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गायत्रीमन्त्रार्थभास्कर

शर्मा, बाबूनन्दन · 2009/03

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यह पुस्तक खेमराज श्रीकृष्णदासने खेतवाड़ी ७ वी गली खम्बाटा लैन
निज "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस वम्बई में अपने लिये छापफर प्रकाशित किया।
upsamTMVP TIMRAYAL.MIRH
BAN...I VIDYAI
Pratral Litery
Art. No... _17.
volt of faccisi

गायत्री.
युक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुटा तत्त्वार्थवात्मिकाम् ।
-----
मुक्ताविद्रुमहेमनीलधवलन्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणे-
गायत्री वरदाभयांकुशकशां शुभ्रं कपालं गदा
RA
शंख चक्रमथारविंदयुगुलं हस्तैर्वहन्तीं भजे ॥१॥

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M ঔ গাহিঙ্গালাঃ शारभ्यते। गायत्रीसगुणध्यानम्। संस्कृतम् । ( १ ) मुक्ताविद्रुमहेमनीलधवलच्छायेमुलै- स्त्रीक्षणैर्युक्तासिन्दुनिवद्धरत्नमुकुटां तत्त्वार्थवर्णा- ल्लिकाम् ॥ गायत्री वरदर्भियाङ्कुशर्फशं शूलं कपाल- गुणं शङ्ख चक्रेमथारविन्दयुगुलं हस्तैर्वहन्ती- सजे ॥१॥ भाषा। मुक्ता विद्रुम (मूंगा ) सुवर्ण, नीलम और स्फटिकके छविवाले तीन तीन नेत्रवाले [पांच ] मुखोंसे युक्त, चन्द्रमासे सुशोभित रलमुकुटवाली, चौबीस अर्थ और वर्ण स्वरूप वाली, वरद अभय अंकुश कोडॉ शूलें मुण्ड पाशं शंख चक्र और दो कमलोंको (दश) हाथोंसे धारण करती हुई श्रीगायत्री देवीको मैं भजताई ॥ १ ॥ (१) देवीभागवते । स्क० १२ । अ० ३ । श्लो. १० ।

(2) गायत्रीसगुणध्यानम् । संस्कृतम् । (१) वेतवर्णा सलुबिष्टा कौशेयवसना तथा । श्वेतविलेपनैः पुप्पैरलङ्कारैश्च भूषिता ॥ १ ॥ आदित्यमण्डलस्था च ब्रह्मलोकगताथवा। अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासलगता शुभा ॥२॥ साषा। गायत्री देवी, श्वेतवर्ण, रेशमी वसको धारण किये हुए, वेत चन्दन और श्वेत पुप्पोंकी माला और सब भूषणोंसे भूपित, तथा श्वेत रुद्राक्षकी माला धारण किये हुए, पन्नासनसे स्थित, सूर्यमण्डल अथवा ब्रह्मलोकमें विराजमान हैं ॥ १॥२॥ , ( १ ) बृहद्योगियाज्ञवल्क्यसंहिता अ. ४ श्लो. २७ । २८ निर्गुणध्यानम् । (५) .... দিল । संस्कृतम् । (१) हृदयकसलमध्ये दीएवद्वेदसारं प्रणवम- यसतयं योगिभिर्ध्यानगम्यम् ॥ हरिगुरुशिश्योगं सर्वभूतस्थसेकं सकृदपि सनला वै ध्यायते यः स सुक्तः ॥१॥ भाषा। हृदयकमलमें शुद्ध दीपशिखाके ज्योतिके समान सर्व- वेदोंका सारभूत, प्रणवरूप, तर्कनारहित योगियोंके ध्यान- द्वारा जानने योग्य विष्णु, गुरु, शिवस्वरूप, सर्वभूतोंमें चैतन्यरूपमें विराजमान, अद्वितीय परब्रह्मरूप गायत्रीका मनसे जो पुरुष एक बार भी ध्यान करता है वह जीव- न्मुक्त है ॥ १॥ (१) गायत्रीहृदये।

त्रुटि। ८७ पृष्टे स्कान्दीयसूतसंहितोतमन्त्रव्याख्या विद्यारण्यवासिकृता। अन्तर्यामितया स्थितो यो देवः स नोऽस्माकं धियो वुद्धीधर्मज्ञानादिपु प्रचोदयात्प्रेरयेत् । “चु- प्रेरणे" इत्येतस्माल्लेटघाडागसः । तस्य देवस्य शेतमानस्य स्वयं प्रकाशचिद्रूपस्य सर्वप्राणि- हृदयाल्बुजमध्यवर्त्यन्तःकरणांदिसाक्षित्वेन वर्त. सानस्य सवितुः प्रेरकस्य शिवस्वरूपभूतं तत्सृष्टि- स्थितिसंहारकारणतया प्रसिद्धं वरेण्यं सर्वप्राणि- सेव्यं सगों सर्जनात्पापल्य सर्जकं सत्यज्ञानादिल- क्षणं वसायाशक्तिवशेन शिवरुद्रादिसंज्ञापन्नं सूर्य मण्डलमध्ये तत्प्रेरकत्वेनावस्थितं वाङ्मनसातीत- स्त्रीहरिवधं यत्परं ब्रह्म तद्वयं धीमहि ध्यायेम। तदे- वाहलस्मीति जानीयामित्यर्थः । “ध्यै चिन्तायाम्" इत्यत्साल्लिडि छाल्बसं रूपस्, तदुत्तमाचार्यः “ध्यै चिन्तायां स्मृतो धातुर्लिप्पन्नं धीलहीत्यतः" इति। ।

संस्कृतभूमिका। संस्कृतम् । विद्वज्जनेषु सर्ववेदसारभूतब्रह्मात्मैक्यवोधक गायत्रीमन्त्रो विदितोस्ति । तस्य सर्वकर्मादावनु- ष्ठानं तदकरणे प्रायश्चित्तं चान्यस्मिन्ननधिकारं शास्त्रेषु निर्दिष्टम् । पुनरपि यत्सर्वश्रुतिस्मृतीति- हासपुराणप्रभृतीनां संसारदुःखनिवृत्तिपूर्वकनि- त्यकैवल्यानन्दावातिप्रयोजनमस्ति तत्केवलैतन्म- त्रेण मलविक्षेपावरणनिरसनपूर्वकेण सिद्धं भवती- त्युच्यते। "यज्ञानां जपयज्ञोस्मीति" भगवद्वी- तोक्तवचनात् सर्वयज्ञेषु निर्द्धनपुरुषसुसाध्यत्वा- द्धिंसादिरहितत्वाच्च यज्ञस्याधिकत्वमः पुनः “सर्वेषां जपसूक्तानां गायत्री परमो जपः,” इति- पराशरोक्तवचनात्सर्वजपसूक्तेषु साक्षाद्ब्रह्मोपास- नात्वाद्वायत्रीजपस्य परत्वम् । पुनः ‘गारन्तं त्रायते यस्मात्पातकादुपपातकादिति' व्यासवच- (८) संस्कृतमृमिका । नात् सर्वोत्कृष्टगायत्रीजपेल सर्वमहापातकादि- सलालिहलनल्सवति । तथा "असावादित्यो ब्रह्म" "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च" 'योऽसावा- दित्ये पुरुषः सोसावहस्' इत्यादिश्रुतिभ्यस्तन्म- न्त्रार्थरूपल्य सूर्यमण्डलहत्पुण्डरीकान्तर्गतपरले- श्वरस्य चिन्तनाल्लकोपासनया विक्षेपनिरसनं भवति । तथा च तत्स्वरूपलक्ष्यभूतब्रह्मास्पैश्य- ज्ञानेनावरणक्षयो भवति । एवं त्रीणि मुक्तिध- तिवन्धकानि नश्यन्ति । ततोऽर्थधादिपुरुषार्थ- चतुष्टयसारभूतसालोक्यादिचतुष्कसारतमं पर- सानन्दलक्षणं सायुज्यकैवल्यपदं भवति । यद- विद्यावीजविललितसुशुप्त्यवस्थायाम्-अज्ञानकार्य- दिलयाद् दुःखनिवृत्त्याल्पक विषयानन्दोत्कृष्ट सकलजनानुसूतसुखास्ति । तस्मादपि कैवल्यपदे अज्ञालनिवृत्तिपूर्वकानन्दागातिरूपं ह्यत्यन्तोत्कृष्ट- तरं सुखल्भवति पर "यदेव विद्यया करोति संस्कृतमृमिका । (९) श्रद्धया तदेव वीर्यवत्तरमवति ॥” (छान्दोग्य०) "तजपस्तदर्थभावलम् ।” (योगसू०) “वेदस्या- ध्ययनं सर्व धर्मशास्त्रस्य चापि यत् । अज्ञातार्थ तु तत्सर्वं तुपाणां खण्डनं यश" ( व्यासः) "स वेदपाठमात्रेण सन्तुष्टो यो सवेद द्विजः। पाठसा- श्रावसायी तु पङ्के गौरिव सीदति ॥” योऽधीत्य विधिवद्विषो न वेदार्थ विचारयेत् । स सान्वयः शूद्रसमः पात्रतान्न प्रपद्यते” ( सनुः ) "योऽधीतेऽ- हन्यहन्येतां गायत्री वेदसातरम् । विज्ञाया) ब्रह्मचारी स याति परसाङ्गतिम् ” (कर्मपु०) "जपस्याभ्यन्तरे व्याख्या स्मर्त्तव्या मनसा द्विजैः। स्मरणात्सर्वपापानि प्रणश्यन्ति न संशयः ॥ विश्वासभक्तिजननं मन्त्रैर्यज्ज्ञानमुत्तमम् । तस्मा- दर्थ विजानीयाद्यनेन जपकृद् द्विजः" (भारद्वाजः) इत्यादिवाक्येभ्यस्तदुपासनायास्तदर्थज्ञानसाध्य- त्वात् तदर्थज्ञानस्यावश्यकत्वम् । अतस्तदधिका- (१०) संस्कृतभूमिका । A-~- रिजनोपकारार्थ मतान्तराक्षेपनिरसनपूर्वकमल- भ्यानेकश्रुति, स्मृति, पुराण, भाष्यादिनन्थेभ्यः सारभूतं प्रधानार्थं समुद्धत्य यथास्थानं संयोज्य गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः संकलितः। तस्य वहुमित्र जनसम्मतानुमोदनाय भापाटीकापि कारिता ।

Free বাসুবিঙ্কা। विद्वज्जनोंको गायत्रीमन्त्र विदित ही है जो चारों वेदोंका सार है और जो ब्रह्म और जीवात्माकी एकताका बोधक है । शास्त्रों में ऐसा लेख है कि वेदविहित सब कोंके आरम्भमें गायत्री मन्त्रका अनुष्ठान होता है, ऐसा न करनेसे प्रायश्चित्त ( पाप ) होता है और अन्य सत्कर्म करनेका अकिकार नहीं रहता है । पुनः समस्त श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराणादिका लक्ष्य यही है कि संसार- दुःखकी निवृत्ति और नित्य कैवल्यानन्दकी प्राप्ति हो, यह केवल गायत्रीमन्त्र द्वारा ही फलीभूत हो सकता है क्यों- कि गायत्री मन्त्रका आश्रय लेनेसे ही मल, विक्षेप और आवरणका नाश होता है ( यज्ञानां जपयज्ञोस्मि) यज्ञोंमें मैं जपयज्ञ हूँ, भगवान् श्रीकृष्णके इस वाक्यके अनुसार सब यज्ञोंमें हिंसा तथा द्रव्यव्ययके अभावके कारण जपयज्ञका ही महत्त्व अधिक है, पुनः “सर्वेषां जपसूक्तानां गायत्री परमो जपः सब प्रकारकेजपोंमें गायत्रीजप श्रेष्ठ है पराशरमुनिके इस वचनके अनुसार साक्षात् ब्रह्मकी उपासना होनेके कारण गायत्री मन्त्रका जप सब जपोंमें श्रेष्ठ है । पुनः “गायन्तन्त्रायते यस्मा- स्पातकादुपपातकात् इस महर्षि व्यासजीके वचनके अनुसार जो गायत्री मन्त्रका गान ( जप ) करता है उसकी रक्षा यह मन्त्र पातक (महापातक) और उपपात- " " (१२) सापासूमिका । K कसे करता है । इस वचनके अनुसार सर्वश्रेष्ठ गायत्री- जप द्वारा सब प्रकारकं महापातकादि मलोंका नाश होताहै। तथा “ अमावादित्यो ब्रह्म ( यह मूर्य जो आका- शमण्डलमें उदय होता है और अपने प्रकाशसे अन्धका. रका नाश करता है यही ब्रह्म है ) सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च" ( सर्य चर और अचर दोनों प्रका- रकी सृष्टिका आत्मा है) " योऽपावादित्य पुरुषः सोसावहम् ' ( जो पुरुप सूर्यमें है वहीं मैं हूँ ) इत्यादि श्रुतियों द्वारा यह प्रतिपादित होता है कि गाय- त्रीमन्त्रार्थ रूप जो तेजोमय पुरुष सूर्यमण्डल तथा हमारे हृदयकमलमें विराजमान है उसका चिन्तन करनेसे विक्षेपका नाश होता है। गायत्रीमन्त्रमें भी यही उपा- सना प्रतिपाद्य है । तथा उस तेजोमय पुरुपके लक्ष्यार्थ- स्वरूप अर्थात् ब्रह्मात्मैक्यका जो ज्ञान होता है उससे आवरणका क्षय होता है । इस प्रकार तीनों लोक्षके प्रति- बन्धकोंका नाश होता है इन प्रतिवन्धकोंके क्षय होनसे पुरुषार्थ चतुष्टयमें सारभूत मोक्षकी और मुक्ति चतुष्टयमें । अतिश्रेष्ठ परमानन्दरूप सायुज्य कैवल्यपदकी प्राप्ति होती है। सब लांगोंका यह साधारण अनुभव है कि अविद्या- । वीजविलसित मुपुप्ति अवस्थायें अज्ञानके कायाँक लोप होनस मर्व दुःख निवृत्ति पूर्वक विषयानन्दसे उत्कृष्ट सुख होता उससे भी अधिक कैवल्यपद प्राप्त होने पर अज्ञान- निवृत्तिपूर्वक अत्यन्त उत्कृष्ट अक्षय सुख होता है । निश्चय करके जो सत्कर्म अर्थज्ञान तथा श्रद्धापूर्वक किया जाताहै वह अधिकतर बलिष्ठ होता है (छान्दोग्य )

भाषाभूमिका ।
(१३)
कारका जप करना और उसके अर्थका चिन्तन करना"
(योगसूत्र ) "वेद तथा धर्मशास्त्रीका अध्ययन जो विना
अर्थक किया जाता है वह ऐसा है जैसे भूसी कूटना (व्यास)
जो द्विज वेदक पाठमात्रसे सन्तुष्ट रहता है उसने केवल
पाठमात्रका ही कष्ट उठाया है और वह उसी प्रकार खेद
को प्राप्त होताहै जैसे कीचड़में फँसी हुई गऊ " (मनु)
"जो विन विधिपूर्वक वेदका अध्ययन करता है परन्तु
वदक अर्थको नहीं विचारता वह वंशसहित शूटके तुल्य
है और सुपात्रताको नहीं प्राप्त होता है" (मनु) “जो
ब्रह्मचारी प्रतिदिन वेदोंका कारण इस गायत्रीले अर्थका
जानकर जप करता है वह परम गतिको प्राप्त होता है"
( कूर्मपुराण) “द्विजोंको उचित है कि जपके समय
मनमें मन्त्रार्थ चिन्तन करते हैं क्योंकि अर्थके स्मरणसे
सब पाप नष्ट होजाते हैं। मन्त्रका जो यथार्थ ज्ञान है
वही विश्वास और भक्तिको उत्पन्न करनेवाला है, इस
लिये जप करनेवाले दिनको यत्नपूर्वक अर्थ जानना
उचित है" ( भारद्वाज ) इत्यादि वाक्योंसे स्पष्ट है
कि गायत्री मंत्रके अर्थका ज्ञान भी आवश्यक है
क्योंकि संत्रके अर्थज्ञान विना उपासना साध्य नहीं है ।
इस कारण अधिकारी पुरुषोंके उपकारके लिये "गायत्री-
मन्त्रार्थ भास्कर" नामक ग्रन्थकी रचना हुई है। इस
ग्रन्थमें भिन्न भिन्न सम्प्रदायोंके मतोंका उल्लेख न करके
केवल अनेक अलभ्य श्रुति, स्मृति, पुराण, भाप्यादि-
ग्रन्थोंका सारभूत प्रधान अर्थ लेकर यथोचित स्थानमें
रखदिया गया है। इति ।
"

विषयानुक्रमणिका। विषयाकाः। पृष्ठाङ्काः १ मंगलाचरणम् १. ३ .... १० १५ .... 1... .... . १८ २१ " .... .... .... २२ .... .... २ गायत्रीमहत्त्वम् ३ गायत्रीब्रह्मैक्यम् ४ कालभेदन गायत्रीनामानि ५ गायत्रीनामार्थः ६ वर्णाशमिणां तन्मन्त्रभेदाः ७ ब्रह्मचारिगृहस्थयोः ८ वानप्रस्थादीनाम् ९ गायत्रीप्रणवसंयोगकरणे हेतुः १० गायत्रीमन्त्रः ११ गायत्रीपदच्छेदः १२ अन्वयः १३.प्रणवमहत्त्वम् १४ प्रणवस्य ब्रह्मबोधकत्वम् १५ प्रणवफलम् १६ प्रणवनामानि १७ पदार्थाः १८ मात्राभेदाः १९ मात्राभेदेष्वग्न्यादीनां व्याख्याः २० प्रकारान्तरेण मात्रार्थाः २१ व्याहृत्यर्थः २२ भूः-पदार्थः " .... २३ .... .... २५ २८ .... .... .... २९ ३२ .... .... ३८ .... ४१ विषयानुनमणिका। (१५) विषयालाः। प्रधान .... .... १८ ... .... ६० .... ... ... १६ ३ .... .... .... .... २. भुवः-पदार्थ: २४ स्थापनार्थः २५ नन्-रदायः (५ २६ लायन:--पदार्थ: २५ वरेण्य-पदार्थः २८ भगः-पदार्थः ११ २९ देवन्य-पदार्य: ३०-भीमति पदार्थः ३१ पियः-पदार्थः २२ यः--पदार्थ ३३ न:-पदार्थः ३४ प्रचोदयात्-पदार्थः ३५ बृहयोगियाझ्वलयोक्तगायत्रीचाशः ३६ भरद्वाजस्मृन्युक्तगायत्रीभाष्यम् ३.७ अगम्योक्तालोकः ३८ वृक्ष पाराशरोक्तश्लोकः ३९ सूतसंहितोक्तमंत्रार्थः ४० आमयनिर्वाणतन्त्रोक्तमंत्रायः ४१ उज्वटभाष्यम् १२ सायनमाण्यम् ४३ रावणभाष्यम् ४ ४ महीधरभाष्यम् ४५ श्रीमच्छङ्करभाष्यम् .... ८४ .... ८६ .... .... .... ८८ .... ९२ ९४ ९७ ... ... .... ९९ (१६) विषयानुक्रमणिका । विषयाङ्काः। पृष्टाङ्काः Ans ४६ विद्यारण्यस्वामिकृतमंत्रार्थः ४७ भट्टोजिदीक्षितविरचितभाप्यम् ४८ वरदराजभाष्यम् ४९ तारानायतर्कवाचस्पत्युक्तगायत्री वाक्यार्थः ५० विष्णुधर्मोत्तरोक्तमंत्रवर्णाः १०२ १०३ १०५ १०७ १०८ .... ५१ निष्कर्षः ५२ भावार्थ: ११४ ११५ .... .... .... .... ५३.गायत्रीजपमहत्त्वम् ५४ जपमंट: तत्फलन ५५ जपकाल: ५६ जपस्थानं तत्फलञ्च ६७ जरविधिः ५८ मालाविवरणम् ५९ जपसंख्या ६० जपफलम् ६१ गायत्र्यष्टकम् ६२ सूर्यप्रार्थना ग्रंथसमाप्ति... ११६ ११७ ११८ ११९ १२१ १२२ १२५ २ ॐ गायत्रीमन्त्रार्थ यास्करः। भाषाटीकासहितः। सङ्गलाचरणर। संस्कृतम् । (१) ध्यात्या ब्रह्म प्रथमसतनु प्राणसूले नदन्तं दृष्टा चान्तः प्रणवमुखरं व्याहृतीः सम्यगुरुत्वा । यत्तद्वेदे तदिति सवितुब्रह्मणोक्तं वरेण्यं तद्भ- ख्यं किमपि परमं धाम गर्न प्रपो॥१॥ भाषा। प्रथम विभु ब्रह्मको ध्यानकर, भीतर हृदयघायुके मृलस्थानमें अव्यक्त शब्दको करते हुए, आदिमें (ॐ) तर व्याहृति (भर्भुवः स्वः) को अले प्रकारसे कह (तत्) यह और ( सवितुर्वरेण्यं ) ऐसा वेदमें ब्रह्माजीसे कथित को देखकर (भगों) भर्ग नामक कोई अनिर्वचनीय तेजके शरणमें मैं प्राप्त होता हूं ॥ १॥ (१) साम्पपञ्चाशिकायाम् ।

(२) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। 15........ संस्कृतम्। (१) यन्मण्डलं व्याधिविनाशदक्षं यदृग्यजुः- साललु सम्प्रगीतम् ॥ प्रकाशितं येन च भूर्भुवः स्वः पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ २ ॥ यन्सण्डलं ज्ञानघनं त्वगम्यं त्रैलोक्यपूज्यं त्रिगुणात्मरूपम् ॥ समस्ततेजोमयदिव्यरूपं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥३॥ सारा। जो सूर्यमण्डल व्याधियोंके विनाश करनेमें समर्थ है, जो अक्, यजु और सामवेदमें सम्यक् प्रकारसे गान किया गयाहै, जिससे सूर्भुवः स्वः प्रकाशित होता है (तत्स- वितुर्वरेण्यम् ) वह सूर्यदेवका वर्णनीय तंजवाला मंडल मुझे पवित्र करै ॥ २॥ जो मण्डल निविड़ ज्ञानरूर, अगम्य, त्रैलोक्यपूज्य, त्रिगुणात्मस्वरूप और समस्त तंजीमय दिव्य स्वरूप है, वह सूर्य देवका वर्णनीय तेजवाला मण्डल मुझे पवित्र करै ॥ ३ ॥ (१) महाभारते ।

AR Ponder गायत्रीमहत्त्वम् । (३) गायत्रीमहत्वम्। संस्कृतम्। (१) गायत्री छन्दसामहम् ॥ १॥ (२) गायत्री छन्दसां सातेति ॥ २ ॥ (३) नास्ति गंगास तीर्थ न देवः केशवात्परः। गायच्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति ॥३॥ भूर्भुवः स्थरिति चैव चतुर्थिशाक्षरास्तथा । गायत्री चतुरो वेदा ओङ्कारः सर्वलेव तु ॥ ४ ॥ साषा। छन्दाम गायत्री छन्द में हूं .॥ १ ॥ गायत्री वेदोंका आदि कारण हैं ॥ २ ॥ गंगाके समान कोई तीर्थ नहीं है; केशव भगवानमे पर काई देवता नहीं है; गायत्रीसे परे कोई जप न हुआ है न होगा ॥ ३ ॥ भूर्भुवः स्वः यह तीन महाव्याहृतियां और चौबीस अक्षरवाली गायत्री चारों वेद स्वरूप है और निस्सन्देह ओंकार सर्वरूप है ॥ ४ ॥ (१) भगवद्गीता अध्याय १०॥३५॥ (२) महानारायणोपनिषदि १५॥१॥ (३) वृ० यो. याश० अ० १०।१०; २१७९; ४।१६।

(४) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम्। यथा मधु च पुष्पेभ्यो घृतं दुग्धादसात्ययः । एवं हि सर्ववेदानां गायत्री सारमुच्यते ॥ ५॥ (१) त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादम्पादमदूदुहत्। तदित्यूचोऽस्याः सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापतिः॥६॥ (२) अष्टादशसु विद्यासु सीमांसातिगरीयसी। ततोऽपि तर्कशास्त्राणि पुराणं तेभ्य एव च ॥७॥ ततोऽपि धर्मशास्त्राणि तेभ्यो गुर्वी श्रुतिर्द्विज। ततोप्युपनिषच्छ्रेष्ठा गायत्री च ततोऽधिका ॥ दुर्लभा सर्वसन्त्रेषु गायत्री प्रणवान्विता ॥८॥ भाषा। जैसे फूलोंका सार मधु, दूधका सार वृत, रसका सार दूध है इसी प्रकार सब भूतोंका सार गायत्री मंत्र कहा जाता है ॥ ५॥ परमेष्ठी प्रजापति (ब्रह्मा) ने तीन चावाली गायत्रीके तीनों चरणोंको तीनों वेदोंसे सारभूत निकालं हैं ॥ ६ ॥ अठारहों विद्यामें मीमांसा अति श्रेष्ठ है तिससे भी न्यायशास्त्र और न्यायशास्त्रसे पुराण श्रेष्ठ हैं ॥ ७ ॥ हे द्विज! तिससे भी श्रेष्ठ धर्मशास्त्र है और उससे भी श्रेष्ठ वेद हैं वेदसे श्रेष्ठ उपनिषद् तिससे भी गायत्री मंत्र श्रेष्ठ है, प्रणवयुक्त यह गायत्री सर्व मंत्रोंमें दुर्लभ है ॥ ८ ॥ (१) मनु० अ० २। श्लो. ७७॥ (२) वृ० सन्ध्यामा।

