Hindustani Academy, Allahabad

Nagari Pracharini Granthamala Series No. 4-10

Chand Baradai · 2004/20/11

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सूचीपत्र।
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( ३६ ) हंसावती व्याह
(३७) पहाड़राय समय
( ३८) बरुण कथा
( ३९ ) सोमवध समय
(४०) पज्जून छोंगा नाम प्रस्ताव
(४१) पज्जून चालुक नाम प्रस्ताव
(४२) चंद द्वारका समय
(४३ ) कैमास जुद्ध (अपूर्ण)
रासोसार
पृष्ठ १०७३ से १०९७ तक
, १०९९ ,, ११.१८ ,,
१११९
११२९
११५३
१९५७ ११६३
११७७
११७४
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छत्तीसवां समय २१ ] पृथ्वीराजरासो। १०७३ तिथ पंचम रवि भोम। लगन प्रथिराज सु थप्पो॥ कमलहु सुरीज किन्नौ कनक । किति लम्भौ दुज्जन बहिय ॥ तप तेज भान मध्यान ज्यौं । तिन चौहान चंदह कहिय ॥छं०॥६६॥ और उक्त रनथंभ के युद्ध की रत्नाकर से उपमा वर्णन । बर पंचाइन समर । दंड मुक्किय बर मुक्किय ॥ मथौ सेन सम्म ह । रतन कित्ती फल रुकिय ॥ लच्छि भाग चहुबान । हथ्थ हंसावति लडिय ॥ अमृत भाग चिचंग । सेन हाला हल सद्धिय ॥ बारुनी बौर अस्सिय सु झर । अरिन पाइ जस रतन लिय ॥ मह महन रंभ हथ्यह कपट । सिंभ सौस बर अप्प लिय॥छं०॥१०॥ लग्न के समय के अन्तरगत पृथ्वीराज का बारू बन को शिकार खेलने के लिये जाना। दूहा ॥ तब लगि मंतन लगन दिन । विप आषटक जाइ ॥ बारू बन उम्भौ बपति । मात दरस निस पाइ ॥ छं० ॥ १०१ ॥ पृथ्वीराज के बारू बन में शिकार करते समय सारंग राय सौलंकी का पितृबैर लेने का विचार करना। कवित्त ॥ बारु विरल बन वपति। राइ आषटक सारिय ॥ सारंग चालुक चूक । रूक तिहि बेर विचारिय ॥ समरसिंघ चढ़ि हथ्य । हथ्य आवै चहुआनं ॥ पिता बैर बहु बंध । हुऔ कर नार समानं ॥ बर बैर सपुत्तन निकसै । ज्यौं आगम अरि अंगयौ ॥ बर बौर बैर ससि सनिह लगि । गुन प्रधान बर मंगयौ ॥छ०॥१०२॥ सारंगदेव का कहना कि पितृबैर का लेना वीरों का मुख्य कर्तव्य है। दूहा ॥ बैर काज बर नंद सुत । बर बैरोचन हत्त ॥ करि वसौठ माली सुतन । बैर पुब्ब मन जित्त ॥ छं० ॥ १०३ ॥ ३७ १०७४ पृथ्वीराजरासो। छत्तीसवां समय २२ कवित्त ॥ सुनि मंत्रीवर बैर । राम रावन *सिर सज्जिय । बरे काज ग्रहभेद । करन उरजन सिर भज्जिय ॥ बर काज सुग्रीव । बाल जान्यो न बंधगति ॥ बर बौति सुर इंद्र । बर चिंतिजै इसौ भै ति ॥ चहुआन समर लभ्भै जु तत । चंद सूर जिम ग्रह लिय ॥ बर चूक दान अग लग्गिहै। कित्ति एक जुग जुग चलिय ॥छ०॥१०४॥ 'कित्ति काज परधान । राज राजन सुख चुक्किय । कित्ति काज विक्रम्म । देश देसह धर लुकिय । कित्ति काज पंवार । सौस जगदेव समप्पौ ॥ कित्ति काज बर सिवरि। मथ्थ कर कट्टि सु अप्यौ । रयत अचल गल्हां जियन । कौरति सब जग भल कहै ॥ सकंग एक जुग्गन विरह । रहै तो गुर भल्हा रहै ॥ छं० ॥ १०५ ॥ दूहा ॥ केहरि कल केहरौ हिरन । करन जोग में ईस । कोइक उत्तर देषिये। गल्ह बोहथौ सौस ॥ छं० ॥ १०६ ॥ सारंग राय* का नागौद के पास मंगलगढ़ के राजा हाड़ा हम्मीर से मिल कर उसे अपने कपट मत में बांधना। कवित्त ॥ मंगल गढ़ मंगलिय । नयर नागदह मिलंतह ॥ है हाड़ा हम्मीर । नैन बाहू सु जुरंतह ॥ पारधिरा प्रथौराज । चूक मंद्यौ चालुक्कां ॥ हाड़ा सों हथलेव । मूल कडून सालुक्कां ॥ भंभरी भोर भौनिग तनय । परि पगार उदिग्ग तन ॥ पंचारि राइ पट्टनपती । तिवर तेग बत्ते कहन ॥ छं० ॥ १०७ ॥ सारंग राय" भीम देव का पुत्र था । यद्यपि यह बात इस छन्द में स्पष्ट नहीं लिखी गई है परंतु इस "पिता वैरं वहुवन्ध, हुओ कर नार समान” पंक्ति से उक्त आशय निकलता है । (१) ए. कृ. को.- किसी को परधाम राज हरिचन्द न मंकिय २) ए. क. को.-मंस। (३) ए. कृ. को.-अचर । * ए. कृ. को.-प्रतियों में "कित्ती काज श्रिय राम राज भाभीछन दोनों” पाठ है और दूसरी पंक्ति "कित्ती काज विक्रम्म जैसे देसह धर लुक्किय" नहीं है। (४) ए. कृ.-को.-चालुक्कां ।

छत्तीसवां समय २३ ] पृथ्वीराजरासो १०७५ * सारंग राय का पृथ्वीराज और समरसिंह जी के पास न्योता भेजना। दूहा ॥ भोजन मिस चालुक्क ने। 'पाइक पाइक कौन ॥ ग्रेह कपट्ट सु मंडि के । करि जु निवंतन कौन ॥ छं० ॥ १०८ ॥ बरन राव रावन्न ढिंग । बर चालुक्क सु थान ॥ समर सिंघ चहुबान को । न्योतन को बलवान ॥ छं० ॥ १०६ ॥ यहां एक एक मकान में पांच पांच शस्त्रधारी नियत करके कपट-चक्र रचना। कवित्त ॥ एक ग्रह बिच बीच । सुभर सन्नाहति पंचै ॥ पंच घट्टि पंचास । बौर अंबी रज संच ॥ तक लोह सह दोन । करै चालक सु चल्लै ॥ आषेटक चहुआन । समर रावर बर मिल्ल भोजन भंति रस बोर बर । बर प्रबोध ग्रह दिसि चलिय ॥ मन तन्न मुष्प मिट्टै सघन । सुबर बोर संगह हलिय ॥छं०॥११०॥ हाड़ा राव का पृथ्वीराज और समर सिंह से मिल कर शिष्टाचार करना। दूहा ॥ आज हनंदे पाप बर । ग्रह बड्डे बड़राइ ॥ समरसिंघ चहुबान मिलि । दुष्प हनंदे आइ॥ छं० ॥ १११ ॥ कवि का हाडाराव पर कटाक्ष । बर प्रमान ग्रह ग्रह कै। भेद च क तिन जानि ।। घालि पिटारी उरग को । मेल्हे को ग्रह आनि ॥ ई० ॥ ११२ ॥ पृथ्वीराज को नगर में पैठतेही अशकुन होना । गाम वाम पसत बपति । बन वप बोलत सद्द ॥ * इस प्रवन्ध में चालक शब्द से सारंग राय से ही अभिप्राय है। (१) को. मो.-धाइक । (२) मो. सन्नाहित । -- १०७६ पृथ्वीराजरासो। [छत्तीसवां समय २४ फेरि बौर दष्पिन भयौ । बरी करन निकंद ॥ छं० ॥ ११३ ॥ ज्योनार होते हुए वार्तालाप होना। करिय सबर मनुहार त्रिप । चित्त धरं धरकत्त ॥ भोजन पिधि विधि सकल भय । अकल अपूरब बत्त ॥ छं० ॥ ११४ ॥ उसी समय किले के किवार फिर गए और पृथ्वीराज पर चारों ओर से आक्रमण हुआ। कवित्त ॥ दै किपाट चिहुं कोद । राज मुक्यौ सु मंझ ग्रह ॥ ठाम ठाम सब सथ्य । सूर सामंत सथ्य रहि ॥ घोरंधार विहार ।। बिपन बर बर बन मुकिय ॥ संभ सपत्ते राज । च क चालुक्क सलुकिय ॥ प्रथिराज सथ्य सामंत सह । बर षवास लोहान भर ॥ बर बंध उभै सेवक चिगट । समर काज उम्भौ समर ॥छं०॥११५॥ दूहा ॥ तकि बक्कि उठे 'सुभर । चपे चाल क राइ ॥ हाइ हाइ मच्ची समुष । बकत बौर प्रथिराइ ॥ छं० ॥ ११६ ॥ सारंगदेव के सिपाहियों का सबको घेरना और पृथ्वीराज के सामन्तों का उनका साम्हना करना। कवित्त ॥ चिहूं कोद बर सूर । तेग कढी सु हक्कि कर ॥ बज कट्टि कुंडली । करिय मंडली रजं फिरि । लहि न और अवसान । कढ़ी बर् 'अभि सु सस्सी ॥ झरि चालक सब देह । सिरह बढी मन हस्सी ॥ कैचूं दुबद्धि बंदर सिरह । हलधर हल सिर झारयौ ॥ सामंत सटि ग्रह कूदि कैं। फिरि पारस अरि पारयौ ॥छं०॥११॥ रावल जी और भीम भट्टी का हन्द युद्ध । रावगीन बर समर । भौम भट्टी जु कंध परि ॥ (१) ए. कृ. को.-समर । (२) ए. कृ. को.-आसे अस्से ।

छत्तीसवां समय २५ ] पृथ्वीराजरासो। १०७७ तेग हथ्थ झकझोर । बौर लिन्नों सु बथ्य 'भरि ॥ दुतिय घात आघात । घाइ अग्गा बर बाहै ॥ कमल पंति दंतौ । समूह दारुन जल गाहै ॥ घट घाव भंग भेदै नहौं । चौकट जल घट बूंद जिम ॥ आहुट्ट उग्र साहस करिय । पत्र तरोवत अरिन तिम ॥छं॥११८॥ पृथ्वीराज का * नागफनी से शत्रुओं को मारना । दूहा ॥ नागमुषो चहुबान लिय । अरिन करन्न सु दाह ॥ हद्द नंषि उच्चाइ अरि । ज्यों कल बधि बराह ॥ छं० ॥ ११६ ॥ घोर घमसान युद्ध होना और समस्त राज्य महल में खरभर मच जाना । मोतीदाम ॥ रन बौर रवद्द कहै कवि चंद । सु मोतिय दाम पयं पय छंद ॥ कद बर आवध बज्जत तूर । उठे परसद्द महल्लन मूर ॥ छं० ॥ १२० ॥ नच बर उठि धरं धर सूर । करै हक देषि उसस्सि करूर ॥ जु तक्कत अच्छर जालिन मड्छि । रहो तिन मभभ सुकौव समुभम ॥ छं० ॥ १२१ ॥ दिषौ दिषि सुकिव अच्छरि जुथ्थ । उपावहि “मत्त जु सुंदर तथ्य ॥ उपावत मत्त सु छोड़न घट्ट । चलंत है विधि अगम्मनि वट्ट ॥ छं० ॥ १२२॥ अपजस कित्ति तज्यौ अस राइ । चल्यौ अप अग्ग छुड़ावत जाइ॥ बरं कुलटा छडि छडि सु केउ । अझ उल कत्ति तज्यौ करि पेउ ॥ छ० ॥ १२३ ॥ जु पौय वियोग सह्यौ नह जाइ । चलो बर नारि अमग्गन धाइ ॥ लरंतह भूपति भान कुंआर । कर मनु "वजय बज प्रहार ॥ छं० ॥ १२४ ॥ , (१) ए. कृ. को.-परि । (२) मो. लग्गा । ( ३ ) मो.-हट्ट नंषिड । * ' नगफनी । एक शस्त्रविशेष । ( ४ ) मो.-सुकवि,कुक्कवि । ५) ए. को. मंत। (६) ए.- अयजस । (७) मो.-बजूह ।

१०७८ पृथ्वीराजरासो। [छत्तीसवां समय २६ लरै भर चालु क चंपत घट्ट । सचौरह नारि अगंम सुभट्ट ॥ निगं म्रिग लज्जन दच्छन जाइ । भजे क्रम स्तूर 'त्रियं गय पाइ ॥ छं० ॥ १२५॥ कड़ी बर तेग लग्यौ ग्रह धन्न । उड़े बर मग्ग अलग्ग 'क्रसन्न ॥ सु उज्जल छोह चल्यौ रुधि छेदि । मनों जल गंग सु भारति भेदि॥ छं० ॥ १२६ ॥ तजै जर जम्म भिदै रवि जाइ । परै धर मुत्ति जु सूरन आइ ॥ ॥ छं० ॥१२७॥ रामराय बड़ गूजर का हाथी पर से किले के भीतर पैठ कर पारस करना। कवित्त ॥ बर बड़ गुज्जर राम । कह वज्जिग बर धायौ ॥ पौलवान अरियान। पौल अरि पूर लगायौ ॥ नारिगोरि सा बात । तौर जल जोर सु बढी॥ मौन रूप रघुवंस । पूर सम्हौ अरि चट्टी ॥ कल मलिनि कलिनि कलि कलन कल । लोह लहर सम्हौ हलो ॥ अरि घरा फुट्टि बर धार सों। सुमन लोह उड्ड मिली ॥छ०॥१२८॥ कविचन्द द्वारा "युद्ध" एवं सारंग देव के कुकृत्य का परिणाम कथन । पंच कमन दस हथ्थ । “ल थ्थि पर ल थ्थिय हुट्टिय ॥ न को जियत संचयौ । न को जुझभयौ बिन षुट्टिय ॥ कोन जम सु जुझझवै । वैर मंगै सु पुब्व अब ॥ व्याज तत्त अप्पीय । मूल अप्पयो कुट ब सब ।। अदिहार बौर चालुक्क कौ । नको घेत बिन मुक्कयौ ॥ संभाग बौर चहुआन कौ । सबै सथ्य भोरौ कियौ ॥छ०॥१२६॥ (१) ए. कृ. को.-त्रियंअग ( ४ ) ए.-धरा। (२) ए. कृ. को.-सक्रन । (३) ए.-पीर । ( ५ ) मो.-" लोथि पर लाथ "।

छत्तीसवां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो। १०७६ पज्जून राय के पुत्र कूरंभराय का बड़ी बीरता के साथ मारा जाना। कवित्त ॥ 'सुत पज्जन नरिंद । बौर करंभ नाम हर ॥ अस्त बस्त अरु सस्त । टूक लम्भै न ढुंढ धर ॥ विहत बीच अरु चंड । एक 'उग्गरि फँडेक भय ॥ कवि आयौ गुर तौय । नम्भ कहि सहिस अत्ति हय ॥ ढुंढंत अस्ति न सुझि परै । लोह किरचि रच्यो रह्यौ ॥ भेदयौ राह रूपह सु रवि । बरन बौर बैकुंठ गयौ ॥ छं० ॥ १३० ॥ इस युद्ध में एक राजा, तीन राव, सोलह रावत और पंद्रह भारी योद्धा काम आए। कवित्त ॥ तीन राइ रजवार । सु इक्क रायत्तन सोरह ॥ रावत्तन दस पंच । सेन संभरिपति जोरह ॥ नागर चाल नरिंद। रैन रावत पट्टनवै ॥ इते राइ अंगए । चू क एकन ठट्टनवै ॥ उद्दिग दार पांवार पर । पहुर तीन तुग्यौ करन॥ आचिज सूर मंडल सुन्यौ । सहु सथ्थें 'बध्यौ सुतन ॥छ॥१३१॥ रेन पवार ( सामंत ) की प्रशंसा। कुंडलिला ॥ मरन न लचौ तुंग तिहि । सब सथ्थई पंवार ॥ सोमेसर नंदन "छला । गहि गज्जे गंमार ॥ गहि गज्ज गंमार । तेग तोरिन बर जारन ॥ च क मूक्कि चालक । स्वामि कन्यौ बर बारुन ॥ है हलान हथ्थियन । रयन रायत्तन सिद्धे ॥ सह सथ्था तन ताइ । तुंग तिन मरन न लद्दे ॥ छं० ॥ १३२ ॥ रेन पंवार के भाई का सारंग को पकड़ना और पृथ्वीराज का (१) मो.-मत । (२) ए.-ठगरि। (३) मो.-रावन । ( ४ ) ए. कृ. को.-मंडयौ। (५) ए. कृ. को.-कला । (६) मो.-हेसतय्थान बंधेरन ।

पृथ्वीराजरासो। [छत्तीसवां समय २० उसे छुड़ा कर हम्मीर को तलाश करके उससे पुनः मित्र भाव से पेश आना। कवित्त ॥ बंध रेन लिय रज्ज । चाइ चाल क छंडायौ ॥ ढकि सेन संभरी। हेल हम्मौर बढ़ायौ ॥ घेल घग्ग घुमान । पान जोरै जल पौनौ ॥ सो घोचौ परसंग । राइ तुल्ल दल लौनौ ॥ अंकुयौ अरिन रिनथंभ सौ । सजि जद्दव बौरन बलिय ॥ रवि राह सस्मि संमुह गहन । जानि छछंदरि अप्पलिय ॥छ०॥१३३॥ तेरह तोमर सरदार और अन्य बारह सरदार सारंग की तरफ के काम आए। भयौ भूमि भूचाल । संघ समरी आहु? ॥ सजि सई सिंदूर । सिंह पिंडौ रवि तु? ॥ तट्टे तेरह 'तुरब । सथ्य बंबर बर धारी ॥ बार बार रावत्त । हस्त बर बाहर रारी॥ अदभूत जुद्द चहुआन किय । मिलि षुमान चल्ल्यौ पलह ॥ अजहूं सु अजब जुग्गिनि जगहि । पल संभरि पषिन पलह ॥ छं० ॥१३४॥ हुसेनखां का अमरसिंह की बहिन को पकड़ लेना और रावल जी का उसे छुड़ा देना। कुंडलिया ॥ बंधे बर हुस्स न । पान बल सुबर कुआरिय ॥ रन जित्ते दुज्जनह । कोइ न मंडै रारिय ॥ कोइ न मंडै रारि । मेछ सुंदरी बघेरौं ॥ समरसिंह सुनि कह । चियं बंधत फिरि हेरौ ॥ आन । हद्द अहरत्तन संधे॥ धौठ जमन हंकार । समर हेतु बर बंधे ॥ छं ॥ १३५ ।। 9 धौठ पान दै (१) ए. क. को.-तुररा । (२) ए. पीठ ।

