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Urvashi Ka Samajik Sandarbh

Meena Ahuja · 2011/03

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उर्वशी का सामाजिक संदर्भ

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हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद की एम० फिल० (हि दी) उपाधि
के लिए स्वीकृत लघु शोध प्रबन्ध
उर्वशी का
सामाजिक संदर्भ
मीना आहूजा
शारदा प्रकाशन, नई दिल्ली-११०००२

संस्करण 1989 ISBN-81-85023-506 मूल्य 4500 प्रकाशक शारदा प्रकाशन 16/एफ 3 असारी रोड, दरियागज, नई दिल्ली 110002 - विजयदेव झारी द्वारा शारदा प्रकाशन, नई दिनी के लिए प्रकाशित एव हरिकृष्ण प्रिंटस, शाहदरा, दिल्ला 32 मे मुद्रित। मावरण मुद्रण गणेश प्रेम, गाधी नगर निल्ली 110031 तथा ग्रावरण सज्जाधी चेतनदास द्वारा। । -- Urvasht Ka Samajik Sandarah (Dissertation) (A critical study of the most famous & awarded Hindi Epicpoetry written by Ramdhari Singh Dinkar with special reference to social centexi] by Meena Ahuja भूमिका - "उपशी' दिनकर का प्रेम-काव्य है और इसका सामाजिक सदभ थोडा अटपटा सा विषय लगता है । दिनकर प्रखर राष्ट्रीय चेतना के कवि रहे हैं, उहोने भारतीय निधनता की समस्या पर उदग्रतापूर्वक विचार किया है। उनकी कविताओ से सामाजिक शक्तियो को वाणी मिली है और आधुनिक कविता मे वे प्रखर सामाजिक चेतना के कवि माने जाते हैं। यदि उनके काव्य के इस व्यापक सदभ मे सामाजिक सदम पर भी विचार किया जाता तो इसका औचित्य स्वत सिद्ध था। किन्तु सामा यतया 'रसवती' और 'उर्वशी' को हिदी के भालोधक उनकी मुख्य काव्य-धारा नही मानते रहे हैं और इसलिए ऐकातिक प्रेम की इन कवि- ताओ मे सामाजिक सदभ का सधान थोडा बेतुका सा लगता है। 'उवशी' जब प्रकाशित हुई तब उस पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध क्रातिकारी श्री म मयनाथ । गुप्त ने लिखा था कि "हुकार', 'कुरुक्षेत्र' और 'रश्मिरथी' के कवि ने विपय तो अपने स्वभाव से बहुत भिन चुना, कि तु शृगार के बहाने उसने कविता ऐसी रच डाली, जिमकी तुलना किमी और काव्य से नहीं की जा सकती।" इसी प्रकार 'रसवती' पर एक तल्ख टिप्पणी देते हुए डॉ. कामेश्वर शर्मा ने लिखा था कि 'हकार के बाद 'रसवती' का प्रकाशन ठीक उसी प्रकार है, जिस प्रकार किसी आतकवादी का काले पानी से लौटकर आने के बाद घर बसाना या या कहिए कि 'हाहाकार' के दिनकर ने 'रसवती' मे आकर अपने कानो मे कस कर उगली ठूस ली है।" हिदी के आलोचक इस स्थूल धारणा के भ्रान शिकार रहे हैं कि सामाजिक चेतना जव तक अभिधात्मक सपाट बयानी के द्वारा ही व्यक्त न हो तब तक कविता का सामाजिक सदभ होता ही नहीं। कविता का यह स्थूल समाजशास्त्र विकसित आलोचना शास्त्र मे सब जगह तिरस्कृत हो चुका है और हिदी की साम्प्रतिक आलोचना इस जुए को उतार फेंक्ने को क्ममसा रही है। रवी द्रनाथ ने एक जगह पर लिखा है कि "साहित्य मदिर की भित्ति पथ्वी क गम्भीर अतर्देश मे गडी रहती है और उसका सिर मेघो को भेदकर आकाश में उठता है।' रवीन्द्रनाथ साहित्य का समाजशास्त्र नही लिख रहे थे कि तु वे परमोच्य, कोटि की प्रतिभा थे, सजनशील कवि थे और वे साहित्य के सामाजिक आधार को जानते थे। इसलिए वे कवि कल्पना के झरोखे और महराव और ठोस प 1 म -- सामाजिक सम्बध ये आधारो का विलक्षण सामजस्य प्रस्तुत कर रहे थे । साहित्य के फूल शूय आवा मे नहीं खिलते, उनमे यौवन और लाली रहती है, वे मिटटी से रस ग्रहण करते हैं। प्रेम मनुष्य के सामाजिक सम्बध का सबसे गहन रूप है। आज का आलोचक जिसे नर-नारी सम्बध कहता है वह प्रेम ही है इसलिए प्रेम काव्य गहन सामाजिक सदभ की अभिव्यक्ति होता है। इसलिए प्रेम कविता चाह सूरदास की हो या दिनकर की, साहित्य के समाज शास्त्र के लिए श्रेष्ठ उप जीव्य है। समाज के उन प्रतिबिम्बो का सघान आलोचक का दायित्व है जिन प्रतिविम्वों ने कविता की जीवन और रम से भर दिया है। दिनकर प्रखर राष्ट्रीयता और सामाजिक घेता के ही कवि नहीं वरन् मार्मिक प्रेमच्छवियो के भी कवि हैं । सोदय को उन मार्मिक छवियो की रचना में उनका समाज सापेक्ष मन ही ढला है। नर नारी सम्बधो वे वर्णन के माध्यम से वे अपने युग और समाज की आत्मा का सपान करते हैं । 'उवशी' उनका एक ऐसा काव्य है जिसमे उनकी जीवन चितन और साहित्य-साधना के उत्तमाश ढले हैं । इसलिए 'उवशी' ये मामाजिक सदम को खोज साहित्य के समाज शास्त्र को रचना में एक फलप्रद दिशा है। श्रद्धेय गुरुवर डॉ. विजे द्रनारायण सिंह के प्रति चिर कृतज्ञ हूँ जिनके मागदशन से यह काय मम्प न हो सका । पुस्तक पूरी करने मे अनेक मित्रो से सहायता मिली है । मैं उन सबकी आभारी हू। अत में अपनी स्वाभाविक श्रुटियो के लिए विनम्रतापूर्वक क्षमा याचना करती हू। आशा है कि 'उवशी' के सम्बध मे होनेवाली भावी विचारधाराओ के आलोक मे यह प्रयास भी कहीं जुगनू की भाति आपका ध्यान आकर्षित करेगा। ना आहुजा हिदी प्राध्यापिका, यू गवनमेट डिग्री कॉलेज खरताबाद, हैदरावाद -

विषय-अनुक्रम
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भूमिका
1 भारतीय नवोत्थान और प्रवृत्ति का जीवन दशन/9
नवोत्थान की भावभूमि और दिनकर
2 उवशी का मायुनिक परिप्रेक्ष्य/16
प्राचीन कथा नव्य सदम
औशीनरी सती नारी की त्रासदी-
पुरूरवा आधुनिक पुरुष की विडम्बना
उवशी हृदय का अप्रतिहत आवेग
3 नर नारी सम्बध फा आधुनिर परिप्रेक्ष्य/30
आधुनिकता और प्रेम
अप्सरा घम बनाम मानवी घम
सण्डित दाम्पत्य और निकोण
4 काम की मानिफ समस्याए/47
काम और अध्यात्म
5 उपसहार/59
6 सदभसकेत/64
7 सबभ प्रयों की तालि/70

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1 भारतीय नवोत्थान और प्रवृत्ति का जीवन-दर्शन कोई भी कृति अपने युगबोध से निस्सग नही हुआ करती । कलाकार अपनी तीद्र सवेदनशीलता के कारण युग चेतना से अनय रूप से समृक्त रहता है। समाज की जीवन दष्टि और दृष्टिकोण मे बदलाव आने से साहित्य में भी बदलाव उपस्थित होता है। जब कभी युगीन सवेदनशीलता मे परिवतन उपस्थित होता है, नवीनता का आग्रह होता है, उस समय पारम्परिक बोध और नवीन सवेदनाओ मे सपप उत्पन होता है। यह सत्रमण की स्थिति समाज की चेतना मे तनाव पंदा करती है, प्राचीन जीवन मूल्य, जो जड हो चुके हैं, जो हमारे समाज के लिए उपयोगी सिद्ध नहीं हो रहे हैं, उहें नकार कर नवीन मूल्यो को प्रस्थापित करने में सहायक होती है। पुनर्जागरण काल मे साहित्य व समाज मे जो अविरोघ तथा आन्तरिक विसंगतिया दृष्टिगोचर होती हैं, उनके केद्र मे यही सक्रमण की स्थिति है। पुनर्जागरण से पूर्व मध्ययुगीन जीवन दृष्टि के परिप्रेक्ष्य मे धम समाज मे के द्रीय भूमिका निभा रहा था। समाज के प्रत्येक क्रिया क्लाप का नियत्रण धम के सशक्त हाथो में था। इसी कारण समाज की प्रत्येक समस्या का हल धम- मूल्यो में ही खोजा जाता था। धम की दष्टि में यह समाज, यह जीवन, इसके प्रत्येक क्रिया कलाप क्सिी अज्ञात पारलौकिक शक्ति से संचालित स्वप्नवत् माया जगत का क्षणमगुर आविष्कार था। अत मनुष्य और उससे निर्मित मानवीय समाज तथा इहलौकिक एव भौतिक शक्तियो पर किसी की आस्था न थी। 'योगक्षेमम् वहाम्यहम्' कहनेवाले ईश्वर पर ही सबकी अटूट आस्था थी। फलत पुनर्जागरण से पूर्व का समाज स्वयं अपने प्रति ही उदासीन, भौतिक आकषणो के प्रति निष्क्रिय, भाग्य और भगवान पर ही अवलवित रहा। विविध धर्मों ने मानव-मुक्ति के भिन भिन माग तय कर लिये थे। कि तु मे भिन्न भिन मार्ग उसी एक बिदुपर आकर एक हो जाते थे, जहा किसी पारलौकिक सत्ता की शक्ति को स्वीकृति प्राप्त होती थी और मनुष्य की समस्त सुप्त अतशक्तियो को उस शक्ति के सम्मुख समर्पित कर दिया जाता था। मानव की ऐहिक शक्तियो की भत्सना कर पाप- पुण्य, धम-अघम, सत्य-असत्य की व्याख्याए 'ब्रह्मसत्य जगमिथ्या' की केन्द्रीय - 10 उवशी का सामाजिक सदम पुरी से चिपर पर रह गई थी। नवोत्थान की लहर ने इन प्रतिक्रियावादी सहे-गले रीति रिवाजो और धामिर अप विश्वासी वे सम्मुख प्रश्न चिह्न लगाये । जीवन मो देखने-समझने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया । वैज्ञानिक दृष्टि के कारण "विश्वास ने बजाय परीक्षण, अदा की जगह तक, आस्था की जगह विश्लेषण पर बल दिया जान लगा, जिसकी निश्चित परिणति यह हुई वि मानव नियति ये विषय म हमारी मध्ययुगीन धारणा विल्कुल बदल गई। परिणामस्वरूप मानवमा मूल्य बढ़ गया और मानवेतर पाक्तियो का मूल्य घट गया। 'धर्मे हि तेपाम अधिको विशेषाम में स्थान पर बुद्धि तेपाम् अधिको विशेषाम् का विधान परिताप होने लगा। नवोत्थान की लहर म नैतिकता ईश्वर-परख न रहकर मानय सापेर बन गई । बौद्धिकता के प्रकाश ने नतिरता के जीण-शीण मूल्यो को ध्वस्त कर दिया। मध्यकालीन नतिरता मेवाम घिनौना और विकृत कृत्य था । वाम और नर्क एक दूसरे के पर्याय थे । कबीर का कथन है "जहा भाम है, वहा राम नहीं, जहा राम है, वहा काम नहीं।" सेंट पाल का तो यह दावा है, "मैथुन चाहे विवाह के बाद ही हो मुक्ति प्राप्त करने की चेष्टा में बाधक होता है। इसी आधार पर वे कहते हैं 'पुरप के लिए अच्छा तो यही है कि वह स्त्री को छुए भी नही।" स्पष्ट है जहा काम के सम्बध मे ऐसे विचार प्रचलित होंगे वहा गाहस्थ्य धर्म गौरव का प्रतीक कभी नही हो सकता । सेंट जोसेफ का वथन है, 'विवाह की लकडी को ब्रह्मचय के कुल्हाडे से काट दो।" इसी कारण विवाह के सम्बध मे स्वस्थ दृष्टि कोण नही अपाया जाता था।"पति या पली के मन मे धम का आवेग आते ही पला परिणाम यह होता था कि 'सुखी सम्बध' असभव हो जाता था। दोनो में से जिसमे भी धम की भावना अधिक उत्कट होती थी, उमरी तत्काल यह इच्छा होती थी कि एकातवास मिले और तपस्या करने लगू।" इस भावना के वैद्र मे यौन सम्बन्ध तिक पतन व पाप वा सूर था। पितु इतिहास साक्षी है काम की सहज धारा को जितना ही अवरुद्ध पिया गया, वह हमारी चेतना मे और गहराई से प्रविष्ट होती गयी। नीत्से का कथन है। घम ने जहर खिलाकर सेक्स को मार डालने की कोशिश की । सेक्स मरा तो नहीं, सिफ जहरीला होकर जिदा है।" कि तु नवोत्थान के उपरान्त काम के प्रति इस परम्परागत दृष्टिकोण मे बदलाव आया । मनोवैज्ञानिक आविष्कारो ने सिद्ध घर दिया कि मानव के सतुलित विकास के लिए यह आवश्यक है कि काम से मत्री स्थापित की जाय । इसी कारण आधुनिक युग मे नतिक्ता को सेगम सम्बधो से नापने की दक्यिानूसो परम्परा को प्रश्रय नही दिया जाता। शारीरिक पवित्रता भाति की बातें कोसला मात्र हो गई हैं। आज नर-नारी यौन मुक्ति के आग्रही हैं। आज योन सम्बध व्यक्ति के मन मे पाप-बोध उत्पन नहीं करते।

भारतीय नवोत्थान और प्रवृत्ति का जीवन-दशन 11 काम को जीवन में प्रथय प्राप्त होते ही नारी की स्थिति मे भी परिवतन आया। नारी जोशंतान का दरवाजा थी, नक का माग दिखानेवाली मशाल थी, अब वह सगिनी, सर्मिणी बन गई। अब वह उपभोग की वस्तु मात्र नही रह गई। शिक्षा एव बौद्धिकता के आलोक मे उसे अपनी अस्मिता का बोध हुआ और इस अस्मिता (Identity) की पुनप्रतिष्ठा मे वह सारी बाधाओ को अतिक्रमित करती गयी। सबसे पहली थी आर्थिक परत त्रता-पहले वह आर्थिक दष्टि से पुरुष पर अवलवित थी । अब वह आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनी। आज उसने आर्थिक ही नहीं, राजनैतिक, सामाजिक आदि क्षेत्रो मे भी अपनी पहचान बनानी भारभ की है। वस्तुत नवोत्थान की धारा मे नारी देश की मुक्ति मे भी कही अपनी ही मुक्ति खोज रही थी और उसका यह मुक्ति प्रसग उत्तरोत्तर प्रशस्त ही होता चला गया। अत नवोत्थान के प्रकाश मे परम्परागत स्थापित नैतिक बोध का विघटन बडी बुरी तरह से हुआ। वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाते ही सवेदनशील मन जीवन की प्रत्येक घटना और परम्परागत मूल्यो को बुद्धि की आख से परखने का आदी हो गया । नवीन सामाजिक सदों मे भारतीय आदर्शों एव मूल्यो की असारता प्रतीत होने लगी। भारत जैसे धम-परायण देश मे धम अब मात्र ऐति- हासिक तथ्य रह गया है। घम ने समाज को जिन चार वर्गों में बाटा था, बदले हुए सामाजिक सदर्भो मे यह विभाजन असगत, अस्वाभाविक और विशेप वग की चालबाजी लगता है। नवोत्थान को भावभूमि और दिनकर किसी कृति के सामाजिक सदभ का अध्ययन करने के लिए आवश्यक है कृतिकार के उस सदर्म का विश्लेपण करना जिसकी कोख से वह उत्पन हुआ है, जिन परि- स्थितियो ने उसके निर्माण में योग दिया है उसकी चेतना को आदोलित किया है, उसमे बेचनी उत्पन कर अभिव्यक्ति के द्वार तक पहुचाया है। सच्चा कवि जीवन की आत्यतिक गहराइयो व अनुभूतियो से उदभूत होता है। जीवन की समस्याओ की गहनतम जडो को स्पश कर, जीवन को उसकी समग्रता मे जानने, जीने और प्रयोग करने का जीवत प्रतीक होता है। दिनकर नि सदेह ऐसे ही कवि हैं। जब कभी युग का बोध बदलता है, तब साहित्य की रचना भी बदले हुए सदन मे होने लगती है । नवोत्थान की लहर ने भारतीय मनीषा में जो क्रान्ति- कारी परिवतन उपस्थित क्यिा, उसका प्रभाव भारतेदु से लेकर आज तक प्रत्येक साहित्यकार पर पडा है । इनमे मध्यकालीन बोध को स्वीकृति भी है और अस्वी- कृति भी । भारते दु को आधुनिक कवि की सज्ञा उनके व्यक्तित्व से आतकित 12 वशीका सामाजिक सदम होकर ही दी जा सकती है। वस्तुत पुनरुत्पान के साये मे अपनी संवेदना को ढालने का प्रयास सवप्रथम मैथिलीशरण गुप्त ने ही किया पा। दिनकर की काव्य-चेतना भी नवोत्थान की भाव भूमि से स्पदित है। उनीसवी सदी मे प्रारम्भ होनेवाले नवोत्यान की पेद्रीय प्रवृत्ति राष्ट्रीयता है । वेद, उपनिषद, गीता की नवीन व्याख्या ने भारतीयो में अपने देश और सस्कृति के प्रति रागात्मक वृत्ति को जन्म दिया । यद्यपि राष्ट्रीयता की भावना ने दिनकर की चेतना को भीतर से नहीं, अपितु बाहर से आनात किया था। तथापि उनके काव्य मे राष्ट्रीयता की भावना अत्यन्त ही उदात्त रूप में प्रतिफलित हुई है । उनका मुख्य स्वर विद्रोह और आगोश का रहा है। उनकी प्रारभिक रचना 'ताडव' का हाहाकार सुनिए "लहरें प्रलय प्रमोद गगन मे अघ धूम हो व्याप्त भुवन मे, बरसे आग, बहे झझानिल, मचे त्राहि जग के आगन मे, फटे अतल पाताल, धसे जग, उछल-उछल कूदे भूघर। नाचो, हे नाचो नटवर दिनकर मे भारतीय सास्कृतिक चेतना का अत्यत उदात्त बोध था। अपनी सस्कृति के प्रति अनुराग हाने से ही उनकी राष्ट्रीय भावना से उदभूत कविताए इतनी मार्मिक बन पडी हैं । दिनकर की राष्ट्रीय चेतना का धरातल अत्यत ही विस्तत और गहरा है और इसी गहराई मे जाकर वह समस्त मानवता को अपने भीतर समेट लेता है। दिनकर मे आर्थिक विषमता धार्मिक अघविश्वास और सामाजिक कुरीतियो के प्रति तीव्र आक्रोश था। 'दिगम्बरी', 'हाहाकार', 'असमय' 'आह्वान', 'भीख', 'बिल्ली', "विपथगा' आदि रचनाआ मे सामाजिक और साम्राज्यवादी शासन के व्यापक शोषण को कवि ने अनावत किया है। "वे भी यही दूध से जो अपो श्वानो को नहलाते हैं ये भी बच्चे यही, कद्र मे दूध-दूध जो चिल्लाते हैं।" अत मे कवि बच्चो के दूध के लिए स्वर्ग मे धावा बोल देता है। "हटो व्योम के मेघ, पथ से, स्वग लूटने हम आते हैं, 'दूध-दूध' ओ वत्स ! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं।" उपयुक्त मानवतावादी स्वर के परिप्रेक्ष्य मे नवोत्थान के बाद का बदला हुआ दृष्टिकोण है । नवोत्थान के बाद साहित्य मे शोषित वर्ग के प्रति साहित्यकार की सवेदना प्रमुख रूप से प्रभावित हुई है । इसी सदभ मे समाज मे नारी व्यक्तित्व की भी नई पहचान बनी है। मध्य-युग तक नर-नारी के लिए नैतिकता के भिन्न भिन्न भारतीय नवोत्थान और प्रवृत्ति का जीवन दशन 13 मानदण्ड थे । पुरुष वेदो का अध्ययन कर सकता था, किन्तु नारी नही । बुद्ध देव ने भी अपने प्रिय शिष्य आनन्द के आग्रह पर सघ मे स्त्रियो के प्रवेश की स्वीकृति दे तो दी, कि तु बाद मे इसका उहें धोर पश्चात्ताप हुआ। दिनकर का क्थन है, "जव जीवन का सर्वोच्च ध्येय मोक्ष और मोक्ष का उपाय स यास हो गया, तब समाज म हट्टे-कट्टे नवयुवक भी पत्नियो को छोडकरस यास लेने लगे। उस विवशता- भरी वेदना की तनिक कल्पना कीजिए, जो उन पत्नियो के हृदय को दग्ध करती होगी, जिनके पति जीवन के सर्वोच्च ध्येय की खोज मे उनका त्याग कर रहे थे नारियो पर अत्याचार सभी देशो के पुरुषो ने किया था, किंतु उन पर जैसा अत्या- चार भारतवर्ष मे हुआ, वैसा कदाचित् और वही नही हुआ होगा।" वितु पुनरुत्थान की धारा ने नारी के व्यक्तित्व को नई गरिमा दी । अव नारी निदा की पात्री या पाप की खान न होकर मानवी के रूप मे प्रतिष्ठित हुई। उसे अपनी अस्मिता का बोध हुआ। आर्थिक स्वातत्र्य और शिक्षा के आलोक ने नारी मे अपने व्यक्तित्व के प्रति सचेतनता उत्पन कर दी। दिनकर के काव्य में नारी के तीन रूप दष्टिगोचर होते हैं-1 रक्षणीया, 2 आधुनिका, 3 गहिणी। इन तीनो रूपो मे उन्हें नारी का रक्षणीया और गृहिणी रूप ही प्रिय है । आधुनिका के लिए उनके पास केवल भत्सना है। वस्तुत दिनकर को नारी का 'आचल मे है दूध और आखो मे पानी' रूप ही प्रिय है। "राजा हसते हैं, हसे, तुम्हे रोना है, मालिय मुकुट का भी तुमको धोना है, रानी । विधि का अभिशाप, यहा ऊसर में आसू से मोती बीज तुम्हे बोना है।" 'रसवती' मे नारी की वदना करते हुए वे कहते हैं- "न छू सकते जिसको हम देवि ! कल्पना वह तुम अगुण, अमेय, भावना अतर की वह गूढ, रही जो युग-युग अकथ, अगेय । तैरती स्वप्नो मे दिन रात मोहिनी छवि-सी तुम अम्लान, विजिसके पीछे-पीछे नारि । रहे फिर मेरे भिक्षुक गान ।' 10 दूसरी ओर आधुनिका की वे सदैव भत्सना करते हैं। 'रसवती' मे वे आधुनिक नारी की भर्त्सना करते हुए कहते हैं- 14 उवशी का सामाजिक सदर्भ "जनाकीण ससार के बीच कितनो का मन बांधोगी? निरुद्देश्य वेघोगी चलते राह हृदय क्सि किस का।"1 मध्ययुगीन जीवन दशन 'ब्रह्मसत्य जमिथ्या' की धुरी पर टिका हुआ था। समाज के प्रति उदासीन भौतिक आकपणो के प्रति निष्क्रिय, भाग्य और भगवान पर अवलबित रहना ही मनुष्य की नियति थी। कम का जीवन मे कोई महत्त्व न था। 'अजगर कर न चाकरी, पछी करै न काम' यही सिद्धात समाज मे लागू था । प्रवत्ति के आख्याता दिनकर 'कुरुक्षेत्र' मे भाग्यवाद पर कमवाद की विजय स्थापित कर जीवन मे कम की महत्ता को प्रतिपादित करते हैं- "ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य मे मनुज नही लाया है अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया है।"12 भाग्यवाद को वे पाप मानते हैं- "भाग्यवाद आवरण पाप का और अस्त्र शोषण का, जिससे रखता दबा एक जन भाग दूसरे जन का।' 13 कमठता का सदेश देते हुए वे कहते हैं- "नर समाज का भाग्य एक है, वह श्रम, वह भुज-चल है, जिसके सम्मुख झुकी हुई पृथ्वी, विनीत नभ तल है।" "14 मध्ययुग मे जगमिथ्या की धुरी से चिपके रहने के फलस्वरूप समाज मे अकमण्यता और जीवन से निवृत्ति का बोल-वाला था। भीष्म निवत्तिवादियो को सचेत करते हुए कहते हैं- "धमराज, कमठ मनुष्य का पथ स यास नहीं है, नर जिस पर चलता वह मिट्टी है, आकाश नही है ।"15 जो व्यक्ति वतमान का तिरस्कार करके दिन रात मरण का ही चिंतन करता है, वह कभी किसी समाज के लिए उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकता- तिरस्कार कर वतमान जीवन के उद्वेलन का, भारतीय नवोत्थान और प्रवृत्ति का जीवन-दशन 15 । करता रहता ध्यान भनिश जो विद्रूप मरण का। अकमण्य वह पुरुष काम किसके, कब आ सकता मिट्टी पर कैसे वह कोई कुसुम खिला सकता है।"18 इसी कारण वे इस जगत् की, इस मिट्टी की सेवा कर कर्मठ सग्यासी बनने का सदेश देते हैं- - "मिट्टी का यह भार सभालो, बन कर कमठ सयासी, पा सक्ता कुछ नही मनुज बन केवल व्योम प्रवासी।"17 दिनकर मिट्टी की महिमा का गान करते हुए स्वग से धरती को अधिक आपक और जात्मीय मानते हैं। वे धरती से स्वग की नहीं अपितु स्वग से धरती की यात्रा कर उसे गौरवावित करते है । 'उवशी' को स्वगलोकवासिनी अप्सराए धरती के सौदय पर मुग्ध हो जाती हैं । 'उवशी' की सहज या कहती है- "धुली चान्नी मे शोभा मिट्टी की भी जगती है कभी-कभी यह घरती भी कितनी सुदर लगती है जी करता है यही रहे हम फूलो मे बस जाए।"18 इस प्रकार दिनकर की काव्य चेतना नवोत्थान की भाव भूमि पर ही पल्लवित, पुष्पित हुई है। किसी कृति के सामाजिक सदभ का विश्लेषण करने से पूर्व आवश्यक होता है कृतिकार के उस परिवेश को जानना जिसकी कोख से वह उत्पन्न हुआ है। वस्तुत परिवेश केवल प्रतिक्रिया ही नहीं, मूल्यबोध भी है। समाज द्वारा स्वीकृत, सवमा य और बहुप्रयुक्त प्रक्रिया ही नवीन मूल्यो को जन्म देती है । दयान द, विवेकान द, राजा राममोहन राय, गाधी अरविद आदि के सुधारात्मक दष्टिकोणो ने जिस मानवतावादी परिवेश का निर्माण किया, उसी के प्रतिक्रियास्वरूप भारत दु से लेकर आज तक के साहित्य मे मानव सम्बधी नवीन मूल्य विकसित हुए। मानव अपने सत्कर्मों से देवता बन सकता है, नारी के प्रति बन्ला हुआ दृष्टिकोण, भारी सगिनी सहधर्मिणी, शक्निदायिनी है, वह मात्र भोग्या नहीं है। ये समस्त मूल्य परिवर्तित सामाजिक परिवेश की देन हैं।