गायत्रीमहत्वम् । (५) संस्कृतम्। (१) एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायासाः परन्तपः । साकियास्तु परन्नास्ति पावनं परमं स्मृतः ॥ ९॥ पाठान्तरम--(मौनालयं विशिष्यते ) (२) तदित्युचः समो नास्ति मंत्रो वेदचतुष्टयो। सर्वे वेदाश्च यज्ञाश्च दानानि च तपांसि च ॥ समानि कलया प्रासु नयो न तदित्य॒त्रः॥ १० ॥ (३) सपा जपलूक्तानामृचाश्च यजुपां तथा। सानां चैकाक्षरादीनां गायत्री परसो जपः ॥ ११ ॥ भाषा। एकाक्षर (ॐ) परब्रह्म है, प्राणायाम परमतप है, गायत्रीसे परे कोई मंत्र परमपवित्र नहीं है । तथा सत्य वालना मौनसे श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥ चारों वेमें गायत्रीके समान काई मन्त्र नहीं है। सुनिलोग कहते हैं, कि गायत्रीके एक कलाके समान सर्वपद, सर्वयज्ञ, सर्वदान और सर्व तपस्याएं नहीं हैं ॥ १० ॥ सब जपसूक्तोंमें ऋग्यजुःसामवेदों और एकाक्षरादि मन्त्रों में गायत्री परम जप है ॥ ११ ॥ (१) मनु० अ० २।०८३। अत्रिम० अ० २१ श्लो०११॥ (२) विश्वामित्रः । (३) वृ० पाराशर स्मृ० अ० [४|४| PUNIL (६) गायत्रीमन्वार्थभास्करः। संस्कृतम् (१)साङ्गाश्च चतुरो देवानीत्यापि सवाङ्मयान्। सावित्री यो न जानाति वृथा तस्य परिश्रमः॥१२॥ (२) गायत्री चैव वेदाश्च ब्रह्मणा तोलिता पुरा। वेदेभ्यश्च सहस्त्रेभ्यो गायव्यतिगरीयसी ॥ १३॥ (३) सर्ववेदसारभूता गायत्र्यास्तु समर्चना । ब्रह्मादयोऽपि संध्यायांताध्यायन्ति जपन्ति ॥१४॥ (2) गायत्र्युपासना नित्या सर्व वेदैः समीरिता। यया विना वधःपातो ब्राह्मणस्यास्ति सर्वथा॥१५॥ भाषा। स्वर तथा अङ्ग सहित चारों वेद पढ़ने परभी जो गायत्री मन्त्रको नहीं जानता है, उसका परिश्रम निष्फल है ॥१२॥ पूर्व कालमें ब्रह्माने गायत्री और वदोंको ताला तो सहस्रों वेदोंसे भी गायत्रीका पल्ला भारी पाया ॥ १३ ॥ गायत्रीका आराधन सब वेदोंका साररूप है सन्ध्याकालमें ब्रह्मादिक भी तिसका ध्यान सहित जप करते हैं ॥ १४ ॥ सर्व वदोंमें गायत्रीकी नित्य उपासना वर्णित है, जिसके विना सर्व प्रकारसे ब्राह्मणोंकी अधोगति होतीहै ॥ १५ ॥ (१) बोगियाज्ञवल्क्य । (२) ३. पाराशर । अ० ११६॥ (३) देवी भागयने रकं० ११। अ० १६। श्लो० ॥१५॥ (४) देवी भागवते स्कन्ध १२। अ० ८1 श्लो. ९।

4 गायत्रीमहत्त्वम् । (७) ....... संस्कृतम् । (१) गायत्रीमात्रनिष्णातो द्विजो मोक्ष मवाप्नु- यात् ॥ १६॥ (२) गायत्र्याः परसं नास्ति दिवि चेह च पार- नम् । हस्तत्राणप्रदा देवी पततां नरकार्णवे ॥१७॥ (३) किं वेदै पठितैः सर्वेः सेतिहासपुराणकैः । साङ्गे सावित्रहीनेन न विप्रत्वमवाप्नुयात् ॥ १८॥ भाषा। दबल गायत्री मात्रकी उपासनासे द्विज मोक्षका माप्त होता है ॥ १६ ॥ इस लोक तथा परलोकमें पवित्र करनेवाला गायत्रीसे परे कोई मंत्र नहीं है क्योंकि नरकरुप समुद्र में गिरते हुएको यह गायत्री हाथ पकड़कर बचाती है ॥१७॥ अङ्गसहित सर्व वेद तथा इतिहास पुराणादिकोंके पढ़नेसे क्या हुआ जो गायत्रीमंत्रकी उपासनासे हीन है वह ब्राह्मणत्वको नहीं प्राप्त होता है ॥ १८ ॥ (१) दे. भा० स्कं. १२। अ० ८ दली. ९० (२) शाट्यस्म० अ० १२ दलो० २५॥ (३) वृ० पाराशर भ०५।१४॥

(८) गायत्रीमन्वार्थभास्करः। संस्कृतम् । (१) न ब्राह्मणो वेदपाठान्न शास्त्रपठनादएि। देव्यास्त्रिकालमभ्यासाब्राह्मणः स्याहिजोड- न्यथा ॥ १९॥ (२) गायत्र्यास्तु परन्नास्ति शोधनं पाप- कर्मणाम् । महाव्याहृतिसंयुक्तां प्रणवेन च संजपेत् ॥ २०॥ (३) गायत्रीं यः परित्यज चान्यमंत्रमुपासते न साफल्यसवाप्नोति कल्पकोटिशतैरपि ॥२१॥ भाषा। वेद और शास्त्रके पढ़नेसे भी ब्राह्मण नहीं हो सकता है त्रिकाल गायत्रीकी उपासनासे ब्राह्मण कहा जाता अन्यथा दिनही रहता है ॥ १९ ॥ गायत्रीकी उपासनासे परे पापकांके शोधनक लिय कोई मंत्र नहीं है अतः प्रणव तथा महाव्याहति सहित गायत्रीका जप करें ॥२०॥ गायत्रीको छोड़कर जो दूसरे मंत्रकी उपासना करता है, वह शतकोटि कल्पतक भी सफलताको प्राप्त नहीं कर सकता है ॥ २१॥ (१) वृ० सन्ध्यामाप्ये । (२) सम्वतं स्मृ० । श्लो० २१८॥ (३) ३० सन्ध्यामाप्थे ।

गायत्रीमहत्त्वम् ।
संस्कृतम् ।
एए एव मंत्रो द्विजत्रलंपादकोपनयनसंस्कारे
उपदिश्यसानो गुरुमंत्र इत्युच्यते, सूर्यवंशीया-
श्चन्द्रवंशीयाश्च सर्वे राजान इससेव संत्रं
शुचयो भूत्वा नित्यं जपन्ति स्म । यथा सहाभारते
अनुशासनपर्वणि अ० १५० श्लो० ७८ युधि-
प्टिर प्रति भीप्सवाक्यम्। सोमादित्यान्वयाः
सर्वे राघवाः कुरवस्तथा । पठन्ति शुचयो नित्यं
सावित्री परसां गतिम् ॥ श्रीरामचन्द्रकर्तृकनित्य-
सन्ध्योपासनं (गायत्रीसंत्रजपः ) तु वाल्मिकीये
बहुपु स्थलेपूपवर्णितमिति विदितमेशस्ति ॥२२॥
भाषा।
यही मंत्र द्विजत्व-संपादक-उपनयनसंस्कारमें उपदेश
किया गया गुरुमंत्र कहा जाताहै । इसी मंत्रको
सूर्यवंशी तथा चंद्रवंशी राजन्यगण पवित्र होकर नित्य जपा
करते थे जैसा कि ( महाभारतकं अनुशासन पर्वमें १५०
अध्याय ७८ वें श्लोकमें ) युधिष्ठिरकं प्रति भीष्मने कहा
है, कि सूर्य और चन्द्रवंशके सब कोई तथा रघुवंशी कुरु-
वंशी (विशेष) पवित्र होकर नित्य परमगति दायिनी
सावित्रीको जपा करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीका किया सन्ध्यो-
पासन ( गायत्रीमंत्रजप) पाल्मीकीय रामायणमें कई एक
स्थलमें वर्णित है इति ॥ २२ ॥

(१०) गायत्रीमन्त्रार्थमास्करः। संस्कृतम् । (१) नानतोयलनं दानं न चाहिंसापरं तपः । न सावित्रासमं जप्यं न व्याहृतिसमं हुतम् ॥२३॥ भाषा। अन्न और जलके समान दान, अहिंसाके समान तप, सावित्रीके समान जप और व्याहृतिसमान कोई आहुति नहीं है ॥ २३ ॥ गायत्रीनौक्यम्। संस्कृतम् । (२) ब्रह्म गायत्रीति-ब्रह्म वै गायत्री ॥१॥ (३) गायत्री परमात्मा ॥ २॥ (१) गायत्री परदेवतति गर्दिता ब्रह्मेव चिपिणी ॥३॥ भाषा। ब्रह्म ही गायत्री है ॥१॥ गायत्री परमात्मा है ॥२॥ गायत्री सबसे परे देवता और चैतन्यरूपिणी ब्रह्म ऐसा कहा गया है ॥३॥ (१) सूनसंहितायां यज्ञवैभवग्यण्डे (अ० ६ श्लो. ३० पृ० ३६९) (२) शतपथब्राह्मणे। ८1५/३१७ | ऐतरेय बा० अ० २७१ खं० ५. (३) गायत्रीतत्त्थे । श्लो. ९ । (४) गायत्री पुरश्चरणप० । gho गायत्रीब्रह्मैक्यम् । ( ११) संस्कृतम् (१)अथो वदामि गायत्री तत्त्वरूपांत्रयीमयीम्॥ यथा प्रकाश्यते ब्रह्म सच्चिदानन्दलक्षणम् ॥ ४॥ (२) असावादित्यो ब्रह्म ॥५॥ (३) सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥६॥ (2) गायत्री वा इदं सर्वम् ॥७॥ (५) गायत्री वा इदं सर्वभूतं यदिदं किञ्च॥८॥ भाषा। तत्त्वरूपिणी त्रिवेदमयी गायत्रीको मैं कहता हूँ, जिससे सच्चिदानन्द लक्षण ब्रह्म प्रकाशित होताहै, अर्थात् ब्रह्मका ज्ञान होताहै ॥४॥ यह प्रत्यक्ष सूर्यदेव ब्रह्मरूप हैं ॥ ५॥ यह सूर्य भगवान् चर अचर सृष्टिका आत्मा है ॥ ६॥ यह सब सृष्टि गायत्रीरूप है ॥ ७ ॥ यह संसार जो कुछ है वह सब गायत्रीरूप है ॥ ८ ॥ (१) गायत्रीतये । दलो १ । (२) महावाक्योपनिषदि। (३) पर्योपनिषदि । (४) मिहपूर्वतापनीयोप० ४।२।। (५) छान्दोग्योप० ३।१२।१।

(१२) गायत्रीमन्त्रार्यभास्करः। संस्कृतम् । (१) न सिन्नां प्रतिपयेत गायत्री ब्रह्मणा सह । सोहलस्मीत्युपासीत विधिना येनकेनचित् ॥ ९॥ (२) देवस्य सवितुस्तस्य धियो यो नः प्रचोदयात्। भगों वरेण्यं तद्ब्रह्म धीमहीत्यथ उच्यते ॥१०॥ सप्रमं सत्यसानन्दं हृदये सण्डलेपि च । ध्यायअपेत्तदित्येतानिष्कामो मुच्यतेऽचिरात् ॥११॥ (सयश्चायं पुरुषो यश्चासावादित्ये स एकः,इतिश्रुतेः) भाषा। गायत्री और ब्रह्ममें भंद नहीं है, चाह जिस किसी प्रकारसे हो ( वह ) में हैं. यह उपासना करै ॥ ९ ॥ उस प्रकाशमान सविताका वर्णन करने योग्य तंज जो हमारी बुद्रिकी प्रेरणा करता है वह ब्रह्म है उसका में ध्यान करता हूँ ऐसा कथन है ॥ १० ॥ प्रकाशसहित सत्यानन्द स्वरूप ब्रह्मको हृदयमें वा सूर्य- मण्डलमें ध्यान करता हुआ निष्काम गायत्रीका जप करे तो शीघ्र भवबन्धनसे छूट जाताहै ॥ ११ ॥ (सर्व भूताके हृदयमें जो आत्मरूप पुरुप है और जो सूर्यमण्डलमें परमात्मरूप पुरुप है वे दोनों एकरूप हैं) (१) व्यासः । (२) विश्वामित्रः ।

गायत्रीब्रह्मण्यम् । (१३) संस्कृतम् । (१) गास्यास्यं ब्रह्म गायत्र्यनुगतं गायत्री- सुखेनोक्तम् ॥ १२ ॥ (२) गायत्री प्रत्यब्रह्मैक्वांधिका ॥ १३॥ (३) प्रणयव्याहृतिभ्याश्च गायच्या तृतयेन च। उपास्यं परमं ब्रह्म आत्मा यत्र प्रतिष्ठितः॥१४॥ (४) परब्रह्मस्वरूपा च निर्वाणपदायिनी ॥ ब्रह्मतजोमयी शक्तिस्तदधिष्टातृदेवता ॥ १५ ॥ भाषा। गायत्री नामक ब्रह्म गायत्री में व्यापक गायत्री नामसं वर्णित है ।। १२ ॥ गायत्री जीवात्मा और ब्रह्मकी एकताका बाधक है।। १३॥ प्रणव व्याहति और गायत्री इन तीनोंद्वारा परब्रम उपासना करने योग्य है जिस ब्रह्ममें आत्मा स्थित है॥१४॥ ब्रह्मरूपा गायत्री मोक्षपद देनेवाली है और ब्रह्मतेजमयी शक्ति है वह गायत्री मन्त्रकी अधिष्ठात्री देवता है।।१५॥ (१) छान्दोग्य ० शंकरभाष्ये प्र० ३ ० १२ मं० ५ ॥ (२) दशहरमाये । (३) तारानाथकृतगा० व्या० पृ. २५ । (४) देवीभाग० स्कं. ९ अ० १ श्लोक ४२।

(१४) गायत्रीमन्त्राभास्करः। संस्कृतम् । (१) ओङ्कारस्तत्परब्रह्म सावित्रीस्यात्तदक्षरम्१६ (२) गायत्री तु परं तत्त्वं परं तत्त्वं गायत्री परमा गतिः ॥ १७॥ (३) गायव्येव परो विष्णुर्गायत्र्येव परः शिवः॥ गायत्येव परो ब्रह्मा गायत्येव त्रयी यतः ॥ १८॥ (४) सर्वात्मना हि सा देवी सर्वभूतेषु संस्थिता। गायत्री मोक्षहेतु मोक्षस्थानमलक्षणम् ॥ १९॥ आषा। आङ्कार परब्रह्मरूप है और गायत्री भी नाश रहित ब्रह्म है ॥ १६ ॥ गायत्री परमतत्व और परम गति है,। १७ ।। गायत्री ही दूसरा विष्णु, दूसरा शिव और दूसरा ब्रह्मा क्योंकि गायत्री तीनों देवोंका स्वरूप है ॥ १८ ॥ वही गायत्री देवी सर्वात्मरूपसे सर्व भूतोंमें स्थित है और गायत्रीही मोक्षका कारण तथा अरूप मुक्तिका स्थान है ॥ १९॥ chci (१) कुर्मपुराणे उ. विभा० अ० १४। इलो० ५५॥ (२) बहत्वाराशर सं० अ० ५। दलो. ४॥ (३) बृहन्मन्ध्यामाप्ये । (४) पिशङ्गः।

गायत्रीनामानि । (१५) कालभेदेन गायन्या नामानि। संस्कृतम् । (१) गायत्री नाम पूर्वा सावित्री सध्यसे दिन। सरस्वती च सायाहे सैव सन्ध्या त्रिपु स्मृता ॥१॥ आषा। प्रातःकालमें गायत्री, मध्याह्नमें सावित्री तथा सायङ्कालमें सरस्वती नाम है वही गायत्री तीनों सन्ध्यामें वर्णित है॥ १॥ गायत्रीनामार्थः। संस्कृतम् । (२) तद्यद्गयात्रायते तस्माद्गायत्री ॥१॥ (३) गायत्री गायतेः स्तुतिकर्मण इति ॥ २॥ भाषा। गायत्री जिस कारणसे प्राणोंकी रक्षा करती है तिस कारणसे उसका गायत्री नाम है ॥ १॥ गान और स्तुतिकर्ममें गायत्री नाम है ॥ २ ॥ (१) व्यासः । (२) बृहदारण्यक० ५।१४|४|| (३) निरुक्ती नेघण्टुके काण्डे । १ अ० ३ पा० ३ ख. ।

(१६) गायत्रीमन्वार्थभास्करः । Mush. संस्कृतम् । (१) प्रतिग्रहान्नदोषाच्च पातकादुपपातकात् ।। गायत्री प्रोच्यते तस्माद्गायन्तं त्रायते यतः॥३॥ (२) सवितृद्योतनासैव सावित्री परिकीर्तिता। जगतः प्रसवितृत्वात् वाग्रूपत्वात्सरस्वती ॥ ४॥ (३) गायच्छिप्यान् यतस्त्रायेत्कायं प्राणांस्तथैव च । ततः स्मृतेयं गायत्री सावित्रीयं ततो यतः ॥ प्रकाशनात्सा सवितुररूपत्वात्सरस्वती ॥५॥ भाषा जिस कारणसे जप करनेवालेकी प्रतिग्रह, अन्नदोप, पातक और उपपातकोस रक्षा करती है तिस कारणसे गायत्री कही जाती है ॥ ३ ॥ प्रकाशकरनेस और जगत्के उत्पन्न करनेके कारण उसी गायत्रीको नाम सावित्री हुआ और वाणीरूप हानसे सरस्वती हुआ ॥ ४ ॥ जिसकारण जप करनेवालेके शरीर और प्राणकी रक्षा करती है तिसकारण गायत्री नाम है प्रकाश हानसे सावित्री और वागरूप होनेसे सरस्वती नाम है ॥ ५ ॥ (१) व्यासः --याज्ञवल्क्यः । (२) व्यासः । (३) अग्निपुराणे अ० २१६ । श्लो. १-२।

वर्णाश्रमिणां गायत्रीमंत्रभेदः । (१७) संस्कृतम् । १) प्राणा गया इति प्रोक्ता त्रायते तानथापि वा। (२.) गयान् प्राणान् त्रायते सा गायत्री ॥६॥ (३) चतुर्विशत्यक्षराणां सत्त्वेन गायत्री छन्दस्क- तयापीयं गायत्रीत्यभिधीयते ॥७॥ भाषा। प्राणका नाम गय है तिस प्राणकी रक्षा करनेके कारण गायत्री नाम हुआ ॥ जो 'गय' अर्थात्-प्राणोंकी रक्षा करती है वह गायत्री है ॥ ६ ॥ चौबीस अक्षरोंसे निर्मित होनेके कारण तथा गायत्री छन्द होनेके कारण गायत्री नाम है ॥ ७ ॥ वर्णाश्रमिणां तन्मन्त्रभेदमाह । संस्कृतम् । (४) ओङ्कारव्याहृतिपूर्वां गायत्रीं ब्राह्मणो जपेत् । त्रिष्टुभश्चैव राजन्यो जगतीं वैश्य एव च ॥ १॥ भाषा। ओङ्कार और तीनों व्याहृति सहित गायत्री मंत्रको ब्राह्मण जपे । त्रिष्टुप्छन्दवाला मंत्र क्षत्रिय और जगती छन्दवाला मंत्र वैश्य जपै ॥ १॥ (१) भरद्वाजः । (२) ऐतरेयत्रा। (३) तारानाथ गा. व्या० । पृ० १६ पं० १५ । (४) अपरार्के शाखान्तरे मन्त्रनिरूपणखण्डे ।

( १८) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । यद्वा सर्वेऽपि गायत्री लायो ब्रह्मसंज्ञिताम् । बिड् वैष्णवी नृपो रौद्री सवे वा ब्रह्मसंज्ञिताम्॥२॥ भाषा। अथवा तीनों वर्ण गायत्रीछन्दवाला मंत्र जपें । तिनमें आदिवर्ण ब्राह्मण ब्रह्मगायत्री जपै । वैश्य विष्णुगायत्री, क्षत्रिय रुद्रगायत्री अथवा तीनों वर्ण ब्रह्मगायत्री जपैं ॥२॥ ब्रह्मचारिगृहस्थयोः- संस्कृतम् । (१)ओङ्कारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः। त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो सुखम् ॥ १॥ (२) जपेत्प्रणवपूर्वाभिर्व्याहृतिभिः सदैव तु । तितृभिर्भूःप्रभृतिभिर्गायत्री ब्रह्मरूपिणीम् ॥२॥ भाषा। ओंकार पूर्वक तीनों अव्यय व्याहृतियों सहित त्रिपदा गायत्री ब्रह्ममुख जानने योग्य है ।। १ । प्रणव पूर्वक तीनों व्याहृतियों (भूः भुवः स्वः) सहित ब्रह्मरूपिणी गायत्रीको सदैव जपै ॥ २ ॥ (१) मनु० [अ०२ दलो ८१ । (२) लघ्याश्यलायन । म १ श्लोक ४५-४६ ।

ब्रह्मचारिगृहस्थयोर्मत्रभेदः। (१९) संस्कृतम् । (१) ओङ्कारमादितः कृत्वा व्याहृतीस्तदनन्तरम्। तलोऽधीयीत सावित्रीमेकानः श्रद्धयान्वितः॥३॥ (२) ओमित्येकाक्षरं ब्रह्मेत्येतदात्मायसुच्यते । गायत्र्यास्तत्पठित्वादी जपकर्म समाचरेत् ॥ ४॥ (३) प्रणवव्याहृतियुतां गायत्रीं वै जपेत्ततः । (१) तत्रैकप्रणवा कार्या गृहस्थैर्जएकर्मणि ॥५॥ भाषा। श्रद्धायुक्त एकाग्र चित्तसे आदिमें ओङ्कार, तदनन्तर महाव्याहृति, तत्पश्चात् गायत्री ( सावित्री ) मन्त्रका जप करै ॥ ३॥ ॐ एकाक्षर ब्रह्म है और इसीको आत्मा कहते हैं इसीको गायत्रीके आदिमें कहकर जपै ॥ ४ ॥ इसके अनन्तर प्रणव व्याहृति युक्त गायत्रीको जपै जपकर्ममें एक प्रणवयुक्त गायत्री गृहस्थको जप करना उचित है ।। ५॥ (१) कूर्म पु० उ० भा० अ० १४ श्लो० ५२ ॥ (२) शौनकः । (३) व्यासः ।। (४) वशिष्ठः।

(२०) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । संस्कृतम्। (१) गृहस्थवत्तु जप्तव्या सदैव ब्रह्मचारिभिः॥६॥ (२) गृहस्थो ब्रह्मचारी च प्रणवाद्यामिमांजपेत् । अन्ते यः प्रणवकुन्निासौ वृद्धिमवाप्नुयात् ॥७॥ (३)ओङ्कारोव्याहृतीस्तिस्रः प्रथम संप्रयोजयेत् । ओङ्कारायास्थिरावृत्य वेदस्यारम्भणे तथा ॥ ८॥ प्रणवाद्या तु विज्ञेया जपे व्याहृतिभिः सह । प्रणवठ्यातिभिः साई स्वाहान्त होमकर्मणि।।९॥ भाषा। ब्रह्मचारियोंको भी गृहस्थोंकी भांति गायत्री सदैव जपना चाहिये ॥६॥ गृहस्थ और ब्रह्मचारी प्रणवको आदिमें कहके गायत्री जपै जो अन्तमें प्रणयकी योजना करके जपते हैं वे वृद्धिको नहीं प्राप्त होतेहैं ॥ ७ ॥ ओङ्कार और तीनों व्याहृतियोंकी प्रथम योजना करै । तथा वेदके आरम्भमें ओङ्कारयुक्त गायत्री तीन वार जप ॥ ८॥ जपमें प्रणवादि व्याहृतियों सहित गायत्री जानना चाहिये । होम कर्ममें स्वाहाके अन्ततक प्रणव और ब्याहति सहित जपना चाहिये ॥ ९॥ (१) स्मृतिचन्द्रिकायाम् | (२) यो. याश० अ० ४।२६ । ३) यो० वाज० अ० ४।३८,३९,४०, वानप्रस्थादीनां मंत्रभदः । (२१) वानप्रस्थादीनाए। संस्कृतम् । (१) ओङ्कारं पूर्वमुच्चार्य सूर्भुवः स्वस्तथैव च । गायत्री प्रणवश्चान्ते जो ह्येश्सुबाहृतः ।। ? मारा। पहिलं ओङ्कारका उच्चारण करकं फिर भूर्भुवः स्वः अनन्तर विपदा गायत्री और अन्तमें आङ्कार सहित गायत्रीका जप कहा गया है ॥ १ ॥ गायत्रीप्रणवसंयोगकरणे हेतुः । संस्कृतम् । (२) गायत्री प्रकृतिज्ञेया ओङ्कारः पुरुषः स्मृतः ताभ्यासुभयसंयोगाजगत्सर्व प्रवर्त्तते ॥ १ ॥ भापा। गायत्रीको प्रकृति जानना चाहिये, ओङ्कार पुरुष कहा गया है, इन दोनोंके संयोगसे सब जगत् होताहे ॥ १ ॥ (१) वृ० यो० याज्ञः । (२) बृहद्योगियाजव०। अ० ४।१७।

HINA NAAMRA. (२२) गायत्रीमन्वार्थभास्करः । (अ)गायत्रीमन्त्रः। संस्कृतम् । (१) ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भयों देवश्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ १॥ पदच्छेदः। ॐ भूः। भुवः। स्वः। तत् । सवितुः। वरेण्यम् । अर्गः। देवस्य । धीमहि । धियः । यः । नः । प्रचोदयात् ॥ १॥ अन्वयः। सवितुः देवस्य यद्वरेण्यं भर्गः नः धियः प्रचो- दयात् (प्रेरयति ) तत् धीमहि । कीरशं तत्, सूः सुवः स्वः । पुनः कीदृशम्, ओम् ॥ १ ॥ अथवा-सवितुः देवस्य यद्वरेण्यं भर्गः धीमहि, तत् नः धियः प्रचोदयात् (प्रेरयेत् ) कीदृशं तत्, भूर्भुवः स्वः। पुनः कीदृशम्, ओम् ॥२॥ (अ) मंत्रामननात् (निरु दै० . ० ३ पा० ६ ग्य. ) मननात्तस्वरूपस्य मितदेवस्य ते नमः । त्रायते सर्वभरतस्तस्मान्मंत्र इसीरिनः ॥ (कलार्णवतन्त्र १७११ आर्यसम्प्रदायप्रदर्शकगायत्रीमाण्य पृ. २४) (१) ऋ० वे अष्ट० ३ अ० ४५०१०म०३२०१० ६२मन्त्र१०; शुक्लयजुर्वेद अ. ३ | मं० २५ ! कृष्णयजुर्वेद कां० १ अ.प्र.५ । अनु० ६ ! सामवंद उत्त, अ०१३ यं. ४.६ अ०३सू०९ऋ.१ ।

"24 न प्रणवमहन्म। (२३) यत्रा-यः (लविता)नः धियः प्रचोदयात् (प्रेरयति) तत्, तस्य लश्ःि ददरय बरेपर भर्मः धीमहि, तस्मादशम्-भूर्भुवः स्वः, पुनः कीदृशम ओम्।।३।। इति (याज्ञवल्क्यभारद्वाजागस्त्यकृतशाप्यानसारण पायोजना कृता) प्रणवमहत्व। संस्कृतम्। (१) ओङ्कारस्तु परंबा गायत्री स्यातदक्षरम् । एवं सन्त्रो महायोगः साक्षात्कार उदाहतः॥१॥ (२) अकारं चाप्युकारं च सकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयान्निरदुहद् भूर्भुवः स्वरितीति च ॥२॥ भाषा। आंकार परब्रह्म है और गायत्री उसका अक्षर है इसप्रकार यह मन्त्र महायांग और साक्षात् सार कहा गया है ॥ १॥ अकार उकार मकार और भूर्भुवः स्वः को ब्रह्मान तीनों वदास साररूप प्रकट किया है ॥ २ ॥ (१) आँगनमम्मृता ।। ३ । (२) मनु । अ० २।७६ ।

