Adarsh Library, Jaipur
Meri Ankho Se
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मेरी आंखों से
श्रेष्ठ बंगला लेखकों की
चुनी हुई कहानियां
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मेरी आंखों से विमल मित्र, आशापूर्णा देवी, वनफूल, गजेन्द्र कुमार मित्र, दिव्येन्दु पालित, गिहिर आचार्य, सुनील गंगोपाध्याय, प्रयमनाप वीसी, प्राइभि राहा तथा समरेश वमु की उत्तृप्ट कहानियां
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क्रम
यनफूल, ज्योतिष
विमस मित्र मेरी माया से
माशापूर्णा देयो/प्राणों में प्रिय
३०
गजेन्द्रामार मित्र, गणतात्रिक
दिप्येन्दु पालित, गर
मिहिर प्राचापं गन वा रग साल
सुनीत गगोपाध्याय उस्ताद
प्रपमनाय योसो वया या विधाता के मन में
पाइभि राहा, यह एक विचित्र प्रयार ६८
समरेश यागहीद को मा
पिहानीरारो परिचय पृष्ट ९ गे]
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मेरी आंखों से
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भेरी आंखों से विमल मिन . . मेरी एक मादत से सभी परिचित हैं। निरन-निरते जब दिमाग गरायो जाने जमी पनुभूति होने मगती है सब मैं कलम रम गया पर निकल पड़ता है। जिग सड़क पर अधिक-गे-पधिक भीड़ हो, उग पर पूमने में ही मेरा दिमाग टदाता है। रास्ते में जितनी भी हो उतना ही मया है. उनमा तो मधिन मुझे यह महसूस होता है मानो में समुद्र , तिमी एवाल रिनारे पर पूग रहा। जो लोग एकान पाने के लिये पहाट गाने हैं या गपुर-किनारे जातं । ये गोग नही जानते कि निजनता मनुप्य का स्वाप्प मगर पता है जितनी एषात पोगी, मनुप्प सना हो पपिक गुदमो मेफर परेशान होगा। याद नही पामो पड़ा पा विमो का यह पपन पि. "The largest eaty is the lonthest place." मोनिय जय गाम के बा महक को भार-मार मना-मना पूम तुद र जनता का निष्कपट आचरण देखता हूं तो मुझे बहुत ही मजा पाता । उस वक्त कई घन्टों के लिये मैं खुद को भूल जाता हूं। अपनी पीड़ा भी स्मृत हो जाती है। मुझे लगता है मानो अब मैं इस संसार के नाट्य-मंच । अभिनेता नहीं, सिर्फ एक दर्शक मात्र हूं। को दर्शक समझने में जो पाराम मिलता है उसकी शायद तुलना नहीं की जा सकती। मेरी अपनी समस्याएं भी उस वक्त जैसे मेरी नहीं रहतीं । अपनी पीड़ा भी उस वक्त अपनी नहीं रहती। अगर एक ही वाक्य में कहूं तो उस वक्त मैं सभी का होता हूं, सभी मेरे होते हैं, फिर भी मैं अकेला रहता हूं। हां तो, इस वक्त दार्शनिक वातों को जाने दें। मैं दार्शनिक नहीं हूं । वल्कि, कवि भी नहीं हूं। वो सब होने में बहुत लफड़ा है । उससे तो अच्छा है कि मैं एक मनुप्य हूं। एक साधारण मनुष्य । इस अनुभूति में एक सांत्वना तो है। साधारण होकर ही मैंने इस पृथ्वी पर जन्म लिया है और साधारण मनुप्य के रूप में ही इस दुनियां से चला जाऊंगा । इस कामना में एक विशेष गैर-जिम्मेदारी एवं कर्तव्यहीन अलसता है जिसको भोगना, महमूस करना, मुझे बहुत अच्छा लगता है इसी तरह एक शाम को घूमते-घूमते एक जगह भीड़ देखकर मैं ठिठक गया। वह बड़े रास्ते का एक मोड़ था। सामने ही था थाना । मुझे लगा किसी प्रकार की कोई दुर्घटना हुई है । एक आदमी को घेरकर खड़े सभी लोग बहुत उत्तेजित थे। ऐसा लगता था कि उस व्यक्ति को सभी ने पकड़ रग्या है और उसे मार रहे हैं । लात, धूंसे, थप्पड़ । पता नहीं, किस अपराध की सजा दे रहे हैं उसे सब मिलकर । वेचारा आदमी कहने की कोशिश करता है कि वह बेकसूर है, लेकिन उसकी सुनता कोन है । उस आदमी के बगल में ही एक कार खड़ी है । एक व्यक्ति चिल्लाता है, 'देखते क्या हो, गाड़ी में आग लगा दो।' मुझे थोड़ा डर लगा, क्या सचमुच ही ये गाड़ी में आग लगा देंगे ? लेकिन नहीं, जनता में कुछ स्वस्थ मस्तिष्क के लोग भी थे। उन लोगों ने कहा, 'नहीं, नहीं, आग नहीं लगानी चाहिए। जव पुलिस मौजूद है तो सब कुछ पुलिस के हाथ में ही छोड़ दो।'
पुनिम मा एषः गिपाही भी पाग हो गड़ाया। पब उमने सय मामी को पर निपा, और पूधा, 'वोल, ड्राइवर रहां भाग गर, बोत?' रोनी-मी गुरन बनाकर यह प्रादमी चोला, 'मैं बुध नहीं जानता । सुन पोट दीजिये। 'प्रोहियेगा नहीं उसको। सिमी तरह भी नहीं छोड़ियेगा। बेटे पी पद मरह धुनाई करिये।' जिन्होंने गुमाई करने का मुभाष दिया पा ये लोग पहल में ही गुर भी अपने नरमक धुलाई कर रहे थे उग येचारे पो।रिमी नै उसके बाल मुट्ठी मे पर ग है, ना किसी ने उसकी गर्दन पकड़ रही है, तो किसी ने उसका गमा पद मा है, तो पिसी ने उसका कमौन पारकर फार दिया है। मैंने भी उचाकर देपा, उस व्यक्ति को हालन गोपनीय थी। भारत मच फट गये थें । नाक तया मुह मे पून निकरा रहा था। फिर भी गिगी थी महानुभूति नहीं थी उन पर । सिपाही ने उगों पर रगा पा मेरिन नान, पूमो तथा घाटों में बचाने की योशिश यह भी नहीं बरता था। यगम के एक व्यक्ति से मैंने पूछा, 'इग भादमी ने क्या अपराध पिया है ?' उस व्यक्ति ने बताया, 'इमने गाड़ी में एक मादमी पा एमीदेन्ट पर दिया है। मैंने पूपा, 'मायद यह गाड़ी का डाइपर है ?' ग पति ने कहा, 'नहीं मिस्टर, यह दावा नहीं है । जी गाड़ी मसा रहा पा यानी भाग गया है। यह परडा जाता तो अब ना उसरा पुरस्म निकाल दिया होता। प्रधा, 'लो क्या यह व्यक्ति गाडी रामानिर है" 'नहीं भर्ग, मानिक का पेहरा पा ऐमा हो होता है पर देश नहीं दे *. स्तिनी कीमती गाडी है। यह पादमी नो दाइपर पो बगल में बंटा हुमा पा। मापद हाइवर पा दोस्त है। दायर भाग गया है और यह भाग नही महा।' मैंने पूपा, को किर गर लोग मिलकर इमे यो मार रहे हैं ? इमरो मारने से क्या पाया?'
ल-बगल के सभी लोगों ने मुझ जलती निगाहों से देखा, मानो मेरी दलील मी को भी पसन्द नहीं आई। क सज्जन बोले, 'मिस्टर, इसीलिए तो आये दिन एक्सीडेन्ट होते रहते हैं । उन लोगों को सजा दिये बगैर एक्सीडेण्ट भी बन्द नहीं होंगे।' मियाही अभी तक उस आदमी से जिरह ही किये जा रहा था। पूछ रहा था 'बोल, कहां गया ड्राइवर ? उसका घर कहां है ?' प्रादमी बोल रहा था, 'मैं कुछ भी नहीं जानता। वह गाड़ी लिये जा र था, मेरा जान-पहचानवाला था, लेकिन उसका घर कहां है, मैं नहीं जानता।' घर कहां है, नहीं जानते ? मजाक समझा है क्या ? चल, थाने चल ।' कहकर सिपाही ने भी एक धौल उसकी पीठ पर जमा दी। बेचारे आदमी ने एक बार फिर कहने की कोशिश की, 'हुजूर, मुझे मारिये नन । नाम-पता मुझे मालूम होगा तभी तो बताऊंगा? 'तो, न पता वताएगा, न नाम बतायेगा? यह तो बहुत ही शैतान है। विना अच्छी तरह ठुकाई हुए कुछ उगलनेवाला नहीं है।' परकर फिर उस वेचारे को एक धील जमा दी। में खड़ा-बड़ा सब कुछ देखता रहा । यह कैसा न्याय है ? अपराध कोई करे- और दण्ड किसी को मिले ! मैंने एक वार विरोध करने का विचार किया। नोचा कि कहूं, आपलोग राम के अपराध में श्याम को सजा क्यों दे रहे हैं ? लेकिन उस वक्त मेरी वात कौन सुनता भला ! मैंने देखा कि सिपाही भी जनता के पक्ष में ही था। वह भी चाहता था कि उन आदमी को सजा मिले । कारण कुछ हो या न हो, पर एक व्यत्ति को सजा दे पा रहा है शायद यही उसकी पद-मर्यादा के लिये गौरव बात थी। नीः जितना ही ईधन जुटाती थी सिपाही उतना ही उत्तेजित-उल्लसित जा रहा था। श्रीक उसी वक्त एक घटना घटी। एक सज्जन ने हठात् वहां अपनी की। गाड़ी से उतरते ही वह वोले, 'अरे, यह गाड़ी तो मिस्टर मिस्टर दामगुप्त ? यात मेरे पानों में भी पड़ी । मि मेरे कानों में ही क्यों, वहां किन मनी से कानों में ही पड़ी। यात पुलिगिर के कार में भी को। उसने पूया, 'कोन दासगुप्त ?' ये मग्मन भीड़ को मारकर अब मिपाही को पार बढ़ गये। बोमे, 'मेरे भाई, यह गाही मिनिस्टर दी है। मिनिस्टर पानोपान्त सागपुण हो। होन मिनिस्टर । उनकी गाटी यहा कौन साया ? डावर महा गया?' इतनी देर बाद सिपाही को ममम, में यात मापी प्रा गरे चेहरे पर भर, भक्ति, प्रदा के भाव प्रस्फुटित हुए। बोला, 'हमारे होम मिनिस्टर को गाड़ी है? नो पहले क्यों नहीं बताया पाने में भी तो इतनी दी गयी कह रहा हूं कि यह ड्राइवर की गलती नहीं है।' जो लोग इतनी देर मे अग मादमी की मरम्मत करने के लिए उपर-पर पेये भी जरा प्रधाना गये। सिपाही ने भी की तरफ देशकर डाटा, 'यहा मममा यो कर रहे की सोग? भागो । जाप्रो पहा से। भाग बापो।' मोग दिन से हो गये। गिपाही की गट पाकर बुध मोग नो योर पी; गिर गये लेशिन उनमें बुध शाहगी लोग भी थे, ६ नहीं पिमरे । यो होम मिनिस्टर की गाड़ी है तो क्या था? होम मिनिष्टर हैं तो मनाया हो गये ? बुला मामो पपने होम मिनिस्टर रो, पभी होम मिनिस्टरों का मजा पगा देते है। भर सिपाही को जग गर्म होना पड़ा भार वह भी गा पा प्रचाना अपनी कमर से होगम निकालकर जोर से बना दी उगने । पोर माप ही पाने में दो-पार पाटेक्न नाठी एमाने हा दौड माय । म मैं रिवाल्वर गो हुई थी। मामा है यहा? रा हुमा, मई ?' पर गोगों ने गौर मयाना गुरू रिया तो उपर पुरिस ने राठी पुमाना। और पता नहीं पर गेद, परपर तपा मोराटर की बोतर पारि पिक - . पर वरसनी शुरू हो गया । .. जिधर भाग सका भागने लगा। झट-पट नड़क की वत्तियां बुझनी शुरू हो गई। कहां गई वह गाड़ी, और उस आदमी का क्या हुअा, मेरी बिल्कुल भी समझ में नहीं आया। चारों तरफ टीयरनौस छूटने की आवाज और धुंए से भरा वातावरण था । क्षण भर में ही वह जगह मानो युद्ध-क्षेत्र में बदल गयी। मैं भी वहां अधिक खड़ा नहीं रहा । चुप-चाप वहां से निकलकर अन्य इलाके की ओर चला गया जो बिल्कुल शान्त था। रा देते यहां तक तो सब ठीक ही था। ऐसी घटनाएं तो कलकत्ता महानगरी के लिए आम बात है । इस घटना को लेकर कहानी लिखना उचित नहीं। लेकिन कहानी बन गई । यह साधारण घटना ही दूसरे दिन सुबह कहानी बन गई। इमरे दिन सुवह अखवार में खवर थी: पिछली शाम को कुछ उपद्रवी लोगों द्वारा मुरारी-पुकुर थाने पर आक्रमण जाने के कारण पुलिस को उन पर गोली चलानी पड़ी।' घटना का आगे लिखा था, 'उस उपद्रवी दल को शक था कि, स्वराष्ट्र वी श्री काशीकान्त दासगुप्त की कार में बम है और इस शक के कारण स दल ने कार को रोक लिया। गाड़ी की तलाशी लेने के बाद जब कहीं कुछ नहीं मिला तो उपद्रवी गाड़ी में आग लगा देना चाहते थे कि आखिर पुलिस को वाध्य होकर गोली चलानी पड़ी । स्वराष्ट्र मंत्री श्री काशीकान्त दासगुप्त दिल्ली गये हुए हैं । उनको उक्त खबर ट्रककॉल द्वारा बता दी ग है। स्वराष्ट्र मंत्रालय के एक व्यक्ति के बताने पर तीन उपद्रवियों गिरफ्तार किया गया है । अभी तक किसी के हताहत होने का समाचार मिला है। जांच जारी है।'
प्राणों से प्रिय आशापूर्णा देवी ... O थाने, पुलिस प्रकार के घर, अस्पताल, आदि बहुत-सी जगहे जाने-माने, जाने- पाने, बहुत दुःय, बहुत कष्ट, कितनी ही जिरह, कितने ही अरमान पौर स्तिनी ही ग्लानि के एक दो दिन के महासमुद्र को पार कर जब शचिनाथ घर लौटे तब रात बहुत बीत चुकी थी। दिन भर की इस तकलीफ और परेशानी में कौन-कौन उनके साथ थे, यह शचिनाथ को इस समय याद नही पा रहा है। क्या भानजा निमाई भी था ? और छोटा माला निधु और मित्र देवेश' शायद वही लोग साथ प्राकर उसे पहुचा गये हैं ? या कि वे लोग भी यही रुक गये हैं ? क्या टैक्सी से सभी एकसाथ उतरे थे, और टॅक्सी साली लोट गई है ? या चिनाथ अकेला ही उतरा था, वाकी सब चले गये हैं ? शचिनाय ठीक तरह से याद नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन हठात् उन्हे लगा कि अगर वे लोग भी यहां उतरे होगे तो यह उनकी बहुत बड़ी गलती होगी।
उनको भी शामिनायी ही तरह प्यास लगी होगी। एक समुद्र को पूरी तरह सोल लेने जैसी पास ! इस घर में माहां है इतना पानी ! इसके अलावा, शायद उन्हें भूख भी लगी होगी। सुबह से ही तो शनिनाय के साथ गते फिर भी शचिनाप इस मुहूर्त याद नहीं कर पा रहे कि सनगुणगौन-कौन थे जनके साथ ? मानो पेट से गले तक पुल भरी पड़ी हो, ऐसा महसूस हो रहा था । भीतर से बहुत जोर की उधकाई उठ रही थी। माह, नाश, इस कमरे में एक सुराती पानी होता! पर यह कमरा शनिनाम का स्टसी-रूम भा। इस कमरे में सुराही या पा रहने का सवाल ही नहीं उठता। सीढ़ी चढ़ते-पढ़ते सीढ़ियों के बीच में बने नीनी प्रतवाले इसी नागरे में शनिनाम उहर गये थे; दो तल्ले तक नही गये। किस तरह जा सकते है ? नहीं लीला को होगी। । महो जाने पर उससे सामना-सामना करना पड़ेगा। भाग की बात है कि, सचिनाप के पास कोई था नहीं रहा है। शो नहीं जा रहा है ? उर से ? जिस डर से शमिनाथ दो तल्ले नहीं गया ? लेकिन, पाटिका तो पा सकता है? जसे किस बात का डर है ? पर ने एक लोकरे नोकर से पपिन तो कुछ नहीं पह। उसमें भला इतनी बुझिया चिन्ता याहाँ है जो सोनेगा नि, बायु के नागरे में भी नहीं जाना चाहिये ! बाबु का मन ठीक नहीं है ! शाना युतिमान होकर अगर फटिक धेयाम की तरह ही शवानर इस कमरे में गा जाय, तो भनिनाम उससे एक गिलास पानी मंगवा सकते थे। नि पान यह भी मूर्ग की तरह माम नहीं कर रहा है। भर पिनाएको पेट में ऐंठन हो रही है। भयानक ऐन हो रही है। शायद जामिनाथ होग हो जायेगा। माह, बेहोश होने से पहले अगर एक गिलास 'पानी मिल जाता। सिर्फ एक गिलास । ठण्डे पानी का भरा हुमा एक बडा गिलास। शचिनाय से थोड़ी ही दूर, दिल्कुल थोड़ी ही दूर वह इच्छित वस्तु है, बुद शचिनाथ के हो कमाये रुपयों से खरीदे फ्रिज के मन्दर। इसी समय उठकर, मिज खोलकर, चार बोतल निकालकर गटा-गट पी सकता है। लेकिन ऐसा करना क्या शोभनीय होगा। शचिनाथ ने सोचा। जवकि शचिनाथ को इस समय इतना भी ठीक से याद नहीं है कि दिन भर वे किसके साथ घूमते रहे हैं, किस-किसके साथ बातें करते रहे हैं, फिर भी उनके मन में यह बात पायी कि, "पया ऐसा करना शोभनीय होगा ?' गत रात जिसके बेटे का खून हुआ हो, दिन भर जिसको उस खून के सम्बन्ध में पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देते वीता हो, खुद अपनी ही नजरो से देवकर अपने ही बेटे की लाश की शिनाख्त करनी पडी हो, और यह रिपोर्ट लिखकर पाना पड़ा हो कि, 'हा, मेरा बेटा पार्थनाथ, उम्र वाईस वर्ष, पोस्ट-प्रेजुएट का छात्र, कल रात जब खाना खाने बैठ रहा था कि पता नहीं किसने उमे बाहर से ग्रावाज दी और उसको बुला ले गये। फिर, उसके बाद, वह नही लौटा। वही शादमी खुद अपने हाथ से फ्रिज मे से पानी लेकर पोयेगा ? छी: बी. ! ...और फिर वह दूसरी बात उस बात को अभी कोई नहीं जानता । अगर वह बात भी सामने आ गई, तब ?........ तब लोग क्या कहेगे शचिनाथ को' तो क्या किसी को बुलाकर ही शचिनाथ एक गिलास पानी मगाये लेकिन का ऐमा करना अच्छा लगेगा? पाश्चर्य की बात है, पार्थनाय की वे बडी-बड़ी पायें, विखरे-बिसरे वाल, बुद्धि-दीप्त युवा चेहरा, ऐसे पुत्र का गत रात खून हो गया है, और तब भी शचिनाय है कि बंठा-वठा मोच रहा है, क्या अच्छा लगेगा और क्या अच्छा नही लगेगा? लेकिन पानी तो चाहिए ही। शचिनाय मन को कड़ा करने की कोशिश करने लगे। विनाय फटिक को आवाज देने की कोशिश करने लगे पर नहीं, गले से आवाज ही नहीं निकल रही है। क्या गले को लकवा मार गया है ? या शचिनाय गूंगा हो गया है? अव क्या करे शचिनाथ ? - अब शचिनाथ मन-ही-मन प्रार्थना करने लगा कि कोई आ जाय इस कमरे में। और शायद सच्चे मन से की गयी प्रार्थना का असर भी होता है। इसलिये फटिक ही पाया । वह चोर की तरह दरवाजे पर पा खड़ा हुमा । शचिनाथ के हाथ मानो स्वर्ग लग गया। बोले, 'एक गिलास पानी ला।' फटिक ने झिझकते-झिझकते कहा, 'वुपा-मालकिन ने हाथ-मुंह धोकर कपड़े बदलने को कहा है। 'जो कहता हूं, वह कर ।' फिर शचिनाथ ने अचानक ही लड़के को धमकी दी, 'पानी ला ।' फटिक जल्दी-जल्दी वहां से चला गया। थोड़ी देर बाद ही फ्रिज खुलने की आवाज सुनाई दी। शचिनाथ को महसूस हुग्रा कि यह आवाज भी इतनी मधुर हो सकती है, इसका तो उनको ज्ञान ही नहीं था आज तक । फटिक हाथ में एक वोतल लिये वापस उनके पास और भी चोर की तरह प्रा खड़ा हुआ । बोला, 'गिलास तो मिल नहीं रहा है।' 'गिलास नहीं मिल रहा है ? अच्छा ही है ।' ठंडे पानी की वह बोतल शचिनाथ ने लगभग छीनते हुए ही लड़के के हाय से ले ली; और फिर वह पानी, सब कुछ शीतल करता हुमा, एक मरुभूमि के रास्ते से नीचे उतरने लगा। शचिनाथ ने सोचा-मन, प्राण, आत्मा, स्नेह, शोक, ये सभी मिथ्या हैं। सत्य कुछ है तो वह है शरीर । शरीर ही स्वामी है। शेष सभी तो सिर्फ दास हैं । अगर ऐसा नहीं होता तो पानी की धार गले में उड़ेलते ही ऐसा क्यों लगता कि सभी कप्टों से मुक्ति मिल गयी है ! खाली बोतल लौटा रहे थे कि लड़के का चेहरा उतरा हुआ-सा देखकर उन्होंने पूछा, 'शायद अभी तक तूने खाना नहीं खाया है ?' फटिक चौंक उठा। .
इस ममता भरे प्रश्न के लिये वह स्वप्न मे भी प्रस्तुत नहीं या इसीलिये उसने
चौंककर धीरे-से ना में सिर हिलाया ।
शचिनाथ ने फिर पूछा, 'शायद खाना नहीं बना है ?'
सबसे ऊपर शरीर का ही महत्व नहीं होता तो पानी पीने के साथ-साथ ही
क्या शाचिनाथ ऐसा एक प्रति स्वाभाविक प्रश्न पूछ सकते थे ?
फटिक ने रुलाई के आवेग को दबाते हुए कहा, 'मुबह भी माना नही
बना था।'
'श्रोह, तो आज घर में किसी ने भी नहीं खाया है ?'
'मैंने और रसोइये ने दोपहर मे मूडी खाई थी।'
शचिनाय ने चट् से पूछ ही लिया, 'और तुम्हारी मालकिन ?'
'मालकिन ?'
फटिक ने बड़े उत्साहित स्वर मे बताया, 'मालकिन ने तो पानी की वूद तक
ग्रहण नहीं की है। बुप्रा-मालकिन ने बर्फ डाला हुअा शरबत ले जाकर,
मिन्नत करके, पिलाना चाहा था लेकिन मालकिन ने गुस्से में वह शरवत नाली
में फेंक दिया।'
वर्फ डाला हुआ शरवत ! नाली में फेंक दिया ।
प्राचिनाय स्तब्ध रह गया।
शचिनाथ अाज अपनी ही नजरो मे बहुत क्षुद्र, दीन, हीन हो उठा । अव इसके
याद तो लीला के सामने जाने काविल ही नहीं रहा । तो क्या करे शचिनाय ?
पटिक को मना कर दे? कह दे कि, 'मैंने तुमसे पानी मागकर पीया था यह
किमी से नहीं कहना
इसका मतलब शचिनाथ और अधिक अकिंचन हो जाये ? और अधम हो
जाग ? नहीं।
नो क्या बात को योहा धुमाकर कहे कि, 'स्नान के पहले मैंने पानी पीया है.
मुनकर, तेरी बुप्रा-मालकिन गुस्सा होंगी, समझे ? इसलिए यह किसी से मत
पहना कि मैंने पानी पीया है।'
हा, इस तरह कहा जा सकता है।
!'
.
- इस तरह कहूंगा तो फटिक भी असली बात को पकड़ नहीं पायेगा। या फिर अगर यों कहूं कि- गत रात में शचिनाथ के बड़े लड़के का खून हो गया था और उस खून के जुर्म में शचिनाय का छोटा लड़का पकड़ा गया है । इसके बावजूद, शचिनाय अभी यहां बैठा-बैठा तिकड़म भिड़ा रहा है, सोच रहा है कि एक साधारण-सी झूठी बात को किस तरह से कहे कि वह सुनने में सच्ची और वाजिव लगे। शचिनाथ के बड़े लड़के की हत्या की बात तो बहुत लोग जानते हैं और अब तक वाकी सब ने भी जान ली होगी। हो सकता है, कल के अखबार में मोटे-मोटे अक्षरों में नाम देकर ही खवर छपे, लेकिन शचिनाथ के छोटे लड़के के बारे में अभी तक कोई नहीं जानता-सिवाय उन लोगों के जो दिन भर उसके साथ रहे थे। कौन हैं वे लोग? शचिनाथ का भानजा, साला, और मित्र ? यही न ? तो क्या वे लोग जगह-जगह यह कहानी सुनाते फिरेंगे ? कहेंगे, 'पुलिस आजकल बहुत ही मुस्तैद हो गई है । खून करने के साथ-साथ ही खूनी को पकड़ लिया। अब आणा होती है कि देश में शांति कायम हो जायेगी । भई, तीन-चार लड़के इस काम में एक साथ थे; सभी को भट् से पकड़ लिया। उन्हीं में शचिनाथ का छोटा लड़का शक्तिनाथ भी था, जिसकी उम्र है अट्ठारह साल । इसी वर्ष तो बी० ए० पार्ट वन की परीक्षा दी है उसने । शचिनाथ के बड़े लड़के के साथ जो कुछ हुआ वह तो जरा भी अविश्वास योग्य नहीं है क्योंकि वह शहर की नित्य की घटनाओं में से ही एक थी। लेकिन छोटे लड़केवाली बात ? क्या इससे अधिक अविश्वसनीय भी कोई खबर हो सकती है इस दुनिया में ? अतः इसी बात को लेकर शहर भर में चर्चा फैलेगी। तब यह खबर लीला के कानों में भी जायेगी। चिनाय का साला अपने भानजे की जमानत देना चाहता था। बहुत दौड़-धूप की थी, लेकिन इसके लिये पुलिस तैय्यार नहीं हुई। अगर पुलिस राजी हो जाती तो किसी तरह यह खबर लीला से छिपायी जा सकती थी, लेकिन अब इस खबर को किस प्रकार सजाये कि- : - फिर वही वातों को सजानेवाली तिकहम मोचने बैठ गया चिनाय ! उन्होने अवश्य यही कहा था, 'कही कोई गलतफहमी हुई है। ऐगा हो ही नहीं सकता ।' यह बात निमाई, निघु और देवेश ने कही थी, पर शचिनाय को ऐगा नही लगता । चिनाय सोचता है, कहीं कोई गलतफहमी नहीं हुई है । हालाकि, शचिनाय के छोटे लड़के शक्तिनाय के यहां होने की तिल भर भी समावना नहीं थी । बल्कि, शक्तिनाथ के तो उस समय कलकत्ता में होने की हो बात नही थी। शक्तिनाय एक छोटा गूटकेस लेकर परसों मुबह ही यह कहकर गया था कि 'चार-पाव दिन के लिये में कलकत्ता के बाहर जा रहा है। पम्मी में कल तक, क्या चार दिन पूरे हो गये ? हो सकता है, कही लौटते समय रास्ते में ही तो पुलिस ने उसे झूठ-मूठ हो-शायद निधु नै भी तो यही बहा था। शचिनाय ने उत्तर दिया था, 'महिपादल से लौटते समय बेहाला गस्तै में नहीं पटता है, निघु ।' हा, शनि परसों यही कहकर गया था कि महिपादल जा रहा है। बिना किमी काम के हो महिपादल जाने की बात सुनकर शचिनाय को प्रच्या नहीं लगा था । उन्होंने सोचा था, बहुत ज्यादा हाप के बाहर हुमा जा रहा है मड़या । बार की पॉकेट से साये मर्च करेगा पाप बन्दकर । लेकिन यह सब बातें इस जमाने के अन्य वालों की तरह विनाय ने भी मुह मोलकर वही नही। मचिनाय ने मिर्फ इतना पूटा था, 'अचानक ही कलाता यः बाहर जाने का उद्देश्य क्या है ? और क्या नाम है तुम्हारे गाय-स्थल का ?' जतिनाय ने पर्यटन की दृष्टि में किमी दगंनीय म्पल या नाम नहीं बताया; चन्धि मावेगनरे स्वर में ही बोला था, 'महिपादन का नाम कमी नहीं गुना प्रापन?' 'महिपादन का नाम भी नहीं मुना मैंने " प्रवार होकर गधिनाय ने बैंट के बालय को ही दोहराया। 'और क्या ?' कहकर मनिलाय मर-मर करता र कदमी में नीच उतर गया।
'वस हो गया न ?' लीला ने कहा, 'मन की निकल गई न ? गाल आगे करके थप्पड़ खानेवाली बात हुई न !' शचिनाथ उसी वक्त चिल्ला पड़े, 'इसका मतलब मुझे यह पूछने का भी हक नहीं है कि लड़का कहां जा रहा है ?' 'नहीं। कुछ भी पूछने का हक नहीं है । आजकल वह जमाना नहीं रहा ।' वह जमाना नहीं रहा, अतः शचिनाथ को चुप रह जाना पड़ा था, जबकि और सब बातों में जमाना ज्यों-का-त्यों था। - पार्थ जब वापस नहीं लौटा तो इस जमाने के अन्य सभी बापों की तरह शचिनाथ को भी रात बारह बजे तक पूरा कलकत्ता शहर छानना पड़ा था। ढूंढना पड़ा था अस्पतालों एवं थानों में । फिर वह भयानक खबर सुनने के बाद में तो मानो वेहद मानसिक यंत्रणा के बेड़े पर चढ़कर ही अगाध समुद्र जैसा एक दिन पारकर, और एक मरुभूमि साथ लेकर, लौटा था शचिनाय । लेकिन आजकल इन सब का कोई उपाय नहीं है। गत रात के नौ बजे से हुई अब तक की सारी घटनाओं को चित्र की तरह सजाने की कोशिश को शचिनाय ने । पार्थ पढ़ते-पढ़ते उठ आया था। बोला था, 'मां, मुझे भूख लगी है, खाना दो।' । पार्थ हमेशा ऐसा ही किया करता था। छोटेपन से ही उसकी आदत थी कि भूख लगने के बाद उसे एक मिनिट की देर भी सहन नहीं होती थी। लीला ने रसोइये को आवाज दी। ठीक उसी समय बाहर से किसी ने पार्थ को भी आवाज दी। फटिक ने पाकर कहा, 'बड़े भैय्या, आपको एक लड़का चुला रहा है।' 'लड़का बुला रहा है ?' लीला ने नाराज होकर कहा था, 'तव तो हो गया खाना !' एक भयानक और अशुभ क्षण में ही शायद वह अशुभ बात लीला के मुंह से निकली थी।
'तुम थाली परोसकर लायो न मा, मैं अभी पाया।' फहकर पार्थ गया था सो फिर नहीं लौटा। बहुत देर होती देखकर लीला ने कहा था, 'फटिक, जरा देखकर मा तो सडक पर खड़ा किससे बात कर रहा है लडका ?' फटिक ने अम्लान स्वर में कहा, 'सडक पर थोड़े ही खड़े हैं भया । वे तो उमो समय लड़कों के साथ चले गये थे।' चला गया ? खाना परोसने को कहकर चला गया ! लीला हांफती-सी मेरे पास आकर बोली थी, 'अजी, तुम जरा बाहर जाकर देखो न, पार्थ ने मुझसे खाना मांगा और अचानक पता नहीं बाहर से किसने पुकारा, उनके संग ही चला गया। मुझे बहुत चिन्ता हो रही है।' शचिनाथ ने कहा था, 'अोह, तो चिन्ता करने का जमाना नही गया अभी तक. लीला ने धिक्कारते हुए कहा, 'छो , ऐसे मौके पर तुम मुझसे बदला चुका रहे हो? तुम्हे शर्म नहीं आती ? कैसे वाप हो तुम !' "हां, तुम ठीक ही कहती हो।' शचिनाय उसी समय घर से निकत गया था। दुकानें तो सभी वन्द हो चुकी थी, सडक सुनसान पड़ी थी। शचिनाय का दिन किसी अज्ञात माशका से काप उठा था। मोहल्ले का जो भी व्यक्ति चिनाथ को दिखाई पडा उसी से पायं के बारे मे उन्होने पूछा। किसी ने कहा, नहीं, मैंने नहीं देखा । किसी ने कहा, हा, थोड़ी ही देर पहले एक लड़के के साथ जाते देखा था। उसके बाद २ उसके बाद बगल के पडौसी भवेशबाबू के घर से फोन करने शुरू किये थे याद प्राता है, फोन-पर-फोन करते गये थे वे। और उसके बाद ? नहीं, उसके बाद कुछ भी याद नही । सब कुछ धुघला हो जाता है । याद नहीं कर पा रहे हैं कि कब पुलिस ने प्राकर पूछ-ताछ की थी, 'मापका एक लडका भोर भी तो है न? क्या नाम है उसका ? कितनी उम्न है ।' याद नहीं कर पा रहे हैं कि कब निधु ने प्राकर कहा था, 'हा, मैं उनलोगो के साथ जाकर अपनी आंख से देख पाया हूं। शक्ति ही है ।' सिर्फ इतना याद है कि अभी थोड़ी देर पहले लौटते समय निधु ने कहा था, 'जरूर कहीं कोई गलतफहमी हुई है। नहीं तो ऐसा हो ही नहीं सकता । असंभव । हो सकता है, वह वहां से जल्दी ही लौट आया हो और रास्ते में- और जवाव में शचिनाथ ने कहा था, 'बेहाला तो महिपादल से लौटने के मार्ग में प्राता नहीं है, निधु ।' उराके बाद फिर सब धुंधला हो जाता है । चया उनलोगों ने हाथ पकड़कर पाचिनाथ को इस सोफे पर लाकर बैठा दिया है ? हठात् ही उनको याद पाया कि फटिक नामक भूव का मारा लड़का लाज सिर्फ मूड़ी खाकर ही रह गया है । फिर हठात् ही यह याद पाया कि सुषमा ने वर्फ डालकर शरबत बनाया था और लीला को पिलाने के लिये मिन्नतें कर रही थी कि लीला ने उस मूल्यवान वस्तु को नाली में फेंक दिया। काश कि वही चीज इस वक्त कोई शचिनाथ को लाकर देता ! शचिनाथ के दिमाग पर फिर कुहरा-सा छा गया। लेकिन शचिनाथ के पास कोई भी नहीं आ रहा है, जबकि सुपमा शचिनाथ की ही बहन है। इसका मतलब, लीला की अपेक्षा वे लोग शचिनाथ से अधिक डरते हैं। इसका मानव, उन्होंने दूसरी खबर भी सुन ली है। लेकिन लीला ? कहीं उसे भी नहीं गुना दी हो वह गावर ! ऐसा वे लोग कर सकते हैं भला ? वे भी तो मनुष्य है । या पापाण है ? 'बाबू, युग्रा-मालकिन ने नहलाया है कि चाय का पानी रख दिया है, अतः पाप नहा लीजिगे।' 'माग का पानी ?" हटान ही मानो शचिनाय को दो तल्ले पर जाने का एक सहारा मिल गया हो । जो जगह उनको इतनी देर से तीर रही थी यहां सिर्फ इसलिये नहीं -
गये कि अनजाने में ही सीढ़ियों के बीच बने कमरे में वे ठहर गये थे। बम
इमी लज्जावश वह अब तक पर नहीं गये थे।
अब शचिनाय ने बाकी बची सीढियों को पार किया और मापुट म्यर में
चिल्लाये, क्यों ? मेरे लिए चाय का पानी क्यों रखा ? मैं यूर जीतन होगर
लौटा हैन! इसीलिये मुझे वर्फ डालकर शरबत-वरवत देने की जरम नहीं
समझी। क्यो
अपनी अावाज अपने ही कानों में बहुत भद्दी और बेगुरी नगी चिनायो।
सुषमा को भी लगी।
फिर भी रवर तो था ।
स्वर जिससे सहारा मिलता है।
स्तब्धता भयकर होती है । शब्दहीनता प्रेत की तरह गला दबाने को पानी
है । मुपमा अपने बड़े भाई की ग्रावाज मुनकार हिम्मत कर पागे बदी,
स्वर में बोली, 'रात हो गई है न, इमीलिये-~-
'है, इसीलिये ! तो इसका मतलब है कि दिन भर मेरे गले में कोई जान
जन ही दालता रहा है न
सुषमा ने मानो अपने भाई के मूदते गले को महम्म किया, बोडी, "पी
लाती हूं।'
मुषमा ने और नी एक बात पट्टी, बहुत ही अन्ट म्दा है, " बार की
दान दनि रही थी कि वे लोग भी दार होता रद है।'
दे लोग वोट.
देनोगमदद
प्रोह ! निमाई, निषु और देवेन ?
नी वे निनाय को मारकर चने नहीं कहा, मैं, की
पी है। ही मादा है, रात का दाना नीदेवही मी, मा
में नीरन बनेगा!
टात् चिनाय को रिपटिका चेहरा माद प्रा राग यादी
पटना
.