छत्तीसवां ममय २६ ] पृथ्वीराजरासो। १०८१ रावल अमरसिंहजी की प्रशंसा और अमरसिंह का उनको अपनी बहिन ब्याह देना। दूहा ॥ अमर बंध रष्षौ अमर । अगि दौनौ बर माल । जस बेली चतुरंग कौं । बरन घल्लि उर माल ॥ छ० ॥ १३६ ॥ चौपाई ॥ जसबेली 'बरिगौ चतुरंगी । चढ़ि चौंडोल ग्रह अनभंगौ ॥ बरन राव रावल संजोगी। सु धर फेरि चालक न भोगौ ॥ छं० ॥ १३७॥ आधी रात को समाचार मिलना कि रणथंभ के राजा को चन्देल ने घेर लिया है। कवित्त ॥ अद्द रयान संदेह । सद्द सावद्द कवौयस ॥ पन्चौ बौर जदव । नरिंद चंदेल 'छवीयस ॥ गूडराइ सबसलह । जुद्द लोहं लरि बित्त । मुन्यौ सेन पुञ्चहि । पसार पच्छिम भरि जित्ते ॥ अप्याह अप्प वौतक वित्यौ । बंधि चंदेल सज्जै मुहर ॥ आवड्व बौर मत्तौ कहर । गही गल्ह बंधी सु धर ॥ छं० ॥ १३८ ॥ षुमान और “प्रसंगराय' खीची का रणथंभ की रक्षा के लिये जाना। गाथा ॥ जित्ताराय षुमानं । निसाने सदयं धायं ॥ छुट्टा रन रनथंभं । षा घग्गे पौचियं रायं ॥ छं० ॥ १३९ ॥ चौपाई ॥ पौचौराइ हमौर अवन्निय । दोइ चहुबान घरम्म भवन्निय ॥ चालुकां सों चूक सवन्निय । दुत्तिय दीपंता निरबन्निय ॥ छं० ॥१४० ॥ कवित्त ॥ दूसासन अंग में। राज विहग गति कौनौ ॥ मध्यदेश मालव नरिंद । हंसध्वज भौनी ॥ नौल वज कर धरिग । विप्र बंदन संपन्नौ ॥ (१) ए. कृ. को. परिगो । (२) ए. कृ. को.-सवीयस । (३) कृ अप्पांह ।

पृथ्वीराजरासो। [ छत्तीसवां समय ३० १०८२ नालिकेल तरू फूल । अनंद सौं नह सुभ किन्नौ ॥ सत पत्र लगन लम्भह भरिय । घरिय अठ्ठ तेरह तिनह ॥ रनथंभ सेन संचरि बपति । करिय अवधि ताकरि रनह ॥ छं० ॥ १४१ ॥ पृथ्वीराज का रणथंभ ब्याहने जाना। दूहा ॥ आगम बौर बसंत कौ । रन जित्ते जुधवान ॥ बर हंसावति सुन्दरी । चलि व्याहे चहुबान ॥ छं० ॥ १४२ ॥ पृथ्वीराज की स्तुति वर्णन । गाथा ॥ रंग सुरंग सुदौहं । ज्यों कुंजिन मेलयं सङ्घ ॥ बय रुष मुष अंकुरियं । सा मिलयं बंकुरौ मुच्छं ॥ छ० ॥ १४३ ॥ दूहा ॥ मुच्छ रखनिय राजमुष । बर बंधिग सुरतान ॥ तीन दिनन श्रावन लगन । आय सगंध पुरान ॥ छं० ॥ १४४ दोधक ॥ ग्रंथर्ड ग्रंथ पुरान कुरानय । राज रसं बरुनों बरु जानय ॥ नौति अनौति सुभं सरसानय । लम्भरु कित्ति लही चहुबानय ॥ छं० ॥ १४५॥ संपय राज स कोकिल संठिय । जानि जुवान न जानि सु पुट्टिय ॥ गायन गाइ सुअथ्य सु अथ्थिय । संभाय गानकला कल सथ्थिय ॥ छं० ॥ १४६॥ छंदह छंद रसे रस जानन । कंठ कला मधुरे मधु आनन ॥ उहिम मेन उदार सुधारिय । 'बजय रूप सरूप सुरारिय ॥ छं० ॥ १४७॥ दूहा ॥ श्रवन रवन अरु सिष भवन । पवन त्रिविध तन लग्ग ॥ वापी कूप तड़ाक दृष। विधि व्रनन कवि लग ॥ छं० ॥ १४८ ॥ पृथ्वीराज का आगवन सुनकर उन्हें देखने की इच्छा से हंसावती का झरोषे से झांकना। (१) ए. कृ. को.-न्यज्जय, नूयजय । (२) ए कृ.को.-सटाक ।

छत्तीसवां समय ३१ ] पृथ्वीराजरासो। सा संदरि हंसावतौ । सुनि श्रोतान सुरुष्प ॥ बर दिष्टा नन मानियै । बेला लग्गि गवष्ष ॥ छं ॥ १४६ ॥ सुनि आयौ चहुबान अप । गुरुजन बंध्यौ जानि ॥ तब मति सुंदरि चिंतवै । भेदक गौष वषान ॥ छं० ॥ १५० ॥ गौख में से देखती हुई हंसावती की दशा का वर्णन । कवित्त ॥ पंथ बाल पिय अंकि । सुभित विंटियं सु राजे मनों चंद उड़गन विचाल । मेरह चढ़ि भाजै सुनिय श्रवन दै सैन । अलिन अलिमैन सरोज ॥ रति मच्छर मति काम । जानि अच्छरि सुर सोज । धावंत वेस अंकुरित वपु । बसि सैसव तिन बेस धुरि ॥ श्रोतान सुष्य दिष्टान धनि । यह कहि चलि सैसव बहुरि ॥ छं० ॥ १५१ ॥ दूहा ॥ प्रथम बत्त श्रोतान सुनि । सुष पै दिषहि सलोइ ॥ सच्च बात मठौ चवौ । तब जिय सुष्य न होइ ॥ छं० ॥ १५२ ॥ सुनि श्रोतान सु मनिय । दिषि दिष्टांत सचीय ॥ बौज चंद पूरन्न जिम । बधै कला मनि जोय ॥ छं० ॥ १५३ ।। हंसावती के शृंगार की तय्यारी । बर वेहरि देषी नृपति । गौ विप निपबर थान ॥ बालु सुअंबर काज कौं । बर बज्ज नौसान ॥ छं० ॥ १५४ ॥ हंसावती की अवस्था की सूक्ष्मता वर्णन । अाभूषन भूषन वपति । वैसँधि कहि न कविंद ॥ कवि बनन इह लग्गि चिय । ज्यों बृत लघु चंद ॥ छं० ॥ १५५ ॥ हंसावती का स्वाभाविक सौन्दर्य वर्णन । कवित्त ॥ बर भूषन तजि बाल । सुबर मज्जन आरंभिय ॥ सोइ छबि बर दिष्पनह । कोटि अोपम पारंभिय ॥ १ ( १ ) मो.-उपमा ।

पृथ्वीराजरासो। [ छत्तीसवां समय ३२ १०८४ बर सैसव बर चंपि । कंपि चिंहु कोद भपागै ॥ सो ओपम कविचंद । जौन्र बूड़त नल धायौ ॥ बालपन बोर बर मित्र पन । रबि ससि करि अंजुरि भरिय ॥ बय बाल 'उबौचन प्रौति जल । सैसव तें हरई करिय ॥ छं० ॥१५६॥ नेत्रों की शोभा वर्णन । दूहा ॥ बर सैसव अच्छर नहौं । जोवन जल बर मैन ॥ बाल घरौ घरियार ज्यौं । नेह नौर बुड़ि नैन ॥ छं० ॥ १५७ ॥ हंसावती के स्नान समय की शोभा। मोतीदाम ॥ कि बाल प्रमोद सु मज्जन चंद। सुमुत्तिय दाम पयं पय छंद ॥ लटिं भिजि बार रही लपटाइ । मनौ दिढ़ सुक लग्यौ ससि आइ ॥ छं० ॥ १५८॥ बि ओपम दै बरनै कबिराज । द्रवै ससि रौस दसं मदु आज ॥ बहै जल भेदि सु कुंकम बार । तिनं उपमान लहै कवि चार ॥ छं० ॥ १५६॥ जु राहय त्रास पियै विष सोम । द्वै मुष चंदह मत्तह भोम ॥ करें बर मज्जन सज्जन नारि । धरै धन धारत संत सँवारि ॥ छं० ॥ १६ ॥ हंसावती के शरीर में सुगंधादि लेपन होकर सोलहो शृंगार और बारहो आभूषण सहित शृंगार की उपमा उपमेय सहित शोभा वर्णन। नराच ॥ कियं सुरंग मजनं । नराच छंद रज्जनं ॥ सुगंध केस पासयौ । बिहथ्थ हथ्य भासयौ ॥ छं० ॥ १६१ ॥ उपम्म जीस साधयौ। बिरंचि लेष बाधयौ ॥ जु बुद्धि रासि भासयौ । सजीवता प्रगासयौ ॥ छं० ॥ १६२ ॥ । ( १ ) ए. कृ. को.-उलीचन ।

scnm छत्तीसवां समय ३३ ] पृथ्वीराजरासो। १०८५ 'जु केस मुत्ति संजुरे । ससौ सराह दो लरे ॥ मनौस बाल साच ज्यौं । कि कर कालि नाच ज्यौं ॥छ॥१६॥ घरौ नबैन कथ्थयौ । जु कन्र कालि मथ्थयौ ॥ तिलक भाल भासयौ । भलक काल साचयौ ॥ छं० ॥ १६४ ॥ विधार गंग पावयौ । जु तिथ्य राज आसयौ ॥ द्यसंत सोमता वरं । कलौन भद्र सावरं॥ छं० ॥ १६५ ॥ सुभाव वान बाढ़यौ । सुराह कंपिठाठयौ ॥ सु पट्टि बाल ठानयौ । सुराह रूप जानयौ ॥ छं० ॥ १६६ ॥ उपम्म नेन ऐनसौ । मनौं कि मौन मैनसी ॥ कवी 'निसंक जानयौ । उपम्म चित्त मानयौ ॥ छं० ॥ १६७ ॥ भवन्न जीव छंडयौ । ससौम रूप मंडयौ ॥ उपम बिंब उग्गनं । कमल्ल जासु सुम्मनं ॥ छं० ॥ १६८॥ रुलंत मुत्ति सोभई । उपम्म अत्ति लोभई ॥ अम्रत्त तार विच्छुरी । दु चंद अग्ग निक्करौ ॥ छ० ॥ १६ ॥ सु तारि हंस सामरं । अनेक भेस तामरं ॥ विभास रूप जामरं। सु चंद चित्त साहरं॥ छं० ॥ १७० ॥ रतन बिंब जानयं । सु चंदबी प्रमानयं ॥ विवल्लि ग्रोव सोभई । जु पोति पुंज लोभई ॥ छ० ॥ १७१ ॥ ससौरु राह छडि के। असंन बैठि मंडि के डरं हरा विसाल यौ। कि ईस दीप मालयौ ॥ छं० ॥ १७२ ॥ उरं त्रिअंग जित्तयौ । जु सुक्क बग्ग पंतयौ ॥ कि काम बौर भंजयौ । दहत्ति ग्रेह रंजयौ ॥ छं० ॥ १७३ ॥ उपम ईस कुच्चयौ । अनंग नौति रचयौ ॥ रोमंग तुच्छ राजयं। उपम्म ता विराजयं ॥ छं० ॥ १७४ ॥ ( १ ) मो.-सु । (२) मो.-बाढ़को । ( ३ ) मो..ठाढको । (४०) ए. कृ. को.-संक। ( ५ ) मो.-लुभ्भई । (६) ए.-चक्कयो।

१०८६ पृथ्वीराजरासो। [छत्तीसवां समय ३४ उरज्ज पत्र काम कौ । लिषै जोवंत वाम कौ ॥ कटी अलप्यता ग्रही। मनों कि रिद्धि रंकई ॥ छं० ॥ १७५ ॥ कि सौभ है वपं रही। तुला कि दंडिका कही ॥ रुलंत घंटिका । सदंत सद्द दंडिका ॥ छं० ॥ १७६ ॥ जु जेहरी जराइ को । घुरंत नद्द पाइ को ॥ नितंब अव तुंबियं । प्रबाल रंग 'घुब्बियं ॥ छं० ॥ १७७ ॥ कि काम रथ्य चक्रए । चलंत रडि वक्रर ॥ उलट्टि रंभ जंघनं । करी सु नास पिंडनं ॥ छं० ॥ १७८ ॥ उपम रंग राजही। जलज्ज भांति-साजही ॥ बसन्न सेत बन्नयं । उपम्म कवि भन्नयं ॥.छं० ॥ १७ ॥ मनों कि दोय अंभयं । सुभंत मध्य रंभयं ॥ दसन्न जोति दामिनी । मनों अनंग भामिनी ॥ छं० ॥ १८ ॥ सुगत्ति हंस लौनयं । सिंगार सोभ कौनयं ॥ झंकार भंजनं झनं । मनों कि सोर भहनं ॥ छं० ॥ १८१ ॥ सु कासमौर रंगयं । जु डि जावकं लयं ॥ मनों कि हंस सावक । चलै बिद्रुम्म भावकं ॥ छं० ॥ १८२ ॥ जरित्त मुदका नगं । सु जोति अंगुलौ लगं ॥ जुवास रास त्रासयं । मनों हुतास पासयं ॥ छं० ॥ १८३ ॥ 'दिपंति नष्प बोसयं । रबी ससौ सुरोसयं ॥ नव ग्रहीय पुच्चिया। उपम्म कबि बंच्चिया ॥ छं० ॥ १८४ ॥ जु चंद राह षेदि के। कि हस्त चंद भेदि कै ॥ उभै तिषट्ट भूषनं । सजंत मेटि दूषनं ॥ छं० ॥ १८५ ॥ चलंत वाम कोड़यं । तजंत हंस होड़यं ॥ उमग्गि प्रिथ्यि देषनं । अलौन मझम पेषनं ॥ छं० ॥ १८६ ॥ सु सैसवं लगंत रष्पि । मुक्कियं दरस्म दिष्षि । ॥ छं० ॥ १८७॥ (१) मो.- षुम्भिय,को.-पुब्बियं । (२) मो.-जरित । (३) मो.-दियत्त ।

छत्तीसवां समय ३५ ] पृथ्वीराजरासो। १०८७ हंसावती के वस्त्र आभूषणों की शोभा वर्णन । हनूफाल ॥ सुर मनौं कौकिल जोइ । अबजंघ रंचन होइ ॥ अंबर कमल पुटन्न । रितु देषि सौत बसन्न ॥ छं० ॥ १८८॥ इह संधि रंभ दसन्न । बनि रवनि प्रीत बसन्न ॥ कसि कासमौर सुरंग । भंकार पिंड अभंग ॥ छं० ॥ १८ ॥ नग जरित मुद्रिक पानि । रवि परौ होड़ सुजानि ॥ नौ ग्रहिअ पुंचिय हथ्थ । उपम्म चंद सु कथ्थ ॥ छं० ॥ १६ ॥ सोई चंद उप्पम घेदि । कै हँसत हिमकर भेदि ॥ बर रड़ि मंडि सुरंग । जनु प्रभा रवि ससि संग ॥ छं० ॥ १६१ ॥ षट दून भूषन सज्जि । सजि सजत सैसव लज्जि ॥ नग मुत्ति जेहर जोड़ । गति हंस तजहित होड़ ॥ छं० ॥ १८२ ॥ बर चरन लगि चिंपयान । पय परस चलि चहुआन ॥ कर वाम 'पान सलाइ । बे काज क्रम अगदाइ ॥ छं० ॥ १३ ॥ तव लग्गी सैसव रष्षि । मो 'कत दरसन दष्षि ॥ छं० ॥ १६४ ॥ हंसावती के केशरकलित हाथ पावों की शोभा वर्णन कुंडलिया ॥ बर कुंकुम सब सथ्य र गि। बहु सथ 'नृप बर सथ्य ॥ सो ओपम बर राज लहि । कबि बरनन लहि कथ्थ ॥ कवि बरनन लहि कथ्थ । फिरिय गुर राजहि कथ्थे मन ससितर काम को। प्रात उग्गत रवि सथ्थ ।। सुभ्रत रवि ससि रूप । एक असु जीव काम तर ॥ पंचानन तिन होइ । पंच प्रथिराज देव बर ॥ छं० ॥ १६५॥ पृथ्वीरज का विवाह मंडप में प्रवेश । दूहा ॥ वंदन वर आयौ नृपति । तोरन संभरिवार ॥ प्रौति पुरातन जानि कै । कामिन पूजत मार ॥ छं० ॥ १८६ ॥ (२) मो.-कहन। ( ३ ) मो.-उप । ( १ ) ए. कृ. को.-यान । ( ४ ) मो. कै सुभूत ससि रूप ।