2 उर्वशी का आधुनिक परिप्रेक्ष्य प्राचीन कथा नव्य सदभ उवशी पुरुरवा क्या का मूल उत्स ऋग्वेद के दशम् मडल मे आठवें अनुवाक 95वें सूक्त मे मिलता है। इस सूक्त से यही ज्ञात होता है कि उवशी पुरुरवा को छोडकर चली गई है। पुरुरवा उसकी खोज करता है। एक दिन उवशी उसे मिल जाती है । पुरुरवा साथ रहने का आग्रह करता है, किंतु उवगी अस्वीकार कर देती है। ऋग्वेद की यही कथा 'शतपथ' में अधिक विस्तार और मोहक रूप में कही गई है। इस कथा के अनुसार उवशी पुरुरवा का पतीत्व तीन शर्ती के आधार पर स्वीकृत करती है-1 पुरुरवा उवशी की इच्छा के बिना समागम नही करेगा। 2 पुरुरवा उवशी के दो मेयो की रक्षा करेगा, 3 उवशी पुरुरवा को नग्नावस्था मे नही देखेगी, अयथा उवशी पुन स्वर्ग लौट जायगी। इन शतों का निर्वाह करते हुए दोनो बहुत समय तक माय-माय रहे। गधव उवशो का वियोग और अधिक न सह सके। एक रात उहोंने उवशी के मेष शिशुओ को चुरा लिया। यह देखकर उवशी सहायता के लिए चिल्लाई । पुरुरवा उस समय नग्नावस्था मे था। उवशी की पुकार सुन वह तुरत उसी दशा मे गधा के पीछे दौड पडे। अवसर देखकर गधों ने प्रकाश कर दिया, जिसमे राजा को नग्न देखकर उवशी प्रतिज्ञानुसार लुप्त हो गई। महाभारत मे यह क्या पुरुरवा से सम्बधित न होकर उवशी अजुन से सम्बधित है । एक वार अर्जुन के स्वागताथ इद्र सभा मे नृत्य का आयोजन किया जाता है, उसमे उर्वशी अजुन के प्रति आकृष्ट हो जाती है कि तु अजुन उसे माता के रूप मे देखता है । कामातुर उवशी रुष्ट होकर अजुन को एक वष तक नपुसक रहने का धाप देती है। एक अ य क्या के अनुसार भरत-श्राप के कारण उवशी पुरुरवा की पत्नी बनी और पुरुरवा ने जब आयु नामक अपने पुत्र का मुख देख लिया, तब उवणी पुरुरवा को छोष्ट स्वगलो चली गई। कालिदास ने विक्रमो धणीयम में इसी क्या वो लिया है। किंतु सुखात कथा बनाने के लिए अत में नारद द्वारा इद्र के थाना परिवतन की उन्भावना की है, जिसके कारण उनी । उवशी का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 17 श्रापमुक्त होकर पुरुरवा के साथ रहने लगती है। कविवर रवी द्रनाथ ठाकुर ने भी उवशी की फ्था को लिया है, किन्तु उसे सवथा वायवीय घरातल पर प्रस्तुत किया है। महर्षि अरविद ने भी 'उवशी' नामक काव्य की रचना की, किन्तु औशीनरी का उल्लेख न कर पुरुरवा उवशी को सन्यस्त कर काम के आकुल उफान कोशात किया है। "उवशी' के सगुफ्न मे कवि को यही समद्ध परम्परा प्राप्त हुई है। किंतु इस क्था को लेन मे उनका उद्देश्य वैदिक आख्यान की पुनरावृत्ति या वैदिक प्रसग का प्रत्यावतन नहीं था। वस्तुत कोई भी कृति अपने युगबोध अपने परिवेश से निस्सग नही हुआ करती। किसी प्राचीन कथा को लेने का अभिप्राय यह नहीं होता वि कवि उस परम्परा मे मात्र एक क्डी जोड देना चाहता है। विचारो की सपदा अवश्य उसे परम्परा से प्राप्त होती है, किन्तु उनमे जीते हुए निरतर विकसित और आधुनिक होने की अनिवायता वह अपने परिवेश से ग्रहण करता है । कवि मत्यु का उपासक नहीं होता, उसका जीवन इतिहास-सापेक्ष है। अपने यथाथ को वहन करते हुए निरन्तर बदलते परिवेश को सवेदना को ग्रहण करते हुए लिखने का प्रयास ही कवि के जीवन को साथकता देता है। वस्तुत प्राचीन क्था की पौराणिकता की रक्षा करते हुए उसे आधुनिक रूप देना बडे साहस का काय है। नरेश मेहता का कथन है, "एक युग की गरिमा दूसरे युग की गरिमा हो, इसकी कोई स्वीकृति नही । ऐसी स्थिति में विभिन युगीन गरिमाओ को योजित करना खतरे से खाली नही । इसके अतिरिक्त विभिन मूल्यो, बोधो वाले समाज मे कोई चरित्र लेकर एकदम विपरीत मूल्यो, बोधो, मा यताओ के उद्देश्य के लिए प्रस्तुत करना काफी सक्टपूर्ण होता है, लेकिन ऐसा सकट एक रचनाकार का ही हो सकता है और विना सक्ट उठाए किसी के लिए भी केवल रचना ही नही उसकी उपलब्धि सभव नहीं।"20 दिनकर इस चुनौती को स्वीकार ही नही करते, अपितु उसका प्रत्युत्तर भी देते हैं। 'उवशो' का ढाचा प्राचीन है, कि तु ज्वाला उसमे आधुनिक युग की धधक रही है ।21 "उवशी' की आधुनिकता अपने ऐतिहासिक क्रम और सामाजिक सदों से प्रस्फुटित हुई है । लेखक सदैव अतद्वंद्वी से ग्रस्त रहता है । बदलते परिवेश में, जहा मूल्यो का टकराव हो मानवीय सम्बधो मे असगतियां उत्पन हो गयी हो, ऐसी स्थिति को देखकर, अनुभव के स्तर पर जीकर, सवेदनात्मक स्वर में कुछ कहना ही कवि का दायित्व बन जाता है । 'उवशी' मे इन विसगतियो के प्रतीक हैं औशीनरी-पुरुरवा और उनका खडित दाम्पत्य ।

18 उवशी का सामाजिक सदर्भ औशीनरी सती नारी की वासदी औशीनरी की त्रासदी उस परम्परागत नारी की त्रासदी है, जिसका सती रूप पराकाष्ठा पर पहुचा हुआ है, वितु वह अपने अप्सरा तत्त्व को उभार नही पायी है। प्राचीन युग से ही नारी के सती रूप को इतनी अधिक प्रतिष्ठा प्रदान की गयी है कि उसका अप्सरा पक्ष धूमिल हो गया है । नारी की महिमा उसके सती रूप को लेकर ही हुई है । 'यत्र नायस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता' तथा 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो' जैसी उक्तिया सती नारी को गौरवावित करने के लिए ही कही गयी सती नारी पति के प्रति एकात समपण मे ही अपने जीवन को साथकता मानती है । पति ही उसका देवता, आराध्य, स्वामी सभी कुछ होता है । नीत्से का क्थन है—"नारी के लिए प्रेम मात्र भक्ति नहीं होता, वरन् विना कुछ लुकाये- छिपाये, बिना किसी तरह का हील-हवाला क्येि या प्राप्ति की आशा क्येि अपनी देह और आत्मा को सपूण रूप से समर्पित कर देने का भाव होता है।" औशीनरी ऐसी ही नारी है, जिसका अपना कोई व्यक्तित्व नही है। पति के प्रति निस्वाथ सेवा, त्याग निष्ठा में ही उसके जीवन का सार है। डॉ. राधाकृष्णन् का कथन है, "शताब्दियो की परम्परा ने भारतीय नारी को सारे ससार मे सबसे अधिक निस्वाथ, सबसे अधिक आत्मत्यागी और सबसे अधिक धयशील और सबसे अधिक कतव्यपरायण बना दिया है।"22 वस्तुत "वह बचपन से पुरुष को एक अद्वितीय व्यक्ति के रूप मे देखने की अभ्यस्त होती है, जिसकी बराबरी वह नही कर सक्ती, इमलिए इस शक्तिशाली व्यक्तित्व मे खुद को एकाकार कर देने के स्वप्न देखती है। इसके अतिरिक्त उसे अय कोई माग दिखाई नहीं देता। वह अपनी इस गुलामी को ही स्वतत्रता की अभिव्यक्ति समझने लगती है।"23 इसी कारण वह पुरुष के चरणो म सवस्व अर्पित कर देने मे ही जीवन की साथकता समझती है। यद्यपि सती घम अपने जाप मे महान आदश है सपूण ससार मे इससे ऊचे आदश की कल्पना तक नही की गई है। वितु नित नवीनता के आग्रही पुरुष मे नारी का यह एकरसीय व्यवहार बासीपन की भावना को जन्म देता है । फलत वह नयी हरियालियो की ओर आकृष्ट होता है । रसेल का कथन है, 'वे व्यक्ति जिनमे किसी प्रकार का रूढि निषेध नही रहता सम्भव है वे कुछ वष तक एक ही नारी के प्रति आसक्त रहे, किंतु कुछ वर्षों के पश्चात उनका भोग मद पड जाता है और तब वे पुरानी पुलक की खोज मे औरो की ओर देखने लगते हैं ।"24 पुरुरवा ऐसा ही पुरुष है । भौशानरी के एकरसीय व्यवहार से वह ऊब चुका है। इसी कारण वह उवशी की ओर आकृष्ट होता है। उवशी को पाकर वह निहाल हो जाता है, उवणी के व्यक्तित्व मे पुरुरवा को अपने व्यक्तित्व की पूर्णता के चिह दृष्टिगोचर होते ही वह कहता है- --- -- १ उवशी का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 19 "एक मूर्ति मे सिमट गयी विस भांति सिद्धियां सारी? कब या ज्ञात मुझे इतनी सुदर होती है नारी ?"25 पुरुष सदव कमठता के कोलाहल मे घिरा रहता है, नारी के पास वह इस इच्छा से आता है कि वह उसे ताजगी और शीतलता से आप्लावित कर दे। "सधों से अमित-यात हो पुरुष खोजता विह्वल सिर पर पर सोने का, क्षण भर, नारी का वक्षस्थाना आखो मे जब अश्रु उमडते, पुरुष चाहता पुम्बनको और विपद मे रमणी के अगो का गाालिंगन। जलती हुई धूप मे आती याद छाह की जल को पार. या निकुज मे राह देखती प्रमदा के अचने की और नरा मे भी, जो जितना ही विक्रमी, प्रब उतना ही उद्दाम, वेगमय उसका दीप्त अनल है ।"26 ओशीनरी पुरुष की यही वृत्ति समझ नहीं पाती। तन मन से पति चरणो मे अर्पित हो जाने में ही वह अपने क्तव्य की इतिश्री समझती है। "अरी, कौन है कृत्य जिसे मैं अब तक न कर सकी हू फोन पुष्प है जिसे प्रणय वेदी पर घर न सकी है? प्रभु को दिया नहीं, ऐसा तो पास न कोई धन है । “योछावर आराध्य चरण पर सखि | तन, मन, जीवन है।"27 पुरुरवा वस्तुत रोमाटिक पुरुष है। रोमाटिक पुरुष दूरी के रोमास को पस द करता है । वह उसी नारी की ओर आकृष्ट होता है जो सभी नारियो मे छिपी विचित्रता की सार हो, जो पुरुष मे आकाक्षा को जाग्रत तो करती हो किंतु उसे तप्त करने से भागती हो । स्वप्न सदृश्य बाहा मे उडी-उडी आती हो और लहर सी लौटकर फिर अधिकार मे खो जाती हो- "क्षण क्षण प्रक्टे, दुरे, छिपे फिर-फिर जो चुम्बन लेकर, ले समेट जा निज को प्रिय के क्षुधित अब मे देकर, जो सपने के सदश बाहु मे उडी-उडी आती हो और लहर सी लौट तिमिर मे डूब डूब जाती हो प्रियतम को रख सके निमज्जित हो अतृप्ति के रस मे, पुरुप बडे सुख से रहता है उस प्रमदा के बस मे।' "रोमाटिक प्रेम मे प्रेम-पात्र सच्चे रूप मे दिखाई नही पडता, बल्कि सोदय के कुहासे म से दीखता है।' इसीलिए नारी को धुधलके मे ही पुरुष की ओर उ मुख होना चाहिए और घुघलके मे ही स्वय को समेट लेना चाहिए । वितु सती नारी पति से गोपनीयता रखना पाप समझती है, सम्पूण समपण ही उसके जीवन का । 1128 आदश होता है।