ताज्जुब की बात है ! शचिनाथ क्या पत्थर का बना हुआ है ? शचिनाथ के एक लड़के का खून हो गया जो इस समय मुर्दाघर में पड़ा हुआ है, दूसरे को खून के जुर्म में थाने में बन्द करके रखा गया है, और इधर शचिनाथ है कि फटिक के खाने की बात को लेकर चिन्ता कर रहा है ? उस फटिक को लेकर जो घर का एक अकिंचन नौकर मात्र है। 'मैया! . शरवत से भरा हुअा कांच का बड़ा गिलास हाथ में लिये सुपमा खड़ी थी। एक बार तो शचिनाथ की इच्छा हुई कि गिलास पर टूट पड़े, लेकिन सब जगह कुहरा छा जाने पर भी मस्तिष्क का एकाध कोना अभी भी बहुत साफ था । अतः शचिनाथ को ख्याल आया कि लीला के बारे में पूछने का यह अच्छा सुअवसर है। लीला के पास पहुंचने का भी यही स्वर्ण अवसर है। इसीलिये हाथ न बढ़ाकर उन्होंने पूछा, 'भाभी ने कुछ खाया-पीया कि नहीं ?' भाभी से उनका मतलब अवश्य ही 'तुम्हारी भाभी' से था। सुपमा को मन-ही-मन जोर की हंसी आई, लेकिन ऊपर से बहुत ही मरी-सी आवाज में, मानो वही अपराधिनी हो, वोली, 'मैं तो कह-कहकर हार गई नाराज होती हैं।' 'नाराज होने का मतलब ? नाराज होने की क्या बात है ?' कहकर मानो स्वयं भी गुस्से में भरकर बड़बड़ाते हुए अपने शयन-कक्ष में घुस गया शचिनाथ । कल से जिस कमरे को ग्रांख से देखा तक नहीं था, उसी कमरे में शचिनाथ इसलिये गुस्से का दिखावा कर बड़बड़ाता हुआ घुस गया था कि शायद इस गुस्से के बहाने ही पत्नी से कुछ-न-कुछ बोलना तो सहज हो जायेगा। लेकिन कमरे में घुसते ही सचमुच के गुस्से से शचिनाथ की समस्त स्नायु- शिराय दप-दप कर सुलग उठीं । शचिनाथ का मन हुअा कि चीखकर कहे, 'पोह, तभी ! तभी तुम्हें इतनी विलासिता सूझती है ! शरबत का गिलास नाली में फेंक देने की विलासिता ! लेकिन इच्छा होने से ही तो सब बातें कही नहीं जा सकतीं। पृथ्वी की चरम अविश्वसनीय घटना के कारण सब कुछ उलट-पलट हो जाने पर भी 'क्या अच्छा लगेगा और क्या अच्छा नहीं लगेगा' का भेद तो कभी नहीं मिटेगा।
इसीलिये अपनी चोख पड़ने को इच्छा को शचिनाय ने रोक लिया । भीतर जल रही पाग को नियंत्रित करने की कोशिश करने लगा। पर इतना बड़ा ढोंग देसकर क्या वैसा करना सम्भव था ? सिर्फ डोग ही नही, अश्लीलता। शचिनाय का शयन-कक्ष अभी भी पहले की ही तरह सजा हुम्रा है। उसी तरह खूबसूरत रंगीन चदर विद्या पलङ्ग । उसी तरह किताबों की रैक पर सजी हुई छोटी-छोटी गुड़ियों की कतार । मेज पर टाइम-पीस के पास कांच के दो पक्षी । सामने दीवार पर झूलता लीला द्वारा अपने बचपन में कार्पेट पर सुना प्राकृतिक दृश्य । काच की अलमारी में करीने से सजी, लीला द्वारा संचित की हुई बहुविध शौकीनी और सजावट की चीजें । सभी बातें तो ज्यों-की-त्यों, हमेशा की तरह, ठीक-ठीक हैं । कही कुछ भी तो अस्त-व्यस्त या इधर-उधर बिखरा हुआ नहीं है। और ठीक पहले की ही तरह, हमेशा की ही तरह, फुल स्पीड में सिर पर पंसा चनाये और स्वच्छ धुली हुई साड़ी पहने लेटी हुई है लीला। इतनी अस्वाभाविकता कसे सहन की जा सकती है हालाकि दरअसल इसमे अस्वाभाविकता की कोई यात नहीं थी। अगर कोई प्राकस्मिक दुर्घटना घट जाय, तो क्या व्यक्ति घर-गृहस्थी को उजाड़ कर, सब कुछ तहस-नहस कर डालता है ? मोने की जगह सोता नहीं ? कि बैठने जगह चंटता नहीं ? कि पहनने के कपड़ो मे धूल-मिट्टी रगड़कर उन्हें मला कर डालता है ? शचिनाय ने यह युक्ति-सगत यात क्यो नहीं सोची ? शचिनाथ की पाखो के समक्ष कल रात से लेकर अाज दिन-भर का अजन्य घृणित, कुत्सित, वीभत्स दृश्य तर उठा । सचिनाय के पेट में फिर उबकाई जोर मारने लगी। शचिनाय ने यश और टूटे हुए शब्दो में कहा, 'शरबत क्यों नहीं पीया तुमने ?' यही तो बहना चाहता था चिनाय । यही रहने के लिये तो वह गुस्से का दिखावा करके इस कमरे में प्राया था। लेविन क्या इसी तरह से बोलना भी 7 चाहा था उसने?
- न्दीला ने शचिनाथ से यह बात सुनने की उम्मीद नहीं की थी। वह उठकर बैठ गई, और बोली, 'तुम भी यही बात कहते हो !' 'यहूंगा क्यों नहीं ? आखिर खाये-पिये बिना तो काम चलने से रहा । अभी ना करोगी तो फिर मांगकर खाना-पीना पड़ेगा। मरुभूमि की वालू से तो पेट की भूख-प्यास बुझ नहीं जायेगी !' लीला को लगा कि शचिनाथ अभी भी अपना वही वदला ले रहा है । वह अपने अन्तर की तीव्र, तीक्ष्ण रुलाई के आवेग को सम्हाल नहीं सकी। हिंच- कियां बंध गयीं । रोते-रोते बोली, 'मेरा पार्थ खाना मांगकर भी विना खाये चला गया, लौटकर नहीं आया और मैं खुद खा लूं ? जब तक तुम लोग उस बनी शैतान को पकड़कर दण्ड नहीं दिलवाते, तब तक मैं-' शचिनाथ के हृदय में फिर वही आंग सुलग उठी । शचिनाय ने सोचा, इसी क्षण इसकी शोक की इस विलासिता को वह मिटा सकता है, वह अस्त्र उसके हाथ में ही मौजूद है। जबकि थोड़ी ही देर पहले तक वह बातों को इस तरह सजा-संवार रहा था कि किसी तरह भी वह दूसरी वात लीला के कानों तक न पहुंचे। इनका मतलब, पूरी स्पीड में चलते पंखे के नीचे साफ-सुथरी साड़ी पहने सोई नीला को देखकर उसे ईर्ष्या हुई ! कभी वह इसी लीला को 'प्रारणों से प्रिय' नन्योधन से पत्र लिखा करता था, यह बात भी इस समय भूल गया। किर भी शचिनाथ ने चीख-चिल्लाकर कुछ नहीं कहा । वल्कि, शान्त स्वर में ही कहा, 'उसको दण्ड मिलने से क्या पार्थ लौट आयेगा ?' 'जानती हूं । जानती हूं। वह लोट नहीं आयेगा, जानती हूं।' लीला उन्मादित मां-बों से देखती हुई बोली, 'फिर भी मेरे कलेजे की यह अग्नि तो ठंढी हो जायेगी।' 'जहर ठंढी हो जायेगी !' शचिनाथ ने व्यंग्यपूर्वक कहा, 'तव तो तुम्हें वह बार मुनानी ही पड़ेगी । तो सुनो, उस शैतान को ढूंढने की आवश्यकता नहीं है । वह पकड़ा गया है।' 'पकड़ा गया है ? पकड़ा गया है वह ? कहां है ? कहां है वह ?' हागत में।' . ।
'हाजत मे ? तुम देस आये हो उसे ? पूछा था कि पार्थ ने उसका क्या
विगाड़ा था ?'
'नहीं पूछा।
'नहीं पूया?' लीला विलविला उठी, 'कंसा पत्थर दिल पाया जी तुमने ?
मुझे ले चलो। मैं जाकर देखूगी उसे ।'
'देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मानो चिनाय किमी दर्शनीय वस्तु को देस
रहा हो, इस तरह पाहिस्ते-प्राहिस्ते, संभाल-मंभालकर कहा उसने, 'बहुत देव
पुकी हो उसे ।'
'बहुत देस चुकी हू !'
अचानक लीला भयभीत हो जाती है । बहुत ही भयभीत । लीला की लाई
रुक जाती है । लीला के गले से एक अस्फट शब्द निकलता है, 'कौन ?'
"तेरा छोटा बेटा!'
ज्योतिष वन फूल . . । - ज्योतिप के पाने की बात थी। मैं सूटकेस सजाकर उसके इन्तजार में बैठा है। करीव महीने भर पहले हम दोनों का कश्मीर जाने का प्रोग्राम बना था । खुद उसी ने यह प्रस्ताव मेरे सामने रखा था । बोला था, 'भाई परेश, अव तो कलकत्ता जरा भी अच्छा नहीं लगता है। बम-बाजी और राजनीति, सस्ते नाटक और फालतू सिनेमा, घेराव-स्ट्राइक और हमले-मेरा तो दम घुटा जा रहा है, भाई । चल नहीं भाग चलें। कश्मीर चलेगा ? इन दिनों मंजुलि भी कश्मीर में ही है। रहने की कोई असुविधा नहीं होगी। मंजुलि के पिता वहां बड़े अफसर हैं। उन्होंने मुझे निमंत्रण भी दिया है । चल, कश्मीर ही चला जाय ।' परसों ज्योतिप ने ही रिजर्वेशन के दो टिकट खरीदकर मुझे दिये थे और कहा था कि प्राण ठीक समय पर वह टैक्सी लेकर पा जायेगा। मैं दाढ़ी बनाकर, नूटनेस सजाकर बैठा था, पर ज्योतिष का कोई पता नहीं था। ज्योतिष गवर्नमेन्ट पलट में एक कमरा लेकर रहता है। उसके यहां फोन भी है। मैंने उसे फोन किया पर फोन बजता ही रहा । इसका मतलब, वह घर में नहीं है। ट्रेन का समय हो गया। फिर भी वह नहीं माया। एक बार फिर फोन रिया, तब भी फोन बजता ही रहा । जरूर घर पर नहीं है। दोनों टिकट मेरे ही पास थीं। एक टक्सी बुलवाकर में अकेला ही स्टेशन चला गया । सोचा, शायद वह स्टेशन पर ही मेरा इन्तजार कर रहा हो। लेकिन नहीं । वह स्टेशन पर भी नहीं था। वही देन ही न छूट जाय । दो बार समूचे स्टेशन के चकार लगाये, अच्छी तरह खोजा, पर नहीं मिला। चाहता तो मैं अकेला ही वश्मीर जा सकता था पर उसको छोड़कर जाना क्या उचित था? मैं नहीं गया । स्टेशन से ही उसकै फ्लंट पर पहुचा । देखा, उसके कमरे में ताला लगा हुप्रा था । कहा गया, यह कोई नहीं बता सका । कलकत्ता शहर में कोई किसी की सबर नहीं रखता । यहा तक कि बगल के कमरे में रहनेवाला भी नहीं। मैं भी एक गवनं मन्द फ्लंट में ही एक कमरा लेकर रहता हूं। मेरे पास भी फोन है। घर पाकर फिर एक बार ज्योतिष को फोन करता हूं। पर फोन बजता ही रहा लगातार । ज्योतिप घर में नहीं है। मामला क्या है ? D मैं हडबड़ाकर बिस्तर पर उठ बैठता है। सा-पीकर मैं सो गया था। मेरा फोन बज रहा है। 'हैलो, कौन ?' 'मैं, ज्योतिप।' 'अरे तुम, यार मामला क्या है ?' "भई, मैं तो चला भाया हूँ यहा" 'कहा ? कश्मीर प्लेन से ? मुझे छोड़कर चला गया बहुत ताग्जुब की बात है !' 'तुम्हें लाना मंभव नहीं था । बडा अद्भुत है यह देश ।' 'बहुत ही खूबसूरत सीनरी है न ? कश्मीर तो पृथ्वी का स्वर्ग है । सीनरी तो अच्छी होगी ही । लेकिन मुझे छोड़कर चला गया तू !" 'नहीं। मैं सौनरी नहीं देख रहा है। यह एक अद्भुत देश है।
पहल यहां पाया तब देखा कि चारों तरफ निर्जन और उजाड़ है । कहीं कोई नहीं है। विराट देश, विराट आकाश, विराट मैदान, विराट दिगन्त लेकिन कहीं कोई नहीं है । मैं पैदल चलने लगा। थोड़ी दूर पैदल चलने पर देखता हूं कि लोगों का एक झुंड मेरी तरफ दौड़ा आ रहा है। मैं डर गया लेकिन भाग नहीं सका। चारों तरफ खुली जगह थी। छिपने का कोई स्थान नजर नहीं आया। वे लोग मेरे पास आकर पूछने लगे, 'आप बंगाली हैं ?' मैंने कहा, 'हां ।' उन्होंने कहा, 'तब प्राइये हमारे साथ । हमलोग मुक्तिवाहिनी के लोग हैं । पाकिस्तानी फौज को मार भगायेंगे। वे लोग यहां भी पहुंच गये हैं पर यहां भी उन्हें टिकने नहीं देंगे। यहां से भी मार भगायेंगे उनको । आप आइये हमारे साथ ।' उनमें से किसी के हाथ में दाव, किसी के कुदाल, किसी के बन्दूक, किसी के तलवार, किसी के लाठी आदि हथियार थे। किसी के हाथ में कुछ भी नहीं था। जिनके हाथ में कुछ भी नहीं था वे कह रहे थे, 'हमारे पास हमारे दांत हैं, नाखून हैं, मन की ताकत है, हायों के मुक्के हैं तथा लातों की मार है। आप भी चलिये हमारे साथ । चलिये, चलिये। और देर करने का समय नहीं है।' मुझे वे हाथ पकड़कर खींचने लगे। आखिर मैं भी उनके दल के साथ हो लिया। उनके साथ दौड़ने लगा। दौड़ते-दौड़ते ही मैंने पूछा, 'कितनी दूर है पाक सेना ? हम कहां जा रहे हैं ?' उन्होंने कहा, 'जा रहे हैं हमारे नेता के पास । वे ही हमें बतायेंगे कि कहां, किस तरह आक्रमण करना है ।' थोड़ी दूर और जाने पर एक ज्योतिर्मय-लोक में पहुंच गये। चारों तरफ रोशनी-ही- रोगनी। सबसे पहले मुझे नजर पाया एक बहुत ही बलिष्ठ व्यक्ति जो घोड़े पर बैठा हमलोगों की तरफ ही देख रहा था । उन्होंने कहा, 'वह देखिये, हमारा शेर यतिन । उसके पीछे बुदीराम । उसकी बांयी तरफ सूर्य सेन । उसके सामने विनय । उस टीले पर खड़ा है दिनेश । इधर बादल । वारिन दा भी खड़े हैं वांयी तरफ । वो देखिये बहुत दूर श्री अरविन्द हैं । पुलिन दास है, उसके पास कन्हाई है । उसके पास-' मैंने कहा, 'पर भई, वे तो सब मर चुके हैं !' 'मैं भी मर चुका हूं और मेरी मृत देह यादवपुर की एक नाली में पड़ी है।' 'तुम किस तरह मरे ?' - - ३२
"पाइपगन की गोली से।'
किसने मारा तुम्हें ?
'किसने मारा यह जानता हूं पर उसका नाम नहीं बताऊंगा । वह मेरा दोस्त
है । अपनी भूल वह खुद ही वाद में महसूस करेगा । मैं-'
उसका गला भर पाया।
अचानक उधर से फोन की लाइन कट गयी।
'हैलो, हैलो!'
पर कोई जवाब नहीं मिला।
गणतांत्रिक गजेन्द्रकुमार मित्र नहीं, खाने-पीने का तो आजकल कोई सवला ही नहीं उठता । वो दिन गये। विमल के पिता बताया करते हैं कि पहले के दिनों में म्युनिसिपलिटी के इलेक्शन आते ही लड़कों के चाय-नाश्तों से उनकी मां-मौसियों को छुटकारा मिल जाता था। एक महीने से भी अधिक, कभी-कभी तो दो-तीन महीने बोट लेने के दिन का तो कहना ही क्या ? प्रत्येक बूथ के मास-पास उम्मीद- वारों के कैम्प लगते । वहां टोकरो-के-टोकरे पूड़ी तथा बुदिया और गमले भर-भरकर मालू की सब्जी राव से ही पानी शुरू हो जाती थी। कौन-कौन सा रहे हैं, कितना सा रहे हैं, कौन-से प्रार्षी के वालंटियर किसके कप में खा रहै हैं, जो लोग खा रहे हैं वे सभी बालंटियर ही हैं कि नहीं, यह सब देखने की किसी को फुरसत नहीं होती थी। अब सब कुछ बदल गया है। प्राज-कल तो चाय और विस्कुट ही इष्ट-देवता हो रहे हैं । जो भी मिल जाय, उसी से काम चलाना पड़ता है । बहुत बार तो बिस्कुट भी अच्छी कम्पनी के नही होते । 'विशुद्ध ब्राह्मण की दुकान' के बिस्कुट तो कभी-कभी ही नसीब हो पाते हैं । जो दो-एक बहुत विश्वस्त वालंटियर होते हैं उनको चुपचाप घर ले जाकर खिलाया जाता है अव तो । यहा तक कि सास इलेक्शन के दिन भी (माजकल तो घर-पकड होती है, मतलव दो दिन पहले से ही कनवासिंग बन्द करनी पड़ती है । बूथ से एक सौ गज की दूरी तक उम्मीदवारो को कैप लगाने की भी मनाही है) पहले की तरह तली हुई पूडिया और मास की बात तो दूर, पालू की सब्जी तक का इन्तजाम नहीं होता। कूपन दे दिया जाता है जिससे कि मोहल्ले की गय-दुकान में जाकर सिर्फ चाय और टोस्ट से सकते हैं। अब तो निर्वाचन का अधिकतर काम पार्टी के हाथ में होता है । पार्टी के वालटियर ही मेहनत करते हैं, वे संख्या में भी बहुत होते हैं, प्रत उन सभी को खिलाना-पिलाना सभव नहीं होता। नहीं, पर वह माकर्षण तया लालच नहीं रहा । निर्वाचन के याद जीतने पर अवश्य ही कोई-कोई उम्मीदवार अपने खचं से कुछ सास पनिष्ट व्यक्तियों को पिलाते हैं लेकिन किसी-किसी पार्टी के विधान में तो वह भी निपिट होगा है । विमल के ताऊ कहा करते हैं, नौबतखाने में तूती को आवाज को बहावत मुनी है न? प्राज-कल किसी भी उम्मीदवार के लिये काम करना वैसा ही है । सारी-सारी रात जागकर दीवारों पर लिसना मोर पोस्टर चिपकाना, हर शाम को जुलूस निकालना, गला फाड़कर नारे लगाना, फिर उन नारों का अनुसरण करना, मौर वापस कप में लौटने पर मिलते हैं सिर्फ चाय-विस्पुट - .. या फिर चाय-टोस्ट । पूड़ी, आलू की सब्जी और बुन्दिया तो एकदम स्वप्न की सी बात लगती है। विमल इस घर का खाकर उस घर की रखवाली करनेवालों में से नहीं है। किसी एक पार्टी के नाम के साथ जुड़ना भी पसन्द नहीं है । वह चाहता है-- चाहे इसके लिए कितने भी प्रयत्न क्यों न करने पड़ें-उन सभी को कुछ-न- कुछ प्रोग्लाइज्ड करके रखे । यानी उन तीनों ही मुख्य प्रार्थियों को जिनको हिन्दी में 'उम्मीदवार' कहा जाता है । यह काम उतना सहज नहीं है, यह वह अच्छी तरह जानता है। और यही कारण है कि इसमें उसे इतना उत्साह महसूस होता है । दोपहर को प्रदीप सरकार के घर जाकर बोल पायेगा, 'नहीं माटू दा । मैं आपके जुलूस में नारे लगाने के लिये नहीं जाऊगा । चाहे आप नाराज हों या मुझ पर गुस्सा हो करो । क्योंकि मुझे लगता है, अलग रहकर मैं उससे बहुत बड़ा तथा बहुत महत्वपूर्ण कुछ कर सकूगा । मैं निर्मल माइति के कैप में बराबर आता-जाती रहता हूं। वे जानते हैं कि मैं उनका खास सपोर्टर हूं, अत: दिल खोलकर मुझसे सारी बातें करते हैं । वे सब वातें, यानी इलेक्शन के लिये उनकी क्या टैक्टिक्स हैं, बीच-बीच में अगर आपको बताता रहा तो उसी में आपका अधिक लाभ होगा। लेकिन प्रदीप सरकार भी घाघ प्रकृति का व्यक्ति था। उन्होंने भौंहों में वल डालकर कहा, 'तभी हमारे कैम्प में आते-जाते हो और हमारी बात उन्हें बताते हो जाकर ! कौन-सी बात सच है ?' विमल जरा- सा भी विचलित नहीं हुग्रा । साहित्यिक भाषा में अगर कहा जाय तो उसके चेहरे की रेखाओं में तिल भर भी कम्पन नहीं दिखा । हंसकर ही जवाब दिया उसने, 'अच्छी बात है। अगर आपको यही शक है, तो एक बार परीक्षा लेकर देख लीजिये । यह काम और किसी के लिये मुश्किल हो सकता है, लेकिन आपके लिये नहीं। और मेरे क्या दो सिर हैं जो आपके साथ ऐसी चेईमानी करूंगा? ऐसा करने का परिणाम क्या मैं नहीं जानता ? या चारों ओर की घटनाओं से मैं अनभिज्ञ हूं?' 'प्रदीप सरकार आश्वस्त हो जाते हैं, तथा सस्नेह विमल की पीठ थपथपाते हैं। निर्मल माइति भी ग्राश्वस्त हो जाते हैं। 'निमल से वह नहता, 'मैं आपके पास पाकर आपका काम नहीं कर रहा इससे चुरा न मानियेगा, हावू दा । यह न सोच बैठना कि मैं उस दल का ग्रादमी हूं। - प्रकट रूप से यहा काम करने पर ये लोग सतर्क हो जायेंगे। फिर तो मुझे. उनकी एक भी सबर हाय नहीं लगेगी । अभी तो वे मुझमे दिल सोलकर बात करते हैं। कोई खाम सवर मिलते ही यानी इस चुनाव में उनकी बया- क्या ट्रिक्म है इसका पता लगते ही आपको बता दूंगा। इमी मे प्रापका अधिक दित होगा।' तब निर्मल माइति ने उसे चमगादड़ को कहानी सुनायी थी । वह इस प्रकार थी, 'एक बार पृथ्वी के सभी पशुमा एव पक्षियों में युद्ध छिड़ गया । बहुत जोर की लहाई छिड गई थी परस्पर । दोनों दल में से बहुत हताहत हुए। लेकिन चमगादह ने अपनी सुरक्षा का अच्छा उपाय टूह निकाला था । एक तरफ तो उसके पख हैं, वह आकाश में उड़ता है, इसलिए पक्षी है। दूसरी तरफ वह स्तनपायी जीव है तथा अण्डे भी नहीं देता, प्रत. वह पशु है। दर. असल वह पशु है या पक्षी, यह समझना मुश्किल है । इसी समस्या और बेनिफिट ऑफ डाउट के सुअवसर का लाभ उठाया चमगादड़ ने । जव पक्षी हारते तव वह पशुओं के पास जाकर कहता, 'मैं तो तुम्हारे ही दल का एक सदस्य हूं। मैं पक्षी थोडे ही है। हा, पस हैं मेरे लेकिन जुड़े हुए हैं । अन्य परियो जैसे नहीं हैं । और फिर हम तो मा का दूध पीकर बडे होते हैं। प्रत. हमारे पशु होने में तो दो मत हो ही नहीं सकते।' और जब देखता कि पशुमो की हानत पतली हो रही है तब सीधा पक्षियों के पास चकर यहता, "मई, हम आकाश में उड़ते हैं, पेड़ पर वास करते हैं । जन्तु नाम का हमारा कोई सवधी भी हो, ऐमा सुना है क्या मापने कभी ?' इसी तरह दोनों दलों को घोसा देकर दुद का बचाव कर रहा था वह, लेकिन एक दिन जय दोनो का झगडा खत्म हो गया, मापम मे सन्धि हो गई तब दोनों दलो ने ही चमगादड या यहिष्कार कर दिया । उसकी चालाकी को दोनो पक्षो ने पकड लिया था। अब वह जमीन पर उतरता तो पशु नागून और दातो से उम पर माश्रमण परने और प्राकाश में उड़ने पर पक्षी चोच मारते । इमीलिये चमगाद दिन में किसी उजाह, सूने मंडहर मे दुवका रहता है। दिन में वह बाहर नही निकलता । रात को सब के सो जाने के बाद सुपके से बाहर निकलता है और मनुष्य के वाम में फल-फूल चोरी करके साता है।' यह कहानी सुनने के बाद भी विमल के चेहरे की एक रेषा तक नहीं करती है । वह उसी तरह हसकर कहता है, 'ठीक ही तो है, पापलोगों के हायों यह परिणाम तो निश्चित हो ही गया है, हाबू दा। नाखून और दांत की क्या बात है, उनसे फिर भी बचा जा सकता है, आपलोगों के पास तो पाइपगन, पिस्तौल, छरा आदि भी मौजूद हैं । चमगादड़ को दंड देने में देर ही कितनी लगेगी ?' इसके वाद निर्मल माइति के लिए उससे हैण्ड-शेक करने के अलावा कोई चारा ही नहीं था। इन सब में तृतीय उम्मीदवार ही कुछ दुर्वल था । वह था हरीश भण्डारी । दुर्वल का मतलब अहिंसक दल का उम्मीदवार । उनके न नाखून तेज हैं न दांत, यहां तक कि वे अपनी अांखें भी वन्द ही रखते हैं । फिर भी बैलेट. वॉक्स का रहस्य कौन समझ पाया है ? यही सोचकर विमल उसे भी कभी- कभार चुपके से मौहल्ले की गतिविधि से वाकिफ करा आता; और दे पाता या कुछ उपदेश । हरीश बाबू के जीतने की उम्मीद सौ में से दस प्रतिशत ही थी, फिर भी अगर बिल्ली के भाग से ही छींका टूटे तो जितनी-सी वेगार कर रहा है उसके वदले भी बहुत-कुछ दावा कर सकता है। हां, नहीं जीता तो कोई बात ही नहीं। विमल का अधिक पाना-जाना उन्हीं दोनों यानी प्रदीप सरकार और निर्मल माइति के कैंप में ही था। इसके अलावा, यही दोनों परस्पर समान प्रतिपक्षी थे । इसलिए विमल सचमुच ही प्रदीप की कुछ-कुछ गुप्त योजना निर्मल को और निर्मल की गुप्त चाल प्रदीप सरकार को बताने लगा। इससे दोनों की ही आस्था और विश्वास उस पर बढ़ा इसमें शक नहीं, पर दोनों ही सतर्क भी हो उठे थे अपनी-अपनी गुप्त योजना के प्रति । उनकी कुछ बातें ग्राउट हो जाने से उन्हें शक होने लगा कि उनके दल का कोई ऐसा व्यक्ति है जो उनके साथ सांघातिक रूप में विश्वासघात कर रहा है । वह कौन हो सकता है ? किसकी हिम्मत है इतनी? दोनों दलों के सामने प्रधान समस्या यही थी। एक बार पता लग जाय तो फिर उसका उचित इन्तजाम कर देंगे वे। विश्वासघाती को किस तरह की सजा देनी चाहिये यह वे अच्छी तरह ही जानते हैं। विमल भी इतना लापरवाह नहीं था उस ओर से । यह आग से खेलना था। चल्कि आग से भी भयानक था यह खतरा । प्राग से जलकर फिर भी कोई कोई बच जाता है । यह सेल तो काले विषधर से खेलने के ममान पा । वह भी बहुत फूंक-फूककर कदम रस रहा था। जो मंत्रगा बहुत ही सीमित विश्वासी व्यक्तियों के सामने होती उसे वह कभी किसी के सामने प्रकट नहीं करता, क्योकि ज्यादा लोग सन्देह की परिधि हों तो स्वयं बहुत-कुल निरापद रहा जा सकता है, पर संकोणं घेरे में फमने से ही मुमीवत प्रा जाती है। साहसिकता के सेल में भी एक अदभुत नगा होता है। जो मरे काले एवं गोसरे साप को लेकर सेल करते हैं उन्हें कोई अन्य सुविधाजनक निरापद जीविका मिलने पर भी वे उसे स्वीकार करेंगे कि नहीं, इसमे सन्देह ही है। लेकिन इस नशे को झोक में जब मनुष्य प्रघा हो जाता है तो उसका सारा हिसाब बरावर हो जाता है। नहीं तो कुमुद चौधरी जैसा पयका शिकारी पचास के करीब बाघों का शिकार करने के बाद ऐसी सांघातिक भूल क्यों करता ? वह खुद ही कितने लोगों से कहा करता था कि पायल वाघ का कभी विश्वास नहीं करना चाहिये । मर गया है कि नहीं, इस बात का पूरी तरह विश्वाम किये बगैर उसके पास कभी नहीं जाना चाहिये । और सुद वही घायल वाघ के पास जाकर अपने प्राण दे बैठा। सभी मामलों में ऐसा ही होता है । जमे रेस का पक्का पिलाडी दुमरी को मही पोडा वताकर भी खुद गलत धोडे पर दाव लगाकर सर्वस्व हार घंटता है। विमल भी प्रापिर खुद को सम्हाल नहीं सका । प्रदीप सरकार के दल ने तप किया था कि जो जाली बोट डालेंगे वे वांये हाथ की तर्जनी में वैसलिन या बोरोलिन तगाकर जायेंगे जिससे स्थायी निशान हमाल से पोछा ही अस्थायी हो जाय । जब यह मत्रणा तय हुई तब प्रदीप सरकार के अलावा यहा पाच व्यक्ति प्रौर मौजूद थे। एक प्रदीप सरकार या लडका अम्यू, एक उनका वहा साला, एक उनकी पार्टी का सेक्रेटरी, चौथा प्रदीप बावू का बहन ही विश्वसनीय और दाहिने हाय जैसा प्रधान सहायक अभय, मोर पांचया विमल। प्रतएव यह सवाद जय निर्मल माइति के कैम्प मे धूम-फिरकर वापरा प्रदीर सरकार के कैप मे पहुचा तब उन लोगों को भृकुटी का तन आना स्वाभाविक ही था। लेकिन उनलोगो ने न तो यह बात ही फैलने दी कि इस विषय में वे । कुछ जानते हैं और न उत्तेजना ही जाहिर की। वे तो स्तब्ध एवं स्तंभित-से हो गये थे । सभी के मन में एक कुटिल संदेह एवं उत्तेजना फैल गई थी। अगर उस समय भी वह सम्हल जाता तो अच्छा रहता पर विमल यहीं पर चूक गया। उनकी उस स्तब्धता को विमल ने अनभिज्ञता समझ लिया। उसने समझा कि इन लोगों को कुछ भी पता नहीं चला है, अतः शक होने की कोई गुंजाइश नहीं है। फिर से निःशंक हो उसने दोनों के ऑफिस में आना-जाना शुरू कर दिया। हां प्रकट में नहीं आता-जाता था, उसी तरह अन्तरंगता से चुपचाप जाता था। उसने मन-ही-मन अपनी इस चतुराई की तारीफ भी की। पर इसी बीच उधर निर्मल माइति का दल भी सतर्क हो उठा । विमल द्वारा दी हुई गुप्त खवर से उनको बहुत ही लाभ पहुंचा था लेकिन साथ ही वे विमल की ओर से शंकित भी हो उठे थे। जो उनका इतना अंतरंग होकर भी (अगर अंतरंग नहीं होता तो यह सब बातें उसे क्यों बतायी जाती ! ) उनके साथ इतना विश्वासघात कर सकता है उस पर किसी को भी विश्वास नहीं करना चाहिये। इसीलिये माइति-दल को चाल एवं योजना के बारे में वह कुछ भी नहीं जान सका। निर्मल माइति ने एक ऐसी योजना बनाई थी जिसकी प्रदीप-दल के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे। बहुत ही जबर्दस्त योजना थी। और उसका पता चला ठीक वोट डालने के वक्त । वह उस दिन किसी बूध के नजदीक भी नहीं फटका । खुद वोट डालने भी नहीं गया। जो कुछ उसने सुना, वस लोगों के मुंह रो ही सुना । जितने मुंह उतनी वाते हो रही थीं। फिर भी एक बात साफ थी कि उन्होंने डर दिखाकर ही बाजी मात की थी। किसी ने कहा, रिवाल्वर दिखाकर पोलिंग ऑफिसरों से बैलट पेपर छीन लिये और अपनी इच्छानुसार वोट दे दिये। किसी ने कहा, जाली बैलट पेपर छपवाकर लाये थे। किसी से सुना कि बैलट वॉक्स ही अदल-बदल कर दिये। सबसे मजेदार जो वात विमल ने सुनी वह यह थी कि माइति-दल के गुप्त गुण्डे, क्यू लगाये खड़े वोटरों के कानों में नुपचाप बोल गये थे, 'तुमलोगों की गर्दन पर एक सिर भी मौजूद है, लेकिन उस सिर को अगर सही-सलामत रखना चाहते हो, तो अच्छी तरह सोच-समझ कर ही वोट - देना।' प्रादि-प्रादि। हो सकता है, यह सब अफवाह हो हो । जिसका जंमा जी चाहा, उसने बसी बात उड़ा दी। लेकिन फिर भी यह निश्चित था कि उन्होंने कोई जवर्दम्न चाल अवश्य चली है। पर क्या चाल यी निमंल माइति की, इमे विमन नही पकड़ मका । जानने का मौका ही नहीं मिला, इमी का पफमाम या विमल को। मौका नहीं मिला इसीलिये रातों-राद घर-गाव छोड कर उनको भागना वोटरों की गति देखकर, या फिर बूय के भीतर मौदूद अपने प्रादमियों के मुंह से विवरण मुनकर, प्रदीर सरकार अपनी माग्यलिपि साफ पढ़ सकता था । इसीलिये ज्यों-ज्यों समय व्यतीत होता जा रहा था, ज्यों-ज्यों मूर्य अस्ताचत की पोर अग्रसर हो रहा था, वोट डालने का समय ज्यों-ज्यों ममाप्ति की और पहुंच रहा था, त्यों-त्यों ही उनके दल की मुख-मुद्रा काली एव कर होती जा रही थी। चेहरे पर भयानक कटोरता लिए वे लोग मरगर्मी मे दिमन को टूढने लगे। इम पराजय का एकमात्र प्राराधी वे विमल को हो ठहरा रहे थे। उनकी धारणा थी कि विमल मय वातं जानता या। उनकी गुप्त योजना उमने निर्मन माइति को बता दी, लेकिन निर्मल माइति की एक भी बात उन्हें नहीं बनायी। - माइनि के दल पर उन लोगो को उनना और नहीं था। होने का कोई कारण भी नहीं था क्योंकि मभी माना स्वार्थ देगते हैं और यह म्यानाविक भी है, लेकिन विश्वामघातकता दूसरी बात है । विमल प्रकार ही मादति-दन का गाईपा। प्रदीप का मित्र एव विश्वासपात्र वनकर उसने गुण गवरें मग्रह की और उघर चालान कर दी। उधर की दो-एक फालतू मवर जबर माया पा, लेकिन मुन्ध योजना को कोई पाच नहीं माने दी। एमे अपराध की क्षमा नहीं मिलती। इतना यडा विश्वासपात । साई ममी देशों में, सभी तरह की राजनीति में गिन ममझे जाते हैं; और ममी देशों में इनके लिए दंड भी एस-या है, यानी मृत्यु । इसके प्रनादा, मानवता की दृष्टि से भी ऐने पनरनार प्रादमी का जिन्दा रहना ठीक नहीं। पता नहीं १ राका सत्यानाश कर चट। . दरा प्रतएव की प्रतीक्षा में बैठा नहीं रहा विमल । जो कपड़े पहने था मों में भर ग भाग गया। गि घर से नहीं, बांगला देश से ही भागना था उसे । वन जानता था कि इस देश में गाड़ी भी रहने पर ये लोग कासी-न-गिागी दिन उरोटूनही निकालेंगे। रातों-रात टेगसीकर माल पाया और उसी रात को एक्सप्रेस पकर सीमा गउरमोला, अपने बड़े भाई गी रागुराल, जा पहुंचा। हालत उरागी शोचनीय हो रही थी। गालगता में भी बेकार ही था, फिर भी टय शन करके गुद का गर्न निसी प्रकार चला लेता था। पर यहां बिल्कुल असहाय एवं खाली जेय था । इस हालत में रिपोदारों ने यहां जाने पर गर्ग की कोई सीमा नहीं रहती लेगिन और उपाय भी गया था? बंगाल से बाहर और गोई अपना था भी तो नहीं । लाज-गर्ग गी पर्वाह न गारगे टय जगदलने के अलावा उसे और कोई उपाय नहीं गूमा । प्रारम-सम्मान को बचाने के लिये मूठी काहानी गढ़ने में उसे कोई अगुविधा नहीं , गोंगि मालगातागी विगती हर्ष स्थिति और रात-दिन होने वाली दुर्धटनात्रों ने बारे में सभी को पता था । अतः इस तरह भाग पाने का एक भूटा इतिहास फायग करने में उसे जरा भी देर नहीं लगी। "नता स्वीकार करने के बावजूद यहां पाने के बाद से यह थोड़ी निश्चितता मी गहरा गारने लगा। लेकिन एक बात विमल ने नहीं सोची थी कि, इस पराजय की ग्लानि की कसा भयकर रूप मारण कर सकती है! प्रतिशोध की भावना कितना रप धारण गार गमती! वह रागमा दरा-बारह दिन बाद । अरावार मार्फत पता लगा उमे। विगतका छोटा भाई प्रगल बी० ए० में पढ़ता था। बेगारा बहुत लगा था। रात-दिन अध्ययन में ही ध्यरत रहता था और उसकी अनिनामागी बस परीक्षा में अच्छी सफलता प्राप्त करना ही थी में उसकी कोई गान नहीं थी।
मित सेन पाने के शोभरोसे
है । तानी, पिसोनोगे सो ताना.
दिया पा।
भौर भी रायर मिसो की पी जाती है । Melt
सोपना अपमान रायमररAttart attitnt
पति घोषित कर दियापोरसा Himritii hitthit
मोहल्ले में जुलूस एमाया है तथा मा uी मान #th.
धमका रहे है।
बेचारा ममस ! मिरामा मा मोर || 4 |
थापमा ।
ग हत्या पापोई प्रतिकार भीगी निगा ना 1111, In turn mam
जानता है। साक्षापा Hr mht
दंगा । कोई पमा नागा ।
सेमिनगर प्रकार मा भी गगा am TIME
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दो है सो प्रदीप दुपागम famil | HIT
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केननी बारे में माम....."