१०८८ पृथ्वीराजरामो। [छत्तीसवां समय ३६ १ पृथ्वीराज के रत्नजटित मौर ( व्याह मुकुट ) की शोभा और दीप्ति वर्णन । कंडलिया ॥ नग मग जटित सुमेर सिर । तन तर वर मन सोभ ॥ पंच उभै ग्रह चंद सिर । संग सपत्तौ लोभ ॥ संग सपत्तौ लोभ । जुद्ध तट वर अन रुकौ ॥ रहै नृपति दै आन । नैन चितवत फिर मुक्कौ ॥ घंचन पष चिमनिय । ति नर तरुनी मन 'लग्गा ॥ रन रावत जिम रेह । सूर भंगन ग्रह नग्गा ॥ छं० ॥ १७ ॥ हंसावती का सखियों सहित मंडप में आना। चौपाई॥ सत संग किन्न अवंत अली। नंषत बर अचित पाय चलि ॥ पिय तन देषि रूप रस सानि। पंषि मनौ नव पंजर आनि ॥ छं० ॥ १९८॥ पृथ्वीराज का हंसावती का सौन्दर्य देख कर प्रकुलित होना। कवित्त ॥ बंदि सु वर चहुआन । मंझ ग्रह काज सु लिन्नौ ॥ बाल रूप अवलोकि । महुर महुरं रस पि नौ ॥ द्रिग सौं द्रिग संमुहे। पीय उमगे द्रिग पोरन ॥ सो अोपम प्रथिराज । चंद ज्यौं चंद चकोरन ॥ नव भमर पिठ्ठ वर कमल में । कै मकरंद झ लावहौं ॥ आनंद उगति मंगल अभिष । सो कवि बरनन गावहीं ॥छं०॥१८॥ पृथ्वीराज का हंसावती के साथ गठवन्धन होना । दूहा ॥ बर अंचल सोमेस चित । बंधि बौर बर नारि ॥ देवक्रम दुज क्रम कहौ । सो बर बौर कुआरि ॥ छं० ॥ २० ॥ संहावती के अंग प्रत्यंग में काम की अलौकिक लालिमा का वर्णन। ॥ (१) ए. कृ. को.-भग्गा मग्गा । (२) ए. कृ. को.-पिय । ( ३ ) मो.-मानी ।

छत्तीसवां समय ३७ ] पृथ्वीराजरासो। कवित्त ॥ बैनि नाग लुट्टयौ । बदन ससि राका लुयौ ॥ नैन पदम पंषुरिय । कुंभ कुच नारिंग छुट्यौ ॥ मधि भाग प्रथिराज। हंस गति 'सारंग मत्ती॥ जंघ रंभ बिपरीत । कंठ कोकिल रस मत्ती ॥ अहि लियौ साज चंपक बरन । दसन बीज दुज नास बर ॥ सेना समग्र एकत करिय । काम राज जीतन सुधर ॥ई०॥२०१॥ दूहा ॥ कवि लघु लघु बत्ती कही । उकति चंद नन छेव ॥ मनों जनक बंदन कवन । जानु कि बंदै देव ॥ छं० ॥ २०२॥ इसी समय दिल्ली पर मुसलमान सेना का आक्रमण करना और ५० सामंतों का उस आक्रमण को रोकना । कवित्त ॥ चडिग सब सामंत । चूक सव सेन सु दिष्षिय ॥ षट दस बर सामंत । मरन केवल मन लिष्षिय ॥ पंत निसुरत्ति समूह । जूह दैवान सु धाइय ॥ मार मार उचरंत । मार कहि समर सु साइय॥ इत उतह सब सामंत रजि । तिन अरि तन तिन बर करिय । मानव न नाग दिन आइ जुध । सुबर जुद्ध रत्ती करिय ॥ छं० ॥ २०३ ॥ पृथ्वीराज के सामंतों और मुसलमान सेना का युद्ध वर्णन। रसावला ॥ सूर सम्ह परे, सेन भग्गे लरे । काफर विड्ड रे, लोह मच्ची झरे॥ छं० ॥२०४॥ पारसं तं फिर, सूर हक्क करं । कढियं पंजरं, नंष्षि लोहं करं॥ छ. ॥ २०५॥ तूर बथ्य परं, मोह मोह परं। कूक बज्जी घरं, लोह वडप्फर ॥ छं० ॥ २०६॥ । (१) ए. कृ. को. सारद । (२) मो.-जापन । * यद्यपि यहां पर दिल्ली का कोई जिक्र नहीं है परंतु यह बात आगे छ० २२० में खुलती है । (३) ए. कृ. को.-उचंत,उच्चंत ।

पृथ्वीराजरासो। [ छतीसवां समय ३८ अग्ग उड्डौ झर, बौर बाजं ढरं। श्रोन रतं 'धरं, अंत आलुभारं॥ छं० ॥ २०७॥ सूर जा उच्चरं, रारि उग्म जरं। लज्ज पब्ब परं, लोह लोहं कर। छं॥२०८॥ बास साजं भरं, रैनि अबी बरं। बाज कुट्टीझरं, पान मारा भरें। छं० ॥२०६॥ ढाह मौरं धरं, माझ रोसं रं। सानि सामं नरं, घाइ घुम्म घरं । छं० ॥ २१० ॥ दूहा ॥ कह बंध मझझै रह्यौ । रहे सु जैत कु पार ॥ है मुकिव सामंत गौ । उप्पर मेर पहार ॥ छं० ॥ २११ ॥ दूसरे दिवस प्रातः काल सुरतान खां का आक्रमण करना। कवित्त ॥ प्रात पान सुरतान । सेन 'बंधी अहसारौ ॥ बर सोभै कविचंद । चंद अष्टमि अाकारी ॥ अर्द्ध चंद्र मह{दि । अई पुरसान पान करि ॥ मध्य भाग रुस्तम्म । सेन षुरसान जित्ति वरि। दल धरकि भरकि सिप्पर लई । अरुन दौय उदिम सुभर ॥ चित्रंग राइ रावर समर । चढि मंग्यौ 'बंधव अमर ॥छं०॥२१२ ॥ हिन्दू मुसलमान दोनों सेनाओं की चढ़ाई के समय की शोभा वर्णन । घोटक ॥ सारंग चढ्यौ कविचंद भने । रन नंकिय बौर नफेरि घनं ॥ छननंकहि घंटन घंटन की। तन नंकहि भरि भयंटन की। छ० ॥ २१३॥ 'घन कहि घुघ्घर पष्प रन । उननंकहि आइ प्रसद्द घनं ॥ "बर चिक्किय चक्कि मिले पलटे । दिषि घुघ्घुर रेनिय अस्स घटे छं० ॥ २१४॥ (१) मो.-भरं । (२) मो.-बन्धे । ( ३ ) ए. कृ. को. बर । (४) ए. कृ. को. बंध्यौ । (५) ए. कृ. को.-"वर चक्किय"।

छतीसवां समय ३९] पृथ्वीराजरासो १०६१. तमके तम तेज पहार उठे। बहुरे किधु पावस अभ्भ बुठे ॥ कविचंद सु अंसुय 'साव धरे। चय नेत्त जु गंग समौर घरे ॥ छं० ॥ २१५॥ दोउ दौन अनंदिय तेग छुटौ । सु बनै चहुआनय सार टटौ ॥ छं० ॥ २१६॥ तब तक पृथ्वीराज का भी युद्ध के लिये तैयार होना। दूहा ॥ उठ्ठि ढाल चहुबान बर । बढ़ि अवाज परवान । सुनि बरनी सों रत्त तिन । सत छुट्टे बर थान ॥ छं० ॥ २१७ ॥ थोड़ी ही देर युद्ध होने पीछे मुसलमान सेना के पैर उखड़ गए। कवित्त ॥ धुअ मुष रावर समर । पान निसुरत्ति घेत तजि ॥ घरी अड्व बजि लोह । सबै चतुरंग सेन भजि ॥ जुद्ध कंध कुल नास । पान निसुरत्ति अहुट्टे ॥ चामर छच रषत्त । तषत है वै बर लुढे ॥ प्रथिराज बीर रावर समर । मिलि निषित्र पति ग्रहन गिरि । धर लज्जि लज्जि आठ पति । तीन वार अग गिरि ॥छ०॥२१८॥ युद्ध के अन्त में लूट में एक लाख का असवान हाथ लगना और पीरोज खां का मारा जाना। जीत लियौ चतुरंग । चारु चतुरंग समोरौ ॥ "एक लष्प प्रम्मान । ढाल गोरी ढंढोरी॥ पां पिरोज परि षेत । षेत को का उप्पारौं ॥ समर सिंघ रावर । नरिंद भोरी करि डारी ॥ बजे निसान जयपत्त के । बिन सुरतानै लुट्टि दल ॥ २१६ ॥ नौसान नद्द उनमद्द के। चामर छत्र रषत्त तल " ए. कृ. को.-नछित्र। ष्षर प्रमांन। (१) मो. साच । ( २ ) मो.-नेत्र । (. ४ ) मो.-" एक लष्प पम्मर प्रमांन" ए. कृ. को.-एक ला ५) मो.-"विन सुरतान सु लुहि छल " ।

.१०६२ पृथ्वीराजरासो। [ छतीसवां समय ४ पृथ्वीराज का सब सामन्तों को हृदय से लगा कर कहना कि मैं आपका बहुत ही अनुगृहीत हूं। मिले आइ चहुआन । सब्ब सामंतन मन्ने ॥ उच्च भाव आदर सु । दीन उर चपि सु लिन्न । नैन चैन नन बैन । हीन सुषन्न कढ़ि दोज ॥ बर समान तुम राज । तेग राजन विधि कोज ॥ रष्ययौ गाम रतिवाह दै। तुम कंधे ढिल्लो नयर ॥ चिचंग राव रावर समर । 'पाघ सौस बंधी अमर ॥छं०॥२२०॥ पृथ्वीराज का रावल समर सिंह के पौत्र कुंभा जी को संभर की जागीर का पट्टा लिखना। दूह ॥ तेजसिंह सुत समरसौ । तिह सुत कुंभ नरेस ॥ संभरि संभरि वार दै। दौहित्तौ सोमेस ॥ छ० ॥ २२१ ॥ समर सिंह का उस पट्टे को अस्वीकार कर लौटा देना। कवित्त ।। तब चित्रंग नरेस । विझवि नंध्यौ बर पढौ । तुम ढूंढा कुल ढुंढ । सु मनि ऐसौ मति ठट्टौ । हथ्थ नौच करतार । हथ्थ उप्पर गजत्त गुर ॥ हम आहुट्ट मझामि । स्वामि कहिजै सु'उंच बर ॥ कालंक राइ कप्पन "विरुद। कुलह कलंक न लग्गयौ ॥ दग्यौ न हाथ चित्तौर पति । हम जगत्त सब दग्गयौ ॥छ ॥२२॥ कृ. पाय। २) २२१ की प्रथम पंक्ति का पाठ ए. कृ. को.-तीनों प्रतियों में समान है जिसका समरसी का पुत्र तेजसी तिसका पुत्र कुम्भकरन जो कि पृथ्वीराज का भांजा था किन्तु मो. प्रांत में तेज सिंह चित्रंग सुत नाम धरिग भर वेष" पाठ है, इससे उक्त अर्थ में अर्थ होता भेद पड़ता है। ( ३ ) मो.-नारिंद । (६) कृ.-चीतौर । (४) मो.-चंद । (१) ए. क. को.- बिरद्ध ।

छतीसवां समय ४१] पृथ्वीराजरासो। १०६३ समर सिंह का चित्तौर जाना । दूह ॥ ग्रेह गयौ चिचंग पति । गौ ढिल्लिय वप छेह ॥ मास बौय बित्ते वपति । मतौ मंडि बप एह ॥ छं० ॥ २२३॥ पृथ्वीराज का हंसावती के प्रेम में मस्त हो जाना । विमल विलोकन कोक रस । सोक हरन सुष सत्त ॥ समुष हंस प्रभु नौलग्रभ । विभ्रम वर द्रिग मत्त ॥ छं० ॥ २२४ ॥ हंसावती के प्रथम समागम का वर्णन । भुजंगी ॥ दिगं मंत्र मंत्र सुमंत्र प्रमानं। वियं केलि करनी विधानं सुजान। निजं नेह नौलं सु कौलं कलानं । मुषं मूल बिप्प सु देवं सधानं ॥ छं० ॥ २२५॥ मयं मोह मंडं सु बंदीन दानं । हयं हेम हड्ड पताका सु थानं ॥ 'सु अंषं च सोभा स सोभा स मंत्र। 'छयं छंद जोतीय संसाइ तंत्र। छं० ॥ २२६ ॥ पियं पेम तंत्र सु कतं सु थानं । सुराया बिहंगं सु पुत्री प्रमानं ॥ लियं ग्रह सज्ज्या प्रथमं अलौनं । मनों मत्त मातंग बिध्यौ कलौना छं० ॥ २२७॥ बच अंकुसं हेट हेटं चलावै । दुरै देषि जालंतरे फेरि नावै छुट्यौ सैसवं लज्ज ते प्रेम आसं । फिरे जानि बाला तनं प्रेम पास। छं० ॥ २२८॥ सया हंस हंसावती नौल थाहं। कवी केलि कंठे थकी सच्च स्याह॥ उरं अंत घोरं विवाहं विरोरं । कला केलि बढी विहानं सजोरं ॥ छं० ॥ २२६ ॥ दनौ देव ज्यौं आनि सद्दान सेजं । सदा स्वंद घेदं हुौ प्रात हेज॥ ॥ छं० ॥ २३० ॥ .... .... (१) कृ. को. सुयं । (३) मो.-बन्धे । (२) मो.. " छय दुत्तिय छंन्द छम्माय. तंत्रं ।

१०६४ पृथ्वीराजरासो। [छतीसवां समय ४२ मुग्धा हंसावती की कोक कला में पृथ्वीराज का मुग्ध हो कर कामान्ध वृषभ की नाई मस्त होना। * कवित्त ॥ अगह गहन रमि रमन । रवन रमि रवन सु छुट्टिय ॥ दहिय वदन सहि रहिय । सरस रस सौर सु लुट्टिय ॥ महिय लहिय नहिं नहिय। 'हइय हय हयइ यथा 'हह ॥ सहिय सेज कह कहिय । चंषि चिंचनिय सन्न थह ॥ कामंध अंध मुद्दह वृषभ । भमन भ्रमावह तिलक सन ॥ इह अर्थ सर्थ जानन सु गह । अगह मुमदन मन हसन॥ई०॥२३१॥ हंसावती के मन का पृथ्वीराज के प्रेम में निर्मल चन्द्रमा की भांति प्रफुल्लित हो जाना। दूहा ॥ मन हिय वृत्तन मुगधनिय । रमि राजन निय नेह ॥ नमिय निसा कर मग रथिय । निसि विम्मल दिय छेह ॥छं॥२३२॥ शनै शनैः हंसावती के डर और लज्जा का हास होना और उसकी कामेच्छा का बढ़ना। छंद कमंध ॥ विम्मली नेह नासा । दिष्ट एन लग्गी सु वासा ॥ छेहंग कामी रसा। संचान भग्गी बसा ॥ छं० ॥ २३३ ॥ हंसावतो संकुची। दासौ प्रौति संवचौ ॥ + पुस्तका पढ़ि विस्तरौ। कथा गाथा प्रेम बिस्तरौ॥छं०॥२३४॥ दंत कंडक निस्तरी । हास विलास सुस्तरी ॥ छं० ॥ २३५ ॥ हंसावती के बढ़ते हुए प्रेम रूपी चद्रमा को देख कर पृथ्वीराज हृदय समुद्र का उमड़ना। काव्य ॥ गगन सरस हसं स्याम लोक प्रदीपं । सस सज बंधू चक्रवाकोपि कौरा ॥ के * यह छन्द मो.-प्रति में नहीं है। (१) को.-सवद । (२) ए.- हरय। ( ३ ) को.हय । ( ४ ) मो.-मग्गथिय । + इस छन्द का पाठ चारों प्रतियों में उलट पलट है। (५) मो.-समं ससं।

छतीसवां समय ४३] पृथ्वीराजरासो। १०६५ । तिमिरगजम्रगेद्र चन्द्रकातंप्रमाथी। विकसि अरुन प्राची भास्करं तं नमामौ ॥ छं० ॥ २३६ ॥ अमृतमय शरीरं सागरा नंद हेतुं । कुमुद बन विकासौ रोहीणी जीव तेसं ॥ मनसिज नस बंधु र्माननौमानमहौं । रमति रज निरमनं चंद्रमा तं नमामी ॥ छं० ॥ २३७ ॥ दिवस के समय रात्रि को पृथ्वीराज से मिलने के लिये हंसावती ऐसी व्याकुल रहती जैसी चकोर चन्द्र के लिये मुरिल ॥ बछय चंद चकोरत राजन । 'हसनि हंस उदै भयौ साजन ॥ बिहु निसि नेह निसाकर बढिय । कनक जेम कसि कर 'आहुट्टिय॥ छं० ॥ २३८॥ गाथा ॥ उवनि फलनी फंदा। विसनी पत्त वलाकरे हथ्थ ॥ मरकति मनि भाजन्न । परठियं पहुप सु तौयं ॥ छं० ॥ २३६ ॥ पावस का अन्त होने पर शरद का आगम और शीत का बढ़ना। झिल्ली भिंगुर खरौ । गायन पुत्रीय ललित लुभ्भरियं ॥ पहुकिय पंष 'सु हासं । झलकिय सौताइ मदं मंदाइ ॥छ॥२४॥ किय मंडि स पुक्करियं । मैनं राइ सिरीय बंधायं ॥ पर दार चौर साही । पुकारे जाहु रे जाह ॥ छं० ॥ २४१ ॥ शीत काल की बढ़ती हुई रात्रि के साथ दंपति में प्रेम बढ़ना। पंपट करि करतारं। हंसा सयनेव हंस सह पायं ॥ निसि बड्डय अंकुरियं । कुकडयं कंठ कल्लायं ॥ छं० ॥ २४२॥ अचलौय नेह ससौ हर । रसनह रंगी सुरंगयं देह ॥ उवकंठय संदेसं । गावै एकतं चित्त सलाई॥ छं० ॥ २४३ ॥ ( १ ) ए. कृ. को.-हसति, हंसति । (२) ए.-आहुठिय। (३) ए. कृ. को.-सहासं । ( ४ ) मो.-कठक । (५) ए. कृ. को.-"अबलिय नेह से सहिए"। (६ ) ए. कृ. को.-रसरह ।

