ॥ ४ ॥ वर्ष ॥ परवन्तुउपर रहतीपत्नश्माना योगेको उपनी अज्ञानयवस्थानी थाधीनता ते जनाधंतःकरणमा व्यापीठे एवामृन्याने जे परकीयवस्नुउपर की यपणुफ पेने तेमात्र गट रुप रसादित विषयांना यावशंकरीजकल्प्योजायएए क महोई खेदकारण ॥ २ ॥ पुण्यवानपुर पन्तीने पोतानीनोकरी निवनक ग्वं तेजनविपनीने कारतापने तेमज परकीयवलुटपर जममन्दरा, नेपण नानाप्रकाग्नीपीना, यने अनेकवाग्ना नपर्नु सापयायवे ॥ ३ ॥ माया ---------- माम पारनंती पापने गहती समारी पुम्पोनी गतिथोनी फजेतीजोड्ने मन नेने रोगरता तारुण्यथास्थाना मदेकरी उन्मत्तथायवे चलीकाईकया। यन चिरतिमिनि नगते ।।म्त्यजतमा नृनवशुनशेप किया। वयारमा यागसारमा कोनियमांतो दीकरोते यापथायले परीक्षा यका याममारमा सुप तया यारतिजेचिता थने गगरपान नियनयानेगन नापणमोटाप मदिगना मदेरी नन्मनयनतम मयटामायने मान मिगदे मोदनाफदेज जीवधु पीयायत्री दापन विमपि मुखरना ।। महानदय मदमत्र रे॥त्रि नति शिवामिनन ॥रालस्टको ऽयमपरेका मानमानाने उगमगार काययोजनाहायर्मा १३४ शातसुधारस. घटयसि वचन मदमुन्नते क्वचिदहो दीनतादीन रे ॥ त्र तिनव रूपमपरापर वदसि बत कर्मणाधीन रे॥20॥३॥ अर्थ ॥ हेयात्मातु किदाकतो राजलक्ष्मीप्रमुख सपत्तीनामदने धारणको वीक्दिांकतो हीनतापामी राजेवो नीखारीथई दीनतापणाने धारणको १ चायापर्य हेजीतु कर्माधीनथको जन्मजन्मप्रते थपरथपरके० नवानवाजमा ने बोनवेनीग्यारो कोनवेराजा कोनवेतिर्यच कोनयेनारकी वलीएकनवर्मापन राजारकपणवमुप थनेफरुपधारणकरे एकेहेवो महोटो खेदनोहेतुने ॥३॥ जातुशगवदगापरवशो ॥ जातु तारुण्यमदमत्त रे॥ जातु उभयजराजरो ॥ जातु पितृपतिकरायत्तरे ॥क॥ ४ ॥ गई। अजोरतु एकजनामापण कोकवारतो बालकथवस्थाने श्राधीन निय जग यायायें को सस्तथापने अनेकोकवारें यमराजाना साथमा तर रानापनेनीयास्यायाने पामे ॥ ५ ॥ नजनि तनयोपिनन जनता ॥ तनयता व्रजति पुनरेपरे ॥ नाव wa Tना परवाने पदयों तु याससाग्ने मूकीयाप ॥ ५॥ पत्र मातिगदपलबग्नदिन दद्यमे जीप रे॥ दत नर रचमि निर मांदमंदिगमददीव रे ॥ कण॥६॥ . मार गरें मजद याजगता कानरूपीया बार - शातसुधारस. २३५ नुजने कांकसुख ऐश्वर्यादिक देखाडीने अकस्मात् तेलुखने जारोनलहता तेवा करीनाखेडे एम बोकराने वगवानी रीतें कालरूपवटुक लोकोने उगेठे ॥ ७ ॥ सकल संसारनयन्नेदकं ॥ जिनवचो मनसि निवधान रे॥ विनय परिण मय निःश्रेयसं ॥ विदितशमरससुधापान रे॥७॥ इति श्री गांतसुधारस गेयकाव्ये संसारनावना विनावनो नाम तृतीयः प्रकाशः॥ श्रर्थ ॥ तेमाटे अरेविनयतुं शांतिसुधारसपानकरी समस्ततंसारिकनयना नागकरनार एहवा जिन श्री वीतरागनावचनने मनमांधारणकर अने मोक्षपाम एरोते विनयविजयजीउपाध्याय पोतेजपोताना आत्मानेसीखामण थापेठे ॥ इतिश्रीगातसुधारसगेयकाव्ये संसारनावना विनावनोनाम तृतीयःप्रकाशः ॥३॥ स्वागताटत्तीएक एव नगवानयमात्मा ज्ञानदर्शनतरंगसरंगः ॥ सर्वमन्यउपकल्पितमेतत् व्याकुलीकरणमेव ममत्वम् ॥१॥ अर्थ। हवेचोथी एकत्वनावना नावे एकज लगवानते यायात्माचे अने शानदर्श न तथा चारित्ररुप तरंगेकरीने सरगके विलासोठे पणते यात्मासिवाय वीजाजे कार्ड कल्पितपुजनादिकडे तेसर्व ममतास्पदमांज व्याकुलकरनाराठे ॥ १ ॥ प्रबोधतावृत्तत्रयाअबुधैः परनावलालसालसदकानदशा वशात्मनि ॥ परवस्तुयु दा स्वकीयता विषयावेशवशाद्धि कल्प्यते ॥ २॥ कृतिनां दयितेति चितनं परदारेपु यथा विपत्तया।विविधार्तिनयावढं तथा परनावेपु ममत्वनावन।। ॥अधुना परनावमंतिं दर चेतः परितावगुंनि। कण मात्मविचारचंदनद्रुमवातोमिरमाः स्पृशंतु मा ।। ४ ।। वर्थ ॥ परचम्नुउपर रहेज़ीयत्यंतधाना योगे उपनीने यज्ञानयवस्थानी घाधीनता ते जेना धंत करणमां व्यापीठे एहवामृवोंने जे परकीयवस्तुउपर म्दको पपागुंकरपे तेमात्र शाद रूप रसादिकविषयांना यावडीकरीजम्योजायते ए ए क महो, वरनुकारण ॥ २॥ पुण्यवानपुर परवीन पोतानीन्बीररी नियनक ग्वं तेजेमविपत्नीने झाररापापने तमज परकीयवस्तुउपर से ममन्वाई नेपण नानाप्रकारनीपीमार्नु यने अनेक काग्ना नपढें कामयाय ॥३॥ माटेरेया .

जीव तेपणपुजज तथा नवविधपरिग्रह तेपणपुजलवे एहनापुलना समुदायान र व्यर्थ ममता रूप ताप धारण करीने सताप सहन करेठे ॥ ६ ॥ त्यज सयोग नियतवियोग ॥ कुरु निर्मलमवधान ॥ नदिविद धान कथमपितृप्यसि।मृगतृष्णाघनरसपानं ॥विणाा नज जिनपतिमसहायसहाय ॥ शिवगतिसुगमोपाय ॥ पिब गद शमन परिहतवमन ॥शातसुधारसमनपाय ॥ वि०॥ ॥ इण्शातसुधारसगेय काव्ये अन्यत्वनावनाविनावनो नाम पचम प्रकाश थर्थ ॥ माटेनिश्चयेकरी जेहनो वियोगथवानो एहवापुजादिकसाथे जे तेंत योगकसुळे तेनोत्यागकर अनेनिर्मल एडवोजेपोतानो शुधात्मनावतेनेविपे यवान के० सस्यथ एकाग्रपणेलक्षाख केमकेकोऽपणप्राणी मृगतृलारूप जसनुपानः रीने कदापिका तृप्तथवानोनथी तेमतुपण परवस्तुउपर ममत्वराखी कामाने थात्मरतिमा तृप्तिपामनारनथी ॥ ७ ॥ माटेरेयात्मा तु असहायने सहापनाकर नार एटलेशरणने शरणनूत एहवातीर्थकरदेव तेनुसेवनकर यनेनिरदोप मोद गतिमांजवान जे सुगमोपाय अथवा जेमाची परिकतके नाशपाम्पु वमनके मोदनासुखनो वमवापणु वली गदशमनके ससाररूप रोगनो समावनार एहवो जे शांतनामा सुधारसके अमृतरस तेनो पिवके पानकर ॥ ॥ इतिश्रीशांत पारसगेयकाव्ये धन्यत्वनावनाविनावनो नाम पचम प्रकाश शार्दूलविक्रीडित वृत्त ॥ सचिशे मदिराघट परिगलतल्लेश सगाशुचि शुच्या मृद्यमृदा बदि स वदुशो धौतोपि गगो दकै ॥ नाधत्ते शुचिता यथा तनुनृता कायो निकायो महावी नत्सास्थिपुरीपमूत्ररजसा नाय तथा शुक्ष्यति ॥ १ ॥ थर्थ ॥ हवेही श्रचि नावना नावे जेम मदिरा गालवानुयत्र जारीनीमाफ क निकरी सहितयायवे तेविनोमाथी मदिरागलावेने तेथी विमा मदिराना कणियानु श्रशरहोजायचे तेलेशमात्र पण मदिरानासकरीने अपवित्रथयजू एहवोजे मदिराना नाजननो लिए तेनेपवित्रकरयाने अर्थ बाहिरथी माटीसाथे गसी ने पडे गगानदीना पाणीकरी घणावखत धोधोने साफकरवामाझिये तोपणते मदिरागालवाना निशे कोश्यारें पवित्र थायनही तेमज मनुष्यनो थत्यत बीनरस शांतसुधारस. १४१ उगठाकरवायोग्य हाम रक्त मल मूत्रनोस्थानकरूप शरीर तेने माटीवेंगसवाथी अथवा गंगाटिकनापाणीये नवराव्याथी पणपूर्वोक्त दृष्टांतेकोऽवारें शुक्ष्यातुनथी? मंदाक्रांतारत्तास्नायं स्नायं पुनरपि पुनः स्नांति शुशानिरनि वा रं वारं बत मलतनुं चंदनैरर्चयंते॥ मूढात्मानो वय मपमलाः प्री तिमित्याश्रयंते नो शुद्यते कयमवकरः शक्यते शोधुमेवं ॥ ५ ॥ अर्थ ॥ माटेजगतमा जेनुंअंतःकरण मूढथ{ एहवालोक स्नानकरीने वा रंवार शरीरशुद्धि करवाने फरिपण स्नानकरे तथा वारंवार मलनास्थानकरू प शरीरने चटनेकरीचर्चेचे अने अनिर्मलथया एकुंकहीने प्रीतिकरेठे पण एम न थी जाणताजे एशरीर तो किवारेपण गुस्थातुंनथी केमके खात्रनुं तकरडो तेको इरीते गु६ थायकेसुं अर्थात्नजथाय ॥ २ ॥ शार्दूलविक्रीडितं उत्तं ॥ कर्पूरादिनिरचितोपि लशुनो नो गाह्ते सौरनं नाजन्मोपकृतोपि दंत पिशुनः सौजन्यमा लंबते॥देदोप्येप तथा जहाति न नृणां स्वाभाविकी विस्त्र तां नान्यक्तोपि विनूपितोपि वढुधा पुष्टोपि विश्वस्यते॥३॥ अर्थ ।। जेमलसणमां कर्पूरादिकपदार्थोनो नेलकरयो तोपण लसणकाइ सुगंधी वंत थायनही तथा जन्मपर्यत उपकारकयोहोय तोपण उर्जनपुरुप कांड सौजन्यता ने धारणकरतोनथी तो हंतइतिखेटे थामनुप्यनुशरीर तेपण स्वनावसिह उर्गधने मूकतुंनथी आशरीरने विविधप्रकारनासुगंधीतेलेंकरीमसत्यो भनेवस्त्रालंकारेकरी नूपितकखो तथा खवरावी पीवरावीने अत्यंतपुष्टकखो तोपण विश्वासनोपात्र था यनही एटले एशरीर हवेसाययं एहवोविश्वास कदापित्रावेनही ॥३॥ पेंश्ववारत्तं ॥ यदीयसंसर्गमवाप्य सद्यो नवेच्चुचीनामशुचित्वमु चैः॥अमेध्ययोनेर्ववपुपोस्य शौचसंकल्पमोदोयमदो महीयान्॥४॥ अर्थ ॥ शरीरनोसंबंधपामिने पवित्रपटाोंने पण अपवित्रतापणुं थावे केम के थाशरीरने उत्तमजातिना चंदनादिके मर्दनकरो तो तेचदनादिक थोडीजवारमा पोतानुं सुमंधतापणुंमूकीने उधतानेधारणकरेचे तेमज उत्तमप्रकारनानोजन खव राव्याथी तेपण तुरत नरगमय थयीजाय एवो था अपवित्रवस्तुने उत्पत्तिनुकार ए जेशरीर तेनेपवित्रपणुं करवाना संकल्पनो मोहराखq एमहोटोआश्चर्यकारीनेध सर्प । मुदानावनमा मग्ममुपनारपीने मुसमवपीवायु अनुनारयानेयय रिननगर दरा तहागमपनीमगीन रेटनोरमतरदमे ॥३॥ शरीरमांगन मग दिवसाना सिदित यमरनिगपनी रहेनागे जे तादरामुपना वा स्वागतासत्ताऽत्यवेत्य शुचिवाटमतथ्यं पथ्यमेव जगदेकपवित्र ॥ शोधनं सकलदोपमलाना धर्ममेव हृदये निदधीथा ॥ ५ ॥ थर्थ ॥ एरीते शरीरने पवित्रकरवानोवाद वोटोजागीने जगतमा एकपवित्र पय्य तो समस्तदोपरूपमदानो शोधक एहवोजेधर्म तेहनेकदयमावरो॥ ५॥ ॥ पटनावनाटक यासावरीरागेण गीयते कागारेतनुचुनिचुनिजावे एदेगी ॥ नावय रे वपुरिदमतिमलिन विनय विवोधय मानसनलिना पावनमनुचितय विनुमेकापरममहोमयमुदितविवेकानाणा॥ दम्पतिरेतोरुधिरविवर्ते कि शुनमिद मलकमलगत् ।। नृशम पिपिदित स्रवति विरूप को बदमनतेऽवस्करकूप॥ना॥३॥ यर्थ ॥ दाग्नियविजयजी उपाध्याय पोतेपोताने उपदेशकरतो याचिपर्ण भाग्ने देविनय याशरीरनेतु घणुजमलीनजाणीने पोतामनरूपकमन प्रफुल्लित पर बीजे परमतेजस्ता अनेजेनाथको उत्तमविचार उत्पन्नथाय एहयो एकपवित्र परमारमानु पितानकर ॥ १ ॥ स्त्रीनोरक्त धने पुरुपनी रेत तेनापरिणाम सम्पपी उपनयपु एल्यु मजमयजे कश्मनके चीखलतेनी गर्ताकेछ सार रूप या गरीर मासुमारने जोथाशरीरने थत्यतटाकीराख्यु तोपणतेमाथी विरूपा णे मानोऽर्गरज सोने तोएपाकचराना कपाने कोणरुडोकरी माननारठे थयान पांशण पररडारूप कचगारी नरेला कूपाने नजुमानसेनही ॥ २ ॥ नजति मय शुचि ताल कित मखमारुतमनुकूल ॥तिष्ठ नि मुनि फियत कालामुसमसुगधि जुगुप्सितलाल ना ॥३॥अमरनिगमरहीतरचारआवरितु गक्यो न विकारी। वपुर पनित्रमिवारपारा॥हमति बुवम्तव गोचाचार |नाDUN मापने पानु निदागायोग्य यनेवणी गायोग्यवे लाउजेनी पनी या पुतने हारनावाने दुममययोनही तोताहगगने सगीपदायाना नेपो दर नेहनों मुगनिने एतापविमानहाने us शांतसुधारस. २४३ घादश नव रंध्राणि निकामं ॥ गलदशुचीनि न यांति विराम यत्र वपुपि तत्कलयसि पूतामन्ये तव नूतनमाकूताना॥ अशितमुपस्करसंस्कृतमन्नं जगति जुगुप्सां जनयति हन्न।' सवनं धेनवमपि लीदं नवति विदितमति जनमोढाना॥ अर्थ ॥ अतिशयेकरी जेमाथी रात्रदिवस अपवित्रवस्तुवे पणकोऽवारें विरा मपामतिनयी एदवास्त्रीना बारविश् अने पुरुपनानवविज्ञ तेविडेकरीसहित एहवा शरीरने तुंपवित्रपणेजाणेठे माटेए ताहरोकोऽ नवोज याचारजणायते ॥ ५ ॥ ना नाप्रकारे वगारप्रमुखना संस्कारेकरी संस्कृतकरेनुं पचावेj एहजे अन्न तेपण या शरीरमा आरोग्याथकी हनके० विष्टारूपयजायते तेणेकरी जगतमां जुगुप्सा के गहाउत्पन्नकरेठे वली श्राशरीरने वीर्यनीधिकरनारुं गायनुंध प्राशनक रीने फरीतेपुरुपें मूत्रितकखोयको तेपणथत्यंत निंदाकरवायोग्य थपडेठे ॥ ६ ॥ केवलमलमयपुजलनिचये अशुचीकृतशुचिनोजनसिचये ॥वपु पि विचिंतय परमिदसारं शिवसाधनसामर्थ्यमुदारं॥ ना॥ ॥ येन विराजितमिदमतिपुण्यं तच्चिंतय चेतननैपुण्याविशदागमम धिगम्य निपानं विरचय शांतसुधारसपानं नाणातइतिश्री शांतसुधारसगेयकाव्ये अशौचनावनाविनावनोनाम पष्ठः प्रकाशः अर्थ ॥ माटे केवलम्लरुप पुगजनोसमूह अने पवित्रनोजनने अपवित्रपणु था पनार एहवाशरीरमा मात्रएक मोदसाधन करवानुंजे सामर्थ्यठे एहिजमहोटो सार नूतजाण ॥ ७ ॥ मोदसाधनेकरी नूपितकखोयको ए शरीरपवित्रयायते तेचेतना नीज चातुर्यताजाणवी पणजेमां निर्मलसि-क्षांतरुप जलमिलेठे एडवो जलस्थान कजोड्ने शांतसुधारसनोपानकर ॥ ७ ॥ इतिश्री शातसुधारसगेयकाव्ये अगुचिना वनाविनावनोनाम पष्टः प्रकाशः नुजंगप्रयातं वृत्तीयथा सर्वतो निरै रापतनिःप्रपूर्यंत सद्यः पयोनिस्त टाकातयेवावेंः कर्मनिःसंनृतोंगीनवेयाकुलश्चंचलः पंकिलश्च ॥१॥ अर्थ ।। हवेसातमी पाश्रवनावना नावे जेम सर्ववाजुथी पमता पाणीना निजरणायेंकरी तत्कालतलाव नराइजायठे पठे पाणीनातरगेकरी चंचलथायठे ते

॥ पुरापरतपुरुपोष १ मिय्यात्व २ थनति ३ कषाय ४ योग एचारनाम
रयोनावृत्त।ज्यिावतकपाययोगजा पच पच चतुरन्वितास्त्र
या। परिशियो तया प्राणातिपातादिक पाचथत थने कोगादिक पाक
नाना इमाश्रयाणामधिगम्य तल निश्चित्य सत्व शुनिसनिग/
या निशानाप शाषन टनाप तेजेनायकी रोिगपुरे एहवा यापार
२४४
शांतसुधारस.
मज कादयवधेचे इत्यादिके व्याकुलथाय तेम थाश्रवेकरीयुक्तप्राणी कर्मरूपपासी
थो नरप्रय व्याकुल यने चचलयको पापरूपकादवे सहितथायवे ॥ १॥
शार्दूलविक्रीडित वृत्त ॥ यावकिचिदिवानुनूय तरसा कह
निर्जीयते तावचाश्रवशत्रवोऽनुसमय सिचति नूयोपि तत् ॥
दा काट कयमाश्रवप्रतिनटा शक्या निरोङ्गु मया ससा
रादतिनीपणान्मम दहा मुक्ति कथं नाविनी ॥२॥
श्रयं ॥ ते जेटलामा थनुनवलेने बलात्कारेकरी महारा अत्मामाथी कांश
मने
इ गुप्ककरुनु तेटलामावली थाश्रवरूपशत्रु समयसमयप्रते कर्मोने फरी ही
घनाने माटे हाइतिग्वेदे मने एव कवणलागेठे के तुं याश्रवरूपशत्रुने केवीरने
जीतिशा अने एरीततो श्रत्यतनपफर ससारथका महारौटको पण सीरीतेचसे।"
प्रहर्पणीवृत्त मिथ्यावाविरतिकपाययोगसझाश्चत्वार
मुरतिनिराश्रवा प्रदिष्टा ॥ कर्माणि प्रतिसमय
स्फुटरमीनिधतो भ्रमवशतो भ्रमति जीवा ॥३॥
माग जीगे ते घमेरी चारगतिरुप ससारमानमेठे ॥ ३ ॥
प ॥ पचविगनिरमक्रिया इति नेत्रवेटपरिसख्यया ऽप्यमीnel
मी यायर बनानीम प्रसारनुते ॥ ४ ॥
व दवु यासानु तवजाणीने निययकी शाखसन्निपानपणु
नो निगरमा रिष देवान्मार्नु नुन्त पनार ॥ ५ ॥

शांतसुधारस. १४ सतमनावनाष्टकं धनाश्रीरागेण गीयते ॥ जोलीमारेहंसारे विपयनराचियें एदेशी। परिदरणीया रे सुकृतिनिराश्रवा हदि शमतामवधायाप्रनवं त्येत रे नृशमुच्चूंखला विनुगुणविनववधाय ॥ परि० ॥ १ ॥ कुगुरुनियुक्ता रे कुमतिपरिष्ठुनाः ॥ शिवपुरपथमपहाय प्रयतेऽमीरे क्रियया उटया प्रत्युत शिवविरदाय। परिणाशा अर्थ ॥ सुरुतवतपुरु हृदयमा समताधारणकरी धाश्रवनोपरिहारकरवो थरे जीव था लोखटना शांकलनीपरें वांधारावनारो जे पाव ते विलुजे परमात्मा तेनागुणरूप ऐश्वर्यतानो नाशकरवाने समर्थथायठे ॥ १ ॥ कुगुरुयेंकरेलीप्रेरणा थने कुमतियेकरी युक्तथयला हेडटजीव तुं कायिकादिक उष्टक्रियाउँमा प्रवर्तवे करीमोदपुरीये जवानो मार्गमूकीने उलटोमोदमार्गनो नाशकरवानुज यत्नकरेगाशा अविरतचित्ता रे विषयवशीकृता विपदंते विततानि ॥ श्द परलोकेरे कर्मविपाकजान्यविरलरवशतानि॥ परि॥३॥ करिकपमधुपा रे शलनमृगाढयो विपयविनोदरसेन ॥ दंत लनंते रे विविधा वेदना वत परिणतिविरसेन । परि॥४॥ थर्थ ।। जेनाचित्तमां वैगम्यनथी एहवा विषयने पराधीनथयताप्राणी इहलोके तथा परलोकेपण निरंतरपणे कर्मनापरिणामोथी उत्पन्नथयला शैकमाउ.खोजें सहनकरेठे ।। ३ ॥ हस्ति मत्म्य व्रमर पतंग अने मृग एवा पांचजातना प्राणीयो अनुक्रमेंस्पर्श रन गंध रूप शब्द ए एकेकाविपयना विनोटरसेकरी नानाप्रकारनी वेदनायोने एविषयोना परिणाम जे विरस एटले मावारस तेणेकरीपामेठे ए महो टुंग्वेदन कारण ॥ ४ ॥ गदितकपाया रे विषयवशीकृता यांति महानरकेपु परिव तते रे नियतमनंतशो जन्मजरामरकेपु ॥ परिण ॥ ५ ॥ मनसा वाचा रे वपुपा चंचला उर्जयजरितनरेण ॥ उपलि प्यंतेरे तत आश्रवजये यततां कृतमपरेण ॥परिण ॥६॥ अर्थ ॥ जेने कोधादिक कपाय उदयमांधाव्या तेप्राणीयो पांचइंडियोना विषयोने स्वाधीनथयला तेणेकरी महोटा नरकमां जायते अने अनंतिवार जन्म जरामरणकरे ॥ यावेंकरी चंचल थयता प्राणी मन वचन अने कायाना | पोते पोतानेर देने के घरेविनय थावाप्रकारेकरी थाश्रवसहित जेपाप तनोति गंधारा उपर युधिरावी यारवार शांतिसुधारसनो पानकरीफरीने थानदपामा गाथ्यानमार्तमय रोऽमजस्त्र चेतसः स्थिरतया च निरुप्या ॥ निशपदी याश्रानागेप पोहोय ते ते उपाय ताहरी यतरदृष्टियेंजोद तेनति/ यातमी मरग्नापनानाने थरेपिनय थाजगतमा जे जे धपायेंगे पिन नमामीने तेनेघोसारका ॥१॥ एटले सयमेफरीने विषयमपर बगा! रिपालन पोकगने वान तथा राइए ये ध्याननु निरतर रुपनकर ॥ शालिनीटन ॥ भोरदात्या मार्दवेनानिमान ढन्या मायामार्जवनी/ संजनान्जीन वागगशिरा निम्ध्या मतापेण प्राशुना सेतुने! संगमगाट ने दनाप वनीममुजेरो पुष्कर जेलान तेहना को या मागायनों जयका माविकरीयानिमाननो जयकर माना १४६ शांतसुधारस योगें उर्जय एहबुजेपाप तेणेकरी युक्तथायडे माटे चतुरपुरुपे श्रावने जीता प्रयनकरवु श्रने नवा कर्म बांधवानही ॥ ६ ॥ शुभायोगा रे यदपि यतात्मना स्रवते शुनकर्माणि ॥ काचन निगडास्तान्यपि जानीयात् दतनितिशर्माणि ॥ परि० ॥७॥ मोदस्वैव रे साश्रवपाप्मना रोधे धियमाधाय ॥शातसुधारसपा नमनारत विनय विधाय विधाय ॥ ॥ इतिश्री शातसुधा रस गेयकाव्ये पाश्रवनावनाविनावनोनाम सप्तम प्रकाश थर्य । जेरोपोतानु मनस्वाधीनकयु तेनाराक्ष्योगजेने ते शुक्ष्योग जोपस एनकानेन सवेने एटले धनकर्मोनीज प्राप्तिकरावे. परतु कर्मोपण मोशनल ना नावाने गोनानीबेडीसरखा जाणवा माटे विनयविजयजी उपाचार निप्रीतिसुधारस गेयकाव्ये याप्रवनावनाविनावनो नाम सप्तम प्रकाश स्यागतासनत्यं ॥ येन येन य इटावरोध सलवेनियतमा पपिकेन॥ आश्यिस्व विनयोद्यततास्तत्तदांतरदशा परिना य्य ॥१॥ सयमेन विपयाविरतले दर्शनेन वितथानिनिये मन मरना गंगा ॥३॥ ० शांतसुधारस. २४७ स्वागतादृत्त। गुप्तिनिस्तिसृनिरेवमजय्यान् त्रीन् विजित्य तरसाऽधमयो गान् ॥ साधुसंवरपथे प्रयतेथा लप्स्यसे दितमनीदितमिद्धं ॥ ४ ॥ अर्थ ॥ एमज मनगुप्ति वचनगुप्ति यने कायगुप्ति एत्रण गुप्तियेंकरीने जे जीत पाने घणाजन निंदनीक एहवा त्रण कुष्ठयोग्य तेने जीती रुडासंवर मार्गनेवि पे यनकर एटले प्रकाशवत देदीप्यमान श्रने कोश्कालें विनाशने न पामनारा एह वा जे हितार्थ तेने पामील अर्थात् मोक्षसुखने पामीत ॥ ४ ॥ मंदाक्रांतावृत्तं ॥ एवं रुक्षेप्वमलहृदयैराश्रवेष्वाप्तवाक्यश्रधाचंच सितपटपटुः सुप्रतिष्ठानशाली ॥ शु.योगैर्जवनपवनैः प्रेरितो जीवपोतः स्रोतस्ती| नवजलनिधेर्याति निर्वाणपुर्या ॥५॥ थर्थ ॥ एवाप्रकारेकरी स्वष्ठकदयवंत पुरु थाश्रवनो रोधकरवो पठे श्राप्तके पोतानादितवाठक तीर्थकरादिक पुरुपोना वायोतपर जेश्रधाराववी तेजाणी वाहणनेविपे एकसुंदर अनेउज्वल वावटोचडाव्यो एहवो नूतनपीठबंध थयो थको शुभमनोयोग शुभवचनयोग शुभकाययोग एत्रणयोग तेहिज जाणि कोक वेग वानवायरो तेणेकरी पूखोथको जीवरुपीयो जहाज तेसंसारसमुनो प्रवाहतरी तुरत मोक्षरूप नगरियें जश्पहोचेठे ॥ ॥ ॥ अष्टमनावनाटकं नटरागण गीयते महावीरमेरो लालन एदेशी ।। शृणु शिवसुखसाधनसउपायं सउपाय रे सज्उपायं॥शृणु शिवसु खसाधनसउपायं ॥ ज्ञानादिकपावनरत्नत्रयपरमाराधनमनपार्य ॥ शृण ॥१॥॥ विषयविकारमपाकुरु दूरं क्रोधं मानं सदमाय॥ लोन रिपुंच विजित्य सदेलं ॥ जज संयमगुणमकपायं। शृ०॥॥ थर्थ ।। हे विनय तुं मोक्षसाधननो रूडोशपाय सांजल एकतो निर्दोषपवित्र ज्ञानादिक रत्नत्रयनु थाराधनकर वीजो पांचेश्यिोना विपयसंबंधीजे विकारो ते हनेदूरकर त्रीजोमायासहित कोध मान थनेलोनरूप शत्रुथोनी हेलनाकरी सहेज मां श्रमविना एचारेकपायने हलकटजेवा लाणी जीतीलेश्ने कपायथी शून्यथयलो एहवोजे संयमरूप गुण तेनुंतेवनकर ॥ ५ ॥ ने

यनेम्नानागने जगने शुरूइय्यनो सग्रहारिय तेरीतसग्रहार ॥६॥
धान रम्ननारीटाना यसवमायनेययनपपारराने कानादिर
या गदमनापोगपी थपजीजेमननीति तेगोकरीने कापण रुतापण
ran नपाप क्षमाग एटने म्यादाद शनीम्पजे जनमार्ग तेनागोपार ॥
नामानी मचिगीत निचिनकारना मतफरी गहन एटानेव्यात एहवा थार
रीना समुदापने धरनार यत्यतनिर्मन पदयाग्रह्मचर्यव्रत ने तीसरा
मा पारनग्मन निनचम्ति गाय गाय ॥ सविनय गातिम
रमनन चिरन पाय पाय ।।०॥6॥इति श्रीशानमा
ग्मंगराव्य माग्नापनापिनावना नाम अटम प्रकाश
थप १ मयनन नादन कानाग पहा परमेवानी गाणीमय 71
१४G
शांतसुधारस.
उपशमरसमनुशीलय मनसा रोपदहनजलदप्राय ॥ कलय
विरागं धृतपरनाग हदि विनय नाय नायं ॥ ॥३॥
आतं रोड ध्यान मार्जय ॥ दद विकल्परचनानाय ॥
यटियमरुक्षा मानसचीयी॥ तत्वविद पथा नाय ॥धृ०॥४॥
यूर्य ।। क्रोरुपयनीने शमाववा मेघनीपरें शांतिनोकरनार एहगोजे उपना
गग तेहने तु मनमा धारणकर हे विनय दयमा धारणकरेलोजे परपुजनारिक
मपी नाग तेदने सहाराझदयमायी नीत्वानीलाके काढीकाढीने अत्यत गुणा
नजे गग्य तेने धारणकर वजी थानध्यान थनेरीध्यानने धारणकरीमनही।
नपा मरा किट्पनीजालने तेने वाली नस्मकरीनारस कारण मना
पोला मार्गने स्थी न राखयो एवोकाइ तत्व वेत्तानो मार्गनथी तत्ववेना पुष्प
नेता मनापांग मारतो रासवुज नही ॥४॥
मपमयोगैरवदितमानसशुद्ध्या चरितार्थयकाय ॥ नानामत
मचिगढने नुयने निश्चिनु शुभपथ नाय ॥ शृणाया ब्रह्म
नतमगीकुरु विमल बिधाण गणममवाय ॥ नदित
गुम्बदनाउपदेशं सरदाण गचिमिव राय ॥ शु० ॥६॥
गयमबाहमपासमग्मरति सुग्नय निजमध्ययमाय ॥ चेतन
मालय कतलदानानचरणगणपर्याय ॥ 7 ॥४॥

مبهمه

संरमपरिदार जज सालीन्य कायछेश तप इति बाह्यमुदारा
राजानीपरें जीतीजवायने वत्ती जेतपयकी ऐश्वर्यताने प्रगटकरनारी थम्चावीमन
ब्धीथो थने थाउसिदियो प्रगटथायने तथा जे स्वर्ग थने मोदना सुखभापवामा
कराल वलीजगतने पूजवायोग्य एडवोजेतप तेहनेछ निरतर नमस्कारकरुनु ॥७॥
थथनवमनावनाष्टक सारगरागण गीयते ॥ जिपदरायसरण तिहारे थायर्याएदेश।
थर्य ॥ विनयविजयजी पोताने उपदेशकरके अरेविनय तु तपनामहिमानी ।
नावनाकर जेनायोगधकी घणानगर्नु सचितकरेलु पाप तुरतज हलकापाषाम
॥ १ ॥जेम तीक्ष्णायुयें करी महोटी महोटी मेघनीपंक्तियो नाशपामते तेमर
वास्तिमाकपति दूरादपि रिपुमपिव्रजति वयस्य॥तपदमाश्र
यनिर्मलनावाढागमपरमरहस्य॥३॥अनशनमूनोदरता वृत्तिन्दा
२५०
शांतसुधारस.
थोमजले केमके दृढप्रहारी जेवा पुरुषोए महोटा कठोर कम करीने यत्पत पापोने
सपादान कहतो तेपण तपस्याना मनावें समस्त पापोनो नाशकरीने थोडाजमा
लमा मोद प्रतें पाम्या ॥ ५॥ जेम प्रदीप्तयनि सुवर्णनु पवित्रस्वरूप प्रगटको
तेमज तपजेठे तेपण धात्मामाथी कर्मरूप रजनो नाशकरीने सादात् धारमान
ज्योतिस्वरूप प्रगटकरे ॥ ६ ॥
स्रग्धरावृत्त॥ वाह्येनान्यतरेण प्रथितवदुनिदाजीयते येन
शत्रुश्रेणी वाह्यातरगा जरतनपतिवत् नावलब्धाढिना।।
यस्मात्प्रानवेयु प्रकटितविनवा लब्धय सिध्यश्च व
दे स्वर्गापवर्गार्पणपटु सतत तत्तपो विश्ववद्य ॥ ७ ॥
थर्थ ॥ जेना बाह्य थने अन्यतर देकरी पणानेद प्रख्यात एहवा तफ्ना
उपर विशेपनावना योगेकरी जेहन दृढपलब्ध प्राप्तायतो ते तकरी इन
मनादिक
बाह्यशत्रु
थने रागादिक थतरग शत्रु तेनीजे श्रेणीके पक्ति तेने नरत
विनावय विनय तपोमहिमान॥ध्रुवपद ॥ वदुनवसचित3
प्कृतममुना ॥ लनतेलघुलघिमान ॥ वि०॥ ॥ याति
घनापि धनाधनपटली। खरपवनेन विराम ॥नजति त
था तपसा जरिताली ॥णनगरपरिणाम वि०॥२॥
तकरीने महोटीमहोटी पापनापतिथो एक क्षणमात्रमा नष्टथज्ञापः ॥ २॥

शांतसुधारस. २५१ थर्थ ॥ वली जे वांचितार्थ वणुदूरहोय तेनेपण नजीकधाणीयापेने तथाशत्रु नेपण मित्रकरे एहवाएतपने शास्त्रनु परमरहस्य जाणीने निर्मलना थादर ।। ॥ ॥ तेतपनाबारजेदवे १ अनशन २ उनोदरी ३ वृत्तिहात एटले रत्तित देप ४ रतपरिहार ५ सालीन्यता एटले इंडियोनोरोध एकांतवेतवू ६ कायक्लेश एकप्रकारचं महोटं बाह्मतपत्रे तेनुं तुं सेवनकर ॥ ४ ॥ प्रायश्चित्तं वैयावृत्यं स्वाध्यायं विनयं च ॥ कायोत्सर्ग शुनध्यानं आन्यंतरमिदमचाविणाशमयति तापं गमयति पापं रमयति मानसद्संहति विमोदं दूरारोट् तपति विगताशंसंः॥विणा॥ अर्थ ॥ १ प्रायश्चित्त २ वेचावन ३ स्वाध्याय ४ विनय ५ कायोत्सर्ग ६ गुन ध्यान एकप्रकारना धान्यंतर तपठे तेनेसेव ॥ ५ ॥ एतप अनेकप्रकारना संसारी कतापनी शांतिकरे। धनेपापनोनागकरे तथा मनरूपहंसने रमाडे वली निःतं शयपणे धाजगतमां दुःखोनेदरकरवा थसमर्थ एहवोजे मोहतेनो नाशकरे ॥६॥ संयमकमलाकामणमुज्वलशिवसुखसत्यंकारं चिंतितचिंतामणिमाराध य तप ऽद वारं वारं विणा कर्मगदौयधमिदमिदमस्य च जिनपति मतमनुपान।विनय समाचर सोख्यनिधानं शांतिसुधारसपानविणात इतिश्रीशांतसुधारसगेयकाव्ये निर्जरानावनाविनावनोनामनवमःप्रकाशः श्रयं ।। वजीएतपते चारित्रम्प सन्चाने वगकरवानी विद्याठे तया सुंदर मो दना सुखधापवाने विशारद वली चिंतितार्य देवाने चिंतामणीरत्नतरखोठे एह वा तपने याजगतमा हेविनय तु वारंवार अंगीकारकर ॥ ७ ॥ हविनय कर्मरूप रोगर्नु श्रीपध अने तीर्थकरोनो जे मत तेठे धनुपानजेहलु तथा समस्त मुख→ निधान एहवोजे शांतसुधारस तेनुतुंपानकर || G ॥ इतिश्रीशांतसुधारस गेयकाव्ये -निडरानावनाविनावनो नाम नवमः प्रकाशः उपजातिवृत्तं ॥ दानं च शीलं च तपश्च नावो धर्मश्चतुर्धा जिनवां धवेनानिरूपितो यो जगतांदिताय स मानसे मे रमतामजस्त्री। अर्थ ॥ हवेदशमी धर्मनावना नावे तीवकरदेवें लोकहिताय दानशील तपथ ने नाव एरीते चारप्रकारनो धर्मको तेधर्ममारामनमा सर्वकालरहो ॥ १ ॥ । -- 1 अर्थ ॥ जेना वाह्य श्रने अन्यतर नदेवीघाणाना प्रग्यानो एहवा तपना/ उपर विडोपनापना यागकरी जहने दृढपणु नव्या प्राप्नथायना ते तपकरी न मनादिर बाह्यशत्रुधने गगादिक अतरंग शव तनीज गी0 पति तेने जरत राजानीपर जीतीजवायने वनी जेतपथकी वयताने प्रगटकनारी थम्यावीतना ब्धीथा थने श्रामिविया प्रगटथायने तथा ज स्वग थन मादाना मुग्वधापवाना कुशन नीनगतने पूजवायाग्य एहगाजतप तदनद निम्तर नमम्मारकस्तु॥1 थथनयमनापनाप्टर सारगगगण गीयते ॥ निणरायमगण निहार थायाएदेशी। विनावय पिनय तपोमहिमान ॥ ब्रुवपद ।। वदुनयमचिन थर्थ ।। पिनयपिजयनी पासान नपरशकरने के घरेपिनय तु तपनामहिमानी/ नावनाकर जेनायागथकी पणानवनु सचितकोतु पाप तुग्नन नापशुपाने यनिर्मलनावादागमपरमरहस्याअनशनमूनादरता पनि १५० शातसधारम थोमुज केमके दृढप्रहारी जेया पुस्योग महाग कतार में करीने थत्यंत पा- सपादान कम्युहतो तेपण तपम्याना प्रनार ममम्न पापानो नाशकरीने थोडात लमा मोक्ष प्रतें पाम्या ॥ ५ ॥ जेम प्रदीमान माणनु पवित्रम्वरूप प्रगर तेमज तपजेते तेपण थान्मामाथी कर्मरूप निना नागाचीन माहात् थामा ज्योतिस्वरुप प्रगटकरते ॥ ६ ॥ सम्परावृनबाह्येनान्यतरण प्रयितबदनिदाजीयते येन गत्रुश्रेणी वाह्यातरगा नरतनपनिवत नावलव्यढिना।। यम्मात्प्रावय प्रकटितविनवा लब्यय ,मिध्यश्च व दे स्वर्गापवर्गार्पणपट सतत तनपा विश्वद्य ॥ ॥ प्कृतममुना ॥ लनतेलघुलपिमान ॥ वि० ॥ 1 ॥ यानि घनापि पनापनपटली ॥ वरपवनन विराम ॥जनतिन था तपमा चरिताली ॥ काणनगरपरिणाम वि०॥ २॥ ॥ १ ॥जेम तीक्ष्णयाय कण महोटी माटी मपनीपक्श्रिा नाशपामन नमा उरीने महाटीमहाटी पापनीपनिया एक क्षणमात्रमा नष्ट था नायन । वान्तिमाकर्षति दूगदपि रिपुमपि वनति वयम्य। तपमान सरसपरिदार नज सालीन्य कायमग तपति बाह्यमुदार

शांतसुधारस.
२५१
थर्थ ॥ वली जे वांनितार्थ घ[दूरदोय तेनेपण नजीकथाणीयापेठे तथाशत्रु
नेपण मित्रकरेचे एहवाएतपने शास्त्रनुं परमरहस्य जाणीने निर्मलनावें थावर ॥
॥३॥ तेतपनावारनेदले १ अनशन २ उनोदरी ३ वृत्तिम्हास एटले वृत्तिसं
क्षेप ४ रसपरिहार ५ सालीन्यता एटले इंडियोनोरोधएकांतेंवेस, ६ कायक्लेश
एकप्रकारर्नु महोटं वाह्यतपत्रे तेनुं तुं सेवनकर ॥ ४ ॥
प्रायश्चित्तं वैयावृत्यं स्वाध्यायं विनयं च ॥ कायोत्सर्ग शुनध्यानं
आन्यंतरमिदमचाविणाशमयति तापं गमयति पापं रमयति
मानसद्संादरति विमोदं दूरारोहं तप ऽति विगताशंसंः॥वि॥॥
थर्थ ॥ १ प्रायश्चित्त ५ वेयावच ३ स्वाध्याय ४ विनय ए कायोत्सर्ग ६ गुन
ध्यान एउपकारना थान्यंतर तप तेनेसेव ॥ ५ ॥ एतप अनेकप्रकारना संसारी
कतापनी शांतिकरेठे अनेपापनोनाशकरे तथा मनरूपहंसने रमाडेठे वली निःसं
शयपणे थाजगतमा खोनेदूरकरवा असमर्थ एडवोजे मोहतेनो नाशकरेठे ॥६॥
संयमकमलाकामणमुज्वलशिवसुखसत्यंकारं चिंतितचिंतामणिमाराध
य तप श्द वारं वारं ॥विणाकर्मगदौषधमिदमिदमस्य च जिनपति
मतमनुपान।विनय समाचर सोख्यनिधानं शांतिसुधारसपानाविणा
इतिश्रीशांतसुधारसगेयकाव्ये निर्जरानावनाविनावनोनामनवमःप्रकाशः
श्रर्थ ॥ वलीएतपते चारित्ररुप लक्ष्मीने वशकरवानी विद्याठे तथा सुंदर मो
दना सुखथापवाने विशारद वली चिंतितार्य देवाने चिंतामणीरत्नसरखोने एह
वा तपने थाजगतमा हेविनय तुं वारंवार अंगीकारकर ॥ ७ ॥ हेविनय कर्मरूप
रोगर्नु औपध थने तीर्थकरोनो जे मत तेठे अनुपानजेहनु तथा समस्त सुख
निधान एहवोजे शांतसुधारस तेनुतुंपानकर ॥ ॥ इतिश्रीशांतसुधारस गेयकाव्ये
निर्जरानावनाविनावनो नाम नवमः प्रकाशः
नपजातिहत्तं ॥ दानं च शीलं च तपश्य भावो धर्मश्चतुर्धा जिनवां
धवेनानिरूपितो यो जगतांदिताय स मानसे मे रमतामजस्त्र॥२॥
अर्थ ॥ हुवेदशमी धर्मनावना नावे तीर्थकरदेवें लोकहितार्थ दानशीन तपथ
ने नाव एरीते चारप्रकारनो धर्मकह्यो तेधर्ममारामनमा सर्वकालरहो ॥ १ ॥

मित्रते पोतानाथगा वरन्तरजेवुप जाणे एक धर्मरूप बरन्तरज पहनुहोपनी . नी थत्यंत तप्तथयती जमोनने वातुमा मेघ वदकरीने समिकरे ॥३॥ | था समुश्पोताना महोटाकानोलेंकरी पृथ्वीनेबुडावतोनथी भने व्याघ्र तपा दाम त्र हितावदस्तनुनृता सर्वार्थसिद्धिप्रद ॥येनानर्थकदर्थ थर्थ ॥ जेवखत पोतानाहितनेयय बाप ना माता पुत्र थत्यतउद्योगक | सशकर तेपण देयके दीनपणाने पामेठे तथा जेवरखतपोतानी जाथान तेपण धर्मनोजप्रतापजाणवो भनेवली धनुष्यनायोगेकरी चपलथयलो जे सम्य | निष्फलयायने एवी कष्टयवस्याना परिणामकाले पण सकनएहजे थाधर्म २५२ शांतसुधारस. इंज्वचारत्त त्रयमित्यदमामार्दवगोचसंगत्यागार्जवब्रह्मविमुक्कियु काय संयम किच ततोपगूढचारित्रधर्मो दशधायमुक्त ॥२॥ स्य प्रनावादिद् पुष्पदतो विश्वोपकाराय सदोढयेते॥ग्रीष्मोप्मनी प्मामुदितस्तमिवान् काले समावासयत्ति क्षिति च ॥ ३ ॥ उल्लो लकल्लोलकलाविलासै प्लावयत्यंबुनिधि विति यत् ॥ न प्रति यत् व्याघ्रमरुदवाया धर्मस्य सर्वोप्यनुनाव एप ॥४॥ थर्थ ॥ १ सत्य २ क्षमा ३ माईव शौच ५ तपधर्म ६ सगत्याग उब्रह्मचर्य । विशेपप्रकारे मुक्तिएटले निलोनतापणु ए सयम र थकिचनता ते रोते वसप्रकारन चारित्रधर्म कपुरे ॥ २॥ जे धर्मनापसायेंकरी जगतमा पण सर्वप्राणीमात्रने उपकारकरवाने थर्थे नित्यउदयपणु पामेले वलीग्रीष्मश्नुस नल बने पवन इत्यादिकोकोने मारतानया एप्रतापसर्व धर्मनोज ॥५॥ शार्दूलविक्रीडित स्त्तक्ष्य ॥ यस्मिन्नेव पिता हिताय यतते भ्राता च माता सुत सैन्य दैन्यमुपैति चापचपल यत्रा फल दौर्बल ॥ तस्मिन्कष्टदशाविपाकसमये धर्मस्तु सवार्म त सज्ज सज्जन एप सर्वजगतस्त्राणाय बहोयम ॥५॥ त्रैलोक्य सचराचरं विजयते यस्य प्रसादादि योत्राम ना निजमह स्सामर्थ्यतो व्यर्थिता तस्मै कारुणिकाय घ मविनवे नक्तिप्रणामोऽस्तु मे ॥ ६ ॥ - शांतसुधारस. ૧૫૩ से प्रांगमा वरप्तरपहेस्या नीपरेंथयीने सर्वजगतना रक्षणार्थे उद्योगकरे ॥ ५ ॥ वली जेहनापसायथकी स्थावर घने जंगमसहित जगत गोने तथा जे धालोके प्राणीयोने हितकरवाने योग्यथयाने सर्वअर्थनी सिताने पमाडेठे जेणेपोताना तेजस्वीसामयेकरी पापरुपविटंबनानो नाशकरीनारव्युंठे एहवो जे दयावत धर्मरूप प्रनु तेने महारो नमस्कार होजो ॥ ८ ॥ मंदाक्रांतारत्तं ॥ प्राज्यं राज्यं सुनगदयिता नंदनानंदनानां रम्यं रूपं सरसकविता चातुरी सुस्वरत्वं ॥ नीरोगत्वं गुणपरिचयः सजानत्वं सुबुद्धि किंतु ब्रूमः फलपरिणति धर्मकल्पद्रुमस्य ॥७॥ थर्थ । महोटुंराज्य सुंदरस्त्री पुत्र पुत्रीयो रमणीकरूप घणीज सरस कविता करवानी चतुरा सुस्वरपणुं धारोग्यतापणुं गुणोनोपरिचय तथासङनपणुं अने रुडीबुदि एतर्ववाना ते धर्मरूप कल्पवृदना फलने ॥ ७ ॥ ॥ अथ दशमनावनाष्टकं वसंतरागण गीयते नवितुमेवंदोरेहीरविजयसुरिराया एदेशी। पालय पालय रे पालय मां जिनधर्म ॥ मंगलकमलाकेलिनिके तन करुणाकेतन धीर ॥ शिवसुखसाधन नवनयबाधन जगदा धार गंनीर ॥ पाण॥२॥ सिचति पयसा जलधरपटलीनूतलममृत मयेन ॥ सूर्याचंउमसावुदयेते तव महिमातिशयेन ॥ पा॥३॥ अर्थ ।। हे जैनधर्म तुं महारुरवणकर महारु रहएकर तुं मांगलिकरुप लक्ष्मी नुं क्रीमागृहठो वलीकरुणानो स्थानकठो तथा मोदासुखनु साधनठो भने संसा रना समस्तनयनो नागकरनारतो तेमज जगतना जीवोने याश्रयनूततो थनेअतिगं जीरठो ॥ १ ॥ जे मेघनो समूहते पृथ्वीतलने अमृत सरखा पाणीये करीने सिंचन करेठे घने चंद सूर्य जे नित्य उगेठे तेसर्व ताहरोज महिमाठे ॥ २ ॥ निरालंबमियमसदाधारा तिष्ठति वसुधा येनातं विश्वस्थितिमूलम्तं नंतं सेवे विनयेनपाण॥३॥ दानशीलगुननावतपोमुखचरितार्थीऽक तलोकः ॥शरणस्मरणकतामिद नविनां दूरीकृतनयशोक.पा ४॥ अर्थ ॥ निरालंब पृथ्वीनेको अाधार नवतां जेनाथाधारचकी रहेठे एहवो जग तनीस्थितीनो मूलस्तंन जे धर्म तेने ढुं नित्यप्रतं विनय एटले नक्तिये करी सेबुं॥३॥ दान शील शुननाव भने तप एचारप्रकारेकरी लोकोने चारित्रायनो करनारो थने . यनारे धर्मग्पमित्र तहारीरूपायकी यारण्य ते महोटा नगर जेवो थाय तर शपिने पाणीगरपीयाय श्रने समुश्ते म्थन सरखो तुरतयऽजायचे पधारे सर यमनसि दपारप धर्म उदयथाव्याने तो तेने उहापण पूवाक्तमकार सुपया बने पानो शदिर देवनायोनी पदवीयापेचे वजी कमेफरी मोक्षसपन या मानवनवनीतमनातन मिचिमदनमोपान ॥ जय जय वि नयना प्रनिलविनयातमुधारसपान ॥पा ॥॥ऽतिशात या गांगायोमा नानीन एटले माग्यणजेया सारनृत अने मनातनकर मुपागम गयमाव्य धर्मनावनाविनावना नाम दाम प्रकाश भन न मिहिरपदनों मापान एटाने निसरणीम्प बने जे निपत विप्रोतमाग्न प्रेयसाये धर्मनावनाविनापनो नाम दशम प्रकाश Ud शांतसुधारस जे प्राणी था जगतमा ए वर्मनो स्मरण करे तथा आश्रय करेने ते नय तथा गोफने दूर करनारो एहवो ए धर्म ॥ ५ ॥ कमासत्यसतोपदयादिकसुनगसकलपरिवार ॥ देवासुरनरपूजिन शासन कृतवदुनवपरिदार पाणावधुरवंधुजनस्य दिवानिशमस दायस्य सहाय ॥भ्राम्यतिनीमे नवगहनेगी खा वाधवमपहायापा थर्थ । जेनो क्षमा सत्य संतोष दया श्रादेवेश्ने समस्तपरिवार सदरचे देता वैत्य थने मनुष्योए जेनी श्राझामान्यकरी तथा थनेक जन्म जरा नो परिहार करनारो ते ए धर्मजने ॥णा वलीहे धर्मतु जेनेको नाइनची 5 तया जेनेको सहायनथी तेने रात्रदिवस सहायनो करनार बारव 10 नता यांवरूप तुजने मूकीने प्राणीश्रो ससाररुप अरण्यमां फिरे।॥ ६ ॥ जगति गहन जलति कृशानुःस्थलति जचरे। कामितमिविदुना कितु परेण पाण॥७॥ इद यवसि प्रेन्यजादिपदानि।कमतोङानादीनि च वितरसि नि " न पायाप्राणीमात्रना सर्व मनोग्य पूर्णयायचे ॥ ७ ॥ थानोरमा नागदा दानादि गुणयापेठे ॥ ७ ॥ ने निमारमनु पान कगने वाले म ने जयपामो जयपामो ॥ त । शांतसुधारस. २५५ मालिनी उत्तं ॥सप्ताधोधो विस्तृतायाः पृथिव्यश्स्त्राकाराःसंतिरत्नप्रना याः॥ तानिः पूर्णो योस्त्यधोलोक एतो पादौ यस्य व्यायतो सप्तरज्जः।।? अर्थ ॥ हवे ग्यारमी लोकस्वरुप नावनानावेठे सातअधोयधो एटले एकवी जाने नीचेंनीचे विस्तीर्ण उत्राकारे रत्नप्रनादिक सातप्टथ्वीयोठे तेणेकरी परिपू र्ण एवा अधोलोकरुप सातरज्जुप्रमाणे जेना महोटावेपगवे ॥ १ ॥ तिर्यग्लोको विस्तृतो रज्जुमेकां पूर्णो हीपैरणवांतरसंख्यैः ॥ यस्य ज्योतिश्चक्रकांचोकलापं मध्ये कार्य श्रीविचित्रं कटिनं ॥३॥ अर्य । घने एक रज्जु प्रमाण विस्तारवंत असंख्याता दीपसमुकरी व्याप्त एह वो तिर्यग्लोकमां रुगपणानी शोनायेफरी युक्तने वाली ज्योतिष चक्ररुप कांचीक लापा युक्त जेनुं मुंदर कणदोरोठे ॥ २ ॥ लोकोऽयोर्ध्वं ब्रह्मलोके द्युलोके यस्य व्याप्ती कूपरो पंच रज्जू लोक स्यांतो विस्तृतो रङ्गुमेकां सिझज्योतिश्चित्रको यस्य मालिः ॥ ३ ॥ थर्थ ॥ जेनो ऊर्वलोके ब्रह्मनामा देवलोक पांचरज्जुप्रमाणे व्यात ते कोपराम रखो कूरपर घने जेनुं लोकनेते एकरज्जुविस्तारपणे जे निगिलातेमस्तक॥ यो वैशाखस्थानकस्थायिपादः श्रोणीदेशे न्यस्तदम्तघ्यश्च ॥ का लेऽनादी शश्वदूर्ध्वदमत्वाद्विधाणोपि श्रांतमुजामखिन्नः ॥ ४ ॥ श्रथ ॥ जेना मथनकरवाना दंडने स्थानकेपगने एटले ठासमथन करवानादंनी परें जेना पगपसरेलावे जेणे पोतानी कटीउपर वेदाथ गग्वेजा एहयोथकोयना विकास, निरंतर कवंटमपणे जितेंश्यियको शांतमुशधरीग्याने पण ग्पिन्ननय सोयं झेयः पुरुपो लोकनामा पड्डव्यात्माऽ कृत्रिमोनाद्यनंतः ॥ धर्माधर्माकाशकालान्मसझै व्यः पूर्णः सर्वतः पुजलेश्व॥४॥ अर्थ ॥ पटश्यम्प जेना यात्मानु स्वर पले जेनेकोश्य कन्योनची जनो जन्म अपवा मृत्यथयोनपी वली धर्म अधर्म थायाम काज जीव अने पुजा पान व्यपरी सर्वम्पले परिपूर्ण एवो था चउटगज लोपनामा पुस्पजाणवो ॥ ॥ ॥ रंगम्यानं पुजलानां नटानां नानाम् पैन्यनामान्मनां च ॥ का लोचोगम्बम्वनावादिनावः कमीताचैनर्तितानां नियत्या | au वर्ष ।। पनी जे राज उयोग वसनावादिस्ना समर पवाजि निपनियर | मापोटचा सुरर्णमयपर्वतो वतीकिहांकतो गर्ता एटले खामायोरे ॥ ४ ॥ थर्थ ॥ विनयविजयजी उपाध्याय पोताने समजावेजे थरेविनय सावत। चिरकाल रहेनारो एहयो लोकाकाशतु ताहरा हृदयमा धारणकर जेमा समान लोकेकरी वेष्टितके० विटघु तथा जे गणनाके परिमाण मृकीने रह्योने केमो थसण्यातो लोकाकाशने माटे, वली जेनीसीमाधर्मादिक पाचव्यकरी सुपरितक। समवघातसमये जिनै परिपूरितदेह ॥ असुमदणुकविविधक्रिया गुणगौरर्वगेट् ॥विण॥३॥ एकरूपमपि पुजलै कृतविविधविवर्त॥ थये । वजी लोकनामा पुरुपनेविपे श्रीतीर्थकरदेव समुशातना समय पोतानी प्राणी यने थाणुफे० परमाणु तेमनी नानाप्रकारनी जे किया थनेगुण तनागारवर वात्माना प्रदेशेफरीने चउदेराजलोकना समस्तनाग परिपूर्णकरेने तथा थसुमार णानु स्थानकजाणवु ॥ ३ ॥ वली एलोकाकाश पुरुपमा यद्यपि रुपने धारणार नारे एक पुगनश्य तेणे नानाप्रकारना करेला एदवा फिहाक मेरुना शिखर २५६ शांतसुधारस. री नानाप्रकारना रूपेकरी नचावेला जीयोनु थने नाचनारोजे पुजनरूप श्रो तेनु रगस्थान एटले रगममपठे एवो एचपदराज लोकनामा पुरुषले ॥६॥ एव लोको नाव्यमानो विविक्त्या विज्ञानां स्यान्मानसस्यहेतु ॥ स्थैर्य प्राप्ते मानसे चात्मनीना सुप्राप्येवा ऽध्यात्मसौख्यप्रसूति ॥३॥ यर्थ ॥ एरीतेजोकने विवक्त एटले जूदोजूदोस्पष्टपणे नाव्यो थकोगन. नामनने स्थिरकरवानो कारण तेहीजथायवे जेवार मनस्थिरथयो तेवारें हितकरनारी ययात्मिक सुखनी प्राप्तिसुलनथाय ॥७॥ सप्तनिर्मातनोवृत्त कुल ॥ श्रथ एकादशनावनाप्टक काफीरागेणगीयते थाजसखीमनमोहनो । एदेवी विनय विनावय शाश्वत ॥ हृदि लोकाकाश ॥ सकसचराचरथा रणे परिणमदवकाश ॥ विलसदलोकपरिवटित गणनाति गमान ॥ पचनिरपि धर्मादिनि सुघटितसीमानं ॥ वि० ॥२॥ स्यावर अनेजगमपदार्थोने धरवाविप पूर्णधवकाशने ॥ १ ॥ पसीना समीरचनायें करी रचित एडवो एचपदराज लोकनामा पुरुषः ॥ ३ ॥ काचनशैलशिखरोन्नत कचिदवनतगर्त ॥ वि० ॥ ४ ॥ 0 शांतसुधारस. ՀԱ Տ कचन तविपमणिमंदिरैरुदितोदितरूपं ॥ घोरतिमिरनरकादिनिः . क्वचनातिविरूपं ॥ वि० ॥ ५॥ कचिउत्सवमयमुज्वलं जयमंगल नादं ॥ क्वचिदमंददादारवं ॥ टयुशोक विपादं ॥ वि० ॥ ६ ॥ अर्थ ॥ वली किहांक तो देवताओना जुवन तेनी सूर्यकांत मणीरत्ननी शोनायें करी सुंदररूप पणाना उदयने पाम्योठे एटले उदितोदित रूपनेपाम्योने वली किहांक नयंकर अंधकार घने नरकादिकें अत्यंत विरूप एटले मागरूप पणाने पा म्यो। ॥ ५॥ वली किहांकतो उत्सवमयठे एटले उज्वल जयमंगलना वाजिन ना नाडेकरी युक्त तथा किहांकतो अत्यंतशोक अने खेदे करीयुक्त जेमांथी महो टो हाहाकार शब्द निकलीरह्यो। एहवं पुनल इव्यते ॥ ६ ॥ वदुपरिचितमनंतशो निखिलेरपिसत्वेः जन्ममरणपरिवर्तिनिः कृ तमुक्तममवैः ॥ विण ॥ इहपर्यटनपराङ्मुखाः ॥ प्रणमत नगवं तं ॥ शांतसुधारसपानतो धृतविनयमवंतं ॥ ॥ इतिश्रीशांतसु धारसगेयकाव्ये लोकस्वरूपनावनाविनावनो नामैकादशः प्रकाशः अर्थ ॥ वली लोकमा पुगतनो स्वरुप विो कहे जेने जन्म मरणाना योगेंक री फिरनारा प्राणी पूर्वपूर्व ममत्वनी परंपरायेंकरी अनंति अनंतिवार सेनेनेमू क्योठे अनेजेनुं सर्वप्राणीयोए यनंतिवार घणुंपरिचित करयंचे एहबुंए पुगतव्य ॥ ७ ॥ माटे हेजीव तुंजो थालोकरूप पुरुपमा फिरवाने विपे पराङ्मुख थयो होय तो शांतिसुधारसना पानेकरी विनय धारण करनारायोनुं रक्षण करवा वाला जे जगवंत परमात्मा तेने नमस्कारकर ॥ ॥ इतिश्री शांतसुधारस गेयकाव्ये लोक सम्पनावनाविनावनो नाम एकादश. प्रकागः मंदाक्रांतारत।यस्माधिस्मापयितसुमनःस्वर्गसंपब्लिासप्राप्तोल्ला साः पुनरपि जनिः सत्कुले नूरिनोगे। ब्रह्मास्तप्रगुणपदवीप्राप कं नि.सपनं तदुप्प्रापं नृशमुरुधियः सेव्यतां बोधिरत्नं ॥ १ ॥ थर्थ ॥ दवेवारमी बोधिसन नावनानावे जेनाथकी देवतायोपण घि स्मयपामे एडवो स्वर्गसंपत्तिनो विलास पामीने जीव थानंद पामनार थायवे व लीजेनाथकी अनेकप्रकारना अत्यंत नोगेकरी युक्त एहवा समाजमा पुनःपुनः ज | मां जेप्राणी धर्मउपर दृढता राग्वेने तेज प्राणी पुस्पवान जाणवो॥५॥ केमके जेथकी महोटा थानदे सहित जीव निगोद रूप अधकार कुवामांची | लेनने तेमा वलीपर्याप्तिपशु पामबु दूर्लन तेमापण सझी पचेश्यिपण दीर्घायु । | ने मनुष्यपणुं पामवुतो परमर्सनवे ॥शामहामोह मिथ्यात्व तथा माया एरोक 'युक्तपको मूर्खप्राणी था मनुष्यपषु पामीने ससाररुप श्रगाध खाडामा फिरतो, | फिरतो युडयोथको रहेठे तेप्राणीने बोधिरत्न फरीने शीरीतें प्राप्तथसे ॥५॥ शिखरिणीवृत्ता।विनिन्ना पथान प्रतिपदमनल्पाश्च मतिन कुयुक्ति व्यासगैर्निजनिजमतोल्लासरसिका ॥न देवा सान्निध्य विदधतिन । वा कोप्यरसिकस्तदेव कालेऽस्मिन् य द दृढधर्मा स सुकृती॥ टिने श्रन्यासे करीने पोतपोताना मतना उदयविपेरसिक एहसा घणामतवानाधा- थर्थ ॥ धोना निन्ननिन्न मार्ग थने निन्नभिन्न स्थानके कुपुक्तिना व्यास । काजमा थनेजो देयतानेटाजस्तो देव का कोपासे श्रावतोनथी एमएद | वो यतिगयवालोपण कोश्नथीके जेने पूठि निर्णय करीये तो एवा था अप्परफान ՀԱԿ शांतसुधारस. न्मथाय तथा परपरायें थत ब्रह्मपदवी पमायामा जेनेकोऽशत्रुनथी । पामवी थत्यतकनीणजे एहजे बोधरूपरत्न तेनोहेबुद्धिमतो तमेसेवनकरो ।। नुजगप्रयातस्त्तत्रयो।अनादो निगोदाधकूप स्थितानामजस्त्रं जनुर्म त्यु खार्दिताना॥परीणामशुद्धि कुतस्तादृशी स्यायया दत तस्माहि निर्याति जीवा ॥ ततो निर्गतानामपि स्थावरत त्रसस्त्र पुनतेने देहनाजा॥सलेपि पंचादपर्याप्तसझिस्थिरायुप्कवल उर्लन मानु पत्व ॥३॥ तदेतन्मनुष्यत्वमाप्यापि मूढो मदामोदमिथ्यात्वमायोपगूढ भ्रमन्दूरमन्नो नवागाधगर्ने पुन व प्रपद्येत तहोधिरन ॥ ४ ॥ थर्थ ॥ पण अनादि कालना निगोदरूप धंधकार तद्रूप कुवामा रहेनारा तर जन्म मरणना 5 खेकरी पीडायला प्राणीयोने तेवी परिणामद हेरपडे ॥ २॥ ते निगोदमाथी नीकलीने पण स्थावरमा उपजवुथाय प्राणीने त्रसपणु पामवुतो उसनने वाली सपणामा पण पचड़ियपणु पाम, A ।

शांतसुधारस. पए शार्दूलविक्रीडितरत्ती यावदेवमिदं गंदन मृदितं नोवा जराजर्जरं याव त्वतकटंबकं स्वविषयकानावगादतम। यावत्रायुरनंगुरं निजदिते ता वहुधैर्यत्यतां कासारे स्फुटिने जले प्रचलिते पालिः कयं वध्यते ॥६॥ अर्थ ॥ जिहांधी श्रागरीर रोगाक्रांत थयोनथी तेमज जिहांधी वाशरीर जरायेंकरी जर्जरीनूतथयोनथी तथा जिहांसुधी या पांचयिनो समूह पोतपोता ना विषयो लेवाने समर्थवे धने जिहांसुधी श्रायुष्य दीपथगुंनी तिहांधी हेजीव तुं पोताना कल्याणविपे पत्नकर केमके तलोफुटीने पाणी बाहेर नीकली जसे तोपने पालते केवी वांधीस ॥ ६ ॥ अनुष्टुत्तं ॥ विविधोपावं देवमायुश्च हणनंगुरं ॥ कामालव्य धृतिं मूढः स्वश्रेयसि विलंव्यते ॥ ७ ॥ अथे । धागरीर नानाप्रकारना उपवेंकरी युक्त थायुप हणनंगुरले एमवतां कोणमूर्ख तेनाउपर संतोष राखी पोताना कल्याणयवाना कार्यमा विलंब करे। दशनावनाष्टकं धनश्रीरागेणगीयते॥हीचेरेहीचेरेपीधा हिंडोलडेएदेशी॥ बुध्यतां बुध्यतां बोधिरतिजलना ॥ जलधिजलपतितसुररत्नयु त्या सम्यगाराध्यतां स्वदितमिद साध्यतां ॥ बाध्यताम धरगतिरात्मशक्त्या ॥ ७॥ १ ॥ चक्रिनोज्यादिरिव न रनवो उतनो भ्राम्यतां घोरसंसारकः ॥ वदुनिगोढादिका यस्थितिव्यायते ॥ मोदमिथ्यात्वमुखचोरलः ॥ ७ ॥२॥ अर्थ ।। जेम समुइनापाणीमा पमोगयतुं चिंतामणीरन पाठोहाथमा श्रावq यतिऽनने तेम वोधिपामवीपण तिर्जन माटेरुमारीते वोषितुंथाराधनकरी पोतार्नु हितसाधई धनेपोतानी शक्तीयेंकरी उर्गतिनो वाधकरवो ॥ १ ॥ घणी नि गोदाहिक कायस्थितियें करी विशाल थने मोह मिय्यावप्रमुख लाखोगमे चोरटा ये युक्त एहवो था घोर संसाररूप अरस्यमा फिरनारा जीवोने चक्रवर्तिना नोजन सरखो मनुष्य जन्म पामवो उतनवे ॥२॥ लव्ध श्द नरनवो ऽनार्यदेशेषु यः स भवति प्रत्युतानर्थकारी ॥ जी वदिसादिपापाश्रवव्यसनिनां माघवत्यादिमार्गानुसारी॥ वु ॥ ३ ॥ ।

सोकोतो परस्पर एकबीजा साथे वारकरे पणधर्मनी वातोसनिली धर्म पाम्योतो १ विविदिपायामपि श्रवणमतिउर्लनं धर्मशास्त्रस्य गुरुसन्निधाने । किन ॥ ॥ धर्ममाकर्ण्य सवुध्य तत्रोद्यम कुर्वतो वैरिवाँऽतरंग राम् थर्थ ॥ कदाचकोइने धर्मतत्व जाणवानी चाहोय भने गुरुसनिध बेशक तोपण वृथा विकथारसना आवेशथी नानाप्रकारना विकेफरी जोते,यत | सानती धर्मनेपाम्यो थने धर्मनेरिपे उद्योगपए करवावेगे तेवा प्राणीनेपण रूप प्रसगना नाशकरनारा जे रागहेप श्रम थालस निा इत्यादिक यंतर चतुरशीतावदो योनिलदेविय क बया कर्णिता धर्मवाती ॥प्रा शो जगति जनता मियो विवदते शझिरसशातगुरुगौरवाती।बुध- एवमतिउतनात्प्राप्य उर्लनतम बोधिरत्न सकलगुणनिधानाकुर थपे । माटे यहोति थार्य हेजीव चौरासीजद जीवा योनीम | पराते धर्मनीबात सनिजी हमेके अर्थात् नहीज सनिली हसे केमके के या जगतमा दिगारव रतगारव सातागारव एत्रण महोटा गारवेकरी २६० शांतसुधारस. आर्यदेशस्टशामपि सुकुलजन्मना॥उलना विविदिपा धर्मतते॥र तपरिग्रहनयादारसझावर्तिनि दंत मग्नं जगहुस्थितते ॥७॥४॥ अर्थ ॥ जोथा जगतमा प्राणी अनार्यदेशमा मनुष्यनव र्थनु कारणथायडे केमके जीरहिसादिक पापावना व्यसनबाला जी ति जे सातमी नरकादिक तेना मार्गनु कारण थायने ॥३॥ रुडाकुनमा पामेलो होय थनेवली थार्यदेशमा रहेनार होय तेनेपण धर्मतत्त्व जाणवान पीन कारणके रतके मैथुन परिग्रह नय थने यहार ए चार नामना स्थितपणामा सर्वजगत बूमोपडयोवे ॥४॥ थविकथादितत्तसावेशतो विविविक्तपमलिनऽवधाने ॥ बु क्षेपश्रमालस्यनिजादिको वाधते निहतसुकृतप्रसग ॥ ७० ॥६ मनीन थयुहोयतो धर्मशास्त्रोनु अयण उर्जनहोय नो समूह तेपीडाकरेवे तेथीतेने धर्मपामवु पुर्जनथायवे ॥६॥ प्राज्यविनयप्रसादोदित ॥ शातरमसरसपीयूपपान ॥ बु।। 50 शातसुधारसगेयकाव्ये बोधिनावनाविनावनो नामधादश ॥ ५ ॥ वली जेप्राणी शांतसुधारस. १६१ नितानयी ॥७॥ एम अतिउर्जन वस्तु करतां पण विजोग उर्जन अने समस्त गुणनुं निधानए जे बोधिरन ते पामीने गुरुनो श्रत्यंत विनयकखो तेणेकरीने प्राप्तथ{ ए हवं जे शानिनुधारस रूप नलोअमृत तेनु तुं पानकर एमांकायें पोतानाम पणसु चव्यं ॥ ॥ इतिश्री गांतसुधारस गेयकाव्ये बोधिनावनाविनावनोनाम बादशः काश. एगते अनित्यादिक वारनावनाोनो अधिकार संपूर्णथयो। - अनुष्टुत्तं ॥ सर्मध्यानसंध्यानदेतवः श्रीजिनेश्वरैः ॥ मैत्रीप्रनृतयः प्रोक्ताश्चतस्रो नावनाः पराः ॥१॥ तथादुः।मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्य स्थानि नियोजयेत् ॥ धर्मध्यानमुपस्कत तद्धि तस्य रसायनं ॥ ३॥ थर्य ॥ हवे मयादिक धारनावनायो जावे श्रीतीर्थकरदेवें सत्यधर्मध्याननी धागनी हेतुनूत मंत्रीश्रादेदेऽने बीजी चारनावनाथो कहीं ॥१॥ तेश्रीतीर्थकरनेवें कहीने तेमज नावियते । मंत्री २ प्रमोट ३ कारुण्य थने ४ माध्यस्थ्य एचारनाव नाते धर्मध्यानना नूपणार्थ एटले धर्मध्याननी शोनानेथर्य योजना करीयको ध्या वनाग्ने चारनावनायुक्त जे धर्म ते रसायन (ोषधी) तुल्य थायठे ॥ २ ॥ नपजातियत्तामंत्री परेपादितचितनं यत् नवेत्प्रमोदो गुणपत्नपातः।। कारुण्यमातीगिरुजां जिदीत्युपेकणं इष्टधियामुपेढा ॥ ३ ॥ सर्वत्र मंत्रीमुपकल्पयात्मन् चित्यो जगत्यत्र न कोपि शत्रुः ॥ कियहिन स्थायिनि जीविते ऽस्मिन् कि खिद्यते वैरिधिया परस्मिन ॥४॥ सर्वेप्यमी बंधुतया ऽनुनृताः स शोऽस्मिन्नवता नवाब्धी ॥ जी वास्तती बंधव एव सर्वे न कोपि ते शत्रुरिति प्रतीदि ॥ ५ ॥ सर्वे पितृभ्रातृपितृव्यमातपुत्रांगजान्त्रीलगिनीस्नुपात्वं ॥ जी वाः प्रपन्नाबशन्तदेतत्कुटुंवमेवेति परो न कश्चित् ॥ ६ ॥ अर्थ ॥ जे वीजानाहिननुं चितनकर ने मंत्रीनावना जाणवी गुणीनो पदपा तकरयु ते प्रमोटनावना जाणवी इन्वीप्राणीना उरख उपकरवानी मागखवीते का रुम्यनावना इटचुकीवंत प्राणीउपर उपेक्षाकरवी ते उपेक्षणानावना ॥ 3 ॥ दया स्मातुं सर्वत्र मैत्रीतापाणुकर एटले याजगतमा कोऽपण मदागे गट पदयों तुं ताहग मनमा बीनकुन जावीलनही कमर घोडादिवस म्हेनागे अल्पमात्र नाद रो जीवतव्यपणुले तेनां वीजाउपर गठि गाने में क्या चित्रयायनं ॥ ५ ॥ --

.
4
पण समारमा नमवारूप जयतुं यतकरसे एवुजाणीने तेजीवोनी साथे पण
कर ॥ ॥ जीजे प्राणीथोने रागपादिरूप पीडा मन वचन कायाना
। गानो डोहारने तेसर्वप्राणी उदाशीनतापणु पामीने सर्वलोक सुखीयायो ,
पिनय पिचिनय मित्रता ॥ त्रिजगति जनतासु॥कर्मविचित्रतया गर्नि
॥ यथ प्रयोदशनापनाष्टक देशाखरागेणगीयते रेजीवनिनधर्मकीजिये एगी।
सिरिया गमितामु ॥वि०॥१॥ सर्वते प्रियवाधवा नदि रिपुरिह
कोपि ॥ माकुर कलिकलुप मनो निजसुकृतविलोपिनि0 Non
अयं ॥ देग्निय या प्राय नोकमा कर्मनी विचित्रतायेफरी नानाप्रभारनी
पादिक गनियाने पामेनाप्राणी जे ले तेसर्वप्राणीमात्रना समूहमपर तु।
नार र रेमो एमर्व ताहरा परमप्रिय बापजते पण एमांकार तहान
पिनानान पुष्पनो नागनारों n १ ॥ २ ॥ ए येफाय्यनो यथएक्वारे
नपी माटे पोस्टमनने ठोररी कनुपता मकर कारणके कोधजने तता
यदि कोप कुमने परो निनकर्मवशेन । अपि नवता किं नूयन
दिगंपर्शन ॥वि० ॥३॥ अनुचितमिद कलह सता ।।त्यन
ममग्मनीन ॥ जज फिकलढमता गुणपरिचयपीनाविणा
शातसुधारस
हेजीर याससारसमुश्मा ए समस्तप्राणीसाथ हजारोबखत ते नाइपणो
व्यो तेमाटे एसर्व ताहरा नाइयोजचे पण कोइ तहारो शत्रुनयी एवीरीतें
॥ ५ ॥ सर्वजीवो मात्र, ससारमा माता पिता वधु काको पुत्र पुत्री
लोकरानीस्त्री इत्यादिकरीत तारीसाय शेकडो वखत सगपण करीचुकाने
एसर्व ताहारो कुटुंबजने पण एमाको परकीयनथी एमविचारी सर्वजतु
त्रिता पणु थादर ॥ ६ ॥
ऽऽवबाटत्तक्ष्य॥ एकेडियाद्या अपि हत जीवा पचेज्यित्वायपि
गत्य सम्यक् ॥बोधि समाराध्य कदा लनते नूयो नवभ्रातिनिया
विराम॥ या रागरीपादिरुजो जनानां शाम्यतु वाक्काय
मनोहस्ता ॥सर्वेप्युदासीनरसरसतु सर्वत्र सर्वेसुखिनोनवण.
श्रयं ।। फिरी हेजीव तु एवो विचारकर के था ससारमा जे एका
जीने तेपण रुडाप्रकारे पचेडियादिकपणु पामीने ज्ञानाराधनाकरी ।
श्रीपण तु सर्वजीरो उपर राख ॥ ७ ॥

शांनसुधारम. अर्थ ।। माटे जो बीजोको पाताना कमांधीनपाणायकी तादगदपर कायका ने तो नुपात नहागन्यमां नेनाउपर क्रोध शावास्ते कन्नं ॥ ३ ॥ अग्जीवर्नु मनानप पालीना नजावतुं मन्तयन नपुत्पांने अयोग्य एनबुजे वजह तेनेम मीयाप घनेगुणोनो परिचय करवाने पुष्टकारी एडवोंजे विवेकाप नगंवर मां मग सग्याने हंन जवो वा ॥ ४ ॥ शत्रुजना. मुग्विन ममे मत्मरमपनाय ॥ मंतु गंतुमनमोप्यमी शिवमाख्यगृहायाविसकृदपि यदि समतालवं हदयेन लि दति ॥ विदितरमाम्मत ऽद रतिं स्वत एव वदति ॥ वि०॥६॥ अर्थ ॥ हेजीवतुं नमन्त शत्रुलांकोनी ममलीउपर मन्तरतानावना त्यागकरी ने परमसुखीया धन मोक्षरूप उखना घरने जाणवाने ताहरमनपर ॥ ५ ॥ जोए कवारपण समताना सवतुं ताहग हृदयमा थास्वादन करील तो रसझपने सम्य कटपर पोतानी मेलेज प्रीतिकरीत ।। ६ ।। किमुत कुमतमदमूर्गिनां चरितेपु पतंति जिनवचनानि कयंद दा न रसाऽपयंतिाविाजा परमात्मनि विमलात्मनां परिणम्य वसं तु ॥विनय समामृतपानतो जनता विलसंतु॥विणातातिश्रीशांत मुधारमगेयकाव्ये मैत्रीनावनाविनावनोनाम त्रयोदशः प्रकाशः श्रर्थ ॥ हे जीवतुं गावान्त कुमतायेंकरी मृतियने नग्मांपहने धने गांत ग्सचीज नग्ला श्रीतीर्थंकरदेवना वचनो, केम संरक्षण करतोनयी ।। 3 । निर्म सर्थत करणवाला जीवानामन परमात्माना स्वरुपनेविपेज परिणत थइ रहो अन लोकोनानगृह ते नमनारूपी अमृतना पानकरी विनयनो विजालपामोनि ऽनिश्री शांतसुधारत गेयकाव्य मंत्री नावनाविनावनो नाम त्रयोदशः प्रकागः गधरात्ताधन्यान्ते वीतरागाःदपकपयगतिवीणकमों पगगाबैलोक्ये गंधनागाःसदजसमुदितज्ञानजाग्रद्विरा गागाअध्यानह्यात्मगुध्या सकलशशिकलानिमलध्यानधा रामारान्मुक्तः प्रपन्नाः कृतसुकृतशतोपार्जितात्यलटमी तेषां कर्मयोत्यरतनुगुणगणे निर्मलात्मस्वनावगीयं + य। दवे प्रमोद नावना नावेठे पक श्रेणीना मार्गमा प्रायरवाने कर्म | रुपमाने जेणे क्षीणुरुग्युचे थने त्रलोकमा गधहस्तिसरखासनावमा रमाए पानाग गहनदयने पामेला केरलझानेकरी जागृतथपुंठे (वराग्यजेहनु एका | निजी निर्मन जे ध्यानधारा तप अनतपुण्यना समूहकरीतपादननी | सानीभी नेनु यागधनारी मुक्तिनेप्राप्तयायठे ॥ १ ॥ श्री दिनपविनयनी नेनी ननिसारिप जेदना परिणामहोयठे एवा यात्माना निर्माना तरिकानी मानि गगन परणना थावस्थानकोप्रत परित्रकनानल मनका नमा नायागनी ग्ननिना रमने जागनारी जिव्हाने धन्यमान्ममृधनविना मनुन ॥ ॥ पनी पतमा घरायमां गुफागुहिरमा नियामारीने मन पर सचिन गमनाग तथा सम्यनम्प रसेसरी सतुष्टथयजा पनी "विश्य पहा महामने नगतमा प्ररताया श्रीनगर रानी का नायनपर पसानी बहियारमोपदेवाधापने यन गाव शातसुधारस गाय पुनीमस्तवनपरिणतेरवर्णास्पदानि ॥धन्या मन्ये र सहा जगति नवतस्तोत्रवाणीरसझामझा मन्ये तदन्या वितथजनकथाकार्यमौखयमन्ना ॥३॥निर्ययास्तेपि ध न्या गिरिगदनगुहागव्हरातर्निविष्टा धर्मध्यानावधाना समरससदिता पक्रमासोपवासा ॥ येन्येपि झानवत श्रुतविततधियो दत्तधर्मोपदेशाः शाता दाता जिताता जगति जिनपते शासन नासयति ॥ ३ ॥ दानं शीत तपो ये विदधति गृहिणोनावना नावयति धर्म धन्या चतुपा श्रुतसमुपचितझ्या राधयति ॥ साध्व्य श्राध्य श्व धन्या श्रुतविदशधिया शीलमुभावयत्यस्ता न्सून मुक्तगी प्रतिदिनमसकृनाग्यनाज स्तुवति ॥ ॥ श्रीगग एटले तीधारनेचन्यने केमके जे थात्मशुद्धिकर, ध्यापरदेने के द ते तीर्थरोना कर्मपथकी उत्पन्नथयाजे निन ना यने गयाना वाचालणामा पर्तनाग मा मदन पूण पाना पण गुगना FFE स

शांतसुधारस.
२६य.
शासनने प्रकाशितकरे तेनेपण धन्यते ॥ ३ ॥ वलीजे गृहस्थावासमा रह्यायका
पण सुपात्रने दानापेठे शीलपाते तपकरेठे नावनायो नावेठे तथा चारप्रका
करी धर्मध्यानने आराधेठे धने पुष्टरक्षायें शास्त्रनुं आराधन को लेनेपण
पन्य बलीजे साध्वी तथा श्राविकायो शास्त्रयकी स्वत्थयती बुधियें शीतपाले
ने तेनेपण धन्यवे एरीते हे जाग्यवत नव्यपुस्पो तमे सर्वथा गर्वमूकीने ए पूर्वोक्त
समस्त उत्तमपुरुषोनी नित्यप्रतें निरंतर स्तुतिकरो के जेथकी तमारुं कल्याणथाय॥४॥
नपजातिवृत्त। मिट्याशामप्युपकारसारं संतोपसत्यादिगुणप्रसा
रं॥ वदान्यतावेन यकप्रकारं मार्गानुसारीत्यनुमोदयामः॥ ७ ॥
अर्थ ॥ ए पूर्वोक्त सम्यक् दृष्टी जीवनी स्तुति करवी ते तो श्रेष्टजवे परंतु यमें
मिच्यादृष्टीनो पण उत्तम उपकार जागीय कारपके जो तेमनो संतोप सल्या
दिक गुणनी प्रतार तथा दातारपाणु अने विनयना प्रकार एटलावाना मार्गानुं
सारी तो एहवोजाणीने तेनीपण अनुमोदना करिठे ॥ ५ ॥
स्त्रग्धराउत्तं ॥ जिव्दे प्रदी नव वं सुकृतिसुचरितोचारणे सु
प्रसन्ना नूयास्तामन्यकीर्तिश्रुतिरसिकतया मेऽब कौँ सुक
गौ ॥ वीदयान्यप्रोटलदमी द्रुतमुपचिनुतं लोचने रोचनत्वं
संसारेऽस्मिन्नसारे फलमिति नवतां जन्मनो मुख्यमेव ॥६॥
थर्थ ॥ हेजीवो जो तमे सरलठो थने पुस्यवान पुरुषोना पुस्यनो उच्चार कर
ने प्रसन्नतो एटले घाज अमारा कान बीजा पुण्यवान पुस्पोनी कीर्ति श्रवण
। रसिकपणे कगै सुकार्गरहो अन बीजानी प्रोट एश्वर्यताजोऽने अमारी चतु
काशपणाने धारणकरो एहवा जो तमारा विचाग्वे तो था संसारमा एज नमाग
न्म सफल पणानो मुख्य फलने ॥ ६ ॥
उपजातिवृत्तं ॥ प्रमोदमामाब गुणैः परेपां येषां मति. सहनि मा
म्यसिधी । देदीप्यते तेपु मनःप्रसादे गुणानते विशदीनवंतिः॥
थर्य ।। बीजाना गुणो लानती तंतोपपामिन जनीति समतारनर प समुह
वी संवनयापले तेमाणीना मननो प्रनाद देदीप्यमान थायो तमज ना पीना
गुण पण सर्व वह यायः ॥ ॥

बर्ष ॥ या जगता जेना मननेविपे कोप्रकारनो विकारनथी एटले निर्विका शातसुधारस ॥ थथ चतुर्दश नावनाष्टक टोडीरागेणगीयते पनकीमेरेमनजगतिवशीरोएदेशी। विनय विनावय गुणपरितोष ॥ ध्रुवपद ॥ निजसुकृता तवरेप परेपु॥ परिदर दूर मत्सरदोप ॥ वि० ॥१॥ अर्थ ॥ देविनय तु गुणीपुरुषनागुण उपर सतोप करवु मनमालाव अने पर ताना पुरस्पप्रातिनावखतें वीजानपर मत्सरकरवापणाना दोपने दूरकर ॥१॥ दिष्ट्याय वितरति बहुदान वरमयमिह लनते वहुमान ॥ किमिति न विमृगसि परपरमाग॥ यदिनजसि तत्सुकृतविनागं विणा थर्य ॥ यमुक मनुष्य थत्यत दानथापेठे एवढु कल्याणकारक कामकरेते श्रध वा यमुकपुरुष थमुझस्थानके बहुमानपामेठे एपणघणुजरुमुझे एहवो रुडोविचार तु केमारतोनथी काणेकाणे लोकोना गुणोत्कर्ष करवा एहिज मुकत विनागनेर येपा मन ढि विगतविकार ॥ ये विदधति नुवि जगउपकारं॥ तेपा वयमुचिताचरिताना ॥ नाम जपामो वारवार ॥ ३ ॥ रीता एपीनरिपे लोकोनो पकारकरेठे एहवा पवित्र सदाचारी पुरुषोना नाम धमें वारंवार जपियें ॥ ३ ॥ घटट तितिष्ठागुणमममानं ॥ पश्यत नगवति मुक्तिनिदान। येन रुपा मह समदानमान ॥ जटिति विघटते कमवितान ॥वि० ॥४॥ वर्ष ॥ जेनीनगरी करवाने कोई समर्थनथी हो मुक्तिनु कारणजे धमा गुप्त ने श्रीती नानी के जेणेफरी कोधसहित थनिमानेकरी शोनना | गएहयान मंनो समूह ते तुरत नाशपामेने ॥ ४ ॥ घद केचन शीलमुदार ॥ गृहिणोपि परिहतपरदार ॥ यशद्ध मानपि शुचितेपापिलमति फलिताफलमढकार ॥विण ॥ वर्ष ॥ जेगहन्यो परम्मीनु न्यागरी महोद शीनातपानेने ते दमाणापण शा इतम परित्रयों जीन्न यपाया सफज यांवाना वृक्षमरियागानन पा वनिता अपि यगमा माक कुलयुगल विदधति सुपताक ।। नामां मुघग्निमचिनराक ॥ दर्शनमपि तमुस्तविपाकाविणा॥ नीरे मोरारीन पानीने पाताना माविन्यतया समग कर शांतसुधारस. २६७ लोने यगनी सुपताकके ध्वजाकरेठे एवीस्त्रीयोनो पुण्य परिपाके करी प्राप्तथ येर्बु जेदर्शन ते पण पुण्यरुप धनमुंज संपादकठे ॥ ६ ॥ तात्विकसालिकमुजनवतंसाः॥ केचन युक्तिविवेचनहंसाः॥ अलम कृपत किल नुवनानोगं । स्मरणमनीपां कृतशुन्नयोगविण॥७॥ अर्थ ॥ खरेखरा सत्वगुणने धारणकरनारा सजनलोकोना मस्तकना नूपणस मान बने जेम हंस दृध तथापाणीनो विवेचनकरेठे तेनीपरें युक्तियेकरी विवेचन नाकरनारा एहवा जे सर्वोत्कृष्टप्राणीने ते पात्रणेनुवनने शोजायमान करवाने तत्परते तो तेवापुरुपोनु स्मरणकरवु ते पण शुनयोगनो करनारथाय ॥ ७ ॥ पति परगुणपरिनावनसारं ॥ सफलय सततं निजमवतारं । कुरु सुविहितगुणनिधिगुणगानविरचय शांतसुधारसपानाविणाना इति श्री शांतसुधारसगेयकाव्ये प्रमोदनावनाविनावनोनामचतुर्दशः प्रकाशः अर्थ ॥ हे थात्मा एपूर्वोक्तरीते परनागुणनो विचार कर, एहिज जेमा सार ने एवं था तहारो पोतानो अवतार तेने तुं निरंतर परनागुणो स्मरणकरीने सफ लकर तथा शुधगुणोना निधि एहवाजे मनुष्यो तेना गुणोनुं गायनकर अने शां तसुधारसयुं पानकर ॥ ॥ इतिश्री शांतसुधारसगेयकाव्ये प्रमोदनावना वि नावनो नाम चतुर्दश प्रकाशः ।। मालिनीरत्तप्रियममशनपानप्राप्तिवांगविदस्ता स्तदनु वस नवेश्मालंकृतिव्यग्रचित्ता. ॥ परिणयनमपत्यावाप्तिमिडि यार्यान्सततमनिलपतः स्वस्थतां क्वास्सुतीरन् ॥ १ ॥ अर्थ ॥ हवे कारुण्यनावना नावे प्रथमतो यशनपान प्राप्तिकरवानी हा ये व्याकुलथयला तदनंतर वस्त्र घर अलंकार इत्याटिकोनी प्राप्ति करवाने विपे जे मनुचित्त व्ययययुठे तेवारपठि जमकरवानी श्ता तेपठि पुत्रपुत्री प्राप्त करवानी चा थने इंडियार्थजे पांचइंडियोना त्रेवीस विपयोतेप्रते वनार एहवाजे संसार वासी जीवो तेकेवारीतें स्वस्थ थाय ॥ १ ॥ शिखरिणीदत्तं ॥ नपायानां लदैः कथमपि समासाद्य विनवं नवा भ्यासात्तत्र ध्रुवमिति निबध्नाति हृदय॥ अथाकस्मादस्मिन्विकिर ति रजः क्रुरहदयो रिपु रोगो वा नयमुत जरा मृत्युरथवाशा

1६G
श्रयं ।। को क्रोधेकरी दग्धथयाथका देषकरे कोई परस्पर हृदयमा मगर
धग्ने केटलाफ कोश्ना रुथ्यानठता स्वठदपणे इव्य स्त्री पशु वेत्र गाम इत्यादिको ने/
सारीने व्यामृत्यायने तो हो सु करिये थने सु बोलिये था जगत तो अन्यत/
या पतति । तया ततो निप्क्रमण तु दूरे ऽधोट प्रपातापिरमति
य। प्राणीगन पोतानहाये पाडापादीने तेमा एपीरीत पडनेक करीm/
नर बारनार नयी पटनो नडोपाडो खोदने ॥ ४ ॥ जे नास्तिकादिक यार
पीने प्रमादनो यन्यामारनाग दोकरी दग्धथयीने निगादाविरुमा पुकारसा
या नियत पणुनमाठा एदना महा गकारी उखाने सांसेने ताहाहा इनिप/
नं ना मन पर्श करतीनपी तेप्राणीना खो सीरीते दृरकीयें तना
शांतसुधारस
अर्थ ॥ हे प्राणी तुथा जगतमा लक्षावधि उपायोफरीने कोइपणरीत ऐभा
ता मेजवरी जन्मोजन्मना थन्यासेकरी तेदनाउपरज मनने स्थिर राखेने पर एना
उपरतो एयोयनतर जे थकस्मातिक र हृदयवत शत्रु किवा रोगप्राति नय
श्रया मृत्यु एटलावाना धुलनाखे ॥२॥
स्रग्धरात्त ॥ स्पर्धते केपि केचिद्दधति हदि मियो मत्सर
को पदग्धा युध्यते केरुप्या धनयुवतिपशुक्षेत्रपजादिदेतो।
केचिल्लोनाल्लनते विपदमनुपद दूरदेशानटंत ॥ किं कुर्म
कि वढामो नृशमरतिशतैर्व्याकुल विश्वमेतत् ॥ ३ ॥
पा ने बाजी कोलोनेरी पतियोगिताका दूर देशांतरांना रन
शेरदा मेरो व्याकुन ॥३॥
उपजातियत्तत्रय ॥ स्वय सनत स्वकरण गर्तान्मध्ये स्वय तत्र य
नं ॥४॥प्रकल्पयन्नास्तिकतादिवाद मिट प्रमाद परिशीलयत
॥ मना निगोदादिपु टोपदग्या उरंतसानि दवा सहते ॥५॥
पनि ये नेय दिनोपदेश न ममलेश मनसा स्टशति । रुज
फयाराग्मयापनंयाम्नपामपायम्वयमक एव ॥ ६ ॥
प्रगों नमायो नीनवुनो दृग्ग्ा परतु उनटो नीचनीच जपहबु तनु
गन कटनी पहनानी ॥ ५ ॥ जैनाणीहितोपदेश साननतोनयी धन,
भ
प्रासाप तेयागनना नोरमा रहेने ॥६॥

शांतसुधारस. अनुष्टुव्वृत्तं ॥ परःखप्रतीकारमेवं ध्यायति ये हदि ॥ लनंत निर्विकारं ते सुरखमायतिसुंदरं ॥ ७ ॥ अर्थ ॥ जेप्राणी पूर्वोक्तप्रकारे वीजाना 5 खोनो प्रतीकार हृदयमा धरेने करी जेना परिणाम सुंदरथाय तेने निर्विकारी सुख प्राप्तथाय ॥ ७ ॥ ॥ पंचदशनावनाष्टकं रामकुलीरागण गीयते ॥ हमारो अंबरदेदुमुरारी एदेशी ।। सुजना नजत मुदा जगवंतं सुजनानजत मुदा नगवंतं ॥ध्रुवपदं॥ शरणागतजनमिद निष्कारणकरुणावंतमवंतरे ॥ सुज ॥ १ ॥ थर्थ ॥ सजानो था जगतमां कारणविना टयाना पालनारा घने जे पोताने .रणे श्राव्यो तेनीरदाना करनारा जे जगवंतठे तेने तुमे हर्पकरी नजो॥ १ ॥ तणमुपधाय मन. स्थिरतायां पिवत जिनागमसारं॥ का पयघटनाविकृतविचारं त्यजत कृतांतमसारं रे॥ सुज ॥॥ अर्थ ॥ एकमात्र पोतानो मनस्थिरकरी जैनागमना सारनुं पानकरो बने कृत्योमां कुत्सित मार्गनी घटनाये करी थापणो विवेक विकारवत थायठे एवा यसार निंदानिक कल्यनो त्यागकरो ॥ २ ॥ परिदरणीयो गुरुरविवेकी भ्रमयति यो मतिमंद।सुगुरुवच सकटपि परिपीतं प्रथयति परमानंदं रे ॥ सुज ॥ ३ ॥ श्रयविचारितगुस्नो संगमूको केमके जे गुरुयो मंदबुद्धिवंत पुरुपोने चांति सहि त करे यने मुगुरुना वचनो जो एक वरखत सांजव्या तोपणपरमानंद उत्पन्नकरेते ३ कुमततमोन्नरमीलितनयनं किमु पृच्छत पंयानं॥ दधिबुध्या नर जलमंयन्यां किमु निदधत मंधानं रे ॥ सुज० ॥ ४ ॥ अर्थ ॥ कुमतरुपी बंधारेकरी जेनी थांखोढकाइ गयली तेवाप्राणीने मोद गनो रस्तोसुं पूq हेलोको तमे दहीनी बुधिये पाणीनेविपे मथनिकाने केम वोठो केमके ए पाणीमाथी कांड मारवण निकलवान नथी ॥ ४ ॥ अनिरुद्धं मन एव जनानां ॥ जनयति विविधातंकं ॥ सप दि सुखानि तदेव विधत्ते॥ आत्माराममशंकं रे ॥ सुज॥ थे ॥ पोतानुमन पोताने स्वाधीन न राख्यो उता तेहिज पोताने नानाप्रकार थर्थ ॥ माटेहे नव्यो विनयविजयजीना कहेला अथवा पिनयेकरीने कहना था ग्रथमाहेला वाक्यो तेने एक नियमें करी एटले तदाकार वत्तिय करी वरावर ध्यानराखीने सांननो ए वचनो सानलवाथी उत्तरफलनी प्राप्तिथवाना कानविष निर्ममनिनिरम्यारम्येश्येष्टिते कस्यकस्यतविभिस्तूयते रुप्यते वा॥9॥मिथ्याशसवीरतीर्यश्वरेण रोक्षु शेके न स्वशिप्यो जमा लि ॥ अन्य कोवा रोत्स्यते केन पापात्तस्माटोदासीन्यमेवात्मनी २७० शातसुधारस. नाउ खो उत्पन्नकरे थने तेहिज मनपोताने स्वाधीन राज्योलता श्रआत्मारामन निगकपणे विविध प्रकारना सुखथापेठे ॥ ५ ॥ परिदरताश्रवविकथागौरवं मदनमनादिवयस्य ॥ क्रियता सावरसाप्तपदीन ॥ध्रुवमिदमेव रहस्यम् रे॥ मुज० ॥ ६ ॥ अर्थ ॥ हे सङनो तमे थाश्रव थने विकथानुजे गौरवपणु तथा अनादिकानल मित्रजे कामदेव तेनी साथ मित्रतानो त्याग ना करीने सररूप सन्मित्रकरो ए हिज एक गुप्त तत्वले ॥६॥ सह्यत इह कि नवकातारे॥ गदनिकुरबमपार ॥ अनुस रतादितजगज्पकारं जिनपतिमगढकार रे॥सुज ॥७॥ अर्थ ॥ हेजीब था ससाररूप अरण्यमा रागपादिक अपाररोगना समुहने तु सोसेले तेनो त्यागकरी ने जगतना उपकार करनार अने ससारीनीवाने रात क्षेप मद मत्सर इत्यादिक रोगोनो निवारणकरी निरोगताना थापनार एहवा तीर्थंकरदेवरूप श्रीपधनी सेवनाकर ॥ ७ ॥ शृणुतेक विनयोदितवचन नियतायतिदितरचनं ॥ रचयत सुकृत सुखशतसधान शातसुधारसपान रे ॥सुजणा॥इति श्रीशातसु धारसगेयकाव्ये कारुण्यानावनाविनावनो नाम पचदश प्रकाश। श्रीशातसुधारस गेयकाव्ये कारुण्यनावनाविनावनो नाम पचदश प्रकाश पचापि शालिनीरत्तानिधाता यस्मिन् विश्रम सश्रयते रुग्णा तिं यत्समासाद्य सद्यालय रागोपविपिरोयादौदासीन्य सर्व दातत्प्रिय नालोके लोका ननिस्वरूपा निन्नेनिन्नै कर्म श्री प्री

२७१
शांतसुधारस.
नं ॥३॥ अतोपि प्राज्यशक्तिस्पृशः किं धर्मोद्योगं कारयेयुः प्र
सह्य ॥ दद्युः शुद्धं किंतु धर्मोपदेश यत्कुर्वाणा उस्तरं निस्तरंतिा।
तस्मादौदासीन्यपीयूपसारं वारंवारं हंत संतो लिहंतु ॥ आनंदा
नामुत्तरंगत्तरंगेर्जीवनियनुज्यते मुक्तिसौख्यं ॥ ५ ॥
अर्थ ॥ हवे सोलमी माध्यस्थ नावना नावे जेमकोप्राणीने थाकचडेलो
होयते प्राणी विश्रांतिनास्थानक विश्रांतिलेते तेमज उदासीनता जेठेते संसार
रूप अरस्यमा ब्रमणकरनारा प्राणीने विश्रांतिलेवानुं स्थानको अने जेनेजो
रोगीपुस्प तत्काल प्रीतिवंतथायठे एटले गमेतेवा रोगेकरी पीडितहोय तथापि
जेने उठासीनता पणुं प्राप्तथयु तो तेने ते रोगनी व्याधि कांऽपण जाणवामां न
धावता उलटो हर्षवधेठे बली जेनीप्राप्ति राग अने परूप शत्रुनो रोधकरवाथी
यायचे एहवीजे उदासीनता ते श्रमोने सर्वकाल प्रियठे ॥ १ ॥ थाजगतमांना
लोको अंतरना प्राश्येकरी मर्मनानेदे निन्ननिन्न कर्मकरी श्रने रम्यारम्य व्या
पारेकरी निन्ननिन्न स्वरूपवंतवे पण वधाप्राणीनी एकप्रति तो नथीज तिवारें
हवे विधानपुस्पे केनीकेनी रम्यारम्य चेष्टा उपर संतुष्टयाएं किंवा रुटथा, अर्या
त् विधान पुरुपेतो सर्वप्राणी उपर संतुष्ट थथवा रुटनयता समदृष्टीज राखवी
जती ॥ २ ॥ जूधोकेश्री वीरनगवान पोते तीर्यकर उता मिथ्यासहित वोलना
रो पोतानो शिष्य जमाली तेने स्थाशक्यानही तो बीजो कोण कोऽने पण पाप
थकी रंधीराखनारठे माटे उदासीनपणुं राखतेहीज थात्मानु हितकारी एम
जाण ॥ ३ ॥ जुधोके श्रीतीर्थकरदेव धन्यंत शक्तिना धरनारहता तथापिते
कोइने बलात्कारेकरी धोयोग करवाने प्रवर्तावताहता केसुं ते तो जेणेकरीन
व्यपुस्पो सुन्तर संमार समुश्माधी तरी पारपामे एहवो केवल शुरुधमनोज उपदेश
मात्र श्रापताहता ॥ ४ ॥ तेकारणे हंसत्पुरुषो तमेवाग्वार हसहित श्रीदासीन्य
तारुप मारनूत अमृतनो धास्वादनकरी के जेथकी जीव यानंटना बहेनाग मो
जाफरी नहित मोदसुरव नौगवे ॥ ७ ॥
॥ पोडशनावनाष्टकं प्रनातिगोग्ग गीयते ॥ यादरजीवक्ष्मागुणधादर ॥ एदेगी
अनुन्नव विनर सदासुखमनुनव ॥ औदासीन्यमुदारं रे ॥ क
शलसमागममागममार ॥ कॉमितफलमंदारंरे ॥ अनु० ॥१॥

रीसनही निष्फल लोकोउपर सतापकरी पोताना सुरखनो लोपकांकरेचे ॥३॥ लाक मूर्ख सूत्र त्यजीने बोले केटलाक उत्सूत्र नापपकरेने एवीरीतना के तेतु कमजोतोनयी केमके जेप्राणीने जेवी नवितव्यता तेना मननो पति पण तेहबोजने तो तेतहाराथी चारडे एटले तहागथी वारीशकाय तेमन दपरिणामं ॥लनसे सुखमविराम रे ॥ अनु० ॥॥ परब्रह्मप १७३ शातसुधारस. परिहर परचितापरिवारं ॥ चितय निजमविकारं रे ॥ वदति को पि चिनोति करीरं ॥ चिनुतेऽन्य सहकार रे ॥ अनु० ॥३॥ अर्थ ॥ वली विशेष प्रकारे मायस्थपाणु नावे हे नियतु सर्वशन धनुनबकर जेम बारित पदार्थो थापवामा कल्पवृक्षमुख्यचे तेम गठित मादन खनी पमाडनारी अने सर्वशास्त्रोमा महोटी सारजूत एहीजे उदासीनता तनुज तुसेवनकर ॥ १ ॥ थरेजीव तु बीजा विकारीपदार्थानी चितयनाना करावनागणे ताहरो परिवार तेनोत्यागकर यने पोताना श्रविकारि स्वरूपनु चितनकर ॥ ३॥ योपि न सहते हितमुपदेश ॥ तउपरि माकुरु कोप रे ॥ निष्क लया किं परजनतप्त्या ॥कुरुपे निजसुखलोप रे॥ अनु० ॥ सूत्र मपास्य जडा नापते ॥ केचन मतमुत्सूत्र रे ॥ किकुर्मस्ते प रिहतपयसो यदि पीयते मूत्र रे ॥ अनु० ॥ ४ ॥ अर्थ ॥ जोपणको हितकारी उपदेश सानतो नयी तोपण तेनाउपर के नारा जोनिर्मलपाणीने मूकी लधुनीतनु पान करवालागा तोतेने यमेमुकरिये ।। पश्यति किन मन परिणाम निजनिजगत्यनुसार २॥ येन जनेन यथा नवितव्य तभवता चार रे॥ अनु० ॥५॥ रमय हृदा हृदयगमसमता ॥ सरणु मायाजाल रे॥च्या वसि पुजलपरवशतामायु परिमितकाल रे॥अनु०॥ ६॥ यर्थ ॥ हेजी पोतपोतानी गत्यनुसार सर्वजीवोनामननो परिणाम जूब माटे हृदयने थानद थापनारीएवीजे समतातेने मनमा धारणकरी यानद थने मायाजानने त्यागकर व्यर्थ पुलने परवश काथाय केमके तहारोमा रिमितकालने एटले प्रमाणसहित तेनेनटता वारलागसेनहीं ॥ ६ ॥ अनुपमतीयमिट स्मर चैतनमतस्यामनिरामचिरजीव धिः . है ने । शांतसुधारस. २७३ गामनिदानं ।। स्फुटकेवलविज्ञानं रे ॥ विरचय विनय विवेचित झानं ॥ शांतसुधारसपानं रे॥ अनु० ॥ ॥ इतिश्री शांतसुधार स गेयकाव्ये माध्यस्थ्यनावनाविनावनो नाम पोमशः प्रकाशः॥ अर्थ ॥ हेनन्यो तमे मनमा रहेनारं श्रानंदन कारण एहवं अनोपम उदा सीनपणारुप तीर्थनु स्मरणकरो अने जे कोकालेंपण विराम पामतानथी एहवा मोक्षसुखपामि चिरकाल स्वतपरिणामेरहो ।। ७ ॥ अने परब्रह्मतारुप परिणामोनुं जे निदान तप विद्वानने जे प्रगटकरेठे एहQ विवेचननुंकरनारंजेमा ज्ञान एदवा शांतसुधारसर्नु पान ते हे विनयतुं निरंतरकर ॥ ७ ॥ इति श्रीशांतसुधार स गेयकाव्येमाध्यस्थ्यनावना विनावनोनाम पोडशः प्रकागः॥ स्त्रग्धरावृत्त ध्यं ।। एवं सनावनानिः सुरनितहृदयाः संशयाती तगीतोन्नीतस्फीतात्मतत्त्वास्त्वरितमपसरन्मोदनिजाममत्त्वाः ।। गत्वा सत्त्वा ममत्त्वातिशयमनुपमां चक्रिशक्राधिकानां सौख्या नां मंतु लदमी परिचितविनयाः स्फारकीर्ति अयंते ॥१॥ जुानप्रेतपीमा प्रनवति न मनाक् काचिदसौख्यस्फा तिः प्रीपाति चित्तं प्रसरति परितः सौख्यसौदित्यसिंधुः ॥ दीयंते रागरोपप्रनतिरिपुनटाः सिदिसाम्राज्यलहमीः स्याछ श्या यन्महिम्ना विनयशुचिधियो भावनास्ताः श्रयध्वं ॥३॥ अर्थ ॥ हवे श्रीविनयविजयजी उपाध्याय श्राग्रंथ समाप्तकरीने उपदेशरूप पोताना पानिप्रायनुं कथनकरेते यावीरीतें पूर्वोक्तप्रकारें सन्नावनायोनी सुगंधिये जेनाहृदयमा संशयरहित गायनकरवाथी तार्किककाचे स्पष्ट आत्मतत्वजेणे अने जे ना मोह निशा अने ममत्व तुरत नाशपाम्या के एवाप्राणी ममतानुं अतिशय पणुं मूकीने चक्रवर्ति तथा इंज्ञटिकोनासुखोथकी पण अधिक एवा विनयधरनारा थ नुपम सुखोनी पुष्कल कीर्तिवंत समीने पामेठे ॥ १ ॥ जेहना महिमायेंकरी उर्ध्यानरूप प्रेतनीपीडा लगारमात्रपण थातीनथी पण कोइएक थपूर्व थ६६ सी रख्यनी वृदियायवे अने चित्तप्रीतिवंतथायवे अने यात्माने चारे वाजुथी सौरव्य दृ तिनी नदीपसरेठे वली रागपिरुपशत्रु दीपयजायते सिद्धिरूप साम्राज्यलक्ष्मी ।

विजयेन।शानसुधारसनामा सदृष्टोनावनाप्रबोधो ऽया थर्थ । तेमा कीर्तिविजय वाचकना शिष्य श्रीविनयविजयजी उपाध्याय तेरो | वीसना वर्षे श्रीगांधार नगरमा श्रीविजयप्रनसूरिना प्रसादथकी हर्पसहि शांतसुपारस नामा नावनानो प्रबोधकरयो ॥४॥ या प्रयत्न सवत सतरम उपजातिरत्त ॥ यथा विधु पोडशनि कलानि सपूर्णतामेत्य जग, त्पुनीतापथस्तथा पोडशनि प्रकाशैरय समग्रे शिवमातनोतु॥६॥ ग्रथपण सोनकतारुप सोलप्रकागेकरी जगतनु कल्याणकरोएवोमहारोबाशीवर थर्थ । जेम चश्मा सोलेफलाये पूर्णतापामी जगतने पचित्रकरेचे जेम था, ते॥ तावत्मतामेतदपि प्रमोद ज्योति स्फुरघाड्मयमातनोतु॥णा ज्यवारत्त ।। यावजगत्येप सहस्त्रनानु पीयूपनानुश्च सदोदये अर्थ ॥ जेकानपर्यंत जगतमा चश्मर्य उगेने तिहांसुधी जेमाप्रकाशमान । * इति श्रीमन्महापाध्याय श्री कीर्तिपिजयगणिशिष्योपाध्याय श्री 8 शांतसुधारस. वशथायवे एहवीजे लावनायो तेने हे नव्य लोको तमारी दिन दियश्ठता ते नावनाधोनुं थाश्रयकरो ॥ २ ॥ पथ्यारत्त ॥ श्रीहीरविजयसूरीश्वरशिप्यो सोदराव धौ॥ श्रीसोमविजयवाचकवाचकवरकीर्तिविजयारयो। श्रर्थ ॥ श्रीहारविजय सूरीश्वरना शिष्यवेनाइहता तेमां एक सोम. क श्रने बीजा कीर्तिविजयवाचक ॥ ३ ॥ गीतिक्ष्य ॥ तत्र च कीतिविजयवाचकशिष्योपाध्यायविनय शिखिनयनसिधशशिमितवर्षे हर्पण गधपुरनगरे ॥ श्री विजयप्रनसूरिप्रसादतो यत्न एप सफलो ऽभूत् ॥५॥ सफलथयु ॥ ५॥ णी मपरप ज्यातिने एह या शास्त्र सत्पुरुषाने शानद थापो॥" ग्निनियगणिविरचिते शांतसुधारसमथे पोमरा हित समाति पकानात स्तोत्र. २७ ॥ अथ श्रीजिनप्रनसूरिकृतचतुर्विंशतिजिनस्तवनं ॥ पात्वादिदेवो दशकल्पदा यस्मादध धीत्येहितदानविद्याम् ॥ अपूपुजन् यचरणौ नखालिव्याजेन नूनं नवपन्नवः स्वः ॥ १ ॥ गत्या विजित्य विरदं स्वसेवां चिन्ह बलाचश्वदचीकरद्य. ॥ यम्योदये हव्यनुजा नृणां वो बनूव नूमा चुधि सोऽजि तोऽव्यात् ॥ २ ॥ सद्यः स निद्याभवसंनवं वः श्रीशंनवो यस्य पितुर्जितारेः ॥ रा जाधिराजत्वजुपोपि सेनापतित्वमेवानिमत बतानूत् ॥ ३ ॥ जातोपि यः संवरत स्वयं यदजीजनत् संवरमभुत तत् ॥ स कीशकेतुर्जितमीनकेतुर्जितोऽनिनंद्यादनिनं दनो वः ॥ ४ ॥ सुलनं मेघनवस्य यस्य मुक्ताफलस्येव न दर्शनं के. ॥ चाव दात सुमतिं तमार्याः सर्वश्रियामाश्रयमाश्रयध्वं ॥ ५ ॥ न नेजिवान् वक्रगति क दाचित् नचातिचारं सततं च सौम्य ॥ पद्मप्रनः शोणतनुप्रनोपि नव्यश्रिये को पि धरांगजन्मा ॥ ६ ॥ पृथ्व्यां प्रसूत. सुमनोनिरर्यः सुपर्णकातिर्वदुकव्युपास्यः ॥ श्रेयःफलश्रीर्जयताउदयस्कंधः सुपार्श्वगुरपास्ततापः ॥ ७ ॥ चंप्रनोऽव्यात् वपुरं गुजारालिगितांगीजनता यदीयः ॥ प्रसेननिर्वाणरमाविमुक्तकटादलदस्तपितेव जाति ॥ ७॥ नावाहवे पुप्पशरं विजित्य नश्यध्वजं यो मकर गृहीत्वा ॥ आरोप यन्नदमपदे ध्रुवं स स्वनृत्यतां मे सुविधिविधेयात् ॥ ५ ॥ पित्रंगदाहप्रशमेन नाव दाहप्रमाथेपि खलु स्वशक्ति ॥ यजिझपनगतोपि विज्ञान् यस्तं स्तुम शीतलमत शीनं ॥ १० ॥ श्रेयान् श्रिये दोहटि मातृरुवात् गर्नस्थिते यत्र महार्हतल्पात् ।। उयंतरीक्षक प्रणनाशमोहराजाय पूत्कर्तुमिवाहितोत्थः ॥ ११ ॥नव्यांगिनां यस्य रुचिप्रपंचरंगानि चेतांसि च रंजितानि ।। स वासुपज्यो जगदेकपूज्य. संपूज्यतां नि र्जितउर्जयारिः ॥ १२ ॥ दमानर धर्तुमशिक्षितांकठलेन सेवां प्रतिपंद्य यस्मात् ।। धत्ते ततस्तं स किलादिकोलः कांपिढ्यजन्मा विमलः स जीयात् ।। १३ ॥ अनंत जिन्नंतुरनंतसौख्यप्रदोऽस्तु दोस्तनितरिवारः ॥ यत्नांठनं श्येनमपि प्रदृश्य विश्व स्य नश्यंत्यथ वर्तिकोधाः ॥१४॥ पापानिजमुदीदय दीप्रं यन्त्रणं नक्तिचिकीरु पेतः ॥ तदंशशंकी मुद्रालुलोके शक्रः स्वपाणिं स घिनोतु धर्मः॥१॥ अरातिरम्ये प्यनरातिरम्ये सन्नानियोगेऽपि दृढानियोगे॥ चके स्थिता यस्य सुख जयश्री. स पातु वः पंचमचक्रवर्ती ॥ १६ ॥ वागं ध्वज यम्य तनी विलोक्य तत्प्रेमतो हव्यनुजा ध्रुव यः ॥ सर्वांगमालिगिसुवर्णवर्णनाः सुपरदनात्स मुदेऽस्तु कुंथुः ॥१७॥ सुदर्शना । जन्मदीदा ज्ञानापवौरसववासराणि ॥ जैनानि नाकायितनूतलानि नाम तीर्याधिनाथा प्रथयतु सेवाहेवा किना ते कुपथप्रमाथं ॥ २६ ॥ कुवादिवत्राशि || हातरान्न प्रयोगघकातिरल निरेतु ॥ यस्मितपत्यस्ततम समूहे श्रीवीरसिहानगर रिनिरीडिता जिनवराश्चतुरुत्तरविशति ॥ नरतवर्षनवा नुवनेश्वरा स्वरससिदि स्या करे राजति पुमरीक सा नारती यतु वाठितं व ॥ २७॥ इति निननन् । २६ स्तोत्र. जात इति प्रसह्य वेद व्यधाद्यस्तमस खवृत्ते ॥ पितु कम पानयितु स्तान्न कलासप्टिवरूङिनोर ॥ १७ ॥ यस्य प्रिया नो निहितारि. ७ यो न पपी नदीन ॥ निस्तारकामा नयमालयस्यो नव्य श्रिये कुननव समलि. ॥ १५ ॥ यस्यागरोचि पटल समतात्प्रसृत्वर नृगकुजानिराम ॥ is वास साझामावदिषा नदतु सुव्रत्तोऽसी ॥२॥ यलोचनस्पर्मिविधेविदित्वा सापराधं जगदेकनाथ ॥ यो लमलक्ष्याचरण श्रितो झारु नानोत्पलेनास्तु नमः स नूत्यै ॥ २१॥ यक्ष्क्रयोगात्सुनग विदन् स्व महाशयोत्पन्नतया रुता । बुरकिमिपात्सिपेवे त नेमिमध्येमि यप्रकाड ॥ २२ ॥ यदेहदीप्ति नार । प्रना चिर चारुनिनालयत ॥ नर्मव्यकोटिं घटयति दृष्टे शिष्टा थनिष्ट त पार्थ ॥ २३ ॥ प्राच्य विमोच्यास्पदमुद्भवात्प्राक् स्थानांतरे रोपितवान् हरि । प्राचोकसत्सङ्गुणशालिनूय यम्याधमन्यान्नमता से वीर ॥ २५ ॥ जयंति गाना लोकप्रमदप्रदानि ॥२॥ यदाप्तवान शिरसानिव सुमेरुरक्षाजनि गोत्रमुरुम । स जीयात् ॥ २७ ॥ व्यामोहनूपालवर जित्य तस्मापत्ति तु सितातपत्र ।। ख वित्तरतु न ॥ २॥ इति श्रीचतुर्विंशतिजिनस्तवन समाप्तम् ॥ ॥ इति श्रीचतुर्विशतिजिनस्तवन समाप्तम् ॥

आस्तिक नास्तिक संवाद. 190 ॥श्री वीतरागायनमः॥ atr ॥ अथ श्री आस्तिक तथा नास्तिफनो संवाद प्रारंन ॥ १ नास्तिकः-या जगत अने तेमांना पदार्थो सर्व शून्यते; एने ससलानां शीगडां, प्राकाशनां फूल तथा वांजणीना पुत्र वगैरे जे पदार्थोनी त्रणे कालमा सिम ना यती नयी. तेवा पदार्थोनी उपमा देवाय. कदाच तमे कहेशो के, जेम शशगूं दिक देखाता नथी, तेम ए पदार्थो पण देखाया न जोश्ये. तेम तो नथी. जग ततो प्रत्यद देखायचे, तेने ए उपमा केम देवाय; प्रत्यक्ष प्रमाणवडे सिम पदार्थ शुन्य केम कहेवाय ? एनो उत्तर ए के, जे ए पदार्थोने देखे , ते त्रमिष्ट . जे पुरुपने 'नम थयो होय, तेने एकनु बीजु नाशे; तेम तमने पण थयुं कहेवा शे. तमे ए दृष्टांतोनो मर्म समजी शकता नथी, त्यारे तमारा ध्यानमा सहेज था वे एवो वीजो दृष्टांत कहूं तु ते सांजलो; या लगत स्वप्नसमान वे. जेम स्वप्न अस त्य वे, तेम जगत पण असत्य वे. अने स्वप्नना पदार्थानी पते या जगतना पदार्थों पण असत्य वे. जे देखाय ते ते स्वप्ननी पठे व्रम मात्र : एमां संशय नथी. श्रान्तिकः-थरे नास्तिक, हूँ तने एटझुंज पुलु बु के तारा सिद्धांतनो कहेनार जीव ठे के यजीव वे, एनो उत्तर ताराथी गुं देवाशे ? जीव अथवाघजीव कह्याविना चाल शेज नही. जो तुं कहीश के ते नमरूप , तो ते एक रीते व्यवहार दृष्टीए योग्य कहेवारो खलं, केम के जे पोते नमरूप होय तेने वधुं नमरूप नाशे. जो एम हो य तो अमारो कार्ड बांधो नथी; पण हो तारो सि-हाती भ्रमरूप तरो नही, तो जेवो तरशे तेवा वीजा पदार्थो पण कबूल करवा पडशे; बने कबूल करयाविना चालनार नथी; केम के,वीजुं वधु नमरूप होय थने तारो सिक्षांतीज मात्र अन्त्रम होय एम संनवे नही. त्यारे एक सिक्षांती ने एक सिक्षांत ए वे पदार्य मानवा जोइये . ए वे पदार्थ जो तुं माने, तो जीव थने यजीवपणुं सिद्ध थाय वे के नहीं ! एवी रीते जगतमां पण घटपटादिक जे वस्तु ने ते वस्तुज ने धवस्तु नथी. तेमज घट ते घट ने, ने पट ते पट . घट पट नी, ने पट घट नथी. एक पदार्थमा वीजा पदार्थनो अनाव होय , पण घट घटपणे नावरूपें ; ने पट पटपणे ना वरुपें ने. इत्यादिक सर्व पदार्थो विपे जाणी लेवु. जे नावरूप होय ते सत्यज होय या जगत जावरुप होवाथी सत्य वे. केम के सर्व वस्तु पोतपोताना रू वे

No text on this page.

No text on this page.

नजगलवार तपातानामा श्वरपद जन मिश्रादरे ५ नाति भने माटे गैर जेना म नवी आपणे लिवान ने धोना रजत नियमित गादिकने व वात को पेला पाय । रहित , तो चेतनजदणात जीवने नूतथी उपनो कहिये ते युक्त नयी पाच महानृतना असथी तो मात्र शरीग्नी उत्पत्ति थाय ते प्तिक- ए यात पण कल्पित वे यद्यपिजीविपे तो तारा सारा पिचार र , तयापि जहागुधी जिनोक्त वचनजन्य ज्ञान नथी ययु, तहासुधी सर्व मि र जीपने भायत जाण्यो तेथी शु थयु कोई अजाणना मुखयकी ना मुग जेग तादृदय यदोनो अचानक उच्चार याय तेथी शु तेने तेना क नि घार तेम त जीपने शायत जाण्यो तेथी शु सम्यक्त झानगान के । नदी नही थने शरीर पर महानूतोथको उत्पन्न याय , घमन्य ने शरीग्नी उत्पत्ति तो पुनाथकी थाय वे बीजा सवादमा यस्या पनि महानायो कही ते पण मिय्याने, केमके, अस्थि जे वे ते एवी नपी.पण एपीना जेग कवण ने स्थीर ने तेजलनो यस नथी, पण जन भावपुराग पाप ने,जठरानिजे ने ते थनिनो श्रश नथी, पण अग्नीनीप 7. मायाग जे ते यापुनो श्रश नथी, पण वायुनी पत्रे पुरुपनो शिरा सरात ते पागल नाजन ने. तेम वतां गरीर पचमहाभूतोयको उत्पन arम करतो तो परमतानृतोमाना पृथ्वी, आप, तेज थने यापु ए पो मत पाप नव्यादिकपण जीवरुप चे, श्रने तेश्रो शरीर समकालीमाटी राजीरन ने मादेज तेमा वनस्पति उगे ले, अने जेदार पाने नेमा वनपनि मन यता नयी तेमज पंच महाभूत ते सां नपानिपने,माटे जा जगत नपजवानां कारण ए पाग ताना पागमदानाशायी पेदा थया कहेशो ? माटे एनायी शरीर - गाना। भानि गना नही जी थने जद पने पदायाची जग नाम जानु दादा, यागम अगम अगाधरत, ज्ञान साह्या नर । वन पिना ता.लह चाह फन तेद ३ न नायग्ना श्रमयी नत्पन्न थायने एम जणाय ने - बनायायायापोने याममापने सस्ने बरनवन पाम यानि नेता कर्मनेप सहित गमयाब मगर ग ने माणगंग रहित वे ते सन्मादिकसहितकमयाय ने त्रि र ने मदत कम पारarcा मृदना जगनमां का नयीज प्रशाना कार यदा'मट पग्मभाने ना मिथ ने पायापर ममी शान्तिान नात्र सनदे को ने,पणा (पनो नपी म तो पाय। नही लोक माग अमित आस्तिक नास्तिक संवाद. ने जगत वाशी जीव थयो. केमके सर्व मतमतांतर वाला परमपदनी वांछनाये तपोताना मार्गनी क्रिया करे वे. पोताना यात्माने निलेपपणुं चाहे वे तो स्वर ईश्वरपट जन्म जरा मरण रहितपणुं पामीने वली जन्ममरण सहित उपाधिप केमाटरे वे? माटे ए तमारा वचन विस्६ जणाय वे. ५ नास्तिकः-- कांई नवी युक्ति कहाडीने वोले वे. था वीजायोनी मति तो मार गई माटे गमे तेम बके के.जीवने कोई शाश्वत कहे , ने कोई अशाश्वत कहे ठे. वगैरे जेना मनमां जेम थावे ते ते तेम महोडेथी वोले वे. पण मर्म को जाणतो नथी थापणे प्रत्यद धनुनव करेलुं वे ने यांखे देखीए वैए के जीव पदार्थ उत्प त्तिवान वे, ने कोईक समये तेनो अंत पण थाय . स्त्रीपुरुपनो संयोग थयाथी ते श्रोना रज तथा वीर्यथी माताना उदरनेविपे गरीररूप एक पिम बंधाय , ने पठी नियमित समये तेमां चेतना शक्ति आवे ठे, तेने जीव कहे . वली गरीर का रो गादिकने वश मरण पामे वे, त्यारे जीव पण तेनी शाथे नाश थाय ठे, ए प्रत्यक्ष वात . दाथना कांकणने श्रारी शासास जोये. माटे जीव पदार्थ कोकालें न वो पेदा थाय ठे, तेथीजीवनी श्रादि वे एम जणाय ठे. थास्तिकः-नाई, तुं तो वली वधायी दाह्यो देखाय ! चेतननी उत्पत्ति तथा नाग संनवे नही. कर्मना वो जीवने जन्मांतर थाय ते, तेथी नवं शरीर धारण करे वे; पण जीव नवं यतुं नथी. वली शरीरनो नाश ययाथी जीवनो नाश पण तो नथी. जीव तो वीजा शरीरने धारण करे . तेम उतां जो वधारे याग्रह करी , तो था माग प्रश्ननो उत्तर थाप के, जीव कई वस्तु पलटीने तेमांथी उत्पन्न च' यथवा कई वस्तुनो परिणाम ? केमके कारण विना कार्यनी उत्पत्ति थाय । एवो नियम ठे; एटलुं समजाव्या ठतां पण जो नही मानीश, तो तुं पोते जीव पण जड ठो एवं ठरतो. त्यारे जटनी साथे कोण मायाकृट करे ! नास्तिक-- कटाच जड वन्तुनो परिणाम जीव घने जीवनो परिणाम जट ने, एम कहीए तो काई दोष थावे के ? अघटितपटनापटीयशी माया ठे, ते धु संनवे ते माटे थमे तो एम मानीए ए के, जड वस्तु बदलीने तेथी जी त्पत्ति थाय वे. स्तिक-नाई, ए तमासं बोलतुं फेवल थविचारनु ने, एम तो कोई थशानीप नार नयी जे जड वस्तुथी जीवनी उत्पत्ति याय; एक वनाववाला पदार्थ - स्वनाववाला पदार्थीनी उत्पत्ति थाप नही एवो नियम . जेम के, मा आस्तिक नास्तिक सवाद. - पिमथकी पट थाय नही थने तंतुना पुजयकी घट थाय नही तेम अजीवची, उत्पन्न याय नही यने जीपथी यजीव उत्पन्न थाय नही जे थचेतन हाव नड कहे यने जे चेतन होय तेने जीव कहे ते ए बने पदार्थ परस्पर स्वनावे जित , तेम उता जड वस्तुथकी जीवनी उत्पत्ति कहेवी, एना जेरी बीजी मूर्ख ईले । शु कोईक एवो मसालो दशे के जो ते जड वस्तुमा पडे तो तेमाथी चेतन याय ? एवी काई चीज तमे शोधी कहाडी होय तो थमने देखमावो नी। मारे ए बनरूप धारु हृदयमाथी कहाडी नाखो, ने गुम धर्मने अंगीकार करो दोदा धर्म जन जे लहे, ते पामे पद मोक्ष,प्रगट वस्तुने मूकिने, कां जन चमे परोद । - नास्तिक - स्वबदीना जेवी मुखमुश करीने बोलवा लाग्यो के, जीवने लागे ले के नही ? ए विपे विचार करयो जोइये थमारा मतप्रमाणे जी कर्म लागतां नथी यास्तिक - तमे तो वली वधाना शिरताज थया जणाधो वो पण कर्मविना बनतुज नथी, एम मान्याविना चालशे नही कर्मने तो सर्व अंगीकार करे इमा कोई वाधो कहाहे एवु नथी. जो कर्म न होय तो पापपुण्यनु फल घडू नोइये, ते तो प्रत्यक्ष दीनामा थावे , जेणे पाप कसु ले ते 5 खी ने, ने - पुण्य करयु रे ते सुखी ठे, बली जो एम होय तो, दान, ध्यान, स्नान । पूजा प्रमुख जे सहर्म , ते सर्व मतवालायो शासारु करे ? तमारा के चमाणे तेनु फल तो काई थनार नथी, पण ते गुन कर्म जाणीने लोको था ले ज्यारे कर्म नथी त्यारे जन्म धारण करवानु शु प्रयोजन ? माटे जाज मरण तथा मुख रस , सो कर्म पण होवा जोइये कर्म ने ते जीपने रज -वे रागादिकथी वधाय डे, ने नोगव्यापठी बुटे ने जहानगि कर्म ने तहान ससारी जीव कहेवाय ने, कर्मोनो क्ष्य थवाथों मुक्त थयो कहेवाय ने माटे मारे निश्चय मानवु जोश्ये वे के जीरने अवश्य कर्म लागे ने दोहा, कर्मथकीया पने, सुग्य ईख सघला थाय , सत्य शुनागुन जेहया, शफल थया कहेवाय नास्तिक -तमे कहो तो के, जीवनयातर को थावाने श्राहि अपजे . बरे एक नवनी यात वानमा करतो ना जोनवातर होय तो ते स्मृति जरुर थी जोश्ये, ते तो कोने पण थती नथी त्यारे नवांतर ते एम उपरथी समजाय? थास्तिक -थागजा नवनी स्मृति थती नथी ते उपरथी नवातरनोधनाव ले ए आरितक नास्तिक संवाद. १३ स्वरूपे . म जाणवू नही. यागला नवनी बात तो रही, पण या नवमांज मद्याटिक पढ़ा थना योगे, गया दिवसनी बात पूवाथी माणस बराबर कही शकतो नवी जु यो के, कोई मनुष्य ताडनादिकना योगे मूवान थयो होय, कोई पुरुषे सुगपान कायु होय, अथवा निसावश थयो होय, त्यारे गया दिवसनी स्मृति रहेनी नथी; तेनुं कारण मद्यादिक पदार्थोनुं श्रावरण ते तेम जीवने डानावरणी कर्मना उदयथी पूर्व नवना वातनी स्मृति यती नथी. बली जेम था जवमांज माताना उ दरमां नाना प्रकारना दुःख सहन करेला होय, ते वात जन्म्यापठी कार्ड कही गक तो नया; तो नवातरनी वात केम कही शके ? माटे नवांतरनी वात तो विशेष ज्ञा नीविना बीजो कोई जाणी शकेज नही. एम समजबु. दोहा, कानावरणी कर्मयीन वविस्मृति या जाय: विशेष ज्ञानी कहि शके, पूर्व जन्म महिमाय ६ ए नास्तिकः-अनिमानयुक मुश करीने वोले -तमे एम मानो टो, के जीवने कर्मनो लेप लागे .ने वली एम पण कहो गे के, जीव वास्तविक गु६ ने. त्यारे जे शुद्ध होय तेने लेप केम लागे? माटे जीव गुरुज तेने कोई कर्मनो लेप लागतो नयी एम मान, जोश्ये. थास्तिकः-टुकामांज समाधान करे ने के, यद्यपि जीवनुं वास्तविक स्वरूप गुड़ ने, तथापि जुनान कर्मने योगे तेने लेप लागे वे; तेथीज जीव बंध कहेवाय ठे घने जेने कर्मनो लेप नथी, ते मुक्त कहेवाय वे. मुक्ति तो सिमता पान्याविना संन वेनही अने जहांसुधा मुक्तिनो धनाव ठे, तहांसुधी बंधनी कल्पना अवश्य कर वी जोश्ये. ते बंध जीवने अनादि कालथी चाल्यो श्रावे . जेम धानने गेलाज होय तेम जीवने कर्म थने कर्मजन्य गरीर लागेलुंज होय . जेम था नने तूस लागवानुं कारण ठोतरां होय ते. तेम जीवने कर्मबंध लागवानुं का रण मिथ्यात्व तथा रागपादिक होय वे. जेम धान्यमांथी तूत तथा तत्संबंधी टो तरारुप बंध हेतु पदार्थना अनावथा शुद्ध कण देखाय वे: तेम जीवमाथी मि य्यात्व तथा राग देपादिक कर्मबंध हेतुनो अनाव थयाथी शुक्ष निर्मल थाय के.जेम अनाजनो शुरु थयनुं दाएं उगे नही. तेम जीवपण गुह निर्मल यया थी जन्ममरण पामे नही. दोहा, कर्म लेपना योगयी, बंध जीवने होय; कर्म खपे मुक्ती लहे, जन्म मरण नहि कोय. छ १ नास्तिक-समा विचारमा पडेला जेवी मुाथी बोलवा लागे .कर्म पोते तो जड पदार्थ . तेथोनो जीवनी साये स्वतंत्र संबंध संनवे नही. कोई पण प्रेरक होवो तूस सा राप मा,पति मानासि यश नही तेम कर्मादिक जड पदापायी। एम पद अग्ना राय यया पिता जेम पुननी उत्पत्ति कर तम/ मात्र मानी होता जाय तम तोदीमामा यानुनयी कोई सुग्वीकाजी រ 8 आस्तिक नास्तिक सवाद जोये माटे ईश्वरेवायी जीवने कर्म वध थाय , थने तेज प्रेरक वे एम जाणवू थास्तिक - लगारेक हास्य करीने वोले 'ईश्वरे पोताना थशरूप जीने उन्पन्न करावे तेथी जीव वरनो यंग कहेवाय, ए उपरथी जीव तथा ईश्वरना श्रगाशीनार सबर तमारा कहेवा प्रमाणे रे जोवर यश के एम मानीए नो पग्ना जेयो जीत होवो जोये केमके, थांयशीमा जेद होतो नथी तेथीश्वर नो पवे जीर पण निर्मत , एम मानवु जोये त्यारे एवा निर्मलस्वरूपी जीवन रमे जगाडीने मतसहित करवानु कारण छ हतु थापणे कोई शुद्ध वस्तु वाप गगाने श्रयं ज्यारे लावीए वैये, त्यारे जहासुधी बने तहासुधी तेने मजीन करक देता नयी, थने सद्य राखवानो घणो प्रयत्न कखा करीये डे त्यारे पोताना घर कप जीपने जाणी जो ने मेज लगाडवु ए ईश्वरनेवि सनये नही एम तो को मागरण मृर्व मनुष्य पण करे नही, त्यारे ईश्वर ते तेम करे। अने जे पोता ना यगनो तिरस्कार या नाश करे ते यात्मवाती कहेवाय तेम ईश्वरपण वाग्मगती करेगगे कदाच तमे एम कहेशो के, रिपोते पण कर्मफन कसहित ने ग्यारे जे पोते कनासहित दोय, ते बीजानो कलकणु मटाडी शकवानो हतो यो ने यर पणशाना माटेगमे ते मना करीने निदापी ईश्वरने दोर लागु या फेटली मूर्यता । माटे इथरनीशायी कार्ड पण थतु नय. ज पाप व ने कर्मयी थाय एम जाण दोहा, कर्मवय या जीपने, ईश्वर SHI, एम ते मृर्ग ने, ईश अकीय थनृप १ मिश्रा जगतनी जे तरचना देखाय ठे, तेनो कर्ता काई पण हातो पm जानती न पनि सनोनही माटेप ने, तनज श्या महिप, बने जीनामपदता पण ने, के जगत स वर सत्य ने दमर जगननी कना पर दाय, तो साप्राणीमात्रनु इयर शरण सामग्राम मानेरा जाये पुजनी उपर पितानो प्यार दाय मानात स्तक नास्तिक संवाद. नी वर्तणुक जुदी जुदी दीवामां आवे वे. एम केम की वे ? वली जगतन वोने प्रवर्तावनारो ईश्वर के, एम पण तमारा कह्या उपरथीज सिद्ध थाय ने. हिंए गायनी पूजा करवी, अने म्लेते तेनो वध करवो, ए बुद्धि पण ईश्वरे पी कहेवाशे. जो एवी बुद्धि देनारो ईश्वर मानशो नही, तो बीजो कोई मान जोज्ञो. केमके तमारा मत प्रमाणे प्रेरणा करनारो कोई जुदोज होय : घने प्रेरणा करे वे ते ईश्वर ने. त्यारे ते वीजो प्रेरणा करनारो ईश्वर मानवो पडशे ईची रीते ईश्वरनो ईश्वर तेनो ईश्वर इत्यादिक मानशो तो अनवस्था दोष प्राप्त य गे वली पोते पोताने 5.खी कोई पण करतो नथी. सर्व पोताने सुरखनी चाहना करे वे. तेमज पोताना संबंधीयोविपे पण सुखनी चाहना करे वे. तमारा केहेवा प्रमाणे तो जे जीव नरके जाय तेपण ईश्वरनो अंश, अने जे स्वर्गे जायचे ते पण ईश्वर नोज अंश से. एटले सुखी तथा फुःखी थाय ते सर्व ईश्वर पोतेज ठेएम तयं. ए प्रमाणे इश्वर पोतेज संसारमा परित्रमण करे. ते पोताना सेवकनां जन्म मरणाटिक 5.ख केम टाली अके! अने जीवोने नरकथी यथवा वीजी कुगतिथी केम बचावी शके ? इत्याटिक विचार करतां जगतनो कर्ता ईश्वर नथी; कितु स्वानाविक सि-वे. दोहा,ज ग कत्ती वर कहे, ते विधान न होय; ईश्वरने कर्तव्यनहि, स्वनाव सिहज जोय. ए १२ नास्तिक - जगतनी उत्पत्तिकर्ता नले ईश्वर न होय, एमां दुं कगो वांयो सेतो नथी. पण ईश्वर सर्वव्यापक वे के नही ? थास्तिक - जो वर सर्वव्यापक होय, तो जीव शिवाय वीजो कोई पदार्थ न होवो न जोये. केमके, ईश्वरतो चेतनवत ; ते सर्वमा व्यापक होय, तो चेतना 'ना कोई जगा खाली न जोश्ये, के जे ठेकाणे वीजो पदार्थ रदी के बने गतमां तो जीव यजीव पदार्थी जुटा जुदा दोठामा आवे वे. एयी स्पष्ट सिम य के, ईश्वर सर्व व्यापक नयी वली ब्राह्मण, त्रिय, वैश्य तया गुह, ए वर्ण अनुक्रमे श्रेष्ठता तथा कनिष्टता केम पाम्या ने ! जेम के,ब्राह्मण सर्वथी तेनाथी क्षत्रिय कनिष्ट, क्षत्रियथी वैश्य, थने वैश्यथी गुड कनिष्ट ठे, थने । कनिष्ट चंमालाटिक जाति ठे, तेथोमा श्रेष्ट कनिष्टता न थी जोश्ये. के श्वर तो सर्वमा एक घने समान वे; तेमां उत्तम मध्यमता प्रमुग्व संनवे पने उत्तम मध्यम तो प्रत्यक्ष दीनामां यावे ते. वली वीजा पण उदादर क , जेम के. कोई पुस्प गुन कृत्य करे . ने कोई पुस्प अशुन रुत्य क न यवु जोऽये वर तो वधामा व्यापक ठे, तेथी गुनागुन सत्य माना + १७६ आस्तिक नास्तिक सवाद रु करे वे ? ए उपरथी एवो निश्चय याय के, ईश्वर सर्व व्यापक नयी टोहा व्याप क वर जे कहे, तेह न जाणे मर्म, नमें नूच्या सर्व मत, बिना एक जिनधर्म १० १३ नास्तिक - ईश्वर सर्व व्यापक हो के न हो, तेनी साथे यमारे जरूर नथी, पण था जगतनो अधिपति ऽश्वर ठे, यने जगतरूप तेनु ऐश्वर्य , तेथीन ईम रताने पायो वे जे यश्वर्यवालो होय तेने ईश्वर कहिये श्रान्तिक - जगतनु थाधिपत्य लेगानु ईश्वरने शु कारण हतु थने जगत रुप श्रुवर्य पण तेने शासारु जोतु हतु । शु जगतनी उत्पत्तिनी पूर्व ते अधर्य ने पाम्यो न हतो ऐश्वर्यविना ईश्वरता सनवे नही ए उपरथी जे जगतनी उत्प निनी पू थनीवर हतो, ते उत्पत्ति करीने ईश्वरताने पाम्यो , एवो तमारा थागय जणाय वे नही वारु । पण ए वधुं खोटु ईश्वरनेविपे एवी क पना परतीज नही जोये जुथो के, तमारा कहेवा प्रमाणेज जेम प्रजानी थपेदाप गजा कडेगय ने, थया धननी अपेक्षाये धनाढ्य कहेवाय ठे, तेम जगतनी अपेक्षा गर कहेवाय ने एटले जवारे जगतने नजाने वारे जगतनु घर पाप न्यानो पण नाप जियो जाये जो एचात कबूल करो तो जे का पाणु परिये, यो जगतनी पूरे ईश्वर न हतो एम थयु, थने जेवारे जगतनो प्रनय पातमा होप ने कोई काजमा न होय ते क्षणिक कहेगाने जो कणिक मानशो ता पीना पणा दोर प्राप्त पशे. माटे यरने जगतनो एवी ते थपिपति कहेगो ने योग्य नपी दोहा, थपिति जगनो जे कहे, ईश्वरने मतवादि , ते एकात पनिट में, मुनम थनेक पादि ११ १४ नाम्निा - बाटना मवाद यया, तेश्रोमा ईयरनु यथार्थ कारणपण कोष का नयी जगतनी उत्पनिनी पूर्व परने एपो साप थया के, मार माम गट कर, ए पात वेदमा कही ते यावी रीते - “एकोह बढुष्यामि एजे एक हु बहु प चाउ एा कारणया जगतना उत्पनि करी दे, तेथीभ ग्ने काममा यामिक - पानानु मामयं प्रगट करपानी या तो तेने थाय के, मान होप भग्नो मर्वत ने, ते शु पातानु सामथ्र्य जाणता नहातामा गमा रेनु मामय ने, राजेने माय होय, तर गानो । साधारण मनु पीपानानु मामयं नाणी गातो र कम न जाणी गा' जननि आस्तिक नास्तिक संवाद. २७. . माटे एम कहे ते मूर्खता ने. दोहा, निज समर्थने जाणवा, कयुं ईग जग एह: कारण वादी जे कहे, शतमूरख ने तेह. १२ १५ नास्तिक.-- ईयरे पोतार्नु सामर्थ्य बताववा सार जगतनी उत्पत्ति करी ठे, एम जाणवू जोऽये. श्रान्तिकः-- कोने बताववा सारु जगतनी उत्पत्ति करीते जीव अने जड प पार्थो तो ईश्वरेज उत्पन्न करवा ने, एम तमे कहो तो. त्यारे वीजो कोण जगतनी पूर्वे हनो के, जेने देखाडवा सास ईश्वरे या जगतनी उत्पत्ति कर ले ! माटे ए बात पण असत्य ने. दोहा, बीजाने देखाडवा, पोतानुं सामर्थ्य, जग उपजा एं इन्वरे. एम कहे ते व्यर्थ. १३ १६ नास्तिक - जेम माणस सवारमा उती वस्त्राटिक पहेरीने प्रारीसामां पोतानुं प देखे वे; ते सारं देखाय तो आनंदित थाय , तेम ईश्वर पण पोते पोतार्नु प जोवासारु या जगतरुप शृंगार करी पोतानुं रूप विस्तारीने देखे ठे; एम गर्बु जोश्ये. यान्तिकमाणस पोतान रुप धारीसामा जुवे ठे, तेनुं कारण ए के, मारु रूप देखा नही, तो लोको दागी करशे, अथवा कोई खोड काहाडशे: तेम ईश्वरे कोना नययी पोताना रुपनो विस्तार करयो वे ? ईश्वरना जेवो बीजो ईश्वर नही; त्यारे जोनारो कोण! माटे ए वात पण जूती वे. दोहा, पोते जोवा रच्यो जगत था ईश: कोना नयथी ते कहो, मतवादी तजि रोश.१४ नास्तिक - "एक एवहि नूतात्मा, नूते नूते व्यवस्थितः; एकधा बहुधा चेव. नल चंवत्" एवी रीते आत्मा एक ठतां सर्व प्राणीमात्रमा जुदो जुद वे ठे: जेम चंइमा एक उतां यनेक जलस्थानकोमा प्रतिबिंव रूपे मां यावे ठे: तेम म्वर एकज वे पण घट घटमां जुदो जुदो देखाय र विव ते ने सर्व जीव प्रतिबिंब वे एम जाणवू. 5.- जेम एक चश्माना अनेक प्रतिबिंबो होय , ते जेवो चश्मा खाय . तथा काचना जुवनमा एक मनुष्य उतां अनेक प्रतिविव i श्रावे वे. तेमां मूल धारूतिथी जुटी आरुति देखाती नथी. यी ते पूर्णिमागुधी गमे तेवी चंइमानी थारुति होय, तेवो प्रतिबिंव या काच नुवनमां मनुष्यनी जेवी यारुति होय तेवीज तादृश्य दे गो होय तो काणो देखाय, यांधलो होय तो आंधलो देखाय; वगैरे . सनार धोवी तेम पोतानायतरनो मल टालनार थात्मा पोते ने जेम वस्त्रन सानु करी मल टले ठे, तेम जीवने गुनध्यानेकरी कर्मरूप मल टले ने जेम वस्त्रने अमि. त होय तेने कर्म लागे, पए कमरहित होय, तेने नवा कर्म लागे नही जेम सूत्रका तनारी नाडी काते, तेमाथी थोडी वाकी रहे, त्यारे तेनी साये वीजी वनगा GG आस्तिक नास्तिक संवाद बिंबना जेयोज प्रतिबिब देखाय के तेम पर सर्व प्राणीयोमा सरखो देवानी नथी कोई सुखी, कोई 5 खी, कोई पापी, कोई पुल्यवान वगैरे अनेक प्रकारे है। खाय रे त्यारे ईश्वरना प्रतिबिंब केम संनये? जे प्रतिक्वि होय, ते विवना जवाज होय तेम तो ए नथी चली जेम चश्मानो उदय थता प्रतिरिव पण तेन र खते उत्पन्न थाय ने थने चश्मा थम्त थयाथी प्रतिवित पण मटी जार ने तेम ईश्वर अने जीपोनेविपे थतु नथी पर उत्पत्ति नाश रहित वे, तेम जीव पण होवा जोये ईश्वर जेम थक्रिय , तेम जीर पण कर्मपिना हाग जाय जेवो बिव तेवा प्रतिबिंब होया जोये तेम तोवर ने जीव नथी, माटे चबिंब नो दृष्टात सर्वथा असत्य ठे, केमके सर्व जीव पोताना कर्मोदयथी उनम मध्यम पणु पामेवे दोहा, बिंब अने प्रतिक्विता, वर जीव प्रमान, चइ विवचन ए नही, तेथी सत्य न जान. १५ १७ नास्तिक - जीप वर्णादिके करी सहित , एम मानवु जोये आस्तिक - जीव वर्णादिके करी रहित , श्रने चेतन लक्षणवत , थने कानु रातु, नीनु, पीनु, तथा धोनु ए पांच वर्ण, सुगधि तथा उगंध ए वे गर, तीयु, डबु, कशाययु, खाटु तथा मीत ए पाच रस, शीत, उल, निग्ध, तूर, करकश मृङ, गुरु, तथा लघु ए आठ फरस, अने परिममत, व्रत, त्रयांश, चरस तथा नो श्राकार शरीरने श्राश्रये जेम पाणानाकर जलाशययी जणाय ने आयतन ए सस्थान प्रमुख सर्व जड पदार्थना गुण , ते चैतन्यमा नथी चेतन तेम चेतननो थाकार पुनलथी जणाय ठे १ए नास्तिक - जीव कर्मोने केम ग्रहण करतो हो वारु' थास्तिक - जेम वस्त्रना तंतु ते वस्त्रना यश , तैम जीयना प्रदेश ते जीव ना यश ठे, जेम वस्त्रातर्गत ततुना सूक्ष्म तंतु तेमजीवना पर्यायडे जेम वस्त्रना वरण तेम जीवनु सदलण ने जेम वस्त्रने मेल लागवानु कारण, तेमजीवने मिथ्या त्वादिक हेतुये रागद्वेषयाश्वे कर्मरूप मेल लागवानु कारण ने जेम वस्त्रनो मतदा .

आस्तिक नास्तिक संवाद. २तए , पण पहेली होयज नही, तो तेनीसाथे वीजो संबंध साथी करे ! तेम जीव प | अनादिनो कर्मसहित ठे, अनादि जीवनुं एहवून स्वरूप चाव्यु थावे ; माटे नहांशुधी कर्म सहित ने तहांधी नवां कर्म पण ग्रहण करे वे ; पण प्रथमयी अमुक खतेज जीव नवां कर्म ग्रहण करी कर्ममल सहित थयो; एवी आदि नथी. २० नास्तिकः--जीवने कर्म क्यारे लागांवे? कर्म लागवानी कोई पण श्राद्य तोय जे पदार्थनो अंत थतो होय, तेनी आदि पण होवी जोये, ज्ञान करी क लौनो अंत थाय ठे. एम तमेज कहो ठो. त्यारे श्राद्य पण कबुल करवी पडतो; ते यादिनो समय कह्यो तेरवशो? केम के. जीव प्रथम निर्मल होय तोज तेने फर्मरुप मन लाग्यो कहेवाय. श्रास्तिकः--ए वचन दूपण सहित ते. केमके, जीव प्रथम ज्यारे निर्मल हतो त्यारे तेने कर्म सागवाना परिणाम केम यया ? जे निर्मल होय ते पोताने मल सहित थवानी रक्षा करे नही. तेम उतां जीवे कर्मोनी वांठा केम करी? माटे जीव अनादिनो कर्म सहित . जीवनेविपे कर्म स्वनावे अनादिसिम ने. टोहा, श्राटि जीव निर्मल हतो, पछि वलग्यां वे कर्म; एम कहे ते ना लहे, जिन वच नोनो मर्म. १६ २१ नास्तिकः--सर्वमा व्यापक थात्मा एक वे; थने शरीरो जुदां जुदा ठे; एम मानवु जोइये. थास्तिक-जो वधामां श्रात्मा एक होय तो माता, पिता, स्त्री, पुरुप, नाई, वेन, पुत्र, राजा, प्रजा. चोर, साहुकार, चंमाल, क्षत्रिय, उंच, नीच, नरक, देव ता, पुण्यवान, तथा पापी इत्यादिक निन्न निन्न केम देखाय ? सर्वमां यात्मा एक होवाथी तेज देखायुं जोये; अने एके कोधेनु पाप सर्वने लागवू जोश्ये: ते मज एके कीधेला पुरस्थना सर्व नागीदार थवा जोश्ये; एकना मुक्त थयायी सर्व मु क. थवा जोश्ये; प्रत्येक माणसवें जुडं जुडं अनुष्टान निष्फल थर्बु जोऽये; तेम तो यतुं नथी जे करे ते नोगवे ; ए कहेवत प्रमाणे वधाथात्मा निन्न जिन्न दे खाय ते. माटे सर्वमा एक धात्मा व्यापकपणुं कहेवु ते समीचीन नयी; एम जाणवू. दोहा. यात्म सर्वमा एक वे, जिन्न निन्न था देह; एम कहे एकांत म त; असत कहीजे तेह. १७ " नास्तिक.-सर्व कार्य यने धकार्य इश्वरनी नारूप : थने वग्नी 5 साथीज सर्व थाय वे; एम जाणवू जोश्ये.

. . . ने ,तेने नूत कहिये नूतनो तो कोई काले वेद थतो नथी,माटे एथस्तित्वमा नूतनो यश तो सनवे नही, तेम थाकाशादिक पच महानूतनो यश पण कहाँ | नथी ते जीप पूर्वीपार्जित कर्मे करी शरीर बाधे रे ते जस पुद्गलनु ग्रहण नूतनु काई प्रयोजन नथी, नूत केवी वस्तु ? जीव वे के जड रूपी थाय ने ए पिपे काई विचार करीशकातो नथी,माटे नूत ए शब्दज व्यर्थ ने 'नायी जीपनी उत्पत्ति केम मनाय । दोहा, जीव ऊपजे नूतथी, ए मत ठेवा २५ नास्तिक -तमारा कह्या प्रमाणे जीवने नवातर थाय वे नवनी प्रालि | मानुसार वे जेवां कर्मी कखां होय तेवा नयनी प्राप्ति थाय ठे गुन कर्मनु म २० आस्तिक नास्तिक संवाद. थास्तिक -जो एम होय, तो जन्म धारण करवामां मातापितातुं शु ' अने विप खाधाथी मरण पाय , तेमा विपद् सु वांक ? जनथी तुधानी निवृत्ति, पाणीथी तृपानी निरनि, अग्नियी शीतनिवनि, ली तापथी खेदोत्पत्ति, वर्षाथी धान्योत्पत्ति, पयो वरोत्पत्ति, नम्रताथी त्पत्ति, चोरी कयाथी ताडन, यारी थकी निर्सङ, पापयकी नरक, स्वर्ग, इत्यादि सर्व कारणो भने कार्यो व्यर्थ थशे थने सर्व वस्तुयो स्वगुण कहेवी जोशे राग करनारो स्नेही नही, तेम क्षेप करनारो वैरी नही कहेवा.. पकार प्रति उपकार करवानी काई जरुर रहेगे नही अने पाप पुण्य यो केम के, सर्व कार्य करवानु मूल कारण एक श्वर ना थई, माटे सर्व अंध र श्वारूप , एम कहे ते समीचीन नथी तमारा कहेवा प्रमाणे पुण्य कर्ता पण ईश्वर अने नोक्ता पण ईश्वर थयो दोहा, ईश्वर चारूप था, व जगमाहि, एम कहे गुणता टले, सारासार न काहि १७ २३ नास्तिक - यात्मा पच नूतो थकी थयो , ए वात धसत्य नथी, साची वे, एवु अमने जणाय वे आस्तिक नूत शब्दनो अर्थ त्रणे कालमां अस्तित्व थाय वे एटले जे वे शकाय नही वली पाच नूतना अकरी शरीरनी उत्पत्ति थाय , त्यारे थने चेतना कह्या अशी उत्पन्न थया माटे जूत शब्द ए भ्रमजाल के चिदानद ज्ञानरूप यात्मा तो शाश्वत ते कोई समये जूनो तथा नवा था तेमा रूप, जीर चिदानंद सत्य , यनादि नाव अनूप १५ M घ N आस्तिक नास्तिक संवाद. २ जीवने एक खंडमां गरीर मूकीने वीजा खममा वीजें शरीर धारण करवु पर्छ एटलो दूर जतां तेने केटलो वखत लागतो दशे ! अने कोई जीवने एक श र मूकी तरत तेज गाममां उपज, होय, तेने कांई दूर जq पडतुं नथी, तेथी ई वधारे वखत लागतो नही हो, पण जेने दूर जवु पडतुं हो तेने रस्तामां सिता वधारे करवत लागतो हो नी ! आस्तिकः-- नजीक अथवा दूर नवांतर करवामां वधारे वखत लागतो नथी; रखोज वखत लागे . जेम पाणी, रहेंटीयो अथवा वारपुं इत्यादिक ज्यारे रे ते. त्यारे तेयोना माहेला तथा बाहेरना नागने फरतां सरखोज वखत लागे यद्यपि अंदरनो क्षेत्र योडो होय वे, ने वाहेरनो घणो होय ठे; तथापि फरतां खतमां वधघट थत्ती तथी. वली जेम दीपकने शलगावीए ते दणमांज प्रकाश रेने. वचमां कोई अंतर पडतो नथी; तेम जे वरखते एक नव मूके के लागलोज जो नव पामे :तेमां लगार पण अवकाश रहेतो नथी. ते नव पठी देश रण करवो होय, के नजीक देशमां धारण करवो दोय, गमे त्यां नव धारण कर वामां वखतनो वार फेर थतो नथी. २५ नास्तिकः-जीवने कर्म केवी रीते लागे वे. आस्तिक-यात्माना गुनागुन परिणामथी जीवने कर्म लागे . जो गुन 'रिणाम होय, तो सारा कर्म लागे वे; अने थगुन परिणाम होय, तो नरशां म लागे वे. घने तेनां फल पण तेवां थाय ते. कर्मने का ज्ञान नथी, जे पाजीवे पाप कर्तुं माटे हुँ एने पापरुप कर्म थर्ड लायं. २६ नास्तिकः कर्म तो जड वे तेथी तेयोमा हान शक्ति नयी ल्यारे जीवे नर ॥ अथवा सागं कमी कम्याथी पाप अथवा पुण्यरुप परिणाम केम थाय वे ? { परिणाम तो झानविना याय नही. तेथी एवं जणाय ते के कर्म लागवामां ग्वर हेतु दे. कर्म करवापणुं जीवने , ने तेनुं फल देवु वरने ते. यान्तिक -कर्म लागवामां श्वरखें कोई काम नयी. कोनो एवो स्वनावज वे के परिणामने पाम. जेम कोई पुरुप विपमिश्रित नोजन करे, ते मरण पामे वे नरवु ए विपनो परिणाम वे; पण विष जम पदार्य होवाथी तेने एवं झान नथी के मने जे खाप ने, ते मरीजायते; तेम उतां तेथी तेवो परिणाम थाय के नहीं' बनी जेम कोई पुरुष मिष्टान्न जोजन करे, तेयी पुष्ट थाय वे पण ते जोजन एम नची जाणतुं के, माराथकी श्रा गरीरनी पुष्टी पाच ते. तेम लता नेनो परिणाम | श्वरना नक्तने पण सग्राम उचित नथी, तो ईश्वरने ते केम सग्राम कार्य जाति/ रवी परशे जो पाणी, पृथ्वी, तथा प्रागवम ए बधा पदार्थ महा प्रनय पया पठी पण रहे , त्यारे सहार ते शानो कस्यो कहेवाय , जो एम हाय तो / ए वगैरे विचार करायी एम जणाय वे के, ए बधा गपाटा जेना मन ३२ नास्तिक -ब्रह्मा, विष्नु, यने महेश एत्रणे सर्वज्ञ ईश्वर , एम थमे मा म मानगु तमे कह्या ते त्रणे जो सर्वज्ञ होय तो अझानने केम श्रगीसार थान्तिक-तमे गमे तेम मानो तेमाश्रमारु शु गयु अमे तो जेम होते रे' जुगरा के, महादेवे पोताना पुत्र गणेशनु माथु कापी नारव्यु तेनी सबर पा ताने केम न पडी? रावण सीतार्नु हरण करी गयो ते वखते राम सर्वज्ञ बता ४ आस्तिक नास्तिक संवाद. थास्तिक-यद्यपि तमे कहोठो के वर सर्प ने, ए पात सत्य ने तयारी ते सर्वज्ञतानी रीत काईक जूदीज से जे तमे मानो तो ते घर सर्वक नयी । मे एटलुज पूर्वीए ए के, ज्यारे इश्वर सर्प ने, सारे पोताने उस देनाग गर णादिकने तेणे शा सारु उत्पन्न कखा। ज्यारे ए राक्षसोनी उत्पनि पोते की त्यारे पोतानेज युद्ध करवु पडघु ए उपरथीज विचार करो के जा ईश्वर जाणतो होय, तो एजी नूल कम करे ? जो एम कहिये, के रासादिक प्राप्ती थो ईश्वर थकी यजाणमा उत्पन्न थया जणाय ले, तो वरनेविषे अज्ञानमा दूषण प्राप्त थशे अने जो एम कहीशु के जाणी जोऽने उत्पन्न कखा , तो. त थयो' माटे एम कहे तदन असनवित ठे ३१ नास्तिक -श्वर ज्यारे जगतनो सहार करेठे, त्यारे पोते प्रागवाना पर डापर पहोढे , धने ज्यारे जगनना उत्पत्ति करवानो सनव होय, त्यारे जाणून थाय , ए वात तो साची के नी? थास्तिक -ए वात ते वली जूनी होय पण इ तमने वह श्रधर श्राकाशमा रहे । के, पृथ्वी पर होय तेमा अधर रहे ते, एक तो तमे कबूल करशो नही, केम के तमे वली एम पण मानो ठो के, बधु थई जाय डे, ने तेनी उपर मात्र प्रागवम देखाय , त्यारे पृथ्वी पण कवून, देजा कह्या प्रमाणे पाच महा नूत तथा, प्रागवड हतो त्यारे नवु ते । जेम थाव्यु, तेणे तेम शास्त्रोमा लखी नाण्य जणाय ने. निये ये के ते प्राव जनमा तक नास्तिक संवाद. ने 1 . : पशु, पक्षी, तथा वृक्ष प्रमुखने केम पूजतो हतो? अने ब्रह्मा पासेथी वेद केम चोरी लई गया? ए रीते ब्रह्मा, विभु अने शिव अज्ञानी रे . अज्ञानी तेने ईश्वर केम कहिये? ३३ नास्तिकः-सर्व योनियोमां मनुष्य योनि उत्तम जे. एवं शास्त्रोमां क सत्य ले. अने वली अनुनव सिम पण जे. थास्तिक.-ना कोणे कडं वे ? मनुष्य योनि तो उत्तमज जे. परंतु तमे अंतःकरण पूर्वक मानता नथी देखाता. महोडाथीज मात्र कहो बो. केम तमारे तो एथकी पण बीजी उत्तम योनियो मानवी जोइये जे. जे योनिने श्वरे अंगीकार करी ठे, ते योनि तमारे पण सर्वोत्कृष्ट मानवी जोश्ये. मह, क 1, तथा वराह, प्रमुख योनिश्रोमां ईश्वरे अवतार लीधो डे; ते योनियो मनु र योनिकरतां उत्तम मानवी जोश्ये. जो मनुप्य योनिज उत्तम होय तो ईश्व पोते बीजी योनि केम धारण करे ? माटे तमारा बोलवा प्रमाणे तो मनुष्य नि करता वराहादिक योनि उत्तम जणाय . ईश्वर ज्यारे पगुमां अवतार जये , त्यारे पगुमुखी, पगुवाही, तथा पशुरूपी होय . तेने देव मानवो अयोग्य वे. आहार, अम्ति, थायुध, असवारी, तथा धावाश ए पांच पदार्थ वरना नक्तने पण त्याग करवा कयुं तो ईश्वर पोते तेनु केम ग्रहण करे ? टे वराहादि योनि धारण करनारो श्वर मानो, तो मनुष्य योनि करता ते योनि म कहेवी जोशे; जो तेम नही कहेगो तो ईश्वरने अपमान लागशे. ३४ नास्तिक-शरीरनो त्याग करीने जीव परलोके गया पठीपागे या लोक मां केम धावतो नथी? जे ने तेने तो थाव्युं जोइये. आस्तिक.-श्रा संसारनो संबंध मटी गया पठी जीवनुं फरी थावतुं यतु न थी, तेनु कारण कर्म दे. जीवनुं श्रावq जवु कर्माधीन . ज्यां कर्म लई जाप या जीव जाय वे. घने जे जे नव पामे ले ते ते नवना कार्य करे ने. थान मा पण हमेश एक रीत रेहेती नथी जेम के वालपणानी प्रीति होय ते कोई ले मटी जाय ते. घणा काल लक्ष्मीनो संबंध उतां कोई काले तूटी जायचे. त्यारे रिय आवे ने कोई कर्मना योगे प्राणी बंदीखानामां पडे, ते वारे तेनो यन्यं नेही होय ते पण पासे थावतो नथी. कोई पुरुष एक स्त्रीउपर बीजी करे प्रथम स्वीनी उपर प्रीति रहेती नथी; अने पूर्वनो संबंध पण लूटी गया जे प्रय ते. तो पूर्व जन्मना संबंध ते कम याद यावे ? ज्ञानावरणी कर्मना यो परयीमारीरीते याची लाहतु, के जेमा पपन पण प्रवेश करी शके नही । जेतो होय, तेने कोई चामाल संमाशमा जवाने कहे तो ते त्या जाय के एक गुरु -तेम तारी दादी स्वर्गलोकमा गई , ते सेतरवाना तुय था मनुष्य राजा- एक चोरे चोरी करी, तेनो इन्साफ करीने तेने लोहानी कोठीमा या ली दीयो तेनु मुख वध करीने उपर सारी रीते कनई करावी तेमा पवन पर प्रवेश करी शके नही एवु कस्यु पठी ते चोर कोठीमा मरी गयो तेनो जीप कोठीना क्या रस्तेथी नीकली गयो तेमा तो कोई विश्दीगमा याच्या नहीं गुरु- मोटी शालामा एक पुरुपने नेरी सहित घालीने तेने चातरफ वध शैलीती होय, तेमा ते नेरी वगाड्याथी तेनो अवाज बाहार रानलाय ते ग्निा बाहार केम थारे ते? तेम जीप पण विचिना बाहार निकली जाय राना- एक चोरना कटका करी एक कुनमा में नरीराच्याहता तेनु महाड २एक आस्तिक नास्तिक संवाद. गे वीजा नवनु स्मरण पण थतु नथी ए पियने मलती प्रदेगी र शी गुरुगी प्रमोत्तररूप चर्चा ते कहूँ तु प्रदेशी राजा - मारो अधर्मी दादो नरकमा गयो , ते तमारा मत त्याथी श्रावीने मने थधर्म करतो वारे त्यारे दु मानु, के पात साची केशी गुरु - तारी स्त्रीनी साथै कोई पुरुषने कामनोग करतो तने दीगामा वे, ने ते तारा हाथमा याव्या पठी ते तारी वीनती करे के, मने थोडीक वार रङ्ग श्रापो, तो दु मारा कुटबने कही या के, कामनोग कसाथी या पुस थापरे तो ते वात कबूल करीने तेने व रजा यापीश' राजा ना तेने एक कण पण जुटो मूकु नही गुरु - तेमज तारो दोदो पण पापसचो. गुनेहगार थई, नरकमा गया पो परमाधामी तेने केम मूके ? तेथी ते याची शके नही राजा -- मारी दादी स्पेबाचारी थई, जैनधर्मने अगीकार करीने सग पाठी केम कहेवा प्रावी नदी, ने आरे तो तेने शु हरफत ? गुरु - कोई पुरुप मानकरी, कुशुम तथा धूप प्रमुख लई देवनी पूजा का दी श्वा पस करे। राजा - ना ते एवा खराब स्यले कम जाय ? कदी पण जाय नही फमा केम थावे । आलोकमा भाववानी चा पण थाय नदी - गई हो जीर ते केम मनाय' क नास्तिक संवाद, केटलाफ काल पठी उघाडीजोयुं, तो तेमां अनेक क्रम पडेला देखायां. ते विना क्याथी श्राव्यां? गुरु- अग्निमां लोहनो गोलो नाख्यो होय तेमा निविना अग्नि कम प्रवे करेने जे वस्तु अग्निमां नाखीए तेमां हि नदोय, तो पण अनि प्रवेश करे ने तेम जीवनो प्रवेश थवामां विश्नुं का काम नथी. राजा- एक चोरने में ते जीवतो हतो त्यारे तोल्यो. अने मरी गया पती पण तोव्यो; त्यारे जीव नीकली गयो उतां नारमा कांई फेर पडयो नही तेनुं गु कारण होवु जाये? गुरु:- जेम खाली मगक तथा पवनथी नरेली मगक तोती जोतां वजनमां फेरफार थतो नथी. तेम जीव वायुरुप होवाथी ते शरीरमांथी नीकली गया प जी कांड तोलमां फेर पडतो नथी. राजा-बालक धने यावनना गरीरमां फेर ते पण जीवमां कांई फेर नयी वन्ने वाणी सरवी बोल्ने ठे ने तेनुं गद पणे कानमां सरखी रीते स्वर जाय ; तेम उतां उपयोग सरखो केम यतो नथी ? युवान जे क्रिया करी गके ते बाल कथी यती नथी तेनुं कारण गुं ते कहो. गुरु - जेम जून धनुष्य होय तेथी वाणनो उपयोग जुटी रीते थाय वे ने न धनुप्य होय तो तेथी वाणनो उपयोग जुटी रीते याय : धनुष्यमा फेर होवा वाणनी क्रियामां फेर पडे . तेम वालक ने युवानना शरीरमां फेर होवा जीवनी किया सरखी याय नही एटले वल वीर्य प्रमुखमां पण फेर फारयाय वे. राजा -युवान अने वृक्ष माणशना शरीरमां जीव सरखो उतां युवाननी पठे - केम नार उपाडी गकतो नथी? गुर-जेम कावडवहे नार उपाटनारो पुरुप सारी नवी कावड होय तो वधा र उपामी शके ने, ने जूनी कावड होय तो कांक थोडो नार उपाडी शक म जीव तो तेज वे पण युवान शरीर होय तो वधारे नार उपामी गके, ने परीर थाय तो थोमो नार उपाडी के ते. ना.-एक चोरने मारीने तेना यनेक खंम कीयां, पण जीव तथा जीवना टेकाएं टीनामां थाव्युं नही, माटे जीव को वेज नही -जेम काटमा यमि रही ठे, तेम शरीरमा जीव रह्यो , ते देखाय केम? मा यमि देवाय तो शरीरमां जीव देखाय काठीयारो हमेश लाकमा ते केम समाई जाय वे' दूधशु चारे वस्तु एक देत्र अवगाही निता श्रास्तिक- जेम सूक्ष्म जीव सर्वत्र पूर्ण वे ते ज्यारे दिवो तडका पडेल घरमाना कोई विचाराय थोडोएक तडको घरमा थावे ते तडका तरकब केटला एक परमाणु जेवा दीवामा यावे ठे, ते वधा सूक्ष्म जीवो वे ते बार थास्तिक-जेम अधकारमा थाकाशनेविपे कोई पुरुष चायो जाय, वाधपणे जई शके ठे, पण वचमा जोनित आवीजाय तो पागल चनातु 'ने ते कार्यमा थपरावायक थायने. ए प्रत्यद ब्रम के सत्य तथा काई मारे, कूटे, दानदिये, ए वस्तु गत्ये सत्यठे, यसत्य अने भ्रमजाल तो स्वप्न रएन आस्तिक नास्तिक सवाद. कापे पण तेने अग्नि कोई वखते पण दीवाम थावती नयी ने ते अविन हेवानु वेकाणु पण दीगा थावतु नथी तेम जाणी लेतु राजा -मने प्रत्यक्ष जीर देखामी श्रापो के जेथी दु जीवने जाए गुरु-तमे वादर वायु कायना जीपने जो गको केतेने पण जाई शो नही तो जे यरूपी जीव ते तेने केम जोई शक्यो राजा -हाथीमा थने कौमीमा जीव केम सरखो होय । गुरु-हाथीनु तथा कीमोनू शरीर महोटु नानु वे, पण जीवमा यरिक ता नथी जीव वन्नेमा सरखो वे राजा- लोकमां जीव थने जड एक क्षेत्र थवगाही निस्तरपणे । केम रह्या । गुरु - जेम दूधनी नरेली कडाईमा साकर, एलची. थने केशर नाखी - केम रहे हैं ? एकज काणे चारे वस्तु यनिन नावे रहेजी वे एना वर्ण रस, फरश निरतर निरावाधपणेतमजीव थने जड जगतमा निरतर क्षेत्र अवगाही निरावाधपणे रह्या वे ३५ नास्तिक - सर्व लोकमा जीव नरपूर ते त्यारे देखाता केम नथी! ने जड सर्व लोकमा नरपूर वता प्रस्थने देखाय नही, कितु केवन तपना योगे देखायठे अर्थात् केवल ज्ञानीज जाणी शकेले ३६ नास्तिक - चइ, सूर्य, बाया, तप, माता, पिता, स्वर्ग, नरक जड, घट, पट, स्तन, तथा कुन प्रमुख सर्व भ्रममात्र दे, 'ज्ञानरूप - वस्तुरूप वजन - - सक.पने कहिये आस्तिक नास्तिक संवाद. ३३ नास्तिक.-सर्व जगतमा एकज वर ठे. श्वर विना वीजु काई नथी, 'जाणवू जोये. धास्तिकः-जो सर्व जगतमां एक वर होय, तो दाननो देनार पण व अने लेनार पण वर कहिये. सेनार बने देनारमा कांई नेद थयो नही. ई श्वरे पोते पोतानी पाशेयी दान निधुं त्यारे दान दीवातुं पुस्य कोने ययुं ? एयी --; दान तथा पुस्य व्यर्थ गया. वली मारनार पण ऽश्वर ने मरनार पण ईश्वर कहेवो -जोय; तो ईश्वरे ईश्वरने मास्यो तेर्नु पाप कोने लाग्युं ? धणी पण ईश्वर ने चोर पण ऽश्वर; तो ऽश्वरनो माल बरे चोयो कहेवाय, त्यारे चोरीनी तपाश शासा रु करवी जोये? पुरम्ये करी स्वर्गमा गयो ते पण ईश्वर, तथा पापे करी नरकमां गयो ते पण ऽश्वर; त्यारे स्वर्गमा पुग्यवान जाय अने नरकमां पापी जाय; एम क हेवू व्यर्थ के. ए उपरथी तमारं बोलवू श्रनिवित . जगतमा एकज़ ईश्वर वे एम जे कहेवू ते असत्य . घटघटप्रत्ये जीव जुदा जुदा , अने तेयोनी कर मी पण जुटी जुटी जाणवी. ३७ नास्तिक-घट पटादिक सर्व पदार्थोमां ईश्वर एकज वे. एम जाणवू जोये. थास्तिक:- जो सर्वमा एक ईवर होय तो जात, कुल, राजा, तथा चंडा ती निन्नता कही न जोय; कोई श्रेष्ट तथा नष्ट कहेवाय नही. एक पुस्य करे ते कल सर्वने थर्बु जोये, तेमज कोऽएक पाप कर तेनुं फल पण सर्वने यदुं जो एक नोजन करण्याची सर्वनी तृप्ति थवी जोये; एक नरकगामी थयाथी सगला न नवाजोये; एक स्वर्गगामी थयाची सर्व स्वर्गमा जवा जोये; एकनो जोग सर्वने यो जोये, कर्म जुदा जुदा नोगवां न जाये; तेम तो देखातुं नथी, जे करे ते एवं स्पष्ट देखाय ते. त्यारे सर्वमा एक ईश्वर केम कहवाय? माटे एम क समीचीन नथी; क्या जीव जुदा जुदा , एम कहं योग्य वे. नास्तिकः-वर्ग, नरक, पुरस्य, पाप, चंड, सूर्य, नदी, समुश्, दीप, नर, गर, ग्राम, तथा माता, पिता इत्यादिक चोराशी सह जीवयोनि प्रमु सत्य ठे, एयोमा सत्य पदार्य कोई नयी. का-सर्व पदार्थ तत्य दे. जजनी कुंद पण यसत्य कडेवाय नदी, तो पदार्थो केम सत्य कहेवाय ? जे वस्तु पाय त्यार थ कहेन थापळे, ए प्रति मिथ्या याय माटेश्वरना थधिष्ठितपणातले इश्वरनी शायी/ क बीजा कार्यनी उत्पत्ति थायनही जो एम थतु न होय तो कारणथी कार्य। ४ एनास्तिक- जीपने जवातर थाय खरु, पण वेदनो छेद थतो नयी पुरुष २०३ आस्तिक नास्तिक संवाद. समये पोताना कारण पंच महाभूतोमा लीन थो, ने पच महानूतो ईश्वरमा लीन थो थास्तिक -जो एम होय तो ईश्वर जड मिश्रित थाय श्रने ते समन तथा निर्मल ए वे अवस्थावालो कहेपाशे त्यारे केवल ज्योतिस्वरूपपाणु क्या गषु जे पच महाभूतोथकी जगतनी उत्पत्ति थ कहोतो ते तो सदा शाश्वत ने ते थोमा पृथ्वी, आप, तेज तथा वायु, ए चारे नृतो पोतपोतानी क्रिया करने का म के, वनस्पति घने जगम सनी उत्पत्ति करने ते क्रियापिना थाय नहीं एवी रीते तो जीवनी व खान शाश्वत सदा काल के, त्यारे प्रलय ते गानो थया' जो एम कहेशो, के पच महाभूतो जगत विनिर्मित क्रिया करता नथी, त्या ता ते नूतभव्यरूप कथन मात्रज र घने हरेक वस्तु पोतपोताना गुणविना रहे नहीं एवो नियम ले वली जो कहेशो के नूत तो धनत कालना ने त्यारे ता ससार पण अनत कालनो उरशे तेनी उत्पत्ति तथा प्रलय केम कहेगपए तो जेम ने तेमने वाली ईश्वर मनसा वाचा कर्मणा करि रहित ठे, थने एक थी अनेक थाउ एवी मननी हा यई त्यारे जगतनी उत्पनि करी ए वे वाक्य नो परस्पर विरोध में, केम के, प्रथम वाक्यप्रमाणे वर वारहित तरे डे, न वीजा वाक्यमा इटासहित कहो तो, एवो पूर्वापर वचनविरोध होवाथी तमा बोलवु सर्व थसमीचीन ने ४ नास्तिक - सर्व वस्तुनो ईश्वर अधिष्ठान ने ईश्वरनी हाथी कृत तथा यस्त सर्वे थायले आस्तिक -जो एमवे तो घट ते पट कम थतो नथी ? पण तेम थाय नहीं, केमो, घटनु कारण मृतिकानु पिम के, माया घटन यायचे पण पटादि कार्य नथी यता तेमज पटनु कारण तंतु, तथको पटज थायडे, पण घटादि रुत तथा यात सर्व थायचे ए तमारु कहेवु सर्व व्यर्थ ठे वेद ते वो वेद न थाय, स्त्रीद ते पुरुपवेद न थाय, तम स्त्री तथा पुरुष ते नपुर क द न थाय, श्रने नपुसकोद ते पुरुप तथा स्त्री वेद न थाय एम जाण श्रान्तिक -पुजतना परिणमनो नियम नथी एना पुन पुन रूपातर या आस्तिक नास्तिक संवाद. २०३ गेले. मात्र श्रवस्तुपाणं पामता नथी, वस्तुपणे गमे ते रुपे यह जायचे. जेम जैस नाशिंगमाथी केल थायठे; कागयकी सेरढी थायवे, माखीना हिंगारथकी कद तीनी नाजी थायने. एवी रीते कर्मना परिणामे गत्यंतर थायवे. श्रागामिक जव नेवि कायवेद पलटाईन त नवा नवरुप परिणमेने. जेम सोनीना योगे मुव ण नाना प्रकारना थाकाररुपे परिणामने पामेले. तेम जीव कर्मना योगे नाना विध गतियो पामेले. ते तो रघु, था नवमां पण एकसरखी स्थिति रहेती न थी.जेम के, राजा ते रंक यई जायते, ने, रक ते राजा बनी जायडे, सुखी ते . रखी, तथा हवी ते सुखवान घई जायठे. इत्यादिक था नवमां पण पर्याय पलटाई जायते; तो नवांतरमां कम एकरुपे रहे ? कर्मना बंध साहिते, माटे जेवो कर्म नो उदय तेवा फलनी प्राप्ति थायने, एविपे कोई नियम थ के नही. गमे ते वेट बदली ने गमे ते वेद कर्मना योगे थायले एम जाणवू. भए नास्तिकः-एम कयु के ब्रह्माना मुखमांधी ब्राह्मणों उत्पन्न थया, नुज थकी क्षत्रिय थया, तथा जंघा थकी वैश्य थया, माटे एत्रणे वर्ण उसमते,थ ने पादयकी गृह उत्पन्न थया माटे अधम ठे, एम जाणवू. धास्तिक.- ए वात संजवित नथी. जुवो के, उबराना वृक्ष्मां पेड, दाल, तथा पत्रनेविपे सरखो फल लागेवे. ते सर्व फलोर्नु रुप सर होय; तथा ते योमा रस पण सरखोज होय. तेश्रोमां कोई प्रकारे उत्तम तथा अधमता क हेवाय नही. तेमज ब्रह्माना भरीर थकी उत्पन्न थया जे चार वर्ण, ते सर्व चेतन रूप दोबाथी सर्व जीव सररया जाणवा. उत्तम मध्यम वगैरे सर्व लोकिक कार्य थकी कहेवायवे. पण चेतनपणे तो सर्व सरखा वे. एना उपर एक दृष्टांत कडे बु. चारे वर्णना मनुष्य एक तलावने कांवे वेशीने पाणी पिये ; तेथी कोई वट लतो नथी. पण ते तलावमांधी पाणी नरीने पोतपोताना वासयोमा लीधा पठी हलका वर्णना वासणर्नु पाणी उंचा वरणवालो माणस पीए तो वटले दे. फरी चारे वर्णना नरेला पाणीना वासपो मार्नु पाणी ते तलावमा नारवीने पी तां कोई बटलतुं नथी तेनु कारण झुं? माटे पाणीमां वटलवापएं नधी. ने वा सण तो सर्वनां सरखा वे. माटे वटलवू ए मननी मानीता वे; अने एवी लोक म यादा ठे. ज्या सुधी मननो मिथ्यानाव ठे, त्यां सुधी निन्न पणुं वे एम जाणवू. Up नास्तिक:- समदृष्टीने विपे मिय्यानाव होतो नथी, तेम वतां ते निन्न नाव केम राखे?

. ५२ नास्तिक-जो कुछ होता है, सो थलाइतालाके दुकमसे होता है, और थास्तिक - जो ऐसे होवे, तो थन्नादुताजाने पैदा किये हुये, इमामे हसन काफिरोने मारे, ये बडी थजायवकी बात है तिन बचानेके वास्ते सुदाना कावत था? इमाम किसीके गुनेहगारनी नहीं थे, वे क्यू मारे गये इमवान। जो होता है, सो तकदीरसे होता है जो जैसा करता है, तो तसा पावता है। थान्तिक-याला दिये शिवाय तिनोंके दिसकी बात खुदा नही जापता था। जो कहोगे को नही जाणताया, तो खुदाम खुदापना क्या रहा 'खुदा ता/ | सब जानता है, ऐसे तुमारे कुरानेशरीफमें कहा है एस हाके जी इमामों मारनेकी दयानत जो काफरोने करीयी सो खुदा जानकेनी कसे चुप रहा। ०४ आस्तिक नास्तिक संवाद. थासिक -लोक मर्यादा लोपवी नहीं एनीति के तेनो लोप करवो नही, जे कार्यनी जगत निदा करे ते कार्य करवो नही एबु श्रेष्टोनु वचन ने तेना पक्ष लोप करो नही तेथील समदृष्टि पण तेवु याचरण करे पण मनयकी म म दृष्टिने काइ नथी ५१ नास्तिक - सर्व कार्यनो कती वर ठे, एम मानवु जोये के नहीं ? श्रास्तिक - एम मानवु नही जोये ए वचन प्रजाप ने वरपिपे कब होयज नही घट, पट, कपि, सयाम, सान, पान, दान, मान, स्लान, किया, विनय तथा व्यावच त्याटिक सर्व पदार्योना कारण काज, स्वनाव, नि. यत, पूर्वरुत कर्म, तथा पराक्रम ए पाच ते जेम के, तंतुना पुजमायो पटनी : त्पत्ति थवानो जे समय ते काल समजवो, नतुना पुजने पटनी उत्पनि करवानी योग्यता ते सनाव लाणो, सतुना पुजमायी पटनी उत्पत्तिनु जे निमित्त यत् पूर्व कर्म समजवु, यने ततुना पुजमाया पटनी उत्पान करवानो जे उद्यम करवा पराक्रम जाणवो, ए पाचमायाँ एक ओ होय तो यस्तुनी उत्पत्ति थई शक नहीं, एपाचना समुदायथी घटपटादिक सर्व कार्योनी उत्पनि घायडे, एयूब मत जाणा किसीका किया कुछ होता नहीं, यही बात रास्त है श्री दुसन, काफिरोंके दातसे कैसे मारे गये तो खुदाकै प्यारे वदे थे, निन तामें थनादुताजाका उठ वास्ता नहीं है यही बात रास्त है ५३ नान्तिक - थलादुतालाने मामका दिल देखने के वास्ते पाजाव दियायर साम्ले ये बात नी गनत है आस्तिक नास्तिक संवाद. ០ឬ ५४ नास्तिकः- आदमी मरगये बाद जीकू फिरस्त लेजाते है ये वात तो सञ् है की नही? आस्तिकः- इस वातः कौन फूठ कहता है ? लेकीन समजमें कुछ फरक है. तुम कहेते हो की कीयामततक जीकू एक ठिकानेमें रखते हैं, पीछे खुदाके पाश ले जाके इन्साफ करवाते है; ऐसे नही होवे है. लेकीन उसीवरस्त जी अपनी त गटीरके लिये अठा या बुरा फल पावता है. तुमनी सुख, सुख, नेहेस्त यो टोज क तो मानते हो! सो जैसी जीने करनी करी होवे तेती गति उसकु मलती है. ५५ नास्तिकः-अनाहुतालाने असे फरमाया है की जो किसी• इजा देता है सो मारने लायक है. आस्तिक.- कवू मावाप ठोकरेकू इजा देते हैं, आ कबु टोकरा मावापर्व इजा देता है; कवू पीर मुर्विदकू इजा देता है, औ कवू मुर्पिद पोरकू इजा देता है; कबू नौकर खाविंदळू जा देता है, कबू खाविद नोकरकू इजा देताहै; ऐसे खुटाकी खलकतमें जहांत के जी है, वे सब इजा देनेवाले होनेते जो सव मारने लायक हो वै तो खैर महिर कैसे रहेगी ! औ रहम करने लायक को नी नही रहेगांधार इमामोकू जब काफरोने जा दी, तव तिनोळू कायके वास्ते इमामोने मारे नही इस वास्ते जो दोवै दै सो तगदिरसे होवे एसे जानना चाहिये. ५६ नास्तिक:-मांसायाहारी पापिष्ट कहे . था उनीयामां जलचर,स्थलचर, तथा खेचर प्रमुख जे नाना प्रकारना जीव , तेयोने वेशक मारी नाखवा, थने तेयोनुं मांस नहण कर. एम थमने साहेवे फरमाव्यु ले, ते प्रमाणे करवामां शुं गुनाह तथा पाप ? यास्तिकः-तमारा कह्या प्रमाणे जीवने मार ए खुटानो टुकम ठे, ते कोई ए फेरववो जोये नही. जो फेरवीए तो गुनेहगार ठरीए, एम सिह थायवे ; त्यारे कोई वाघ यथवा सिंह प्रमुख मनुप्यनो थाहार करनार जीव, तमने मारवा था वेठे, तेथी मरीने तमे केम नाशी जाधोठो ? थने ते प्राणीने नाना प्रकारना ह थीथार वगैरेनी सहायता वझे फेम मारवा तैयार यायोगे? थने जो ते जीव तमारा दावमा थावी जाए तो केम मारीनारखो तो? जेम खुटाए तमने जीव मा रवाने फरमाव्यु तेम तेयोने पण मनुष्य मारवाने फरमायं ! ते प्रमाणे तेथो पोतानुं रुत्य करेठे; तेयोने मार लायक नथी. जो तेयोने मारवा त मने लायक दीशतुं होय, तो जे जीवोने तमे मारांठो, तेथोए अथवा तेधाने वा साफ जणायने फायनादिक यस्तु खावायोग्य ते, पण मांस खावायोग्य नयी । पनी मुसलमीन प्रमुखने बीजु युक्तिथी समजावे के, तमारा किता | यने पारु यस्तु कहीने, थने पिशाबने नापाक वस्तु कहीने, पाक बमुथी । वायने जेम के.थन्न वगैरे पदार्थों जे पाणी थी पेदा यायचे. ते पार विलायचीजे कीटकादिक पेदा थायठे, ते नापाक वे एतु तमे पण मानो नामा म पानता नथी केमके मांसाहार करोवो जुश्रोके प्राणिमात्र पिनावनी ने ते पिगार ज्यारे नापाक त्यारे तेथी पेदा थयेला प्राणीया केम पास बार नाना मांसने समे पाक मानो ठो, एकेटली वेवकृफीने वार नामासन पर नशे नही जे कारण तेयो कार्य एवो उनीयामा नियम 1 पागदास, त्यारे तेनोथाहार करयाथीदोजकमा गयापिना कम राथादत हमणा जनार नथा पण पारगारr J०६ आस्तिक नास्तिक सवाद स्ते को वीजा प्राणीए तमने मारवु पण नालायक नथी, सायकज ने मारे वाय वगैरे प्राणीयो जीव घातक होवाथी मारया योग्य ने तेम तमे पछ । र घातक होयाथी मारवा योग्य तो एम तमारे कबून करवु जोजो जाम नही करगो. तो खुदाना गुनेहगार ठरशो माटे हेमहामटीयन मुसनमीनो ब" जीव मारवामां खुदानोहुकम होयज नही जो एम होय तो खुदा रहम दिलान। खुदा तो रहमदिल में, एवु तमारा रसूलिवाए कुरानेशरीफमा फरमायु ने इसे बार थावशे ए उपरथी ए जणाय ने के, कोई एक पुरुपने कोई कारणने. धे अचानक मासनो थाहार मली गयाथी, तेने तेनो स्वाद लागो तेथी, व्यसन गई. गपु. ने पनी लोकापवादसारु खुदाए फरमाव्यु ने, एम कहीने वचारा खुदान दिन वेग्य्यो जणाय ने तेमां केटलो गुनाह ने एनो विचारतो करो। ते प्राणीश्रीने गाने सुदा फरमावे त्यारे बीजी बन्नादिक वस्तुयो पेदा शावास्ते करे ? एउ रे . म उता जे जीनना सादने थर्थ खायचे ते रादसतुल्य जाणवा दाग थापने, ते पाक कहेवापत्रे, धने नापाक वस्तुथी जे पेदाश थापने त म 1 --- माको ना नागरे थना सादिष्ट पदार्थानो थाहार गन 'पानुनमः। मनी पादत पडीग के तहाइ नाप भान वन नीगत गोसाखो फाटीने पडाना पाहा

No text on this page.

। । अपने कर्म निर्जरीने तूटी पण जाय ठे कर्मोनी उत्पत्ति तया नाम भग्नु सह कारण पणु नयी ईश्वर तो थफी , तेने रिपे का पणुका पर सारगो उत्पत्तिना कह्या वे एणे करीनेज पुण्य पाप जग नारन (T गमनागमन थायले थने दमकमा जे नरक, तिर्यक मनुष! पागानी पारी गतियो कही ने ते प्रमाणे जपपरपराने पामेने उनसे साताना गुनागुन कर्म नोगले ते ते जपने रिपे झानापरणाशिक मी यनुगा बन ने जेम माटीनी नरेली सूची जजमा नासी तोतं.' 77 वी जायचे पती जेम जेम तेमाटी, तेमायोपानी यतीन, rries नग्ती रहे पण पाणीग्री उपर जाय नही तेवी गतं जीरा समपीवापा परो योगनिने पामे ने पती जेम जेम ते कर्मनी न्यनता ने नेमत गनिने पामतो जाय, ग्यारे बचा कमाना नाम 7 योजीतनासामने विषे प्रात यायचे, पण तेनी माया मोनाको, मनुष्य माना बनयी सात गज नार सरीin ចុច आस्तिक नास्तिक संवाद ५७ नास्तिक - कोड वेधी प्रम करे के, तमारा जनमतमा जीवना, दिकनेपिप केचीरीते वर्णन करेनुने ? तेने उत्तर दिये के, सर्वज्ञ के क्यु -सर्व लोकनेपिपे धर्मास्तिकाय,थधर्मास्तिकाय थाकाशास्तिकाय, 1 स्तिकाय तया पुजनास्तिकाय ए उइव्य नरपूर ने एउएव्य पोतपोताना गुण ता. पयांप की पूर्ण वे सदा नावरूप ले जगतनी स्थिति जेम वर्तमान कानमा ले में मज नूत काजमा हती, थने नविष्य कालमा पण एवी रीतेज जाणवी ते भर जी थने पुद्गज थनत कान लोलुपनूत ने एटले जेम छोर तथा पाणी व मृनिश तया धातु- मिश्रण थयाथी एक रूप बनी जाय तेम जीव तथा नोपण एकापे रहे के समय समयविनामजीबांधे वे थने समय में नहरी माटे यर रोनु कारण नयी काल, सनाव, नियत, पूर्व धर्म, तथा ! मागगन गनि पामे नयी के बाद से न पुणे न्यायोगी यायाचे तीन मामला गयी सारे पनुयायी बाण लूट में आस्तिक नास्तिक संवाद. ए यमिन ठेकाणे पहोतो एम समजवु. ए विषय उपर वीजा पण त्रण दृष्टांतो . कुंनकारनो चक्र. अमिनो धूमाडो, तथा एरंडीयो ए चार दृष्टांत वडे जाणी से. एए नास्तिक. कर्मक्ष्य थया पठी जीव अलोकनेविपे केम जतो नथी! जो जायतो वचमां तेने कोण रोकनारो ? यास्तिकः-चलन शक्तिने सहाय आपनारं जे धर्मास्तिकाय इव्य, तेनुं त्यां बालंबन नथी. धर्मास्तिकाय इव्य लोक प्रमाणेज वे. ते थकी अधिक नथी. तेथी अलोकमां जवाने जीव तथा पुगतनी गति थती नथी. ८० नास्तिक:-कोनो क्य करीने लिहावस्थाने पामेला जे सिह जीवो ते सिपत्रे समवेपीए जायठे. पण स्थानांतरनेविपे जता नयी तेनुं कारण गु? आस्तिक---ते समयनेविपे कोई प्रेरक नथी प्रेरणाविना चकनमण याय नही, तेथी सिघना जीवो समश्रेणीए सिसिला उपर जायठे. ६ १ नास्तिकः-सिझने गरीरनो अनाव थायवे. त्यारे अवगाहना केम कहीवे? श्रान्तिकः-जेम टारानुं वासण बनाववाने अर्थ प्रथम तेना जेवो मेणनो या कार कम्बो पडेते. तमां ते रस श्रोत्याथी ते धातुनो तेवो श्राकार थायवे. ते वामण मेणयी तूटू कस्या पठी पण मेणनो श्राकार थायने. कदाच मेण गाली नारवीए तो पण ते श्राकारपणुं जतु नथी, केमके वासणनो श्राकार जे कायम रहने. ते पण ते मेणना थाकार जेबोज ने, तेथी याकारपणं कायम रहे. तम जीव जे शरीगकारे ययोले. ते शरीरनो अनाव यया पठी पण सिह पुरु पनो ते शरीरनी अवगाहनारुपे रहे. एटले यावरवान ते जेवो सि इना शरीरनो श्राकार रहने. तेवोज जीवना प्रयोनो यरूपी धाकार रहेठे. ८ नास्तिकः-जेम जलमां जल मले त एफर पे थई जायने. निन्नता देखा ती नथी. तेम अनंत मिझ एकरुपे यई रहने के चेतन इव्यपणुं जुडं जुडले. यान्तिक.- ज्या जलना विजयो मलीने एक जलनो पिम याय; ज जल कहेवायचे. पण ज्यारे जलना विंड जुदा जुदा होय त्यारे विंड कहेवा पढ़े. एक जल कहेवाय नही. तेम निझ पणे नर्व एकत्र ये: परंतु चेतन ६ व्ये करी सर्व निन्न निन्न ने. उपर दृष्टांत: जेम अनेक गोपीयोयकी उत्पन्न थएना अनेक मोतीयो जुदा जुदा होय. तेयामांना कंटनाएकलन एक मोटी टगतो करिये. ने पनी तथा विपे विचार करिये क ए गलामाता अनेकना गुं? तो तन्त जणागे ते मोतीयो उच्चजता गुणरूपे सर्व फले. पण यात्मा त्यारे एक

No text on this page.

No text on this page.

1 - - . धारोरे॥५॥चूटकाप्रनाविक अड पच नूपण । पचलका जाणिये॥ पट् जयणही श्रागार नायन । उबिहा मन यागिये ॥ ५॥ षट गण समकित तपा सकस। "चदु रिह सदहा तिहा । जीवादिक परमहोरे॥प्रवचनमा जे नापिया। ली है। नो छोरे ॥ ७॥ त्रूटक । तेहनो अर्थ विचार करिये । प्रथम सद्दहणा खरी । वीनी केत जेणे मही यमिक । निन्दव ने थहन्दारे ॥ पासवाने कुशीशिया ते।वा विमयर मदारे गए।चूटक॥मदाथनाएं। दूर मो। त्रीजीसदहणा ग्रही॥ | शनीनो सग तजिये । चोथी सदहणा कही ॥ हीणातयो जे सगनत। तेहना गुण नदि रहे ॥ ज्यू जत्नपि जलमा नल्यू गगा। नीर खूणपणू जह॥१०१) समक्ति रंग । जिम लदिय सुप थनगरे । प्राणी, टेक ॥ ११ ॥ तरुण / पहिलो श्रुतयनिनाराजेदयि श्रोता रस सहेरे । जेयो सारुर ज्ञाखरे। प्राणी, ध। स्त्री परिवग्योरे चतुर सुर्ण सुग्गीन ॥ तेहाय रागे यति घणोरे। धर्म सुण्यानी । निम जे धर्मने। तेहिज वीनू जिंगरे । प्राणी ॥ १३ ॥ यापच गुरु ददन् / १२ सम्यक्त सडसम्बोल सजाय ॥श्रीजिनाय नम ॥ अथ श्रीयशोविजयजी उपाध्यायकृत सम्यक्तना सडसर बोलनी सजाय प्रारंन ॥ ॥ दोहा॥ ॥ सुरूत वलिकादविनी। समरी सरसति भात ॥ समक्ति सत बोलनी । कहिशू मधुरी वात ॥ १ ॥ समकित दायक गुरुतणो। न थाय ॥ ना कोडाकोडे करी । करता सर्व उपाय ॥ २ ॥ दानादिक कि दिये । समफित विण शिवशर्म ॥ तेमाटे समकित पर्छ । जाणो प्रवचन मर्म दर्शन मोह विनाशयी जे निर्मल गुणगाण ॥ त निश्चय समकित कह्या । तेहन ए थहिताण ॥५॥ ॥ ढाल । देश देश दरसण आपणू, एदेशी॥ | उ सइदछ। तिलिग ठे। दशविध रिनय विचारोरे ॥ त्रिण शुदि पण दूषण । यातन नेद एह उदार ए॥ एहनो तत्व विचार करता । लहीजे नवपार ए ॥६॥ दान सदहणा तेहना जै। जाण सुनिगुण जयहरी । सवेग रग रग जीन्ने । मार्ग इस कहे युधा ॥ तेहनी सेवा कॉजये जमा पजिये समता सुधा ॥ ॥ ढान॥ ॥ दान ॥ कपूर होरे अति कजन रे, एदेशी ।। ॥त्रण जिग समति तणारे। तो प्राणी ॥ यो वा तया शाजमहज पर चग ॥ - 1 सम्यक्त सडसम्बोल सजाय. २२३ - - । । है। त्रीजं लिंग उदार ॥ विद्या साधक तणि परे रे । बालस नविय लगार रे । पी॥१४॥ ॥ ढाल ॥ प्रथम गोवालातणे नवेजी, एदेशी॥ ॥धरिहंत ते जि विचरता जी ॥ कर्म खपी दुआ सिम ॥ चेश्य जिण पडिमा कही जी। सूत्र हांत प्रसि-६ । चतुर नर, समको विनय प्रकार । जिम लहिये समकित सार। तुर ॥ १५ ॥ धर्म खिमाटिक नाखेयो जी। साधु तेहना गेह ॥ श्राचारय श्रा पारना जी। दायक नायक जेद । चतुर ॥ १६ ॥ उपाध्याय ते शिप्यने जी। स्त्र नणावण हार ॥ प्रवचन संघ वखाणिये जी। दरसण समकित सार | च र ॥ १७ ॥ नगति वाह्य प्रतिपत्तिथी जी। हृदय प्रेम वहुमान ॥ गुण थुति प्रवगुण ढांकवा जी। बागातननी हाण । चतुर ॥ १७ ॥ पांच नेद ए दश त शो जी 1 विनय करे अनुकूल ।। सीचे तेह सुधा रसें जी। धर्म सदन मूल । चतुर० ।१।। ढाल ॥ ॥धोवीडा तूं धोए मन, धोतीयू रे॥ ॥ एदेशी ॥ ॥त्रण युधिसम केततणी रे । तिहाँ पहिली मन शुद्धि रे॥ श्री जिनने जिनमत विना रे । फूठ स ल ए बुद्धि रे॥ चतुर विचारो चित्तमां रे । टेक ॥ ५० ॥ जिन जगत जे नवि घर्ष है। तेबीजाथि नवि थाय रे॥ एवं जे मुख नाखिये रे। ते वचन शुद्धि कहिवाय रे।च पुर० ॥ २१॥ठेद्यो नेद्यो वेदना रे । जे सहतो अनेक प्रकाररे जिण विण पर सुर रवि नमे रे । तेहनी काया शुक्ष उदाररे । चतुर ॥२॥ दाल । मुनि जन मारगनी, र देगी ॥ ॥ समकित टूपण परिहरो । तेमा पहिली वे शंका रे ॥ ते जिन वचन मां मत करो ॥ जेहने समनप रंकारे । समकित दूपण परि हरो ॥ टेक ॥ २३॥ करखा कुमतनी पाठना । वीजू दृपण तजिये ॥पामो सुरतरु परगहो। फिमबाऊल नजिये। समफित ॥ २४ ॥ संग धर्मना फलतणो । विनिगिया नामे ॥ त्रीजं दृपण परिहरो। निज गुन परिणामे ॥ समकित ॥ २५ ॥ मिथ्यामति गुण वर्णनो। टालो चोपो टोप। उन्मारगि पुणतां दुवे । उनमारग पोप । समक्तिः ॥ २६ ॥ पांचमो टोप मिथ्यामती। परिचय नदि कीजे ॥ म शुन मति याविटनी न ती वासना तीजे ॥ समकित॥२७॥ ॥ दाल ॥जोजिटा हंसारे विषय नग ए यात प्रनाधिक प्रवचनना पह्या । पावयणी धुरि जाण ॥ व नमान सुतना जे थर्थना । पार लहे गुण वाण || धन धन मानन मंन मु निवरा । टेक ॥ २८ ॥ धर्म फची वीजो जाणिये । नविण पनिंदन ज उपदेशेरे रंजे लोकने । नंजे हदय नंद । धन धन ॥णा वाटी बीजारे त के निपुण नायो । मानवाटी परिजेह ॥ गजमाने जयफमता व गाजंती जिम । चीये. देशी ॥

तथकी। चितविये प्रतिकून । सुगुण नर । श्री जिननापित वचन विचारिये । मेह । धन धन० ॥ ३० ॥ नश्वादु परि जेह निमिन कहे । परमत जापत ज॥ तेह निमित्तीरे चोथो जाणिय । श्री जिनगासन राज । धन धन० ॥ ३. तप गुण ऊपर रोपे धर्मने । गोपे नवि जिन श्राण ॥ श्राव लापेरेन दा। पचम तपसी जाण | धन धन ॥३॥ठो विद्यारे मत्र तणो वनि ।। श्रीवयर मुणिद ॥ सिम सातमोरे थजन योगथी । जिम कातिक मुनि वह इस धना ॥ ३३ ॥ काव्य सुधारस मधुर यर्थ जग्या । धर्म हेतु करि जेह ॥ मिलमन परि नरपति रीझवे । थम वर कवि तेह । धन धन० ॥ ३५ ॥ जव नवि हारे । नाविक एहया । तब विधि पूरव अनेक ॥ जात्रा पूजाटिक करणी करे । तेह प्रभावित क ठेक। यन धन ॥३५॥ढाल॥ सतीय सुनानी। ए देशी॥ जेहथी । सखि जिम थानरणे देह ॥ नूपण पाच ते मन वस्या । सखी मन स्या । तेमा नही सदेह । मुफ समकित रंग थचल होयो । टेक० ॥ ३६॥ लु कुशलपणु तिहा । सखी वदन ने पञ्चखाण ॥ किरियानो विधि थति पण तारे जेह ॥ ते गीतारथ मुनिवरा । सखी तेहन कीजे नेह । मुज० ॥ ३९ ॥साहे समान सखी श्राचरे तेह सुजाण । मुफ ॥ ३७ ॥ बीजू तीरथ सेवना । ससीत | गति करे गुरु देवनी । सरवीत्रीजू नूपण होय ॥ किणहि चलाव्यो नवि सखि चोयु नूषण जोय । मुफ० ॥३॥ जिनशासन अनुमोदना । सखी मकित तपा। धुर नपशम अनुकूल। सुगुण नर ॥ अपराधी सूपण - क्षण मर्म । सु० । श्री जिन० ॥ ४३ ॥ इव्ययकी उरिवयानीज दया पानी नार। सु० ॥ चोथु सक्षण अनुकपा कही । निज शकते - सु. श्रीजिन०१४ ॥ जे जिन नारख्यु त नहि थन्यथा । एहवा जे दर ते यास्तिकता सदण पाचमु । करे कुमतिनो ए जग । सु० । श्रीजिन ॥ दान ॥ जिन जिन प्रति वदन दिसे, ए देशी॥ पर तीर्थी परना सु त्य प्रह्मा वति जेह ।। बदन प्रमुख तिहा ननि करचु । ते जयणा पट ॥do थी बहुजन दुत ॥ कीजे तेह प्रनावना । सखी पाच नूपणनी खत । ॥ ढाल | श्म नवि कीजे हो, ए देशी॥ ॥ लवण पाचक ॥४१॥ सुरनर सुरव जे उ ख करि लेखवे । वचे शिवसुख एक ॥ सु० लक्षण ते थगीकरे । सार सवेग सुटेक । सु. श्रीजिन० ॥ ४२ ॥ नारक मनव कनग्यो। तारक जाणिने धर्म | ॥चाहे निकज निवद ते ।

सग्यता समचाल महाय. 37U - । । जरिया मशिन बनना की। टेक | HE || बदनकर जाउन कहियान मन में तीन नमारे । नान इष्ट प्रमादिक देव । गौरव नगनि देन्याईरे । नवि कार || 13 ॥ अनुप्रदान ने तंटने कहिये । बार बार जे दान ॥ दोष कृपा पात्र मनिय । नहि अनुकंपा मान रे । नविकार ॥ ४ ॥ यण बोजावे जेद ना यह न करिये यालाए । चार चार प्राजाप करना । कहिये संतापरे । नविका जयणाची समकित दी। पति दी गवदार ॥एमा पण कारणवीजयणा | नाना प्रकार विका० ॥५॥ दात ॥ सतना नीदेशी ॥ शुद्ध धरमपी नवि बन्ने । अति इन गुण प्राधार जना ॥ तो पण जनवि तेलया । तदने पद यागार । लज़ना ।। || बोय तह पानिये । दंति दंत सम बोज । ललना ॥ मडानना जन ताणा । कप कौटिने तोलाल सनावो गागजा नगगदिक धणी | नम शासन नियोग । ललना। तेहथी कानिकनी परे। नहि मिथ्यात संयोगा ललना वोगामेलो जननो घण कह्यो। बल चोगदिक जाण । ललना ॥ पेत्रपालादिक देवता । तातादिक गुरु गण ।स लनाबो ति दुर्जन श्राजिविका । ते नीरवण कतार । ललना ।। ते देते दू पण नहीं करतां श्रन्य प्राचार लिनना वोपणादालाराग महार॥ नाविजे रेममकित जेदथी राबईते नायनारे जायो मनकरि परवडूं॥जो समकित रे ताजू रे ॥ तो व्रत तरु से दीये शिवपट थनुकून रे॥५मातूटक। अनुकून मू ल रसाल समकित । तेहविण मति अंध रे ।। जे करे किरिया गर्व नरिया । तेह फूठो धंध रे॥ए प्रथम नावना गुणो रुघडी। सुलो बीजीनाचना ।। वार" समकि त धर्मपुरन । एहवीत पावना।।५४ादालात्रीजी नावना रे समकित पीत जो दृढ स ही। तो मोटो रे धर्म प्रासाट मगे नही ॥ पाश्ये खोटे रे मोटो मंमाण न शोनी ये ॥ तेह कारण रे समकितमं चित थोनी ॥५॥त्रूटकायोनी चित नित एम नावी । चोधी नावना नाविये । समकित निधान समस्त गुणनु । एहई मन ला विये ॥ तेह विण तूटा रत्न सरिरवा ! मूल उत्तर गुण सबै ॥ किम रहे ताके जेह हरवा। चोर जोर नवे नवे पाढालनावो पंचमी रे नावना सम दम सार रे पृथवी परे रे समफित तस श्राधार रे ॥ठी नावना रे नाजन समफित जो मि ॥ श्रुत शीजनो रे तो रस तेदमा नवि ढले॥६॥त्रूटकानवि ढले समकित नाव ना रस । यमियसम नंवरतणो । पट नावना एकही एहमा । करो यादर य ति घणो ॥ श्म नायता परमार्थ जलनिधि । होइ निनु कमोल साजूं मूल -- क चेतन कर्ता । कर्मतणे वे योगे रे ॥ कुनकार जिम कुजतो जे । दमाई। सू करशे रेजल पेसी कर पद न हलाये । तार ते किम तरसे रे। दूपण नपण प्रमादे रे ॥ ६॥ इणि परे सडसन बोल विचारी ।जे सममित थाराहे रे। १६ सम्यक्त सडसमोल सजाय पुण्य प्रमाण प्रगटेचिदानद को एदाजे मनिरोप सोनीमा उरे जिहा सममित ते यानक । तेदना पट पि कहिये ।। तिहां पदिनु थाना कले चेतन । राण थातम लहिये रे ॥ सीरनीर पर पुजन मिश्रित । पर एहथी के थलगो रे। अनुनय हस चरजो लागे | तो नरिटी कागो रे ॥६॥ बीजू थानक नित्य थातमा । जे अनुभूत सनारे रे ॥ बाजाने स्तन पान वामना । पूरव जय श्रनुसारे रे । देव मनुज नरकादिक तेहना । वे श्रनित्य पर्याय रे ।। श्व्यथकी अविचलित श्रवति । निज गुण श्रातमराय रे ॥ १३ ॥ त्री क सयोगे रे ॥ निश्रयथी निज गुणनो का । अनुपचरित व्यवहारे रे ॥ ३५. कर्मनो नगरादिकनो ! ते उपचार प्रकारे रे ॥ ६ ॥ चोथू थानक ले ते लोका। पुण्य पाप फल केरो रे ॥ व्यवहारे निश्चय नय दृष्टे । बुजे निज गुण नेरो रे । चम थानक चे परम पद । थचल अनत सुख वासो रे ॥ याषि व्याक्तिन में नथी लहिये । तसु थनावे सुख खासो रे ॥६५॥ तु थानक मोक्तणू वेल यम ज्ञान उपायो रे । जोसहिजे लहिये तो संपलेकारण निलयायारे । कहे ज्ञान नय झानज सान्त्र । ते पिण फूठीकिरिया रे ॥ न सहे रूपू रूप । सीप नपी जे फिरियारे ॥६६ कहे किरियानय किरियाविण जे । ज्ञान तह ने इहा बहुला । नय एकेकने वादे रे ॥ सिमांति ते बेहु नय साधे। ज्ञानवता राग देप टाली मन वाली । ते समसुख अवगाहे रे ॥ जेहनो निवल । कोइ नहीं तस तोले रे ॥ श्री नय विजय विबुध पय सेवक । वाचक स इम बोले रे ॥ ६॥ 'जाणी मन समतिमा ॥ इति श्रीसम्यक्त सडसम्बोल सजाय समात राग्यतरंगिणी श्रीजिनाय नमः अथ श्री शृंगारवैराग्यतरंगिणीप्रारंनः संस्कृतटीकाना का आरनमा मंगलाचरण करते. नपजातियत्तं ॥ श्रीपार्श्वनायं प्रणिपत्य नक्त्या पुरि स्थितं श्रीफलवर्धिकायां ॥ शृंगारवैराग्यतरंगिणी या व्याख्याननाव्या क्रियते मया सा ॥१॥ अर्थः- श्रीफलवकिानामनी पुरीने विपे स्थित श्रीपार्श्वनाथ नगवानने न केवडे प्रणाम करीने शृंगारवैराग्यतरंगिणी नटीनी नाविकारूप व्याख्या हुँ करुंतुं. अवतरण-श्रीसोमप्रनाचार्य, वैराग्यनी वासनावडे शृंगारने दूपित करनार व तां था शृंगारवैराग्यतरगणी नामनो ग्रंथ करवानी कामनाएकरी स्त्री, रूप निं दा करवा योग्य वे एवं प्रतिपादन करे.॥ १ ॥ शार्दूलविक्रीडितंटत्तम् ॥ धर्मारामदवाग्निधूमलद्रीलावण्य लीलाजुप स्तन्वंग्या यमितान्विलोक्य तददो वालान्किमु कंठसे ॥ व्यालान् दर्शनतोपि मुक्तिनगरप्रस्थानविनद मान् मत्वा दूरममून् विमुंच कुशलं यद्यात्मनो वांसि ॥२॥ अर्थ-अहो! या धर्मरप वननेविपे दावाग्निना धुमाडानी पंक्तिना जेवा उया मवर्णवाला, सायंगयुक्त गरीरवाली स्त्रीयोना वांधेला जे वालो ठे, तेने जोई ने तूं केम यानंदने पामेठे ? जो तूं पोतानुं सारं यवानी ना करतो हो तो, जे ा दर्शनेकरी मुक्तिरुप नगरीना मार्गमां विघ्न यायठे, एवा वालोने व्याल (स ) रूप मानीने दूरथी त्याग कर. एणेकरी वैराग्यरस दावीने शृंगारने दृषित योठे; जेम सर्प लांबा अने काला होयते, तेमज स्त्रीना वाल पण लांबा ने काला होवाथी, तेयोनु सादृश्यपणुं काठे; जेम सर्पने जोतांज थापणे नाशी जये ये, तेम ते वालोने जोताज तेयोनो तिरस्कार करवो जोऽये. नशास्त्रमा काठे के, कोई वाहेर गाम कामे जतो होय ते वरखते जो मा साप. मले तो ते काममां विघ्न पडतां ते कार्यनी सिदि थाय नही, तेमज १८ | चमत्कार उत्पन्न करेले, तेयो मूर्तिमान चतुरिश्यिगम्य क्लेश , एम निम- दूर नारखी दे जो एयोनो तु त्याग करीश नही, तो तु कष्टपरपराए पुत्र थयोथको शोक करवायोग्य अवस्थाने पामीश आलोफमा स्त्रीना केशने वेग सादृश्य काने, ते थावीरीते “ससित" ए शद मूलमा , एनो अर्थ ला “था तृत्तमा, मेघना वर्णनी साथे स्त्रीना केशनी बराबरी करीने जेम काशने विपे मेघ यति शोनायमान दीठामा थावे, तेम स्वीना मस्तक केश यति लसित एटले देदीप्यमान दीवामा यावे स्वीनां केश जे चलकता पते श्रेष्ठ कहेवायवे ए मुख्य केशनी श्रेटतानो विषय कहेतां यतरगत ते के शृगारवराग्यतररागणी मुक्तिरूप नगरीना मार्गमा स्त्रोना वालम्प सर्प जो श्राडे बारे एटले । मोह उत्पन्न थाय तो मोटो विघ्न यायचे, माटे ए सर्वथा त्याग करवा वे उपर कह्यु के, स्त्रीयोना वधेिला वालने व्याजरूप जाण, एगणे कदिए मत्कार राख्यो ने के, वालशब्दमा यफार मन्यायी व्यालगर थायने, लने व्याल कहेतु योग्य वे एने नेपालकार कहेते था वृत्तमा, सर्प चालती वखते जेम वांकोचको थई जायते, तेम स्वीना श विटडीयाला होय तेने कपिलोको श्रेष्ठ कहे। घने जेम सर्पनो रम कालो होय, तेम स्वीमा यति काला रगवाला वाल होय, तो ते श्रेष्ट कहेबा- वे एवी रीते वालनी जे श्रेष्ठता , ते पियक शृगार रस दर्शाब्योने, श्रने म मार्गमा सर्प थामो थावे तो कार्य सिदि थाय नही, तेम गुणस्थानक | णी चडतां पुरुषने वचमा स्त्रीना केशनी मोह उत्पन्न थयो तो तेया श्रेणी हनी सिविथती नथी, एवी रीते वालनी जे निसना कीपी ते विषयक ग्य रस दाव्योठे ॥१॥ ये केशा लसिता सरोरुहशा चारित्रच प्रनाभ्रशा जोदसहोदरास्तव सखे चेतश्चमत्कारिण ॥ क्लेशान्मू तिमतोऽवगम्य नियत दूरेण तानुत्सृजे!चेत् कष्टपरप रापरिचित शोच्यां दशामप्यसि ॥३॥ अर्थ- हे सखा, कमलपत्रना जेवा नेत्रोवाली बीना देदीप्यमान केश, रित्ररूप चश्नी ज्योतिनो नाश करवाविप मेघजेवा , अने जे तारा श्रत करण- जाणीने करी सित केहेता युक्त, केशशब्दनो क्लेश शब्द यायचे शृंगारवैराग्यतरंगिणी. • धारण करनारी स्त्रीनां नेत्रोने कमलपत्र जेवां कह्यांचे : ए वधो शृंगार रस ज वो. अने स्त्रीना एवा केश जोर्डने पुस्पना यंत करणमा मदनाटि विकाररुप च कार उत्पन्न यायचे. माटे ते क्लगरुप कह्याठे: केमके, कामादि विकारो क्तगत कह्याने, क्लंगो अंतरना विपय होवायी चलुना विषय नथी, तेथोएज जाणे कर रूप मूर्ति धारण करी होय नी! एवी उत्प्रेक्षा थायठे. ए कारणथी स्त्रीना देदीप्य मान कंगने क्वेशरूप जाणीने तेनो तुं त्याग कर; एवडे वैराग्य रस दाव्यो.॥॥ वसंततिलकारत्तम्॥ ये शुभवोधशशिखंडनरादुचमाश्चित्तं नति तव वक्रकचा दृशांग्या. ॥ ते निश्चितं सुकृतमर्त्य विवेकदेनिर्दारणे ननु नवक्रकचा स्फुरंति ॥ ३ ॥ अर्थ- हे पुरुष, निर्मल ज्ञानरूप चंठे ग्रासन करवाविपे, स्त्रीना वांका के श, रादु जेवा कूर . ते तारा अंत:करणमा चमत्कार उत्पन्न करते. अर्थात् रा हु जेम चंनो ग्रास करेठे, तेम ए वांका केश तारा झाननो नाश करनारा . थने ते जाणे सुरूतरुप मनुष्यना विवेकरुप देहy विदारण करवाने नवी कर्वत ज होयनी ! ए उत्प्रेका के. एमां “वक कच" एटाने वांका केश ते च" एटले नवी करवतना जेवा ठे. एमकह्याथी श्लेपरुप चमत्कार जाणवो. था वृत्तमां. स्त्रीना वाका कंग होय ते श्रेष्ट कह्याने स्वीना वक्रकेा पुरुपना मनने मोदित करेने, एथीज अंत करणमां चमत्कार उत्पन्न करने एम का . माटे ए शृंगार रन वे , अने बीना वांका कंगनुं दर्शन यतांज पुस्पनुं मन दिल थायठे. देवनी पण हि रहती नथी. घने ज्ञाननो नाम थर्ड जायने यो तथोने गदुरुप क्ह्याने. तेमज विवेकरूप झरीग्ने कापवाने नवी कर्वत क्ह्याते. एवा जाणीने तेयोनो तुं त्याग कर. ए वैराग्य रम जाणवा. ॥३॥ नपजातिसत्तम्।।अलंकृतं कुंतलनारमस्या विलोक्य लोकः कुम्ने प्रमोदमागग्यवीरचित्रं उरंत ममुं न किं पश्यमिकंतनाग्म्।। 2 -हे पुस्प. पुष्पादिकंकरी गूंघेना बीना वांधता कंगांनो ममृद एटले हो जोन लोक श्रानंदने पामने: पग्नु ए वगग्यल्प वीग्नुं वेटन करणा ' नामक मह गवते. एम हूँ का जोतो तपी? अर्थात मीना अतंरत नार" एटले जे गाणगारीने वधिना का दे, ते कुंतनार एटले प्रान नाम नवकक रुपरिपना वृदनो प्रानीव उत्पन्न थायने, थर्थात् 'चू एटले चुकुटी, त साधु मा चितन करेठे, ते व्यर्थ वे अहो इत्याश्चर्ये। ते स्त्रीयोनु यतिक एटले जे श्रा वृत्तमा, अष्टमीनो चश् अर्धगोलाकार उता बन्ने खूणाए सरखो देखाप तेना वचमा श्याम वर्णना चांदलाना जेवु देखायले, तेथी ते अति शानित लाग- नोहर देखायो, ते जोड्ने पुरुषना मननेविपे घणो यानर थायने. ते डागार यने ए जे कस्तूरीना तिलक सहित स्त्रीनु लजाट यति शोनायमान देखाय तमा काई थर्य नयी, किंतु व्यर्थ ने, माटे तेनो त्याग करवो ए वैराग्यरत ने । उपजातिसत्तम् ॥ न भूरिय पकजलोचनायाश्चकास्ति शगाररस कपात्रम्॥नू किंवसौ सावुतरा प्रसूते निवधन मोविपशुमस्या श्रय-हे पुरुष, कमलपत्रना जेवा लोचनवाली स्त्रीनी शोनायमान चुकुटी ते जाण शृगाररसनु एक पात्रजचे, ते यतिशय श्रेष्ट नृमिरे, केमके, एथकी- गृगार क शस्त्रज से एम जाणवु ा तेकाणे अल एटले लकाररहित, कृत एटने लो, जे कुतलनार शब्द, तेनो कुतनार एवो गद थाय, ते योग्य था वृत्तमा, पुष्पादिकेकरी शगारेलो स्त्रीना केगोनो अधोमो पुरुषने एका णीय लागे के, ते जोड़ने चराग्यवान पुरुपनो वैराग्य पण मगी जायन, श्रेष्टता कही, ते शृगाररस ने अने ते दुग्वे करीने पण सहन न थाय, प्रास नामक शस्त्ररुप उता वैराग्यनो नाशकरनारो ठे, माटे तेनो त्याग कर ए वैराग्य रस वे ॥४॥ वसततिलकादृत्तम् ॥ कस्तूरिकातिलकित तुलिताष्टमी चित्ते विचितयसि सौख्यनिमित्तमेकम् । वामभुवा यदलिक तवदो अलीकमित्याख्ययेव परया प्रवदति रूपम् ॥५॥ श्रर्थ -हे पुरुप, जेमां कस्तूरीनो तिलक कखोने, तेथी अष्टमीना चई जेनी सुदर 'नृकुटी देखाय , ते अक्तिीय सौख्यनु कारण ने, एवु तु लाट , तेने पडित लोको थलीक एटले मिथ्या कहेले अर्थात् अनिक एकदा रूप सजाट वाचक डे, तेयोमाना पहेला रूपने बीजा रूपे करी जाण, लाटने मिथ्या जाण, ए पण श्लेपज ठे १ एने .

प शृंगारवैराग्यतरंगिणी. नू एटले नूमि थायडे, एम कयु; तेमां श्रावी रीते लेप :-सा एटले प्रा धुतरा एटले रेफरहित एवो, चू शब्द नूमिवाचक शब्द थयो ते योग्य वे. श्रा वृत्तमा, स्त्रीनी जे शोनायमान चुकुटि, तेने शृंगार रसना पात्ररूपे वे; केमके, एने जीतांज पुरुपने मोह उत्पन्न थायठे, माटे ए शृंगार रस वे; ने ए नृकुटि नथी पण मोहरूप विपना वृदने उत्पन्न करनारी सारी नूमि ,ए फहेवाथी वैराग्य रस जाणवो. ॥ ६ ॥ मालिनीटत्तम् ॥ नवकुवलयामश्यामलान् दृष्टिपातान् कृत परमदनाशान् विदिपल्यायतादी॥ इति वदसि मुदं कि मोद राजप्रयुक्तान् प्रशमनटवधार्थ वियमूत्रष्टिपातान् ॥ ७ ॥ अर्थः- हे पुरुष, विस्तीर्ण नेत्रोवाली स्त्रीना कुवलयनी माला जेवा उयामव र्णवाला, अन्यमदना नाश करनारा जे कटाक्ष, ते मारा उपर नाखेडे, एम जाणीने तूं शासारु हर्पित थायवे ? अरे, ए जे दृष्टिपात (कटाद ) ते प्रशम रूप शूरवी । रनो वध करवा सारु मोह राजाए प्रेरणा करेला कृष्टिपात एटले तलवारना पात (घा) : एम जाण; अंही दृष्टिपातनो शष्टिपात यावी रीते थयो :- दृष्टिपात शब्दनुं विशेषण मूलमां “कतपरमटनाशान् '; एनो श्लेप करी थावो अर्थ थाय वेः- कृत एटले कस्यो, परम एटले अत्यंत, टनाश एटले दकारनो नाश थयाथी शष्टिपात गव्द थाय ते ते योग्य ते. श्रा वृत्तमां, विस्तीर्ण नेत्रोवाली स्त्री कही ठे, एथी स्त्रीना विशाल नेत्रोने कवीयो ए उत्तम कह्या ठे, एम जाणदुं, एवा विशाल नेत्रांना जे कटाद, ते कुवलयनी माला जेवा, अने अन्य मदना नाश करनारा कह्या ; एटले जे पुरुप उपर कु बलयनी मालाना जेवा कटाद पमे ते पुरुप वीजा गमे तेवा मदवालो होय तो 'ण तरत ते स्त्रीनी उपर मोहित थने तेना किंकर जेवो थई रहेठे, अने ते तानी उपर स्त्रीना कटाद पडया जोड्ने अति आनंदित थायवे, माटे ए शृंगार ठे थने एवो लुब्ध थएलो पुस्प मोहरूप राजाने वश थयो थको दुखी थायचे; सके, नेत्रकटारुप तलवारना घाएकरी तेना प्रशमरुप शूरवीरपणानो वध वे. तेनो तु त्याग कर, ए वैराग्य रस वे. ॥ ७ ॥ शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ तस्याः कोपपदं यदाननमदोरा त्रं स्मरन्नात्मनः संतापं वितनोपि काननमदो ज्ञात्वा स 1 पविचित् कोपापमान पुरुपने दीठामा थावे तो तेने कामविकार उत्पन थापा यपरा यो कारणने सीधे स्त्रीने रीश थाचीने पुरुपने पोतानो मुखमुश कोपार मान एरीदेगाड्यायो तेने प्रीति उत्पन्न थायडे, अने विविध प्रकारे तेने सम स्पाप्पानी यापुरताने लोधे कामविकार उत्पन्न थायवे तेथही शृगाररस जाणता, यो बीना मुम्पने वन जेयु काले, ने तेमा कामरूप सर्प रहे ते ते दश करनपुर । पना हदपने शुन्य करे ने एटने सारासार शिवेकरहित करे . अर्थात् मनात य-देहीपहिचान पुम्प, तम्ण स्वीनु साकार एटने सुदर मुर जान नमार यानदिन चायने मुपने पितान पुम्प निश्चय कति भ्रनार नाटानुयामुपस्टने याचाग्न पदेने यहीं साकार एटाले थाकार महिन यानन्म, तम्ण बीनु सुदर मुम क्युने, तेनु कारण एके मुपनी सुदर दामा दोपत्रे ते गर्म तेवी मारीदिवाना पुस्पनी दिन रिम 999 शृगारवैराग्यतरगिणी. खे तत्यजे ॥ एतस्मिन् वसता मनोनवमहासर्पण दृष्ट पुमान् कार्याकार्यविवेकशून्यहृदय कस्को न सजायते॥॥ अर्थ-हे सखा, कोपनु स्थान जे स्त्रीनु आनन एटले मुख, तेनु रात्रदिवस मन रण करीने तूं पोताने सताप करीने ,थहो ऽति खेटे ते यानन नयी पण कानन एटले वन , एम जाणीने मूकी दे, केमके, ए वनमा रहेनारो जे कामरूप ना ते जे पुरुपने दश करेते, ते पुरुपनो हृदय कार्याकार्य विवेकथी शून्य थई जायचे एवो कोण , के जे उक्त विवेकशून्य न थाय। किंतु सर्व थायज ने सामान सर्पनापिपे करीने मूर्वित थएलो पुरुप पण शून्य हृदयवालो यई जायने, ता अम सर्प दश कम्यो होय तेनु शु कहेतु। अही कोपपद थानन कानन ने, एम कबुने, तेथी कोपपद एटले ककार ने उपपद एटले समीपपद जेनो एवो थानन जब कानन पद पाय रे ते योग्य वे, एश्लेप ठे या रनमा, खोनु मुख कोपायमान का ने तेनु कारण ए के, स्त्रीनी मुन्धर र को जे. तेची तेनो तु त्याग कर ए वैराग्यरस जाणवो ॥ ७ ॥ उपजानिटनम ॥ मामारमालोक्य मुस तरुण्य कि मुग्धमुढे मुर मादयामिाद्ध हि चित्तभ्रमनाटकस्य विचकणेरामुसमाचचत ।। मरदार ते यामुप नेते योग्य ने रे दिन गने. एगार ग्म ने यने तरुण वीनु मुग्य ঘিনমি शृंगारवेराग्यतरंगिणी. २२३ नाटकनो याद्यारंन . एटले स्त्रीन मुख जोड़ने मोहनो धारन थाय वे. जेम ना टकनो बाद्यारन सूत्रधार अने नटीप्रमुखना गायन क्षारा थायवे, ते जोनारा पुरुपना चित्तने मोह उत्पन्न करते. तेम ए पण जाणवू. तेनो तुं त्याग कर. ए वैराग्य रस वे. ॥ ॥ वसंततिलकावृत्तम् ॥कामज्वरातुरमते तव सर्वदाऽऽस्यं वा मध्रुवां यदि कथंचिदवाप्तुमिना ॥ यत्नं विनाप्यखिलज न्मपरंपरासु तज्जातमेव नवतो ननु सर्वदास्यम् ॥ १० ॥ अर्थः- हे कामरूपज्वरथी पीडायमान थएली मतिवाला पुरुष. जो सर्वदा एटले सर्व काल सुंदर नृकुटिवाली बीनु थास्य एटले मुख, कोई पण प्रकारेकरि तने प्राप्त यवानी वा दोय, तो निश्चयेकरि यत्नशिवाय संपूर्ण जन्मपरपराने विपे सर्वदास्य एटले सर्वनुं टासपणुं तने थयढुंज , एम जाणवू. श्राश्लोकर्मा वे ठेकाणे · सर्वदास्य" ए शद यावेलो ते. ते वनेनो अर्थ लिन्न निन्न थाय चे. तेथीयाहिं यमक जाणवो. या वृत्तमां, सुंदर नृकुटीवालुं स्त्रीतुं मुख का चे, एथी जे स्त्रीनी कुटि सा । होय, ते मुरुप दीवामां श्रावे. तेनुं मुख कामी पुरुपने अति प्रिय लागेठे. बने तेने जोतांज कामीपुरुपनी मति कामज्वरथी पीडायमान थायछे, एज ऽहां गार रस ले. श्रने एवा स्वीना मुग्वनी प्राप्तिनी हा जे पुस्प करने ते जन्मो न्मने विपे पराधीन रहे. माटे तेनो तूं त्याग कर ए वैराग्य रत जाणवो.॥१७॥ शार्दूलविक्रीमितं वृत्तम् ॥ तस्याः साधुरदं विलोक्य वद नं य. संश्रयत्यंजसा मुक्त्वा मुक्तिपश्यं ददा प्रविशति भ्रां ल्या स ग वनम् ॥ नन्चाल्यंतमचाम्बश्वमतियनात्र रा गादिनियोरधर्मधनापढारकरणात्कष्टं न किं प्राप्यते॥११॥ अर्थ.- ते न्वीनुं “माधु रदं" एटले साग दातवाडं वदनं एटने मुख जी जे पुस्प वेगे करी तेनो याश्रय करने, एटने तेमां बुध यायचे ते पुरुष. हा इति वंदे ! मुनिमार्गने मृकीने. वमतिने घरम्य परीने पुग्वेररि प मन न पाय एवा वनविप ब्रांतिए करि प्रवेश करने. ते वन मर्यादारदि तमां गमन करनारा पुत्पनु धर्मरुप धन गगादिर चोरों दगण करी जाय यी युं रटनी प्राप्ति यती नयी? यहिं माधुग्दं बटन जे ते बन र घर परिढरे पर दूरत ॥ दास्फुलनतोऽन्यथाविशदवासनानो वर्ष-के पुरष जोतु या ससार समुश्नो पार लेवानी श्छा करतो हो, तो रिलीजेपी नेत्रांगजी नीयोना थहीन एटने थमृतादिवडे परिपूर्ण, थपर एवं योटाप पर एटने परत जे ने तेने तु दूर नारखी दे ते जो तु नही मूकी तो है। | नागानना याग तारी निर्मज्ञ वासनारूप नोका नागी जशे तेथी तारु पार पहनही जेम समुश्मा पतनालागरायी वहाण नांगी जाय तारा भारगरि गिदि थनीनयी ते प्रमाणे तु पण थाना समुश्न पहेने पर होगी गोनही ग्रहीयहीन श्रपर जनेते धर एटले पर्वतन एमरस ने यहीन एटले थमारे करिहीन एदने रहित थपर गदन, ना नेता यति नियने मुगनिन हायने तेम स्त्रीना नेत्रा पण अनि मन वनमा. मीना नेत्राने परिणीना नंगांनी बराबरी परी, एटने ही नमानित हावायी पुम्पनु मन पची नियने, तया ज मामी तुम नारन. यन ते यमर नेते पतिजने, केमा, पुर पायनेन ममाग्यीनटी भरतो नयी एवंगग्य रम॥12॥ २४ शृगारवैराग्यतरगिणी म का वे. ते थाम - साघुरद ए गदनो पदडेट करिये तो साधु अदए पद जुदा यायचे एमाना थद पदथकी दकार रहितपणु थापठे, एम वन यायचे, ते योग्य श्रा वृनमा, सारा दातवाजी स्त्रीनु मुख जोताज पुरुपनु मन खुप यने मुक्तिनो मार्ग जे धर्मध्यानादिक तेने ते मूकी दे ले जेने वसति सारी गती नथी, मदनने वश थयो थको बनादिक एकात स्थलमा ते स्त्रीमहित स्वीना यागमननी श्यावान थयो थको वास करे, अने तेथी महाकष्ट करने, एगो स्त्रीना मुख दर्शननो जे प्रनाव ते यहि शृगार रस ठे सरुप जे पन तेमा जे पुरुप प्रवेश करे तेनु धर्मरूप धन रागादिक चार निये के माटे तेमा बुध थ नही ए यहि वैराग्य रस वे ॥ ११ ॥ एथ्वीटत्तम् ॥ ययाससि नवोदधेदितट तटेणीहशामदीनमधर म्ना नजिप्यति विशीर्णता न नविता ततो वांजितम् ॥ १७ ॥ पार पाप ने योग्य ने ब शृंगारवैराग्यतरगिणी. २२५ शिखरिणीरत्तम् ।। न नातीदं भ्रातः स्फुरदरुणरत्नोधकिरणप्रता नं तन्वंग्यान्तरलतरलं कुंडलयुगम्॥ढम जुग्धं पुंसामिद विरसं योगदशयोर्चलचोकानंगज्वलनयुगिढं कुंडयुगलम् ॥ १३ ॥ अर्थः- हे नाई. देदीप्यमान रक्तवर्ण रत्नोनो किरणसमूह वे जेनाविपे, तथा तरल तरलं " एटले जे अत्यंत चंचल ले. एका रुशांगी एटले पातला यांगवाली स्त्री नाजे "कुंमलयुगं" एटले जे वे कानना कुंमल ते ते शोनता नथी; किंतु विरहदशा 'यने संयोगदशामा शोक तथा कामानिएकरी युक्त एटले विरहावस्थामां शोकावि नीव, तथा स्त्रीपुरुपनी संयोगावस्थामा कामानिनो थावि व थायठे. थने या संसारनेविपे पुरुपना शांतिरुप दूधने वालवावाला ए कुंमयुगल एटले वे कुंम एम साण. अहीं कुंमलयुग ते कुंमयुगल थाय ते. ते धावी रीते.-कुंमलयुग शब्दनुं वि शेषण तरलतरलं एवं . एनो लेपार्थ थाम :- तरलतर एटले चंचल .स एटले लकार जेमां एवो जे कुंमलयुग शब्द; तेमांनो लकार कहाडी नाखिये तो कुंमयुग शब्द थायचे; थने युग शब्द थया पठी तेना थंतमां लकार जोडीये तो कुंमयुगल शब्द थायठे. ते योग्य वे. था वृत्तमां, स्त्रीना काननेविपे देदीप्यमान रत्नजडित जे वे कुंमल होयठे, ते स्त्रीना रूपमा यति वृद्धि करेठे. थने चचल होवाथी थति सुशोनित देखायटे तेमां पण कशांगी एटले पातला थागवाली स्त्रीने यति शोनेठे. ए शृंगार .अ ने ए जे वे कुंमल ते शोनाकारक नयी पण विरहदशा तथा संयोगदशामां शो क तथा कामानिना उत्पन्न करनारा , ए पुरुपनी शांतिरूप दूधनो नाश करना राठे तेथी कुंडरूप से, तेनो तूं त्याग कर. ए वैराग्य रस लें. ॥ १३ ॥ अनुष्टुत्तम् । ताडकं सस्पृहं तस्याः पश्यन् मूढः परे नवे ॥ नरो नरकपालेन्यस्ताडं कं न सदिप्यते ॥१४॥ थर्थ.- हे मूर्ख पुस्प, ते स्त्री सानिलाप “तामंकं" एटले कर्णनूपण थव लोकन करतां यागल थावनारा नवमध्ये नरक पालन करनारा थधम परमाधा मी पुरुषोनी पाशेथी “कंताडं" एटले कोण श्राघात सहन करनार नथी? थ पितु सर्व थाघात सहन करो. यही "ताडकं" ए शब्द वे वार भाष्यो, तेथो नो थर्थ निन्न निन्न वे. ए यमकालंकार ठे.