कहीं इन गभीर घा
नोमा दायोट
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सर. दिव्येन्दु पालित . - । ग्मन कमरे में घुसते ही बोला, 'सर, मैं बहुत ही मुसीबत में फंस गया हूं। बाप मुझे बचा नीजिये। में घबरा गया । रमन के इस तरह अचानक सेम्बर में पा घुराने से नहीं, उसके बात करने तथा गड़े होने के ढंग से । टेविल के उस पोर पारा-पास तीन अगियां रखी थी। चंम्बर में घुसकर बात कहने से पहले उसने एक चेयर को जानकार कर लिया था और शब गेयर के सहारे यह इस तरह सड़ा था कि नेवर की पीठ उसके पेट में धंसी जा रही थी । गुलियों के पायों में शब्द- লায় हुए थे, नहीं तो इसी क्षण एक विकट शव्द होता । किन इन सब बातों को लेकर रमन जरा भी विचलित नहीं हुया । उसको बांग दिनातिनी हो रही थीं। नगरें इस कदर स्थिर थीं कि वह मेरे सिवाय जौर कुछ नहीं कर रहा था । ऐसे अवसरों पर जैसी होनी चाहिये, ठीक वैसी अभिव्यक्ति व्यापार रहा था यह । इन परा. वह मंजा हुया अभिनेता निरोधक कुगन सा रहा था उसको साधारण मनःस्थिति मे लौटने में थोड़ा समम नगा। रमन अभिनय कर रहा हो, ऐगी बात नहीं थी। ग्रॉफिम में में उसका वांग या नया वह मेरा सबोडिनेट, इस लिहाज से यह निश्चित था कि रमन बेमौके मुभगे मजार करने नहीं पाया या। मैंने घबराकर पूछा, 'क्या हुआ? तुम काप क्यों रहे हो? बंठो!' 'सर, मैं बहुत मुमीयत में पड़ गया हूं।' कहते-कहते अचानक रमन नुप हो गया । एक साथ ही ढेर सारी बातें जुगन पर मा जाने से जिग तरह प्रागे-पीछे बहन की मभी यातें गह-मड हो जाती हैं, उसी तरह रमन भी दुविधा में पड़ गया। अपनी बातें कहना भूल गया, मानो जुवान तालू से चिपक गई हो। फिर किसी प्रकार कोशिश कर बोला, 'सर, मेरी पत्नी वाय-रूम मे गिर पड़ी है। यह सात महीने से एडवास स्टेन मे चो, बहुत लीडिंग हो रही है, सर। मैं घर कैमे जाऊ ? मिलिट्री ने मोहल्ला घेर रखा है। हडताल नन रही है। कोई भी टेक्मी गाने को तैयार नही । बस भी वन्द है ।' रमन और भी बहुत युथ पहना चाहता था, पर कुछ ग बहार हात् यह मेरी टेबिल की और मिराक पाया। उसके रग-ढग दमकर नगा कि अब वह मेरे पैर परडेगा। में पुर्ती से उट पड़ा हुआ और उसका हाय पर लिया । 'रमन, होग में ग्रामो । बोलो, मैं तुम्हारी किम तरह मदद कर सकता तुम अभी तक मॉफिम में क्यों बैठे हो ? एम्बुलेन्ग को सयर करने नो प्रच्चा रहना । पैदल जाते तव भी अब तक पहुँच मरते थे। अच्छा, तुम्हाग र , 'वारानगर।' अचानक दीवार से पीठ गाकर रमन कुछ सयत हुमा, मानो उमने दुद को सम्हाल लिया हो । सभयतः इतनी देर बाद भव उमको पयाल माया हो कि मेरे माय उमरा क्या सम्बन्ध है और उस कारण यह जितना मत हमा है उससे और ज्यादा नहीं हो सकता। शायद मेरे उपदेनों ने भी उग बुध निराश कर डाला था। गलतो मेरी ही थी। यह मैं की यह मरता है कि मैंने जो कुछ कहा, पंसा रमन ने नहीं सोचा या कोचिग नहीं वी? वहन ही मुसीबत में पड़े विना रमन मेरे पास नही माता । उसको पोर मेरी श्रेणी अलग-अलग है। कौन किसको कितना पसन्द करता है या नहीं करता मह में अच्छी तरह जानता हूं। नहीं, इस तरह की बात कहना उचित नहीं था। हो सके तो इस वक्त उसकी मदद करनी चाहिये। उसी वक्त मैंने अपने मन को स्थिर कर लिया । रमन मुझसे कैसी मदद चाहता है, यह समझने में मुझे मुश्किल नहीं हुई। घर पहुंचने की कोशिश व्यर्थ जाते देख शायद उसे खयाल आया हो कि मेरे पास एक गाड़ी भी है। मतलब कि मैं अपनी गाड़ी में उसको घर पहुंचा आऊ । जिद्दी एवं स्नॉब के रूप में मैं चाहे जितना भी बदनाम क्यों न होऊ, लेकिन निश्चित रूप से रमन अव भी मुझे इन्सान समझता है । पूरी तरह मामले पर गौर किया तो ठण्डे कमरे में भी मेरे माथे पर पसीना झलक आया। मैंने कहा, 'ठीक है, तुम नीचे जाकर खड़े होप्रो । मैं आ रहा हूं।' ग्मन खुश हुआ या नहीं, यह मैं नहीं जान सका । वैसे भी मैं जानता था कि निराशा के अलावा इस वक्त उसके चेहरे पर और कोई भाव नहीं आयेगा।. कमरे से निकलने के पहले उसकी ठण्डी नजरें मुझे टू गयीं। ब्लीडिंग सुनकर ही मेरा शरीर कांप उठा था। सांस रुक-सी गई थी । सात महीने का भ्रूण गर्भ में लिये एक युवती वाथ-रूम में गिर गई है और उसके लिये कुछ किया नहीं जा रहा है, यह सब सोचने से ही बदन सिहर उठ । मेरी एक बुआ इसी तरह इसी हालत में वाथ-रूम में गिर पड़ी थी हास्पिटल पहुंचते-पहुंचते उसकी मृत्यु हो गई थी। अकस्मात् ही वह घः पाद या जाने से मुझे जोर की झरझरी आ गई। रमन के कमरे में जाते ही मैंने ड्रायर में ताला लगाया और जैकेट कंधे पर डाल में उतर आया। शाम हो गई थी। घिरते अंधेरे में रमन विल्कुल स्तब्य-सा, प्रेत-छ एम्बेसडर का सहारा लिये खड़ा था। इस वक्त वह अभिनेता-सा न न्हा था। उसकी तरफ देखते-देखते ही मेरे भीतर से एक दीर्घ-देही निकल आया और उसने रमन के कंधे पर हाय रखा । रमन के को तो घटना बहुत ही सीरियस लगी मुझे । एक-एक क्षण मूल्यवान रहा था। मेरी सहायता से अगर उसकी पली स्वस्य हो उठे तो जीवन भर मेरे प्रति कृतज्ञ नहीं रहेगा। यही मय शोरन-मोवने कार में बैठकर मैंने रमन के लिये पौधे का दरवाजा गोल दिया और पहा, 'मामी, गाड़ी में बैठो।' रमन बिना कुछ बोने चुपचाप गाड़ी में बैठ गया । गाड़ी स्टार्ट होने में देर कर रही थी। रमन उकताकर बोला, 'सर, इंजन तो टीक है न?' मैंने कुछ नहीं कहा । वास्तव में इग चिन्ताजनक वातावरण में भी मुझे मन- ही-मन हो पा रही थी। जिन लोगों को कभी कार में बैठना नमीव नहीं होता, वे सभी रमन की भाषा में ही बातें करते हैं। स्टार्ट होने में देर हो रही है, अतः इंजन खराब है ! रमन ने भी शायद यही सोचा था । सीधे- सादे होते हैं उनके सिद्धात । दरअसल उसका सोचना भी उचित था कि गाड़ी कमी नहीं मनुष्य की तरह तसर होती ! यही तो समय है उसके लिए कुछ कर दिखाने का! रमन पीई बैठा था। मेरे हाय स्टीयरिंग पर थे। भीड-भरे राम्ने मे जितनीनेज चला सकता था उतनी तेज गाड़ी चलाने लगा मैं । मैं समझ रहा था कि गाडी में वैटकर भी वह पाश्वस्त नहीं हुआ है । यह एक बार बायी पोर से दासी मोर बिमका; उसके बाद वापस वापी और सरक प्राया। साइड-ग्लास को पोटामा नीचा करके मैंने वापस ऊपर कर दिया। रमन बहुत ही नवंस फीत रहा था। पीछे की सीट पर रमन का सीन ऐमा था मानो मधेरे में रमन में गेल रहा है । अपना एक काल्पनिक प्रतिद्वन्दी खडा कर सा रहा है सोच रहा है कि उसे जीतना ही पड़ेगा । पार्क स्ट्रीट के मोड पर ही अचानक चौराहे को माल बत्ती जल उठी। मैंने जोर का rat रोकी । यह घटना बहुत स्वाभाविक ही थी, फिर भी सन हरभरा शब्द निकाल ही दिया । शायद मुझे ही घिसा को पत्ती को । उस छोटी-सी मन से ही मानो सारे Errore आहिर हो गया था। बीमार पली एव मुद के भी तीसरे के अस्तित्व तक को मानने को तकर में भी उसके दिमाग से भोझल हो गया। रहा, 'रमन, तुम निश्चित होकर । पहुंचा देते हैं। मपानर रमन ने पूछा, 'सर, - 'देखो।' टाई की गांठ मैंने ढीली कर ली। शायद आज बहुत गरमी थी । या हो सकता है, शायद रमन की उत्तेजना मुझमें भी प्रवेश कर गई थी। थोड़ी देर बाद मैंने पूछा, 'पटेण्ड करनेवाले लोग तो होंगे न घर में ? 'मेरी बूढ़ी मां है। वह भला क्या केयर ले सकेगी! उसे तो ठीक से दीखता भी नहीं । बगल के मकानवालों ने मुझे फोन पर खबर दी और कहा कि डॉक्टर को बुलाना ठीक रहेगा; पर इस समय जैसी परिस्थिति है शहर की, उसमें भला डॉक्टर घर से क्यों निकलेगा ?' 'रमन, इतना नर्वस होने की कोई बात नहीं है।' फिर से चौराहे की लाल बत्ती जल उठी । ऐसे ही अवसर पर तो सावधानी बरतने की जरूरत होती है । इन सब कामों में साधारणतः मैं नियम-कायदे भंग नहीं करता। दो-एक मिनट में ऐसी कौन-सी देर होती है ? लेकिन आज रमन के साथ होने की वजह से ही शायद समुचे शिष्टाचार ही मुझसे बगावत करने पर तुले थे । भीतर से एक अद्भुत प्रेरणा मिल रही थी आगे बढ़ने के लिये । उल्टे रास्ते से आती एक गाड़ी की नाक को लगभग छूता हुआ में द्रत गति से रास्ता पर कर गया। रमन भी देख ले अाज कि मैं भी कुछ कर सकता हूं। यों मैंने रमन की पत्नी को कभी देखा नहीं था, फिर भी इस समय मैंने अपने सामने उसका एक काल्पनिक चित्र बना लिया। पीड़ा से नीला पड़ा चेहरा लिये वह पति के लोट पाने की प्रतीक्षा कर रही है। उसके और रमन के बीच में वाधास्वरूप खड़े हैं मिलिट्री, हड़ताल, अनिच्छुक टैक्सी, स्तब्ध बसे और एक पूरा निपिद्ध और शून्यप्रायः इलाका। मैं सोचने लगा, क्या अर्भ तक ब्लीडिंग बन्द नहीं हुई होगी? क्या अभी तक कोई डॉक्टर नहीं पहुंच होगा ? जिन्होंने फोन पर खबर दी थी क्या वे रमन की प्रतीक्षा में निश्चिं बंटे होंगे? इस धरती पर इन्सानियत का क्या इतना प्रभाव हो सकता है - किसी को असहायता और पीड़ा के प्रति मनुष्य इतना हृदयहीन एवं उदात्ती हो जाय ? अब मुझे ही देखो, विना अपने किसी स्वार्थ के भी कितनी तत्पर से दौड़ा जा रहा हूं ! इसी बात से पता लगता है कि मुझे कितनी चिन्ता है मुझे तो लग रहा था कि एम्बेसडर में जन नहीं बल्कि मेरा हृदय ही धन घर कर रहा है। मान का दिन मानो रमन के लिये ही विशेष रूप से उदय हुआ था, या मन से अधिक स्वार्थी और कोई नहीं लगा। अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये । उपयोग कर रहा है । अपनी बीमार पत्नी को बचाने के लिये बह ती जोखिम उठा सकता है, लेकिन मैं किस स्वार्थवश जा रहा हूँ? रमन .? क्यो ? सभी को पता है कि हमारी श्रेणी अलग-अलग है । ऑफिस मैं तथा रमन एक-दूसरे के दुश्मन हो हैं । तो क्या इन्सानियतवश ? ग ? पता नहीं । शायद इन सभी से भिन्न भी कोई भाव-विन्दु है जहां र रमन एक हो जाते हैं। अधिक ही दार्शनिक बन बैठा था। रमन ने मुझे जगा दिया। प्रय बांयी मोर चलिये !' कम कर मैंने अपने चारो तरफ देखने के बाद गाड़ी को बायी पोर ना । 'यहा इतना मंधेरा क्यों है ? क्या हमेशा इसी तरह अघेरा । है ?' ‘, गर । सड़क के बल्ब फोड डाले हैं।' बहकर रमन क्षण भर को चुप रहा, - - आदि-ग्रादि याद नहीं और भी क्या-क्या कह गया था मैं । ग्मन ने सिर झुकाये सव सुन लिया। उसके बाद बोला, 'सर, आप लोग गाड़ियों में पढ़कर चलते हैं, आप लोग इसे नहीं समझ पायेंगे। हमारे उपर वस बन्द है । ट्रेन भी वन्द है। पैदल चलकर किसी तरह यहां पहुंचा हूं। आप शौक से कर सकते हैं मेरे विरुद्ध रिपोर्ट ।' उनकी प्रतिम बात में कुछ कटुता का भाव था । यह तो उडता है । काम नहीं हुआ इसके लिये जरा-सा भी अफसोस नहीं है। सिर्फ कारण दिखाता है । यह रोज का ही बंधा हो गया है। रमन नहीं नो और कोई, कोई-न-कोई, कहीं-न-कहीं अवश्य ही अटक जाता है और ठीक ममय नहीं पहुंच पाता । खास बात यह है कि इसके लिये कोई भी अफसोस महसूस नहीं करता । मेरा सारा वदन गुस्से से कांपने लगा था। पेपरवेट को मुट्ठी में भींचकर मैंने उससे कहा था, 'यो के, यू मूव आउट ।' रमन चला गया। उसके विरुद्ध कोई नोट लिखू या नहीं, इसी उत्तेजना और उलझन में दिन भर मिजाज खराव रहा । और फिर उस दिन की घटना को ही लो! लेकिन शायद उस दिन इतना कोधित होना ठीक नहीं हुआ। धीरे-धीरे मेरी शिरानों को उत्तेजना शांत होती जा रही है । मन खराव रहनेवाला भाव खत्म होता जा रहा है। बल्कि इस समय तो लग रहा है कि अच्छा ही हुआ जो पार्टी नहीं हुई, तभी तो हताश-परेशान रमन को मैं ऑफिस में मिल गया। मैं उस वक्त बैठा यही तो सोच रहा था कि शाम किस तरह व्यतीत की जाये ? अाफ्टरमॉल, यह काम सबसे ज्यादा जरूरी है। मेरी तत्परता पर ही पाज एक युवती का जीवन और मृत्यु निर्भर है। अच्छा ही है, पल मीनाक्षी के पास बैठकर बात करने का एक विपय मिल गया। उसी वक्त एक नई चिन्ता ने मुझे दुविधा में डाल दिया। रमन के अनुनय- विनय पर चला तो आया हूं, लेकिन मैंने यह क्यों नहीं सोचा कि यह समय विना सोचे-समझे उपकारी की भूमिका निभाने का नहीं है। हड़ताल के ही कारण जय शोमन को मंरिज-एनिवर्सरी की पार्टी में नहीं गया तव फिर अव क्यों जा रहा हूं ? रमन ने भी तो कहा था, 'हड़ताल चल रही है । उपद्रवियों पोर संदिग्ध अपराधियों की खोज हो रही है । सारे मोहल्ले को मिलिट्री ने पेर रखा है।' जिधर में जा रहा हूं, क्या उपर रिस्क कम है ! इस क्षरा , ५० मुझे रमन से अधिक स्वार्थी और कोई नहीं लगा। अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये वह मेरा उपयोग कर रहा है । अपनी बीमार पत्नी को बचाने के लिये वह कोई भी जोखिम उठा सकता है, लेकिन मैं किरा स्वार्थवश जा रहा हूं? रमन के लिये ? क्यों ? मभी को पता है कि हमारी श्रेणी अलग-अलग है। ऑफिस में तो मैं तथा रमन एक-दूसरे के दुश्मन ही हैं । तो क्या इन्सानियतवश ? दयावश ? पता नहीं । शायद इन सभी से भिन्न भी कोई भाव-विन्दु है जहा मैं और रमन एक हो जाते हैं । घायद मैं अधिक ही दार्शनिक बन बैठा था। रमन ने मुझे जगा दिया। 'मर, अब बांयी मोर चलिये !' स्पीड कम कर मैंने अपने चारो तरफ देखने के बाद गाडी को बायी घोर घुमाया । 'यहां इतना मधेरा क्यों है ? क्या हमेशा इसी तरह अघेरा रहता है ?' 'नही, मर । सइक के बल्ब फोड़ डाले हैं ।' कहकर रमन क्षण भर को चुप रहा, फिर बोला, 'हमारा मौहल्ला तो सर, और भी सराव है । वहा रोज दो-एक गडंर तो होते ही हैं । पन्द्रह दिनो मे यह तीसरी बार हुई है हरताल ।' यहां सड़क चौड़ी होकर दो तरफ को मुट गई थी। बहुत दूर-दूर पर लम्प- पोस्टो से झूलती एकाध लाइट जल रही थी । किसी-किसी मकान को खिह- कियों से भी रोशनी छनकर वाहर पा रही थी। इस तरह के प्रकाश से तो अन्धेरे का अहसास और भी बढ़ जाता है । किस्मत अच्छी थी कि चान्दनी रात थी । उसी रोशनी में प्रागे बढ़ने की बात सोची मैंने । रमन मेरी गर्दन पर मुका पा रहा था । उसकी मास में अपनी कनपटी पर स्पष्ट रूप से मह- सूस कर रहा था। मैंने महगूम किया कि बहुत देर नुप रहने के बाद वह फिर में अधीर हो रहा है । मैं वहा कोई प्रादमी ढूढ़ने की कोशिश मे या पर कहीं कोई दिगाई नहीं पड़ रहा था। रात के पाठ बजे से ही ऐसी स्तम्यता ! अचानक रमन ने कहा, 'सर, मापने मेरा बहुत उपकार किया है।' 'अंक मू ।' मैंने उद्विग्न स्वर में जवाब दिया । 'पहले पर पहुच जानो, वहा देवो मया हालत है, तब यह सब बात कहना।' 'हॉन्ट !' यह पाकस्मिक घमरी मुन मने शरीर की ममस्त शक्ति से गाड़ी को रोक - कर रोका । देखा कि सिर्फ दस गज की दूरी पर दो सैनिक राइफ 1 रोशनी की कमी के कारण उनकी उपस्थिति का पता पहले नहीं लगा था । मन नर्वस होते हुए बोला, 'लगता है, यहां भी वही हड़ताल और 'कूम्बिग' वाला मामला चल रहा है।' 'कोई और रास्ता नहीं है ?' 'मेन रोड को मैंने इसीलिये एवाइड किया था कि वहां भी कुम्बिग चल रहा है।............' मंनिकों में से एक जहां था वहीं बड़ा रहा तथा दूसरा आगे बढ़ पाया। 'हट जायो ! जल्दी........' मेरे सिर से सिर्फ एक हाथ की दूरी पर राइफल का मुंह था। रमन गाड़ी में ही बड़े होने की मुद्रा में था। उसने जल्दी से कहा, 'भाई, बहुत जलगे काम है।' लेकिन फिर वैसा ही कर्कश जवाव मिला, 'हट जायो !' मेरी नजर राइफल पर ही टिकी हुई थी। क्या करू, समझ में नहीं पा रहा था। हठात् रमन ने मेरा कंधा जोर से दबाकर कहा, 'सर, अंग्रेजी में बोलिये तो समझ जायेगा।' उन जना एवं भय के मारे मेरी समूची देह से पसीना छूट रहा था, तब में रमन की बात पर मुझे हसी पा रही थी। मैंने कहा, 'कोई फायदा नहीं कोई ग्रांफिसर वगैरह रहता तो उसको समझाया जा सकता था । अव इसी में भलाई है कि गाडी वैक करु।' धीरे-धीरे गाडी वैक की। मेरी अांखें राइफन पर से क्षण भर को भी हटीं। हमारी गांवों में उनके प्रोझल होने के साथ-साथ ही वम फ जोरदार धमाका सुनाई पड़ा-एक बार, दो बार, और प्रायः उसीके सा चारों ओर से प्राती सुनाई दी तीखी-तेज बीसल की अावाजें । हमारे । एक भी पादमी दिखाई नहीं दे रहा था । अधिकांश घरों के खिड़क बन्द थे। रात के पाठ बजे हैं या दो, यह भी समझ में नहीं आ रहा 'यह जगह नेफ नहीं है। हमारा यहां से निकल जाना ही उचित है। 'तव फिर?'
'वा और कोई रास्ता नही है ?' रमन के मुंह से मानो बात नहीं निकल रही है । 'दाहिनी ओर से जाया जा सकता है, सर । उधर कोई ट्रबल नही है । जरा-सा मागे बढते ही बड़ा रास्ता है। हां, जरा चक्कर पड़ेगा।' 'ठीक है । तो फिर वहां तुम उतर जानोगे न ?' रमन ने कोई जवाब नहीं दिया। पीछे मुडकर देखता हूँ कि वह सीट पर अपनेटा-सा-पड़ा है और जल्दी-जल्दी सिर को हाथ से रगड़ रहा है । “रमन, क्या हुआ?' 'मर, कुछ समझ में नहीं आता। अगर अस्पताल ले जाना पड़ेगा, तो........?" तो मैं क्या कर सकता हूं? अब मुझे सचमुच ही गुस्सा पा रहा था । दात- पर-दात भिच गये मेरे---सोचा, रमन, तुम हद से ज्यादा बढे जा रहे हो । अब तुम्हें स्वय ही अपना कोई इन्तजाम करना होगा। मैं मजबूर हूं। शायद मेरे करने लायक कुछ नहीं बचा है। 'टीक है चलो, दाहिनी पोर चला जाय । उपर भी ट्राई कर लें।' फिर ने गादी को घुमाया। वही पाम ही जवर्दस्त गोलमाल हो रहा है। कानो में कितनी ही तरह के अस्वाभाविक शब्द मुनाई पड रहे हैं। दाहिनी ओर जाते-जाते में और भी अधिमः शकिन हो उठा। किसी-किसी रास्ते के प्रत्येक करा में अस्वाभाविकता भरी होती है-यहा भी टोक बंसा ही लग रहा था मुझे। चारों ओर सन्नाटा, अधमार और हवा के झोको के साथ-साथ विविध प्रकार की रहस्यमय छायाए हिलती-डुलती नगर पानी । रमन ने कहा, 'इधर शायद कोई खतरा नही....' में हसा । इस तरह करकर रमन सुद को ही प्राश्वस्त कर रहा था। शायद समझ रहा हो कि मैं अब उसके पास नहीं है। बाधा घन्टा पहले उसने मुझे अपनी पत्नी के बाथरूम में गिर जाने की खबर दी थी। दुर्घटना के ममय का अगर पता रहता तो रक्तपात के परिणाम का अनुमान किया जा मरता था। टोक उगी समय अप्रत्याशित रूप में वह घटना घट गई जिसके साथ इतनी.
ता-फिक्र या उत्तेजना का कोई सम्बन्ध नहीं था। में से अचानक ही पांच-छ: युवक प्रकट हुये। उनमें से एक सामने पोर से गाड़ी पर कूद पड़ा । मैंने एक्सीडेन्ट की आशंका से तुरन्त गाड़ी ।। फिर तो पलक झपकते ही उन्होंने गाड़ी का दरवाजा खोला और तर या बैठे। गाड़ी चलायो ! जल्दी !" अस्फुट अावाज और अंधेरे में अस्पष्ट चेहरे । पाश्चर्य का प्रथम प्रहार सम्हाल. कर मैंने पूछा, 'मामला क्या है ? आप लोग इस तरह गाड़ी में कैसे या बैठे ?' 'गाड़ी चलायो।' में प्रतिवाद करता उससे पहले ही गर्दन पर ठण्डी धातु के स्पर्श से मेरा शरीर वर्फ-सा हो उठा । आंख रो देखे विना भी मैं सब कुछ समझ गया । कलेजा मुह को आ गया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि अब क्या करूं, क्या करना उचित है ! । घटना की प्राकस्मिकता का शायद रमन पर भी गहरा असर हुआ था। थोड़ी देर तो वह स्तब्ध-सा चुप बैठा रहा। उसके बाद रहा। उसके बाद टूटे-फूटे शब्दों में बोला, 'मेरी पत्नी बहुत बीमार है । प्लीज, हमलोगों को छोड़ दीजिये।' 'ठीक है ।' मैं गर्दन घुमा नहीं सकता था, लेकिन यह समझने में मुझे कोई असुविधा नहीं हुई कि यह अावाज किसकी है ? उसने मेरी गर्दन पर से रिवाल्वर हटाकर मेरा कॉलर कसकर पकड़ लिया और बोला, 'इस साले की पत्नी वीमार है ! इसको उतार दो।........' 'सर !' । रमन की कातर आवाज पाई। मानो वह स्वर बहुत दूर से मुझ तक या है। 'सर-सर!........ गर्दन पर फिर यही धातु का स्पणं । मैं जानता हूं अब मुझे क्या करना जानता हूं कि में गाड़ी नहीं चलाऊंगा तब भी वह चलेगी। बॉनेट के मेरा कलेगा जोर-जोर से धक् धक् कर रहा है, वही चलाकर ले गादी।
- अधेरे के बाद अंधेरा । बहुत दूर पाने के बाद मेरी गर्दन पर से पातु का स्वर्ग हट गया। जिन्होने मुझ पर यह कृपा की थी, उनका चेहरा देखने की जरूरत नहीं थी। सिर्फ खुद से ही मैंने प्रश्न किया, रमन, क्या तुम पहुच गये हो? मेरे सामने से एक-के-बाद-एक दृश्य बदलते जा रहे हैं। सूब पना अंधेग होने के कारण ही इन दृश्यों को अलग-अलग पहवान पाना संभव नहीं है।
खून का रंग लाल
मिहिर प्राचार्य
००
बडे बाबू के सामने प्रासामी को पेश किया गया ।
पासामी को देखकर दंग रह गये बड़े बाबू । अपनी जिन्दगी में आज से पहले
ऐसा विचित्र दृश्य उन्होंने कभी नहीं देखा था।
दुबला-पतला शरीर, पुरानी मल से चीकट धोती, उलझे-विखरे वाल, धूप
मे नपकर ताम्बई चेहरा और झुकी-झुकी आंखें। उम्र भी शायद चौदह या
पन्द्रह के करीब होगी।
क्या यही लड़का पॉलीटिकल फेस का एक नम्बरी आसामी है ? क्या इसी
को रिवाल्वर नहित गिरफ्तार किया गया है ? वरना क्या प्राग भारत के
एक महान ज्योतिषी का असमय काम तमाम हो जाता ?
तो पया मंत्रान गुग सचमुच लोट पाया है ? बड़े बाबू ने सोचा ।
'गया नाम है तुम्हारा ?'
'तो क्या मेरा नाम जाने विना ही मुझे पकड़ा गया है ?' किशोर
जवाब था। - 'हम !' बड़े बाबू ने गंभीर स्वर में भावाज निकाली। "रिवाल्वर तुम्हारे पारा कहा से प्रायो ? सितौनेवानी नहीं, बिल्कुल मन्ची, शक्तिशाली प्राग्नेयास्त्र ?' 'पा ही तो गई। यह तो पाप भी देख ही रहे हैं।' 'इन उम्र में तुम्हारे हाय में किताब-कॉपी शोमा देती है, रिवाल्वर नहीं।' "पापको पता है, मेरा स्कूल से नाम काट दिया गया है !' 'क्यों ?' 'और क्यो, आपको सरकार बौदह साल के लड़के की पढ़ाई निःशुल्क नहीं फर की इमलिय। वडे बाबू ने कहा, 'ग्रोह तो, पढ़ाई-लिखाई नहीं कर पाये इसीलिये यह मावारा- गर्दी अपनाई है ?' किशोर ने कहा, 'क्या करता, पाप ही बताइये ! तीन दिन से घर में साने को नहीं है। मेरी छोटी वहन नीलू अभी उस दिन मर गई। मां रोई, पितामी रोये । में मुद अपने हाथों में उसे जंगल में गाट आया ।' बरे बापू ने कहा, 'दारिद्रय एक जातीय समस्या है। यह एक-दो दिन में हो सत्म हो नही जायेगी।' किशोर ने कहा, 'तब तक मेरी बहन भरनी रहेगी। यही न? इस जातीय समस्या को समझाने के लिये? क्या आप मेरी बहन को वापस लौटा सकते है ? नहीं न?' "तो क्या, इमीलिये रिवाल्वर उठा तोगे इन प्रस्ट से तुम दरिद्रता के विरुद्ध महाग' नुम्हें पता है, हमारे हाथ में कितनी ताकत है ?' 'नही । दरिद्रता के विरुद्ध नहीं । मापलोगो की इस शक्ति, इसी ताकत के विरुद्ध में लहमा चाहता है। वायू ने कहा, 'नुम जो बुद्ध कह रहे हो वह तुम्हारे मन की बात है, यह मानो नो पार नही में । ये सब बातें किसी की सिपायी हुई है। विनार ने कहा, 'जन्म लेने के बाद ही वो मनुष्य सोपता है, बड़े बाबू । क्या मंगन में प्रापयी कोई वहन भूल से भरी है " मन्मी वरद समनता हूं कि तुम्हारे पीछे विसो दल का हाथ है, जो अपने ।
her स तुम्हारे जीवन को तहस-नहस कर देना चाहता है । : का हूं। मैं तुम्हें वचाऊंगा।' कीजियेगा, अपने पिता को मैं अच्छी तरह पहचानता हूं, उनकी पीड़ा सो मैं खूब समझता हूं। आप किस तरह मेरे पिता को समझ सकते है ? बों के पिता की जात ही दूसरी होती है।' गरीव और अमीर की बात नहीं है । सभी पिता एक समान होते हैं।' नहीं। यह आपकी धोखा देनेवाली बात है। । आप पिता हुए विना भी अपना कर्तव्य पूरा कर सकते हैं जैसे कि मैंने अपना कर्त्तव्य पूरा कर दिया है।' बड़े बाबू ने पूछा, 'तुमने मीटिंग में मंच की ओर रिवाल्वर तानी थी-' किशोर ने बीच में ही टोककर कहा, 'हां, मुझे थोड़ी देर हो गई जिससे मैं ट्रिगर नहीं दवा सका। 'जानते हो, तुम क्या कह रहे हो ? तुम्हारी बातों का मतलब क्या है ?' 'मैं एक भालू का शिकार करना चाहता था ।' 'भालू ?' 'एक ही बात है । हम दोनों का जीवित रहना नामुमकिन है । एक को जाना ही पड़ेगा।' 'पता है, यह एक भयानक राजनैतिक अपराध है ? इस अपराध की सजा फांसी तक भी हो सकती है। 'जिन्दगी एक ही है, बड़े वाबू ।' 'तुमको अपने प्राणों का भी मोह नहीं ? खुद से प्यार नहीं तुम्हें ?' से प्यार करता हूं इसीलिये तो राह के रोडे साफ करना चाहता बड़े वायू ने कहा, 'बाहर तुम्हारे माता-पिता आये हुए हैं। तुमसे f चाहते हैं।' किशोर ने कहा, 'उनसे मिलकर मुझे क्या लाभ होगा ?' 'तुम अपने माता-पिता को प्यार नहीं करते?' 'देखिये, मैं यहां कोई पारिवारिक नाटक के अभिनय के लिये नहीं अगर आपको नुझसे और कुछ नहीं पूछना है तो मुझे लॉक-
दीजिये।'
'तो तुम कुछ भी नहीं पतामोगे ?' प्रब बड़े बाबू गे मन्य रूप धारण किया ।
'रामसिंह !
'जी, हुजूर ।' रामसिंह ने सलाम किया।
"इसको ले जामो । जब तक यह कुछ बताने को राजी न हो।'
'जी।'
किशोर को पकड कर रामसिंह मंधेरी कोठरी में ले माया ।
'योत घोगरे, सच बात वोल।'
किशोर पुष ।
'तो कुछ
हठात् तल-पेट पर एफ चूंसा पडा जोर से। किशोर उछलकर दीवार से जा
टकराया । सिर इतनी जोर से टकराया मानो फट गया हो।
रामसिंह ने उसको बिल्ली बच्चे की भांति फिर से उठा लिया और पुमफारसे
हुए बोला, 'योलो भाई, सच-सच बतायो । हाय राम !'
किशोर के होठों को कोर मे सून यह चला था। दो दांत भी टूटकर गिर गये
थे। पीने से वह नहा उठा था तया फपयापी से उसका गगूमा शरीर हिल
रहा था।
भी नहीं बोलोगे ?'
बड़े वायू ने प्रावाज दी, 'रामसिंह, प्रामामी को मे पायो।'
रामनिह विशोर में होग शरीर को धमीटकर रो पापा ।
बड़े बाबू ने कहा, 'यह दंगो, तुम्हारे माता-पिता बेटे हैं । तुमग पृध कहना
पाहते हैं।'
'मां।'
'बेटा ! कमी हालत कर दी है इन्होंने तुम्हारी ?'
'मा, मुझे, पानी"।'
'राममिह, एक लोटा पानी ने प्राणो।'
पानी मार राममिह रंग देने लगा।
.
ने हांक लगायी, 'ठहरो ! क्यों छोकरे, अब तो सच
गेन?'
र ने धुंधली दृष्टि से उनकी ओर देखकर कहा, 'पानी ।'
हां, पानी मिलेगा, पर उससे पहले तुम्हें सब बताना होगा'
शोर बड़बड़ाता-सा बोला, 'हां बताऊंगा, बताऊगा।'
रामसिंह, पानी दो।'
किशोर पानी पीते-पीते उल्टी करने लगा।
'हाय राम!' रामसिंह के मुंह से निकल गया ।
'बड़े बाबू, इतना न्यून कैसे ? लड़के का हृदय डूवता जा रहा है।' मां आर्तनाद
कर उठी।
बड़े बाबू ने भी फुर्ती दिखाई, 'कहां, देखू ?'
बड़े बाबू
कलेजे के नीचे एक बहुत बड़ा घाव हो गया था। बिल्कुल ताजा घाव था
और कच्ची चमढ़ी के कट जाने के कारण घाव बनकर वहां से खून निकल
रहा था।
ने व्यग्य से कहा, 'यह नाजुक तथा दुवला-पतला शरीर लेकर ही लड़ने
चला था ! गमसिंह को दो लात तक तो सह नहीं सका । रामसिंह, डॉक्टर
को बुलायो।'
किशोर की चेतना हॉस्पिटल की वेड पर लौटी।
शाम के समय बड़े बाबू पाये, “अव कसा जी है ?'
रिपोर ने कहा, 'ठीक है।'
'जल्दी ही ठीक होना पड़ेगा तुम्हें । तुम्हारे बयान पर ही एक बहुत बड़ा
निर्णन करता है। फिर हम लोगों को भी तो अनुसन्धान करना पड़े
उहुं, हिलो-डुलो नहीं । टॉस्टर ने कहा है, अगर बैंडेज पुल गई तो फिर
किसी तरा, से नहीं बचाया जा सकेगा । तुम्हारे शरीर में खून नहीं है
1
।
सो दिन बाद ।
को वायु बदन ही यात्मीय बनकर उसकी बेड के पास चेयर पीनार
गोद में डायरी का पेज पुला हुआ था और उंगलियों में पसिन ट्वी हुई थी। 'अब तुम शुरू हो जानो।' बड़े बाबू ने प्रावाज मे अभिभायक था-सा लाट भरते हुए कहा। किशोर मास भूदे लेटा हुमा पा। उगके होठ कांप रहे थे और मीना गारा से हिलता-शा दिसता था। उसके नासिका-रन्नो मे मानो किमी फूल को खुशबू संरकर पा रही थी। पता नही, रजनीगधा की या बैना की । मुगधमप वातावरण को लहरों पर वह मानो कमल-गा तर रहा था। फिगोर के होटो पर हंसी फैल गई। बड़े बाबू दोनों पर नचा रहे थे। उसके बाद जरा सांगे । 'बहुत देर पाराम कर चुके ।' बढे वायू ने उसके वालों में हाथ फिराया। 'हा तो, अब अच्छे बच्चे की तरह शुरू कर दो।' अचानक किशोर ने प्रश्न किया, 'मच्या बडे वायू, प्रादमी के मर जाने के बाद क्या होता है ?' बड़े याबू हसे, 'मृत्यु तो नश्वर देह की होती है, प्रात्मा घोडे ही मरती है।' "कल रात मैंने एक मजेदार स्वप्न देगा है।' "स्वप्न ? 'हां, मैं मर गया हूं। फिर भी मुझे होग है । पता है, मैंने या देगा ? देगा किरितने ही मूपर मेरे चारों तरफ पुरं-धुरं कर रहे हैं।' 'सुपर बडे बाबू वैमन मे हो-हो कर हंग परे । 'मन्या, प्रब काम की बातें की जायें। हां तो, अपने दल की गवर गुनामी । कौन-कौन है उसमें ' उनका अस्त्रागार वहाँ है? 'बड़े यात्र, चमगार पगु है या पक्षी ?' 'पार नहीं बता मरे न' विजोर हो-ही हमने मगा। मन बड़े बाबू गंभीर हुए । 'गायद तुम मेरे माय रक्षा कर रहे हो !' 'बड़े बाव, पायो पता है, उजू दिन से रोगनी गो और नहीं दंग सरता आप जानते हैं, ऐसा क्यों होता है ? इसकी एक कहानी है।' मैं कहानी नहीं सुनना चाहता। मैं जो कुछ जानना चाहता हूं वह तुम वतायोगे कि नहीं?' । 'एक वार की बात है, मेरी बहन है ना, वह मेरे पांव में गुदगुदी कर रही थी और मुझे बहुत जोर की हंसी आ रही थी । नीलू ऐसी ही शरीर है न !' 'चालाकी अपने पास ही रखो । तुम सोचते हो कि वातों में मुझे बहला लोगे? कुछ बतायोगे नहीं ? तो ठीक है । तुम भी सुन लो । हमलोग सच उगलवाना जानते हैं। डॉक्टर साहब के पास एक ऐसा इन्जेक्शन है कि तुम्हें वेझेश करके तुम्हारे मुंह से सारी सच बात उगलवा लेंगे। मैंने सोचा था कि उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। अव तुम तैयार रहना । कल ही डॉक्टर से तुम्हारे इन्जेक्शन लगवाने का इन्तजाम करता हूं।' बड़े वाबू गुस्से में भरकर वहां से निकल गये । किशोर को सारी रात नींद नहीं आयी। वह विस्तर पर पड़ा छटपटाता रहा, क्योंकि इन्जेक्शनवासी बात ने उसे बहुत ही चिन्तित कर दिया था। अगर सचमुच ही वेहोशी की हालत में उसने सब स्वीकार कर लिया........तो ? जब तक होश में है तब तक तो डरने की कोई बात नहीं है। लेकिन वेहोश में वह क्या बक जायेगा, यह तो उसके बस की बात है नहीं। खिड़की से बाहर हल्दिया चांद दीख रहा था। अस्पताल निस्तब्ध था । रात की ड्यू टी पर तैनात नर्स बिल्ली की तरह : पर बैठी ऊंघ रही थी। उसको एक बार मां की याद आयी। मां बहुत है। 'मां, मैया, मां!' उसने अस्पप्ट आवाज में मां को पुकारा । दूसरे दिन मुबह डॉक्टर को लेकर बड़े वाबू उसके वेड की ओर बढ़े । लेकिन पास पहुंचकर जो विभीषिका उन्होंने देखी उसके सामने वे स्थिर, मूर्तिवत खड़े-के-खडे रह गये। एक चौदह साल के लड़के लापरवाह हिम्मत पाई तो कहां से ? बेट पर विछी चादर खून से लथपथ हो लाल हो गई थी। बेड पर धारा पह-बहकर नीचे गिरी पी, और ढेर सारे सून के बीचों-धीच एक बलि के बकरे की तरह पड़ा था किशोर। दोनों मासे खुली थीं। चेहरे पर ज्योतिर्मय मुस्कुराहट थी। रॉक्टर ने कहा, 'सका भापको गच्चा दे गया। उसने अपने हापों कच्ची वैटेन पोन डाली। रात भर में उसने अपना सारा खून निचोड़ हाला है।' बड़े वायू पडे-सड़े पसीना-पसीना हो रहे थे। ...
उस्ताद
सुनील गंगोपाध्याय
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की चाल चलना, विल्ली की चाल नहीं।
'ऐ डाबू, बुड्ढे को बुलाकर ला।'
'बुलाता हूं, उस्ताद ।'
'भागकर जा और दौड़कर पा । कुत्ते
समझा?"
'समझ गया, उस्ताद ! चाय-वाय चढ़ा लूं जरा।'
'जाते समय मालूम करना कि नौ पच्चीस की रानाघाट लोकल ट्रेन लेट है
कि नहीं।'
'स्टेशन जाऊं?'