20 उवशी का सामाजिक सदम यह सत्य है, पराजित भी वह इसी आदश के फलस्वरूप होती है- गृहिणी जाती हार दांव सम्पूण समपण करके, जयिनी रहती बनी अप्सरा ललक पुरुष मे भरके। पर, क्या जाने ललक जगाना पर मे गहिणी नारी? जीत गई अप्सरा, सखी | मैं रानी बनकर हारी।"29 रसेल का कथन है, "रोमाटिक प्रेम का मूल तत्त्व यह है कि इसम प्रेम के पात्र को पाना बडा कठिन माना जाता है और उसे बहुमूल्य समझता जाता है।"30 दिनकर भी यही कहते हैं- "कौन कहे ? यह प्रेम हृदय की बहुत बडी उलझन है। जो अलभ्य, जो दूर, उसी को अधिक चाहता मन है।"31 पुरुरवा उवशी को बड़ी कठिनाई से प्राप्त करता है, जबकि औशीनरी उसे सहज ही प्राप्त हो गई थी। मदनिका पुरुष की इसी प्रकृति की ओर सकेत करते हुए कहती है- "कर स्पश से दूर स्वप्न मलमल नर को भाता है।) छक कर जिसको पी न सका, वह जल नर को भाता है ग्रीवा मे झूलते कुसुम पर प्रीति नही जगती है, जो पद पर चढ गयी, चादनी फीकी वह लगती है।"32 परम्परागत आदर्शों से युक्त औशीनरी की यही विडम्बना है। सतीत्व की गरिमा से युक्त पुरुष पर सभी कुछ निस्वाथ होकर अर्पित कर देने मे ही वह जीवन की साथकता मानती है। किंतु पुरुष जब उसकी निष्ठा और गाम्भीय से ऊब कर नये सोदय, नई पुलक की खोज मे उसके बधन को तोड देता है, तव औशीनरी के पश्चात्ताप को सीमा नही रह जाती तब ही उसे अपनी भूल ज्ञात होती है जब उवशी बाजी मार ले जाती है- गंवा दिया सवस्व हाय मैंने छिपकर छाया मे, अस्वीकृत कर खुली धूप मे आख खोल चलने से। देवि प्रेम के जिस तट पर अप्सरा स्नान करती है, गयी नही क्यो में तरग आकुल उस रसित पुलिन पर 33 यही सती नारी की त्रासदी है। अत में औशीनरी अछता-पछता कर रह जाती "पछताती हूं हाय, रक्त आवरण फाड ब्रीडा का व्यजित होने दिया नही क्यो मैंने उस प्रमदा को जो वेवल अप्सरा नही, मुभमे भी छिपी हुई थी ?' 31 वस्तुत "ओशीनरी जिसका अभाव महसूस करती है उवशी ने वही वस्तु पुरुरवा मोदी। इसीलिए उवशी को अप्सरा भौशीनरी को सती को परास्त करती है।' 1135 उवशी का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 21 मोशीनरी को अपेक्षा सुक या पुरुष को प्रकृति से अधिक परिचित है। वह जानती है कि चट्टानो और पवतो से टकराने वाला विनात, भीम, दुजय पुरुष भी हृदय की तृष्णा के सामने पराजित हो जाता है। जगत् की सभी उलझनो से त्राण पाने मे वह समथ होता है, किन्तु अपनी ही बनाई हुई उलझनो से निकलने मे वह असमय होता है । इसीलिए गृहिणी को सचेत होकर पुरुष के अभावो और उल- झनो को देखना होता है। "इसीलिए दायित्व गहन, दुस्तर गहस्थ नारी का । क्षण क्षण सजग, अनिद्र-दृष्टि देखना उसे होता है, अभी कहा है व्यथा? समर मे लौटे हुए पुरुष को कहा लगी है प्यास, प्राण मे काटे कहाँ चुभे हैं ?"36 यद्यपि दिनकर की स्थापना है "प्रश्नो के उत्तर रोगो के समाधान मनुष्यो के नेता दिया करते हैं । कविता की भूमि केवल दद को जानती है, केवल बेचनी को जानती है।"37 किन्तु 'उवशी' मे दिनकर केवल औशीनरी के दद और बेचैनी से ही आ दोलित नही हुए हैं, वरन् आधुनिक युग की नर-नारी समस्या ने भी दिनकर के मानस को आन्दोलित कर उसका समाधान प्रस्तुत करने के लिए बाध्य किया है। 'उवशी काव्य की समाप्ति' नामक अपनी कविता मे औशीनरी के चरित्र के सबघ में अपनी विवशता को वाणी देते हुए कहते हैं- "मिनतें बहुत की माया की युवती पुरुरवा जाया की, पर वह अजीब जिद्दी निक्ली, अपनी शरारतोसे न टली। बंठ ही गयी लेकर यह प्रण, पट का न करूगी उमोचन पर, मैं किवाड कूटता रहा, पूरे बल से टूटता रहा।"38 किन्तु गौरवान्वित वे सती नारी को ही करते हैं। वस्तुत उनको सम्पूर्ण निष्ठा, अशेष श्रद्धा नारी के सती रूप पर ही है, 'उवशी वाव्य की समाप्ति कविता मे वे कहते हैं- "जो त्रिया अत मे आती है, वह क्यो सब पर छा जाती है यो नीति काम को मार गयी अप्सरा सती से हार गयी।"39 उवशी का अतर्धान होना इसी का सूचक है कि दिनवर को नारी का केवल अप्सरा रूप ग्राह्य नहीं है । सती नारी की वन्दना करते हुए दिनकर बहते हैं- 22 उवशी का सामाजिक सदर्म "पर, मैं क्या क्रू? सती नारी आती जब लिये प्रभा सारी करतब वह यही दिखाती है, सबके ऊपर छा जाती है।"40 वस्तुत दिनकर चाहते हैं कि नारी को पुरुष से अप्सरावत गोपनीयता भी बनाये रखनी चाहिए। इस सदम मे उनका क्यन है, "मैं नारी को शय्या पर अप्सरा और शेष समय लक्ष्मी देखना चाहता हू।"1 पुरुरवा आधुनिक मानव की विडम्बना पुरुरवा आधुनिक युग के मानव का प्रतिनिधित्व करता है। वस्तुत पुरुरवा का निर्माण स्वय दिनकर के व्यक्तित्व की भाव मियो से हुआ है। 'उवशी' मे पुरुरवा कहता है- "मत्स मानव की विजय का तूय हू मैं, उवशी | अपने समय का सूय हू मैं ।' 42 सूय का अय दिनकर होता है। 'उवशी काव्य की समाप्ति' कविता मे 'उवशी' रचना प्रतिक्रिया को खोलते हुए दिनकर वहते हैं- 'मैं ही पुरुरवा राजा था हा, तब अव से कुछ ताजा था। था उसे पिलाता केवल घत, खुद मैं पीता था सोम अमत । उन दिनो रोग से खाली था, में बडा पुष्ट बलशाली था।' 43 दिनकर 'उवशी' की भूमिका में भी यही स्वीकृति देते हैं "शायद, अपने से अल' करके मैं उसे देख नहीं सकता, शायद वह अलिखित रह गयी, शायद वह इस पुस्तक में व्याप्त है।' 44 कहने का तात्पय यह है कि दिनकर के व्यक्तित्व की द्वद्वात्मक्ता ने प्रेम और शृगार की उनकी सुकुमार चेतना ने पुरुरवा जैसे अद्वि तीय नायक के निर्माण मे महत्त्वपूर्ण योग दिया है। डॉ. विजे द्रनारायण सिंह ठीक ही लिखते हैं । हिदी कविता के नायको की गैलरी से यदि पुरुरवा निकाल दिया जाय तो वह गैलरी प्रभाहीन हो जाएगी।' आदिकाल से आधु निक काल तक हिंदी कविता मे ऐसे नायक का निर्माण नही हुआ चाहे वह चदबरदायी के पथ्वीराज हो, साकेत के राम हो अथवा कामायनी के मनु--- पुरुरवा इन सभी से विलक्षण है, जिसमे अदम्य पौरुष के साथ साथ कविहृदय सी सुकुमारता भी कम नही । उवशी उसके इसी रूप पर मुग्ध होकर कहती को 45 उवशी का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 23 "स्यात् दिखाने को, धरती जब महावीर जनती है, असुरो से वह बली, सुरो से भी मनोज्ञ होता है।"46 अपने पुरुषाय से पुरुरवा ने सभी कुछ प्राप्त कर लिया है और सौभाग्य से प्रत्येक सुयश, सुख, सिद्धि उसके जीवन मे अनायास स्वयमेव ही प्राप्त होती नायी है। उवशी जैसी अनि द्य सुन्दरी उस पर आसक्त है, किन्तु ये सभी सुख उसे सतोष नही दे पाते, इन सबसे आगे बढकर वह विसी अय अतीन्द्रिय आनद की कामना के लिए आकुल-व्याकुल है। यह आधुनिक मानव की विडम्बना है। सभी कुछ प्राप्त होते हुए भी वह मन से विषण्ण है, भीतर से रिक्त है। मन के शून्य को भरने के लिए वह ऐद्रिय-अतीद्रिय, मण्मय चिमय, स्थूल-सूक्ष्म के द्वन्द्व मे दोलायमान होता रहता है। "मत्ति महदाकाश मे ठहरे कहा पर शूय है सब। और नीचे भी नहीं सतोष, मिट्टी के हृदय से दूर होता ही कभी अम्बर नहीं है।' 148 पहले का व्यक्ति यदि जीवन में प्रवृत्त होता था तो पूरी तमयता से और यदि जीवन से विमुख होता था तो सदा के लिए। उसके मन मे कही द्वद्रों का आलो. वन विलोक्न नही था, कि तु आधुनिक युग के व्यक्ति की यही विवशता है, वह जीवन को उसकी समग्रता मे भोगने मे असमय है। पुरुरवा के माध्यम से दिनकर ने आधुनिक युग के मानव की द्विधा को सशक्त वाणी दी - "रूप का रसमय निमीण या कि मेरे रुधिर की वह्नि मुझको शाति से जीने न देती। हर घडी कहती, उठो, C इस घद्रमा को हाथ से घर कर निचोडी, CE पान कर लो यह सुधा, मैं शात हूगी, अब नही आगे कभी उदभ्रान्त किन्तु दूसरे ही क्षण जब- "रस के पात्र पर ज्यो ही घूट या दो घूट पीते ही न जाने, किस अतल से नाद आग "अभी तक भी न समझा? दृष्टि का जो पेय है, वह रक्त का भोजन नहा हा रूप की आराधना का माग आलिंगन नही है।" यह माधुनिक युग के व्यक्ति की त्रासदी है। डॉ. नगेद्र कहते हैं, "पुपरवा 24 उबशी का सामाजिक सदम ? के युग का भारतीय पुरुष हैजो सस्कारवश चि मम आस्वाद को न ता सवथा अस्वीकार कर मृण्मय आस्वाद के अमित्र रस का भोग कर सकता है और न पूर्वजो की भाति मण्मय अनुभूति का सहज परित्याग कर चिमय अनुभूति मे लीन हो मक्ता है ।३० उवशी उसकी इसी मन स्थिति पर खीझ कर कहती है- "तन से मुझको कसे हुए अपने दृढ आलिंगन मे, मन से, कि तु, विषण्ण दूर तुम वहा चले जाते हो? बरमा र पीयूप प्रेम का, आवा से आखो मे, मुझे देखते हुए कहा तुम जाकर खो जाते हो कभी-कभी लगता है, तुम से जो कुछ भी कहती हू आशय उसका नहीं, शब्द देवल मेरे सुनने हा!"51 आधुनिक मभ्यता ने मनुष्य के तन और मन के बीच विभाजन रेसा खीच दी है। उसकी चेतना को, उसके व्यक्तित्व को खडित कर दिया है। वह तन से कही है और मन से कही। उमकी भावना की तीव्रता बौद्धिक स्तर पर चिन्तन ने ले ली है। इसी कारण वह जीवन के रस को छन कर पाने में असमय है। क्षण म तो भावनाओ का ज्वार सपूण वेग से उफनता है, कि तु पुन भन कही किसी गुह्य लोक म विचरण करने लगता है। "क्षण म प्रेम अगाध, सिधु हो छैसे अलोडन म, और पुन वह नाति, नही जब पत्ते भी हिलते हैं। अभी दृष्टि युग-युग के परिचर से उत्फुल्ल हरी मी, और अभी यह भाव, गोद मे पड़ी हुई मैं जैसे युवती नारी नही, पथना की कोई कविताह 153 पुरुरवा का द्वन्द्व उम चितनशील व्यक्ति का है, जो विवेकशूम होकर काम को न तो जैव धरातल पर, एंद्रिय मुख के लिए भोग सकता है और न तो वाम के प्रति अबाध यासक्ति से मुक्त ही हो सकता है 154 यस्तुत वह एक नयी नैतिकता के लिए छटपटा रहा है, एक ऐसी नैतिकता के लिए, जो आधुनिक बोप के माप समुचित व्यावहारिक सतुला उत्पन कर सके, कितु उसकी यह छटपटाहट निरपर सिद्ध हो रही है । इस मक्रमण को प्रश्यिा से गुजरते हुए, दद की यात नाममा भोगते हुए वह वही चन नही पा रहा है। पुराने मुल्यों से चिपके रहना वह नहीं चाहता और नये मूल्यो को वह गढ नहीं सकता। पुरुरवा की इस द्विधा के भीतर कही न कही उमका अपराध-बोध भी है। गीनरी के निर्भोग समपण और सपूण आत्मदान वा तिरस्कार कर यह उवणी को मार भुसता हाता है किन्तु उसपी अतरात्मा अवश्य ही उसे पचोटती है। इमी मदन म दिनार का स्थान है, वह उन मानवों का प्रतीक है, जो मूल्य की अवहेलना करणे सफलता प्राप्त करते हैं और फिर भीतर ही भीतर मूल्य की उवशी का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 25 155 महिमा पर रीझ कर तडपते रहते हैं।' दूसरी ओर पुरुरवा अत्यत ही सुसस्कृत व्यक्ति है । वह नारी को मात्र उप- भोग की वस्तु नही समझता है या उस पर अपना जमसिद्ध अधिकार नहीं मानता । उवशी जब स्वगलोक से भूलोक पर उसके प्रणय मे बधी चली आती है, तब वह क्तज्ञता ज्ञापन करते हुए कहता है ' चिरकृतज्ञहू इस कृपालुता के हित ।" कितु इतना निश्चित है कि पुरुरवा सक्रमण की प्रक्रिया से गुजरता हुआ द्विघाग्रस्त व्यक्ति है । आधुनिक युग मे जीवन विषयक परम्परागत धारणा टूट रही है और नवीन धारणा बनने के कोई चिह्न नज़र नहीं आ रहे हैं। दोनो तरफ हमारा सामाजिक जीवन दव रहा है। परिणामत इस समाज मे ऐसा व्यक्ति उभरने लगा है, जिसकी सवेदनक्षमता ही जैसे खो गई हो, उसे जैसे अपने आस- पास की काई घटना स्पश ही नहीं कर रही हो । इस सवेदनशूयता के फलस्वरूप आज के मानव का न प्रेम ही इतना उद्दाम रह गया है और न विरह ही इतना गहन कि किसी कवि को 'मेघदूत' रचने के लिए प्रेरित कर सके । पुरुरवा उवशी से प्रेम करता है, कि तु उसे प्राप्त करने का प्रयास तक नहीं करता (केवल बहानेबाजी करता है) 1 उवशी स्वय उसके पास आयी है। वह तो इसी प्रतीक्षा म बठा रहा कि उसके हृदय की पीडा जब उवशी के मन को उद्वेलित कर दगी, तब वह स्वय ही उसके पास चली आयेगी। "इसीलिये, असहाय, तडपता बैठा रहा महल मे, लेकर यह विश्वास, प्रीति मेरी यदि मृपा नहीं है, तो मेरे मन का दाह व्योम के नीचे नही रुकेगा, जलद-पुज को भेद, पहुचकर पारिजात के वन मे वह अवश्य ही कर देगा सतप्न तुम्हारे मन को। और प्रीति जगने पर तुम वैकुण्ठ-लोर को तज पर पिमी रात निश्चय, भूतल पर स्वय चली आओगी।"56 उपाणी के स्वग लौट जाने पर भी वह स्वग से लोहा लेने का आगो तो व्यक्त करता है, वितु उमे प्रियावित नहीं करता "लाओ मेरा धनुप, सजाओ गगन जयो स्यदन का ससा नही, वन त्रु स्वग-पुर मुझे आज जाना है। और निपाना है, दाहहता विसकी अधिक प्रवल है, भरत पाप की या पुरुरवा ये प्रचड बाणा की।" यस्तुत "आज के मनुष्य रा कमपक्ष निस्तेज हो गया है । आज वा मनुष्य चिन मे सम्बो-सम्बी यात तो परता है, पर धम मे पदाचित ही वनी प्रवृत्त होता है। बाव रे मनुष्य का राधप अधिक दानिर और एकेडमिय होता है।' अन्न म पुरुरवा अपने अन्तमन की आवाज सुन स यास के लिए प्रस्थान 26 उवशी का सामाजिव सदम - करता है। उसे वोध होता है- "इन दहिक सिद्धियो, कत्तियो के वचनावरण मे, भीतर ही भीतर, विषण्ण मैं क्तिना रिक्त रहा हूँ। अतरतम वे रुदन, अभावो की अव्यक्त गिरा को क्तिनी वार श्रवण करके भी मैंने नहीं सुना है 1150 उसका अतमन उसे चेतावनी दता है वि तेरे प्रत्येक उचित-अनुचित निणय से आगामी भविष्य का मनुष्य प्रभावित होता है- "चिन्तन कर यह जान कि तेरे क्षण-क्षण की चिता से दूर-दूर तक के भविष्य का मनुज जम लेता है। उठा चरण यह सोच कि तेरे पद के निक्षेपो की आगामी युग के कानो मे ध्वनिया पहुच रही है।' स्पष्ट है पुरुरवा ने ऐसे क्म क्येि हैं जिसके लिए उसकी आत्मा उसे चेतावनी दे रही है । यदि वह आदश पुरुष होता तो उसकी अतरात्मा से यह आवाज न आती। 180 उर्वशी हृदय का अप्रतिहत आवेग उवशी हृदय के अप्रतिहत आवेग से प्रेरित है। हृदय राग का प्रतीक है। अपनी प्रारभिक अवस्था मे मनुष्य अपने हृदय के सहजावेग से परिचालित था, इसी कारण क्रोध म तुरत तलवार लेकर प्रस्तुत हो जाता था और प्रेम में वलपूवक अपनाने के लिए भी उद्यत हो जाता था। वुद्धि की चकाचौध से वह सवथा मुक्त था । सभ्यता के विकास के माथ मानव हृदय से कम और बुद्धि से अधिक परिचालित हो गया है प्रत्येक वस्तु को बुद्धि की जाख से दखने का आदी हो गया है । फलत ज्ञान के मर दश मे उसके शोणित का रस सूख गया है । बौद्धिकता के अतिशय आग्रह के फल स्वरूप वह जीवन को उसकी समग्रता मे भोगने मे असमय हो गया है। उसकी भावना की तीव्रता बौद्धिक स्तर पर चितन ने ले ली है। सभोग के प्रगाढतम क्षणो को बुद्धि से परिचालित पुरुरवा त मय होकर भोग नही पाता। उवशी उससे शिकायत करती है- "तन से मुझ को क्से हुए अपने दढ आलिंगन मे, मन से, वितु विषण्ण दूर तुम कहा चले जाते हो। बुद्धि सशय को जम देती है। इसी कारण पुरुरवा द्वद्वो से ग्रस्त है। पुरुरवा की अपेक्षा उवशी द्वद्वो से सवथा मुक्त है। वेलि के निविडतम क्षणो को वह सहज- भाव से निर्व्याज होकर भोगती है- "उफ री यह माधुरी । और ये अधर विक्च फूलो-से ये नवीन पाटल के दल आनन पर जब फिरते है, 162 - उवशी का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 27 रोम-कूप, जाने, भर जाते किन पीयूप-कणो से । और सिमटते ही कठोर बाहो आलिंगन मे, चटुल एक पर एक उष्ण ऊर्मिया तुम्हारे तन की मुझमे कर सक्रमण प्राण उमत्त बना देती है। कुसुमायित पवत समान तब लगी तुम्हारे तन से पुलकित विह्वल, प्रसन मूच्छित होने लगती है।"63 वस्तुत बुद्धि से अनुभूति अधिक प्रबल है । इद्रियगम्य, सहज स्वानुभूति ही सजीव होती है, बुद्धि द्वारा अर्जित ज्ञान निर्जीव होता है। उवशी शोणित की विश्वस- नीयता का आकलन करते हुए कहती है- "रक्त बुद्धि से अधिक बली है और अधिक ज्ञानी भी, क्याकि बुद्धि सोचती है और शोणित अनुभव करता है निरी बुद्धि की निर्मितिया निष्प्राण हुआ करती है, चित्र और प्रतिमा, इनमे जो जीवन लहराता है, वह सूझो से नही, पत्र पाषाणो मे आया है, कलाकार के अतर के हिलकोरे हुए रुधिर से।"64 साहित्य हो या कला मानवीय संवेदना और रागात्मक अनुभूति की उष्णता से सपृक्त होने के कारण ही दशन, इतिहास एव विज्ञान जैसे विषयनिष्ठ और वस्तु- परक उपयोगिता प्रधान विषयो से विशिष्ट माने जाते हैं, क्योकि उनमे प्राणो का स्पश और आत्मीयता की पुलक होती है, बुद्धि को चकाचौध नहीं। अनुभूति की कोख से उत्पन्न कला ही जीवत होती है। बुद्धि का प्रत्येक अनुभव मात्र तथ्य होता है, जबकि रुधिर का स्पश उसे सत्य बना देता है। लारेस का कथन है, "रुधिर मे विश्वास ही मेरा सबसे बडा धम है। मास बुद्धि की तुलना में अधिक चतुर होता है । हम लोग अपने मन से गलती कर सकते हैं। लेकिन रुधिर जो अनुभव करता है, जो विश्वास करता है, जो कहता है वह हमेशा सच ही होता है।"65 उवशी भी उतने ही विश्वास से कहती है- "पढो रक्त की भाषा को, विश्वास करो इस लिपि का, यह भाषा, यह लिपि मानस को कभी न भरमायेगी छली बुद्धि की भाति, जिसे सुख-दुख से भरे भवन मे पाप दीखता वहा जहा सुदरता हुलस रही है, और पुण्य चय वहा जहा काल, कुलिश, काटे हैं।"66 सभोग के प्रगाढतम क्षण मे जब नर-नारी सम्बधों के धरातल एक हो जाते हैं, उन क्षणो का वणन बुद्धि नही कर सकती, उसे तो केवल शोणित ही अनुभव कर सकता है । उवमी कहती है- 28 उवशी का सामाजिक सदम "श्रुतिपुट पर उत्तप्त श्वास वा स्पन और अधरो पर रसना की गुदगुदी, अदीपित निश ये अधियाले मे रस माती, भटक्ती उगलियो का सचरण त्वचा पर, इम निगढ कूजन का आशय बुद्धि समझ सकती है ? x X x उसे समझता रक्त, एक कम्पन जिसमे उठता है, किसी दूब की फुनगी से औचक छू जाने पर भी।"87 पलावेयर का कथन है, "सत्य, ऐद्रियता और यथाथ एक ही चीज है। हम यदि कोई उपदेश पढना है तो यह पाचो इद्रियो का उपदश ही है।" कबीर भी लगभग यही बात कहते हैं, "तू कहता कागद की लेखि, मैं कहता आखिन की देखि ।" वितु "अधिकाश व्यक्ति आस से न देखकर बुद्धि से देखते हैं। वे पुतलिया का प्रयोग न करके शब्दकोश का प्रयोग करते हैं। परिणामस्वरूप उहे जीवन के सुख दुखात्मक परिवेश का यथाथ ज्ञान नहीं हो पाता है। उनकी दृष्टि सकुचित और सीमित बन जाती है ।"68 उवशी भी प्रकारातर से यही बात कहते हुए इन्द्रिय गम्य अनुभव की सत्यता को प्रमाणित करती है- "बुद्धि बहुत करती बखान सागर तट की सिक्ता का, पर, तरग चुम्बित सक्त मे क्तिनी कोमलता है, इसे जानती वेवल सिरहित त्वचा नग्न चरणो की।"69 बुद्धि की निंदा करते हुए उवशी कहती है- 'क्या विश्वास करे कोई कल्पना मयी इस धीका अमित बार देती यह छलना भेज तीथ पथिको को उस मदिर की ओर, कही जिसका अस्तित्व नहीं है। 70 उवशी बुद्धि की निष्प्राण झकार की अपेक्षा रुधिर की उत्तप्त लहरो के सगीत को महत्त्व देती है, क्योकि बुद्धि सदैव भ्रमो को उपजाती है, अजन वजन को सिख लाती है । बुद्धि द्वारा अजित नान कभी भी सत्य की सीमा को छू नहीं सकता। उवशी कहती है- प्रकृति नही माया माया है नाम भ्रमित उस धी का, बीचोबीच सप सी जिसकी जिह्वा फटी हुई है, एक जीभ से जो कहती कुछ सुख अर्जित करने को और दूसरी से वाकी का वजन सिखलाती है। 71 दिनकर मे बुद्धिवाद का विरोध लारेस को पढकर ही नही आया है अपितु कुरु क्षेत्र मे भी जव उहोने लारेस को पढा नही था, बुद्धिवाद का वे विरोध करते हैं। इतना अवश्य है कि लारेस को पढने के बाद दिनकर के विचार और अधिक परिपक्व हुए हैं । कुरक्षेत्र मे दिनकर बुद्धि की निंदा करते हुए रुधिर की महत्ता 7 .