में जानाज पृर यानदित थायने, थर्थात् कामनी या उत्पन्न थायने, ते जगार गने, थने पायनितापी पुरुपोनो मुक्तिरप नगरीमा प्रोग गिरिपीटनम् ॥ अलं प्राप्य स्पर्श कचकलशयो पजना पग प्रीति धान कलयमि सुधामग्नश्च किम्॥अवस्कद धर्मदिति परटक दानुमनमा प्रयुक्त जानीया कलुपयरटेन स्पशमिम 17. मन यत एटले थत्यत स्पर्श पामीन अमृतमा मग्न यई जनागना। सदन सानिने पामेने, ए स्पर्श, धर्मग्प राजानी संन्यनेमा " नुन मनमा, एमा नुर एटने पापाप नीने मोरलेना सा अपरमजा यदी यन सीजेते स्पाने, एम मुग २२६ शृंगारवैराग्यतरंगिणी था वृत्तमा, स्त्रीना कानना कुमज जोताज पुरुपने एवी यनिनापा ए कुमलेकरी शोनायमान स्त्री मने प्राप्त थाय तो सारु ए शृंगार रस ने. निनाए करी स्त्रीना कुडलोने जे पुरुप जो ते आवता नवमा नरकम सन करनारा परमाधामी देवतायोनी मार खायजे, माटे एनो त्याग करना , राग्य रसवे ॥१॥ वसततिलकाटत्तम् ॥ सार गलं यमरविदविलोचनाना मालोक्य चेतसि मुद कलयत्ति मूढा ॥ हा निश्चित रचि तमुक्तिपुरप्रवेशव्याषेधमर्गलममुं न विचारयति ॥ १५ ॥ यर्थ - हे मूढ, कमजना जेवा नेत्रोवाली स्त्रीयोनो जे सार एटले श्रेष्ठ पटवे व श्राजोकन करीने पुरुषो अंत करणमा हर्ष पामेठे परतु हा जे गज ते ते मुक्तिनगरीमा प्रवेश करवानेचिपे प्रतिबंध करनार गावे. एका विचार करता नथी यही सार एटले अरसहित गज शदत र पायने ते योग्य या उगमा. वीना कउनी श्रेष्ठता कही जो स्त्रीनो कप सारो होय नपी माटे तनों त्याग करवो ए चराग्य रस ने ॥ १५ ॥ बान, जेना कमनना पत्र जे नेत्र जी घीयाना मान, . ६ F" ने नेह पायजे ते योग्य ने : शृंगारवैराग्यतरंगिणी. श श्रा वृत्तमा, स्त्रीना स्तननी उत्कृष्टता कही, एटले पुरुपने स्त्रीना स्तननो स्प थतांज अमृतनेचिपे मन थई गएला पुरुपनी पते धानंद उत्पन्न थायठे; ए गार रस वे; अने ए स्तन जे उ ते धर्मनो नाश करवाने अर्थ पापनो एक ठा जावट वे, माटे तेनो तुं त्याग कर. ए वैराग्य रस . ॥ १६ ॥ वसंततिलकावृत्तम्॥पीनोन्नतं स्तनतटं मृगलोचनाया आ लोकसे नरहितं यदपूर्वमेतत् ॥ मोहांधकारनिकरतय कारणस्य विद्यास्तदस्ततटमेव विवेकनानोः ॥ १७ ॥ अर्थः- मृगना जेवां लोचनवाली स्त्रीनां जे पुष्ट अने उन्नत स्तनतट एटले स्तनो ठे, ते नरहित एटले पुस्पने हितकारक नासेठे, थने अपूर्व एटले प्र तक्ष्ण पुरुपने चमत्कार उत्पन्न करे वे; तेनु तुं अवलोकन करेते; पण ते मोह प अंधकारनो क्ष्य करवातुं कारण विवेकरूप सूर्यना अस्ततट वे. अर्थात् ए की ज्ञानरूप सूर्यनो अस्त थायठे. या पद्यमा स्तनतट जे ते तेने तु अस्ततट नाण एम का, केमके, नरहित अने थपूर्व ए वे स्तनतटनां विशेषणो वे, तेयो थी श्रावो अर्थ निकले वे - नरहित एटले नकारेकरी रहित अने अपूर्व एटले जेनी थायमांचकार , एम कयाधीस्तनतटनो यस्ततट शब्द थाय ते योग्य ते. था वृत्तमां, मृगना जेवां लोचनवाली स्त्रीना मांसथी नरेला धने उंचा रहेला जे वे स्तन , ते पुरुपने अति सुख करनारा लागेठे; अने पुरुपना मनमा कामवि कार उत्पन्न करे। माटे ए शृंगार रस . धने एज स्तनोतुं विलोकन करनारा पुरु पोनो विवेकनाडा थई जाय, एटले कामविव्हल थयो थको तेने कोई सूजन थीतेथी एनो त्याग कर ए वैराग्य रस दे.॥ १७ ॥ शार्दूलविक्रीमितं वृत्तम्॥कंदप्पदिपकुंनचासणि कुचई म गादया मया न्यस्तो दस्त प्रति प्रमोदमदिरामाद्यन्मना मा स्मनः।। किंताजन्म यटर्जितं बहुविधामन्यस्य कप्रक्रियां इतोऽयं सुकृतस्य तस्य सदसाऽदायीति संचितयः॥१॥ यर्थ ।। हे सरखा, कामरुप हस्तिना गंमस्थल जेवा मनोज जे मृगादी स्त्रीना वे स्तन ठे, तेने विपे में हस्तस्थापन कयां ठे, एम जाणीने हर्परुप मदिराएकरी मदो न्मत्त अंतःकरणवालो तुं नही था. केमके, नाना प्रकारनी तपोनुष्टानादिरूपजे क टसाध्य किया ठे, तेनो धन्यास करीने जन्मेकरी संपादन करेला जे सुस्त एटले V ना मुन एटने बाद, ते जग एटले सर्पज डे, एम तु जाग. ए सर्पना नेगरी पूर्ण वतन्य दणमानमा नाशने पामेले जेम सर्पना स्पर्श मा थोकरी गजित एटाने युक्तथपाथी जग शद थापरे, ते पुत। या यता, रंठनी पाशे यांस वलेला स्त्रीना बे हाथ पुरुपने यस्ता पत्र मोदिन पपांपरी पोताना शरीरनी गृति पण रहेती नयी एशंग २.पने ए थे मीना दाय रे ते सादात सर्परुप, केमके, एनो स्पर्श' र पर पजाप, माटे तेनो तु त्याग कर ए वराग्य रस १६ नपजानिटनम्॥ कंज्ञायमतं कपिते नाही वर बदि प्राणदरे- यमरानो ना करनागे कोपायमान जे नगरानी एटने ना ने पुराना गनार्मा मनम याय ते सार, परतु धर्मपयन्यता नीति शादीमपनी दादी पटले नुन, त पुस्पना गलार्मा सनम पार संपर्ने,नेति ने योग्य नयी, केमो, सर्प, कठमना न २२७ शृगारवैराग्यतरगिणी. पुल्प, तेने तें वाहुं हाथ दीधुळे जेमके, कोई बाहेरथी बावनारा पुरुष दानसझाएकरी निषेध करे, तेम कुचक्षनेविपे हस्तप्रदानेकरीने सुरूतन पेर कम्योठे एवो जे तु ते मनमा विचार कर या पद्यमा स्तन रन्यु थने सुरुतने हाथ दी\ एज चमत्कार दे. श्रा उनमा, कामरुप हस्ती कह्यो ने तेना गमस्थलरूप स्त्रीना ने घाने ते ज्यारे पुरुप हाथनेविपे ग्रहण करेने त्यारे मदनातुर थयो हादर्षने पामेछे, ए शूगार रस , थने नाना प्रकारे कष्ट कराने सपा सुस्तनो निषेध करेठे, माटे तेनो त्यागकर ए वैराग्य रस वे ॥ १८ ज्यशास्त्तम् ॥ कगेपकंठे लुलितं विनावयेर्नुज युवत्या नुजगं गराजितम् ॥ एतस्य सस्पर्शवशादपि दणाद गैपचैतन्यमुपेति सक्षयम् ॥ २५ ॥ वर्ष चतनी पाशे वलेजा गर एटले विपे करीने थजित एवा नो ना पापने, तेमज तरुण स्त्रीना नमस्पर्शया चैतन्यनाश थापा मो नग थापा रीते थापळे-नुज शदनु विशेषण गराजित ने. तेनो द ॥पियन्नघमातरजीवित न येणे नयादी विपा म युक्त एट व रोपनीयांना नाम पायी धना शृंगारवैराग्यतरंगिणी. तो नाश करेठे ; माटे स्त्रीए पोताना हाथथी करेलु थालिंगन सर्प करतां पण थ कि उःख देनारुंठे. या श्लोका नवाही शब्द वे वखत याव्योठे तेनोयर्थ जुदो ने. ! या वृत्तमां, स्त्री ज्यारे पोतानी मुजावडे पुरुपने आलिंगन करेठे, त्यारे पुरुप गेताना प्रापनी पण परवा राखतो नथी, एवो कामातुर थायठे; ए शृंगाररसवे. थने सर्प गलामां वाजी प्राण लिये ते सारं, पण स्त्रीन थालिंगन नखं नही; के के, तेथी माग कर्म बंधाईने यंतरात्मानो नाश थायवे. माटे तेनो त्याग कर वो उचित वे ए वैराग्यरस वे. ॥ २० ॥ इंज्वंशाटत्तम् ॥ कोयं विवेकस्तव यन्नतनवां दोपावगूढः प्रमदं वि गादसे ॥यतः स्मरातंकपरीतचेतसां कि सुंदरासुंदरयोविवेचनं ॥२२॥ अर्थ.- हे साधो, था तारो कयो विवेक वे के, नम चुकुटि जेथोनी एवी स्त्रीना दोपावगृढ एटले नुजाए थालिंगित थयो थको तूं उत्कष्ट मदने पामेठे ! केमके, कामरूप रोगेकरीने जेना थंतःकरण व्याप्त थयाठे, एवा पुरुपने सारा तथा नरसानुं विवेचन यतुं नथी. जेम थपस्मारादि (मरी) रोगवाला पुरुपने गु नागुन झान होतु नथी, तेम तने पण थयुंठे. अथवा तारो विवेक दोपावगृढ एटले टोपेकरीने युक्त वे एवो थर्ष पण थायठे, माटे ए तारो केवो विवेक एम कहेवं योग्यज ते. था वृत्तमां, पुरुपने स्वीए वालिंगन कखंठतां, ते गमे तेवो विवेकी दोय तो ग ते एक कोरे रहीने कामातुर थयोषको हर्पित थायठे ; ए शृंगार रस से ने स्वीना थालिंगनथी पुरुपना विवेकनो नाश पायवे, घने यंतःकरणमा थ कथादेठे, माटे तेनो तुं त्याग कर ए वैराग्य रस . ॥ २१ ॥ वसंततिलकादृत्तम् ॥ दंदो विलोक्य परमंगदमंगनाना मानंदमुसि किं मदनांधवुझे ॥ सत्यं विवेकनिधन कनिमित्तमेतत् मेधाविनो दि परमं गदमुनृणंति ॥ २॥ ये - हे कामेरी धंधडिवाला पुस्प, खीयोना परमंगदं एटने टस्ट र जोर्डने झुं धानंद करेते ? पमित लोखोजे ते ए वाडवंधने झाननोनाग पग्म एटले उत्रप्ट गट एटले गंगरहेने ते मत्य ठे.मके,जेम संगजीव तो हेतु दे. तेम मशीनो वाटुनूपा पर दानना नादानी हेतु.ए पयमा देवखत याव्योते, तेनोधर्ष दो दोने,एवो पमरम्प चमारको ।

नो नागरनारो , माटे तेनो तु त्याग कर ए वराग्य रसवें ॥२३॥ पसततिलकारत्तम् ॥ ये दृक्पथे तव पतति नितविनीना काता करा जमिमपल्लवनप्रवीणा ॥नो वेत्सि तान् किमपर य-रे जमनाना प्रक्टीरण करवाविपे निपुण पुरुप, निग्निीमच गंपुरप्रयाणप्रत्यृढकारणतया करकानवश्यम् ॥ ४ ॥ तटने मनोज्ञ कर एटने हाथ तारी दृष्टिरूप मार्गमा थाले, तेयानमा नागीन ना करक एटाने करानी पेठे पिन्न करनारा केम जाणतानची नाजी मार्गमा कगनीष्टि थाय तो इछला कार्यनीसिमि थाप नही, हनाममा रुपने या पयमा स्त्रीना कर जेने ते करकज एम यमुन दीपीनगदनु विशेषण कात बन्द ने, एनो थर्य करना अतनसिक नपरनी पनगादि यतांन ते गमे तेपो धर्मादिक्नेविसावर यवतमा, नानानु प्रकटीकरण करवारिये स्त्रीना दाय निपुण २३० शृगारवैराग्यतरंगिणी या वृत्तमा, स्त्रीना वाहुनुं नूपण जे बाजूबध वे, ते पुरुषना मनने को हित करी जियेठे के पुरुप कामाध थयोयको महाहर्पने पामेने ए. चे, यने ए जे वाजूबंध ते थानद करनारो नथी, पण जीनो नाम मोटो रोग ठे, एम जाणीने तेनो तू त्याग कर ए वैराग्य रस ते. ॥ ३५॥ अय जनो वलयनर विलोकते मृगीदृशामधिनुजवल्लि वालिश। न बुध्यते सुकृतचमू जिगीपत समुद्यत बलनरमेनमेनस ॥३॥ थर्थ - श्रय एटले था प्रत्यक्ष मूर्ख जन जे वे, ते हरिणाही स्त्रीश्रीमा लताने रिपे वलयनर एटले जे कणसमूह ने ते जुवेने परतु ए वनय जे सुस्त जे शीतादिक, तेथोने जीतवानी बावालो एवो पापनो वानर एटले सेनासमूह ठे, एम जाण या पद्यमा वलयनर जे ले, ते बनन एमपुत्रे, वकार श्रने वकारनु ऐक्य वलपनर शब्दनु विशेषण थप एमा एनो थर्षय रहित प थायडे, तेथी वलयनर शब्द, बलनर थयो ते पोप या रनमा, स्त्रीयोना हाथमा जे ककण होय, तेने जोईने जे मूस जन शानदने पामेने, ए श्रृंगार रस अने एजे काणनो समूह ने, ते . 7 . . ते,यान् का शदना प्रकार तो करक थाप त पाग्य शृंगारवैराग्यतरंगिणी. २३१ - ण दिग्मूट एटले कामने वश घई जाय , ने तेमां ते पोताने परमानंद माने 1; ए शृंगार रस वे. अने स्त्रीना करस्पर्शादिकेकरी स्तब्ध बनी गएला पुरुपने गोदनो मार्ग जे धर्म. ते सूजतो नथी, माटे तेनो तुं त्याग कर.ए वैराग्य रस वे. नपजातिवृत्तम् ॥ नीव्याप्तमस्या हरिणेदपाया यंवीदय दारं हदिद पमेपि॥ विवेकपंकेरुहकाननस्य तमेव नीहारमुदाति ॥ ३५ ॥ अर्थः-जीवी एटले वस्त्र. तेनी गांठ पर्यंत हरिणाही स्त्रीनो जे लंबायमान हा , तेने लोईने तूं पोताना मनमां थानंदने पामेठे, ते हारने पंमितलोक, ज्ञानरू । कमलना वनने नीहार एटले हिम कहेठे. जेम हिम, कमलना वनने नाश कर तारो ठे, तेम स्त्रीना हृदय कपरनो जे हार ते ज्ञानने नाश करनारो . या पद्यमां हारने नीहार कोठे, ते आमः हारशब्दनु विडोपण नीव्याप्त ठे. एनो अर्थ था -नीशब्देकरी व्याप्त एटले जे युक्त हारशब्द ते नीहारशब्द थायवे ते योग्य वे. • या वृत्तमां, स्त्रीना हृदयनो जे सांवो हार ते तोतांज पुरुपने यति आनंद उ पन्न थायवे ए श्रृंगाररस अने ते हार जे वे ते ज्ञानरूप कमलना वनने वा जवामां हिम जेवो , एटले ते हारमा लुब्ध थएला पुरुपनुं ज्ञान नाश थर्ड जाय जे, माटे तनो तूं त्याग कर. ए वैराग्य रस . ॥ २५ ॥ वंशस्यवृत्तम्॥ विलोक्य किं सुंदरमंगनोदरं करोपि मोदं मदनज्वरा तुरानो ऽदसे र्गतिपातसंनवं नवांतरे नाविनमंगनोदरम् ॥२६॥ अर्थः-कामज्वरवड़े पीडाने पामेला हे पुस्प, सुंदर अंगना एटले स्त्रीन उदर जोईने तूं का मोहने पाठे ? अंग एटले हे पुरुप, ए उदर नयी पण जन्मांतरने विपेचने नरकने विपे पड्याथी उत्पन्न यनारा जे दर एटले नय; तेज वे; एवो का विचार करतो नथी? या पद्यमां धंगनोदर ए पद वे वखत ठे; तेयोनो पद विनागेफरी निन्न अर्थ वे, ते यहिं यमकरुप चमत्कार लाएवो. था वृत्तमां, स्त्रीनु उदर जोई पुरुष मोहने पामीने कामज्वरनी पीडाने पामेवे ए शृंगाररसते; थने ए उदर नयी पण जन्मांतर तथा नरकमां थनारो जय हे, एम जाणीने तेनो टुं त्याग कर ए वैराग्य रस . ॥ २६ ॥ वसंततिलकाहत्तम् ॥ स्फूर्जन्मनोनवनुजंगमपाशनानी नानी कुरंगकदृशां दृशि यस्य लना ॥ नानीमयं जगदशेपमुदी दतेऽसौ यो यत्र रज्यति स तन्मयमेव पश्यत् ॥ २७ ॥ ।

No text on this page.

शृंगारंगग्यतरंगिणी. २३ त निंबन काट सर्व प्रकारे करयु दोयने. तम बीना निनव सर्व प्रकारे ग्लानि कन्या योग्य ने. तेनो त न्याग कर.या पद्यमा गजमिन तापनो नार जेनिनव ने निववृक्षाज ने, एम कयु, ते याम.-गवतित पटले विकमित ने तमाग्नो अप नोट एटने नाम जेन विपे, एवो नितंत्र नाल निवगन यायने ते योग्य ने. त्रा वृनमां. कमलना जेवां नत्रावाली बीना जे वेनिनव नेते संतापनी र गा करनागने, एटने म्बीनी कटिनो पालो नाग जोयाथी अन्यत मदन विकार उत्पन्न यायचे. ते वा पूर्ण न घयाथी तना मनमा संताप यायचे, एवो ते नि तंबोनो जे प्रजाव ने. ते शृंगार ग्ल : घने स्त्रीयांना नितब निंबढाना झाडजेवा करवा . माटे एनो तुं त्याग कर; ए गग्य रस ने.॥ २० ॥ शार्दूलविक्रीडितं उत्तम्॥नूनं नूपुरमेतदायतशी रागादि विपिणां क्रीडार्थ पुरमित्यवेल न दृशाप्यालोकनीयं क चित् ॥ येनाम्मिन् मुखमात्रचंगिमगुणेराकृप्य तैरुल्बणे वश्वस्य प्रसनं चिरादपि सम्व मुक्तिनवित्री न ते ॥ ३० ॥ अर्थः- हे सरया. नूनं एटाने निश्चयेफरी विशालनेत्रोवाली स्त्रीयोनां जे था पुर एटले चरणनूरण. रागादिशत्रुन कीडा करवानुं पुर एटले नगर : एम गणीने क्यारे पण नजरेकरी जोश नही. जेने पोतानु सासै थवानी हा हो तेणे क्यारे पण शत्रुनु नगर जो नही. केमके, ए नगर प्रसिह, उदार, त । मुख्यत्वे श्रेष्ट गुणे थाकर्पण करी वलात्कारेकरी तने बांधीलेशे, तेथी फरी तूटी शकनार नथी अर्थात् ते नूपुरमां जो तु आसक्त थशे तो, फसाई पड श्रा पद्यमा स्त्रीयोना नृपुरने शत्रुनु नगर कधुने, ते याम-नूपुरशब्दनुं विशे जे नून ,तेनो अर्थ न शदेकरि कन एटले जे रहित ठे, एवं नूपुर ,एम जाणवू. या वृत्तमां' स्त्रीश्रोना पगनां नूपुर पुरुपना मन, हरण करी लिए.ए शृंगाररस यने ते नूपुर शत्रुनुं नगर एम जाणीने तेनो त्याग करवो, ए वैराग्य रस .३० पजाति वृत्तम्॥यास्त्रीतिनाम्ना विनृते शमादो शस्त्री प्रबुद्धैरवबुध्यतां ॥ एनां पुरस्कृत्य जगत्यनंगनटों यतः पुण्यनटं निन्नत्ति ॥३१॥ गर्थ:-जे स्त्री एवं नाम तु अंतःकरणमां धारण करेठे, ते शमादी एटले उपश धर्म कर्मने विपे शस्त्री एटले एक आयुधविशेप , एम सुजाण पुरुपोए जा २३४ . शृगारवेराग्यतरंगिणी वु था ससारने विपे कामरूप योझो, ए स्त्रीरूप शस्त्रीने थागत करीने धर्मरूपयो भानु भेदन करेने जेम सग्रामनेपिपे एक मोटो योको, पोताना शस्त्रेकरीने प्रति योबा नेदन करे ,तेम कामरूप योको स्त्रीरूप शस्त्रीए करी धर्मरुप योजानु दन करेठे था पद्यमा स्त्रीने शस्त्री कही, ते थाम -या स्त्री शमादी विनृते, ए टले जे स्त्री प्रथम शकार धारेने, थर्थात् स्त्रीशब्दनी थाये शकार याव्यार्थी शस्त्री शब्द थायवे ते योग्य ने श्रा वृतमा, प्रसिघ शृंगारग्स नथी, परंतु स्त्रीनी मिसना हारा वैराग्यानर गत शृंगारनी पण सूचना करीवे. ॥ ३१ ॥ वसततिलकात्तम् ॥ येय वधूरवसिता हृदये प्रमोदसपा दनव्यतिकरैकनिवधन ते ॥ सा जुर्गदुर्गतिपयेन जगन्नि नोपोधूरेव मन्मथरथस्य विनावनीया ॥ ३२॥ अर्थ -- हे पुरुप, ताराहृदयनेपिपे दर्पसमूह उत्पादन करवानु कारण जे व एटले स्त्री, असिता एटले थावीने रही, ते स्त्रीने तु जे हटयने दर्ष उत्पन्न करनारी माने, ते वधू, अत्यत उर्गम नरकना मार्गकरी लेई जवापि ऽना के रनारा कामरथनी यू एटले धुररी , एम तु जाण अर्थात ए स्त्री नथी, किनु नरक ना मार्गकरी ससारनेविपे जनारो जे कामरथ तेनी धुरी ने था पद्यमाव धू कामरथनी धुरी ने, एम का, मूलमा वधू शदनु विशेषण अवसिता शब्द . एनो अर्थ वकारेकरि सित एटले रहित थयाथी वधू शदनो धू शब्द थायने ते योग्य था वृत्तमा, स्त्रीने हर्पसमूह उत्पादन करनारी, धने पुरुपना मननेविषे रम ण करनारी कहीने, ए शृगार रस , अने ए वधू नथी पण कामदेवना रयनी धुरी , एम जाणीने तु त्याग कर, ए वैराग्य रस . मदानातावृत्तम् ॥ प्रीति तन्वत्यनलसदृशो यास्तरुण्य स्तवेता देहद्युत्या कनकनिनया योतिताशा विवेकिन् । सत्य तासामनलसहशा सयमारामराज्या मानू पा थर्थ - विक्यान् पुरुष, जना अननस एटले यातस्य रहित दृष्टि से, धने

शृंगारवैराग्यतरंगिणी.
३३५
जेनी सुवर्णना जेवी शरीरनी कांतीए दिशाथो प्रकाशित करीते, एवी तरुण स्त्रीयो
तने हर्ष उत्पन्न करते. ते धनलसदृश एटले यामिना जेवी स्त्रीयोनी सत्ता संयम
एटले चारित्ररूप वनपरंपराविपेठे. एम जाण. अर्थात् जेम अग्निसंपकरी वन द
ग्ध घायठे, तेम स्त्रीसंपर्केकरी चारित्र दृग्ध थायले. जो मोक्ष्मातिनी बुद्धि तने
यी होय, तो स्त्रीयोनी समीप पण जतो नही, आ पद्यमा अनलसदृश पट वे चार
श्राव्यांठेतेनो अर्थ नोखो नोखो ,ए चमत्कार जाणवो.
श्रा वृत्तमां. चंचलाष्टिवाली स्त्रीना शरीरनो वर्ण सोना जेवो होय, तो पुरु
पना मनमा यति आनंद उत्पन्न करते. ए शृंगार रस ; अने स्त्री अग्नि जेवी
वे. ते संयमादिक वनपरपराने वाली नस्म करनारी , माटे एनो तुं त्याग
कर, ए वैराग्य रस वे ॥ ३३ ॥
मालिनीवृत्तम ॥क ऽद् विपयनोगं पुण्यकर्मायशून्यं स्पृदय
ति विपनोगं नावयेस्तखतस्वम्॥स्मरति न करणीयं मूर्वि
तो येन जंतुः पतति कुगतिगर्ते नेहते मोदमार्गम् ॥ ३४ ॥
अर्थः- या संसारनेविषे कयौ पुरुप पुण्यकर्मनो श्राय एटले लान. एकरी
शून्य एटले रहित जे विषय नोग एटले पांच इंडियना सुरखनी उठा करेठे, केमके
एजे विषयनोग ठे, ते विपनोग एटले विपनदण ने, जे विषयनोगना योगे
मोहने पामेलो प्राणी, स्मरण करवायोग्य ते करतो नथी. तेथी नरकरुप खा
डामां पडे. ते फरी मोदमार्गने पामतो नथी, जेम विप खानारा पुरुपने स्म
रणादि रहेतां नथी, तेम विपयोपनोग करनाराने पण स्मरणादिक रहेतां नथी.
था पद्यमां विषय लोग जे ते ते विपनोग से, एम कडं; ते श्राम:- विपयोपनोगी
पदनु यशून्यं ए विशेषण ठे, एनो थर्य यकारेकरी शून्य एटले रहित थायठे;
एम यकाररहित जे विषयलोग ते विपनोग , ते योग्य ते.
श्रा वृत्तमा, पांचे विषयोनो तिरस्कार कयो वे, तेश्रोनुं मूल कारण स्त्री विषय
सुख शास्त्रोमां काने, ते श्राश्लोकमां यद्यपि प्रगट को नयी तथापि अर्था
तु सिक्ष थायवे, तेथी ए शृंगार रस छे; थने विषयनोगने विषनोग कह्यावे ए
वैराग्य रस वे. ॥ ३४॥
नपजातिवृत्तम् ।। सखे मुखं वैपथिक यदेतदानासते तन्नरकां
तमंतः ॥ सत्यं तसर्पदघप्रबंधनिबंधनवान्नरकांतमेव ॥ ३५ ॥

जेना मृगना जेवा नेत्र ठे, एवी था स्त्री ते जपफर वन, जेनीबाहुलताए
थर्थ-या कामिनीरूप यामिनीएटले रात्रि, उपशमरूप धन हरण करवाने सार।
करेने जेम रात्रिनेविपे सर्व मनुष्य निश्ति ता इव्य हरण करवासास चोर किस
अर्थात् स्त्री कामोत्पत्ति करनारी ठे, एशृगाररस ठे, अने एरात्रिनेविपे मनुष्य में
था मृत्तमा, स्वीने मोह उत्पन्न करनारी रात्रि कहीले, ने कामने घोर ह्योन।
ए करे तो कामरुप चोरना सपाटामा भावी पोतानी सपत्ति तथा प्राण प्रमुख
नुपजातिवृत्तम् ॥ मृगेदाणा नूनमसावसीमा नीमाटवी बुद्धिमतामती |
त्या ।। यहादुवल्लीनिरनगनिल्लो बध्वा नरान् लनयते न मुक्तिम् ॥४॥
थर्य-ने बुद्धिमान पुरुपोने थतिक्रमण करवा योग्य नथी, जेने मर्यादा नदी।
शृगारवैराग्यतरंगिणी
अर्थ- हे पुरुष, जो तने मुक्तिरूप नगरी प्रत्ये जवानी थनिरुचि दोष,
व कामरूप गजशिशुने कीडाने श्रर्थ, पिहारपिपे योग्य एवा था स्त्री।
स्थली एटले नूमि, तेने तू दूर मूकोदे जो त् ए नूमिने मुझीग नही, तो
प प्रवत वायुए करी विस्तारने पामेला व्यामोहरूप रज कणो तारा नेत्रोमा पमो
तेथी मार्ग समनार नथी अर्थात् मोदमार्ग मलनार नथी याखोमा धृन गयाची
मार्गने जोई शकातु नथी ए प्रसिद्ध वे, एम ससाररुप अरण्यमा 'भ्रमण करत
था वृत्तमा, कामने हस्तिनाबालक जेवो कोने तेने क्रीडा करवाने स्त्री निता
रूप पृथवी ने, अर्थात् कामक्रीडानु स्थान जे स्त्रीना निनब कह्याने ए शृगाररत के,
घने ए पृथवीनेविपे यौवनना योगे नेत्रोनेपि रज कणो पमयाथी मार्ग सुनता
नथी, अर्थात् स्त्री नितवरूप नूमिनेविपे जे पुरुप थावी जायचे ते विषयरूप रजक
ऐकरी हृदयाव थई जायठे माटे ए त्याग करवा योग्य ठे ए वैराग्यरस ॥ ३५॥
मालिनीटत्तम्॥शमधनमपहर्तु कामचौरप्रचार विरचयति
निकामं कामिनी यामिनीयम् ॥ सपटि विदधती या मोद
निज्ञसमुज्ञा जनयति जनमत सर्वचैतन्यशून्यम् ॥ ४० ॥
कामरुप चोरनो थत्यंत प्रचार प्रगट करेले, तथा मोहरूप निशानी समूहिका
नारी जे ए रात्र, ते जन एटले मनुष्याने श्रत करणनेवि सर्व चैतन्य थकी रहिन
वे तेनी पठे जाणी लेवु
सर्व खो दिये।, माटे एनो त्याग करयो योग्य ते ए वैराग्य रसवे ॥ ४० ॥

शृंगाग्वैगग्यतरंगिणी. कामम्पनील, मनुष्याने बांधिने फरी नोटी मृतां नवी. अर्थात बांधलीन वाचलो जवा दियेने जेमचगायमा माग चालनाग लोकांन चोर.जिवडे बांधिन नेत्रानु नवम्य दराण करीलीयने. नेमज मंगेहाणान्त्री पोतानी बाजनाए कंगन वित्र बंधन कन्या पती पुरुपने मुक्ती नथी. श्रासनमा स्त्रीने मर्यादारहित कदी, तेथी दावनाच सूचव्या ने. स्वीने वनरूप प्रदीने तेनी नुजाने लतार प कही. एमां कोई पुरुष सपढाय तो फनी पडेने.अ र्थात चीए नुजावडे थालिंगन गंतता तेथी पुरुष तूटी मकतो नश्री. ए शृंगार गम ने. अने ए बनमा कामरूप चोग्टा बोने ते मोक्षमागे जनाग पुस्पनु धर्म धन प्रमुग्व हरण करी जेनार ने.माटे त्याग करवा योग्य ठे, ए वैराग्य रस चे. ॥४१॥ शिखरिणीदत्तम् ॥ऽयं वारं वारं द्युतितुलितरोलंबवलयं न वक्र धूचक्र चलयति मगासी मम पुरः ॥ कुधीकारागारापसरणमति मां रखलयितुं प्रपंचत्पंचेपोर्वदति निवर्ड लोनिगडम् ॥ ४ ॥ अर्थ-या मृगलोचना जे म्बी . तेनु जे बांकं कुटिचक ने, ते जमरायोना ज, कांतिवाटुं ने ने मारी मात्र वाग्वार चयन करे. एम नयी; पण नरशी बु हिरप कागययी दृर नाशी जवानी वाचालो जे दुं . तेमने नाशी जया न देता कामना प्रपंच युक्त इ सह जे लोग्नमनी बंडी धारण करेली ने. अर्थात् जेम चोरने बेमी नाखीने बंटीखानामा नाग्वने. तेमन मने पण वश करवा सारुयास्त्री 'कुटी चक्ररूप कामदेवनीलोखमनी बेटी धारण करते. श्रा वृत्तमा, स्त्रीनें वृकुटिचक एQ के के जे पुरुप तेना फासामा धावे ते फरी लूटी शकतो नथी, अर्थात अति मोह उत्पन्न करना , ए शृंगार रस चे; थने स्त्रीने 'नुकुटिचक काम देवनी लोहनी बेमी , माटे तेनो त्याग करवो जाये ए वैराग्य रस वे. ॥ ४२ ॥ मंदाक्रांता उत्तम् ॥ यामोन्यत्र जुततरमितो मित्र यत्कंठपी नायं द्वारश्चकितनरिणीलोचनाया चकास्ति ॥नानीरंधे विदितवसति योस्ति कंदर्पसर्पस्तन्मुक्तोयं स्फुरति रुचिरः किंतु निर्मोकपटः॥४३॥ घर्थः हे मित्र, या थापणे स्थानकने मूकीने जलदीवीजे काणेजबु जोये.के मके तृपावान थाली हरिणीना नेत्रना जेवा जेना नेत्र, एवी स्त्रीयोना कंठमांजे .. से गर्ग ने अपवर्ग एटले मोक्षरूप नगरनो मार्ग जोई शकतो नथी, एमतता ।। पर्मा पदेने , जेम कमाना गैगेकरीने जेना नेत्रो यस्त थयला होय, तजा या बनर्मा, रामन नेत्र रोगना जेगो कोने, एटाने जेने कामो प्रमुग प्रगम पायने ते कई जोई नाफतो नथी, तेम कामरुप नत्र रोगना या पुरा मगरना कृपामा पटेले,माटे त्याग करवायोग्य , ए घराग्यरस 1933 विपरिणीवनम् ।।जगारण्य मुक्त्वा यदि जिगमिपुमक्तिनगरीत दानी मारापीपियविषय वसतिम्।। यतश्वायाप्येपा प्रत्यय निमदामोदमचिगटय जतुर्यम्मात्पदमपिन गतु प्रनवनि या दर्प-हेपजो तुनादवीन मृगीने मुनि नगरीते जागनी २४० शृंगारराग्यतरागण या हार शोने , ते हार नथी, कितु नानिरुप रघनेविपे रहेनारोजे प, तेणे मूकेज था मनोहर निकपट्ट एटले कचुक दीवामा यावेने, ठेकाणु मृकीने बीजे काणे नागी जवानी सूचना करेचे सर्पनु क्चुक देनु ने. माटे नानीरूप जे कामरूप सर्पने रहेवार्नु राफ, थने था हाररूप कचुक , एम जाणीने नाशी जवु योग्य वे था उनमा, स्त्रीयोना कतना दारनी शोना कही, तथा नानिनु वर्णन का चे, ए शृगाररम , थने ए वन्ने उखना साधन होवाथी त्याग करवा याग। ए वैराग्परस ठे ॥४३॥ वसततिलका उत्तम् ॥य कामकामलविलुप्तविवेकचतु स्वर्गापवर्गपुरमार्गमवीक्ष्यमाण. ॥ कानांजन प्रति निरा दरतामुपैति भ्रात. पतिप्यति स नीमनवाधुकूपे ॥४४॥ अर्ष - जे पुपना विकल्प चहु कामरूप कामज एटले नेत्र रोगेकरी प्रश्न परमानाप यजननो यादर करनो नथी, ते पुरुप जयकर संसाररूप ग्गेनार यजन नायगनो अनादर करे तो श्रध कृपमा पडी जाय, जनमो जे निगदर कोते, ते या मसाररूप धापना कृयामा पाइने तमा हा - 7 कमा पानी महामंदना रिम्नाग्न पाइने तयटनी नायाना रपश पान शृंगारवेराग्यतरंगिणी. ह कारक . ए कारण माटे था प्राणी एक पगलुं पण चालवाने समर्थ थतो नर्थ नेम वननेविपे विषवृक्ष्नी नीचे वेठेलो पुरुष, मत्त थयेलो होयचे, ते वरखते मूकीने नगरमा जवानी इवा करे तो एक पगबुं, पण नारखी गकातुं नथी. मा मोदनी वा करनारा पुरुपे विषयसेवन करवानी बुद्धि करवी नही. था वृत्तमा, विषयना सेवन थकी पुरुप कामांध थई जाय , एम कयुं ते गू ररस , अने ते सर्वथा त्याग करवा योग्य वे एम कडं ते वैराग्यरस डे. नुपजातिटत्तम्।।सोमप्रनाचार्यमना च यन्न पुंसां तमःपकमपाकरोति॥ तदप्यमुष्मिन्नुपदेशलेश निशम्यमानेऽनिशमेति नाशम् ॥ ४६॥ इति श्रीशतार्थत्तिकारश्रीसोमप्रनाचार्यविरचिता शृंगारवैराग्यतरंगिणी समाप्ता. थर्थः-सोमप्रना एटलेचंकांति, अने अर्यमना एटले सूर्यकांति जे मनुष्यो नो तमःपंक एटले अज्ञानांधकारसमूह दूर करता नथी, ते पण था अल्प उप देश श्रवण कस्यो उतां नाशने पामेले, अर्थात् चंकांति तथा सूर्यकांति यज्ञानरू पअंधकारनो नाश करवाने समर्थ थती नथी, थने श्रा उपदेश यंतरनो अंधका र मटाडवाने समर्थ वे एथी या उपदेश यति उत्कृष्ट ठे. श्रा पद्यमा ग्रंथकर्ता ए पोतानुं सोमप्रनाचार्य एवं नाम चातुर्ये करी गोपन करेलुंखे, ते ज्ञातायोए जाणी लेवु.॥४६॥ था ग्रंथनु नाम ग्रंथकतीए शृंगारवराग्यतरंगिणी रारब्युंठे, एनोर्थ शृंगार थने वैराग्यरुप तरंगोवाली नदी, एवो थायवे. ते नदीना बन्ने प्रकार नंदलाल नामना टी काकीए स्पष्टरीते दाव्या ठे,तेनोज नाव सईने था श्रमे श्रर्थ कस्यो . ग्रंथ आ थंतमा टीकाकर्ताए त्रण लोक राख्या ते ते याप्रमाणेः- संवत्सरदिपमुनींऽमितस्य मासे मार्गे त्रयोदगमिते दिवसे नृगोच। स्वल्पा तरी रचिता सुरवबोधिकारख्या पायठतरतरंगिणिकासुशास्त्रे ॥ १ ॥थागारानान्नि गरे नंदलालेन धीमता ॥ दानविशालशिष्यानुरोधेन रुपया गुरोः ॥शा युग्मम् ॥ मननाचार्यरुति सुउर्गमा विवृएवता स्वरूपधिया मयाऽत्र यत् ॥ न्यूनाधिकोकन पक्षितः रुत वियोध्यं रुतिनिः रूपानुनिः ॥ ३ ॥ assSAESTHETASSSSSSSESS इति श्रीश्रृंगारवैराग्यतरगिणीनापांतरं समातं ॥ ॥ ७ ॥ सरलाशया सुन वश्री,क्लिासलीजा सिहाय सुरयोपा ॥ य शिश्रियु स्वरीशा श्रीवीर श्रेयसी शिवाजयसरसी, वरसावर सर्वधिपयपिनाम्याासवरसारसवासर, सर्वपालानदीचा प ॥ ॥ शीतश्रियो विवाहावसरे विश्वाश्रयो रसावलये ॥ यावर्ष वसुवर्ण मा शिशातरयराती ॥ १० ॥श्यागसे सहसाह, वासवसेवाह शिवरसान हो। हरिश्रसारसाय, व्यवसायायासविरहवर ॥ ११॥ यहरुपयोविंशरारु,यमिक | रसतिनरागे , शोपे कपिगडोयश्च वीर ॥ सर्वाशालासियशो,राशिरहिसारह हिशशिसरोस्हयो ॥थशरारुस्वास्यश्री,साम्यविलासर्विलोलयसि ॥ १२॥ सेहो पियवं रिवारस्य ।। व्याहरसि परहस्य, शस्याय शरीरिविसराय ॥१५॥ सुमार , स्वरहार्यभिगेपिलोलसेव्यान्हे ॥ सहरसि हेजयाह , तिहश्य दापनीतरासिवरै ॥ १७ ॥ उन्नासय स्वसेवारसशीले निशि शिवाय तिमविषयहताहत, सहरीसहारसुशिरीप ॥ १७ ॥ श्रयसी वशमि य-हे सुगहिविशा ॥ ये सह रसानयाऽहा,सि हारहूरारसानग्मक २४ स्तोत्र ॥अथ श्रीवीरस्तवनप्रारंन ॥ स्य श्रेयससरसीरुद, सूर श्रीवीर शपिवर सेव ।। सविशेपहर्षरसवत्र, व्यूहसेव्याहि ॥ १॥ श्रवोवसीयससर गोपसहसागुराश्रय सहसो । लालसा वो, नूयानवशो वशी वीर ॥२॥ विषयाशी विपवीश्वर, हिसारस साहब रिस्हशिशिर ॥ विम्य रोपशावर, सहारर शिवाय म्या ॥ ३ ॥ श्रागमय । व ॥ ४ ॥ हरदासहसशशिहा,रहारियशमो शिवपिसश्रययो ॥ ऽहं वरिवण्यात वीरेशम्यान्हिसारसयो ॥ ५ ॥ शीतसरोवरलहरी, विहारशिशिरा असवरीयो छ । वीरम्य व्याहारा, व्हियासुरशरीरशौर्यहरा ॥ ॥ उरुसशयलिस्वरु, ररिहा वगष्ट यो वरपाम ॥थरसेयानात्य वा, वारुहवारिवाहरव पा, रिरसा प्रायसश्रिया सह ये ॥ येपा श्रीवारेश्वर,सेवारस एव दर्याय ला ॥ १३ ॥ उरसियाज श्रेय ,श्रिया असवरसरोरुहाशीव ॥ रापान बारह, रसाबिहार ससेपाया ॥ १४ ॥ सदानिक ॥ यविषह्मशिर गुना ॥ १६ ॥ शिशिरायशिशिरलेश्य रायव्यवहारजालसररुपै रतो दो, तो विपगसुरापार्यवीर्यशाजी य ॥ वार। या पण महामोहनास्य सूरियर विहाय याशारसाबिहारियशा ॥ ॥ सश्री श्र .

रतोत्र. ४३ । -- इरिः, सुशिलशिलाविनालोराः ॥ २१ ॥ गुभूपुशिप्पविसर,श्रव.सुहर्परसर्पिरा वः ॥ अविलयवायैश्वर्य, श्रीयोपाश्नेपरतविवाः ॥२॥ सैपोऽसहायवीरः, शिवा म्बिाराहवेवसुसहेषु ॥ विश्वम्य सुरोर्वीरुद, यायुष्य श्रेयसां वीरः ॥ ३३॥ संसारो सविपालय, वारिविशोपर्विव्यवाहो वः॥अव्यालीनाऽजससुर, बिनयाहावाऽविषय गीतः ॥ २४ ॥ पंचनिः कुलकं ॥ अहियोऽलसम्य शिप्या वयवलवन्याऽयविग्हथि ग्सम्य ॥ श्रीवीर वीरयरया लेण्या अश्रेयनीरस्य ।। २७ ॥ यः पंचवर्गपरिहारमनी झमेततश्चमत्कृतिकर गुणकीर्तनं तं ॥ जिव्हायवर्ति वितनाति विपक्षितानाः श्री वीरनाम्ययुजि न प्रनवंति तस्मिन् ॥ २६ ॥ इति पंचवर्गपरिहारेण श्रीजिनमनस रिकतश्रीवीरम्तवनं समाप्तम् ॥

N ८ ॥ . मुपीमानां ॥१॥थवद्यमयि प्रसादप्रवण कृपानिधे विधेहि शैवेय निज मनन श्रीहरिकुजहीराकर, वजमणिर्वजपाणिना प्रणत ॥ त्वमवद्यमुक्त नेमे, प्रणमुच | वशीक्तिक श्रियानिवासस्तव पादपंकज ॥ खोर्मिसघट्टविघहितात्मना तनाप गनीरतमे नयाधी ॥ ३॥ याति ॥ उनियाल्वमहातरीनिना स्यात्पदोपहिताम्। तराधियुग्म शरण प्रपद्य॥ ५॥ गे॥ यस्त्वया रुजुपथ सता मतो देवरसडितकुतीय खन्नखश्रेणिमयूखलेखा निर्वासिताशावलयाधकार ॥ थवार्यसौदर्यविनास गाह 'विधा यम्त सदिवेकचिनारुत ॥ तस्यानिमुखमीदते न जातु सुखसपद ॥ाथसत्।। वर्ग ॥ तं प्रपद्य निरपद्यमुद्यता नेदयति ननु मुर्तिपुरीज्ञाक्॥ ६ ॥ कदे॥ वरिवचा कर्मरदारजीपाव तावर पुर्नयाहरुतित्रासन शासन ।। ये प्रपन्ना गुणस्नहिना जनावरमणीरमणीनिरल मम ॥ हदि पदांमुरुहस्मरण चते गिरि च तथ्यगुणमा २४४ स्तोत्र श ॥ तत्रापि नीतिं दधती शलाकाव्यांजेन जग्राह तृण नु वक्रे॥१२॥ रसलालसत्वात् तदाधिनी केवलबोधलक्ष्मी ॥ ययायतामादरिणीं वरीनु य मत्वा खमिव समस्या ॥ १३ ॥ थपोढपके कविनिर्निपेव्ये नगजाले ॥ विनो जवाड्मुखगागपूरे उदिपुगास्तृणवत्तरति ॥ १५ ॥ मये दिग्वलये समतात् यश शशाकेन रुते ध्रुव ते ॥ कुहूयानि केवनमेव पिकानां शरणीचकार ॥ १५॥ जगत्रयोजासि यशस्तवेतत् कस्पर्वता ३ ॥ यस्यापराईपि तृणस्य नव प्रनाप्रनावो जनतेऽवकाश ॥ १६ रूढिमात्र खन्नानि तु श्रीर्वसतीति मुष्टि ॥ कुतोन्यथा तङपदोदिताना पुर . ति नित्यमृद्धि ॥ १७ ॥ वसुनूतिसुतोपि कौतुक वसुनूतेजनक प्रणेमुपा ॥ ननवोपि वर्तसे कथमगीतसर्वमगल ॥१७॥नाध करोपि कृपमीश धत्से सदास यमपाशमपि प्रचेता ॥श्रीदोपि सूत्रितयमालयवासकेतिस्त्व हमे दरहेतिपातं ॥ १५ ॥ यत्तपत्यपि कली जिनमनाचार्यमत्रमनुशीनता ॥ हेतुताऽत्र खलु तत्वदेकताध्यानपारमितयैव गृह्यते ॥२०॥ मयेव दुर्दैव शमयितु जूममहिमा सुतस्त्व लेशेन श्रुतरथधुरा गौतमगुरु कुरुद्योतीवादिनपतिसुधा गर मनिमे प्रनो विद्यामत्र प्रनव नवतो गौतम नम ॥२॥इति श्रीगौतमस्तवन समाप्त। ॥अथ नेमिस्तवनं क्रियागुप्त ॥ विम्तरा ॥ पातकानि नादीरितागिराजनु जातशिवदानलालसा देहिनम्ते सुगगव्य खानि सुत्रियां ॥ G ॥ यह ॥॥थन ॥ विनवराज्यानामुग -- स्तोत्र 98 , नं तव ॥ [ ॥ चते ॥ जंगनश्रवणपुटामृतष्टा तमोपहां सुललितरा गपेशलां ॥ उदीरयन् गिरमिलदेशनावनावरा गतामयसुखसंपदां सतां ॥ ॥ १० ॥ धराः ॥ नव्यान् जवनमानीरुकचित्तवृत्तीन् सद्देशनानिरनितस्त्वमुरुष नावः ॥ दोषासमागमनिमीलितमन्नखंडमान्बासयेन किमुरश्मिनिरंशुमाली ॥११॥ आवः ॥ नूत्यानिनूतपुस्हूतपुरानिरामतां कुर्वति ,संततमहोत्सवनाजमुर्वरी ॥ स्ववंदनंदथुमयानि महामुतानि ते कल्याणकानि जुवनेश विनाव्य चेतसा ॥ १२॥ श्रयानि ॥ नास्त्वया भ्रमरविनमवर्णो हे मुनीं वपुपि प्रचरिनुः ॥ पापशात्रवनिव दारुल ध्यानसंततिरिवाश्रितमूर्तिः ॥ १३ ॥ कहे ॥ उर्बोधं मे सपदि पदकोनूत वाम्तोः पते सद्गश्रेणीकुवलयवनश्यामलनायकाय ॥ श्राकौमारा वनजयिनि यस्य ते ब्रह्मवर्म स्वैः कादंबन खलु मटनः स्प्रष्टुमप्यमीष्ट ॥१४॥ उय ॥ नाशंनो दनिनादयाटवकुलश्रीकंवपीनीजुन्न् मुक्ताहारमहारथं रतिपत्ति निर्जित्य जैनाजिरे । कीति करवकोमलामधिगत वामेव देव प्रतुं श्रीमन्नेमिजिनेचं शरण नीरुन बारातितः ॥ १५॥ एमि ॥ सेवाहेवाकिनः स्युस्तव पटयुगले येऽत्र नतिप्रयुक्तास्ते पां देवा. सदा पिप्रति इतविपदः संपदः सुप्रसन्नाः ॥ चिंतारनं प्रयत्नात् करतलकाल तं कुर्वतां सर्वकालं काल नेतनराणामटति सुपटतांनो मनोराज्यसिदिः॥ १६ ॥पि प्रति ॥ नवताऽऽस्जियोपुरैर्यशःप्रसरैः शुक्लतया जगत्रयं । जिनसिविरिति प्रतिदिना क सुखसाम्राज्यमयी महापुरी ॥ १७ ॥ थारि ॥ श्रवगतरी स्वसेवकं मां नगवन् यांच शिवस्य वर्तिनी त्वं ।। करुणाईमनाः कुरु प्रसादं मयि तस्याः सपदि प्रकारा नेन ॥ १७ ॥थवक् ॥ मरकतकमनीयकांतिकाय त्वमनिनतेइ किरीटवहितान्हे ॥ चिरमिन मम चंचरीकचर्या हृदय कुशेगयकोशमन्वजस्त्रं ॥ १॥ श्रय ॥ निखिलज गतां गोता गुप्तक्रियास्तवतंत्रणादिति कतनुतिः सानंदं श्रीजिनमनमीनिः ॥ नय तु जवतां ने नूयो नवमनंनव नयमनयदोजीमः श्रीमधिवातनयः प्रनुः ॥२०॥ इति श्रीनेमिजितम्तवनं क्रियागुप्तं समाप्तम् ।। ॥ अथ श्रीवईमानस्तवनप्रारंजः।। कामारिक्रमनियंदापगाधागशुद्धविरादवि ॥ ठंदोनिविविधरधीरथी स्तोप्येऽहं चरमंजिनवरं ॥ १ ॥ त्रलोस्पनेतन्तब नयालीनिनाशनं मातनमात्रितोयः॥ त स्वजायुधमाचिरम्ति कर्मगनिटाविधानं ॥ २॥ फिमकमाचर्यकरं न ते यत् पुप्पंधयोप्ये विशेष विकः । त्यक्तापजातिन्त्रमणानितापस्त्वदंगलीगंध्यमनुप्रयानि ॥ ३ ॥ यः मृजत्यनर सौरजसारैरंजस्लव पटांबुजपूजा ॥ प्रत्य नम्र रिवि देवन ..

M . A 1 - N प्रहर्पिणीना निर्वक्त का यथावदस्तु शक्र ॥ १५ ॥ सिद्धार्थराजकुलनदनमाज। त न वाम्यति क तव कीर्तिरपारिजात ॥ वर्णेन मुग्धमधुरेण मतोजनामिक । ६ता स्थिरतया सुमनोजनाऽग ॥ १६ ॥ अति महति नवोर्मीमानिनीह प्रमा |जननमरणवीच्या घातदोदूयमाना ॥ कथमपि पृथुपुल्या प्राणिन प्रामुवति हणमिर केचितासन तावकीन ॥१७॥ लवणिमतर्जितस्मरपुर धिरुपदर्पा' | टालदशरविकामिमर्मा। कनकमणीमयानरपर श्मिरजितागी व्यजपत बार नीन नवत समाधिमुश ॥ १७॥ प्रबोध नव्यानोरुहवनमधीशाधिगमयन । रन् मोहध्वान परसमयतारा कवलयन् ॥ निविष्ट सिहासन्यलममननामाना | यनुरगमसगमत्रिदशहरणीनेत्रो नेत्रत्रिनागविलोकिते ॥ तव जिन मन शाके रिनवजनुचिखसामृत्युड खंरातो के के न तव वलव देवसेवा प्रपन्ना । किंम्पादन मनागपि न ससाचलयितुमल कि हेमादियुगातमहाबला ॥ २०॥ दारियान श्व स्तोत्र, गादयं वागतानि निगदंति सराग ॥ ५ ॥ 4 नोगनगिनृत् ॥ राज्यकाविरुपनन्नमीति तं ननमीति तच य पदी मुदा ।। किनिकायकरप्रहतानां संप्रसरन् गगने मरुजानां ॥ जन्ममहे तव कम्य दत्तमदो धकधारुतिनाद ॥६॥ये जक्यातनमरविलसिता जा विनो॥ ते श्रेय श्रीर्मधुरमधुरसास्वादो सादात् समजनि तिनि ॥३॥ तत्वारोपलोपप्रवीणा प्रव्हप्राणिनाणसस्थाधुरीणा ॥ थाझा धने मोनिना तुश्रेणि अधाशातिनी तावकीनां ॥ ॥ वसुगाम सुधामयवक्र वियो. माश्यिते वि य ॥ स सुखानि सुखानिरिवोद्यमणीन् बिन्ते परिता नर ॥ ए ॥ स्रग्विणी कुडलबाजिगन्नस्थला तारदारद्युतिौतिवदन्तम् ।। राखमलानामखडादरा पादपीठे मुक्त्तायके पावके ॥ १०॥ दणादेव श्रीनुजगप्रयात विवृद्धि हुन कर्म पुसा ॥ नवन्नाममत्रम्य पनि, तिमुरापादिता ये ॥ ११ ॥ दुतविलवितमध्यरवध्वनद् पर ॥ कुसुमवर्षचितं तव देशनावनितल कश्वैत्य न मोदते ॥ १२॥ मुदुर नृता हृदये प्रमितादापि वत वाक् नवत ॥ थनियत्नया प्रतिपफान नितोऽर्थतश्च जगद→धिया ॥ १३॥ जगप्रनो नक्तिनरादनुदिजा । पहृत्य हत्यवित् ॥ नरेंश्वशस्थमचीकरवाचीपतिर्नवत हरिनैगमेपिणा ॥' ' ते निखिलनयाविरोधिनीना ोधद्रुमदलने कुनारिकाणां ॥ माहात्म्य तो नवानानातिस्मोदयशिखरिणीव द्युतिपति A . -- ॥१॥ थमितदमितस्त्रातामा

स्तोत्र.
प्रशमनपटोगेपधन्योपयुक्ती मंदाक्रांता जगति जनता महेनामयेन ॥ १ ॥
रादितनियामगंगुमना जैत्रकीर्तिवटायवलितनिखिजत्रिलोकीतलं अध्योपा
॥ सरननविनमन्सुराधीगढामलिज्योतिपामरुणितपढपीतमूमिनिरेप्यविस्त
मनो ॥ २५ ॥ विन्राणो नखविक्रियां नयकरी धूतोलमालधारीई शब्द
नीचकै प्रकटयन् नूयोवनीकाहतः ॥ वनक्त्या नृतकोप्यवाप्य नृपतां मांसाद
वर्थयन् धनेऽनेकपराजिदर्पटलने शार्दूलविक्रीडित ॥ २३ ॥ विद्यामंत्रन कार्य सु
तरनिरलं वित्तेन च मृनं पर्याप्तं राज्यलक्ष्म्या कृतममरतया ह्यास्तां सुवदना ॥ स्ट
नत्वेका तु नक्तिस्त्वयि मम मनति ध्वस्तारिखतमला कैवल्यत्रीर्यया स्यात् करतल निल
T साऽन्हाय नगवन् ॥ २४ ॥ श्रीवीरः सर्वदिकः कनकरु चित्तनूरोचिरुद्रीप्रदीपैमंग
र. सोस्तु टीपोत्सव व जगदानंदसंदर्नकंदः ॥ सूक्तिजैनप्रनीयं मृविशदपदा खग्ध
घीयमाना नव्यानां नव्यनूत्यै नवतु नवतुदे नावनानावितानां ॥ २५ ॥ इति
वईमान स्तवनं समाप्तम् ॥
॥ अन्य चतुर्विंशतिजिनस्तवनं ॥
कनककांतिधनुः शतपंचकोतितपांकितदेहमुपास्महे ॥ रतिपतेर्जयिनं प्रथ
मं जिनं नृवपनं तपनं सपनंजिनः ॥ १ ॥ विरदलांन्ति वांठितदायक कमनुत्रि
"यासुरनायका स्तुतिपरः पुरुपो नवति दिता वजित राजितरा जितराग ते॥शातुरग
'सांठनसंनव संनवत्यहरिद जिन पत्र रसादहं ॥ हृटि दधे नाणितीर्गुणनूरुहां
'शमहिता महितामहि तावकी ॥ 3 ॥ नवमहार्णवनिस्तरणेच्या त्वमनिनंदन
देव निषेत्र्यसे । व्रतनृतां कुगतेः स्मरनिग्रहप्रसनंया सनया सनयात्मना ॥ ४ ॥
त्रिभुवनामितकामितपूरणे सुरतरोरुपमामतिगामुको ।। तव विनो जजते नवतः
कमावसुमते सुमते सुमतेर्दद ॥ ५ ॥ धरनृपात्मज पंट जिनेश्वर त्वयि कृतपण
घः क्रियते पतिः । रनसतः प्रथितार्थिदरिद तोपरमया रमया रमयान्वितः ॥६॥
मनुसुपार्श्वजगत्रितयाङनुः पवितकाशिपुरीकवीतदणः। सुरुतिनः कृतिनश्चरितं वि
गुनवतो नवतो नवतोदनं ॥ ॥ कुनयकानननंजनकुंजराः शशिस्चे महसेन
त प्रनो ॥ निखिलजीवनिकायहितोक्तिनिः शुनवदा नवदा नवदागमाः || G !!
धि विजित्य मनोनवमग्रहीन्मकरमंकमिपाध्वजमम्य यः ॥ स्तुतजनाः सविधि
दृशां सुरस्तुतमसंतमसं तमसंस्तुत ।। ए ॥ दृढरयांगजशीतल शीतलद्युतिकमावि
ना तव नारती॥ मनसि कस्य न हर्षसनाथतां जिन ततान ततानततायिनी ॥१०॥

A महापणीना निर्वत कश्च यथावदस्तु शक ॥ १५ ॥ सायराजकुस्तान त न 'नाम्यति क तव कीर्तिरपारिजात ॥ वर्णन पुग्धमधुरेण मतोजनामा । ता स्थिरतया सुमनोजनाऽग ॥ १६ ॥थति महति नयोर्मीमानिनीह, दमिर के चिपासन तावकीन ॥१७॥ लवणिमतर्जितस्मरपुरधिरुपदर्पा जननमरणयीच्या घातदोयमाना ॥ कथमपि पृथुपुल्या प्राणिन प्राप्नुवति टाइनदशरविकामिमा । कनकमणीमयानर रश्मिरजितागी व्यजयन | रन् मोहध्यांत परसमयतारा कवलयन् ॥ निविष्ट सिहासन्यलममननामा | मनागपि न समाचलयितुमज कि हेमादि युगांतमहाबजा ॥२०॥ दारिद्यात यनुरगमसगमत्रिदाहरणीनेत्रो नेत्रत्रिनागरिलोकित ॥ तव जिन मन र २५६ स्तोत्र, गाय स्वागतानि निगदंति सराग ॥ ५॥ वाजिवारणरयोग जोगनगिनृत् ॥ राज्यशक्षिरुपनन्नमीति त ननमीति तव य पदी मुदा ॥ किनिकायकरप्रहताना सप्रसरन् गगते मरुजाना ॥ जन्ममहे तव कम्प दत्तमदो धकधारूतिनाद ॥६॥ ये नत्याननमरविलसिता जापा पिनो॥ ते श्रेय श्रीर्मधुरमधुरसासादो सादात् समजनि कतिनि ॥ ॥ तत्वारोपलोपप्रवीणां प्रव्हमाणित्राणसस्थाधुरीणा ॥ थाहा धने मोनिना तुश्रेणि अक्षाशाजिनी तावकीनां ॥ GM वसुधाम सुधामयचक्र रियो माश्यिते नुवि य ॥ स सुखानि सुखानिरिवोद्यमणीन् विनृते नर ॥ ॥ ॥ स्रग्विणी कुडलबाजिगनस्थला तारहारद्युतियोतिवदतम् । राखमलानामखडादरा पादपीठे सुत्ताव पावके ॥ १० ॥ कृणादेव तंत्रा' श्रीनुजगप्रयातं विधि शुभ कर्म पुसा ॥ नवन्नाममत्रस्य वर्णानुपूर्वी तिमुरापादिता ये ॥ ११ ॥ द्रुतविलवितमध्यरवध्वनद् विपि । ॥ कुसुमपर्पचिर्त तव देशनावनितल कश्चैत्य न मोदते ॥ १२॥ ४ एणनृता हृदये प्रमितादापि बत वाक् नवत ॥ धनियत्तया प्रतिपफान। नितोऽर्थतश्च जगदय॑ धियां ॥ १३ ॥ जगत्प्रनो नक्तिनानुदिजा दिन. पहृत्य हत्यवित् ।। नरेंड्वशस्थमचीकरचीपतिर्नवत हरिनगमेपिणा ॥१॥ ते निखिजनयाविरोधिनीना पुर्वाधदुमदलने कुमारिकाणां ॥ माहात्म्य - नी न नवत समाविमुभा ॥ धनव्यानोदयनमधीशाधिगमपन तो नवानानातिस्मोदयशिखरिणीव द्युतिपति ॥ १५ ॥ । મિતતિ

स्तोत्र.
ឱ8១
--
प्रशमनपटोरोपधन्योपयुक्ती मंदाकांता जगति जनता सहेनामयेन ॥ १ ॥
रमुदितनिशाकरांगुमना जैत्रकीर्तिवटाधवलितनिखिलत्रिलोकीतलं अक्ष्योपासते
ना सरनसविनमत्तुराधीशचूडामणिज्योतिपामरुणितपदपीतमूर्मिनिरेप्यचविस्तां
मनो ॥ २२ ॥ वित्राणो नखविकियां जयकरी धूतोलसवालोराई शब्दम
नीचकैः प्रकटयन् नूयोवनीकाहतः ॥ त्वमत्या नृतकोप्यवाप्य नृपतां मांसादरं
वर्धयन् धत्तेऽनेकपराजिदर्पदलने शार्दूलविक्रीडितं ॥ २३ ॥ विद्यामंत्रन कार्य सुर
तरनिरलं वित्नेन च मृतं पर्याप्तं राज्यलम्या कृतममरतया ह्यास्तां सुवदना ॥ स्फ
लत्वेका तु नक्तिस्त्वयि मम मनसि ध्वस्ताखिलमला कैवव्यत्रीर्यया स्यात् करतलनिल
या साऽन्हाय नगवन् ॥ २४ ॥ श्रीवीरः सर्वदिक्कैः कनकरु चितनूरोचिरुदीप्रदीपैमंग
य. सोस्तु दीपोत्सव ऽव जगदानंदतंदर्नकंदः॥ सूक्तिजैनमनीयं मृडविगदपटा लग्ध
राधीयमाना नव्यानां नव्यनूत्यै नवतु भवतुढे नावनानावितानां ॥ २५ ॥ इति
श्रीवर्धमान स्तवनं समाप्तम् ॥
॥ अथ चतुर्विंशतिजिनस्तवनं ।।
कनककांतिधनुः शतपंचकोतितपांकितदेहमुपास्महे ॥ रतिपतेर्जयिनं प्रथ
में जिनं नृपानं तपनं वपनंजिन ॥ १ ॥ विरटलांटित वांठितदायक कमजुनन्त्रि
दयानुरनायक।। स्तुतिपरः पुस्पोनवति दिता वजित राजितग जितगग ते॥२॥नुग्ग
लावनसंनव संनवत्यहरिदं जिन पत्र रसाददं ॥ हृदि ध नणितीर्गणनूरूहां
शमहिता महितामहि तावकी ॥ ३ ॥ नवमहार्णव निस्तरणेन्चया त्वमनिनंदन
देव निपेत्र्यसे ।। व्रतनृतां कुगतेः स्मरनिग्रहप्रसनंया सनया सनयात्मना ॥ ४ ॥
त्रिभुवनामितकामितपणे सुग्तगेरुपमामतिगामुकी ।। तव विजो नजते नवतः
क्रमावसुमते सुमते मुमतेर्दद ॥ ५ ॥ धरनृपात्मज पंट जिनेश्वर त्वयि रुतरण
य. क्रियते पति. ॥ ग्नसतः प्रथितार्थिदरिद तोपरमया रमया रमयान्वितः ॥६॥
प्रसुपार्श्वजगत्रितपालनु. पवितकानिपुरीकवीजदणः।। सुकृतिन तिनमग्निं वि
गुनवतो नवतो नवतोदनं ॥ ७ ॥ कुनयकानननंजनकुंजराः शशित्चे महमेन
सुत प्रनो ॥ निखिलजीवनिकायहितोक्तिनिः शुनवटा नवदा नवटागमाः ॥ ७॥
युधि विजित्य मनोनवमग्रहीन्मकग्मंकमिपाध्वजमन्य यः ।। स्तुतजनाः सविधि
कुशा सुरस्तुतमसंतमतं तमसंस्नुनं ॥ ॥ ॥ दृढरयांगजनीतज गीतलतिकमाथि
मजा तव नारती॥ मननि कन्यन हर्षसनाथतां जिन ततान नतानततायिनी ॥१०॥

AP A 1 । णाचिता किमुदिता मुदिता मुदितादर ॥१ा त्वमिन सुनत कसपनांढना । । हरिवंशविनूपण ॥ शिवसुरवाय तप परगुछिताऽशुनयनो नानो नग्नोलि नेन उरात्मना तव मतेऽवमतेऽवमतेजस ॥२३॥ त्रिजगदीक्षण केसरिलक्ष्य एमपि अनुवीर मनोगिरी॥ गुपगणान् मम मारम विरज्यतामुदायिता दरितार तावकान् ॥२४॥च्युतिजनुर्बत केवल निर्वृतिणदिनाददता मुदमार्हता- यरूपयत्रिदशैशां नवसुधा वसुधा वसुधामलि ॥२५॥ इति जिनप्रनवोमयको: मक्रमगर्तर्यमकाऽवयवेर्नुता ॥ बलममी वितरंतु धुरिस्थिती संभवता नवता का तिनित् ॥ २६॥ सऽपदेशकर प्रसरक्षिताऽखिलतमस्कतया तपनोपमा प्रदान रुतो मम निर्ममा शमरमा मरमाऽमरमानिता ॥२७॥ जयति पुर्नयपकनिती हिमततिर्मतिकरवीमुदीशमयितु तिमिराणिजते महावृजिननाजिन ", चि' सुदृशां मुखव्युपरम परम परमविका ॥ २५॥ इति चतुर्विशति ती॥२०॥ करकताम्रफला एणती जिनप्रनवतीर्थ मिनारिमधिश्रिता। हरख है। २४७ स्तोत्र. जयति गंडकलमतनुजिन शशिमुगोंयुजहर दशमोनर ॥ कस्तवरदो वरदो वरदोर्युग॥ ११ ॥ शुनमयी वसप्रज्यस्त मनी नगन पाकिता । तर तनुस्तिनोतु सुग्मं सतामरुचिर सचिन पिजिता ॥१२॥ वसरोमविकासने रविरुचिर्विमज त्रिजगत्पते ॥ थपि शर्म नयते तत्र रसा तरसा तरसा तृपं ॥ १३ ॥i gori तजित् ॥ दिशतु व कुमतासुरनिमहे नृशमन शमन शमनन्धरं ॥ १४ ॥ तव धर्म धुनोतु वाश्रुतिपथाऽतिषितां गमिता सती ॥ किमु करोतिन वरसिता रसिता रसिताजुभा ॥१५॥ जयति जातिजिन स्म जगतिमा धि मोहमहीपते ॥ रणकयामपि नक्तिनरेण ते ससहसा सहसा ॥ १६॥ श्रवति कुथुजिनाधिपराज्यमाहिमयत स्त्वयि चाहताहिता त्रिविनोदन धिका जनिदिनिर्पनरसा नरसानरसारका नगदधीश सुदर्शन सरिदीश निशामणे। प्रणिदधेऽतिपदो विशदाता बनरतानरता नरतावकान् । हृदि नरनवममिजिनस्मरन्नपि हि मूर्तिमुपति महत्फर्ज ॥ निशमयन् । विरतिपर्म तटाहतिकुनितस्मरशर शरणाक्रियता त्वया ॥ गुणगणम्य ए बजनना जननाजन नावनक् ॥ २१ ॥ श्रनुमित खजु नाम मयका यदि यञ्चिर ॥ महितपादनवान् नवत रुपानवनमानवमा वा ॥ २२ ॥ कमवशासन पाशिवकरे रमतएव मन प्रियधर्मणा ॥ अपि V - -- ३ .

स्तोत्र. 8[ប अय श्रीमदावीरस्तवनप्रारंभः पराक्रमेणेच पराजितोऽयं सिंह. सिपेवे धृतलादन. ॥ सुखानि व. वानिग्य र मागां ईमातुरन्तीर्थकरः करोतु ॥ १ ॥ सप्ताश्वतंजाः करससकोच. कमैथसप्ता निग्मतनीति. ॥ प्रणीनवान् सप्तशती नयानां वीरः श्रिये व्यंजितसततत्वः ॥ ४ ॥ कानत प्रापतकल्पपुप्योत्तरात्वमापाटवलक्ष्यष्ट्यां ॥ देवाधिदेव विजदारदेवा दोटरेऽनुर्विहितावतार ॥ ३ ॥ऽयम्य नंद्याटसिता त्रयोदशी यशीत्यहानंत परमीशितन्ततः ॥ नरेगसेनापतिदेशितावना छात्रं कुलं पत्र पचित्रितं त्वया । ४ ॥ अनूतनूतिथुनबनुवा नबङनुर्महे नोऽजनि हेजिन ध्रुवम् ॥ लगत्रयीजंतु इ दुर्पवर्षिणी निरुहरु ढिर्मदनत्रयोदशी ॥ ५ ॥ त्वया स्वदेहातिसंविनागसंनावि ज हेम सुवर्णमासीत् ।। तारंतु हीनं लटनुग्रहेण उर्वर्णमित्यापटवर्णवाद ॥ ६ ॥ बाव्य विवोधाय हरेः सुरादिः पादानुन्नस्तव यन्त्रकंपे ॥ चित्रीयता त्वत्तरसा रसात मूर्धानमानयतिस्म नूनं ॥ ७ ॥ बनूब जाग्यातिशयप्रनावात् गुरुस्तवापि त्रिजर्ग शुरोये. ॥ युक्त्यैव ते मेसगिरेगरिठं सिधार्यमप्यार्यगणा गृति ॥ ॥ कथं गु णः प्राप्तयश पताका नारी। नास्तु त्रिशलाशलाका | यत्कुदिक्ती विमलः मुह तो मोतिक्यनूस्त्वं गुणयुक्तिय. ॥ ए ॥ विवि प्रवाई सुरमीश मुष्टिघातेन यज्ञाम नतामनपीः ॥ गाइिवकिरणश्रमं तु चकर्ष तीर्थावर शैशवेन तत् ॥ १० ॥ मो हं गमी यः खलु तभवेपि गंतु कयं सोईति लेखशाला । तीच शकोऽपजलाप पित्रोरनाचिति ते विनयेन धीमान् ॥ ११ ॥ व्याकुर्वतस्ते हरये यदागर्म संगृह्य बु ध्या कत्तिचित् गिरा लवान् ॥ अध्यापको यदिधे तउचकरें भुवि व्याकरणं प्र यामगात् ।। १५ । यस्या न कन्योक्तिमुक्तिमार्गमार्गम्य कला दशमी शमीश ॥ प्रा ज्यं प्रनो यत्र विसृज्य राज्यं श्रमण्यसाम्राज्यमुपायथास्वं ॥ १३ ॥ शिवालये प्रो जितविग्रह यत् त्वत्पादमूले चमरं निलीनं ॥ जनारिदंनोनियम. प्रचंडो नस्प एमाप्यष्ट किमत्र चित्रं ॥ १४ ॥ न वाक्तुिं जातु दधुः समर्थतां मुनीइ धातोरि व नान्ववर्तिपु. !! समाविरुद्ध प्रकृतार्थसंपदं तवोपसर्गा व्यशिपस्तु केवलं ॥ १५}} न कौशिक रागमुपासनापरे करोपि रोपं स्मन चमकोशिके ॥ अहो उदासीनत यव निर्जिता चमुस्त्वया विपहापि कर्मणां ॥ १६ ॥ निबर्हितुगां सुर जनुरुयतस्तथा तथा यो उरचेटत त्वयि ॥ वहि. सत्तः स्वर्गिसमाजतंगमा |माकाररेखात्रयटिताग ॥ नंरत धन्या कतिनाम रक्षायत्रोपम त्वां सुमनोचनीय तदा ऽस्तु तम्य नरनुपम्याजननिर्जगत्या ॥ २ए ॥ थनिय विद्यापदनदर्पणा गणा पिपाम्त यदसूत्रपन् श्रुनं ॥ गिरस्तवव त्रिपदीसुधाफिर सता मन स्वप्रथितेन गौ म्न नयनिगिंधता पिपापि सबोधविना निवयन ॥३१॥ तप्त्वा तप पटमपान्तन निवत्सरापुः ।। ३२॥ से यन्त्र बुझे सति फल्गुनीपुजाले स्मरोऽन्मृतरुपमानी ध्यमांगतिर कार्तिकदीरानी ॥ अपापमापु पदमीश पापा पुर्या विपुगत तश्विरद्यानरफ-गुनीपु वनृप क्याणकपचर ते ॥ ३३ ॥ वनाधिपतरनतया नवत स्वातिगतंत्र नाधिपे ॥ उदयाधुचित धनायनोदकयोगानवमांकिकषि पा॥ ३ ॥ हातेदवासप्रदीप नगरन् पदारुतदारकोणीरत्नकिरीटकातिनहरी | हमम्मिहिन श्रीवीर तुन्य नम ॥३५॥ तिम्तुतिपरायणे त्रिजगदेकचूडामणे प्रति । समान्यमानान्हये ।। मोहोगापतिगर्वपर्वतनिदि व्याधामधामश्रियामप्रति जिनमि २५० स्तोत्र त् ससगम स्यान्नकथं जनंगम ॥ १७ ॥ एकाग्रपत्रिशतावसाने " | रे जुवा निकाया ॥ तवोदगात् केवलकरिस्ताऽपराधरापस्य शुची दजी ॥१०॥ एकादमाहुर्मुनय कथ मामितीव कोपात् खपर्यशोक ॥ यदीदृशत् पर पदगर्नपुष्पव्याजस्फुरत्तारकदृक्सहस्र ॥ १ ॥ सुरविकीर्णास्तव देशनावना जर प्रसूनप्रकरा समतत ॥ जयश्लथीनूतकरात्परिच्युता शराऽवानगनटस्य मासुमा ॥ २० ॥ स्फुटीनवन्मालककौगिकी मुखप्रशस्तरागस्तवसस्तवोचित ॥ प्रविश्य कि व्य अवणाध्वनि ध्वनिर्मदे न केपा रजयन् मृगानपि ॥ २१ ॥ स्थातु चनजाम पुग्मकतवात् त्वदीयदतयुतिजान्हवीजले ॥ ध्रुव त्वदास्याबुजवासिनारती युरो उपेता कतहसदपती ॥ २२ ॥ स्थर्य हत यवता शिशुत्वे तद्याचनाय स्फुटो प मेरु ॥ सयसमागादिति तुगहेमसिहासने ते करवति तर्क ॥ २३ ॥ हतु धमा ह तम एकमेर तदेहि मेसर्वतमोपहत्व ॥ इतीव विज्ञापयितु सिपेवे नामडनाप धरो रपिस्त्वा ॥ २४ ॥ दूराऊराजन्मनिदे नवजी सुधासपीयं त्रिजगढनीध । नून नदन् ससदि देवदेवर्दिव्याहतो निराजुहाव ॥ २५ ॥ मेद प्रमाणात शिनं सन्नमस्यते सर्व ऽती पुसा ॥ सितातपत्रत्रितपयलेन रत्नत्रय दर्शयतिस्मता दात् ॥ २८ ॥ सुपर्वसचारितहेमपकजापदेशतचंक्रमणक्षणे किल ॥ गतस्ष्टहान्या पि गुणगादा पदोस्तले ते निधयो नवान् ॥ ७॥ लोम्यसयुक्तनिरकुशत्रि ॥ २७ ॥ त्वत्प्रातिदायश्रियमित्यवेक्ष्य चेतो न यस्येश चमञ्चकार ॥ स केवनी चेन्न ॥

No text on this page.

श्रीगर्यपादानतनागराज प्रोत्सर्पदेन कफनागराज ॥सतां हताऽसत्परिणाम एतापपपदनानुसार नाशिश्रयत्ने कमजानुकार । कुतोऽन्यथा त्वन्नतिदीहितास पंधिपत्रिम नदी छनेषु॥ २ ॥ यन्यदिन नयक्दबकानां दर्षनापहिसदमाना। नियंधिया ने मुग्नापिराति ॥ नादोनि चेत परनावतीनमचित्यधिमारिका मेवनि परिधिमानते नियोणसारख्य युधवन न ते ॥ ४ ॥रतेरह सत्यपनायिका । गायरामादपरी भुरतानिगमा ॥ थप्ययर श्रुतितप सपनाहतेन पुमान पनि परावनाप नम्मम्टदामजिनमनपाय नया लसीविनात समन: यगय निनातीनान् मुगीमार्चिनमान् ॥ कप नदीवरहीपम्यायनी। युग्म ॥ पुस्य स एऽवसरोऽमराली सरो मरालीय निपेयते यत् ॥ २ ॥ प्रामा पूर्णसमस्तकाम समस्तकाम सहदप्यधीश ॥ नवतमानम्य विमानमाया विमानम या प्रनगे नवति ॥ ३ ॥ नयाढ्यमुद्यामनगमाल मनगमालदितनाव । कर म धीमनिरमानि गानं रमानिगात न वचस्त्वदीय ॥ ४ ॥ नित्य प्रमाननिमावि ताम पिनागितामगतमगनाजा ॥ त्वन्नाम धन्य मरतीश सार रतीशसारगमृग, नाद ५॥ नृत्योपि योत्राऽजिनप्रनावे जिनप्रनावकरसस्त्वयि स्यात् ॥ सम्पन्न नोग्गजाश्वसेने गजाश्वसेनेश्वरतामुपति ॥ ६॥ नूयान्नमो नीजतमाऽलशय तमा पापप्रन तुन्यमेव ॥ नवात्त्वदन्य कतमोऽविता न तमोवितानष्ठिरोऽर्फ एव३॥ वपुत रुन्यप्चधिगमयामे रािम वामेय मयि प्रसीदानव्या स्तव पातु निन प्रकार जिनमनीय विदधे यती ॥ ७॥इति जिनप्रनसरिविरचितं श्रीपार्श्वस्तवन समाप्त ॥ अय श्रीपार्श्वनाथस्तवनप्रारन ॥ न्या गगम स्पर्पगुणा:मगये मयंदेवासुरमाननीय पत्पति ते श्रीन ग्मानीय ॥ सयनितोकीतिजकाऽमितानि सिध्यति पामिह कामितानि ॥२॥ मानन ॥ ५ ॥ मना नगतम्माजमान नखाजानेन विराजमाने ॥ उमर रे गनगननीय मुममा साहिता बदनिय जनन मदानश्या NG | नि निनमानचिन श्रीपार्थनाथम्तयन समाप्तम् । ॥ अय श्रीनंदीश्वरफटपसारन ॥ भारन यम नदीवगनानाटमांही यमनिन । ना पुन ॥ २ ॥ एनहानपविष्यने लक्षानीतिअनुर्पुता 7 तपरिक्षता स्तोत्रः त तांत्रिपष्टिश्च कोटयः कोटीशतं तथा ॥ ३ ॥ असो विविधविन्यासोद्यान नौगनूः ॥ जिनेऽपूनासंसक्तसुरसंपातसुंदरः ॥ ४ ॥ अस्य मध्यप्रदेशे तु पूर्वादिदिनु च ॥ अंजनवर्णाश्चत्वारस्तिष्ट्रत्यंजनपर्वताः ॥ ५ ॥ दशयोजन तिरिक्तविस्तृतास्तले ॥ सहस्रयोजनाबाई कुमेरुट्याश्च ते ॥ ६ ॥ तत्र देवरमपो नित्योद्योतश्च दक्षिणः ॥ स्वयंप्रनः प्रतीच्यस्तु रमणीय उदस्थितः शतयोजनायतानि तदर्धे विस्तृतानि च ॥ विसप्ततियोजनोच्चान्यर्हचैत्यानि तेषु 1}.एथक् हाराणि चत्वार्युच्चानि पोडश योजनी ॥ प्रवेशे योजनान्यष्ट । व्यष्टातेषु तु ॥ए । तानि. देवासुरनागसुपर्णानां दिवाकसां ॥ समाश्रयादेव ...मनिर्विश्रुतानि च ॥ १० ॥ पोडशयोजनायामा स्तावन्मात्राश्च विस्तृती ॥ योजनको सेंधास्तन्मध्ये मणिपीठिकाः ॥ ११ ॥ सर्वरत्नमया देवचंदकाः पीतिको रि प्रीतिकान्योऽधिकायामोठ्यनाजस्तु तेषु च ॥ १२॥ अपना वर्षमाना च : पा चंज्ञननापिच ॥ वारिपेणाचेति नाम्ना पर्यकासनसंस्थिता ॥ १३ ॥ रत्नमद्योयु खस्वपरिवारेण दारिणा ॥ शाश्वताईत्प्रतिमाः प्रत्येकमष्टोत्तरं शतं ॥ १४ ॥ ३.नागनूतकुंडनृत् प्रतिमे पृथक् पृथक् ॥ प्रतिमानां पृष्टतस्तु उत्रनृत् प्रतिमकिका २५ ॥ तेषु धूपघटीटामघंटाष्टमंगलध्वजाः ॥ उत्रतोरणचंगेर्यः पटलान्यास तानि च ॥ १६ ॥ षोडश पूर्णकलशादीन्यलंकरणानि च ॥ सुवर्णरुचिररजो वालु जन्तत्र नूमयः ॥ १७ ॥ पायतनप्रमाणेन रुचिरा मुखमंडपाः ॥ प्रेक्षार्थमंडपा दिवाटिकामणिपीठिकाः ॥ १७ ॥ रम्याश्च स्तूपप्रतिमाश्चैत्यदाश्च सुंदराः ॥ ६ ध्वजाः पुष्करिण्यो दिव्याः संति यथाक्रमं ॥ १५ ॥ प्रतिमाः पोमश चतुरिस्तू पेषु सर्वतः ॥ शतं चतुर्विंशमेवं ताः साएशततद्युताः ॥ २० ॥ प्रत्येकमंअनाड़ीणां ककुसु चतसृप्वपि ॥ गते लदे योजनानां निर्मत्स्यस्वनवारयः ॥ २१ ॥ सहस्र योजनो धा विष्कंने लक्ष्योजनाः ॥ पुष्करिण्यः संति तासां कमानामानि पो शः॥ २२ ॥ नंदिपेणा चाप्यमोघा गोस्तूपाऽथ सुदर्शना ॥ तथा नंदोत्तरानंदा सु डा नंदिवर्धना ॥ २३ ॥ ना विशाला कुमुदा पुंडरीकिणिका तथा॥ विजया वै पंतीच जयंती चापराजिता ॥ २४ ॥ प्रत्येकं योजनं पंच पंचशत्या परत्रच ।। यो नां पंचशतिं यावदिस्तारनानि तु ॥ २५ ॥ लक्ष्योजनदीर्घाणि महो पनि तानि तु.॥ अशोकसप्तबदक.चूत. चंपंकसंज्ञया ॥ २६ ॥ मध्ये पुं 'पीनां च स्फटिकाःपल्यमूर्तयः ॥ सलामवोऽद्यानादिचिन्हा दधिमुखाइ 11' २७..॥ चतुःपष्टिसहस्रोच्चाः सहस्रं चावगाहिनः सहस्राणि देशा . म A N पि विश्वति विष क्षणात् ॥ ४ ॥ सिक्ष्योप्यणिमाद्यास्ता नमस्कारमपिष्ठिता | वेशिता ॥ नमस्रूतेनवपदी कटरे वजपजर ॥६॥ वर्ण्यता श्रीनमस्कारान् काम श्रष्टापष्टयदात्मापि यदसो प्रणवेऽविशत् ॥ ५ ॥ शिर कादिषियाधीरे स., | कोप्टे पदेप्यम्य वर्णानाज़िख्य तावत् ॥ कुडयादापर्चयन् सम्यगेति शातेनिशानर एदलाढये हत्पुडरीके निवेश्य य ॥ध्यायेत्पच नमस्कार ससारस तरेतरा ॥१॥ | ॥१॥थाद्यादाण्यपीटासिय स्य परमेष्ठिना।बिपुरष्यामृत किन नाशक्षित किया॥१२॥करागुलीषु विन्यस्याहंदादीन् ध्यानमानयन् ॥ प्रत्यूहपन्नगन्यूहमा | मयि विमोचयेत् ॥ १४ ॥ पोडशारगान् अक्षापरम परमेछिन ॥ प्राणी वनतेयति ॥१३॥ गुरून् पच क्रमात् ध्यायन् मुश्या परमेष्ठिना ।। गूढप्ररुद्ध मनि २५६ स्तोत्र. ता ते सरस्वती कुश्वशीकराणां ॥ माधुर्यशैत्यायिनी तरिनी सतत राणां ॥ ७॥ सदोदिताबोधमतरुपा थप्यानवितारागमृत श्रवोन्या ॥ धमपूरुषा अप्युपाशमस्तेन मुनीपु तेपा ॥ ७॥ व्यामोहवाणासुरदर्पमाथ दीर्णतमोवितान ॥ त्वमेधि सन्मत्रजपानिराम पद्मावरो दीर्णतमोवितान ॥ योगेन धीरोचित माननीय श्रियस्तयोचे शशिनोपमान ॥ योगेनधीरोचित प्रख्यातमूर्ख तमुदाहराम ॥ १०॥ स्मरागुगाना हदि में तानि ॥ तत्वानि सूरी मदाहिनेदविधाऽमरेशाऽस्वनि हितानि ॥ ११॥ नाचार्यमनासमानांवबोधमव्या कविमात्मशिप्य ॥ जिनप्रना चा नो स्फुरत्वम्य तव प्रसादात् ॥१२॥ जानवर, पापन, जिनसिहसूरि ॥ इत्य स्तुतोम्त यमकै शमरवरानंदकदलननितो ॥ १३ ॥ इति श्रीजिनप्रनसूरिस्तयमकस्तबकितश्रीजिनसिहसूरिस्तवन समाप्त ॥ ॥ अथ श्रीपचनमस्कृतिस्तवनप्रारन ॥ प्रतिष्ठितं तम पारे पारेवाग्वनिवेनव ।। प्रपच वेदस पच नमक ॥ १ ॥ अहो पचनमस्कार कोप्युदारो जगत्सु य ॥ सपदोऽष्टी स्वप धत्ते तु ता सत्ता॥ ५॥ दत्तेऽनुकूलएवान्यो जुक्तिमात्रमपिप्रनु ॥ एष पच नमस्कार, तिलोम्यपि मुक्तिद ॥ ३ ॥ नमस्कारनरेऽस्य किमपि प्रानव स्तुम ॥4 किमतोषिक ॥ यत्सप्रयोगत पागुरपि सपनयेऊगत् ॥ ७ ॥ नमस्कार तुम यत्पदस्पर्शपूतया ॥ पद्यावादितसर्वाग शातिमासादयेऽऽवरी स्रूत्या स्तो प्रतिपद जपन् । विधत्ते विविधानिम्नविनावग्रहनिप्रद A ३ . ॥6॥ ॥

स्तोत्र. २७ धानोप्यौपवस्तुफलमेधते ॥ १५॥ विद्युकालानिनूपालव्यालचारारिमारिज ॥ यिं वंचयत पंच नमस्कारम्य संस्मरन् ॥ १६ ॥ आराध्य विधिवत्पंच नमस्कारमु पारधीः ॥ सदाजापेन पापेन मुक्तमात्यमनुते ॥ १७ ॥ ऐहिकं फलमीप्सनामष्ट मप्रताधिनी ॥ मुक्त्यार्थनां च स्यादेवाटकर्मनिपेधिनी ॥१७॥ विपदामनि गरन्योपादानस्याखिलधियां ॥ स्मर्ता नमस्रुतेः स्वर्गिवगैए वरिवस्यते ॥ १ ॥ उतुर्दशानां पूर्वाणामेषेवोपनिषत्परा ॥ थाद्या सकल विद्यानां बीजानां प्रतिः रा ॥ २० । इयं पय्योदनं पथ्यं परलोकाध्वयायिनां ॥ परमास्त्रं नृणां मोहराज शय सजातां ॥ २१ ॥ प्राणी प्राणप्रयाणस्य दणे ध्यायन्नमस्कियां ॥ जनते सु ति नकान् पाप्मनः कृतपूळपि ॥ २२ ॥ नमस्रूनि रूपाविनैः श्रोत्रयोः प्रान्ती तां ॥ स्त्रीरुत्य पुरस्यसध्यंचस्तियचोपि यर्दिवं ॥ २३ ॥ त्रिदंडिनं निगृह्याऽसिय टेना श्रेष्टिनंदनः ॥ नमस्कारस्य महसाऽसाधय स्वर्णपूरुपं ॥ ४ ॥ स्मृत्वा पंच नमस्कारं प्रविष्टायास्तमोगृहं ॥ घटन्यस्तो महासत्याः पन्नगः पुष्पमाल्यनूत् ॥५॥ नमस्कारेण संबोध्य मातुलिगवनामरं ॥ प्राणत्राणं स्वपरयोwधन आइपुंगवः । ६ ॥ वदतां दुडिकः प्रापत् सुकुलं चंडपिंगतः ।। इतस्तादृक् गुणस्फीनिं सुदर्श नः सुदर्शने ॥ २७ ।। एप माता पिता स्वामी गुरुनेत्रं निपक् सखा ॥ प्राणत्राणं 'गतिपः शांतिः पुष्टिर्महन्महः ॥ ७ ॥ निधयः संनिधो कामधेनुरप्यनुगामिका ॥ 'नूनृतो नृतकाम्तम्य यन्य नप हृदो हिरुक् ॥णा नास्येयत्ता प्रनावाणां क्रमवर्ति 'तया गिरा ॥ मितायुष्ट्वाब सर्वोपि न्यदेण नणितुं दमः॥ ३० ॥ सर्वावस्थोचित 'सर्वश्रुतसारं सनातनं । परमेष्ठिमहामंत्रं जनितंत्रमुपास्महे ॥ ३१ ॥ उनयोजन लक्ष्मानविदितो बिनत्सुवर्णात्मतां जव्यानंदननशालमहिमा गेचिनुचूलांचि तः ॥ धन्तु श्रीजिनगेहनास्वररुचिस्यानं लसन्निर्जरः सोयं वः परमेष्ठिपंचकनम स्कार. सुमेरु.श्रिये ॥ ३२ ॥ सान्नायावयवां जिनमनगुस्या सूत्रयामासिवान् दि व्यां पंचनमस्कतिस्तुतिमिमामानंदनंदन्मनाः ॥ यभ्यपांचति कंठसीमनि सटा मुक्ता लतावित्रमं तं मुंचत्यचिरेण विननिचयाः श्लिप्यंति च श्रीनराः ॥ ३३ ॥ इति श्रीपंचनमस्कृतिस्तवनं समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीवीरस्तवनप्रारंनः॥ श्रीव-ईमान परिपूरितनम्रकाम चामीकरमन जिनप्रनसरिरेत । सोध्यते त [ जगडानहर्पवर्षदीपोत्तवस्तवलवं यमकावदातं ॥ १ ॥ श्रितास्त्वां कमलाह ॥ ११॥ वासुपूज्य सविनास्त वधूकारुपयागत A A ॥ १ ॥ गर्वमैदवमजापमाननम्यप्रनोरुण ॥ सौदर्यपाजितस्वैर माननम्य नरे शमितारये ।। ३ || मुदे निनदन सूतो राजसवरदेहत ॥ यत्पादाने. नाव राजस वरदे हत ॥ ४ ॥ स्याना सुमते दास्थ्य साध्यसागदवानन ध्यायस्त्वा च स नीरोग साध्यसागद वालन ॥ ५॥ क पद्मप्रन शक्तीत. मिता हिता ॥ सरख्यातुमीट चार्कप्रनावदमिता हिता ॥ ६ ॥ मोहरात.' नकमेनत ॥ न सेवा विरहं सोढु महसेनक्षमे नत राना रविकल्पमनामया ॥ त्वा प्रत्यात्मा रुतो ना चन्मते रमते श्रेयन् कमलायतनेत्र या ॥ सा परि Չսե स्तोत्र H कल्पपाद पयोज ये ॥ करी तान् प्रति विश्वककटपपादपयोजये ॥ १ स्ते नति न सद्दोपसिधुरारातिलपणे ॥ रके च तुल्यचित्ताय सि. ॥ ३ ॥ हिलेश देह दर्शे वा शिवगकार्तिके चिद ॥ नान्यतीर्य्या यत्र । तिकेविद ॥ ४ ॥ रुद्वान्यपवर्णानामादान दीपालिका सता ॥ कोटि परा दानदो पालिका सता ॥ ५॥ कुदृशा शुश्रुवे तेऽत्यदेशनाशितटर्पका।। ग्यदेशनाशितदर्पका ॥ ६ ॥ त्वन्मुक्त्याऽसीत्तमो हतु तरसा द पावनी॥ पापपद्माऽत्पेतरसादपाऽवनी ॥ ॥ वत्सेवाया हपीकेनहस्तिपार कर्न नाम तदा राज्ञो हस्तिपालस्य दीनता दधाना ऽघोरगेपूक्तस्वा । ता ।। देषु जात वन्मोदो स्वातिरेका रािजता ।। ए ॥ त्वन्निाणेन करण गसझमरजयत् ॥ एनासि जगवन् क ना नागसझमरजयत् ॥ १० ॥ स्येश्यिार्थममता विषपानत ॥ नाथोपचर्या कुर्यास्त्व मम ताविषपानत ॥ १॥ तावक या पिबत्युच्चै रमायाननसारस ॥ दृष्टिविदति सोरस्य रमाया न न ॥ १२ ॥ स्तूयासमन्वहमह नवत पृथिव्या सिधार्थनदनयशोनिमत सिधार्थनदनयशोनि मत समस्या सर्वश्रिया जिन निज हदि रोप्यता मे ॥1 इतिश्री जिनप्रनस रिविरचितश्रीवीरस्तवन समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीआदिजिनादिस्तवनप्रारन । प्रणम्यादिजिन प्राणी मरुदेवागजायते ॥ हरणे पापरेणूना मरुदेवा ग ए ॥ २ ॥ मोहस्यानापतस्त्राण शनश मिता रये ॥ यस्म विश्व नमी व नुतमायाम ॥ नक्की तेऽत कोस्तु विधानुतमायामोनुप ॥' दमनोदयां ॥ तन्यास्त्व सुविध सर्वनावलद प्रना। ध्यते त कमलाह स्तोत्र. J ...गरणं त्वनमो विश्वबंधूकारण्ययोगतः ॥ १२ ॥ श्रेयसः शरणं नव्य त्वं गह वेमनंकते ॥ त्वटि देहि च नत्यादिकत्व गवविमलंकते ॥ १३ ॥ यःरख्यात स्त्रि जगत्यार्य सदानुननयोऽनिगं ॥ हंवर्कवन्मोहमयीं मटानुतनयोनिश ॥ १४ ॥ वत्पादानेऽलिनो हपदि मलं पटतां पदं ॥ शांते मोहं जित मन्ये दमलंपटतां रदं ॥ १५ ॥ सुश्रीकुंथु प्रतिप्रव्हा यमलार्जन नंजना ॥ यास्तावीगरोपयम नार्जननजनाः ॥ १६ ॥ सोढुं समर्था नूद्यस्य नतमामवनिर्वलं ॥ गोरत्वमहब कीइनत मामय निर्वलं ॥ १७ ॥ शक्तिं नवाब्धेतु मतिमलीनदेहिनः ॥ पुण्य यातर्जने नक्तिमतिमानीन देहि नः ॥ १७॥ यम्या विलासास्वलोक्य पानंदनना नव ॥ मा तु सुव्रत सा शक्या पद्मानंदनना न व ॥१ए । यत्र नाहिन्या ते वान मे सचिरकोमला ॥ तत्र राजेप्यनीतानां नमेचिरकोमला ॥ २० ॥ नेमे नमस्त पक्ष रंजन. प्रनविलवे । कालुरवधायोरंजनप्रनविभवे ॥ २१ ॥ तापानी दुवे पार्थ नवता पंचसायक. ॥ श्रितोऽतस्त्वं जनो मोदनवतापं च सायकः ॥ २॥ नाऽसुन्यः कामसौख्याय लोकनेतरणीयसा ॥ तेन वीर जगत्कर्मालोकने त यसे ॥ ३ ॥ तवाहन पंचकल्याणी टया लोकामदायिन ॥ पायास्त्रिजगते दत्तो लो कामदायिनः ॥ २४ ॥त्रातु जीववीधाः संविदा मानव तामिता. ॥ जिनें पातु करणा ददा मानवतामिता. ॥ २५॥ यदाराध्यति गीर्वाणवजाऽजयदशा । तत् प्रज्ञा शरणं नक्ता व्रजानयटशासनं ॥ २६ ॥ यस्या नेशजिरा जन्या सुत वासना । हत्वापद सुसंवन्यासुतरा मघवासना ॥२७॥ लदम्याष्टिकर जिने नावलीमदिर वढे तम्य गिर नतन्रमतम सूर्य चिया कारणं ॥ सार्वीयप्रथित खिलारिष्टोघहानिप्रदं दंनव्यालसृणिं वरेण्यसमयं रगणं वोचिदं ॥ ७ ॥ यमकयुक्त आदिजिनादिम्तवनं संपूर्णम् ।। ॥ अथ श्रीपार्श्वप्रातिदायस्तवनप्रारंन ॥ वनुत्य महिमश्रियामहं पन्नगाकमतदर्पको पिणं ॥ स्वां पुनामि किमपीनर मां कमदर्पकोपिणं ॥ १॥ कोनुरज्यति देगनौकसि शगगोकतरणा वि रत्नहेमरचिनिः दितोनसागयोकतरणाविनासिते ॥ २॥ देहटीधिति व्यमारना सुमनसः सदानवाः ॥ देशना नुवि किरति ते स्फुरत्सारना दानवाः ॥ ३ ॥ ताहा. श्रवणतस्तवोत्तमा कारकाय वरदेशनाध्वने ॥ व पाप्मनां निगकारकायवरदेशनाध्वने ॥४॥ नाकिनायकयुगेन सादर ग वीज्यसे ॥ त्वं न कैनवसुरयायमुक्तये चामरविपटनागवीज्यसे ।।४॥

प्रामतबिनावे कलकपक्च्युतिसयुतियां ॥ प्रधानशिष्ट वदन वदीप मन्यान . V . निनिपलोकायित नूतल श्रिया नयन्मुद नैरयिकानपि क्षण ॥ त्रिलारनाम ॥ २ ॥ कुकुप्कुमारीरुतसूतिसस्क्रिय सुपर्वतपादितमऊना ॥ सूजनमुद्यावर पं जगत्रय जनुर्मह सस्तुमहे नवद्गद ॥३॥ सुरोपनीत परिवत्सर धयानि रितावर करोतु जैन शुलनाजन जन ॥ ५ ॥ पुरदरऋदितसनमन्त्रमत्सुरामा ॥ ॥थमर्त्य निचितदेशनावनीरुताभुत कंवलवनवोनच ॥वमाना गितमुक्तिवानन ॥ जिनस्य निर्वाण दिन दिगतरस्फुरत्तम सनमशर्मणे नुन । महर्पयो नूतनवजविष्यताममुत्र कल्याणक्पचहता ॥ विना विदेहान् दशर्मा आपनकवच हदि यो बिनर्ति ॥ शस्त्राणि ते जिततराएयपि मोहरान सोनार भाग्ययुजि न पनवत्ति तस्मिन् ॥ ७॥ इति श्रीफल्याएपचकस्तान समातम्। निम्तीर्ण विस्तीर्णनमार्णव इंरुत्कर्णमाकर्णितवर्णवाद ॥ सुपर्णमहाहि । | पर्ण श्रीपर्णवर्णपिनुरामि वीर ॥१॥ याप्यता प्राप्यत तावकीन कमान नर | नमस्करोते ॥ ससारचकत्रमणानियस्य गणम्य ते वृत्करण गृति ॥२॥ तुका । न्यायपशिष्टमि ॥ ३ ॥ द्विगोरिव त्वत्प्रतम्य सख्या पूर्वी प्रवृत्तिन दुनापिका स्तोत्र. वादितुर्नयनयोनिरारुता शसनासुरमणीपनावत ॥ थातनोति रुता नासुर मणीपनावत ॥ ६ ॥ इष्टुरपयति कीर्तिशुद्रिता शidn दीप्यमानमनुमोलि तावक शांतनावलयमर्यमोहद ॥ ७॥ योनि गजि रस्तवामानवैरिमुदिरो महर्पिनि ॥ कन निरव श्रुतस्तनी मानवरिमुदि नि ॥ 6 ॥ मुषीषु कुपथानि मौक्तिकन्यास हृद्यरुचितानि चापितु ॥ प्रणि जिन शितोमवारण न्यासहृद्यरुचितानिचायितु ॥५॥ श्रीजिनप्रन विति स्तुतो मया ॥ पार्श्वकामितफलाय कल्पता क नेमुषा ॥ १७ ॥ इति जिनप्रनसरितश्रीपार्श्वप्रातिहार्यस्तयन सपूर्णम् ॥ ॥ अथ श्रीकल्याणपचकस्तवनप्रारजः ॥ रते प्रपचकं जिनें कयाणकपचकं स्तुम ॥ १ ॥ निवेदित प्रीतिपर श सनविनापितोदय ॥ महानिधानाम चारता तनोतु गर्नावतरात्सव कि पं परितोपितार्थिने ॥ जिनाधिपानां निखिलागिरविणे मिपु स्मरति मासतिथीन् सनातनान् ॥ ॥ ॥ अथ लक्षणप्रयोगमयश्रीवीरस्तवनप्रारन ॥ इत्यादृतस्विनुवनप्रनुसत पर स्तोत्र. - नां ॥ चिनो बहुव्रीहिसमासवत्समन्याय एवोपदयाति वृत्तिं ॥ ४ ॥ विनक्तिमुक्तं पुरु परसंरल्पः समाधिन धातुविकारहीनं ॥ अपूर्वमेतत्कटकृत्यनिष्टाप्रधानमारल्यात मिन त्वदीयं ॥ ५॥ यस्मिन्न तधिन त्र वर्णलोपो न संस्तुतिर्विग्रहकारकाणां । नवा विकल्पः कचन प्रयोगेप्वही नवं व्याकरणं तवेदं ॥ ६ ॥ ध्याता हटा ला फ लमेति नयो दृष्टापि तादान्न रुतीखनव्यः ॥ तत्तत्यमेतहिरंगतो यत् स्यादतरं गोत्रविधिबलीयान् ॥ ७ ॥ एतावतैव प्रतिनाति विश्वविलक्षणं वीर जवचरित्रं ।। नालेन युप्मत्पदसंप्रयोगेप्यलंनि लोकन्य यउत्तमत्वं ॥6॥ एकत्र धातावुपत गपंचकप्रयोग इष्ट. कविनिनिरंतरं ॥ त्वक्ष्यानधातावुपतर्गविंगनि सुरः प्रयोक्ता न कयं कुलदणः ॥ ॥ प्रनो महाबित्रमिदं कदंबके कुतीथिकाणामपि कर्म धारये।। यन्मोहराजप्रधनेषु वनावो न कश्चित् परिपोफरीति ॥१०॥ गुरूयोर्वरद नावकर्म : पोर्दर्शयन् विकरपस्थिति पदेनिर्विनक्ति समुदाहरन् पदं साधुलदाणविदोन - वान्॥१॥धनुपचातिनमेव किसागमं प्रणिगदंति जिनेश्वर शादिकाः।यसमतामुपया तकर स्ष्टगत् कथमिवागमतांस कृतःपाः॥१॥योपाटानं नव्यतः पापपूगन्याति व्या प्पं वंदतेवालवानयाधारः श्रीसंपदा संप्रदानं त्रैलोक्यस्य स्तोत्ररत्नोपदायाः ॥१३॥ वेडावद्यः करणमुदातां मोहवादि सरीतु कर्ता नातेदिरदरदनदयोनियंगोनिः ।। नव्यानां यस्लमसि सुपथप्रस्थितो हेतुको तस्मै तुन्यं जिन मम गिरी नम्रतासनम म्त ॥ १४ ॥ यंतस्थाम्तव शासनस्य यहासां कुंदावदातत्विषां गल्ते नुवि संग्र सारणविधा मा न तत्कौतुकं ॥ यत्ते नित्यमनामिनोपि कुगुरी उर्वृत्तदेवेषु च 'ना जते गुणधिनाजनतया वृमस्तदत्यनुतं ॥ १५॥ तात त्रातग्दिं नपुंसकमपि स्वान मटोपे नवन्माहात्म्यम्नुतिसुंदरी प्रणयतः पाण करोत्वेकदा ॥ तत्तलेपनुग्वानु नाववगतः हेल्पं विधूय पात् तत्रोत्पा-पिता ऽथ शाश्वतचिदानंदाव्दयं नंदनं 1॥ १६ ॥ इत्यकारमिनारि लानरः साबक्षणप्रक्रिया चित्रं स्तोत्रमिदं चिदनहटयों जिव्हायजायत्तमं ॥ कुर्वाण स्मरबाणकुंठनकजानिलाततानर्तकी नाट्याचार्य जिनपने पदवीसाम्राज्यमासादयेत ॥१७॥ इति श्रीजिनमन विरचिनलकण पोगमयीवीरम्नवनं समातम् ।। ॥ अथ श्रीवीतरागनवनप्रारंनः॥ जपति पादा जिननायक्त्य दोशपदा ध्वन्नतमोविकागः ॥रवग्विाभर्यमतापरा भ न कोशिकागकरा. खरान ॥ ! ॥ वान्डाननानिग्पायम् पाश्चन्दा पन:निटापा मवैव ॥ देवाधिदेवत्वमनिष्ठवंतवतु कपायहत तु नाथ ॥ २ ॥ प्रयोगनवन वेति परसरूप न स्वस्थित देव तव स्वरूप ॥ चतुर्यथा पश्यति बाह्यरूप नचामा देवर्य स्नएरे तुट सोमनांनितरिग्रह ॥ दद्याचश्मन प्रीति सोमजानितविक ॥१॥ येरा पूजाविधि कर्माजनहत्कमसाजय ॥ते जिना पातु वानव्यनना मदनी झानिरनन ॥३॥ पातु गीश स्तावियोपरमा कमलासना ॥ यत् प्रना या २६२ स्तोत्र स्तयेन हतार्थतामेति रुती सतीश ॥न वाच्यतां याति कदापि लोके यथा यथार्थमर काव्यकर्ता ॥३॥ त्वमेव चचेतसि जागरूको जतोरसि श्रीजिनराजमान ॥ नवेन के सस्त्रिजगन्महन्न प्रपात्यते किं नहि मोहमन ॥४॥ त्वमेव देवस्त्रिविधेन येषां जगत्र यीवद्यपदो हिपाद ॥धात्री पवित्री क्रियते किमत्रचित्र तदीय स्त्रिजगत्पवित्र ॥५॥ उपाधियोगान्महतो लघुत्व लघोरपि प्राज्यगुरुत्वमेवाबादीके देव यथा विपस्य प्रयो पदीप्ती तु तनूनुत ग्यात् ॥६॥ कश्चिजणाना हिलवोपि लोके यो दृश्यते सोपि दिन प्रनार ।। यतक-याणनिधेर्जिने पयोविना पल्लविता नवृक्ष ॥ ७ ॥नात पर एक जडत्वमत प्रत्यदलकोपि नवान्नचुद ॥ सर्वज्ञताप्यन्ति विनो न चान्या त्वमेव यो विदितो यदीद॥ ॥ विदति सर्वेप्यपरानधीशान नतान्नतास्ते प्रवदति सर्वान् । जगजगन्नाथ यथास्थित हि त्व वैसिहि त्वा न वेनि चित्र ॥ ॥ वहि स्थित पतु कदापि लोके ॥ १० ॥ सदात्मविज्ञान विहीनधीनिन ज्ञायते नाथ विनो स्वरूप ॥ स्वशीर्षपश्चात्यविनागसम्य निरीक्षणे कोपि न वाह्य हेतु ॥ ११ ॥ स्थनायोपि जिन त्वयाह गुणकृते स्थाणिनो नितात ॥ यथाऽगुणप्रत्यय एषधात कर्मण्यथो कोऽत्र विचारहेतु ॥ १२ ॥ वकिलायोप्ययथार्थ एव नवत्प्रणीता विपर्ययेण ॥ रियायते सर्वहितोपसर्गवगण धात्वर्थवान्यथा हि ॥ १३ ॥ दृयते य स्वयमेव रागपादिलुटाकनटयथेष्ट ॥ सस्तूयते सोपि हि देवयुभ्या इ महामोह विनितं तत् ॥ १४ ॥चित्यमाहात्म्यनिधि प्रसन्न जगन्धरण्य जगता पूज्य ॥ त्वमेर देव प्रवित्ति हिला प्रकाशतेऽन्येन किमु प्रदीप ॥ १५॥ तिनातिति पिकपदा रागादिपक्षहतिलब्धदशा ॥ ये श्रीजगन्नाथ जिनप्रन त्वामेव देव जिनमाश्रयति ॥ १६ ॥ इति श्रीवीतरागस्तवन समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीचंप्रनस्वामिस्तवनप्रारंन । कमनालय ॥ २ ॥ युतीथिसायन रामद नोझानिरजन ॥ श्रुतं सेति माह नेनने पामा क्मनासना ॥ ४ ॥ इति श्रीचननस्वामिस्तवन समातम ।।

रतोत्र २६३ - ॥अथ श्रीझपनदेवस्तवनप्राश्नः ।। संस्कृतनापा. निरवधिरुचिरज्ञानं दोपत्रयविजयिनं सतां ध्येयम् ॥ जगदवबोधनिबंधनमादि जिनेई नवीमि मुदा ॥ १ ॥ कस्तवमिति विपोलं बदितुं परितो गुणान् गुरुनिनो प। चुजुकै. प्रमिमासति वा कश्व जलं वरमनीरनिधेः ॥ ३ ॥ तदपि त्वभक्तिनर प्रतरलितो वच्मि तावकगुणाणुं ॥ चापलनुन्नो स्फुटमपि सपन् शिगुर्वा निरपवा दः ॥ ३ ॥ ज्ञानप्रदीपजमिव स्निग्धांजनमुपहितं चरणलक्ष्म्या ॥ सधानहगंजि ताय चिकुरचयस्ते स यो रुरुचे ॥ ४ ॥ प्राकृतनापा. तमकसिण सप्पवयमो,र मोरनबाहुते किलिम्मति ॥ तुह सासणापि, जे कुएं ति विविहे तव किलेसो ॥ ५॥ तटिय कलासिरि, पिदे वकनारा सिरिविलासगि हं ।। तुह वदे देहमहं विलसिरमोहंपि हयमोहं॥ ६ ॥ युग्मं ॥तुह मुहरन्नासयला, रविदलही मरदृफुसरोणं ॥ ज विजितुं हिमरस्सी नियकंती निवहसुहडेहिं ॥ ७ ॥ असई तमनि नवनरं सुसिरिर पहू ससंकोसो ॥ उग्गं खुर इय घएपरि,दिदंना परनिसेहता ॥ ७ ॥ मागधीनापा. तुह शुस्तिदैवनाव, स्तं गदपञ्झे शमयपथमचनें । ते यिण कुमदल कशव,शि मिश्चादिस्टी पददि नवे ।। । । तमवय्यवभ्यिटमिधं, आचिरिकट शुस्टु मोस्कपुलम ग्गं ।। काला चिटामि हगे, हलिशनले पिस्किई धन्ने ॥ १७ ॥ केलीहलाहगुणहं, हलिकशवस्टलायि किलणाह ॥ तुह थपुलनवत्तिलसं, वंदामु हगे शलीलाह ॥ ११ ॥ संयणिदधनकमले, ये पष्कालिदमहंदपंकमले ॥ धिदपलमहिमशलवे, यया नवशे शदा कोहे ॥ १ ॥ पैशाची नापा. विबुधान राचिनानत, अनञ्ज सामञ्च बुझ्न तिसपनं ॥रंतून हितपके मे, कतगि दीकुतुंबिनी पनय ॥ १३ ॥ जत्तिनरातो दूरे विष्टति यो तुह रमिय्यतेनेन ॥ कामदन चरणसुधा विहितसिनातो न सो नोति ॥ १४ ॥ युम्हातिसेवि तेदे अपुग्यसम्पान वे सतय्येवाकारतिनो येन रतीस कथं वपते सुकतबीजा १ नत्थून नुग्निरिगुनी नवव तिहेतुमं मिमलरूपा॥ विलतिर पमतहीजल, परकालितका. " Paar चूलिका पैशाची - | दयम्मि ॥ २३ ॥ युग्मम् ॥ हीमाण्हे नवादो चकिदोह यम्महे यदिखावोशन नेय नवतमनिवदे ॥ २५ ॥ तव चरणोनयजलरुह पालीसेवापरायणादेव । हेमसरोरुहनास कलिमलकमलाजिमथहिमनास ॥ नवनयधूलिमहावन मा ति नराजिगणा परसिदिरमामरदसय ॥२६॥ महिमधर तमसमहिम, विमन वर्ष चिताररसा नुवि नरावलीधते ॥ सरुमारिनरामरन, दरमालिगकेलिरस ॥३) सरोरुहेपिमत || समयदयारससुगम चरण सेवे तवासुगम ॥ २७ ॥ तव नामक तर रेहस्थतिसामजि बिदुनरावलि सुयपिहि॥ निजिपरिवबलमणे ऽग सहान। | मुपिपई, सुफरुसनिय करणपपार ॥३॥ तास महानवजलहिज जिना निना/ । हुहुरुति ।। जास्वन पाविय तुध्र प,दुसारुपनावडति ।।३१॥ सुकटु कह तिदुता। | सुय, इकहत मुसनजटजम्मु ॥ विविदिवि जीवाजुन कर,दि पश्बुत निगम/ २६४ स्तोत्र कात सिनेदफलिता तुह वतन सेवते समा थनखाहानून फकुरकुन पोम लकमपि च विधु ॥ १७ ॥ चलथलमटलपटिमा चिकुराली शोफते तबसयुके नसिरितितसथेनू चरनायल तच नव तुवा ॥ १७ ॥ तुझसकिलितटे फुन,ति नालिब मचुकचलाची ॥ गतरुचकपोलतलरुचि,फासुर सोतामिनीतामा॥ १ । सफसुमकानाविल चनपरिहिन संखनीरवाहखटा ॥ पथस फुवि सबकना ती तसिया तुमए ॥ २० ॥ शौरसेनी कुमद मकय्यनिदाण ताश्ध नवमाणविजदे नगव ॥ चिदाविदाव नय्ये, दि यायाणनाध मा ॥ २१॥ कम्य अल हरिपदवि काय अल वा महन लि यसुहे ॥ खलु जहिय अपुरवपद पणाल पाविदूण खजु ॥ २२ ॥ दहा से रागमिदो पथ्यत्त णेग उत्तरण नवरद तिपाय माजिणरापं कुरई है यध तायध म ससेवग सामिया तत्तो ॥ २५ ॥ ॥ समसस्कृतम् ॥ ॥ अपभ्रशनापा ॥ थसिजाति ॥ २७ ॥ हा मिहि विसहजा, यावदिय जणयवहार ॥ पर ॥३२॥रे हि कुतित्यियज, वयणूथवरुप्य रया विरुवात नेरसिवपमियता, कापर इति स्तोत्र. २६५ । हिता सुर रद करिविषु उरकविघाय॥३४॥ मन कहंतिदु नावरित दडवड तण उद चेछु । सामिय सट्टलतेउ.तु डुनहु चंपई परचळू ॥३५॥ जुत्तिवि किरिय नाणहरि घ 'यंमण मनसुविजुगग्गि । कुकुनपदुवा सिवनय, रितुह सासणरहिलग्गि ॥३६॥ परि कवि तुह तषु नूडहि,कंचणकांति रवन्न । वियसहि महणयपुझम, तामइ नवउह 'तिन्न ॥३७॥ नुत्तरपद्यस्यायंन्दौ संस्कृतं र समसंस्कृतं प्राकृतं ३ दितीये पैशाची चूलिका पैशाचिके ॥ तार्तीयिक मागधीशौरसेन्यौ॥तुर्ये अपभ्रंशः॥ नायालीहयमंदयामयमलं नातं धरतं परं राकालिं पवलोतयं अखचयास क मालाचितं ॥ धील लोधमहं ददावहकलं बिन्नाहमायालदं नाधा नीदिरेसि वदवं पई साणंड सीसुलई ॥३७॥ ॥ कविनामगर्नचक्र॥ तं प्राप्तो रुचिगुक्ष्योगरजसोन्मीलत्प्रतोपान्वितं शस्तः सौष्ठवनममोहरवनः कं के ‘जहस्त छवि ॥ रुच्या जास्करतिग्मसिविरमणीसंकृतनावः परं रंता ज्ञानरमांशमास्त ' रुपमे तन्याः सुविद्यां चिरं ॥ ३५ ॥ जगति विदितवान् यस्त्वत्कमाझास्वरूपं तव गु चिपटनाव संस्तवादध्यवम्य ॥ रचयति निजकंगलंकियां स्तोत्रमेतभवति नवकरीणां सिंहसोनीटलक्ष्मीः ॥ ५० ॥ इति श्रीजिनप्रजसूरिविरचित अष्टनापात्मकं श्रीझपन देवस्तवनं समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीमहावीरस्तवनं ॥ चित्रः स्तोप्ये जिनं वीरं चित्ररूचरित मुदा ॥ प्रतिलोमानुलोमाद्यैः खङ्गायैश्चातिचारुनिः ॥ १ ॥ ॥प्रतिलोमानुलोमपाद ॥ वंदे ऽमंददमं देवं यशमाय यमाशयः॥ नायेनाघघनायेना पाहता ममता रूपाश ॥ अनुलोमप्रतिलोम ॥ दासतां तव नागारांनचेयाय मतामसासमतामययाचेनरागाजावततां सदा॥३॥ ॥अप्रतिलोमानुलोम॥ वरदानवरादिख त्वदिरावनदारव ॥ याज्यदेव नयान्यास सन्याय नवदेज्यया॥५॥ ॥ अईभ्रम॥ श्रीद वीर विरेनत्वं दमिताद गतागुन॥ वीतादमारंनितारे रद मां सदरंगवि - गोरांगोरुगीगंगा गोरीगुरुररोगरुक् ॥ गोरगा गाररोगारिरेशिरोरेगुरु मिरा साननाजानीना ततताततितातते । ममाममामममुमा नमानेनोननाना २६६ स्तोत्र ॥ मुरजबंध ॥ गीरतारजतारदणे धीरता स्थिरतारसा सारतारश्रुतावच्या सुरता जन तास ॥ गोमूत्रिका॥ ये पइपति तवेहाम्यारविद नकिबधुरा नि पतति नवे शम्यास्ते विदो नगवन्नरा। ॥ सर्वतोन॥ नमासररसामान मारिताददतारिमा॥साता म या यामतासारदयाममगार ॥ रथपद॥ तिर्यटनरसुराकीणा नासते ननते सना ।। सन्माहात्म्यात् रुताश्चर्य याश्रिता ततता श्रिया ॥ ९ ॥ ॥ यदरपाद ॥ ॥ एकाहरपाद ।। ॥ एकाक्षर लोक ॥ पाकिारयकांक केकाकोकककेकिक ॥ परसाएकसारंक स्कु सोफोककांकर ॥ ॥ अमयोग। পর্না নানার বাসা। कुन सुस्तहीनाना सुनन तर शासन ॥ १३ ॥ पुरम । मापनि पुष्पान्याया पन्या रगतका नाकाम नुनविदा काम दगा FATEHयात्रिपदी नाना असा ॥ सा में 3 जन रहिनन मा u॥ । मुमन ॥ अमिायक्लयामदिगर निग्जन ॥ तनवा मन तायर ताश्रिता ॥' -

स्तोत्र,
॥ त्रिगृलं ॥
नुक्ता या त्वयि नव्याली धन्या धनेस्म चेतसा ॥
सामता तामसाकाममकासारंगसागरं ॥ १७ ॥
॥ दलं ॥
त्रिशलाकुक्षिपाथोजराजहंस जगदिनो ॥
जोगास्तृणमिव त्यक्तास्त्वयामुक्ति दिवया ॥ १७ ॥
॥ धनु॥
सुरासुर नमस्तुभ्यं नमम्यति लिनोनम ।।
मनःप्रसादसंदर्नदलिता शुनवासना ॥ १० ॥
॥शर ॥
कथं कर्तु जनो मोहव्यपोहमहहदमः ॥
मनसा सादरं यस्त्वां न स्तौति तिमिरापहं ॥ २० ॥
॥ शक्ति।
बाल्यो मरुशिरःकंपसंपत्प्रथितविक्रम ॥
मनोजानोकहव्याल मम स्वामी जवानवं ॥ २१ ॥
॥ अष्ट दलकमलं ॥
मानितार्यक्रमामार रमामाकंद माधवः ।।
वधमार्गे ममाकास सकामाधीः प्रतानि मा ।। २२॥
॥ पोडशदल कमलं ॥
वनप्या न धनवान ध्यानमौन कनन ॥
झानस्थान जिनश्रीनघनमेनस्वनःस्व नः॥ २३ ॥
॥ स्तुत्यनामगर्न वीजपूरं ॥
जय हेमवपु.श्रीक जगन्मोहापहारक ।।
जराहिवीन सिंहांक जन्मनीरधि नाविक ॥ २४ ॥
॥ दा॥
तुज्यं नमोस्तुलनयस्थितिकाय नीतिवन्यासुपावक सुरस्तुत वीर नेतः ॥
विद्याल ताविपुलमंडपहेमरूप कल्याणधीकरणदद नतेदमीन ॥ २५ ॥

पश्यतोहरनृतापि सारसा सारसाधुनिचिता जवनरा ॥ ५ ॥ याममात्रमरित जिन निधाय यो हदि ॥ निश्चित स सलते न उर्गती पुर्गतीर्णनवसागर प्रनो' पद सपद सममुपैति शाश्वती ॥६॥ त्वत्पुर प्रकुरुते प्रजावनांना यो दधाति हदि तन्हिपकज पकज मलमय करोति स ॥ तसयेपि न जा त्ति पार्थतस्यतु नवोभरत्रमालालत्स्मृतेरपि जना निरामया र तिजाउमादर सादर दरति जातुनाध्वनि । यन याति ननु नानुनानका ना ५ नमन्त तत्र 10 श्यतरगरिपवोऽरुपापरा पापराशिहर पामयनि । सन्यपि त्वयि रिनो कपाल पालयेश दारणागने तत ॥ ॥ बम पनि तत्क्षणात् ॥ १२॥ देवशारिखमणि रेनुदेवता देव तापदिह वानिनप्रदान पन्य मानम मानमयमनत्तन्य दुईरा ॥ तस्कराननपय करेणया गणवाहिका वदेव तव धामनामन नाम तुमनसि प्रदीयति ॥१३॥ज्ञामिन नगग्नि नि', កុឌុច स्तोत्र. ॥ कविकाव्यनामाक चक्रः ॥ जमारुत्यपथो जिनेश्वरवरो नव्यानमित्र कियादिष्ट तत्वविगानदोषरहित श्रवस्तर्पण जन्मापित्यसुखप्रद. सुरचितारिष्टयो व सदा दाता शोननवादि । जलद पामेण सविदा ॥ २६ ॥ ॥चामरवध ॥ श्रीमझाम समग्रविग्रह मया चित्रस्तबेनामुना नूतस्त्व पुरुहूतपूजित विनोद प्रसृद्यपिमे ॥ ल्पातशातकुनायतस सकतत्रलोक्यक्ततातर attent र सरधरक्षारत ॥ २७ ॥ इति श्रीमहावीरस्तरन समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीजीगपल्लिपार्श्वस्तवन ।। जौरिकापुरपति सदैवतं दैवत परमह स्तवे जिन ॥ यस्य नाम जगतो । कर जपति मनवान स्तुचे ॥ येन मेरिततापहारिणा हारिणा लसति पुग्यवारिधि ॥ २ ॥ वि ॥ १ ॥ नाथ तत्तव मुग्दर्शन दर्शन च नयन महानाय तं नावतेज इह मातिनो युगे । उनले दिनकर हि नामरे नामुम्बा, म्य कि नवेत् ।। ३ ॥ अर्बुदस्य नवता ना या नावियात्रिकजनेष्वरित लिका पनिकाननसहोदरीव या ॥ त्वत्पदस्थितिबलेन साधुना सा, यमनेनन - S स्तोत्र. श्६ए नं त्रिजगतः पुरातनं ।। त्वां स्मरामि सकलंच निष्कलं निष्कलंकमचलं महाव ॥१॥ इयं यःप्रयतः स्तवीति सततं श्रीजीरपल्लीपुरीवासं पार्श्वजिनप्रनुं प्रकटित ढप्रतापोटयं ॥ सोवश्यं सुनगं नविप्रधिकं धर्मार्थकामामृतश्रीनिः बीनिस्वि पं गुणगणाश्लिष्टानिराश्लिप्यते ॥१५॥ इति श्रीजीरापल्लीपार्श्वस्तवनं समाप्तम्।। ॥ अथ श्रीफलवद्धिजिनपार्श्वस्तवनं ।। सयलाहिवाहिजलहर, समूहसंहरणचंडपवमाणं ॥ फलवहिपासनाहं संथुणि । फणय फलं ॥ १ ॥ विदुयासं विदुयातं, विदुयासं पत्तमनिथुर्णति तुमं ॥ श्रम रया अमयरया, यमयरया पुगश्वमवयम् ॥ २ ॥ समणाएं समणाणं, समणा 'संविळ फुरश् सत्ती ॥ विणयाणं विणयाणं, विणयाणंदणनयाहि मुद्दे ॥३॥य रन्ना अहिरन्ना, अहिरन्ना विणियमंति कयपूया ॥ सवाही सवाही, सवाहीणा ह य नना ॥ ४ ॥ गयवाहा गयवाहा, गयवाहा यरहियापश्पसन्ने ॥ परमहिया रमहिया, परमहिया सहन हुँति नरा ॥ ५॥ सद्दवणा सदवणा, सहवणामयरि हति जणा ॥ सुहयगया सुहयगया, सुहयगया तुह पसाए ॥ ६॥ कण्या पियाउ, कण्या ररकती तुमंजवणं ॥ नहवयो नदवथो, नदवथो रिद्धिसिरिया ॥ ॥ नाएणं नाएणं, नाएणं चियति लोहमुहसि ॥ नयराई नयराई, नयरा मुगुणपोराणं ॥ ७ ॥ फलवची फलवदी, फसवही दाणा तुमे विहिया । सन्न री सन्नयरी, सन्नयरीमंतयाश्जया ॥ ए॥ समणाली समणाली, समणाली हागमे धन्ना ॥ चरणरया चरणरया, चरणरया नाश्चत्तसिरी ॥१॥ निदप्पहस्स नेह,प्पहस्स, निदप्पहस्त मोदले । रयणायर रयणायर, रयणायर गहिर तुन मो ।। ११ । इत्यं घुसि सिरिपास जगनिवास सिंगारदारफलवदिपुरीसिरीए ।। दीपराकयजिणप्पहसूरिवाणी थूपचमे वियर थंतररोगमुरकं ॥ १२ ॥ ॥ इति श्रीफलवदिपार्श्वनाथस्तवनं समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीचं प्रनस्वामिस्तवनं ।। ॥ संस्रु॥ नमो महसेननरेंइतनूज जगऊनलोचननंगसरोज ॥ शरवसोमसमद्युतिकाप दयामय तुभ्यमनंतसुखाय ॥ १ ॥ सुखीस्तगादरवकलद विनिर्जितर्जपनाव विपत् ॥ सुरासुरवृंदनमस्रुत नंद महोदय कल्पमहीरुहकंट ॥२॥ ॥ प्राकृतं ॥ जय निरसिय तिदुपणजंतु ति जय मोहमहीन्ददलनदंनि ॥ जयकुंदक . 5 . - नग्पसुह।, निम्मस तुह मुहचाउजे पहुपिक्खुपसरिसियनिरुवमाया। सासयसम्व निहाणुनाहनदिको जेहि तवं पुन्नविहूण वजाणु निफल सानुदि हाम्हिारहरहामकुदसंदरदेहानय केवलकमलाकेजिनिलय मजुनशमन कमवारणरचरणरणनरपरणधवल वससिदिरमणिमगमविलासना" वदन ॥ ११ ॥ नगनरदवजलवाहविमलमगलकुलमदिर वामकामरिनिहाय हरिवरगुणधुर । भदरगिरीगुस्सारसवतकलिनूरुहकुजर दहिमहादयमा इनि श्रीजिनमनहरिस्तवमानस्वामिसक्त पानापान रन मणम् २० स्तोत्र जियसमंदतयंति जयजय चप्पहवदकति ॥३॥ जय ५. रक जय जगडिय अपयमकसयपरक ॥ जय निम्मलकेवजनाणगेह, जपायाने दछप्पडिमदेह ॥४॥ ॥ शौरसेनी॥ विगदउहहेषु मोहारिकदृदय दलिदगुरुपुरिदमध विहिदकुमदरकप । नाधतं नमादिजोसदटनदवत्ससलहदिनिमदि गति सोददं निम्मन ॥ ३ मागधी। असुलसुन पिसलनलनाय सेविवपदे नमिल जय जनुदि दिनसिवपनपते। चजनपुननिलद ससालिसलसीलुदे, देहि महसामितसालि सासदपदे। ३५ ॥ पैशाचिक ॥ तलितारिपलतोमतया सतन मदनानलनीजमनानगुण ॥ नजिनारुणपाततलानमते जिननां इधत सशिव सनते ॥ ७ ॥ । चूजिका पैशाचिक ॥ कजनाज़िकनातुलतप्पहल चलनीकल चालुपशप्पसल । लजनाचनकीतकुनलुचित चिनलावमहसमलामिचिल ।। ६ ॥ ॥ अपभ्रश ॥ ॥ क्ष्य समसंस्कृत। पहनामानिष्टत मम मगमनसिनिमुखानि दिनो वितर ॥ १३ ॥ . ह मुनिसामी विफर ॥ १० ॥ । ।

स्तोत्र. २०१ ॥ अथ श्रीवईमाननिर्माणकल्याणकस्तवनप्रारंनः॥ श्रीतिझायनरेशवंशकमलाशंगारचूमामणेनव्यानां पुरपोहमोहतिमिरप्रोडासने हर्मणे. ॥ कुर्वे किचन कांचनोचलरुचेनिर्वाणकल्याणकस्तोत्रं गोत्रनिदचनीयचर गांनोजस्य वीरप्रनोः ॥ १ ॥ प्राप्य देव शरदाधिसप्तति शीतगौ पचनदेवतदंगे ॥ तामुपायत रसेन कार्तिकाऽमावसीनिशि शिवधियं नवान् ॥ ॥ हस्तिपालकन पालपाजिता पूर्न पूरयतु मन्मन.गुचा ॥ यत्र दर्शश्व चंमा जवानस्तमाप नवताप हा पुन.॥३॥ कर्जटर्शनिशि दर्शितईचस्तत्रपुर्य खिलवर्णजाःप्रजाः। त्वन्महोदयमही तयाऽधुनाऽप्युत्सवं विदधतेऽनुवत्सरं ॥ ४ ॥ यर्ध्वनिस्तव पपे श्रवःपुटैः पोडशप्रहरदे शनाविधौ । तान्निवेश्य धुरि धन्यताजुपा रेखया न खलु सप्यतेऽन्यतः॥ पुस्यपाप फलपाकवर्णनामध्यमध्ययनपंक्तियुक्शत ॥ व्यास्याः स्फुटमटष्टपतिव्यारुतीच परिषद्पुरस्तदा ॥८॥ जीवति त्वयि जिनेनूतिना त्वत्प्रणामविधिनंगनीरुणा ॥ नून मेप्यत न देव केवलज्ञानसंपदनुरागनागपि ॥ ७ ॥ यदिधेयमुपदिश्य गौतमः प्रेपि नक्तिलृटपि त्वयाऽन्यतः ॥ रोगिण. कटुकजायुपानवज्यायसेऽस्य चरूपे गुणाय तत् }} ७ ॥ त्वविवतरत्सुरावली चा न देदमणिनूपणांयुनिः ॥ सा कुहूरजनि र म्तत्तामसा पूर्णिमानिशमुपाहसद्धृव ।। ।। निस्ते त्वयि विलोक्य विष्टपं ध्वातपूरपरि पूरितोदरं ॥ रोढयंत इव रोदसी प्रतिश्रुमरेण रुरुड पुरदरा ॥१७॥ वन्हिवायुजलदेश्व रसुरैतलपर्णिकळतांगसंस्कृतेनूतिमात्रमपि नूतिधाम ते ऽपस्टशन वतन तान् र जोऽस्टशत् ॥११॥ नक्तितो महितुमीशवासवास्तावकीनहनुसंग्रहं व्यधुः॥नूनमदविज याय तावकानुग्रहेण हनुमत्वमितव ॥१२॥ कुग्रहा न तव जातु शासनं वीर बाधितुम नविप्लवः ॥ एककः स खलु नस्मकग्रहो बाधते नवउपेक्षितस्तदा॥१३॥जग्मुपि व यि शिवं नराधिपास्तत्दणं गृहमणीनवोधयन् ।। ये वः कुनयकाननलुपस्त्वत्प्रताप शिखिनः कणा इव ।।१४॥ यत्न कश्चन मुनिस्त्वया समं युक्ति मैयरितरैर्जनैरिव ।। जुपमा समयनावालंगिनां व्यंजितेन गुरुनिळपेक्षिता ॥ १५ ॥ प्रस्थिते त्वयि शिवाय तत्दणं संमुमूर्तुरधिष्टवि कुंथवः ॥ कृश्नीववदुलामतः परं सूचयंतश्व नाधिनी महीं ॥ १६॥ यत्र यत्र चरणौ खयार्पिता तनदास्पदमगादमापतां ॥ ए कया पुनरपापया पुरापापयाऽजनि सुरोक्तिनामतः ॥ १७ ॥ यत्र मुक्तिमगमः शम मावाप पापतुहिनार्कतापतत् ॥ प्रीतिमीति तरकुंजनजने नाग नागकरणं करो तु नः १७ ॥ यः पठत्यशम्धीस्तव वीरस्तोत्रमेतदवधानसमेतः ॥ तत्रनावरिपुरा -- लमपमतकलमलमकल ॥ ४॥ नयमयवचनपवनसमवमत परमताना शमन सदयमदघमफलयगजगमन ॥ ६ ॥ नतशतमरवतमखनननमर। मयपरमपदमनयदसदर ॥ नवनवनववननवदशमगम शकलनगनाना नदमनकमनगजकरद दत्तनमबलत्तमहतमदचण्ट ॥ ७॥ मदनयनगमा गम ॥ ॥ तमचयमपनयतपमहतपन परसमयजरजहरपदजपन | समा 'रमदहमहलग्न ॥७॥ सततमचरचरजगदवगमक मननजनकपनतरतमा रशरण गतरणसदवतरपावरकरण ॥ परसहचरसमरमजगदवन सममान समपरसमवक ॥ गदगजरएफणधरदकदहन धनहरमरकजदरहरमहन 11 ११॥ कपटशकटजलशयसमनवक जनमानी मरोगठिदा काम केवजवर्णसस्तवसुधास्वाद विधने सुधी । श्रेयो वान दवम वनमवनमपसहनमहनवम ॥ १३ ॥ एव श्रीधरतीर्थराज तब याff कपरपदनगरगमनरपरएक मफलदशमसफजयपथना ॥१॥ विपदवीमारल्यानि वायतरा मिनाजी जय मुदर सनियत शिश्रीयत मानव # ३७२ स्तोत्र. जि रयश्रीनाजिन प्रनवति प्रवलापि ॥ १॥ ॥ इति श्रीवर्धमाननि । कस्तवन समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीअरिनाथस्तवनपारन । जय शरदशकलदशहयवदन जय हतजगदसहनमदमदन ॥ मनजकदन जयनगवदरपरमपदसदन ॥ १ ॥ गतमजकमनसकनार जननमरणनवनयनरहरण ॥ रचय चरणरसनशवलस्वन मनवमसनदमाग वचन ॥ २ ॥ नवरचनरतदशशतनयन नयवनजलदजलजदलनपन । कजकलयजयकरयजन नमदशमपहरशममननजन ॥ ३ ॥ अमरफना, पदकमल गजकरसरलसवलकरयमल ॥ जनयसनयमतनतजनतस्न लमनसमत ॥ शमदमयमसमरसरमसमय नवपतनजनयमज मम शमर !! धनरखकनकशकलघनवरन मदकलकरणकलनजयशरन ॥ 1vAR सत्सदनजसनमदमन जवनपवनचग्नरयतसमर ॥ मतरतनरशतगतपरवशत दलयवहलमनमरवा समतसतमहपरमतकलस गणधरगणधरशमरसकलस ॥ जवदनवपदलान इनि केवताक्रमप श्रीअरनायस्तयन सपूर्ण । me अध्यात्ममतपरीक्षा. ३ -- ॥श्रीवीतरागाय नमः ॥ ११ अथ श्रीयशोविजयजी उपाध्यायकत अध्यात्ममतपरीक्षामारंजः॥ ॥आर्या वृत्तं पणमिय पासजिणंद, वंदिअ सिरिविजयदेवसू रिदाअनप्पमयपरिरकं, जदयोदमिमं करिस्सामि ॥ १ ॥ व्यारख्या - सर्व कल्याणनी सिदिने अर्थ, श्रीपार्श्वनाथने प्रणाम करीने, तथा संप्रति विजयमान तपागठाधिराज जे श्रीविजयदेवसूरी तेमनी वंदना करीने, पो नाना वोधने अनुसारे, श्रा अध्यात्ममतपरीक्षानामनुं प्रकरण ढुं करुं हुं. - उपोदातः- कोई पागंका करे के, गुरु तलनो जे अंगीकार तेने अध्यात्म कदेते. तेमां कोई विवाद नथी : त्यारे परीक्षा ते शानी करवी ? जे वस्तुमां संदेह पमे तेनी परीक्षा कराय ; निस्संदेह वस्तुनी गी परीक्षा ! माटे या अध्यात्ममत परीक्षानामनुं प्रकरण करवानू कार्ड प्रयोजन दीवामां यावतु नथी. तेने कहे ॥१॥ अनप्पं णामाई, चनविदं चनविदा य तवंता ॥ तव मे अनुत्तिय, पामेणअप्पिआ णेआ॥२॥ व्याख्याः- अध्यात्मना चार प्रकार . एक नामअध्यात्म, वीजो स्थापनाथ थ्यात्म, त्रीजो व्यअध्यात्म अने चोयो नावयध्यात्म, चेतन तथा अचेतन ए वेमांनी कोई पण वस्तुनुं अध्यात्म एवं नाम राखेद्धं होय ते नामअध्यात्म; .ध्यात्मवंत यतिना श्राकार- चित्र कहाङयूं होय ते स्थापनाअध्यात्म ; अने जेथ की नावअध्यात्म उत्पन्न थाय, जेवां के, प्रतिमादर्शन, सशुरुसेवा, अने अध्या त्मशास्त्रान्यास ए त्रणे नावाध्यात्मना कारण ने, माटे ते व्याव्यात्म; तया था माना जे शुभ परिणामते नाव अव्यात्म कहिये. तेम थध्यात्मीना पण पूर्वोक्त रीते चार प्रकार के तेश्रोमां हां जेयोना मतनो विचार कर्तव्य वे, ते नामयध्यात्म वत्त . तेथोना मतनी आशंकानुं निवारण करवू, ते या ग्रंथन प्रयोजन ॥॥ उ:- पूर्वोक्त चार प्रकारना अध्यात्ममानो नावयध्यात्म मोदनु कारण ठे. माटे तेनुं विशेषेकरी स्वरुप कहे:- जा खलु सदावसिक्षा, किरिआ अप्पाणमेव अदिगिव ।। नसा परमनप्पं, सा दसण नाण चरणमा ॥ ३ ॥ व्या:- जहांधी कपाय तथा इंडियने वश थयोथको संसारनेविगे यात्मा " ५। . . थायवे एटले कर्मनो अधिकार टलीने स्वत यात्मानो अधिकार प्रवने । | त्मानमात्मनोवेत्ति,मोहत्यागाद्ययात्मनि। तदेव तस्य चारित्र, तज्ज्ञान तब दर्शन' एक ने जेम चपाधिरहित स्फटिकनो निर्मल स्वनाव तेम परमार्थ त जीरनो निर्मल स्वनाव ने तेनेज शुक्षोपयोग कहेते. थने एनेन शानि || कहे। परव्यसगे जीवनो जे मलिन सनाय थायजे, तेने शादोपयोग स्य, एना वे नेद -एक शुनोपयोग बीजो अशुनोपयोग देव गुरु तथा धर्मादि म्फटिकनो रातो रग थायले, तेम जाए अने जे थप्रशस्त राग तथा देशहर वे. तेने थानोपयोग कहेने जेम काला फूलना सगथकी स्फटिकनो कानोस | जाणवु ए बन्ने मूल वनावने ढाकी जिये, तेथी थमहोत्र शुकोपयोगरूप चारित्रना छेद कहेठे एनां थायतन परश्य ७४ अध्यात्ममतपरीदा. फरे , तहायुती यात्मानेविपे कर्मनो अधिकार वे. खत थात्मानो नथी केमके, आत्मस्वनावर्नु आचादन थएटु के जेम नु याबादन थई जायचे, तेथी तेनो स्वनाव प्रगट थई शकतो नयी योगे आत्मानु यानादन थई जायचे, तेथी तेनो ज्ञान, विज्ञान, तया दि स्वनाव प्रगट थई शकतो नथी थने नामकर्म ते थात्मसनावने नर, तिर्यंच, नारकी, तथा देवताप्रमुखना पर्यायरूप पोताना वनावने वे जेम तीव्र थग्निमा सुवर्णने नाख्याथी ते मल ज्यारे बली जाय त्यारे नो गुइतादिखनाव प्रगट यायचे तेम शुनपरिणाम पूर्वक .. की ज्यारे कर्मोनो क्य थई जायते, त्यारे थात्मानो ज्ञानादिरूप खनाद अधिकारनी जे क्रिया तेने नावअध्यात्म कहिये ते यात्म ज्ञानरूप वाथी बोधरूप ले माटे ज्ञान कहिये, तेमज रुचिरूप दोवाथी सम्यक्त १५ हिये, तथा प्राणातिपातादिक थाश्रवनिरोधरूप होवायी चारित्र कहिये पल उ० कोइ अाशका कर के, नावाच्या या शुओपयोग ए वे शब्दोनो की पर जे प्रशस्त राग दोय, तेने शुनोपयोग कहे जेम राता फूनना . सायक थाने तर कहे वे ॥३॥ परगहोसो, अप्परसेहि किचि पडिकूल ॥ चिरण, किपुण देवत्व धम्म ॥" सो सारना 1 उपोदातः- कोई श्राशंका करे के, गुरु तत्खनो जे अंगीकार तेने अध्यात्म जा खलु सत्यसिक्षा, किरिआ अप्पाणमेव ने. त्यारे दागेरठया नसा परमप्पं, सा दसण नाण चरणमानिमित्त वे. तेथी अध्यात्ममतपरीदा. ॥ श्रीवीतरागाय नमः॥ ॥ अथ श्रीयशोविजयजी उपाध्यायकत अध्यात्ममतपरीक्षामारंजः॥ ॥ आर्या वृत्तं॥पणमिय पासजिणंदं, वंदिअ सिरिविजयदेवसू रिंदै ॥अनप्पमयपरिक, जवोमिमं करिस्सामि ॥ ५ ॥ व्याख्या - सर्व कल्याणनी सिधिने अर्थे, श्रीपार्श्वनाथने प्रणाम करीने, तथा संप्रति विजयमान तपागवाधिराज जे श्रीविजयदेवसूरी तेमनी वंदना करीने, पो बाना वोधने अनुसारे, या अध्यात्ममतपरीक्षानामनुं प्रकरण ढुं करुं तुं. - . "हेत्रे तेमां कोई विवाद नयी; त्यारे परीक्षा ते शानी करवी ? जे वस्तुमां संदेह में तेनी परीक्षा कराय ते ; निस्संदेह वस्तुनी शी परीक्षा ! माटे या अध्यात्ममत गदानामनुं प्रकरण करवानुं काई प्रयोजन दीवामां आवतुं नथी. तेने कहेठे ॥१॥ अनपं णामाई, चनविदं चनविदा य तवंता ॥ तव मे अनुत्तिय, पामेणाप्पिा आ॥२॥ व्याख्या.- अध्यात्मना चार प्रकार वे. एक नामअध्यात्म, वीजो स्थापनाथ त्म, त्रीजो व्ययथ्यात्म अने चोयो नावयथ्यात्म. चेतन तथा अचेतन ए पनी कोई पण वस्तुनुं अध्यात्म एवं नाम राखेळू होय ते नामअध्यात्म; अ मवत यतिना याकार- चित्र कहाडवू होय ते स्थापनाअध्यात्म; अने जेथ सावअध्यात्म उत्पन्न याय, जेवां के, प्रतिमादर्शन, सशुरुसेवा, अने अध्या स्वान्यास एत्रणे नावाध्यात्मना कारण ने, माटे ते इव्याध्यात्म; तथा आ जे शुक्ष परिणामते जाव यध्यात्म कहिये. तेम थध्यात्मीना पण पूर्वोक्त र प्रकार वे तेयोमा इहां जेयोना मतनो विचार कर्तव्य , ते नामअध्यात्म तेयोना मतनी आशंकातुं निवारण करवं, ते या ग्रंथतुं प्रयोजन ॥२॥ पूर्वक्ति चार प्रकारना थध्यात्ममानो नावअध्यात्म मोदन कारण ले. विशेपेकरी स्वरूप कहेते.- -जहां कषाय तथा इंडियने वश 44 | थी, त्यारे मूविना धर्मोपकरणनो पण सनच केम थो। जो एम कहेमा धर्मोपकरणथकी परव्यनेविपे -रति होवाथी यात्मश्यमा रति यतीना- उदओ तणु सममुवति, पासतो कि ण लकेसि ॥ ॥ | केम लागे' थर्थात् एम तो सनवे नही थने जो सरक्षणानुबधा राइध्यान राइध्यानरूप । जो प्रथम काययोग परिणाम कहेशो तो गुनकाययागे । प कहेशो तो ते पण सनवशे नही केमके, चोरादिकथकी सर्व प्रसव 'दिकनु बचाव तेने सरण कहेने, ने तेनु जे निरतर चितन करवु तन धनु ध कहेने एबु रोइध्याननो नेद जो उपधियकी थाय तो शरीरथकी पण जोश्ये केमके, सर्प, चोर, तथा कटकप्रमुख थको शरीरनी रक्षा करसाना : ६ अध्यात्ममतपरीक्षा. थधिक मूली सनवे एनुं समाधान जो थावी रीते करिये के, मूछना ये - एक मारु मारूं एवो ममत्वपरिणाम, थने बीजो पामेज़ी बग्नुनपर योगनो अध्यवसाय, ए धानध्याननो नेद तेयोमानी पहेनी जे ममत्वपरिणामरूप मूळ कही, ते तो सम्यकदृष्टिने पण थाय नही, ते शानी से बने ममतपरिणाम तो यज्ञान निमिन वे एथीन विपयादिकनु सेवन करतो उता पण तेने परमार्थथी विषयसेवनरहित त्यारे यतिनेविपे ते शु कहेतु। थर्थात् यति तो सर्वथा विषयसेपनरहित यने बीजी वार्तध्यानरूप जे मूळ वे ते धर्मध्यानना प्रनावेकरी । य नही एज समाधान उपकरणनेपिपेपण जाणी लेवु जो एम कहना है उपकरण राख्याथी तेना ग्रहण तथा त्यागयी धारन थायठे , ए वात पण वन नवित केमके, पारन तो शरीरना करचरणादिनी क्रिया कस्यायो । ने जो कहेशो के शरीरना करचरणादिकनी क्रिया जयणाएकरी थापने गाएकरी धर्मोपकरण लेता तथा मूकता पर्ण पारंन यतु नथी जो. शो के, धर्मोपकरणथकी शुमात्मपरिणाम नगरूप हिसा थायवे त्यारे की केम हिसा थती नथी? ज्यारे मूाविना शरीरथको हिसानो सनय परव्यरतिने वे विकल्पेकरी दूषित करेठे - ॥ ६ ॥ तद परदवम्मि रई, परिणामो रकणाणुबधो वा ॥ व्या० - परव्यरति ते शु काययोगना परिणामरूप के, . सरक्षणानुष अध्यात्ममतपरीता. पवसाय पण घणानेविषे दीवामां आवेने. एने तो रोश्ध्यान कहेता नयी! जो म कहेशो के, यतिने गरीरनेविपे राग नधी होतो, तेम पत्ता सादिकथी शरीर । रहा तो धर्मताधनने अर्थे करे. तेथी तेना अध्यवसाय अगुन होता नथी. म पण संचवे नहीं ! केमके, यतिने शरीरनी पते धर्मोपकरणउपर पण राग हो नथी. तेम वतां तेनीरदा.पण धर्मसाधनने अर्थ करेठे. एवीरीते शरीरना जे जि धर्मोपकरण तरेते. तेम वतां तेयोनी उठापना करतां तमने शरम थती नथी। व:- कोई अाशंका करे के. उपकरण जे वे ते ध्यानना विरोधी . केमके, योना प्रतिलेखनाटि वाह्यव्यापारना योगे अंतर आत्मतत्वनेविपे चित्त एकाय रूपध्यानमां विघ्न थायवे. एम कहेनाराने उत्तर दिये वे. ॥ ७ ॥ जो किर जयणापुबो. वावारो सोण जाण पडिवरको॥ सोचेव दोऽ जाणं, जुगवं मण वयण कायाणं ॥७॥ व्या:- श्रावश्यक पडिलेहपाप्रमुख जे जयणाएकरी व्यापार यायवे ते प ग ध्याननो विरोधी होवोजोये; एने तो कोई विरोधी कहेतो नथी किंतु एतो ए कालाश्रित मन, वचन, तथा कायासंबंधी ध्यानरूप होय. जेमके, शुनयो करीमन एकाय होय, एनेज मन संबंधी ध्यान कहे; निरवद्य वचन बोला पते, अने सावद्य वचननो त्याग थायठे, एनेज वचनसंबंधी ध्यान कहे। अने शुनयोगनेविपे यत्नेकरी कायानी दृढता याय, एने कायसंबंधी ध्यान क हे. जो तमे एम कहेशो के, जगवंते एकसमयनेविपे वे क्रियानो निपेध कहोने; म तो एकसमयाश्रित मन, वचन तथा काया संबंधी ध्यान केम संनए नो उत्तर आमः- नगवंते जे एकसमयनेविपे वे क्रियानो निपेध करोडे ते लिन्न विपयविपे : एक विपयविपे निपेध नयी कहो. जेमके, वांदणाना आवर्तननेवि पेत्रण योगनी क्रिया एकज समयनेविपे थायवे. यतः “निन्नविपये णिसिद्ध, किरि या उगमेगयाण एगम्मि : जोग तिगस्त विनंगिय, सुत्ने किरिया जनाणिया." ३७:- कोई आशंका करे के, ध्यान जे ते योगनो परिणाम नथी. के जेनी प्रवृत्ति बाह्य व्यापार करता थाय.' जो योगना परिणामरूप ध्यान होय, तो लेझ्या बने ध्यान एक कहेवाय. एथोमां काई न्यूनाधिकता होय नही तेम तो नधी देखातुं. लेश्याथोनुं रूप पण जुने, ने ध्यानतुं रूप पण शास्त्रोमां जुड काने. वली जो योगपरिणामरूप. ध्यान होय तो चौदमे अयोगिकेवल गुण . व्या० मन वचन तथा कायारूप त्रिकरण एटले त्रण योगनो प्रयत्न कसाची ध्याननी सिदि थाय , माटे योगपरिणामरूप ध्यान ठे, परतु उपयोगरूपड ध्यान नथी थने तेश्या पण योगपरिणामरूप ले तेथी योगपरिणामपणे तो २७G अध्यात्ममतपरीक्षा. स्थानके शुक्लध्याननो संनय केम थाय । ए तो योगनी परिणतिरूप नथी के ध्यानतो यात्मस्वनाव समवस्थानरूप में थने तेनी उत्पत्ति थावीरीते । यजे - सुखनी तृमाएकरी मोहनीयकर्मने वश थयो थको जीव परइध्यनेविवेक वृत्ति करे, ज्यारे मोहनीयकर्मनी न्यूनता थायडे, त्यारे परइध्यनेविषे प्रति थती नथी. एमथयाथी विपयनेविपे वैराग्य थाय के केमके, विपयनेविषे जेए ग होय जे, ते विषय प्राप्तिपूर्वक होयरे वने रागना धनावे वैराग्य होयचे वैरा ग्यथकी मननो रोध थायडे केमके, मननी प्रति विषयविना यती नथी प्रेम तृणरहित स्थानकनेविपे पडेली अनि पोतानी मेलेज नाशने पामेने तेम विश्व विना मन पोतानी मेलेज स्थिरताने पामे मनो निरोध थयाची चचलतामा जायठे अने पनी मन एकाग्र थईने आत्माने विपे प्रवृन थायडे ए थात्मसनाव ने ध्यान कहेठे यत "जो खरिदमोहकलुसो, विषयविरनो मणेण सनिता समवहिदो सहावे, सो थप्पाणे दवदिजा दा" इति प्रवचनसारे ए सह चेतर सनावरूप जे ध्यान ते, वाह्य व्यापार करता, तथा परव्य अधिकरण कियाटर केम प्रगट पाय ? एनो निर्णय करे ॥ ७ ॥ काण तिकरण पयत्तो, सहावो तेण जेण सिंहस्स॥ श्द पधाणविनागो, कद सुकशाणनेआणं ॥ ५ ॥ . - . Tamil दयाजे H .. जए अध्यात्ममतपरीक्षा. ''वस्थान तो केवलीने सर्वथकी अधिक ते. ए कारण माटे अयोगीने तो योगनि रोधरुप ध्यान दे. श्रने उनस्थने करणना दृढव्यापाररूप ध्यानठे. एवी रीते गुन योगेकरी प्रवर्तनीय जे ध्यान, तेमां वाद विवाद शानो होय ! कोई थाशंका करे के, जो उपकरण होय तो राग पण होय, माटे उप करण सर्वथा त्याग करवा योग्य वे, तेम जो न करिये तो उत्सर्गमार्ग केम हे? एप्रश्ननो उत्तर दिये :- ॥ए । जा खलु सरागचरिआ, साविय उस्सग्गमग्गसंलग्गं॥ मोत्तुं अववायपयं, अऽप्पसंगी परविसेसो ॥ १० ॥ व्या जे स्थिविरकल्परूप सरागचयां कहेतां सरागमार्ग ठे. ते पण उत्स गमार्गने लागेलोज वे. अर्थात् अपवाद मार्ग यने उत्सर्ग मार्ग निकट संबंधी वे. यद्यपि स्थिविरकल्पी पण थपवादनो तो त्याग करेठे, तथापि कोई कारण रे लीधे तेने ग्रहण पण कर जोयेते. अने जिनकल्पी तो कदापि अपवादनु ग्रह T करेज नही. एवी रीते स्थिविरकल्पी तथा जिनकल्पीना अपवाद तथा उत्त गमार्गमां अल्प अंतराय . एटले थपवाटमार्ग थकी उत्सर्गमार्गनी काईक उत्कृष्टता , तेथीज वे नेद थयाठे. अने जिनकल्पनी थपेदाए स्थिविर कल्प कोठे. तेमज उत्सर्गमार्गनीधपेदाए अपवाद मार्ग को ठे. जो उत्सर्ग मार्ग थकी काईक न्यूनता वालो अपवाट मार्ग, तथा अपवादमार्गथी काईक थधिकतावालो उत्सर्ग न कहेगुं तो चादमा गुणस्थानकना यंतना समयसुधी उत्सर्गमार्गनो संनव थशे नही. केमके सर्वोत्लष्ट संवर तिहांज . माटे जे ठेकाणे जे मार्ग उलट कह्यो होय ते काणे तेज उत्सर्गमार्ग वे. जेमके स्थि विरकल्पनेविषे चौद उपकरणज उलट होवाथी ते उत्सर्ग मार्ग .॥ १० ॥ उ मूल गाथावडे पूर्वपदी थाशंका करे :- नणु वसंग सादण, मववान अंतरंगमुस्सग्गो ॥ जा पुण सराग चरिया, समुच्चिया णेव सिझाए॥२॥ पडिसेवणो पुणमो, अववा न फुडो अणायारो॥ता वनाई गयो, को नस्सग्गो ण अववानारा व्या:- परव्यमावनी जे निवृत्ति, एटले परव्यनो काई पण परिग्रह रह्यो य, मात्र यात्मव्यनोज प्रतिबंध होय, तेज संयमर्नु अंतरंग कारण ते; 24t . " | ग्गो, लिंग जह जादरूपमिदि नणिद, गुरुवयणपिय विष, सुनस्यल | ननं” एवो जे अपवादमार्ग तेने सरागचर्या कहेठे अर्थात् शुओपयागनी | नताने सीधे अपवादमार्ग कहेवाय पण जे वस्तु प्रतिपिच एटले सेवन | योग्य न होयने तेनु जे सेवन करवु तेने थपवाद कहता नथीतने तो. | नाचारज कहेले. तेमवता सयतीने वस्त्रादिक सेवन करवायोग्य नथी कमा | अनाचार ने माटे ए सर्व परिग्रहनो त्याग करवो जोये वस्त्रादिक परिग्रहा। ग्रहण करते उत्सर्ग पण नयी ने अपवाद पण नथी, किंतु थनाचार केम करवो एहवु जे कहेने तेने उत्तर थापीतेनो समाधान करेठे-111 जम्दा त मुगीण, सुए अणेगे गुणा भणिआ॥१३॥ प्या०-जेम शरीर परऽव्य उता शुक्षोपयोगनु साह्यकारिठे, तेथी परिमर हेवाय नही तेमनपकरण पण गुशोपयोगना साह्यकारी होवाथी परिमहरह य नही केमके, ए वात, मिझोतोनेविपे पण धर्मोपकरणना थनेक गुण महत तेथी मि थायने जेमके, रात्रीय वनकालें काल ग्रहलेता वस्खे करी यतीन ? |नी चिनना थाय तेयो थान यान उत्पन्न यायचे वस्त्रेकरी सचिनी |नी पीडाटले ते ने जो वस्त्र न होय तो शीतनी पीमाने लीधे थनिना ताप मन्त्र ची पदीयाम, वृष्टि तया हिग्मज प्रमुग्नी रक्षा थायवे नेजोवस्त्र न हायर ट्या दारीर दोय, तो भारीपनी गरमीनी वाफथकीते जीगोने उपउत्पन पार श्त अध एने उत्सर्गमार्ग कहे। एवी सामग्रीनी प्राप्तिविना शुधोपयोगनूमिकाए शकातु नथी, त्यारे तेनी साह्यता करनारी जे उपधि होय तेनुं धारण थपवाट कहे ते उपधि बंधनो हेतु नथी, माटे निषेध नयी कही उपघि सयमरहित पुरुपना उपयोगमा यावती नथी स्तुि सयतीने थने मूर्तानो हेतु थती नथी यत “यस्ममिकुर उवहिं, जद जणोहि, मुसादिजणणरहिद, गेहसमणोयजदि पिथपते या वे- एक तो यथाजातलिंग पुन, एटले यो माताना बदरमायी होय तेवो याकार धारण करवो, वीजो वचनपुजन, एटले जेयी वोध थायले , तेनु ग्रहण करणे, त्रीच गुळदिक विनयरूप मनना करवु, थने चोथु सूत्राध्ययनना पुजसने धारण करवं यत वकुणs जद सरीर, सुवग तदेवमुवगरण ॥ उववरण अध्यात्ममतपरीक्षा. G . संपातिमरजरेणु प्रमार्जवाने अथें मुहपती राखवी, जेवादेवा प्रमुखनी क्रियाए पू चप्रमावाने प्रर्य तथा जनलिंगने यये उगो राखवो. तथा पुस्प वेदनीयोद यादिक वर्जन अर्थे चोलपट राखवो. इत्यादिक वस्त्रना गुण कह्यावे. अनानोगे लीधेला जे संसक्त गोरसादिक, ते पात्रेकरीने विधिए परवाई कायवे. पात्रवि ना हाथमाज लीधा होय तो योग्य ठेकाणे केम परग्वी काय ? तया दाथमा सरस वस्तु लीयाथी तेनो विंड जो नीचे पडे, तो तेथकी कीडीयोप्रमुख अनेक जं योनी विराधना थाय. गृहस्थ नाजनने थर्थे उपनोगेपण पश्चात्कर्माटिक दोप पजे घने जो पात्र होय तो तेणे करी ग्लान अथवा उबलने पथ्याटिक लाव ने यथै उपयोगी होवाथी उपकार थायठे. अलब्धिवत तथा लब्धिवत यस तथा समर्थ प्रादुणाने वास्तव्य पात्र होय तो अन्नपानाटिकने आपणी उप 'करे. अन्यथा केम करे ? इत्यादिक वस्त्र तथा पात्रने विपे अनेक गुएजाणी रनी पते धर्महेतु होवाथी तेमां परिग्रहपणानी आशंका करवी नही. ॥१३॥ '-- उपहासयुक्त पूर्वपदीनी मूल गाथा वडे आशंका करे - जः नवदिनारगणं, जुनाणवळणाणिमित्तं ॥ तो सेयं श्रीगणं, मेढुणसणाणिरो ॥ १४ ॥ व्या गीत तथा तापप्रमुखनी पीडाए करी थानव्यान उपजे नही; ते सा रु तमे एटलो वधो उपचिनो नार वेठो ठो; त्यारे मैथुन संझानिमित्त धानध्यान 'नो त्याग करवासास एक स्त्रीनो परिग्रह पण शासारु राखता नथी? ज्यारे जी दिक वस्त्र राखवाथी मूळ थती नथी, त्यारे अंगनंग थएली तथा कुरूप स्त्री पखवाथी मूर्ता केम थाय ? ॥ १४ ॥ उ:-एयाशंकानो उत्तर दियेने:- एवं वि दूसगाणं, वयणं मयणंधवयणमिव मोहा ॥ अस्मद समोवहासो, देवादारागदणेवि ॥ १५ ॥ व्या.-तमा वोलवू नांड (मस्करा) ना जेवू नासेठे. जेम होलीना दाहा डांमां कामी पुस्यो गमे तेम वक्या करेठे. अने कामने वश थया थका लाज उप जावे एवा वचनो बोल्या करे वे. तेम तमे पण मिथ्यात्वना परवशेकरी अज्ञानने नीधे मस्करीना वचन बोलो दो. ते वचनोथी थमने तो कार्ड थवानु नथी, पण मे पोते तेवा देखाई थावो ठो. केमके, तमे पोते पण नूरखनी पीडा टालवासारूं - ते कोरनो यश, माटे क्रोधरूप जे पते पण रागनी पत वे प्रहार , ne करतो पडे तेने प्रशस्त देष कहिये जेम के, मिथ्यात्व अज्ञान, तथा धानिरी प्रमुग्वउपर जे क्षेप थाय ठे, ते प्रशस्त आप कहेवायचे केमके, तेयाशि ६प न थाय तो तेथोनो त्याग केम थायकेवल विषयनी थपेक्षाएज यो एम न मानबु जो मात्र विपयनेअफेज प थतो होय तो तेना प्रशन । धर्मनेरि पण जे श्रा लोकादिकने अर्थे राग थापले ते अप्रशन्त कहेवापर्व था थप्रशस्त ए वे विनाग थई शके नही तेमज उत्तमयतीनेचिप तथा अन्य) कोई कहेशे के, रागना उपर कहेला वे विनाग थई शकेले केमके, तेनामा तथा पिशुह ए वे थगले तेम अपना एके विनाग थई शके नही. केमो नो बीजो विशुन थंग नथी मात्र सक्लेशरूप होवाथी अप्रशस्त ने पत (रिणामी दो बधो, परिणामो राग दोस मोह जुदो, थानो मोह य दोसा । यसुदो दददि रागो " इति प्रवचनसारे एम कहेनाराने एम कहे है। सामापकनेरिपे पाप गहीना श्रध्यवसाय केम थाय? जे वन्तविर थाय तने त्याग करवाना परिणाम थाय नही तेवा परिणामो ता थापता ចុច अध्यात्ममतपरीता सावाने न मझेतो था ध्यान थाय तेने टालवासार, तया शरीरने वासारु थाहार लेवानुं मानोगे, तेम स्त्रीपरिग्रह शासारु मानता नथी? जेम थाहारमा गुण, दोप नथी तेम वीपकरणमा पण गुण दे, दोर ए रुसमाधान के. ए कारणथी धर्मनां साधनोनेपिपजे राग यायचे, जाणीने तेनेपरिग्रहरुप दोष जाणवो नही. ॥ १५ ॥ 30 -- सम्यक्झान थपासारु राग प्रशस्त वे धने क्षेप थप्रशस्त वे ते रागरस व दोसस्सव, नहिस्स सुहासुदे सुढासुइया ।।। जश्पुण विसयावेका, कह दोजा तो विनागोसि ॥१६॥ व्याध - सारा उद्देशेफरी रिहतादिकनेविषे जे राग करवो, ते प्रसन्न कर। कहेगायवे यत रागो, अऊस रागाण साहूण,तिश्रावश्यक अंगुनने तजवासार जे 1. . एम सा अप्रगत देय कडेवाय किंतु प्रशस्त कहेवाय केमके, परन नाम चार निरूपाए करी गग तथा पनु विवरण करे वे ~ ॥१६॥ - अध्यात्ममतपरीक्षा. J णामं ग्वणा दविए, रागो दोसो अनाव चग्नेया॥ कम्म जोग्गं वच, वनंतमुदीरणोवगयं ॥१७॥ यो कम्म दवरान, पायवो वीस साप नगा य । संझाइ कुसुनाई, दोसो ऽवणाईओ रजा जं राग दोस कम्मं, समुन्नं जे तो अपरिणामा ॥ ते नावराग सोसा, वोचमिद णय समोआरं॥रा कोदो माणो दोसो, माया लोनोअ राग पजाया । संगणयमयमयं, दोसो माया अवि वहारा ॥३०॥ नमुमु अस्सय कोदो, दोसो सेसेसु पनि ए गंतो ॥ कोदोचिय लोदोचिय, माणो मायाव सदस्स ॥ १ ॥ व्या० राग तथा अपना नाम, स्थापना, इव्य तथा नाव ए चार चार प्रकार 'होवाथी बन्नेना चार चार नेट थायवे. जेम के, नामराग, स्थापनाराग, इत्य राग, तथा नावराग ए चार नेट रागना थायठे. तेमज नामदेप, स्थापनादेष, 'इव्यप, तथा नावप ए चार नेद देपना थायठे. जेनुं राग एवं नाम होय ते नामराग कहेवाय. रागवान, जे चित्र कहाडेनु होय ते स्थापनाराग कहेवाय. इव्यरागना वे प्रकार वे -एक कर्मव्यराग, बीजो नोकर्मव्यराग, एमांना कर्म इव्यरागना चार प्रकार के.-एक योग बीजो वक्ष्यमान, त्रीजो वक्ष, घने चोयो उदीरणाप्राप्त. जे मोहनीयकर्मना पुगनबंध परिणामने अनिमुख थया होय ते योगकर्मव्यराग कहेवाय. जे मोहनीयकर्मना पुजतबंध कियाना परिणामने पाम्या होय ते वक्ष्यमान कर्मव्यराग कहेवाय. जे मोहनीयकर्मना पुजन बंधं परिणामनी निष्ठाने पाम्या दोय तेवश्कर्म इव्यराग कहेवाय. धने जे मोहनीय कर्मना पुजन उदयने पाम्या होय ते उदीरणाप्राप्त कर्मव्यराग कहेवायवे. तेम नोकर्मव्यरागना वे प्रकार ठेः-एक विश्रसा, वीजो प्रयोग. जे संध्याराग प्र मुख देखायचे ते विश्रसानो कर्मव्यराग कहेवाय; घने जे वस्त्रादिकनेविपे कु सुनादिक राग देखायठे ते प्रयोगनो कर्मव्यराग कहेवाय. थने जावरागना पण वे प्रकार वे -एक उदयप्राप्त, वीजो परिणाम. मोहनीयकर्मनो उदय थाय ते उदयप्राप्त नावराग कहेवाय. यने मोहनीयकर्म परिणाामे ते परिणामनावराग कहेवायचे. जेनुं देप एवं नाम होय ते नामक्षेप कहवाय .. कहामेलु P En मापनेचारे शरमा यावीन मनीजाय न्यारेत पिकवान बना A 1 से नपेपरी रागपनुपिवरण करे -सग्रह नयनी रीतिए कोर तथा सपने यात्रीनिनो परिणाम होवाथी देष कहेवायले, थन माया तथा नाना पर प्रीनिनी परिणाम होयाथी राग कहेवायचे व्यवहारनपनी । मापानी पोजना परना उपपातने अर्थ थायो माटे त्रीजी माया पण in रहेगप थने म्यायोपान इध्यप्रमुखने रिपे जे लोन थापने ते राग कराया | पातु थन्यापोपार्जित इय्यादिफनेपिपे जे लोन थायचे ते राग कर मके, एची कायादिकनी मन्पत्ति थायरे शजुम्रवनपनी गति उन यीनिनान परिणाम होगथी एकांत देष कहेगयने घाना या मान, माया ने जोन ते पांत देर कहेयाय नही मितु यनात बदर एम.मान याने यावर परिणामाप दोय त्यारे गग पहायन,R नामारे पूर्व परिणामाप होय त्यारे राग काय, हरिणामाप दोयने त्यारे परहेगायने. श्रने गदनपनी शनि नरनवे पायपदायी माना मान तथा माया थत्रीतिना UGU अध्यात्ममतपरीता. होय ते स्थापनाप कहेवाय इव्यक्षेषना बे प्रकार -एक बीजी नोकर्मइत्यदेष एमांना कर्मव्योपना चार प्रकार के एक योग वपमान, पीजो वक्ष बने चोथो उदीरणाप्राप्त जे मोहनीयर्मना पुत्र परिणामने अनिमुख थया होय ते योगर्मव्यप कहेवाय, जे ना पुजन वधक्रियाना परिणामने पाम्या होय ते वक्ष्यमानकर्मव्य य: जे मोहनीयकर्मना पुल बधपरिणामनी निष्टाने पाम्या दाय ते इत्र्य देषकहेगाय, श्रने जे मोहनीयकर्मना पुल उदयने पाम्या दोय ते पाप्रानकर्मव्यप कहेवापने तेम नोकर्मव्योपना ये प्रकार से एक अमा, बानो प्रयोग जे सध्याराग प्रमुख देखाय जे, ते निसान कडेगप , तथा जे वस्मादिकनंयिषे कुसुनादिक राग देखायने ते प्रयामना इप्प देष कडेगय ने थने नापना पण बे प्रकार -एक अवयवात. परिणाम मोहनीयकर्मनो जे उदय थाय ते उदयप्राप्तनावदेष कहेवाय, मोग्नीपकर्मपरिणामने पामे ते परिणामनावप कहेवायचे पानिगरिणामाप दोया न्यारे देप कहेगापने तमन माना अध्यात्ममतपरीदा. शक्य M - परदबंमि पवित्ती, ए मोदजाणिया व मोदजाणावा ॥ जोगकया पवित्ती, फलकंखा रागढोसकया ॥ २ ॥ व्या:- परव्यनेविपे जे प्रवृत्ति थाय ते तेनु निश्चयथी मोह कारण नथी. केमके, प्रवृत्ति तो मन वचन तथा काय योगथी थायवे, अने फलनी चा राग पची थायले. माटे फलनी नाविना यतिजो धर्मापकरण धारण करे तो तेथी अयोग्य 'थयुं कहेवाय ? केमकं, फलनी श्वाविना राग तथा देष यता नथी.॥५॥ ववाणेवगंथो, मुणीण मुलं विणेव गढ्णा ॥ तद देदपालणा, जद आदाला तुद् वि हो ।। ३३ ।। व्या:- यतिने वस्त्राटिकनो ग्रंय यतो नथी. केमके, मात्र शरीरनी रक्षा कर वासारु ग्रहण करते. तेमां मूळ रंचमात्र पण होती नथी. जेम शरीरनी रवाने यय यति निरवद्य थाहारनुं ग्रहण करे पण तेमां मूर्ती होती नथी. तेम धर्मों पकरणोविपे पण जाणी लेवु. ॥ २३ ॥ जद देदपालणा, जुत्तादारो विरागो ण मुणी॥ जद जुत्तवपत्ता, विराद्गो णेव णिहिटो॥ २४॥ जेम शरीरनु पालन करवाने अथै निरवद्य थाहार लेतां यतिने विरा 'धक कह्यो नथी. तेम निरवद्य वस्त्र पात्र राख्याथी पणविराधक न कहेवाय किंतु धारायकज कहेवाय. कोई एम कहे के, गुोपयोग जे वे ते प्रदीप जेवो, अने जोजन तथा शरीर संचलन जे ते तेलपूरण तथा वाटसंचार जेवो के. एतो योग्य पण उपधि अयोग्य ते. एवं अमरचंदन वोलq असमीचीन ठे. केमके, धर्मोपकरण धारण करवा ते प्रटीपने निर्वातस्थले राखवा जेवावे.माटे योग्यवे. अणसण सदावजोगा, जद असणं अणसणं तिजुत्त मिणं ॥ जुत्तं तद वचाई, सदावन तप्परिणयरस ॥ ५ ॥ व्या:- जेम सर्व नोजननी तृमाथकी रहित उतां अंतरंग धात्मस्वनावनी नावना करतां तेना उपटनने अर्थ आहार- जे ग्रहण करवू ते परमार्थ अनाहार ज कहेवाय. यत. “जस्त असणमप्पा, नपि तथो तप्प डिवगसमणा; थण निरकमणे सण, मयतेसमणायणाहारा.” इति प्रवचनसारे. तेमज सकल परि व्या:-

No text on this page.

अध्यात्ममतपरीक्षा.
ចុចទី
-
तो ते निर्धन जेवोज होय ते. एम सचेल साधुविपे पण जागी लेवू. सर्वथा थ
चेल तो ज्यारे स्कंध ऊपरयी देवाप्य वस्त्र पडे त्यारे तीर्थकर कहेवायचे. ॥श्णा
एएण जा अचेला, जिणंद जिणकप्पिाआ सुमु
पीता एसोच्चिय मग्गो, पामोत्ति पराकयं वयणं ॥३०॥
व्या:- एणेकरी, जिनतीर्थकर तथा जिनकपिप्रमुख बचेलाठे, तेथी एज
मार्ग उत्तमचे; बने स्थिविरकल्पनो मार्ग उत्तम नथी ; एम कहेनारानु निराकरण
'कस्यं. कारणके, जिनकल्पीते ते पण एकांते थचेला नयी. केमके, जे जिनकल्पीने
'पात्रनी लब्धि दोय, हाथ विरहित थया होय ; किंतु वस्वनी लब्धि न होय ते
श्रोमांना कोइएकने रजोहरण, मुहपति, तथा एक कल्पक एत्रण उपधि होय
वे : कोकने रजोहरण, मुत्पति, तथा वे कल्पक मनी चार उपधि होयते ; को
कने रजोहरण, मुहपति, तथा ऋण कल्पक मनी पांच उपधि होय; जेने व
बनी लब्धि होय, किंतु पात्रनी लब्धि न होय तेने सप्तविध पात्रनिर्योग, रजोह
रण. तथा मुहपती मली नव उपधि होयते ; जेने बन्ने लब्धिमानी एके लब्धि
न होय तेयोमांना कोकने सात पात्रा, रजोहरण, मुहपती तया एक कल्पक
मजी दश उपवि होय; कोकने सात पात्रा, रजोहरण, मुहपति तथा वे कल्प
क मलो अग्यार उपधि होय, अने कोकने सात पात्रा, रजाहरण. मुहपति,
तथा त्रण कल्पक मनी वार उपधि होय अर्थात् पोतानी शक्तिने धनुसारे उप
धि होय. अने जेने वन लम्चीयो होय तेन पण रजोहरण तथा मुहपति ए
बे उपधि तो निधयथी होय. एवो नियम. ॥ ३० ॥
जिणकम्मेव य कम्मं, ज काय तन तु ऽयं ॥
नवएम सिस्स दिका, गुरुवयणादि किं कनं ॥३॥
व्या:- जो तम कहेगो के. जे कार्य जिनेवरे नयी कयु त धमारे पण क
ग्वू नथी! न्यारे धमापदेश, शिप्य. टीदा, तथा गुरुवचनादिक, तमारे यूं उप
योग ! जम नगवंने ज्ञान उपना पतीधर्मोपदेश दोनोने, किंतु केवजनाननी पूर्व
कोने उपदेश करो नथी: तेम तमारे पण केवलज्ञान उत्पन्न थाय त्यारेज उपदेश
करवो जोये. तेनी पूर्व कोई पण धर्मापटंग प्रमुख कर जोये नही चार !! ॥३१॥
पिरतिसवाणं कप्पी, येगणदिन नि अ तवेव ॥
पम्विजन जिणकप्पं, पंचदि तुलणाः जुनो नो ॥ ३ ॥

No text on this page.

अध्यात्ममतपरीक्षा.
ចម
?
'प्रमुख धर्मचिनाने बर्थे साधु थाहार को ते. पण वन तथा कपादिकने यथें
रतो नधी, तेमज वन्न पण कारणने सीधे धारण करे ले तेनो त्याग करवानुं का
ण : याहार लेवो भने वर मूकवा ! एम करवाने तमारो धनिप्राय ने
जागनु नयी ॥ ३४॥
अविजिय ििरकुनाणं जा नूणं संजमेण अदिगारो ।।
ताकद अजिय गंग तगाणं तत्र अदिगारो ॥ ३५ ॥
व्या-जो एम कहेगो के जेणे साज तथा गंठा प्रमुख जीत्यां न होय ते
ने चाग्निनो अधिकार नथी त्यारे जेणे कुधा तथा तृपा जीत्यां न होय तेने चा,
ग्वनो अधिकार केम कहेवाय ? ज्यारे क्रुधा तथा तृषा मूलगुणनां घातक नथी
त्यारे लका तथा उगंठा पण मूल गुणघातक केम कहेवाय ? माटे यही तमारे
यनिनिवेशविना बीच का कारण दीवामां थावतुं नथी॥३५॥
प्रद निरि कुना दिसया हिरि कुछ सदाव नावणो णोचेत् ॥
एटा बुढादि ताकद तय नाव सदाव संवुद्धी॥३६॥
व्या७.- जो कहंगो के, यतिन लला तथा उगंठा होय तो तेथी विपरीत जे
प्रलला तया थडगंधारूप यात्मस्वनावनी नावना ते न थाय. त्यारे दुधा तथा
कृपा बता तेथकी विपरित जे थद्धा तथा यसपारूप यात्मस्वनावनी नावना
। यतिने कम थाय । माटे शांत टांत प्रमुख श्रेष्ट गुणयुक्त जे यति ठे, तेनु मन
गुम होय तेनावलथी यात्मस्वनावनावना टलती नयी. ए समाधान थाहार
घने उपकरण ए वन्ननेविपे लागु पडे ॥३६॥
नस्सग्गववायाणं मित्तीए अहण नोअणं ॥a
स्सग्गववायाणं मित्ती तदेव उवगरणं ॥३७ ॥
व्या:- जो एम कहेगो के, उत्सर्ग तथा अपवाद ए वन्ने मार्गनेविपे सापेक्ष
ताएकरी नोजन कर ते अयोग्य कहेवाय नही : त्यारे सापेक्षताएकरी उपकरण
धारण करवामां गूंथयोग्यतावे?॥३७॥
ए पसुवगरणेणं पञ्चरकापस्स दवन नंगो ॥श्यकप्प
पावि विदवा जोवणमिव णिप्फला एआ ॥ ३ ॥

प्या. मीना यानी कहानि, ए बन्नेनो यमारे प्रतिकार करवानो थधिकार ने ली २० अध्यात्ममतपरीदा वा० - जो एम कहेशो के, उपकरण जे ते नावथी तो मूरिहित ने व्ययकी परियहरूप ले तेथी पञ्चखाणनो जग थायवे केमके इष काज तया नाव ए चार प्रकारे जे पञ्चरकाण तेमांनो प्रथम उपकरण उता संनवे नही एवी जे थध्यात्मनी कल्पना चे ते पठे निष्फज केमके, व्यादिक चार प्रकारे सर्व मूर्गनो जे त्याग करवा मिमांतोनो परमार्थ ठे एम जो न मानीए तो शरीर पण इव्यपरिग्रह ने, त्याग केम थाय थने पञ्चरकाणना जे चार प्रकार कह्या ते तो सर्व घरवानी विस्तार , एम जाणवु यत " थपरिग्गहिथासुत्ते, तिजाय मुग रिगहोनिम, सबइयेसु एसा, कायना सुत्नसनावो,” इति विशेषावश्यक सित सिधरणं ग्यगरण त मुणीण सुदकरण ।। अब दोऽ पावद्रण ऽय अम्द विति आयरिया ॥३॥ एपीगते निकांतनेपिपे उपकरण धारण करवानु का ठे, त गानाची यतिने सुम्पकारक थाप , तथा पापर्नु हरण पानिप्रमुग्पनेषि यमारा पूर्वाचार्य का ने, ते अवश्य मान्य करवू जोये ॥३० पुछ दिनयराण केवलमन्नपिआण पक्षासो॥ प्रम्हाण पुण दूट दोह विवदि धारवावारो ॥४०॥ यापपरिष दिगमरीयो जे प्रश्न कन्या , तथा अध्यात्मीयोप, पारण नपा नापयध्यात्म ए वनेनु पोतपोतामा अविरोधपणु पताणूं। ययामनी प्राति कम पाय ते फहेने- पर ममिन निगुतो मुविहिप यवहार किरिथ परिक ग्मो ॥ पायः परमनप सादू पिजिदिअपमरो॥४॥ म समिनि तयात्रणनिए करि सहित होप, मा नया नियम किया पानापतया दिया कि र ते मातुने दमट यध्यात्मनी प्राति याय ने ॥ ४१ ॥ ए वन विम्पिं जो बल यादव नार कढणेण ॥ मैदा बाहिती नुम्मापरवण कान ॥४॥ करे , f प्यानया अध्यात्ममतपरीदा. श्र व्या:- कोई एम कहे के, व्यवहाररूप वाह्य क्रियाथी अर्थ लिद थाय एवो नियम नघी; केमके, किया कस्याविना नरत चक्रवर्त्तिने काच जुवनमा थनित्य नावना नावंतां केवल ज्ञान उत्पन्न थयुं अने वाह्य क्रिया करतां रोष ध्यानना योगे प्रसन्नचं अशुन प्ररुति वांधि लीधी. माटे व्यवहार क्रिया करवी नही, किंतु निश्चय क्रियानो अंगीकार करवो. एम कहेनारा उन्मार्गनी प्ररूपणा करीने पोताना वोधवीजनो नाश करते. माटे ते वचन मान्य करवां नही. केमके, जरता दिकनुं स्वरूप कदाचित नावमा कहेवाय. एटले एबुं कदाचितज बनेने, पण नि यमथी एमज थायवे एवं कोनायी कहेवाय नही. अने व्यवहार पंथमा तो व्य वहार क्रियाविना निश्चय क्रिया संनवेज नही यने ए कारण माटे एक निश्चय थंगीकार करिने किया मूकी देवी नही कितु वनै अवश्य करवीः ॥ ४५ ॥ सत्वं सदावसजं णिवं पनपरकयं च ववदारा ॥ए गंते मितं म्नय णयमयं पुण वयाणं ॥ ४३ ॥ व्या:- निश्चयनयनी रीतिए सर्व वस्तु स्वनावे उत्पन्न थायठे, विशिष्ट वस्तु परिणामने स्वनाव कहेठे. ज्यारे बीजने अंकुरपणे उत्पन्न थवानो परिणाम था यो, त्यारे वीजपर्याय टलीने अंकुरपर्याय उत्पन्न थायवे. पण तेने वीजा का रणनी अपेक्षा होती नथी. यहीं कोई थाशंका करे के, जो वीजा कारणनी थ पेक्षा न होय तो कोवामां पडेला वीजनो केम थंकुररूपे परिणाम थतो नथी ? एनो जवाब.- कोठामां पडेला वीजने थंकुररुप परिणाम थवानां वीजा कारणो जोयेठे, माटे व्यवहारनय पण यंगीकार करवो जोये वे. तेने सामग्री कहे, ते सामग्री मल्याविना बीजनो अंकुररुपे परिणाम थाय नही. किंतु सामयीना योगे ते परिणाम थाय वे. कोई अाशंका करे के जो सामग्रीथील कार्यनी उत्प त्ति थती होय तो तेने परिणाम एवं नाम राखवा, कारण गुं? किंतु सामग्रीय की कार्यनी उत्पत्ति थायठे, एवो भंगीकार करवो जोश्ये. एनो जवाव के, सामग्रीथी कार्यनी उत्पत्ति थापठे एम मानिये तो व्यवहारनय सिम थाय पण निश्चयनय मी जाय. तेथी एकांतपणुं थाय ते मिथ्यात्व कहेवाय. माटे वन्ने नयनुं मत प्रमाणभूत मानवु. जो एकलो निश्चय नय थंगीकार करिये ने व्यव हारनय अंगीकार नही करिये तो सामग्री थकी परिणामविकोपनी उत्पनि मना य नही, थने एकज वस्तु कारण तथा थकारण ए वन्ने नावे कहेवाओ. त्यारे -- पुम्पोने कर्मनी विचित्रताने लीधे सुख खनी थधिक न्यूनता दीगेने, यी रवा ने उपउपजेने,एकमनु बजरतपण जाणवु, थही दृष्टांत ए के,जेमकोश मनुष ने दृधना पानयीपणस यायवे. ए वचनपण समर्थ नथी थही पण नानान अपमनी चपेदा ने, केमके,उग्धपानादिके करी पण पित्तादिकना योग तितरसात नुमापन पयायोऽपऊपजेठे ॥४५॥जो कहेगो के, कर्म पोताना नागनंबर पायकारणने निपने,ते बन ने तो जन्मांतरनोग्द्यम जन्मांतरना फननागन थतगले कारण कर्मादिर कारण नत्पन्न करने एम पण देवाई शमायने जार रेगा केचित् बाह्यगरणग्निा कार्यनी उत्पत्ति थायवे, पण थतामगार र कार्यनीटपनि चायननही, एवजजाणतो एम पण मना नहीं कर माधात् यया बाह्यसरणयीन कार्यनी उत्पत्ति यायने, ते पिना काय पान नही. किंबहुना कानादिर बाघ कारणधिना को कार्यनी उत्पत्तिज पनी न राण्श अध्यात्ममतपरीक्षा थकारण वस्तुथी परिणामरुप कार्यनी उत्पतिनो सनव केम यो कार्यनी ति तो कारणयी थायठे पण अकारणथी थाय नही, इत्यादिक सूक्ष्म । थी बन्ने पद अगीकार करवा योग्य वे एवु सहज जणाई थावगे ॥ ३ ॥ अनतर वाण बलिजावलितणति ज बुद्धि ॥ नणु कयर अर लत्त वेचित्तंवा विवेसम्म ॥४४॥ पिप्पत्तीव फल अणिचय । जोगो फलेण वा सिझ॥ पढमे समसावग्गी वि ति ए वावार वे सम्म ॥ ४५ ॥ नति ए दोण विसमया सनच पग्को पुणो अप्ति शोत्ति ॥ तेण समावेकाण दोम विसमयत्ति वईि ॥ ६ व्या कोई कहे के, कर्मरूप अतरग हेतु जे ले ते बजवान ने अने उपाय, दिग्प बाह्यहेतु जे जे, निवल वे एम कनारा नयवादीने एम पूज्यु के में रूप श्रुतरंग हेतु केवी रीते वनगान ' जो कहेगो के एक जातनो उद्यम मा थनर हेतुनु बत मिक्ष थाय तो ते कर्म शाथी थया एनो विचार त्याची पूर नाना ग्यमयी पपांचएम वरशे एथी उद्यमनी विचित्रताने लीधेज कर्मनी विश्व ने मानो कहेशो के, सुग्पना कारण तापण शालावेदनीयकर्मना उदये अनि बन माटे पामार्थनाए वाय तथा अनरण बनेकारण सग्ग्याज ने ए नावे नरने घटगेरे प्रमाणमार्ग ॥ १६ ॥ निमयनस्नु मत बद ने - अध्यात्ममतपरीक्षा शए३ पिलिय उसकचिय सवं पो परकयं व वढुं॥ परिणामा बत्ता एयवंऊ दाण द्रणा ॥ ४ ॥ व्या:- निश्चयनयथी सर्व वन्तु आत्मपरिणामथी उत्पन्न थायवे ; परंतु पर थी परवस्तुनी उत्पत्ति यती नयी केवल पुरस्य पापकर्मना विपाकने अवसरे पागे श्रावेला ने अंगना सादिक वाह्य अर्थ ते निमित्त मात्र वे. तेने व्यवहार व मृढ जीव कारण करी माने ठे. व्यवहारवाड़ी कहने के. ज्यारे परकारणत नधी, त्यारे साधुने दान दीयाथी गुनफल अने परश्यनु हरण कयाधी अशुन फल कम थाय ? निश्रयवादी समाधान करे ने के. निदोप आहार साधुने देतां त देनराना जे गुन परिणाम होय. तेथी गुनफल थायने, परंतु अन्नादिक पुनरू पहोवायी, तेथी फल यतुं नथी. केमके, पुनत यथकी पुनत परिणाम थाय ते; परंतु आत्मपरिणाम नथी यतो. तेमज परपव्यनु हरण कस्याथी जे यशुन फल यायचे. ते पण यात्माना अशुन परिणामे करी थाय ठे, परंतु इव्यरूप पु जन यकीनधी यतुं. ॥ ४५ ॥ :- निश्चय यकी दान पण श्रात्मपरिणामरूपते, पुनत परिणामरूप नथी एम कहेले:- दितो वढरंतो वा णय किचि परस्स दे अबदम् ।। दे: मुदं परिणामं दर वत्तं अप्पणोचेव ॥ ४ ॥ व्या:--निश्वयकी तो माधुने निदीप याहार देता तथा परश्व्यर्नु हरण क रतो ते दान देनार तथा व्य दग्ण करनारनंथिपे काई देवं, तथा नेg वन्युज नथी. कोई कोन दान देतो नथी, तथा कोई कोऽनुं श्च्य हरण करतो नथी. साधुने थाहारादिकनु दान देतां देनागे पोते पोतानंज परानुग्रह बुद्धिरूप नप रिणाम दियेते; तथा परनुं श्य हरण करतां ते हरण करनारो जीव घात बु दिए करी पोतेज पोताना शुन परिणामर्नु हरण करते. परंतु परनेविपे काई दे कुं लेबु तंजवे नही. ॥ ४ ॥ एण्य धम्माव मुई वा परस्म देयं गया विदरणिनं ।। कवणासा कवनोग, प्पमुदा दोसा फुमा दा ॥ ४ए॥ व्या:-जी परमात्मा पाने तो दोष तो पातानो धर्म तथा पांतानुं सुख वीजाने देवाई शकाप ले: अने जो परनो थान्मा पर हरण करतो होय तो .

नमसमरिन विनदायत यापणु,ने जे पग्ने नाग यावन पानु Trmat प्पा०-नत प्रमुग्य पुगतनु देवु तथा लेवु जीवनेवि थाय नहीं, के पोतानी दोय तेनु देयु तथा लेबु थायठे, परनी वस्तुनुं लेबु वेवु पर्नु • नामकर्मना परिणाम जे मन वचन तथा कायना पागने, तना। ना वा ननु महण थायले.ते यात्मतत्वना हानथकी जान गमा तम्दाम परिविनागी पोग्गलदबमि पनि मिठपठ॥ नांगानागरिममा ववदाराचेव सपसम्न ॥७॥ - माटे निचपनययकोष्टनी विशेष ने रे, जे यापणन नमा एए अध्यात्ममतपरीदा. वीजानो धर्म तथा वीजानु सुख पोते लेवा शकायचे ए वन्ने पदमा थने यस्तागम दोप प्राप्त थायठे, केमके, जो पोतानो धर्म तथा पातानु बीजाने देवाई शकातु होय तो पोते करेला कतनो नाश थई गयो कहेगार. ने लेनारने थकतनो थागम थयो कहेवाय केमके, तेने नकरेलो धर्म नु फज जे सुख, तेनी प्राप्ति थायडे, तथा करेलो अधर्म तथा तह थायडे, ते रुतनाश कहेवाय वे तेमज वीजानो धर्म तथा बीनानु सुख की लेगाई गकातु होय तो तेणे करेला कतनो नाश थई गयो कहेवा' थस्तनो थागम थयो कहेवाय, केमके, पोताने नहीं करेलो धर्म तथा सनी प्राति पायने, तथा करेलो धर्म तथा तेना फलनो नाश थापने, ते नाग कहेगाप ॥४॥ जताऽ पोग्गलाणवि ण दाण हरणाऽ दोऽ जीवरस॥ जस्त सचिय दुजा तो दिज्जा वा अवदरिजा ॥ ७० ॥ जे য पी. ने पायग्नुनु क्षेत्र देवु तो प्रत्यक्ष करिये ये ते कम बने? ज्यारे पुरुन । पाप नषी त्यारे सेतु देवु केम कराय ? ॥ ५० ॥ जोगवणवणीया हानिहाय पोग्गला जेदु ॥ यामाणे जीवान जीवो अणो अदितो ॥ १ ॥ उनु पदण थापने, जमक, सुध तथा धनु ग्रहण करता कर के पुत्र पक्षण गुण , बने थामा उपयोग गुण ने ॥ ५ ॥ प्या.

अध्यात्ममतपरीदा. ए पुणपयडीण उदय नांगो नोगांतराय विलएणं ॥ज पिअचित्तेणंचित्र, तो नोगो किण किं विणाणं ॥५३॥ व्या:- सातावेदनीयप्रमुख पुस्यप्ररुतीना उदयथी जोगांतरायकर्मनो विल य थया पठी पण जो जीवने जोग थता होय तो रुपणने पण नोगनी प्राप्ति य वी जोश्ये, तेम तो नथी यतुं ; केमके, रुपणने पण लानांतरायकर्मना श्योप समयकी इयनी प्राप्ति तो थायवे. परंतु नोगांतराय कर्मना वशथी जोगवी शकतो नथी. माटे जे थापपने भोगवायोग्य होय ते स्वव्य कहेवाय, ने वीजुं वधुं पर ठे एम जाणवू. एवी रीते व्यवहार नयना मते पण एकांत नथी; माटे ए सर्व मन इव्यने परकरी जाणवू जोश्ये.॥ ५३॥ याचा सर्व पुजत इव्य परकीय वे एम जे जाणे नही तेने यात्मस्वनावनी ति न थाय. ते कहे . जो परदवमि पुणो करेइ मूढो ममत्त संकप्पो ॥ सो कदआय सहायं गिझ विसएसु नबलई ॥ ५४॥ व्या-- व्यवहारमूढ जीव परश्व्यनी उपर ममत्वसंकल्प करे, ते विपय सोलुप थयो श्रको यात्मस्वनावने पामतो नथी. केमके, शरीरादिकनेविपे 'हुँमा लो ढुं, दूवलो , हुँगोरो हुँ तथा हुँ कालो हुँ' इत्यादिक अहंकार जीवने उत्पन्न यायठे; तथा मारुं शरीर, माझं कुटुंब; इत्यादिक ममकार उत्पन्न थायठे; थी विषयोनेविपे दृढप्रवृत्ति थायडे, यने विपयना अभ्यासे तेयोनेविपे दृढ नाव पायठे, एवी परंपराए करीथज्ञाननी दि थई गयाधीथात्मज्ञान केम थाय !iman पाहं दोमि परेसिं ण मे परे पछि मसमिकिंची। श्य अप्पन्नावणाए राग होसा विलऊंति ॥ ५॥ व्या:-- ९ वीजा कोईनो संबंधी नथी, तेम मारो कोई बीजो संबंधी नथी, था जगतनेविपे मारुं कोई नथी, केमके, परभव्यतुं यस्तित्व निन्न ; अने मारा था त्मव्यर्नु अस्तित्व निन्न ठे, शरीर कुटुंबादिक कर्मना योगे संयोग लक्षण नाव: तेमा मारूं काई लागतुं वलगतुं नथी, केमके, तेथोनो वियोग पण याय, जेनो कोई काले संयोग तथा कोई काले वियोग थतो होय ते पोतार्नु इव्य कहेवाय नही जेनो कोई काले वियोग थाय नही ते पोतानुं व्य कहेवाय ठे, एवो तो यात्मस्व . ८. - |ने, तेम यात्माना थानथकी थएलो जे कर्मबध, ते बारमझानथकी निय ते पण ज्ञानना संयोगथीज फल थायले केमके, अज्ञानी कोमाकोडी वारी | पातादिक, तथा क्रियानुष्ठानादिक एकातिक नयी, तेम थात्यंतिक पण नयी | मके, वाह्य हिसाविना मनना क्लिष्ट परिणामे करी, तंजमल, सातमी नरक. नरिये उत्पन्न थायले थने थप्रमत्त यतिने जयगाए चालता अनानोगे जीला | नयी पण ते प्रत्ययिक कर्मनो वर थतो नथी तथाविध कियानुष्टानविना ल' केवन शान उत्पन्न याय ने ने थनव्य जीप यतीने निगे उत्कृष्ट बाह्य किया। से तेना बने ते नवमा रेयकसुधी जायचे तो पण शुभ परिणामविना समान, • समारपार गमन सिझलए निश्चय कियाथीज थायले एमां पर दिनी विशेषता के, पणाने व्यवहारथकीज निश्चय थावे थने को ना बने पूर्व चाग्निान्यासक्री तथा नध्यत्वना परिपाकेकरी सहजे पण मा पए कहेना योग्यपणुते निभय तया व्यवहार ए बनेना सयाग थमीज पर रवि मितमा चार नांगा क्या ने पहनो नेरपु सारुनही ने वारा नही, तेनी पत्रे ए नांगों चरकपरिमाजकपमुखनेविपेचे केमकेत- एए अध्यात्ममतपरीक्षा. नाव , जेनो आत्मायो वियोग थतो नथी, जेम ज्ञान दर्शननारिक कोई कालें यात्माथी वियोग यतो नथी एवी रीते शास्त्रोक्तमयादाए मनाचना कस्याथी राग पनो नाश थाय ॥५५॥ तो परिणामानच्चिय बंधा मोरको व पिचयणयस्स ॥ ऐगतिया अणचं तिया पुणो वाहिरो जोगो ॥ ५६॥ व्या० -माटे जीवने बंध अथवामोक्ष निश्चयनयथी धात्मपरिणामी ने थज्ञानरूप परिणामथकी बंध थायडे, थने यात्मज्ञानरूप परिणामणी थायवे जेम हिमथकी थएली जे शीतनी वेदना ते थग्निना तापथकी पवे केमके, एम सिद्धांतोमा पण का ले के, तपथकी इश्वीर्ण कर्मनो कप कर्मनो क्ष्य करे, ते कर्मनो क्ष्य ज्ञानी एक उच्चासमा करेने बाह्य योग पार पामता नीं ॥५६॥ सिही णिचयनच्चिय दोह सजोगन अवेयत्त ॥ क ना कई दोहवि बनगो तुल्लवचेव ॥७॥ प्या- 1 अध्यात्ममतपरीक्षा. एस वो शुक्ष परिणाम नथी, तथा वापना जेवो वेप पण नथी. माटे तेयोना अर्थ ॥ सिदि थती नथी, ने ते वदन करवायोग्य पण नथी. वीजो रू' खोटु, होय 1वाप खरी होय ए नांगो. पासत्या. उसन्ना, प्रमुखनेविपे थाय ते ; प्रमुख श देकरी दिगंबरादिक पण सेवा. केमके, तेयोने रूपाना जेवो शु६ परिणाम नथी मात्र गपनी पते वेप तेवो ते. पण परिणामविना तेोना अर्थनी सिस्थिती नथी. प तेवो माटे जहांसृधी दोप जास्या न होय तहांसूधी वंदना करवायोग्यवे, परं तु दोष जाएया पठी जो वंदना करिये तो माहा टोप लागे. यतः “जह वेलं बगलि ज, जाणं तस्त एम धुवं दोसो; णिहंटसत्तिणाऊ, वंदमाणे धुवदोसो " इत्या वश्यके. एनो अर्थ:-जेम को नांडे यतिनो वेप लीयो होय तेने जाणीने वंदन क तां निश्चयेकरी टोप लागेठे. तिम निस जाणी वेष मात्र जोश्ने वदना करतां ध्रुव दोप लागे. त्रीजो रुपुं चोखं दोय पण वाप खरी न होय ए नांगो प्रत्येक बुधने तागु थायठे. केमके, तेश्रोयन्यलिंगे पण होय तथापि तेयोने रूपानी पठे नावचारि तोते, तेथी पोताना यात्मानो धर्थ तो सिद्ध करे, परतु साधुना पथ्यविना वंदन करवा योग्य नयी. चोथो नांगो रु' पण चोऱ्या तथा वाप पण चोखी होय तेनी पठे सर्व शुछ जाणवू.जे महानुनाव थालय विहारादिक सर्व गुरू. यतिनी समाचारी पाले, घने विगुरु चारित्रवत होय, एने रूपानी पठे शुभ परिणाम ठे, तेथीयात्मानो थर्थ सिह करे, तथा साधुनु पय्य से, माटे वंढवा योग्य तथा पूजवायोग्य पण . एवीरीते एवा ठेकाणे गुरू परिणामरुप निश्चय वलवंत . साबु वेपादिरूप उपचरिता सनुत व्यवहार ते निर्वतवे. तयाकोईक ठेकाणे व्यवहार अने निश्चय ए वनेनो सरखो उपयोग .यही ज्ञान अने क्रियानुं उदाहरण लेवु झाननयनी रीतिए धाम कह्यु वे के, छानविना कियामात्रथी फलनी सिदि थती नथी. केमके, मिथ्याझानेकरी सीपनेविपे रूपानी बुद्धि प्रवर्ते वे ने तेनी प्राप्ति तो थती नथी माटे मिथ्याझानजन्य जे किया, तेथी फलनी प्रानि यती नथी; किंतु सत्यज्ञानजन्य क्रियाथी फलनी 'नाप्ति यायवे. परंतु क्रिया तो ज्ञानेकरीनेज थायठे, तेमा मिथ्याज्ञानजन्यकि या निष्फल थाय ने सत्य ज्ञानजन्यक्रिया सफल थायवे, एवीरीते क्रियानु कारण ज्ञान होवाथी प्रधान दे. अने ज्ञान- कार्य क्रिया होवाथी थप्रधान ठे, ते मज क्रियानयनी थपेक्षाए एम कडं:- झानजन्य क्रियाए करीने संपादन क रेलुं जे फल, ते कोई कारणने सीधे दीण थई जाय तो ते पावं क्रियाथी प्राप्त थाय; माटे क्रिया प्रधान दे.थने ज्ञान थप्रधान वे. जुवो के, ज्ञानवान उतां ३८ . - । • यद्यपि कार्य करवानी थपेक्षाए शान थने किया ए वनेनु साधु पो न्यारे पष्टादिगुणस्थानके नियमे शुरूझान होयचे पण ज्यारे सक्दान। शुरू झान तो होयठे, परतु थपिरति होवाने ली शुक्रिया : निभयनी पिता ने-जे एपनयनु मत त व्यवहार, यन सवनस्तु शत अध्यात्ममतपरीदा. क्रिया न करे तो ते ज्ञानमात्रथकी फलनी प्राप्ति थती नयी यही .. वे -जेम कोई पुरुपने मार्गनु ज्ञान सारी पठे होय, पण जो चनना तो पाठित नगर प्रत्ये पहोची शके नही, जेम कोई पुरुपने नृत्यक नानु न होय पण जो नृत्य अनिनय क्रिया न करे तो जोनारा लोकनु शके नही, तथा तेने काई इव्यनी प्राप्ति थाय नहीं तथा जेम काई पुरुष जाणतो होय एटले जलतरणज्ञानवान होय, पण जोहतपासना रेतो ऽवितस्थले न पोहोचता बच्चेज बूडी मरे, एवी रीते ज्ञाननय तया नो परस्पर रिगद ले, तेने एककोरे मूकीने मात्र साराशनो विचार जो स्या तो परमाया फसिने विपन्न समान बलवत वे केमके, स्थानेरिपे केवलज्ञानरूप ज्ञान, तथा सवररूप क्रिया ए वन्ने योगयो मुक्ति पण ए बन्नेमायूँ कोई एक न होय तो मुक्ति थाय नही, ए प्रमाण पते ॥ था निचयनयनी थपेक्षाए कहे- तुल्लतमयेरकाए णियमासमुदाय जोगमदि गिच ॥ किरिआ विसस्सए पुण नाणान सुए जन जणिया जम्दा दसण नाण संपुन्नफल न दिति पत्तेन ॥ चा रित्तजुआ दितिद् विसस्सए तेण चारित्तं ॥ up ) नवे , तयापि शान करता कियाने थाटली विशेषता य, यारे शुक्रियानो नियम नया कमा, चतुर्थगुणस्थानो पर के गपूर्ण फल दाता मकामा फयुज्या चारित्रनविय एकता मनेन का गपूर्ण पत्र दिया तमाट दशीन तथा जयार करता चारित्रश्रेष्ठ र ॥ ५४॥" पप सहारान वलयतो जिबनणेयवो ॥ एग मय याहारो समय जिवन यत्ति ॥ ६॥ प्या ज्यारे राति प्या. - - अध्यात्ममतपरीदा. शए .. निश्चय कहिये, यथा नूतपदार्थ जे कथन ते निश्चयनय कहेवाय ठे, ने ए नूता निय पण कहेवायचे, निश्चयनयनो विपय नाव जे वे ते सर्व समान वे. यतः सवण्या नावमिति " इति विशेषावश्यके. ॥६० ॥ अन् एनिश्चयनयनुमत सांजलीने सिंहावलोकनन्यायें व्यवहारवाटो बोले ते.- अहिआ जर तुद किरिआ अदिआ नाणं वि तस्स देवत्ति ॥ कारणगुणाणुरूवा कजगुणाणेव विवरीआ ॥ ६१ ॥ पूर्व कहेली रीतिए व्यारे तुं क्रियाने अधिक माने ठे, त्यारेडानने पण अधिक मानवू जोयेठे. केमके, ज्ञान क्रियानुं कारण वे. कारणना गुण जेवाज का रना गुण होयठे, तेथी विपरीत होता नथी. जेमाटे ज्ञान क्रियानु कारण , तेमाटे ना गुणे करीने क्रियाने कार्य पणानी प्रधानता ते, तेथी ज्ञान यत्यंत प्रधान से, जो कहेशोके, मोदरूप कार्य क्रियाथकी थायवे. माटे किया अधिक वे ; तो तेम पण संनवे नही. केमके, ज्यारे क्रिया ज्ञानतुं कार्य ठे. त्यारे क्रियानुं कार्य जे मोद, तेपण परंपराए ज्ञाननुज कार्य जाणवू. यतः " दासेण मे खरो की, दासोवि मे वरोवि मे." एटले मारा दासे रखर वेचातो लीधो, ते दास पण मारो अने खर पण मारो ठे; एम सिमांतोक्तन्याययी जाणी लेवु. ॥ ६१ ॥ अद जन सब णयमयं वणितिगमयं च ववहारो॥ सोसा सयलाटेसा विगलादेसा कदं दोऊ ॥६॥ व्या पूर्वे कह्या प्रमाणे निश्चयनय जे वे ते सर्व नयनुं मत वे, जो एम होय तो ते सर्व नांगानुं ग्रहण करनार सकनादेश प्रमाणरुप मानवो जोतो. त्यारे ते नयरूप विकलादेश केम मानहो? ॥ ६ ॥ थ० एवीरीते व्यवहार तथा निश्चय ए वन्नेनय परस्पर वाद करता जोड़ने मध्यस्थपणे प्रमाणवाटी कहेने.- मुरकामुकविभागोवामेत्तेण पति एगंतो ॥ जा अवि तो विनाणे चरणं सारोत्ति तं मुकं ॥ ३ ॥ व्या० व्यवहार तथा निश्चय एबन्ने नयांना मुख्य तथा यमुख्य ए वे विनाग पोतपो तानी वाए थई शख्ने, फोक गुगने लईने निश्चयनी मुग्यता फहवायचे, अने कोईक गुणने लईने व्यवहारनी मुख्यता कहेवायचे. परतु एयोनेविपे एरातपणू मंन . निथपनयने सर्वनयमय पणु जे पूर्वे का ते सनिय सम्मा प्या. निर्दा एर धर्मनी धागए सर्वधर्म जे सकलादेशनेपिये प्रतिपाइन ,निदा निन्दादिए एक धर्मनी साये बीजा साल धर्मानु अनेदपाने ते निभपनपने बापत के, एपी थपेक्षाएकरी निचयनयने प्रमाण ह्याने म्म मुफनारे णियमा अपरोक्यारोनि ॥6॥ एम कहने के निचयनय परमायग्रादीने नमानाई दीदांगीन बनानन, यन य्यरदार नय परमार्थवादी नयी नम्र 300 अध्यालमतपरीदा. नहीं; स्तुि थनेकातपणुं सनवे. केम के, निश्चय तथा व्यवहाना, श्रमुग्न्य विनाग वनाधिकधर्मरुप नथी, कितु थापेक्षिक वे जेम वदग्नी थपेक्षाए दीर्घ कहेवाय, थने घटादिकनी थपेक्षाए हम तेम ए वन्ने नयो एक बीजानी अपेक्षाए मुख्य तथा थमुख्य कहेवायन, वता पण जो व्यवहारनयवादी पोताना मतनु मुख्यपाणु प्रकाशमान वाले तो तेणे वली था युक्तियेकरीने पोताना मननु समाधान करी के व्यवहाग्नु जे मुख्यपणु ते मात्र कहेवावें , थने निश्चय मुग्मा कार्यनो उपयोगी , केम के, सामायक श्रादिदने चीद पूर्वपर्यत झाननु ते पारित्र का वे, यत 'सामाश्थमाईयं, सुथनाण जाय विसाराउ, निसारो चरण, स्सारो चरणस्स निवाण" इति यावश्यके ॥६३ ॥ सवणयमयत्तं पुण सबेसि सम्मन जन विसः ॥ णयणिञ्चयस्स तेण सयल दिसत मेगस्स ॥ ६ ॥ प मानेने तेमाटे का एम जाण्याथी एकला निश्चयनयने प्रमाणामा सरज देशपपण दोपनु करनार थशे नहीं ॥ ६ ॥ जण सयला देसो अनेय वित्ती णिवयाधीणो ।। तेणेर मोपमाण ण पमाण दो ववदारो ॥६५॥ जम गुपयारोपिचल कासा गतिमढवे तपि ॥ कोई घ्या. प्पा हा दागयों ने निबनने, omwiनयी, मा. बननय र सरगनय यामाही , तेर्मा ग्यारे निचयनयनी मुग्यता Pिalam अध्यात्ममतपरीक्षा. ३०१ - सनय पण उपचारसहित थायठे, इहां कोई विशेषता नथी, यतः थर्पि तानर्पितसिहे तत्वार्थ" शदेकरी नयनी प्रधानतानी जे विवहा करवी ते थर्पित कहिये, धने नयांतरनी अपेक्षाए तेनी अप्रधानतानी जे विवदा करवी ते अन पित कहिये, एबन्ने प्रकारनी विवदायी जे पदार्थनी सिदि थायवे, ते तत्वार्थ सिदि कहेवायठे. ॥ ६६ ॥ पिठयणयस्स विसयं नावंचिय जे पमाण मादंसु॥ तसिं विणेव देनें कऊप्पत्ती कामेरा ॥ ६ ॥ व्याः कोऽक धाम मानेठे के, निश्चयनयनो विपय जे नाव तेज प्रमाण चे, तो ते नावनो हेतु इव्य , इव्यविना नावनी उत्पत्ति थाय नही जो व्यवि ना नावनी उत्पत्ति अंगीकार करीये तो मर्यादा रहे नही. घने कारणविना का चनी उत्पत्ति थती नयी एवो नियम ठे तेनो नंग थशे! जो एम कहेशो के, इव्य क्रिया संसारमा थनंतवार प्राप्त थएलीवे, माटे ते अप्रधान ; तो नाव पण थ प्रशस्त धनंतवार प्राप्त थएलो वे ते केम प्रधान कहेवाय ? जो कहेशो के, शुभ 'नाव धपूर्व ठे, तो शुक्षव्य पण थपूर्वज ठे, ते शासारुनही मानवू जोये ! ॥६॥ खानवसमिगनावे सुझो देऊ सुहस्स खश्अस्स ॥त नावेण कया पुण किरिआ तनावबुद्धि करी ॥ ६ ॥ व्याः दायोपशमिक नावे कीधेली जे क्रिया तेज झायोपशमिक नावनीट दि करनारी ; माटे गुचनावथी किया थवश्य करवी योग्य ; थने तेम न कयाथी नावनी हाणी थई जाय. ॥ ६ ॥ धि सभा सुद् विविऽस विमती तत्त धम्म जोणित्ती॥ तल्लवधम्मनावा व नावतत्तणं तत्तो ॥ ६ ॥ एवं पवमूनावो कमेण गुणगणसिम्मिासदिय ॥ परकीणघाँकम्मो कयकिच्चो केवली दोऽ ॥ ७० ॥ व्याः धृति, श्रक्षा, गुश्रूपा, विविदिपा, तथा विज्ञप्ति ए पांच पदार्थ धर्मना कारण , एविपे पतंजलिप्रमुख ग्रंयोमां पण कहेलु ठे, उगादिनो त्याग क रीने चित्त स्वस्थ कर, ते धृति कहिये, चित्त स्वस्थ थयाथी मार्गानुसारिणी रुचि उत्पन्न थाय ते ते अक्षा कहिये ; मार्गानुसारिणी बुद्धि थयायी दायोपशम नाव - पारपनर यामाही, तेमा ग्यारे निचयनयनी मुग्यता शिक्षित माता ते पारित्र का , निभयनयने सर्वनयमय पणुं जे पूर्वे का ते सर्वनय सम्मन प्या. निहां एक धर्मनी धाराए सर्वधर्मजे सकलादेशने रिपे प्रतिपादन का | ने, निहाँ थनित्वादिफ एक धर्मनी साये वीजा सफल धर्मोनु थनेदपण रस ते निधपनपने बापत ने, एपी थपेदाएकरी निश्चयनयने प्रमाण वह्याने, व्यग्दानपने यत्रमाण क्ह्योने, परतु एकांत निचयनय प्रमाण क्ह्यानयो । दी होरपी ने बनगनने, यने व्यपहार नय परमार्यमादी नयी, तrrr पर दोवायी ते निर्वन, एपण एकांत नयी. केमके, बानय व 300 अध्यात्ममतपरीदा. नही, रितु अनेकांतपणुं सनवेवे केम के, निश्चय तथा ना. श्रमुग्न्य विनाग स्वनाविकधर्मरूप नथी, कितु थापेदिक ने जेम वदरनी अपेक्षाए दी कहेवाय, अने घटादिकनी थपेदाए हम तेम ए बन्ने नयो एक बीजानी अपेक्षाए मुख्य तथा थमुख्य कहवायने उता पण जो व्यवहारनयवादी पोताना मतनु मुरव्यपणु प्रकाशवान, वाले तो तेणे वली था युक्तियेकरीने पोताना मननु समाधान करी मेनु के व्यवहारनु जे मुख्यपणु वे ते मात्र कहेवानु ठे, थने निश्चय मुख्या कार्यनो उपयोगी के, केम के, सामायक ग्रादिदर्शने चीद पूर्वपर्यंत ज्ञानर्नु यत सामाश्यमाश्यं, सुयनाण जाव विसाराउ, गि सारो चरण, स्सारो चरणस्स निवाण" इति थावश्यके ॥ ६३ ॥ सवणयमयत्त पुण सवेसिं सम्म जन विसन ॥ यणिचयस्स तेण सयल दिसत्त मेगस्स ॥ ६ ॥ ध्या० प मानेने तेमाटे का एम जाण्याथी एकता निश्चयनयने सन । प्रमाणात्मक समज देशपाणु पण दोपनु करनार थशे नहीं ॥ ६ ॥ जेण मयला देसी अनेय वित्तीऽ पिचयाधीणो॥ तेणेप सोपमाण ण पमाणं दो बवहारो ॥६॥ जम गुपयारोविचल कासा गतिरं दवे तपि ॥ एग म्म मुम्फनाने णियमा अारोवयारोत्ति ॥ ६ ॥ या० कोई एम कहो नाही तमा को पार .

अध्यात्ममतपरीक्षा. ३०१ - बनय पण उपचारसहित थायवे, इहां कोई विशेषता नथी, यतः “थर्पि मानर्पितसिहे तत्वाथै" शब्देकरी नयनी प्रधानतानी जे विवदा करवी ते धर्पित कहिये, श्रने नयांतरनी अपेक्षाए तेनी अप्रधानतानी जे विवदा करवी ते अन पित कहिये, एवन्ने प्रकारनी विवाथी जे पदार्थनी लिक्षि यायते, ते तत्वार्थ सिदि कहेवायवे. ॥ ६६ ॥ णियणयस्स विसयं नावंचिय जे पमाण मादसु॥ तेसिं विणेव देवं कळप्पत्ती कामेरा ॥ ६ ॥ व्याः कोईक थाम मानेने के, निश्चयनयनो विपय जे नाव ठे तेज प्रमाण , तो ते नावनो हेतु इव्य वे, व्यविना नावनी उत्पत्ति थाय नही जो व्यवि ना नावनी उत्पत्ति अंगीकार करीये तो मर्यादा रहे नही. अने कारणविना का थनी उत्पत्ति थती नथी एवो नियम ठे तेनो नंग थशे! जो एम कहेशो के, व्य क्रिया संसारमा अनंतवार प्राप्त थाएली, माटे ते अप्रधान ; तो नाव पण प्रगस्त अनंतवार प्राप्त थएलो वे ते केम प्रधान कहेवाय ? जो कहेशो के, गुरु नाव थपूर्व , तो शुक्षश्य पण थपूर्वज ,ते शासानही मानवु जोये ॥६॥ खा-वसमिगनावे सुझो देऊ सुदस्स खश्अस्स ॥त प्रावण कया पुण किरिआ तनावबुद्धि करी ॥ ६ ॥ व्याः दायोपशमिक जावे कीधेली जे क्रिया तेज दायोपशमिक नावनीट दि करनारी ; माटे गुचनावथी क्रिया थवश्य करवी योग्य वे; थने तेम न कत्याथीनावनी हाणी थई जाय. ॥ ६ ॥ धि सहा सुद विविश्स वित्ती तत्त धम्म जोणित। तल्लवधम्मनावा व नावतत्तणं तत्तो ॥ ६ए । एवं पवमूनावो कमेण गुणगणसिनिमारुदिय ॥ परकीपघाँस्कम्मो कयकिच्चो केवली हो ॥ ७० ॥ व्याः धृति, श्रा, शुश्रूपा, विविदिपा, तथा विज्ञप्ति ए पांच पदार्थ धर्मना कारण ठे, एविपे पतंजलिप्रमुख ग्रंथोमां पण कहेलुं वे, उगादिनो त्याग क रीने चित्त स्वस्थ करतुं ते धृति कहिये, चित्त स्वस्थ थयाथी मार्गानुसारिणी रुचि उत्पन्न थाय ते ते अक्षा कहिये ; मार्गानुसारिणी बुद्धि थयाथी दायोपशम नाव . . निश्चयनयने सर्वनयमय पणु जे पूर्वे का ते सर्वनय सम्मन । तेणेव सोपमाण प पमाण होइ ववहारो ॥६५॥ व्या जिहां एक धर्मनी धाराए सर्व धर्म जे सकलादेशनेविपे प्रतिपादन कार ध्या० कोई एम कहेते के निश्चयनय परमार्थयाहीने तेमां कोई उपचार ही होगाथी ते वलपान, थने व्यवहार नय परमार्थग्राही नथी, तमा | प्यवहारनय थराग्राही उ, तेमा ज्यारे निश्चयनयनी मुख्यता विवदिए ३०० अध्यात्ममतपरीक्षा. वे नही, कितु अनेकांतपणु संनये. केम के, निश्चय तथा थमुख्य बिनाग वनाधिकार्मरुप नथी, फितु थापेदिक ने नेम बदरनी अपेक्षाए दीर्घ कहेगाय, अने घटादिकनी यपेदाए हस्त तेम ए बन्ने नयो एक वीजानी अपेक्षाए मुख्य तथा यमुख्य कहेवायन उतां पण जो व्यवहारनयवादी पोताना मतनुं मुख्यपाणु प्रकाशवान, वाले तो तेणे वली था युक्तियेकरीने पोताना मननु समाधान करी के व्यवहारनु जे मुख्यपणु ते मात्र कहेगानु ठे, धने निश्रय , कार्यनो उपयोगी ठे, केम के, सामायक यादिदर्शने चाँद पूर्वपर्यंत ज्ञाननु ते चारित्र का ठे, यत 'सामाश्थमाश्यं, सुश्रनाण जावे विडसाराउ, ल वि सारो चरण, स्सारो चरणस्स निवाण" इति थावश्यके ॥ ६३ ॥ सवणयमयत्त पुण सवेसिं सम्मनज विसन ॥ पयणिव्यस्स तेण सयल दिसत्त मेगस्स ॥ ६ ॥ थे माने तेमाटे का एम जाण्याथी एकता निश्चयनयने प्रमाणात्मक सकल देशपणु पण दोपनु करनार थशे नहीं ॥ १४ ॥ जेण सयला देसो अनेय वित्ती णिहयाधीणो । ने , तिहां अस्तित्वादिक एक धर्मनी सायबीजा सकल धर्मानु बजेर ते निश्चयनयने थायत , एवी थपेदाएकरी निचयनयने नमा व्यवहारनपने थप्रमाण कह्योने, परतु एकात निश्चयनय प्रमाण कह्यो नथी । जम णुवयारोविचल कासगतिअ हवे तपि ॥ एग स्स मुरूनावे णियमा अवरोक्यारोत्ति ॥ ६६ ॥ व्या० 4 . .

अध्यात्ममतपरीक्षा. ३०१ नय पण उपचारसहित थायडे, उहां कोई विशेषता नथी, यतः “थपि नर्पितति तत्वाधे" शब्देकरी नयनी प्रधानतानी जे विवक्षा करवी ते थर्पित हिये, धने नयांतरनी अपेक्षाए तेनी अप्रधानतानी जे विवदा करवी ते यन पंत कहिये, एवन्ने प्रकारनी विवदायी जे पदार्थनी मिति पायठे, ते तत्वार्थ सहि कहेवायचे. ॥ ६६ ॥ पिव्ययस्स विसयं नावंचिय जे पमाण मादंसु ॥ तेसि विणेव देवें कडप्पत्ती कामेरा ॥ ६ ॥ व्या: कोक थाम मानेने के, निश्चयनयनो विषय जे नाव तेज प्रमाण 1, तो ते नावनो हेतु इव्य वे, इव्यविना नावनी उत्पनि थाय नही जो व्यवि नावनी उत्पत्ति अंगीकार करीये तो मर्यादा रहे नही. घने कारणविना का नी उत्पत्ति यती नयी एवो नियम ते तेनो नंग थशे जो एम कहेगो के, व्य केया संमारमा थनंतवार प्राप्त भएली, माटे ते श्रप्रधान तो नाव पण थ रगस्त थनंतवार प्राप्त थएलो वे ते केम प्रधान कहेवाय ? जो कहेगो के, शुरु नाव थपूर्व ठे, तो शुरुव्य पण थपूर्वज , ते शासारूनही मानवु जोये ! ॥६॥ खानवसमिगनावे सुझो देक सुदस्स खऽअस्स ॥ त प्रावेण कया पुण किरिआ तनावबुद्धि करी ॥ ६ ॥ व्याः दायोपगमिक नावे कीती जे क्रिया नेज दायोपामिक नावनीर ६ करना ; माटे शुधनावी किया थवश्य कन्यो चोग्य ते ; न्यने तेम न ग्याची नायनी हाणी थर्ड जाय. ॥ ६ ॥ घि सना मुद विविश्म विपत्ती तत्त धम्म जोणिती। तलवधम्मनावा व नावतत्तणं तनो ॥ वए। एवं पवमनावो कमेण गुणगणमिनिमानदिय ॥ पन्कीणपॉकम्मो कचकिच्चो केवली तो ॥ ॥ व्याः धृनि, अक्षा, शुया. विविदिपा, तथा विनिए पांच पदार्य धर्मना शारण ने, एविये पनजतिनमुन ग्रंथोमां पण क. नगादिनी न्याग र ने चिन सम्प कन्वं ते नि कहिये, चिन समय पयाथी मागानुगारिजीनधि उत्पन्न पार वे ते असा दिये ; मार्गानुनारिती हि पयायी छापान नद

उता रुतरुत्यता केम सनवे? माटे केवलीने जो कवलाहारी कहो तावे
-
।
1
तमे पण जो एमज मानता होतो तेने कवलाहार करनारो केम कहोठो!.
व्याग देव तो थडारदोपरहित वे, घने स्तरुत्य वे, ए सर्व मान्यने ।
लाहार यगीकार करखाथी दुधा पा पण अंगीकार करवा जोश कम
हुधा तृषाविना कवलाहार सनवे नही जो कुधा तृपाने पण अगीकार का
तो परमेश्वरने थडारदोषरहित केम कही शकशो? केम के, हुधा थने हा
वे दोप तो कबसाहारना ग्रहणथी सिम थायवे त्यारे गु केवली सोनापरहित
वे, जो एम मानशो तोथागमवचननो अपमान थशे यत "कुत्पिपासाजरा
थातरगत नपासकाध्ययने हुधा, तृपा, जरा, दय, जन्म, यम, हिलोकादिया।
हकार, राग, प, मोह, चिता, अरति, निझा, विस्मय, विपाद, स्वेद, तथा सा,
। ए थडार दोष केवलीने नथी एम काठे तेयोमाना दुधा तथा तृपा एकल
३०२
अध्यालमतपरीदा.
उत्पन्न थायवे, त्यारे जेम सर्प वाहेर थामो तिडो चाले पण ज्यारे ।
सेठे त्यारे पांसरो थई जायचे तेम श्रवणादिकनेचिपे युधिनी जे सरला थवी ते
पा कहिये, श्रवणादिक कखाथी जेम जेम वदि गुरु थती जायचे,
स्मतत्वचितननी उत्पत्ति थती जायचे ते विदिषा कहिये, म
की शुश्रूपा जे ते श्रवणादिगुणरूप थायचे, तेविना ते थानासमात्र कहेवाब,
पण गुण कहेवाय नही, यात्मतलचितन बडे श्रवणादिक गुण उत्पन्न
तनी उत्पत्ति थायवे, ते सम्यक्तना पाच लिग शम, सवेग, निर्वेद, यनुकमा
थास्तिक्यता, एवो यात्मानो जे गुन परिणाम तेने परमतनेपिपे
माना गुनपरिणामथी धर्मनो नाव उत्पन्न थायठे, तेणेकरी
६ि थायजे, एम उत्तरोत्तर, नायधिकरी थविरति देशविरत्यादिक
पीचढी घातीकर्मनो क्यकरी स्तरुत्य केवलीयाय एनो सारी रीते ।
जुवो एटले सहज जणाईयावेठे ॥ ६ए॥ ७० ॥
था एवु युक्तिपूर्वक वचन सानलीने पीडितकर्ण थयो थको परवाई
नणु जय सो कयकिच्चो अधारसदोसविरदिन देवो॥
ता उहतला नावा जुङ कम्मा कवलनोजी ॥३२॥
अंगीकार करो ॥ १ ॥

३०३ अध्यात्ममतपरीदा. या ए याशंकानो उत्तर कहे :-- तो सकावृत्तु जे बुदतहाई जिस्स किरदोसो ॥ जड़ तं दूसेज गुणं सादावियमप्पणो कि वि॥ १२ ॥ दूसऽ अबाबादं इय जर तुद् सम्म तयं दोसो ॥ मणुयत्त पं वि दोसो ता सिश्त्तस्स दूसण ॥ ३ ॥ व्या: दुधा अने तृपा ए वे दोप अडार दोपमां गणीने, कृतकृत्य जे केवली नेविषे ते वे दोपनो ते जे अनाव कह्यो; ते वचन ताराज मतानुयाविमां कहेता शोनाप्रट ते; परंतु पंमितोनी पर्पदामां शोनाने पामे नही, किंतु मूख्य विना ना कहे वाय. केमके, हुधा अने तृपा ए वन्ने दोपमा त्यारे गणी शकाय. के ज्यारे कोई स्वानाविकथात्माना गुणने दूपण लागतुं होय; तेम तो कार्ड यतुं नथी, केम के, ए नाव वेदनीयकर्मना करेला वे; ते केवलज्ञानने दूपित करी न शके के मके, केवलज्ञानने दूपण करनार ज्ञानावरणीय कर्म ते. तेम केवलदर्शनने टू पित करनारुं दर्शनावरणीय कर्म : तेम सम्यक्तचारित्रने दूपित करी शके नहीं केमके, सम्यक्तचारित्रने दूपित करनारं मोहनीयकर्म वे. तेमज दानादिक पां च लब्धिने पण दृपित करी शके नही; केमके, लब्धियोने दूपित करनारूं अंतरा य कर्म वे. ए कारण माटे हुधा यने तृपा ए वे टोप कहेवाय नही यहिं को ईयागंका करो के जेम हुधा तथा तृपावमे उमस्यने र्या समिति श्रुताच्यासा 'दिकनो नंग दीनामां यावेठे; तेम केवलीने पण चारित्रज्ञानमा प्रतिबंधरुप शा रू. न थाय? एनो उत्तर या वेः यद्यपि कुधा तथा तृषा ए वे वहिरिश्यि त्तिनी ग्लानि करवाने लीधे एकश्यि ज्ञानाटिकना विरोधी थायठे. तथापि यती श्य ज्ञाननो घात करी शकतां नयी, को एवी यागंका करे के, जीवनो अ याबाध गुण ते. एटले निराकुलत्वरूप जे जीव, तेने दूपित करनारी हुधा तथा तृ पावे. केमके, ते याकुलता परिणामरूप वे. जे याकुलतानी दुधावमे निवृत्ति यायठे, तेहधानी परिणामक वे. ने दुधा तेनो परिणाम ठे; अने जे थाकुल तानी तृपावडे निवृत्ति थायठे, ते तृपानी परिणामक वे. ने तृपा तेनो परिणाम वे. तेने एम कहे के, केवलीनो सिमत्व गुण , तेने दूपित करनारुं मनुष्यपणुं पण दोपरूप केम न कहेवाय ? इत्यादिक विचार करी पोतानी कल्पना मूकीने घातिकर्मना करेला धमार दोप जेवी रीते पूर्वाचार्ये कह्याने, तेवी रीतेज मानवा

A
व्या० - कोई थाशका करे के, जेम केवलीने दायिक झानादिक ,
• उपलो थाराकानु उत्तर दियेवे के, केवलीने जो दायक सुर में
नयो थर्थात् मानवो जोशो जेम ज्ञानावरणीयकर्मना उदय वाचार
ता होतो सिद्धांतनेविपे केवलीने वेदनीयकर्मनो चदय कोते, ते मासाला
झान यतु नथी, तेम वेदनीयकर्मनो उदय मतां दायिक सुख्ख पण यतु
कोई शका करेके, केवलीने एवा वेदनीयकर्मनो उदय हायवे के, जना
थात्मप्रदेशनी साये मजेने, ते स्थिति प्रमाणे रहीने वीण घई जाय तु
'चलीने तेनी थाकुलता थती नथी एनु उत्तर एके, पद्यपि एवा प्रदेशाइर इन
ने पण मान्य ठे, तो केवलीने दायिक सुख सनवे नही तेम बतायपुर
थाश्रमारे कडेड, मेये के, केवलीने वेदनीयकर्मनो प्रदेशोदय वेन नही।
तु सिद्धांतोमा विपाको सात्ती पयडिपसहोदबएसेप ॥
३०४
अध्यात्ममतपरीदा.
जोइये, यत "थंतराया दानलान, वीर्यनोगोपनोगगा ॥हासारत्यरती
गुप्ता शोक एव च ॥ १ ॥ कामोमिथ्यात्वमझान, निा चाविरतिस्तथा
पश्च नो दोपा, केपामष्टादशाप्यमी ॥२॥" झानगुणनो घात करना
दर्शनगुणनो घात करनारी निशा, सम्यक्तगुणनो घात करनारुं मिय्यान
त्रगुणनो घात करनारां दास्य, रति, धरति, जय शोक, उगठा, पाम,
राग, तथा देष, थने दानादि सब्धिरूपवीर्यगुणना घात करनारा :
लानांतराय, लोगांतराय, उपनोगांतराय, तथा वीर्यातराय,
कर्मना कह्याते, परंतु केवलीने पातीकमानो कय यई जायने, माटे ते'
हेवायचे तेम उता हुधा थने तृपाने थडारदोपोमा जे गणेने ते.
चार नकरतां केवल स्वमतनु पोपण करेठे, ॥ ७२ ॥ ७३ ॥
अब जइ जिणस्स खश्य सुरक जुक विरुभए तेण ।।
तो सामणानावे विसेसजुत्ता कई सत्ता ॥ ४ ॥
यिक सुख पण ते, तिहां 5 खनो लेश पण नथी, तो ठुधा नृपा
तो वेयणिजकम्म नदयपत्त कद हवे तस्स ॥ णय
सोपदेसन्द समयम्मि विवाग नणणाd ॥ ५ ॥
व्या
जोन्य कोठे ॥ ५॥
केमनाने
ब
न
मा
आवस्सयशि
जा ता सुदाया
1
॥1 असुदपडिवरकवयणेण ॥ ६ ॥

अध्यात्ममतपरीदा. ३०५ व्या:- थावश्यक नियुक्तिनेविपे प्रतिनो प्रशस्त उदय कह्यो , तथा दिगं ना प्रवचनसारनामक ग्रंथमां पए " पुस्मफला अरिहंता " इत्यादिक वचनो गांठे, एवी रीते असुखना प्रतिपक्ष वचनथी केवलीने सुखनो विपाक .॥७॥ अ० कोई यागंका करे के, जे कारण माटे सुखविपाक छे, तेथील सुखवि 6 नथी ? तेनुं समाधान करेठे. ॥ ७६ ॥ तत्तसुत्तनणिआ एकारसदा परीसदा य जिणे ॥तेद वि बुदतहाइ खअस्स सुदस्स पडिकूलं ॥ ७ ॥ व्या:- अमारा श्रीनगवतीसूत्रनेविपे केवलीने थग्यार परीसह कह्यावे. श्या " एकविहवंधगस्तणं नंते सजोगि नवल केवलिस्त का परीसहा परम ? गोयमा, एकारस परीसहा परमत्ता, एव पुणवेण तित्ते" तथा वेढुने “ए दश जिने " एवीरीते श्रीतत्वार्थसूत्रमा अग्यार परीसह कह्याने; एणेकरी के ने हुधा तथापा प्राप्त थर्शवतां दायिक सुखनी हानि थती नथी एवं उरे। ही उक्त “ एकादशजिने " ए सूत्रनो थर्थ केटलाएक पोतार्नु मत पोपण कर ना हेतुथी एवं करेठे के "एकेनाधिकानदश" एटले एकअधिक दश न थाय पात् थग्यार परीसह नही. ए अपव्याख्यान जाणवू, केमके, एवो समास सं नही. वली केटलाएक सर्वार्थसिक्षिप्रमुख "नसंक्ति" एवं बाहेरथी वाक्य येते. तेतो जाणे पोतार्नु उत्सूत्रनापज प्रगट करतो दोयनी ! परंतु तेथोए वो विचार करवो जोये के, परीसहनास्वामी चिंतानाथधिकारनेविपे प्रति उतां थनाव केम थशे ! जे धनरहित होय ते धननो स्वामी कहेवाय नही. वली प्लाएक धावीरीते व्याख्यान करने के, केवलीने वेदनीयकर्म होवाथी कारण योपचारेकरीने श्रग्यार परीसह कह्या ए व्याख्यान पण नदीमां वूडतां धास थाश्रय सेवाजेयूँ , केमके, स्वामित्वचिंताए उपचार संनवे नहीं, जो उप र मानिये तो उता मोहनीयकर्मना होवाथी उपशांत मोहयुणस्थानकनेविपे पु वावीस परीसह कह्या जोजो, ए प्रकारे करी सूत्रनां घणां थपव्याख्यानो त्याग करीने परमार्थनो विचार करवो जोये ॥ ७ ॥ अस्साय वेयणिडं वुदतहाईण कारणं जाण ॥ पड़ तिसतित्तज्दय जलिअंतरजलादित्ताणं ॥ ७ ॥ व्या-थाहार पर्याप्तिनामकर्म तथा थसाता वेदनीयकर्म ए बनेना उदय ध्या० - पने ते सर्व पाम्याने ती तामा फहेवायचे ते चार प्रकार श्रीगोगा थीयागरसझा उत्पन्न थापते. अर्थात् ए चार कारण मयाथी भोहनीप ा याने थाहारसा उत्पन्न यायने, थतण्य गोमठ सारटीशप्रमुयन ३०६ अध्यात्ममतपरीक्षा. थी प्रज्वलित अण्लो जे जठरानि, तेणे करीने जीपने क्षुधा तया तृपा लागेनेत वर्धा कारण केरलीनेविपे वतां वे तेने कृपा तथा तृषा केम न लागे? तेकहो ॥१७॥ या वादी धाशका करे- नणु युद तहा तहा मोहुदन पत्तियारिरंसध ॥ नगड अणा तहा अपहुक तयकृति ॥ ७ ॥ रुपा तथा पाए मैथुननी छानी पो तृानारूप होवायी ते मोड नीयकर्मयकी उत्पन्न थायवे. माटे केवलीने रिपे ए सना नही केमके, केव तो मोहनीयफर्मनो प्रथमज नाश कग्यो एनो उत्तर थाचीरीते वे - तर थने इसमा घणी निन्नता , तृमानेज दुख कहेवाय नही परतु ससारी तृमायकी उम्पनी उत्पत्ति थायठे ॥ ॥ या ताना उत्पन्न थानो प्रकार कहेंगे- मोहानिणिसेण चदि वि तुमको ध्याइ देहि ॥ पगरिस पत्तातहा जायज्ञ आहारसणति ॥ ७ ॥ प्या- मोदनीय कर्म अनिनिश चार कारणथी श्राहारसंझा उत्पन घाले, यत "यदि गणेशथाहारसणा समुप्पकार, ग्मकोड्याए, बुहारह साम्गण कम्मरस बदएण, मती, तदोवण, नो अर्थ - चार कारपोर थाहारसहा उत्पन्न थायने कोगेसाती ययाश्री, धावेदनीयकर्मना उप थाझागविग्नी कयानु प्राण करायी. तया वारपार थाहारनो उपयोग का - M होगायी यति . ॥ एज पेपण यानरमझायादारानि नापरप कहीजे. पिना गनपानादिफनेपिपे प्रनिके प्रमाणाऽम्मि पबित्ती ता दुन पिपिताणो व्या० ए देनुपीन यतिने पण मके, रिपालना यतिने मची: दि अध्यात्ममतपरीदा. ३०७ चारमा बे. माटे जे एम कहेवे के श्रादारसंज्ञाविना यतीए बाहार करवो नही तेने श्राचारमां पण अतिचार करा . ॥ ७९ ॥ एयं विणा गनुत्ती मेहुणसणं विणा जद् अबंनं ॥ य वयणं पिपरेसि एएण पराकयं अं ॥ ७ ॥ व्याजेम मैथुनसंझाविना अब्रह्मचर्य न थाय, तेम पाहारसंझाविना केय लीने नुक्ति थाय नही. एचा परवादीना वचन, थावीरीते निगकरण कयं वे.- जेम यतिए श्रादारसंझाविना थाहार करवो उचित वे, तेम केवलीनेविणे पण मानी सेतुं जोईये. ॥ ७ ॥ पद सादु चिय पवित्ती वय सुपसवमाणदेवत्ति ॥ आ दारोच्च अवनं अमद तुद दो णिहोसं ॥ ३ ॥ व्या० श्राहार थवर्जनीय होवाथी उचित , तथा उमस्थ यतीने प्रशस्त ध्याननु कारण . माटे थाहारसंझाविना केवलीने याहार सेवो संनये वे. याने मधुन वर्जनीय होवाथी अनुचित ठे; तथा यांननु कारण . माटे मधुना दिक अनुचितप्रवृत्ति प्रशस्त राग पविना केवलीने थाय नही. एवा अर्थनी विचार करीने तेनुं ग्रहण करवू जोये.॥७३॥ आदारचिंतणुप्तव मेयं आदारसग्मासक ॥ यु अनाणं हा लोनेण मूढाणं ॥ ४ ॥ व्यायाहारना चितनथकी जे याहारमंझा उत्पन्न यायचे, तेनविप मोहित पपला मूढजीवने जो ते थाहापाटवस्तुनी प्राति न याय तो ते बम्न क्यारे प्राप्त यो एवा चित्तनरूप धानध्यान करेने. परंतु ते धनिलाश मटती नयी.१४ तनो माणसग्कं लदः जिन कंदणाऽ कुर्वना ।। लहुं विविसयं र चिंते अवियोगं ॥ ५॥ व्या त्यार पनी प्रातः शानिए जो नंने थाहागटिक इटवानुनी प्राति न पाय तो ते जीर हुदनीपना वदयची प्रचलित भएना नगनजना मांग का गेर व पामेने. यने पती कंटन रोदनादिका बारा वर्गनिमांदनीयरमना उदयने लोगाट चिनोपनापरप मानमर पामने. रदार पुरनिना परिपा इटरननी प्रानि पाप तो पर निनोदनीपरमना ढपी ने बन , ॥ पार." शिवमंगमे तेनु समाधान थामने- जो तमारा क्या प्रमाणे हार नायगानागनीयनी पवे केवतीने बीजी प्रतियो पण मोहनीय गरी का पोताना कापनी करनारीदोगी जोये थने तमे वेदनीयफमनीसाये घातीरर्मनी गुमना गर्ने गेनो पातीयाना रसना जेवो तेनो रा होप एम सरल गरेमाप करवानेरिय पातीयानी थपेक्षापाणु कपाना घर याममानि पातीना जेपी होवी जाये केमो, न्यायाध पानी मानिनी माये ये त्यारे ते सर घातिनीघातिना I नप गारगपानिनीनां रिपाक देवाडे, यने पनी वेश्य न्यारा नरवानर दिपार पाडेने; माटे पक्ष मनाती नयी जा रेम कादरे बानीयानी थपेक्षा होती जोपेने, ता नामार्म , दरी यथा कानु नना जम कपनीने मारिना या अध्यात्ममतपरीक्षा. ना थपियोगनी या कखाकरे, तेणे करी ते वस्तु उपर गाढानुरागेकरी ध्यानना बा थयो थको जीव उ खज पामे ने, माटे मोहमूढ जे जीत के परमार्ययकी क्दी पण सुख नथी ॥५॥ तो मोदणिजखयो तप्रवउरकावंधि विलएए । स सुदं सबह चएणो पुण ह च ॥ ७६ प्या० - मोहनीयकर्मना यथी जीवने आहार करवानी रति तथा भगत न पापने, ने मोहनीयकर्मना उदयची जीवने मानस इस उत्पन्न पार माजीने मटी जापने पण सातादनीयफमना अवययी केपी या हग लागे, तेनो ते त्याग करी शके नहीं ॥ ६ ॥ पात्र वैयणी इय जामोद विणा ए उसयर ॥ पपई पडिरुवा ता अशा विपयडी ॥ ७ ॥ प्पा-गदी कोवे के, येदनीयकर्म घाती कर्मना जेयुने, माटे मोहनीय riशा पापफ याय नही नक्तच " पादीग्वेदणीयं, + मोहामा सम । देनदेन में माइनीयपनी अपेक्षारिना - मनदे नहीं जो इंगों के बदनीयरमयी दार नागठ पार कर अध्यात्ममतपरीदा. ३०ए . पण मनाय नही, केमके, क्षुधा अने तृपानेविपे दोषपणानुं पूर्वेज खंडन करघु वे; एवीरीते स्वबुधिएकरी सारी पत्रे विचार करीने जुवो. ॥ ७ ॥ अणुकूलं पडिकूलं च वेयणं लकणं सुदाणं ॥ ॥ दु एसौ एगंतो अपमत्तजईस तयनावा ॥ ७ ॥ व्या: श्रीदयिक सुख उतां अनुकूलत्व वेदन थायठे, ते रागरूप से घने श्री दयिक ख उतां प्रतिकूलत्व वेदन यायचे, ते परूप : माटे केवलीने यो दायिक मुख तथा सुख ए वन्ने होता नथी; किंतु दायिक सुखज होय. एम केटलाएक कहे, ते योग्य नथी. केम के, जेम अप्रमत्तयतीने यादयिक सुख तथा उःख ए बन्ने होय. पण राग तथा प ए वे होता नथी; तेम केवलीने विपे पण जाणी से. एमां एकांतपणुं न मान. ॥ ७ ॥ अधुवाण सुदाणं नोगो नोगेण कम्मबंधो य ॥ णदु एसो एगंतो अपमत्तजईसु तयनावा ॥ जए । व्याः सुख तथा दुख ए वन्ने पदार्थ शाश्वत नथी, किंतु यशाश्वत वे. ते थोनो एवो नियम ले के, अवश्य नोगने दियेते. काने के, “नालुक्तं दीयते कर्म" इत्यादि. थने नोगथकी कर्मबंध यायवे. ए कारण माटे केवलीनेविषे ते संनवे नही. केमके, सुख तथा कुख ए बन्ने पदार्थों अभुव . एम केटलाएक कहेते, ते पण योग्य नथी. कैमके, सुख तथा मुःख यध्रुव तां अप्रमत्नयती ने होयठे ; तो पण तेनाथी कर्मबंध यतो नथी; तेम केवलीविपे पण जाणवू जोश्ये. यहीं पण एकांत नथी. ॥ ॥ अन्नाजं तु उरकं नाणावरणरकरण खयमे ॥ तत्तो सुदमकलंकिय केवलनाणा पुदयूयं ॥ ए ॥ ज्यारे हरेक पदार्यनो सूक्ष्म अर्थ जाम्यामां थावतो नथी, त्यारे जी वने महाउस उत्पन्न थायठे. केमके, यथार्थवस्तु जाणवानी इशा प्रमाणे जास्यामां न थावे तो तेथी जीवने थाकूलता थायवे. तेज उ.ख जाणवू. ए उस वस्तुनो सूक्ष्म अर्थ न जाण्यायकी थायवे, माटे यज्ञानरूपज वे. थ झान झानावरणीयकर्मना क्यथी नाश थाय ठे, ते सुःखनोज नाश जाणवो. केवलीने झानावरणीयकर्मनो क्ष्य थई जवाथी उखरूप थज्ञाननो लेश पण व्या:- . १ १ . " - 1 ने ते यद्यपि व्यवहार दृष्टिए तो मुख कहेवायचे, तथापि परमार्थताए उस ने उक्तच “पप्या पिसए, फासेहि समास देस हावेण परिणममाणावर । सयमेर सह एयरदिरेहोत्ति" इति प्रवचनसारे ए कारण माटे देहगत ससा पिरले तेमज खपण ऍश्यिक वे एवा ऐंख्यिक विपयोना पचीमा पजे. माटे देहगत सुख तथा 5 व केरलीनेविप नथी तेथीज केचनी थीं। पथपा ने उनच "सोफिया पुणऽस्क, केवलनाणिस्स नशि देवगय, जम्हाध निदिधन, जार तम्हाउनण्यति" इति प्रवचनसारे एनु समाधानकाल मासुर तथा उप शियाधीन नथी केम के, इशियोनी पराधीनताथी नै यत्र न तया मोहयसी मुप तया उप उत्पन्न थायवे, तेयोनेज इश्यिानीथाहा पातु यममनयतीने जे मानम सुग्व यायने, तथा सातादिकामना नदया। पादिर दोर उत्पन्न यापने, तेमा इश्यिोनी अपेक्षानो नियम नथी, जाल मानिये ने दियायीनन सर तथा समानीये तो रतिमाहनीयर्मयादात १३१० अध्यात्ममतपरीक्षा रह्यो नथी थने केवल ज्ञाननो उदय थयो ते सर्व सुखरूप वे ते सुम्ब' लझानयकी पृथकजूत नथी केमके, केवल ज्ञान जे ते ते वनावना तिघातरहित होवाथी बनाकूलतारूप ले, त्या थाकुलता वेज नही, कुलता नथी त्यारे तजन्य जे 5 ख ते क्याथी होय। थने उख नथी । सुखजवे एवी रीते "जं केवलित्तिनाण, त सोरक परण सचसोचेव ॥ जणीदो, जम्दाघादीखय जाटा ए प्रवचनसारना वचन थसनति वे थाटलो विशेप -- केवल ज्ञान क्षायिकसुखप्रक्रिया सनी नही, केम क सुख तो वेदनीयकर्मनाक्ष्यथकीज उत्पन्न थायठे ॥ ५ ॥ पय सुरक उरक वा देहगय इदिनप्रवं सब ॥ अ नाण मोह कले पमाणसिन सकोए ॥ ए ॥ व्या० दिगवर एम कहे -के शरीरगत सुख दुख सर्वश्यियको थाय ने केम के, उद्मस्थने-जे सुख तथा ख उत्पन्न थायडे ते एवी तिन यने प्रथम परोक्शानना कारणया योनी उपर मंत्री प्रवर्ने ने, ५५ मंत्री थकी पियोनेविपे तृमा उत्पन्न यायले जेम अमिथी तापेजो सोहना गान होपत्रे , तेम विपयोनी तृमाएकरी इडियो तप्त दोयने ते महाव्या दे थने तृमा टालगने यर्थ विपयनु सेवन थायवे, ते व्याधीना .