(२४) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । ..." ".... ........ संस्कृतम् । (१) सारभूताश्च वेदानां गुह्योपनिषदः स्मृताः । ताभ्यस्सारंतु गायत्री गायल्या व्याहृतित्रयम् ॥३॥ व्याहृतिभ्यस्तथोङ्कारस्त्रिब्रह्म स उच्यते त्रिवृब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ४॥ ओङ्कारः परमं ब्रह्म सर्वमन्त्रेषु नायकः । प्रजापतेर्मुखोत्पन्नः तपःसिद्धस्य वै पुरा ॥५॥ भाषा। वेदांका सार गुह्य उपनिषद् कहे गये हैं तिनका सार गायत्री, गायत्रीका सार तीनों व्याहृति हैं ॥ ३ ॥ तीनों व्याहतियोंका सार ओंकार कहा गया है, ओंकारको त्रिमात्र ब्रह्म कहते हैं, त्रिमात्र ब्रह्ममें जो मम रहताहै वह परब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ ओंकार परब्रह्म है और सब मन्त्रोंमें श्रेष्ठ है, आदिमें तपसे सिद्ध हुए ब्रह्माके मुखसे प्रकट हुआ है ॥५॥ (१) वृ० यो० याज्ञ० अ० ४।७८-७९ अ० २।२-३ ।

प्रणवस्य ब्रह्मबोधकत्वम् । (२५) प्रणरस्य ब्रह्मदोषकत्वम् । संस्कृतम् । (१) ओमिति ब्रह्म ॥१॥ ल ओमित्येतदक्षरमपश्यविवर्णं चतुर्मात्रम् सर्वव्यापि सर्वविश्वयातयास ब्रह्म ॥ २ ॥ (२) हंसप्रणवयोरसेद इति ॥३॥ (३) प्रणवहंसः परब्रह्मेति ॥ ४॥ (४) परश्चापरश्च ब्रह्म यदोङ्कारः ॥ ५॥ (५) ओङ्कार एवेद सर्वस् ॥ ६ ॥ भाषा। ओंकार ब्रह्म है ॥ १॥ ब्रह्माने ओम् इस अक्षरको देखा जो दो वर्ण और चार मात्रावाला सर्वव्यापी नाशरहित ब्रह्म है ॥ २॥ हंस (परमात्मा) और प्रणव (ॐ ) में भेद नहीं है ॥३॥ प्रणव और हंस ये दोनों परब्रह्म हैं ॥ ४ ॥ ओंकार निर्गुण और सगुण ब्रह्म है ॥ ५ ॥ यह सर्व सृष्टि ओंकाररूप ही है ॥ ६ ॥ (१) तत्तिरीयोप। अ० ११८-गोपथब्राह्मण पूर्वभा०प्र० १ बा.१६ (२) पाशुपतत्रह्मोप (३) परब्रह्मोप० (४) प्रश्न० ५।२ (५) छान्दो० २।२३।३ " (२६) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । संस्कृतम् । (१) भूतम्भवद्भविष्यति सर्वमोङ्कार एव यच्चा- न्यस्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एवं सोऽयमात्माऽध्य- क्षरमोंकारोऽधिमात्रम् । ओमित्येतदक्षरमिद सर्वम् ॥ ७॥ (२) यदसूत तत्सत्यं तद्ब्रह्म यद्ब्रह्म तज्ज्यो- तिर्यज्ज्योतिः स आदित्यः स वा एक ओमित्येत- दात्माप्यसवत् ॥८॥ (३) ओं तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्कृतः॥९॥ आषा। भूत, वर्तमान और भविष्य सब ओंकाररूप है । तथा जो कुछ तीनों कालस परे है निश्चय करके सो भी ओंकार रूप है वह ओंकार यह आत्मा है-५ अध्यक्षर नाशरहित तथा अधिमात्रा यह सर्व सृष्टि ओंकाररूप है ॥ ७ ॥ जो रूपरहित है वह सत्य है वही ब्रह्मा है, जो ब्रह्म है वह प्रकाशस्वरूप है, जो प्रकाशस्वरूप है वह सूर्य है, वही सूर्य ॐकार है वही आत्मा है । ८ ॥ ॐतत्सत् यह ब्रह्मका तीन प्रकारका नाम कहा गया है । (१) माण्डक्य | श्रु० १८१ (२) मव्युपनिषदि ० ६।३। (३) भगवदगीतायाम् । अ० १७/२३ ।

- प्रणवस्य ब्रह्मवोधकत्वम् । (२७) संस्कृतम् । (१) तस्य (ईश्वरस्य) वाचकः प्रणवः ॥१०॥ (२) त्रिमात्रार्द्धपरं ब्रहमानाक्षरविवर्जितम॥ अचिन्त्यसव्ययं सूक्ष्म निष्कल परमं पदम् ॥११॥ वाच्यः स ईश्वरः प्रोक्तो वाचकः प्रणवः स्वृतः ।। वाचकपि च विज्ञाते वाच्य एव प्रसीदति ॥१२॥ भाषा। तिस ईश्वरका वाचक (बोधक) प्रणव है ॥ १० ॥ तीनमावासे परे जो अंईमात्रा है वह परब्रह्मरूप है, जो मावा और अक्षरसे रहित, अचिन्त्य,अव्यय, सूक्ष्म, निष्कल ( कलारहित ) और परमपद है ॥ ११ ॥ वाच्य ईश्वर है औरवाचक प्रणव कहा गया है। वाचक(प्रणव) का विशेषज्ञान होनेपर वाच्य (ईश्वर) प्रसन्न होता है ॥१२॥ प्रणवफलस् । संस्कृतम् । (३) ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १॥ भाषा। इस एकाक्षर ब्रह्मका जप और मेरा स्मरण करता हुआ जो शरीरको छोड़ता है वह परमपदको प्राप्त होता है ॥ १ ॥ (१) पातंजलयोगसूत्राणि । १ पा० २७ सू०। (२) वृ० यो० याश० अ०.२।४४ । (३) गीतायाम् ८११३ ।

(२८) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । संस्कृतम्। (१) यदोङ्कारमकृत्या किञ्चिदारभ्यते तद्व- ब्रीमति । तस्माद्वभयाद्रीतमोंकारं पूर्वमारभे- दिति ॥२॥ भाषा। ओंकारका उच्चारण न करके जो कुछ ( श्रीतादि ) कार्य आरम्भ किया जाता है वह वन्नवत् होजाता है अर्थात् निष्फल होजाता है। सिकारण वनके भयसे डर ॐकारके उच्चारण पूर्वक कार्यको आरम्भ करै ॥२॥ प्रणवनामानि। संस्कृतम्। (२) ओङ्कारं प्रणवञ्चैव सर्वव्यापिनमेर च। अनन्तं च तथा तारं शुक्लं वैद्युतमेव च ॥ हंस तुर्य परब्रह्म इति नामानि जानत ॥१॥ साषा। ओंकार, प्रणव, सर्वव्यापी, अनन्त, तार, शुक्ल, वैद्युत, हंस, तुर्य, परब्रह्म इन ओङ्कार नामोंको जानो ॥ १ ॥ (१) छान्दोग्यपरि० । (२) वृ० यो० वाश० अ० । २।११६-११७ ।

पदार्थाः-ओ३म्। । २९) पदार्थाः-ओश्म। संस्कृतम् । (१) आप्लर्धातुरवतिमप्येके रूपसामान्यादर्थ- सामान्यन्नेदीयस्तस्मादापेरोङ्कारः सर्वमाप्नोती- त्यर्थः ॥१॥ (.२) अव-रक्षाप्रकाशपालनहिंसावृद्धयादिषु अवति चतुर्दशभुवनानीत्योम् ॥२॥ भाषा। आप्ल व्याप्ती अवरक्षणे इन दोनों धातुओंका रूप सामान्य कथन किया है इससे अर्थ सामान्य है तिससे आप्ल धातुसे ॐकार सर्वव्यापी है ॥ १॥ अव-धातु, रक्षा-प्रकाश-पालन हिंसा-वृद्धि आदि अर्थमें है। चतुर्दश भुवनके रक्षा करनेके कारण अंकार नाम हुआ ॥२॥ (१) गोषथवा० पू० भा. प्र. १ वा. २६ । (२) विष्णुस० भा० [शब्दकल्पद्रुमकोशे च ] (३०) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । संस्कृतम् । (१) अवति संसारसागरादिति ओ३म् । अवतेष्टिलोपश्चेत्यौणादिकसूत्रेण मन्प्रत्ययः । मन्प्रत्ययस्य टिलोपः। ज्वरत्वरेत्यादिनोठ्, ततो गुणः ततः श्लिष्टोच्चारणमिति प्रक्रियया ओ३म्, इति निष्पन्नम् ॥३॥ (२)प्र-गु-स्तुती,प्रकर्षेण नूयतेस्तूयतें आत्मा स्वेष्टदेवता अनेनेति प्रणवः ॥४॥ भाषा। संसारसागरसे रक्षा करता है इससे ॐ नाम हुआ.। अब धातुसे “अवनेष्टिलोपश्च"- इस उणादि सूत्रसे मन् प्रत्यय होने पर और मन्प्रत्ययके टिलोप करने पर (ज्वरत्वर०) इत्यादि सूत्रसे ऊठ करनेसे तदनन्तर गुण करने पर मिला- करके उच्चारण करनेसे ॐ नाम सिद्ध हुआ ॥ ३ ॥ प्र-उपसर्ग पूर्वक 'गु' धातु स्तुति अर्थमें है। अच्छी तरहसे स्तुति कीजाय आत्मा स्वेष्टं देवताकी जिस- करके वह प्रणव है ॥ ४॥ (१) बृहत्सं० भा०। (२) विष्णु स० भा०।

पदार्थाः ओ३म् । (३१) संस्कृतम् । (१) अकारश्चाप्युकारश्च सकारश्चाक्षरत्रयम्॥ ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रिदेवत्य उदाहृतः॥५॥ (२) प्रणवो हि परन्तत्त्वं निवेदं त्रिगुणा- सकम् ॥ त्रिवेदत्वं त्रिधामं च त्रिपक्षं विश्वास्थि- तम् ॥६॥ विमानं च त्रिकालं च त्रिलिङ्गं कवयो विदुः ॥ सर्वसेतत्रिरूपेण व्याप्तं तु प्रणवेन तु ॥७॥ भाषा। अकार, उकार, मकार यह तीनों अक्षर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र त्रिदेवता कहे गये हैं ॥ ५॥ निश्चय करके प्रणव परमतत्त्व तीन वेद और तीन गुण रूप है। तथा तीन धाम तीन प्रज्ञा तीन अवस्था रूप है ॥६॥ तीन प्रमाण तीन काल और तीन रूप कवि लोग जानसे हैं। यह सर्व सृष्टि विराट् हिरण्यगर्भ ईश्वररूप प्रणवसे परिपूर्ण है ॥ ७॥ (१) बृ० यो० याज्ञवल्क्य० । अ० २।१९-२० । (२) बृ० पाराशर सं० (षट्कर्माणि स्वरूपवर्णनम् ) अ० ४। श्लो०१०-११ ।

(३२) गायत्रीमन्त्रार्थमास्करः । म३ मात्राभेदाः। (१) अ१ उ२ अर्द्धमात्रा ४ कृष्णा कपिला शुद्धस्फटिकसनिभा ऋकू यजुः साम अथर्वणः भूः भुवः स्वः महान्याहृतयः गायत्र्यम् त्रिष्टुभम् जागतम् अनुष्टुभम् भूमिलोकः अंतरिक्षलोकः मुरलोकः परलोकः आमिः वायुः आदित्यः सर्वदैवत्या रजः सत्त्वम् तमः निर्गुणः ब्रह्मा विष्णुः शिवः निराकारः विराट् हिरण्यगर्भः ईश्वरः ब्रह्म विश्वः तैजसः प्राज्ञः कूटस्थः बहिःप्रज्ञः अन्तःप्रज्ञः घनप्रज्ञः विप्रज्ञरहितः स्थूलशरीरम् सूक्ष्मशरीरम् कारणशरीरम् अशरीरम जाग्रत् स्वनः मुषुप्तिः तुरीया मनआदि १४ अन्तः करणं चित्तम् करणरहितम् वाचमध्या प्राणमध्या० मनअध्या. ज्योतिरध्यात्मम् स्थूलभुक् सूक्ष्मसुक् आनन्दभुक् भोगरहितः ब्रह्मचर्यः गृहस्थः वानप्रस्थः संन्यासः धर्मः अर्थः कामः मोक्षः ब्रह्मलोक- विष्णुलोक- शिवलोक- अनामयपद- प्राप्तिः प्राप्तिः प्राप्तिः प्राप्तिः (१) गोपथना० ब्रह्मविद्योप०. अथर्वशिखोप. य. योयाज्ञ० ० पाराशर, गायत्रीनिवाणशिवरहस्य।

M d मात्रामदेवग्न्यादीनां व्याख्याः। (३३) मात्रायेदेवत्यादीनां व्याख्याः । संस्कृतम्। अग्निः अञ्चुगंतिपूजनयोः-गानेन्द्रयोऽर्थः ज्ञानं गसतं प्राप्तिश्चेति-पूजनं सत्कारः अय॑ते वा सोयमग्निः॥१॥ · वायुः या गतिगन्धनयोः - बन्धन हितनम, वाति लोऽयं शयुः चराचरं जगद्धारयति वास । अञ्चति वायुः॥२॥ आदित्यः दोऽवखण्डन-अवखण्डनं विनाशः । इति नश्यतीति व्युत्पत्त्या दित्यः न दित्यः अदि. त्यः अदित्य एशदित्यः ॥३॥ भाषा। ( अनिः) 'अञ्चु' धातु गति पूजन अर्थमें है, और गतिके ज्ञान, गमन, प्राप्ति ये तीन अर्थ हैं, पूजन सत्कार है। सर्वत्र जो व्याप्त है अथवा सबसे पूजित है वह अनि है ।। १ ।। (वायुः) 'वा' धातु गति गन्धन अर्थमें है, गन्धन कहते हैं हिंसनको, चलै जो अथवा चराचर जगत्को प्राणरूपसे धारण करै वह वायु है। वायु परमेश्वर है ॥ २ ॥ ( आदित्यः ) 'दो' धातु 'अवखण्डन' अर्थमें है । अब खण्डन विनाशको कहते हैं। जो नाश हो वह दित्य है और जिसका नाश न हो वह अदित्य है और वही आदित्य है ।।३

(३४) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः।
संस्कृतम् ।
ब्रह्मा=वृह वृहि वृद्धौ, बृहयति वर्द्धयति जगत्
इति ब्रह्मा ॥ ४ ॥
विष्णु-विष्ल व्याप्ती, वेवेष्टि व्याप्नोति चराचरं
जगत् स विष्णुः ॥ ५॥
शिवः शीशयने-शेते चराचरं जगदस्मिन्
स शिवः ॥६॥
निराकारः नास्त्याकारो यस्य स निराकारः।७।
विराट्="राजु दीप्तौ”-विविधं चराचरं जगत्
राजते प्रकाशते स विराट् ॥८॥
मापा।
(ब्रह्मा ) 'बृह' 'बृहि' का अर्थ वृद्धि हैं जो संसारको
बढावे उसे ब्रह्मा कहते हैं । और स्वयं बृहत् और परिपूर्ण
हो उसे भी ब्रह्मा कहते हैं ॥४॥
(विष्णुः) 'विष्ल' धातुका अर्थ व्याप्त है जो चराचर
जगत्में व्याप्त हो वह विष्णु है ॥ ५ ॥
(शिवः) 'शी' धातुका शयन अर्थ होता है, चराचर
जगत् जिसमें सोवै उसे शिव कहते हैं ॥ ६ ॥
(निराकारः)जिसका स्वरूप नहीं है वह निराकार है॥७॥
विराट् ) राजू धातु प्रकाश अर्थमें है जो नानाप्रकारके
वराचर जगत्को प्रकाशित करै वह विराट् है ॥ ८ ॥

मात्राभेदेवरन्यादीनां व्याख्याः। (३५)
संस्कृतम् ।
हिरण्यगर्भः हिरण्यं तेजलो नास, हिरण्यानि
सूर्यादीनि तेजांसि गर्भे यस्य ल हिरण्यगर्भः-वा
हिरण्यानां सूर्यादीनां तेजसा गर्भः हिरण्यगर्भः
( ज्योति हिरण्यम्-शतपथना० )-हिरण्यगर्भः
समवर्तताने भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्
( यजुर्वेद)॥९॥
ईश्वरः ईश ऐश्वर्य,-ईष्टे ऐश्वर्यं करोति असौ
ईश्वरः सर्वैश्वर्यवानिति ॥ १०॥
भाषा।
(हिरण्यगर्भः) हिरण्य तेजका नाम है। प्रकाशरूप
सूर्यादि तेज जिसमें व्याप्त है वह हिरण्यगर्भ है । अर्थवा
सूर्यादिक तेजोंका उत्पत्तिस्थान हिरण्यगर्भ है। ज्योति ही
निश्चय करके हिरण्य है ऐसा शतपथ ब्राह्मणका वचन है ।
हिरण्यगर्भ प्रथम हुआ जिससे भूतोंकी उत्पत्ति हुई । वही
एक पति था, यह यजुर्वेदका वचन है ॥ ९ ॥
(ईश्वरः) ईश' धातु ऐश्वर्य अर्थमें है। जो अपने ऐश्वर्यसे
सयका पालन करे वह ईश्वर है, अथवा जो सर्व ऐश्वर्याला
है॥ १०॥

(३६)
गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः।
संस्कृतम् ।
विश्वः विश प्रवेशने-विशन्ति सर्वाणि भूतानि
आकाशादीनि यस्मिन् स विश्वः (वा) विशति
व्यष्टि स्थूलशरीरं प्राप्नोतीति विश्वः ॥ ११ ॥
तैजस तिज निशाने, निशानं सूक्ष्माकरणम्,
तेजसि सूक्ष्मवासनामयप्रज्ञायामाश्रयत्वेन वर्त-
मान इति तैजसः, वा सूर्यादीनां प्रकाशत्वा-
दिति ॥ १२ ॥
भाषा।
(विश्वः), विश' प्रवेशन अर्थमें है। प्रवेश हो सम्पूर्ण
भूत आकाशादि जिसमें वह विश्व है, व्यष्टि स्थूल शरीरमें
जो परिपूर्ण है वह विश्व है ॥ ११ ॥
( तैजसः) 'तिज' निशान अर्थमें है । निशान सूक्ष्म कर-
नेको कहते हैं। सूक्ष्म वासनामय बुद्धिमें आश्रय करके जो
साक्षी रूपसे वर्तमान है वह तैजस है, अथवा सूर्यादिकोंका
प्रकाशक होनेसे तैजस नाम है ॥ १२ ॥

नात्राभेदेष्वग्न्यादीनां व्याख्याः। (३७) संस्कृतम् । प्राज्ञः ज्ञा अवबोधने-जानातीति ज्ञः, प्रकृष्ट- चासौ ज्ञश्च प्रज्ञः (ा) प्रकृष्टे स्वप्रकाशात्मनि ज्ञान शतिरज्ञानवृत्त्यात्मको बोधो यस्य सः प्रज्ञः (वा)प्रजानाति चराचरं जगत् ल प्रज्ञः, प्रज्ञ एव प्राज्ञः ॥ १३॥ कूटस्थः-कूटे मायाकार्यविकारे आकाशवत्ति- ष्टतीति कूटस्थः। (कूटस्थोऽक्षर उच्यते। गी०अ० १५॥१६) ॥१४॥ भाषा। (प्राज्ञः) ज्ञा' धातु अवबोधन अर्थमें है, अच्छी तरहसे जो जाने उसका नाम प्रज्ञ है, अथवा स्वप्रकाशात्मामें अज्ञानरूप वृत्तिका जिसको बोध है वह प्रज्ञ है, अथवा चराचर जगत्को जो जानता है वह प्रज्ञ है । प्रज्ञ ही प्राज्ञ है ॥ १३ ॥ (कूटस्थः) कूट अर्थात् मायाके कार्यके विकारमें आकाश की तरह जो स्थित है वह कूटस्थ है। कूटस्थको अक्षर (नाश रहित) कहते हैं (गीता अध्याय १५।१६)॥ १४ ॥ HINDI (३८) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। ....... प्रकारान्तरेण मात्रार्थाः। संस्कृतम् । ( १ ) समष्टिव्यष्टिस्थूलप्रपञ्चोपहितचैतन्य- सकारार्थः,तत्स्थूलप्रपञ्चांशपरित्यागेन केवलचैत- न्यमात्रमकारेण लक्ष्यते ॥१॥ तथा समष्टिव्यष्टिसूक्ष्मप्रपंचोपहितं चैतन्य- सुकारार्थः । तत्सूक्ष्मप्रपंचांशपरित्यागेन केवल- चैतन्यमात्रमुकारेण लक्ष्यते ॥२॥ साषा। समष्टि व्यष्टि स्थूल प्रपत्रोपहित चैतन्य अकारका वाच्यार्थ है तिस स्थूल प्रपश्चरूप अंशक परित्यागसे जो केवल चैतन्यमात्र रहता है वह अकारसे लक्षित होताहै ॥१॥ तथा समष्टि व्यष्टि सूक्ष्म प्रपञ्चोपहित चैतन्य उकारका वाच्यार्थ है तिस मूक्ष्म प्रपंच अंशके परित्यागसे जो केवल चैतन्य शेष है वह उकारका लक्ष्यार्य है ।।२॥ (१) शिवरहस्यभा०। PMEGJAII

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प्रकारान्तरेण मात्रार्थाः। (३९)
संस्कृतम्।
तथा समष्टिव्यष्टिस्थूलसूक्ष्मअपंचद्वयका-
रणभूतमायोपहितचैतन्यं सकारार्थः । तादृशमा-
यांशपरित्यागेन केवलचैतन्यमानं सकारेण
लक्ष्यते ॥३॥
एवं तुरीयत्वसर्वानुगतत्वोपहितं चैतन्यमर्द्धमा-
त्रार्थः, तदुपाधिपरित्यागेनार्द्धमात्रया चैतन्यमात्र
लक्ष्यते । एवं चतुर्णा समानाधिकरणपादभेदबोधे
परिपूर्णमद्वितीयं चैतन्यमात्रमेव सर्वद्वतोपमर्दैन
सिद्धं भवति ॥४॥
भाषा।
तथा समष्टि व्यष्टि स्थूल सूक्ष्म दोनों प्रपश्चोंका कारण
जो माया उपहित चैतन्य है वह मकारका वाच्यार्थ है।
इसी प्रकार मायारूप अंशके परित्यागसे केवल चैतन्यमात्र
मकारका लक्ष्यार्थ है ॥ ३ ॥
इसी प्रकार तुरीय सर्वमें अनुगत व्यापक उपहित
चैतन्य अर्धमात्राका वाच्यार्थ हैतिस उपाधिके परित्यागसे
अर्धमात्राका जो चैतन्य मात्र शेष रहता है वह अर्धमा-
त्राका लक्ष्यार्थ है । इसी प्रकार चारों समानाधिकरण पाद
(चरण) के भेदको जाननेसे परिपूर्ण अद्वितीय चैतन्य-
मात्र सर्वदैतभावके मर्दनसे सिद्ध होता है ॥ ४ ॥

(४०) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। व्याहत्यर्थः। संस्कृतम् । १) विशेषेण आहृतिः सर्वविराजः प्राहानं प्रकाशीकरणं व्याहृतिः॥१॥ (२) भूर्भुवःसुवर्ब्रह्म। भूर्भुवः सुवराप ओम्।। (३) ब्रह्मसत्ताव्यतिरेकेण भूलोंकादिप्रपंचस्य पृथक्सत्ताऽनङ्गीकारात्तद्ब्रह्मैव ॥३॥ आषा। विशेषरूपसे आहति अर्थात् सर्वविराटका बोध अर्थात् प्रकाश करनेसे व्याहति हुआ ॥ १ ॥ भूर्भुवः स्वः ब्रह्मरूप है, तथा भूर्भुवः स्वः और जल ओंकाररूप है ॥२॥ ब्रह्मसत्ताके बिना भूलोकादिक प्रपंचकी पृथक् सत्ताका अङ्गीकार न करनेसे वह निश्चय करके ब्रह्म है ॥३॥ (१) निगुत० भा। (२) महानारा ८६॥१४११ । (३) निर्णयकल्पवल्यायसं० भा।

व्याहत्यर्थः। (११) संस्कृतम् । (१) भूर्भुवस्वस्तथा पूर्व स्वयमेव स्वय- सुवा । व्याहता ज्ञानदेहन तन व्याहृतयः सहलाः ॥४॥ (२) प्रधानं पुरुपः कालो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । सत्वं रजस्तसस्तित्रः ऋसायातयः स्मृताः॥५॥ (३) भवतेः स्विपि भूरिति रूपम् ॥ १॥ भाषा। सृष्टिसे पूर्व स्वयं ब्रह्माने ज्ञानंदहसे सूर्भुवः स्वः कहा है तिस कारणसे व्याहृतियां कही जाती हैं ॥ ४ ॥ प्रधान, पुरुप, काल, ब्रह्मा, विष्णु, रुद, सत्त्व, रज, तम तीनों क्रमसे व्याहृतियाँ कही गयी हैं ॥ ५ ॥ भूः= भू धातुसे विप् प्रत्यय करनेसे 'भूः' ऐसा रूप होता है ॥ १॥ (१) यो. याज्ञः । अ० ३ | दलो० ९ । (२) कूर्मपुराणे । उत्तरविभागे | अ० १४ । दलो० ५४ । (३) यहचसन्ध्यापद्धतिभा० पृ० ८ । 4dTRESS Raninml (४२) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । संस्कृतम् । (१) भवतीति भूः संवेपामुत्पत्तिस्थानं लिङ्ग- स्थानं शतालादिसप्तभुवनसहितो भूलोकश्च ॥२॥ (२) भवन्ति चास्मिन्भूतानि स्थावराणि चराणि च । तस्मादूरिति विज्ञेया प्रथमा व्याहृ- तिस्तु या ॥३॥ (३) भूरिति वै प्राणः। प्राणयति जीवयति सर्वान् प्राणिनः सः। ( स उ प्राणस्य प्राण इति- श्रुतेः) प्राण ईश्वर एव ॥ ४॥ भाषा। भवतीति भूः ( पृथिवी ) जो सर्वके उत्पत्तिका स्थान है लिङ्गस्थान पातालादि सप्त भुवन सहित भूलोक है ॥२॥ जिसमें चराचर भूत उत्पन्न होते हैं तिसकारणसे भूः- प्रथम व्याहृति कही गई है ॥ ३ ॥ भूः यह निश्चय करके प्राण है । सम्पूर्ण प्राणियोंको जो जिलावै उसे प्राण कहते हैं। प्राण ही ईश्वर है (श्रुति ) ( वह ईश्वर प्राणका भी प्राण है ) ॥ ४ ॥ (१) विष्णुस. मा । (२) वृ० यो० याश० । अ० ३।१६-१७ । (३) तत्तिरीयोप० (शीक्षाध्याये ) अनु० ५ मं० ३ ।