पृथ्वीराजरासो। [छतासवां समय १४ में हे मौनं करि कोकिलयं । जलधर सम एह कंठ 'उचत ॥ बिकसित कर जल बंदे। विकसित रमे कोक सावासी ॥ छं० ॥२४४॥ संग्राम गए सूरौ संपगे। होइ चंद्रोदर ॥ विविधा काम तौयं । अवसर रत्त काम लभभाई॥ छं० ॥ २४५ ॥ गाहा नक्किय तत्तौ । सदानं नूपुरं उरवा ॥ "जिह अंकुर पब्वितं । भूतं जुथ्थांइ मंग भंगुरयं ॥ छं० ॥ २४६ ॥ जोई छविना वेनं । रचया सि महिला न रूप महु कमले ॥ तां नंचिय सु बियोगे। निमहं मुत्तंच जुग जुग्गाए ॥छ०॥२४७॥ हंसावती पृथ्वीराज की और पृथ्वीराज हंसावती की चाह अहिर्निसि मस्त रहते थे। पौय आरंभत चिययं । चिय प्रारंभ कंतं "चित्तायं ॥ सो तिय पिय पिय पतौ। मा पिमं विदमं धामं ॥ छं० ॥२४८॥ अजा "सन्न जो होजा । कंठायं पयो हरं फलयं ॥ दोहंते सय लष्ष। हसनं रस नाय स बकियं होई॥ छं०॥२४८॥ * जोती अहर सहाऔ । उचसिया कौल कंतायं ॥ सो तिय अग्ग सुहाई। दिस असनी रसं नायं ॥ छं० ॥ २५० ॥ कवित्त ॥ रयनि पंच संकुलित । पंच लज्जित दुरि लोइन ॥ भिरत उभय भिरि घग्ग । मग लग्गिय जुर जोइन 'मिलत चतुर इक रौय । अतुर ग्रह ग्रहं ददुर बल ॥ कमल कमल मंडिय सु चित्त । नष अष °बष्य बल ॥ आरति सोइ दइता विछुरि । पार''समुद्र न नेह लहि ॥ इय प्रात पतित प्रथम पहु । नवति चित्त आचंभ लहि ॥छ०॥२५१॥ इस समय की कथा का अंतिम परिणाम वर्णन । (१) ए. कृ. को.-उंचती । (२) ए.-संष । ( ३ ) ए. कृ. को.-कान । ( ४ ) ए. कृ. को. "निद अंकुरं र वित्त" । (५) ए. कृ. को.-वितायं । (६ ) मो.-बंदयं । (७) ए. कृ. को.-सान। * यह छंद ए. कृ. को.-तीनों प्रतियों में नहीं है। (८) मो.-माचित । (९) ए. कृ. को.-दुदुर । (१०) मो.-चप्ष । ( ११ ) मो.-समुद्रिन ।

छत्तीमवां समय ४५] पृथ्वीगजरासो। १०६७ कवित्त ॥ हंसराइ ' हंसनिय । पानि ग्रहनी ग्रह हल्लिय ॥ मालव द्रुग्ग देवास । वास मुद्दत नव वल्लिय ॥ हय गय धुर धर धम्म । क्रम्म कित्ती अति दानह ॥ ता पाछे रनथंभ । प्रौति षौची चौहानह ॥ चित्रंग राइ रावर रमिय । देव राज जद्दव वहिय ॥ वित्तिय वसंत रिति अम्भरिय । अचल एक कित्ती रहिय छं॥२५२॥ समर सिंह जी और पृथ्वीराज की अवस्था वर्णन । दूहा ॥ वत्त कवित्त उगाह करि । चंद छंद कविचंद ॥ समर अठारह बरष दस । दिवस त्रिपंच रविंद ॥ छं० ॥ २५३ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराज रासके हंसावती विवाह नाम छत्तीसमो प्रस्तावः संपूर्णम् ॥ ३६ ॥ (१) ए..संसनिय । (३) ए. कृ. को. बेदराज । ( २ ) मो.-वास मुहंत नबल्लिय । ( ४ ) मो.-कवि छंद ।

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अथ पहाड़राय सम्यो लिष्यते । (सैंतीसवां समय ।) कविचंद की स्त्री का पूछना कि पहाड़राय तोअर ने शहाबुद्दीन को किस प्रकार पकड़ा। दूहा ॥ दुज सम दुजो सु उच्चरिय । ससि निसि उज्जल देस ॥ किम तूंअर पाहार पहु । गहिय सु असुर नरेस ॥ छं० ॥ १ ॥ शहाबुद्दीन का तत्तार खां से पूछना कि पृथ्वीराज का क्या हाल है। कवित्त ॥ संवत सर च्यालौस । मास मधु पष्प धम्मधुर ॥ बनिय दौह अहरुन्न । उदित रवि व्यंब बरन तर ॥ अलिय बाल आलोल। गरुन 'गज्जे विसम्म गन ॥ रस रसाल मंजरि । तमाल पल्लव कमल्ल मन ॥ साहाब दौन सुरतान भर। आनि हार ठवौ सु बर ॥ अष्य ततार षुरसान पां। कहा पबरि चहुआन घर ॥ छं०॥२॥ तत्तार खां का उत्तर देना। गाथा ॥ उच्चरि षान ततारं । अरि वरजोर अतर अत्तारं ॥ सामंत सूर सभारं। मत्त अमित समित जमकारं॥ छं० ॥३॥ शहाबुद्दीन का पृथ्वीराज पर चढ़ाई करने की सलाह करना। भुजंगी ॥ कहै साह साहाब तत्तारषानं । रचौ मंडली मंडि दीवान थानं ॥ (१) मो. गज्ज । (२) २. कृ. को.-विसंग मन ।

११०० पृथ्वीराजरासो। [ मैंतीसवां समय २ अरौ 'षान दिष्यौ बरं आसमानं । करौ कूच सेना प्रकासंत भानं ॥ छं० ॥ ४॥ दलं लष्प तीनं गजं बाज पूरं। तिनं तेज तोनं करं कित्ति सूरं ॥ अनंहद्द नौसान नहे कि नूरं । नचे भूत बैताल मत्त मदरं ॥ छं० ॥ ५॥ हलाहम्म झंकार हुंकार झारौ। तुटै तेक तानं झर ढुमि धारौ ॥ करै सेन मग नचै जोगमाया। घनं निंदरे चोर नंचै न छाया ॥ छं० ॥६॥ सुरं सिंदनं. सोभ सा भानं लोलं । सजे. सेन राजौ रसालं सदोलं ॥ रच रंभ रंभा विमानं विमानं । जयं सह देवी 'दिमानं दिमानं॥ छं॥७॥ मनों साल भंजौक तेज प्रकार। रचौ. स्वामि संची रची मंडिरारं॥ एजं धूमरं सेत पीतं सुरंगे । रितं राज अग्ग मन फूलि 'दंगे ॥ छं० ॥८॥ असं बेस कंपी ढुरौ चौर मज्जौ । चढ़े काम फजरं पतौ पौत सज्जौ॥ निहारं विहारं उपं हार हारं । बरें अग्रसेना मध व्रत्त पारं॥ छं० ॥६॥ रचे तुंड तुंगं तियं एक नैनं । सजे ताल वैताल सिंदू सवैनं ॥ बनै अच्छरौ कच्छि विम्मान गैनं । पतं जुग्गिनी पानि इच्छंत रैनं ॥ छ. ॥१०॥ नचे रंग नारह मंडै अनूपं । चमू च्यारि भारं भरं सहि रुपं ॥ अनौ कोर आकार आकत्ति नूपं । बढ़ी भाग पथ्थी पथो उंच ओप॥ छं० ॥ ११ ॥ को.-पान । (१) एक. .. (२) मो.-करी कूच सेनाइ सासंत भानं । (३) ए. कृ. को.-विमानं विमानं । (४ ) मो.-हंगे । ( ५ ) मो.-आत।

मैंतीसवां समय ३] पृथ्वीराजरासो। ११०१ मही मंडि माया रहै लोपि मालं। षिले 'षग्ग अग्गबलं बोलि तान्न। नवं नद नौसान भेरी भयानं । मनों मेघ गज्जे कयानं पयानं ॥ छं० ॥ १२॥ दूसरे दिन गजनी राजमहल के दरवाजे पर सहस्रों मुसलमान सेना का सज कर इकट्ठा होना। दूहा ॥ "तब ततार षुरसान षां । सुनौ साह साहाब ॥ अरि अभंग दल सक रस । अमित तेज बल आब ॥ छं० ॥ ॥ १३॥ अरुन बरुन उहित अरुन । बढ़ि प्राचौ रुचि "रुप ॥ मेच्छ सामि चढ़ि सेत अस । रन दिल्ली सम भूप ॥ छं० ॥ १४ ॥ समस्त सेना का दस कोस पूर्व को बढ़ कर पड़ाव डालना। कवित्त ॥ अरुन कोर बर अरुन । बंदि साहाब साहि चढ़ि ॥ दिसि प्राची दष्पिन 'विपथ्य । पच्छिम उत्तर बढ़ि ॥ सेस भाग भै भाग । भोमि संकुचि कुकंपि निल ॥ गमन सेन उड़ि रेन । गेंन रवि पत्त धुंध इल ॥ दस कोस थान दल उत्तरिग । घन अवाज घर रिपु परिग ॥ गत मेच्छ मंडि मंडल सुमति । गति सु जंग अग्गर धरिग ॥छ०॥१५॥ दूहा ॥ रत निसान डग मग अरुन । जिम दीपक बसि बात ॥ सुनिव चंप अति साह मन । तन विकंप अकुलात ॥ छं० ॥ १६॥ अरिल्ल ॥ मिले मेच्छ मंडल भर भौरं। अतुलित पान पान संधौरं॥ उठत बयन अप अप्प समौरं। साहि बढ़ौ थिर कर कंठीरं॥छ०॥१७ शहाबुद्दीन की आज्ञानुसार दीवान खास में गोष्ठी के लिये उपस्थित हुए सदस्य योद्धाओं के नाम । (१) मो.-पग्ग । (२) ए. कृ. को. भेभी । ( ४ ) ए. कृ. को.-तवि । (५) ए. कृ. को.-रूपि । (७) मो.-रचि । (८) मो.-परिय । ( ३ ) मो.-पयानं कयानं । (६ ) मो.-विथ । (९) ए. कृ. को.-थटौ थछौ ।

११०२ पृथ्वीराजरासो। [सैंतीसवां ममय हनूफाल ॥ घम घम्म बज्जि निसान । चढ़ि सेन कंपि दिसान ॥ पहु और कोरति भान । भर मंडि साहि दिवान ॥ छं० ॥ १८ ॥ बर मंत्र पान ततार । जुरि जुव सेन करार ॥ . पुरसान रुस्तम पान । 'बाजिंद मौर प्रमान ॥ छं० ॥ १६ ॥ मनसूर सेर हुजाब । जिन दान पग जम आब ॥ महमंद कम्मन काल । तिन तेज अरि भै चाल ॥ छं० ॥ २० ॥ मन ज्यद जम्मन धौर । तेजर्म पान गँभौर ॥ बेहद्द पान जिहान । निसुरत्ति आजम मान ॥ छं० ॥ २१ ॥ ममरेज से रनसिंघ । भजि जात तिन अरिभंग ॥ मुलतान पान मसद्द । भारथ्य पान सुहद्द ॥ छं० ॥२२॥ आमोद जाजन पौन । तिन हकि अरि तन छोन ॥ आषेट आतस मौर। सारुफ सेर गँभौर ॥ छं० ॥२३॥ सुरतान मंडि दिवान । बर मंत्र करि परमान । ॥ छं ॥ २४ ॥ सभा में तत्तार खां का नियमित कार्य के लिये प्रस्ताव करना। दूहा ॥ मिले मौर भर पान सब । रचि दिवान दरबार ॥ मंड मसूरत्ति मत्त बर । तब पुरसान ततार ॥ छं० ॥ २५ ॥ वितंड खां का सगर्व अपना पराक्रम कहना। कवित्त ॥ मौरपान से रनवितंड। हक्किय हकारिय ॥ सनमुष साहि सहाब । बोलि बह बह बकारिय ॥ हनों सेन हिँदवान । ऐन चहुानह संधौं । अरि अरिन्न अरि भौर । हकि हक्कों पग पंधों ॥ (१) मो.-वाजीद । ( ३ ) ए. संझि, कृ.-मांझि । (२) ए. महमूंद । (४) ए. कृ. को. बन्धौं ।

सैंतीसवां समय ५] पृथ्वीराजरासो। गज बाज साजि जथल पथल । घल अंदुन भंजौं भरन ॥ भुभाष भिस्त मंकोद रन । कै घोरह जीवन धरन ॥छं०॥२६॥ खुरसान खां का राजनीति कथन । पदरी ॥ षुरसान पान कहि सुनि ततार । संचौ सु बत्त जंपौ सु ढार ॥ दल जोर तेज हिंदू अकार । बर मंत्र सेन रष्यौ विषार ॥ छं० ॥२०॥ बुल्ल्यौ वितंड काली तमंकि । तम छतें जुड़ 'किम साह संकि ॥ संग्रहौ सेनपति हिंदुराज । बंधों अपारि पल घग्ग बाज ॥छं०॥२८॥ निसुरत्ति मौर जंपै सु तब । तम हसे साह किन्नै न ग्रब ॥ ॥ छं० ॥२६॥ दूहा ॥ रावन अब्ब विनाश रज । एन सौस हयबौर ॥ अप्पा कोनन उच्छयौ । कालू से रनमौर ॥ छं० ॥ ३० ॥ पडरौ ॥ पुनि अष्षि साहि निसुरत्ति बन । सुरतान भान भरकान "नैन कुहि बाज तेन चालत पब । भौषंग कपि है अब सब ॥छ॥३१॥ राई सुमेर करते न बार। अल्लह सुआल ऐसौ विचारि ॥ बिन साह तेज बढे सु ग्रह । इष्य न ताहि अल्लह अदब ॥छं०॥३२॥ मनो न संक चहुआन सूर । बधव सुमंत्र भर मंत्र बेल विलाइ नदि बंधि वारि । बिन सेन कंक चहुबान च्यारि ॥ छं० ॥ ३३ ॥ * हिंदू सहस्स दस सामसंद । दल गैन लेस तन तेक कंद ॥ बुल्लाइ बैनपति समर मंड । बचे विचार सु विहान चंड ॥ छं० ३४॥ बादशाह का (लोरक राय ) खत्री को पत्र देकर धर्मायन के पास दिल्ली भेजना। पूर ( १ ) ए. कृ. को.-सरन । (२) ए. कृ. को.-घोराहि । (३) ए. कृ. को.-विचार । ( ४ ) मो. क्यों। (५) मो.-दैन । (६) ए. क.-अलहस्सुआल । * ए. कृ. को.- "हिन्दु सु हह तोमेस नंद । लग्गे न लेस तन तेक कंद"। ।

११०४ [ सैंतीसवां. समय ६ पृथ्वीराजगसो। ॥३५॥ गाथा ॥ 'बुल्लि सु दूत हजूरं । मंडे पत्रीय बौर पचायं ॥ अष्पित पान प्रमानं । कथ्थी गाथाय सूर चहुवानं ॥छं० दूहा ॥ बोलि दूत चव निकट लिय । दिय सु पच तिन हथ्थ ॥ कही जाइ धम्मान सों । सजि चहुआन समथ्य ॥ छं० ॥ ३६ ॥ दूत का दिल्ली को जाना और इधर चढ़ाई के लिये तैयारी होना। गाथा ॥ निज के वौसा रुढं । वर साहाब दिल्लीय ग्रासं ॥ बरति मंत्र मष किन्न । गज्जीय मह भद्द नौसानं ॥ छं० ॥ ३७॥ दूहा ॥ गए दूत चलि निकट चव । करि सलाम बर साहि ॥ पुर डंकिन कंकन सजन । बलि आतुर बर ताह ॥ छं० ॥ ३८ ॥ दूत का दिल्ली पहुंचना। स्याम पष्य पूरन क्रमिग । पहु जुग्गिनपुर नैर दिय कग्गर भ्रम्मान कर । बर मिम्म रिन बैरं ॥ छं० ॥ ३ ॥ दूत का धर्मायन से मिलना । गाथा ॥ दिय पत्री धम्मानं । पानं गहि पाइ नाइ बर मथ्यौं । भर चौहान समथ्यं । सज्जौ सम साह कज्जयं वैरं ॥ छं० ॥ ४० ॥ धर्मायन का पत्र पढ़ कर बादशाह के मत पर शोक करना। दूहा ॥ कायथ कागर वंचि कर । हायथ "हाय सु कोय ॥ साहि काल सुम्भर सभर । आय पहुंच्यौ दौय ॥ छं० । ४१ ॥ धर्मायन का दरवार में जा कर यह पत्री, कैमास को देना। बचनिका ॥ पत्रौ ध्रम्मन बाचि के देहु। बहुरि दरबार गण्हु ॥ कै मास को तसलीम कौनौ । पत्रौ सु हाथ दीनौ ॥ छं० ॥ ४२ ॥ ॥ (१) ए. कृ. बुल्लवि। (४) ए. कृ. को.-मंगे। (३) मो.-पथ्यः । (२) मो.-साह । (५) ए. को. हीय । *.

मैंतीसवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो। ११०५ शहाबुद्दीन की पत्री का लेख । चौपाई ॥ हम तुम घरतें सौगंध कौनौ । नाते धम्म दुद्ध हैं चौन्तौ ॥ दानव देव आदि भी लग्ग । तातें बैर पुरातन जग्गे ॥ छं० ॥४३॥ ज्यों ज्यों हम तुम बजिहैं धार । त्यौं त्यौं सुकवि गाइहैं सार ॥ अमर नाम साहिब का मांचा । पानी पिंड घेह का कांचा ॥छं०॥४४॥ हम तुम में वंध्या अहंकार । मरदां धम्म पुरातन धार ॥ मरदा अलि भारथ्या वेतौ । मरद मरै तब निपजै षेतौ ॥ छं० ॥४५॥ दूहा ॥ मरदां षेतौ घग मरन। अथ्यि समप्पन हथ्थ ॥ सो सच्चा कच्चा अवर । कोइ दिन रहै सु कथ्य ॥ छं० ॥ ४६ ॥ कथा रही पैगंबरा । अरु भारथ्य पुरान ॥ तातें हठ हजरत्ति है। सुनौ राज चहुबान ॥ छं० ॥ ४७ ॥ धर्मायन का कैमास के हाथ में पत्र देना । दिय पत्री इह कहि सु कर। करि सलाम तिय बार ॥ साहिब तुम सन लरन कौ। आयो सिंधु उतार ॥ छं० ॥४८॥ कैमास का पत्र पढ़ कर सुनाना। सुनि मंत्री नृप अष्षि सम । बंचि पत्र तिन बार ॥ कंच कुंच घंधार पति । आयो सिंधु उतार ॥ छं० ॥ ४६॥ पत्री सुनकर पृथ्वीराज का सामंतों की सभा करना। सुनि पचौ चहुबान ने । सम सामंतन राज ॥ बात परठिय सब भरन । अप्प अप्य भरसाज ॥ छं० ॥ ५० ॥ पृथ्वीराज का उक्त पत्री का मर्म सब सामंतों को समझाना। कवित्त ॥ कहै राज प्रथिराज । सुनौ सामंत सूर भर ॥ गज्जनेस चतुरथ्य । विरथ आयौ सु अप्प पर ॥ साज बाज मय मत्त । घग्ग बर भर उम्भारिय॥ (१) ए. कृ. को.- लग्गो। (२) ए. को.-धारें। (३) ए.-हथि । ( ४ ) मो.-बल । (५) ए. क. को.-सुर ।

१९०६ पृथ्वीराजरासो। [ सैतीसवां समय ८ उतरि वेग नदि सिंधु । सुनिय धुनि अर उत्तारिय ॥ सज्जौ समथ्य सामंत सब । संमर चावर डंब रन ॥ सुरतान खान खुरसानपति । दल बद्दल पावस परन ॥छ०॥५१॥ सामंतों का उत्तर देना। तमकि राज प्रथिराज। कहै समंत सूर भर ॥ चाहुान समरथ्थ । पथ्थ भारथ्य चारु चर ॥ सिंधु साह गज गाह । घग्ग पंडौ पल पित्तह ॥ कर अंजुलि रिषि अस्ति । चंद अचवन दल कित्तह । हर हार सार संमुष समर । अमर मोह जग्यौ अमर ॥ ज्यों मान व्योम आरुढ धरि । बनौ चमू चौसर चमर ॥छं०॥५२॥ पृथ्वीराज का पच्चीस हजार सेना के साथ आगे बढ़ना। अरिल्ल ॥ चढ्यौ गज प्रथिराज सु राजन । 'पाव लष्य दल बल गज बाजन॥ चामर छत्र रषत्त निसानं । मनुं घनघोर दिसान दिसानं ॥ छं० ॥ ५३॥ कूच के समय सेना की शोभा और उसका आतंक वर्णन । चोटक ॥ चढ़ि राज महा भर सेंन भरं । उडि षेह पुरं रुकि सूर करं ॥ बनि अच्छरि चच्छरि चारु बरं। किल कौतिग भूत बेताल वरं॥ छं० ॥ ५४॥ मुष छंद सु चंद बरं पठिय। 'मुष जुग्गिनि अंग वियौ गहियं ॥ सुर सद्द जयं जयरं कथयं । चल चंचल सूर चढ़ कसियं ॥ छं० ॥५५॥ .... .... तल ताल करालति कूक करें। दोइ अाइस दूत ससाहि दलं। तिन अष्षिय सेन निकट्ट कलं॥छं०॥५६॥ ( १ ) ए. कृ. को.-लागस्ति, अगस्त । ३) मो.-तीन फौज रच्चे गज बाजन । (५) ए.-पथयं । (२) ए. कृ. को.-ढरि । (४) ए. कृ. को.-सुख । (६) ए. कृ. को.-कोतिक ।

सैंतीसवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो। ११०७ पृथ्वीराज का पड़ाव डालना। दूहा ॥ सुनि अवाज सुरतान दल । हरषि राज प्रथिराज ॥ कोस पंच दुःअ संवचिग । हिंदुअ मेच्छ अवाज ॥ छं० ॥ ५७ ॥ अरुणोदय होते ही पृथ्वीराज का शत्रु पर आक्रमण करना उदय भान प्राची अरुन । चढ्यौ राज सजि सेन ॥ उर पातर कातर इसे । मेच्छ पौर फर सेन ॥ छं० ॥ ५८ ॥ गाथा ॥ अच्छरि कच्छिय गैनं। चैनं चवसठ्ठ गैन गोमायं ॥ हर हरषे हारायं । जुद्ध सज्जाइ दो दसा दीनं ॥ छं० ॥ ५६ ॥ हिन्दू और मुस्लमान दोनों सेनाओं का परस्पर मिलना। दूहा ॥ मिलिवि सेन अरुन सु अनौ । तनौ तनौ दुअ 'दीन ॥ असुर ससुर सज्ज सयन । दोउ बोरां रस भीन ॥ छं० ॥ ६० ॥ शहाबुद्दीन का अपने सैनिकों को उत्तेजित करना । भोटि साहि भर पान सब । पति पुच्छौ इह बत्त ॥ अरिय प्रचंड प्रचंड दल । करहु समर सक मत्त ॥ छं० ॥ ६१ ॥ सूर्योदय होते होते दोनों सेनाओं में रणवाद्य बजना और कोलाहल होना। अरिन ॥ प्रगटित भान पयानिति पूरं । वाजिग दुदभि धुनि सुर कर । चढ्यौ साहि संमर करि सूरं। अरुन बरुन मिलि तथ्य सनूरं ॥ छ० ॥६२॥ दोनों सेनाओं का एक दूसरे पर धावा करना । दूहा ॥ ढलकि ढाल बहुरंग बर । 'गुरुत मत्त गजराज ॥ झलकि नौर वपु दल चढ़िय । मनों पावस गुर राज छिं॥६॥ (१) ए. कृ. को.-जिसे । (३) ए. कृ. को.-न थूरं । (२) ए. कृ. को.-दीम । ( ४ ) मो.-"गुरतम चढ़ि गजराज" ।

१९०८ पृथ्वीराजरासो। [ सैंतीसवां समय १० दोनों सेनाओं के उत्कर्ष से मिलने की शोभा और यवन सेना का व्यूह वर्णन । भुजंगी ॥ ढलको सु ढालं, हलक्क ति 'सूरं। धमक्के धरा, नाग नौसान पूरं ॥ किलक्क सुभैरु, बजे बाज तूरं । झलक सुनेजा धरा धूम धूरं ॥ छं० ॥ ६४॥ बरक वितालं, बजै तार तालं । करै कूह कूह, जगी जोग मालं ॥ नचै सटि चार, करै राग सिंधू । वकै भूत प्रेतं, कठे तार तिंदू ॥ छ. ॥६५॥ मिली सेंन सेनं, टगौ लग्गि नेनं । वढी काल काया, चढ़ी गिद्धि गैन। भरं भौर भौरं, भिरै बौर भारं। रची अठ्ठ फौज, विचे साहि सारां। छं० ॥६६॥ मुषं अग्ग मंने, पुरासान अन्नौ । भरं चिम्मनं, पान तेयं दिठन्नी ॥ दिसं वाम मारुफ, पौरोज सज्ज । दिसा दच्छनं, चिम्मनं जम्मरज ॥ छं० ॥ ६७॥ अनी च्यारि पिठु, अनी दोइ अग्ग। गुरं गौर तारं, फरी पाइ कग्ग। जग्यौ जगं जोरं, हुऔ बौर सोरं। घनंनद नौसान, भह सघोरं ॥ छं० ॥ ६८॥ दूहा ॥ भर सहाब सज्जिय अनौ । जिवन जोर चतुरंग ॥ सुभर प्रफुल्लित वौर मुष । काइर कंपत अंग ॥ छं० ॥ ६ ॥ हिन्दू सेना की शोभा और उपस्थित युद्ध के लिये उस के अनी भाग और व्यूह वद्ध होने का वर्णन । भुजंगी ॥ चढ्यौ राज चहुआन कुप्यौ करुरं। बढ़ी बेद साषी चढ़ी जाग रूर। ढलको सुढालं सु ढालं धमक । करं कृत घग्ग सु पट्टे चमक ॥ छं० ॥ ७० ॥ (१) ए.-निसानं । ( ३ ) मो.-"धरा धूर पूरं"। (२) ए.-मेरं, कृ.-मूरं । ( ४ ) मो. गैनं ।

तीसवां समय ११] पृथ्वीराजरासो। ११०९ घनंआगमं जानि विज्ज दमक । घनघोर नौसान नादं घमक ॥ रची पंच 'सेना मधे मंद्दि राजं । गजं बाजि रोहं हथनार साज॥ छं० ॥ ७१ ॥ मुषं अग्ग कैमास चावंड सूरं । सहस्स अठं सेन गज बाजि पूरं ॥ भुजा दच्छिनं भौम कन् किवारं । सतं तथ्य सामंत सेनं सवारं॥ छं० ॥ ७२॥ दिगं वाम पंम्मार अाबू प्रईसं । चमू च्यारी सोभं भिरी आनि सौसं ॥ 'रसं रौद्र मंद्यौ घगं पंडि जोस । फिर वेक ढालं "दुरै नागरीसं ॥ छं० ॥ ७३॥ पछं जाम जाजं दलं सिंघ साजं । सय पंच पंचास संगी विराज॥ दहं तीन पंचं तथं पंच सज्ज । इलं लेष नंदं गनं गेन गज्ज ॥ छं० ॥ ७४ ॥ घमं घम्म नौसान रोसान बज्ज । सबद 'सु सङ्घ सु सिद्ध सु लज्ज॥ चढ़े मेच्छ हिंदू मिली जुद्ध अन्नी। कथौ व्यास भारथ्य सा आज वन्नी॥ छं० ॥ ७५॥ कुरं पंड बंध्यौ बधे आप अग्ग । इसे मेच्छ हिंदू भरं घग्ग लग्गे ॥ ॥ छं० ॥ ७६ ॥ दोनों सेनाओं की अनियों का परस्पर यथाक्रम युद्ध होना। दूहा ॥ जनुकि पथ्य भारथ्य भर । लगि कुर पंड प्रचंड ॥ चाहुान दल मेच्छ दल । हक्कि हय ग्गय झुंड ॥ छं० ॥ ७७ ॥ इत हिंदू उत मेच्छ दल। 'रन चढे बर धौर ।। हकि तेज असि बेग बढ़ि। लगे सुभर हर भौर ॥ छं० ॥ ७८ ॥ .... । ( १ ) मो.-फौज । (२) ए. क. को.-मधं । ( ३ ) ए. कृ. को दिसा । ( ४ ) मो.-अईस । ( ५ ) मो.-"रसं शङ्कर मडि पग पांडे जीसं"। ६) ए. कृ. को.-पंड। (७) ए. कृ. को.-ढलै, ढलैं । (८) ए. कृ. को.-मयं । (९) ए. कृ. को.-सुसज्ज । (१०) ए. कृ. को.-चल्ले चढ़ि ।

१११० पृथ्वीराजरासो। [सैंतीसवां समय १२ .... .... युद्ध का दृश्य वर्णन। दंडमाल ॥ मेछ हिंदू जुद्ध घरहरि । घाइ घाइ अघाय घर हरि ॥ रुंड मुंडन घंड पर हर । मत्त बह त सुरत्त भरहरि ॥ छं० ॥ ७६ ॥ भग्ग काइर जूह भौरन । छडि जल सूरिज्ज धौरन ॥ लंड चट्टिय रचि थर हरि । रक्त जुग्गिनि पत्र पिय भरि ॥छं॥८॥ चवत कौरति अच्छ अच्छरि । सुफटि पट्ट सुपट्ट फर हरि ॥ सिद्ध सूरन बौर जुरि जुरि । ॥ छं० ॥ ८१॥ प्रबल पौलिय पाल सेनिय । विचलि थल दिग परै ऐनिय ॥ गोम गैंन निसान नंगिय । थान थान बिवान संगिय ॥ छं० ॥२॥ भुअन भिरि भुअधार धारन । श्रोन तुच्छिय होर झारन ॥ हिंदु मेच्छ अघाइ घाइन । नंचि नारद जुड़ चायन ॥ छं० ॥८३॥ गाथा ॥ नंचिय नारद मोदं। क्रोधं घन देषि सु भट्टाय ॥ हर हरषिय हारं। पत्तो चंद भानं भा यानं ॥ छं० ॥८४ ॥ सायकाल होने पर दोनों सेनाओं का विश्राम करना । दूहा ॥ थैकि मुझझत संध्या सपत । सपत भान पायान ॥ पहु प्राची बजि पंचजन । लह सूझत गोयान॥ छं० ॥ छं ॥८५ ॥ प्रातःकाल होतेही इधर से कैमास का और उधर शहाबुद्दीन का अपनी अपनी सेना को सम्हालना। कुंडलिया ॥ पहुलग्गे चामड सुभर । अरु चिमन्न चतुरंग ॥ इंद्रजीत लछिमन रहसि । बहसि बढ़ी 'सु तुरंग । बहसि बढि सु तुरंग । पंच साइक भाले भिलि ॥ फुनि गोरी दाहिम्म । सु हय छंडे सु बंधि कलि ॥ जिम रघुपति पतिलकं । बकं कंकन कर अग्गी ॥ तिम गोरी दाहिम्म । सु हय छंडे जुध लग्गी ॥ छं० ॥ ८६ ॥ ( १ ) मो.-चतुरंग ।

सैंतीसवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासो। ॥ सूर्योदय होतेही दोनों सेनाओं का आगे बढ़ना और अपने अपने स्वामियों का जैकार शब्द करना। कवित्त ॥ उदय भान पापान । कोर दिष्षिय दल चढिय ॥ हय गय 'नर आररिय । सद्ध पर सदन बढिय ॥ अच्छरि तन सच्छरिय । व्योम विम्मानह चढिय ॥ दिष्पि सूर सामंत । देव जैजै मुख पड्डिय ॥ हथ्थिय सुधारि हथनारि धरि । गजेनारि करनारि बजि ॥ चढि हिंदु मेछ मुह मिलि अनिय । मनों अम्भ पावस सु रजि ॥ छं ॥८७॥ दोनों सेनाओं का परस्पर एक दूसरे पर वाणों की वर्षा करना ॥ दूहा ॥ भर भौषम तौकम अमर । धनुष बान अग्रान ॥ हिंदुअ मौर सुइक्क हुअ । मौरचंद सनमान ॥ छं० ८८॥ दोनों सेनाओं का एक दूसरे में पैठ कर शस्त्रों की मार करना। भुजंगौ ॥ मिले हिंदु मेंछं अनी एक मेक । बजे घग्ग धारं रजे तोन तेक ॥ करं पत्र सत्ती चवै ' सिंध नह। श्रवै श्रोन गंडूष घग्ग उनंगं ॥ छं० ॥८६॥ उठे रत्त पीतं घमं धूम रंगं । सतं ५ सेत नौलं जलं जात संगं॥ उठं पत्र डंडूर सर सोभ सज्जौ । मनों डंड साल समंडं डरज्जौ ॥ छं० ॥१०॥ वितालं विताल रजे ताल प्रेरं। गिरं मेच्छ हिंदू धनं घाइ बेरं ॥ जमं जांम जग्यौ जमानं सुजग्ग। तिल तिमझ अग्ग बढ़ घग्ग घग्गं॥ छं० ॥ ११ ॥ (१) ए. कृ. को.-अर। (२) मो.-"वजे षग्ग घोरं जेतो झत्ततेकं"। ( ३ ) ए. क. को.-सट्ठी । (५) मो.-सेल । (६ ) ए.-डेंडूर । ( ४ ) मो.-सिद्ध । (७) ए. कृ. को.-तिल्ल ।

१११२ पृथ्वीराजरासो। [सैंतीसवां समय १४ जयं अग्गि जग्गी जनू जग्य जून। रते अंग अंगं चले सग सून।। चढ़ी गिद्धि गैनं छयौ बान भान । परे पाइ सामंत सोचंद जान। छं० ॥१२॥ जिमं पड करूं परे मभिम जुद्धं । सही सत्रु, कथ्थौ षगं बढि उद्ध् । कवीचंद कथ्थो कुरष्यत हेतं । इसे हिंदु मौरं चढ़े बंदि नेत॥ छं० ॥ १३॥ युद्ध भूमि में वैताल और योगिनियों के नृत्य की शोभा वर्णन। कबित्त ॥ नेत बंधि हिंदू । नरिदं सामंत मत्तभर ॥ मौर भार असरार । सबें ढाहे सु सद्धि सर ।। पथ्य जेम भारथ्य । कथ्य सुम्भ जिम कथ्थिय ॥ सु कविचंद बरदाइ । एम कथ्थिय रन बत्तिय ॥ घन घाइ आघाइ सुधाइ घट । तेक तानि नंचिय करस ॥ चहुआन राइ सुरतान दल । वत्य बौर मंद्यौ सरस ॥ छं. ६४॥ दूहा ॥ तेग तार मंडिय समर । नचिय नंच बिन पैर ॥ चाहुआन सुरतान रिन । रचे वत्य बर बर ॥ छं० ॥ ६५ ॥ योगिनी भूत वैताल और अप्सराओं का प्रसन्न होना और सूरवीरों का वीरता के साथ प्राण देना। भुजंगौ ॥ रचे वत्य बर बर हिंदू रु मौर। मदुमंदल तज्ज राजंत धोरं। घनं गज्ज नौसान ईसान सोरं । करें वत्य भूतं रचें और कोर॥ छं० ॥६६॥ करंताल भाल बजे रंग रंगं । भ्रमै गिद्धि गैनं नच चारि जंग सुरं सुंदरौ नंदरौ चढि व्योमं । छबी छब्बि छायं बरं बार सोमं ॥ छं० ॥१७॥ उड़ें रत्त गुलाल फूले सु फागं । पल षग्ग कूचं समं माल लागं॥ उठे गाइन नंचि तोरंत तानं । लगें षग्ग पत्तं सुपेरंत मानं॥छं०॥८॥ ॥ १ ( १ ) मो.-रूनं । (३) मो.-हिन्दू समारं । (२) ए. कृ. को.-केरं । (४) ए. कृ. को.-काग ।