अध्यात्ममतपरीक्षा ३११ हिनीचकर्मनुं नामांतरज वेदनीयकर्मना उदयी असाता वेदनीय कर्म चाय ठे म तर. त्यारे वेदनीयकर्म जुड़ कहेवागे नही. जो वेदनीयकर्म मोहनीयसाये नीये तो सातज कर्म ठरशे.यात कर्मनो संचव यशे नही एम करतां सर्व जैन रुतिनो उवेद यज्ञो. वली देहगत सुख जो केवलीने न मानीये तो तीर्थकरनाम मनो विपाक केम संनवे ! जो एम कहिये के तीर्थकरनामकर्म जीव विपाकी ठे, आटे तेथी जीवगत सुखतो ऊपजेते. परंतु देहगत हुयादिक व संनवे नही. जेम सुखने पण देहनीअपेक्षा ठे, तेम रखने पण देहनी अपेक्षा वे, माटे देहग ज मानवा योग्यते, इत्यादिक सून्य विचार करी मध्यस्यबुधिये न्याय करो. ॥१॥ एत्तोचि बदु अख, रकएण तेसि बुदाऽवेयणियं ॥ पिंवरस लवुद पए अप्पंति नणंति समय विक ॥ए॥ व्या केवलीने अज्ञानादि जयन्य पणां दु.ख मटीगयां ने, मात्र एक दुधावे नीय रा तेते पण घातीकर्मनी लाथे मलेला जेवो पोतानो विपाक देखाडे ते कम के, केवलीने पुण्यप्रतिनो विपाफ प्रवल . यतः "अस्सायमाश्यायो, जाविध यहा हवनि पयडी; किंचुरस शिंबुचपषु ण हुँति ता अनुह यात ल." ए यावश्यकगायामां तीर्थकरने अत्लाता प्रकृति खदायिनी यती नथी. जम दृधना घडामां निंबना रननो वि नारख्याथी कटुता याय नही, एम श्रीन बाद स्वामीए का ठे, जेमतेने प्रवल पुग्यपगनव करेने. परतु तेथी कृयाटिक ऊप जे नही एम न जाणवू, एवो नाव जणायवे. पठी विशेषार्थ तो बदुःश्रुत जाणे.ए| गय तं कवलाजोग्गं वेयणियं अगणिमंदयानावा ॥ गय दरजुकणं वेअणि हंदि मुअमिदं ॥ ए ॥ व्या:- केवलीनुं वेटनीयकर्म कवनाहार योग्य थाय नही एम न कहें. केमके. वतीने अग्निमंडपाणु नयी थाहारपर्यातनाममनो उदय थने ये दनीयकर्मनो उदय होवाने लीध उदगति प्रज्वलित थायने. एवनं कारणो दो वाथी केवजीने वेदनीय कर्म कवजाहारयोग्य थाप.. जो कोई को के. चंदनी य कर्म दोल्टीना जेवं ते, तेथी केवजीने व्यावाय करीगर नदी तेने धावो ज वाव देयो के. ए वचन प्रयोपन के, नाम्यनु नथी. कमर, श्रीनुपगटांगनी टीकामां थाम करें के, “यदपि ग्यन्यानवमुच्यते पेदनीपन्य नदभ्यना क N पाव . है ए थावश्यकवहात्तिनुं वचन । कंचनीने यम दोरडीना जेा कह्याने "थतएव नवोपयाहित्वात्पग्राहित्यशि | वाघाने एव थमने प्रतिनासेने बजी विशेष गीतार्थनेचिपे जेम पूर्वापारिगए। | पाप, तेम रिचारयु केटला एक प्रमेयकमलमानना थनिमायने धनुनी यावीरीत कहने के, थपूर्पकरणगुणताणाए पापनातिना रस को, शनी तयारिय सातोदय थाय नही मोहसापेक्ष्माति पाय तनो मार ना पातपीचरय पात पायने यन्यथा परावातनामकर्मना उदयीमा पादननादिर केम न करे । ए बोजा पण रामदन जाणवु, केमो, जमा पात पापो, नेम चिनिनो पण घात थायवे माटे जो रस थाना यतो हारता रिपनि योनी थी जोय जैम वधमानरूर्मनी स्थिति घटी जापत्रे तंत्र। २पमान मनोरम पण पटी जायने, एज समाधान तथा परागतनानन नुनकरनीने चापजके, थने परदनन तो मोहपिना याय नही करत' म देने के वेदनीय कर्म केवनीनेपिप दतवीर्य में, माटे तेनरियादिया मारा बटनाएर करेले,करनीनधि वदीग्णाधिना प्रचुर पुन , महापासर एनजेपनीनेत्रिपको तेणे श्वेतांबरनी प्रक्रिया जाणीन! 1. कमर,वीन तो सातादेदनीपोदय पए मर होवा जोप, it अध्यात्ममतपरीदा. गमिकमयुक्तिसंगत वागमे त्यतोदय सातन्य केवलिन्यनिधीयते तिकर्मक्ष्यादानादयस्तस्या अनूवन् वेदनीयोनचाया दुध वति न तपोधायातपयोरिव सहानवस्थानलक्षणो विरोधो रिव परस्परपरिहारेण लक्षणकचिदिरोधोस्तीति साताili वर्नमानतया यथा सातोदय एवमतातोदयोपीति थनतवीर्यव सत्यपि लापचय वेदनीयोन्या पीडा च नवत्येव नचादारग्रहणे किवितदीप यज्ञ महोपुरुपिकामात्रमेवेति पचाशीतिर्जर समाया होगतयोगिनि एतु जे गुणस्थानककमारोहमा काठे, ते तो थोडी स्थितिनी थोर यु, पण रसनी थपेक्षाए न जाणवु केमके, सत्तानी प्रति तो कही, पण उदयनी प्राति एवी कही नथी उलटो तीर्थकरनामप्रमुग्यो पज उदयज कह्योचे एम जाणीने 'थतएव दग्धरकल्पेन मिता केयजिनोपि न मुक्तिमासादयेयु " जोने पण व्यामोह करयो नहीं तेटना माटेज हां पण स्थितिनो नदीम अमातादेनीयोदय यजी दोरडीना जेवोज ने -- एबोनई अध्यात्ममतपरीदा. ३२३ मतनो विचार करतां वास्तविक अर्थ सहल देखाई श्रावो. माटे सूक्ष्म दृष्टिवडे ते थर्थन शोधन करो. ॥ ए३ ।। णय केवलनाणाई वुदाईपडिबंधगं जिणंदस्स ॥ दासिव मंताई ऽय जुत्तं तंतनुत्तीए ॥ ए४ ॥ व्या:-जेम जेम गहना प्रतिबंधक मंत्रादिक वे, तेम धादिकनुं प्रतिबंधक के वलज्ञान के. ए वचन पण शास्त्रानुसार नथी केमके, जेम हायनेविपे मंत्रलो अग्नि राख्यो उतां हाथ वलतो नथी एवं प्रत्यद दीवामां आवेठे, तेथील मंत्रादि के जे वे ते दाहना प्रतिबंधक ठे, एवी कल्पना करायचे, तेम जो केवलीनेविष वे टनीयाटिक कमोदयरूप कारण उतां दुधादिक उन्नय उत्पन्न थतां नयी एम जो सम्मतशास्त्रमा कां होय तो एवी कल्पना थर्ड शके; तेविना वोलवू व्यर्थ ; माटे शास्त्रनी युक्तिए जिमपूर्वे कयु के तेम पादरवू योग्य वे. ॥ ए४ ॥ खिल वलं बुढ़ाए णय तं जुञ्ज अणंतविरिआणं ॥ ज्य नत्तुं पिण सुतुं बलविरियाणं जन ने ॥ एए । केवलीने लो नूख लागती होय तो वलनी हाणी थाय. ते तो तेने विपे संनवे नही केमके, वीर्यातरायकर्मना क्यने लीधे केवलीयनंतवीयवंत वे. ए वचन पण अयोग्य . केमके, बस अने वीर्यमा जेदवे. शरीरनो जे पराक म ते वल कहेवायने, यने अंतरग जे शक्तिविशेष ते वीर्य कहेवायचे. तेम उतां दुधाएकरी शरीरनुं वन घटेने, एविपे अमे ना कहेता नयी ए योगप्रत्यय : योग जे ते ते गरीरनामकर्मपरिणतिविशेषरुप . अने नामकर्म तो नगवंतनेविपे वीण थयुं नथी. ।। ए॥ अ० पूर्वपदी आशंका करेजेः- वंधो परपरिणामा सो पुण नाणा ण वीयमोदाणं ॥ जो गकया पिदु किरिया तो तेसि दो णिवीआ ॥ ए६ ॥ व्या:-ग्रहण तथा मोचनादिक परपरिणामथी जीवने कर्मबंध थायले. ते परिणाम बीतरागने ज्ञानना प्रतापे थाय नही. उक्तंच “ गेहदि व ण मुंबदि, ए परं परिणमदि केवली नगवं; पेठदि समंतदोसो, जाणदि सत्वं निरवसेसं" 5 ति प्रवचनसारे. केवलीने तो योगनी क्रिया पण नथी, त्यारे नौजननी गी कथा थर्थात् केवलीनेविपे नोजन पण नवे नही जो नोजन क्रिया केवलीनेविषेमा व्या.- - . - 1 तुल्ल फिरिवेचित्त तद तुन. मबुद्धिपुवत ॥ एy ॥. बनिसक थाय एम तो का दीठामा थापतु नया प्रयत्न सार्थकजर -करीनेपिपे स्याननिपद्यादिक्रिया जो स्वनावेज थती होय तो मरे, प्रपत्रग्निा चेष्टा यतीज नथी माटे केवलीनेविपे प्रयत्ननो सना मात्र सानारिकतानोज ठपयोग करयो नही जो कहेगो के, केपनीनतिर अन्य मेटा नची किंतु तेया रिजण ले यर्थात् केयजीनी चेष्टा अपनी परे तो उसनेटा रिजण ने, तेमज प्रयत्न पण शासारू पिनक्षण न चटा मोह पिना थायने, तेम पितरण प्रपन्न पण ३१४ अध्यात्ममतपरीदा. | निये तो तेथी योगकिया सिम थशे ते तो केवलीने विपे सनवे नही स्थाननिषद्या, विहार, तथा धर्मोपदेशादिकक्रिया पण केवलीने यती त्यारे नोजन क्रिया ते केम थाय। जो कहेशो के, स्थाननिपया, विहार, धर्मोपदेशादिककिया केवलीने प्रत्यक्ष विद्यमान बता ना केम कहेवाय क्रिया यद्यपि , तथापि प्रयत्नपूर्वक नथी केमके, प्रयत्न रागदेष थी तेतो केवलीनेपिपे नथी, माटे ए क्रिया खनावसिम जेम यादला समयविशेपे स्वनावेज संचार करने, रहेजे, गर्जना करे, तथा वर्षा तेम केवलीने पण स्थाननिपद्या, विहार तथा धर्मोपदेशादिक सनावेन उकय “वाणिसेज पिहारो, धम्मुवदेसो थणियदिशा तेसि से, मायाचारोबाण" इति प्रवचनसारे अतएव केवलीने जे पाने, तेनेपिपे मोह नहीं होवाने लीधे परव्य परिणामना घिरहथी जाणी. पत विरहिया, तम्हा साखाइ गतिमदत्ति" पुणफला थरिहता, तेसि किरिया पुणोहि यादयिगी, ॥ ए६॥ या ए पूर्वपक्षीनी थागकानु उत्तर थापेले - जोग पिणावि किरिया वका कद ण तस्सोवि ॥ बदेशों के, केलीना मान पूर्वक नयी. तात ? एम शामा न मानो एवारीते सावराणे सा ५ जत्ता जेणि तेसि वयजोगो ॥ कम्मरखवणाय ॥एG ॥ ।

अध्यात्ममतपरीदा. ३२५ व्या:-पूर्व कहेला हेतुए करीज दिगंबरो कहे। के, केवलीने राग नथी होतो तेथी तेनेविपे वचनव्यापार संनवे नही. तेम उतां जे वचनव्यापार थायवे ते बनावेंज मस्तकमांधी ध्वनि नीकले के एम जाणवो, पण अदररूप वाणी निवे नही. ए शंका पण अयुक्त वे. केमके, केवलीने केवलस्थनी पूर्वे जेवीरीते वचन पोग हतो, तेमज केवलझान थया पती पण जाणवो. अने केवतीने रागविना रण क्रियानु सामर्थ्य उतां अदररूप वाणी केम न संनवे ? कोई धाशंका करेके, केवली कतरुत्य ने. त्यारे ते उपदेश शासारू करे ? तेनु समाधान ए के तीर्थक रनामकर्मनो विपाक एवीरीतेज नौगवायवे. तेथीज केवली उपदेश करते. ए केवलीनो स्वनावज वे. जो कहेशो के, केवली पदेकरी एकांते कृतकृत्य ? तो तेम पण न समजवं. यतः गतेण कयठो ; जेणे दिन्नं जिणंदणामसे, तदवंज फन लम्स य खवणो वाउ धमवेज ; इति विडोपावश्यके. जो कहेशो के, परोप कार निना उपदेश देवो तनवे नही, अने श्वा तेज राग कहेवायवे. अने रागत निपे संनवे नही. एवो व्यामोह पण न करवो. केमके एव। वा प्रय तेने राग न समजबु. ॥ ए॥ माधान रां खेअस्सोदीरणं जिणंदस्स ॥ ऽद देऊ णय वा अस्पयमीणं ॥ एए । गेलवाना प्रयत्नेकरी जीवने खेद थयानी उ दीरपा के, मनुष्यना श्राउखामां साताअसाता वे दनीयका होय; प्रमादविना वीजा कारणो उतां नदी ....०५ थने वीजा कारणोथी वदीरणा थाय एम कार५; ता काययोगनेविपे सातावेदनीयनी उदीरणा, पण तेने केम थाय ? केमके, उदीरणानुं तो आq लक्षण कझुंठे.- जे स्थितिना दलिक, उदयावलिका थी बाहेर वर्नेठे, तेने कवायसहित योगनामना वीर्येकरी थाकर्पण करीने ते उदयावलिकाने विष ने प्रदेपन करवू, ते उटीरणा कहेवायवे. ।। एए । पय तं विरिअविरदियं जायऽ अपवत्तणच करणंति ॥ केवलसदावपरकं सुगयस्स मवमणुमयं जाण ॥ २० ॥ व्या- जो कहेगो के ते उटीरणा वीर्यविना थायठे, तो ते संनवे नही. के मके, उदीरणा जेठे ते थपवर्जनानी परीकरण विशेपने. एटले स्थानांतर करावया तेरुप व्या वे नापनों मारन पता नयी पण ते गुणवाणे बांचा मारा ३१६ सान ते गप थापळे ते रागदेष तो केवलीने रिपे नयी थरार यादातीपजीना योगने प्रणिधान थाय नही कमर, म मन प्राण घडेता जे कोडिन्नादिमहर्षि, तेथोने थाहार करतो पण नयी नयी थना किरियाहार करता तेयाने यात्मनीनताना मादल माद पोनी स्नुि यसमादररहेते मातमा गुणगाणानेषिनगम यान पनी नयी पण याना व्यापारनी निष्टा हापने जम - अध्यात्ममतपरीदा. नुं कारण ठे, थने कारण जेठे ते प्रयत्नरूप ने, एम नमानतां जो केवन वाद मानिये तो वोक्नु मत अनुमत याय, माटे प्रयत्न पण थगीकार खेल पारिज केवलजोगेदि तो विषु पमाय ॥ ननु दयदेवपनवो दीस पुण सो वि तत्तुल्लो ॥ १० ॥ व्या0- केवली योग प्रमादविना खेद उदीरतो नथी, परतु उदयना हां वदीरणासरखा दीठामा थावे, तेथी खेद जेथे ते उदीरितना पण परमार्थताए ते उदीरणा कहेवाय नहीं ॥ ११ ॥ नुत्ती सुदपत्ती त पुण जोगाउदीरिय दुजा ॥ एसा परजुत्तिलया एएण पकपिआ आ ॥ १० ॥ प्या० - मुक्ति कहेता जे कवलादार तेणेकरी केवलीने जे सुख उत्पा पने , ते योगयी उदीप्यु, थने केवलाने तो योगनी उदारणा सनवे नही तेने वेदनापनी उदारणा हातानीमा कालान कयलाहार संनये ना यी जे परपुनिरूप येळी ते थापीत पाई गले के प्रमादविना धारण पज नती एम निथपे जाणवु ॥ १० ॥ णय पणिहाण पिटु, केवलजोगाण दोऽ नुत्तीए ॥ त रागद्दोसफय, ते पण तेसि विलीपत्ति ॥ १०३ ॥ ऽप मनमाड फासग, कोडिनाईणकवलनोईए । वय उपणिहाण, सुप्पणिढाणस्स माढप्पा ॥ १०४ ॥ . व्या - ihr

अध्यात्ममतपरीक्षा.
३१७
ना अनिप्रायेज "इत्येतस्मिन् गुणस्यानानि संत्यावश्यानि पट्" एवं गुणस्थान
मारोहनेविपे कमु. ते संनवितवे. ॥ १०३ ॥ १४ ॥
देऊ पमत्तयाए आदारकत्व व आहारो ॥ दोङ
जइ पारो अमदती एव तेणावि ॥ १५ ॥
व्या-आहारनी कथा करतां साधु प्रमत्त थायठे. त्यारे थाहार करतां के
र प्रमत्त न थाय ? एवं प्रनावे कहे ते अयुक्त जाणवू. केमके, थाहारकथा
समानुं कारण नथी. तेम उतां जो वन्ने सरखा कहिये तो जेम बादारकथा
करतां अतिचार यायचे. तेमाहार करतांपण यतीने अतिचार थवो जोये॥१०॥
पिदाविण एण देव नुत्ती सहयारमेत्त ओत्तीए ॥जेण
सुए णिद्दिा पयडी सा दंसणावरणी ॥ १०६ ॥
व्या:- जो केवली थाहार करतो होय तो तेने निज्ञ होवी जोश्ये. एम
जे कहेठे ते पण अप्रमाण जाणवु. केमके, निशानुं कारण आहार नथी. था
हार तो मात्र निज्ञनो सहचारी वे. सिक्षांतोनेविपे निाने दर्शनावरणीयकर्म
नी प्रकृति कही. केमके, आहार करतां पण केवलीने दर्शनावरणीयकर्मनो
अनाव . माटे केवलीने निश होती नथी. ॥ १०६ ॥
णय तस्स थोवयाए जेण अणुमा त त उभे ॥
जिद्दव ऽध्या लिदाई पसंग तस्स ॥ २० ॥
व्या:- शास्त्रोमां कडं वे के योडो थाहार करवो, माटे थाहार उष्ट ने,
म कहेवू पण योग्य ; केमके, घणे थाहार कखाथी दर्शनावरणीयकर्म
ना विपाकनो उदय थायठे. एटला माटे घणो थाहार करवो डट कह्योठे. प
ए स्वनावे थाहार उट नथी. ॥ १७ ॥
आहारो । पमान नन्नइ अववाउनत्तिकाऊणं ॥
अववाया बोलीणा वीयनयाणं जिणाण जन ॥१॥
व्या७.- थाहार थपवादमार्गने प्रतिबंध करनारो होवाथी प्रमादरुप ठे, ए
म नकहे. केमके, वीतनय तीर्थकरने कोई थपवाद नथी. थपवाद तो जे उ
त्सर्गमार्ग करी शके नही, बने चारित्रना त्यागथी बीहे, तेने वे. जिनने तो ते
नहोय. ए केवल पोतानी कल्पना नथी, केमके, धर्मबिंडनेविपे निरपेक्ष्यतिध
मना थधिकारे अपवादत्यागसूत्र काठे, ए गीतार्थ यथा सूत्र विचारवो ॥१०॥

--
J
व्या.
१
.
-
थसमीचीन ने केमके, जेटनु पुगत व्य वे ते सर्व यात्माची बायक
- जो कहेगो के, थाहारेकरी केवलीना ध्यान तथा तपनो
| मिप्या ने. फेमके, ध्यान तो शलेशीये वे पण पूर्व उत्कर्पताची देशेडपी
(ो थयोग्य तो एवु जे तारी मतिमा नासे नेते
तापिय केलिपो कवलादारित्तण जुत्त ॥११॥
-यांदारिकारीग्नी स्थिति, तथा तेनी वृद्धिथाहारपिना पनी
परमांगलियंदो केलिण नणु टवेज मोढखए ।
किर पाप ते गिदिक सनयानुरादित परम परित्र हापर
यापूर्वी सोने के, मोहनीपर्मना श्ययी करीन पार
३१७
अध्यात्ममतपरीदा.
पत्त ममत्तहेक जुत्तं वोत्तुं पुणो ण देढुव ॥ इहाणी
ममनावो जिणाण कह पाणिपत्ताणं ॥ १७ ॥
थाहार करनारने पात्र राखवा जोश्ये, ते पात्रतो
एम कहेतु नही केमके, पात्र तो शरीरनी पत्रे धर्मसाधन ने जो एम न
ने ममत्वनु कारण मानिये तो तीर्थकरप्रमुख जे पाणिपात्री वे :
ममतपणु केम सनवेजोकदेशो के, बाह्य पात्र ममत्वनु कारण ,
टेय ते ममत्वनु कारण थाय? ॥ १० ॥
जाण तवोवधान आदारेणति ते मई मिया ॥
काण सेलेसीए तवो अणिविसस्स तेसिति ॥१०॥
याहार
रोटी सुगना ने विशेषकरी कवलीने कोई तप पण नयी
रिज करजीने जे यानर तप कने, ते पण शस्लेश्यावस्थानाय
एने थने सोमितना प्रभागाकार श्रीनगवतीमा "कि नते जना
ता. जमे तरणियम सयम सजायसनापासयमासु जोएस जपणा" एए
ने नेहा पण तपनु फन ने तेमाटे उपचारें तप का ॥ ११० ॥
गलियदेवम्म य ईि अबुट्टीय णो विणादार ॥
मोपनीने करनादा पुन ने ॥ १११॥
मदिगभ्याउदिन तेअमन अप्नपडलुवो
प्या.
पाप, माटे
॥ 110॥

अध्यात्ममतपरीक्षा. ३१ए ना पडसनी पते केवल तेजमय होयठे एवा शरीरने कवलाहारनीअपेक्षा नथी॥११२ यस उपती शाशंकानुं समाधान करे:- संघयणणामपगन केवलिदेहस्स धानरदियत्ते ॥ पोग्गलविवागिणी कद अतारिसे पोग्गले दोऊ ॥ ११३ ॥ - केवलीनुं गरीर जो सप्तधातुरहित कहिये तो तेने वजझपननाराच संघयण नामकर्म प्रतिनो उटय केम थाय. केमके, ते प्रति तो पुनल विपाकनी वे. ते अस्थि पुनने -विपेज विपाक देखा . जो दृढ संस्थानमात्र पुजलनेचिपे ते विपाकने देखाडती होय तो देवताने पण वजझपननाराच संघयण कहेवू जोये.११३ मोविलएण नाणं गामुदयाचेव तस्स पारम्मं ॥ तो वमाविसेसो तं होऊण धानरहियत्तं ॥ ११४ ॥ व्या:- मोहनीयकर्मना विलयथी केवलीने केवल ज्ञान उपजे वे. पण श सरनेविप काई विशेपपणुं यतुं नथी. शरीरनामकर्मना उदयीज शरीरनेविषे विशेषता यायले. माटे केवलीना शरीरनेविपे पुण्यप्रतिना माहात्म्यथी वर्णगति सारसत्वादिकनी विशेषता युक्तज ठे. परंतु थातुरहितपणुं थाय नही. अतए व शास्त्रोनेविषे कह्यु के, “संघयणरूव संहा, ण वन्नग सारसत्त ऊसासा; ए मा इपुत्तराई, हवति णामोदया तस्स.' एम वतां जे केवलीना शरीरनेविपे अ स्य्यादि पुजल पलटीने अन्यविपेज पुगत उत्पन्न थायठे. एवी कल्पना करवी ते दृष्टिविपरीत होवाथी अयोग्य ठे. केमके, पुण्यप्रकतिनो उदय थयाथी तथा विध लब्धिवडे शरीरवर्णादिकविशेप दृढ होय. एम जाण. ॥ ११४ ॥ ओरालिपत्तणेणं तद परमोरालिअंवि केवलियो । कवलाहारावेरकं वि च बुद्धिच पानगई ॥ ११५ ॥ व्या:- तीर्थकरनें शरीर जो परमौटारिक होय तो पण तेने कवलाहार सा पेरुज स्थिति तथा डिनो अनुनव थाय. केमके सामान्यपणे श्रीदारिकशरीर नेविपे एवो नियम ग्रह्यो के, थाहार विना शरीरनी स्थिति होयज नही.॥११५ गय मनाणपसत्ती, कवलाहारेण दोइ केवलियो । पुप्फाईअं विसयं, अम दयापाइ गिहिज्जा ।। १२६ ॥ व्याः-जो केवली थाहार करे तो तेना आस्वादयी रसनानुं मतिझान थाय ने निहार दाय नदी तो पनी ते कम मनो यन . पगरनीलानि पाप, एम कहे न जोश्ये केमके, ते तृतीयमारनेरी प्पा • पनी जो करनाहार करे तो धर्मोपदेशमा थतराय पडे, तेथी २ जा पहनों के, पनी याहार करेतो शूजादिक व्याधि उत्पन थानो मात्र निपतगमपेज याहार करेने तेथी वाकीनो सर्व कार उपदेशने या पाप, माकपना पए) व्यर्थ केमो, ते सारीरीते जापान लामरहिन हित मिताहारज करे ते माटे तेनेपि शनादिकना सना नरी यने पपीतनशिप रागनी पदपना पण थाय नही ॥११॥ मामय उय परमि विवित्तदेसेविहाणाय। जो कहेगों के, केरनी थाहार करे ता तेथी यदिनीन प्रमुर हर मन तनु ता प्रयमन सन्मनन कोतु ने थने तीर्थापना ए दनां याहार तथा निहारनी विपिन कोदपीके नही ईइन "दा मान याय नहीं बनी सामान्य पनी तिला मदीना कान्न गना उत्पन्न थाय नही प्रपत्रीकर ३२० अध्यात्ममतपदा. नही. जो एम मानिये तो समवरणनूमिकानेविपे गृणप्रमाण होवायी, तेना परिमलथी घाणेश्यिनु मतिज्ञान केम न थाय थाना तृनि थाय नहीं, एम पण न कहेवु केमके, रतिरूप तृप्ति थती न होष श्रमारे प0 ट ते परतु हुधानाशरूप तृप्ति तो आहारविना थायज नहीं, रिया वढिा किरिया, कवलादारेण जयण केवलियो। गमगाणा विनवे, सा कि तुद पाण पिहियति ॥ ११॥ प्या० जो कहेगो के, केवलीने कवलाहार करता इरिश्रावहिकी क्रिया तो गमनागमनादिक क्रियाए करी केवलीने इरिथावहिया क्रिया केमन माटे जेम केवजीने गमनादिक किया, मनोजन क्रिया पण जाणली. प्रपमज कम्यु.॥ ११ ॥ एप परुवयारदाणी तेण सया जोग्गसमयणियएण ॥ णप वादिसमुप्पत्ती दिअमिअाहारगढणा- ॥ २१॥ पुरीमा उत्रिय मेसि जिद मोहबीआण ॥ प्रदान कारण ने, म पण कह नही कमो, . . उगनानु मून अध्यात्ममतपरीदा. ३२१ तप्पियरो, हलधर चक्कीय वासुदेवाय ; मपुआण लोगनूमी, आहारो धिणी रो. " ए तो कोई अपूर्व मतठे. केमके, शास्त्रोनेविपे एवो कोई अतिशय क नथी; तेम एवी उदराग्नि पण नथी के जेथी निहारनो अनाव थाय. तेम 1 जो ए वातसाची मानिये तो नस्मकव्याधिनी पते ते दोपरूप थशे. खल कत थाहार मात्र जो लस्म थाय तो पूर्व केम न थाय ? माटे ते केवल पसचिमात्र ते ॥ ११ए ॥ जो पुण नुत्तिअनावो केवलिणो अइसत्ति जपेई ॥ सो वायामित्तेणं सादेऊ सुद खन पुष्पं ॥ २० ॥ व्या:- जो कहेशो के, केवलीने जे मुक्तिनो अनाव ले. ते अतिशय जाण एम कह्याथी तमे पोते पोताना वचने अतीवस्तुने बती करो तो त्या आकाशना पुष्प पण ते एम कहेशो तो कोण ना कहेनारो ! पण ए वच सप्रमाण न कहेवाय. ॥ १२०॥ एवं कवलाहारो जुत्ती समचिन जिणवराणं ॥ पुवायरिएहि जदा तदेव लेसेण वो ॥ २१ ॥ व्या:-- एम जे प्रकारे पूर्वाचार्य केवलीने विपे कवलाहारनी समर्थना करीवे प्रकारेज आ ठेकाणे अमे लेशमात्र कह्यु. ॥ ११ ॥ तेणं केवलनाणी कयकिच्चो चेव कवलनोईणं ।। नाणाईण गुणाणं पमिघायानावन सिहो ॥ २२॥ व्या:- माटे केवली कवलाहार करता उता पण कृतकृत्यज . केमके, ज्ञान शन चारित्र तथा वीर्यगुणनो स्वनावपरावृत्ति एटले पाउल हटवारुप प्रतिघात थी. झानादिक गुण संपूर्ण सिहज होय. माटे ते सर्वथा कतरुत्य तो सिज वे. म कहे जोश्ये. तथापि झानादिगुणचतुष्टयनी विशुपताने जीधे केवलाने देश तरुत्य कहेता पण काई विरोध यावे नही.॥ १२ ॥ नाणस्स विसुधीए अप्पा एगंत ण संसुशो ॥ जम्दा नाणं अप्पा अप्पा नाणं तमं वा ॥२३॥ व्या:-- जो कहेशो के, यात्मा ज्ञानरूप वे. तेथी छाननी एकांत शुक्ष्ताने सीधे थात्मा पण एकांत शुक्ष थाय ने. एम न कहेवु. केमके, ज्ञान ते श्रात्म ४२ ते वाह्यात्मा कहिये शरीरादिकनो यविष्ठायक जे चेतन ते थतरात्मा कहिये, त्मधिया समुपातकायादि कीर्त्यते अत्र वहिगत्मा कायादेशमविद्यायको नर । त्यतरात्मा तु चिद्रूपानदमयो नि पोपाधिवर्जित शुक्ष अप्रत्यदोनतगुण पर, मात्माकीर्तितत्तरिति योगशास्त्रे “केटलाएक एम कहेने के, जे मिथ्याचा दि परिणामरान होय ते बाह्यात्मा कहिये, जे सम्यक्तादि परिणामवान हार- च्यात्वादि त्रण गुणवाणा सुधी बाह्मात्मा कहेवायचे, थविरतिसम्यग्दृष्टिनाम ते थतरात्मा कहिये , थने जे केवल ज्ञाननिधान होय ते परमात्मा कहिरे ना चोया गुणगणाथी लईने दीपमोहनामना वारमा गुणगणासुदी धना= त्मा कहेवायचे. माटे मिथ्याटिने पण निश्चयथी सम्यग्दर्शन तथा केवन । नवे ते शक्तिएफरी अंतरात्मता तथा परमात्मताने पामेले केमके, शरित करी कायने केमके तेने मिच्यादर्शन पर्याय पूर्व थयाने जेम मयुयोर सम्यग्दृष्टयादिकने पण निश्रयथी केवल झान श्रने बाह्यात्मा ते जूतपूर्वन रेला घटमाथी मधु कहाडी लीरा पठी पण मधुघट कहेवायचे ते न्याय पए जाणवो व्यक्ते परमात्माते वाटारमा तथाथतरात्मा पूर्वनूतनयी कहबार । केमके,तेने मिप्यादर्शन तथा सम्यक्दष्टयादि ए बन्ने पर्याय पूर्व थयाने ॥ तस्स य सदावसिक्षा, किरिआ गुण करण जोग अहिगिद कम्मुगणी आचिढवे, जजपकरण त अदिगिच्च ।। 1301 ३२२ अध्यात्ममतपरीक्षा रूपज होयले केमके, थात्माविना झाननु रहेवु नयी थने अात्मा डे ते ज्ञानस्वरूप पण होयछे ने तदन्यस्वरूप पण दोयते, ए हेनुयी ज्ञानादिगुणने स्वनावकरी गुरु पण वे धने अव्याबाधादिगुणना सनावे । शुझ पण वे एम जाणवु ॥ १२३ ॥ एव परमप्पत्त नागाश्वारगं मुणेअव ॥ सबद परमप्पत्त सिधाण चव ससिझ॥१४॥ व्या - एवी रीते केवलीने परमात्मापणु ज्ञानादिकगुणेकरी देगयीन जाए बु, सर्वथा परमात्मा ते सिज कहेवाय माटे यात दोपना विरहयोआत गुन तेनेज प्रगट थायवे प्रात्मा त्रण कानो होयने एक वाह्यात्मा, बीनों व तरात्मा, थने त्रीजो परमात्मा, यात्मस्थिकी जे कायादिकनुं ग्रहण धायक ही अध्यात्ममतपरीता. . . व्या- ते केवलीने गुणकरण यात्री वनावति६ किया होपवे. तेने केव ली झानादि गुणपर्याय उपजतां श्रात्माथी अन्यकर्मादिकारणनी धपेक्षा नधी कालखनावादिके तेना कारणपणे सर्व प्रात्मांतरतूत ने. मनोवाझायरुप पुंज ना कारण यात्रीने कंवलीने कर्मोपनीतकिया पण चायने. माटेत धंगेकरी के वल स्वनावतिम कियान नथी. ॥ १२ ॥ अद सो सेलेसीए. काणानलदङ्सयलकम्ममलो ।। कणगंव सबद विय, लघसदावो ढ्वः सि ॥१६॥ व्या:-हवे केवली जे ने ते. गलेलीयवस्थाविप गुलथ्यानरूप थनिएक री नवकर्मरूपमलने दग्ध करीने अमिएकरी निर्मज धितां सुवर्णनी पढे त वथा सम्भवनाव थईने निक्षत्वपर्यायनो नजनार यायचे. ॥ १२ ॥ तम्स वर नाण दमण, वर सुद सम्मन चरण निव॥ि अवगाहणा अणंता, मुत्ताणं यई अविरियं च ॥ १२ ॥ व्या:- झानावरणीयाहिक घातकर्मथी जीवने यज्ञानाटिक दोष दोयने ते नाम पायापती निधने या यात गुण प्राप्त थापा- पहेलो हानायराणीयकर्म ना क्ष्पपी धनंत कंवतहान उत्पन्न गपत्रे; वीजा दर्शनावरणीयर्मनाक्ष्य थीनंत कंवलदर्शन उत्पन्न थायठे; त्रीजो वेदनीपफर्मना व्यथा दायिक म म्यक उत्पन्न घायले : चौधों चारित्रमोहनीमना यी दापि नास्त्रि त्पन्न पापळे : पारमा श्राप कर्मना दयची श्रदय स्थिति उत्पन्न घायचे; न नामर्म तथा गोत्रर्म ए वतनो रूप ययाधी एक निसायगाहक स्थानीय संदीग्दागनी पठे धनंत निसावगाहना उत्पन्न भाव; वहीं मांदनीपरमना रायची वे गुण उत्पन्न घायने एम का तथा नाम बन गोत्र एवमना पची एक ज गुण उत्पन्न गयो एम एंजे: ए काणे पग्निापाजगराने. ॥१२॥ घिरवावग्गदणान. पनेचं नामगीनकन्मखए । चरणंविथ मोदबए. अ अ गणनि विति पर 120Gl व्या:- पेटलाएक मोहनीपमना पी एस मान्त्रिपन्न पा नाममना यदी मालदिना; मारना माटे मोहनरिपे चारित्र सनी नही, एम जे कहेते, तेनु समाधान थावरील . तो किरियारूव चित्र, सम्मत्त गायपरिणामो॥१३॥ व्या० -जे प्रेदोत्प्रेहादिक्रियावे, ते चारित्र कहिये, थने तऽपयागप रित्र ते नारचारित्र कहिये, नावचारित्र झानरूपज ले त्यारे निगकताचा पजे किया, तेज सम्यक्त कहिये, यने श्रद्धानपरिणाम ते ज्ञान कहिप निणय करतां शान तया दर्शननो नेद थाय नही, ज्यारे यात्मगुणरूप सम्या त्यारे चारित्र पण यात्मगुणरुप केमन कहिये थतएव मरुदेवादिकने वाया |ने, तऽनयनरिए चरिने गोयमा, ह नरिए चरित्ते, पो परनविए चरिन पात । रचिना पण चारित्र सनरेने ॥१३॥थ."ह नपिए नते, चरित्ते परनलिएक | पनयि चम्तेि" एपा नगवती सूत्रनां वचनोए करी चारित्र नगननुगामी का ३३४ अध्यात्ममतपरीदा. यथी श्रवगाहना गुण मानेठे ॥ १२ ॥ थप जे थाचार्य सिक्ने ण नथी मानता, ते सूत्रनु थवलंबन करीने पूर्व पद करे - नणु सिचाते सिहो, जो चारित्ती अ णो अचारित्ती॥ नणि ववदारणया, पिन दोई चारित्ती ॥१२॥ व्या "सिधे हो चारित्ती णो श्रचारित्ती " ए सत्रनेविपे सिझने नो श्रचारित्री कह्यो, एल वचन तो चारित्र न होय तो सनो, जेम ही होवाथी नव्यत्वने काणे बनव्यख कहेवायठे, तेम उता सिदना . रिबनी गणना केम कीपीले १ ॥१२॥ य को एक ए सूत्रनु सम नणु ऽद देसणिसेहे,पो सदो तेण तस्स देसस्स ।। अनु णिसेहो किरिया,रूवस्स ण सत्तिरुवस्स ॥१३॥ " णो चारित्री णो अचारित्री" ए वाक्यमाना “ नो" शब्दयी नो निषेध थायवे एटले चारित्र वे प्रकारनु होय , एक क्रियारूप ने वीनो णामरूप के तेयोमाना क्रियारूपचारित्रनो सिनेविपे निपेध ने , परंतु चारित्रनो निषेध नथी, एम जाण ॥१३॥ केवलानेपिपे रित्र , परतु शक्तिरूप चारित्र नयाँ एम कहेवु नही तें कहे - ज किरियारूव चित्र, चारित्त व णायपरिणामो ॥ . व्या

अध्यात्ममतपरीदा.
३३५
जं पुण तं श्द नविनं, ते किरियारूपमेव णेयत्वं ॥
अदवा नवो ण मुरको, णो तम्मि नवे अं अवा ॥ १३ ॥
व्याः-जे चारित्र इह नविक कावे, ते कियारूप जाणवू ; यने बीलु जे मो
हनीयकमना क्ष्यथी उत्पन्न थायठे ते चारित्र मोक्षनेविपे होयठे, तेनी अमे प
पण ना कहेता नथी. अथवा मोदना नवमां विवदा करी नथी माटे शह नविक
चारित्र काळे, अथवा मोक्ने विपे चारित्र तो वे, परंतु कर्मनिर्जरारूप प्रयोजन
तिहां नथी, तेथीज इह नविक कमुठे ॥ १३ ॥
णय मोरकसुदे लथे, तयणुशाणस्स हंदि वेफल्लं ॥
तकारणस्स द्रा, नास्स विदो वेफल्लं ।। १३३ ।।
व्या० चारित्रनु फल मोद वे, ते पाम्या पठी चारित्र रहेतुं नथी. एम कहेवु नही.
अन्यथा झाननु फल विरति , ते पाम्या पठी चारित्र रहेतुं नथी; एम कहेवू न
ही; अन्यथा ज्ञाननुं फल विरति . ते पाम्या पठी झानपण संनवे नही. ज्यारे
सिघने ज्ञाननुं फल निश्चयी लोकालोकप्रकाशरूप ; त्यारे चारित्रनुं फल पण
निश्चयथी शुक्षात्मस्वनावानुनवलक्षण शासारू न होय. ॥ १३३ ॥
व पऽमानंगो, अहियावहि पूरणंमि चरणस्स ॥
सावा किरियारूवे, सुअकरणे जं करमिति ॥ १३४॥
व्या० सिमने जो चारित्र मानिये तो यावजीवतोनी प्रतिज्ञानो चंग थशे. ए
म पण न कहे. केमके, ओठा काले प्रतिज्ञानो नंग थाय ; पण अधिक का
ले प्रतिज्ञानो नंग न थाय. अथवा ते प्रतिज्ञा क्रियारूपचारित्रनीयज जाणवी.
केमके, “ करेमि नंते” एसूत्र श्रुतकरणार्य कोठे. ते श्रुतकरण गुंजनाकरण
रूप चारित्रज अवलंबीने प्रवर्ने वे. गुणरूप चारित्र ते श्रात्मस्वरूप दे. मोहवि
। रहथी तेनो धावि व मात्र याय. ॥ १३४ ॥
अद चरण मनुहाएं, तं प सरीरं विपत्ति ज बुद्धी ॥
तेण विणा नाणाई, ता तस्स देकअं पत्तं ॥ १३५ ॥
व्या जो चारित्र अनुष्टानरूपठे, ते शरीरविना सिनेविपे संनवे नही. एम
जो कहिये तो शरीरविना ज्ञानाटिक पण सिनेविपे केम संनवे! पूर्वावस्थामा शरी
रथी उत्पन्न थएला झानाटिकना नाशना कारणविना सिखने ध्रुव कहियेते. ॥१३॥

" वलेकरी नाश यगीकार कर तो पण ते निरर्थक थशे केमफे, वामन यकर्मना नाशथी दायिक नावतो उत्पन्न थयोनही त्यारे ए नाशपरयु म, नु ? जेम झानावरणीयकर्मना नागनु फल केवल झान , तेम चारित्रमाही कर्मना नाशनु फज ययाख्यात चारित्र वे ते जो सिबने विषे । कारणकजविनागा, सततमिय किं न सिधेसु॥१३॥ प्या. ते कारण माटे शुक्षोपयोगरुप चारित्र यद्यपि उपयोगरूपता अन्पपा , तथापि तेथोमा फारएकार्यनावनेद वे ज्ञान चारितु मार अध्यात्ममतपरीता किरिया फलदायगी, खअं चरण वि दोह मद नेठा ' सातेण वनचरण, बभतरिय तु परिणामा ॥ १३६ ॥ “व्या बीजूं क्रिया ते शरीरनामकर्मना उदयथी , गरीरविना |य नही शरीरवमे चारित्ररूप किया थाय ते वाद्यचारित्र कहेवायचे बाह्यचारित्ररूप शुभ जनसमाचारीरूप क्रियानुं सेवन करीने यनय जीत वमा ययकसुधी जायठे , एवो वाह्य चारित्रनो महिमाले अन कप यिक चारित्र काठे माटे ते वाह्यचारित्र कहेगाय नही, किंतु ते शुक्र रिणामरूप होवाथी ए यतरग चारित्रज कहेवाय ॥ १३६ ॥ आया खलु सामाश्य, आया सामाअस्स अघोत्ति ॥ तेणेव इमं सुत्त, नासऽ त आयपरिणाम ॥ १३ ॥ .व्या० वाया सामाईए थाया सामाश्यस्स श्र" ए सूत्र पण यात्मपरिणामरूपज कहे परतु वाह्यक्रियारूप नयी कहेता ॥ १३ ॥ णय खश्य विचरितं, जोगिणिरोदेण त विलयमे ।। अम्मद विदल पत्तो, विरदो चारित्तमोदस्स ॥ १३ ॥ व्याकेवलीने जे दायिक चारित्र उत्पन्न थायवे, ते ज्यारे योगनोनि ने मोहनविप गमन करे, तना प्रथमसमयमा नाश थायठे एम कहेव, केमके, हायिकनावनो नाश योजना जो एमन मानिये यने चनो नाग मानिये तो चारित्रमोहनीयकर्मनो नाश कहेवागे नही तन नीयनो नाश निष्फत कहेगाडगे ॥ १३ ॥ तेणं सुवनगे, चरण नाणान दसण वन्न । . .

अध्यात्ममतपरीदा. ३३७ ।, तेम चारित्र ज्ञान- कारण ठे; जेम सम्यक्त तथा ज्ञानना विपयोमा नेट न '. अर्थात् बन्नेनो एकज विषय ठे, तथापि तत्वरोचकरुप ते ज्ञान कहेवायठे, था तत्वरुचिरूप ते सम्यक्त कहेवायचे. एवो बन्नेनो जेद . तेम ज्ञान अने नारित्रनो पण नेद जाणवो. तेमज ज्ञानावरणीयाटिक कोनो नेट पण संनवे 1. एवी रोते ज्ञानथी अन्य चारित्र उपयोगरूपने ज्ञानयी अनन्य अनेकांतस्वरू सिमनेवि केम न थाय ॥ १३॥ ॥ ० ए प्रमाणे सिनेविपे चारित्रनी स पर्यना करी, ते उपर सिहांतपदने अवलंबीने पूर्वपदी समाधान करेठे. एक समादाणविदी, जो मूलगुणेसु दुज घिरनावे ॥ सो परिणामा किरिआ, मुंजणकरणं पडिहंतो॥ २४ ॥ व्याछ मूलगुणनेविपे जे स्थिर नावरूप वे, तेज चारित्र क्रियारूप कहे. के सके. ते मनोवाकाययोगरूप {जनाकरणनी अपेक्षा करेठे. कोई पूढे के, एम ह्याथी वीर्यरुप चारित्र थाय. ते संनवे नही. जेम ज्ञानाचारादिकथी ज्ञाना 'टेक अन्य वे, तेम चारित्राचारथी चारित्र पण अन्यज संनवे. तेने एम कहे है, जो एम कहिये तो वीर्याचारथी वीर्य पण कां अन्य न कहिये! जो कहेशो 'के, योगरूप चारित्र होय तो ते उपगमिक नावे केम थाय! केमके' योग ते नामकर्मना उदविकनावे वर्तेते. उपशमिक नाव तो मोहविना अन्य कर्मनो था यज नही. एम पण न कहे, केमके, योगपरिणाम विशेष पण चारित्रमोह नीयकर्मना उपशमादिकनी नियमेंकरी थपेक्षा करेठे ते उपशमादिक नावेज कहिये, केमके, प्रधाननी अपेक्षाए व्यवहार होय. अतएव इंख्यिपर्याप्ति उ दय जघन्य पण इंडियप्रधाननी अपेक्षाए शास्त्रमा दायोपशामिक कहेवाय.॥१४० अस्मद् वक्कजडाणं, चंमाणं चारुदपनाईणं ॥ वेणसिया चारितं, सुधुवनगोत्ति काऊणं ॥ १४ ॥ व्या जो योगस्थर्यरूप चारित्र न कहिये, अने शुकोपयोगरूप चारित्र क रहिये, तो वक्र जमने चारित्र केम संनवे ? केमके, तेने तथाविध माया ते थ गुनोपयोगप ठे. यने ते तो शुक्षोपयोगनो भेद , तथा क्रोधमोहनीयक मैना परवशे जे चराचार्यादिक सहजे कोपनशील , तेने पण चारित्र केम संनवे? केमके, तेने पण यशुनोपयोग वे. मूलगुणनेविपे योगीर्य ते तेने पण संनवे. जेम वा थनिएकरी काम थाय, तो पण बज्जपणुं मूके नही. जे A . ण तेर उपयोग था जोश्ये थने शास्त्रोनेविपे तो वार उपयोग करावे मके, ते समपने शिषे प्रनिरुप वीर्य नथी एम जे कहेने, तेनु समाधान पनिकर पन देन, तेज परम स्थिरनावर प चारित्र ले, ते.स्मिाना प्या० नेशीयरस्यानेपिपे यद्यपि रुप यत्न नथी, तथापि योगनिराया। नपी, केमो तेनी वीर्य नयी, माटे चारित्रने दानादिक पांच लगिए दायिक | मादिमांत क्याने, तया सूत्रमा पण सिध्यवीर्य कह्याने ॥१३॥ १० जो मास्त्रिक्रियारप कहिये, तो थक्रिया मोक्षकारण कही म सना "मानने यामिरिया किं फजा, गोयमा, सिगमणपडामार अने अनफिरिया, मलेसी अकिरियत्ति एगा। नाशिग्यिादि मोफो, एतो चित्र जुज्जर एपml व्यायनमिया, मनेगी तया यक्रिया । सासद एमायावहा। पाएर मस्तरमबमम्प प्रयोजन, जेथी का चय ३२७ अध्यात्ममतपरीदा. म यथाविध कपायथी थस्थिरता पण कपायपरिणति प्रमादरूप तन पण योगर्यनो धात थाय नही जो योगक्रियारूप चारित्र कहिये वादिकने केम सनवे ? एवो सदेह पण न करवो केमके, मरुदेवादिकनं ससारनिवृत्निरूप मनोयोगपरिणतियुक्त वे उक्तंच “नगवदर्शनाना पमुपेपुषी केवलज्ञानमम्सान, माससाद तथैव सा" इति योगशास्त्र सनी ॥ चरणं जऽ नवनगो, जिणाण ता दुति तिन्नि उवगो॥ दोसु अ अतनावे, त तिअस्स पकप्पणा मोहा ॥१४॥ य्या जो युधोपयोगरूप चारित्र कहिये, तो केवलीने था व्रण उपपोष वा जोश्ये ज्ञानोपयोग, दर्शनोपयोग, तथा चारित्रोपयोग इम न तया दर्शनमाज चारित्र नेतिये तो बीज का चारित्र कहीयं, जे प्रयाममात्र पाय जो साफारोपयोग चारित्र लिए तो साकार पण सनो उपयोगरूप चारित्र मान्याथी इत्यादिक अनेक दूपण थाय।। 70 जो वार्यरुप चारित्र कहिये तो पण शैलेशी अवस्थाने विपे ते पेम सेलेसीए जत्तो, णिवित्तिरूवो सचेव घिरनायो । एणय मो सिक्षाण पिय, ज तेसि वीरिअ पशि ॥१३॥ एदवु जे कहेते, तेनु समागान करे - 7 अध्यात्ममतपरीदा. ३ए ; नही ते ; शैलेश एटले मेरुपर्वत, तेनी पठे जे निश्चल अवस्था ते शैलेशी कहेवाय; धने जे अवस्यानेविपे प्रवृत्तिरूपक्रिया न होय ते यक्रिया कहेवायवे. यतएव झानक्रियान्यां मोद" ए वचन युक्त ठे, केमके, सर्व संवररूपक्रिया अक्रिया पजवे. ॥ १४४ ॥ 30 को आशंका करे. । नणु जोग निरोदेणं, चारित्तं सासयं परं दोऊ ॥ अस्मद् तेण ए मोरको, वप्नव काले असंतेणं ॥ १४ ॥ व्या० परमार्यताथी चारित्रनो प्रतिपक्षी यद्यपि चारित्रमोहनीयकर्म , तथा पेजेम चोरनी साये रहेनारो अचोर पण कर्माकित थापठे, तेम मोहना सहवा थी योग पण चारित्रना विरोधी . माटे योगना निरोधेकरी परम यथारख्यातचा नेत्र गलेशीने चरमतमये ऊपजे ते शाश्वतचारित्र तिने पण होय.जोते चा रित्र ते समयनेविपे उत्पन्न थने श्रागल मोद थवाना समये नाग पामतुं होय तो ते उत्पन्न यवानुं प्रयोजन गुं? तया जो कार्यना नमये कारण न होय तो कार्यनी उत्पनिपण कम थाय ? ॥ १४५॥ के विति मुणीणं, सदावसमवदिई दवे चरणं ॥ तं लइसहावाणं. सिद्धाणं सामयं जुत्तं ॥ १४ ॥ व्या केटलाएक कहने के. पूर्वोक्त टोपने लीध शुडोपयोगप चान्त्रि थाप नही. स्वनावनमवम्यानरुप चान्त्रि होय. ते यात्मस्वनाव घविग्ल्यादि दया ए याबादन करी लीयु ने ज्यारे चारित्रमोहनीयकर्मनो विजय यायचे, त्यारे ने धात्मन्वनाव प्रगटने. ते सधन्वनाव निकने शाश्वतरप चारित्र युक्त ने. ॥१४॥ उ० ए कहेला पग्मतनुं नमाधान करते:- चरणरितणो ण जोगा, अवसमाएण सबमवरणं ॥ सिझे तम्मि सदावे, समवनणंति सितो ॥१४॥ व्या० जो एम कहिये के, योगाग्विना विरोधीने, तेथी यांगनी निगंय का यको परम चारित्र उपजे वे. एकहंदुं योग्य नयी. केमके जो नदवारथी योग पास्त्रिना विरोधी चाय: तो दर्शनना पण विरोधी यवा जो तेमनां न रडया प. ज्यारे दागीयमन्यानेविपन नंबर देवाय न्यारेनेज लमयनविपे मरत ফৰবিলাকা কান্তি ৪, বালিৰ শলাবলমান দারি বালি 'उने क्तुं जाये जायांगपरिणामचीनिन्नन्वनावधान चारित्र निसहाय १४ ॥ - व्या० सिने चारित्र नही होय तो तेने चारित्रमोहनीयकर्मनोवर यवोन तेण विणा सो जुज्जइ धूमेण विणा दुआ सुन्न ॥२५॥ रित्र का माटे ते तिने पण होवु जोये एम कहेवु नही कमी जीयस्त लरकण" एवीरीते श्रीउत्तराध्ययनसत्रनी गाथाएकरी जीवनु सदा 'नाण च दसरा चव, चरित्त च तवो तहा, वीरिय उवगोया, थे निग जाणवो जेम धूम थनिनो लिग वे तेम चारित्र जीवनो निगमले जेम धूमविना थग्नि तप्त लोहनेविपे होय, तेम चारित्रपिना जीवपण हा । एमा काई शिरोप नथी, अतएव थतरग सहण कहीने बाह्य लक्षण हकना थे उपर कहेली गाथा उत्तराध्ययनवृहत्तिनेविपे अवतरण करेनीने ॥१५॥ पाय पियस्स नाणे अनेयवित्ती कह चरणविरहे। सत चिअपम्विज फलेण ज सोय सतवि॥10॥ सनवे ? केमके, सरुनादेशे उतांज सर्व धर्म एक धर्मवाचक : व्या० जो सिनेविपे चारित्र न होय तो ज्ञानमा चारित्रनी अनद का पण न करवी, केमके, ते समयमा चारित्र नथी ता पण चारितुनी नाटे चारित्र ते एम मनायठे, ए नयना मते चारित्रना फलविना बन जाता -~- , अध्यात्ममतपरीदा. उजुसुएण मएण, सेलेसीचरमसमय नाविति ॥ अतसम चिय जहो, देक देकस्स कजम्मि ॥ १४ ॥ व्या० एम जे कयुठे के, शैलेसीना वेला समयनेविपे चारित्र उपजेने, सूत्रनयनामते कणपर्याय नगुरने तथा कारणनो थत्यसमयज कार्यनो हे ए थनिप्रायकरी मोहना क्यथाज सादिसात छापिकनावरूप वीजु चारित्र पय चरणमोदबधो, सिक्षण अचरणाण सताण ॥ अविरय पञ्चश्न सो अप्पसगो ढवे ऽहरा ॥२४॥ माटे एम न केहेवु केमके विरति यने यविरति ए वे स्वतत्र परिणाम है। जच जिअलकण ते वह तब लकण लिग ॥ पजे हे ॥१४॥ । व्या जे वे ते उपयोगनी पठे यावत् व्यनावि लक्षण नथी थाही 1 य र यात मना जन F यठतु माने ॥ १५१॥ गद वाने एवी नानाम्य . ग्वादकस्मिन् अध्यात्ममतपरीदा. ३३१ - पावि याचरणं चित्र आया सामाध्यंति वयणेणं ।। दवियाया जयणाए चरणाया सबथोकुत्ति ॥ १५ ॥ व्या० "शाया समाईए, बाया सामाध्यस्त थ" ए सूत्रनेविपे धात्मपर्यायरू रजे चारित्रठे, ते व्यार्थिक नयना आदेशे श्रात्मरूप कडं, माटे ते चारित्र रावत् व्यनावी श्रात्मस्वनावरूप न जाणवू केमके, व्यात्मा, ते नजनाए चा रेत्रात्मा कयुने, तथाहि " जस्त दवियाया तस्स चरिताया जयणाएत्ति" एवी ते नगवतीमत्रमा कयुने, तथा आत्माना जे आव नेद कह्या ठे, तेश्रोमांचा रेत्रात्माने सर्वस्तोक कयुंके, माटे आत्मा तेज चारित्र एम न कहेवू ॥ १५ ॥ एतो च्चिय सिक्षाणं, खअम्मि नाणदंसणगादमं ।। सम्मत्तजागवणं, वढूण दोसा ण संकंती॥१५३ ॥ व्या वली सिनेविपे चारित्र नथी, ते माटेज सिक्ने दाइकनावमां ज्ञान तथा दर्शन एवेज कह्यांने.जो कोई कहे के, सम्यक्तसमान चारित्रवे. तेथीसम्यक्तना ग्रह पथी चारित्रनुपण ग्रहण थायवे. एम कहेवू नही. केमके, गुझोपयोगरूप चारित्रनो वेज निपेध करावे. अने योगस्थैर्यरूप तेहनीज व्यवस्थापना करी ॥ १५३ ॥ अम्दं णानिणिवेसा, सिक्षाणं अचरणस्स पकम्मि ॥ तत् वि नणिमो रतीरऽ, जंजिणमयमन्न दाका ॥१५॥ व्या तिघने चारित्र नथी, ए पदमा यद्यपि अमने अनिनिवेश नथी, तथा पिघाटबुं व्यवस्थापन पाटलासारु, करिये ये के, श्रीवीतरागनां वचन अन्यथा नयाय ॥ १५४ ॥ अ एवीरीते सिमने चारित्र नथी, एवी समर्थना करी, त्यारे सिघना गुपोमां चारित्रनी गणना केम करीठे ? एवा पूर्वपदनुं समाधान करे।:- जवि जश्मो सितो, 5 केसिंवि तदवि सूरीणं ॥ सिहाणं चारित्तं, तेसिमए तं मए मिदिरं ॥ १५ ॥ व्याण् यद्यपि सिमने चारित्र नयी ; एवो सिक्षांत वे, तथापि केटलाएक याचा यो चारित्र मानेठे, यतः “अन्येतु दानाटिलब्धिपंचकं चारित्रं च सिमस्यापीठंति, तदाचरणस्य तत्राप्यनावात्, थाचरणानावेपि च तदऽसते वीपमोहादि प्वपि तट सत्व प्रसंगात् ।।ततस्तन्मते नचारित्रनावनां सिमावस्थायामपि सनावेनापर्यवसि तत्वाटकस्मिन् दितीयनंग एव क्षायिको नावो न शेपेषु त्रिप्वपि” इति विडोपावश्यक --- - ।

|टे तेज यात्मरूप कर्म ठे, ए बीजं कर्मनामा कारक जेणे करीने झानखनावी) तथा शतिस्पनावे आत्मा किया करे , तेज आत्मरूप करण होवाथी थामा | काठे एम जाणवु एत्रीजु करणनामा कारक जे स्वानुफलवेयने थर्थक त्मा झतिक्रिया करने, तेज यात्मरूप सप्रदान उ, ए चोथु सप्रदाननामा कार। क जे पूर्व याकारने विश्लेपे उत्तर याकारमिश्रित झानस्वनाय थात्मा नजेते | नरूपगुणनु नाजन जे थात्मानामे इव्य तेज थाधार ठे एम जाणवु, एक याधारनामा कारक कयु ए ज्ञान प्राश्रीन कारक कह्या, एमज सर्व वीजा। तव श्यीय सिद्धिं, ण खमइ खवणो अनिणिवेसी॥१५॥ घ्या० ते मिश्ना पदर नेद कहावे, यत तीर्थसिम, थतीसिम, तीर्यकर; सिम, पुरुषनिंगसिक्ष, नपुसकजिंगसिक, स्वलिंगसिझ, श्रन्यलिगसिह गृहनिगमि। ६ एमसिक, तया थनेसमिझ हो एनो थर्य करेने तीर्थ एटले जे चतुविध सर.) ३३२ अध्यात्ममतपदा. टीकायां" ए धाचार्यना मतेकरी अमे सिपना गुणोमा चारित्रनी गणना ए मत जे ते पूर्वमतथी विरुवे माटे थप्रमाणजवे एम कहेवु नही अविछिन्नपरपराए श्रावेलां जे ए वे मत, ते अनतिशय पुरुपथको निवारण नही जो कहेशो के, एक एकनी युक्तिनी समर्थना करता प्रत्येकमा दोष चारले, एवो विचार पण न करवो केमके, जिनवचनकपर अरुचि थयाविना । नश थतो नथी ॥ १५५ ॥ तेसि सबा किरिआ, सहावसिक्षा पण कम्माण ॥ उहपि कारगाणं, एग समावेसो ॥ १५६ ॥ व्या ते सिखने सर्व क्रिया स्वनावसिक्ष, एक पण विनाव क्रियानवी है। मके, कर्मरहित सिक्ने उ कारक एक अर्थ विश्राति पामे ते कहेठे - कथचित झानथी थन्यथा अत्माज्ञप्तिक्रिया स्वतंत्रपणे कर माटे यात्मा जे ले तेज कर उ, ए पहेलु कर्तानामा कारक ज्ञप्तिकिया स्वतत्र श्रात्मानेविपे प्राप्यमाण ठे, धर्मों थाश्री जाणी लेवु ॥ ५५६ ॥ ते पुण पनरस ने, तिनातिवाय सिझनेएण॥ थथया प्रयम गणधर उत्पन्न यया पी जेसिपथयात तीर्थसिम, तीर्थनी उप " अध्यात्ममतपरीदाः ३३३ ति यया पहेला अथवा तीर्थनो विठेद थया पठी जे सिम थया ते अतीर्थसिक, तीर्थकरपदवी जोगवीने जे सिह थया ते तीर्थकरसि; सामान्य केवली वतां जे सिम थया ते थतीर्थकरसिक्ष, वाह्य कारण दीनाविना जे पोतेज जातिस्मरणा दिकथी प्रतिवोध पामीने लिप थया ते स्वयंबुधिसिफ; प्रत्येक बाह्य कारण ह पिनादि देखी प्रतिबोध पामीने जे सिह ययाने ते प्रत्येकयुनिलिम, बुझजे गुर्वादिकथकी बोध पामीने तिच थया ते खुश्बोधित्तसिझ. स्त्रीलिंगना त्रण प्रकार वे. वेद, शरीरनिवृत्ति, तथा पय्य, एत्रणमां अत्रे शरीरनिवृत्तिनो अधि कार लेवो. वेद तथा पथ्यनो अधिकार नथी. केमके, ए वे प्रकार मोदना यंग नथी माटे शरीरेकरी वर्तमान ठतां जे ति यया ते स्त्रीलिंगतिह; पुरुष शरीरे करी वर्तमान उतां जे सिह थया ते पुरुपलिंगलि-६; नपुंसकलिगे करी वर्तमान उतां जे सिम थया ते नपुंसकलिंगसि; रजोहरणादिकस्वलिंगनेविपे व्यवस्थि त ठतां जे ति यया ते स्वलिगति ; परिव्राजकाटिक चार अन्यलिंगनेविपे जे सिह यया ते परलिंगतिगृहस्थलिंगनेविपे वर्तमान उतां जे सि-६ थया ते गृ हस्थतिंगति ;जे एकला सिह यया ते एकति; अने जे अनेकनी साथे सिम थाय ते थनेकसिच कहेवायठे. ए पंदर जेटमांना स्त्रीलिंगतिने अनिनिवेशने वश थया थका दिगंवरीयो मानता नथी. ॥ १५७ ॥ तस्सम्मयथीसिचा, जे पुचि चेव खीपायीवेआ ॥ एवं पुरिस पुंसा, थी पढाएण णो सिही ॥२५७ ।। चरणविरदेण हीण, तणेण पाव पयडीण वाढल्ला ॥ मणपगरिसविरदान, संघयणानावन चेव ॥ २५ ॥ व्या ते दिगंबरीओ आयु मत वे के, स्त्रीलिंगसि तो कहिये के जो पूर्वे स्त्रीवेदनो क्ष्य करी अने पठी वन्ने वेटनो क्ष्य करी सिम थतां होय; तेमज न पुंसकसिम पण तो मानिये के जो प्रथम नपुंसकवेदनो तया पठी वन्ने वेदनो क्ष्य करी सिख थता होय; शरीरे करितो पुरुपज सिह थायते; परंतु स्त्रीना प ोये करी सिद्धताने पमातुं नयी. केमके स्त्रीने चारित्र होतुं नथी. चारित्र जे ने ते गुकोपयोगरूप याचेलक्यमूलगुणमय ; थने स्त्रीतो अचेलक थायज नही. त था पुरुष यकी स्त्रीहीन होवाथी पण तेने सिक्तानो संनव नयी. नपुंसकल तथा स्त्रीव महापापे करीने यर्जायटे, एम पापप्रतिनी वाव्यताने लीधे पण स्त्रीने . | कहिये के, वदीर्ण वेदनोज पूर्वे क्ष्य करवो तो तेनेविपे पण शास्त्रोक्त व्यवसा भने पठी पुरुपवेदना त्रण खम करी तेमाना बे खमनो एकवार क्ष्य करवाया नेत्रीजो खम सज्वलन क्रोध मान खपाववो जो स्त्रीए दपक श्रेणिनो थारन र यो होय तो तेणे पूर्व नपुसक वेदनो कृय करवो, पती पुरुष वेदनो, पनी हास्य कमरुतिनो थने ठेवट स्वीवेदनो क्य करवो जोये अने जो नपुसके दर! श्रेणीनो थारन करवो होय तो तेणे पूर्व स्त्रीवेदनो क्ष्य करवो, पनी पुस्। नो, पठी दाम्यादिक ठ प्ररुतिनो, अने सरसेवटे नपुसकवेदनो क्ष्य करवो जार, या स्वीनिगे सिह थवातु नथी, तेमा चारित्रविरहादिक जे हेतु क्या च्या स्त्रीने चारित्र न होय तेमां कारण शुठे स्त्रीनेविपेजे शीनादिकहार दोपत्रे ते एकात नथी, केमके, परमशीजवान जे सुशीजसादिक श्राविका पर अध्यात्ममतपरीदा मुक्ति थाय नही तथा जेम स्त्रीने सातमी नरक पृथवीए जवायोग्य तीब्र नपरिणाम थता नथी तेम मुक्ति पामवायोग्य तीत्र शुनमनपरिणाम पण थता नथी. माटे स्त्री सिह थायज नहीं बने सातमी नरकष्टविए जवातु नथी, माटे तेने वचपननाराच सघयण नही होवायी पण ख सनव नथी ॥१५७ ॥ १५ ॥ एवी दिगवरीयोनी युक्तिने अथकर्ता दूपण दिये - तमिचा वेयखन, सरीरणिवत्ति णियमणियनत्ति ॥ चरणविरदाया पुण, सो तुद दोऽओ सिक्षा ॥ १६॥ । व्या दिगवरीयो स्त्रीसिमादिकना प्रसिद्ध अर्थने मूकीने जे अन्य अर्थ को ते सनवित नयी केमके, जेने स्त्रीवेदादिको पूर्वज हय वे, एवा नपुसकारित शरीरेकरी वर्तता श्रेणी करे तेनेवि माटे वासणपुसगयेया" इत्यादिक स शास्त्रवचन समर्थवाने अर्थ ए कल्पना केवल कदाग्रहरूप जणायः, आ एक पूर्व नपुसकवेदनी काय करतो, पटना, पली हास्यादिक उ प्रतिमा इत्यादिक रीति जाणी लेवी ॥ १६ ॥ थसिकते, एम कहे। ऐगति यमितीणं, मुखत्त सजमो चिया लना ॥ तामि चरित्तविरहे, चाउवलो कद सघो ॥ १६ ॥ ।

अध्यात्ममतपरीदा. ३३५ उनी जगवंते पोते प्रशंसा करी. वला स्त्री जेम केटलाएक पुरुप उटठे तेम - पण महारंन महापरिग्रही देखायो, माटे स्त्रीतुंउटल कार्ड एकांते नथी. लो कहेशो के, स्त्रीने लड़ा मटती नथी, माटे चारित्र थाय नही; एम पण न कहे ; केमके, नग्नताज चारित्रांग नथी, विधिए करीने धर्मोपकरणोनुं धारण करतां चारित्रनो नंग थतो नथी. जो कहेशो के, स्त्री, शरीर हिंसायतन ठे, माटे तेने हिंसा नथी; एक हे पण असन्यपणानुं ते. केमके, अशक्यपरिहारस्यलनेविपे हिंसा थाय नही. प्रमा दना योगे हिंसा थाय , प्रमाद जे व्यपरोपण तेज हिंसा कहिये. वली जो स्त्रीने चारित्र न मानिये तो चार प्रकारनो संघ केम संनवे? जो वेपधारिणीश्रा 'विकाज साध्वी कहिये तो चारित्र जाण्याविना जे वेषधारण कर, ए तो मोटी , विटंबना कहेवाय ! जो कहेशों के, चारित्रलेश स्त्रीने थाय ठे, तो तेमां अमे प ए ना कहेता नथी, पण जो कहेशो के, स्त्रीने चारित्र मोदनु कारण थाय नही तो ते कदाग्रह मात्र जाणवू. केमके,अध्यवसायविशेपेकरी पुरुपनी पठे स्त्रीने पण चारित्रनो उत्कर्ष होय; एमां कांई विरोधता नथी. ॥ १६१ ॥ हीपत्तं पुण माणं, लचिन िवलं च अदिगिन्छ । यो पडिकूलमसिई, तिरियणसारम्मि संतम्मि ॥१६॥ व्या स्त्रीने जे पुरुपथी हीनपणुं कयुवे, ते जो विशिष्ट पूर्वज्ञाननी अपेक्षा ए कहिये तो ते प्रतिकृत नथी, किंतु अनुकूलन ने. केमके, तथाविध झानविना पण गुरुपरतंत्रताए मापतुपादिक चारित्रना पालणार ययावे. जो लब्धिनी थपे दाए कहिये तो पण प्रतिकूल नथी, किंतु श्रनुजज ने, केमके, तथाविध लब्धि विना पण मानुप्याटिक स्तरुत्य थया; जो शदिनी अपेक्षाए कहिये तो पण प्रतिकूल नथी किंतु यनुकूलज टे. अन्यथा तीर्थकरादिकनी अपेक्षाए अमदार्दिक गाधरादिक ने, तेने मुक्तिनो संनव केम थाय ? वी पुरुपने अवंद्य , माटे ते चारित्र शहिए करी हीन होवी जोये, एवी आशंका पण न करवी, यन्यया शि प्याटिक थाचार्याटिकने अवंद्य ठे, तेपण चारित्रशक्षिए करी दीन होवा जोये, जो वजनी थपेक्षा कहिये तो तेपण प्रतिकृत नथी, किंतु यनुकूलन ठे, केमके, न्वी करतां निवज जे पंगुप्रमुख ते पण अध्यवसायविशेपे मुनि पामे, जो कदेशो के. हीनबजने विशिष्टादिम्प चारित्र कम थाय! एमपण न कहे. कमो. शारि त्र ते यथाशक्ति थाचरणाम्प वे; माटे तेवीने पण नंनवे . नंच “वादिति .

. वथकारण मिय्यात्वादिक रहे तो स्त्रीए सम्यक्त पण न पाम्युजोये जा के, पुरुपयी तीन काम पण अध्यवसाय ले, माटे नपुसकनी पटेली मति माटे ते मुक्तिनेविपे विघ्नकारक नही होगाथी ए हेतु अप्रयोजक जापवा या स्वी मुक्ति पामे केमके, ते नपुसकथी हीनकाम, माटे लेने पुरुपनी पढे ।' नोवीप नथी, माटे तेने मुक्तिनेविपे जवानो पण तयाविध मनोवीर्य धापना च्या० जो कहेशोके, जेम सातमी नरक पृथवीए जरायोग्य स्त्रीने घर एम कहेवु नहीं केमके, एरो नियम नथी, के, जेटला अधोगनि ज्ञानोबा साप पाप तेटलोज कर्वगति जवानो अध्यवसाय थाय केमके सुनसरी बीनी पृथ्वीसुधी उत्कर्षथी अधोगतिए जायठे, पछी त्रीजी एयवीसी काना नर पृथ्वीसुरी जायने, पुरुप थने मठ सातमी नरक पृथ्वीसुरी चतुष्पद चायी पृथवीमुपी जायठे उरग पांचमीटथ्वीसुपी जायने मी ए स्त्री तथा पुरुपचिना बीजा पूर्णत संबं प्राणीया नकरी / अध्यात्ममतपरीदा. कुर्वणवादिलब्धिधिरहे श्रुते कनीयसि च जिनकपमन पर्ययविरहेपिन विरहोस्ती" एणेकरी अनुपस्थाप्यपारा चितक प्रायचित्तना यनुपदेशयी बने। ए दीनपहुँने, ए थसब जाणवु, केमके. योग्यतानी अपेक्षाए शास्त्रनेदिने चित्रतपनो उपदेश ने उक्तंच संवरनिर्जरारूपो वदुप्रकारस्तपोविजित योगचिकित्साविधिरिव कम्यापि कथचिउपकारीति" ॥ १६ ॥ पाचाणं पयडीप थीणिवत्ती वधजणणी ॥ सम्मत्तेणेव पए णो तासि पाववदुलत्तं ॥ १६ ॥ व्या स्त्रीने जे पापनी वाव्यता कहीजे, ते वचन पण मिथ्याने, रेमा । वारे स्त्रीपणुं वायु ठे, तेवार यद्यपि बदुल पापप्रति मिथ्यात्वादिस्प है। तथापि ते प्रति जेबारे तानव्याने परिपाक सम्यक्त गुण पामीने रूप को तेवारे स्त्रीने पापनी वाढव्यता नथी जहासुधा स्त्रीशरीर होय, तहासयी भोजन वी ए हेतु पण अत्रे लागु यायवे ॥ १६३ ॥ णय तासि मण विरिअ असुन च सुढ विणेव नकिटं ॥ तारिमणियमानावा तेण हन चरमकवि ॥ १६४ ॥ । याउमा दालोररी उध्र्वगमन करे। एपी रीते ययपि मी मानमो न

अध्यात्ममतपरीदा.
३३७
,
थ्वीसुधी जती नथी, तथापि तेने मोदसुरखनी प्राप्ति थायवे एमां कोई विरोध
थी. केटलाएक कहेठे के. अधोगतिने परमोत्कर्ष होयवे. ते एकांततायी संनवे
रही. केमके, जेवी कारणनी उत्कर्पता होय. तेवीज कार्यनी उत्कर्यता कहेवा
ले; एवो नियमते परंतु एधी अन्य कोई नियम नथी. स्त्रीने विपे जो युद्धादिक
वहारंनरुप कारणनो संजव होय. तो सातमी नरक पृथ्वीसुधी जवाय; तेवू
कोई कारण नही होवाने लीधे स्त्रीयकी त्यांसुधी जवातुं नथी, कितु उनीसुधीज
जवायने अने पुरुष तथा मत्यनेविपे तेवा कारण होवाथी तेश्रोथी सातमीनर
पृथ्वीसुधी जवायचे. एवी रीते अधोगतिनेविपे जवासारू पुरुप अने स्वीना
कारणोनी विलक्षणता होवाथी सरखं गमन थतु नथी, परंतु कर्ध्वगतिनेविपे
जवासारू बन्नेनां कारणो सरखा होवायी सरर, गमन यवानो अवश्य संनव वे.
जेम पुरुपनेविपे शीलादिक गुणरूप कर्वगमननां कारण होय तेम स्त्रीनेविपे ।
पण होयते. ए हेतुथीज स्त्रीने वजझपननाराचतंययणनो नव वे. एम न
मानवामां कोई युक्ति नथी. ए प्रकारे स्वीना निर्माणना निरोधनेविपे दिगंवरीयो
ना हेतुनो निपेध कस्यो ; हवे स्त्रीनो निर्वाण थवामां अनुमान कहे:-हरेक व
तुना अनुमानमा पद, साध्य, हेतु तथा दृष्टांत ए चार प्रकार दोपवे. एटले ए
चार पदार्थोए करी निछ थएली वस्तुने अनुमित कहे; अने एचार पदार्थोए
करी सिह थवा योग्य वस्तुने अनुमेय कहेते. जेम के, अनियुक्त पर्वत सिह कर
वो दोय. ते अनुमेय कहेवायठे ; अने एज पद कहेवायचे. अनुमान करनी
वरखते “पर्वतम्पदीरुत्य, वन्दिमत्वसाध्यते, धूमत्वात् इतिहेतु . पाकगृहवत्. य
त्यत्रधूमः तत्रतत्र वन्दि." पर्वतनो पद करीने तेने धनियुक्न सिह करेने
एमां हेतु पर्वतउपर नीकलतुं धूमाईं वे, जेम रसोई करवाना गृहमा अग्नि होवा
घी धूमाहुं नीकलेने, कमके, ज्या ज्यां धूमाई होय त्या त्या अग्नि होय. ए दृष्टा
त . तेम “कांचिल्वीव्यक्तिं पदीहत्य, मौदा विकलकारणता साध्यते, टीकापि
कारत्वात्, पुस्पवत्, येचे टीदाधिकारिण- ते ते मोक्षाविफलकारिणः" कोर
क स्वीनी व्यक्तीने पदय करीन तेने मोहना अविकलकारणवंत मिस कन्वे; एमां
टोहानो अधिकार हेतु अने पुत्पनातिनी पढे ए दृष्टांत . लेमके जेजे टी
कानो अधिकारी होय ते ते मोदना अविरुजकारणवंत होपनं. ॥ १४ ॥

पण मुक्ति थती नथी एम उताजो कहेशो के, जेम रुत्रिमनपुसकने मुक्ति थार- नो क्ष्य थाय नही थने विशिष्ट कर्मनो क्ष्य थयाविना मुक्ति थती नयी ता स्त्रीपणु जे ले ते पापप्रतिरूप नदीनु फरणु ठे, ते पुण्यरुप सुरतरुना केवनना नरूपफलने सेवन करनारा केवलीनेविपे केम संनवे। अर्थात् पापप्रतिरूपमा ने केवल ज्ञान सनने नही तथा स्त्री परम याचिवे तेने परमौदारिफ गर य वित्त प्राव जिणाण पाए गण वित्ति ॥ १६ ॥ व्या० स्वीन कियारिशिष्टविना विशिष्ट निर्जरा न थाय एम जे वादिर थपुक्त ने केमके, नाव पिठोपे फलचिोपने क्रियापिशप पिना नावविध य, एमां एकातता नथी केमके, जो शक्तिना निग्रह करीने किया वरियत नारनी हानि थायने, थन्यया नावनी हानि यती नयी तयात्री पए -प, एमां पण एफातता नथी, केमके, सम्यक्तना बनयी मिथ्यात्वादिक पर, ६प यायने एम पूर्वस्ही याया ये पषुफरीने तीर्थकरनेपिप बीपतु न्हानु, एटल बगा स्त्री तीर्थकर थती दीठामा थापती नयी नयी वीपण पा) ने एम जो कहिये तो शिमलादिर पण तेयाज कहेगा जाये स्मा बना मायक्रनेविष विप्रवादिकना पण थनार हायचे थर्थात घणुगीन कृषि पण सन नही केवलीनु शरीर तो परमोदारिक होयठे तेवु तो स्त्रीनु सागर/ 7 तीर्थर थएना दीठामा थाने तेथी गुरिमादिकने मादना मना ३३७ अध्यात्ममतपरीता कीवस्स कम्पिअस्स व चीए कपिआउ सिद्धीवि ॥ विणा विसिह चरित्र तासि त विसिकम्मख ॥१६॥ पाव तह चित्तं णय पुरसफलाण केवलीण ढवे ॥ परमा सुन्नूआण णय परमोरालि देहो ॥ १६६ ॥ व्या० कोई थाशका करे के, जेम जातिनपुसकने मुक्ति थाय नही तेम सा तेम विद्याप्रयोगादिकेकरी युक्त स्त्रीने मुक्ति थायठे, तो तेम पण न सनने, मके, स्त्रीने विशिष्ट क्रियानुष्ठान होतु नथा, विशिष्टकियानुष्टानविना विशिष्ट कहेवाय नही, माटे स्त्रीने केवल ज्ञान केम सनवे ? ॥ १६५ ॥ '६६ ॥ था ए थाशकाने युक्तिवडे दृपित करे - एय मयुत्त जम्दा विचित्तनाचा विचित्तकम्मखन ॥ 4 अध्यात्ममतपरीक्षा. ३३ए - थी अने परमादारिक शरीरनो तो पूर्वेज निषेध कसोने, माटे ते होय के न होय तेनी गातार चर्चा करवी! ॥ १६ ॥ य तीणं सिद्धी सिधा सिझंतमूलजुत्तीदि ॥ईअं असहदंता चिक्कणकम्मा मुणेवा ॥ १६ ॥ व्या० एवी रीते सिद्धांतमूलयुक्तिउए करीने स्त्रीने मुक्ति थायवे एयु सिह कखं तेम ठतां जे होकरीने ए अर्थनी सहहणा करता नथी, ते चिकणा कर्मवाना जाणवा. एवा प्रकारे न्बीनेविपे मुक्तिनी व्यवस्थापन कस्खाथी सिना पंदर नेटनी व्यवस्था य तेथी सप्रसंग सर्व मिनु स्वरूप कन्यु. लि-इस्वरूपना वर्णनथी परम नावाध्यात्मनु निरुपण थयुं श्रने नावाध्यात्मना निरूपणथी ग्रंथार्य पूर्ण थयो.१६॥ था हवे ग्रंथार्यनुं परम रहम्य कहे।:- ऽयं परमरदस्सं एसो अनप्पकणगकसवहो। एसा य परा आणा संयमजोगेसु जो जत्तो ॥ १६ ॥ च्या संयमयोगनो जे उद्यम करवो, तेल सर्व शास्त्रना नयविस्तार जाणवार्नु फल ते ; अने एज परम रहन्यनूत . यतः “सवेतिं पिण याणं, बहुविहवत्तव यणि सामित्ता, न सबणयविसुई, जं चरणगुणहि साहू.' इत्यावश्यकाटौ. तथा श्रावो नवहेतुःस्यात् संवरो मोदकारणं ; ऽतीयमाईती मुष्टि, रटनस्याप्रपंचनम् ; एनो अर्थ - प्राणातिपाताटिक जे पाव ठे, ते संसारनुं कारणठे. प्राणातिपा तादिकथकी विरमवारुप जे संवर ते मोदनुं कारण ; ए परमार्थने विस्तारेकरी जाणवासारज सर्व शास्त्र . माटे जेणे ए अर्थ जाण्यो वे ते परमार्थताथी सर्व एम जाणवू. अतएव उपगम विवेक संवर ए पदनो अर्थ जाणीने चि जातीपुत्रे निजयर्थ साध्यो. तथा संयमयोगनो जे उद्यम करवो तेज अध्यात्मरूप सोनानी कमोटी ; जेम कसोटीए करी सोनानी परीक्षा थायठे, तेम क्रियानुष्ठाने करी यध्यात्मनी परीक्षा थायवे. ते अध्यात्मेकरी जे विधि थायवे, ते वाह्यका रणनु यालस्य करे नही. यतः “संयमयोगेसु सया, जे पुण संत विरिया विसी यंति; कहते विसुधचरणा, वाहिरकरणालसा हुँति.'' त्यावश्यके. तथा एज श्री वीतरागनी परमथाज्ञा ते के, संयमयोगनेविपे यत्न करवो. जेणे ए यत्न क यो, तेणे चैत्य कुल गणादिक सर्वन कार्य कयं, एम जाणतुं. यत. " चेय गण संपे, थायरियाणं च पवयणमुए थसवेच वि तेण कयं, तव संयममुकम्मंतो गास्त्रज्ञ

.
।
| कितु साधकज थाय अने हुँ नव्यन के अलव्य एवीजेने शका उत्पन्न या
थनायादित्याचारागटीकाया" एथाशका तो उलटी चारित्रप्रतिनो अग।
करीने जो योगा प्रवृति करिये तो ते सुखथी थई शकेने, एम कहेनाराने
व्या० जे पुरुप नोग नागवीने पठी सयम पालवानी या करेठे, तेशा
यम थनिमा पमी वतीने पठी शीतलता पामवानी पठे वे केमके, नोगा
माना, मुपनोगेन शाम्यति, हविषा रुमवर्मे व, पुनरेव प्रवाईते " जेम
व नोगवेने, ते सुख ययपि यनतवार जोगवाई गया . तथापि मानी
मना दोरने तीघे एम नासेने के, में ए सुख पूर्वे कोई समयनेपि नोगा
"पत्ताय कामनोगा, काजमात इह स वनोगो, थपुच्च पिव मन।
३४०
अध्यात्ममतपरीदा.
था कोईक कहेशे के, ज्यां सुधी जीवने नव्यवनो संदेह होय त्यांसुधी
नेविपे ते केम प्रवृत्त । केमके, थनव्य अनेक क्रियाकरे तेथी तेने
परतु परमार्थथी तेने कोई फलनी प्राप्ति थती नथी, एचं समाधान करे -
आसन्नसिविण जीवाणं लकण इम चेव ॥
तेण ण पवित्तिरोदो जवानवत्तसकाए ॥ १७० ॥
व्या. जे जीव थोडा नवे मुक्ति पामनार होय तेनु एज लक्षणने के
यनेविपे वैराग्य धारण करीने धर्ममा प्रवृत्ते यत “थासन्नकालनवति,
जीवस्स लरकण इणमो, विसयसुहेसु ण रऊ, सवधामेण उङ,मई"
लाया माटे चारित्रनेविपे प्रवृत्ति थाय, त्यारे जीरे पोताने श्रासन्नतिपय
एयुकहेवाय, पनी ते नव्यानव्यवनी शकाएकरी शुनप्रवृत्तिनो बाधक केम शत्र'
ते जीव निश्चये करीने नव्यज जाणवो यत
अनव्यस्यहि नव्यान
माटे तेथी का बाधा थती नयी ॥ १० ॥
था केटलाएफ परवादी एम कहे के, मोदोपायनेविपे प्रवृत्ति :
थायवे, ते वैराग्य यनुतनोगनेवि सनवे माटे जोगनोगव्या पढी तना
जो पुण नोए नोत्तु श्चोइ ततो असंयम कान ॥ज
लणम्मि पज्जलित्ता व पक्षा सणिचान ॥ ११ ॥
घ्याथी तेनी चा मटती नथी, कितु अधिक थायः यत
.
ने अर्थ कहे-
'नजातु काम
पत
हरिप जीये मणे सुरकं" इत्युपदेशमालायां ॥ ११ ॥

अध्यात्ममतपरीक्षा.
३४२
अप वली नोगनेविपे प्रवृत्ति करतां एवो संदेह रहे के रखेने जोगनो नाश
थई जाय; ते योग्य ठे, केमके, नोग स्थिर नथी, किंतु यस्थिर . अथवा नो
ग जोगवतां घायुप्यनो धंत आवी जाय तो पण नोग नोगवाता नयी. एवा
लोग नोगववानेविषे प्रवृत्ति यतां अविरति जीवने प्रतिक्षणे कर्मबंध थायवे. ए
मां रंचमात्र संशय नथी. माटे जे विवेकी पुरुप ते स्वप्ननेविपे पण नोगनेविपे
प्रवृत्तिनी अनिसापा करता नथी. वो उपदेश करे. ॥ ११ ॥
कोवा जिअवीसासो विकुलया चंचलम्मि आनम्मि ॥
सजो सिजमो ज जरानिनून कद दोदी ॥ १७ ॥
व्या हे जीव, तने जीवितव्यनो गो विश्वास ते? केमके, जेम विजलीनील
ता इटले जात्कार हणनंगुर , एटले दणमा देखाय वे ने एमां नाग थर्ड
जायचे, तेम जीवितव्य कदएमा प्रत्यक्ष देखातो उतां कोई रोगादिकना उद
यथा वीजी दएमां नाग यतां वार लागती नथी माटे ज्यांनधी शरीर निरोगी
वे त्यांधी जो तूं धर्मकार्य करीश तो करी शकीश. ॥ १७२ ॥
या कोई कहेो के, जो जीव रोगेकरीने ग्रमेलो होय, अथवा कायवलेकरी
हीण यएलो दोय, ते चारित्र मार्गनेविपे केम प्रवृत्ति करी गके, तेने उत्तर दिये।
देवलं ज ण व तद्वि मणोधिश्वलेण जम्अई ॥
तिसिन पत्तानावे करेण किं पो जलं पिबई ॥ १३ ॥
व्या० जो रोगादिक करी शरीर निर्वल थई गयुं होय तो मनवुयादिकना व
ले करीने योग धारण करवो. जेम पुस्पने ज्यारे तृपा लागे त्यारे तेनीपासे जो पा
पी पीवानुं पात्र न होय तो हाथेकरी पाणी पीएले : पण तरन्यो रहेनों नथी.
तेम तथाविध काजबल न उतां पण जेने मोदनी अनितापा होय तेणे मनोर
नेकरी योगमार्गनेविपे प्रवृनि फरवी ॥ १३ ॥
था जे पुस्प बसना नमवनी गौचनाएकरी वनरहितसमयमा नविष्यका
ल उपर नगेसो राग्वी थालत करीन वेगी रहे ते यति उग्य पामे ; एम कहेते.
वलकालसोअणाए अलसा चिति जे अकयपुन्ना ॥
ते पतिता विलद सोऽति सुदं अपावंता ।। २७४ ।।
जद पाम को पुरिमो ण धनता णिचणो विनमः ॥
मोदाइ यतणाए सो पुण मोए: अप्पाणं ॥ १४ ॥

या कोई कहेगे के, पापनीति णे" इत्युपदेशमाजाया हो मिठामि उकड ए शब्दनो यर्थ कहे-मि कहना | कायाथी तथा नावया मृज थs, छा कहेता थसयमरूप दोषनु थछादन करीन. | मि कहेता चारित्रनी मर्यादामा रह्यो यको, उ कहेता उरुत कार्यनो करनार / ने उनघन करुड एरो अर्थ जाणीने मिठामि उकम दीधा पठी फरी पाप ना | उखटु माया मृपावादादि पाप लागेवे यत "ज उक्कडति मिठा। तं चरणिमए। थ० ए कारण माटे चारित्र लईने जो ते सारा नायथी पालिए तोज तपी/ महाफलनी प्राप्ति थायठे, यन्यथा याजीविकाने थर्थ चारित्र लीधा करतां गह ३४२ अध्यात्ममतपतिा. व्या जे पुरुप एवी शोचना करे के, हमणा मारामां बन नयी, माटे कान धर्माचरण करीश थथरा हमणा मारो श्रासर नथी, माटे थागज जता धमत रण करीश. एम जाणीने घालस करी वेशी रहे ते श्रस्तपुरस्य यका श्रागन थी। प्रार्थना करखाथी पण पुण्यपिना सुम्पने पामे नही, त्यारे घणो शौच करने म कोइ निर्मन पुरुष प्रथम बालस करीने धन थानो उद्यमन करे ने पनी ताली श्या करीने धनपिना 5 खने पामेते त्यारे पोताना थात्मानविष घणान शान । रेले माटे प्राप्त थएलो धर्म मृकीने थागल धर्मप्रार्थना करीये तो नानी प्रार्थन कहेवाय यत “समिनियचोहि, अफिरतो गपगपछित्तो, थाणा वादि सप्तसि कयरेण मुल्ले।" || १७४ ॥ १५ ॥ दायीज पाप टले , त्यारे विशेष अनुष्टान करवानु कारण शु? एविये कहने- जो पाव गरदतो तं चेव णिमेवए पुणो पाच ॥ तस्स गरदा वि मिठा अतदकारो दिमित्रत्तं ॥ १७६ ॥ व्या जे पाप कररी मिछामि कड दाने फरो पाप करे तेनी पापनि मिच्या ने केमके, जेबु बोजिए तेवु जो पालिए नही तो तेज मिथ्यात वे यत । थात्मा तेने दुनिनु, क कहता में जे पाप कस्खा, तेनुड कहेता उपशम पानी पुणो पाव, पञ्चरकमुसावा, मायानिवडी पसगोथ" इति ॥ १७६ ॥ स्थधर्मज सारो वे एम कहेने चुअधम्मान मुणिणो सुअर किर सुसावगत पि ॥ प डिअ पि फल सेय तरुपडणान पच्चपि ॥ १७ ॥ " *

अध्यात्ममतपरीता.
३४३
व्या वेषधारी चारित्ररहित जे तु आवक वे, ते अरिहंतनी पूजा करे, सुसा
उनी सेवा करे, हटाचारीपणुं पाले. इत्यादिक धर्माचरण करेने, अने जे चारित्र वेय
पारी दोय ते गृही धर्म तथा यतिधर्म ए वनयी नष्ट थायवे. उक्तंच "ठजीव
एकायदया. विवहिउणेव टिरिक ए गिही ; जश्यम्मा चुक्को, बुझ गिहदाण
सम्माई न्युपदेशमालायां. वेषधारी चारित्रियाने मूलगुणविना तपथी पण ते
फल यतुं नथी. उनंच
मह्वय अजयाs, ल डेवं जो तवं चरइयाणं,
सो अन्नाणी मूढो, नावावुड्डो मुणेप्रबो. माटे केवल वेषधारी करतां गृही
म सारो . दृष्टांन:- फलनी अनितापायी वृक्ष उपर चढी, फल मेलव्यावि
ना पडी न जतां ते फल मेलवाई शकाय तो सालं, पण जो फलनी प्राप्ति न थ
नां नीचे पडी जवाय तो उलटुं शरीरने लागे तेथी उखनी प्राप्ति याय. तेना क
तां वदनी नीचे वेसीनेज पडेलु फल ग्रहण करिये ते सारं ॥ १७ ॥
संयमयोगे अप्नु, अिस्स संचत्तवनजोगस्स ।। ण प
रेण किंचि कर्क आयसहावेण चिस्स ॥ १७ ॥
व्या संयमना योगे जे थानंद यायचे ते केवल आत्मस्वनावने विपेज अव
स्थित ठे. तेने परनुं गुं काम ! माटे जेने चारित्त परिणम्युं दोय, तेणे सर्व प
प्रतिबंध मूकीने आत्मश्यमात्रना प्रतिबंधे प्रवर्तवू ॥ १७ ॥ अएक आत्म
इव्यमात्रनेविपे प्रवायी वीजाने उपदेश केम देवाने, एविपे कहेठे.
संविग्गो गीयचो वादेन परंपरा करुणाए ॥ अन्नो
पुण तुसणी, पुवं बोदेन अप्पाणं ॥ २७ ॥
व्या जे महानुनावी संवेगी गीतार्थ होय, ते पोते तो कृतरुत्य होयठे, प
रंतु बीजानी उपर परम करुणाए करीने तेने प्रतिबोध करे तो तेथीते महाफलदाई
ने. परंतु जे एवो न होय तेणे वीजाने उपदेश करवानुं मामीवालीने प्रथम पोताना
थात्मानेज वोध करवो जोयेठे. जे पोते प्रतिबोध पाम्या विना वीजाने प्रतिबोध
करे ते केवल नाटकीयानी पते नाटक करी देखामनारोठे एम जाणवु.॥ १७एगा
या एवी रीते ज्यारे परप्रतिबंध सारो नथी, किंतु एकाकीपणुंज सारूं ,
माटे गह पण प्रतिबंधरूपज , एम जे जाणे तेनो संदेह मटाडवाने अर्थ कहेठे
दवेण जो अणेगो गठे सो नाव दवे एगो॥ एगागी
गीनच्चिय कया दवेष नावे ॥ १० ॥

1 काने के, ज्यारे पोताथकी थधिक गुणवालो थथवा समान गुणवानों का ॥ वर्जीने कामनेविपे असग करेने माटे तेने एम काठे थने अगीता हारो, नाणुना जिएवरेहि " ए गाथामा खुजीरीते थगीतार्यने एकाकी 8/ । हारनो निपेध कखोने माटे गन्बमा रही, गुरुकुलवास सेवी, गुनादिकनों अब स करी, अने साधुसग उता पण अतरग निर्लेप रहीने जो यध्यात्मना। ह तह पयहिअब एसा आणा जिणदाण ॥११॥ व्या० घणु शु कहिये, जेजे प्रकारे रागपि विलय थाय तेवी रीते प्रवर्तन १ असप्पमयपरिरका एसा जुत्तीहि पूरिया जुत्ता। सोहि तु पसायपरा त गीयता विसेस विक ॥ २३ ॥ तेनु विशेषज्ञ जेगीतार्थ ते मजउपर रुपा करीने शोधन करो ए विज्ञापना । व्या० था अध्यात्ममतपरिदा युक्तिएकरी पूरी कीधी, तद्रूप जे था। शार्दूलविक्रीडितं वृत्तं ॥ यस्यासन् गुरवोऽत्र जीतवीजयमाझा प्रयास । यो जात सुधी सोदर सोयं तत्वमिद यशोविजयश्त्याख्यानदारख्यातवान् ।। वाजते सनयानयादि विजयप्राझाच विद्याप्रदा ॥केम्वा यस्यच सम पति ३४४ अध्यात्ममतपरीहा. व्या गडमां बता व्यथी जे अनेकता थायडे, तेज नावयी एकता थायो । न्यथा गुर्वाज्ञादिक थकुशविना चित्तरूप हस्ति ससाररुप बनमा फरता एकव नारूप वेलीनू उन्मूलन करी नाखे श्रतएव नगवते "एकस्स थठि धम्मो” दिक प्रबंधे करी एकाकी विहारनो निपेय कखोवे श्रीदशकानिक ण थाम काळे "नया लनिका निजण सयाय गुणाहि थ वा गुणउ समय, श्क्कोवि पावाइ विवऊपतो, विहरेक कामेसु यसऊमाणो था गाथामा नही, त्यारे एकाकी विहार करयो, ते गातार्य याश्री जाणवु केमके, ते पार गीतार्थनी निश्राविना पाप वर्जी शके नदी तेम कामासगपण वानी शके न अतएव “गीय अविहारी, वामन इनो तव । नाविये तो परमानदनी प्राप्ति थायठे ॥ १७ ॥ कि बहुणा इह जह जद रागहोसा लढविलकति ॥ त ज श्रीवीतरागदेवनी आशा ठे ॥ ११ ॥ प इति पमित यशोविजयजी उपाध्यायकृत श्री अ ध्यात्ममतपरीक्षाययो बानावबोधसहित समाप्त समयमारनाटक. ३४५ श्रीजिनायनमः अय श्रीसमयसार नाटक बनारसीदास कृत गुजराती जापामां अर्थ सदित प्रारंजः उपोदात. श्रा यंपनी दिगंबरी वनारसीदाने गुम हिंउस्थानी नापामां पद्यात्मक ग्रंथरुप ग्चना करते. ए ग्रंथकनी पोते महापंमित तया कवीश्वर होवाची विविध प्रका ग्नी दग्चना करीने तणे पोतानी श्रेष्ट कति देखाडी थापीते. पदलालित्यता तथा अर्य गौरवतादिक जे काव्यना सारा गुण वर्णन करखाने, ते था ग्रंथनी क वितामां मारी गते दीवामां आवेचे अलंकारवडे कविता सारीरीते नूपित करी. श्रा ग्रंथ अध्यात्मिक विषयवालो होवाथी यामां मात्र शांत रसज मुख्यवे पण प्रसंगानुमारे वाकीना रस पण कचित दीनामां आवेळे. जोपण या ग्रंथ उपर क ह्या प्रमाणे नन्हवाटिकमां गणायला दिगंबरीनो रचेलो, तोपण एनो विषय थाध्या स्मिक होवाथी ते सर्वने उपयोगी; माटे या पुस्तकमां अमे नाख्यो. ए ग्रंथनी व्याख्या कोई रूपचंदजी नामना पमित करीवे, ते पण हिंस्यानी नापामा हो वाथी सर्व जनने समज्यामां श्रावे नही, माटे तेनो धाश्रय लने धमे गुजराती नापामा व्याख्या करी ये. व्याख्या करतांए आदिमां मंगलाचरणनो दोहरो कयां ते याप्रमाणे- दोहा:- श्रीजिन वचन समुश्को, कॉलगि होइ वरखान ; रूपचंद तादू लिखे, अपनी मति अनुमानः ॥ १ ॥ अर्थ-व्याख्याकत्ती रूपचदनी कहेठे के, श्री जिनवचनरुप समुनो कहांशु थी व्याख्यान थाय, तोपण ढुं मारी मतीन अनुमाने लखी जणाq. ॥ १ ॥ हवे ग्रंथकता प्रारंनमा मंगलाचरणरुप श्रीपार्श्वनाथ स्वामीनी स्तुति करेते. कवित्त, इकतीसासर्व हस्वादरः- करम नरम जग तिमिर हरन खग, उरग लग्वन पग शिव मग दरसि; निरखत नयन नविक जल वरखत, हरखत य मितनविक जन सरलि; मदन कदन जित परम धरम हित, सुमिरत नगत जग जेमाटे कामदेवना क्ष्य करनार वे, थने जेनु उत्कृष्ट सहज सुखरूप धा- मा सघु स्वरात यदर युक्त उप्पय उद एने चित्रकाव्य पण कहते- करम खन्न दलन, कमठसठ पवन कनक नग.धान परम पद रमन, जाना नयमन कमन खग, पर मत जलपर पपन, मजल घन सम तन समस्या थद्य रजहर जसद, सकल जन नत नवनय हर, यम दलन नरका अर्थ-सर्व कर्मरूप खलके० उष्ट वरीने दलवा वानाठा कमन नामा हा मृर थहर तेरुप परन यागत मेरु पर्वतनी पर अगवा धान ने मटाडवाने थर्य पपनना जेवा वो जज सहित मेर घटाना जेवा पानी श्वर करानेयर्थ सगके० सूर्य जेवा ठो एफात नय वादी जे पर मत कर नो शरीरले समकरके० उपशमना करनार ठो परफे० गनुरूप थगा. रजने हरण करवाने मेय जेवा ठो जेने सफल नोक नमे ने श्रयान् त्रियुता। ज्या जन्म मरणुरुप जेनरनय तन हरण करनार ठा पाद ग्रन थतटा पार पजे मसाररुप समुश्तन तपाराना जगाना वा नय प्राणीयोन नरक पदना दय करनारा श्रगम दारामा राप्रपान यन बनान जे पदपवन, तने बानवान हर व्य करन, यगम यतट नव जल तरन, वर सवत मदन वन हर। जगतना लोफारूपी नग्न कमनने पर. ३४६ समयसारनाटक तसब मरसि, सजल जलद तन मुकुट सपत फन, कमठ टनन वनरसि ॥१॥ अर्थ - जगतमा जे याठ कर्मरूप तिमिर एटले ययकारचे करवाने खग एटले सूर्यरुप वे जेना चरणनेविपे सर्पनु चिन्ह ने = मार्गने देखाडनारा जेनेनेत्रे करी निरखता कयारुप जन - करी अमित के प्रमाणपिना नव्यलोफरूप सरोवर महा दान नक्तजन स्मरण करी रह्याने तेथी तेनु सब दरसिके सात नयरूप जे मन ते नाशी जायचे जेनु शरीर जलसहित मेपना जेवु नीलवर्ण वे जेना मुक्कर सात फण वे जेणे कम नामे असुरनु मान नजन कराने एवा निन नाय नगवान, तेने बनारसीदास नमस्कार करते ॥५॥ फरीथी विशेपे श्री पार्श्वनाथ स्वामीनी स्तुति करेठे . - स जय जय परमथनय करन ॥२॥ लमिझ स्थानकनेरिपे रमनारा ठो - म E नाफाना माना समयसारनाटक. ३४७ नेत्रनी अलि जेवा हे नगवान तमे जयवंता थाो. वली तमे परम श्रनय पद मा करनार गे, एटले नय जन तो. ॥ ॥आ उप्पय ठंद बड़े परमेश्वरनी महिमान वर्णन कन्यु, अने पोतार्नु काव्य चातुर्य दर्गायुं वे. या ग्रंथना कर्ता बनारसीदास कहे। के जेना प्रसादथी परगसेन पिताने घर मा जन्म थयुं एवो ९ श्री पार्श्वनाथ जगवाननी स्तुति कसं. सवैया ऽकतीला:- जिन्हके वचन उर धारत जुगल नाग, नये धरनिंद पद मावति पलकमें ; जाके नाम महिमासों कुधातु कनक करै, पारस पाषान नामी नयों है खलकमें: जिनकी जनमपुरी नामके प्रनाव हम. अपनो स्वरूप लग्यो नानसो नलकमें; ते प्रन पारस महारसके दाता अव, दीजे मोहि साता हग 'लीलाके ललकम॥ ३॥ अर्थ.- ज्यारे श्री पार्श्वनाथ नगवाननी कुमारावस्थाहती त्यारे कोई एक सम पे श्री बनारसी नगरीविपे एक तापसीनी साये अचानतपश्चर्यानी निर्नलना पू बैंक वाद थयो, ते प्रसंगे ते तापनीनी धूणीमानां लाकडांमां नाग वे एवी गते 'श्री पार्श्वनाथ जगवाने कम्युं, ते वातने पेला तापसीए गणकारी नही, तेथी ते लाकडांफोमीने ते नागने बाहेर कहाड्यो: पण ते यधवथ्यो थयो हतो ते थी तमफडवा लाग्यो, तेना अंतना समयमा श्री पार्श्वनाथ नगवाने तेन ॥ चनीया उसाय नमः . ए मंत्र संनलाव्यो. ते वचन तेणे सारी रीते हृदयमा धागली. एटनामां तेना भरीरनी शांति थ गई. तेना अंतना सारा परिणामाने लीधे ते धरण्इ थयो. तेनी बी पद्मावती हती; ए कथा श्री पार्श्वनाथ चरित्र मां प्रतिवे. ते घट्नुत महिमाने दायितां उतां ग्रंथकना उपमा काग्वढे पा रसमणि श्रने श्री पार्श्वनाथना ए गुगनी नादृश्यता देण्याडेने.. जना वचन हदयनेवि धारण करीने नाग घने नागणीए बने पतकमां धगणे इधने पद्मावतीरूपे थया. यांही नाग श्रने नागणी कहेबाथी दिगंबरी मत जा पा. श्वेतांबरी तो एक नाग नेज कहेले. वनी पापायान सक्षम पटले दुनिया मां प्रति एटले पारा मणी नामना पापापम्प यतांजलाम नामनी, धातुं लोनु थापने. तो ए पान्याणमां एवी महिमा फिदायी उत्पन्न यई? तेनुं न पर कहने.- पार्थ एव नाम श्री पार्थनायने तुल्य ने. तनी महिमा यी टनेले मात्र पार्व एवं नान नेते नामनीज महिमायकीने पावर पायामास গুগ थपोने. बनी जनी जन्म पुगेर्नु नाम बनानी नगर्ग.यानं धरना व - थडिल्ल उद-श्राविनाशी अधिकार, परम रसधाम है, समाधान सता, हज थनिरामहै, शुक्षवुक्ष अविरु अनादि अनत है, जगत गिरामन |ने, माटे सरवगने विपे सहजनी जे थनत सुखरुप समाधी तेणेरीज एटने कोई केवलीगम्य जे सहजानद उत्कृष्ट सातरस, तेना जे धाम एई। 'ची रहित शुकने सर्वज्ञता पाम्याथी चुने थने सर्वना ईथर माटे चार राम एटने यति मनोज्ञ चौदराजलोकनी उपर विराजमान होवाची सांत एदवी यवस्थाए री ते अनादि न्यनत ठे अने चन्द रानलोकना नर जमान ले तेयी जगतना शिरोमणि वे एरा जे श्रीति६ नगवान ते सामा रस नया है मग्नकी रीत हर मरनको ने न कर करनमा पीठ दराण या संवपारुतिसा-ज्ञानके उजागर सहज सुरव सागर सुगुण तनागरी समुशने बने मुगुनजे ज्ञान, दर्शन यने चारित्राप ग्नीना या rit, यर्थ-जे ज्ञाननो न्यात करनार ने थात्मश्यनुज महनासुर नना न्मान माघनश्य जाणीने जेा मरना नयमुसीदीन 17.1 ३४न समयसारनाटक. के, माझं नाम पण बनारसी दु पाम्यो ते मात्र नामना प्रजावया में त्मस्वरूप जाणी ली ते केवी रीते जेम प्रनात समयमा सूर्य पोताना मां वह प्रकारे ठे, तेनीपरे मारु रुप पण प्रकाशी रघु ठे एपण श्री थ नगवाननी महिमानो प्रताप ने तेज श्री पार्श्वनाथ नगवान महाशा देयावाला , ते हवे हग लीताकी ललकमेंके थारख मीचीने उपाडीए व क पतरु मात्रनी सत्तामा मुजने यात्म समाधिरूप शाता आपो एयी निक खनी सूचना करी वे ॥३॥ सिम नगवाननी स्तुति करेवे- सदा जयरत है ॥ ४॥ श्रर्थ-जेनोविनाश नथी, अने जेने कोई विकार लागे नही एवो परम जपवत पायो॥४॥ साधुरूप नगवाननी स्तुति करे - । . ऐमो मुनिगन थ लामम पिजमानामग्य बनारमा नममकार यादव पाने काई पग्मिद याची प्रात्ययायो युगम्य नापरेशागणना गनि पार समयसारनाटक. ३४ए नवापी तेना विषयोथी विमुख थयाथकीजे चारित्रने अनुसखा वे; वली जेनो प्राश्रय लेवाथी धर्मपदार्थ विराजमान थाय माटे धर्मना मंगन करनारावे. मि यामतिरूप जे नरम तेनुं विशेपेकरीने जे खमन करनारा वे: जे परम दयावान ने कर्मोनीसाये युरू करे। दयावानने युधकरवू तनवे नही तेम ततां कयुं ते आटे विरोधालंकार जाणी लेवो. एवी विशेषताने जीधे जे मुनिराज एटले रुपी घर सुअलोकमां पिततालोग लाख मनुष्य देवनेवि विराजमान वे तेने हृदय मनवी जोडने बनारसीदान नमस्कार करते. ॥ ५ ॥ हवे पांच अनुव्रत लोया ये जेमणे एवा समकितीनी स्तुति करते. । सवैया तेऽसा:- नेद विज्ञान जग्यो जिनके घट, शीतल चित्त नयो जिम चं न: कति करै शिव मारगमें जगमाहि जिनेश्वरके लघु नंदन; सत्य स्वरूप स " जिन्हके प्रगट्यो अवदात मिथ्यात निकंदन; संत दशा तिन्हक पहिचान करे र जोरि वनारनि वंदन.॥6॥ अर्थ-जे मंदबुदि वे ते जीव अने शरीरने एक करी जाणे ; नेद जा शना नयी. पण जेणे तमकित पान्यो , तेना हृदयमा जड बने चेतननु निन्न नन्न ज्ञान ययुं एवं तेने जेटविज्ञान जागृत थयो, तेथी तेनुं चित्त चंदननी पते गी जि थयु के. जे मुक्ति मारगमां केलि करे एटले खेन करी रह्या वे; था जगतमा श्रीजिनेवरना जे न्हाना पुत्र.अने साधुजे ले ते सर्वज्ञपुत्र कहेवायवे माटे ते मो का पुत्र वे. वली श्रात्मा सदा निश्चयेकरी सत्यरूपमांजवे, पण मिच्यातवडे मलि सह्यावे. ते फरी सत्यस्वरुप जेनुं निर्मल प्रगढताने पाम्युंजे, अने मिय्यावर्नु नेकंदन अयुंठे, एटले मिथ्यात्व रयु नथी बार यनंतानुबंधीनी जड तुटी गई. की तेमनी शुश्दशा उत्तरखीने बनारमोदाम बन्ने हाथजोडी बंदना करे. ए सर्व पामां सम्यक्तनी दृढ़ता वतावीने. ॥६॥ पूर्ण सम्यक्तता दर्शाववानयर्थ फरी तेनीज स्तुति करते. सवैया इकतीसा.-सारथकंसाचे परमारथके साचे चित्त साचे साचे बैन कह सा चे जनमती हैं, काहूके विरोधी नांहि परजायबुद्धि नाहि,यातम गवेषीन ग्रहस्थहन पती दें; निति निदिक्षिदाम घटमें प्रगट सदा,अंतरकी लक्ष्तों अजाची लक्ष्पती दान नगवतके उदात रहे जगतनों, सुम्विया नहीव ऐसे जीव समकिती हैं. ॥७॥ अर्थ.- जेनी स्वार्थ एटले यात्मा पदार्थनेविपे साची प्रतीति वे. तथा परमार्थ ते मोद पायनेविपे साची प्रतीति ते. जेनुं चित्त निर्मजते. जे सत्यवचनना बोज 7 ३५० समयसारनाटक. नाराले जे साचा जिनमतने ग्रहण करी रह्याने जेनु मन कल्पना करतु नथी केम के, ते साते नयनुं शुक्षस्वरूप जाणेने तेथी कोना दर्शनना विरोधी नथी जेमवीर मतानुसारी पर्याय बुधिवालावे पण इव्य बुध्धिाला नथी तेथी जीपने रुपनगुर' मानेचे तेम समफितीपर्याय बुधिवत नथी पण यात्मइयनी गोपना करनार ! तेथी तेने पर वस्तुमा मोहनथी माटे गृहस्थ पण नथी यने महा नत लीया नथी, तेथी यति पण नथी पोताना घटनेपि गुड़ यात्म इव्यन सिइसमानत जुएते तेथी घटमाज प्रगट सिदि देग्वेने थने ज्ञान दर्शन चारित्रपरिनीति जेना घटमा सदा प्रगट देखायठे जे यतर परमात्मा देव ते तेनु जेने ला था वे, तेथी थयाची एटने कोनी पासे काई मागे नही एलपति ने बीजे ए पक्ति प्रकारना प्रगट स्वरुपने पामेला श्री वीतराग नगवतने पामीने तेना दास ययात्रे,थने जगतयो उदास रहे। जे थान थने राइए वे व्यानया विमुख थयाने. तेथी सदीप सुखनी सन्मुख थयाने, एवा समकिती जी महा सुखमयीवे ॥७॥ फरी पोताना उशासथी समक्रितीनी स्तति करे - समयसारनाटक. ३ . खेडे. चारित्रमा यात्मानी शक्तिने साधे. अने मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञाननो उदय थवानी वा करेते. मतिअज्ञान तथा श्रुतअज्ञानने गमावी दियेते. ते समकित्ती जीच नवसमुश्नो तरनार कहेवायठे ; ए रहम्य ने ॥ ७ ॥ हवे समकेत पाम्या ठतां मिथ्यात्वदृष्टिमांज रहेते. तेनुं वर्णन करे. । सवैया इकतीसा.- धरम न जानत वरखानत नरमरूप. तौर और तानत सराई पडपातकी. चूल्यो अनिमानमें न पाउं धरे धरनीमें, हिरटेमें करनी विचार उतपा तको. फिरेमावामोलमों करमके कनोलनमे वैरही अवस्थासों वधूलाकेसे पात की, जाकी पाती ताती कारी कुटिल कुवाती नारी, ऐसो ब्रह्मवाती है मिथ्याती महापातकी. ॥ एR । अर्थ-जे वन्तुना स्वनावरूप धर्मने जाणे नही, श्रने नर्मस्प मिथ्यावाणीने यरवाणे; तया काणे ठेकाणे, पोतार्नु मत स्थापवाने पक्षपातनी लडाई करे श्रने पो ताना थनिमाने नूच्यो थको धरती पर पग राग्वे नही. पोतानेज तत्ववेना जाणे. एमां श्रधर पगवडेकरी उत्प्रेक्षालंकार जाणयो. अने हश्यामां जैथी उत पान उपजे एवोज करणीनो विचार करे, धने था संसाररुप समुश्नेविपे कर्मम्प, कजोलोना धकाये करी चारे गतिमां मामामोल करतो फरेते ; जेम बढोलिया या युमा श्रावीगएटुं पानडं धाकागमा कडीने जम्यां करने, पण कोई काणे स्थिर थई रहेतुं नथी; तेबीज एनी अवस्था थरही. जेनीठाती गपवमें तत थर्ड देने ते तापे करी काली एटले माया तेने गरयवाथी कुटिल या रहने. श्रने कु वाती एटले जे माती वातोनुंज चितवनकरी रहेने.तथा पापेफरी नरेली में माटे नारी जाणवी एवी जेनी वाती . एहवो ब्रह्मघाती एटले धात्मयानना करनार मिथ्यात्वी जी महापातकयुनते ॥ ५ ॥ टोहगः- वदो शिव अवगाहना, थरु वंदों शिवपंथ, जनु प्रसाद नापा कगे. नाटक नामे गरंथ. ॥ १० ॥ अर्य.- जिहां सिझनो अवगाह य रह्योनेने देवने ढुं वंदन राई छने शान दर्शन शास्त्रि ए मोदनो पंथ मार्ग के. तेने दुं वदन कर. मंग लाचरण करी हवे पोतार्नु प्रयोजन पत्रे.- जेना प्रसाद यकी समय मार नाट अंध नस्टतमा हतो ते प्रारुन नावारूप उ. ए प्रयोजन पायो. ॥ 1 ॥ दवे या ग्रंधना अधिकारी वनाग्नीटान पान न करता सापक पोनातुं यात्माच्य ने नेतुं वर्णन करने-रविवर्णनं. %;

१ - एह महात्म्य सवैया इकतीसा -जेसै कोन मूरख महासमुश्तरिवेको जुजानिसान थर्थ - जेम कोई मूरख मनुष्य महासागरने तरवा चाहे अने चाहापने। पहाड उपर हद होय तेना फलतोडवाने उतावलो थको उमग कर, इनु प्रतिबिंब पडेलु जोईने कोई नादान तेने साचो चइ समजी हाथ नीश, तो तेना हाथमा चश्मा केची रीते यावे तेमज दुअल्पबुदितु थने था। टकमथनो थारन मे कीयोचे, ते मारोधारन सफल नही यशे तेपारे बीना वान पुरुषो कहशेके, जु था ग्रथनो यारन करेवे एवु कहीने गुणीननो दोरी पोइ गई है,तस बुद्धीटीका करीनाटिक सुगम कीनो तापरि श्रनप बुदि सर्वया तीता-जैर्स कोउ रतनसो वाथ्यो है रतन कोड, तामें मृत । समयसारनाटक. सर्वया तेवीसा-- चेतनरूप अरुप अमूरति सि समान सदा पद मेरो, महातम यातम अंग कियो परसग महातम घेरो, ज्ञानकला उपजीयन गुननाटक आगम केरो जासु प्रसाद सौ शिवमारग पेग मिटे घटवास बसेरो । । अर्थ - बाह्यात्मामा अतरात्माने अने यंतरात्मामा परमात्माना जोईये, ए मारो निश्चयरूप पद कहेवा योग्य थायचे ते चेतनरूपी यनूपम तिक सिह समान ने जो ते निश्रयरूप पद एवो ये तो पठी ते प्रगट तु नथी? तेनो उत्तर एम वे के, मोहकर्मनु कोई थात्मयगके यात्म प्रदेशनेविपे महायधकारनो घेरो वे तेथी प्रगट : हमणा कोई ज्ञान कला मुमने अपनी ते कलानो अश प्रगट थोडे तेवो टक सिधात गुणनु व्याख्यान करुनु, जे आगमना प्रसादवडे मोदमार्ग अने जलदायी शरीरमा वास वसवानुमटी जाय एटलेघशरीरपणु तिक्ष्याय हवे था ग्रथनु गौरवपणु बतावीने कविराज पोतानी चुधिनु मदपणु लघुता जाणवे ने - लघुता वर्णन - है तजि नावरो, जेसे गिरिपरि विरपफल तोरिवेको बावन पुरुष का । वरो, जेसे जलकुममें निरखी शशि प्रतिबिब ताके गहिवकों कर नीचो रो, तैसे मै अलपति नाटिकारन कीनो गुनीमोहि हसेगे कहेंगे कोउ हायरमे तरचानो उद्यम करे, तो कार्य कमवने, जेम कोई वामन पुरुष हार केवी रीते बनी शके ? वली एक बीजो हटात कहेले के, जेम पाणीना वरो जाणी हशी काडगे ॥१२॥ वजी ए कार्य करवाने साहस करेठे पुन ७ . ,

રૂ
समयसारनाटक.
गरिनई है; जैसे काढु देसके पुरुप जैसी नापा कहै, तैसी तिनहूके बालकनी सिखीला
है, ततै ज्योंगरंथको धरथ को गुरु त्यो हमारीमति कहिवेको सावधान न है॥१३
जेम कोई हीरानी कणीवडे कोई कठण रतनने अागलथी वीधी राख्युं होय,
ने ते पठी तेमां पटुवो रेगिमनी दोरी परोवे ते सुगम चालीजाय तो तेम या कार्य
पण थो. केमके मुनि अमृतचंद अने पामेराजमल जेवा पंमितो थया तेमणे
था ग्रंथनी टीका वालबोधमां करीने या नाटकग्रंथने सुगम करयोठे, तो तेउपर
माहरी अल्प चुहिने तोपण या ग्रंथमा सुधारीत परणमी गई, तेथी या कार्य
नेविपे महारी समर्थाऽनो दृष्टांत देखाई ढुं- जेम कोई देशनो वसनारो पुरुप
तानी देशनापामा वोले अने तेनुं वालक होय तेपण तेनीपासे रहेतोयको ते
नापा शाखी ले तेमज या कार्य पण वे. केमके मारा गुरुए या ग्रंथनो य
ये मने कह्योd, तेज प्रमाणे या ग्रंथनो अर्थ केहेवाने मारी बुद्धि समाधिवंत थ
ने. एटले पागल कहेलो पश्चाताप मट्यो ॥ १३ ॥
हवे पोताना सामर्थ्यनु कारण वतावे.
सवैया इकतीसा.-कवदों सुमति व्द कुमतिको विनाश करै, कवहीं विमल ज्यो
[अंतर जगति है; कवहीं टया है चित्त करत दयालरूप, कवहों सुखालसा व्है लोच
लगति है; कबहों कि धारतीब्द प्रनु सनमुख यावे, कवहीं सुनारतीन्दै वाहरि
गति है; धेरै दसा जैसी तव करैरीति तैसी ऐसी हिरटे हमारे जगवतकीनगति है१४
अर्थः- अमारा हदयमां नगवतनी जगती रही, ते क्यारेकतो सुमतीरूप य
ईने कुमतीनो नाश करेठे, क्यारेक अंतरविपे ते जगती विमल ज्योतीरूप , ने
जागृत थायचे. अर्थात् सम्यक्त चेतना तेज जगवतनी नक्ति ने, क्यारेक तेजनक्ति
दयारुप थने चित्तने दयालरूप करने, अने क्यारेक ते नक्ति पोताना श्रात्मक
रने जोवानी लालसा के लगन यकी एटले लयलागवामां लोचनोने स्थिर करे।
“यने क्यारेक तो तेजतिना रति के अति रगेकरी प्रनु सनमुख थई रेहेठे (बीजेयर
प्रनू सनमुख आरती करेठे ते ) अने क्यारेक तो ते जगति मुनारती के न
वाणीरूप थने वाहार वगति के शब्द करी रहेठे. जेवी जेवी दशा धारेवे
वारे तेवी तेवीरीतनी करनारी ठे, ते एवी नगवतनी नक्ति यमारा हृदयमां व
रही तेथी या नाटकग्रंथ रचनारूप कार्यमां पण एक नगवंतनी नक्तिज कार
वे. एतात्पर्य है. ॥ १४ ॥

।
२२॥
दोहरा- ज्यों पथिक ग्रीपमसमै, वैते ठाया माहि, त्यो अधर्मको नूमिमें
थर्य - जेम कोई वटेमार्ग बेसवानी क्रियानो कर्त्ताने, ने क्रियानी सापक
वे, तेम अधर्मास्तिकायनी नमी के अवगाहना तेमा जड जे पुजन न चनन।
जीर ते बने स्थिर थायवे, तेथी यधर्मास्तिकाय इव्य स्थिरतानु कारणने ॥३॥
सर्व जगतनु नाजन के० थाधारनूत ठे, ते याकाश इव्य जाण ॥२५॥
थर्य-सतत के निरतर जेना उदरमा समस्त पदार्थ वसी रह्या,धन।
दोहग-जो नवकरि जीरन करे, सकल वस्तु यिति गन, परावत्तवनन,
३५६
समयसारनाटक.
, तेथी अलक्ष ठे, देहना खम थाय पण श्रात्मा श्रसमित वे, सर्व
नयो ते तेथी सर्व गत वे, एवु जीव इव्यतुं स्वरुप ते करो ॥ २० ॥
हवे पुगत इव्यतुं लक्षण कहे। अथ पुज्त इव्य यथा -
दोहरा - फरस वन रस गमय, नरद फास साण, यनुरूपी पुग्न
नन प्रदेश परवान ॥२१॥
अर्थ -स्पर्श वर्ण रस गपए गुणमय सदा रहे,नरद जे सोगठीरूप
मा सूक्ष्म, रत्न,अस्त्र, चतुरस्त्र,वायत ए पाच सस्थान ठे, तेथी
पोत पोतानी वर्गणा योग्यरूप ग्रहण करे, तेथीए पुन व्य अनुरूपी
माणुरूपी ठे. जेम आकाश प्रदेश अनत , तेम ए पण अनत प्रमाण के.
दवे धर्म इव्यनु लदाण कहेठे धर्म इव्य यथा
दोहरा - जैसे सलिल समूहमें, करै मौन गति कर्म, तेसै पुजन जीवका,
न सहाई धर्म
थर्थ --जेम पाणीना नरावमा माठलु गमन किया करे,
माग्नु , अने सजिल समूह जे पाणीनो नराव ते क्रियानो साधक के
लव्यनी तथा जीवश्व्यनी चलन क्रियानो साधक धर्मास्तिकाय व्यते ॥
हवे थधर्मास्तिकाय व्यनु लक्षण कहे। अधर्म इव्य यथा.
ड चेतन उदराहि ॥ २३ ॥
दोहा - सतत जाके चदर में, सफल पदारथ वास, जो नाजन सब भी
हवे याफाश इव्यनु लक्षण कहे थाकाश व्य यथा
हवे काजश्व्यनु लक्षण कहे काल व्य यथा
तहा
कियानां
.
को, सो दरव थाफाश ॥ २४ ॥
O
काजदरब सो जान ॥२५॥

समयसारनाटक.
३५७
अर्थ:-जे इव्य वडे सघला वस्तुनी स्थिति बंधाय एटले पेला सकल वस्तुने
नवी बतावे, ने पठवाडेथी ते सघलीने जुनी करी देखाडे, अने उलट पालट वर्ना
ववानी दशाधरे ते कालव्य जाए. ॥ ५ ॥
हवे या ग्रंथमां कहेवा लायक नव तत्व ठे तेनुं वर्णन करे:- तेमा प्रथम
जीवतलनी समज पाडेते. नवतत्व वर्णनं, जीवतत्व यथा.
; दोहरा:- समता रमता उरधता, शायकता सुखनात; वेटकता चैतन्यता, ए
सब जीव विलास. ॥ २६ ॥
थर्थः- सर्व जीव वरावर ए समता, घटघटमां रमी रेहेते ए रमता, ऊर्ध्व
दिशे गमन करतुं ए उरथता, सर्व पदार्थनो जाणनार ते झायकता सुखमय नासे
'ने तेथी मुखनास, सुखःख वेदे ए वेटकता, अने चेतना गुणथी चतन्यता एस
'यलो जीव तत्खनो विलासठे. ॥ २६ ॥
अथ अजीवतल यथा.
दोहा:- तनता मनता वचनता, जडता जड संमेल; लघुता गुरुता गमनता,
एयजीवके वेला ॥ २७॥
। अर्थः-- शरीरपणुं, मनपएं, वचनपणुं, जडवस्तुमां गेलनेस यवापणं, लघु
पएं, गुरुपएं, गमनपाणु ए सर्व घजीवतत्वना वेतो. ॥ ॥
यथपुन्यतत्व यथा.
दोहगः-जो विद्यु६ नावनि बधे, अरु जरथ मुख होय; जो सुखदायक ज
गतमें, पुन्य पदार्थ मोय. ॥ २७ ॥
अर्थः- जे पदार्थ विशुद्ध परिणामयी वधे, अन जेर्नु ऊर्ध्वमुखले, ऊर्ध्वगति
एज चडेठे,जे पदार्थ जगतमा सुखदायकले, ते पुन्य पदार्थ जाणवो. ॥ २० ॥
घथ पाप तत्व यथा.
दोहगः-- संकिलेति नावनि वधे, सहिज अधोमुख होय; सदायक संसा
रमें, पाप पदारथ सोय. ॥ २ ॥
थ:-जे पदार्थ संक्लेग नाव वडे कपायनीडीयो वध, सेहजे जेनी गती
नीची वे थोमुखने, घने जगतमां दुविद्यायक ने तेज पाप पदार्य केवायवे. २६
थथ याश्रय तत्व पया
दोहरा:-जोई काम द्योत धरि, दोड किया ग्न ग्न; र नूनन म
कॉ, सोई थाभव तत्त. ॥ ३० ॥

7
.
rapl
१
थर्थ - जे नवा कमें जूना कर्म साथे याची मले, थने तेनी गति हरवंशय
थने थागत जतां ते कर्मना वसनी शक्ती चढतीथाय, ते बध पदारथ केवार।
दोहा-थिति पूरन करि जो करम, घिरे बध पद नानि, हस थस पस
थर्थ-जे कर्मनी स्थितिने पूर्ण करीने कर्मने खेरे के० इयकरी नाले में
बध पद के० सनावन प्रकारे बधस्थान तेने नानि के नांगीने दस के पार
हवे कवित्त उदमां पदार्यनी नाममालां एटले प्रयोजनवाला नामनी
दोहरा-नाव पदारथ समय धन, तत्व वित्त वसु दर्व, इविन थप
३५
समयसारनाटक.
थर्थ - जे कर्मनो उदय धरीने शुन तथा थान कियाना रसमा
रहे, त्यारे नवा करमर्नु करखे के खेचबु करे ते थाश्रव तत्व केवाय ,
अथ संबर तत्व यथा
दोरा -- जो उपयोग सरूप धरि, वरत जोग विरत्त,
रौके थावत
सो है संवर तत् ॥ ३१ ॥
अर्थ- जे शुभ उपयोग स्वरूपने धारीने मन वचन काया जोगयी
थको चर्ने अने नवा करम थावताने रोकी राखे ते सवर तत्व कहिये ॥ ३१
अथ निर्सरा तत्व यथा
दोहा - जो पूरव सत्ता करम, करि थिति पूरण थान,
सो निर्भरा लखाउ ॥ ३२ ॥
थर्थ-जे पूर्व कालनेविपे घायुविना सात कर्म सत्तारूप हता
कर्म वर्तमान कालमा सत्तारूप के तेनी स्थिति पूर्ण करीने पठी नीरत
विखैरवामां जे जीव उद्यमवत थयो ए निर्जरा जण जाणवु ॥३२॥
थथ वध तत्व यथा
दोहा -जो नव कर्म पुरानसों, मिले गति मिढ होइ, सकति बढावे
वध पदारथ सोइ ॥३३॥
श्रथ मोद तत्व यथा
करै, मोद तत्व सो जानि ॥३॥
स्माना थंसने क्रमे उज्वल करे तेज मोक्ष तत्व जाणवु ॥ ३५ ॥
माला सखी जणावे
थथ नाम माला सूचनिका मात्र लिख्यते श्रथ समुच्चय वस्तुके नाम
.
यह वस्तु नाम ए सर्व ॥३५॥

समयसारनाटक.
३५ए
Pisha
M
.
,
अर्थः-प्रथम सामान्यपणे वस्तुना नाम कहेते. नाव, पदारथ, समय, धन,
तत्व, वित्त, वस्तु, इव्य, इविण, अर्थ, इत्यादि घणां वन्तुना नाम ले. ॥ ३५ ॥
अथ गुरू जीव इव्यके नाम:-
सचेया इकतीसा:-परमपुरुष परमेसुर परमज्योति, परब्रह्म पूरन परम परधान
है; अनादि अनंत अविगत अविनाशि थज. निरउंद मुकत मुकुंद अमलान है;
निरावाध निगम निरंजन निरविकार.निराकार संसार सिरोमनि सुजान है; सरव
दरसी सरवज्ञ सिम सांई शिव, धनी नाथ इंश जगदीश जगवान है. ॥ ३६ ॥
अर्थः-परमपुरुप, परमेश्वर, परमज्योति, परब्रह्म, पूर्ण, परमप्रधान, अनादिय
नंत, श्रव्यक्त, अविनाशी,श्रज, नि, मुक्ति, मुकुंद, यम्लान, निरावाध, निगम,
निरंजन, निर्विकार, निराकार, संसारसिरोमनि, सुजान, सर्वदर्शी, सर्वज्ञ, तिक्ष,
स्वामी, शिव, धनी, नाथ, ईश, जगदीश, नगवान, कहीये. ॥ ३६ ॥
हवे कर्म व्याप्त यक्ष जीव इव्यना नाम कहे:-संसारी जीव व्यके नाम
चिदानंद चेतन अलख जीव समसार, बुरूप यह अशुउपयोगी है; चि
दरुप स्वयंनू चिन्मूरति धरमवत, प्रानवत प्रानि जंतु नूत नव जोगी है; गुनधारी क
लाधारी नेपधारी विद्याधारी, थंगधारी संगधारी जोगधारी जोगी है; चिन्मय अखं
महंस थपर थातमराम, करमको करतार परम विजोगी है ॥३७॥
अर्थः-चिदानंद, चेतन, थलव, जीव, समयसार, वुधरूप, अ६, अझोप
योगी, चिप, स्वयंनू, चिन्मूर्ति, धर्मवंत, प्राणवंत, प्राणी, जंतु, नूत, नवनोगी,
गुणधारी, कलाधारी, नेपधारी, विद्याधारी, थंगधारी, संगधारी, योगधारी, योगी,
चिन्मय अखंड, हंस, अदर, यात्मराम, कर्मकर्ता, परमवियोगी कहिये. ॥३॥
यथ थाकासके नामः-
दोहराः- पं विहाय अंबर गगन, अंतरिक्ष जगधाम; व्योम वियत नन
मेघपथ, ए अकाशके नाम ॥ ३० ॥
• थर्थः-खं, विहाय, अंबर, गगन, अंतरिक्ष, जगधाम, व्योम, वियत, नन, मेघ
'पथ, ए श्राकाशनां नामः ॥ ३० ॥
यथ कालके नाम.
दोहा -यम, कतांत, अंतक, त्रिदस, थावर्ती मृतथान; प्रानहरन, थादित त
नय, कातनाम परमान.॥३॥

दोहा -प्रझा पिपना सेमुखी,धी मेधा मति बुद्धि, सुरति मनीषा चतना थर्प-प्रझा, पिपना, सेमुपी, धी, मेधा, मति, बुद्धि, सुरति, मनीशा समयसारनाटक. थर्थ-यम, कांत,थतक, त्रिदश, थावर्तीक, मतस्थान, प्राणहरए तनप, एवां कालना नाम ॥ ३५ ॥ पुन्यके नाम यथा दोहा -पुन्य सुरुत करधवदन, थकर रोग गुन कर्म, सुखदायक भागबहिर्मुख धर्म ॥४॥ थर्थ-पुन्य, सुस्त, उर्ध्ववदन, अकररोग, गुनकर्म, सुखदायक, नाग, वहिर्मुख, धर्म,ए पुन्यना नाम ठे ॥ ४ ॥ यथ पापके नाम यथा दोहा - पाप थधोमुख एन अघ, कप रोग रखधाम , कनिन कजुध परित, अशुन कर्मके नाम ॥४१॥ यर्थ - पाप, थधोमुख, एन, थध, कंप, रोग, सुखधाम, किविप, थने ऽरित, ए थथुन कर्मना नाम जाणवा ॥४१॥ अथ मोदके नाम दोहा -सिमवेत्र त्रिनुवन मुकुट, शिवमग थविचल थान, शिव, पंचम गति निरवान ॥ १२ ॥ यर्थ -सिवत्रि, त्रिवनमुकुट, शिवमार्ग, अविचलस्यान, मोह, मुकि, उ, निव, पंचमगति थने निर्वाण ॥ ४२ ॥ थथ बुद्धिके नाम यथा पथसरिधि ॥४३॥ यालय, यसविशुदि कहिये ॥४३ ॥ व्यय पिचहण पुरुषके नाम कनिन मोपमुगति - . - समयसारनाटक. ३६१ अथ मुनीश्वरके नाम:- दोहाः-मुनि महंत तापस तपी. निलुक चारितधाम ; यती तपोधन संयमी, ती साधु रिपि नाम. ॥ ४६ ॥ अर्थ.-मुनी. महंत, तापस, तपी, निहुक, चारित्रधाम, यति, तपोधन. संय . व्रती. साधु ए झपिना नाम जाणवां. ॥ ४६ ॥ दरसनके नामः- दोहा-दग्स विलोकन देखनो.अवलोकन गिचाल; लखन दृष्टि निरखननु न, चितवन चाहन नाल ॥ ४ ॥ अर्थ-दर्शन, विलोकन, टेख, अवलोकन. इगचालन, लखवं. दृष्टी, निग्द ग. जो. चितवन. चाहन. ने नाल. ॥ ४ ॥ अथ ज्ञान तथा चारित्रके नाम.- दोहा.--झान बोध अवगम मनन. जगतनान जगलान : संयम चारित था वरण, चरन ति धिग्वान ॥ ४ ॥ अथे. ज्ञान. बोध, अवगम, मनन, जगनानु, जगजान. संयम. चारित्र, याच प्र, वरण, वृत्ती. बर्यवान. ॥४७॥ अथ साचके नाम:- दोहा -सम्यक् सत्य अमोघ सत, निनंदेह निग्धार : ठीक यथारथ उचित तथ, मथ्या धादिधकार ॥ ४ ॥ अर्य-सम्यक्, सत्य, अमोच, नत्, निःसंदेह, निधार, ठीक, यथार्य, उचित, त य. मिथ्या अदने धादि अकार लगाडीने बीतीये तो अमिय्या शदयाय ते प ग एर्नु नाम जाण ॥ ४ ॥ अथ सूतके नाम:- दोहा -यजथाग्य मिथ्या मृपा, वृथा असत्य अलीक; मुधा मोर निष्फल वेतय. अनुचित असत अठीक | U० ॥ अर्थ -अयथार्य. मिय्या. मृपा. वृया, अमत्य. अलीक. मुबा, मोष. निष्फल वितय. अनुचित. असत्य. अने, अतीक. ॥ १० ॥ इति नाममाता ममाता. श्रय ममयसारकं दादा हार वार्गन मवैया कतीला.-जीव निग्जीव करता करम पुस्य पाप, यात्रव नंवर निरज गबंध माप है, नग्ब विशुदिन्यादवाद माधिसाधक चासद चार घरे समसा - - AA नीनो पनाव एक सरखो दाहक ठे, एम जो ग्रहण करिये तो वोथानी एकम फरीबीजीरीते शु६ जीव व्यवस्था कहते थथ जीव व्यवस्था बनवारी : सवैया इकतीसा -जैसै बनवारीमें कुधातुके मिलाप हेम, नाना नाति भयो। तथापि एक नाम है, कसिके कसोटी लोक निरव सराफ ताही, वानके प्रमान की सेतु देतु दाम है, तेसैही अनादि पुनजसों सयोगी जीव, नव तत्वरूपमें गई | महा धाम है, दीशे उनमानसी चद्योत वान तोर गैर, दूसरो न धोरस अर्थ-जेम सोनानी मूसमा चोखु सोनु गादयुथने सोनाथीहीण धातु से इन | तु कहिये, तेना नाम कहे। -रूपु,त्राबु, सीसु,जसत, कथीर, इत्यादि वस्तुनो छु। | दो हेमनी साथे मिलाप थयो तेथी जुदी जुदी जातनु सोनु थयु, ते लता एक मानान लकीर जुये ने तेउपरथी सोनु केतु ते प्रमाण करे, जेम था दस रुपीयाना ना नुले ने था अगीयार रुपीयाना नावनु , ने ते माफक तेना दाम थापे लिए। तेमज थनादि कालथी ए जीव पुगल इव्यनो सयोगी माटे ए जीवे नव व्यवस्था धारी, गतीपणे स्थितिपणे नाजनपरो वर्तमानपणे, थाधारपस। पचि इय्य ग्रहण कीधां थने नवतस्वरूप धारण करया पण एमां कोई घर 'महा तेजवत इव्य रे ते तो कोई प्रत्यक्ष प्रमाणे ग्रहण थतु नथी, थने थनुमन समयसारनाटक पावकमें दहिये : धारुति बिलोकत कहावै धागि नानारूप, दीश एक सुनाउ जब गहिये तसे नव तत्वमें नयो है बहु नेखी जीव, गुबरूप थगुरूप कहिये जाही किन चेतना शकतिको विचार की, ताही दिन अनेदरूप लहिये ॥ ५ ॥ जेम थग्निमां तृण, काठ, वांस घने थारने के बननो वीजो कचरो इन्यादिक ने क तरेना इयण बालीये श्ये ने जेवी जेवी धनी थाहतीएटले (अाकार) तेवीलने थारुतीनो यनी देखाय, एरीते अग्नी नाना प्रकारनारूपनी कहेवायचे, पण ते क्शा तेमज नव तत्वमा जीव जे ते नातनातनो प धारी रह्यो , माटे जीव बदु वेशी के० नाना प्रकारनो थयो एटले शुरूपजीव , ते मिश्रित थयो, त्यारे र जीवने अगुफरूप कह्यो एनु नाम व्यवहार नय ,अने जे दा. चेतना शक्ति विचारिये, ते वखते शुद निश्चयनये केवलीवडे नव नत्वनो ख्य राखीने असदप जीवने,ते सर्वत्र अनेदरूप पामिये गुरु थातमाहि राम है ॥ ६ ॥ . 1 1413

गगनुमानजी को न्या
Prit नमन नागवान मारना नीमनी पर
जाmai:
TERA नयी जायां ॥ ॥
rinोजना की पवित्र पामि ननं नुन र अहि. ने
गाना ?ri नेना नटांन देने
परनुना प्राय यांन.
या सनीला -ममममममम.मानसटल नम पटन
नग परमानमा अनुनी रन ना. नाही कई गिनकर पा
पानमा ना परवानगीन पनि गमोनु जानु
जमारक बाधा मागही दगा। मीन यातु।
--ন দানা না না না না মনে পঃ
- जाप,यननमा धमाग्नापमानामा जाप.प्रा. शेत पारनेमन गुरु नि
श्वयनयना पायरे याराधी पंतगामाने विष परमात्मानो चनुना रहने.त्या मुधी
'काई पण तिविधता न याय, पानपाताना मनना पक्षपात न वन ची नय
नांग 2.0 Zा न पामिये, नय तो ते के पे.जणेरणेने गन्ननु साधन क्राय
'अन यनुनर नो मिस यग्नुनी होप माटे घी अनुनयमां नयनो प्लेग नयी वने
एमां प्रत्यय परोक्षादिकः प्रमाणनो पण प्रवेश नथी, मर जे प्रमाण दोय ते
तो चनिनु साधन पर पण मिस बनने संसाधने ? यने नाम स्थापना श्य
नाव ए चार निदपा ते. तेपण भ्यसिह वम्तनुं साधन को ते. ते तो जेबारें परमा
स्मानो अनुनव सि६ थयो न्यारे निदपाना वसनो विधमज थयो. जेम सूर्यना
प्रकाशवर्ग धधकारनो नाम थायचे. तेम ए सर्व विलय थाय . या परमात्माने
नयप्रमाण निदंपादिक वन्तु जे जे साधक
जे जे साधक वे ते सर्व वस्तु परमात्माना अनुनवमा
वाधक ने ; ज्यांसुधी नयप्रमाण थने निपानी परिवार होय त्या सुधी गुमश्रनु
नव न होय एटलामारु ए वाधक वे. वाकी राग प दगानी यं वात केवी! तिहा
तो नयाटिक कहेवाज जोश्ये. ॥ १ ॥
हवे श्रनुनवमां गुE मप जीवज लरख्यो तेनी व्यवस्था वचन गोचर जेवी
दोय तेवी केदे। -यय जीव व्यवस्था विवरन हार.
अडिन उंद.- थादि यंत पूग्न सुनाव संयुक्त है; पर स्वरूप परजोग कलपना
मुक : मदा एक रस प्रगट कही है जनमें, शुरु नयातमवस्तु विराजे वनम॥६॥

No text on this page.

समयसारनाटक. ३६ए - ना स्वनावने मूकतो जाय धने पोताना यात्मानुं ध्यान करे. अने अनुनवमां प्रका शरुप देग्वे. तारे कर्म कलंक तेहिज पंक के कादव तेथी रहित प्रगटरूप अचल धवावित सर्व वाध रहित एवो शाश्वत निरंजन देव परमात्मा पोते ते, एवं देखे. अथ गुन गुनी अनेद कथन व्यवस्था . सवेया तईसा---गुनयातम धातमको अनुभूति विज्ञान विनूतिहि सोई वस्तु विचारत एक पदारथ नामक नेद कहावत दोई : यों सरवंग सदा सखि यापुहि, आ तमध्यान करै जव कोई मेटि अशुद्धि विनावदशा तव सिघसरूपकि प्रापतिहोऽ६५ अर्थ.- हवे गुम धनुनव जे वे ते गुण ठे, एक धातमा गुणी छे, तेनुं जेवू बजेद स्वरूप वे तेवी बनेट अवस्था कही वतावेजेः- गु६ निश्रय स्वरुपी धात्मा नो अनुभूति के जे अनुनव . तेज विज्ञान विनूती के विशेष रूप ज्ञान संपदा ने यही प्रात्मा गुणी वे ने अनुनवज्ञान गुण . हवे ए वे वन्तु अ॒ वे ? एवो जो विचार करीये तो एकज यात्म पदार्थ नासेते. एकज पदार्थमा श्रा गुण यने या गुणी एवां वे नाम . तेज नेट केवायठे. एम सरवंग के सर्व प्रकारे पोतानेज गु एणगुणी रूप लखीने जागे कोई यात्मध्यान करे, तारे अगुडविनाव दशा मटीने सिवस्वरूपनी प्राप्ति थाय. ।। ६५ ।। अथ ज्ञाता चिंतवन स्वरूप कथन. सवैया इकतीसा.-अपनेही गुन परजायसों प्रवाहरुप, परिनयो तिहूं कालप ने थाधारसों;अंतर वाहिर परकासवान एक रस, खिन्नता न गहै निन्न रहै ना विकार नों, चेतनाके रस सरवग नरि रह्यो जीव, जैस लोन काकर नर्यो है रस ठारसों; पूरन सरूप अति उज्वल विज्ञान धन, मोकों होदु प्रगट निशेष निरवारसों ॥६६॥ अर्थ.- हवे एज वातने जेम झाता लोक पोताना चित्तमां चिंतवे तेज स्व रूप कहीं देखाडे वे.- या जे कोई यात्मा केवायवे, ते तो विज्ञान घन : विशे। प ज्ञानमय एक पिंम ते यतीत अनागत ने वर्तमान ए त्रणे कालमा प्रवाह रुप कस्वाथी अविछिन्न धाराये पोतानाज गुण पर्याये करीने पोतानाज ज्ञानादिक रणनी अवस्था नेदने लीधे अने पोताना थाधारथी परना थाश्रयविना परिण म्यो रहे . अने ए विज्ञान घननी एवी महिमा के के तेथी माहे घने बाहिर ए कचित्त चेतना रसवडे प्रकाशवान थयो जे पोताने जाणे ते अंतर प्रकाश धने वाह्य वस्तुने जाणे ते वाहिर प्रकाश एवा कार्यमां खिन्नता ग्रहण न करे; यने नव विकारथी न्यारो रही सर्व प्रदेशविपे चेतनना रसे करी जीव नरपूर थई रह्यो

No text on this page.

समयसारनाटक. ३१ न अविचल अविकार निर्मल रूप से. निश्चय नय ने व्यवहार नय ए वन वे ते सम्यक् दशामां प्रमाण ; जे नय वे ते तो अभिप्राय विशेष वे, माटे एकज अ क्त रूप निर्मल तथा समल रूप जाणिये. एम समकाले निर्मल अने समल जीवनी रणति थई रही ठे, ते श्री जिन देव कहे ते अने गणधर देव सर्द हे . ॥६॥ अथ व्यवहार कथनं. होहरा:- एक रूप पातम दरव, ज्ञान चरन दृग तीन ; जेट नाव परिनाम i, विवहारे सु मलीन. ॥ ६॥ अर्थः- हवे ज्ञान दर्शन चारित्रनो त्रिक ते व्यवहार नययी थाय : ते क -यात्म इव्य जे वे ते एकरूप ने, ने ज्ञान दर्शन चारित्र ए त्रए जे वे ते ने नाव परिणाम वे; त्यारे एकविपेत्रण नेट थया तेथी ए व्यवहार नयवडे समल प ययु.॥ ६ए । अथ निहचे स्वरूप कथन. दोहराः-- यदपि समन विवहारसों, पर्यय शक्ति अनेक; तदपि नियत नय खये, गुरु निरजन एक. ॥ ७० ॥ अर्थ-निश्चयनयेकरी निर्मल स्वरूपमांज ध्याव, नखं ते केहे-यद्यपि व्यव रिनयनी अपेदाथी यात्मानेविपे अनेक शक्ति अनेक पर्याय देखायवे : माटे ते मल ठे; तोपण निश्चय नयनी अपेक्षाथी छु निरजन एकज जाण्यामांबावे.७० अथ गु६ कयन. दोहरा:-- एक देखिये जानिये, रमि रहिये इक तौर ; समल विमल न विचा ये, यहे सिदि नहि धीर. ॥ ७१ ॥ अर्थः- हवे शुरूपीज उपादेय वे एवं केहेरे:-जे एक गुरू चेतनामय रू ज देख ते दर्शन, तेमज जाणवू ते झान: अने तेमां जे रमि रहे ते चारित्र ', ते नयनी अपेदावडे समल अथवा विमल रूप विचारवू नही. एहिज सिम हिये, पण वीजा स्वरूपमा लिद नथी. ॥ १ ॥ अथ गुरु धनुनव प्रशंसा. सर्वया इकतीसा:- जाके पद सोहत सुलहन अनंत ज्ञान, विमल विकासवं । ज्योति लहलही है; यद्यपि त्रिविध रूप व्यवहारमें तथापि, एकता न तर्ज यों नेयत थंग कही है ; सो है जीव कैसीहू जुगतिक सदीव ताके, ध्यान करिवेकों ..

| उनागे नारो न्यारो उद दलसों, याते थिर रहे थनुनी विज्ञास गह सिरिया A , सर्वया तेईसा--के अपनो पद यापु सॅनारत, के गुरुके मुखकी सुनि वान थर्य -- हवे नेद विज्ञानवडे एनो अनुनव थाय ने तेथी मुक्ति मने तर मार्थ कहेवे- कोई तो पोतानु पद जे पोतानु निरालब स्वरूप, ते पातेन सम्म ने पोताने उजखेडे यने जेना घटमा जड चेतननु नेद विज्ञान जाग्युत वर्ग, ने पोतावडे ग्रथीनेदकरी पोताने उलखेने कोई तो गुरुना मुखनी वाणो शान | पोताना चेतन रुपनी जे न्यारी कला , तेनी राजधानी जे तेनु विरपतु जना पटमा प्रगटघु, यने एज राजधानीमां बनत नाव पदार्थ प्रतिविधित पाता झायक थया एटले जीवता थकाज मोद दशा तरी मुक्त स्वरूपीथपा परत यनतनाव प्रतिबिक्ति थया तोपण समलरूप न थया, तेथीते मनुष्य दर्पण ले थारीसानीपरे विकार रहित थया, स्थिररुप थया, अने सुखदायक' नादिको पग्यो कर्म मजसा, उदो करै नेदशान महासचिका निधान, र सबैया शतीसा-पाही वर्तमान समै जव्यनिको मिट्यो मोह लग्या है। ३७५ समयसारनाटक. मेरी मनसा उमही है, जाते अविचल सिमि होतु धीर नाति सिब,नादि नाहि यामे धोखो नांहि सही है ॥ २ ॥ थर्थ - हवे एवा स्वरूपनो धनुनव स्थिर रहेवो ते उर्जन डे, माटे सर्व एनो मनोरथ को जेनेविप अनत ज्ञानरूप सुजवण शोने, बने। काशवत के पोतानो तथा पर जाणवु एवी ज्योति जेनेविपे लहनहीं के ने यद्यपि व्यवहारनयमा वाह्यात्मा, अतरात्मा, तथा परमात्मा ए त्रिविध ने, तथापि निश्चयनयनी थपेक्षाथी एकताने त्यजे नही ए७ एकरूपी क्युके एवो पदार्थतो जीव हवे ते युक्तियाकरी बागल केहेही ते युक्तिपेस्रो" तर तेनु ध्यान करवाने मारी होस मनमा उमगी रहोठे जेना ध्यानयो नी ज्ञान दर्शन चारित्ररूप इति अविचल थायठे, एज रीते सिम ले पण कोई प्रकारे सिदि नथी एमा कई धोखो नथी एटजे तु नथी एज वात सावं अथ ज्ञाताकी व्यवस्था वर्णन नेद विज्ञान जग्यो जिनके प्रगटे सु विवेक कला रज धानी, नाव यनत प्रतिविधत, जोवन मोप दशा हरानी, ते नर दर्पनज्यो अविकार रहे पिर सदा सुखदानी ॥ ३ ॥ थथ नेद ज्ञान प्रशसा कथन . 'यपा समयसारनाटक. ३३ अपनप न कंद पुदगलमों ; यद करतृत्ति यों जुटा कर जगतला. पावकज्यो नि कंचन उपलनों ।। ४ ।। अर्थः- दवे नेदविद्याननी उत्पत्ति चने महिमा कडेने-था वर्तमानकाल थेपे नव्यलोकनो मोद म टली जाय जे मोह कर्म यात्माने अनादिकालयी नाग्यु : श्रने कर्ममलमा व्यापी रह्योने : ने मौद व्रम मटवाथी नेट विज्ञाननो दिय घाय. ते नेद विज्ञान केचुने ? महासचिनुं निधान . ए नेट विज्ञानमा पदोटी सचि पामीये ठिये एटने महारुचिद् कारण . नेट विहानयी गरिष्ट उर जवाबूं प्रगट श्रायते, ते अजवालु केले ? एटले महा घाम घुमयी न्यागेचे ६६ दशाथी नीकली स्थिरतामा रहे, थने ताना धनुनबनो विलास ग्रहण करे. पोताने सत्यार्थ पणे जाणे. पठी ए नेद 'वेडान पाम्या थकी शरीर कर्मादि पुगज रुपी जाणीने पोतानुं न कहे. यात्मारू न कहे करतूति के० ए जे नेद विज्ञाननी क्रिया तेज जगतथी जुदाईने करे, पां ३ इव्यथी जुदाई करे, श्रदी दृष्टांत बतावेते.- जेम अनी माटी पापाएने कंचन मी जुदी करे ये तेम जाणी जेई ॥ १४ ॥ थथ परमार्थ शिक्षा कथन. सवैया इकतीसाः- वानारसी कहै नया नव्य सुनो मेरी शीरव, केहू नांति के हूके एसो काज कीजिए ; एकहू मुहूरत मिण्यातको विध्वंस होश, ज्ञानको ज गाई श्रंस हंस खोजि लीजिये; वाहीको विचार वाको ध्यान यहै कोतुहल, यों ही नरि जनम परम रस पीजिए ; तजी नववासको विलास सविकासरूप, अंतक र मोहको धनंत काल जीजिए. ॥ ५ ॥ अर्थः-हवे शुद्ध जीवव्यमा रहे तेज परमार्थ वे तेनी शिदा कहेः-- व णारसीदास केहेते.- अहो नाई नव्य जीवो, मारी शीक्षा सांजलो. केवीपण रीते यी कोई इव्य देव काल नाव पामोने एवं काम कर के जेणे करीने एक मुहुर्तमा त्रमा मिथ्यात मोहनो विध्वस थाय थने झाननोथंत जगावी जेवो,यने सोहं हंसो एवी ध्वनि करतो हंस जे यात्मा तेने खोजी लश्यें. पठी तेनु लण विचार, पठी तेने शोलखीने तेनुं ध्यान करवू, एवी एनी कला खोजीने कुतोहल जे खेल ते करया करियें : घने तेज जनम परियंत परम रस पीवो. एरीते सविकार रू पथी फेली रह्यो एवो नववासनो विलास तेने तजीने तथा मोहनो अंत श्रा पीने अनंत कालसुधी जीवीए एटला प्रकारे सिम थवाय. ॥ ७ ॥ प

No text on this page.

समयसारनाटक. ३७५ अचल कयुंठे, पण निरंतर अचल आसन संनवे नही एवा जिनराजदेव जग मिां जयवंत थाम्रो जेनी रूडी नक्ति करवाथी महामुक्ति फलनी प्राप्ती थायले. यथार्थ कथन:- - दोहरा - जिन पट नाहिं शरीरकों, जिन पद चेतन माहि; जिन वर्नन कनु और है, यह जिन वर्नन नाहि. ।। ७ ।। अर्थः-एटली व्यवहार स्तुति करीने हवे सत्यार्थ वात कहे :--एजे जिन नाम ते जीव विपाकी वे पण पुजज विपाकी नथी, तेथी जिनपद ते शरीरनो नथी, नि पद तो चेतननो वे; तेथी जिनेश्वरनी स्तुति कोई धोरज वे पण पूर्वे जे जिनेश्वर जी स्तुति करी ते जिन स्तुति नथी. इहां शरीर जड ठे धने यात्मा चैतन ए वने ताव निन्न स्वनावमा ने तेनुं दृष्टांत थापेठे.॥ ७ ॥ अथ जड चेतन निन्ननाव दृष्टांत कयनः-- - सवैया इकतीसाः--उंचे उंचे गढके कंगुरे यों विराजत हैं, मानो नन लोक ली लवेको दांत दियो है ; सोहे चिहोंडर उपवनकी सघनताई, घेरा करि मानो नू मे लोक घेरि लियो है; गहरी गंजीर खाई ताकी उपमा वनाई, नीचो करि आ जन पताल जल पियो है ; ऐसो है नगर थामें नृपको न अंगकोउ, योंही चिदानं सों शरीर निन्न किया है। पुए । अर्थ:-जेम कोई गढना उंचा उंचा कांगरा वीराजे ने (अहिं कवि उत्प्रेक्षणा क वे.) पण ते कांगरां नथी पण मानु हुँ जे श्रा नगरमा स्वर्गलोकने गली ज बाने टांत याप्यां : एटले जाणे स्वर्ग लोकने गली जशे. अने एनी चारे तरफ (उपवन एटले वाग वाडीनी सघनता एवी शोनी रही ले के जाणे नूमिलोक एट नि मनुष्य लोक तेणे घेरी लीयो . धने ए नगरनी चारे वाजुए उमी खाही बनी ते जाणे नीचुं थानन एटले मुख करीने पातालज पाणी पातो होयनी हरीते जेणे त्रणे लोक जीत्या वे एवं नगरनुं वर्णन कीg पण ए नगरमां कोई दाजाना अंगर्नु का वर्णन कीधुं नथी. मतलब के चिदानंदथकी शरीरने निन्न करी बताव्यु. ॥ ७ ॥ अथ तिर्थकरकी निह स्तुति सरुप कथन वस्तु वर्णनं. सवैया इकतीसा:-- जामें लोकालोकके सुनाउ प्रतिनीसे सब, जगी ज्ञान सग ते बिमल जैसी थारसी; दर्शन उदोत लियो अंतराय थंतकी, गयो महामोह जयो परम महारसी; सन्यासी सहज जोगी जोगसों उदासी जामें, प्रकृति पंचाशील ;

न पामे, जेना सहज करीन मानीए, ते कारण तननी स्तुति करी ने नि , , एमो जिनराज-शरीर भने थात्मा एबने व्यवहारमा एक सरखाने निधन। थर्थ-दो पदावे. एमाटे तननी स्तुति करता जीवनी मुनि य मीने मर्ण पर्यतटीची जोतो ते मिच्या स्तुतिः जिनपद कर्म जले। पाणु पाणु विपाकीनयो. तेथी जिन तेजीवले थन नोरने नित नम जेर्नु मन यचत ठे, नथर चिरकाल गडी वसुधा महिनरि महानीTTA अम्बेदरहित निमन रहन स्तुरूप कथन शांत करी हिवाश्यतुह- ३७६ समयसारनाटक. गि रहि जरि वारसी, सोहै घटमदिरमे चेतन प्रगटरुप, ऐसो त्रि ताहि बंदत बनारशी ॥६० ॥ अर्थ.- हवे तीर्थकरपदने लेई रहेली जे वस्तु तेना स्वरूपर्नु जेमा लोक थने थलोकनो स्वनाव एटले खट इव्य नाव प्रतिनासी रहे न शक्ति निर्मल प्रगटी जेम थारीसामा पदार्थना नाव नासेठे, एवी झानमा सर्व नाव नासे , एटले ज्ञानावरण गयु, थने दर्शनावरणमा थी केवल दर्शन ज्योत थयु.थने अंतराय नाश करो, तेथी थयो; थने महा मोह कर्म जे ते नाश पाम्यो, तेथी परम आतू. १८५, यो, तेणे करी यथारख्यात चारित्रनो सन्यास एटले तेनो १५ चारित्र आदि जे सहजयोग से तेनो धरनार,मन वचन कायना । थपातिक चार कर्मनी पयासी नाते पण बनने से वी थई रही,थने जेना घटमदिरमा चेतनदा ते प्रगटपणे शादी एवा श्री जिन राज देव तेने वणारसीदास वदन ए निश्चय स्तुति कर हवे एवा गुम चेतननी स्तुतिनु दृष्टात देखाडीने हो निश्चय व्यवहारको करेजे. अथ श्री निश्चय व्यवहार तीर्थकर स्तुति करन कवित्त बंद -तनु चेतन विवहार एकसे, निहचे नि निन्न है दाइ, " सवे विवहार जीव धुति. नियत टि मिथ्या थुति सोऽ, ननमा जीत इन रूप महावर. तनु जिन एक न मानै कोइ, ता काग्न तनक 1 प्रस्तुतिमा निरमजद ति नहि दोश् ॥ ७॥ र N ." । - भने जेनेरिप चोजीमय॥ परि, जो हगवत तिन्हें सब सूजी समयसारनाटक. ३७५ . bar । अचस कडं, पण निरंतर अचल आसन संचवे नही एवा जिनराजदेव जग मां जयवत थायो जेनी रूडी नक्ति करवायी महामुक्ति फलनी प्राप्ती यायचे. यथार्थ कथन:- दोहरा:- जिन पद नाहिं शरीरकों, जिन पद चेतन मांहि; जिन वर्नन कलु और है, यह जिन वर्नन नाहि. ॥ ७ ॥ - अर्थ:-एटली व्यवहार स्तुति करीने हवे सत्यार्थ वात कहे :--एजे जिन नाम ते जीव विपाकी पण पुजन विपाकी नथी, तेथी जिनपद ते शरीरनो नथी, नि जपद तो चेतननो वे; तेथी जिनेश्वरनी स्तुति कोई थोरज वे पण पूर्वे जे जिनेश्वर की स्तुति करी ते जिन स्तुति नथी. इहां शरीर जड वे थने यात्मा चेतन वे ए बने ताव निन्न स्वनावमां तेनु दृष्टांत थापेरें. ॥ ७ ॥ अथ जड चेतन निन्ननाव दृष्टांत कथन:-. सवैया कतीसा-उंचे उंचे गढके कंगुरे या विराजत है, मानो नन लोक ली नवेको दांत दियो हैसोहे चिहावर उपबनकी सघनताई, घेरा करि मानो नू मे लोक घेरि लियो है; गहरी गंनीर खाई ताकी उपमा बनाई, नीचो करि श्रा जन पताल जल पियो है: ऐसो है नगर वामें नृपको न अंगकोउ, याँही चिदानं सो शरीर निन्न कियो है। ए !! धर्थ.- जेम को गटना उंचा उंचाकांगरा वीराजे - (यहिं कवि उत्प्रेणार वे.) पण ते कांगरां नथी पण मानु हुँ जे था नगरमा स्वर्गलोकने गली न ने दांत थाप्यां वे ; एटले जाणे स्वर्ग लोकने गली जगे. अने एनी चारे के. उपवन एटले वाग वाढीनी सघनता एवी गोनी रही है के जाणे मित्र जोयु मनुष्य लोक तेणे घेरी लीयो वे. बने ए नगरनी चार वाजुए उम्री ते वन्त्र बनी ते जाणे नीचे थानन एटले मुख करीने पातालज पाणी पात्यांग गं रीते जेणे त्रणे लोक जीत्या वे एवं नगरनुं वर्णन कीथु पण एग मनी ताजाना अंगनुं का वर्णन की\ नथी. मतलब के चिदानंदयकीननी निनाद करी वताव्यु. ॥ ७॥ : पर अथ तिर्थकरकी निह स्तुति सरुप कयन वस्तु । सवैया इकतीसा.- जामें लोकालोकके सुनाउ प्रनिनीनं बात कहः- ते विमत जैसीथारसी; दर्शन उदोत जियो धंतराय धन रम महारती; सन्यासी सहन जोगी जोगमा उदानी अन्नना जर नि थर्य जेमकोई नाचनारी स्त्रीथाडो पट करीने तया वखा नपण' 1 1 रो विश्राम पाम्यो ते स्थिरता पामीने पोताने विपेज पोतानो सहन सना तेनु ग्रहण करीने सहज स्वनावमा राग ऐप मोहरूपी विनाय जे. 'हतो ते मटी गयो यही दृष्टात कहे जेम पाफी स्टनी नतीमा गाना। निर्मल थायठे, तेम शुक्ष चेतन निर्मलरूप थईने प्रकाश रूप थयो । हवे विनाय नूटपाथी निज स्वरूप प्रगटताने पामे तेउपर नदी ना वी, तेनु दृष्टात कही देसाडे -अथ वस्तु स्वरूप कथन पातरको दृरत- निशि थाडो पट करिके मुह र दीरटि सवारि पट दृरि कीजे सामान सर्वया झतीमा-जैरी कोन पातर बनाय वस्त्र थानर, थाति क दे दृष्टि धरिफ, तेरी शान सागर मिय्यात ग्रथिभेद करि नमा रह्यो तिद् लोक नरिके ऐसो उपदेस मुनि चाहिये जगत जोर ३७ समयसारनाटक. पनी टेकहो, मोह कर्म मम नाहि नाहि 'नम कूप है , शुद्ध चेतना मारो रूप है. ॥ ४ ॥ थर्थ - विचक्षण पुरुप केहेते के, ढुं सदा एक पणे रदु तु , चेतना रपूर इं, यने पोताना आधारथी रह छ, मने बीजानो याश्रय नयी जातनो मोह कर्मनो प्रपच ठे ते महारु स्वरूप नथी, ए चम स्वरूप नथी, पण शुक्ष चेतनानो सिधु के समुइ ते मारु रूपवे ॥ हवे एवा पोताना स्वरूपने जाण्याथकी केवा अवस्था प्राप्त घई ते केर- अथ शान व्यवस्था कथन सवैया इकतीसा तत्वकी प्रतीतिसो लख्यो है निज पर गुन, हा न त्रिविध परिनयो है, विसद विवेक यायो बाठो विसराम पायो, पनो सहारो सोधि लयो है, कहत बनारसी गहत पुरुषारथको, सहा सों विनाउ मिटि गयो है, पन्नाके पाय जैसे कचन विमल होतु, तैन तन प्रकाश रूप नयो है ॥ ५॥ एवी जी तत्वनी प्रतीति थई तेणे करीने ज्ञानादिक निजगुण अने पर जा व्यना गुण जे गति, स्थिति, अवगाह, वर्तना, वर्णादिक एस4 cr झान थने चारित्र एत्रणे गुणने विषपारणमा रह्यो । निर्मल विवेक । धो लीयो बही वणारसीदास फेहेने के त्यारे या पुरुषार्थ ते ३ , . जग जाजमा निफरिक ॥६॥ सुहना समयसारनाटक. 3 मनोहर बनावीने सतना बरखते बरवाडामांधावीकनी रहे. ते धाडा पटथीरा नविपे देवाय नही. ने जारे अंतरपट दृर करी बेनु तरफ दायमां काकढा मलगावी रेचय दूर करे त्यारे सर्व मनाना लोक दृष्टी धरीने तेनां रुप सणगार वगैरेनी शो प्रगट जोर्ड रीके ने. तेम हाननो सागर एवो जे श्रात्मा, ते मिथ्यातरुप पाडा थी प्रवन्न रह्यो दतो. ते कोई समे मिय्यात ग्रंचीप पटने नेटीने प्रगट थ डान नमुश् त्रण लोंक्षे नरी रह्यो ने ; एटले त्रणे लोक ए श्रात्माने पै नानी न्ह्या वे. दवे गुरु कंडेने के दो जगतवानी जीव. में जे पूर्व उपदे दीयो एवा उपदेगनुं श्रवण करवं तारे जरुरतुं ; ते सानली जगत जाल थी निकलीने तारी गुरु दशाने संचारी लेस. ॥ ६ ॥ ति श्रीनाटिक समयमारना प्रथम जीव हारनुं निरुपण वालबोध सहित समाप्त थयुं. दोहग.-जीव तत्व अधिकार यह, कह्यो प्रगट समुजा; अव अधिकार य तीवको, सुनो चतुर मन ला ॥ ७ ॥ अर्थ-जीवतत्वनुं जेवू स्वरूप तेनो ए अधिकार एटले स्वरूप, लक्षण, गु -J, प्रगट समजाव्यो. हवे बीजो जे यजीवधारते, तेमां यजीवनो अधिकार ग्व्यपणे करीने कर्बुवं; ते चनुर लोको चित्त दईने सांनलजो ॥ ७ ॥ हवे अजीवने पण ज्ञानवडेज जाणवानुं बनेठे घने था ग्रंथमां अनिध्येय ज्ञान प्रटे संपूर्ण ज्ञाननी अवस्था निरुपण करेठेः-थथ ज्ञानकी व्यवस्था कथनः- सवैया इकतीसा -परम प्रतीति उपजाई गनधरकीती, यंतर अनादिकी विना बिदारी है; जेदझान दृष्टिसों विवेककी सकति साधि, चेतन अचेतनकी - निरवारी है ; करमको नासकरी थनुनी अन्यास धारी, हियेमें हरख निज ता संजारी है ; यंतराय नास गयो गुफ परकास नयो, ज्ञानको विलास ता टना हमारी है. ॥७॥ 'थ.--प्रथमथी जे ज्ञानवडे नव्य लोकना यात्मामां गणधरनी माफक तत्व म प्रतीति उपजावी, यने समकालपणे अंतरात्मानेविपे अंतरनी जे घना बनावता (मूढता ) तेने विमारी ; यने जड चेतन ए वने निन्न वे एवु प्रगटयुं तेनी दृष्टी तेज विवेकनी शकति ते साधि एटले जुटा जुदा गुण अने जुदा जुदा जाणीने चेतन तथा जड तेनी दशा ठीक की ठी गुण श्रेणीने धरीने णेणे कर्मनी निर्जरा करवा लाग्यो; ते करी नाण्या;

- . नथी, अने थानगइध्यानथी अज्ञान दशामां सकटप विकल्प घणा ने र थात्मानेविपे विकार नपजे माटे तेना शिकारने तजोदे, श्रने एकाना वो देख थने तेमा एक उज्वल कमल जोश्ये ते कमल तुरने श्रने न रुपने नीरे मधुकर रूपे था, एम करवाथी तु सहस्त्र दन कमनमा दिनाना एपिमस्य ध्यान लगाव्य एटलु कार्य करवायी पोताना बरुपनी प्रातिन अर्य-चेतनायत नेथने यनत गुणसहित जे पदार्थ ताबा ១០ समयसारनाटक अनुनय अभ्यास कीयो, एटले सत्य प्रत्ययमा पेगे, अने हश्यानेविगे हा धने पोतानी शक्ति उत्कृष्ट कीपी ए कार्य पता थतराय कर्म नांग्पु, रूप प्रकाश पाम्यु, एवो कोई कमेकमे करी ज्ञाननो विनास इत्यात ने मारी बदनावे ॥1॥ शिष्य पूढे के स्वामी, तमे जे ज्ञान विलाम कहो, तेतो तेवोज ३.; ते पामतु दूर्लन , ते उपर गुरु परमार्थनी शिक्षा दिये -- अथ दा कथन - सवैया कतीसा -- नैया जगवासी तू उदासी है जगतसो, एक 3e" पदेन मेगे मानु रे और सकलप विकनपके विकार तजि बदके एक्त । गेर यानु रे, तेरो घट सर तामे तुदी है कमन ताको तही मधुकर है रे,प्रापति न है है कबु ऐसो त बिचारतु मही व्हे प्रापतिसरुपयाही जादु अर्थ - अरे जीव जगतवामी नाई तु जगत के० नब ब्रमणा तेलु का (शब्द स्पर्श, रूप, ग्सने गा) एने पाचाराम सत्रना वचनयी नगन । तेथी उदास थने, एक ठ महिना सूची अखम धागए मारा उपदेश एटले मान्य कर 'एमा उमदीना कला ते उपलक्षणची जाणवा, पर सी मनने एक काणे परिणामयी खाट के शरीर तेनेन रूपनी प्राप्ति था, एज गते गुणज्ञान खुलतो ॥ rep {{ हवे जीपने अजीर एक सरखा थई रह्याने, ते जुटा जुदा १५ यथ वस्तु व्यवस्था वर्णन दोहा - चेतनात श्रनत गुण, महित सुयातमराम सर पुनके परिणाम ॥ ॥ पान यकिन समयसारनाटक. ३ - --- जाणवो; अने जे एटलां लदपोथी मलेला नथी ते सर्व अपर पुजलना परिणाम गणवा. ॥ ए॥ हवे एवी पिडान थनुनवविना न होय माटे अनुजवनी प्रशंसा कहे।:- अथ अनुनव प्रशंसाः- । कवित्त ढंदः-जव चेतन सॅनारि निज पौरुष, निरखै निज हगसों निज मर्म; व सुखरूप विमल अविनाशक, जानै जगत शिरोमनि धर्म; अनुनी करै शुद्ध तनको, रमै सुनाउ व मै सव कर्म; इहि विधि सधै मुक्तिको मारग, अरु समीप प्राव शिव सर्मः ॥१॥ - अर्थः-ए चेतन जे जे, ते जारे पोतानुं पुरुप के पराक्रम संजारे, ने पवे पोतानी टीकरी पोतानुं मर्म जे चेतनपणुंठे ते निरखे; त्यारे पोतानो धर्म के स्वनाव सुख रुप जे निर्मल पणुं, अविनाशी पणुं, जगत शिरोमणी :पएं, सहज स्वरूप तेने नाणे. एज अनुनव एटले जे निःसंदेह यथार्थ ज्ञान ने तेज चेतनने गुरु करेठे, अने एज अनुनव जे ते पोताना स्वनावमा रमे अने सर्व कर्मने दूर करे, एरोते अनुनववडे मुक्ति मार्ग सिह थायवे; अने शिवशर्म के मोदनुं सुखते पामेठेए? हवे ए यनुनवथकी चेतनविपे पोतार्नु अस्तित्व साधीने परतुं नास्तित्व साधेवे:- अथ अनुनय प्रशंसाः- दोहराः बरनादिक रागादि जड, रूप हमारो नांहि ; एक ब्रह्म नहि दूसरो, दीसे धनुनव माहि. ।। १२ ॥ श्रर्थः था शरीरमा जे वर्ण गंध रस स्पर्श राग देपादिक पदार्थनेविपे मोह ने ते मारु श्रात्मरूप नथी; अने अनुनवविपे पोता, एकज जाणपणानुं रूप श्रमे जोश्ये उश्ये. पण वीजुं रूप जोता नथी. ॥ ५२ ॥ । हवे जीव यजीव एक देवावगाही थया ते जुदा केम केहेवाय? ते उपर दृष्टांत :-अथ वस्तु विचार--- दोहरा-- खामो कहिये कनकको, कनक म्यान संयोग; न्यारो निरखत म्यान सों, लोह कहैं सब लोग. ॥ ए३ ।। थर्थ:-जे सोनानी म्यानमा राखेली तलवार लोक जापामां सोनेरी केहे वायवे, ते सोनेरीनो योगतो म्यान उपर वे; जारे तरवारने सोनेरी म्यानमाथी वार काहाडी जोश्ये त्यारे तरवार लोढानी जणाय, पण सोनेरी नही जणाय. तेम यंतरात्मा मांहे जाणवो. ॥ ३ ॥ - .. --more जीर पदार्य जुदो जाएगो, तेनु वर्णन करने हा ३४ . . 1 'लका, थवधिकों ध्याच मनपर्येकी अवस्था पावै, उमगिके थावे परमावकितना याही जाति पूरन सरूपको नद्योत घर,करे प्रतिविवत पदारथ सकलका ॥ थर्य-जेम एक लाकडाने करवती वेहेरीने वे नाग करे ने जेम । के नेदहान प्रगटे ते पोतानी नेदक शक्तिवडे चिदानद तथा पुजन एरो' | नी थपिने ध्यावे एटले पोतानी यवधि झानरूप पर्यायने पामे, पडी हिर | वधि सुरी पोचे, एम वधते वधते नेदज्ञान यकी पोतानु पूर्ण साप वातान झानथी विद्यक्ष थयेनु मनपर्याय थवस्थाने पामे,थने तेथो विद्युत धन पाय इनी श्री समयसार नाटकनो बीजो थजीववार वालाववोर सहित समात पर बोहरा- यह यजीव थधिकारको, प्रगट बरखाम्यो मर्म, थन मनुजीवा बर्ष-यजीव दार एरीते समजावीने करो थने एनु रहस्य एक या समयसारनाटक कोतुक, सो जलिये वरनादि पसारो, मोहसँ निन्न जुदो जडतों चिन, : टक देखनहारो॥ एए॥ अर्थ - या घटमा अनादि कालनो विस्तारवत चमरूप महा या खाडो ममा रह्यो , ते अखाडामा वीजो कोई शुक्ष स्वरूप तो अने पुशन व्य जे वे ते अत्यत महोटो नृत्य करी रह्योडे, एज अविवेकनी झा ते अजीव पुजल इव्य ले तेहिज एकेहियादिकना वेपमा लेबरावी रवी वर्णादिकना पसारनी सामग्री लेवरावी कौतुक देखाडी रह्यो । वेकरूप जे ने ते मोहथी जे पुज जड तेथी दो ले तेहिज विनमूर्ति चेतन राजाले ते तो हा नाटिकनो देखनारो वे ॥ एए ॥ हवे जे जीव अने यजीवन एकतापणु मिथ्या ज्ञानमा नासेठे, तेतो , थी निन्न निन्न रूप देखायडे, ते कहे। -अथ ज्ञान विलास कथन सवैया इकतीसा - जैसे करवत एक का वीचि कम करै जैसे राहत दूध जजों , तेसै दशान निज नेदक शकसित, निन्न निन्न कर चिदान पुरु दूपने पाणी एकता होय तेने जुदा जुदा करी नाखे ने तेम जेने य तेने जुदा जुदा करे। थने तेज दज्ञान पोताना योपशम - - - ५ " १ संके, करता किरिया कर्म ॥ ११ ॥ . ग समयमारनाटक. 3 . विष बनामकियानो विचार यनं अजीवनविषं पण कामक्रियानी Tर गुम कंदन ने शिष्य जाननेनं ॥ ११ ॥ दवे कापणामा जीवनी मिय्या दृष्टि से ते नेदकानयी वुटे. माटे नंदज्ञा नु मादाम्य बने-अथ नेट ज्ञान मादात्म्य वर्नन- नया ऽकतीनाः-प्रथम श्रहानी जीव कह मं नदीव एफ. दृन्नरो न धार में कन्ना कमको: अंतर विवेकण्यायोग्रापापर नेट पायो नयों बोध गयो मिटी माग्न नग्मको ; नाग नदों दरवक गुण परजाय सब. नाम खवख्यो मुख पूर '' पग्मको: करमको करतार मान्यो पुढगज पिमायापु करतार नयों धातम धरम जो. ॥ ॥ जादि लन जीव देदवुद्धिको विकार तज. वेदत नरूप निज नेटत न मको ; महा पग्चम मति मंगन घसंम रस. अनुनी अन्यात परकासत परम : तादी नम घटमें न रद विपरीत नाव जन तम नास नानु प्रगट धग्मको; "मो दद्या था जब नायक कहावं तब, करता व्ह कस कर पुजन करमको.॥३॥ अर्य-प्रथमयी श्रद्धानी जीव जे ते. ते पोताना रुपनी नूनवडे एमज कहते 5 निम्तर कर्मनों का ढुंज दु, बीजो कोई नयी एरीने जीवनी अपेक्षा लईने मनो कता वन. पठी जारे घटमा विवेक प्राप्त थाय, त्यारे निजरूपनो नेदन रच्या एटले वोध थयो, भने 'त्रम के० मिय्यातना वज़ मटी गयो; ने 'ब्रम नार पना टए श्यना गुण पर्याय यात्मानेविपे नासवा लाग्या, कृण दाण शकल। नेट ते पर्याय कहीए अने पूर्णपुस्प जे ने तेनुं मुख दी, तेणे करीन के ा पुजनपिम मान्यो. थने पोतं थकती ययो अन थामिक धर्म कता, तथा चेतनता इत्याटिक वनावनो हुँ पोते कर्ना न एम. नायकत्तीयन पोताना वनावना की एम कंवा लाग्यो । जे प्रस्तावे जीव ठे, ते श्रेणीनुं धारोहण कर, श्रममा र तजे, एटले वाह्यान्माने पीतापणे जाणवो किम जुउंज वेदे, यन मनो नेद करे, घाणीतील बेनो रस थखम ठे, पूर्ण रसस्वाद , एन न करी यंते परमात्मानो प्रकार का नी, एटने यहंबुद्धि वडे नं अनानं - तो ते रहे नहीं. ते उपर दृष्टंट - वना प्रकागवाथी तम अंक ग ग .

निप्प पुनेनेरे, घेनन तथा थचेतन एफक्षेत्रमा रहेने, थने कर्म करे.
ថ្មី
-
-
.
मटी गई थने परजाय बुदि के० मन वचन थने कायाना योगनी जे पक्षित
| पो दीरी, थने इप्यदि राखीने थात्मानो जे निर्णय स्वनारसे, तेनुं ग्रहण की।
यने मनायनो जे थनुनर रस तेमा नीनो के मन थई रह्यो थने सर्व अर
हारमा पनि करीरह्यो, पण दृष्टिमा अक्षा तो निश्चयमा राखी, एम करतान
मनी दोरी तोडीनारखी, एउपस्थपणु मूकी दीपु, थने यात्मिक धर्म जे पाता
सगाव तेना पारी के धरनारो थयो, परम साये प्रीति जोडी, एटाले सिम
| प्रीनि रापीने कर्मनो साखी थयो, एटले पुग्नकर्मने करे तेनो साक्षी थया वेग
दो तनने सपनो यरी केम मनाय ? गुरु कहेने के, ज्ञानशक्तिवह /
मिनमा धानमा, नीर वस्तु चतन करम जड जाति भेद,यमिन मिनट
मदैया रतीमा-जमो जो दरव ताके तेसै गुन परजाय, ताइसौं मिनत
मानिमिर जग्यो नानमा, सोड जोर क्रमको करतासीदीमे पेंथरता
ज्या निनोकानमा, एमां मुश्विक जाके हिरदे प्रगट नया, ताका प्रमाण
समयसारनाटक
मत्त दशा ज्यारे प्राप्त थाय, त्यारे ते थात्मस्वनावनो साधक थयो, ते
नो कर्ता केम थाय । थने पुद्गतरूपी कर्मने केवी रीते करे। एनो
उपयोग नयी ॥३॥
हवे यहीं प्रथम श्रात्माने कर्मनो कत्ती मानीने पठी तेने थकना
ते
झानना सामर्थ्य वडे बने ते कहे अथ ज्ञानसामर्यवर्णन-
सवैया इकतीसा- जगमें अनादिको थझानी कह मेरो कर्म,
किरियाको प्रतिपाखी है, अतर सुमति नासी जोगसो नयो उदासी,ममता मिटर
परजाय चुदि नारखी है, निरन सुजान लीनो धनुनौके रस नीनो, कीनो भक्दा
दृष्टि निहमें राखीद, नरमकी दोरी तोरी धरमको नयो धोरी, परमसों
जोरी करमको सारखी है ॥ ४ ॥
थथै- ससारनेविपे जीव अनादिकालपी अज्ञानीज वे, ते कहेने के
ने थथुन कर्मनो कर्ता दुज कियानो प्रतिपक्षी के कर्मनी क्रियानो पाहाय
नारो छ, पनी ज्यारे आंतरमा समत्तानो नास थयो, थने मन वचन तथा का
ना योगयी उदास थयो, एटले ए योगने पररुप समज्यो, तथा ए योगनी
मनाय ते पहने-थय दवानको सामर्थपनो कथन
पर पावानमा ॥ ५॥

समयसारनाटक. ច थर्थः-जे जेतुं इव्य होय तेना तेवा गुणपर्याय होय वे, ते तेज इव्यसाये मलेठे, पण वीजा इव्यसाये मलता नथी; जेम कोई स्निग्धगुणवडे घृतादिक इव्य पोताना पर्यायथी निग्ध गुणवाला इव्यसाये मले, पण रुदा गुणवालासाथे म ले नहीं; तेम ए जीव वस्तु चेतनजाति ते, अने कर्म जे वे ते जडजाति ठे, एवो जातिनंद. तेथी चेतन तथा जडने अमिलनता ठे, पण कार्ड युक्ति मिला प नथी. जेम केडना नागनी नीचे पश्चिम प्रदेश नितंब वे, ते उपर रहेला का नसाथे केम मले? एवो गुणपर्यायनो विवेक जेना हैयामां प्रगट थयो, तेना है यामां पूर्वनो उपजेलो नम नाश पाम्यो, ते उपर दृष्टांत केटे के, जेम सूर्यनो उदय यवाथी अंधकार नासेठे, तेम नाश पामेठे; एवा विवेकवालो जीव जे वे ते कर्मनो का तो देखाय पण गुरुता जे पोतपोताना इव्यनीगुण परिणति तेना माएथी जीवने कर्मनो यकर्ताज कहो. ॥ ५ ॥ हवे जीव यने पुजलना लक्षणना जेद देखाडीने एज वात दृढ करे:- यथ जीवपुगतलणनेदकवन:- उप्पय ठंदः-जीव ज्ञानगुनसहित, आपगुन पररांन ज्ञायक; थापा परयु तरी, नांहि पुजन हि लायक; जीवरूप चिद्रूप, सहज पुदगल यचेत जड; 'यमूरति मूरतीक पुदगल यंतर वड; जवलग न होऽ अनुनी प्रगट, तवल 'च्यामति से; करतार जीव जड करमको, सुवुधि विकाशक भ्रम नसे ॥६॥ पर्थः-जीवजे ठे ते ज्ञानगुणसहित ठे, थने जेम पोताना गुणनो ग्राहक वे पारका गुणनो पण ग्राहक के. अने एज गुणना नेटे करीने पोताने रने लख के जुएते : एवी कजा शक्ति लायक पुगत प्यारे पण वनी शके जीवनुं स्वरूप चिधूप के चेतनारूप ,थने पुजतो सेहेज नावे थचेतना पटले जडते. वली जीव थमूर्ति थने पुगत मूर्ति , ए मोटुं अंतर एवंने यांसुधी गुपचेतननो धनुनव प्रगट न घाय. त्यांहांसुधी मिथ्यामति लस वंत होयठे घने जडस्वरुपी कर्मनो का जीव ठे, ते चमबुद्धि ; पण कालनो भ्रम ते सुबुद्धिना विकाश थवाथी नाश पामे. ॥ ६ ॥ कर्मथने किया एत्रणे स्वरूप कहेतेः-यथ कर्ताकर्मक्रियास्वरुपकथनः- करता परिनामी दरव, करमरूप परिनाम ; किरिया परकी फिरनि, य नाम. ॥ ॥ पांतरने नजे ते परिणामी केहेवाय, एवं जेव्य, ते कता कहिये; रूपां ;

१ में - मरे कती कर्म ने क्रियानो रिचार कहेले थथ कत्तीकर्मक्रियाणि दवन धातु है,एक परतृति दो दर्व क्वहों न करे, दोई करतूतिरा, एक परिनामके न करता दरब दोय, दोय पग्निाम त मुनीर पुदगा एप त यवगाही दोऽ, यपने अपने रूपन है, ना पग्निामनिसा करता है पुदगन, चिदानद चेतन सुनान यातु है।" पर्य-र परिणामना ये इय्य क्त्ता न होय, थने एक इयत" दापर कहर के, जीरयन पुदगन एसमेस यग्यांन नयीन एनन का तमन रथ्य च किया पण नहीन कर व्याम्या पति नेबाने परिणामनान कना याय, श्रने चिदानद चनन7न मन ចុច समयसारनाटक तर यावु ते परिणाम, अनेकर्मनु स्वरूप कहिये,थने पर्याय, क्रमे क्रिया कहिये ए रीते कर्ता कर्मने क्रिया एवा त्रण नाम से पण वस्तु हवे कत्ती, कर्म, ने किया ते केहेवामा नाम निन्न निन्न वे पण वस्तु एका ते कहे-श्रथ काकर्म क्रियकत्वकथन - दोहरा -कर्ता कर्म किया कर, क्रिया कर्म करतार, नान नेद बहु विधि वस्तु एफ निरधार ॥ ७॥ श्रर्य -कर्ता त्यारे केहेवाय के ज्यारे क्रिया करे, अने किया त्यारे के देशको ज्यारे कर्म करे. एम नाम जेद जातजातनो पड्यो पण करवायी कर्ना कर्म ने करवायी क्रिया एत्रणे एकज वस्तु ते ॥ ७॥ हो एक कर्म क्रियानो कर्ता एकज होयडे, ते स्थापन करे। -अथ का फर्मक्रियाप्रनिस्यापना-- दोहा -एक कर्म कर्तव्यता, करे न कर्ता दोय, या दरय सना सु तो ए नार क्यों दोय ॥ ॥ अर्थ - बात तो सुनी ते के, एक कर्मनी कर्तव्यता के० किया ते एक परे अने तेनो नो पण एफज होय, पण वे का एकज कियाना करना होय यदी चेतन इथ्यसत्ता भने पुजव्यसत्ता ते तोधा के० वे प्रशारे शुद्धीने, ते माटे एक नाव एफ कर्म केम बने ? ॥ ए॥ सापानीमा रन यदा 10 - . - है समयसारनाटक. ३नए अर्थः- महाधृष्ट ते हवे सम्यक्तयवस्थामा कर्मनो थकती थने मिध्यात्वथवस्थानेविपे कर्मनो कत्ती के एम कहेजेः-यथ सम्यक्तमिथ्याकथन:- सर्वया कितीताः-महा ढीव उरखको वसीत पर दर्वरूप, अंध कूप काढुपै निवारयों नहि गयो है: ऐसो मिथ्यानाव लग्यो; जीवकों अनादिहीको, याही यह चुधि लिये नाना नांति नयो है; काहू समै काढूको मिथ्यात अंधकार नेट, मम ता उठेदि गुरु नाउ परिनयो है; तिनही विवेक धारि वंधको विलास मारि, यातम सकतिनों जगत जीति लयो है. ॥ ११ ॥ श्रने उरखनो पटु यात्मय परव्य के० पुनम्नव्य जेनें रूप , पिंम , अने जेमां सत्य दृष्टि पोची शकती नथी, तेमाटे अं धकृप समान वे; घने कोईथी निवारण नथी थतो, एवो मिथ्याजाव जे मिथ्या त्व मोह कर्म ते जीवने अनादि काल थकी लागेलुं ; एथी परव्य तरफ जीव नी यहंबुद्धि लागी, तेथी जीव नाना प्रकारनो थयो. धने कोई समये यथाप्रर निकरणना वखते कोई नव्यजीवनो मिथ्यात अंधकार नेटायो, ते मिथ्यात्वयंथि नेदीने धने सर्व कार्यनेविपे जे अहंधिवडे रहेली ममता दती, तेने नेटीने शुरू चिदानंद नावमांज परिणमी रह्यो, ते समये ते नव्यजीव नेट विज्ञान के जड चे 'तननो विवेक धारण करीने थविरत्ति, कपाय, योग तथा प्रमाद एजे बंधनाहेतु ह ता, तेनो विलास बोडीने यात्मशक्तिवडे एटले पोताना वीर्यवलवडे जगतने जी ति लीये; जगतथी निरालो थाय वे.॥ ११ ॥ हवे जेम कर्मनो कर्ता धात्मा नथी तेम ए कर्म यात्माना करेला नथी; अनेक ती ने कर्म एक रूपज वे ते केहे-अथ यथा कर्म तथा कर्ता एकरूपकथन. । सर्वया इकतीसाः-शुधनाव चेतन श्रशुधनाव चेतन हूंको करतार जीव और नही मानीये : कर्मपिमको विलास वन रस गंध फास, करता उहूको पुदगल पर मानिये; ताते वरनादि गुन ज्ञानावरनादि कर्म, नाना परकार पुजलरूप जानि ये; समत विमल परिनाम जे जे चेतनके, ते ते सवधलख पुरुप यो वखानिये. १२ थर्थः-- चेतनानेविपे शुभ नाव तथा अझ नाव जे जाणवामां आवे, ते तो परिणामरूप कर्म ने तेथी ते बनेनो कर्ता जीवज वीजो कोई की मान वो नही. अने ज्ञानने ढांक दर्शनने ढांक इत्यादि कर्म पिंमनो विलास वे; थने वर्ण गंध रस स्पर्श इत्यादि जे कार्य थने कर्म , ए वनेनो कर्ता पुदगल व्यनेज प्रमाण राखिये ;तेणे करीने वर्णादि के वर्ण रस गंध स्पर्श गुण के ते ;;

(रण जमवाने थापीये ने पुतीये के एनो स्वाद केवोठे तो ते केहेश के
। पीये तेवोठे पण तेने दारूनी छमा छदा स्वादनी सवर पडती भयो
जीव मिथ्यामतिवालो थईने जोपण धनादि कालनो ज्ञानरूपी एटो।
थयो त्यारे चेतन थने थचेतन जे पुनज ते वेपने मित्र के एक पिंक
एकमेक माने ; पुगजना नेलथी चेतनने पण पुजनकर्मनो का मान
सर्वया इकतीसा -जसे महाधूपकी तपतिमें तिसीयो मृग, नरमसों
पमानि थायो है. थपने सुनाय जैसे सागर सुधिर सदा, पवन सनागर्ग
ल पीवनकों धायो है, जैस थंधकारमांहि जेवरी निरखी नर, नरमता मरती
रियकुलायो है, तसे जीव जडसा थव्यापक सहजरूप, नरमतों करम
३०
समयसारनाटक.
अने ज्ञानावरण दर्शनावरण प्रमुख जे कर्म ले ते सर्व नाना प्रकारना
जाणवा, जेम कहुं वे के, जोगापयमिपयेसा के जोगवहे प्रातिप्रदेशवा
ने तेनेविपे चेतनना समतपरिणाम के थक्ष परिणाम थने वित
के शुभ परिणाम ए जे कर्मरुपकते ते सर्व थलच पुरुषरुप के,
कर्मने एकज वरवाणीए ॥ १५ ॥
हवे ए वातना रहस्यने मिय्यादृष्टि जाणे नही, तेना उपर हस्तिनो
थथ मिय्यादृष्टि बनन हस्तिको दृष्टात -
सर्वया इकतीसा -जैसे गजराज नाज घासके गरास करि, नहत ।
लिन्न रस लियो है, जैसे मतवारी नहि जानै सिखरनि स्वाद, जुगमें मगन
गफ दूध पियो है, तैसे मिथ्यामति जीव ज्ञान रूपी ई सदीब, पग्यो पार.
सों सहज सुन्न दियो है, चेतन थचेतन उहकों मिश्र पिम लखि,
न विवेक कवु कियो है ॥ १३ ॥
थर्य-जैम हाथीने अनाज साये घात लवीने ग्रास थापेठे ते
हाथीनो स्वनाव एवोठे के पासने नाजनो दो स्वाद क्षेतो नपी
कोई माणस मद्य पीने मतवारो थयो दोयने तेने दहीने खामथी
तो पण पापकर्म थने पुन्यकर्ममा लीन थई रह्यो, मा सहज
कदी विवेकनी नजरथी जोतो नथी ।। १३
हवे जीवने कर्मनों का मानवो एमवडे मनायडे , ते उपर
थथ भ्रमस्वरूपकथनहष्टात
.
कहापो द ॥ १४ ॥

समयसारनाटक. ३८ . यर्थ.-जेम वैशाक ने जेवना घणा सख्त तापनी गरमीवडे मृग तरस्यो थईने ग तृपाने जो तेने जल नरेद्यं तलाव मानी ते मिथ्या जलने पीवाने दोडे ; त जिम अंधारे पडेली दोरडीने जोईने कोई मनुष्य नरमवडे तेने साप जाणी मरी जायठे ; वली जेम समुश्नो स्वनाव स्थिर पण पवनना संजोग थकी उठलतो देखायठे, तेम जीव निश्चय थकी लोता जड वस्तुथी अव्यापक ठे, पण अनादि का जनो सहज रूपी भ्रम तेणे करीने ते जीवने कर्मनो कर्ता कहेते.॥ १४ ॥ । दवे जे सम्यक् दृष्टि थाय ते सम्यक् स्वनावे करीने भ्रम दूर करे ; अने जु ने जुदोज नाव जाणे, ते उपर राजहंसपदीनो दृष्टांत आपेठे. थथ सम्यक् टिस्वनाववर्णनं, राजहंसके दृष्टांतः- सर्वया इकतीसा - जैसे राजहंसके वदनके सपरतत, देखिये प्रगट न्यारो ठी र न्यारो नीर है, तसे समकितीको सुदृष्टिमें सहजरूप, न्यारो जीव न्यारो कर्म न्यारोई शरीर है ; जब शु६ चेतनाको अनुनी थन्यासे तव, नास बापु अचल न जो उर सीर; पूरव करम उदै आश्के दिखाई देहि, करता न हो तिन्हको मासगीर है ॥ १५॥ श्रर्य- जेम राजहंसतुं वदन के मुखनी अंदरनी जीन, तेना थडकवाथी ने पाणी एकमेक होय ते फाटीने दुध जुई ने पाणी जुई थाय ते ; तेमन स दृष्टिवडे सहजरूपे जीव ठे ते जुदोन जणाय नं कर्म पण जुउंज जणाय : गरीर पण जुउंज जणाय : एटले वाह्यात्मा, थंतरात्मा ने परमात्मा एत्रणे जणाय. ज्यारे शुद्ध चेतन धनुनवनो थन्यात करे त्यारे पोतेज देखाय. कनो वीजा कोई साथे नेल नथी. पूर्व संचित कर्म जे वे ते निज स्थिति ये थथवा उदीरणा करी के कर्म उदे धाव्याथी देखाय; पण जीव का की नथी, पण ते कर्मना उदयनो तमासो नुएले ॥ १५ ॥ शिष्य पूछे ठे के, हे स्वामी जीव तथा पुजन एकमेक थई रह्या , त्यारे ते वो जुदो दोस्वनाव केम जाणीये ? त्यारे गुरु तेनो उत्तर थापता पाणि कनुंदृष्टांत थापेनेःथथ कर्तृत्व स्वनाव तप्तोदक तया व्यंजनको दृष्टांतः इकतीसा--जैसे उसनोदकमें उदक सुनाउ सौरो, थागिकी उसनते लखिये, जैसे स्वाद व्यंजनमें तीसत विविध रूप, लोनको सवाद ज्ञान चखिये; तसे याहि पिंममें विनावता थज्ञानरूप, ज्ञानरुप नी

-
हवे निश्चय प्रमाणपडे जे जेनो कती तेने जुदो वतावेठे यथ कर्तृत्वविवष्य,
दोहा -- ज्ञाननाव ज्ञानी करै, अज्ञानी अज्ञान, दरव करम पाउने
अर्थ-झानी होय तेतो झाननाव करे एटले जाणवारूपजे कार्य में
वरचे, ते कया नयथी ठरेले तेनो उत्तर गुरु आपेलेल्यथ व्यवहार कर्तृवान
शिष्य पूढेठे के हे स्वामी ज्ञाननाव ज्ञानी करे ए वात केहेतां ज्ञानना ना
दोहा- ज्ञानसरुपी थातमा, करे ज्ञान नहि उर, दर्व कर्म चेतन
थर्थ-थात्मा ज्ञानस्वरूपी माटे ज्ञानने तो तेज करे, पण बीना नदी
कान कर यद् रूप रहो थव, को करता करनी कहु केसी, थापुहि या
सर्वया तेईसा -पुदगल कर्म करे नहि जीय कहो तुम में समुजी महिने
३
समयसारनाटक.
व जेद ज्ञानसो परखिये, नरमसो करमको करता है चिदानट, दरव।
रतार नाव नखिये. ॥१६॥
थर्थ-जेम चमोदक के उन पाणी ते पाणीनो पोतानो सनाव तो
के शीतलज , पण तेनो स्पर्श करता गरम लागे ते गरमी धागनी ।
स्वादिष्ट व्यंजन के शाकमा नात नातनो स्वाद होय वे धने लोन के
नो खारो स्वाद जुदोज जणाय वे,ते जीन ज्ञानवडे जणाय , तमन
विनावता जे कर्मनी साथै चेतननु मलवु तेतो जेम में था की एम, .
झानरूप ठे थने जीव वे ते शुद्ध ज्ञानरूपीछे, एनेतो शुद्धता
ने
ए वात नेदज्ञान वडे जणाय वे ए चिदानंद जे के तेने कर्मनो की
ते ब्रमवसे मनाय । पण व्यनो विचार करता एनो कर्ता नाव वने नई
ण झाता नावज बने ए रहस्य 2 ॥१६॥
यह निहचे परवान ॥ १७ ॥
ने, थने अज्ञानी होय ते दुका एम मानी अज्ञाननाव कोठे,
कर्म के तेने पुजसज करेठे, निश्रेप्रमाणमा एवु स्पष्ट के ॥ २५ ॥
द पिवहारी दार ॥१७॥
रमा कहेवाय ॥१८॥
हवे शिष्य प्रश्न - कर्तृत्वकथन
-
है गुरु है क्यु
लेसी ॥ १५ ॥

समयसारनाटक.' ३५३ अर्थः-हवे शिष्य पूजे ने के, जीवने निश्चयनयथी ज्ञाननो का कह्यो ने कर्मनो की कह्यो, तेनुं गुं कारण ? हे गुरु पुगत इय्यरूप कर्मने जीव करे नही एवी 'वात तमे कही, ते वात हूं यथार्थ समज्यो नही. ए पुगतरूपी कर्मनो स्वनाव रे? हां की तो उरावना नथी श्रने तेनी क्रिया केवी ने ते कहो. वली पुग्न मनो कर्ता पुननेज बनावोतो त्यारे कर्ता कर्म बंने जड थया, ते पोतानी मेले लिवू तूटा था केम वनीशके ? ए मारा मनमां संदेह वे. शिप्यना संदेह निवा वाने या प्रश्ननो यथार्थ उत्तर गुरु दवे कहेते:- ॥ ११ ॥ श्रथ गुरु उत्तर कथन:- टोहाः- पुदगल परिनामी दरव, सदा परिनमै सोय; याते पुदगल करमको, दगल कर्ता होय ॥ २० ॥ थर्थः- हे शिष्य, पुदगल जे ते परिणामी इव्य ते. कृण क्षणमा तरेहवार नी जायने तेमाटे सदा परिणमी रह्यो वे ते युक्तिथी पुलिक कर्मनो कर्ता पु नज थई शकेले. ॥ २० ॥ अथ पुनः शिष्य प्रश्नः- घडिल वेट.ज्ञानवंतको जोग निर्जरा हेतु है; यहानीको नोग बंध फल देतु है; हि अचरजकी वात हिये नहि थावही; बूम कोऊ गिप्य गुरू समुझावही. ॥ २१ ॥ अर्थ. हवे शिष्य पूवेवे के, ज्ञाननाव ज्ञानी करे एवं कहेवाथी लोग निर्जरारूपी माय ले ते केम ? ज्ञानी लोग जोगवे ते कर्मनी निर्जरा करे, त्यारे तो ज्ञानीनो नो निर्जरानो हेतु वे अने अज्ञानी जे नोग जोगवे ते कर्म बंधन करेठे; त्यारे तो अ कानीनेज जोग बंध फलदाई कह्यो एतो अचरजनी वातवे : केमके नोग नोगववा मां समान होय ने एकनो नोग निर्जरानो कारक बने बीजानो नोग बंधनो का क एम केम वने ? अने ए वात हृदयमा तसती नथी. यावं शिप्यतुं केहे सां नलीने गुरु तेनो उत्तर कहेते.- ॥ २१ ॥ थथ गुरु उत्तर कथन:- सर्वया इकतीसा: दया दान पूजादिक विपय कपायादिक, दोहू कर्म जोग जुहूको एक खेतु ; हानी मूढ करम करत दीसे एकसे पें, परिनाम नेद न्यारो न्यारो फल देतु है; ज्ञानवंत करनी करे में उदासीन रूप, ममता न धेरै ताते निर्जराको हेतु है; वहे करतूति मूढ करे पै मगन रूप, अंध नयो ममता सो वंध फल सेतु है. ॥ २२ ॥ ५० . . | ज्ञान मति,जगमाहि थहरुत नावसो, करम रूप व्हे परिनमति ॥ ३॥ थर्य-जेम कलसरूप कार्य थवामा माटीइव्यनीशक्तिध्रव केनिभय ने ते कार्यनेविपे तेने फेरववानो दम अने चक्र के चाफने चीपर उतारवानी। कुलार ए सर्वे वाह्य निमित्त थया तेम परमाणु पुजलनो पुज ते वधपषु | मणवर्गणानो नेप धरीने झानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीर, नामकर्म गोत्रकर्म थतराय ए स्वरूपे विविध के नात नातनो पुग्न ५ रूपी अज्ञान ग्रहीने यही कारण बन्यो, त्यारे जगतमा थहकारमुदिनी थहीं बहिरात्मा एटले देव मनुष्यादिरूपी वाह्यात्मा वाह्यनिमित्त पनि, हवे निधे जोपनु थकीपणु मानीने एना थनुनवमा रेहेवु तेनु माहात्म्य संबंया तेईसा-जे न करे नयपद विवाद धरैन विपाद थनीक ननार उदवेग तंज घट थंतर, शीतलनाव निरतर राख, जेन गुनी गुन नाशि ३०४ समयसारनाटक. अर्थ -दया पानवी, दान देवु, पूजा प्रमुख करवी, एक एवी लिन अने पाच इयिोना विषय सेवन करवु, कपायर्नु सेवन करवु, एक एव म ठे, एबने कर्मनो संसारमा जोग , पण देत्र एक छे, तेथी वर्न ने बने झानी पण ए बे कर्म करै , तथा अज्ञानी पण करे , अने ए रतां तो ज्ञानी अज्ञानी एक सरखाज देखाय , पण एना परिणाम दावे माटे ए कर्मनु फल जुदो जुदो आप ने ज्ञानवान जे कर्म किया उदासीन रूप थईने करे ने, एटले एनी मेले उदय थावेलु कर्म करने मता धरतो नथी, ए माटे निर्जरानो हेतु वे अने एज कर्म किया पण ए क्रिया करवामा आनद रूप रहे हैं, ने निजात्म शुद्धीने विप्तरी एटले थध जेवो बनी जाय , अने ममता धारण करे , तेथी क्य ये, एज माटे अज्ञानी अज्ञाननो करता उरे ने ॥ २२ ॥ हवे कुनारनुं दृष्टात यापीने मूढनु कर्तापणु शि६ करे - अथ मूढ कर्तृत्व कथन कुलाल दृष्टात उप्पय उद -ज्यो माटीमहि कलस, होनकी शक्ति रहे ध्रुव, दम कुजाल वाहिज निमित्त दुव, त्यों पुदगल परवानु, पुज वरगना नेप धरि, , वरनादिक सरूप बिचरत विविध पार, वाहिज निमित्त वहिरातमा, तेहिज पुजलखध कर्मरूप वनीने परिणम्यो वे ॥ ३ ॥ थथ कानुनच महात्म्य कथन - .

समयस टिक. ३५ पाकुलता मनकी सब नाव; ते जगमें धरित्रातमध्यान अखंमित ज्ञानसुधारस चाख अर्थः-जेम मिथ्याती लोक पोतपोताना नयनो पक्षधरी ने पोतपोतामां विवाद क 3 तेम न करता जे सहज यानंदमारहेते ; ने विषाद धरता नथी, अने फूतुं वोल निथी, अने इष्ट ध्यान धरता नथी एटले उदवेगनो त्याग करेगे; अने हमेश ताना हृदयनेविपे शीतल जाव राखेठे, ने एवा सुक्ष्वात्माना यनुनवमां मजेने. थी पात्मा गुणी ते ने ज्ञानगुण ठे, एवो जेने नेद विचार रह्योज नथी, अने कल्प के व्याकुलताने मनमांथी काढी नाखे. एवाजे शुभ अनुजवी याय, तेज रात्मध्यान धरीने जगतनेविपे संपूर्ण केवल ज्ञानरूप अमृत रस तेने चाखेडे.२४ । हवे निश्चय नच यकी धकपिणानी स्थापना अने व्यवहार नयवडे कर्त्ताप 'वानी स्थापना प्रमाण करीवतावे :--अथ निश्चय व्यवहारनय प्रमाण स्थापना:- । सवैया इकतीसा.- विवहार दृष्टिसो विलोकत बंध्योसो टीसे, निहचे निहार (न बांध्यो यह किनहीं; एक पच वंध्यो एक पतसो थवंध सदा, दोउ पह अपने 'प्रनादि धरे नही; कोउ कहै तमल विमल रूप कोउ कहै, चिदानंद तैसोई व पान्यो जसो जिनही ; बंध्यो मान खुल्यो मान उद्धनको नेट जाने, सोई ज्ञानवंत जीव तल पायो तिनही. ॥ २५ ॥ ' अर्थ- चतुर्गतिरूप संसारमा ब्रमण करवानो श्रात्मानो व्यवहार जोऽए तो पात्मा कीज देखाय ने बंधमां पण जणाय, अने निश्चयनयवमे झाननोज क थिने ज्ञानस्वरुपी जोऽये तो एज थात्मा कशामां बंधायलो नहीजणाय; तेथी (कतो व्यवहार पर ग्रहीये तो थात्मा बंधमां वे, ने एकलो निश्चयपद ग्रही तो धात्मा सदा धबंध जणाय, एदा वंने पदयनादिकालना ग्रहण कीधा ने. कोई व्यवहारनयवालो होय ते जीवने समत कहेते, ने कोई निश्चयनयवालो होय ने एने विमल क्हरे पण जेणे जेवु पातानी बुद्धिथी चिदानंदने वखास्यो तेवोज चदानंदचे. हवे जे सम्यक्ष्टि होय तेतो धात्माने बंधायलो पण माने, अने प्रबंधपण माने, पण ए मानवामां बंदुनयनो नेट जे जाणे तेज डानी केहेवाय, धने तेणेजजीव तवर्नु स्वरूप उतरव्यं ॥ ५ ॥ । हवे बेउ नयने ममान राखीने सममित गन्थी समरस नावमा रहे तेनी शना करेः यय समग्ली नाव प्रशंसा कचन.- सर्वया इस्तीसा.-प्रथम नियत नय दृजो विवहार नय, इटुको फलाक्त श्र नंत नेद फल है; ज्यों ज्यों नय फल त्या त्यों मनक क्लोज फल. चंचल मनाय

No text on this page.

No text on this page.

No text on this page.

高

No text on this page.

समयसारनाटक. ४०१ । तिन मद्य मांस चाख्यो है; तैसे एक वेदनी करमके जुगल पुत्र, एक पाप ए स्य नांउ निन्न नाख्यो है; उहो माहिं दोरधूप दोउ कर्म बंधरूप, याते झान न कोच अनिलारख्यो है. ॥ ३० ॥ अर्थ:- जेम कोई चमालनी स्त्री जुगल पुत्र के वे पुत्र जणे ने पठी एक ठो ब्राह्मणने आपे,ने एक ठोकरो पोताना घरमा राखे, हवे जे ठोकरो ब्राह्मणना | उबरे ते ब्राह्मण केहेवाय, ने ते मद्य मांसनो त्याग करे, जे चंमालना घरमा ते चंमाल केहेवाय, ने ते मद्य मांस पण चाखे, ते रीते एक वेदनीय कर्मनां त्र, एक पाप ने बीजो पुण्य, एवां जुदा जुदा नाम कह्यांचे. पण वनेनो वि एक ने एटले बेचने विपे दोरधूप के वेदवानी सत्ता के. एटले खेदसंताप ली पापने पुण्यए वेन कर्म बंधरूप ठे, एटला वासते ज्ञानीजने ए वेतमाथी नो पण थनिलाप कीयो नथी. ॥ ३ ॥ हवे पाप तथा पुण्य ए वेडने समान कह्या तेउपर शिष्य प्रश्न पूछे:- अथ शिष्य प्रश्नः-- चोपाई:- कोक शिप्य कई गुरु पाही; पाप पुस्य दोक सम नांही; कारन रस वि फल न्यारे; एक अनिष्ट लगे इक प्यारेः ॥ ३ ॥ थर्थ -कोई शिष्य गुरुनी पासे यावी कहे के, स्वामी पाप ने पुण्य एवेने समान पण ते समान टेखाता नयी केमके. ए वेना कारण रस स्वनाव तथा फ तो जुदां जुटा ठे वली एमांयी एक प्रिय लागे ठे ने एक अप्रिय लागे ॥३॥ हवे शिप्य ए वेचना कारण प्रमुग्व जुदा जुदा कहे .-- अय शिष्य कथन.- सर्वया कतीमा -- संफिलेस परिनामनिसो पाप बंध हो, विगुरूसों पुन्य हेतु भेट मानिये ; पापके उढे असाता ताको है कटुक स्वाद, पुन्य उटे साता र रस नेट जानिये; पाप संकिलेस रूप पुन्यहिं विशुद्ध रूप, मुहूंको सुनाउ नेट यो वखानिये : पापसों कुगति होय पुन्यसों सुगति होय, ऐसो फल ने परत परवानिये. ।। ४ ।। अर्थ:- तीव्र कपायमय जे परिणामठे तेनु नाम संक्लेग परिणाम. तेणे करी पापर्नु बंध यायते; अने कयायनु जे मंटपणुं तेने विद्यक्ष कहिये; तेवमे पुन्य वंध याय; एवा हेतु एटले कारण जेद मानिये साये. यने पापना उदययो माता पाय ठे, तेनो स्वादतो कटुक होय . ने पुश्यना उटयवहे गाता उपजे ठे से मिष्ट वाट होय . एटले पाप ने पुन्य ए बेठने विषे रमनेद थयो ; वती -

.
मानज वली जे सक्लेश स्वनावने लीये पाप डे, ने विशुद्ध स्वनावधी
वेत महा थपप ,थने ए वे कर्म , ते वरूप ने थने मोक्षमार्गन
तो तो ए देतबार देखा नही ए वेनेविर्प यात्मानु अवलाकन नयी. तर
हवे मोद मार्गनेविपे वेतनो विनाश वतावे दे - थय मोक्ष पनि हरन
कपाय पिनोग है, को गुजरूप कोउ अगुन सरूप मृज, वन्नु
उविध कर्म रोग है, ऐसी वा पति वखानी वीतराग देव,थातम परम
त्याग जोगह, नोजल तरैया राग दोषको हरैया महा मोपका कराता
थर्य-ब्रह्मचर्य तप, पश्यि निग्रह, सवर दान पूजाप्रमुग्म किया एर्ण
०२
समयसारनाटक.
पापकर्म क्लेश रूप से, तीन कपायरूपचे, अने पुण्य कर्म विक रूप से
यरूप , ए बने कर्मनो निन्न निन्न स्वनाय थयो, ते एज उपरथी एक
नेद वखाणीये तश्ये, अने पापथी कुगति के नर्क गती तिर्यच गती
यने पुण्यवझे मनुष्यगति देवगति एवी सुगति थाय ने, ए रीते पाप
नेविपे फलनो नेद प्रत्यक्ष प्रमाणथी रे ॥ ४ ॥
हवे शिप्यना प्रशनो गुरु उत्तर करें -अथ गुरु उत्तर वचन यक-
सपैया इकतीसा - पाप व पुन्य वध मुहमें मुगति नाहि कटुक मग
द पुग्गलको पेखिये, सकिलेस विधि सहज दोउ कर्म चानि, कुगति
ग जालमें विगेखिये, कारनादि नेद तोहि सफत मिय्यातमाहि, ऐसा
झान दृष्टिमें न लेखिये, दोन महा अपकृप दोउ कर्म बघ रूप, हू का
मोप मारगमें देखिये ॥४१॥
अर्थ - पापनो पण व थाय ने पुण्यनो पण वय थायने ने
त्या मुक्ति न होय, एटले वेउया मुक्ति नही ते माटे वे समान , यन
रसमा पाप ले ने मधुर रसमा पुण्य वे एवेत रस पुदगलना ले तेथी पापन,
पण ए वेव स्वनाव जे ले ते कर्मनीचाल ने कुगति तथा सुगति त पाप
फल ते, ते नेदवडे जगत जालनी विशेप ता, तेथी पाप पुण्य
थरे शिष्य तने जे पाप पुस्यना कारणादि नेद तेणे करीने पाप
व के विविध नाव सूजे से, ते तो मिथ्यामतिमा सूजे ,
ए वेतनो विनाश देखीये , तेथीए वेउ समान ॥ ४ ॥
सीज तप सजम सिति दान पूजादिक, श्रयदा कर
.
पुापनों
पण ज्ञान शिकार
सर्वया फतीमा
.
उपयोग है ॥ ४ ॥

समयसारनाटक. ४०३ . ; - 3B कारण कर्मवे. अथवा पापना कारण असंयम कपाय अने विषय नो वे. ए वेउमां कोई शुनरुप कार्य वे.यने को अगुलरूप कार्य वे; पण वस्तुनु विचारता तो वेनए कर्म रोग . एटले बेउ प्रकारनो कर्म रोग ; एवी बंधनी इति के एक मंडी ते वीतराग देवे वखाणी; पण यात्मिक धर्ममां एटले श्रा मानो स्वनाव जोतां कर्म क्रिया त्यागवा योग्य ठे: एवा पापपुण्यने हेय कहेनार, पने नवजल ने तरनार, राग हेपने हरनार तथा महा मोदनो करनार एक शुरू पियोग उपदेश वे.॥ ४ ॥ हवे अर्धा सर्वयामां शिष्य प्रश्न करेते, ने अर्धा सर्वयामा गुरु तेनो उतर लेिने -अथ शिप्य प्रश्न गुरु उत्तर कथनः सर्वया इकतीसा - शिष्य कह स्वामी तुम करनी गुन अगुन, कीनी है निपिछ रे संसो मनमांहि है; मोपके संधैया ज्ञाता देसविरती मुनीस, तिन्हकी अवस्था निरावतंव नाहि है; कह गुरु करमको न्यास अनुनी अन्यास ऐसो अवलंब उ हहोको उनमाहि है; निरुपाधि पातम समाधि सोऽ शिवरूप, और दौर धूप पु गत परवाहि है. ।। ४३ ॥ ' अर्थ -शिष्य प्रवेवे हे स्वामी, तमे तो मोद मार्गमा गुनने अगुन करणी वेड निपेय कीयो, तेनो मारा मनमां संदेह पडेट : केमके मोदमार्गना साधक ज्ञा देश विरती पंचम गुण स्थान वर्ति यया धने मुनीश के पष्ट सप्तम गुणस्था 'वर्ति सर्व विरती यया, तेमनी अवस्था तो निरालंबननथी एटलेपोतपोतानी ६ क्रियाना याब ने लेने देश विरती सर्व विरती केवायठे, त्यारे करणी निरिक्ष म य? हवे गुस् कहते-जेबो यदनो न्यास मांमयो तेवो श्रुत झानतुं आलंव होय तेम शुन कर्मनो न्यास तेतो जोवामां वे पण ते अनुनवनोज श्रच्यासते ते प्रनुनव अन्यासरुप थालंबन ते तो ज्ञातानुं झाता पासेज वे, अने तेमां निरुपा वे के रागय कपाय इवादिकविना यात्मानी जे समाधीने, एटले जे पर रूपने पे निरुपयोगीपणे रहे तेज शिवरूप, के मोपवे अने जे दोरधूप के खेद तापजेठे ते तो पुगतनी परिवाही के वांयावे ॥४३॥ । हवे एज गुन क्रियाविपे बंध अने एज गुन क्रियाविपे मोद ए वेड स्वरुप कही वतावेजेः-यय बंध मोद स्वरूप कथन । सवैया तेऽसा-मोठसरूप सदा चिनमूरति वंधमई करतूति कही है; जावतकाल वसं जह चेतन, तावत सो रसरीति गही है ; यातमको धनुनी जबलों तबसों शिव . सर्वया कितीमा-कोट शिष्य कह स्वामी थान किया यक्ष, पुन शु६ तुम ऐसी क्यों न बरनी गुरु कई जवनों क्रियाको परिणाम रहे। ल उपयोग योग धरनी, थिरता न था तोता शुक्ष्थनुना न हार, किया मोष पयसी क्तरनी, वषकी करेया दोक उहू में न जानी रात्र न्यारे गुरु उना यापेने के अहो मिष्य, ज्यांसुधी कियाना परिणाम ४४ समयसारनाटक. रूप दसा निवही है,यधनयो करनी जब गनत, बंधाविया तब ! थर्य -चिन्मूर्ति के चिदानंद ठे ते तो सदा मोद स्वरूप ठे, किया तेतो सदा वधमयने यावत काल के जेटला कान छुपी चान तावतकाज़ के तेटला कान सुनी तेज रसरीति ग्रहण कीयाने, ५ रहे, एटले ज्यासुधीथात्मानोअनुनय रहे त्या सुधी गुन दशा निवही एटले मोद स्वरुपमा रहे,अप्रमतता केहेवाय, याता थप ययो यको ज्यारे करणीनोज रस ठरा त्यारे तोवधनाजपट हवे मोदप्राप्तिनु कारण कहे -थथ मोच मार्ग निरूपण- सोरठा -थतर दृष्टि लखान, यरु सरूपको याचरण, ए ।। शिवकारन एई सदा ॥ ४५ ॥ थर्थ-बाह्य दृष्टि तामीने यतर दृष्टि थापीने थलदनो जापारवा स्वरूपनु थाचरण करवु, एटले ज्ञान दर्शन चारित्रने याचरिये, तेयकी नारमिम थाय, सदाकालनेविपे एज मोक्नु कारण वे ॥४५॥ दवे वाह्य दृष्टिबडे वध पति थाय ते कहे -थथ वध मार्ग सोरठा करम गुनागुन दोऽ, पुमा पिम विनाव मज; ३. नाही केवल पाए ॥ ४६॥ थर्थ -गुनकर्म ते पुन्य ने कर्म ते पाप ए वे कर्म थने पिनाय जे राग पादिक मपए वेतनविष दृष्टि रदेवाची मुकि नही, यने केवलज्ञान- पद पामीये नही ॥१६॥ ए गत उपर शिष्य प्रकारे तेनो उत्तर गुरु दिये - थथ शिप्य प्रश्न गुरु उत्तर कयन विचारमें निपिद कीनी बग्नी ॥ ४ ॥ यर्य-कोई शिष्य पूछे के हे स्वामी, तमे एषु 4 न किया जे हिमादिक ते यह ले धन न किया जे दया , P इनसों । .

समयसारनाटक. ४५ । उपयोगनी धरनी के क्षेत्री एटले उपयोगवंत यात्मा चंचल रहे . ज्यां क्रियानां उपयोग रहे त्यांधी यात्मानी स्थिरता थाय नही. यने यात्मानो अनुभव होय नहीं. ए उपरची ए पुण्य पापनी वे किया ने ते मोदमार्ग कतरणी समान वंचनी करनार एथी वे क्रियामां एक पण नजी नयी. मुक्तिमार्गनो वायक विचारे त्यां वे किया निपिच कीधी ने ॥ ४३ ।। मात्र ज्ञान नोदनो मार्ग से कहे वेः-यच ज्ञान माद मार्ग यह कयनः- नया नीताः- मुनिक नायरको वायक करम तब.यातमा अनादिको मनांहि बुझ्यों है: एते परि कह जो कि पाप बुरो पुस्य नतो. तो महा ट मोबमारगनों बुन्यो है: नया सुनाउ जिये हियेमें प्रगठ्यो ज्ञान. उस्य नंगि त्यों काहूपे न स्योह: भारतीतो उन्चल बनारती कहत यापु. कारन प के कारकों दुक्यो है ॥ ४ ॥ प्र:- वात्मा मुजिनो तायक ,तेने तब कर्म वायक ने एपीजयनादि जनो श्रात्मा कर्ममा सुन्यो एजेदवारह्यो वे; एम उतां पण जो कोई एबुं कहे पाप कर्म नवाने पुण्य कम तावे. तेने महा मूट जावो ;ने ते मोद गियो बुझ्यो, एन जावं. एवानां कोने नवल परिपात थकी सम्यक् सनाव प्राति का तेतारे हीयानां ज्ञान प्रगट्युं तो ते व दमा तरफ उमंगे करीने यो. पण कोई कर्मची रोकाया रह्यो नही. ते वारीतानी पते उचल पने ज ज्ञानोपयोगी पणे कारण रुपी याने पोनाना मुक्तिन्प कार्यने पोतेन दुक ते बुं बनारसी दान कहे ॥४७॥ हवे काननी तथा कर्मनी विवरो वतावनेः- अय ज्ञान नथा मै विवग्नः- तवचा कनीनाः-- जोजो अष्ट कर्म विनात नाही तस्बया. नोनों धन निनामें धान टो: वरनी: एक ज्ञानयाग एक शुनाशुन पर्मधारा, पुहूकी प्र नि न्यारी न्यारी न्याने धरनी: ग्यान पाग नोकप मोटीनहान, दोपती न हार नी तमु नग्नी; ननो विशेष शुकरमयाग बाप, पगचीन नरनि विध बंध करनी. ॥ ए !! अथ:- ज्यां व्धी धातर्मनी नया विनाम यता नयी एकजानुयरी मुनिन य त्यांनुयी अंगमा यती धाग वो; नेना एक हानी पागने बीजी नाजुन मनी बाग. एवंनी प्रस्नी छुट्टी जुनी, वन पन्नी के इत्रने 1 जुडं ने एमां एव्लु विशेष के र्मयाग ने बंपल्पने; अनेक

No text on this page.

* : यर्थ:-जहां पुनत व्यवे ते जीवनामा मागको समयसारनाटक. ४० रणजे गुंन शियाने तेथी ते ज्ञानी निन्न रहे,ममतान धरे.अने यात्मानुजस्व ग्रही अत्माना अनुनवना वारंजना रतनुं कौतुक करे . ॥ १ ॥ इति श्री नाइक समयमारको पुन्य पाप एकत्ती कयन चतुर्य द्वार संपूर्णः टोहरा--पुन्य पापकी एकता. वरनी धगम अनूप; अब आश्रव अधिकार तु. कहाँ अध्यातम रूप. ॥ ४२ ॥ अर्थ-पाप पुस्यनी एकता तो यगम अने अनुपम ने तेनुं वर्णन कीथु. हवे कि श्राश्रवनो अधिकारचे ते कटुडं धने अध्यात्मनुं वरुप कडुडं | Uv ॥ थाश्रव मुनटनोनाशकरनारडानसुनटनेनमस्कारकरेः यथज्ञान बल वर्णन:- सवैया कत्तीना:-जे जे जगवासी जीव थावर जंगम रूप. ते ते निज वन क राख वन तोकि; महा अनिमानी ऐसो यात्रव थगाय जोधो रोपि रनर्थन वा नियो मूठ मोरिक ; यायो तिहि थानक अचानक परमधाम, डान नाम सुनट वायो वन फोरिके यात्रव पहार्यो रनयंन तोरि मार्यो ताहि, निरखी वनारनी मत कर जोरिके. ॥ ५३॥ अर्थ-जे जे थावर जंगमरूप जगतवासीजीव वे, तेना सहजवल ने तोडीने ते जीवोने यात्रव जोधाए पोताने वस करी राख्या एवं महा यनिमानीजगतमा वरूपी अगाध जोहो रहेने, ते रणयन रोपीने मूठमरोडीने वाढो थयो ने 'एम कहते के. जगतमां मने जीते एवो कोड नथी. ते स्यले अचानक पल Tम के अती तेजस्वी ज्ञान नामनो मुनट उपना थाश्रव जोहानो निर्व, सिवायोरल फोरवीने लडवा ने थाव्यो तेणे याभव सुनटने पनाहर, रणथंन तोडी नाख्यो एवा झान सुनदने निरखीने वनाग्नी दान मिस्कार करते ॥ ५३॥ हवे इध्यरूपी श्राअवयने नावरूपी थावना लक्षण - मन काननु लक्षण पण कहे-यय विविध याव सनन नामानिन नवया तेऽसा:- दर्वित थायव सो कहिये जाहिं पर वेत यायव सो कहिए जहिं राग विरोध विमोड़ निक- Frent - हेये जहिं दर्वित नावित थाश्रव नास; डानमा । बाहरि और न नातै ॥ ५४ ॥ १ .

- . । ग थर्थ-जे व्याश्रवना स्वरुपमा होय नही, घने जांहां नावाप्रवनु पण नाव कोई नथी,थने जेनी दशा ज्ञानमय होय,तेज जीप ज्ञानीथने थानवरहित कपि, हवे ज्ञातानी समर्याईथी निराश्रवपणु देखाडे -थथज्ञाताकोसमर्थपणोवर्धन- अर्थ-जेटला परिणाम प्रगट मनगोचर ठे, एटला जिन परिणामन मनमा | सनारेने जाणे ,थने बुद्धिपूर्वक के पोतानी यह बुझिवडे जे थक्ष परिक्षा | | स्वरूप मनवडे देखाय नही, थने अबुद्धि पूर्वक के जेने बुझिनो प्रचार लागेन ४०G समयसारनाटक. इवित थाश्रव जाणीये. थने जाहां इवित थावना प्रसंग थकी गप विमोहनो विकाश थाय त्या नावित थाश्रय कहीये, थने ज्यां सम्यक् पति के सम्यक् स्वरूप कहिये ताहां तेने इवित यात्रव अने थाश्रवनो नाश थाय, एटले सम्यक् पक्षतिने विपे ज्ञान कला प्रगटे तेथी वाश्रवमा बाहिर व्याश्रवा बीजू नासे नही, सम्यक्ज दीनामां थावे ॥ ५३ हवे सम्यक् स्वरूपनो धणी जे ज्ञाता तेनु लक्षण कहेढे अथ ज्ञाता लाल चोपाई बंद -जो दरवाश्रवरूप न होई, जहनावाश्रव नाव न कोई, दशा ज्ञानमय लहिये, सो छातार निराश्रव कहिये ॥ ५५ ॥ सर्वया इकतीसा -जेते मन गोचर प्रगट बुधि पूरवक, तिन परिनामनकी ममता हरतु है, मनसा अगोचर अबुधि प्रयक नाव, तिन्हिके विनासको उद्यम धन है, याहि नाति परपरिनतिको पतन कर, मोखको जतन करे नौजल तरतु है, से हानवत ते निराश्रव कहावै सदा, जिन्हको सुजस सु विचक्षण करतु है।५३ म उपजेठे, ते परिणामनी ममता नाम लेथने जे नाव मनी अगोचर के जान . ३am- समयसारनाटक. ४गए अर्थः- जेम मतिमंद के अज्ञानी जन जगतमा स्वछंद के मरजी मुजब गर्ने, तेम पंमित पण सदा तेवीरीते वर्त, ते भावीरीते चचल चित्तवाला रहे, संजत वेन के विचारविना वचन बोले, थने शरीर स्नेहने प्रवर्तीवे, घने प्रज्ञानीनी माफक नोगतंयोग राखे, परिग्रहनो संग्रह करे, अने ज्ञान अवस्थामां मोहविलास एवोज करे, ए रीते अज्ञानीनी धने ज्ञानीनी एक सरखी रीति जोईने शेष्य वाचार्यने पूढे के, एने सम्यक्वंत निराश्रव केम कहिये ? ॥ ५७ ॥ हवे ए प्रश्न, उत्तर गुरु आपेठे:-अथ गुरु उत्तर कथन:-- सवैया इकतीसाः-पूरव अवस्था जे करमबंध कीने अब, तेई नदै थाई नाना ना ति रस देत है; केई गुन शाता केवगुन असातारूप, उद्सों न राग न विरोध सम चेत है, यथायोग क्रिया करै फलकी न वा धरै, जीवन मुगतिको विरुद्ध गहिजेत हैं, यातें ज्ञानवंतको न थाश्रव कहत कोउ, मुखतासो न्यारे नये सुद्धता समेत हैं.७७ अर्थः-पूर्वकालमां अज्ञानअवस्थानेविपे जे जे कर्मबंध कीधेला होय तेज कर्मों वर्तमानकालमां उदय आवीने नाना प्रकारनो रस आपेले. तेमा केटला एक शुनकर्म ते शातारूप , अने केटलाएक अगुन कर्म अगातारुप ठे; एवा वे जातना कर्मनेविपेझानीने राग अने विरोध नथी, एथी ज्ञानी समचित्त वे. अने यथायोग्य के उदयमाफक क्रिया करे, पण फलनी वा राखे नही. ने जीवता ज मुक्त थयाठे तेथी जीवन्मुक्तिनो विरुद धारेवे, ए रीते ज्ञानवत मनुप्यने कोई थाश्रव केहेतु नथी. ते मूढतायी न्यारो थयो अने गुइता समेत वे ॥ ५७ ॥ हवे राग देप मोह अने झानना लक्षण कहेते.-यय राग देप मोहझान लक्षणः- दोहरा:- जो हितनाव सु राग है, अनहितनाव विरोध; 'नामकनाव वि मोह है, निर्मलनाव सु बोध ॥ एए । अर्थ-जे हितनाव वे ते राग ठे, थने अनहितनाव ते विरोध वेयने नाम कनाव तेने विमोह कहिये, थने निर्मलनाव ते वोध एटने झान कहिये ॥५ए हवे राग पर्नु स्वरूप कहेने.- अथ राग हेप कथन.- दोहा -राग विरोध विमोद मल, ए थाश्रव मूल; एई कर्म वढाके, करे घरमकी नूल ॥ ६ ॥ अर्थ -राग हेप ने विमोह जे वे ते थात्माने मज , घने एज दोपयाश्रवना मूल ले. थने एज रागपि थने मोह वे ते करमने वधारीने धरमने नुनावी दिने ६० हवे ज्ञाताने निगश्रव कहतेः-यथ ज्ञातानिगश्रव कयनः- बने जेने अतर मुहूर्तजगी उपशम्योज रहे तेने उपशमी कहीये एग बनमा . . . . - r | निकट के पासे थया, ने मिथ्यामतिने नेदीने पोतानु स्वरूप जे ज्ञान जाव नेविपे परिणामी रहे, जेनी ज्ञानरूपी दृष्टिमा राग ३पने मोह कई पामियर धावे, थने पाचे प्रमाद तजी पोताना शरीरने साधीने मन वचन थने कापान, ही, अने निर्मल निज स्वनावनी विलोकतामा राग ३पने मोहएत्रणेने जीती। | शैलेशीकरणमा निरोध करीने गुच उपयोग दशा जे केवल दशा तेनेवि मनी गया तेवा ज्ञानी वपनो मार्ग विमारी अने परवस्तुनो सग वोडीने यात्मानषि/ श्रवी थो गुरु उत्तर आपेने के, हातापणु तो उपशमनावने क्योपशम भार शिष्य पूढेठे के, एम झातानेविपे निराश्रवपणु थशे तो थायुष्यपर्यत ज्ञाता निग) 'ज्या लुहारकी समासी है, ठिन थागमाहि विन पानिमाहि तसे एक, सर्वया इकतीसा -जेते जीप पमित खयोपशमी उपशमी, तिन्हको थरया जमे कोने नगकी सगति गति नासी है, आवत मिथ्यात तब नानारूप बारी जेनो म्वपीजाय अने मिष्यातपुज उपशम्यो रहे ते जीर यापशमी रहित अर्थ-मिथ्यात्वनी गाउनेद कीधा पठ| जे मिय्यात्वनो यश उदय था। ४१ समयसारनाटका दोहा -- जहा न रागादिक दसा, सो सम्यक परिनाम, यात , ह्यो निराश्रय नाम ॥६१ ॥ अर्थ - जहा राग देप'मोहनी दशा न मले तेने सम्यक परिणाम कहिये, उपरथी सम्यकवत पुरुषने निराश्रयी नाम थाप्यु ॥ ६ ॥ हवे ज्ञाता जे ते निराश्रवपणामा विलास करे। -अथ ज्ञाता सवैया इकतीसा-जे कोई निकट नव्य रासी जगवासी जीव, मिय्या झान नाव परिनये है, जिन्हकी सुदिष्टिमे न राग दोप मोह कहू, विमनी कनिमे तीनो जीति लये है , तजि परमाद घट सोधि जे निरोधि जोग, गृह गकी दशामें मिलिगये है. तेई व पति विमारि पर सग मारि थापुमे मम व्हके श्रापरूप नये है ॥ ६ ॥ अर्थ-- जे कोई नव्य राशीमा जगतवासी जीव वे, ते नव्यत्व परिपाकन मगन थई श्रापरुपे थया ॥ ६ ॥ वडे चचन ते करे -अथ उपगमी क्योपशमी व्यवस्था कयन जो कोने नागको प्ररुति परगासी है ॥६३ ॥ - जिनमें .