उदशी का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 29
को प्रतिपादित करते हैं-
"हिम विमुक्त, निर्विघ्न तपस्या पर खिलता यौवन है,
नयी दीप्ति, नूतन सौरभ मे रहता भरा भुवन है।
किन्तु बुद्धि नित खडी ताक मे रहती घात लगाये,
क्व जीवन का ज्वार शिथिल हो, कब वह उसे दबाये।
और सत्य ही जभी रुधिर का वेग तनिक कम होता,
सुस्ताने को कही ठहर जाता जीवन का सोता
बुद्धि फेंकती तुरत जाल निज मानव फस जाता है।
नयी-नयी उलझनें लिये जीवन सम्मुख आता है ।"72
अत दिनकर बुद्धि द्वारा अजित ज्ञान को सत्य नहीं मानते, उनके लिए तो रक्त
की भाषा ही सत्य है।

3 नर-नारी सबध का आधुनिक परिप्रेक्ष्य नर और नारी एक दूसरे के पूरक हैं, साथ ही समाज के अनिवाय अग भी । अध नारीश्वर की मूर्ति नर-नारी के पारस्परिक सबधो को मा यता दने की प्रतीक है। वह सहयोगात्मक, परम्पराश्रित पुरुपोचित और स्त्रीजनोचित कृत्यो की, जो अलग रहते हुए अपूण रहते हैं और मिलकर पूर्णता प्राप्त करते हैं, अवधारणा को पुष्ट करती है। कालिदास नर-नारी सवध को शब्द और अथ के सवध के सदश मानते हैं। कि तु सामाजिक मूल्यो के बिखराव के कारण अब आधुनिक युग म नर नारी परस्पर पूरक न रहकर परस्पर विरोधी बन गये हैं। नये सामाजिक सटों मे प्राचीन आदश एव मूल्य व्यथ लगने लगे हैं। परम्परागत मूल्यो का विघटन मानवीय सबधो की जिन इकाइयो पर तीव्रता से पड़ा है, वे हैं स्त्री और पुरुष के सबध । एक युग था जब नर नारी एक दूसरे को अपना पूरक समझते थे । समाज के क्रिया-कलापो मे वे द्रीय भूमिका पुरुष निभाता था, इसी कारण नारी उसे एक अद्वितीय व्यक्ति के रूप मे देखने की बादी थी। समाज द्वारा नैतिकता के दोहरे मानदड भी नारी को यही सोचने के लिए विवश करते थे कि पुरुष उससे श्रेष्ठ है, उसका सरक्षक है, उसका पालनकर्ता है । वस्तुत नारी का पालन पोषण ही इसी भाव से किया जाता था कि वह सदैव पुरुष पर आश्रित रहे, एक लता के सदश जिसका विकास वक्ष से लिपट कर ही हो सकता है। पति अच्छा हो अथवा बुरा, पत्नी के प्रति ईमानदार हो या न हो स्त्री को इससे कुछ असर नहीं पड़ता था। वह ता भाग्य और ईश्वर पर विश्वास रखकर पति-सेवा मे ही सारा जीवन व्यतीत कर देने मे अपने जीवन की साथक्ता मानती थी। पति ही उसका भगवान था, उसका सवस्व था। गय्या पर भी पुरुप की इच्छा ही सर्वोपरि हाती थी, नारी पुरुष के लिए मात्र एक उपकरण थी, जवकि नारी के लिए पुरुष उसका एकमात्र जाधार। किन्तु जाधुनिक युग की शिक्षित नारी आर्थिक व मानसिक रूप से स्वतत्र है। उसकी आर्थिक स्वावलविता ने उसे अपने याग्य वर चुनन की शक्ति दी है । इसी कारण परम्परागत रूप स विवाह को एक मजबूरी के रूप मे ग्रहण करने के नर-नारी सम्बघ का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 31 लिए विवश नहीं है। फिर भी नारी का स्वतत्र व्यक्तित्व पुरुष से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकता। नर-नारी की प्राकृतिक आवश्यकताए किसी मोड पर आकर दोनो को मिलने के लिए बाध्य करती हैं। इस आवश्यकता को महसूस करते हुए भी नारी अपने व्यक्तित्व, अपनी स्वतत्रता को कायम रखना चाहती है। दूसरी ओर पुरुष समझ तथा शिक्षा मे आधुनिकता का समथक होकर भी सस्कारो मे रूढियो का पोपक है। पुरुष का परम्परा निर्मित अह और नारी पर एकाधिकार प्राप्त करने की भावना से आज भी वह स्त्री को अपनी वस्तु समझकर 'पूण नियत्रण में रखना चाहता है। नर नारी के सम्बधो के महत्त्व को वह मानता अवश्य है, किंतु उसका अह उसे नारी के सम्मुख झकन की स्वीकृति नही देता। परिणामस्वरूप नर नारी आज अपने व्यक्तित्व की पूणता की खोज मे दो भिन- मिन इकाइयो के रूप में प्रतिष्ठित हो गये हैं। स्त्री पुरुष सवधो का बदलाव काम के सदभ मे भी हुआ है। आधुनिक नर- नारी नयी नैतिकता के पोषक हैं। काम के सम्बध मे जो परम्परागत पाप बोध को धारणा थी, उससे वे मुक्त हो गये हैं। वस्तुत वे यौनमुक्ति के आग्रही है, कितु साथ हो आधुनिक युग की स्वावलम्बी नारी यौनमुक्ति की समस्याआ को अकेले झेलने के पक्ष मे भी नही है। यद्यपि परम्परागत वजनाओ से आधुनिक नारी मुक्त हो रही है, फिर भी स्वय को वह सुरक्षित महसूस नही कर पा रही है। एक तरफ व्यक्तित्व की पूर्णता का आग्रह दूसरी ओर असुरक्षा का भय, इन दो पाटो के बीच पिसती हुई नारी अत मे अपनी मजबूरी से समझौता करके, अत मै समर्पिता होकर रह जाती है। किन्तु दूसरी ओर नारी का एक रूप यह भी है कि वह अभी तक अपनी परम्परागत धारणाओ से मुक्त नहीं हो पा रही है । आज भी वह पुरुष को अपना सवस्व मानती है, और पूर्ण रूप से उसी पर समर्पित होना चाहती है, कि तु नित नवीनता का अाग्रही पुरुष नारी के सती रूप स पूर्णतया ऊब घुका है । आधुनिक पुरुष न तो नारी का एकनिष्ठ ममपण पाहता है और न ही उसे पूणरूप से मुक्ति प्रदान करना चाहता है। आधुनिक नर नारी सम्बध की यही विसगतिया हैं। आधुनिकता और प्रेम अपन स्वतत्र व्यक्तित्व की तला मे नारी ने सबसे पहले उन परम्परागत मूल्यो को चुनौती दी है जिनके बोझ से वह आज तक दबती आयी है । आधुनिक सामा- जिव जागति और नैतिकता के नये मानदडा से नारी मे अपने व्यक्तित्व के प्रति जागरुकता उत्पन कर दी है। आधुनिक नारी रूढियो और वजनाओ से पूर्णत मुक्त होने की आग्रही है। विवाह को वह एक अप्राकृतिक बधन मानती है । बायरन ने एक स्थल पर लिखा है, 'प्रणय, पुरुष जीवन में एक अलग वस्तु 32 उवशी या सामाजिक सदभ 7 की तरह होता है, जबकि नारी का समूचा अस्तित्व।" नीत्से भी लगभग यही वात कहते हैं, "नारी के लिए प्रेम मात्र भक्ति नहीं होता, परन् विना कुछ लिकाप छिपाये, बिना किसी तरह का होरा हवाला दिये या प्राप्ति यो बाशा किये अपनी देह और आत्मा को सपूर्ण रूप से समर्पित कर दन का भाव होता है।" आधुनिक नारी न प्रणय सम्बधी इन मारे मियका यो चुनौती दी है । उसे न तो प्राचीन सामाजिक व्यवस्था के प्रति आस्या है, न नतिक व्यवस्था के प्रति । न वह समर्पिता होकर पुरुष के भाग्य पर जीना चाहती है, न ही परिणीता हापर क्सिी एक पुरुष के वाहुपा म बधकर उत्तरदायित्वो का पालन करना चाहती है। अपने अह को विसर्जित कर प्रेम की वेदी पर सभी कुछ निस्वाथ भाव से अर्पित कर देना वह मुखता समभनी है। "उवशी' मे आधुनिया की प्रतीक रम्भा कहती है- "सहजये । पर, हम परियो का इतना भी रोना क्या क्सिी एक नर के निमित्त इतना धीरज सोना क्या ?"7B आधुनिक नारी ने अब उस पारम्परिक पत्नी-बोध से मुक्ति प्राप्त कर ली है, जिसमे केवल पातिव्रत धम ही उसके जीवन का सार था। अव वह सोचती है एक हो पुरुष के साथ सारा जीवन व्यतीत कर देने में कौन-सी अकलमदी है । वस्तुत वह मुक्त प्रणय की आकाक्षी है। रम्भा कहती है-- "अपना है आवास, न जाने, कितनो की चाहो मे, वैसे हम वध रहें किसी भी नर की दो बाहो में?"77 वस्तुत उ मुक्त साहवय और आधुनिक नारी के प्रेम के सम्बध मे बदले हुए दष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में बदला हुआ सामाजिक सदभ है-वह सदम जो नारी को समग्न चेतना से जुड़ा हुआ है। नारी में व्यक्तित्व प्राप्त करने की आकाक्षा पुरुष प्रभुत्वपूर्ण समाज मे अपनी स्थिति बनाने के लिए उत्पन हुई है। यह सच है कि अपनी स्थिति, जपने व्यक्तित्व के प्रति सचेतनता के फेर म वह अति तक पहुच गयी है । दिनकर की काव्य चेतना आधुनिक भाव बोध से अनुप्राणित होते हुए भी नारी का यह रूप उहे ग्राह्य नही है। रसवती' की 'नारी' कविता मे आधुनिका वो भत्सना करते हुए वे कहते है- "जनात्तीण ससार बीच कितनो का मन बाधोगी? निरुद्देश्य बेघोगी चलते राह हृदय किस क्सि का 'उवशी' मे यही बात रम्भा कहती है- "प्रेम मानवी की निधि है अपनी तो वह क्रीडा है प्रेम हमारा स्वाद, मानवी की आकुल पीडा है । आधुनिक नारी प्रेम के लिए प्रेम करती है। प्रेम की वेदना को जगाती तो है, 7178 79 नर-नारी सम्बध का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 33 किंतु एक ही सूटे से बधकर उसकी पीडाओ म अपने यौवन को गलाना नही चाहती। "रचना की, वेदना जगाती, पर, न स्वय रचती हम, बध कर कही विविध पीडाओ मे न कभी पचती हम । हम सागर-आत्मजा सिधु-मी ही असीम उच्छल हैं, इच्छामो की अमित तरगो से भकृत, चचल हैं।' प्रेम और काम-सम्बधी सभी पूर्वाग्रहो और परम्परागत धारणाओ से मुक्त आधुनिक नारी, सेक्स को पाप का पर्याय न मानकर सुख और आनद का साधन 1180 मानती है। "सच है, कभी कभी तन से भी मिलती रागमयी हम, क्नक रग मे नर को रग देती अनुरागमयी हम, देती मुक्त उडेल अघर मधु ताप-तप्त अघरो मे, सुख से देती छोड कनक-कलशो को उष्ण करो मे, पर यह तो रसमय विनोद है, भावो का खिलना है, तन की उदवेलित तरग पर प्राणो का मिलना है।"81 उ मुक्त साहचय और भोग के प्रति अतिशय आग्रह ही आधुनिक नारी के जीवन का चरम ध्येय बन गया है। दिनकर को आधुनिक नारी का यह रूप स्वीकार नही है। दिनकर के विचारो की वाहक सुक या आधुनिक नारी को चेतावनी देते हुए कहती है- "इसीलिए, कहती है, जब तक हरा-भरा उपवन है, विसी एक के सग बाघ लो तार निखिल जीवन का, न तो एक दिन वह होगा जब गलित, म्लान अगो पर क्षण भर को भी क्सिी पुरुष की दष्टि नही विरमेगी, बाहर होगा विजन निकेतन, भीतर प्राण तजेंगे अन्तर के देवता तपित भीषण हाहाकारो मे।"82 सुक या समझ ही नही पाती कि- 'शिखर शिखर उडने मे, जाने, कोन प्रमोद लहर है। कि तु, एक तरु से लग सारी आयु बिता देने मे जो प्रफुल्ल, घन, गहन शाति है, वह क्या कभी मिलेगी नये-नये फूलो पर नित उडती फिरनेवाली को?"83 वस्तुत दिनकर को नारी का यह रूप प्रिय नहीं है। उहें तो नारी का वही सती रूप प्रिय है । सुक्या कहती है- "एक चारिणी मैं क्या जानू स्वाद विविध भोगो का? मेरे तो आनद-धाम केवल महर्षि भर्ता हैं।

34 उवशी का सामाजिक सदम योग-भोग का भेद अप्सरा की अबघ त्रीडा है, गहिणी के तो परम देव आराध्य एक होते हैं, जिससे मिलता भोग, योग भी वही हमे देता है ।"84 अप्सरा धम बनाम मानवी धर्म बदलते सामाजिक सदर्भो मे नारी की भूमिका मे भी क्रातिकारी परिवतन आया है। शिक्षा के आलोक और समाज म नये नये उभरने वाले साधनो और उनसे जुडी नयी स्थितियो और परिवेश मे तथा समानता के अधिकार के प्रति आग्रह और वैधानिक अधिकारी ने नारी को पहले से अधिक स्वतन और अपने अधि कारो के प्रति सचेत अधिक साहसी, आत्मविश्वासी और आत्मनिभर बनाया है । पुरुष के लिए त्याग, बलिदान की प्रतिमूर्ति न रहकर अब वह जीवन के प्रत्येक क्रिया कलाप मे पुरुप की समकक्षी बन गयी है। प्रेम और सतान के प्रति नारी का दष्टिकोण पुराना, रोमानी, भावुकतापूण तथा त्यागवादी न होकर यथाथ वादी, भौतिक, स्थूलरूपी और नयी आकाक्षाआ से प्रेरित हो गया है । पारम्परिक नैतिक तथा वैयक्तिक मूल्यो के विघटनस्वरूप यौन सम्बधो मे भी नारी के दष्टि कोण मे परिवतन उपस्थित हुआ है। हम कह आए हैं 'उवशी' की अप्सराए आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करती हैं । आधुनिक नारी मे अप्सरा पक्ष विशेष रूप से उभर कर आया है। इतिहास साक्षी है जब भी नारी मे अप्सरा पक्ष प्रबल हो उठता है तब वह गभ धारण नही करना चाहती, माता बनकर उत्तरदायित्व का पालन नही करना चाहती, वह पूर्ण रूप स स्वच्छ द होकर उ मुक्त जीवन व्यतीत करना चाहती है। रजनीश का कथन है 'स्त्रियो को सेक्म का पागलपन सवार हो गया है इसीलिए मा नही बनना चाहती, क्योकि मा बनने के बाद सेक्स का रस कम हो जाता है।' सेक्स का रस तभी तक रह सकता है जब तक वह मा न बने।85 आधुनिक नारी की प्रतीष रम्भा भी यही कहती है- • और मात पद को पवित्र धरती, यद्यपि, कहती है, पर माता बनकर नारी क्या क्लेश नही सहती है ? तन हो जाता मिथिल दान मे यौवन गल जाता है, ममता व रस मे प्राणो का वेग पिघल जाता है। रव जाती है राह स्वप्न जग म जान जान की, फूलो म उ मुक्त घूमने की सौरभ पान की। मघा मे कामना नहीं उ मुक्त खेल करती है, प्राणा म फिर नही इद्रघनुपी उमग भरती है।"88 पहले नारी माता वनन म ही अपन जीवन की चरम साथक्ता मानती थी।