'हां, स्टेशन जा । और बुड्ढे से कहना, तुरन्त पाये ।'
डायू चाय की दुकान में से उठकर बाहर निकल गया । उसके चलने का टंग
भी बहुत ही विचित्र था। देखने में यों लगता मानो उसके गरीर के किस
हिस्से में कोई तकलीफ हो । सामने देखते हुए तो जैसे चलना जानता ही नहीं
:
वह । अचानक ही वह कभी वाये, कभी दाहिने, तो कभी एक्दम पोहे की मोर गर्दन घुमा लेता। उसके दोनों हाय कभी भी एक-माय बाहर नहीं रहते थे । एक हाय पेन्ट की जेय में अवश्य ही रहता। चलते-चलते वह अचानक सड़क पार कर दूसरे फुटपाथ पर पा जाता 1 कोई लड़की दिगाई जानी तो उसकी प्रा बस वही जम जाती, और तब वह कुछ देर वही टिठा जाता। लड़की नजर पाते ही वह होठ बिचकाने तथा मासे मटकाने लगता। ली जितनी ग्वूवमूरत होती, उसकी यह क्रिया उतनी ही तीन गति पकड वेती। 'ऐ परी, इधर प्रा।' 'क्या बात है, उस्ताद ?' 'देख तो इम लाइटर मे क्या परावी है ? जलता नहीं है स्साला । वन मुबह ही तो पेट्रोल भरा है।' 'शायद पत्यर यतम हो गया है।' 'धत् तेरे को।" 'यह क्या, उस्ताद । लाइटर ही फेंक दिया। इतनी कीमती चीन फेंक दी।' 'चुप कर । मोर बहुत प्रायेगी।' परी नुप हो गया । उस्ताद यानी पल्लू की इस तरह की पादत से वह अच्छी तरह परिचित है। किसी-किसी दिन पल्लू को यो ही चीजें वरवाद करने की मन में मा जाती है। अब इस कीमती लाइटर की बात को ही लें, भगर यह उठान जाय तो जोर को डाट सायेगा । थोड़ी ही देर पहले, सिगरेट मरीदते समय पल्टू ने दस का नोट भुनाया था। सुनाते वक्त पल्लू के हाथ नोट जमीन पर गिर गया था, पर पाल ने वह नोट वापस नहीं उठाया । पास हो एक भिखारी का तडका एक अन्य व्यक्ति के सामने एक पैसे के लिये रिरिया रहा था । पल्लू ने उसको पुकार, रपया दिमाकर कहा, 'ऐ, यह रपया उठा ले । यह रहा । लेने।" मान पल्लू शायद पोर भी बहुत-बुध फेक देगा या दरबाद करेगा। पर, परी, डा, बुड्ढा इन सभी का एक-एक मन्दा नाम भी है । लेकिन बहुत दिनों से वे नाम व्यवहृत नहीं हुए। किसी ने उम नाम से उन्हें नहीं पुकारा। एकका बाँस, वे लोग एक चाय-दुकान की एक केविन में बैठे थे । पर्दा गिरा हुआ नहीं है फिर भी उनके रहते उस केविन में कोई नहीं घुसेगा । यहां तक कि आवाज दिये बिना वेयरे तक की वहां झांकने की हिम्मत नहीं होती। पल्लू ने अपने कप में बची हुई चाय को एश-ट्रे में डाल दिया । उसके बाद जमीन पर रखे थैले में बहुत ही सावधानी-पूर्वक हाथ डालकर शराव की एक बोतल निकाली । अपने कप में लबालब शराव भरकर परी से बोला, 'ला, तेरा कप भी खाली करके दे । डाबू के सामने इसलिये नहीं निकाला कि वह जरा-सी लेते ही डाउन हो जाता है । क्या चीज है, देखी तूने !' परी ने शराब की बोतल पर चिपके लेवल को परखते हुए कहा, 'अरे वाह, यह तो-' पल्टू ने कप को होंठों के पास ले जाकर उस रंगीन पदार्थ को एक ही धूंट में खतम कर दिया । खूबी यह कि न तो उसके चेहरे की एक भी रेखा कांपी और न ही उसे हिचकी आई । परी प्रशंसा भरी नजरों से उसकी ओर देखे जा रहा था। फिर बोला, 'यह हुई न कोई काम की बात !' इस तीखे अर्क को पान करने की प्रतिक्रिया सिर्फ उसकी प्रांखों में दिखाई पड़ी । कप खाली होने के साथ ही उसकी आंखों के डोरे लाल हो उठे । कप को दुवारा भरते हुए पल्टू बोला, 'ऐसे दिनों में मुझे सबसे अधिक कौन याद आता है, जानते हो ? पगला । पगले के चले जाने से मानो मेरा दाहिना हाथ ही चला गया हो।' परी ने कहा, 'पगला भी साला पॉलीटिक्स से भिड़ने क्यों गया था भला। मैंने तो उससे उसी समय कहा था कि ये सब बेकार के झमेले हैं। हर दिन कोई नई बात कहते हैं ये राजनीतिज्ञ लोग।' पल्टू गम्भीर हो जाता है । फिर अपने आप बड़बड़ाता है, 'पगले की पत्नी भी भभाटिया थी।' रावू ने प्राकर कहा, 'बुड्ढा नहीं आ सकेगा। उसने कहा है कि उसे वुस . पल्लू ने ऋद्ध होकर कहा, 'उसने ही कहा या तूने भी देखा ?' 'बुडता लेटा हुआ था यह तो मैंने भी देखा । सावी ने भी मुझसे कहा- पल्ट उठ सहा हा मोर बोला, 'चल, देख पाते हैं। अन्धा, ट्रेन नेट है क्या?' 'वीस मिनिट मड़क पर वे तीनों पास-पास कभी नहीं चलते। एक-दूसरे से दूरी रखते हुए चला करते । इस शहर की सड़कों, रास्तो, दुकानों, मकानों एवं जिन्दगी के जो एक प्रकार के अपने नियम हैं, ये लोग उन सभी नियमों से बाहर है। ये लोग एक-दूसरे से इतनी दूरी पर रहते हुए भी एक-दूसरे के लिए पूरी तरह सतर्क रहते हैं। विपरीत दिशा से चार-पांच लडकों का एक और दल बला पा रहा है। यहाँ के रास्ते भी बंटे हुए हैं । इस तरह एक ही समय एक ही रास्ते से एक साप दो दलों का गुजरना, नियम के विरुद्ध है। जगल मे भी तो यही नियम चनता है। फिर भी पद के साय रहने पर उसके दल को कोई तङ्ग नहीं करता । पर इस समय खुद पल्टू ने ही उन्हें निर्विरोध चले जाने का अधिकार रिमा। पन्टू अपने दल के साथ दीवार मे लगकर पड़ा हो गया। हाय में स्थित सिगरेट माघी भी नही खत्म हुई थी कि उसे फेंककर पल्लू ने बहुत ही मनो- योग सहित दूसरी सिगरेट सुलगा ली। रेलवे लाइन को पार कर एक बस्ती प्राती है । बस्ती के एक कोने में बुड्ढे का पर है । बुड्ढे की उम्र करीब तीस बरस है । चादर मुह पर लपेटे बुड्ढा सोया पडा है । खटिया के पास एक दुवले चेहरेवाली लडकी सही है। पल्लू ने कमरे में घुसते ही एक झटके मे दुढे के बदन पर से चादर सोनकर दूर फेंक दी और कहा, "ऐ साला !' 'मा कसम, पान मुझे वुधार है । भान मैं नहीं जाऊंगा।' 'स्साले, भालू के बच्चे ! तुम्हारे बुसार की ऐसी-तैसी ।' परी हम रहा था । पल्टू की चीजें वरवाद करने की भादत एवं बुरे को सुमार का बहाना करने की मादत, दोनों को मादतें एक-सी पी। हरार ऐसा पन्द्र शराब की बोतल निकालकर बुदे के मुंह से लगाते हुए भोला, ने, ? । पी स्साले । तेरा बुखार तो क्या बुखार का बाप भाग जायेगा इससे ।' दुबले-पतले चेहरेवाली लड़की ने तीखी आवाज में पल्टू से कहा, 'मैं पूछती हूं, यह सब क्या हो रहा है ? वह आज एकदम नहीं जायेगा ! मैं कहती हूं, वह नहीं जायेगा।' पल्टू हंस पड़ा । इस तरह की भयानक हंसी हंसने का उसने अभ्यास किया है या जन्मजात पादत है, पता नहीं। पर उस हंसी को देखनेवालों के बदन सिहर उठते हैं। झट से उसने लड़की का एक हाथ कसकर पकड़ लिया और हाथ को मरोड़ते हुए बोला, 'वोल, अब वोल, तोड़ दूं?' लड़की दर्द के मारे चीख पड़ी। वोली, 'याह, दर्द होता है। हाय, दट जायेगा मेरा हाथ पल्टू हसते-हंसते और भी जोर से उसका हाथ मरोड़ने लगा । इस बीच बुड्ढा भी हड़बड़ाकर उठ बैठा । बुड्ढे ने कुछ अनुनय तथा कुछ भत्सना का सम्मि- श्रण कर कहा, 'योह, यह क्या करते हो, उस्ताद ? औरत जात के शरीर पर हाय क्यों डालते हो ?' पल्टू ने उसकी बात अनसुनी कर लड़की का हाथ छोड़ दिया और ताक् से एक चांटा लड़की के गाल पर जड़ दिया। फिर वोला, 'पागे से कभी मेरे सामने जवाब देने की हिम्मत मत करना । रामझी ?' और फिर बुड्ढे की ओर मुड़कर बोला, 'चल, श्रीजार ले लिया है न ? जल्दी चल ।' लड़की ने दर्द से बेहाल हाथ को सहलाते-सहलाते कहा, 'मरो । आज ही तुम सब-के-सब मर जायो । तुम सब मरोगे उस दिन में सत्यनारायण भगवान की कथा कराऊंगी, शीतला माता पर जल चढ़ाऊंगी, और तुम लोगों को चिता पर बैठकर कीर्तन कहंगी।' पल्लू दस का एक नोट उसको अोर उछालकर जमीन पर फेंकता हुया बोला, 'मैं चला, मावी । तेरे बुड्ढे को सही-सलामत तेरे पास पहुंचा दूंगा। मैं मरू या जीऊ पर तेरा वुड्डा तुझे सही-सलामत वापस मिल जायेगा । तब तू मांग लाकर पकाना, रांधना। समझी?'
- उनके बाद बम्नी के पीछे की ओर मड़ी की गई जीर में सवार होकर पन्द्रह मिनिट तक उन लोगों ने निरयंका चक्कर लगाये। कोई उभय नही, मिर्फ. गाढी में घटकर घूमना । गाड़ी में बैठे-बैठे ही शराब की बोतल गेप हो गई। पल्लू ने उसे गड़क पर फेक दिया । पाली बोतल का शीशा भनमनाकर भूर-चूर हो गया। आखिर जोर रेलवे स्टेशन के मामने आकर रुकी। वे तीनो उतर गये । परी जीप स्टार्ट कर वहां से चला गया। स्टेशन पर भी वे तीनों पाम-माम पड़े नहीं हुए, एक-दूसरे में विशेष दूरी रस- कर पडे थे। ट्रेन के पाते ही तीनो व्यक्ति तीन डव्यों में चढ़ गये; मोर इम नरद चढे मानो पापम में एक-दूसरे को पहचानते ही न हों। करीव पन्द्रह मिनट चलने के बाद दो लम्बी तथा एक छोटी हिसिल देते-देते ट्रेन की गति मंथर हो गई और आखिर एक अधेरै जगल में ठहर गई ट्रेन । क्यो ठहर गई, इमार किमी को भी पता नहीं । भट-पट ये तीनों नीचे उतर गये। दो-एक पल उनमे पता नहीं क्या विचार- विनिमय हुप्रा और उसके बाद तीनों एक ही डब्बे मे मवार हो गये । हेन फिर में धीरे-धीरे चलने लगी। पन्द्र के हाथ में रिवाल्वर घा नया डायू पौर बुड्ढे के हाथों में छुरे | । डब्बे मे उनीम या बीस से अधिक यात्री नहीं थे । पन्टू ने यात्रियों की पोर मुगा- तिब होकर भयानक रूप से दात पीसते हुए कहा, 'कोई भी चिल्लाया तो गोली मार दूगा । सालो, निकालो जिस-जिसके पास जो माल है ।' हो में बैठे यापी निस्तब्ध-निस्पद से बेटे थे। सिर्फ एक प्रोड उम्र की महिला डर के मारे चिल्ला पडी थी, क्योंकि दम्ये में वही एकमात्र महिला थी । पर किमी ने भी कुछ निकालकर नहीं दिया । बुड्ढा, गचमुच के एक वृद्ध के पाग जाकर बोला, 'घडी पोन, स्माले । इस तरह मुद बार क्या देख रहा है ?' पता नहीं पड़ी योनने का हुक्म सुनकर या अपने लिये साना गन्द गुनगार वृर मंचमुच हो हरसा-याका रह गया था। बिगुल प्रसारण, मिर्फ अपने शैतान दिन की गुणी के लिये, पल्लू ने अपने ममीर बेटे प्रादमी के सीने पर रिवाल्वर की नात रमते हा प्रश्नीत एप चौमाम गाली-गलौन करते-करले इननी जोर में उमफे मुह पर मुसा माग किमी ममय होठ कटकर वैचारे के होंठों मे तपा मुह मे गन पाने लगा।
हार खोने के अब, टपा-टप रुपये, पैसे, घड़ी आदि चीजें निकलने लगीं चारों ओर से । डाबू उन सभी चीजों को थैले में भरता जा रहा था और बुड्ढा जा-जाकर लोगों की तलाशी ले रहा था। एक आदमी की अंटी में सात हजार रुपये मिले । इतने रुपये लेकर वह रात की ट्रेन से सफर क्यों कर रहा है, इसका जवाब कौन देता? प्रौढ़ महिला अपने गले का हार देने को किसी तरह भी राजी नहीं हुई । गहनों से औरतों को बहुत प्यार होता है। पल्लू खुद महिला के समीप पहुंचा और हार को अपनी मुट्ठी में कसकर जोर का झटका दे तोड़ लेना चाहा, पर हार इतनी सहजता से टूटनेवाला नहीं था। पल्टू स्वभावतः लड़कियों से बहुत निष्ठुरता से पेश आता है। उसने उक्त महिला की छाती पर एक हाथ रख पीछे की अोर ढकेला तथा दूसरे हाथ से हार को पकड़कर कई झटके दिये, तव कहीं हार टूटा । उस महिला के तो मानो प्राण ही निकल गये हों इस तरह की एक चीख मारी उसने । पता नहीं, शारीरिक पीड़ा महसूस करके या दुःख में कुल मिलाकर, चीजें कम इकट्ठी नहीं हुई थीं फिर भी उनको ट्रेन से उतरने की कोई जल्दी नहीं थी। दो व्यक्तियों की छाती पर छुरी रखे डावू और बुड्ढा उनसे पेन्ट खुलवा रहे थे । यह सब सिर्फ सेल नहीं था, टेरिलीन की पेन्ट थीं। कम-से-कम सत्तर-अस्सी रुपये की तो होगी ही। वेचारे एक ने तो पेन्ट-बुश्शर्ट दोनों ही खोल दिये । दूसरे व्यक्ति को ज्यादा ही शर्म आ रही थी, वह किसी तरह भी पेन्ट खोलने को तैयार नहीं था। वुड्ढे का पारा गर्म हो गया, उसने उस आदमी के पेट में छुरा भोंक दिया। यह उस व्यक्ति की शर्म की कीमत थी। रक्त-दर्शन के साथ-साय ही दृश्य पलट गया। इतनी देर सब चुपचाप बैठे थे । डर के मारे सभी यात्री चीखने-चिल्लाने लगे। उन्होंने भी फुर्ती से अपनी सभी चीजें समेट लीं। ट्रेन उस वक्त तक बहुत धीमी चाल से ही चल रही थी, अतः ये बड़ी फुर्ती से ट्रेन से कूद गये । अब तक डब्बे में चीख-पुकार बहुत जोरों से मच गई थी। इतना सब होने के बाद बम फेंकने की जिम्मेदारी बुड्ढे की थी । भोले में से निकाल-निकालकर एक-के-बाद-एका तीन वम फोड़े भागने से पहले । ट्रेन अब एकदम रुक गई। कुछ सिपाही बहुत ही मुस्तैदी के साथ भाग-दौड़ करने ।
लगे; निम इन्ले में गोल-माल हुमा है उसे वाद देकर तथा पन्द्र सोनियर भागे हैं उसको विरीत दिशा में ही वे मधिक भाग-दौड़ कर रहे थे। परी जीप लिये तयार पड़ा था। उन लोगों के जीप में सवार होते ही उसने पूछा, 'माल-बाल कैसा हाय लगा? दिया ?' पल्ट ने कहा, 'बुरा तो नहीं। पर तू जन्दी चला।' मानो रमगुल्ले का रस हो इस तरह पल्लू ने युद्ध से कहा, 'बुइटे, तेरे गाय में यून लगा है, कहीं मेरे शरीर से मत छुमा देना।' जीप दौडी जा रही थी। अब तक तो प्रोग्राम बहुत ही मफल रहा । इससे पहले के दो प्रोग्राम भी इसी तरह मफल रहे थे। कहीं भी किसी प्रकार की मुमीबत में नहीं फसे । लेकिन इस बार ऐमा नहीं हुमा । थोड़ी देर बाद ही उन्होंने देखा कि दो जीप उन्ही का पीछा करती वढी वली भा रही हैं । पर ऐसा होने की कोई ममारना तो नहीं पी। परी का दिमाग ठटा था, उनकी गाडी वहुत मागे निकल पाई थी पतः मतरा बहुत ज्यादा तो नहीं था। थोड़ी देर तेज रपवार से गाड़ी चलाने के बाद परी ने कहा, 'उस्ताद, मामने चैक-पोस्ट है, गाडी स्लो करनी पड़ेगी।' पल्टू ने गदंन धुमाकर पीछे की ओर देपने की कोशिश की भोर बोला, 'उम जीप में प्रो. मो. है क्या अगर मो. मी. है तो..' इतनी देर से डाव भी पीछे की पोर ही देग रहा था। उसकी तेत्र नजी पाइनाकुलर को तरह दूरी को पाम ले पाती थी । उसने चौंककर कहा, 'पुलिम नहीं, मिलिट्री है।' मिलिट्री के साथ रेम नउने से कोई फायदा नहीं। इसके अलावा, यह भी तो संभव है कि, मिलिट्री उनका पीछा नही कर रही हो। उनके साइड देने पर शायद ये पाने चले जायं। जरा मागे, दाहिनी मोर एक मकरा रास्ता है, अगर वे उपर मुड़ना चाहेंगे तो भी उन्हें गाडो की रएतार तो वम भरनी हो पड़ेगी। पल्लू ने कहा, 'साइड कर । परी, मार कर।' लेकिन गाड़ी की गति धीमी होते ही उघर में गोलियों की बौधार होने मगी इन पर । मौर कोई उपाय भी तो नहीं पा । मिर भडाते ही मोले [पहनेवाली बात । हो गई । इस अंचल में शायद हाल में ही कफ्यू लगा है। पॉलीटिक्स-बाज लड़कों ने इधर कोई कांड किया है और उनकी गलती का दंड पल्टू आदि को भुगतना पड़ रहा है। अचानक जीप में ब्रेक लगा, परी गाड़ी से कूदकर अंधेरे की ओर भाग गया । वह इतनी शीघ्रता से चम्पत हुआ कि एक पल पहले तक उसके साथी उसके मतलव को नहीं समझ पाये । डाबू भी कूद गया था । पल्लू के हाथ में रिवा- ल्वर था पर सिर्फ एक रिवाल्वर से मिलिट्री का सामना नहीं किया जा मकाना । भागने की सुविधा प्राप्त करने हेतु वुड्ढे एवं पल्टू ने सड़क पर बम पंकने शुरू कर दिये। वे वहुन दूर तक दौड़ चुके थे लेकिन इस बीच फौजी भी जीप से उतरकर लगातार उनका पीछा कर रहे थे । इसी भाग-दौड़ में बुड्ढे की पीठ में गोली लगने से वह वहीं गिर गया । पल्टू एक पीपल के पेड़ के मोटे तने के पीछे छिपा वड़ा था । अभी भागा जा सकता है लेकिन एक फौजी बुड्ढे की देह की योर आ रहा था। वदला लिये विना भाग जाना पल्टू के खून में ही नहीं है । शायद बुड्ढा अभी भी जीवित हो। उस व्यक्ति ने बूट से बुड्ढे की देह पर ठोकर मारी, तो पल्टू ने लगातार तीन गोलियां उस पर चलाकर उसके शरीर को छेद डाला । उसके बाद पता नहीं कहा ने एक गोली उसके दाहिने बाजू में आकर लगी। पल्टू और उसके साथियों का दुर्भाग्य ही कहिये कि वे फौजी ऑफिसरों की दो जीयों के सामने पड़ गये थे। ट्रेन से उतरकर कुछ लोगों ने फौजी अफसरों की जीप को रोककर ट्रेन में हुई डकैती के बारे में बताया था । गोली खाकर पल्ल जमीन पर गिर पड़ा, लेकिन दूसरे ही पल यह उठकर भागने लगा था कि एक मजबूत हाथ ने उसकी गर्दन पर दवायी। हाय की पीड़ा के मारे पल्लू मरा जा रहा था। अतः कुद्ध हो पागल कुते की तरह घूमकर उसने कुरी मारनी चाही कि उसकी कनपटी पर जन्नाटेदार एक थगड़ पड़ा । बप्पड़ पड़ने के बावाद पल्टू के मुंह ने आश्चर्यजनका आवाज में निल पड़ा, 'साधन दा!' प्सौजी अफसर ने पूछा, 'कोन ?' 'सामन दा, मैं हूं, पल्लू । मुझे छोड़ दो।'
हाय या रमाव गर्दन पर बुध टोला पड़ गया,
पन्टू ने पुद को फोजी पफनर के पजैसे मुहरानजर कर दिया।
जाने से पहले पन्द्र ने पनि विरोधी को पुपो पर निर दे और हर
किया था और कुछ मरचील गालियां भी देना होगई.
पडसा)
पौदे से चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी, 'हांडनाइट।
लेकिन पर मला पन्टू कहीं रकनेवाला पा!
सबक
है । बुड्ढे को मारने का वदना ले किस है।
दारी वाकी नहीं रही।
दुवारा दहाड सुनाई पड़ी, 'रउ डा!'सन्नई, बैंक
स्टेनगन की गोलियों से उनका शरीर इतनी है
रहने
एक शब्द भी नहीं बोल सN मर -
उसके प्राण-परोरू उड़ गये थे।
D
'क्यो रे पल्लू, क्या हाल-चात है तेरे :'
'साधन दा, मेरी मां मर गई है।'
'मोह, कब?'
'यही, करीब डेढ़ महीना हुभा होता।
'तभी, तुम्हारा पुटा-टा-मा निरक:-
नो मैं तुझे पहचान ही नहीं ना।
'कुछ नहीं । बन को ही मो-तुकारनामा
'मोह ! पना ही नहीं करा दी
दलकाई'
'तुमनोग कनाना में दो नहीं'
'नहीं। हमलोल दो पद दिन्नी मीनदार
तुम्हारे सिवारी तो मदरहीट'
'हा। लिाजों ने सहा मर है:
प्ले हैं।'
'चेहरे से तू इतना भोंदू सरीखा क्यों दीख रहा है ? पढ़ाई-बढ़ाई तो करता - पल्लू ने शनं से सिर झुका लिया और बोला, 'मुझसे पढ़ाई नहीं होती। दिमाग ही नहीं है मेरे पास ।' साधन ने हंसते हुए कहा, 'तो गर्दन पर इतना बड़ा सिर बिल्कुल खाली है क्या ? स्कूल फाइनल में कितनी बार फेल हुआ ?' 'दो बार ।' 'तो तीसरी बार भी हो जाते । कोशिश तो करते।' 'तुम्हें तो पता ही है साधन दा, मां तो है नहीं, पिताजी मुझे और आगे पढ़ायेंगे नहीं।' 'तो फिर, तू अव क्या करेगा ?' 'कोई नौकरी-वौकरी ढूंढ़नी पड़ेगी। ड्राइविंग सीख रहा हूं, शायद ड्राइवर की नौकरी मिल जाय ।' 'इतनी छोटी सी उम्र में तुझे नौकरी पर कौन रखेगा? कितनी उन होगी तेरी इस वक्त ? सोलह या सत्रह का होगा तू ?' 'उन्नीस का हो गया हूं।' 'उन्नीस का हो गया ? तो फिर ड्राइवरी करके नया करेगा ? किसी कारखाने में घुत सके तो कोशिश कर ।' 'तुम्हारी तो बहुत जगह जान-पहचान है, जरा मेरे लिये भी कोशिश करीन !" 'अच्छी बात है, देबूंगा । अाजकल नौकरी का बाजार इतना तंग है कि वन पूछो मत ।' 'तो, तुम वापस दिल्ली चले जायोगे ?' 'हो । अभी एक महीने की उट्टी पर हूं। तुम्हें मालूम है न, में आजकल अार्मी 'हां, जानता हूं। तुमलोग अभी भी उसी मनोहरपुकुर वाले मकान में हो रहते हो न ?' ७४
'हो यही । माना कभी । भच्छा तो प्रव में चलू-
'टहरो न । इतने दिनों बाद तो तुम मिते हो।'
'तो पन, चाय पीयें।'
साधन ने पल्लू के कंधे पर हाय रस चाय की दुकान की मोर कदम बढ़ाये ।
चरने चलते यहत ही अपनत्व भरे गन्दों में बोला, 'तेरी मा मर गई मुनकर
मुझे बहुत ही दु.म हुमा। मुझे इतना चाहती थी, इतना स्नेह करती थी कि,
पया बताऊ ! यह खबर मुन मेरो मा को भी बहुत ही दुस होगा।'
'मा देयो, सापन दा!'
"कहा ? हाप राम, सचमुच, यह सापन ही तो है।'
'मुगाऊ?'
'जा, जा । बुलाकर ना।
'यो साधन दा सापन दा' मुझे नहीं पहचाना "
'मरे'", पद !
। तो
पहचाना ही नही जाता मय । कितना बड़ा हो गया
है रे!'
'वार, नुम भी तो बड़े हो गये हो । यह देखो, मो यही सही है।'
चन, मिल माऊ'
मापन नै पाग पहनकर पल्लू की मां के चरण स्पर्श किये । मां ने भी माचीवर्वाद
दिया, 'जीते रहो बेटा, गुग्गी रहो । कितने दिनों बाद तुम्हें देखा है
ने
बहा, 'हा चाची, सब, यहुत दिन हो गये । पल्ट को देगार में तो
पमित रह गया। पहचान ही नहीं पाया। रितना बड़ा हो गया है यह
कौन-सी पनास में परना है रे ?'
'पनास मेवेन में । देशमा विद्यालय में।'
मो ने पूछा, 'मापन, तुम भी बरा पड़ ही रहे हो।"
'इम बार मैंने माई एर.-पी०पी परीक्षा दी है।'
सापन
.
'अच्छी बात है बेटा, बहुत ही खुशी की बात है । भगवान करे तुम और अधिक विद्वान बनो, मां-बाप का नाम रोशन करो। यहां अचानक कैसे आये, बेटा?' 'दोस्तों के साथ मुर्शीदाबाद की सैर करने आया हूं। वहरामपुर स्टेशन के पास ही एक होटल में ठहरे हैं।' होटल में ठहरे हो ? क्यों ? तुम यहां आ जाओ न ।' 'नहीं चाची, दोस्तों के साथ आया हूं न, इसलिए उन्हीं के साथ रहना ठीक रहेगा । इसके अलावा, हमलोग कल तो जा ही रहे हैं।' 'नेरी मां कैसी है ? कलकत्ता में तुमलोग किस जगह रहते हो ?' 'हमलोगों ने मनोहरपुकुर में एक मकान खरीदा है | आप आइये न किसी दिन । आपको देखकर मां बहुत खुश होंगी। मैं मां से कहूंगा कि आपसे मिला हूँ मैं ।' मैं तो बस जा चुकी, बेटा ! मुझे ले ही कौन जायेगा? उनका स्वास्थ्य तो ठीक नहीं रहता।" 'न्यों ? क्या पल्लू नहीं ले जा सकेगा? हां रे पल्टू, तू ट्रेन में बैठकर नहीं जा नरेगा ? ट्रेन से उतरकर एट-बी बस में चढ़ जाना ।' 'हा, मैं जा सकता हूं।" मा ने कहा, 'चलो साधन, थोड़ी देर हमारे घर चलो न । दूर नहीं, बस पास ही है । इतने दिनों बाद तुम्हें देखा है।' 'चाची, दो मिनिट यहीं ठहरो, मैं दोस्तों से कह पाऊं जरा।' मा ने घर का दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश करते हुए साधन से कहा, 'प्रानो, म बाट पर बैटो । रहने दो, रहने दो; जूते उतारने की कोई जरूरत नहीं । पहले से ही घर कौन-सा साफ-सुथरा है! ऐसी हालत है मकान की कि, बाहर का कोई भी ना जाता है तो शमिन्दा होना पड़ता है । तुम्हारी बात दुमरी है । तुम तो अपने ही लड़के जैसे हो । जब अपने देश में थे तो तुम्हारी मां और मुझमें कितनी गहरी मिमता थी। उसके घर में विशेष पुछ भी बनता तो भने बिलाये विना नहीं पाती थी। इसी तरह मैं भी कुछ अच्छी चीज बनाती तो-' - - 'हाँ चाची, मुझे सब कुछ याद है।' 'तरी वहन चन्दना की गादी हो गई क्या ?' 'हा, दीदी की गादी हो गई। दीदी भी पाजरन दिल्ली में ही रहती है जीजाजी, सेन्ट्रन गवर्नमेन्ट में एक प्रॉफिगर हैं।' 'वाह भई, बहुत ही मुनी की बात है। सब मुझे बहुत मुशी हुई यह सबर मुनकर । भगयान फरे उसकी गृहस्थी सदा हरी-भरी रहे । पोर नेरे छोटे भाई के क्या हाल हैं ? 'यह तो दाजिनिंग में पढ़ता है । चाची, झरना दीदी वहा है पानकल?' "झरना दीदी को नमिंग में भरती करवा दिया है । नमिग की ट्रेनिंग पाम कर ले तो युध कमाने लायक हो जायेगी। क्या करू, गादी नो कर नही मी उसको । और फिर फरती भी कहा ग घर में कोई भी तो नहीं है कमाने. वाला । तुम्हारे चाचा नो हरदम बीमार ही रहते हैं। गुन रहे हो न, मामी पी पावाज वम मी तरह चलता है इनके कभी गामी, कभी युमार ।' 'टॉस्टर को नहीं दिपाया ?' "पताल में दिनापा पा । वे लोग अस्पताल में भर्ती करवाने को कहते है । लेकिन मतों फरवाना इतना मासान थोडे ही है !' चाची, पापका चेहरा भी कितना बदल गया है । बास्थ्य गिर गया है । पहले पाप कितनी मुन्दर लगती यों, क्या म्वास्थ्य या माका 'नहीं-नहीं, मुझे कुछ नहीं हुमा । मैं विगुल ठीक हूं।' 'तो, प्रब मुझे मामा दीजिये। दोस्त लोग इन्तजार कर रहे होंगे । पन्द्र वहा गया?' 'चंटो, बस पोडी देर और ठो। इतने दिन याद तुम्हें देखा है. मच, मुझे बहुत ही गुनी हो रही है । तुम सब तो कुगलपूर्वक हो. गुनकर मेरा गून बा गया है रे गुशी के मारे ।' 'पन्द्र, महा गया पा? यह क्या चाची मापने यह सब करो मगवाया है चंकार ही इतनी मिटाई-विठाई मंगवायी मारने । नहीं, मैं कुछ भी नहीं गाऊंगा इम वक्त । 'मरे, बुरा नहीं है. यम बरा-सी मिठाई भगवानी है । इतने दिनो बाद तुम्हाग - - - प्रणाम हासिल हुआ है मुझे, और इस खुशी के अवसर पर मैं तुम्हारा मुंह भी मीठा न कराऊ? जब गांव में थी तब, जब भी तुम्हारे घर जाती तो कितनी- कितनी चीजें खाकर आया करती, मुझे सब याद है।' 'अब उन बातों से... 'पल्लू, तेरी घुथनी इस तरह कैसे कट गई रे ? क्या हुआ ?' साधन दा का प्रश्न सुन पल्टू हक्का-बक्का रह गया । उसने एक बार सावन दा की ओर देखा, फिर अपनी मां की ओर देखने लगा। उसके बाद बहुत ही मंकोच-सहित बोला, 'कल गिर पड़ा था।' पल्टू की मां रो पड़ी । प्रांखों पर प्रांचल ढंकती हुई बोली, 'नहीं, गिरा नहीं है । मनुष्य कितना निष्ठुर हो सकता है, यह उसी का प्रमाण है । पास ही के एक मकान में पल्लू खेलने जाया करता है । वे लोग बढ़े आदमी हैं । हम उनकी नगरों में कुछ भी नहीं हैं । फिर भी हमारे बच्चे भी तो और बच्चों की तरह प्राखिर बच्चे ही हैं । औरों की तरह हमें भी अपने बच्चों से उतनी ही ममता है । क्या हमें अपने बच्चों का दुख-दर्द नहीं सताता ? उनके घर में वह अांख- मिचौली खेल रहा था । पल्लू के हाथ का धक्का लगकर उनकी एक कीमती फूल- दानी टूट गई । मान लो, इसने तोड़ ही दी, पर आखिर तो यह बच्चा ही है। इसने क्या जान-बूझकर तोड़ी थी ? उनके लड़के से भी तो टूट सकती थी। इतनी-सी बात के लिये बच्चे को इस तरह मारना चाहिये था ? तुम्हीं देखो, कितनी बुरी तरह मारा है ! खून से भीगा कमीज लेकर जब यह घर लौटा तो मैं ही जानती हूं, मेरे दिल पर क्या गुजरी है....ठोंगे वैचकर कितने कप्ट से मैं इसकी पढाई करवा रही हूं, इसी उम्मीद पर कि, बड़ा होकर यह मुझे सहारा देगा।' एक पांच साल का गोल-मटोल वच्चा उछलता-कूदता पाता है और प्राकर कहता है, 'मां, तुमने साधन को पैसे दिये हैं, और मुझे नहीं दिये !' 'ची: छी: पल्लू, माधन नहीं कहते, वेटा । साचन भैया कहो । वह तुमसे बड़ा न उम्र में!' 'हा-हां, साधन नंया को तुमने पसे क्यों दिये जबकि, मुझे नहीं दिये !' लम्बे बरामदे में विछे कार्पेट पर एक पाठसाल का लड़का बाबू बना सजा- मंवरा बैठा है । वह बड़े ही मनोयोगपूर्वक खीर खाने में मगन है।
मां में कहा, 'हा तुम्हें भी दूंगी, पा पहले मुंह-हाय पोकर मा।' पटू उपलता-कूदता हाप-मुंह धोने चला गया। मा ने मापन से पूछा, 'क्यों बेटा, थोडी-मी और लेगा? सौर नहीं लेता तो दो सङ्ग ही ले में नारिपन के । बड़ा ही राजा बेटा है ! कहना मानता है मेरा। नब तक पल्लू भी यहां पहुंच गया था। वह भी माधन की तरह सार-मुपरा हो पानाकारी बालक की तरह बठकर बोला, 'सापन नंगा को जितने मला दिये हैं उतने मुझे भी दो। 'तूने गुवह भी माये थे । अधिक पायेगा तो पेट दुमेगा ।' 'युध भी हो, पान तो मैं जरूर सूंगा।' 'नो ले, जल्दी मे मा ले । फिर दोनों भाई गेलना । टीक है न ? झगड़ा नही परोगे न मापम में ' गाधन ने चाट-पोदार बीर सा नी । पल्लू नी मा ने अपने हाथ से उसका मह धोकर पोछ दिया । पर की नाक से पानी बह रहा था, यह भी साफ रिया । उगके बाद पन्द्र का भी मुह धोकर बोली, 'जामो, अब तुम लोग मेपने जापो। सभी समय माधन के माता पितानी वहा पा पदचे। वे बगल के मकान में चिमी में मिलने पाये थे। माधन कीमा ने मापन गे वहा, 'चल, प्रब पर पलना पड़ेगा।" पल्लू पी मा ने रहा, 'इननी जल्दी की जायेगी! अभी तो पायी है। थोडी देर सो बैट 1 इन मोगो को गेमने दे।' मापन की माने पन्दू को गोद में उठाने की पोशिश की, पर वह तिमी तरह भी उनकी गोर में नहीं गया । मापन गरी मा ने पल्लू सीमा में रहा, 'पना, नेग बेटा कितना गवमूरत नगता है ' गहरे तथा पपराले वान,कटीनी मागे-- पन्द्र की मा मन्द-मन्द मुस्कुराती हुई बेटे की मोर देगती रही। मापन मोर पल्टू गेलने के लिये चले गये। मती पर ऊंचा पुन बना हुमा है । बरमात का मौसम है। पोड़ी ही देर पहने यरमान होकर पुरी है । प्राग, पृषी तथा पेड़-पौधे मर धुन-धुने, माप- सुथरे-से लगते हैं । घास की नोक पर पानी की बून्दै टिकी हुई हैं। शाम के वक्त की हवा सरसराहट की आवाज कर रही है । और उस स्वच्छ वातावरण में खेल रहे हैं दो शिशु । एक घेर-घुमेर कदम के पेड़ में गुच्छे-के-गुच्छे अनगिनत फूल खिले हुए थे, पर उन बच्चों के हाय फूलों तक नहीं पहुंच रहे थे । बहुत उछलने पर भी फूल हाथ नहीं पाये उनके। पल्ट ने पूछा, 'साधन दा, तुम गाछ पर चढ़ सकते हो?' साधन ने बहुत ही समझदार की तरह कहा 'बरसात के दिनों में गाछ पर नहीं चढ़ना चाहिए । इन दिनों गाछ में सांप रहते हैं । हरे रंग के सांप ।' 'मैंने सांप देखा है । तुमने देखा है कभी ?' 'बहुत, बहुत बार ।' 'कदम फूल के पेड़ पर सांप नहीं रहते।' 'हां, तुझे अधिक मालूम है ! तुझे पूछकर चढ़ेगा कदग के पेड़ पर सांप ! 'हां, मालूम तो है ही । मैं और दीदी एक दिन इस गाछ पर चढ़े थे ।' 'जा भूठे ! 'सच । अच्छा फिर चढ़कर दिखा दू?' 1 - 'अगर तू गाछ पर चढ़ेगा तो मैं चाची से कह दूंगा । गाछ भीगा हुया है । चढ़ेगा तो फिसल जायेगा । श्रा, हम आंख-मिचौली खेलें ।' थोड़ी ही देर बाद पल्टू दौड़ा-दौड़ा अपनी मां के पास गया और नाक फुला- कर बोला, 'मां, साधन दा ने मुझे मारा है ! साधन की मां ने कहा, 'उसने तुझे मारा? बुलाकर लायो उसे । मैं उसे सूब डांढूंगी । मा बेटे, मुझे दिखा, कहां लगी है ? मैं सहला देती हूं। थोड़ी लगी है या ज्यादा ?' पल्ह ने कहा, 'थोड़ी ही लगी है ।' पल्ट की मां ने पल्लू को डांटते हुए कहा, 'सेल-खेल में इस तरह शिकायत नहीं करते । जाप्रो। बेलते समय ऐसा ही होता है। जामो, फिर से लो जाकर।'
मांस-मिचौली के पेल मे साधन कभी भी पल्टू को पकड़ नहीं पाता । बहुत ही
सतर्क होकर नदी के पाप पर चढ़कर भाका उसने पर वहा को भी नहीं
पा । पन्ना कही भी नजर नहीं पाया।
हरते-डरते, कापते गले से साधन ने चिल्लाकर पल्टू को मावाज दी, पन्द्र !
कहा गया? पद-उ-उ-उ !
पास से ही प्रावात्र पाई, 'ढूंढ लो।'
साधन ने गर्दन घुमाकर चारों ओर देग लिया पर पल्लू कहीं भी दियाई
नहीं दिया।
पल्लू कदम के गाध पर फूलों के भुड के भीतर छुपा बेटा था। वह सिल्नी
उड़ाने के मै भन्दाज में बोला, 'हार गये, माधन दा हार गये ! मुझे नहीं
जूद गके । साधन दा मुझे पकड नहीं मरते ।....
...
क्या था विधाता के मन में प्रमथनाथ बीसी . ० 'क्या था विधाता के मन में ?' पर सच पूछा जाये तो 'क्या था विधाता के मन में' यह ग्बुद विधाता को भी कहां मालूम था ? खुद विधाता के लिए भी हर वात, हर समय पहले से ही जान लेना भला संभव है ? और अच्छा भी है कि हर समय, हर बात पहले से उन्हें भी मालूम नहीं होती, नहीं तो इस रसीली दुनिया का बहुत-कुछ रस सूखकर यह विश्व-संसार भी गणित की पुस्तक की तरह नीरस हो जाता। तभी तो विधाता ने अपने और मृप्टि के बीच थोड़ा-सा परदा रखा है, यानी जानकर भी अनजान बना रहता है । उत्तर-मेरू की उज्ज्वल हिमशिला-राज्य की एक दुग्य-धवल हिमशिला शनैः- शनैः जब पुष्ट-मजबूत होकर भीषण रूप धारण कर रही थी तब स्कॉटलैण्ड को जहाज-निर्माण कारखाने में भी एक विशालकाय जहाज का निर्माण कार्य चल रहा था, पर उसके भयावह दुःखद परिणाम का उस समय भला किसे पता था ! मगर विधाता को इस बात का पागे से पता भी था तो उन्होंने इस .