समयसारनाटक. ४११ - ते जे जीव पंमित तेनी अवस्था ते लुहारनी सापसी समान वे; जेम सागमी घडीमा लोहने ग्रहण करी भागमा होयठे, ने घडीमा तेहज सारासी लोखमने मो करवा सारु पाणीनेविपे होयठे ; तेम ए दयोपशमी अने उपगमीजीव क्षण एकमां मिय्यात जावमा आवे न हणनेविपे डानकलाना प्रकाशमा रहेते. एवी अवस्थानेविपे जांहांसुधी झानकता रहे तांसुधी चारित्र मोहनीनी पचीस प्रक ति शिथिल के ढीली थई रहेवे; जेम मंत्रनी जडीए करीने सर्पनी शक्ति गति शिथिल थर्ड जायठे. तेम ए पण जाणवू ; हवे ए जीवने फरी मिथ्यात्व उदय श्रा वेने त्यारे तो नाना प्रकारना फर्मवंध करेठे ; जेम नागनी कोलनी करवाथी ना गनी पोतानी प्रति फरीथी प्रगटे ते रीते जाग. ।। ६३ ।। हवे ज्ञानना गुरुपणानी प्रशंसा कहेने-अथ शुभनय प्रशंसाः- दोहा. यह निचोर या ग्रंथको, कहै परम रस पोप, तजे शुभनय बंध है, गहै शुभनय मोय ॥ ४ ॥ अर्थः-या समयसारग्रंयर्नु रहस्य एज वे अने एज उत्कृष्ट रसनो पोषक के जे गुरूतानी नयरीती ठांमी तो बंध ठे यने शुक्तानी नयरीति ग्रही तो मोद ६४ हवे वे नयनेविपे जीवनो विलास कही बतावे वे:-अथ जीव विलास वर्ननं:- सवैया इकत्तीसा-- करमके चक्रमें फिरत जगवासी जीव, व्है रह्यो वहिर मु ख व्यापत विषमता ; अंतर सुमति आई विमल वडाई पाई, पुजनसों प्रीति टूटी ठूटी माया ममता, सुनै निवास कीन्हो यनुनी यन्यास लीन्हो, नमनाव ठां मिंदीनो जिनो चित्त समता, अनादि अनंत अविकलप अचल ऐसो, पट अवलंबी अवलोके राम रमता ।। ६५ ।। अर्थः-चौदराजलोकमां कर्मन चक्र के० कटक फरी रघु ठे, तेमां जगतवासी जीव पण फरी रह्यो , यने ए फरवामां जीव विषमताए युक्त थयो थको क्यारे 5ष्ट संयोगी ने क्यारे यनिष्ट संयोगी थर्ड ने तेमां वहिर्मुख थई रह्यो, एटले बाह्य विषय नोगनोज ग्राहक थयो, अने यंतरदृष्टियकी थात्मा न जाएयो एटलामां अंतरनेविपे सुमति उपजी, तेणे करीने पोतानी निर्मल प्रनुताने पाम्यो, त्यारे परव स्तु जे पुजन तेनी प्रीति टूटी. एटला कालसुधी पुजनी माया ममता जे नही तूटी हती ते तूटी. जेम शुधनयवडे श्रात्मानुं स्वरूप कह्यु, तेवा शुधनयमा पोते निवास फीधो, अने श्रात्मस्वरूपमा उपयोग राखीने अनुनयनो यन्यास लीयो एथी 'चमनावनो त्याग थयो. अने मन जे ते समाधिनेविपे लीन थयु. , थ-थात्मानु थहित करता थने थध्यात्मस्वरूपथी रहित एबुबा - . तुलना नथी एटले यतुल , वली जेनी खंझना नथी माटे यखम, ए यान थपिनाशी धाम के तेजोमय तेहिज चिदानद स्वरूप ठे, एश्वररूपसमा श्तीश्री नाटक समयसारचिपे वालाबोधरूप आश्रवदार पचम सपूर्ण दोहा-थाश्रवको थधिकार यह, कह्यो यथावत जेम, यव सबर बनन हवे सवरनु थादी ज्ञानवस्तु तने नमस्कार करेवेन्यथ ज्ञान वर्णन - । समथमवत है, ताको विसतार मिलिवेकों परगट नयो, ब्रहममको रिकामीत्रहमा सर्वया इकतीसा-यातमको थहित अध्यातमरहित ऐसो, थाव महातन वत है. जामें सवरूप जो सबमे सबरूपसोपें सबनि सौ थलिप्त अकाशयाना है. सा है शान नानु गुरुसंवरको नेप धरे, ताकी रुचि रेखको श्रमारे दमवत है ।।। ४१२ समयसारनाटक. 'रथी अनादि धनत कालसुधी जे स्वरूपमा कई वीजा रिकपन पोता, बचत पद थवलंबीने पोतानुं जे रमता रामपणु दे तेने अपना हवे यात्मानु शुक्षपणुं सम्यक दर्शन , तेनी प्रशसा करे। सवैया इकतीसा - जाके परगासमें न दीसे राग दोष मोह, थाश्रव हि बंधको तरस है, तिदु काल जामे प्रतिविवित बनतरूप, यापु हू, ता नतते सरस है, नाव श्रुत झान परवान जो रिचारि वस्तु, यमुनो न बानीको परस है, अतुल पखम अविचल अविनासी धाम, पिन सो सम्यक दरस है ॥ ६६ ॥ थर्थ : जे शुक्ष यान्माना प्रकाशमा राग देष मोह न देसाय, थने न होय, तेमा बंधनो तरस के लागवु ते पण न होय, अने जे शुद्ध प्रकाशमा त्रणे काले अनतरूप प्रतिबिंबित थाय ठे, थने निजस्वरूप पण बे, धने सत्तानतमा सरस , ते सत्तारूपी अनत पदार्थ , तेथी सरसने, जेना थनतपर्याय सर्व तेहिज धर्म कहे, धने नावश्रुत झानने प्रमाण की नो विचार अनुनय करे, धने जादा वाणीनो स्पर्श नही, एटले जे वचन नी, थनदररूपनो थनुनव पोते करे, ए सयोगीगुणस्थानकनी दशा में वर्शननु स्वरूप कहिये ॥ ६६ ॥ करों, सुनी जविक धरि प्रेम ॥ ६ ॥ अर्थ - ए रीते श्राश्रयनो अधिकार कह्यो हवे सवरतत्वनु वर्णन करु, हो नविक के. नव्य प्राणी प्रेम धरीने ते सानलो ॥ ६७ ॥ - ॥ - समयसारनाटक. ४१३ रूप महातम के महा अंधकार अखंझपणे अंमवत के सर्व लोकने ढांकी रह्यो जे, तेनो विस्तार गलवाने जे ज्ञानसूर्य प्रगट थयो ते ब्रह्मांम जेवो सर्व लोका जोकने विकागनो करनारो थयो, अने ब्रह्मांमनु मंझन जेयकी थायठे, अने जेने विपे सर्व रूप नासे वे; अने जे सर्वरूपे सर्वमां पामिये वे, अने जे सर्व मूर्तिक वस्तुथी याकागरखमनीपरे अलिप्त ते ते झानरूपी सूर्य तथा जे शुभ संवरनो नेपधरी रह्या ; तेनी रुचि रेखाने एटले तेना उदयने अमारो दमवत के नमस्कार है.६७ हवे जड़ चेतनना जेदज्ञानथकीज संवररूपी परमात्माने उलखाय वे, ते सम जावेते:-अथ नेदज्ञान महिमा कथनः- - सर्वया तेइसाः--गुम मुछेद अनेद अबाधित, नेद विज्ञान सु तीठन थारा; थंतर नेद सुनाउ विनाव करे जड चेतनरूप उफारा; सो जिन्हके नरमें उप ज्यो न रुचै तिन्हकों परतंग सहारा; आतमको अनुनी करि ते हरखे परखे प रमातम धारा.॥६॥ यर्थः- शुक्षपणे स्ववेद के पोतपोताना न्यारा स्वरूपने वतावनार अनेट के - एक स्वरूप अवापित एटले कोई प्रमाणांतरें अखंमित एवं नैदान ते तीक्षण सुलारख ले, ते सुलाखयो अंतरात्मामां नेदन करीने स्वभाव अने विनावने जुदा जुदा करे ने जमरूप तया चैतनरूपने उफार के न्यारा करो वतावे एवं नैदज्ञान जेना दयनेविपे उपज्यु ठे, तेज जीवने परवस्तुनो संग ते सहारा के रुचे नही. धने तेज जीव पोताना स्वरूपनो अनुनव करी यथार्थपणे अंतरात्माने विपे जे परमात्मानी धारा 2 तेने पारखे. ॥ ६ ॥ । हवे नेट विज्ञान ने वे, ते सम्यक्त झान , तेनी समर्थाऽ थकी स्वरूपनी प्रा प्ति थाय ; ते कठे:-- अथ सम्यक्त सामर्थता कथनः-- । सबैया तेइसाः--जो कवहूं यह जीव पदारथ, यौसर पा मिथ्यात मिटावै; सम्यक धार प्रवाह वहे गुन ज्ञान उदे मुख करध धाव; तो थनिअंतर दर्चित नावित कर्म कि लेश प्रवेश न पावै, बातम साधि यध्यातमको पय पूरण व्है परब्रह्मकहावै ॥ ७० ॥ अर्थ.- जो कोई था जीव पदार्थ वे, ते यथाप्रवृत्तिकरणरूप अवसर पामी ने मिथ्यात्वयंथि नेटीने मिथ्यात्वने मिटावे शु६ सम्यक अने स्वरुप जलधा रानो प्रवाह वहे अने ज्ञानगुणना उदय वहे उर्ध्व मुख थईने मुक्ति सनमुख दोडे त्यारे अन्यंतर जे इवित कर्म अने नावित कर्म तेना क्लेसनो प्रवेश ते न 4 तुनिश्तर ज्याति सघाउ त मनिमान मुद्रण समान गनिनकान गुनाना- पिरतीनी रीत फुरी श्रने निरतर तप यकीननो माऽ यानि यायन तन बुद्धि कहिये त सुमणसमान ने नेमन गुनागुन स्मरपसाट नागा गस्ता नयी। नंदज्ञान त्याग जाग ता पण नयानु नपाय तारपा न77 नया" हो स्वरुपनी प्राति थया पठी नदाननु हयपाणु ग्यान अगर ना गुरुमापन परमानन समयसारनाटक. थाय जे प्रति प्रदेशाप कर्म ते ऽवित कर्म अने गग देवादिक कर्म ए वने प्रवेश नही की गा अने अ यात्मना पय मानीमा धाव ने साधीने पाताना म्पमा पूर्ण यन परब्रह्म हवाय ॥ १० ॥ हवे सरनु मागण सम्या टिन तेना महिमा रहने-अथ सम्यक दृष्टि सवया नेऽना -न- मि यान पर महापस न- विज्ञान कना जिन पर अपनी महिमा यामाग्न योगानमा नगर नननि बम निनरंप अर्थ -मि यातथि ने नया मम्मदाम बीन न बुटियने । विज्ञाननी नापामाचे, अनान TE पाताना बम्पनी प्राप्ति पोताना झान दर्शन चापि महिमान पान या यी पर्गमा सामग्री तेना त्यागने मानिक तशविरनि तयार म हर माग्नु मन नरपिठान ने त मादनु कारण कही ममनादन अथ नरज्ञान महिमा स्थन थडिन उद -नादान मघरनिदान निरताप ह कम मार है नदज्ञान शिरमन जगतमहि मानिय यपि हय है नपादय जानिये ॥ १२ ॥ अर्थ -न-ठान जन त निरठाप माग्नु नितान २० मन कारण न गन गनु कारण मार ने अन निगनन ते मान्नु गण न त प्रनाम प्रमान सरमा निग्नग म नु कारण परपगयी नापिकानन दाहा- नेदज्ञान तवना नना जहा तहा शिप न काय ॥ १३ ॥ नशा मुनि न हाय श्रयं -नेदज्ञान त्यांसुधा ननु ज्यास म। मुनि या नथ। चार प्रगट थाय त्या विकटप काई रहे नहीं तानाहान मन नेदज्ञान मुक्तिना उपाय ले ते कहत -अथ नटानमनन राम समयसारनाटक. ૪૧૫ , दूध • चोपाई:-जेदज्ञान तंवर जिन्हि पायो, सो चेतन शिवरुप कहायो, नेटज्ञान जनके घट नाही; ते जडजीव बंध घटमांही. ॥ ४ ॥ अर्थ:-जे जोवने नेदज्ञानरुप संवरनी प्राप्ति थर्ड तेज चंतन शिवरूप कहिये ना हयनेविपे नेदज्ञान नथी ते मूर्ख घटपिमनेविपे बंधायलो रहेते. ॥ ७ ॥ वे जेटविज्ञानवडे यात्मानो महिमा वध ते कहेतेः यथ नेदज्ञानकी महात्म्य.- : टोहराः नेदज्ञान साबू नयो, समरस निर्मल नीर ; धोत्री अंतर पातमा, नीज गुन चीर. ॥ ७ ॥ अर्थः-- नेदज्ञान जे वे ते सावुरुप जाणवू, अने उपगम रस ते निर्मल पाणी | अंतर आत्माने धोबी मानवो, ते धोबी पोताना गुणरूपवस्त्रने धुवेठे ॥ ५ ॥ वे नेटविकाननी जे क्रिया ते कहेठेः-यथ नेदज्ञानको कर्तव्यता महात्म्यः- सर्वया कितीता-जेस रजसोधा रज सोधिके दरव काढे, पावक कनक काटी हत उपलकों, पंकके गरजमे ज्यों मारिये कतक फल, नीर करे उज्वल नितारि कारे मलका, दधिको मयया मथि काडे जैसे माखनकों, राजहंस जैसे पौव पागि जलको : तैसे ज्ञानवंत नेदज्ञानकी सकति साधि, वेदे निज संपति उठेदे रदलकॉ. ॥ १६ ॥ अर्थ.-जेम कोर्ड ग्ज सोधा के जोनारो रजने सोधीने एटले सोना रूपा प्रमु व श्यने काढवाने पावक के अग्मिने लगाडे, ने सोनु काढीनई पथरा धूल गेरेने वाली नाखते. वली जेम कतकफलने पंकना गर्ननेविपे नाखीये तो तें कल जलने मेलथी जूई करेठे, वली जेम दधार्नु मथनहार दधीमयन करी साखणने जूठं करेठे ने राजहंस पाणी दूध भेगा होय तेमांयी मात्र दूध पीई जायचे. पाणीने जूई करेठे तेम ज्ञानवंत प्राणी नेटविज्ञाननी शक्ति साधीने पो तानी ज्ञानसंपत्तिने वेदे अने परदल के पुगजनुं कटक जे राग देपादिक तेने कापी नाखेने. ॥ ८ ॥ अथ दशान मोदमूल यदु कथन-- ठप्पय लंद --प्रगट नेद विज्ञान, थापगुण परगुणजान; परपरिनति परि त्या गि, शुक्ष अनुभव यिति गने; करि अनुनव अन्यास, सहज संवर परगास; थाश्रव चार निरोझ, कर्म धनतिमिर बिनास ; व्य करिविनाव समजाव नजि, निरविकल्पनिज पद गहे; निर्मन विशुद्ध सात मुथिर, परम अनिश्चि सुख लहै.७७ : - अपनी महिमा अवधारत, त्याग करे उरनों ज पराई, उतरीति वसे निना सवैया तेश्सा-नेद मिथ्यात सुरेट महारस नेद विज्ञान कना तिन पाई। तु निरतर ज्योति सवाई. ते मतिमान सुवर्ण समान जगे तिनसेन गुनागुनका विज्ञाननी कला पामोठे,यने जे ए नेदविज्ञान वडे पोताना स्वरुपनी प्राप्ति अर्थ-मिथ्यातग्रथिनेदीने तथा उपशमरुप महारस वेढीने जे दिन में पोताना ज्ञान दर्शन चारित्ररूप महिमाने अवधारे, नर के ० हैया थकी पराईन केसामग्री तेनो त्याग करे घने जेना घटमा उहतरीति के देशविरनि तयार विरतीनी रीत फुरी अने निरतर तप थकीजेनी सवाई ज्योति थाय रे तेने बुनि कहिये ते सुवर्णसमान वे तेमने गुनागुन कर्मरूप काट लागी शकतोनयी हवे सवरनु मूल नेद विज्ञान वे ते मोदनु कारण कही समनावे- अडिन उद-नेदज्ञान सवरनिदान निरदाप ह , सवरसो निरनराव क्रम मोप है, नेदझान शिवमूल जगतमहि मानिये यदपि हेप है वर्ग थर्थ-नेदज्ञान जेठे ते निरदोष सवरनु निदान के मृनकारण ने यनंकित नु कारण परपराथी नेदविज्ञानज वे यगर जा यक्षस्वरूपनी यांनी हवे स्वरूपनी प्राप्ति थया पठी दशाननु हेयपणु देखाइने - दोहा - नेदज्ञान तवजों नतो, जबलों मुक्ति न हाय परम यानि पर कारणले ए यनुकम प्रमार थर्थ-नेदज्ञान त्यांसुधीनमुळे ज्यांसुधी मुक्ति थई नथी नहा परम समयसारनाटक. थाय जे प्रति प्रदेशरूप कर्म ते इवित कर्म थने राग पादिक ते म कर्म ए बने प्रवेश नही करी शके, अने अध्यात्मना पंथ सेलीमा थापीने का ने साधीने पोताना रूपमा पूर्ण थईने परब्रह्म केहेवाय ॥ ७० ॥ हवे सवरनु कारण सम्यक दृष्टिने,तेनो महिमा कहे ते -अथ सम्यक दृष्टि मदिर ० यथ नेदज्ञान महिमा कथन । उपादय जानिये ॥ ७॥ रानु कारण सवर थने निर्जराजेठे ते मोदनु हा, तहा विक्टप न कोय ॥ ३ ॥ -स्वरूपपन- पाय त्या विकटप कोई रहे नही तो दज्ञान केम करीने रही 1 नेदशान मुक्तिनो उपाय लेते कहने श्रथ वज्ञानमहिमा समयसारनाटक. ४२५ चोपाई:-दज्ञान संवर जिन्हि पायो. सो चेतन शिवरुप कहायो, नेदज्ञान निके घट नांही : ते जडजीव बंध घटमांही. ॥ १४ ॥ अर्थः-जे जीवने जेदज्ञानरूप संवरनी प्राप्ति थई तेज चेतन शिवरूप कहिये ना हयनेविपे नेदज्ञान नथी ते मूर्ख घटपिमनेविपे बंधायलो रहेठे. ॥ ७ ॥ वे नेदविज्ञानवडे यात्मानो महिमा वधेठे ते कहेः अथ नेदज्ञानकी महात्म्यः- दोहराः नेदज्ञान साबू जयो, समरस निर्मल नीर ; धोबी अंतर पातमा, वि नीज गुन चीर. | FU ॥ । अर्थ -- नेदज्ञान जे ते ते सायुरुप जाणवू, अने उपशम रस ते निर्मल पाणी । अंतर आत्माने धोबी मानवो, ते धोबी पोताना गुणरुपवस्त्रने धुवेठे ॥ ५ ॥ वे नेदविज्ञाननी जे किया वे ते कहे-अथ नेटज्ञानकी कर्तव्यता महात्म्य - सवैया इकतीसा:-जैसे रजसोधा रज सोधिके दरव काढे, पावक कनक काढी हत उपलकों, पंकके गरनमे ज्यों मारिये कतक फल, नीर करे उज्वल नितारि कारे मलको ; दधिको मथैया मथि काटे जैसे माखनको, राजहंस जैसे दूध पीवे पागि जलकों ; तैसे ज्ञानवंत नेदज्ञानकी सकति साधि, वेटे निज संपति उठेदे रदलकॉ. ॥ ६ ॥ अर्थ -जेम कोई रजसोधा के जोनारो रजने सोधीने एटले सोना रूपा प्रमु व इव्यने काढवाने पावक के अग्मिने लगाडेवे, ने सोनु काढीतई पथरा धूल गरेने वाली नाखेने. वत्ती जेम कतकफलने पंकना गर्ननेविपे नाखीये तो तें कल जलने मेलथी जू करे, वली जेम दधी, मथनहार दधी, मथन करी ताखणने जूई करे ने राजहंस पाणी दूध लेगा होय तेमाथी मात्र दूध पीई नायठे. पाणीने जूई करेठे तेम ज्ञानवंत प्राणी नेदविझाननी शक्ति साधीने पो तानी ज्ञानसंपत्तिने वेटे अने परदल के पुजलन कटक जे राग पादिक तेने कापी नाखेते. ॥ ७६ ॥ अथ दशान मोदमूल यदु कथनः- ठप्पय वंदः-प्रगट नेट विज्ञान, थापगुण परगुणजान; परपरिनति परि त्या गि, गुड़ अनुनव यिति नै ; करि अनुनव अन्यास, सहज संवर परगास; थाश्रव धार निरोझ, कर्म धनतिमिर विनास ; व्य करिविनाव समनाव लजि, निरविकल्पनिज पद गहे; निर्मत विशुद्ध सामुत सुथिर, परमयतिश्यि सुग्व सह.७७ - नेददान सुनिनो उपाय ने ते कठे-थथ भेदज्ञानमहिमा A कहिये ते सुवर्णसमान वे तेमने गुनागुन कर्मरूप काट लागी शकतो नयाँ दो सवरनु मूल नेद विज्ञान के ते मोदनु कारण कही समनावे - श्रहिन उद -नेदज्ञान सवरनिदान निरदोप है , सबरसो निरजरा कम मोप है, नेदज्ञान शिवमूल जगतमहि मानिये, यदपि हेय है थर्य-नेदज्ञान जेने ते निरदोष सवरनु निदान के मूजकारण धनं. रानु कारण सपर थने निर्जराजेने ते मोदनु कारण एअनुक्रम प्रमाण दनु कारण परपराथी जेद विज्ञानज ते थगर जो शुक्षस्वरूपनी थोशन भेदज्ञान त्याग जोगले तो पण नयोर्नु उपादेय ते श्रादरवा जाग्य जानिये. दवे सम्पनी प्राति थया पठी नेदशाननु हेयपणु देखाडेने-साप स्पन दोहा - दशान तवजों ननो, जबलों मुक्ति न होय, परम ज्याति पण थप-नेदज्ञान त्यासुधीनजुरे ज्यासुधी मुक्ति थई नथी जहाँ परम 7 ४१४ समयसारनाटक. थाय. जे प्रकृति प्रदेशरुप कर्म ते इवित कर्म थने राग देवादिक ते कर्म ए वने प्रवेश नही करी शके, थने अध्यात्मना पथ सेलीमा धावीन ने साधीने पोताना रूपमा पूर्ण थईने परब्रह्म केहेवाय ॥ ७० ॥ हवे सवरनु कारण सम्यक दृष्टिले,तेनो महिमा कहे ते -अथ सम्यक सवैया तेऽसा -नेद मिथ्यात सु वेद महारस नेद विज्ञान कजा निन, ', थपनी महिमा अवधारत, त्याग करे बरसों ज पराई, उत्तरीति बसे।।। तु निरतर ज्योति सवाई, ते मतिमान सुवर्ण समान लगे तिनको न अर्थ -मिथ्यातथि नेदीने तथा उपशमरूप महारस वेदीने जे बुदिधन विज्ञाननी कला पामोने, अने जे ए चेदविज्ञान बडे पोताना स्वरूपनी पोताना ज्ञान दर्शन चारित्ररुप महिमाने अवधारे, उर के० हैया यरी के सामग्री तेनो त्याग करे अने जेनापटमा बरीति के देशविरनि विरतीनी रीत फुरी थने निरतर तप थकी जेनी सवाई ज्योति ५७. यथ नेदज्ञान महिमा कथन- उपादय जानिये ॥ ७ ॥ जहा, तहा सिप न काय ॥ १३ ॥ कपन- समयसारनाटकः ४१५ • चोपाई. नेदज्ञान संवर जिन्हि पायो, सो चेतन शिवरूप कहायो, नेदज्ञान नके घट नाही; ते जडजीव वंधे घटमांही. ॥ ४ ॥ 'अर्थः-जे जीवने नेदज्ञानरूप संवरनी प्राप्ति थई तेज चेतन शिवरूप कहिये ना हृयनेविपे नेटझान नथी. ते मूर्ख घटपिंमनेविपे बंधायलो रहेठे. ॥ ४ ॥ वे जेदविद्वानवडे यात्मानो महिमा वधेठे ते कहे:-अथ नेटानकी महात्म्य - : दोहराः-नेटज्ञान साबू नयो, समरस निर्मल नीर ; धोबी अंतर थातमा, व नीज गुन चीर. ॥ ७ ॥ अर्थ.-- नेदज्ञान जे वे ते सावुरुप जाणवू, अने उपगम रस ते निर्मल पाणीने यंतर यात्माने धोवी मानवो, ते धोबी पोताना गुणरुपवस्त्रने धुवेते ॥ ५॥ वे नेटविज्ञाननी जे किया वे ते कहेः-अथ नेदज्ञानकी कर्तव्यता महात्म्य - सर्वया इकतीसा -जैसे रजसोधा रज सोषिके दरव काढे, पावक कनक काढी आहत उपलको, पंकके गरनमे ज्यों मारिये कतक फल. नीर करे उज्वल नितारि बारे मलकों; दधिको मर्यया मथि काढे जैसे माखनकों, राजहंस जैसे दूध पीय मागि जलकों, तैस ज्ञानवंत नेदझानकी सकति साथि, वेटे निज संपति नटे नारदलकों. ॥ ७ ॥ अर्थ -जेम कोई रज मांधा के० जोनारी रजने नोधीने एटले लोनारपा प्रमु व व्यने काढवाने पावक के० अग्मिने लगाडे. ने सोनुं काटीत पथग यूज़ गिरने वाली नाग्वेने. वली जेम कतकफलने पंकना गर्ननेविपे नाखीये तो ते कल जलने मेजयी जू करने, बली जेम धोनुं मयनहार दधीनुं मयन करी ताग्वणने तूई कोठे ने राजदंस पाणी दूध नेगा होय तेमांयी मात्र दृध पी लाय. पाणीने जूई करेतेम ज्ञानवत प्राणी नेटविताननी हानि नाधीने पो मानी ज्ञानसंपनिने बेटे थने परदल के पुल, कटक जे राग ६पाटिक तेने कापी नावे. ॥ ६ ॥ अथ नेदझान मोदमूल यदु कथन.- उप्पय बंद -प्रगट नेट विज्ञान. थापगुण परगुजान ; परपग्निनि पहिल्या गि, शुक्ष अनुनय विनि गर्न करिअनुनय श्रन्यान, सहज नंबर परगान ; थाअव धार निरोड, कम घनतिमिर विनान; व्य कनिधिनाय नमनाव नजि. निरविकल्पनिज पद नहः निर्मज विशुद्ध सामुत चिर.परमयनिश्चि नुन लई.33

पान तनु फज नांगता यका श्वनावधनवा कर्मनो बध थतानपी."
-
,
। सरर थानद फरे, थने पूर्व कालनेविपे जे कर्म कीया, तेने जडथी बडी
यात्मानी निर्जरा कहिये ते निर्जराने बनारसीदास बदन करे ॥ ५॥
निर्जरानु कारण सम्यक्त ने माटे सम्यक्तनो महिमा बरखासे -
दोहा- महिमा सम्यक् शानकी, थरु चिराग बल जोइ, किया काल
यर्य- जे कर्म नूटे तेनु फरीने बंधन थई शके नही एसम्या
मा ठे वजी एसम्यरज्ञान साये वैराग बननो जोग ठे, तेयो गुनासन किया
समयसारनाटक
अर्थ- नेद ज्ञान जे ते प्रगटपणे पोताना तेम पारका न
थी परवस्तुमा जे परिनमन - तेनु ज्ञान करे, पोताना शुध
खे, ने ते अनुनवनो अभ्यास करीने सहज संकरना रूपनो प्रकाश
पारनो विरोध करीने कर्मरूप मेघ अधकारनो नाश करे, यने विनाव
दशानो क्य करीने समजाव के समाधिने नजे, तेणे करीने जहा
नयी एवु पोतानु निर्विकल्प पद तेने पामे एटले जे सुखनेविषे मन
उपरथी ते विशुर थनत कालसुनी एकरूप तेथी शाश्वत स्थिर एबु
के इडियगोचर नही एवु सुख पामे ॥ ७ ॥
इति श्री नाटक समयसारको बालावोधरूप सवर धार बठो सपूर्ण
दोहा -- बरनी सवरकी दसा, जथा जुगति परमान,
सुनहु नाविक धरि कान ॥ ७ ॥
थर्थ -सवररूपनी दशा कही ते युक्ति तथा प्रमाणे करी कहीने,
नी वितरणी के० थापनारी एवी जे निर्जरा वे तेनु वर्णन करु
नय्य लोको तमे कान दर्शने शनिलो ॥ ७ ॥
हवे निर्जरानु केवु स्वरूप ने ते कहे - अथ निर्जरास्वरूप कथन
चोपाई - जो सवर पद पाइ अनदे, जो पूरव कृत कर्म निकदे,
व्ह बटुरि न फदे, सो निरजरा बनारसि बंदे ॥ ७ ॥
श्रर्थ-पोतानु जे शुद्ध स्वरूप राखनु तेनु नाम सवर कहिये, तेनु,
थथ सम्यक्त महिमा कयन
मुक्ति वितरनी
-
प्लुजते, करमवध नहि होइ ॥ ७० ॥

จ एटले सम्यक् ज्ञाननी प्राति न थई तेथी यात्माना श्रगविपे वधविचार नहीं था . थने सत्यउपदेश थापी बीजाने पण तारे, ए रीते पोताना यात्मश्यने। हवे विपयनी थरुचिविना झाननु वल निष्फल ठे, थने एवा ज्ञानीने सोया तेश्सा .. जो नर सम्यक्वत कहावत, सम्यक ज्ञान फजानहि जागी थातमयग थवध विचारत, धारत सग कहे हम त्यागी, नेप धरै मुनिरान तर, मोह महानल थतर दागी, सून्य हिये करतूति कर परि,सो सर जोर थर्य-जे मनुष्य पोत सम्यकवत केहेवाय धने सम्यक् झाननी कनान ४१७ समयसारनाटक तेवी रीते ज्ञानवत प्राणी नाना प्रकारनी किया करेठे, पण क्रियाने पुजा वाली जाणीयात्मस्वरूपथी निन्न माने ते तेथीज कर्म वध कलंकया. हवे विपय नोगवता थका कर्म व न थाय एवी ज्ञानवैराग्यनी in -अथ ज्ञान वैराग शक्ति वर्णन:- सोरा-पूर्व उदय सबध, विषय नौगवै समकिती; करै न नूतन महिमा ज्ञान विरागकी ॥ ३ ॥ अर्थ - पूर्व सचित कर्म उदय थाव्याथी तेना सबधे सम्यक्ती जीव विषय गवे दे, पण नवां कर्मबंध करतो नथी, एसम्यक् ज्ञान तथा वैरागनी शकिडे वे जे ज्ञाता होय ते सम्यक् ज्ञान थने विषयनी थरुची ए बेउने । ते कहेठे-अथ शताको व्यवस्था कथन सवैया तेऽसा - सम्यकवत सदा र अतर, ज्ञान विराग उनै गुन धारे, सु प्रनाव लबै निज लहन, जीव अजीव दशा निरवार,थातमको ब्द थिर, थापु तरै थरु थोरनि तार, साधि सुदर्व लहै शिवसर्म सुकर्म • | व्यथा वमिमारै ॥ ४ ॥ थर्थ-जे समकिती होय ते सदा पोताना यंत कर. वे गुणने धारे जे गुणना प्रनायवडे पोतानु ज्ञातापणु लक्षण जोने जीव व दशा एटले जीव थजीवनु स्वरूप निरवार के जुठ जुड़ जाणे, ते पनी माने यथार्थपणे वेदीने यात्मिक स्वनावमा स्थिरता थई रहेठे, ने मोदसूखने पामे, थने कर्मउपाधि सहित जे व्यथा तेनु वमन करे ॥ ६ पदनेपिप रहेवायो मिथ्या हिरा - मियादृष्टि व्यवस्था कपन होइ चिरागी ॥ ५॥ ५शान. .

समयसारनाटक.
४रए
श्रय नयनो पक्ष लईने पोते त्यागी एम कहे, मुनिराजनी पते पटतर के नेप
धरे, पण अंतरनेविपे मोहमहानल के मोहरूप धमि शलगी रही होय; विषय
थकी वैरागी न थयो, तेथी हिया सून्य थको मुनिराजनी पठे क्रिया करे, पण
ते जीव मूर्खज केहेवायठे पण वेरागी कहेवाय नही ॥ ५ ॥
हवे जे सर्व क्रिया करता थका पण मूढ केवाय वे ते कहे :-
थथ मूढ किया वर्णन:--
सवैया तेइसाः- ग्रंथ रच चरच गुन पंथ लखै जगमें व्यवहार सुपत्ता; सा
घि संतोप अराधि निरजन, दे सुसीख न लेइ थदत्ता; नंग धरंग फिरै तजि संग
के सरवग मुधारस मत्ता; ए करतूति करे सर पें समुजैन अनातम आतम सत्ता.
॥६॥ ध्यान धेरै करि इंघिय निग्रह, विग्रहसों न गिनै निज नत्ता; त्यागि विनूति
विनूति मिटै तन जोग गर्ह नवनोग विरत्ता; मौन रहै लहि मंद कषाय सहै वध
बंधन होइन तत्ता; ए करतूति करै सठ पै समुजैन अनातम पातम सत्ता ॥७॥
थर्थः- ग्रंथ रचना करे, नला मार्गनी चरचा करे, नला मार्गने लखे, जगतमां
व्यवहार मार्गमा प्राप्तिथको रहे, संतोपी थईने निरंजनने आराधे, लोकोने सा
री शीखामण आपे, अदत्तदान ले नही, परिग्रह संग त्यागीने नंग धरंग फिरे के
दिगंबर थई फरे, यने मुधा के ० मुग्धपणे पोताना रसमा मातो थको सर्वांगे क्यो
रहे, एवी एवी क्रिया मूर्ख होय ते करेठे पण अनातम सत्ता के छ आत्माथी पृथक
जे मोहनी गहलता ते तेने, अने यात्मसत्ता केन्गुरू जाणपणानी जे सत्ता से,
तेने झुदी जुटी जाणे नही तेमने मूर्ख केहेवा ॥ ६ ॥
वली मूढनी क्रिया केहेत्रे के, ध्यान धरे, इंख्यि दमन करे, विग्रह करेठे तेश
रीरनी साथै पोताना यात्मानो संबंध गणे नही. विनूति के संपत्तिनो त्याग क
री विनूति के नस्म शरीर उपर लगाडे, योग मार्ग ग्रहे, अने संसारना नोगथी
विरक्त रहे, मानपणे रहे, कपायतुं मंदपणुं समजे, वध बंधन सहेतो यको पण
तातो नही थाय, क्रोधादिक न करे, एवी क्रिया सठ मूढ होय ते करे ठे, पण थ
नातम सत्ता एटले कर्मादिक प्रनावनी सत्ता अने यात्मसत्ता ऐटले थात्मा
सत्य स्वरूप तेने समजे नही माटे तेने मूर्व समजवो. ॥ ७ ॥
हवे फरी मूढपणानुं स्वरूप वतावेजेः- पुनः मूढ वर्ननः-
चौपाई:-- जो बिनुझान किया अवगाहै; जो बिनु किया मोख पद चाहै; जो
बिनु मोख कहै में सुखिया; सो अजान मूढनिमें मुखिया ॥ ७ ॥

मनकामना, तरै बनमार यो मासरो सपट धार विर्य सुम्पसरत - -. १ कर्मची रीते के० म्यारावे, एवा वचन गुरु कहे ते जे प्राणी हयामा | ता नपी ते मित्रना पुत्र जेयाने, केमके मित्रना पुत्रबहे पोतानु पर उग, नयी थने तेने शीग्वामण शी देवी थने चित्रामण जेवा ने कारण के नदना नवीनी जागृनदा एप ये दशावेतेनी चाजमानना ॥wat सादर करना, मन को चनन थचेतनता नीद निए, मादकीमगार मर्वया शनीमा- काया चित्र सारीमें परम परजक नारी,माया मेर ४० समयसारनाटका थर्थ-जे जन छानविना क्रिया थवगाहे थने क्रियाविना मोह पर चली जे मोद पाम्या शिवाय कहे के दु सुखी कुं, तेने अजाण मूर्सनो जापवो ॥ ७॥ हो जेने कर्मसत्ता तथा यात्मसत्तानी निन्नता नासती नयी तेने ढ कहिये तेनु विवेचन करेठे - अथ महामूढ व्यवस्थाकथन सर्पया इझतीसा -- जगवासी जीवनिसों गुरु उपदेश कहै, तुम्हे इहा थनत कात बीते है , जागो व्द सुचेत चित समता समेत सुनो, केवन जामे यदर सजीते है, थान मेरे निकट बताउ में तुह्मारे गुन, परम । फरमसो रीते हैं, ऐसे बैन कहै गुरु तउ ते न धरै उर, मित्रकेसे पुत्र । चित्रकेसे बोते है ॥ ए ॥ थर्थ - सर्ष जगवासी जीना हित चाटयने थर्थे गुरु एवो उपदेश यही नथ्य प्राणी जीव तमे श्रा जगतमा मोहनिझनेविषे सूता रह्या थकान नादि यनतकाल तमोने चौत्यो , माटे हो तो चित्तमा सचेत बने ने समता सहित थका केवलीना वचन साचलो, जे केवलीना वचनर्मा के. इश्यिना पिय रस तेने जीतेलाने, थने तमे मारी पासे गुण बतात, ते गुण कैवाने, परम एटले उलट सुरसे करी नरेता ने, एपी काई सस्य किया थती नयी ॥ नए ॥ दोहा - एते पर बडगे सुगुरू, वो वचन रसाल, सेन दशा जागून वह उहूरो चान | mou वर्य -ए प्रमाणे सने ते फरी सरस पचन बौने , के जीने एर हो मन दशानु वर्णन ने-थय गयन दशा वर्णन . - - समयसारनाटक. ४३१ बर्ष:- कायारूप चित्र साली, तेमां कर्मरूप पर्यक ठे, तेउपर मायानी सेज संवारी , कल्पना के मननी विकल्पनारूप चादर वे, अचेतनानी कंघल ईने एवी सामग्रीमा चेतन शयन करी रह्यो , मोहनी मरोम तेणे करीने लोचन ढंकाया ; उदय बल जोर जे ठे, ते श्वासनो घोर शब्द वे,अने विषय सुख कार्य नी दोड एटले करणी करवी ते स्वप्नावस्था ठे, अने एनुंज नाम मूढदशा तथा श यन दशा कहिये. धने ए दशानेविपे जे मूढ जन दोय, ते चणे काल मगन थको धावे , एटले भ्रमजालमां ढोडेठे, पण पोतार्नु रुप पामतो नथी. ॥ १ ॥ हवे जीवनी जागृतदशानुं वर्णन करेवेः अथ जागृतदशा वर्णनं:- सवैया इकतीसाः-चित्र सारी न्यारी परजंक न्यारो सेज न्यारी, चादर जी न्या री श्हां फूठी मेरी थपना; अतीत यवस्था सैन निभा वही कोच पैन विद्यमान पलक न यामें थव उपना; श्वास थौ सुपन दोउ निशकी अलंग बूजे, सूर्ण सब थंग लखि थातम दरपना; त्यागी नयो चेतन अचेतनता नाव त्यागी, नाले दृष्टि खोलिक संजाले रूप अपना. ॥ ए२ ॥ अर्थः- यात्मशान पाम्याथकी कायारूप चित्रसारी जुदी जुए,थने कर्मरुप पलं गने पण न्यारो देखे; मायारूप सेज पण जुटी जुए, कल्पनारूप चादरने न्यारी इए, मतलवके ए वेकाणे मारी स्थापना फूठी एम समजे. अतीत थवस्थानेवि एटले सपनटशामा निश सेनार पण कोई वीजा रूपे ढुंजलु, विद्यमान कालमां ते अवस्था नथी. हवे पलकमात्र पण या अवस्थामा मारो धनाव थनार नथी. श्वास थने स्वप्न ए वे निशानी अलंगनासंयोगे बूजे, धने यात्मारूप धारिमामां श्रात्मानुज सर्व थंग सूजे एवी रीते धचेतनतारुप निझनो त्याग करीने चेतन ल्या गी थयो त्यारे पोतानी दृष्टि खोलीने जुए, धने पोता रूप संनाले. ॥ ५ ॥ वली सद्गुरु शिक्षानां वचन कहे। थथ पुन: सद्गुरु शिदा कयनं:- दोहाः-इहि विधि जे जागे पुरुप, ते शिवरूप नटीच; जे सोवहि नंगाग्में, ते जगवाली जीव ॥ ए३ ॥ अर्थ एरोते जे पुरुप जागे .तेतो सर्व कालनेविपे शिवरूप के मोदरप जाणपा. बने जेटला संसारनेविपे सूता ने. तेटला तो जगतवानी जीव ममजवा. ॥ ३ ॥ ढे मोक्पट उपादेयम्प कहीने न्तुति करेवे. यथ यात्मव्य म्ननिकपन दोहा--जो पट नोपद नप हरै, सोपद तोठ अनूप ; जिदि पद परमन श्री र पर, लंग वापदारूप ॥ए ।

No text on this page.

समयसारनाटक. ४२३ - ख तेथी विमुख थई परमात्मारूप थईने कर्मनी निर्जरा करे , एटले निर्जरा थायठे. तेथी पोतानी सहज समाधिसाधिने पर जे कर्मपुजलादिकनी उपाधि जे राग देवादिक, तेनो त्याग करीने आत्माने श्राराधी परमात्मा पषु करे ॥६॥ हवे जे ज्ञान समुझ परमात्मानी प्राप्ति थाय , ते झाननी प्रशंसा करे:- अथ ज्ञान समुश्वर्णन:- सर्वया इकतीसाः-जाके उरचंतर निरंतर थनंत दर्व, नाव नासि रहे पें संजाउ न टरतु है; निर्मलसी निर्मल सुजीवन प्रगट जाके, घटमें अघट रस कौतुक करतु है; जान मति श्रुत योधि मनपये केवल सु, पंचधा तरंगनि उमंग उतरतु है ; सो है शानदाधि उदार महिमा अपार, निराधार एकमें अनेकता धरतु है । ए७ ॥ अर्थः-जे ज्ञान सागरना मध्यनागनेविपे निरंतर अनंत इव्य पदार्थ नासी रह्या ने, पण ते इयनो स्वनाव पोते पामतो नथी, निर्मलमां निर्मल एबुं सुजी वन के जीवितव्य अने समुश्; पदे मुजीवन के पाणी ते, जेनुं प्रगटठे,यने घटमें के हृदयनेविपे अवट के यणरस कौतुक के सत्यार्थ वेदननुं जे रस तेनुज कुतोहल करे ठे, एटले ए समुन्नेविपे रस कुतोहल घणा ने, अने जे ज्ञान समुश्नेविपे मतिझान श्रुतझान अवधिकान मनपर्यवज्ञान ने केवल झान ए पांचे ज्ञान तरंगरुप . उमंग के पोतपोताने ठेकाणे प्रगट थई रह्यां वे एवो झानसमुझ ते उदार प्रधान , एनो अपार महिमा ठे, एनविपे सर्व पदार्थ नासे ते तेथी पोते निराधार घने एक स्वरुप उता ज्ञातापणामां अनेकताधरे गए हवे छानविना मात्र क्रियावडेज मोदनी प्राप्ति नथी तेनुं वर्णन करे:- यथ मोदमार्ग थप्राप्ति कथन:- सर्वया इकतीसाः-के क्रूर कष्ट सहै तपसा शरीर दर्द, धूम्रपान करै अधो मुख व्हके फूले है; के महा व्रत गर्दै क्रियामें मगन रहै, वह मुनि नारमें पयारकेसे से हैइत्यादिक जीवनको सर्वथा मुगति नाहि, फिरे जगमाहि ज्यों वयारके वधू ; जिनके हियेमें शान तिन्हहीको निरवान, करमके करतार नरममें नूले हैं। थर्य:- कोई थानी क्रूर कष्ट सहन करे धने पंचाग्नि प्रमुग्य तप करीने शरीरने वाले, कक यज्ञानी थग्निना धुमाटा पान करने, नीचं मुख राखी वंचा पग करीने फूलेने केटला थानी जैन लिंग लईने पांच महावन व्यथा ग्रहण करेते, धने क्रियामां मग्न रहेते, एरीते मुनिराज पणानो नार बहेढे, पण जेवा पूलेने, देश नापायें पयार एटले पलाल, जेना फूलनेविपे कण ते पयारना

,
.
.
.
.
अर्थ - प्रनुने समरो, नावे पूजो, ने नावसहित पढो इत्यादि व्यवहार
पण मोद स्वरूपी यात्माते तेतो निरधार के निश्चय ज्ञान गम्य रे ॥२॥
ऊ, मीनविना न सरे परमारथ, सीनविना सतसा न थरूके, नेम विना न.
निहचे पद, प्रेमविना रस रीति न बूज, ध्यानविना न थने मनकी गति,
थर्य-यहीं थर्थातर बतावेठे के, जेम जीव पोताना काम विना .
| रतो नथी जेम लाज विना रणसयामने विपे फूऊतो नथी वजी जेमह
| खापिना परमार्थ थतो नथी, थने शीन धारण कीयाविना सत्व साये मजनु
| पिना रसरीत जाती नयी, तथा ध्यानविना मननी गति थोनाती नयी,
थी वली नियम धरया शिवाय निश्चय पद मलतु नथी, थने जेम प्रेमनी
४४
समयसारनाटक
होता नथी तेवी रीते निराश जाणवा, इत्यादि केवल क्रिया कलापवडे
वथा मुक्ति थती नथी, ते जगतनेविषे वयारना वधूल जेम बंचा नीचा है
ठे, पण एक ठेकाणे उरता नथी, तेवा समजवा,
थने जेना
कजा जागृतरूप थईचे, तेमने निरवाण के मोहवे थने जे
ले केवल क्रियानाज करनारा तेतो नर्मनेविपेज नूली रह्यावे ॥ ए॥
हवे जे मूढ जन वे तेनी टिममा नया, पण व्यवहारने विषे में,
तेने विपे अज्ञान वे ते कठे - अथ मूढ व्यवस्था वर्णन -
दोहा -तीन नयो विवहारमें, उति न उपजे कोइ, दीन नयो
मुकति कहासों हो ॥ ए॥ -
अर्थ -- जे व्यवहारमा लीन थई रह्यो होय एटले मगन थई रह्यो होप,
कोई उकति के तत्वदृष्टि उपजे नही, धने पोते थनाथ थईने पोताना
पदने नजे, ए रीते पोतानु निश्चयरूप जाण्याविना मुक्ति क्याथी थाय ॥एर
दोहा -प्रनु समरो पूजो पढो, करो विविध विवहार, मोद सरूपी
झानगम्य निरधार ॥ २० ॥
हवे निश्चय स्वरूपनेविपे ज्ञान पर्याय रूपी अर्यनु निरूपण कोने-
अथ पर्यायार्थ निरूपन-
सवैया तेईसा -काज विना न करे जिय उद्यम, लाज विना रनहित
पिना शिवपथ न सूऊ. ॥ १ ॥
-
ज्ञानग्निा शिवपथ के मुक्तिमार्ग ते सूजतो नयी. ॥ १ ॥

समयसारनाटक. ४३५ - , हवे ज्ञानवंतनो महिमा देखामीने तेनी व्यवस्था कहे:-- अथ ज्ञानमहिमा धारक व्यवस्था कथन:- सबैया तेईसाः- ज्ञान उदै जिनके घट अंतर, ज्योति जगी मति होति न मै जी; वाहिज दृष्टिमिटी जिन्हके हिय.यातम ध्यान कला विधि फैली; जे जड चेतन निन्न लख सु विवेक लिये परखै गुन थैली; ते जगमें परमारथ जानि गहै रुचि मानि यध्यातम सैली. ॥२॥ अर्थः-जेना हृदयनेविपे ज्ञाननो उदय थवाथी पोतानी ज्योति जागृत थई ने तेथी मति जे बुद्धि ते उज्वल थई पण मेली नथी; यने पोताना बाह्य शरीरने आत्मा करी माने एवी बाह्य दृष्टी ते मटी गई, अने हृदयनेविपे आत्मध्याननी कला तेनी विधि जे यमनियमादिक ते विधि फेली एटले पसरी, ते वरखतथी जड चेतनने निन्न निन्न लखे, अने पोतानो विवेक के जेदविज्ञान तेणेकरी पोताना गुणनी थेली पारखी लीधी. एवा जे जीव तेज जगतमां परमार्थने जाणी तेने रुचिये करी ग्रहण करे, एरीतें अध्यात्मसेली मान्य करीने परमार्थने जाणे. ॥२॥ हवे मोक्नी सुगम प्राप्ति देखाडे:-अथ मोक्षप्राप्ति कथन:- टोहा--- बहु विधि किया कलेससों, शिवपट लहै न कोई; ज्ञान कता परकाश सों, सहज मोद पद होइ. ॥ ३ ॥ ज्ञान कला घट घट वसे, योग युगतिके पार; निज निज कला उदोत करि, मुक्त होइ संसार. ॥४॥ अर्थः-नात जातनी कियाने निमित्त क्संग करवो, तेथी मोक्षपद मले नही. प ण ज्ञानकलानो प्रकाश थवाथी सेहेज मोपद प्राप्त थायवे ॥३॥ ज्ञानकला तो घट घटनेविपे वसी रहेली वे. पण मन वचन यने कायाना योगनी युक्तियो पार रहे जीते, माटे पोत पोतानी कलाने प्रकाश करवाथी संसारथी मुक्त थवाय ,ए वो सर्वने सशुरुनो आशीर्वाद दे. ॥ ४ ॥ हवे मुक्तपणुं अनुभव थकी थायवे माटे अनुनवनी प्रशंसा करे... यथ यनुनव प्रशंसाः-- कुमतियाळंट: यनुनव चिंतामनिरतन, जाके हिय परगास; सो पुनीत शिवपद सहै, दहै चतुर्गतिवास: दहै चतुर्गतिवास, थास धरि क्रिया न मम; नूतन बंध निरो ध, पूर्वरुत कर्म विहंमे; ताके न गनु विकार, न गनु वदु नार न गनु नी, जाके हिरटेमाहि, रतनचिंतामनि अनुनी ॥ ५॥ अर्थ-यनुनवरूपी चितामणिरत्न जेना हृदयनेविपे प्रकाशमान यई रह्यो , र मनुष्य यों हैयर निज परे 'नम दृरि करिव सा " . जे जीरनी सुटिमा पिमतानो परिचय नथी, एटल्ने समतासाये प्रीति : |ना पटादनेरि एटाने योहा पिलोफनमा सहज स्वनावे मादमार्ग मिल पाना फ्ट पपी. एग ज्ञानपारीने जे कर्म हेर थाने तेने गणतीमा समारी पर नापने जोपदी गती कर्मना उदयपके मोजेने तोपण ते जागागन। हवेद्वानीने परवम्तनो त्याग क्ह्यो थने विशेषपणे तेनाज त्याग बमारी- संवा शनीमा-यातम सुनान परनामकीन मुदितारा, जाहा मन परपद ग्यो द; ऐमोथरिको निधन परिमद गग, नात ४३६ समयसारनाटक. ते जीव पुनीत के पवित्र थईने शिवपदने पामेठे, ने चतुर्गतिनो जे वाम दन करेठे, एटले देवगति, मनुष्यगति, तिर्यचगति ने नरकगति ए चारे गतिना ने वानी नाग्वेने थनुनवी जननी रीत एठे के ते थाशा धरीने किया नतन वर के० नवा कर्मना वंधने निरोधीने सवर धारण करे, तया ने विहमी नारसीने तेनी निर्जरा करे, तेना विकारने यहो नत्य जी नहीं, थने तेना यतिनारने तु गणीस नही, थने तेना जयने पण जेना हृदयमा धनुनवरूपी,चितामणीरत्न प्रकाशी रयुठे ॥ ५ ॥ हवे थनुनवीनी शानदृष्टीनु सामर्थ्य वखाणे - थथ ज्ञानदृष्टि सामर्प सईया सतीमा -जिनके हियेमें सत्य सूरज उदोत नयो, फेनि मति मियात तम नष्ट है, जिनकी सुटिम न परचे विषमतासों समतासों प्रीति नासो लप्ट पुष्ट है; जिन्हके कटानमे सहज मोप पथ सथै, सापन तनरो न कष्ट है, तिन्हिकों करमकी किलोल यह है समाधि, मोने यह रान गोले पहमट है ॥ ६ ॥ अर्थ - जेना हियानेपिपे सत्य सूर्यनो उद्योत यई इह्योठे, थने. मानिकप किर्ण फेनी रह्याने, तथा मिथ्यात पयधकार ते नाश पाम्या , ने ममतागाये तया मोहसायलट पुट के चित्तपिनानी प्रीति राणेने, न सापन मनोयोगादिशत्रण योगनो निरोध एटले बन नो योनेने तोपण मष्ट के० मीनप्रतिवें ॥ ६ ॥ यय परपस्नुको त्याग ताको विशेष वर्नन- . १ - - वह नया दn समयसारनाटक: स ' अर्यः-जेनुं मन परिग्रहनेविपे मगन थई रह्यं वें, ते जीवने पोताना, तथा पारका स्वनावनी शुद्धता थती नथी. परिग्रहनो राग तेतो अविवेक निधान के सुं,जे परियहना रागनेविपे पोताना ने पारका स्वनावनी शुक्षता नथी, ते परिय ह रागने त्याग; अहीसुधी सामान्य मात्र कहो. हवे निजखरूपनो ब्रम ने पर स्वरूपनो तेने दूर करवाना कार्यने घणा प्रकारें सद्गुरू नपदेश करवाने उ इंगवंत या वे. हवे इहां परिग्रह तथा ते परिग्रहवें विशेष अंग केदेवाने सद गुरु जे वे ते नद्यम उदीरणा करीने सह सह्मो के सचेत थया रे ॥ ७ ॥ : हवे सामान्यरूप परिग्रहनो राग अने विशेषरूप परिग्रहनो राग तेनो विवरो कहे :-अथ सामान्य विशेष कथन:- : दोहाः--त्याग जोग परवस्तु सब, यह सामान्य विचार; विविध वस्तु नाना विरति, यह विशेप विस्तार ॥ ७ ॥ थर्थः--जेटली परवलु वे तेटली बधी त्याग जोग वे. एतो सामान्यपणे प 'रिग्रहना त्यागनो विचार जाणीये; थने ते परवस्तु नात नातनी ठे, अने तेना उपर विचार पण नातनातनो वे एने विशेषपणे परिग्रह त्यागो विस्तार जाणवो. हवे परिग्रह पत्तां ज्ञातानी परिग्रह उपर अलिप्त दृशा कहे :- अथ ज्ञाता अलिप्त कथन:- चोपाई-पूरव कर्म उदै रस चुंजे; झान मगन ममता न प्रयुंजे ; सीनता सहिये, यो वुध परिगह वंत न कहिये ॥ ५ ॥ अर्थः-पूर्व कर्मना उदयथकी जे गुलागुन रस उपजे ते जोगवे पण ते रस जो गनेविपे ममता प्रयुंजे नही, मात्र ज्ञाननेविपेज मग्न रहे, पण परिग्रहना संयोग.वि योगनेविपे हर्प विपाद उपजे नही, एवीरीतें जेना मनमां वदासीनता पामीये ठश्य. एवा बुध के पंमितने परिग्रहवंत कहेवाय नहीं ॥ ए॥ हवे झानीनी निस्टह दशा वखाणे -यथ ज्ञानी अवांतक कयनं:- सर्वया इकतीसा-जे जे मनवठित विलास जोग जगतमें, तेते विनासिक सव राखे न रहत है; और जे जे नोग अनिलाप चित्त परिणाम, तेते विनासीक धर्मरुप है वहत है; एकता न उहों माहि ताते वांवा फरे नाही, ऐसे घ्रम कारजको मूरखव हत है; संतत रहे सचेत परसोन करे हेत याते ज्ञानवंतकों अवंठक कहत है।।१० अर्थः-मनना मानी लीधेला जे जे जगतना नोग विलास , ते ते नांगरूप वे, आपणा राख्या रेहेता नथी. वली जे जे नोग यजिलापुरुप वित्त परिणाम रहे।

, हवे परिग्रहने विपे रेहता उता ज्ञाताने उग रहितपणु होय रे ते ४० सवैया इकतीसा -जैसे कादु देसको वसैया बलवत नर, जगलमें जाई उत्ताको गहतु है, वाकों लपटाय चदु और मधुमक्षिका पे, कबलीकी उंटता व | हतु है, पहिरे सहज को सनाह मनमें उलाह, ताने सुरखराह उदवेग नलहतु है। धपुडाने ग्रहण करे ठे, ते वखत ते पुरुपने चारे तरफ मधु मक्षिका केर थर्थ-जेम कोईक देशनो रेहेवासी नीज वगेरे बलवत नर जगलमा जर्व |मारवीलपटाई जाय ठे, पण ते पुरुपना शरीर पर कामती हाय. सत्ता के सत्नूतपणु तेनु स्वरूप जे एक विज्ञानधनपणु तेने साने, ४श्न समयसारनाटक. ते ते चित्त परिणाम चचलपणे पिनासी धर्म सपने पिथई रह्या ले नेविषे तथा लोग थनिलापने विपे थनेता ने, पण एकता नथी बनी। पहुं ने तेथी एना उपर हानीनी वांठग फुरती नथी एका व्रम कार्यने मूर्व | तेज चाहे , जे सतत के निरतर सावधान रहे अने परवस्तु साये नही, एज माटे ज्ञानवतने अवचक निस्टही कहेठे ॥ १० ॥ हवे परिग्रहमा रेहेता उता ज्ञाताने थजितपणु केवी रीते केहेवाय ते थापीने समजावे थथ झाता थलित दृष्टात कथन सवैया इकतीसा-जैसे फिटकडी लोऽ हरडेकी पुटबिना स्वेत वस्त्र मजीत रग नीरमें नीग्यो र चिरकाल सर्वथा न हो लाल. ने नही | पेती रहे चीरमे , तैसे समकितवत राग दोप मोह बिनु, रहे निशिवाप्सर जीरमें, पूरव करम हरे नूतन न करेजाचे नजगत सुख राचे न शरीरमों अर्थ - जेम कोई स्वेत वस्त्र होय तेने फटकडी लोदर तया ६(6Ini. पट दीधा शिवाय मजीना लाल रंगनापाणीमा चिरकाल के घणापान सुधी नावी राखे तोपण ते वस्त्र सर्वथा प्रकारे लाल थाय नही, अंतर रण | तेथी ते चौरमा सफेती रहेज, तेमज समकितवत जे जीव होय ते राग । ना पटविना निशिवासर के रात दिवस परिग्रहनी नोडमा रहेठे तोपण कर्मना नोगनी निर्जरा करने, अने नवा कर्मनु वधन करे नही, धने " खने जाचे नही चली शरीरने जोईने राचे नहीं ॥ ११ ॥ वडे दृढ करावे -अथ झाता अनुग कयन रहतु है, तैसे समकिती शिव सत्ताको सरूप साधे, उदेकी उपाति . . ५ तेथी

यसारनाटक.
ved.
ए
जे
दयनी जे थात्माने उपाधि लागी रही, तेने ते समाधि करी जाणे ठे. सहज
गुण जे ज्ञान दर्शन चारित्र तद्रूप जे सनाह के० वरन्तर ते पेहेरी राखे,अने
मते जे कर्मनिर्जरा तेनो उठाह मनमां धारण करे एवा अनंत सुरखना राह के
मार्गनेविपे रेहेतो थको उग दशाने पामतो नथी. ॥ १२ ॥
हवे ए रीतमां ज्ञातानो अवंधकपएं वतावे:-अथ ज्ञाता अवंध कथनंः--
दोहराः- ज्ञानी ज्ञान मगन रहे, रागादिक मल खोइ : चित उदास करनी
रे, करम बंध नहि होइ. ॥ १३ ॥ मोह महातम मल हरे, धरे सुमति परगा
त; मुगति पंथ परगट करे, दीपक ज्ञान विलास. ॥ १४ ॥
थर्यः-झानी पुस्प तो ज्ञानमां मगन रहेठे, बने रमेठे, अने राग देष मोहरूपी
मल , तेने खोइ दिएठे यने जे क्रिया करेते पण उदासीनरूप करेठे, माटे
एवा ज्ञानीने कर्म बंधन यतो नथी. ॥ १३ ॥ वली मोहरूपी महातम के घोर
पंधकाररुप जे मल तेने हरे, अने सुमतिना प्रकाशनार दीपकने धरे, ए रीते मुक्ति
अपने प्रगट करी वतावे, एवोज ज्ञाननो विलास ते दीपकरूप जाणवो. ॥ १४ ॥
हवे ज्ञानदीपकनुं स्वरूप कही देखाडेठे:-अथ ज्ञान टीपक वर्नन:-
सर्वया इकतीसा - जामें धूमको न लेस वातको न परवेस, करम पतंगनिको
श करे पलमें ; दसाको न नोग न सनेहको संयोग जामें, मोह बंधकारको
जोग जाके थसमें : जामें नतताइ नही रागरंक ता रंच, लह लहे समता स
थे जोग जलमें; ऐसी ज्ञानटीपकी सिखा जगी अनंगरूप, निराधार फुरी
री है पुदगलमें. ॥ १५ ॥
गर्थः-- जे ज्ञान दीपकमा धुमाडानो लेग नथी ने जेमा वायुनो पण प्रवेश
थने जे कर्मरूपी पतंग जीवनो पलकमां नाश करे ठे, ने जेमां दगा के
ने नोग नथी, वीजो अर्थ- कोई विकल्प दशा नथी घने जेने सनेह के
नो संयोग नथी. वली जेना प्रकाशमां मोहरूप अंधकारनो वियोग थयुं
जे दीपकमां तप्ततापणुं नथी, वली जेमां लालगनी रचमात्र लाना
थने जे समता समाधिनो जोग ते रूप जे जल तेनेविपे लहलहायमा
गो , एवोजे ज्ञानदीपक वे, तेनी शिखा सटा थनंगरुप जागी रही,
खा सर्व पदार्थनुं ज्ञान करवानी थापार वे, अने पोते निराधार फरी
ने पुगतमा उरी के तुपी रही ते ॥ १५ ॥

ते परमेश्वर परमात्मानी दोही के छोह करनारीले माटत पिरययाति समयसारनाटका - हवें ज्ञानना खनावमा खमना नथी ते उपर दृष्टांत थापेठे - " थथ ज्ञान स्वनाव अवमित दृष्टांत कथन सवैया इकतीसा --जैसो जो दरव तामें तसोही सुनाउ सपे, कोउ दशा को सुनाउ न गहतु है , जैसे सरख उज्यन पिपिम वर्ण माटी नखे, मात्र मान से नित उज्वल रहतु है, तैसे ज्ञानवत नाना जोग परिगह जोग, परत किया न अज्ञानता लहतु है, ज्ञानकला दूनी होऽ दशा सूनी होड, ऊनी हाने थर्थ - जे जेवु व्य ठे, तेमा तेपोज स्पनाव सिम , पण को इन इव्यनो स्वनाव ग्रहण करे नही जेम कोई जलाशयमा सख वेइझीनीव हावर सरूपमा उज्वल होय , पण नात नातनी माटी खाय , तेमठता रग तेना स्वरूपमा देखातो नथी, तो नित्य उज्वलज देखाय , तेम थिति वनारसी कहतु है प्राणी परिग्रहना जोगथकी नाना प्रकारना नोग नोगवतो उता थने विनाम, तो उता अज्ञानता पामतो नयी अने ज्ञाननी कला वमणी चाय , थने । 'दशा के० 'नमदशा ते शूनी थाय ठे, थने नरस्थिति के ससार स्थिति तना हवे सम्यक छाननी साये सम्यक् क्रिया स्यावाद मतने थाश्रयी कहे . सबैया इकतीसा-जोलों ज्ञानको उदोत तोली नही वर होतु, वात। निसों उद्यमकी रीतितें विठोहि है, सुनो नया सतत कहे म समक्तिवता तो एक्त परमेसरकी दोहि ई, विपेसा चिमुख हो यनुनो दशा धाराहि मात्र थर्य- ज्या सुपी ज्ञाननो ज्योत ने,त्यासुचीवध थतो नथी अन पाव दगावत ,त्यारे तो नाना प्रकारनो बध थाय ने का पता जान माहात्म्यनो नेट साननीनं एदु कधु के विषय भोगवा नाग्याना ने के हे सतपुस्प सांगत तु जे कहेले, केतु समफितवत पाग चन कायाना योगथकी उयमनी रीति जे किया, तने ते नाडी दोगन ! ॥ के Jी थाप , एवो गते वनारसीदासनु केहेवु ॥ १६ ॥ ते ० थथ स्यावाद प्ररूपन कथन- ध्यात तब नाना वय होहि है, ऐसो नेद मानालन्यात प्रिय नागनिमो, इन - - सुख ढोहि ऐसी तोहि मति सोहि है ॥ १७ ॥ मान

No text on this page.

. विचार सुन ध्यान है, स्वारथको त्यागी जे लहंगे परमारथकों, जिनके बरावर वे,थने जेनो याचार एवोठे के जे जला विचारथी गुन ध्यानमान रहे. ने विषय सुख प्रमुख स्वार्थने त्यागीने जे अध्यात्मरूप परमार्थ तेनेविपे लागा द, वली जेना वचन एवा वे के, जेमा नफो नथी तेम टोटो पण नथी, एजे ने सुसीख किंवा कुसीख देता नथी मौन वृतिज रहेने वली जेनी समऊ, य के शरीरने याननीठीन के० तुस जेवु यने रुपान के० तरवार तना 'होय तेवी तेनी परिदा करे , थने जेम नय छानपिना पाच दर्शनमा बु माने , मतलब के यात्माने शरीरथी जुदो जाणे वे वली जे जेरो नुनारथ चाली राने, तेनो सादी ठे, पूग्वानु थानक, तहिजर हवे समफितनु साहसपणु वर्णन करे। - थय सम्यातका सा९. रस न साहस गहतु ह, सुरग निवासी नूमिवासीयो पतालवासी, सरया इकतीसा - जमकोसो नाता उखदाता है यसाता की,त मन कपत रहतु है, उरको उजारो न्यारो देखिये सपत नेता, Tint यो थानद लहतु है, सहज सुवीर जाको सामुतो शरीर ऐसो, ज्ञानी जल यर्थ-थहि ससारनेविपे जे थसाता वेदनीय कर्मठे,ते के ४३२ समयसारनाटक यर्थ - जे जीव पोताना पूर्व सचित शुन कर्मना उदय वडे सुर ने पण जोगथी उदास रहे ,अने जे जीवने असाता वेद जे तो पण विलाप करे नही, घरतिनो विनाग करे नही, यतरमा ही राखे, यने शरीरनो सताप सहन करे, बली जेनीपासे यात्मशान के क्रिया करीने फलने इछे नही, तेज उलष्ट विचक्षण ज्ञानी केहवायने, कर्म करता थका कर्मना कर्ता एम तो अमे कही सकछु नही ॥२२॥ हवे एवा झानीनी व्यवस्था कहे ज्ञाता वर्णन सवेया इकतीसा - जिनकी सुदृष्टिमें अनिष्ट प्रष्ट दोउ सम, निनको नफान है न ज्यान है, जिनकी समुझमें शरीर ऐतो मानीयतु, रुपानकोसो म्यान है, पारखी पदारथ साखी त्रम जारथके ते नहीको जथारथ ज्ञान है ॥ २३ ॥ थर्थ-जे ज्ञातानी सुदृष्टि एवी ने के, जेनेविपे इष्ट वस्तु तथा थनिष्ट थने तेने यथार्थ ज्ञानी कहिये ॥ ॥ २३ ॥ जयाचारज कहतु है ॥ २ ॥ - समयसारनाटक. ४३३ - अहिं जमा करे -जमकोसो त्राता के यमना नाई ने. तेनो उदय थता मू जिन जे . ततो नादन ग्रही गर नही. सुग्गनिवासी के देवता नूमि मी के मनुप्य तिथंच श्रने पातालवासी देवता नारकी एवा सर्व त्रिलोकवा जीनां तन मन अनातावेटनीय थकी कांपता रहेने. हवे ज्ञानी जीवनात जवानुं जे ने ते अंतग्ना चांदरणां ज ने. ते केवु ? ते समजावे ते के, सात नय यकी जुज ने. जे श्रजवालाची साते जय प्राप्त थतां नयी, अने ए नावधी निशंक थई मोजे . अने धानंद पामे . सहज सुवीर के महोटो दिमीक सुनट, जनुं ज्ञानरूपी शरीर शाश्वत , एचा ज्ञानी जीवों श्राचार्य के हा पुरुष पूज्य जाणवा, एवं श्राचार्य कहेते ॥ ४ ॥ दवे साते नयनां नाम कहे:- श्रथ सप्त नयनाम:- दोहा:-- इह नव नव परलोक लय, मरन वेदना जात; अनरदा थनगुप्त य.थकस्मात जय सात ॥ २५ ॥ श्रयः-- या नवर्नु नय, परलोकनु नय, मर्ण नय, वेदना उपजवानुं नय, अ वरदानुं जय, अनगुप्त नय, धने अकस्मात नय. ए सात जय जाणवां ॥२५॥ हये साते नयनां लक्षण कही जुदां जुदा उतरवावे. अथ सप्त नय सहन कयनं.- सर्वया इकतीसा.- टसधा परिग्रह वियोगचिंता इह नव, उर्गति गमन परलोक जय मानिये; माननिको हग्न मग्न न कहावै सोई, रोगाटिक कष्ट यह वेदना वरखा निये; रहक हमारो कोउ नाही अनरझा जय, चौर ने विचार धनगुप्त मनानिये धनचित्यो अबहि अचानक कहांधों होऽ, ऐसो नय अकस्मात जगतमें जानियेश्६ अर्थः-- शास्त्रमा जे दस नातिनो परिग्रह कह्यो ते. तेना विजोगनी चिंता रहे ते जया नवर्नु नय जाणवू. उर्गतिगमन- जेनय ते परलोक-नय कहिये; प्राण तू ट्यानुं जे जय ते मर्ण नय; रोग प्रमुखथकी जे कष्ट उपजे ते वेदना जय वखा णियथमारी रक्षा करनार कोई नथी देखातो ए अनरक्षा नय; चोर अथवा छ उमण थाव्याथीदुं यं यत्न करी शकीश एवो जे नय तेने धनगुप्त जाणिये.यणचित्यु शुं यो एवं जे नय मननेविपे रहे तेनु नाम थकस्मात् नय जाण ॥ २६ ॥ हवे या नवनुनय निवारण रूप मंत्र कहेठे-यथइह नव जय निवारण कथनः- उप्पय ठंद:- नख शिरव मित परवान, ज्ञान अवगाह निररकत; थातम थं ग यनंग, संग परधन म थरकत ; दिन गुर संसार , विनय परिवार नाराला - B uu 1 नहि व्यापक वरते मुखित,झानी निसफनिकनक निज, ज्ञानरूप निसतनित ॥, दोप ऽख नथी परलोकमा सुगतिनु देनार पुन्य ,थने परलोकमा कुगनिनु | पनार पाप ठे एवं पुन्य पाप यात्मानी खमनानी खाणी यने हुथरस तु शिवनायक के० सिझरूपी तु एवा विचारथी परलोक जय व्यापे नही, सुखित के० सदा सुखपत वत, ए प्रमाणे परलोक जय नामिने झानी। हवे मर्णनय निवारणनो मत्र कहे ठे-थथ मरन नय निवारण मत्र- बत तीन, सास उससास थार थिति, ए दस प्राणग्निाश, ताहिक ठप्पयन्दः- फरस जीन नाशिका, नैन अरु श्रवन थक्ष इति, मन वर नय प्रमाण जिनवर कथित,ज्ञानीनिसक निकलक निज,झानरूप निरपननिता यये स्पर्श, रसना, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, एपाचे इश्यि,मनोवन, वरना ४३४ समयसारनाटक. जहाँ उत्तपति तहाँ प्रलय, जासे सयोग विरह तसु, परिग्रह प्रपत्र " श्ह नव नय उपजै न चित, झानी निगक निकलक निज,ज्ञानरूपनिर. अर्थ-पगना नखथी ते माथानी सिखासुधी एटले सर्व शरीर प्रमाण गुण जे ज्ञान ते थवगाह के व्याप्ति तेने जुए, एवा नख सिरस सहित यात्मानु अग अनग रहे, तेनी साथे जे पुजवे तेने परधन के परड्य कहेने सर्व ससार दपनगुर ठे, ने तेनेविपे जे विनव परिवाररूप नार , गुर जे, यने जेनी उत्पत्ती तेनु विनाशने, जेनो सयोग तेनो पियोग । एपो परिग्रहनो प्रपच प्रगट परखीएं तो था नवनु नय चित्तमा उपने नही ते जे ज्ञानी होय ते परिग्रहना वियोगनी चिता न राखे, ने निसक रहे । स्कलक स्वरूप झानमय सदा जुए ॥ २७ हवे परलोकनय निवारणनु मत्र कहे -अथ परलोक नय निवारण उप्पयनद - ज्ञान चक्र मम लोक, जासु अवलोक माख सुख, । म नाहि, नाहि जिसमाहि दोप उख, पुन सुगति दातार, पाप मुरगति यक, दो खमित खानिम, अखमित है शिवनायक, इह विधि विचार परलोक थर्थ - झान चक्र के ज्ञान विस्तार तो ममलोक के मारो लाकडे, के तेविना धन्य लोक ते मारी नथी, महारो ज्ञान लोक मारी साथै ने प्रचार के, तेने प्रत्यक् जोयो, अने मोक्ष सुख बन्ने रूप में, थने इतर सफ थको निकलंक ए जे निजज्ञानरूप तेने सदा निरखे ॥ २० ॥ TU समयसारनाटक. सत्यपणे जुए वे कायवल एत्रण, स्वासोवास आयुस्थिति, ए दस प्राण थादिनो विनाश थाय, तेने जगतमा मर्णनय कहे ते, पण जीव पदार्थ वे ते ज्ञानरूपी नाव प्राण संयुक्त ते, तो जीवने ज्ञान प्राण त्रणे कालनेविपे बेटे नही, एवो विचार मनमां करवाथी वर्णनय उपजे नही. नय प्रमाण वडे एवं जिनेश्वरनु कथन ठे, ज्ञानी लोक नि क. पणे पोताना निकलक स्वरूप ज्ञानरूपने सदा निरंतर निरखत के ॥ श्ए॥ हवे वेदना नय निवारणरूप मंत्र कहे :- अय वेदना नय निवारण मंत्र:- । उप्पय वंट:-- वेदनवारो जीव, जांहि वेदंत सोउ जिय; यह वेदना अनंग, तो मम अंग नाहि व्यय ; करम वेदना विविध, एक सुखमय उतीय उख; टोक द विकार, पुजनाकार बहिरमुख : जब यह विवेक मनमहिं धरत, तवन वेद ना नय विदित; ज्ञानी नितंक निकलंक निज, ज्ञानरूप निरखंत नित ॥ ३० ॥ अर्थ- वेदनावारो एटले जाणनारो तेतो जीव ठे, अने जेने जाणवू ठे, तेपण नोवज एटले वेदनावंत ते ज्ञानीजीवए ज्ञानरूप वेदन जे धनंग रूप से तेतो मारु 'यंग ने. अने कर्म वेदना जे ते मारी नयी थने ते कर्मरूप वेदना वे प्रकारनी ३. एक सुखमय वेदना ने वीजी 5.खमय वेदना ठे, ए वेउ मोह विकार वे, ए मुख उखनी वेदना पुजाकार , पुजलनी ठाया वाह्यरुप , ज्यारे एवो वि क विचार मनमां धरे ठे, त्यारे वेदनातुं नय वेदी सरुतुं नयी. ज्ञानी लोक तेतो वेटना नयथी नितंक रहे थने निकलंक एबुं पोतानुं झान सम्प ते मदा जोतो रहे ॥ ३० ॥ वे धनग्दानय निवारणरूप मंत्र कह ः यथ अनन्ता नय निवारण मंत्र:-. चप्पय लंद -- जो स्ववस्तु सत्ता सम्प जगमहि त्रिकाल गत; तान विनास 5. महज निह प्रमाण मत; मो मम धातम टरब, सरवथा नहि सहाय निहिं कारन तक न. दोनहन कोड पर जब यदि प्रकार निधार किय, इनरवानय नमित.ज्ञानी नितंक निकलंक निज, डानम्प निरनंत नित." स्वयम्त के निजन्यात्मरूप वस्तु, सत्ताबाप कश्यपणे व कंदवा बगतमा त्रणे कानुनविप पामि, तेनो क्यारे पण विनाग नयी थनो, एवं वरुप निश्चयनयना प्रमाणवढे जाणवं; एज मान धान्माच्य में, या प्रकारे कोनो सदाय धरतु नयी, तेमाटे ए यान्मश्य्यनो गई रक तेमज कोई पर के वीजा एनो नदक पाए नयी ज्या एको विचार समयमारनाटक हृदयमा नकी करी राग्य त्या अनपटा नय नाग पाम पाशा रक्षा नययी निमा या पानाना नाना नानगापन मा निग हो चाग्नय निवारण कप मत्राने अय मारना निवार तप्पयन परम प पग्ना नाम 77न Tन मफिन पर हि माहि महि अगम अमित मा ममप अनप यान प्रना धन , तादि चार किम गर गर नदि । यार नन नाम तब श्रगुप्त नय उपममिन कान। निगा मानन कानम्प नित अर्थ ज परम स्वरूप रहाय ने अन मान सन्मानाड प्रत्यक्ष - श नथी, माहिमही के ए पीना पचमा श्रगम्य न थनूपम मारु रुप ने ते फाईनु की इन नया अनमिन F० प्रमाणविना ट धन ते, ते धनने चोर कम गर। श्रन यार ० बीना का नाम अन थपमित ने मित के चिन्मय एवु जनु नहाण ने अन नना चापनविष परसर: गा पामी शक नही ज्यारे ध्यान धन पचनपन कर न्यार अगुप्त नयक। घाडा पननु जेनय ते नपशमी जाय ग्रन पादानी हारत यगत नायी हवे अकस्मातनय निवारण रूपमत्र रहने-अनअस्म्मानना निवाराम दि अनत अतुन अश्विन सरूप मम चिदनार पगार शान 111 तप्पयन- गु६६अधिस सहन ममम ममम मनन, अय-- जगत गुरूने न पाताना स्वरपन एन7757 शान। रहित ने जेनी तुनना सायी न याय माट-अनु77THERE य अधिगपीने, मिहममान तिने अादन मागिनतनना चिदपिनास 70 वानपिनामना जन प्रकाशन साताप मां ज्यार नपजने त्यारे यस्मात नयजन न नाप थतनय ब यारातिर गक थका पोताना निफनक कान मापन मा निग्यता रहन ॥ ३२ ॥ -- थाना नदॉ विधा नहि माउ दाउ नान अचाना नपनत तव अम्म्मात नय नहि नदिन रुप निम्मत नित ॥ ३३ ॥ ठान नसतानन रहिन ने अन समाधि मुग्यन यानन्यामानानाय न प म । थणचितव्या अचानक नय गाफ का उपज नह

जे ते अकस्मात जयथा निशंक थको पोताना निष्कलंक शान स्वरुपने सदा
तो रहेठे. ॥ ३३ ॥
हवे निर्जराना करनार ज्ञानीनी व्यवस्था कहे।-अथ ज्ञानी व्यवस्था कथन:-
ठप्पय वेदः-- जो परगुन त्यागंत, शुभ निजगुन गहंत धुव; विमल ज्ञान अं
र, जासु घट महि प्रकास दुव ; जो पूरव रुतकर्म, निर्जरा धार वहावत ; जोन
बंध निरोध, मोप मारग मुख धावत;
निःसंकतादि जस अष्ट गुन, अष्ट कर्म
हरि संहरत ; सो पुरुप विचतन तासु पट, वनारसी वंदन करत. ॥ ३४ ॥
अर्थः-जे कोई पुतादि गुणनो त्याग करे, अने ध्रुव के निश्चयरूप एवा गुड़
ताना गुणन ग्रहण करे: निर्मल ज्ञाननो अंकुर के उदय जेना घटमां प्रका
त थयो, अने जे पूर्वकत कर्मने निर्जरानी धर के श्रेणिविपे वहावि दिये वली
। नवा बंधनो निरोध करीने एटले निराश्रव थईने मोक्षमार्गने सन्मुख दोडेठे;
ण श्रेणिमा दोडे, निशंकित प्रमुख जेना थाठ गुण , ते आते कर्मरूप
त्रुनो संहार करे, तेज विचरण पुरुप केहेवाय, अने तेना चरनकमलने वणारसी
स वंदन करेठे ॥ ३४ ॥
हवे यात अंगनां नाम कहे। अथ अष्टांगके नाम कथन:-
| सोरगः-प्रथम निसजानि, उतिय अवंतित परिनमन; तृतिय अंग अ
गेलान, निर्मल दृष्टि चतुर्थ गुन ॥ ३५ ॥ पंच अकथ परदोप, थिरी करन ठहम
तहज; सत्तम ववल पोप, अहम यंग प्रनावन ॥ ३६ ॥
यर्थः-- पेटु निसंगय के नि.शंकित, वीजुं समकितनो गुण
ने अवांठक प
पारुप मननो परिणाम, त्रीजु अंग अग्लान, चोयुं गुण निर्मल दृष्टि एटले मूढ ह
ष्टि नही ते, ॥ ३५ ॥ पांचमुं परदोप यकथन, उतुं अंग समकित स्थिर करवाना
विनावरूप, सातमुं सर्व साये चाठलपणुं यध्यात्मक पोपक, थने यातमुं अंग
नावना गुणरूप ॥ ३६॥
हवे अंगना लक्षण कहे :- थथ यंग लदणः--
सर्वया इकतीसा:-धर्ममें न संस गुनकर्म फलकी न वा, अगुनकों देखि न
गिलानि याने चित्तमें; साचि दृष्टि राख काढू प्रानीको न दोष नाख, चंचलता ना
नि थिति नै बोध चित्तमें : प्यारे निजरूपसों उठाहके तरंग उठे, ए थाठो यंग
जब जागे समकितमें ; ताहि समकितकों धरे सो समकितवंत, वहे मोषपावे 3
-
न था फिर इतमें ॥ ३ ॥

एटले रग ममप थया, तेनेविपेत्रणे कालमा गुददृष्टीमहित ज्ञानापा
जागे, अने ते याव गुणे सहित सम्यक्तनु धारण करे, ते समकितवत रहता
सवैया इकतीसा-पूर्व वध नासे सोतो सगित कला प्रकाशे, नव वस्ती
स तोरत उतरिके. निसकित यादि थष्ट श्रग सग सरया जारी, समता या
करे सुरव नरिके, निरजरा नाद गाजे ध्यान मिरदिग वाजे. ठम्यो महालय
अर्थ-जेम पूर्वकालनेविपे उत्कृष्ट स्थितिथकी वध करतो होती
न करता थनुरुष्ट स्थितिथकी करवो एम पूर्व वध नास तेती सरिता
थालाप चारी प्रकाडो, थने नया बधने रोधचु ते रूपतान वनेने तानतारी
जे समकितना आठ अग कह्या ने सहाय जाडी समता समा
तप स्वर बाधीने थालाप करे ने, यही कर्मनी निर्जग हतु एवं
साह धुनी ने तेरुप मृदंग वाजे ले, यही जे महानदमय थान नाक्या
रखी थयो, ते जाणिये रोज थई, ने पोतानी प्रात्मसत्ता तन काई ।
इतीश्री समयसार नाटकरिप वालवाधरुप निर्जगार मतम मत
दोहा-कही निर्जराकी कथा, शिवपथ साधनहार, अत्र का
४३०
समयसारनाटक
थर्थ - धर्मनेवि संदेह न दोय ते नि गफित गुण, गुन कर्मना मला
छा न होय ते निस्टही गुण, थनिष्ट वम्तने जोऽने चित्तमा ग्लानी न नाच
थग्लान गुण, कोईना मगाच्या मग नहीं ने साचनेपिपे दृष्टि राखली ते
दृष्टिगुण, कोई प्राणीनो दोष केदेवो नही ते दोपारथन गुण, चचनता
ज्ञानरूप चिनविपे स्थिरता रासवी ते थिरीकरण गुण, यात्म सपना न
राखयो ते वठल गुण, श्रने यात्मस्वरूप सानिनविपे उदाह सहरी के
उग्वापण लीयो गहे ते प्रभावना गुण, म समकेतना थाने या
तेवाज समकिती मोक्ष पामे, ने फरीया या समारमा यावे नही ।। ३ ।।
हुवे निर्जराधारी चैतन्य नाटक कहे -अथ चैतन्य नाटक कथन -
झान साग धरिके ॥३७॥
कित
प्रमुख
पहेरी धरीने नटरुप चतन्य मुक्त यने नाचे ॥ ३८ ॥
रह थाप म्तिार ॥ ३ ॥

समयसारनाटक. ४३ए Poem च , 'अये.- मोक्ष मार्गनी साधनकार जे निर्जरा तेनी कथा हती ते कही, हवे जे थाय ते तेना अधिकारनो अल्प विचार कहेठे ॥३ए । हवे बंध जे ले ते ठांमवा योग्य वे. माटे ते बंधनो विदारणहार जे समकित ने नमस्कार करे:-अथ बंध विदारन सम्यक्त वर्णनं:- सवैया इकतीसाः- मोह मद पाई जिन संसारी विकल कोने, याहिते अजानु हु विरद वस्तु है : ऐसो बंध वीर विकराल महाजाल सम, ज्ञान मंद करे चंद हु ज्यों गहतु है; ताको वल नंजिवेको घटमें प्रगट नयो, उक्त उदार जाको उ महतु है; सो है समकित सूर आनंद अंकूर ताही. निरखी बनारसी नमो मो कहतु है.॥४॥ अर्थः-जे बंधरुप सुनट वे ते मोहरूप मदिरा पाईने सर्व संसारी जीवने विक करेते, एथी ए बंधरूप वीर वे ते आजानुबादु, वीरुद्र वहावे के सार्व म थई रहेलावे, एवो विकराल ए वंधरूप वीर गुजट वे, वली ए महाजाल स जान . अने एज ज्ञान प्रकाशने मंद करेठे, कोनी पते जेम राहु चंइने मंद करेठे. नी पd जागी लेवू; हवे एवा वंधरूप वीरनो प्रतिपक्षी जे ठे, ते एनुं वल तोड ने घटनेविपेज प्रगट ययो , जेनो उद्यम उत ने, एटले कोईथी रोक्यो रेहे वो नथी, यने उदार वे के श्रेष्ट . तथा महत के मोटो दे, तेतो समकितरूप रवीर जाणवो, ते यानंद अंकूर लईने उदय ययो , ते सम्यक्त शूरवीरने जो पोताना अंग उन्नसित थको वनारसीदास नमो नमो कहे. ॥ ४० ॥ । हवे चेतनाविना कर्म बंध नयी यता, माटे ज्ञानचेतना तथा कर्म चेतना ए उनी समज पाडेः-अथ कर्यचेतना ज्ञानचेतना वर्णन:- सवैया इकतीसाः-जहां परमातम कलाको परगास तहां, धरम परामें सत्य सू जको धूप है; जहां गुज अशुन करमको गढास तहां; मोहके विलासमें महा ग्रंधर कृप है; फेली फिर उटासी घटासी घट धन बीच, चेतनकी चेतना उहाधा पचूप है ; बुदिता न गही जाय बेनसों न कही जाय, पानीकी तरंग जैसे पा राडप है. ॥४१॥ । यर्थ:-जे चेतनामां परमात्मानी कलानो प्रकाश थाय ते, ते धर्म धरती ; ने धरतीमा सल्यरुप सूर्यनो तहको , एटले उजली जगावे. वली जे चेतना गुन अशुन कर्मना रसनी गढास ठे, एटले शुनाशुन कर्मनारस बडे जे चे ना घोलाइ रही वे, त्यां मोहराजा विलास करे , तेतो घोर अंधकार , तीमें विपे

.
| वात खोटी एटले कर्म वर्गना जीवना बंधनो हेतु नयी, एवीरीतें कदा
चन कायाना योगथी पण जीप बधातो नथी. चेतन तथा थचेतननी ।
थलद पती ठे, तथा यलदरूपी है,
शियना यिपवरूप विपरोग बडे पण बधातो नथी कर्म वर्गनाथी "
विधाता नथी, वली जिनेश्वर देव वे तेतो त्रणे योगमाने तोपण थवरले.
वे, ते यनानोग पणे हिसा करे , तोपण थबंध , ज्ञाता विषय जानने
धातो नथी पण मात्र एक राग देपने मोह घने जीरवरूप थक्ष
हो राग क्षेप थने मोहनेज दृढपणे बधना हेतु उरावे में-
सर्वया इकतीसा -कर्मजाल वर्गनाको वास लोकाकाश माहि, मन
याको निवास गति थाउमें, चेतन थचेतनकी हिसा बर्स पुजलमें, विषे
। उदेके उरजाउमें, रागादिक गुप्ता थक्षता है थलखकी यहे .
। बधक बढाउमें, याहिते विचठन यबध कह्यो तिहू काल, राग दार
४४०
समयसारनाटक.
ए गते चेतन पुरुपनी जे चेतना के संज्ञा ने, तेतो घटापनबीच के
घवचे ठटानी माफक फेली रही , धने घटानी माफक फेनीयकी .
ए चेतना ते परमात्मानी कलाना प्रकाशमा तथा मोहपिनासमा ए वेड
गुपचुप ने, एटले चुप थई रही , एपी ए चेतना वे तरफ प्रवेश को वे,
बुझीया ग्रहण थाय , पण वचनथी कही जाय एवी नयी, जेम
पाणीमा
স্তম্ভ
ये तेम चेतना वे तरफ गुरुप्प वे ॥ १ ॥
हवे बधारनेविपे बंधनो हेतु कहे - अथ बंधनिदान कथन-
सवैया इकतीसा-कर्मजात वर्गनासो जगमें न वे जीव, वधे न
मन वच काय जोगसों, चेतन अचेतनको हिसासों न बचे जीव, बंधन
पचविपे विखरोगसो, कर्मसी यव सिजोगसौ थबंध जिन
साधु झाता पिप नोगसों, इत्यादिक वस्तुके मिलापों न बधे जीव,
रागादि थउपजोगों ॥ ४२ ॥
थर्थ - कोई कहे ते के कर्मजाल वर्गणा यकी जगतमा जीव
की पण जीपने बध थतो नथी
पण ते अवर ठे, एरीते कर्म वर्गना प्रमुख वस्तुना
योज जीप बंगाय वे ॥ ४२ ॥
यथ बनिदानदृष्टी करन व्यवस्था
.
1
मिनापपी जीत
.
सम्यक सुनाउमें, ॥४३॥

समयसारनाटक.
४४१
अर्थः-कर्म जाल वर्गणानो वास तो लोकाकाशमांजवे, केवल कर्म वर्गणा कारण
कीज जो यमूर्ति चेतनव्य बंधनावने पामे, तो लोकाकाशनो बंध केम नही थाय?
'मज मन वचन अने कायाना योगनो वास तो चारे गतिनेविपेने, अने चारे श्रा
“पामां वे. त्यारे योग ते प्रात्माना बंधना हेतु केम थाय? चेतननां प्राण हर्णथी
सा थाय ; ते पुजन बंधरूप प्राणमांज हिंसा थाय ने, एमज अचेतननी हिंसा
ग पुगतमां ने, ते श्रात्मासाये स्पर्शती नथी,तो वंध केम थाय? अने विषय नोग
। वरते , तेतो कर्मना उदयमांवे,अरुजी रह्या ले, अने यात्मा तो तेथी निरालो
- ते बंधाय केम? माटे राग वेपने मोदयकी जे मुक्ता के मुग्धता थाय ने
-रिवस्तुने पोतानी करी मानवी ते अलख पुरुपनी अगुता . अने एज अगुम
कर बंधने वधारे , ए माटे विचरण पुरुपने त्रण कालविपे अबंध करो ; केमके,
भने सम्यक् स्वनावमां राग हेप अने मोह नथी॥ ४३ ॥
• हवे ज्ञाताने प्रबंध करो तोपण उद्यमी थईने क्रिया करवी ते समजावे:-
अथ उद्यम प्रशंसाः-
सवैया इकतीसाः-- कर्मजाल जोग हिंसा नोगों न वधे पै तथापि ज्ञाता उ
मी वरखान्यो जिन वैनमें ; ज्ञानदृष्टि देतु विप नोगनिसों हेतु दोउ, क्रिया एक
त यों तो बनै नांहि जैनमें ; उदै वल उद्यम गहै पै फलको न चहे निरटै दसा
होइ हिरदेके नैनमे ; बालस निरुद्यमकी नूमिका मिथ्यात माहि, जहां न संन
जीव मोहनींद सैनमें ॥ १४ ॥
अर्थः-जीव ने ते कदापी कर्मजालथी बंधाय नही, बने जोगथकी पण वं
आय नही, थने हिंसाथकी पण न बंधाय, जोगवडे न बंधाय, तोपण जिनेश्वरना
चनथकी झाता जीवने उद्यमीज वरवाण्यु ठे.ज्ञाननेविपे दृष्टि पण यापेठे,यने
वेपयनोगमा प्यार पण राखेठे, एवी वे क्रिया एक खेत के एक थात्माविपे एक
थानकवि करेठे, ए, तो जनवासीमा बने नही; धने जे झानी होय ते एटबूं
तो करेके जे संहनन के संघयण प्रमुख कर्मनो उदय वल , तेथी यथायोग्य ते
केयाविपे उद्यमवंत थाय, धने तेना फलने इछे नही, ने हृदयरूप नेत्रनेविपे
नेर्दय दशावंत न थाय, अने बालस निरुद्यम तो मिथ्यात्वमाज पामियें, एथी
धालस ने निरुद्यमनी मिय्यात्व नूमिका , जे नूमिकानेविपे जीव मोहनिश सेतो
यको सयन दिशामा रहेठे, धने पोताना स्वरूपने संनारतो नयी. ॥ ४ ॥

, हरे चारे पदार्थनी न्यारी न्यारी व्यवस्था सुमनि थनेमनिना मन अर्य-जे मृर्म जन दोय ते पोताना कुजना याचाग्न धर्म रहे। अनुजपाभिर चगाने तेन थर्थ 10 इन्य राह बनाना द्विततनता रम्नुना मनारने धर्म कहेले अज्ञानी जन हाय न पहना जन हाप त इय्यना दरबापने यार्थ कहे ने एटाने पट्यन अपहर निनामावनितारने साम कहेने, श्रने जे इना म्यानर कर मारेन,अन ने मतिमान एटन यामन नारद मारवायन ययान्मम्परहने-अथारपाचनुरययनमा पामा मापन चम्नमा मनाना Fra दस्टम, पह काममारना सगर निगम पद माजमा ४४४ समयसारनाटक. ती केहेवाय, थने जे विषय नोगथी उदासीरहे ते तोयना समरेती , णीने थहो भव्यलोको नोगथी उदास थई, ने मुकिने साथी के कहे ते के. जेनु मन चगुते तेने कथरोटमांज गगा , मतलब है। नाता थका गगा स्नाननु फल पामेठे ॥ ५० ॥ हवे मोदना अधिकारनेविपे चार पदार्थनु स्वरूप कहे . अथ पदार्य चतुष्क कथन - दोहा-धरम थरथ अरु काम सिच, पुरुपारय चतुरग , कुधीर रहे, सुत्री गहै सरवग ॥ १ ॥ श्रर्थ - धर्म, अर्थ, काम, ने मोद, पुरुषार्थना ए चार थग से, ए पिपे कुधी के कुमतिवाजो पोतानी मति कपनाने जातीने वेसे दे. धन फ० पमित पुरुप ते सगनु ग्रहण करे ये ॥ ५१ ॥ श्रय पदार्य व्यवस्था कथन- सर्वया कत्तीमा - कुलको प्राचार ताहि मूरग्य धरम रुहे. ५ind पानु सुनाउने, पेहको खजानो ताहि झीनी श्रग्य कहै. ज्ञानी । दर दरसाइका, दपतिको नोग ताहि पुरधि काम रई सुपी शान पार चिन यामको जोक थानका थजान लाक कह माद, बरं धोयनारों॥ ५५ ॥ विजन को नानाग्ना नाग मयागने काम कहे न. पण मुगा अनार पायन, एटने वरना नागने माक्ष मह॥ मया सिनीमा - . . मनिमान . M मित .

समयसारनाटक. ४४ + ता प्रगटमें अंतर हटिसों निरंतर विलोकै बुध, धरमपरथ काम मोठ निलयटमें; धन थाराधनकी सोंज रहै जाके संग, नूलो फिरै मूरख मिथ्यातकी अलटमें।। ५३॥ । थर्थः-धर्मनुं साधन तो तेने कहीये के जे वस्तुना वनावने साधवो एटले व हना स्वनावने यथार्थ जाणवो, अर्थ साधन तेने कहीये के जे पट् इव्यने वि पण के छुदां जुदां जाणवां ; काम साधन तेनु नाम वे के, जे निरास पदनो ग्रह करयो, एटले निस्टह दशामां रेहे; मोदनु साधन ते ठे, के जेवडे पोता सहज स्वरूप गुरुता प्रगट जावमा करवी, ए रीते अंतरदृष्टि वहे एटले ज्ञान ष्टि यकी बुद्धिमान पुरुप धर्म अर्थ काम ने मोद ए चारपुरुपार्थने निरंतर पो ना घटमां देखें; एम चारे पुरुषार्थ साधवानी जेना संवाते सोज के सा 'ग्री रहे ते, तोपण मूर्ख जे वे ते मिय्यातनी अटलमा जून्या फिरे वे ॥५॥ हवे शुक्ष व्यवहार नये करी वस्तुनुं सत्य स्वरूप कहेवेः- अथ शुद्ध नय वस्तु स्वरूप कथनं:- सर्वया इकतीसाः- तिहूं लोकमांहि तिहूं काल सब जीवनिकों, पूरव करम उदै थाइ रस देतु है; कोउ दीरवान धरै कोउ धनपाउ मरे, कोल उरखी कोन सु नवी कोउ समचेतु है; याहीमें जीवायो याही माखो याहि सुखी कस्यो उखी कयो एसी मूट थापु मानी लेतु है; चाही अहं बुधिसों न विलसे नरम मूल यहै -मेय्या धरम करम वंध हेतु है. ॥ ५५ ॥ । यर्थः-त्रणे लोक तथा त्रणे काल तेनेविपे जगतवासी सर्व जीवने पूर्व सं चेत कर्म उदय आवेठे, ने ते पोतानो कडयो तथा मीठो रस आपेठे, तेणे करी हने कोई दी थायुष्य जोगवी मरेते, ने कोई यल्प आयुष्यमांज मरे, कोई उखी डे, धने को सुखी होय, कोई समचित के सम नावमा रहेठे, एम पोत पो तानी कमाईथी सर्व जीव सुखी अथवा रवी . तेने मूट प्राणी जे वे ते पोताना साधन मानेने के, जो में फलाणाने जीवाञ्चो, फलाणाने मारी नाख्यो, फलाणाने 3 खी कोयो, ने फलाणाने सुख थाप्यु. एवो मूढ अहं बुधीथी नर्ममा मुथ्यो फरेठे, बने ए नून एनी मटती नथी, एज मिथ्या धर्म मूढने कर्मबंधनो हेतु थाय॥५४॥ हवे फरी मूढनीज व्यवस्था कहेते:-अथ मूटता कथन:- सवैया कितीसाः-जहांलों जगतके निवासी जीव जगतमें, सबै असहाय जती जती पूरव करम सत्ता वांधि जिन, तैसी तैसी उदमें यवस्था आइ बनी है; एते परि जो कोउ कहै कि में जीवावों मारों इत्यादि धने कोक कादुको न धनी है;

विरागी मऽ अगह, मध्यम पुम्प नारीयर कमी जाति/ना वाहिन हिरथा ने यदरथा कामनन तमज नत्तम पुस्य वाद्ययपहार मन व्यवहारमा पण मग सामनन म यम पुस्प नागरम नागया वाह्य व्यपहारमा ठार अन यन्यतर सामान नममयम बाहारी तण ग्रन हयामा सामनहाय न अपम सरर माना। मवार वाद्ययपहारनाप नरमपायन न माहया मर7411 पवाहार नग्माउराग्य पण अतरमा सग F० पारागनम गम यामाधम पुम्पपुगा फTTO मापारी जवान नम मापET TF गमावारन तमयधमाधम पुस्पमाहग्रनचाहार मच 77 नार गारमा नरमी नाग नानिहरमा राम: मानमा निर जाम नाचमा नम्रपान ४६ समयसारनाटक क विकलप वात धनी है मा तो यह हिमा किन नया निट्ट र ज थातम सकति तिन्ह बनी है अर्थ - जांदासपी नीर नगतमा निशान न नादामी एक बीमा पणे रहे कार्ड माईना मदायका नया नम का काना वग। तयो वी जेवी पूर्व मानविपे क्ममना वाी गयाने ती नया नयन वनी अवस्था बनेन पटना नपर न FISTETम यान नपाइयों ने यो, इत्यादि यना मनना विपनी पाना पणन त सपनी अदबुदि अने ते जीप त्रणे कानन विप अहसार हिमा मानन नण गुद६. ने हाणी ने, अन ते जीवनी मृट याम्या दवार नारदम्य ने ॥ ५ ॥ हो चार प्रकारे करीन वीपनी व्याम्या नपर चार नष्टात प्रापेने - अथ चार प्रसार नीर याम्या क्यन सरया इस्तीमा उनम पुम्पी दशा या किसमिन शान्य बाहि14' य कामन तरंग द मम पुस्प बन ममान ना बाहिग्ना निमा दिन सग ह, अयममा श्रम पुम्प पुगीफन सम अतग्ग बाहिर कतार कर थर्थ उत्तम पुरुपनी दगा सिमिम शाक नत्र नम मिमिम ५ . हर नुनम पुरुपनी रया कहो वतापन मग्याकताना व नवि नाग्मी नाजमा जग विनाम नाम नान वरपर अथ उनम गुर समयसारनाटक. ४४ जोक लाज लारसी; सीउलो सुजस जाने वीउसो वखत माने, ऐसी जाकी री ताही बंदत वनारसी. ॥ ५७ ॥ अर्थ-जे पोताना यानेविपे सुवर्णने कादव तर जाणे, अने नरेश पद राज्य गादीने नीच सरखी जाणे, मित्राने मीचसी के मर्ण जेवी जाणे, ने वार्ड के वडा ते लीपवानी गार जेवी जाणे, रमायन प्रमुख इव्यजोगनी जा ते फेर सरिखी जाणे, मंत्र शक्तीवडे जे करामत थाय तेने कहर सरखी जाणे, जापानेविपे दहर के अनर्थ ते सरखी होस वे, अने पुढगलनी नवी ख समान जाणे, माया रूप जाल तथा जगतनो विलास तेने जाल जेवोजा सुवनवास के घरवास ने तीरना नाल समान जाणे, कुटुंब कार्यने का समान करी जागवे, लोकलाज राखवी ते मोहडानी लाल जेवी जागेठे, सु नि सीठ के नाकना मेल समान जाणे, नाग्योदयने विष्टासमान जाणे, एवी रीत होय तेने बनारसीदास वंदना करेठे ॥ ७ ॥ । हवे मध्यम पुरुपनी दशा वतावे :- यथ मध्यम पुरुप यथाः- सवैया इकतीसाः- जैसे कोउ सुनट सुनाय उग मूरखाय, चेरा नयो ठगनीके प्रमें रहतु है: गोरी उतर गई तब ताहि सुधि नई, पयो परवस नाना संकट हनु है तसेही धनादिको मिथ्याति जीव जगतमें, मोले धागे लाम वित्तराम गहनु है ; ज्ञान कला नासी नयो यंतर उदाली तथापी नदै व्याधिसों स घि न सहतु है ॥ ५ ॥ • अर्थ - जेम कोई खनावे सुनट होय ने तेने कोई वग मले ने ते सुनटने को जडी मूली खवरावे, तेथी ते सुनट उगनो चेलो थई जाय, अने उगना घेरामा यो रहे, पनी ते सुनटे जे मूली खाधेजी तेनी असर नीकली जाय ने पागे पो नी शुधिमां थावे, तेवारे ते उगने उर्जन करी जाणे, पण पोते परवश पडयो ते नाना प्रकारना संकट सहन करा करे , तेम अनादि कालनो मिथ्यात्वीजी परवस पडेलो नाना प्रकारना संकट सहन करे, ने पाठ प्रहर संसारमा वि लि थई ने मोले, पण विश्राम लिये नही, एटलामा ज्ञान कलानो नात थयो, वारे यंतरमा उदासी थयो तो पण कर्मना उदयरूप व्याधी वडे समाधि लहेतो थी,थाश्रवमान रहेठे ॥ ५ ॥ हवे यधम पुरुपनी दशा दृष्टांत दर्शने दृढावे -यथ यधम पुरुप यथा:- सवैया कतीता:-जैसे रांक पुरुषके जाये कानी कोडी धन, उस्वाके जाय विने जोईने कुकरिके नगरो कचिरीश बजे ले तेम अरमाधम पुरुरत . विलोकि धनवतको, रैनके जगेयाकों बिलोकि चोर गेप कर मिथ्यमति रत सुनत सिहतको, इसकों विलोकी जैसे काग मनि रोप करे चनिमानी का । देखत महतको, सुकविकों देखि ज्यों कुरुवि मन रोप करै त्यही जन अर्थ-जेम हाथी जोईने कुतग रीगे नराईने मुफेने जेम निर्मन पुरात नने जाईने रीठो नराय ,जेम राते जागनार पुरुपने जोईन चार रहो, जो नगय ने, जेम महतने जोईने यनिमानी रीश करे ने जेम मुकरिया जेम मिथ्याती मिहातने शानली रीशे नराय वे जेम हमने नोनमा सर्वया तीता-सरलको सत कहै वकताफाँधी कहे विना कानात हवे वलीथरमाधम पुस्पनी चाल कहेने-अथ पुन अपमाराम पुष धनको थधीन है, ठमीको निवज कहै दमीको श्रदत्ती कहे मधुर वन सों कहे दीन है, धरमौकों दनी निसटहीकों गुमानी कहे तिगमा पानी नागहीन है, जहा साधु गुण देव तिन्हको लगा दोष ऐसा कह 88 समयसारनाटक जसे सफाई विहान है, कूकरके नाये ज्यों पिमोर जिरवानी मठा, सूरते ज्यो पुरीष पकवान है. वायसके नाये से नीकी निवारी दाख, वानरहे दत कथा ज्यो पुरान है , हिसकके नाये जैसे हिसामें धरम तसे, मालक सुन बंध निरवान है ।। एए । थर्थ - जेम राक पुरुपने काणी कोडीने तेहीज धन मनायडे, बने बडने सयाकाल प्रनात मनाय , धने कुकडाने पिमोर जीरवानी के पर सतुं पाणी ते दहीनो यडो मनाय ने बने सफर के सुधरने पुरीर के तेज पावान मनायडे, धने कागडाने लोबोसो जमाद जेवी मनाने बालकने दत कथा के लोकनी कथा ने तेज पुराण मनाय ने, ने हिसकने माज धरम मनाय ने तेमज मूर्यने पुन्यवंय ते निवाण के मापद , ए अधम पुरुपनी दशा जाणवी ॥ ५ ॥ हवे थधमाधम पुरुपनी दशा दृष्टातेकरी हढावेने यथ अधमाधम पुरुष सवैया इकतीसा - कुजरको देखि जसे रोप करी चुमे स्वान, रोप को - कर देसि सतको ॥६॥ - F उट मन बडे रीशे नराय ।। ६० । E है . रदा मनीन है ॥११॥ न समयसारनाटका ४सए यर्थः- सरल चित्तवालाने गत केमूर्ख कहे, वक्ता के कथा कीर्तन वांच रने धीठ कहे. विनय करनारने कहे के एतो धननीयाधीनताथी करे, क्षमावं ने निरवल कहे, इंख्यि दमन करनारने थदाता कहे, अने मधुर नापण करना । कहे एतो गरीव वीहामणो वे, धरमीने दंनी कहे, अने निस्प्रहीने अहंकारी हे , तृप्ना वोडनारने नाग्यहीन कहे. ज्यां एवां सरलतादिक गुण देखे त्यां ण लगाडे, एवं उर्जननु हऽयं मलीन के मेलुं होय वे. अने एवा उर्जननेज धमाधम पुरुपनी प्रति जागावी ।। ६१ ॥ । हुवे मिथ्यादृष्टीनी अहंयुक्नुि वर्णन करे :- अथ मिय्यादृष्टी वर्णन:- चौपाई - में करता में कीन्ही कैसी: अव यों करों कही जो एसी : ए विपरीत वि है जामें : सो वरतै मिथ्यात दसामें. ॥ ६ ॥ दोहरा:-यहं बुद्धि मिय्या सा, धरै तु मिथ्यावत; विकल नयो संसारमें, करै विलाप अनंत. ॥ ६३ ॥ अर्थ:-हूं का दूं, या वर्तमान कालमां केवी वात करं, नविष्य कालमां वी कहीत तेवी करीश, एवी अहं बुद्धी ए विपरीत जाव ठे, थने ए नाव मिथ्या दशाना ॥६॥ जे एवी अहंदि तेज मिथ्यात दशा ने, अने ए मिथ्यातद गाने धारण करे, तेज मिथ्यावंत केहेवाय , बने एवा पुरुपोज संसारनेविपे वि ल यका संसारमा नटकता सुख सहता अनंत विलाप करते. ॥ १३ ॥ हवे मूट प्राणीनी व्यवस्था कही देखाडे वेः-अथ मूट व्यवस्था कथन:- सर्वया इकतीसाः रविके उदोत अस्तहोत दिनदिन प्रति, थंजुलीके जीवन ज्यों जीवन घटतु है; कालके ग्रसत विनठिन होत तीन तन, औरके चलत मानो काउसो क तु है. एते परि मूरखन खोजे परमारथकों, स्वारथके हेतु भ्रम नारथ उटतु है; नग्यो फिरै लोगनिलों पग्यो परजोगनिसों, विपे रस जोगनिसों नेकुन हटतु है.६४ जसे मृग मत्त पाटित्यकी तपतिमांहि तृपावंत मृपा जल कारण थटतु है ; तैसे नववासी मायाहीलों हित मानिमानि गनिनामि मनूमि नाटक नटतु है; धागे टुक्त धाय पाठे वठरा चराय, जैसे हग हीन नर जेवरी वटतु है ; तैसे मूढ चेतन सुरूत करतूति कर, रोवत हसत फल खोवत खटतु है. ॥ ६ ॥ थी.- सूर्यना उटयथी ते अस्तसुधीमा अंजुलीना पाणीनी परें थायुष्य घटतु जायजे, अने दण दणविपे काल जे ते ते शरीरने यासेठे, तेथी शरीरवीण थायने, ए रोते तन और केशरीर तरफ काल ग्रसी रह्यो, एटले जेम शस्त्र कोई वस्तुने कापे छे तेम कालरुपी शस्त्र शरीरने कापेठे. एवं कार्य थई राडे तोपण मूर्वजन जे वे r फतो नथी तेथी तेनी मेहनत व्यर्थ जायवे तेम मूढ प्राणी जे क्रिया करेते त्यारे रोवत हसत के० घरति यने रतिये करी ५ हो फरी बधना करनार मूढ विपयिनीयवस्था कहेठे-थथ मूढ विपी संचया फतीसा -- लिये झिट पेच फिरे लोटन कबूतरसो, वनटो न की शुनटतु है, जाको फल 5 ख ताही सातासो कहत सुस, सहित.. अनी धारासी घटतु है, ऐसे मृढ जन निज सपती न लग्वे क्योंही, मेरी निशियासर स्टतु है, याही ममतासों परमारथ पिनसी जाइ, काजी में थर्य-जेम लोटण ग्यतर होय ते जो पारख वध करीने पर भयो मार्ग परेले, पण कोरीते सपनो मार्ग धरतो नयी थन जेनुमान टपाट फरेने, तेम मूढ प्राणीयनादि कालना कर्ममा पान पेटो नग्गग्नी धाग्ने बाटे, जेमा मधनी मीठास योडीदाय न पानी मीतामरामराजा जीनने दी नावे तेनु दुख बडु थाय, तर पूर. पोनानीदानादिक मपतीने पदी योजयता नयी, पण पायातुन मरीमारी मानी ग्याने, एज पृती ममतारडे परमार्य जाण गनु । ४५० समयसारनाटक ते परमार्थने खोजतो नथी, पए पोताना स्वार्थने माटेज घमना वे, लोग के० परवस्तु जे काम क्रोधादिक ते साथे लागो फिरेने, बने तेथी पग्यो के हलिमली रहेते, तेथी विपयरसने नोगवता जरा पर थर्थ -वजी जेम कोई जबरोमृग होयचे ते वृषादित्य के पतकोननो टमास तेना तापनेविपे थती तृपावत थयो थको मृपा के फूठी वापर थटतु हे के पलटके, तेवी रीते ससाजीव परवरूप मायाजाजनेविरे । एटले तेने हितकारी मानीने भ्रमरूपी नूमीनेविपे ठराव करी नटनी ने ते केहेगे तो जेवो कोई हाहान याखविनानो पुरुष होय ने वाटतो होय त्या पासे वाडं होय ते दोरीने चावी नारयतो होय तेने ते करेजी क्रियाना परम फलने खोई देयले ॥६५॥ सपा ज्यों फटतु है ॥६६॥ . न . तम ममताली जयने, जेन कानीना पाणीना स्पर्शया र फाटी जायने, हो मुटनी यष्टिनी व्यपन्या कही यतापत्रे -श्रय पुन मा भार समयसारनाटक. ४५ सर्वया इकतीसाः-रुपकीन फांक हिये करमको मांक पिये, ज्ञान दवि रह्यो मिर जैसे घनमें ; लोचनको ढांकतों न माने सदगुरु हांक, मोलै पराधीन मूढ तिदूं पनमें; टाक क मांसकी मलासी तामें तीन फांक, तीनि कोसो ; लिखि रारव्यो कादु तनमें; तासों कहै नांक ताके राखिवेको करे कांक, सो खरग बांधि वांक धरै मनमें. ॥ ६ ॥ थर्थ. यात्मानु रूप हश्यामां नथी दीवं. तेथी कर्मनो मांक पीयो, एटले कर्म रस व्यापी गयो, तेणे करी यात्मानुं स्वरूप जे शुभ ज्ञान ते दवाई रघु, कोनी जेम धन के ० मेवरूप वादलानेविपेचं ढंकाई रेहेत्रे.तेम तथा ज्ञानरूप लोचन र मिथ्यातनी ढांक पडी तेथी सदगुरुनी हांक के थाहा तेने मानतो नथी, ने मूर्ख पराधिन थको रांक वचन बोलेठे, अने त्रणे कालनेविपे निशंक रहेठे. मूढता प्रगट करी वतावेजे जे नाकठे ते टांक के एक मांसनी सीमरीचे ते पे त्रण फांक ठे ते प्रत्यक्ष प्रमाणे देखिये वैये, ते त्रण फांक केवा देखायो कहेते, ते जाणे त्रणनो यांक त्रण फांकवालो कोए शरीरमांज लखी राख्यो, श्रीटारिक अवयवने नाक कहेठे, थने ते नाकने राखवाने कांक के लडाई रेने विचारे जे मरीजश तो पण नाक तो रहेसे एवा विचारथी लडाई करेठे खड्ग यने मनमां वांक धरीज राखे ॥ ६ ॥ हवे मूटना विपय रागीपणानी दशा कहे :- पथ मूढ विषय वरननं:- सवैया इकतीसाः-जैसे कोउ कूकर कुधित सूके हाम चावे, हाडनिकी कोर चिहू र चुने मुख में ; गाल ताजू रस मांस मूढनिको मांस फाटे चाटै निज रुधिर मगन मुखमें ; तैसे मूढ विषयी पुरुप रति रीत गने, तामें चित साने हित माने खेद छ |में, देख परतत बल हानी मल मूत खानी गहे न गिलानि पगी रहे रागरु खमें। अर्थ-जेम कोई कुतरो जुख्यो थको हाडकाने चावे ते, ते हाडकुं सूकुं होय , तो पण तेने चारे तरफ फेरवीने ते चाटे , ने तेम चाटतां तेना गाल जीन ने लिवानी चामडी फाटे , अने तेथी लोही नीकले ठे ने तेज पोताना सोही । स्वादथी मगन थई जाय वे, तेमज जे मूढ विषयी पुरुप , ते रती के० की पुरुष संयोगनी रीति जे श्रृंगार रस तेनेविपे मगन रहे, थने तेथी खेद ः व उपजे , तो पण तेमां सुख माने से, बने ते कार्यथी प्रत्यक्ष पणे वलनी हाणी थती जाणे , तथा तेने मल मूत्रनी खाण जुए . तेम तो तेमां गि समयमारनाटक लानपणु ग्रहण करता नथी उगम पामता नयी यन गगरूप रत मनी रहेने तेना गार पाणता नया, नटानमा चित नगावा थानद हो समारीन। मिताहान मा ननन। व्यवस्था कहने अथ ममा नया मना याम्या क्यन अमिलन मग काममा निन्न सहन ननन स्या मिय्याती कह रह्या सिप अनन अहमति पारिक मा मुनि ना ममत्त निपारित ॥ ६ ॥ माह विना यर्थ-निश्चयनय पड महजरूपचननन तमा स्मथानित मरयाक्तीना-थमग्व्यात नाम परवान ना मियात नाव न पिहारमा मुफतह निरविरनप निस्पापियानम समाप मापन न पथमा दस्त ह त नाच परम दगामायापहम्ममा अय- नाफाफागने तनी यमग्यानपण पनागर ना यमग्यान न तप्रमाणन मिय्यात नारन नापना ययाय स्याना" गुणमय थन माफ मागन जान त जान परमगामा - न मगाउन व्यवहारमा पडीन माहनु पिकनपाण मानीन मियामन। य रह्या न करने मा अनत विकल्प नर्गन अति पाप ग्यान अन नण ममन्व मि । कीर ने स्थिरता पाम्या तेज मा यया ॥ ६ ॥ हर मि यात नावथकी यरहारनु अनग्न्यातपण कद 7- अथ मि.यात्वनार व्यवहार व क्यन नान थया अन यादग्या मुचायनमा जिप नया व विमान जमा नपाधि नह। त निम्पानिपी समापिथी Fa मा ममा टस पण समय गमाय नह।।। 30 हर गुम्न गिय पत्र प्रनन सपिन र - न ज माद रमी पग्निनि निगन पट में 6 चतनमा, निन्दिका मन नु यह पत्र । माम नरा शिष्य ऽम पूनन हम यय गिय प्रम- नर पुजन दव -- समयसारनाटक. ४५३ - अर्थः- मोह कर्मनी जे जे परिनति , एटले राग देषादिक वे. ते तो तमेस धनुं निदान कयुं, अने एतो निरंतर शुद्ध चेतन थकी निन्न वे, ते माटे एवं जो हवे मूल हेतु कहो; ए बंध थाय ते गुं जोवने सहज कौतुक , के पुशल व्य निमित्त ये ते कहो एम शिप्य माथु नमावीने गुरुने पूछे वे. हवे उत्तर यापे के हे नव्य प्राणी एनु उत्तर भांनलो ॥ १ ॥ अथ गुरु वचन:- सवैया इकतीसाः-जैसे नाना वरन पुरी बना दीजै देवि उजाल विमल म सूरज करांति है, उडालता नासै जब वस्तुको विचार कीजै, पुरीकी ऊतकों न नांति नांति है ; तैसे जीव दरवको पुग्गल निमित्त रूप, ताकी ममता सो ह मदिराकी मांति है; जेद ज्ञान दृष्टिसों सुनाव साधि लोजे तहा, साचि शुरू तना यवाची सुख शांति है।॥ ७३॥ यर्थः-जेम सूर्यकांति मणी तेम वीजो काश्मिरी पापाण तेवोज ठे, ने ते हा उज्वल वे, ने तेनी नीचे तरेतरेना रंगनी पुरी वनावी थापिये त्यारे तेमां तनातनो रंग देखाय; पण जारे ते सूर्यकांति मणीना वनावनो विचार करि तारे तो तेनी कांति जे उज्वल , तेज मनमां थावे, घने दीवामां तो नीचेनी नावेली रंगनी पुरणीनी जलक पडे तेथील तरेवार रंग वरण देखायो, तेरीते जीव व्यनी यक्ष दशानुं निमित्त कारण पुज्ज इव्य ठे, तेनी ममताथी मोह प मदिरानु उन्मत्तपणुं , घने ज्यारे जम चेतननी नेद ज्ञान दृष्टीवमे चेतन खनाव साधीये, त्यारे साची शुद्ध चेतनाज नासे. अने अवाच के० वचन गोचर एवो रीतनी सुख शांति ठे तेज नासे. ॥ ७२ ।। हवे वग्नना संयोगथी खनावमा नेद पडेठे, ते उपर दृष्टांत धापेवेः- यथ संयोगिका खनाव वर्णनंः- सर्वया शतीसा.-- जैसे महिममलमें नदीको प्रवाह एक ताहीमें घनेक नानि वीरकी दरनि पायरको जोर तहां धारको मरोरि होति कांकरिकी खानि तदा हांगकी फरनि है: पानकी फकोर तहां चंचल तरंग उठे. नृमिकी निचानि तहां होरको परनि है ; तैसे एक यातमा थनंत रस पुदगल हकी संयोगमें बिनाय यर्थः-जेम पृथ्वी मंमत उपर नदीनो प्रवाह एकरूप के, अने तंज नदीना वाहमा पापी व्हेनु भनेक तरतुं ने, जे काणे नदीना प्रवाहमा मांटा मांटा 3B नरनि है. ।। ७३ ॥

. तनकी | देहपी ते तुदी ने देह थचेतन पिम, यने थात्मा चतनपिने ने जे जगतने जाणे, थने जोयत के० देग्वेने, पोतानी वेहने प्रमाणे पतो नयी. पण एना जे सदण ते तेने वेदी के० जाणीने शिक्षण देद यचेतन प्रेत दरी रज रेत न मन पती ध्यापिस पाट यगतिकीट उपाधिफी जोट समापिसा गारी जिला सर हानि ने परि ताहि तुलागत प्यारी, देह तु ताहि तजगि निदान य- दयचनन ने, प्रेत दीरे जमतारूप प्रतनी गुजारत. नही न वीर्य ते परीनगजीने, यने मजम्प तिग्नी यती ४५४ समयसारनाटक. पथरा थावी थडेला होय त्या धार मरडाईने पमे, थने जाहां काकरी य तां फागनी करनी के काग एटले पाणीना जरा जनकी उठेने बने ननी ककोर चालती होय तांहा चचल तर नवे, थने जे ठेकाणे होय ताहा नोर पडेने वमल थायवे, तेम धात्मव्य , तेने पुग्न योग वे यने रस जे वे ते पट गुणी हानी दीया धनत दे, तेनो सयोग त्माने विपे विनावनीचरणी थायवे ॥ ३ ॥ हवे यात्मा यने शरीर एक मेक बंधाई रह्या ठे पण लक्षण नेद का ते वतावे -- थथ यात्मशरीर सहन निन्न कथन दोहरा - चेतन लहन थातमा, जड लबन तन जाल, गि के, लीजें चेतन चाल ॥ ७ ॥ श्रये - यात्मानु चेतन लक्षण ने शरीरनु जड लक्षण दे, तेथी मता वोमीने चेतननु शुक्ष ज्ञानपणु तेनु ग्रहण करी लेवु ॥ ३५ ॥ हरे नि केरत यात्मानी गुरु चाल कहे - थथ यात्मा यया संया तेईसा - जो जगकी करनी सब गनत, जो जग जानत - देह प्रमान पे देहसु दूसरो देह थचेतन चैतन सोई, देह धरे प्रनु देव, पर उन लसे नहि कोई, जम्न वेदि पिचठन चूमत थनिसा परत न थर्य - जे पदार्य सर्व जगतनी करणी करने, एटले चतुर्गति वे. अनु वे पण देहयो मिन्न ले देवनविप प्रजन्न के टकाई रह्या ते, एने. लपेरे पोयामा ग्रह के इस्यियी प्रत्यद नयी ॥ ३५॥ दवे देहनी चाती कहे-थय दह यया मरया तेमा जन देहति यागे ॥ १६ ॥ * - समयसारनाटक. - रोगनी पोट 2. आराध के आत्माने उपावाने उट अने उपाधिनी जोट के. मेलारुप ने, एने विपे असमाधिन रहे, समाधि रेती नथी. माटे अरे जीव ए देह ते सुरखनो नाश करे वे एवी , तोपण तने ए देह प्यारी लागेवे. अरे जीव तूं समझ के ए देह निदान तनेज तजशे पण तुंए देहनी यारीनो त्याग करतो नथी. दोहराः-सुनु प्रानी सदगुरु कहै, देह खेहकी खानि ; धरै सहज उरख दोष कों, कर मोठकी हानिः ॥ ७ ॥ • अर्थ:-- सदगुरु कहे के अरे प्राणी सांजलो देह वे ते खेह के० धुलनी खा ए के. एनो सहज वनाव वात पित्त कफ रूप दुख दोपने धरनारो ने. अने मोद नी हाणी करे . ॥ ७ ॥ हवे देहलु वर्णन करे:-- अथ देह वर्णनं.- सर्वया इकतीसाः- रेतकीली गढी किधों मढी है मसान केसी अंदर अंधेरी जैसी कंदरा है संलकी ; कपरकी चमक दमक पट नूखनकी, धोखे लागे नली जैसी कली है कनैलकी; औगुनको ओमी महा नोंमी मोहकी कनोंडी, मायाकी मसूर ति है मूरति है मैलकी; ऐसी देह याहिके सनेह याको संगतिसो व्है रही हमा री मति कोल केसे वैलकी. ॥७७ ॥ ौर और रकतके कुंम केसनिके घूम, दाम नि सो नरो जैसे थरी है चुरेलकी; योरेसे धकाके लगे ऐसे फट जाइ मानो, कागदको पुरी कियो चादर है चैलकी; सूचै 'चम वानि तानि मूढनिसों पहिचानि करै सुखदा नि अरुखानि वटफैलकी; ऐसी देह याहिक सनेह याकी संगतिसों व्है रही ह मारी मति कोलू केसे वैलकी. ॥ ७ ॥ यर्थः- जाणे रेतीनी गढी बांधी होय के मसाणनी मढी एटले अपवित्र ठेका । हाड़ मांस→ एक थ, कयुं होय,वली जेनीअंदर सैल के पहाडनी कंदर के गुफा जेवू थंधारूं ते, एवा अपवित्र देहरूप स्थान तेउपर नूपणना चमक दमकथी शो ने , धोखे के पूना ननकाथी देह नली लागे . ते उपर दृष्टांत वे के, जेम कनेरनी कली उपरथी सुंदर देखाय ठे, पण तेमां अंदर बिलकुल सुवास होती नथा; तेथी उचाटकारी लागे वे, अवगुणनी उरमी के महामी ने, अने मो हनी कनोडी के मोहनी काणी थांख , तेथी सूजतुं नथी, धने मायानी मस् रति के मायानो समुदाय ठे; एवी मेलनी मूरती ए देह , एना स्नेहथी अने संग तथा थमारी मति शेलडी पानवायूँ कोन्दु तैना वलद सरखी वनी गई us on वलो ए देहनेवि काणे काणे लोहीना कुमला ने, ने अपवित्र केशनी कुंभ 1 हवे जगतवासी जीपनी व्यस्था कहे ठे-यथ जगतवासी यथा- धों रेत केसे धुहे है, दीसे पटनूखन थामबरसों निके फिरे फीके दिनांकि सर्वया इकतीसा - जगतमे मोले जगतवासी नर रूपधरी, प्रेतर्कसे पा । थंयरज्यो सुहे है,मोह के थनल दगे मायाकी मनीसों पगे दानकी लगे कसकेसे फुहे है, धग्मकी युकि नाही उरके नरम माहि नाचि नावि थर्थ - जगतवासी जीर मनुष्यरूप धरीने डोली रह्यावे, एरेवा में समयसारनाटक. बे, तेमा हामका नरेला दे जेम चुडेल व्यतरीन स्थानक होय तेवी ए थोडो धको लागवाथी ए देह एवी फुटी जाय ले के, जेम कागलनी पुडी नी मेली चादर , ते जेम जरा टकोराथी फाटी जाय, तेम देह फाटी एवी ए देहनी ममताथी भ्रम वाणी के० मिथ्यावाणी सुचे के कहे, अने लोक एनी पिठान राखे , अने ए देह सुखनी हानी करता ने, थने खाण बे एवी ए देहना स्नेह तथा एनी सोबत थकी श्रमारी बुद्धि शेजडी ना कोव्हाना बलदनी गति जेवी थई गई ॥ ७ ॥ हवे कोहुना बलदनी अवस्था अने तेनी वराबर ससारी जीवनी गती* स्पष्ट करी बतावे , अथ कोटदुका बैलकी अरु ससारी जीव समानरूप सवेया इकतीसा -पाटी बंधे लोचनसों सकुचै दवोचनिसो कोच' वेदे खेद् तनको, धाश्वोही धधा अरु कधा माहि लग्यो जोत, वार वार कायर है मनको, नूखसहे प्यास सहेजनको त्रास सहे, यिरता न गहे न सास लहे बिनको, पराधीन यूमै जैसो कोटदुको कमेरो बेल तेसोइ । या जगवासी जनको ॥ ७॥ थर्थ - जेनी श्रारख वपर पाटी बाधा के दबोच के पगथी तेलतु, तेयी चाय वे, अने परोणानी धारना धोच वागे , तेनी सोचनायी शरीरने ५ दी, ने दोडतो फिर पोताना मा धावत रहो, ने खाध जोतर लागो रहे चार वार थारनो मार पड़े , ते सहन कण्या करे अने मननो कायर . पण वेते ने, थने जननो त्रासपण खमे , अने स्थिरता पकडतो नथी. चार पण सुखे मोडेथी स्वास लई शकतो नथी, एरीत पराधीन थको जेम का कमेरो, के काम करनारो बलद धमे, तम जगत वासी लोक घूमे से, हे नाई कोददुना बलद सरखो तेमनो पण स्वनाव ॥ ५० ॥ १ - - जाहि मरीफ़से चुहे है ॥ १ ॥ .

समयसारनाटक. ४८ - . प्रेतना दीप , ते जेम जलढी मटी जाय ठे, तेम ए पण समजवा. वली रेति ना घुमाडा जेवा , तथा वस्त्र नूपणना आडवरथी शोनायमान देखाय वे.अने कणेकमां फीका थई जाय , जेम सांज सम अाकाशमा वादल रंग बदले ते, तेम जाणवा वली मोहनी अगनीथी दाजे , ने मायानी मनी के० पोतापणुं तेथी पगे के व्यापी रह्या , जाणिये डाननी अणीउपर लागेला पाणीना विंड सर खा . नगरना विदु जेवा . धरमनी अोलखाण जेने नथी थने त्रमनेविपे थरुमा रह्या ठे, जेम मरी उतपादनां उदरडां नाची नाची ने मरी जाय वे. तेम ए सं सारी जीव नाची नाचीने मरण पामे ॥ १ ॥ हवे जगतवासीनी मोह व्यवस्था कहे-यथ जगत व्यवस्था कथन:- सवैया कतीताः-जासों हूँ कहत यह संपदा हमारी सोतो, साधनि धमारी ऐसे जैसे नाक सिनकी; जासों तूं कहत हम पुन्य जोग पाई सोतो, नरकको साई है वमाई देढ दिनकी; पेरा मोहि पर्यो तूं विचारे सुख थाखिन्हिको, माखि नकं यूंटत मिताई जैसे जिनकी; एते परि होहि न उदासी जगवासी जीव, जगमें थसाता है न साता एक दिनकी. ॥ ७ ॥ अर्थ:- अरे प्राणी जेने तूं कहे। के था मारी संपत्ति है, तेने तो माधु लोके एवी रीते नारवी टीपीने, के जैम नाकना मेलने नाखी देय.थने जे बदाश्न तुं क ठे के पुन्यना जोगथी हुँ पाम्यो ते तो नरकनी सहायी , जे गजादिफनी साहेबीवे. ते दो दिवसना . ए परीवारना घेरामा तुं पटयो थको यारपर्नु सुन समजे ने, पण ते मितानी पर माखीनी पेट टोलानो नएनणाट यई रहे तेम परीवारनो घरोते. एवं उतां जगवासी जीव उदास यतो नथी. साचु जो जोऽये तो जगतनविपे थसाताज , एक क्षणमात्र पण शाता नयी ॥ ७२ ॥ दोहा:-- यह जगवासी यह जगत, इनसों तोहि न काज; तेरे घटमें जग व श्रर्थ.- ए जे पुर्वे वखाण्या एवा जगतवानी लोक के, घने ए लोरोनी ज्यां वाम दे, तेने जगत जाणवू, ए साथै नंबंध रात्ववानुं तारं काम नथी, पर ताग घटनेविपेज जगतनो वास ,धन ते जगतमा तारं राज्य ने ।। ७३ ॥ हवे जे पिमे ते ब्रह्मांम ए वात माचीवे, एवं निर्णयाने.- यधपिंम ब्रह्मांक वनेनं नया नीता.-- याही नर पिम विगजे त्रिनुवन विनि.पाटिने त्रिविध प ! म, साम तेरो राज ।। ७३ ॥ - 4 विममा गनित के० मध्यनागमा गुप्तरूपे सर्व विलास पण जेना थत्तरमा सर्वया तेऽसा-रे रुचिवत पचारि कहै गुरु, त् थपनो पद धूलतन ग्योज हिये निज चेतन सन है निजमे निज गूफत नाही, ति सुन 'अनि उडान, मायके फद थरूफत नाही, तोर तरूप न उदाकि दोहिमे । श्रर्य - पचारी के० बोलावीने गुरु कहे , के रे रुचिवत नश पद १० स्थान तेने जाणतो नयी पोतानु चेतन लदाण हश्यामा सोर तानु लक्षण पोताने रिपे ठे ते गृफत के० गुप्त नथी, तारू स्वरुपतिमत मन्द २० निन यापन , सदा यति निर्मल ले, पण मायानी जानना मा पडधु ने, तेमाथी लूटी शकतो नथी, तारू रूप ६६नेपिपे नचाएन जालनी विविध दशामा नथी, तारामांजरे, पण तने सूज नथी । GUn माया तैसा- के उदास रहे मनु कारन, के कहीं अमिजाहि नहीं, एG समयसारनाटक रिणाम रूप शहि है, याहिमे करमकी उपाधि दुख दावानल, याहिम ख बारिदकी वृष्टि है , यामे करतार करतूति याहिमें विभूति या नोग वियोग यामे पृष्टि है, याहिमें विलास सब गर्तित गुपतरूप. ताहिका अंतर सुदृष्टि है ॥ ४ ॥ थर्थ -मनुष्य पिमनेविपे कटीनी नीचे पाताल लोकछे, नानि ते तिर्यक ते उपर उर्ध्व लोकने, एवी त्रिनुवननी स्थिति जाणवी, बने एनेविपेज कर णाम उपजे वे, ने कईक नाश पामे वे, ने कई स्थिर , एवी त्रिविध शाटि रही ने, बने एज पिममा यात्माने कर्मनी उपाधि वलगी, तेज उपकारी नल के अमिनो समुह लाग्यो चे अने एज पिममा कोश्वारे समाथि ६५ तेज बादलनी दृष्टी जाणवी, ते दावानल उपर मेघनी दृष्टी ठे, एज पिका नो कर्ता पुरुप , एज पिममा कान किया. एपिफमाज पिजूति के नादिक सपत्ति , एज पिममा कर्मनो जोग ने कर्मनो वियोग , थने एन. के v दलन जे गुनागुन गुणोमा घमडाई रहे ते ठे, . दृष्टीनो प्रकाश में, तेने सर्व विलास प्रत्यक्षपणे जणाय रे ॥ 58 हवे ए यातनो उपदेश गुरु कहे ने है नुहि सूऊत नाही ॥ ५ ॥ हो ज्ञानना प्रकाश वडे वरताने माय ते समजावे वे - थथ झान माहात्म्य कथन मा यात्मानु घृष्ट श्रय गुरुपदेश कथन त समयसारनाटक. ४पए अथ मन स्वरूप कथन:- प्रनाम करै गदि मूरति, केश पहार चढे चदि तीके ; के कहे असमान के कपरि, के कहे प्रञ्च देवि नमीके; मेरो धनी नहि दूरदिशांतर मोमहि है मुहि सूजतनीक. । अर्थ.- कोई पोताना परमेश्वरने उतरखवाने उदासी थई बेसी रहे , कोई क ई दंत्रनविपे जतो रहे ठे, कोई परमेश्वरनी घडेली मूरत्तिने प्रणाम करे , कोई परमेश्वरने पामवाने ठोकामां बेसी पर्वतने उपर चढे , कोई परमेश्वरने यास्मा न उपर ने एवं कहे ते, कोई कहे ते के, परमेश्वर जमीननी नीचे ठे, ए कुगन वालानी श्रधाते; पण एरिपे मारो निश्चय तो ए वे के मारो धणी तो कार्ड टूर दंग नथी, पण माराविपेज . एम अनुनवथी मने सारं मालम पडे ते ॥७॥ । दोहगः- कहै सुगुरु जो समकिती, परम उदासी होइ; सुथिर चित्त अनुनी करे , यह पद परस सोय ॥ ८ ॥ अर्थः-सदगुरु कहे के जे समकित्ती होय ते परम उदासी रूप थई चित्त ने स्थिर राखीने निज धनुनव अन्यासयी पोताना पढ़ने पामे ॥ ७ ॥ हवे मननी चंचलता दर्शावी तेने स्थिर केम राख, ते उपदेशे :- मईया इकतीसा:- विनमें प्रवीन विनहीमें मायासों मलीन, निकमें टीन दिन माहि जेसो शक है; लिये टोर धूप ठिन ठिनमें धनंतरुप कोलाहल मानत मथान शोलो तक है ; नट कोसो थार किधों हार है रहट कोसो नदी कोसो लौर कि कुंजार कोसो चक्र है; ऐसो मन नामक मुथिर याजु केसो हो योरहिको चच ल अनादिहीको वक है. ॥ ७ ॥ धायो सदा काल पै न पायो कहू साची पसों विमुख अरव कृपवास बसा है ; धरमको घाती अधरमको संघाती महा, कु राफाती जाको सनिपातीकाली दसा है, मायाको पटि गहै कायासों लपटि र है, नूयो नम नारमें बहीरकोसो सता है; ऐसो मन चंचल पताका कोसो अं चलनु ज्ञान जगेसें निरवान पथ घसा है. ॥ Gए ॥ अर्य-श्रा मन क्षणमा प्रवीण थायवे, क्षणमा मायानेवि मतीन थाय, णमां दीन दशा धरने, क्षणमां शक के इं जेवं वने, क्षणमा टोड धाम करने, हणमां अनंतरूप धरे वे, जेम दहीने क्लोवता कुजाहल थायजे, तेवू कु लाहल ए मन करे, वली नट जे नाचनार घुमे तवं, के यरहटनी माला घुमे ते वं, के नदीनो वमल घुमे तेवू, अथवा कुंनारनुं चक्र फरेचे ते, कढुं, एवो सदा काल मननो नामक स्वनाव वे, एवं ए मन याज केम स्थिर थाय? जाते चंच . AN . निरागी निरबध है , ऐलो चिदानद याही घटमे निकट तेरे, ताही व विचार अर्थ- ए थात्मा थलदरे, थमूरति ,थरूपी, अविनाशीने धन म्यो नही एवो , अने जेने कोईनोथाधार नही, ज्ञानरुपीछे,तथा रगविनानो ने विविनानो ठे, व्यवहारमा जोईयेतो नाना प्रकारना वेष धरनारो। जोईये तो वेपनो लेश धरे नही मात्र चेतनाना प्रदेशनु धारण करनारो,थने नो पध के० पुजरूप में, ए उपदेश मनने वाह्यात्मानो , ते बाह्यात्मा मनने वे के,ए चिदानद जेठे ते राजा,ने या पिमनो मोह धरे, थने हे मन ए ४६० समयसारनाटक. सबने अनादि कालथी वाकु चालनालं मन वे वली के " I हमेशा फरेने, पण एने किाय सानु सुख प्राप्त थतु नथी, पोताना समाधिसुस्तषी ख थयुबे, थने 5 खरूप कूप यासमां वस्यु वे, वली ए मन धर्मनु घाती ने अधर्मर्नु सघाती , ए मदा कुराफाती , ए मननी दशा तो जेम पने सनेपात थयो होय तेना सरखी के. शेह तथा वचनाने नट ग्रही कायाना मोहथी मगन रहे, ने नम जालमा पमी नुयंज फरे, जेम १ ममा ससलु थाची पडे ने नमतु फरे, तेवु मन ले ने पताका के० 2411 चल के वेडानी पते जाणवु ते ज्यारे ज्ञान प्रगटे त्यारे निरवाण के मार्ग तेने विपे गमन करे एवु दोहरा.- जो मन विपय कपायमें, वरते चचल सोश, जो मन ध्यान सो, रुके सु अविचल हो ॥ ए॥ ताते विषय कपापसो, फेरि से नि, शुभातम धनुनोविपे, कीजे थविचल यानि ॥ १ ॥ अर्थ-जो मन विपय कपायरूप राग देपमा वर्ते तो चचल जाणवु एमन राग पेप गमी ध्यान विचारथी रोक्यु रहे तो थविचल जागनु ॥ माटे विपय कपायमा मननी लागणीने तेने काडी निज क्षात्मना लगाडीने था मनने अविचल करिये ॥१॥ हवे मन स्थिर करवाने यात्मानो विचार करवो ते कहे।.- अथ विचार शिका कथन सवैया इकतीसा -अलख अमूरति यरूपी अविनासी थज, निराधार निरजन निरय है, नानारूप ने धरनलेस धरे, चेतन प्रदेस चेतनाको पंध है, मोह धरे मोहीसो विराजे तो तोहीसो न तोहिताना ॥ ए A . ३ धीर सर्व धध है ॥ ए॥ - " समयसारनाटक. ४६१ तारामा ताराजेवो विराजे , पण निश्चेनयथकी तारेविपे ने मारेविपे एने मोह नथी, एवं निरागी निरबंध . एवो जे चिदानंद नगवान ते, ते बरे मन जे घट मांहे जिहां तुं बसे तेज घटमां ते पण वसेचे माटे ते वरनोज विचार तुं कर, बीजो विचार सर्व ६६ रूप. ॥ ५ ॥ हवे ए चिदानंदनो जे रीते गुझानुनव थाय, ते रीते मनने उपदेश करते अथ शुक्षानुनव शिक्षा कथनः- । सर्वया इकतीसाः-प्रथम सु दृष्टिसों सरीररुप कीजे निन्न ताम और सूटम शरीर निन्न मानियें: अष्ट कर्मनावकी उपाधि सोई किजे निन्न तादुमें सुबुद्धिको विलास निन्न जानिये: तामें प्रनु चेतन विराजित अखमरुप, बहे श्रुत ज्ञानके प्रवान ठीक थानिये; वाहिको विचार करि वाहिमें मगन दुजे, वाको पद साधि वेकों ऐसी विधि वानिये.॥ ए३ ।। थर्थः-प्रथम सम्यक् दृष्टिवडे शरीररूप बाह्यात्मा निन्न राखवो, ते वाह्यात्मा नेविपे वीजें सूक्ष्म शरीर कर्म संबंधी अंतरात्मा ले ते पण निन्न जाणवो, ते अंत रात्माथी परमात्माना ज्ञान दर्शननु थाहादुन थायठे, एवं अष्ट प्रकारचें कर्म तेना नावनी उपाधि ते पण निन्न जाणवी, धने ते यंतरात्मानेविपे सुबुझिनो विलास जे नेद ज्ञानादिक ते पण निन्न जाणीये, अने ते सुबुद्धि विलासमां चेतनरूपी म जे ते घरखमरूपे विराजे , थने ते चेतन श्रुत ज्ञानना प्रमाणथी हृदयमां सारीपठे ठराविये, ए रीते हे मन तुं तेनाज विचारमा मन रेजे, ने ते चेतन, पद साधवाने एटले मोद मार्ग ग्रेहवाने एज एम जाणजे । ए३ ॥ हवे ज्ञाता जीवनु स्वरूप वर्णवे वे:-अथ ज्ञानी जीव कथनः- चोपाई - इहि विधि वस्तु व्यवस्था जाने ; रागाटिक निजरूप न माने; तातें ज्ञानवत जगमांही, करम बंधको करता नाही. ॥ ए४ ॥ थर्यः- ए रीते वस्तुनी व्यवस्था जाणे अने राग पाटिक जे नाव ठे, तेने पोतानुं रूप न माने, तेणे करीने ज्ञानवंतने जगतमा कर्म बंधनो का कह्यो नथी थात कर्म तेने बंध करी गकता नथी. ॥ ए४ ॥ हवे ज्ञातानी क्रिया कहे :-यथ ज्ञाताकी क्रिया कथन:- सवैया कितीता-ज्ञानी भेद ज्ञानसों विलेठि पुदगल कर्म, धातमाके धर्मसों निरालो करि मानतो; ताको मूल कारन अशुभ राग नाव ताके, नासिवेको शुद्ध धनुनौ यन्यास मानतो; याही अनुक्रम पररूप निन्न बंध त्यागि, यापुमाहिथ विधी युक्त ने ।

. केवल प्रधान सवि ताकुसा, चुके न सकतिसों के न पुदगलमाहि. दुरु, ने महा बलवान वे, ते सदना मूलने खोदीने पठी पोताना सुनना थर्थ - जेम हिंसक पुरुप नीन प्रमुख जे हिंसाना फलयीयताण में | ने चग्वेडी नाखे ते, तेम मतिमान के० सम्यक्ती पमित जे , ते पुग्न | इन्य कर्मने,थने ज्ञानावरणी दर्शनावरणी इत्यादि यात नाव कर्मने त्यागने | दशारडे थतीत के कर्मरहित थई रह्यो ,अने एकामा ए क्रियाना न | मोह या कारने मटावे , थने तेथी केवल झाननी ज्योति उदय थाप, ति मति ज्ञान प्रमुख सर्व ज्ञानोमा प्रधान ,अने एथी अनत वीर्य प्रगटेने | ए शक्ती ते चुके नही,थने मोद स्थानने जई ढुके, थने काईथी रोगाय नहीं. इतिश्री नाटक समयसारवि बधवार वातावोध रूप थाष्टम समान दोहरा- वध दार प्रन नयो, जो उस दोष निदान, थव वरना । ४६२ समयसारनाटक पनो सुनाउ गहि थानतो. सावि शिवचाल निरबंध होतु तिहू कान, रिलोक पाई लोकालोक जानतो ॥ ए५ ॥ अर्थ- ज्ञाता होय ते नेद ज्ञानवडे पुदगनिक कर्म विजण', वे, आत्मिक धर्मथी पुदगलिक धर्मने जुदो करी जाणे, एम विजक्षण करे, पुदगल धर्मनु मूल कारण अगुव रागपादिक नार , तेनो नाश करवान अनुनव अन्यास जे रीते पूर्व करो ते प्रमाणे अवस्था देखी अन्यास राखे, अनुक्रमे प्रथम सुदृष्टियी शरीररूप निन्न करवु, एअनुक्रमे पूर्व सवयी बंधने त्यागीने पोतानविप पोतानोज झानाटिक सनाव ग्रहण करे, दनी साधना करीने त्रणे काल निर्वध थाय, तेवो थई केवल ज्ञान पामीन लोकने जाणनार थाय ।। एए॥ हवे सम्यक्त धारीनु पराक्रम कही बतावे -अथ सम्यक्तधारी' सवैया इकतीसा - जैसे कोउ हिसक अजान महा बलवान, खादिसून ख उखारे गहि बादसों, तैसे मतिमान दर्वकर्म नावकर्म त्यागि, व्द रहूँ मति झानकी दसानुसों, याहि क्रिया अनुसार मिटे मोह अधकार, न लको रुके न फिरि काढुसो ॥ ए६ ॥ " " मोद हार सुखखान ॥ एं।

समयसारनाटक. ४६३ अर्थ.- कुखने दोपर्नु निदान जे बंध तेनो कार संपूर्ण थयु. हवे सुखनुं स्था न जे मोद तेनो धार संदेपथी वरणवू . ॥ १ ॥ दवे मोदधारने आदि ज्ञान विलासने नमस्कार करे :-अथ ज्ञान विलास वर्णनं:- सवैया इकतीसा.-नेद ज्ञान अरासो फारा करै ज्ञानी जीव, प्रातम करम धारा निन्न निन्न चरर्च : अनुनी अन्यास लहै परम धरम गहै, करम जरमको खजानो खोलि खरच ; योंही मोरखमुख धावै केवल निकट आवै. पूरन समाधि सई पूरनके परचै ; नयो निरदोर याहि करनो न कतु और, ऐसो विश्वनाथ ता हि वानारसी भरच ॥ ए॥ अर्थ- जेम कोई परिदान करनार पुरुप मुज्ञ प्रमुख इव्यने सुलाकनी धार बडे नेदी सुधातु , के कुधातु , तेनो निश्चय करे , तेम ज्ञानी जीव , ते नेद ज्ञानरूपी पार वडे श्रात्मा तथा कर्म ए बेचने जुदा करे . अने ते बेचने उदा जुदा चरचे के तेमां धात्मिक धारानेविपे तो अनुनवनो अन्यास धारण करे, थो परम धरम के शुरू समाधि तेनुं ग्रहण करे; अने कर्मजालने जुदी जा ।, तेने सत्ता कर्मरूप खजानो खोलि खरचे के विखेरी नाखे, तिहां निर्जरा य, एवी दपक श्रेणीने लीधे मोदना सुरखने धाय, त्यां केवल ज्ञान ढुकडोत्रा अने पूर्ण धात्म स्वरुपना परिचय थकी पूर्ण समाधि पामे, पठी नव भ्रमण दोर तमीने निरदोर थाय. ते पती तेने कई बीजुरुत्य करवाने वाकी रहे नही; तेथी ते विश्वनो नाथ थयो, तेने बनारसी दास पूजे ठे ॥ ॥ हवे सुबुद्धि विलास वडे धात्मस्वरूप सधाय ते अधिकार कहे.. अथ सुवुद्धि विलास वर्ननः- सवैया इकतीसाः- कादु एक जैनी सावधान व्हे परम पैनी, ऐसी बुद्धि वैनी हि मारि दीनी है ; पैती नौ करम नेदि दरब करम ठेदि, सुनाउ विनाउ ता घि सोधि लीनी है : तहां मध्य पाती होश लखी तिन्हि धारा दोइ, एक मु ई एक सुधारस जानी है; मुधासों विरचि सुधा सिंधूमें मगन नई, ए ती सब एक सम वीच कीनी है ॥ एए ॥ दोहरा:- जैसी छैनी लोहकी, करै एक ; जड चेतनकी जिन्नता, त्यों सुबुदितों हो ॥ ३० ॥ र्थः-कोई एक जैनी जैन आगमना जाणनारे सावधान थईने परमपंनी के० तीक्ष्ण एवी बुधिरूप वैनी के सोनीनी ठीणी ते शस्त्र विशेप, पोताना नाखो दीधी, पठी ते सुबुद्धिरूप दीनी ना कर्म के० यात्म प्रदेशनेविपे १ , 4 रित, लखति थमित वित करि चित दरपन, कहात मरम धुर दहति नरमपुर, ते क्रियामा कामे लगाडे नखति के खाय ने सित के शीतल जोनन सनरित के. जीननना स्वादविना नोजन जमे, अमित वितके परिमाण त्रुट गुरुना वचनने ग्रहण करे, थने हृदयनेविपे उपसरपन के० स्थिरता लहे, एटले सर्व लोकने पूजनीफ थाय होई प्रगति गति के जेनेविप वीरा, मान्यनी गति थती नयी, तेवीमोदगति चाहे, एवो सुमतिनो उलए बिना हवे झातानो विलास कहे -अथ शाता वर्नन- सवैया श्रुतीता-(सर्व गुरु यदर चित्रालकार ) रानाकोसी गाना थापा साधे थाना चीन, दाना थगीनानारगी खाना जगीजोधा है. माया (जेती तेती रेतेमें धारेती सेती, फदाहीको कदा खोदे खेतीकोमो लोधा है, ४६० समयसारनाटक. श्लेष्म रूप जे राग देप परिणाम , ते ना करमना नेद तेना पुनरूपी ने दीने स्वनाव भने विनावतानी सधी सोधी लीरी, तहा साधनेविष पाती के बिहाश्त बनीने ते पुरुपे वे धारा लरबी, तेमा एक तो मुधामर ज्ञान मय , ने बीजी सुधारस नीनी के धमृत रस जानी ज्ञान समा थहीं राग देषादिकनी दगा वे, ते मुपा दशावे, तेथी विरचि के वैराग सुधा सिधुमा मग्न यवु, ज्ञान समाधिरूप सुधा समुहमा मन रेवु, एजे, ही ते सर्व क्रियानो विचार एक समयमा करे ।। एए ॥ जेम लोढानी बीपी नावे लाग करे , तेम जड चेतननी एकता नागीने निन्नता करवी ते कीज थाय बे ॥३०॥ हवे जेनु सुबुझिनु पिलास वे, तेवु कहे वे -अथ सुक्षि विलास कथन- सवैया इकतीसा - (सर्व हसकर चित्रालकार) धरति धरम फनहरति म मल, मन वच तन बल करत समरपन , नखति असन सित चखति हति परम गुर वर उपसरपन, रहति जगत हात सहति जगति रति, ति गति यह मति परपन ॥ १ ॥ श्रर्थ -सुबुद्धिजे से ते धरम रूप फलने धारेते, कर्मरूप मलने हरे वे धने ए नेविषे मन बज वचनवल थने कायान बल तैने समरपण करे एटले ए. पोतानु झानादिक धन चित्तरूप दर्पण वडेजुए, मम धुर के मर्मनी जीवन स्वरूप ते कहे, म पुर के मध्या नगर तेने वाले, धने . . ० . -

नाटक.
हाता लोरे राधासंती तांता जोरे वाटी सेती नांता तोरै चांदी कोस
है; जाने जाही ताही नीके माने राही पाही पीके, गने वाते माह
धारावाही बोधा है. ॥ २ ॥
अर्थः-जे बुध के० कानी ठे, ते राणा के राजा जे पातसाहनु स्वांग लेता
रह जे. जेम राजा पोताना यात्मानुसाधन करे; अने पोताना ममलनो साज
पोताना धायाने चीन्हे के नीचेवानी राखे. दानाइ राखे पण नादानी नही राख
चारे उपाय वडे नाना रंग करे. खानाजंगी केलढाईनेविपे जोधा थर्ड रहे, तेम
नी पुरुप यात्म साधन करे, गुणताणा चिन्हे यने त्यागीयको कर्म निर्जरानेविपे
ना प्रकारना रंग धारे, राग हेप उर्जन साथे लमो हटावी टेय, एवीरीते एक प
नावे थर्थ थाय , जेम लुहार रेतरमीवडे लोढाने घसी नाखे . तेम जेटर
'टली माया वेली के०कर्मजाल तथा गजवेल जे क्रोध तेने मेधा के सुबुद्धि ते रू
प रेतरमी वडे घसी नाखे ; घने फंदना कंढने खोदेठे जेम लोधा के खेडुत खेतर
नी धरतीने कंद के० मूलथी खोटी नाखे वे. तेम वाधा के० कर्मबंध तेथी दा
तालारे के० जुदाई करे, अने राधा के सुबुद्धि ते साचे नातो जोडे; वांदीके
कुबुधि तेनो नांतों के संबंध ते तोडे, जेम सोना रूपानी चांदी सोधनार वस्तु उ
ज्वल करे,तेमजे जेने तेने जाणे, हेय जे वांमवा योग्य वस्तु थने उपादेय जेथा
रवा योग्य वस्तु तेने पण नीके के ठीक जाणे, पण हैयाने राहीपाही के फुल
मान पीकसमान जाणे जीनासथी खीलावेडे, ए रीते माही वातो ठरावे एवो
यक्त धारानो वेहेनार श्रवोधा के० पंमित ने शानी कहीये ॥ २ ॥
'. हवे हाताने चक्रवत्ति समान कही वतावेठे-यथ ज्ञाता चक्रवर्ति समान कथन:-
सर्वया इकतीसाः- जिन्हिके दरव मिति साधत ठ खंम थिति, विनस विनाव
यरिपंकति पतन है: जिन्हिके नगतिको विधान पनो निधान, त्रिगुनके नेदमान
चौदह रतन है; जिन्हिके सुक्षि रानी चूरि महा मोह वन, पूरे मंगलीक जे जे
मोखके जतन है; जिन्हिके प्रमान थंग सोर्ह चमू चतुरंग, तेई चक्रवर्ति तनु धरै
अर्थः- जेणे गए इव्य प्रमाण करी साध्या तेज जाणे व्ये खेम साधीलीया,
यने जेना रागपादि विनावदिशा वणसी जाए तेज जाणिये शत्रुनी पंक्ति, प
न के नाग थयो, अने तेने नव प्रकारनी नक्तिनुं विधान के कर तेज तेने
व निधान , झान दर्शन ने चारित्ररूप जे त्रण गुण ठे, थने तेना क्योपशम
प थतन है. ॥ ३ ॥

थागत कहीजेत्रण धारा तेतो ध्यवहार नयनी चालमा था जेसिकात व . दोदा.- श्रवन कीरतन चितवन, सेवन बदन ध्यान, लघुता समना एकजना थर्थ-उपादेय स्वरूपने शानलवु, किरतन करवु चितवन करई. संवा करवी, वदन स्तुति करवी, ध्यान धरबु, तन्मयता करवी समाधि करवी, एकम सवैया इकतीसा- कोई अनुनवी जीव कहै मेरे धनुनीमे, लवन विनर जाने श्राप यापुको लापु करी थापुरिपे, उतपनि माग भुव धारा असराल हे, सारे विकसप मोसों न्यारे सरवथा मेरो निह सुनार यह विवहार चाल है, म तो शुक्ष चेतन बनत चिन मुशधारी, प्रहता हमाणे राथनुनवमा लदा नेदथकी कर्म जाल हवे निन्न दोसवा लागी भनेका थर्थ-जे थात्मानो यनुनय पायो तेजश्रनुनवी जीर एयु कहे के के (माज की कारकथात्माज करण कारक थात्माज थाधार कारकविरे याम ज कर्म कारकने जाणे थने थदी कोई पर्यायनी उत्पनि धन नाश ने, व्य भुपता पणे ठे, एत्रणेधारा बहीथसराल पणे चही रही तोपए ऐ धारा विकल्परूपले, थने मारेथी तो सर्व विक.प सर्वथा उदार ने कि पमा तो कही निश्रय नथी थने मारो तो चेतना स्वरूप निभवनाव ४६६ समयसारनाटक. माफक जे जेद उपजे, तेजेना चीद रतन प्रगटमान ,थने जेम चक्रवतिने न होय, ते तेना उखम साधयाना राज्याभिषेक समय होय त्यारे वत्र हाथाड़े चूरी ने, मुख पागल मगलीक पूरे तेम जेने सुधिरूप स्त्री रत्न है, है महा मोहरूप बजने चूरोने मोदना जतनने माटे मगलीक पूरे डे, एटले मगज कार्य को यने जे प्रत्यक्ष प्रमाणे करीने थर्थन ग्रहण करेचे, तया परोक्ष णे करीने पण अर्थने यहे, एवा जेना प्रमाणरुप भंग , तेज तेन सेना थई एम जाणवु, ए रोते ज्ञाता पुरुपे चक्रवर्तिनी देहधारी ठे, तेम उता पर झाता थतनके० थशरीरी जेबुले ॥३॥ पूर्व कही जे नवधा नक्ति तेनु हवे वर्णन करे -अथ नवधा भकि वर्णन नौधा नक्ति प्रमान ॥४॥ गु, ए नौधा के नव दवडे जाति प्रमाण थायठे ॥ ४ ॥ हवे जे ज्ञाता मोक्ष सन्मुख थयो तेनी थनुनर दशा कहे - थथथनुनवी वचन न करमको जाल है, एक रूप तिह काल है ॥ ५॥ . - समयसारनाटक. . ४ - कडं दुं तेणे करीने दुतो शुरू चेतना स्वरूपी j, धनंत चिन मुशा धारी के थन त झाननो धरवा वालो , एहवी महारी प्रजुता त्रणे कालने विपे एक रूपेठे। हवे चेतनानुज स्वरूप वतावे वे.- यथ चेतना वर्नन- सवैया इकतीसाः-निराकार चेतना कहावे दरसन गुन साकार चेतना राम ज्ञान गुण सार है : चेतना यवैत दोउ चेतन दरवमांहि, सामान विशेप सत्ताही विसतारहै ; कोउ कहै चेतना चिनह नाही यात्मामें, चेतनाके नास होत त्रि विध विकार है : सठनको नास सत्ता नास मूल वस्तु नास, तातें जीव दरवको चेतना थाधार है।। ६ ॥ दोहराः- चेतन लठन पातमा, बातम सत्ता मांहि; सत्ता परिमित वस्तु है, नेद तिहूमें नाहि ॥ ७ ॥ थर्थः-थात्मानो दर्शन गुण जे निराकार कहीये तश्ये तेतो निराकार चेत ना थई, बने जे घात्माने शुद्ध ज्ञान गुण सारनूत कहीये तश्ये तेतो साकार चे तना थई, विशेषताने लीयो रह्यो वे माटे साकार कहिये, एरीते निराकार थने साका रपणे दर्शन तथा ज्ञाननेविपे वैत नाव थयो, पण चेतनानेविपे तो श्रौत नाव ज रह्यो , धने चेतनागुण थकी चेतन इव्य , तेथी चेतन इव्यमां वे समाई गया. वली निराकार ने साकारपणुं सामान्य ने विशेपपणाथकी ठे, ते तो सामा न्यता धने विशेषता चेतना इव्यनी सत्तानो विस्तार ; कोई मूढमति वैशिपिक मुख दर्शन वाला कहे वे, के, थात्मानेविपे चेतन चिन्द नथी, चेतना लक्षण थो, तेने के, के, अरे मूढ, जो चेतन चिन्ह न कहिये तो चेतनानो नाश थवाधी विध विकार उपजशे, ते कया तो मन वचन ने कायाना विकार जाणवा; माटे कपनो नाश थवाथी वस्तुनी सत्तानो नाश थशे धने वस्तुनी सत्तानो नाश थवाथी रूप वस्तुनो पण नाश थशे, माटे जीवने जाणवानो तो एक बाधार चेतनानोजवे थात्मानुं चेतना लक्षण वे, सत्ता धर्मविना यात्मा उरे नही तेथोथात्मा त विपेज , अने पोतपोतानी सत्ता प्रमाणेज सर्व वस्तु , वस्तु इव्य विचारी त्यारे उत्पादादित्रणे वस्तुमा जेद कोई नथी ।। ७ ॥ हवे चेतना लक्षणहूँ शाश्वत तथा थविनाशीपएं दृढ करावेः- थथ चेतना थविनासी यह कथन:- ग तेईसाः-- ज्यों कलधौत सुनारकि संगति, नूपन नांउ कह सब कोई; के मिटी तिहिं हेतु वह फिरि यौटि तु कंचन होई; त्यों यह जीव यजीव यो वहु रूप नयो नहि दोई; चेतनता न गई कवहू तिहिं, कारन ब्रह्म . १ . जना सयोगथी एक कोडी शाडी सताणु लाख कुल कोडीमा बहुरूपे थयों, ब्रह्मज केवाय ने, जेनो विस्तार मोटो तेने ब्रह्म कहीये ॥ ॥ थात्मानी एहिज ईश्वर घटने थतर व्यापक रूप से, तेथी जे जे अवस्थामा व्यापले झाननेविपे पण बीजो कोश्नथीथने थज्ञाननेविपे पण वीजो कोश्नथी । ना उपर दृष्टांत कहेने-जेम कोई नट होय ते बहु वेप धरेने,ने तेते वेपनी करेते,त्यारे जगत तेने कुतुहल समजे,पण नट पोते पोताना किया जाना घरेला वेपथी पोते जुदोठे, एबु जाऐठे तेम घटनेविपे चेतन राजा रूपमा ते विनाव दशा धरीने रूप विशेप करेठे, पण ज्यारे सुदृष्टि खोनी जुए | पोतानु पद उनग्वे थने ६६ विचारनी दशाने पोते लेखामां गणे नही । थडिम्ब ठद - जाके चेतननाव चिदातम सोई है, थार नाव जा घरम មឌុច समयसारनाटक. कहावत सोई ॥ ७॥ देखु सखी यह थापु विराजत याकि दसा संब सोहै, एकमें एक अनेक अनेकमें, ६६ लिये उविधामहि दो है, श्रापु लखे थपनो पद, आपु विसारके आपुहिमोहै, व्यापक रूप यहै घट उत्तर म कौन अज्ञानुमें कोहे । ॥ ए ॥ ज्यों नट एक धरै बहु नेप कला तुक देखे, थापु लखै थपनी करतूति वहै नट निन्न विलोकत पेखे, त्यों नट चेतन राउ विनाउ दसा धरि रूप विसेखे, खोलि सुदृष्टि लखे अपनो उंद विचार दसा नहि लेखे, ॥ १० ॥ अर्थ- जेम कलपोत के सोनु तेने सोनी घडीने नूपण बनावेडे, पाटना सयोगथी लोको तेने नपण केहेवा लागेठे पण मूल वस्तु जे कचन ईजतु रा नथी, केमके, ज्यारे ते घाटने थग्नीमा गाली नाखे त्यारे । केवाय, तेम था जीव जे , ते अजीवरूप कर्म पुदगल इत्यादिक बीना पण विविध नथी थयो, केमके, चेतनता कई गई नथी, तेमाटे ते स्वरूपमा जुनूति ते सहि सखीने कहे, हे सखी, जो भा थापणो ईश्वर विरा" एश्वरनी दशा सर्व एनेज शोनेछे, एवं विसता बाजे काणे न शोने बड़े एकतामा जोईये तो एक रुप ठे, थने अपर सत्ताए देखीये तो थने ६६ दशामा देखीये एटले अज्ञान दशामा देखोयेथने ज्ञान दशामा विविध रूप , ते विविधपणु कहे - क्यारे तो पोतानु पद जप ने सनारीने जुए, थने पारक तो पोताने विसरीने पोते मोहमा पढे हवे चेतन नटनी सयजी चेतना एकाडे, को-थ चेतनाउपादय यह 7 1 समयसारनाटक. ४६ए जे कोइ है ; यो चिनमंमित जाव, उपादे जानते ; त्याग जोग परजाव पराये मानते॥ : अर्थः-जेनेविपे चेतन नाव ठे, तेने चिटात्मा अथवाचिप कहिये ,अने ए चेतनानावथी बीजो नाव जे धारेते, तेतो कोई बीजो ठे, एथी चेतना मंमित जे लावले तेतो उपादेय रूप जाणवो, अर्थात् पोतानो करी जाणवो, धने चेतनाना वथी जे परनायवे, ते सघलो त्यागवा योग्यवे ने तेने पारको करीमानी यो॥११॥ , हवे जे सम्यक दृष्टि चेतना उपादेय राखीने मोद मार्गना साधक थया तेनी अवस्था कहे-थथ सम्यकदृष्टि मोठ मारगको साधक कथनः- सर्वया इकतीसाः- जिन्दके सुमति जागी नोगों नये विरागी, परसंग त्यागी पुस्प विनुवनमें; रागादिक नावनिसों जिन्हकी रहनि न्यारी, कबहू मगन व्है न रहै धाम धनमें ; जे सटीव थापकों विचारै सरवंग सुद्ध, जिन्हके विकल ता न व्याप कब मनमें; तेई मोक्ष मारगके साधक कहावं जीव, नावै रहो मंदि रमें नावे रहो बनमें. ॥ १२ ॥ अर्थ:- जेना हश्यामां सुबुद्धि जागी, धने विषय जोगथी जे वैरागी थया, अने रागदेषादिक परनाव वे, तेनो सेवना संग के त्रण लोकनेविपे तेनो त्यागी जे पुरुष ठे, थने जे रागपादिक नाव पदार्थ ते थकी जेनी रेहेणी न्यारीने, तेथी धाम केण्घर थने धन तेनेविपे मग्न थईन रहे, घने जे सदा निश्चय दृष्टीए देखीने आत्माने सर्वांग शुद्ध विचारे , तेथी जेना मननेविपे विकलता नही व्यापे, एवी दशा लईने जे जीव रह्या वे, तेज जीव मोक्ष मार्गना साधक केहेवाय, पठी ते (नावे तो मंदिरमा रहे, ने नावे तो वनमा रहे, पण तेनी दशा सर्व स्थानके एकज होय . ॥१२॥ हवे मोदगामी जीव विचक्षण पुरुपनी दशा कहे:-अथ विचरणटशा वर्णन:- सर्वया तेईसा-- चेतन मंमित धंग थखमित शुद्ध पवित्र पटारथ मेरो; राग विरोध विमोह दशा समुफे भ्रम नाटिक पुग्गल केरो; नोग सॅयोग वियोग व्यथा यविलोकि कहै यह कमज रो; है जिन्दको अनुनी इहि जांति सदा तिन्हिकों परमारथ नेरो.॥१३॥ थर्यः-जे परमात्मानेवि दृष्टि देने एवो विचार करे के, जे मारो पदार्थ ठे, चेतन मंमित , भने बसमित ने, अवेद्य हे.अनेद्य , अने शुध, पवित्र , यने एथी जुटी जे राग ऐपने मोहनी दशा थई रही, तेने तो घमरूप मिथ्याजाल पुदगल, नाटक करी समजे ,थने पंचेंशियना नोगसंयोग ने वियोग एवी वाहा ते दोहरा-उपजे विनसे पिर रहे, यह तो वस्तु वखान, जो मरजादा वस्तुनी मरयादाजे परिमाण ते धर्म ने सत्ता कहीये,एअनुनय प्रमाण माझा थर्थ - उत्पत्तिवत, विनाशवत, स्थिरतावत एतो वस्तुनु परवाण , धने सवैया इकतीसा-लोकालोक मान एक सत्ता है थाकाम दर्व, धर्म हवं लोक परवान एक सत्ता है यधर्म दर्व, कानो यसव सत्ता थगनिति है, पुदगल शुझ परवानकी यनत सना, जीरी सत्ता पारी न्यारी थिति है, को सत्ता कासोन मिनै एकमेक हाई को थार्थ-थाफाश इव्यनी मर्यादा लोकालोक लगे एक नयी धागा एक सत्ता ठे, थने धान्तिकाय इव्य लोकप्रमाण एक रूपने यी वर्म एक सनावे, थने थथमास्तिकाय इव्य पालक प्रमाण एक रूपरनपी इश्यनी एक सनाने,थने कानना इच्यना थने ते सोसकाश प्रदा' चमण्यात, तेथी काल थपुनी यसरख्यात सत्ता ए रहनु दिगवर ४०० समयसारनाटक. स्माने विपे व्यथा अवलोकी ने एवं कहे के, एतो कर्मनो पेरो ने, कर्मनो अर एवो धनुनव जेने नित्य रहे, तेने परमार्थरूप मोक्ष ते सदा नेरो के नजीकचे। हवे जे मोदथी दूर ते चोर, ने मोक्ष्यी निकट ते माहुकार एवु कहे। अब चोर तथा साहुकार वर्णन दोहरा - जो पुमान परधन दरै, सो थपराधी यज्ञ, जो थपनो धन सो धनपति घरमा ॥ १४॥ परकी सगति जो रचे, व बडाये सोइ, जो तामें मगन, सहज मुक्त सो हो ॥ १५ ॥ थर्थ-जे पुमान के पुरुप परधनने हरे, ते थपराधी जीव था के कहीये, ने जे पोतानाज धननो व्यवहार राखे, ते धनपती कहिये, धर्मत है। मने जाणनार कहियें ॥१॥ तेम जे परवस्तुनी सगतीए राचे ते चोर ने तेज पोताना बंधने वधार, अन पोताना सलामा सदाकात मगन रहे मुक्तरुप थाय ॥ १५ ॥ हवे वस्तु कोने कहिये थने सत्ता कोने कहिये ते वतावेवे - सो सत्ता परवान ॥ १६ ॥ हवे केवा केवा व्यनी केयी केयी सना ले ते कहे - थथ सत्ता व्यवस्था वर्नन सत्ता लोक परिमिति है हाय यों अनादिहीकी थिति है ॥ १३॥ . , 4 समयसारनाटक. , ४७१ अने योग शास्त्रमा पण कडे वे, अने लोकविपे पुनजरूपी गुम परमाणुनी 'ण अनंत सत्ताले, अने लोकवि जीव अनंत , तेथी जीवनी पण अनंत सत्ता तेथीज जीवाजीवनी जुदी जुदी देवावगाहना , जे इव्यनी जे सत्ता होय बीजी कोई व्यनी सत्ता साथे मले नही, जो एकमेक थई जाय तो सर्व सत्ता सहाय पणे वर्ने, माटे एकमेकन थाय एवी अनादि कालनी स्थिति ॥१७॥ दुवे चेतन इव्यनी सत्तानुं वर्णन करे.- अथ चेतन सत्ता वर्ननं:- सवैया इकतीसा:- ए ठहो इव्य इन्हहीको हे जगतजाल, तामें पांच जड - चेतन सुजान है ; काढुकी अनंत सत्ता कादुसों न मिले कोई, एक एक सत्ता यनंत गुन गान है: एक एक सत्तामें अनंत परजाय फिरे, एकमें अनेक शह । परवान है; यहे स्याटवाट यहै संतनिकी मरजाद, यहे सुरख पोप यहै को निदान है. ॥ १७॥ थ:- ए गए इव्ये करी एथीज जगतजाल वनेंठे, ते नेविपे पांच इव्य ठे, ने एक चेतनरूपी इव्य ते ते जाणनार वे, अंही पुदगलनी थनंत हो, थने जीवनी अनंत सत्ता कही, एवा अनंतपणे करीने कोनी सत्ता ये मले नही, एटले जुदी जुदी अनंत सत्ता , धने प्रत्येक सत्तामा थनंत न वे, घने एक एक सत्तामा थनंत पर्याय अनंत यवस्था नेटफिरे वे एकमां अनेक का ते एरिते , स्यामाद मतमा ए वात प्रमाण वे, कपना वचननी पण एज मरियादा , तथा एज मत सुरखनुं पोपण क ने मोदनुं निदान एटले मूल कारण वे. ॥ १७ ॥ चन थकी जे वस्तुनो धर्म ग्रह्यो जाय तेज सत्ताधर्म कहीये तेथी धनी सत्ता कहे.-थथ एक जीव इव्यसत्ता वर्ननः- तीसाः-साधि दधि मंथनि थराधि रसपंथनिमें, जहां तहां ग्रंथ सोर है; ज्ञान नानु सत्नामें सुधा निधान सत्ताहीमें सत्ताकी उर उख नोर है; सत्ताको सरुप मोख सत्ता नून यह दोष, सत्नाके उ चहू थोर है ; सत्ताकी समाधिमें विराजि रहे सोई सोई चोर है. ॥ १५ ॥ विपे ठती देखाय,जेम दहीना मंथनमां घीनी सत्ता सारिये.जे थी - तो तेथी वन्नु नोपजे ने,माटे रत मार्गमा सनाविना नि नयी तेने सत्ता महिये,गासमा ज्यां त्यां ग्रंथोनविपे सत्तानोजलो साहुः सत्तातें क . . न थर्थ-जेमा लौकिक वेदवु नथी, घने जेमा स्थापनानो उमेद नथी. वय मोद नथी, जेमा प्रभुताने दासपणु नथी, जेमा थाकाश थने धरती मां विप नरनी एटले चालवु हालवु नथी, जेमां कोई थाश्रम व्यवहार था वर्ण व्यवहार नथी, जे कोनी शरण रूप नथी एवी शुभ सत्तानी हवे मिथ्यादृष्टिने चोर थने अपराधी कही देखडावे- दोहरा-जाके घट समता नही ममता मगन सदीय रमता राम रकॉ माने थातमा, करे करमको वध ॥ २२ ॥ फूठी करनी थाचर, एई। थर्थ-जेने केवल जाणपणु जे समता ने समाधि ते नथी यन, वन्तुनी ममतापिपे मगन थई रहे, ने निज घट यथवा स्वरूपनरिपे रमी । यो जे यात्मराम तेने जेणे जाण्यो नथी तेनेज अपराधी चोर जीप वहीवार ४३ समयसारनाटक. शब्दने ज्ञान रूपीनानुनो मृदय जीवनी सनामा निपजे,वली सत्तामाज पामिये, निधान पण सनामांज पामिये जे सत्ता पुरनि के सध्या रूपडे, धने जे सत्तानी मुख्यता तेज नोर के० प्रनात रूपने, नु जे स्वरूप ने तेज मोह , अने सत्ताने चली जवु एज दोषरूप ले . न करवाथी चोहोनर के चारे तरफ धामधुम नीपजे,जे पोतानी. तेमा विराजमान थई रहे तेने साकार कहिये, थने जे पोतानी सत्ताथी अन्यनी सत्ताने ग्रहे तेने चोर कहीये ॥ १७ ॥ हवे सत्तानी समाधिनु वर्णन करते -श्रथ समाधि वर्नन - सवैया इकतीसा - जामे लोक वेद नाहि थापना उठेद नाहि पाप, हि किया नाहि करनी, जामे रागदोप नाहि जामें वध मोष नाहि, न सन थाकास नाहि धरनी, जामे कुनरीत नाहि जामें हारजीत शिख नाहि विप नाहि नरनी थाश्रम वरन नाहि काहुकी सरनि न ६ सत्ताकी समाधि नूमि वरनी ॥ २० ॥ पाप पुन्यनो खेद नथी, जेमा को किया करणी नथी, जेमी राग देव जेमा कुलनी रीत नथी, जेमा हारने जात नथी, जेमा गुरु थने माविरूप वरणवीले एटले स्वरूपनी शुद्ध समाधिने पिपेज शुरू थथ मिय्यादृष्टि अपराधि यह कथन ही, सो थपराधी जीव ॥ २१ ॥ थास, फूली नगती हिय धरे, फूठो प्रभुको दास ॥ २३ ॥ . . - अपराधी मिथ्यामती, निरर्द कि ७ .

, रनाटक. . - अर्थ:- जे पर वग्न लेय ते अपगधी ने तेज मिय्यामति. तेज निरदय नेते रानो अंधकदिय. एदले जे पररुप पुगतने घात्मा माने ते कर्मनो बंध करवेश जांदांसुधी पोतानी वस्तुने न जाणे त्यांसुधी तो जे किया याचरे ते सर्वत्र ने. अने तने जे मोद खनी धागा वे. ते सर्व फूनी . पोताना प्रनु जा । विनानो जनक्ति हियामां धरे ले. ते सर्व कुटी जाणवी, धने परमेश्वरने । रज्यविना दासपणुं गरखवू तं पण सरg फूटुं ॥ २३ ॥ हवे मृट लोफना फूठपणानी व्यवस्था कहे ते फूठपणानी व्यवस्था कहे वे - अथ मूढ व्यवस्था यथाः- मईया कनीनाः- माटी नूमी लजकी सु संपदा वखाने निज. कर्ममें अमृत गने शानमें जहर है. अपनोन रुप गहे घोरहीसोंथापु कहै, ताता तो समाधि जाक थसाता कहर है: कोपको रुपान लिये मान महपान किये, मायाकीम रिहिवे लोनकी लहर है,याही नांति चेतन धचेतनकी संगतितों, साचतों विमु नयो में वदर है ॥ २४ ॥ तीन काल अतीत अनागत वरतमान, जगमें मित प्रवाहको महर है; तानों कह यह मेरो दिन यह मेरी घरी, यह मेरोई लोई मेगेई पहर है: पेहको खजानो जोरे तासों कहे मेरो गेह, जहां वसे तातों हे मरो सहर है : याहि नाति चेतन बचेतनकी संगतिसों, साचतों विमुख यो उमें बहर दे ॥ २५ ॥ अर्य:- नात धातु जे ते पहाटनी धरतीनी माटी जेवी , तेने संपत्ति करीव बाणे ते. पानानी शुरु क्रियामां अमृत जाणे ठे, अने ज्ञानमां फेर समजे से, टले क्रिया यकी मिडिजाणे, ने ज्ञान थकी नही जाणे. जे पोतातुं चिदानंद पले. तेने ग्रह नही, पण गरीराटिक जे तेने यात्मारूप जाणेठे. अने जे ना वंदनीय उपजे . तेने तो समाधि करी जाणे, घसाता वेदनीयने कहर उपश्व माने ठे, कोपर्नु रुपान जे खड्ग ते लईने रहे , मान ने अहंकार नट पीन रहने, यानेविपे मायानो मरोड राखेचे, लोननी फेर खाया करे वीरीते अचेतननी संगती थकी एटले जड पुकतनी संगतीयी साच थकी थयो, न कृतमा बहर हे के तत्पर थर्ड रह्यो, ॥२४॥ अर्थ स्पष्ट. २५ यक् दृष्टि सादुकारनी व्यवस्था कहे वे-यथ सम्यक्दृष्टि व्यवस्थाकयनः- ग.- जिन्हके मिय्या मति नही, ज्ञान कला वटमाहि; परचे यातम राम पराधी नाहि ।। २६॥

| पढे है ॥२७॥ जिन्हकी चिहुटी चिमटानी गुन चूनवेको कुरुयाके सुनवेश
केसे गढे है, जिन्हिके सगति जगि थलव थराधिवेका परम समापिसारित
थर्थ-जेना हैयामा धर्म व्यानरूप पावक केअग्नि प्रगट ययो, यो सन
ह यने विन्नम एत्रणे वृदरूपते, ते वढे के० बनी गया ने जेनी विता
झानदृष्टि प्रागत उदयरुप कुतरो नसीने नागी जाय ने अन ज्ञानरूपी।
उपर चढी रहेठे, तेथी कर्मरूप रज लागतीनथी बीजानु न अगम था,
जेनी समजना तरगमती रह्या ले एवा यागम के०जन पानीमा निपुण्या
ने अध्यात्म ज्ञानमा पूर्ण थयो , तेनेज सम्यस्टष्टि काहिर परमायने ।
पुनित के पवित्र रूप थयो नागवो यात्मागमना यनुनर ग्ममा थाई बात
न्ये, तेम पारका गुण चुटी लेवाने जेनी एवी चपटीने अने मिया मानना।
मटी के हाथनी चिमटी अथवा चिपीयो तेरडे कई नानी पस्तुन परमान
बने कानने वध करी राखेने जेनु चित्त सरन ने निक्पटीन न निराहा
स्वरूपने साधवाने जेनी सुमति जागीने,श्रयागी अवस्थामा उनी पान
थई ठे,तेने सापवाने जेनो मन वध्यो वे तेज सम्यर नष्ट परमायना ना
कान मढे है, जिन्हको सरल चित कोमन वचन वाने मोम दृष्टिनियमा
न के पवित्र रूपथ रह्याठे, ने तेज यात्मारामनाअनुना रममा
{ ४
समयसारनाटक
थर्थ-जेनी मिथ्यामति नाश पामीने घटनेविपे ज्ञान कना प्रग
थात्मारामने उलख्यो , ते लोक अपराधी नथी सादुकार ने ॥ २६ ॥
हवे ज्ञानीनी व्यवस्था कहे ते -श्रथ ज्ञानी यथा
। सवैया इकतीसा - जिन्हके परम यान पावक प्रगट नयो, समे मोह
विरप तीन्यो वढे है , जिन्हकी चितानि यागे नढे म्यान नृमि नागे नागेन
झान गज चढे है, जिन्हिकी समुकिफी तग अग अगममें श्रागममें निजून
तममें कढे हे, तेई परमारथी पुनित नर थातो जाम राम रम गाठ करेस
-
वढे हैं, तेई परमारथी पुनित नर बातों जाम, राम राम गाठ करे यहेपाड पई
त
.
०
दृट मन थई एज पाठ पढे वे ॥ २० ॥

समयमारनाटक. वे समाथिबाप हं- अय नमाधि वर्णन:- यहाः- गन ननिधनगनन्न.कन सुनना बर: जब नमाधिप नी.नव विग नहि कांडला नंदन वंदन वृनि कन्न.अवन चितवन जा टन पवादन दिनन. बहुविध क्रिया बजार.॥30॥ शुभानन अनुनी जब नाका निहि नाहिः करन कम नारनविज्ञ. गिव मान्न शिवमाहि ॥ ३१ ॥ मय-आत्नागनरनिक करत नाना .अनं रान के निर्बुने नरकवांन नानजवान निकनन्न व.पवारं एनविनमाधि प्र टचाय त्या वे यj नवीन्, त्यतां गनिन ने ग्न ए वे एकज- Farनक निलयायान्नो एती जिया करने क.नंदन कन्या पाबंदन प्रधान का.मृती के० जात नातना रणनीती को एनज गुपनांनती एवं चितवन का एनांज जाप ज. नण नावं पदवी, एवीनीने नलिन उदत्यनां जात जानना किया जाप । ३०॥ पूर्व ही जे जिया नेनं जगतां करनां जहां ऋक्ष यात्मानो उनुनव शयन ट शुजाचार बुटीजाय. कन कल्याण ने अयोगी दशानां के, कर्म के कर्म समाज र एट तंना मार्गनजि रहे. गुन नर्म पतंजार मार्गमा जे न शिव मार्ग में शिवमा एक क्यान्मान विज . ॥ ३ ॥ चांग:-हि विध वन्न वन्य जैनी. कदी जिनिंद कही में नैनी; नंगति मुनि गजा, निन्दिको अनाचान्नों काजा. ॥ ३० ॥ जहां प्रसाद नहिं व्याप: नहाँ अवलंब धारना आपं. ना नान्न प्रमाद उनपानी, प्रगट नागनं बानी. ॥ ३ ॥ प्रमाद नंयुक्त गुनां; नहि मिनिह गिरकी नाद नजिक होती : निन्दिल ना नि म नाही. ॥ ४ ॥ है प्रमाद जब पनवीन पानी नवनां:जब प्रमानी ना नान थान यनुनी पन्नान. ॥ ५ ॥ वर्ष- एगेन श्री जिन देव वनुनी व्यरत्यय नहीं . नवीन शाहा पची में पाठ महीने मुगिज प्रनाद दद्यानां नं नांधनाचार इन किया जानवन जोगनीज सार्य निकाय !: !! जमुनिगजने जान्नाना अधिक वीपीमने जीव गट हा न व्यारे नातुंडाग्न पनि जि.नप्रमाइतो उनपाती, नंगटनेम तो बान रग्ना, अनंतरापनी काना..! , । . । . चेतना मुक्त ठे, ते मुनीश्वर थोडा कालमा कर्मथी मुक्त थाय रे ॥३०॥ | मादी यने थालशी तेने थहबुद्धिथी थनिमानी कहिये ने जे किस हवे थनिमानी तथा झानीनी यवस्था उपर दृष्टांत थापेरे- रुप सवे ताफी लघु, उतर मिले उनको नमनग्ग, तसे थनिमानी उततगन. जीरका लघुपद दग्ग,थनिमानीकों कहे तुठ सब, ज्ञान जगे समतारसनगा यर्थ-जेम काई माणस पहाड उपर घडपो होय तेने जपरक तनाटा जुए, थने पठी पहाड उपर चहेतो हेठे उतरी तशाटी पानान मले त्यो (जीपने नाना जुए, तुम जाणे, यने वीजा पुरुषोते थनिमानी पुरुश्न तुम घम नाना पणानो दूर थाय, तेम थनिमानी पुरुप उची गरदन गरसनारा, पक्ष समयसारनाटक. गुसाई देशी नापानो शब्द वे, एनो थर्थ मुनिराज थाय वे, जे मुनिरान | सयुक्त , ते तो गिडफ के० दडानी रोते बसे , ने पडे है, परस मे नही थने जे प्रमाद बोडीने अप्रमादपणे चमेने उना रहे थे, तेने टीनजीक मोठे ॥ ३५ ॥ जहां सुधी घटमा प्रमाद चे, त्यांची ते न , थने ज्यारे थात्मानी शक्ती जागे ठे, त्यारे प्रमादनी प्रचंता नाश स्यारे तो पोताना प्रधान अनुनयनो प्रकाश थाय रे ॥ ३५ ॥ दोहरा-ता कारन जग पथ इत, उत शिवमारग जोर, परमादी थपरमाद सिव थोर ॥ ३६॥ जे परमादी थालसी, जिनके विकलप नूरि; ५ विज थनुनौविपे, तिन्हिको सिवपथ दरि ॥३०॥ जे अविकजपी थनुननी चेतना युक्त, ते मुनिवर लघु कालमे, दोहि करमसों मुक्त ॥ ३० ॥ जे थालसी, ते थनिमानी जीव, जे अविकलापी अनुभवी, ते समरसी ॥ थर्थ - तेमाटे जगतनो मार्ग प्रमादानी तरफ, थने थप्रमादीनी च मार्ग , केमके, जे प्रमादी होय ते जगतने नुए थने थप्रमादी मुक्ती ए ॥ ३६ ॥ जे प्रमादी , ते थालशी ने तेने नूरि के० घणा विकल्प , थने पोताना अनुभवमा तेने शिथिलपणुं रहे , थने तेने मुक्ति सरूपाचरण दूर ने न विपविना धनुनमा बसे से, ने त पोताना यनुनवमा , तेने तो सदाय समरसी कहिये ।। ३ ।। थथ थनिमानी तथा ज्ञानी व्यवस्था कथन कवित्त उद् -जैसे पुरुष लग्ये पहार बाढ,नूचर पुरुष ताहि दाघु जग्ग, माणतो न्हानोरे एमजुए, थने तलोटी बाजामाणसने पहाड उपर - - १

समयसारनाटक.
४
-
म भरपरस विचारमा विपमता रहे वे. ते ज्यारे ज्ञान जागे त्यारे बेउना मनमा
अपमता मटीने तमपणुं श्रावी जाय ॥ ४ ॥
हवे एकला अनिमानीनी व्यवस्था कहे :- अथ धनिमानी यथा.-
• संवैया इकतीमा:- करमके नागे समुऊन गुनको मरम. परम यनीति अधरम
ति गहें है : होहि न नरम चितगरम घरमहुते, चरमकी दृष्टिमा चरम चुली रहै है;
प्रासन न खोले मुख वचन न बोले सिर नाएहू न मोले मानो पाथरके चहे है;
खनके हाउ नव पंथक वटा ऐन, मायाक खटाउ अनिमानी जीव कहे है.४१
। अर्थ-जे करम बंधयी अती नारीने. हेपने गुण जाणे, पण गुणनो मर्म जा
गतो नथी. अने परमअन्याय तथा अधर्मनी रीत ग्रही राखेने. चित्तनेवि नरमा
तथा दया परिणाम नथी. वेपनो यती धर्म ताप वे, तेथी गरम रहने, ज्ञान
यो नयी थने चर्मरूप दृष्टीबड़े नरममां नूट्यो फरे . कोई विकट घासन बांधे
ने खोले नही, ने मोडेथी वचन बोले नही, मौन व्रती रहे, तेने ज्ञानी महा पु
व जाणीने कोई माथु नमावे, तो तेनो सत्कार ने अंग चेष्टा पण न करे, जाणि
पथर थवानीज वा करतो होय नीवली जेम वालकने मराववाने हाउ कहीये
ये तेम लोकोने मराववाने वेप धरी हाउ वनीने बेसे, अने नव चमना मा
मां वटाउना सरखो चाले, एरीते माया जालना वाटनारा अनिमानी जीवने
जखीये ॥४१॥
-
.
हवे ज्ञानी जीवनी व्यवस्था कहे वेः-अथ ज्ञानी यथा.-
संवया इकतीसा:-धीरके धेरैया नवनीरके तरैया नवजीरके हरैया वर वीर
न्यो उमहे हैं; मारके मरया सुवीचारके करैया सुख ढारके ढरैया गुनसोसों लह
लहे हैं; रूपके मिया सवनके समुया सवहाके लघुनया सबके कुबोल सहेहैं
वामके वमैया दुखदामके टमैया ऐसे रामके रमैया नर ज्ञानी जीव कहे है ॥ २॥
थर्यः-धीरजने धरनार, संसार सागरने तरनार, नवनीडने हरनार, मोटा सूर
बोरनी परे पोताने साह्य आपवाने उमंगी रह्यावे, कंदर्पने मारनार, जला विचारनुं
करनार, मुख समाधिना हानामा ढननार, यात्माना गुणनो लव एटले यंस तेमां
हलिहि रह्या , यात्मरूपना रीमनार,सर्व नयना सारनो रस समझनार, निर
कारी पणे सर्वना नाना नाई थई रह्यावे. कमावंतपणे सर्वना उष्ट वचन सहेवे.
नाम के स्त्रीने वमैया के वोडनार, कु.खनो परंपराना दमनार, एवा यात्मारां
भने विपे रमनारा मनुष्यने ज्ञानी जीव कहोये ॥ ११ ॥

A निर्विकार निफिटप थनुनय पद कहीये, एटले थनुनवमा विक पनी । जहां परियहनो त्याग , थने त्रणे जोग स्थिर ठे, त्या नवीन कर्मना ख के० प्रारन वे ॥४४॥ वली जहा पुर्वे जे कर्मवय, तेनो उदय नपी. जहां पुन्य पापना दनो पिचार नथी, यने जाहा साधुना सतावीम णे नारपणे निर्मल धाराये वही रह्या , वली जाहा बोधविधान के कार नात नातना विस्तारमा वे ॥४५॥ जेनी एवी सहज अवस्था थई हृदयमा यात्म थोजखानी उविधा केम रहे। यने एज अवस्थामा जे. ज रूपक श्रेणी चढी उर्व मुग्व धाये तेतो केवनी नगरत जाणवा ।। श्रये - ए गैते करी श्रष्ट कर्मरूप बनने वालीने पूर्ण थात्मारूपमा जे |यने तेना महिमाने जे सत् पुरुप होय तेहिज जुएने, एटले सन्य पणे हो मोर पदायनी उत्पत्तिनो क्रम कहे-श्रथ माक्ष उत्पनि बनन- महज निम गुरुपद शशि, केरन रुप प्रकासि,नासि सुपरामि धरम धुन,, त्यागि गतनाव परम दुव, हावारयनन्य मनुता धान मागर भयो, यश्चित थपमथननय यरवय, जोर दरव जगमहि जरा वर्ष-स्तानो यंकर प्रगट यता मिथ्यात मृतथीनाश पाम्पु, तर मुंजन समयसारनाटक. हवे शुक्षात्मना यनुनवनी प्रशंसा करेठे -यय क्षात्म चोपाई -जे समफिती जीप समचेती, तिन्हिको कथा कहाँ तुमसेती, प्रमाद क्रिया नहि कोई, निर्विकल्प अनुनी पद सोई ॥४३॥ परग्रिह त्यास थिर तीनो, करम वा नहि होइ नवीनो, जहा न राग दोप रत माहे, पमारग सुख सोहे ॥ ४ ॥ प्रव बंध उदे नहि व्यापे, जहां न नेद पापे, दरव नाव गुन निर्मल धारा, बोधभियान विविध विस्तारा ॥४५ न्हिके सहज अवस्था ऐसी, तिन्हिके हिरदे सुविधा केसी, जे मुनिश्पिक | चढि धाये, ते केवनि नगवान कहाये ॥E दोहरा - इहिविधि जे . थष्ट करम वनदाहि, तिन्हिकी महिमा जो लखे, नमे वनारसि ताहि । थर्थ-जे समकिती जीव ले ते समचेती के वीतरागपणे समताइन हो नय प्राणी, तेनी कथा दु तमने कदुनु जाहा कोई प्रमादनी क्रिया थतो, वजी जहा जीपने राग प स मोह नथा, तेज प्रगटपणे मोह तेने पणारसीदास नमस्कार करे ॥४॥ उप्पय उद -नयो गुद अपूर, गयो मिथ्यात् मर नगि, क्रमाम . . 1 नचिनियाट, 4 समयसारनाटक. - जवालीया पखवाडीयामां चंमा क्रमे क्रमे उद्योतवंत थायडे, एरीते यात्म क्रमे उद्योत थतां केवल ज्ञान रूपनो प्रकाश थाय, अने यात्मानो नि धर्म सुख समुह ते नासे, ते पनी आयुष्य कर्मनी स्थिती पूर्ण करीने यन तिनो नाव बोडीने परमात्मारूपें थाय, एरीते अनन्य प्रनुता एटले सर्व ता धारण करे, कोनी पेठे तो जेम पापीनी बुंद धुंद एकठी मली समुह म यात्मर गुणना अंस कमे क्रमे प्रगट करतो पूर्ण थयो, ते पठी अविच विंम थनय ने यक्ष्य एवं जीव इव्य जगतनेविपे सटा जयवत थायठे.॥४ । दवे घट कर्मनो नाश थयेथी जे आत्माना सहज पाठ गुण प्रगट थायः कहेते-अथ अष्ट कर्म नाशतें अष्ट गुन प्रकाश वर्ननं.- सर्वया इकतीसाः- ज्ञानावरनीके गये जानिये जु है सु सब, इंसनावरन ते सब देखिये : वेदनी करमके गयेते निराबाध रस, मोहनीफे गये गुम च विसे खिये; आउ कर्म गये अवगाहन थटल होइ. नाम कर्म गयेते अमूरती पेखिये, अगुरुलअघुरूप होई गोत कर्म गये,अंतराय गयेते धनंत वल लेखियें. ए यर्थ.-झानावरणीय कर्म नाश यता लोकालोकमांजे वस्तु वे, ते सर्व जणाय, एटले, चल ज्ञान प्रकाश थाय,धने दर्शनावरणीय कर्मनो क्ष्य यवायी लोकालोकना नाव सामान्यपणे जोईये, एटले केवल दर्शनगुण प्रगट थाय,अने वेदनीय कर्मना क्य निरावाध रस उपजे एटले यात्मा बाधपणाथी मुक्त थाय, ते वाथपणे थनं उखरुप गुण उपजे, वली मोहनीय कर्मनो नाग थयेथी विशेषपणे गुरु चारित्र ...याय, एटले यथारख्यात चारित्र स्पष्ट गुण होय, घायु कर्मनाश थयेयी श्रव पहनानी सादि अनंत स्थिति याय, (थायुकर्मगते निश्चला स्थिनिर्नवति) नाम कर्म नाम थयेथा अमूनिकपणुं जीव गुरु स्वरुप उपजे, गोत्र कर्मनो क्ष्य थयेथी गुस्जघु गुण उपजे, जेथा जीवमा लघुपणु तथा गुरुपषु न होय. थने अंतराय मिनो नाश थयेथीथनंत वल उपजे. एटले धनंत वीर्यपणानो गुण उपजे . ए व गुण उपजे. ॥४॥ इति श्री नाटक समयसारनो बालबोधरूप नवमो मोह हार समातः दोहरा.- इति भि नाटिक ग्रथमें, कहो मोह घधिकार; अब वग्नों संप्टेपनों, रव विशुमीक्षार.॥५०॥ . me- . A | पंमितनो प्यारो एटले तत्व ज्ञानीने वनन, मोदमार्गमा दुशीयार के न, पुजजिक धर्मथो जुदो रेनार, मतिश्रुत प्रमुख उपयोगनु थजबाज जेना. एटले बेरागी, मन वचन ने कायाना योगनीममता नही रखनार माटे ज्ञानी | ज्ञानावरणीप्रमुख कर्मनोक पण नथी,थने इख सुरखनानोगनो ना ! ॥५॥गपिना किया करवी, यने घटपिमा नोगनी रुची नही रामवी, मुक्तिनो साधक पुरुष सिम समान कह्यो, थने ते कर्ता तथा नोका नयी कवित्तद - ज्या हिय थध विकल मिथ्यात धर मृपा सकन सिना हवे यहयुक्षि थकी कर्त्तापपु थाय ते कहेठे-थथ थहंदि वर्ननं - रव चारित कर, करनी करि करतार कहावत, वलित मुक्ति तथापि | मिजे नहि कोक ॥६० ॥ दोहरा- निजनिज नाम किया महित, यर्प.- जेम कोइ हदय थरपुरुष स्किल मिथ्याधारीने हयामा । त समयसारनाटक टले वस्तुनो स्वनाव विचारीने परनावने त्यागीने पोताना सहज बे, तेथी सुखी दुखी इत्यादि विकल्पविना कर्म सयोगरूप उपाधिदिना. स्माने थाराधीने ज्ञान दर्शन चारित्ररूप जोगनी जुगति साधी समाधि हज स्वरूपमा समायठे ॥ ५६ ॥ हवे थनोक्ता जीवनी यवस्थानु वर्णन करे -अथ जीव अनोक्ता सवैया इकतीसा - चिनमुशधारी ध्रुव धर्म अधिकारी युन, रतन हारी कर्म रोगको, प्यारो पमितनिको दुस्यारो मोख मारगमें न्यारो : जियारो उपयोगको, जाने निजपर तत्त रहे जगमें विरत गहे न ममत काय जोगको, ता कारन ज्ञानी ज्ञानावरनादि करमको, करता न न होइ नोगको ॥ ५ ॥ दोहरा - निरनिलाप करनी करे, जोग माहि तातें साधक सिम सम, करता जुगता नांहि ॥ ५॥ अर्थ - चेतना चिन्हनो धरनार, निश्चल स्वनाव ज्ञातापर तेनों झानादिक गुणरूप रत्नना नमारनो नमारी ने, कर्मरूप रोगनो विनाश मां थयु, पोताना थने परका सर्व तत्वनो जाणनार, जगतमा पत, गहि एक्त पठ यातमको, करता मानि यधोमुख धावत, जोन्दा, पुद्गल करम थचेतन चीन्हा, वासी एक खेतके दाऊ, थापि न कोर, करता पुदगल करमको, जो कहाँमा होः ॥ ६१ त्यानि - "

समयसारनाटक.
१३
जावे, ते सर्व फूठा वे ते क्रियावादीनो एकांत पद यहीने यात्माने कर्ता मानीने
अधोमुख के नीची गतीने पकडी रह्योछे, एवो जे जिनमती ते नाव चारित्र
बिना अने व्य चारित्रयुक्त करणी करेठे, ने किया करण एटले गुन क्रियानो
हा पोते केहेवायठे, ते मुक्तिने वांद तोपण मूढमतिवे, नवनो पार समकित
विना पामतो नथी. ॥ ५५ ॥ अने जीवनो अंक के चिन्द चेतना जाणवी
प्रने पुगत तथा कर्म ए वेलने जड जाणवा. चेतन धने अचेतन वे एक क्षेत्रा
गाही एटले एक क्षेत्रवासी , तथापि कोई कोईथी मले एवा नथी. ॥६॥
ने पदार्थ ते पोतपोताना नावनी क्रिया सहित रहे , जेमां व्यापी रहे ते
अन्तुने व्याप्य कहीये अने व्यापी रहेनार पदार्थने व्यापक कहीये तेथी पुजत व्या
त्यमा जीवनुं व्यापकपणुं नथी, माटे पुग्लीक कर्मनो का जीव न्याथी थाय
पर्यात् न ज थाय. ॥ ६१ ॥
हवे व्यवहारमा जे रीते जीवनुं कपिणुं नरेने ते जाणवेनेथथ कर्ता कथनः-
सवैया इकतीताः-जीव थरु पुशन करम रहे एक खेत, जद्यपि तथापि सत्ता
गरी न्यारी कही है; सठन सरूप गुन परजे प्ररुति नेद, उहूमें अनादिहीको
विधा व्हरही है। एते परि निन्नता न नासे जीव करमकी, जौलो मिथ्या नाउ
लों थोंधी वाउ वही है; ज्ञानके उदोत होत ऐसी सूधी दृष्टि नई, जीव कर्म
पंमको
अकरतार सही है. ॥ ६ ॥ दोहरा.- एक वस्तु जेसी जु है, तासों
मेले न धान जीव अकः करमको,यह अनुनो परवान. ॥ ६३ ।।
थर्थः- जेम थाकाश प्रदेशमा पुदगल कर्म थवगाहि रहे ; तेज थाकाश
देशमां जीव प्रदेश पण अवगाहि रहे वे. एम जीव अने पुजल एक देवना
गती , तथापि चेतननी सत्ता बने जडनी सत्ता ए वे जुदी वे. अनादि काल
नी लक्षण दवहे स्वरूप नेटवडे गुणपर्यायवडे ने प्रति नेटवडे ए वेडनेविषे
विविधता चाली यावे तेम उतां लक्ष्ण प्रमुखनी निन्नता मिथ्यात्व नावने सीधे
जीव थने कर्मनी ज्यां सुधी नासे नही, त्यां सुधा उधोवायु वहे एटले जीवने
कर्ना मानीये ये. अने ज्ञानहुँ उद्योत थवाथी सम्यक्तनी एवी छपता थई के ते
यो कर्म पिमनो थका जीव सही थयो के. एम जायं ॥ ६॥ जे वस्तु जेवारी
ते ते ते साये थानके वीजा स्वरूप वाली वस्तु मलती नथी. एकमेक यती नथी
एथी जीव कर्मनो थकना : एथर्थ अनुनय प्रमाणथी समझाय ते ॥ ६३ ॥

- ते यशुरू -- . . थब शह नावित करम तुम, कहो कौनकी चाल ॥ ६ ॥करता यााकीन वर्य-हवे शिष्य प्रश्न पुढे वे के, हे प्रनु तमे कयु के, कर्मनु . व्य फर्मनो करनार जीव त्रणे कालमा नथी, त्यारे नावित कर्म तमे काली स कहो ठो॥६८ ॥ एनावित कर्मनो कर्ता कोण , ने एना कर्म नोक्ता कोण ' पुजल का नोक्ता ? के यात्मा का,नोकावे स्विा हवे या प्रश्ननो गुरु उत्तर आपेठे-अथ गुरु उत्तर स्थन- दोहरा - क्रिया एक परता जुगल, यों न जिनागम माह, थोरकी, थोर करै यो नाहि ॥ ७० ॥ करे और फल नोगवे, थोर वन नहिहन Uru समयसारनाटक. हवे मूढ जीव कर्मनो कर्ता मानी लेय ठे ते कहे -श्रय चौपाई-जेउरमती विकल थज्ञानी, जिन्हि सुरीति पररीति न जानी, मगन नरमके जरता, ते जिय नाव करमके करता ।। ६५ ।। टाहरा- ध्यामति तिमरसो,लखेनजीर थजी तेई नापित करमके, करता होई ॥६५॥ जे अशुभ परिनति धरे, करे यह परवान, रता होइ थजान ॥ ६६ ॥ अर्थ - जे जीव उष्ट बुद्धिवडे विकल ने, यज्ञानी , जे पोतानी ने रीत जाणता नथी माया जालमा मन्नने, 'मनानरता के० धणी ठे, नाव कर्मना करनारा ॥ ६ ॥ जे जीव मिथ्यामति अधकारथी जीव ने निन्न पणे जाणता नथी, ते जीव सदाकाल नावित कर्मना कर्ता ने, पोतपोताना कर्मनो जे स्वनाव तेनेज नावित कर्म कहिये ॥ १५ ॥ गुद परिणतिने धरे, सर्व क्रियामा अहकार बुझिथी यह कर्ता एव रहे, ते जीव अजाण थका अद्यक्ष परिणामना कर्ता थायडे ॥६६॥ अथ शिप्य प्रश्न- दोहरा-शिष्य कहै प्रनु तुह्म कह्यो, उविध करमको रूप, मई, नाव कर्म चिप ॥ ६॥ करता दरवित करमको, जीवन हो । कोन करै फल लोग, के पुदगल के पातमा, के उद्बुको सयोग ॥ ६ ॥ व कर्म ने ते चिद्रूप के चेतनाविकाररूपावली स्वामी तमे एतु, लयने थात्मा ए वेदुनो सयोग कर्ता जोक्ता ने ॥ ६ ॥ दर्व कर्म थपवा समयसारनाटक. सत्य जो करतासो नोगता, यहे यथावत जेम॥७॥ नाव कर्म कर्त्तव्यता, स्वयं सिघन हे होश; जो जगकी करनी करे, जग वासी जिय सोइ ।।७शा जिय करता जिय नो ता, नाव कर्म जिय चालि; पुदगल करे न जोगवे,उविधा मिथ्या जालि॥७॥तातें जावित करमको, करे मिथ्याती जीव; सुख उरख थापद संपदा,नूजे सहजसदीवा।। । अर्थः-- क्रिया करणी एक होय अने तेना करनारा जुगल के वे एवी वात जेनेश्वरना आगममां नथी कही, तेम पुद्गल घने जीव ए वेन एक क्रिया करे नही, अथवा वीजानी क्रिया अने करनार वली बीजोज , एबुं पण वे नही, इटले पुदगलनी क्रिया जीव न करे अने जीवनी क्रिया पुदगल न करे॥ ७ ॥ए रीते क हे एक यने तेनु फल नोगवनार वीजोज होय एवं बने नही, ए, जिनेश्वरना बाग ममा नथी का, एटले पुद्गलनी क्रियानु फल जीव नोगवे नहीं; केमके जे कर्ता तेहिज नोगता:जे कर्म करे तेज फल नोगवे, ए वात केवत प्रमाणे खरीवे.॥७१ । नाव कर्मनी कर्तव्यता के क्रिया तेतो स्वयं सिन याय, एटले नाव कर्म 'पोतानी मेले सिप नही थाय. तेथी एवं ठरे के जे जगतनी क्रिया करे ते ना व कर्मनो कर्ता वे; एटले गमनागमन क्रिया करे तेज जाव कर्मनो कर्ता जगत वासी जीव | शाजीवज कर्ता अने जीवज नोक्ताठे, जीवनी चल विचलताथी नाव कर्म उपजे , एथीनावित कर्म जीवनी चाल के. ए नावित कर्मने पुगत करे नही, तेम नोगवे पण नही, एमां जे थत मतवाला विधा राखे वे. ते मि ध्या जाल वे ॥७३॥ तेमाटे जे मिथ्याती जीव , ते नावित कर्मने करे वे. तेणे करी सुख उःख आपदा संपदा सदा सहजे जोगवे ॥ ७ ॥ हवे एकांत वादिसांख्यमतना वचननु वर्णन करे -अथ एकांत वादी वर्ननं.- सर्वया इकतीसा - केई मूढ विकल एकंत पट गहै कहै आतमा अकरतार पूरन परम है; तिन्हसों जु कोउकहै जीउ करता है तासों, फेरी कहै करमको क रता करम है : ऐसे मिथ्यामगन मिथ्यातो ब्रह्म घाती जीव, जिन्हेके हिये बना दि मोहको नरम है ; तिन्हको मिथ्यात दूरि करिवेको कहै गुरु स्यादवाद परवान यातम धरम है ॥ ७५ ॥ थर्थः- कोई मोह मूढ जीव ज्ञानवडे विकल एकांत पद ग्रहीने एम कहे ते थात्मा थकर्ता , परम पूर्ण ठे, ते एकांत वादीने कोई एवं कहे के, यात्मा कर्ता , तेने सांरव्यमति प्रमुख एकांत वादी कहे वे के. कर्मनु कर्ना कर्मज वे. एवा मिथ्यातमा मग्न मिथ्याती जीव ब्रह्म पाती.. तेमना हैयामां धनादि का ; - हवे धनुनवमा निर्विकल्प उपयोग थापवु तेनु दृष्टांत कहे- सवैया इकतीसा-जेसे काटु चतुर सवारी हे मुगतमाल माजाकी कितने नानातिको विज्ञान है, क्रियाको विकलप न देखे पहिरन वालो, मातीनी मगन सुखवान है, तेसे न करे न मुजे अथवा करे म हजे,थोर करें चार सब नै प्रवान है, यद्यपि तथापि विकलप विधि त्याग जोग निरविस्तर नातनु विज्ञान के, पण ते मालानो पहेरनारो तेनी कियानो विकल्प जोतो थर्थ-जेम कोई चतुर पुरुपे मोतीनी माला समारीने बनावी ने तो पण मोतीनी शोनाथी मगन ने सुरववान थई रहे , जेम मोतीनी मानाना नेक विज्ञान ठे, तेम यही पण थनेक विकल्प ,थात्मा की नथी, नय व सर्व विकल्प विधि त्यागवा योग्य ते केमके अनुनय जे वे ततो निर्विक वे स्यावादीथात्माने कर्मनो कर्ता जे नयथीमाने ते कहे-वथ कनारपन दोहरा- दरव करम करता थलख, यह विवहार कहान, निहल ना थ- पुदगल व्यरूप कर्मनो कर्ता घलख पुरुप यात्मा .ए बार समयसारनाटक. नी सगतीथी उलट पालट थई रह्योने, जाणे नटनी वाजीनो ग्वेन र नी तेम खेल करेठे ॥ ए५॥ थथ अनुनव व्यवस्था कथन दोहरा - नट वाजी विकलप टसा, नाही अनुनी जोग, केवन धनुनी को, निर विकलप उपयोग ॥ ए६ ॥ थर्थ- धनुनवमा धात्मव्यनी जे अवस्था पामिये ते कहेटे पूर्व जे नट सरवी जीवनी उलट पालट वाजी , ते तो किप दशा ठे ए दवा नुनवमां योग्य नथी नि केवल धनुनय करवाने निर्विकप उपयोग तेज सत्य ॥६॥ अथ थनुनो दृष्टांत कथन - - . . नो धमृत पान है ॥ ७ ॥ गवनारा वीजा ने , ए सर्वनय प्राणायद्याप ए सर्व नय प्रमाण ठे, बने थमृतपान समान उपादेय ब, तेसो ताको नाउ ॥ ए॥

समयसारनाटक. भए ज्ञानको पर जो केवाई शके , निश्चय नयमां तो ए वात वे के जेवू जे इव्य होय तेवं तेनुं नाव स्वरूप होय, एथी पुदगल इव्यनी क्रिया पुजजवडेज बनेठे. ॥ए । हवे जेवं विपरीतपणुं बुद्धिमां नासेठे, तेवु कहेतेः-श्रथ विपरीत धिकघन:- । सवैया इकतीसा सहज ज्ञेयाकाररुप पग्निमे यद्यपि तथापि झा झान रूप कह्यो है ; केयङ्गय रूप यो अनादिहीकी मरजाद. कादु वस्तु कानुको नाउ नहि गह्यो है; एते परि कोउ मिय्या मति कहे जेयाकार प्रति नातनिसों हान अयुद्ध व्है रह्यो है; याहि उरबुधितों विकल नयो मोलत है समुफे न धर यो नर्ममाहि वह्यो है ॥ एए । यर्थ - छाननो ए सहज स्वनाव के, घट पट प्रमुख केय के जाणवाजोग ने पदार्थ वे. तेनो जे थाकार वे, तेजरुपे यात्मानुझान परिणमे, यद्यपि ए वात रमाण वे तो पण ज्ञान जे ठे, ते ज्ञानरुपज कहेवाय पण इयम्प न कहेवाय प्रने जे झय पदार्थ वे ते ज्ञानमा परिणम्यो तोपण शेयरुपज फेवाय, पण शानर प केवाय एवी धनादि कालनी मर्यादा ठे, कोई वस्त वीजी वस्तुनो स्वनाय ग्रहण नही, तेम जुदो जुदो वनावपण धारण करे नहीं, एवी मर्यादा वंय वात, तेम कोई वैशेपिक प्रमुख मिथ्यामति कहेवे. के शेय पदार्थनाथाफार प्रति मासे ने, झान पदार्थ यशुम थई रह्यो,ज्यारे ए धनुरुपएं मटी जो तारे मुक्लियो, उट बुद्धिथी मिध्यात्व मोहनो विकल्प थयो, तेषी चहि तहिं विस्त धने .धने धर्म के० वस्तुनो स्वनाव जाणतो नथी. तेघी ब्रममा वह्यो फिरले. ए. व पदार्थ पोताना स्वनावमा व्यापीरह्याने ते रहे। -वधव्यापरतार पन:- - सकल वस्तु जगमें असुहाई; वन्तु वन्तुनों मिले न काई; जोर बन्नु गजेती, सोग निन्न रहे सबनती। 100 ॥ जगतनेविपे सर्व नाव घसदार पणे वनं . साईनो दायरा जय प्रगट पणे हे के, के एक वन्नु वीजी विजदण दल गधे माझे मां जेटली बम्त ते. तेटलीन जीव जाने. एटलेन टेप दम्न की हो परिणम , तोपरा जीव सर्व वन्नधी दोज हं दे, म पनपना 10 तेची हटा रहे ॥ ४० ॥ व्यवदारनी स्वत देवाले अप व्यवहार स्थनं - करम रैपज नागवं. जीद यहानी का पद र पनी सदर न हो.. ॥ ११॥ - M - सतरंज खेले राधिका, कुवजा खेले सारि, या नि , १ थर्थ-जेम कोई चोपटनो खेल करे, ते पुरुप चित्तमा लान विचारी चोक प्रमुख दाव उपर सारी सनाल राखीने रमे, पण दाव तो पासान ।। कवित्त उद -जैसे नर खिलार सतरजको, समुफे सब सतरजकी पात; चाल निरखे दोन दल, मोह राग न विचारे मात, तैसे साधु निपुन व जन सखे तजे उतपात, साधे पुन्य चितवे थन पद, यह मविवेक वाटा L00 समयसारनाटक. भ्रमरूप तालाने खोलवानी कुंची वे सुबुदिशीजरूपसुधा समुहमा राधा पण तेवीचे, एम ए वेडशीन प्रात्तीकरी महा सुग्यदायीले उदय करवाने प्राची के पूर्व दिगा जेवीने, निदाननी जाचनारी नयी, हीपणे सुबुद्धि भने राधिका ने निरवाची के वचन गोचर नथी, ५ . रहे, जेनी साची ग्वरता धाम केजे पोतानु थात्म घर तेनी खबरदार साथे रमी रही ते राम एटले पोताना इटनी साथे रमनारी वे राधा रस टले राधावल्लनीना मार्गना रसग्रथमा रापानामे ऽश्वरनी प्यारी ठे, तेवीज पण वे एवी सतजननी मानेती बने स्वस्थपणे रेनारी थने नूर के र शाणी ने एवी सुबुदि वठे, माटे सुबुधिने राधिका राणी कहेवी ॥३॥ | रीते कुबुदि कुबजा थई थने सवाद राधिका थीए वे पोतपातानी मति लोधी रहे ते कुक्षि जे कुबजा तो करम बधनी थधिकारणी* संबुधि राधिका तो विवेकनी खाण ने ॥ ५ ॥ ज्ञानावरणीय यादिक- , ते पुद्गलरुप थने मतिनी तनाव कम जाणीए, जे . परिणमन होय तेने विवेक गुणनु चक्र कहीए ॥ २६ ॥ हवे नाव कर्मना चकनी उपर दृष्टात कहे - अथ कर्म चक्र यथा कवित्त बंद - जैसे नर खेलार चोपरको, लान विचार कर चित चाच, . वारि सा बुद्धी वासों, पासाको कुछ परे सु दाउ, तैसे जगत जीव उद्यम चितवे उपाउ, तिख्यो ललाट होइसाई फल, कर्म चक्रको ५ चाद राखे, एटले होस राखे, पोतानी क्षि बलने जुग प्रमुखनो पान तेम जगतनो जीव उद्यम करीने पोताना सारथनो उपाय चितवे, लाटमालव्युहोय तेज फल याय,कर्मचउदय माफक थाय एनो एन. हवे विवेक चक्र उपर दृष्टात कहे - थथ विवेक चक्र यथा- 3 ॥ २८ ॥ दोहरा उपाधि रहित यात्म समाधिमां विराजे तेथीतेने समयसारनाटकः ५०१ जीतवो, वाके निसिटिन हारि ॥ ए ॥ दोहराः- जाके उर कुबजा वसे, सोई अलख बजान; जाके हिरदे राधिका, सो बुध सम्यक वान ॥३०॥ अर्थ-जेम कोर्डमाणस सेतरंजनो रमनार सेतरजना खेलनी सर्व धात के युक्ति अने दाव समजेने. पोताना पराया दल उपर नजर राखी चाल चाले, पोताना पारका वजीर हाथी प्रमुख मोहोरा गणतिमा राखी मनमां परने मांत करवो वि तारेने. तेम साधु लोक पंमित वे, ते मोद मार्गमां खेले. सण्यी वस्तुने होय तेमां उत्पातरूप कार्य होय ते ठांमी दे, अने पोतार्नु साधन करे, चित्तमा अनेट पद विचारे ए विवेक चक्रनी वात ॥ २७ ॥ सुबुद्धि राधिका ते सेतरंज बेली रही , अने कुमति कुवजा पासा सरखो खेल खेले. तेमांधा सुमतीरा का तेनुं विवेक चक्रमा रातदिन जीत, थायठे. अने कुमति कुबजा ते कर्म कमां रातदिन हारे ॥ २५ ॥ जेना हैयामां कुमति कुवजा वसे, तेतो अलख पात्माना अजाण वे. अने जेना हैयामां सुमति राधिका वसेवे. तेज समकेतवंत ६ कहेतां ज्ञाता कहिये ॥३०॥ (वे ज्यां शुरुझान वे त्यां शुक्षकिया थाय ते कहे-अथ ज्ञानक्रिया सहकार कथन सर्वया इकतीसा:- जहां शुद्ध ज्ञानकी कला उद्योत दीसे तहां सुझ परवान ३६ चारित्रको अंस है; ता कारन ज्ञानी सब जाने झेय वस्तु मर्म, वैराग विलास अर्म वाको सरवंत है; राग दोप मोहकी दसासों निन्न रहे याते, सर्वथा त्रि हाल कर्मजालको विध्वंस है; निरुपाधि पातम समाधिमें विराजे ताते, कहिये प्र पूरन परमहंस है;॥३१॥ दोहरा-झायक नाव जहां तहां, गुरू वरनकी बाल; ताते ज्ञान विराग मल, सिव साधे सम काल. ॥ ३ ॥ यर्य:- जे प्राणीविपे जे गुरु जाननी कलानो उद्योत देखायो, ते प्राणीवि वखतमा यात्मानी शुद्धता प्रमाण करीने शुद्ध चारित्रनो पण अंस याय कारणथी जे ज्ञाता होय तेतो केय के हेय उपादेयरूप सर्व जाणवा योग्य स्तुनो मर्म जाणे, त्यारे ते देवने गमे अने उपादेय रूप सर्व जाणवू तेने ग्रहे , वो वैराग्यना विलासनो स्वनाव सर्व धंसे करी प्रगट याय, अने वैराग्य था साथी राग केप मोहनी दशाथी प्राणी निन्न रहेठे, तेथी पूर्वरूत कर्मनी निर्जरा सायने, यने वर्तमानकालमा कर्म न बाधे, जे प्रति बुटी गई तेयागामिक काल मां बांधे नही, एम सर्वधाप्रकारे कर्मजालनो विध्वस याय. तेवारे राग देवादिक ट तेज . . एमिप्यात परिनाम, ॥४२॥ मन वच काया करम फल, करम दशा जा दररित पुगन पिममे, नापित नरम तरग ॥ ५३॥ तांते नावित धरमनो. छान चेतना नाग्यापिना मन वचन कायामां मिय्या परिणाम बसेने,478 नपजेने, ॥४३॥ तेमाटे यात्मानो नापित धर्म एटले गुम जाणपणु प्या तरंगरूप कर्म स्वनार पिपरीत ने, तेने कराने कोण थने करे कोण दवे या जोगयी किया नाय तेनी निदा करेने-अथ कियाफी नि । पिष, सनी महा पुर माहि, ॥ ४ ॥ संया फतीमा-मानी मात्र दोदग-कानी हित बरनी सदा, मुफति पितग्नी नाहि. गनीना माद राजा बम, नीथज्ञाननार गफसकी पुरीह, करनी सरम का की प्रनी नापा कग्नी प्रगट, माया मिसमीरी है,कनीक जाना चिदानद कानोसी उट ज्ञान नान दुति उरी है, याचारजौ कानीमा वर्य-काली जे प्रियाने ते मदा यहितनी करनारीमना ५०४ समयसारनाटक. कहे। के,माहारु स्वरुप करुणानिधान ले तथा सर्वनो सर्वनो हित वत्सल से अने थम्लान कहेता निर्मल कालने कान वे कर्म चालनो तेने जय नथी, एटले कर्म जेना स्वनावनो नाश करी के मन वचन थने कायना योगनी जाल तेथी अजीत वे, थने था स, तेतो मोहनो विलास , पण माहारो पिलास नथी, जगत व्रमण तेथी हु गून्य , गति कर्म जगत करेते, तेतो मारा. पकूप समान के, एथी पाप कोणे की, हवे कोण करेठे, थागत रो, था जे क्रियानोविचार दीवामा यावे तेतो स्वप्नानी दोरधार । व्यवहार ॥४१॥ हरे मिथ्या परिणाममुं वरणन करे - अथ मिथ्यात परिनाम , दोहरा - मै या कीनी यो करो, अब यह मेरो काम, मन वच सुनाउ अपूत , कोन कराये को करे, कोसर लहे सब जूठ ॥ ४ थर्थ - मश्रायु की श्राम करुजु, हवे था माहारु काम ले. ते बार मन यचन कायाना जोग ले, ते कर्मनु फल ठे, थने कर्मनी दशा जहरू " जे मन पचन काया , ते पुन इयनो पिने, तेया था मिथ्या तरी मग्न कोण ने, एटले अनुमोदे कोण ए प्रपच सर्व जुठाने, ॥ ४५ ॥ जीद कानी सटीर निह मम्प बुरी ॥ ४६॥ - - " समयसारनाटक. បុប यी, था कियाने यागममां तो बंध पतिमांज गणी ठे, तेयो किया महा रख हित . ॥ ४५ ॥ कियानी नूमिमां महा मोह राजा वसेवे, थने किया वे ते अज्ञान नाव रादतनी नगरी के. एटले क्रियामां अज्ञान राक्षस रही शकेले. अने किया वे ते तो कर्मनो पडवायो दयने काय योगनी पडवायो ते. अने पुजननो हनायो वे किया वे ते प्रगट माया जाल , तथा ते साकरनी ठरी , मोगत स्पो मारे था करणीनी जालमां चिदानंद परमात्मा उरनो के मन थर्ड यो वे, धने क्रियाना थोचे ज्ञानरूप सूर्यनी ज्योति पी रही है. श्रीधाचार्य हिरे के किया करतो थको जीव व्यवहारीज कहिए. पण निश्चल रूप देखवाथी कया तग लर्वदा वुरी ठे, एटले खोटो . ॥ ४ ॥ हवे पोतानी समज पामे तेने ज्ञाता कहे:- यथ ज्ञाता कथन:- चोपाई.- मृपा मोहकी परिनति फैली, तातें करम चेतना मैजी; ज्ञान होत हम मुजी एती, जीव सदीव निन्न परसती ॥४७॥ दोहराः-जीव अनादि सरूप मम, रम रहित निरुपाधि ; अविनाशी अगरन सदा, सुखमय सिक समाधि ॥४ जा यर्थः- अमारामां पहला मिथ्या मोहनी परिनति फेलाई वे, एटले मोहथी प्रक्ष यी, त्यारे फेजाणी. तेनो उदय गाढो थयो, तेथी चेतना शुरु हती पण प्रयक्ष पई, कर्मसहीत चेतना मलीन थर्ड. हवे ज्ञान चेतना प्रगट यता अमे एटली मात जाणी, के जे जीव ते ते निचे परजोगथी न्यारो वे ॥४॥ अनादि कालथी के नीव प्राणधारी केहेवायठे. ते माझं स्वरूप दे ते स्वरूप के वे ते कहेते. कर्म हित वे. अने संयोगादिक उपाधि रहित वे. वली विनाश न पामे, तदा ईश्वर से; कोर्नु गरण न राखे, अने या स्वरूप लिखतमाधिना सुखमय वे ॥ ७ ॥ हवे ज्ञानस्वरूप की उपाधियी जिन्नते कहेः-थय ज्ञान स्वरूपी कपन.- चौपाई:- में त्रिकाल करणीनों न्यारा, चिदविलात पद जगत उज्यारा ; राग विगेध मोह मम नाही, मेरी अवलंबन मुझमाही ॥ ४ ॥ सवैया तेश्सा:- सम्यकवन कहे अपने गुनमें नित राग विरोधन रीनो , में करतृति करों निरवं इक, मोह विषे रस लागत तीतो; सु सुचेतनको अनुनी कार, में जग मोह महानढ़ जातो, मोर समीप नयो अब मो कई फान अनंत ही विधि वीनो १५॥ दोहरा.- कह विचठन में सदा, रह्यो ज्ञान रस सबि; सुझातम अनुनूनि तो, खजित न होड कदावि ॥ १ ॥ पूर्व करम विष तर नए, उदे लोग फल हज; में इन्दको नहिं जोगता, सहज होढुं निगमूल ॥ ५ ॥ - ५०६ समयसारनाटक थर्थ-ई त्रणे कालमा क्रिया करणीयी न्यारो बु माहारे कर्मथो सगनथी तो कोपाथी सग केम थाप माहारं पद के स्वरूप, चिदविलास के ज्ञानविलास , ते जगतमा थजवा ने थने राग देप मोहनाव वत्तं . तेतो माहारुं स्वर प नथी माहारो थवतब श्राधार माहारा स्वरुपमा ने ॥४॥ समकेती जीव पोताना गुण कहे दुनित्य प्रत्ये राग देष मोहथी, रीतो के रक्त एटले रहित बु दुजे क्रिया करुनु ते राग आप बिना वावारहित करुनु 'थने जे ए विषय रस ले ते, मोहतीतो के मने तिक्त लागे एटले कडवा लागेजे शुद्ध पोतानी चेतनानो थनुनय करीने दु जगतमा मोहरूप महासुनट जीत्यो, माहारु एबु स्वरूप पामीने दु मोक्ने सन्मुख थयो, हवे मने एवीरीतीज धन त काज बोतो एटने यनत काल लगे एवोज रतु ए थारासा ॥ ५० ॥ विचक्षण हानी पुरुप थागसा करीने कहे के हु सदा ज्ञान रसमा राची रहु थ ने टुं शुम श्रात्माना थनुनवथा कोइ पण कालमा खलित न था ए थागसा गए पूर्व स्त पुन्य पापरूप जे कर्म , ते विष वृक्ष जाणवा अने ते कर्मना उदय नोजे जोग वे ते विष वक्षना फल फुल वे दुधा उदय जोगनो नोक्ता नयी राग के पपीरहित दुथनादिकाजना साथे लागेला विषय लोग बे तेसहज निर्मूलथाय ५२ हवे उदासीनताने वैराग्य कहिये तेनो महिमा कहे। थथ वैराग्यमहिमाकथन वोहरा-जो पूरव रुत कर्म फल, रुचिसोनुजे नाहि, मगन रहे थाने पहुर, शुभातम पदमाहि ॥ ५२ ॥ सो चुप कर्मदसा रहित, पावे मोप तुरंत, सुजे परम समाधि सुष, थागम काज यनत. ॥ ५४ ॥ थर्ष - जे पर्वकालमा कर्म का तेनु फल उदय पर्यु ते फलथी रुचि लगा ही नागवे नहीं भने थाd प्रहर शुक्ष यामपदमा मगन रहे. ॥ ५३ ॥ तेज पमित कर्मदशा रक्षित पाने तरत मोक्ष्पद पामे, ते पठी थागमिक कालमा धनत काज लगे परम समाधिनु सुग्व जोगवे ॥ ५ ॥ हवे झानि पुम्पनो कम कमे महिमा बधेते कहेते - ज्ञानी पुरुष महिमा कथन - पप उद - जो परदा रुतकर्म, रिष विषफल नहि जे, जोग जुगतिकारज परत ममता न प्रहने, राग विरोध, निरोध सग पिक्लप सधि बने, एमातम धनुनी ययाति सि नाटकममे जो ज्ञात हमग चलत. परन व्ह केव अजहे, सो परम यतीयि मध्यविषे, मगन रूप सतत रहे ॥ ५५ ॥ वर्ष- जो झाला पन्ने पूर्व तक प वक्षना विष फजने नोगये नही dwwe mam PARAN ए वली जे विग्रह के शरीर दी ... रियह तेथी जुदो रे.जेमा सदाय णले. घने चेतनानो निधान न समयसारनाटक. एटले इष्ट फलथी रतिन उपजे अनिष्ट फलथी अरति न उपजे एवो हाताने ते मन वचन कायाना योगे करी युक्त तेथी जोगनी गति के प्रवृत्ति करेते, पण कार्यविपे ममता प्रखंजे नही एरीते राग पनो विरोध कर ना संगथी जे विकल्प सवेरे. ते सर्व मे. शुक्ष श्रात्माना थनुनयनी हर करीने शिवनाटक के जे थकी जीवन्मुक्ति होय एवो नाटक मामजद पुरुष एहिज मार्गे चाले तो पूरण स्वनाव पामीने केवल झान पानी झान पामीने उत्कृष्ट अतीयि सुरखनेविपे निरंतर मगन रहे. ॥ ५ : हवे गुम यात्मा व्य । तेनुं वर्णन करेनेः अथ शुभ वान- संवैया इकतीसा.- निरज निराकुल निगम वेद निरजेद, जाममा त माश्यतु है; रूप रस गंध फास पुद्गलको विलास, तानी - श गायतु है, विग्रहसों विरत परिग्रहसे न्यारो सदा, नाम: पाश्यतु है; सो हे ज्ञान परवान चेतन निधान ताहिक सोस नाश्यतु है ; ॥ ५६ ॥ जसो नर नेदरूप निक रनेद यव नेटको न गर्दगो ; दीसे कर्म रहित सहिन ज थान फिरि वाहिर न वहेगो ; कबहु कटाचि यानी कर रस राचिके न परवस्तु गहंगो ; अमलान झान दिन नांति भागम अनंत काल रहेगो. ॥ ५७ ॥ * टि थापु समौ पाइ थपनो सुनाउ गहि लीनांनी सो से सब लीनो, जो जो त्याग जोग सो सो ही तोर त्यागिवेको नांही यार, वाकी कहा तर Trma थंग त्यागि वचन तरंग त्यागि, मन त्यागिदिन अर्थ:-जे निर्नय केवाय वे, निराकृत : देवाय . वेद के ज्ञानरुप केदेवाय थे वे जेमां सर्व जगत समाय दे. यन ा ने, तेतो पुजलनो विलास ठे, तना बना ए पामीए रे एपदार्थ तो Panam Me -- Whumma Jammer marper ING - dae -- 4 ឬ ០៨ : समयसारनाटक ठे ॥५६॥ हवे बीजुं पण शुधात्म व्य सिनु वर्णन करे-थतीत कालमा पण शुक्षात्म इव्य निश्चय नयथी अनेद रूप हतो थने व्यहारनये नेदरूप हतो हवे केवल रुप पामिने निर्नेद के. नेद रहित जाणीए दवे एषी दशामा कोण मूर्ख बेद वरावसे नैयायिक लोक जे पोतानी परुपणामां समाधि योग थारमाने कर्म रहित मानीने फरी संसारमा अवतार मानीने तेने नमस्कार करेठे पण जे कर्म रहित थयो सुख समाधान सहित थयो. पोतानु स्थानक पाम्यो ते पाठो बाह्य सकटमा केम पडशे जेम धरतीनो नार उतारवा वर थवतार लेश्ने ईख पामे मिथ्याटिनो केवतमाठे पण जीव शुक्ष थईने फरी राग रसमा राचि ने कोई कालमा थापणु स्वनाय त्याग करीने पर वस्तुने ग्रहे नही केमके थम्ला न ज्ञान के जे ज्ञान फरी करमाय नही एवु ज्ञान विद्यमान कालविपे प्रगट थयु तेतो धागमिक कानमा अनत काल लगी रहेगे ॥ ५७ ॥ हवे फरीयी अवतार लेवाना कारणनो अनाव कहेले - अनादिकालथी चेतन मिथ्यात नावरूप विनावमा रमि रह्यो हतो ते समयप्रस्ताव पामीने, विनावथी उपरागे थई पोतानो गुरु स्वनाव दतो ते पोतेज ल लीधो, तेथी ज्ञान दर्शनादिक नाव सेवा योग्य हतो ते लोगो, बने राग देपादिक नाव त्यागवाजोग हतो ते सर्व त्यागी दीयो ते लेवानु वौजु काणु रा नही, थने त्यागवानु पण बीजु ठेकाणु रयु नही हवे इहां बाकी नवु कार्य करवानुं क्यो रह्यो जे कार्य करवाने फरी श्रव तार सेतु पडे जे उपाधिसग हतो तेतो सर्व त्यजी ने एटने थंग त्याग के काय योग त्यागिने वचन तरग त्याग के वचन योग त्यागीने तथा मनो योग त्यागिने बुद्धि त्याग के विकल्प त्यागीने यात्माने शुक्ष करी लीयो ॥ ५० ॥ हवे बाह्य भेष धरयो ते व्यजिग कहिए ते एकांतपणे मोदनु कारण नथी ते कहे -अथ एकांत इव्यजिगीकी निदा दोदरा- शुक्ष ज्ञानके देह नहि, मुझ नेपन कोइ, ताते कारन मोपको, दर वजिगि नहि होइ ।। एए ॥ इव्य लिग न्यारो प्रगट, कला वचन विन्यान, श्रष्ट महारिधि थष्ट सिधि, एक होहि न ज्ञान ॥ ६० ॥ अर्थ-यात्मा तो शुक्ष ज्ञानमय वे थने शुक्ष ज्ञानने देह नथी, थने ज्यारे देह नपी त्यारे ज्ञान ने मुज्ञ नेप पण कोश्नी तेथी मोदनु कारण व्य जिगहोय नदी एटले नेप सीधे मुक्ति नयी ॥ ५॥ ॥ शानथी इव्यलिंग तो प्रगट पणे जुदोज वे कलाविज्ञान, वचन विज्ञान, ते ज्ञानयो न्यारो ले तथा याचार, श्रुत शरीर, ० समयसारनाटक. ឬ ចប់ , - वचन, वाचना, बुद्धि, उपयोग, संग्रह संलीनता, ए अष्ट महा रिविले. घने थ णमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, शिव, वशित्व, ए यष्टमहा सिधिवे. ते पण शान नथी ॥ ६ ॥ हवे एटला महिमावंत स्थानक वे, तो पण ए ज्ञानना स्थानक नयी ते कहतेः- अथ शान धनाव स्थानक कथन.- सर्वया इकतीसा - नेपमें न ज्ञान नहि ज्ञान गुरु वर्जनमें, मंत्र जंत्र तंत्रमें न झानकी कहानी है, ग्रंथमें न ज्ञान नहिं ज्ञान कवि चातुरी में वातनिमें ज्ञान नहीं झान कहा वानी है ; तातें नेप गुरुता कवित्त ग्रंथ मंत्र वात, नितें थतीत ज्ञान चेतना निसानी है, ज्ञानहीमें ज्ञाननही ज्ञान उरतोर कहू, जाके घट ज्ञान तोड झानको निदानी है ॥ ६१ ॥ थर्थः-नेपमा ज्ञान न पामीए थने गुरुवाई के गर्वपणुं महोटाइ पणुं ते मां पण झानतुं स्यानक नथी अने मंत्र तत्र यंत्रमा ज्ञाननी कहेणी नयी तया ग्रंथ गास्त्र पढवाथी पण ज्ञान प्राप्त यतु नयी कवितामां चातुर्यतामां ज्ञान नथी. वातनी चतुराश्मां ज्ञान नथी. अन जे वाणी ते ते ज्ञान ठे, अर्थात् वाणी पण ज्ञान नथी माटेनेख गुरु वा कविताई, ग्रंथ मंत्र यंत्र तत्र वात ए सर्वधी यतीत के जुदोज ज्ञान वस्तु ठे, ते चेतननी तहिनाणी वे. ज्ञानतो क्यारे जा: ए. के जे अगुआ पणे होय तेतो ज्ञान न कहेवाय, माटे पूर्व जे स्थानक क ह्या तेथी जूटोज कोई ज्ञान वस्तु वे माटे जेना घटमां ज्ञान प्रगटयु, तेज झानतुं मृलकारण ते ॥ ६१ ॥ हवे जे पूर्व नेप प्रमुखना धारक कह्या तेनी मूटता कहि देखाहे :- यथ नेपादि धारक मूट यद् कथनः- सर्वया इकतीसा - नेप धरे लोगनिको वंचे तो धरम ठग, गुरुसो कहावे गुरु वाई जाते चहियें, मंत्र तंत्र साधक कहावे गुनी जादूगर, पंमित कहावे पंमिताई जामें लहिये कवितकी कलामें प्रवीन तो कहावे कवि, वात कही जाने सो पवार गीर कहिये; ए तो सब विपके निखारी मायाधारी जीव, इन्हको विजोकिके द पाल रूप रहिये ॥ ६॥ यर्थ.-नेप धरीने लोकोने, ठगे जरमावे ते धर्म ठग कहेवाय, एटले तेने गु स्तानी चाहना होय ते गुरु केवाय. मंत्र यंत्र नत्रादिक गुणतुं जे साधक होय ते जादूगर केवाय. धने जेमां पंमिताई रही . ते पंमित केवाय, कवित चातुग्निी .