सैंतीसवां समय १५ ] पृथ्वीराजरासो। कट अद्द सौसं बहै रत्तजानं। रतं पट्ट बंध्यौ मनों रिमिझ भानं ॥ सुरं सछि नई चवै मुष्प गानं । फिरै जुड्व जोधं बहै मोह बानं ॥ छं० ॥१६॥ बढ़े मांस प्रासाद भूतं असूरं । रत पानि डारं तक सूर नूरं ॥ रुरै रत्त रूपं कच कुंच वासं । विधि छित्ति राजौ रसं रंग रासं ॥ छं० ॥ १० ॥ नचे प्रेत पानं बिना सौस केलं । मनां अम्ग फागं जगे नत्य ल॥ षगं घंटि नाना कटे लंड सेष। इभं रूढ़ सौ निने नारि देष। छं० ॥ १.१॥ बकै मत्त हालाहल षग्ग पंडे । जिसे राम रन माझ रावन्न मंडे ॥ नवं नारिका बाटिका वौर तुह। घनं घाइ प्रध्धाइ जुग जोग छु? ॥ छं० ॥ १०२॥ युद्ध रूपी समुद्र मथन को उक्ति वर्णन। कवित्त ॥ नव बद्विय नाटिका । घग्ग कढी असु हकिय ॥ हिंदु मेच्छ मिलि घेत । अप्प अप्पन चढ़ि कंकिय ॥ रा चावड रा जैतसौ । राइ पज्जून 'कनकह ॥ मौर षान भर पंच । घग्ग वढुए तननंकह ॥ वपु बेद चन्द बानी विमल । विदुरि घग्ग पल घेत बढ़ि ॥ केवल सु कदि 'सुरतान दल । लिय रतन्न मथि देव दधि ॥ छं० ॥ १०३ ॥ कुंडलिया ॥ मथि कन्यौ सुरतान दल । दधि केवल मन वदि ॥ मौर षान मारूफ दल । बौर विमानन चहि ॥ वौर विमानन चहि । दिष्ट बढी बारह परि ॥ भर चंदेल विरंम । षेत भोरी सुभांह भर ॥ गय नंगचंद अमृत भारिग । कुसुम गुच्छ कविचंद पथि ॥ विम्मान पथ्य रवि कुंत रथ । षग्ग नेत कढि केल मथि ॥ छं० ॥ १०४॥ (१) ए. कृ. को.-कमक्कह । (२) मो.-पुरसान, पुरसांन । १ पृथ्वीराजरासो। संतीसवां समय १६ इस युद्ध में जो जो वीर सरदार मारे गए उनके नाम और उनका पराक्रम वर्णन । मतौदाम ॥ मथ्थो सुरतानय सेन पयार । लई जस कौरति चंद सुचार ॥ परे रन मझम चंदेल सुचाइ । परे बहु पान सुधाइ अघाइ॥ छं० ॥ १०५॥ पच्यौ धर बाहर 'राइति साल । धरधर घग्गन तुट्ठिय ताल ॥ बरें कर अच्छर सुच्छर माल । धकधक काइर छत्ति विसाल ॥ छ० ॥ १०६ । झुकि भझुकि तुंडन अड्च कमद्ध । मनों हरि चक्रन केतन बद्ध ॥ पायौ घन 'घाव सु वीरमदेव । हयग्गय विविय छच अनेव ॥ छं० ॥१०७॥ बिनों सिर नंचत मौर कमंध। हये हय नाग नरभ्भर संध ॥ लयौ धर सौस सुभ्यो असि साइ । हनैं लगि पंचय पंचय धाइ ॥ छं० ॥ १०८॥ हर लगि पंचल षिम्मन घाइ "प-यौ पौरोज सु रावन नंद । करे "नय कोतिग सूरन चंद ॥ छं० ॥ १०१ चले दल चंचल दो सुरतानं । लगे कर देषि चँदेल परानं ॥ परे मफरद्द सुमंच 'विभौर । लगे ग्रहलुट्टि ऋषी कर कौर ॥ छं० ॥ ११०॥ गिरे सु पिरोज तिलत्तिल गात । विय छवि छंछ बढ़ी हबिपात ॥ रजे रति आगम राव वसंत । नगम्मनि जंग परे बर संत ॥ छं० ॥ १११॥ .. T.. ... ११) मो.-राय विसाल । (२) मो.-घाय। (३) ए. कृ. को.-हनें, हने । ( ४ ) ए. कृ. को.-"परयौ पुं पीरोज" (५) ए. कृ. को.-जय ! (६) ए. कृ. को.-विमीर । (७) मो.-रते।

सेंतीसवां समय १७ ] पृथ्वीराजरासो। । ..... .... .... ...... गही तरवार विपानि सु झारि । नवंतिय वाइस अंत उतारि ॥ फ्यौ सम बाज सु हाजमषान । रचे गज इंद्र सुब्रह्म धियान ॥ छं० ॥११२॥ कन्यौ मन सूर तिलत्तिल घग्ग। उड़े रिन पत्तरि तप्पत अग्ग ॥ चढ़े सारूप सु गैवर रूप । छयौसम सौस धरधर भूप छं०॥११३॥ भिरें भर हिंदु मौर अघाइ । गिरे दस पंच सहस्सह छाइ ॥ छं० ॥ ११४॥ युद्ध होते होते रात्रि हो गई। दूहा ॥ गिरे मेच्छ हिंदू सुभर । हय गय घाइ अघाइ ॥ 'सुंड हँड मुंडन झरत । रत्त झाकि झुकि ताइ ॥ छं० ॥ ११५ ॥ उपरोक्त वीरों के मारे जाने पर पहाड़ राय तोमर का हरावल में होकर स्वयं सेनापति होना । भिरि तूंअर लिय बग्ग भरि । हय करि नौर प्रवाह ॥ सघन घाइ संमुष 'समर । लगे मेच्छ पति थाह ॥ छं० ॥ ११६ ॥ पहाड़राय तोमर का बल और पराक्रम वर्णन । घाइ घाइ तन छाइ छिति । रत्त छिछ उछरंत ॥ भर तोवर हर जिम तमकि । लग्गि जमन गज अंत ॥छ ॥११॥ कवित्त ॥ भर तोअर अभि रत्त । धरत कर कुंत जंत अरि ॥ गजन बाज धर ढारि । धरनि बर रत्त जुथ्थ परि ॥ भग्गि मोर काइर कनक । हिय पत्त 'मुच्छि द्रढ़ ॥ भग्गि सेन सुरतान। दिष्षि भर सुभर पानि कढ़ ॥ उम्भारि सिंगि कुंभन छरिय । झरिय श्रोन मद गज ढरिय ॥ हर हरषि हरषि जुग्गिनि सकल । जै जै जै सुर उच्चरिय ॥छ०॥११८॥ (१) मो.-ब्रह्म सुधान । (३) ए. कृ. को-मुंड। (६) ए. कृ. को.-मुठ्ठि । (२) मो.- पातरि । (४) ए.-ससन, कृ. को..सरन । (७) मो.-द्रग। (५) मो.-जमुन ।

पृथ्वीराजरासो। [ सैंतीसवां समय १८ दुतिया का चन्द्रमा अस्त होने पर युद्ध का अवसान होना। दूहा ॥ प्रदिपद परिपातह पहर । समर सूर चहुआन ॥ दिन दुतिया दल दुअ उरमि । ससि जिम सद्धि घिसान ॥ छं० ॥ ११६॥ तृतिया को दोनों सेनाओं में शान्ति रही और चतुर्थी को पुनः युद्धारंभ हुआ। कवित्त ॥ दिन बतिया बर तंग । झुक्कि झारन झुकि झकिन ॥ हिंदु मेच्छ हय हकि । धक्क बज्जिय भर इक्कन ॥ कटि मंडल घटि घुम्मि । झुम्मि झझरिन अकालहि ॥ भूत बौर बेताल । मंस तुहत भ्रम चालहि ॥ दसकंध कोपि रघुपति रहसि । बिहसि चंद बदिय बदन ॥ चतुरथ्य जुड्व जंगिय जगौ । रंगि केक डकिन रदन ॥ छ० ॥ १२० ॥ चतुर्थी के युद्ध में वीरों का उत्साह क्रोध उत्कर्ष वर्णन और युद्ध का जलमय वीभत्स दृश्य वर्णन । दंडक ॥ चवथि जुड्व उदोत भारनि । सुभर भौर समुष्प धारनि ॥ कोपियं चहुआन भरहर। घाइ कुंजर ढाहि धरहर ॥ छं० ॥१२१॥ श्रोन द्रोन प्रवाह थरहर । अंत अंतन अंत भर हर ॥ 'तार तान विताल करि करि । तेग बेचत पाइ परि परि ॥ छं० ॥ १२२ ॥ घुम्मि झम्मि निसान बज्जिय । अगम मेघ असाढ़ गज्जिय ॥ धुनि सु असि असमान रज्जिय । दिष्षि देव विमान छज्जिय ॥ छं० ॥ १२३॥ कपि कायर लज्जि लज्जिय । 'विकल मुष ह निकलि भज्जिय ॥ समुष तोवर साह सज्जिय । विचल अरि कर तेग तज्जिय ॥ छं० ॥ १२४॥ (१) मो.-तार वितान विताल कर कर । (२) ९. कृ. को.-विमल । (३) ९. कृ.को.-निकरि । ( ४ ) ए. विमल ।

सैंतीसवां समय १६] पृथ्वीराजरासो। १११७ बोर बहुरि विशेष वानय । छुट्टि छाय अकास भानय ॥ रेन सूर दिसान थानय । सोक कोक 'अलोक आनय ॥छ०॥१२५॥ भमकि सुर मुष सस्त्र लग्गिय । दमकि दिसि दिसि घग्ग नग्गिय ॥ रत्त पत्त प्रवाह झरि झरि । ईस सौस सजंत गुरि गुरि ॥छं०॥१२६॥ मच्छ मच्छन कच्छ कच्छिय। दलन दोन कलोन अच्छिय ॥ अंत दंतिय दंत पाइन । गिव जुग लै उड़ी चाइन ॥ छं० ॥१२७॥ नषत पित्त सुहत्त फिरि फिरि । मप्पि डोरि पसारि कर धरि ॥ रुहिर सर सम बहत धार स । भँवर पंषिन काक पारस ॥ छं० ॥ १२८॥ मौका पाकर पहाड़ राय का शहाबुद्दीन के हाथी के पर तलवार का वार करना और हाथी का भहरा कर गिरना। हनूफाल ॥ रंगिय रदनु जुग्गिन बौर । है गै पारि असि वर मौर ॥ तोवर राइ दिष्यौ साहि । नंष्यौ बाज सनमुष आइ ॥छं०॥१२६॥ डारिय तेग सिर करि पोज । * गिर पर जनु कि करकिय बीज ॥ करि कर वारि गज धर ढाहि । गैवर गिरत निकरि साहि ॥ छं० ॥ १३० ॥ तोवर दिष्पि राह पहार । गैंवर दिष्पि है कौंध डारि ॥ भावरौं भग्गि जव्व मेछान।जै जै जै जंपियं चहुबान ॥छ०॥१३१॥ मुस्लमान सेना का घवरा कर भाग उठना । इहा ॥ भग्गि सेन सुरतान सब । रव लग्गी मुष तक्कि ॥ गह्यौ साहि तोवर पुरस । जानि राह ससि बक्क ॥ छं० ॥ १३२ ॥ (१) ए. कृ. को.-असोक जानय । (२) मो. जति । * मो.-गिर पर जानु करंकिय बीन-पाठ है और ए. कृ. को.-प्रतियों में "गिरि पर किंकर कीय वीजा पाठ है किन्तु इन दोनों पिठो में छन्दोभंग होता है। (३) ए. कृ. को.-तंतिय । ( ४ ) मो.-चर। ( ५ ) मो.-गिर चंत गैवर निकर साह । (६ ) मो.-पुरिस ।

पृथ्वीराजरासो। [ सैंतीसवां समय २० अपनी सेना भाग उठने पर शहाबुद्दीन का चक्रित होकर रह जाना और पहाड़ राय का उसका हाथ जा पकड़ना और लाकर उसे पृथ्वीराज के पास हाजिर करना । कवित्त ॥ जुग्गिनि गन गर सिंधु । करत उच्चार सार मुष ॥ अछि अच्छरि बर इच्छ । विसन अक पानि नैन सिष ॥ बज्जि ताल बेताल । रजि बर 'तुंड चंड सँग ॥ श्रोन छोनि छय छंछ । गुंज गन देन रत्ति अँग ॥ 'मुरि मेच्छ घाइ घट सघन परि। हथ्थ घालि सुरतान लिय ॥ जित्तो जु आनि सोमेस सुत्र । अभै सुभै अंगन घटिय ॥छं०॥१३३॥ सुलतान सहित पृथ्वीराज का दिल्ली को लौटना और दंड लेकर उसे छोड़ देना । गहि गोरी सुरतान । अप्प ढिल्ली संपत्तौ ॥ माह सुकल पंचमौ । बार भ्रगु बर दिन वित्तौ ॥ किय सु दंड पतिसाह । सहस सत्तह सुभ हैंवर ॥ दुरद घट्ट प्रम्मान । वहै षट रित्त मह भर ॥ कोटेक द्रव्य वप हेम लिय । घालि सुषासन पठय दिय ॥ कलि काज कित्ति बेली अमर। सुभत सौस चहुआन किय ॥छ०॥१३४॥ इति श्री. कविचंद विरचिते प्रथिराज रासके तोवर पहाड़ राइ पातिसाह ग्रहन नाम सैंतीसमो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥३७॥ (१) ए. कृ. को.-तंड। (३) मो.-पठ्ठ । (२) मो.-मुरि सेन धाइ मिछ सछन परी ।

अथ बरुण कथा लिष्यते । (अड़तीसवां समय।) "सोमेश्वर" सांसारिक सम्पूर्ण सुखों का आनन्द लेते हुए स्वतंत्र राज्य करते थे। दूहा ॥ सुष लुट्टहि लुट्टहि मयन । अरि धर लुह धाइ ॥ अंग नवनि करि उबरै। है षुर षग्गह चाइ ॥ छं० ॥ १॥ चन्द्र ग्रहण पर सोमेश्वर जी का समाज सहित यमुना जी पर ग्रहण स्नान करने जाना। सोम 'ग्रहन सुनि सोमन्त्रप । कालंद्री मन आनि ॥ है गैजन सब संग लै । तहां बोले बिन ठानि ॥ छं० ॥२॥ सोमेश्वर जीके साथ में जाने वाले योद्धाओं के नाम और पराक्रम वर्णन । मोती दाम ॥ जुषोडस दान विचारिय राजारची विधि ज्यौं बध 'देवति साज॥ तहां ढिगोसिंघ पवार पवित्त । "सुध्रम्मय ध्रम्म तहां बिपचित्त । छं० ॥३॥ जुगौर गुरंबर सिंह सुसंग । जिनै करि जज्जर देहिय जंग ॥ तहां ढिग संजम राव नरिंदु। धरे जनु इंद्र विराजत चन्द ॥ छं० ॥ ४॥ सुबाहन बौर बली कुनि तथ्य । तिने कलि धम्मन दृजि यकथ्य ॥ तहां गुर राज 'विराजत ताम । तिदिष्ट बचिष्ट मनों ढिग राम ॥ छं० ॥५॥ (१) ए. कृ. को.-ग्रहनी । (२) ए. कृ. को.-होम जग्य । ( ३ ) ए. कृ. को.-बुध । ( ४ ) मो.-देवनी । (द) ए कृ. को.-सुधर्मय धूम नहीं वियचित । (६) ए. कृ. को.-इन्द, इन्द्र । (७) मो.-बिरामत ।

११२० पृथ्वीराजरासो। [अड़तीसवां समय २ सु और अनेक महाभर मंझ । श्रमंत क्रमंत 'सयन्तिय संझ ॥छ॥६॥ उक्त समय पर पूर्णमा की शोभा वर्णन । साटक । मुदौ मुष्प कमोद हंसति कला, चक्कीय चक्कंचितं । चंदं किरन कड़त पोइन पिमं, भानं कला छौनयं ॥ बानं मन्मथ मत्त रत्त जुगयं, भोग्य च भोगं भवं । निद्रा वस्य जगत्त भक्त जनयं, वा जग्य कामी नरं॥ छं० ॥ ७॥ चोटक ॥ * चकौ चक्क चक्किय चित्त मयं । बिछुरे बिय दिष्षिय संझ मयं ॥ * जु पयो ध्रिम तत्त मझमुरबौ । सुमनों दिसि दिस्मि सिंदूर "जबी ॥ छं० ॥८॥ घन सोर द्रमं करि पंष घनं । सु मनों लगि पारसियं पढ़नं ॥ अलि वासिय पंकज कोक नदं । कुलटा बसि छैल रसं विमिदं ॥ छं० ॥६॥ विरही जन दिष्टि सु धाम दुरौ ।उलटैं बसि डोरि ज्यौं चंग उरि॥ बजी बर देवल झल्लर झर । तिसं घरु सिंगिय सिद्धन पूर ॥छं०॥१०॥ कपी मुग धापिय केलि कठौर । मुदै हसि प्रौढत सुंदर चौर ॥ छबि दीपक हारन जोति जगै। जनु दंपति नैन सुमे उमगै ॥ छं० ॥ ११ ॥ जु বী धुअ धूमर रैनन मंडि । चलै क्रम चोर मगं "पियं छडि ॥ जुरसे रस चामर सौस इसे । दिषि दीपक जोति पतंग जिसे ॥ छं० ॥१२॥ विरहा उर मारिय केलि करौ । इन दाहिय देहरु प्रौति धरी ॥ विरही त्रिय मुष्ष सु दुष्प सदं । कुम्हिले जनु पंकज कोक नदं ॥ छं० ॥१३॥ (१) ए. कृ. को-सपन्निय । (२) मो.चक्कीचितं । (३) मो.-निद्रया । ( ४ ) ए. कृ. को. जगंत । * ए. कृ. को.-"कवि चक्क सु चक्किय" " ए. कृ. को.-जु पयोध पतंत भझं सुरबी । (१) मो.बची। (६) मो.-किपि। (७) ए. क. को.-पिम । ए. कृ. को.-"जुरसे रस बामर सीदक से" । (८) ए. कृ. को.-मुदं ।

अड़तीसवां समय ३] पृथ्वीराजरासा। ११२१ जु सँजोगय भोग सुषं सरसे । सु कमोदिन चंद फुलै दरसे ॥ जु ग्रिहं ग्रह जोवत दीप जुवं । जु वर मनु काम के बीज भुवं ॥ छं० ॥ १४॥ अर्द्ध रात्रि के समय ग्रहण का लग्न आने पर सब का यमुना के किनारे पर जाना। दूहा ॥ साँझ समय ससि उग्गि नभ । गइ जामिनि जुग जाम ॥ ग्रहन समय दिषि होतहौ । जमुन पधारे 'ताम ॥ छ० ॥ १५ ॥ वरुण के बीरों का जागृत होना। स्नानं जंकी नौ वपति । जल रक्षा अगि बौर ॥ हकारे संमुष उठे । मंगन जुड सरौर ॥ छं० ॥ १६ ॥ इधर सामंत लोग शस्त्र रहित केवल दूब और अक्षत आदि लिए हुए खड़े थे। ए बिन वस्त्र रु सस्त्र बिन । हस्त दरभ कुस कोस ॥ तिल तंदुल जव पुहप कर । बरन दूत उठि रोस ॥ छं० ॥ १७॥ वीरों का गहरे जल में शब्द करना। अति प्रचंड गहराइ गल । गल गज्जे बल बौर ॥ स्याम बरन भय भौत दिषि । धौरन छुट्टै धौर ॥ छं० ॥ १८ ॥ जलवीरों के सहज भयानक और विकराल स्वरूप का वर्णना कवित्त ॥ अति उतंग बजग । उदित उर जोति रत्त द्रिग ॥ अरुन रुधिर नष अधर । बस्त्र नन अस्त्र सस्त्र ढिग ॥ दसन जंच सिर केस । वेस भय भग्गिय पासं ॥ अति उनाह जम दाह । कौन मंडै जुध आसं ॥ कल कलह बचन किलकंत सुर । सुर बाजत जनु धुनि धमनि ॥ (१) मो.- बाम । (३) ए. कृ. को.-समीर । (२) ए. कृ.- को.-हहकारे ।