'रहस्य को अपने तक ही सीमित रखा । हल्का-गा भानास भी प्रगर दे देते हो सागों लोगों की प्रारस-रक्षा की जा सकती थी। हिमगिला के पापात में राइटानिक जहाज के इवने को एक मास्मिर दुर्घटना यह सरने है । उम दुर्घटना को नियम न कहकर नियम का म्पत्तिकम कहें तो गदा उनित होगा। फिर भी कहने का मारोग यह है कि नियम के व्यक्तितम में ही नियम के अस्तित्व का प्रमाण निहित रहता है । समी नियम के अनुसार में महा एर घटना का विवरण देने को प्रस्तुत हुप्रा है जिसमे अप्रत्याशित गप के फल- स्वरूप एक पुरुष भौर एक नारी दोनों ही बने है। टाइटानिक में तो मिर्फ पुरप ही इवे थे। शहर के एक ही मोहल्ले के दो अलग-अलग मकानों में मनुपम मौर निन्दनीया रहते थे। वे एक-दूसरे को बिल्कुल नही जानते थे । जानते भी करो ' जानने का कोई कारण भी तो नहीं था। उनके रास्ते मि भिन्न ही नहीं एपदम विपरीत थे। फिर भी पता नहीं दियाना को क्या मजूर या' जिम समय अनुपम गीता पटना उस वक्त. अनिन्दनीया मि.पिटल' पटी। जब मनुएम को गदर की धोती छोटी होते-होते पटनों तक मा पानी पी तय मनिन्दनीया की गाडी प्राय धूल बटोरनी चलती । अनुपम का गिनात था कि लग्ना निवारण के लिये जितना करडा पावश्यक है उममे अधिक ग्रहण करना चोरी है जबकि भनिन्दनीया फा गयाल पाकिमाने पहनने में कामी करना पागलपन है । पनुपम जब बन्दमातरम् की पावाज युलन्द करता तर पनिन्द- नीपा लालित्यपूर्ण यारणी में इकनाय मिराबाद का नारा लगाती । मगर पही तर होता तो माई साम बात नहीं थी वोफि ऐगा तो प्राय: हर घर में ही होता है । इतनी भी बात की बहानी नही यन मरनी, सिर्फ नीरम विवरण लिया जा सकता है। लेकिन जब इमी नीरम मोर साधारण-गे विपररा पर हटात यह यात लागू हो गई, 'क्या या विद्याता मे मन में तो यही विवरण एक कहानी बन गयी और इमरे मवार वन गमे काम्य । ऐसे ही गमय में राजनैतिक पारन के जोर से लोगो के दिलों में देवी माग बाहर निकल पडी पोर परिणामम्वरूप पारो मोर उगका ही तार मोर मोना- इल गुनाई पडने सपा ! हा गर वात बनाना में भूप हो गया था। अनुपम जितना ही निष्ठावान का गी पा भनिन्दनीया उतनी ही निष्ठावान पम्युनिष्ट पी। पर मैं भूल गया तो क्या हुमा, मेरे पाठक सय ही गममा गये होंगे - योंकि निष्ठा, पुरुषों का स्वभाव है, इसलिए वह बदल सकता है। को निष्ठा नहीं बदलती। यह उसकी प्रकृति होती है। चाहे पति हो, चाहे धर्म, चाहे राजनीति-नारियां अपनी निष्ठा की हर वस्तु को मरते दम तक मुट्ठी में बन्द रखना चाहती हैं। अनिन्दनीया का विश्वास है कि राजनीति हो वर्तमान युग का धर्म है जबकि अनुपम का कहना है कि धर्म ही वर्तमान युग की राजनीति है। दोनों के मत, पय, प्राचार, आचरण तो सर अलग-अलग थे ही, राजनीति को लेकर तो जमीन-पासमान का फर्क था। सिर्फ यही क्यों, चेहरे और आकार-प्रकार में भी दोनों में कोई साम्य नहीं था। अनुपम स्वस्थ, सुन्दर, लम्बा, सुपुरुप दिखाई पड़ता था। रंग भी गोरा था। दस व्यक्तियों के वीच सड़ा होने पर भी सबसे अलग दिखाई पड़ता था। और अनिन्दनीया ? छरहरा शरीर, अांख और चेहरे के भाव में तीखी धार जैसा भाव मानो ईश्वर तलवार गढ़ने बैठा और बना बैठा तनु-लता। और रंग ? केले के वृक्ष के गर्भ से जब पहले पत्ते की कोंपल थोड़ी-सी बाहर झांकती है, उस समय उसका जंसा रंग होता है, ठीक वैसा ही रंग था अनिन्दनीया का । रंग के साथ उसके नाम का कोई मेल नहीं था । अरुणोदय की प्रथम किरण के कुशल हाथों से बुनी गुन्दर बनावट जैसी थी वह । उसके माता-पिता के पास कितने ही पाय शादी की इच्छा लेकर पाये पर लड़की का एक ही जवाब था कि वह शादी नहीं करेगी। - विवाह सम्बन्धी समस्या पर शायद कुछ और प्रागे तक सींच-तान होती पर ऐसे ही वक्त शहर में पान्दोलन छिड़ गया। अनुपम तथा अनिन्दनीया के नेतृत्व में कांग्रेसी और कम्युनिस्ट दल आमने-सामने आ खड़े हुए । वन्देमातरम् और इनकालाव-जिन्दाबाद के नारे एक-दूसरे से प्रतियोगिता कर रहे थे। दोनों ही दलों के लोगों के हाथों में पताकाएं एवं अनेक तरह के आकर्षक पौर उत्तेजक नारों से सजे फेस्टून थे जो संभवतः सम्बन्धित नेतानों के समयोचित निर्देशानुसार निरो गये थे। अब जबकि दो परस्पर विरोधी दल आमने-साम प्रा डटे थे तो कुछ अप्रत्याशित घटित होना अवश्यम्भावी था ही। यह वा न्यूटन सम्बन्धी किसी नियम के अन्तर्गत पाती है कि नहीं यह तो पता ना पर राजनैतिक अांदोलन का ध्रव नियम है गह । गुहूर्त भर में फेस्टून मान-दण्ड राज-दण्ड के रूप में प्रगट हुमा। तभी समझ में आया कि फेस पर कपड़ा टांगना तो सिर्फ एक प्रौपचारिकता थी। एक उण्डा प्रनिन्दन के मिर की भोर बढते ही, "है, है, यह क्या करते हो ? हमलोग पहिनावारी हैं' बहता हुमा अनुपम मागे यहा। पर उसके मुंह की बात पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि अहिंसक मापात बड़ा ही हिसा होता है शायद इसी के प्रमाणस्वरूप गिर पर गहरी चोट पाकर भनुपम घराशायी हो गया और माप-ही-माप वहीग भी हो गया। घटना को विचित्र रूप से पलटते देम दोनों ही दस स्तम्प हो गये । उस स्नयना को भग करके मिर्फ मनिन्दनीया के मुह से घिरकार गूंजी, 'क्या यही तुम्हारी महिमा है ?' काग्रेसियों के नेक्स्ट इन कमाण्ड ने कहा, 'पहिमा राय को समझना तुम्हारा काम नही है । शत्रु के प्रति अहिंसक होने का हमे हम मिला है, किन्तु अनुपम दा तो हमारे शत्रु हैं नहीं।' पर उम वक्त महिमा तत्व पर विचार करने लायक मन.स्पिति न होने के कारण दोनो दस मिलकर अनुपम को साथ ले गये । साय गई थी मनिन्दनीया । पता नही, 'क्या था विपाता के मन में ।' दूसरे दिन प्रनिन्दनीया अनुपम को देखने पस्पताल गई तो उमने पाया कि मिर पर पट्टी बाध अनुपम पलग पर पहा है । वह घोड़े-से फूल तथा फम ने गई थी। उनको पास की टेबिल पर रसकर वही गडी रही। थोड़ी देर बाद अनुपम ने भाग गोलकर उसकी तरफ देगा, पर उसको पहचान नहीं पाया । रोगी ने मार्ग यापम द सीं । मापिर जब मिलने का ममय गरम होने की पाटी बजी तव एक दोघं नि स्वाग घोड यह चली भापी। a अगले दिन भनिन्दनीया फूल तथा फर ने उसी वक्त फिर गयी । भार रोगी की हालत में काफी मुधार नजर मापा । यह उपर ही देग रहा था। मनिन्द नीया को देखते ही पहचान गया पोर पूछा, 'तो क्या पाप मल भी पाई थी? ये फल और फन पाप ही रए गई पो?' पनिन्दनीया के मौन को स्पीरारोक्ति गमनकर अनुपम ने पहा, 'पर माप गफेद फूल यों गाई मरने राजनंदिर गिमान में मनुमार सो पापको साल फूल लेकर पाना पाहि।' फिर उगरे हाय को सरफ देगरूर मोता, 'पोह, माप तो मार भी साई है ! मरिन ? यह गाय या विजयी के महमार-चिन्ह है .
अनिन्दनीया ने मुस्कराकर कहा, 'पहले आप ठीक तो हो लीजिये, उसके बाद इस मसले पर विचार किया जायेगा।' 'मेरा स्वस्थ होना तो, अगर मैं गलत नहीं कहता, आप लोगों की आकांक्षा होनी नहीं चाहिये । जिसने लाठी मारी थी वह......" 'प्रापको गलतफहमी हुई है, अनुपम बाबू । लाठी तो आपके ही कांग्रेसी स्वयं- सेवक ने मारी थी, और मुझे मारी थी। आपने खामखाह अपना सिर बीच में देकर यह अनहोनी कर डाली। वह लाठी अगर मेरे सिर पर पड़ी होती तो मैं खत्म ही हो जाती। पर कांग्रेसी लोगों का सिर बहुत ठोस होता है न, इसी- लिए इस बार ग्राप बच गये।' जवाब में अनुपम कुछ कहने जा रहा था कि लड़की ने वीच में ही रोककर कहा, 'माज के लिए इतनी बातें काफी हैं । हां, आपका मन नहीं भरा हो तो कल सुना लीजियेगा।' 'तो पाप कल भी आयेंगी? लेकिन क्यों? मुझ पर जासूसी करने का तथा मुझे नजरों के सामने रखने का भार शायद आपको ही सौंपा गया है !' लड़की ने हंसकर कहा, 'हां, मुझे भी यह नगरों के सामने रखनेवाला मामला ही लगता है।' 'यह क्या ! आप चल दी ?' 'हां । घण्टी बज चुकी है । जाने का समय हो गया है।' उसको जाते देय अनुपम ने कहा, 'अगर मैं आज की ही रात यहां से भाग जाऊ, तो?' . . 'अगर ऐसा ही हुआ तो भाग जाने के बाद विचार किया जायगा ! आज तो में चली।' दूसरे दिन फिर ठीक समय पर लड़की प्रा उपस्थित हुई। ग्राज उसके हाथ में फून मोर फल के अलावा सन्देश भी थे । उसने देखा कि अनुपम के सिर की यंग गोल दी गई है तथा वाल बहुत ही छोटे-छोटे काट दिये गये हैं जिसके फलस्वरूप वह बहुत ही कृश-काय दोष रहा है। लड़की के हृदय को आघात पहुँगा उराका मेहरा देखकर । बोली, 'क्यों बेकार ही मुझे बचाने के लिए अपना सिर आगे किया आपने ?'
यह खर्च क्यों" 'अगर सच सुनना चाहती हो तो नवकुमार की भाषा में जवाब देना पड़ेगा। बहुत-से लोग दूसरों का दायित्व निभाने के लिए ही जन्म लेते हैं।' अनिन्दनीया ने कहा, 'नवकुमार को स्वीकारोक्ति का शेप कयन क्यों गोल कर गये ? कह दीजिये न, तुम भले ही अधम हो, लेकिन मैं महान क्यों न व ?' इस वार अनुपम ने कहा, 'एक तो पाने का कष्ट वहन करती ही हैं श्राप, ऊपर से 'जब खर्च हो ही चुका है तो फिर साइये भी।' कहकर एक सन्देश अनुपम के हाय पर रख दिया। अनुपम ने मन्देश खाते-याते कहा, 'तो पाप क्या सिर्फ दृष्टि-भोग ही करेंगी?' अनिन्दनीया ने हसकर कहा, 'भोग की तो शुरूपात है, पता नहीं मेरी किस्मत में अभी और क्या-क्या भोगना लिखा है।' विदा लेते वक्त लड़की के हाथ में गुलाब का फूल देते हुए अनुपम ने कहा, 'अस्पताल के बगीचे से प्रापके लिए ही लाया था।' 'वेकार ही क्यों कष्ट किया मापने ?' 'पाप तो रोज ही कष्ट करती हैं, एक दिन मैंने भी किया समझिये । कष्ट के ऋण का शोर कष्ट से ही होता है।' लड़की ने कहा, 'समझी। बदला चुकाकर सारे सम्बन्ध ही खत्म करना चाहते हैं ! 'सम्बन्धों की तो यह शुरूपात हुई है, भई । बाद मे जब फिर दोनों दल मामने. सामने होंगे तब इससे भी जोर से लाठी मारकर भूल का संशोधन कर लेना।' मनुपम ने कहा। 'मेरा सयाल है, वह शक्ति तो आपकी अहिंसक लाठी मे ही अधिक है ।' 'अच्छा बताइये, पापको किस नाम से पुकारू? अनिन्दनीया नाम तो बहुत ही भारी-भरकम है, प्रत इसको ढोने के लिए मजदूर की अावश्यकता पडेगी।' 'तो ठीक है, एक मक्षर कम करके माप मुझे निन्दनीया कह सकते हैं । तव तो योड़ा हल्का हो जायेगा न?' 'फिर भी साम हल्का नहीं हुमा । मैं सोचता हू, थोड़ा और छोटा करके नि नाम से ही क्यों न पुकारू ?'
लड़की ने जवाब दिया, 'इस नामकरण के कारण लोग आपके सिवाय और किसी की निन्दा नहीं करेंगे । फिर भी आपको उसी में खुशी हो तो आप उसी नाम से पुकारिये । अच्छा, तो आज मैं चली।' . . अगले दिन उसी समय पाकर अनिन्दनीया ने देखा कि अनुपम जाने के लिये तयार बैठा है। 'ग्राज मुबह दस बजे ही मेरी छुट्टी हो गयी थी। डॉक्टर से कहकर कुछ घण्टा और रहने की इजाजत मांगी है।' लड़की ने कहा, 'यह तो मैं आज नई बात सुन रही हूं कि अस्पताल में भी कोई रोगी खुशी-खुशी अधिक रहना चाहता है।' उसने अतिरिक्त समय मांगकर अस्पताल में क्यों रहना चाहा, यह बात अनिन्द- नीया को न समझते देख अनुपम को थोड़ा दुःख हुमा । उसके चेहरे का म्लान व अनिन्दनीया से छिपा नहीं रहा । मन-ही-मन वह खुश हुई। लड़कियां समझती सब कुछ हैं, सिर्फ न समझने का ढोंग करती हैं । 'अब क्या यहीं खड़े रहेंगे? जव छुट्टी मिल ही गयी है तो चलिये, आपको पहुंचा आऊ । मेरे पास गाड़ी है।' 'घर की गाड़ी है शायद ? सचमुच, घर की गाड़ी बिना कम्युनिष्ट होने का मुख नही है !' on . लड़की ने उस बात का कोई जवाब न देकर पूछा, 'आपलोग भी कार में बैटते तो है न ? फिर आपने ऐसी विचित्र बात क्यों पूछी, वताइये तो? वैसे मैंने मुना है, बहुतों की धारणा है कि बैलगाड़ी के अलावा और किसी गाड़ी में बैठने से कांग्रेसी लोग जाति-बाहर समझे जाते हैं।' गादी दौड़ी जा रही थी। अचानक अनुपम ने पूछा, 'हमें जाना है मध्य फलकत्ता । अाप गंगा-किनारे क्यों ले पाई मुझे ? गंगा-प्राप्ति करवाने का परादा तो नहीं ?' 'अगर गंगा को हवा खाने से ही गंगा-प्राप्ति होती है तो आप यही समझ लीजिये।' 'कई दिनों से तो पाप संदेश खिला रही हैं, अब भला हवा खाने की जगह बची होगी मेरे पेट में ?' ८ ने दो नन्देर साने के लिए पाने एक बार भी नहीं कहा, पर सिर्फ हमा माने के मनावा मेरे और चारा हो रहा है ?' मनिन्दनीश मे माम कुछ कहने-नुनने को न होने पर भी जब मादमी बोले हो जाता है पर समझ नेना चाहिरे कि उत्तको भवत्या स्वाभाविक नहीं है। काम की पात होतो दो मिनट में पूरी हो जाती है पर बेकार बाते द्रौपदी के पीर की तरह है। उन्हीं कार बातों में मुग्ध होकर पन्द्रह मिनट का रास्ता अप डेड घण्टे में तय करके भनुपम के घर के दरवाजे के सामने गाड़ी पहुंची सप शाम प्राप: पूरी तरह झुक प्रायी थी। अनुपम ने कहा, 'भीतर चलिये।' 'नहीं । प्राज नहीं । रात हो गई है।' 'लगता फिर से सिर फुड़वाकर हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ेगा। पम्ममा तो अव मापसे मेंट होनी सम्भव नहीं।' 'मैं क्या फ्लोरेन्स नाइटेगल हू जो मस्पताल मे घूम-घूमफर रोगी को रोना करती फिरती हू?' अनुपम ने पूछा, 'अब कय मिलना होगा।' 'जल्दी तो नहीं।' कहकर अनिन्दनीया गाड़ी में जा बैठी पोर गाड़ी मनुपम मी पाखों से दूर हो गई। जितनी देर पीछे की मास मतियां दिगाई पड़ती रही अनुपम एकटक उघर ही देखता रहा । 'जल्दी तो नहीं शन्द कार्ट की तरह अनुपम के दिमाग में गारी रा भता रहा । स्वप्न एव जागरण के बीच की स्थिति में भूमा रहा पर। दो दिन पहले जो अपरिचित थी या किर गजुगक्ष की थी, उगी में पिएसी तहप क्यों ? लगता था, उसके वे छोटे-छोटे वीन गम्छोटी पुरी भाषा तरह उनके हृदय में पीड़ा उत्पन्न कर रहे थे। ममार में दुःव-गुम दोनों ही प्रत्यागित होते है-ग पृगान बगिया मान व्याया तब हुई जब दूसरे दिन गाम को निन्दनीया की गाड़ी प्रामा के मानने या पटीद । दागं निकों का कहना है कि 'ममय जम्पति-गा है। मीन नदवी चिति-गारक्षा प्रारिमीम है। प्राय मुनि funn को यह गाहार गये , कि गीत्र लोगा, और किर नारे ही नहीं। पर गनिन्दनीया काही कि जल्दी तो नहीं, जयति बोधीस घण्टे भी पुरे नहीं हा । शम्भ-गास्त्रों की महिमा भी अपार है। अनिन्दनीय को गाड़ी से उतारकर घर के भीतर ले जाते समय अनुपग तीन रहा था कि कल की गल उसने ये कार ही दुःन में काली थी। जगी तो नहीं का अर्थ उगने दो-चार साल से ही नगों लगाया ? दो बार चार को दान- पागल से गौबीस पन्दे भी तो हो सकते थे। और यही या अनुपम ने अनिन्दनीया का परिचय अपनी मां से कराया । बोला, 'मां, यही लड़की है जो अस्पताल जाकर मेरी देख-भाल किया करती थी। मेरी बल गम्भाल कीगने ।' मा लड़की को देखकर कितनी मुग्म हुई यह तो बाद में पता चला । दो दिन बाद ही उन्हीं ली से कहा, 'बेटे, लहनी तो बहुत अच्छी है । तुम्हारी शादी ऐगी ही लामी से हो तो बहुत अच्छा रहे ।' विवाह-गोग्य कन्या की पुस-या के रूप में जाना करना मांगों को सना होती है। 'वह नपती शादी नहीं करेगी, मां । इस प्रोर से तुग निश्चित रहो ।' मा म काला, पल पगले ! साठ बरस की में होने को ग्राई । लकियां तो वन परगी लडकी नहीं देती जिसकी शादी करने की इच्छा नको। मीनागी ने भनुप-गंग का प्रण किया था, फिर भी उनकी शादी अटती नहीं। एक दिन निन्दनीग गे अनुपम की मां ने कहा, 'काई दिन हॉस्पिटल में रहने मेमो गये हैं। में जगा नगा-लिलारे पुना गाऊ ।' जगर मन को गति नाना नही चाह मकाते । अनुमति, पाना तारा मापन बीपी निगाह नती। प्रिसव घाट के पास पहरे मैदान में दोनों नाम दरा पूनो नो । फिर गंगा-गिनारे बनी वेन पर दोनों ने पास-पास बैठार गमगीना। फिर तो रोज कीमतीनो गयी । एक लिपि पाट पान बैठे पनुपम शोर निन्दनीया बात कर रहे थे किम कहा, "निया, मैं मग-र-गन का आत्मग्लानि माग करता हूं। देश में राजनैतिक मान्यता नागौर में गार वा वरवाद करता हूं।'
लड़की ने कहा, 'क्या करें पम, तुम्हारा शरीर तो अभी भी याम लायक नहीं अनुपम और अनिन्दनीया दोनो के नाम मक्षिप्त होकर जब पम और निन्दा में परिणत हो गये तथा प्राप सम्बोधन तुम पर या गया, तो समझ लेना चाहिये कि इस बीच बहुत-कुछ घट चुका है जो बाहरी लोगो को मालूम नहीं है। मसार की गति दगी तरह बहुत-से मध्यवर्ती अंगो को बाद देती हुई चना करती है। कुछ देर चुप रहकर अनुपम ने कहा, 'वस थोड़ा-सा और आराम कर लेता हूं। शरीर थोड़ा टोक होते ही फिर से राजनीति मे भाग लूंगा । धर्म ही इस युग की राजनीति है।' लड़की ने कहा, 'टीक ही है । तुम ठीक हो जानो तो फिर मैं भी राजनीति में योग दू । राजनीति ही इस युग का धर्म है । 'तब फिर क्या हनारी मुलाकातें नही होगी" लड़की ने जवाब दिया, 'यत्कि और जल्दी-जल्दी होगी। पितुन धर्मक्षेष- कुरक्षेत्र में। अनुपम ने कहा, 'हो गया बेड़ा गर्क । यह तो एकदम गोता जैसी स्थिति 7' 'न हो तो तुम मार्सवाद अपना लो, मुझे प्रापत्ति नहीं है, लेकिन पिप्य में अपने दोनो दलो का मामना होने पर दूसरे का सिर बचाने के लिये अपना गिर ग्रागेन बढा देना।' अनुपम ने कहा, 'वादा नहीं कर मरता। सारी बात इस पर निर्भर करती है कि सिर गिका है इसी तरह अनर्गल प्रनहीन पाती की तरगं सामने पहनी गगा की तरह प्रवाहित होती रहती थी और उधर अन्धकार को नुनिका सहस्त्र दीपालीवित कलकत्ता शहर के भाकाम को काला करने की कोशिश करती रहती थी। इन कुछ ही दिनों में अनुपम यो धोती की गालर घुटनो से नीचे उतरती- उतरती माय. हानी पोहुने लगी थी तथा दर का मूल महोन रोल होत इतना सूक्ष्म हो गया पारिमिला छदम-शी पता था । पर यो साड़ी रंगीन हो गयी थी तथा उसमें वैसाखी गुल्म के फूल खिलने लगे थे । अनुपम के चरखे पर मकड़ी ने जाला बुन रखा था तथा गीता पर इतनी धूल जम गई थी कि एक फसल तैयार की जा सकती थी । अनिन्दनीया की माक्सवाद सम्बन्धी कितावें भी तकिये के नीचे पड़ी-पड़ी उसकी ऊंचाई कुछ और बढ़ाने का गौरव प्राप्त कर रही थीं। अनिन्दनीया के साथ पुस्तकों का अब यही सम्बन्ध रह गया था । अनुपम सोचता कि उसके कर्तव्य में त्रुटि हो रही है और पार्टी के लोग पता नहीं क्या सोच रहे होंगे; उधर अनिन्द- नीया को लोग वुलाने जाते तो जवाब मिलता कि सिर्फ जुलूसवाजी करना ही राजनीति नहीं है । घर जाकर इस विषय की किताबों का भली प्रकार अध्ययन करो। पर सच्ची बात यह थी कि दोनों पक्षों के ऊर्व में एक तृतीय पक्ष भी था । और वह था शायद देवता । राजनीति अगर विशेष युग की होती है तो वह देवता निविशेष युग का होता है। उनके लिये चाहे शत्रु -पक्ष हो या मित्र-पक्ष, दोनों पक्षों के आमने-सामने आने पर वे बहुत ही कौतुक महसूस करते हैं, और फिर एक छोटा-सा वाण छोड़ते हैं। कहना उचित होगा कि वही देवता अनुपम और अनिन्दनीया के सिर पर सवार हो गया था। उन्हीं को महिमा का फल है कि अनुपम तो पम हो गया तथा अनिन्दनीया निन्दा बन गई और उन दोनों के परस्पर आप सम्बोधन तुम पर आकर ठहर गये । इतनी-मी वात शायद वे दोनों नहीं जानते या फिर जानकर भी अनजान बनते है । मानसिक यात्म-प्रवंचना करने की शक्ति भी अपरिसीम होती है । . एक दिन शाम के वक्त निर्दिष्ट समय अनुपम के दरवाजे पर अनिन्दनीया की गायी नहीं पहुंचने पर वह बहुत ही उद्विग्न हो उठा । आज इतनी देर क्यों हो रही है ? मोहल्ले के लोगों ने गाड़ी की उपस्थिति देखकर घड़ी का टाइम मिलाना शुरू कर दिया था। ऐसी हालत में उद्विग्न न होना ही अस्वाभाविक होता । वह अधिक सम नहीं कर सका। बाहर निकल सीधा कम्युनिस्ट पार्टी के प्रॉफिस जा पहुंचा। उसे वहां देखकर कामरेड-गण घोर अचरज में इव गये । एक ने कहा भी कि, 'बाप.."और यहां ?' पर उसकी बात का जवाब देना बेकार समझ. अनुपम ने पूछा, 'अनिन्दनीया कहां है ?' जवाब मिला कि यह बाजपाल यहां अधिक नहीं पाती है। शायद घर पर ही हो। अपने अना- ग. इस तरह वहां पाने की व्याख्या न कर वह सीधा अनिन्दनीया के. घर की गार चल पड़ा। यहां पहुंच विना भूमिका के घर में प्रवेश करते ही देखा कि दरवाजे की ओर पीठ किये बहुत तन्मयता के साथ मनिन्दनीया कुछ कर रही है । दवे कदमों से ठीक उसके पीछे पहुंचने पर अनुपम ने देखा कि अनि. न्दनीया चित्र बना रही है, और यह चित्र उसका यानी अनुपम का ही है । प्रनिन्दनीया को पता ही नहीं चला उसके पाने का । वह तो बस चित्र प्रक्ति करने में ही मग्न यो । साधारणतः चित्र बनाते वक्त मॉडल सामने रखा जाता है पर यहा मॉडल पौधे था। लेकिन जब मॉडल हृदय में ही बसा हुअा हो तो सामने रहे या पौधे, एक ही बात है। इसी तरह पता नहीं कितनी देर और गुजरती कि अनिन्दनीया की छोटी बहन ने कमरे में प्रवेश किया और अनुपम को वहां देखते ही पुशी के मारे लगभग चीखने हुए बोल उठी, 'देखो न दीदी, कौन पाया है ?' अनिन्दनीया ने पीछे मुडकर देखा और देखते ही चित्र को भटपट आचल में छिपा लिया। फिर बात बनाने के लिये योही कहने लगी, 'बहुत दिन हो गये चित्र बनाना छोडे, इसीलिये मात्र देर रही थी कि मेरा हाथ ठीक चल रहा है कि नहीं।' अनुपम उक्त व्याख्या की उपेक्षा कर बोला, 'माज पायी क्यों नहीं ?' चित्र यनाने जो वंठी तो समय का होश ही नहीं रहा।' "अब तो होश में आ गयी हो। चलो, तुमसे जरूरी काम है।' दोनों गंगा किनारे निर्दिष्ट स्थान पर पाकर वैटे। सारे दुविधा-बन्धनो को तोड़ मनुपम ने कहा, 'निन्दा, मैं तुम्हें प्यार करता हूं।' अनुपम मगर निपट प्रबोध नही होता तो समझ सकता था कि इस बात को अनिन्दनीया बहुत पहले ही ममझ नुकी थी। सिर्फ मनिन्दनीया ही क्यो, पार्टी व मोहल्ले के लोग भी इस बात से अनभिज्ञ नहीं थे। अनमिन या तो सिर्फ नैष्ठिक कांग्रेस-कर्मी अनुपम सरकार ही था। स्वत:सिद्ध बात का क्या जवाब दे यह जब अनिन्दनीया नहीं ममन पायो तब चोली, 'गंगा की धारा में प्राज इतना शोर क्यों हो रहा है। गायद इम वक्र ज्वार माया हुमा है !" किस प्रत्याशा का कसा उत्तर ! इस बार भनुपम ने कहा, "निन्दा, तुम मुम करोगी?' माज अनुपम बिल्कुल विनीत हो रहा था की बात माने ही न हो इस तरह से प्रनिन्दनीया फिर बोन नद्र तिना दूर है.
उसके ज्वार के पाघात से नद-नदियों का पानी उत्तेजित हो उठता है। यह बहुत ही अचरज की बात है न !' अब अनुपन एकदम क्षुब्ध होकर बोला, 'भौगोलिक समस्या को इस वक्त छोड़ो और मेरी बात का जवाव दो।' अनिन्दनीया खुद में ही मगन बोले जा रही थी, "कहां तो लाखों मील की दूरी पर चांद, फिर भी किस सहप्य आकर्षण शक्ति के वशीभूत हो समुद्र का पानी ज्वार-भाटा के रूप में सिर धुनता है। यह क्या अचरज की बात नहीं है, अनुपम वायू? । इतने दिनों बाद, इतना कुछ अघटनीय घट जाने के बाद, पम से फिर अनुपम वाबू हो गया वह ! अनुपम शुब्ध हो उठा। बोला, 'समझ गया। अब घर चलो । सभी लड़कियां एक जैसी ही होती हैं ।' अनिन्दनीया ने निर्विकार भाव से कहा, 'यह सुनकर सचमुच मेरी चिन्ता ही मिटा दी तुमने। अब किसी भी एक लड़की से शादी कर लो, क्योंकि सभी लड़कियां तो एक समान होती है।' मोटर में बैठने के बाद अनुपम ने एक भी बात नहीं की। बाहर अंधेरे में प्रकृति-गोभा देखने की कोशिश करता रहा । लड़कियां छोटी रहती हैं तब वे गुड़िया से बेलती हैं । जब बड़ी हो जाती हैं तब अयोध, सीधे, सरल पुरुषों से रोलती है। उस समय उनकी यह हालत हो जाती है कि आंख होते हुए भी देख नहीं सकती, कान रहते सुन नहीं सकतीं, हां, मुंह से बात अवश्य कर सकती हैं लेकिन वे होती हैं सिर्फ 'अर्थहीन वातें ।' 'पम, तुम्हारे प्रस्ताव पर मैं राजी हूं, लेकिन मैं राजनीति को नहीं छोड़ मपती । राजनीति ही इस युग का धर्म है।' 'राजनीति छोड़ने को तुम्हें कौन कह रहा है, निन्दा ? मैं ही क्या राजनीति चोड़ दूंगा? धर्म हो इस युग की राजनीति है।' 'एक बात और गी है, तुमलोगों की गीता मैं नहीं पड़ सगी ।' 'क्यों ? बहुत छोटी-सी किताब है। सिर्फ सात सौ श्लोक ही तो हैं।' 'हा. प्राकार में छोटी अवश्य है, पर प्रकार में नहीं । उसका टीका-भाप्य बारह हाथ की पांमुड़ बेल के तेरह हाथ लम्ये बीज की तरह है।' .
"तुम गीता पर टीका-टिपणी कर रही हो तो मुझे भी कहना पड़ेगा निन्दा, कि तुम्हारे दि कैपिटल ग्रन्य के पास तो कुछ भी नहीं है। प्रत्येक पाठक पानी इच्छानुसार उसका अर्थ-कुप्रथं लगाता है।' 'मेर, गीता की बात जाने भी दो लेकिन पार्टी किस तरह छोड़ सकती हूं?' 'तो ठीक है। तुम अपनी पार्टी में रहो, मैं अपनी पार्टी में रहता हूं। इसमें मादी मे पहा बाधा पडती है ?' 'प्रमभय ।' कहकर अनिन्दनीया गम्भीर हो गई। तब फिर ? 'तय फिर और क्या कहूं, अनिन्दनीया? पंव और प्राक्त में क्या विवाह नहीं होते ? हिन्दू-फ्रिस्तानों में क्या सिविल मैरिज नहीं होती? फिर अपनी ही मादी असभव क्यो होने लगी ?' अनिन्दनीया ने कहा, 'यह तुलना चलनेवाली नहीं है । शंव और शाक्त दोनों ही हिन्दू होते हैं । हिन्दू और पिस्तान दोनो ही धर्म को मानते हैं ।' 'तुम भी तो धर्म को माननी हो । फर्क मिर्फ इतना है कि, तुम राजनीति को इम युग का धर्म मानती हो।' 'अमली वात क्या है, पता है तुम्हे ' तुम हो इस युग के व्यक्ति, जवकि मैं भावी युग की है। अनुपम ने नगर उत्तर दिया, 'तो फिर वर्तमान का क्या होगा ?' 'यह गुझे पता नहीं है । लेकिन इतना जानती हूं कि इस तरह विवाह करके हम दोनों ही गुती नहीं होगे।' 'अच्छा निन्दा, तुम बना सकती हो कि शादी करके. कभी कोई मुगी हमा है प्रनिन्दनीया ने कहा, 'हा, बहुत से।' "जिस काम को करने से सभी ठगे जाते हैं, उसकी पभिमता क्या कोई कभी ठीक से बताता है ? फिर भी सुनो, में बताता हू, विवाहित जीवन में सुख नहीं है तो प्रविवाहित जीवन में भी शाति नहीं है।' 'वृपा तम करने से लाभ यया है ? हमारी शादी नही हो सकती।'
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महारे सपने मान-सम्मान की रक्षा करते हुए गादी-मनारोह में शापित होने को नीद हो रहे थे। बन मद मेरी कहानी दत्म होने की है। इतनी बड़ी दुनिया में दिया तो होता ही रहता है । फिनी घटना के प्रभाव में कितने ही मानोरन दन आटे है टी घिर दत्म भी हो जाते हैं। दिन भर की मदद के बाद जो दारद नरीमनार टदार होती है वह जरा-सी माम दिवाने ही अग्निहार छोडली दुई मिनिट नानत्म हो जाती है। D दूसरे दिन अनुग्न और अनिन्दनीवा पी. एन.पी. के प्रतिम पवे मोर मदस्य दन गं तया उनके अगले ही दिन मंन्त्रि रबिन्दार के पास पहुंदकर उन्हान गादी के अनुवन्ध पर. हन्तामर कर दि गाद यह कहने को जान नहीं कि दमी दिन दिविस्त वैदिक गति में भी उनकी शादी हो इन कार में कांग्रेस और कम्युनिष्ट दोनों पाटियों के ही दमन्दन्ति रह म्दै। इन दिनों के सरनंटिक दिन का प्रन आदिर इन कार में दृप्रा! सनर में उन्होंने मिला-जुला उन्न निकानकर उनके घर के सामने नारं नगा और उन्हें विकार दे प्रा।दिर, देगी की पर पद कि जुनम के कारण उन दिन दान-दन दन्द न्ही दुई, जिन घर के गन्ने में न दान चननी थी, न बम । मारपदुम और प्रदिन्दीका को पद नादन होता कि 'का या विकाटा के मन में दो दें पहने में ही मावशाल .
उन्होंने तो इस तरह अपना सिद्धान्त स्थिर कर लिया, लेकिन सबसे शक्तिशाली मिसान्त तो देवतायों के हाथ में था। उनके तेज वारण नित्य-प्रति ही उनको लक्ष्य कर चला करते। तीन दिन बाद अनिन्दनीया ने कहा, 'मैंने एक उपाय सोचा है । अब तुम निश्चित हो जानो । कोई अड़चन नहीं होगी अब ।' इस बार अनुपम की वारी थी संक्षिप्त भापण देने की। उसने कहा, 'असंभव ।' - नीन दिन और बीते । उनकी मुलाकात रोज ही होती थी। कई बार तो एक वार से अधिक भी हो जाती। इस बार अनुपन ने कहा, 'मैंने एक उपाय सोचा है, तुम भी विचार कर देखो । जव म राजनीति को छोड़कर रह नहीं सकते तो एक नाम क्यों न करें। तुम्हारी पार्टी और मेरी पार्टी दोनों को ही जाने दें। क्यों न हम दोनों एक तीसरी पार्टी में शामिल हो जायें। फिर तो कोई अडचन नहीं पायेगी।' 'अच्छा, मैं सोचूंगी।' अनिन्दनीया ने कहा । तीन दिन बाद फिर दोनों में प्रसंग उठा । अनिन्दनीया से अनुपम ने पूछा कि उसने क्या सोचा है ? अनिन्दनीया ने कहा, 'तीसरी ऐसी कौन-सी पार्टी है, मुझे तो नजर नहीं पा रही है।' 'मुझे आ रही है। जिनकी राजनीति हम दोनों के बीच की है, चलो उसी में हम सहयोग दें।' 'ऐसी कौन-सी पार्टी है ?' 'नयों ? पी. एस. पी. है न । वे लोग कांग्रेस तथा याम्युनिष्ट दोनों दलों से बरावर दूरी रखते हैं।' ये अयोध नर-नारी अगर अपने होशो-हवास में होते तो समझते कि उनकी इस मुक्ति में कितना बड़ा झूठ तथा घोखा था। लेकिन उस अदृश्य देवता के जादू-प्रभाव से ही उन पर ऐसा मुग्ध-भाव छाया हुआ था कि एक धोसे के सहारे सपने मात्म-सम्मान की रक्षा करते हुए शादी-समारोह में उपस्थित होने को उदग्रीव हो रहे थे। वस भव मेरी कहानी खत्म होने को है। इतनी बड़ी दुनिया में ऐमा तो होता ही रहता है । किसी घटना के प्रभाव से कितने ही मायोजन बन जाते हैं तो फिर खत्म भी हो जाते हैं । दिन भर की मेहनत के बाद जो यारूद मरी मनार तयार होती है वह जरा-सी माग दिसाते ही अग्निफुहार छोड़ती हुई मिनिट भर मे खरम हो जाती है। दूसरे दिन अनुपम और अनिन्दनीया पी. एम. पी. के ऑफिस पहुचे और उसके सदस्य बन गये तथा उसके अगले ही दिन मैरिज रजिस्ट्रार के ऑफिस में पहुंचकर उन्होंने शादी के अनुवन्य पर हस्ताक्षर कर दिये । शायद यह कहने की जरूरत नहीं कि उसी दिन विधिवत वैदिक रीति से भी उनकी शादी हो इस कार में काग्रेम और कम्युनिष्ट दोनो पार्टियों के ही सदस्य स्तम्भित रह गये । इतने दिनों के राजनंतिक जीवन का अन्त आखिर इम काण्ड में हुप्रा ! इस उपलक्ष्य में उन्होने मिला-जुला जुलूस निकालकर उनके घर के सामने नारे लगाये और उन्हे धिक्कार दे पाये । फिर भी खुशी की बात यह थी कि जुलूस के कारण उस दिन ट्राम-वस बन्द नहीं हुई, क्योंकि उनके घर के रास्ते मे न दाम चलती थी, न बस । अगर अनुपम और अनिन्दनीया को यह मालूम होता कि 'पा था विधाता के मन में' तो वे पहले से ही मावधान रहते । HD.