५१० समयसारनाटक. - कलामा जे प्रवीण दोय तेतो कवि केवाय, वातो बनाची बनावीने कही जाणे ते पवारगर केवाय एटली थवस्थाना धरनारा वे ते सर्व इश्यिविपयना याव के मायाधारी जीव ने तेने जोईने मनमा ए विचारिये के थहो ति थाश्चर्य ए बापडा केम पोतानो स्वार्थ खोयठे एवी रीते तेना उपर दयालरूप थई रहेवु हवे जीवना थनुनवनी योग्य दशा कहे वे - थप अनुनो जोगता कथन दोहरा - जो दयालता नाव सो, प्रगट ज्ञानको अग, पें तथापि अनुनो द शा, वरते विगत तरग ।। ६३ ॥ दरशन शान चरण दशा, करे एक जो कोऽ। थिर व्है साधे मोप मग, सुधी अनुनवी सोइ ॥ ६ ॥ अर्थ-- जे थात्माने गुरु दयालता नाव प्रगटेटे तेतो ज्ञाननु अग प्रगट थ\ एम जाणीए पण अनुनय दशा जे वे ते तो विगततरग के विकल्प रहि त वर्ने ॥ ६३ ॥ वली दर्शन ज्ञान चारितनी दशाने विकल्प रहित एकपणे था त्माने जुए, एज रीते स्थिररूप थईने मोद मार्गने साधे तेनेज सुधी के सु बुधिवत अनुनववत केहिये ॥ ६ ॥ हवे नि सदेह सु६ स्वरुप पामतेनो महिमां कहेवे-थथ थनुनो महिमाकथन सवैया इकतीसा - जो हग ज्ञान चरणातममें नटि ठगेर नयो, निरदोर पर वस्तुकों न परसे, सुक्षता विचारे ध्यावे गुवतामें केलि करे, सुक्षतामें पिर ब्दै थम्त धारा वरसे, त्यागी तन कट व्है सपष्ट अष्ट करमकों,करे थान नष्ट नष्ट करे थोर करसे, सोई विकलप विजई अलप कालमाहि, त्यागि नो विधान निरवान पद दरसे॥६५॥ अर्थ - जे कोई दर्शन झान चारित्ररूपी थात्मानेविपे ज्ञानने काणे तेरावीने चाट बांधे, स्यां निरदोर के सशय रहित थईने परवस्तुनो स्पर्श न करे त्या निभे नय ग्रहण करीने शुभताज विचारे, अक्षताज ध्यावे थप्रमादि थईने शुक्षतामा केनि करे शुक्ल ध्यानना प्रथम पायामा प्रवेशकरी गुचतामां थिर थईने महा थान वरूप थमृतनी धारा वरपावे, यादी अवयवरूप लक्षण ने तेथी शरीरना कटने त्यागेले लीनताथी शरीर कष्ट न जाणे त्यारे स्पष्ट थईने एटले वीर्य फोरवीने थावे कर्मनो स्थान नष्ट करे एटले कर्मोने सत्ता थकी चलायमान करे थने नष्ट करे के निर्जरा करे ऐसे थोरदकसे के ते जीव कोने थापिने निर्जरावे ते जीव विकल्प जालनो विजय करीने थल्प कालमांज विधान के नवे श्रेणि ने त्यागी मोक्ष पद देखे एटले पामे ॥ ६५ ॥ .

समयसारनाटक. ५११ . हवे शिष्य पुढे ठे के ए अनुनव पामवो महा विषम ते उपर गुरु शिक्षादे :- अथ अनुनो शिक्षा कथन:- चोपाई:- :- गुन परमें दृष्टि न दीजे; निरविकलप अनुनी रस पीजे; थाप समाइ थापमें लीजे; तनपा मेटि अपनपो कीजे ॥६६॥ दोहरा.- तजि बिनाव दुजे मगन, सुझातम पदमाहि; एक मोप मारग यहे, और दूसरो नांहि ॥६॥ अर्थ.- यात्माना गुण पर्याय अनेक वे. पण तेमां दृष्टि न देवी. मात्र नि विकल्प इव्यनो अनुनव रस पीवो. यात्मा आधारमा यात्मानो समास करी लेवो एटले लय लगाडवो, एटले आपणे शरीर धारी ठोए, ते दशानो काय योग पणुं वे ते मटावी यात्म स्वरूप करीए ।। ६६ ॥ श्रात्माना मूल स्वनाव विना बीजो सर्व विनाव पणुं वे, तेहने त्यजीने गु-६ आत्माना चिदानंद स्वनावमांज मगन थप ये, एक थक्तिीय मोदनो मार्ग एज वे. तेथी बीजो को मोदनो मार्ग नथी॥६७ हवे गुरु यात्मस्वरुपना अनुनवविना महाव्रतिपण व्यलिगीजाणवा ते कहेते.- अथ इव्यलिंगी व्यवस्था कथन.- सवैया इकतीताः- कई मिथ्या दृष्टि जीव धारे जिन मुश नेप. क्रियामें म गन रहे कहे हम जती हैं, अतुल श्रखंम मलरहित सदा उदोत, ऐसे झान नावसों विमुख मूढमति हैं; थागम संनाले दोष टाले विवहार नाले, पाले वृत्त यद्यपि तथापि अविरती हैं, थापुको कहवे मोप मारगके अधिकारी मोपसी सदी व स्ट उष्ट उरगति हे॥ ६७ ॥ दोहरा - जे विवहारी मूढ नर, परजे बुद्धी जीव, तिनको वाहिज कीयको, हे थवलंब सदीव. ॥ ६ ॥ थर्थः- केक जीव मिथ्या दृष्टि के थने याचार्य उपटेश रसथी जिन मुशनेप धारी थने साधुनी क्रियामां मगन रहे, थने पोताना मनयी थथवा कोना पूटयाथो थमे जती पश्ये एम कहे। एटसे महावन्ति ये घने जेनी तुलना नथी एबु थरखम के संपूर्ण विनाव मजरहित सदा प्रकागवत पोता, अनुनवरूप जे कान नाव ने तेथी विमुख माटे मृढमती जोपण ते किया करे याग म सिक्षांत नारेते थने थाहाराटिकना दोष टाली व्यवहारमा दृष्टि गावे म जयपि महान पाने वे तो पण निभ नपची एअविरतीज कहीए एवा जीव ते पोते मोक्ष मार्गना अधिकारी लोकमा क्वायचे. पण मोठाधी दा स्याज रहे। एटले धनव्यने पण किया केवल नामा ग्रेव्यपरामि गनि ही ले पानी एE गतिमा पढेते. ॥ ८॥ को मृर मनुप प्यपहार - ए २२ समयसारनाटक माज रहे अने जे जीव पर्याय बुद्धिवत ते सुनगतियो जीप दोय तो नसो एवी पर्याय बुदिधारेने तेने तो बाह्य क्रियानो थवलवन सदाय कह्यो। ॥६॥ हवे व्यवहारे महामूढ तेनुं वर्णन करते - थथ महामूढ वर्नन- चौपाई-जैसे मुगध धान पहिचाने, तुप तज्जको नेद न जाने, तेसे मूढमती व्यवहारी, लखे,न बंध मोष विधि न्यारी ॥३॥दोहरा-कुमती वाहिज दिष्टिसों. बाहिन क्रिया करत, माने मोप परपरा, मनमे हरप धरत ॥ ७१ ॥ शुक्षातम अनुनो कथा, कहे समकिती कोइ, सो सुनिके तासो कहे, यह सिवपथ न हो। थर्थ-जेम कोइमननो नोलो, पुरुप वे ते धानने तो थोलखे पण तूस थने तंजल मां निन्नता से ते न जाणे तेम जे व्यवहारी मूढमती ते तेतो बंधविधि धने मो विधि दी जूदी सखी शके नही केवल विधिज जाणे ॥३०॥ जे कुमती होय ते पर्याय बुद्धिथी शाता वेदनी पणे समाधि सुख जाणीने बाह्य इष्टियी तेनी हेतुरूप बाह्यक्रिया करे धने बाह्यक्रियामा मगन होय तो तेथी तेने निर्जरा मा नीने मोद परपरा माने थने मनमा आनद पामे ॥ १॥ ते मूढने को सम किती जीव गुड़ यात्मानी अनुनय दशाने मोक्नु कारण कहे तो तेनु वचन सानलीने तेने एवु कहे के ए रीतेतो मोदमार्ग थाय नही ॥ २ ॥ हवे मूढ तथा ज्ञानी लक्ष्ण कहेठे -थथ मूढ तथा ज्ञानी सण कथन । कवित - जिन्हके देह बुद्धि घट यतर, मुनि मुझ धरि किया प्रवानहि, ते हि य थध बधके करता, परम तत्वको नेद न जानहि जिन्हके हिये सुमतिकी कनि का, बाहिज क्रिया नेप परमानहि, ते समकिती मोप मारग मुप, करि प्रस्थान नव स्थिति नानहि ॥ ३ ॥ थर्थ - जेना हीयामा देह बुद्धि रहेठे एटले देहधारी ने पण निन्नपणे जाण तो नी थने मुनीश्वरनी मुश धारिने क्रियानेज प्रमाण करे तेतो हीयानो थध वे थने बधनो करनार वे थने परम तत्वके मोक्ष तत्वना नेद ने जाणतो नपी थने जेना दीयामा सम्यग हटिने सीधे सुबुदिनी करणीका जागी तेतो बाह्य कियाने प रूप प्रमाण करेते तेनेतो समकिता कहीए ते जीव मोक्ष मार्ग ने सन्मुख प्रस्थान के प्रयाण करी करीने नवस्थितिने नि.नांजे ॥७३॥ दवे सपिथी नि केवल उपादेयरूप मोक्ष मार्गनो उपदेश दे - थथ मोक्को उपदेश सक्षेप मात्र कथन सर्वया इकतीसा -थाचारिज कहे जिन वचनको विसतार, थगम अपार है समयसारनाटक. ५१३ कहेंगे हम कितनो! बहुत बोलवेतों न मकसूद चुप नली, वीजीए सु वचन प्रयोज न है जितनो; नानारुप जलपसों नाना विकलप उते, ताते जेतो कारिज कथन नलो तितनो; गुरु परमातमको अनुनी अन्यास कीजे, यहे मोप पंथ परमारथ है इतनो ॥ ४ ॥ दोहरा:- सुझातम धनुनोकिया, सुक्ष ज्ञान दृग दौर, मु कति पंथ साधन वह, वाग जाल सब और ॥ ७५ ॥ अर्थः- श्राचार्यजी शिष्यने कहे ते. अहो शिप्य जिनेश्वरना वचननो विस्ता र तो नय प्रमाण करीने अगम थपार . यमे केटलोक कहीए, आही बहु वो लई ते घमारे मकसुद नयी तेथी चुप रहे तेज वीक वे,बने जेटलुं प्रयोजन के. तेटझुंज बोलवू पण नाना प्रकारनु जल्प के वोलवू कहियें तो नाना प्रकारना वि कल्प उठेने तेथो जे एक कार्य वे तेपुरतुंज बोलवू वस , शुक्ष परमात्म व्यना अनुनव योगर्नु अन्यास करीए एज मोद मार्ग जाणीए, वधी वातमा एटलोज परमार्थ ठे ॥ ४ ॥ जे क्रियाथी शुक्ष यात्मानो अनुनव थाय तेज क्रिया अ ने शुक्ष ज्ञान दृष्टिनी दोर तेज मुक्ति पंथनु कारण . वौजु सर्व वचनामंबरठे ॥७॥ हवे शुरू जीव इव्यनुं वर्णन करे:-अथ शुभ जीव इव्य वर्नन-- दोहरा - जगत चहु यानंदमय, ज्ञान चेतना जास; निर्विकल्प साश्वत सुयिर, कीजे धनुनी तास. ॥ ७६ ॥ अचन अखंमित ज्ञानमय, पूरन वीत ममत्व, ज्ञानग म्य वाधा रहित, सो है अर्थः- जे पदार्थ जगतमा चढूजेवू दे अने यानंदमय ते. जेनी ज्योति ज्ञान अने चेतना वे. जेमां कोई विकल्प नथीनेद नथी. अने शाश्वतो वे तथा स्थिर के.जे पदार्थनो अनुनय करीए तो मुक्ति पामीए. ॥ ७६ ॥ जे कोकाले पोताना वनावथी चलायमान थाय नही एवो अमित ज्ञानमयठे. संपूर्ण समाधिवंत थने ममत्व रहित, इंघिय ग्राह्य नही तेथी ज्ञान गम्य वे थने थव्य अनेद्यपणा थी वाधा रहित ठे तेज यात्म तत्व कहीए. ॥ ७ ॥ इति श्री नाटक समयसार ग्रंथनो दशम सरव विसुमिनामा कार वालाबोधरूप संपूर्ण थयो. दोहराः सरव विसुनी बार यह, कह्यो प्रगट शिवपंथ; कुंद कुंद मुनिरानरुत, पूरन नयो गरंथ. ॥ ४ ॥ थर्य.-जे तारमा यात्मानी सर्व विशुदि पामिये तेज धार यातम तत्व.॥ ७७॥ गटप NA ५२३ समयसारनाटक. - माज रहे अने जे जीव पर्याय बुद्धिवत ते सुजगतियो जीव होय तो नतो, एवी पर्याय बुधि धारेठे तेने तो वाह्य क्रियानो अवलवन सदाय कह्योचे ।।६।। हवे व्यवहारे महामूढ तेनु वर्णन करेठे - थथ महामूढ़ बनन· चोपाई-जैसे मुगध धान पहिचाने, तुप तंजतको नेद न जाने, तैसे मूढमती व्यवहारी, लखे न बध मोष विधि न्यारी॥॥दोहरा-कुमती वाहिज दिष्टिसों, वाहिन क्रिया करत, माने मोप परपरा, मनमें हरप धरत. ॥ १ ॥ गुमानम धनुनो कथा, कहे समकित्ती कोड, सो सुनिक तासों कहें, यह सिवपथन होस थर्थ-जेम कोइमननो नोलो पुरुप ले ते धानने तो थोलखे पण तूस थने तज्जत मा निन्नता वे ते न जाणे तेम जे व्यवहारी मूढमती दे तेतो बधविधि थने मो विधि दी जूदी सखी शके नही केवल विधिज जाणे ॥७॥ जे कुमती होय ते पर्याय बुदिया शाता वेदनी पणे समाधि सुख जाणीने वाह्य इष्टिथी तेनी हेतुरुप वाह्यक्रिया करे बने बाह्यक्रियामा मगन होय तो तेथी तेने निर्जरा मा नीने मोद परपरा माने थने मनमा थानद पामे ॥ १॥ ते मूटने कोइ सम फिती जीव गुम थात्मानी थनुनव दशाने मोदनुं कारण कहे तो तेनु वचन सानलीने तेने एवु कहे के ए रीतेतो मोदमार्ग थाय नही ॥ ५५ ॥ हये मृढ तथा ज्ञानी लप कहेठे -थथ मूढ तथा ज्ञानी लक्ष्य कथन कर्षित - जिन्दके देह बुद्धि घट अतर, मुनि मुशधरि क्रिया प्रवानहि, ते हि य थध वधके करता, परम तत्वको नेद न जानहि, जिन्हके हिये सुमतिकी कनि का, वाहिज क्रिया नेप परमानहि , ते समकिती मोप मारग मुप, करि प्रस्थान नव स्थिति नानहि ॥ ३ ॥ थर्थ -जेना दीयामा देह बुद्धि रहेठे एटले देहधारी ने पण निन्नपणे जाण तो नधी थने मुनी बरनी मुश धारिने क्रियानेज प्रमाण करेने सेतो हीयानो थध के थने बधनो करनार के यने परम तत्वके मोह तत्वना नेद ने जाणतो नयी धने जेना हीयामा सम्यग हटिने ली सुनुदिनी करणीका जागी तेतो बाह्य किपाने नेप रूप प्रमाण करने सेनेतो सममिता कहीए ते जीव मोक्ष मार्ग ने सन्मुस प्रस्थान के प्रयाण करी करीने नास्थितिने निधनांजे ॥ ३ ॥ हवे सदेपयी नि केयस उपादेयरूप मोक्ष मार्गना उपदेश दे वे - थथ मोदको उपदेश सदेप मात्र कथन सर्वया कतीमा-थाचारिज कहे जिन वचनको विसतार, थगम थपार है - समयसारनाटक. ५१३ ने कहेंगे हम कितनो! बहुत बोलवेसों न मकसूट चुप नली, वोलीए सु वचन प्रयोज न है जितनो: नानारूप जलपसों नाना विकलप उते, ताते जेतो कारिज कथन नलो तितनो; शुक्ष परमातमको अनुनी अन्यास कीजे, यहे मोप पंथ परमारथ हे इतनो ॥ ४ ॥ दोहरा:- सुबातम धनुनोक्रिया, १६ ज्ञान दृग दौर, मु कति पंथ साधन वह, वाग जाल सब और ॥ ५ ॥ अर्थः- आचार्यजी शिप्यने कहे . अहो शिष्य जिनेश्वरना वचननो विस्ता र तो नय प्रमाण करोने अगम अपार वे. थमे केटलोक कहीए, थाही बहु वो लवू ते श्रमारे मकसुद नथी तेथी चुप रहे तेज ठीक ठे,यने जेटलुं प्रयोजन के. तेटबुंज बोलवू पण नाना प्रकारनु जल्प के० बोलवू कहियें तो नाना प्रकारना वि कल्प उठेठे तेथो जे एक कार्य के तेपुरतुंज बोलq बस , शुम परमात्म इव्यना अनुनव योगर्नु अन्यास करीए एज मोद मार्ग जाणीए, बधी वातमा एटसोज परमार्थ ठे ॥ ४ ॥ जे कियाथी शुभ यात्मानो धनुनव थाय तेज कियाथ शुक्ष ज्ञान दृष्टिनी दोर तेज मुक्ति पंथनु कारण . बोजु सर्व वचनामंबरठे ॥५॥ हवे शुद्ध जीव इव्यर्नु वर्णन करे:-अथ गुरू जीव इव्य वर्ननः-- दोहराः-जगत चक्कु थानंदमय, ज्ञान चेतना जास; निर्विकल्प साश्वत सुथिर, कीजे अनुनी तास. ॥ ७६ ॥ अचज अखंमित ज्ञानमय, पूरन वीत ममत्व, झानग भ्य वाधा रहित, सो है आतम तत्व. ॥ ॥ अर्थः- जे पदार्थ जगतमां चढूजेवू अने आनंदमय के. जेनी ज्योति ज्ञान अने चेतना वे. जेमां कोई विकल्प नथी नेद नथी. अने शाश्वतो वे तथा स्थिर है.जे पदार्थनो अनुनव करीए तो मुक्ति पामीए. ॥ ७६ ॥ जे कोईकाले पोताना खनावथी चलायमान थाय नही एवो अखंमित ज्ञानमय. संपूर्ण समाधिवंत अने ममत्व रहित, इंख्यि ग्राह्य नही तेथी ज्ञान गम्य ने यने अवेद्य यनेद्यपणा थी वाधा रहित ने तेज यात्म तत्व कहीए. ॥ ७ ॥ इति श्री नाटक समयसार ग्रंथनो दशम सरव विसुधि नामा चार बालावोधरुप संपूर्ण अयो. दोहरा:-सरव विसुनी बार यह, कह्यो प्रगट शिवपंथ ;कुंद कुंद मुनिरानरुत, पूरन नयो गरंथ. ॥ ७ ॥ थर्थः-जे बारमा यात्मानी सर्व विशुदि पामिये तेज धार कह्यो ते प्रगटप ԱՀԵ समयसारनाटक. - - ; यर्थ- प्रथम शिष्य पुत्रे, स्वामी जीव स्वाधिन के पराधिन जीव ए कने के गणतिमा थनेक वे ? ए केम मनमा जाणवु थने जीव कहेवाय ने तो जगतमा सदायठे के नथी, ए यस्तिपणानो सदेह , यने जीव यस्ति के थविनासी के विनाशी हवे आवी रीतना प्रश्न उपर सरु कहेछे के हे शिप्य जीव वस्नु जगतमा ठे, पण नास्ति न कहीए, थने ते जीव थापणे स्वाधिन ने बने एक यद्यपि गिणती थनेक , तो पण लपथी एक ठे थपिनाशी इव्य इष्टि दीजे तो एमज, अने जो पर्याय नय प्रमाण करीये तो जीव पराधीन , कर्माधीन ठे अने अवचित मरण देखता हणनगर ले गत्यादिक देखता अनेकरूप से क्ली अजीव पदार्थ स्थापनानी अपेक्षाये न थी श्रने जहां पर्याय प्रमाण तिहा एठे ॥ ए७ ॥ हवे इव्य क्षेत्र काल नावें करीने सर्व वस्तुनु थस्तिनास्तिपणु कहे- थय दरव क्षेत्र काल नाव अस्तिनास्ति कथन सवैया श्क्तीता-दर्व क्षेत्र काल नाव चारो नेद वस्तुहीमें,थपने चतुष्क वस्तु यस्तिरुप मानियें, परके चतुफ वस्तु नासति नियत थग, ताको नेद दर्व परजाय मध्य जानिये, दरवतो वस्तु क्षेत्र सत्ता नूमिकाल चाल, सुनाव सहज मूल सकति घरवानिये, याही नाती परपिकलप बुद्धि कलपना, विवहार दृष्टि थानेद परवानि ये ॥ ए८ ॥ दोहरा - हे नाही नाही स है, हे हे नाही नाहि, यह सरवगी नयध नी, सयमाने सव माहि ॥ एए । यूथ -इथ्य क्षेत्र काज नाव ए चारें नेद वस्तुमा विचारीए, थाही थापणे वन्नु ठे, ते थन्तिरूप मानीए, एटले स्वश्व्य स्वक्षेत्र स्वकाल स्वनावथी विचारीए त्या रे तो सर्व वस्तु थन्तिरूपें ने, थने जो परवस्तुथी ए चारने विचारिये तो वस्तुनु ना तिसरूप नापजे ने एटने परव्य परदेव परकाल परनावी सर्व वस्तु नान्तिरू पेने नियत श्रग के निशेनययी थस्ति ते तेनो नेद इव्य पर्यापथी नाणवो ए पार नेदमा ऽव्ययी वस्तु कहीए, वस्तुनी सत्नानी नूमिने क्षेत्र कहिये, वस्तुनी परि णाम चापी काज कहीए, सहजनी मूलशक्तिने सनाव कहीए ए रीते युदिनी रूपना करीने परश्य्य देवादिकना जो विकल्प ग्रहण करिये जेम के घट यस्तु ग्रह ए करवायी परश्य परक्षेत्र परकाल परनावनी कापनाथी नास्ति ने ए व्यवहार दृष्टिपी यन्तुना यंग नेद प्रमाण थाप ॥ ए॥थने ए नयी एवु कदेवामा स्वर व्यादि यास्तिपणु लने परव्यादिकयी नास्तिपणु लाए तथा नही ते ने एम समयसारनाटक. पए कहवामा प्रथम परव्याटिकनु अम्तिपणुं ग्रहीए; वे अने नथीज एम केहेवामांफ री परश्व्यादिकनु केवल नास्तिपणुज ग्रहण करिये ; एयी सात नांगा उपजे ठे, धांही सर्वांग नयना धणी न्यावादी सर्व वस्तुमा सर्व नांगा माने ते. ॥ एए । हवं चौद नयना नेटथी एकेक नेदे एकांत पदीनी जेवी केहणी व तेवी कहेवेः- अथ चतुर्दश नय नेद एकांत पद कयन नाम स्थापन:- सर्वया कितीता:- ज्ञानको कारन डेय यातमा त्रिलोक मेय. ज्ञेयता यनेक झान मेज इय ठांही है. जोलों ोय तोलो ज्ञान सर्व दर्वमें विनाय क्षेत्र डान जी व वन्तु नांही है. देह नस जीव नसें देह उपजत लसे, यातमा अचेतन है तनायनमांही है, जीव ठिन नंगुर यज्ञायक सरूपी ज्ञान, ऐसी ऐसी एकंत य वस्था मृढ पाही है ।। ५०० ।। अर्थ. .- प्रथम बट नयना नाम स्थापना कहेने.-जे जेय वस्तुमा ज्ञान उप जेवे, तेथी ज्ञानतुं कारण जेय ते ए नाम , १ ऋण लोक प्रमाणे श्रात्मा दे, तेथी त्रिलोकमय एवं नाम ले. जेम अनेक झेय , तेम ज्ञान पण अनेक ते. ते अनेक झान ए नाम.३ज्ञानमांजैयनी वायावे ते मेलबुं वे. तेथी मंजन केय ए नाम दे. ४ ज्यां सुधी ज्ञेय ते त्यां नुधी ज्ञान ठे. श्रेय उपरांत ज्ञान नयी तेयी ज्या जगी कंय ए नामले ए सर्व व मची विद्वान वे. तेनु तेज नामवे. इंप दंवन प्रमा रोजान , तेथी केय देवमान एनाम ने. ७ जीव वन्नु जगतमां नयी तैयीनास्ति जीव ए नाम, देहनी नाग यवाचीजीवनों पण नागनेयीजीव नागए नामने, देद् उपजवाथी जीव विगजे ने, तथा देह त्यां जीवोत्पाट ए नामने १० यात्मा ने ते यचंतन पदार्थ दे तथा यचंतन ज्ञाता ए नाम रे ११ मनाना धन ते जीव कदिने, पण यात्मा धंस मात्र ए नाम ले ? जीव ते.ते कृष्णनंगुर ने तेथी गज नाम १३, ज्ञान लेते हायक सम्पमां नयी तेथी घडायक ज्ञान ए नाम ने १४ एवीएवी एकात श्रवस्या मृट लोको पाम ते, ए नयना नेट जाणवा ॥ ५० ॥ हवे हान, कागा . एजे प्रयम नय कई नेनो प्रपंच को देगाने:- श्रय ठानको कारन इंप प्रयम नय यदु कयन.- सवैया कनीना:- कोउ मृट कई जन प्रथम नमारिनोनि. पोडे नाक टपर चित्र प्रादो जेसियन मृत वान्न प्राट बट पट जमो. नमो नादान नप सारज विशेरिय दानी कहे जनी बन्न ननावनाय ना.नान दान पनि .

, ५२० समयसारनाटक निन्न पद पेपिये, कारन कारज दोउ एकहीमे निहचे पें, तेरो मत साचो विवहार दृष्टि देखीये ॥ ५०१ ॥ अर्थ- कोई मीमासक ते शिप्य लोकने एम समजावे ते के, जेम प्रथम नितने समारी होय तोपठी तेना नपर चित्र सारं थाय, थने नरसी उपर नरमुं चित्र थाय, तेम ज्ञाननी उत्पत्तिनु कारण मन ठे, पण जेवो घटपट प्रमुख पदार्थ हो य तेवुज तिहाज्ञानरूप कार्य विशेप थाय ने, जो घटपदार्थ जाणवा योग्य होय तो घट झान होय, अने पट पदार्थमा पट ज्ञान होय, तेथी ज्ञान- कारण झेय , हवे तेने स्यावाद ज्ञानी एम कहे के, यहो नाई, जे जेवी वस्तु ने तेनो स्वनाव पण तेवोज ,जे ज्ञानपदार्थ ठे तेनो स्वनाव जाणवानोज ,थने जे शेयपदार्थ वे ते जाणवा योग्यज दे, या अर्थ नेदथी ज्ञान थने झेय एबने जुदा पद जाणवा थहीं जे झेय कारण पणे कह्यो तेज ज्ञान विकल्पे कयु, तेथी घटपटादि जगत ले ते जड पदार्थ दूर रह्या,यने ज्ञान के तेज सामान्य पणे ने तेथी निवे नयथी तो ज्ञानमां झेय पामिये,पण व्यवहार दृष्टियापता तो ताहारु मत पण साचुते ५०१ हवे वीजा एकात नय यात्मा त्रिलोकमय वे तेनो प्रपच देखाडे ठे थथ ऽतिय नय थातमा त्रिलोक प्रमानयहु कथन सर्वया तीसा - कोड मिथ्यामति लोकालोक व्यापि ज्ञान मानि, समुफे त्रि लोक पिम थातम दर्व है, याहिते सुन्द नयो मोले मुप हू न बोले कहे याज गतमें हमारोई खरव है, तासों ज्ञाता कहे जीव जगतसों निन्न पै जगतको विकासी तोहि याहीते गरव है, जो वस्तु सो वस्तु पररूपसों निराली सदा, निह प्रमान म्यादवादमें सरव है, ॥ ५० ॥ थर्थ- कोई नैयायिक पेशेषिक मिथ्याति ले ते झानने लोकालोक व्यापीमा नीने एवु समझें वे के जीव विज्ञाननो पिम ने विज्ञान लेते लोकालोक ध्यापीठे तेथी थात्मव्य त्रण लोक प्रमाण तेथी पोताने सर्व व्यापी ईश्वर मानीने सनद थयो मोले थनिमानमा चढ्यो थको वीजाने मूर्ख मानीने कोई नो साये मुखयी न बोले जो बोले तो एम कहे के था जगतमा हमारीज खरव के सर्व रचना वे हवे तेने साझाद ज्ञानी कहे वे के थहो ना जीव जे वे ते जगतयी निन्न ले पण तेना झानमा जगतनो विकास तेथी वरपणानो गर्व चढचोठे पण वन्नु वे तेतो पोताना स्वरूपमाजरहे थने परसरूपथी सदा जुदी रहे ठे तेथी जगतयनेथात्माने निये नयना प्रमाणयीस्यावादमा सर्वथा विवरोष पामिए ५०२ - D समयसारनाटक. ઘg? - हवे त्रीजो एकांत नय ते यथी ज्ञाननो थनेक प्रपंच कहि देखाडे:- यथ त्रितीय शेयसो अनेक ज्ञान कथनः- सर्वया इकतीसाः- कोउ पशु झानकी अनंत विचित्रा देखे, शेयको थाकार नाना रूप विततयों है; ताहीको विचारी कहे ज्ञानकी अनेक सत्ता, गहिके एकंत पद लोकनिसों लर्यो है : ताको भ्रम नंजवेको ज्ञानवंत कहे ज्ञान, धगम थ गाय निरावाध रत नर्यों है; शायक सुनाई परजाईतों थनेक नयो, जद्यपि त थापि एकतासों नहिं टर्यों है; ॥ ५०३ ॥ थर्थः- कोई पशु के० मूर्ख झाननी अनंत विचित्रता देखेठे. तनो हेतु कहे वे. जगतमा जेय वस्तु अनंत ठे, तेना आकार अनंत वे. ते ज्ञानमां परणमे के तेथी ज्ञानपण नानाप्रकारथी विस्तरे , यने तेना नाना रूप विस्तारने विचा रीने छाननी थनंत सत्ता माने ते. एवो एकांत पर लाने प्रतिवादी लोकथी लडे वे. हवे स्याहादी ज्ञानवंत ते एकान्तपदीना भ्रम नांजवाने एम कहेने के, यहो नाई तुं ज्ञानने यनो थाकार परणम्यो जाणीने केम जूले वे ? शान वे ते अगम्य वस्तु . निरावाध रसथी नो वे. ज्ञाननो ज्ञायक स्वनाव ठे, तेथी यद्यपि पर्याय शक्तिथी झान बनेकरूप ययुं वे. तथापि ज्ञायक स्वनावधी ज्ञाननी एकताज . पण ते एकताथी ज्ञान टलतुं नथी. ॥ ५०३ ॥ हवे चोथा नयमां ज्ञाननेविप झेयनी गयानो प्रपंच देखामे :- थथ चतुर्थ होय वाया यह कथनः- सवैया कितीता:- कोउ कुधी कहे ज्ञानमांहि झेयको थाकार, प्रतिनाति रह्यो कलंक ताहि धोइए; जब ध्यान जलतों परवारिक धवल कीजे, सब निराकार शु ६ ज्ञान होइए; तासों स्यादादी कहे ज्ञानको सुनार यहे, शेयको थाकार वस्तु नाहि कहा खोइए; जैसे नाना रूप प्रतिबिंबकी फलक दीसे, जदपि तथापि या रसी विमल जोशए. ॥ ५० ॥ थर्यः-कोई कुधी के कुबुद्धि वैशेषिक मतवालो एम कहे ठे के,जो जगत वासी जीवना ज्ञानमांज रेयनो थाकार प्रतिनासे , ते याकार तो निराकार ज्ञान, कलंक उपजेते. तेने धोई नाखवो जोए, तेथी निराकारनुं ध्यान लगाढवू ततो जल थपुं, ते जलथी प्रदालीने ते ज्ञानने उज्वल करि तेवार निराकार शुक्ष ज्ञानमय थवाय ठे, हवे याही स्यामादी तेने कहे . थरे नाई ज्ञाननो एज स्वनाव , ५३० समयसारनाटक. . निन्न पद पेपिये, कारन कारज दोउ एकहीमे निहचे पें, तेरो मत साचो विवहार दृष्टि देखीये ॥ ५० ॥ अर्थ- कोई मूढ मीमांसक ते शिष्य लोकने एम समजावे ले के, जेम प्रथम नितने समारी होय तोपठी तेना उपर चित्र सारु थाय, थने नरसी उपर नरसु चित्र थाय, तेम ज्ञाननी उत्पत्निनु कारण मन ठे, पण जेवो घटपट प्रमुग्य पदार्थ हो य तेवुज तिहांझानरूप कार्य विरोप थाय ने, जो घटपदार्य जाणवा योग्य होय तो घट ज्ञान होय, श्रने पट पदार्थमा पट ज्ञान होय, तेथी ज्ञाननु कारण झेय ने, हवे तेने स्यावाद ज्ञानी एम कहेठे के, थहो नाई, जे जेवी वस्तु के तेनो स्वनाव पण तेवोज ,जे ज्ञानपदार्थ । तेनो स्वनाव जाणवानोज , थने जे शेयपदार्थ ठे ते जाणवा योग्यज , था थर्थ जेदथी शान थने झेय ए बने जुदा पद जाणवा अही जे झेय कारण पणे कह्यो तेज ज्ञान विकल्पे कत्यु, तेथी घटपटादि जगत ४ ते जड पदार्थ दूर रह्या,अने ज्ञान वे तेज सामान्य पणे तेथी निभे नयथी तो ज्ञानमा झेय पामिये,पण व्यवहार दृष्टि थापता तो ताहारु मत पण साचुठे५०१ हवे बीजा एकात नय यात्मा त्रिलोकमय वे तेनो प्रपच देखाडे ने अथ उतिय नय यातमा त्रिलोक प्रमानयह कथन सवैया झतीसा- कोउ मिय्यामति लोकालोक व्यापि ज्ञान मानि, समुफे त्रि लोक पिम यातम दर्व है, याहिते सुब्द नयो मोले मुष हू न बोले कहे याज गतमें हमारोई खरव है, तासों ज्ञाता कहे जीव जगतों निन्न पे जगतको विकासी तोहि याहीते गरव है, जो वस्त सो वस्तु पररूपसों निराली सदा, निहंचे प्रमान स्यादवादमें सरव है, ॥ ५० ॥ अर्थ - कोई नैयायिक वैशेषिक मिथ्याति ते झानने लोकालोक व्यापी मा नीने एवु समफे के के जीवडे ते विज्ञाननो पिमले थने विज्ञान ले ते लोकालोक व्यापी ने तेथी यात्मश्व्य त्रण लोक प्रमाण ने तेथी पोताने सर्व व्यापी ईश्वर मानीने स्ववद थयो मोले ले यनिमानमा चढ्यो थको बीजाने मूर्ख मानीने कोई नो साथे मुखथी न बोले जो बोले तो एम कहे के था जगतमा हमारीज खरब के सर्व रचना ने हवे तेने साक्षाद ज्ञानी कहे जे के यहो जाई जीव जे जे ते जगतथी निन्न वे पण तेना झानमा जगतनो विकास ने तेथी ईश्वरपणानो गर्व चढयोडे पण जे वस्तु वे तेतो पोताना स्वरूपमांज रहे थने परस्वरूपथी सदा जुदी रहे जे तेथी जगत थनेथात्माने निश्चे नयना प्रमाणथी स्यावादमा सर्वथा विवरोध पामिए ५०२ समयसारनाटक. ५२२ हवे त्रीजो एकांत नय ते शेयथी ज्ञाननो थनेक प्रपंच कहि देखाडे:- यय त्रितीय झेयसो अनेक ज्ञान कथन:- सर्वया इकतीताः- कोउ पगु ज्ञानकी अनंत विचित्राई देखे, शेयको श्राकार नाना रूप विसतयों है ; ताहीकों विचारी कहे ज्ञानकी यनेक सत्ता, गहिके एकंत पच लोकनिसों लयों है: ताको भ्रम नंजवेकों ज्ञानवंत कहे ज्ञान, अगम थ गाध निरावाध रस नर्यों है ; ज्ञायक सुनाई परजाईसों थनेक नयो, जद्यपि त थापि एकतातों नहिं टर्यो है; ॥ ५७३ ॥ थर्थः- कोई पद्य के मूर्ख ज्ञाननी अनंत विचित्रता देखेठे. तेनो हेतु कहे वे. जगतमां ज्ञेय वस्तु अनंत ठे, तेना आकार अनंत बे. ते ज्ञानमां परणमे के तेथी झानपण नानाप्रकारथी विस्तरे , यने तेना नाना रूप विस्तारने विचा रीने झाननी धनंत सत्ता माने ते. एवो एकांत पद लईने प्रतिवादी लोकथी लडे . हवे स्याहाटी ज्ञानवंत ते एकान्तपदीना नम नांजवाने एम कहे। के, अहो नाई तुं ज्ञानने केयनो याकार परणम्यो जापीने केम नूले ? ज्ञान वे ते अगम्य वस्तु ठे. निरावाध रसथी नर्यो . ज्ञाननो शायक वनाव ,तेथी यद्यपि पर्याय शक्तिथी ज्ञान थनेकरूप ययुं . तथापि शायक स्वनावधी ज्ञाननी एकताज , पण ते एकताथी ज्ञान टलतुं नथी. ॥ ५७३ ॥ हवे चोथा नयमां ज्ञाननेविपे झेयनी वायानो प्रपंच देखामे वे.- थथ चतुर्थ शेय ठाया यह कथन:- सवैया इकतीसाः- कोउ कुधी कहे ज्ञानमांहि ज्ञेयको थाकार, प्रतिनासि रह्यो हे कलंक ताहि धोइए; जव ध्यान जलसों परवारिके धवल कोजे, सब निराकार शु ६ ज्ञानमई होइए; तासों स्याहादी कहे ज्ञानको सुनाउ यहे, झेयको थाकार वस्तु नाहि कहा खोइए; जैसे नाना रूप प्रतिविंवकी फलक दीसे, जदपि तथापि या रसी विमल जोशए. ॥ ५० ॥ थर्थः-कोई कुधी के कुबुद्धि वैशेषिक मतवालो एम कहे ते के, जो जगत वासी जीवना ज्ञानमांज यनो थाकार प्रतिनासे , ते याकार तो निराकार झाननुं कलंक उपजेते तेने धोई नाखवो जोए, तेथी निराकार- ध्यान लगाडq तेतो जल थपुं, ते जलथी प्रदालीने ते ज्ञानने उज्वल करिये तेवारें निराकार शुक्ष ज्ञानमय थवाय ते, हवे यांही स्याहादी तेने कहे ते. बरे नाई ज्ञाननो एज खनाव ठे, ५२ समयसारनाटक. - N के झेयनो श्राकार वस्तुमा नासे तो थाही थाकार गमावी नारखवानी शु मतलब ते जेम थारसीमा नाना रूप प्रति बिवनो जनकाट देखाय तो पण थारसी निर्मल जोशए पण तेने प्रतिबिबनु कनक कोई न कहे ॥ ५० ॥ -हवे पांचमो एकांतनय ते ज्या समें क्षेय त्यां लगें ज्ञान तेनो प्रपंच कही देखाडेठे थप पचम जौलो झेय तोलो ज्ञान यह कथन सवैया इकतीसा- कोउ था कहे ज्ञेयाकार ज्ञान परिनाम जोलों विद्यमा न तीनों शान परगट है झेयके विनाश होत ज्ञानको पिनास हो, ऐसी वार्क हिरदे मिण्यातको अलट है, तासों समकितवत कहे थनुनी कहान. परजे प्रया न झान नानाकार नट है, निरविकलप थविनस्वर दरव रूप, ज्ञानझेय वस्तुसों श्रव्यापक अघट है ॥ ५०५॥ अर्थ - कोई अजाण पुरुप एवु कहे के जेवो झेयनो थाकार तेवु ज्ञाननु परिणाम थायजे, तेथी झेय विद्यमान ज्या लगी होय, त्यो लगी ज्ञान प्रगट रहे। अने झेयनो विनाश थये ज्ञाननो पण विनाश थायडे, एवी वात मिय्यामतीना ह दयमा मिथ्यानी अलट लागी रहेडे , हवे तेनाथी सम्यकवत स्यावादी अनुनय नी कथा कहेले बरे नाई, जेम कोई नट पुरुष वे ते नाना प्रकारना प धारी ने नाना प्रकारना नाम धरावे, तेम ज्ञानरूप नट दे, ते नाना थाकार धरीने पर्याय प्रमाणे बदुरूपी थाय पण जेवु नट इव्य एक ले तेवु शान वस्तु पण निर्विकल्प एक , इव्यपणे अविनस्वर ने अने ज्ञान वस्तु ते झेय वस्तुर्थी श्रव्यापक , एटले झेयवस्तु ज्ञान वस्तुमा एक मेक न थाय तेथी ज्ञान ईयनी एकत्ता घटती ॥५०५॥ हवे हा एकांतनय सर्व व्यमयी आत्मानो प्रपंच कही देरवाडे ने थथ पष्टम सर्व दर्वमय थातमा यह कथन सवैया इकतीसा -कोन मद कहे धर्म अधर्म थाकास काल, पुदगल जीवस व मेरो रूप जगमें, जाने न मरम निज मानें आपा परवस्तु बधे दिढ करम धरम खोवे मगमें , समकिती जीव सुन अनुनो बन्यासे तातें परको ममत्व त्याग करे पग पगमें, अपने सुनावमे मगन रहे थानों जाम, धारा वाही पथिक करावे मो प मगमें ॥ ५०६॥ थर्थ- कोई मूर्ख ब्रह्मावैतवादी एबु कहे रे के जो कोईनां मतमा धर्म अध म याकाश काल जीव, पुदगल ए एव्य कहेवाय ने ते सर्व ब्रह्म-डे तेथी मा रु पारुप सर्व जगतमा विस्तार रयु ने बीजो पदार्थ कोई नथी थांही गुरु शि - - समयसारनाटक. ५२३ प्यने कहे . थहो शिष्य एतो ब्रह्मा तिवादी मूढ मती ठे, ते पोतानो मर्म जाण तो नथी, थने पर वस्तु वे तेने यात्मा जाणे के. एवा मिथ्यात्वथी ए दृढ कर्म वां धे . अने जगतमा पोतानो धर्म खोवे वे. पोतानो स्वनाव गमावे वे. जे सम केती जीव होय तेतो सोहं चीजना ध्यानथी गु६ धनुनवनो अन्यास करे, तेथी धात्मतत्व जुउंज पामे. अने पगले पगले परवस्तुनो त्याग करे, धने पोताना शु ६ स्वनावमां याते प्रहर मगन रहे, तेथी ज्ञान धारामां वहेनारो मोद मार्गमां चालनारो कहेवाय ते ॥ ६ ॥ हवे सातमो एकांत नय जे झेय क्षेत्र प्रमाण ज्ञान तेनो प्रपंच कहि देखाडेठे यथ सप्तम झेय क्षेत्र प्रमाण ज्ञान यह कयनः- सवैया इकतीसा.- कोउ सठ कहे जेतो केयरूप परवान, तेतो झान ता ते कई अधिक न और है; तिहूं काल पर नेत्र व्यापी परनयो माने, आपा न पि वाने ऐसी मिथ्या हग दौर है; जैन मती कहे जीव सत्ता परवान ज्ञान, यसोय व्यापक जगत सिर मोर है; ज्ञानकी प्रनामें प्रतिबिंबित विविध ज्ञेय, नदापि तथा पि थिति न्यारी न्यारी तौर है ॥ ५०७ ॥ यर्थः- कोई मूर्ख एम कहे वे के जेटलुं ज्ञेय वस्तुनो श्राकाररूपर्नु प्रमाण वे एटले झेयनो जेटटुं एक नाहानुं मोहोटुं प्रमाण ठे. तेटलुं ज्ञाननुं प्रमाण वे. थी कोई वधारे वीजो प्रमाण नथी एम ज्ञानने त्रणे कालमां परदेव व्यापी थ ने पर वस्तुथी परिणम्यो, एटले केयथी एक मेक थयो झानने माने वे. पण झानने थात्मारूप जाणे नहीं; एवी मिथ्या दृष्टिनी दोर वे. हवे तेने जनमती स्या दाटी कहे ते. अहो नाई, जेटलां श्राकाश देवमां जीव सत्ता तेटलाज प्रमाण छान वे. घने ज्ञान ले ते घट पटाटिक झेय पदार्थथी अव्यापक वे एज जगतना मस्तके मुगट समान वे. जो पण ए ज्ञाननी प्रनामां नाना प्रकारना से च पदार्थ प्रतिविवित थ रह्यावे, तोपण छाननी स्थिति जूटीज के यने झेयनी स्थिति पण जुदीजवे.थने शान-ठेकाणुं थात्मा ते पण जुदोज ठे, घने इयना एथिवी प्रमुख जे ठेकाणा ते पण जुदाज ॥ ५०७ ॥ हवे थाउमो नय नास्तिकवादी एम कहे ते के वस्तु नथी एज एकांत नय ते. तेनो प्रपंच कही देखाडे :-थथ अष्टम नास्तिकवादी वस्तु नाही यह कथन:- सवैया इकतीसा.-कोच शून्यवादी कहे ज्ञेयके विनास होत, ज्ञानको विनाश होइ कहो केसे जीजियें; तातें जीवितव्यताकी थिरता निमिन धव, झयाकार परि ते समयसारनाटक. - यनो श्राकार वस्तुमा नासे तो थाही थाकार गमावी नारखवानी शुं मतलब जेम थारसीमा नाना रूप प्रति बिवनो फलकाट देखाय ये तो पण थारसी नर्मल जोइए पण तेने प्रतिबिधनु कनक कोई न कहे. ॥ ५० ॥ हवे पांचमी एकांतनय ते ज्या लगे झेय त्यां लगें शान तेनो प्रपंच कही देखाउने अप पचम जौलो ज्ञेय तोलो ज्ञान यह कथन सवैया इकतीसा - कोउ था कहे ज्ञेयाकार ज्ञान परिनाम जोलों विद्यमा न तौलों ज्ञान परगट है , शेयके विनाश होत ज्ञानको विनास हो, ऐसी वार्क हेरदे मिथ्यातकी अलट है, तासों समकितवत कहे थनुनी कहान, परजे प्रया न ज्ञान नानाकार नट है, निरविकलप थपिनस्वर दरव रूप, ज्ञानज्ञेय वस्तुसों अव्यापक अघट है ॥ ५५ ॥ अर्थ- कोई अजाण पुरुप एवु कहे के जेवो झेयनो थाकार तेवु ज्ञाननु परिणाम थायजे, तेथी झेय विद्यमान ज्या लगी होय, त्यां लगी ज्ञान प्रगट रहेठे यने शेयनो विनाश यये ज्ञाननो पण विनाश थायडे, एवी वात मिथ्यामतीनाह दयमा मिथ्यानी अलट लागी रहे, हवे तेनाथी सम्यकवत स्यावादी धनुनव नी कथा कहे। अरे नाई, जेम कोई नट पुरुप वे ते नाना प्रकारना नेप धारी ने नाना प्रकारना नाम धरावे, तेम ज्ञानरूप नटले, ते नाना थाकार धरीने पर्याय प्रमाणे बदुरूपी थायडे पण जेवु नट इव्य एक ने तेवु ज्ञान वस्तु पण निर्विकल्प एक बे, इव्यपणे अविनस्वर ले धने ज्ञान वस्तु ते ज्ञेय वस्तु थव्यापक , एटले ज्ञेयवस्तु झान वस्तुमा एक मेक न थाय तेथी ज्ञान यिनी एकता घटती ने ॥५०५॥ हवे उस एकातनय सर्व इव्यमयी आत्मानो प्रपंच कही देखाडे थथ पटम सर्व दर्वमय थातमा यह कथन'- सवैया इकतीसा-कोउ मद कहे धर्म अधर्म थाकास काल, पुदगल जीवस ब मेरो रूप जगमें , जाने न मरम निजमाने थापा परवस्तु बधे दिट करम धरम खोवे मगमें, समकिती जीव सुख अनुनो थन्यासे तातें परको ममत्व त्याग करे पग पगमे, अपने सुनावमे मगन रहे थामें जाम, धारा वाही पंथिक करावे मो प मगमें ॥ ५०६ ॥ अर्थ- कोई मूर्ख ब्रह्मादेतवादी एबु कहे ते के जो कोईनां मतमा धर्म अध मै थाकाश काल जीव पुदगल एन एव्य कहेवाय ने ते सर्व ब्रह्म-वे तेथीमा रु पणरुप सर्व जगतमा विस्तरि रघु ने बीजो पदार्थ कोई नयी थांही गुरु शि . - -

No text on this page.

- - , ५२६ समयसारनाटक. त्रणे कालमा यात्मा अचेतन थय. एवं माहारो मत छे. हवे पंमित स्यावादी क हे जे अहो नाई ज्ञान वस्तु सहज सनावे थखमित , अने झेयनों श्राकार धरेठे तोपण शेयथी विरक्त जेम धारसीमा थाकार नासे तोपण ते थाकाररूप धार सीन थाय, जो चेतना लदानोपण नाश मानीए तो जीवनी सनानो पण ना श थाय, त्यारे जीव वस्तु पण यसत् थाय, तेथी जीप तत्व जे ते ज्ञान चेतनाना प्रमाणथीज मानीए ॥ १२ ॥ हवे बारमो एकात नय यसप्रमाण जीव सत्तानो प्रपच कही बतावे ठे यथ दादशम यस प्रमान सत्ता यह कथन सवैया इकतीसा - कोच महा मूरप कदत एक पिममाहि, जहालों थचित चित श्रग सहलहे है, जोगरूप जोग रूप नाना कार ज्ञेय रूप, जेते नेद करम के तेते जीव कहे है, मतिमान कहे एक पिमाहि एक जीव, ताहीके थनत जाव यस फेलिरहे हे पुग्गलसों निन्न कर्म जोगसों अखिन्न सदा, उपजे विन से थिरता सुनाव गहे है ॥ १३ ॥ थर्थ-कोई बौधमती महा मूर्ख एम कहेटे के, एक शरीरमा ज्या लगी आदि तचित थंग के घटपटादिक थचेतन विकल्प अथवा नर अमर तिर्यचादि चेतन थ गते सचित विकल्प चकचकी रह्यावे, योगपरिणामथी योगरूप जोगपरिणामथी नोगरूप एम शेयनां नानाप्रकार रूप जेटलां कर्म के क्रियाना नेद थाय ते टलाने जीव सख्या कहेडे, एटले जीव सत्ता थस प्रमाण थई, हवे पुश्वित स्यामा दी एम कहे के, थहो नाई एक मिमा एक जीव थने ते जीवना ज्ञान परि पामे करीने बनत नाव नासनरूप अस फेली रह्या ले पण जीव ते पुदगल थी निन्न ,थने कर्मयोगथी थनिन्न के निराकुन ठे, तेमा नाव अस धनत न पजेले भने बनत विणसे ठे पण जीवतो स्थिरतारुपज ग्रही रह्यो रे ॥ १३ ॥ हवे तेरमो एकातनय नगुर जीवनो प्रपच कही देखाडे ठे. थथ त्रयोदशम लिननगुर जीव यह कथन सवैया इकतीसा - कोउ एक निनवादी कहे एक पिममाहि, एक जीव उपजत एक विनसतु है ; जाही समै थतर नवीन उतपति दुइ ताही समै प्रथम पुरातन वसतु है; सरवग वादी कहे जेसे जलवस्तु एक, सोइ जलविविध तरगनि लसतु है तेसे एक थातम दरव गुनपरजेसों अनेक नयो में एक रूप दरसतु है ॥ १॥ थर्थ - कोई एक क्षणवादी बौध एम कहे के एक पिममा एक जीव उपजे समयसारनाटक. ५३२ है. एक जीव विणसे .जे समे पिंममा नवा जीवनी उत्पत्ति न थाय ते समे पे हलो पुराणो जीव ते वसे , पठी ते विणसेठे. एम शृंखला बंध उपजे विणसे , तेने सर्वांगवादी जैनमती एम कहे के अहो नाई, जेम तलाव प्रमुख ज लाश्रयमां जल वस्तु एक वे तेज जल विविध तरंगे करी लसित के निन्न जिन्न देखाय ते, तेम एक प्रात्मा इव्य ते गुण पर्यायथी अनेक रूप थयो ये तोपण इव्यार्थिक नये एक रूपेंज देखीए . ॥ १४ ॥ हवे चउदमो एकांतनय ज्ञायक यज्ञायकनो प्रपंच कही बतावे :- अथ चतुर्दशम अझायक ज्ञायक नय यह कथन:- सवैया इकतीसाः- कोउ वाल बुद्धि कहे ज्ञायक सकति जोलों, तोलों ज्ञान अहम जगत मध्य जानिये ; शायक सकति काल पाई मिटि जाई जब, तब ५ विरोध बोध विमल वखानिये; परम प्रवीन कहे ऐसी तो न बनें वाही, जैसे विनु परगास सरजन मानिये; तेसें विनुं झायक सकति न कहावे ज्ञान, यहतो न पट परतद परवानिये. ॥१५॥ अर्थ.- जेनी बालकना जेवी तुल बुधि ले. एवो कोई गुन्य वादी तथागत कहे के,ज्यां लगे ज्ञानमा ज्ञायक शक्ति , त्यां लगें जगतमा ज्ञान अद्यम कहे वायठे, तेनो एज परमार्थ , के जे झायकपणुं वे ते विकल्परूप वे.अने विकल्प थी शान अगुम थाय ठे, तेथी निर्विकल्प ज्ञान गुरु . ज्यारे नवितव्यताने व शथी पोतानो समय प्रस्ताव पामीने झायक शक्ति से ते मटी जाय, त्यारेज विक ल्पना विरोधथी रहित एवं बोध के झान ते विमल के शु६ वरवाणीए. हवे एने परम प्रवीण स्या दादी कहे:- अरे नाई जे तुं झायक एकतामां विकल्प मानीने शंका पामेठे, अने ज्ञायक पणुं यक्ष मानेठे, ए वात बने नही. जेम प्रका गविना सूर्य मान्यो न जाय, थने प्रकाशथीज सूर्य मान्यो जाय, तेम शायक श क्तिविना झानपण कहेवाय नही, जो तमे अनुमानप्रमाणथी तमारो पद साधन करता नथी, तो प्रत्यद प्रमाणथी पण तमारो पद प्रमाण कीधो न जाय, तेथी तमारो पद वे ते पदानास डे. ॥ १५ ॥ हवे जेणे चन्द एकांत नय हटावी दीधा एवो जे स्यामाद तेनी स्तुतिकरे:- अथ स्यादवाद प्रशंसा कथन:- दोहरा.-इह विधि यातम डान हित, स्याटवाद परवान, जाके वचन वि चारसों, मूरख हो। सुजान ॥ १६ ॥ स्यादवाद यातम सदा, ता कारन बल एएG समयसारनाटक. ॥ ॥ ॥ चीन, शिव साधक बाधा रहित, थपे थखमित थान ॥१॥ स्यादवाद थधिकार यह, कह्यो थलप विसतार, अमृत चद मुनिवर कहे, साधक साधि ज्वार ॥१॥ थर्थ-यावी रीते थात्माना झाननो हितकारी स्यावाद मत ठे, तेज प्रमा ए जाणवो जे स्यावादनी वचन युक्तिमा पूर्व मूर्ख होय ते मुजाण थाय ॥१६ जे स्यावाद स्वरुपये तेज थात्मानी दशा में ते कारणथी स्यावाद वे ते महा बलवान वे मोदनु साधक दे, थने कोई युक्तिथी नांगे नही, तेथी ते वाधा रहित थदय भने सर्व नयमा फेलि रह्यो के तेथीथखमित एनीबाण ॥१॥ श्री याचार्य एम कहे ने के, था कईक स्यावादनो अधिकार अल्पविस्तारथी कह्यो हवे श्री अमृतचद थाचार्य बारमो साध्य साधक बार कहे रे ॥१७॥ इति श्री नाटक समयसारना श्यारमा स्याद नामा धारनो थधिकार बालाबोध प्तहित समाप्त ॥ हवे साध्य वस्तु अने साधक वस्तुनु स्वरूप देखाडे ठे अथ श्री साध्य साधक स्वरूप कथन- सवैया इकतीसा-जो जीव वस्तु थस्ति प्रमेय थगुरु लघु, थजोगी अमूरतिक पर देशवत हे, उतपतिरूप नाशरूप अविचल रूप, रतनत्रयादि गुण नेदसो धनत है, सोई जीव दरव प्रवान सदा एकरूप, ऐसो शुभ निहचे सुनाउ विरतंत हे, स्यादवाव माहि साधि पद थधिकार कह्यो, थव थागे कहिवेकों साधक सिधात हे ॥ १५ ॥ दोहरा - साधि शुक्ष केवल दशा, यथया सिक महत, साधक अविरत था दिनुध , तीन मोह परजत ॥२०॥ यर्थ - जे कोई जीव वस्तु ने ते इव्यथी यस्तिपणे प्रमेयपणे थगुरु लघु प णे थनोगीपणे थमूर्तिक पणे, प्रदेशवत पणे, प्रवर्ते , तेमा जे नास्तिपण नही ते थस्तिपणु जानु, थने प्रमाण ग्रहण करवा योग्य, तेथी प्रमेपपणं वे यपुदगलीक पणाचीथगुरु लघुपाणु वे, इत्यादि धर्म ले उत्पत्तिरूप पर्यायथा वि नाश रूप पर्याययी थविचलरूपी ज्ञान दर्शन चारित्र रत्नत्रय कहिए. इत्यादि क गुणेना नेदयी अनत पणु लीयो यत्ते के तेज जीवइव्य एकरूपज सदा माण ते एकरूपने अस्तित्व प्रमेयत्वादिक धर्म करी थागल कह्यो तेज शुद्ध निधयनपथी एनो एवो सनाव वृत्तांत से तेज साध्य पद का एटने साधवाना यक यम्नु ते स्यावाद थधिकारमा का हवे बागल एने साधवानु सिक्षात सापकने समयसारनाटक. एए ॥ || सुन केवलीनी दयाने साध्य वस्तु कहीए. अथवा महंत सिपएं ते माध्य बस्तु ने. धनं चोथा घविरत गुणगाणाधी मामीने बाग्मां कीण मोह गुणा या पर्यंत नव गुणगणाना धणी जे बुध के पंमित ने. ते सर्वेने साध्य कहीए.२० दवे प्रविग्त्यादि साधफनी व्यवस्था कहने-अथ साधक व्यवस्था कथन:- सर्व या फितीमा:- जाको थधो अपूरव धनवर्ति करनको, जयो लान नई गु से बचनकी बोदनी; जाके अनंतानुबंध क्रोधमान माया लोन,अनादि मिथ्यात मि श्र समकित मोहनी, सातों परकिति खपी किवा उपसमीजाके, जगी उरमांही समकित कला सोहनी; सोऽ मोद साधक कहायो ताके सरवंग, प्रगटी गगतिगुन थानक थारोदनी. ॥ २१ ॥ लोरठा:-जाको मुगति समीप, नई नव स्थिति घट गई; ताकी मनसा सीप, सुगुरु मेघ मुकता वचन. ॥ २२ ॥ अर्थः- जे जीवने श्रधो के छ यथाप्रवत्ति करणनो अने अपूर्व करणनो तथा थनिवृत करणनो लान थयो, एटले ए सम्यक्त प्राप्तिनात्रा करण तेनो लान थयो, घने जेने गुरु वचननी बोहनी थर्ड एटले गुरु उपदेशनो लान थयो , तेथी अनंतानुबंधी कोष मान माया थने लोन, तथा अनादिकालना मिथ्यात मोहनी, मिश्रमोहनी थने सम्यक्त मोहनी, ए सात प्रति जेनी क्ष्य थई, अथवा उप शमी अथवा सातेमा कंश खपी कंश उपशमी, एवी जेना हैयामां सुहामणी सम कितनी कला जागी. तेज जीव मोक्नो साधनारो कहेवाय. तेना सर्व अंगमां एट से वाह्य थन्यंतर अंगमा गुणस्यानक थारोहणी के चढवानी शक्ति प्रगट॥२॥ जेने नवस्थितिना परिपाकथी मुक्ति समीप थई, यने संसारनी स्थित घटी गई, ते पुरुपनी मनसा शीप समान थई, त्यां सदगुरु ते मेघ समान थयो, ते सदगुरुना वचन तेनी मनसारूप सीपमा थमौलिक मोती जेवा यया थका रुचे ॥ २२ ॥ हवे सदगुरुने मेवनी उपमा कहीने स्तवे :- थथ गुरु प्रशंसाः- दोहरा- ज्यों वरपे बरपा समे, मेघ अखंमित धार, त्यों सदगुरु वानी खिरें, जगत जीव हितकार ॥ २३ ॥ अर्थ:-जेम वरसाद कालमा मेघ यखमित धारायें वरसे. तेमज सदगुरु हो य ते जगतवासी जीवने हित कारक अमृत वाणी खेरे ॥ २३ ॥ हवे सदगुरुना उपटेश यादेपणी धर्म कथा कहे :- श्रथ उपदेश कथन:- सवैया तेईसाः- चेतनजी तुमजागि विलोकहुँ लाग रहे कहाँ मायाकि ताई, आय कहीं कहीं तुम जागे माया रहेगि जहाकि तहाई; माया तुह्मारि ५३० समयसारनाटक - . " न जाति न पाति न वसकि वेली न थसकि कोई, दासि किए बिनु लातनि मारत, एसि थनीति न कीजे गुसाई ॥ ॥ दोहरा - माया गया एक हे, घटे वढे बिनमाहि, इन्दकी सगति जे लगे, तिनहि कई सुख नाहि ॥२५॥ सवैया तेईसा लोगनिसो कनु नातों न तेरों न तो कतू इह लोगों नांतो, ए तों रहेरमि स्वारथके रस, तू परमारथके रस मातो, ए तनसों तनमे तनसे जड, चेतन तू त नसो नित हातो, होहि सुखी अपनो वल तोरिके राग चिराग विरोधका तातो ॥ २६ ॥ सोरता - जे उरबुद्धीजीव, ते उतग पदवी चहे, जे समरसी सदीव, तिन्हको कतून चाहिए ॥ २७ ॥ सवैया इकतीसा -दासीमे विपाद वसे विद्यामें विवाद बसे, कायामे मरन गुरुवर्तनमे हीनता, सुचिमे गिलान बसे प्रापतिमें हानि वसे, जैमें हारि सुदर दशामे बबिधीनता, रोग वसे जोगमें सयोगमे वियोग बसे,गु नमे गरर बसे सेवामाहि दीनता, और जगरीति जेती गनित असाता सेती, साताकी सहेली है थकेली उदासीनता ॥ २७ ॥ दोहरा -जिहि तंग चढि फिरि पतन, नहि उतंग बहिकृप, जिहि सुख थत्तर नयवसे, सो सुख है उखरूप ॥ २५ ॥ जो विलसे सुप सपदा, गये ताहि उख होइ, जो धरती बहु त्रिणवती, जरे अगनि सो सोई ॥ ३० ॥ इति गुरुउपदेस समाप्त दोहरा - सबदमाहि सतगुरु कहे, प्रगटरुप जिन धर्म, सुनत विचण सहदे मूढन जानै मर्म ॥ ३१ ॥ - अर्थ - यहो जीव चेतन, तमे मोह निशेतजीने जागो,थने सत्य स्वरूप खीने मायारूप सपदाने शु वलगी रह्यागे, प्रथिवी प्रमुख थढार नारादीक जेने तेमा तमे क्यायी श्राव्या वो थने कही दशामा जाशो' भने जेनी सा थे तमे राची रह्याठो, तेतो मायाजाल सपदा ज्यानी त्या रहेशे एमायाजाल तमा री जातो नथी, तया पाती नथोयने माया तमारा वसनी वेली नथी,अने तमा रा थश के एक देशनी पण काई नथी, तेथी तमारे भने मायाने सबध तो को पण नथी थने तमे पोतानी करीने जाणोतो तेथी एकहवत साची करो डो, के दासी को वगर लात मारो हो, तेथी उतपात थाशे माटे हे महत पुरुषो एवी अनीति न करवी ॥ २ ॥ माया थने लाया एक सरखीज क्षणमा यधे जे श्रने णमा घटे वे तेपी ए मायानी सगते जे लागी रहे। तेने क्यारे पण मुख पातु नयी ॥ २५॥ थाजे पुत्र कजत्रादिक तु पोताना जाणे तेतो पारका लोका जेवावे, ए लोकोनो साये तारो का नातो नयी थने ए लोकोने पण ता हारी साये कोई प्रकारनो नातो नथी एजे पुत्रकलयादि लोको ने तेतो पोता ना न्यायना नया तादानाचमा रह्यान, अनयर चतन तु ता पातानाच तना रूप पामारधना म्ममां गत्री रह्यो . वली ए जे लोको ते ते ताग तनयी तनमय घई रह्या ते. एटले तादाग गरीरथी मोदीत .धने ए शरीर तो जमते घने तुनो चेतन ने. तेथी ते जची तादारी नदा निन्नता है. माटे गगधने प म्प माद कर्मनो नांतो नोमी पोतानुं बल फोग्चीने सुखी था।॥ २८ ॥ जे जीव गग पथी 5ष्ट बुद्धिथई रह्यो ने. तेतो इंसादिकनी उंची पदवी चाहे , घने जं जीवनदाई ममन्मीनावमा रहे ने. तेने कोई उंच पदवीनी चाहना थाती न घी. ॥ २७॥ दांनीने मारी मानीए ने पण तेमां विषयाट वने के, विद्याने सारी जागीए ठीप पण तेमां विवाद जगडो बसे ते. कायाने सारी जाणीए वीए पण ते मां मरणोप से, गुरुताई के बढाईने सारी जाणीए वीए, पण तेमां कोकवारे हीण ता, पवित्रा सारी जागीए ठीए, पण एने थादि के ण्यते उगठा उपजे वे,प्राप्ति सारी जाणीए टीए पण तेनी माये दाणी लागी रही, जीत नखं वे पण तेनी साथे दार लाग्पुंज , ज्ञानीनी सुंदर दशा नजी वे पण अंते कांती दी। थई जाय वे, नोगनुं सुख सारं, पण तेमां रोगनी उत्पत्ति के, ए संयोग जलो पण तेनी माये वियोगपण तैयार थई रहे .प्रीती नली ते पण तेनीसाथे अनी ति पण उपजे ठे,श्रादायोटिक गुणमां गर्व अहंकार वसे वे,राज सेवा सारी , पण तेमा टीन पणुं वसे ते.थने वीजी जेटली जगतवासी जीवोनी रीत सारी जाणी एवे, तेतो सर्व अंतर गनित थगाता सहित वे. तेथी एकली उदासीनताज शा तानी साहेली वे. माटे समरस नावज श्रेष्ट ॥ २७ ॥ जे उंचे ठेकाणे चढी ने पठी नीचे पडq थाय. ते उतंग वेकाएं न कहेवाय. पण ते काणुं कुवा जेवू कहेवाय, तेम जे सुखना थंटर 5 ख वसे वे ते सुख पण .खरूप कहेवाय ॥रए केमके सुख संपदा विलसे वे पण पठी तेना नाशथी व थाय . जेम तृणोवालीध रतीथमिथी वली जाय ठे. पण तृण विनानीधरती कोई रीते वलती नथी, ए दृष्टां ते जाणी सेतुं ॥ ३० ॥ एरीते गुरु उपदेश सुचनीकामात्र संपूर्ण थयु, सदगुरु जे । ते जिनधर्मने प्रगट रूप शब्दमांज कहे . एटले वचनमा वरवाणे वे. ते जिन धर्मने सांजली विचरण पुरुष होय ते सर्द है ,अने मूर्ख होय ते तेनो मर्म जाणे नही ३१ दवे कोकने उपदेशनी रुचिठे, घने कोईकने नथी तेनुं वरुप कहे :- अथ उपदेश रुचि अरुचि कथन सवैया तेइसा.- जेसे काढू नगरके वासी हे पुरुष नूले, तामें एक नर सुष्ट ए - , वर्म सदा जा का टाकी, टोटरिक ममीर पर बटमें, काइ थोर पथिकों परेप च गुणां, मांनी करे, नृयाग नगर हे तुमार हिंग,माग्न हिराव नमुच बाजार की, गन पाएट पहिचान न माने घट, दिदं प्रगान तन उपदंदा गुन्को ३३॥ प्रया शनीमा.- जगरा जगजमें पावनको ममी पाई यपन बनाई महा मेर अग्पनुरे; यामत कपाय फट्ट नीरन मर पार, तमा रन वाटें जदा जेमा दापन, तंमा धानपान नर धान बमान करेग्मको उमाही न काढू परम गानि मुनि काय गट कान रद मोई, काहकों विपाट होई काउ हरपनु PANE || दोरग-रग उपवंश कहा करे, गगघि ससार, भदर, नीरपंच परकार || || अर्थ-म की नगग्ना पासीवे पुरुष नगरमाथी निकजीने दिशा नली गया, तय रुपमा तो एष्ट के दयाना सरज बनावनो इतो, थने एक हपानी पर भी, पी से बने एश्य नगग्नी समीपज फरवा लाग्या पठी कोई बीना गाटमाणुने नगग्नी माग्ग ' या लाग्या, व्यारे ते कदेवा जागो जे तमारु गाम सासमारी समीपये, गम फदी ते येनेने मारग देखाडे, थनेरुडीरीते पुर के नग ने योज परी.समजा, पग बतावे तेमा जे सरता दयानो ठे, तेतो साचू पण यानो नेते मानेनिकी, तेम गुरुनो उपदेश से तेपण पुरुपना हैया प्र माणे ते ॥ २२ ॥ जेम को अरण्यमा बरसाद पोतानो समय पामीने स्वनावधी गगा मेप घर प्यारे प्यारी प्रमुग्य खाटा रसाला तथा बावल प्रमुख कता एतरायाणा, यने शिवटा प्रहप कउया रसवाता, जाल प्रमुख नीव रसवाला, यी गप प्राण मधुर रसयातायने सोण प्रमुख क्षार रस वाला जाडोमा ते ना.गुण प्रमाणे सादि थाय ने, तेम ज्ञानी याचा प्रमुख पोताना वचन पर्गणा गया योगे घिरे के प्रकारो नेते शान, पखाण करतो पोताना चिनुन पराम गमग पई खाने, पण ते यखते कोई योग्य अयोग्य श्रोतानी परिक्षा मानधी, पनी से भोता पुस्पोमा ते धाननी पनि सानजीने कोई तेनी या जोगदे, कोई राई र मेने, निश फरे , को मिथ्याटिन पादपण याय , थोपोई गम्पर पुष्टि ते हर्ष पण पामे ॥ २३ ॥ माटे गुरुनोपदेश मोया ससारी तोक राराध्य ने समजावया पण , जे ससारना नवरा पाररानी पक्षापाता जीयो , ते सदा पसीज रह्या वे ॥३४॥ मान, - - .

- हव पाच प्रकारना जावना नाम कह नः- यथ पच प्रकार यथाः- दोहराः-सूंघा प्रतु चूंधा चतुर, सूंघा रोचक सुक्ष, संघा कुरबुखी विकल, धूंधा घोर थबुझ ॥ ३५॥ अर्थः-एक तो कुंघा तेतो प्रनु स्वामी , बीजा चुंघा के चतुर , त्रीजा सुं घा के रुचिवंत , चोथो उघाके फुट उरवुदि, अने विकल ठे पांचमा धूंधा के घोर कुबुदि वे ॥ ३५ ॥ हवे मूंघानुं लक्षण कहे :- अथ सूंघा यथाः- दोहराः-जाकी परम दशाविष, करम कलंक न हो; सूंघा अगम अगाध पद, वचन अगोचर सोई॥३६ ।। अर्थः- जेनी उत्कृष्ट दशा वर्णवेली , जेमां कोई कर्मरूप कलंक देखाय नही, एवो जे धगम तथा अगाध पद के एटले सिम पद ले जे वचननो विपय थई शके नही तेने मूंघा कहिये. ॥ ३६ ॥ हवे चुंघावं लक्षण कहे:- श्रथ चुंघा यथाः- दोहरा:-जे उदास व्है जगतसों, गहे परम रस पेम ; सो चूंघा गुरुके वचन, चूंघे वालक जेम. ॥ ३७॥ बर्थ.-जे जीव जगतथी उदासी थई रहे , अने जे परम दशामा रही तेना प्रेम सवादने हे वे. एटले उत्कृष्ट दशा नावे ठे, तेतो गुरुना वचनने बालकनी परे चुंपे . यने पुष्ट याय ठे, ते चुंघा कहेवायवे. ॥ ३७॥ हवे सुंघानुं जदण कहें। अथ सुंघा यथाः- 'टोहरा:- जो सु बचन रुचिसो सुने, हिए उटता नाहि; परमारथ समुफ नही, सो सुंघा जगमाहि. ॥ ३॥ थर्थः-जेरुचियें करीयागमना भंग जे सु वचन तेने सांनने, जेना हृदयमा उष्टता नधी, पण सूक्ष्म तत्वने समझे नदी-तेने जगतमा सुंघा-पुरुप कहीये.॥३.५ । हवे उघानं लक्षण कहे-थथ या यथाः-- 17 दोदरा:-जाको विकथ गम,थंगन्यनिष्ट ; सो उंवा विपः-विक ताजरिए पापियः॥ धः-जेने थंने थागम अंग्रयनिष्ट लागे के. सेतो "पंत पापफर्मा, पीरहेते. 3; - - लिगे mehar .

- हवे इथ्य क्षेत्र काल नावे करीने थात्मानु अखंमितपणुं कहे - थथ इव्य क्षेत्र काल नाच कथन सवैया इकतीसा -जैसे एक पाको थावफल ताके चारि यस, रसजाली गुन्जी वोनक जव मानिये, यों तो न बनें पे एने वने जेसे दहेफल रुपरस गध फास अपम प्रवानिये, तेसे एक जीवको दरव पेत्र कालनार,घस नेट करि निन्न निन्न न वपानि ये, दर्व रूप पेतरूप कालरूप नावरूप, चारों रुप अलख थखम सत्ता मानिये॥६१ थर्थ - शिप्य कहे हे स्वामी इव्य देत्र काल जावरूप वस्तुना चार यशत मे कहो ठो, त्या एतु दृष्टात थापवु के, एक यावफल के तेना रस, जाली एट से रेसो गोटली बने ठगल ए चार यस वे, तेमज वस्तुना इव्य क्षेत्र काल नाव ए थश होय के न होय, हवे गुरु कहे हे शिष्य थाही तु अशके खमसमज्यो ते थीए दृष्टात दी तेतो वने नही पण याही यखमपणामा चार यस लावया तेनु दृष्टात ए वे के तेज थाव फल तेमा रूप, रस, गप ने स्पर्श ए चारे थखाप णे प्रमाण करिए ए चार रस ठे, तेम एक जीवनु इव्य क्षेत्र काल नावरूप अस नेद करीने रस जाली गोठलीने गल एखम खम वखाणीये नही थाही जे सा ध्यरुप यात्म सत्ता से ते व्यथी यसमितपणे, आत्मा इव्यरूप ने बने देवथी श्रखमपणे यसरख्यात प्रदेशाधवगाहपणे ठे, कालथी अखम त्रिकाल वनिने जा वथी यसमझायक नावपणे , एम जीवना चार यश यखमपणे मानीये॥१॥ हये साध्यपदमा ज्ञान केयनु विरोप पणु थने यविशेष पणु कहे - थय झान झेय विशेप कथन सर्वया इतीमा-कोउ ज्ञान वान कहे ज्ञान तो हमारो रूप,ज्ञेय पटदर्व सो हमारो रूप नाही हे, एफ ने प्रवान एसे दूजीयब कहाँ जेसे, सरस्वती बदर थरथ एक नही है, तेसे ज्ञाता मेरो नाम झान चेतना रािम, झेयरूप सरुति धनंत मुज पाही है, ताकारण वचन द नेद कहों कोत, ज्ञाता ज्ञान झेयको रिजास सना माही हे ॥ ६२ ॥ चोपाई -सपर प्रकाशक सकति हमारी, तायें व चन नेद वम नारी, ज्ञेय दमा दिपिया परगामी, निज रूपा पररूपा नासी ॥ ॥६२॥ दोदग- निजरूपा यातम साति, पररूपा परवस्त, जिनि रासि लीना पेन यह तिनि जिस जियो समस्त ॥ ६४ ॥ थर्य -- कोई ज्ञानवत प्राणी पोताना अनुनय प्रमाणथी एम कहे के जे झा न तेनों घमारु रुप ने धने जे पट इय देयते ततो यमारु रूप नया तेथी समयसारनाटक. ५४१ जान थने झेय विशेप पणामां बे. गुरु कहे , एतो एकज नय प्रमाण . ह -वीजा नयथी जेम अविशेष पणुं थाय . तेम कहुं हुं. जेम सरस्वती के वि रूप अर्थ वे. तेम अदर के विद्यारूप अर्थ एकठो रहे, तेम ज्ञाता ते तो मा सरं नाम ययुं. अने जे ज्ञान ने तेतो चेतनानो विराम के प्रकार वे.घने जे जान झेय पणे परिणम्यो . ते तो झेयरूप शक्ति एवी अनंत शक्ति माहारीज से वे. ते कारणथी वचन नेट करीने ज्ञान यने झेयनो जेद कोई न कहो प J बीजो नय देखवाथी ज्ञाननो ने शेयनो विलास यात्म सत्तामांजवे. तेथी अवि प पणुं . ॥ ६ ॥ जेथी हमारी शक्ति एवी जे पोतानो प्रकाश करे अने रनो पण प्रकाश करे तेथी स्व पर प्रकासक वे, तेथी ज्ञान थने झेय ए वचन ने जे नेद , तेज नारी त्रम उपजावे पण वस्तु एक वे. झेय के जे जाणवा यो य तेतो दगा वे प्रकारे करीने कही एक तो निजरूपा वीजी पर रुपा कही वे॥६३ ही जे निजरूप केय दशा कहीए ते तो स्वरूप प्रकाशक यात्म शक्ति , अने जे वी पर रूप ज्ञेय दशा ते परवस्तु वे जेणे एवातनो पेच जाण्युं तेणे तो समस्त जाण्युं६४ हवे एज पेच स्याहादमा जोइए ते स्याहादरूप वस्तुनुं वर्णन करे:- अथ स्या दाद रूप वस्तु वर्ननः सवैया इकतीसा--- करम अवस्थामें अगुवसो विलोकियत, करम कलंकसो र हत शुक्ष अंग हे, उने नै प्रवान समकाल सुमासुधरूप, एसो परजाइ धारी जीव ना रंग हे, एकही समेमें त्रिधारूप में तथापि याकी, अखंमित चेतना सकति स वग हे, यहे स्याहाट याको नेट स्याहाटी जान, मूरप न माने जाको हियो दृ नंग हे. ॥ ६॥ ॥ निहचे दरव डिष्टि दीजें तव एकरूप, गुन परनति नेट नाय * वदुत है, असंप प्रदेश संयुगत सत्ता परवान, ज्ञानको प्रनासों लोकालोकमा जुत हे, परजे तरगनिके अंग छिननंगुर हे, चेतना सकति सो प्रसंमित अचुत हे, हे जीव जगति विनायक जगत सार, जाकी मौज महिमा अपार थदनुन है, विनाव सकति परिनतितो विकन टीम, सुक्ष चेतना विचारतें सहज नं हे; करम संयोग मों कहावे गतिको निवासी निह मरुप सदा मुकत महंन दे यिक सुनान धरे लोकालोक परगाती सत्ता परवा न मना परगान बंत दे; नोहे जी जानत जहां न कौतुको महान जाके कीरति कहानधनादि अनंत है. ॥ ८ ॥ श्रयः- कार्मण गरीर सहित यात्मानी कर्म श्रवन्यामा दृष्टि दईए नो त्रा माने थक्ष देखीए वीए.थने कर्म कलंक रहित कंचन यात्मामाज दृष्टि ट पायने ५४३ समयसारनाटक. ए तो जो ६ थग थने एघेवनय समकालेज प्रमाण करीए तो शुभा रूप का जाय एमा पर्यायनी धारायें करीने जीवना विचित्र प्रकार से अक्षय ६ थने शुक्षाशुद्ध एत्रणम्प यात्माना एफज समे पामीए, यद्यपि एम दे तया पित्ररूपमा यात्मानी श्रमित चेतना शतिम अंगमा जरि रहि छे, तेन म्यामा कहीए, तेनो जेद जे म्या काटी होय, तेज जाणे पण जेनु हऽयु हाना के० ० सम्यक दृष्टि रहित ले ते मूर्य एनो नेट न जाणे ॥६५॥ निश्चयनययी इथ्य उपर दृष्टी थापिये तो श्रात्म इच्य एकरूप से धन ए यात्म व्यना गुण परिणतिरूप नेद नारथी जोऽये तो थात्मा बदुरूपे वे धने यात्मानी सनाथ सग्यात याकाश प्रदेश सयुक्त ने, थने ते सत्ताने प्रमाण वात्मा कह्यो जायठे यने धाननी प्रना विधाएतो जोकाजीक प्रमाण क्षेत्रथा सयुक्त श्रात्मा कह्यो जापने, तथा दणदणमा पर्याय रुप तरगना श्रग विचारीएतो जीप दानगुरज फगाप ने, ने तेने चेतना शकिथी विचारीए तो सदा सर्वदा थखमज कहेगा यच्युत कडेगय ने तेज जी जगतनो विनायक के धणी थने जगत मा मारनन पदार्य ने जेनी मोज थने महिमा थपार वे धने भूत ॥ ६६ ॥ पोवीन पण म्यादवाद कडेने रागपादिक विनाशक्तिथी परिणम्यो देखीए नायामा विक देवाय अने तेनी शुक्ष चेतनाज विचारीतो महज सतरूप दोगेने, पर्म गजोंग मदित थान्मा पिचारीये तो चारे गतिनो वासी धने चारा रसी साम्य पानीनी वाली कहेगाय ने, थने निश्रयनयथी एनु स्वरुप जो.विचारी तो सदा गांदा मुनिरूप मात दे, थने जो एने ज्ञायक सनाव धारी रिचारीए सोनोगनार प्रफ यमेय कवाय, यने जोए यात्मानी प्रकाशवत सत्ता । पानिय ता पोतानी सना प्रमाण थामा होय, ते जोर नग्नु साध्य चे जे जदान गतने जाणे, जे महाटा नुकी पुस्प , जेनी कीर्ति यने कथा अनादि नत माननगोपीन चानती यावे॥६॥ दवे गायरा दगानु वर्णन करे श्रथ केाज दमा वर्नन मरया परतीमा-पर परमार ज्ञानावरनको नास करि, प्रगटी प्रसिद्ध जग जगमगी झापा प्रनामे नाना इयरीयाम्या परि, अनेक नई एकता में गमगी है, माही नानि रहेगी यनन कान पग्नत, यनत शाति फोरिथनत मोनाई, नगदद देग्नम कतम माप मुह, ऐमी ज्ञान ज्योतिकी मि TREमी ॥ १८ ॥ . - समयसारनाटक. एUE अर्थ- मति कानावरण प्रमुख पांच प्रकारना ज्ञानावरणीय कर्मनो नाश क रीने प्रसिध्द के प्रत्यक्षपणे प्रगटी एवी जे ज्ञान ज्योतिनी सिपा नगतमां जग मगी रही वे. ते ज्ञान ज्योतिनी गिपा पोताना ज्ञायकपणारूप प्रनामां ना ना प्रकारना ज्ञेयनी अवस्या धरीने अनेक रूप थके,तेपण झायक पपानी जे एकता वे तेना रसथी मती रही . तेज रीते अनंत काल पर्यत रहेो. अने अनंत वीर्य फोरवीने अनंत पदवी लागी रहे शे. जेवारे मनुप्पना देहरूप देवसमां गुरू केवल ज्ञान स्वरूप एवी ज्ञान ज्योतिनी सिखा जेवी समाधि वे, ते जागृत थर्ड एटले सर्व विषमता नाव मटि गयो ॥ ६ ॥ हवे अमृतचंद श्राचार्य ने ते चंइमां ते. अने तेनी कलारूपि त्रण धारा , तेनुं जुदा जुदा अर्थथी वर्णन करे वेः अथ अमृत चं कलाके तीन अर्थ कथन--- सवैया इकतीसा - अदर अरथमें मगन रहै सदा काल, महा सुख देवा जै सी सेवा काम गविकी अमल अबाधित अलप गुन गावना है, पावना परम गुरु नावना है नविकी, मिय्यात तिमर अपहार वर्षमान धारा.जैसी उन्ने जाम लो किरन टीपे रविकी, ऐसी है अमृत चंद्रकला त्रिधारूप धरे, अनुनो दशा गरंथ टीका बुद्धि कविकी ॥ ६ ॥ दोहरा.- नाम साथि साधक कह्यो, दार दाद शम तीक, समय सार नाटक सकल, पूरन नयो सटीक ॥ ७ ॥ यय-यमृतचदनी अनुनव दगारुप कसा वे तेतो अदर अर्थमां के मोद पदार्थमां सदाकाल मगन रहे वे, घने जेवी कामधेनुनी सेवा सुखदायक थाय तेवी सुखदायक वे; अने अमृत चंदनीग्रंथ टीकारुप कला के तेज पाठला वर्ण ने करी युक्त, धने अमृतचंद कविनी बुद्धि , तेतो अदर अर्थ के शदार्थ तेमां मगन रहे वे, यागल बीलु वर्णन पूर्वली रीते जेम अमृत चंदनी अनुनव दयानी कला घने ग्रंथनी टीकानी कला धने कवीकला एवणे कला यमल , अवाधित ठे, अलख पुरुषना गुणनो गायन करतीज रहे ये तेथी पावन , नव्य त्व पणानी परम शुरु नावना ,यने ए त्रणेकला, मिथ्यावरूप यंधकारनी थ पहरण करनार ,थने चडते परिणामे , जेम चढता वे पोहोर लगी सूर्यना किरण चढता चढता टोपे , तेम ए कनापण वधती वथती दीपे ठे, एवी अमृ तचर थाचार्यनी कला ते ते त्रण प्रकार रुप धारण करे , एक तो अनुभव दगा वीजी ग्रंथनी टीका करी ते अनेत्रीजी काव्य वंध करतां कविकता कीच॥ए Ugg समयसारनाटक साध्य साधीक नामे वारमा हार तीक कह्यो, यमृतचद याचार्य, करेलु कलस रूप समयसार नाटक अथ टीका समेत सपूर्ण थयु ॥ ७० ॥ इतिश्री नाटक समयसारनो साध्य सापकनामा बारमुकार वाताबोधरूप सपूर्ण थयो ग्रथायथ 6000 मान ठे हो गयनी अते अमृतच याचार्य कवि थालोचनाकरे -अथ कपियालोचन - दोहग-थव कविजन पूरब दशा, कहै यापसो थाप, सहज हरप मनमे धी, और न पगताप ॥७१॥ सर्वया कतिसा - जो मे थाप नामि दीनो पररुप गरी लीनो, कोनो न पसेरो तदा जहा मेरो यत है, जोगनिको नोगी रहि करमको फता नयो, हिग्दे दमारे राग दोष मोह मल है, ऐसी विपरीति चाल नई जो थ तीन कान, सो तो मेरी क्रियाकी ममताताको फल है, ज्ञान दृष्टि नासी नयो क्रिया सो उदासी रह, मिय्या मोह निझमे सुपनको सो उल है ॥शा दोहरा-थमृत पदमुनिराज रत, पूरन नयो गरथ, समयसार नाटक प्रगट, पचमगतिकोपथ १३ श्रर्य - दो कनसनो करनार करिव ते पोतानेज पोतानी पूर्वदशा कहे। पोताना मर्म नाप्यायी सहज हर्ष उपज्यो वे ते थालोचनामा पारे , पण प मागे परती नयी ॥१॥ यतीत काजे जे महारु यात्मानुं सनाव हतो ते म नामि दी, अने पर जे फर्मादिक परम्प हतो ते मे सई लीयो, अने ज्या समा बिपि मागे निमाम इतो, त्यां में वाम न कीयो पाच इडियोना विपय नोग नो नागी थाने मनो को थया, श्रमाग हेयामा गग परुप महा मोह मा रनो ती नटी चाने चायां तेनो यतीत कालमा पात नीती ए जे कार्य पपु नेनो मारी कियामा ममता गगी तेनु फज थयु हो तो ज्ञान दृष्टि नामी नयी कियायी उदासी ययो, भने जे अतीत काजमा श्रास्था थई तता मोर मिपात निमा मपना जैग मैन ययो । ७ शायमृत चद याचार्यना करेलो प्रय मपूर्ण पया, या समयमार नाटर जे ग्रय नेते प्रगट पणे पचम गतिके० मुकिना पप वे 13 ३॥ इति श्री ममयमार नाटर ग्रय श्रमृतबद याचार्यम्त सपूर्णम् ॥ से बजारमीदास रहने- दोग जारी नगति नापसा, कीनो प्रय निदि, निन प्रतिमा नि मारपी, नमें वनाग्मी ताहि ॥ ४ ॥ वर्ष- नेनी जनिना प्रनारे रोने गहनाय ग्रयानां ते निदवीगे एयी दानमा दिन प्रतिमा त श्रीविनया मापी ने बणारगीदाग नमने समयसारनाटक. पठण हवे जेवा श्री जिनेश्वर देव महात्म्यवंत ठे, तेवी जिन प्रतिमा पण महात्म वत ते कहे।:- श्रथ जिन प्रतिमा महात्म्य कथन:- सर्वया इकतीसाः- जाके मुख दरससों नगतके नैननिकों थिरताकी वानी चढी चंचलता बिनती; मुश देखे केवलीकी मुश यादि आवे जहां, जाके यागें की विनूति दिसे तिनसी; जाको जस जपत प्रकास जगे हिरटेमें, सोई सुछ म ती हो। दुती जो मलिनसी; कहत बनारसी सु महिमा प्रगट जाकी, सोहे जि नकी सबी हे विद्यमान जिनसी ॥ ५ ॥ थर्थ.- श्री जिन प्रतिमाना मुख दर्शन थवाथी जे तेना नक्तजन तेना न चनने कं धागल सम्यक् दशा के संवर दिशा पामेली होय तेनी स्थिरतानी वाणी बधे, घने जे नावपदार्थमा चंचलता होय तेनो नाश थाय. अने पद्मासन स्थित मुज्ञ आकार ज्यां देखे. त्यां केवलीनी मुश याद यावे वे. ते केवलीनी मुश एम सं नारवामां यावे वे के, जेनी धागल इंश्नी संपदा ले ते त्रए समान देखायचे, एटले चोस इंश महिमा करे, अने ते दशा सांजलवामां थावे तेवारे त्यां जे के वलीना जा कहेवायठे, तेना गुणनो प्रकाश हैयामा जागेठे, अने त्यां जे पहेली मति सम्यक् दशामां मेली जेवी हती ते गुमथई, तेथीवणारसीदास कहे के जिन प्रतिमानी एवी प्रगट महिमा वे के ते विद्यमानजिनेश्वर समानज मानवी ॥७॥ हवे जिन प्रतिमानो नक्तिवत वे तेनुं वर्णन करे.-अथ प्रतिमा माने ताको वर्णन सर्वया इकतीसा.-जाके तर अंतर सुदृष्टिकी लहरि लसी, विनसी मिथ्यात मो ह निशकी समारपी, सैली जिन सासनकी फैली जाके घट नयो, गरवको त्यागी पट दरवको पारपी, धागमके अदर परे है जाके श्रवन में, हिरदे नंमारमें समा नी वानी आरपी; कहत बनारसी अलप नवस्थिति नाकी, सोइ जिन प्रतिमा प्रवाने जिन सारपी॥ ७६ ॥ अर्यः-जेना हीयामां सम्यक् दर्शननी जेहेर विराजमान थई रही . अने मिथ्यात मोहनीय रूप निहानी मुर्वा ते विनास पामी, तथा जेना घटमांथी जिन शासननी सेली के तत्व समजवामां श्रने तल समऊणमां अहं बुद्धिरुप अनि माननो त्याग थयोठे, घने जे उ ए इव्यने परखनारो वे. जेना श्रवणमांथाग मना थदर पडे वे. एटले सिक्षांत सानले ने, वली पेरियं आप धार्पित ज्ञपि संबंधी वाणी ते जिनवाणी कहिये, ते जेना हृदयरूप नंमारमा समापीठे.

ए४६ समयसारनाटक. - एटले जरी , वणारसी दास कहे ते के जेनी नवस्थिति अल्प थावी रही है, तेज पुमप जिन प्रतिमाने जिन सरिपी प्रमाण करेठे ॥ ६ ॥ हवे वणारसी दास पोतानी कथनी कहे-थथ वारसी कथन चोपाई-जिन प्रतिमा जन दोप निकदे, सीस नमार वनारसिवदे , फिरि म नमाहि विचारे ऐसा, नाटक प्रथ परम पद जैसा ॥ ७ ॥ परम तत्व परचे समाही , गुन थानककी रचना नाही, पामें गुनयानक रस यावे, तो गरथ यति शोना पार ॥ ७॥ दोहरा - यह बिचारि सदेपसो, गुनयानक रस योज, वरनन करे वनारसी, कारन सिव पथ खोज ॥ ७ ॥ थर्ष- जिन प्रतिमा के तेज मनुष्यना राग देप मिथ्यातर्नु निकदन करनार ने, तेथी वणारसीदास मन्तक नमावीने तेने वदे के पी बनारसीदास मना एम पिनगरे केथा नाटक प्रथमां जेवु परमपद ले तेवु थाही कहेठे ॥७॥ श्रा यथा उपादेयरूप परम तत्व, थान्म तत्वनो परिचय दे पण गुणस्या नानी ग्वना या पयमा नथी हो जो था मंथमा गुणस्थानकनो रस यावे तोपागंप सारीशांना पामे ॥ ७ ॥ ए प्रमाणे विचारीने सकेप मात्र गुण रपानराना रसनी चोजनो वणारसी दास वर्णन करे ते वर्णन शिवपथनुं पारण ने यने निश्पयनी खोजना ले ॥४॥ को गुणस्यानरनु सम्पने तेवु कहेने -श्रय गुनयानक सरूप कथन दोहग - नियत फ विहारसों, जीप चतुर्दश नेद, रंग जोग बहु विधि पो, न्यु पट राहत सुपेद ॥ ७० ॥ पर्य - नि जीरmप ने थने व्याहारनयथा जीव चांद नेद के ही दृष्टात यावे, जेम वन्य सहज रगमा सफेद ले पण रंगना जोगथी विधि प्रमाना ग्गनों पाप तेम गुणम्यानस्थी जीवनो तेरो नेद ॥ Go || हो गांद गुण स्थानना नाम कहेने - थय चतुर्दश गुनयानक कयन सांपा नीना - प्रयम मिय्यात दृजो सासादन तीजा मिश्र, चतुग्यो धान पंचनो नाच है, तो परमन सातमो थपग्मतनाम, याउमा श्र पर कान तुम मर है, नामो यनिाननार दगमा मूनमनोन, एमादनमा सुदामन माह बच है, बाटामो तीन माह तेगा मजागी निन, चादों यजाने जाती विनि यापन है ॥१॥ दादग-पग्ने सर गुन याना, मान मनुन मार, यब बग्नों मिप्यानर, नेद पंच परमार ॥२॥ - -

समयसारनाटक.
५७
.
-
श्रयः- प्रथम मिप्यात, वीजो सास्वादन, त्रीजो मिश्र, चोथो अविरत, पांच
मो रंच मात्र व्रत एटले देशवती, ठगे प्रमत्त, सातमो थप्रमत्त, एवा नाम वे.
वाठमो अपूर्वकरण अथवा निवृत्ति वाटर, ए वे नाम ते श्रांही सुखनो संघ
के० मिलापते, नवमो अनिन्ति वादर, दगमो सक्षम लोन, यग्यारमो उपसांत
मोद, अांदी मोहनी वंचना के एटप्ले मोहथी बुटवु वे. वारमो दीण मोह क
दीए, तेरमो सयोगी जिन, ते केवलो थयो, चौटमो थजोगी जिन, जेनी स्थिति
थउ ल ए न्दुस्ख पांच श्रदर जेटली ते. ॥१॥ एम सर्व चउदे गुण स्थान
ना नामनु सत्यार्थ वर्णन की, ते शोने . हवे अनुक्रमें पहेला मिथ्यात गुणग
पाना पांच प्रकारथी पांच नेद वे ते कटुंडं. ॥ २ ॥
हवे पांच मिथ्यात्वना नाम कहेते.-थथ पंच मिथ्यातके नाम कथन.-
सर्वया इकतीसा:- प्रथम एकंत नाम मिय्यात थनिग्रहीक, दूजो विपरित थ
निनिवेसिक गोत है; तीजो विनै मिथ्यात अनानिग्रह नाम लाको, चोथो संसे
जहां चित नोरकोसो पोत है; पंचमो थज्ञान थनानोगिक गहलरूप, जाके उद्दे
चेतन अचेतनसो होत है; ए पांचो मिथ्यात 'भ्रमावे जीवको जगतमें, इन्हके वि
नास समकितको उदोत है. ॥ ३ ॥
अर्थः- पांच मिथ्यात्वमा पेहेलो एकांत पक्ष्ना ग्राही अनियहिक नामे मिथ्या
व वे. बीजो मिथ्यात पेहेला मिथ्यातथा विपरित ते. तेनुं थनिनिवेसिक एवं गो
त के नाम ठे, त्रीजो विनय मिथ्यात सर्वनो पूजनार ठे जेतुं नाम धनानिय
हिक ठे, चौथो संसयिक मिथ्यात ज्यां चित्त ते ब्रमण करतुं रहे जमराना बचानी
माफक, पाचमो अज्ञान मिथ्यात, ए थनानोगीक पणाथी अजाणपणे एकेडिया
दिकमां गहलरुपी . निानी ठाकनु स्वरूपी ठे. जेना उदयथी चेतन वे तेथ
चेतन थर्ड रावे. जेना नाम लीया ते एज पांचे मिथ्यात जीवने जगतमां नमा
वेठे. ए पांचे मिथ्यात्व, विनाश थएथी समकेतनो उद्योत थायवे ॥ ३ ॥
हवे एकातवादी थनिग्रहीक मिथ्यातनुं लक्ष्ण कहेः-थय एकांत यथा--
दोहराः- जो कंत नय पद गहि, ठके करावे उदसो कंत वादी पुरुप,
मृपावंत परतद. ॥ ४ ॥
थर्थ.- साते नयमा हर कोई एक नयनो पद ग्रहीने पोताना जाणपणामांग
की जायते, थने दद के तत्ववेता कहेवाय, ते एकांत मतनो स्थापक मीमांसक
नयायक प्रमुख पुरुप ते प्रत्यक्षपणे थनिग्रहीक मिथ्याती ते ॥ ४ ॥

५४ समयसारनाटक. - हवे जाणपणाम तो काईक थनेकांतपणु . पण हग्यको विपरीत कहे। माटे तेनुं सदए कहेठे-अथ विपरीत यथा दोहरा-अथ उकति पथ उउपे, थापे कुमत सुकीय, सुजस देत गुरुता ग्र हे, सो विपरीती जीय ॥ ५ ॥ थर्थ - ग्रंथमा जे कह्यो एवो मार्ग तेने उयापीने नन्दवादिक पोतानी कुम ति थापे पोतानी प्रसिद्धि यवाने माटे गुरुता के प्राचार्यपणे ग्रहेने,ते जीरथ नेकातताथी विपरीत थयो तेने यानिनिवेसिक मिय्यामती कहीए ॥ ५ ॥ हवे जेनो विनय मिथ्यात ठे एवा अननियहिक मिय्यातीनु लक्ष्ण कहे। अथ विनय मिय्यात यथा दोहरा- देव कुदेव सु गुरु कु गुरु, गिने समान जु कोइ, नमें जगतिसों सब निको, विनय मिथ्याती सोई॥ ८ ॥ थर्य - सु देवने अने कुदेवने सु गुरुने श्रने कु गुरुने जे कोई समानज गणे वे, थने तामलो तापसनीपरे परिणाम प्रवा सेग्ने नक्तिथी सर्वने नमेवे, पण गुणदोपनी खबर न होय ते विनय मिथ्यात्व कहिये ॥ ६ ॥ हवे जेना जाणपणामा सदेह ठे, ते सशय मिथ्याती कहिये तेनु सक्षण कहे। अय ससय यथा दोहरा - जो नाना विकलप गहे, रहे हिए हेरान, यिर व्हे तत्व न सदहे, सो जिय ससयवान ॥ ७ ॥ थर्थ-जे अपार नय जाल देखिने जीपमा सशय राखे, विकल्प रहे थने हेरान थई रहे। स्थिरता राखीने तत्वने सई नही तेज जीप सशयवत मिथ्याती कहीये ॥ ७ ॥ , हवे पांचमा थज्ञान मिथ्यातानु लक्षण कहे - थथ अज्ञान यथा - दोहरा जाको तन उस दहलसों, सुरति होति नदि रच, गहल रुप वरते सदा, सो थज्ञान तिरयंच ॥ ७ ॥ पच नेद मिथ्यातके, कहे जिनागम जोश, सादि थनादि सरूप थव, कहाँ थवस्था दो ॥ ९ ॥ थर्थ - शरीरमा उखना दहेजयी जेने देय उपादेयनी, रचमात्र सुरता रेती नथी, मुर्वित रूपे जे सदा वर्ने ले ते एकश्यिादिक तिर्यच थज्ञान मिथ्याती कहि येणा श्री जिनेश्वरना थागम सिद्धांत जोईने मिथ्यातना पाच नेद कहे। --जे . नानाप्रकारना चित्त - समयसारनाटक. एमए - नी श्रादि पामीए तेतो श्रादि मिथ्यात्व कहीए, घने जेनी पाटि न पामीए तेतो अनादि मिथ्यात्व कहिये, एवी एवी मिथ्यात्वनी अवस्थानुं स्वरूप हवे कहे॥णा प्रथम सादि मिथ्यात्वनुं लक्षण कहे:-अथ सादि यथाः- दोहरा.- जो मिथ्या दल नपसमे, ग्रंथ नेद बुद्धि हो, फिरि थावे मिथ्यातमें, सादि मिथ्याती सोड ॥ ए० ॥ अर्थः-जे मिथ्यात मोहनीयना टलने उपसमावीने मिथ्याल ग्रंथी जेदीने झाता समकेती थईने पाठा मिथ्यातमां श्रावे ते साटि मिथ्यात्व कहीए एना मि थ्यातमा हवे आदि थई तेथी साटि मिथ्याती कहिये ॥ ए ॥ हवे वीजो अनादि मिथ्यातनुं लक्षण कहेठे:- यथ अनादि यथा कथनः- दोहरा:- जिनि गरंथि नेटी नही, ममता मगन सदीव ; सो अनाटि मिथ्या मती, विकल वहिर्मुख जीव. ॥ १ ॥ अर्थ.-जे जीवे मिथ्याल ग्रंथी दीनथीयने सदासर्वदा काल लगण ममता मांज मगन रहे, ते जीव अनाटि मिथ्याती कहीए, अने जे वहिर्मुख रहे जेने प रमात्मा इव्यनी दृष्टि नथी, ते बहिर्मुख जीव कहीए. ॥ ए१ ॥ इति श्री वणार सीदास कत नाटक समयसारनेविपे प्रथम गुनस्थानकनो अधिकार संपूर्ण ययो. दोहरा:-कह्यो प्रथम गुण यान यह, मिथ्या मत अनिधान ; अलप रुपय व वरनवू, सासादन गुन थान. ॥ ए॥ सर्वया इकतीता - जैसे कोउ बुषित पुरुप खाऽ खीर खांम, वोन करे पीने के लगार स्वाट पावे हे; तैसे चटि चोथे पां चएके ठने गुनयान काहु उपसमीको कपा नटे थावे हे ; ताहि समे तहां गि रें परधान दशा त्यागी, मिथ्यात अवस्थाको अधोमुख व्हे धावे हे; बीच एक स मे वा उ थावली प्रमान रहे, सोइ सासादन गुनथानक कहावे हे. ॥ १३ ॥ थर्थः--जेनु मिथ्यात एवं नाम वे, ते पेहेलुं गुणस्थानक सूचना मात्र कायुं, दवे संक्षेप मात्र नास्वादन गुन स्थाननु स्वरुप कर्बुवं. ।। ए ॥ थर्थ:-जेम कोऽ दुधावंत पुस्प ते ते वीरखांम खाय पठी तेने वमन करने ते वमननी पती पण खीरखांमना नोजननो लगारेक स्वाट पामेते. तेम कोड जीव उपशम सम्यक पामीने चोये थविरत गुनस्याने ग्यो तेश्रथवा उपदाम म म्यक पामताज सरखो समान पाचमां गुणताणे अथवा ठठे गुग्णवाणे बदयों त्यां समकेतनी उज्यज्ञाता न थई, थने अनंतानुबंधी उपदामि कराय दतां ते उदय भयो, ते ममयमां ते त्रणे गुण वाणायही ते उपगम सम्पनी प्रधान प्रील मिश्र नामे ठाणु थाचार्यजी कहे। इति तृतीय गुनस्थान समाप्त ए॥ (गा पूग्न नई, कही यया मति नापि,अथ चतुर्य गुनथान एएन समयसारनाटक दशा जे श्रेष्ट दशा तेने त्यागीने फरी मिथ्यात दशाने उधे मुखे उलटो रहेने, एटले मिथ्यात्व पामतामा थने सम्यक्त टूटतामा वचे एक समयकाल प्रमाणे था उत्कृष्ट उ थावलिका प्रमाणे जे सम्यक थश रहे। तेनेज सास्वादन गुन स्यानक कहिए । ए३ ॥ इति वितीय गुन थानक समाप्त दोहरा - सासादन गुन थान यह, नयो समापत वीय, मिश्र नाम गुन था नथव, बरनन करो त्रितीय ॥ ४ ॥ सवैया इकतीसा- उपसमी समकि ती केतो सादि मिथ्यामती, मुहनिको मिश्रित मिथ्यात था गहे है, धनतानु बधी चौफरीको उदे नाही जामे, मिथ्यात समे प्राति मिथ्यात न रहेहे, जहां महदन सत्यासत्यरुप समकाल, झान नाव मिथ्या नाव मिश्र धारा वहे हें, जाकी थिति थतर मुहूरत या एक समे, एसो मिश्र गुन थान याचारज कहे हे वर्थ - था बीजो सास्वादन नामे गुणस्थान सपूर्ण थयु हवे त्रीजु मिश्र उ नपाननु वर्णन करुनु ॥ ए४ ॥ अर्थ - उपगम सम्यक्ति मिथ्यात मिश्र अने सम्यक्त रूप त्रण पुज करीने ज्यारे मित्र पुजमा जीव वर्ते, थथया सम्यक्तथी पडीने फरी मिथ्यात्वमा थावी सादि मिथ्यात्वा पने मित्र पुज उदय थयाथी मिश्रमा वर्ने, एबेचने मिश्र गुण स्पाना कहियं, केमके मिथ्यात्व सम्यक्त को वजेथा ससार थनतो बरे ते बनतानुवधानी चोकमा कहिए, तेनो जेमा उदय नाथने मिथ्यातपणु शमे तथा उपामेले, त्यां मिथ्यात्वनी प्रतिनो उदय रहेतो नथी ज्या समकाले सत्या सस्य रूप Gard एटले श्रमामा साचु खोटुंबेचने तिहा ज्ञान नाव ले, ते मिश्र पारामा यहते थने मिथ्या नावण सम्यधाराया मिश्रित धारा की बहेने जेनी ठष्टि स्थित यतर्मुहूर्त काजनीठे, थथवाजघन्य एक समयनी ते एनु नाम दोहा-मित्र निरि,कहाँ मिनागम कपि, ॥ ए६ ॥ ई-मित्र गुणा न जेवी पोतानी युधि ले तेपी रीन जागाप कही ते सपूर्ण हो श्री जिनागमनी शाप लईने चोथा सम्यक गुण सापानी विधि ॥ ६ । दो चोया मम्यन गण गानु वर्णन करे -श्रथ सम्यक वर्णन मदयाशीना-जीर - जमकित पाथ पुदगल, परावर्त कान ना समयसारनाटक. ए चोखे होई चित्तके : कोई एक अंतर मुहूरतमें ग्रंथि नेदि. मारग उघि सुख वेद मोप वितके ; तात अंतरमुहूरतसा अर्थ पुजनतो. जेते लमें होही तेते जेद समकितके ; नाही समे जाको जब समकित होई मोई, तबहीनों गुन गहे दो पदहे इतके. ॥ ए॥ दोहरा:- यथ अपूर्व अनवर्ति त्रिक, करन करे जो कोड; मिच्या ग्रंथि विदार गुन, प्रगटे समकित तो ॥ ए७ ॥ थ.- सम्यक्त पामीने चित्तनो चोखो थने अई पुदगल परावर्त काल ल गण संसारमा रहेने, अने कोऽक जीव तो एकल अंतमुहूर्न कालमां मिथ्यात ग्रंथी नेदी समक्त पामीने चारे गतिनो मार्ग उलंघन करी मोदरूप वित्तना नुरव वेदे. पण संसारमा रहे नही तेथी सम्यक्त पामीने जघन्य संसार स्थित एक अंतर मुहूर्ननी अने उल्लटि संसार स्थित यई पुदगल परावर्तनी यायठे. दवे एटली संसार स्थितिनी वचमा एक एक समयनी वृद्धि करता जेटला ते स्थितिना नेद थाय तेटना सम्यक्तना नेद पामीए ए रीते सम्यक्तना घणा नेट पामिये; जे समे जेने सम्यक्तनु उदय होय ते समे ते जीव त्यारथी पोताना गुण ग्रह।; थने 5 तके के ते तंसार यवत्याना दोपर्नु दहन करेते. ॥ ७ ॥ अय क० ययान त्ति करण, अपूर्व करण, अनिवृत्ति करण ते त्रणे करण जे कोई नव्यजीव करे ने त्यां कोऽक वखते एक, थायुकर्मविना शाते कर्मनी स्थिति थंत कोडा को मी सागरोपम प्रमाण रहे. त्या वयाप्रवृत्ति करण याय पठी मिथ्यात ग्रंथी ने दवाथा धपूर्वकरण थाय. अने सम्यक्त प्रगटवाथी थनिवृत्तिकरण याय,जे कोई ए त्रणे करणे करी मिय्यात ग्रंथी विदारीने सम्यक्त स्वरुप पामे तेज सम्यक्त कहिये हवे घष्ट प्रकारथी सम्यक्त विवरण करे :- यय अष्टरूप कयन:- दाहरा.- नमकित उतपनि चिन्ह गुन, नूपन दोष विनास; यतीचार जुन घष्ट विधि, वरनों विवग्न तास ॥ एए । अर्थ - सम्यक्तनुं सम्प, १ तम्यक्तनी उत्पत्ति. " तम्यननु चिन्ह, ३ मन्यन्त नो गुण, ४ सम्यकन नूपण. U सम्यक्तना दोप, ः सम्यानां विनादा, 3 सम्य तना थविचार, ७ ए नर्व यात प्रकार चया. तेनो विवर्ग कन्टुं ॥ ॥ हवे प्रथम सम्यक्तनुं तम्प कहे।.- अय सम्यक्त यथा- चोपाई:- सय प्रनीति अवस्था जाती; दिन दिन जति गह नमतानी; दिन दिन करे सत्यको नाकी, तमकित नांठ कदा ताको 100॥ थर्य.- तयमा जेनी प्रनीततेसाचानज मन्दने, एवी जेनी अयस्याने - एप समयसारनाटक - यने दिवसे दिवसे वधती वरती मा निर्लोनता प्रमुख समतानी रीत ग्रहण करेने एवु सत्य कार्य पहेला कदीन कर्यु, तेथी हवे दण दणमा सत्यनो ता को के महा कार्य करेले ते नावनु नाम सम्यक्त कहीए ॥ ६०० ॥ हवे सम्यक्तनी उत्पत्ति कहे। -अथ उत्पत्ति यथा दोहरा - केतो सहज सुनाउको, उपदेशे गुरु कोइ, चिहुँ गतिसेती जीवकों, सम्यक् दरशन होइ, ॥ ६०१ ॥ अर्थ - नंदीने किनारे उना पाणीना कलोल थावता जाताना न्यायथी एट ले सरिऽपल घोलना न्यायथी कोऽने सहज स्वनामाज समकित उपजे, कोई गु रुना उपदेश थकी सम्यक्त उपजे, जे जीप चारे गतिमा सयन निश करी रह्यो हतो तेने जे सम्यक्त उपजे ने ते एवा एवा प्रकारची उपजेठे ॥ ६०१ ॥ हवे जेथी सम्यक्त नपज्यु जाणीए ते सम्यक्तना लक्ष्ण कहे -अथ लटन यथा दोहरा - थापा पर परचेविषे, उपजे नहि सदेह, सहज प्रपच रहित दशा समकित सदए एह ॥ ६०२ अर्थ-यात्मा थने आत्माथी बीजा जे कर्मादिकना पुगज में, एटले बीजा पाचे इव्य तेना परिचय प्रतीतिमा, सदेह उपजे नही अने सहज सनावमा था स्मदशा ते मायानी प्रपच रहितथाय ए सम्यक्तना लक्षण कहिये ॥ ६०२ हवे सम्यक्तना गुण कहेठे - अय-गुन यथा - दोहरा - करुना वठल सुजनता, आतमनिदा पाठ, समता नगति विरागता, धरम राग गुन या ॥ ६०३ ॥ थर्थ- दया तथा सर्वनु हित वाठक पणु सर्व साथे मैत्री नाव राखनु यात्मा दानु पठन करवु, इट अनिष्ट उपर समनावे रहेवो, देव गुरुनी नक्ति, माज निज्यो थको रहेतु धर्मथी राग राखवो ए सम्यक्तना था गुण वे ॥६॥३॥ हवे सम्यक्तना पाच नूपण कहे ठे यथ पच नूपण यथा दोहरा - चित प्रनावना नावजुत, हेय उपादयवानि, धीरज हरप प्रवीनता नूपन पच बरवानि ॥ ६०४ ॥ थर्थ-चित के ज्ञान एटले जिन शासननो जेवी रीतें प्रनाय वधे तेवा ना वमा रहेतु हेय उपादेयनु ज्ञानवत थई, धैर्यमा रहेवु, सम्यकपामीने हर्ष राखवु, तत्वरिचारमा प्रवीणता राखनी, ए पाच सम्यक्तनां नूपण वखाणिए ॥ ६०४ ॥ , । मनि वैरागरस - समयसारनाटक. एU३ हवे सम्यक्तना पचीस टोप कहेते:-अथ पंचवीत दोप यथा- दोहरा - अष्ट माहामट अष्ट मल, पट आयतन विशेष; तीन मूढता संजुगत, दोप पचीसी एप. ॥६०४॥ थर्थ:-- अष्ट महामद ने, श्रने धाव मल , व थायतन विशेष वे, अने त्रण मूढता वे ; ए सर्व एका करीए तो पचीस दोप थाय. ॥ ६०५ ॥ हवे यात जातना मद कहे।:-अथ अष्ट मद यथाः- दोहरा:- जाति लान कुल रूप तप. वन विद्या अधिकार; इन्हको गरव जु कीजिये, यह मद श्रष्ट प्रकार. ॥ ६०६ ॥ अर्थ.-- जातिमट, सानमद, कुलमद, रूपमद, तपमद, वलमद, विद्यामह, तथा अधिकार के ऐश्वर्यमद ए बाउ वस्तुनो जे गर्व करवो तेज आठ प्रकारना मद कह्यावे. ॥६०६ ॥ हवे आत प्रकारना मल कहे वे.- अथ थष्ट मल कथन.- चोपाई:- श्रासंका अस्थिरता वांठा; ममता दृष्टि दशा सुरगंठा; वत्सल रहि त दोष परनापे; चित्त प्रनावना मांहि न रापे. ॥ ७ ॥ अर्थ-धर्म उपर थने जिनशासन वचन उपर गंका राखे, धर्ममा स्थिरता नही. स्वादिकनी वांठा धरे, कुटुंवादिकविपे ममत्व नाव राखे, ए धर्म म तीन ते एवी गंठा करे, स्वामी वत्सल न करे, पारका दोष प्रकाओ, ज्ञान प्रमु ख विविध प्रकारनी प्रनावनामा चित्त न राखे. ए यात मल जाएवा ॥ ७ ॥ हवे त थायतन दोष कहे ते ठस्थान मिथ्यात्वना कहे-यथ पडायतनयथा - दोहराः-- कुगुरु कुदेव कुधर्म धर, कुगुरु कुदेव कुधर्म ; इनकी करे सराहना, यह पढायतन कर्म. ॥ ७॥ अर्थः- कुगुरुने माननार, कुदेवने सेवनार, कुधर्मने माननार, कुशुरु प्रशंसा, कुदेव प्रशंसा, कुधर्म प्रशंसा, ए नएनी प्रशंसा करे ते आयतन कर्म दोप .॥॥ हवे त्रण मूढता टोप कहेते.-- अथ मूढत्रय यथा कथन:-- दोहरा.- देव मूढ गुरु मूढता, धर्म मूढता पोप; बात बात पट तीनि मिति, ए पचीस सव टोप. ॥ ॥ थर्थ.- सुदेव समजे नही ए पेनी मृढता, सुगुरुने समजे नही ए बीजी गुरु मूढता. सुधर्मने समझे नहीं ए त्रीजी धर्म मृढता. ए अविद्यानो पोपक वे ए रीत धाव मद, यात मल, व्यायनन, त्रण मूटता, सर्व मनी पचीस दोप यया. ए ५५४ समयसारनाटक - हवे पाच प्रकार सम्यक्तनो नाश करे ते कहे -- थथ नाश पचक यया दोहरा - झान गर्व मतिमदता, नितुर वचन उदगार ; रुश्नाव थालत द सा, नास पच परकार ॥१०॥ थर्थ-- झानना गर्वथी, बुधिनी मदताथी, कवण वचनना उदगार के कहेवाथी, रोइ नाव धरवाथी, बालसु पणाथी, एवी रीते पाच प्रकारे सम्यक्तनो नाश थायडे हवे दिगबर सप्रदायथी सम्यक्तना पाच अतिचार कहेठे-थथथतीचारपचकयथा • दोहरा - लोग हास नय लोग रुचि, अग्रसोच थिति चैव, मिथ्या थागमकी नगति, मृपा दरसनी सेवा।११॥चोपाई यतीचार ए पच प्रकारा, समल करहि स मकितकी धारा, दूपन नूषन गति अनुसरनी, दसा आठ समकितकी बरनी१२॥ अर्थ - सम्यक्तनी क्रियाथी मने लोक इससे एवो मनमा जय राखे, पाच ६ यिना विषयनोगनी रुचि राखे, बागल माहारु शु थागे एवी पोतानी स्थितिनु | चिन्तन करतो रहे, मिय्यात दर्शनना जे थागम सिक्षांत ने तेनी भक्ति करे, पाच मु मिथ्या दर्शननी सेवा करे ॥ ११॥ ए पाच प्रकारना यतीचार ते सम्यक्त नी उज्वल धाराने मल सहित करेठे, एवी दूपण गतिनी पाउल लागी थने नूप ए गतिने पाठल लागी रहे ए समकितनी बात दशाने वरणी ॥ १२ ॥ हवे जे सात प्रतिना क्य अथवा उपशमथी सम्यक्त उपजे ते कदेठे- अथ सम प्ररुति यथा दोहरा - प्ररुति सात थब मोहकी, कहो जिनागम जोइ, जिन्हको उदै नि वारिके, सम्यक दरशन हो ॥ १३ ॥ सवैया इकतीता - चारित मोहकी चारि मिथ्यातको तानि तामे, प्रथम प्ररुति अनतानुबधी कोहनी, बीजी महामान रस नीजी माया नई तीजी, चोथी महालोन दसा परिगह पोहनी, पाच मिथ्यातम ति उती मिश्र परनति, सातई समे प्ररुति समकित मोहनी, एई पट विगवनि तासी एक कुतियासी, सातो मोहारुति कहावे सना रोहनी ॥ १५ ॥ थर्थ- हवे मोहनीयनी सात प्ररुति श्री जिनेश्वरनो थागम जोई कहुड सात प्रतिनो उदय निवारवाथी सम्यक्त दर्शन प्रगट थायवे ॥१३॥ मोहनी कर्मना ये नेद - एकतो चारित्र मोहना, बीजी मिथ्यादर्शन मोहनी, तेमां चारित्र मोहनीयनी चार प्ररुति, थने मिय्या दर्शन मोहनीनी त्रण प्रति मजी सात तेमा प्रथम प्ररुति थनतानु वधी कोहनी के कोपनी, वीजीप्रतिम हा थनिमानना रसमा नीनो थको रहे ते थनतानुबया मान, थने ब्रीजीप्र - जे प्रति, समयसारनाटक. एए कति महामायामय ते अनंतानुबंधी माया, चोथी प्रकति महालोन दशामां प रिग्रहनी पोपण करनार ए अनंतानुबंधी लोन, पांचमी प्रति मिथ्यात मोह नी, मी प्रति मिश्रपरिणाम एटले मिश्र मोहनी, सातमी प्रकृति जे जे ते पहेली उए प्रतिनुं सम थयो एटले टवाई गई ते सातमी सम्यक्त मोहनी जाण वी, एमां धुरती व प्रतितो विंगवनितासी के वाघणी जेवी ने एनी गैल लागी तो कांश ठूटती नथी, थने एक सातमी प्रति कुतियासी के ० कुनार्या जेवी तेनोपण नरोसो नथी ए साते मोहनीयनी प्रकृति ते जीवना सद्नावनी रोकनार .॥१४॥ हवे साते प्रकृतिथी सम्यक्तना बेद उपजे ते कहे जे:-अथ सम्यक्त नेद कथन उप्पय लंद - सात प्रति उपसमहि, जासु सो उपसम मंमित ; सात प्रकृति व्य करन, हार वायकी अखंमित; सातमांहि कलु पिपहि, कबुक उपसम करि ररके; सो व्य उपसमवंत, मिश्र समकित रस चरके; पट प्रकृति उपशमश् वा पिपइ, अथ वा ठय उपशम करे; सातई प्रकृति जाके उदय, सो वेदक समकित धरे ॥ १५॥ अर्थः-जेने ए सात प्रकति उपसमीजाय तेतो उपसमी, पंमित के ज्ञाता होय तेनुं नाम उपशम सम्यक्त कहीए; अने जे एसाते प्रतिनो क्ष्य करनार होय तेने का यकी कहीए, ते अखंमित शायक सम्यक्त होय, वली ए साते प्रतिमां कई खपावे, कई उपशमावी राखे, तेतो उपशम लक्षण सहित, तेमां मिश्ररूप सम्यक्त रसने चा खे, ए सातो प्रकृतिमां ठ प्ररुति उपशमे बने सातमी सम्यक्त मोहनीय तो प्रकृतिक दय धावी वेदे . अथवा उ प्रति क्य थई भने सातमी वेदे . अथवा उप्र कृतिमां कोई प्रतिनो क्य थयो . अने कोइनो उपशम थयो, अने सा तमी प्रति वेदे जे ते वेदक सम्यक्त धारी कहीए ॥ १५ ॥ हवे सर्वे सम्यक्तना नव नेट कहे -अथ नवविधि सम्यक्त वर्ननः दोहरा:- उय उपसम बरते त्रिबिध, वेदक चार प्रकार; बायक उपशम जुग सयुत, नौधा समकित धार ॥१६॥ अर्थः- क्योपशमसमकित त्रण प्रकारनो वर्ते . वेदक सम्यक्तना चार प्रकार ठे, दायक सम्यक्तनो एक प्रकार ने अने उपशम सम्यक्तनो एक प्रकार, ए दायकने उपशम वेहुना मलवाथी सर्व मली नव प्रकारनो सम्यक्तधारी थाय ॥ १६ ॥ हवे क्योपशम सम्यक्तना त्रण प्रकार कहे:-पथ क्ष्योपशम ई यथाः- दोहराः- चारि पिपहि त्रय उपसमहि, पण पय उपसम दोश्; पै पट उपसम एक यो, पय उपसम त्रिक होई ॥ १७ ॥ -

समयसारनाटक.
थर्य-माते प्रतिमा थनतानुबधीनी चोकडी खपी गश्वे,थने त्रण दर्शन मोह
नी उपसमी, तेने योपशम सम्यक्त कहिए थथवा चार थनतानुबंधी थने मि
प्यात मोहनी ए पाच प्राति क्ष्य गई, थने वे उपशमी ने, तेने पण क्ष्योपशम
मम्यक्त कहीए,थयवा मिश्र मोहनी लगए व प्रति य गई, थने सातमी उपरा
मातीने.तोपण योपशम सम्यक्त कहीए एम व्रण प्रकारे क्षयोपशम सम्यक्त थाय
हो कृपोपगम महित सम्यक्त मोहनी पेदवाथी जे क्षयोपसम वेदक नीपजे ने ते
ना ये प्रकार ने थथ योपशम वेदक विक यथा कथन
दोहरा - जना चारि प्रकरती पिपहि, हे उपसम क वेद, पय उपसम वेद
सादगा, तासु प्रथम यह नेद ॥ १७ ॥ पच पिपे इक उपसम, क वेदे जिहि
ठार, मी पयउपसम वेदकी, दशा ऽतिय यह थोर ॥ १५ ॥
पर्य- ज्या अनतानुरी चार प्रति क्ष्य थाय के थने मिथ्यात मिश्र ए
वेश प्रनि उपगमेने अने एफ सम्यक्त मोहनी वेदेने थावी दशामा जे यो
पाम सहित वेदक समलित थयो। तेनो था प्रयम नेद ॥१७॥ वली ज्या
गार धनतानुनी यने मिथ्यात मोहनी ए पांच प्ररुति खपीने, यने एक मिश्रमा
पनी मीठे यने एफ सम्यक मोहनी वेदे ते त्यारे श्योपशम सहित वेदक
समस्तिनीचा चीनी दगा यई ॥ १५ ॥
विजेदापि सहित वेदरने यने छपसमसहित वेदक ने तेनो प्रकार कहे थे
ययापर पेदक नपशम वेदक यथा कथन -
दोग-पप पट दे ग जो, प्यायफ दस सोश, पट उपसम क प्रक
तिदि, ममम दर हां ॥२०॥ पायर उपसममी दगा, पर पट पर
माहिती प्रगट या पुनरनि, माग्न बरनी नादि ॥१॥
बर्ष-या नारे बनतानुरषियने मिथ्यात मावनी मित्र मोदनी उप्र
रवि मरीन यन एक गम्यत मांदनी वैदेने, त्यारे दायिक वेदर सम्यन ।
हिपचने हानिकदी ते जेणे ठपगमारीने, यने सम्यनमा
पनीर देर, या माम बदर मम्पन रहिये ॥२०॥ यापगम नामे ने
महनासोर तेनो नाना पाटना पटप उपय वदा कही ने, तेहात
मार नेनान वर्गगर्ग, पद प्रगट कानुन तेयी याहि फरी कगाया
यमिना रमत कायोगी नयी ॥१॥

समयसारनाटक . ບg हवे सम्यक्तना मूल जेद चार यने उत्तर नेद नव वे ते कहे-यथ नेद विवरन:- दोहराः- पय उपसम वेदक विपक. उपसम समकित च्यारि; तीन च्यारि इक कमिलत, सब नव नेट विचारित ॥२२॥ अर्थः-श्योपशम सम्यक्त, वेदक सम्यक्त, दायक सम्यक्त, उपशम सम्यक्त, एवा मूल चार नेट समफितना थया. वला योपशमना त्रण नेट.वेदकना चार नेट अने दाय । कनो एक नेट, उपशमनो एक नेट, ए सर्व मली समकितना नव उत्तर नेद थया. हवे निश्चयादिक सम्यक्तनी व्यवस्था कहे.-यथ निश्चे व्यवहार सामान्य विशेप.- सोरता - अव निहचे विवहार, अरु सामान्य विशेष विधि; कहाँ च्यारि परका रि. रचना समफित नूमिकी. ॥ २३ ॥ सवैया इकतीसाः- मिथ्या मति गांति नेद जगी निरमल ज्योति, जोगसों अतीत सोतो निहचें प्रवानिये; वहे उंद दसासों कहावे जोग मुझ धरे, मति श्रुति ज्ञान नेट विवहार मानिये, चेतना चिहन पहि चान थापपर वेटे, पौरुप अलप ताते समान वखानिये; करे नेदानेटको विचार विस ताररूप हेय गेय उपादेयतों विशेष जानियें. ॥ २४ ॥ सोरताः- यिति सागर ते तीस, अंतर मुद्रत एक वा; अविरति समकिति रीस, यह चतुर्थ गुन थान इतिश्५ थर्थः- हवे निवेथी अने व्यवहारथी सामान्य विशेपपणो कहेठे सम्यक्तनी नूमि नी चार प्रकारनी रचना ने ते कहेते. ॥२३॥ प्रथम मिय्यात ग्रंथी नेटिने जे या त्मानी निर्मल ज्योति जागी . अने ने ज्योति मन, वचन, कायाना जोगयी थ तीत ते तेतो सम्यक निवेनयथा प्रमाण करीए. वीजुं ते सम्यक ६६ दशाथी व र्तमान थाय ते. एटले बहु विकल्पथी धामधूम दशाथी वत्तें ते. त्यारे तो एवं कदे वाय वे के ए जोग मुश धारी ते था मति ज्ञानी वे. या श्रुत ज्ञानी . एवा नेट व्यवहारनपथीमानिये ठे त्रीजु ए यात्माना चेतनारूप चिन्ह के लक्षण जाणी ने यात्म इव्य अने परश्व्यने बेटे ते. परतु थंतरायना उदयथी पुस्प पगम अल्प . एटले अविरति वे. तेथी ए सामान्यपणे सम्यक्त कहीए, बाथ र घने गुणिनो नेटानेद विचार विस्ताररुप करे जेम यात्मा गुणिने द्वानाyि ण . तेना नेटानेदनो विचार करवो एवा हेय ज्ञेय उपादयनां विrmer ए विशेषपणे सम्यक्त जाणिए. ॥ २४ ॥ अविरत सम्यकतनी nि. गरोपम स्थिति अथवा जयन्यथा एक अंतर मुहूर्तनी स्थिनि हाण,her re; तनी रहस्य मर्यादा ए वे प्रकारें होय, ए चोथु गुणम्यान ri - ԱԱԾ समयसारनाटक. दवे पांचमां गुणस्थानकना विवरणनो थारन करे -यथ पंचमगुनयानक थारन दोहरा- अब वरनो इकवीस गुन, थरु बावीस अनप्य, जिन्हके संग्रह त्या गसों, सोहे श्रावक पप्य ॥ १६ ॥ अर्थ-तेमा प्रथम पाचमा गुणस्थानक लायक श्रावकना एकवीस गुण क हुंदु थने बावीस यनद ते कडुछ जे गुणने सग्रह करवायीथने जे अनदने त्यागवाथी श्रावकनो पद गुणसग्रहीत शोजायमान थाय ते कडु ॥ २६ ॥ हवे श्रावकना एकवीस गुणना नाम कहेठे-यथ श्रावक कीसगुन कथन सवैया इकतीसा - सजावत दयावत प्रसत प्रतीतवत परदोपको टकैया पर उपगारी है, सोम दृष्टि गुन ग्राही गरिष्ट सबकों श्ट सीट पक्षी मिष्टवादी टोरग विचा री हे, विठोपा रसज्ञ कतज्ञ तज्ञ धरमज्ञ, नदीन न थनिमानी मध्य विवहारी है, सहजै विनीत पाप क्रियासों अतीत एसो, श्रावक पुनीत शवीत गुन धारी है।२७॥ थर्थ - सजावत १, दयावतर, सतमूर्ति ३, प्रतीतवत ४, परदोपनो ढाकनार ५, परचपकारी ६, सोमदृष्टि , गुणग्राहक , गुरुवाई ए, सर्वनो वजन १०, सि टाचारनु पदी ११, मिष्टवचन वोजनार १२, उमो विचार विचारे १३, विशेप झा ननो जागनार १५, शास्त्ररस जाणनार १५, करेला उपकारने जाणे १६, ते उप कारने जाणे १७,धर्मने जापानार १७,यदीनपणु यहे अनिमानी रहे नही १ए,एवा मध्यम वेहेवारमा रहे के जेथी सहज स्वनावे विनयवत होय २०, अने पापक्रिया थी रहित होय २१, एवा पवित्र श्रावक एकवीश गुणना धरनार थाय ॥ २७ ॥ हवे जघन्य प्रावकने वावीत वस्तु अजद -अथ वावीसथानद वर्नन- कवित्त बंद -उरा घोरवरा निसनोजन, बदु बीजा वेगन सधान, पीपर वर उबरि क तूवरी, पाकर जोफल हो अजान, कद मूल माटी विप थामिप, मधु मापन थरु मदिरापान, फल अति तु तुसार चलित रस, जिनमत ए बावीस यपान ॥२७॥ अर्थ- गमोरा हेमा करदा , काचा धोलना वमा २, रात्री जोजन ३, बहु बी ज फल ते दाडम प्रमुख ४, वेगण ५,यथाणु पाणीमाहेलो ६, पीपलनी पीपी , वमरदना फज , घोलरना फल ए, कतुबरनां फल १०, पाकरीना फल ११, थजाण्याफल १२, कदमूलनीजाति सर्व १३, माटीनीजाति १४, थफीमप्रमुख १५ मास १६ मधु १५, माखण १७, मदिरापान १ए, बहु तुब फल काचु फल २०, हीम २१, जेनो वर्ण, रस, गध, स्पर्श फरी गयो होय ते चलित रस २२, ए वा। वाम वन्तु श्री जिनेश्वरना मत धारीने यनद ते खावी नहीं ॥ २७ - समयसारनाटक. ՍԱ दोहरा - अव पंचम गुन थानकी, रचना वरनो अल्प; जामे एकादश दशा, प्रतिमा नाम विकल्प. ॥ २५ ॥ अर्थ:-हवे देशविरतीनामें पांचमा गुनथाननी रचना अल्पमात्र वर्णदुं संदेपमात्र करीने ते गुणथानमा अग्यार प्रतिमा धारी के प्रतिमा एवं नाम चारित्र विकल्पमुंठे.ए हवे अगीबार प्रतिमाना यथार्थनाम कहे-अथ एकादश प्रतिमा नामकथन सबैया इकतीसाः- दंसन विगु-हकारी वारह विरतधारी सामायक चारी पर्व पो सह विधि वहे; सचित्तको परिहारी दिवा अपरस नारी, आगो जाम ब्रह्मचारी नि रारंनी है रहे; पाप परिग्रह में पापकी न शिक्षा मंमे, कोउ याके निमित्त करे तो वस्त न गहे; एते देस व्रतके धरैया समकिती जीव, ग्यारह प्रतिमा तिन्हे जगवंतजी कहे ॥३०॥ अर्थः- दर्शन विगुनी करनारी दर्शन प्रतिमा १, वारे व्रतनी धरनारी वि रति प्रतिमा. २, जहां सामायकनो उचार ते सामायक प्रतिमां. ३ जहां पर्व थाव्याथी पोसह करवो ते पोसहप्रतिमा. ४, जहां सचित्त वस्तुनो परिहार कहिये ते सचित्त परिहार प्रतिमा. ५, ज्यां दीवसे स्त्री स्पर्श न करवो ते दिवस अस्पर्श प्रतिमा. ६, याठे प्रहर ब्रह्मचर्यमां रहे ते ब्रह्मचर्य प्रतिमा. ७, सर्व आरननो जिहां त्याग करवो ते निरारनी प्रतिमा. ७, परिग्रहने त्यागवो ते परिग्रह त्याग प्रतिमा, ए, ज्यां पापोपदेश न दे, ते पापोपदेश त्याग प्रतिमा. १७.कोई आपणा निमित्त थाहाराटिक वस्तु करे तैले नही ते उद्देशिक त्याग प्रतिमा. ११, ए अगीयार प्रकारे करीने देश विरत धारी सम्यक्ति जोव कह्या वे तेनी आ ग्यार प्रतिमारूप प्रतिझा नगवंतजी कहे रे ॥ ३० ॥ हवे ए प्रतिमानो यर्थ कहे:-अथ प्रतिमा कथन:- दोहरा.- संयम यंस जग्यो जहां, नोग धरुचि परिनाम, उदे प्रतिज्ञाको नयो, प्रतिमा ताको नाम. ॥ ३१ ॥ यर्थः-- जहां संयम चारित्रनो धंस जाग्यो, थने नोग अरुचिना परिणाम यया, त्यां कोई प्रतिज्ञानो उटय थयो तेनुं नाम प्रतिमां कहीए. ॥३१॥ हवे प्रथम दर्शन प्रतिमार्नु विवरण करे:- यय प्रथम प्रतिमा यथा- दोहराः- यात मूलगुण संग्रहे, कुवसन किया न कोऽ; दर्शन गुन निर्मल करे; दर्शन प्रतिमा सोइ ॥ ३२ ॥ अर्थः-थाही पेहेला कह्यावे करुणा वत्सल सुजनता इत्यादिक सम्यक्तना आठ मूल

५०
समयसारनाटक.
-
-
गुण ले तेनो सग्रह करे, ज्यां साते व्यसननी क्रिया नथीएपा सम्यक्त दर्शनना गुण नि
मल करे, तेज दर्शन प्रतिमा कही हा तत नयी एनो काज एक माननो वे ॥३२॥
हवे बीजी प्रतिमानो विवरो कहेठे-यथ दितीय प्रतिमा यथा
दोहरा - पच अनुप्रत थादरे, तीन गुण तत पाल, सिदा त च्यारों धरे, यह
व्रत प्रतिमा चाल ॥३३ ।।
अर्थ - पांच अपुवत, त्रण गुणत्रत थने सामायक धारे १, पोसह धारे २,
देशावगासग करे ३, यतिथ सविनाग करे तथा चार शिक्षावत धारे, ते व्रत
प्रतिमा जाणवी तेनो काल वे महीनानो ने ॥ ३३ ॥
हवे त्रीजी सामायक प्रतिमानो विवरो कहेठे - यथ तृतिय प्रतिमा यथा
दोहरा -- दर्वनाव विधि सजुगत, हिये प्रतिज्ञा टेक, तजि ममता समता गहे,
अतर मुहुरत एक ॥ ३४ ॥ चोपाई • जो थरिमित्र समान विचारे, थारत रूप
कुध्यान निवार, सजमसहित नावना जावे,सो सामायकवत कहावे ॥३५॥
अर्थ - दश दोप वचनना टालवा, वार दोप कायाना टालवा, ए इव्यविधि
थने दश दोप मनना टालवा ते नावविधि जाणवी, तेणे करीने सयुक्त, थने हैया
मा एक शो पाठ पचपरमेष्टी मत्रनो स्मरण लागो रहे, एम बीजी पण कोई प्रतिज्ञा
नी टेक राखीने, ममता तजीने, समता ग्रहण करवी, एम एक यतरमुहूर्त काल
पर्यंत सामायक चारित्र थाय ॥ ३४ ॥ जे कोई शत्रु मित्रने समान विचारे, या
ध्यान सध्यान, निवारण करे, पच सवर सहित थाय वार नावना नावे,
तेज सामायकधारी श्रावक कहिए, ए त्रीजी प्रतिमा त्रण मासनी होय ॥ ३ ॥
हवे चोथी पोसह प्रतिमानो विवरो कहे -अथ चतुर्थ प्रतिमा यथा-
दोहरा-सामायक कीसी दसा, चार पहर लो होश,
यथवा यात पहर रहे, पोसह प्रतिमा सोइ ॥३६ ॥
अर्थ - जे पूर्व सामायकनी दशा कही तेवी दशा चार प्रहर लगी होय, अ
थवा तेवी दशा थाल प्रहर लगे रहे तेज पोसह प्रतिमा धारी श्रावक कहीए, ए
चार मासनी प्रतिमा जाणवी इहा थाउम चनदश थमास पूनमने दहाडे तथा
पर्वदिन थावेथी पोसह करे ॥ ३६॥
हवे पाचमी सचित्त परिहार प्रतिमानो विवरो कहेते यथ पचमी प्रतिमायथा -
दोहरा ~ जो सचिन नोजन तजे, पीवे प्रासुक नीर,
सो सचित्त त्यागी पुरुष, पच प्रतिझागीर ॥३७ ॥

-
समयसारनाटक.
५६१
T
अर्थ:-जे सचित्त नोजननो त्याग करे धने फानु जन पीए. ए गते जे पुत्प
सचिन वन्तुनो त्याग करे ए पहनी प्रतिमायी एटली बधनी. क्रिया कर ततो पां
चमी प्रतिमानो धरनार जाण्डे ए प्रतिमा पांच माल सुधी रह. ॥ ३ ॥
हवे नी ब्रह्मचर्यप्रतिमानो विवरो कहः-यय पष्टी प्रतिमा यथाः-
चोपाई-- जो दिन ब्रह्मचर्यव्रत पाले; तिथि श्राए निसि द्यौस नाले :
गहि नौवामी करै व्रत रदा; सो पट प्रतिमा ताधक यदा. ॥ ३ ॥
अर्थ:- सचिननो परिहार तो प्रथमनीज रीते ते. अन दिवन ब्रह्मचर्य व
धारे पाले. अने पंचमी पर्व श्रावे दीवलरात्रमा एटले आठ प्रदर ब्रह्मचर्य पाने
तिहां नववाडे करीने ब्रह्मचर्यवृत्तनी रक्षा कर. ते पुरुष ठठी प्रतिमानां सायनहार
होय ते मास लगनी जाणवी ॥ ३ ॥
हवे सातमी ब्रह्मचर्य प्रतिमानो विवरी कहे -अथ नप्तमी प्रतिमां यथा.-
चोपाई:- जो नववाडि महित विधि नाध; निगिदिन ब्रह्मचर्य धाग: सोम
तम प्रतिमाघर
ज्ञाता;
गीन गिगेमनि जगत विख्याता ॥ ३ ॥
यथे. जे श्रावक नववाड सहित जे ब्रह्मचर्यवृत्तनी विधि , ते विधियं ज रात
दिवस ब्रह्मचर्यने याराधना रहं . अन जे आगज न प्रतिमानी क्रिया दी।
तेने तो लीपांज रह्यो वे. एवो जे श्रावक ने. ततो नातमी ब्रह्मचर्य प्रतिमानों
धरनार ज्ञानी पुस्प गीत शिगेमणि जगनमा प्रग्न्यानि पामंतो जाणवो ॥ ३ ॥
हवे अांदी प्रनंगयी नव वाटनो विवर्ग कहं वेः- अवनीवाटि यचा.-
कविनवंट:-तिययनवान प्रेमवि निरपन, परीठ नापन मधुबन; पृग्वनी
गति रमचिंतन, गुरुशादार नेत चितचेन; करिनुचितन निगार बनायन, तियप
रजंक मध्यसवमेन; मनमथ कथा उदग्निमिनोजन, ए नववामि जान मतजन ४०
अर्य.- ज्यांनी व त्यां शानन कवी. प्रेमचिगवीन बीना अंगांपांग
ग्वानहीं, दृष्टिदोष निवारण करीने. यादं पहुंथापीने वीना मधुर वचन ना
जले नहीं, पूर्व कानमांजे नांग कीटा की टांय ना नि नि नहीं, पित
ना चनने चर्चे घुनाटिक नहित गन्ष्टि थाहार नहीं.नान मंजनची माग्नं पवित्र
फरीने गार गाना मजे नहीं, बीने नुवाना पलंगमां नवगन का नहीं, मनमय
जवंदर्प तनी क्या वह नही. पंट जरीन नांजन न कर, एनव याटां जन मनमा
जारावी एवजयानंद काग॥ ४० ॥

५६२ समयसारनाटक -- हो यामी निरारन प्रतिमानो विपरो कहे -अथ थष्टमी प्रतिमा यथा- दोहरा - जो विवेक विधि थादरे, करे न पापारन, सो अष्टम प्रतिमा पनी, कुगति विजे रन थन ॥ १ ॥ श्रर्थ-जे कोई श्रावक पाउली सर्व क्रिया करतो थको कि सहित विधि विशेष थादरे, थने पापनो थारन पोताना हाथे न करे तेतो यादमी निरारन प्रतिमानो धरनार श्रावक कुगतिना विजयनो रणयंन रुप थई रह्यो ॥४१॥ हवे नवमी परिग्रह प्रतिमानो विवरो कहे ~ श्रय नवमी प्रतिमा यथा - चोपाई - जो दसया परिग्रहको त्यागी, सुख सतोप सहज वैरागी, समरस चितित किचित ग्राही, सो आवक नी प्रतिमा पाही ॥ ४२ ॥ थर्थ -जे नवविध परिग्रहनो त्यागी होय, सुख सतोष सहित वेरागी होय, 3 पशमरसथी जीज्यो रहेतो होय, किचित ग्राही कहेता कएिक थसन वशननु ग्रहण करनारो होय अने बीजी क्रिया सर्वे आवमी प्रतिमानी परे होय, ते श्रावक नव मी प्रतिमानो धरनार होय ए प्रतिमा नवमास लगी रहे ॥ ४२ ॥ हो दसमी पापोपदेश त्याग प्रतिमा कहेठे - अथ दसमी प्रतिमा यथा दोहरा - परकों पापारनको, जो न दे उपदेश, सो दशमी प्रतिमासहित, श्रा चक विगत कलेश ॥ ५३ ॥ थर्थ - नवमी प्रतिमा लगण गृह कुटुब परिवारने पापनो उपदेशबापे पण थाही पापारननो उपदेश त्यागे ते श्रावकने दशमी प्रतिमासहित जाणिये तेज श्रावक क्वेश रहित थयो एम जाण ॥ ४३ ॥ हवे थग्यारम। उचितग्राही प्रतिमानो विवरो कहेते -यथ अग्यारमी प्रतिमा यथा चोपाई -- जो सुखद वरते तजि मेरा, मवममपमहि करे वसेरा, उचित थ दार उदम विदारी, सो एकादश प्रतिमा धारी ॥ ४ ॥ यर्थ -जे थापणां घर वार मेरा ठामीने स्वद वर्त, थने मठ ममपमा वास करे, थाधाकर्मि थाहार त्यागे, योग्य थाहार से थने उडम व्यवहारी यह साधु जे वु थाय, ते थगीयारमी प्रतिमनो धरनार याय ए श्रावकनी करणी चे ॥४४॥ हो थग्यारमी प्रतिमानी व्यवस्था कहे -थथ एकादश प्रतिमा यथा दोहरा - एकादश प्रतिमा दशा, कहाँ देशात माहि, वही थनुक्रममूलसों, गही सु नृटी नाहि ॥४५॥ थर्य - ए थगीधार प्रतिमांनी दशा पांचमा देशविरति गुणस्थानकमाहे के " .

समयसारनाटक. U६३ - चोपाई.- एक ही हवे प्रथमथी जे आगलनी प्रतिमाश्रो ग्रहण करेली के तेतो अनुक्रमे ग्रहोज रह्यो वे पण तेथी ठुटो नथी धने चढति चढति क्रिया करतो रहे हवे अग्यार प्रतिमा धारीमा जघन्य, मध्यम, उत्कृष्ट, दशा कहे:- अथ जवन मध्यम उत्रुट कथन:- दोहा - पट प्रतिमा ताई जघन, मध्यम नव परजंत; उत्तम दशमी ग्यार मी, इति प्रतिमा विरतत ॥ ४६ ॥ थर्थः- ठठी दिवश ब्रह्मचर्य प्रतिमा लग जघन्य श्रावक होय, धने नवमी परिग्रह त्याग प्रतिमा लगण मध्यस्थ श्रावक थाय, दगमी धगीधारमी प्रतिमानो धणी उत्तम आवक होय एटले प्रतिमा वृत्तांत कडं इति प्रतिमा अधिकार समाप्त हवे पांचमां गुणस्थाननी स्थिति कहे.- अथ पंचम गुनस्थानक स्थिति.- -- एक कोटि पूरव गनिलीजें; तामें थाठ वरप घट कीजै; यह उत्क ट काल यिति जाकी, अंत मुहुर्न जघन्य दसाकी ॥१॥ अर्थः- एक कोटि पूर्ववर्पनी संख्या कीजे तेमां आठ वर्ष घटामीए पठी जे वर्ष रहे ते देश व्रति गुणस्थानफनी उत्कृष्ट कालस्थिति जाणवी, अने अादेशत्र त्ति गुणस्थाननी जघन्यदशानी स्थिति एक अंतर्मुहूर्त कालमांन होय ॥ ४ ॥ हवे एक पूर्वकालनी वर्पसंख्या कहे।:- थथ पूर्वसंख्या कथन:- दोहराः- सत्तरि लाख करोड मिति, ठप्पन सहस एते वरप मिला करि, पूरव संख्या जोडि. ॥ ४ ॥ अर्थ-सिंतेरलाख कोटि वर्प एटली मिती के प्रमाणता उपर उपन हजार कोटि वर्ष मेलवीय तेवारे पूर्वकालनी जोमिना वर्ष संख्या थाय तेना ७५६०४ 0 0 0 0 0 0 0 D. एटला थंक थाय, लोक वेहेवारमा सात सल्प पांचननील साउथर्व कहिए. ॥४॥ वे अंतर्मुहूर्त कालनो जघन्य उत्कृष्ट प्रमाण कढुंः-थय यंतमुहुरतप्रमान दोहरा - अंतर मुठुरत वै घडी, कठुक घाटि उतकृष्ट; एक समे एकाउली, थं त मुहूर्त कनिष्ट. ॥ ४ ॥ यह पंचम गुनथानकी, रचना कही विचित्र ; अव ठम गुनथानकी, दसा कहूँ सुनु मित्र ॥ ५० ॥ थर्थ.- वे घमीमां एक समय श्रोतो याय, त्यारेतो उत्कृष्ट अंतमुर्त थाय धने एक यावलीने एक समय ते कनिष्ट के जघन्य यंतमुहूर्त काल होय ए दिगंबर संप्रदायथी ॥ ४॥ एम देशव्रति पांचमां गुणस्थाननी विचित्र पुरुपे रचना कहोवे हवे हे मित्र ठग गुणस्थाननी दशा कढुंठे ते सानलो ॥ ५० ॥ करोडि ;

समयसारनाटक. - हवे प्रमत्तनामे ठग गुणगणानी अवस्था कहु थथ प्रमत्तगुनस्थानक दोहरा - पंचप्रमाद दशा धरे, यगइस गुनवान, थविर कदप जिन कल्प त, हे प्रमत्त गुनथान ॥ १ ॥ अर्थ-धर्मरागादि पांच प्रमादनी दशा धारेठे धने साधुना अव्यावीस गुणध धाहीथग्यावीस गुण कह्या ते दिगवर सप्रदायथी थिवर कल्पथी थिवरनो था थने जिनकल्पथी जिननो याचार तेणेकरी युक्त वे एम प्रमत गुण स्थान होय हवे पांच प्रमादना नामनी गणती करेठे थथ पच प्रमाद यथा दोहरा - धरमराग विकथा वचन, निज्ञाविपय कपाश्, पच प्रमाद दसासहि त, परमादी मुनि राइ ॥ ५ ॥ थर्थ -धर्मउपर राग राखे, विकथा वचन बोले, निशसेवे, रस ते शशिप्रमुखना वि पय सेवे, कपाय सेवे, ए दशासहित जे मुनिराज होय ते प्रमादी कहीए ॥ ५ ॥ हवे श्री मुनिराजना अनावीस मूल गुण कहेठे - अथ अगश्स मूलगुन कथन सर्वया इकतीसा -- पच महाव्रत पाले पच सुमती सनाले, पच इदि जीति न यो नोगी चित चेनको, पट श्रावशक क्रिया दवित नावित साधे, प्रामुक धरा में एक थासन है सेनको, मजन न करे केसलुचे तन वस्त्र सुचे, त्यागे दतवन पें सुगर स्वास चेनको, गढो करपे थहार लघु जुजी एकवार, अगश्त मूल गुन धारी जती नको ॥ ५३ ॥ थर्थ - सवाउ पाणाइ वायाउबेरमण इत्यादिक पच महाव्रत पाले सूर्यासुमति प्रमुख पांच सुमति सनालीने करे अने पाच दिनो जीतनार एटले जेने यिोनाविप य सेवता चित्तमा चेन नउपजे, तेथी विषयोनो त्यागीथाय सामायक प्रमुख र थाव श्यक क्रिया वे ते ऽव्यथी पण साधे थने नावथी पण साधे ए२१ गुण थया फासू पृथ्वी प्रमुख सच्यामा प्रमाणोपेत एफ शयन शासन राग्वे ए २२ गुण थया स्नान न करे केश लाच करे शरीरविपे वस्त्रनो त्याग करे दांतण नकरे स्वासवदानो स गध मूग्यनुण प्रमुख नले, उनो उनो श्रहारकरे लघुता के अतप्रांत थाहार मुजे तेपण एक टेक खाय ए अगरीस मूल गुणनो धरनार जैन दर्शनी जती होय ।। ५३ ॥ ए दिगमवर सप्रदायथी गुण कह्या ने हो पाच महानत कहे। -श्रथ पच महाव्रत यथा दोहरा-हिंगा मृपा थदत्त धन, मैथुन परिग्रह साज रिचित त्यागी अनुप्रती, सपि त्यागी मुनिराज ॥ ५ ॥ .

समयसारनाटक. ५६५ . यर्थः-- जीवधात असत्य चोरी मैथुन परिग्रहसामग्री ए पांचे धाश्रवने किंचि त त्यागे ते अपुव्रती आवक कहिए बने सर्वथा त्यागे ते मुनिराज कहिए॥५४॥ हवे पांच प्रकारनी समिति एटले सावधानपणुं कहेः-थथ पंच सुमति यथाः- दोहरा:- चले निरपि नापे उचित, जपे घदोष यहार; ले निरखि मारे निरखि, सुमति पंच परकार ॥ ५५ ॥ अर्थ.- जोने चाले ते र्या सुमति, योग्य वचन वोले ते नापा सुमति, दूप परहित आहार लीए ते एपणा सुमति, वस्त्र पात्र निरपीने ले ते अदान सुमति मलमुत्रादिक जोड्ने परग्वे ते पारीगवणीया सुमति, ए पांच प्रकारे सुमति।।५५॥ हवे जे अवश्य करीए तेयावश्यक कहीए तेना नाम कहे, अथषमावश्यकयथा दोहराः- समता वंदन युति करन, पमिकमनो सजाउ, काउसग्ग मुशधरन ए पडावसिक नाउ. ॥ ६ ॥ थर्थ.- सामायक धरवी १ गुरुवंदना करवी ३ चोवीशजिनेश्वरनी म्नुति कर वी ३ अतिचारथी निवर्तनाते पडिकमना ४ स्वाध्याय करवी ५ काससग्गमुज्ञ ध रवी ए यावश्यक कहीए. ॥ ५६ ॥ हवे यिवर कल्प धने जिनकल्पनो नेद कहे. यथ स्थिविर कल्पी जिनकल्पी संवैया इकतीता-- थविर कलपी जिनकलपी उविध मुनि, टोउ वनवासी दोउ नगन रहत है; दोनयनाईस मूल गुन के धरैया दोउ सरव तियागीव्ह विरागता गह त है; यविर कलपिते जिन्दके सिप्प सापा होई,वेठके सनामें धर्म देसना कहत है; ए काकी सहज जिन कलपी तपस्वी पोर, उदेकी मरोरसुं परिसह सहत है. ॥ ५७ ॥ घय - थिवर कल्पो थने जिन कल्पी ए वे प्रकारना मुनिश्वर होय ए वे व नवासमा रहे. यने वेदु नागारहे ए वे अनावीस मूल गुणना धारनार एवे सर्वस्व के सर्व परिग्रहना त्यागी यम्ने वैरागनाव धरे एवा कह्या पण ते वेमां स्थिवर कटपी ते कहीए जेने शिप्य शापा दोय, थने सनामां बेसिने धर्म देशना करे धने जे जिन कल्पी होय ते एकाकी होय धोरतपस्वी दोय यने कर्म उदयनी मगे रथी जे परिसह उपजे ते ते सहन करे ए दिगमवर नंप्रदायिक वचनोवे.ाएगा हवे प्रसंगथी वावीन परिसद साधुने सहवा योग्य तेना नाम कहेते.- यथ वाचीन परीसह यथा कथन- सर्वया इकतीसाः-ग्रीपममें धूप विति नीतमें धंक पत्रीत, नृपेयधीर प्यालेनी रन चहतु है; मंस मतकादिनों न मंचूमिनन करें,वर वंध वियाने थमाज व्हर - - . लग्वे हतु है, चर्या उरख नरे तिन फाससो न थरहरें, मल उरगधकी गिलान न गहतु है, रोगनको न करें इजाज एसो मुनिराज, वेदनीके उदे ए परीसह सहतु है ॥५॥ थर्थ नए कालमा तडकामा याताप सहे, शीत कालमां शीत सहेवाथी चिनमा कपे नही, जुख्यो उता धीरज राखे थनेपणी ग्रहे नही प्यासवत थको त दीप पाणीनी चाहना करे नही नागा शरीरने मास मसकादि करडे तोपण मरे नही धरतिये सन्या करे मरणांत कष्ट श्रावे नातनातना वध बधनादिक कष्ट तेथी श्रमोज रहे पण चलायमान न थाय चर्या के० विहारनुख नरे तदरीले विहारमा तथा सयनासनमा कठोर व्रण स्पर्शथी थरहरे नहीं मेलनी जे दुर्गध ने तेथी तेनी उगमा न करे रोगनी वेदना सहे पण तेनो लाज न करे एवा मुनिराज होय ते वेदनीय कर्मना उदयथी ए ग्यार परिसह उपजे ले तेने सहे ॥ ५ ॥ कुडजीया - एते संकट मुनि लहे, चारित मोह उदोत , सजा सकुच उपध रे, नगन दिगवर दोत, नगन दिगबर होत, श्रोत रति स्वाद न सेवे, त्रियसनमुर हग रोकि, मान श्रापमान न बेचे, थिर व्हे निर्नय रहे, सहे कुवचन जग जेते, निष्टक पद सग्रहे, हे मुनि सफट एते पणा दोहरा-थप झान लघुता मनि उतारप पितो. झानावरन उदोत मुनि, सहे परीसह दो ॥ ६०॥ स रे बदरसन पुरदसा, दरसन मोह उदोत, रोके उमग थजानकी, श्रतरायके होत श्रर्य - हवे चारित मोहनीना उदय यवाथी मुनिराज सकट सहे ते सा टनी गणतरी कहते नगन दिगवर थई जे सहाथ सकोच ख उपजे ने तेने धरे एटले सम्टथी न नागे १ वली नगन दिगवर था श्रोत के दीयना र नि पादने न मेवे, २ वीना हार नायी चुके नही ३ को सत्कार करे कार घससार करे तेरपर पिम लार लागे नहीं ४ कोई नयी नागे नही स्थिर र है निनप रह ५ जगतमा जे व कुपचन ले थाकोसना वचन ने ते सर्व सहन फो ६ निक्षा ग्रहणय निकुर पद सग्रहे पण ते सफटथी नाजे नही ए मान मस्ट चारित्र मोहनीना उदययी मुनि लहेने ते सहन करे ये ॥ ५५ नयाग्निापानी मामा पोतानी लघुना थाय ते सहन कर पोता ना मनिना उलयो उत्स्टपणु जोइन गुस्ता महे. एया ज्ञानावरणी कर्मना । दप पाना यदान पग्मिद थने प्रकापग्मिद ए वे परिसह उपजे ले ते सदन दर्शन मोहनीयना उदय ययायी मम्या दर्शननी मलिनता उपजे तनी पुट दा महे पण मम्या दर्शनयी न नागे तगय कर्मनी उदय थयायो ।

समयसारनाटक. U६ लाननो उमंग रोकी रहे तेयो चलानने सहन करे ए वावीस परितह कहा।।६१॥ हवे जे कर्मची जे परिसह उपजे ते कहे वे. श्रय बावीस परिसह विवरनन - सवैया इकतीसाः- एकादश वेदनीकी चारित मोहकी सात, ज्ञानावरनीकी दोई एक अंतरायकी; दंसन मोहको एक बाविसति बाधा सब, के मनसाकी के 5 वाकी के कायकी, कादुकों अलप काहूसों बहोत उनी साता, एकहीं समेमें उ दे यावे असहायकी: चर्याथित सकामांहि एक सीत उस्नमांहि, एक दोहोहि ती नि नांही समुदायकी ॥ ६ ॥ दोहरा:- नानाविध संकटदशा, सहिसाधे शिव पंथ, थिविरकल्प जिन कल्पधर, दोक सम निगरंथ. ॥ ६३ ॥ अर्थ.-अग्याचार संकट तो वेदनी कर्मना उदयथी उपजे वे चारित्र मोहनी य कर्मथी सात वाधा उपजे वे ज्ञानावरपनी करेली वे वाधा उपजे वे अंत रायनी कीची एक वाया उपजेने दर्शन मोहनीनी करेली एक वाधा उपजे ,स व मती वावीस वाधा थइ ते वावीसने परिसह कहीए वावीत वाधामां कोई मन नी कोई वचननी ते को कायानी ने बा बावीस वाधामाहेली कोइने अल्प एक वे उपजे कोने बदु उपजे तो एकज समे श्रोगणीस वाधानुं उदय थाय ते मां असहायनी के जे वाधा वाधासायेज वोलेने पण साये वने नही त्यारे तेमां एकज वाधा एक समे थ ते असहायनी कहीए. जेम चर्यापरिसह चालवाथी उ पज वे निपेद्या परिसह रहेवाथी उपजेठे शय्या परिसह रहेबाथी उपजे वे. यने शितवाधा तथा जपण वाधामां एक समयमा एकज वाधा उपजे तेथीथा पां च परिसहमा एक यथवा वे अथवा त्रण एक समयमां थाय पण समुदायरूप पां चे न थाय ॥ इति परिसह अधिकार समाप्त थयो इति परिसह अधिकार - यर्थ.- एवां नाना प्रकारना संकट वे तेनी दशा सहन करीने मुक्तिमार्ग साधे, तेथी थिविर कल्पना धरनार थने जिन कल्पना धरनार ए बेहु निग्रंथ समान ठे हवे यिवर कल्पमा थने जिनकल्पमा कंश तफावत वे ते कहेते:- थय स्थिविरकल्प जिनकल्प तारतम्य कथन:- दोहरा - जो मुनि संगतिम रहे, थविरकल्पि सो जानि, एकाकी जाकी दसा, सो जिनकल्प वपानि. ॥ ६ ॥ चौपाई-थविर कलप मुनि कबुक सरागी; जिन कलपी महांत विरागी, अति प्रमत्त गुनथानक धरनी, पूरन नई जथारथ वरनी.६५ थर्थ - जे मुनीश्वर गहना गणनी संगतमा रहे।, तेतो थिवरकल्पी जाणीए जेने गणनी निश्रा नथी जेनी एकाकी दशा वे तेतो जिनकल्पी कहिए ॥ ४ ॥ - एन समयसारनाटक ए बेट निग्रथमा थिवरकल्पनो धरनार कश्क सराग दशामा ने, थने जे जिनक पाने ते महावैरागी ने एटले प्रमत्त गुणवाणानो जे नूमिका बाधी थने यथार्थ साचपणे वरणी ते पूर्ण थई । ६५ ।। हवे सातमा गुणस्थाननु वर्णन करे - श्रथ सप्तम गुनयानक वर्नन- चोपाई - यब बरनो सत्तम विसरामा, अप्रमत्त गुनथानक नामा, जहा प्रमा द क्रिया विधि नासे, धर्मध्यान थिरता परंगासे ॥६६॥ दोहरा-प्रथम करनचा रित्रको, जासु श्रत पद होइ, जहां थहार विहार नहि, अप्रमत्त हे सोइ ॥ १७ ॥ अर्थ-मुक्तिरुप मदिरमा चढतां ते सातमो पिसामो , थने अप्रमन गुण स्यानक जेनु नाम दे ते हवे वखाणे जे गुणस्यानमा धर्मरागादितकरी प्रमा दनी पिपि नासेने, जे पूर्वला गुणस्थानका धर्मध्यान चचल हतो ते थाही स्थि ग्पणे प्रकाश करे ॥६६॥ प्रथम गुणस्थानना थंतपदमा एटले ठेला सम या चारित्रमोहनी कर्मने चेदवानो यथा प्रवृत्तिनामे प्रथम करण थयु, थाही धर्मप्पाननी स्थिरता एवी के ज्यां थहार विहार क्रिया नथी ते थप्रमत्त गु एस्पानक होय ए वचन दिगवर संप्रदायनु दवे थाउमा गुणस्थानरुनु वर्णन कहेठे थथ थटम गुनस्थानक वर्नन- गोपाई - थर बरनो थष्टम गुनयाना, नाम थपूरव करन वखाना, कबुक मोन उपसम करि रापे, थथा फिचित क्ष्यकरि नाखे ॥ ६ ॥ जो परिनाम न ये ना स्वहीं, तिन्हको उदो देखिये जवी, तब अटम गुनथानक होई, चारि त परन दूसगे सोई ॥ ६ ॥ थर्ष - जेनु नाम थर्व फरण बगाणीए जीए, हो याही श्रेणी चढवामा जे पामीर पो चढेने तेती थाही यश मोहने उपशमानी राग्वे, अथवा जे ६ पर पो पटेले तेतो याही चारित्र मोहनो का क्ष्य करि नावने ॥ ६५ ।। एव जे परिणाम पेहेना को कालमा यु नथी ते परिणामनु ज्यारे प्रगट पर देनिपेटीए, न्यारेनो थाउमुं गुणभ्यानक होय तेने ते समय चारित्र मोहनीय कर्म भदवाने यावं करण नामे बीच कराण होय तेनु नाम निरनि पण वे ॥६॥ हो नम्मा गुणम्याननु वर्णन करने-थय नमम गुणस्थानक वर्णन गो-यर यानि कान सुनु नाई, जदा नार यिन्ता अधिकाई, द ना ननादन जेने, महन थमानना मर तेते ॥30॥ जहां न ना ले - - समयसारनाटक. एए ॥ व उलटि अध यावे; सो नवमो गुनथान कहावे; चारित मोह जहां वद नीडा; सो हे चरन करन पद तीजा. ॥ १ ॥ अर्थः- प्रथम थनिवृत्ति करण गुणस्थाननो व्यवहार कहुं हुं ते सांगतो. जे गुणस्थाननेविपे स्थिरता नावनी अधिकाई वे. अने पूर्वनाव कपायना उटयथी जेटला चलाचल नाव होय तेवा सर्व यांही सहज अमोल थया रे ॥ ७॥ ज्यां नावथी चढीने फरी तिहाथी पडी नीचेना गुणस्थानके न थावे एवो अनि वृत्ति कहेवाय, अांही अनिवृत्तिनो परमार्थ सिद्धांतमां बीजीरीते ठे, ते तो नवमुं गुणस्थान कहेवाय, ज्यां चारित्र-मोहनीय कर्म घएंज त्रुटी गयो ठे तेज ए चा स्त्रि मोहनीय कर्म जेदवानो त्रीजो थनिवृत्ति करण थयो. ॥ १ ॥ हवे दशम गुन स्थानक कदु :- यथ दशम गुनथानक वर्ननं:- चोपाई:-कहो उगम गुन थान उसाखा, जहां सूछम शिवकी थनिलापा; सृतम लोन ढसा जहाँ लहिए; सूठम संपराय सो कहिए. ॥ २ ॥ अर्थः- जिहां उपगम्यक् अने पक एवी चे शाखा वर्ने वे. जे गुण स्थानमा सूख्य शिव पदवीनी यनिलापा ठे. एवी ज्यां सदम लोन दशा पामिये, ते सूद म संपराय कहीए, संपराय एवं कपायर्नु नाम ने. ॥ २ ॥ हवे अग्यार{ उपसंत मोह नामे गुणथान कटुंव-यने तेनी अनुतानुं प्रमाण कढुंदु: श्रथ एकादशम गुनयान वर्नन:- चोपाई.- यव उपसंतमोह गुनथाना; कहों तातु मनुता परवाना; जहां मोह उपसमे न नासे; जथाप्यात चारित परगाम. ॥ ३३ ॥ दोहरा -- जादि फग्नके जीव गिरि, पर कर गुन रद्द; सो एकादसमी दसा, उपममकी सरहद. ॥ ४ ॥ थर्थ.-जे गुणस्थानमां मोहनीय कर्म नवं उपदामी जाय पण उदयमां नामे नही थने यथारख्यात चारित्रनो प्रकाश ने जे निसंग धान्मानु महज रुप से तेवु प्रगटेने. ॥ ३ ॥ जे उपशम श्रेणि चटिने घने जे गुपयानने फ ग्सीने घवश्यज जीव तिहांधी पटे थने जे गुण प्रगटे ते सर्व रद कर, एगीपार मीदशा थर्ड, एटले उपसंत मोह गुणस्थान थएटले नपामनी मर्यादा...|| हवे वारमा हीरामाद गुनस्थाननु वर्णन पाई-प्रय बादाम गुनयानर वर्नन-- चोपाई:- फेवज शान निक्ट जहाँथाये नहां जोर मन मोर दिसा: प्रगटे पपाण्यात परधाना • सोमाददाम दीन गुन चाना. ॥१७॥ अर्च- जे गुणम्पानने पंचजदान निकट मा.नयां जीत्र 400 समयसारनाटक. -- - . हनीय कर्म खपाचीने बीजा पण घाती कर्म सर्व खपाये,थने ज्यां प्रधान उत्कृष्ट यथा रख्यात चारित्र प्रगटे एवा प्रकारथीजे ते वारमोक्षीणमोह गुणस्थानक कहीए।३५ हुवे थाहीसगण पाठसा उमाथी मामी सात गुणस्थानमा उपगम श्रेणीनाथपेक्षा काल स्थिति देते कहेते थथपष्ट गुनधानक स्थितिकथन उपशम श्रेणिक थपेका दोहरा-पट सत्तम श्रम नवम, दश एकादश वार, थंतर मुदुरत एक बा, एक समे थिति धार ॥ ४६॥ चीन मोह पूरन नयो, करि घूरन चित चाज,थ ब सजोग गुण थानकी, वरनो दसा रसाल ॥ ७ ॥ थर्थ -उतुं, सातमु थाम, नवमु दशमु, अग्यारमु, बारसु, ए सात जे गुणस्थान वे तेनी स्थिति एक थंतर मुहूर्तनी अथवा सात गुनस्थाननी जयन्य एक समयनी स्थिति धारो ॥७॥ मोहमय जे चित्तनी चाल हती तेनु चूर्ण करीने शीण मोह गुण स्थानक पूरण थयु हवे सजोगीगुन थानफनी रसाल दशानु वर्णन करुनु HUN हवे तेरमा गुणथान- वर्णन करुंड - थप त्रयोदशम गुन स्थानक वर्नन - सबैया इकत्तीमा--जाकीख वाला घाती चोकरी विनसगई चोकरी थपा ती जरी जेवरी समान है, प्रगट जयो थनत दसन धनत ज्ञान धीरज धनत सुरख सत्ता समाधान है, जाम भाव नाम गोत वेदनी प्रति ऐसी एक्यासी चोरासी या पचासी परचान है, सो है जिन केवली जगत वासी नगवान, जो थवस्था सो सजोगी [न थान है ॥७॥ थर्थ-जे यात्म गुणना धातना करनार एवा नानावरणी, दर्शनावरणी, मोहनीय, पतराय, ए घाती कर्मनी चोकडी दुख दाता हती ते जेनी विनादा थई गई, अने जे धान्माना गुणनो घात न करे एवा वेदनी, वायु, नाम, गोत्र,ए चार थयाति कर्मनी चोकडी रही ते वलेली दोरी समान रही दर्शनावर णीय कर्मक्ष्य पयाथी जिहा थनत केवल दर्शन प्रगट थयो भने ज्ञानावरणी क्ष्य थपाथी जिहां केवल ज्ञान प्रगटधु अतराय कर्म क्ष्य थयाधी श्रनत की में प्रगटयो मोहनीय कर्म क्ष्य थयाथों धनत सुखसत्तामय थने समाधि प्रगटी यने जेमा थापु कर्म,नामकर्म,गोत्रकर्म, वेदनीकर्म, एचारनी सर्व प्रकृति रही ने तेमा कोना थाहारिक दारीर थाहारक अंगोपांग,थाहारक सपातन, थाहारक बंधन,तथा जिननामविना,ऐसी प्रस्ती रही थने कोने जिननाम सहित ने तथी (६१) रही ले तया काईने थदारक चतुष्को थने जिननामनथी माटे ४ ले तथा को इन जिननाम सहित पचास प्रति प्रमान वे एवी दशानी भरनार जे ने ते ताकी समयसारनाटक. Us? . जिन होय केवली होय जगतनुं जगवान होय तेनी जे अवस्था वे तेनेज सयोगी गुणस्थानक कहीए. ॥ ७ ॥ हवे सजोगी गुणस्थानकवालानी मुज्ञ देखाडे:- सर्वयाकतीनाः-जोअमोल परजंक मुशधारीसरवथा अथवा सुकाउलग्ग मुज्ञ घिरपाल है; खेत सपरत कर्म प्रकृतिके उदे थाए, बिना मग जरे अंतरिक्ष जाकी चाज है; जाकी थिति पूरव करोडि श्राववर्ष घाट, अंतरमुगुरति जघन्य जग जाल हे; तो हे देव थारह दृपन रहित ताको वनारसी कहे मेरी वंदना त्रिकाल हे. ए अर्थ-जे यमोजपणे सर्वथा प्रकारे पर्यक मुशधारी होय एटले पद्मातनवा लीने सदा सर्वदा वेसेठे,अथवा काउसग्गमुश स्थिरपणे पाले ए वचन दिगंवर तं प्रदायतुं वे, घने क्षेत्र, स्पर्श रूप जे कर्म प्ररुति तेनो उदय थयाथी केवली विहार करेठे पण वीजा पुरुषनीपठे चाले नही पण केवली मग नस्याविनाज थाकाशमां थधर चालें चाले ए परूपणा दिगंवर संप्रदायनी ; जे सयोगी गुण स्थाननी स्थिति बाठ वर्षे न्यून पूर्वकोटी वर्पनी थाय केमके जन्मथीबाठ वर्पलगी केवलहान उपजतो नथी,धने या गुनथानानीजघन्यस्थिति एक अंतरमुहूर्तनी थाप जगतजालमा एटझुंज रहेq होय यांही जे एवीयवस्थानो धरनार होय तेतोथढार दूपण रहित देवाधिदेव थाय वनारसीदास कहे। के तेने मारी त्रिकाल वंदना ॥७॥ हवे थटार दूपणनां नाम कहे-थथ अवारस दोप कथन:- कुंमलीयाः-दूपन थधारह रहित, सो केवति संजोग; जनम मरण जाके नहीं, नहिं निंश नय रोग, नहिं निंजय रोग, सोग विस्मय न मोहमति; जरा खेद परस्वेद, नाहिं मट वैर विपे रति; चिंता नांही सनेह, नाहिं जह प्यास न नूपन; थिर समाधि सुख सहित, रहित बजारह दूपन. ॥ ७० ॥ कुंडलीयाः- वानी न हां निरक्षरी, सप्तधातु मन नांहि; केस रोम नख नहि वढे, परम उदारिक माहि; परम उदारिक माहि, जाहि इंख्यि विकार नति, जथारख्यात चारित प्रधान थिर सुकन ध्यान ससि ; लोकालोक प्रकात, करन केवल रजधानी; सो तेरम गुनया न, जहां अतिशय मयवानी. ॥ ७९ ॥ दोहरा. यह सजोग गुनथानकी, रचना कही धनूप, थव योग केवल कथा, कहों यथारथ रूप ॥ ७ ॥ थर्थः-जे थटार दूपणथी रहित ते सजोगी केवली कहिए जेने जन्म नथी मरण नथी, निज्ञ नयी, नय नथी, रोग नथी, सोग नथी, विस्मय नथी, मोहम ति नथी, जरानो खेद नथी, परसेवो नथी १० मद नथी ११ वर नयी १२ विपय समयसारनाटक: - उपरति नथी १३ चिता नथी १४ स्नेह नथी१५ जेने तरस लागे नही१६ नूप ला गे नही १७ अस्थिरपणु नथी १७ तेथी समाधिसुख सहित स्थिररूप थायवे, ए, वा थढार दूपण रहित ए अढार दोष दिगवर संप्रदायथी सिांत सम दायमा १७ दूपण जुटा कह्या रे ॥ ७० ॥ था गुणस्थाननी अवस्थामा निरकरी वाणी होय ने मस्तकमा अहंकार ध्वनीरूप होयठे, थने शरीरमा सात धातु अने सात धातुना मल थता नथी ए दिगबर सप्रदायथी कहेलु ने बने जेना शरीर मा केश, रोम, नखनी वृद्धिथती तथी, एतो उदारीक शरीरमा पण एटला दाय नथी, तेथी देवाधिदेव परम उदारीक शरीरमाज कहिए, ज्या जेने शियविकार नाती गया, ने ज्या प्रधान उत्कृष्ट ययाख्यात चारित्र प्रगट ययुठे, ज्या शुक्त ध्यानरूप चश्मा स्थिररूप थयोठे घने ज्या लोकालोकना प्रकाशनी करनारी केवल ज्ञानरूप राजधानी विराजी रही , ते तेर# सयोगी गुणस्थानक कहिए, ज्या पातरीश थति। शय मयवाणी ॥१॥ए सयोगी गुणयाननी सर्वथीयधिक धनूप रचना कहीते होथयोगी केवलीनी दशा यथार्थरूप के जेवीरीते बनी तेवीरीतनी कदुई ३१ हवे चादमा अयोगी गुणस्थाननु कर्णन करुनु अथ चतुर्दश गुनस्थानक वर्नन सवैया कतीसा - जहा काहू जीवको साता उदे साता नाहि, काहूको थ साता नाहि साता उदे पाश्ये, मन वच कायसों अतीत नयो जहां जीव जाको जस गीत जग जीत रूप गाश्ये, जामें कर्म प्रकृतिकी सत्ता जागी जिनकीसी, य तकाल समेमें सकल खिपाइये, जाकी थिति पच लघु थदर प्रवान सोइ, चौद हो अायोगी गुन थाना ठहराश्ये ॥ ३ ॥ जे गुणस्थानमा कोई जीरने यशाता वेदनीनो उदय थने शाता उदय नयी, एटले शाता वेदनी सत्तारूप भने कोने शाता वेदनी पहाता सुखरूप उदयमा नथी, एटले सत्तामा ले थने ज्यो ण, वचनयोग, काया जोगथी जीर थतीत एटन्ने र "तने जीतया रूप गाए गए एटलो ने श्रने समयसारनाटक. ५७३ दोहरा:-- चौदहगुनथानक दशा, जगवासी जियनूल;थाव संवर नाव दे, वंध मोदके मूल. ॥ ७ ॥ अर्थः-- जगतवासी जीव थ६ थको नूलमा पड्यो । तेनी ए चीद गुण स्थानकथी चोट दशा थाय ठे. श्रांही तत्व दृष्टिमा जोतां जे थाव संवर जाव ने तेज वध मोदना मूल ; एटले याश्रव बंधनुं मूल अने संवर मोदनु, मूलचे हवे याव संवरनी जुटी जूदी अवस्था कहेते.अथ श्राव संवर व्यवस्था कयन. चोप.5-थाश्रव संवर परनति जोलों, जगत निवासि चेतना तोलों; श्राव संवर विधि विवहारा; दोज नवपथ शिवपय धारा-पायाश्रय रुप बंध उतपाता, संवरझान मोप पद दाता, जा संवरसोंथाव ठीजे, ताको नमस्कार थव कीजे.७६ अर्थः- ज्यां सुधी धाव संवरनुं परिणाम परिणमे , त्यांसुधी चेतन रुपई श्वर जगत निवासी थर्ड रह्योठे. याही थाश्रवनी विधि ने ते व्यवहारमा से थने संवरनी विधि वे ते पण व्यवहारमा ते.ए उनी के ण्वे व्यवहार पंथ ते संसार मार्गनी धारा घने मोद मार्गनी धारा पण ने. ॥५॥तंसारमा जे वंधरुप उत्पात ठे ते तो धाश्रवरूप वे. अने जे मोक्षपटनो दाता झान ते संवर रूप वे. जे संवरथी थाव क्ष्य थयो दोय तेने हवे नमस्कार करीए वीए. ।। ८६ ॥ हवे ग्रंथनी धंते मंगलाचरण रुप संवर रूपी झानने नमस्कार करने.- सर्वया इकतीसा --जगतके प्रानीजीवहरह्यो गुमानी एसो, याव असुर .स टानी महा नीम हे; ताको परताप खमिवेको परगट नयां,धर्मको धगया कर्म रोगको हकीम है, जाके परजाव थागे नागे परनाव सब, नागर नवल सुख सागरकी मीम हे; संवरको रूपधरे साधे शिवराह एसो,ज्ञानीपातसाह तारों मेरीतसमीज है. यर्थः- जगतना वासी जेटला प्राणी ने. ते नयने जीनीने जे गुमानी गई रह्यो, एवो यात्रवरूप जे यहर ते. ते महा उन्वदायक . तनी प्रताप गंगवा ने जे टानगप बादशाह प्रगट थयो ने ने केवो तेक धर्मना धागा कानागं वे. घने माप गंग गमाववानो हकीम ने जे ज्ञान बाटगादनां प्रनाय धागल पाम क्रोधादिक राग परुप पुजतना नाव ते सर्व नानीजाय नयन नागरकर तुरते.जे पेहेन को वारेन पामजी एवो जेनोसल समुनेलगानी जीन ने. संपरसपनो पन्नार घने मुनिमार्गनी नायनार एपो जहानापी बादाट. नंनं मादागेमजाम के. एटले नाटकसरीने दान मानाने मुजर्ग रोग है. 53 । इति श्री समपसार नाटर बाजारांपादई नहीन समान था,

७४
समयसारनाटक.
चोप-नयो ग्रंथ सपूरन नापा, वरनी गुनथानककी सापा, वरनन थोर कहाँ
लो कहिये, जथा सकति कही चुप व्हे रहीयें ॥ ॥ लिहए करन अथ उदधि
का, ज्यों ज्यो कहिये त्यों त्यो यधिका, ताते नाटक थगम थपारा, थलप क
वीसुरकी मतियारा ॥ Gए ॥ दोहरा- समयसार नाटक अकथ,
कविकी म
ति लघु होऽ, तातें कहत बनारसी, पूरन कथे न कोश् ॥ ए ॥
सर्वया इकतीसा -जैसे कोर एकाकी सुनट पराकम करि जीते केही नातिचक्री
कटक सोलरनो, जेसे कोन परविन तारु नुज नारु नर तरे केसे स्वयंजूरमन सिधु तर
नो, जेसे को दिमी उठाह मनमाधिरे, करे केसे कारज विधाताको सो करनो,
तेसे तुठ मतीमोरी तामें कविकला थोरी, नाटक थपारमे कहांलो याहि बरनो' एप
अथ जीव महिमा कथन
सर्वया झतीसा -- जेसे वटवृक्ष एक तामे फल हे अनेक फल फल वह बीज
वीज वीज वट है, वटमाहि फल फलमाहि वीज तामेवट कीजे जो विचार तो धन
तता थघट है, तेसे एक सत्तामें थनत गुण प्रजा प्रजामें धनत नृत्य नृत्यमें धनत
उट है, उटमें थनत कता कलामे अनत रूप, रूपमें धनत सत्ता एतो जीव नट
है ॥ ९ ॥ दोहरा ब्रह्म ज्ञान थाकाशमें, उहे समति पग होइ, जथात
कति वहिम धरे, पार न पाये कोई ॥ ए३ ॥ घोपाई -- ब्रह्म ज्ञान नन बत न
पाये, सुमति परोठ कहानी धार, जिहि विधि समयसार जिनि कीनो, तिन्दके
नाम धरे थव तीनो ॥ ४ ॥
यथ कपि त्रयी कथन नाम
सवैया इस्तीमा - कुदकुवाचारज प्रथम गाथावकरे, समेसार नाटक पियारी
नाम दया है, ताही परपरा थमतचद नये तिन्ह, ससरुत कलस समारि सुख लया
है, प्रगटया बनारमा गृहस्थ सिरीमान किये हकरित्तहिए वोध घीज वयो है
गवद यनादि ताम थरय थनादि जीव, नाटक थनादियो यनादिहिको जयो दे
थथ करिय्यवस्था कयन
चोपाई थप पढ क्ह यथारय वानी, सुकवि कुविकी कथा कहानी,प्रयम
सुरवी कहाच मोई, परमारथ रम बग्ने जो एपित वात दिए नहिं थाने,
एर परपग रीनि बरमाने, मत्याग्य सजी नहि मे, मृपा वादसों प्रीति न ममे ॥3॥
दोद्ग - दद मबद यदर यरय, क्हे मिक्षांत प्रवान, जो हि विधि रचना रच
सो हे हावि हसान ॥ ७ ॥

समयमारनाटक. ບ ຈົບ : - चौपाह... मुनु परविरह है जंगा: अपगमी दिय बंध अनेना: मृपा नाव न बग्न हिनना नई वनि नदि उपजे चिनमा ॥ण !! प्याति सानं पू जामन यान; पन्माग्य पर नंदन नान: बानी जीव एक करि वृमि: जानी नजर चिन संग ॥ 300 ॥ यानी तीन नयो जग मौजे. वानी ममता ल्यागि न वोने दे चनादि वानी जगमांडी. कुरुवि वान यह समुफे नाही. ॥ 30१ ॥ अघवानी व्यवस्था कवन- मर्वया कनीना-जेन कार देनमें नजिजधार काजली. नदीनों निति फिरि नदी में नमानी है: नगरमें वीरवर फेजीग्दी वहूं योग.जाके दिग यह ना कहे मेगे पानीले. त्याही घट नटन नदनयनाटिनम, बदन बटनमें घनादिदीको वानी है: करम कलोजनों उसातकी बचारि वाजे. तानों कहे मेरीधुनि एतो मृद्र प्रानी है. ॥ ३०२ ॥ दोहन:- एने मृह फुकवि कुधी, गहे मृपा पय दोर : रहे मगन घनिमानमें, कई घोरकी घोर. ॥ ३ ॥वस्तु सरूप सखे नही. वाहिन दृष्टि प्रमान; मृपा विलास बिजोकके, करे मृपा गुन ज्ञान. ॥ ७०४ ॥ यथ मृपा गुन डान पया- सर्वया कितीमा.~ मांसकी गरथि कुच कंचन कज़न कहे. कहे मुख चंद जो मलेखमाको घरु है, दाटके दान याहि हीग मोती कहे ताहि. मानके अधर यो उ फहे विव फर है: हाड दंम मुजा कहै काजनाज़ काम जुधा. हामहीके थंना जंघा क्हे रना तर हे, याही जूनी जुगति बनावं श्री कहावं कवि. एते पर कहे हम मारदाको वर हे. ॥ ७०५ ॥ चौपाई - मिय्यावत कुकवि जे पानी, मिथ्या तिनको नापित वानी, मिथ्यावंत सुकवि जो होई, वचन प्रवान करे सब कोई.७७६ दोहरा ~ वचन प्रवान करे तुकवि, पुस्प हदे परवान. दोन अंग प्रवान जो, तोहे सहज मुजान. ॥ ७० ॥ यय नाटक समयतार व्यवस्था कयन:- चौपाई-थव यह वात कही हे जेसे, नाटक नापा नयो तु एत, कुंद कुंद मुनि मूल उधरता, अमृतचंद टीकाके करता. ॥ 300 ॥ समेतार नाटक मुख गनी, टीका सहित तंतस्त वानी, पंमित पढे घटमती वूफे यसपमतीको थरथ न सूजे. ॥ 300 ॥ पां राजमन जिनधर्मी, समयसार नाटकके मर्मी, तिन्ह ग रंथकी टीका कीनी, वालाबोध सुगम करि दीनी. ॥७१ ॥ इहि विधि वोधवचनिका फैली, समीपा अध्यातम सेली, प्रकटी जगतमांहि जिनवानी, घर घर नाटक कथा वपानी. ॥ ११ ॥ नगर आगरामांहि विख्याता, कारन पार "ग, - - + यय विगयया शिन यशान ह, मान इनिही थटिल चारि कुमनीए मिले, सफा सातसं मनाई। Ugs समयसारनाटक. पच पुरुष यति निपुन प्रवीने, निसिदिन ज्ञानकया रस जीने ॥ १२॥ दोहरा - रूपचद पडित प्रथम, इतिय चतुर्नुज नाम, वृत्तिय नगौती दासनर, कौरपान गुनधाम ॥ १३ ॥ धर्मदास ए पच जन, मिलि वेसे गेर, परमारथ चरचा करे, इन्हके कथा न थोर ॥ १४ ॥ कबहूं नाटक रस सुने, कबहू थोर सिघात, कबहू विग बनाइके, कहे बोध विरतंत ॥ १५ ॥ दोहरा - चित चकोर करु धरम धरु, सुमति नगीती दास, चतुर नाव पिर ता नए, रूपचद परगास ॥ १६ ॥ इदि विवि ज्ञान प्रगट नयो, नगर थागरे माहि, देसदेस महि विस्तयों, मृपा देश महि नाहि. ॥ १७॥ चौपई - जहा त हो जिनवानी फेली, सपे न सो जाकी मति मेली, जाके सहज बोध उतपाता, मो ततकाल लग्वे यह वाता ॥ १७॥ दोहरा.- घटपट अंतर जिन वसे, घटय ४ श्रतर जैन, मत मदिराके पानसो, मतवाला समुळ न ॥ १५ ॥ घोपाई -बहुत वटाउ कहालो कीजे, कारजरूपपात कहि लीजें, नगर थागरा मारे रिष्याता, बनारसी नामे लघु झाता ॥७२॥तामे कवित कला चतुराई, कपा परे पचा नाई. ए परपच रहित हिय खोले, ते वनारसीसो हसि बोले ॥२१॥ नाटर गमगार हित जीका, सुगमरुप राजमली टीका, कवित वह रचना जो रोई, नारा मथ पढे सन को ॥ २२ ॥ तव बनारसी मनमहि थानी, कीजे नो प्रगटेरिनानी, पर्च पुस्पकी श्राझा लीनी, कवित बधकी रचना कीनी ७५३ मोग्नगं निगनरे रिते, थासुमाग मित पक्ष रितीते, तिथि तेरसि रविवार प्रवीना, तादिन मय समापत कीना ॥२॥ दोहरा। सुस निधान सकवरन र मानिय माहि गिन, सहम साहि निर मुकुटमनि, साह जहा सुजतान । ३२५॥ नारे गज सुचनमों, कीनो थागम सार, उति नीती व्यापी नहीं, पर हनी पगार ॥२६॥ थर सबका तीफ कयन- गया प्रतीमा - तीनम दसोनर सोरता दोहा उद दोर, शनीमा दानेद, वामी सचोपज्य मतीम तने सर्वये, बीम वप्प अठारह , म तोक्ने है, बनीन यक्ष मनोकीन ता पेय प्रय सम्या सत्रहत सा नयरिशने है ॥ ३२ ॥ दादग-समयसार यातम दरव, नाटक नाव यनत, महे यान नामम, पामाग्य शिनन ॥ १२॥ ॥नि परमागन समयमाग्नाटक नाम मिहांत सपूर्णम् श्री रस्तु । जुगनस तेतानीम

No text on this page.

थनार्यक्षेत्र धनार्यकुलमा उपजे, तिहां प्रबल कपाय विषयादिक अगुआहेतुना थथवा कोईदेवमरी मनुष्यथाय, तिहां कारण थपरिपाकपणाथी बहुलतायें। योगे परिणम्यो तो फरीतियंचगति यावत् एकेश्यि चक्रमापडे वली ते दशापाम) सम्यक्त स्वरूपस्तव. थी थकाम निर्जराने योगे गर्नज मनुष्य थाय,थथवा गर्नन तिर्यंच पचेश्यि य, ते जेवारे गर्नज पचेड़ितीर्यच थथवा गर्नज मनुष्य थाय, तेवारे प्रबल धिकरणी थयो, तिहां पांचे थाश्रव प्रवलपणे सेवे तिहा प्राण तथा पय प्रणहोय तेनेलीधे त्रिकाल वेदन स्वकीय परकीयना विकल्पजालमा पड़े, ते उत्कृष्ट कर्मस्थितिनु धणी थाय, थार्न राइ ध्याननी प्रबलता थाय, ते सुध ननायोगे कर्मस्थिति दीर्वकरे, शहां कोकजीव प्रबल हिसादिक कारणनेयोत सातेनरकोने विपे जाय, थथवा किवारेक मुर्दादिक अधिकरण योगे पाठो एक झियमां पण जाय, तिहां अनतकाल रुले थथवा किवारेक चेदन दन ताडन तर्जन शीत तापादिक सहनकरतो जा ति शरलपरिणामी माटे तीसक्लेश न करे तो थकामनिर्जराकरी कोकजीव देवगति पामे, अथवा को जीव मनुष्यथाय तेमांजो देव थयोतो अतिशय विषयाशक्तमा माचीने तीसक्लेशे विषयाशक्त थको मरीने प्राय तिर्यच पचेही गर्नजयाय, तिहाँ वदुल हिसादिक सेवनकरी नरकेजाय, अथवा पाठोपडी एकेश्यिचक्रमा जाय, फ रीतिहाथी निकली पचेश्यिपणु पामतां उत्कृष्ट कायस्थिति योगे असख्य पुजन परावर्त वीतीजाय योगे थढारे पापस्थानकसेवी, फिवारे सातेनरकोंने विपे जेवा जेवा कर्म बांधे तेवा तेवां कर्मानुसारे ते ते नरकमा जई उपजवुयाय, एम यथावधी उपजे, तिहां नरक सबधी थाकराऽ रख थसत्यकाज पर्यंत सहन करे, ते नरक खना विपाक नव नावनादिक ग्रथथी जाणवा थथवाकोई तो मनुप्यनवपामी घरकुटवनी तीच मूर्धामा मूतियको थशान ॥ थनतानत काज व्यतिक्रमीजाय, तया कोईमनुष्य विशिष्टज्ञानपिना मूढचेतना नप्रतियें सरलयको सहेजे कपायनी मदताये मनुष्यपण थाय, तिहावनी वरिपाकविना थक्षकारणनी बहुलतानेयोगे मिथ्यात्वादिक थबहेतुनी पुष्ट में कर्मस्थिति उल्लटिकरे, ते उलएकमस्थिति लखियें ॥ गाथा ॥ माहेका कोडी, सत्तरियोसचनामगायाण ॥ तीसायराणि चउन, तिनीसायरा था सम्यक्त स्वरूपस्तव. एर उस्त ॥१॥ अर्थ ॥ तेकर्मबंध वांधवाना चारहेतुने, मिथ्यात्व अविरति कपा यथने योग, ए चारहेनुनी प्रवततायें कर्मस्थिति उत्कृष्टी वांधवे. तिहां सर्वकर्मनो उत्पादकपोषक मोहनीय कर्म , जेम माथी मुरगी थने मु रगीयी हुं तेम मोहनीयकर्मथो बावेकर्मवांध, यावे मनी मोहनीयकर्म नी पुष्टीकर, माटे मोहनीयकर्मनी मुख्यताकही. मोहनीयकर्मने राजपदनी उपमाकही, ते मोहनीयकर्मनी अव्यावील प्रतिमां मिथ्यात्व मुख्य कर्मप्रतिने. तमस्त संसारमा सर्वजीवोने समस्त दुखनोहंतु एकमिथ्यात्वठे. ते मिथ्यात्वमोह नीय एकवारनुबांध्युं उत्कृष्टो सिंतेरकोडाकोडी सागरोपमधी विपाकयापे, तेहनो विपाक अत्यंत मदिरापाननी घुमि सरिखोने, जेम मदिरानुं पानकरनार पुरुष मि त्रने शत्रुनी चुहिये मारवादोडे अने शत्रुने हंसीहंती मलवादोडे. तेम तोत्रमोहना उदयथी जीवने अजीवजाणे यने अजीवने जीवजारो तया धर्मने यधर्मजाणे, थधर्मने धर्मजाणे, मार्गने उन्मार्गजाणे. उन्मार्गने मार्गजाणे, साधुने असाधुजाणे, असाधुन साधुजाएं, मुक्तने यमुक्तजाणे,धमुक्तने मुक्तजाणे, ए दाप्रकारे मिथ्यात्व विपाक थापे. तथा नामकर्म थने गोत्रकर्म एकवारनुवायुं उत्कृष्टो वीसकोडाकोडी सागरोप म स्थितिरहे.ते नामकर्मनो विपाक चित्रकार सरिखो विचित्रपणे वे केमके जे वर्ण रहित गंधरहित स्पर्शरहित रूपरहित रसरहित धने समन्तदोष रहित,यसंख्यानम्र शीलोकप्रमाण यखमयनंत ज्ञान दर्शन चारित्र स्वरूपी नंबयण संस्थान दिन, वा धरुपी यात्माने एकश्यि वयि कुरुपी सुरुपी नीगणो कुवमो कालो घाट थतिमहोटो तो हजारयोजनप्रमाणथतिमृन्म तो वाजनीश्रणीउपरेंथनामा गोलेगोले धतरव्य निगोट निगों निगोद थनंत जीव, ल्याटिक जीवनं - ख्यान रुप विपाकथापे एवं ए नामकर्मवे. गोत्रकर्मनो विपाक कुंनारना नांमा नरसो से कम एजीय mms णी निघतमान जगतने वंदनीय स्वरूपी ने, तेज जीवन चंगाट गाzary खोर जेने कोई घटक नही कदापि घटक तो जनाटिकंत्रान -~ विष्टा चर्म दामन जण नागे स्वान घग्मां धावं, या तो तेनी का अंश नयाणे, गोचपरा न करे, धने पंक प्राएनो धारक तन्दानव नवे दिन वन्नुनी जाण, नर्वः शुन करती करवा ननये, तहत दर्शन सी या eng - (तेम एस्मना रिपाक जे पूर्वोक्त स्वरूप जीवने अधकरे, न्यूनश्शीय शन्यशीयकरे। वेदनीयकर्म मधुजित तरवारनी धारा समानवे तेमा मधुना थास्वाद सरिखी/ याय सम्यक्त स्वरूपस्तव ना करेनही, तेथी तेने वस्ति बाहिर रहेतु पडे, ए सर्व विपाक नीच गोत्रना जाय वा तथा उंच गोत्रना विपाक ते जे कोई जीव मूर्ख जड इष्ट निर्मन निर्गुण कुरूप कुहित दोय, थने कुकर्मनो कर्ता होय, कर्म चमाल होय, एबु उता पण महोटा कुलमा अवतार लीयो होय, तो दोपे नखो पण लोकमां आदर सन्मान सत्कार पामे, जो थक्षाचरण देखी निदा थाय, तोपण अवशर उपर तेहने सर कोई तेडीने विनयकर, जे ए महोटा बे, महोटा कुजना बे, बोलादीने, केटलाक दोष ढाक्या जाय इति गोत्र कर्मविपाक झानावरणी थने दर्शनावरणी तथा वेदनीय थने थतराय एचारकर्मनी स्थि ति एकवार वांध्या त्रीसकोडाकोडी सागरोपम पर्यत विपाकापे तेमा कानावरणीकर्म थारखनापाटा समानवे, जेने एकमनो तीवोदयहोय ते प्राणी काज जाणेनही, केमके जीवना सर्व थाकाश तथा काल प्रमुख व्या र्यायथी धनतगुणा ज्ञानगुणना पर्यापले, ते सर्वपर्याय ए ज्ञानावरणीकमै थाव खाने, एक अकरना थनतपर्यायले, तेमाहेलो एकपर्यायनु ज्ञान निगादिया जीव ने उपजतांहोय, बाकी सर्वपर्यायनु ज्ञान ढाक्युबे, एक बरनो थनतमो नाग ३ पाडोरहे, तेपण इव्यस्वनावेरहे, पण कर्मनी रायतिनथी, एक जीवश्व्य ते वीनात वव्यना व्य गुण पर्यायना त्रिकालिक उत्पाद व्ययनो एकसमयमा झायक चिदा नदयनरुपी पहबु चेतनराजने तेने ए ज्ञानावरणीकर्म जहरूप अतियुसकरीनाखे. पण तेदना उपर कोईरीते अनुकपाकरेनही, काष्टप्रायकर, चेतनना मुख्य ज्ञानगुण ने थावरे. ए ज्ञानावरणीय कर्मना विपाक जागवा दर्शनावरणीयकर्म वैत्रीसरितु दरवान दोढीदार सरिखु ,जेम राजाप्रसन्न पोरता दरवान खुमी नहोयतो ते घटकाची राखे, पण राजानी नेटकरवानथापे वधिर करे सर्व गुनकरणीयादरे, ते अवसरे सर्वपाता निधिावी तेनो राननिमिन ध्यर्थकरी नाग्वे, ए दर्शनावरणीय कर्मनो विपाक जाणवा शातावेदनीपत्रे थन जीन वेदायाना इस सारखी श्रशाता वेदनीयळे एकर्मना 'विपाक गर्नगत व जन्मसमयना न्य समस्त रोगोत्पत्तिनाऽख मरण समय ना स वियोगोदयनाउ ख विषय थप्रातिना ख थान महानयनाड व शीत व तापद स्व तथा तिर्यंचना नवमा वध वन नारवहन शकटवहन रूपिक्रियागत 3 सम्यक्त स्वरूपस्तव. एG३ , ख खासीक्रियाउ.ख नासावेधःख हुधाःख प्यासाउ.ख मृगयाउःख असवारी नाहःख दूरपंथ गमनख जातिवैरीनाऊःख धर्मवुहिये हनन समयना इख पिंजरामी पडवाना ख इत्यादिक अनेकःख तिर्यचगतिमांछे, तथा नरकगतिमा त्रिवेदना शरीरगत अनेक रोगजन्यमुख परमाधामिकत ख अन्योन्य प्रहरण प्रहार उःख ए सर्व यशातोदय वेदनीयना विपाकजाणवा, तथा शातावेदनीयोद यथी सर्वहित खावा पीवानानोग वली खेल, स्त्रीविलास राग रंग सुख सच्या मान महत्व राजलीना कामनासिदि निरोगता इत्यादिक सर्व शातावेदनीयना वि पाक मे. एकर्म जीवना याव्यावाधगुणने वाधकरनारुंठे. समस्त देव मनुप्यना |त्रिकालिक पुजलिकमुख एकठाकरीने तुल्यनाकरियें तो सिझनासुखने अनंतमे नागे पण न थावे, एहवा सहजानंदी जीवने एकर्म शुनागुन पुगतपिंममा रखडावे ए वेदनीयकर्मनो विपाककह्यो. अंतरायकर्म राजाना मारीशरिखं. जेम राजा सुप्रशन्नयई कोऽने श्व्य आप वानो धादेशकरे, पण जो नंमारी अनुकूल न होय, तोकोऽपण निमिचे विलंबक रीथापे, धकाखबरावे, पण इव्य यापेनही, तेम ए कर्मनाविपाके दान शक्ति न पामे कदापि दानवा न करे यने चाकरतो उलटो कोई एहवो विकल्पग्ठे के, जेथकी दानधापवानी बुद्धिज नूतीजाय, पण आपीशकेनही, तेमज लान मेलववाने अर्थ पण घणीज पोतानी बुद्धि केलवी चतुराईथी उद्यमकरे, सर्ववातें खबरदारीराखे, थने कार्यपण सखुवामां आवे, जेथकी एवी आशा थायके आ उद्यममां रूडीपा प्ति अवश्ययशे तेथी हर्षवत पण याय एटलामां कोईलानांतराय कर्मना उदयथी एहवां कारणो यावी वने के जेथकी लानने काणे उलटो त्रोटोथ पडे, ते ला नातंराय कर्मनो विपाक जाणवो तेमज नोगांतरायकर्मना विपाके नोगन पामे,कदा पि पामे तो रोग शोग नयादिक कारणे नोगवी शकेनही एमज उपनोग वस्तुपण एना उदयथीन पामे, कदापिपामे तो तेनो कोईपण हरकतनेलीधे उपनोग करीशके नही, तेमज वीतरायना उदयथी शरीर निर्वलतापामे, थनेक घोपध रसायन खाय तोपण उलटो कोई कुपथ्याटिकने योगे रोग थाय, उर्बलतानी वृद्धि थाय, परवसादिकने योगे मननीहोस मनमांसमें पण चिंतितकार्य करी शकेनही, एरीते अंतरायकर्मनो विपाक जाणवो. यायुकर्मनी उत्कृष्टीस्थिति तेत्रीत सागरोपमनी, ते एक गुनायु वीलु थ नायु ए वे प्रकारेठे, ए कर्म हेड गरिठे, जेम ज्यां लगण हेडमां पग प न्ये सदहे, जे धर्मशब्द शानलवा सन्मुख निर्विवेकपणेहोय तेने श्रवणसन्मुखी ना पने तिहांथी ससार परिचमणकरतो जीप उच्च नावमा धावे, तेवारे दोढपुन/ स परावर्तरहे मार्गगवेपणा मार्गश्रवण मार्गसन्मुख मार्गानुसारीमार्गप्राप्ति इत्यादि कनाम इहाथीथागथाय,धर्मनपीपसे जिनोक्तमार्गनु श्रवणहोय कोझरीतें रुचि थाय पण तीवनावें गवेपणानहोय, एने मार्गपतित कहिये, एटले मार्गपडयो को गांनुसारीपणु गुहागुरुनी गवेपणामात्रहोय, एगतेफरतां यहां धर्मयोवनकानथा | नेय, एहने मार्गानुसारी कहिये, इहा पटदर्शननो निन्नताजाणे, जिनोतमागें व्यव/ तिनथाय, हा पहेना त्रण यनुष्टाननीप्रवजता होय, सर्वक्रियाकरे तेदेखीवी/ थनेरजीर धर्मपामे, पण पोताने नहोय तेभियानुफल स्वगादिकथाय, पण नि) सम्यक्स स्वरूपस्तव घुहोय त्यालगण विहापण जवाई शकायनही, तेम थायुकर्म वांग्यापनी एटलो धर्मकरणीकरे दायिक सम्यक्त्वादिक उपार्जे तोपण बांधेलीगतीथवश्य गवीपडे, पण तूटेनही, बीजा कौनोउदय तोयपवर्तन सक्रमणादि करण य नि फलकरे, पण ए कर्मतो जोगव्यापिना तुटेजनही, बीजा शुनागुनकर्म उंच : च परिणाम योगे दल वृद्धि हानीयाय, पण एकर्मतो यथावधे अवश्य नोगव्युंज जोय, जोपण नरकादिकना खयणाय थनिष्ट लागे, तोपण वुटेनही, एरीते थायुकर्मनो विपाक जाणवो एरीतें थावेफर्मनी प्रति स्थिति रस ने प्रदेशबंधना परवशपणे थनंतानंत पुगनपरावर्त थया जन्ममरणादिरूप, नीपण कातारमा नम्यो, एम नमता नमता कोशवारे ऽर्जन मनुष्यनवादि सामग्रीयोग मयो, पण मिथ्यात्वनी प्रबलता' तुये अथवा पाचकारणना परिपाकविना किहापण सम्यक्त्वनी प्राप्ति नई, केव नवपूर्णथयो हा प्रसगे योगविंऽयंथमाकोली सम्यक्त्व प्राप्तिनी शैली लखियेंठश्ये जे नव्यजीते तेने नव्यताना उदयेकरी थकाम निर्जराये कर्मखपावता पाच कारणनी थनुकूलतायकरी बे पुजपरावर्त शेप ससार रहे, तेबारे धर्मशब्द सामा वकहिये, पण तथाविध थादरपीपासाकाईहोयनही पण सहज मिलेतो विमुखनही लो एवीरुचीयईपमी, ससारपरित्रमणकरता एकपुन परावर्तरहे तेवारें जिनमा न्यायसपन्न बिनाप्रमुख पात्रीसगुणपामे, मित्रादिकदृष्टी पामवानो थवशर प्रवर्ने, हाथी मिथ्यात्वमदपड्यु, तेथी व्यवहारे व्यधर्मपणपामे, थ नयाय ॥ २ ॥ इतिद्वितीय गाथार्य पण सम्यक्त्व सम्यक्त्वस्वरूपस्तव. បចU. हवे सम्यक्त्व प्राप्तिनो उपायकहेते:- पल्लोवलमाअदा. पवनिकरणेणकोविजकुणः ॥ पलिआ असंखनागुण. कोमिकामि अरवि सेसं॥ ३ ॥ अर्च ॥ इहां चरम पुजनपगवर्तमां मिथ्यात्वनी मंदताथाय तिवारें सम्यक्त्व पामवाना कारण त्रण करणने, तेनानाम एक यथाप्रवृत्ति वीजोयपूर्व त्रीजोथनिव ति. तमां हांप्रथमकराणनो छवमरने तेकहेने, ए सम्यस्त्वगुण पामतां सुधीमांत वनाधारण या दृष्टांतकांने तेमां ययाप्रवृत्तिकरणकरतां वे दृष्टांतलागे ते दृष्टां तनी आवश्यकोक्त गाथा जिएं. "पत्नयगिरि मरिचना, पिवीतिया पुस्तिपह जरगहीया कोदव जन वहा गिध सामाश्यलानदिता ॥ १ ॥ एगाथानोअर्यकहे एक पालानुंदृष्टांत, वीजुं पर्वतथी नदिप्रपातस्थानेरहेता पापाणर्नु दृष्टांत, त्रीजुं पीपीलिका ते कोमीनदृष्टां त. चोथु त्रणपंयीपुत्पनु दृष्टांत. पांचमु ज्वरग्रहीत, दृष्टांत, तुं मदनकोऽवतुं दृष्टात, मातमुं मलिनजल दृष्टांत, आवमुं समलवस्त्रदृष्टात, ए या दृष्टांत सर्वे त म्यक्त्वनो लान थतासुधीमा लागे, तं यथा स्थानकं लखीतुं, पण ऽहांतो यथा प्रवृत्तिकरणे वे दृष्टांतलागेठे ते कहिये यं. तिहां सम्यक्त्वपामता करण त्रण १ यथाप्रवृत्तिकरण अपूर्वकरण ३ अनि वृत्तिकरण; तेमा यथाप्रवृत्तिते ‘यनतिकम्यकरोतीति' यथाप्रवृत्ति, ए व्युत्पत्तिनो थर्थ -यथाके जेम अनादिनी चालते तेमनीतेम प्रवृत्तिनुं करणके जीवपरिणाम, प्रवर्तन जिहां, तेने यथाप्रवृत्तिकरणकहियें, एटले यनादिनुजे चाल परिणामठे ते प्रवर्तन फरघुनयी, अनादिचालें प्रवतठे पण कारणपरिपाकना जोरथी मिथ्या त्वनी मंदतायाय, तेथी पालाने दृष्टांते जेम पूर्वे नखो धाननोपालो तेमां थोडंधा ननारिखयें घने घणुं धानकाटीये तेवारे तेपालो कालांतरे खालीयाय तेम कर्मरू प धानेकरी समस्त यात्मप्रटेगरुप पालोनयो तेपालो जीवने अनानोगथी एट ले चाविना सहजें अकामनिर्जराथी वेदननेदनादिकथा अग्रुनविपाकावगरें मि ध्यात्व तथा अनंतानुबंधी कपायनी मंदतानायोगें कर्मविपाके वहु व्यापक न होय तेवारे कष्टमाफक निर्जरावणीयाय, अने मिथ्याल कपायनी मंदता माटे नवाकर्मप ण घणाबाधेनही, मंदवीर्यमाटे प्रदेगरश पण थोडंग्रहणकरे एटले घणी निर्जरा थाय बने बंध यल्पयाय तेथी कर्मस्थिति रूपधान्य पालो घटाडे.

त्रीजु थनिवृत्तिकरण ते जे थव्यवसाय फल प्राप्तिपिनानिवर्ने पडेनही, एटजे। हा एत्रण करणनी सारस्थापवाने कल्पनाप्यनी गाथा जिम्वेवे "धतिमकोटा। ५७६ सम्यक्लस्वरूपस्तव. तथा बीजुद्दष्टात नदीना पापाणनु, जेम पर्वतथी नदीपारापडे तिहा नीचेरहे झुं पाषाण तेनदीनी जलधारा पडवाथी यरहो परदो घोलाप यथडाय, ते पापा ण घोलना पचनानेयोगे घसाईने घोलघाटमायावे, फरसमां सुहालीयाय, एरीतेस हेज वनावेकोक घाटमाथ्यावे पण कोऽए एनो विचारपूर्वक घाट कखोनी तेम जीवते पापाणरूप, नदीप्रवाह ते कर्मोदय प्रवाहे पचतो थकाम निर्जराथी पूर्वोक्तन्याये निर्जरायेकरी कोइक धर्मप्रवृत्तियोग्य घाटमाथावे. (थाकारमाबावे) ए बेदृष्टातेकरी एकधायुकर्मवर्जिने वाकीसातेकर्मनी उत्करिस्थितियोग्य वषष रिणामने घटाडे, तथा पूर्वबधहोय तेपण निर्जरे, तेबारे सितेरकोडाकोडी मिथ्या त्व वाधतोहतो ते परिणाम टलीने पथ्योपमने यसख्यातमे जागे न्यून एक को माकोडीनी स्थितिबधना परिणाम राखे, तथा पूर्ववधहोय तेपण सर्व स्थिति घटीने एक कोमाकोडीनी स्थिति सेपरहे, एरीतें एक थायुकर्म मूकी बाकी सा ते कर्मनी स्थितिवटामीनाखे एटले त्रीसकोमाकोसी स्थितिवाला कर्मोनी श्रोगण त्रीत कोडाकोडि घटाडी पत्योपमने यसख्यातमेनागे न्यून एक कोडाकोडी सागरोपम राखे, ज्ञानावरण दर्शनावरण वेदनीय अने अत्तरीय ए चार कर्मनी एटलो स्थितिराखे, तथा नाम बने गोत्र ए वेकर्मनी उत्कृष्टी वीसकोडाकोडी साग रोपमनी स्थितिमाथी योगणीस कोडाकोडीपटाडीने पल्योपमने असख्यातमें ना में न्यून एक कोडाकोडिराखे, एटलासुधी जे जीवना परिणामनी योग्यताथयी एनु नाम यथाप्रवृत्तिकरण कहिये, ए करण जीव ससारमा नमता नमता धनतिवार करे, पोपमने असख्यातनागे ही एककोडाफोडी सागरोपमनी शातकर्मनी से पस्थितिरही तिहासुधी यथाप्रवृत्तिकरण कहिये, थागले ग्रथीदेशयाव्यो खरो पण ए करणयोग्य परिणामे थागन न जवाय इति प्रथमकरण बीजु थपूर्वकरण ते जे पहेला ससार परित्रमण करता कदापि एतु, करण से जीतपरिणाम विशेष ते पायोनी माटे यापूर्वकरण कहिये, एथपूर्वकरण परि पामें धन निण्ड रागक्षेप परिणतीमयी जे प्रथा तेने दवामामे,जे नेदे तेह अध्य वमायने थपूर्वकरण कहिये से थायोजे अपूर्वकरणरूप परिणाम त पागे जायनही तेने अनिवनिकरण कहिय, ते घनिवृत्तिकरणरूप परिणामेफरी जी सम्यक्त्व पामे ते त्रीकरण ।

सम्यक्लस्वरूपस्तव. បទ कोडी, सर्वकम्माण घाउबलाएं ॥ पलियाअतंखिमा, नागेखोगेहवागंठी ॥ १ ॥ गंनितिने, करकटयएमढमूढगंठीव ॥ जीवस्सकम्मणिन, घमरागदोसपरि पामो ॥ २ ॥ जागंतीतापढमं, गंठी समस्याउँनवेवीयं ॥अनियट्टी करणंपुण, सम्म नपुरकडे जीवे ॥३॥ एत्रणगायानो अर्थ लेशमात्र लखियेने. थायुव ने सातेकर्मनी अंतिम के ठहेली कोडाकोडिस्थिति पन्योपमने थ संख्यातमेंनागे न्यूनरहे वाकीसर्वरवपीजाय एदवे ऽहां गंती कणस्थानकडे ॥१॥ गंठीकहेचीने सुउप्नेत के अत्यंतमुग्वे नेटवायोग्य कर्कग वक्र गृढ गुप्त कोइ ख टिराटि कठीण काटनागांउनीपरें जेवीतेवीरीते नेदाय टायनही ए उपमायें थ नादिनु जीवने कर्मजनित धन के निवड राग देप परिणति संचयरूप ग्रंथी ते वजवत् उजेद्यचे ॥ २ ॥ जिहांगंठी तिहांसुधीयावे तेने पढम के प्रथम यथा प्रवृत्तिकरण होय, पठी गंठीसमव के ग्रंथी समर्थनकरतां साम्यर्यवतथई ग्रंथी नेदतां वीजु थपूर्वकरण होय; तथा पुण के वलीथनियटीकरण के अनिवृत्ति करण ते सम्मनपुरकडे के सम्यक्त्व थवश्यप्राप्त नव्यपणे वागतकरयं जेणे जीवे, एटले सम्यक्त्व अवश्यपामतुं जेना मुखागल राठे तेजीवनेत्रीजुंकरण होय॥३॥ एरीते धाननोपालो तथा नदीनुपर ए वे दृष्टांतें कोकजीवें यथाप्रवृत्तिकरणे पन्योपमने घसंख्यातनागें न्यून एककोडाकोडि सागरोपमनी सातेकर्मनी शेप स्थिति कीधी, एटले सम्यक्त्व प्राप्तिनो निश्चथयो एरीतें शिष्यवोल्यो तेवारे गुरुक हे इहां सम्यक्त्व प्राप्ति, निधैथयोनथी ते गाथायें करीकहेठे. तविगंगघणराग दोसपरिणश्मयं अनिहितो ॥ गंग्यिजीवो विदहा, नलह तुद दसणं नाद ॥ ४ ॥ अर्थः- तविके० तिहांपण काश्कवणी एककोडाकोडी स्थिति शेप सातकर्म नी कीधी तोपण थनव्य अथवा उजव्यत्वादिक दूपण ने लीधे हाहाइतिखेदे रा गपपरिणाममग्रंथोदेशगत जीवपण ग्रथीने थानेदतोथको हे नाथ ताहरु दर्श नजे श्रीमुख कहेलु सम्यक्त्वते पामीशनही केमके ए यथाप्रवृत्ति करणधीतो थनव्यपण थावे एवं थावश्यक वृत्तिमा कपुत्र के अनव्यपण कोक धकामनि र्जराकरतो ग्रंथीदेशसुधीयावे तिहां अरिहंतनी कछीदेखीने अथवा अन्यकोई पुजली काहीनी इवायें प्रवर्तमानथको चारित्रलीये तिहांमात्र श्रुतसामायकनो लान तेने होय, पण शेप दर्शन सामायिकादिक पामेनही, एम संसारमा नमताथका व्यव បុបថ្មី सम्यक्त्वस्वरूपलव. हार रासियाजीवप्राये जिहांशुधी चरमावर्त चरमकरण न पामे तिहासुधी यनतिका र ग्रथोदेशसुधीधावी पागपडे ॥ ४ ॥ इतिचतुर्थगाथार्थ हवे जीव जे रीते ग्रथीनेदे तेरीत कहे- पहिलिय पविलिय नाएण, कोविपत्त सन्निपंचिट। नबो अवपुग्गल, परियड्वसेस ससारो ॥५॥ थर्थ -पहिलियपिविलियनाएणके ० हा ग्रंथीदेशपाम्यापठी कोकजीव थपूर्वक रणकरे ते पथीजे वाटमार्ग तथा पिपिलोकाजे कीडी तेने नायण के न्याये दृष्टी तेंकरे तेदृष्टांत देखाडवाने जाप्यनी गाथा लिखुख जहश्हतिन्निमस्सा, जतडविपहसहावगमणेण ॥ कालाकमनीया, तुरतिष जायदोचोरा ॥ १ ॥ दमग्गतडछे, तेएगोमग्गउपडिनियत्तो॥बीगहियोतश्व, त मश्कतोपुरपत्तो ॥ २॥ थडवीनवोमषुस्सा, जीवोकम्महिपहोदीहो । गतीयनय घाण, रागदोसायदोचोरा ॥ ३ ॥ जग्गोविश्परिवुही, गहियोपुणगविगत॥ मत्तपुरएव, जोशा तिनिकरणा ॥ ॥ विईसहावियगमण, प्पयण ॥ गणथाणुसिरेवा उहरणवामुअगीण ॥ ५॥ विगमणपिवपढमं ॥ था णूसरणचकरणमप्पुब्ध ॥ उप्पयपपिवतत्तो, जीवाणकरणमनियहि ॥ ६ ॥ था वग विदेसो, गठियसत्तस्सतउवाण ॥ उतरणपिवतत्तो, पुणोविकम्महि विवति ॥ ७॥ हवे ए सातगाथानो थर्थ किचितमात्र लिखु जहाह के जेमइहा कोक ति निमणुस्सा के० प्रणमनुष्यवे, ते सहावगमणेण के खनावगमनेकरी सहेजे नि प्रयोजने जतिपद के घटवीपंथेजायजे ते जाताजाता घणी थटवी उघोगया पठी कालाकमनीया के० कालथतिकमयेकरी जयपाम्या, एटले थसूरवरखते थट वीनो पंथ तेथी मरवालागा, एटलामा तुरति के तुरत पत्तायदोचोरा के बेचार यावा लागा. ॥ १ ॥ पनी ते त्रणमनुष्य दिउमगतह के मार्गनेतडे एट से मार्गनेमुग्थे ढकडा वे चोरोदेखीने ते के तेत्रणमाथी एगोमग्गा के० एकतोमा गयको पाठो निवर्यो, एटले पानासीगयो तथा बलियो के बीजानेतो ते घोरलोकोपे ग्रहणकीयो एटले पकडीलाधो, अने तश्योसमकतो के बीजोमनु प्पते चोरोने सम्यक्प्रकारे यतिकम्यो, एटले पोतानु वलवीर्यफोरवी चोरोने हतन हतकरी पुरंपत्तो के पुरप्रतेपहोतो एटले जितस्यान के निर्णयपणे पहोतो ॥२॥ ए दृष्टांत सम्यक्त्व प्रातिमा उपनयनावे अतारे- थाणूसरण तसम सम्यक्त्वस्वरूपस्तव. UGy घडविनवो के नवज्रमणरूप तो अटवीकहियें, तेमा मास्साजीवो के म नुप्य ते त्रण उत्कृष्ट जातना संसारी जीव कहिये,घने कम्मपिहोटीहो केक मस्थितिते महोटो दीर्य मार्गकहियें, तथा गठियनयाणं के० ग्रंथीदेश ते जयनुं स्थानक कहियें, वली रागदोसायदोचोरा के राग धने परूप वे चोरजाणवा ॥३॥ तेत्रणमाथी उनव्य अथवा अनव्यजीव तेतो जग्गो के० पाठो जागो (ना सीगयो) तथा अचरमकरणी अथवा अपरिपक्क कारणीतो ग्रंथीदेशजरह्यो, यहां ग्रंथोदेशे नव्य अथवा अनव्य उलटो संख्यात असंख्यात कालसुधीरहे पठी न व्यने शेप अईपुगनपरावर्त संसाररह्योहोयतो ग्रंथीनेदे अधिक संसारीपाठोफिरे ऽहां ग्रंथीदेशे नव्य अथवा धनव्य रह्यांथका इव्यश्रुत निन्न दशपूर्वसुधी पामे इव्यचारित्रपामे. धनव्य पूर्वश्रुत न पामें, केटलाक ग्रंथोने अनुसारे तथा वृक्ष परंपरायेंपण अन व्यने पूर्वश्रुत न होय, तथा कोइक ग्रंथने अनुसारे लब्धिदशपूर्वसंपूर्णने पूर्वलब्धिक हियें, ते अनव्यने न होय पण शेपहोय, पठी बहुश्रुतकहेतेखरुं पुरेपुरा दशपूर्व तथा अधिक यावत् चवटपूर्वसुधि जे नणे ते नियमा सम्यक्त्वीहोय केमके कल्प नाप्यमां कह्युते यतः चवदस दसय बनिन्ने, नियमासम्मत्सेसएनयणा ॥ इति तेमाटे उत्कट कारणयोगे वीजो पुरुपतो ग्रंथोदेशेज टकीरह्यो, तथा त्रीजो चरम करणी प्रात नव्य सम्यक्त्ववंत वीर्योल्लासवधते राग देव परिणतिरुप ग्रंथीनेटी ने सम्यकदर्शन रूप नगरेंज पहोचे एम त्रणेकरणनो उपनय जोऽना के जोडयो॥४॥ हवे त्रणगाथायें पीपानिकानुं दृष्टांत समजावे.-- विश्सदाव के जेमदिति जे पृथ्वी तेनानपरे सहजस्वनावें कीमीफिरे गमनकरेले पण तेमां कोनी प्रेर पानथी, हवे तेमां एक कीडीतो फरती फरती थाणुजे खीतो यथवा नीतप्रमुख तिहांसुधी याविने वली पाठीफरीजाय, तथा कोऽक कीडीतो थाणुजे खीसो जीतते उपर चढवामांम तेचढीने याणुना उपर बेसी रहे, तथा वली कोऽक की डी थाणु उपर चढीने उडीजाय, तथा कोक कीडी खिलाथी अथवच पाठीउतरे ए मूधगीणं के मृदंगीजे कीडी तेनुं दृष्टांत जाणवू ॥ ५ ॥ हवे एनो उपनय उपमान देखाडे, खिश्गमणंके० क्षितिगमन एटले कोडीनुं पृथवी उपरे फरवु खोलाना मूजनुधी थावत् ते पढमके० प्रथमना यथा प्रवृनिक रण सरिखंडे, तथा कोऽक कीडी थाणुंतरणंचके खोलेचटी ते सरितुं वाई ,

थर्थ - हवेपूर्वोक्त लागवत जीव ते ग्रथीदेशसुधीभावे, तिहा परिणाम निम् ।
। तेने थपूर्वकरण कहिये, ते अपूर्वकरण कहेवुठे जे निवड आकरी अत्पतकविण
सतानी वृद्धिहोय ते कळे, अपुवके० पूर्वेकोश्वारे पाम्योनही, एहवुजे परिणाम
एवी पूर्वोक्तरुपजे ग्रथी तेने नेदवाने मुग्गरके० वज सरिखु तेने पायके
मात्रमा पूक्त थनीवृत्ति करणेगयो एटले प्रथीनेदकरता थतर मूहूर्तलागे तिहाँ ।
चढते परिणामें ग्रथीनेदकरी थनितिकरणे जाय, हा थपूर्वकरणनी विद्युक्ता/
जोरथी मिथ्यात्व माहनीयना पुजनीस्थिति ये थाय, तेमा पहेली स्थिति थ
थर्थ-॥ सोतके तेजीरने तिहां थनितिकरणे थती विराद परिणाम |
थकी थनिवृत्तिकरणनी निर्मलता वोचतरने, माटे अपूर्वकरण थने अनिवनिक
मुहृतरेय एटले एफ थतरमुहूर्तमा खपीजाय, एटसी स्थितिना मिथ्यात्व मो।
सम्यक्तस्वरूपस्तव
मपुर्वके थपूर्वकरण, तथा कोइक कीडी खोलेचढीने तेखीजाथी उपयण
डोगई ते सरिखु जीवने त्रीजु अनिवृत्तिकरण कहिये ॥ ६ ॥
थाणुवगविदेसोके थापुंजे खोजो तिहाज टकीरहेतु ते अथीदेशे रहे,
गठीयसत्तरसतलवमाणके ग्रथोगतजीवन कोकालसुधा तिहा रहेवुहोय, ते
खुने, तथा उसरणपिवतनोके ते खीजारूप गीदेगथीयोसरे एटले पाकि
ते पुणोवि के० फरी कर्मस्थितिनी वृद्धिकरे फरी उलटी कर्मस्थितिवधारे ॥७॥
ए सातगाथाये वे दृष्टातकह्या तेणेकरी को सझीपर्याप्तो पचेही नव्यजीव मु
तिजाया योग्यहोय, जेने थवपुग्गलपरियड के मात्र पुगतपरावन शेष
ससार वाकी रह्यो होय, एहवो एटले लक्षणेपूरण जे जीव होय ते जीव जे करे ते
धागली गाथाये कहेठे ॥ ५॥ इति पचमगाथार्थ
अपुवकरणमुग्गर, घायचिहिय गम्नेिसो ॥
अतमहत्तेणगन, नियट्टिकरणे वि सुजतो ॥६॥
पायेंरीने विहियके विहित एटले कखाने उष्टयथानु नेदजेणे, सोके तथानून
ते जीव प्रतिक्षणे विशुधमान परिणाम नलावधते थके थतर मुहूत
रणनी निन्नता यई॥ ६॥ऽतिपष्टिगाथार्थ
हवे ते थनिवृनिकरणे गयोथको जीव जे करे ते कहेने
सो तवरणे सहमोव, वयरी जय जणियपरमआनद ॥
सम्मत्तलाजीवो, सामनेण तद पसाया ॥७॥

सम्यान्यवरूपनव. Um नीर नामा नाजीमनटीमिमि गंगामंदी नानगंरममा पर्याप मना प्रमंचाना नाग न्युनने में बिनिमांनी नजीरगंवीत. एट वीजीपयों पमने गमगानमंनाचनकांटागंटी लागर्गरम प्रगणहती माथी नामदनरमाण नीची जीन अटी. वारी जगदी तं, महोटो पुज मागागन्यां पटले नानातिना मोटी मनिन थमा त्रांतर्गपडयो त या चिमिनी मां पाती जगाग्दी नेताकदि एम हां मिनिकरणना जोधी ना. अनं वम चिनिगन हिरानं महतमा संपरे चने महोटीयिनिमांची प्रायता बनियान उपगमा विपनिन नायक नग्मुदत उदयनयावे एवाको पटने निजिकरणे ये सायंक पानां मियत्यस्थिनिना नागरी अंतर परणको अने बीजं धनग्मनबंध प्रथम जयन्थिनिन सपाचे एटाने अनिनिकर णनी गालगंधाय नवावागज तकगामांध दी जाय प्रोगकरे, तेवारे तिदां नरगणने प्रथमसमय नाय तमारे प्रमाद नायिकाटिफनीपर विशिष्टतो नदी पण सामान्यपणे यापकालीन उपमनामा ममस्तिपाने. ते सीरीतंपामें ते नी उपमाफरेने,रणेसुदगांवरिजपजणियपरमधाणंदक जेमनटहोय ते रणने विपे वैगने जीतयाथों परमानंदपामे, तम धनादिनाज गगषरुप महोटागन तक नित गुरुकर्मम्यिन्यादि अनंतानुवंधिया चार वरीनं जीतवायी परमानंद सरिखू स म्यक्त्व जीवपामे यमुक्तंन्यावश्यकादियंथे. पावति वकएं, फम्माऽ यहा पनि करणेणं ॥ उपसनाएग कहमवि, श्य निन्नपुवि तगठि ॥ १ ॥ नंगिग्विरंच तु. श्रपुवकरणुग्गवङधाराए ॥ आंतोमुटु नकानं, गंतुमनियटिकरणंमि ॥ ॥ पइसमयंसतो, खविक कम्मा३ तबद्या इं। मितं मिनणे, खीणेपुञ्यमिउवसते ॥ ३ ॥ संसारगिम्मतवियो ॥ ततोगो सीमचंदरपरसोब, थपरमनिवुकरं, तस्तंतेलहसम्मतं ॥ ४ ॥ हवे ए चारगाथायोनो थर्थ लिखे थनादिकालनु संसारचक्रमां नमतोथको जीव पावतिके पामे, मिथ्यात्वमोहनीयादिक कम्माश्के कम्मीने खवेमके रख पावीने ते अहापवनि करेकपके० यथाप्रवृत्तिकरणेकरीने कर्मा ग्वेपवे, तेनुंदृष्टांत अवलनाएणके उपनजे पूर्वोक्त नदीना प्रवाहनो पाखाण, तेना दृष्टांतेखेपवे, प वीथनिन्नपुविकेपुर्वकोऽवारे जेटीनयी एवीजे रागदेष परिणतिमई मिथ्यात्वयंथी त के ते ग्रंथीने गीरीतेनेदे के गिरिवरंके ० गिरवरजे पर्वतते नेतु के नेदवाने जेम व नमा सूर्यनापडेला फिरणने परिता पडेला जुना थजडतापेफरी यतिव्याकुन था होय, तेने कोई शीतल स्थानकमले वली तिहाफाई बावनाचदननु रसवाट वारे। मरणादिकरूप निर्जलवनमा कपायरूप उग्रतापे पीडयो रागशोगादिरूप व यजड़ एटले सुख तेणेकरी थज्यो (दग्धथयेनु) यने तृलारुप महाटी पीपासा ते ऐफरी परानव्यो थको एवो नव्यपथी ते थनिवृत्तिकरणरुप गुरू शरलमार्ग पा मि दूरथी थतरकरणरूप शीतलस्थानकदेवी हर्पवतथकोधमीतिहा पहातो, एटने गोशीर्पजे वावनाचदन तेहनोजे रस तेहनीपरें शीतल थपरमके थतिशय परम उरूट थनिनिकरण परम सुखसाताकरण एह तस्ततेकेणते थनिवृत्तिकर ने थते थने अंतरकरणने प्रथमसमये धनसारवत् शीतल सम्यक्त्वपामे तेवाग्थनता वधीतथा मिय्यात्वरुत परिताप सर्व मटीजाय गाढ तृाना पीपामा मटीवाय|| तर मुहूर्तसुधी दफेयाय (दूरथाप) यनादिनो प्रथम पुरखांत इहाययो शहां सि हा यनादिवशननु परमशत्रु परम उखदातारुप एहवा मिथ्यात्वनु सुख थ बात सजीमा काजनिष्टायें गुणदोष प्राप्ति तथा विरह याश्री चारनांगा क्ह्याने ए चारनांगानु थर्यफो। जेने मिथ्यात्वादिक थनादिनु थने ते किवार मट पण नही एवा यनयरिकने थनादिथनत प्रथमनागो थने जे नव्यनीवें। सम्यक्त स्वरूपस्तव जबलपानवे, तेम थपूर्वकरण परिणामाप उग्र बजपारायं करीने जीप दतो अतर मुहूर्तकालमा थनितिकरणेगयो, पठीते शनिवृतिकरणे गयो करे तेयागली गाथाये कहेठे ॥ ५ ॥ पइसमयंके० प्रतिसमये एटले समय समयप्रते विशुधमान परिणामिया हा बगुलाकीने खेपवे, तेवखते जे मिथ्यालना दतिया उदययाव्या, तेने छ थने जे उदय न थाव्या उदयानिमुख न थया ते दनियाने उपगमावे, एटले रणादिक करणवलें पण विपाकोदय अथवा प्रदेशोदय जे यशकेनही तेने उप माव्या कहिये, एम इहा थनिवृत्तिकरणे केटलाक मिथ्यात्वना दनियावेपण्या, थन केट खाक उपशमाव्या, थने मिय्यात स्थितिना ये नागकरी विचमा थतरकरण करयु ॥ ३॥ हवे ते अतरकरण करता जे थयु ते धागली गाथायें कहे। ससारगिम्मके जेम को पथ नाकालमा मध्यान समये निर्ननव ते पथी सातापामे केवो थानदमन होय तेम हा नव्यजीय रूप पथी अनादिकालनु ससाररूप उग्र गीष्म काले जन्म . ना नामकहे। १ थानाविधनत २ थनादिमात ३ सादिसात ४ मादियनत

सम्यक्त्वस्वरूपस्तव.
एए३
प्रथम सम्यक्त्वपाम्युं तेवारे ते जीवें अनादिना मिथ्यात्व, अंतयात्यु तेमाटे तेने
अनादिसांत बीजोनांगो जाणवो; तथा जे जीव सम्यक्त्वपामी वली सम्यक्त्व वमन
करी मिथ्यात्वे गया तेवारें मिथ्यात्वनी आदिथयी, पठी केटलोक काल मिथ्यावे
रहो वली गुनसामग्रीना योगथी फरी सम्यक्त्व पाम्यो तेवारें मिथ्यात्वनो अंतथ
यो ए त्रीजो सादिसांतनामा नांगोथयो, तथा चोथो सादियनंतनामा नांगो तेदा
यिक सम्यक्त्वादि हायकनावें जेने जे मुण प्रगट थया तेगुण तेने होय पण मि
थ्यात्वीने न होय, केमके ग्रंथी जेद कखापनी जे मिथ्यात्व होय, ते तो सादिसांत
जांगे ज होय, माटे जेने सम्यक्त्वादिक कायकगुण प्रगट्या ते सादि,धने ते गुण्या
व्या जाय नही ते अनंत, एटले नव्य मिथ्यात्वीने त्रणे नांगाहोय,श्रने अनव्य मिथ्या
वीने एकज अनादिअनंत नांगोहोय, यमुक्त:-मित्तमनवाणं, तमणामपंत येमु
यज्ञानवाणं तमणा,सपय्यवसियंतु सम्मत्ते॥१॥अर्थः-अनव्यने मिथ्यात्व अना
दिथनंत नांगेहोय, धने नव्यने अनादि सपर्यवसित नांगें मिथ्यात्वहोय इति॥१॥७॥
हवे सम्यक्त्व केटले नेहोय ते आगमनी गाथायें कहे:-
तंचेगविहंजविहं, तिविहं तह चनविहंच पंचविहं ॥
तोगविहं जंतुद, पणीय नावे सु तत्तरुई ॥७॥
अर्थः-एक प्रकारे वे प्रकारेंत्रण प्रकारे चारप्रकारें अने पांच प्रकारे पण धागममा
सम्यक्त्व कडं,ते नेदोना स्वरूप विवरीने कहेते.-तोगविहंके तिहां एकविध स
म्यक्त्व ते जंके जे हे परमेश्वर तुहके ताहरा पणियंके ० प्रकास्या जे जीवादिकनाव
पदार्थ तेनेविपे तत्वरुचिहोय अर्थात् परमार्थ चुदिहोय, शकल दोपरहित थने शक
लगुरो संपन्न एहवा अरिहंतदेवें नाप्यंजे तत्वते सत्यठे,एहवी रुचि परमार्थबुद्धि, तद्दू
पथागममा कयुंठे. 'तमेवसचनिस्संकंजंजिरोहिपवेश्य' इत्यादि रुचिरूप,यमुक्तं योग
शास्त्रे:-रुचिजिनोक्ततत्वेपु सम्यक्त्रज्ञानमुच्यते जायतेतन्निसर्गेण गुरोरधिगमेनय ?
ए उपला श्लोकनो यर्थ करेगे -श्री जिनेश्वर नापित जीवाजीवाटिक तत्वनेवि
पेजे सम्यक्प्रधान के निश्चल प्रतीत तेने तत्वरुचि कहियें, ते तत्वरुचि अक्षान
मिथ्यात्वदलना रसनी मंदताये जातिस्मरणादिक निमित्तें ईहापोह करता करता
सहेजे पोतानीमेलें तत्वज्ञान पामे ते निसर्ग सम्यक्त्व कहेवाय, थथवा शुनगु
रुनी उपागना करतां तिक्षांतवाणी सांनजता जे पामे ते उपदेसिक श्रदान कहिये
॥ १ ॥ इत्यादिक लक्षण जे तत्वरुचि ते एकविध सम्यात्व कहिये ॥ ७ ॥

No text on this page.