११२२ पृथ्वीराजरासो। [ अड़तीसवां समय ४ हम करत केलि जल संचरत । तुम 'संमुह कोइ 'मत अवनि ॥ छं० ॥ १६ ॥ सांमतो का ग्राव पर चला जाना । दूहा ॥ सुभट दिष्प करि क्रोध उर । भये भयानक सूर ॥ सस्त्र हथ्थ दिष्प नहीं। *ग्राव ग्रहे जलपूर ॥ छ० ॥ २० ॥ जल वीरों के उछारने से वेग से जो जल ग्राव पर पड़ता था उसका दृश्य वर्णन। कवित्त ॥ परत ग्राव जल पूर । भरत जनु रुष्ष फल सुबन । बजत घात आघात । फुरत अवसान बौर तन ॥ रावचन अवसान । देव दुंदुभि अधिकारी ॥ 'जोग ग्यान त्रय मान । बनिक बुधि मोहि सुनारी ॥ राजेंद्र दान सिह तपह । भुगति जुगति विधि कोबिदह ॥ इतनी बत्त अवसान मिलि । मनहु मंत्र जनु गुन भिदह ॥ छं० ॥ २१ ॥ जल के बीच में जल वीरों की आसुरी माया का वर्णन । आवरि कर वर करह । भिरत भारथ "पच्चारिय ॥ अंग अंग संग्रहहिं । इक इकत अधिकारिय ॥ अधम जुड़ जुरि करहिं। करहिं बल कपट अनंगिय ॥ कबहु धूम वे करहि । करहि कव झार भरनिय ॥ कबहूं मेघ उठे सुजल । कबहिं करन ग्रावह बरष ॥ उच्चरहिं बैन बहु बौर बर । बिरचि कबहु बुल्ल हरष ॥ छं० ॥ २२ ॥ (१) ए. क. को.-सुमढ़। (२) ए. कृ. को.-मति *ग्राव यह श्रुद्ध संस्कृत शब्द है यथा-शब्दकल्पद्रुम "पृथ्वी तावत् त्रिकोण विपिन नद नदी ग्रावरुद्धं तदद्धम्" । इसका तात्पर्य डेलटा से है। (३) मो.-ज्यों। ( ४ ) मो.-कोबदह। (५) ए. कृ. को.- परचारिय (६) मो. वुठे ।

अड़तीसवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो। जलवीरों के बहुत उपद्रव करने पर भी सोमेश्वर के सामंतों का भयभीत न होना। कबहुँ सस्त्र सर परहि । कबहुं डक डकारिहिं ॥ तीन लोक तन 'हकहिं । बकहिं बौरन बक्कारहिं । अकल कलह बल करहिं । समहि संग्राम सुधारहिं॥ अजुत जंग उद्धरहिं । *कलह बल धार उघारहिं ॥ सामंत भूमि भंजहिं भिरहिं । गिरहिं परहिं उठहिं लरहिं । सोमेस स्वर संक न गनहिं । विरचि गाल गल बल करहिं ॥ वीरों को स्वयं अपना पराक्रम वर्णन करके सामंतों का भय दिखाना। हम सु भयंकर बल अभूत । सुभटन हकारिहिं ॥ हम सु प्रवत्त प्रमान । कनिष्ट अंगुरि उप्पारहिं ॥ हम समुद्र प्रम्मान । डोहि जल पहुमि "प्रवाहहिं ॥ देषी सुनी न कोइ । सोइ ब्रह मंडल गावहिं। किन काम धाम तजि वाम सुष । आइ सपत्त जमुनि निसि ॥ चर बेर निसाचर हम फिरहि। नौर रमें तिल लेइ धसि ॥ छं० ॥२४॥ वीरों का राजा सहित सामंतों पर आसुरी शस्त्र प्रहार करना। दूहा ॥ इह कहि के लग्गे लरन । गैन गुंज जल फार ॥ मानहु भारथ अंत कौ । भार उतारन हार ॥ छं० ॥ २५ ॥ सामंतों का वीरों से यथाशक्ति युद्ध करना। कवित्त ॥ काल संक अहरहि । तार बज्जत प्रहार सुर ॥ जम्मन जल अंदोल । बौर बोलंत और गुर । (१) मो.-तकहि । * कृ. को.-कबहि वीरन वक्काराहि । (२) मो.-गिनाह। ( ३ ) ए. कृ. को.-हक्कारिय । (४) ए. कृ. को.-चंड प्रव्वत समान १५) मो.-प्रवानाहि । को.-प्रवाहिहि। (६)-न होइ । (७) मो.-एह कहे । (८) मो.-सजन । । ।

पृथ्वीराजरालो। [ अड़तीसवां समय ६ कलह केलि सम केलि । ठेलि क8 चावहिसि ॥ एक ग्राव वरपंत । एक फारंत नष्प कसि ॥ परि मुच्छि मध्य विक्रम बलिय । जुद्ध निसाचर बिषम 'अषि ॥ बर बौर धौर धप्प लरन । फहु पट्टत वप सोम 'लषि ॥छ ॥२६॥ इसी प्रकार अरुणोदय की लालिमा प्रगट होते देख वीरो का वल कम होना और सामतों का जोर बढ़ना। पद्धरौ ॥ तिम 'तिम सु बौर तामसत थोर । दिन उगन बढ़ रजपूत जोर ॥ व "जु मल्ल मुट्ठी प्रहार । फट्टै कि भूम पट तार तार छ० ॥२७॥ उच्छरत जमुन जल इन प्रकार । क्रौड़त जानि मद गज फुकार॥ तरफरहि मध्य जल इन प्रकार । कपि कोप नंषि गिरि समुद सार॥ छं० ॥२८॥ बर भरहि करहिं लत्तननि हाइ।* बज्जत बज जनु विषम घाइ॥ रन रह बहस्सि उच्चार बैन । इतनै भयो परताप गैन ॥छ॥२६॥ निसिचरन दिष्षि जब समय सूर । मलमलत किरन विमल करुर ॥ तमचरह पूर प्रगटौ किरन्न । प्रगटौं सु दिसा विदिसान अन्न ॥ छं० ॥ ३०॥ तब लग्गि पंच भर परिय मुच्छ । निसचर उतंग करि जुद्द गच्छ । छं० ॥ ३१ ॥ प्रातःकाल के वाल सूर्य की प्रतिभा वर्णन । दूहा ॥ ज्यौं सैसब में जुवन कछु । तुच्छ तुच्छ दरसाइ ॥ यों निसि मध्यह अरुन कर। उहित दिसा 'लसाइ ॥ छं० ॥ ३२ ॥ * रत्ति रही वर विलगि बर । ज्यों ससि कोरह राह ॥ हरि डड्डे बाराह धर । कै हरि चंपत राह ॥ छ० ॥ ३३ ॥ (१) ए. कृ. को.-पिषि! (२) ए. क. को. लिपि। (३) ए. कृ. को.तिमति । (४) मो.-वछै । ( ५ ) मो.-मुगल। * मो.-बज्र लेत हथ्य जम्बू विघाइ। (६ ) ए. कृ. को.-परभात । (७) ए. कृ. को.-कव। (८) मो.-ललसाइ। * मो.-"यों रत्ति ही रविलग वर" अड़तीसवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो। ११२५ सुर्योदय होते ही वीरों का अन्र्तध्यान होना और सोमेश्वर सहित सब सामंतों का मुर्छित होना। अरिल्ल ॥ गच्छिय सुद्द निसाचर बौर । परै धर मुच्छि सु पंच सरौर ॥ किए तन पान प्रमानन जान । सु देवहि दुंदुभि जानिय गान ॥ छं० ॥ ३४॥ सव मुर्छित पड़े हुइ थे उसी समय पृथ्वीराज का वहां पर आना। दूहा ॥ मृतक समानति मृतक परि । रहिग जीव छिपि छान ॥ तब लगि तहँ प्रथिराज रन । आनि सपत्ते 'पान ॥ छं० ॥ ३५॥ निज पिता एवं सब सामंतों की ऐसी दशा देख कर पृथ्वीराज के हृदय में दुःख होना। साटक ॥ 'सोहिष्ष वप राज तात निजयं । बौभच्छ इच्छा क्रुधं ॥ कालं केलिय छिछ रुव तनयं, न्द्र सु संरत्तयं ॥ माते तामस रस्म कस्स असुरं, हालाहलं नैनयं ॥ राजं जा प्रथिराज चिंति तनयं, पुच्छे गुरं ततगुरं ॥ छं० ॥ ३६ ॥ यमुना के सम्मुख हाथ वांध कर खड़े हो पृथ्वीराज का स्तुति करना । दूहा ॥ जमुन सनंमुष जोर कर । अस्तुति मंडिय मुष्प ॥ तूं माता दुष भंजनौ । रंजन सेवक सुष्य ॥ ई० ॥ ३७ ॥ यमुना जी की स्तुति । भुजंगी ॥ नमो मात मातंग "सूरज्ज जाया। नमो देवि भनौ जमं पै कहाया। जगं अंधकूपं सु दीपक गन्नौ । नदी कौन "पुज्ज सु तेरी करन्नौ ॥ छं० ॥ ३८॥ (१) ए. कृ. को.-प्रान । (२) ए. कृ. को.. से दिष्यं । (३) ए. कृ. को.-हाली। ( ४ ) ए. कृ. को.-सद्गुरं, तदुरं । ( ५ ) मो.-सूरिज्ज । (६) ए. कृ.को.-कहाये । ( ७ ) मो.-पूजै । ) ११२६ पृथ्वीराजरासो। [अड़तीसवां समय ८ महा धम्म धारन तारन्न देही । निकस्सी सलील सु सेलं समेहौ। बलौभद्र रष्यो हरष्षौ हलंदी । तुझं नाम पासं सुभै सो कलंदौ ॥ छं० ॥ ३० ॥ • ॥४१॥ चयं ताप भंजै जगत जननी । तुयं सेपियं सेसु नंमं सरनी ॥ तुही तारनौ जुग्ग हारनि पापं । तुहौं मात 'करनी अघं कष्ट कार्य। छं० ॥ ४० ॥ तुही याम सूरं जलं मुक्ति धारा।तुही नभ्भ मातंग नर लोग सारा॥ तुहौं साधवी मात नध्य समानी । तुहो तारनं लोक लोक रानी॥ छं तुही बाल बैसं तुही दृड्व कालौ । तुही तापसं ताप आपं सुराली ॥ तु तट्ट सेवै जिते 'तिच सिद्ध । तिते मुक्ति मुक्ति मनं बंछ दिव। छ० ॥ ४२ ॥ तुही मद्दनं मथ्थनं तेज धारा । तुहौं देवता देव चय लोक हारा॥ तुही जोगिनी जोग जोगं कपाल । तुही कल्प में कंपराषंत भाल छं० ॥४३॥ तुही विस्त्र रुपं तुहि विन माया । तुही तारनं जन्न संसार आया। कियौ अश्वमेधं पुनर्जन्म आवै । नही जन्म मातंग तो ध्यान पावै ॥ छं० ॥४४॥ तु ध्यान मातंग अस्नान पूरं । करै अर्घ 'आचार उग्गत सूरं ॥ तनं तम्मनं तं जयं निर्विकारी । इसी जमुन अप्पं सदिष्यो अकारी छ० ॥४५॥ स्तुति के अन्त में पृथ्वीराज का यमुना जी से वर मांगना । कवित्त ॥ गंगा मूरति विसन । ब्रह्म मूरति सरसत्तिय ॥ जमुना मूरति ईस । दिव्य दैवन मुनि थप्पिय ॥ ( १ ) ए. कृ. को.-कर वत, कर वत्त । (२) ए. कृ. को:-"सिद्ध सिद्धति" । (४) ए. कृ. को. में कप्प । (६) ए. कृ. को.-अष्पं । ( ३ ) मो.-महंत । (५) ए.-आवार ।

अड़तीसवां समय ] पृथ्वीराजरासो। ११२७ मिली जाइ मल मंग। गंग सागर अवधारिध ॥ ता सोमेसर रोग । दोष दोषह तन टारिय ॥ अब सुभट सहित देवी सु तन । करि निरमल तन मोह मय ॥ इह कहत जग्गि टप मूरछा । प्रति बुल्लौ प्रथिराज तय ॥छं॥४६॥ सोमेस की मूछी भंग होने पर पृथ्वीराज का पुनः ब्रह्मज्ञान की युक्तिमय स्तुति करना। साटक ॥ त्वं मे देह सु भाजनेव सरिसा जीवं धनं प्रनायं ॥ दाहं अग्गि सु क्रम्म दारुन धरै आवस्य बंदं करं॥ सं रुच जम जोग तिकृत तनै अङ्घ पल मध्ययं ॥ जीवी वारि तरंग चंचल धियं बिस्मत "अनतर॥ छं० ॥ ४७॥ आसा अस्य सरोवरीय सलिल पंषी वरं सुद्धयं ॥ सुष्पं दुष्षय मध्य वृच्छ तवयं साषास्य चे गुन्बयं ॥ मोहं पत्तय रत्त सन्नव क्रमे फूल फल धारनं ॥ एकश्रय सँतोष दोष तिगुना अस्याय वा निर्गुनं ॥ छं० ॥४८॥ यों भूतं आभूत बर्ष सु सतं आयुर्बलं अदभुतं ॥ तेषा अई निसा गत रवि उभै बाल्य च वृद्धगता ॥ प्राप्त जोवन रत्त मत्तय रसं व्याधं क्रधं बंधनै । ना भूतं संसार तारन गुने संभार निस्तारयं ॥ छं० ॥ ४६ ॥ इस प्रकार मूर्छा जगने पर पृथ्वीराज का गन्धर्व यंत्र का जप करना जिससे मूर्छित लोगों का शिथिल शरीर चैतन्य होना । दोहा ॥ ग्यान ध्यान अस्तुति करिय । भयसु प्रसन्नय देव ॥ राज सहित सामंत सब । जगे मूरछा एव ॥ छं० ॥ ५० ॥ गंध्रव मंत्र सुइष्ट 'जिय। आराध्यौ प्रथिराज ॥ 'बरुन दोष तन ताप गय । उठि निद्रा जनु भाज ॥ छं० ॥ ५१ ॥ (१) ए. कृ. को.-जल गंग । ( २ ) ए. कृ- को.-त्वमे । (४) ए. कृ. को.-सबदं । (५) ए. कृ. को.-नर । (७) मो.-संसार । (८) ए. क. को. (३) ए. सस्सी। (६ ) मो.सुठयं । (२) ए. कृ. को.-वरन । हुआ।

११२८ पृथ्वीराजरासो। [ अड़तीमवां समय १० पृथ्वीराज का सोमेश्वर को सिर नवाना। पद्धरौ ॥ प्रथिराज राज सिर नामि जाइ । जानंत मरम तुम सकल राइ ॥ सरिता रु ताल वापी अन्दाइ। निसि समय बस्न तन धरिय पाइ। छं० ॥ ५२॥ सरवरिय केलि सोइत्त 'आइ । पाताल ईस क्रौलै सुभाइ ॥ सुमिरै न नाम सन सुद्ध ध्याइ । उपजै सु विघन कै धर्म जाइ॥ छं० ॥ ५३॥ भौसेन तब तहँ एक ठाइ । करि वेद पठन तहँ विप्र गाइ ॥ करि होम जाप किस्सह पराइ । भए सुद्ध पाय गए तन पुलाय ॥ छं० ॥५४॥ सोमश्वर को लिवा कर पृथ्वीराज का राजमहल में आना। इहा ॥ बरुन दोष मेंब्यौ सुप्रथु । ग्रेह संपते पाय ॥ देषि पराक्रम सोम नृप । फूल्यौ अंग न माय ॥ छं० ॥ ५५ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराज रासके वरूण कथा नाम अड़तीसमो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ३८॥ (१) ए. कृ. को.-पाइ । (२) ए.पाइ, कृ. को.- धाइ । (३) ए. कृ. को.-फुलाइ ।

अथ सोमवध सम्यो लिष्यते । (उन्तालीसवां समय।) भीमदेव की इच्छा। कवित्त ॥ गुज्जर धर चालुक्क । भौम जिम भौम महाबल ॥ कोइ न चंपै सौम । कित्ति बर रौति अचंगल ॥ सोमेसर संभरिय । तास मन अंतर सल्लै ॥ प्रथौराज ढिल्लोस । रीस तस 'अंतर बल्लै ॥ मिलि मंत तप्त बुझझवि मरम । करिय सेन चतुरंग सज ॥ धर लेउ आज दुज्जन दवटि । एकछच मंडोति रज ॥ छं ॥ १ ॥ भीमदेव का दिल्ली पर आक्रमण करने की सलाह करना। पद्धरौ ॥ संभरिय राज गुज्जर नरेस । रत्तौ जु साम दानह असेस ॥ कालिंद कूल जंगलिय जास । प्रथिराज अकस रष्य इलास ॥ई॥२॥ चंपौ अप्प उर र डंस । मन मध्य भौम इम भूमि गंस ॥ हारे जुआरि कलमलिय घेल । चालुक चित्त इम "मिलन सेल ॥ छं० ॥३॥ कुलटा छयल्ल जिम मिलन हेत । इम षगन षेत चहुआन चेत ॥ जिम चंद सूर मनि राह केत । कलमलिय चलिय उर भीम तेत ॥ छं० ॥४॥ रानंग देव झाला नरिंद । बुल्यौ सु राइ चालुक्क ईद ॥ तमि कह्यौ ताम हौ इतत रोस । झलहलत अग्गि ज्यों जग्गि कोस ॥ जु छं० ॥५॥ बुल्लाइ सब मर इक ठौर । चढ़िवाइ बेगि बर करौ दौरि ॥ षेलंत नारि नर लेइ गढ़ । इम लेउ भूमि घल घग्ग बडि ॥छं०॥६॥ (१) मो.-अंबर । (२) ए. कृ. को.-अरेस । (३) मो.-काल्यंद। को.-प्रेत । (५) ए. कृ. को.-मलन । (६) मो.-मत । (४) ए. क.