व्याहृत्यर्थः। (४३) संस्कृतम् । (१) भूरिति वा अग्निः। ( अत्रास्विरूप ईश्वर एव )॥५॥ (२) भवति- अस्तीति सदिति व्युत्पत्त्या भूरिति सन्मात्रमुच्यते ॥६॥ सुषः। (३) भावयति स्थापयति विश्वमिति सुवः॥१॥ (४) भवन्ति भूयो भूतानि उपभोगक्षये पुनः। कल्पान्ते उपभोगाय भुवस्तेन प्रकीर्तितम् ॥ २॥ भाषा। अथवा भूः यह अग्नि है और अग्नि ही ईश्वर है ॥ ५ ॥ भूः अर्थ जो तीनों कालमें रहै, तीनों कालमें रहनेसे सत् परमात्मारूप है ॥ ६ ॥ विश्वका जो स्थापन करै वह भुवः है ॥ १ ॥ कल्पान्तमें भोगके क्षयके पश्चात् फिर उपभोगके लिये उत्पन्न होते हैं इस कारणसे भुवः कहा गया है ॥ २ ॥ १) तैत्तिरीयोप० (शीक्षाध्याये) अनु० ५ मं० २। (२) शङ्करभा०।- (३) सायनभा० । (४) बृ. यो. याज्ञ० अ० ३।१७-१८ ।

(४४) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । (१) भुवरिति सर्व भावयति प्रकाशयतीति व्युत्पत्त्या चिद्रूपसुच्यते ॥ ३॥ (२) भुव इत्यपानः, अपानयति दूरीकरोति सर्व दुःख मुमुक्षूणां मुक्तानां खसेवकानां धर्मा- मनां यः सोऽपानो दयालुरीश्वरः॥४॥ (३) भुव इति वायुः। वायुरूप ईश्वरः ॥५॥ (४) सुष्ठु अवति प्राप्नुवते, इति स्वः ॥ १॥ भाषा। भुवः यह सर्वको प्रकाश करता है, इस व्युत्पत्तिसे चैत- न्यरूप कहा जाता है ॥ ३ ॥ भुवः अपान वायु है जो मुमुक्षुवों, जीवन्मुक्तों, अपने सेवकों और धर्मात्माओंके सर्व दुःखोंको दूर करता है वह अपानवायुरूप दयालु ईश्वर है॥४॥ भुवः यह वायुरूप है वायु ही ईश्वर है ॥ ५ ॥ 'अवति' का अर्थ परिपूर्ण है, भली प्रकार परिपूर्ण होनेसे स्वः कहा जाता है ॥ १॥ (१) शङ्करभाष्ये । (२) तैत्तिरीयोप० शीक्षाध्याये अनु० ५ मं ३। (३) तैत्तिरीयोप० शीक्षाध्याये अनु० ५ मं० २ (४) सायनमा० व्याहत्यर्थः। (४५) संस्कृतम्। (१) स्वर्यन्ते उच्चार्यन्ते प्रकटीसवन्ति देह- देवता यतः तत् स्वः त्रयस्त्रिंशत्कोटिदेवतालयः स्वलोक इति ॥२॥ (२) सुवरित्यादित्यः। आदित्यरूपेश्वरः॥३॥ (३) शीतोष्णवृष्टितेजांसि जायन्ते तानि 2 ततः । आलयस्सुकृतीनां च स्वलोकस्स उदा- हृतः॥४॥ भाषा। स्वर्यन्ते-देहके देवता जिससे प्रकट हों उसको स्वः कहते हैं अर्थात् तैंतीस कोटि देवताओंका स्थान स्वर्ग- लोक है ॥२॥ सुवः यह आदित्य है आदित्य ही ईश्वर है ॥ ३ ॥ शीत, उष्ण, वृष्टि, तेज, जिससे उत्पन्न होते हैं वह पुण्यात्मा पुरुषोंका स्थान स्वर्गलोक कहा जाता है॥४॥ (१) विष्णुस० भा०। (२) तैत्तिरीयोप० शीक्षाध्याये अनु० ५ मं० २ । (३) बृ० यो० याज्ञ० अ० ३।१८-१९ ।

गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। -'. vw संस्कृतम् । (१) स्वःशब्दो हि सुखवाची प्रसिद्धः। तदुक्तम्-पूणों भूतिवरोऽनन्तसुखो यद्वयाहृती- रितः ॥५॥ ( २ ) स्वरिति व्युत्पत्त्या सुष्टु सवैत्रियमाणसुख- स्वरूपमुच्यते ॥६॥ (३) सुवरिति व्यानः-व्यानयति चेष्टयति प्राणादिसकलं जगदभिव्याप्य स व्यानः सर्वाधि- प्टानं वृहद्ब्रह्म ॥७॥ भाषा। स्वः शब्द सुखवाची प्रसिद्ध है यह कहा है। पूर्ण ऐश्वर्यश्रेष्ठ अनन्तसुख जिससे हो वह स्वः व्याहृति है ॥५॥ स्वः इस व्युत्पत्तिसे सुष्ठु सबोंसे कथित सुखस्वरूप कहा जाता है ॥६॥ स्वः यह व्यान वायु है, जो जगत्में व्यापक होकर प्राणादि सर्वका चेष्टा कराता है वह व्यान वायु सबका अधिष्ठान व्यापक ब्रह्म है ॥ ७ ॥ (१) वाहनसन्ध्यामा० पृ. ९ । (२) शाइरभा। (३) तत्तिरीयभा० शीशाध्याये अनु० ५ मं ३ ।

गायव्यर्थः । (४७) गायत्यर्थः। तत् । संस्कृतम्। (१) तदिति अव्ययं परोक्षार्थे ॥ १ ॥ (२) तदिति लुप्तषष्टयन्तं लगों विशेषणं (३) तच्छन्दः स्वबुद्धिसेदकृतः अतिदूरत- सेऽत्युकांख्येऽर्थे वर्तते ॥३॥ (४) तच्छब्देन प्रत्यग्सूतं स्वतस्तिद्धं परं ब्रह्मोच्यते ॥ ४ ॥ साधा। तत् यह अव्यय परोक्ष अर्थमें है अर्थात् जो दिखलाई न दे ॥ १ ॥ तत् यह लुप्तषष्ठयन्त है वा अर्गशब्दका विशेषण है॥२॥ तत् शब्द अपनी अपनी बुद्धिके भेदसे अति दूर अति उत्कर्ष (अति श्रेष्ठ ) अर्थमें वर्तमान है ॥ ३ ॥ तत् शब्दसे आत्मरूप स्वतस्सिद्द परब्रह्म कहा जाता है ॥४॥ (१) सन्ध्यामा० । (२) तारा। (३) विष्णु० भा । (४) शाङ्करभा० । Akha (४८) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। .0-1... -..-~ संस्कृतम् । (१) तत्, तस्य सर्वासु श्रुतिपुप्रसिद्धस्य ॥५॥ (२) ओतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिवि. धस्स्मृतः॥६॥ सवितुः। (३) पुञ्-प्राणिप्रसवे इत्यस्य धातोरेतद्रूपम्, सुनोति सूयते वा उत्पादयति चराचरं जगत् स सविता सूर्यमण्डलान्तर्गतपुरुष ईश्वरः॥ १॥ भापा। तत् उसका-जो सब श्रुतियों में प्रसिद्ध है ॥ ५ ॥ ॐ तत् और सत् ये ब्रह्मके तीन प्रकारके नाम कहे गये हैं इससे 'तत्' ब्रह्मका नाम है ॥ ६ ॥ 'पुञ्' धातु प्राणिके उत्पन्न करनेके अर्थमें है, इसधातुसे सविता यह रूप वना जो चराचर जगतको उत्पन्न करता है वह सविता देव सूर्यमण्डलके अन्तर्गत पुरुप ईश्वर है१॥ (१) सायन। (२) गीता १७१३ । (३) भारद्वाजभा० रावण ।

4 गायत्र्यर्थः । (४९) . संस्कृतम् । (१) पु-प्रसवैश्वर्ययोः, सर्ववस्तूनां प्रसवः उत्पत्तिस्थानं सर्वैश्वर्यस्य च ॥ २ ॥ (२) प्रेरणे-सुवति स्वखव्यापारे प्रेरयति यः ल लविता प्रेरकान्तर्यामिविज्ञानानन्दस्वभावो हिरण्यगोपाध्यवच्छिन्नः ॥३॥ (३) सू,तृच्-जगत्स्रष्टरि परमेश्वरे ॥४॥ (४) सवनात् सविता ॥५॥ भाषा। पु धातु उत्पत्ति और ऐश्वर्य अर्थमें है इस कारण सर्व वस्तुओंके उत्पत्ति और ऐश्वर्यका स्थान सविता देव है।॥२॥ घू धातु प्रेरणा करनेके अर्थमें हैं, जो सबको अपने अपने व्यापार में प्रेरणा करै वह सविता प्रेरक अन्तर्यामी विज्ञान आनन्दस्वरूप हिरण्यगर्भ उपाधिमें व्यापक है॥३॥ तृव प्रत्यय मू धातु जगत्का सृष्टिकर्ता परमेश्वरके अर्थ- में है ॥ ४ ॥ पालन करनेसे सविता नाम हुआ ॥ ५ ॥ (१) विष्णुस० भा० । भारद्वाज. महीधर । (२) महीधरमा। (३) वाचस्पत्ये । (४) मैन्युप० ६१३५ । .in (५०) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । (१) सविता सर्वसूनानां सर्वभावांश्च सूयते । सवनात्प्रेरणाच्चैर सविता तेन चोच्यते ॥६॥ (२) सविता वै प्रसवानामीशे ॥७॥ (३) सूर्याद्भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानितु । सूर्ये लयप्राप्नुवन्ति यः सूर्यः सोऽहमेव च ॥ ८॥ (४) हिरण्यरोन पात्रेण सत्यस्यापिहितं सुत्रम् ॥ योऽसावादित्ये पुरुषः सोसावहम् ॥९॥ आषा। सर्वभूतोंका उत्पादक है और सर्व भावोंको उत्पन्न करता है। उत्पन्न और प्रेरणा करनेसे सविता कहते हैं ॥६॥ सर्वसृष्टिका ईश्वर सविता है ॥ ७ ॥ सूर्यभगवानसे सर्वसृष्टिको उत्पत्ति पालन और संहार होता है, जो सूर्यका स्वरूप है वही निश्चयकरके मैं हूँ॥ ८ ॥ तेजोमय ढकनसे सत्यरूप परमात्माका मुख ढका है। जो पुरुष सूर्यमण्डलमें है वही मैं हूँ ॥ ९॥ (१) वृ० यो. याश• अ. ९५५-५६ । सायन । (२) कृष्णयजुः । (३) सूर्योप० । (४) भन्युर० ६ । ३५ ।

این همه مهمت गायत्र्यर्थः। (५१) संस्कृतम् । (१) एपोन्तादित्य हिरण्ययः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुहिरण्यकशा आशणरवारलई एन सुनुवर्णः ॥ १० ॥ (२) आदित्यमण्डले ध्यायेत्परमात्मानमव्य- यम् ॥ ११ ॥ (३) लते सकलजनदुःखनिवृत्तिहेतुं वृष्टिं ज- नयतीति सविता (यासिरादित्यस्तपति रक्सिमि- तामिः पर्जन्यो वर्षति-श्रु०) (आदित्याज्जायते ।। दृष्टिक्र्ष्टेरन्नं ततः प्रजाः-स्पृ० ). ॥ १२ ॥ साषा। जो यह सूर्यमण्डलमें तेजोमय पुरुष सुवर्णश्मश्रु और करावाला दखपड़ता है वह नखसे शिखातक तेजोमय है॥ १० ॥ आदित्यमण्डलमें अव्यय परमात्मा का ध्यान करे॥११॥ सकलजनके दुःसके निवृत्तिका कारण वृष्टिको जो करै वह सविता (सूर्यभगवान् ) है (जिन किरणोंसे आदित्य भगवान् तपते हैं उन्हीं किरणों द्वारा जलको खींच करके भेषरूपसे वर्साते हैं-श्रुति ) आदित्यसे वृष्टि, दृष्टिसे. अन्न और अन्नसे प्रजा उत्पन्न होती है ॥ १२ ॥ (१) छान्दोग्योप० । अ० १ । खं० ६ । मं० ६ । (२) शौनक । (३) सन्ध्यामा०। NAINITAL (५२) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम्। (१) देवोयं भगवान्भानुरन्तर्यामी सनात- नः॥१३॥ (२)एष भूतात्मको देवः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सना- तनः। ईश्वरः सर्वभूतानां परमेष्ठी प्रजापतिः॥१४॥ नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थिति- नाशहेतवे॥त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरिञ्चि- नारायणशंकरात्मने ॥१५॥ भाषा। यह सूर्य भगवान् अन्तर्यामी और सनातन देव हैं॥ १३॥ यह भूतात्मारूप देव मूक्ष्म, अव्यक्तरूप और सनातन सर्वभूतोंके ईश्वर, परमेष्ठी प्रजापति (ब्रह्मा) हैं॥ १४ ॥ उन सविता सूर्यदेवको नमस्कार है जो जगत्के एक नेत्र हैं, जो जगत्के उत्पत्ति, पालन और नाशके कारण हैं, जो ब्रह्मा-विष्णु-महेशरूप, त्रिगुणरूप धारण करनेवाले और तीनों वेदके स्वरूप हैं ॥ १५॥ (१) सूर्यपु० अ० १ श्लो० ११ । २) भविष्यपु०॥

गायभ्यर्थः ।
(५३)
संस्कृतम् ।
..
एमण्डलं ज्ञानघनं स्वल्यं त्रैलोक्यपूज्यं
त्रिगुणातरूपम्। लसस्ततेजोलयदिव्यरूपं पुनातु
नां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १६ ॥
इसण्डलं सर्वगतस्य विष्णोराला परंधाम
विशुद्धतत्त्वम् ।। सूक्ष्मान्तरैयोगस्थानुगन्यं पुनातु
मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १७ ॥
भाषा।
ज्ञानवन, अगम्य, तीनों लोकोंके पूज्य, रजोगुण-तमो-
गुण-सतोगुणरूप समस्त तेजोमय दिव्यस्वरूप सर्वके
वर्णतयोग्य जो सविता देवका मण्डल है वह मुझको पवित्र
करे ॥ १६॥
11
सर्ववस्तुओंमें व्यापक विष्णु भगवानका आत्मा परमधाम
विशुद्धतत्व (तेज) रूप, योग द्वारा मूक्ष्म बुद्धिवाले महात्मा-
ओंके प्राप्त होनेयोग्य सर्वसे उपासनीय ऐसा जो सूर्यभगवान
का मंडल है वह मुझको पवित्र करै ॥ १७ ॥

(५४) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । (१) नत्वा सूर्य परं धाम ऋग्यजुःसामरूपि- णम् । प्रज्ञानायाखिलेशाय सप्ताश्वाय त्रिमूर्तये ॥ नमो व्याहृतिरूपाय त्वमोङ्कारः सदैव हि। त्वामृते परमात्मानं न तत्पश्यामि दैवतम् ॥ १८ ॥ (२) असौ वै देवः सवितेति ॥ १९॥ (३) तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ २० ॥ भाषा। परमधाम, ऋग्यजुस्साम-वेदस्वरूप सूर्यको नमस्कार करके ज्ञानस्वरूप, सर्वेश्वर, सात घोडेके रथ पर चलनेवाले ब्रह्मा-विष्णु-महेशस्वरूप, व्याहृतिरूप सूर्यको नमस्कार है आप सदैव ॐकाररूप हैं तुम्हारे परमात्मस्वरूपको छोड- कर अन्य कोई देवता नहीं देखता हूँ॥ १८ ॥ निश्चय करके यह देव सविता हैं ॥ १९ ॥ वह श्रेष्ठ सविता है वह अविनाशी है ॥ २० ॥ (१) सूर्यपु० अ० १ । १३ । ३३ । ३४ । ३७ । (२) शतपथना० । (३) श्वेताश्वतर० । ४ । १८ । ASHTHHATAR गायत्र्यर्थः। संस्कृतम्। (१)सविता दे लवत्य प्रसविता अनिः सवि- तारमाह लर्वस्य प्रसवितारम् ॥ २१ ॥ (२) चन्द्रमाः सविता प्राण एक सविता विद्युदेव सविता ॥ २२ ॥ (३) सवितुरितिसृष्टिस्थितिलयलक्षणकस्य सर्वप्रपञ्चस्य समस्तद्वैतविनमस्याधिष्ठानं लक्ष्यते (यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रत्ययन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञा- सव तद्ब्रह्मेति-तैत्तिरीय भू०च०अ०१) ॥ २३ ॥ भाषा। निश्चय करके सविता सब सृष्टिका उत्पन्न करनेवाला है। अग्निको सविता कहते हैं, अग्नि ही सबका उत्पन्न करने- वाला है ।। २१॥ चन्द्रमा सविता है, प्राण भी सविता है, विद्युत् भी सविता है ॥ २२ ॥ सृष्टि (उत्पत्ति ) पालन लयरूप, सर्वप्रपंचका अर्थात् समस्त द्वैतविभ्रमका आधारभूत सविता है । (जिससे यह सर्वभूत उत्पन्न और पालित होते हैं जिसमें प्रवेश होते हैं तिसके जाननेकी इच्छा करो वही ब्रह्म है ) ॥ २३ ॥ (१) निरुक्ते दैवतकाण्डे अ० ७ पा० ७ खं० ९ । (२) गोपथब्रा० । पूर्वभागे । प्र० १ ब्रा० ३३ । (३) शंकरभा० उव्वट० विद्यारण्य । HUMATION (५६) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । (१) एष हि खल्वात्मा सविता ॥ २४ ॥ (२) संरक्षिता च भूतानां सविता च ततः स्मृतः ॥२५॥ (३) सूते सकलश्रेयांसि ध्यातॄणामिति स- विता ( उद्यन्तमस्तं यान्तमादित्यमभिध्यायन कुर्वन् ब्राह्मणो विद्वान् सकलं भद्रसश्नुते-इति श्रुतेः) ॥ २६ ॥ भाषा। निश्चय करके यही सविता देव सब भूतोंका. आत्मा है ॥ २४ ॥ सब भूतोंकी रक्षा करनेसे सविता नाम हुआ ॥ २५ ॥ ध्यान करनेवालेके सर्वकल्याणोंको उत्पन्न करनेके कारण सविता नाम हुआ (उदय और अस्त समय सूर्य भगवा- नका ध्यान करता हुआ विद्वान् ब्राह्मण सर्व कल्याणको प्राप्त करता है-यह श्रुति है ) ॥ २६ ॥ (१) मैन्युप. ६।८। (२) बृ० यो० याज्ञ० अ० ९ । ९१ । (३) सन्ध्यामा० । LAMICROLLIAME गायत्र्यर्थः । (५७) हरेण्यम्। संस्कृतम्। (१) (एण्य )-प्रधाने प्रार्थतीये च-यद्वरं वर्तुम् अहम् , अतिश्रेष्ठं तद्वरेण्यम् ॥१॥ (२) वरणीयं प्रार्थनीयम्, जन्ममृत्युदुःखा- दीनां नाशाय ध्यानेनोपासलीयम् ॥ २॥ (३) पुरुषार्थकामिभिरर्थ्यमानम् ॥३॥ भाषा। एण्य प्रत्यय युक्त वृत्-धातु प्रधान और प्रार्थनीय अर्थमें है, जो वर्णन करनेके योग्य अतिश्रेष्ठ है वही वरेण्य शब्दसे कहा गया है ॥ १॥ वरणीय-मार्थनीय अर्थमें है अर्थात् जन्म, मृत्यु- दुःखादिकोंके नाश-निमित्त ध्यानपूर्वक उपासना करने- योग्य है ॥२॥ पुरुषार्थकामनावालोंसे प्रार्थित है ॥ ३ ॥ (१) वाचस्पत्ये । (२) सायनमा० भारद्वाज. रावण महीधर.. (३) तैत्तिरीय सं० भा० गु० ४ पृ० ५३ ।

(५८) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । संस्कृतम् । (१) सर्वैरुपास्यतया ज्ञेयतया च सम्भजनी- यम्॥४॥ (२) वरणीयमभेदगम्यमित्यर्थः ॥५॥ (३) सर्ववरणीयं निरतिशयानन्दरूपम् ॥६॥ (४) वरेण्यमाश्रयणीयम् ॥७॥ (५) वरेण्यं वरणीयञ्च संसारभयभीरुमिः॥ आदित्यान्तर्गतं यच्च भाख्यं वा मुमुक्षुभिः॥८॥ भाषा। सर्वप्राणियों करके उपास्याव और ज्ञेयभाव करके चिन्तनकरने योग्य है ॥ ४॥ वरणीय अर्थात् अभेद ज्ञानकरके जालनेके योग्य है।॥५॥ सबके चिन्तन करनेके योग्य परमानन्दरूप ब्रह्म है ॥६॥ वरेण्यम्=आश्रय लेनेके योग्य है ॥ ७ ॥ वरेण्यम् संसारके अयसे डरे हुए पुरुषोंसे वा मुक्तिकी इच्छावाले जनोंसे आदित्यके अन्तर्गत जो भर्ग नाम तेज है वह प्रार्थनीय है ॥ ८॥ (१) भारद्वाजस्मृ०। (२) वि० सं० भा० । (३) शङ्करभा० । (४) विद्यारण्य । (५) यो० याज्ञ० ९ । ५६-५७ ।

गायव्यर्थः। (५९) संस्कृतम् । (१)वरेण्यं सर्वतेजोभ्यः श्रेष्ठं वै परमं पदम् । स्वर्गाऽपवर्गकामैर्वा वरणीयं सदैव हि ॥९॥ (२) वृणुते वरणार्थत्वाजायत्स्वप्तादिवर्जितम् । नित्यं शुद्धं बुद्धमेकं सत्यं तद्धीमहीश्वरम् ॥१०॥ (३) सवितुस्खात्मभूतन्तु वरेण्यं सर्वजन्तुभिः । भजनीयं द्विजा भर्गः तेजश्चैतन्यलक्षणम् ॥११॥ (४) वरेण्यं सेव्यम् ॥ १२ ॥ आषा। वरेण्यम्-सर्वतेजोंसे श्रेष्ठ परम्पद है । स्वर्ग तथा मोक्षकी कामना वाले पुरुषोंसे सदैव प्रार्थनीय है ॥ ९॥ वृणुते (वरणार्थ होनेसे) जाग्रत्स्वमादिसे वर्जित, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, एक सत्यरूप तिस ईश्वरका ध्यान करता हूँ ॥ १० ॥ सविता देवका आत्मरूप, सर्वजन्तुओंसे प्रार्थनीय ऐसा जो भर्ग तेज चैतन्यरूप है वह द्विजों द्वारा भजन करने योग्य है ॥ ११ ॥ वरेण्यम् सेवाकरनेयोग्य है ॥ १२ ॥ (१) अमिपु० अ०--२१६ । ५ । (२) अग्निपुराण अ० २१६ श्लो०६ (३) स्कन्दपु० सूतसंहितायाम् । (४) खण्डराजदीक्षित सं० भा० ।

(६०) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। भर्गः। संस्कृतम्। १) भाभिर्गतिरस्य हीति भगों भर्जयतीति वैक भर्गः ॥१॥ (२) भो-आमर्दने,भृजी भर्जन इत्येतयोर्धा- त्वोभर्गः । भजतां पापभञ्जनहेतुभूतमित्यर्थः॥ भ्राज दीप्तावित्यस्य धातोर्वा भर्गः तेज इत्यर्थः॥२॥ आषा। आ गति-किरणद्वारा गति अर्थात् विषयव्याप्ति है जिसकी वह भर्ग है अथवा जगत्के नाश करनेके कारण भर्ग नाम हुवा ॥ १॥ मञ्जू धातु आमर्दन अर्थमें और भृज् धातु भर्जन अर्थमें : इन दोनों धातुओंसे भजन करनेवालोंके पापके भञ्जनका कारण होनेसे भर्ग नाम हुआ । भ्राज धातु दीप्ति अर्थमें है इस धातुका रूप भर्ग है, भर्गका अर्थ तेज है ॥२॥ (१) मैन्युप० ६ । । (२) भारद्वाज गायत्यर्थः। संस्कृतम् (१) अजपाको, अनुन्, जो रोएधयोर- नत्यतरस्यामिति रोपध्योलोपः रमागला न्यङ्का- दित्वात्कुत्वम् ॥ ३॥ (२) भ्रस्जxघञ्, आदित्यान्तर्गते ऐश्वरे तेजलि ॥४॥ (३) पापानां तापकं तेजोमण्डलम् ॥५॥ (४) अविद्यादोषभर्जनात्मकज्ञानविषय- त्वम् ॥ ६॥ भाषा भ्रस्ट धातु पाक अर्थमें असुन् प्रत्यय "भ्रस्जोरोपधयों- रमन्यतरन्याम्" इस सूत्रसे उपधाका लोप फिर रमागम- न्यवादिसे कुत्व होता है इससे भर्ग सिद्ध हुआ ॥ ३ ॥ (घञ् प्रत्यययुक्त भ्रस्ज् धातु) सूर्यमण्डलान्तर्गत ईश्वर- सम्बन्धी तेज अर्थमें है ॥ ४ ॥ पापोंके तपाने ( नाश करने) वाला तेजरूपमण्डल अविद्याके दोषोंका नाश करनेवाला एक (केवल) ज्ञान स्वरूप भर्ग है ॥ ६॥ (१) गृह्यपरिशिष्टे (२) तारानाथकोशे (३) सायनभाष्ये । (४) शंकर. महीधरः। LERNAJASTHAN गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । (१) भोऽविद्यातकार्ययोर्भर्जनाद्भर्गः। स्वयंज्योतिः परब्रह्मात्मकं तेजः ॥७॥ (२)भ्रस्जपाके भवेद्धातुर्यस्मात्पाचयते ह्यसौ। भ्राजते दीप्यते यस्माजगदन्ते हरत्यपि ॥८॥ (३) भजन्ति नश्यन्ति पापानि संसार- जन्ममरणादिदुःखमूलानि येन असौ भर्गः॥९॥ (४)प्रकाशप्रदानेन जगतो बाह्याभ्यन्तरतमो- भञ्जकत्वाद्भर्गः॥१०॥ भाषा। अविद्या और उसके कार्योंका नाश करनेसे भर्ग स्वयं- ज्योतिः परब्रह्मरूप तेज है ॥ ७ ॥ जिस कारण पचनार्थक भ्रधातु सवको पचन करता है प्रकाशकरने तथा अन्तमें जगत्के लय करनेके कारण यह भर्ग नाम हुआ ॥ ८॥ पाप अर्थात् संसाररूपी जन्ममरणादि दुःखका मूल जिससे नष्ट हो वह भर्ग है ॥ ९ ॥ प्रकाश द्वारा जगत्के भीतर बाहरके अज्ञानरूप तमका नाश करनेसे भर्ग नाम हुआ॥ १० ॥ (१) सायन० विद्यारण्य ० महोजिदी। (२)ब० यो० यान० अ०९ । ५२-५३ । (३) सं० भा० । (४) वरदराज।