यह एक विचित्र अंधकार आइभि राहा 0 'ऐ देन, देख न ! मां कसम, पहचाना- राना-सा लग रहा है। याद नहीं श्रा रहा है, कहां तो देखा है ! 'अरे, वह नो पिकलू है । पिकलू ! तुम्हें याद नहीं ? हमारे साथ प्राशुतोष फॉलेज में पढ़ा करता था न ?' 'मोह हां, वही, अंग्रेजी साहित्य का पिट्ट ! हम वंगला पढ़ते थे इसलिये जो उपेक्षा करता था हमारी । प्रांस-मुंह की एक खास मुद्रा बनाकर कहा करता था, अमां छोड़ो भी यार, इस देश का साहित्य भी कोई साहित्य है ?' 'हां-हां, याद मा गया। तो पड़ोस की वह' 'जो भी कहो, यार है चीज ! लेकिन कैसे फंसा लिया, बता तो सही ?' 'यह ऐमा कोन मुश्किल काम है ! दो रुपये अस्सी पैसे सिनेमा के और कपर से एका बाटलेट, बस ।' 'बेटा हमको भी रंग दिसाता है। क्या शेयर करने से डर लगता है ?'
'हा, यार । अपना तो मूगा-ही-गूगा है। जलाकर राम कर दिया है माले ने! हमारे घर के चबूतरे पर ही उनका अड्डा जमता या । गेज प्रारुर वैट जाते । हल्ला-गुल्ला मचाते। राजनीति पर बहग करले। मिनेमा-स्टारों पर टोका. टिप्पणी करते। लड़की देखते ही अावाज कमले। फिर चाहे वह बचपन में गोद पिलायी मोहल्ले की लड़की हो या मा की उन की अन मौहल्ले वी अपरिचित महिला। दादी ने एक दिन उनके गोर-गराये मे तंग प्राकर कहा या, 'अच्छा, क्या तुमलोगों को बंटने के लिये और कोई जगह नही मिलनी जो पहा बैठकर इस तरह चीखते-चिल्लाने हो ? तुम लोगो के मारे क्या हम दो घड़ी भजन-पूजन भी नहीं करें?' बम, इतना काफी था। फिर तो दादी के लिए पिंड छुडाना मुश्किल हो गया । उनमें से एक बोला, 'क्यों दिया, बहुत राय दिवा रही हो? जानती हो, फिनसे बात कर रही हो और हा, तुम्हारी नातिन के क्या हाल-चान हैं ? उसको क्यो नही भेज दिया ? कोई फैमला ही कर डालते ।' तग पेन्ट पर कुरला पहने एक नदी ने कहा, 'ज्यादा मत टर्रा तुढी, नहीं तो तेरी नातिन की मिट्टी पलीद करके छोटेंगे।' दादी गुम्से मे बदबड़ाती लौट गई थी। छोटे चाचा नाम को लौटे तो मारा शिस्मा मुन सत्रस्त हो उटे। दादी पर गुम्मा भी बहुत हुए । 'उन मभी को मैं पहचानता है। उनके नाम भी जानता है । ये मभी मोहल्ले के प्रतिष्ठित परो के लडके है, पर तुद इनको कोई इज्जत नहीं।' ज 'मा कसम, तू ही बता, कही चला जाय? चबूतरे पर थोड़ी देर निश्चित होकर बैठ मकै, यह भी मुश्किल कर रखा है । साली पुलिस आकर हुम्जत करेगी। ये पुलिसवाले भी तो बेटे उसी जाति के हैं जो कहते हैं कि, 'तूने नही तो तेरे बाप ने पानी गदा किया होगा ।' भोर कोई दुप्रा न सान, कोई बात न चीत, बस सीधे ले जाकर हवालात में दस देंगे।' कमल ने मानो कोई नई खोज की हो इस तरह की मुख-मुद्रा बनारद 'ज्यू-गार्डन चले ? बहुत दिनों से उपर जाना ही नहीं हुआ । चरीर यही चला जाय । पूब मजा........"
- 'तुम्हें और कोई जगह नहीं सूझी, मेरे चांद ?' कमल की बात काटते मसीम बीच में ही बोल पड़ा । 'योह, तो चिढ़ते क्यों हो ? उसने तो खुद के लिए उपयुक्त जगह ही ढूंढ़ी है।' दीपू की इस बात पर सभी हो-हो करके हंस पड़े। लेकिन सुमन नहीं हंसा । कमल की बात का ही उसने जवाब दिया, 'धत्, वहां जाकर नया करेंगे ? वहां जाकर तो यही देखने को मिलेगा कि सभी जानवर अपने-अपने जोड़ों के साथ प्रेमालाप कर रहे हैं। सालों को देखकर और मन पराब हो जाता है। हमारी किस्मत में तो वे सब जुटेंगी नहीं।" 'गया बात करता है, यार? वस इतनी-सी बात के लिये मन छोटा करते हो ? मैं तो ऐसी-ऐसी कितनी ही चीजें हाय में प्राई हुई भी छोड़ देता हूं।' असीम ने उपेक्षा दिखाते हुए कहा, 'रहने दे वरा । तुझे डोंग मारने की जरूरत नहीं है । हमें सब मालूम है, तेरी दौड़ कहां तक है ? हां, सचमुच कोई जोगार हो तो नल, दिगाज में चलें ।' 'तुगलोग सिर्फ यही सब करते रहोगे क्या ? कल की बात याद है न ?' 'कल ! कल गया है ?' 'सब कुछ भूल बैठे हो, गुरू ?' 'परीक्षा ? पढ़ने-लिखने से कोई सरोकार ही नहीं, फिर वह सब किसे याद - रहता है ?' युनिवसिटी-विल्डिग के एक तल्ले से नीचे तक उनका साम्राज्य है। गेट के पारा, सीढ़ी पर तथा कारीडोर में वे लोग अड्डा जमाये रहते हैं। उस बार मृणाल हमलोगों के साथ परीक्षा नहीं दे सका था । परीक्षा के कई महीने पहले उसकी बैंक में नौकरी लग गई थी। पढ़ने-लिखने में यह बहुत होशियार था । हम सभी जानते थे कि वह बहुत अच्छा रिजल्ट लायेगा । दो साल बाद वह इस बार परीक्षा दे रहा है। गृणाल पे गेट के सामने पहुंचते ही एक लड़के ने उसको अंटा, 'पाप यहां मा कर रहे हैं ?' मृणाल नर्वस हो गया । उस वक्त गायद उसके दिमाग में परीक्षा की चिन्ता से पलाया पौर कोई बात नहीं थी। इसीलिये वह उग्न में अपने से छोटे लडके की इस बात का जवाब देते समय भी हर के मारे हकला उठा ! बोला, 'जी, मैं परीक्षार्थी हूं।' 'मन्जेक्ट क्या है ?' कड़ाई से पूछा गया । "जी, ६""... इंग्लिश ।' 'जार चले जाइये । तीन तल्ले पर ।' कमाहर जैसा हुक्म हो गया। पर पहुंचकर मृणाल परीक्षा-हॉल ढूंढ रहा था कि एक लड़का आगे बढ पाया, 'यहां क्या कर रहे हैं ?' 'मैं अपनी क्लास दूढ रहा हूं।' 'सबजेक्ट क्या हैं, इंग्लिश ? इधर माइये। उस सामनेवाले कमरे में बंट जाइये । जाइये ! और हा, रुपये लाये हैं ? दस रूपये लगेंगे।' 'द-स-रु-प-ये ? क्यों ? इ-इतने रुपये तो मैं लाया नहीं । मेरे पास तो सिर्फ ८. रपये हैं।' लड़के ने प्यग्य से होंठ विचकाये । 'परीक्षा देने माये हैं मोर रुपये नहीं नाये ? वहां के जन्तु है पाप ?' फिर पाहा, 'मेर दीजिये, घ रुपये ही दीजिये । किताव-वितायें तो लाये हैं न' या कि वे भी... 'किता ? कितावें किमलिये ? किताबों का क्या होगा ?" 'बेड़ा गर्क हो तो फिर माप परीक्षा किस तरह देंगे ना ! पाप तो पायद ऐमे येन से पाप परीक्षा पास करके भी क्या करेंगे? रविश ! जाइये, जाकर अपनी जगह बैठ जाइये । " जाइये !' मृणाल को मन-ही-मन क्रोध तो बहुत पा रहा था लेकिन फिर भी वह बुद्ध योर नहीं सका। बल्कि भय और पाशका से वह भीतर ही भीतर काप रहा या । क्लाम में प्रवेश कर उसने एक बार चारों ओर देख लिया । सभी के पाग पावश्यक कॉपी-कितावें थी । मृणाल का पाली हाय देख सबने उमको हमी उड़ाई। प्रनीव-मजीव चेहरे बनाये सभी ने जिनमें व्यंग्य एव तिरष्कार जमा भाव था। मृणाल भी अपने को उस वक्त अपराधी महसूस करने लगा। वह यहुत देर तक गुपचाप बैठा रहा । जर प्रश्न-पत्र सामने पापा तो उसने देखा कि ये सभी
प्रश्न नही थे जिन्हें यह याद करते पाया है । उसका जी सुश हो गया।
लेकिन उसने हॉल में चारों तरफ नजरें घुमायीं तो स्तब्ध रह गया । सभी
सामने किताब खोले नमाल कर रहे थे। मना करनेवाला कोई भी नहीं
था ।
मृगाल जो याद करके वाया था अचानक सब भूल गया । उसने याद करने
की बहुत कोशिग की लेकिन नफल नहीं हुआ । मानो सब गड़बड़ हो गया ।
तंग आकर वह उठ गड़ा हुया 1 बाहर निकलते ही एक लड़के ने टोका, 'कहां
जा रहे है ? उठकर क्यों आ गये ?'
'मैं परीक्षा नहीं दूंगा; घर जाना चाहता हूं।'
'परीक्षा नहीं देंगे ? मतलव ? तो फिर आय क्यों थे ?'
दूर खड़े एक मस्ताने किस्म के लड़के ने वहीं से चिल्लाकर पूछा, 'क्यों रे
लालह, क्या मामला है ? रीले कर न ।'
'अरे गुरु, बाहर का माल चला जाना चाहता है।'
'पत्ती छोड़ी है?'
'अधिक नहीं । गुंजाइश नहीं है ।'
'अरे भगा, नदेड़ उसे, कहां से ताले नय....'
मृगाल उनके हाथ से मुक्ति पाकर सड़क पर निकल पाया। इतनी देर के
दवे बोध को उमने प्रकट किया एलमिट-गाई के टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें सड़क
पर फेंककर । इस वक्त उसे परीक्षा और एम. ए. की डिग्री प्रादि बातें नितान्त
व्ययं सय अर्थहीन प्रतीत हुई।
'अरे, नानोवोली ? डरती हो ?'
'नहीं, ती नही । घर के बारे में सोच रही हूं। इस सब काण्ट के बाद
यापन पर लौटने में बाल राय लग रहा है।'
'मोर.! तुम चिन्ता नयों करती हो? अब और ज्यादा दिन तो है नहीं।
देगना, स बार रेन्टरव्यू में जहर न लिया जाऊंगा।' दीपंकर की
आपाप्रसारका नाम-विश्वास पा ।
'तुम कंगे रह सकते हो यह ? ऐमी यात तो तुम हमेगा ही पहले हो । सब फालतू बातें है।' शमिता ने अविश्वास प्रकट किया। "पिछली बार तो उम गाले हिरेपटर की पत्नी का भतीजा पा टपका पा वीर में; दगीलिए मैं रह गया । साला पाकर टपका भी तो लाम्ट मोमेन्ट में....। पर इस बार यी बात और है। जो लोग इन्टरव्यू लेते हैं उनके पहरे गया प्रांगों के भाव से ही पता लग जाता है । भई, जब उन्हें किमी को लेना नही होता तो पालतू-फालतू क्वेश्चन पूछते हैं ताकि धेचारा उम्मीदवार गुद ही डरकर भाग जाये । इनलोगो ने तो मुझसे कुछ पूधा ही नहीं । इन्टरव्यू बोर्ड में मेरे गझने जीजाजी थेन, इमोलिये तो"।' "लेकिन अगर इस बार भी कुछ नहीं हुमा, तर ? पिताजी ने जंगा उतान मचा रखा है उससे तो लगता है, मेरी भी मीमा जमी ही हालत न हो।' 'सीमा ! क्या हुमा है सीमा को ?' 'वाह ! तुम्हें नहीं मालूम ? उसने भी तो मेरी तरह किमी में यमाये बिना ही रजिस्ट्री-मैरिज की थी। उसके पिताजी ने जब उसको मादी मन्यन गय कर दी तब उसने बताया, पर कोई लाभ नहीं हुप्रा । उगके पिता ने एक तरह से जबर्दस्ती ही उसकी शादी कर दी। छी छी, कंगा पृणित काण्ड हुमा यर वह सो मगीर बहुत ही भला लाका है, वरना.... ' 'तो क्या तुम गोचती हो कि तुम्हारा भी वही हाह देखना, जान नही लदा टू तो पती।' अचानक दीपकर ने नावाज दबाकर यहा, 'ऐ. एक काम करेगी। हमारे घर चोगी। 'वाद । तुम्हारे पिता, भाई... ' 'गोली मारो वार और भाइयो को | उनसे हम नया करना है 'ना यात्रा, इन राय कमटो में पाने की जरूरत नही । घन् तेरी, पनी में यह सब नहीं करते तो ही अच्छा रहता । गुम्ही तो ये कार इतने जापते हो रहे पे"।' 'क्यो, तुम्हे परेशानी हो गई है क्या' तो टीक है, मगर तुम्हारे तिानी । । , 'धत् । मैं यह थोड़े ही कह रही हूं। तुममें तो इतना बचपना है कि" लो, पहुंच गये । टक्सी यहां रोकोगे ?' दीपंगार सहम गया । 'तु" तुम, बल्कि में ही पहले उतर जाता हूं। तुम टंसी पर तक ले जामो।' शमिता ने धीरे से दीपंकर का हाथ दवाया तथा इशारे से डाइवर के सामने अलग-अलग उतरने की बात नाहने को मना किया। मानो इतनी देर से टैक्सी- बायर के कान बन्द ही थे। कम-से-कम शमिता का तो यही सयाल था मापद ! बड़ी मुश्किल से बस की पट्टी पर पांव रख पाया । प्रोह ! बहुत भीड़ है । गुवह से तो टप-टप बरसात हो रही है । ट्राम और सरकारी बसें तो मानो नजाफत मे मारे मरी जाती हैं । पानी शरीर से छूते ही वे नाराज जाती है । एकमात्र भरोसा है पब्लिक वस का । उन्होंने भी मौका देखकर मांग की है, भाड़ा बढ़ानो! भीतर से किसी का खिजलाहट-भरा स्वर सुनाई पड़ा, 'बेटे बस में लिखकर रखेंगे पैतीस व्यक्तियों के बैठने की जगह, तो फिर कितने लोग सड़े रहेंगे और कितने रॉड पकड़कर झूलते रहेंगे यह भी तो लिख सकते थे । बेटे बसें तो निकालेंगे गाम और उनमें स लेगे इतने लोगों को मानो ट्रक में कपड़े ठूस निगे हों।' और भी पता नहीं यह व्यक्ति नया-गया वड़वड़ा रहा था। 'नो भाई, श्री पश्मेवाले भाई, मुझे एकदम से ही प्राउट किये दे रहे हो ! जरा देरा कर, भाई । . 'गधा करू भई, पाप ही बताइये । मुझे भी तो पोजीशन लेनी पड़ेगी न ! 'मानी बरसात भी जान साये जा रही है। तंग कर डाला ।' 'अरे दादा, पपका पयों दे रहे हैं ? देराते नहीं, लेडीज बैठी हैं ?' 'जरा-सा हाय पूने में अगर पगका लगता है तो आपको टैक्सी में ही गाना पाहिये, जनाव । फिर हाथ तो पया साया तक नहीं छूयेगा।' भीतर से किसी ने पायाज कसी, 'यह तो पुरानी बात हो गई बहे दा, गुद्ध नया सगुफा छोदिये।' - १०४ जयना दाका 'टवमी में जाने की तो मापने सलाह दे दी, पर उगरा सामने बैठे एक वृद्ध सज्जन भी प्राज-कल के चल योगिश कर रहे थे। 'वाह, क्या बात कही है, दादू (दादा), गावाम ! एक छोकरे में। 'अरे भई, क्या कर रहे हैं ? भीगा छाता शरीर दिया कमीज का सत्यानाश ।' वह व्यक्ति प्रत्यन क्रोध की नरह कमीज पर से पानी भाड़ने लगा। . . प्रांफिम जाकर देखता हूँ कि कोई भी काम नहीं कर रहा है। सभी कर्मचारी दलो में बटकर गप-शप कर रहे हैं । क्या बात है ? तभी मुमन पास पाया, 'मापने नुना, विकाश को पुलिम पकड़कर ले गई है ? परमों मुबह उसके मोहल्ले में एक्शन हुआ था । अरे, वह तो उम वक्त मौहल्ले में था ही नहीं। पुलिमबालो ने उसे प्राइडेन्टिटी काहं दिखाने तक वा अपमर नही दिया । विकाग ने शायद प्रॉफिम में फोन करना नाहा पा तो जानते हो, पट्टों ने क्या पहा, 'हमने ज्यादा होशियारी न बरतो क्या अन्याय है । है न? हमने भी नय कर लिया है कि घेराव करेंगे।' 'घेराव' हठात् घेराव किसका करेंगे।' 'प्रॉफिगरों का। थाने में फोन करके विकाश को छुड़वाने के लिए। क्या फर्म- चारियों के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है यात मुनकर शान्ता ने होठ बिचाये । 'क्यों, माफिमर का घेराव क्यों ? पया उनके हुनम से विभाग को पकड़ा गया है जो वे 'सफर' करने ?' मफिया इस बात के लिये बदनाम है कि उनमें किसी के प्रति भी विसी प्रार पी फीलिंगम नहीं होती । लगा कि यह बात दूर नहीं है । देवागिप नो मुझमे बरार ही रहता है, 'तुमलोग चाहे बी. ए, एग ". पाग कर लो और चाहे मॉफिमों में नौकरी कर लो, मेकिन अभी भी पड़ी हो उमी प्रिमिटिव युग में ही । चांद पर मनुष्य के कदम पड पुके हैं, देश में मंगी. मंगी उथल-पुथल हो रही है, मेक्नि तुमलोगों की विचारधारा में कोई परि. धन्न नहीं हुना है।' देवाशिप ठीक ही कहता है । ' ली ने कुछ दिन ऑफिस से छुट्टी ली थी। वे पति-पत्नी दोनों 'धत् । मैं फिस में काम करते हैं । पत्नी की अनुपस्थिति के दिनों में जयन्त लो, परत ही रसिक हो-होकर बातें की थीं। बस, शान्ता दी ने जयन्त के जाकर उसकी पत्नी को कितने ही उपदेश दे डाले और पति की तरफ ने उसे सतकं कर पाई। बाद में हमने यह खबर मुनी तो चकित रह गये । दीर ऑफिस में चन्द्रा कुछ लजायी-लजायी-सी रहती है। अधिक बातें करना नहीं चाहती। लेकिन फिर भी उसको रिहाई नहीं मिलती है। जैसे, 'हां री तुम्हारी शादी को कितने दिन हो गये ? हाय राम, पांच साल हो गये ? अभी तक बच्चे क्यों नहीं हुए ? तो फिर, तुम्हारा पति किसकी नौकरी करता फिरता है ?' प्रादि-आदि । - चन्द्रा को इन सब बातों से बहुत शर्म आती है । इस तरह की आलोचना उसे पसन्द भी नही है। फिर भी सभी उसे छेड़ती हैं। कम उम्रवाली लड़कियों में तो अधिकतर यही सब बातें चलती रहती हैं, या फिर 'लटेस्ट डिजाइन' के बारे में वतियाती रहती हैं । पुरुष जब कहीं बैठकर क्रिकेट या फुटबॉल मैच की बातें कर रहे होते हैं तब ये लड़कियां बिना प्रयोजन ही वहां पहुंच जाती हैं और वात-चीत में शरीक होने की कोशिश करती हैं, कहती हैं, 'जयन्तीलाल थोड़ी देर और विकेट पर रह जाता तो मजा आ जाता। सरदेसाई तो वस फालतू ही है । एक रन बनाकर ही कूपर के हाथ में कैच दे दिया। हां, वेदी और वाटेकर कुछ अच्छा खेले हैं। फिर भी एक सौ पैंतालीस रन में ही इनिंग्स खत्म; यह भी कोई मतलब हुग्रा के दो-चार मुखस्थ किये नाम या अग्रवार में पढ़ी रिपोर्ट से, या घर में बड़े भाइयों के मुह से सुनी बातों की पुनरावृत्ति करके स्वयं को बहुत ही जानकार-होशियार दिखाती हैं पुरुपों के सामने; मानो मेल के बारे में बहुत समझती हों। सिर्फ तेल ही क्यों, सभी विषयों के बारे में जानकारी प्रकट करना ही याज की स्टाइल है । मदं लोग उनके ज्ञान की परिधि नाप नहीं सकते, यह वात नहीं है । वे लोग तो सिर्फ उनकी कम्पनी के लोभवश ही उनकी मूर्खतापूर्ण वकवास को भी महत्वपूर्ण बातों की तरह मनोयोग से पास बैठे सुनते हैं। इस सातवें दशक की लड़कियों का विप्लव सिर्फ बातों एवं पोशाक में ही है, काम में नहीं। साड़ी उतरती-उतरती नाभि के नीचे तक पहुंच गई है। उसके अलावा कुर्ता, बेलबॉटम, तुंगी, ?' इसी तरह
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लिी ने कुछ दिन ऑफिस से छुट्टी ली थी। वे पति-पत्नी दोनों 'पत् । मैं फिस में काम करते हैं । पत्नी की अनुपस्थिति के दिनों में जयन्त लो, परत ही रसिक हो-होकर वातें की थीं। वस, शान्ता दी ने जयन्त के दी जाकर उसकी पत्नी को कितने ही उपदेश दे डाले और पति की तरफ से उसे सतकं कर पाई। बाद में हमने यह बवर सुनी तो चकित रह गये। ऑफिस में चन्द्रा कुछ लजायी-लजायी-सी रहती है। अधिक बातें करना नहीं चाहती । लेकिन फिर भी उसको रिहाई नहीं मिलती है। जैसे, 'हां री तुम्हारी शादी को कितने दिन हो गये ? हाय राम, पांच साल हो गये ? अभी तक बच्चे क्यों नहीं हुए ? तो फिर, तुम्हारा पति किसकी नौकरी करता फिरता है ?' प्रादि-ग्रादि । चन्द्रा को इन सब बातों से बहुत शर्म आती है । इस तरह की पालोचना उसे पसन्द भी नहीं है । फिर भी सभी उसे छेड़ती हैं । कम उम्रवाली लड़कियों में तो अधिकतर यही सब बातें चलती रहती हैं, या फिर 'लेटेस्ट डिजाइन' के बारे में वतियाती रहती हैं । पुरुप जव कहीं बैठकर निकेट या फुटबॉल मैच की बातें कर रहे होते हैं तब ये लड़कियां बिना प्रयोजन ही वहां पहुंच जाती हैं और वात-चीत में शरीक होने की कोशिश करती हैं, कहती हैं, 'जयन्तीलाल थोड़ी देर और विकेट पर रह जाता तो मजा आ जाता। सरदेसाई तो बस फालतू ही है । एक रन बनाकर ही कूपर के हाथ में कैच दे दिया। हां, वेदी और वाटेकर कुछ अच्छा खेले हैं । फिर भी एक सौ पैंतालीस रन में ही इनिंग्स खत्म; यह भी कोई मतलव हुग्रा ?' इसी तरह के दो-चार मुखस्य किये नाम या अपवार में पढ़ी रिपोर्ट से, या घर में बड़े भाइयों के मुंह से सुनी बातों की पुनरावृत्ति करके स्वयं को बहुत ही जानकार-होशियार दिखाती हैं पुरुपों के सामने; मानो गेल के बारे में बहुत समझती हों। सिर्फ रोल ही क्यों, सभी विपयों के बारे में जानकारी प्रकट करना ही पाज की स्टाइल है । मर्द लोग उनके जान की परिधि नाप नहीं सकते, यह बात नहीं है । वे लोग तो सिर्फ उनकी कम्पनी के लोभवश ही उनकी मूर्खतापूर्ण वकवास को भी महत्वपूर्ण बातों की तरह मनोयोग से पास बैठे सुनते हैं । इस सातवें दशक की लड़कियों का विप्लव सिर्फ बातों एवं पोशाक में ही है, काम में नहीं । साड़ी उतरती-उतरती नाभि के नीचे तक पहुंच गई है। उसके अलावा कुर्ता, बेलवॉटम, लुगी, जीन्म । नये-नये फंगन पाते है और चले जाते हैं। गुबत को पूरे प्रॉफिम में सवर फैलने में देर नहीं लगी कि मुव्रत का हिमोगन हुमा है । गभी ने कहा, यह अवश्य ही अनन्त की यारसाजी है । एकाउन्ट्स मकान मे उसको डिस्पंच में कर दिया गया है । मुझे एक दिन की यात याद भा जाती है । किसी बात को लेकर बड़े साहब ने मुवत को बुलाकर डाटा था । टाट पिना कारण ही पड़ गई थी क्योंकि गलती जिसको थी यह बड़े साहब को भाम का तारा पा । उसको बचाने के लिए मुखर्जी साहब यानी वहे मार ने मोगों के सामने अपराधी ठहराया था। सब कुछ जानते-बूझते हुए भी मुखत ने उनके सामने कुछ नहीं कहा । किसी प्रकार का प्रतिवाद तक नहीं किया । बस फट पड़ा हमलोगो के पास पहुंचकर । यह अपने भीतर की ज्वाला को, भाग को, युभाना चाहता था पपने सह- यमियों के समक्ष बड़े साहब की..... । इन मजेदार बातो को सभी मह. कर्मी रस ले-लेकर गुनने लगे । वे मुक्त को और अधिक भडकाने की कोशिश भी करते जा रहे थे। मुझे यह बात बहुत बुरी लगी। मैंने सोचा, क्या मुदत बिल्कुल ही मपं है ' यह क्या इतना भी नहीं समझता कि जिनके सामने वह मन बी भड़ास निकाल रहा है उनमें से कोई भी उसका मित्र नहीं है। यह तो गुद रोज देयता है तथा जानता है कि कोई किसी की भलाई फूटी भायो नहीं देख सकता। अपने महल कर्मी की अनुपस्थिति में उसकी बुराई करते हैं, किसी की नौकरी को किस प्रकार नुकसान पहुचाया जा सकता है इसका उपाय सोचते रहते हैं, मोर सामने पड़ते ही फैसे यतीमी निकालकर हमते हैं, मित्रता का ढोग रपाते हैं ! अभी मुदत का भापण नारी ही था कि इसी बीच मनात मित्र पाकर अपनी रेबिन के सामने अंठ गया । मुग्रत फिर भी चुप नहीं हुमा, कि उसका गुस्गा मौर अधिक वह गया। मनन्त मित्र के सामने बडे साहब के विषय में कुछ बहना हितकर नहीं है, यह जानते हुए भी मुरत पुप नहीं रहा । मेसिन माश्चयं तो इस बात का है कि इतनी देर से जो लोग बड़े माहब का महा-बार करने में मुद्रत के लिए भाल-मगाला जुटा रहे थे वे साल हग हो गरे।
. इससे भी अधिक प्राश्चर्य की बात यह कि वे अब अनन्त मित्र की टेबिल के सामने भीड़ लगाकर खड़े हो गये। उनमें से एक ने फुर्ती से सिगरेट का पैकेट बोलकर अनन्त मित्र के सामने बढ़ा दिया । अनन्त मित्र को सिगरेट जलाने का काप्ट तक नहीं करना पड़ा । एक और ने लाइटर जलाकर आगे बढ़ाया । फिर राजेन ने कहा, 'अनन्त दा, उस दिन रेडियो में आपकी बेटी का गाना सुना था । वाह, क्या खूब गाया था! क्या गला पाया है !' उसकी बात खत्म होते-न-होते कमल ने बड़े अपनत्व से पूछा, 'इस बार पूजा पर तुम बाहर नहीं जा रहे हो, अनन्त दा?' 'भाभी कैसी हैं, अनन्त दा? कहे देते हैं, भाभी के हाथ के बने मांस के समोसे एक बार और खिलाने पड़ेंगे ।' उन सब के बीच में से सुमिता भी चहक उठी। ओफ्फ ! असह्य है यह ढोंग ! मेरा मन हुआ कि चिल्लाकर उन सबसे कहूं, 'श्राप सब चिड़ियाघर में वास करिये जाकर । आपलोगों में मनुष्यत्व नहीं, मानवीयता नहीं । जब सिर्फ दो टाइम खाना जुटाने की ही प्रॉब्लम है प्राप सभी को, तो फिर वहां जाकर रहने में ही क्या आपत्ति है ? भोजन तो, सुना है, वहां दोनों वक्त ही देते हैं।' परिनसिटी डिपार्टमेंट के बूढ़े क्लर्क वाबू ने कहा था, 'हं ! हमलोग राजनीति के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं । सभानों में भाषण देते हैं । अन्य देशों के कुब को देखकर विचलित हो उठते हैं । उस पार के बांगला देश की मुक्ति के लिये जुलूस निकालते हैं । अविचार तथा अन्याय के प्रतिकार का बहाना बना- कर अफिमों में काम बन्द करते हैं । स्कूल, कॉलेजों में पढ़ाई नहीं होने देते। हड़ताल करवाते हैं । ........"और प्रॉफिस में इतने दिनों तक जिसके साथ बैठकर काम किया है उसके साथ अन्याय होते देखकर कुछ भी नहीं कह मकले ? डर लगता है, क्या पता, कहीं अपनी ही नौकरी न चली जाय ? अगर हम पर बड़े साहब असंतुष्ट हो गये तो ? नौकरी को बचाये रखने के लिए सिर्फ बड़े साहब को ही ग्युश नहीं रखना पड़ता बल्कि उनके चमचे पर भी पालिग करनी पड़ती है । वेशमों की तरह खुशामद करनी पड़ती है।' पब्लिसिटी डिपार्टमेन्ट के क्लक बाबू की बात सुनकर मैं सिर झुका लेती हूँ । उनको पया कहू, मेरी भी तो हिम्मत नहीं हुई। मेरी समस्त अन्तरात्मा लोग रही थी, तब भी तो मैं उस विद्रोह को भापा देकर उसे उच्च स्वर में प्रगट नहीं कर सकी । दरसल हम मर चुके हैं । मर रहे हैं । अपनत्व, ममता, मित्रता मादि अनुभूतियों को महसूस करने की शक्ति हम खो बैठे हैं । जिस सरह पराधीनता के जमाने में एक वर्ग ऐसा या जो बड़े-बड़े पिताव पाने के लिये, नौकरी यहाल रराने लिये वेशों की तरह राजशक्ति को गुशामद रिया करता था तथा अपने देग के लोगों के प्रति उदासीनता दिसाताया, प्राज भी यिल्युल वही स्थिति है । दृश्य परिवर्तन हुमा है, लेकिन पात्र नहीं यदले हैं। दिन-ब-दिन हम कैसे भावना-शून्य हुए जा रहे है । शुभ भावो को खो बेटे है । कौन तथा किसलिए भाकर पडोमी का गून कर जाते है यह जाने बिना हम यथाशीघ्र दरवाजा बन्द कर निलिप्त हो जाते हैं। हाई-जम्प लगा-लगाकर चीजों के दाम बढे जा रहे है, लेकिन हम निविकार है । गड़क पर चलती. चलती यस सी० एम० डी० या कार्पोरेशन या और किसी द्वाग बनाये गढ़ में गिरकर भीतर के लोगो के बारह बजा देती है, फिर भी हमें होग नहीं पाता। पन्टों बग-स्टन्डो पर राडे-गड़े वस पाने के पल गिनते है मौर स्टेट ट्रासपोर्ट हमारी इग पीड़ा की रत्ती भर परवाह नहीं करतो, फिर भी हम धंयं धारण किये रहते हैं । मोहल्ले में यम-वाजी होती है, लूट-गाट होती है, जिन्दा रहने के लिये चन्दा देना पड़ता है । ये लोग याहते हैं, 'गचमुच, यह तो बहुत वडा अन्याय है, बहुत सराव बात है, यह सब नहीं चल सकता । गरकारी दफ्तरो यो पूर्णतया सुधारना होगा । इस सबकी जाच के लिये कमीशन बैठाना पड़ेगा।' और हम 'ही-ही' हाकर कहते हैं, 'तथास्तु' । और हालत पूर्ण, पथा पर । सच, इस धरती पर प्रान यह एक प्रदभुन अंधकार घिर माया है। इमको पदभुन अपकार के अलावा और क्या कह मरते हैं ? अगर यह सच नही होता तो उस दिन धमंतल्ला पर पांच-यः लडके उन लाकियो को....। मैं यस के इन्तजार राडी थी। मेरी तरह भोर भी बहुत-गे लोग खडे थे। उनमें कई लट के भी थे। उन उन सभी की तीम से नीचे ही होगी। टिपटॉर टाइप पेन्ट तथा कान के मूब नीचे तक लम्गी-लम्बी कनौतिया । वे सब पडे-राहे सिगरेट पो रहे थे। भावारा की मोर मुंह करके घुए के पन्ले छोड़ रहे थे, और उनकी बातचीत का विषय या सदकिया। उनमें में एक बोला, 'परे, नूने देवा, माज-कल एक तरह की छोटी साइज की लडकिया निकली हैं ? लगता है, सभी छोकरियों ने स्कूल-चूल में पढ़ना छोड़ दिया है। यया ! . -- अगर इनमें से एक भी हाथ लग जाय तो कसम से, मजा आ जाय ! मुझे तो लगता है, ये सभी अभी अनछुई ही हैं !....' 'हां रे, जरा पास जा न, तेरी गुरुग्रानी हैं।' 'ऐ, देख....देख ! प्रा-हः ! टॉप ! टॉप माल है, कसम से ! प्रा-हः जवाब नहीं। दिल पर ठोकर लगी है, कसम से !' मैंने देखा, लुंगी पहने कई लड़कियां हमारी तरफ आ रही हैं । गोरी, चुलबुली तथा खूबसूरत लड़कियां। 'क्या फैशन है, यार ! दिल पर कटारी चला रही हैं । गुरू, कहां से ले आये?' उसके बाद एक बेहद गंदा फिकरा कसा उनमें से एक लड़के ने । तव तक लड़कियां पास आ गयी थीं। बात उनके कानों में भी पड़ी, लेकिन आश्चर्य की बात कि वे पीछे मुड़कर हौले-से मुस्करा दीं। इसका मतलब, उस फिकरे को उन्होंने एप्रीशियेट किया । उन्हें शर्म नहीं आई। अपमानित महसूस नहीं किया । एक छोकरे ने कहा, 'लाइन की ही है, रे !' सुबह रतन ने आकर अपने काका को बताया, 'कल क्या कांड हुअा, पता है ? कल रात पुलक की क्या दुर्दशा की है ! अरे, सब मौहल्ले के ही लड़के थे। कई दिनों से उनके घर सब ताश खेलने जाते रहे हैं । उन्होंने कल रात अचा- नक ही पुलक को घेर लिया और कहा, 'जेब में जितना माल-पानी है, सय निकालिये तो जरा।' शायद पुलक ने उनमें से एक को पहचानकर कहा था, 'तुम अविनाश के वेटे गौतम हो न ? छोः छोः, तुम भले घर के लड़के होकर भी....' बस, फिर क्या था, गौतम वोला, 'ज्यादा टर्र-टरं मत करिये, जनाब । ये नक्शे किसी और को दिखाइयेगा । हुह.... ! भल्ले घर के....! ग्बूब बढ़िया सरकारी नौकरी करके मोज मार रहे हैं, और हमें ज्ञान सिखा रहे हैं ! जल्दी से माल वाहर करो वरना लाश ही पड़ी नजर आयेगी।' में कमरे में बैठा सब सुन रहा था। लेकिन आश्चर्य ! इस बात की मेरे मन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई । मैंने तो उठकर रेडियो को और तेज कर दिया तथा विज्ञापनयुक्त हिन्दी फिल्मी-गानों का कार्यक्रम सुनने लगा।
मरा में लोग उसाठग भरे हुए हैं । सभी निर्विकार भाव से एक-दूमरे के पायों को इतों-चप्पलों से कुचल रहे हैं । कोहनी से पका मारते हैं । 'ग्राह ! मह ! मया कर रहे हैं ? जरा सोधे होकर गड़े होइये न । पाह, कुचल गला रे पेर !' गेट के पास से किसी ने चिचियाकर वाक्य फेंका, 'क्या यात है पनाय ? मन्दर पहिये न ! रास्ता रोककर क्यों सड़े हैं ? मौर लोग नहीं पड़ेगे क्या ?' गंट पर गढ़े व्यक्ति ने उसकी तरफ उपेक्षा से देमा, पर सिसका नहीं। 'सब-के-मर आवारा नवमली हैं । सही बात कहो तब भी कोई कुछ सुनता ही नही....' बम चल पड़ी । अचानक ही गेट रोककर सड़े मड़के ने मागे बहार, बड़बड़ करनेवाले भले मादमी का कमीज घाती के पास से मुट्ठी मे कसकर पकड़ लिया। बोला, 'क्यों दादा, क्या यह बहा रहे थे तब ? एक बार फिर से बोलो, तो जरा तुम्हे सीधा कर दूं।' वह सज्जन लड़के के हाप से अपना कमीज छुट्टाकर मानो कुछ कहने जा रहे थे, कि तभी लड़का फिर बोल उटा, 'शाम को तो अपनी पोती के उम्र की सौडिया को लेकर मोर उडाप्रोगे पोर प्रब बस में पढकर शराफत की दुप मनते हो। पौर उस सज्जन की कनपटी पर एक जोरदार घुसा पड़ा । मगल-बगत पहे लोग सिमककर पडे हो गये । अब तक जो लोग सड़कियों की सीट से सटकर खढे थे और यहा से तिल भर भी हिलने को तैयार नहीं थे, ये पलक झपकते हो बिमाकर भागे को मोर घले गमे । मभी नुए थे । योई पुष भी बात नहीं कर रहा था। मॉफिग में जो लोग अपने अधीनस्थ मंचारियों पर रोव भाड़कर, दाटकर, प्रपनी पोजीगन ठीक रखने की कोशिश करते हैं, इस वक्त ये भी बिल्कुल निरीह बने एक तरफ यामोग सड़े थे। बहुत-गे तो प्रानाप्रपना स्टॉलेज पाने में पहले ही उतर पड़े । मेरा समस्त मस्तित्व विरोध करने की तीन इच्छा से स्थिर हो उठा, लेकिन साथ-साथ भय भी लगा। पर हमारा सहारा मिर्फ भय ही रह गया है। मन में तीन कोष, मसाए जतम संकर भी मिर्फ घर से चुप रहते हैं हमलोग । हमारे इस डरपोक मस्तित्व यो पहचानकर एक दन हमारा अपमान करता है, हमे हेय समझता है ।
दुकान पर पहुंचकर किसी वस्तु की अविश्वसनीय रूप से अधिक कीमत देखकर जब मैं कहती हूँ', 'वाह, अभी उसी दिन तो आपके बगलवाली दुकान से बहुत कम में ले गयी थी। तो दुकानदार मौन साधे ही मेरे हाय से वह वस्तु लेकर रख देता है और मेरी पूर्णतः उपेक्षा कर दूसरे ग्राहक से बात करने लगता है। मैं अपमान को चुप- चाप हजम कर वहां से चली आती हूँ। सुबह से ही पानी बरस रहा है । ऑफिस की छुट्टी हुई उस वक्त सड़क पर घुटनों तक पानी भरा हुप्रा था। टैक्सियां खाली होते हुए भी अावाज को अनसुनी कर आगे बढ़ जाती हैं । अाखिर एक रुको भी तो ड्राइवर ने महा- तरह रोरदार स्वर में पूछा, 'किस तरफ जायेंगी पाप ? लेकिन नॉर्थ में नहीं जाऊंगा मैं ।' में बात का जवाब दिये बिना उपचार टक्सी में जा बैठी। उसके बाद ग्रावाज में तेजी लाकर डांटने के अन्दाज में कहा, 'पहले में ही इतनी जिन्ह क्यों करते हैं ग्राप ? कहां जाना है, कहां नही, यह टैक्सी में बैठने के बाद पूछना चाहिए।' 'पाप गरम क्यों हो रही हैं ? मैं नॉर्थ में नहीं जाऊंगा, यही तो कह गजा की 'मैं भी तो मुनू कि क्यो नहीं जायेंगे ? पैसेंजर क्या आप जहां ले जाना चाहेंगे यहां जायेंगे ?' हाइवर ने क्षरण भर मेरी मोर जलती निगाहों से देखकर कहा, 'माप उतर जाइये । मेरी गाड़ी खराब है; नहीं जायेगी।' मेरे तन-बदन में ग्राग लग गई लेकिन अगले ही क्षण एक अनजाने भय-बग मेरा हृदय कांप उठा और मैं टैक्सी का गेट खोलकर बाहर निकल पायी। टैक्सी पल भर में ही अदृश्य हो गई। मन में इतना विक्षोभ, असहनीय ज्वाला तथा पीड़ा लेफर पता नहीं हम क्या हूंढ़ रहे हैं ? शायद एक सीढ़ी ढूंढते है-ऊपर उठने की सीढ़ी जो हमें किसी प्रकार भी नहीं मिल रही है । और नहीं मिल रही है इसीलिये हम विक्षुब्ध हो रहे हैं । सव कुछ तोड़-फोड़कर चूर-चूर कर देना चाहते हैं। इनमगन, हमारे सफल बनने में वावक कौन है, यही हम नहीं समझ पा रहे हैं। इसीलिये हम गुमराह हो गये हैं। सब कुछ को बैठे हैं। ११२ रतन नैह रही हैं, 'यह मद पटेगन के मिवार बुध नहीं है। पनी गित दम्नु नहीं पाने के कारण ही पटमद पमनोर है। मगर मदुल मुग में मचन्द रह मोनो फिर उन प्रौर क्या चाहिने ?' यह सब बेकार की बात है। मैं ऐसा नहीं मानता। दिम नहीं सरता। मगर यही दात होती, तो फिर अमन मुदीना के माय इन नह"मन तो वईवार का बेटा है । पहा-लिगा है। प्रॉक्ति में पच्ची नोग्ग र है। फिर भी मुमंत्र में उम दिन पूछ रहा था, 'टेरे जान-गवान की यो: प्रच्ची-मी लहकी-बड़ी है मा? हो तो गार हमारे लिये भी दो न किमी एक को! गामा वन, राटे नहीं करता। 'कनी बात करते हो, पार? मुदीना ये होते तुम्हाग समय नही पटना , वह कहा गई? 'गोली मान मुदीप्ता कोन्टि छुटा निराई मैंने तो उसने ।' 'त्रो नू उममे मादी नहीं करेगा? नुन लोगों में नो पार?' 'देर गुफ, यह प्यार-बार नर बेकार की बातें हैं । वैर-इंटेड । नम: मागे वा देवाशित ने यही मैंने । पहले तो वर पमनार-मा होगा। एक मनगम देकर उम महार को मेरे मन में हटा देने के नि उनी मानों की पुतरियों में एक दृन्ता जाग टटो, पर उमने मुद पर याद कर निगा। पानी इन याना या ग्म ननने गुन पौर मुन्दर की ओर मोट दिया। पूरे प्रामविश्वास में वह वोरा, प्रेम, यसा, नाहन किमी जमाने की मामा में बचकर नहीं रहते। कितने ही पुग, स्निने ही जीवन, कितने ही जन्मी को मकर-करके प्रेम चिरायु होता है। चन्दन के प्रती पर प्यार ममूची जनन यो गीतन कर देता है। पार बग्मान की बर दी तरह पवित्र है। एक अन्य प्रार की दिगुट भावना है। एक निर्वगनीर पानर है।' देवागिर नै विभोर होकर मुझे प्राने निण्ट मोच निया । इती नाम से मेरद पाना को निहार रही थी। विक्टोरिया मेमोरिपन की हरियाली बनान पर दरली मार की मोर देर रही यो । मेरे होंठों पर मुम्कराह मेन गई । देवागिन नारा समझ गया। मने मुद से मना कर निवा, ठया प्रादान - में गंभीरता भरते हुए बोला, 'अपराजिता, क्या तुम नहीं जानती कि प्रेम को बहुत तपा-तपाकर, गहरी ममता से सींच-सींचकर, हृदयरूपी घर में उसका यत्नपूर्वक लालन-पालन करना पड़ता है ?' 'जानती हूं। और जानती हूं इसीलिये तो मैं गुमराह नहीं हुई हूं। मैं भटके हुए राही की तरह पथ नहीं ढूंढ़ती हूं। कदम-कदम गंतव्य को और बढ़ती जा रही है तथा बढ़ती जाऊंगी। 'मेरा यह विश्वास है कि एक दिन ऐसा ही एक घर हम जरूर ढूंढ़ लेंगे जिसको दुली खिड़की से उन्मुक्त प्रकाश भीतर पायेगा; और हमारे मन को, हमारी देह को पालोकित करेगा । तब मैं देवाशिप में खुद को विलीन करके कभी न खत्म होनेवाला सुख पाऊंगी । जीवन की अंतिम सांस तक हम लोग निर्मल, पवित्र ज्योत्स्ना-रश्मि की तरह विहसते रहेंगे । रात-दिन के इस बोझ को हटाकर हम किसी-न-किसी दिन वैसा ही घर जरूर ढूढ़ लेंगे। हमारे प्यार का यह शुभ फल हमें जरूर मिलेगा।' वागिप के समूचे चेहरे पर मुग्यता की मधुर किरण फैल गई। मेरे हाय को उगने कसकर पकड़ लिया। मेरी मांखों से अपनी प्रांखें हटाकर उसने अपने चंचल होते मन पर काबू किया । मुझे बहुत अच्छा लगा । जीवन में ऐसी बहुत-सी धाकांक्षाएं है जो हाथ पसार कर मांगी नहीं जा सकतीं । सिर्फ अनुभर से प्राप्त की जाती हैं । यह धात देवाशिप जानता है। जाड़े को नाम ने बहुत जल्दी ही पास-पास के लोगों को छाया का रूप दे दिया। हग उठ खड़े हुए । दूर-दूर बत्तियां जल रही थीं। धीरे-धीरे नम घास पर कदम बढ़ाते हुए हम प्रकाश की ओर बढ़ गये ।