नर नारी सम्बध का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 35 187 - पत्नीत्व और मातृत्व के उत्तरदायित्व का वहन करना ही उसके जीवन का प्रधान लक्ष्य था। नारी के मातत्व की वदना करते हुए दिनकर कहते है- "विना पुत्र नारी का सम्यक रूप नही खुल पाता, जीवन मे रमणी प्रवेश करती है माता बनकर। नीत्से का क्थन है "स्त्री एक पहेली है, जिसका हल सतान है।" फेन्ने मातत्व को नारी की सहजवत्ति कहते है। आधुनिक नारी ने इन परम्परागत मा यताओ को चुनौती दी है। मातृत्व उसके लिए सहजवृत्ति न होकर अनचाहा बोझ बन गया है। मातत्व की गरिमा, मातृत्व का सुख उसके लिए क्लेश का कारण बन गया है। यह अनचाहा बोझ ढोकर, अपनी देह को ढीला करना उसके लिए कोई साथक्ता नही रखता । रमा कहती है-- "गम-भार उवशी मानवी के समान ढोयेगी? यह शोभा, यह गठन देह की, यह प्रकाति खोयेगी ?89 दिनकर को आधुनिक नारी का यह रूप ग्राह्य नही है। आधुनिकाओ की भत्सना करते हुए वे कहते हैं- "काश | समझती जमनिरोधातुर कृतिम बघ्याएँ, पुन कामना इच्छा है अपने को ही पाने की।' 90 बदलते सामाजिक सदर्भो मे नारी ने यह महसूस किया है कि वे सारे मूल्यो के नाम पर लगाये गये वधन और उत्तरदायित्व व्यथ और अथहीन हैं। पुरुष के समान नारी को भी अपने व्यक्तित्व विकास का पूर्ण अधिकार है । अपने व्यक्तित्व विकास के लिए उत्तरोत्तर बढते हुए आग्रह के कारण आधुनिक नारी किसी भी पारिवारिक उत्तरदायित्व का पालन नहीं करना चाहती । स तान उत्पन कर अपने सौ दय की काति, देह का गठन ढीला नही करना चाहती । रभा नारी के मातत्व पर व्यग्य करते हुए कहती है- "पुत्रवती होगी, शिशु को गोटी मे हलरायेंगी, मदिर तान को छोड सास से ही लोरी गायेंगी। पहनेंगी कचुकी क्षीर से क्षण क्षण गीली गीली, नेह लगायेंगी मनुष्य से, देह करेंगी ढीली।"01 डा० वचनदेव कुमार का कथन है 'आज समग्न ससार मे यह फान चल गया है कि किगोरिया मतानोत्पत्ति की जहमत से बचना चाहती है। भारत मे भी आधु निकाओ को सम्या म चावद्धि हो रही है जो अपन रूप के डोरे डालकर दिलफेंक अलमस्ता कोफसाना अपना परमघम समझती हैं और गम को हिमालय का वाघ । ये तरह-तरह की गम निरोधव ओषधियो के द्वारा अपना मुक्त विलास वद्धमान रखना चाहती हैं। खुदा न खास्ते यह बला सिर पर आ गयी तो बहुत विचार- विमदा के बाद जस-तस ढोती हैं। 92 36 उवशी या सामाजिक सदम दिनकर मातत्व को चरम सफलता म ही नारी की पूर्णता मानते हैं । दिनार के विचारो के वाहक महर्षि च्यवन नारी के मातत्य की गरिमा का वणन करते हुए कहत हैं-- "सच पूछो तो, प्रजा-सृष्टि में क्या है भाग पुरुष का' यह तो नारी ही है, जो सब यन पूर्ण करती है। सत्व-भार सहती असग, सतति असग जनती है, और वही शिशु को ले आती मन के उच्च तिलय मे, जहा निरापद, सुखद कक्ष है शशव के झूले का।"93 मेनका भी प्रकारातर से मातत्व की दिव्यता और पवित्रता का वर्णन इसी प्रकार से करती है- "पर, रम्भे | क्या कभी बात यह भी मन मे आती है मा बनते ही प्रिया कहा से कहा पहुच जाती है । गलती है हिमशिला, सत्य है, गठन देह की खोकर। पर, हो जाती वह असीम कितनी पयस्विनी होकर? युवा जननि को देख शाति सी मन मे जगती है। रूपमती भी सखी | मुझे तो वही त्रिया लगती है, जो गोदी मे लिये क्षीरमुख शिशु को सुला रही हो अथवा खडी प्रस न पुत्र का पलना भुला रही हो।" उवशी के व्यक्तित्व मे निखार तब ही आता है, जब वह मा बनती है । दिनकर ने गमवती नारी की मानसिक्ता का वणन कितनी स्वच्छता से क्यिा है प्रत्यक गभवती नारी अपने शिशु के लिए यही कल्पना करती है, जैसी कि उवशी करती "यही चाहती थी, समेट कर पी लू सूय किरण को, विधु की कोमल रश्मि, तारको की पवित्र आभा को, जिससे ये अपरूप, अमर ज्योतिया गम में जाकर समा जायें इसके शोणित मे, हृदय और प्राणो म । यही सोचती थी, त्रिलोक मे जो भी शुभ, सुदर है, बरस जाय सब एक साथ मेरे अचल मे आकर । मैं समेट सबको रच दू मुसकान एक पतली सी और किसी भी भाति उसे जड़ दू इसके अधरो पर । तब भी केवल भ्रूण वहन और प्रजनन मातत्व नहीं है। माता तो वही है, जो शिशु का पालन करती है। उवशी पलीत्व और मातत्व दोनो का भार बहन करती हैं किन्तु उवशी के लिए ये दोनो रूप साधन भर हैं, साध्य नही । पत्नीत्व से उसे दैहिक मिलन की सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है और मातत्व उस 195 -- नर नारी सम्बध का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 37 । मिलन की अनिवाय परिणति । दिनकर "उवशी काव्य की समाप्ति" में उवशी की रचना प्रक्रिया खोलते हुए आधुनिक नारी पर व्यग्य करते हैं--- "तब भी, सब महिमा खसी नही, सब प्रिया-जाति उवशी नहीं। घे भी हैं जिनके बडे हृदय में मधु से मिला हुआ है पय, जिनके प्राणा के महाव्योम मे सग उदित है सूय सोम। पर, हाय, यही रोती रहती दायित्य सभी ढोती रहती। माताए क्लेश उठाती हैं। उवशिया मौज मनाती हैं।"98 मौज मनान के लिए ही उवशी सुर पुर लौट जाती है और मातत्व का समस्त दायित्व सुक्या और औशीनरी ही सभालती हैं। प्रति न नारी को ही गम-भार का दायित्व पालन करने के लिए चुना है। माता बनकर अपने दायित्व पालन मे वह पुरुप से पिछड जाती है। इसी कारण वह मातृत्व के दायित्व मे डूबकर जीवन की दौड में पीछे नहीं होना वस्तुत दिनकर नारी जीवन को साथकता मातृत्व मे ही मानते हैं । गभिणी नारी का उहाने कितना सुदर चित्र चित्रित किया है- "देह काति पीतिमा युक्त गति नहीं पदो व वा म, चल लेती है किसी भाति पीवर उस मेघाली-मी जो समुद्र वा जल पीकर मयर डगमगा रही हो। "आवृति ओप विहीन, वितु, वह रहित नहीं भावो से, फिर भी, वोई रग देर तक ठहर नहीं पाता है, विवशा वा मे, अब ये ऊर्मियों नहीं हो। हिनी कविता मे बनाचित ही विसी कवि न गमिषी नारी या इतना स्वच्छ यमन पाती। 797 पिपाहा, दिनकर वहते हैं-- 'निस्सहाय, उदरस्थ भविष्यत दे अधीन यह नीना रिम प्रकार ररा सवे भला अपने वश में अपने को? जो पाहता मरिष्य, वस्त्र पर वही नाव आते हैं। माना, जो से जाम कभी सुतली पापी योलेगा मगा भेजन वह अजात तुतले सक्त मनी से। सत्यवती नारी अशा पट है भविष्य पेरा। 193 38 उवशी का सामाजिक सदर्भ -? गभिणी को तपस्या की वदना करते हुए दिनकर बहते हैं- 'क्तिनोमह यातना पालती प्रिया भविष्य जगत् वा कह सकता है कोन पूण महिमा इम तपश्चरण का?" कितु आधुनिय नारी इस तपस्या वा अप समभन से ही इनकार कर रही है। वह सोचती है कि उसका यौवन यदि वह स तान उत्पन्न नहीं करेगी तो कभी विग लित न होगा। सुक या इसी सदभ मे कहती है। "सो, केवल इसलिए कि तुम अप्सरा, सिद्ध नारी हो। विगलित कभी रहा होता यौवन तुम अप्सरियो का? पर, यौवन है मात्र क्षणिक छलना इस मत्य भुवन मे, ले उसका अवलम्ब मानवी क्व तक जी सरती है ?"100 मानवी के लिए तो- जीवन का आनद-कोष वेवल मधुपूण हृदय है । हृदय नही त्यागता हम यौवन के तज देने पर, न तो जीणता के आने पर हृदय जोण होता है।"101 मानवी अपने जीवन की चरम साथकता पत्नीत्व और मातत्व के क्तव्य-पालन मे ही समझती है। सुक या मानवी जीवन की चरम साथक्ता को प्रस्तुत करते हुए कहती है- "एक दूसरे के उर म हम ऐसे वस जाते हैं, दो प्रसून एक ही बात पर जसे खिले हुए हो। फिर रह जाता भेद कहा शिशिर, घाम, पावस का। एक सग हम युवा, सग ही सग वृद्ध होते हैं।" इस प्रकार दिनकर ने अप्सराओ के माध्यम से आधुनिन नारी के उसुक्त विलास और उत्तरोत्तर बढती हुई म्वच्छ दता के अतिशय आग्रह को चित्रित किया है। खडित दाम्पत्य और त्रिकोण परम्परागत मूल्यो के टूटने की प्रक्रिया ने स्त्री पुरुष के सम्बधो का लपेट में ले लिया है। परम्परागत वैवाहिक सस्था नपारा साबित होने लगी है। प्रेम के प्रति पुराना रूमानी और भावुक्तापूण दप्टिकोण अब माय नहीं है। आधु निक बौद्धिक पुरु प उस नारी को अधिक पसद करने लगा है, जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे उसको समकक्षी हो। नारी का सम्पूण समपण, त्याग, निष्ठा अब उसे बाघ रखने में असफल सिद्ध हा रहे हैं। 'उर्वशी' मे प्रतिपादित दाम्पत्य का एक कोण है-ौशीनरी पुरुरवा और उनका खण्डित दाम्पत्य । योशीनरी उस परम्परागत नारी का प्रतिनिधित्व करती है, जिसने अपने अप्सरा तत्त्व को उभरने नहीं दिया है । सती धर्म के प्रबलतम मोह के फलस्वरूप WL02 अपनी - 7 पुरुष सदैव दूरी रोमास को पन नारीR. नर नारी सम्बध का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 39 पति सेवा, त्याग निष्ठा, अशेष समपण मे ही वह अपने जीवन की चरम उपलब्धि मानती है। इसी कारण वह अपने दाम्पत्य के खडित होने का कारण नही जान पाती ।वह तो यही सोचती है- "मरी, कौन हैं कृत्य जिसे मैं अब तक न कर सकी हू? कोन पुष्प है जिसे प्रणय वेदी पर घर न सकी हू प्रभु को दिया नही, ऐसा तो पास न कोई धन है । “योछावर आराध्य-चरण पर सखि ! ता, मन, जीवन है।"10% पत्नीत्व की साथक्ता को समझते हुए भी औशीनरी पति को बाये रखने की क्ला से अनभिज्ञ है। "सब कुछ है उपलब्ध, एक सुख वही नहीं मिलता है, जिससे नारी के अन्तर का मान पद्म खिलता है। वह सुख जो मुक्त बरस पडता उस अवलोक्न से, देख रहा हो नारी को जब नर मधु मत नयन से ।"104 वस्तुत नर नारी सम्बध का केवल सामाजिक सन्म ही नहीं होता जिसके कारण वे परस्पर बधे रहने के लिए बाध्य हा । नर-नारी सम्बध का एक अन्य पक्ष भी है, वह है उसका मनोवैज्ञानिक पक्ष । दाम्पत्य की सफलता के लिए बार- श्यक है नारी, पुरुष को मनोवैनानिकता से पूर्णत परिचित हो। ओशीनरी पु- रथा की मनोवैज्ञानिकता से अपरिचित है, यही औशीनरी पुरुरवा के नाम खडित होने का मूल कारण है। पुरुरवा का उद्दाम पौरुप और तेज उन - सघर्षों से जूझने के लिए प्रेरित करते है, स तोप उसको प्रकृति नहीं है। के कोलाहल से घिरे रहने के कारण और सघर्षों से क्लात हान पर वक्ष की गर्माहट म विश्राम पाना चाहता है- "सघर्षों से अमित श्रात हो पुरुष खोजता विद्वान सिर घर कर सोने को, क्षण भर, नारी का दर आखो मे जब अश्रु उमडते, पुरुष चाहना बना, और विपद मे रमणी ये बगो का गाढा जो पुरुष जितना ही पराक्रमी होता है, उननादीग आकर्षण से विध जाता है- "प्रकृति कोष से जो जितना रति, वह उतना ही अनायाम पूर्णपट, अगम, अगाध दीर नर होकरी बडी सहजता से जय वीट Is - 40 उवशी का सामाजिक सत्म "प्रेमिका के बहुमूल्य होने का विश्वास उसे प्राप्त करने की कठिनाई के मनोवज्ञा निक प्रभाव के कारण है। मेरा विचार है कि जिस पुरुष को स्त्री की प्राप्ति में कोई कठिनाई नही होती, उस स्त्री के प्रति उसकी भावना रोमेटिक प्रेम का रूप धारण नहीं करती।"107 इसी सदम मे दिनकर भी कहते हैं- "करस्पश से दूर, स्वप्न झलमल नर को भाता है, छककर जिसको पी न सका, वह जल नर को भाता है। ग्रीवा में झूलत कुसुम पर प्रीति नही जगती है, जो पद पर चढ गयी, चादनी फोकी वह लगती है।"108 औशीनरी पद पर चढी हुई चादनी ही है, औशीनरी को प्राप्त करने मे पुरुरवा को कोई प्रयास नहीं करना पड़ा। उनका दाम्पत्य सम्बध परम्परागत वैवाहिक सस्था का प्रतिफलन है, जबकि उवशी को प्राप्त करने मे पुरुरवा को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उवशी पुररवा का प्रणय रोमाटिक प्रेम से ही फ्लीभूत हुआ है। इसलिए औशीनरी की तुलना मे पुरुरवा की दृष्टि मे उवशी का मूल्य अधिक है। पुरुरवा उवशी को प्राप्त करने की कठिनाई को व्यक्त करते हुए कहता 'प्राणो की मणि | अयि मनोन मोहिनी । दुर त विरह मे हो झेलता रहा वेदनाए क्या-क्या दुस्सह मैं ? दिवा रानि उनिद्र पलो मे तेरा ध्यान सजोकर काट दिये जातप, वर्षा, हिमकाल सतत रो रोकर। विदा प्रतिमा, वह रष्टि न भूली भी एक क्षण मन से।' 109 पुरुरवा रोमाटिक पुरुष है। रोमाटिक पुरुष नित नवीनता का आग्रही होता है । नैरतय उसमे ऊब उत्पन करता है। दिनकर का कथन है "पुस्प मे नवीनता की प्यास होती है, खतरा और विरोधो से टकराने की इच्छा होती है और इन तपाआ के शमन के उपाय घर में उपलब्ध नहीं होते। एकात उसके मन मे अब उपजाता है और एक ही प्रकार का बधा जीवन उसे 'बोर' पर देता है।' 110 पुरुरवा भी औशीनरी के एकरमीय व्यवहार से ऊब चुका है । औशीनरी का यत्रवत जड व्यक्तित्व पुरुरवा को बाघ नही पाता । फलत वह नई हरियालियो की ओर आकृष्ट होता है । रसेल का क्थन है "जिन सभ्य लोगा म रूप निषेध न हो उनम, चाहे वे पुरुप हो या स्त्रिया साधारणतया बहुविवाह की प्रवृत्ति रहती है । सभव है हि वे प्रेम म डूब जायें और कुछ वप तक एक ही व्यक्ति के प्रति आसक्न रहें परन्तु कभी न कभी सेक्स सम्बध घनिष्ठता से ऊब जाने के कारण काम-वासना मद पड़ जाती है और तब वे पुगनी पुलक की खोज मे औरा की ओर देखने लगते हैं। 11 मदनिका पुरुष की इसी प्रवृति की ओर सकेत करते हुए कहती नर-नारी सम्बध का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 41 "उस पर भी नर की प्रवृत्ति है क्षण क्षण अकुलाने की, नयी-नयी प्रतिमाओ का नित नया प्यार पाने की। वश मे आयी हुई वस्तु से इसको तोप नहीं है, जीत लिया जिसको, उससे आगे सतोप नहीं है। नयी सिद्धि हित नित्य नया सघर्ष चाहता है नर, नया स्वाद, नव जय, नित नूतन हप चाहता है नर ।"112 वितु औशीनरी पुरुष की इसी प्रवत्ति को जान नही पाती । अशेष समपण को ही वह दाम्पत्य को केद्रीय धुरी मानती है। पति की सहगामिनी नहीं, अपितु दासी बनने मे ही जीवन की साथक्ता समझती है । जहा पति नारी का एकमात्र आधार हो, वहा नारी का अप्सरा तत्व उभर नहीं पाता। अत मे औशीनरी अपने व्यक्तित्व की इसी कमी को महसूसते हुए कहती है- "गयी नही क्यो सग सग मैं धरणी और गगन मे जहा-जहा प्रिय को महान घटनाए बुला रही थी? अकित थे कर रहे प्राणपति जब आख्यान विजय का पण पण पर, लहर लहर मे, उनत शिखर शिखर पर, समा गयी क्यो नही, हाय, तब मैं जीव त प्रभा सी वाणो के फलको, कृशानु की लौहित रेखाओ मे ?"13 पुरुरवा रोमाटिक पुरुष है और रोमाटिक पुरुष उसी नारी की ओर जाना चाहता है जो सभी नारियो में छिपी विचित्रता का सार हो। जो एक बार ही सम्पूर्ण समर्पित होने से कतराती हो, जो पुरुष मे आकाक्षा तो जगाती हो रितु उसे तप्त करने से भागती हो, शय्या पर होकर भी पूर्ण रूप से वहा न होती हो । रसेल का कथन है "रोमाटिक प्रेम में प्रेम-पात्र सच्चे रूप में दिखाई नही पडता, बल्कि सौत्य के कुहासे मे से दीखता है। इसमे स देह नहीं कि एक विशेष प्रकार की स्त्री यदि उसे विशेष प्रकार का पति मिल जाये तो, विवाह के बाद भी वह उस कुहासे मै लिपटो रहेगी।"114 दिनकर भी लगभग यही बात कहते हैं- क्षण क्षण प्रक्टे, दुरे, छिपे फिर फिर जो चुम्बन लेकर, ले समेट जो निज को प्रिय के क्षुपित अक मे देकर, जो सपने के सदश बाहु मे उडी उडी आती हो, और लहर सी लौट तिमिर मे डूब डूब जाती हो, प्रियतम को रख सके निमज्जित जो अतप्ति के रस मे, पुरुप बडे सुख से रहता उस प्रमदा के बस मे।' रसेल का कथन है वि नारी को वैवाहिक जीवन को सफल बनाये रखने के लिए पुरुष से अप्सरावत् गोपनीयता बरतनी चाहिए। न केवल विचारो और भावनाओ से ही अपितु एक सीमा तक अपने अग की नग्नता को भी पति की दष्टि से बचाए 115 42 अवशी का सामाजिब सदम रखना चाहिए। वितु औशीनरी यही क्ला नही समझती। समझती वह तब है जब समभना कोई अथ नहीं रखता। अपनी पराजय पर पश्चात्ताप करती हुई वह कहती है- "गृहिणी जाती हार दाव सपूण समपण करके, जयिनी रहती वनी अप्सरा ललक पुरुष म भरके । पर, क्या जाने लवर जगाना नर म गृहिणी नारी? जीत गयी अप्सरा, सखी ! मैं रानी बनकर हारी ।"116 अपनी पराजय का बोध, अपनी भूल का अहमाम होते ही औशीनरी की व्यथा को सीमा नहीं रह जाती । तब ही वह समझ पाती है कि वह पुरुरवा को वह भावमय आहार नहीं दे पायी, जिसको उसे आवश्यक्ता थी- "हाय सती । मैं ही कदप दोपी, अनुदार, कृपण हूँ, केवल शुभ कामना, मगनपा से क्या होता है ? मैं ही दे पायी न भावमय यह आहार पुरुष को जिसकी उह अपार क्षुधा, उतनी आवश्यक्ता थी।"17 पछताती हुई वह कहती है~- "जीत गयी वे जो लहरो पर मचल मचल चलती थी, उड सक्ती थी खुली धूप म, मेघों-भरे गगन मे । हारी मैं इसलिए कि मेरे व्रीडा-विकल दृगों मे। खुली धूप की प्रभा, किरण कोलाहल की गडती थी। 218 अत औशीनरी पुरुरवा के दाम्पत्य के खडित होने के मूल मे दिनकर यही प्रस्था पित करना चाहते हैं कि नारी का सती रूप आदश होते हुए भी दाम्पत्य की सफलता नै लिए नारी को अपना अप्सरा रूप भी उभार कर रखना चाहिए, जिससे पुरष नई हरियालियो की ओर आकृष्ट न हो । डॉ. विजेन्द्र नारायणसिंह का क्थन है कि..--"दिनकर ने नौशीनरी के दाम्पत्य की असफलता का अच्छा विश्लेषण किया है। उहोंने परम्परामुक्त ढग से भारतीय नारी के साथ सहानु भूति प्रकट कर पाठक की भावना को 'एक्सप्लायट' नहीं किया है। यही काम "एक्सप्लायटेशन' गुप्तजी ने यशोधरा' में किया है। गुलजी न तो केवल भारतीय नारी के करुण रूप का चित्रण किया है। आचल में दूध आग्बो मे खारा पानी पाड डालता है, यह तो ठीक है। किंतु वे कौन से कारण हैं, जिनसे इस देश के हटे-बट्टे नवयुवक असमय ही स यास ग्रहण करते रहे, गुप्तजी उसवा विश्लेषण न भर सके। यह वैज्ञानिक दृष्टि उनके पास नहीं थी। यह काय कदाचित् पहली बार हिन्दी कविता म दिनकर ने किया है।"111 'उवणी मे प्रतिपादित नर-नारी सम्बध का दूसरा कोण है-उवणी पुरवा का सम्बध । उनी आधुनिक युग की बौदिर नारी है, जो परम्परा से नर नारी सम्बध का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 43 चले आए नैतिक-बोध को चुनौती देती है। औशीनरी की अपेक्षा वह अधिक साहसी और आत्मविश्वासी है। औशीनरी का व्यक्तित्व इतना दबा हुआ है कि अपना सवस्व खो जाने पर भी वह केवल विलाप करती रह जाती है। उसे प्राप्त करने का प्रयास तक नहीं करती। उवशी के व्यक्तित्व मे एक सहन निर्भीकता है पुरुष के लिए त्याग-बलिदान को प्रतिमूर्ति ही न रहकर वह जीवन के सभी क्षेत्रो मे पुरुष के कधे से कधा मिलाकर चलने की आकाक्षी है। औशी- नरी के लिए पति उसका आधार मात्र है, जबकि उवशी पति का ज्ञान-गुर, सखा, मित्र, सहपर मानती है । उवशी ऐसी नारी है, जो अपनी अगयष्टि से ही पुरुष को आकृष्ट नहीं करती, अपितु अपने व्यक्तित्व से भी पुरुष को बाध रखने मे समथ होती है । पुरुरवा उवशी मे अपनी कल्पना का साकार रूप पाता है। पुरुरवा कहता है- "एक मूत्ति मे सिमट गयी किस भाति सिद्धिया सारी ? कब था ज्ञात मुझे इतनी सुदर होती है नारी ?"120 उवशी को पाकर पुरुरवा सोचता है, यही वह नारी है, जिसके साथ जम- जमान्तरो से उसका सम्बध था। पुरुरवा कहता है- "जहा जहा तुम खिली, स्यात, मैं ही मलयानिल बनकर तुम्हें घेरता आया हूँ अपनी आकुल बाहो से । जिसके भी सामने किया तुमने कुचित अधरो को, लगता है, मैं ही सदैव वह चुम्बन-रसिक पुरुष था।"121 औशीनरी का व्यक्तित्व जहा अपने-आप मे सिमटा हुआ है, वही उवशी के व्यक्तित्व मे एक सहज खुलापन है । उसमे कही कोई द्विधा नही है । जीवन के रस को छककर भोगने की वह आकाक्षी है । वह रस लेती और देती है ।औशीनरी के समान वह केवल देने मे विश्वास नही रखती। केलि के निबिडतम क्षणो मे वह कितने उ मुक्त भाव से खो जाती है, पुरुरवा से वह कहती है- पर, मैं बाधक नहीं, जहा भी रहो, भूमि, या नभ मे, वक्षस्थल पर, इसी भाति, मेरा कपोल रहने दो। कसै रहो, बस, इसी भाति, उस पीडक आलिंगन मे और जलाते रहो अधर-पुट को कठोर चुम्बन से। कितु आह ! यो नही, तनिक तो शिथिल करो बाहो को, निप्पेषित मत करो, यदपि, इम मधु निष्पेषण मे भी मर्मातक है शान्ति और आनद एक दारण है ।"1222 उदशी का निरन्तर गतिशील व्यक्तित्व पुरुष मे भी स्फूर्ति व ताजगी को भर देता है। विस्मित होकर पुरुरवा कहता है- "जब से हम-तुम मिले, रूप के अगम, फुल्ल कानन में 44 उवशी का सामाजिक सदभ 1123 अनिमिप मेरी दष्टि किसी विस्मय मे डूब गयी है, अथ नही सुभता मुझे अपनी ही विक्ल गिरा का, शब्दो से बनती है जो मूर्तिया, तुम्हारे दग से उठनेवाले धीर-ज्वार मे गलकर खो जाती है। खडा सिहरता रहता में आनद विकल उस तरु सा, जिसकी डाला पर प्रसन गिलहरिया किलक रही हो, या पत्तो मे छिपी हुई कोयन कूजन करती हो।' उवशी का आक्रामक और वेबाक व्यक्तित्व पुरुष को वधे रहने के लिए बाध्य करता है । डॉ० विजे द्रनारायणसिंह ठीक ही लिखते हैं, "उवशी रूपसी है, सुकुमार है, मादक है, त वगी है, पर उसमे शीय और साहस भी है। इसीलिए जीवन की लडाई वह जीत जाती है। यही दिनकर की कल्पना को मरदानी औरत है। इस दृष्टि से दिनकर की उवशी अप्रतिम है।" क्तिने साहस से वह कहती है- "पढो रक्त की भाषा को, विश्वास करो इस लिपि का, यह भाषा, यह लिपि मानस को कभी न भरमायेगी।"124 उवशी पुरुरवा का सम्बध रोमाटिक प्रेम का प्रतिफलन है। उवशी पुरुष की मनोवज्ञानिकता से पूर्णत परिचित है। सहज खुलापन होते हुए भी पुरुष से अप्सरावत गोपनीयता रखने की कला मे वह पारगत है। पुरुरवा से वह कहती 7 "और जहा भी मिलन देखते हो प्रकाश छाया का, वही निरापद बिदु मनुज मन का आश्रय शीतल है। सधन कुज गाधूलि, चादनी ये नही रहे तो दिन की खुली धूप म कब तक जीवा चल सकता है ?"125 पुरुरवा जानकर भी उवशी को जान नही पाता, सौ दय के रस को पीकर भी उसके अपर प्यासे ही रह जाते हैं। उवशी का रहस्यमय व्यक्तित्व पुलकर भी रहस्य मे ही लिपटा रहता है । पुरुरवा कहता है- "आवेशित उद्गार । यही मर्मों का उत्घाटन हुआ सस्त क्तिना रहस्यमय अवगुठन माया का? पर, रहस्य हट जाने पर भी रही रहस्यमयी तुम, मायावरण दूर कर देने पर भी तुम माया हो। '198 अत उवणी पुरुरवा का सम्बध मात्र रूपवती देह की चाह का प्रतिफलन ही नहीं है, अपितु वह एक व्यक्तित्व द्वारा दूसरे व्यक्तित्व की पूर्णता है । उवणी ही वह नारी है, जिसब लिए पुरुरवा का व्यक्तित्व निर्मित हुआ है । वही उसको सह- योगिनी बनकर उस व्यक्तित्व को साथक्ता और चरितायता देती है । उर्वगी में स्वग लौट जाने के बाद पुरुरवा फिर किसी अय नारी की आर आकृष्ट नही नर-नारी सम्बध का आधुनिक परिप्रेक्ष्य 45 - होता, यहां तक कि औशीनरी की ओर भी नही । वह स यास लेकर चल देता है। दिनकर को नारी से सहानुभूति अवश्य है, इसीलिए दिनकर औशीनरी की वेदना को वाणी तो देते हैं किन्तु जिस दाम्पत्य की नीव अटूट और नित नवीन प्रेम पर न टिकी हो, जहा हृदय से हृदय का मिलन न हो अपितु सम्बध को ढाने की मजबूरी हो, वह सम्बध दिनकर को ग्राह्य नही है। 'उवशी' म प्रतिपादित दाम्पत्य का तीसरा कोण सुक या और च्यवन का है । सुक्या को तप की सिद्धि के रूप में महर्षि च्यवन ने ग्रहण किया था। अपने तप के बल पर उहोने पुन यौवन धारण कर सुक्या को वरण किया था । च्यवन इसी सदम मे सुक या से कहते है- "डरो नही, यह तपोमग च्युति नही, सिद्धि मेरी है । पहले भी जब हुआ पूण कटु तप महर्षि कदम का, स्वग नही ऋषि न वर मे नारी मनोज्ञ मागी थी। सो तुम सम्मुख खडी तपस्या के फल की आभा सी, अब होगा क्या अपर स्वर्ग जिसका सधान क्रू मैं ? हरि प्रसन यदि नही, सिद्धि बनकर तुम क्यो आयो हो ?"127 नारीत्व की इससे बढकर वदना और क्या हो सकती है । प्राचीन नैतिकता मे जहा नारी पाप की प्रतिमा मानी जाती थी, वही दिनकर ने नारी को तप सिद्धि का पर्याय बतलाकर असीम सम्मान दिया है। चित्रलेखा कहती है- "च्यवन पूज्य सारी वसुधा के, पर असख्य ललनाएं उहे देखती हैं अपार श्रद्धा, असीम गौरव से। नारी को पयाय बताकर तप सिद्धि भूमा का, सचमुच, त्रिया जाति को ऋषि ने अद्भुत मान दिया है।' यह प्रशस्ति सुन सुक्या का तन मन मुकुलित हो उठता है, हृदय में असख्य कलिया 'खिल उठती हैं। उसके नारीत्व को नयी अथवत्ता प्राप्त होती है। पहली बार प्रणय के मधुर रस मे वह आकठ डूब जाती है- "लगा मुझे सवत्र देह को पपरी टूट रही है निकल रही हैं त्वचा तोडकर दीपित, नयी त्वचाए, चला मा रहा फूट अतुल से कुछ मधु को धारा सा, हरियाली से मैं प्रस न आकठ भरी जाती है ।"123 सुक या-च्यवन का सम्बध रोमाटिक प्रेम से प्रतिफलित हुआ है। पहली बार सुक या को देखते ही च्यवन का हृदय आदोलित हो उठता है। अकस्मात् वे कह 1128 उठते हैं- "कहा मिला यह रूप, देखते ही जिसको पाव की दाहकता मिट गयी, स्थाणु मे पत्ते निकल रहे हैं।"130 46 उवशी का सामाजिक सदम रसेल का कथन है, "रोमाटिक प्रेम-जीवन के सर्वोत्तम उल्लास का स्रोत है। स्त्री- पुरुप एक दूसरे को प्रेम करते हो और उस प्रेम की उत्कटता, कल्पना और कोम- लता हो, तो उमका अमूल्य महत्त्व है।"131 सुव या च्यवन का सम्बध इसी धुरी पर केन्द्रित है। उनका प्रेम मात्र शारीरिक घरातल पर टिका न होकर मन और आत्मा को भी स्पदित कर देता है। सुक्या उसी मा स्थिति को व्यक्त करते हुए कहती है- "सचमुच ही, फूटते स्पश से पत्र अपर मों मे, घरती जहां चरण, ऊसर मे फूल निकल आते हैं।"152 मुक्या पुरुष की मनोवत्ति मे अधिक परिचित है । वह जानती है कि पुरुप का दुदमनीय तेज चट्टानो और पवतो से तो टक्कर ले सकता है, किन्तु अपने मन की रग और तप्णा के सम्मुख पराजित हो जाता है । बाहरी अवरोधो का वह डट कर मुकाबला करता है, किंतु अपने भीतर मे व्याप्त शत्रु से वह हार जाता है। सुक या पुरुष की इसी प्रवृत्ति की ओर सकेत करते हुए कहती है- "पर के फैरे पारा से पुरुष नही डरता है, वह अवश्य ही, काट फेंकता उसे बाहु के बल से । पर, फम जाता जभी वीर अपनी निमित उलझन में, निकल भागने की उसको तब राह नहीं मिलती है ।"133 इसीलिए गृहस्थ नारी का दायित्व है कि वह क्षण क्षण सजग होकर पुरुष के भीतर की व्यथा और पीडा को समझे। उसके हृदय की प्रत्येक चोट पर प्रेम का मलहम रखे । सुकया कहती है- "इसीलिए दायित्व गहन, दुस्तर गहस्थ नारी का। क्षण-क्षण सजग, अनिद्र दृष्टि देखना उसे होता है, अभी कहा है व्यथा समर मे लौटे हुए पुरप को क्हा लगी है प्यास, प्राण मे काटे कहा चुभे हैं।"134 अत सुक्या औशीनरी की अपक्षा गहस्थ नारी के दायित्व को भलीभाति समझती है। औशीनरी के दाम्पत्य के खहित होने के कारण की ओर सकेत करते हुए. सुक्या कहती है- "बुरा क्यिा यदि शुभे! आपने देखा नही, नृपति के कहाँ घाव थे वहा जलन थी, वहा मम पीडा थी?"135 दिनकर भूमिका म लिखते हैं प्रश्ना के उत्तर रोगो के ममाधान मनुष्यो के नेता दिया करते हैं। कविता की भूमि केवल दद को जाननी है , केवल बेधनी को जानती है।' वितु उवगी' मे उहोंने औशीनरी की व्यथा और उसके दाम्पत्य वे खहित होने की समस्या को प्रस्तुत करने के साप सुक्या और व्यवन के साम- जस्यपूण गाहस्थ्य जीवन को प्रस्तुत कर रोग का समाधान भी प्रस्तुत कर दिया है।