गायव्यर्थः। (६३) संस्कृतम्। (१) प्रकाशरूपं यत्प्रकाशेनं सर्वप्रकाशःप्रका- शते । (“न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनु- भाति सर्व तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" कठोप०) ११॥ (२) भर्गस्तेजः-प्रकाशः प्रकाशो ज्ञानम्, यनिरुपद्रवं निष्पापं निर्गुणं शुद्ध सकलदोषरहितं पक्कं परमार्थविज्ञानस्वरूपं तद्भर्गः ॥ १२ ॥ भाषा। प्रकाशरूप जिसके प्रकाशसे सर्व प्रकाशित है वह भग है (यथा श्रुत्यर्थ) (न वहां सूर्य प्रकाश करता है न चन्द्रमा न तारा न विद्युत्, तो इस अमिका वहां कब प्रकाश होसकता है; उसके प्रकाश होनेसे पश्चात् सब प्रकाशित होते हैं और तिसीके प्रकाशसे यह सर्व प्रका- शित है कठोप०)॥ ११॥ भर्ग तेज है प्रकाश है और प्रकाशज्ञानरूप है जो उपद्रवरहित, पापरहित, निर्गुण शुद्ध सकल दोषरहित परिपक्क परमार्थ विज्ञानस्वरूप वही भर्ग है ॥ १२ ॥ (१) सन्ध्यामा। (२) निरतं । तारानाथ० ।

(६४) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । (१)भ-भासंयतीमाँल्लोकानिति । र-रञ्जयतीमानि भूतानि । ग-गच्छन्त्यस्मिन्नागच्छन्त्यस्मादिमाः प्रजास्तस्माद्भरणत्वाद् भर्गः ॥१३॥ (२) भेति-भासयतेलोकान् रेति रञ्जयते प्रजाः। ग इत्यागच्छतेऽजत्रं भरगाद्भर्ग उच्यते ॥१४॥ भाषा भ-इन लोकोंको प्रकाशित करता है। र-इन भूतोंको आनन्द देता है। ग-जिस कारण आत्मामें यह सब प्रजा सुषुप्ति और प्रलय कालमें लयको प्राप्त होती है, पुनः जिस कारण आत्मासे जाग्रत् और सृष्टिकालमें सब उत्पन्न होती है वह गअक्षरका अर्थ है तिस भासन रंजन और गमनोंसे भर्ग शब्द करके सर्वात्माका ग्रहण है ॥ १३ ॥ 'भ' सर्वलोकोंको प्रकाश करता है 'र' सर्व प्रजाको आनन्द देता है 'ग' बारम्बार लय होता है तिस कारणसे अर्ग कहलाता है ॥ १४ ॥ (१) मैन्युप०६।७। (२) बृ० यो० याज्ञ० अ० ९। श्लो० ४५-४६।५०५३/५४१२३ ।

गायव्यर्थः ।
A-
।
संस्कृतम् ।
श्राजी वामनः पुत्रत्वाब पूरुषः
सर्वात्मा सदभावन्तु आला तेल किन्यते॥१५॥
कालाग्निरूपमास्थाय सतासितरितभिः।
भाजले स्वेन रूपेण तस्मार्ग इलि स्मृतः
(सत्ये)।॥ १६॥
ईश्वरं पुरुषाख्यं तु सत्यधर्माणसव्ययम्।सर्गा-
व्यं विष्णुसंज्ञं तु यं ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ॥ १७॥
हृद्योस्नि तपते ह्येष वाह्ये सूर्यस्य चान्तरे।
अग्नी धूमके ह्येष ज्योतिश्चित्रतरङ्गवत्॥१८॥
भाषा
प्रकाशरूप होनेसे भग नाम है, परिपूर्ण होनेसे पुरुष
नाम है, सर्वात्मा और सर्वरूप होनेसे आत्मा कहा गया
है॥ १५ ॥
कालाग्निरूपमें स्थित होकर सतार्चि अग्निरूप और
कसनकिरणोंकरके जो अपने रूपसे प्रकाशित है तिस कार-
१. जर भर्ग है ॥ १६ ॥
ईश्वर पुरुष सत्यधर्मवाला अविनाशी भगनामक विष्णु
है जिसको जानकर मोक्षको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥
वह भग हृदयाकाशमें तथा बाहर सूर्यमण्डलमें तपायमान
होता है और नाना प्रकारके तरंगकी नाई यह ज्योतिरूप
सर्ग धूमरहित अनिमें प्रकाशस्वरूप है ॥ १८ ॥

गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् हृदाकाशे तु यो जीवः साधकैरुपगीयते । स एवादित्यरूपेण बहिर्नभसि राजते ॥ १९ ॥ तस्य चान्तर्गतं धाम सूक्ष्मं प्राकाश्यमेव च । स चारमा सर्वभूतानां चेतोमात्रस्वरूपकः॥२०॥ सर्वस्यैवोपरिष्टस्य पूरणात्पुरुषः स्मृतः। भवभीत्यन्धकारेभ्यः शंकरोति ततःशिवः२१॥ (१) मण्डलं पुरुषो रश्मय इति त्रयं सर्ग- पदवाच्यम् ॥ २२॥ भाषा। जो भर्ग हृदयाकाशमें जीवात्मारूपसे साधक पुरुषों करके कथन किया गया है वही भग बाह्याकाशमें आदित्य- रूपसे शोभित है ॥ १९॥ तिस आदित्यके अन्तर्गत जो सूक्ष्म प्रकाशरूप है वही सब भूतोंकी चेतनरूप आत्मा है ॥ २० ॥ वही अर्ग सर्वोपरि परिपूर्ण होनेसे पुरुष कहा गया है । उसी भर्गको संसारके अयरूप अन्धकारसे बचानेके कारण शिव कहते हैं ॥२१॥ सूर्य मण्डल, पुरुष, तथा किरण यह तीनों भर्ग पदके वाच्यार्थ हैं ॥ २२ ॥ (१) शुक्लयजुः । वाजसनेयसंहिता।

Moonm Mandir गायत्र्यर्थः। (६७) ............. संस्कृतम्। (१) बीच वै सर्ग इति ॥ २३ ॥ १२) गायत्रोव अर्गः तेजो वै गायत्री ॥२४॥ (३) तेजो वै ब्रह्मवर्चलस् । गायत्री तेजस्वी वर्चसी सवति ॥ २५॥ (४) स यश्चार्य पुरुषे पश्चालावादित्ये ल एकः॥ २६ ॥ भाषा। निश्चय करके बल भर्ग रूप है ॥ २३ ॥ निश्चय करके गायत्री ही भर्ग है तथा तेज ही गायत्री है॥२४॥ निश्चय करके तेज ही ब्रह्म तेज है गायत्री तेज- बरूप है ॥ २५॥ जो सब प्राणियों में आत्मा है और जो सूर्यमें है वह दोनों एक हैं ॥ २६ ॥ (१) शतपथब्रा० ५ । ४ । ५।१। (२) गोपथब्रा० रावण ० पू० ।५ । १५ । (३) ऐतरेयत्रा० अ० १ । ख० १ । ब्रा० ५ ॥ ४) तैत्तिरीयन्ना० ब्रह्मवल्ली ख० ८।

(६८) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । संस्कृतम् । (१) आदित्यान्तर्गतं यच्च ज्योतिषां ज्योति- रुत्तमम् ॥ हृदये सर्वभूतानां जीवभूतः स तिष्ठति ॥२७॥ (२) तज्ज्योतिः परमं ब्रह्म भर्गस्तेजो यत- स्कृतम् ॥२८॥ भादीप्ताविति रूपंहि प्रस्जपाकेऽथ तस्मृतम्।। ओषध्यादिकं पचति भ्राज दीप्तौ तथा भवेत् । भर्गःस्याद्राजत इति बहुलं छन्द ईरितम् २९॥ भाषा आदित्यके अन्तर्गत जो सर्व ज्योतियोंमें उत्तम ज्योति वही सब भूतोंके हृदय में जीवरूपसे स्थित है ॥ २७ ॥ जिस कारणसे भर्ग तेजरूप है उसीसे वह तेज पर- ब्रह्म है ॥ २८॥ दीप्त्यर्थक 'भा' धातुका रूप भर्ग है। जिससे ओष- ध्यादिक परिपक्क होते हैं उस 'भ्रस्न धातुका रूप भर्ग है। -दीप्त्यर्थक भ्राज धातुका रूप भर्ग है (और प्रकाशरूप भर्गको वेदमें बहुत प्रकारसे कथन किया है) ॥ २९ ॥ (१) वृ० यो० याज्ञः। (२) अग्निपु० । अ० २१६ । श्लो० ३, ४, ५, ९ ।

गायत्र्यर्थः। ( ६९) संस्कृतम् । शिवं केचिपठतिक शक्तिहर एकति छ । केचिसूर्य क्षेचिदग्नि वेदमा अग्निहोत्रिणः३० अन्यादिरूपी विष्णुहि वेलदो ब्रह्म गीयते। तत्पदं परमं विष्णोदेवस्य सवितुरस्कृतम् ॥३१॥ (१) एतद्ब्रह्मतदकृतलेतर्गः ॥ ३२ ॥ (२) भर्गः। अद्वयानन्दलक्षणं सर्वजगदुपा- कृतं परिपूर्णज्योतीरूपं बिल्वस्थानीयं ब्रहर वाक्या- थतया पर्यवसन्नम्, एतादृरब्राह्म तद्रूपवेनेति शेषः ॥ ३३॥ साषा। कोई भर्गको शिव कहते हैं, कोई शक्ति निरूपण करते हैं। कोई सूर्य और कोई वैदिक अग्निहोत्री अग्निरूप कहते हैं ॥ ३०॥ अमि आदि रूपी विष्णु हैं, यह वेद आदिमें ब्रह्मरूपसे कथन कियागया है वह विष्णुदेव सविताका परमपद कहा गया है॥ ३१॥ यही ब्रह्म है यही मोक्ष है यही भर्ग है ॥ ३२ ॥ भग-अद्वय, आनन्दरूप, सम्पूर्णजगत्का आधार, परि- पूर्ण ज्योतिस्वरूप विस्वरूप ब्रह्मवाक्योंके अर्थरूपसे सम्पन्न ऐसा ब्रह्मसम्बन्धी तेज भर्गरूपसे कहा गया है ॥ ३३ ॥ (१) मैन्युप० ६ । ३५ ॥ (२) निर्णयकल्पवल्ल्याख्य० सं० भा० ।

(७०) गायत्रीमन्नार्थभास्करः। देवस्य। संस्कृतम् । (१) दिवु-क्रीडा-विजिगीषा-व्यवहार-द्युति- स्तुति-मोद-मद-स्वप्न-कान्ति-गतिघु, पचाद्यच् -इत्यच् प्रत्ययः। दीव्यति प्रकाशते चराचरञ्जगत् स देवः प्रकाशस्वरूपं वा ॥१॥ (२) सर्वद्योतनात्मके आत्मनि परमेश्वर अमरे ॥ २॥ भाषा) दिनु धातु क्रीडा, विजिगीपा (जीतनकी इच्छा) व्यवहार, शुति, स्तुति, मोद, मद, स्वम, कान्ति, गति इन अर्थीम है । 'पचायच्' इस मूत्रसे 'अच् प्रत्यय करने पर 'देवता' बनता है। जो वर अचर जगत्को प्रकाश करे वह देव है अथवा जो प्रकाश स्वरूप है ॥ १ ॥ सर्व प्रकाशोंमें, आत्मामें, परमेश्वरम, देवताओंमें 'देव' शब्द घटित होता है ॥२॥ (१) धासु पाठ । भरद्वाज | सायन । रावण । (२) वाचस्पतिको शब्दस्तोगको० महीधरः ।

गायत्यर्थः। (७१) संस्कृतम्। ( १ ) सर्वद्योतनासकाखण्डचिदेकरसम् ॥३॥ (२) देवो दानाद्वा दीपनाद्वा घुस्थाने भवति वा ॥४॥ (३) दीव्यते क्रीड़ते यस्माद्रोचते द्योतते दिवि । तस्मादेव इति प्रोक्तः स्तूयते सर्व दैवतैः ॥ ५॥ भाषा। सर्वका प्रकाशक, अखण्ड, चैतन्य, एकरस 'देव' का अर्थ है ॥ ३॥ 'देव' शब्द दानमें, प्रकाश करने में, वा स्वर्लोकके अर्थ में है ॥ ४॥ जिसकारणसे स्वर्गमें क्रीडा करता है प्रकाश करता है इस कारण देव कहागया है और जिसकी सब देवता स्तुति करते हैं ॥ ५॥ (१) शङ्करभा०॥ (२) निरुक्ते दैवतकाण्डे ७ अ० ४ पा० २ खः । (३) बृ० यो० याज्ञ० अ० ९ । ५४ । विद्यारण्य० ।

(७२) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। ॥ संस्कृतम् । (१)रज्ज्वाकारादीव्यतिप्रकाशयतीति देवः। ध्यातृहृदयारविन्दमध्ये क्रीड़तीति देवः॥ दीव्यति नन्दतीति देवः । अखण्डानन्दैकरस इत्यर्थः ॥६॥ (२) सर्वभूतेष्वात्मतया द्योततेस्तूयते स्तुत्यैः सर्वत्र गच्छति तस्माद्देवः। (एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूता- न्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च-इति श्वेताश्वतरः। ११) ७ ॥ साषा। रज्जु (रस्सी) के आकारमें सर्पके भ्रमके सदृश अधि- ठान रूपसे जो सबका प्रकाशक है वह देव कहा गया है। ध्यान करनेवालेके हृदय कमलमें क्रीडा करनेसे 'देव' कहा गया है। आनन्दित करता है इस कारण 'देव' शब्द अखण्डानन्द एक रसके अर्थमें है ॥ ६ ॥ सब भूतों में आत्मारूपसे प्रकाश करता है, स्तोत्रोंसे स्तुति किया जाता है सब जगह आत्मरूपसे प्राप्त है इस कारण देव कहा जाता है (एकही देव सर्वभूतोंमें गुह्य है सर्व व्यापी और सर्वभूतोंका अन्तरात्मा है । कर्मोंका स्वामी सर्व भूतोंके निवास स्थान, साक्षी, सबको चेतन करनेवाला केवल और निर्गुण है-श्वेताश्वतर ६.११) ॥७॥ (१) सन्ध्यामा० (२) शब्दकल्पद्रुमे ।

----- गायत्र्यर्थः। (७३) धीमहि। संस्कृतम् । ( १) ध्यै-चिन्तायाम् । ध्यायतर्लिङ्, बहुलं छन्दसीति सम्प्रसारणं (अ) व्यत्ययेनासलेपदम् । ध्यायामः । चिन्तयामः निगमनिरुतविधानरूपेण चक्षुषा निदिध्यासं तद्विषयं कुर्म इति ॥ १॥ (२) धी-आधारे लिङि बहुलं छन्दसीति विकरणस्य लुका ध्यातृध्येयव्यापाराभिन्नत्वमेव ध्यानम् ॥२॥ आषा। "ध्यै" धातु चिन्तवन अर्थमें है ध्यायते लिड्-बहुलं छन्दसि इस मूत्रसे सम्प्रसारण व्यत्ययसे करने पर आत्मने पद हुआ निगम, निरुक्त विधानरूप नेत्रसे चिन्तन करता हूँ अर्थात् तत् स्वरूपका ध्यान करता हूँ ॥ १ ॥ धीङ् धातु आधार अर्थमें है 'लिङि बहुलं छन्दसि' इस भूत्रसे विकरण का लोप हुआ ध्यान करनेवालेका ध्यान करने योग्य परमात्मासे अभेद होना ध्यान कहा जाता है ॥ २॥ (१) भरद्वाज गृह्यपरिशिष्टे । याज्ञवल्क्य. उबट० । (२) गृह्यपरिशिष्टे । सायन० । विष्णु स० भा०।

(७४) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । (१) धीमहि-आत्सना आत्मरूपेण ध्यानं क्यमकुर्म । ध्यानम् नाम " सर्वशरीरेषु चैतन्यै- कतानता ” ॥३॥ (२) ध्यानेनहेया वृत्तयः ॥४॥ (३) रागोपहितध्यानम्॥५॥ (४)ध्यानेन लभतेमोक्ष मोक्षण लभते सुखम् । सुखेनानन्दवृद्धिः स्यादानन्दो ब्रह्मविग्रहः ॥ ६ ॥ लाषा। आत्मरूप करके आत्माका हम लोग ध्यान करते हैं। "सर्वभूतोंमें चैतन्यका फैलाव देखना" ध्यान कहलाता ॥३॥ ध्यानसे वृत्तियों का त्याग करना चाहिये ॥ ४ ॥ किसी वस्तुमें अनुरागसे युक्त होनेका नाम ध्यान है॥५॥ ध्यानसे मोक्ष और मोक्षसे सुख प्राप्त होता है, सुखसे आनन्दकी वृद्धि होती है और आनन्द ही ब्रह्ममूर्ति है ॥६॥ (१) मण्डलबाहाणोप० । १ । १ (२) योगसूत्रपा० २ । सू० ११ । (३) सांख्यसूत्रे अ० ३ । सू० ३० । (४) रुद्रयामलोत्तरतन्त्रे पट० २४ । १३९ । ३ ।

गायत्र्यर्थः। (७५) संस्कृतम्। (१) वयं ध्यायेम-ध्येयतया मनसा धारयेस वाक्यम् उपासीमहि उपास्महे वा ॥७॥ (२) अहस्ब्रह्मेति धीमहि ॥ ८॥ (३) ब्रह्मैव साक्षिरूपसिति तल्लक्षणतया ध्यायितमुपपन्नमिति ॥९॥ (४) ध्यायते अनया ध्यानं वा धीः । ध्यानतेः सम्प्रसारणं च इति घिय लम्प्रसारणे हल इति दीर्घः ॥ १०॥ भाषा । ध्येय पदार्थको हम लोग मनमें धारण करते हैं अथवा हम उपासना करते हैं ॥ ७॥ मैं ब्रह्मरूप हूँ ऐसा ध्यान करता हूँ॥ ८ ॥ ब्रह्म ही साक्षीरूप है इस लक्षणसे ध्यान करने वालेको ध्यान करना युक्त है ॥ ९॥ जिससे ध्यान किया जाय उसको ध्यान व धी कहते हैं "ध्यायतेः सम्प्रसारणं च" इस मूत्रसे ध्यके यकारको इ होगया तो धि बना फिर "हलः" इस सूत्रसे दीर्घ होगया इस प्रकार धी रूप सिद्ध होता है ॥ १० ॥ (१) स्कन्दपु० । भारद्वाज । सायन । (२) अमिपु० अ० २१६ । १८ । (३) निर्णयकल्पवल्ल्याख्य सं० भा० ।

(७६) गायत्रीमन्नार्थभास्करः। धियः । संस्कृतम् । ( १ ) वुद्धयो वै धियः ॥ १॥ २) धियो धारणवत्यो बुद्धयः (धीर्धारणा- वती मेधेत्यमरः ) ॥ २॥ (३) धर्मादिविषया बुद्धिः ॥३॥ (४) कर्माणि धिय इति ॥ ४॥ (५) धीशब्दो बुद्धिश्चनः, कर्मवचनो, वा वारवचनश्च ॥ ५॥ भाषा। बुद्धियां निश्चय करके 'धियः' हैं ॥ १ ॥ 'पियः धारण करनेवाली शुद्धियाँ हैं (धी धारण करने वाली बुद्धिको कहते हैं, यह अमरकोपका वचन है)॥२॥ धर्मादि विषयोंवाली बुद्धिको भी कहते हैं ॥ ३ ॥ काँको शुद्धि कहते हैं ॥ ४ ॥ धीशब्द बुद्धिवाची कर्मवानी और वास्वाची है ॥ ५॥ (१) मैयुप० ६ ! ७ । भरद्वाजः | (२) विम० भा० । (३) याज्ञः । सायन । (४) अथर्वण । (५) उघट० | सायनः ।

गायत्यर्थः । (७७) संस्कृतम् । (१) कर्मयज्ञसहस्त्रेभ्यस्तोयज्ञो विशिष्यते। तपोयज्ञसहस्त्रेभ्यो जपयज्ञो विशिष्यते ॥ जपयज्ञसहस्रस्यो ध्यानयज्ञो विशिष्यते। ध्यानय- ज्ञात्परो नास्ति ध्यानं ज्ञानस्य साधनम् ॥६॥ यः (२) यः शब्दश्च यदित्यर्थे लिङ्गव्यत्ययतो भवेत् ॥ १॥ (३) य इति लिङ्गव्यत्ययः यद्भर्गः यः भगों भाषा। हजारों कर्मयज्ञसे तपयज्ञ विशेष हैं और हजारों तप- यज्ञसे जपयज्ञ विशेष हैं और हजारों जपयज्ञसे ध्यानयज्ञ विशेष हैं-ध्यान यज्ञसे परे कोई यज्ञ नहीं है ध्यान ज्ञानका साधन है॥ ६॥ लिङ्गव्यत्ययसे 'यः' शब्द 'यत्' होजाता है ॥ १ ॥ 'या' शब्द लिङ्ग व्यत्ययसे 'यद्भर्गः' बना वा यः' भर्गः बना॥२॥ (१) लिंगपुराणपूर्वार्द्ध अध्याय ७५ श्लो० १३-१४ (२) लौहित्यनीलकण्ठ । भरद्वाज । उव्वट० । (३) यो० याज्ञ. भरद्वाज सायन । महीधर । Harijumi Shili (७८) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । (१) यत्सत्यज्ञानादिलक्षणम् ॥३॥ (२) यः प्रत्यग्रूपः ॥ ४॥ (३) यः सविता देवः ॥ ५॥ नः (४) नः अस्माकम् ॥ १॥ (५) नः अस्मदीयाः ॥२॥ भाषा। जो सत्यज्ञानादिरूप ब्रह्म है ॥ ३ ॥ जो जीवात्मरूप है ॥ ४॥ जो सविता देव है ॥ ५॥ 'न:' का अर्थ हमारा है ॥ १॥ 'नः' का अर्थ हम लोगोंका है ॥ २ ॥ (१) विद्यारण्यस्वा० । (२) निर्णयकल्पवल्याख्यसं० भा. (३) सायन० महीधर. (४) सायन० महीधर० (५) तारानाथतकवाच.

गायव्यर्थः । (७९) प्रचोदयात् । संस्कृतम् । (१) चुद-प्रेरणे प्रकर्षेण चोदयति प्रेरयति॥१॥ (२) प्रेरयति, अयमाशयः-सर्वस्याश्चेतनाया- अचेतन चेतनोऽपि भगवांश्चात्र प्रतिप्रेत्यति ॥२॥ (३) योजयति धर्मार्थकाममोक्षेवस्मदादीनां बुद्धिम् ॥ ३॥ आषा। 'चुद्' धातु 'प्रेरणा' अर्थमें है। अच्छीतरहसे प्रेरणा करनेसे 'प्रचोदयात्' हुआ ॥ १॥ 'प्रेरयति' का यह आशय है कि सब अचेतनोंके अचै- तन्यको चैतन्य करनेवाला भगवान् यहां प्रेरणा करता धर्म, अर्थ, काम, मोक्षमें हम लोगोंकी बुद्धिको युक्त करता है ॥३॥ (१) सायन । महीधर. यो. याज्ञः । उवट० । (२) विष्णुस० भा० (३) भारद्वाज. योगियाज्ञः ।

(८०) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । (१) प्रचोदयात् अकण प्रेरयति सकलं कर्मानुष्टानप्रवणा दुष्कर्मविमुखाश्चास्महु द्धीः करोति । अन्तःकरणवृत्तीः प्रकाशयति वा ॥४॥ (२) प्रचोदयात् प्रेरयेत् ॥५॥ सुल्यो याज्ञवल्लयोक्तगायत्री मन्त्राः। तच्छब्देन तु यच्छन्दो बोद्धव्यः सततं बुधैः । उदाहते तु यच्छब्दे तच्छब्द उदितो भवेत्॥१॥ भाषा। प्रचोदयात् अच्छी तरहसे सम्पूर्ण कर्मानुष्ठानके सन्मुख और दुष्कर्मसे विमुख हमारी बुद्धिको करता है अथवा अन्तःकरणकी वृत्तियोंको प्रकाश करता है ॥ ४ ॥ प्रेरणा करै॥५॥ 'तत्' शब्द जहां हो वहां यत् शब्द भी बुद्धिमानोंको सदैव जाननेयोग्य है । और जहां पर 'यत्' शब्द कहा गया है वहां पर 'तत्' शब्दका भी बोध होता है ॥ १ ॥ (१) तैत्तिरीय सन्ध्या भा० गु० ४ पृ० ५२, ५३

गायव्यर्थः ।
(८१)
संस्कृतम्।
सिविता सर्वभूतानां सर्वभावांश्च सृयते ।
लवनात्प्रेरणाच्चैव लविता तेन शेव्यते ॥ २ ॥
वरेण्यं वरणीयच संसारमयसीतरिः ।
१ आवित्यान्तर्गतं यच्च भर्गाल्यं वा लुमुक्षुभिः॥३॥
अरज पाके भवेद्धातुर्यस्मात्याच्यते यसौ ।
आजते दीप्यते यस्माजगदन्त हरत्यति॥ ४॥
दीचते क्रीडते यस्साद्रोचते घोतते दिवि ।
तस्माद्देव इति प्रोक्तः स्तूयते सर्वदैवतैः ॥५॥
भाषा।
सविता सर्व भूतोंके सव भावोंको उत्पन्न करता है ।
उत्पन्न तथा प्रेरणा करनेसे सविता नाम कहा जाता
॥ २॥
संसारके भयसे डरे हुए जनों और मोक्षकी इच्छा-
वालोंसे सूर्यमण्डलके अन्तर्गत जो भर्गरूप तेज है वह
प्रार्थना (भावना) करनेके योग्य है ॥ ३ ॥
भ्रस्न धातुका अर्थ पकाना है जिस कारणसे सबको
एकाता है प्रकाशित करता है तथा अन्तमें संसारका नाश
करता है इससे भर्ग शब्द हुआ ॥ ४ ॥
जो स्वर्ग लोकमें जिस कारणसे क्रीडा और प्रकाश
करता है तिस कारणसे देव शब्द कहागया है जिसकी
स्तुति देवता लोग करते हैं ॥५॥

(८२)
गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः।
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"""
संस्कृतम् ।
देवस्य सवितुर्यच्च भर्गअन्तर्गतं विभुम् ।
ब्राह्मवादिन एवाहुर्वरेण्यं तच्च धीमहि ॥ ६ ॥
चिन्तयामो क्यम्भों धियो यो नः प्रचोदयात् ।
धमार्थकाममोक्षेषु बुद्धिवृत्तीः पुनःपुनः ॥७॥
बुद्धेवोधयिता यस्तु चिदात्मा पुरुषो विराट् ।
सवितुस्तद्वरेण्यन्तु सत्यधर्माणमीश्वरम् ॥८॥
हिरण्यवर्ण पुरुषं ध्यायेस विष्णुसंज्ञकम् ।
विशनास्सर्वभूतानां विष्णुरित्यभिधीयते ॥ ९॥
साषा।
सविता देवके अन्तर्गत जो भर्गरूप तेज व्यापक है उसी
तेजको ब्रह्मज्ञानी लोग वरेण्य कहते हैं, तिसका हम ध्यान
करते हैं ॥ ६॥
जो भर्ग-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, में बार बार
बुद्धिकी वृत्ति प्रेरणा करता है उसका हम चिन्तन
करते हैं ॥ ७ ॥
बुद्धिको वोध करानेवाला जो चैतन्यरूप आत्मा पुरुष
विराट् है वही सविता देवका सत्यधर्मशाला ईश्वररूप
तेज प्रार्थनीय है ॥ ८॥
उस हिरण्यवर्ण विष्णुरूप पुरुषका हम ध्यान करते
। सब भूतोंमें प्रवेश करनेसे विष्णु यह नाम कहा
गया है ॥९॥