सम्यक्तस्वरूपस्तवः Uए थर्थः- ज्ञान दर्शन चारित्ररूप गुरू अक्षा नासन रमणता पूर्वक रत्नत्रयोरू प यात्मानुजे शुनपरिणाम तेने नियउसमम्मत्तंक निश्चय सम्यक्त कहिये, ए टले यात्मानेज निश्चय सम्यक्त्व कहिये, केमके यात्मा ने थात्माना गुण ते का जुदानथी परिणामे अनन्यने एक गुण गुणी नावं अटेज रह्याने केमके श्र नेटपरिणामे परिणम्योजे यात्मा ते तणरूपज कहेवाय. यउक्तं योगशास्त्रेः- यात्मेवदर्शनकान चारित्रास्यथवायते ॥ यन्तदात्मैवस्वगुणः शरीरमधितिष्टति॥१॥ प्रायें अप्रमत्नसाधुने निश्चयनय सम्यक्त्व पूर्णकहेवायवे केमके जे जाण्यं ते वोज त्यागनावळे अने अापण तदनुरूपये माटे स्वरूपोपयोगी जीवने यात्मा तहिज ज्ञान दर्शन चारित्र. कारणके आत्मा रत्नत्रयात्मक अनेदनावें शरीरमां रह्योते. माटे रत्नत्रयीने गुडोपयोगे वर्नताजीवने निश्चय सम्यक्त्व कहिये. तथा इचरके० ऽतर ते वीजुं व्यवहारसम्यस्त्ववे. ते हे प्रनु तहारा मिमांतने विपे तम्यक्त्वना हेतुजे मिथ्यात्वीन संस्तव परिचय प्रमुख जे यतिचारादिक ढो पठे तेना त्यागयी याय तथा देव गुरु जक्ति वदुमान योगे मातनोन्नति हेकहिं के हेनु थाय. यदुक्तं गुणस्थानक विचारयंवेः- देवेगुस्चयेच तनक्तिगासनो नति चित्रता पिफरोवेव स्थितिम्तयें गुणातये ॥ १ ॥ श्रय- देव गुरु तयात्री तंब तेनी वनुमान सहित नक्तिकरे यातनोन्नतिकर अविरति गुणगणे रद्यायको पण घागमोक्त विधिमार्गे निरनिचार नम्यक्त्वमनि महितहोयतेने व्यवहार सम्यक्त्व कहियें ॥ ११ ॥ हवे त्रीजा वे प्रकारे तम्यक्त्व कह तमा एक निन, सम्यक्त्व प्राप्ति घने वी जी उपदेशजन्य सम्यक्त्व प्राप्ति इहां गिप्पपूर्वक निसर्गरे ० महंजे सम्यक्त्वनी प्राप्ति क्वीरीतेचाय ? तेवा गुन दृष्टांत गनित सम्यक्च प्रामिनी उपाय फहवे - जल व मग्ग कुदव. जरा नाएण जेणपन्नतं ॥ नि स्सग्गुवएमनवं ।। समनं तम्म तुम नमो ॥ १७॥ थर्थः- ए मायामां पाच दृष्टांत क्ह्याने. मां जननां तथा ववनाचन कोश्य नो ए ऋणदृष्टांन घागज पुंज त्रय नावनाबमरे कदीवताय. बने मार्गनां तथा ज्वरना ए वे प्रतने ते -जमांक पंची मार्गची टाययों पढी वीजारोई ना टपटेदा पायाविनाज नमो नमना पीतानी महंज मार्गचंटे, नगर पंच प्रष्ट पपनी पंची नविध पापना उदयची म्हनना यंग नमाजरा ची मार्ग पामेजनही निहानिहाजा वनंत्री वीजानेवीमार्गमाने.

-
पए
सम्यक्त स्वरूपस्तव.
तेमज वली ज्वरनो दृष्टात कहेजे-जेम कोईकने तापज्वर थाव्यो ते कोने
औपध कस्याविनाज पोतानी मेले जतोरहे, घने कोईकने तो थोषध चूर्ण धागादि
(दोरादिक) प्रयोगकरवाथी ज्वरजायचे, तथा कोईकनेतो असाध्यज्वर कोरीते।
जायजनही एरी ए ये दृष्टांत सम्यक्त्व प्राप्तिविपे जोडवा ते यावीरीते-
कोईक शुक्लपदी कालादिक कारण परिपाकवत चरमावर्ति चरमकरणी एवो नव्य
जीव ते सहेजे थापे श्राप विचारतेयके सम्यक्त्वपामे ते निसर्ग सम्यक्त्व कहिये,
सथा कोईक जीव पूर्वोक्त कालादिक योग्यतावत होय पण सजुरुने योगे उपदेश
सानलीयनादिनीनूलमटाडी देव गुरु धर्म सहहणारूप सम्यक्त्वपामे तेने उपदेश
सम्यक्त्व कहिये एरीते नाएणके० ए न्याये (दृष्टात)वाराये निसर्गानव सम्यक्त्व त
था उपदेशोभव सम्यक्त्व ते हे प्रनु तुमे का परूप्युं तेमाटे परमोपकारी एहवा तु
जने माहरो नमस्कार थायो ॥ १२ ॥ एम वेप्रकारनु सम्यक्त्व त्रण रीते का
हवे त्रणप्रकारे सम्यस्त्व कहेठे --
तिविद कारग रोअग, दीवग नेएदि तुद मय विकदि ॥
खाबसमोवसमिय, काश्य एदि वा कहियं ॥ १३ ॥
थर्थ - हेनाथ तुहमय के० तहारा मतना विकहि के० वेता जे गणधरा
दिक, तेणे कारक रोचक थने दीपक एम तिविद के व्रण एहि के० प्रकारे
सम्यक्त्व कपुते, वा के अथवा दायोपशमिक उपशमिक यने दायिक एरीतें
पण त्रणने सम्यक्त्व कहियंके कत्यु ॥ १३ ॥
हवे कारकादिक सम्यक्त्वना लक्षण कहेठे
ज जद नणिय तुमए, त तद करण मि कारगो दो ॥
रोअग सम्मत्त पुण, रुमित्त करतु तुद धम्मे ॥ १५ ॥
थर्थ - हेनाथ जे जेम यथार्थनावे विधिमार्ग तुमे नणिय के प्रकाश्यो ते
तेमज थाझाने थनतिकमतोयको एटले तुमारी थाझासहित थागमोक्त शैलीपूर्व
क यथाशक्तियें दान पूजा प्रत नियमादिक करे तेने कारक सम्यक्त्व कहियें, तथा
पुन के वजी वीजु रोचक सम्यक्त्व, ते तुहधम्मेके० तहारा धर्मनेविपे रुईमि
करतुमे रुचिमात्रकरे, श्रीजिनोक्त धर्मकरवानी शारहे शुश्रधाराखे कोईने
धर्म प्रवृत्नि करतोदेखीने रडुमाने परतु पोते नारीकर्मी माटे क्रियानुष्टानादिक करी
सके नही तेने रोचक सम्यस्त्व कहिये ॥ १४ ॥

सम्यक्खस्वरूपस्तच. បុប១ हवे दीपक सम्यक्त्व कहे:- सयमिह मिहिछी, धम्मकदाईहिं दीव परस्स ॥ दीवग सम्मत्तमिणं, नएंति तुद संमय मईणो॥ १५ ॥ थर्थः- सयमिह के स्वयं पोतेतो मिथ्यादृष्टी अनव्य पुर्नव्य होय, पण थं गारमर्दाकाचार्यनी परे धम्मकदार्शहिंके धर्मकथादिकेकरी धादिशब्दथी सामाथिग णना अनुष्टानना अतिशयेंकरीने एटले दंजरचना विशेपेकरी, पर जे वीजा नव्य नश्क जोवोहोय तेने धर्मकरी दीपावे, एटले पागला जीवोना घटमां प्रकाशक रावे. परंतु पोताने अंतरंगपरिणामें श्रद्धानहोय एहवाने हे प्रल तहारा समयजे सिद्धांत तेना जाणपुरुपो दीपक सम्यक्त्व कहेते. यहां शिप्ये प्रश्नकांजे पोते मिथ्यात्वी मिथ्यात्वे वासित अंतःकरण वालाने सम्यक्त्वी केमकहोठो? तेवारे गुरुकहेठे हे शिप्य, जो मिथ्यापरिणामी तोपणा गला प्राणीने धर्म पमामवानो हेतुथायठे, अथवा शासनोन्नतिकरे, माटे कारणे कार्यनो उपचारकरी सम्यक्त्व कहियें,सम्यक्त्वनो हेतु माटे सम्यक्त्व कहिये, यह क्तं सिद्धांतेः-विहियापुणं पुण, कारग मिहरोयगंतु सदहामिवदितीदीव, जंत नेदीवगं तंतु ॥१॥अर्थः-विहियापुषण के विहित एटले नीपजाव्युठे क वे धाग मानुसारें धर्मानुष्टानजेणे ते कारक सम्यक्त्व कहियें; अने रोयगं के रोचक सम्यक्त्व ते गुसदहणारूप रुचिथाय तेने कहिये, वली मिहिनी के पोतें मिथ्यादृष्टीयको परने तत्वदीपावे, परने सम्यक्त्व प्रकाशकरे तेने दीपक सम्यक्त्व उपचारें कहिये।।१५ हवे बीजीरीते प्रकारांतरें त्रणनेद सम्यक्त्वना कहे:- अपुवकय तिपुंजो, मिठ मुश्नं खवित्तुअणुशनं । नवसामिय अनियहि, करणा परं खनवसमी॥ १६॥ थर्थः- इहां त्रण सम्यक्त्वनी विगत ए प्रकरणनेविपे प्रकरणकारना थाशयथी अवचूरिकारनो धाशय निन्नपमेठे. पण तीक शब्दार्थ मलतोनथी माटे आवश्यक विशेषावश्यक यर्थदीपिका सुदर्शनाचरित्र कल्पनाप्य प्रमुरवग्रंथोने सम्मत प्रकर एकारनो भाशयचे ते विगत लखिये:-प्रकरणका सिद्धांत तथा कर्मग्रंथिक ए वेदुना अनिप्राय ग्रहणकरी प्रकरण रचनाकरीने. तेमा सिक्षांतकारनो ए श्राशय जे अनादि मिथ्यादृष्टीने कोई तथाविध सामग्रीनो सदनाव एटले प्राप्तिथ य थाप्रवृत्तिप्रमुख त्रएकरण करतां यपूर्वकरणना यध्यवसायथी ग्रंथी भेदी शेपमि पाएन सम्यक्त्वस्वरूपस्तव. थ्याव स्थितिना त्रण पुंज करी प्रथम गुआपुशननेवेदे ए ऋणपुजनी स्थापना करि येये -(० शुक्षपुज मिश्रपुज • शुरूपुज) ते कारणथी उपशम सम्यक्त्वपा म्याविनाज प्रथम क्योपशम सम्यक्त्वपामे, तथा वली कोईक नव्यजीव यथाप्रट त्यादिक करणत्रय अनुक्रमें पूर्वोक्तविधियेंकरी अंतरकरणने प्रथम समये उपराम | सम्यक्त्वपामे पण उपशमें रह्यो पुजत्रण करेजनही, अत्तरमुहूर्त काल प्रमाण नु -निर्मल अपोलिक उपशमनाववेदी तिहाथी चलायमान थयोयको अवश्य मि च्यात्वेजाय, अपरपुजतो वेनही माटे निकाने दृष्टांतफरीपाठो सवाणजे मिय्या त्व स्थानकथी धाव्यो तेफरी मिथ्यात्वेंज जाय, जेम इनिजे कोजातनी लट श्य ज एककाष्टादिक पदार्यथी थागल जावाने चाहनाकरे त्यारे पागलागात्रनु विदे प के विस्तारवुकरे, आगला शरीरनानागने चारेतरफविस्तारता स्थानक थापा मता पानीपूर्वस्थानके जिहाथी सरीर उपाड्युहतु तिहाजयावे यमुक्त कल्पनाप्ये - थालवणमलहति जहसानमुचएइलिया ॥ एवथकयतिपुजो मिचियवसमी ए ॥ १ ॥ ए गायानो थर्थ सुगम प्रथम लखाजगयोडे एम स्थानांतरगमनना नाव माटे उपशम सम्यक्त्वी मिथ्यात्वेज जाय ए सि दांतिफनो थनिप्रायवे, तथा कर्मग्रथ वाला एममाने के जेको अनादि मि प्यादृष्टी ससारीजी जेवारे चरमावर्त तथा चरमकरण करवाने अवसर पहेला सम्यक्त्व प्राप्तिकालेज यथा प्रवृत्त्यादि करणत्रय करवा पूर्वकज अतरकरणकरे, तिहां उपशम सम्यक्त्वपामी थवश्य त्रणपुंज करे, एटले यथाप्रवृत्तिकरणे अथीरे शेधावे, तथा अपूर्वकरणे ग्रंथानेदकरे, तथा अनिवृत्तिकरणे मिथ्यात्वस्थितिनावे नागकरे, एकवतरमुहूर्तवेद्य न्हानीस्थितिकरे, वीजी देसूणी कोमाकोडीप्रमाण म होटी स्थितिकरे एवी वे स्थितिकरे एरीतें ये स्थितिकरी तेमाथीन्दानी स्थिति खेंचोलेई नेवचमांशतरकरे एटले बे स्थि तिनीवचमा खाली जायगारहे एमकरे, पठान्दानीस्थितिने अनिवृतिकरणना थध्य वसायेंकररी खपायाने, पी अतरकरणजे वे स्थितानावचे खाली जायगारही, तेमा प्रवेशकरे, त्या थतरकरणमा प्रवेशकरवाने पहेले समयेज उपशम सम्यक्त्व पामे, ते श्रतरकरणथोलयतां थतर मुहूर्त प्रमाण कालजाय तेनेज उपशम सम्यक्त्व कहिये हवे यतरकरणमा वर्ततो श्रीपधसरिखु जे उपशम सम्यक्त्व, ते सम्यक्त्वेकरी ने कोदराया धान थयवा मजीनजल थथवा मलीनवस्त्र एत्रणेना सरिखुजे मि प्यात्व मोहनीयकर्म तेने सोधीने त्रणेनागे वेचीनाखे, तेमा पहेलो नागतो शु६ सम्यक्तस्वरूपस्तव. एएए निर्विप तथा स्वस निर्मल जाणवो अने बीजोनाग यगुड़ तथा थोडोक गर्बु घने थोडोमलीन जावो वजी त्रीजो नाग संपूर्ण अगुम यथास्थित तथा कलु प अतिमोहोलो तथा मलीन गलोच जाणवो. हवे एत्रणे वस्तुना दृष्टांते विवरीने विपरीतें देखाडे:-- जिम मोपसहीत कोश्च धानने उलजलादिक औषधनायोगे एकनाग मीएर होतकरयो, वीजोनाग अईगुड़ कस्यो,धने त्रीजोनाग जेमहतो तेमनोतेमरह्यो, ते अयुझवे, तथा जेम को वस्त्रमतीनहतुं ते क्षारादिक औपधनायोगे अतिस्वत निर्मत याय, वीजें थोडायोपधानो प्रयत्नमाटे योइंनिर्मलयाय यने त्रीजुंमतीनज रहे, तथामलीन जलजेमनिर्मत फलाटिकनायोगे यतीखवधाय, बीजु थोडंनिर्मल थाय त्रीजुंमतीनज रहे, एमत्रण दृष्टांतें अंतरकरण गत उपशमसम्यक्त्वरुप औपध नायोगे करी मिथ्यात्वमोहनीयना दलियां मिथ्यात्वरूप मीणमा नखांहतां तेनो ए क नागतो शुक्षकस्यो मीणरहीत कस्यो, अने वीजोनाग यमीणरहीत थयो, एट लामां अंतरमुहूर्तना कालनीसमाप्ति थई तेथीते बीजो नागतो अशुचथयो अने त्रोजोनाग शुभकरवानेतो पोची शक्योज नही तेयो ते त्रीजो जागतो संपू र्ण मिथ्यात्वरूप मीणसहित विपथी नरेलोज रहिगयो. हवे ते त्रणपुंजनां त्रण नामथयां, तेमां पहेलो शुरूपुंजते दर्शनमोहनीयक हियें, हवे ते जीव अंतरकरण गत उपशम काल, पूरोययेथके एटले जेटलोवखत अंतरकरणनो तेटलोज वखत उपशम सम्यक्त्वनोठे ते उपशम सम्यक्त्वनोकाल अंतरमुहूर्तप्रमाण पूरोथयेयके जो परिणामनी विगुतीरहे तो शुभपुंजनो उदयथा य, तेनाम क्योपगम सम्यक्त्व कहिये, एटले मिय्यात्वरूप मीणामां नरेलां द लियांजे गुझकयां तेहनो उदय क्षयोपशम सम्यक्त्वकहिये. शहां शिष्य प्रश्नकरेवे के जो निर्विपदालियांकस्यां तोपण जातेंते टलियांपोते मिथ्यात्वनांठे, निर्विषयीतो रस रूप गंधादिक गयुं पण गुणने यावरणकरनारां द लियांतो तेमनां तेमजले, तो सम्यक्त्वश्रा नासना केमथाय? तेवारें गुरुकहे। के जेमकोई यत्रक अथवा थपर पाषाणाटिक ते जातेंमलीनहोय तेनेकोई योपधा दिक योगेंकरी ते पापाणाटिकमांथी कालासरुप कलुपता काडीनाखे तेवारे ते दल निर्मलथाय, पीतेने थांतरेजे वस्तुरहीहोय ते सर्वदीनामांबावे, पण वानीरहेनही तेमज इहां दर्शनमोहनीयकर्मना दलमध्ये अनुक्ष्परिणतिरूप मिथ्यात्व विकरी मलीनययेनुं अत्यंतकालासपणुं नरेलुंहतुं ते उपशम सम्यक्त्वरूप औपधनी ទី ២ सम्यक्लस्वरूपस्तव. महीमाथी दूरथाय, पनी निर्विपदतियारयां ते स्वच्छ थत्रपटल सरिखांचे ते निर्म ललियां काईश्रा जासनमा विपरिणाम करेनही, तेथी जो जाते मिथ्यात्वदजि यांचे तोपण निर्विपळे (निर्मल) तेथी तेने क्योपशम सम्यक्त्व कहिये यजक्तं विशेपावश्यकवृत्ती-तद्यथेसुप्रदीपस्य स्वधानपटलेगृह ॥ नकरो त्यारति काचि देवमेतदुवेरपि ॥१॥ एकपुजी विपुजी च त्रीपुजी वाननुक्रमात; एने पश्चानुप चखेवु एटले त्रीपुजी बीपुजी एकपुजी दर्शन्युनयवाश्चैव मिग्याष्टिश्चकीर्तित ॥ २ ॥ इहा लोकनेविपे जेम थखना पडातरे रहेधुंदीपक सर्वस्थानके उद्योतकरे, पण तिहा थन्त्रक जोयाडोचे तोपण काई न्यून प्रकाश दीपकर्नु करीशकेनही, ते वीजरीते सोधेला मिथ्यात्वदल तेपण काई न्यून अक्षाकरेनही तिहा त्रिपुजी ते सम्यकदर्शनी विपुजी ते मिश्रदर्शनी थने एक पुजी मिथ्या दृष्टिहोय, तथा उपशम सम्यक्त्वथी पागलें जो काईक उज्वल काईकमलीन एह वा मिश्रपरिणामथाय तो मिश्रमोहनीयनो उदयथाय, एटले मिश्रपुजनो उदय थावे थनेजो थनतानुबधीना उदय बलथकी अतिमतिन परिणामथया तो मि प्यात्व मोहनीयनो उदयथाय एटले यशुरूपुजनो उदययावे एरीते ससारमा केटलाक त्रीपुजी केटलाक विपुजी केटलाक एकपुजी, तेमा क्षयोपशमी त्रिपुजीहोय तया मिथ्यात्व क्ष्य करवाने सम्यक्त्व मोहनीयनी उज्व सताकरे तेवारें विपुजीहोय, यथवा अपुजी एटले पुजरहित पण कायक सम्य क्वीहोय तथा जिवारे मिलन करे थथवा पिवे तेवारे एकपुजीज होय यहाँ पुजनयनो सकम कल्पनाष्ये एमकह्यो प्रवईमान परिणामीजे सम्यक्त्वीहोय ते मिथ्यात्य दक्षिक पुजसने याकरीने सम्यक्त्वपुजमा अथवा मिश्रपुजमा सक्र मावे तथा मिश्रपुजने सम्यस्त्वी सम्यक्त्वमा सक्रमावे तथा मिध्यादृष्टी मिश्रपुजने मिथ्यात्व पुजमानाखे बने सम्यक्त्व पुजन मि प्यात्वपुजमा सक्रमावे, पण मिश्रपुजमा न नाखे, तथाचोक्त -मिवत्तमियखाणे ति पुजीसम्मदीहिणोनियमा ॥ खीणमिलमिति एगपुजीवखवगोवा ॥१॥ एरीत फर्ममथिकमतें प्रथम उपशम सम्यक्त्वजपामे थने ते उपशमिनीयमा त्रणपुजफरे, उक्तच कर्मयये -कम्मग्गयेसुधुव पढ़मोवसमी करेइपुज तियं ॥ तबडिउपुणगछा स म्मेमासमिमिठेवा ॥ ॥ अर्थ सुगमने एरीत सिद्धांतिकमार्गे तथा कर्मप्रथिकमार्गे निन्न निन्न थाशप वे ते प्रकरणफरनारे तो वेदुनाथाशयई प्रकरणनी रचना कराठे तिहां सिमांतकारना थाशयें कोई मियादृष्टी यथाप्रवादि करणन्न करी सम्यक्त स्वरूपस्तव. ६०१ धंतरकरणको तिहां अंतरकरणमा उपशम सम्यक्त्वपामे पण पुजत्रय करेनही अं तरमुहूर्ग उपशम सम्यक्त्ववेदीने पठी मिथ्यात्वंजाय एथागय प्रकरणकारें सातमी गाथामां अनिवृत्तिकरणे अतर करणकरी सामान्ये मात्र उपशम सम्यक्त्वपामे पण पुंजत्रण न करयां एमकत्यु, वली को जीव ययाप्रवृत्तिकरण करी पठी अपूर्वकरणे ग्रंयोनेदी पुंजत्रयकरी अनिवृत्तिफरणे योपगम सम्यक्त्वपामे ए श्राशय अपुवक यत्तिपुंजो एम सोलमी गाथामां कोठे, एटले अनादि मिय्यादृष्टी प्रथम श्योप शम सम्यक्त्वजपामे ए सिक्षांतसली. तथा कर्मग्रंथानिमायें तो अनादि मिथ्यादृष्टी जीव पहेलां करणत्रयपूर्वक थं तरकरणे उपशम सम्यक्त्वीयईने त्रणपुंजयवश्यकरे. पठीजे पुंजनो उदययाय ति हांजाय एटले कोई शुमपुंजेजायतो क्योपशम सम्यक्त्वीयाय तथा जो मिश्रपुंज नो उदय थायतो मित्रगुणगणेजाय बने अगुजेगयो तो मिथ्यात्वीयाय ए शनिप्राय कर्मग्रंथसेलीनो , ते ग्रंथकारें सत्तरमीगाथायें अकयतिपुंजोउस्सर इत्या दियाशयकह्यो, एरीते सिद्धांतिक तथा कर्मग्रंथिक बेदुएमली उपशम सम्यक्त्व पाम वाना वे मार्गका तथा क्षयोपशम सम्यक्त्वपामवाना पण वे मार्गकह्या, एटलीवा त प्रसंगथी कही हवे मूलगाथानो शब्दार्थ लिखियेठे. अपुवकयत्तिपुंजो इत्यादिक अपूर्वकरणे कसावे त्रणपुंजजेणे मिडजे मिथ्यात्व तेनादल उश्म 0 उटययाव्या तेने देपवीने क्यकरीने अने अपुश्नं के० उद यन धाव्या जे मिथ्यात्वनादल तेने उपशमावीने अनियट्टीकरणा परखवसमी के यनिवृत्तिकरणथी धागल श्योपशम सम्यक्त्व पामे ॥ १६ ॥ हवे कर्मग्रंथनी सेलीयें उपशम सम्यक्त्व प्राप्तिनो उपाय कहेवे:- अकय ति पुंजो ऊसर, दव इलिय दह रुख्ख नाएण ॥ अंतरकरणुवसमिन, वसमियोवाससेणि ग ॥ १७ ॥ अर्थः-घकयतिपुंजोत्ति के जेणे त्रणपुंज पूर्वेकयानथी एटले पुंजकरयाथी धागल जेम वनमां दावानल वलतो ऊसरके उरखरखेत्र एटले निहां खारीजमी न रणरूपदोय अथवा केवल वेलुएटले रेतिनीनूमिहोय सुकी नदीप्रमुखनी; तेने करखरनूमिकहिये, तथा जेनूमिउपर पूर्वदवलागो गयोहोय अने घासलाकडी तथा रुख्य केन्जाडप्रमुख वली साफई गयाहोय ते दवदग्ध नूमिकहिये एटले एक क खरनूमि थने वीजी दवदग्धनूमि ए वे काणा जो वसती इलियके यग्नीपामें के ६०२ सम्यक्लस्वरूपस्तव तो पोतानीमेले उलवाजाय नाएणके एन्यायें मिथ्यात्व वेदनरूप जे दावानल ते यंतरकरारूप करखरखेत्रपामीने सहेजे पोतानीमेले उपसमिके० उपशमि जाय उलवाजाय तेथी जीव नवसमिके० उपसम्यक्त्व पामे. केमके पूर्व अनिवृत्तिकरणना जोरथी जे जे मिथ्यात्वना दलिया उदयथा व्याते यकीधा अने जे उदयनयी आव्या ते उपशमाव्या, एटले आवता रोकी राख्या तथा विष्कनित, उदयकवा अने वली दूरेराख्या एम विचमा अतरमुहूर्त गम्य निर्मल, प्रदेशोदीरणादि करण ने अयोग्य एहयतरकरएकी इहां शिष्य प्रश्नकरे के पूर्व क्ष्योपशम सम्यक्त्व पामवाने थवसरे एम कयु हतु जे उदयघाव्या मिथ्यात्वदल ते क्यकीयां थने उदय न थाव्या ते उपशमा व्या ए सदएका हतु थने चली उपशम सम्यक्त्व काले पण एमजकहोठो तो श्योपशम तथा उपशममा कांई, फेरपड्योनही तेमवतां गणतिमा जूदाकेम कहोटो हवे गुरु उत्तर कहे के क्योपशममा तो गुरुदलियानो उदय तेमां कोई मिथ्यात्व पुजमाथी दलिघुननीने उदय थावे ते प्रदेशोदय इतितत्व हवे ते थनिवृत्तिकरणना बलथी मिथ्यात्वनी एक न्हानी थने एक महोटी एवो बे स्थितिकरी तेमां पेली लघुस्थितिने पिवी अने बीजी महोटी स्थितिने दूरथंनावी विचमा तरकखो, तेमा प्रवेशकरे तेने पहेलेसमये उपशम सम्यक्त्व | दोय, पीते उपशम सम्यक्त्वना जोरथी थतरमुहमा शेप विष्कनितउदय मि प्याव स्थिति, तेना शुरु थईगुरु थने अक्ष एवा अणपुजकरे एट उपशम सम्यक्त्वनो कालपूरोथयो कहेवाय पीते जीवना जदेवा परिणामरहे तेवा पुज नो उदयथाय ए उपशम सम्यक्त्व एकजवार होय थने ए सहज मोदनुवीजने शहां प्रथम सम्यक्त्व पामतां कोईक जीवतो एकतु सम्यक्त्वज पामीने रहि जाय थने कोई जीव सम्यवसाये देशविरतिपषु पण पामे अथवा सर्वविरति पणुपण सार्थेज पामे यमुक्त वृहत्रातकचूण उयसमसम्महिती थतरकरणे ग्थिो कोई देस विरपि सने कोई पमत्तापमत्तनावपि सासायणो पुण न किं पिलहेइ इति एनोयर्थ सुगम इहां उपशमकाल पूर्णथयाथी परिणामनी निर्मलताये शुक्षपुजनो उदयथा वे तेथी क्ष्योपशम सम्यक्त्वथाय ते वली कालातरें सका करवा कुतीर्थससर्ग कु शाख श्रवणादिक यतिचारनी प्रबलताथी मिथ्यात्वदलनी उदारणताथी मिथ्या त्वे मिश्रितथाय तो तत्काल मिथ्यात्वगुणगणेजाय मिथ्यात्वीथाय ते यती स - सम्यक्त स्वरूपस्तव. ६०३ रव्यात् धनरव्यात कालांतरे गुननिमित्ने करी, प्रपतित तम्यक्त्वीजीव फरी सम्यक्त पामे तेवारपण अपूर्वकरणे त्रणपुंजकरी घनिवृत्तिकरणे शुरूपुंजोटय क्योपशम सम्यस्त्वपामे. इहां शिष्यपुनेठे जे पहेला सम्यक्त्व लानकालें तो किवारे प्रथम न पाम्या तेमाटे अपूर्वकरणकहो पण हमणा तो जे पूर्वपाम्युं हतुं तेनोज फरीलान थयो तो तेने शीगत थपूर्व कहिये ? हवे गुरुकहे अपूर्वसरिखं अपूर्व एटले जे वस्तने थोमाज वखतपामि पण पणावरखत नपामि तेने अपूर्वजकहियें केमके संसारसंबंधी वन्यपर्याय प्रातिनी संख्यायागल ए सीगणतिमा माटे एने थपूर्वज कहिये एरीते वृक्षवचनठे सिहां तिक नो ए अभिप्रायवे. तथा फरी सम्यक्त्वनी प्राप्तिनीपरें देशविरति अथवा सर्वविरति नी प्राप्तिना व खतेपण यथाप्रत्ति तथा पूर्वकरण ए वन्नेकरे पण थनितिकरण न करे मात्र थपूर्वकाल समाप्ति समयेज देशविरति अथवा सर्वविरतिपणुंपामे जेवारें देशविर ति अथवा सर्व विरतिपणुंपामे तेवारे यावत् थंतरमूहुर्न लगें तो अवश्य ते जी वना प्रवईमान परिणामहोय थने थंतमुहूर्त वीत्यापठी कोऽना प्रवर्तमान परिणामयाय अथवा कोना हीन हीन थाय थने कोई स्वनावस्थजरहे. तथावली जे उपयोगविना सहेजे परिणामनी मलिनताये देशविर तिथी पडयो अथवा सर्वविरतिथी पडयो ते फरी परिणामनी निर्मलताने योगें करएकखावि नाज देशविरति अथवा सर्वविरतिपणुं पामे, वलीजे उपयोगेपड्या एटले उपयो गीतोहोय पण पोताना कुमत कदाग्रहादिक दोपेकरी विपर्याशथ कुविकल्प पूर्व क पड्याथका मिथ्यात्वेंगया ते जघन्यथी यंतरमुहूर्त तथा उत्कृष्टो प्रनूत् घणोका लगये थके फरी देशविरति अथवा सर्वविरतिपएं पामें ते पूर्वोक्त करण कसाथी ज पामे एम कम्मपयमाग्रंथे टीकामां काठे तया सिक्षांतिक ने मते तो विराधि त सम्यक्त्वी गृहित सम्यक्त्वथकोपण कदाचकोईक तीनरकप्पथ्वी सुधीपणजाय खरो, अने कर्मग्रंथिक मतेंतो वैमानिक विना यन्यस्थानके न उपजे तेमाटे गृही त सम्यक्त्ववत वे एह प्रवचन सारोबार वृत्तिमांकयुवे. तथा धावाप्त सम्यक्त्वगुणथी पडयोयको कर्मयंथिकना मतेतो उत्कष्टस्थितिक कर्मप्रतिवांधे अने सिक्षांतने अभिप्रायेंतो निन्न यथिक उत्कस्थितें कर्मप्रति वांधेजनही ए सर्व प्रसंगेकयुठे एटलें यंतरकरणगत उपशम सम्यक्त्वकयुं. तथा उवसमियो वा त सेणिग के अथवा उपशम सम्यक्त्व स्वश्रेणीयेहोय एटले स्वणिते उपशमणि चढतापण होय, यमुक्तं -उवसमसे ढिगयस्मय, हो। उपस्तामिउसम्मत्त, जोवा यकय तिपुजो, थखविहमिठो लहसम्म ॥ १ ॥ ए गायानो थर्य सुगम हवे स्वणिजे उपशमश्रेणी तेनी विधियनुक्रमे लिखेने , तिहां प्रथम उपराम श्रेणि चढगायोग्यना सदण गुणस्थान क्रमारोह प्रथथीनिखिये ये -पूर्व दि मान् युक्तो. ह्याद्यसहनन स्विनि सध्यायन्नाद्यगुकाश स्वाश्रेणीश्रयतेकमात् ॥१॥ घर्य - पूर्वगत श्रुतनो धरनारहोय शुद्धिमान के नित्य अप्रमत्त निरतिचारवत पारित्रियो हाय, पत्नी केटसाफने मतेतो अविरत्यादिक चारगुणागपावाला पण उपम श्रेणीना प्रारना होय, तथा थायसहनन के० वजरुपननाराच कपनना राय नारार ए थायना प्रण सवयणमाथीथन्यतर सघयणीयने ध्यायनाद्यसका ० एम्पाननो प्रयम पाद ध्यातोयको एपोते उपशमश्रेणी मामबायोग्य ति मायामन गुणाणे श्रनतानुनधी कपापनी चोफडी तथा मिय्यात्व मिश्र थने सम्पान्य प्रणमादनी मनी माते प्रति उपशमारीने सज्वलननो लोनर्जित पीग मांगनीय पमनीरुति तेथपर्वकरण गुणगाणे तथा थनितिकरण गु गणे एपामारीने पनी समसपराय गुणगणेलोनमोहनीय प्रतिने थषु थापी पनी उपशान मोद गुणगणे तेहिज थणुरुप लोनमातिने उपरा मा म सोपामारे पाक गुणस्थान कमारोहयथे- थपूर्वावि एक गुणे पुसमरामान गनिपिगतेगाति लोनापुत्वचतत्सम ॥ १ ॥ श्रथ सुगमने नपाइहा पगमणीराम प्रसारदोय एक स्वल्पायु बीजो दीर्घायु तिहाँ घारापुरत तो श्रेणीममानि असो मरणपाम्यो पको बदमपणे उपजे मर यामिति पपन देतापाप पन - श्रेष्प्याग्दस्तेकाजे दमप्रगति पुष्टा पुग्नान नपेनाग्निमादन ॥ १॥ थर्य - जे पटपापुहोय अने प्रथम सरय सोहीप ते सग्गमिविपर्यन जाय, थहमने जेनाउपर मोक्नु दुकमनटी एह या मातीत परनामा भरने यने वीना तया जीजा सायणगाजात यागुतांत घरमा देवकात दपने पण यागन न जाय नपा मम्यान्दो तो उपानिमोद गुणताणापर्यंत मोहनीयामनु पूर्ण भामरे नेगो मातम मम्याद हाय, यमुन -गानिहाएनमारचा दास शनि मनामध्यस्दनानि नाववादमात्मा अर्य-इहा वपति मंद मयान दर्शनमोहनीय मान्त्रिमाहनीय ठपगमारगर सम्यान्य चार सम्यस्वरवरूपन्तव. ६०५ व्रते उगम जायमांहाय नया नावपण उपगमहोय नया जने तमंचे माजवू होय तेने दायिक नम्यक्त्व पणहीय. तेने उपगांतमोद गुरागणे पांचनाव होय पणतेजन जाण्या पण इहांतो केवल उपनमनीज विवक्षा तथा हां अगा तमोद गुणगशे घट्यो ते वयपर्डन. पठनं नमोदाव्यंप्राप्यो पगमीच्यवतन तः ॥ अथरुतमतंतोयं पुनमानिन्यमस्नुते ॥ १ ॥ वर्ष.- उपगमी चान्त्रिमाह नीयनो उदयपामीन उपयांतमाद यतो पडे फरी मोदजनित प्रमादनी रचुरता मांपडे ए एमजयमान कमक जेम मोहाबु गम्छुपाणी होय तेने को श्रीप धनंजोर मेनहोकन्यि तवारे निर्मलजल उपर तरतुंम्ह तेपाणी कोई वायुप्रमुग्य नो प्रेरणानिमित्त पामी फरी गढढं (मेनुयाय)ए प्रनाव प्रमादोदयनाने. यहक:- सुधकवतीयादारग उजुमच्चनंतगाविउपमाया॥ हिंमंतिनवमरांनं तयांतरमेव चउगश्या ॥ १ ॥ श्रये.- श्रुतकवलीजे उदयूर्वि तथा याहारक दारीरनाथणी बनी उजुर्मांजे मनपर्यवज्ञांनी जुमतीवाजा पण विपुलमनीना पणीनही तथा उपमांनमांद ग्यारमा गुणवाणावाला ए सर्वप्रमादना योगयी तेहिजनवने धनं तर अनंतानवव्रमण चारगतिमां वालोकरं तेमाटे मोदन वांदनार प्रापणीचे सर्व था प्रमाद नहीजरवो. ऽहां शिप्यपूर्व के उपगमीनो अवश्यपडे तो उपशमीने मुक्तिनी योग्यता ते के नथी? गुस्कंह सातजव प्रमाण अवांप श्रायुवानो उपगमी संगणीक घ को अधुरीणीयकोज पाठाफिरे ते सातमें गुणनाणेधावी फरीदपक श्रेणीवडे ते तातलवने निंतर क्षीणमोह वारमें गुणगाणेच अंतगड फेवनी चको मोद साय, हां सातजवते मुहूर्तनो ग्यारमो नागकहिये प्राणी तमवमोदगामी होय ते एकजबार ठपामणीमा उपगमयी उतरी पकोणीचढे अनेज तनव मोदगामी नहींय ते एकनवमा वेवारपण कोकजीवश्रपीकरे पण नवें मिदिवा नही यजुतं निहाते.-जीवोदुक्क जम्मंमि. कमेटी करे। उवनमगो। खयंपिकना नोकनादीवारेउवसामगोपायर्य:- जे जीव एक जन्ममा एकवार उपदामपी करे ते मोदपणपामे अन जे वे वारको तेने आपकोणीनहोय ऽहां घचरम गरी री उपझमी पमयायका प्रयम गुणस्थानके मिथ्यात्वें जाय यह गुणस्थानक मारो हे वाद्यात्त्रयोप्पुर्यः मेकंयानिसमोद्यता; चत्वारोपिञ्युतायाय नप्तमंचांत्यहि नः ॥ ॥ यर्थः-उपगमश्रेणीवटतां अपूर्वाद्याकेण्यपूर्वथनितिन सूक्ष्मपराय ए त्रणरणताणावाजा उंचाचढतां एकेक गुणगणो चढे एटले अपूर्वगुणची यानिव - ६०६ सम्यक्ल स्वरूपस्तव. तिचादरें जाय थने थनिवृत्तिबावरथी सूक्ष्मसंपरायें जायथने सूक्ष्क्षसंपरायणी उप शांतमोद गुणेवाणे जाय एम एकेकगुणवाणेचढे तथा उपशमधी पडता अपूर्वादिक चारगुणगणाथीपडतां मिथ्यात्वेजाय थथवा थंतदेहीजे चरमशरीरीहोय ते पडता सातमें गुणवाणे श्रावी थटके, तेवली सातमागुणगणाथी फरीदपक श्रेणीयेचढे परतु जे एकवार उपशमीहोय ते पकणीकरे पण वेवार उपशमी होयते कृप कश्रेणी न करे यता-उवसमसेलिचउक नाजीवस्स थानव नूग, तापुणदोणान छे खवगसेणीपुणोएगा ॥ १॥ था ससारमा रहेतोथको जीव मोहपामे तिहासुधी चारवखत उपशम श्रेणीकरे तेवली एकलवमा वेवारकरे थने पक श्रेणीतो थासा ससारमा एकजवारकरे इतिगाथार्थ ॥ एवात प्रतंगेथई ॥१७॥ हवे रूपक श्रेणी, स्वरूपकहे प्रथम दायकनी अनुक्रमणिका कहे। मिशाइखएखश्न सोसत्तगिखीणिगवाक। चनतिनवनाविमुरको तलवसिद्धीविश्यरोवा ॥ १७॥ अर्थ-पूर्वे सिद्धांतानिप्राये धपूर्वकरणेकखाने अणपुजजेणे ते जीव शुक्ष पुजोदयें वर्ततो यथा कर्मप्रथानिप्राय अतरकरणगत उपशमवलें कन्या त्रपुज जेणे ते जीव जेवारे शुभविषाकोदय दतो एटले छायोपशमसम्यक्त्वें वर्त तो चोथायुपताणाथी मामीने दायिकमारने' तिहा प्रथम थनतानुबधी चार के पाय तथा मिथ्यात्वमोहनीयपुज मिश्रमोहनीयपुज थनेसम्यक्त्वमोहनीयपुज ए त्रणपुज भने पूर्वोक्त चार कपाय ए सातेप्रतिनो क्ष्यकरे तेवारे हायक सभ्य क्वीथाय तेना वे दवे एक बतायुक्षायिक सम्यक्त्वी बीजो थवायुदायिक स म्यक्त्वी तिहाजे अवज्ञायु एटले जे जीव वागतानवनु वायुबाध्युनथी एवो का पिक सम्यक्पोजीवतो तावेज मोजाय, थने जेणे थावतानबनु थाउपुवांधीने पठी सातप्रति पकरी हायक सम्यक्त्व पायो तेजीव रणनवे अथवा चार नवे मोहजाय तिहाजो देवनवनु अथवा नरकनवर्नु घायु बाध्यहोय तो श्रीजे नये मोक्षजाय, तथा यसख्यान वर्षना थापावन युगनिया मनुष्य तिर्यवनु थायुवापुहोप तो चोथेनवें मोक्षपामे, कैमके युगलम अवश्य देवगतिपामे, ति होया चवी मनुष्य मोक्षजाय, माटे चारलवकरे, इहां थानाध्यापली काजी व क्षाषिक सम्यक्त्वपाम्पु तो ते जीय सातमरुति क्ष्यकरीले एटलेजरहे पण थागत क्षकश्रेणीचडेनही ते नवेतो क्षायिक माजरहे पनी पूर्वोत्तरीतें त्रीजेन चे थथवा चोथेनरं लिहिवरे ए प्रसगी वातकही सम्यक्त स्वरूपस्तव. ច 5 हवे पक श्रेणीनु स्वरूपकहेतेः-यणमित मिस्ससम्मं यह नपुंसटिवेयतकंच पुमवेयंचखवे कोहाइएयसंजलणा ॥ १ ॥ गश्यापुपुविदोटो जानामंचजावचउरें दी पायावंउकोयं थावरनामंचमुहमंच ॥ २ ॥ साहारणमपडतं निदानिदंचपय लपयनंच थीणंखवेताहे श्रोतंजंचत्रघ्नं ॥ ३ ॥ वी समिकणनियंठो ॥ दोहेस मएहिं केवलोसेते पढमेनिदंपयलं नामस्स इमाइ पयडी ॥ ४ ॥ देवगऽ यापुपुत्री निकविसंघयण पढम वजा यलयरंतंताण तियराहारनामंत्र ॥ U || चरिमेना पावरणं पंचविहंदसणंचनवियप्प पंचविहमंतरायं खेवित्ताकेवलीहो ॥ ६ ॥ ६ ति श्रेणीस्वरूपं. ए त्राप्रकारे सम्यक्त्व कह्यु. ॥१७॥ हवे चार प्रकारे सम्यक्त्व कहे:- चव्हा सासाएं, गुना वमणुव माल पमणुष्व ॥ वसमिन उपडतो, सासाणो मिठ मऽप्पत्तो ॥ २ए॥ थर्थः-- चहा के चारप्रकार तम्यक्त्वहोय ते यावीरीते के त्रण तम्य क्वतो पूर्वेकह्या घने जेवारे तेनीतायें सासाणं के सास्वादन नामे सम्यक्त्व नेली तेवारें चारप्रकारे सम्यक्त्वयाय हवेतास्वादन स्वरूपकहे. उपशम सम्यक्त्वनो काल धंतरमुहूर्त तेमाथी जेवारे कोकजीवने नवित व्यनानायोगें मिथ्यात्वे अवश्यजावूठे तेवारे उपगमकालमा उल्लष्ट थावलिका प्रमाण काज वाको शेपरह्योहोय घने जवन्यथी एकसमय रह्योहाय घथवा तेनी वचमानो जेजेरहेने मध्यमकाल कहियें एटलो उपशम तम्यस्त्वनो काल शेपरहे तिवारें उपगमावलाजे अनंतानुबंधी कपायनादल तेनो उदयथाय ते जीवन सम्य क्त्व थकां गोलना वमननीपरें तथा माल पतननीपरें एटले जेम गोजप्रमुख मधु ररसन नोजनकरी पातुं वमनकरे तेवार नोजन करती वखतेंजे मधुरताना साद नी लेजतहोय तेवो तेजत काई वमन करती वरखतें न होय पण कांक गज च टयो थनिहित स्वादलाग केमके जोपण वमनतो तापण मोगसनु। तेम उपा मथी पडयो धने हजी मिप्यावे पदानुनथी तेना विचनाकाजमा सासाटन न म्यक्त्व ते गुडवमन सरखोहाय ते वमतां तम्यक्त्वनो यनुनवदेखाटयो चने मा सयकी पडवा गरियो काजस्पिनि देखाट्यो. जेम माजयो पटतां सावधानहोय तोपरा वेद्यायो ते घवश्य नूमी फरसे तेन मम्क्न्दनी गीगन मावधान होय तोपरा थनंतानुबंधी दसना उदयवनें टसी ननदी इनि तवं.

៩ច सम्यक्त्व स्वरूपस्तव. - हवे सास्वादन शदनो अर्थलिखेने सहयावादेन वर्तते इति सास्वादन सम्य क्त्वनो थास्वादमात्ररहे तेथी सास्वादनकहिये यथया थाके समस्तपणे शातन करे पातनकरे मुक्तिमार्गथी नसकरे ते थाशातनकहियें एटले थनतानुवधी कपा यवले सम्यक्त्वगुणथी भ्रष्टकरेमाटे थाशातने ते थाशातनसहीत थवस्यहोय मा टे माहाशातन कहिये थने प्रारुतसूत्र माटे सासायणकहियें ययुक्तं चिोपाव श्यके - उवसमसम्मत्ता चश्कपमिथ्थपावमास्स ॥ सासायणसम्मन तव त रालमिहावजिय ॥ १ ॥एनोयर्थ सुगमने एरीतें चार प्रकारे सम्यक्त्वका ॥१] हवे पाचप्रकारे सम्यक्त्व कहेते. वेयग जुअ पचविद ॥ तचतुज्पुंजखयमितऽयस्स ॥ खयकाल चरमसमए । सुधाणु वेयगो हो॥२०॥ थर्थ - पूर्व कह्याजे चार सम्यक्त्व तेनीसाये वेयगके वेदक सम्यक्त्व छ थके० युक्तकरिये तेवारें पचविहके. पाचप्रकारे सम्यक्त्वहोय जे सम्यक्त्वना थत्यंत शुरूपुगतने वेदीये यनुनविये ते वेदकसम्यक्त्वकहिये तेहथी सक्षपुगत थी न्यनतरते थनेद से माटे ए सम्यक्त्वपण वेदक कहेवाय एटले जे पका णी प्रतिपन्न तंचके ते प्रथम यनतानुबंधीचोकडी तथा पुजखयमिकेमि ध्यात्वपुज धने मिश्रपुज ए वेपुजक्ष्यययेनते तश्यस्तरखयकाज चरमसमएके गु ६ व्हेला सम्यक्त्व पुजना दतियापण उदेरी उदेरी उदयें थनवी धनुनवी नि जरा करता करता निवव्युठे उदीरणा वल जिहा एटले चरमावलिकायें उदीरण करण लागेनही एटले त्रीजा सम्यक्त्व पुजने ये करता जेवारे वेलो सर्वोदित पुजमास चरम समय वेद्य शुस्थपुनु वेदन एटले गुपक्षायोपशम पुजलनेवेदे ते वेदक सम्यक्त्व कहिये यक्त विशपावश्यके -यगसमनपुण सदोश्य चरम पु ग्गजावो ॥ खीरोदसण मोदे, तिविहामि रकाश्यहोइ ॥ १ ॥ इहां शिप्य प्रश्नकरने के तुमे चरम शुष्पासनु वेदन ते वेदक कहोगे तेवारे श्योपशमा थने वेदक मा दयो फेरथयो केमके शुक्षपुजनु वेदन वे काणे सरिखुढे तो जुनाम केस कहोनी? तेबारे गुरु उत्तरकहने के ते सानुका पण एमा विशेप ए के ए वेदक तो थशेप समस्त पुजनानुना वत थत्यंत शुमने थने इतरजे श्योपशम सम्य क्य ने तेता उदित थनुदित चे पुज्न उदयानुन बत्तठे एटलो विशेपवे परमा थे जोतातो दयोपशमज समन्त मोहनीय क्ष्यकरयाना कालनो जे चरमसमप सम्यक्स स्वरूपस्तव. ६०ए मात्र ते वेदक सम्यक्त्व कहिये. जेम सूक्ष्मलोचना खेम वेटवाथकी सूक्ष्मसंपराय गुणस्थानक कहिये. तेम गुरूक्योपगम पुगलना वेदवाथकी वेदक सम्यक्त्व था यो, एम वेदक सम्यक्त्व सहित सम्यक्त्वना पांचनेद थाय इति वेदकस्वरूपं० हवे ए पांचे सम्यक्त्वनो काल कहे:- अंतमुदत्तो वसमो, गवलिय सासण वेयगो सम॥ सादिय तित्तीसायर, खड्न गुणो खवसमो॥३१॥ अर्थः- उपशम सम्यक्त्वनो काल उत्कृष्टो अंतरमुहूर्त्तने,अने सास्वादननो का ल उत्कृप्टो ठ श्रावलिनोठे, तथा वेदक सम्यक्त्वनो काल एक समयडे, अने दायि क सम्यक्त्वनो उत्कृष्टकाल सर्वार्थ सिधिनी अपेक्षायें साधिक तेत्रीससागरोपमनो वे, साधिककह्यातेतो मनुष्यनवनी अपेक्षायेंकह्या; केमके दायक सम्यक्त्ववतजीव ते त्रणनव अथवा चारनव उत्कटो संसारमारहे, उक्तंच पंचसंयदेः-तस्य च तमि, नवमि सिय्यंति दसणे खीणे जं देव निरय संखाउ, चरम देहेसु ते इंति ॥१॥ अर्थः- वायु कायकसम्यक्त्ववतजे होय ते देवगति अथवा नरकगति जाय, तेवारे तभवांतरे तृतीयनवें मोदजाय; तथा कोई दीए सप्तकी जो तिर्यचमांउप जे तो अवश्य असंख्य वर्पना पाउपावाला युगल तिर्यंचमां उपजे, पण संख्यात वायु तिर्यचमां दायक सम्यक्त्ववंत न उपजे, पठी तिर्यंचमांयी देवथाय, अने दे वमाथी मनुष्यथई मोदजाय, घने जे अवधायुवत होय तेतो तेहिजनवें दपक श्रेणीपुरीकरी सिध्याय, तथा एकजीव आश्री अथवा अनेकजीवाश्री सम्यक्त्व नो उपयोग जघन्यथी तथा उत्कृष्टथी अंतरमुहूर्तज होय. अने योपशमरूप स म्यक्त्वनी लब्धीतो एकजीवने जघन्य अंतरमुहूर्त अने उत्कृष्टीतो उगणो के दायकथकी बमणो वासठ सागरोपम अने मनुष्यनवें अधिकहोय, तेथी नपरांत सिजयाय, एटले बारमादेवलोकमुषोत्रणवार गमनथाय, तिहां उत्कृष्टायु बावी स सागरोपमनुंठे, अने मनुष्यनो नव अधिकगणतां वासासागरोपम फाराथाय, धने विजयविमान आश्री वे नव करवाप; तिहांपण उलटायु तेत्रीस सागरोप मनु, अने मनुष्यनव गणतां साधिक वासनसागरोपम क्षयोपशम सम्यक्त्वनो कालमानथाय, एम नानाप्रकारना जीवो श्री सर्वकाल ठाशन सागरोपम, यड तं सिखाते -दोवारे विजयाइसु, गयस्स तिनीय अनुए यहवा ।। तऽ अरेग नरनधि य, नाणा जीवाए सवठा ॥ १ ॥ एनोयर्थ सुगम ए पांचसम्यक्त्वनो कालकह्यो.

६२४ सम्यक्त स्वरूपस्तव दवाण सचनावा, सतपमाणेहि जस्सरवला ॥ सवाहि नयपिही हिय, विवाररुति नायवो ॥ ॥ अर्थ - इव्यजे धर्मास्तिकायादिक व तेना सर्वनाव जे श्व्य गुण पर्याय उत्पाद व्यय ध्रौव्य तेने सर्वनय नग प्रत्यक्ष परोदादिप्रमा ऐ स्याबाद सैली सहित अनेक सप्तनगीपरुपणायजाणे ते सातमीविस्तार रवि दसण नाण चरित्ते, तव विणए सच्चसमी गुत्तिसु ॥ जोकिरिया नावरु३, सोखलु किरिया रुग्नाम ॥ ए॥यर्थ -जेने दर्शन झान चारित्र तप विनय समिति गुप्तिप्रमुख वाह्य क्रियाथी घणु रगहोय क्रियानावमा घणी चाहना रहे तेने थान मी क्रियारुची कहिये यणनि गाहिय कुदिही, सम्वेव रुइति होइ नायवो ॥थविसार पवयणे, य पनि गहियो थसेसेसु ॥ १०॥ अर्थ - जेप्राणी थनिगहिय के अननि यहिक कुदृष्ठीजे कुमार्ग शारख्यादिक दर्शनोनो थाग्रह धरेनही थोहु कह्याथकी घणुजाणे कुमतिये पमेनही समोविचारे चिलातिपुत्रनीपरे तथा प्रवचनजे जिना गम तेनेविपे घणु थविसारद के निपुणतो न होय तोपण सरलगुणेकरी कदा ग्रह धरेनही जिनमार्गनी प्रतीत माने तेने नवमीसक्षेप रुचीकहिये जो थछिकाय धम्म, सुय धम्मखसुचरित्तयम्मच ॥ सहदइ जिणानिहिप,सा धम्मरुति नायबो ॥ ११॥ अर्थ-जे नव्यजीव अधिकायधम्म के० पचा स्तिकायनु स्वरूप जाणे तथा श्रुतधर्म अने चारित्रधर्म ने वाह्य अतरगनावें श्री जिनोक्तमार्ग सहहे सकल स्वनाव विनाव स्वरूप जाणे तेने हेपोपादेय नावें य थायोग्य सदहे ते दशमी धर्मरुचि कहिये ए दशरुचि ते सम्यक्त्वना दवे हवे ए सम्यक्त्वगुणनी प्राप्ति ते मिय्यात्वना त्यागथी थाय ते मिथ्यात्वना ने द पाच तेमाजे लौकिक प्रवाहीम जेजे सारनी सपरिग्रही कशीजसेवनादिक जे धर्म बुझेंग्रह्यो तेहिज सारकरीजाणे तेनु हताणे थमारोधर्म तेज सारने एम कदाग्रहकरे पण मध्यस्थथई परिक्षाकरी गुमनेग्रहेनही ते थनिग्रहिक मिथ्यावं जे एम कहेके सर्व दर्शनरुडाचे सर्वने वादिये पण नदियेनही एवी पोतानी मदयुधिजे जडतापणु तेनेजीधे काचने तथा मणीने सरखाकरे पण परिक्षाकरी शुक्ने ग्रही शकेनही ते वीज थननिग्रहिक मिथ्यात्व जे जाणीजोईने छठु बोले कुमति कदाग्रहना जोरथी निरुक्ष परुपणाकरी 3 रत ससार रक्षिकरे जमाजी प्रमुख नन्दवनीपरे ते त्रौ यानिनिवेशिक मिथ्यात्व सम्यक्त स्वरूपस्तव. ६२५ जे श्री जिनोक्त सिद्धांतना नाव सांगली संशय धरे जे ए केमहसे एम मगम ग्योरहे ते चोj सांगविक मिय्यात्व कहिये. एकेडियादिक समूहम जीवोने अनादिनु पठवाडे लागोरह्योठे प्रायें अस नीयासुधीतो अनानोगिकज होय ते पांचमुं अनानोगिक मिथ्यात्व जाणवू अथवा संसारीजीवोने बीजापण चारप्रकारे मिय्यात्वहोय ते कहेले एक देव गत लौकिक वीजो गुरुगत लौकिक त्रीजो लोकोत्तर देवगत चोयो लोकोत्तर गुरु गत तेमां हरी हर शक्ति प्रमुखने माने पूजे ते लौकिक देवगत मिथ्यात्व, ब्राह्मण तापसादिकने गुरुवुझमाने पूजे ते लौकिक गुरुगत मिथ्यात्व, वलीजे सप्रनाव जि नविवने इंडिय सुरखने अर्थ माने पूजे ते लोकोत्तर देवगत मिथ्यात्व,अनेजे सुसा धुने श्लोक सुरव या मान प्रतिष्टा अथवा धन धान्य पुत्रादिकनी आस्याधरी माने हे दानापे ते लोकोत्तर गुरुगत मिथ्यात्व कहियें. तथा जीवे यजीवसन्ना अजीवेजीव सन्ना मग्गे उमग्गसन्ना उमग्गेमग्गसन्ना सुदेवेअदेवसन्ना अदेवेसुदेवसन्ना सुसासु असादुसन्ना असादुसुसाइसन्ना धम्मे अधम्मसन्ना यधम्मेधम्मसन्ना ए दशप्रकारे विपरीत वासनारूप मिथ्यात्वते. तथा जे बली रक्षाबंधन गंक्रांतिपूजन एम एकवर्षमा शतपर्व आराधन ते सर्व लौकिक पर्वगत मिथ्यात्वठे तया दीवालीप्रमुख कल्याणीकना दिवशे इंशी यसुखने साधे विशेप पूजारचनादिक करे ते लोकोत्तर पर्वगत मिथ्यात्वचे ए सर्व मली एकवीसनेदे मिथ्यात्व ते संसारीजीवोने संसारमा नमाडेठे. तथा वली धार्थिजीवने चारप्रकारे मिथ्यात्व टालवानो नपयोग राखवो ते कहे। तेमा प्रथम प्रदेशमिथ्यात्वठे ते जे यात्मप्रदेश पूर्वबंध मिथ्यात्वनादलियां र ह्या ते सत्तागत थथवा उदयगत दलियां ते प्रदेशगत मिथ्यात्व ते जेवारे जीव जिनवाणीसांजली यथार्थनावजाणी सदहे सकल पुनलिकनावने हेयसबहे केवल स्वरूपलानते यथार्थ परिणति परिणमन तेनेज सुरखनुमूलजाणी सबहे श्रादरकरे एवीवांठायें प्रदेशमिय्याव टलीजाय. वीजें परिणाम मिथ्यात्व ते जे पोताना प्रमाददोपेकरी शुक्षश्राफरीने कुश्र दायाय जेम पूर्वधरने निसादिक टोपेकरी पूर्वगलीतथाय मरीने निगोदाटिकेजाय जेम प्रसन्नचंद राजपी दूरवाक्य सानली चेतनाफरीगइ ते परिणाम मिथ्यात्वक हिये ए मिथ्यात्व ते जिनवाणीने विपे तीवोपयोगी रहेवाथी टले. त्रीजु परुपणामिथ्यात्व ते उत्सूत्रनापवाना जे महोटादोप तेने कहियें एथीय नतसतार चमणकरे धर्मवीजनो सफरे जे सद्दहणाराखीने मरणांत कष्टपडे तो पण श्रीजिनवाणी विरुक्ष प्ररुपणानकरे तेने ए मिथ्यात्वनु दोपटले चोथु प्रवर्निमिय्यात्व ते जे मिथ्यात्वनी करणीकरे मिथ्यात्व प्रवर्गव तेने क हिये ए मिथ्यात्व सुसाधु तथा सुश्रावकनी सगति करवाथी तथा रागपने मद करी मध्यस्यनारे थइ परिदाकरी शुक्षप्रवर्तन करवाथ टलेले एमए मिय्यात्वजे ते जगतमा जेटली 5 खनीजातो ते सर्वनु मूलकारणले कोप्योऽममन कोप्योव्याल तथा वेताल जे नकरीसके ते सुख एमिथ्यात्वथापेठे च्याधि मृत्यु दानिश तथा वनवासथीपण मिथ्यात्व सेवनते यनतरा 5 खदार वे जेणे मिथ्यात्वजीन्यो तेणे सर्वजगतजीत्यो शदिकनी शकिपामवी सुलनने पण मिय्याव टाजवु 5 करने तेमाटे यात्मसुखार्थिजीवे विशेपथकी मिथ्यात्व सो धन करयु निर्मत प्रदान करीश्राग्गुणयुक्त सकादिदोप विमुक्त सम्यक्त्व दृढकरवु दो थातगुणेफरी सम्यक्त्वनी पुष्टीकरे ते थातगुण कहे गाथा ॥ निस्सक्रिय निगिय, नितिनिगिया थमृददिकीय ॥ थववुह थिरीकरणे, बलप्पनावणेया १॥ श्रीजिनागमनेपिपे सूक्ष्म विचार थतियादिक नावजेते ते साचा सदहे, पण मदेनमा नयाणे यने सातनय पण मनमा थाणेनही ते प्रथम निसकगुण धीनी निापागुण जे यन्यदर्शनना कष्ट मत्र चमत्कारादिक उन्नतदेखी तेनी पाहना नरे थारदायरेनही अथवा धर्मना पुण्यापफनी इछा नरासे केमो निशानी थानुरता तिहापुण्यरस योगोयाय जिहा इजा तिहाफर्मबध थने पुष्यनो धर्मझियानो वस्तुम्पनापने तेतो अवश्यजथाय तेने वारूप दाप तो सा म मामा घने जे निस्टहपणे धर्मक्रियानुफलने ते निरविपिने माटे ए निक पागुणधी धर्मफा वृद्धिनेपामेने प्रीज निचिनिगमायण ते जे कर्ममबी फलनो सदेह गरवेनही जेम कोई मनु प धर्मती करता का पर्वत पातिने उदय पोडतो थको मदयुद्धि नो धणी मरिचारे जे दुधमास्तु तोपण पोडाकेम पामुख ए धमक्रियानु फन पामे नही पाय एगमारे पण म नपिचाजे पतोपूर्वस्त कर्मफन । दय यायाने पण रनमान जे धर्मक्रिया कस्तु ते थागज अश्य थायगज रेमो मानिनया कप टाण कमाण न मुफ नि, माट जे निमिति गया पवनहोप ते मन्द पानही श्रीजिननशाण समाश्रमणे कायम बने निविहार दि दिउँगरि नया दानणेण, नाणापरणा दगाव, संम्यक्त्वस्वरूपस्तव. ६१ प्रयवा अगुजपुत एकनरखागणे पण अगुनपुजनदेखी गंवा करनदी तथा पुग्योदये गुनसंयोग मिठ्यायका खुसीनधाय अहंकार करेनही पापोदयवी अशु जतंयोगमिच्या हितगीरथायनही ते निविनिगंवा गुणकहिये. चौथो चमूढदृष्टीगुण ते जे श्रीयागमतिक्षांतमां निगोदप्रमुखना सुचविचार सांनजतां मुंफायनही जे पोतानी धारणामां आवे ते धारीराखे घने जे धारणत्रु दिये नयावे ते सदहे. तिहां एमविचारेजे सर्वोपथी विमुक्त एहवा जिनेश्वरते अ न्यथा वादीनहाय. यउक्त आगमः-अनसनंबुफिय्या, सवपुमय मवितह ।। त हाचिंतएमयं. धनहान वयंतिजे॥१॥अपुवकय पराणुग्गह, परायणा जंजिणाजग प्पवरा ॥ जिय गग दोसमो हाय. नन्नहा वाणो तेण ॥ ॥ अर्थ:- जेजि नवाणी सांनजतां खबर नपडे. समजवामां नयावे, तेना हेतु निखे. कोको तातो पूर्वनव कृत ज्ञानविराधन कर्मोदयथयेयक मतिर्बलताची न समजे तिवा रंबाचार्य तथा विधि उपदेशक कोई हेतु दृष्टांतादिक वचनेकरी श्रोताना चित्त मां उतारे, एहवा महापुरुषोंने विरहे तथा नीतोन्यायना अजाणवायकी एटले धनंक नय युक्तिना ग्रहणपणाविना अथवा ज्ञानावरणीकर्मना प्रवलोदयथी न समजे, तेवार यात्मार्थि थमृटदृष्टीजीव एवो विचारकरे जे हेतु उदाहरण ययवा अनेक युक्तिदृष्टांत घणा वखत कताथकां पण मने तारीपठे समजण पड़तीन थी ते महारे पूर्वोक्त दोपना योग्यथी जाणवी, पण तर्वङमत तो अवित सत्य जवे, एम कहे तेवारं कोई टवाकरे ज एकांते जिनोक्त रचनाज लत्य एबुं तंकि मजास्यु ? तेवारें अमूढदृष्टी श्रोता उत्तर कहतेः-यणुवकय केन जिनेश्वर ते केवां प्रत्युपकारनी चाहनाविना परने धनुग्रह उपकार करवाने तत्परते, तथा जि पा के जे कारणमाटे जिनेश्वरते जगतमा प्रवर के श्रेष्टने, रुप वन तेजकांति बुधि कति लिक्षिप्रमुख गुणे सर्वोत्कृष्टते; थने वलीजियराग के जीत्याठे मूलयी राग ६पने मोहजे यज्ञान एत्रण्टोप जेमांयी गया माटे जिनेश्वर अन्यथावादी होयज नही तेथी परमययायवात तेयागमनीज एथमूटहीनामा चोयोगण. पांचमो अवह गुण ते पोतानी यात्मामां अनंत ज्ञानदर्शनादिक गुण ते तुपावनही उटैंक ख मेटवाने दीनतादिक न नापे गुस्सत्ता जेवी तेवीजकहे बने पुजतिक सुखड खते अडानशा रुत उपाधिने यात्मा ए राग क्षेप उपाधि थी न्यारोजे. ऽमज परजे अन्यसाधक तमापणजे गुणहोय ते प्रगटकरीरुहं पण तुपावेनही ते पाचमोगुण.

सम्यक्खस्वरूपस्तव . वोथिरीकरणगुण ते पोताना परिणाम परजावमाथी काढी ज्ञानध्यानमा जोडे, नित्य धर्मक्रियाकरतोहोय ते अवश्य थिरयोगवत थयोषको करे, पण चप सताना कारणमिले तोपण थथिरपणु ग्रहेनही साध्यसाधनथी मगेनही, तथा काई नयप्राणी शुनागुन फांदयनिमिने धर्मथी पमतोहोय तेने समुपदेशाविक थापी अथरा तेने कोरीते सहायीथईने तेनुं परिणाम थिरकरे, पण मगवान थापे ते वो स्थिरीकरण गुण जावो. सातमो वन्सलतागुण था वर्तमान शासनमा जे जय धर्मरुचि जीयोसा सामायक पोसह परिकमण यात्रा पूजादिक धर्मकरणी करताहोय, जेहनी साह पा एकदोय ते पोताना साधी कहिये, तेनी नक्तिकरवी ते वत्सलताकहिये थ पण सर्वजीर जाते थापणासाहमीजने, एकसत्तायें सरखावे, वास्ते सर्वजीवनी पासजना करयी. जीवदयापालयी, अथवा थतरगनावे जीवना ज्ञानादिकगुण । तेने शानपानेकरी पोरया (पुष्टकरणा) एटले ज्ञान ध्याननो घणो थन्यास करयो ए स्वनिरा पान्मनगुण सातमोने यावमा अनाधिकगुण ते जनशासननी उन्ननिकरची, सधयात्रा रथयात्रा श्रयया महादा तर जप ती उपधान प्रतिष्टा पूजादिकना घणामहोत्सवे थढजक दाना दिरनी पदारताकरी जेपी अन्यदर्शनीउपण अनुमोदनाकरे एपी धाराये धर्म त मुग्री, मदर्शननी क्षिकरे,पणाजीगेने धर्मजोडावे, या कारण मेजये जेयकी जनशासनने प्रनाये (दोपावे) ए बाह्यमनारिफगुण अथवा पातानी धारमाना सानादिरगुण तेने वपारवा पुष्टकरवा ते थतरमनाविक गुण ए मनायनागुण - हरे श्री मम्यान्वना सडसग्नेद विशुद्ध व्याहारथी कहे निमुद्धिलिंग सफण, दूमण नूमण पनावगागारा ॥ महाप जयप नापण, वाण विणय गुरु गुणाईय ॥ 11 वर्ष - निमुदि के सम्यन्वनी प्रणालिने, तेमा पहेली मनसुधिन श्रीजित सपा जिनमत ए वे रिना थपर सर्व असाग्ने म चितवे ते मनादि बीजी र पनामि ते श्रीनिभानु बागपन करता सर्वाना सवायज अन का रन रतना प्रपोज का नया तथयशाची गुणानुन, माट थरिह तनी मंदापी सामना मिलियान, वान मामापण यन्यदयनी प्रार्थना न १ सम्यक्तस्वरूपस्तव. रए एवंजे निसंकपणे बोलतुं ते वचनसुधि कहिये. त्रीजी कायगुपिते कोई पूर्वस्त अशुनोदयथा कोई मिथ्यादृष्टी उष्टराजा अथवा चोर अथवा इष्ट देवादिकजे ते ऐ खड्गादिके नेद्यो, निनादिके यंत्र घाणीप्रमुख पीच्यो, अग्नी प्रमुखे दाज्यो, एवा महोटा मरणांत कष्टयावे, पण एक श्रीजिनेश्वर विना अपर देवने वनजंघनीपरे नमेनही ते कायशुदि कहिये. लिगके लिंगत्रणळे. ते कहे:-जे श्रीजिनागम सानलवानी घणीज श्याराखे इंडियसुखना अनेककार्यमूकी पागम सांजलवाने तत्परहोय ते प्रथम सुश्रुपा लिंग कहिये. वीजंलिंगते धर्मकरणी करवाने परमरागहोय जेटला धर्मकरणीय तेहिजकार्यमाने वाकी सर्व नवपूरणमाने ते वीजुलिंग. त्रीलिगते जे श्रीजिनेश्व र तथा जिनमार्गानुसारी गुरु तेना वैयावञ्चमां यथायोग्य निश्चलानिग्रह रूप नियमें प्रवृत्ते ते त्रीलिंग जाणवू. हवे जेथको हृदयगत् सम्यक्त्व लिखियें जाणिये तेलक्षण पांचवेः-ते कहेते तेमा पहेलुं सदण समते, तेजेम रागदेपनी मंदता, तेम समतानी वृद्धि, सुखःखना उदये हर्प विषाद धरेनही ते समकहियें. एटले समपणेहोय पापोदये पुण्योदये थ व्यापकहोय तेसम नामा प्रथम लक्षण जाणवू. वीजु संवेग लक्षण ते नित्य मोदानिलापरहे, जे जे मोदना कारण ते ते उपरे थादर घणुहोय, परनावथी विमुखरहेते वीचं लक्षण. त्रीखं निरवेद्यलक्षणते जे सप्तांग सहित एकपत्र राज्यपाम्युंहोय तोपण एमजाणे जे ए बंटीखाने पडयोतुं. ए कारागारथी के वारें टूटीस, सर्व पुजलिकनाव ते बंधनरुपगणे, समस्त संसारथी चदासरहे, ते नि रवेद्य लक्षण त्रीखं जाणवू चोथु थनुकंपनलक्षण ते जे सर्व संसारीजीव उपरे थनुकंपाधरे, एटले संसारीजीवोना इव्यख देखीने तेना उपर परम मैत्रीनावध री, यथा शनि उपकारकरे, मनमां एवी चाहना राखेजे कोई जीव पाप नकरे कोरंजीव ऽ खी नथाय, सर्व संसारीजीव इव्य नाव उ खथी वुटे, धर्मपामे महा री शक्तिफुरे तो सर्वने धर्मसचिवंतकरूं, जेम एना जन्ममरणना 5 खटले, एवी या सनाते थनुकंपा लक्षण चोथु जाणवू. पाचमु थास्तिक्यता लक्षणते श्रीजिनदा सन तथा जिनधर्मउपरें परम थासताहोय, परमरंगहोय एरीतें धर्मरंग वालीतहो य ते थास्तिक्यता लक्ष्य पांचमुं जाए. हवे पांच दृषण सम्यस्त्वना कहेतेः-तेमा प्रथम संकापार ते जे जिनवाणी मां संदेहधरे ते शंकाकदिये. तेनावेदः-एक देशविषयीचीजो सर्वविषयी. तेमा सम्यक्त्व स्वरूपस्तव सर्वविषपसंका ते धर्म के नधी अथवा जिनधर्म सत्यने किया असत्यने एपीन चारणाते सर्वधी समाजाणवी श्रने जे देशसकाते जोर सर्वगतः के असंगत पृथ्वीमा जीवपणु केमरे अथवा निगोदादि स्वरूप केम घटमानथाय' कई युक्किए । मानिये अथवा वर्तमानकालें चारित्र के नया इत्यादिक देशसफा जाणवी तया पूर्वेकहीजे सर्वमका ए बेसका सम्यक्त्वने दृरयो ते मकानाम प्रथम दृषण जाण बीजु कादादूपण ते जे परदर्शननो निजापधरे तेन यामाद, दूपणकहिये ते वेप्रकारे एक देशथी श्राकाक्षा वीजी सर्वथो श्राराक्षा तमा सौगतादिक एकन दर्शननो शनिलापधरे ते तो देश विषय थाक्साधने जे सपासमीपर्मनी थाको क्षाधरे ते बोजी सर्व विषय थाकाका, एपीजुदृपणकयु सम्यक्त्व मजीनारे ए श्रीजिनागममा अविस्वास रूप दूपए बीजे वितिगिठादृपण ते जे तपस्यादिक धर्मरणीकरता तकन्यफजनो सदेह घरे, ए धर्मक्रिया फलसे के नहीफलस, केमके किया ये कारनी जगतमा देखाय ने, एक फलमा बीजी श्रफलपण श्राय, थापाढाचार्यनी पर सदहमापडे, यहाँ कोऽशिष्य पूबधु जे सकाते सदेहरूपवे, घने था विकलापण सदहरूप कहोतो तो ए वेमा शोविज्ञपपणु जेथी जिन्न निनकहोना एम शिप्ये पुनयाथी गुरुकहे दे सका दूपणते इव्यगुण विपेचे अने विचिकहा किया रिपेचे एत्रीजु दूपण चोयु प्रगसादूपण ते कलिगी तापस साक्पाटिक देखीने श्रहा । महाटात पस्वी, श्यादिक वर्णन ते याससाकहिये, ए प्रसमाकरता थसणाकरणे करी । म्यक्त्व मलीनकरे, मुग्धबुद्धि मिथ्यादृष्टी लोफने रिप थत्यादरयाय मिथ्याधर्मनी सदापुष्टीयाय, केमके लोककहेके जनधर्मापण एनी प्रसमारने. तो ए महागुणी वे इत्यादिक दृपणाश्री सम्यक्त्व मलीनथाय ए चाधुदृपण पाचमु दूपणते जे कुलिगी धन्यदर्शनी साये सस्त परिचयको नित्य नेगार हे, तेनो क्रियाना वर्णन महिमा सानली अक्षादोषदलीयाय थने नेनी अलग क्रियादेखी दर्शन दृढता सिथिलथाय, माटे थन्य दर्शनीनो परिचय त्यजवा ए पचिमुं दूपण हने पांच नूपण कहेजे -प्रथम स्थर्यनृपणते जे श्रीजिनधर्मने विप स्थिरताहो य, पण मुक्ति कुयुक्ति सनिली चपलचित्त करेनही ते स्थैर्यनृपण बीज प्रनावा नूपणते श्रीजिनशासननी थनेक सपयात्रा पूजा प्रतादिना महात्मा करेन चीच प्रनावना नूपण जाणवु त्रीज नतिनूपणते श्रीजिनशासन उपर घणीनक्ति सम्यक्ल स्वरुपस्तव. ६३२ राखे, जेम कोई दलिसी रोगी अपराधी कलंकी प्रमुख दोपनिधान महाऽखियो दीन हीननिदाचरानुवस्था थनुनवतो, एवा ३ खी पुरुपने कोई उपकारी साम्यर्यवान पुरु– करुणालावी तेना सर्वष्ठ खफेडी महोटा धन धान्य राजादि समृदिय स हितकयो, हवेते दलिसीपुरुपने उपकारना करनार उपर केहवी नक्तिहोय तेथी अधिक नक्ति देव, गुरु, धर्म, उपरेराखे ते त्रीजु जतिनूपण कहिये. चीथु नूपण श्रीजिनशासननेविपे कुशलता थागममेलीयुक्ति प्रयुक्ति हेतुदृष्टांत मांहे अत्तिनिपु एए ए नूपणवंत क्यांय खलायनही जिहांजाय तिहां धागमनी कुशलताथी अन्य दर्शनीमा जैनमार्ग दीपावे कोई स्थानके हारेनही, परिकम्मित बुदिवले प्रहनो मार्गदीपावे घणाने जैनधर्मपमाडे ते चोथुनूपण. पांचमुं तीर्थसेवा नूपण ते जे इव्यनावथी तीर्थनी सेवामा रसीयोहोय तिहां व्ययी तीर्थ ते श्रीसिक्षाचलादिक पुण्यक्षेत्र जिहां तरतमयोगें घणाजीव लिखि वस्या घणाजीव रत्नत्रयीपाम्या घणासम्यक्त्वदृष्टी देवनिवासि ते एवां पुस्य देने थनेक जनसमुदाययुक्त विधिपूर्वक जायते तिहां ते महापुरुपोना चरित्रने वद्या द करता पुरस्य देवना योगथी घणा कर्मोनी निर्जराथाय, केमके बंध तथा निर्जरा ते इव्य क्षेत्र काल नाव ए चारने अनुकूलता माफक थायठे नव्यादिक चा रने निमित्ने पुण्यनी वृदियायचे, तेथी निकटतंसारीयायते. वली अनुजव्यादिक चारने योगे संसारमुःख उर्गतिनी वृद्धिथायठे, माटे कर्मक्ष्य निमितें व्यतीर्थज बुं थने नावतीर्थ ते हादसांगी अथवा चतुर्विध संघ तेनी सेवा नक्तिवदुमान क रता थात्मा निर्मलथाय, वीजाजीव धर्मपामे ए तीर्थसेवानामे पांचमुनूपणकोवे. हवे थामिनावक कहे। पावयणी धम्मकही, वाई निम्मित्त तवस्तीय ॥ वि च्या सिको थ वमि, अन्य पनावगा नणिया ||१॥ यर्थः- पावयणीके प्रावचनीते जिनमार्गमा कुशल जिनमार्गदीपावे, तेथी प्रनावक कहीये. वीजुं धर्म कथामा प्रतिनिपुण होय ते पण र्बोधजीवोने धर्मपमाडे, शासननी उन्नतिवधा रे, माटे वीजो प्रनावकजाणवू. वीजो प्रनावक वादी तेएकवातने शेकडावखतथा पे, वलीतेज शेकडावखत उत्यापे पण किहां खलायनही. प्रतिझा हेतु दृष्टांत यु क्ति कुयुक्तिमा निपुण, एवा तीक्ष्णबुद्धिमान वादी स्यामादमां निपुण ते राजदार वढुजनसमद जयपताकावरे, शासनने दीपावे माटे वादी मनावकत्रीजो जाएवो चोयो निमित्तनापी प्रनायक ते जे पूर्व थाम्नायनायोगथी नूत नविष्य वर्तमान कालनी वातकहे ते निमित्त कुशल; कोई तथाविध अवशरे राजारादिकमां गा

No text on this page.

वित्तिकतारेणं ते रनि कदेतां याजीविका तहिज महोटा कांतार एटले अटवी ए टने कोई पापोदयधी एवं श्य देवादिक योग मनिजाय के जेथकी थाजीविका नी सुमनताजाय त्रदिवश पर्यंत जिहांसुधी गतिफुरे परिणामटके तिहां सु धीतो टफ्योरदे पने जाणेजे हवे टकासेनही एबुंटेग्वे तेवारें कोई विरुप कारणे श्राजीविका करवीपडे ते वो श्रागार जाणवो. ए टए थागारतो जे उत्सर्ग पाली भकेनही तेनेने, पणजे दृढ परिणामी होय ते सावास्ते थालंबनलहे, जे मंदहोय ते लाकडी लेने चाले तो तेने कोई विरूपण कहे नही. दवे चार सराहणा कहेते तेमा प्रथम परमार्थजे तत्वार्य तत्वज्ञान शास्त्ररह ग्य तेनो परिचयकरे, केमके तत्वज्ञान पाम्याविना जे उद्यम ते कप्टरूपठे, माटे तत्वज्ञान परिचय ए प्रथम सहदणाकहिये. वीजी तत्वज्ञाननी सकलपरमार्थनाजा ण जे मुनिराज तेनी सेवाकरे, एवा मुनीने सेव्याविना तत्व प्राप्तिपणनथाय, माटे तत्व छाननी सेवना ते वीजी सदहणाजाणवी. त्रीजी व्यापन्नदर्शनी वर्जन ते व्यापन्नके ए गपुंठे दर्शन जेथकी, एटले श्रदानृप्ट थयेला स्वदर्शनी, तेनी संगतन करवी, होणानी सोवतकरतां साधुजनपण हीणोकेहेवाय, वास्ते दर्शन भ्रष्ट संग वर्ज, ए त्रीजी सदहणा जाणवी. चोथी कुदृष्टी संगवर्जन.ते मिथ्यात्वी ता पसादिकनी संगतनकरे, रासनसंगे गायकुटाणी माटे धर्मार्थिये कुलिंगीतुं संगवर्ज वु एचोथी सदहणा जाणवी हवे व प्रकारे जयणाकडे तेमां प्रथम थन्यदर्शनी जे तापसादिक तथा तेना देवजे ब्रह्मा विष्णु महेस शक्ति प्रमुख ३ तथा तेणे ग्रहणकरेलाजे अरिहं तना चैत्य प्रतिमा वझिनाथ प्रमुख एटलानी साये उप्रकारनो व्यवहार नकरवो ठ प्रकारनी जयणा कहियें तेनानाम कहेठे एक वंदननकर बीजुं विशेष बहुमान पूर्वक पंचांग प्रणिपातादिक तेने नमन कहीये ते पण नकर त्रीजुं दानजे अन्न वस्त्रादिक तेपण नक्तिपूर्वक धर्मसाधनार्थ नथाप, उचित अनुकंप जाणीदेवु ते नी मनाई नथी. चोथु अनुग्रह प्रदान जे वारंवार तेडीतेडीने दे, ते पण नकरवू. पोचमुं बालाप ते बोलाव्याविना थागलथी एकवार बोल तेपण नकरवं, नहो संलापते वारंवार बोलq तेपण नकर. ए व वाना करतां सम्यक्त्वजाय माटे उ वाना वर्जवा ए व प्रकारनी जयणा कहियें. हवे सम्यक्त्वनी नावना कहेले.-समस्त धर्मर्नु मूलते सम्यक्त्व एवं नाववं ते प्रथम नावना. तथा समस्त धर्मरुप नगरनो कार तेपण सम्यक्त्व एवु नाव ॥ दोहरा ॥ यह विधि समकित गुणतणी ॥ प्रापति थागम माहि ॥ नापी नि! ចុម सम्यक्ख स्वरूपस्तव ते बीजी नावना तथा धर्मरुप प्रासादनो पाइयो यथवा पीवते पण सम्यक्त्व जचे एधु नाव ते त्रीजीनावना, तथा सम्यक्त्वते यात्मार्थिकजीयोने निधान अखुट खजानोगे ए नाव ते चौथीनावना, समस्त धर्मनो थाधार ते सम्यक्त्व जडे एवी वासना ते पांचमी नावना जाणवी, तथाधर्मरूप थमुल्यचीजने राखवा नु नाजनते सम्यक्त्व एम नाव ते उही नावना जाणवी हवे सम्यक्त्वना ट गण कहेठे शुरूपद पणामाटे यस्ति ते जीव एम दृढ निश्चे जाणवु ते प्रथम गणने तथा सास्वत नित्य इव्यथी किवारे नाशनथी ए बीजुनाण तथा पुण्य पापनो का तेपण ए जीवजने एत्रीजुगण तथा वली पुण्य पापनो नोक्ता तेपण जीवजले ए चोथुनाण तथा निर्वाण जे मुक्ति सिपले ए पा चमुंठाण तथा ते मुक्तिपामवानो उपायपण ते तुगण एव वाणाविशेषनीच या दर्शन सितरी प्रमुख ग्रंथथकी जाणवी ए नगणनी थप्रतीत अविश्वास ते मिथ्यात्व जाणवु माटे उ नगण रुडीरीते सहदवा बागमरुची गुरुपासेथी धारवा हवे सम्यक्त्वनी निर्मलताने अथै दशनो विनयरवो ते कहे - परिहत ते विचरता तीर्थकर र ज्योतिस्वरूपी सिह ३ चैत्यजे प्रचना देरासर । श्रुतसिधा त ५ वीतरागनो धर्म मोक्षमार्गना साधक साधु पाचप्रकारना आचार ते पोतेपण पाले भने परने पलावे ते श्राचार्य जे ग्यारअग पोते नणे धने प रने नणावे ते उपाध्याय ए पवयणीते चवदपूर्वधर १७ दर्शनजे सम्यक्त्व ए दश नो विनयकरवो एदशेनो यथायोग्य अनुकूलपणेथयीने विनय करताथका सम्प क्व अतिनिर्मल थाय विचार तुद समया, सया सरताण नवजीवाण ॥ सामिय तुह प्पसाया, हवेक समत्त सपत्ति ॥ २५ ॥ थर्थ -हे स्वामिन् तुहसमया केतहारा परूप्या सिद्धांतनो विधारं के विस्तार तेने सया के सदाफास सरताण केण्यनुसरता थन्यासकरता एवा नवजीवाण का नव्यजीने तुहप्पसाया के तादरा पशायथा सकल सिद्धांतनोपार एवोजे समन के सम्यक्त्व तेनी सपत्नि के प्राप्ति ते सम्यक्प्रकारे निरावरणनाचे हवेयु केल्या ए प्रकरण करनारनी थासीस इति सम्यक्त्वस्तव वालावबोध सपूर्ण मगमत ॥ अय प्रशस्तिलिख्यते ।।

सम्यक्त्वस्वरूपस्तव. ६श्य सुणी सदहे ॥ तस दो ऽरगति नाहि ॥ १ ॥ सुरपति सुख लेवो सुगम ॥ सुलन रज इक उत्त ॥ उर्लन नरनव जगतमें ॥ समकित गुण संपत्त ॥२॥ दान दया संयम क्रिया ॥ समकित युत शिव देतानहि तो मंक चूर्णपरिरानव बंधन संकेत ॥ ३ ॥ विण समकित संयम किया ॥ करे धनंती वार ॥ पार न पावे तेह युत ॥ अड नवमे निस्तार ॥ ॥ एक सहित दश गुण वधे ॥ गुन्य यंक कहिवाय ॥ वो वियुक्त गुण सवि क्रिया ॥ नहितो कष्ट कहाय ॥५॥ पुन्यदिशी पूरव नली ॥ जिहाँ उदयाचल थान ॥ कल्याणक सवि जिनतणा ॥ तिए ए दिशि परधान ॥ ६॥सु विहित सूरि गुणे नस्या ॥ (श्री) पुन्यसिंधु तूरील ॥ वाचक ज्ञानसागर तणि ॥ नितु जस नामे सीत ॥ ७ ॥ तास शिप्य पूरव तणा ॥ तीरथ नेटण काज ॥ गुन सकुने सूरतयकी । करि प्रयाण गुन साल ॥ ७ ॥ यमुना सुर तटनी तटे ॥ वद न श्रीजिनपाय ।। नगर मगसुदावाद लगि॥अनुक्रम पद्धता जाय ।। ए ॥ साउत खा गोत्रे नलो ॥ साह सुगाल सु नाम ॥ उखमां कालें धर्मनो, कयो मुगाल सु नाम ।। १० । समतसिखर गिरिराज पर ।। वीसे ढूंके स्तूप ॥ यापी तिम कवी समो ॥ कयो प्रसाद अनूप ॥ ११ ॥ पंचम थारे परगढी । कस्यो उधार प्रसि ६॥ मानव नव सफलो करी ॥ जगमाहे जश लीध ॥ १२ ॥ ततु सुत नागनि धी नलो ।। दाता धर्मी दद॥राजसना मंझन समी॥ थनिनव अनय प्रत्यद ॥ ॥१३शसाह मुला नामे निपुण ॥यागम रुचि प्रिय धर्म ॥ तास कहण्थी ए कियो ॥नापामय स्तव मर्म ॥ १४ ॥ यागे वढुश्रुते वढु निख्या॥ समफित नेट विशेष ॥ वाळू लखि नापा लिखुं | उनमें कूण विशेप ॥ १५ ॥ तोनी तस थासय य उद्मस्य थयाण ॥ नूल चूक जे मुफ्तणी ॥ वुध जन लाजो गए । ॥ १६ ॥ आगम जलधि थपार है । मुज मति नौका तुह ॥ क्यों निवहे नादो नदी ॥ पकरे जेडी पुठ ॥१॥ अल्पमति में अज्ञान हूँ। जाणुन वद्भुत रहस्य। कपाकरी मो कृति ॥ करजो गुरु अवस्य ॥ १७ ॥ सङान मुफशिरमोर हे ॥ तजनको दास ॥ संतकृपाथी मुझ दुसे ॥ ए सफलो प्रयास ॥१॥ ॥ कुमति क दायह चमथकी ॥ वितठ लखाणु जेह ॥ श्रीसंघ सारखे मुझगु । मिछाउकड तेह ॥ १० ॥ दूलन चारुं यंगमें । समफित एह धमूल ॥ नविजन तस उद्यम करो ॥ जिम शिवसुख अनुकूल ॥ १ ॥ इतित्री सम्यक्त्व स्वरुपस्तव वालाववोध तहित समाप्तः गम ॥

त्व विनय दयामूल श्रीजिननापित एवो धम्म-जे उर्गतिनेविपे पडता प्राणी निवम जे रागदेय तथा मोहरूप गाती नेदीने निर्मल सम्यक्त्ववान पष्टी शतक ॥ श्रीशासनतिनकाय नम ॥ ॥ अथ श्रीपटिशतक बासायवोर व्याख्यासहित प्रारन । प्रयम व्याख्यातानु मगलाचरण दोहा- शासननायक जगतिलो, प्रणामी वीर जिलद ॥ पटीशतक प्रकीर्णना. श्रर्थ लिखु मतिमद ॥ १॥ श्रर्थ - शासनना नायक एटले थपिपति जगति | लो एटले त्रण जगतनेविपे तिजक समान, एहेवा जे श्रीजिनइ. तेमने प्रस्त म करीने था पप्टी शतक प्रकर्णनो श्रर्य, मारी मदमतिने अनुसारे लसुड ॥१॥ मूलप्रकरणकर्त्तानु मगजाचरण - मूल थार्यावृत्तम् - थरिद देवो सुगुरु, सुक्ष धम्म च पच नसकारा॥ धन्नाप कयवाण, निरतर वसऽ हिययम्मि॥१॥दोहा-धन्य हतारो हिये, श्रीमरिहतसुदे व॥ सुगुरुवसे जिनधर्मपुनि,पाचनमणनितमेव॥१॥व्याख्या -थरिह-दवश्रुत पूजा दिकने योग्य, अथवा थ-नथी, रह-वानो कार्ड पदार्थ जनाथी, यथवा थ नयी रह-रथ जेने समीप, अथवा श्र-नथी, रह-प्राप्ति पुत्रकतत्र धनादिकनी जेने, अथवा अ-नथी, रह-त्याग आत्मगुणगणनो जेने, एवो देवा-दव तथा हु. रूडा शोनायमान शान कियावान गुरु-धर्मशास्त्रार्थना उपदश दवावाना व्यथवा तेनु कथन करवावाला, शुक्ष-निर्मल ते कपायमल रहित सम्य गरे ते श्रीवीतरागनो धर्म जाणवो, पण अन्य हरिहरादिकना नही च-समुच्च पर्थ डे, एटले जे पदनी साये वोजवु योग्य होय ते पदनी साथे एनाथी बाना ठे वली पच-यरहतादिक पाच परमेष्टी, तत्सवधी. नवकारा-नमस्कार, ए रपदार्य ते धन्नाण-धन्य जे पुण्यवान प्राणीज, कयहाण-कृतार्थ प्राणीउना ए ने, तेजना हिययम्मि-हदयनेपिपे एटले यत करणनेविपे निरतर-बतराय व एटले सदासर्वदा वस--वसेठे एथी पापी दरिया ए जे मिथ्यादृष्टि त हृदयनेविपे वसे नही एदु सूचन करयु एनो फनितार्थ थाले N ज धन्यथा पष्ठी शतक. ६ तू; ने कृतार्थ पुरुपो होय तेमना हृदयनेविपे सुदेव, सुगुरु, शुबधर्म तथा पंचपरमे प्टीने नमस्कार ए चार पदार्थो निरंतर वास करी रहे, परंतु बीजाना हृदयमां रहेता नथी ॥१॥ अवतरण.--पोताथी वीजुंकार्ड नवने तोपण अरिहंत देव→थाराधन अवश्य कर, ते कहेजेः- मूलः-ज न कुणसि तव चरणं, न पढसि न गुणेसि देसि नो दाणं, ता इचियं न सक्किसि, जं देवो शक्क अरिहंतो ॥ २ ॥ दोहाः--जो न करै तप दान न पढे न गुणे तत ॥ तद पाणंट जपो सदा, देव एक अरिहंत ॥ ५॥ व्याख्याः- ज-जो तवचरणं- तपचारित्रने तुं न कुणसि-न करी शकतो हो न पढसि- सूत्र तथा प्रकरणादिने नणी शकतो न हो. न गुणेसि-प्रथम नगेला सूत्र अथवा प्रकरणादिकनुं मनन अथवा विचार करी शकतो न हो, अने | दाणं- सुपात्रादिकने का पण दान दे, ते नदेसि-तुं दई शकतो न हो ता-तो । पण इनियं-घाट . न सक्किसि- तुं करी शकतो नथी? जं-जे, देवोश्क अरिहंतो- देव तो एक अरिहंतज अमारे थाराधवा योग्य ठे, तेनी साये सुगुरु तथा सुधर्म पण लई लेवा. एनो नाव ए के, वीजुं का पोताथी बनी शकतुं न होय तोपण अर्हदेव, गुरु, सुसाधु तथा सुधर्म कपर अक्षा राखीने तेमनेज मानवू ते सर्वोत्तम .॥ ॥ श्रवतरण -संसारनां खनो नाश करनार मात्र एक वीतरागनोधर्मज ,वीजो कोई नयी एम कहेते. मूल -रे जीव नव उहाई, sकं चिय हरऽ जिएमयं धम्मं ॥ ज्यराणं पणमंतो, सुह कय्ये मूढ मुसियोसि॥३॥ दोहा - नव उप हरन जिनें मत, धर्म एक रे जीव ॥ परसुर नमतो तूं मुस्यो, सुन कारजमें क्लीव ॥शव्याख्या.-रे जीव- जीव ऽकंचिय-एकज जिणमयं-जिनमत ते श्रीवीतराग नापित धम्म-धर्म,नव उहाइ-संसारसंबंधी जन्मजरा मरणादिक उ.खोने हर-हरण करेवे एटले नाग क रेठे. एमज सुदेव यने मुगुरु पए जाणवा पण ऽयराणं-उतर जे वीतराग देवथ को अन्य देव हरि हर ब्रह्मादिक ते तेयोन, सुहकन्ये-पोताने सुख यवाने थर्य, पणमतो-प्रणाम करतां मृट-हे मूर्ख, मुसियोसि-तुं मनायो वे एटले उगायो रे एनो फजिताय - सुदेव सुगुरु तथा सुधर्मने मूकीने कुदेव, कुगुस् तथा कुधर्मने जे तेवढुं तेथी कांई कल्याण यतुं नथी ॥३॥ यवतरणः- वली पण एज नावनी पुष्टी करेः- मूल- देवेहिं दाणवेहि य, तृउ मरणा रिका कोई ।। टट कय जिण समत्ता, बद्यवि थजरामर - ६श्त पटीशतक पत्ता ॥ ४॥ दोहा- सुल्यो न देव रु दानवे, मरणथि राख्यो कोय ॥ बहुत वि थजर अमर थया, निश्चल समकित जोय ॥ ४ ॥ व्याख्या - देवेहि- सुरो ए, य-तेमज दाणवेहि-असुरोए मरणायो-मरण थकी कोई-कोईने पण रस्कियो-रक्षण को वे एतु सुयो-सानयामा थथवा दीनामा थाव्यु नथो थने दटकयजिणसम्मत्ता-जेणे निश्चय करी एकजजिन देव सत्य मान्यो वे, व थवा मिथ्यात्वमोद उछेदकरूप जे जिनप्ररूपित धर्म तेना तत्वार्थ श्रद्धानरुप स म्यक् दर्शन जेणे निश्चय कखो , एवा बढुयवि-घणा प्राणीयो अजरामर-मो क्षस्थानने पत्ता-पाम्या, पामे अने पामशे एनो लावार्थ - एबु क्याय सांन नामां यथवा दीगमा थावतु नथी के कोईने देवे अथवा दानवे मरणथी वचा व्यु वे, परतु जेणे श्रीजिननो नापेलो धर्म पाजी सम्यक्त्व पाम्यो वे एवा घणा प्राणीयो मोदने पाम्या ठे, उपचारथी पामे वे अने पामशे, ॥ ४ ॥ यवतरण - सम्यक्त्व सकल सुखनु कारण ठे, अने मिथ्यात्व सकल उख थथवा यनर्थोनु कारण ठे, तोपण वधा सम्यक्त्वने अंगीकार करीने मिथ्यात्वने केम मूकी देता नथी? ते दृष्टांते करी कहे। - मूल - जह कुवि वेसा रत्तो, म सिङमाणोधि मन्नए हरिस ॥ तद मिष्ठ वेस मुसिया, गपपि न मुणति धम्मनि हि॥५॥ दोहा -जिम वेस्या रत कोई नर, मने गातो सर्म ॥ तिम मिथ्या वेस्या वग्यो, लग्ये न गत निधि धर्म ॥ ५॥ व्याख्या -जह-जेम कुषि-कोईक माणस वे सारनो-चेम्यानेरिपे रत एटले थासक्त थयो थको मुसिकमाणो-खराब थवा मामपो होय एटले वेन्याए तेनु धन वगेरे स्त्रीना सगथा जेटली दाणी थापळे ते यधु करया मांडयु हाय तोपण ते हरिस-दर्पने मन्नए-मानी लियेठे , तह-तेम मित येम मुसिया-पिथ्यात्वरुपिणी वेस्याएकरी गायला लोकनु सर्वस्व गयपि- गपु वना पण न मुणति-जाणता नया एनो नावार्थ थाने-जे मनुष्यो मि प्यात्वमा मुगाई रह्या ठे तेया धम्मनिहि-चारित्र धर्मनु निधान जे सम्यक्त्व चपराधर्मनिधि ते मम्यक्त्वर निधान तेनी दाणी यवतो पण जाणता नयी यवतरण - मिप्यान्वी जीर धर्मम्प निधाननो नाश थएजो देखता नयी दुपाचमा गायमा मामान्यपणे कयु, तेज या उठी गाथामा कुनाचार धाश्री शेरपणे रहे। - मृन-जाय पगड़े मकुन, कमम्मि जाहो मृत धम्मुत्ति। ता मिति पम्मा,पाय यहम्म पग्गिाड़ी ॥ ६ ॥ दादा-लोक प्रवाह म्पकुन क्र में धर्मदाय जा वान ॥ तापमी मिथ्यात्व कुन, यरियामी चाल ॥ ६॥ य्या

पष्ठी शतक.
शए
रख्या - लोय पवादे-अजाण लोकोनी विचार रहित जे प्रवृत्ति ते लोकप्रवाह क
हि. ते रुप सकुन कमम्मि- स्वकुनक्रम एटले पोताना वंश परंपरानो श्राचार
पाल्याथी मूट- हे मूव एटले विवेक विकल, जा-जो धम्मुत्ति होइ-धर्म थतो हो
यता-तो मिहाणवि-चंडाल. मावीगर, जिल तथा म्लेवाटिक अनार्यने पण धम्मे-
धर्म थाय , तथा अहम्म परिवाडी-अधर्मनी परिपाटी एटले पापपद्धति अथवा श्रे
णी यकाय-याकी एटले एफ तेकाणे रहीने पुन्यपणाने पामी एबुं यशे एनो नावा
श्री श्रावे -हे मूर्व, जो लोकप्रवाहरूप पोतानो कुलाचार पालवाथी धर्म यतो
होय, तो म्लेट लोकोने पण धर्म थवो जोये. तथा अधर्मनी परिपाटी थाकी ए
टले लोकमाथी अधर्मनो अनावज यई जवो जोये. माटे जेत्रो लोकप्रवाहरूप
स्वकुलाचाग्नेविपे धर्मने मानेते, तेथोए म्लेवादिक धनार्योनेविपे पण धर्मनुंस्था
पन करयुं एम थशे; घने धर्म तथा पाप ए वे पदार्थ जुदा तरशे नही. ॥ ६ ॥
थवतरणः- एनीज लोक थने लोकोत्तरनेविपे विशेषता बतावे वे.-
मूलः
लोयम्मि राय नीई, नायं न कुनक्कमम्मि कश्यावि ॥ किं पुण तिलोय पहुणो, जि
विंद धम्माहि गारम्मि ॥ ७ ॥ दोहाः-कुनाचार करि जो नही, राजनीतिमें न्याय॥
जैनराजमें तो किसुं, कुलाचार करि नाय ॥ ७ ॥
व्याख्याः- लोयम्मि-लोकने
विपे एवो नायं-न्याय वे के, कुनकमम्मि-कुतक्रम एटले कुलाचारनी अपेक्षाए क
री कश्यावि- कदापि रायनोई-राजनीति न-नथी प्रवर्तती; त्यारे पुण-वली
कुलाचारे करी तिलोय पदुणो-त्रिलोक प्रजु एहवा जे जिणिंद-जिनें। तेना ध
म्माहि गारम्मि-धर्मरूप अधिकारनेविपे प्रति कि- केम थाय' अपितु
नज थाय. यही अर्थनी योजना यावी रीते करवी:- कुजनो श्राचार अवश्य
पालवो, पठी ते सारो होय के नरशो होय तोपण तेनो तिरस्कार करवो नहीं, एवी
काई राजनीति पण होती नथी, केमके जो एहेवी राजनीति होय तो धर्म अनेथ
धर्मनी व्यवस्था निन्नपणे थाय नही माटे राजनीतिनो संबंध कुलाचारनी साथे
होतोज नयी एयो कुलाचार पालवो एहेवो नियम नथी, एटले कुलाचार धर्म
यो विरुव होय तो तेनो त्याग करवामां कांईयटक नथी. एवं लोकमां पण सिह था
यो,त्यारे त्रिलोकपति जे जिने तेना धर्मरूप अधिराजना अधिकारनेविपे कुनाचा
रना अपेक्षा केम दोय ! एटले कुलाचारना धायहने विपे धर्म होतो नथी. एनो नावा
थः-जेमराजानीथाझाएकरी राजनीति होय, तेम जिने देवनीयाझाए शुरूध
मरूप अधिराज यथवा अधिकार होय; अन्यथा न होय. ॥ ७ ॥

६३० पष्टी शतक अवतरण-एवीरीते लोकप्रवाहरुप कुलाचार सेव्याथी जिनधर्मनी पण मिझता थती नथी, त्यारे तेथी ससारनी निवृत्तिनो सनव ते शारीते थाय ते देखाडे. मूल -जिण वयण वियन्नूणवि, जीवाण ज न हो जव चिरई ॥ ताकह विथ न्नूण, मित्त हयाण पासम्मि ॥ ॥ दोहा ॥ कर्मे जिन मत निपुनके, जो नव विरति न होय ॥ तो मिथ्यात्व हत मूढके, पास विरति किम जोय ॥ ॥ व्या ख्या - जिण वयण वियन्नूणवि जीवाण-जेथो जिन वचनोना जाणनारा ,एहेवा केटलाएक जीवोने पण कुगुरु तथा कुग्रहनायोगथी ज-जो नवविरइ-नवविरति एटले ससारनी निवृत्ति न होइ-नथी यती ता-त्यारे मिनहयाण-मिथ्यात्वेक रीने हणायला एहेवा अवि अनूप-जिनागमनाथजाण लोक तेउने पासम्मि- पासे नवविरति एटले ससारनी निवृत्ति कह-केम थाय । थपितु नज थाय एनो नावार्थ - केटलाएक जिनागमना जाणनारा मनुष्योने पण कुगुरु तथा कुग्रहजे उराग्रहतेना प्रसगथी ससारनी निवृत्ति यती नथी, तो मिथ्यात्वेकरी हणायला जे थजाण लोक, तेउने नानी निवृत्ति ढुकडी ते केम होय। एटले ते चारित्र धर्म क्याथी पामे के जेथी कर्मबध त्रूटे । अर्थात् चारित्र धर्म नज पामे ॥ ॥ अवतरण - एवी रीते विरतिनु ऊर्जनपणु देखाड्यु, हवे थविरति जीवोने जा ईने विरति जीवोने शु थायडे ते कहे रे - मूल -विरयाण अविरए, जीवे दपूण होऽमण तावो ॥ दा दा कह नवकूवे, बुद्धता पिठ नञ्चति ॥ए॥ दोहा -देख थ विरती जीवकृ, ताप विरति मन होय ॥ हा हा किम नव कूपमे, बूडत नाचे जोय ॥णा व्याख्या अधिरए-थविरति जे हिसादि थडारे पापना सेववा वाला, जी वे- जीवोने दहण- देखीने विरयाण-विरतिवत पुरुपोना मणतावो-चिननेविपे करुणारूप ताप होइ- यायले तेनु स्वरूप थावु - दादा- खेदनी वात कह- केम नवकूवे-ससाररूप थधकूपनेविपे बुड्डता-बूडता ते अविरति अपना रकाणी धनाणी प्राणी नक्षति- नाचेठे एटले नृत्य कर वे अथवा खुशी थायले हे थात्मान, पिठ- देप, उगतिनु कारण जे पाप, ते करी करीने बापडा जीयो खुशी थायठे , एउनु कल्याण ते थमे केम करी शकीये। एवी रीते थनेक प्रकारे रितिवत पुरुषोना मननेरिपे ताप अथवा खेद थायवे , पण वीजा कोई प्रका रनो ताप विरतिवत पुरुपोंने थतो नथी ॥५॥ थवतरण - थविरतिने जोईने विरतिना मनमा दयानाव उत्पन्न थायठे, का, हवे वीजा सर्व पापोनु फल कडबुज , तेमा पण मिथ्यात्वनु फल अति - - एम पाटी शतक. ६३१ इष्ट नेते देखाडे ने.- मृत-आग्न जन्मि पावे.जीवा पावति तिरक उरका॥ पु गमित्त लव, तेन लहंति जिण बाहिं।। १०॥ दोहा -यारनज पापे करी, जीव महा रख पाय ॥ बलि मिय्यात्व सर्वे करी, सदन समकित नाय ॥ १० ॥ व्याख्या - धाग्नजन्मि-जीवन उपञ्च कग्वी. ते धारंन थकी उत्पन्न थया जे पाव-पाप. त करयाची जीवा-जीयो तिरक उरकाई-तीक्ष्ण उखाने पावति-पामं, एटले : रखनेज पामेछे पण तेथी लम्यक्त्व न पामे एम नयी यतुं ; किंतु लम्यक्त्व पाम वानो तंउने सनव होयते ; धने प्राप्त पण याय वे. पुण-परतु -जो मिहन लव-विपरीत प्रमपणादिक मिथ्यात्वनो लवमात्र पण जो जीवने धावीने वनगे तो तेणं-तनां योगयी जिणवोहि-जिनबोधि ते श्री जिननाधित तम्या न. तेने पर नवे न लहंति-पामतो नथी एनो नावायः-वीजा पापो कन्या उतां प ए नवांतरनेविपे सम्यक्त्वनी प्राप्ति थवानो संनव वे, परंतु मिथ्यात्वना लवना तं योगयी नवांतरमा सम्यक्खनी प्राप्ति यती नयी माटे वीजां पापा करतां मिय्या व पापर्नु वधारे उष्टपणुं देखाड्यु ते ॥ १० ॥ यवतरणः-जे उत्सूत्र तेज मिथ्यात्व वे ते प्रगट करी देखाडे :- मृतः-जिए वर याणा नंगं, उमग उस्मुत्त लेस देसण ॥याणा जंगे पावं, ता जिएमय उकरं यम्मं ॥ ११ ॥ दोहा-देगना य उल्लूत्रकी, होय जिणाना नंग ॥ आझा नंगे पाप तट, 5 कर जिण धरमंग ॥ ११ ॥ व्याख्या.- उमग्ग उत्सुत्त लेल नण-उन्मार्ग उत्सुत्रनोलेश देखाडवायी उत्पन्न थयो जे जिणवर आणानंगं- जिनवरनी थाझानो जंग (जंग करायी थत्यंतानाव नही पण जंगनी पठे य थवा खमनी पढ़ थायवे ते सुखना हेतु दोवायी तेज यहीं जिनाजानो नंग जाणवो) धाणानंगे-जिन थाज्ञानो जंग थयायो पावं-पाप थायठे; ता-तेय की जिमय--जिनमत त श्री जिनेश्वरनो नापेलो धम्म-सम्यक्लादिक धर्म ते उकर--उप्कर वे : एटले करवो घणो कवण वे. माटे जेम जिन धाज्ञानो नंग थ थवा खंम न याय तंम जन्य जीवोए करवू जोये ॥ ११ ॥ अवतरण.-था-मांदाए करी झा-जणाय जीवादिक पदार्थो जेथीतेने या झा कहे। ; एहवी श्रीवीतरागनी वाणी .छायोपशमिक नाव तजीने उदयिक नाव सेवन कर, ते उन्मार्ग; यने श्री वीतरागनां वचनोथी जे उनटुं वोल, तेने उत्सूत्र कहेवे. तो जिन याज्ञा रहित जे धर्म ते पाप फलना देनार , ते देखा मृत -जिएवर थाणा रहियं, वधारतावि केवि जिण दव।। वुटुंति नव तमु नुं डेले.

६३२ पठी शतक - . है, मूढा मोहेण यन्नाणी ॥ १२ ॥ दोहा - के मूढ थन्याय करि, थाण नग जिम थाय ॥ तिम जिरा इव्य वधारता, बुडे नवोदधिमाय ॥ १२ ॥ व्याख्या केवि-केटलाएक मोहेण- मोहे करीने थन्नाणी-यज्ञानी गुरुझान विकल एह वा मूढ- मूर्स तत्वज्ञानना थजाण जिएवरयाणारहिय- जिनवरनी थाहायकी रहित थया था जिपदव जिनव्यने-वक्षारतावि वधारता उता पण नव समुद्दे- ससार समुश्नेविपे बुद्दति- बुडे २ नमे ॥ १२ ॥ थपतरण -थगारकर्मादिक फर्मरूप कुव्यापार पोते कयाधीअथवा कोईना हा थे करायाथी, अथवा देवश्व्येकरी गृहादिक स्थावर मिलकत खरीद करो थय या करावीने नाडे थापी तथा नीच लोकोने जिनऽव्य व्याजनी थाशाए धीरया थी, तया पोते बजरान उतां जोर देपाडीने जबरजस्तीथी कोनी पासेथी काई इय्य लई लेगु तया माजी, सुतार, शिल्पी (कडिया) इत्यादिकनी पाशेथी वचनाकरीए टले ठगीने जे देव इय्यनी वृद्धि करवी ते जिनथााथी रहित ले ए वृद्धि जिन याझा प्रमाणे कहेयाय नहीं पण जिनयाशायी बाहेर कहेवाय तथा कुरुना एटाने नरमी कमाए कररी देवश्य पारयानो शास्त्रोनेविपे निपेय कखो वे घणो पान यतो सोय तोपण ए इथ्य कोईने थग उधार देवानो निषेध कयो वे सुर ण तपा रसादिकना थानूपणो रापीने तेना व्याजथी देवव्यनी वृद्धिकरवी कही के बने गुरनारी तया न्यायोपार्जित धनना नागे करी देवव्यनी यक्षिक ग्वी एम शाग्योमा कपु. माटेज थयोग्य मनुष्यने देशना देवी नही ते कहेते - मृत-कुगद गद गहियाण, मुझो जो देश धाम उपएस ॥ सो चम्मासी कुमार, पणनिवि कप्परं ॥ 1 ॥ दोहा-फुग्रह ग्रह यहि जीवकू, जो छ । में सुणाप । चर्मनगरी फरमुग्मे, सो कर्पूर घवाय ॥ १३ ॥ व्याख्या चनिनिदेश मिथ्यावरूप जे ग्रह तदृप गह-ग्रह जे नूतादिक तेणेकरी गहिया ए-ग्रहण पएता जे लोग थाने मुखो-मुग्ध जो-जै धम्मउवएस-धर्मना । पदेगने देश-दिये , सो- ते यम्मासीमरवणम्मि-चर्मादिकन लक्षण करना हताना महामा जाणे कप्पूर-कपर नोजन विड-क्षिपति ष्टले नाग्येने एनो नागप-जे मनुयो युगमहरप नृतपणे ग्रसायना ने तेने गुम धर्मनी दा ना देवी ते कूतराना महाडामां उनम भोजन थापानी पढने, सारी जान्न धमापदेश करगंा तात्पर्य में ॥१३॥ मिनदी पाहेर पानानी मनिए करी कल्पना पाते यगीतर रेजा जे यस कुग्गह यथात् याप -- त्य पदार्थ तेने फूलो उपदेश देईने पुष्ट करवो ते अनिनिवेश मिथ्यात्व कहेवाय ठे. अने जे हेय उपादेयना ज्ञानेकरी रहित दोय तेने मुग्ध कहे. अवतरणः-अयोग्य पुरुपने उपदेश देवामां रोपनो संनव ते कहेवेः-मूल- रोलो विरखमा कोलो, सत्तं नातंतयस्त धन्नस्स ।। उस्लुत्तेण खमाविय, टोस महा मोह श्रावासो ॥ १४ ॥ दोहाः- सूत्र नापि नर धन्य तस. रोपवि उपशम कोश उत्सूत्रीकी पिण मा, महा मोह घर दोप ॥ १४ ॥ व्याख्या -सुत्तं नातंतयस्स धनस्त-सूत्रनु नापण कर्ता जे धन्य पुरुप ठे, तेनो रोसोवि-रोप एटले क्रोध ते ते पण खमाकोसो-दमानो कोश एटले नंडार; श्रने उस्तुत्तेण-उत्सूत्रेकरी खमावि य-दमा पण दोस-दोप अथवा परूप : महामोह आवासोते महामोह एटले अझाननो यावास एटले महेल वे. एनो नावार्यः-सूत्र नापी गु- प्ररूप क गीतार्थ पुरुपनो क्रोध पण मानो भंडार के, केमके, ते शिप्याटिकने गुन सा धननो हेतु वे बने उत्सत्र नापी धगीतार्थ पुरुपनी क्षमा पण कोषनो भंडार ते, केमके, ते शिप्यादिकने यगुन साधननो हेतु वे.॥ १४ ॥ थवतरणः-कोक तेकाणे क्रोध शुननो हेतु थायठे थने दमा अयुननो हेतु थायवे माटे जिनधर्मनुं सम्यक् जाणपएं घणुं कवण ते कहे. मूल -कोवि न संदेहो, जं जिण धम्मेण थठि मुरक सुहं ॥ तं पुण बिन्नेयं, थनक्कड पुन्न रहियाणं ॥ १५ ॥ दोहा--जो शिवसुख जिणधर्मथी, एकनि नहि संदेह ॥ पुन्य हीणके जाणवो, कठिण मोद सुख तेह ॥ १५ ॥ व्याख्या.- कोवि-एक पण नसंदेहो-संदेह नथी, ज-जो जिणधम्मेण- जिधर्मनुं धाराधन कसुं उतां मुस्कल हं-मोदमुख अधि-वे; एटले जिनधर्मना बाराधनथी निश्चये करी मोद थायठे एमा एके संदेह नथी. पुण-वली त-ते जिनधर्म विन्नेय-दुःखेकरी जाणवा योग्य ते: एटले जाणवाने अशक्य ते. ते कोणेजे श्रश्नक्कड पुन्नरहियाणं अति उत्कट ए टले यति प्रधान सम्यक्त्वरूप पुन्य थकी रहित प्राणी तेने, अर्थात् अनिनिवेश मिथ्यात्वीने जिनधर्मनु सम्यक् जाणपणुं थर्बु घएं कठण ते ए नाव ठे. ॥ १५ ॥ यवतरण.-स्त्रीनी चोसत कलायने पुरुपनी वोतेर कला इत्यादि स्थूल पदार्थोथी जिनधर्मद् उतनपणुं देखाडे वे - मूल - सबंपि वियाणिजार, सनई तह चउरि मा जएम ॥ कंपि जाय उनहं, जिण मय विदु रयण सुविधाएं ॥ १६ ॥ दोहा-- चतुराई सवही कला, लहिये जगत सुजाण ॥ पिण पुलन कजन मत, विधी रत्न विज्ञान ॥ १६॥ व्याख्या - सबंपि-सर्व पण विया Lo " -- पष्टी शतक - ६३४ नेविपे जाण्यामा यावेने, तह-तिम चरिमाइ-चतुराईपणु एटले उचित कार्यने विपे कुशलपणु जपमझे-अविवेकी लोकोनेविपे पण लप्पा दोगमा थावे, काई उनन नथी, केमके ससारनी चतुराई जी थनत वार पामेली ते परतु जाय-हे नाई इकपि-एकज जह-सुजेन एटले ऽखे करी पमाय एवु ने त जिणमय विहि रयण सुवियाण-जिनमत सबधी विधि रत्ननु नलु जाणपणु तथा करवा पणु तेज एक उर्जन , केमके, विवेकी पुरुपने जिनशासन सबधी विधिरत्ननु स म्यक् जाणपणु तथा करवापणु सनवे पण वीजाने सनवे नही ए नाव वे ॥१६॥ यवतरण --जिनमतविधिरत्नना सम्यक् जाणपणानुननपणु देखामधु ते जाण पणानेज सम्यक्त्व कहे, माटे हवे सम्यक्त्वनु ऊर्जनपणु देखाडेठे -- मूल-मि उत्त बनु लयाए, विसुद्ध सम्मत्त कहण नवि उत्तह ॥ जह वर नरवा चरिय, पाव नरिदस्त उदयम्मि ॥ १७ ॥ दोहा -- बहुलताय मिथ्यात्वकी, उजन म | समकित दयान ॥ जिम पापी नृपके उदै, वर नरनाथ कथान ॥१७॥ व्याख्या - मिवन बदु लयाए- मिथ्यात्व तथा मिथ्यात्वीयोना बहुल पणाने लीधे, एटले व तमान उपम कालमा देदीप्यमान असयतपूजा नामे दशमा यराना महिमाए करी व्यनिगी कुलिगी तथा तेश्रोना सेवको थनिनिवेशादिक मिथ्यात्वीयो घण | माटे विसुधसम्मत्तकहणमवि-अनिनिवेश मिथ्यात्व मलरहित निर्मल सम्यक्त्व नु कथन करवु पण उजह-उर्जन ने थहीं दृष्टात कहेते -जह-जेम पावनरिद स्त उदयम्मि--पापी एटले अन्याई राजानो उदय थयो उतां वरनरव चरिय-प्रधा न न्यायवत नृपतिना चरित्रनु वर्णन करवु मन तेम ते पण जाणी लेवु ॥१॥ अवतरण --विशुद्ध सम्यक्त्वनु कथन करवु पण उलन ठे, तथापि उत्सूत्र नापी इव्यलिंगीनो त्यागकरयो योग्य वे ते कहे -- मूल - बहु गुण विजा निलयो, उसुत्न नासी तहा विमुत्तवो ॥ जह वर मणि जुत्तो विदु, विग्ध करो वितहरी लोए ॥ १७॥ दोहा -- बद गुण विद्या गेहजो, तदपि उसूत्री हेय ॥ जिम वर मणिजुत विघ्न कर, विपधर लोक विपेय ॥ १७ ॥ ण घणी थारी किया करवादिरूप घणा गुण विजा-चौद श्रुतरूप विद्यानु नि तथा-पर वे, अथवा बहु गुणगानी विद्यानु घर , तहाचि-तोपण उस्सुअना सी-उत्सूत्र नापण करनारा व्यतिगीनो मुतत्वो-त्यागकरचो योग्य ले एपिपे । हात कहने -जह-जेम वरमणिनोवि-श्रेष्ट मणि रत्नेकर युक्त ठता पण दु-निश्च पकरी विग्य करो-निने करनारो एहेवो विसहरी-विपरजे सर्प ते लोए-सोकने व्याख्या -- बहु गुण-जोप पटीशतक. ६३५ - विपे अपवा लोकोए नांडवा योग्य जे. एनो जावार्थ:-जेम सर्प अमूल्य मणिने धारण करनारो उतां विपमयी होवाथी त्याग करवा योग्य ; तेम कोई पुरुष बद्ध गुणयुक्त विद्यावान उतां उत्सूत्रनापी होय तो अवश्य त्याग करवा योग्य वे॥१॥ अवतरण-- अतिशय करी जे मोह ते व्यामोह कहेवायठे. तेम उत्सूत्रनाषी इयलिगी जे गुरु ते, कुनक्रमथी चाव्या यावे, माटे तेने केम काय! जो हुँ त्याग करूं तो सजान लोको मारो त्याग करे, अथवा वमाए थंगीकार करेलो चात मुकी ये तो वाप दादानु नाम जाय, इत्यादिक जे विचार करवो ते स्वजन व्योमोह कहेवायचे; तेज दर्गावे:- मूल -सयणाणं वामोहे, लोधा विपत्ति अम लोएण ॥ नो विष्यति सुधम्मे, रम्मेहा मोह माहपं. ॥ १५ ॥ दोहा.-ख जन नेह धन लोन करि, सेवै लोक मिथ्यात ॥ रम्य धर्ममें नवि रमै, है अज्ञान उतपात ॥१॥ व्याख्याः- सयणावामोहे-खजनना व्यामोहेकरी, लोहे- थर्थना सोनेकरी, एटले मंत्र तंत्राटिकनुं अर्थ जे प्रयोजन अथवा थर्थ जे धन तेना लोनेकरी, लोथा -सामान्य लोक जे वे ते, धिप्पंति-ग्रहण करेठे एटले पो ताने वश करे; अने रम्मे- रमणीय जिन नापित सुषम्मे-जे सारो धर्म ते नोधिप्पंति-ग्रहण करता नथी हा--मोटी खेदनी वात ; जुयो मोहमाहप्पं-मो हनु केटलु माहात्म्य एटले महिमा ठे एनो नावार्थः स्वजन यथवा धनना लोने करीने सोको मिथ्यात्व, सेवन करे ये; अने रम्य जे जिन धर्म तेने मूकी दिये वे ए मोहन महात्म्य वे ॥ १ ॥ धाशंकाः सर्व लोक मोहने वश थया यका मिथ्यात्वनी सेवना करे। एम कह्यायो सर्वने अधर्मनो प्रसंग प्राप्त थशे! ए गंकानुं निराकरण करेठे...मूल:- गिहवावार परिस्सम, खिन्ना नराण वीसमण नाणं ॥ एगाण हो रमणी, थ नेति जिप्रिंट वर धम्मं ॥ २० ॥ दोहा.- गृह व्यापार परिश्रमे, खिन्न थया नर ताहि ॥ कनारी विश्राम हे, अन्य जिनागममांहि. ॥ २० ॥ व्याख्या:-- स्त्री पुत्राटिक कुटव परिवार गिह एटसे घरने अर्थ, बावार-दंत लाख साटिक यनेक विध व्यापार करतां थयो जे परिस्सम-परिश्रम एटले पेट तेणे करी खि नाए-खिन्न एटले थाक लाग्याथी धाकुन थयला एवा एगाण-एक नराण- मनुप्यने वीसमावाणं-विधामनुं स्थान ते रमणी-स्त्री होइ-से. कमफे, तेउ नारी काजोवो वे माटे. धने यनेति-चीजाने एटले सुदृष्टिवत जोबोने विश्रामर्नुस्थान जिणंटवर धम-जिनेनो नापलो प्रधान धर्म वे.यात् जे नारी कमी माण ; R पष्टी शतक. सो तेठने स्वोनो सग प्रीय लागेले, अने जे हलुकी माणशो तेथोने जिन धर्म कर्तव्य प्रीय लागेठे ॥ २० ॥ श्रवतरण -मृढ तया अमूढ पेट नरवामा सरखाने,पण कर्मविपाकेकरी सरसा नयी ते कहेने मूल - तुलेवि तथर नरणे, मूढ थमूढाण पिष्ठ सुविचाग । एमाण नरय पुरक थन्नेति सासप सुग्क ॥ २१ ॥ दोहा-सम पिय उदर नरे जुयो मृद थमृद प्रिपाक ।। मूट लो नरकादि पुख, निपुण सह शिव नारु ॥ २१ ॥ व्याख्या -- जेना थरस परस उयर नरणे-उदरनु नवु एटले पेट नगर श्रया घग्ना व्यापार कार्यनु करवु ते तुनोवि-तुत्य एटले सरखा ये तोप ए मृदयमृदाण-मूहते थपियकी थजाणताफ थने श्रमूढ ते विवेकी धर्मना जाण सास. तथाना सिग-पिपाक एटने कर्मना गुनायुन रस ने पिचम-हे भाई तु वेष, एगाण-एक एक केटजाएक निर्विको महामनी महापरिग्रही. तथा मि पारनि जीवनयान नरयमुफ नरकनु पुरय चे उपनदणी तिर्यच तथा निगानु म पण जाण अनमि-बीजाज सम्यदृष्टि देशपिरति धर्म पिये पीना मान मामपमुप माटो स्थिति श्राश्री देशनोकसनधी शाश्वत सुख नपदणया पम्पग माझ्ना सुग्वना पण सनय के मद तथा श्रमूर नाभिरमा एटानु फग माट मूढपणानो त्याग करया योग्य ने ॥ २१ ॥ यातरण - य गायाए करी अमृटपणानी मातिनो नपाय प्रगट कगने कहे ३-मिप यहा परया मग गजियाण समाति॥ सगा मम्मन स गमन १६ दमणा ॥२॥ ना जिन थाणु परण, धम्मामा अब सुगुर पामम्मिा यर पिपरहाया नाम मम्म कहगाया ||२३|| दोहा-जिनमन कपा मग नपाय ॥ मग तु ममक्ति नत समक्ति मुह गिगय॥२३॥ नागिन प्राण पर परम मुणा सुगु माग ॥ श्रथा नन उपद कप व्यापया मवाति-मा जिपमय रहा पाया नि मनापानार या निरनिपाण-तुम्मा नश्य वीरान भाग-माग ने मामानिनार नेना कानार अन मागा माम P-RIP मम्दाव उना सम्पन्न ना मग हाय एस-स्त्र मात्र का ति मुना मम्मन-गम्य व दापन । नाम- इतु कमी जापान दिन मनन क्याना गरप्रया ययग दनि मगना रना ना-ने कारण माट निया . - - २३॥

पटी शतक. ६३७ जिनगजनी याज्ञानेबिपे जे तत्पर प्रधान ने ते मनुचे. सुगुरु पासन्मि-माग गु रुनी पाले एटले सम्यक् ज्ञान दर्गन तथा चारित्रवान गुस्नी पाश धम्मा-धर्म नोत्र-मनन योग्य वे. चह-अथ एटले जी तेवा मुनि महाराजनो योग न घाय तो चिपं- उचित प्रमाणे तस्तुबएतन्त-तं सुगुरु नायित धर्म उ पदेशनों कहगायो-बना पण पोत्तानी मतिया कहनार नही एहवो सहायो-श्राव कले धारणादिक गुणेनदित होय तने समीपे धर्म नानजवो पण वीजानी पार्टी श्री लांचल नही एनो नाबार्य जिनाज्ञा पासनार प्रापीए मुगुस्नी पाशवीधर्म नुं श्रवण कन्. तेनो योग न याच तो कोई धारणाटि गुणे सहित श्रावकनी पा लेधी सांनतनु पण धनंग पासेयो कदी पण नाननई नही. ॥ ३ ॥ अवतरण.- धर्मोपदेश लानन्याधी सम्यक्त्वादिकन जाणपणुं यायले त श्रेष्टने ते कहें:- मृतः- त कहातो उबएनो. तन्नाणं जंग जाई तीवो ॥ तम्मत्त मिव नावं. गुरु गुरु धन्म लोध हि ॥ २४ ॥ दोहाः- कथा ज्ञान उपदेशते जाणे जात जीव ॥ लमकित थरु मिच्यालनो, नाव त्रिलोक चितीव ॥ ४ ॥ व्याख्याः- तकहा- ते कथा सो उपएलो-ते उपदेश तन्नाणं-ते ज्ञान जेण-जेणे करी जीवो-जीव तम्मत्तमिहनावं-सम्यक्त्व तथा मिथ्यात्वना नाव अथवा व रूपने गुस्था-सुगुरु अनं घगुरु एटले कुगुस्ना नावने तथा धम्म-जिन धर्मनी स्थिनिना नावने धन लोयति लोकनी स्थितिना स्वरूपने जाए-नपा व्य तथा हेवपणे जाणे एनो नावार्थ:-- जेणेकरी जीव सम्यक्त्वादिकना स्वर- पने जाणी शके नही ते कथा पण नही ते उपदेश पण नहीं अने ते ज्ञानपण कहेवाय नही. ज्ञानादि रत्नत्रय संयुक्त ते सुगुरु कहवाय वे, तेथी विपरीन ते कुगुस् कहवायवे. रात्रि जोजननी विरति प्रमुख ते धर्मस्थिति कहेवायथने ध न धान्यादिक करी माये ग्रहत्य गोनेठे, यथवा लोकविस्त न करतुं ते लोकस्थि ति कहेवारते. ॥ ४ ॥ यवतरण:- जिन वचन सांजव्यायकी पण केटलाएक नारी कमी जीवोनु मि थ्यात्व जतुं नथी ते कहे. मूल--- जिण गुण रयण महा निहि, लणधि किन जाश मिव ।। यह पत्तेति निहाणे, किवणाण पुणोवि दारिदं ॥ २५ ॥ दोहा:-जिन गुग मणि निधि पाय कर, किम न थाय मिच्यात ॥ निधि पाये.. पिण रुपणके, वति दरिद विरव्यात ॥ १५ ॥ व्याख्या:--जिण गुण निहि-जिनराजना तम्यह व चारित्रादिक गुणरूप र ६३G पष्टी शतक बातम्प महा निग्नेि लक्षणवि-पामीने पण एटले सांजलीने पण थनिनिवेश मिथ्यान्धी जीवोनु मिठन-मिथ्यात्वते थतत्वज्ञानरूप किनजाइ-फेम जतु नधी एग गिप्पे प्रश्न ग्यो तेनो गुरु उत्तर थापेठे-बह-श्रथ निहाणे पने-रखा तरा सुरणेनु निपान प्रात थयु वतां पण किवणाण-कृपण पुरुपोनु पुपोषि-तो पर दाग्दि-दारिद्रय केम जतु नयी, अर्थात् रूपण पुरुपने रत्न अथवा सुवर्णादि स्नु निगान मयु उता पण तेनु दारिद्य जतु नथी, तेम जिन गुण रत्न सिद्धांत मानिधिसते काने साननीने पण नारी कर्मी जोगेनु मिथ्यात्व जतु नथी॥२५॥ परतरण - जेम जिनागम सम्यस्त्वादिक धर्मनु कारण , तेमज जिनना उप *गाना पवणादिक रुडा पा पण सम्यक्त्वादिक धर्मनु कारण ते कहे। मा-गा जपर जेण रिहिया, सपछर चाउमासिय सुपवा ॥ निबंधसाण जा प: गि पनारयो धम्मम ॥ २८ दोहा - धर्म पर्व सवत्सरी, चतुर्मासि था ॥ पाया जेणे जपतु ते. पापी सुमति धरेय ॥ २६ ॥ व्याख्या - सो-ते F-जपाना पापोजेण-जेणे सागर चाउमासिय सुपधा-सांवत्सरकपy पागामांगिण (पक्षणयी चौदस पूर्णमासि यष्टम्यादि वर्षि TITIATiपिनमा पनि सिस्पिा यत्पन्न कन्या , जेसि-जे पर्योना प -मारपा नियधगाण -निक्षम प्राणीयोनी एटले निर्दय प्राणीयोनी uri-मशागनी मनि तया जिन धर्म प्ररामपानी मति एटले बुद्धि m:-पर एना नागार्य - पपणादिक सुपने पिप चतुर्विध श्रीसप, विशे "धर्मा प्रद्यम को , तेने जाई निर्दय प्राणीनी पण जैन KP TET कागती यया प्रगारगना मनि चायने,त्यारे दयावत प्राणीयोनी rTT'मरणं सरयाच्याच ते जिनराज जयपता याथा ॥२६॥ नाग-ATTीन दा नेपिप बदले -मा-नामपि तरण मिमि यमगाउ, धामीणरि दाइ पार मई पर गरमा, यरन नाम पण तास ॥ धमान पण सर्वत्र वाम ॥ २ ॥ तस्म-तनु नामपि-नामप rama ण-तणे मिठ प-मिप्यायना पा नेना मा क्या गि-जे पाना य प्रमग या माग-धमानांकानी पण पार दा:-ययन एनो नागगर्य-मांत्री, पु . व्याया पष्टी शतक. लेटी. विजयादशमी. गणेश चौथ. नाग पंचमी. पाप नवमी. वह वाग्स, धन तेरस इत्यादिक अनेक मिथ्यात्वना पर्वोने दिवसे घणा पाप. उपश्व.. कुतुहत पाय वे. जेना प्रमंगथी धर्मा पुरुयोनी पण पाप मति थाय ते. त्यारे या लोकोनी ते गीवात कदेवी! माटे जे पुस्पे मिथ्याल पानीस्थापना करी ते पु तुं नाम पण अगुन जाणवू : एटले तेनुं नाम लीयाथी पण पाप लागेठे ॥ अवतरण-उपरनी वे गाथाना अनुसारे तो ज्यारे सुपर्व आवे ते. त्यारे सर्व धर्ममति उत्पन्न होवाथी वधा धर्मा थवा जोये; अने ज्यारे कुपर्व थावे ते त्या फरी तेयोनीज पाप बुद्धि थर्ड जवाने सीधे वधा पापी थवा जोये. त्यारे कोनो स्थायीनाव मिझ यो नही एटले सर्व जन पापी अने धर्मी ठरतो. ए धागका टूर करवाने उत्तर कहे ते.- मूल -मनहि पुण एसा, अणुसंगणं वति गुण टोला ॥ उछि पुम पावा, अणुसंगेणं न विप्पंति ॥ २७ ॥ दोहा - हेवे तंगे जे हवो. ते नर मध्यम होय ॥ यति धर्मी अति पातकी. ते तो फिरे न कोय ॥२॥ व्याख्याः-- पुण तेमां मत्र- मध्यम पुरुपनी स्थिति एटले मर्यादा एसा-ए ; थणुसंगेणं- अनुसंगे करीने एटले परना प्रसंगे करीने गुणटोसा- गुणवान तथा दोपवान हवंति-थायठे, एटले गुणीना प्रसंगथा गुणी तथा निर्गुणीना प्र संगथी गुण रहित थाय ठे, ए मध्यम पुरुपनी स्थिति , परतु उक्कि पुणपावा- जे उत्कृष्ट पुण्यवंत धर्मी तथा जे उत्कृष्ट पापी यधर्मी ठे ते अणुसंगेणं- पर प्र संगेकरी न धिप्पति- ग्रहण कया जता नयी एनो नावार्थ:- उत्कृष्ट धर्माने पापीनो प्रसंग थाय तो पण तेनी पापमति थती नथी, यने उत्कृष्ट जे पापी होय तेने धर्मीनो प्रसंग थाय तोपण तेने धर्म मति थती नथी; अने जे मध्यम पुरुष होय तेजज न्यूनाधिकताने पामे . जे यति पापी तेमज यति पुन्यवान नहोय ते मध्यम पुरुप कहेवाय ते.॥ २७ ॥ यवतरण.-वली एनेज वली दृढावे.--मूलः-अश्सय पाविय पावा, धम्मिय प सु तोवि पाव रयान चतंति सुधम्मा, धन्ना किविपाव पवेसुग्णाटोहा -यति य पापी पापरत, रहे सुपर्वे जेम ॥ पाप कुपवे धर्मथी, धन्य चल नहि तेम ॥२॥ ख्या --जे माटे एम ठे तो-तेमाटे घासय पाविय पावा-यतिगय एटले उत्कृष्ट न्यु वे पाप जेणे, एटले जे उलट पापी पुस्प वे. ते धम्मियपवेसुवि-धर्मी पुरु संबंधी पर्दूपणादिक पर्वोनेविपे पण पावरया-पाप रत होयते, एटले पाप क बेपे थासक्त रहे. किवि-तेमज केटलाएक धन्न-धन्य एटले पुन्यवंत प्राणी पष्ठी शतक नाममात्र गुम क्रन बाह्य निंग रजोहरण मुग वस्त्र धारीने याजीधिकानो कर बाल मिति-नियले त्रिवि-ते बनेटले नग्ना साननीने वस्तुने दवाराना 80 उपापपवेसु-पाप पानेविपे पण शुद्ध धम्मा-गुरु धर्मथकी नचतंति-चलायमा न यता नयी बने नवीन धर्मी जीवोने स्थिर राखवाने थर्य दर्शन ब्रष्ट पासधा दिकनो तथा थन्य दर्शनी कुलिंगीनो प्रसंग पण करता नथी, घणो कहेवाथी गु थवतरण - जेम सुपर्व यने कुपर्व ए वे प्रकारना पर्व कह्याते, तेम सुलक्ष्मी तया कुतवी ए वे प्रकारनी लक्ष्मी ते बतावे - मूल-लष्ठीचि हवा सुवि हा, एगा पुरिसाण खवर गुण रिति ॥ एगाय उनसती, अपुन पुन्नाणु नावाद ॥ ३० ॥ दोहा - लक्ष्मी दोविध एक तो, नर गुण धण क्ष्यकार ॥ एक दिपाये पुस्पक, पाप पुन्य यनुसार ॥ ३० ॥ व्याख्या -लबीवि-लक्ष्मी पण विहा- वे प्र कारे दय-वे तेमा एगा-एक तो थज्ञान कटादिके करी प्राप्त थएली जे ते ते पुरिसाण-पुरुषांनी गुणरिदी-ज्ञानादिक गुणरूप रिदिने खवश्-क्ष्य करे, एट से नाश करने य-जी एगा-एक सुपात्र दानादिकेकरी प्राप्त थएनी जे समीते ते पुम्पानी झानादिक गुणधिने उनसती-नहलासने पमाम एटले वचारे अपुन पुनाणु नावा- पाप धर्मना थनुनार थकी एटले प्रनावथकी ते लक्ष्मी के परारे झापले थपुन-पाप यशान कष्टादिक, तेना प्रनाथी प्राप्त थएली जे सध्या ते गुणधिने नाश करने, यने पुन-पुन्य धर्म सुपात्र दानादिक, मनायपको मात थएनी जे लक्ष्वी ते गुण शधिनी वृद्धि करेठे ॥ ३० ॥ घरतरण - ते लक्ष्मी औरा देवामा जेम दोष थायवे तेम कहेते -- मूज गुरुणो नहा जापा. सढे थुणिकण लिति दाणा ॥ इनिवि थमुणिय सारा, द. सम ममपम्मि युति ॥ ३१ ॥ दोहा - नाट थया गुरु श्रामने, स्तवी खेत वा पादि ॥ नन्द जाणEए युटे, उमम्म समए प्रादि ॥३१॥ व्याख्या - गुरुणो- नार, नहा जापा-गाट पया एटने जाटनी पठे कीर्ति वचनाना योजनार थया रहे नाममात्र पारस्ने युणिकण-नरीने पटले यही महानाग्य, पुन्यवत, होकर, मनोनिन पूर, देवगुरु ननिकास, जिन याज्ञा प्रतिपातर, या मन पार, होन दोनोजाक, धीर गनीर श्रादायाँदि गुण गरजस्त ऽन्यादि माना कीने दागा: यमनादि थाहा पात्र यत पाद पुमणादिक महापब मना करीने गन्ने मेगगनां कृणु यमुणियसाग-जे मिal तेना थ पष्टी शतक. ६४१ तनो सार एटले परमार्थ जाण्यो नथी, ते दूसमसमयम्मि-उपम कालरुप समु इनेविपे वुटुंति-बूमेठे; एटले नरक निगोटादिकनेविपे प्राये घणा कालसुधीनमेठे२१ अवतरण:- गत गाथामां परमार्थने न जाणनारा वूडेठे एम कर्दा, ते परमा र्थने न जाणनारा घणा ने अने परमार्थने जाणनारा थोडा वे ते कारण सहित कहेते. मूलः- मित पवाहे रत्तो, लोयो परम जाणयो थोवो ॥ गुरुणो गारव रसिया, सुई धम्म निगृहंति ॥ ३२ ॥ दोहाः- मिह प्रवाहे रत घणा, लोक स्तो क सवुम ॥ गारविरस लंपट गुरु, गोपे धर्म विसु ॥ ३२ ॥ व्याख्या.- मिठप वाहे-मिथ्या एटले विचार रहित फूठाने विपे रत्नो-रक्त एटले यासक्त एवा लोयो- ने लोक : ते घणा . ते लोकोथकी तथा सम्यक्त्वना पडिवाइ थकी परमठ जाणयो-परमार्थना जाण पुरुषो हमणा घणाजयोवो-थोडा वे; कारण के गा रव रसिया-डि रस साता गौरवनेविपे रसिक एवा गुरुणो-नाम मात्र गुरुलेते सुई धम्म-निर्मल जिन नापित तपसंयमरुप धर्ममार्गने निगूदंति-गोपवेने. केम के, गुड़ मार्गनी प्ररूपणा करीश तो मने कोण वांदशे! तथा पूजो! एवी स्था पना करीने गुरू मार्गने प्रकाश करता नथी, माटे परमार्थना जाण पुरुप थोडावे.३२ श्रवतरण - वली वीजो हेतु वतावे वे. मूलः- सबोवि अरिह देवो, सुगुरु गुरु नए नाम मित्तेणं ॥ तेसि सुरुवं मुहयं, पुन विहूणा न पावति ॥ ३३ ॥ टोहा - थरिह देव सुगुरु गुरु, नाम मात्र सवि क्हत् ॥ ताके सुनग सुम्पर्क, पुन्यहीण नहि लहत् ॥ ३३ ॥ व्याख्या.- परपग गत जे श्रावक कुन, तेनधिपे उपजेला ते सवोवि-वधाउने पूढीये तो नाममिनणं-नामात्र करीने नए-एम क हेठे के, थरिह देवो-घरिहंत जे वीतराग ते देव, सुगुस्गुरु-संविज्ञ गीतार्य ते गुरु, उपलक्ष्पथी श्रीवीतराग नापित श्रुत चारित्रम्प ते धर्म; एम नाममात्र यो कहेठे, केमके, तेसि-ते देव गुरु तथा धर्मर्नु मुदयं-सुन्य दायक इष्टकारी एवं जे सुरुवं-स्वरुप, तेने पुन्नविदूणा-रडा पुन्यथा रहिन प्राणी न पायनि-पामना न थी.माटे परमार्थना जाण वर्तमान काननविपे थोटाययवाको विग्ना ने.॥३३॥ यवतरण - गुरु मानना उपदेदाक तो ने तीपण दमणा परमार्थना जाण पुरुष थोडा केम कहोठो? एवो गिप्पना संगय दृर कग्या निमिन गुरु कहने । अहो नइ, सानज-मृतः-सुधा जिण घाण न्या, निं पाया टुंनि निर मतं, जेति ते मिरतृत कर्मि मृटा ते गुण ॥३॥ टोदा.- जिनालाग्न दव, सनने शिर एन । जन न मिरमज फुन, ते गुन मयनुकता यासा ६४ पष्ट शतक. जिए थाणरया-जिन राजनी थाझा.पाजवानेरिपे रक्त एटले सावधान होवाने सीधे सुखा- निर्मल चित्तवाला एवा जे सरिज्ञ गीतार्य शुद्ध मार्गोपदेशक लेते केसि पावाण-केटलाएक पापी श्रमणोना सिरसूल-माथानु सल हुति- थायने, एटले शुरु मार्गनी देशना कोई प्रकारे साजलीने त्रासने पामे एचा जेसि-- जे पापी श्रमण केवल वेशधारी होय , तेने ते शुद्ध मार्ग उपदेशक पुरुपति रसूल-माथाना शुलना जेवा लागे ते-ते पापी श्रमण नि केवल वेपधारी के सिंमूढाण-केटला एक मूढ बजाए लोकोना गुरुपो-गुरु , एटले पूज्य ठे एनो नावार्थ-जे पापी श्रमण पापमी जैनानास नि केवल वेप धारी सविज्ञ प क्षीना गुणे करीने पण रहित एपा तया तेजना सम्यक् ज्ञान विकल एवा नक्त लोक तो घणा दोय , पण सत्य असत्यना विवेकी परमार्थ कुशल कोई विरलाज होय वे थवतरण अशुभ मार्ग प्ररुपक कुगुरुने तथा तेना नक्त लोकोने जोने में थकार खेद सहित वचन कहे हैं ॥ मूल - हा हा गुरु थ थकडं, सामी न दु थधि कस्स पुजरिमो ॥ कह जिण चयण कह सुगुरु, सावया कद इय थकङ ॥३५॥ दोहा - गुरु अकार्य हानहि घणी, करिये कहा पुकार ॥ सुगुरु आदि न वचन कह, कहा अकार्य थसार ॥ ३५ ॥ व्याख्या द थाय दे, गुरु थ अकड कुगुरुने मानवु तथा पूजबु इत्यादिरूप वर्तमान सम पनेविप मोटु थकार्य थाय , एवी रोते दयालु सुगुरुना वचन समितीने कोई एक बोयो के त्यारे पुकार करो, एटले कोई सुधर्मी राजा प्रमुखनी पाशे किरि याद करो त्यारे गुरु कहेवा जाग्या के है नइ, सामी-सुराजकुलोत्पन्न लोकहि त कारक पुर्नीति निवारक कोई राजा नयटी थी तो दु-निश्चये कस्स-कानी थागल पुरिमो-थमे पुकार करिये। माटे फिरियाद करवा निरर्थक वे, एवाय रुना वचन सानजीने वली ते बोल्यो के,त्यारे प्रथम हा हा गुरु थ थकह' ए वाक्य तमे केम वोया? गुरुए का एटला वास्ते के, सफल नय समूह, थखिल दोष रहित, एवा जिनवचन एटले सर्व नापित वचन,थेने कह-क्याहां सुगुरु सावया- सुगुरु तथा धायक धने कह- क्याहाँ गुरु थ थकका सम्यक् दान किया थकी भ्रष्ट यविधि मार्गना उपदेशक, कुगुरु, तेउनी मेयनारूप मोटु कार्य जे ते केटलो यनर्थ कारी नामादिक नई, तया मार्गनी प्ररूपणा करी करीने ते हा हा यति मोटो खे कद-क्यांहा जिपवय- एवाजे पाटी शतक. ६४३ - कुगुरु पोताने तथा पोताना नक्त लोकोने उर्गतिमां नाखे वे; एवा करुणा नाव थो ‘हा हा गुरु अथकङ' ए वाक्य बोलवामां थाव्युं ॥३५॥ अवतरणः- पूर्व गाथामां कुगुरुनी सेवनारूप मोटुं अकार्य कयुं ते यथार्थ जाणीने कोईक हलुकर्मी नव्यजीव ते गुरुनो त्याग करे तेने मूढ लोक उष्ट क हे, ते दृष्टांतेकरि कहे। -मूल.-सप्ये दिले नासर, लोउ न किंपि कोइ थरके ई॥ जो चई गुरु सप्पं, हा मूढा नण ते 5 ॥ ३६॥ दोहाः- साप देख नासे कुई, लोक कहै कबु नाहि ॥ कुगुरु सापथी जे नसे, मूढ कहै खल ताहि ॥३६ ॥ व्याख्याः-लोउ-लोक सप्पे दिहे सर्पनेदेखीने नासर-नाशी जाय तेने कोइ-कोई माणस किपि-काई अरकेश्-कहेता न-नथी. दु-निश्चये, एटले तेने कोई एम कहेतो नथी के तुं कायर , वीकए , अथवा नपुंसक वे इत्यादिक कोई नरझुं वचन कहेता नथी, उलटुं सारूं कहेठे, के तारूं मोटु नाग्य जे तुं सा पनी पासेथी नाशी गयो. अने जो-जे पुरुष कुगुरु सप्पंकगुरुरूप सर्पने चयर- त्याग करेठे एटले तेने मूकी दियेडे, हा-इतिखेदे मूढा-मूढ अज्ञानी लोक ते-ते ऋगुरुरूप सर्पने मूकी देनारने कुछ-उष्ट, नाग्यहीण, पोताना बाप दादादि पूर्वजोनी कुलमर्यादानुं उल्लंघन करनार वे एम नए-कहे ; पण सारं कहेता नथी; एटले तुं कुगुरुरूप सर्पथी बची गयो ए घणुं सारं थयु माटे तुं मोटो नाग्यवान वे एमक हेता नथी; केमके सर्प भने कुगुरुमां केटखं अंतर 2 ते तेउजाणता नथी. ॥३६॥ अवतरणः- हवे सर्प धने कुगुरुमां घणो अंतरायठे ते कहेले.-- ॥ मूलः- सप्पो इकं मरणं, कुगुरु अणंता दे मरणा ॥ तो वरिसप्पं गहियु, मा कुगुरू सेवणं नई ॥ ३७॥ दोहाः- एक मरणकू साप दे, कुगुरू मरण अनंत ॥ श्रेष्ठ सा प ग्रहदूं तदा, कगुरु सेव नहि संत ॥ ३७॥ व्यारव्याः-सप्पो-सर्प इकंमरणं- एकजवार मरणने दियेते; घने कुगुरु-यगीतार्थ तथा विधिमार्गना बजाए जे कुगुरु ते अनंता मरणाइ देश-अनंतवार मरणने दिये ; ज्यारे थगीतार्थ कुरा रुनी एवी कथा ने, त्यारे जे सर्व गुणेकरी रहित कुगुरु होय तेनुं यु कहे ! तो- ते माटे नई-हे नइ, सप्पंगहियु-सर्पने मणिलेवादिकने अर्थे जे ग्रहण कर, ते वर-श्रेष्ट वे पण कुगुरुसेवणं-कुगुरुनी सेवा अथवो पूजा मा- करीश मा. अर्था त् हे नइ, रखे कुगुरुनी सेवना तु करे कदापि करवी नही, तुं पोतानुं कल्याण बनार तथा सरल स्वनावनो होवाथी था उत्तम सीखामण ढुं तने थापुं॥३॥ अवतरणः-एवी रीते पूर्व गाथामा सर्पयकी पण कुगुरुने जूमो कह्यो तेम ६२४ पष्टी शतक. , वतां तेने लोको गुरुयुक्षिए नेमेवे तेनु कारण शु? ते वलायाने लीधे माने एम दृष्टांत सहित कहे। -जिण थाणा विधता, गुरुपोणिक ज न मिप्यति।। ता कि कोर लोथो, बलियो गडुरि पवाहेण ॥ ३० ॥ दोहा- जिण थाशायी रहितने, गुरुकहि जो शिर नाय || गमर प्रवाहे जण बत्यो, तो सुं करिये जाय॥ ॥३७॥ व्याख्या - जिण घाणा- समिति गुप्ति महाप्रतादि जिण नापित कि या अनुष्ठानरुप जे जिनराजनी याज्ञा, तेने विचयंता-ठिोपे करी त्याग करनार एवो जे कुगुरु, तेने गुरुणे- गुरु जणिकण-कहीने एटले जाणीने ज जो नमियंति-लोक नमेठे, ता-तो किकरइ-शु करिये। एनो कोई उपाय नथी केम के, गडरि पवाहे--गाडरीना प्रवाहनी पठे विचार रहित मूर्ख लोकोनी जे चान तेणे करीने लोयो-लोको बलियो-नलाई गया वे से जाणे दिग्मूढपणाने, थ धपणाने, बधिरपणाने पाम्या होयनी। एवा ए लोक थई गया ले तथा तेश्रोने जाणे उष्टयह तथा नूत वलग्या होयनी तथा तेयोनी ऊपर योग चूर्णादिक नापीने जाणे कोईये वश करी लीया होयनी। केमके सितिथी वधुं विपरीत आचारे चालेले, तेमज बीजाने पण चलावेठे एवा कुगुरुने गुरु कराने मानेने माटे ए लोक गाडरीया प्रवाहे करी उलाया , तेयोने हवे सुधारवानो कोई व पाय विचारमा धावतो नथी ॥३०॥ थवतरण -पूर्व गाथामां का के लोको वलाई गया ते कपर कोई एवीधाशका करेके, लोको गुरुने दाक्षिणताने लीधे नमता हो। एटले चतुराईशला जाणीने नम ता दशे । तेने हितोपदेशक गुरु कहेले के, नाई एवेकाणे लोको चतुराईया रहित, ते सानत-मूल-निस्किन्नो लोधो,जाकवि मारुटिपारसमागुरूण सग चयणे, दरिकनही महामोहए।दोहा -लोक थदादणि कोइजो,मागेरुटिया नागकुछ रु सगत्यागनविपे,दाणता धिग रागाच्या व्याख्या-निहारिकनो-दाक्षिणधीरहित लोय-या लोको , कैमके, जय जो कुषि-कोई पण नूखेकरी पीडित रोक माणसरुष्टि पासम-रोटीनो स्सम एटले रोटतीनो एक ककडो मग्गेइ-अन्नदाता, सेव साहेव ६ त्यादिक चाटुक वचने करी मागे, तो पण तेने ते श्रोपता नथी, उलटा उर्वच नो योजीने फहाडी मूके थने गुरुण सग चयणे करुनो सग त्यागवाने विपे दरिकन-दाक्षिणपणु करेठे एट एमने मारा बाप दादादिक मानता था येता के, बजी मारा गधना कहेवायचे, माटे केम गोडाय। एम लोक कुगुरुनी वाक्षितामा मोटो ग्वेद , महामोहो-ए मोटु थकान ठे के, पटी शतक. ६४५ दीन खीने एक रोटीनो ककडो श्रापला कठण लागेवे, अने उर्ग-मुर्गति प्रापक जे कुगुरु, तेने अति सरस असन प्रधान वसन प्रमुखेकरी सन्मानेते; माटे ए मोटुं यज्ञान लोकोनेविपे प्रवर्ने ठे. ॥ ३५ ॥ अवतरणः- पूर्व गाथामां दृष्टीरागी लोकोनुं मूंढपणुं का, हवे तेयोना नाम मात्र गुरुनु मूढपणु कहेजेः- मूलः- किं मणिमो किं करिमो, ताण हयासाण विधवा जे दंतिकण लिंग, विवति न रयन्मि मु६ जणं ॥ ४० ॥ टो हा:- नाख नरके मुग्ध जन, देखाडी मुनि वेप ॥ ते हताश खल धाउने, कहिये कि विशेप ।। ४०॥ व्याख्याः- हयाताण-उत्तरोत्तर कल्याणरूप हगाई ते श्रागा जेनी एवा विक उठाणं-धीठ एटले कार्य करवामां यति चतुर धने उट एटले टोपवाला ताण-तेयोने कि नलिमो~ गुं कहंदूं! अने किं करिमो-युं करवू? जो उपकार करिये तो परयातादि उपव करवाने सावधान याय; ते यांधला सिंहना नेत्र उघाडवाना दृष्टांते जाणी लेवू; एटले कोई यांधलो सिंद जोई तेनी ऊपर दया श्राणीने कोई पुरुप काई इलाज करीने तेने देखतो करे तो तेनाज प्राण लिये. तेम गुरुनी ऊपर उपकार करयो होय तो तेना बदलामा थपकार शिवाय वीजो फायदो यवानो नथी. त्यारे कोई कहेगे के तेयोनी कप र थपकारज करवो तो ते पुरस्यवानने थवटित वे; माटे तेयोने गुं कहे ! यने गुं कर कार्ड कहे ! अथवा करउचितज नयी. केमके, जे-जे लिंग-रजाहरण तथा मुख वस्लादिक साधुनो वेष तेने दैनिकण-देखामीने मुजणु-मुग्ध जन ए टले विवेक विकत लोक, तेयोने नरयन्मि-नरकनेविपे खिवति-नाग्वेने. ॥ ४० ॥ अवतरण:-पूर्व गाथामां कुशुरुउनुं मूढपणुं देखाड्युं, हवे तेउनी स्नुतिने मिपे निंदा करे :- ॥ मूल - कुगुरुवि संनिमोहं, जेनिं मोहाइ चमिमा दहुं । मुगुरुण उवरि नती,धा निविमा दो नवाणं ।। ४१ ॥ दोहा-ते प्रतंनिये कुगुर पाण, ज सु मोहादिक देप ॥ सुगुरु परिनवी जीवक, थाए नगति विशेष ॥ ४१ ॥ | व्याख्या.- कुगुरुवि- कुयुत्ने पण नंनिमोई-टुं- प्रगं वं; केमर, जेति-जना मोहा। चंमिमा-मोहाटिके करी जे चंपणं धयवा. क्रूरपणू, तेने दुष्ट-टंगीन न वाणं-मोक्षानिनापी नव्य प्राणीयोने रगुरतु नवरि-एयत्नी ऊपर यानिधिमा- यतिबद्ध नकि हांड-चाय ने. एटजा वान्ने फुगुस्नी प्रगना कचि ठचे, पन्नु तना गुणोतुं वर्णन करी प्रशंसा करता नयी. ॥ ४१ ॥ अवतरण-पूर्व गावानां जे नव्य जीव क्ह्या ने नम्बर গি নাম্বা নর पष्टी शतक. ज मतनो प्रति उदय नयी थोरे तेनु कारण दोप ऽष्ट कनिष्ट पचम काल रिपेउ। ६४६ सम्यक्त्व उल्लासने पामयानु कारण कहे - मूल - जह जह तुदृश् धम्मो, ह जद ताण हो य उदसमदिति जियाण ॥ तह तह उल्लसइ समत्त ॥ ५२ ॥ दोहा । जिम जिम खलनो अति उदे, जिम जिम तूटे धर्म ॥ तिम तिम समकित जीवको, उससे समकित सर्म ॥४२॥ व्याख्या-जह जह-जेम जेम धम्मो-जिन जापित धर्म तुह-तूटेवे एटले हाणीने पामे , वली जद जह- जेम जेम काण- दर्शन भ्रष्ट, निन्दव, पासधा, उसना तथा कुसीलियादिक य ने अन्य दर्शनी त्रिदो, परिव्राजक, तथा विनादिक उष्ट लोकोनो थइ उदळ-थ ति उदय एटले अतिशय जोर सत्कार तथा पूजादिक होइ- थाय ने तह तह- तेम तेम समदिति जियाण- सम्यक् दृष्टि जीगोनु सम्मत्त- सम्यक्त्व उनसर-3 वासने पामे , एटले विशेष दीपेने ए मोटो पाचर्य ते शिप्यने गुरु कहे चे के, काई थाचर्य नथी, वस्त्र, पात्र, वसति, थाहार तथा पोतपोताना श्रावक ३ त्यादिनी ऊपर लडी मरशे, थने साधु कहेवाशे वली कलहना करनार, मारकू टना करनार गुर्यादिक मोटा सत्पुरुपने पण असमाधि उत्पन्न करनारा थशे 5 पम कालमा घणा थसयति थया थका सयति कहेवागे, अने कोक विरला धर्मार्थी सुसाधु यो एवा श्री महावीर स्वामीना वचन सनारी सनारीने तथा ते पूर्वोक्त लोकोने जो जोईने श्री वीर वचननी थास्था ते सम्यक्त्वनु आस्तिक्यता नामे पाचमु लक्षण दृढ थाय वे ॥ ४२ ॥ अवतरण - पूर्वोक्त गाथामा जेम उष्ट पापी लोकोनो दमणा थति उदय क ह्यो तेम हमणा जिनमतनो थति उदय केम यतो नथी ते प्रश्नोत्तररूप गाथा एकरी कहे। -- मृज - जथ जतु जणि तुने, घ उदय ज न जिणमए होश त कि काल मनव, जियाण था पाव मादप ॥ ३ ॥ दोहा - जग जननी सम जिनमते, जो थति उदय न होय ॥ कति कालज जपनो यति, पाप म हातम सोय ॥ १३ ॥ व्याख्या - जयजतुजणणितुल्ले-जगतना जीवने मातानी तुय, निएमए-एदो जे जिनमत, तेनो था उदय-थति उदय ज-जो न-नबी हाउ-यतो न-ते किकालमनवजियाण-क्लिष्टकाल एटले फनिकाजमा उत्पन्न थएना जे जीव तेउना सावमाहप्प-उत्सूत्र देशनादिक दोपरूप अति पापनु महात्म्य - एना नावार्थ- जिनमतनो उदय तो श्री उप्पसह थणगारसुधी व नंगे, तोपण जेवा ताकर महाराज उता जिनमतनो उदय हतो, तेवो निन पटी शतक. ६४० पन्न पयाजे जीव पानंमी सांक. तेना उन्मत्र देगनादि महादोषप अति पा पनो प्रताप वे. माटे जैन मतनों श्रति उदय केवी रीते चाय! ॥ ४३ ॥ अवतरण - पूर्व गाथामा कन्यु के जिनमतनो अति उदय यता नयी ने 5 ट लोकोना अनि पापर्नु महात्म्य ने : ते दृष्ट लोको पापे करीने पूर्ण होयचे ते कहने मूल-धम्ममि जस्ल माया, मित्त गहो उत्ति नोसंका ॥ कुगुरुवि कर सुगुरु, विउसोवित पाय पुन्नत्ति ॥ ४५ ॥ दोहा- जिसके माया धर्ममें, लागो ग्रह मिथ्यात ॥ सो उत्सूत्री नरम नद, कई उजटि सवि वात ॥ ४ ॥ व्याख्या - जस्स-जेने धम्ममि-जिन धर्मनेविषे माया-कपट वनडे, एटने पूजा धनादिक लान या कीर्तिने थलोकनी दृष्टिए करी धर्म करवो ते वधीमा या जाणवी ते जेने , मितत्तगहो-अतल श्रदान मिथ्यात्वनो गृह हवा ८ वत्तेते जेने वली उत्ति- उत्तृन्त्र नापी ठे, मोतंका- उत्सूत्र नापवा थकी नरक निगोद विपे अनंत कालसुधी निवात यो एवी जेने गंका नथी; बली जे कुगुरुवि-कुगुस्मते पण सुगुस्-तारो गुरु कर-कोठे, एटले या उत्तम गुरु ते एम मानेने, स-ते विसोवि-विज्ञान उतां पण एटले व्यथकी घणा शास्त्रो नगेलो वतां पण पाव पुन्नत्ति-हिंसादिक अहारे पापेकरी पूर्ण जावो.॥ अवतरण - पूर्व गायामां कह्या प्रमाणे जे पापेफरी पूर्ण होय ते कार्ड पण धर्म कार्य करी के नहीधर्म कार्य जिनाझा प्रमाणे कत्यायी सुखदायक थाय ; अन्यथा न घाय ते कहे। - मूल - किनपि धम्म किचं, पूया पमुहं जिणिं दयाणाए ॥ नूय मणुग्ग दरश्चं, धाणा नंगाउ उहदायं ॥ ४५ ॥ दोहा.- जिन पूजादिक कार्य पण सफल जिनाझा थाय ॥ याणा नंगरहित दया, कार्य सवी उखदाय ॥ ४५ ॥ व्याख्या - पूया पमुहं-पूजा प्रमुख एटले जिन पूजा, सामायक प्रतिक्रमण, गावान्यास, तथा जिननुवन कराववा प्रमुख धम्मकिन धर्मकृत्य जे किच्चंपि-करवू तेपण जिणिंद थाणाए-जिनेश्नी बाझाए करी सुखटाई थायवे. नूयमयुग्गहरहिग्रं-नूत अनुयह रहित एटले जीव दयाए करीने रहित जे जिन पूजा तथा सामायकादिक धर्म कार्य करतु ते जिन बाणानो जंग कल्या जे, थायवे. माटे सिक्षांतमां कडं वे के, वीतरागनी थाझानो जंग करवा यकी पूर्वोक्त सर्व धर्मकार्य उहदायं-जन्म मरणादिक उखना देनारां . जिन राजनी थाहानु थाराधन कस्याथोज मोद थायवे. अने जिनराजनी धाज्ञा विराघवा यकी नरकादिक 5ख थायवे. ए जिनागमनुं गुह्य ते. ॥ ४५ ॥ ; - पाठीशतक. . - . विधि धर्मनो राग, असुर सगे-बगु६ पुरुप एटले उत्सूत्र नापी पासवादिकनो និមិច यवतरण -- जिनाशाविना कष्टादिक जे करबु ते सर्व ससारनो हेतु थाय वे ते कहे - मूल - क करति थप्पं, दमति दच चर्यति धम्मी ॥ इक न चय तिमिहत्त विसलय जेण बुद्दति ॥ १६ ॥ दोहा - कष्ट कर थापा दमे, इव्य ते जे पण जोय ॥ तने नही मिथ्यात्व लव, घुडे जेहथी लोय ॥ ४६॥ व्याख्या क करति-सोच करवो, उपामे पगे चालवु, धरती ऊपर संवु, तथा थणसणा दि अनेक प्रकारनु बाह्य तप, इत्यादिक कष्ट जे ते मूर्व करे अप्प-यात्मा ने, एटले मनने तथा इश्यिोने दमति-मूर्य दमे , वली दई-धनादिक इय्य ते ने धम्मष्ठि-धर्मना श्रर्थी थका जे भूख चपति- त्यागे , पण इक मिवत्तवित लव-एक मिथ्यात्व उत्सूत्ररूप विपलयने न चयति- मूकी देता नयी जेण-ने मिथ्यात्व उत्सूत्ररुप विपलवे करी मूर थज्ञानी इस समुन्नेविषे चुद्धति-यूडे , ए मोटी खेदनी वात वे ॥ ६ ॥ थवतरण -- पूर्व गाथामा उत्सत्र नापीनु मूढपणु देखामधु, हवे शु६ पुरुष नो सग करवो थने अगुव पुरुपनो सग त्यागयो ते कहे जे ॥ मूल - सु६ वि हि धम्म राउ, बढई सुकाण सगमे मुघणु ॥ साविय यस सगे, निवणाण पिंग लइ थादियह ।। ४७ ॥ दोहा - वधे मीत सतसगथी, पर विधि धरम सुराग ॥ ५ टे कुसगे प्रति दिवस, विनो पण ते राग ॥ ५ ॥ व्यारख्या - सुथा हे सुनना हे धर्मोपदेश योग्य, सुवाण-जे शुद्ध पुरुप, मुसाधु, तथा सुश्रावक होय तेनो लग मे-समागम अथवा परिचय कखाथा सुन विहि धम्मराज-गु विधि ते राग क्षेप मल रहित रत्नत्रयी मोक्ष मार्ग विधि तप जे जिन नापित धर्म तेनेपिपे राग एट से प्रीति बढा- वधे ने एटले वृधिने पामे वे थने हे मुजन, सोविय-ते पण शुद्ध सग थथवा परिचय कयाथी निवणाणवि-निपुण पुरुषो पण अणुदिया-निरंतर दिन दिन प्रते गली-गले ने एटले हाणीने पामे त्यारे धनिपुण पुरुपोने हाणी थाय तेमा गु कहे। माटे वत्सूत्रनापी पासादिकनो सग सर्वथा वर्जयो, थ ने एक प्ररूपक पाचारवत पुरुपनो परिचय करवो ॥४॥ थवतरण - पूर्व गाथामां यक्ष पुरुपना सगनो त्याग करयो एम कयु, एथी ए म जाणवु फे जे येशुप पुरुष दोय ले ते शुद्ध पुरुपनी कपर देष करवा वाला दाय d, माटे तेना समीपे बलविनाना पुरुपे वसवु नहीं, ते कहे वई सुम गुरु, थसुक्ष लोयाण सो महा सत्तू ॥ तम्हा ताण सयासे, - - वल रहियो पटी शतक. ६४ए ते मा वसिय्यासु ॥४७॥ दोहा - गुरू गुरू जे सेवतो, ते अगु६ जण शत्रु ॥ तो वल रहित वसो नही, ज्हां असुन जण तत्र ॥ ४ ॥ व्याख्याः-जो-जे लोक सुम गुरु-निर्मल ज्ञान दर्शन चारित्र गुणे गुणवंत गुरु प्रते सेवइ-सेवे वे; सो- ते लोक यगुड़ लोयाण-उत्सूत्र नापी पासवादिकना दृष्टीरागीभक्त लोक, तेउने म हातत्तू-महा शत्रु एटले वैरीना जेवां लागे ते; तम्हा-ते कारण माटे ताण-ते अतुम लोकोना सयासे-समीपे वलरहित-धर्म धाश्री निर्नय पणुं अने शरीर ध नाटिक शक्ति तंपन्न एम अन्यंतर वाह्य एवे प्रकारना वले करी, रहितजे होय तेणे मा वसिय्यानु-वस नही; केमके, जे पी माणस होय ते सारा गुणने पण दूपण दिये : माटे अक्ष लोकोना समीपे वसतुं तेमां घणो उपश्व रह्यो । थी बीजे को ठेकाणे रहे ते सारं ठे! ॥ ४ ॥ यवतरण - पूर्व गाथामां खल पुरुयोनी पासे रहेवानुं निवारण कयुं तेनुं कारण कहवे.- मूल- समय विक असमता, सुसमचा जन जिएमए अविकं॥ तठ न वह धम्मो, पराहवं लह गुणरागी ॥ ४ए ॥ दोहा -- जिन मत विड थसमर्थ जन, जहां समर्थ अजाण ॥ धर्म न वाधै तह सहे, गुणरागी अपमान ॥ ४५ ॥ व्याख्या.- जन-जहां समय विक-जिन घागमना जाए पुरुप असम छा-देत्र कालादिक टोपेकरीने असमर्थ वे,अने जिएमए-जिन मतनेविपेयविक- जे अविट के एटले अजाण ; ते सुसमठा-यति कलह, क्लेश तथा मार कूट कर वाने समर्थ वे; तठ-तिहांधम्मो-शुक्ष विधि धर्म नव-धिने पामे नहीं; उ लटुं गुणरागी-गुणानुरागी पुरुष पगहवं-परानवने एटले तिरस्कारपणाने लहर- लहे एटले पामेठे, माटे यक्ष पुरुषोना समोपे असमर्थ होय तेणे न वसवू. या अवतरणः-जे सामर्थवान उन्मार्गी तथा उत्तृत्री होय तेनो जिनमार्गने विपे प्रवेश करवा देवो नही ते कहे। - मूल-जंन कर अश् नावं, थमग्ग से वो समय धम्मे ॥ ताल यहकुच्या, ता पीडइ सुध धम्मटी ॥ ५० ॥ दोहा सबल कुमार्गी धर्ममें, जो न करे अति नाव ।। तो सुंटर यथ जो करें, तो सुध धार्म उप दाव ॥ ५० ॥ व्याख्या - समठ-मुष्टि चपेटादिक प्रहारनी अपेक्षाए करी कुलित समर्थवंत एवो जे यमग्गलेवी-अविधिमार्ग एटले उन्मार्गनो सेव नार, उत्सत्रनो वोजनार, सम्यक्त्वरहित जिगधारी लोक तथा तेउना नक्त लोक ते धम्मे-जिन धर्मनेविपे ज-जो अनाव-यति नावप्रते नकर करे नही; एट ले त्यां पसारो यथवा प्रवेश करे नही; ता-तो लह-सष्ट वे एटले सुंदरठे थद- ६५० पाटी शतक धर्मवि थथ जो ते अविधि मार्गना सेवनार लोक जिनधर्मनेपिपेथति नाव एटले प्रवेग कुय्या--करे ता--तो सुक्ष वामी-गु६ धर्मना थर्थी जे जय प्राणी के तेउनपी ड-पोहे एटले थठता थाल प्रदान उर्वचन हेजनादिके करीस दिये, माटे ते उ न्मार्गि लोकोनो जिनधर्मनेपेि प्रसारन थाय एटले थावु न थाय तोज सारु ५० यवतरण - पूर्व गाथामा का के, समर्थ उन्मार्गीनो जिनधर्मनेपिप प्रवेश थाय तो ते धमार्थीने पीडा करे. हवे धर्मार्थी पुरुपोनो कोई परान करीश के नही ते कहे - मूल - जइ सच सावयाण, एगच्च ज तु मिछपायम्मि । धम्मछियाण सुदर, ता कहां परानव कुल्या ॥ ५१ ॥ दोहा -- मिथ्या वादे होय जो, श्रावक जन सब एक ॥ धर्मी जन• वर तदा, किम ये उग्व थपिर्वक व्याख्या • मिलवायम्मि-मिथ्यावादनेविपे सच सावयाण-नाम मात्र सर्व श्रावकोनु ज-जो एगच्च--एकत्वपयुं , तु--वली जश्-जो एफत्वपणु धिवादनेविषे धम्मप्रियाण-धर्मार्थी पुरुषोनु होय ता--तो सुदर-हे सुदर, हे न इ, ते नाम मात्र श्रावक लोक धर्मार्थी पुरुषोनो परानव-परानव अथवा तिर स्कार तु-इति चितर्फे कह-केम कुव्या-करे। यपि तु न करे धर्मार्थी पुरुषा नु पण धर्मविधिपादनपिप एकलपणु नथी केमके, ए पिम कालनो प्रनाव ठे माटे नाम मात्र जे श्रावक चे ते धर्मार्थी पुरुषोनो परानव करेठे एनो नावार्थ था देरासरनेविपे अमारो तथा थमारा गोत्री होय तेश्रोनो मूल नायकनी पूजा थारती करवानो अधिकार ने, वीजानो अधिकार नथी तथा चडिकादि गोत्र देवो देवता श्रमारा पूर्वज मानता श्राव्याने, ते श्रमे तमारा कह्याथी केम मूकी ये? नगरादिकनेपिप सुनिहितनो प्रवेश थता पूर्वे कोई समये थोठा थयो नयी ते थमे बेवा उता केम थाय। इत्यादिक जे मिथ्यावाद तेनेपि नाममात्र श्रावकोनु जे एफत्वपण ने, तेमा सिमित्यादिक धर्मविधियानाधर्मार्थी पुरुषोनु सघपट्टोक्त एकत्वपणु होय तो हे सुदर, कोई पण धर्मार्थी पुरुपोनो परानव करी शके नही थवतरण - पूर्व गाथामा धर्मार्थावं वर्णन कयु, हवे ते धमार्थाने सहाय के रनारा गुणोने कहै - मूल - तं जया पुरिस रयण, सुगुण हेम गिरिवर मह ग्य ॥ जस्ता सम्मि सेवई, सुमिहिर जिण धम्म ॥५॥ दोहा -मुगुण म हर्ष महा गिरि, जयसों पुरुष रतन्न । जसु याश्रय याचार रत, करै सुर्म जत त पुरिस रयण-ते पुरुप रत्न जय-जयवत ठे,श्रय वा जयवत यायो, जस्स सन्मि-जेना थाश्रय एटले जेना थाधारे सुविहिर न॥ ५२ ॥ व्याख्या - पष्टी शतक. ५२ - तु-सुविधिरत पुरुष एटले विधिमार्गनेविपे तत्पर पुरुष गु६ जिणधम्मं कदाग्रहा दिक मन कलंक रहित जिनधर्मप्रते सेवइ-सेवेठे एटले आराधेठे, एवो पुरुषरत्न सुगुण--ौदाये, वैर्य. गंनोर, दमा विनयादिक सुष्ट गुणरूप धनेकरीने सहित , वजी ते पुरुष रत्न केवो ठे? हेम गिरिवर महग्धं-मेरु पर्वतनी पठे महर्ष वे एटले अति महोंगो अथवा अमूल्य ठे. ॥ ५५ ॥ अवतरणः- पूर्व गाथामां का के, धर्मने सहायता करनारो अमूल्य पुरुष ते; तेनोज फरी पुष्टी करे.- मूल.- सुरतरु चिंतामणिणो, यग्यं न लहंति तस्त पुरिसस्त ॥ जो सुविहिरय जणाणं, धम्माधार सया देई ॥ ५३ ॥ दोहा.- ते नुपुरुषके मूनकू, सुरतरु मणी न पाय ॥ विधिरत जन• जो दिए, धर्म सहा ह्य सदाय। ५३ ।। व्याख्याः- जो-जे पुरुप सुविहि रयणाएं- सुविधि रत लोको ने धन्माधारं- धर्मनो याचार एटले धर्मनो अवष्टंव साह्य, देश- टियेठे, सया-स दा सर्वदा, तस्त पुरिसस्त-ते पुरुपनो अग्यं-अर्स एटले मूल ते सुरतरु चिंतामणि गो-कल्पद चिंतामणिरत्न उपलदण्या कामधेनु कामकुंन 2 ते नलहंति-नथी पामता; केमके. ते पुरुपने शिवसुखदायक अमूलक सम्यक्त्व रत्ननी प्राप्ति के माटे कल्पवृदा चिंतामणि प्रमुख वे ते ते पुरुपना मूलने नथी पामता, एटले तेनो तुनना करी शकता नयी. ॥ ५३ ॥ यवतरण - पूर्व गाथामा धर्मने सहाय्य करनार पुरुपना गुणतुं कीर्तन ते साननीने ते सत्पुरुषोतो लहाने पामे; त्यारे तेनुं गुण कोत्तेन करवामां फल झुं वे एवो गंकानुं निवारण करवानेयर्थे कहेठे - मून.- लहंति जाणि मोहं, सप्पुरिसा नियय नाम गहणेणं ॥ पुण तेलि फित्तणा, यम्दाण गति कम्मा 5 ॥ ५५ ॥ दोहा - लाजै निज नामोबरे, ढुं मानुं सत पुर्ष ॥ वनि त्हेना गुण । गाय हम, कर्म टले कटु तुर्प ॥ ५५ ॥ व्याख्या.- सप्पुरिसा-सत्पुरुष जे ते ते जोपण नियय नाम गहणेणं-निजक नामनु ग्रहण कस्याथी एटले था दाता, परोपकार का, इत्यादिक गुणे करी सहित पोतार्नु नाम सांनव्यायी लड़ति--स काने पामे. जाणिमोहं-एम ठे ते दुं जाए॒वं, तोपण तेमि कित्तणाउ-तेना गुण कीर्तन करखाथी पुण-वलो अम्हाण-थमारा कम्माइ-शानावरणादिक पाप कर्म गलति-गजेने, एटले दय थायने, माटे सत्पुरुपना गुण कोर्तन निरंतर करवा. अवतरण-पूर्व गायामां सत्पुस्पोनेविपे रहेला गुणेनुं जे वर्णन कर ते निर्जरानो हेतु ने एम कयुं, हवे थाझा रहित धर्म सेवनारनो वानी कहे। -मूल पष्टी शतक. -- आणा रहियं कोहाइ संजुयं थप्प ससगळंच ॥ धम्म सेव ताण नय कित्ती नेय धम्म च ॥ ५५ ॥ दोहा - याण जंग क्रोधादि जुत, थाप प्रसस निमित्त ॥ धर्म सेवता लोकने, नही धर्म नहि कित्त ॥ ५५ ॥ व्याख्या थाणारहिय-थाश्रव हेय, संवर, उपादेय ए वीतरागनी श्राझा तेणे करी रहित वलो कोहाइ सत्रुप क्रोधादि सयुक्त एटले क्रोध मान माया लोन ए चार कपाये करोने सहित, तथा थप्प ससपन-यात्म प्रशसाने यर्थे पोतानी शोनाने अर्थ ए प्रकारे धम्म-जिन धर्म प्रते सेवताण -सेवनारा लोकोनी नय कित्ती-कीर्ति नथी. एटले विवेकी पु रुप जे ते तेउनी श्लाघा करता नथी च-वली नेयधम्म-ते धर्म पण नही के जे गतिमा पमता प्राणीने राखे नही ॥ ५५ ॥ अवतरण -- पूर्व गाथामां का के, थाझारहित धर्मना सेवनारनी कति नयी होती थने तेजने धर्म पण नको होतो, तो पण काईक तो कीर्ति तथा धर्म प तो दशे, ए थाशका दूर करवाने कहेठे - मूल - इयर जण ससणाए, हिमा उ स्सुत्त नासिए न जय ॥ ही ही ताण नराण, उहाइजमुण जिण नाही॥५६॥ दोहा - नीच प्रससाए नणे, उत्श्रुत धीठ निलाज ॥ जो नावी 5 ख तेहने, सो जानै जिन राज || ५६ ॥ व्याख्या - इयर जण ससणाए-जिनोक्त धर्मना थजा ए इतर जन सामान्य लोकोए करेली जे प्रशसा, तेणे करीने हिश-हिष्ट थए ला एटले प्रसन्न थया था उस्सुत्त नासिए-उत्सूत्र नापण करता न जय-जे ने नरकादिकनेविपे नमवानुं जय नथी. ही ही-मोटी खेदनी वात वे ताण न राण-ते नरोना थनागत कालतबधी हाइ-जे उख, ते प्रते जश्- सो जिणू नाहो-जिननाथ मुण-जाणे , तो पण ते खाते समस्त प्रकारे कहेवाने समर्थ नथी, केमके, उख धनत वे माटे ॥ ५६ ॥ यवतरण - पूर्व गाथामा उत्सूत्र नापीने थनत ख थाय ने एम का है वे बोधीने अनत सप्तार भ्रमणनो नाश थाय ते कहे - मूल नासगाण, वोही नासो थपत ससारो ॥ पाणचएवि धीरा, उस्मुत्त ता न जास ति on दोहा - बोधि नाश उत्सुत्रिके, जामण मरण अनंत ॥ प्राण तजे पण घोर तत, नहि उत्सूत्र नपत ॥ ५७ ॥ व्याख्या राजना वचनयी विरुष ते उत्सव कहेवाय , तेनु नापण करनार एटले बोन नार, तेने वोहीनासो-श्री जिन धर्मनी प्राप्ति ते बोधी सम्यक्त्व तेनो नाश थाय थने थपत ससारो-यनत ससार थाय एटले धनत कालसुयी चार गतिमात्र . उस्मुत्त उस्मुत्त नासगाण-जिन पष्टी शतक. ६५३ मद् थाय ता-ते कारण माटे पाणचएवि-प्राण तज्याथी पण एटले प्राण कंचने विपे आव्या बता पण धीरा- बुद्धिमान जे पंमित पुरुप ते उस्सुत्तं--जिन वचन थी विरुन नासंति-बोलता नथी ।। ५७ ॥ अवतरणः- पूर्व गाथामां उत्सूत्र बोलवू नही, एटले जे धीर पुरुप होय ते उत्सूत्रनुं बोजवं अविधि जाणीने त्याग करेजे; हवे ते अविधिनी प्रशंसा पण न कर वी ते कहेजेः- मूल - मुझण रंजणवं, अविहि पसंसं कयावि न करिय्या ॥ किं कुल बहुणो कवि, धुणंति वेसाण चरिया ॥ ५ ॥ दोहाः- अविधि कीर्ति न कर कदा, जु जन रंजन हेत ॥ शुन कुन वधु कि नी किया, वेस्या चरित धुणेत ॥ ५७ ॥ व्याख्याः- मुदाण रंजणवं-अजाण लोकोने रंजन कर वाने अर्थे अविहि पसंसं-पोतानो गढ मूकी बीजानी पाशे जई सामायक पडि कमण शास्त्र श्रवणादिक काई न कर, जेम तेम पूजा सामायकादिक धर्मरूल्य करवू, विधि अविधि कांई न जोवू, इत्यादिक जे उत्सूत्र तेरूप अविधिनी प्रशंसा एटले नि कारण जे अविधि करवानी अनिलापा जे अविधिनी प्रशंसा तेने सत्पु रुप कयावि-कदापि एटले कोई काले पण न करिय्या करे नही; एज वात दृढ करवाने वास्ते यही दृष्टांत कहे:- कि-युं कुलवहुणो- कुलवधु एटले कुसवा न स्त्रीयो कवि-कोई ठेकाणे पण वेसाण चरियाइ- पोतानी खाए चालवू, सरस आहार करवो, अति उजव वेश पहेरवो, परपुरुपने नोगवई, जोबननो लान मानवो, इत्यादिक वेस्याना जे चरित ते प्रते धुणंति-स्तवे अथवा वखाणे,अपि तु नहोज वखाणे केम के जो तेना वरखाण करे तो कलंक लागे. तेम जे सत्पुरुष ते थविधिनी श्लाघा करेज नही केमके,जो करे तो तेने उत्सूत्रनो कलंक लागे.५७ अवतरण- पूर्व गाथामा अविधिनी प्रशंसा ते जिन अझाना नंगनो हेतु हो वाथी तेनो निपेध कयो, हवे ते जिन आझाना नंगनो नय कोईने होयवे ने को ईने नथी होतो ते कहे रे.- मूल.- जिण आणा नंग नयं, नवसय नीयाण होइ जीवाणं ॥ नवसय थनीरुयाणं, जिण थाणा मंजणं कीडा ॥५॥ दोहा- नवनयथा यति नीरू जे, थाण नंग नय तास ॥ नवनयथकीथनीरुने, थाणा नंग न हास ॥ ५॥ ॥ व्याख्या - नवसय नीयाण-नवसतनीत एटले नरकाहि कना शेकडा नवथकी वीहोता एवा जीवाणं-- जीव जे तेयोने जिण्याणा नंगनयं-- जिन थाझाना नंगनो नय होइ--याय ; कैमक, ते नवसत नीत जोव एवो विचार करे के जो राजानी थाझानोनंग कखो होय तो बंधादिक थने पष्टी शतक - एम पुरण काशियग्गी, जहास सुर धम्ममि ॥ ६ ॥ दोहा -- करवु पर उपहास | उपहास करगोन-ते कुन पमृयाण-कुन प्रमृत एटले कुनीन पुरुषोने थयुन-थ ६५४ क प्रकारना उखनी प्राप्ति थायडे, तो जिन थानो नंग करवायी जीव निभे करो नरकादि चार गतिमा प्राए अनत कालसुमी अनत दुख जोगवे तेमा शु कहेवु । माटे जिन थाज्ञाना नगनो नय सत्पुरुष नवसतनीतने होय, थने न घसय अनीरुयाण-जे नरकादिक नाना शेकडाथकी नयी बोहोता एवा जे जीव तेयोने तो जिण प्राणानजल कीमा- जिन थाझानो भग करवो, तथा विराध | वु ते कोमारूप ते एटले एक दासीरूप ले ॥ ५ए । यवतरण - पूर्व गाथामां का के, जे जीवोने नवनी नीति नथी ते निन थाहाने विराधे , एयी एम न जाणवु के, जे शास्त्रोयो अजाण होय ने तेन चिराधे , अने जे जाण होय ते नया राधता स्तुि शास्त्रना जाण दोय वे ते पण कोई उष्ट कर्मना उदयथी जिन याज्ञाने विराधे एमा काई थाश्चर्य नयी ते कहे ने मूज - को असुश्राण दोसो, ज सुध सहियाण चेपणा ना ॥ fr ही कम्माणजन, जिणोवि लको यसति ॥ ६० ॥ दोहा -जोनसि स्तुत युत्त चे तना, किसो यस्तुतनो दोप। धिर धिग् कर्मनकू यदा, सनय थलन जिन पोस॥६॥ व्याख्या - सुश्र सहियाण-श्रुत सहित जे लोक , तेउने एटले घणा सिद्धांत ना जाण लोकोनी ज-जो चयन-चेतना नाशने पामी एटले जिन श्राज्ञानी अक्षाने थनाये थनिनिवेश मिथ्यात्वना उदये करी चेतना विपरीत पणाने पा मी तो थसुयाण-श्रश्रुत लोकोनी एटले जे जिनोक्त सिखात नल्या नथो एवा। लोक ले तेनो को दोसो-शु दोष कामाण-कर्मने बिहि-धिक धिक्र थाd एटने पर्मने विकार वे जयो-जे कारण माटे जिणोविलो-जिन एटले तीर्यकर, पाम्या उतां पण थनमुत्ति-थण साध्या अथवा अण पाम्या जेवु युज मात प्रमुखने, ते सत्य के कम, सिक्षातमा कयु ले के, मनुष्य जन्म थने मि दति सानन उनन ने ते कदाच सानले पण सानजीने तेनी अक्षा श्राववी पग्म उनन केमके, मोक्ष मार्ग सानजीने पण घणा नष्ट थाय ते ॥ ६ ॥ यातरण - पूर्व गायामा कर्मने विकार होजो एम का,माटे कोईनो उपहास करवा नही ते कढ़े - मून --इयराणरि उपदास, तम जुन नाय कुटा पसूयाए । ने ते ययुक्त निनदास ॥ कुन प्रमृतक यगनि ले धरमपि जो दास ॥ ६१ " नाय-हे नाई ऽयराणरि उपहास-उतर सामान्य नीच लाकोना पण ध्याग्मा पष्टीशनक. ឪឬឬ एम कहने- - हुन नदिन--तथा तुम धम्ममि-निमत काय मत दित धर्म विनया धर्म दो बान-शानी लोकोने जे दाम्य धा ने एन-ए गावगी-बनायीन बायः एवां शोक मिले कमक. दाम्य ने त क्रोधा नरायन शारण वे ते कोड पूर्व नंचित नए चान्त्रिनं बाजी जन्म को नाग्वे ने. जीवनं मात्र उन्रष्ट चनंत काल यो कुंनसग्ना वाकनी पवे नंगार कांतारमा नमाने. मांटकांनी उपहास ग्यों नहीं ॥ १ ॥ प्रकरणः-- पूर्व गाथामा कार्य शुरु धर्मनो उपदान करते अज्ञानी , तेने पण जे सुमण नुजन दोध ते. परम हित देवानी या म.न.- टोनी जिपिट गयणे. संतांनी जाण मिठ पायन्मि ॥ ताणपि तुम दिय पा. परम हिय दाउ मिति ॥ १२ ॥ दोहा - मिच्यात्वे नंतोष जत, जिन पर पचने हेप ॥ ततु पाण सु मनादिए. परम सहित उपदेश ॥ ६ ॥ ब्यारन्या.- जाण-- जेन्याने जिणिंद बयणे-जिनाना हान्य कपायाटिक टोप वर्जित वचन, नेयोनधिपं दोसा-ए वर्ने ते थन मिपावंमि-हिंसा जाव मिथ्यात्व दर्शन शल्य घटार पाप तेनधि संतोसो-संतोप बनने एटले प्रसन्नता वनें वे, ताणपि-तेयोने पण मुम हियया-निर्मल ने हदय जेयोना एवा पुस्प ते परम हियं दान ति-सम्यरु झान दर्शन चारित्र मोदना उपायरुप परम हित देवाने वेवे ॥६॥ यवतरणः-पूर्व गाथामां कायु के, जिनधर्मनो देषो थने मिथ्यात्व पापनो थति गनी होय तेनी ऊपर पण उपकार करवो तेनु कारण गुं? ते कहे:-- मृत-यहवा सरल सहावा, सुथा सब दंति यवियप्पा ॥ पहुंत विसनरा रावि, कुवंति कस्स जीयाणं ॥ ६३ ॥ दोहा:- सरल स्वनावी स्वजन व्है. नि विकल्प सब तार || मसित साप उपर थपी, करे कृपा क्या थोर ।। ६३ ॥ व्यापा.-घहवा-थथवा सरल सहावा-सरल एटले निष्कपट स्वभाव ते जे श्रोनो एवा जे सुअणा- सुजन एटले संत पुरुप ते सब-सर्व स्थानकनेविपे थवियप्पा-उष्ट रागदेष विकल्प रहित हुँति- होय. एटले शत्रुमित्रनेवि सम चित्तवी होय. ठद्धतविसनराणवि उजीहाणं-मूको दीयो डे अथवा वमनकस्यो ठे मुखयकी विपनो नर एटले समूह जे विजिन एटले सर्प तेयोनी कपर पण करुणे-करुणा एटले दया कुएंति-करेठे, त्यारे बीजानी ऊपर दया करे तेमां ते शुं कहे! यही सर्प समान उर्जन श्रने विष समान तेयोनां सुर्व जे . जेणे, एवा हवे उत्सूत्रनो निषेध करवो ते कहे। -मूल-नसय न पर कोवा ज नीय, दोहा- किमहिन उत् श्रुत नापवु, उत् श्रुत नाप्यु जोय ॥ ता सहि बूडिस नो बुदिए करीने न-उत्सूत्र न बोलवु, पर-गुर्वादिकनी अपेक्षाए करोने न-न त्सूत्र न बोलवु वा-यथा कोण जाणे केमले केम नथी। जिनागम थति ग नीरार्थने, विधि जोता तो तीर्थनो नछेद याय, माटे जेम चाने तेम चनाया। रे जीव, जा-जो उसुत्त नासण-उत्सृत्रनु नापण एटले कथन विहिय-कर। पष्टीशतक चन जाणवा एवा उर्जननी कपर पण जेने दयानाव वठे एपा सडा- हित करवानी श्छा केम नही करे । थपि तु करेज ॥६३ ॥ अवतरण - पूर्व गाथामां श्रावकनु सम्यक्त्व दृढ करवाने कथन कस्यु साधुनु सम्यक्त्व का नही तेथी एवो विचार थायवे के साबुने सम्यक्त ते शका दूर करवाने कहेठे - मून - गिहि वावार विमुक्के. बहु मुणि लोएकि वि सम्मत्त ॥ बालवण निरयाण, सहाण नाय कि नणिमो ॥ ६४ ॥ दोहा गृह व्यापार रहित घणा, मुनि पण समकित हीन ॥ इह साजबन आचकू का ये किसु कुनीन ॥ ६ ॥ व्याख्या - गिहि वावार विमुक्के-गृहस्थ सबधीर गार कर्मादिक अनेक प्रकारना व्यापार कुव्यापार यकी विमुत्त-रहित एटले व्येकरी गृहस्थना व्यापारेकरी रहित एवा जे बहुमुणितोगवि-घणा जे साधुजन तेउनेविषेपण नवि सम्मत्त-सम्यक्त्व नथी तो मालवण निग्याण-माता पिना नो श्राग्रह, पुत्र कनत्र वातादिकनो मोह, श्रेष्टादिकनी दाक्षिणता इत्यादिक जे थानबन तेनेविषे निरत-तत्पर एटले पूर्वोक्त श्राजबनोएकरी कुदेव कुगुरु तथा कुधर्मने से पता एवा जे सहाप-नाममात्र आवक तेजनेवि सम्यक्त्वनी प्राप्ति नो नाय-हे प्रात, कि नणिमो-शु अमे कहिये ? केमके जो गृहस्थ व्यापारया लबन रहित इव्य मुनिनेविषे सम्यक्त्वनी नास्ति ले, तो पुत्र कत्रादिक थने थालबनोएकरी सहित व्याकुल एवा जे नाम श्रावक तेउनेवि सम्यक्त्व केम होय' थपि तु न होय ए नाव ॥ ६४ ॥ अवतरण-पूर्व गाथामा सम्यक्त्व पामवानो उद्यम प्रथम करवो एम देखाइयु, उसुत्न नासण घिहिय । तावुहिति निप्प्रतं, निरउय तवफडा डोर नव्य तू निरर्थ जप तप होय ॥ ६५ ॥ व्याख्या- सप-स्वयमेव एटने पोता जवु एम जे बोन ते उत्सूत्र, इत्यादिक उत्सूत्र बान नही तया कापा-कोप यो उपनवणया मान माया लोन हास्य नादिकथा उत्सूत्र न बानव जीय- - पष्टी शतक. ६५७ ता-तो संसार समुज्नेविपे बुड्डिसि-तुं बुडीश. निनंत-निश्च तवफडाडोवं-तपनो फटाटोप एटले आमंबर ते उत्सूत्र वोलवाथकी निरधयं-निरर्थक , एटले फो कट . माटे तपक्रियाए करीने संसारथी तूं तूटवानो नथी. ॥ ५ ॥ अवतरणः- पूर्व गाथामा जेने जिनवचन परिणम्या नथी तेनुं स्वरूप कह्यु, हवे जेने जिनवचन परणम्या वे तेनुं स्वरूप कहेते:- मूलः- जह जह जिणिंद वयणं, सम्मं परिणम सुम हिययाणं ॥ तहतह लोथ पवाहे, धम्म पडिहाइ नड चरियं. ॥ ६६॥ दोहा - जिम जिम जिनवच सुमनने, प्रगटे सम्यक् प्रकार। तिम तिम लोक प्रवाहमें, धर्म नाति नट चार ॥ ६६ ॥ व्याख्या-जह जह-जे म जेम सुम हिययाणं- निर्मल हृदयवंत पुरुपोने निशिंटवयणं-जिनेश्नां वचन सम्म-सम्यक् प्रकारे परिणमश्-परिणमे वे एटले थत्यंत रुचेते, तह तह-तेम तेम लोअपवाहे-लोक प्रवाहने विपे धम्म-जे आपमतिनो धर्म से ते नडचरि यं- नट चरित एटले नटना खेलनी पते तेने पडिहाइ- प्रतिनासेठे एटले देखाय ते, तेवा पुरुपोने सम्यक्त्व यायः॥६६॥ अवतरणः- पूर्व गाथामां जिने वचन याश्री कडे ; हवे तेनुज दृढपणे क थन करे.- मूल.- जाण जिकिंदो निवसइ, सम्म हिययम्मि सुझनाणेणं ॥ ता ण तिथं व विराय, समिव धम्मो जो सयलो ॥ ६७ ॥ दोहाः- शुक्ष ज्ञान कर जसु हिये, सम्यक वशो जिनेश ॥ तमु धागे तृण जिम दिपे, मिथ्या धर्मि अोप ॥ ६७ ॥ व्याख्या - जाण हिययम्मि-जेना हृदयनेविपे जिमिंटो-जिने तीर्थनाथ सम्म-सम्यक् प्रकारे सुक्ष नाणेणं-निर्मल झाने करीने निवस- बसे वे; ताण-तेने सम्मित धम्मो-मिथ्या धर्म सहित एवा जे सयलो-सकल जो- लोक ते ते तिपंव-तृणोनी परे अकिंचित्कर एटले का हित वल फरवा समर्थ नथी एवो ते मिथ्यात्वी लोक विराया-विराजे ठे, नासेठे एटले देखायठे. ॥६॥ अवतरणः- पूर्व गाथामां जेना हृदयमां सम्यक् प्रकारे जिनें। देव वोचे ते जिनधर्मयकी चलायमान याय नही, एम देखाढयु. हवे तेथी जे इतर वे तेनुं स्वरूप कहे। - मूलः- लोय पवाह समीरण, उदंम पयंम चं लहरीए ॥ दट सम्मत्त महावत, रहिया गुरुयाविहन्नति ॥ ६७ ॥ दोहा.- लोक प्रवाह पवन उदम, चंम प्रचम लहरेय ॥ दृढ समफित यति बलविना, गुस्था पण दल्लेय व्याख्या.- लोय पवाह समीरण--लोक प्रवाहरूप पवन, तेने उबंट- थागम विरु६ यतां वचनरूप अति गनी एवी पयंम-प्रचंड उखदायक क्रोध ८.

जीप मिram नियमिशिदाम ॥ थप्पादिन याणलि नया कण मिय्याट कानिना दोष जुरे गु यार । नदि ना/ वना नपा-सातगगनाचनया नागायन मम्मन-सम्वन - कायनगम दपा पाया पमाय ययगानणाय 7 पणम cिam-याना न मिय्याटटिन नाना दाम-जिनमनना हीरनादिर 7-नया नागना जयनर र इय्य या जिनमन थाश्रानजिनमनन।। ៩បថ្មី पाटी शतक ना वचनरुप माहोमाहे मलेजी श्रेणी जे चम-रो अतिशय जयकारी एवीस हरीए-सहेरीयोएफरी प्रेस्सा उता एवा, वली टढसम्मत्त महाबल रहिया-दृढ स म्यक्त्वरूप महा बलेफरीने मोटा पराक्रमे करीने रहितठता एवा गुरुयावि-वा ह्य गुणेकरीने मोटा पण ते हन्नति-हालेने एटले मोलम मोजा थायठे थमुरु एम कहे, थने श्रमुफ एम कहे। तेमा कोनु वरु मानिये' थानु के पहेनानु । करिये एवीरीते मातम मोजा यायचे पण तत्व निचे करी शकतो नथी ॥६॥ थरतरण - पूर्व गाथामा लोक प्रवाहरुप पवननी लहेरोएकरी जे प्रेखा होय ते यतानी दायडे, एम कयु, हवे तेनु स्वरुप कहे - मून - जिण मय जब तीनाह ज स पाउणति थन्नाणी, नाणीण सनरित्ता, नएण हियय थरार ॥ ५॥ ॥ दाहा- जिनमतनी निदा करी, जो अज्ञानि उव पाय ॥ ते सानरि पानी तणा, नय करि कपे काय ॥ ६॥ ॥ व्याख्या -जिणमय लमहीनाए-स्या दादनी मात्र दीननाए करी थन्नाणी-अज्ञानी जीव ज पुरक-जे सुख ने पानि-पाम न पपने मनग्निा-सनारीने अथवा न सनरिता-ते उस न ममगन नाणीण-दान गन पुम्पानु नाग-नयेफरीने हियय-हृदय थरघर पर न वानी जोपनी कपर अनुपा श्रावे ठे बन पात पण तिनमननी हानना थी वणुज बी ने नार | Fa' || प्रातरण - पूर गायामा जिनमतनी हीना ग्याथी अज्ञानी नीरज पुग्यने सामने न पन याद कराने झानी पुस्पनु हृदय नये करीयर थर कप ने राम कम TRETनानाथशानीना दापने जाता नयी न कहने-मन- नार श्रना पा पा पापमान पायन . पारन 2 मन्ति पार ॥30॥ याम्या -+जार-द नय नार प्रता न - नियमि-नुग, नु नारीयपाधि-धान्मान पण हि नया - ना का नया सणाप पाम्या, एम गुनु नया जाणता? मन यया नाय नहा ॥10॥ ययात पाटीदानक. दए - अवतरण-पूर्व गायामां कष्ट करीने सम्यक्त्व जणाय ने एम कडं, त्यारे निय यगंका की कं, गोत्र देवनादिक तथा पानवाक्नेि पूजतां लोवृत्तिए क नने काएक यशी जाय नेमां गुं दोप ? या तो शुभ जिनधर्मनी ? एनो उनर कटने - मृत - मिउन मायग्तवि. जे ऽह वंनि मुम जिण धम्मं ॥ तेग उगवि जण. जुनं नि योगई ३१ ॥ दोहा - याचरता मिथ्यात्वने, जे वा बन जिन धर्म । ज्वर पाटिन नं पय पिया. वां विरुन विगर्म ॥३१॥ व्याख्याः- मियन मायग्नवि-कुच. गुरु, कुधर्म मेवनाप मिथ्यात्वने श्राचरतां अथवा से वनां लोकनी वृनिए करी कोशाक दिवने पण जे-जे पुस्र इह-या जगतनेविषे नु जिणधम्म-निर्मल जिन धर्मन बनि-चांव ते. ते पुस्प जरा-स्वरे करी ने एटने तापे करीने बनावि-यम्न एटले पीडाता यका पण खीग-दीरादिकम ते नुनु-ग्वावाने वंति-वंडे, एवा न्याय करते. एटले जे मिय्यात्वपते सेवतो यको जिनधर्मनी वा करते ते करवु तेनुं सर्व नव उखने यये वे. ॥ १ ॥ अवतरण - पूर्व गाथामां मिथ्यात्वने याचरतो तो पण जे जिनधर्म कर वानी हा करते. एम कडं. हवे तेना टोप देखाढता उतां दृष्टांत सहित दाष्टांत क्ने.- मून:- जह के सुकृत वगुणो. सीतं मयलंति जिंति कुन नामं ॥ मि उत्त मायरतवि, वहंति तह मुगुरु करतं. ॥ ३२ ॥ दोहाः- जिम केक सुकुन वधू. व्रत हत नियकुन नाम ॥ याचरता मिथ्यात्व तिम, वहे गुरु यनुगाम.॥ ॥ 3 ॥ व्याख्या - जह-जेम के कोर्डएक मुकुन वदुणो-सारा कुलमा उत्पन्न थएनी स्वीयो सीनं मयलंनि- थंग उपांग गोपीने राखवां, पर पुरुषोनी लायें वातो न करवी, यनि उनट वेप न पहेरवो, नीची दृष्टि करी चालवू, कामविका रनी कथा न करवी, घरने वारणे जना न रहेवू, वारी गोखलानी बाहर मुख कहाडीने न जांबु, लाज तथा गरमने मूकीने वातनो विस्तार न करवो. वाजत न मोटq, जाणो जोड़ने वगासा न नाखवां, क्डकडां न कहाडवां, पर पुरुपने प्रेम सहित न जोद्, कार्यबिना कोई सगावाताने घेर पण न जावं, इत्यादिक गीत याचारने मनोन करती तो तितिकुलनाम-सेनापनि, गाथापति श्रेष्टी इत्यादि मो टाना कुन नाम लेती एटले यमे मोटा कुतनी ठेए, एम कहेतीमोटा कुनने कलं कित करे तह-तेम मित्त मायरतवि-कुठेच तया कुगुरुसेवा, अने उत्तूत्रप्ररू पणादिक मिथ्यात्वने थाचरतां उतां पण नामसाधु यने नामावक ते गुरु करत-साधी स्वामी प्रमुख मुगुरुना केडवापणापते वहंति-- वहे। एटले धारण .

६६० पष्टी शतक. करे थर्थात् पोते उत्सूत्री थनाचारी ठता सविज्ञ गीतार्य सुगुरुना केडवापणाने धारे ते उलटं थाचारवत गुरुने उत्सूत्री थनाचारी लोकमाहे प्रसिद करे पण ते बापडाने अज्ञानने वसे खवर पडती नथी ॥ २ ॥ अवतरण -- पूर्व गाथामा मिथ्यात्वनु थाचरण करता घणा दोप लागेठे एम का, हवे उत्सूत्रविपे वात कहेते -- मूल -- उस्सुन मायरतवि, व्वति थप्प म साय गनम्मि ॥ तेरुदरोरघनधि, तुसंति सरिस धनहि ॥ ३ ॥ दोहा-थाव रता उत्सत्र जे, माने यापसुसह ॥ राइ दरिदे ऽखि ते, तुले साथ सुधन॥३३॥ व्याख्या --उस्सुत्त मायरतवि-अविधिए जिनपूजा सामायक पडिकमणाविक उत्सूत्र प्रते पाचरता उता पण एटले सेवतां थका थने जे सुसावगत्तम्मि-सुश्रावकपणा नेविपे अप्प-पोताने विति- स्थापेठे ते-ते पुरुप शु करे । रुदरोरगउविरोध रोरेकरी एटले अतिशय दारिदे करी ग्रस्तता पण एटले पीडया थका धने धणदेहि सरिस-धनाढ्यनी साथै एटले महाधनवाननी साथे तुलति- तुलना कर ने, एटले पोतें दारी बता धनाढयनीसाथे बरोबरीपणु करेवे ॥ ३ ॥ अवतरण - पूर्व गाथामा उत्सूत्र बोले ते मूढ कहेवाय एम कयु, हवे जे मूढ होय ते न्याय जाणे नही ते कहे - मूल - किवि कुल कमम्मिरनो, किवि रत्ता १६ जिणवर मयम्मि ॥ इय अंतरम्मि पिचह, मूढा नाय न जापति ॥ ७ ॥ दोहा -- केश कुलाचारे रता, के रत जिन मतमाहि ॥ जयो नात इति अतरे, लखे न्याय सव नाहि ॥ ॥ व्याख्या - कवि-केटलाएक पु रुप ते कुलकम्ममि-कुल कर्मनेविपे एटले सत्य थसत्य विचार रहित, थ विधि मल फलक सहित, लोक प्रवाहनेवि रत्ता-रक एटले थासक्त दे, थने किवि-केटलाएक पुरुपो रे ते सुद जिएवरमयम्मि-निर्मल विधि मन कलकरहित अनेकात स्यावाद जिनवर मतनेविपे रत्ता-रत ने एटले सावधान बे, इय-ए प्रकारे अंतरम्भि-पुरुपोमा प्रगट AT GHI कुजक्रम मिथ्यात्वनेवि जे रक्त ते थविवेकी, थने शुद्ध जिनमतनेवि जे रक्त ते विवेकी, ए प्रकारे पुरुषों मां प्रगट थतर २ ते मूढा-मूढ ज्ञान विकल प्राणी नाय-न्यायने नयापति- नयी जाणता एटले कुजक्रम ने ते ससारनो हेतु , युजिनेइमत ले ते मोट नो हेतु ने ए खरे खरो जे न्याय तेने नयी जाणता पिल-हे श्रोतायो तमे जुयो ए केटली यावर्यनी वात । ॥ ४ ॥ थवतरण - पूर्व गाथामा कह्यो जे न्याय ने विपरीतपणे जाणीने कोई एक पष्टी शतक. ६६१ जीव मिथ्या दृष्टि पाखमोनो संगमात्र मूके पण तेणे कहेलो धर्म मूकी दिये नही ते अयुक्तपणु वे एम कहे वे.- मूलः- संगोवि जाण अहित, तेसि धम्मा जे पकुवंति ॥ मुत्तूण चोर संगं, करंति ते चोरियं पावा ॥ ५ ॥ दोहा.- अहि तकारि जसु संग पण, जे तसु धर्म करेय ॥ चोर संग तजि चोरिने, करै पापिन र तेय ॥ ५ ॥ व्याख्याः- जाण-जे मिथ्यादृष्टि पापमोचनो संगोवि-संगपण अहियो-यहितकारी ठे, जन्म जरा मरणादिक उखने देवा वालो ते; तेसिं-ते मिय्यादृष्टि पारखमी लोकोतुं कथन करेलु थापेटु जे धम्माइ-पाप नवमी चामुंडा कालिकादिक पूजना प्रमुख धर्म तेने जे-जे पुरुप पकुवंति-यतिगय करीने करे वे ते पावा-पापी जुयो शुं न्याय करे ! चोरसंग-चोरना संगने मुत्तूण-मूकीने एटले सूली धारोपण, कान नाशिकादिक ठेदन जेमां कांक संशय हतो ते चोर नो संग मुकीने तेना संगथी संतोप न पामीने पाप मति ते चोरी-चोरी पणा प्रते करंति- करे ; एनो नाव-जेमां शूली देवानो अथवा कान नागिकाटिक छेदन क रवानो काई पण संशय नथी एवीजे चोरी तेने करे वे जुवो ए केटलो यज्ञान वे. अवतरण-पूर्व गाथामां मिथ्यात्वीना धर्मनी स्थापना करे ते पापी कहेवाय एम का, हवे तेज वात विशेपे करी कहे वे - मूलः- जच पसुमहिस लरका, पत्वं होमति पाव नवमीए ॥ पूर्धति तंपि सहा, हा दीना वीयरायस्स ।। ७६ ॥ दोहाः- पातक नवमी पर्वमें, पसु मरता जसु पास ॥ तेने पूजित श्रार जन, हा जिन हेला हास ।। ७६ ॥ व्याख्याः- जठ-जे स्थानकनेविपे तया जे चामुदा कालिका ज्वाला प्रमुखनी थागज़ पाप नवमीए पवं-पाप नवमी गुछ बासु चत्र संबंधी नवमी तिथी प्रमुख जे पर्व तेनेविपे पनुमहिस लरका लाखो गमे पशु ना ग वोकडा महीत पामा उपलदण्थी मनुष्य सूरुरादिक होमंति-हामाया जाय ते, मगया जाय , रुधिरना कर्दम थाय . नपि-ते चामुंमादिक देवीयोमते महा- कुन कमथी चालतुं थावेलुं ग्रहण कग्यु रे जिनमत जेणे, ते श्रावक लोक पूयं ति-पूजे के, हाथ जोडे , मस्तक नमावे , नवेद्याटिक बडा ने, जे श्रावक ना म धरावीने एम करेले ते हा-इति ग्वेदे करी वीयरायरल-चीनगग देवनी दोजा- होनना एटले निंदा करे यथवा कगवे ने ; मिथ्यावी लोक एम बोले जे जगाक, रुधिर पी पण जे मरे, एक कीडाना मरवायी वोहे, एवा श्रावक लोग धारी धावीने धमारी चामुंमा देवीने पूजे ने माटे जनना देवयकी प्रमाणे चामुंटादि -

No text on this page.

पटी शतक. तं. सगळं कहँति केवि धुरि धवला ॥ तह मिबाउ कुटुंब, इह विरला केवि कई ति ॥ ७॥ ॥ दोहाः- जिम कादव खूतो शकट, कालै केक धोरि ॥ तिम कुटुंब मिथ्यात्वथी, काढ़े केश सजोर ॥ उए ॥ व्याख्या:- जह-जेम केवि केटलाएक धु रिधवला-प्रधान वृपन ने ते घालम्मिखुतं-थति कादवमां खूतेलु एबुं जे शग- शकट एटले गाहुं तेने कद्वंति--कहाडेठे तह- तेम इह- या दूसम था रानेविपे के विविरला- केटलाएक विरला हलुकर्मी आसन्न सिदि कदाग्रह रहित पुरुप ते मिवायो-पूर्वोक्त मिय्यात्वरूप कादवमाथी कडुवं- पोताना पुत्र क सत्रादिक कुटंब परिवारने कहृति-कहाडेठे, थने जिननापित धर्मनेविपे जोडे पण सर्व प्राणी जोडवा समर्थ नथी. ॥ ७ ॥ यवतरण -- पूर्व गाथामां मिय्यात्वमां पडेला जे कुटुंब तेने कोई विरला पुरु प कहाडे पण वधा कहाडी शके नही एम का, पण जिनदेवने जोवाथकी सर्व जीव सम्यक्त्व पाम ते शंका निवारण करवाने वास्ते कहेठे.- मूल -- जह व दलेण सूरं, महियल पयडंपि नेय पिरति ॥ मिवत्तस्स य उदए, तहेव न नियं ति जिण देव ॥ ७० ॥ दोहा:- जैसे महितल प्रगट नी, घन युत रवि न दि खाय ॥ तैसे उदय मिथ्यात्वके, नहि दीसत जिनराय | G० ॥ व्याख्याः- महि यल पगडंपि सूर-घट पटादिक वस्तु देखाडवाथकी महीतल पृथ्वीमंमलने विपे प्र गट एवो जे सूर्य, तेने पण जह-जेम वदलेण-वाटलाए करीने एटले मेघ घटाए करीने लोक नेयपिउँति-नया देखता. तहेव--तेमज मित्तस्सय उदए-पूर्वोक्त मिथ्यात्वनो उदय ययो उतां जिणदेवं-जिनदेव प्रत्ये लोक न नियंति-नथी देख ता, च शब्दयी सुगुरु तथा सुधर्म प्रत्ये पण नथी देखता, जेम वाढलाएकरीने सू र्यनो विब देखाय नही, तेम मिथ्यात्वना उदयथी सुदेव सुगुरु देखाय नही वादल खशी जाय त्यारे सूर्य देखायवे; तेम मिथ्यात्व टल्याथी जिनदर्शन थाय वे. एटले त त्वयकी जिनटेरनुं स्वरूप उनखाय ए नाव; पण वोजीरीते नही एम जाणवू. ७॥ यवतरण -- हवे मिय्यात्वनो उदय थयायी जीव मिथ्यात्वनेविपे थासक्त था यठे, अने गुणी पुरुषनेविपे मवर करे ठे, एवा जीव यायज नही तो सालं ते कि सोपि जणणि जायो, जागो जणगी कि गयो विहिं॥ज ३ मितरयो जायो, गुणेसु तह महर वह ॥ १ ॥ दोहा -- किम ते जायो जानिये, जायो तो किं पुष्ट ॥ मिथ्या मगन थयो जदी, तिम गुण महरि उष्ट ।। ॥ ७९ ॥ व्याख्या.-- कि-युं सो-ते थपिनिचे जणणिजायो- यो, कहे।

•वेस्या ब्राह्मण नाट डुब, जदसिद इन काम। नु स्यानर ने एटले वेम्या चारण नाटादिक सरिखा जे मिथ्यादृष्टि देव देवीचोने मते मिथ्यार देर देवीना न्यागी ठे, वदन नमस्कागदिक थादर पण म. माटे विरनि पुस १६ मार्गनेरिपे मुग्वे चाले ते कोने-मृज-सुमणे थरताण-पूर्व गायामा पिरनि पुरुपोयमी मिय्यादृष्टि देवता दर जाप एन गया,सुहण गनिए मगमि॥ जे पृण यमग्ग जाया,मग्गे गानित चुप्प, पष्टीशतक जगणी-जो माता ए जायो-जन्म्यो तो ते विधि-वृदिने कि कम गयो-पा म्यो' एटले ते पुष्ट केम थयो। एम केम कहेवु पड्यु। जह-जो मिलरयो-मि घ्यावनेविपे रत एटले यासक्त एहयो जायो-ययो वली जो गुणेसु-सम्यक् ज्ञान दर्शन चारित्रादि गुणे युक्त जे पुरुप तेनेविपे तह-तथा समुच्चय थर्थनेविषे महर-मगर र्या एटले पनाव प्रत्ये वहा-यह, करेएटला वास्ते हे शिष्य, कहघु पडयु जे ते माताए केम जन्म्यो । थने जो माताए जन्म्यो तो केम ते र दिने पाम्यो। केमके पूर्वोक्त जे लोकिक लोकोत्तर मिथ्यात्व, तेनेविषे पोते प्रत्र नि कयाथी परने प्रवृत्ति कराव्यायी थने गुणी पुरुपनेविपे क्षेपबुद्धि करायी पाए धनत नवन्रमण वजी कुपुत्रनी माता पण प्राए सारी होती नथी, कदार मोऽसारी दोय तो कुपुत्रने जोगे माताने मलिनता यावे माटे कुपुत्र नजन्म्योजसारं यवतरण - पूर्व गायानो थर्थसानलीने कोई वोल्यो के, देव तथा देवी प्रमु म थापणने कोई उपाय करे नहीं माटे मानीए ए ते शका दूर करवाने कहे। मन - पेसाण बदियाणय, मादण ढुंबाण जस्कसिरकाण ॥ नतानरकहाण, ति पात निदरेण ॥ ७१ ॥ दोहा नद ज्या मनगत ने, रितीयी अगाय ॥ व्याख्या-येताण-वेन्या नो यदिपाणचारण नाटादिक लोकोनो माहण डुवाण-ब्राह्मण लोगोनो ईबो नो, जाफ निकाल-जE प्यतर देव शेप गणेशादिकनो एटले मिथ्या दृष्टि ददी देतायोनी ना-ना या सेवक के तेज तेयोनो नरकवाण-लक्ष्ने माग घी नह मागेन पण पिरयाण-रिति पुस्पोयको दृरेण-दूर जति-जायने एक करता नयी तेयकी ते देव देवी दूर जायते ॥ २ ॥ ४.५३ ॥ दोहा - मुष समाग पन, थया मगजेय ॥ जात मागीमा में बने यवान तय व्याया- मुझे मागे जाया-शुहमार्गभित्र नया टने जे पागल माधु प्राना कुलनविष उत्पन थपात पष्टी शतक. ६६ जीव मुह मग्गम्मि-सम्यक् ज्ञान दर्शन चारित्र रूप निर्मल जे मोक्षमार्ग तेनेविषे सुहेण-सुखे सुखे गहंति-गमन करे. एटले जायठे, एमां काई थार्य नथी. पुण-वली जे-जे प्राणी श्रमग्ग जाया-कुमार्गनेविपे उत्पन्न थया ते एटले अन्य दर्शननेविरे तथा उत्सूत्र नापी उन्मार्गे चालनार नानास नन्हव पासठा योस नाटिकना कुलनेविषे उत्पन्न घया ते जीव मुगुरुना मुखनी वाणीसांनलीने मग्गे- मोदमार्गविपे गढ़ति-गमन करे यथवा जायचे. तं-ते चुव्यं-बाश्चर्य ॥३॥ अवतरणः- पूर्व गाथामां कडे जे कुमार्गनविपे उत्पन्न थया त मोहमार्गे चा से ते मोटो आश्चर्य वे. एवं सांनतीने कोई कहेशेके एमां सुं श्राचर्य ? ए थाशंका दूर करवाने कहे:- मूलः-मित्त सेवगाणं, विग्यसयाईपि विति नोपावा ॥ विग्य लमि विपमिए, टढ धम्माणं पपनंति ॥ ४ ॥ दोहा:-मि ध्यालोके विचन सत, पण बोलत नहि मुष्ट ॥ पडे विधन लव धर्मिके, तो नाच श्रय पुष्ट ॥ ४ ॥ व्याख्या.- मिउन सेवगाणं- मिथ्यात्वनुं सेवन करनार, पट ले कुदेव कुगुरु मिथ्यादृष्टि देवी देवताना पूजनारने विग्यसयाइपि-रोग सोग न य कष्ट मरणादिक डोकडा गमे विन थापळे, पण ते गेरुढा विनोना समूद्र प्रत्ये पावा-जे पापी मिथ्यावी लोक ते ते नो-नथी विति-बोलता यने दधम्मा ए-दृढ धर्मी पुरुपोने विग्य सवंमि विपडिर-सवमात्र विन्न पट्याथी पण एटले लगारेक खास श्वास स्वरादिक थयाथी पण ते पापी मिच्यादृष्टि लोक पणनि- थतिमय करी नाचे थथवा कूटेठे ; दृढ धर्मी पुरुषोनो थवर्णवाट बोनेने माटे जे कुमार्गनेविपे उत्पन्न थ ने शुभ मार्गनविपे चाले ते मोटो याची जाणयो. केम के कुमार्गमा उत्पन्न बने सुमागे चाले एवो संनव थनो नयी. ॥ ४ ॥ घवतरण.- पूर्व गाथामां कयु के जे पापी लोक ने त हट धर्मी पुस्मोन त गारेक विघ्न पडे ते जोड्ने नाचे; क.मकतेपोत उन्मार्गनविप उत्पन्न यया एवं जापता नथी ते कहे - मून-सम्मन मंजुयारा, विग्यपि न दोऽपय मरिया परमुछपपि मिठ. संध्यं च महाविधं ॥ ६ ॥ दोहा.- समष्टी पिय न पण, अंदर गरिखो होय ॥ धनि र निभ्यान्द सन. महा नि नय गंप ॥ ५ ॥ व्याख्या- मानन नंख्याएं-गमन्द मदिन पुराने रिपित-मा रणाटिप दिन प निमको उसनहि-समयना दो-चाप मलयवान मालीवालोरनपिनन ननादिर शेतीटानी शं. मरीन प्रधान यानिन पा. माटतंन मानादिर मत थवतरण-पूर्व गाथामा का के, कठगत प्राण उता पण सम्यक्त्वनो त्याग करता नथी एहेतु दृढपणु होवानु कारण शुठे ते कहे - मून-उडति निय| जे मोक्ष्नो थर्य ने ते नियय जीय-पोताना जोषितने एटाने यायु तथा प्रार ने तिपर-तृणनी पठनहुनि-ठामे थथवा त्यागी दियेने नण-पुन एटने वन सम्म-सम्यस्त्वने न-नयी मूकता गुजाणीने नथी मूफता? जीय-नीवित में ते ता पुणावि-पनी पण सप्र-प्राप्त थशे, केमके ज्या सुधीमाद नथी त्यां। फत्ताक्याथो प्रात थाप केमके सम्यक्त्व रत्न हारेन फरीने प्राप्त यत्र यति / लेन एम श्रीनगग का वे माटे पोताना जीवितनो त्याग करत पण मा। पष्टीशतक. - 1 , पवे , श्रने जे मित्त सजुश्र-मिथ्यात्व सयुक्त वे ते परमुधवपि-परम व त्सव उतां पण थइ महाविग्य-अति महा विघ्नन्त वे केमके मिथ्यादृष्टि महा मोह मिथ्यात्व दवानलने योगे सतप्तात्मा होयठे माटे यहीं उखी मरीने पुर्गतिनेविपे जायचे एवी रीते परलोकनेपि पण दुखी यायठे ते उन्मार्गीमा जे उत्पन्न थाय ते जाणता नथी ॥ ५ ॥ अवतरण-पूर्व गाथामां का के, सम्यक्त्ववान प्राणीने विघ्न पण उत्सव जेवो थायठे, ते केवी रोते ते कहे - मूल - दोवि ताण पणमs, दीपतो नियम रिति विधार ॥ मरणते विदु पत्ते, सम्मत्त जे न उड्डति ॥ ६ ॥ दोहा - निज स पतकू हीजतो, नमे इइ पण तास ॥ जे समकित वामे नही पडे मरणकी जान ।। ७६ ॥ व्याख्या - दु-निश्चेकरी मरणतेवि पत्न-मरणात समय प्राप्त उता पर एटले कगत प्राण थया उता पण जे-जे पुरुष सम्मत्त-जिनोक्त तत्व श्रदान सम्यक्त्वने न उति-नयी मूकता ताण-ते पुरुषोने ऽदोवि-देवेश पण पणमर प्रणाम करेते ते गु करतो थको प्रणाम करे ? नियय विविवार-निजक घी एटले पोता सबधी कति समझिनो जे विस्तार तेने हीनता-हीनना करत थको एटले तृण तुय मानतो थको प्रणाम करेठे ॥ ७६ ॥ सा कत्तो ॥ ७७ ॥ दादा - मोक्षार्थी तृण जिम तजे, निज जीवित न समन ॥ जी वित बनि पण पामिये, दस्यु न समकितना व्याख्या - मुरकठिणो- सुमो जारित ताजन्म जन्मनेविपके, पण सम्मान हारिय-सम्यक्त्व रत्न दातु क्नो या सम्यक्त्वना त्याग करता नयी ॥ ७ ॥ यवतरण पूर्व गायामा सम्यक्त्व हारेनु फरी प्राप्त यवु नन क्यु तना

No text on this page.

जन निण प्राणा- जपचन जिन श्राझारा करीनने त चिय-तेवा मम-ने टानी आप जिन श्राझा शिरु जे वचन' सरना-नत्वज्ञान। जाणता पण एयीचीना का तत्वना जाणनथ1030/ पर गायामा राजेश्रय, न प्रगट करगान थथ नपनप: 77 नारायन यापनापकपmने धमयम उतनामा -मदार नानदन निण याणा- जिन यादाशन पटीशतक नीपूया-जज पुष्प चढन धूप दीपादिरूप विधिपूर्वक पूजा ते सम्मत्त गुए सम्यन्त ज्ञानादिक गुणनो कारिणी-करवा वाली तथा सम्यक्त्व ज्ञानादि- प्रगट करवाने कारणनृत नणिया-जिनागममा कही ये साविय- वनी ण या-तीयारनी पुष्प चदनादिरूप थविधि पूर्वक पूजा ते मियनयरि-- प्यात्वनी करनारी णि समये-जिन थागमनेविषे देसिया-देखामी एम पोने श्रदो नइ तीयकरनी विधिपूर्वकज पूना करवी श्रेय रे ॥ ए० ॥ थग्नरण -पूर्व गाथामा जे तत्वने जाणनार होयचे ते विधिपूर्वक जिनपूजाक रेम दरगामय पण एवी रीते तत्वने जाणनार कोण हाय ते क्हे- न त निण थाणाए त चिय मन न मन्नए मेस ॥ जाण सोयपा में न र तन साथ तनपिक ॥ १ ॥ दाहा - जो जो जिन थाझा सहित. सादिन मान नाय | और न मान तत्व नह, लाकिके विदृ सोय ॥ ११ ॥ मृन - TH मन-3 परमानन जन न HT- नया माना II द-निश नायक-नोक प्रगहनेत्रित्र T-TT मा गारनाप मार पदाथ Is पण न-नया नाण-जाणता सा- यान तिमिन नाना पटल ममाति करता ना करे ने rm yामा माणा हियाण फूड यदमुनि ॥ ऽय मुणि दिन' धम्म ॥ ॥ दाहा याणा रदिन श्रम कर a gre न नाण) ग धम जिनाका मार || ॥ ॥ याव्या Ram- बा. कान सम्मा-हमा दयादिकाम प्राणायाण- मान-11 का दिन न पुर तन-प्रगटपण अमन-हिसान नना Tra- या नि-पद समातिन य इय- प्राा वन- -- मन निण. कणय तन जिण या म निनादा निणया रनमा म प्रत्य गट-नमम || नायर नम्वन्दन मा जिन यादगा। मकाराम यना १. पानन्दन नया मानना नया नाणन म धम्म-गुड़ तेने दोप देखाडतां ठतां कहे- मूलः- साहीणे गुरु जोगे, जे नदु निसुषंति सुन धम्मठं ॥ ते उछ विछ चिना, थह सुहमा नवनय विहूणा ॥३॥ दोहाः- नवनय रहित सुनट तया, उष्ट धीउ नर तेय ॥ ठते सुगुरु स्वाधीन जे, गुरु धर्म न सुणेय ॥ ए३ ॥ व्याख्या - ताहीणे-स्वाधीन पएं उतां गुस्जोगे-गुमध मोपदेशक गुरुनो योग समागम उतां जे-जे पुरुष सुद धर्मार्थप्रते एटले विषय कपाय मलरहित सम्यक् झान कियारूप धर्म परमार्थने दु-निये न नथी, निमुति-सांनसता. ते-ते पुरुष केवाठे ? उठवित चित्ता-उट घीउ चित्तवा सा नाणवा एटले रागप मिथ्यात्व कदाग्रह सहित चित्त ते उष्ट चित्त कहिये वारंवार कहिये तोपण कुचाल ठोडे नही ते धीउपएं; ते धीरपणाए करी देत चित्त होय ते धीतचित्त कहिये एवा चित्तवाला यह-यथवा ते केवा ? नवनय विदूणा-संसार चमणरूप संग्रामना नयथकी विहूणा-रहित .

No text on this page.

पाठीशतक. इधर ताराणवि, श्राणा नंगे होऽ मरण उहं ॥ किं पुण तिलोय पहुणो, जिपिंडदे वा देवस्त ॥ ए७॥ दोहाः- एक मर लघु नूपनी, श्राण जंगथी थाय ॥ सुंव ती त्रिनुवन नूपनी, आण हणे कहवाय ॥ एच ॥ व्याख्याः- इयराण ताराण वि-इतर वीजापण ठाकुर सामान्य राजायोनी थाणा नंगेण-थाज्ञानंग करखाथी मरण उहं-मरणादिक ख होश्-होय. तो तिलोयपदुणो-त्रिलोकना प्रनु एटले स्वामी एवा जिणिंद देवाहिदेवस्त-जिनेंइ देवाधिदेवनी माझा नंग करवायी थ नंत जन्म मरण थाय ते दुःखनुं किंपुग-युं वर्णन करिये ! अनंत अरव कहीं श काय नही संविज्ञ गीतार्थनी परंपराथी चालतो धावेलो जे अर्थ, तेने प्रमाण न करवू एटले मानवु नही ते याज्ञा नंग कहेवायठे. । एG || यवतरण:-पूर्व गाथामां जिन थाझानो नंग कस्याथी अनंत उख थायठे एम का, पण जेयो दया धर्मनेविपे उद्यमवान होयठे, तेथोने जिन थाझाएकरी सं थायवे ते कहेठे:- मूल- जग गुरु जिणस्त वयणं, सयलाण जिणाण होइ हिय करणं ॥ तातस्त विराहणया. कह धम्मो कहा जीवदया. ॥ एए ॥ दोहाः- जगहितकर जिनवर वचन, ते कारण नविलोय ॥ तास विराधे धर्म किम, जीवदया किम होय. ॥ ॥ ॥ व्याख्या:- जगगुरु जिएस्स-त्रण जगना गुरु एवा जे श्रीजिनव र, तेमनु-वय-वचन कहे ठे ? सयलाण जियाण- एकड़ियथी लाने जावत् पंचेंघिय सकल जीवोने हिय करणं-हित करनार एटले कल्याणनुं करनार होड-वे. ता-ते कारणमाटे तस्स-ते जिनवचननी विराहण्या-विरावना करवायी एटले सं डना कन्याथी नु-इति वितर्के कहधम्मो-धर्म ते क्याथो! थने कह-क्यांचीपु जीय दया-निज परजीवनी अनुकंपा एटले करुणा थपितु काज नथी; जिनवचननी थाराधनाएकरीनेज चारित्र धर्म थने दया प्रमाण ठे, धन्यथा नथी. ॥ ए || थवतरण:-पूर्व गाथामा जिन थाज्ञानी विराधना कही, ते जिन थाझानो प्रकार देखामतां कहे- मृल - किरियाई फमा मोवं, यहियं नाहंति यागमवि दूणं । मुघाण रंजण, सुझाणं हीजणाए ॥ १० ॥ दोहाः- सूत्र रहित दगी यधिक, किया तो मंमाण ॥ शजु रजण मुनि हीनया, फिरे मृटगत प्राण ॥ १० ॥ व्याख्या -थागम विद्वणं-मिक्षांतोक्त विधिये करीने रहिन धन सिद्धांतमांह नयी कह्यो जे प्रकार तेणेकरीने सहित. एटले मितमा पुष्प ने वेद्याटिक पूजा करवी, फही , ते न काची एम कहे; वजी जिनपूजा सामायक प्रतिरूपणाटिक धर्म फनध्य विधि पूर्वक पर एम ए के. ने जेम तेन पाई;

६७२ पष्ठी शतक. विधि थविध प्रमुखने जोवु नही एम कहे, इत्यादिक जे नत्सूत्र प्ररूपण ते या गम विहीण कहिये, एषु किरिया फडाडोवबाह्य तप नियम व्रतादि धर्म थनु टानरूप क्रियानो जे फटाटोप एटले थामंबर तेने मुनिराजथी अहिय-यधिक साहति-साधेवे एटले करे,जे निन्दवादिक जिगिया तोक चेते, एम करेचे ते शा सारु थामंबर करेले ? मुक्षाण रजए-मुग्ध लोक एटले जिन धर्मना बजाए नोला लोकोना चित्तने रजन करवाने यर्थे, तथा सुकाण होनहाए-गुरु पुरु पोनी एटले सिक्षात नापित थर्थना कथनार पुरुपोनी हीजना करवाने थर्थे ते अज्ञानी मूढ सम्यक ज्ञान रहित क्रियानो थाम्बर अधिकतर देखाउने ॥१०॥ अवतरण -पूर्व गाथामा थयुद्ध धर्म देखाडवावालाने मुढ़ तथा थज्ञानी का हवे जे शु६ धर्मनुं दान करे ते पुरुपो केवा होय ते कहेले - मूल - जो देश सुरु धम्म, सो परमप्पा जयम्मि न दु धन्नो ॥ किं कप्पहुम सरिसो, इयर तरू होइ कश्यादि ॥११॥ दोहा - शुद्ध धर्मकू जो दिए, सो जिनराजन और॥ सुरतरु समतरु थन्य क्या। दोय कहो किण और ॥ ११ ॥ व्याख्या-जो-जे साधु आवक सम्यक् दृष्टि को सुधम्म-निर्मल कपाय मल रहित श्री वीतराग नापित धर्मप्रते देश-दिये, सो-ते परमप्पा-परमात्मा के एटले तीर्थकरतुल्स ने हु-निश्चय जयम्मि-जगतनेविपे तेनी तुलना करनारो अन्नो-बीजो कोई नथी एवातमा कोई वितर्क करे तो तेने एम कहिये के. कि-शु कप्पहुमसरिसो- कल्पना नेवो इयरतरू-कोई बीजो वद कश्यावि-कोई काले होइ-याप ते कहो त्यारे ते वितर्क करनरोबोल्यों के कदापिन थाय माटे तमे कयु ते सत्य १७१ अवतरण वे गाथामां थोक्ष धर्म नीप्रशसा करवान जे जणाव्यु ते तो जे वस्तुनो गुण दोष जाणे ते करे, केम के,ते मध्यस्थ पुरुप होय पण जे वस्तुना गुण दोषयी थजाण होय ते मध्यस्थ पुरुष मां गणाय नही ते कहे - मूल-जे थमुणिय गुण दोपा, ते कहब वुहाए हुति मन्सधा ॥ यह तेवि दु मशही, ता विस अभियाण तुलन्त ॥ १०॥ दोहा - जे गुण दोप थशान तै,किम बुधमें बुध होय॥अथवा ते बुध होय तो, सम विष अमृत दोय ॥ १०२॥ व्याख्या -जे-जे पुरुप थमुणि थगुणदोसा-वस्तुना गुण श्रने दोप नयी जाणता, ते-ते पुरुष वुहाण-बुध एटले पडित पुरुषोनेविषे म या- मध्यस्य राग देष रहित समाचनवाला कदम कम इति-पाय। एटले जे वस्तुना गुण तथा दोपने जाणतो नयी ते बुधमध्यस्थ पुरुपने तुज्य केम गणप' नी उपेक्षा अने गुमधर्मदायक . - पष्टी शतक. or अपितु नहीज गणाय. अह- वली तेवि-तेनेपण दु-जो मनव-मध्यस्थ कहिये एटले वस्तुना अजाण जीवपण जो समचित्तवाला होय ता- तो विसअमित्राण- विप ने अमृत बन्नेने तुल्लत-तुल्यता थाय. पण एमतो कोई प्रकारे थाय नही वस्तु धर्मने जे जाणनारो होय तेनेज मध्यस्थ पंमित कहिये. अने वस्तु धर्मनो के अजाण होय तेने अमध्यस्थ पुरुप कहिये ए नावार्थ.॥ १२ ॥ अवतरणः- हवे गुणनो राग अने दोष त्याग पूर्वक उपदेशना मिले करीने क हे :-त्रण तत्व बाराधवा योग्य ः- मूल--- मूलं जिमिंट देवो, तवयम् गुरु जणं महासयम् ॥ सेसं पावठाणं, परमप्पाणं च वळमि ॥ १०३ ॥ दोहा.- मूल जिनेश्वर तवचन, गुरु जन गाढा सैन । गेप पाप थानक तजू, निज पर नो दिन रैन ॥१०३॥ व्याख्याः-मूल-प्रथम जिविंद देवो--जिनेश देव वीजो तवर एं-ते जिनें देवसंबंधी वचन सिद्धांत त्रीजा महा सयणं-परम हितकारी माटे मोट स्वजन एहेवा गुरुजणं-गुरुजन एटले ते जिनें। देवना साधु मुनिराज, एत्रए तत्व सेववा योग्य वे. सेसं-शेप वीजा परमप्पाणं च--पर संबंधी एटले अन्य दर्शनी संबंधी अने पोतासंबंधी एटले लोकोत्तर मिथ्यात्व संबंधी पावठाणं-जे प प स्थानक ते ते सर्वने वऊंमि-दं वर्जु तुं एटले त्याग करुं दु॥ १०३ ॥ अवतरण - कोई कहेशे के, एकनो अंगीकार करवो अने बीजानो त्याग कर वो; एम कयायी तमारामांज राग देपनी प्राप्ति यो ? ते गंका दूर करवाने कहे वेः- मूलः- अम्हाण राग रोसं, कस्तुवरि नलिइक गुरु विसए । जिण आणरया गुरुणो, धम्मठं सेस वोसरिमो ॥ १४ ॥ दोहा:- राग रोस किन ऊपरे, नहि हमने ले एक ॥ धर्म हेत जिन बाण रत, वे गुरु और विवेक ॥ १०४ । व्याख्या.- यमारे रागरोस-राग देप कस्सुवरि-कोनी ऊपर नछि-नथी. गुस विसए-गुरु संबंधी वार्ता, इव-एम ठे. जिए आणरया-जिनराजनी थाझामा रत यथवा तत्पर एवा गुरुणो-गुरु धम्मलं-मोद साधन जे धर्म तेने अर्थे मारे सेववा योग्य वे सेस-शेष एटले बीजा जे जिनराजनी याज्ञायी वादित ते सर्वने वोसरिमो-यमे वोसराविए ए, एटले त्याग करीए ए. जेवीग नी थाझामा होय तेने गुरु मानिये ठये ; अने वीजाउनी ऊपर तो ध्यमा un स्थ नाव वते ते. माटे हे न, कोनी ऊपर थमे गग देव करतानी 158 यवतरण - हवे गुरुनेविपे पण राग देपनो अनाव होयरे मेर कहे:- मूल -- नो अप्पणा पराया, गुरुणो कश्यावि टुंनि । -- ឱ98 पाटी शतक. . - ए रयण ममण, ममिय संवि ते सुगुरु ॥ १७५ ॥ दोहा- निज पर गुरु न करे कदा. तल झात गत गर्व ।। जैन वचन मणि मम, मंमित ते गुरु सर्व ॥ ॥ १०५॥ व्याख्या - थप्पणा-ए थापणा गहना गुरुपो-गुरु माटे एमनेज वाद थने एमनी पागेथीज व्याख्यान सनिलवु, तथा व्रत पजरकाण करवा, पराया-ए परगहना गुरु वे माटे एने बादवु नही, एनी पाठोथी व्याख्यान सान लघु नही, व्रत पञ्चरकाण काई न करबु, एवी चाल ते सुभाण-सम्यकदृष्टि श्रावक लोफोनी कश्यावि-कदापि नोनही इंति-होय केमके, जिणवयण रयण मण मडिय- जिन वचनरुप रत्नना ममन एटले थानूपणे करी जे ममित विनूषित वे, ते सो वि-ते सर्वेपण सुगुरु-रुडा गुरु वे, सम्यकदृष्टि श्रावक लोकाने बोदवा पू जवा योग्य वे थनेजे जिनवचनी उपराठा चाले ठे ते वांदवा पूजवा योग्य नयी. यवतरण -- सुगुरुनुज शामाटे ग्रहण करवु । ए शका दूर करवाने कहे। मूल - वलि किलामो सहाण, जणस्त सुविसु पुनजुनस्स ॥ जस्स लहु संग मेवि, सुधम्म युद्धी समुहसए ॥ १०६॥ दोहा - गुरू पुन्य युत सजन जन, तसु जश्ये बनिहार ॥ जसु लघु मगमथी दुवे, धर्म बुद्धि विस्तार ॥१६॥ व्या रख्या - सुविसुन पुन्न जुत्तस्त-यति निर्मल श्रुत चारित्र धर्मरूप पुन्य, तेणे करी सयुक्त एवा जे सजाए जणस्स-परम हितकारी होवाथी सजन जन एटले साधु जन तेनी पनि किकामो- वली पूजा तथा सेवा श्रमे करिये ये एटले थमे तेनी बजिहारीये जैये कैये जस्त-जेनो लदुसगमेणापि लघु एटजे थटपमात्र स गम एटले परिचय कखायी पण सुधम्म- जिननापित धर्मनी चुधि-विचारणा स मुम्हसए- अति उल्हास एटले यति थानदने अथवा यति विस्तारने पामेने ए कारण माटे सुगुरुज ग्रहण करवा योग्य वे ॥ १०६ ॥ थवतरण - सामत सुगुरुनु वर्णन करवाना अधिकारनेपिप स्मृतिना उपयोग मा थाध्या जे श्रीजिनवानसूरीजी, ते सुरु होवाथी तमनी स्तवना करता कहे वे - मूल - थकवि गुरुणो गणिणो, सुदा दौमति तडयडा केवि ॥ पटु जिण यामह सरिसो, पुपोधि जिवनही चैव ॥ १७॥ दाहा-- के थाज पिण या करा, दीमे गुणि गुरु शुक्ष प्रच जिनवान सारिखो, पति जिनवान बुझ॥१०॥ व्याख्या-थकवि-थाजपण एटले चालता समयमा पण गुणिणा- झानादिर रोकरीने गुणवत एया FE- दनरहित यानिलचिताला तडपडा- याकरी तप कियाना करवावाजा सा तथा रका-वा, केवि-केटलाएक गुरुणो- पाटी शतक. ६घ गुरु एटले साधुजन टीसनी देखीए बैचे, नजरे जोश्ये वैये. उपलहणधी सांजली ये ठेचे. पुणोव-वली पण पद्धजिपवनह सरिसो-प्रनु लिनवलन सरखोतो जिए वत्रहांचेव- जिनवजनज संनसायले ; ने तेज कर्ण श्रवदुने दर्शनज यतुंगोपनी अवतरण -हवे जिनवल्लन तृरिना जेवा सर्वोत्लट पुरुषोनां वचनोथी पण के टलाएकने सम्यक्त्वनी प्राप्ति थती नथी, ते दृष्टांतसहित कहे - मूल -- वयणे विमुगुरु जिणवलहस्त केसिन उनसः सम्मं ॥ यह कह दिएमणि तेयं, उनु धाणं हर अंधत्तं ॥ १७ ॥ दोहाः- गुरु जिनवलन वचनथी, उससे सम्मन जात ॥ दरे यूककी अंधत्ता, कैसे जानु प्रकाग ॥ १० ॥ व्याख्याः- सुगुरुजिए वनहस्त-नुगुरु जिनवजनजीना वयणेवि- वचनो उतां पण एटले उपदेश सां जनता उता पण केनि-केटलाएक नारीकर्मी जीवोनुं सम्म- सम्यक्त्व ज्ञान चतु न उन्नत- उन्नासने पामता नथी एटले जघडता नधी अह-अथ एटले एनी ऊपर दृष्टांत कह:- दिणमणितेयं- सूर्यनुं तेज सर्वत्र प्रकाश करतुं उतां उलु श्राएं- उजूक एटले घुबड पदीनो अंधत्तं--अंधकार कह-केम एटले कया प्रकारे हर-हरे एटले दूर करे; अपि तु नहीज करीगके. ॥ १७ ॥ अवतरण:- वाली जे श्रीजिनवलनसूरीनां वचनोयकी नवना स्वरूपने देखता उतां सम्यक्त्वने अंगीकार करता नथी, तेवा पुरुषोना विपणाने विकारता उतां कहेजेः- मूलः- तिनुश्रण जणं मरतं, तण नियंति जे न यप्पाणं ॥ विरमंति न पावा. घिद्धी वित्तएं ताणं ॥ १५॥ दोहा:- मरता जग जन जोड्ने, जे न करें वन मन्न ॥ पापयकी विरमे नही, ते नर धीत यवन्न. ॥ १५ ॥ । व्याख्या-- मरंत-मरता एवा जे, तिनुश्रण जम्-त्रण नवनना जन एटले लो कने दकूण- देखीने जे-जे पुस्प यप्पा-पोतानी यात्माने न नियंति- नथी देखता. धने पावाधा--हिंसा तथा मृपादि पाप व्यापार यकीन विरमंनि- विराम पामता नयो, एटले निवर्ततां नयी; ताणं-ते पुस्पोना वित्तणं-धीउ पणाने विक्षी-विक धिक् होजो, एटले विकार था. ॥ १० ॥ अवतरण:- हवे तेनाज कुस्नेहपणाने कहे।:- मूलः-- तोएण कंदिकणं, कु हेकणं निरं च उधरव ॥ अप्पं खिवंति नरए, तं पिदु धिक्षी कुनेहत्तं ॥ ११ ॥ दोहा.-- गोक विजाप करी उदर, भिर फूटी उर देह ॥ नाख नरके जीवने, विम् विग ते उनैद ।। ११० ॥ व्याख्याः- तोएए-शोकेकरीने कंदिन-धानंदन थ थवा विलाप कन्यायी व-वनी मिर-मस्तक उयर-उटर एटले पेट व गदथी - ६६ पाठीशतक . उरु एटले उरादिक प्रते कुटकण-कूटी पीटीने नरए-नरकनेविपे जे थप्पं- त्माने खिपति-हेपेठे एटले नाखेने, दु-जे कारण माटे तेनुं जे कुनेहन-फुरत पषु , तपि-तेने पण घिद्धी- धिक् धिक् होजो एटले धिक्कार थायो॥ ११॥ अवतरण -- हवे शोकादिक कीधाथकी उलटो अति दोप होयठे तेज कहेठे मूल- एग पियमरणउह, थन्न थप्पावि विप्पए नरए ॥ एगच मालपमण, थन्न लगुडेण तिरिघा ॥ १११ ॥ दोहा - प्रिय मरणनु एक ख, बीजुन रक मकार ।। कतो पडवु मालथी, बीजो कम प्रहार ॥ १११ ॥ व्याख्या - ए ग-एक पित्रमरपउह--पुत्र कलत्रादिक प्रियजन स्वजन लोकोना मरवानु उख थन-बीजु नरए--नरकनेविपे थप्पा-थात्मा निखिप्पए-विदेपिये नए एटले ना खीये ठेए ए मोटो थाश्चर्य वे यही दृष्टातकहे - एगच -एक तो मालपडण- एकादि मालयको पडवु, अने थन्न -बोजु लगुडेण-साकमाए करीने सिरिया- माथाकपर घात करवो एटले जे पमयो तेनु माथु फोमी नारखवु ए मोटो अन्याय ठे अवतरण - एम क्याथी करे? एवी श्राशका करीने दमणा सुगुरुवादिकनु । सनपणु प्रगटकरता उता कहे जे - मूल -- सपर दूसम काले, धम्मछी सुगुरु सावया उसहा ॥ नाम गुरु नामसट्टा, सरागदोसा बहू जी ॥ ११२ ॥ दोहा धर्मार्थी दुपम समे, उलन साधुने श्राम ॥ नाम साधु श्रावक बहू दृग रागादि सवाध ॥ ११२॥ व्याख्या सपश्--साप्रत एटले वर्तमान काल दूसम काले-दू सम कालनेविपे धम्मछी-श्रीजिन नापित मोक्ष पद सापक गु पिपि धर्मना श्री थनिजापी एवा, सुगुरु सावया-सुगुरु सु साधुने श्रावक समणोपासक छ लहा- उनन ठे, थने सराग दोसा-राग पे करीने सहित एवा, नाम गुरु-स म्यग् ज्ञानादि गुणे करीने रहित केवल नाम मात्र गुरु साधु, तथा नाम सडा-- नाममात्र श्रावक तेतो व यजी- घणारे ॥ ११ ॥ थवतरण -हवे सुगुरु श्रावकपणानो हेतु कहे -- मूल - कहियपि सुख सम्म, काहिवि धन्नाण जण आषद ॥ मित्तमोहियाण, होइ रई मिष्ठ म्मेसु ॥ ११३ ॥ दोहा - गुरु धर्मनी वात पण, धनने रति उपजाय ॥ मि मोहित मूढने, मिथ्यात्वे रति थाय ॥ ११३ ॥ व्याख्या - कहियपि- क 1 तोपण सुम धम्म-निर्मल वीतराग नापित धर्म एटले विस्तार सहित हो जे जिन धर्म ते काहिविधन्नाण-- केटलाएक धन्य पुस्पोन पण एटने था ज धन्य पुन्यवत प्राणीउने थापद -थानद एटले यात्मिक हर्ष जण-उत्प

No text on this page.