4 काम की आधुनिक समस्याए दिनकर की काव्य चेतना सदैव समाज की समस्याओ से जूझती रही है । समाज को प्रत्येक समस्या उनकी सवेदना मे सपृक्त हुए बिना नहीं रह सकी है। उवशी मे प्रतिपादित काम की समस्याए वस्तुत आधुनिक मनुष्य की समस्याए हैं। आधुनिक मनुष्य हृदय से कम और बुद्धि से अधिक परिचालित है। बुद्धि के प्रति अतिशय आग्रह ने उसके सम्मुख कई समस्याओ को प्रस्तुत कर दिया है। इन समस्याओ से टूटता बिखरता वह सदध तनाव और द्वद्वो से ग्रस्त रहता है। आज के मानव की प्रमुख समस्या काम की समस्या है। काम के प्रति परम्परागत नैतिक बोध से वह पूणत मुक्त नहीं हो पाया है । काम के प्रति पाप-बोध को अवधारणा से उसका मन आज भी ग्रसित है । पुरुरवा के मन मे काम के प्रति यही प्रथि विद्यमान है पुरुरवा कहता है- 'आग है कोई नही जो शात होती, और खुलकर खेलने से भी निर तर भागती है।"136 आधुनिक मनुष्य जैव धरातल पर काम को भोगना चाहता है, किंतु प्राचीन नतिकता के परकोटे से बधा रहने के कारण वह काम को सहज रूप स ग्रहण करने से भागता है। "चाहिये देवत्व, पर, इस आग को धर दू कहा पर? कामनाओ को विसर्जित व्योम मे कर द् कहा पर?"137 काम से मुक्त होने के प्रयास आधुनिक मनुष्य काम मे और भी अधिक जाड गया है । काम का सहन माग अवरुद्ध होने से काम विकृत होकर वह निकला है। वस्तुत हम जिम चीज से बचना चाहते है हमारी चेतना उसी पर केंद्रित हो जाती है, यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है। काम की निदा और विरोध करने से ही आधुनिक मनुष्य कामुक हो गया है। हमारा समस्त साहित्य इसी कामुकता का प्रदशन कर रहा है। हमारी पोगा हमारे हाव भाव, हमारी फिल्में इसी सामुक्ता को प्रमाणित कर रही हैं । हम जिसे जीवन मे सहज ढग से अपनाने से कतरा रहे है जिसे बुरा समझकर विरोध कर रहे हैं हमारे अवचेतन में 48 उवशी का सामाजिक सदभ । अपनी जड जमाकर बैठ गया है। काम का यह कुस्मित रूप काम के प्रति शत्रुता रखने के फलस्वम्प ही उत्पन हुआ है। रजनीश लिखते है, "मनुष्य की काम की ऊर्जा को समझा जाय फिर उसे रूपातरित वरो के प्रयोग किये जा सकते हैं । विना उस ऊर्जा को समझे दमन की, सयम की सारी शिक्षा मनुष्य को पागल, विक्षिप्त और रुग्ण करेगी। "यह मनुष्य इतना रग्ण, इतना दीन-हीन कभी नही था, इतना विषाक्त भी नहीं था, इतना पायजण्ड' भी नहीं था, इतना दुखी भी न था।"138 आधुनिक मनुष्य काम के प्रति इतना पागन क्यो है, इसके मूल मे काम का दमन है। काम जव नसगिक रुप से सचालित नहीं होना, तव वह जहर बन जाता है, उसका निवास मन मे हो जाता है। आधुनिक बौद्धिक मनुष्य का काम उसके शरीर तक ही सीमित नहीं है, वरन वह उसके दिमाग पर भी हावी हो गया है । एक किसान जो खेतो मे हल जोतता है, दिनभर मेहनत करता है, वह आधुनिक युग के वौद्धिक मनुष्य की अपेक्षा काम से अधिक मुक्त है, क्योकि काम उसके शरीर मे ही रहता है, मन में नहीं । वह काम का अहर्निश चितन नही करता, किंतु आज का बुद्धिजीवी दिनभर काम के विषय मे सोचता रहता है, जबकि वास्तविकता यह है कि काम उनमें रहता नही । लारेस ने दिमागी सेक्स की बडी नि दा की है। यह शब्द उसी का आविष्कार है । यह दोष उसने बुद्धिजीवियो मे देखा है। उसने इसे समकालीन चितन और सस्कृति के लेखको, कलाकारो और नताओ का बबर मसार कहा है। उसका कहना है, सेक्स से जितना पीडित ये लोग हैं, उतना समाज का कोई भी वग नही। उसका कहना है कि इन लोगो मे सक्स इनके गणित से भी अधिक मानसिक है और उनके शरीर की प्राणवत्ता प्रेतो की तुलना मे भी नहीं के बराबर है। लारेस इस प्रवत्ति को आत्मा के विरुद्ध किया गया पाप कहता है 1139 आधुनिक मनुष्य तनावो और द्वद्वो मे जी रहा है। जीवन विषयक परम्परा गत धारणा टूट रही है और नयी धारणाओ को वह गढ नही पा रहा है। आधुनिक दृष्टि का वरदान उसके लिए भीषण सकट का अभिशाप बन गया है । आज के व्यक्ति की मवेदन क्षमता ही जैसे खो गई है। हर तरफ वह स्वय को अकेला महसूस कर रहा है ।ऐसे समय मे सेक्स के क्षणो मे ही उसे कुछ सुख की अनुभूति हो पाती है। काम के क्षणो मे ही वह आत्मविस्मत हो पाता है। उसका अह कुछ क्षणो के लिए विलीन हो जाता है इसीलिए वह इस क्रिया को बार बार दुहराना चाहता है और दिमाग में भी उही सुखो की स्मति ढोता रहता है । उवशी कहती है- 'मन जब हो आसक्त काम के लभ्य अनेक सुखो पर, चितन मे भी उही सुखा की स्मति ढोये फिरता है, विक्ल, व्यग्र, फिर-फिर, मधु सर मे अवगाहन करने को।"140 शाम को आधुनिक समस्याए 49 "अत हमारी खोज आत्म विस्मति की खोज है, कुछ मे डूब जाना है, जिसमे हम अपने को सो सकें। चूकि अह क्षुद्र है और दुख का मूल है, अत चेतन या अचेतन रूप से हम व्यक्ति या समूह की उत्तेजना में अपने को सो देना चाहते हैं। अधिकाशतया दुष्ट मनोवेगो की वैयक्तिक परिण ति में हम आत्मविस्मृति का उपाय पाते हैं । सेक्स सृजा से रहित जीवन का एक मात्र निकास रह जाता है। चूकि हम प्रेम नहीं करते हैं इसलिए सेक्स हमे घुला घुलाकर मारनेवाला मीठा जहर बन गया है ।"141 प्रेम के बिना सेक्स पाप है। आज का व्यक्ति प्रेम का दावा सो करता है, कि तु वस्तुन वह प्रेम करता नही। वह छल से, बल से किसी भी यत्न से उस सुख को प्राप्त करता है, इसीलिए काम से बलात्कार के पाप जन्म लते हैं। दो शरीर मिलते हैं, कि तु मन और आत्मा हाहाकार करते हैं- "स्नेहाकृष्ट नहीं, तो यत्नो से, छल से, बल से भी तभी काम से बलात्कार के पाप जम लेते हैं, तभी काम दुद्धप, दानवी किल्विश बन जाता है। काम-कृत्य वे सभी दुष्ट हैं, जिनके सम्पादन में मन-आत्माए नहीं, मात्र दो वपुस मिला करते हैं, या तन जहा विरुद्ध प्रकृति के विवश किया जाता है सुख पाने को, क्षुधा नही, केवल मन की लिप्सा से ।"142 वस्तुत काम की प्रकृति को मनुष्य ने समझा नहीं है। आज तक समझने का प्रयास तक नहीं किया है। सदव सेक्स को गाली ही दी है। उसे घृणित समझकर बलपूर्वक जीवन से निष्कासित करने की चेष्टा की है। किन्तु काम हमार जीवन से निकला नहीं है, अपितु हमारे मन के भीतर बहुत अतिशय होकर बठा है । हमारी समस्त चेतना काम से आक्रात है। हम अहनिश काम का चितन करते रहते हैं । दिनकर कहते हैं, "काम तन मे रहता ही है, कभी कभी उसका निवास मन मे भी हो जाता है। तन का काम स्वाभाविक प्रवत्ति, कि तु मन का काम रोग है। यह भी कि तन के काम की आवश्यकता सीमित होती है कि तु मन का काम निस्सीम होता है । तन का काम अपनी आवश्यकता से आगे नहीं बढता, किन्तु मन का काम उसका फेवल अतिक्रमण ही नही करता, वह नकली आवश्यकताओं को भी जन्म देता है । तन का काम बस मे लाया जा सकता है किंतु मन का काम काल्पनिक होने के कारण पकड मे नही आता।"143 उवशो भी प्रकारातर से यही बात कहती है- 'वन का क्या अपराध ? यत्र वह तो सुकुमार प्रकृति का, सीमित उसकी शक्ति और सीमित आवश्यकता है। यह तो मन ही है, निवास जिसमे समस्त विपदो का वही व्यग्र, व्याकुल असीम अपनी काल्पनिक क्षुधा से 50 उवशी का सामाजिक सदम हाय हाक तन को उस जल को मलिन बना देता है, विम्बित होती किरण अगोचर की जिस स्वच्छ सलिल में, जिस पवित्र जल मे समाधि के सहस्रार खिलते हैं।"144 प्रेम से फलित काम केवल शरीर के तल तक ही नहीं रुकता वरन वह आत्मा की गहराइयो को भी छू लेता है। तन का अतिक्रमण कर लेता है, जैसे दो लहर मिलकर एक दूसरे का अतिक्रमण कर लेती हैं। आधुनिक नर-नारी उस सहज आक्पण से नही मिलते, उनका मिलन प्रेम के सहजावेग से फलीभूत नहीं होता, अपितु जैसे तस्कर छिपकर स्वण का सधान करता है, वैसे ही छिपकर, भप से ग्रसित होकर वे मन की लिप्सा का शमन करने के लिए मिलते हैं- जहा नही मिलते नर-नारी उस सहजाक्पण जैसे दो वीचिया अनामत्रित आ मिल जाती हैं, पर, सुवण की लोलुपता मे छिप-छिपे तस्वर-से एक दूसरे का आकुल स धान किया करते हैं।"145 यही छिपाव यही भय कामुकता को ज म देता है । सेक्स को दिमाग मे घुस जाने के लिए मजबूर कर देता है। काम की समस्या ने आज हमारे समाज को रोगी बना दिया है। वस्तुत प्रेम के अभाव मे ही काम समस्या बन जाता है, प्रेम के अभाव मे ही मन नई हग्यिालियो की ओर आकृष्ट होता है। 'वश मे आयी हुई वस्तु से इसको तोष नही है । जीत लिया जिसको, उमसे आगे स तोप नहीं है ।1०७ X ग्रीवा मे झूलते कुसुम पर प्रीति नही जगती है जो पद पर चढ गयी चादनी फीकी वह लगती है ।"147 हमारे आधुनिक समाज मे बहुगामिता की समस्या के केद्र मे यही प्रेम का अभाव है, प्रेम के अभाव मे काम केवल शारीरिक कृत्य हो जाता है । वह शरीर का अति- ऋमण कर जादोलित नहीं करता। काम को पाप समझने के फलस्वरूप ही नर-नारी उस सहजावेग से मिल नही पाते । वे तप्त नही हो पाते। जो स्त्री पुरुप सेक्स से धणा करते होगे, उनके बीच प्रेम कसे हो पायेगा और जहा प्रेम न होगा वहा उनके सम्बधो मे एकनिष्ठता भी स्थापित नही हो सकती। इसी सदम मे रजनीश कहते हैं, जो पति अपनी पत्नी और अपने बीच एक दीवार पाता हो, वह पत्नी से कभी तप्ति अनुभव नही कर पाता। वह आस पास की स्त्रियो को खोजता है वेश्याओ को खोजता है। खोजेगा। अगर पत्नी से उसे तप्ति मिल गई होती तो शायद इस जगत की सारी स्त्रिया उसके लिए मा और वह्न हो जाती, लेकिन पत्नी से तप्ति न मिलने के पारण सारी स्त्रिया उसे पॉटेनियल पत्नियो की तरह मालूम पडती हैं जिनको X काम की आधुनिक समस्याए 51 कि पत्नी मे बदला जा सकता है ।"148 पुरुरवा' को औशीनरी से तप्ति न मिल सकी, क्योकि तब वह काम को पाप समझता था। औशीनरी-पुरुरवा का सम्बध प्रेम से फलोभूत नहीं था, इसीलिए उस सम्बध मे एकनिष्ठता नही रह सकी। पुरुरवा-उवशी का सम्बघ प्रेम से परिचालित होने के कारण शरीर का अतिक्रमण कर आत्मा की गहराइयो को छू लेता है। इसीलिए पुरुरवा उवशी को पाकर तप्त हो जाता है, फिर वह कही भटकता नही। "उवशी' के कवि ने प्राचीन मिथक को लिया अवश्य है, कि तु उसके परिप्रेक्ष्य मे दिनकर ने आधुनिक युग की समस्याओ को उदघाटित किया है। जिस प्रकार अप्सराए आधुनिक आभिजात्य वग की नारी का प्रतिनिधित्व करती है, उसी प्रकार से देवता आभिजात्य वर्ग के पुरुष का प्रतिनिधित्व करते हैं। हमारे समाज का आभिजात्य वग का पुरुष अत्यधिक विलास मे डूबा हुआ है। विलास मे डूबे रहने के कारण उसकी शारीरिक शक्ति क्षीण हो चुकी है, कि तु फिर भी उसका मन अतृप्त है। मन की यह अतृप्ति काम को भोगने के लिए उत्तेजित तो करती है, कितु उसकी यह विडम्बना है कि वह उस स्वाद को भोगने में असमर्थ रहता है । फलत वह आखो से, गध से, श्रवण से ही उस सुख को पाने के लिए लाला- यित रहता है । उवशी आधुनिक पुरुष की इसी पत्ति पर आक्षेप करते हुए कहती “शमित वह्नि ये शीत-प्राण पीते सोदय नयन से, प्राण मात्र लेते, न कुसुम का अग कभी छूते हैं ।' 149) 'अवशी' का कवि देवताओ के माध्यम से आभिजात्य वग के पुरुष की इसी वृत्ति पर गुणीभूत व्यग्य करता है । पुसत्वहीनता की यह समस्या समाज के इस वग मे आज एक भयकर रोग की तरह फैली हुई है । चित्रलेखा आधुनिक पुरुष की इस कुत्सित वत्ति पर कटाक्ष करते हुए कहती है- "सरल मानवी क्या जानो तुम कुटिल रूप देवो का? भस्म समूहो के भीतर, चिनगिया अभी जीती हैं। सिद्ध हुए, पर सतत चारिणी तरी मीनकेतन की अब भी मद-मद चलती है श्रमित रक्त धारा मे।"150 इस समस्या के केद्र मे भी प्रेम का अभाव ही है । जहा नर-नारी का सम्बध प्रेम की आधार शिला पर टिका रहता है, वहा ऐसी समस्याए उत्पन ही नही हो सकती। मन और आत्मा प्रेम से ही तप्त हो सक्ते हैं और जब तक मन और आत्मा तप्त नहीं हैं तभी तक मनुष्य भटकता है और इस भटकने की प्रक्रिया मे वह विलास मे डूब जाता है, अहनिश काम का चितन करता है। जिससे उसका तन तो शिथिल हो जाता है, कि तु मन की ज्वाला धधकती रहती है। मन की लिप्सा का शमन करने के लिए वह गध, श्रवण और नयनो का आधार लेता है।

52 उवशी का सामाजिक सदभ इसी सदर्भ मे दिनकर कहते हैं "सहे मुक्त प्रहरण अनग का, दप कहा वह तन मे? विवुध पचशर के बाणो को भानस पर लेते हैं। वश मे नही सुरो के प्रशमन सहज, स्वच्छ पावक वा ये भोगते पविन भोग औरो मे वह्नि जगाकर ।"151 मेनका इस वग की विडम्बना को यो व्यक्त करती है-- "हम भी क्तिने विवश । गध पीकर ही रह जाते हैं, स्वाद व्यजनो का न कभी, रसना से ले पाते हैं। हो जाते हैं तप्त पान कर स्वर माधुरी श्रवण से, रूप भोगते है मन से या तृष्णा-भरे नयन से । पर, जब काई ज्वार रूप को देख उमड आता है, क्सिी अनिवचनीय क्षुधा मे जीवन पड़ जाता है। उस पीडा से बचने की तब राह नही मिलती है, उठती जो वेदना यहा, खुल कर न कभी खिलती है । कि तु, मत्य जीवन पर ऐसा कोई बध नहीं है, रुके गध तक, वहा प्रेम पर यह प्रतिव ध नहीं है ।"152 आधुनिक युग में गभ निरोधक यत्रो के आविष्कार से भी काम की समस्या में वृद्धि हुई है । आधुनिक नर-नारी मुक्त प्रणय के आकाक्षी हैं । पाज काम का ध्येय सता नोत्पादन नही रहा है अपितु आधुनिक नर नारी यौन-सुख का ही महत्वपूर्ण मान बैठे हैं । गम निरोधक यत्रो के आविष्कार से गम रह जान का भय भी समाप्त हो गया है । इसीलिए आधुनिक नर-नारी उ मुक्त होकर काम का सुख भोगना चाहते हैं । आधुनिक नारी की प्रतीक रभा कहती है- 'सच है कभी कभी तन से भी मिलती रागमयी हम, कनक रग मे नर को रग लेती अनुरागमयी हम, देती मुक्त उडेल अधर मधु ताप तप्त अधरो मे, सुख से देती छोड कनक-बलशो को उष्ण क्रो मे, पर यह तो रसमय विनोद है, भावो का खिलना है। तन भी उद्वेलित तरग पर प्राणो का मिलना है।"153 आधुनिक नारी यह सोचती है कि माता बनने से सेक्स का सुख कम हो जाता है। इसो सम्म मै रजनी का क्यन है "जिन स्त्रियो को सेक्स का पागलपन सवार हो गया है जसे पश्चिम मे, वह इसीलिए मा नहीं बनना चाहती क्योकि मा मनने के बाद सेवस वा रस कम हो जाता है। 154 इसीलिए रमा कहती है---- "और मातपद को पवित्र परती, यद्यपि, कहती है, पर, माता बनकर नारी क्या बलेशनही सहती है ?