2.
Art
पापयर्थः।
(८३)
संस्कृतम् ।
अादिल्लल्लपर्यन्तले हि व्याप्य लिष्ठति ।
भाषणमणिशतूनां तेजोरूपेण संस्थितः॥ १०॥
वृक्षोपधितृणानां च. रसरूपेण सिष्ठति।
तन्मात्रसूतो भूतानां विश्वरूपेण संस्थितः ॥११॥
आदित्य हृदये चैवं योऽसौ व्योति तथापरे ।
एक एव सवेदात्मा पंचधारस्थितस्तु सः ॥१२॥
एवं यो वेत्ति आसानसेकधा सम्प्रतिष्टितम् ।
ज्ञास चोपास्यते समय लोऽमृतस्त्राय कल्पते१३
साषा।
बलासे तृण पर्यन्त इसी प्रकार व्यापक होकर स्थित
हैं। पत्यर, मणि, तथा सर्वधातुओं में वह तेजरूपसे
स्थित है ॥ १० ॥
वृक्ष, औपषि, और तृणों में रसरूपसे और सर्व
सूतों में आत्मरूपसे स्थित है इस प्रकार विश्वरूपसे स्थित
है ॥ ११ ॥
सूर्य, हृदय, अनि, आकाश तथा ईश्वरमें एकही आत्मा
पांच प्रकारसे स्थित है ॥ १२ ॥
इस प्रकार जो पुरुषआत्माको सबमें एक रूपसे स्थित
जानता है और जानकर अच्छी तरह उपासना करता है
वह मुक्त होजाता है ॥ १३ ॥

Sto ...Nee.. (८४) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। भरद्वाजस्मृत्युक्तगायत्रीभाष्यम्। संस्कृतम् । पदानि देश सन्त्रस्य तदादीनि यथाक्रमात् । पदं प्रत्यर्थनिष्पत्तिः स्पष्टन्तु क्रियतेऽत्र हि ॥१॥ तदिति द्वितीयेकवचनम् । अनेनाखिल- जगदुत्पत्तिस्थितिलयकारणभूतमुपनिषदि कथ्य- मानं निरुपमं तेजः सूर्यमण्डलाभिध्येयं परब्रह्मा- भिधीयते ॥ संवितुरितिषष्ठ्येकवचनं, पुञ् प्राणि- प्रसवे, इत्यस्य धातोरेतद्रूपम्, सर्वस्य भूतजातस्य प्रसवितुरित्यर्थः ॥ भाषा। मन्त्रमें 'तत्' आदि क्रमसे देस पद हैं प्रत्येक पदका अर्थ यहां स्पष्ट करके कहता हूं ॥ १ ॥ 'तत्' यह द्वितीयाका एकवचन है इससे अखिल जग- की उत्पत्ति स्थिति लयका कारणभूत उपनिषदोंमें कथित जो उपमारहित तेज सूर्यमण्डलमें स्थित परब्रह्म है, वह कहा गया है ॥ सवितुः यह षष्ठीका एकवचन है 'पुञ्' धातुका अर्थ प्राणियोंके उत्पत्ति करनेमें है इस धातुका यह. रूप है । सम्पूर्ण प्राणियोंके उत्पन्न करनेवालेका प्रसविता नाम है ॥

. गायभ्यर्थः । ---- वरेण्यं वरणीयं प्रार्थनीयम, नियमादि- सिरपगतकल्सपैः लततं यम् ॥ सर्गः ॥ सओ आमने-सृज् सर्जन, इत्येतयोर्धात्वोर्म- जतां पापर्जनहेतुभूतमित्यर्थः। सा बीताक्त्यिस्य धातो; भर्गः तेज इत्यर्थः ॥ देवस्य वृष्टिदाता- दिगुणयुक्तस्य निरतिशयस्येत्यर्थः । दीव्यते प्रका- शत्वात् ॥ धीमहि ध्यै-चिन्ताया, निगसनिरुक्त- विद्यारूपेण चक्षुषा योऽसावादित्ये हिरण्मयः पुरुषः सोहमिति चिन्तयामि। सापा। वरेण्यं वरणीय प्रार्थना करनेयोग्य है पापरहित पुरुषोंसे नियमपूर्वक सदैव ध्यानके योग्य है ॥ भैग: अञ्जो आम- दने 'भृ भन्ने' इन दोनों धातुओंसे भजन करनेवालोंके पापनाश करनेका हेतु भर्ग है अथवा 'भा' धातु दीप्ति अर्थमें है इस धातुसे भर्ग' (तेज) वना । देवस्य-वृष्टि- दानादि गुणयुक्त निरतिशय (आनन्द ) रूपका ऐसा अर्थ है । प्रकाशरूप होनेसे 'दीप्यते' शब्दका प्रयोग हुआ । धीमहिन्ध्यै धातु चिन्तन अर्थमें है इससे निगम निरुक्त विद्यारूपी नेत्रोंसे जो यह आदित्यमें हिरण्मय पुरुष है वह मैं हूँ ऐसा चिन्तन करता हूँ।

(८६)
गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः।
"...
ANN...+wa+MAHAw..
:
संस्कृतम्।
धियः इति द्वितीयावहुवचनम् ॥ यं इति
छान्दसत्वाल्लिङ्गव्यत्ययः। यत्तेजः सवितुर्देवस्य श्रे-
ज्यमस्माभिः असिध्यातंभों जपतां पापमञ्जलहे.
तुसूतं धीमहि उपास्महे । तत्तेजो नोऽस्माकं धियो
बुद्धीः श्रेयस्करेषु कर्मसु प्रचोदयात् प्रेरयेदित्यर्थः ।
इति ॥
अगस्त्योकश्लोक्षः।
यो देवः सविताऽस्माकं धियो धर्मादिगोचराः।
प्रेरयेत्तस्य यदर्गस्तं वरेण्यमुपास्महे ॥१॥
साषा।
धियः यह द्वितीयाका बहुवचन है या=( यत् )
छन्द होनेके कारण लिङ्ग व्यत्यय है, जो सविता देवका
तेज (भर्ग) हम सबसे प्रार्थनीय है और जप करनेवालोंके
पापके नाश करनेका हेतु है उस तेजकी हम उपासना
करते हैं । वह तेज हम लोगोंकी बुद्धिको उत्तम काँके
करनेमें प्रेरणा करै । इति ।
जो सविता देव हमारी बुद्धियोंको धर्मादिमें लगाता
तिस सविता देवका जो प्रार्थनीय भर्गरूप तेज है
उसकी हम उपासना करते हैं ॥ १ ॥

गायत्र्यर्थः। (८७)
वृहत्पाराशरोलश्लोकः।
संस्कृतम् ।
देवस्य सवितुर्भों वरणीयञ्च धीमहि ।
तल्लाकंधियो यस्तु ब्रह्मने च प्रचोदयात् ॥१॥
स्कान्दीयसूतसंहितोक्तमन्त्रार्थः।
योनोऽस्माकं धियश्चित्तान्यन्तर्यामिस्वरूपतः ।
प्रचोदयात्प्रेरयेच तस्य देवस्या सुव्रताः ॥ १॥
दीप्तस्य सर्वजन्तूनां प्रत्यक्षस्य स्वभावतः ।
सवितुस्खाल्लभूतन्तु वरेण्यं सर्वजन्तुभिः ॥२॥
सजलीयं द्विजा अर्गस्तेजश्चैतन्यलक्षणम् ।
तच्छन्दवाच्यं सर्वशं जगत्सर्गादिकारणम् ॥३॥
साषा।
सवितादेवका जो भर्गरूप तेज वरणीय है उसका हम
ध्यान करते हैं सो हमारी बुद्धिको ब्रह्मरूपमें प्रेरणा करै॥१॥
हेसुव्रतद्विजलोगो! अन्तयांमी रूप हम सबके चित्तोंको
प्रेरणा करता है तिस॥ १
प्रकाशमान, सर्वजन्तुओंमें प्रत्यक्षरूपसे स्थित सविता-
रूप परमेश्वरका स्वरूप, सर्वजन्तु करके ॥ २ ॥
भजनीय, जो भर्ग तेज, चैतन्यरूप, तत् शब्दका वाच्य,
सर्वज्ञ जगत्के उत्पत्तिका आदि कारण ॥ ३ ॥

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(८८) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः।
संस्कृतम् ।
खसायाशक्तिसंभिन्नं शिवरुद्रादिसंज्ञितम् ।
आदित्यदेवतायास्तु प्रेरकं परमेश्वरम् ॥ ४॥
आदित्येन परिज्ञातं वयं धीमापास्महे ।
सावित्र्याः कथितो ह्यर्थः संग्राहेण मयाऽदरात्॥५॥
आग्नेयनिर्वाणतंत्रोक्तमन्त्रार्थः।
ध्यक्षरात्मकतारेण परेशः प्रतिपाद्यते ।
पाता हर्ता च संस्त्रष्टायो देवः प्रकृतेः परः ॥ १॥
भाषा।
स्वमायाशक्तिसे शिवरुद्रादि भिन्न भिन्न रूप, सूर्य नारा-
यणका प्रेरक, परमेश्वर ॥ ४ ॥
सूर्यरूपसे ज्ञात, उसकी हम उपासना करते हैं संक्षेपसे
गायत्रीका अर्थ मैंने आदरपूर्वक कथन किया है ॥ ५ ॥
ध्यक्षगत्मक तारक प्रणवरूपसे परमात्मा प्रतिपादित है
जो देवप्रकृतिके परे है वही पालन करनेवाला नाश करने
वाला और उत्पन्न करनेवाला है ॥ १ ॥

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गायव्यर्थः।
(८९)
....--
संस्कृतम् ।
अलौ देवत्रिलोकारमा निगुणं व्याप्य तिष्ठति ।
अतो विश्वमयं ब्रह्म वाच्यं व्याहृतिसिस्थितिः॥२॥
तारख्याहतिवाच्यो यः साकिया ज्ञेय एव लः।
जगद्रूपस्य सवितुः संखष्टुर्दीव्यते विभोः ॥३॥
अन्तर्गतं महदचों वरणीयं यतात्ससिः।
ध्यायेत्तत्परं सत्यं सर्वव्यापि सनातनम् ॥ ४॥
यो भर्गस्सर्वसाक्षी च मनोबुद्धीन्द्रियाणि नः ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु प्रेरयेद्विनियोजयेत् ॥ ५॥
भाषा।
वही परमेश्वर तीनों लोकोंका आत्मा तीनों गुणोंमें
व्यापक होकर स्थित है इस कारण विश्वमय ब्रह्म तीनों
व्याहृतियोंका वाच्य है ॥ २ ॥
प्रणव व्याहृतिका जो वाच्य है वही गायत्री मंत्रसे ज्ञेय
(जाननेयोग्य ) है । जगतरूप, सृष्टिकर्ता, विभु सविता
प्रकाश करता है ॥ ३ ॥
अन्तर्गत जो महान् तेन है वह इन्द्रियजित् पुरुषोंसे
वरणीय है तिस परम सत्य; सर्वव्यापी, सनातन ब्रह्मका
ध्यान करे ॥ ४॥
जो भर्ग सर्वसृष्टिका साक्षी है वह हमारे मन बुद्धि
इन्द्रियोंको धर्म, अर्थ, काम, मोक्षमें युक्त करे ॥ ५॥

(९०) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । MARA -- उबटभाष्यम् । संस्कृतम्। तदिति षष्ट्या विपरिणभ्यते, तस्य सवितुः सर्वस्य प्रसवदातुः आदित्यान्तरपुरुषस्य देवस्य हिरण्यगर्योपाध्यवच्छिन्नस्य वा विज्ञानानन्दखभा- वस्य वा ब्रह्मणो वरेण्यं वरणीयं भर्गः भर्ग- शब्दो वीर्यवचनः वरुणा वा अभिषेचनाद्भगों- पचक्राम वीर्य वै भर्ग इति श्रुतिः । तेन हि पापं भृञ्जन्ति दहन्ति, भृजीभर्जने अथवा अगस्तेजोवचनः यद्वा मण्डलं पुरुषो रश्मय इत्येतत्रितयमभिप्रेयते देवस्य दानादिगुणयुक्तस्य भाषा। तत् शब्द षष्ठ्यर्थमें है तिस सविताका अर्थात् सबके उत्पन्न करनेवाले सूर्यके अन्तर्गत पुरुष देवका अर्थात् हिर- ण्यगोपाध्यवच्छिन्न विज्ञानानन्दस्वरूप ब्रह्मका वरणीय रूप भर्ग है भर्ग शब्द वीर्यवाची है भर्गका प्रभव वरुण अथवा अभिषेचनसे हुआ। निश्चय करके वीर्यही भर्ग है यह श्रुति है तिससे पाप नष्ट होते हैं भृजीधातु भर्जनार्थक होनेसे भर्ग तेजोवाची है अथवा मण्डलं, पुरुषं, और किरण यह तीनों अर्गशब्दसे कहेगये हैं; देव दानादिगुणयुक्त का हम गायत्यर्थः। (९१) संस्कृतम् धीमहि। ध्यैचिन्ताया, अस्य च्छान्दसंलग्नसार- णम्, ध्यायासः चिन्तयामः लिबिध्यालं तद्विषयं कुर्म इति यावत् धियो योनः धीशब्दो बुद्धिश्चनः कर्सचनो वा वाग्वचनश्च बुद्धीः काणि वा नाचो वा यः सविता लोऽस्माकं प्रचोदयात् यस्सविता देवः नोऽस्माकं धियः काणि धर्मा- दिविषया वा बुद्धीः "प्रचोदयात्" प्रेरयेत् "तत्" तस्य-चुवसञ्चोदने प्रकर्षेण चोदयति प्रेरयति तस्य सावितुः सम्बन्धि वीर्य तेजो वा ध्यायाम इति भाषा। ध्यान करते हैं 'ध्यै धातु चिन्तन अर्थमें है, वैदिक प्रयोग होनेसे इसका सम्प्रसारण है ध्यान करते हैं (चिन्तन करते ) अर्थात् ब्रह्मविषयका निदिध्यासन करते हैं। 'धियो. योनः' यहां धीशब्द बुद्धिवाची वा कर्मवाची वा वाक्काची है इस लिये जो सूर्य हमारी बुद्धि, कर्म वा वाणीकी प्रेरणा करता है । जो सविता देव हमारी बुद्धिको धर्मादि कर्मों में प्रेरणा करता है तिसके । धातु-प्रेरणार्थक है जो अच्छी तरहसे प्रेरणा करे तिस सविता देव सम्बन्धी वीर्य वा तेज (भर्ग) का (९२) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम्। सम्बन्धः वाश्यभेदेन श योजना। तत्सवितुर्वरणीयं वीर्य तेजो वा देवस्य ध्यायामः यश्च बुद्धीः प्रचो- दयात् प्रेरयत्यस्माकं तं च ध्यायामः स च सवितैव सवति। लिङ्गव्यत्ययेन वा योजना, तत्सवितु- वरणीयं भर्गो देवस्य ध्यायामः धियो यद्भर्गः अस्माकं प्रेरयति ॥ सायनभाष्यम्। सर्वासु श्रुतिषु प्रलिद्धस्य देवस्य धोतमानस्य. सवितुः । सन्तामितथा प्रेरकस्य जगत्त्रष्टुः साषा। हम ध्यान करते हैं यह सम्बन्ध है । अब वाक्यभेद करके योजना करते हैं उस सविता देवके वरणीय वीर्य वा तेज- का हम ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धिकी प्रेरणा करता. है जो भर्ग हमको प्रेरणा करता है तिसका हम ध्यान करते हैं वह भर्ग सविताही है । अथवा लिङ्ग व्यत्यय करके यह योजना है तिस सविता देवके वरणीय भर्गका हमध्यान करते हैं जो भर्गहमारी बुद्धिको प्रेरणा करता है। सवश्रुतियोंमें प्रसिद्ध, प्रकाशमान, सर्व अन्तर्यामी, रूपसे प्रेरक, जगत्की रचनाकरनेवाला, सवितारूप, Mara गायव्यर्थः। ENT संस्कृतम्। परमेश्वरस्य आत्मसूतं वरेण्यं लबेरुपास्यतया ज्ञेयतयां च सस्सजनीयम्॥भर्गः-अविद्यातत्कार्य- योर्भर्जनार्गः स्वयंज्योतिः परब्रह्मात्सलं तेजःधी- महितबोहं सोऽसौ योऽसौ सोहमिति वयं ध्यायेसा॥ (यद्वा) तदिति भगों विशेषणम्, लवितुदेवस्य तत्तादृशं सर्गः धीमहि किं तदित्यपेक्षायामाह । य इति लिङ्गव्यत्ययः यद्भगों धियः प्रचोदयादिति तद्ध्यायसेति समन्वयः॥ आषा। परमेश्वरका आत्मरूप (वरेण्य) सव करके उपासनीय जानने और भजन करने योग्य भर्ग है अज्ञान और तिसके कार्यको जलानेके कारण भर्ग स्वयं ज्योति परब्रह्मरूपात्मकतेज है। तिसका ध्यान करते हैं जो मैं हूँ सो वह है जो वह है सो मैं हूँ इस प्रकार हम ध्यान करते हैं । अथवा 'तत्' यह भर्गका विशेषण है सविता देवके तिस परब्रह्मके सदृश भर्गका ध्यान करता हूँ तिस किस इसको कहते हैं . 'य' 'यह' लिङ्ग व्यत्यय है जो भर्ग हमारी बुद्धिको प्रेरणा कर- ताहै तिस भर्गका ध्यान करते हैं यह समन्वय है। PUNITat

(९४)
गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः।
Pr..........--.-PM.M
संस्कृतम् ।
(यवा ) यः सवितालयों धियः कर्माणि प्रचो-
दयात् प्रेरयति तस्य सवितुःसर्वस्य प्रसवितुर्देवस्य
योतमानस्य सूर्यस्य तत् सईदृश्यमानतया प्रसिद्ध,
वरेण्यं सर्वैः सजलीयं सर्गः पापानां तापकं तेजो.
मण्डलं, धीमहि ध्येयतया मनसा धारयेम ।
रावणमाष्यम्।
तत् तस्य सर्गस्तेजः धीमहि ध्यायेमःचिन्तयामः
अत्रययपि तदिति पदंलगोंविशेषणं नास्ति तथापि
तच्छब्दप्रयोगादेव यच्छन्दप्रयोगो लभ्यते तस्य
आषा।
जो सूर्य कोको प्रेरणा करते हैं उस सविता (सर्वो-
त्पादक ) देव (प्रकाशमान ) सूर्यके तत् (वह) सर्वलो-
फसे प्रत्यक्ष होनेके कारण प्रसिद्ध वरेण्य (सर्वजनोंसे उपा-
सना करने योग्य) भर्ग ( पापोंके नाश करनेवाला )तेजो-
मण्डलको ध्येय रूपसे मनसे हम धारण करते हैं ।
तिस अर्गतेजका मैं चिन्तन करता हूँ यहांपर इस
मन्त्रमें तत् पद अर्गका विशेषण नहीं है तिसपर भी तत्
शब्दके प्रयोगसे यत् शब्दकी उपलब्धि होती है । तिसका

Mr. गायत्र्यर्थः। (९५) संस्कृतम्। कस्य "सवितुः" सर्वभावानां प्रलवितुः । पुनः किं मृतस्य "देवस्य" बीतेक्रीडादियुक्तस्य तं कं यो भर्गो नोऽस्माकं धियो बुद्धीः प्रचोदयात् प्रेरयती- त्यर्थः । तदिह भर्गशब्देन वहुविधमाहाल्ल्यानुकम् । सवितृमण्डलगतादित्यदेवतास्वपुरुण उच्यते ॥ अन्न यद्यपि सवितुर्भर्ग इति सबितमायोर्मिनता गायत्रीसन्त्र प्रतीयते तथापि परमार्थचिन्तायां सवितृसर्गयो)दो न विद्यते एव । ल एक्सविता स एव सर्गः सवितृसर्गयोःअद्वैतमेव तथा च राहोः भाषा। किसका सविताका-सब भावोंके उत्पन्न करनेवालेका फिर कैसा है वह सविता क्रीडादियुक्त है । सो कौन जो भर्ग हमारी बुद्धिकी प्रेरणा करता है यहां तिस भर्ग शब्दसे बहुत प्रकारका माहात्म्य कहा गया है वह भर्ग सूर्य मण्ड- लमें ( व्यापक ) पुरुष कहा गया है । यद्यपि इस गायत्री मन्त्रमें सविता और भर्गकी भिन्नता प्रतीत होती है तथापि परमार्थ विचारमें। सविता और भर्गमें भेद नहीं है वही सविता है वही भर्ग है सविता और भर्ग एकरूप है जैसा कि राहोः शिरः ( राहुका शिर) अर्थात् राहुही शिर है यहां षष्ठी (९६) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। ~-~-~....... संस्कृतम्। शिर इतिवत् षष्ठी त्वभेदसाधिका पुनरपि किं भूतं भर्गः वरेण्यं प्रवरणीयं प्रार्थनीयम्, जन्ममृत्युदुःख- नाशाय ध्यानेन उपासनीयमित्यर्थः। एवं गायच्या- स्तस्य च महात्म्यमुपवर्ण्य पुनस्तस्यैव महाप्रभा- वत्वं महाव्याहृतिभिर्विशेषणीभूताभिर भिधीयते तद्यथा किं भूतं भर्गः भूरादि व्याप्य तिष्ठन्त मिति शेषः । तथा च भूरादि त्रैलोक्य प्रकाशकम् । भूर्भू- मिलोकः भुवः भुवलोकः अन्तरिक्ष, स्वःस्वर्लोकः भाषा। विभक्ति अभेद सम्बन्ध साधिका हुई है वैसाही यहां भी है । (तथा राहुके शिरके समान षष्ठी विभक्ति भेदका साधक नहीं है)। फिर भी किसप्रकारका वह भर्ग है। वरणीय है अर्थात् प्रार्थनीय है जन्म, मृत्युरूप दुःखोंके नाशके लिये ध्यान पूर्वक उपासना करनेयोग्य है । इस प्रकारसे गायत्री मन्त्रका माहात्म्य वर्णन करके फिर तिसीका महाप्रभाव महाव्याहृतिद्वारा विशेषरूपसे कहते हैं किस प्रकारका वह भर्ग है भु आदि लोकोंमें व्यापक होकर स्थित है तथा भू आदि तीनों लोकोंका प्रकाशक हैं भूः' भूमिलोक 'भुवः ' अन्तरिक्षलोक, स्वः स्वर्गलोक, गायत्र्याः। (९७) संस्कृतम्। एक्लुपर्युपरिणावस्थितान् लोकशालशिव्याया- वशिष्ठमानोऽली सर्गः एताँखील्लोकालर प्रदीप- वत् प्रकाशयतीत्यर्थः ।। सहीधरभाष्यम्। तदिति षष्ठ्यर्थे तस्य देवस्य धोतनात्मकल्य सवितुः प्रेरकस्यान्तर्यामिणो विज्ञानानन्दस्वभावस्य हिर- ण्यगर्मोपाध्यवच्छिन्नस्य वा आदित्यान्तरपुरुषस्य, वा ब्रह्मणो वरेण्यं वरणीयं सर्वेः प्रार्थनीयं भर्गः सर्वपापानां सर्वसंसारस्य च भर्जनसमर्थ तेजः साषा। इसीप्रकार क्रमसे ऊपर ऊपर स्थित तीनों लोकोंमें परिपूर्ण होकर भर्ग स्थित है अर्थात् इन तीनों लोकोंका प्रदीपवत् प्रकाशक है। 'तत्' यह षष्ठी अर्थ में है तिस प्रकाशमान प्रेरक अन्त- यामी विज्ञानानन्दस्वरूप हिरण्यगर्भोपाधिमें स्थित सूर्य- अण्डलके अन्तगत पुरुषरूप ब्रह्मका वरणीया नाम सबसे प्रार्थनीय जो भर्ग अर्थात् सर्व पापों तथा सर्वसंसारके नाश (९८) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम्। सत्यज्ञानानन्दवेदान्तप्रतिपाद्यं वयं धीमहि ध्याया- मः,छान्दस सम्प्रसारणम्, यद्वा मण्डलं पुरुषोरम- य इति त्रयं भर्गःशब्दवाच्यम्, भर्गो वीर्य वा वरुणाद्धवा अभिषिचानाद्भगोऽपचक्राम वीर्य वै भर्ग इति श्रुतेः तस्य कस्य यस्सविता नोऽस्माकं धियः बुद्धीः कर्माणि वा प्रचोदयात् वा प्रकर्षण चोदयति प्रेरयति सत्कर्मानुष्ठानाय । यद्वा वाक्य भेदेन योजना-सवितुर्देवस्य वरेण्यं भर्गो ध्या यासः यश्च नो बुद्धीः प्रेरयति तं च ध्यायामः स भाषा। करनेमें समर्थ वेदान्तद्वारा वर्णित सत्यज्ञानानन्दस्वरूप तेजका हम ध्यान करते हैं वैदिकप्रयोग होनेसे सम्प्रसारण है।अथवा मण्डल, पुरुष, किरण ये तीनों अर्गशब्दके वाच्य हैं अथवा अर्ग वीर्य्यरूप है (वा वरुणरूपसे सर्वको सिञ्चन करनेसे अर्ग वीर्यको कहते हैं-"निश्चयकरके भर्ग वीर्य है। ऐसी श्रुति है) तिसका किसका ? जो सविता हमारी बुद्धि वाःकर्मों में प्रेरणा करता है अथवा सत्कर्मोंके अनुष्ठानमें भलीभांति लगाता है अथवा वाक्यभेदसे योजना करते । उस सविता देवके वरणीय भर्गका हम ध्यान करते हैं जो सविता हमारी बुद्धिकी प्रेरणा करता है तिसका ISTITLE नायव्यर्थः। (९९) ४-....- --- संस्कृतम् । व लवितैव । लिङ्गव्यत्ययेन वा योजना, सवितुर्दे- बरूम तद्भर्गो धीमहि यो यद्भगों लो बुद्धीः प्रेरयति। श्रीमच्छङ्करमाध्यम्। शुद्धगायत्रीप्रत्यरब्रह्मेश्यबोधिका । वियो यो नः प्रचोदयादिति नोऽस्माकं थियो बुद्धीः यः प्रचोदयात् प्रेरयेदिति सर्वबुद्धिसंज्ञांतः- करणप्रकाशकसर्वसाक्षी प्रत्यगात्मेत्युच्यते । तस्य प्रचोदयात् शब्दनिर्दिष्टस्यात्मनः स्वरूप- भूतं परं ब्रह्म तत् सवितरित्यादिपदैनिर्दिश्यते । आषा। हम ध्यान करते हैं वह सविता ही है। लिङ्गव्यत्यय करके योजना करते हैं । सविता देवके तिस अर्गका हम ध्यान करते हैं जो भर्ग हमारी बुद्धिकी प्रेरणा करता है। तहां शुद्ध गायत्री जीवात्मा और ब्रह्मके एकताका वोधक है। धियो यो नः प्रचोदयात्' अर्थात् जो हमारी बुद्धिको प्रेरणा करता है, अर्थात् सर्व अन्तःकरणका प्रकाशक, सर्वका साक्षी प्रत्यगात्मा कहा जाता है, तिस प्रचोदयात् शब्द करके कथित आत्माका स्वरूप परब्रह्म तत्सवितुः' इत्यादि पदोंसे कथित है । तहां पर (१००) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । तत्र "ओं तत्सदितिनिर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृत" इति तच्छन्देन प्रत्याभूतं स्वतः सिद्धं परब्रह्मोच्य- ते । सवितुरिति सृष्टिस्थितिप्रलयलक्षणकस्य सर्व- प्रपंचकल्य समस्तद्वैतविश्नमस्याधिष्ठानं लक्ष्यते, वरेण्यमिति। सर्ववरणीयं निरतिशयानन्दरूपम् । भर्ग इत्यविद्याविदोषभर्जनात्मकज्ञानेकविषयत्वम्। देवस्यति सर्वद्योतनात्मकाखण्डचिदेकरसम् । सवितुर्देवस्थत्यत्र षष्ठयों राहोःशिरोवदौपचारिक- बुद्धयादिसर्वदृश्यसाक्षिलक्षणं यन्मे स्वरूपं तत्स- वाधिष्ठानभूतं परमानन्दनिरस्तसमस्तानर्थरूपं भाषा। ॐ तत्सत् यह ब्रह्मके तीन प्रकारके नाम हैं, तत् शब्दसे सब भूतोंमें स्थित स्वतः सिद्ध परब्रह्म कहा जाता । सविता यह उत्पन्न, पालन, प्रलय. लक्षण वाला सर्व प्रपंचका तथा सर्व दैत भ्रमका अधिष्ठान है। 'वरेण्यं' यह सबसे प्रार्थनीय और परमानन्दरूप है भग' यह अज्ञानादिदोषोंका नाशक ज्ञानरूप है 'देव- ख्य ' यह सर्वका प्रकाशरूप अखण्ड, चैतन्य, एकरस देव है । 'सवितुर्देवस्य' यहां पर षष्ठीका अर्थ "राहोः शिरः" की भांति औपचारिक है । बुद्धयादि सर्व दृश्य पदार्थोंका साक्षी रूप जो मेश स्वरूप है तिस सर्व-अधिष्ठान परमा- १ ....... पायपः। (१०१) संस्कृता। लश्काशचिनात्मकं ब्रह्मत्येवं धीमहि ध्यायेस। एवं सति लह ब्रह्मणा स्वविवर्तजडप्रपञ्चेन रज्जुसर्पल्यायेनापशदः। समानाधिकरण्यरूपलेकर लोऽयमिलिन्यायेन सर्वसाक्षिणत्यगात्मनो ब्रह्मणा लह तादात्स्य- रूपलकल सवतीति सर्वात्मकब्रह्मबोधकोऽयं गायत्रीमन्त्रः सम्पयते, त्रिमहाव्याहतीलालय- अर्थः भूरिति सन्मात्रमुच्यते, सुवइति लर्व भाष- यति प्रकाशयतीति व्युत्पत्त्या चिद्रूपसुच्यते। लुब्रियते इति व्युत्पत्त्या स्वरिति सुष्टु सबैत्रियमा- गसुखस्वरूपसुच्यत इति । भाषा। नन्द सर्वअनर्थरहित स्वयंप्रकाश चैतन्यरूप ब्रह्मका हम ध्यान करते हैं। इस प्रकार ब्रह्मके साथ तथा उसीके विवर्तरूप जड़ प्रपंच करके रज्जुसर्प न्यायसे अपवाद है । अर्थात् एक अधिकरण होनेसे एकरूपता है। 'सोय' इस न्यायसे सर्वसाक्षी प्रत्यक आत्मा (जीवात्मा) का ब्रह्मके साथ एकरूप होनेसे एकता सिद्ध है, इसप्रकार गायत्रीमंत्र सर्वस्वरूप ब्रह्मका बोधक है। तीन महाव्याहृतियोंका यह अर्थ है-'भूः' इस शब्दसे सवरूप ब्रह्म है, 'भुवः सर्वस- ष्टिका प्रकाश करता है, इस व्युत्पत्तिसे चैतन्यरूप कहा जाताहै। 'स्वः' अलीप्रकार सबसे प्रार्थित सुखरूप आनन्द कहा जाता है।