១០ पष्ठी शतक. तेम धर्म ममाण सब, विन समकित न फलंत ।। ११६॥ व्याख्या --क बड हिला रहिय--गामानां पड़ा रोकवानी खीजीए करी रहित एवु, सबग सगड-स वाग शकट उतां पण एटले बीजां सर्व धंगेकरी सहित गाकु बता पण जहने म दु-निचे नचत-नयी चालतु तह-तेम सम्मत्त परिहीण-सम्यक्त्व रहित ए हेतु जे धम्मफमामोव-दान दया शीत तपादिक धर्मनो फटाटोप एटले जे थामव र ते न चला--नथी चालतो, एटले अव्यावाध अक्ष्य मोक फल नथी थापतो, उलटुं विशेपतर उखनु कारण थाय ॥ ११६ ।। थवतरण - शिष्य वितर्क करे के, जे सम्यक्लविना अन्य धर्म थामवर , ते हितने करता नथी, एबु वाक्य मिथ्यात्वीनेवि रोपरुप श्रो? ए थाशका दूर करवाने कहेठे - मूल - न मुमति धम्मतत्त, सब परम गुणहिय थाहिया वालाण ताण उवार, कह रोसो मुणिय तत्ताण ॥ ११७ ॥ दोहा - धर्म तत्व श्रुत यात्महित, थहित न जाणे जेह ।। ते थजाण पर रोप किम, जिनमत कुत ल करेह ।। १२७॥ व्याख्या -- धम्मतत्त-जेमा निनोक्त धर्मनु स्वरूप रहेनुरे, एवा जे सब-शास्त्रलिमात तेने जे पुरुप नमुणति नथी जाणता, वली जे पुरुष परम व गुणहियं- परमार्थ जे मोदपद तेनु साधन सम्यक् ज्ञानाटिक गुण तप हित तेने जाणता नथी, वली जे पुरुष थहिय-अहित एटले मिथ्यात्व थविरति कपायादि नवन्त्रमणनु कारणरूप जे थहित तेने नयी जाणता, ताणबालाण-ते वाल अज्ञानी जीवोनी उरि-नपर मुणियतत्ताण-जेनए जिन धर्म तत्व एटले परमार्य माल्यो , ते पुरुषोने कहरोसो-रोप केम थाय अपितु नज थाय केम के, जे ज्ञाता पुरुष होय ते ते इव्य तथा नाव ए वे अनुकपा सहितज हाय ॥१९॥ श्रवतरण - हवे जे वाल अज्ञानी लोको ने तेनुज बालपण दृष्टात सहित देखाहे , मृन - थप्पारि जाण वयरी, सि कह दोइ परलिए करूणा ॥ चो राण यदियाणप, दिप्तेश मुणेयह ॥ ११ ॥ दोहा-सवेरी निज धातमा, तसु परदया न होय ॥ याचक चोरतणो हा, उदाहरण जग जाय ॥१७॥ व्यारव्या-जाण-जे लोकोनो पोतानो थप्पा-यामा पण वयरी-वेरीचे एट ले शनुनी तुमने, केमके हिमा असत्य थटन तथा परदारागमनादि श्रहित कार्य करे। माटे. तेसि-ते बाल थानो लोकोने परजिए-पर जीवानी ऊपर के रुणा-दया कह-कम होइ-थाय थपितु नज थाय, एटले जेन पोतानो यात्मा पण शत्रुनी पवे शत्र वर्ने , तो तेने बाजाजीवानी ऊपर दया ते केम बने 'श्र जे

पाठी शतक.
६जए
-
a
पितु नहीज वन ते चोगा-चोरने वली बंदियाण-दिक पुस्पोने एटले परधन
अनितापी पुरुपोने दिए-दृष्टांते करीने मुणेयवं-जाणवू एटले जेम चोगदि
कनें परनी दया श्रावती नथी, तेम उष्टाचारी शह परलोक विरोधकारी, उत्सूत्र
नापी जे होय तेने परजीवनी दया श्रावे नही. ॥ ११७ ॥
अवतरणः- दवे बाल स्वनावप्रते विचार करीने ते बालना स्वरूप तथा ल
रणने कहे।:- मूलः-जे रज धणाईणं. कारणनृया हवति वावारा ॥ तेवि दु
अपावच्या, धन्ना पहुँति नवनीया ॥ ११ ॥ टोहा.-जे वे राज धनादिनो.
हेतुनून व्यापार ॥ ते यति पाप वणिज तजे. उत्तम नव जीतार ।। ११ए । व्या
रजधणाई-राज एटले राजादि पटवीनो, घणीमादि धनाटिकनो यादि
शब्दयो गन्दाटिक इंशियविषयनो कारणनूया-कारणनूत एटले हेतुरूप. एवो जे-
जे वावारा व्यापार हवंति-वे, एटले वाह्य व्यापार शत्रुहनन राजसेवा रूपी कर्म
दंतवाणिज्यादि. घने धंतर व्यापार पंचाग्निताप अज्ञान कष्ट कियादिरूप तेवि-
ते व्यापार पण दु-निश्चय अपावजुया-नरक निगोदादिकना कारणमाटे अति
पापसहित ४ एम जाणीने ते व्यापारने धन्ना-जे धन्य पुन्यवंत उत्तम पुरुष
ते ठहुंति-ठोडेने एटने त्याग करेठे. ते उत्तम पुरुष केहेवाय नवनीया-नवनी
त वे एटले जे संसारथकी वाहीना ठे, अने उदास रहे तेज महा मविवे.११ए
धवतरण:- धन्य पुन्यवंत सत्ववंत जे उत्तम पुरुप ते तेनुं स्वरूप कयु; हवे थ
धम पुरुष जे हीण सलि ने तेनु स्वरुप कहे। -मूलः-विश्याय सत्तर हिया, धण
सवणाहिं मोहिया तुझा ।। सेवंति पावकम्म, वावारे उयर नरपहा ॥ १२ ॥
दोहा:- मोहित धन स्वजनादिके, लुब्ध सत्व करि हीण ॥ पाप नजे व्यापारमें,
मध्यम पेटाधीन ॥ १२ ॥ व्याख्याः- विश्याय-प्रथम उत्तम पुरुष कह्यो, तेनी
अपेक्षाएकरीने वीजा जे अधम पुरुष ते ते पावकम्म-स्वामी शेह, विश्वासघात,
चोरी, परधन हरणादी तथा अंगार कर्मादि पंदर कौदान तथा हिंसादि थ
प्टादश पापस्थानकने सेवत्ति-सेवेठे, वावारे-व्यापारनेविपे उचरनरणा-उदर ए
टले पेट नरवाने अर्थे, ते यथम पुरुष केवा :- सत्तरहिया-सल एटले शुन
पराक्रम रहित एवा, वली ते अधम पुरुषो केवा :- धणसयपाइहिं धन स्वज
नादिके करीने यादि गब्दयी शब्दरूपादिक इंघिय विपये करीने मोहिया-मोहित
एटले मूढ थएला एवा, वली ते अधम पुरुप केवा ठे? खुदा-लोनी एटले ला
लची अतिठे एवा जाणवा. ॥ १० ॥

ឌុច្ច पष्ठी शतक. अवतरण अवतरण- बीजा अधम पुरुपनु स्वरूप को हो त्रीजा अधमापम पुरुपनु स्वरूप कहेले - मूल - तश्या हमाण थदमा, कारणरहिया अनाणगवेण ॥ जे जपत्ति उसुत्त, तेसि विदित पमिजं ॥ ११ ॥ दोहा - थधम थधम कारण विना, करि अज्ञान अनिमान ॥ जे उत्श्रुत नापन फर, गि धिग तेतुं ज्ञान ॥ १५१ ॥ व्याख्या - तश्या-त्रीजा थहमाण-यधमोनेविपे थहमा अधम एट ले त्रीजा अधमाधम पुरुप ते कारण रहिया-धनलान कुटव पोपणादि कारण रहि त उता थनाणगवेण-थज्ञानना गर्वे करीने जे-जे उसुन उत्सूत्रप्रते अपति- जपेठे अथवा बोले तेति तेना पडिच्च पामित्यने विधि-धिकार विकार थायो धनलानादि कारणे जे उत्सूत्र बोलवु, ते मुर्गतिने देवाचालु ,माटे कारणने सोध पण उत्सूत्र वोलवानो निपेध वे त्यारे कारणविना तो विशेपपणे निधन जाण वो माटे कारणविना अने अज्ञान थनिमाननी बुद्धियी जे उत्सूत्र नापण करेले ते थधमाधम पुरुष जाणवो तेना पडितपणाने विकार धिकार वे जे नीचथी पण नीच होय तेने यधमाधम कहिये ॥ १२१ ॥ उत्सूत्र बोलनारने शासारु थधमाधम कह्यो। थने तेना पनि तपणाने शासारु विकार याओ एम का ते देखाडता बना कहे - मून जवीरजिस्स जियो मिरई उस्सुत्त लेन देसण्यो । सागर कोडाकोडि, हिमा थश्नीमनवररमे ॥ १२२॥ दोहा - जीव मरीची वीरनो, उत्श्रुत लेस चार सागर कोडा कोडि जो, नमियो नवकातार ॥ २२॥ व्याख्या -- ज-जे कारण माटे वीरजिणतजीयो-बीर जिनेश्वरनो जीव मिरई-जरत पुत्र मरीचीने नवे उस्सुत्त लेस देसणधोकपिले ज्यारे वारवार पूवा माम. त्यारे एम बोया के हे कपिल झपन जिणसाधुयोनेविपे पण धर्म अने ही धमारामा पण धर्म दे, एतथूप उत्सूननो जे लेश, तेनी देशना को नीमनवरस्मे-श्रति नाम रोइ नव थरण्य जे ससार कातार तेनेविपसार TETTER- सागरोपमनी को डाकोडीसुधी पटले एक कोडाकोमो सागरोपमसुधा हिम-हीमेचे एटसे नमेने, एम वर्तमान निर्देशनी थपेक्षाए कयु, परमार्थ नो नम्यो एम जाणवु ॥१५॥ थवतरण हवे उन्मुत्रनु निगमन करता उता कहने - मज - ताज इमपि चयण, वारवार सुणित समयमि ॥ दोसेण गणिता, सुत्त पयाइ भवति । ॥ १२३ ॥ दोहा - वारवार ए श्रुत वचन, साननि जोतो हेय ॥ से बहु उत्सुन पद, दोर न माने जेय ॥ १२३ ॥ व्याख्या ता-ते कारणमादे जर-जो इम-ए ॥ - पाठीशतक. ច? - प्रत्यक्ष. बयणं-मरीचिउक्त नमृत्र वचनो प्रत्ये समयम्मि-तिहांतनेविपे वारंवार- वारंवार सुणीत-सुणीने एटले मानलीने अपि-पण दोसेण-अनिनिवेप मिथ्यात्वा दिक दोपेकरीअथवा पेकरी अवगणित्ता-अवगणनाए करीने एटले अपमानताए करीने उस्मुत्तपया-उत्सूत्रना पदने सेवंति-जे सेवेवे एटले जे बोले.. ॥ १२३ ॥ मूलः-ताण कहंजिण धम्मं, कह नाणं कह उहाण वेरग्गं ।। कुमानिमाण पंमिय,न डिया बुति नरयम्मि॥१२॥ दोहा:-तसु जिन धर्म किहां थकी, ज्ञानसु 5 ख वै राग। कूटमान पंडित नटित, नरके खेलत फाग।।१५४॥ व्याख्या -ताण-ते पुरुषोने कह-केम जिण धम्मो-जिन धर्म थाय' कह-केम नाणं-यथार्थ ज्ञान थाय! क ह-केम उहाण-नरकादिकनां सुख यकी वेरग्गं-वैराग्य एटले उदासपणुं थाय! अपितु ते उत्सूत्र नापीउने जिनधर्मादिक काई प्राप्तज न थाय. केमके, जिन धर्म थाहाए करीने पूर्व कयुं ते ते कारण माटे कृमानिमाण पंमिय-कूड अने अनिमा न अथवा जूता अनिमान श्रहंकारे करी सहित जे पंमित पणुं ते कूटानिमान पं डितपणुं कहिये. तेणे करीने ते पुरुप नडिया-नडेला एटले पीडायला नरयम्मि- नरकनेविपे एटले नरकरूप अंधकूपनेविपे बुद्धंति-बूडे . एम जाणीने उत्सूत्र न बोलवु एज सार ते ॥ १२४ ॥ अवतरणः-हवे जे उत्स्त्र नापी जीव वे, तेने हितोपदेशनुं दान देवू नही, केम के, ते ए दान लेवाने अयोग्य ते ते कहे - मूल - मामा जंपह वदुधे, जे बक्षा चिकणेहिं कम्मेहिं ।। स वेति तेनि जायs, हिवएसो महाटोसो ॥ १२५॥ टोहाः- जे वाच्या खल कर्म करि, ते सवहीके थाय ॥ हित उपदेश सु टोप मय ॥ बहु मा नण इण न्याय ॥ १२५ ॥ व्याख्या- उत्सूत्र नापी कदाग्रही अयोग्य जीवने व दुध-घणो हितोपदेश मामा पह-कहेवो नही. केमके, जे-जे पुरुप चिकणेहिं कम्मे हिं-चीकणा कम एटले अति क्लिष्ट ज्ञानावरणादिक कर्मे करिवदा-बांधेला थथवा निगडेला . तेति सवेसि-ते सर्वने हिवएसो-हितोपदेश एटले मोद मार्गनो उपदेश ते महादोसो-महा दोपरूप अथवा महापरूप जायइ-थाय ठे माटे अयोग्य जीवने घणो हितोपदेश कहेवो नही ॥ १२५ ॥ यवतरण - धर्मने अयोग्य जीवने हितोपदेश करवाथी क्लेशमात्र थाय तेनुं कारण कहे वे - मूल - हिययम्मि जे कुसुक्षा, ते किं बुजति धम्म वयणेण॥ ता ताण कए गुणियो, निरचयं दम अप्पाण ॥ १२६ ॥ दोहा - जसु कुसु६ मन केम लो, जिन वचने बूजेय ॥ तो तेने अर्थ गुणी, फोकट आत्म दमेय॥१२६॥ १ ८.

कम ॥ १२० ॥ दोहा-ते दिन क्यारे थापको ज्यारे सदगुरु पाम ॥ उत्मनामे रहित जिन, धर्म सुणीसु खास ॥ १२८ ॥ व्यारव्या -दिपमा-त दिराम दिएम "श्या-ग्यारे सुगुरुण-सुपिहित गीतार्थ धर्माचार्य सुगुस्न पायमनन्मि-पादन से समीपे जिणधम्म-जिननास्ति धर्मने निसुगम-द साननीश केमो थया ឌុចថ្មី पष्टीशतक. . व्याख्या - हिययम्मि-हृदयनेधिपे एटले चिननेपिपे जे-जे पुरुप कुरक्षा-कुसुम एटले थमने, एटले अनिनिवेश मिथ्यात्वादिक दोपरुप काक पके करीने म नवे, ते-ते पुरुप फि-केमधम्मवयोण-जिनधर्मसबधी पचने करी चुनति- पामे थपितु नहीज पामे, ता- ते कारण माटे ताणफए-ते उष्ट चित्तालाने थर्य पिणो- ज्ञानादिक गुणेकरी गुणवत पुरुषले ते निग्य-निरर्थक एटजे फोकट थप एं-थात्माने दम- दमेने, एटले क्लेश उपजावे यहीं फलीतार्थ एम समजवु के,जे गुणी पुरुष होय ते परने गुण करपानी धिमाटे हितोपदेश कत्ती कार्ड पण पोताने क्लेश माने नही, पठी परने गुण थायो वा न यायो ए गुणीनो सहज स्वनारले माटे गुणी पुरुपनो कीधेलो उपदेश फोकट नथी ते उपदेश पोताने स्वाध्याय तप चे ११६ थवतरण -- गुणी पुरुप एम कहेले के श्रदो नय, जिनधर्म करयादिक तो दूर रहो, पण एक जिन धर्मनु श्रधान ने तेपण दु खनु दरण करनारु ने, तेज कहे - मूल - दृरे करण दूर,म्मि साहण तह पनावणा रे ॥ जिण धम्म सदहाण, पितिरकपुरका निध्य ॥ १२ ॥ दोहा - करनो अरु सापन तथा रदो प्रनाव ए दूर ॥ ६ धर्म श्रधान पिण दर्न कठिण उग्यपूर ॥ १२ ॥ व्याख्या रण-विधिए फरीने दान शी7 तप नापनाप जिनधर्मनु जे ग्वु, तेतो दुरे-दूर रहो. तथा साहण-पूर्वोक्त जिनधर्मनु साधन एटले कथन करतु तेपिण दृम्मि-दूर रहो, तथा पनावणा-प्रापचनी धर्मकथी प्रमुख थष्ट प्रकाग्ना प्रनारकपणे करीने जे जिनधर्मनी प्रनावना करो एटाने जिनधर्मनो मदिमा उद्यात करपा तेपण दृरे- दूर एटले ठेटे रहो, मात्र जिण धम्मसहदाणपि-जिननापित धर्मनु एफ श्रधान रुचि पणु पण तिरक उरकाइ-तीक्ष्ण दारुण जे नरकादिक द ख तेने निहत-निष्टापेठे एटले नसाडेने , थथात् बीच काई न बने तो पण एक जैनधर्मनु श्रदान करतु १२० थवतरण -- ते प्रधाननु लक्षण ए के सिद्धांतनु सनिलव ते मिहान सान लयानी पोतासबधी या देखाहता उता कहे - मृत्न जश्या सुगुरुण पायमूलम्मि । उस्सुत्त लेस सिलय, रहियो निसुगणेसु जिण ध - क श्या दोही दिवसो हेगाथी ते घडी ते मुद्दर्न ते पह, ते मास कश्या-क्यारे दादी-यो' पटीशतक. थको हुँ सनिलीग ! उस्सुत्त लेसविसलव रहियो-उत्सूत्रना लेशरूप विपलवेकरी ने रहित ठतो एटले गुरुने समीपे सांनसवाथी मनमा रहेला जे उत्सूत्र वाक्य, तेना लेशरुप विपना लवेकरी रहीत थयो थको हुँ सनिलीश. ॥ १२ ॥ अवतरणः- ते दिवस क्यारे थशे एम शासारु कयुं ? गुरुनु तो काई उर्सनप एं नथी; केमके, गुरु तो जोवामा घणा धावेठे, ते कपर कहेठेः- मूलः- दिश वि केवि गुरुयो, हियए न रमंति मुणिय तत्ताणं ॥ केवि पुण थदिषुच्चिय, रमं ति जिणवल्लहो जेम ॥ १२ए ॥ दोहा:-दीता पण केशक गुरु, न गमे जाण हि येय।। केशवदीताहि जगमें, जिम जिपवनन श्रेय.॥१श्या व्याख्याः- केवि-केटला एक दिनावि-नजरे जोएला पण काने सांजलेलानी शो वात करवी! गुरुयो-साधु समाचारीमाहे निपुण एपणीय आहारना सेवावाला एवा गुरु ते मुणियतत्ताणं-जेणे जिनशासननो तत्वपरमार्थ जाल्यो , तेना हियए-हृदयनेविपे नरमंति-रमता नथी एटले रुचता नथी, केमके तेना हृदयनेविपे तोजे सम्यक ज्ञान किया संवेग गुणे करीने सहित गुरु होय ते रुचेठे, पण एकहुं ज्ञान एकली क्रियादिक वाला रुचता नथी. पुण-वली केवि-केटलाएक अदिञ्चिय-नही दीखेला ज्ञान क्रिया सं वेग सहित गुरु पण रमंति-रमेवे रुचे; जेम-जिम जिणवल्लहो-ज्ञान किया संवेग सहित जिनवजन सूरि नही दीलो अमारा चित्तने विपे रुचे; तेमना र चेला ग्रंथो जोतां तथा तेमना संतानीक साधुनी समीपे तेयोना ज्ञान वैराग्य कि यानुष्टान सांजलतां अति प्रिय लागे एम नेमीचंद नमारी कहे. ॥ १२ ॥ अवतरणः- एम वतां पण जे पुरुप कुगुरुने पण सुगुरुनी पते माने जे, तेनुं निराकरण करता उता कहेठे:- मूलः-अजया घपाविता, सुक्ष गुरू जिण वरिद तुजति ।। जो इह एवं मन्न३, सो विमुहो सुन धम्मस्स ॥ १३ ॥ दोहा:-धारं नी यति पापिने, जिनवर सुगुरु समान ॥ जे जाणे ते जीव जिन, धर्म विमुख वेनान ॥ १३० ॥ व्याख्या:- ते कुगुरु केवा ? अजया-यत्न रहित ने, एटले पट् जीवनि कायना व करवानेविपे जे तत्पर वे; ते कारण माटेज अ पावि हा-अति पापिष्ट वे; एटले पाप कर्म बांधवानेविगे प्रधान के एटले मुख्य ने एवा जे कुगुरु दे, तेने पण सुम गुरु जिणवरिंदतुम्नत्ति-निर्मल गुरु गौतम गणधरा दिकने सदृश अथवा घएं युं कहिये जिनवरें तुल्य ठे, एव-ए गतनेविपे जो कोई मूढ पुरुप मन्नइ-माने एटले जाणे वे; सोते पुरुप सुE प्रकारे इह--ज ក្នុង पठी शतक धम्मस्स -श्री वीतराग नापित श्रुत चारित्ररुप निर्मत जे धर्म, तेने शिमुहो- ख जाणवो एटले अवला मुखवालो जाणवो ॥ १३ ॥ अवतरण -- धर्मने करतो थको पण धर्मथी पिमुखपणु केम कयु ए थ. कानु समाधान करतां कहे - मूल - जो तं वदसि पुसि, वयण हीनेसि स्स रागेण ॥ ता कह वदसि पुसि, जणपाय विपि न मुसि ॥१३१॥ दोहा वांदे पूजे जेहने, होले तेनो वण ॥ यदि पूर्ज किम तदा,जन थिति जूये सेन ॥ १३१ ॥ व्याख्या - जो-जे जिनराजमते त-तु वटसि-चांद , पुङसि-पूजे वे, अने पोताना उत्सूत्र नापी हीणाचार्य गुरुने रागेण-रागे करीने तस्स-ते बंद नीयथी तो जिनराजनुज वली वयण-आगमरूप वचन हीजेमि-तेनी तुहीनना करे , एटले निदा करे, रे मूट, जिनराजनां वचनोनी होजना करे , ता-तो के ह-केम जिनराजने वदति-तु वांदेठे, पुऊसि-तु पूजने , जलवायविऽपि-रे मूढ, तु जनवादनी लोक व्यवहारनी स्थिति एटले मर्यादाने पण नमुणेसि- नथी जा णतो, के जेने वादिए तेना वचन जो न मानिये तो वाद तथा पूजवु व्यर्थ जाणवु ए नावार्थ वे ॥ ११ ॥ थवतरण -- लोकव्यवहारनी जे स्थिति वे ते कहे .. मृत - लोएवि इम नणिय, जो थाराहिङ सो न कुविजा ॥ मनिङ तस्स वयण, जर श्चसि इछि यं काउ॥ १३ ॥ दोहा -- कह जन जे थाराधिए, न कोपाश्ये तेह ॥ मानी जो तमु वेन जो, वठित तु वाह ॥ १३ ॥ व्याख्या तो शी वात । लौकिक व्यवहारनेविपे पण श्म नणिय-एम कयु ने जो-जे दव । दानव राजादिक मोटा पुरुप थाराहिङ-बाराधिए, पूजिये सो-ते देव दानव राजादिकने न कुधिता-कुपित न करिये एटले तेने जे वातथी कोप चट ते वातन करिये तस्स-ते देव दानव राजादिकनु वयण-वचन मानिये एटले प्रमाण क रिये ऽठिय कान-इडित करवाने एटले पोताना मन वनित पूरण करवाने जर- जो इससि-तु इच्छेने तो ए प्रकारे पुत्र मित्रादिकने लोक व्यवहाग्नेविषे जोक सी खामण दीए , तो लोकोत्तर व्यवहारनी पात ता मोटी ने ॥ १३२ ॥ एम नगवन् वचन सानया उता पण धर्म करवाने दोष रहीने हवे स्याहा जे निवल पुरुप ने तेनी स्तवना करतो तो कहे। - मून- सम दमे लोए, सुउरक सिक्षमि उरक उदयम्मि ॥ धन्नाण जाण न चान, सम्म ताण पणमामि ॥ १३३ ॥ दोहा - 5ट उदय उख प्रगट जन दूसम दहन -- लोएवि-लोकोतरनी थवतरण -

No text on this page.

पष्टी शतक. - तादृशविशिष्ट बुधि नथी माटे नियजम्याए-पोतासबंधी जडपणानो वजी कम्म रुतस्स-प्रथम सुगुरु जोग न थवानी थपेक्षाए करीने कर्मना नारीपणानो नेव-न थीज वीससिमो-थमे विश्वास करता, केमके, पुग्नेण-तादृश विशिष्ट पुन्यकरीने धन्नाण-धन्य पुन्यवत प्राणीउने कयठाण-जेणे अर्थ सिम करयो ने एटले जेणे बोध बीजरूप अर्थ नीपजाव्यो ने तेने सुम गुरु-बाह्य थन्यतर परिग्रह रहित निर्मल गुरु मिल-मले वे ॥ १३५ ॥ अवतरण - वली कोई शिप्यादिक थथवा वादी वितर्क करे वे के एमां तमा रेशु प्राप्ति थई ? तेविपे कहेठे - मूल यहथ पुणो थउन्नो, ता जइ पत्तोष ह न पत्तो थ ॥ तहवि दु सो मह सरण, सपने जो जुग पहाण गुरु ॥ १३६ ॥ दोहा - वलिदुधपुन्य तदा जदी, लाधो नवि लाधोय॥ तेपिण ते मुफ सरण थव, जग प्रधान गुरु जोय ॥ १३६ ॥ व्याख्या - पुणो-वली अहम थउन्नो दुथपु न्य तु एटले तादृश वसिष्ट पुन्येकरी रहित बु ता-ते कारण माटे जश्-जो पत्तो- पूर्वोक्त गुरु में पाम्यो,बह-अथवा न पत्तोथ-न पाम्यो, तहवि-तापण दु-निचे सप इ-सप्रति एटले वर्तमानकालनेविषे जो-जे जुगपदाणगुरु-गप्रधान गुरु ठे,सविन गीतार्थ याचार्य ठे, उपलक्ष्णया तेमनी निश्राए जे उपाध्याय थथवा साधु सोते मह-श्रमारे सरण-शरण थाधार थात्मगुणधिने यथे विश्रामनु नाम ले १३६ थवतरण- कोई थाशका करे के, एवी सुगुरुनी प्राप्ति थवाथी पण शु थ{ एवो सशय दूर करवाने कहेठे - मूल - जिणधम्म उन्नेयं, अऽसय नाणीहि न जाए सम्म ॥ तहवि दु समय लिईए, ववहार नएण नायव ॥ १३७ ॥ दोहा- सम्यक् जाणे केवली, जैनधर्म इयि॥ तदपि जाणणा योग्य है श्रुत व्यवहारे तेय ॥ १३ ॥ व्याख्या - जिणधम्म-श्रुत चारित्र लक्षण जिननापित धर्म ते ते छ नेय-मुखे जाणवा योग्य ले केमके, उत्सर्ग अपवाद निश्चय व्यवहारादिक जोक डागमे नयोए करीने कहेलो ने माटे जिनधर्म 5 खे जाणवा योग्य , नाणीहि-थवधिज्ञानी चोदपूर्वधर तथा दशपूर्वधरादि अतिशय ज्ञानीयोने सम्यक् प्रकारे जिननापित धर्म नए-जाणीए ए पण थनिपुण घुहिने गम्य नयो, माटे जिनधर्म खे जाणवा योग्य कह्यो, एम निश्चयनये करीने से तहवि- तोपण दु-निमय समयटिए-सिमांतनी स्थिति मर्यादाए करीने ववहार नएण- सिधांतोक्त साधु श्रावक सम्यक् दृष्टिना व्यवहारे एटले व्यवहार नयेकरीने जिनना पित धर्म नायव-जाणवा योग्य, विधिपूर्वक यथाशक्तिए श्राराधवा योग्य चे १३१ यश्तय पटीशतक. अवतरण:- कोई आशंका करे के, एम कहेटु वे ते केम मानवं? तेने कहे वे.- :- मूलः- जम्हा जेहिं नणियं, सुय ववहारं विसोहियं तस्स ॥ जायज्ञ विस ६ वोही. जिण थाणाराहगत्तायो ॥ १३ ॥ दोहा- शोधित श्रुत व्यवहारने, निर्मल समकित थाय ॥ जिण थाणा राधन थकी, जे कारन जिनगाय ॥१३॥ व्याख्या.- जम्हा-जे कारणमाटे जिणेहिं-जिन तीर्थकरोए नणियं--कयुं . सुय ववहार-श्रुत व्यवहारे करीने एटले सूत्र नियुक्ति वृत्ति नाप्य चूर्णिए पांचने श्रुत कहिये ; ते श्रुतना व्यवहारे करीने विसोहियं तस्स-चारित्रनी विगु-ही करनार जे पुरुष, तेने विद्युक्ष बोही-विगुभवोधी एटले अति निर्मल सम्यक्त्व जायइ- थाय. श्यायी? जिण थाणा राह गत्तायो-श्रुतव्यवहारे करीने चारित्रनी विधि करवा रूप जिन याज्ञानुं धाराधकपणुं थवाथी. ॥ १३ ॥ अवतरण.- कोई धाशंका करे के, तमे कह्यु जे सिक्षांतनी स्थितिए करीने अने व्यवहार नये करीने जिनधर्म जाणवा योग्य वे; एवी रीते कहेवाथी जिन पर्म देखाडवावाला गुरु पण सिम थाय ; तेम उतां तेनेविपे शी शंका ? ते । उत्तर कहेवेः- मूलः- जे जे दीसंति गुरु, समय परिरकाइ ते न पुऊंति ।। समेगं सहहणं, उप्पसहंत जन चरणं ॥ १३॥ ॥ दोहा- जे जे गुरु थव देखि ते न मिले श्रुत न्याय ॥ पिण अक्षा इक चरण, उपसह थंत गवाय ॥१३॥ रव्याः- सांप्रतकाले जेजेगुरु-जे जे गुरु धर्माचार्य उपाध्याय साधु दीसंति-दे ठे ; समय परिरकाइ-सिमांतनी परिक्षाए करीने एटले सिद्धांत कथित व्य नयनी विचारणाए करीने जे धर्माचार्य गुरु ते नपुङति-ते नथी पूराता नथी मिलता परिक्षाने नथी सहन करी शकता; शाथी? सिक्षांत कथित नने यथार्थपणे न करवाथी. यहीं कोई शंका करे के, एम तो चारित्रनी यई? त्यारे ग्रंथकर्ता कहे के, पुणमेगं सहहणं-वली अमारे एक जिनव बान . ज जे कारणमाटे सिमांतमा कयुं . उप्पसहंत-प्रसहया धु यंतसुधी एटले उप्रसह थाचार्यसुधी चरणं-चारित्र वनशे. एअमारे नये. माटे अमे चारित्र मानिये ए. चारित्रनो निषेध करता नथी; पण हारे करीने प्रवर्नतो देखीए तो कहियें के, कुगुरुने मुगुरु केम कहेवाय.१३ ग.-जे श्रधान ते गुं करवायोग्य ले ते कहे:- मूलः- ता एगो मनठमणेहि समयदिडीए ॥ सम्मं परिस्कियचो, मुत्तूण पवाह हल ॥ दोहा:- तो मध्यस्थ मनेवि इक, युग प्रधान श्रुत न्याय ॥डी पष्टो शतक राते परिखको तजि प्रवाह हलवाय ॥ १५० ॥ व्याख्या-ता-ते कारणमाटे पवाह हलबोल-लोकप्रवाह सबंधी जे हलबोज विचार रहित जे कज़कज तेने, मुतण-मुकीने चली समयदिछीए- श्री श्राचारोग निसीय व्यवहारादिक सिका तनी घटिए करीने मगठमणेहि- मध्यस्थ राग प कदामह रहित जेथोना मन ने ते पुरुषोए एगो जुगपवरो- एक जुगप्रवर एटले सम्यक ज्ञान क्रियाएकरीसहित एक जुग प्रधान श्राचार्य होय ते सम्म-सम्यक प्रकारे परिस्कियो-परसवो निभय करवो, पण याचार्यादिकना श्राचारे करि रहितने श्राचार्यादिक मानवुनही १४७ अवतरण -- कोई धाशका करे के, प्रवाह हलबोलने मूकीने एम कयु, पण लोक प्रवाहनो हलबोल जो पोते निपुण होयें तो करे? एवं निवारण कर तो कहे - मूल - सपा दसमोरय, नामायरिएहि जणिय जणमोहे । मुह ध म्मथो निकणवि, चलति बहु जण पवाहाथो ॥ ११॥ दोहा-थव दशम चरज नामगणि, जनित नीच जन कर्म । लोक प्रवाहे निपुण पण, पडियात जि शुन धर्म ॥ ११॥ व्यरख्या - सपा-साप्रत एटले वर्तमान उपमा कालने पिपे दसमग्य-धारन परिग्रहमा श्रासक सदा ब्रह्मचारी थसयत यका सय त कहेवरावता तेयोने जे पूजवु तथा वदन नमस्कारादिक करवु, ते असयत पूजा नामे दशमो याश्चर्यठे , वली नामायरिएहि-नाम मात्र थाचार्य केवल लि गोपजीवि व्ययकी ने नावथकी साधुनी क्रियाए करीने रहित दशमो श्राश्चर्य न नामाचार्य ए वन्ने जाणिय-जाण्यु दे अथवा उपजाव्यु, जण-नीच पामर लोकोने उचित मोहे-मोह एटले अति गग तेने एवा जे निकणवि-निपुण पण एटले धर्म कर्मनेधिपे चतुर पण सुश्रधम्मान-गुन शिव कल्याणकारी जिन नापित जे धर्म तेथको चलति-चलेने, भ्रष्ट थायडे, तो वीजा थनिपुण पुरुषोनी शी वा ना केमके, निपुण पुरुष पण धर्मयकी चलेठे, बहु जण पवादात-घणा सोको नो जे प्रवाह गतानुगतिक एटले विवेकरहित बोल चाल प्रवनबु, तेणे क रीने ते निपुण पुरुष पण जिन धर्मयकी चलेठे पडेले माटे लोक प्रवाहने मूकी ने वेटे रहेछ, भ्रष्टाचार नामाचार्यनो पण परिचय न करयो जो जिनधर्म विधिमा गैनी थनिलाप सरन्यो होय तो ए नाव ॥ १४१ ॥ थवतरण - एवी रीते जेयो लोक प्रवाहमा पहेला ने तेथोनु पुष्टपणु देखा इधु, हवे जे जिनधर्मथी पडेलानु थालवन जिएले तेनो दोष, धने जे नथी लेता तेनो गुण बोलता बता कहेने - मूल -- जाणिव्य मिसदियो. जे पडणा अबणा

No text on this page.

हए
पटी शतक.
ते तेनु स्वरूप कहे वे ~ मूल-अनिमाणपिसोपगमा गं च पानि देन गु
रुणो य । तेहि पि जयो माणे, हीही त पुग अमग्निं ॥ ४ ॥ दोहा- मा
नविपोप समावया, शुद्ध देव गुरु धर्म । ते सेवे पण मर थयो. हा ते पूर्व कु
कर्म ॥ १४॥ ॥ व्याख्या- देवगुरुपोप-थमार दोप रहित. हादरा गुण सहि
त जे अरिहत देव तेनी, तथा सप्तविश गुणास्त गुरु सुसाधु तेनी, पुत्रति-
स्तवनातथा उत्कीर्तना करवी, उपलक्षणाथी अन्युगन नक्ति बहुमान वदन न
मस्कारादिक करयां ते थश्माण रिसोपसोपडपंच- जात्यादि अनिमानरूप
विपने उपशमाववाने थर्थ ठे, च शब्द थकी मिथ्यात्वादि दोष उपशमानवाने
थथै ने, केम के, सुदेव सुगुरुनी स्तुति करवायी थनिनिवेश कदाग्रह श्रज्ञान व
निमान टले थने शुष सम्यक्त्वनी प्राप्ति थाय एम थागममां कन्यु ले तेहिपि-
ते देव गुरुये करीने जयो-जो माणो-- मान थनिमान देव गुरुचिपे थयो केम
थयो ते कहे - था चैत्य मारा पूर्वजोना है, एने मूकीने वीजा चेत्यमा उत्त
वादिक करवाने केम जवाय? इत्यादिक देवरिप थनिमान, वजी ए गुरु मारे अ
गीकार करेलो ने, एगीतार्थ कियावत गुणवतवे तेविना वीजा गुरुयोनले गुण
वान होय तो पण तेनी कपर राग धरे नही, उलटुमर नाव थाणे इत्यादि गुरु
विषे अनिमान थयो, ही हो-ए मोटी खेदनी वात के पुत्वाचरिय-तेपूर्वनवनु
पुष्कर्म चरित ने एटले ते पोतानो दोप वे एमां वीजा कोईनो दोष नयी ॥१४॥
अवतरण -- जेने खोटा थनिमानरूप धन , ते सदेव असत पदार्थ ने
माने ठे, तेने उपालन सहित प्रगट दोप जणावीने निर्नस्ना करता उता कहे
-- मूल - जो जिणवायरणाए, लोयो न मिले तस्स थायारे ॥ हा हा म
ढ करितो, थप्प कह नणसि जिण पणय ॥ १५ ॥ दोहा- जिन थाचरण थ
की जुदो, जे जण तसु थाचार ॥ रे सन करतो किम कर्द, दु जिन नगत उदार
॥ १४५ व्याख्या - जोलोयो-जे पासादिक लोक ते जिण थायरणाए-
जिन नापित थाचरणानी साथे नमिलेइ- नथी मलता, तस्स- ते पासधादिक
नो जे थायारे- निजमति कल्पित जे याचार में तेने करितो- अगीकार करतो
बतो हा हा- मोटी खेदनी वात, मूढ- हे मूर्व, थप्प-पोताने जिणपण
यं- जिनने विषे सुगुरुने विप नमस्कार करवावाली, स्नेह करवावाला कह- के
म नणसि-तु कहे , जो जिननापित पाचरणाने याचरतो होय तो तारु कह
सनवे, माटे फुट बोलीने शासारु-फोकट यात्माने विटबना करे ॥ १५ ॥

पष्टीशतक. दए अवतरणः यही कोई वितर्क करे के, जिन आचरण मूकीने कोई पासना दिकनी कहेली थाचरणा अंगीकार करता हो, तेनो उत्तर कहे:- मूलः-नं चिध लोयो मन्नइ, तंचिधमन्नंति सयल लोथावि ॥ जे मन जिवनाहो, तंचि थ मन्नंति किवि विरला ॥ १४६ ॥ दोहा:-जाळू माने लोक तस, मान लोक अनेक ॥ मान जास जिनें तसु, माने कोश्क ठेक॥ १४६ ॥ व्याख्याः-लोयो- पासादिक लोक चिय-नेयाचरणाने मन्नई-माने सयल लोयावि-तादृशवि वेक विकल सकल लोक पण तंचित्र-ते पाससादिकनी नापेली पाचरणाने म नंति-माने,जेम लीवडानो कीडोसीवडाने सारुंमानेठे,तेम,वलीजिएनाहो-नि ननाथ ज-जे धाचरणानेमन्नश-माने,सम्यक् जाणे,तेम किवि विरला केटलाए कविरला. हलुकर्मी जीव तंचिय-ते जिननापित आचरणनेन मन्नंति-मानेठे, यथाशक्ति पाले, थाराधे ठे, जिनधर्म पालवु ते नदीना पूरनी सांवे जवा वरा वर वे. माटे कोईक हल्लु कर्मी जीव जिननापित धर्म थाचरणने माने किंव दुणा एटले घणुं कह्याथी मु! ॥ १४६ ॥ ।'अवतरणः-अहो कोई वितर्क करे के, लोको प्रायेकरी लोकोमुंज कहेतुं मानेठे, जिनराजनुं कहेलु मानता नथी, एवो तेयोनो खनावज वे; तेनले पण जिनराजनुं कहेलु न मान्या उतां अने लोकोनुं कहेj मान्या उतां जे दोष थायठे ते कहे - मूलः-- साहमि थाउ यहियो, वंधसुधासु जाण थपुरायो । तेसिं नदु सम्म विनेयं समयनीईये ॥ १४ ॥ दोहा:- साधर्मीथी अधिक जस, परि जन पर प्रेम ॥ तास न समकित मानिये, थागम नोती एम ॥ १४॥व्यां ख्याः-जाण-जेने साहम्मिघाउ-सम्यक्त्वादि गुणे करीने जे सरखा ते साधर्मी,कहि ये तेथीपण बंधमुत्राश्न-बांधव पुत्रादिकनेविपे धादि शब्दथोमाता पितानार्यादिक नेविपे थहियो अधिक थपुरायो-यपुराग स्नेह वर्ने ने. तो तेसिं-तेने नहु-नहीं: जसम्मत-सम्यक्त्व,होय एवात समयनाईये-तिक्षांतनीतिएकरीने विन्नेयं-विशेपप' णे जाणवा योग्य वे. साधर्मीनी साथै कोई प्रकारनो कलह अथवा क्लेश करवो नहीवली साधर्मी 'सीदातो होय तो तेने सहाय करवू, केमके, शास्त्रमा कडं बे के संसारमा साधर्मीना जे वीजु कोई सगपण नथी-साधीनी सेवा नक्ति. वाहलताए करीने सम्यक्त्व विशेष निर्मल थाय. माटे बंधु मुतादिक सर्व खन ननोन्थनुराग ते करमबंधन कारण ए दोप जाणी साधर्मीनेविपे थधिकतरधर्मा नुरोग-निरंतर राखवो एजश्रेय गुण ॥१५॥ .

पष्ठी शतक मिछत्त सनिवायग, गठाण ताण कोविको ॥ १४ ॥ दोहा- जिनवरने प्रण रिहर ब्रह्मादिक रागी पी मिय्यादृष्टि देव ने तेने पणमति-प्रणमने एटले एगा थ गुरु एगो हिसावगो चेश्याणि पिवहागि ॥ एए गुरु एक वनिया थवतरण - एवी रीते लोकाचारने माननारनो दोष प्रगट करीने हवे काचार संबंधी निपेधनो उपदेश कहेते - मूल - ज जाणिसि जिण नाह यायारा विपरकए नूयो । ता तं त मन्नतो, कह मन्नसि लोय थायार ॥ दोहा-जिनपति लोकाचारथी, जो तु जाणे निन ॥ तो किम लोकाचार- माने प्रजु मन्न ॥ १४७ ॥ व्याख्या - जइ-जो जाणिमि-तु जाणेठे , जिणना जिननाथ एटले जिनवरे ने ते लोयायारा-दर्शननष्ट पासादिक तथा च शनी ब्राह्मण परिव्राजक त्रिदडी तापसादिक जे लोक तेयोना थाचारथकी । रकए नूथो-विपक्षनूत , एटले न्यारो वे अथवा ते जोकोना याचारोनो किन नाय विपद नूत ने एटले शत्रुरूप ने एम जो हे न तु जाणे, ता-तो - तु त-ते जिननाथने मन्नतो-मानतो अथवा जाणतो तो नोययायार-सोक ना थाचारने कह-केम मन्नसि-तु माने ॥ १४ ॥ श्रयतरण - तु लोकाचारने कैम मानेते ? एम का तेनेज फरी दृढ करे, तथा जिनेंइने मान्या थका पण जे मुग्ध लोको ले ते बीजा देवाने मानेने ते दे खाहता उता कहे। -मूल - जे मन्नेवि जिषिद, पुणोचि पणमति इयर देवाला। मीवली, जे प्रणमे थन देव ॥ सन्निपात मिथ्यात हत, तस कुण वद रहे। ॥१५पायाख्या - जे-जे मुग्ध तत्वना अजाण ठे, ते जिणिद-जिनेश देवने पण म नेवि मानेने थने पुणोवि-वजी पण इयरदेवाण-इतर जे जिनेऽ दवथी बीना है पूजे ठे ताण-त मिउत्तमन्निवायगगहाण-मि यात्वरूप सन्निपात राग करि ग्रस्त यएला गजायना अथवा व्याप्त थएलानो कोषिको-वद्य काण थाय' अपितु नेना ई वद्यज नथो केमके जने थमृत समान जिन धर्म पुरिस विषसमान मिथ्या म जेवा थया तेना हितापदेशक गुरु वद्यराज शु नपाय करे । ॥ १४ ॥ यवतरण-हवे मिथ्या निपातरी ग्रस्त थाना गु करने त हरे- मृत यज निणद परप्पर ने न पिचति ॥ १५ ॥ दोहा- रु, चन्य विविध चिनेर । ताम जा जिनच्य ते दिए परस्पर ना । १५० मा-गोयगुरु-एफज गुरू केमके जिग याचार एक माटे एक गुरु, गाधि मार इक पण पावक कारण साना देवगुरु काटे प्रावक पण एक चश्राणि पटीशतक. ए - विवहाणि- चैत्य देहरासर अथवा जिनप्रतिमा ते विविध अनेक ; तथापि जि ने देव सर्व सरवा माटे चैत्य पण एकज; एत्रणे एक एक थए थके पण त धय-त्या एटले ते श्रावकोनी पाशे ज-जे जिणटवं- जिन इव्य ; उपल क्षणथी ज्ञान इव्य साधारण इव्य त--ते इव्य परुप्पर-परस्पर एटले माहो माहे चैत्य ज्ञानादिक कार्य पडेठते न विचंति- नथी वेचता एटले नथी थाप ता; ते लोनी सुखना लालची गुरु निर्मल उपदेश तेने देता नथी; पण उलटुं जेथी थहंकार ममकार पषु वधे तेवो उपदेश करे वे. ए नाव ते ॥ १५ ॥ श्रवतरण:- एम करता उता ते गुरु थादिक के नथी? ते विपे कहे : मूलः-ते न गुरू नो सट्टा, न पूश्यो तेहिं होइ जिएनाहो ॥ मूढाणं मोह लिई, सा नहर समय निउरोह॥१५॥ दोहा.- ते गुरु नहि श्रावक नही, नहि प्रनु पूजक तेय ॥ मोह थिती मूढोतणी, जाणी श्रुत निपुणेय ॥१५१॥ व्याख्याः- ते-ते नगुरु-तेगुरु नथी केम के, सुख दायिताएं करीने जिनोक्त निर्मल उपदेश नथी देता माटे तथा नो सट्टा-ते श्रावकपण नथी; केम के, चैत्यादिव्य चैत्यादि का र्य पमयाथी ममताने सीधे नथी वेंचीबापता माटे ते श्रावकपण नही कहेवाय वली तेहि-तेणे जिणनाहो-जिननाथ पण नपूश्यो होई-पूज्यो नथी एम केमके जे ममकारादिक क्लिष्टचित्तवाला यद्यपि पूजादिक करे तथापि तेने पूजादिक कर वावाला न कहिये. माटे शिष्य कहेजे तो तेने शुं कहिये ? गुरु कहेले मूढाण-मू निी मोहतिई-मोहस्थिति कहिये. सा-तेवात समय निठणेहि-सिक्षांतमा जे निपुण पुरुप तेने नाइ-जणाय ने पण वीजा जाणता नथी॥ १५ ॥ थवतरण:-पूर्व गाथामां कयुं नथी ते गुरु तेजवात प्रगट करता उता कहे बेः-मूलः-सो न गुरू जुग पवरो, जस्त वयशूमि वट्टए नेयो । चिय लवण स गाणं, साहारण दवमाईणं. ॥ १५ ॥ दोहा:-चैत्य नुवन 'वलि श्राधजन, साधारण इव्यादि ॥ तास भेद जसु वचनमें, तेगुरु ने जगदादि ॥ १५ ॥ व्या ख्या:- जस्स-जेगुरुना वयणंमि-वचने करीने एटले कुटिल उपदेशे करोने तथा पोतासंबंधी चैत्यादि करावq ते तमने प्रधान , एम सादात् उपदेश-दीधाथी चियनवण-चैत्यनवनोने विपे एटले जिन प्रासादोने विपेतथा सहगाणं-श्रावकोने विषे:वली साहारणदह 'माईणं-साधारण इव्यादिकने विषेः थादि शब्दथी ज्ञान इध्यने विषे नेयो नेद वट्टए-वतै जे; एटले "यहंकार म. पोता संबंधी चैत्य तथा श्रावकादिक थापीने माहोमाहे जे जगडा +14 - . ए पष्टी शतक. पाडे जे ते जुग पवरो जुग प्रधान गुरु-श्राचार्य न-नथी केम के, प्रथम जे वि शेषण कयुं ते कुगुरुनु ने माटे ते जुगप्रधान गुरु न जाणवो ॥ १५ ॥ श्रवतरण -थही कोई वितर्क करे के, जेना वचन पकी चैत्य नवनादिकोनो नेद वर्ते , ते जुग प्रवर गुरु न होय, एमजे का, ते तो तीर्थकरादिकवर्ने ते कान नेविषे युक्त वे, पण हमणा तो नेद विना कोई पण मर्यादा नहोय ! ए आश का दूर करवाने साप्रतहमणा पण सिद्धांत कथित विधिनेविपे जे पुरुप नथी प्रवर्तता तेथोना दोप देखाडता उता कहे - मूल - सपश् पदुवयरोणवि, जाव न उ हवस विहि विवेयत्तं । ता निविड मोह मि त गठिया उ6 माहप्प ॥ १५३ ॥ दोहा-प्रगटे न विधि विवेक यव, प्रनु वचने पण जाव ॥ ताव निवड मिथ्या त्वनी, गवितणो थनुनाव ॥ १५३ ॥ व्याख्या-सपइ-सप्रति एटले वर्तमान का लनेविपे पण पदु वयरोणवि-प्रनु नापित जे वचन बागम ते सानन्याथी जा व-ज्यां सुधी विहि विवेयत्त-जिन इव्यादिकनु जिनागम उक्त प्रकारे वधारवु, खर चतु, रक्षण करवु, तथा इव्ये नावे पवित्र थईने याशातना टाली, थनिगम सा ची, जिनपूजा करवी, सुगुरु नक्ति करवी, तथा दोप रहित सामायक प्रतिक्रम ए पोपध उपवास करवा, तथा निरतिचार सम्यक्त्व सहित सर्व व्रत पालवा, ३ त्यादिक विधिविवेक पणु जेने न उल्लस-नयोजनासने पामतो,ता-ते कारण माटे एनिविममोहमिछत्तगठिया माहप्प-निविम एटले अतिदृढ मोह मिथ्यात्वनी गांठनु कोई उष्ट माहात्म्य है, एटले प्रनाय ठे, एम जाणवु केमके उतीसमर्थाई सिक्षांतोक्त विधिनेविपे न प्रवर्तवु ते प्रजुना वचननी थाशातना डे ॥ १५ ॥ थवतरण - ते कारण माटे हवे अनुवचननी थाशातनानु इष्टपणु कथन के रता उता कहे। -- मूल - वयण मरण नयाई, उहाइ तिरकाइनेथ उ स्काइ ॥3 रकाण उह निहाण, पदुवयणा सापणा करण ॥ १५ ॥ दोहा- बधन मरण नयादि उग्य, नहि तोहण उग्य जाण ॥ जे अविनय प्रच वचननो, ते सुख दोष निपान ॥ १५ ॥ व्याख्या - वधन-दोरडादिके करी बांधयु, मरण-थायु थप वा प्राणनो नाश, नयाश्-श्ह लोकादिक सात जय इत्यादिक जे उरकाई-5 ख ते, तिस्काइ-तोदण एटले थारा उकाइ-ख नेथ-नयीज पोडाकात रहे। पण पदुपयणा सापणाकरण-पढना वचननी थासातनानु जे करवु, ते सा ण-जन्ममरणादिक सनु हानिहाल-ख निधान ले, एना जेवु वीच कोई समारमा उख नची ए नाव ॥ १५ ॥ ले पष्टी शतक. ६ए। ANA अवतरण.- एवीरीते याशातनाना करनार संबंधी अनंत सुख कयां, हवे वर्न मानकालादि दोप थकी यथोक्त विधि करवाने असमर्थ एवो जे पोतानो थात्मा तेने निंदतां वतां कहे वेः- मूलः- पदुवयण विहिरहस्तं, णाकणं जाय दीसए अप्पा ॥ ता कह सुसावग, चिन्नं धीर पुरिसेहिं ।। १५६ ॥ दोहा:-चीर वच न विधि सार लखि, जव निज थातम जोय ॥ तो कहते गृहि धर्म जे, गृह्यो धीर पुरुषोय ॥ १५५ ।। व्याख्याः- पदुवयण विहि रहस्सं-प्रतुना वचन सिद्धांत नो जे विधिनो सार तेने नामां-जाणीने जाव-यावत् एटले ज्यागंधीयमे थप्पा- पोतानो थात्मा दीसए-देखीए ए. तात्यारे एम विचार थाय वे के, मारेविपे कह-क्याथी सुसावगनं--सुश्रावकपणुं धीरपुरिसे हिं--कामदेव थरएक श्रावकादिक धीर पुरुषोए जं चिन्नं-जे याचमु ते. ॥ १५५ ॥ यवतरण:- कोई वितर्क करेठे के. जो धीर पुरुपोए थंगीकार करेबु श्रावक पणुं नयी तो शा कारणथी देवपूजादि थनुष्टानविधिनेविपे पोताना थारमा ए प्रकारे पर्यासीए वैए एटले जोडिये ए? ए थाशंकाए करीने कहे।:- मूतः- जवि दु उत्तम सावय, पयडीए चडण करण असमठो ॥ तहवि पद्धवयणं कर णे, मोरहो मन हिययम्मि ॥ १५६ ॥ दोहा:- यदपि सुत्रावक सेढिए, चढण कटण थसमर्थ ।। तदपि मनोरथ मुजहिये. कबहू करूं तदर्थ ॥१५॥ च्याख्याः- जावि-जोपण दु-निश्चे, उत्तम सावयपयडीए-पूर्वोक्त उत्तम आवकोनी पगथीए एटले श्रेणिए चडण करण थसमधो-चडण करवाने एटले धरोहण करवाने य समर्थ एवो हुं हुं तहवि-तथापि एटले तोपण पद्धवयण करणे-प्रचनापित वच न थंगीकार करवानेविपे एटले श्रीवीतराग कथित जे विधिनुं करतुं तेनेविपे म पोरहो-मनोरथ माहिययम्मि-मारा हृदयमा वठे, एटले जोपण उत्तम प्राव कोनी पदवीने थारोहण करवाने हुँचसमर्थ हुँ तो पण प्रवचन धंगीकार क रवानो मनोरथ मारा हृदयमा वनँठे, धने पोतानी यथाशक्तिप्रमाणे थारापु इं, तेमाटे सम्यक्त्व प्राप्ति योग्य कोईएक पावरुना नेटमा दु निमयतो श्रीबीन राग देव जाणे.॥ १५ ॥ थवतरण.- हदे बनी ते जिनवचन घंगीकार करयाना मनोरथनी यांदा कर ता उतां कहेने जे कारण माटे अनुना वचन थंगीकार करवानां मारा मनमा मनोरथ :- मृतः- ता पटु पमिय चलणे, संपनि पाम नायेण ॥ नुद व यण रपण गहणे, या लोहामन दुल नया ॥ १५॥ दोहा:- तो पष्टी शतक धारी पारसनो च-वनी नाम-नाम मात्रप्रत धरमिन्दु धारण करुनु, पि-ते, दए प्रजनमत, चरणे जाचू एक ॥ होय सदा मुज तुम वचन, रतन लोन यतिरेक ॥ १५७ ॥ व्याख्या ता-ते कारण माटेज पहु-हे प्रनो, श्रीवीतरागदेव, वर ऐ-तमारा चरण जुगलने पणमिथ-प्रणाम करीने परम जावेण परम उत्कृष्ट जावधी क-एक वस्तु पोमि-दु प्राथु तु एटले माय बुं, ते एक वस्तु तुहवयण रपण गहणे-तमारा वचनरूप ख दारिइ दोन ग्यादिक दूर करवाथी रत्ननीय ठेरन, तेनु ग्रहण करवानेविपे थलोहो-यतिलोन एटले यति घपणुं मझ-थ मारे दुल होय सया-सदा ॥ १५७ ॥ थवतरण - कोई वितर्क करे के, एवीरीते शासारु या करवी पडे ? पोतानी मेलेज जिन वचनरुप रत्ननु ग्रहण करवानेविपे लोन थशे ? ए याशंका करीने कहे। - मूल - इह मिठवास निकितनावगलिय गुरुवि वेयाण ॥ थम्हाण कह सुहाइ, सनावितति सुमिणेवि ॥ १५ ॥ दोहा- मिथ्यावास सुमनिन मन, गत विवेक हमाहि ॥ कहाथि सुख सनाविए, स्वपन विपे पण नाहि॥१५० ध्यारख्या - शह-ए पाचमा दूपम कालनेपिपे मिडवास-मिथ्यात्वनी वासनाए अ झाए फरीने निकितनाव-निलीट एटले अति मलिन नाव परिणाम थयो ते थी गजिन गुरुविधाए-- गजायो वे एटले नाशने पाम्यो तत्व थतत्व सबंधी प्रथग नाव एटले न्यारा न्यारा मार, जे मोटा विवेक विचार जेना एवा जे थ म्हाण-थमे, तेने सुमिणेपि - स्वप्ननेविपे पण सुहाई-- जिनवचनरूप रत्न ग्रहण परयु ते सुग्प हेतु माटे सुग्य ते कह-शा प्रकारे करीने सनाविज्ञाति-सनाविए एटाने पिचारिए थया थापिए? केमके, मिथ्यात्वे करीने वासित ने मति जेनो, थने गयो माटो विफ जेनो तेने तेवु सुख क्याथी थाय ॥ १५॥ यवतरण -सीरीने क्याथी होय तेरीत कहे। -मूल-ज जीवियमितपि दु,धरे म नाम च सापयापि ॥ तं पिपलु महा चुङ, इन विसमे दृसमे कालेपणा दोहा - परु जो जीवित मात्र पण, नाम नो सार ॥ तेपण अति थचिरज दुसम काजनेरि ज-जो जीविय मिनाप-देश सयमरूप जोपितमात्रने पण को अतु, दृसम कान मकार ॥ १५ए ॥ व्याख्या - दविसमे दृसमेकाले-था पिपम रना नगे करोने दु-अक्टपणे सावयाणपि-सम्यस्त्व पूर्वक वादन व्रत पर पटु-हे प्रतु, हेनाय महा चुड-माटो थाधय ने, वीज यधारे गुबहिये ?!! बनाए-एप्रशारे कानादिना यनुमारे करीने पोताना सम्पने कहीन हो पटी शतक. हए पोतानुं जन्म सफल करवाने अर्थ सुगुरुने विनती करता उता कहे - मूलः-परिना विकण एवं, तह सुगुरु करित अम्ह सामित्तं ॥पद्धसामग्गि सुजोगो; नह सहलं हो मणुअता १६०॥दोहा.-इम विचार करि तिम सुगुरु, हमने करो सनाया।सुलन होय जिम नरपणुं शिव सामग्री साथ ॥ १६० ॥ व्याख्याः- एवं-दूषमा कालनेविपे जिन नापित धर्मर्नु उर्जनपणुं ए प्रकारे परिनाविकण-परिनावीन एटले वीचारी ने सु गुरु-हे सुगुरु, हे शोजन प्राचार्य एटले हे सम्यक् ज्ञान दर्शन चारित्रादि गुण संपन्न सुगुरु तह-तेम अथवा ते प्रकार म्हसामिन-धमारा संबंधी स्वामीपणाने करिडा करो एटले ते प्रकारे घमारा ऊपर तमे स्वामीपणुं धारण करो. जह-जेम अथवा जे प्रकारे पद्धसामग्गिजोगो-प्रदर्शनाटिकनी सामयीनो एटले प्रचनापि त धर्मसामग्रीनो सारो योग थाय, ते थएथके मषुवतं-मनुप्यपणुं सहलं- सफल होइ-थाय, केमके, संसारमा चार अंग जीवने पामवा मुलन , तेमां प्रथम मनुष्य पणुं,बीजं तिक्षांतनुंसांनन,त्रीजु सिमांतने सानलीने जिन वचननी अक्षा करवी, अक्षा यया पती तप संयमने विपे पराक्रम फोरववो; ए चार अंग उनन वे. तेमां प्रथम मनुष्य पणुं उर्जन कडं, पण ते मनुप्य पणुं सफल क्यारे थाय ज्यारे जोपत्रण थंगनी प्राप्ति थाय माटे हे सुगुरोधमारा ऊपर तमे स्वामीप एं करो के जेम प्रनु नापित धर्म सामग्रीनो रुमो जोग थाय, ते थवाथी मनु- प्यपणुं सफल थाय? ॥ १६० ॥ अवतरण.-- हवे समातिने अर्थ ग्रंथकार पोतानुं नाम कथन पूर्वक तथा ते ना अध्ययनादिकथा थता फलना कथन पूर्वक यने स्मरणनी नपादेयता प्रते ए टले तेनुं जे अंगीकारपणुं तेने कहे -- मूल.- एवं नमारिय ने, मि चंदरच्या न कशविगाहा ॥ विहि मग्गरया नवा, पढंतु जाणंतु जंतु सिवं ॥ १६१ ॥ दोहा नेमिचंद जमारिकत, गाथा केऽक एम ॥ विधि मग मम नविक नयो, लखो ल हो शिव हेम।। १६१ ॥ पष्टि शतक प्रारुत यकी, दोधक. किया सुनास ॥ दोध क शोधक बुद्धिजन, सेवक मोहन तास ॥ १६ ॥ व्याख्या -एवं-ए प्रकारे सज न नंमारीनो पुत्र धने जिनेश्वर सूरीनो पिता प्रसिद एवो जे नंमारीय नेमिचंद-एटले नमारिक गोत्री नेमिचंद श्रावक तेणे रइयाउ-रचिज कवि-केटलो गाहा- गाथा? एकशो ने एकसठ ते गाथाउने विहिमग्गरया-श्री वीतराग नापित वि धिमार्ग एटले मोदमार्गनेविपे रत एटले तत्पर एवा जे नवा-जव्य जीव ते पढं तु-सूत्र थकी जणो, जाणंतु-यय परिझानेकरी जाणो: ; सूत्रार्थ वेदु सम्यक् प्र ८८ एन पष्ठी शतक. कारे थन्यासीने सिव-शिवप्रत्ये एटले निरुपच मोदने जान-पामो ए ग्रंथ न स्याथी तथा ग्रथनो सम्यक् प्रकारे अर्थ जास्याथी निश्चल सम्यक्त्व थाय ठे, नित्र स सम्यक्त्वयी दायिक ज्ञान चारित्र थाय ते दायिक झान चारित्रेकरी अनुक्रमे वबि तथर्थनी मिश्थिाय वलीवठित अर्थ वे ते नव्य जीवोने शिव प्राप्तिज जाणवी, बीजो कोई वहितार्थ नथी तथा शिव शब्द ग्रंथना अते श्रगीकार कस्यो ते मगलथ थवा कल्याणने थर्थ जाणवो इति गाथार्थ ॥ १६१ ॥ इति श्रीपष्टी शतक समाप्त तपोरन श्री गुण सुंदर उपाध्यायरुत पष्टी शतकनी टीका ते श्रीशांति सागरजी महाराजजीनी समीपे श्रीराजनगरमध्ये श्री गुरु बुद्धिविजय महाराज जीनो उपासक जे यह गोत्रीउसवाल मोहनलाल, तेणे सनिली धारी विचारीने ते नो किंचित् नायार्य ग्रहण करीने षष्टी शतकनो थक्षार्थ केवल नापारूप बालाव बोप कसोतेमा श्री वीतरागां यचनथी जे काई अधिक उ विपरीत सखाएं होय, कोई प्रकारनु उत्सूत्र सखाई गयु होय, तया कोई कानामात्रादि शव दीर्घनो फरक पमयो होय, तस्स मिशामिक एटले तेनु जे पाप मने लाग्यु होय, ते मिप्पा फोकट पाउ यजी स्यामाद श्री जिनमत निपुण परोपकार स्वनाववाजा पुरुषोए मुफ थम्पमति कपर थनुग्रह करीने था पष्टी शतकनो बालावबोध शोधी मेरो एन विनती ॥ ॥ ॥ ॥ इतिश्री पष्टीशतक नामक ग्रय दो डा तया गालावर सदित समाप्त

उत्तमविजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन.
६एए
॥ श्री वीरपरमात्मायनमः ।।
सकलपंमित चक्रचक्रवत्तिमित श्रीदमाविजयगणि शिप्यमुरव्यपंमित परपद
मिनीनालतिलक पंमित श्रीजिनविजयगणि गुरुन्योनमः सिदि बुद्धि विधायिने
श्रीमत् गौतम स्वामिनेनमः
अथ श्री पंमित उत्तम विजयजीकृत संयमश्रेणीनुंस्तवन
अर्थसहित प्रारंनिये.
श्रीवर्धमानंजिनंनवा ॥ वईमानगुणास्पदं ॥
स्वोपझसंयमश्रेणी ॥ स्तवस्यार्थीवितन्यते ॥१॥
॥ ढाल पहेली प्रथम गोवालातऐनवेजी एदेशी ।।
केवल झान दिवाकरूजी। सिश वुद्ध सुखदाय॥आतम सं
पद नोगवेजी॥ वर्धमान जिनराय ॥ गुणोदधि शासन ना
यक वीर । मेरू महिधर धीर॥ गुणो॥ शास॥॥एआंकणो
अर्थ ॥ समस्त केवलज्ञानावरणी कर्मना यथकी उपजे केवलज्ञान तप
सूर्यठे दायकनावें सकलगुण निष्पन्नसिक समस्त वस्तुवनावनुं वुश्के जाण
वे उपकारीपणे सर्वसुखवं दातारठे स्याहादपणे परिणमित धनंतगुण पर्यायरू
प यात्मसंपदाने नोगवेचे एहवो चोवीसमो तीर्थकर सामान्य केवलीमा राजा
सरिखो श्रीवमानस्वामी गुणोनोसमुह गुणरूप रत्ननी उत्पत्तिनुं स्थानक वर्तमान
शासन थाधिपति श्रीवीरपरमेश्वर वली उपसर्ग परिसह यावेथकेयमिगरह्या माटे
मेरूनीपरेधीरने ॥१॥ एटले वंदनात्मक स्तवनात्मक थने वस्तुनिर्देशात्मक एत्रणप्र
कारना नमस्कार तेमा स्तवनात्मक इटसमुचित नमस्कारकरो ॥ १ ॥
अनुक्रमि संयम फरसतोजी ॥ पाम्यो दायक नाव ॥
संयमश्रेणी फूलडेनी ॥ पूचं पद निप्पाव ॥ गु० ॥३॥

900 नत्तमविजयजीकृत सयमश्रेणी स्तवन थर्य ॥ अनुक्रमें उत्तरोत्तर प्रधान सयमस्थानक फरसतोयको यमुक्त दशाश्रुत स्कधे -'तस्सपनगवतस्स अनुत्तरेणनाणेण अनुत्तरेणदसणेण यनुत्तरेणचरिनेण थनुत्तरेणयालए अनुत्तरेणाविहारेण अनुत्तरेपनरिएण अनुत्तरेणयावेण धनु तरेपामहवेग इत्यादिक मोहनीय कर्मनु कृयकरी उत्कृष्ट सयमस्थानरूप कोण मोद गुणस्थानक पाम्यो एहवो श्री वर्षमानस्वामी तेना पापरहित चरणकमन ने सयम श्रेणीरूप नावफलेंकरीने पूजुके० वर्चतु एवदनात्मक नमस्कार कखो।। वाचक जशविजये - रच्योजी॥ सखेपे सजाय ॥विस्तरि जिन गुण गावताजी॥जीदा पावन थाय ॥ गु० ॥३॥ थर्थ ॥ प्रथम सयमश्रेणीनु सजाय तिक्ष्णबुद्धिवालाने गम्ययाय एबुन्यायवा दियोनेविषे मुकुटमणि समान उपाध्याय श्री जशोविजय गणिये रच्युते पण तेनी रचना गपेफरीने माटे विस्ताररुचीने अथ विस्तारे सयमस्थानक गर्जित जिनेश्वरना गुण गावता जीन तया जन्म पवित्रथाय उत्तमजीरने एवोज मनोर्थ होयचे यात चिरसचिय पावपणासणीए नवसयसहस्तमहणीए चोवीसजिनरि णि गायकहा योजनुमेदोहा एटले मगज थनिध्यादिककह्या ॥ ३ ॥ चारकपॉय खय उपशमेजी ॥ सरव चिरति गुण गण ॥ तेना आदिम गणमाजी ॥ पर्यवनु परिमाण ॥गुण॥ ४॥ थर्थ ।। दो याद्यना बारकपायने क्योपशमें एटलेजे दतिक बदयथाव्यां तेनु रूपकरे यनेजे उदयनयोथाय तेने उपशमाये थने प्रदेश उदयथाव्याने वेदे एदवी चाया धनताथका अधिपति देगरितिप्रमुख बारकपायने धना उपनुजे सर्वपि रनिरप तो गुणस्थानक तेहना सर्वजयन्यमांजघन्य स्थानकमा एटले थादिमजे पम स्याना तेमा निर्षिनाग नाग ण्टले जेना केवलीनी घुधियपण एकरसाना में यंसनथाप एपाजे चाग्विनापर्याय थथरा थस ते प्रमाण जे सख्या तेरहे। सरवाफाग प्रदेशयीजी ॥ अनंत गुणा अविनाग ।। रदतफल्पना जाप्यमाजी।। नापेतु महा नाग||गुणा वर्ष ॥ सोचतारना थाराशप्रटेन जेटजामें थनतेने एटले थनतानी गणना यनंत माग्नौने तेमा लोगनाफना थाकामप्रदेगनी गणनानु जे दननगुणो कन्यि पटना याग्निाग नागुणम्यानम्ना सर्वथी जयन्या जपन्य प्र तेन অনন্ত

उत्तमविजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन.
७०२
स्थानक जे पहेलु स्थानक तेमांवे एरीतें वृहत्कल्पनानाप्यमां है महानाग्य म
हापूज्य तुं कहे यक्तं तेकत्तियापएता तबागासस्तमग्गणा होई, तेतत्तियापएता
अविनागत धनंतगुणा. ॥ १ ॥ इति ।।
एरीने सर्व विरतिगुणस्थानना सर्वथी जघन्यमां जयन्य पहेला संयमस्थानमां
एटला निर्विनागहोय ए निर्विनाग सर्वोत्लट विगुरू देशविरति गुणस्थानकना
निर्विनागथी समस्त जीव जेटले अनंते तेटले अनंते गुणता जेटला थनंताया
य तेटला जाणवा ग्रंयांतरे एमपण काळे जे उत्कृष्ट, देशविरति विद्यक्षस्थानक
ना थविनाग दशहजार यसत्कल्पनायें कपियें पठी सर्वजीवतो अनंता तेनेप
ए असत्कल्पनायें एकशत प्रमाणकल्पिये पठीते परस्पर दशहलारने सौगुणकरि
तेवारें दशलारवयाय एटलाअविनाग सर्वविरतिना प्रथम संयमस्थानकमांते.॥५॥
नाग अनंते आदिधीजी ॥ बीजे गणे वृद्धि ॥ इम
अनंत नागुत्तरेजी ॥ यानकनि होय सिद्धि ॥गुणा ॥
अर्थ ॥ एपहेला संयमस्थानथकी वीजा संयमस्थानकमां अनंतमें नागें त
विहोय एटले पहेला संयमस्थानकमां जेटला अविनागवे ते जेटलाचदराजलो
कमां जीव ते सर्वजीवने सरखेनागें वहेंचोथापता एकजीवनेनागें जेटला संय
मना थविनागथावे तेटला यविनागनी पहेला संयमस्थानना थविनागकरतां
वीजा संयमस्थानमा वृद्धियाय एवीरीते वीजा संयमस्थानथी वली त्रीजा संयम
स्थानमां पण तेटलाज अविनागनी वृद्धिथाय तेम त्रीजाथी चोथामां यथोत्तर
धनंतनाग वृद्धिथाय तेमज धागलपण संयमस्थाननी निप्पत्थिाय हवे एम
वि करता करता सर्व केटला संयमस्थान एक कंझकथाय तेकहे. ॥ ६ ॥
अंगुल नाग असंखमांजी॥जे आकाश प्रदेश ॥ तेता
यानक नीपजेजी ॥ कंमक तास निवेश ॥ गु०॥ ७ ॥
अर्थ ॥ एक अंगुलमात्र याकाशदेवना थसंख्यातमा नागमा जेटला थाकाश
प्रदेश के तेटला अनंतनाग वृधिना संयम स्थानक नीपजे के नीपजावियें एटला
तंयमना स्थानकनो समुदाय तेने यागम परिनापाचें कंझकनी स्थापना कहिये
उक्तंच कमंतिएनन्नई अगुलनागो यसरिखको. ॥ ७ ॥

७०
उत्तम विजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन.
1
-वीजा कंडक गणमांजी ॥ आदि असख्यांस जाण ॥
तदनंतरनत नागनाजी ॥थानक कंमक माण ॥ गुणात
अर्थ ॥ दवे पूजे धनतनागधिना कमकनु स्वरूपबताव्यु ते बनतनाग व
विककनी स्थापना ने थनतर वीजो असख्यातनाग धिना कमकनी स्थापना
पाय ते थावीरीते जे पूर्व बनतनागधि कमकना चर्मस्थानकमा जेटला थवि
भागने तेथकी था वीजा कमकनाथादिस्थानकमांथसख्यातमें नागें वृद्धिजाणवी
एटले पहेजा कमकना चरमस्थानकमा जेटला अविनाग ते थसख्याता लो
काकाश प्रदेशने वहेची थापता एकप्रदेशने नागे जेटला थविनागथावे तेटला
थसंख्यातनागनाथसनी वीजाकमकना प्रथमस्थानकमा मिथाय तेने अनतर
पजीयनतनाग वृधिना स्थानक कमक प्रमाथाय ते केम थसत्पातनाग
रविना प्रथमस्थानथी अनतमो नागवधे ए प्रथम स्थानक तेनु थनतमोना
गरविकप वीजु स्थानक एम यथोत्तर कमकप्रमाण होय एम थागलपण पान
सा स्थानपीआगजा स्थानमा नागधि तथा गुणद्धिपोतानी बुफेजाणवी राजा
इम नंत नाग रदिनेजी ॥ कंफ कम्क मध्य ॥ गण
अमस्यास रचिनाजी ॥ कमक माने लक्ष ॥गु० ॥ ए॥
वर्ष ॥ एम यनतनाग दिना कमक प्रमाणस्थानक थने थसंख्यातनाग र
दिनु एरस्थानक एरीते यनतनाग वृद्धि कमक कमकने विचालें थसख्यनाग
तु एरेर स्थानर करता यसरव्यात नाग दिना स्थानक केटलाथाय ते फहे।
समामानेन यमाप्रमाणे या एटले एफ का प्रमाण थयां एटले पर
सिमांदे यसपनाग क्षिरुप धीजीधि पूरीयई ॥ ए॥
ते घागनत जागनाजी। यानक कमक मात ॥ तदनतर
संग्य नागनुजी ॥ यानक एक विरयात ॥ गु०॥ १० ॥
च॥ ते यमासनागदि माना चग्म स्थानकने धागेके० थागन थन
तर नंतनाग मिना स्याना ममाप्रयाय पटले का प्रमाण परिय तेया
रपती संख्यातना दिनु परस्यानर प्रमिसदीय एटले पूर्वपापातयपेजा पार
ना परमयानरमा बटना यरिनाग ने उलट मण्यातपद सा नागात
स्नेनमें जेटनायादे तटगार्थ एम यागतरण म जाणीलेयु ॥ १० ॥

नुत्तम विजयजीकृत संयम श्रेणी स्तवन. ७०३ 1 ते ऊपर क्ष्य राधिनाजी॥जेता गण अतीत ॥ते कीधे संख्यनागनुंजी ॥ वीज्युं गण पवित्त ॥ गुण ॥११॥ अर्थः-हवेते तरख्यातनाग वृदिना प्रथम स्थानकने ऊपर ६यके वे वृदिना स्थानक जेटला अतिकम्याने एटले पूर्व अनंतनागवृद्धि अने असंख्यातनागर दिएरीते एवेलिना जेटला स्थानक गयाठे ते सर्वने था पहेला संख्यातनाग वृद्धि नामा स्थानकने आगसकरिव ते करवापठी संख्यातनागन्नुि वीजु स्या नक पवित्र संयम परिणामरूप आवे ॥ ११ ॥ इम दृद्धिक्ष्य अंतरेजी ॥ कंम्क माने ७० ॥ अंसस ख्यातें चिनाजी॥ थानकजिनवर पु ॥ गुण ॥१२ ।। अर्थ ॥ एजरीते धागलपण ते अनंतनागवृद्धि तया असंख्यातनागडि ए क्ष्यके वे वे वृधिना स्थानकने विचमा एकेक संख्यातनाग दिन स्थानक कर ता कम प्रमाणनीपजे हेष्ट हे प्राणवल्लन ते संख्यातनाग झिना स्यानक हे जिनवीर हे वीतराग तुमे फरस्या. ॥ १५ ॥ वलि पूरव क्ष्य दृचिनाजी॥ यानक सरव करेढ् ।। आग ल गुण संख्यातनुंजी। यानक एक धरेद ॥गुण॥ १३ ॥ श्रर्थ ॥ संग्ख्यातनागधि कमकना चरमस्थानकने धागलें पूर्वनी वे वृदिना जेटला स्यानकगयांचे तेटला तर्वस्थानक करवा एटले करि तेने थागत संख्या तनागजिनु कंकक पुरंथयुं तमाटे तेने ठेकाणे नख्यातगुणमिनु एकनंयम स्थानकधरे एटले घन्चेि थापिनें एटले पाउन धनंतनागवृन्नुि कंझा गपुंचे तेना चरम स्थानकमा जेटला अविनागने तेने उत्कृष्ट संरण्यात गुणाकरि ते संख्यात गुणा करतां जेटला थविनागथाय नेटना अविनाग प्रथम संख्यानगुपस्निा स्थानकमां वधे एरीते धागलपण स्वबु जाप॥ १३ ॥ इम त्रिक दृचिने अंतरेजी । गुण संख्यातना वगणाम क माने नीपजेजी॥ जाणे तुं वर नाण ॥ तु० ॥ १४ ॥ अर्थ ॥ एम त्रिकवृद्धिने विचानें एटले पूर्वजे यनननागडि घसंगमाननाग वृद्धि ख्यातनागवधि एत्रा वृहिना नर्व स्थानाने विचालें एक एक संख्यातगुणतुं स्थानक करि एम करना नातगुण वृधिना स्थानक कंमत ७०४ नत्तमविजयजीकृत सयमश्रेणी स्तवन प्रमाण नीपजे एटले पवृद्धि माहे चोथी सख्यातगुणवृधि पूरीयई सयम स्था नक चारित्र परिणामरूप होवाने लीधे थरूपी तेमाटे हे सर्व ते सर्वतु जाणे पुनरपि त्रिक सही तणाजी ॥ पूरी थानक सर्वाअसरया त गुण yिजी ॥ थानक एक अगर्व ॥ गुण ॥ १५॥ थर्थ- सख्यातगुण वृश्किमकना चरमास्थानकथी थागत वली त्रचिना एटले धनतनागक्षिअसख्यातनागक्षियने सख्यातनागघि एत्रणवृधिनास्था नक जेटला पूर्वं गांठे ते सर्व सयमस्थानक पूरीने नीपजावीने ते पनी यसख्या तगुण दृधिनु एक सयमस्थानक थावे माटे है गर्व पाश्चात एटले पूर्व थयला थनतर कमक ना चरम सयमस्थानकमा जेटला अविनागवे तेने असख्यात लोकाकाश प्रदेश प्रमाणे गुणाकार करता जेटला अविनागथाय तेटला थविना ग प्रयम थसख्पगुण दिना स्थानकमा वधे ॥ १५ ॥ चरंतर चरंतरेजी॥थानक कमक मेय ॥ असंरयात गुण चिनाजी ॥ पंमित वीर्य वरेय ॥ गु० ॥ १६ ॥ थर्थ ॥ तेगारपती पनी थागलपण चार चार वृधिने विचालें एकेक थसख्या तगुण दिनु सयम स्थानक नीपजे एम नीपजावता कमक मात्र थाय ए थत रम्पात गुणरधिना सयम स्यानक एटले थसख्यातगुण वृधिना प्रथम स्थानक पनी थनतनागदि यसपनागधि सरख्यातनागधि सख्यात गणवृद्धि एवा चार दिना स्थानक कन्यापती यसरव्यगुणदिनु वा स्थानक थावे एरीते चार पार वृद्धिने पिचालें एफेक थसख्यातगुण दिनु स्थानक करता कमकमा प्रपाप एटले पट मिहि यसरव्यगुण विरुप पाचमी पनि पूरीयइ ए सर्व सपमस्थानकरूप यान्मगुण ते हे पीर हे परमेश्वर तुमें पंमित वारकरीने वया पाम्या माटे नुमे वद्य पूज्य स्तुत्यो तमारी स्तवना करता एवां गुण पामि।१६ नपर बली चन दिनाजी ॥ फरसे यानक सार ॥ तद नंतरनंत गुणनुंजी॥यानक एक नदार ॥ गु० ॥ २५ ॥ यर्ष- दवेते चसम्पगुणति कमाना चरम स्थानकने उपर पनी चारर जिना स्थानक एटो यनंतनागधि तथा थसत्यनागक्षियने सरयातनागर ६ि तथा मंग्यानगुणहिए चार दिनास स्थान फरसे है सार है जगत चला मनु नेवार पनी वनो थातगरहित धनतगुणधिनु एक प्रथम स्थानक उत्तमविजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन. you महोटुं यावे एटले पाश्चात्य जे (पूर्वषयला) धनंतर संयम स्थानकमां जेटला य विनागले ते सर्व जीवोनी संख्यारूपजे धनंतोते ते अनंता साथै अनंतगुणकरतां जेटला अविनागयाय तेटला अविनाग अनंतगुणधिना प्रथम स्थानकमां वधे. पंच पंच वुढ्ढी विचेंजी ॥ गण एक इक जोय ॥ इम अनंत गुण वुहिनाजी।कंमक माने होय ॥गु०॥२७॥ यर्थः-- अनंतगुणधिना प्रथम स्थानक पठी धनंतर अनंतनागधि असंख्य नागद्धि संख्यातनागवृद्धि संख्यातगुणहि असंख्यातगुणवृद्धि एवां पांच वृद्धि रूप समस्त संयम स्थानक उपजे तेवारपठी एक अनंतगुणधिन वीजु संयम स्था नक यावे एरीते पांच पांच वृद्धिने विचमां एक एक अनंतगुपदिनुं स्थानक नीपजे ते झान दृष्टिये जुर्व एम करतां अनंतगुणधिना संयमस्थानक केटलाथाय कहे वे कंमक प्रमाणेहोय एटले अंगुलना असंख्यातमा नागमा जेटला यामार प्रदेश तेनाजेटता अनंतगुण वृधिना संयम स्थानक थाय ते कंमक यर्य: नपर वली पंच चिनाजी ॥ फरसे संयम गण || प्रब चन अनुसार कांजी॥ पट थानक परिमाण ॥ गुण ॥ 12 अर्थ.- हवे धनंतगुणधिना चरम स्थानकने उपर वली मृलयर - दिना सर्व संयमस्थानक फरसे पण पांचवृद्धि पूरी कग्यापती प्रग नंतगुणधिनु स्यानक ते न करवू केमके पट स्यानक पुमययं -2 स्थानकना परिमाणनी पस्पणा ते प्रवचनधनुनारेके० T सारोबारनी टीकाने थनुसारे कही॥१॥ असंख्य लोकाकाशनाजी ॥ प्रदेश ने पनि थानक कपरेंजी ॥ करें चलि पटग 30 अर्थ - चकदराज प्रमाण एक लोकाकाराने पर अलोकमां कल्पीय तेना जेटला याकाम प्रदान गट णे एक प्रथमर्नु मृल पट स्थानक ने कपर र एटले श्रसंग्ग्यानिवार परा ऊपर पटाया थनं उताणपं पुनो धन्न; एव मनंगा नांगा, 27 ए संयम गुण गणमांजी अपर नजना पणजी। नाम A - - Prer .

नाग तथा गुण वृद्धिकही ते केवी सरव्याये ते जाणगान श्रागमनी गायाकहे -सह जिएहिं बनते, नागच गुण थसरव लागहि ॥ जाणथमम सस.सति। प्रदेश नी जेटली सरव्या ते सख्याये नाग तथा गुणनीतिफरती श्रन सरण्यात नागधि तथा सरख्यातगुणवृद्धि ए वे स्थानक ते नलट मरयातानी जटनीस तथा जे सयमस्थानक अनतनागधिने पामे ते पावना सयमस्थानफना। टसा अविनाग होय तेने समस्त जीवोनी जेटली सख्याने ते सव्याय नाग याप) ता जेटला अविनाग यावे तावत्प्रमाण घनतनागे अधिक जाण अननस यमस्थानक असरव्यातनाग वृदिनेपामे ते पावना सयमस्थानस्नानिविनागना) नक सरख्यातनाग वृद्धिने पामे ते पाउना सयमस्थानकना जेटला अविनागहाय) तेने करुष्ट मरव्याताये नाग हरता जे अविनाग लाने तेटना सरव्यातनाग थ न्यानक ना जे निर्विनागनाग तेने छल्लष्ट सरव्यातगुणनी गमियेगुणता जे य नागथाय तावत्प्रमाण सरख्यातगुणे अधिक जाणवु तथा जे सयमस्यानक यस नुत्तमविजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन थर्थ ॥ ए सयमके. चारित्र गुणस्यानका एटने नहागुणगणाना स्थानकधी मामीने यथान्यात पारित्रप नग्म म्यानपर्यन तमा वर्तेने ते मुनि वांदवायोग्यने पण पेशमात्रने नादानु प्रयोजननयी क सोवि थप्पमाणो, श्रमजमपासु बद्रमाणस्म ॥ किपरि नियोमा पिस रेश खजात ॥१॥ इति माटे श्रपरका बीजा जे मयमागीयो वाय ते नन वदनीक एटले कारणे पांदगायाग्य पण कारणरिना दियाग्यनदीए थर्य यह पनाप्यमा जोइलेवुकतच सयम गण ठियाण किसम्म पाहिगणनश्यन॥२० शहां पटस्थानकना नामकहे पथनतनाग २ श्रमायनागधि ३ सर तनागधि सख्यातगुणवृक्ष ५ थसपातगुणदिश्रनतगुणवृद्धि एन- सेण च जिण ॥ १॥ एनोयर्थ - एपटवृक्षरुप पट म्यानकनेनिषे जे थनत नागनु स्थानक तथा अनतगुणनु स्थानक ए वे स्थानकनी सरया ते सर्व चकर राजलोकमा जेटला जीवनी सल्याने ते सख्याये नागया गुणनीदि करवी धने असत्यनागवृद्धि तथा थसख्यगुणवृदिए वे स्थानक ते असल्यात नाकाकाश ख्या तेटली सख्यायें नाग तथा गुणनी वृद्धिकरवी इतिनाव ग जेटलाहोय तेने असरव्य लोकाकाश प्रदेशप्रमाण नाग अापता जटना थपिनाग लाने तावत् प्रमाण असरव्येयत्नागे अधिकजाणवु तथा ज सयमस्या धैक जाणवु वजी जे सयम स्थानक सरण्यातगुण दिनेपामे ते पाउना सयम नत्तमविजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन. ១០១ ख्यात गुणधिने पामे ते पाठला संयमस्थानना जे अविजागठे तेने असं रख्यात लोकाकागनाजे प्रदेशवे तद्गुणित करियें तावत् प्रमाण असंख्यातगुणो श्र धिक जाणवू तथा जे संयमस्थानक अनंतगुणवृद्धिने पामेवे ते पाठला संयम स्थानकना जेटला अविनागवे तेने समस्तजीवोनी अनंति संख्यायें गुणतां जेटला अविनाग याय तावत्प्रमाण धनंतगुणो यधिक जाणवू. इतिज्ञेयं. ॥ २१ ॥ पट थानक संयम तणाजी ॥ कदेतां स्तवतां वीर ॥ द माविजय जिन नक्तिथीजी॥ उत्तम लदे नव तीर ॥गुण्॥श्॥ अर्थ ॥ ए संयमना पटस्थानक कहेता थकां तथा संयमश्रेणे गर्जित वीर प रमेश्वरने स्तवतां तथा वली मागुणे करीने मोह जेणे विजय कखोडे,अपुत्तरा ए खतिए इतिवचनात् एहवा जिनके वीतराग जे श्रीवीरस्वामि तेनी नक्तिथी उत्तमजीव होय ते नवके० संसारसमुइनो पारपामे सिपरमेश्वरथाय एटले पं मित श्री माविजयगणि तत्शिष्य पंमितश्री जिनविजयगणि तेमनी नक्तिथी मु नि उत्तम विजयजी संसारनो पारपामे एमपण जाणवु ॥ २२॥ अवतरणः- पूर्वोक्त संयमस्थानक समजवाने सुगमथाय तेमाटे श्री वीरप्रनु नी स्तवनाकरतां यंत्रनो वीजोढालकहे। इति संबंध ॥ टाल वीजो सुरतीमहीनानीदेशी. वस्तु स्वनाव प्रकाशक नाशित लोगालोग वीर जगत गुरु नोगवे रत्नत्रयीनो नोग।संयमना पट थानिक सूक्ष्म बुद्धिगम्य ॥ स्व पर विवोधन देते था' यंत्र सुरम्य॥२॥ अर्थ:- सदसटादिक अनंतधर्मात्मक वस्तुस्खनाव तेनुं प्रकाशक तथा केवल झानरूप धारसीमा जेने लोकालोकनुं स्वरूप नास्योवे एहवो श्रीवीरपरमेश्वर त्र एनगत्नो गुरु जावरत्नत्रयीनो धास्वाद अनुनवेठे सम्यक्झान यथार्थविवोध स म्यदर्शनं तत्वप्रतीति सम्यक्चारित्रं निजस्वरूप रमण स्थिरतारूप इति रत्नत्रयी स्वरूपं संयमनी पटक्षिना स्थानक तीक्ष्ण बुद्धियें गम्य तेमाटे पोताने तथा परने समजवाने थर्य असत्कल्पनायें मनोहर पंत्रयापुढे तिहां अनंत नागधि ने स्थानके मीमां अने थसंरख्यातनागवृदि स्थानके एकडा संरस्यातनागवृद्धिस्या नके वगडा संख्यातगुणवृद्धि स्थानके गडा असंख्यात्तगुण वृद्धिस्थानके चोगा उत्तमावजयजीकृत सयमश्रण। स्तवन. बनतगुण वृधिस्थानके पांचडा एम असत्कल्पनाये चारमीमाये धनतनागवृद्धि कमक चार एकडे थसंख्यनागवृद्धि कमक इत्यादिक संज्ञा जाणवी ॥१॥ नाग अनतह रहिना गण कमक सार॥ यद्यपि ते अ सख्य उखु तस विउ चार ॥ असस्य नाग रश्चिनु थानक आ गलं एक ॥ तस गमे व्वु एको मन धरी अतिदि विवेक ॥२॥ यर्थ ॥ अनंतनागधिना स्थानक नला कमकमात्र अगुल असंख्यनागगत थाकाश प्रदेश प्रमाण एरीते जोपण ते अनतनाग वृधिना स्थानक थसरया ताडे तोपण असत्कल्पनाये तेना चारविड स्थापुतु एटले थनतनागजिन का क, पुरुययु तेथी पागल असरख्यातनागछि स्थानक एक थावे तेने ठेकाणे मनमा अत्यत विवेक धरीने एकडो थापुटु ते पूर्वोक्त स्थानकथी निन्न पाडवा निमित्ने थापुड एम सर्वत्रजाणवु ॥ २ ॥ चन चन विधु अतर श्म दोय एकाचार ॥तदनतर चन विउ सघला वीस नदार ॥ आगल नाग सख्यातह सचिनो वीन जाण ॥ श्म चन विया उवता मीमा शत परिमाण ॥३॥ चन वीआ वीस एका मीमा शत समुदाय॥नागनी रद्धिमादे यया हवे गुण रधि कहाय ॥ सख्यात गुणनी सचिमा तीन आदि नदार ॥म सविमीमा अका विच वितिआ चार ॥४॥ यूथ ॥ वली पागल यनतनाग वृधिना एक कमक जेटला स्यानक थाय तेने ठेकाणे चारवि थापीयें बागल यसपनाग वृदिनु एक स्थानकडे तेमाटे वजी एकडो थापीये एरीतें चारचार विउने यांतरे जेवारे चार एकडाथाय एटले यसख्य नाग धिनु कमक पुरुथयु तेवारपठी थातरा रहीत डानु थनत नागधिन के मक थावे तेने ठेकाणे चारविज्यापीये एटले सपला सरवाले चार एकडाने वीस मिमायया ते पनी थागत सख्यातनाग धिनु स्थानक एक थावे तेने वामे वर्ग डानी थापना जाणीये एरीतें चार एकडा गनित वीसविड थनतर सख्यातना ग धिनु एक एक वगडोथाणता जेवारें चार बगडाथावे तेवारे सख्यातनागवृद्धि नु कमक पुरुथाय तेवारपठी वली वेडे चार एफडा गनित वीस मीमाथाये एमस रख्यातनाग क्षिपर्यंत सर्व समुदायें मींडा (100) एकडा (२०) वगडा (४) नत्तमविजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन. ទចយ एतावता संख्यात नागजिनुं कंक एफ असंख्यातनागधिना कंझक पांच थ नंतनागझिना कंमक पचवीस एटला स्थानक असत्कल्पनायें नाग वृद्धिमांचया हवे गुणद्धिमाहे जे स्थानकथाय ते कवे. हवे श्रागत संख्यातगुण धिनु ए के स्थानकावे तेने वेकाणे एक गडो यापी एटले संख्यातगुण वृद्धिमा प्रथम उत्तमस्थानकनो जगडोजाणवो एरीते वली पण पूर्वला चार बगडा वीस एकडा गनित गतमिमा थापीने तेने धनंतर वीजो त्रगडोधावे एरीते जेवारे चार त्रगडा याय तेवार ते चार बगडे संरख्यातगुण धिरूप कंझक पुरुययुं चोथा गडाने अनंतर वली चार वगडा वीस एकडा भने शत मीडा थापीयें ॥३॥४॥ वीस वीआ शत एका पण सय विंड मान ॥ असंख्यात गुण दिनो चोको धुरि मंमाण ॥श्म चन चोका आणतां तिक वीस विक शत जोय॥पण सय एकडा मीडा पंचवीससे दोय ॥५॥ अर्थ ।। इहां संख्यातगुण वृद्धिपर्यंत सर्वमली गडा चार बगडा वील अने एक डा शो तथा पांचसे मीमा एटले संख्यातगुण धिन कंमक एक अने संख्यात नाग वृद्धिना कंझक पांच असंख्यातनाग वृधिना कंझक पचीत अनंतनाग वृद्धि ना कंझक एकतो ने पचीस थाय तेवार पठी असंख्यातगुण वृधिरूप प्रथम स्थान कनो चोगडो मामीये फरी चार गडावीस वगडा एकसो एकडा सहीत पांचसो मी मा गयेथके वली वीजो चोगडोमांमीये ए परीपाटीये जेवारे चार चोगडाथाय एटले यसंख्यात गुण वृधि कंझक पुरंथायुं वली चोथा चोगडाने अनंतर चार त्रगमा वीरस वगडा एकसो एकडा बने पाचसें मीमा थापीये तो सर्वमली चार चोगडा वीत वगमा एकसो बगडा पांचसे एकडा पचीसोमीमा थाय एटले असंख्यात गु पनि कमक एक संख्यात गुणधिना कंमक पांच संख्यात नागधिना कम क पचीस असंख्यात नागवृद्धिना कंमक एकसोपचीस तथा अनंतनागधिना कंमक ठसोने पचीस यया ॥ ५ ॥ वे अनंत गुण द्धिपदेवि पंचक चंग॥पुनरपि पूरव रीतें मीडां अंक सुरंग ॥ तिवार परी पंचक इम पंचक चन जव थाय ॥ आगे पण पंचवीससें मीमां अंक कराय ॥६॥ थर्थ ।। हवे अनंतगुण क्षिपदेके अनंतगुण धिरूप प्रथम स्थानकने ठे काणे एक पांचमोथापीये पुनरपि पूर्वलीरीते चार चोगमा वीस गमा

No text on this page.

उत्तमविजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन. ७१२ मेनागें संज्वलनन क्रोधखपावे आठमेनागें संज्वलननुमान खपावे यने नवमेंनागें संज्वलननीमाया खपावे एरीते नवमें गुणगाणे वीजापायाची वीलप्रति खपावे पठी दशमेगुणगणे संज्वलननुं लोन खपावतो शुक्लध्यान- प्रथक्त्व वितर्क सविचाररूप प्रथमपाद तप धनलेकरी सकल मोहनीय नस्म शांतकरे पठी वीणमोह गुण गणे चढे कायक चारित्रवंतथाय तिहा एकत्व वितर्क अविचाररूप शुक्लथ्याननु वीजोपाद अनुनवी चिरम समय निजागरखपावी चरमसमये झानावरणीपांच दर्शनावरणीचार अंतरायपांच एवं चटप्ररुति ने ये अनंत चतुष्टी विनूपित सिक्षवधु योग्यथाय इतिश्री सिइसेनदिवाकर रुत प्रवचनसारोबारनी वृतिमां प टस्थानकना यंत्रनीस्थापनादीती ते कमायें उपलदित जे दशविधधर्म तेणेकरी विशेपे जयवंता एवां जिनके श्रुतकेवली अवधिजिन मनपर्यवजिन जे सुधर्मा स्वामी तेना वयएके वर्तमान आगम तेथी उत्तम साधु साध्वीउने फरतनरूपे तथा उत्तम श्रावक श्राविकाने अशा मनोरथ रूपें संयमश्रेणी चित्तमांपेनी एटले पंमित्तश्री दमाविजयगणि शिप्यरत्न पंमितश्री जिनविजयगणि ना वचनथी मुनि उत्तमविजयना चित्तमां यंत्रनीस्थापना पेनी एटले स्थिरपणेरही इति ए पण तोचवू अवतरण:-प्रथमढाले पटस्थानक परूपणाकीधी वीजाढालें तेनायंत्रनी स्था पनाकरतां स्यूलबुझिनेपण सुखेसमजाय तेमकयु हवे एकांतरादिक मार्गणायें को ईपू तेने सुखे कहासकियें तेरीते वीरप्रनुनी स्तवनाकरतां यधस्तन स्थान पर पणानो ढाल कहियें। इति संबंध जाणवो ॥ ढाल त्रीजो एकवीसानी देशीनो. आतम रामीरे, शिव विसरामी नित्यनम् ॥ प्रनुजी स्तवतारे पाप पोताना निगम ॥ पटथानिकरे जे अद गण परूपणा॥ सुणो सयणारे वयणा कल्पनी नाप्यना ॥ १ ॥ त्रूटकः- आ दि असंख अंस रशियी कहो ॥ नाग अनंत अंस केटलां॥ हेग्यानिक एम पूरत ॥ कय कंक जेतला ॥ नाग संख्या तह गुण संख्यातें ॥ असंख अनंतद् गुण वली ॥ तस प्रथ मथी कदे अध अनंतर॥कंमक माने केवली॥शा इत्यनंतरमार्गणा थर्थ॥ शुक्ष निर्मल निकलंक यात्मस्वनाव रमणशीत निरुपश्व्यस्थान देवथी उर्ध लोकायनावया निरावरणावस्था तेनेविपे विसरामी एवां श्री वीरप्रष्टने नित्य सरख्यातगुणा वृदिना हेवला स्थानक वलीअनतगुण वृदिना प्रथम स्थानकथी/ थर्थ ।। हवे एकातर मार्गणा कहेने ते हे सर्व सतजनो उत्तम पुस्पो तमेमा तर मार्गपा कहेवाय ते यापीरीते जे सरख्यातनाग दिना माके० प्रयम नत्तमविजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन सदा नमस्कारकरूं एप्रनुने स्तवता थनेकनयोपार्जित पोतानाफरखा सी परे थनेवरह्यां जे पापकर्म तेने निगमु के गमावु प्रनोनमस्कार स्तु मेतदेव सयम पट स्थानकनेविपेजे यनतर एकातरादिक श्रदाण परू पणा सम्यकदृष्टी उत्तमसक्कनो तमे सानलो ए वचन श्रीवृहकपना नाप्यनावे ॥ हे उत्तमजीवो तमे कहोके असरख्यात नागद्धिना प्रथम सयम स्थान थनतनाग वृधिना हेग्ला सयमस्थानक केटलागया एम कोई पूढे तेने उत्तर थनतनाग दिना हेठलास्थानक एक कमक जेटला गया केमके थनतनाग:- कमकपूरुथयु तेने यनतरेज थसख्यनाग वृधिनु प्रथम स्थानक थयुठे तेमाटेज ए- केतु तैमज सख्यातनाग धिना प्रथम सयम स्थानको यसख्यनाग दिना हे उला सयम स्थानक केटलागया तथा सख्यातगुण वृधिना प्रथम स्थानयी स ख्यातनागधिना हेग्ला स्थानक तथा असंख्यातगुण दिना प्रथम स्थानकयी हेला असत्यातगुण वृधिना स्थानक केटला गया ए रीते का प्ठे तेवारे सर्व त्र हेलना थातरा रहीत मार्गणाये कंमक प्रमाणे सयम स्थानक केवलीकहे य उक्त पचसग्रहे सवासि बुद्विप कमक मेता अनतरा वुहि ॥ इत्यनतरमार्गणा ॥२॥ एकातररे मार्गणा सणो सविसतरे।नाग सरयातेरे मूल था नकथी ततरे ॥ देठे यानिकरे भाग अनतना नापीये ॥ एकक मकरे कमक वर्गते दापीये ॥३॥टक ॥ दापीय गण मरया तथी वली ॥ असख अनत गुणयो तथा॥ पढम गणवी एक अतर ॥ कमक वर्ग कमक यथाप्रति एकातर मार्गणा ॥ एक अतर मार्गणा कही ॥ सुणो द्यतर मार्गणा ॥ सरयान गुण थी देवयानक अनत नागना सुनमना ॥ ४ ॥ नजो के एकांतरमार्गणाते सुजे एकवृद्धि विचमा पडतीमूकीने जाकरवी त ए जानकथी हेग्न थसख्यातनाग वृधिनाजे स्थानफगया तेनी प्रधानाची अने तन जवजीजे धनतनाग वृधिना स्थानकगया। ते पूलपा एम कार्ड एकातर पूरे त नुत्तम विजयजीकृत संयम श्रेणी स्तवन. चारे एम कहि जे एक कंमक घने कंमकवर्ग प्रमाण. जेमां हेल असंख्य ग वृधिना स्थानक कंमकमात्र गयां तेमां एकेका असंख्यातनाग वृद्धि कने देग्ल एकेक धनंतनाग जिन कंमकगपुंने श्रने संख्यातनाग वृद्धि स्थानक कंमकमात्र माटे कंमक कमक साय गुणाकार करिये एटले कंमक घाय तोवर्ग इतिवचनात् थने असंख्यनाग ति उपरे अनंतनाग वृद्धि एक कंमकथने तेमाटे एकतो कंमफवर्ग थने तेना उपर वली एक कंमकप्रम ण एटता अनंतनाग वृधिना स्थानक गया। एम कहे. ॥ ३ ॥ तेमज वजी संख्यातगुण वृधिना प्रयम स्यानकथी हेठे संख्यातनाग वृधिना स्थानकगयां तेमूकीने घसंख्यातनाग धिना स्थानक पूढवा तथा असंख्यातन ण वृधिना प्रथम स्थानकधी हेवन संख्यातगुणधिना स्थानक गयां ते मूकीने संख्यातनाग वृधिना स्थानक पूवा तेमज वली थनंतगुण वृधिना प्रथम स्या नकथी हेल असंख्यातगुण वृधिनाजे स्थानकगयां ते पडतामूकीने संख्यातगुण वृद्धिना स्थानक एकांतर मार्गणायें केटला पामीय एमकोई पूढे तेने एवं उत्तर थापिये जे कंमकवर्ग अने उपर एक कंझक जेम पूर्व कह्याठे तेम कहेवा इति एकांतर मार्गणा यमुक्त पंचसंग्रहे एगंतरावुट्टी ॥ वग्गो कंमस्तकंमंच इति एरीते एकातर मार्गणाकही हवे तर मार्गणा सानतो जे वे वृद्धि वचमां मूकीने पूर्वी ते ६वंतर मार्गणा कहिये ते यावीरीते के संख्यातगुण वृद्धिना प्रथम स्थान कयी थनंतनाग वृद्धिना स्थानक केटला गयां एमपूठवाथो हे शुनमना तेकहियेठे. Hel कंडक घनरे, कंडक वर्ग ,गुणो करो ॥ एक कंमकरे तस सं ख्या मनमा धरी ॥ उग अंतररे असंख्य अनंत गुणया ल ह्यां ॥ अध स्थानकरे पूरव परें जाणो कह्यां ॥५॥इति विका तरमार्गणा त्रूटकः-त्रिकै अंतर कोई पूरे ॥ आदि असंख्य गुण वृद्धियी ॥ देवें नाग अनंत केरां ॥ गण कहो गुरु वय पथी॥ कंडक वर्गर्नु वर्ग कीजे ॥ कंडक घन त्रिक नपरें । कंडक वर्ग त्रिक एक कंडक ॥ दोए ते मनमां धरे॥६॥ अर्थ ॥ कंमक धन एक घने कंमक वर्ग वे तथा ते उपर एक कंझक एटला नक पामोयें ए सर्व नेता करतां केटती संख्याथाय ते मनमांधरोकेर

No text on this page.

नत्तमविजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन, १५ RA दिम गणधी॥ देव थानकरे नाग अनंत ना मानयी ॥ ७ ॥ Jटक, परिमाणथी ते अष्ट कंडक ॥ वर्गवर्गा पट घना ॥ चार कंडक वर्ग आगल ॥ एक कंडक सोनना ॥ ऽति चतुरं तर मार्गणा, पर्यवसाननी मार्गणा ते ॥ पट यानिक पूरे करे॥ मूलथी संयम गण फरसी ॥ वीर विनू केवल वरे ॥ ७ ॥ अर्थ ॥ एम ठती अनंतगुण वृधिना पहेला स्थानकधी हेवलि वीजी वृधिना एटले असंख्यात नागधिना स्थानक पण पूर्वे जेटलां त्रिकांतर दिना अनंत र कह्यांचे तेटला जाणवा इति त्रिकांतर मार्गणा हवे चतुरंतर मार्गाने विपे थनंतगुण दिना थादिमके० प्रथम स्थानकथी हेग्ला स्थानक धनंतनाग वृधिना प्रमाणधी केटला ॥ ७ ॥ तेपरिमाणथी थात कंमकवर्गवर्ग तथा व कंमफयन तथा चार कंमकवर्ग तथा उपरें एक कम क शोनन संयम परिणामरुप ए केवीरीते जाणी ते समजावे. धनंतगुण वृधिना प्रथम स्थानकथी हेलि असंख्यगुण वृधिना स्थानक के मक प्रमाण गया थने असंख्यगुणना एकेक स्थानकने हेग्न अनंतनाग वृद्धि ना स्थानक कंमकवर्गवगएक तथा कंमकघनत्रण बने कंमकवर्गत्रण वली कमक एक प्रमाण पामिये तेमाटे ए सर्वने कंकगुणा करिये जेथाय ते सरवालो करी राखियें तथा थसंख्यातगुण वृधिने उपरें कंमकवर्गवर्गएक कंमकघनत्रण कंमक वर्गत्रण ककएक पामियेंठे ते पूर्वती रातीमां प्रदपियें तेवारे यथोक्त मान थाप यमुक्तं पंचसंग्रहे, घड कंम वग्गवंग्गा, चत्तारि वग्गा ग्यनाकंमं ॥ चन, अंतर बुट्टीए, हेमण परुवणाए ॥१॥ इति, कंमक संज्ञा चारतेने तशुणोवर्ग सोल वर्गः कंकगुणों धन चौसठ वर्गवी वसो उपन्न घनःकंकगुणोपि वसो उपन्न यथो चित स्थानके संख्याकरजो इति चतुरंतरमार्गणा. दवे पर्यवशाननी मार्गणा कहे। पर्यवशान जे वेदडो तेनी मार्गणा ते पट स्थानक पूरेथये जाणवी ए मूलयोके धुरथी संयमस्थान फरसोने जगतनुं नायक जे श्रीवीरपरमेश्वर ते केवलज्ञानवखो ॥ ॥ नपर मध्यधीरे संयम थानिक जे नजे॥ ते नियमारे देव न तरी पुनरपी सजे॥अंतर्मुहूर्त्तनीरे बुढी हानि गणमा। होय ७१६ उत्तमविनयंजीकृत संयमश्रेणी स्तवन मुनिनेरे ज्ञानीदेखे ज्ञानमा एाटक ॥ अप्पवदुअ विचार करता अनत गुणना थोडला॥तेदयी गुणद असंख्य के रा॥ कमक वर्ग कमक भला॥पचानुपूर्वि वुद्धि नत्तर एदन्याये नावीये॥क्षमाविजय जिन चरण नत्तम नक्तिनावे पावीये ॥१॥ थर्थ ॥ जे उपरना सयमस्थानक तथा वचमांना सयमस्थानक अनुक्रमे फर से ते नियमा हेन उतरोने काजातरे पुनरपीके वली सजेके० सावधानथाय स यमश्रेणीपामे यक्त थतोमुहुन मित्तंपि, फासियं दुङ जेहि समतं तेसिधवा पुग्गन, परियट्टो चेव ससारो ॥ १ ॥ जो एमठे तो संयम पाम्यानु सुं कहे इति थतरमुडुन कालप्रमाणे अधस्तन सयमस्थान थकी उपरि स्तन सयमस्थानारो दरूप हि तया उपर स्तन स्यानयको अधस्तन स्थानावरोहरूप हाणी मुनिने पाप ते हे धानवान वीरपरमेश्वर तमे देखोगे यमुक्त कल्पनाष्ये गाथावर्ष ए पंचरिन सेदि, पडियका हेत को परिवा ॥ जे हेवा पचमिसाइ, सिसहणिय मां जमा नरदा ॥ १ मतेग व्यरिया, नियमा गमतु देविम जाण ॥ यतो मु इन युही, दाणीरि तहेर नायद्या ॥ २ ॥ इति ॥ ५ ॥ छने थम्पयदुत्वनी विचारकरता थनतगुण वृधिना सयमस्थानक सर्वयकी यो गजाण्या तेपकीयसग्यातगुण धिना सयमस्यानक कमकवर्गथने एक कमक जेटा एटमे परमायें यमरमातगुणा पभानु पुर्याय मिथागले थागजे एरी ने नापि सन यनंतर वृधिस्थानक थसख्यातगुणा तिनाव क्ष्मानाविजय एवा जिन पीपरमेघर तेना चरणकमलनी नमविधि युक्त नकिना महिमा परी सपमणी पामिये नवनिम्नार थश्ये ससार समुश्नो पारपामिये ॥ १० ॥ द्वान चोयो रागवन्याश्री क्लसरूप गापो गायोगे नल वीर जगतगुरु गायो॥ एआकर्णी मंपमणी यानक पटविसपणा यत्र बनायो । अद नल पम्पा करता ॥ मनुज जनम फल पायोरेशनले ॥१॥ व ॥ सातनाएर जगतनापुन्य या श्री महावीरपट नेने नग्नेनाणी गा योमया मंग्मयशीनाम्नाननी सग्रहगाया देना (क्दीन) कमरपीपेत प्रथम

उत्तमविजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन.
३१
ढाले संयमश्रेणीना पटस्थानपरूपणा वीजाढाले यंत्रस्थापना त्रीजाढाले यहा
ए परूपणा करतां मनुष्य जन्मनु फल पाम्यं ॥ १ ॥
शुद्ध निरंजन अलख अगोचर ॥ एहिज साध्य सुदायो । झा
नक्रिया अवलंबी फरसो॥अनुभव सिद्धिनपायोरे॥नलें॥॥
अर्थ ॥ शुद्धनिरावरण निरंजन रागक्षेप अंजन रहित अलख लिपि अगोचर ते
जे स्वरूप चर्म चक्षु जणायनही एवो परमात्मा स्वरूपानंद विलासी परनाव उ
दासी तेहीज धमारो स्वरूप अमने साध्यपणे सुहायो एटले रुच्यो हे थात्मन्
हे जीव सम्यक्झान सम्यक्रिया अवलंबीने फरसो पामो जे स्वस्वरूपना विचारमा
मनविसरामपामे अने अपूर्व रसस्वादनपजे एवोजे अनुनव ते सिवितुं उपाय
यक्तं नाणकिरियाहिंमुरको इतिवचनात् ॥ २ ॥
अशा झान लह्यां तोपण ॥ जोनवि जाय पमायो॥
वंध्य तरु उपमते पामे। संयमगपजो नायोरे नलेण॥३॥
थर्थ ।। संयमश्रेणीन महीमा कहियेते जे सम्यक्दर्शन सम्यक्झान पाम्यावे
तोपण जो प्रमादस्थानक नजाय तो वांजीया फलरहीत वृक्ष्नी उपमापामे केम
के जोतंयमस्थानक नथाव्योतो राजाश्रेणीक तथा सत्यकी विद्याधरनीपरे जाणवु.
जम खर चंदन नारनो वादक ॥ नारनो नागी कहायो॥ति
णिपरें ज्ञानी संयम दीनो ॥ सदगती नविजायोरे॥नलेंगा।
थर्थ ॥ जेम गईन वावनाचंदननो जारवहेतोथको नारनो नजनार कहेवाय
पण सुगंधनो नोगी न कहेवाय तेम ज्ञानीपुरुप चारित्रविना ज्ञाननो नोगीथाय
पण सद्गतीजे मोद तिहाजायनही यमुक्त जहाखरो चंदन नारवाही ॥ नारस्स
नागी नहुचंदनस्त ॥ एवंपुनाणी चरणेहीणो नाणस्सनागी नदु सुग्गईए ॥१॥
आश्रव त्यागें संवर परिणति ॥ अविरति सरव नगयो।। स्व
स्वरूपमां थिरता तेदिजा। संयम शुश्रवद्रायोरे ॥नला।
अर्थ ॥ संयमनुं मूलस्वरुप कहिये पंचावने त्यागे पंचतंवर परणतिम्प
मनकरणानियमुखजीववहीं ए वार घनतिने धनावें पोताना स्वरूपमा स्थिरता
रमण निधनानुनव तेहीज वीतरागें थागममां शुक्षसंयम ठहरापो. ॥ ५॥

हायें कीचो ते दिवश सयमश्रेणं गर्मित श्रीवीरप्रसनु स्तरनरुप प्रासादनपिपे के
७१७ नत्तमविजयजीकृत संयमश्रेणी स्तवन
अनुभव सुरतरु फलने काजे कीजे आत्म अमायो।सन
मुखनावे जेद प्रवर्तन ॥ तेह निवर्त निदायोरे॥नले॥६॥
थर्थ । थनुनवरूपजे कल्पवृक्ष तेनुफलजे मोक्ष ते पामवाने थर्य थात्मा मा
यारहीत करयो अथवा अनुनवसुग्वी जीवनमुक्त मोदने सन्मुखनावें प्रसुमार्गी
नुमारी जे प्रवर्तन तेहिज निवर्तननु उपाय यमुक्त निर्जित मदमदनानां वाका
य मनो विकार रहितानां ॥ विनिवृत्त पराशानां मेंहैव मादलुधिहितानां ॥१॥६॥
ज्ञान क्रिया शुग चक्रे शोनित ॥ सयम रथ सुखदायो । अनुभव
धोरीयुत शिव नगरे ॥ जाता विघ्ननथायोरे ॥नले० ॥ ७ ॥
अर्थ ॥ ज्ञान भने क्रियारूप वे चक्रके० पाडा तेपोकरी शानित एवो सपने
रूप रथ ते सुखदाईवे यने थनुनवरूप धोरि जोड्यो तदारुढ थात्मा चिदान
दने शिवनगरिये जाता निरावरण्यातां विघ्न पतराय कोईनयाय १७ ॥
रायसिधारथ वश विनूपण॥तिसलाराणीजायो। अजअज
रामर सहेजानंदी। ध्यान नवनमा ध्यायोरे ॥नले० ॥5॥
अर्थ ॥ बदितोदित राजा सिद्धार्थना वशनो शोनावनारो शीन सम्यक्त्व देत
विरति एवी त्रिसलाराणी जन्म्यो अपुनरावृत्निये योनिनिर्गम एटले हवे तिलाव
स्था कहोने जन्मरहित जगमरण रहीत सहेज धकतम स्वस्वरुपानदी एवो वीर
परमात्मा तेने ध्यानरुप नाव घरमा ध्याव्यो चितव्यो । ७ ॥
सवत नद निधि मुनि च ॥ देव दयाकर पायो॥प्रयम जिने
सर पारण दिवशे॥म्तवना कलश चढायोरे । नले० ॥ ५ ॥
थर्थ ॥ नवनद नवनिदि सातमुनि एकच थकानावामतोगतीतिवचनात् एटले
सवत् १७९ए नावरसमा देवदयानो करनार पायो अथवा तनु सासनपाम्यो
जे दिवशे प्रथम जिनेश्वर श्री थादिनाथें चरसीतपनो पारणा रस अपामन
लमवटाव्यो एटले सपूर्णकीयो ॥ ए ॥
विजयदेवसूरीम पटोधर ॥ विजयमिद मवायो।। मत्यशिप्याधर
कपूरविजयबुध ॥ कमाविजय पुण्य पायोरे ॥ नले० ॥ १७ ॥

मनमविजयजीकृत संयमणी स्तवन. दए दवे गुरुपरंपग लिखीचने श्रीवीरवामिना पांचमां गणधर श्रीधर्मस्वामि पहे ला पोधग्या निदाधी त्रापाटलग नियंघाविरुधागे रनवौपाटे तरिमंत्र कोटी वार जप्या माटे कोटीविरुधारी पन्नरपाटे चंइसरिश्वत् धनुतोम्यथया माटे चनमा कहेवाणा ३ मोसपाटे सामतनाचार्य यषु निर्ममयया बनवानरह्या माटे बनवानी विस्तययुं ४ वत्रीसमेंपादे सर्वदेवरियया बढतलें श्राचार्यपद श्रा प्यु घने तेना गिप्पजेयया ते वडसाखानीपरे परिवारे वध्या तेवली घणागुणे व ध्या माटे वडगटाफहेबाण ५ जुमानीत पाटे यांविन वर्षमान तपकीधामाटे रा गाजीये तपाविरुददीयो तिहांधी तपाकहेवाण : यनुक्रमे वासतमंपा श्रादेयना मधारी श्रीविजयदेवतृरि तत्पटमनावक सवाविजयसिहतरि तेनी साची ग्रहण शिक्षा चासेवना शिप्याधारी अर्थात् पंमित सत्यविजयगणि गहनायकनी आज्ञा मागी किया उभारकीयो श्रीयानंदघनतायें वनवासरह्या अनेक तपकीधा अनुक्र मेदवावस्याजाणीने यनिहलपुर पाटणमा रहेतां धर्मोपदेशदेतां तेमना शिष्य पं मित कपूर विजय घने पंमित कुशलविजय थयां तेमां श्रीकपूरविजयगणितो थरि हंतप्रतिमा प्रतिष्टादिक धनेक धर्मकार्यकारी प्रनावक यया देश नगर पुर पाटणे विहार करता करता रह्या तेमना शिष्य पंमित वृक्षविजयगणि तथा पंमित दमा विजयगणि थया तेमां पंमित क्ष्माविजयगणि तो देशनायापवाना गुणेकरी अ नेक नव्यजीवोन उपकारी पवित्र चरण कमल धारी यया ॥१०॥ सूरतमांदे सूरय मंगण॥ श्रीजिन विजय पसायो । विजयद यासरिराजे जगपति ॥ उत्तमविजय मल्हायोरे॥नलेंणार॥ अर्थ ॥ श्रीसूरतवंटरे सूर्यममण पार्श्वनाथनी स्मृति प्रणति महिमाये तथा पंमित श्रीदमाविजयगणि शिष्य रत्न संप्रति विद्यमान चिरजीवी परमोपकारी पं मितभी जिनविजयगणिय उद्यमकरी मने प्रथम थन्यास कराव्यो ते जेम माता पिता पुत्रने प्रथम पगमांमवा तया बोलवा शिरखवे तेम गुर्वादिके मने उपकारकीधोए श्री तपागहधिराज नहारक श्रीविजयदयास रिश्वरना राजमां जगत्पति जगत् परमे श्वर श्रीवीरस्वामिने मुनि उत्तमविजय मल्हायो गायो स्तवनागोचरकीयो एम्तवन य महरी गीतार्थ पुरुपो तमे सोधजो नणावजो नाता नपावतां संयमश्रेणी नू स्तिथ सहेजानंदपामजो ॥ ११ ॥ इतिश्री संयमणी गनित वीरविनो स्तवनं समाप्तं श्रीरस्तु.

ទីចុច लोकनालघात्रिशिका ॥ श्री जिनाय नम ॥ अथ श्री लोकनालघात्रिशिका वालाववोध सहित प्रारन - कि प्रथम वालावबोध कार्नु मगलाचरण- श्रीमदाप्त प्रणम्यादौ, जगत स्थिति दर्शक ॥ वस्ये लोक विचारस्य, वार्तिक समयानु गम्॥१॥ प्याल्या - जगतनी स्थितिना देखाडनारा एटले जगतनी यथार्थ स्वरूप रिप तिना देसाहनारा श्रीीतराग नगवानने प्रणाम करीने एटले नमस्कार करीने था लोकना चिारनु वार्तिक समयानुसारे एटले थागमोक्त प्रकारे हूँ कहुँ बु॥१॥ जिण दसणं विणाज, लोअं पूरति जम्म मरणेहि ।। नमा जित नये, तस्स सरूव किमवि चुच ॥१॥ प्पामा - 'जिण'-जिन एटाने श्रीतीर्थकरदेव, तत्प्रणीत 'दसण'-वर्शन एटाने सम्पान्य, दर्शन अथवा तीर्थकरनु दर्शन ते मनोवचन तथा काय ए. पण नार्य करीजे देखतु ते ने पिण-ते निा ज-जे 'जम्ममरणेहि जन्म तपा मरणे करी 'लोथ:-जोक एटले सामान्यपणे चादराज लोकने :पूर R-तो पो ‘यात नये'-थनत व जियो नम-जीप मेने, 'तम्ममा' ते लोग्नु सम्प, याफार, जांबी, पहोलाई तथा जाडाई 'किमयो'- मनोरमान 'युद्ध'कट्ठ तु ॥ १ ॥ अवताण - अनंत प्रदेश यांमशनरिप सामान्यपणे थम्पमात्र लानो भागार वन्वारी - पामाद गण यि पय, कडित कर युग नरागिई लोगो।। उमति नाम धुथ गुण, धम्मा उदध पडिपुणो ॥२॥ थामा 'वश्माइ'वाल्यो तेना वाण'- निसाना समयनेविचे निय पिन एएसे याच्या ने ' पटवणजेणे, बनी रजोस्तो कडि पदिय ए कटोनविन ने "कायुग' वन्य युगनाज 'नागि

No text on this page.

-
एर गन प्रमाण पहानी के चारे विभिनेधि ए विस्तार मध्यनारनो।
लोकनालधात्रिशिका.
च्याल्पा- 'पयत्तलि'-पदतले एटले पहेला जे वैशाख स्थान स्थित मनुष्यने
थाकारे लोक कहो, ते पगना तलियाने काणे चारेदिशिए सात राज प्रमाण पो
जो ,थने मध्य नाग जे पुरुपाकारनेविपे नानिनु गम के, त्याहाँ एक राल प्र
माण चारे दिशिए पोजो वे बन्ने हाथनी कोणीना गमनेविपे पांच राज प्रमाण
पोलो :थने मन्तकने ठेकाणे एक राज प्रमाण पोलो , चली ते लोक हेपनी
माघयती सातमी नरक पृथ्वीना तलाथी कपर यावत् ति शिजासुधो जोतां चीन
राज प्रमाए था लोक कंचौ ॥ ४ ॥
यवतरण-हवे पहोलानी स्थिति कहे-
सगरज मघव तला, पएस दाणीय मदियले एगा।
तो बुद्धि बनना पुण, पण दाणीजा सिवे एगा ॥५॥
प्यारमा -माययतीजे सातमी नरक पृथ्वी, तेनातलाथी चारे दिशिनेरिप ए लोक
सात राज प्रमाण पहोतो वे, त्यांची प्रदेशनी हानी करतो पर तिर्यगलोकनी
मही तजनेरिपे याचे त्यारे चारे दिशिने विपे एकराज प्रमाण विस्तार से त्यांची धनी
ऊपर जातो दिपाय वे, ते पांचमी ब्रह्म नामे देवलोक त्यां चारे दिशाए पा
पराज प्रमाण पहोतो . त्यांची बली प्रदेश घटता ले ते ज्या सिक शिनावे त्या
धारे दिलिए एक राज प्रमाण पहोजो तथा दाणी मिजे ले ते तो प्रदेशमा
प्रकही ये तो पूर्ण पांमुथा फेम मानिये ? त्या ए विशेष से -जे बन्नेपासे प्र
सनी हाणो से तापण कतरता तथा चढता बन्ने पासाना ये घिराणा लई, श्रवना
सपना जोही सांथामा ने नीर त्यारे खौथा पूरां थाय एम सर्वत्र जाणषु
हवे विम्नाग्ना मिरो लगाए ए - सातमी नरक पृथ्वी सात गज प्रमाण,
माहा नगर प्रमाण, पाचमी न राज प्रमाण, चोथी पांच गज प्रमाण, प्री
जी पा रान प्रमाण, घोजी योग प्रमाण तथा पहेनी धम्मा नाक पृथ्वी
.
ਗੁਰ
ने प्राता
विग्नार यागन दो ए मान लोकनाज बोशीने अनुसार क्यु
नेवि घन्मशापण दमाम बावने निभायनी वालातो ज्ञानी जाण ॥ ५ ॥
या-हवे नारना न मांगना राय क्हता प्रथम स नाडांना विचार कहा
मगपन्न रेट निरित्र, यमु पाणु च रहा चश्रमे ।।
इगर रिचरा यय, चरम रखाच तसनाही ॥६॥

लोकनालघात्रिंशिका. ७१३ व्याख्याः-सत्तावन रेपा त्रीठी स्थापीयें, वली पांच रेषा मनोमांमिए, एम करता कंचपणे च खूणा उपन्न खेम थाय; त्रीठी सत्तावन्न रेपा . तेमाटे तेना उप्पन खम थाय . कनी पांच रेपा ठे. तेना त्रीठा चार खांमुश्रा थाय, चार खांसुए एक राज थाय, तथा ए त्रस नाडी पहोलाए करी एक राज प्रमाण, अने लां ब पणे चौदराज प्रमाण जाणवी. ॥ ६ ॥ अवतरणः- तथा लोकनो मध्य नाल ते त्रस नाडी तेमा वेंशियादिक त्रस जीव जन्ममरण पामे ठे, माटे त्रस नाडी कहेवाय . ए त्रस नाडीनी बाहार जे लोकोनो विस्तार , त्यां सूक्ष्म एकेश्यि निगोद सर्वत्र व्यापी रयुं . ते बाहा रनो विस्तार अधोलोकनेविपे कहो हवे ऊर्ध्वलोकनेविपे खांसुआनो विस्तारकहे तिरिअं चनरो, उसु हुसु अह दसय किक्के । वारस दोसुं सोलस, दोसुं वीसाय चनसु पुढो ॥७॥ व्यारव्याः ऊर्ध्व लोकनी श्रेणीनेविपे प्रथम रत्नप्रना नरकप्टथ्वी थकी कपर जे थाचावीश खांसुयानी श्रेणी वे. तेमां लोकना मध्यथी कपर पहेली वे श्रे णीनेविपे चार चार खांडुया त्रस नाडीनाज . पण त्रस नाडीथी बहार नथी. त्यार पठी वली तेथी कपर वे श्रेणीनेविपे उखांमुथा , एटले चार खांच्या त्रस नाडोना पने एकेको बन्ने पासानो खांमुयो लेखवता ब खांमुथा थाय. त्यार प ती पर एक श्रेणीनेविपे था खांबावे. ते वबे खांमुत्रा वे पाशे तेनां चार खांमुत्रा भने त्रस नाडीना चार खांमुथा ए थाउ खांमुथा . वली तेनी कपर एक श्रेणीनेविपे दश खांमुया . तेबन्ने पासे त्रण त्रण,थने त्रसनाडीना चार मली दश थाय . त्यार पठी वे श्रेणीने विपे बार बार खांमुत्रा जे; त्यार पडी वे श्रेणीनेविपे शोल शोल खांमुआवे, तेमज चार श्रेणीनेविप वीश वीश खांड श्रा ठे. ते बधा पृथक् एटले जुजुया . ॥ ७ ॥ थवतरणः-एवी रीते ऊर्ध्व लोकनेविपे प्रदेशनी वृदिना खांमुथा कह्या, एटले अगवीश श्रेणीमां चोद श्रेणी थई; हवे हानीना खांमुथा कहे :- पुणरवि सोलस दोसुं, वारस दोसुं च तिसु दस तिसु॥ उसु उमुं चन खमुअ, सब्वे चनरुत्तरा तिसया ॥॥ व्याख्या:-वली पंदरमी तथा शोलमो ए वे श्रेणीनेविपे शोल शोल खांमुथा 938 लोकनालधात्रिंशिका. सतरमी तथा थडारमी ए वे श्रेणीनेधिपे वार बार खामुथा ये थोगलीम मी, वीशमी तथा एकवीशमी एत्रण पक्तिनेविपे दश दश यांमुथा जाणवा. वावीशमी वेवीसमी तथा चोवीशमी एत्रण पक्तिनेविपे बात धाव खांमुथा जा एवा. पचीशमी तथा ग्वीशमी एवे श्रेणीने विपे उ उ खाया थने सत्यावीशमी तया यग्याचीशमीएवे श्रेणीनेविपे चार चार खांमुथा उस माहेलाज ॥ यवतरण -एवी रीते ऊर्ध्व लोकनी थव्यावीश श्रेणीना खांथानु मान का ए प्रमाणे सर्व कर्ध्व लोकना खांडुया त्रशेने चार पाय ठे वली पण कहे उपरीय लोअ मना, चन चन गणेसु सत्त पुढवीम् ।। चार दस सोल वीसा, चन्चीस व्वीस अडवीसा॥ प्यारमा-बाद राज प्रमाणनो मध्य एटसे जे वजेनो प्रदेशवे, त्यांची श्रधोनो फमते घातरता सात नरक एपीनेरिपे प्रत्येक प्रत्येके चार चार श्रेणीनेपिये क देने ते फेम यो लोग्नी प्रत्यायोग श्रेणीमा पहेजी नरक ध्वीनी चार श्रेणी नेविणे पार समया नेना गोन सामुया थाय ने बीजी नरक पृथ्वीनेपिप पार श्रेणीए प्रत्यारे प्रपके दश दश सामुथा तेन दश गुणा करता पालीश सांमुथा पाप के. घीनी नरक पृथ्वी चार श्रेणीमा प्रत्येक प्रत्येके शोज शान सामुया वे तेना यांसठ यायचे, चोथो नगफ एवीए चार श्रेणीमानी प्रत्येकमा पीपी मायावे तेना एशी सामुन्या थापरे पाचमी नरक एवीत चार सीमा प्रयो घांची चाची सांमुथा ले. तेना उनु पायो उठी नरक पृथ्वी पालोमा प्रत्याशी माया , तेना एफशाने चार थापने सात मनपान पारण irl समुश्रा ने ते नारान यार पाय 7 la 17, चा, चाशन, जी, मनु, ताशा न पार नपा नजारा॥ अद पण मय पास्नर, मनमोलदिय यन्मय सो॥ अम्मा नोरमनं, जायण अम्मग काईदि । १० ॥ গান সব সব গ গরি না বান মা পা ने ना गमेने भा II नन माय माय नगर मी वया दर नारना मयनु ठाम , लोकनालक्षात्रिंशका. ३५ नामनी प्रथम नरक पृथ्वीनेविपे असंख्यात योजननी कोडी मेरूना मूलनेविपे गो स्तनाकार रुचकथी हेवल लोकनो मध्यनाग जाणवो. ॥ १० ॥ अवतरण हवे चोद राजनेविपे अधो लोक, तिर्यक् लोक तथा कर्व लोक मां कोण कोण रहे ते कहे :- सग रज्जु जोयण सया, अधार सुण सगरज्जु माण इदं ॥ अन् तिरिय न लोआ, निरय नर सुरा नावुल्ला ॥११॥ व्याख्या. लोकना मध्यथी याठमा राजनेविपे तमजूतलथी नवों योजन ऊं चो तथा नवशे योजन हेतुज ए अमारों योजन प्रमाण तिर्यग् लोक कहे वाय वे. त्यारे नवं लोकना सात राज वे. ते घडारों योजन कर्ध्व लोकमां ग स्थाथी हेग्ला सात राज ते अधो लोक कहेवाय; आढारशे योजन रहित सातराज प्रमाण नवं लोक कहेवाय ते. हवे अयो लोकनेविपे नारकी प्रमुख, तिर्यक् लोक नेविपे मनुप्याटिक, अने ऊर्ध्व लोकनेविपे देवता प्रमुख कोठे. यद्यपि नवनपत्याटिक देवता थयोलोकमां वशे तथापि नारकी पणा ठे,माटे तेज थधोलोके कह्यावे.११॥ अट् लोय निरय असुरा, वंतर नर तिरिअ जोस तरुग्गी ॥ दीवु ददि तिरिअलोए, सुर सिधा न लोगम्मि ॥ १५ ॥ व्याख्याः- पाठली गाथानेविपे निरय नर मुराइ'-ए वाक्यमां धादि शब्द थाव्यो माटे यादिशब्द निरयाहि त्रणे शदोनी साये जोडिये. त्यारे निरयादिक नारको श्रसुर देवता अधोलोकमां वोठे. व्यंतर नर मनुप्याटिक तिर्यंच ज्योतिषी, तर वनस्पतिकाय अनिकाय एथसंख्याता द्वीप समुहकप तिर्यक लोफमां वशेने. मुरादिक सुर देवता, ति६ कहिये मुक्त जीव ते सर्व कर्व लोकमा रह्या ॥१२॥ प्रकिक रङ प्रकि,क निरय सग पुटवि असुर पढमंता ।। तद वंतर तध्वरिनर, गिरिमा अजोडमा गयणे ॥१३॥ व्याख्याः- एकक राज प्रमाण एफेक नरक पृथ्वी के. एटले साते नरक सात राज यया. तथा पहनी नरक पृथ्वीनां घर एटले नवन पति रहेते; तथा प्र कारे व्यंतर पण पहेजी नरक दृध्विमां न्हं. तया प्रथम पृथ्वीनी पर नरम नुस्य धनंक नगर गिरि एटले मेरू पर्वतादिक पदार्थना नमूह ने. बंदमा, सूर्य ग्रह, नदत्र तथा तारा ए पांच प्राग्ना ज्योतिषी गयणे यामागनंविरहने ।।१३॥

प्पपी माहिश रनोक थडीराज कचो , लोकना मध्यथी सहस्त्रार देव नोक। नादन वपन दर कायदम, तनी विरति एपाजे सयमना सनर नद,तणाग। -रे माग्नि तेरिरहित एटजे मिथ्यात्व गुम, कुदेर नया वृधर्मनास सादगरनार प्रन मुन्द्र नपा यादर जीर यानिमा फग्ना यशनिाशिप २६ लोकनालघात्रिशिका. उसु खमुगेसु अग, चनसु उगं उसु अ कप्प चत्तारी ॥ चन्सु चक सेसेसु अ, गेविन गुत्तराय सिझते ॥१४॥ व्याख्या - लोकना मध्यथी कपर ट खांद्याना कपरला नागनेवि सं. ईशान ए नामना वे देवलोक वे एटले यही लोकना मध्यथी दोढ राज कप देवलोकठे वली त्याथी चार खांमुथा ऊपरना नागनेवि सनत्कुमार तथामा नामना वे देवलोक हे त्यांथी उखामुश्रामां अनुक्रमे ब्रह्म, लांतक, शुक्र तथा सर श्रार नामना चार देवजोक ठे त्यारपठी चार खांमुथानेविषे चार देवलोक थानत, प्राणत, धारण, तथा थच्युत नामनाले वाकीना थाउ खांमुथानेविपे नव प्रवेयक तथा पांच थनुत्तर विमान वे तेमा प्रथम चार खामुथानेविष नवप्रवेयकले ने उपरना पार सामुयानेपिपे पांच अनुनर पिमान थतखामथाना वेडानेवि सिम शिलाने घरतरण - एगीरीते कल लोकनेविषे देवलोकनी स्थिति कही, तेविषे थाग मनी सास फदेते तथा चागमे - मोहम्मम्मि दिवा, आश्जा य रॉ माहिदे ॥ चत्तारी सहसार, पणचए सत्त लोगते ॥१५॥ प्पारमा - सारना मध्ययी सौधर्म वजोक दोडराज छचो ने, लोकना म पार न पा , लोग्ना मध्ययो यत वारमो देवलोक पाचराज घोडे, पने लारना मध्पयो लाभांत सात राजकचो ॥ १५ ॥ मम्मन चरण रहिया, सब लोग फसे निरवसेस ॥ मनय पदम नाए, पचय सुय देस विरईए ॥१६॥ सम्परत्व एटने दग्नेपिप देवनी सहहणा, गुरुनेपिपे गुस्नी सा इदा दपामन धर्मनषि धर्मनी सदहणा, चरण एटले पंचाश्रवयी विरमण पो ६पना निमद. यनतानुवरिया काध, प्पाग्या मान नायविरनि एवाज ममागे जीतेन मम्याव गण रहित कहिया माया नया जानना स्याग लोकनालधात्रिंशिका. ១១ पणे फग्ने एटले चीराजमां तिजमात्र नूमि श्रण फरसी न मूके ; श्रुतज्ञानी जे यति ते लोकना मध्यची उंचे तात राज फरसे वे ; कारण के, श्रुत ज्ञानी ने उत्रुष्टी गति सर्वार्थ सिदि सुधीले एवं तिक्षांतमां का ने. ते सर्वार्थ सिदि लोकना मध्यची का एक कणा सात राज वे. ते लोकमात्र कणा होवा घो. सामान्य पणे पूराज गस्यामां थान्या वे. "नमठ संजयाणं, उववाउ छोत असव' एम कयुं वे. 'चउदस नागे पंचय, वजी देशविरति वारव्रत ध र श्रावक ते चीद राजना चौद नागमांथी, पांच नाग कर्ध्व लोकना फरशे, केमके, श्रावकनी उत्कृष्टी गति थञ्युत नामना वारमा देवलोकधी कही ते ते वारमो देवलोक लोकना मध्यपी पांच राज उचो वे. तेमाटे पांच राज कह्या अवतरण-- हवे प्रथम सुचिरा, प्रतररह, धनरड, तेउना थनुक्रमे प्रमाण कहेतां प्रथम तातमी नरक पृथ्वीनी धादियो मामीने सुचिरड कहे:- अडवीसा बीसा, चवीसा वीस सोल दस चनरो ।। सुप रज्जु सत्त पुढविसु, चन चन नआन पयर घणा ॥१७॥ धर्य ।। तातमी नरक पृथ्वीनेविपे अनावीग सुचिरड , वी नरक पृथ्वीने विपे वीश सुचिरडा, पांचमी नरक टवीनविपे चोवोश सुचिरकु, चोथी नरक पृथ्वीने विष वीग मुचिरक, त्रीजी नरक टवीनेविरे शोल सुचिरकु, वीजी नरक पृथ्वीने विषे दश सुचिरड तया पहेती नरक पृथ्वीनविपे चार तुचीरजु,जे चार खंग था श्रेणीबंध, धने पहोलाए एकल खंमुश्रो होय तेने सुधिर कहिये, सात मी नरकप्टप्वी चार खंमुथा कंची ; थने यावीश खंमुथा त्रीठी धोलीए ठे; ए माटे थनवीश सुचिराज जावा. एवी सर्वत्र नावना करवी हवे ए साते न रकप्टथ्वीना नुचिरड्नु मान जे एकोने घावोश थायठे ते चार नागे करीए तो प्रतर रहनु मान मले वली ते प्रतर रकुनु थांक चारे नागे देतांजे फलितांक याय तेटला घनरड जाणवा. चार चार खांमुश्रा चारे दिशिए एटले थकेक राजलांवो तथा पहोजो धने पाराज नाडो होय ते प्रतररख कहेवाय , तथा चार खांकुथा नाडापणे, लांबपणे तथा पोहोलपणे ते धनरह कहिये. पहेला प्रतर रडनेविषे शोल खांमुथा होय घनरकुनेवि चोशठ खोया होय ते पागल कहेवाशे ॥१॥ अडवीस सयं उसयरि, अद् न, चन जुया उसय सवे ॥ सुइ रज्जु पयर रज्जु, दुतीसि गुण वीस गवरमारना थधोलोकनेविपे पाठ धनरडा जावा सर्व लोकनेविपे श्रोगणीश प्रतररकु / ते चार नागे देता पोणा पाच घनरक ठे ते ने कहेतां थध तथा जल लान न कहे।-चोसठ खांमुथानो एक धनरडा थाय, शोल खामुथानो एक प्रतररक स्त्र लोकनु परिणाम देखाडयु, पण लोकनु स्वरूप वृत्ताकार मनकने श्राकार. व्याल्पा-पोताना वर्गथी यांमुथा गपीए ते था प्रमाणे-सातमी माघद पृथ्वीनेविपे हेठजी श्रेणी ए थावीश खांमुथा, तेने अगवीशना थोकर गए त्यारे सातशेनें चोराशी वांमुथा एक श्रेणीमा थाय एपी चार श्रेणी म उठी नरक टप्वीनेविपे हेलिनी श्रेणीए ठवीश खामुाने तने ग्वीश थवतरण-हवे मन कल्पनाए रुत वृत्ताकार लोकनेविपे धनरकु प्रतररहु, लोकनालघात्रिंशिका व्याख्या-धो जोकनेविपे पाचशेने वार खांमुथा . तेना चार ना- तां प्रत्येक नाग एकशेने अगवीशनो थाय तेटला सुचिरहु जाणवा ऊर्ध्व । नेविपे प्रणशेने चार खांमुथा ये तेना चार नाग करता प्रत्येक नाग होते पाय, तेटला सुचिरकुजाणवा ते थधोलोकना एकोने थवावीश सुचिरा, तन कर्व लोकना ठोतेर सुचिरड, एबन्ने एका करिये त्यारे बशेने चार सुचिरकु थाप अधोलोकना एकशेने थावीश सुचिरकुने चार नाग देये त्यारे वत्रीश प्रतररथाप, कवं लोकना ठगेतर सुचिरकुने चार नाग दैये तो योगणीश प्रतररकु थाय ॥१७॥ यवतरण - हवे धनरहनु मान कहेठे. घणरज्ज अह दिध, पनुण पणुछ ग्ने पनप तेर । घण पयर सूझ रज्जु, खडुअचसहि सोल चन॥रए। व्याख्या -अधोलोकना बत्रीश प्रतररड ठे, ते चार नागे देतां भात थाय, मा ना एकता करिये तो पोणा तेर घनरकु थाय हवे धन प्रतर तथा सुचिरहनु मा थाय, चार खांमुथानो एक सुचिरङ्गु थाय ए सामान्य प्रकारे दृष्टात मात्र च ते वृत्ताकारना खांमुथा यत्रमा लखाय नही, माटे चौरस कह्यो वे ॥ १५ ॥ तथा सुचिरहुनु मान कहे , तेमां प्रथम खोमुथानी सख्या केहेत्रे सयवग्गु सिगुणे पुण, विसय गुणयाल हवति घण रकु ॥ स पणढत्तरि सय, समृतिसही अदुष्ट कमा ॥३०॥ - सातशोने चोराशीने चारे गुणतां त्रण हजार एकशोने उत्रीश खांमुश्रा था लोकनाल हात्रिंशिका. पए अ थी गुणतां वशेने टोतेर थाय. एवी चार श्रेणीवे. तेथी दशेने ठोतरने चार थी गुणतां वे हजार सातशेने चार धनरकुनां खांमुया थाय. पांचमी नरक ट ध्वीनेविप हेलिनी श्रेणीए चोवीश खांमुथा वे. तेने चोवीशथी • गुणतां पांचशेने होतेर घाय. एवी चार श्रेणी ठे तेथी पांचगोने टोतरने चा रथो गुणतां वे हजार ऋणोंने चार घनरजुना खांमुथा याय. चोथी नर क पृथ्वीनेविपे वेली श्रेणीए वीश खांमुया तेने वागथी गुणतां चारों थाय. एवी चार श्रेणी के तेथी चारशेने चारथी गुणतां शोलगे धनकुना खांमुथा थाय. त्रीजी नरक पृथ्वीनेविपे वेली श्रेणीए शोल खांमुथा . तेने शोलथी गुण तां वगेने उप्पन थाय. एवी चार श्रेणी . तेथी बोने उप्पनने चारे गुणतां ए क हजारने चोवीश धनरहना खांडुया थाय. बीजी नरक पृथ्वीने विपे वेली थे पीए दश खांमुया वे. तेने दो गुणतां एकयो थाय. एवी चार श्रेणी वे. तेथी एकगोने चारे गुणतां चारो खांच्या याय. श्रने पेली नरकप्टथ्वीन विपे वेली श्रे पीए वन नाडोना चार खांच्या वे. तेने चारे गुणता गोल याय. एवी चार णी तेथी शोलने चाग्थी गुणतां चोगत थाय. त्यारे पहेती नरकप्टयानविप घनरञ्जना चोगत खांमुया जाणवा. एवी रीते तात नरकप्टथ्वीना खायानो व र्ग करी सर्व धंक एकता करीए तो यग्यार हजार वगोंने वत्रीय अधोलोकनेविषे धनरहना खांमुथा याय. हवे जर्वजोकनेविपे धनग्ना सांमुयानो विचार क हे उपर लोकना मस्तकयी धादि लेवी. कपग्नी श्रेणीए चार ग्यांमुथा उस नाडीना वे. तेन चारे गुणतां गाल थाय. एवी वे श्रेणी दोबाथी गांजने वमागा करतां वत्री धनरहना ग्यांमुथा थाय तेथी वजनी श्रेणीनविषयांच्यावे. तेने व गुणा करता-वत्री थाव. एवी वे श्रेणी दोबाथी वत्रीगने वमना करना वो तेर याय. पठी धावने यात गुणा करिच त्या चोग थाय. एवी त्रण श्रेणीउदो पाथी चौगतने त्रण गुणा करता एकगोने वाणु थाय. त्यार पठी दाने दश गुणा करिये न्यारे एकदो याय. एवी त्र0 श्रेणीयो दोवाची एकमोनत्र एथी गुणतां त्रयों यार. पनी वाग्ने चार गुणा करिव न्यारे एकगोने चुनाजी श चाप. एवी वे श्रेणीचा होवाची एकगोने चुमाजीयने वमा करना बटोने घण्यागी घाय. पती मोजन योजषी गुमनां कॉनसन घाय. एवी योगीयो होवाचीकडोंने उपनन बमणा कानां पनिॉन गर पाय. पदी वीटाने बीपी না মা রা. তো খা খা না। খান না বা लोकनालघात्रिशिका. थाय वली त्याथी घटतां शोलने शोलथी गुणता वगेने उपन थाय श्रेणीयो होवाथी वशेने उपनने वमणा करतापांचोने वार थाय त्यांची रने वारे गुणतां एकशोने चुमालीश थाय एवी वेश्रेणीयो होवाथी एकशो लीशने वमणा करता वशेने श्राशी थाय त्यांची देउन दगने दो गुणत शो थाय एवी एकज श्रेणी होवाथी एकशोज गणवा त्यांथी हेन थानन ठे गुणतां चोशठ थाय एवी एकज श्रेणी होवाथी चोशराज गणवा त्याची उने उथी गुणतां त्रीश थाय एवी वे श्रेणीउ दोबाथी वत्रीशने बमणा करता तेर थाय त्यांथी हेग्ला चारने चारे गुणतां शोल थाय एवी वे श्रेणीव होवा शोलने वमणा करता बत्रीश थाय ए सर्व थक एकता करता उर्वलोकनेविट चार हजारने चोसत घनरकुना खांमुथा थायडे तेने पूर्वोक्त अधोलोकना थग्या खांमुथा थाय एवीरीते पोताना वर्गनीसाथे गणतां चोश खामुए एक घनरजया य ने माटे पंदर हजार बशोनुने चोशन नागे वेचतां वशोने उगणचालीशनो ना ग थावे त्यारे ए वृत्ताकार लोकनेविप बशेने जगणचालीश धनरकु थाय ठे ह हजार वशोवत्रीस खांमुधानीसाथे एकता गएता पदर हजार वशोने उनु धनरञ्जना ये अधोलोकना तथा उर्ध्व लोकना धनरकुर निन्न निन्न करी कहे- 'सडप/ प हत्तरिय' थधोलोकनेविपे एकशोने सामी पचोतेर धनरकु थाय 'सरि । सहीथ हुडकमा' कवं लोकनेविपे साडी नेसत धनरकु थाय ने अनुक्रमे ए मा न जाणीवो ए वन्ने एकठा करिये त्यारे वशोने उंगणचालीश धनरजु थाय ॥२०॥ गुणता सातशे ने वे थधोलोकनेविषे प्रतरराज थाय फर्घ लोकनेविषे साडी में मान जाणवु ॥२१॥ एसर थवतरण - हवे धनरहना खांमुथाना प्रतररकु कहे वे - चन गुणिय पयर रज्जु, सत्त उरुत्तरय उसय चम्पामा ॥ अद नढ नव उप्पणा, सवे चन गुणिय सुइ रङ ॥7 व्याख्या - यधोलोकनेविपे एकशोने साढी पचोतेर धनराज वे तेने चार 7 पनराज ने, तेने चारथी गुणता बने चोपन र राज थाय एम श्रधोनोक या कर्वजोकना एफठा करिये त्यारे नवो ने उप्पन प्रतरराज थाय र राजने चागुणा करतां जे थक थावे ते सूचीरहुनु लोकनालक्षात्रिंशिका. ७३२ अवतरण- हवे सूचीरहुनु मान गाथाए करी कहे:- अडवीस सयजुत्तर, दस सोला अन्तीस चोवीसा॥ ज्य संवग्गिय लोए, तिद रज्जु खंमुआ नेया ॥श्॥ व्याख्या - अधोलोकनेविपे सातशे ने वे प्रतर रड वे. तेन चोगुणा करता वे हजार पावशे ने थानसूची रख थाय. कर्वलोकनेविपे वशेने चोपन प्रतर र कुठे, तेने चोगुणा करतां एक हजारने गोल सूचीरक थाय तथा अधोलोक यने कर्ध्व लोकना एकठा करतां त्रण हजार आठशे अने चोवीश सूची रकु थाय. पोता ना वगै गणित लोकनेविषे त्रिक रनु कहिये एम धनरड तथा प्रतररकु तथा सु चीरकु ए त्रय राजना खांमुथानी संख्या जाणवी. ॥ २२ ॥ हवे वर्गना कधी गणतां जे खांमुथानी संरख्या धावे ते संग्रह गाथामां कहे:- एगार सढ्स उसया, बत्तीसा चसहस्स चसही॥ अ द इं सब पत्नर, सदस्स उन्नि सय उन्ननुआ॥ २३ ॥ व्याख्याः- अधो लोकनेविपे वर्गने अंकथी गणतां अग्यार हजार वशोने व त्रीश खांमुथा थाय. कर्व लोकनी श्रेणी वर्गना अंकथी गणतांचारहजार ने चोसन खांसुथा यायतेवेदु एकता करिये त्यारे पंदर हजार वशे ने उपन्न थाय॥२३ अवतरणः-हवे वर्ग करवानो विधि गाथाए करी कहे:- अडचनवीस वीसा, सोल दस चक अदु च ॥ दस बार सोल वीसा, सरिसंक गुणान चनदि गुणोश्वा व्याख्या.- अही वील शब्द त्रण काणे जोडवो. ते धामः- यावीश, ठवीश तथा चोवीश एम जाणवु. तथा ए माधवती सातमी पृथ्वीथी आदि लईने जे श्रा गवीशादिक थंक त्रीती श्रेणीने विपे यावे ते पोतपोतानेसरखे अंके गुणी ए अने एक वा करिये. पठी तेने चोगुणा करतां जे अंक थावे ते खांबानी संख्या जाणवी ते श्रावी रीते.- सातमी नरक पृथ्वीने तलेथी भगवीशने अवावीसथी गुणतां सात शेने चोरासीयाय उवासने वीशथी गुणतां ठशेनेटोतर थाय; चोवीसने चोवी सथी गुणतां पांचशोने टोतेर थाय वीशने वीशथीगुणतां चारशों थाय; शोलने शोलथी गुणतां वशे ने उपन्न थाय, दशने दशथी गुणतां एकशो थाय; अने चारने ३३२ लोकनालघानिशिका चारथी गुणता शोल थाय, एसाते स्थानायकोने एकता करिये त्यारे वे हमार था शो ने थात थाय, तेने चोगुणा करतां अग्यार हजार वशे ने वत्रीस थाय एयधो लो कना साधा जाणवा हवे की लोकना सामुश्रा कहे -चार, उ,थाउ, दश, बार, शोल तथा वोश ए अकोने सरखा अकथी गुणगा, ते यावी रीते -चारने चार गुण कस्याथी शोल थाय ने उथी गुणता उत्रीस थाय, थाउने थातथी गुण तां चोसन थाय, दाने दशथी गुणता एक गो थाय वारने बारथी गुणतां एक शोने चुमालील थाय, शोलने शोजथी गुणता वशीने उपन थाय, वीसने वीस थी गुणतां चारशे थाय, ए सात स्थलोना अक एकठा कसाथी एक हजारने शोल थाय. तेने चारथी गुणता चार हजार ने चोसन कर्व लोकना खोमुथानी संख्या थाय पती अधोलोकना तथाकल लोकना सामुमा एकता करिये त्यारे पदर हजार वशोने उनु थाय ॥ २४ ॥ अवतरण - वली प्रकारांतरे वर्ग फरवानो विधि गाथाए करी कहेते चन अडवीसा उप्प, मपयरसरिसंक गुणिय पिद्धमिलिए ॥ सम दीह पिदुवेहा, नमूमनो खमुआ नेा ॥ २५॥ व्याख्या - लोकना मस्तकनेविपे ऊपरली त्रीठी श्रेणीए चार सामुयारे सा तमी नरक एथ्वीनी टेली श्रेणी श्रावीश रखामुानी ले एम चारथीथादिलश्ने वेली उपनमी श्रेणी असावीस खामुथानी एटले पुरुषाकार लोकनेविपे बीती वपन प्रतरनी श्रेणी में श्रादि तथा अतनी श्रेणीउनु ग्रहण करया थी मध्यनी श्रेणीनु पण ग्रहण थाय ने, माटे वपन श्रेणी जे श्रेणीनेविपे त्रीही श्रेणीना जेटला खामुथा वे तेटला थकथी गुणीए, जेमके, सर्वथी ऊपर नी मस्तक श्रेणीनेविपे चार खांद्ययात्रीमावे त्यारे चारने चारथी गुणता शोलथाय एम उपन श्रेणी सरखे थांके गए। एकठी करिए त्यारे पूर्वोक्त पदर हजार व शेंने उनु खोमुवानी सख्या थाय हवे खामुथानु परिमाण कहे - लांबपणे, पोलाइए तथा जाडपणे कुनीनी पते सरखा वे एटले पोना. लांबा तथा जाडा पा राज प्रमाण जयलोक तथा अधोलोकना सर्व एवा यांमुथा जाण्या ॥३॥ थवतरण - हवे वृत्ताकार लाक पन करवानो विधि कहे- दाहिण पास उवमा, वामे विज चिवरीया । नामी सदिय ति रङ्गु, पिदु जाया सत्त दोहुन्चे ॥ २६ ॥ - लोकनालधात्रिंशिका. ७३३ व्याख्याः- कल लोकनेविसे त्रस नाडीपकी दक्षिण बाजुए एटले जमणी वा जुना वे खंम. ते थामः-ऊर्ध्व लोकनेविपे ज्यां कोणीनी जगो वे, तेमध्ययी जोतां वारमी श्रेणीवे. ते वारमी श्रेणीधी वे खंभ करिये एटले ऊपरसा खमनेविषे शोल श्रेणीयो रहे. एवी रीते दक्षिण वाजूना जे वे खेम ले ते कर्व लोकनेविये त्रत नाडीनी मावी वाजूनेविये उलटा करी नारखीए. ते थामः- ऊपरना खमनी कूर्परनी जे दिशा, ते मस्तकनी तरफ करिचे; यने हेग्ला खमनी कूपरनी जे दिशा ते लोकना मध्य तरफ करिये. एटले ऊपरलो खंग ऊपरनी दिशाए तथा हेग्लो खम हेवनी दिशाए थापीए. चल नाडी सहित मावी बाजूए त्रीठा त्रण राज चाय ते धामः- त्रस नाडीया वाहार कूर्परने ठेकाणे जमणी वाजूए थान खां रुघा त्रीता : तेना वे राज थने एक त नामीतुं राज, एमत्र राज पोला ए थायठे; यने लांबपणे तथा उचपणे सात राज होय. ॥ २६ ॥ विधान वाम खंमे, दाहिण पासे विज विवरीअं ॥ नवरिम ति रङ्गु खमं, वामे गणे अहो दिजा ॥३॥ व्याख्याः- धधो लोकनी त्रत नाडीची जे मावी वाजुनो धारवां खंगले, ते विपरीत एटले घवतो यथवा उयो हेठजी त्रत नाडीनी जमणी वाजुनविप या पीए. एटले अधोलोसनेविरे जमणी वाजुए जीता चार राज, थने लांबपणे ना त गज थया ते या प्रमाणे:- त्रत नाडीयी जमणी वाजुमा प्रायोजोकनी हेतु वार खांड्या ने तेना त्रण राज; थने वन नाडीतुं एक गज , एम चार गज थाय. पती कर्वतोकनो मावी वाजुनी त्रीतो त्रण गज लांची नात गज प्रमा ए खमते. ते थोलोकनी जे व्रत नाही तेनी मावी बाजए देए, एटले सर्व त्र पूर्व, पश्चिम, दक्षिण तथा उत्तर दिगिधोए तथा जाट परो मातयन प्र माए घन लोक ययो. ॥ 3 ॥ ज्य संवटिय लोन, बुद्धि कन सत्त रड माण घणो ॥ मग रमु अयि विधा, गिए पामाः पृरिजा।। ३ व्यारव्या:- ए प्रकारे तप तंवनित लांस नासतारे कोनो पण ते सोर हनासरे ने देवी रोनेसीयो-हिए करी. मन रमनाए करीमान गज प्रमाण धन कीयो, तपानात पर घना लांबपणे, पोजाणे तथा चपणे अधिक ७३४ लोकनालघात्रिशिका - - खांमु धाय ते लईने हेउन जे जगोए श्रोड होय ते पासू पूरिये एवीरीते चोर स सात धनरङ्ग प्रमाण लोक कसो पण चोरस नथी गोलाने थाकारे लोक ह ताकार वे पण धनलोक वृत्ताकार लखाय नही तेमाटे चोरस कीघोले ॥५॥ थवतरण - हवे ए समधन लोकनेविपे धनरझु, प्रतररह, सूचीरज थने खां मुथानी संख्या कहे घण रङ्गु तिसय तेया,ल तेर बावत्तरीय पयर सू३ ।। चपन्न डसी खंमुअ, सदसि गवीसा नव पन्नाशया व्याख्या -- ए इत्ताकार धनीरुत चोरस लोकनेवि त्रएशेने तेतालीम पनर कु ने एक हजार त्रशेने वोतर प्रतर रॉ के. पाच हजार चारशेने थत्याशी सूची राठे खाधानी सख्या कहे - सातराज प्रमाण धनलोकना मुथा एकवीश हजार नवशे ने बावन जाणवा ॥ २ए । यवतरण - हवे धनरड, प्रतरर, सूचिरञ्जु थने धनलोकना खांमुथा था एवानी करणी गाथाए करी कहे- सगवग्गो सग चन तिग, गुणिए उन्नय अदुखं घणा॥ उनूस सिआलं, चन गुणिए पयर सुश् असा ॥३०॥ व्याख्या-ए सातपनर प्रमाण समचोरस जे लोक ते सात सात वर्गथी गणि एते सप्त वर्ग कहिये त्यारे सातने सातथी गुणिये, त्यारे गण पचाम थाय एवीग एपचाश धनरहनी सात श्रेणीचे ते थोगणपचाशने सातथी गुणतां त्रएशोने तेतालीश धनरहनी सरमा थाय पनी धनरहनो श्रांक त्रण बार चोगुणो करिये त्यारे अनुक्रमे अधोलोक तथा कर्वलोकना प्रतररह, सुचीरकु, तथा खामुथानी सख्या मलेले, ते था प्रमाणे-त्रणशो तेताली धनरहने चोगुणा करिये त्यारे एक हजार ऋणोने बोतेर प्रतररनु थायचे ते प्रतररहुनो श्रांक चोगुणो करिये त्यारे पांच हजार चारशे ने अग्यासी शुधिरह पाय तथा सुचिरकुनो चोगुणो थांक करता खांमुथानी सख्या एकवीस हजार नवसेने बावन थाय हवे अधो लोक तथा कर्वोकनी जुदीजुदी धनरकु सुचिर प्रतररकु तथा सान्थानी स स्या कहेते - अधोलोकनेविषे एक से ने उनु धनरकुने, अने ऊर्ध्व लोकनेपि एक शो ने सुडताजीश घेनरहु ने, एने चली त्रण वार चोगुणा करता थनुक्रमे प्र .

लोकनालघात्रिंशका.
७३५
तरकु, तथा सुधिरहना धंस एटले खांमुत्रानो मान अधोलोक तथा गज़लो
कनेविपेनिन निन्न मिली धावे. ॥ ३० ॥
अवतरण - धो लोक तथा ऊर्ध्व लोकना खांकुआनो निन्न निन्न प्रमा
एनो संग्रह करी कहे:-
सग चुलसी पण अमसी, ग तीस पतीस तिथिस बावन्ना ॥
पण चुअल जुआ वारस, दस्स चना वश्सय हिआ॥३१॥
व्याख्याः- अधोलोकनेविपे एक शो ने उनु धनरङ ठे; तेने चोगुणा करिये
त्यारे सातों ने चोराशी अधोलोकनेविषे प्रतररकु थाय. धने ऊर्ध्व लोकनेविपे
एक शो ने सुडतालीश धनरकु वे, तेने चोगुणा करिये त्यारे कवं लोकनेविपे
प्रतररकु पांच शो ने यग्याशी थाय. थने अधोलोकनेविपेत्रण हजार एक शो
ने उनीश सुचिरड याय अर्ध्व लोकनेविपे वे हजार प्रण शे ने वावन सुचिर
क वे हवे खांमुथानी संख्या कहेजेः- अधोलोकनेविपे पण वार हजार
पचिशोने चुमालीस खांबावे जर्व लोकनेविपे नवहजार चारसो ने
धाव रखांमुथा . अधोलोक तया उर्ध्वलोकना एका खांसुया करिये तो एक
वीश हजार नवशोने वावन पूर्वोक्त संख्या मले. तथा अही त्राओं ने तेतालीश
राज कहां पण तेना खांमुधा नथी. मात्र वशोने गण चालीशराजना खांमुआ
तेथी एकशोने चार घनरक अधिक वे. तेना खांमुधानो गम नथी. पण एक वि
शेप , के ए धनलोक चोरस करयो , धने लोक वृत्ताकार वे. त्यारे चारे दिशि
ना खूणा अधिक थाय ; तोपण एवडो यंतर पड़े नही. पण ए चोरसनुं जे परि
माण का ते अंतरंग वृत्ताकार लोकनु मान धरीने का चे. माटे खुणानो ना
ग थधिक थाय नही. पी प्रकारांतरनी वात तो झानी जाणे. पण पूर्वोक्त वर्ग
ना थोक गणतां पंदर हजार बशोने उनु खांमुथा थाय. तेने चोशठ जाग देतां
घनराज थाय. अधिक खांमुथा नथी त्यारे त्रणशोने तेतालीश राज केम थाय
ते गीतार्थ विचारी जेवं,असंख्यात योजननो एक राज थायवे. अथवा सहस्त्र नार
लोहनो गोलो को एक महर्षिक देवतापोतानी शक्तिए करी तेने नीचे नाखी दिये त्या
रे ते गोलो उ मास, व दिवस, उपहोर ; उघडी अने ब पल जेटला काले
नीचे भावीने पहे. तेटलो एक राज थाय. ए चारे दिशिने विपे राजनुं प्रमाण
थाय ते जाणवू. ॥ ३१ ॥

३६ लोकनालधानिशिका. श्य पयर लिहिय पग्गिय, संवष्ट्रिय लोग सार मुवला ॥ सुअ धम्म कित्तिअ तह, जय ह जहा नमह न द भिस ॥३शा व्याख्या - ए प्रकारे करी जे उपन प्रतर, ते प्रकारे लिखित वली संगित एटले वर्गने थक गणित लोक तेनो सार तत्व ज्ञानविचार यथार्थ पणे लोकस्वरुप सब गुरुधी पामीने ते प्रकारे यत्न एटले उद्यम करवो पूर्वे जे प्रकारे चोद राज लोक तुं प्रमाण का, ते लोकमा धनत जन्ममरण पामता थका वारवार अत्यर्थपणे मां ब्रमो, एवो तीर्थकर सकल जीव हितकर पारग परमेश्वरनो नव्य जीवने उ पदेश दे. लोकनो सार केवो वे - ते श्रुतधर्म एटले जे सिक्षात मार्गमा ज्ञानना बजे करी ज्ञानवान तीर्थकरे कहेलु ते ॥ ३५ ॥ श्रीमदाप्तोक्त विधिना, लोकनालस्य वात्तिक । धिमित्र धनराजस्य, गगाख्य तनुजाकृते॥१॥ श्रीमत्सहज रने न, व्याख्यान मुदयाब्धिना ॥ असगत यमुक्तत, विशो ध्य धीधनैनुश ॥ २ ॥ युग्मम् ॥ इतिश्री लोकनास मात्रिंशिका वाजावबोध सम्यक्त्वविचारगनित महावीरजिनस्तवन. ७३७ श्री कली कुंम पार्श्वनाथायनमः यय श्री सम्यक्त्व विचार गर्मित श्री महावीरजिनस्तवन. बालावबोध सहित प्रारंन. मंगलाचरण. प्रणम्य परमानंद, दायकं जिननायकं ॥ वईमान चिदानंद, वर्षमान निधा धर ॥ १ ॥ श्रीतम्यक्त्वस्तवस्यास्य, वधस्य लोकनापया ॥ वालानामवबोधाय वालाबोधं तनोम्यहं ॥ २ ॥ दोहाः- प्रणमी पद जिनवरतणा ॥ जे जगने अनुकूल ॥ जास पसायें में लघु ॥ तमकित रयण अमूल ॥१॥ ते जिम वीरे उपदिस्युं ॥ परखद मजि ध नूप ॥ तिम टुं वर्णवसुं हवे । समकित सुन स्वरूप ॥ ५ ॥ यर्थः-श्री देवाधिदेवना चरणकमल नमीने जेना चरणकमन सकल जीवने हितकारी अनुकून जे श्रीवीरपरमात्माना चरणकमलने प्रसाटे में पण यमु लक सम्यक्त्वरन्न पाम्युं ॥ १॥ ते सम्यक्त्व जम श्रीमहावीरे वार परपदामां प्र कास्युं तेम दुं सम्यक्त्वनुं स्वरूप महारीवुधिप्रमाणे वर्णवीस ॥ २ ॥ ढाल पेढेलो एग्मिीकिदां राखी एदेशी टीका. इगविध इविध त्रिविध चविधवति ॥ पणविध दाविधजाणो ॥ ए समकि त शिवतरुनुं वीजक ॥ संप्रति परे मन श्राणोरे ॥ प्राणी समकित गुध थारा थो । जम गिवमारग साधारे । प्राणी ॥ सम० ॥ १ ॥ ए यांफणी॥ उगविध तुज थाणा स्ची विहा ॥ इव्य नावयी कहिये ॥ निश्चयने व्यवहारे अथवा ।। समकित इविध सदश्य रे ॥ प्रा० ॥ २ ॥ सदहणा सूची तुज यागम ॥ परमा रथ नवीजाणे ॥ समकित व्ययकी तल कहिये ॥ नावथी तल वखाणेरे ॥ प्रा० ॥ ३ ॥ मिय्यापुन्त गुमनु वेदन ॥ समकित इव्य कहावं ॥ नावयि तत्व र विपण तिमहिज ॥ तत्व रुची पग्निावरे । प्रा० ॥ ४ ॥ पुन्नरूपी धरूपी य पुन्नन ॥ ए पण विविध तुटवे ॥ क्षायोपामिक वेढक पुजन | रोष थपुन्त लेखरे ॥ प्रा० ॥ ॥ निश्चय समक्ति शुन, यातमनो ॥ हानादिक परिणाम ॥

॥
सम्यक्त्वविचारगनित महावीरजिनस्तवन
अथवा धातम समकित कहिये ॥ गुण गुणी भेद न गमरे ॥ प्रा०॥ ६ ॥मि
थ्या दृष्टीती सम्तवना ॥ त्यागादिक व्यवहार ।। वतिय निसर्गापर अधिगमय।
बिदुनेदे निरधारे प्रा० ॥ ॥ जिम कोई मारग नूलो पंथी। जमता मारग
थाचे ॥ कोक उपदेशादिक योगे । कोक धाग न पायेरे ॥ प्रा०10॥ ज्वर प
ए सहेजे श्रीपध योगे, जाये एक न जाय ॥ मारग ज्वर दृष्टांते समफित ॥३
गि परे विविधे थायरे ॥ प्रा० ॥ ॥ जाती समरण प्रमुख थकीजे ॥ तान नि
सर्ग विचारा ।। गुरुउपदेशादिक थी याव्युं । ते थधिगम चिनधारोरे ॥णार ॥
कारक रोचक दीपकनेदे । त्रिविधे पण ए नाप्पु ॥ अथवा उपशम झायोपामि
क ॥ दाधिक नेदे टारस्युरे ॥ मा० ॥ ११ ॥ तें जिमनाप्यु ते तिमकी ॥ ते का
रक तत स्वास ॥ तुज धर्मापरि रुचिधी रोचक । नहि, किरिया, श्रयासरे । प्राय
॥१३॥ मिय्या दृष्टि थको पण पोते ॥ धर्मकथादिक सारे ॥ दीपक पर परने दी
पावे ।। ते दीपक उपचाररे । प्रा०॥ १३ ॥ ते समकित जिम फरस्यु
जीवे
तिम तुज थागल दाखु ॥ तुज बागम नय न्याय शुधोदधि ॥ परमारथ रस चा
खुरे ॥ प्राणी समफित सुरु थराधो ॥ १४ १५
अर्थ ॥ एकप्रकाग्नु वेप्रकारनु त्रणप्रकारतु चारप्रकारचं पाचप्रकारनु अथवा
दशनकारनु सम्यक्त्वजाणवु ए सम्यक्त्व माइपरदन वोजनूतजाणवु सपतिरा
जानीपर मनमांचितववु पडत - एगधित विद तिविह, चहा पचविह दसवि
ह सम्म । मुरक तरुवीयनूयं, सपर रायाव धारिता ॥ १ ॥
एकविधते ताहरी थाझारुचिरूप चेप्रकारनु सम्यक्त्वते एकस्थ्य सम्यक्त्व बीजना
वसम्यक्त्व अथवा निर्धेसम्यक्त्व धने व्यवहारसम्यक्त्व एपण यप्रकार कहियो।२
तेमाजे तमेवसननिस्सकंजजिरोदि पवेश्य इत्यादिकसहहणामधीहोय पण
रमार्थ काईनजाणे जीवाजीवादि स्वरुपपण नममजे तेने व्यसम्यक्त्व कहिये
नावेण सदहतो घयाण मावि सम्मत्तमितिवचनात तथा तमेवसच इत्यादि
क सराहणाधीहोय थने नवतत्वादिकना भेदानुनेदपण परमार्थ समजे तेने ना
वसभ्यरत कहिये जीवाश्नवपयथ्ये, जाजाए तस्सहोसम्मत्तमिति वचनात् ।।
अथवा रूपी इव्यसम्यक्त्व थने श्रमपी नावसम्यक्त्व एप्रकारेपण बदथाय
तेज विचरीनकहेते मिथ्यालना राबपुजननुदन एटले मिथ्यात्वना ऋणपुन कन्या
वे तेमा जे सुक्ष पुजनुवेदच तेने व्यसम्यक्त्व कहिये धने नारथी तत्वविहाय
तेने नावसम्यक्त्व कहिये ते उपशम दायिकादिक जाणवु ॥ ४ ॥

३ए सम्यक्त्वविचारगर्जित महावीरजिनस्तवन. अथवावली बीजेप्रकारे सम्यक्त्व, विविधपणु देखाडेठे रूपी अने अरूपी ए वे बेटेजे सम्यक्त्व ते धावीरीतेजे एक दायोपशम अने बीजुवेदक ए वे सन्च त्वरूपी पुग्दलरूपठे माटेएने रूपी कहिये अने शेष जे दावक. उपशम अने सा वादन ए त्रण सम्यक्त पुनरुपनधी माटे एने अरुपी कहिये यह विचारपं चालिकायां धम्मायम्मा गासा, जीवाकालोय खाइमंचेव ॥ सासायण उपसमियं, यपुग्गलाई तुएया ॥ १ ॥ करालिय वेविय, आहारग तेयस कुणी मलो ।। उ स्तातंनिस्तातंकम्मण कम्माणिवायतमो ॥ २ ॥ वग्गण्यणंतत्रायव, मिस्तरकंधो अचित्त महसंयो। वेयग खाउँवसम, कन्जोय पुग्गललएनणियं ॥३॥ ए विविध पणुपण साक्षात् केवलज्ञाने हे जगवन्तुं देखे ॥ ४ ॥ हवे निचेसम्यक्त्व धने व्यवहारसम्यक्त्व ए वे देखाडेठे निश्चयथी नि.नये ज्ञानादिमय एटले ज्ञान दर्शन चारित्ररूप यात्मानो शुनपरिणाम तेहिल तम्य क्वकाहि अथवा ज्ञान दर्शन चारित्ररूप यात्मानो परिणाम ते यात्मारूपज तेमाटे यात्माज सम्यक्त्व कहियें हां गुणगुणीनो यनेदोपचार लहियें गुणते ज्ञान दर्शन चारित्रादिक अने गुपीते यात्मा ए वे एकेकधी तूटानथो तेमाटे ए वे ने माहोमा नेदनथी अनेदरूपजते यतः यात्मैव ज्ञानदर्शन चारित्रास्यथवा यते. यत्तदात्मकएवैप गरीरमरितिष्टति ॥ ६ ॥ वीजें व्यवहार सम्यक्त्वते ने मिय्यादृष्टिसंयाते परिचयप्रमुग्व वा यथवा दे वगुरुनी नक्तिप्रमुख साचवे व्यवहारथी तम्यक्त्वना दूषण्टाने यने सम्यक्त्वना नूपण्यादरे इत्यादिक लदाणेकरी व्यवहारथी सम्यक्त्वयारि कहिये जेमाटे गुण स्थान क्रमारोहमां कन्युने. देवेगुर्गव तपेच, नजतिंगासनोन्नति ॥ अव्रतोपि कगे त्येव, स्वितिन्तूर्ये गुणालये ॥ १ ॥ घयवा निसर्ग अने यधिगम ए वेनेदपण सम्यक्त्वना कहि ते देखाउने.जे म कोकम्प मार्गयीनूनो कोना उपदेशविना स्वयंनमतो पोतानीमेजेज पोते मार्गप्रतेपामें एटले पोतानीमेले मार्गधा अने कोऽकतो तृतीयको परनाउपदेश थी एटले बीजोको मार्गदखाम तेबारें मायावे धने कोसतो मृलयो मागे पामेज नही एमज नूनोफरे अथवा ज्वग्नंदृष्टांत नाय जम कोरने ताप या वतोहोय ते पण कोकतो पोतानीमने परीपाजजाय घने को थोपवाटिक ने संयोगे जाय तथा कोकम्वग्तो जायजनही ए दृष्टांत कोजी वतो जानिस्मरणादिक पोतानीमलेजपाने धन कोकर्ज हाची पाने .

80 सम्यक्त्वविचारगर्मित महावीरजिनस्तवन. तथा कोकपामेजनही इहातो मिथ्यात्वरूपज्वरले ते कोकने गुरुवपदेणे अथवा सहेजेमटीजाय थने कोइक थनव्यादिकने मटेजनही थने जल वस्त्र कोश्व दृ |टात त्रण ते पुजत्रयनेविपे नावसे हा मार्ग तथा ज्वर ए वेदृष्टातनो प्रस्तावने माटे बेज कहा ॥ ७ ॥ ॥ ए॥ १० ॥ हवे सम्यक्त्वना त्रण नेद कहेठे तेमा एक कारक बीजु रोचक त्रीजु दीपक अथवा एक दायक बीजु उपशमिक त्रीजु दायोपामिक ॥ ११ ॥ दवे एना लक्ष्ण कहे हे जगवन् हे वीतराग ते जेम कधुने तेमज करवु एटले ताहरी श्राझाप्रमाणे चालवु तेने कारक सम्यक्त्व कहिये थने करनार ते पण कारकसम्यक्त्ववत थयो तेनेपण कारक सम्यक्त्व कहिये श्राधाराधेयानेदोप चारे बने रोचक सम्यक्त्व तेतो ताहरा धर्मउपर ताहरा शासनउपर रुचीमात्रनु कर नार एटले धर्मउपर रुचीमात्र होय पण याचरी शकेनही तेमाटे रोचक कहिये॥१२॥ त्रीजु दीपकसम्यक्त्वते पोते मिथ्यादृष्टी अथवा अनव्य अगारमईकाटिकनी परे धर्मकथायेकरी अथवा मातृस्थानानुष्टानातिसयेकरी कोइक प्रकारे जिनोक्त तत्व परने दीपावे वीतरागना वचन परनेप्रकाशे तेथी कोइक सम्यक्त्व पामे दीप कनीपरे पोतानीपासे अधकार अने परने प्रकाशस्थानीय सम्यक्त्व पमाडे तेमाटे दीपक सम्यक्त्व कहिये एनु अपरनाम व्यजक सम्यक्त्वपण कहिये ते मिथ्याह टीनेपण परिणाम परिणमन ते उपचारथी कारणने रिपे कार्यनाउपचारथी सम्य क्त्व कहिये यमुक्त यथायथा चाचरण जिनोदितं, तथा तथा यत्र सतिप्रवर्तते ॥ तदगसम्यक्त्वमिद प्रचढ़ते, तथा विशुदे खजुकारकजिना ॥१॥ विहितानुष्ठान प्रतिनाव विशुद्ध रतीवति या ॥प्ररोचयतीतिरुवा रोचकमिदमाह सम्यक्त्वा स्वयमिय्यादृष्टि स्तदपिचजनधर्मकथयामुदु सम्यड्मार्गे नयतिचहित चैववदति ॥ तउक्त सम्यक्त्व यु पचरितरत्या जिनमते तथा धर्मादीनाप्रकटनतया व्यजक मिति ॥ ३ ॥ पुनरप्युक्त - पिहियापुषण पुण, कारगमिहरोयगतु सदहण मिसबिहीदीव, जतनोदीवगतंतु ॥ ४ ॥ इति ते सम्यक्त्व जेम जीवे फरस्यु अनुनव्यु पाम्यु तेम तमारा श्रागल बीनवुड ते ताहरा यागमने थनुसारे एटले ताहरा यागमना नयजे नैगमादिकने न्याय शास्त्र समत्यादिक तपजे सुधोदधि एटले थमृतसमुश् तेनु परमार्थजे तइहस्य तेहिजरसने चाखु यनुन एटले तहारा थागमनु परमार्थ सेइने तेने थनुसारे फहीमु ॥ १७ ॥ ए पहेलो दालनु थर्थ पुरो थयु सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीर जिनस्तवन ४२ ढाल बीजो देवतुज सिक्षांत मीनोएदेशी वीरजिणेसर साहिव सुणजो ॥ निजसेवक अरदासरे ॥ दीन दयाकर ठाकुर आपो ॥ तुह्मचरणे मुज वासरे ॥ वी० ॥ १ ॥ लोकाकाशि रह्यो अविनाशी ॥ नाव अनादि अनंतरे ॥ ए जव चक तणा कु:ख बदुला ॥ जोगवियां नगवंतरे ॥ वी० ॥ ५ ॥ सूक्ष्म निगोद वस्योढुं स्वामी ॥ अनादि वणस्सा नामरे ॥ तिहामे कीध अनंता पुजल ॥ परावर्तविण स्वामिरे ॥ वी० ॥३॥ अव्यवहाररासें श्म व सि ॥ काल अनंतो नोगेरे ॥ कर्मपरिणाम नृपति आदेशे ॥ तादश नव्यता यो गेरे ॥ वी० ॥ ४ ॥ तिहाएकण सासोसासमें कीधां ॥ नवसतरे जाजेरारे ॥ ए5 ख तुलविण कुण्डोमावे ॥ स्वामी मुज नवफेरारे ॥ वी० ॥ ५ ॥ व्यवहाररासी लइ उतक ॥ काल अनंत अनंतोरे ॥ घुल निगोदने पृथवी पाणी ॥ तेज अनि स त्रस जंतोरे ॥ वी० ॥ ६ ॥ तिहांपण हुँ वसि तुमपाखें ॥ मिथ्यामतनेजोरे रे ॥ हरिहरदेवकरीमें मान्या ॥ तुं न चढ्यो मनमोरेरे ॥वी ॥ ७ ॥ तेण में वेद न नेदन ताडन ॥ नूष तृपा गुरु नाररे ॥ गर्नवासने जन्म जरा उख ॥ जोगवि यांनिरधाररे ॥ वी० ॥ ॥ इम चनगड नवना उख फरसी ॥ वारअनंती धना पीरे ॥ पालादृष्टांते इगपुजल ॥ परावर्त्तस्थिति प्राणीरे ॥ वी० ॥ ए ॥ नव्यपणा दिक ने परिपाके ॥ गिरिसरि उपल न्यायेरे ॥ अध्यवसाय विशेपकरणजे ॥ धना जोगथी थायरे ॥ वी० ॥ १० ॥ ते त्रिविधे जारव्यु तिहां पहेलु ॥ यथाप्रवृत्त व ली बीजुरे ॥ करण अपूरव नामे कहीये ॥ अनिवृत्त करण ते त्रीजुरे ॥ वी० ॥ ॥ ११ ॥ यथाप्रवृत्तकरणे थायुविण ॥ सात करम करी खीरे ॥ कोमा कोमी सायर गपलनो ॥ असंख्यनाग तिणे हीणरें ॥ ची० ॥ १२ ॥ इहां कर्फस निवि म गुपिलजिम ग्रंथी ॥ टन उक्कर कामरे ॥ कर्मपरिणाम जनित घन जीवनो ॥ रागक्षेप परिणामरे । वी० ॥ १३ ॥ ते ग्रंथी नवीनेदी जीवे ॥ पहेलि इणे संसार रे ॥ वार अनंति अनव्यपण थावे ॥ ग्रंथोनमें निरधाररे । वी० ॥ १४ ॥ नव्य धनव्य रहे तिहां ग्रंथी ॥ संख्य असंख्योकालरे ॥ अरिहंतादिकनी शक्षिदेखी ॥ संयमने उजमालरे ॥ वी० ॥ १५ ॥ तिहां लहे श्रुत समायक इव्ये ॥ सेप ला न नही तासरे ।। तिहाथी ग्रेव्यकेपणजीवे ।। पण नहि शिवपुर वासरे ॥ वी० ॥ १६ ॥ कोक नव्य महातम तेहमां ॥ जेहनेनवनो पाररे ॥ निशित कुमार धारें जिम ततपिण ॥ दे वल मनोहाररे । वी० ॥ १७ ।। करण थपूरव परमविशु धे ।। तिमते ग्रंथी थायरे ॥ जेटीने यंतर मूहूरतमां ॥ यनिनिकरणे जायरे ॥

४२ सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन. वी० ॥१८मिय्यामोह तणीस्थिति तेहनु ॥थतरमुहरत एकोरे ॥ उदय छ ए नपरें उजघी ॥ ते समरय सुविवेकोरे ॥ वी० ॥ १ए ॥ थनिवृत्ति करण विगे पे थतर ॥ मुहूरतकाल थनूपोरे ॥ अतरकरण करे तिहां वेद्यजे॥दलिक थनाव सरूपोरे ॥ वी ॥२०॥ जिमवनदवदग्धे घन वखर ॥ पामी ठाम उल्हायरे। तिम मिथ्या वेदन वनदव सम ॥ अतरकरणे थायरे ॥ वी० ॥ २१ ॥ यतरकरण करे मिथ्यातनी ॥ थितियुग कहे जिन न्यानेरे ॥ यतरकरण थकी थिति हेवी ॥ पहे ली मुहूरत मानेरे ॥ वी० ॥ २२ ॥ तेदयी उपरली थिति वीजी ॥ तिहां प्रथम स्थिति जाणोरे ॥ मिथ्याटलीफनु वेटन तेहथी ॥ मिथ्यादृष्टी वखाणोरे ॥ वी० ॥ २३ ॥ अतरमुहूरत ते यितिनाशे ॥ नहीं मिठादल वेदोरे ॥ अतरकरणनो प्र यम समय तिहा।। लहे उपशम निरवेदोरे ॥वी॥२४॥ परमानद मगन होइनटजि माजीती कटक अपरे।न्यायवत हरपेजिम गाढे॥न्याय धनागम पेखरेवी॥२॥ यर्थ ।। हवे वीजाढालनी प्रथमगाथातो सुगमछे माटे बीजीगाथायी थर्थ क हेतु - हा सदेवलोकाफाश प्रतिष्टित अनादि अपर्यवसित नवचक्राख्य पुरोटर वनि तेमाहे वर्नता एवा पूर्व सर्वप्राणी यनादिवनस्पतिमा सवानिगोट परपर्याय माहेश्रनता पुनपरावर्तलगे जीप रह्यो साथै एकश्वासोश्वासमा सतरनव जाजेरा करे जन्ममरणादिक वेदनाना समूहने थनुनये तथाविध नव्यप्राणी पण थनतो काल श्रव्यवहाररासीमारही कर्मपरिणाम राजानी थासाथी तथाविध नव्यपणाने नियोगेकरी व्यवहाररासीमाहे प्रवेसकरे व्यवहाररासीते कोनेकहिये जे वादरनिगोद पृथ्वी पाणी तेज वायु प्रत्येकवन स्पति थने त्रस तेमापण थनतानत कालसुधीरहे एप्रमाणे सकलड सपादप वी जनूत जे मिथ्यात्व तेणेकरी एटला काललगे चारगतिनु ससार सबधी छेदन ने दन तामन नूपातपादिसहन गुरुनाराक्रमण गर्नवशन जन्म जरा रोग शोकश्टरियो ग थनिष्टसयोग या पिाट मरणादिक दारुणख पाये थनतिवार धनुनीने पाजाने दृष्टाते पाजुते धान्यनरवानु नाजनविशेषजाणवु ते जेम कोऽपुरुष ते पाजामा योग्योपु धान्यनाग्वे थने गणुघणुफाढे ते धान्य केटलेफकाले गुटे तेम कर्मचान्यरूप पाजामाहे जी धनानोगथा योमा कर्मवाधे एटले थोमपाले थने घणाकर्मनिर्जरे एटलेषणुकाढे एरीते दलो एक पुगनपरापर्न जेणे नवस्थिति याणीगसी एकोक चारगति समीजी ते कयमपि महताकटे तथा लय्य व परिपाकना बायकी गिरिसरिउपज घोजनाअप पर्वत नदी पथ्थर घोजनास सम्यक्तविचारगनित महावीरजिनस्तवन. ४३ मान नालोग निर्वर्तित एवं यथाप्रवर्तिकरण करणंपरिणामोत्रेतिवचनात् एहवं थथ्यवसायविशेषरुप तेणेकरीने एक आयुवर्जीने सर्वज्ञानावरणाटिक सातेकर्म ते नी पठ्योपमासंख्येयलागे न्यून एककोटीसागरोपमनी स्थिति जेहनी एहवांकरे ते सर्वकर्मनी उत्कृष्ट स्थितिकेटली के जेमांथी वीजीन्यूनकरे ते गाथायेंकरीकहे मोहे कोडाकोडी, सत्तरिवीसंचनामगोयाण ॥ तीसयराणि चउहं, तित्तीसयराणि थाजस्त ॥ १ ॥ अत्रांतरे जीवने कर्मपरिणामजनित धन राग पिपरिणामरूप क फैश निबिडचिरप्ररुढ गुपिल वल्कयंथीनीपरे उर्नेट अनिन्नपूर्वगावीहोय. तमुक्तं घस्सण घोलण जोगा, जीवेषजयादविज कम्मतिई ॥ खबिया सव्वासा गर, कोडाकोडी पमुतणं ॥ १ ॥ तववियथोवमित्ते. खविये ऽबंतरमि जीवस्स. ह वरुद्ध थनिन्नपुबो, गंठीएवं जिणाविति ॥ २ ॥ गनिनिसुउने, करकडघणरूढगूढ गति जीवस्स कम्मजपि, घणरागदोस परिणामो ॥ ३ ॥ ए गांव सुधी अनव्यपण यथाप्रवर्तिकरणेकरी कर्मरवपावी अनंतिवारावे प एणगांतने नेदेनही यउक्तं प्रवचनसारोवारे करणं अहापवतं, अपुवमनियहिमेव न वाणं ॥ इयरेसि पढमंचिय, नाश्करपंति परिणामो ॥ १ ॥ ग्रंथीदेशेवर्त्ततो नव्य अथवा अनव्य तिहां संख्यात अथवा असंख्यातोकाल रहे तिहारह्योयको इव्यश्रुत निन्न दशपूर्वलगें थनव्यनणे ते तीर्थकरनी शनिदे खी अथवा स्वर्गसुखादिकनो थर्थिथको जेवारे दीवालिये तेवारे पूर्वनणे तेमाटे ज निन्न दशपूर्वतश्रुत ते मिथ्याश्रुतपणहोय मिथ्यात्वेंयह्यामाटे मिथ्याश्रुत कहे वाय थने जेने चउदपूर्व अथवा संपूर्ण दशपूर्वश्रुतहोय तेने नियमा सम्यक्त्व होय पण कांकनणा दशपूर्वधरादिकनेविपे सम्यक्त्वनी नजना जाणवी यउक्त कल्पनाप्ये चउदस दसय अनिन्ने, नियमा सम्मत्त सेसए नयणा ॥ इति तिहाथी व्यसंयमपाली जननीक्रियानेबले नवयैव्यकेपणजाय पण मिथ्यादृष्टीमाटे संसा रनो पारपामेनही यमुक्तं आवश्यकटीकायां अनव्यस्यापि कम्यचित् यथाप्रवृत्तिक रणतो ग्रंथिमाप्ताद्याईदादि विनूतिदर्शनतः प्रयोजनांतरतोवा प्रवर्त्तमानस्य श्रुत सामायिक लानोनवति नशेपलानइति एम यथाप्रवर्ति करणेकरीने ग्रंथोलगे नव्यपणयावे घने अनवपणावे पण अपूर्वकरणादिकतो जव्यनेजहोय अपूर्वकरणे तो पथिक पिपीलिकयोतिं यथा. जह इह तिन्निमणूसा, जंतमविपहं सहावगमणेणं ॥ वेला इकमनिया, तुरंति पताय दोचोरा ॥१॥ दहुंमग्ग तडले, तजेगोमास पडिनियत्तो ॥वीउंगहि त, ७४४ सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन. समश्कतो पुरपनो ॥२॥ अडवी नो मणूसा, जीगाफम्म ितहोदीहो, गठी यनय क्षण | राग दोसाय दो चोरा ॥ ३ ॥ जग्गोनि परिबुट्टी, गहिन पुण गति d ग त ॥ सम्मन पुरएव, जोजा तिन्नि करणा ॥ ४ ॥ विश् सानावियग मण, थाणूसरण त समुप्पयण ॥ गणापुसिरेवा, महरण वा मुयगीण ॥ ५ ॥ खिश्गमण पिव पढम थाणु सरणच करण मपुवं ॥ उप्पयापिवतत्तो, जीवारा करण मनियहि ॥ ५ ॥ वाणुष्व गविदेसो, गठिय सनस्स तब वजण ॥ ऊपरण पिवतत्तो, पुणोविकम्मतिषिवडी ॥ ७ ॥ एम ए वे दृष्टाते त्रणकरणं नावयां एफयायुकर्मवजिने बीजा सातकर्मनी करुष्टी स्थिति खपाची वाकी एककोडाफोडी सागरोपमते पल्योपमने थतरल्या- | तमेनागें न्यून सातेफर्मनी स्थिति प्रत्येके थाणी राखी हवे कोश्क महात्मा समासन्न परमनिर्वृत्ति सुख समुल्लसित प्रचुरसुनिवार चोर्यप्रसर तीण कुवारधारानीपरे थपूर्वकरणरुप यात्मानी परमवियु यथोक्त स्वरूप प्रयीनोनेदकरीने मिथ्यात्वमोहनीय कर्मस्थितिनु थत्तरमूदुन उदयणथी उपरे थतिक्रमिने थनिवृत्तिकरण सझितपिशुद्धि विशेपेकरीने अतरमृदुकान प्रमाण वेद्यदतिका नायरुप अतरकरणकरे इहा ययाप्रतिकरण अपूर्वकरण थनिवृत्तिकरण नो अनुक्रम थावीरीतेंजाणवु तेफहेढे यथा जागती तापढम, गठीसमश्या नवेबीपं ॥ थनियट्टीकरण पुण, सम्मत्त पुररकडेजी ॥ १ ॥ गर्विस म यति ॥ यथि समतिकामत निदानस्येत्यर्थ सम्मत्त पुरस्कति सम्यक्त्व पुर स्कृतं येनतस्मिन् थासन्नसम्यक्त्वे एवजीवे थनिवृत्तिकरण नवतीत्यर्थ एटले जे करणेकरी गिरिसरि जलवेगालोमयमान पापणनीपरें घचना घोलनादि केफरीने एकथापुरुर्मवर्जि प सातेफर्मनी कामवणी एक कोडाकोडी सागरोप मनी स्थितिफरतो ग्रथोदेशलगेयावे ते यथाप्रतिकरणकहिये थने जे थध्यवसा ये थप्राप्तपूर्वके धन रागदेष परिणतिरूप ग्रथीने नेदयामामे ते थपूर्व करण क हि वजी पूर्वप्रातययाजे यध्यासाय तेने निवर्तक एवा यध्यवसायविशेष ग्रंथानेदकरीने सम्यक्त्वपामे ते अनिवृत्तिकरण कहिये हवे यतरकरण करतिवे सामिप्यास मोहनीयरुर्मनी ने स्थितिकरे एक अंतरकरणथी हेवजी प्रथम स्थिति थतरमुहूर्तप्रमाण बीनी तेथी उपरली बाकीरहेजी पोपमासर येषनाग न्यून फोडाफोडी मागरोपमरुप स्थितिजाणवी तेमा प्रयन स्थितिनेवि मिथ्यात्वदक्षिक वेदनथी ए जीपने मिथ्याटष्टीन क सम्यक्तविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन. उधए हियें अंतरमुहूर्ते वली ते स्थितिगयेयके अंतरकरणनो प्रथम समय तिहाज सम्य क्लपामे मिथ्यात्वदलिक वेदनना अनावथीजेम वनमां दवलागोहोय ते जेवारे उरख रचूमिपामें तेवारें पोतानीमेलें उन्हाज्ञाय तेम मिथ्यात्व वेदनरूप वनदव तेपण थंत रकरणरूप उरखरनूमिपामिने उन्हाइजाय तेवारे तेने उपशमसम्यक्त्वनो लान थाय. उक्तंच कसरदेसंदड्डि, नियं च विआइ वणवोपप्प॥ यमिनस्तापुदए, उवस मसम्मंसहजीवो ॥ १ ॥ टीका । यिनेदोहि मनोविघातपरिश्रमादिनिख साथ्योवर्तते तदाहि सजीव. कमरिपुमध्यगतस्तं ग्रंथिप्राप्यातीव परिश्राम्यति प्रनू तकारातिसैन्यांतकत्वेन संजातखेदत्वात् संग्रामशिरसीवउर्जयापारुतानेक श त्रुनरनरें नटवत्।। यमुक्तं सम्यक्त्वस्तवे।सोततरणे सुहमो, व वेरिजयजणियपरम थाएंदो ॥ सम्मतं लहड जि, सामन्नेणं तुह पसाया ॥ १ ॥ टीका ।। सजीवस्त जानिवृत्तिकरणेलते यंतरे हेनाथ तवप्रसादात् तवसाह्यात् सामान्यतो नतुदाधि कादिवशिष्टतया सम्यक्त्वं उपशमिकाख्यं लनतेजीवः कवेत्याह रणे सुहमोवे ति वैरिजयेन जनितोयः परमानंदस्तंरणे सुनटश्वातथाहि रणेनटो वैरिजवादानं दमझते तथैव रागईप कर्मस्थित्याटि वैरिजयात्परमानंद कल्पंसम्यक्त्वं लनते जीव. तऽक्तं पावंति खवेकणं, कम्मा अहापवत्त करणे ॥ उवलनाएण कह मवि, अनिन्न पुदि तगति ॥ १ ॥ तगिरिवरंवजेत्तुं अपुचकरपुग्गवड धाराए । आंतोमुद्त्तकालं ।। गंतुंअनियहिकरणंमि ॥ ५ ॥ पऽसमयंसुझंतो, खविठकम्माइ तष्ठ वदुयाई । मिवत्तमिठो खीणेणुश्यंमि उवतंते ॥३॥ संसारगिम्दतविउ, त तो गोसीसचंटणरसोद ॥ थऽपरम निबुइ कर, तस्तंते लहसम्मनं ॥ ४ ॥ यत एव नव्यानां मिथ्यात्वस्यानादिसांतत्वं ॥ तक्तं मिहत्तमनवाणं, तमणा मपंतयं मुणेयवं ।। नवाणंतमणाs, सपजवसियंतु सम्मत्ते।ए वीजाढालनी सोलमीगायायी मामीने चोवीसमी गाथासुधी नवगायानो थर्यकयो बीजाटालनोयर्थ पूरो थयो. ॥ टाल त्रीजो सहीरेनमाणी एदेगी. ॥ ॥णीपरें तुजयी समकित फरस्युं । जेदयी नवजल तरस्युरे ।। धनधन तुम सेवा ।। एयो मन वठीत फल सेवा ॥ तेकरवा मुज हेवारे ॥धol' | तिहां कोई देश विरति तससरसा ॥ मर्व विरतिलह दरिनी ॥ धमिछामयण कोटर वा सरि ॥ उपशम योपधपरखं ॥ ध० ॥ २ ॥ जज वम्याटिकनेदृष्टाने ॥ तुज थागम कहेखांत ॥ ध० मिय्यापुजफन्त्रणमोधी ॥ उपामा शुनवोधीरे ॥ १० ॥३॥ शुधने श्रई विशुद्धत वीजा ॥ अविशु मतगजोरे ॥ १०॥ उपामयी ४६ सम्यक्तविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन. पडिमिनवामे ॥ क्षयोपशमिक पामेरे ॥ १०॥ मिश्र तथा मिय्यात्वने फर से ॥ करममतीइम हरसेरे ॥ध ॥वीजुदायोपशमिक कहिये, उपशमपरिपणन हियेरे ॥धा मिष्ठापुजकरीत्रिण निरणे । कोई थपरवकरणेरे रावणा गुरूपुन तिहावेदतोज्ञानी, जिनवचनामृतपानोरे ॥ ३० ॥ ६ ॥ उपशमपाम्याविण नुजना मे ॥ क्षायोपशमिकपामेरे ॥ ध० ॥ यथाप्रवृत्तिकरणत्रयक्रमथी। थतरकरणेतुज थीरे ॥ध ॥ ७ ॥ जेलहेउपशम नवजल तरवा ॥ तसत्रणपुजन करवारे ॥ध थालवन अलहती ईयल, जिमसगण नमूकेरे ॥ ध०॥ ॥ मिश्रपुज थणजानी उपशमे ॥ तिममिय्याते टूकेरे ॥ ४० ॥ उपशमसमकितयोतिणिपडि ॥ जइ मि प्या गुण अडिउरे ॥ ५० ॥ ॥ ॥ इम सिक्षांतीनिज मत खोले ॥ कल्पनाप्यपण बोलेरे ॥ध०॥ ते त्रणपुजनुसक्रमनापु ॥ जिनवयणेमनराखुरे ॥३०॥१०॥ मिथ्या दलिकयीपुजन खिची ॥ समकितदृष्टीविचीरे ॥ ॥ सकरमावे समकित मीमे॥ शुनपरिणामे हिंसेरे ॥ध ॥ ११ ॥ समकितदृष्टी मीस पाक ॥ समकितमा हेहीरे ॥ ३० ॥ सकरमावे मिय्यादृष्टी ॥ मिथ्यामागुणप्टष्टीरे ॥ ध० १२॥ सम फित पुंजज मिथ्यामहि ॥ पण मीसे नवि चाहेरे ॥धमिष्ठाखीण नहीने जे हने ॥ ते त्रण पुजले तेहनेरे ॥ ५० ॥ १३ ॥ मिष्ठावीण थये दोय पुजी ॥ मी स खये एक पुजीरे ॥ ॥ कायक समकित पुजन नाशे ॥ जिन थागम इम ना सेरे ॥ ५० ॥ १४ ॥ सोधित मयण कोइवा थाने ॥ समकित पुजल मानेरे ॥३०॥ तेहने विरुध तैलाविक पाशे ॥ शुक्षपणु तस नासेरे ॥ ४० ॥ १५॥ तिमज कु शाल कुतीर्थिकसगे ॥ तस किरिया मन रगेरे ॥ध ॥ मिय्या, मिश्रित समफित जाये ॥ ततण मिथ्या थायरे ॥ ३० ॥ १६॥ समकितथी पडिकजो पातु ॥ वजी समकितलहे थाबुरे ॥ध ॥ ते त्रण पुज करे तिहां फेरी ॥ मिठ थपूर विवेरीरे ॥३०॥१॥ थनिवृत्तिकरण बनें ते रसी ॥ समकित पुजे वसीउरे ॥ ध०॥ समफित परेजिहा विरतिनेपावे ॥ थायकरण वे थावेरे ॥ध० ॥ करण थप रव कालने थागे ॥ पिरतिलही तिहा जागेरे ॥ ध० ॥ १७ ॥ श्रतर तस लाधे ॥ निज परिणामे वाधेरे ॥ध ॥ उचो नियम नही तिहां कोई ॥ वि हाणी सम होईरे ॥ धo ॥ १५ ॥थनानोग परिणामनी हाणे ॥ गइ पिरति नवी जाणेरे ॥ ५० ॥ श्यस्त करण थको ते प्राणी ॥ फिरो लहे विरति सुहा जीरे ॥ ५० ॥ २०॥ थानोग जे विरतिथी खसिया ॥ तिमज मिय्यागुणे रसिया धनायतरमुहूरतमालहे थाउजघन्य थको फिरी पाठीरे ॥३०॥२१॥उत्कर्ष व मुद्धरता ७४७ सम्यक्त्वविचारगर्मित महावीरजिनस्तवन. पुकालें नापी ॥ बाय करणने सारसीरे ॥ ३० ॥ इणीपरे कर्मप्रति वृत्तिमाहे ।। तिदां जोजो उचारे ॥ ४० ॥ २२ ॥ को विगधित समकेत फेरी ॥ ते लहे मि च्या वेरो ॥ध ॥ ठीनरक लगें ते जाय ।। समय मतें कहेवायरे ॥ ध० ॥२३ यान बंधविना जताहे ॥ फिरी समफित थवगाहेरे ।। ध० ॥ वैमानिकविण था उन बांधे ॥ कर्म मती मत सांधेरे ।। ध० ॥ २४ ॥ समकित पतित कहे मतवां धे।। उत्कृष्टो स्थिती वांधेरे ॥ध ॥ निन्न थिने थागम न्याने ॥ स्थिति उत्कर्ष न मानेरे ॥१०॥ २५ ॥णीपरें नेद मतांतर जाणे ॥ पण संदेह न थाणेरे॥धo नि.शंकित तुज वयण धाराधे । न्याये तस गुण वाधेरे ॥ध ॥ २६ ॥ अर्थः- हवे त्रीलाढालनो अर्थ कहेते हवे प्रथम सम्यक्त्व पामतां कोक जीव सम्यक्त्वनी साथेंज देशविरति यथवा सर्व विरतिपणुं पामे।। उक्तंच शतकवह भूर्णी ॥ उपसम सम्महिती, अंतरकरणेनि कोऽ॥ देसविरयंपित्तनइ, कोश्पमत्ताप मत्तनापि सासापोनकिपिलनेति. पठी ते योषधसमान उपशम सम्यक्त्वे करी ने कोऽक जल वस्त्रने दृष्टांत मिथ्याल मोहनीयकर्म सोधीने प्रण प्रकारेकरे ते कहेठे १ शुभपुंज २ थर्कविगुइपुंज ३ थविशुमपुंज. ते त्रण पुजमांथी जेवारे गुछ पुंजनो उदय होय तेवारे शुक्षमिथ्याल पुगत वेदनथी छायोपशम सम्यक्त्व कहिये तेनुं लक्षण कहे जेम कोऽवा धोयाथकां केटलाक मयणारहित थाय थने केटलाफ लिगारेक मयणावालारहे यने केटलाक तो मयणासहीतज रहे थथवा पाणीपण केटलुक स्वड निर्मल थाय धने केटलुक निर्मल तथा मेलुं रहे तथा केटलुकतो मेलुजरहे तेमज वस्त्रपण धोयाथकां को इक निर्मलज थाय कोक थर्ड मलीन रहे धने कोश्कतो पाखु मलीनजरहे. ए पूर्वोक्त दृष्टांते त्रण पुंजपण ते तेमां जेवारे पुजनुं उदय होय तेवारे तेना उदयना वशथकी जीवने विद्युत थरिहंतना तत्वनी अमाहोय तेथीते जीव झायोपशमिक सम्यक्त्व पामे अने जेवारे वली अविद्यक्ष पुंजनो उदय होय तेवारे ते उदयनावशथकी जीवने अईविगुरू थरिहंतनापीतर्नु तत्व श्रमान होय तेवारे एजीव सम्यक् मिथ्यादृष्टी एटले मिश्रष्टीवत कहिये थने जेवारें अरामपुं जनो उदय होय तेवारे जीवने मिथ्यादृष्टीज कहिये तेवारे ते उदयनावशयकी वीतरागना शासनपरें सर्वथा रुची नज दोय. यथाप्रतिकरणादिकरणत्रय अनुक्रमे अंतरकरणे उपशम सम्यक्त्वपामे त्रएपुंज तोजीव सर्वथा नजकरे तेमाटे उपशम सम्यक्त्वथी पमयो अवश्य मिर ១៩១ सम्यक्त्वविचारगर्फित महावीर जिनस्तवन. दवे कर्मग्रंथिकनुमतकहे कर्मग्रथवाला एममाने के थनाटि मिच्यादृष्टीजीव स म्यक्त्वलानकाले यथाप्रवादिक करणत्रय पूर्वक थतरकरणकरे तिहां उपशम सम्य क्वपामे तिहात्रणपुज अवश्यकरे तेकारणमाटेज उपशमथी पढ्योजीव झायोपश मिकसम्यक्त्वपामे अथवा मिश्रपुजेजाय अथवा मिथ्यात्वेजाय एचारगाथानो यर्थडे हवे पाचमीगाथाथी मामीने नवमीगाथासुधी वली सिद्धांतिकनुमत कहे। कोईथ नादि मिय्यादृष्टी तथाविधसामग्रीना सनावे अपूर्वकरणेकरी त्रणपुजकरे पनी गु पुंजना पुजलनेवेदतो जीव उपशम सम्यक्त्व पाम्याविना प्रथमपीज झायोपश मिक सम्यक्त्वपामे थने वीजा घणाजीवतो यथाप्रवादिक करणत्रय अनुक्रमे थतरकरणे उपशम सम्यक्त्वपामे माटे त्रणपुजतो जीव सर्वथानजकरे उपशमयी पडयो थवश्यमिय्यात्वेज जाय॥यक्त कल्पनाप्ये॥यालवण मसहताजह सचण न मुंचएलिया ॥ एव थकयतिपुजो, मिथिय उचसमीएई ॥ १ ॥ जेम गात्रसमु दिप्तकरेथके इलिफाजे गामरते बीजास्थानकरुप बालबनने थणपामति पोतानु स्वस्थाननमूके गात्रसकोची तेजस्थानके रहे तेम उपशम सम्यकदृष्टी उपशम स म्यस्त्वयीपड्यो ऋणपुजकखानयी माटेमिश्रपुज थने शुझपुजलदण स्थानातर थपामतो वलीतेहीज मिथ्यात्वपुजे थावे एतिक्षतिकनु मत का॥५॥६॥७॥जाए। हवेपुजत्रयनुसफमण कहे कल्पनाप्यमा एमकाने के सम्यकदृष्टीजीव मि प्यात्वदलियकी पुजयाकर्पि प्रवर्षमान परिणामथको सम्यक्त्वपुजमाहे अथ या मिश्रपुजमादे सक्रमावे थने मिश्रपुजलने सम्यकदृष्टी सम्यक्त्व पुजमर्माह तक माये थने मिथ्यादृष्टी मिथ्यालपुंजमा सक्रमावे तथा सम्यक्त्वपुजन पण मिथ्या त्वमाहेज सक्रमावे पण मिश्रमानसक्रमावे यमुक्त मिछत्तासकती थविरुक्षा हो। सम्म मोसेसु ।। मीमाउवादोसु, सम्मामिहन उपमीस ॥ १ ॥ जेनो मिथ्यावद यपाम्पुनथी ते सम्यकदृष्टी निपमा त्रिपुजीजहोय थने मिथ्यात्वहीणथयेथके विपुजीजहोय थने मिथ्यात्व तथा मिश्रवेक्षीणथयेठते एकपुजीजहोय थन स म्यक्त्वपुज पकरेयके पक एटले त्रणेपुजनोक्ष्य करवाथका दायिक सम्यस्त्व पत होय ॥ यक कपनाप्य मिष्ठनेमियखाणे, तीपुजीमम्मदिहिणोनियमा। खील मिठ मिलेगपुजीवरखवगोवा ॥ १ ॥ जे सम्यक्त्वपुजन ते सोधित मदनका या समानजाणवा तथा जेम सोधेजा कोश्वा विरुधौलादिके नाध्यायका फरीपा वा मपणातायाय तेम सम्यक्त्वपुजतने विरुधौलादिक समान कुतीर्थससर्ग कु शासप्रवणादिक मिय्यान्चेकरी वासीतकखायको ततक्षण मिथ्यात्विथाय .