काम की आधुनिक समस्याए 53 तन हो जाता शिथिल, दान मे यौवन गल जाता है ममता के रस मे प्राणो का वेग पिघल जाता है रुक जाती है राह स्वप्न जग मे आने जाने की दि फूलो मे उ मुक्त धूमन की, सौरभ पाने की मधो मे कामना नही उ मुक्त खेला करती है प्राणो मे फिर नही इद्रधनुषी उमग भरती है ।' 155 अत 'उवशी' में प्रतिपादित काम की समस्याएं आधुनिक युग की समस्याए हैं। काम और अध्यात्म मनुष्य के प्रत्येक क्रिया-कलाप के केद्र मे काम प्रमुख भूमिका निर्वाह करता है। काम वस्तुत मनुष्य की ऊर्जा का स्रोत है। मनुष्य के भीतर की कोई प्रवत्ति ऐसी नहीं है, जो काम से प्रभावित न होती हो।काम वस्तुत राग का पर्याय है। राग से प्रेरित होकर ही हमारे जीवन के समस्त काय घटित होते हैं। प्राचीन नतिकता इसी राग का विरोध करती रही। धम का निवृत्तिमार्गी रूप इसी अदमनीय शक्ति का बलात् दमन करने की शिक्षा देता रहा । काम को दुराचार और सौदय को पाप की सजा देता रहा। घम के भीतर यही केन्द्रीय विचारधारा पनपी हुई थी कि जो नर-नारी एक दूसरे को जान लेते हैं, उनकी मुक्ति का माग अवरुद्ध हो जाता है । अध्यात्म की भूमि पर वे कभी प्रवेश नही कर सकते। इसलिए सवत्र यही सिद्धान प्रतिपादित हो चुका था कि "पुरुष के लिए अच्छा तो यही है कि वह स्त्री का स्पश न करे ।" गाधी जी हो या गौतम बुद्ध, महावीर हो, अथवा सेण्ट पाल सभी विचारको की यही धारणा थी कि "जो चीज़ मुक्ति मे सहायक नही है, उसे मैं अनावश्यक मानता हूँ । विवाह भी ऐसा ही अनावश्यक कृत्य है। मुक्ति से दूर होने के कारण मनुष्य को जम लेना पडता है और जब वह मुक्ति से और भी अधिक दूर होता है तब वह विवाह करता है ।" अत काम चाहे विवाह के घेरे मे ही घटित क्यो न हुआ हो मुक्ति के माग का सबसे बडा रोडा माना जाता था। जो नर नारी काम के प्रति पाप बोध की अवधारणा से ग्रसित होगे, वे कभी एक दूसरे से उ मुक्त भाव से प्रेम नही कर सकते। वस्तुत काम का ही विकसित रूप प्रेम है । पुरुरवा के मन मे काम के प्रति यही पाप बाध ग्रथि विद्यमान थी, इसीलिए ओशोनरी को वह प्रेम न कर सका । जो नर नारी एक दूसरे से प्रेम न कर सके जो कि अत्यन्त सहज और नैसर्गिक है, वे ईश्वर से प्रेम क्या कर पायेंगे। रजनीश लिखते हैं, "धम ने मनुष्य के जीवन से प्रेम के सारे द्वार बद कर दिये, प्रेम को जहरीला कर दिया।"156 पुरुरवा भी काम की दिव्य शक्ति को न पहचान कर उसे मुक्ति मे बाधा मानता है। उमकी समस्त द्विधा के केद्र मे यही अव- धारणा है। इसी कारण जीवन के रस को वह उमुक्त होकर भोग नही पाता।

54 उवशी का सामाजिक सदभ "रूप का रसमय निमत्रण या कि मेरे ही रुधिर की वह्नि मुझको शाति से जीने न देती। हर घडी कहती, उठो, इस चद्रमा को हाथ से धर कर निचोडो, पान कर लो यह सुधा मैं शात हूगी, अब नही आगे कभी उद्भात हूगी। किन्तु, रस के पात्र को ज्यो ही लगाता हूँ अघर को, घूट या दो घूट पीते ही न जाने, किस अतल से नाद यह आता, अभी तक भी न समझा? दृष्टि का जो पेय है, वह रक्त का भोजन नहीं है। रूप की आराधना का माग आलिंगन नही है।" और फिर "टूट गिरती हैं उमगें, बाहुओ का पाश हो जाता शिथिल है ।"157 पुरुरवा की इस विक्लता के परिप्रेक्ष्य मे सेक्स के प्रति उसकी दुश्मनी है। पुरुरवा ने सेक्स की प्रकृति को समझा नहीं है। यदि वह काम की ऊर्जा को समझ पाता तो उसकी सारी द्विधा ही समाप्त हो जाती। उवशी इमी ओर सकेत करते हुए कहती है- "राग विराग दुष्ट दोनो, दोनों निमग द्रोही हैं । एक चेतना को अजुष्ट सकोचन सिखलाता है और दूसरा प्रिय, अभीष्ट सुख की अभिप्रेत दिशा मे, कहता है बल-सहित भावना को प्रसारित होने को दोनो विषम, शाति समता के दोनो ही बाधक हैं, दोनो से निश्चित चेतना को अभग बहने दो। करने दो सब कृत्य उसे निर्लिप्त सभी से होकर, लोभ भीति, मघप और यम, नियम सयमो से भी।"158 वस्तुत काम से मैत्री स्थापित करने से ही मनुष्य काम से मुक्त हो सकता है । काम को कर्जा को समझकर ही उसकी शक्ति को रूपातरित कर सकता है । वितु आज तक हमने काम की प्रति को समझने की चेष्टा नही की। काम की शक्ति योन समझने के कारण ही हम कामुक हो गये हैं। हमारी सारी पेतना काम पर मेदित हो गई है। इसी सदम मे रजनीश कहते हैं, "आदमी ये भीतर जहर इवट्ठा हो गया है और उसके इक्टठे हो जाने का पहला सूत्र यह है रि हमने - काम को आधुनिक समस्याए 55 आदमी के निसग को, उसकी प्रकृति को स्वीकार नहीं किया। उसकी प्रकृति को दवाने और जवरदस्ती तोडने की चेष्टा की। मनुष्य के भीतर जो हो सकता है उस शक्ति को रूपातरित करने का, ऊचा ले जाने का आवाशगामी बनाने का, हमने कोई प्रयास नहीं किया।"15 अपितु हम पुरुरवा की भाति यही सोचते रहते "हाय, तृष्णा फिर यही तरगो मे गाहन करने की। वही लोभ चेतना सिधु के अपर-पार जाने का झप मार तन की प्रतप्त, उफनाती हुई लहर मे ठहर सकेगा कभी नही क्या प्रणय शूय अबर पर।"150 वस्तुत वाम से मुक्त हम तब ही हो सकते हैं, जब हम उसे दिव्य माने, पवित्र मार्ने । जब हम उसका प्रतिरोध करना छोड दें, उसे जीवन मे सहज रूप से स्वीकार करें। उवशी काम के प्रति इसी भ्राति का निराकरण यो करती है- "भ्राति नही, अनुभूति, जिसे ईश्वर हम सब कहते है, पात्रु प्रकृति का नही, न उसका प्रतियोगी, प्रतिबल है। किसने कहा तुम्हें, परमेश्वर और प्रकृति, मे दोनो साथ नही रहते, जिसको भी ईश्वर तक जाना है, उसे तोह लेने होंगे सारे सम्बध प्रकृति से, और प्रकृति के रस में जिसका अतर रमा हुआ है उसे और जो मिले, वितु, परमेश्वर नहीं मिलेगा ?"161 अत काम के प्रति गहरी समझ से ही हम काम से मुक्त हो सकते हैं। काम की ऊर्जा को रूपातरित कर राम की ओर मोड सकते है। "अत काम वासना के प्रति प्रखर जागरण से ही शन दाने ब्रह्मचय का जम होने लगता है। इस प्रकार अधकार से प्रकाश की ओर यात्रा आरभ होती है । काम को पूरी तरह समझकर ही काम से मुक्त हुआ जा सकता है। काम से मुक्ति ही ब्रह्मचय है।"162 काम के क्षणो मे हमारा मन विचारो से शून्य हो जाता है। हमारे अहकार का विसर्जन होता है । काम म जो हमे सुख की अनुभूति होती है, वह हमारी मह के विलय के कारण ही होती है। पुरुरवा जसे दुधष व्यक्ति का अह ऐसे क्षणो मे विजित हो जाता है- "मैं तुम्हारे बाण का बीघा हुआ खग, वक्ष पर धर सीस मरना चाहता हू। मैं तुम्हारे हाथ का लोला-कमल हूँ प्राण के सर मे उतरना चाहता हू ।"163 परमात्मा से मिलने के लिए भी पहली शतं अह का विसजन है । अह का विसजन होने पर ही हम देना सीखते हैं। जब तक अह है, तब तक हम केवल लेना चाहते 56 उवशी का सामाजिक सदभ हैं । सभोग के क्षणो मे ही हम कुछ देते हैं। लारेस का पन है कि ऐसे क्षणों मे कुछ नया हमारे भीतर प्रवेश करता है और कुछ पुराना चल देता है । काम हमें स्फूर्ति और ताजगी से भर देता है । उवशी उही क्षणो के आनद को बड़े कवित्व मय ढग से यो व्यक्त करती है- "उफ री यह माधुरी | और ये अपर विक्च फूलो से ये नवीन पाटल के दल आनन पर जब फिरते हैं रोमकूप, जानें, भर जाते किन पीयूष कणो से। और सिमटते ही कठोर बाहो के आलिंगन मे, चटुल एक पर एक उष्ण कर्मिया तुम्हारे तन की मुझमे कर सक्रमण प्राण उ मत्त बना देती हैं । कुसुमायित पवत-समान तब लगी तुम्हारे तन से मैं पुलक्ति विह्वल, प्रसन मूच्छित होने लगती है। 1184 "स्त्री और पुरुष के मिलन से किसी नई शक्ति का सचार होता है । स्त्री का शरीर और पुरुष का शरीर विद्यत की भाषा मे ऋणात्मक और धनात्मक शरीर है। पुरुष का प्रथम भौतिक शरीर धनात्मक होता है। नर के वह्नि रस से स्त्री का सिंचन होता है और स्त्री के रज से पुरुष अभिसिंचित होता है। सभोग का गहन अनुभव जीवन को नया क्षितिज, नया परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।"185 इसी सम्भोग के अनुभव को विकसित किया जा सकता है। ऐन्द्रिय से अतीद्रिय धरातल पर पहुचाया जा सकता है, बशर्ते कि हम काम को पाप न समझे । इसी- लिए रजनीश कहते है कि "यदि हम प्राथनापूण हृदय से और अत्यत पवित्रता से सेक्स के पास जायें तो हम परमात्मा की इस झलक को सहज ही अनुभव कर सकते है।"166 उवशी कहती है- 'विधि निषेध से मुक्त, न तो पीडित सचेष्ट बजन से न तो प्राण को बल समेत, बरबस, उस और लगाये जिस दिशा से जीवन मे सुख धारा फूटा करती है। जब इन्द्रिया और मन ऐसी सहज, शात मुद्रा मे वातायन खोले चिता से रहित पडे होते है, तभी किरण निष्कलुप मोद की स्वय उतर आती है रवि की किरणों के समान, अम्बर से, खुले भवन में ।" वस्तुत काम का सुख यौन सुख न होकर हमारे ठीक सेक्स सेंटर के पास हमारे जीवन की ऊर्जा का कुड है, जिसे कुडलिनी कहा जाता है। काम का सुख इसी कुडलिनी मे आये हुए कम्पन का सुख है। रजनीश लिखते हैं "काम से, सेक्स से जो थोडा-सा सुख मिलता है, वह सुख भी यौन के साथ वह जो कुड है, हमारी जीवन ऊर्जा का उसमे आये हुए कम्पन का सुख है।"169 अत काम पाप नहीं है।

काम की आधुनिक समस्याए 57 वह पूजा की तरह पवित्र है। काम और धम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। काम से यात्रा प्रारम्भ करके ही हम राम तक पहुच सकते हैं। डॉ. विजेन्द्र नारायण सिंह लिखते हैं, "काम की गगोत्री ही राम के महानद तक पहुचती है । यात्रा काम की होती है, उपलब्धि राम की होती है। काम के विना इस प्राथमिक सापान के बिना, राम को भी नहीं पाया जा सकता।"15 दिनकर कहते हैं -- "तुम अशेष सुदर हो, पर, हो कोर मात्र ही केवल उस विराट छवि की, जो धन के नीचे अभी दबी है। अतिक्रमण इसलिये कि इन जलदो का पटल हटाकर देख सकू मधुकान्तिमान् सारा सौदय तुम्हारा।"170 अत काम को ही उदात्तीकृत कर अध्यात्म तक पहुचा जा सकता है। दिनकर भूमिका में लिखते हैं, "काम की ये जो निराकार झकृतिया हैं, वे ही उदात्तीकरण के सूक्ष्म सोपान है । त्वचाए, स्परा के द्वारा, सुदरता का जो परिचय प्राप्त करती हैं, वह अधूरा और अपूण होता है, पूणता पर वह तब पहुचता है, जब हम सौंदय के निदिध्यासन अथवा समाधि मे होते हैं।" हमारी आध्यात्मिक यात्रा मूलाधार चक्र से प्रारभ होकर महस्रार तक है। मूलाधार चक्र की प्राथमिक प्राकृतिक सम्भावना काम वासना है, जो हमे प्रकृति से प्राप्त होती है, वह भौतिक शरीर की मे द्रीय वासना है। इसीको समभकर रूपातरित करके सहस्रार तक पहुचना है। इसी मदभ मे रजनीश लिखते है "मैं सम्भोग और समाधि को बडी समतुल बातें मानता हूँ । असल मे वे ही दो समतुल घटनाए हैं और कोई घटना समतुल नही है। सम्भोग की स्थिति मे हम ब्रिज के एक छोर पर होते हैं, सीढी के नीचेवाले हिस्से पर होते हैं जहा से हम प्रकृति से मिलते हैं और समाधि मे हम सीढी के दूसरे छोर पर होते हैं, जहा हम परमात्मा से मिलते हैं। दोनो मिलन है, दोनो विस्फोट है पर अर्थ में, दोनो मे किसी खाम अथ में तुम खोते सम्भोग मे क्षण भर के लिये और समाधि मे सदा के लिए।"171 "जब भी तन की परिधि पार कर मन के उच्च निलय मे, नर-नारी मिलते समाधि सुख के निश्चेत शिखर पर, तब प्रहप की अति से यो ही प्रकृति काप उठती है। और फून यो ही प्रसन होकर हसने लगते हैं।' 172 अत मनुष्य की काम भावना केवल शरीर को ही नहीं मन और आत्मा को भी आन्दोलित करती है। काम जव मन और आत्मा के धरातल पर पहुंचता है, तब उसके भीतर रहस्यपूण अथों का समावेश होने लगता है। उवगी उही क्षणो को महसूसते हुए कहती है- "जला जा रहा अथ सत्य वा सपनो की ज्वाला मे, निराकार मे आकारों की पृथ्वी डूब रही है। - 58 उवशी का सामाजिक सदभ यह कैसी माधुरी? कौर स्वर लय मे गूज रहा है त्वचा जाल पर, रक्त शिराओ मे, अकूल अतर मे? ये ऊर्मिया। अशब्द नाद । उफरी बेबमी गिरा की। दोगे कोई शब्द ? कहू क्या कहकर इस महिमा को ?"13 अत काम एक धार्मिक कृत्य है। वह पूजा की तरह पवित्र है । काम अध्यात्म का विरोधी ही, अपितु यह तो वह विदु है, जहा से अध्यात्म तक पहुंचने की यात्रा प्रारम्भ होती है। काम का गहरा अनुभव ही हमे उस ऊचाई तक ले जाता है, जहा काम मात्र शरीर तक नही रुक्ता वरन शरीर और मन के तल को पार कर आत्मा के तल पर, जो काम का आध्यात्मिक तल है, पहुचता है। उवशी उस स्थिति का वणन यो करती है- "प्रकृति नित्य आन दमयी है जब भी भूल स्वय को हम निसग के किसी रूप (नारी, नर या फूलो) से एक तान होकर खो जाते हैं समाधि निस्तल मे खुल जाता है कमल, धार मधु की बहने लगती है दैहिक जग को छोड कही हम और पहुच जाते हैं, मानो मायावरण एक क्षण मन से उतर गया हो।' 174 अत प्राचीन नैतिकता जहा काम को दुराचार की और सौदय को पाप की सज्ञा दती रही, वही दिनकर काम को अध्यात्म तक पहुचने का साधन मानते हैं। पुरुरवा की द्विधा प्राचीन नैतिकता के परकोटे से वधे व्यक्ति की द्विधा है, जो काम को राम का प्रवल शत्र मानता है, जबकि महर्षि च्यवन के भीतर कोई द्वन्द्व नही है । काम उनकी तपस्या में बाधक नहीं है । चित्रलेखा कहती है- "यही गव मुभको भी- हो आता है जनायास उन तेजवन्त पुरुषो पर बाधर नही तपोव्रत जिनके व्यप-उदग्न प्रणय का, न तो प्रेम ही विघ्न डालता जिनके तपश्चरण में, प्रणय, पाश मे बधे हुए भी जो निमग्न मानस से उसी महासुख की चोटी पर चढ़े हुए रहते हैं जहा योग योगी को, कवि को कविता ले जाती है। और निरजन की समाधि से उमीलित होने पर जिनके दृग दूपते नही अजनवाली आसो को।"175 अत दिनकर काम और अध्यात्म को परस्पर विरोधी न मानकर मनुष्य के आध्यात्मिक विकास का साधन मानते हैं।