(१०२) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः ।
विद्यारण्यस्वामिकृतमन्त्रार्थः।
संस्कृतम्।
तदिति वाङ्मनोगम्यं ध्येयं यत्सूर्यमण्डले ।
सवितुः सकलोत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणः ॥ १ ॥
वरेण्यमाश्रयणीयं यदाधारमिदञ्जगत् ।
अर्गस्स्वसाक्षात्कारेणाविद्यातत्कार्यदाहकम् ॥२॥
देवस्य द्योतमानस्य ह्यानन्दाक्रीडतोऽपि वा।
धीमह स एवेति तेनैवाभेदसिद्धये ॥३॥
भाषा
तत्-वाणी और मनसे अगोचर जो सूर्यमण्डलमें ध्यान
करने योग्य है । सवितुः सकल लोकोंका उत्पत्ति, पालन
और संहारका कारण है ॥ १ ॥
वरेण्यम्-सबके आश्रय लेनेयोग्य जो इस जगत्का
आधार है। भर्गः अपने स्वरूपको साक्षात् करनेसे अविद्या
और उसके कार्यका नाशक है ॥२॥
देवस्य प्रकाशमान वा आनन्दरूपसे क्रीडा करनेवाला ।
धीमहि-हम निश्चय करके वही परमात्मा ब्रह्म हैं इस
अभेदसिद्धिके लिए ॥ ३॥

Helhirgi गायव्यर्थः। ( १०६) ~-~- संस्कृतम् । वियोन्तारणवृत्तीश्च प्रत्याभवाचारिणीः । य इत्यलिङ्गधर्स बल्लत्यज्ञानादिलक्षणम् ॥ ४॥ लोऽस्माकं बहुधाभ्यस्तमित्रभेदशां लथा ॥ प्रचोदयात्प्रेरयतु प्रार्थनेयं विचार्यते ॥ ५॥ महोजिदीक्षितविरचितगायत्री भाष्यम्। तदिति-प्रेरणे । सुवति प्रेरयतीति सविता- सूर्यः तत्सम्वन्धि सूर्यमण्डलावच्छिन्नामिति यावत् । भाषा धियः अन्तःकरणकी वृत्ति अर्थात् प्रत्यगात्मा (जीवा- स्माके ) सन्मुख चलनेवाली (बुद्धि ) या यहाँ लिङ्ग व्यत्यय है, जो सत्य, ज्ञान और आनन्दरूप है ॥ ४ ॥ ना हमारी बहुत प्रकारके अभ्यासोंसे भिन्न २ भेद देख- नेवालोंकी, प्रचोदयात् प्रेरणा करे । यह प्रार्थना है ॥५॥ तदिति-धू-धातु प्रेरणार्थमें है सबको प्रेरणा करनेवाला सविता अर्थात् सूर्यमण्डलमें व्यापक तेज है।

(१०४) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम् । दीव्यतीति देवः परमात्मा तस्य वरेण्यं सवैभजनी- थम् । वृञ् एण्यः । अविद्याकामकर्मादिसर्जना- गर्गः। स्वरूपात्मकं ज्योतिः धीमहि तदेवाहमिति तहासोऽहमिति वा ध्यायेन । यः देवः नः अस्माकं धियः बुद्धीः प्रचोदयात् श्रेस्थतीत्यर्थः। बाहुलका- लडथे लेट् । लेटोऽडाटौ इत्याडागमः । भूः सुवः स्वः एते त्रयो लोका अपि ॐब्रह्मैवेति । भाषा॥ जो सबको प्रकाश करै वह देव परमात्मा है तिस पर- मात्माका सब करके चिन्तन योग्य तेज है, एण्य प्रत्यय युक्त वृज धातुसे सिद्ध 'वरेण्यम्' सिद्ध होता है। अज्ञान काम कर्मादिका नाशक होनेसे भर्ग आत्मस्वरूप ज्योति है उसका मैं ध्यान करता हूँ ( अर्थात् ) वह परमात्मा मैं हूँ पा उस परमात्माका दास (अधीन) हूँ ऐसा ध्यान करता हूँ, जो देव हमारी बुद्धिको प्रेरणा करता है। 'बाहुलका- ल्लड लेद। लेटोडाटौ' इस सूत्र के अनुसार आद्का आगम हुआ । भूः, सुवः, स्वः यह तीनों व्याहृतियाँ तीनों लोक हैं ॐकार ब्रह्मरूप है। इति ।

गायत्र्यर्थः। (१०५) वरदराजमाण्यम्। संस्कृतम् । नित्यमन्त्रो व्याख्यायते। तच्छन्दशुतेर्षच्छब्दो- ऽध्याहारार्थः। सवितुः जगतां प्रसवितुः । सविता वै अलवानामीशे। उत्तसे शिषे प्रसवल्य त्वमेक:- इत्यादिश्रुतेः। वरेण्यम्"वृञ् सम्भक्तो"एण्यप्रत्ययः सर्वेषां सम्भजनीयम्। भर्गस्तेजः मञ्जनान्वर्गःप्रका- शप्रदानेन जगतोबाह्याभ्यन्तरतमोभञ्जकल्वाद्भर्ज- नाहा कालात्मकतया लकलकर्मफलपाकहेतुत्वाद्भ, रणाद्वा वृष्टिप्रदानेन भूतानां भरणहेतुत्वात्। देवस्य भाषा। नित्यमंत्र गायत्रीकी व्याख्या करता हूँ। तत् शब्दके श्रवणसे यत् शब्दका ग्रहण है । सवितुः जगत्को उत्पन्न करनेवाला सविता सर्वसृष्टिका स्वामी है। हे सूर्य ! आप सृष्टिके एक उत्पन्न करनेवाले हो-यह श्रुति है वरेण्यम् एण्य प्रत्यय युक्त वृञ् धातुसम्यक्प्रकारके अक्त्यर्थ में है, अर्थात् सब प्राणियोंके चिन्तन योग्य है। भर्गः अर्ग तेज है जगत्के बाहर भीतर प्रकाश करनेसे अंधकारका नाशक है वा सर्वजगत्का भञ्जन (संहार) करनेसे भर्ग नाम है।

(१०६) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । संस्कृतम्। योतमानस्य धीमहि चिन्तयामः, ध्ये चिन्तायाम् देवस्य सवितुर्वरेण्यम् । यदर्गस्तद्धयायामः आदि- त्यमण्डलान्तर्वतिनं तेजोमयं पुरुषमनुचिन्तयामः यएषोन्तरादित्य हिरण्मयः पुरुषः अथ य एष एत- स्मिन्मण्डलेचिषि पुरुष इत्यादिश्रुतेः धियो यो नः सविता अस्माकं धियः हानोपादानविषयाणि ज्ञानानि प्रचोदयात् प्रचोदयति प्रवर्तयति तत्सवि- तुस्तद्भर्गश्चिन्तयाम इति॥ आषा। वा कालरूपसे सर्व कर्मोंके फलोंके परिपाकका कारण होनेसे भर्ग है । वा वृष्टिप्रदानसे प्राणियोंके पालनका हेतु होनेसे भर्ग है । देवस्य प्रकाशमानका धीमहि चिन्तन करता हूँ ध्यै धातु चिन्तन अर्थमें है सविता देवका वरणीय जो भर्ग है उस भर्गका चिन्तन करता हूँ अर्थात् सूर्यमण्डके भीतर वर्तमान तेजोमय पुरुषका चिन्तन करता हूँ। जो यह प्रत्यक्ष सूर्यमण्डलके भीतर :हिरण्मय पुरुष है और जो यह इस तेजोरूप मण्डलमें प्रत्यक्ष पुरुष है यह (श्रुति ) है धियो यो नः जो सविता हमारे त्याग ग्रहण विषयक ज्ञानोंकी प्रेरणा करता है उस सविता देवके तिस भर्गका मैं ध्यान करता हूँ। इति ।

AC गायव्यर्थः। ( १०७) .. -------------.. -------- तारानाथतर्कवादस्पत्युक्त गायत्रीवाक्यार्थः । संस्कृतम् । सवितुदेवस्य भर्गाख्यं परन्ब्राह्मस्वरूपं तेजः चि- न्तनीयं मम हत्यमस्थितेनैवभाख्येन तेजला प्रेर्य- माणस्तदेव सलोकान्तरिक्षलोकस्वर्गलोकादिब्रह्मा- ण्डोदरवृत्ति सचराचरत्रैलोक्यस्वरूपं मम हृदय- मध्ये वाह्ये च सूर्यमण्डले वर्तमानतेजसा एकीभूत परब्रह्मस्वरूपं ज्योतिरहमिति चिन्तयअपं कुर्या- दिति गा० व्या०॥ आषा। सविता देवका अर्गनामक परब्रह्मस्वरूप तेज चिन्तन करनेयोग्य हमारे हृदय-कमलमें स्थित, मर्गनामक तेजसे प्रेरित है, वही भूलोक, अन्तरिक्षलोक, स्वर्गलोकादि ब्रह्माण्डके भीतर वर्तमान चराचर त्रैलोक्य स्वरूप हमारे हृदयमें, बाहर और सूर्यमण्डलमें वर्तमान तेज द्वारा एक रूप परब्रह्मस्वरूप ज्योति मैं हूँ ऐसा चिन्तन करता हुआ जप करै।

(१०८) गायत्रीमन्वार्थसास्करः । विष्णुधर्मोत्तरोतमन्त्रवर्णार्थः। संस्कृतम् । कलेन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि च । पञ्चबुद्धीन्द्रियार्थाश्च भतानां चैव पञ्चकम् ॥ १॥ सनोबुद्धिस्तथैवारमा अव्यक्तश्च यदुत्तमम् । चतुर्विंशति एतानि गायत्र्या अक्षराणि च ॥ प्रणवं पुरुषं विद्धि सर्वग पञ्चविंशकम् ॥ २ ॥ निष्कर्षः। यत्प्रकाशात्मकोत्पत्तिस्थितिलयकारणसूर्यमण्ड- लान्तर्गतमोकारवाच्यसच्चिदानन्दलक्षणचिन्तली- आषा। पांच कर्म इन्द्रिय, पांच ज्ञान इन्द्रिय, पांच ज्ञानइन्द्रि- योंके विषय आकाशादिक पांच महाभूत ॥ १ ॥ मन, बुद्धि जीवात्मा और जो इन कार्योंसे श्रेष्ठ कार- णरूप अव्यक्त ह यह चौबीस गायत्रीके अक्षर ( रूप ) हैं। सर्व चराचरमें जो व्यापक प्रणवरूप पुरुष है उसको एबीसवाँ जालो ॥ २ ॥ जो प्रकाशरूप उत्पत्ति, स्थिति, लयका कारण सूर्य- मण्डलके अन्तर्गत ॐशारका वाच्य सच्चिदानन्दरूप

(१०९)
गायव्यर्थः ।
संस्कृतम् ।
याविद्यादिदोषर्जनसमर्थब्रह्मालक तेजः, यचा-
सहुद्धिवृत्तिनियामकमन्तःकरणावच्छिणत्यया-
मसूतकूटस्थलक्षणं त्वात्मतेजः, तत्परेशजीवयो-
लक्ष्यभूत ब्रह्मात्मैकसावं चिन्तयामः ॥
भावार्थः ।
गायत्री मंत्रप्रतिपायस्थ प्रणववाच्यब्रह्मत्वविव-
क्षया तदादौ प्रणवोच्चारणम् ॥१॥
भाषा।
चिन्तन करने योग्य, अविद्यादिक दोषोंके नाशकरनेमें
समर्थ ब्रह्मरूप तेज है पुनः जो हमारी बुद्धिवृत्तिका प्रेरक
अन्तः करणमें व्यापक प्रत्यगात्म कूटस्थरूप आत्मतेज
है। उस परमेश्वर और जीवका लक्ष्यभूत अर्थात् ब्रह्म और
आत्माके एकरूपका हम चिन्तन करते हैं ।
गायत्रीमन्त्रसे प्रतिपाद्य देवको प्रणववाच्य ब्रह्मरूप
कहनेकी इच्छा करके तिस गायत्रीके आदिमें प्रणवका
उञ्चारण है ॥ १॥

( ११०) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः ।
संस्कृतम् ।
ॐ भूर्भुवः स्वः तदितिशब्देभ्यो ह्युत्तमाधिका-
रिण प्रति प्रणववाच्यं त्रैलोक्योपलक्षितसकलावि-
यकस्याधिष्ठानभूतं तदविद्याण्डोपरिस्थतत्पद-
लक्ष्यभूतसर्वपरिच्छेदरहितसच्चिदनन्तानन्दलक्षणं
शुद्धं ब्रह्मोपदिशति ॥ २ ॥
तथा-सवितुर्वरेण्यं भगों देवस्य धीमहीतिशब्दे-
भ्यो मध्यसाधिकारिणं प्रति प्रकाशमानोत्पत्ति-
स्थितिलयकारणसवितृमण्डलान्तर्गतचिन्तनीय-
भर्गाख्यसायोपहितचैतन्येश्वरज्ञानमालक्ष्य तदुपा-
सनां दर्शयति ॥३॥
आषा।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत् इन शब्दोंसे उत्तमाधिकारीके प्रति
प्रणवका वाच्य त्रैलोक्य करके उपलक्षित सर्व अविद्या-
सम्बन्धी कार्योंके अधिष्ठानरूप और तिस अविद्याके
ऊपर स्थित तत्पदका लक्ष्यभूत सर्वपरिच्छेदसे रहित
सच्चिदनन्तानन्दरूप शुद्ध ब्रह्मका उपदेश है ॥ २ ॥
तथा-सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि' इन शब्दोंसे
मध्यमाधिकारीके प्रति प्रकाशमान, उत्पत्ति, स्थिति,
लयका कारण, सूर्यमण्डलके अन्तर्गत चिन्तनीय अर्ग-
नामक मायोपहित चैतन्य ईश्वर ज्ञानका लक्ष्य करके तिस
ईश्वरकी उपासनाको दर्शाया है ॥ ३ ॥

मायभ्यर्थः ।
(१११)
संस्कृतम्।
तथा धियो यो नः प्रचोदयादिति शब्देल्योऽ-
वियोपाधिविशिष्टचेतनकूटस्थलक्षणजीवात्मज्ञान-
मालक्ष्य निकृष्टाधिकारिणं प्रति कर्मकाण्डं प्रद-
शितम् ॥ ४॥
एवमुपाधिदैविविधं ब्रह्म निर्दिष्टम् । तदु-
पाधिनिर्गुतसेकमेव लक्ष्यते । तथाऽधिकारिदैः
कर्मादि त्रिविधं सूचितम्। एवं तज्जपतदर्थभाव-
नयोः परिपाकादहंवृत्तितिरोभावपूर्विका केवलध्ये-
याकारा वृत्तिरुदेति तदा जीवन्मुक्तो भवति ॥५॥
साषा।
तथा धियो यो नः प्रचोदयात्' इन शब्दोंसे अविद्या उपा-
धियुक्त चैतन्यकूटस्थरूप जीवात्माके ज्ञानको लक्ष्य करके
निकृष्ट अधिकारीके प्रति कर्मकाण्डको दर्शाया है ॥ ४ ॥
इस प्रकारसे उपाधिके भेदसे तीन प्रकारका ब्रह्मभेद
कहागया है तिन उपाधियोंसे निर्मुक्त एकही ब्रह्म लक्षित
है। तथा अधिकारी भेदसे कर्म, उपासना, ज्ञान, तीन
प्रकारसे सूचित किया गया है । इस प्रकार गायत्रीका
जप और उसके अर्थकी भावनाकी परिपक्वतासे अहम् इस
वृत्तिके अभावपूर्वक केवल ध्येयाकार (ब्रह्माकार ) वृत्ति
उदय होती है, तब जीवन्मुक्त होता है ॥ ५॥

( ११३) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । संस्कृतम् । एतन्मन्त्रेण भगवनेतादृक्परमार्थभूतं त्वां वयं चिन्तयामोऽस्मचिंधादिषु प्रेरयत्विति जीवः प्रार्थयते ॥६॥ परञ्च- यन्मनसि सङ्कल्पादिक तहुछिनिश्चिनो- ति तदेव जीवालेन्द्रियद्वारा करोतीतिनियमाबदा तत्प्रार्थनाभिः प्रसन्शो धर्ममार्गे बुद्धि प्रवर्तये तदा तदनुकम्पितो जीवः शुभकार्य करोति तेन भाषा। हे भगवन् ! इस गायत्री मन्त्रसे ऐसे परमार्थरूप आपका मैं चिन्तन करता हूँ। हमारी बुद्धिको धर्मादिविषयोंमें आप प्रेरणा करें इस प्रकार जीव प्रार्थना करता है ॥ ६ ॥ फिर भी जो मनसे संकल्पादिक होते हैं उनको बुद्धि निश्चय करती है और जो बुद्धि निश्चय करती है उसीको जीवात्मा इन्द्रियद्वारा करता है । इस नियमसे जब तिस प्रार्थनासे प्रसन्न परमेश्वर धर्ममार्गमें बुद्धिकी प्रेरणा करता है, तब तिस परमेश्वरकी दया करके युक्त जीव शुभ कार्यको करता है । तिस शुभ कार्यके करनेसे गारध्यर्थः । (१९६) संस्कृतम्। से सालदुरितक्षयपूर्विका दृढ़ता एरा भक्तिञ्जयते ततो विक्षेएशमनपूर्वकं परमालकानं ख्यसुदेति। लल आवरणक्षयाज्जीवन्मुक्तो भवति । तस्लादतः परा श्रेयस्करोपासना नामोति ॥ ७॥ अन्न वाणस्थादीनां तु तन्त्राउन्तस्थब्रह्मा- लकमणशस्यां मध्येोपि आदावन्ते च यत्रास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा।" सादौ रज्जुलत्तेव बहसत्ते- व केवलस्" प्रपञ्चाधाररूपेण वर्ततेऽतो जगन्नहि मापा। सकल पापक्षय पूर्वक दृढतर परा भक्ति उत्पन्न होती है, तव विक्षेपके नाश होनेसे परमात्माका ज्ञान स्वयं उदय होता है तिसके अनन्तर आवरणके क्षय होनेसे जीवन्मुक्त होता है इस कारणसे उस गायत्रीकी उपासनाके परे कोई कल्याणदायी उपासना नहीं है ॥ ७ ॥ इस मन्त्रमें बाणप्रस्थादिकोंको इस मन्त्रके आदि अन्तमें स्थित ब्रह्मरूप प्रणवके होनस मध्यमें भी कहा है । "जो आदि अन्तमें नहीं है वह वर्तमान कालमें भी नहीं है सादिकोंके भ्रममें जैसे रज्जुसत्ता है उसी प्रकार सब प्रपञ्चमें ब्रह्म सत्ताही है ॥" प्रपञ्चोंके आधाररूपसे ब्रह्म ..... ( ११४) गायत्रीमन्त्रार्थसास्करः । संस्कृतम् । इत्यादिवास्येभ्योऽन्यथाख्यातिसायिकसेदनिरस- लपूर्वकेण नौव सूचितस्लवति ॥ গাঅঙ্গীত। (१)गायत्र्य न परं जप्यं गायत्र्या ल परन्तपः। गायत्र्या न पर ध्यानं गायच्या न परं हुतम् ॥१॥ (२) 'यज्ञाला जपयज्ञोस्सि' यतो जपयज्ञे पशु- बीजादि बधो न सल्लनति ॥ २ ॥ भाषा। वर्तमान है इस कारण प्रपंच नहीं है" इत्यादि वचनोंसे अन्यथाख्याति मायिक भेद त्यागपूर्वक ब्रह्मही सूचित होता है। गायत्रीसे परे और कोई जप नहीं है । गायत्रीसे श्रेष्ठ कोई तप नहीं है। गायत्रीसे परे कोई ध्यान नहीं है। गायत्रीसे परे कोई हवन नहीं है ॥ १॥ सब यज्ञमें जप यज्ञ मैं हूँ। क्योंकि यह पशुवीजादिके बधसे रहित है ॥२॥ (१) ब्रह्मवाक्यम् । २) भगवद्गीतायाम् अ० । १०२लो० २५ ।

जपलेदः । (११६ ) संस्कृतम् । (३) करज्ञाश्चत्वारो विधियकलसान्विताः सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नाहन्ति षोडशी ॥३॥ जासेदः। (४) जपः स्यादक्षरावृत्तिानसोपांशुवाचकैः । धिया यवक्षरश्रेणी वर्णखरपदालिकाम् ॥ उच्चरेदर्थमुदिश्य सानसः ल जपः स्मृतः॥१॥ जिहोष्ठौचालयत्किञ्चिद्देवतागतमालसः किञ्चिच्छ्वणयोग्यः स्यादुपांशुःस जपःस्मृतः२ मन्त्रमुच्चारयेद्वाचा वाचिकास जपः स्मृतः॥३॥ आषा। विधियज्ञ सहित जो चार प्रकारके पाकयज्ञ हैं वह जप यज्ञके सोलहवीं कलाके बराबर नहीं हैं ॥ ३ ॥ मन्त्रोंके अक्षरोंकी बार २ आवृत्ति करनेको जप कहते हैं वह जप मानसिक, उपांशु और वाचिक भेद करके तीन प्रकारका है जिस मन्त्रके अक्षरोंकी पङ्क्तिको वर्ण, स्वर, पदयुक्त अर्थका उद्देश्य करके मनसे उच्चारण किया जाता है वह मानसिक जप कहा जाता है ॥ १ ॥ जिह्वा और ओष्ठ किञ्चित् चला करके देवतामें मन लगाकर किञ्चित् सुननेके योग्य उपांशु जप है ॥ २ ॥ वचनसे मन्त्रका उच्चारण करना वाचिक जप है ॥ ३॥ (३) मनु० अ० | २ | ८६ । (४) तन्त्रसारे । नृसिंहपुराणे श्रीविष्णुधमोत्तरे च जपभेद उक्तः ।

(११६) गायत्रीमन्वार्थभास्करः । संस्कृतम्। (१) विधियज्ञाजपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः। उपांशुः स्याच्छतगुणः साहलोभानसः स्तः४ जपकालः। (२) पूर्व सन्ध्यां सनक्षत्रामुपासीत यथाविधि । गायत्रीमन्यसेतावद्यावदादित्यदर्शनम् ॥१॥ उपास्य पश्चिमा सन्ध्यामादित्यञ्च यथाविधि । गायत्रीमन्यसेत्तावधावत्तारां न पश्यति ॥२॥ साषा। विधियज्ञोंसे जपयज्ञ दशगुण श्रेष्ठ है जपयज्ञोंमें उपांशु सौगुण श्रेष्ठ है उपांशुसे मानस जपहजारगुणा श्रेष्ठ है॥४॥ नक्षत्रोंके रहतेही आरंभकर सूर्यदेवके उदयपर्यन्त भात सन्ध्याकर सविधि गायत्रीमन्त्रका अभ्यास करना चाहिये ॥ १ ॥ सायं सन्ध्या और सूर्यदेवकी उपासनाकर नवतक तारागण न दिखाई पडै तब तक यथाविधि गायत्री मन्त्र- का अभ्यास करना चाहिये ॥ २ ॥ (१) मनु० । अ०.२ । श्लो०८५/बृ० यो० याज्ञ० अ०७।१३६। (२) हारीतसंहिता ४ | १८-१९ TA जपकालः। ( ११७) -CHAT संस्कृतम् । (१) गृहे होकगुणं जप्यं लयां तु द्विगुणं स्मृतम् । गवांगोष्टे शतगुणमयागारे शताधिकरम् ॥१॥ सिद्धक्षेनेच तीर्थे च देवतायाश्च सन्निधौ । सहलं शतकोटीनामनन्तं विष्णुसन्निधौ ॥१॥ (२)कदाचिदपि नो विद्वान्गायत्रीसुदके जपेत् । गारयनिमुखी प्रोक्ता तस्मादुत्थाय ताअपेत्॥३॥ भाषा। घरमें जप करनेसे एक गुण फल है नदीके तटपर दूना पाल कहा गयाहै गोशालामें सौगुण अग्न्यागार ( अमिहोत्र स्थान ) में सौगुणसे अधिक फल है ॥ १ ॥ सिद्ध क्षेत्रमें, तीर्थ में, देवमन्दिरके निकट सौ करोडका हजारगुना फल होता है और विष्णुके निकट अनन्त विज्ञान कभी जलसें गायत्री न जप क्योंकि गायत्री अमिनुखी कही गई है इस कारण जलके बाहर गायत्री जपें ॥३॥ (१) वृ० योगिया० अ० ७ । १४३ । (२) गोभिल.