शहीद की मां समरेश वसु . भानो शरीर में कंपकंपी को लहर उठी है । विमला न मागे मूद ली । विमला ने स्पष्ट महमूग किया जमे उसके पेट के भीतर कुछ हिल-डुल रहा है । उगने पास मूंदकर, एक होट को दूसरे होट मे कमकर दवा लिया और पेट में हिलते-जुलते महमास को पूर्णतया महमूम करना चाहा । उगरे मामने पून्हे पर मम्जी रगी हुई है। सनी में पानी नहीं है अतः घड-बष्ट को प्रागन होने लगी है। शायद थोड़ी देर न मम्हाले तो कड़ाही में चिपककर सारी मन्गी जल जायेगी। लेकिन फिर भी दिमला हिलने में प्रममपं है । मानी समस्त अनुभूति बटोरकर उसने पानी में सीमित कर ली भोर पाने गर्म की भावान गुनने की कोशिश करने लगी। उमे महमूस हुमा मानो उसके दिन की पहान में नि.शन ही बादल का नाम गूंगने लगा है, 'बादल, वादन, पू हो है न !' दूसरे ही क्षण उसका गरीर एक भार भोर काप उठा। यह जोर-जोर से सांस लेने पगी । फिर पायें बोल, मूल्हे पर सम्बीको कडाही की - ओर देखकर वह वहां से उठ खड़ी हुई । उसकी आंखों में बहुत ही व्याकुलता भरा भाव तैर रहा था। कानों को और अधिक सतकं वना वह वाहर की ग्राहट लेने लगी। उसके बाद दरवाजे की योर कदम बढ़ाने ही वाली थी कि वहीं ठिठक गई । सन्जी योंही छोड़ गई तो एकदम जल जायेगी। एक बार चूल्हे पर चढ़ी सब्जी की ओर देखा उसने, लेकिन खड़े रहने की ताकत नहीं थी उसमें । परेशान हो वह बाहर निकल आयी कि, होने दो, खराव होती है तो खराव होने दो। कच्ची रहे, जल जाये, या राख हो जाये, मुझसे अव नहीं मम्हाला जायेगा। अाकाश में गहरे बादल छाये हुए थे, जोरों की हवा चल रही थी। प्रांगन के कोने में लगा सफेद फूल का पेड़ हवा के तेज झोंकों से एकदम झुक गया था। एक साल के पौधे की भी अब झुका, तव झुका, वाली हालत हो रही थी। घर बिल्कुल सुनसान था । लकड़ी के फ्रेम में मंढी टिन की पत्तर से बनाई घर की दीवारें और टिन की ही छत थी घर की। ऐसा लग रहा था मानो घर में कोई भी नहीं है फिर भी विमला बहुत ही कदम दवा-दवाकर चलती हुई प्रांगन मे पाई । बगल के मकान में कना की मां किसी से कुछ कह रही भी । विमला ने नागफनी की चाड़ को पारकर एक बार उस तरफ देखा। यहा से कना की मां का घर तो दिखाई पड़ता है, लेकिन उसमें रहनेवाले नहीं दीखते । उसने एक बार फिर उस घर की ओर देखा पर उधर किसी की भी ग्राहट नहीं मिली । हवा से उसके बाल उड़-उड़कर आंखों पर आ रहे थे । दूर से देखने पर बाल काले लगते थे लेकिन वस्तुतः सफेद होने शुरू हो गये थे । चौड़ी मांग में सिंदूर का वासी निशान था। हाथ में बदरंग शाखा एवं नोया (बंगाली महिला प्रों की सुहाग-चिन्ह स्वरूप पहनी शंस एवं लोहे की नूडी) तमा सोन की कुछ चूड़ियां पहन रखी थीं उसने । लहंगे पर तांत की चुनी कत्यई बॉर्डरवाली सफेद साड़ी पहन रखी थी। साड़ी मैली हो रही थी । जगह-जगह हल्दी के धब्बे लगे हुए थे। इस प्रौढ़ अवस्था में भी शरीर का कसाव बरकरार था। चेहरे पर पड़ी रेखामों से ही उम्र का अहसास होता है, फिर भी इस समय का चेहरा देखकर ही पता लग जाता है कि जवानी में गूबसूरत रही होगी । उनका चौड़ा शरीर कठोर एवं कसा हुआ है। विमला कुछ पल प्रांगन में ही खड़ी रही। फिर सामने की ओर से न जाकर रसोईघर के पीछेवाले रास्ते से गई। नागफनी की बाड़ के सहारे-सहारे मकान ।
के पिछवाड़ेवाले रास्ते पर यह पागे यती हो गई। पर के पिछवाड़े के सभी परों के सिड़की-दरवाजे बन्द थे। जिस जगह मकानों की मीमा गरम होती है वहाँ कोने में एक जवा फूल का पौधा है । विमला वही गदी रह गई। सामने सड़क है जो उत्तर-दक्षिण की भोर नम्बी चली गई है। कांनीनी की गठक है पतः पसी नहीं है। विमना ने उत्तर को पोर देगा । उत्तर मी मोर का रास्ता जिग जगह से पश्चिम की मोर मुद्रता है उसी पोर देगा। उम जगह मोड के एक किनारे बुध ईटें अभी तक पटी है। यहां नहीर-वेदी बनी थी। इन कुछ महीनों में टूटते-टूटने गभी ईटें बिगर गई हैं। पर तो वहा कुछ इनी-गिनी ईटें ही बनी है। इन्हें भी मोई उठाकर ले जायेगा तो शहीद स्मारक का कोई भी निशान नहीं बचेगा । वेदी शिसने तोडी पर उनकी इंटें कहा गई, किसी को भी पता नही । यिमना देगा फरती पो कि, शुरू-शुरू में एक कुत्ता स्मारक से बिल्कुल सटकर सोया करता पा। पर पर वह भी नहीं दीमता। गिनती की ईटों के पनावा मय वहां मुष भी नहीं है। विमला ने गर्दन हिला दी, साय ही उसके होठ भी बटवडा उठे, 'नहीं, पादन नहीं है वहां ।' बादल को श्मशान में ही जनाया गया था। तीन महीने के पारोव हुए होंगे, जब यह स्मारक तैयार किया गया था तर वे लोग विमला को युलाने माये थे । यादल की मा थी विमला। एक शहीद फी मा। इसी. लिये ये लोग बुलाने पाये थे-यादल के मित्र, उमको पार्टी के लाइमे। पर ये लोग मिर्फ विमला को ही बुलाने माये ये । इस पर के और किसी भी मास्य को नहीं बुलाया था उन्होने । न तो बादल के पिता को और न उगरे दोनों वडे भाइयों को। वादल का पिता हरप्रसाद रिगी दूगरी पार्टी या पादमी है । इसके मनाया, दोनों बड़े भाई कृपाल पौर दयास भी पग-पनग पार्टियों के मेम्बर है। घर के पार मदं और पार पार्टियों के मेम्बर । वादल की पार्टी के लोग मिदं विमता फो ही युनाने पाये थे । महोः पो मा को। पिमला यहा गई थी। वहीं, यस जरा-गो ही दूर तो है पर से । पश्चिमी मोर पर, महक के किनारे, वहीं जहा पर गि एप इंटें ही बची है । महोद मा. गए की प्रतिम निशानी । विमला वहां रिसरि ग पी, पर उगे ला नहीं है। बादल की पार्टी के नहरों ने मारूर पहा पा, मोनी, पारो एस. पार - वहां चलना पड़ेगा।' विमला उदासी की प्रतिमूर्ति बनी वहां गई थी। उसके दो दिन पहले ही तो उसके अट्ठारह वर्ष के बेटे को किसी ने इसी जगह पीट- पीटकर मार डाला था । वह दृश्य इस समय भी विमला की अांखों के सामने मानो स्पप्ट घूम रहा है । वादल लहू-लुहान था । मुंह, सिर एवं शरीर के विभिन्न अंगों पर खून बह-बहकर जम गया था। उसकी. पार्टी के लड़के ही मृत बादल को उठाकर उसके घर के प्रांगन तक ले आये थे । बादल सदसे छोटा बेटा था, पर अंतिम संतान नहीं था। उसके बाद भी दो हुए थे पर जीवित नहीं रहे । अतः अब बादल के बाद की और कोई संतान नहीं है । बादल को इस हालत में देखकर विमला चीख मारकर उस पर गिर पड़ी थी तथा बादल को जकड़कर रोने लगी थी। वह रोती-रोती कहती जाती थी, 'ऐसी बुरी मार फिसने मारी रे तुझे ? अरे बादल रे, बादल बेटे !'.."वाहर के लोगों से घर का प्रांगन खचाखच भर गया था उस वक्त । कुछ देर चार वे लोग बादल की अर्थी फूल-मालाओं से सजाकर उसे ले गये थे । लेकिन श्मशान-यात्रा के दौरान 'हरि वोल' का उच्चारण न कर स्लोगन कारे थे' 'कामरेड बादल जिन्दावाद ! सून का बदला म्वून !'... उसके बाद तो विमला खुलकर रो भी नहीं सकी । बस, कारण-अकारण, समय-समय प्रांखों से आंसू बहने लग जाते । तब वह अपने प्रांसुओं को पोंछ लेती। - दो दिन बाद ही स्मारक तैयार किया गया। जिस दिन बादल का खून हुग्रा था उस दिन कॉलोनी के मैदान में एक सभा हुई थी। वह सभा बादल की पार्टी के लोगों की नहीं थी, किसी अन्य दल की सभा थी। गड़बड़ की गुरूपात उसी जगह से हुई थी, हालांकि विल्कुल सही वात कोई भी नहीं बता पाया। शाम के धुंधलके में किसी ने बादल का पीछा किया था । चादल घर की ओर दौड़ पड़ा था, लेकिन मोड़ को पारकर आगे नहीं बढ़ सका । कोई कहता है, वादल अकेला ही पर की ओर पा रहा था और उसका गुनी पहले से ही मोड़ पर छिपा उसका इन्तजार कर रहा था। इसी तरह को जितने मुह, उतनी बातें सुनने में आ रही थीं। विमला की समझ में नहीं आता कि उनमें से किस बात को सच माने तथा किसको झूठ । वादल की चोरा सुनकर लोग दौड़कर उसके पास पहुंचे थे, पर तब तक सारा मेल समाप्त हो गुफा था। सून से लय-गय मृत वादल के अलावा शाम के धुंधलके में और कोई भी वहां दिखाई नहीं पड़ा। पुलिस भी पाई थी। शायद ११८ बादम भी पार्टी ने मुष नोगों के नाम पनाये पर ये दुग्ने पर भी यही नहीं मिले । पुलिस रिमी को भी गिरफ्तार नहीं कर मोहपारों में जिनका नाम पुलिस को बताया गया था उन पर मामला दायर रिया गया था। ये सभी जमानत पर टूटकर निश्चित पूम रहे हैं । अंग पल रहा है। केस दम तरह पल रहा है मानो बुध हुप्रा हो न हो । दारली हरया के दो दिन बाद उसका स्मारक पानी पहीद-ग्मारस. पार हुधा पा 1 इन दो दिनों में कुछ छोटे-मोटे दगे भी हुए। एक दुसान यो जलाकर राम कर दिया गया लेकिन क्यों, यह विममा को पता नहीं। विममा माहीद-स्मारक के पास क्यों गई थी यह भी चमे पता नहीं। वर नो पहा जाकर घस थोडी देर गडी रहकर मा गई थी। पन्द्रह-मोलह टों को एक- के-सारनएका रमकर, गारा-चूना लगाकर, गाय दिया गया था। फिर पून से उस पर सफेदी करके उस पर वादन का नाम लिगा गया पा। उसके वार विमला के चारो पोर गड़े होकर उन नइयों ने वही एक ही स्लोगन बुनर किया था, 'कॉमरेड बादल जिन्दागद । गन का बदला गून...' मादि- भारि । पता नही कौन था वह सहका, उमने बादसा नाम मे-गकर एक भाषण भी दिया था। उसकी रही मारी याने विमना की समझ में नही पाई। समझ में क्या नहीं पाई. पूरी यात मानो उमने गुनी ही नहीं। यह तो गहन दुग मे हवी-सी गडी पी मौर उसी हालत में पर पनी पाई पी। पर पाकर रसोईघर में जाकर गाना बनाने बंट गई थी। पर मैं उस यक्त भोर कोई भी नहीं था । हप्रमाद, वृपान नमा दयाल पाकर गाना गायेंगे, साना बनाये रगर फाम पंसे चलेगा, प्रा. यह जिम दुग यो स्थिति में यहा नई पी उसी हालत में पर माकर माना बनाने में जुट गई। पर रिसी में 14 भी उसने पात नहीं की। कृपान पर ध्यान में तो नही ही की, हरप्रसाद से भी बात नहीं की । हरप्रसाद गुद पाकर रगो पर के दरवारे के पारा गड़ा रहा था। फिर खुद से ही मोन रहा हो इस तरह होना था, कितनी बार मना किया पाकि उस दस से मन-जोन मत बड़ा, पर कोई गात गुनै सव न !' विमला ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर भी हरप्रमार पहीं गरे रहे । योरी पेर धुप गड़े रहने के पश्चात् एक मम्बी माम मेते हुए मोने, 'पहा की ये तर पार्टिया सिदाप गन-गरारे के और युध भी नहीं पाती। इन्हें कोई ।' मतलब नहीं किसी से । जिसका गया, उसका गया । ये थोड़े ही देखने पायेंगे । अव बादल वापस तो पाने से रहा इसके बाद हरप्रसाद चुप रह गये थे। पर विमला ने फिर भी कोई जवाब नहीं दिया। वह तो चूल्हे की तरफ झुकी हुई बैठी थी। हरप्रसाद ने फिर एक गहरी सांस भरकर कहा, 'जो कुछ होना था सो हो गया। अब मन को मजबूत रखो। इसके अलावा और चारा ही क्या है, तुम्हीं बतायो ? मुझे देर हो गई, मैं ऑफिस जा रहा हूं। खाने की बिल्कुल भी इच्छा नहीं है ।' हरप्रसाद चले गये थे । वस, उस दिन के बाद और कोई बात नहीं हुई। इन तीन महीनों में कभी-कभार कुछ कहते भी तो बस यही कि, 'मन को मजबूत कर; धीरज धर; वादल तो अव लौटकर आयेगा नहीं।' विमला हरप्रसाद की बातों का कोई जवाब नहीं देती। वह पति से सिर्फ गृहस्थी-सम्बन्धी आवश्यकताओं की बात ही किया करती। बादल के विषय में कोई भी बात नहीं करती । कृपाल और दयाल ने तो अपनी ओर से ही विमला से बादल सम्बन्धी कोई चर्चा नहीं की। कृपाल नौकरी करता है । दयाल वेकार है। ये दोनों अलग-अलग दल के प्रादमी है। घर में वे दोनों अापस में बहुत कम बातें किया करते । गमछा, तेल, सावुन आदि मांगने, नहाने आदि की बातें ही करते । इसके अलावा नाटक या सिनेमा तक की बात भी नहीं करते । अपने दल की बात तो बिल्कुल ही नहीं करते । विमला से तो भूख लगने पर सिर्फ खाना मांगते । इसके अलावा, घर में क्या सामान लाना है यह भी पूछ लेते, पर वादल के विषय में एक शब्द भी मुंह से नहीं निकालते, मानो उनका भाई नहीं मरा, कोई और ही मरा है । मानो किसी दुमरी पार्टी का, जो उनकी नहीं थी, कोई सदस्य मर गया हो । शायद अपनी पार्टी के लोगों से इस बारे में बात करते हों, पर घर में तो किसी से भी कोई भी बात नहीं करता। विमला जवाकुसुम के पेड़ से सटकर खड़ी, टूटी हुई वेदी की ओर देख रही थी। नहीं. बादल वहां नहीं है। बादल को श्मशान में जला दिया गया है । पर प्राग वादल विमला के सारे शरीर में जीवित है । आज श्रावण की उन्नीस तारीप है। ग्यारह बजे हैं । अट्ठारह साल पहले इसी दिन, इसी समय, बादल पृथ्वी पर आने के लिये विगला के पेट में छटपटा उठा था। - १२० 1 उग यस. पर में और कोई नहीं था। विमना गरदन परेनी पी। पूरी-गर्मा विमला....बादल किमी भी क्षण पंदा ही मरता था। टीम हमी ममय दर उटने गुहाये । सटर, वंची पापमानातो पी नहीं । विमना दिन नि:गंग थी । यह समझ गई थी कि यह क्ष निकर दर्द नहीं है । उसके नगर को परपेक अनुभूनि मे पभिशता मरी थी। ६६ उठने ही यह समझ गई थी कि यह ध्धया, यह दर्द, निष्फन नहीं जायेगा । ममर निकर पा। पहारह मान पहरेदमी दिन, इमो समय, मूगनापार परमात हो रही थी। इस तरह प्रने रहना उचित नही मा ऐसी हालत में। फिमी सरह विमना बगल के मकान ना बना बीमा के पाग गई थी। दंगे कराने हुए विमना ने गुप-चुप ही कना की मां को स्थिति में प्रवगन कराया । बोती, 'दीदी, पर एकदम समय नहीं है। गुनते ही कना भी मा पपने घर का मारा काम छोर शोधना गे पिमला के गाय चमी बाई थी। उस वकः कना प-गान माल भी थी । उसको भेजकर, मयू की विषया युटिया मा को, जो जरगी करवाया करती थी, युलवा लिया। माजमान की तरह ढोल-तमारे नहीं पोटे जाने थे उन दिनों। अपू को मा हो वघ्या जनवाया करती थी । बुढ़िया तुरन ही भा गई थी। उगने विमना की जाप की मोर बोली, 'हा, ददं तो प्रमनी है । अब प्रधिर देर नहीं है।' कला मी मा ने इमी यक्त रमोईघर गाली कर दिया । उगी सोईपर में बादल पंदा हा या। उम यक्त इम पर मोहाना मुष पोर ही पी। टिन की दीगर नहीं थी. फर्ग भी पा नहीं था। हर की दीवारें पोहा, पत उस समय भी टिन की थी। फर्ग ग्या या । विमना रगोपिर में पटाई पर कभी लेटनी, कभी चटनी. दर्द को तीनता यो गहन कर रही हो। पना की मां की समझ में नहीं पा रहा था कि वह रा करे। यह इग गरः परा रहो यो मानो उनी को दर्द उठ रहे हो। विममा दम साधे गहन पर रही थी। दात-पर-दान भींचकर गुद को पिर रगने पो कोकिंग कर रही थी। ददं गहन करते-करतं मोच रही थी-सदा होगा या मरो।मार मी सदा भी किसडी हो, विमला की भी यही इदा पी। हो महो या एक नदी ही होनी चाहिये । पर उगी बनिम नगर के गाय रोमिट हुमा यह लड़का था । मेयू यो मा ने दोनों हायो गे पिमरा या पेट मगर परररणा दामोकि प्रभी तानात नही मिरी थी । मिसाएर पार हिर ।
इसी प्रकार के दर्द की अपेक्षा कर रही थी । उसी बीच उसने अपने शिशु की ओर भी एक नजर डाली थी । ताजा खान से लाल-लाल एक शिशु । उसके गले से तब तक रुलाई भी नहीं फूटी थी । वहुत धीमी कराह-सी ही निकल रही थी शिशु के गले से । पर ज्योंही नाल गिरी. शिशु सप्तम स्वर में चीख उठा, 'उवां, उवां, उवां !' नाड़ी काटते-काटते मेघू की मां ने कहा था, 'बाप रे, कितना बड़ा छोरा है ! मानो पेट से ही एक साल का निकला है । देखकर लगता है, चेहरा मां पर गया है।' . क्या कहा, मां पर गया है ? विमला ने फिर एक बार शिशु की ओर देखा । पर उसकी समझ में नहीं आया कि बच्चा किस पर गया है। मेधू की मां की गोद में बच्चे को देखते-देखते अचानक विमला को अपनी गोद बहुत खाली- ग्वाली महसूस हुई । लड़की नहीं है तो क्या हुया, अपने ही शरीर का एक हिस्सा है, गोद में लेने को तो जी ललकता ही है । पर यह बात मेवू की मां से नहीं कह सकी थी वह । मन-ही-मन बोली थी, 'मां पर गये वेटे, तुम हमेशा मुखी रहो।' बाहर मूसलाधार बरसात हो रही थी। कना की मां ने विमला को सहारा लगाकर बैठाया था। दूध गरम करके पिलाया था। मेघू की मां ने नवजात शिशु को गरम पानी से पोंछकर साफ किया और गुदड़ी में लपेटकर विमला की गोद में देकर कहा, 'समझ गयी, मूसलाधार पानी साथ लेकर पाया है, बाप के इसी तरह धन बरसेगा । वाप रे, कैसा बादलिया लड़ का है ! दुनिया डूब जानेवाली बरसात साथ लाया है।' रसोईघर की हालत बहुत अच्छी नहीं थी उस वक्त । अव तो पक्का यांगन है, पर उस समय कच्चा फर्ग तथा टिन की छत थी जो जगह-जगह से टप-टप टपक रही थी । नवजात शिशु को छाती में छिपाये एक सूखा कोना देस वहां सो रही थी विमला। . नवजात शिशु को परिचित कराने के लिए विमला ने अपना स्तन उसके मुह से छुपा रखा था, तथा उसके मुंह की ओर देखते हुए सोच रही थी, पता नहीं, यह कंसा निकलेगा? यही सब सोचते-सोचते उसने बालक को और भी करीव फर छाती से चिपका लिया । मेधू की मां ने कहा था, मां पर गया है, - १२२ . प्रग. बदन मनान होगा यह यातक ! 'रे, शंतानी पर भी मेरा जी जनायेगा क्या?' दलना यह विमला हा दी थी। फिर बोली पो, 'अगर मंगानी करेगा सो पोगी।' विमना के इनना मही ही नवजात गिगु गे पड़ा था। शिमला भी हंगी पाई थी। यौली, 'अभी थोड़े ही पीट रही है. ममी संगयों रो रहा है ? रहा हो, कोई शैतानी कर, फिर देगी तुझे।' विमना को एक-एक यात पार है। युध भी नहीं भूली है यह, मानो हम यी ही गात हो । पात, दयाल के जन्म की भी एक-एर यात याद है मिना को । ये नो अपने देश में पदभा के उस पार जन्मे थे। वादन इमी पर में जन्मा था। शाम को जब हरप्रसाद पर मोटे ये. तो बच्चा-पर के बाहर हो गडे होर, गगारकर, अपने माने यो मुचना दी थी। दरयामा भीतर मे चन्द्र पा। विमला ने मेयू की मा से कहा, ' पिता पार्य है. दयारापोर दे।' मेपू की मा ने दरवाजा खोल दिया था। हरप्रमाद ने दिममा गे पूपा, 'मी हो मुम ग्मिला ने फोई जवाब नहीं दिया, मिर्फ मालटेन बी गैगनी में परेशो परमे करके दिखा दिया था। हरप्रमाद ने 'ह' बी पाराज वर महा पा. 'मुम्हारा घंटा तो बहुत गयनरत दोगना है।' बाप का मुशी में चमरता चेहरा देगरी ममना जा मा पा fri बहन मुग हुए थे। विमला का हरा गर्व में दमर सा था । उगने गोया. 'नना पसल चेदा पाकर हरगार मोदी न होने का भरोम नहीं है।' मे यी माने रहा था, 'वेटा जवप्न पारल-पानी माय मारा है। एम गाना नईका है।' मन. नाम-मसार रगी ममरवर दिला गा पा । . भान यही दिन या । प्रहारह साल पहले दिन या पार । बारह पर मे । विमला पाल मूदार गामोग यही, मरहार चिर दी। मे एका लग रहा था मानो पेट में कुछ हिसल रहा है। पेट में गार' साल ! एक कोने में जवामुम मे मटार नही है मिना ।
शाहीद-स्मारक की ओर देखकर उसने अांखें मूंद लीं। हां-हां, फिर, फिर वैसा ही लग रहा है मानो पेट में भ्रूण हिल-डुल रहा है। होठों को भींचकर, दोनों हाथ छाती के पास इकट्ठे कर लिये उसने । अब यह सब क्या हो रहा है ? फिर ऐसा क्यों लग रहा है ? संतान पैदा करने की शक्ति तो उसकी बहुत दिनों पहले लुप्त हो चुकी है। आज यह कौन है जो उसके गर्भ में इस तरह उछल रहा है ? तो क्या वादल उसके शरीर में ही व्याप्त है ? वह मन- ही-मन बादल को आवाज देने लगी, 'बादल, बादल !' 'मां, मां, यो मां !' कृपाल अावाज दे रहा था। विमला ने कोई जवाब नहीं दिया । न ही वहां ने हिली । वह जहां खड़ी थी, जैसे खड़ी थी, वैसे ही वहीं खड़ी रही। उसका चेहरा कठोर हो गया। सारा शरीर कड़ा हो गया । नजरें टूटी हुई शहीद- वेदी पर जमी थीं। अपने बच्चों की पुकार का जवाब दिये बिना आज तक कभी नहीं रह सकी है वह, पर आज उसके मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही थी। आज वह किसी की बात का जवाब नहीं देगी। वहां खड़े-बड़े विमला को अपने बच्चों के बचपन की बातें याद आने लगीं। बचपन में कृपाल एवं दयाल दोनों आपस में बहुत झगड़ते थे पर बादल पर दोनों ही जान छिड़कते थे। वे दोनों बराबर से ही थे उम्र में, इसलिये झगड़ा करते थे पर बादल उन दोनों से बहुत छोटा था । बादल को दिये बिना दोनों भाई कुछ भी मुंह में नहीं डालते थे । जव वादल ने बोलना सीखा तो कृपाल और दयाल दोनों ने उससे पूछा था कि वह किसे अधिक चाहता है ? पर वादल भी कम लालची नहीं था । वह किसी भाई को भी खुद से दूर नहीं करना चाहता, अतः दोनों को चाहने को वात कहा करता था। छोटे-से बच्चे की चालाकी पर विमला मन-ही-मन हंसा करती थी। धीरे-धीरे कृपाल और दयाल बड़े हुए । नाय ही बादल भी बड़ा होने लगा । लर के जैसे-जैसे बड़े होने लगे वैसे-वैसे उनका स्वभाव न जाने कसा तो होता गया । बादल को अब अपने बड़े भाइयों का सान्निध्य पहले जितना नहीं मिलता था, क्योंकि अब वे घर से बाहर अधिक व्यस्त रहने लगे थे। धीरे- धीरे बादल ने भी अपना रास्ता चुन लिया। उसके भी अलग दोस्त थे, अलग गेल-पूाद होता था। पर इन परिवर्तन रो विमला को विशेष चिन्ता नहीं हुई थी। उसने सोचा, लड़के बड़े होंगे तो परिवर्तन तो पायेगा ही उनके स्वभाव में। पर सड़कों की इन सब हरनों से चिन्ता हो रही थी तो हरणमाद हो। उन्हें सबरी पधिर कृपाल और दयाल पर गुम्गा पाता पा विमला ने हरप्रसाद के मुंह से ही गुना था कि दोनों बडे मटक कॉम जाते तो है परने के लिए, पर यहां जाकर वे राजनीति करने है। विममा गोपती, गभी पात्र सो ऐमा फरले है, फिर कृपास मोर दयार रापपा दोष है ? यह पाती. 'कनित में जाकर पे मोग क्या करते हैं या नहीं, हमे इन बातों में दिमार गाने से पया साम?' हरप्रगार यहा, "सिर्फ राजनीति में हो पढ़ते तो भी विशेष चिन्तित होने की शान नहीं थी, पर राजनीति के नाम पर ये सोग गुरागर्दी करते है। मेरे पंगों ग कतिज में पढ़कर यह सब नहीं चलेगा। मह या तू पाने वेटोको भन्छी तरह गमना दे। हरप्रमाद से बात करने के ग गे विमला नो मन-ही-मन बुरा लगता पिन फिर यह सोचनी, मच्चो को वाय, पारने में ही पटना पाहिये, प्रन जान पौर दयात में उगने कह दिया था, 'बेटा, तुमलोग गज में पाने में निसे जाते हो । यहाँ जाकर तुमलोग यह गय क्या पधे करते हो? तुम्हारे पिताजी पो तुम्हारे ये उग जरा भी पसन्द नहीं है।' उन दोनों का एक हो ज्यार था, 'यह सब तुम्हारी ममझ में नहीं मागा, मो।' गिर्क पान की पोर से उग ममय तक ग्गिी प्रारको चिना नहीं थी। हरप्रसाद को भी उगरी योई शिकायत नहीं थी। साल से मधिर मगाव मा मे ही था, यार से नहीं। पर के काम में मां को ही महारा मगाया परता पायपि करता पायक-मक फरने परही। . जमाना धीरे-धीरे बदल रहा था। मपम हरप्रसार मा गुग्मा यहे बेटे प्रपात पर निकला पा । याहर का विरोप पर में पा पहुपा । मिर्फ यहन से ही मामला नहीं होता। हरामाद कुर हो उठते बेटे पर । पर पान भी पीछे नहीं रहना । पर उनी पागों से पाप को पूरता रहता । पागिर विमला गैर में मार को हटा ले जाती और कहती, 'चल उधर, बाप के मंह पर इस तरह जवावं देता है, शर्म नहीं आती ?' लेकिन विमला को हरप्रसाद पर भी कम क्रोध नहीं पाता था । कृपाल कोई बाहरी व्यक्ति या दुश्मन तो नहीं था उनका । अाखिर था तो वेटा ही, पर घर में दोनों को झगड़ते देखकर यही लगता था मानो दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हों। सिर्फ कृपाल से ही नहीं, दयाल के साथ भी हरप्रसाद का वैसा ही व्यवहार था। विमला सोचती, दयाल और कृपाल एक ही दल में शामिल हैं। पर विमला के इस भ्रम को टूटने में भी अधिक समय नहीं लगा था। उसने देखा कि दोनों भाइयों के बीच भी जमकर बहस होती है । यह विरोध घर में होने की वजह से तथा विमला की उपस्थिति की वजह से मार-पीट का रूप धारण नहीं कर सकता था। उसकी समझ में नहीं आता कि सब अलग-अलग दल में शामिल क्यों हैं ? यह सोचती, अगर सभी मिलकर एक दल बना लें तो सारा झगड़ा ही मिट जाय । पर उस वक्त घर में तीन दल थे, तथा चौथे दल में थे बादल और विमला। वैसे बादल भी बिल्कुल निरपेक्ष नहीं था । उसका अधिक झुकाव मंझले भाई दयाल की ओर था । वह कहता, मंझले मैया ठीक कहते हैं।' विमला पूछती, 'कैसे ?' बादल कहता, 'हमारी स्कूल के अंची क्लास के सभी लड़के मंझले भैया को बहुत मानते हैं। गेट पर खड़े होकर जब मंझले भैया भापरण देते हैं तब सभी लड़के हड़ताल करके क्लास से बाहर निकल आते हैं।' 'तो तू भी मंझले भया की तरह ही बनेगा ?' इस बात का बादल कोई जवाब नहीं देता। वह कहता, 'अभी से मैं कैसे पह सकता हूं ?' विमला कहती, 'तू तो इन बसेड़ों में मत पड़ना । देखता नहीं, घर में कैसी अगांति रहती है !! जैसे-जैसे नमय गुजरता गया अशांति का रूप बदलता गया। अब हरप्रसाद, कृपाल, दयाल कोई भी किसी से आपस में बात नहीं करते । जब विमला खाना बना लेती तब वे चुपचाप बैठकर खा लेते। रात को अपने-अपने बिस्तर पर यह १२६
पडवर मोरही। कई बार रात को पान या दयाम पर पर नहीं रहने ।
उनी पढ़ाई-नियाई भी चौरर हो रही पीपलने पर मिrn
या इनाम पर लिया था। दयान को भी नोकरीदने की त्रि मग
भी। पाती बने में नहीं, मेरुिन पिर पार्टीवारी मे भी सोनाम
नही चलेगा। उमे भी एक मोरगी मग्न उरत है।
दम बौन दाम भी वहाहो गया। जब यह नाम दग में पा रहा था तब
उमे टासा हो गया था। विमला पालेगा यानी बीमारी में
कार उठा था । उगी मन में रे-चुरे गयार पाने रहने । वह गोपनी, जानी
वही पर उमा माजसएफनो मतान नहीं गौ है। ऐमी भाना बीमारी
भी प्राज ना उगमी रिमी गनान को नहीं हुई थी। तबग fr,
गपाल बीमार पादत निो टटा बुताकर माया था। दाल पर
मिरहने घटा उसके मा ५ को गंपी ग माया मोर मोली,
गन, पंगार मादि जार फरयाने कोने गया था। हग्मगार के मेरे पर भी
लिया उद्विग्नतारी दर पी। भी बादर 2. रिपार
गय नर बादल न कोई पार्टी ज्यान नहीनीची। नगर पाना माना
नही का हार हो ।
जिर विमा यी भागो के ममा मकान बागा पा रम पम गया। इसी पर
क. पागन मे मन में पथपय तथा क्षत-विक्षत बाम गोपी उटी भी । बादाम
पो लाग पो उन दोनों ने ही परसा । ये गय उपाही केही
पदये थे । नृपाल तथा दयाल नो यहा एप सा भी पार नही।
जायद चाहकर भी बडे नही हो गो । हामगार पुगेपर गो।
उनमे ग्मिी ने एक भी मान नहीं कहा, कॉम भी गिी पुपनी गा|
बादन के दोनो ने ही उन पनी को का देकर ममान सपनाया
था। बाप न, या भाइयों में में स्मिी ने नहीं। गरम की मामी
रों पर पाकर ही भगान पहुंची । हरागार -पानण
दोनों भाई तो घर में ही नहीं पे उस पार ।
पगर टापार ममय वाहन ने पो पार्टी मान र मोहोतीar
नहीं क्या होता मशान-बाग की तरह ए माई तपा र मभी दर
रहतं । पार्टी के सामने बाप, बेटे, भाई प्रादिग्मिीमा कोः स्तिम
है । उनका एकमात्र परिचय है वस पार्टी । यह कैसी पार्टीवाजी है, विमला की समझ में नहीं पाता । वह तो गृहस्थी का बोझ सम्हालना जानती है, बस । इसका मतलब पार्टी ही सब कुछ है । विमला की आंखों में क्रोध की अग्नि भभक उठती है एक पल के लिये । पल भर के लिये उसकी नजरें शहीद-वेदी पर से घूमकर घर की ओर मुड़ती है, मानो एक वार गर्दन धुमाकर यह अपने घर को देख लेने की कोशिश करती है। 'भई, मुनती हो ? याहां गई ?' यह अावाज हरप्रसाद की थी। विमला को पुकार रहे थे । पर विमला ने कोई जवाब नहीं दिया । उसने अपना चेहरा भी घुमा लिया उस अोर से । वह फिर ने शहीद-स्मारक की ओर देखने लगी। उसे याद अाया कि आज ऑफिमों की छुट्टी है; किस बात की छुट्टी है यह उसे याद नहीं पा रहा है । कृपाल, दयाल, हरप्रमाद कोई भी काम पर नहीं गये । पर गुछ भी हो, आज विमला किमी की बात का कोई जवाब नहीं देगी । प्राज, इस वक्त, वह जवाब देने में असमर्थ है। उसके पेट में पता नहीं क्या हो रहा है ? अाज से अट्टारह साल पहले, अाज के ही दिन जैसा हुअा था, वैसा ही कुछ उसके शरीर में ग्राज भी हो रहा है। उस स्मारक में भी नहीं है, श्मशान में भी नहीं है, बादल तो उसके पेट में ही है। अब वह फिर से इस धरती पर पाने को मचल रहा है। जब बादल टाइफाइड के चंगुल से छूटा था तब बहुत ही दुबला हो गया था। विमला का मन होता, छोटे बच्चे की तरह उसे अपनी गोद में ले ले । पढ़ाई का एक साल बरवाद हो गया था, पर उसकी कोई परवाह नहीं थी विमला को । लड़के की जान बच गई, यही बहुत है। अगर कृपाल या दयाल में गे कोई बीमार होता तब भी विमला को उतना ही दुःख होता । उतनी ही चिन्ता होती। हरप्रसाद की छोटी-मोटी तकलीफ से भी विमला घबरा उठती है । मदं लोग मौर चाहे जितने भी महत्वपूर्ण कार्य करते हों, पर अपने स्वास्थ्य मी ओर से बहुत लापरवाह होते हैं। फिर हरप्रसाद ही तो एक- मात्र पालनहार था उस गृहस्थी का। विमला कभी भी पति की उपेक्षा नहीं करती। १२८ । वादन धीरे-धीरे विस्त टोक हो गया था । समशेरी भी मिट स्गाप पहले जैमा नहीं रहा, हालाकि गुन्दर यह पहले से भी अधिक हो गया। हमेगा से कम बोलने को भारत भी उमसी-शिशुन विममा मौतरह । शिम महत कम पोती है । उसरी गृहस्पी उगे पपिक पात करले मोगरी नहीं देती। सारी गृहस्पी उसी के कपों पर तो है । पर मे गाफ-गा और पोका-यतन के अलावा बासी मारा राम वही परती है। बादल कम पात पिया करता था। विमता सोचती, सम-गेमम यहोपा माइयों का रास्ता नहीं पपनायेगा। पर मे तीन पाटिमा पहरे गेही गोदाः पी पौर किमी का भी किसी के साप भन्दा पयहार नहीं पा। हाला किबोलवान भी बन्द है। यादम यह गव देगता ही है। गय गमभाभी है, प्रतः वह उग रास्ते कभी नहीं जायेगा । पर विमला ने गनत गोवामा । वादन के काज ग्यान करने हो । विमला ने मुना कि बादल भी गा पन्य हो पार्टी में शामिल होगा। विमला ने पूछा. 'तू भी यही पार्टीवाली करने में लग गया। बादस कमवान करता था। उसने मापीयानापोजमाप नीnि मेरिन हरप्रमाद ने उसे प्रारे हायों लिया था। जिस पर मोंने गन सपा दयाल मे माय भगा दिया था उगी तरह याल को भी यागा धमाया पा। उन्होंने कहा, 'तू एक गूनी पार्टी में गामिन हमा' विमला ना होकर गुल रही थी। बाम पाने fnt परापा. 'हमारी पार्टी, यूनी पार्टी नही है। हरप्रसाद ने चिल्लाकर कहा था, 'बिगुमनी पार्टी, वा । गुर बदमाग, लुच्चों के पनाग उग पार्टी में भी मना माant" मुझे मिनाने की योगिन मनपर।' पहा पा, 'मैं frगीकानी मिनाता। विमा यो ममा परिवार वादन कोनी पहपानगी । पाना सम्पर में मन्नेवारीबातोंरा र गहा पा। वार की सरह जशे मार र नी मोरादमिमा नलि. सी गड़ी मार रही पी, दाान ने मग गे वारकरना र मोग पि' मानो वानर ही बरपा रही है। पनीर ममम ममा है। विमला यह सब सोचकर चकित होने के साथ-साथ थोड़ी नाराज भी हुई थी मन-ही-मन । बादल भी बच्चों की तरह चिल्लाकर कुछ कहता तो गायद विमला को अधिक सुणी होती। हालांकि बादल के इस तरह बोलने पोटंग से विमला को कुछ-पुछ गर्व की अनुभूति भी हो रही थी। लेकिन हरप्रमाद को तो बात करने का दूसरा कोई ढंग आता ही नहीं था। वेनो जिस तरह कृपाल तथा दयाल से कहा-सुनी करते, . उसी तरह बादल को डोट रहे थे, 'यह सब मैं कुछ गुनना नहीं चाहता । अगर तुझे इस घर में रहना है तो उस पार्टी को छोड़ना पड़ेगा।' हरप्रसाद के बात करने का यह रवैया विमला को अच्छा नहीं लगता था । वह सोचती, बातों-बातों में ये सबको घर छोड़ने की धमकी क्यों देते हैं ? बादल ने पाने पिता की उस बात का कोई जवाब नहीं दिया था। बस, उनके सामने से हट गया था । हरप्रसाद मन-ही-मन बड़बड़ाते रहे थे, 'जो देग का निर्माण करना नहीं जानते, सिर्फ उसे बरबाद करना ही जानते हैं, उन्हें मैं अपने घर में नहीं रहने दूंगा । अगर अपना-अपना अलग रास्ता ही चुनना है तो-' बस इसी तरह बक-मार करते रहे थे। विमला भी हरप्रसाद में सामने से उस वक्त बिराक गई थी। यह प्रादमी सिर्फ वक-भक करना पौर डाटना ही जानता है। ऐसा तो कभी नहीं देखा कि ठंडे दिमाग से अपने बच्नों को कभी कुछ समझाया हो। जिस तरह कृपाल, दयाल से पेश पाते रहे है उमी नगह अब बादल को भी टाटने लगे हैं । विमला का हदय सिर्फ अशांति एवं उद्वेग से ही भरपूर है । वह अक्सर अगला पड़ती। सोचती, दुनिया में इतनी चीजों के रहते पार्टीबाजी के पीछे गे लोग नयों इतने दीवाने रहते है ? प्रापिर बादल भी उसी रास्ते चला गया जिग रास्ते उगके बाग और दो भाई गये है। उसने बादल से अमलाकर ही कहा, 'तुझे तो लिखने-पढ़ने और सेलने-खाने में मस्त रहना साहिये । तू गपों पार्टी-चार्टी के चक्कर में पड़ गया ?' बादल ने बहुत ही शांत स्वर में जवाब दिया, 'मैं किसी को कोई नुकसान तो पहुंगा नहीं रहा हूं।' अंब विमला सगमुच गुस्सा हो गई। बोली, 'मैं नफा-नुकसान कुछ नहीं मगमती एक ही घर में तुम गार प्राणी, चारों अलग-अलग पार्टी के पोधे.