उपसहार - 'उवशी' के सामाजिक सदम के प्रमुख आयाम ये हैं-- उवशी प्राचीन आख्यान पर लिखी गयी एक प्रेम-कथा है, किंतु उसका सदभ आधुनिक है । कवि दिनकर भारतीय नवोत्थान की कोख से पैदा हुए और उस नवोत्थान को उहोन अपनी कविता से पूर्णता की ओर ढवेला । 'उवशी' उसी पूणता ये प्रयत्न मे कवि दिनकर की काव्य-साधना का चूडात निदशन है। भारतीय नवोत्थान की पहली लहर म ही निष्क्रिय स यास को तिरस्कृत करते हुए कमठ गाहस्थ्य का संदेश स्वामी विवेकान द न दिया था । उहोने एक जगह कहा कि गीता पढने की अपेक्षा फुटबॉल खेलना कही अधिक श्रेयस्कर है और अयत्र उहोंने निष्प्रयोजन ब्रह्मचय की भत्सना करते हुए कहा कि चिडिया दाना चुगती है तो वह सतान उत्पन करती है और हम तो अन ब्रह्म की उपासना करनेवाले साकार मनुष्य हैं। विवेकानन्द स्वय सयासी थे, किन्तु कमठ गाहस्थ्य का परि- त्याग कर निस्क्रिय सल्यासी की उपासना करनेवाली भारतीय परम्परा से वे परिचित थे और इसी परम्परा को वे घणा की दष्टि से देखते थे। निवत्ति के नित्रिय दशन की अपेक्षा प्रवत्ति के कमठ जीवन को उहोंने श्रेयस्कर माना। मध्यकालीन कवि चडीदास की तरह वे भी यह अच्छी तरह मानते थे कि मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ नही, मनुष्य झूठ बोलता है, व्यभिचार करता है, गाय झूठ नहीं बोलती है, वृक्ष व्यभिचार नहीं करते हैं, किंतु गाय और वक्ष मनुष्य से श्रेष्ठ नही हो जायेंगे। कम नदी को पार करनेवाले पुरुष के वस्त्र वैतरणी की धारा मे थोडा भीगते ही हैं ये तो कम से दाग है । ससार सौ दय है, उससे भागना अपराध है। इसी नवोत्थान की प्रवृत्तिमुखी धारा से सिक्त होकर उवशी के सामाजिक सदभ पुष्ट और सबल हुए हैं। निष्क्रिय स यास और भ्रातिपूण जीवन-दशन की भत्सना करती हुई उवशी कहती है- "पढो रक्त की भाषा की, विश्वास करो इस लिपि का यह भापा, यह लिपि मानस को कभी न भरमायेगी। छली बुद्धि की भाति, जहा सुख-दुख से भरे मुवन में, पाप नीखता वहा, जहा सुदरता हुलास रही है और पुण्य चय वहा जहा ककाल कुलिश काटे है ।"178 किसी और हिंदी कवि ने इतनी दढता के साथ पुराने जीवन दर्शन पर ऐमा 60 उवशी का सामाजिक सदम आक्रामक प्रहार किया हो, यह हमे नही मालूम । 'उवशी' का रचयिता पुराने विचारको की तरह नर-नारी के सम्ब घ को पाप नही मानता है । ससार को देखने और जानने के पाच ही माध्यम हैं मनुष्य के पास, और ये पाच हैं उसकी ज्ञानेद्रिया श्रवण, नासिका, चक्षु, त्वचा और जिह्वा । श्रवण, चक्षु और नासिका के द्वारा प्रेम का अतीन्द्रिय रूप प्रकट होता है, उसे 'प्लटोनिक लव' भी कहा जाता है। किंतु प्रेम का मानवीय रूप तो जिह्वा और त्वचा के धरातल पर ही प्रकट होता है और यदि प्रेम जिह्वा और स्वचा के धरातल पर मनुष्य मे प्रक्ट होता है तो यह प्रकृति है। 'उवशी' का रचयिता यह मानता है कि प्रकृति परमेश्वर के लिए वाधक नहीं है। नर और नारी यदि सचमुच एक दूसरे को जान लेते है तो परम सत्ता का ज्ञान अलभ्य नही बन जाता है। यथा--- 'क्सिने कहा तुम्हे, जो नारी-नर को जान चुकी है, उसके लिये अलभ्य नान हो गया परम-सत्ता का पुस्प जो आलिंगन मे वाघ चुका रमणी को, देश काल को भेद गगन मे उठने योग्य नहीं है।"177 चितन की लहरो के ही समान रुधिर और त्वचा में भी आरोहण के सोपान लगे हैं । दशन की लहर जहा हमे ले जाती है, सौदय की लहर भी प्रकारातर से वही ले जाती है। "चितन की लहरो के समान सौदय लहर मे भी है बल, सातो अम्बर तक उडता है रूपसी नारी का स्वर्गाचल । जिस मधुर भूमिका मे जन को दशन तरग पहुचाती है उस दिव्य लोक तब हमे प्रेम की नाव सहज ले जाती है।"18 और जैसा कि डॉ. विजे द्रनारायण सिंह ने लिखा है कि "चुम्बन और चितन एक ही समुद्र तक पहुचकर रीत जानेवाली नदियो के नाम हैं।" नवोत्थान के इसी प्रवृत्तिमार्गी जीवन दशन "उवशी' के कवि को पुरानी नतिकता पर प्रहार करने का ऐसा प्रखर सामथ्य दिया है। इस जीवन दशन की कई आनुपगिक विशेषताए हैं, एक तो यह पि हृदय का राग बुद्धि तत्त्व की अपेक्षा श्रेष्ठतर चीज़ है । जीवन चूकि सोदय है, जीवन चूकि आक्षण है, इसलिए रुधिर बुद्धि से अधिक वली वस्तु है। रुधिर की पुकार जहा होती है, वहा हृदय के रक्त बिदु रचना की ओर उमुख होते हैं और वुद्धि मे रचना का कोई सामथ्य ही नही होता। रचना का सम्बध कमठ गाहस्थ्य से है और बुद्धि का निष्क्रिय पलायन से । इसलिए उवशी कहती है- "रक्त बुद्धि से अधिक वली है और अधिक ज्ञानी भी। क्योरि बुद्धि सोचती है और शोणित अनुभव करता है। निरी बुद्धि की निर्मितिया निष्प्राण हुआ करती हैं, 1179 चित्र और प्रतिमा इनमे जो जीवन लहराता है, वह सूझो से नही पत्र पापाणो मे आया कलाकार के अतर के हिलकोरे हुए रुधिर से।" और इसी जीवन दशन से लगे हुए कवि माया की भी समीक्षा कर देता है । पुरोने दाशनिक शक्राचाय ने कहा कि प्रकृति माया है, दिनकर उल्टी बात कहते है, कहते हैं कि माया वह भ्रमित बुद्धि है जो एक ओर सृजन का सदेश देती है और दूसरी ओर त्याग की बात करती है- "प्रकृति नहीं माया, माया है नाम भ्रमित उस धी का, बीचोबीच सप सी जिसकी जिह्वा पटी हुई है, एक जीभ से जो कहती कुछ सुख अर्जित करने को, और दूसरे से बाकी का वजन सिखलाती है।"160 इस प्रकार 'उवशी' का रचयिता वध्या बुद्धिवाद की बडी ही तल्ख समीक्षा प्रस्तुत करता है और उसे सम्पूणतया तिरस्कत कर देता है। बुद्धि यदि सपूणत तिरस्कृत हो जाए तो बचता है केवल हृदय और हृदय का मुख्य आक्षण धावित होता है रमणी के सोदय की ओर । 'उवशी' की नारी भावना की यह तकसगत परिणति है। कवि इसलिए स धान करता है कि तपस्या और प्रेम क्या सचमुच ही इनमे कोई सम्बध नहीं है ? क्या हृदय का रस आग मे जला देने के योग्य है ? क्या स्पश के समय देह से टूटनेवाली पपरिया पाप हैं क्या कोमल त्वचा के राग परमात्मा की ओर ले जानेवाली पगडडिया नही हैं ? उवशी के रचयिता को ऐसा लगता है कि वह भालिंगन अधकार नहीं है, जो हम प्रकाश के महासिधु मे फेंक देता है । "वह आलिंगन अधकार है, जिसमे बध जाने पर हम प्रकाश के महासिंघु मे उतराने लगते हैं ? और कहोगे तिमिर मूल उस चुम्वन को भी जिससे जडता की अथिया तन-मन की खुल जाती हैं ?"181 इन्द्रिया के माध्यम से अतीन्द्रिय धरातल का स्पश यही उवशी का कामाध्यात्म है। यह कामाध्यात्म नर नारी सम्बध की गहनता से उत्पन हुआ है। उवशी के इस प्रेम दशन का सामाजिब सदभ क्या है ? इस शताब्दी में पुरुष नारी को केवल ऊपर से ही पाता रहा है और नारी भी रवी द्रनाय को भाषा मे मात्र विनोदिनी बनकर रह गयी है। वह पुरप में केवन वासना की लहर और रुधिर का उत्ताप जगाना जानती है । वह तितली है, मारजारी है विन्तु नारी नही है । दिनकर ने पहले इस नारी को आधुनिक यहा था और उवगी मे इसोको अप्सरा कहते हैं । इस आधुनिका के मिथ्या व रमस को भत्सना करते हुए बहुत पहले उहोंने 'रसवती' मे लिखा था- 7 ?

62 उवशी का सामाजिक सदभ "दातो तले अघर को दाबे, कसे उबलते मन को चलती हो ऐसी कि, देखती होज्यो नही किसी को लेकिन सबको बचा काम करनेवाले वे लोचन कहते हैं तुम विन देखे देखा करती बहुतो को तुम्हे ध्यान रहता कि पीठ सहलाती क्तिनी आखें। वधेचले आते कितने मन छल की भी लटोसे। मन स्पश करती बहुतो का, बलखाती चलती हो मन ही मन गिनती हो लोहू काप गया कितने का ?"182 और यह प्रेम नही व्यभिचार है। नर-नारी यदि सचमुच एक दूसरे से प्रेम करते हो तो भटक्ते नही। लेकिन हमारी शताब्दी मे मन एक हरियाली से दूसरी हरियाली की ओर जाता ही रहता है। प्रेम की समस्या इसी सदर्भ मे उत्पन हुई। इस शताब्दी मे पुरुष और नारी एक आयामी हो गये हैं । वे ऊपर-ऊपर से भरे-भरे दीखते हैं किन्तु भीतर से रिक्त और खोखले हैं। पुरुष का चुम्बन नारी की त्वचा को भेदकर उसकी अतरात्मा को छू नही पाता और नारी का समपण पुरुष के खून मे केवल आग लगा देता है, किन्तु उसकी आत्मा मे कोई ज्वाला नही फूटती है । दोनो एक-दूसरे की जड देख तो पाते हैं और कामायनीकार की भाषा मे सौदय जलधि से केवल अपना गरल पात्र भरकर ले आते हैं। नर और नारी के प्रेम की साथकता और चरिताथता इस बात मे निहित है कि वे एक दूसरे को पूणता प्रदान करें। नर-नारी पूण जैविक इकाइया है और ये एक दूसरे को पूर्णत तब पा सकते हैं जब अतरात्मा की गहराइयो मे उतर जाए । अतरात्मा की गहराइयो मे उतरने का ही नाम प्रेम है। नर-नारी सम्बध की इस पूर्णता की व्यारया करते हुए उवशी को भूमिका मे दिनकर ने लिखा है कि "नारी के भीतर एक और नारी है यह अगोचर और इद्रियातीत है और इस नारी वा स धान पुरुप तब पाता है जब वह शरीर की धारा को उछालते उछालते मन के दुगम समुद्र मे फेंक देता है । जब वह दैहिक चेतना के परे प्रेम की दुगम समाधि मे पहुचता है।' 'उवशी' के रचयिता का लक्ष्य इसी दुगम समाधिवाले प्रेम की खोज है। उवशी की क्था के द्वारा वह इसी प्रेम की ओर घावित होता है । उवशी इसलिए काम्य है कि औशीनरी पुररवा को ऐसा उदवेग नहीं दे सकी। नारी की देह भित्तिपरक है, प्रकृति ने जो अद्भुत चित्रकारी की है वह निष्प्रयोजन नही है उससे पुरुप रोझता है। प्रेम, जैसा कि दिनकर ने कहा है, पहले फिजिक्स है और तव मेटा फिजिक्म है। नारी का अप्सरा वन जाना निधन और हेय है। किंतु अप्सरा तत्व को दया देना और भी बहा अपराध है। मोशीनरी ने अपने अप्सरा तत्त्व को दवा दिया था। वेवल शुभ-कामना और मगलंगा से पुरुष को मिलेगा ही क्या? यह पुरुरवा की प्रेरणा का उत्स नहीं बन सकी, इमलिए पुरुरवा उसी की ओर । - - - - आकृष्ट होता है । यही वह वाछित नारी है, पुरुरवा जिसकी खोज जम जमातर की यात्राओ मे कर रहा था- "जहा जहा तुन खिलो, स्यात में ही मलयानल बनकरें तुम्हें घेरता आया हू आकुल अपनी वाहों से। जिसके भी सामने क्यिा तुमने कुचित अधरो को, लगता है, मैं ही वह चुम्बन रसिक पुरुष था। 183 उवशी को पाकर पुरुरवा की सारी वासनाए विराम पा गई, इसी को प्रेम कहते हैं ।प्रेम यानी र जब कई हरियालियो की ओर आख उठाना निष्प्रयोजन सम- झता है । नारी के पक्ष से इसी को सतीत्व कहते हैं । यह प्रेम तब तक उत्पन नहीं होता, जब तक नारी नर को और नर नारी को सपूणत न पा जाय । मेक्स नर- नारी को सपूणत पाने का एक माग है कि तु यह माग तब तक नही रीतता है जब तक कि त्वचा के परे तक के लोक या दशन न हो जाय । इस लम्बी यात्रा का जहा अत होता है, वही प्रेम की प्राप्ति हो जाती है। औशीनरी ऐमी परम्परामुक्त भारतीय नारी है, जो सेक्स की उपयोगिता का समझती ही नहीं, प्रेम की उप- योगिता वह समझती क्या खाक ? दिनकर को इस सती नारी के पराभव पर क्लेश है कि तु उनकी काम्य नगरी उवशी है। आधुनिक मनुष्य विशेषकर भारतीय मनुष्य की प्रेम परक समस्यामा पर मनन करते हुए 'उवशी' की रचना हुई है। कवि ने क्था तो प्रेता युग की उठाई है। कि तु समस्याए उसके अपने युग की हैं। प्राचीन क्था को उठाना गढे मुर्दे उखाडना नहीं है- जब भी अतीत में जाता हू मुों को नहीं जिलाता हू पीछे हटकर फेंकता बाण जिससे कपित हो वतमान 1184 उवशी के सामाजिक सदभ की यही अवितिया और तारतम्य है। -

सन्दर्भ-सकेत
1 आधुनिक साहित्य बोध (एक परिसवाद)
आधुनिक्ता अर्थात सकट बोध डा० धमवीर भारती, प० 12
2 विवाह और नतिकता बट्रेड रसेल, १० 34
3 कविता और कविता इद्रनाथ मदान, पृ०१
4 पत, प्रसाद और मथिलीशरण गुप्त दिनकर, पृ०१
5 चक्रवाल दिनकर, पृ० 33
6 रेणुका दिनकर, ५० 2
7 हुकार दिनकर, पृ० 23
8 पत, प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त दिनकर
9 रेणुका दिनकर, पृ० 43
10 रसव ती दिनकर, पृ० 29 30
11 वही, पृ० 47
12 कुरक्षत्र दिनकर, ५० 106
13 वही, पृ. 107
14 वही, प० 108
15 वही, प० 131
16 वही, ५० 131
17 वही, प० 142
18 उवशी दिनकर, ५०4
19 उवशी दिनकर, भूमिका (ख)
20 सशय की एक रात नरेश मेहता, भूमिका
21 मत्ति तिलक दिनकर, पृ० 58
22 धम और समाज डा० राधाकृष्णन, प० 166
23
युग चितन मिमेन द बुआ अनु० शरद देवडा, पृ० 144 145
24 विवाह और नैतिकता व ड रसेल, पृ० 93
25 उवशी दिनकर, पृ. 16
26 वही पृ० 27
27 वही, प० 26

सदभ सकेत 65 28 उवशी दिनकर, पृ० 25 29 वही, पृ० 25 30 विवाह और नैतिकता रहेंड रसेल, पृ० 44 31 उवशी दिनपर, पृ० 25 32 वही, पृ० 125 33 वही, प0 125 34 वही, पृ० 25 35 उवशी उपलब्धि और सीमा डा. विजेन्द्रनारायण सिंह, पृ० 92 36 उवशी दिनपर, पृ० 127 37 वही, भूमिका स 38 मृत्ति तिलक दिनकर, ५० 56 39 वही, पृ० 56 40 वही, प058 41 सृजन की मनोभूमि डा० रणवीर राणा, ५० 108 42 उवशी दिनकर, पृ० 41 43 मृत्ति तिराक दिनकर, पृ० 55 44 उवशी दिनकर, भूमिका (झ) 45 उर्वशी उपलब्धि और सीमा डा. विजेद्रनारायण सिंह, पृ. 76 46 उवशी दिनचर, पृ० 59 47 वही, पृ० 38 48 वही, पृ० 37 49 वही, पृ० 36 50 उवशी विचार और विश्लेपण स० वचनदेव कुमार, पृ० 12 51 वही, पृ० 35 52 वही,५०36 53 वही, प035 54 वही, 442 55 सृजन की मनोभूमि डा० रणवीर राना, प० 108 56 उवशी दिनकर, ५० 33 57 वही, प० 113 58 उवशी उपलब्धि और सीमा डा. विजेद्रनारायण सिंह, पृ० 75 59 उदशी दिनकर, ५० 118 60 वही, प० 116 61 रश्मिलोक दिनकर भूमिका (च) 66 उवशी का सामाजिक सदभ 62 उवशी दिनकर, ५० 35 63 वही, पृ० 59 64 वही, प० 45 65 उवशी उपलब्धि और सीमा डा० विजे द्रनारायण सिंह, पृ० 50 66 उर्वशी टिनकर,५०46 67 वही, प० 46 68 कला सृजन प्रक्रिया डा० शिवकरण सिंह, पृ०. 43 69 उवशी दिनकर, 4046 70 वही, पृ० 45 71 वही, प० 62 72 कुरुक्षेत्र दिनकर, पृ० 55 73 युगचिंतन सिमेन द बुआ, अनु० शरद देवडा, पृ० 144-45 74 विवाह की मुसीबतें दिनकर, पृ०१ 75 वही ५०१ 76 उवशी दिनकर, २०9 77 वही पृ० 10 78 रसवती दिनकर, ५० 47 79 उवशी दिनकर, प09 80 वही, प० 10 81 वही, प0 10 82 वही, प० 8485 83 वही, ५० 84 84 वही, प.84 85 सभोग मे समाधि को ओर रजनीश, पृ. 19697 86 उवशी दिनकर, प. 11 87 इडियन एड फारेन रिव्यू अगस्त 73, दिनकर का इटरव्यू, प० 12 13 88 रमवती ग्निकर, पृ० 51 89 उवशी दिनकर, प० 11 90 रसवती दिनकर,4051 91 उवशी दिनकर, पृ० 12 92 उवशी विचार और विश्लेषण स० वचनदेव कुमार, प० 161 62 93 उवशी दिनकर,५०92 94 वही १० 12 95 वही, २०93 96 मत्ति तिलक दिनकर, पृ० 56 97 उवशी दिनकर, पृ० 90 98 वही,५०91 99 वही, पृ० 91 100 वहीं,प.85 101 वही, पृ० 85 102 वही, पृ० 85 103 वही, पृ० 26 104 वही, पृ० 26 105 वहीं, प० 27 106 वही, प० 27 107 विवाह और नैतिकता बट्रेंड रसेल, पृ० 44 108 उवशी दिनकर, पृ० 25 109 वहीं, ५02 110 विवाह की मुसीबतें दिनकर, प० 21 111 विवाह और नैतिकता बट्रेड रसेल पृ० 93 112 उवशी दिनकर, प0 24-25 113 वहीं, प० 125 114 विवाह और नैतिक्ता बट्रेड रसेल पृ० 51 115 उवशी दिनकर, प० 25 116 वही, प० 25 117 वही, पृ० 126 118 वही, प० 125 119 उवशी उपलब्धि और सीमा डा. विजेन्द्रनारायण सिंह, पृ० 84 120 उवशी दिनकर, पृ० 16 121 वही, पृ० 79 122 वही, प05051 123 वही, प० 31 124 वही, 40 46 125 वही, पृ० 72 126 वही, प078 127 वही,प.87 128 वही, पृ० 89 129 वही, पृ० 88 89 68 उवशी वा सामाजिक सदम 130 उवशी दिनकर, पृ० 87 131 विवाह और नैतिकता, बट्रेड रसेल, प० 49 50 132 उवशी दिनकर, पृ० 89 133 वही, प० 127 134 वही, ५० 127 135 वही, प० 127 136 वही, पृ० 36 137 वही, पृ०42 138 सभोग से समाधि की ओर रजनीश, पृ० 54-55 139 उवशी उपलब्धि और सीमा डा. विजे द्रनारायण सिंह, पृ046 140 उवशी दिनकर, पृ० 67 141 राष्ट्रव दिनकर और उनकी साहि ना, स० प्रतापचन्द्र जायसवाल, पृ० 146 142 उवशी दिनकर, पृ० 67 143 विवाह की मुसीबतें दिनकर, पृ० 34 144 उवशी दिनकर, पृ० 67 145 वही, ५० 67 146 वही, पृ० 25 147 वही, ५० 25 148 सभोग से समाधि की ओर रजनीश, पृ० 80 149 उवशी दिनकर, पृ० 52 150 वही, पृ० 96 151 वही, पृ०१ 96 152 वही, पृ०6 153 वही, पृ० 10 154 सभोग से समाधि की ओर रजनीश, प० 126 155 उवशी दिनकर, ५० 11 156 सभोग से समाधि की ओर रजनीश, पृ. 19 157 उवशी दिनकर, ५० 36 158 वही, ५० 62 159 सभोग से समाधि की ओर रजनीश, पृ० 55 160 उवशी दिनकर, पृ० 59 161 वही पृ० 60 162 उर्वगी विचार और विश्लेपण स० डॉ० वचनदेव कुमार, १० 152

सदम-गरेन 69
163 उपगी दिनपर,पृ. 41
164 यही, पृ०59
165 जयंती विकार और विश्लेपण म० डॉ० यचनदेव मुमार, पृ. 150
166 भोग से समाधि थी और रजनीश, पृ० 105
167 उनी निवर, पृ० 63
168 मिन सोजा तिन पाइयां रजनी, पृ० 11
169 उनी विचार और विश्लेपण म० डॉ० वचनदेव कुमार, पृ. 155
170 वी दिनचर, पृ. 49
171 जिन गोजा तिन पाइयां रजनी, पृ०12
172 यी दिनकर, पृ० 57
173 पही, पृ. 57
174 यही, १० 68
175 यही, पृ० 82
176 पही, पृ० 46
in यही.प.60
178 वहीं,1078
179 वही, पृ. 45
150 बी, ५०61
181 सी, १० 35
182. रपयनी निार, पृ० 46
13 दिनार, पृ. 79
154 गिधिना सिर, पृ० 58

सदर्भ-ग्रथो की तालिका 6 कुरुक्षेत्र 1 आधुनिक साहित्य बोध (एक परिसवाद)"आधुनिकता अर्थात सकट का बोध" डा० घमवीर भारती 2 उवशी उपलब्धि और सीमा डा० विजेद्रनारायण सिंह, परिमल प्रकाशन, 194, सोहबतिया बाग, इलाहाबाद 6 3 उवशी विचार और विश्लेषण स० डा० वचनदेव कुमार, बिहार ग्र थ कुटीर, पटना 4 कवि की दष्टि डा० भारतभूषण अग्रवाल, द मेक- मिलन क्पनी आफ इण्डिया 5 कविता और कविता इद्रनाथ मदान, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली रामधारी सिंह दिनकर, उदयाचल प्रकाशन, राष्ट्रकवि दिनकर पथ, राजे द्रनगर, पटना 800016 7 चक्रवाल रामधारी सिंह, दिनकर, उदयाचल प्रकाशन, राष्ट्रकवि दिनकर पथ, राजेन्द्र नगर, पटना 800016 8 जिन खोजा तिन पाइया आचाय भगवान रजनीश, आनद शिला प्रकाशन 9 दिग्भ्रमित राष्ट्रकवि प्रो० कामेश्वर शर्मा 10 घम और समाज डा० सवपल्लि राधाकृष्णन, राजपाल एण्ड स स, कश्मीरी गेट, दिल्ली 11 पत, प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त रामधारी सिंह दिनकर, उदयाचल प्रकाशन, राष्ट्रकवि दिनकर पय, राजेद्र नगर, पटना 800016 12 मृत्ति तिलक रामधारी सिंह दिनकर, उदयाचल प्रकाशन, राष्ट्रकवि दिनकर पथ, राजेद्र नगर, पटना 800016 13 युगपिमान 14 रगयी 15 रश्मिनोर 16 राधाविनिरर और उनसरी माहिप सापना 17 रतुरा मगर मिस त्तिमा रामधारी सिंह दिसतर, उदयापत प्रशान, राष्ट्रपपि दिनार पथ, रामेट गर पटना 800016 रामपारी सिंह दिनार प्रतापपः जापगयाम, समीयासोर वामय भागरा रामधारी गिह द्विार, यापल प्रन, राष्ट्रपि शिनगर पप, राटनगर, पटना F00016 पर रमन, रामर FTTT प्रा. मि०, 8, 47 बागर, मिली 6.पटना-6 रामधारी सिंह निरर, ग्टार पनि प्रा. FT,415ो, मागर मनी रोट, free 110001 11. दुसरानमा 59,गामी पिता 18 विगाह और तिरता 19 गिरमी मुमीरा 20 गरीएर माम मेगमाधिकार पामा शी- FREE मा मirtan, THE TrfAT S

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Urvashi Ka Samajik Sandarbh

Author
Meena Ahuja
Title
Urvashi Ka Samajik Sandarbh
File name
Urvashi Ka Samajik Sandarbh
Text
OCR done
Citation
1953
Published
2011/03
Publisher
Sharda Prakashan Driyaganj New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
74
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551010
Barcode
4990010031793.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
6XBUMLwFelQ
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