( ११८) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । जपविधिः। संस्कृतम् । (१) स्नानं कृत्वा शुचौ देशे बद्धा रुचिरमासनम् । त्वया मां हृदि सञ्चिन्त्य सञ्चिन्त्य स्वगुरुंततः॥१॥ (२)उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा मौनीचैकाग्रमानसः । विशोध्य पञ्चतत्त्वानि दहनप्पावनादिभिः ॥ २॥ मन्त्रन्यासादिकं कृत्वा सकलीकृतविग्रहः । आवयोर्विग्रहं ध्यायन्प्राणापानौ नियम्य च ॥३॥ भाषा। स्नानकर पवित्र स्थानमें रुचिर ( मृदु ) आसन बाँध तुम्हारे (पार्वती) सहित हमारी (शिव) और गुरुकी हृदय- में चिन्तनाकर ॥१॥ उत्तर या पूर्वमुख होकर मौन और एकाग्र चित्त हो दहन प्लावनादिसे पञ्चतत्त्वोंका विशोधनकर और मन्त्रन्यासादि- से ब्राह्मीय शरीर हमारे ( शिव-पार्वती ) रूपका ध्यान करते हुए प्राण अपान वायुको संयतकर जप करना चाहिये ॥३॥ (१) शिव पु०वायु सं०अध्या. १२ श्लो. १२२-१२४ (२) १४८ १ मालाविवरणम् । ( ११९) । । अग्णीपी कंचुली नन्दो मुक्ताळेशो कलाकृतः। अपवित्रकरोऽशुद्धो रिलए जरेल्वाचित् ॥ ४॥ मालाविवरणस् । (१) अंगुल्या जपलयानोकोकलुदाहृतम् रेख्याष्टगुणं विद्यात्पुत्रजीवर्दशाधिकम् ।। १ १॥ शतं स्याच्छंखमणिभिः प्रवालैस्तु लहस्त्रकम् । स्फाटिकदेशसाहस्रमौक्तिकैर्लक्षमुच्यते ॥२॥ आषा। पगडी बांधकर अङ्गा पहनकर ननावस्थामें केश खुलेहुए गुल्लूवन्द बाँधे अपवित्र हाथसे अशुद्धदशामें और बोलते हुए कभी जप न करे ॥ ४ ॥ अशुलियोंमें जप करनेसे एकगुण फल होता है और अंगुलियोंकी पोरोंमें जप करनेसे अष्टगुण पुत्रजीवीकी मालामें दशगुण ॥ १॥ शंख और मणियोंकी मालामें शतगुण शृंगेकी मालामें सहस्त्रगुण स्फटिककी मालाम दशसहस्त्रगुण, मुक्ताकी मालामें लक्षगुण ॥ २॥ (१) शिवपु. वायुसं० अध्या० १२ श्लो० १३६--१३८ (१३०) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः। संस्कृतम्। ॥ पद्माक्षेर्दशलक्ष तु सौवर्णैः कोटिरुच्यते । कुशग्रन्थ्या च रुद्राक्षरनन्तगुणितं भवेत् ॥ ३॥ (१) तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ १॥ (२) नोचैर्जपं च संकुर्याद्रहःकुर्यादतन्द्रितः। सव्याहृतिमनस्तूष्णीम्मनसा चापि चिन्तयेत्॥२॥ (३) मनःप्रहर्षणं शौचं मौनं मंत्रार्थचिन्त- लम् । अव्यप्रत्वमनिर्वेदो जपसम्पत्तिहेतवः॥३॥ आषा। कमलगट्टेकी मालामें दशलक्षगुण सुवर्णकी मालामें कोटिगुण, कुशग्रन्थि और रुद्राक्षकी मालामें जप करनेसे अनन्त फल होता है ॥ ३ ॥ जिस मंत्रका जप करे उसीके अर्थकी भावना करता रहे ॥ १ ॥ उच्चस्वरसे जप न करे, आलस्यको त्यागकर एकान्त स्थानमें वाणीको रोककर एकाग्रमनसे मंत्रका जप करे और मनमें ध्यान करता रहे ॥ ॥ २॥ प्रसन्नमन, पवित्रता, मौन, मंत्रार्थ-चिन्तन, चित्तकी एकाग्रता और अखेद ये जपके फलके हेतु हैं ॥ ३ ॥ (१) पातं० यो० सू० पा०१२८ (२) अमिपुराणे। (३) ब्रह्मा० जपसंख्या। ( १९१) M- जसंख्या। (१) असंख्यालासुर यस्लाहमाचलणवेचा वम् ॥ १ ॥ (२) सावित्री सहस्त्रहत्वः प्रातर्जपेच्छतकृत्व- परिनितः कृतो वा ॥२॥ (३) लहस्रकृत्वः सावित्री जपेदव्यासानसाः शतकृत्वोपि श सम्यकप्राणायामपरो यदि ॥३॥ सप्तव्याहृतिपूर्वा च आद्यन्तप्रणवान्विताम् । मनसा वा जपच्चैव दशकृत्वोवरः स्मृतः॥४॥ भाषा। विना संख्यांके जप आसुरी है तिस कारणसे गिनती पूर्वक जप करना आवश्यक है ॥ १॥ प्रातःकालमें गायत्री मंत्र एक हजार जपै अथवा सौ वार अथवा अपरिमित ॥२॥ भली भांति प्राणायामके पश्चात् एक हजार अथवा सौबार सावित्रीमंत्र चित्तकी एकाग्रतापूर्वक जपै ॥ ३ ॥ सात व्याहृतियों सहित गायत्रोके आदि अन्तमें प्रणव युक्त मानस जप कर तो दशवार भी श्रेष्ठ कहा गया है।॥४॥ (१) वृ० पाराशरसं० अ० ५ । ४१ (२) बौधायनधर्मसूत्रे प्रश्न० २ अ० सू० १२ । (३) योगियाज्ञवल्क्यः।

(१२२) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । संस्कृतम् । (१) कल्पोक्तैव कृते संख्या त्रेतायां द्विगुणां भवेत्।द्वापरे त्रिगुणा प्रोक्ता कलौ संख्या चतुर्गुणा५॥ जपफलम्। (२) सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्। गायत्री यो जपेद्विषो न स पापेन लिप्यते ॥१॥ (३) गायत्रीं विस्तरादिव्यां पठेदेवशणोति वा । मुच्यते सर्वपापेभ्यः परम्ब्रह्माधिगच्छति॥२॥ भाषा। सतयुगमें शास्त्रोक्त संख्या, त्रेतामें उसका दूना, द्वापरमें तिगुना, कलियुगमें चौगुना जप करना चाहिये ॥५॥ गायत्री देवीका हजार वार जप श्रेष्ठ है, सौ मध्यम है, दश निकृष्ट है इस प्रकार जो गायत्रीका जप करता है वह ब्राह्मण पापसे लिप्त नहीं होता है ॥ १ ॥ जो पुरुष विस्तार पूर्वक इस दिव्य गायत्रीका जपना श्रवण करे वह सब पापोंसे छूट कर परब्रह्मरूप होजाता है ॥ २ ॥ . (१) वैशंपायनसं (२) अत्रिस्मृ० अ० २ श्लो. ९ (३) ब्रह्मवाक्यम् ।

जपफलस् । ( १२३) ..........--- लंस्कृतम् । (१) जपनिष्ठो बिजः श्रेष्ठोऽखिलयज्ञफलं लभेतासर्वेषामेव यज्ञानांजायतेऽलौ सहाफलः॥३॥ ( २ ) दशामिर्जन्सजलितं शतेन च पुरा कृतम्। सहस्रेण निजन्मोत्थं गायत्री हन्ति दुष्कृतम् ॥४॥ (३) गायत्री संस्मरेयोगात्स याति ब्रह्मणः पदम। गायत्रीजपनिरतो मोक्षोपायं च विन्दति॥५॥ मावा जपमें निष्ठावाला दिज श्रेष्ठ है और समस्त यज्ञका फल प्राप्त करता है। सब यज्ञोंमें गायत्री मन्त्र जपका महाफल है ॥३॥ दशबार जप करनेसे इस जन्मका और सौबार जप करनेसे पहिले जन्मके और हजार वार जप करनेसे तीन जन्मों ( पहिले जन्मका, इस जन्मका और अगले जन्म) के पापको गायत्री नाश करती है ॥ ४ ॥ जो पुरुष एकाग्रचित्त करके गायत्रीका स्मरण करता है वह ब्रह्म पदको प्राप्त होता है । गायत्रीके जपमें निरत पुरुष मोक्षके उपायको प्राप्त करता है ॥ ५ ॥ (१) तन्त्रसारे पृ० ३९। (शिवधर्मे च) (२) बृ० पाराशर सं० अ० ५ श्लो० ६२ । (३) बृहत्पाराशरसं अ० ५ श्लो०७४शंखस्मृ० अ०१२। श्लो०।३० ( १३४) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः । १ संस्कृतम् । (१) लहस्रकृत्वस्त्वन्यस्य बहिरेतन्त्रिक द्विजः। महतोप्येनेसा लासात्वचेवाहिर्विमुच्यते ॥ ६ ॥ सावित्र्याश्चैव मंत्रार्थ ज्ञात्वा चैव यथार्थतः । तस्यां यदुक्तं चोपास्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥४॥ (योगियाज्ञवल्क्यः) ब्रह्महत्या सुरापानं गुरुदाराभिमर्षणम् । यच्चान्यदुष्कृतं सर्व पुनातीत्याह वै मनुः ॥५॥ आषा। जो दिन ग्रामसे बाहर एकान्त स्थानमें प्रणवव्याहृति युक्त गायत्रीका जप सहस्त्रवार एक महीने तक करता है जैसा सर्प केंचुलीको छोड़ता है इसी प्रकार वह सब महान् पापोंसे छूट जाता है ॥ ६ ॥ गायत्री मंत्रका यथार्थ अर्थ जानकर उस्में कहेहुएकी जो उपासना करता है वह ब्रह्म होताहै ॥ ४ ॥ ब्रह्महत्या, सुरापान, गुरुपलीगमन और इससे इतर सर्वपातक गायत्रीमन्त्रके जपसे नाश होताहै ऐसा अनुने कहा है ॥ ५॥ (३) मनु० अ० २ श्लो० ७९ ।

अथ शारयाक
संस्कृतिल ।
गायत्री तिजननी हिनदिशा
श्रीलाङ्ख्यामन्तहणोनदा निस्त्ध्या ।
पट्कुक्षिः किल त्रिएका छ पंचलोलि
सख्याव्या प्रतिवदलं जनैत्रिनेत्रा॥१॥
सावित्री शरदमृतांशुलक्षकान्तिः
गुलावसलधरा प्रया सुरेशी ॥
ध्येयश ला मणितपनीयसूषिताङ्गी
तिर्यग्यारसत उपर्यधः ककुप्सु ॥२॥
साणा।
अर्थ-वेदमाता गायत्री ही ब्रह्मविद्या है । यह सांख्या-
यल गोत्रवाली त्रिसन्ध्या (प्रातमध्याह्नसायङ्कालीना) षटकु-
क्षि (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योति-
परूपा) पञ्चमौलि ( अधिलोक, अधिज्योतिष, अधिविद्य
अधिनज और अध्यात्मरूपवाली) प्रतिवदनत्रिनेत्रा (प्रति-
मुख, ध्याता, ध्यान और ध्येयस्वरूपा) त्रिपदा ऋग्यजुः
साम तीन पदवाली) किल (निश्चयकरके ) सम्भाव्या
भावना किये जानेवाली है ) ॥ १॥
शरद कालके लक्षचन्द्रमाके सहश कान्तिवाली श्वेतमाल्य
तथा श्वेतवस्त्र धारण करनेवाली रलकाञ्चनसे भूषित अंगवा-
ली वह उत्कृष्ट ज्योतिवाली देवी सावित्री ऊपर नीचे
तिथे सब दिशाओंमें विराजमान है ऐसा ध्यान करे ॥ ३ ॥

( १२६) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः ।
संस्कृतम् ।
ब्रिाणां मजति कमण्डलुं च दण्ड-
मक्षाणां स्त्रजमभयप्रदां द्विजानाम् ॥
श्रीविष्णुप्रियहृदयां च ब्रह्मभाला-
मन्यास्यां गिरिशशिखां परां सदाप्तः॥३॥
प्रातस्त्वं सवितरि बालिकास्न भाव्या
मध्याहे शिवयुवती जरा प्रदोषे॥
आत्मस्था भगवति गीयते निशायां
वर्णानां त्वमलि गतिप्रदा चतुर्णाम् ॥ ४॥
आला।
विष्णु जिनका प्रिय हृदय, ब्रह्मा ललाट, अनि मुख,
और शिव शिखा हैं इसप्रकार द्विजोंकी अभय देनेवाली
कमण्डलु, दण्ड, अक्षमाला धारण करनेवाली परात्मिका
भगवतीको आप्तजन भजते हैं ॥ ३ ॥
हे माता ! सूर्यमण्डलमें प्राप्तकाल बालिका (बाही ),
मध्याह्नकाल युवती शैवी, और सायङ्काल वृद्धा (वैष्णवी)
रूपसे तू आवना की जाती है । तथा हे भगवती ! तू
रात्रि में ( मनके लय होनेसे सब किरणोंके सिमिट जानेपर
सुषुप्तिमें ) आत्मस्था कहलाकर गाईजाती है (अत एव )
तू चारो वर्णोंकी गति देनेवाली है ॥ ४ ॥

(१२७)
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सातले सजनमहिन्न आल्लामा
कारारं सवति शहि शिकस्य ।
आर्यागां खलु परमात्मशक्तिका
चिद्विधा जगति चराचर विभाति ॥ ५ ॥
अत्त्याचं स्वलिति वचः शृणाति जीवः
पावाल्यां चलति निरीक्षते पदार्थात् ॥
सातकिलपि करोति तत्वयेत्र ।
सणास्त्वां सततसरन्तवों सवन्ति ॥६॥
साषा।
है माता! तेरे भजनकी महिमासे. शीघ्र आत्मसाक्षा-
रकार होता है जिस प्रकार विश्वामित्रको हुआ । आर्य-
जनाकी तू अकेली चैतन्यात्मिका विद्या ब्रह्मशक्ति चराचर
जगतमें विराजती है ॥ ५॥
जीव जो अन्न खाता है, श्वास लेता है, वचन सुनता है,
पैरोंस चलता है, पदार्थोंको देखता है अर्थात् जो कुछ
करता है वह तुझसे ही अर्थात् तुझ शतिरूपसे ही सब
कुछ करता है । हे माता ! तुझको नहीं माननेवाले सदैव
क्षीण (श्रीहीन ) रहते हैं ॥ ६ ॥

( १२८) गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः ।
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संस्कृतम् ।
ओंकारस्वमसि स्माम्ब भूर्भुवः स्वः
त्रैलोक्यप्रसविनि ब्रह्मविष्णुरुद्राः॥
यत्किञ्चिद्भवति भविष्यति प्रभूतं
सर्व तत्त्वमसि भवानि निर्विकल्पे ॥७।.
या वाण्यो मुखकमलाद्विनिस्सरन्ति
भक्तानां तव कृपया भवन्ति सत्यम् ॥
सन्तापक्षयकार पुत्रवत्सलेऽम्ब
कल्याणि प्रयतयशःप्रदे प्रसीद ॥८॥
॥
भाषा।
हे मेरी माता ! तू ॐरूप है, तू भूः, भुवः, स्वः तीनों
व्याहृतियाँ है । हे तीनोंलोककी उत्पन्न करनेवाली भवानी!
तू ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र है । हे निर्विकल्पात्मिके !
जो कुछ होता है, होगा और हुआ वह सब तू ही है ॥७॥
हे पुत्रवत्सला माता ! भक्तोंके मुखारविन्दसे जो
बोली निकलती है वह तेरी कृपासे सत्य होती है । हे सन्ता-
पको दूर करनेवाली ! कल्याण करनेवाली ! पवित्र यश
देनेवाली ! तू प्रसन्न हो ॥ ८॥

A PAR गायत्र्यष्टकम्। ( १२९) संस्कृतम् । गायत्र्यष्टकसितलार्यसम्लतं यन् । भक्त्या तत्पठति सदा द्विजः प्रशान्तः॥ सावित्रीजपफलमश्नुते ललीलं जानीते सपदि च रासलन्दनास्वाम् ॥ ९॥ भापा। इल आर्यसम्मत गायत्रीके अष्टकको भक्तिपूर्वक शान्त- चित्त जो निजजन सदा पढ़ते हैं, वे अनायास ही गाय- त्रीके जपका फल प्राप्त करते हैं और रामनन्दनकी माता ( गायत्री ) से परिचित होते हैं ॥ ९ ॥ इति फैजावादीय हिन्दू हाईस्कूलस्थप्रधानसंस्कृताध्यापकेन श्रीरामनन्दनसहायेन निर्मितं गायत्र्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥ ॥ गायव्यर्पणमस्तु ॥

( १३०)
गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः।
सूर्यप्रार्थना।
संस्कृतम् ।
नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे
जगत्प्रसूति-स्थिति-नाश-हेतवे ॥
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे
विरिञ्चिनारायणशंकरासने ॥१॥
यस्योदयेनेह जगत्त्रबुध्यते
प्रवर्तते चाखिलकर्मसिद्धये॥
ब्रह्मेन्द्रनारायणरुद्रवन्दितः
स नः सदा यच्छतु मंगलं रविः ॥१॥
आषा।
जगत्के मुख्य चक्षु, और जगत्के पालन, पोषण, और
लयके कारणः ऋग्यजुस्सामरूप, तीनों गुणों (सत्त्व-रज-तम) के
धारण करनेवाले, ब्रह्मा, विष्णु,महेशात्मक जो श्रीसूर्यदेव, हैं
उनको नमस्कार है ॥१॥
जिसके उदय होनेमें संसार जगकर सम्पूर्ण कार्यसिद्धि-
के लिये प्रवृत्त होता है और ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, महादेव
वन्दित जो श्रीसूर्यदेव हैं वह सदा हम लोगोंको
मङ्गल दें ॥३॥

सूर्यभार्थना। संस्कृतम् । नलोऽस्तु लूथ लहरारे लहलशालान्वितलसमालो ।। लहनयोगोनभावसागिने लहलालंख्यायुगधारिणे नमः॥३॥ यसपडलं दीप्तिकर विशाल मला तीनसनादिरूपम् ॥ बारियदुःखक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ४॥ एरण्डलं देवगणैः सुपूजितं विः स्तुतं भावनसुक्तिकोविदम् ॥ भाषा। अनन्त किरणवाले, तथा सहस्रों शाखाओंके प्रकट कर- नेवाले, अनेक प्रकार कार्योंके करनेवाले, ऐसे जो श्रीसूर्यदेव हैं उनको नमस्कार है ॥ ३ ॥ जिसका मण्डल महान् प्रकाशक और रत्नोंके समान कान्तिवाला, तीक्ष्ण, अनादि तथा दारिय और दुःखोंका नाश करनेवाला है ऐसे घरणीय श्रीसूर्यदेव हमको पवि- त्र करें ॥४॥ जिसका मण्डल देवगणोंसे पूजित तथा ब्राह्मणों करके प्रार्थनीय, तथा श्रद्धा करके मुक्ति देनेवाला है उस देवदेव

(१३२)
गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः।
-11-Ww-
संस्कृतम् ।
तं देवदेवं प्रणमामि सूर्य
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥५॥
यमण्डलं ज्ञानधनं स्वगम्यं
त्रैलोक्यपूज्यं त्रिगुणात्मरूपम् ॥
समस्ततेजोमयदिव्यरूपं
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥६॥
यन्मण्डलं गूढमतिप्रबोध
धर्मस्य वृद्धिं कुरुते जनानाम् ॥
यत्सर्वपापक्षयकारणं च
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ७॥
भाषा।
श्रीसूर्यको प्रणाम करता हूं, वह श्रेष्ठ श्रीसूर्यदेव हमको
पवित्र करें ॥५॥
जिसका मण्डल ज्ञानमूर्ति, अगम्य तीनों लोंकोंसे पूजनी-
य, त्रिगुणात्मरूप,सम्पूर्ण तेजोमय,तथा अलौकिक रूपवाला
है ऐसे वरणीय जो श्रीसूर्यदेव हैं वह हमको पवित्रकरैं ॥६॥
जिसका मण्डल योगियोंके जाननेयोग्य, पुरुषोंमें धर्म-
की वृद्धि करनेवाला, तथा सम्पूर्ण पापोंका नाशक है ऐसे
वरणीय जो श्रीसूर्यनारायण हैं वह हमको पवित्र करें ॥७॥

वर्षमार्थता । ( १९६) एसपडलं व्याधिविनाशवर्ष रहयजुःलारलु लगीतम् ॥ प्रकाशितं न च सूर्भुवः पुलातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ८॥ रसण्डलं लवजलेषु पूजितं ज्योतिश्च कुर्यादिह मर्त्यलोके ॥ रत्कालकालादिसनादिरूर पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥९॥ यन्सण्डलं विष्णुचतुर्सखारव्यं यदक्षरं पाएहरं जनानाम् ॥ भाषा। जिसका मण्डल व्याधियोंके नाश करनेमें कुशल, ऋक्, यजु, लाम करके गान किया हुआ, तथा भूर्भुवः स्वः का प्रकाशक है ऐसे वरणीय श्रीसूर्यभगवान् हमको पवित्र परें ॥ ८॥ जिसका मण्डल सर्वजनोंसे पूजित, तथा इस मनुष्यलो- कदा प्रकाशक है और जो अनादिरूप तथा कालका भी आदिकाल है ऐसे श्रेष्ठ सविता भगवान् हमको पवित्र करें ॥ ९॥ जिसका मण्डल विष्णु तथा ब्रह्माकी संज्ञासे प्रख्यात है; जो अविनाशी तथा सर्व प्राणियोंके पापोंका नाश कर-

( १३४)
गायत्रीमन्त्रार्थभास्करः।
संस्कृतम् ।
यत्कालकल्पक्षयकारणं च
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १०॥
यन्मण्डलं विश्वसृजां प्रसिद्ध-
सुत्पत्तिरक्षाप्रलयप्रगल्भम् ॥
यस्मिञ्जगत्संहरतेऽखिलं च।
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ११ ॥
यमण्डलं सर्वगतस्य विष्णो-
राला परं धाम विशुद्धतत्त्वम् ॥
सूक्ष्मान्तरैयोगपथानुगम्यं
पुलातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १२ ॥
साषा।
लेवाला है और जो काल तथा कल्पका नाश करनेवाला है
ऐसे श्रेष्ठ सूर्यदेव हमको पपित्र करें ॥ १० ॥
जिसका मण्डल सृष्टिकर्ताओंमें प्रसिद्ध, उत्पत्ति, पालन,
तथा लयकरनेमें अतिराक्ति-शाली है और जिसमें सम्पूर्ण
संसार लीन होजाते हैं से श्रेष्ठ श्रीसूर्य भगवान्
हमको पवित्र करें ॥ ११॥
जिसका मण्डल सर्वव्यापी विष्णुका स्वरूप है, जो
परम धाम और जो सूक्ष्महृदयवालोंसे योगमार्ग करके
प्राप्तव्य है ऐसे श्रेष्ठ श्रीसूर्य भगवान हमको पवित्र करें॥१२॥

भार्थना। न यल्लपडलं ब्रह्माविबेो वन्ति गायन्ति यधारणलिहलंघाः ।। एसएडलं वेदविदः सन्ति पुनातु मां तलवितुर्वरेण्यम् ॥ १३ ॥ यएण्डलं वेदविपति रयोगिनां योगस्थालुगस्यम् ॥ सत्सवयं प्रणमामि सर्य पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १४ ॥ सापा। वलज्ञानी जिसके मण्डलका कथन करते हैं; चारण तथा सिक्षगण जिसका गान करते हैं और वेद-वेत्ता गण जिसका स्मरण करते हैं ऐसे श्रेष्ठ श्री सूर्य भगवान् हमको. पवित्र करें ॥ १३॥ वेदवेत्ताओंने जिस मण्डलका गान किया है और जो योगियोंदारा योग पथसे प्राप्य हैं ऐसे सबके जानने योग्य सीसूर्यस्वामीको मैं प्रणाम करता हूं। वह श्रेष्ठ श्रीभास्कर भगवान् हमको पवित्र करें ॥ १४ ॥ इति भाषाटीकासहितो गायत्रीमन्त्रार्थमास्करः समाप्तः ।

AM
पुस्तक मिलनेका पता-
बाबू बलदेव प्रसाद,
हाईकोर्ट वकील फैज
दूसरा पता-
खेमराज-श्रीकृष्णदास,
"भीवेङ्कटेश्वर" स्टील मेरे

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गायत्रीमन्त्रार्थभास्कर

Author
शर्मा, बाबूनन्दन
Title
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File name
गायत्रीमन्त्रार्थभास्कर
Text
OCR done
Citation
1917
Published
2009/03
Publisher
क्षेमराज श्रीकृष्णदास, बंबई
Language
Sanskrit
Pages
156
Library
Banasthali University
Classification
Literature
Keywords
गायत्री मन्त्र
DLI number
408443
Barcode
99999990064806.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
6bUHzp8PAwn
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