सम्यक्तविचारगर्मित महावीरजिनस्तवन. g8 वलीते लम्यक्त्वथी पडवडियो फरी सम्यक्त्वपामे तेवारे शीरीते पामे तेकहे वे प्रथम पडवडिया केटलाहोय श्रने ते केशगतिमालाने ते कहेते. थनविय चळते, पंचमए दसणा परिवडिया ॥ सेसासिदिमाइ, थम तमि तेवीतं ॥ १ ॥ मतांतरेप्येवं ॥ अनविय चनयंते, पंचमिसमा परिवडी सिदा ॥ सेसायमणंते, पङथूलवणा वावीस ॥ ५ ॥ चत्तारिय वाराउ, चवदस पुत्रीकरेश्याहारं ॥ संतारंमिवसंतो, एगनवे उन्नि वारा ॥३॥ तिचयररिचिदंस ण, सद्गुमपयशावगाहणाहेर ॥ संसयवुवेयर, गमणंजिणपायमूलंमि ॥ ४ ॥स मजहन्नमंतर, उक्कोसेणंहवंति सम्माता ॥ श्राहारसरीराणं, उक्कोसेणं नवसह स्ता जनरए यसुराई, पुढवाइस सयल विगल तिरिएसु ॥ वंतर जोऽविमाणे, सुपनेयश्मेअतंखिजा ॥ ६ ॥ लियसंखसियम रखा. मपुएस यतया वणेनवरं ।। परिवडिप्रगया थाहा, रग्गविलनंति इह समए ॥ ७ ॥ जेवारेपण सम्यक्त्वथी पडयो फरीपाद् सम्यक्त्वपामे तंवारें पण धपूर्वकरणेकरी पुलत्रणकरीने अनिवृत्तिकरणेकरी सम्यक्त्व पुंजेलाय एटले दायोपशम सम्यक्त्व पामे यहां कोई पूठेजे थपूर्वकरण तो पूर्वे केवारेपण एवो परिणाम न धाव्योहोय थने प्रथम नवोधावे तेने कहियें करणंपरिणामविशेप इतिवचनात् अने थ पूर्वकरपतो ग्रंथानेदेवाव्योहतो तेहीज वली परिणामे फरी थाव्यो तेवारे अपू वैपणु केमथ{ ? तेने उत्तरकहे थपूर्वमिवापूर्वस्तोक वारमेवलानादितिक्षा थपूर्व नीपरे थपूर्व थोमावारज पाम्या माटे. फरी अपूर्वकदिये जेम कोऽक पदार्थ पुत्र ध नरत्नाटिक पूर्वथोडंपाम्याहोय ते फरीपामे तोपण तेने थपूर्व करीजमाने तेमथ पूर्वकरणरूप परिणामपण जीवने योमीवारज धाव्योवे तेमाटे तेपण थपूर्वज कहियें ए लिक्षांतनुं मतजाए. हवे सम्यक्त्वपाम्यानीपरे जेवारे कोश्जीव देशविरति अथवा सर्वविरतिपयुपा मे तेवारेपण यथाप्रवृत्तिकरण यने अपूर्वकरण ए वे करकरे पण अनिवृत्तिकर ण करेनही थपूर्वकरणनो यंतरमुहूर्तरूप काल समातिने अनंतर समयेज देश विरति सर्वविरति पडिवज्या, पठी धनंतर अंतरमुहूर्तलगे ते जीवने अवश्य प्रव ईमान परिणामहोय पी यंतरमुहूर्त उपरांत नियमनही कोप्रवर्षमान परिणा मिथकोजरहे थने को स्वनावस्वजरहे तथा कोई हीनपरिणामिपणथाय तेवती थनानोगे कोक परिणामनी हाणीथकी देशविरति अथवा सर्व विरति थकी पड्या ते थरुतकरणा एवतांल तेके यथाप्रवृत्तिकरण यने अपूर्वकरण कस्यावि सम्यक्त्वविचारगनित महावीरजिनस्तवन. नाज वली देशविरति थथवा सर्वविरतिपणुपामे थने जेजीव थानोगेकरी पडया भने थनोगेकरीनेज मिथ्यात्वेगया ते जघन्यथी यंतरमुहूर्त थने उत्कर्षथी घणे काले यथोक्त करणपूर्वकज एटले पूर्वोक्त बन्नेकरणोकरीनेज देशविरति थथवा स वैविरतिपणु वली फरीथोपामे एलु कर्मप्रतिनी वृत्तिमा का ए दशमीगाथाथी मामीने बावीसमी गाथासुधी तेरगाथानु थर्थनेलो का ॥ २ ॥ हवे सिझातनुमत बने कर्मग्रथनुमत निन्ननिन्नकहे तेमा प्रथम सिकातिक नामतेतो विराधित सम्यक्त्वी सम्यक्त्वथी पडयो फरी सम्यक्त्व पाम्योथकोपण कोक बठीनरकसुधीजाय थने कर्मग्रथिकनामतेंतो उते सम्यक्त्वे वेमानिकविना बीजातेकाणानुं वायुवाधेजनही यमुक्त सम्मत्तमिवल, विमाएवज न वधए था उ॥ यहयन समत्त जहो, यहवन वयाउ उपुद्धि ॥ १ ॥ वली कर्मग्रथिकनेम तेंतो सम्यक्त्वपामीने पडयो तेजीव उत्कृष्टस्थितिनी कर्मप्रकृतिबाये तथा सिको तिक मतेतो निन्नपथीवालाने उत्कष्टीस्थितिनो बधजनहोय यदुक्त सैज्ञातिक मतेहि विराधित सम्यक्त्वे गृहीतेनापि सम्यक्त्वेन पष्ट ! थिवीयावत्कोप्युत्पद्यते थने कार्मग्रीकमतेतो वैमानिकेन्योन्यानोत्पद्यते तेनग हीतेनेत्युक्त प्रवचनसारोबारवृत्ती थवातसम्यक्त्वश्चतत्परित्यागे । कार्यग्रथिकम तेतो उत्कृष्टस्थिती कर्मप्ररुतीनाति सिद्धांतिकानिप्रायतस्तुनित्राथेरुत्कष्ट स्थि तिबंध एवनस्यादित्यादिनेद मतातरे जाणे पण दत्ताणेनही जे जेम वीतरागनी थाशाहोय तेम प्रमाणकरे पण सदेहनथाणे तेजोव ताहरी थाहानु थाराधक जाणवोए चीसथीमामी वीसमीगाथासुधी त्रीजाढालनो थर्थपूरोषयो चोथो विनयवहोसुरखकार थथवा साजिन नोगीरही एदेशीने ॥ ॥ दर्शन मोह विनाशथीजी ॥ जेनिर्मल गुणगण॥ ते समकित बघे कयुजी॥ ते नवियण हित थाणरे ॥ जिन जी तुज थाणासुरग ॥ मुज नगमे मिथ्यासगरे।। जिन ॥ १ ॥ए थाफणी ॥ मिछा दरसण मोहनीजी॥ उपशमि उपशमजाण ॥ धुरग्रंथी मैदे काजी ॥ उपशमश्रेणी प्रमाणरे ॥ जि० ॥ ॥ नाश उदीरण मि छनोजी ॥ थनुदोरण समगम ॥ क्ष्यउपशमथी उपजेजी ॥ श्योपशमिका नाम रे ॥ नि० ॥२॥ त्रिरिधि मोह पिनासथीजी ॥ त्रीजुदायिकनाम ॥ पकश्रेणीच ढतांदुएजी ॥ जेहथी शिवपुर गमरे ॥ जिol || विपाक प्रदेशों वेदवुजी ॥६ विध उदय विष्कन ॥ उपशमतु तेदने कहेजी॥ थागममां थिरपनरे । जि० ॥ ॥ नाश विपासोदय थकी जी ॥ वेदन तेहनुरे नाम || उपशमि ते नवि सनवेजी।

सम्यक्तविचारगर्जित महावीरजिनस्तवन. ७५२ क्षयोपगमिक मरे । जि॥ ६ ॥ मिला पुजन वेदवाजी ॥ शुभ अशुभ तिहां दो य ॥ विपाक प्रदेशोदय थकीजी ॥ अनुक्रमे समजी जोयरे ॥ जि० ॥ ७॥थण चन उग मिठा तणाली॥ पुंज खपावीरे होय ॥ शुमपुंज खपतां तिहांजी। अंतिम पु जन होयरे ॥ जि०॥ ॥ तस वेदन तेहने कयुंजी॥ वेदक चोथुरे नाम ॥ उपश म वमतां पांचमुंजी | सासादन गुण धामरे ॥ जि० ॥ ए ॥ अंतरमुहूरत एकनी जी ॥ उपशम स्थिति उवेप । उत्कय पट श्रावती जी ।। जघन्य समय होय शेषरे ॥जि०॥ १०॥ घामपुंज जावा तणीजी1 वायें तिहां तासाभण कसाय उदयें दुयेजी ॥ जेहथी उपशम नागरे ॥ जि० ॥ ११ ॥ उपशमथी पमतांथकाजी ॥ न ग यो मिसारे जाव ॥ तावत सासादन कझुंजी॥ उपशम स्वाद सदावरे ॥ जिप ॥ १२॥ यंतरमुहूरत कालनीजी ॥ उपशम स्थिति गुणखाण ॥ सासादन पट था वलीजी॥ वेदक समय प्रमाणरे ॥ जि०॥ १३ ॥ स्थिति सागर तेत्रीसनीजी।सा धिक दायक जाण ॥ बमणी स्थिति एहथी कहीजी ॥ दायोपशमिक नागरे । जि० ॥ १४ ॥ उपशम सासाटन कयुंजी ॥धानव वेलारे पंच ॥ वेदक एक वेला दुयेजी ॥ तिमहिज हायक संचरे ॥जि॥१५॥ वार थसंख उत्कर्षथीजी ॥झायो पशमिक होय ॥ हवे तस गुण गणा कहूंजी। सानलजो सदु कोयरे । जि० १६॥ उपशम घडगुण ठाणमांजी, थविरत गुण पदरेख ॥ दाइक गुण नाणे सवेजी॥ थादिम त्रविणशेपरे । जि० ॥ १७ ॥ अविरति गुणगाणा थकीजो ॥ जावत स सम वाण ॥ एक वेदक बीज हांजी॥क्षायोपशमिक जागरे। जि०॥ १८॥ सा सादन सासादनेजी॥ नापे धंग उवंग ॥ न्याये शिवसुख ते लहेजी॥ जशतुज था पथनंगरे॥जि ॥१५॥ अर्थः- हवे चोथा ढालनो अर्थकहेठे तेमा प्रथम वारगाथालगें उपशमादिक पांच सम्यक्त्वनु स्वरूपकहेठे दर्शनमोहनीयना विनाशथकी जे थात्माने निर्मल गुणस्थानक उपजे ते निर्मल सम्यक्त्व कहिये ते उपशमादिक पाचप्रकारनूवे. हवे उपशमसम्यक्ल ते कोने कहिये ते उत्तरखावे उदीरणामिथ्यात्वनो यथ याथी थने धनुदीरणा मिथ्यात्वनो उपशमथयाथी एटले विपाकप्रदेश वेदनरूप विवि उदयने विप्नपणे करीने नीपर्नु ते उपशम सम्यक्त कही. उदीस्यि मिथ्यात्वस्य वेसत्यनुदीपस्य उपशमविपाकप्रदेशवेदनरूपस्य विविधस्याप्युदयस्य विष्कंजणेन निर्दनिं, उपशमिकं तदोपशमिकं सम्यक्त्वं कि य सम्यक्त्वविचारगर्जित महावीरजिनस्तवन धा ग्रंथिनेदसनव उपशमश्रेणि संजवच ग्रंथिनेदसनवप्रसिई उपशमश्रेणिसंनव सम्यक्त्व श्रीजिननगणिप्रणितगाथानिरेव विनाव्यते. उपशमसम्यक्त्व वे प्रकारचें। एकग्रथीनेदेउपनु बीजुउपशमश्रेणीथी उपर्नु तेमा ग्रंथीनेदर्नु स्वरुपतो बीजाढासमा कपुळे अने प्रसिक्षपण थने उपशमश्रेणीथी उपनुजे सम्यक्त्व तेनु स्वरूपतो श्रीजिननगणि कृत गाथायेंज नावियेते यक्तं उवसामग सेढाए, पवन अप्पमत्तविरवत्ति ॥ पऊवसाणे सोचा हो पमत्तोयविरवा ॥ १ ॥ अन्नपत्ति थविरय, देसपमत्तापमत्तविरयाण ॥ श्रन्नय रो पडिवकर, दसए समयंमि अनियट्टी ॥२॥ सजलाईण समो । जुत्तोस जो थणोदउजेन ॥ तेपुवचिय समिया ॥ नपुसम्मत्ता लानमि ॥ ३ ॥ थाचार्या थासिखउँवसमोति, समो दुणा नण फोविसेसोसि, नणुरवीणमि उश्न्ने ।। सेसोवसमे खवसमो । सोचेव तणूबसमो। वइए खीणमि सेसए समिपात इमोदय यामीसे । नतूव समिए विसेसोय ॥ ५॥ वेए सत फम्म ॥ खवसम्मे सु नापुनावसो । उवसत कसा पुण, वे एश्न सतकम्मपि ॥ ६ ॥ सजोषणा श्याण | नणद सजयस्स पमिसियो ॥ सच्चमिह सोणुनाव ॥ पडुच न पएस कम्मतु ॥७॥ नणियं च सुए जीवो ॥ वेए नवाणुनाव कम्मतु ॥ ज पुण परत कम्म ॥ नियमा वेए त सब ॥ ॥ नादिय निकरए ॥ नासत मुदे जत कुवसम्म ।। सधपएसकम्म ॥ वेएउ मुच्चए सबो ॥ ॥ फिहदसणा पाउन होइ सजोषणा वेययः ॥ मदाणु नावयाए ॥ जहाणु नावपि विकचि॥१७॥ निच मुश्नपि जहा ॥ सयल चक जाणिण तदावरण ॥ नविधाय मदयाए । पएस कम्म तहा तेयं ॥११॥ हवे छायोपशमिकनु स्वरुप कठे उदीरण मिथ्यात्वमोदनीयने विपाकोदयेक रीने वेदितपणामाटे यकरथके थने धनुदोरण मिध्याव मोहनीयने उपशमावे थके ए क्य बने उपशमरूप ते सायोपशम सम्यक्त्व कहिये हा पूर्वपदकरीने चर्चक पूवे के कहोजी झायोपशमिकथने उपशामिक सम्यक्खनो शो विशेष गुरे केमके उदीरण मिथ्यात्वनोदय बने थनुदीरण मिथ्यात्वनो उपशम ए वेहुनेथिपे समान तेमठेता वेदना जूदादा नाम केम कहो एकनाम केम के हेतानथी एम पूछनारने उतर कहेते सानलो छायोपशम सम्यक्त्वनेविषे शुमि व्यात्वपुजना पुन विपाकोदय वेदीय वे बने गुमाल पुजना पुन प्रदे तो सम्यक्तविचारगर्मित महावीरजिनस्तवन. उU३ शोदय वेदीयें। श्रने उपशमसम्यक्त्वनेविशेतो वली सर्वथा काश्यपण नथीवेदता एटलुं विशेषपएं उपशम थने दायोपशमनुं जाणवू. यक्त - प्राति खळबसमोसिसमोगुणा नण कोविसेसोसि; तणु खोमि उन्ने ॥ सेसोवसमे खउँवसमो ।।१।। सोचेवनणूवसमो । उहए खीणमि सेसएसमि एासुदुमोदय यामीसे ।। नतूव समिए विसेसोय ॥२॥ वैए संतकम्मं खउँवसम्मे सु नाणु जावसो ॥ उबसंत कसा पुण ॥ वेएश्न संतकम्मपि ॥३॥ इत्यायुक्त मस्ति. हवे दायक सम्यक्त्वनुं स्वरुपकहेठे सम्यक्त्व मिश्र धने मिथ्यात्वपुंजरूप त्रिवि ध दर्शनमोहनीयन निशेप क्ष्यलक्षण हायक सम्यक्त्वकाहिये ते दायकसम्य क्व क्ष्पकश्रेणीपढिवजतानेहोय यमुक्त ॥ वीणे दंसण मोहे, तिविमि विनव नि थाण नूमि ॥ तिप्पञ्चवायमतुलं, सम्मत्तं खाऽयं हो ॥ १ ॥ ते दायकसम्य क्त्व क्ष्पकश्रेणीने विपे यावीरीतेहोय ते कहे. यमुक्तं ॥ पढम कसाये समयं, खवेश घेतो मुहुत्त मित्तेणं ॥ तत्तुधिय मित्तं, त उथ मीसं तसासं ॥ १॥ वा पडिवन्नो, पढम कसाय रकए जा मरिजा ॥ तो मिहत्तोटयन, विराज जो न खाणंमि ॥ ॥ तमिम उजाइ दिवं, तप्परि णामो असत्तए रवीणे ॥ उवरय परिणामो पुण, पहा नाणा मई गइ ॥ ३ ॥ वीमि दंसातिए, किहो तउति दंसा ॥ नन्न सम्मदिही, समत्त खए क उसम्मं ॥ ४ ॥ निदलिय मयण कुदव, रूवं मित्त मेव सम्मत्तं ।। खीणं न उ जोनावो, सदहणा लरकणो तसत ॥ ७ ॥ सो तस्त विसुक्षयरो, जायज्ञ सम्मत्त पुग्गल स्कयां ॥ दिच्चि सएह सुझ,न पमल विगमे मणूसस्त ॥ ६ ॥ जह सुझ जलायुगयं, दहुं सुई जलरकए सुतरं ।। सम्मत्त सु६ पुग्गल, परिरकए दंसणं एवं ॥ ७ ॥ तमिथ तस्य चन्द्र, नवमि सिति वश्य सम्मत्ते ॥ सुर निरय जुगलि सुगई, इमंतुजिणकालिय नराणं ॥७॥ पडिवत्तीए अविरय,देस पमत्तापमत्तविरयाणं। अन्नयरो पडिवङ5, सुकलापोव गयचित्तो ॥ए॥ इति दायक सम्यक्त्व स्वरूप, हवे वेदकसम्यक्त्वनुं वरुपकहे वेदकसम्यक्त्वते पकश्रेणी पडिवर्जनारने होय चारअनंतानुबंधीया कपाय तया मिथ्यात्व थने मिश्र ए वे पुंज खपावेथके अने सम्यक्त्वपुज खपावतोहोय एटले सम्यक्त्वपुजना खेलापुल खपाववाने उन मालथयो ते सम्यक्त्वनापुंजनुं वेदनकाल तेना चरमसमयनेविपे चरमपुजलनुं वेद, तेनुनाम वेदक सम्यक्त्व कहिये; जेम समलोचना खेम वेदनथी सूक्ष्मसपराय कहिये तेम जाणवू. यउक्त सम्मत्त चरम पुग्गल, थपुनवणावेयगंवित्ति इति वचनात् उप४ सम्यक्त्वविचारगनित महावीरजिनस्तवन हये सास्वादन सम्यक्त्वनु स्वरूपकहेठे पूर्वोक्त परमनिधान लान समानजे उ पशम सम्यक्त्व तेनो थतरमूहूर्तजे काल ते कालमाथी उल्लष्टथी शेप व थाव जिका प्रमाण काल रह्यो होय घने जघन्ययी एकसमय थविशेपदोय तेवारें थ शुभपुजे जावानी चाय कोकने महा बिनोपिकोवान कटप थनतानुबधियानो उदयदोय ते थनतानुबधीने उदये सम्यक्त्व वमतो गुलवमननीपरे थथया मा सपतननीपरे सम्यक्त्वने थास्वादे थातेथके सास्वादन सम्यक्त्वहोय एटले उपश मसम्यम्ववत उपशमयी पमतोयको जिहासुधी हजी मिथ्यात्वगुणगाणो नथी पाम्यो तिहालगे सास्वादन सम्यक्त्व कहिये तक्त उपसम सम्मत्तान, चयउ मि अपाय माणस्मासासायण सम्मत्त, तयतराल मिठा वलिया॥१॥ एरीते चोथाढा लनी बारगायासुधी पाच सम्यक्त्यनुस्वरुपका दवे वली काकतेनोज विशेप कहे। सम्यक्त्व ते सुं कहिये जे मिथ्यात्व विकारनु यणपजावनारो एहयो को अतिशत अभ्यवशायरिशेप यात्मानु परिणमन तेनेज सम्यक्त्व कहिये तेनाने द टापरु वेदक उपगमिक सास्वादन कायोपशमिक दव्याख्यान गाथायेकहेते. ग्वीणे दसण मोडे, तिपिहमि विस्पाइप नवेसम्म यग मिह सोऽय, चरमि उप पुग्णन ग्गास ॥ १ ॥ यसम सेटि गयस्सल, होई उयसामियतु सम्मत्त । जोग यकपतिपुजोय सरिय मिनो लहसम्म ॥२ ॥ उपसम सम्मनात, चय मिा यपार माणस्म ॥ सासायण सम्मन, तय तराल मिठा लिया ॥२॥ मिनज मुन्न, नगीण अणुश्य च असतं ॥ मानीनायपरिणप, वेड खार समं ॥ ४ ॥ ज्यादि वाग्गायानो थर्य कहो हवे ए परि गम्यान्वनी यिति कालमानादिक कहे तमा उपगमसम्यस्त्व नो यनामुन यिनिगान साम्पादननु चमष्टो व थायनिकानु थथा जघन्य पीर ममपान वेदानो एर समय दायरसम्यक्त्वना साधिक तेत्रीम सा मगरमशन दायोपशम सम्यक्त्यनु साधिक नाशवसागरोपमनु काज जाण एक गापादन सम्यस्य यने वीनु उपदामसम्यस्य उमटा परिवार धाने नया वेदर यने दायिक सम्यक कागज या थने झापापशम मम्पय यमामानिगार या य यतमुटुनो गममा, बायति मागाण येयगा मम ॥ सादिय निनी मायर, माई गुणो याममा ॥ १ ॥ नझाम मासाप एवमभिरा दुनि विवाग म्यग गामि, यसपवारा मगममा र दरे ममगागन म विरता कडेने मामाया चार प्रकारनुर सम्यम्य सा सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन. जए मायक श्रुतसामायक देश विरतिसामायक बने सर्वविरतिसामायक तेमांजे सम्य क्साचोलावते सम्यक्त्वसामायक श्रुतसिझांतनु नवुते श्रुतसामायिक देशथकी विरमद् ते देशविरतिसामायक सर्वथकी विरमदूं ते सर्वविरतिसामायक एरोते चार सामायक ने तेमां सम्यक्त्वसामायक श्रुतसामायक देशविरति सामायक ए त्रणने उत्कृष्ट याक एटले जे प्रथमपणे मूक्यानुं ग्रहण ते एकनवमां सहस्रष्ट थक्त्व एटले वेहजारथी मामीने नवहजारगुधी दोय धने सर्वविरतिने शतप्टथ क्त्व एटले वशोथी मामीने नवसोसुधी होय ए उलष्टमी कह्यु, ने जघन्यथी एक ज आकर्ष सर्वने होय ए एकनवधाश्रयी का यक्तं तिहां सहस पुदुत्तं, सय पुढतंच होऽविरईए ॥ एगनवे धागरिसा, एवश्या इंति नायबा ॥ १ ॥ दवे नानानव धाश्री थाकप कहे-ए उपरना त्रणसामायकने सर्वनवने विपे उत्कृष्टा असंख्याता सहस्त्र पृथक्त्व आकर्प थाय घने सर्व विरति सामायकने सर्व नवमां सहल पृथक्त्व आकर्प होय ए सर्वनव आश्री का. यमुक्तं तिह सहस मसंखा, सहस पदुत्तंच हो। विरईए ॥ नाणनवे आगरिसा, एवश्याहुँति नायबा ॥ १३ ॥ १४॥ १५॥ १६॥ हवे ए पांचसम्यक्त्वने गुणगणाकडे वीजे सास्वादन गुणवाणे सास्वादन स भ्यक्त्विहोय थने चोथाथीमांमीने यग्यारमा गुणगणालगे आवगुणगाणा उप शम सम्यक्त्वीने होय घने चोथायीमांमी चउदमांलगें ग्यारगुणवाणा दायक सम्यक्त्विनेहोय थने चोथायीमांझी सातमांगुणाणालगे चारगुणगाणा वेदक य ने दायोपशमसम्यक्त्विनेहोय. यउक्तं वीयगुणे सासाणो, तुरियाइसु अहिगार चउ चन्तु ॥ उवसमग खग वेयग, खाउँवसमा कमावुति ॥ १ ॥ हवे चवदगुणताणानोयर्थ लेशमात्र गाथायेंज कहीदेखाडे गाहा ॥ जीवा पयछेसु, जिणोच इसु जा असद्दहणा ॥ सदहणावि य मिना, विवरीय परूवणा जाय ॥ १ ॥ संसय करणं जंपित्र, जंतेसु यणायरो पयोमु, त पंचविहं मिहं, त विहिमित्रवितीय ॥॥ उवसम या विळ, मिल पमत्तो तमेवगं तुमणो ॥ सम्म, पासायंतो, सासायण सो मुणेयद्यो॥ ३ ॥जह गुम दहीणिवि समा, नाव सहि याणि टुंति मीसाणि ॥ भुजं तस्ततहोनय, दिछीउमीस दिनी ॥४॥ तिविहेविदु सम्मने, सेवावि नविरजस्स कम्मवसा; सो अविरउ तिनन्नई देसे पुण देसविरई उ॥५॥ विगहा कसाय निदा, सहारनवे पमत्तुति ॥ पंच समिउत्ति गुत्तो, थ पमत्त जई मुणेयधो ॥ ६ ॥ यप्पुवं यापुत्वं, जदुत्तरं जोकरेऽ विकंमं ॥ रसकं म ७५६ सम्यक्तविचारगर्जित महावीरजिनस्तवन ग्याय, सोहोइ थप्पुत्व करणुत्ति ॥ ७॥ विनिवति पिसुद्धि, सम्मग दऽपि जमि धनन्न । तत्तोनियहिवाण, विवरीय मवि थनियट्टी ॥ ७ ॥ थूलाण लोह समा ण वेअगो वायरो मुणेयवो ॥ सुद्धमाण होऽसुदुमो, उयसतेहि तु उपसतोराए वीणमि मोहणिके, स्वीप कसा सजोगि जोगिन्ति ॥ दो पत्तो थत,थपम नो होछ थजोगी ॥ १० ॥थविरय सासण मिधा, परनधिया नजण सेस गु पणा | मिस्त तिनि जगा, बावलियं हो सासारा ॥ ११ ॥ तित्तीसयर च नई, पुवाण कोडि कण तेरसम ॥ लदु पचरकर चरिम, अतमुहू सेसगुण गणा ॥ १२ ॥ ए चौथाढालनो १७-१७-१ए-ए त्रण गाथानो थर्थ कह्यो ।। ढाल पाचमो शातिसुधारस कुममा तुरमे मुनिवर एदेशी ॥ धन धन शासन ताहरूं ॥ माहरु जिहांमन लीनरे ॥ण पण तसविण न चिरहे । जिमजल जर विण मीनरे ॥ धन ॥ १ ॥ देशविरति दरशणथकी ॥ प लिय, पुद्दुत्तमा जाणिरे ॥ अनुक्रमे चरणश्रेणीबिदु ॥ सव्यसायर गुण वाणिरे ॥ धन० ॥ २ ॥ तेहिज नवेदुए तेहने ॥ जेहनेसत्तगखीणरे ॥ चउतियनव उत्कर्ष थी । पुत्वबझाउने पीणरे ॥ धन० ॥ ३ ॥ वायु सुर नरगनु । तेहने तियनव ततरे ॥ थाउ असल्यनर तिरितः ॥ तसपण पनवे थंतरे ॥ धन० ॥ ३ ॥ मफित स्थितिदोए थोगी ॥ अतरमूदूरत एकरे ॥ साहिय खचसमासिरी ।। सायर वासहि करे ॥ धन ॥ ५ ॥ ईग अथवा बहु थासरी ॥ दरसणनो उप योगरे । जघन्य उत्कट यकी कह्यो । यतरमूहूरत नोगरे ॥ धन० ॥ ६ ॥ दरत एलब्धि शून सुरतता ॥ क्योपशमादिक, रूपरे ॥ अत्तरमूगुरत माननी ॥ जप न्यथी कहेजिननूपरे । धन || || वासठ सायर सविमली ।। नरनय हिय उ तरुष्टरे । तेही गई जो नविदिए । समकित रयणने पटरे ॥धन 116॥ ते निश्चय शिवपदलहे ॥ ए एकजीवने योगरे ॥जीपनानात्रित सर्वदा ॥ दरस एनो उपयोगरे ॥ धन० ॥ ए ॥ यतरमूदुरत एकनु । जघन्य अतरमन धागरे।। श्रई पुगत परावर्त्तनु ।। तस उलट परिमाणरे ॥ धन ॥ १० ॥ जीव नानाभि त नरि दोए ॥ समकित थतर सेशरे ॥ तत्र यावश्यक वृत्तिमा ॥ए अधिकार विवोपरे ॥ धन ॥ ११ ॥ दशविध सहज उपदेशथी । उपशम प्रमुख जे प निसग्ग रु जेदयी दशविध तस परपचर ।। धन ॥ १२॥ नि सगुवएस थाणारु ॥ सुन वीयस् थनिरामरे ॥ थनिगमा भोग किरियाई ॥ सवेर पम्म रु नामरे ॥ यनः ॥ १३ ॥ गुरुउपदेशविण सहेजथी। जिनश्य चरे । यहव Su 3 सम्यक्त्वविचारगनित महावीरजिनस्तवन. णे परतीतरे । जेहने तेहने जाएजो ॥ प्रथम निसर्ग रुचि रीतरे ॥ धन ॥१४॥ तेनवि गुरुउपदेशची ॥ सद्दहे जे जण थापरे ॥ ते उपदेशरुचि नर करो ॥ इम तुज थागम थापरे ॥ धन ॥ १५ ॥ कारण प्रमुख अजाणतो॥ मुम जिन या पाज ग्वैमरे ॥ तस्य थाणासचि तुकहे ।। माप तूपादिक जेमरे ॥ धन० ॥ १८ ॥ सूत्र जपतो समफितलहे। प्रसन्न प्रसन्न परिणामरे ॥ गोविंद वाचकनीपरे । नई तसनामरे ॥ धन ॥ १७॥ देशरुई खउँवसमथी ।। सबरुई विस्तारिरे । उदकमां तेलविउपरे ॥ बीय नवतारिरे ॥ धन ॥ १७॥ अनिगम सुधना एएने । थरथथको अवगाहेरे । अंगपश्न प्रमुखजे ॥ शास्त्र सोनिरवाहे ॥ धन ॥ १ए । इयना नाव जाण्याजिणे ।। सच प्रमाणे असेसरे ॥ सर्वनयेतिम तसक ह्यु । विष्ठार रुई अकलेगरे । धन० ॥ २० ॥ दंशणनाण चारित वली ॥ तिमतिन यो त्तमकामरे ।। सुमति गुपतिकिरियारुचे ।। तेकिरिया रुग्नामरे । धन ॥ २१ ॥ थागम कोविद नवीहुए ।। कुमय कुटिजीवि जुत्तरे ॥ संखेवरूई तेहने कयुं | जि मचिलातिय पुत्तरे ॥धन ॥ २२ ॥ धम्म अधम्म प्रमुख दछ । चरण सुय ध ममना नेटरे ॥ जेजिन नापित सदहे ॥ तेधम्मरुई निरवेदरे ॥ धन० ॥ २३ ॥ एटशविध दरशण का, उत्तराध्ययनमजाररे । अध्ययने ते घडवीतमें || न्याय सागर सुखकाररे | धन॥ २४ ॥ अर्थ ॥ हवे पांचमा ढालनो अर्थ कहेले जेटली कर्मस्थिति उते पूर्वे सम्यक्त्वपणुं पाम्योवे तेमांहेथी पल्योपम पृथक्त्व लक्षण स्थितिनाखंम ख पावेयके आवकपणुं देशविरतिपणुंपामे तेवारपठी ते कर्मस्थितिमांचीपण संख्यात सागरोपम कर्मस्थितिखेम खपावेथके चारित्र उदय थावे तेवारपती पण वली संख्यात सागरोपम स्थितिखम खपावेथके उपशमश्रेणी पडिवजे वली तेवारपती पण संख्यातसागरोपम खपावेथके पकश्रेणी थाय. तक्त सम्मतमि उनमे, प लिय पुहत्तेण सावगो दुजा ॥ चरणोव सम खयाणं, सायर संखंतरानुति॥ १ ॥ हवे कांइक लेशमात्र श्रेणीस्वरुपकहे। पूर्वनोजाण पूर्वगतश्रुतनो धरनार य प्रमत्तगुणधणीयाद्यनात्रण संघयणमाहेला संघयणनोधणी तेगुक्तध्यानना चारपा पावे तेनानाम कहे पृथक्त्ववितर्कविचार एकत्व वितर्क विचार सूक्ष्यक्रियानिवृत्ति स मुहिनक्रियानिति तेमाहेला यक्लवितर्कविचार नामेप्रथमपायो ध्यातोपराम एपीपडियजे. यजुक्तं पूर्वाः शुधिमान् युक्तोह्याद्यः संहननस्त्रिनिः॥संध्यायन्नाद्य शुक्ला शंस्वाणि यतिकमात् ॥१॥ धन्यनेमतेंतो अविरतादिकपण श्रेणी धारंनको. - UG सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन. बजी तेवारपनी थप्रमत्तातगुणताणे धनतानुबधीनी चोकडी थने त्रणमोहनी य ए सातप्रति उपशमावी एकसंज्वलननु लोनयति बाकी मोहनीयकर्मनी जे बीमारुतिरही ते थातमे थपूर्वकरण तथा नवमे अनियतिवादर गुणाणे उपशमा ये पठी सूक्ष्यसपरायने विपे लोननु थषुयषुकरीने उपशातमोहने विपे तेहिज लोनने उपगमाये तक थपूर्वादिष्यकक, गुणेषु शमक कमात् ॥ करोति विश ते शातिं लोनापुत्वच तधम ॥ १ ॥ निहाँ प्रयम मयपणयाजोतो उपशमश्रेणी थपरिसमाप्ते एटले श्रेणीपूरीकसा ग्निा मरेतो पचानुनरविमानेजाय अने जो पुष्ट थापावालोहोय तेवली उपशा तमोहन मोहनीय उपशमावे तिहा उपशमसम्यक्त्वहोय थने उपशमनाय चा ग्निहोप ए ये उपशमनावना होय ए उपशमिक थवश्यपडे तक शांतहम् वृत्तमोहत्वादन्नौपशमिकानिधे ॥ स्याता सम्पात्यचारि में नागमोपनमामा ॥१॥ पततिचाय मवश्य ॥ यत्त ॥ वृत्तमोहोदय प्रा प्पोपामीयते तत ॥ यथ रूतमानतोय पुनातिन्यमश्नुते ॥ २॥ थपिच ॥ पुत्र पेनि थागरग, वजुमइ उयसतगाविदुपमाया ॥ हिमति नय मणत, त पगतग्मेर गगऽपा ।। ३ ।। ननिष्पनेने मामी उपसमिक्ने तहिजनये मोक्षहोय किवानहोय तेवारे पुराने होपपणमा तेमके साततर अवशेषापुहोय एवो कोई उपशमिक गांधेली गीज पाचोरले ते सातमेगुणगणेथावाने बली पकश्रेणीपडिवजे ते नानापमा वीणमोनीय यनगडकेरतीयाय पण एटलोविशेषजे एकवारज कप मामला पहिरन्याहाप ते कपाश्रेणीपा थने पाणीपण पमियजे पण जे च यापन भागमणी पहिरन्याहाय तेने तेदिजनर पक श्रेणी नयाप तपुन जीगढ म जन्ममि, ममि यमामग्गा ॥ग्यपि कुझा नोकुडा॥ या यारे नमानगो । ॥ उगममणि चनक, जायः जीपस्न यानर नण ॥ता दोगना पग म्मणी पुणो णा ॥ २ ॥ वक्तच समनिका चूणा ॥ जादा बार घरमम, महिपनि तम्म नियमानम्मिनो, मागटि नगिजा गि भरमममेट पहिरडा नम्न मरगटि चिहानि एकदिाना यनिमापन यने यागमना यनिनायता यागिने जा नानी पदिने पनपनापायपरि यहि, मम्मन र मगुबहमेमु ॥ यनयर मंदिरह, नगर मया ॥ ॥ सत्रामा सम्यक्तविचारगनित महावीरजिनस्तवन. उपए Janmami देशविरल्यादिकहोय. अन्यत्राप्युक्तं ॥ मोहोपगमएकस्मिन् नवे विस्यादसंततः॥ यस्मिन् नवे उपगमः क्योमोहस्य तत्रतु ॥ १ ॥ ऽहां शिष्य पूढेवे कहोस्वामी संयतने अनंतानुबंधियानुं उदय निषेध्योठे तो तेनुउपशम केवीरीते घटमानथाय ए संसयदूरकरो गुरु कहे हे माहानुनावतेतो अनुनागकर्म थंगीकारकरीने निपेथ्योते पण प्रदेशकर्मधाश्रीने निपेध्योनथी तेमाटे प्रदेश कर्मादयतुं शहां उपशम जावो तेवारे फरी शिप्यवोल्यो जोतमे संयतने प्रदेगकर्मोदयनो उपगमकखो तो अनंतानुबंधियाना उदयथी दर्शननोविघात के म नथीयतुं तेवारे गुरुकहे। एना प्रदेशकर्मना मंद अनुनवपणामाटे तेम कोऽकने अनुनागकर्मनो अनुनवपण अत्यंत विघात न करे जेम संपूर्ण मत्यादिक चतुर ज्ञानीने मत्यादि ज्ञानावरणोदय अत्यंत विधात नथी करतुं इत्यादिक दृष्टांते दर्श ननो विधात न थाय. तथाचान्यधायि परमगुरुणा:- जीवेणंनंते सयंकं कम्मंवेएइ गोयमा थठेगश्यं वेए अगऽयं नोवेए सेकेण पपुवा गोयमा अविहे पन्नत्ने तंजहा पएसकम्मेय अणुनागसम्मेय तिष्ठणंजं पएस कम्मं ते नियमा वेएइ तिवणं जं अणुनागकम्म त अगइयं वेए थवेगश्यंनोवेएइ इत्यादि. हवे वली विशेपथी कांइक उपशमत्रे पीनुज स्वरूप ग्रंथांतरथी कहे त्यां प्रथमथी अनंतानुबंधीनी उपशमना कहिये. अविरति सम्यक्त्वदृष्टी देशविरती प्रमत्त अप्रमत्त ए माहेलोअन्यतमधन्यतमयो गनेविपे वर्ततो तेजोलेश्या पद्मलेल्या शुक्ललेश्या माहे अन्यतमलेच्या सहीत साका रोपयोगे उपयुक्त सागरोपम कोडाकोडीमांहे स्थितिसत्कर्माकरणकालथी पूर्व पण आंतरमूद्धर्तकाललगें अवदायमान चित्तसंतति एवो अवतिऐतिम अवतिटतोथको वली परावर्तमान प्ररुतिप्रतें एनजबांधे पण अगुनेनवांधे वलीजे अगुन प्ररुति मुंरस चउठाण्युहोय तेने वे वाण्युकरे अने जे गुजप्रकृतिनुरस वे गण्युहोय तेने च उठाण्युकरे वली स्थितिवंधनेविपे पण पूर्णपूर्णथयेथके अन्यस्थितिबंधप्रते पूर्वपू वस्थितिबंधनी अपेक्षायें पट्योपमासंख्येयनाग हीणोकरे. ए प्रकारे करणकालयीपूर्वे थंतरमूदुर्नकाललगे रहीने तेवारपती धनुक्रमे त्रण करणप्रत्येके अंतरमूहूर्त्तना तेप्रते करे ते थावीरीते जेम यथाप्रतिकरण अपूर्व करण अनिवृत्तिकरण वली चोयो उपशांतकाल तिहां यथाप्रवृत्तिकरणनेविपे प्र वेशकरतो प्रतिसमये अनंतगुणवृद्धि विगु-क्षेप्रवेशकरे वली तिहापण पूर्वोक्त गुरु ७६० सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन प्रतिबंधादिकजकरे पण वली स्थितिघात रसघात गुणश्रेणी गुणसंक्रमण प्र तेनकरे केमके ते प्रतिसमय योग्य विशुद्धि नयी वली नानाजीवनी थपेक्षायें थसख्येय लोकाकागप्रदेशमान अध्यवसाय स्था नकहोय वली मनाए वडियाहोय वीजु वली प्रथमसमयनी थपेचार्य बीजासमा यनेविपे थध्यवशायस्थानिक विगेपाधिकहोय तिहाथीपण त्रीजासमयनेविपे कि उपाधिकहोय ए प्रकारे निहालगे यथाप्रवृत्तिकरणनु चरमसमयथाय तिहाँलग केयु एम थपूर्वकरणनेविपे पण जाणवु एटलामाटेज एथध्यवशायस्थानक स्था पाथका विपम चतुरस्त्र देत्रप्रते श्रास्त्रऐव्यापे तेनी स्थापना १२00000000000१६ इहा कल्पनाये वे पुरुप समकालें करण पडिवज्या १000000000१५ विवक्ष्येि तिहा एक सर्वजघन्य विशोधि श्रेणी पडि 0000000000१४ वज्यो भने बीजो सर्वोत्कृष्ट विशोधि श्रेणी पडिया ६००000000१३ ज्यो तिहा पहेलाजीपने प्रथम समयनेधिपे जघन्य ४०००००००११ विद्युदि सर्वथी थप जाणवी तिहाथी बीजासमयने ३००००००ए चिपे जघन्यविशोधि थनतगुणी तिहाथी त्रीजा समपने २०००००७ विपे जघन्यविशोधि धनतयणी ए प्रकारे त्यांलगे कहे जि १००००५ हालगे यथाप्रवृत्तिकरणना कालनो सख्यातमोनाग गयोहोय तेवारपठी सख्येयनाग गयेथके चरमसमयनी जघन्यविशुद्धिना समीपथकी प्रथम समयनेविपे बीजाजीयनी उत्कष्टीवियुद्धी बनतगुणी तेवारपठीपण जेमाटे जय न्यविधि स्थानकथी निवत्यो तेवारपठी उपरलु जघन्यविक्षिस्थानक अनत यो तेवार पठी वित्तीय समयनेविपे उत्कृष्टी विशुद्धी अनतगुणी तेथी कपलुज घन्यवियुक्षि स्थानक यनतगुण तिहाथी वृत्तीय समयनेविपे उरूपविशुद्धि यनत गुणी ए प्रकारे कपरनु वली हेग्लु एकेक विद्यविस्थानक धनतगुणपणे वे जीर तिहाजगे जाणवु जिहालगे यथाप्रवृत्तिकरणमा चरमसमयनेविपे जघन्यविध विस्थानक तेथी शेप उत्स्टा जे विशुधिस्थानक धनुक्तरह्यांचे ते निरतर थन तर तिहालगे जाणया जिहालगे चरमसमयनेविपे उलट विशुभिस्यानक ए यथाप्रवृत्तिकरण का हवे थपकरण कहियेने त्यां थपूर्वकरणनेचिपे प्रतिसमये यसरव्येय लोकामा प्रदेशप्रमाण थध्यवशाय स्थानकहोय प्रतिसमयवली वाणवतियाहोय तिहाप्रथम समय विपे जघन्यविशुद्धि सर्वथीयोडी तेवजी यथाप्रवृत्तिकरणना चरमसत्क उल सम्यक्त्वविचारगर्मित महावीरजिनस्तवन. २५००००००००२७ टविगुद्धि स्थानकथी धनंतगुणी तिहाथी प्रथमसमयनेविपेज जयन्यविक्षि यनं तगुणी तिहाथीपण तेहिज प्रथम समयने विपेज उलष्टविशुद्धि अनंतगुणी. त्यांची पण बीजासमयनेविपे जघन्यविशुद्धि अनंतगुणी त्यांचीपण तेहिजबी जासमयनेविपे उत्कृष्टविगुदि अनंतगुणी त्यांचीपण वली त्रीजासमयनेविपे जय न्यविगुदि अनंतगुणी ए प्रकारे जघन्य अने उत्कृष्टवियुधिस्थानक अनंतगुणर के त्यांलगेजाणवा ज्यांलगें श्रपूर्वकरणना चरमसमयनेवि जयन्यथा उत्कृष्ट विद्यु विथनंतगुणी, स्थापनाचेयं एमपूर्वकरणनेविपे प्रवेशकरतोजीव स्थितियात रस घात गुणश्रेणी गुणसंक्रम अने अन्यस्थितिबंध प्रते २३०००००००२४ समकाले थारंने. त्यास्थितिवात कहेतांठतां कर्मना अग्नि मनागथकी उलटथी प्रनूतसागरोपम शतप्टयक्त्व मात्र य १५00000५० ने जघन्यथी पोपमसंख्येयनागमात्र स्थितिखमनाटलिकप्रते १७००००१७ खेमे बली हेलीजे स्थिति खमासे नही तिहांप्रदेपे अंतरमूदुर्ग कालें उकेरे (खंडे) पूर्वोक्तप्रकारेज वली निदेपे ए प्रकारे अपूर्वकरणना कालने विपे घणास्थितिखम सहस्रव्यतिक्रमें तेमवतापण अपूर्वकरणना प्रथमसमयने विपे जे स्थिति सत्कर्महतु ते तेनाज चरमसमयनेविपे संख्येयगुणहीनथडे ए स्थितिघातका. हवे रसवात कहे अगुनप्रतिनाजे अनुनाग सत्कर्म तेना अनंतमन्नाग प्रते मूकीने शेपथनुनागर्नु अंतरमुहूर्तकालमा विनासकरे खपावीनारखे त्यांथी वली पण ते पूर्वं मूक्यो जे अनंत नाग तेनो पण थनंत नाग मूकीने शेप अनुनाग प्रते अंतरमुहूर्त काले खपाडे. एरीते धनेक सहस्र अनुनाग खम ते एकस्थितिखम नेविपे व्यतिकमे उसंतेस्थितिखमनेसहस्त्रेयपूर्वकरणपरिसमाप्ति थायएरसघातका हवे गुणश्रेणी कहे। अंतरमुहूर्तस्थितिनी उपरतीजे स्थितिवर्तेते तेमांची द लिकलेश्ने जुदयावलिकानी ऊपरली स्थितिमा प्रतिसमये असंख्यातयणपणे निदेपे तद्यथा प्रथम समयनेवि स्तोक वीजासमयनेविपे यसंख्यातगृणु त्रीजा समयनेविपे थसंख्यातगुणु एप्रकारे त्यांलगेजाणवू ज्यांलगें अंतरमुहूर्तनो ठेलो समय श्रावे ते थं तरमुहूर्न अपूर्वकरण अनेअनिनिकरणना कालयकी किचित्मात्र यधिकजाणवु ए प्रथमसमयनेविपे लीयांजे दलिक तेनो निपविधि एप्रकारे के वितीयादी समयग्रहीत दनिकनो पण निदेप कहेतो बीलु गुणश्रेणी रचनाने अर्थ प्रथम समयनेविपे जे दलिक ग्रहीये तेथो तेथीपण बीजा समयनेचिपे असं ख्यातगुणु तेथीपण त्रीजा समयनेविपे असंख्यातगुणु एप्रकारे त्यांलगे जाणवू ១០ सम्यक्तविचारगनित महावीरजिनम्तवन ज्यांलगे गुणश्रेणी करपातुं चरमसमय पारे त्यांगे, अपूर्वकरणना समयनेषि वली थनिवृत्तिकरणना समयनेविपे थनुनयाने अनुक्रमे अयपामतां गुणग्रेर्ण दतिक निक्षेपयाकते वेद्येवली कपर बधेनही ए गुणस्थान कत्यु हवे गुणसक्रम कहेने थपर्वकरणना प्रथम समयने रिपेयनतानुवंधियादिक घर नप्रतिना जे दलिक परप्रतिनेविसकमा तेस्तोकगार पनी वीजा समयनेवि परप्रतिमा असख्यातया सक्रमावे त्यांथीपण त्रीजासमयनेरि थसंख्यातगुण सक्रमाचे ए प्रकारे त्यांलगेकहे ज्यांलगे वेहेलो समयथावे. तिम थन्यस्थिति कहेता थपूर्वकरणना प्रथमसमयनेविप थन्यज स्थितिवध भारनिये स्थिति बध थने स्थितिघात ए बे समकाले जे पुराथाय ते धन्यस्थितिवध जाणवु प्रकारे पांच पदार्थ थपूर्वकरणमा होय प्रवः ए थपूर्वकरण का हवे थनिवृतिकरण कहिये जेमा प्रवेश करनार सर्व तुल्यकालना पणीनु कज अध्यवसायस्थानिक होय ते याचीरीते के थनिवृत्तिकगणना प्रयमसमय चर्ने भने जे वां अनेजे वर्तसे तेसर्वेनु एकजरुप थध्यवसायस्थानक हो तेमज वीजा समयनेविपेपण जे वा पर्ते श्रने वर्तमे तेपण सर्वेनु एकजरूप थध्यवसाय स्थानकहोय पण एटलोविशेषजे प्रथम समयनावी विशोधिस्थानकर्न थपेक्षायें बीजा समयमा थनतगुणहोय ए प्रकारे त्यांलगे कहे ज्याजगे अनि वृत्तिकरणनो चरमसमयथावे एटला माटेज एकरणनेविप पेवा तुल्यकालनापूर्ण, जेप्राणी ते सबधी श्रध्यवसाय स्थानिकने परस्पर निवृत्ति भने व्यावृत्तिनयो तेमा टेज एनु थनिवृत्तिकरण एवु नाम कहिये वली ए करणनेविपे जेटलासमय तेटला अध्यवसाय स्थानकहोय पहेना के थध्यवसायस्थानकथी यागना थध्यवसायस्थानक धनतगुणवदेहोय ए मुक्ता लीने स्थाने स्थापया इहापणप्रथमसमयथा थारनीने पूर्वोक्त पाचपदार्थ समकाले प्रवः ए करणनाकालना थसख्यातानाग गयेथके एकनागथाकतेयके थनतानुः घियानेहेतु यावलीकामात्रमूकीने आंतरमूर्तप्रमाण पतरकरणप्रते थनिनवरिया ति वधाबासमान थत्तरमूर्तप्रमाण काकरे वजी थतरकरण सत्कदलिक वकीर्यमाण वधाचानी परप्रकृतिमा प्रदेपे थमस्थितिगतदनिक थावलिकामात्र वेद्यमान परप्रतिमाहे स्तबुक सक्रमावे थतर करणकरेथके दितीयसमयनेविपे धनतानुबधीयानी उपरली स्थितिनुवजिक उप शमाववाने थर्थ थारने सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन ते यावीरीते प्रथमसमय स्तोक उपगमावे तेथी वितीयसमये असंख्य वती तृतीयसमये असंख्यातगुणु एम ज्यांलगें धंतरमूदुर्जनुकाल त्यानगे एटलेकाले सर्व अनंताबविया उपशम्या उपगमिताते गुंकहिये जेमरेषुनु । एटने समूदते पाणीनाविध्याना समूहे सिंच्यो घणादिके कूटयो निस्पंदहोय म कर्मरेपुर्नु समूहपण विगोविरुप सतितप्रवाहे सिंचीने थनिवृत्तिकरण घणधी कृटयोयको संक्रमण उदय उदीरणा नियत्त निकाचना एटला कारणोनेश्य ग्ययाय एप्रकार केटलाफ श्रचा?ना मते अनंतानुबंधीयानी उपशमनाकही. वली वीजातो एमपणाने के थनंतानुबंधीयानी उपशमनानहोय पण विस योजना एटले दपणाहोय ते धावीरीते ऽहां श्रेणी थणपडिवज्यापण थविरति तथा विरति चारेगतीवाजालेवा ते थाम.-जैम नारकी तथा देवताते थविरतिस सम्यकदृष्टी श्रने तिथंच तथा मनुप्यतेमांथविरति सम्यकदृष्टी तथा देशविरतिसम्य दृष्टी अथवा सर्वविरति ते अनंतानुं वंधियानी वितंयोजनाने अर्थ यथा प्रव त्यादिक त्रणकरणकरेते करणीनी वक्तव्यता सर्व पाठलकह्याप्रमाणे जाणवी पण हां एटलो विशेषजे थनिवृत्तिकरणमा प्रवेश करयोथको अंतरकरण करेनही. त तंच कर्मप्रस्ताचलगश्या पऊना, तिन्निविसंजोयणे विसंजोयं ॥ तिकरणहितीहि सहिया, नंतरकरणं उव समोवा ॥ १ ॥ एनी थदरगमनिका चारगतीना नारकी तिथंच मनुप्प देवता सर्व पर्याप्तियेथपर्याप्ता एवा अविरति देशविरति थने सर्व विर तिए त्रणेमा थविरति सम्यकदृष्टी तो चारेगतीना तथा देश विरति तिर्यंच अथवा मनुष्य थने सर्व विरति तो मनुप्यज संयोजनना अनंतानुबंधीयाप्रते विसंयोजे एटले विनाडो ते यथाप्रतिकरण, अपूर्वकरण, यनिवृत्ति वादरेसहितथको विना से पण इहां एटलो विशेषजे एक धंतरकरण न कहे, थथवा उपशम न कहेवो एटले उपशम धनंतानुबंधियानो न होय पण कर्मप्रति थनिहित स्वरूपे उल ना संक्रमणे करीने हेतु श्रावतिकामात्र प्रते मूकीने उपर निरविशेष धनंतानुंब चिया विनागकरे यने थावलिकामाव्रतो स्तिवुकसंक्रमे करीने वेद्यमान प्रकृतिने संक्रमावे एटले यनंतानुवंधियानी विसंयोजनाकही हवे दर्शनत्रिकनी उपशमना कहिये तेमां मिथ्यात्वनी उपशमना मिथ्याह टीनेहोय सम्यक्त्वनी तथा मिश्रनी उपशमना वेदक सम्यकदृष्टिनेजहोय; तेमा मिथ्यादृष्टीने मिथ्यात्वनी उपशमना प्रथम सम्यक्त्व उपजावतानेहोय ते धावी रीते-जे संज्ञीसर्वपयाप्ति पर्याप्तो करणकानयापूर्वेपण यंतरमुहूर्नकालसुधि प्र ទខុម सम्यक्त्तविचारगनित महावीरजिनस्तवन तिसमयें धनतगुणवृद्धिविगुदीए प्रवर्षमान थनव्यतिक्षिक विशुधिनी थपेक्षायें अनतगुण विशुद्धिसहीत मतिअज्ञान श्रुतयझान श्रने विनगझान एमाहेलो थ न्यतम साकारोपयोग तेनोपयोगी थन्यतम योगने विपे वर्तमान जघन्यपरिणाम तेजोलेश्याने विपे मध्यमपरिणामे बने पद्मलेश्यानेपिपे उत्कृष्टपरिणामे तन्ने श्यानेविपे वर्ततो मिथ्यादृष्टी चारेगतीमाहेलो नारकी तिर्यच मनुष्य अथवा देवता सागरोपमकोडाकोडीमाहे जेने कर्मस्थितिनी सत्ता तेने मिथ्यात्वनी नपशमना प्रथमसम्यक्त्वउपजावता होय इत्यादिक पूर्वोक्त त्यांलगेकहेबु ज्यालगे यथाप्रति करण बने थपूर्वकरण परिपूर्णहोय त्यालगे, पण इहां एटलोपिठोप जे थपूर्व फरणमा गुणसक्रम न केचो तोसुकेको स्थितिघात, रसपात स्थितिबध गुण श्रेणी एटलावानाज केवा गुणश्रेणीनी रचनापण उदय समयथी थारनीने जाणवी तेवारपती अनिवृत्तिकरणनेविपे पण एमजकहेतु थनिवृत्तिकरणकालना सख्यातानाग गयेथके यने एक सख्यातमनाग अवशेषरहेथके अतरमृदुतमात्र है तुमूकीने मिथ्यात्वनु अतरकरण थतरमूदुतमात्र प्रमाण प्रथम स्थितिथी काइक समधिक थथचान्यून थनिनवस्थिति बंधाक्षासमान अतरमूदुनकालेंकरे अंतरक रणसत्क वली दलिकप्रतें उकेरीने प्रथम स्थिति थने वितीय स्थितिमा प्रदेपे प्रय मस्थितिनेविपे प्रवर्ततो उदीरणाप्रयोगकरीने जे प्रथमस्थितिगत वजिको तेने स मापिने उदयनेवि प्रपे ते उदीरणा थने वलीजे हितोयस्थितिना पासायी दोरणाप्रयोगेज दलिकाकर्पिने उदयनेविष प्रपेए उदीरणापण पूर्वसरिये विशेष तिपत्तिनेथथै थागालश्त्युच्यते एबुकहिये उदय उदीरणायेंकरीने प्रथमस्थितिमते अनुनवतो त्यालगेगयो ज्यालगे श्राव निकायधिशेपर तेरहेथके थागलव्यवदीये तेवारपठी केवज़न्दीरणाजपू वन तेपणत्याजगे ज्यांजगे शेप थापतिकानहोय अने थावलिकाओपहाय तेबारें वदीरणापण नियनें तेवारपनी केवल उदयथावलिकामात्र धनुनवे थावलिकामा जना चरमसमयनै विषे वली वित्तीपस्थितिगत दलिकमते अनुनागनेदेकरीने स म्यक्त्व मिश्र मिथ्यात्व ए व्रणप्रकारेकरे उतच कर्मप्रतिौँ । चरमसमय मिष्ठदिहीकाले उसमसम्मदिहीहोही तादेविश्यनिश तिहाणुनागकरे संजहा सम्मत्तसम्मामित मिष्ठत्त चेति स्थापना एएए तिवारपठो थनतरसमयनेविपे मिथ्यात्वनाउदयना अनावथी उपशमिक सम्यक्त्व पामे सम्यक्त्वविचारगर्जित महावीरजिनस्तवन. उदय उक्तंच कर्मप्रकृती मिहत्तुदयेवीणे, जहए सम्मत्त मोवसमियंसो ।। संनेण ज स्त लन. आयहिय मल पुवंजं ॥ १ ॥ अन्यत्राप्युक्तं जात्यंधस्ययथासश्र बोनेगुनोदये। सदर्शनं तथैवास्य. सम्यक्त्वेसतिजायते, ॥१॥ यानंदो जायतेऽन्यतं सात्विकोन्य महात्मन ॥ सध्याध्यपगमेय६६याधितस्य सटौपधात् ॥ ३॥ ए प्रथ म सम्यक्त्वनुं लान मिथ्यात्वना सर्वोपगमनथकी थाय. उक्तंच सम्मत्तपढमलंनो, सहोवसमाऽति ए सम्यक्त्व पडिवजतो कोइकतो देशविरतिसहित पडिवजे अने कोक सर्वविरति सहित पमिवजे. उक्तंच पंचतंग्रहे ॥ तम्मत्तेणं समगं. सबंदेसंच कोविपविले ॥बृहनतक बृह विप्युक्तं ववसम सम्मदिही, अंतरकरणो ति कोऽ ॥ देसविर पिलहे, कोई पमत्ता पमत्त नावंपि ॥ १ ॥ तसाणो पुनकिंपिलहेति तेमाटे देशविरति प्रमन अप्रमत्त संयतनेविपेपण मिध्यात्व उपशांतलाने हवे वेदकसम्यक्ष्टीनेविपे त्रण दर्शनमोहनीयनी उपशमना विधिकहिये वे ऽहां वेदक सम्यक्त्वदृष्टीजीव संयमनेविपे प्रवर्त्ततोयको अंतरमूहुर्तमानकालें दर्शनत्रिकनपशमावे ते उपगमावताने वली करणत्रिकादिकनी विधि जेम कम्मप्र रुतिनीटीकामां कही तेमज जाणवी एम उपशांतदर्शनमोहनीवधिक चारित्रमोहनीयने उपगमाववा वांठतो वली पण यथाप्रत्यादिक ऋणकरणेकरी उपशमावे ते करणनुस्वरूप पूर्वनीपरेंजाणवू पण केवल इहां यथाप्रवृत्तिकरण ते प्रमनगुणाणे जाणवू तेमज अपूर्वकरण अपूर्वगुणाणे यने अनिवृत्तिकरण अनिवृत्तिवादरगुणनाणे तथा सूक्ष्यसंपरावय गाणे जाणवू हा पण स्थितियाताहिक पूर्वनीपरे प्रवर्ने पण एटलोविशेष जे ऽहां सर्व अगुनप्रति अवध्यमाननो गुणसंक्रम प्रवर्ने एम कहेवू अपूर्वकरणका लनो तव्यातमोनाग गयके निपचनाना बंधनो व्यववेट होय तेवारपठी प्रनूत स्थितिखम सहर गयेथके अपूर्वकरण कातना संख्यातानाग गया होय एक अकोष रह्योहोय वनी इहां यंतराले देवगति देवानुपूर्वी पंचेश्यिजाति वै कियशरीर वैकियांगोपांग यहारक गरी यहारकांगोपांग तेजन कार्मण समचतु रत्र वर्णचनुप्फ अस्लघु उपधात परावात उद्यास त्रम वाटर पयांत प्रत्येक प्रशस्तविहायोगति स्विर सुन सुनग नुस्वर थाव्य निर्माण तीर्थफर असंझी ॥ त्रीलप्रतिनुं वय व्यवहंद थाप. तेवार पठी स्थितिरेवम एयरल गयेयके धपूर्वकरण कालना चरमसमयनेविषे जयन्य ६४ सम्यक्त्वविचारगर्भित महावीरजिनस्तवन. तिसमयें थनतगुणवृद्धिविगुदीए प्रवईमान थनव्यसिद्धिक विशुदिनीय थनतगुण विद्युझिसहीत मतियज्ञान श्रुतबझान थने विनगज्ञान एमाहे न्यतम साकारोपयोग तेनो उपयोगी थन्यतम योगनेविपे वर्तमान तेजोलेश्यानेचिपे मध्यमपरिणामे बने पद्मलेश्यानेपिपे उलटपरिणामे व्यानेपिपे वर्ततो मिय्यादृष्टी चारेगतीमाहेलो नारकी तिर्यच मनुष्य अथवा सागरोपमकोडाकोडीमाहे जेने कर्मस्थितिनी सत्ता तेने मिथ्यात्वनी . प्रथमसम्यक्त्वउपजावता होय इत्यादिक पूर्वोक्त त्यानगेकहेतु ज्याजगे यथा करण यने थपूर्वकरण परिपूर्णहोय त्यालगे, पण इहां एटतोपिरोप जे फरणमा गुणसक्रम न केवों तोसुकेयो स्थितिघात, रसवात स्थितिबध श्रेणी एटजावानाज केवा गुणश्रेणीनी रचनापण उटय समयथी था जाणवी तेवारपनी थनिवृत्तिकरणनेविपे पण एमजकहे थनिवृत्तिकरण सग्यातानाग गयेथके थने एक सख्यातमनाग थवगेपरहेथके अतरमूदुनम तुमृकोने मिथ्यात्वनु थतरकरण थतरमूदुनमात्र प्रमाण प्रथम स्थितिथी समधिक थथयान्यून थनिनवस्थिति बंधाक्षासमान थतरमृदुतकालेंकरे ? रणसत्क वलो दतिकप्रतें उकेरीने प्रथमस्थिति थने वितीय स्थितिमा प्रदे मस्थितिने रिपे प्रवर्ततो उदीरणाप्रयोगेकरीने जे प्रथमस्थितिगत दजिक । मापिने उदयनेपिये प्रोपे ते उदीरणा अने वतीजे वित्तीयस्थितिना पा प्रदीरणाप्रयोगेज दतिकार्षिने उदयनेविपे प्रदेपेए पुदीरणापण पूर्वसूरियें वि निपत्तिनेथथ थागाजन्पुच्यते एवुकहिये उदय उदीरणाकरीने प्रथमस्थितिप्रतें थनुनवतो त्यांजगगयो ज्यालगे निकाय विशेपरदे तेरख्यक धागलव्यवछटीये तेवारपठी केवलवदीरणा बने तेपणन्याजग ज्यानगे शेप थावतिकानहोय थने यापलिकाशेपहाय वदीपणापण नियनें तेगारपती केरत उदयथावतिकामात्र अनुन थापनि प्रना चम्मममपनेपिप बजी वित्तीयस्थितिगत दनिकप्रते थनुनागनेदेकरी पम्य मिय मिथ्याचा प्रकारेकरे उतंच कर्मतरुनिचूणां चरमसमय मिदिहीमेसाजे व्यसमसम्मदिडीह ताहेवियदि निहापुनागड जहा सम्मनसम्मामिशन मिछन चेति स्थ एएए निगरपनी यनतरसमयनेपिप मिथ्यात्वनाउवयना यनायी उपा मम्पन्न पामे सम्यक्त्वविचारगर्जित मदावीरजिनस्तवन. ទប់ उक्तंच कर्मप्रकृती मिहत्तुदयेखीणे, जहए सम्मत्त मोवसमियंसो ॥ संने ज स्त लन. आयहिय मल-६ पुवंजं ॥ १ ॥ अन्यत्राप्युक्तं जात्यंधस्ययथापुंसश्चतु विनेगुनोदये।।सदर्शनं तथैवास्य. सम्यक्त्वेसतिजायते, ॥१॥ यानंटो जायतेऽन्यनं सात्विकोन्य महात्मन ॥ मध्याध्यपगमेयव्याधितस्य सौपधात् ॥ २॥ ए प्रथ म सम्यक्त्वनुं लान मिथ्यात्वना सर्वोपशमनथकी थाय उक्तंच सम्मत्तपढमलंनो, सवोवसमाति ए सम्यक्त्व पडिवजतो कोऽकतो देशविरतिसहित पडिवजे अन कोक सर्व विरति सहित पमिवजे. उक्तंच पंचसंग्रहे ॥ सम्मनेणं समगं, सवंटेसंच कोविपमिवले ॥बृहनतक वृह चूर्णावप्युक्तं उत्सम सम्मदिठी, अंतरकरणो विउ कोऽ ।। देसविरई पिलहे, कोऽ पमत्ता पमत्त नावंपि ॥ १ ॥ ससाणो पुनकिंपिलहेति तेमाटे देशविरति प्रमत्त अप्रमत्त संयतनेविपेपण मिथ्यात्व उपांतलाने हवे वेटकसम्यक्दृष्टीने विपे व्रण दर्शनमोहनीयनी उपशमना विधिकहिये ने इहां वेदक सम्यक्त्वदृष्टीजीव संयमनेविपे प्रवर्ततोथको अंतरमूहुर्तमात्रकालें दर्शनत्रिकउपशमावे ते उपगमावताने वाली करणत्रिकादिकनी विधि जेम कर्म प्र कृतिनीटीकामां कही तेमज जाणवी. एम उपगांतदर्शनमोहनीयत्रिक चारित्रमोहनीयने उपगमाववा वांठतो वली पण यथाप्रवृत्याटिक त्रणकरणेकरी उपशमावे ते करणनुस्वरूप पूर्वनीपरेंजाणवू पण केवल इहां यथाप्रवृत्तिकरण ते प्रमत्तगुणगणे जाणवू तेमज अपूर्वकरण अपूर्वगुणगणे अने अनिवृत्तिकरण अनिवृत्तिवाटरगुणगाणे तथा सूक्ष्मसंपरायगु पाताणे जाणवू शहां पण स्थितिघाताटिक पूर्वनीपरे प्रवर्ने पण एटलोविरोय जे यहां सर्व यगुनारुति अवध्यमाननो गुणसंक्रम प्रवर्ते एम कहे, अपूर्वकरणका लनो संख्यातमोजाग गयेथके निशप्रचलाना बंधनो व्यक्वेट होय तेवारपठी प्रभूत स्थितिखम सहस्त्र गयेथके अपूर्वकरण कालना संख्यातानाग गया होय एक अवशेष रह्योहोय वली इहां अंतराले देवगति देवानुपूर्वी पंचेश्यिजाति वं क्रियगरीर वैकियांगोपांग यहारक गरीर थहारकांगोपांग तेजस कार्मण समचतु रस्त्र वर्णचतुष्क अगुरुलघु उपघात पराघात उद्धास त्रस वादर पर्याप्त प्रत्येक प्रशस्तविहायोगति स्थिर गुन सुनग मुस्वर याव्य निर्माण तीयकर असंझी ए त्रीसमरुतिनुं बंध व्यवछेद थाय. तेवार पठी स्थितिरेवम पृथक्त्व गयेयके धपूर्वकरण कालना चरमसमयनेविणे VE४ सम्यक्त्वविचारगनित महावीरजिनस्तवन तिसमये थनंतगुणवृद्धिविगुलीए प्रवईमान थनव्यमिक्षिक विद्युदिनी अपे थनतगुण पिक्षिसहीत मतिथकान श्रनप्रज्ञान श्रने पिनगझान एमाहेट- न्यतम साकारोपयोग तेनो उपयोगी अन्यतम यागनेपिपे वनमान जघन्यपरि तेजोलेश्यानेवि मयमपरिणामे श्रने पद्मश्यानेविषे कटपरिणामे ३ ज्यानपि वर्मतो मिय्यादृष्टी चागतीमाना नारकी निर्यच मनुष्य अथवा सागरोपममाडाफोडीमाह जने कर्मस्थितिनी सनाने तने मिथ्यात्वनी उपश प्रथमगम्यायपजावता दोय इत्यादिक प्रगक त्यानगकदेवु ज्यानग यथान करण यने यापूर्वकरण परिपूर्णताय त्यानग पण हा पटनाविप जे करणर्मा गुणसकम न केगा तोमुफेवा स्थितियात ग्मात स्थितिवध श्रेणी पटनागनाज केया गुणश्रणीनी रचनापण नहर मम यथी श्रार जाणी तेगरपनी श्रनितिकरणनेधिपे पण एमजदे अनिवनिकरणका सम्पानानाग गयेयके भने एक सरव्यातमनाग अवशेषरहयक श्रनग्मृदनमा मृतीने मिप्यान्यनु अतरकरण श्रुतरमूदनमात्र प्रमाण प्रथम स्थिनिया के समधिक यथान्यून अनिनरस्थिति बंधावाममान अनरमूनानका श्र যাক Tী বনিন গঠন অশিনি গ্রন দ্বিীনিমা বন্ধ मस्यिनिरि पानतो दोरणाप्रपागेकगने ज प्रथमम्यनिगन किन न मार्गी उदयगिरी प्रदेपे ते गदोरणा थने तीज नियम्बिनिना पार সীমান্নান বণিমান বনবি সায় যা বৃষি गिनिनेय यागानश्त्युच्यते एकहिये अश्य दोगलापागो प्रयमस्थिनिने अनुनयना न्यो गगया यार" निकायशिरलं तेरहयोधागजयवादाय तयारपनी Tr যদ না লাল সার গ্লানিচানায় গুন গ্যাপ ন प्रदीपलापिने गरपनी करन नदयधापनिकामा नाTITT प्रना चामममयनशिप पनी जिनीययिनिगत दानापन अन माग मार मित्र मियागरा प्रणरेको कर कामनिवृणा चम्मममय मिदिन नमाम्मfor नाहे तिनिहापुनागा मजद सम्मानसम्मामिन मियम नाया निती चननाममग्नलि मियायनायना अनाया गया सम्यक्तविचारगनिन महावीरजिनम्तवन. ១.ប नंच मंतकनी मिऋतुयेखीणे. जहए सन्मन मोवनमियंती ॥ संजेज रन जप, धारदिय मजा पुवनं ॥ १ ॥ अन्यत्राप्युनं जायधन्ययबामुनयन जानेगुनाइये ।।नदर्शनं नवान्य. नपरत्वेन निजायने.॥१॥ यानंबोनायतन्य नालिलान्य महात्मन ॥ नख्याध्यपगमय ध्याचितन्य तीपथात् !' ॥ ए प्रय मनन्यस्त्वतुं जान मिथ्यात्वना नवोपनमनयती याय. उलंच नामपदमजी. सबोवतमातिए नन्न्य पहिवजनो कोकनी इंगविरनिहित पहिवयन को नवविति सहित पविजे. उनंच पंचतंत्र ॥ नन्मने नमनं नं कोविपमियते॥ वृहबतक वृन पूर्णावप्युनं उवनन नन्नविही. अंतरकरणो डिर्ड को ॥ नविन पिजह सो पमना पनन नारि॥ ॥ ननाणे पुनर्निपिनहानि तेमाडे देशाविरति प्रमनप्रमन संयननविषेपण मिथ्यात्व उपांतता. हवं वदन्तष्टीनविष त्रण निमोहनीयनी उपशमना विधिकाहि वहां वेदक नन्यस्त्वष्टीजीव तंयमविपे प्रवनताको अंतर(ननासाने दर्शनत्रिकपदामाव तं उपगमावतानं वत्ती करणत्रिकादिनी विधि जेम क्न्मप्र कनिनोटीशमां कही मज जावी. एम उपशांतदर्शनमोहनीपत्रिक चरित्रमोहनीयने उपगनाववा वांढनो वती परा यथाप्रवृत्यादिक त्रणरणेकरी उपनमा ते बरणनुरूप पूर्वनीपजाणा पण केवळ हां ययाप्रनिकरण ते प्रमनगुवाणे जाणवु नेमज अपूर्वकरण यपूर्वगुणगणे बने थनितिकरण निवृतिवादरगुणजाणे तय वक्ष्मतंपनयर पानणे जाण्व॒ ऽहां पण त्यिनियाताहिक पूर्वनीपन प्रवर्ने पण एडजोविर ऽहां नवे वशुनपनि अवध्यमाननो गुणतंकन प्रश्न एम रहेg बपूर्वनिया लनो संरख्यातमोजाग गयक निजामवताना बंधनो व्यवंद्र होर तवान्पनी प्रनूत स्विनिग्म तहन्त्र गयेय अपूर्वरण काजना तंत्र्यानानान गया होय एक अकार ह्याहोय वनी इहां धनराजे ईदगति देवानुपूर्वी पंचेश्यिजानि वै कियगरीर वैकियांगोपांग बहारक गरी प्रहाररांगोपांग तंजत कार्मर तमनु रस्त्र वर्णचनुक घगुत्लघु उपयात परायान उनात त्रन बाहर पपांत प्रत्येक प्रगन्तविहायोगति लिर शुन ननग सम्बर यान्य निमाण तीवर अतंजी ए त्रीनरुनिन बंध अबंद थार. तबार पनी स्विनिरेवन टयक्त गये धपूर्वकालना चस्मतमपनविरे ១៥ सम्यक्त्वविचारगर्मित महावीरजिनस्तवन तिसमये थनतगुणद्धिविगुडीए प्रवईमान थनव्यमिक्षिक विद्युदिनी यपेक्षा थनंतगुण रियुक्षिसहीत मतियज्ञान श्रुतग्रज्ञान श्रने पिनगवान एमाहेलो य न्यतम साकारोपयोग तेनो उपयोगी थन्यतम योगनेरिपे वनमान जयन्यपरिणामे तेजोलेश्यानेविपे मध्यमपरिणाम अने पद्मलेडयानेरिपे उत्कृष्टपरिणामे गुरचे ज्यानेपि वर्मतो मिथ्यादृष्टी चारेगतीमाहेलो नारकी तिथंच मनुष्य अथवा देवता सागरोपमकोडाफोडीमाहे जेने कर्मस्थितिनी सत्ता तेने मिथ्यात्वनी उपशमना प्रथमसम्यक्त्वउपजावता होय इत्याटिक प्रवाक त्यालगेकहेतु ज्याजगे यथाप्रनि करण थने थपूर्वकरण परिपूर्णहोय त्याजगे पण हा एटलोपियोप जे यपूर्व करणमा गुरासक्रम न केवो तोसुकेवो स्थितिवात, सिपात स्थितिवध गुण श्रेणी एटनाबानाल केवा गुणश्रेणीनी रचनापण उदय समयथी धारनीने जाणवी तेवारपनी थनिवृत्तिकरणनेविपे पण एमजकहेवु थनिवृत्तिकरणकालना सख्यातानाग गयेयके थने एक सख्यातमनाग थशेषरदेयके अनरमूदुनमात्र हे तुमृकोने मिथ्यात्वनु थतरकरण थतरमृदुत्तमात्र प्रमाण प्रथम स्थितिथी काइक समधिक थपरान्यून थनिनवस्थिति बंधाशासमान थतरमृदुतकालेंकरे यतरक रणसक वली दनिकप्रतं उकेरीने प्रथमस्थिति थने वित्तीय स्थितिमा प्रदेपे प्रय मस्थितिनेपिपे प्रवर्ततो उदोरणाप्रयोगेकरीने जे प्रथमस्थितिगत दकिने तेने स मापिने उदयनेविये प्रक्षेपे ते दीरणा थने वलीजे हितोयस्थितिना पासायी उदोरणाप्रयोगज दतिकापिने वटयनेविपे प्रक्षेपेए उदीग्णापण पूर्वसरिये विशेषत्र तिपत्तिनेथथै थागालश्त्युच्यते एचुकहिये उदय उदीरणायेंकगेने प्रथमस्थिनित अनुनयतो त्यांनगगयो ज्यालगे धार लिफायधिशेपरदे तेरसेयके वागलयबटीये सेवारपती करतदीरणान वनं तेपणन्याजग ज्यालग शेप थावतिमानहोय थने भावनिकारापहाय नगरें दीरणापण निपर्ने तापठी केरल उटयथावतिकामात्र अनुनये यावनिकामा जना चरमममयनेचिपे वजी वित्तीयस्थितिगत दनिकमते यनुनागनेटकरीन में म्यार मिश्र मियान्या प्रणामकारेकरे उक्तर कर्मप्रतिपूणो । घरमसमय मिटदियोमेकाने नासमसम्मदिहीहाही ताहेविश्यति तिहाणुनागारे जहा सम्मतमम्मामिन मिशन चति स्थापना एएए तिराम्पो यनतरसमपरिप मिष्यात्यनाउदयना थनावया उपशामिक सम्परन्द पामे - सम्यक्त्वविचारगर्भित महावीरजिनस्तवन. ទប उक्तंच कर्मप्रकृती मिठत्तुदयेखीणे, जहए सम्मन मोवसमियंतो ।। लंनेण ज स्ल सन. श्रापदिय मज६ पुजं ॥ १ ॥ अन्यत्राप्युक्तं नात्यंधन्यवयापुनश्च जानेगुनोदये ॥ तदर्शनं तयवान्य. सम्यक्त्वेनतिजायते, ॥१॥ थानंदो जायतेऽयंनं नात्विकोन्य महात्मनः ॥ नख्याध्यपगमेय ६व्याधित्तस्य सीपधात् ॥ ॥ ए प्रथ म तम्यक्त्वनुं लान मिथ्यात्वना सर्वोपशमनयकी थाय. उक्तंच सम्मत्तपढमनो, नबोवसमाऽनि ए सम्यक्त्व पडिवजतो कोऽकतो देशविरतिसहित पडिवजे अने कोक सर्वविति सहित पमिबजे. उक्तंच पंचसंग्रह ॥ मम्मनेणं समगं, सबंदेतंच कोविपविजे॥ बृहनतक वृद्ध चूर्णावप्युनं उबसम सन्मदिही, अंतरकरणो विउ को ॥ देसविर पिसह, कोड पमत्ता पमत्त नापि ॥ १ ॥ ससाणे पुणनकिपिनहेति तेमाटे देशविरति प्रमत्त अप्रमत्त संयतनविपेपण मिथ्यात्व उपांतलाने. हवे वेटकसम्यक्दृष्टीनविपे त्रण दर्शनमोहनीयनी उपशमना विधिकहिये वे इहां वेदक सम्यक्त्वदृष्टीजीव संयमनेविपे प्रवर्ततोयको अंतरमूर्त्तमात्रकालें दशनत्रिकनपशमावे तं उपगमावताने वली करणत्रिकादिकनी विधि जेम कर्म प्र रुतिनीटीकामां कहीने तेमज जाणवी एम उपशांतदर्शनमोहनीयत्रिक चारित्रमोहनीयने उपगमाववा वांठतो वती पण यथाप्रत्याटिक त्रणकरणेकरी उपगमावे ते करणनुस्वरूप पूर्वनीपरेंजाणवू पण केवल हां यथाप्रवृत्तिकरण ते प्रमत्तगुणवाणे जाण्यं तेमन अपूर्वकरण अपूर्वगुणवाणे अने यनितिकरण अनिवृत्तिवादरगुणवाणे तथा सूक्ष्मसंपरायए पाणे जाणवू ऽहां पण स्थितिघातादिक पूर्वनीपरे प्रवर्ते पण एटलोविशेप जे ऽहा सर्व यशुनप्रकति अवव्यमाननो गुणसंक्रम प्रवर्त्त एम कहे अपूर्वकरणका लनो संरख्यातमोनाग गयेयक निशप्रचताना वंचनो व्यववेद होय तेवारपठी प्रनूत स्थितिग्वंम सहस्त्र गयेथक अपूर्वकरण कालना संख्यातानाग गया होय एक अवशेष रह्योहोय वली इहां यंतराले देवगति देवानुपूर्वी पंचेंक्ष्यिजाति वै क्रियगरीर वैकियांगोपांग यहारक शरीर अहारकांगोपांग तेजस कार्मण समत्रनु रस्त्र वर्णचतुष्क अयस्तघु उपयात परावात उच्चास व्रत बादर पर्याप्त प्रत्येक प्रगस्तविहायोगति स्थिर गुन सुनग मुस्वर श्रादेय निर्माण तीयेफर असंझी ए त्रीसप्रतिनुं बंध व्यववेट थाय तेवार पठी स्थितिरेवम पृथक्ल गयेयके थपूर्वकरण कानना चरमसमयनेविपे दास्य रति नय जुगुप्सानो बंधष्यवच्छेद थाप हास्य रति थरति शोक जय जुगुप्ता नो उदय होय सर्वकर्मना देशोपशमना निधत निकाचनाकरणनो व्यववेदहाय त्याथी अनतर समयनेपिपे थनिवृत्तिकरणमा प्रवेश करे त्यापण स्थितिधाता दिक पूर्वनीपरेकरे तेवारपठी अनियनिकरणकालना सख्यातानाग गयेयके दर्शन सप्तकाविना शेष मोहनीयनी एकवीमप्रतिनु यतरकरश को त्या चार सज्वलन माहेलो थन्पतमवेद्यमान सज्वलननो थने त्रण वेदमाहेलो अन्यतमवेद्यमान वेदनी पहेली स्थिति स्वोदय कालप्रमाण ए वे काडता झोप एकादश कपाप थने थात नोकपायनी यावनिकामात्र पोताना उदयकान प्रमाण वली चारन वलना थने त्रण वेदने तेमा स्त्रीवेद नपुसकवेदनो उदयकाल सर्वम्तोक स्वस्थाने वाली मा होमाहेतुस तेथी पुरुषवेदनो सग्व्येयगुण तेथी सज्वलनना क्रोधनो विशेषाधिक तेथी संज्यसनना माननो विशेषाधिक तेथी सज्वलननी मायानो विशेपाधिक तेथी सालानना लोननु विशेषाधिक एम हा अनिवृत्तिकरणनेविपे घषु कहे ये ते प्रथगौरवना नयी नयी कहेता कयल विशेपाथै कर्मप्रतिनी टीकाजोवी वती थानरकरण करीने तेचारपठी नपुसक वेदने थतरमुहूर्तमात्रमा उपशमा वे तेवारपनी अतरमुहूर्नमात्रे स्त्रीवेदने उपशमाये तेवारपठी थतरमुहूर्तमात्रे दा स्यादिपटक उपशमा ते समयनेविपे पुरुपवेदनो बध उदय उदीरणानो व्यवछेद थाय तेवारपती समयकण थावलिकायें पुरुपवेदने उपशमावे तेवारपनी सम का थतरमुदुनमात्रे थप्रत्याख्याना वरण प्रत्याख्यानावरण एवे क्रोधने उपशमावे तेवारपनी तउपशावली ते समयेज सवलनना शोधना उदय उदारणानो व्य वठेद होय पी समयकश थावनिकाधिक सज्वलननामोधने उपशमावे तेवार पठी थतरमुटुनमात्रे थप्रत्याख्यानावरण प्रत्याख्यानावरणनु मान समकाले उप शमा ते उपशमेथक वलीते समयज सम्वलनना मानना बध उदय उदीरणा नो व्यवछेदहोय तेवारपोग्लो समयकण थावनिकादिक सज्जनामानने । परामाये तेयारपठी समकानें थतरमूनिमात्रे थप्रत्याख्यानावरण प्रत्यारण्यानायर ए ए वे मायाने उपशमा तपशातिवली ते समवेज सज्वलननी मायाना वध उदय उदीरणानो व्याछेदहोय तेयारपठीवजी समयकण थावनिका के सापजननीमायाने उपशमा तेवारपदी समकाले प्रत्याग्न्यानावरण प्रत्यारयाना वरण एवे लोनने उपशमारे ते समज सज्वलनना लोनना बंध उदय उदोरणानो व्यवधेद थाय तेवारपती सग्यसना लोनने उपशमावता सम्यक्त्वविचारगर्जित महावीरजिनस्तवन. ទ។ तेना त्रण नाग करे तेमांथी वे जागने समकाले उपगमावे त्रीजा नागना संख्या ताखंम करे तेपण जूदे जूढे कालने उपशमावे वली संख्याता खमना किट्टीएयूँ अपरनाम से तेना चरमखमना असंख्याता खंझकरी सूक्ष्म किट्टी एवं अपरनामकरे तेवारपती समय समयनेविपे एकेको खमकरे ते उपशमावे शहांवली दर्शनस तक उपशमेथके निवृत्तिवादर एबुनामकहिये त्यांची ऊंचु अनिवृत्तिवाटरकहिये ते ज्यांलगें लोननो असंख्येय अंतिम चरमरखमयावे त्यांलगे कहिये. एअावीसन्नेदें जिनमोहनीयनी उपशमनाकही. हवे गाथानोअर्थ विवरियेठे शहां वनेश्रेणीना स्वरूपमा प्रथम उपशमश्रेणीन स्वरूपकहे उपशमश्रेणीनुं प्रारंनक अप्रमत्तसंयमीज होय धने वीजातो एमकहे ठेके अविरति देशविरति प्रमत्त अप्रमत्त ए माहेलो गमेतेहोय थने श्रेणीपरिस माप्त पण श्रेणीथी पडे तेवारे वली पाठो थविरति देशविरति प्रमत्त थप्रमन ए माहेलो अन्यतम गमेते होय. ते पहेलो समकाले धनंतानुवंधिया क्रोध मान माया लोनने उपशमावे तेवारपठी मिथ्यात्व तथा सम्यमिथ्यात्व श्रने संम्यक दर्शन एत्रण समकाले उपगमावे तेवारपठी अनुदीर्णे पण नपुंसकवेद उपशमावे तेमां जो पुरुप प्रारंनक होय तो प्रथम नपुंसकवेद पठी स्त्रीवेद पठी हास्यपट्क उपगमावीने पठी पुरुप वेट उपशमावे. घने जो स्त्री प्रारंनिका होय तो प्रथम नपुंसकवेट पठी पुरुपवेद पठी हास्यादि पटक पती स्त्रीवेट उपगमावे थने जो नपुंसक प्रारनक होय प्रथम एथनुदीरों पण स्त्रीवेद उपशमावे पठी पुरुपवेट पठी दास्यादि पटक तेवारपठी नपुसकवेद उपा मावे पठी वे कोध एकांतरीत संज्वलन विप क्रोधांतरित सहमतुज्य उपशमाये. एटले एनो ए अर्थठे जे अप्रत्याख्यानावरण प्रत्यारल्यानावरण ए वे क्रोध क्रोध पणे सरखा समकालें उपशमावे तेवारपठी एकलो संचलननोक्रोध उपगमाये प ठी प्रत्यारव्यानावरण प्रत्यारन्यानावरण एवेमान दामकालें उपदामावे पठीसंज्याज ननुमान उपगमावे पठी थप्रत्याख्यानावरण प्रत्याख्यानावरण ए वे मायाने सम काले उपदामाव पठी संज्वलनीमाया उपटामाव पठी थप्रत्याख्यानावरण प्रत्या ज्यानावरण ए वे लोन समकाले उपगमावे तेवारपठी संन्यसन सोन ठपश मावे इहां उपनामश्रेणीनी स्थापनाकरवी. इहां चर्चकपूवेने के क्होजी नंबजनादिकने टपदामपटेने पण यनंतानुवं धियाने तो सम्यक्त्व प्राति त्यांज उपशमाच्याने तो ऽदांधनानुधियानुं ठ , ៩០ सम्यक्त्वविचारगनित महावीरजिनस्तवन पशम केम घटमानथाय हो गुरु उत्तरको दर्शनपविजता त्यांयनंतानुबधिया नो क्षयोपशमहतो अने हातो उपशम तेमाटे विरोधनधी वली शिष्यबोयो र योपशम अने उपशममा शोविोपत्रे गुरुकहे ज्या योपशमले त्यातो उदीरणानु क्ष्य अने अनुदीरणानु विपाकानुनवनी अपेकाये उपगमले थने क्ली प्रदेशानुन वयीतो उदयटेज बने उपशमनेविपेतो प्रदेशानुनवपणनथी यदाहपीयूषपायोपि वेएसंतकम्म, खवसमिए उनाणुनावसो ॥ उपसत कसा पुण, येएइ नप्तत कम्मपि ॥ १ ॥ अन्यत्राप्युक्त उपसत कम्मज, नत को नदे उदएवी ।। नय गमई परमग्गइ, नवउँकडएततु ॥ १ ॥ एगाथानो लेशमात्रथर्थ कहे साप शमेजे उपसम्य ते मोहनीयकवे बीजाकर्मने सर्वोपशमनथी सबोक्समो मोहस्त चेति वचनात् तेनु थपकर्पण पण नथाय एटले मोहनीयकर्म अपवर्तनाकरणेफरीने स्थितिरसेकरी हीनपण को करीश केनही थपिशदने निनक्रमपणामाटे उदयपण ते दिये एटले ते वेटेपणनही उ पसणथी उदयने अविनानाची नदीरणाने विषेपण नदीये एपणजाणवु वली वध्यमान सजातीय परप्रातिप्रते मक्रमणकरणेकराने नगमे सक्रमावे प नही वली तेकमउपशमाव्युथक उन्कर्पपणनही एटले उतनाफरणेकरीने स्थि तिरसेकरी यधारेपणनही नियत्ति निकाचन तो पूर्व श्रपूर्वकरणकाज निवृत्तिवे तेमाटे शहा उपशातपणे तेनु निषेध नकरीये हा शिष्यपूवे कहोजी सयतने था नतानुवधियानु उदय निपेथ्यो तो नेनु उपशम केवारीते घटमानथाय? तेवारे गु रुकहे। के तेतो निश्च अनुनागर्म अंगीकारकरीने तेनु उदयनिषेध्योवे पण प्रदश कर्मथानीने धनतानुबधियानु उदय निषेध्योनथी तथा चान्यधायि परमगुरुणा जीवे रानते सयका कम्म ए गोयमा इत्यादिक पाचपूर्व एज तवनमा कहीगया ये तेमाटे हा प्रदेशकर्मानुनयना उदयनो उपशमजायो तेवारे वली शिष्यवो यो जो एमसयतने थनतानुव पियानो उदयहोय तो तेथी दर्शननो विघातकेमन थाय गुरुकहेने प्रदेशकर्मनु मद थनुनयने तेथी दर्शननो विघातनथाप तेम कार कने यनुनागकर्मानुनरेपण थत्यत पात करे जैम सपूर्ण मत्यादि चतुझानी ने मत्यादि ज्ञानावरणोदय विधातनयी करता तेम जाणयो तेवारपनी मना न चरम किहिनी उपशम थपेयके सज्वलननो लोन उपशांतथाय यक श्रद स नपुनि गोरेय शुकर पुरिस वेयच ॥ दोदोएग तरिए, सरिम सरिस उपनमः ॥ १ ॥ ते समपेज ज्ञानावरण पचक दर्शनावरण चतुफ श्रतराय पचा या

सम्यक्त्वविचारगर्मित महावीरजिनस्तवन.
E
-
-- dima
+
कीर्ति बन्नगीत्र एटली प्रकृतीनोबंध व्यववेदयाय तेषी अनंनर न्नर
उपशांत कपाय गुण होय ते जघन्यथी एकसमयमात्र अने उत्कर्षयी
सगे. तेयी मर्ध्व नियमा ए उपशामक अवश्यपडे, तेपड वेतन
दये वीजें कालनेदये त्यांनवल्य मरतानेहोय थने कालक्ष्य का
पूर्णथये होय जे कालक्ष्य पडेतेतो जेम चढचो तेमजपडे जांजर
रणा व्यवठिन्नने त्यांत्यांपडतोयको तेपाता श्रारंनी एटनानगर--
लगेपडे ज्यांलगे प्रमत्ततंयतगुणाणोठे त्यांलगेपडे. वली कोड:-
ला वे गुणवारोजाय अने कोऽक सास्वादन नावपणपामे.
वली जे नवक्ष्येपडे ते प्रथमसमयेज सर्व बंधनादिक ऋ----
मकहेते बंधन संक्रमण उर्तनाथपवर्तना उदारणा उपशमन:-
हवे ए बंधनादिक श्रावेना यर्थ कहेठे कर्मपुजन
मिलोह मिनीपरे अन्योन्य मल ते बंधन कादयं बनी
प्रदेशने अन्यकर्मरूपपणे रहावे तेने यन्यकर्मरूपे अब
कहिये तथा जे स्थिति थने यनुनागर्नु वधार ने उन
तथा अनुनागर्नु घटाडवु ते अपवर्तना कदि नया
ने उन्यावतिकानेविपे प्रवेश न करवू ते उदीगा की
रपा निधत्ति निकाचना करणने अयोग्यपणे म
amar
PMg

, सम्परत्वनो चरमस्थितिषम उत्कीर्णयके ए पकरुतकरण एवु कहिये एस्तक) 390 सम्यक्त्वविचारगर्मित महावीरजिनस्तवन. स्वरुप वेव याप्रति बनाति जीवस्तदनुनावेन प्रकृत्यंतरस्यं दनिकं वीर्य विशेष ण यत्परिणमयति ससक्रम तत्रप्रतिसक्रम सामान्यलक्षणावगम्य मूलप्रस्ती ना मुत्तरप्रकृतीना वास्थितेर्यकर्षणमपकर्पण या प्ररुत्पतरस्थितीवा नयन सस्थितिसंझम थनुनागसम्मोप्येव मेव यकर्मव्यमन्य प्रति सनावेन परिणामेन परिणम्यते सप्रदेशसंक्रम कर्मणि कर्मातरानुप्रवेश सक्रम करणात उक्तंच मूलप्ररुत्यनिन्ना सकमयति गुणतउतग प्रस्ती ॥ नचात्मा मूतवादध्यव सायप्रयोगेण १ तथा मतांतर ॥ मोनूण याचखलु, देसणमोहचरीत्तमोदच ॥ सेसाण पयडीण, उत्तरविहिसंकमोनगि ॥२॥ नुल्लष्टथी एक नवनेविपे वार उपशमश्रेणी पडियजे तेने नियमा ते जवने विपे पकश्रेणी न होय थने जे एफवार उपशमश्रेणी पडिवजे तेने पकश्रेणी पण होय उक्तंच सप्ततिकाचूर्णी जोदोवारे उत्सम, सेढिपडिवतसानियमातमि नवेखवग,स्से ढीनधिजोकस्सिासम सेपिडितलखवगसेटिदुति। ए कर्मग्रथीनो अनिप्राय कयो अने सिद्धांतानिप्रायतो एकनवमा एकजश्रेणी पडियजे उक्तंच कदपाध्ययने।। एव थप्पडिवडिए, सम्मले देव मणुय जम्मसुरा" यन्नयर सेटिवक, एगनवेशच साsaME सा सर्व सम्यस्त्वि देश विरत्यादिक थन्यत्राप्युक्त मोहोपशम एकस्मिन् नवेदि स्यादसतत ॥ यस्मि न जवेतूपशम कृयोमोहस्य तत्रनइति नपशमश्रेणि हवे दपकश्रेणीनु स्वरूपकहे हा पकश्रेणीनु पडिवजणहार मनुष्य थान वर्षी उपरनो थपिरत देशविरत प्रमत्त अमन ए माहेलो कोई अन्यतम श्रय त विशुक्ष्परिणामि नम सघयणवालो पूर्वनोजाण थामन युक्तध्यानोपगते पण पडिवजे थने वीजातो धर्मध्यानोपगतेन पडिबजे एमकहे पडिवजवानु थनुक म कहेते अविरति देशविरति प्रमत्तसयत थप्रमत्तसयत ए माहेलोको अन्यतम प्रथम थत्तरमृदुर्ने थनतानुवधियानी चोकडी समकाले खपावे तेनो थनतमना ग मिथ्यात्वमसिपीने वारपती मया समाज समकाले खपावे जेम यतिसनृत दावानज निमें थदग्धे पणातरपामिने बेचनेवाले तेरीते एक्ष्पक, पण तारनपरिणाम पणाथी सावशेष अन्यत्र प्रहपीने स्वपावे एमज वली म्यक्त्व मिथ्यात्व, पण ग्यपाये तेवारपती एजधनुक्रमे सम्यक्त्वनेपण खपावे यजी रणाक्षाननेविष वर्नतो कोश कालपण करीने घारगतिमाहे अन्यतमगतियें उपजे सम्यक्त्वविचारगनित महावीरजिनस्तवन. ७१ वली लेश्यानेविपे पण पूर्व शुक्ललेश्यानेविपे हतो बने हमणा अन्यतम से श्यानेविपेजाय तेमाटे प्रस्थापक मनुष्य धने निष्टापक चारेगतिनेविपेहोय. उक्तंच पध्वयगोय मास्सो, निध्वगो चन्सुविसु, हांजो वायु रूपक श्रेणीप्रतें था रंने तो थनंतानुवंधियाना क्यथी अनंतरमरण संभवतो व्युपरमें विरमे तेवारप वो कदाचित् मिथ्यात्वनाउटयथी वली थनंसानुवंधियाने उपविणे पाठा यारंने केमकेअनंतानुबंधिनुं वीजजे मिथ्यात्व ते हजी विनाश पाम्युं नथी माटे. अने जेणे मिथ्यादर्शन दयकमुठे ते उपविणेनही अनंतानुबंधिया फरीपाठा प्रारंनेनही एट ले अनंतानु वंधियानु वधकरेनही केमके मिथ्यात्वरूप वीज नथी तेमाटे वली क्षीसप्तक तो थप्रतिपतित परिणाम माटे अवश्यदेवतामा नप जे बने प्रतिपतित परिणामतो वली नानापरिणाम संनवे तेमाटे जेवो परिणाम होय तेवी चारेगतिमाहेली अन्यतमगति उपजे. उक्तंच व-चाक पडिवन्नो, पढम क सायरकए जश्मरिजा । तोमिहत्तोदय, विणिज नूउन खीमि॥१॥ तमिमकजा दिवं, तप्परिणामोय सत्तए खाणे। उवरय परिणामोपुण, पहानाणा मरंगा॥ वायुपण जो तिवारेकालनकरे तोपण सप्तकदीण थयो यको नियमारहे पणव ली चारित्रमोहनीय खपाववाने यत्न नकरे. उक्तंच वक्षाक पडिवन्नो, नियमा खीएं मि सत्तएताइनि. इहां कोऽपूजे मिय्यादर्शनाटिकनो यथयो तेवारे ए पकने सम्यक्त्व रहीत कहिये किवा सम्यक्त्वसहीत कहीये त्यारेगुरुबोल्या सम्यक्दृष्टीज कहिये फरी परवोल्यो जे कहोजी सम्यक्दर्शननो परिक्ष्यथयो तो सम्यकदृष्टीपणुं क्याथीहोय फरी गुरुकहेठे मयणालाटाली चोखाकस्या एवाजे कोश्वा ते समान अपनीत मिथ्यात्वनाव एवा मिय्यात्वना पुजल तेहिज सम्यक्दर्शन कहिये तेने प रिदयेवली तत्वज्ञान सदण परिणाम पमयोनथी तेमाटे साहमु श्वदणानप टल टलवाथ चकुदर्शननोपरे विशुद्धितरहोय. यदाह नाप्यमुखांनोधिः ॥ खीणमिदंसणतिए, किहो त निदसणाए ॥ नन सम्मदिठी, सम्मत्तखए क सम्मं ॥ १ ॥ तिविलीय मयण कुदव, रुवमिहत्तमेव सम्मतं ।। खीण तजोनावो, सदहणा लरकपोतस्स ॥ ॥ यदिवा ॥ जद सुझ जलाणुगयं, उ सुकं जलरकएसुतरं । सम्मत्त मुझ पुग्गल, परिरकए इंसणं ए वं ॥ ३ तम्मिय तश्य चउठे, नवंमि सिति खश्य तम्मने ॥ सुरनर जुगली सु गई, इमंतु जिण कालिय नराणं ॥ ४ ॥ ए प्रकारे वीणसप्तकीनेवि सम्यक्त पामि जोवली यवायु पकश्रेणीने २ सम्यक्त्तविचारगर्जित मदावा याग्ने तोमतकदीणथये नियमा थनुपरत परिणामज चारित्रमोहनीय खपामवाने पनपते थारने उक्तच नाप्यरुता । इयरोथषुवरचिय, सयलिसमाणेति तिहाजे सम्नश्रेणीप्रतेकरे तेवा पकने निजनिज नवनेविषे सुरायु नरकापु तिव्यंगापु ए त्राण थाउपान्यवनेयाजहोय उक्तच ॥ सुरनरय तिरिय थाउ, नियय नवे सबजी वाणमिति एहिज कहे देशायु नारकायु तिर्यगायु लणजे थायुत्रय ते रूपक साप सम्यदर्शन थाशेप एहवोज थप्रत्याख्यानावरण थने प्रत्याख्यानावर याप याप्रति ते समकालें खपावयाने थर्थे थारने ए प्राति थक्षस पायज तगले नामकर्मनी तेरप्रति थने व्रण दर्शनावरणनी मनी सोलन नि सपा तेना नाम कहेते एड़ियजाति, वेश्यजाति, तेंश्यिजाति, चारिधि पनानि न्यानकित्रित ते निशानिशा, प्रचनाप्रचला, स्थिणडीए, स्त्यानर्विरूप, यातनाम पियरतिक. नरकदिक, थायरनाम, सूक्षनाम, साधारण नाम, था तर नाम, तेगरपनी यात कपायनु जेटलु थवशेष रघु होय ते खपावे ए सर्व यसरमनमाने गपारे ।गनादेश जाणयो उनी यी एमाले प्रथम सोमातिज खपाययानेथर्थ थारने केवन बानगल यातापापन रापार पठी सा.प्रतिसपा पठी नपुसकवेद पठी स्त्री पंजीलयापिदर पनी पुरोदना प्रणसमको तेमायेग्यम समकालेग्यपाये थन मोनोपानी गाना कोरमटियादेपे एकम पुस्पप्रतिपनि होयतेवाग्जाणा यो निराहोय तो प्रथम नपुसकोदकरपा पनी पुरुपवेद पनी विदा पनी पीदमारे चने जे गरे नपुमा प्रारनकहोय तेगा।" उनी यम बोगदगपारे पनी गुम्पद पनी दाम्यादिपटक पनी नए देर र नगपती मानना बाप मान माया नान पण प्रत्या मगर का गनगन गारे प्राणी पग्मिमाति पण यतरमदन उनमनंना यमायातानेदन न्यो लानना घग्मग्यमना मायातायन नपर कानदारीनेने मारेपनी तेना चरमपम तेना अगायाना मनयनप पराममयपारे हाईसंन मना निगनिवारा दिये न्यायी नमा यनित मनामनामनेर या गाणपायांची नग) यमा म राममगर कहिय ने यग नग्मनानना या का न्योता पयामान यात्रिया यि तानी म

No text on this page.

४ सम्यक्सविचारगनित महावीरजिनस्तवन भ्यस्त्वपाम्याना नव सहीत चारनव करे थने जेणे कोपण गतिनु हजी थाउ पुंबांप्यु न होय थने झायक सम्यक्त्वपामे तो ते जीव तेजनवे पकोणी पूरी करी ने सिम थाय उक्तच पचसयहादी तश्य चने तम्मिय, नवमि सिशति द सणे खीणे ॥ जदेव नर असरखा, चरम देहेस ते दुति ॥ १॥ एत्रीजी अने चोथी गाथानो अर्थ वे एक जीवनी थपेक्षाये थथवा नानाजीवनीथपेक्षायें सम्यक्त्वोपयोग जपन्यथी श्रने उत्कृष्टथी अतरमुहूर्तज होय थने छायोपशमरूप सम्यक्त्व सब्धितो एक जीवने जघन्य अतरमुहूर्त थने उत्कृष्टी वाशन सागरोपम मनुष्यनवे थधिक होप ते उपरांत सम्यक्त्वथा पमेनही तो नियमासीजे ए एकजीव थाश्रीने का थने नानाजीवथाश्रीतो कायोपशम सम्यक्त्व सदासर्वदा होय पक्त दोवारे विजया इस, गयस्सतिन्नचुए थहव ता॥ अरेग नरनविय, नाणा जीवाण सवमा ॥ ॥ ५ ॥ ६ ॥ ४ ॥ ७॥ ए ॥ एटती गाथानो अर्थ ने हवे सम्यक्त्वनु अतरते सम्यक्त्वथीपमीने पातु फरी सम्यक्त्वपामे तो केटले कालें पामे इत्यादिक स्वरूप कहेते ते अतर जघन्यथी तो यतर मुहूर्त एटले कोकजीव सम्यक्त्व गयापची वली पानु तदावरणना क्ष्योपशमथी अतरमुहूर्त मात्रेज सम्यक्त्व पामे थने उत्कृष्टथी थाशातना प्रचुरने थईपुजनपरावर्त्तनु थतर पडे उक्तच तिच्यर पवयणसुथ, थायरियं गणहर महट्टीय ॥ यातायतो बढ्सो, थणत ससारिहो॥१॥ हा काइकन्यून थईपुजल परावर्तरुपयनतससारजाणयो हवे ते पुस्लपरावर्त केतलेकालेहोय तेनु स्वरूप कहेते धनति थवसप्पिणी उत्सर्पिणीए एक पुजलपरावर्तहोय तेवा पुजल परावर्न थनता अतीतथया थ ने धनता धनागतयसे हवे ए पुजलपरावर्त इव्य क्षेत्र काल नाव दे चारप्रकारे थाय तेवली एकेको सूक्ष्म थने बादर एवं प्रकारे करता याप्रकार थायते कहे तेमा प्रथम व्यथी सूक्ष्म अने वादर एवे नेदकहे बौदारिकपणे वैक्रियपणे तेजसपणे नापापणे सासोश्वासपणे मनपणे कामणपणे ए सातपणे सर्वचतुर्द सर गत परमाणुनप्रते थात्मा फरसे तेवारे व्यथी बादर पुज्लपरावर्न थाय यमुक्त स्तोत्रादौ चौदारिक चक्रिय ते, जसनापामाणचितकर्मतया ॥ सर्वाणुपरि णतेम्में, स्यूलोनूत् पुजज्ञापन ॥ १ ॥ थन्यत्रायुक्त नापोच्यासमनस्तेज , म्मौदारिकवैफिया ॥ स्टष्ट्वायत्पुजला मुक्ता, इव्यत संप वादर ॥ १ ॥ ए थीदारिकादिक सात माहेथी एकेक यौदारिक शरीरादिकपणे प्रत्येके सर्वचतु , क सम्यन्यविचारगनिन महावी जिनसवन, 530 दनान परमातुने जीपकालीन अनुक्रमेमृक तयार ऽचवी मृत पृनत पगमार गजोम्माता परमाणु पुगतने नीटारिकाम्पो परिणमाये पदीजी नमज नपग्मायुनत क्रियगरपणे परिणमात्रे एमज जन पारीरपणे नापापणे मानोवानपण मनपर्ण कामणगरीरपा प्रत्येक घ नुक्रमे धामापरिणमाये तयार हाथी सम्मपन्न पगवर्नयाय श्रने केटलाएक याचार्यन मनानानमाता बीदानिक वकिय तंजन न काम्मण ए चारभरीर मारे गयेने एकगरीरपणे नर्वत परमाणुधा प्रतं यान्मा अनुक्रमे फरसीने मृरे पणटो युक्रमे फग्न्यात यामां गायनही जयनुक्रमे फरन्यातेज परमा गुधा वामांगणाय तेबारे व्यत्री सुचनपगन्याय यन नत्मतर्फकनत्र, ममग्न परमाणु परिणतयंग्य: मंना मंसरतः मध्योमेजिनतदावनः॥१॥ मतांनोनु मध्यान्यन कायेन म्टष्टानपि पुजा पेनुशमेरा मुंजास्तगयंते व्युत्क्रमेणतु ॥१॥ दय दत्रयी मध्य धनं वाटर ए ये प्रकाग्नो पुजत पगवर्न कहे। जेटता तो काकागाना प्रदेश ने तेटला सर्व यामागप्रदेशों जीवमग्णपामे एटजान मरणेक शेने जीव क्रमोत्कमे जेमतमफरीने फरने एदले जेटलालोराफागनामदेवाने तेटसा नर्वधाकायप्रदेश जम तम मरणेसरी फग्ने बारे त्रियी स्वृत पुगत परावर्तयाय घने जवारें एफ घासागप्रदेगनेवि जीवमगेने तदनंतर वीजा धाकायप्रदेश नविपे मरे तवारे ते मरणाश्रित थाकागप्रदेवा लेग्यामांगणाय पण तृतीपादिक धाकानडगमरे ते याकामप्रदा सामांगणायनही जोइना पासेना थाराग प्रदेशमरे तेहिज थाकामप्रदेश रखामांगणाय एम अनुक्रमें सर्वलोकाकाशना प्र देवा मरणेकरीने फरसे तेटलेकाले त्रिथी सूक्ष्म पुगत परावर्त्तयाय यन्त लोका काशप्रदेशाये नियमाणेन जंतुना ॥ क्रमोत्क्रमेण संस्टष्टाः, तस्यूतः देवतोनवेत्।। ॥२॥ मृत्वादेत्रेचदेकत्र, धियततटनंतर क्रमेणजीव सर्वत्र, देवेसक्ष्यः सउच्यते । हवे कालथी सूक्ष्म थने वादर पुजतपरावन कहे। जेटला उत्तप्पिणीनेविपे नमयहोय तेटला नमय क्रमे अने उत्कमे अनुक्रमे थने धननुक्रमे जीव मररोक रोने व्याप फरस तेवारे कालथी स्यूल पुगत परावर्त थाय, थने ते उस्लपिपीने पहेले समयमरीने वजी वीजी उत्साप्पणीनावीने सम ये मरे तेवारे ते ममयसेवामांगणाय पण वीजी उत्साप्पणीने त्रीजे अथवा प हेजेसम मरे ते लेखामां गणाय नही वनीत्रीजी उत्सापिणीने त्रीसमरे तो तेसमये सामां गणाय पण पतेने वीजे चोये प्रमुख समयमामरे ति महीने माट पनीते कायस्थितिथीपण सयमस्यानक थने यनुनागवधम्यान टले जेटता मयमम्यानक तेटनान यनुनागवध म्यानको थने कायस्थितिनी ១១ सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन नावे एरीते जेटला एक उत्सपिणीना समयहोय तेटलासर्व समय थनुक्रमे करीने फरसे तेवारे तेटले कालें कालथी सूक्ष्मपुजन परावर्तयाय यमुक्त याव त्सपिण्यांस्यु , समयास्तान स्वमृत्युना ॥ क्रमोटकमेणव्याप्नोति, सस्थूज कान नवेत् ।। १ ॥ प्रथमे समये मृत्योत्सप्पियस्तिदनतर ॥ म्रियते यदि सर्वत्र, र सूक्ष्म सकालत ॥ २ ॥ हवे नारथी सूक्ष्म थने वादर पुगनपरावर्त कहेठे शहां जगतमा एक समय विपे जे पृथवीकायादिकनाजीव सूक्षा थग्नीकायमा कपजेठे ते जीव केटलाका जेठे थसरव्येय लोकाकाशप्रदेश रासीप्रमाण पजेवे एटले थलोकमाहे चकदरा जलोकना जेवा यसरख्याता लोक कल्पीये ते यसख्याता चऊदराजलोकना जेट ला थाकाशप्रदेशयाय तेटलाजीव एफसमयनेविपे पृथ्वीमायादिकमाथीचवीने सृब्ध यमीफायनेविपे कपजेठे ते जे पृथिव्यादिकथी थने वादर अनिकायथी चवीने एकसमयनेविपे सूक्ष्म अग्निकायपणे ऊपजे ते लेवा पण जे सूक्ष्मथनिकायप ऐ पूर्वकपनाने वली तेहिजमरीने सूक्ष्मयनिकायपणे ऊपजे ते लेवानही केम के ते तो पूर्वन सदमथग्निकायपणे रह्याने ते केटला एफसमयनेपिपे जे सूक्ष्म थनिकायनाजीव पजेने तेथी यसरख्यातगुणा पूर्व कपना समधनीकायना जी वो तेमके एक सूकाथनिकायनोजीव कपनोथको थतरमृदुनसुधी जीवे थ ने अतरमूर्तिमा जेटला समयचे ते समयसमयमा प्रत्येके पूर्वोक्त श्रसग्येयलोका काशप्रदेशप्रमाण सूक्ष्म श्रमिकायपणे जीवो ऊपजेने तेमाटे एकसमयमा समयानि कायना जे जीवळपजेने तेथी एजफायनेविपे पूर्व कपजेजाजी श्रमरव्यातगुणाने एटने समयनपिपे कपना ते तथा श्रतरमृहूर्नमाहे जे पूर्व ऊपनाने तेसर्व नायगय तनाज मग्याथाय ते सर्वसन्ध्यायी तेजजीगोनो कार्यस्थिति एटले तेहि ज कायनविषे मरीने श्रस्तरयु तेरुप कायस्थिति यसव्यातगुणीचे केमके एकेक सूक्ष्म अनिमायनानीग्नी यसव्येय कन्मप्पिणी श्राप्पिणी प्रमाण काय स्थि क प्रत्येक थमरमानगुणाने एटने कायस्थिनियी सयमम्यानक थसख्यातगुणा यने यनुनागबधम्यानपण यमग्न्यानगुणाने थने माहोमारे ता तुयने यमरमाता स्थितिवध यन एफक स्थितिवचनरिपे थसख्याता यनुनागवध स्वरूप रहने सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन. 199 अनुनागवंध स्थानकते कोनेकहिये जे एक कपायिक यध्यवसायेंकरीने ग्र ह्याजे कर्मपुगत तेनुं विवदित एकसमय बंध रस समुदाय परिमाण तेने अनुना गबंध स्थानककही ते अनुनागबंधस्थानक केटलावे तो के चकदराजलोक जे वो एकलोकाकाश तेवा असंख्याता लोकाकाश थलोकमां कल्पीये तेना जेटलान देश तेना जेटलावे ते अनुनागबंधस्थानकना निष्पादक एटले नीपजावनार जे कपायोदयरूप अध्यवसाय विशेप ते पण अनुनागबंध स्थानक कहिये तेपण ते टलाज जेटलेकाले कमोत्क्रमे करीने सर्व अनुनागबंधाध्यवसायनेविपे वन्तोष को जीव मूत होय तेवारे तेटलेकाले वादर नाव पुगनपरावर्तथाय. कोकजीव सर्वजघन्य कपायोदयरूप अध्यवसाय स्थानकनेविपे मरणपाम्यो तेवारपठीजो तेहिजजीव अनंताकालपठी पण ते प्रथम स्थानकथकी अनंतरवी जा अध्यवसाय स्थानकनेविपे वर्चतोथको मरणतेपामे ते मरणने लेखामांगणियें पण वीजा उत्तमनावी अनंतामरण पण लेखामां न आवे एरीते अनुक्रमे सर्व अनुनाग बंधाध्यवसाय स्थानक जेटलेकाले मरणेकरीने फरसे तेटले कालें सूक्ष्म नाव पुगत परावर्त कहिये इहां देवयकी सूक्ष्म पुगनपरावर्त मार्गणानेवि लेई ने वीजा पुगनपरावर्त्ततो परुपणा मात्रठे. यक्तः- एक समयंमि लोए, सुदुमगणिजिया जे उपविसंति ॥ तेढुंति यस खलोग, पएल तुला थसंखिजा ॥ १ ॥ तत्तो असंख गुणिया,थगणिकाया ते सि कायलिई । तनो संयम थाना,ग बंधषणाण संखाणि ॥ ॥ ताणिमंतरेण जया, पुमणि कमुक्कमेण सवाणि ॥ नामि वायरोसो, सुदुमो अकमेण वोधनो ॥ ३ ॥ अन्यत्राप्युक्तं ॥ नावेथ समये जीवाः पृथ्वीकाय पुरस्सराः ॥ सदमेषु तेजः कायेषु यावंत.प्रविशतिहि॥१॥ श्हते त्युरसंख्येव लोक प्रदेशतुल्यकासाथसंख्यातास्त तः पूर्वोत्पन्नाः कायस्थितिस्ततः ॥ ततःस्थानान्यसंख्यानि संयमाध्यवसाययो. ॥ तानिस्टशेद्यटाजीवः किलगन् नवांतरे ॥ ३ ॥ वादरोव्युत्क्रमेणायं ज्ञेयः सूक्ष्मक मेणतु ॥ यत्रक्षेत्र परावर्तणा धिकार परैर्नतु. ॥ ४ ॥ ए प्रकारे सम्यक्त्वरहित थको एरोजीवे धव्यवहार रासीमांहे एवां पुजलपरा वन यनंताकया तेहिजजीव महताकटे व्यवहाररासोपाम्यो त्या व्यवहाररागीमा पण केटलाक कालसुधीरहेठे माटे हवे ऽहां प्रसंगे कायस्थितिर्नु काशक स्वरूपकहे. तिर्यचनी गति असंनिया एकड़ी वनस्पति श्रने नपुग्नक एटला माहे एक धा वलिकाने घसंख्यात नागें जेटलासमयहोय तंटला पुनलपरावर्त उत्कृष्टोरहे एक .

हले जेटला सयमस्थानक तेटलाज अनुनागवध स्थानकले थने कायस्थितिनी ७७६ सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन नावे एरीते जेटला एक उत्सपिणीना समपहोय तेटलासर्व समय थनुक्रमे करीने फरसे तेवारे तेटले कालें कालथी सूदापुमन परावर्तथाय यउक्त यावर सप्पिण्यास्यु , समयास्तान स्वमृत्युना ॥ क्रमोरक्रमेणव्याप्नोति, सस्यून का नवेत् ॥ १॥ प्रथमे समये मृत्वोत्सप्पियस्तिदनतर ॥ म्रियते यदि सर्वत्र, के सूक्ष सकालत ॥ २॥ हवे नावथी सूक्ष्म थने वादर पुजलपरावर्त कहेठे इहां जगतमा एक समय विपे जे पृथवीकायादिकनाजीव सूक्ष्म थग्नीकायमा ऊपजे ते जीव केटलाकप जेठे थसख्येय लोकाकाशप्रदेश रासीप्रमाण पजेचे एटले थलोकमाहे चकदरा जलोकना जेवा यसरख्याता लोक कल्पीये ते असल्याता चऊदराजलोकना जेट ला थाकाशप्रदेशथाय तेटताजीव एकसमयनेविपे पृथ्वीकायादिकमाथीचवीने सूक्ष्म श्रग्नीफायनेविपे ऊपजे ते जे पृथिव्यादिकथी घने वादर थनिकायथी चवीने एकसमयनेविपे सूक्षा थनिकायपणे ऊपजेचे ते लेवा पण जे सूक्ष्मयनिकायप ऐ पूर्वेकपनावे वली तेहिजमरीने सूक्ष्मयनिकायपणे ऊपजे ते लेवानही केम के ते तो पूर्चेज सूक्ष्मथनिकायपणे रह्याले ते केटलाने एकसमयनेविपे जे सूक्ष्म अनिकायनाजीव ऊपजेठे तेथी असख्यातगुणा पूर्वे ऊपना सूद्मनीकायना जी यो तेफेमके एक सूक्ष्मथग्निकायनोजीब ऊपनोथको थत्तरमूदुनसुधी जीवेळे थ ने थतरमूहुर्नमा जेटला समय ते समयसमयमा प्रत्येके पूर्वोक्त थसख्येवलोका काशप्रदेशप्रमाण सूक्ष्म थनिकायपणे जीवो कपजेचे तेमाटे एकसमयमा सूमयाग्नि कायना जे जीवळपजे तेथी एजकायनेविपे पूर्व कपजेलाजीव असत्यातगुणाने एटले एकसमयनेविपे कपना ते तथा अंतरमूर्तमाहे जे पूर्व कपना तेसर्व नेलाकरीये तेनीजे सख्याथाय ते सर्वसरव्याथा तेजजीवोनी कास्थिति एटले तेहि ज कायनेविपे मरीने थवतरवु रूप कायस्थिति यसल्यातगुणी केमके एकेक सूदम श्रमिकायनाजीवनी यसरव्येय कत्सर्पिणी अवसर्पिणी प्रमाण काय स्थि ते कही माटे वलीते कायस्थितिथीपण सयमस्थानक अने प्रत्येके थसख्यातगुणाः एटले कायस्थितिथी सयमस्थानक असख्यातगुणा ने यनुनागवधस्थानकपण थसख्यातगुणा थने ए वे माहोमाहे तो तुयने थसख्याता स्थितिवधठे थने एकेक स्थितिवधनेविपे थसख्याता थनुनागबध नको तेनोज स्वरूप कहे। थनुनागवधस्थान सम्यक्तविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन. 013 अनुनागबंध स्थानकते कोनेकहियें जे एक कपायिक अध्यवसायेंकरीने ग्र ह्याजे कर्मपुजन तेनु विवक्षित एकसमय बंध रस समुदाय परिमाण तेने अनुना गवंध स्थानककहीये ते धनुनागबंधस्थानक केटसाठे तो के चकदराजसोक जे वो एकलोकाकाश तेवा अतंरव्याता लोकाकाश थलोकमां कल्पीये तेना जेटलाप देशवे तेना जेटलावे ते धनुनागबंधस्थानकना निप्पाटक एटले नीपजावनार जे कपायोदयरुप थध्यवसाय विशेप ते पण थनुनागबंध स्थानक कहिये तेपण ते टलाज जेटलेकाले कमोत्क्रमे करीने सर्व अनुनागबंधाध्यबसायनेविपे वर्नतोप को जीव मूउ होय तेवारे तेटलेकाले वाटर नाव पुलपगवर्नथाय. कोकजीव सर्वजघन्य कपायोदयाप अध्यवसाय स्थानकनेविपे मरणपाम्यो तेवारपटीजो तेहिजजीव थनंताकासपती पण ते प्रथम म्यानकथकी यनंतरची जा अध्यवसाय स्थानकनेधिपे वन्तोषको मगणनेपामे ते मरणने लेवामांगणियें पण वीजा उत्तमनावी अनंतामरण पाल ग्यामां न यारे पीते अनुक्रमे र्मा थनुनाग बंधाध्यवसाय स्थानक जंटलेकाले मरणेकरीने फररे तेटले कामों मृदय नाय पुजन परावर्त कदिये हा क्षेत्रकी मृदा पृमतपगवन मार्गणानेविये लेबु ने वीजा पुलपगवन्तो पम्पणा मात्र यजुक्तं - एक समयंमि लोए. सुदुमगणिजियाउने उपरिमंनि । नेनियम खलोग, पएस तुला यमंपिडा ॥ १ ॥ तनो यनंग गुणिया, गणियापार ते ति काचठिई ।। तनो संयम धपुनाग वंधतणा मंगाणि ॥ 2 ॥ ताणिमंतरण जया, पुत्राणि कमुकमेण सहालि ॥ नामि वायगंनो, सदमो यकमेण चांपा ॥ ३ ॥ धन्यत्राप्युत्तं ।। नावेप समये जीग. पृथ्वीरायपुगगग. ॥ गए नेजः फाप पावत प्रविहांतिहि। १॥ इदते न्युनिंबच लोप प्रदान यशयमांसालान त पूर्वोत्पन्ना कापम्पितिम्नतः ॥ तत न्यानान्य मानि गंपमाध्यवसायो । नानिष्टशेयदाजीप रिजगन् नयां ।। || बागंयन्त्रमणापं इयः दृटर मेएनुअत्रक्षेत्र परावला पिर परतु ॥ ४ ॥ শুনি তা বলা যায় না বা না दर्न पनारमा नदिजजी मदनारटेदारीमानं या मार्ग पल रेटलाल साधारमाटेदारापरने. मिनी गति मनिचाही दानं न नमा वजिरा मानना टानमय दर - TIG सम्यक्तविचारगनित महावीरजिनस्तवन. थावलिकाना पण असंख्यातासमय थने थावलिकाना यसग्यातानागनापण य संख्याता समय जाणका कारणके यसख्यातु थसग्न्याते देने हवे व्यवहाररासीमा याव्यापतीपण सूक्ष्मपणे केटलो काजरहे ते कहेने प प्वी थप तेज वाउ यने वनस्पति ए पाच सूक्ष्ममा सामान्यपणे यमग्न्याता लोकाकाश प्रदेशप्रमाण उत्साप्पिणी यने थवसप्पिणी कााजगे रहे एक्मयमा रहे तोपण एटलोज काल धने पांचसूममारहे तोपण एटजोज काजजाणवो होवादरमा सामान्यपणे रहेतो केटलो कालरहे तेकहे वादरथिने वादरवनस्प तिमोथगुलने थसख्यातमेनागे जेटलाप्रदेशहोय तेटलीवत्सप्पिणीयासप्पिणीका सलगेरहे थनेवादरनिगोटमाथडीपुजन परावतरहेयनेष्टपीकाय थपकायतेउवाय वाचकाप प्रत्येक वनस्पतिकाय थने निगोदमां सितेर कोमाकोमी सागरोपम लगेरहे हवे विगदी थने सामान्यपणे पर्यातीवादर एफेडी एमां केटलोसतरहे ते कहे। वेंडी तेंडा चोरेडीमा सख्यातावरस सहस्रसुधीरहे थने सामान्यपणे पर्याप्तोवा दर एकेडीमाटी पाणी वायरो प्रत्येक वनस्पति मापण सख्यातावरस सहस्र सुधिरहे हवे धादरपर्याप्ता थनिकाय थने गिळंदी तेनो काईक विशेषकहे। बादर थनिकायनी नवस्थिति कत्कृष्टीतो व्रणयहोरात्री थने कायस्थिति उत्कृष्टीतो निरतर सर्वनवकाल सकलनायें सरख्याता दिवसनी नाणवी थने वेशीमाहे जव स्थिति बारवर्षनी ने कास्थिति सर्वन काल मलनायें सख्याता बरत होय थने तडीमाहे गणपचासदिवश नवस्थिति ते एकनवनो कत्लटो श्रापानोकान वे यने कायस्थिति सर्वनवसकलनायें सख्यातादियगनी वे वली चउरडीमा उक्त टो व महीनानी नवस्थिति एकनवयापुरूपठे थने फायस्थिति तो सख्याता मही नानी थने त्रस माहेतो वे सहस्त्रसागरोपम सख्यातेवरसे यधिक कायस्थितिले इवे पचेड़ीनु सामान्य विशेपपणे कायस्थितिनु स्वरुपकहे। पडीमाहे पच हीपणेजीवरहेतो उत्कृष्ट एकहजार सागरोपम जाजेरुरहे थने देव तथा नारकी मा जयस्थिति यने कायस्थिति तेपण त्रीससागरोपमज जाणया सन्नीया अने पुरुषवेदमाहे वो सागरोपमथी मामीने नवशे सागरोपम जाजेरानी कायस्थिति ने सन्निया तिर्यच सन्निया मनुष्यमांद प्रणवण पदयोपम सातपूर्वकोडी सहित कायस्थितिहोय थने स्त्रोदमाहे एकशोदशपत्योपम श्रने पूर्वकोमा पृथक्त्वे ध पिक एटनी कायस्थितिहोय तथा स्त्रोद थने नपुसकवेदमा जपन्यतो एकसम य ते उपशमश्रेणीवाजाने होय यने रोपवाजायाताने जपन्यकाज थतरमूदुर्ग सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन. SON थपर्याप्ताने जघन्य अने उत्कृष्टो पण नंतर मुहूर्नकास पर्याप्त सूक्ष्म थने बादर धनंत कायनं जघन्य अने उप्कृष्टो अंतरमूहुर्नज काल जाणवो. यमुक्तं कायस्थिति विचारस्तोत्रे यववहारियमले, जमिकण अणंत पुग्गल पन्ह । कदाविबदाररातिं, संपत्नांनाहतवविय ॥ १ ॥ महोतंतत्तिरियगड, घतं नि एगिटिवण नपुंसेच ॥ नमियावति धर्मरिच, नागसमपुग्गल परट्टी ॥ ५ ॥ नामन्नं नुहमने, उस्तप्पिणि श्रखलोगतमा ॥ नमिउ तहपिढनुहमे, पुटविज सजलए पवणवणे ॥ ३ उहेण वायरत्ते,तह वायरवणस्सई तुताउ पुणो । यंगु लयतखनागों, दोनपरयनिगोए ॥ ४ ॥ वायरपुटविजसनलण, पवणं पनेय वणनिगोएन । तत्तरि कोडाकोडी, अयराणंनाह जमिउहं ॥ ॥ संखिकवासन हने, वितिवरिंदीमुहांयतहा ॥ पङत्त वाच रेनिदिनूजलानिल परितेसु ॥६॥ वायरपडिगावति च, रिदिनुखदिएवास? माला; संखिलवास थदिया, न सुदोतागरसहस्से ॥ ॥ चयरसहस्तंथहियं, पणिंदिनुतितीसथयरसुगनिगा ।। सन्निनुतहपुरिसे, ययरतयपुढत्तमपहियं ॥ ॥ सन्नितिरिनरेसु पृटो पनि लत्त पुत्व कोडिजुधं ॥ दसहिय पतिय तयं, थी सु पुछकोहि पुदत्तजयं ॥ ! वि नपुग्ने समउँ, जहन्नी अंतो मुद्त्ततेसेतु । थपज सुमोतंपिय,पढ़ा झूटर लघणंतथि ॥ १० ॥ ए कायस्थितिकही हवे प्रतंगागत नवसंबंध परस्परे नवगणनारूप कहे:-पग्नबनें उत्स्ट थने जयन्य थायुने जेदेकरी चारनांगाथाय तेकैवीरीतें- उलट धने परनवर्नुपण उरुष्ट, ज्यां थवतरे त्यां नयन्य अनेक धन्य, ज्यां यवतरे त्या उत्कृष्ट अने परनवर्नु जयन्य, ज्यां शरी थने परनवर्नु उत्कृष्ट, ए चारनांगाजीवने नवगनाये जाणा. तन्निउमनुष्य थने संन्नितिर्यंच ठ नरकमां उत्कृष्टो - सन्नि मनुष्य यने सन्नि निर्यच ते नवनपनि aire मां देवलोकमुधी थानव एकांतरित उत्कृष्टोजाय - वा; नियंच सातमीनरके सातबारजाय थने पुराण, घन्यतो त्रनवथाय, नववेयक यने थानंत ग्रा रेदेवलोक सगे सातनवहोय; चारधनुत्तरमा पwrizr areyer होय, यनेसायनि जयन्य अने उत्सष्ट व्रण न्य घने उलष्टपण व नवजहाव, इदा नर्वत्र -- Amarpan :- लाय; ramhankar - ទូច០ सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन. पुगलिया तिर्यच तथा मनुप्य ते नवनपति व्यतर ज्योतपी बने वे देवलोकना देवतामाजाय, पण इहा उस्कृष्ट थने जघन्यवेजनयहोय, यसन्नि पर्याप्तोतियंच ते प्रथमनरके यने नवनपति तथा व्यंतरमा उलष्ट तथा जघन्य वेजनवहोय थावदेवलोकना देवता थने व नरकनानारकी ते पर्याप्ता थपर्याप्ता सन्निया तिच तथा मनुष्यमा उत्कृष्टा थानवकरे, सातमि नरकना नारकी तियंचमां व नवकरे थने पूरण थाउपे चारनवकरे, नवमेवेपकना देवता बने नवमाथी वार मादेनोफसुधीना चार देवलोकना देवता पर्याप्ता सनिया मनुष्यमा नकरे चार अनुत्तर विमानना देवता मनुष्यमा चारनवकरे अने जघन्यथी वे नवक रे, तथा सर्वार्थसिदिना देवताने जघन्य थने उत्कृष्ट वेज नरहोय, नवनपति य्यतर ज्योतपी थने ये देवलोकना देवताने माटी पाणी प्रत्येक वनस्पतिमा जय न्य यने उत्कृष्ट ये नरहोय असख्याता पाचपावाला युगलिया तिर्यच धने म नुष्यमाह सन्निश्रसन्नि तिर्यच यने सनिउ मनुष्य मिथ परस्परे वेनवजाणवा. माटी पाणी वायु थने थनि एना जीर वनस्पति पृथ्व्यादिकमाहे मिथ परस्पर घमन्यातो काजरहे. धने पृथ्व्यादिकजीव वनस्पतिमाहे थसख्यातोकालरहे थने व नस्पनिनाजोर वनस्पतिमाहे थनतोकानरहे, विगहानाजीर पाचप्टथ्व्यादिकमाहे सरव्यातो काजरदे पांच पृयादिकना जीव गिड़ियमा सख्यातो काज रहे, विगहनाजीर गिनेहीमाहे सरख्यातो कालरहे, उलटयारपे बिनोगे थाउन यजाएग, जयन्यतो सरले ये नजाण्या मनिया थसनिया तिपच तथा मनुष्यने विगलेंडीयने पांच पय्यादिकर्मा थानव | पाप,मनुष्य थने नियंचाहे गिनेंडीयने पृथ्व्यादिकनाजीर यानवथावे, एबिह नांग जाणा, पनी यापु श्रने अग्नीमा मनुयने वलए थने जघन्य तो बेज नव होप, जीन पग्नर थने ते नाना थायुनो सवय तेनी बंधस्थिति चिदुनागे जय म्य बने उरट यनुक्रमे कही उनच नत्रा गयस्यिनिविचार स्तोत्र - परनर तप्यथाक, सटु गुरु चणि सन्निनरनिधि ॥ नग्यनगे उझोम, तर नमानये ॥ नाणवणजोइ PE यि बहनगढ़ जना, सगमनमी तिति, पण पुणास यतिजहन्ना ॥ २ ॥ मेरिकालय वगे, मग पणगुना घनजिनिजहन्ना ।। पडतरोति सरं उहाउनग्न मतमा पुर्णा ॥ ३ ॥ अनुगतिय निग्यिमाणुथा । उनगरा नगणना मागे ॥ ग्यपद नणणे, इद नर श्रमन्नि जतिरि॥४॥ पास .

सम्यक्त्वविचारगनित महावीरजिनस्तवन. ទច नितिरिनरेसुय, सहसारंता सुराय निरया ॥ अडनव सत्तम निरया, तिरिये व नव चमपुरमा ॥ ५ ॥ पज सन्निनरे बनवा, गेविजाण्य चनकदेवाय ॥ चउणुत्त रे चउ नवा ॥ उजहन्न उहावि सबहा ॥६॥ नूजल वणे सु सुनवा, उहावि नव एवण जोश्स कप्पा ॥ उमियानतिरि नरेतह, मिय सन्नियरति सन्निनरा ॥ ७॥ नूजल पवग्गि मिहवणा, नुवाइ सुवणेसु अनवाई । प्रति असंख नवि, वेवणीणमु, थपंतनवे. ॥७॥ पण पुढवाइ सुविगला, विगलेसु धनवाइ विगलि संखनवे । यु रु थाउति नंगेपुण, नव सब जहन्ना ॥ ए| मिहतंनियर तिरिनरा, विगलनु वा सुयनर तिरिसुए ए॥ अमनवा चउनंगे, उह पवणग्गिनु नरा नवा ॥ १० परतनवान माणा, इह पतसंवेद कणवंधतिई । कित्तिय विन्नविउमल, चटनी हनुको सकमा ॥ ११ ॥ ए दशमोगाथानो अर्थवे. नानाजीवनी अपेक्षा मंत्र नहोय इत्यादिक श्रावश्यकवृत्तिमां कयुंठे ए ग्यारमी गाथानो थर्थ ने. अथवा एहिज सम्यक्त्व थनेकविध कहियें यदादुः एगविह इविद दिई चउहा पंचविह दसविहं सम्मं ॥ दजा इकारगाइ, उवसम एहिं ।। एगविहं सम्मरुई, निसग हिगमेहिं तं नवे ऽविहं ॥ तिविहं तसः अनादि दुकार गाश्यं ॥ २ ॥ खश्या सासणजुधे, चहा वेयग जुयं नुपरति वरम पुग्गल, वेयणाउ दस विदंएवं ॥३॥ अथवा उत्तराध्ययनना अठावीसमां थध्ययनमा ए पागल सग्गुवेएसरुई, थारुई सुत्त वीयरुश मेव ॥ थनिगम विनट धम्मरुई ॥ १ ॥ नूथठेणा हिगया, जीवाजीवाय पुराण मन्द्रमा संव,रोय परोए उनिसग्गो ॥ २ ॥ जोविणदिनाये, एमे धन्न न हत्तिध, सनिसग्गरुइत्ति नायबो ॥ नही परेण सददई । उसमझे जिणेण व. नवएलरममा दामो मोहो, थन्नाणं जस्त अवगहोई ॥ श्राणाए माया जोसुतमहिलंतो, सुएए उगाहन सम्मन ।। यो ॥ ६ ॥ एगेण श्रणेगाई, पया जो पनि बीयरुति नायो ।। 3 ॥ मोहोर धनि नई रस थंगाई॥ पश्नगं दिहिवाध ॥रा महान उपE | सहाहि नपविहीदि. कि- तवविणए सहसमिइ गुनीम ॥ नट, He T . अन्य सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन ॥१०॥ यणनिग्गहिय कुदिती, सखेवरुति होइनायो थविसार उपवयणे,थण तिग्राहियो य सेसेसु ॥११॥ जो थठिकायधम्मो, सुथखनुचरित्न धम्मच, सदहर जिणानिहिय, सोधम्म रुइति नायवो ॥ १२ ॥ हवे ए गाथानो विपमार्थ लेशमात्र कहेनूयत्ति सभूताअमीअर्थाई सद्भूतार्थत्वे न सहसमत्याजातिस्मृति प्रति नादिरूपया सभूत ए यर्थ जाणवाने प्रथम सप्तनगीनु स्वरूप कहे। सिया अधि सिधा नछि, यति नछि सिधा पुणो ॥ मिया चेव यवत्तबो, जु ग्गविहिनिसेह ॥१॥ सिधा थछि यवत्तो, चेव विहिनिसेवन ॥ सिया य वितियाणति, अवतन्बो सिया तहा ॥२॥ सत्तनगी जिपुदिना, सहनावेसुसम्मया हवे एनो थर्थ कहेठे - सकल पदार्थ पोतपोताना रूपे इव्य क्षेत्र काल थने नावेकरी उता वे जेम घट पोताने रूपे इव्यथकी माटोनो अथवा सोना रूपा त्रांचा प्रमुखनो वे, देवथकी राजनगरनो उपनो कालथको शीतकालनो उपनाने नावथी स्यामरुप एरीते सर्व इव्यपदार्थ इव्य क्षेत्र काल नावथा पोतपोताने रुपे वतावे ते स्यादस्तिलक्षण सप्तनगीनो प्रथमनेद जाणवो थने सकलपदार्थ पररुपे इव्य क्षेत्र काल भने नावथी नथी जेम घटते वस्त्र रुपेनथी इव्यथी जलरूपेनथी क्षेत्रथो स्तनतीर्थनो उपनोनयी कालथी उलकान नो उपनोनची नावथी रक्तरूपेनथी एम सर्वपदार्थ पररूपे व्य क्षेत्र काल अने नावथा नथ), ए स्यात्नास्ति नक्षण सप्तनंगीनो वीजो भेदजाणवो सक्ल पदार्थ थनुक्रमे विचारता स्वव्य क्षेत्र काल नावेवता, थने परश्य देव काज़ नावे यन्ताजने, जेम घट स्वाव्य देव कालनावे पूर्वोक्तरीते उतोडे थने परय्यादिके यतो एमसर्वपदार्थ नाविये, ते स्यादस्ति स्यान्नास्ति लक्षण सतनगीनो त्रीजो नेदजाएगी तपापली सर्वपदार्थ म्वव्यादिकेचता थने परव्यादिके थतावे पण ते ए केकाजे विधिनिषेध वचने तो यतो कहीं सकीयेनही, केमके एयो को शब्दन थोजे उना थठता सण ये गुणने वोले, ए सुगपविधिनिषेधयीं थवक्तव्यलद ए सतनगीनो चोयोनेद जाएगे तथा सर्वपदार्य स्वयादिकता पण पर्यायथी थरता माटे समकाले विधि निपेय कपना थवा यने जेम सुवर्णमयमेरु ध्यरूपे सासतो थने पर्यायरूपे यमापतो पण एकमले सासता थसासतो कही सकिये नही ए स्यावस्त्येव स्यादवनध्यमेर सतनगीनों पाचमोनेद जाण्यो सम्यक्त्वविचारगर्मित महावीरजिनस्तवन. UG३ सर्वपदाये परव्यादिकेनथी पण वरूपे उतापणाधी एकेकाले निषेध विधि क पनायें अवतव्यन जेम सेलमा गोल खांड एने परस्पर यद्यपि निनपागुंजय ने माधुर्यपणानो अंतरपण, अने सेलडीपणे ऐक्यो, पण निन्न अनिन एकेकही सकीनही, ए स्यान्नास्त्येव स्याटवक्तव्यमेव सप्तनंगीनो गोनेट जाणवो. सर्वपदार्थ स्वव्याटिकेताले अने परव्यादिके अवतावे पण समकाले विधि निषेध कल्पनाये श्रवक्तव्यजते, जेम घट स्वव्यादिके पोतानेरु पेठे बने पटादिकनी अपेक्षायेनथी, माटे एक समयेसपथने घणकहेवायोग्यपणेते एम एकपदार्थनेवि पे स्यावस्त्येव म्यान्नास्त्येव स्यादवक्तव्यमेव लक्षण समनंगीनो सातमोनेटजाणवो. एकपदार्थनेविपे ए कल्पना केमघटे? त्यांदृष्टांत.-जेम कोईकने दूधनोनियम- ते दूधविना दधिप्रमुख सर्वजातनो गोरसतिये, अने जेने दहिनो नियम ठे ते टहि विना सकल गोरस लिये. थने जेने गोरसनोनियमः तेने उधदहीप्रमु ख समस्तगोरसकल्पेनही, तेमजे पूर्वे एफनेट स्यादस्ति स्यान्नास्ति स्यादवक्तव्यमेव लक्षण देखाडया तेने संकलितरुप सातमानेनो अंतर जाणवो एमए सप्तनंगी श्रीजिनेश्वं उपदेगी ते सर्वपदार्थनेविपे सम्मतठे ते सप्तनंग्यादि जेने सम्यक्त कारेरुचे, जे जेमका ते तेम सदहे, सहसम्मत्या जातिस्मरणटिके स्वप्रतिनायक रीने रुचे ते निमर्ग रुचि सम्यकत्वहिये ॥ १५ ॥ १३ ॥ १४ ॥ धर्मास्तिकायाटिक पटव्यना समस्तनाव एकल पृथक्त्वादिक अशेप पर्याय प ने प्रत्यदादिकप्रमाणे जेनो जिहांव्यापार तिहां तेजप्रमाणे प्रतीति प्रसिह जे णे पाम्याने, अनेवली सर्वनयविधिये नंगमादिकनेदे इव्यनासर्वनाव जाण्याने ते विस्ताररुचि प्रमुखने धर्म धर्माना अनेद उपचारे विस्ताररुचि सम्यक्त्व कहिये. हवे कांक प्रमाण थने नयनी विशेषता कहे त्यांप्रथम प्रमाण एटलेसु? ते कहे। -प्रमाकरण ते प्रमाणकहिये. जे 'यथार्थानुनव प्रमा' यथार्यज्ञान ते प्रमा कहिये. ते प्रमानुं करण अतिगयितकारण ते प्रमाणकहिये ते जनमते एकप्रत्यद थने वीजो परोद ए वे प्रमाणवे. थने नास्तिकमति एकप्रत्याप्रमाणजमाने तथा सुगत बोध कणाद अने वैशेपिक प्रत्यद ने अनुमान ए वे प्रमाणमाने पारमार्प सांख्य, प्रत्यद अनुमानने शब्द ए त्राप्रमाणमाने. यपादनैयायिक प्रत्यद य नुमान उपमान बने शब्द ए चारप्रमाणमाने. प्रनाकर, प्रत्यक्ष्यनुमान उपमान श ब्द अर्यापत्ति ए पांच प्रमाणमाने, नह, प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द अापत्ति बने थनाव ए व प्रमाणमाने यमुक्तं रत्नाकरावतारिकायां चार्वाकोध्यक्मेकं च ४ सम्यक्त्वविचारगर्नित महावीरजिनस्तवन. गतकणचुजी सानुमानसशाब्द, तपाग्मा सहित मुपमयातयं विदपाद ।। अर्थापत्त्या प्रनार द्वदतिवनिखिलमन्यतेनह एतत्सानाव प्रमाणे जिनपति स भये स्पष्टतो स्पष्टतश्च ॥१॥ चली जनमते प्रमाणनुं लणकहेले -सम्यग्ज्ञानं प्रमाणतविधा प्रत्यक्षतरजे दात् थवधिमन पायादावेक देशप्रत्यदो केवलसकलप्रत्यहं मतिश्रुतेपरोदे वजी त्री प्रमाणनु लक्षणातरफ -सकलवस्तुसाधक प्रमाणं प्रमीयते परिविद्यते व स्तुतत्व जनझानेतप्रमाण तबिधा सविकल्पतरनेदात् सविकल्प मानस तच्चाई धं मतितावधिमन पायरूपं निर्विकल्प मनोरहित केवलज्ञानमिति प्रमाण स्यव्युत्पत्ति प्रमाणेन सग्रहीतार्थेकाशोनय अतविकल्पोविज्ञानुनिप्रायोवानय ना नासनावन्यो व्याकस्मिन् स्वनावे वस्तुनयति प्रामोतीतिवानय ते नयना सातनेदजे नैगम सग्रह व्यवहार जुसूत्र शब्द समनिस्ट एक्तत समस्तपदार्थ ते सामान्य विशेपोनय धर्मरुपले तेमा सामान्यते घटत्वादिक प्रमुख जात्यादिरुपडे, थने विशेषते सुपर्णमयपट मृन्मयघट एमव्यक्त्यादिरूपः इत्यादि क नैगमनय वस्तुने उनयात्म सामान्यविशेषरुप माने जेमाटे सामान्यते विशेष विनानहोय थने विशेषत सामान्यपिना नहोय सग्रनय तो वस्तुने सामान्यरूपज माने केमके सामान्यथकी व्यतिरिक्त कोइ विशेप नथी थापाशनाफजनीपरे वनस्पतिविना कोई निव श्राम्रादिकनपी देखाता थने जे देवायचे ते सर्व वनस्पतिर पत्रे, जेम हस्तायतनांची थगुली प्रम स हतादिकथी दूरनयी दस्तादिरूपज व्यवहारनया पदार्थने विशेषात्मकज विशेषरूपज माने, विशेपथकी जिन कोई मामान्यनयी सरविषाणनीपरे दृष्टांतदेखाडे -कोहसेसे वनस्पनिलेवीही प तेगारें निगमादिक नामजीयाग्निा सुलशकिये थपितु कोइनन जगकाप धने नामजी तेबारे तो रिशेषजययो वणपिपादलेपादिक जोकप्रयानन त्यो पण विशेषनान उपयोग नामले ने कहेने के प्रमुग श्रीपधारो वारेज ते थापाप पण मात्र या एमवायी, औषधको करतोनथी तेणेकरी विशेषची सामान्यजुषनथी म विशेषरूपजने प्रभूत्रनयता यतीन अनागत वन्नु नमाने केरल वर्तमान मकोयहाय नेन माने, यतीत धनागन यने परकीय यन्तय कार्यमिविनयाय, शनतु याकाम र स नेनी जाणीव यने नाम स्थापना इय ने नाव र चारनिरूपाने तेमाह सम्यक्त्वविचारगर्मित महावीरजिनस्तवन. UGU लो नावनिदेपोमाने, वीजा त्रनिदेपा नमाने, तेमज धागला थागला नयपण नमाने तेपण एक नावनिपोज माने. गदनयेनी अनेक पर्यायेकरी एकज अर्थमाने. जेम कुंन कलश घटादिक यने कशद घटव्यक्तिरूप एक चर्थवोलेने. समनिरुदनयतो पर्यायनेटथी निन्न निन्न अर्थमानेते. कुंन कलग घट एनो जुदोजुदो अर्थते. अने घटपटाढिकनीपरें जो पर्यायदे पण वस्तुनो जेदनहोय तो कुन धने घटनोपण पर्यायांतर नहोय. एव नूतनयतो एक पर्यायानिधेय वस्तुपए स्वकीय कार्य करतुं होय तो माने जो कार्य अणकरतुं पण वन्तुमानिये तो घटनेविपे पटनो व्यपदेश केम न थाय. ए सातेनय यथोत्तर विशु-वे ते एकेकाना गो शो नेटवे. एम सातनयना सातसो जेट थाय. एव नूत अने समनिरूढ ए वे नयोनो शब्द नयमां अंतर्नाव थाय त्यारे पांच नयना पांचो नेट थाय, ते व्यास्तिक तथा पर्यायास्तिक ए बे नयमां सर्व नयेनो यंतरनाव थायवे एटले प्रथमना चारनय इव्यास्तिकमां धावे धने पाठला त्रएनय पर्यायास्तिकमां आवे. यमुक्तं श्री धनुयोगक्षारसूत्रे-नयसरूपं सेकिंत नयेनये सत्तमूलनया पन्नता रो गमे संगहे ववहारे उल्नुसूए सदे समनिरूढे एवंनूते ततणेगेहि माणे, हिं मिण इतिणेगमस्त नीरुत्ती ॥ सेसाणंपि नयाणं लखमिणमो सुणेहवोठं १ संगहिय पिं मिय संगहवघणं समालविति; वन्न विगिठिया, ववहारो सबद वेसु र पञ्चप्प नंगणही, उसूउनय विहिमुऐयवो ॥ व विसे सित्त, पञ्चप्पन्नं नयो सदो ॥३॥ वध संकमणं, होइ थवठंनये समनिरुढे ॥ वजण थठ तनयं, एवं नूएविसे से ॥॥ नायंमि गिएिहयो, थगिएिहयवंमि चेव अमि ॥जश्व मेव मेव, इनो उवएसोसोन नाम ॥ ॥ ॥ सवेसिपि नयाणं, बहुविहदत्तत्व संनि सामित्ता ॥ ते सब नय विसुई, जं चरणगुण हिसाहू ॥६॥ एगं निचं निरक्य, व मक्कियं सब गंच सामन्नं । निस्सामन्नत्ता, नटिविसेसो खपुप्फंच ॥ १ ॥ नेगेनिच मणिववि, सावयव सक्कियंच निन्नगयं ॥ तुम्नत्ता तुल्लत्तण, सवि संसंतं समासन्नं ॥॥२०॥ झान दर्शन चारित्र तप समित्यादिक क्रियाजे सम्यक्त्वने बले रुचे ते क्रिया रुचि सम्यक्त्व कहिये ए एकवीसमीगाथानो यर्थ. घननिगृहीत थनंगीरुत कुदृष्टी सांगतादिक मतरुपवे जेणेवली थविशारदः प्रव चने प्रवचनाननिझोपिएटले प्रवचननेविपे माह्योनथीथने शाक्यादिक प्रवचननेविपे निरपिपरयावसाने मईश्वपडिकल्पा तथा नास्तिजीव परत कालतइतिपढेशविक सम्यक्त्वविचारगनित महावीरजिनस्तवन. चिलातीपुत्रनीपरे थनागृही के थाग्रह रहित ते सपथी तत्वनावतोयको तेने संकेपरुचि सम्यक्त्व कहिये कुमत ते कोने कहिये क्रियावादी थक्रियावादी श्रज्ञानवादी विनयवादी प्रमु खनुं जे मत तेने कुमत कहिये परपासमानि सर्वज्ञप्रणीत पाखमव्यतिरिक्तानि तेपनियतस्त्राणिशतानि त्रिपश्चाधिकानि जवतु यक्त थावश्यक बृहत्ती-थसीइसय किरियाण थकिरियाणचहो चुलसीइ,य नाणियसनति, वेणयाचबत्नीसं ॥१॥ यस्याव्याख्या थसीइसपकिरियाणतिय शीत्युत्तर शतक्रियावादिनां तत्रनकार विनाक्रियासनवति तामात्म समवापिनी बद तिये तबीजाश्वते क्रियावादीनालेपुनरात्माद्यस्तित्व प्रतिपत्तिलक्षणा अमुनोपायेना शीत्यधिक शतसहाविधेया जीवाजीवाश्रव बंधसवर निर्जरा पुण्य थपुण्य मोक्षा ख्या नवपदार्थान विरचय्य परिपाट्याजीय पदार्थम्याध । परपरनेदावुपन्यसनी यौतयोरधोनित्य १ थनित्य (२) दौतयोरप्यध काले १ श्वरा २ स्म ३ नियति । स्वनाय ५ जेदा. पंचन्यसनीया पुनश्शेविकल्पा कर्तव्या अम्तिजीव खत नित्य कालतश्त्येकोविकल्प विकल्पार्थचार्य विद्यतेखलुधय यात्मास्वेन रूपेण नित्यश्च कालवादिन उके नैवानिलापेनक्तिीयोविकल्प ईश्वरकारिणिन तृतीयोविक प थात्मवादिन पुरुपएवेद सर्वमित्यादि नियतिवादिन अतुर्थोविकटप स्वनाववादि न एवस्वतश्त्यऽत्यजतासधा पचविकल्पा परतइत्यऽत्यजताइन्यनेनापि पचैव जन्यते नित्यत्वाऽपरित्याग परित्यागेन चैतेदशधिकपा एब अनित्यत्वेनापि दर्शवएते विशति जीवपदार्थेनलब्धा घजीवादिम्बप्वष्टसएवमेव प्रतिपद विगतिविक पाना मतो विंशतिर्नवगुणशतमशीत्युनर क्रियायादिनामिति अकिरियाणचदोश्चुलमी ति थक्रियावादिना नवति चतुरशीतिनेदाति नक्षिकस्यचिदवस्थितन्य पदार्थस्य कियाममस्ति तनावे एवावस्थितेरनावादित्येववादिनो यक्रियावादिनम्तथा था रेक क्षणिका सर्वसस्कारा अस्थितानांकृत क्रियानूतियेषां कियामवकारक सेब वोच्यते इत्यादि एतेचारमादि नास्तित्वप्रतिपत्तिलक्षणा मुनापायेन चतुरशीतिर्व क्तव्या एतेपा पुरयापुरएपवाऊँत पदार्थ सप्तकान्यसतर्थवजीवस्याध स्वपरविकल्पने दक्षयोपन्यास थसत्वादात्मनो नित्यानित्यत्वदीनस्त कालादीनांतुपचाना षष्टीय शान्यस्यत्तेपश्चाधिकपानिला नास्तिजीव स्वत इत्येकोधिकाप एवमीश्वगादि ८पा एकत्रवादशएवमजीवादिष्यपिपट्सप्रतिपद बादशविकपा एकत्र सप्तवाद सम्यक्तविचारगर्जित महावीर जिनस्तवन. OGI ग गुणाश्चतुरगीतिर्विकल्पा नास्तिकानामिति धनाणियसत्तहिनि अज्ञानिकानां स प्तपटिनँदाऽति तत्र कुत्सितं ज्ञानमझानं तदेषामस्तीत्यज्ञानिका नन्वेवलघुत्वात्य कमस्यप्रागबहुव्रीहिणा नवितव्यं ततश्चझानाऽतिस्यात्नपदोषः ज्ञानांतरमेवाझा नंमिथ्यादर्शनसहवरितत्वात् ततश्चजातिगदत्वात् गोरखरवदरस्यमित्यादिवट ज्ञानिकत्वमिति अथवाऽझानेनचरति तत्प्रयोजना वा अझानिकाः थसंचित्यरुत वंधवैकल्पादिप्रतिलहणा अमुनोपायेन सप्तपष्टिातव्या तत्रजीवादिनवपदार्थान् पूर्ववध्यवस्थाप्यपळतेचोत्पत्तिमुपन्यन्याध. सप्तसदादय उपन्यसनीया सत्व? म तवं सद् असलं ३ अवाच्यत्वं ४ सद्वाच्यत्वं ए थसट्वाच्यस्वं ६ सदसटवाच्य त्वं ७ प्रमितिनकस्यजीवादे. सप्तविकल्पाः एतेन नवसप्तकास्त्रिपष्टिः उत्पत्तेश्चला र एव विकल्पास्तेप्यसत्त्वं १ यतत्वं सदसत्वं ३ थवाच्यत्वं ४ चेतित्रिपष्टि मध्येक्षिता सप्तपटिनवति कोजानातिजीव सन्नित्येकोविकल्प. ज्ञातेनवाकि एवमस दाढयोपिवाच्याः उत्पत्तिरपिकिसतोयसत.सदसतो थवाच्यम्येति कोजानात्येतनक चिटपीत्यनिमाय. देण्यापंच वत्तीतंति वेनयिकानां वात्रिंशदा विनयेनचरंति विनयो वा प्रयोजनमेपामिति वैनयिका एतेच थनवकृतलिंगाचारशावाविनय प्रतिपत्तिलक्षणा यमुनोपायेन वात्रिंगदवगंतव्याः सुग्नृपति शातियति स्यविरा धममातृपितृणां प्रत्येकं कायेन वाचामनसाटानेनच देशकालोत्पन्नेन कालेन विनयः कार्यइत्येतेचत्वारोनेटा. सुगदिप्वष्टसस्थानेषु एकत्र मीनिताहानिशदिति सर्वमं रव्यापुनरेतेपां त्रीणिगतानित्रिपष्टयधिकानि नवति. धन्यत्रापिउक्त:-आस्तिकमतमात्माद्या नित्यानित्यात्मकानवपदार्याः कालनि यतिस्वनावेवरात्मरुतिनः स्वपरस्याः । कानपछानियतीश्वरस्यनावात्मनभर शीतिः नाम्निकवादिगणम नतति सतवपग्नस्या छ यदानिपवाटिमनं नवनी वादिन सदादिसप्त विधान् : नावोत्पनि मटन नावाच्यांश्चकांवनि नयिमन दिन यभंतो वाहायटानत. कार्यः तुरनृपनियनि हातिन्यविगधममातृपितृगमदा ४ ॥ तेषां प्रगंसानकाा पात्यनाज एतेषु सधर्मनिर्जन्मल्याटिजदाणा एतेषामिया दृष्टित्वात ए वावीनमी गाथानोथर्थने. थन्तिकायते रहिये यन्नयःप्रयाःतनिधित्वेन्यनिकायःधर्मानिरापधर्मा स्तिकापथासान्निसाय जीवान्तिकाय पुजनाम्निसाय ए पारनंदनिकाय कादिये. धमांगन्युपटनादिन्नश्रुत धाम या नानापियाटियर्मनचिन्में पर्याय ज्येष्टधन्मों वा अनयन्मदिनविग्न्यनिरन्वा पटारा नम्बरन्द मोहनन्नुं बी ចុច सम्यक्त्वविचारगर्जित महावीरजिनस्तवन जनूतने सपतिराजानेविपेजाणवु यउक्त एगविह पिह तिपि, चवहा पंचविह दसविद सम्म ॥ मुरक तरु वीय नूथ, सपहरायावधारिका ॥१॥ सर्व एगा थानो थर्थ विवखो हवे शिष्यवोल्यो स्वामी एक प्रकारनु सम्यक्त्व सप्रतिराजाने घटेने थथवा वे प्रकार, संनववे पण ऋण प्रकारनु घटमान नथी केमके पहेतातो उपशम सम्य क्वनो सपतिराजानेविपे सदेह, ते उपदेश प्रथमतो प्रथीनेदे हाय थथया उप शमश्रेणीयेहोय त्या प्रथमतो तेना लाननो सदेह एटले तेवखते सप्रतिराजायें प्रथिनेदकरी उपशमसम्यक्त्व पाम्यु होय एका निश्चयनु सवेहवे थने बीज उपम मश्रेणी उपशम सम्यक्त्व होय ते उपशमश्रेणीतो तेकाले विछेद पामीठे थने झायकपण न घटे केमके आपकश्रेणीपण विष्टपामिने तेथी सप्रतिराजानेविपे क्षयोपशम सम्यक्त्वज सनवेठे परिशेषानुमानेकरीने काकाटिनेद थकीपण त्रि विधपणु हा सनवतोनथी थायदक्ष्यनो सनववे पण कारक रोचक्नो सनब वते पण मिथ्यात्व समजित दीपकारख्य तृतीयनेदनो थसनवडे यने चारप्रकार पण सम्यक्त्व सर्वथा नघटे तेती उपशम श्योपगम दायिक थने चोथु साला दनमर्माहे लिये तेवारे चारनेदथाय ते उपशमसम्यस्त्वथकी पडतायका थनता नुवंधियाने उदयठता मिथ्यात्वप्रतें जावावाठतो एवाजीपने सासादन सम्यक्त्वन धारणहसे तेतो थनतानुवधियानोउदय तेणे कवलितपणामाटे कलुपपणु थने पचिप्रकारनु सम्यक्त्वपण सप्रतिराजानविपे नघटे केमके वेदकसम्यकत्वना थ नावथी एटले वेदकतो हायकपामति वेलायें श्योपशमनो चरमपुजल ग्रासदता ने होय तेतो सप्रतिराजाने रिपे सनवियेनही वजी दायिकसम्यक्त्वनी नावपी ए दशविध निसर्गरुच्याटिक पण सर्व तिहा सप्रतिराजानेपिपे घटतानथी सर्वनेद एकस्यले सनोनही तेमवता एटला प्रकारका सम्यक्त्वनुधारण सप्रतिराजा ना दृष्टांत तमे केमकयु एम शिष्यपुवयु हवे गुरु उत्तरकहेते केसम्पावतो सप्रति राजानीपरे निश्चलधरवु ते बनी शासनीत पप्पमाण परपितोयको एकादिनदेहोय ऽन्येवमेवयाप एनो थर्य एमजकरयो तथाच सनिरपद्यमिति जेम सर्व समजसहोय एगविहे इत्यादिक सम्यक्त्वनेद गायावृत्तिनो ए मा थर्थजायो उत्तराध्ययनमापण याचीसम थ ध्ययने दशप्रकारनु सम्यक्त्तकपुते निसरगुपएसईत्यादि ए तेजीममी तथा चाय समी गायानो थर्पने •ho सम्यस्त्वविचारगर्मित सदावीरजिनस्तवन. ទចល वेदहयाही १७७८ मितेवर्षे राजादिनगरस्थेन । विवुधोत्तमाब्धि शिशुना न्या यादिजलविना नाम्ना ॥१॥ सम्यक्त्वस्तवनस्या ऽस्यलोकनापानिववंधस्य ॥ख परेपाम् स्मृतिहेतो, रकारि वालावबोधोयं ॥ ५॥ युग्मं ॥शास्त्र विरुदंकिचि उपयुक्तं बुद्धिमांद्यतो मयका ॥ तत्संशोध्यं विरुपकारपरैर्महामतिनिः ॥ ३ ॥ दाजठो माइ धन्ननुपनतुंदेशी. जडजलपणपोते सिंञ्युकावनबोले । ततसंगतिलोढुं तेहनेपणतसतोले ॥ तेम गुणहीणो तोपण दास तुमारो ॥ अवगुणवेपी प्रजुनी पारउतारो ॥ १ ॥ तुं गुणमणि दरित वहरि जगजेणे॥ मुजकांग्नतायो तुज संगतिनही तेरो॥ थल गो तहिविलगो तुमुफ दिलथीदेव ॥धविचलपदयापो ॥ ढीलतणीसीटेव ॥२॥ न होतो मुजदावे नहीमूकुंकरुंसोर ॥ जालीदिलनीतर घालीकरसुंजोर ॥ जातोकिम टीवा, विणशिवसुखजिनराल ॥ तहेजे जो देशो तो रहेहो तुमलाज ॥३॥अविन यमुमखमजो इंई मूढथयाण ॥ करतांनविधावे वीनतडोजिननाण ॥ वालक जेमबोले कालोगहिलाबोल ॥ ते मातपितामन, लागे, अमृततोल ॥ ४ ॥ इणिपरे प्रमुस्तविङ तमकितलेशविचारे ॥ यागमधनुसारे मुजमतिने थनुहारे ॥ संव तरुतुरसम्मुनि चंसंवत्सरजाणी ॥ १७६६ ॥ नादरवेमाते सीतपंचमीगणवाणि ॥ श्रीतपगवनायक श्रीविजयरत्नसूरिंद ॥ सुरगुरुजश यागलें करजोडेमतिमंद। तसराजेपंमित उत्तमसागरसीत ॥ कहेन्यायसागर प्रनु पूरोसंघजगीत ॥ ६ ॥ - इतिश्री सम्यक्त्व विचार गनित श्रीमहा वीरजिन स्तवन वालाववीध सहित संपू " थयो कल्याणमस्तु सुनंनवतु.

ए पड्डव्यविचार. ।। श्री तीर्थनायकाय नम ॥ ॥अथ श्रीपड्मव्यस्वरूप प्रारन्यते ॥ इध्यमा पहेलु जीवश्व्य वे तेमा चेतना पदार्थ के थही चेतना ते उप योग कहिये तेउपयोग वे प्रकारनो के एक साकार ने बीजो निराकार तेमा सा कार ते ज्ञान अने निराकार ते दर्शन जाणवु एज्ञान तथा दर्शननो विचार बुद्ध यो , ते धागल कहेवाशे, त्याची जाणी लेवो ते जीव वे प्रकारना -एक मिथने वीजा ससारी तेमा जे श्रष्ट कर्म रहित थया ते सिम जाणवा तेना पटर जेद वे ते याप्रमाणे - (१) तीर्थकर विद्यमान पता जे ससारने तरीने मुक्तिने पाम्या ते चतु विध सघ थथवा प्रवचनवक्ता प्रथम गणधरादिक जाणवा यमुक्त तिक्षाते “तिउ नते ति ति करे तिठ गोयमा, अग्हा ताय नियमा तिबकरे तिचंपुणो वा उवणो समण सघो पढम गणहगेवा" एवी रीते तीर्थसिम जाणवा (२) जे तीर्य ऊपनाविना तथा तीर्थनो विछेद थया पठी मुक्तिने पाम्या दे, ते मरुदेवी प्रनृति, श्रीच प्रनु तथा श्रीसुविधिनाथ स्वामीना मध्य समयने विपे धर्म पिछेद थयो उता केटलाएके जातिस्मरणथी टीदा सीधी ने सिख थया ते थतीर्थ तिर जाणवा (३) जे अष्ट महाप्रातिहार्य चोत्रीत अतिशय पात्रीस वाणीगणे, तीर्थकर पद लोगवीने सिह थया ते श्रीपन देव नगवान प्रमुख सर्व तीर्थकर सिह जाणवा (४) जे तीर्थकर पद पाम्याविना तिका यस्थाने पाम्या ते सामान्य केवशी थतीर्थकर लिख जाया (५) जातिस्मर णादिके वाय पामी मोदे गया ते स्वयंवुद्धि सिम जाणवा (६) जे काई बाह्य प्रत्यय देखीने ते निमित्त बोधने पामीने मुक्त यया ते प्रत्येकयुद्ध सिम जाणवा थागका स्यारे स्वप६ थने प्रत्येस्युरामा विशेषता छ ? उत्तरबोधि, श्रुति, लिंग तथा पनि ए चार प्रकारना जेद ले स्वयंचुक ते जोविस्मरणे करी थथवा थवधि ज्ञाने करी वाह्य प्रत्यय दीविना वोधने पाम्या , ते जेम तीर्थकर तथा यतीर्थकरमा व्यतिरेकपशु दे ते अधिकार थही पण जाणी लेगो तीर्थकर साक्षात त्रीजे ठामे क्या वे माटे,थने प्रत्येक्युछ तो का ह्यकरण पन तथा घजादिक देखीने बोध पाम्या , पण ते नियमे एकारी . पड्ऽव्यविचार. जाएर विचरे ते ए प्रथम प्रत्येक बोधिनेट वे. यने स्वयंबुझ्ने पूर्वाधीत श्रुत होय तो तेने देवता लिग थापे, अथवा गुरुनी समीपे जईने लिंग धारण करेठे. लिग ते साधु वेप रनोहरणादिक जाणवा तथा ते जो एकाकी विचरवाने समर्थ होय तो एकाकी विचरे , नही तो गहमांज विचरे वे. यने जो पूर्वाधीत श्रुत न होय तो अवश्य गुरुनी पाठो जईने वेप ग्रहण करे; अने तेनी साथे विचरे ए नियम वे. यने प्रत्येकवुन तो पूर्वनवाधीत श्रुतज्ञानीज होय , ते जवन्यथा अग्यार अंग तथा उत्कृष्टथी कांऽक न्यून दश पूर्व नगेलो जावो. एने लिग देवता दिए वे ; अथवा लिगरहित पण होय. एम श्रुति तथा लिग ए वे नेद मला त्रण भेद यया. अने स्वयंबुझ्ने पात्रादिक दशविध उपधि होयठे एम का , ने प्रत्येकबुझने तो जघन्यथी वे प्रकारनोज उपधि कह्यो ; तथा उ रूटथी नव प्रकारनो उपधि पण कह्यो वे. ए वस्त्र विना पण उपधिना नेट जाणवा. (७) जे चुछ एटले आचार्यना कहेला उपदेशथी वोपने पामीने दीक्षा लई अनुक्रमे मोदने पामे ते वुश्बोधित सि६ जाणवा. (G) जे स्त्रीनु लिग अथवा चिन्ह उतां मुक्तिलनिवस्या ते ते स्त्रीलिंग सिक्ष. ते लिग त्रण प्रकारनुं -एक जेने फुफमदाहनी पते पुरुपनी थनिलापा होय : वीजुं शरीर निवृत्ति निनव तथा स्तननागादिक जेने होय; यने त्रीजु नेप य्यते तिलक. तबोल, नेत्रांजन, वस्त्र, हार, डोर श्रने नूपुराटि लक्षण वाह्यरुत शृंगाररुप होय . ए त्रण लिग तमार्नु भत्र शरीरनिवृत्ति सदाण निंग ग्रह ण करवं. ते उतां चारित्रनी प्राप्ति यईने जे केवलावस्या पामीने मोक्षजाय ते स्त्रीलिंग सिड कहेवाय ते यागंकाः- वेदनी वर्जना शालारु करी ? उत्तर.- वेट उता पथारख्यात चाग्नि तथा केवल ज्ञाननी प्रानि यती नथी. माटे तेनो नवमे गुणगणे अनाव थाय. तोज ऊपरतां गुणगणापत्ये धागेद यो गकेले. थने त्यार पठी सर्व घातिक कोनो क्ष्य कोने माटे वेट सदाण लिग वयं ते. अने शृंगार लक्षण पण काई प्रधान नथी. केमकं, गोले शृंगार सजीने सिंहासन पर बैठती ठतां गुन ध्यान नावना नावती यकी स्त्री केवल झान पामेते. तेम शृंगार रहित थई यकी पूर्वोन वयस्याए करीने पण कंचन झान पामेने. माटे शृंगार मोदनो गेयक नयी. गरीग्नो याकार तो बिजोग रोधक दोपज नही; फेमके. ज्यां सुयी मनुष्य गनिनेविपे मनुचर्नु वायुष टोय ते, त्यां सुपी ए चिन्ह होय.

कारेकरी यास्त उता केवलज्ञान पाम्यो केमके, ते पस्तथकी मृताथी जए पड्च्यविचार. थाशका - (दिगंबरी) स्त्रीने मोदनी प्राप्ति थतीज नथी, केमके, मोद ते चारित्रने बाधीन , ते चारित्र स्त्रीने उदय थाने नही केमके, स्त्रीने सर्व पुरुषविना रहेवाई शकातु नथी स्वीना थगोपाग सर्वथा पुरुषने थनिनवकारी तेथी ते घामा रखाई शकाता नथी, थने ते ढांकवाने थर्थ वस्त्र धारण करवा पढे वस्त्र राख्याथी परिग्रह थायठे, यने परिग्रहवाला मनुष्यने मूर्गनो सन व होयवे ज्यासुधी जेने मूळ वे त्यांधी तेने सयमनी प्राप्ति यती नथी, माटे स्त्रीने चारित्रनी प्राप्ति न थाय, थने चारित्रविना मोदनी प्राप्ति ते केम थाय ? वली ससारमा सर्वोत्कृष्ट पदवीनी प्राप्ति सर्वोत्कृष्ट थध्यवसायथी यायठे, एवात दिगवर तथा श्वेतांबर वधाने सम्मत ते सर्वोत्कृष्ट पट वे प्रकारनु - एक सर्वोत्कृष्ट पद खनु स्थानिक ने ने बीच सर्वोत्लष्ट पट सुखनु स्थानिक ने ते मा सर्वोत्कृष्ट उखनु पद सातमी नरक पृथ्वीनी प्राप्ति ठे, थने सर्वोत्कृष्ट सुख ते मोद पदनी प्राप्ति ने तेमां सप्तम नरक पृथ्वीने विपे स्वीनु गमन ई शके नही एम सिद्धांतोमा का ठे, ज्यारे एवु पाप उपार्जित वीर्य स्त्रीने हातु नथी त्या मोक्षपदनु उपार्जन करवा जेवु मनोवीर्य ते स्त्रीने क्याथी होय। माटे स्त्रीने मां नो सनव नथी वली स्त्रीए पूर्व नवातरनेविपे माया मोहनीयकर्मनु उपार्जन फखु दायचे के जेथी स्त्रीवेद मलेठे, माटे स्त्री मायावीज होयठे ते कारण माटे ते स्वानावे कुटिलज होय. एा न्याये करीने स्त्रीने चारित्रनी प्राप्ति पाय नही। वली साधु तो वनवासी होयडे, ज्या घणा मनुष्याटिकनो सघट्ट होय, त्या साधु रहे नही केमके, त्या ज्ञान तथा ध्याननो व्यायात थायठे श्रने स्त्रीया तो एकाकी रहेवा नु नथी ज्या वमति होय त्यांज रहेवाई शकायठे केमके, स्त्रीने एकाको विचरतां ना शोनमा दिन पडेने घणामा रहेता प्रतिवध नमेले, यने राग देपमा पढे, पटे स्त्रीने चारित्र पण नही ने ते चारित्रना थनावे मोद से क्याथीजहाय (श्वेतावरी) स्त्रीने वस्त्रनो परिग्रह कहेवो नही जेनी ऊपर मृग पत्रे ते परियह कहेगायले, मूर्गविना परिग्रह कहेवायनही यत हा वुत्ता" एम पीमिक्षांतमा कपुरे ते कारण माटेज भरतचकनि पदरस नाता, चौसठ हजार थतेरी सहित दर्पण सदनमा वेठो उता तथा मत . उत्तर - - मुछा परि हता ते माटे जीग्नेमाटा परियह तो ममत्वनाव के थने जे ममत्व ना की रहित तेने तो धनधान्यादि सपत्ति पण वार करी शक्ती नयी जाए पड्डव्यविचार. ए३ मन मानिये तो संसारनेविपे सर्व दरिही मनुप्योने केवल ज्ञाननी प्राप्ति थईने मोक्ष्नो प्रसंग धावतो. केमके, तेनी पाशे कोई समये पण एक कोडीमात्रनो प रिग्रह होतो नथी. तेम उतां तेवा प्राणीतो संसारमा घणा रजडता दीठामा धावे , पण तेउनी पाशे मूळरुप मोटो परियह होय; माटे तेउने जुन दशा प्रगट यती नयी. वली श्रीवीतरागे वे कल्प कह्यावेः-एक जिन कल्पने बीजो स्य विर कल्प. तेमां जिनकल्पनो स्त्रीने संनव नथी, परंतु स्थविर कल्पनो संनव वे. पूर्वपदमा कयुं ठेके, उत्कृष्ट पदनुं वाधक मनोवल ,ते स्त्रीने होतुं नथी मा टे जेम स्त्री सातमे नरकेजती नथी तेम ते मोदनेविपे पण न जई शके ! ए यु क्ति पण समीचीन नथी, एवो पण कांश नियम नथी. केमके, केटलाएक पुरुषा दिकने क्षेत्र खेडवानु सामर्थ्य होयठे पण शस्त्रान्यास करवाचं सामर्थ्य नयी हो तुं तेथी गुं थयु ! कोईने कोईएक कर्मनी फुरया न थयाथी गुं वीजा कर्मोनी फु रणानो पण अनाव समजवो के ? एम ठतां जो हतकरी वेशशो तो बीजी घणी वातोमां विरोध प्रावो. जेमके वधुमां वधुपाप उपार्जिने मुजपरिसर्पनीचे वीजी नरक पृथ्वी सुधीज जायते धने पदीउत्रीजी नरकप्टथ्वी सुधी जायचे. धने वधारेमा वधारे पुण्य उपार्जिने ऊपर ते वन्ने जातिवाला प्राणी सहस्त्रार देवलोकसुधी जा पवे. हा मनोबल तो बनेनुं सरखं वे. त्यारे अधोगमन योइंधने कर्व गमन वएं केम थाय! माटे एवो नियम न कहेवो. एवी रीते स्त्रीजातिनो पण एवो स्वना वज ले के उलट पाप उपार्जन करे तो उनी नरकप्पथ्वी सुधीज जाय; परंतु उ कृष्ट संवरनी प्राप्ति याथी मोदनी प्राप्ति तो थायज. वली पूर्वपदमा कयुं के, स्त्रीने मायामोहनीय कर्मनी अधिकताने लीधे चा रित्र उदय थावे नही; ए वात यद्यपि सत्य ठे, तथापि स्त्रीने मोहनीयकर्मनो उपशम तथा क्ष्य होय; एनो कोनाथी यनंगीकार थाय नही. घने सर्वथा स्त्रीने मोहनीयकर्मनो क्ष्य अथवा उपशम थतोज नथी एवं तो तमाराथी पण केवासे नही. केमके, अनंतानुबंधी कायनो उपशम अथवा क्ष्य थाय त्या रेज सम्यक्त्वनी प्राप्ति थायले. थने अप्रत्याख्यानीय कपायनो उपशम अथवा दय थाय त्यारेजदेशविरतिपणुं प्राप्त थायवे. एम तो तमे पण अंगीकार करोठो त्यारे स्त्रीमा सर्व विरतिपणुं केम मानता नथी! तथा गोमासारनी गाथामां स्त्रीने मोद कह्योः- “यमयाला पुंवेया, उत्थीवेयाय हुँति चालीसा; वीसन पुंसग वेया, समए एगेण सिनंति." एवो पाठ तमारा सिखातोमां पण दीठामा N UU पड्डव्यविचार थावे तेमज कर्मग्रथ, तथा गुणस्थान कमारोहनो विचार करतां प्रसिक्षपणे स्त्रीने मोफ्नो संनव थायवे जेमके, नवमा थनिवृत्तिकरण गुणस्थानकसुधी त्र पो वेदनो उदय होयठे त्यां ठासन प्रति उदयने पामे ठे पठी सूक्ष्म सपराय दशमा गुणस्थानकमा पण गास प्रतिउनोज उदय होयटे, एमा त्रए वेद त था सज्वलननो क्रोध मान ने माया ए प्ररुति होती नयी एवीरीते उदया धिकारमा का वे ए कपरथी जाणवु जोश्ये के जो सर्वविरति चारित्र स्त्रीने न होय तो नवमा गुणस्थानकसुधी केम पहोची शके, माटे स्त्रीने सर्वविरतिपणु मानवुज जोए ने ए विपे सारीरीते विचार करी जोजो वली पूर्व पक्षमा का के, स्त्रीने एकाकी विचरवानो अधिकार नथी, केम के एकाकी विचस्याथी तेना शीलमा विपन्न पमवानो सनव थाय घने जो पचनी साथे विचरे तो ममत्वनाब थाय ए उक्ति पण विचाररहित . केम के एकाकी विचरता पण जो मन शुद्ध होय तो काई पण शीलनो जग यतो नथी स्त्रीने विपे तो एषु धैर्य होय. के तेने देवो पण मोलायमान करी शकता नथी तेम पचनेविषे विचरता ममत्व पण सनवे नही, केमके जो तेना मनमा वीतरागाव स्था होय तो ससारमा जीवने जे सरागपणु वधननो हेतु वे ते जो उपशमने पाम्यो तो पठी तेने वन तथा घर बन्ने सरखा ने एकाई जीवने बधनना हेतु थता नथी वध ते एक रागादि लक्षण / उपयोग इत्यादिक विचार के रता तथा श्रीवीतरागनी थाहा जोता तो स्त्रीने मोद थायवे माटे एवा हठनो त्याग करवो उचित एवीरीते स्त्री सिम जाणिये -(ए) जे पुरुपना लिगवडे सिस्थाने पहोचे ने ते पुरुपलिग सिह ते लिग पण पूर्वनी पढे त्रण प्रकारना - वेद, शृगार ने श्राकार तेमा वेद त्याग कर वा योग्य केम के, वेद उतां निश्चेकरी मोदनी प्राप्ति थायज नही शृगार ता कचित् मुक्ति थायवे ने कचित् नथी पण थती तथापि शृगार अप्रधानज थने थाकार उता मोक् थाय ले माटे ते पुरुप लिग सिम कहिये (१०) जे नपुसक लिगे सिमत्व पामे से ते नपुसक सिद; ते लिग ण पूर्वोक्त रीते त्रण प्रकारना -वेद, शृगार ने थाकार तेमा वेद थने शृगार वे त्याग करवायोग्य थने याकारने विपे मोक्ष थायठे माटे ते ग्रहण करवा योग्य रे ते आकार पण त्रण प्रकारनो - एक इडियदी, एटले पणादिक नग करेला, वीजा इश्यि थवयवसहित एटले बाल्यावस्याने विपे कामादिक का पड्डव्यविचार. घएय चेष्टायें करी इंडियनुं मूलयकी वल गमावीने नपुंसक थया होय ते. अने त्रीजा जे जन्मधीज नपुसक यया होय ते. ए त्रणेने लोको नपुंसक कहे. परंतु पर मार्थे जोतां पहेला वे ने नपुंसकपणुं नथी. केमके, तेउने विपे पुरुप वेदनो अनि लाप होयते : नोगने अर्थ स्त्रीनी श्छा करे ; परंतु पुरुपनी श्ता करता नयी. पण गुं करे के तेजना थवयव सावचेत होतां नथी. तेथी योनि नोग न थाय. एउ नपुंसक पणाने वीजी कुचेष्टाथी पाम्या वे; माटे पुरुपवेद वे, नपुसक वेद नयी. नपुंसक वेद तो जे जन्म जात होयठे तेनेज कहिये. ते नपुंसकने पुरुष तथा स्त्री ए वनेने नोगववानी अभिलाषा थायवे : माटे तेज वास्तविक नपुंसक कहेवाय. पत्रमधाचार्य एम कहेठे के, जे स्वनावे जन्मजात नपुंसक होय ते ने चारित्र आवे नही, त्यारे तेने मोक्ष पदनी प्राप्ति ते केम थाय ! माटे कृत्रिम नपुंसक सेवो. धने नवीन थाचार्य एम कहे के, जे कृत्रिम होय ते नपुंसक न कहेवाय. जेने नपुंसक वेद उदयागत होय तेनेज नपुंसक कहिये. रुत्रिमने तो पुरुप वेद उदयागत होयते, तेथी तेने तो पुरुपवेदन कहिये. एवं विवेचन करी से. एवा नपुंसकलिंगे जे मोक्ष थया ते नपुंसक सिम कहेवाय वे. (११) जे रजोहरण तथा मुखव स्त्रिका प्रमुख बतां कैवल्य पद पामे ते स्वलिंग लिकहेवायठे. (१२) जे तापसादिक प्रमुख वीजा चिन्हवान तो लोकांत स्थित थयावे ते धन्य लिंग सि जाणवा. (१३) जे नरत प्रनृति गृहस्थ वेप धारी वतां लोकना मस्तकनेविपे स्थित थएला ते गृहि लिगी सिम जाणिवे. (१४) जे एक समयनेविपे एकलोज सर्वोत्कृष्ट सुखना धामने पाम्यो होय ते एकाकी सिम . (१५) थने जे एक समयनेविपे थनेक जीवो लिइल पाम्या होय ते अनेक सिम कहेवाय ठे. वली जे सिधावस्था पाम्या बच्चे बीजो कोई समय पई गयो न होय कितु तेन समय ते धनंतर सिद्ध कहिये; थने जेने सिद्धावस्था पाम्याने समयथी उपरांत काल थई गयो होय ते परंपर सिक्षक हिये. इत्यादिक सि जीवोना नेद वे. हवे वीजा संसारी जीवोविपे थाम समजवुः ते संसारी जीव वे प्रकारनावे- एक स्थावर वीजा प्रस. तेमां स्थावर पांच प्रकारना :-टथ्वीकाय, थपकाय, तेउ काय वाउकाय ने वनस्पतिकाय. ए पांचना वलीसूक्ष्म थने वाटर ए वेवे नेद के.थ ने त्रस जीवो चार प्रकारना -ड़िय, तड़िय, चरिंडियने पंचेंश्यि तेमां पंचेश्यि चार प्रकारना-देव, मनुष्य, नारक ने तियंच. एबधा जीवोविपे सविस्तर जीववि थाकाशाति पए पड्डव्यविचार चारादि प्रकरणोमाथी जाणीलेयु ए जीव थनतने , तेहाँ चेतन गुणवे तथा रकादि पर्याय ने जे गुणवत तथा पर्यायवत होय तेने इव्य कहिये गुण प य इव्य मिति वचनात् एवी रीते जीव इव्य जाणवु थजीव इव्यविपे विचार थजीच इव्य पांच प्रकारनु - धर्मास्तिकाय, थधर्मास्तिकाय, काय, पुजास्तिकाय ने काल तेमा जे गतिपर्याय ने नजनाराजी तथा पुरुनोने सहाय्यकारी होय ते धर्मास्तिकाय ज्या ज्यां धर्मव्य ते त्या त्यां जीव तथा पुन लोनी गति थायडे जेम के, थलोकनेविपे ए इव्य नही होवाथी त्या तेथोनी गति थती नथी ए विपे दृष्टांत - जेम मत्स्यनी गतिने सहाय्यकारी जल ठे एटले ज्या ज्या जल दोय त्या त्यां मत्स्यनी गति थई शकेचे, ते मत्स्य ज्यारे ज लथी वाहार स्थलनेविपे थावे त्यारे तेनी गति थई शकती'नथी केमके, त्या जस सहायकारी नथी माटे तेम धर्मास्तिकाय, पण जीव तथा पुजजोनी गतिने सहायकारीले ए धर्म इष्य यद्यपि एकज वे तथापि नयना नेदेकरी एना त्रण प्रकार वे - सयह नयेकरी, व्यवहार नयेकरी तथा जुसूत्र नयेकरी तेमा व्य वहार नये करी धर्मास्तिकाय व्य असख्यात प्रदेशात्मक धर्मास्तिकाय एक ने तेम व्यवहार नयेकरी पोतानी बुधिए करी परिकल्पित ते धर्मास्तिकायना वे नाग, त्रण नाग, चार नाग इत्यादि घणा देश दे थने शसूत्र नये करी थत व्यात प्रदेशना प्रत्येक प्रदेशने धर्मास्तिकाय कहिये, एटले खध, देश तथा प्रदेश एने धर्मास्तिकाय कहियें एनो गति लक्ष्ण गुण ठे, भने थगुरुलघु लक्ष्ण पर्याय ने थधर्मास्तिकाय ते स्थितिना पर्यायने नजनारा जीव थने पुरनोने सहाय्यका जाणवु ज्या ज्यां थधर्मास्तिकाय होय, त्या त्यां जीव तथा पुजलोनी स्थिति शके ने जेम के, थलोकनेविपे ए इव्य नही होवाने लीधे जीव तथा पुनो स्थिति थ शफती नथी एविपे दृष्टांत -स्थितिना पर्यायने सेवन करनारो पथिक, तेने गया सहकारी के एटते था ससारमा देशाटन करतां मार्गनेवि कित थई पीडाने पामेजो जे जीव, ते ज्या वक्षनी सारी वाया होय वे, ते के विश्राम करीने साताने पामे ने तेम ज्या थधर्मास्तिकाय इथ्य ठे, त्यां विश्रामने पामी रह्या ने ए इव्य पण पूर्वोक्त रीते नयना नेवे त्रण प्रका -तेमा समद नयेकरी थसख्य प्रदेश स्वरुप एक सध , व्यवहार नयना इयनो एफज सघ उतां तेनाधिपरिकल्पित दिनाग तथा त्रिनाग प्रमुख पड्डव्यविचार. उए घणा नेद थायवे. अने जुसूत्र नये करी एना जेटला प्रदेश वे ते प्रत्येक थधर्मा स्तिकाय कहेवायवे. एनो स्थिति लक्ष्ण गुण ते, अने थगुरु लघु लदाणपर्याय ठे. आकाशास्तिकाय ते जीवादिक पांच इव्यनुं नाजन जाणवु केम के, ए इव्य नेविपे पोतपोताना स्वरूपे सकल इत्यो व्यापी रह्यावे. ते वे प्रकारचें वे.-एक लोकाकाश ने बीजोअलोकाकाश. तेमां चौद राज हित लोक कहेवायचे ते अनिय त प्रमाण पहोलो . परंतु धन करिये तो लांवो तथा पहोलो देशीन सप्त रकु प्र माण समान यायचे. अने अलोक अनंतो वे. ने ते गोलकाकार . समस्त पदा थे लोकनेविपे होय , माटे अलोक शून्य . एना पण पूर्वनीपते त्रए नेट था यजे.- तेमां संग्रह नयेकरी अनंत प्रदेशात्मक लोकालोक प्रमाण एक खंध : व्यवहार नयेकरी वुद्धिपरिकल्पित वे नाग,त्रण नाग तयाचतुर्नागादिक अनेक प्रदेश वे; अने शसूत्र नयेकरी ते प्रत्येक प्रदेशरूप जाणवू. एम एना पण खंध, देश तथा प्रदेश ए त्रण नेद थया. एनो श्रवकाश लक्षण गुण , अगुरुलघु पर्याय ते. काल ते नव जीर्णोपादक जाणवो. ए सकल पुजलोनेनिपे नवीनता तथा जी र्णता होयते तेनो सहकारी कारण वे. अाशंका:- नवीनता तथा जीर्णता थवी एतो पुदगलनो स्वनावन , तेमां कालवं युं काम ? पुदगलो पोतानी मेलेज नवीन पर्यायोने धारण करे, तेम ज जीण पर्यायोनुं पण नजे वे. केम के, पुदगल अने जीव ए वन्ने परिणामी व्य ; एवं श्री जगवाने कयुं . जे पूर्वावस्थानो विनाश अने उत्तर अव स्थानु उत्पादन तेने परिणाम कहेठे. एटले पर्यायनो उत्पाद तथा विनाश था यते; परंतु इव्यथी उत्पाद तथा विनाश कहेवाय नही. एवी रीते पुजलनेविपे परिणामप' होवाथी स्वयं उत्पाट तथा विनाशरूप नवीनता तथा जीर्णता प यिने पामी रह्या ठे. कांई इव्यनो सवर्या नाग तथा उत्पाद थतो नथी त्यारे काल इव्यनी अधिक कल्पना ते शासारु करवी जोये? उत्तर ---- यद्यपि नवीनता तथा जीर्णता जे पुदगलना पर्याय ने ते पुदगलने विपेज वे. तथापि त्या निमित्त कारण काल इव्य . केमके, नियते करी होय वे. परंतु अनियत पणे कही होतुं नथी. जेमके, चंपक, अशोक तथा सहकार प्रमुख वनस्पतिनेविपे कुसुम संपटा, काले थाय ; महा हिमकण मिश्रित शी तल पवन काले थायचे; मेपष्टि, घनर्जित, तथा विद्युत् जात्कारादिक कालेकरी थाय ; तेमज स्तुविनाग, वाल कुमार तथा यौवनावस्था, तथा पलित गमादि चार्य जाणीजेजो ज्यां थादित्य गतिठे, त्यांज काल व्यवहार से एथधिकार ध ទប្រច पड्व्यविचार. क पण काले करी थायठे इत्यादिक व्यवस्थानेविपे काल सहकारी वे काल निमित्त कारण न होय तो सर्व वस्तु व्यवस्था रहित थई जाय सत ऋतु थाध्या विनाज चपक, अशोक तथा सहकार प्रमुख वनस्पतिनेपि फूल थावे, ऋतु धागल पाठल : जाय, वाल्यावस्थानेविपे जरा थाय, स्थामा बाल्यावस्था थाय , यौवनावस्था प्राप्त थयाविना वातिकाज गर्न करे, इत्यादिक थव्यवस्था, कालव्य नही मान्याथी थई जाय एटले वधु कि तज थयां करे पण तेम तो काज थतु नथी, तेथी काल निमित्त कारणों के सर्व पोतपोतानी कालमर्यादाएकरी यायवे 'माटे पुदगलतानेविपे नवजीर्णता थापादक काल वे ते काल एक प्रदेशी समय लक्षण वे ते समय पण जे व मान वत्तेते ते लेवो केमके, थतीत समयनो विनाश वे धने धनागत समयन सत्पाद थयो नथी ते वर्तमान समय पण यनतो वे जेटला पुजन इव्यना पर्याय ते ते प्रत्येकनेविपे एकेक वर्तमान समय वे तेमाटे यद्यपि एक वे तथापि थनतनेविपे लागेलो होवाथी बनतो कहेवाय . थाशका - (थन्यतीर्थी) एक तां थनतनी साथे केम लागे । उत्तर - जेम तमे सत्ताने एक मानता उता ते थनेक इव्यपर्यायनेविपे रहेन मानो तो। तेम ए पण मानी लेवु जेने तमे सत्ता कहोठो तेने थमे वर्तमान समय कहिये ठेये मात्र नामनो फेर वे थाशका -समयतो एक से बने पूर्वापर कोटी विनिर्मुक्त वे त्यारे थावनिकादि व्यवहार केम थशे? तेतो असख्यात समय मलेठे, त्यारे एक थावनिका थायठे उत्तर - श्रही वे नय - एक निश्चय ने बीजो व्यवहार निश्चय ते परमा र्थनी साथे मजेने थने व्यवहार ते लोकिकविपे होयचे तेमा निश्चय नये करी तो एक समय लक्षणकाल ,थने व्यवहार नयेकरी थावनिकानी कल्पना ने ते थसबूत कल्पनाएकरी कहिये ये - थसख्यात समय मले त्यारे एफ यावनि का थायो , तेवी एक कोडी सडसन लाख सितोतेर हजार वगेने शोज थापनि का थाय त्यारे एक मुहूर्त याय यथा समयावली मु० ए सर्व व्यवहारे करीनेन फहेवाय परतु परमार्थे जोता तो सा कल्पना ए समय लक्षण कान पि सताजीश लाख याजन प्रमाण समय क्षेत्रनेविपे वे पण वाहार नथी ते पर बवाह प्रति सूत्रनी निमा श्रीयनयदेवसरिए होने यत "थादिन्य ग पड्डव्यविचार. उएए ते स्तनकत्वात्. कालनु व्यंजक थादित्यगमन ते झापक के. अने वाहारना ही पनेविपे थादित्यनुं गमन नथी; त्यां स्थिर वे. याशंका.- काल तो मात्र मनुष्य देत्रनेविपेज ने, तेथी बाहार नथी एवं तमारा कहेवा ऊपरथी थयुं. त्यारे वाहा रना दीपोनेविपे तथा स्वर्ग नरकनेविपे कालनी केम खवर पमे? उत्तरः- मनुष्य त्रिनी थपेदाए करीनेन त्यां कालनो व्यवहार कहेवाय ते. यत्र समय ते इव्य जाणवू: इव्य परावर्तन लदण गुण जाणवो; अने अगुरु लघु पर्याय जाणवो. एविपे दिगंबरी थाम माने। - "लोकाकाशनेविपे जेटला घाकाश प्रटेग , तेनेविपे एकेक कालनो घणु वे. एटले अतंरख्यात कालना थषु ते. एवं श्री ने मीचंद सिमातिए इव्य संग्रहमां का वे. यतः सोयागास पएसे, इफेक जेवि यादु इशिका : रयणाणं रासीमिव, कालाणु थसंख वाणि. तेवा संरख्यात का लापु, संमेजन थाय त्यारे एक समय कहेवाय. समय ते पर्याय ठे. ते थषु पण सूर्यममलनमिलण निमित्त कारण पामीने एकामले त्यारे समय नीप जठे. जेम चक्रनमि निमित्त कारणनी जोगवा पामीने मृत्मिनो घढो नीपजे वे. तेवी रीते एपण जाणी लेवू" एने श्वेतांवर टूपए जो मानिये तो ठगे अन्तिकाय था. केम के, जेने खंध. देश तथा प्रदेश होच तेने यन्तिकाय कहे. घढी समय ते संग दिनाग कल्पनारुप देश तथा कालाषु ते प्रदेश उके. एम मान्याथी विपरीतता था.धने यस्तिकाय तो पांचज .धने कालने तो वतावर तया दिगंबर को पण अस्तिकाय कहेता नथी पुद्गल इव्य जे वन्तु पूर्ण तया गजन धर्मपुक्त होय ते जाणयु- एटले कोड पुद्गल पूगता होय, थने कोऽएक संधनेवि गजन एटले वीर गजता दोपवे. एवं कानादि कारण पामीन यायचे. एवो पृन्तानी बनायज हो चने, तेना चार नेट वेः-गंध, देवा प्रदेश ने परमाणु तेमा प्रथम संयना अनंत प्रकार - प्रदेश एकता पयाची प्रिटी बंध.प्राण प्रदेशां मन्याची निटे भी बंध. एम पावत् संपात प्रदेगी. धनंग्यात प्रटी तथा अनंन प्रगी पंध जाती सेवा तेमज देग पराजिनाग तथा प्रिनाग जहाण जाणी मेयो. बागा-संघमा गण परमातु यावी मजे व माटे त्या देश व्यवहार गनी नेमकेतना जंटला देदा वगिर तंटना रं.मरे,रामक बंध घी वर्ष करिव तेने व दवा सहिद पन प्रातरिनाम स्यारी न पाय; ने दिये.- एम एक बंधनेवि A - GOO पड्डव्यविचार यावत् चार, पांच, संख्यात, घसंरख्यात तथा थनत सुपीथई शकेले.एवी रीते जे वडो मोटो बंध होय तेना अनुसार देशनी कल्पना धर्म शके वे परतु मान के प्रदेशिज खध होय तेनेधिपे देशविनाग केम भई शके १ फेम के, तेमा तो मा वे परमाणुउनुज मेलन होय वे तेने ज्यारे वे प्रदेशोनी कल्पना थाय त्यारे वध परिणामनेविपे देश तथा प्रदेश ए वनेनो व्यवहार मिझ होवाथी तेमा देश कीयोने प्रदेश कीयो समऊवा ? उत्तर -देश भने प्रदेशमा काई सर्वथा नेद नथी केम के, स्वधनेवि विनाग बिनागादिक अवयव , तेने देश कहे ते देश पण वे प्रकारना -एक सादा वे, वीजा निराश . एटले जे साश वे तेने पण देश कहिये ने जे निराश ले तेने पण देश कहिये तेम निराशने प्रदेश पण कहे . प्रष्ट जे देश तेने प्रदेश कहि ये, एटले जेमा वीजो कोई यश मले नही तेने प्रदेश कहेवो ए माटे वे प्रदेशी था खधनेविपे देश पण वे कहिये, ने प्रदेश पण वे कहिये एटले जे वे प्रदेश के तेनेज बे देश कहिये. वे प्रदेशी खधनेविपे साश देश न थाय, कि तु निरश देश ज थायने तया त्रण प्रदेशी खधनेविपे एक वे प्रदेगी खध ते देश थाय, जो एक प्रदेशीया थाय परमाणु पोथईन याय केमके, श्रीवीतराग देवे परमाणुने थछेद्य तथा थनेय को ले. माटे त्या जे वे प्रदेशी देश कह्यो ते साश जापयो, थने जे एक प्रदेशी देश ते निरश जाणवो एम सर्व नामे स धनेविषे विचान ले जेटला ना जे अवयवने ते देश कह्या ने तेज प्रदेश कहिये प्रदेश ते नि प्रदेशीय वयव जावाने सप्रदेशी अवयवन देश कहेते ने ज्या मप्रदेशी ययानो मनव नहोय त्या नि प्रदेशीय अवयवने पण देशन कहने ते वे प्रदेशीया वधनेवि प्रसिद्धपणे जाणवो तथा एक देश प्रदेश लक्ष् ए व्यवहार ते ज्यारे सधरुपे परिणम्यो होय त्यारे तेने परमाणु पुज कहिये तथा जे मधपणे परिणामने पाया नथी ने प्रत्येक प्रत्येक एकांकी रह्याचे तेने परमा पु कहिये यही प्रसगथी कालनी स्थिति मर्यादा निखिये ये -एक परमार वीजा परमाणुनीसाये न मलीने मनावने न पाम्यो होय कितु एकाकीज रह्यो होप, तेनाजन्यथा समय नसल्यातो काल जाणको त्यार पत्री वली रखधरुप परिणामने पामेरे एम एक परमाणु थाश्री समज पण सर्व परमाणु थापीता थनतो काज जाणवो ए कोई समये पण जणा नही, जे ममये सर्व परिमाणुयो सपपणे परिणामने पामेला होय, ज्यारे जा G०१ पड्डव्यविचार. गुं त्यारे लोकनेविषे अनंतानंत परमाणु तूटा दीनामां यावे. अने जे एकाकी खंध रहे। तेनी स्थिति जयन्यथा एक समय अने उत्कृष्टया असंख्यात कालनी होय वे. पुजनतंयोगनी स्थिति उत्कृष्टी असंख्यात कालथी घधिक होय नही. ए पण एक काल यात्री जाणवं सर्व काल थाश्रीतो सर्व कालनु अवस्थान ना ए. केमके एवो कोई पण काल होतो नयी के जे काले सर्व लोक खंधथी शून्य होय. एम विचारी सेवं. एकालनी स्थिति कही हवे कालनी मर्यादा घाम :- परमापु, एकाकी नावनो त्याग करीने यन्य परमाणु क्ष्यणुक त्रियपुकादि साये मतीने खंध नावने पाम्या ठे, ते पाठा पूर्वना परमाणु नावने पामे एटले एका की चाय तेमां जघन्यथा एक समय थने उत्कृष्टया यतंख्यातो काल जाणवो. श्राशंका.- अनंत प्रदेशीया खंधनेविपे जे संयुक्त परमाणु वे ते असंख्यात कालसुधी उत्कृष्टपणे ते खंधनेविपे रहेठे. ते खंधनो ज्यारे जंग थायवे त्यारे ते माथी लघु खंघ निप्पन्न थायठे. तेमां पण ते परमाणु असंख्यात कालसुधीर हेते. एवी रीते एक खंधना अनंत खंध थई शकेले. ते प्रत्येक खंधमां घसंख्यात फालसुधी परमाणुनी स्थिति होवाथी अनुक्रमे अनंत कालनो संनव थायटे; त्या र पठी ते एकाकी पणाने पामेठे. एवी रोते अनंत कालनो अंतर पण संनवेठे. त्यारे थसंख्यात कालनोज यंतर केम कहोठो ? उत्तरः-यरे नाई, जो एटला का लसुधी पुगजनो संयोग रहेतो होय तो एम संनवे पण पुगजनो संयोग तो यतं ख्यात कालसुधीज रहेठे. तदनंतर वियोग थर्ड जायते. यागंका - परमाणु खंधनी साये मलेलवे ते खंधविनाश पामेतो अत्तरख्यात काल उपरांत विनाश पामे एटलेज ए सूत्र चरितार्थ थयो पण ते विवादित प रमाणु यायिनूत खंधनो वियोग यये ते परमाणुने सुं. ते माटे एमके, परमा पुनो खंधने विपे अथवा अन्यपरमाणुनी साथे संयोग थयोठे तेनो पाठो वियोग पण घसंख्याते काले थायठे. उपरांत रहे नही. यागंका. एकाकी परमाणु पणे करी केवी रीते वियोग कहोठो? उत्तरः- सूत्रना प्रमाणे करी कहिये वैए. एटले श्री व्याख्यात प्रज्ञप्ति प्रमुख सूत्रनेविपे कहे ते के परमाणु वली परमाणु पणे नजे तो पाठो उत्कृष्ट यसंख्या ते काले जजे तेमज जे वे परमाणुया मलीने खंध थयो उतां तेनो विध्वंस थया पठी फरी,ते वन्नेनो संयोग जघन्यथी एक समय थने उत्कृष्टयीयनंत काले थायवे. लोकनेविपे थनंत परमाणुउठे, अनंत क्ष्यणुक खंध ; एम व्यणुक, चतुर १० नेविपे एकज प्रदेश कहेवो, तथा धनत प्रदेशी खध उत्कृष्ट परोयसरख्यात प्रदेशने । तथसख्यातमो नाग थवगाहीने रहेठे. धने कोक व्यात प्रदेशी कोईथसरख्यात प्रदेशने रोकी शके नही/ पड्डव्यविचार पुक, सख्याताणुक, थसख्यातायुरु थने थनताणुक, एटली जातिना खथ ते सर्व यनत थनत प्रत्येके प्रत्येक वे तेनी साथे प्रत्येके प्रत्येके उत्कृष्ट का स्थितिये जो मिले, तो तेनो वियोग थतां पण थनत काल थाय त्यारे पठी फर ने विस्त्रसा परिणामे, ते पुजन सयोग थाय माटे थनत काल कह्यो ठे । वली प्रसगयी क्षेत्रस्थिति लखिये वैये -परमाणु एक श्राकाशना प्रदेशने रोकेले पण वीजा प्रदेशने रोकी शके नही, एटले जेवडो थाकाश प्रदेश ने तेव मो परमाणु ठे, परतु थाटली विशेषता वे के, थापागनो प्रदेश थमूर्तिक ने ने परमाणु मूर्तिक ठे, माटे वे प्रदेशमा पण समावेश थाय, त्रण प्रदेशमा पण त मावेश थाय एम यावत् सख्यात तथा असख्यात प्रदेशमा पण तेनो समावे श थई शकेले, ते खध पण असख्यात प्रदेशी तथा थनत प्रदेशी जाणवा, वे प्र देशी खध जघन्यथी एक प्रदेशमा समाई सके, अने उल्लष्टथी वेज प्रदेशने रोके , तेमज त्रिप्रदेशी उलटथी त्रण प्रदेश रोकेडे, ए प्रमाणे जे खध जेटला प्रह शनो होय ते तेटलाज थाकाशना प्रदेशने उत्कृष्टथी रोके, तथा जघन्यथी सर्व रोको शकेले पण धनतने रोके नही केम के, लोकाकाशनाथनत प्रदेश देज नही थाराका -एक थाकाश प्रदेशमा थनत प्रदेशीया खधनो समावेश केम थाय उत्तर-थाकाशनेविपे अवगाह गुणवे, तेणेकरी ज्या एक पुजन ले त्याज थ नत पुगजोनो समावेश थई शकेले जेम एक प्रदीप प्रनानेविपे थनेक प्रदीप प्रना सो समावेश : जायवे, तथा जेम एक पारद कनेविष सुवर्ण शत कर्ष समाई नायठे एो पुगतनो धर्म के माटे एक थाफाशना प्रदेशमा थनतपरमाणु धन बघणुक, धनत व्यणुक धनत सख्याताणुक थनत असख्याताणुक तथा थ न थनताणुक खध , ते पोतपोताना स्वनावे करी रह्या ठे -समय लोकनेविपे एक सधनी श्रवगहना केम थाय' विचित्र स्वनाव ठे, कोई तो लोकनो सख्यातमो नाग वे, ते पण वली असल्य प्रदेशी तथा थनत प्रदे , कल लोकने थवगाही रत एम श्री प्रज्ञापना सूब बावे, ते केवल समुदातनी पढे जाणी लेवु, ते था प्रमा पड्डव्यविचार. G०३ ऐः-कोईएक अचित्त महासंध विश्रसा परिणामेकरी पहेला समये थसंख्याता योजन विस्तार सहित दंम करी वीजा समये कपाट करे; त्रीजा समये थाणु फरे; चोथा समये प्रतर पूरणा करे; ते करीने समस्त लोकमां व्यापी रहे; पठी पांचमास मये प्रतर संहरे, ना समये यानक नाजे; सातमा समये कपाट नाजे यातमा सम ये दंम संहरीने खेम खेम थाय ; एमां चोथो एक समय कह्यो, ते सफल लोकने विपे व्यापी रहेवा विपे जाणवू, एनुं वर्णन श्रीविकोपावश्यकमां पण विशेपे करेलुंठे. अशंका:- (वाच मतानुसारी) एक श्राकाश प्रदेशनेविपे रहेला एक परमा णुने वीजा व प्रदेशनी फरसना होय . जे समये पूर्व दिशाने फरसे वे तेजस्व रुपे पश्चिम दिशाने फरसतो नथी. तेथी अपर स्वरूपे फरसे के एई जणायचे के मके, जो तेज स्वरूपे फरसे तो पट् दिगतंबंध संनये नही. धने पट् दिग्संबंध तो लोक प्रतिम वे जेम के, था पश्चिम दिग्संबंध, या पूर्व दिग्संबंध. तथा ग्राउ तर दिग्संबंध प्रमुख ठ ए दिगतंबंध निन्न निन कहेवा अन्यथा पट् दिग् फरतना केम कहेवाई शका? थने परमाणु तो निरंश , माटे एफ अंशनेवि व संवं ध निन्ननिन्न केम थाय ? ए कारण माटे परमाणुने सांग कहेवु जाये, त्यारेज निन्नभिन्न स्वरूपे पट दिगायोनी फरसना घटमान थशे. उत्तरः- (जनी) परमाणु तो निरंशज वे. सांग कहेवायज नही. परंतु पुन ल परमाणुनेविषे थचिंत्य परिणाम शक्ति होवाथी तेणेफरी नरंतर्यपणे व दिशा नीसाथै रह्योते. थने व दिशायोनी फरसना करे . पण धंगेकरी फरसना न समजची. (वली वीचने कांकि विशेप पूर्वते.) तमे कम डानना मंतान विपे एकज पने कारण कार्यनाव संबंध मानोठो? पूर्व छान जनक जे क्षण ते प एं निरंश तेम उतां तेमां वे थंगनी कल्पना कंगठी, जे यंग की कार णतंबंध ठे. तेज शेफरी कार्यसंबंध नयी; घने जे अंडोकरी कार्यनंबंध ने तेज शंशेकरी कारण संबंध नथी. ए तमारी मुक्तिये तमागज गतामां पानी वाव ने माटे एम मानवु जोये के, क्षाणतो निरा ने पण वस्तु व्यावनेरी कार्यका रण नाव संबंधनी कल्पना पई के ते. एम परमाणुनेविष पाण दिनार करीयो. हवे वली प्रसंगी त्रिवगानी स्थिति तन्वीचे बजे प्रासादा प्रदेशनंत्रिय जे पुजव्य र ते एक प्रदेवावगाट, संग्ग्य प्रदेशावगाटायचयाचमान्य प्रद शावगाट जपन्यची एक नमपत्थी रहे; ने न्यार पनी एप प्रदेशाचगाट ने डिन देशावगाट पापडे, घनेडिनावगाट ने त्रिप्रसादगाट चारने ने दरवीनीय दीठामा थावे तेने वर्ण कहेतेना पाच प्रकार ठे-रुल, नीत, वेत,पीतने रक्त उठो रस कहे परतु तेनो मधुर रसनेविपे थतरनाव 2 ते था प्रमाणे-सर्व। स्पर्श थाउने-कश, मृउ, गुरु लघु, उल, शीत, स्निग्ध ने रूद ए थान पांच गुण एक परमाणुनेविपे मनी थावे ते याची रीते-पांच गामानोग मे ते एक वर्ण, पांच रसमांनो गमे ते एक रस, गरमांनो गमे ते एक गर,थन रमां पण विरोगी ये गुण एफ प्रदेगनेपिपे न होय जेमके, शीतनो विरोधी नग्न God पड्डव्यविचार. संख्यात काल पठी थाय परतु थनत कालमुपी एकावगाढपणे रहे नही, एवो एनो स्व नावज वे हवे अवगाहनु अतर लखिये टए -जे परमाणु ए करीने जे थाकाशनो प्रदे शथवगाहित थएलो होय तेज काणे जघन्ययी एक समय थने उत्कृष्टयीय संख्यात कालसुधी रहेठे त्यार पठी वली वीजा प्रदेशनी थवगाहना करेठे एम फरतो फरतो फरि तेज थाकाश प्रदेशनेविपे उलटयीथसंरख्यात काले थावीनाय वे केमके, थाकाशना असख्यात प्रदेशज वे थाशका - मूल प्रदेशनो त्याग करी वीजा थसख्यात थाफाश प्रदेशीय थ नतवार फरसीने पठी पाठो थावीने मूलनो प्रदेश फरसता थनतकाल थत्तर संनवेठे तेम उता असख्यात कालनुज थतर कहेवानु कारण उत्तर - पुजजनो एवो स्वनावज होयठे के, ते थसत्यात कालसुधी फरीने पाठो तेज थाकाश प्रदेशनी थवगाहना करेठे हवे पुगजना गुण कहिये वैए - जेणेकरी वस्तु, थलरुत एटले शोनायमान ए वधा पुजलने विपे होयचे थही कोई नयायिक तो विचित्र वर्ण पण माने। ते पाच वर्णाना सयोगथी उपजे से तेने सर्वथा निनज कहे, पण ते निन्न नयी गध वे - एक सुगध बीजो उन्ध थत्र कोई चीजो विचित्र गय पण माने ठे ते पण सयोगथी उत्पन्न थायठे परतु निन्न नथी रस पांच २ - तिक्त, कटुक, कपाय, थाम्ल तथा मधुर कोऽक लवणने जोजन तैयार कटता तेमा यद्यपि वीजा सर्व व्योनु मेज़न होय ने तथापि । जो एक लवणन प्रक्षेपण करयु न होय तो ते नोजन मधुर लागतु नथी एट माटे लवणने पण मधुरज कहेवु फरस पुजलनेपिप होय. एम सर्व मजी बोश गुण पुजना जाणवा तेजमाना थात फरसमांना चार फरस नयी होता, ते था- कर्कश, मृड, गुरु ने लघु एघार स्पर्श सुक्ष्म परमाणुनेरिपे न होय थने शीन, उन्न, सिग्धने रुद एका ԵԾԱ पडव्यविचार. गुण तथा स्निग्धनो विरोधी रुच गुण . ते माटे थविरोधि वे गुण होय शीत स्निग्ध थथवा शीत तथा रुद अथवा उन स्निग्ध अथवा उप्ल ने रुद, एम विपरीत पणे पण थई शकेले. माटे परमाणु एक अंश ठे तेमां श्रविरोधी वे। फरस लेवा. एवी रीते पांच गुण एक परमापुनेविपे जाणवा. वे प्रदेशीया खंधने विपे उत्कृष्टथी दश गुण होय. केमके, तेमां निन्न निन्न वे व ण, वे रस, वे गंध तथा चार अविरोधी स्पर्श ते वे वे जूटा जूटा प्रदेशनेविपे होय ए दशगुण वे परमाणुना जाणवा. एम त्रिप्रदेशी खंधनेविपे उत्कृष्टयी वार गुण होय, ते या प्रमाणे:-एक वर्णने एक रस एवे गुण दिप्रदेशी खंधना कर तां एमां अधिक होय . केमके त्रण प्रदेश होवाथी गंध तो प्राये वेज , थने फरसतो सूक्ष्म परिणामे चारज होयठे. तथा चार प्रदेशीया खंधनेविपे उत्कृष्टयी चीदगुण होय. तेमां चार वर्ण चार रस ने वाकीनासर्व पूर्वोक्त रीते जाणवा. पंच प्रदेशीया खंधनेविपे पांच वर्ण, पांच रस, वे गंध, तथा चार फरस ए शोल गु ए होय. एम संख्यात प्रदेशीयो खंघ, थसंख्यात प्रदेशीयो संघ तथा यनंत प्रदेशीयो खंध जेटली वारसुधी सूक्ष्म परिणाम पणे परिणाम्यो दोय ते त्यांसुधी तेयोनेविपे उत्कटथी शोल गुण होय. अने जघन्यथी तो पूर्व जे पांच गुण परमाणुनेविपे कहेला ने तेटलाज थनंत प्रदेशीया खंधनेविपे पण होय ते. हवे वादर परिणाम कहियेटए -वादर परिणामनेविपे जयन्य तो सात गुण होय है:-गुरू, कर्कश, थथवा मृउलघु, ए वे स्पर्श थविरोधी सेवा; अने पांच गुण मूल गालेवा थने उत्कृष्टथी तो वीश गुण होय हवे एना पर्याय कहिये वैए --पर्याय ते एक गुण रूपए तेम एक गुण नीतादिक पण जाणवा जेम कं, एक परमाणुमां सर्व जघन्य पणे कस्ल वर्ण होय तो ते एक गुण कालो कहिये. पनी बजी तेथी वमणी कालाश ते विगुण रुपए कहिये एम यावत संख्यात गुणो, कालो यनं रख्यात गुणो कालो तथा धनंत गुणो रुपण वर्ण होयते ; एप्रमाणे न पायो जाणवा. एम नीज तथा पोनाटिकनेवि पण एजरीने जाणी से. घाशंका---गुण धने पायनेविपे नेट ? जे गुन्हा नने पर्याय रहोतो. उत्तर.-- गुण तथा पापनेविपे काफिटते. "मद नापिनों गुणाः कमना विनः पयांपा." जे सईद नहदनों वे एटने वर्ग, गंध, ग्न तया पटी, गु ए जाणवा ए सामान्यपणे मृनिनंत इव्ययी एक देश मित्र न टांय माटेर ए कहेवापसे, यने जे अनुक्रमे होप ते तदा मदनावी न होय तन पांच र पामे नही किंतु सदा सर्वदा कायम होय तेने सत् कहेठे तमुक्त श्रीमतिचई। टपाद तथा पिनाश होतो नथी सदा सर्वदा साश्वत ले तथा पुमन इव्यनेविपे। होय, थने नर पर्यायनो उत्पाद होय पण नीव इव्य तेज तेनो मूलयो उ -तथा रिनाग यायचे, ते कालादिकनी जोगवाई पामीने थायवे ते था प्रमाणे- थम पुगत परमाणु पिस्त्रसा परिणामेकरी मृउथाकारे परिणामने पामेठ, तेनो। नदिक सदण तथा पुरुप व्यापार सदए निमित्त कारएनी योगताथी काश) शामने नजे. पठी तेज कृशुन तथा शिवक परिणामे थाय ते ठनक ज्यारे। ព៖ पड्व्यविचार हिये जेम के, एक गुण कालत्वादिक ते वि{ण कालवाटिक थवस्थाथकी निवन दे, तथा विगुण कालवादिक त्रिगुण कालवादिक थवस्थाथकी निवर्तनने पामे एम पूर्व पूर्व पर्याय निवर्जन एटले नाश थने उत्तर उत्तर पर्यायोनो थावि नाव एटले उत्पत्ति थायचे तेने पर्याय कहिये ए प्रमाणे एक गुण रस तथा हि गुण रसादिक, तेमज एक गुण गध तथा विगुण गधादिक, वली एक गुण कर्कश तया विगुण कर्कशादिक, थने स्पर्शना पर्याय पण जाणी लेवा हवे पुनज सस्थान कहे। -गोल सस्थान ते मोदकवत्, वर्नुल सस्थान ते वन यवत्, सब सस्थान ते दमवत्, यश सस्थान ते घाटकवत् चतुरस्त्र संस्थान ते थयोधनवत्, जापी लेवा ॥ इति जीवादि पट् इव्यस्वरूप झेय ।। श्रथ व्य लक्षण कथ्यते -धनुष्टपू वृत्तम् प्रणम्य परमात्मान, कर्मक्लेशवि वर्जितम् ॥ इव्याणा लक्षण वदये, जैनेड्मतदीप्तिद ॥ १ ॥ जे वस्तु कालत्रयनेविपे वत्ते के तेने सत् कहिये ने तेज इव्य जाणव ते सत् शब्दनु लक्षण थावु ठे "उत्पादव्यय व्ययुक्त हि सत्" जे वलु पर्यायनी थपेक्षाए कथचित उपजे , वली कयचित् जघन्ययी समयांतरे तथा उत्कृष्टयी यसरव्याता काल पठी ते वस्तु पर्यायनी अपेक्षाए विनाशने पामे ठे, थने तेज वस्तु इथ्यथी क्यारे पण उत्पन्न न थाय, तेम विनाश पण "प्रीव्योत्पादव्ययोपेतं, इव्य कालत्रये स्थितम्, इव्यतस्तत्र सत्व हि जन्मनाशी च पर्ययात् " तत्र दृष्टात जेम एक जीव इव्यनेविपे नारक पयायनो विनाश प्रतिमा स्थास, कोश, कुशूज, शिवक, उत्र, घट तथा कपाल प्रमुख पर्यायोना उत्पा नकारना यागयी मूपिम यायचे, त्यार पाज्यारे चानी उपर चडेने त्यारे चकतमि निमित्त कारणनी योगताची स्थास परिणामने पामेठे, पठी हस्त - चुन्न, , तथा ग्रीवक परिणामने पामेछे त्यारे घट कहेवाय दे तथा त पड्डव्यविचार. GOO वली घटनोटन मुजगद्यनिद्यात यकी कपाल परिणामने पामे वे, त्यारे कपाल माला कदेवायने. एटले पूर्व पूर्व पर्यायोनो विनाश थतो जायते ने उत्तरोत्तर प चीयोनो उत्पाद थतो जायठे. पण पुमन इव्य सदा सावतज के. जो ते सत्ता पुनलादिक इव्यनी न मानिये तो उत्पाद तथा विनाश निरर्थक थाय. जो वस्तु घी कोई वेज नही तो उत्पत्ति शानी थाय ? थने जेनी उत्पत्ति यती नथी तेनो विनाश पण थतो नथी, यथा पड्व्य. जे विनाश थायडे तेज उत्पन्न थाय है; अने जेनो विनाश न थाय तेनी उत्पत्ति पण न थाय. माटे उत्पाद, विना श तथा सत्ता ए एकज . तथोक्तं श्रीमतिचंई• " उत्पाद. केवलो नास्ति, विना शोपि न केवलः; कितु सत्तासमाक्रांतो. नापि सत्ता च तीविना, १ यमुत्पन्नं च तन्न टं यन्नष्टं तच जन्मयुक्, यत्र वस्तु नचोत्पन्नं, दृष्टं नष्ट कदापिन. २ कालादिपंच सामग्री, प्राप्य इव्येषु पर्ययाः; उत्पद्यते विपद्यते, जलकनोलवजले. ३ " पाशंकाः--तमे जे पूर्व पूर्व पर्यायनो विनाश मानो तो तेविनाश थपर नाम घनाव ठे,माटे ते सर्वया प्रकारे जावधी निन्न ,किवा थनिन्नवे जो सर्वथा नावणी निन मानिये तो यवन्तु स्वजाव थाय,यवस्तु वनावनी सिरता थयाथी कोई कार्यनी सिधि थशे नही, तथोक्तं श्रीमतिचंई:-तुरूपोहि यो नावः सकथं कार्यसाधकः; घदारिई नवेचिश्व, सचेद्यदि फलेग्रहिः १ तथा नावनेज सर्वथा अनाव कहेशो, तो नावनी प्रतीतिनो लोप थशे, थने तेम थयाथी सर्व जगत् शून्य ठरशे. त्यारे तमे थनाव ते शाने कहोठो ? उत्तरः--नावथकी कथंचित् निन्न अनाव होयते,जे सर्वथा निन्न कहे वाय नही. थने सर्वथा थनिन्नपण न कहेवाय ते कयचित् निन्न कहिये ते याची रीतेते.-समस्त वस्तुनेविपे वे अंश होयठे - एक सदंश ने बीजो असदंश तेमां पर्यायनी अपेक्षाये थतीत तथा धनागत पर्यायने असदंश कहेते, ने वर्तमान पर्यायने सदंश कहे वे. ए सदंश नावरूप कहेवायठे बने यसदंश अनावरूप कहेवाय वे. अनावर्नु लक्षण न्याय शास्त्रमांधावी रीते कत्यु ठेव्यपर्यायोनारमानाव इति" "एटले जे घनाव ते पण इव्य थने पर्यायथी जिन्न नथी. जे नाव स्वनाव तेघनावले. तेना चा रप्रकार :-प्रागधनाव, प्रध्वंसानाव, अत्यंतानाव ने अन्योन्यानाव. तेमांप्रथम प्रगनावनु लक्षण या प्रमाणे:-यन्निवृत्तावेवकार्यस्यउत्पत्तिः सोस्यपागनावः जे पर्यायनेविपे विनाशेकरीने अवश्य यपरपर्यायनी उत्पत्ति थाय ने ते उत्पयमान उत्तर पर्यायथी पूर्वे जे विनाशी पर्याय ठे तेने प्रागनाव कहेवो. अत्र Home | पुत्र, पौत्र, तथा दौहित्र प्रमुख घणा धमो होयठे एटले पुत्रनी थपेक्षाए पिता वे, मातानी थपेदाए पुत्र कहेवाय ठे, पुत्रना पुत्रनी थपेक्षाए पौत्र कहेवायचे तेम पत्र पण जाणवु हवे थन्योऽन्यानावनु लदण याप्रमाणे -स्वरूपातरान्यता थने पुत्रीना पुत्रनी अपेदाए करी दौहित्र कहेवायठे, परतु पुरुप एकज होय । मां गायना स्वरुपनी नास्ति अश्वनेविपेठे. ने अश्वना स्वरुपनी नास्ति गाय नेविषे वे एम थन्योन्य एटले परस्परनेविपे एकेकनो जे अनाव ते धन्योऽ। न्यानाव जाणवो एनां चार नाम -थन्योऽन्यानाव, इतरेतरानाव, परस्पराना। वातथा थन्यापोह नाव हवे थत्यंतानावनु लण था प्रमाणे-कालत्रया।। परिणामनो"त्रण कालनेविषे अनाव, तेने थत्यंतानाव कहिये तत्र दृष्टांत - पीयतादात्म्यपरिणामनिवृत्तिरत्तानाव एटले वस्तुनेविपे तादात्मिकपणे जे । जेम एक चेतन श्रात्मतत्व ते क्यारे पण थचेतन थयो नथी. थतो नधी) पड्डव्यविचार जेमक्षीरना विनाशथी दपिनो उत्पाद थायवे माटे दुग्नेपिप दहीनो प्रागनायक हेवाय जेनो पूर्वथनाव होय तेने प्रागनाव कहेने ज्यांनी दधिरुप पोय पुन थीत्यांसुधी तेनो वीरनेविप प्रागनाय . एम मृम्पिमने घटनो तया तेनुपुतने पटनो पण प्रागनाव सबंध जाणीलेवो हवे प्रध्यसानावनु लक्षण था प्रमाणे - त्पत्ती कार्यस्यावश्यं विप्रतिपत्ति सोस्यप्रध्यसा नाय जे पर्याय उत्पन्न थयायीजेप योनो थवश्य करी विनाग थायडे, ते विनाशी पूर्व पर्याययी उत्तर पर्यापनेविचे प्रध्वसानाय कहेठे यत्र दृष्टांत जेम दूधना विनाशयी अवश्य करी दधिज होग ने तेथी दहीनेविषे दूधनो प्रध्यसानाय कहेवाय तेम मृत्पिमना विनाशयी थवश्ये करी घट, तथा तंतुपुजना विनाशथीथवश्येकरी पटनी उत्पनि होयडे, तो ते घटने तथा पटने प्रध्वसानाव कहे एटले जे पूर्वपूर्व पर्याप होय तेनेपेि प्रागनाव कहेने, ने उत्तर उत्तर पर्याय होय तेनेविपे प्रध्वसानाव कहेठे एम वली दषियी तकनो उत्पा द होवाथी दधिने प्रागनाव कहेवाय, थने तकने प्रध्वसानाव कहेवाय एटले पूर्व कोररूप पर्यायनी थपेदाएकरी दधिने प्रध्यसानाव कहेठे थने उत्तर तकरूप प यिनी थपेक्षाकरी दधिने प्रागनाव कहेठे थाशका - एक वस्तुनेविपे वे धर्म केम सनवे उत्तर - वस्तु, अनत धर्मात्मक होयवे जेम के, एक पुरुपनेविषे घ्रा, नर्तृ कहेवायठे, नाईनी थपेक्षाए नाता कहेवाय , स्वीनी अपेक्षाए ना कहेवाप 2 व्यावृत्तिरितरेतरानाव । तत्र दृष्टात जेम गाय ने थश्व ए बे पदाथों से, ते ने पड्डव्यविचार. ចុចប ने यशे पण नही एमज जड धर्मवाला पुजलनेविपे क्यारे पण वस्तुत्वं चेतनपणुं तं नवे नही एटले तादात्म्य नाव थाय नही, संयोगी नावे तो ए पुजन धनंतिवार चे तन थया वे; यायचे,ने यो; माटे चेतन वस्तुनेविये तादात्मिक नावे थचेतनवस्तुनो अत्यंतानाव. तथा अचेतनवस्तुने विपे तादात्मिकनावे चेतनवस्तुनोयत्यंतानावते. थाशंका:-घट तथा पटनेविपे अत्यंतानाव मानवामां मु हरकत ते? केमके, घट ते पटात्मा नयी ने पट ते घटात्मा नथी. उत्तर--ए तारूं कहेवू यद्यपि सत्य वे. तथापि एवु त्रणे कालनेविपे संनवे नही कमके घटाकारे परिणामने पामेला जे पुजत इव्य ते कोई समवे पटाकार परि पामने पामे, अने पट पुजलो घटाकारे परिणमे वे, माटे तेनेविपे थत्यंता नाव कहेवाय नहो. किंतु अन्योऽन्यानाव कहिये. एना संग्रहना लोक कहे कोरे दथ्यादि यत्रास्ति प्रागनाव तउच्यते; नास्तिता पयसोदप्ति प्रध्वंसा नावतलं. १ गवि योग्वाद्यनावश्च सोन्योन्यानाव उच्यते, झगशृंगादिरूपेणात्यंता जावन्तु नाम्यते. २ नचावस्तुत एक्स्युर्नेदान्ते नास्य वस्तुनि ॥ इति जैनमतेनावो, नावि नोवस्तुरूपक.३ एटले श्रीजैनमतनं विपे नाव स्वनाव अनाव कह्यो भने नैयायिक, वोपिक तथा मीमांनकादिक दर्शननेविये अनाव ते नावथा निन्न पदार्थ माने वे. ते मिथ्यावादि जाण्या. चावीक मती तो अनाव पदार्यने मानताज नयी, तेश्रोने पण अनिष्टनी प्राप्ति वे. तथोक्तं यकनंकाचाय-कार्ययमनादि म्यात्, प्राग नावस्य निन्हवे ॥प्रध्वंसस्यैच कार्यन्य. प्रोच्यते नित्यतां व्रजेत्॥१॥एक रूपं नवेदिय, मन्यापोहव्यतिक्रमे ॥ नवेवानिः स्वधर्मस्याऽ त्वंतानावप्रतापने ॥॥ एनो थर्थ श्री समंतन स्वामीए घट सहस्त्री टीकामां घावी रीते कन्यो ते-ते माटे यहां चा बीक, जो तुं प्रागनाव मान नही, तो कार्य व्यनी अनादि यो थने घट पटा टिक जे कार्य व्यठे, तेनी धादि तो वाल गोपाल सर्वने विटित , जो प्रध्वना नाव नहीं मानशे; तो कार्य इव्यनो विनाश संनयो नदी. सर्व इय निल्य उग्डो ने कार्य इयनो विनाश तो सकन लोकमां प्रनि ने, जो धन्यापोह नही मा नहो तो समस्त वस्तुनु एक रुप तर, धने वस्तु तो सर्व निन्न निन्न सनावेज दोगामा श्रावे . जो अत्यंतालाव नही मानगे तो कोई स्वधर्म निम यो नदी, चेतन जे घात्मा ते को नमय घचेतन य: जरी ने जे जडात्मक पुन्त ते कोई समय सर्वथा चेतनात्मक थर्ड जवानों नव वडा त एम तो कोई काजे थायज नही. माटे सर्वत्रव थनाव मानवा. ते पण बजीघनाव सनाव मानयो; , १८:

निबादरना ये नेद-श्रेणी प्रतिपन्न ने श्रेणीथप्रतिपन्न श्रेणी अप्रतिपनना वे| नेद-यप्रमत्त ने प्रमन प्रमत्तना ये नेद -सर्व विरति ने देशविरति, देशविरतिना दीना ये नेद-परित ससारीने थपरित्त ससारी एम पुगनना पण वये जद पाय ठे ते या प्रमाण-यण ने स्वातेमा स्वधना नेद-सूदन स्वप न पादर बन्नेना बनीवर नेदरे-सचित्त सघने अचित्त सर एबनना पण व जे व वनमान काजे वर्तमान नावनु ग्रहण थाय तश्वन नय जाणव पड्डव्यविचार पण जे तुमसनाव मानवु ते पण थनिष्ट के. श्री चितामणि शास्त्रनेविपे पूर्व छोए कत्यु ले के, दृष्टस्तावदय घटोनच पतन् दृष्ट स्तथा मुनरो दृष्टा कपरत- ति परमितो नावोन दृष्टोपर स्वाधीना कलशस्य केवलमिय दृष्टा कपातावलीत नानाव इति श्रुति क निहिता किचात्र तत्कारणम् ' थहो नयायको, प्रथम नून लनेविषे जे घट दीठो, ते कपर मोगर पात दोगे, त्यार पठी खापरा दिला, पर एटलाथी बीजो थनाय कोई दोगे न कहेवाय, तेम उता तु कहिश के, में घरने पिये अनाव दीठो ते फूठोठे तेनी तो कपालावली दीठी कहेवाय, कहेवाय नहीं माटे थनाव एवो स्तुति ते कई रहेते । ते मानवानु शु कारण के माटे फपाजावलीनेज थनाव कहिये के जेथी सकल वात सुपरे॥इति इव्यलक्षण हवे नय स्वरूप कहेते तेमा नेगम नय अशयाही ने ए वन्तुना थशने सप ण वस्तुज माने जेमके, सूक्ष्म निगोदिया जीपमा धरना थनतमा नाग जे ज्ञान, उता तेने सिख समान माने । थने तेरमा तथा चादमा गुणस्थानने प्रिपे वर्तता सिम मनुष्योने कर्मनो एक थश उता ससारी कहे। सग्रह नयरमें सत्तानु यहण थायवे सर्व नीव सरखा से सना गुण घटे नहीं. प्यवहारनये करी जोर धने पुदगलना नेद कहेवायचे -जेमके, जीवनाव नेट - सिघने ससारी तेमा ससारीना वेनेद-थयोगी ने सयोगी सयोगीना में नेद - उमस्यने केवली उद्मस्थना ये नेद-दहीणमोहने उपशांत मोह, उपशांति मोहना वे नेद - थम्पाई थने सम्पाई सकपाना वे नेद - सूक्ष्मसकपा ने बाद र सकपा बादर सम्पाना बेद-थानति वादर ने निवृनि वादर निट पण यनावदीत । - ये भेद -विरनि ने थविरति थपिरतिना वेद-सम्यक्त्वाने मिथ्यात्वी मिथ्या वीना ये नेद नयने थनथ्य नयना ये नेद-प्रथि नेदीने थाथि यनेदी अधी भेद वे जीरगृहीत ने अजीपगृहीत एपी रीते थनक दोनु विश्चन की जैन के, साधुपणे वन त सागायचे, थने जे साधु बता पण प्रीपणा व - पड्ऽव्यविचार. G११ तो दोय तेने गृदी कहे. जे अदररूप नाम मुखे कहे ते गद नय जाणवो. जे गुणनो उपमाने ग्रहण करे नही, पण गुण सहित अर्थातरनी ग्रहण थती वस्तुने वस्त पणे कहेवी ते समनिरूढ़ नय कहेवायवे. जेम के, केवल ज्ञानादि गुण प्राप्त घयाथी सि६ कहेवो, श्रने जे गुणपर्याय सहित संपूर्ण अवस्था प्राप्त वस्तुने वस्तु कहेची. जेम सिम स्थानिक प्राप्त जीवने सि कहेवो ते एवजूतनय जाणवो एम एव्यने मातेनय पोताना उपयोगथी लगामवा. हये चार निदेपा कहे। -वस्तुना नाम मात्रनो अंगीकार ते नामनिदेपो. एटले निर्गुण नथा गुणसदित वस्तुनी विचारणा न करवी. अने जेवस्तुने प्राकार पणे यंगी कार करवी ते स्थापना निदेपो; उपयोगविना वस्तुनुं संपूर्ण ग्रहण करवु ते व्यनि देपो श्रने गुण सहित वस्तु प्रमाण करवी निर्गुण वस्तुनुं ग्रहण करवू नही ते नाव निदेपो इत्यादिक प्रकारे समस्त नय नंग, प्रमाण निदेप परदेप सहित, गुरु चेतन परमानंदमयी, महानंदी, ज्ञान ज्ञायक, सकल कर्मोपाधि रहित लोकालोक वेत्ता, स्वझानादि गुण समूह कर्ता, अनंत अविगम यक्य अव्यय, ध्रुव, महारसी, सर्व दर्शी, गुणवान, मोद कारण, मोह महाज्ञान ज्ञायक, ध्यान ध्याता ध्येय, एक एकत्व ज्ञानगम्य, स्वल्पबुद्धिने यगोचर ठे; एवो माहरो परमात्मा मुझने ध्येय, उपादेय, मोक्नो वीज ते वीजोजे सर्वपर वस्तुनो संयोगडे, ते माहराथी न्यारो हेये रूप संस्कार ठे, संबंधठे, पण माहरो नथी एवीरीते मोदार्थी सम्यक्त्वीजोवे ध्यावq. हवे मोद प्राप्तिनुं क्रम लखे ते --सफल कर्म क्य लक्षण मोद . ते मोद ने अर्थ चार घघाती कर्म खपाववा. ते चार यघाती कर्म शाथी खपाववा ? के वल ज्ञानादि चार गुणोथी खपाववां ते केवल ज्ञानादि गुण शाथी उपजे 'घ न घाती कर्म खपाववाथी नपजे वे. ते घाती कर्म शाथी खपायवां यथाख्यात चारित्रयो खपाववां, यथारख्यात चारित्र शाथी थाय? लोन मोहनीयना यथोथाय लोनमोहनीय शाथी खपाय ? सूक्ष्मसंपरायचारित्रथी सूनसंपराय चारित्रनुं कारण कोण ? त्रए संज्वलनननो दय. त्रण संज्वलना खपाववानुं कारण कोण ? थपूर्व करण परिणाम. अपूर्व करण परिणाममुं कारण कोण ? दर्शन मोहनीय नो दय, एम दर्शन मोहनीय खपाववानुं कारण सर्व विरति ते सर्व विरतिनुं का रण प्रत्याख्यानीय चार कपायोनु खपवू ठे, प्रत्याख्यान खपवानुं कारण देश विरति है; देशविरतिर्नु कारण अप्रत्याख्यानीय चार कपायर्नु खपवू ; अप्रत्याख्यानीय क्ष्य थवानुं कारण सम्यक्त्व ठे; सम्यक्त्वनी कारणोत्पत्ति सात प्रतिउना क्यथी , दिय गुण यन पायना थाश्रय होय तेने इय कहिये ते इय प्रकार एम इय्य सनार ने बीजो पर्याय स्वनार तेमा इव्य स्वनार कानक पड्डव्यविचार. थायदे,थथवा क्ष्योपशमथीथायठे सात प्रतिमा क्ष्यादिकनु कारण यपूर्व कर ण, अपूर्व करणनु कारण मुहूर्त स्थिति क्ष्य ठे, मुहूर्त स्थिति क्ष्य, कारण यथा वृत्ति करण , यथा प्रवृत्ति करणनु कारण सात कर्मस्थिति घात ठे, सात र्म स्थिति घातनु कारण मद कषायता , मद कपायतानु कारण यात्मवीर्य गुण ना पर्याय गर्जित विशुद्धता नामे पर्याय ठे, एवा अनुक्रमे कर्म क्यथा गुण प्रका श ने गुण प्रकाशथी कम क्ष्य ठे, ते कारण माटे ज्ञाता प्राणीये गुण प्रकाशनो उद्यम करवो जोइये ते उद्यम श्रुतज्ञानथी थाय बे, हेयोपादेवनी परिक्षाने श्रुत ज्ञान कहेने ते श्रुतझानना वे जेद - एक शुक्ष श्रुतज्ञान ने बीजु थक्ष श्रुत झान तेमा गु६ श्रुतझानना वे नेद वे -स्वरूप श्रुतज्ञान ने पररूप श्रुतज्ञान बनी थ६ श्रुतज्ञानना पण वे द 2 - गुन थने थान एवीरीते जीवाजीगादि पट् पदार्यो सदाकात शाश्वता पोतपोताना गुणपर्यायेकरी वर्तः इतिमोप्रापिस्वरूप थय यात्मप्राप्ति विपिनियते -जे कारण माटे यात्मस्वरुप प्राप्तिविना कदा राजे पण मोक्ष प्राप्ति यती नयी जेम कोई पुरुष नगर नाम स्वरूप जाणतो होय ता यन्यने पीने ते नगर प्रत्ये पहोचे तेम था जीवने मुकावनार सम्यक ज्ञान ने उत्तर पिरया सावडा, कसाय होणा महत्वय धरावि, सम्म निजी विहीणा, कयावि मुरक न पावति" सर्व सावद्यथी विरम्या होय, कपाप कोधादिक रहित होय, पंच महानतरूप वाद्य चारित्रेकरी सहित होय, तो पण सम्पपदृष्टि रहित थका कदा काले पण मोक्षपामे नही गाथा -"नय नग पमाणे हि जा थप्पा साय वाय नारेण, जाण मोरक सरुव, सम्मवितीय सो णे ते जीर सम्यग्दृष्टि जाणा के जे, पोतानो थात्मा मोक्षम्वरुप मामयी परमा नदमयो यचा अपिनागी यनत यनादि थवर स्यामाद नारे. जाणे माने स इहे यनुना, त सम्पदृष्टि कहिये ते सात नयेणे जाणे तेना मृन बस - . - नु - माधारण ने वीनु यसाधारण तेमा थन्तित्व, वस्तुत्व, इय्यन्य प्रमयत्व तपा यगुनन्द ए सामान्य एटले साधारण गुण ने थने वीजा यसाधारण गु उ त पानिमायने गनि चानण गुण, यामानिमायन स्थिति गुण अागामा निधापने यग्गादगुप्त, कानमा पापनाना गुण, पुजन इयनपिपे वर्ण गप न नेश गुप्त, नयना नना हान गुण, दर्शनगुण पत्रिगुण न पडव्यविचार. ७१३ वीर्यगुण ए असाधारण गुण. तथा साधारण गुण ते श्रमूर्त्यादिक पर्यायना वे नेद वे:-एक स्वनाव पर्याय ते घगुरुलघु विकाररूप तेना पद्गुणी वृद्धि हाणिमय वार नेट वे. एवारे पर्याय नए व्यने समान . धने वीजो चेद जे विनाव पर्याय ते पुजन व्यने तथा जीव इव्यनेज ने तथा शुरु श्व्याथिक नये करी. श्रापणो यात्मा लिइ समान अष्ट गुणधारी के. पर्यायनये स्वनावपर्यायकरी सदातिकममान वे. घने गात पर्याये करी अज्ञान संबंध संसारी वे. नैगम नयेकरी वल्पयाही वे. जेम श्राउ प्रदेो करी सर्व जीव मिझ ले. संग्रह नये करी सत्तायाही सर्व जीव निच स्वरुप . व्यवहार नोकरी नेद विनंजना कारी जे जीवना ववे नेट वे.-एक मिद बीजो संसारी. संमारिना ये नेद - एक सयोगी वीजो अयोगी सयोगीना ये नेट- एक ठास्य वीजो केवली मस्यना वे जेद - एक रूपक वीजो उप शामक, इत्यादि. तथा जुसूत्र नयेफरी तेजीव जे परिणामे परिणमतो वः, तेसमये तेजीच तेयोज कहिए यथा ममतामयी परवस्तुमानतो चेतन धज्ञानी कहिये. सम तामयी सिम समान. पोतापोतानां यात्माने ध्यावे तेसमये ते सिम कहिये शब्द नयेकरी नामादि निधने पण सिम कहिये समनिरुढ नयेकरी ते पर्याय ने ग्रहे एटले नि पर्यायवंत सिह कहिये. एवंनूत नयेकरी जे संपूर्ण गुण पर्यायने ग्रहे एटले पोतानी किया करतो घचल ते लीजीये. पथा लि स्थानिक प्राप्त जीवने सिम कहिये. एम सर्व वस्तुन विपे सात नय जाणवा. नय ते जे इत्र्य अनेक धर्म वचने करी सात नंग स्यादस्ति, स्वस्थ्य दंत्र जावत्वेन यथा स्वश्व्य चेतन गुण अनंत , स्वदेत्र ते चरम शगेर बिनागन्यून अथवा थसंख्यात प्रेदेश समान चेतनत्व, स्वकाल ते उत्पाद व्ययस्वरुप,यगुरुलघु पर्यायनो परिणमन, स्वनाव ते ज्ञान दर्शन चारित्र वीर्य, इति एगुणेकरी जीवश्व्य ठतो. स्यान्नास्ति परइव्य क्षेत्र काल नावत्वेन परव्य अचेतना, परदेव पांचव्य पोतपोतानी अवगाहनासमान जडतारूप, परंकाल ते पोतानो अगुस्लघु पर्याय, परनाव ते, पोतपोतानो विशेषगुण; एवीरीते पर च्या दिगुण चेतननेविपे नयी ए कारण माटे नास्ति वे. धने म्यादस्ति नास्ति ए वने नाव एक समये . स्याटवक्तव्यते या कारणमाटे वे -कोऽपण समये एकांत वच नेकरी करो जाय नही केमक, वचन ते असंख्यात समयात्मक वे यने यात्म इव्य एक समयमां यनंत गुण पर्यायमयी ठे, यने स्यादस्ति यवक्तव्यं स्यादनेकां तपणे थस्ति, तेनुथवक्तव्यपपुंठे. एमज स्यादनास्ति यवक्तव्यं. तथा स्यादस्तिनास्ति युगपत् श्रवक्तव्यं ते स्यावाटपणे थस्ति नास्ति समय काल एक समये वचन थसरव्या . १४ पड्व्यविचार. अगोचर एम थनेक धर्मात्मक थात्मा स्यामाद नावेकरी जाणे ते स्यावाद ना पाठ पद -नित्य, अनित्य, एक, अनेक, सत्, असत्, वक्तव्य तथा थव तव्य पोताना चेतना गुणेकरी थात्मा नित्य ने, गुरुलधु पर्यायेकरी थात्मा थनिय ठे, एमव्यथा नित्यानित्या , हायक गुणेकरी यात्मा एकछे, त प्रदेशपणेकरी यात्मा अनेकपणे ठे, एम व्यपणे एकानेक ,वश्व्य पर्यायेकरी धात्मा सत् उतो , परव्य पर्यायेकरी श्रात्मा असत् श्रवतो , एम वस्तु स्वरूपे सत् थसत् ,इयपणे वक्तव्य एक समये एकगे कथन योग्य नथी माटे यात्मा प्रवक्तव्य वे, एम ए परकीय थपेक्षाए स्यावाद होय, धने स्वयपेक्षाएकरी चेतन ता नित्यने,यगुरुजघु पर्याये थनित्य चेतना एकले असख्यात प्रदेश थनेकले नि त्यत्वमा नित्यत्व सत् , अनित्यत्व असत् ले थनित्यत्वमा अनित्यत्व सत् ने अने नित्यत्व श्रमत् ने एकत्वमा एकल सत् वे थने अनेकत्व थसत् अनेकत्वमा अनेकत्व सत् , ने एकत्व असत् ने नित्यत्व थनित्यत्व, एकत्व,अनेकत्व, एम निन्न गचन व्यक्त के एक समये थव्यक्त के एम वस्तु स्वरूप एक समये नित्या नित्यने तेज समये एक ने तेज समये थनेक वे एम सत् ने थसत् तेम प्यन ने यथ्यावे एथान पर एक पदमा एक समये रह्या वे एवीरीते स्या बादपणे व इय्यने जाणी, श्रने व व्यथा चेतन लादण जी इव्य पोतानो ज्ञान दर्शन चारित्र वीर्यमयी थपिनाशी वे यनत परमानदमयी एयो पोतानो थात्मा उपादेपररी ध्यायो एप्रकारे यात्मानु मोक्ष कारण मोक्षमयी सर्दहे स्याहादपणे पोताना यामाने जाणे मानेतेज सम्यक्सी कहेवाय तेपिना मिथ्यात्वी कहेवाय हो सम्यान्वीने था गुण उपजेने ते को-प्रथम निशक गुण ते जेने मका, नप तथा गोर दाय नही तेने जाणा, एटले ज्ञाताने थालोफनो लप पाप नही मो, ते सम्यक्त्वा सुग्य, उसनेनो, पुन्य तथा पापनु फज जाणेने ते यात्माने पुन्य तया पापया निनारी ध्याने माटे यालोक तथा परजोना हाताने जय नयी तथा हाताने वेदनानु नय पण व्यापे नही ते वेदना जप कर्म गुण न थने मार्ग यान्मा तो ज्ञानमयों ने बली हाता, पोताना श्रात्माने यमर तथा थपिनानी को ध्यान में माटे तेने भरण नय होतो नथी बीमा ना, पोताना घामाने यक्ष्य बनत गुणी जाणेने माटे तेने चोरनय नयी काता पोताना मानाने दानापसना मानार पोतानी शरणनृत माने ने माई नेने या नय नयी. ज्ञाना पोताना था.माने सदा परमानंदमयी पशव्यविचार. गनं मानने वन्मानना नत्री एवी गाना पाताना वामन जान भय नागीन नाराज निनं . नयश्वीनी बीनी निल्ख गुठ. तर पलं वात्रा नही जागो बर्नमान नुवमा मन बार नही: वन विज्ञा पान का नही अनागत कातना सुन्वनी नाव नही : इन्वयीन नही: না না নানা স্বালোন নি ননন না বান . নী नोत्रीजी वगंधा गुणतंत्रानो सान्चीशुनाशुन नपर्म गुण जाणं. पानानां धान्ना नना ज्ञानानंदमयी में मांटने ज्या पण पुन्नयी उगंदा कर नहीं नकवीनां वांयां अमृतवाट गुण ने पर वन्नु तथा परपन्जिनिनां मृण च नही. नर्वस्वखनाद तब परतावनं निन्न निन करी जाणे. नकलीना पांचनी बन गणतं पोतानां व नां अवगराना को नही. एक्झं जेवो पर धात्मजाय सुरुच्यायिक नयकत्रियजनयी:नवजोत मां नीनने ज्ञाना कहियानन्यक्तीनी वा विरीचा गुण ने पानाना धान्मने पीनाना गुण को स्थिर करे. वजीतता गाज परपरिजननी चाइना नही. नवीनी नानमो वान्लल गुरा ते पोनाना नाननीनांदना तायक नमज्ञानादिगुगन नंडनो वालथ्यता एउसे पांपएका: तेज्ञानयजाज्वो; तंज धान्मा एम देवी न्यवादणे : यात्रोएवात्तव्य रण बह्यो. हवे नयादी बाबमा मनावना गुण ते बाह्य परी नया यंतन्य पोताना छात्नानी प्रजाना कबी. एघाएगावा. नरवी मां बीज पीनानां धात्ना ध्याचे नती बललिये ए:-य नीन. अनागत नंबर्नमान एत्रपात: थाहमध्य नेधत एत्रणवस्या, वर्ग मृत्यु पातात एत्रा जोक. उत्याझ्यय ने ध्रुव एत्रपरिणाम तेनं एक समयमां जागत. एन । एश्यना अनंत मुरा पायने जाणे. एवो धन ज्ञानमयी ताई; नदा कान चनन सदा तोहं. अनाकार उपयोगमयी दशन अनंत बंन सोई नमन पन्नाव. पर परिणनि. पन्निनव्य परित्यागनी खलनाद गुपनविन चिन्तावंत अनंत चारित्रमनी: श्रमपी निर्मल गुणवंत सोराजोर जात मान नाहं नरज कर्म दंय कारण अनंत वीर्यनयी तोहं; तन काल वाया पीटा रहित परमानंदमयी नाई; सोशलोर नारा खवगाहना तंबंध तोहं. पगुणति नि परिणामी घगुस्ताव शनिमयी नाई: एक, अनेक, नित्य, अनिय निक, युद्ध, छजा, विनानी, अयांनी बनोगी. बशी, अयो. व G१६ पडव्यविचार वेदी, थनेटो, सफत्ती, थनाहारक. अशरीरी, अनादि, थनत, यवक्तव्य, अप र एवो परमात्मा परमानदमयी शिव गर नगवान यवाची श्रीयि सोह ध्यान ध्याता ध्येयमयी, ज्ञान,ज्ञाता यमया, सोह, एवो दु परमात्मा परम ज्योति परम शक्ति पच परमेष्टी परम पूज्य तु., एथात्मा इव्यनयेकरी थनत दर्शनमा वे, गुरु सग्रह नयेकरी सिम स्वरूमोठे पचाचारनु निधान होवायी थाचार्य, म्याहादसरुपमयी तेणेफरी उपाध्याय , मोक्षमार्ग साधक तेणेकरी साधुळे, एवो परमात्मा ध्येय उपादेयरूप मुझने ससारमां शरण एबु जे थात्मस्वरुपने जा ण तेने ज्ञान कहे। एवी यात्मस्वरूपनो प्रीतिविपे जे प्रतीति करवी तेने दर्शन कडेने एवा थात्मस्वरूपनेविपे रमण कर तेने चारित्र कहे। एम ए त्रण मोद ना मार्ग से बीजो सर्व श्राझानतामयी दोप ने इति थात्म प्राप्तिविधि को नयने प्रमाण कहिये किया थप्रमाण कहिये ? प्रमाण ते यथार्यतुं कहे गपने ने थप्रमाण ते थयथार्यनु लहवाय वे एम कोई पुरे , तेनो थावो उत्तर " नाममा प्रमाण वा, प्रमाणाशस्तयेा हि, नाउसमुइ समुशेवा, गमुमा यया हि "यही नय ते प्रमाणनो श्रशने जे प्रमाण पण नही ग अत्रमाण पण नही तेने प्रमाणाश कहिये कयचित् प्रमाणन पण कहेने ते माटे नेम समुश्मायी जा पुसजी नरिये तेटना जनने समुइ न कहेगाय पुस गीना ननो ममुर्शग कहिये ते नयने पण प्रमाणांश कहिये तथा सम नाग नगि म्याने, तेने प्रमाण साहये प्रमाण यने नये करी मागावस्तुनु अधिगम एतन्यार्य मनमा ने ऽति चार्चिक वग्नु पदव्य नयादि विचार सपूर्ण देगा पत इति श्री प्रकरण रत्नासर नामारण्य पुम्न मितीय नाग रन्दन Manitor

No text on this page.

, पव्यविचार वेदी, थनेदो, सकती, थनाहारक. अशरीरी, अनादि, अनत, थवक्तव्य, अपर र एवो परमात्मा परमानदमयी शिव शकर नगवान यवाची थतीयि सोह ध्यान ध्याता ध्येयमयी, ज्ञान,ज्ञाता इयमया, सोह, एवोदु परमात्मा परम ज्योति परम शक्ति पच परमेष्टी परम पूज्ज तु, एथात्मा इव्यनयेकरी यनत दर्शनमयी वे, शुभ सयह नयेकरी सिम स्वरूपो. पचाचारनु निधान होवायी थाचार्य, म्या हादस्वरूपमयी तेणेकरी उपाध्याय ने, मोक्षमार्ग साधक तेणेकरी साधुने, एवो परमात्मा ध्येय उपादेयरूप मुझने ससारमा शरण वे एवु जे यात्मस्वरूपने जा तेने ज्ञान कहे। एवीथात्मस्वरूपनो प्रीतिविपे जे प्रतीति करवी तेने दर्शन कहेते एवा श्रात्मस्वरूपनेविपे रमण करव तेने चारित्र कहेते एम ए त्रण मोद ना मार्ग के बीजो सर्व श्राझानतामयी दोप इति धात्म प्राप्तिविधि हो ए नयने प्रमाण कहिये किया थप्रमाण कहिये ? प्रमाण ते यथार्थनु कहे गपत्रे ने प्रमाण ते थयथार्यनु लहवाय वे एम कोई पुरे , तेनो थावो उत्तर 'नाऽप्रमाण प्रमाण वा, प्रमाणाशस्तथैव हि, नाऽसमुइ समुशेवा, समुशंगो ययादि " यही नय व ते प्रमाणनो श्रश जे प्रमाण पण नही ने अप्रमाण पण नदी तेने प्रमाणाश कहिये कयचित् प्रमाणन पण कहेने ते माटे जेम समुश्माथी जज पुसजी नरिये तेटना जनने समुइ न कहेगाय पुस नीना जनने ममुशंग पहिये ते नयने पण प्रमाणाश कहिये तथा सम नाग जेनविन ग्याने , तेने प्रमाण कहिये प्रमाण यने नये करी सफ्नमस्तुनु पिगम एतत्वार्य सूत्रमा के इति चार्चिक वस्तु पदव्य नयादि विचार सपूर्ण दमो पत - इति श्रीप्रसरण रत्नाकर नामारख्य पुनरतीय नाग र दम For

No text on this page.

. , , १६ पडव्यविचार वेदो, थनेदो. सकती, थनाहारक. अशरीरी, अनादि, थनत, थवक्तव्य, अपरस र एवो परमात्मा परमानदमयी शिव शकर नगवान यवाची थतीश्यि सोह, ध्यान ध्याता ध्येयमयी, ज्ञान,ज्ञाता जयमया, सोह, एवोदु परमात्मा परम ज्योति परम शक्ति पच परमेष्टी परम पूज्य तु, एथामा इव्यनयेकरी थनत दर्शनमयी , गुरु सग्रह नयेकरी सिम स्वरूपी पचाचारनु निपान होवाथी थाचार्य, म्या हादस्वरुपमयो तेणेकरी उपाध्याय , मोक्षमार्गसाधक तेणेकरीसाधु, एवो परमात्मा ध्येय उपादेयरूप मुझने ससारमा शरण ने एबु जे यात्मस्वरुपने जा ण तेने ज्ञान कहे। एवी थात्मस्वरूपनो प्रीतिविपे जे प्रतीति करवी तेने दर्शन पहने एवा यात्मस्वरूपनेपिप रमण करव तेने चारित्र कहे एम ए त्रण मोक्ष ना मार्ग से बीजो सर्व श्राज्ञानतामयी दोष के इति यात्म प्राप्तिविधि को नयने प्रमाण कहिये किया थप्रमाण कहिये ? प्रमाण ते यथार्थ कहे गायन ने थप्रमाण ते थयथार्यनु सहवाय वे एम कोई पुने , तेनो थायो उत्तर "ना प्रमाण प्रमाण वा, प्रमाणांशस्तथैव हि, नाऽसमुइ समुशेवा, मुशा ययादि " यही नय व ते प्रमाणनो श्रश जे प्रमाण पण नही अरमाण पण नही तेने प्रमाणाश कहिये कयचित् प्रमाणने पण कहेचे ते दे जेम समुश्मायी जा पुगनी नरिये लेटना जनने समुह न कहेगाय पुस ना जाने गमुशंग कहिये ते नयने पण प्रमाणाश कहिये नथा सम जेनषि म्याने, तेने प्रमाण काहये प्रमाण यने नये करी समावस्तु गमने एतन्वायं मृत्रमा के इति चार्चिक वन्नु पट् इव्य नयादि विचार सपूर्ण - यापन - . Syn इति श्रीप्रसरण रनार नामारय पुनहितीय नाग रन्दन Stars

No text on this page.

१६ पडव्यविचार वेदी, अनेटो, सफी, थनाहारक. अशरीरी, अनादि, अनत, थवक्तव्य, र एवो परमात्मा परमानदमयी शिव शकर नगवान यवाची थतीझ्यि ध्यान ध्याता ध्येयमयी, ज्ञान,ज्ञाता यमया, सोह, एवो दु परमात्मा परमज परम शक्ति पच परमेष्टी परम पूज्य तु, एथात्मा इव्यनयेकरी थनत दर्शन वे, गु६ सयह नयेकरी सिम स्वरूपीठे पचाचारनु निधान होवाथी थाचार्य स्या हादस्वरूपमयी तेणेकरी उपाध्याय , मोक्षमार्ग साधक तेणेकरी साधुळे, एक परमात्मा ध्येय उपादेयरूप मुझने ससारमा गरण ठे एवु जे थात्मस्वरूपने जा णवु तेने ज्ञान कहे। एवी यात्मस्वरूपनो प्रीतिविपे जे प्रतीति करवी तेने दर्शन कहेठे एवा यात्मस्वरूपनेविपे रमण करत तेने चारित्र कहेठे एम ए त्रण माद ना मार्ग ने बीजो सर्व श्राझानतामयी दोप वे इति यात्म प्राप्तिविधि हवे ए नयने प्रमाण कहिये किया थप्रमाण कहिये ? प्रमाण ते यथार्य कहे वायडे ने अप्रमाण ते थयथार्थनु महेवाय वे एम कोई पुत्रे, तनो श्रावो उत्तर नाऽप्रमाण प्रमाण वा, प्रमाणाशस्तथैर हि, नाऽसमुइ समुशेवा, समुज्ञशो यर्थव हि" थही नय ते प्रमाणनो श्रश जे प्रमाण पण नही ने अप्रमाण पण नही तेने प्रमाणाश कहिये कथचित् प्रमाणने पण कहेने ते माटे जेम समुश्माथी जल पुसली जरिये तेटला जलने समुइ न कहेगाय पुस लीनर जलने समुशश कहिये तेप्त नयने पण प्रमाणाश कहिये तथा सम स्तांश जेनेविपे ग्ह्याठे , तेने प्रमाण काहये प्रमाण अने नये करी सकलवर थधिगमने ए तत्वार्य सूत्रमा इति चार्चिक वस्तु पट् इव्य नयादि विचार सपूर्ण देवो यत " इति श्री प्रकरण रत्नापर नामाव्य पुस्तके दितीय नाग स-सप्त

No text on this page.

Pakarn Ratnakar-nagbijo

Author
Bhim Singh
Title
Pakarn Ratnakar-nagbijo
File name
Pakarn Ratnakar-nagbijo
Text
OCR done
Citation
1933
Published
2011/08
Publisher
Mumbay,nirniya Sagar Press
Language
Sanskrit
Pages
772
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313834
Barcode
99999990311222.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
6WnA8hcOyC2
Download PDF

Pakarn Ratnakar-nagbijo