पागल रहने ही, पापम में भगमावहा परते हो, यह मर मुमगे मान नही रिमा नाता । तू तो यह पार्टी पार्टी प्रो।' बादल ने गभीर होकर जवार दिया था, 'मैं पर में मिमी के साथ भी भया करना नहीं चाहता, न रिमी के साथ वहा परना पाहाहा, पार्टी भी नहीं छोड़ सकता है। पिमला ने कहा, 'हां, पार्टी मी घोड़ने सगा फिर तो मुझे पोहा पाराम मिन आयेगा न । समझ गई बेटा, में प्रच्छी तरह गमन गई। जब तक मर नहीं जाती, तुम वाप-माइयो को पार्टी नहीं हटेगी। है भगवान, में मां पती जाऊ? मुझ उठा से ईयर म दुनिया से । सभी मला वो पहामी है जिसमें पार्टीबाजी के प्रतावा कुछ भी नहीं बचा है। विमला का गला रूप गया । पासो में मामू बहने लगे। यह फिर बोली, 'पर तो लगता है, मुझे भी एक पार्टी में मामिल होना पड़ेगा। मादी बातें सुनकर यादन युद्ध दिलित-सा हो उठा । योगा, 'तुम इस तरह जोगराम वो करती हो ने पहा न, मैं पितात्री री या भारती ने भगाणा नहीं।' पर वादन की यह बात भी गलन सावित हुई। कभी पानसे, कमी दयान में, तो कभी हरममा से उगी बहरा-भरा होती ही हनी। बाहरी पशाति ने घर में पुरता नोट बना लिया था। बाहर जो भी गया होगी, उसका सारा हिमाय पर पाकर पुराया जाता। उनसे बात गुन-गुनार विमला समझ गयी पीfr बादल अपनी पार्टी के नाम मे सश्चिमे भाग ले रहा है । पहाई-वडाई यो गतं तो उसके दिमाग पर मे वितुल पृष गई थी। शुरु-गुरु मे कृपाल ने पिममा में एक बार कहा था, 'मामात अधिक विगड गया है। तुम उमे सावधान कर देना। परनाग्मिी निको पार हो गया तो हाथ मलने के सिवाय कोई चारा नहीं रहेगा।' विमला ने कहा था, 'तो मुभमे यही क्यो पाया है ? परने छोटे भाई को तुम गुदनीं मममा मकने' 'यह गमभने-समभाने की सीमा को पार कर गया है।' 'मोर तू भीतर ही है । क्यों ? नमानी पार्टी नही घोर ला" ने कडुवे स्वर में कहा था। कृपाल ने कहा, 'मुझे जो कहना था सो कह दिया । तुम्हें जानकारी देने का मेरा यही मतलब है कि बादल आग से खेल रहा है । मार-पीट और गुण्डागर्दी के अलावा उसे प्राज-कल और कुछ नहीं मूझता है।' सभी का एक-दूसरे के विरुद्ध बस यह एक ही अभियोग था । विमला के पास आकर सिर्फ कृपाल ने ही बादल के विरुद्ध अभियोग लगाया हो, यह बात नहीं थी। दयाल ने भी वही सव बातें कही थीं तथा हरप्रसाद ने भी वही बातें बादल के विरोध में कहीं जो कृपाल ने कही थीं। हरप्रसाद ने कहा था, 'अपने छोटे बेटे से कह देना, अव भी समय है कि वह सम्हल जाय। उसके बहुत पंख निकल आये हैं। किसी दिन वे पंख जला दिये जायेंगे।' हरप्रसाद के मुंह से ऐसी बातें सुन विमला का हृदय कांप उठा था, लेकिन साथ ही हरप्रसाद पर भी उसे कम गुस्सा नहीं पाया था। उसने हरप्रसाद से कहा था, 'अपने बेटे को क्या तुम नहीं समझा सकते ? तुम कोई बच्चे तो हो नहीं। तुम अपने बच्चों के सुख की खातिर पार्टी नहीं छोड़ सकते ? अपने बेटे में कुछ कह भी नहीं सकते ? तुम सब मुझे ही ग्रा-प्राकर क्यों कहते हो?' हरप्रसाद ने कहा, 'तुम यह सब नहीं समझोगी। मेरे पार्टी छोड़ने न छोड़ने से कुछ फर्क नहीं पड़ता । मैं इनलोगों की तरह गुण्डई पार्टी में नहीं हूं। लेकिन बादला जिस तरह हवा में उड़ रहा है न, वह कुछ-न-कुछ कांड किये विना नहीं मानेगा। विमला ने तिक्त-नाराजी भरे स्वर में कहा, 'मुझे कुछ कहने से फायदा नहीं है । मैं तो तुमलोगों के लिये एक नौकरानी से अधिक कुछ नहीं हूं। तुमलोगों की खिदमत कर रही हूं। तुमलोगों को तो बस एक-दूसरे से झगड़ने का ही काम है । मुझे तो अव तुमलोग दुनिया के तमाम झंझटों से मुक्ति दे दो।' इतना कह विमला हरप्रसाद के सामने से चली गई थी, फिर भी हरप्रसाद की बड़बड़ाहट उसके कानों तक पहुंच रही थी-'बादला की मौत मंडरा रही है उसके सिर पर । पार्टी के दादामों के उकसाने पर वह अपने को बहुत-सुध समझने लगा है ।.... विमला का कलेजा फिर एक बार कांप उठा था। बाप होकर हरप्रसाद पंसी १३२ - बाग रह रहे है ! यही नहीं कि उन्होंने ऐगा सिर्फ शान के लिये ही पहा हो; कृपान मौर दयान को भी इसी तरह महसे रहने पे तो पा पितृत्य से भी बार है पार्टी ? भाइयों के मन में मना जरा-मा भी भातृ प्रेम नही है ? मभी मिलकर एक मुगी गृहस्थी यगा सरते थे, यह सोहमा नसे; एक-दूगरे के विपर यम निवायत हो परते रहते हैं। अभियोग मगात रहने हैं। विमला ने बादल मे पहा, 'तेरे पितात्री तथा भाई तेग बहुत शिकायत कर रहे थे। क्या तुम कोई भयानक माम करने हो जिसमे कोई पगुन सार रो जाने की मंभावना है?' ने 'काहयार युध नहीं होनेवाला, मां। ये लोग पाहते हैं कि पुद तो पार्टीवानी करते रहें और मैं गुपचाप बैठा रहूं । पर मैं पिंगा क्यों करने लगा? उनके दराने-धमकाने रो में रती भर भी नहीं डरता । अधिक भू-गपष्ट करेंगे तो हम भी भुप बंटनेवाले नहीं है।' फिर भी विमला ने उसे डांटते हुए कहा था, "तू उनलोगों से बहस ही बयों किया करता है ?" बादल ने जवाब दिया, 'मैं क्यों उनसे बहस करने लगा ? वे ही एमर कम- कमकर पाते हैं।' 'तू गया भपने भाइयों पर अपने पिताजी के साथ भी मिल-जुलकर नही रह बादल पहा. सरता?' 'पोर, जंगे पिताजी पौर नंया सोग तो मुझने मिलकर ही रहते है ! दरममल, पार्टी के मामले में किसी के साथ किसी का भी मेल-जोल राभव नहीं है।' बादन एक पल के लिये मुप रह गया, फिर बोला, 'मैं पार्टी के साथ बेईमानी नही फर ममता । चाहे इसके लिये भाई तथा पिताजी मुझे जितना भी क्यो मांटें। वे लोग तो पापम मे मार-पीट करते रहते हैं, और मुझ पर रोर माटना चाहते हैं । पर में भी पिसी को परवाह नहीं करता।' पर पिमला ने माना अन्तिम ममोप मात्र छोडा । मोनी, 'याप को नागज भानू यह सर पर है। कन को तुझे इस पर से गले मारे को नह चंटे वो?' वार ने तत्काल जवाब दिया था, तो चला जालगा। लेकिन इनर- पिताजी का या पिताजी की पार्टी का समर्थन नहीं कर सकता।' विमला अजीब उलझन में फंस गई थी। उसके मन को किसी तरह भी शांति नहीं थी। इधर कुंआ, उधर खाई जैसी बात थी । अपने ही पति और गुणों में से किसी को भी समभा नहीं सकती वह । एक ही घर के चार सदस्यों में चार पार्टियों का झगड़ा चल रहा था। सब एक साथ बैठकर भोजन करना तक भूल गये थे। अगर किसी दिन संयोगवश सब एक साथ खाना माग भी बैठते, तो खामोशी से खाकर उठ खड़े होते । कोई किसी के साथ एक शब्द भी नहीं कहता, मानो हाड़-मांस के निर्जीव पुतले वैठे हों। । 'मां, मां, कहां गई ?' अन्न दयाल पुकार रहा है । इससे पहले कृपाल पुकार रहा था । उधर कव से हरप्रसाद भी पुकार रहे हैं । पर विमला ने विसी की पुकार का जवाब नहीं दिया । अाज के पहले उनके पुकारने पर वह जवाब दिये बिना नहीं रह सकती थी। पर आज वह किसी की बात का भी जवाब नहीं देगी। यहीं खड़ी-सड़ी वह उस उपेक्षित, टूटे हुए शहीद-स्मारक की पोर ही देखती रहेगी। वादन का शून उमी जगह हुआ था। आकाश काले बादलों से ढका हुआ है । सनसनाती हवा के साथ-साथ मोटो- मोटी वृदे भी पड़ने लगी हैं । हवा के झोंकों से जवाकुसुम का पेड़ विमला के मुह तथा सारे शरीर पर झुका जा रहा है। पर वह वहां से जरा भी नही लिगकी। आज वह फिर उन रसोईघर में नहीं जा सकती। भाग से अट्ठारह साल पहले के बादल के जन्म-स्थान यानी जच्चाघर में जाते ही उसके पेट में एंटन-सी होने लगती हैं । जी सा-कसा हो उठता है । यह सोयी बड़ी रहने में भी असमर्थ है। मानो पेट में कुछ हिलता है, इधर-उधर होता है। पेट में बादल है क्या ? तो गया, बादल अभी उसके गर्भ में ही है ? विमना दांत ने होंठ काटकर दर्द सहने की कोशिश करती है। तो क्या फिर दर्द उठ रहे हैं? उस स्मारक की ओर देखते-देखते विमला की प्रांगों के सामने बादल का क्षत- विक्षत, लह-नुहान गरीर मूर्त हो उठता है और तब उसे याद आती हैं सभी द्वारा बायन को डांटने और धमकी दिये जाने की बातें । उसने अपने ही दिन से प्रपन लिया, किसने मारा है वादन को ? कृपाल के दल ने? या दयाल के - . दम ने ! या हरप्रसाद के दल ने? गभी ने इस बात मे दनार कर दिया कि उनके दल ने वादम को मारा है। पुलिग ने भर में रिनरो परराया उन्होंने भी इन वान रोनार रिया है। जबकि उगे पंनापनी-धमनी इन मभी ने दी थी। पाल, दमाल एवं प्रसाद को साटिनों के पनामा पोर भी पाटिया है, पर रिमी में भी यादन से मारने की बात स्वीकार नहीं की है। विमला को भी पता नहीं किवादल के गन गरिमने हाप से है। माहे जितना भी पस्वीकार क्यों न करें, पर रिसी-न-मिमी पार्टी ने सो मारा ही है यादन मो। यह कौन-गी पार्टी है ? सबगे साहा गर तो विमना को हरप्रमाद, कृपाल तथा दयाल की पार्टीवालो पर ही है। पोरि उन तीनों ने ही कहा था, 'बादल के सिर पर मौत मारा रही है। जबकि रिमना के ही पनि पोर पुष हैं। क्या वादन प्रसाद का बेटा नहीं पा? दयान, पाल पा माई नहीं था? मिर्फ किगी एर पार्टी या बोई एक माही था? उनके लिये क्या यह उनकी विरोधी पार्टी रासामा मात्र हो या मगर यही बात है, नो पाज विमना भी उनी पुकार पर महा मे हिनेगी तक नहीं। विमसा को माफ गुनाई दे रहा था कि ये सभी पानी प्याल, पान और हरप्रसाद बगे बारी-बारी से पुकार रहे हैं । 'मा, मोमा। 'मा, महा गई" नई, वहा हो ' मुनती हो?' विमला गर ममझ रही है कि ये लोग उगे कभी समरे मे, नोभी रमो:मा में, तो कभी प्रागन में दूसने फिर रहे हैं। फिर स्याल ने रमोईपर ये दाग से चिल्लाकर बना की मा को पुराग, यह भी गुना विमना । दयार की भावाज मा रही पी, 'मोनी, पो मौमी।' पना की मां की मावाज सुनाई पडी, 'परा यार है रे दार" 'मां पार यहा पाई है पया "नहीं सो। हमारे यहाँ तो मुबह में एर धार भी नहीं पाई। हाई सेरी मा.
. 'क्या पता ? यहां तो नहीं दीख रही है । रसोईघर का दरवाजा भी खुला पड़ा है। कड़ाही की सारी सब्जी कुत्ता सा गया है, और खाना-वाना कुछ बना नहीं है।' कना की मां की उद्विग्न अावाज सुनाई पड़ती है, 'यह क्या कह रहा है तू ? तेरी मां तो ऐसी लापरवाही कभी नहीं करती। देख, ढूंढ़ तो सही, कहां गई ? मैं भी पाती हूं।' पर विमला को जाने के लिये कहां जगह है ? वह तो अपने बेटे की उसी टूटी हुई शहीद-वेदी की पोर एकटक देख रही है जहां तीन महीने पहले वादल के दोस्त उसे बुलाकर ले गये थे। बादल के उन दोस्तों ने भी सिर्फ स्मारक वनवा दिया और छुट्टी पाली। अव उनको भी इधर पाने की या यह देखने की फुरसत कहां है कि उनका बनाया शहीद-स्मारक तीन महीने में ही कैसे टूट गया है ! वे तो जैसे पहले किया करते थे, वैसे ही अव भी अपनी पार्टी का काम कर रहे हैं । केवल वही क्यों, इस घर में वादल के बाप-भाई भी तो यही सब कर रहे हैं। किसी ने कुछ नहीं खोया, सिर्फ विमला ने खोया है सिर्फ विमला ने खोया है। उसी ने उसे दस महीने गर्भ में धारण किये रखा। अट्ठारह साल पहले, आज के दिन, इस वक्त तक, मेयू की मां ने बादल को धो-पोंछकर, उसकी छाती के पास सटाकर सुला दिया था। . 'वसी बहू ! हरप्रसाद छाता ताने उसके पास पहुंच चुके थे। हरप्रसाद अपने भाइयों में सबसे बढ़े थे । संयुक्त परिवार होने के कारण विमला बड़ी बहू के नाम से ही जानी जाती थी। हरप्रसाद भी कभी-कभी उसे इस नाम से पुकारा करते थे। विमला ने कोई जवाब नहीं दिया । हरप्रसाद ने कहा, 'हम सब तुम्हें कय से हर जगह ढूंढ रहे हैं, और तुम यहां गड़ी क्या कर रही हो?' हरप्रसाद को कुछ बताने की जरूरत नहीं । विमला जानती है कि हरप्रसाद को गइ याद नहीं है कि ग्राज वादल का जन्म-दिवस है। दोनों लड़कों को भी पास नहीं है। पर विमला नही भून मातीरि पिम महक को उगने गि दिन जन्म दिया पामीनो मार्ग में में जब जिम जन्म-दिन पाता २. रिममा पोटी-गी गोर बनाकर उगेपिला देनी है । जने दलों में यह गाही करती प्रा. है। पिपी मान पात्र के दिन उगने यात पांगीर बनाकर पिलाई भी, पर प्रर यादन के लिये विमना को भी पीर नहीं बनानी पड़ेगी। हरप्रमाद यो प्रावाज में प्रगहाय पाश्नयं था, पयोंकि ये विममा सो विगुण भी गमझ नहीं पा रहे थे। वे तो वग योले ही जा रहे थे, हमारे नियं गाना नहीं बनाया । पापी कच्ची मन्त्री घोर पाई, वह भी पुसा गा गया। यह गय पाग है तुम्हारे " विमला के गहरप्रमाद नहीं समझ सरता । वह बुध बना-गममाना भी नहीं चाहती । इस वक्त उमली प्रागो के सामने सो गिगु यादन र रहा है। उसके बाद बादल पड़ा हुमा । बादन स्कूल में पा रहा है। मौके पाम दो पंसों के लिये पहगे जिद करता है । हम वक्त. विमला को अपनी पायों के गामने गिर्फ बादल"""यादल, यग बादस-ही-बादन दिग रहा है। पौरों के लिये तो यह एक पार्टी का मटका मात्र या । सतान तो बम विममा हरप्रमाद को भावान गुन कृपाल सपा स्याल भी यहां मा परे । ये भी चपित-गे मां की पोर देग रहे पे, पर पापम में कोई भी बोल नहीं रहा पा। विमला को यों टूट की तरह गडे देखकर भी मास में बात नही पर पा कृपान ने कहा, 'मा, तुम यहा पो पड़ी हो? या हो गया ?' गभी प्रयास है । कोई भी विमला को गमन नहीं पा रहा है कि ये दिममा केही पति और पुत्र है। विमला अपने पति मोर पुत्रों को पोरकर नही नहीं जा सकती, पर पार वह पर में होते हुए भी उनरे माप नहीं है । विममा पाज यादन के माप ही रहेगी। पादार उमरे हरप में है। हरप्रमाद ने पहा, 'बड़ी यहू, भीतर पनी । यहाँ गहरी-गही मन भीगे।' विमला पी नर टूटे हुए स्मारक पर जमी पी। उसने स्पष्ट मो में रा. 'नहीं। मैं नहीं जाऊगी।'
'क्या पता ? यहां तो नहीं दीख रही है। रसोईघर का दरवाजा भी खुला पड़ा है। कड़ाही की सारी सब्जी कुत्ता सा गया है, और खाना-वाना कुछ वना नहीं है।' कना की मां की उद्विग्न आवाज सुनाई पड़ती है, 'यह क्या कह रहा है तू तेरी मां तो ऐसी लापरवाही कभी नहीं करती । देख, ढूंढ़ तो सही, कहां गई ? में भी पाती हैं। .. - पर विमला को जाने के लिये कहां जगह है ? वह तो अपने बेटे की उसी टूटी हुई शहीद-वेदी की पोर एकटक देख रही है जहां तीन महीने पहले बादल के दोस्त उसे बुलाकर ले गये थे। बादल के उन दोस्तों ने भी सिर्फ स्मारक वनवा दिया और छुट्टी पाली । अव उनको भी इधर पाने की या यह देखने की फुरसत कहां है कि उनका बनाया शहीद स्मारक तीन महीने में ही कैसे टूट गया है ! वे तो जैसे पहले किया करते थे, वैसे ही अब भी अपनी पार्टी का काम कर रहे हैं । केवल वही क्यों, इस घर में वादल के वाप-भाई भी तो यही सब कर रहे हैं। किसी ने कुछ नहीं खोया, सिर्फ विमला ने खोया है। उसी ने उसे दस महीने गर्भ में धारण किये रखा। अट्ठारह साल पहले, आज के दिन, इस वक्त तक, मेयू की मां ने बादल को धो-पोंछकर, उसकी छाती के पास सटाकर सुला दिया था। - - 'बड़ी वह !' हरप्रनाद छाता ताने उसके पास पहुंच चुके थे। हरप्रसाद अपने भाइयों में सबसे बढ़े थे । संयुक्त परिवार होने के कारण विमला बड़ी बहू के नाम से ही जानी जाती थी। हरप्रसाद भी कभी-कभी उसे इस नाम से पुकारा करते थे। विमला ने कोई जवाब नहीं दिया। हरप्रसाद ने पाहा, 'हम सब तुम्हें कब से हर जगह ढूंढ रहे हैं, और तुम यहां नही क्या कर रही हो?' हरप्रसाद को पुछ बताने की जरूरत नहीं । विमला जानती है कि हरप्रसाद को पद याद नहीं है कि ग्राज बादल का जन्म-दिवस है। दोनों लड़कों को की याद नहीं है। पर विमला नही भूत मानी कि पिम मरोगे उपने किम दिन जन्म दिया था। तीनों साग में मेजर त्रिमा जन्म दिन पाता ३, रिमना पोटी-मी मीर बनाकर उगे पिला देनी है । इतने दरों में यह गेला ही करती पार है। पिछली साल मात्र के दिन उगने पात्र होगार बनाकर खिलाई थी, पर प्रत्र वादन के लिये विमला बो कभी गौर नहीं चनानी पडेगी। हरप्रमाद की पायान में प्रमहाय पाश्चयं था, क्योकि ये विमना को मिम भी समझ नहीं पा रहे थे। ये तो बरा बोले ही जा रहे थे, हमारे लिये पाना नहीं बनाया। माधी कच्ची मन्त्री छोर पाई, यह भी मुत्ता गा गया। यह मय क्या दग है तुम्हारे ?' विमला फे ढग हरप्रमाद नहीं समझ सकता । वह मुह कहना-गमगाना भी नहीं चाहती । इस वन उमकी प्रायों के सामने तो निगु वादन गेग रहा है। उगमे याद बादल पडा हुमा। बादत स्यूल में जा रहा है। मौके पाम दो पमो के लिये पहगे जिद करता है। यह विमला रोमानी मानों फे. गामने मिर्फ बादल"""बादल, यम वादन-ही-चादस दिग रहा है। पौरों के लिये तो यह एक पार्टी या मटका मात्र पा । सतान तो वम दिनना शपा। हरप्रमाद को प्रायाज गुन पास तथा ट्याम भी पहो पा पहने । ये भी पक्ति-मे मा को पोर दंग रहे थे, पर पापस में कोई भी बोल नहीं रहा था। विमला को यो टूट की तरह गडे देगार भी पापग में बात नही पर पा पान ने कहा, 'मां, तुम यहां मोगही हो? क्या हो गया?' गभी प्रकार हैं । बोई भी विमला को समझ नहीं पा रहा है कि ये दिनमा के ही पति और पुत्र है। विमला पने पति और पुत्रों को घोगरही नहीं जा सस्ती, पर मात्र वह पर में होते हुए भी उनले माप नहीं है। विमला पात्र वादन के माप ही रहेगी। वाहन उमर दर में है। हरप्रगार ने पहा, 'बड़ी यहू, भीतर पलो। यहां पड़ी-राहो मत भीगे।' विमना की नजर हटे हुए स्मारक पर जमी पी। उसने स्पष्ट गमी में रहा, 'नहीं। म.नहीं जाऊगो।
विमला का जवाब सुनकर तीनों ही पार्टी-गेम्बरों की चकित नगरें पल भर कों आपस में मिल गई । पाल ने कहा, 'साना नहीं बनाया । अब हम क्या खायें ?' विमला ने साफ एवं हद स्वर में कहा, 'ग्राज मैं तुमलोगों को खाना नहीं दे सकती।' तीनों पार्टी के लोग प्राश्चर्य में अब गये । पान विमला उनके लिये पार्टी से भी बड़ी उलमान बनकर उपस्थित हो गई थी । दयाल ने कहा, 'तो हमलोग गया परें प्रव?' पिगला ने कहा, 'तुगलोग अपनी पार्टी का काम करो जाकर । मुझे मत छेड़ो।' अंतहीन विस्मय में सूवे तीनों व्यक्ति खामोश पड़े थे। विमला उनके सामने से हटफर नागफनी की वार के पास जाकर खड़ी हो गई। तीनों ने ही एका- पूसरे की ओर देखा । तीनों की नजरों में अपरिचय की छाप थी। मानो पति, पत्नी को नहीं पहचानता। लड़के मां को नहीं पहचानते। अब उनके घेहरे पर ऐसे भाव थे मानो विमला से कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो रही हो । यह पहली बार ही ऐसा हुआ था जब वे विमला के ढंग देराकर सिर्फ पक्ति ही नहीं हो रहे थे बल्कि उन्हें डर भी लग रहा था । थोड़ी देर और सड़े रहकर तीनों ही व्यक्ति वहां से चले गये । वर्षा की बौछार पौर हवा के तेज झोंकों के कारण यहां खड़े रहना मुश्किल था। तीनों ही व्यक्ति एक असहाय अस्थिरता एवं प्रारमयं में वे एक-एक कर चले गये । विमला उसी तरह राड़ी है । बरसात के पानी से यह धुली जा रही है । पता नहीं पह गया चीज है जो उसके गले के भीतर से बाहर की ओर निकल पड़ना पाहती है । उरागी प्रांतों से प्रांसू कर रहे हैं जो उसके चेहरे पर से बहती बरसात की धार में मिल जाते हैं । विमला छाती पर दोनों हाथ रखकर पुकार, उठती है, 'बादल, बादल, तू मेरे पास है । मेरे ही पास रह तू ....
इस संकलन के कथाकार संक्षिप्त परिचय - विमल मित्र जन्म : १८ मार्च १९१२ । कलकत्ता विश्व- विद्यालय से वंगला साहित्य में एम० ए० किया। १६४५ में 'दिनेर-पर-दिन' शीर्षक प्रथम कहानी-संग्रह प्रकाशित हुया। १९६२ में मतिलाल पुरस्कार और १९६४ में रवीन्द्र पुरस्कार प्राप्त किया। मापके दर्जनों उपन्यासों और कहानियों के हिन्दी-अनुवाद हो चुके हैं जिनमें कुछ प्रमुख उपन्यास-'साहव, वीवी, गुलाम', 'खरीदी कौड़ियों के मोल', 'इकाई, दहाई, सैकड़ा', 'पटरानी', 'नायिका', 'मन ही में रही', 'काजल', 'मुरसतिया' आदि हैं । कई उपन्यासों और कहानियो पर हिन्दी में भी फिल्में बनी हैं और दर्शकों द्वारा पसन्द की गयी हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि रवीन्द्रनाथ और शरचन्द्र के बाद हिन्दी-पाठकों में सर्वाधिक लोकप्रिय पाप ही रहे हैं। पूर्णतः लेखन-जीपी। पता : २६।१११, चेतला सेण्टल रोड, कलकत्ता-२७ । - प्राशापूर्णा देवी जन्म ८ जनवरी १६०६ । पिता श्री हरेन्द्रनाथ गुप्त वंगाल के एक अच्छे चियकार थे। पारिवारिक संस्कारों के कारण अल्प आयु से ही साहित्य के प्रति प्रवल आकर्षण के फलस्वरूप गृह-कार्य के साथ-साथ साहित्य-साधना में भी रत । बंगला में अनेक उपन्यास और कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, और पाप बंगला कथा-साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय कथा-लेखिका हैं। हिन्दी में भी आपकी कृतियों के अनुवाद हुए हैं जिनमें 'रात का पंछी' शीर्षक उपन्यास भी १८०
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. दिव्येन्दु पालित जन्म : १६३६ । कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम० ए० पास करके कलकत्ता के सुप्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक-पत्र 'हिन्दुस्तान स्टैण्डर्ड' के सम्पादकीय विभाग में कार्य शुरू किया । प्राजकल एक व्यापारिक प्रतिष्ठान में अधि- कारी के पद पर हैं। वंगला के युवा कथाकारों में आपका एक विशिष्ट स्थान है। अब तक पांच उपन्यास, एक कहानी-संग्रह और एक कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । पता : १४१२, हिन्दुस्थान रोड, कलकत्ता-२६ । . - मिहिर प्राचार्य जन्म: १६२७, दिनाजपुर [जो अब बंगला देश में है] । कलकत्ता विश्वविद्यालय से बंगला साहित्य में एम० ए० किया। सम्प्रति अध्यापन के साथ-साथ गत पाठ वर्षों से बंगला की प्रथम श्रेणी की साहित्यिक कहानी- पत्रिका 'शुकसारी' के सम्पादक हैं । बारह उपन्यास और चार कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कहानी-संग्रहों में 'याज-कल-परसों' और 'अपराह्न की नदी' वहु-चर्चित हुए हैं। इनके अलावा, 'पूर्व बांगलार गल्प संग्रह' और 'पूर्व बांगलार कविता' शीर्षक दो संकलनों का सम्पादन भी किया है। पता : सम्पादक 'शुकसारी', १७२।३५, प्राचार्य जगदीशचन्द्र बोस रोड, कलकत्ता-१४ । - सुनील गंगोपाध्याय बंगला को ग्राज की पीढ़ी के सर्वाधिक चचित नवयुवक कथाकार । बंगाल में भूखी पीढ़ी के ग्रांदोलन के समय प्राप उसके एक प्रमुख सूत्रधार मल्प ग्रानु में ही विदेश-भ्रमण भी कर चुके हैं । सत्यजित राय द्वारा निर्देशित थे। इस । १४२ पनामानि शिविरगन' पार हो अलग ग्लिपी। म उसयाम भोर महानी-गर प्रगति है। पांमार में बमान. मुगिर ममापारपत्र गापान 'पानाः गार पधिरा' और 2 मार- भोर दिमाग से गायर है। पता : १२, महिपाहार गर.TAILI . प्रमथनाथ योगी पंगता के प्यानिमाण युगं पाता। IRATन में पाविप महाग हामिम है. और पढ़ रहना परिमोक्ति नहीं होगा शिवगानमा गांधए प्यपद-पा- सम। घोर तीसा मय नही, मोटी । पुरी सरह होने गे मगर मही नगद पोर महरी मार वागा होता है पER यगना में कई गहराना है। हिन्दी में भी पायरगनापों के अनुसार प्रागिर। का: १६२१३६, गारंग, गरगा-५ । माइमि राहा मगना नई ग्या-रोकीबो एमिटमार। मानवीर गम्येनाको पति पारगाय जो पूरी तरह महस्सा है. कोमरी पोर मात्र गमार में पतुर्दिक मी पपाया. उगागमता पर पता पारा मनिस पून. निमम पोर ताप है। शोरपानी भाग कर पापारी मंसी पार पा-मेगन की ाि। पता सकारा पापी.सा.४ गमरेश या म: १९२१। सपा में मारपर पति और दुगरपागर । भाग रहा, पापंग रमा पारंगी और रामे निगमारे मरेम सुनार पर रागरा विर' [हिमो पनुगा भीanRsऔर 'Earls
जीपंक उपन्यासों पर अखबारों, पत्र-पत्रिकामों, कॉफी-हाउसों और शिक्षा-
संस्थानों में न केवल गर्मागर्म वाद-विवाद ही हुए, वरन् अदालत में मुकदमें भी
चलाये गये थे। 'गंगा', 'याविनी', 'सात भुवनेर पार' आदि आपके अन्य
चर्चित उपन्यास हैं। बंगला में कई उपन्यासों पर बहु-चचित फिल्में बनी हैं,
और बन रही हैं । पूर्णतया लेखन-जीवी। पता: द्वारा ग्रानन्द पब्लिशर्स,
४५ वेनियाटोला लेन, कलकत्ता-६ ।
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• पुष्पा देवड़ा
जन्म : १६४४, पश्चिम बंगाल के
रानीगंज में । बंगला से कई कहानियों
और उपन्यासों के अनुवाद किये जो
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में एवं प्रकाशकों
से प्रकाशित हुए।
अजितकृपण वतु
लिखित
जादू
कहानियां 'धर्मयुग' के कई अंकों में
प्रकाशित हुई। विमल मित्र का
उपन्यास 'काजल' 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के एक ही अंक में छपा । 'अरिंगमा'
के 'वंगला प्रणय कहानी विशेषांक' और 'भारतीय प्रणय कहानी विशेषांक' के
लिये कई बंगला कहानियों के अनुवाद किये। इनके अलावा, 'अणिमा' के
'बंगला देश कथा विशेषांक' के साथ-साथ प्रस्तुत 'समकालीन पश्चिम बंग कथा
विशेषांक' की सब कहानियां भी आपके द्वारा ही अनूदित हैं
प्रकाषायों में विमल मिम के 'पटरानी', 'नायिका' और 'काजल' तथा
गजेन्द्र गुमार मिय का 'नारी और नियति' राजपाल एण्ड संज से, वाणी राय
का तनिमा-जातक' अपरा प्रकाशन से तथा ताराशंकर वन्द्योपाध्याय का
'कंचनमाला' हिन्दी चुक सेन्टर से प्रकाशित हुए हैं। पता : अणिमा कार्यालय,
पुलिस स्मारका, जयपुर-४।
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