पृथ्वीराजरासो। [ उन्मालीसवां समय २ -- जिम करिव बाल घर मिटत धूरि । तिम इला भाउ चहुबान चूरि । भज्जत भौल जिम घर सुहाल । संभरिय भूमि इम करों हाल ॥ छं ॥७॥ कवित्त ॥ बोलि कन्द कढौं नरिद । रानिंग राज बर ॥ चौरा सिम जयसिंघ । बौर धवलंग देव धर ॥ धौल हरै सुरतान । बगैर सारँग मकवानं ॥ जूनागढ़ तत्तार । सार लग्ग्यौ परवानं ॥ मत मंति सज्जि चालुक्क भर । पुब्ब बैर साल्यौ हि ॥ केतीक बत्त संभरि धरा । रहै रंग चच्चर कियें ॥ छं० ॥८॥ गाथा ॥ सोझत्ती रन जित्ता। केवा किन्न संभरी राजं ॥ तं केलि कलहंतं । सल्लखल घग्ग 'मग्गायं ॥ छं० ॥६॥ सब सरदारों का कहना कि वैर का बदला अवश्य लेना चाहिए कवित्त ॥ बोली राव रानिंग। बोलि चौरासिम भानं । 'स्यामा स्याम नरिंद। भौर कढौ रन थानं ॥ अति उदार अति रूप । भूप साई रन रष्पन ॥ चाहुआन बरसिंह । पिझ्यौ बड़वानल भष्षक ॥ जै जैत कित्ति संसै न करि । सुबर बैर कडौ विषम ॥ भारथ्य कथ्य भावै भवन । सुभर मुत्ति लम्भै सुषम ॥ छ ॥ १० ॥ दूहा ॥ सुषम पिंड संग्रहिय बर । जुग जोग 'नह लभ्भ ॥ हिम ग्रीषम पाक्स सु तप । करै बौर प्रति अम्भ ॥ छं० ॥ ११ ॥ भीमदेव के सैनिक बल की प्रशंशा । भुजंगौ ॥ कर बौर बौर सु बौरं प्रकारं । लगे राह चहुआन सो जुड्व सारं॥ सु रावत्त रत्ता अभीरत्त कोनं । करै षेत भौमंग को सोन जोनं ॥ छं० ॥१२॥ (१) ए. कृ. को.,"तकेलि कुलहंता"। (३) मो.-षिज्यौ । (२) ए. कृ. को.-मग्गाई। (४) ए. कृ. को.-नहिं ।

SOM उन्तालीसा समय ] पृथ्वीराजरासो। । पाहावा कोन जमजोति जोत्य प्रकारं । गनै कोन बेलू सु गंगा प्रकारं ॥ गिनै कोन तारक ते 'तेज भोरै । लरै कोन चालुक सो जुड सोरे॥ छं० ॥१३॥ भीमदेव की सेना का इकट्ठा होना । गाथा ॥ फट्ट पुडु फरमानं । धाये धराजित जिताई। इम जुट्टे सब सेनं । ज्यों भू नौर वढि सरताई ॥ छं० ॥ १४ ॥ भीमदेव की सेना की सजावट और सैनिक ओजस्विता का दृश्य । विअष्परौ ॥ जुट्टे दल पहु पंग अपारं । हैगै बर भर लम्भि न सारं बनै हयं पय पंष समानं । षह भूमौ जनु पंष उड़ानं ॥ छं० ॥ १५ ॥ गज गज्ज गज्यौ जनु नौरं। भद्दव बद्दल जानि समोरं । दिषियै सूर नूर षह पूरं । संध्या सागर नूर करूरं ॥ छं० ॥ १६ ॥ चल्ल मल्ल मंग मल्हारे । धावें धर पग पाहर कारे ॥ कच्छ कच्छ बंधे होरी। चंदन पारि घिले जनु होरौ ॥ छं० ॥ १७ ॥ जिन पग भूमि न ढिल्लै कोई । विचरै लरै जानि जम दोई ॥ पाइक पग पिन्न जनु नठ्ठ। पंडा कडि बढ़े गज 'दड्ड ॥ छं० ॥ १८ ॥ गोरी बिन तिन लोह न छिज्ज । धार अनी कर बर ठेलिज्ज ॥ चंचल अश्वह "नंषत सूरं । सूर तेज जिन मुष्प सनूरं ॥ छं० ॥ १६ ॥ बंकी भोह भयंकर नैनं । फूली बंबर लग्गे गैनं ॥ रत्त स्वामि भ्रम्म रस रंगं । जोग जुगति मन चढत जंगं ॥ छ॥२०॥ नेह न देह न माया ग्रह। चिंतत सदा ब्रह्म मन लेहं॥ तेग त्याग मन मंड न अंगं । सुभ्भत सेन मनों सुअ गंगं ॥ छ॥२१॥ गड परे वप गाहत गहुँ । जिम वाराह मोथ रस दड्ड ॥ (१) मो.-मेज। (२) ए. कृ. को.-प्रपाम् । ( ४ ) मो.-बढं, वळं। (५) मो.-जनुंषत । (३) ए. कृ. को.-सूर । (६) मो.-साम।

पृथ्वीराजरासो। [ उन्तालीसवां समय ४] औगुन अंग न स्वामित जंगं । ज्यों सह गोन दुहागिल रंगं ॥ छं० ॥ २२॥ यों आतुर रत्त पग मग्ग। ज्यों कुलटान छैल मन लग्ग ॥ दसहं दिसि दारुन दल बढ । ज्यों धुर बद्दल भद्दव चढ़ ॥छं० ॥ २३ ॥ सिलह सज्जि बड्डे बल बंकं । रौछ लँगूर मनों कपि लंकं ॥ दिष्पत सेनह नैन भुलाई। मानहुं साइर 'पार डुलाई ॥ छं० ॥२४॥ अमरसिंह सेवर परिमानं । भैरूं भट्ट तत्त बुधि जानं ॥ बंभन लीला लच्छिन मंडे । देव क्रम सब बंधि रु छंडे ॥ छं० ॥२५॥ सांम रूप सेवर परिमानं । दान रूप बर भट्ट सुजानं ॥ भेद रूप दुज राज वकारं । डंड रूप चारन आकारं ॥ छं० ॥२६॥ लौने भौम संग चव मंत्रौ । दुष्ट अरिष्ट रमे जिन 'जंत्री ॥ सुर्ग मृत्यु, पाताल सुसंकं । अस आडंबर मंडत कंकं ॥ छं० ॥२७ ॥ भोलाराय भीम का साम दाम दंड और भेद स्वरूप अपने चारों मंत्रियों को बुलाकर उचित परामर्श की आज्ञा देना। दूहा ॥ साम दाम अरु भेद करि । निरनै दंड रू सार ॥ चारि दूत चतुरंग मन । बर सिघंन आकार ॥ छं० ॥ २८ ॥ ए बुलाइ चालुक बर । मंचौ भारा राज ॥ अमरसिंह सेवर प्रसन । मंत्र जंच गुन काज ॥ छं० ॥ २६ ॥ इनहि समीप बुलाइ करि । बालिय भौम नरिंद ॥ व्यों तुम जंपौ त्यौं करौं । तुम "छत मो सुख निंद॥ छं० ॥३०॥ मंत्रियों का कहना कि इस कार्य में विलंब न करना चाहिए। जंपि सु मंत्री मंत्र तब । सुनि भौमंग सुदेव ॥ धरतौ वर पर अप्पनी । लेत न कीजै छेव ॥ छं० ॥ ३१ ॥ ( १ ) ए. कृ. को.-पाइ। (२) ए.-मंत्री। ( ३.) मो. इनह । (४) ए. कृ. को. ज्यौ । (५) मो.-बत । (६) ए. कृ. को.-न्यद । (७) ए. कृ. को.-सेव ।

उन्तालीसवां समय ५] पृथ्वीराजरासो। ११३३ राज्य प्राप्त करने की लालसा से गत भीषण घटनाओं का ऐतहासिक उदाहरण । साटक ॥ भूमौनं धर धम्म क्रम्म 'निरतं, बंध्यो बधे पाडवं ॥ भूमौ काज दधीच आस मृगया, नित्त बजे कारनं ॥ केकइयं भुअ काज रामय बनं, दसरथ्य मंगे बरं ॥ सा भूमौ क्रित कारनेव सरसा, स्नेहाययं भूमयं ॥ छं० ॥ ३२ ॥ पुनः मंत्रियों का आख्यान कहना। कवित्त ॥ जा जीवन जग पाइ । आइ अवनी रस रंगह ॥ जो जा जीवन वलह । विनोद रषह मन पंगह ॥ जा जौवन कज्जह । कपूर पूरन प्रभु कोकह ॥ जा जीवन आरंभ । कित्ति सा धम्म सु रोपह ॥ जिहि काज जियन तप जप करहि । भमर गुफा साधहि अवस ॥ तिहि जियन त्यागि मंडय कलह । तौ भूमिय लम्मै सु रस ॥ छं० ॥ ३३ ॥ दूहा ॥ सो जीवन इम पहुनि करि । अच्छित सती समान ॥ चावहिसि नष्प निडर। वौ लभ्भै 'मिम पान ॥ छं० ॥ ३४ ॥ भोलाराय का सेन सज कर तय्यारी करना। सुनत मंत चल्लिय बपति । सज्जि सेन चतुरंग ॥ जनु बद्दल षह उन्नर । दिछु न परत 'नभंग ॥ छं० ॥ ३५॥ सेना के जुड़ाव का वर्णन अरिल्ल ॥ हाला हलं मिलत्तं सेनं। ज्वाला मलि ज्वालाह कृत्त नं ॥ दैवत देव बंधि चतुरंगौ । है हिलन्न हिंदू दल नंगी ॥ छं॥३६॥ ( १ ) मो.-सरसं । (३) मो.-सर । (५) ए. कृ. को.-भमंग। ७ ) मो.-क्षालाह। (२) मो.-काज । ( ४ ) ए. कृ. को.-पिम । (६) मो.-क्षाला । (८) ए. कृ. को.-लम्गी।

११३४ पृथ्वीराजरासो। [ उन्तालीसवां समय. गाथा ॥ सो चतुरंगय सेनं । हय गय सज्जि बौर उर रेवं ॥ अरुनोदय गुन मंतं । जानिज सूरतं बोरं ॥ छं० ॥ ३७॥ भीमदेव के सिर पर छत्र की छाया होना । उद्यौ छत्र छिति राज सिर । विषत बौर रस पान ॥ यो सब सेना रज्जि । ज्यौं जोगिंद जुवान ॥ छं० ॥ ३८ ॥ कवि की उक्ति कि मंत्री सदैव भला मंत्र देते हैं परन्तु वे होनहार को नहीं जानते। कहहि मंत्र मंत्रिय सुमति । विधि विधि सुविधि न जान ॥ कै भंजै कै रंजई । कै 'दिवत्त प्रमान ॥ छं० ॥३६ ॥ सेना का श्रेणीवद्ध खड़ा होना । आनि 'अल्लित साल गुन । विधि चालु क सयन्न ॥ पुब्ब बैर सोझित्ति कौ। झिरि भंजै रिन तन्न ॥ छं० ॥४०॥ पंच सहस पंचौ सुक्रत । पंचौ पंच प्रकृत्त ॥ पंच रषि पंचौ ग्रहै। तौ भारथ्य सु जित्त ॥ छ० ॥४१॥ सेना समूह का क्रम वर्णन । दूहा ॥ सलौ मिली कज्जल वरन । भेक भयानक भंति ॥ तिन अग्गै धर महे । तिन अग्गे गज पंति ॥छ०॥४२॥ उक्त सनासमूह की सजावट के आतंक की पावस ऋतु से उपमा वर्णन। माधुर्य ॥ गज पति चल्लिय जलद हल्लिय गरज नग धन भुल्लियं ॥ हल हलन घंटन घोर धुंधर नाग दुभ्भर डुल्लियं ॥ गत लग्गि गिरवर पुरहि तरवर हलहि धरवर धाहही ॥ झलकंत दंत कि पंत बग घन धाम कल सति गावहीं ॥छं॥४३॥ (१) ए. क. को.-देवत्त । (२) मो.-अनति ।

उन्तालीसवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो। ११३५ . गज बहत मदहद 'मनहुँ घन भद छुट्टि छिछन उम्भरै । पग जोरि मोरि मरोरि मुर जनु दिष्वि सुरपति लु भ्भरै ॥ बनि पौलवाननि ढाल हालनि बनिय बैरष साजही ॥ मन सिषर गिरि वर काम अंगन छन्त्र चमर कि राजही ॥ छं० ॥४४॥ अंध धुंधन चलत मग्गन सुनत बज्जन चल्लहौ ॥ वै कोट अोटन अगड़ मन्नत सिषर गिर रद झल्लही ॥ दल मुष्प मंडिय मेंघ छंडिय मनहु सुरपति वजयं ॥ सुर सोम सोमह ममझ मोमह ग्रह तजि प्रज भज्जयं ॥ छ॥४५॥ परि देस देसन रौरि दौरिय सुनिय संभरि रज्जयं ॥ बर मंगि बाजिय सिलह संजिय वहै भोरा अज्जयं ॥ छं० ॥ ४६ ॥ इसी अवसर में मुख्य सामंतों सहित पृथ्वीराज का उत्तर की तरफ जाना और कैमास के संग कुछ सामंतों को पीठि सेना की तरफ आने की आज्ञा देना। कवित्त ॥ उत्तर वै विजयंत । रोह रत्तौ प्रथिराज ॥ सोमेसर ढिल्लोस । संग सामंत सुराजं ॥ पौची राव प्रसंग। जाम जहाँ घट भारिय॥ देवराज बग्गरिय । भान भट्टी पल हारिय ॥ उदिग्ग बाह 'पग्गार भर । बलिय राव बलिभद्र सम॥ इत्तने रष्षि कैमास सँग । कलह कूच किन्नौ सुक्रम ॥ छं० ॥ ४७ ॥ पृथ्वीराज के चले जाने पर उन सब सामंतों का भी चला जाना जिनके भुजबल के आश्रित दिल्ली नगर था। दूहा ॥ जिन कंठन ढिल्लो नयर । ते रष्ष प्रथिराज ॥ रसित स्वामि अभ्यंतरह । कलह न इच्छन काज ॥ छं० ॥ ४८ ॥ (१) मो.-मनल। (३) ए. कृ. को.-पागार । (२) मो.-वहौ । ( ४ ) ए. कृ. को.-इछत ।

चीराजरासो। [ उन्तालीसवां समय ८ सुनत पुकारह छोह छकि । सत्तिय सत्त प्रमान ॥ चढ़त सोम चढ हयन । बिंटि नछिचन भान ॥ छं० ॥४६॥ रन बन घन सोमेस सुत । सज्जि सेन चतुरंग ॥ को विद गुन मन ज्यौं रमत । ज्यौं भर जानत जंग ॥छं०॥५०॥ उसी समय पूर्ववैर का बदला लेने के लिये भीमदेव का अजमेर पर चढ़आना, प्रातःकाल की उसकी तैयारी का वर्णन । कवित्त ॥ नाग कल मलि भार । सार सज्जत रन रज्जन ॥ दै दुवाह चालु क । भौम भारथ सों लग्गन ॥ सोझत्ती बर बर । बहुरि हालाहल मच्च्यौ ॥ भरन पहुंचिय 'आव । लेष लधै को रच्यौ ॥ करि न्हान दान इष्ट सु जप । भट अभंग सज्ज समुद ॥ विगसंत नयन दिय बयन। मनों प्रात फुल्ल कुमुद ॥छ० ॥ ५१ ॥ इधर कन्ह और जैसिंह के साथ सोमेश्वर का भीमदेव के सम्मुख युद्ध करने के लिये तय्यार होना कुसुम जुद्ध कुसुमेक । कुसुम संद्यन कुसुमेकह ॥ आदि जुद्ध संपनौ । दैव बढ्यौ दुति देकह ॥ संभरि वै संभरिय । राज सोमेसह कन्न । उत्तर दिसि प्रथिराज । गयौ उत्तर दिसि मन्न। जै सिंह देव जै सिंह सुत्र। धुअ प्रमान पय 'डड घरौ । इल अचल अचल लग्गन नदिय । गरिल ग्गागर उम्भरौ छं० ॥५२॥ सोमेश्वर की सेना की तय्यारी वर्णन । हनुफाल ॥ सजि सेन सोम अपार । सुनि सज्ज सेन प्रकार ॥ सोमेस सूर बिचार । सजि चढ़े बौर जुझार ॥ छं० ॥ ५३ ॥ ( ५ ) मो.-कान्ह । (१) ए. कृ. को.-आउ। (३) कृ. को. मो.-डंड। .

उन्तालीसवां ममय है ] पृथ्वीराजरासी। .... *धरा धरा कंपिय भार । चढ़ि राइ चालुक पान । धर धरिय दिल्लि सुथान ॥ छं० ॥ ५४॥ सुनि श्रवन संभरि राज । बर बज्जि 'विजयत बाज ॥ तन चविधि तूल तरंग । विधि मंडि बौर विजंग ॥ छं० ॥ ५५ ॥ दल देषि सूर सुरंग । उर होत अरियन पंग ॥ ढलकंत ढिल्लिय ढाल । मधु माध नूत तमाल ॥ छ० ॥ ५६ ॥ छुटि अचग अच्छतुपार । पाहार फारि प्रहारि ॥ उड्डि वृत्त तिड्डिय सेन । मनों राम लंका लेन ॥छं० ॥ ५७ ॥ सैनिकों का उत्साह सोमेश्वर की वीरता और कन्हराय का वल वर्णन। कवित्त ॥ विविध साज वढिय । अवाज भेरौ कोकिल सुर ॥ भवर झंड झंकार । चौर मोरह दुरंत बर ॥ बर बसंत सम वीर । नच्चि तोषार विभगिय ॥ 'रन रत्तौ सोमेस । भौम भारथ अनभंगिय ॥ दल धरकि भरकि काइर सरकि । हरषि सूर बज्जिय करस ॥ कन्हा नरिंद प्रथिराज बिन । सुभर कंक मंडिय सरस ॥छं०॥५८॥ युद्ध आरंभ होना । दूहा ॥ सुबर बौर मंद्यौ समर । रन उतंग सोमेस ॥ है दुबाह दुज्जन घरौ । घरी सु अक्क तरेस ॥ छं० ॥ ५६ ॥ कन्ह का वीरमत और तदनुसार सेनापति उसका व्याखान। कवित्त ॥ जा दिन जीव रु जम्म । क्रम्मता दिज जम पच्छ । सुष्य दुष्प जय अजय । लोभ माया नन सुच्छे ॥ * यद्यपि यह पाठ मो.-प्रति में ५३ छंद का चतुर्थ चहण करके दिया हुआ है किन्तु अन्य तनों ए. कृ. को.-प्रतियों में छ० ५३ के चतुर्थ चरण का “सजि चढ़े बीर सुझार" पाठ है । अतएव यह पाठ भेद नहीं हो सकता, आगे चल कर छंद भंग भी है-इस से मालूम होता है कि इसके साथ का दूसरा चरण लेखक की भूल से छूट गया है । (२) मो.-विजयसु । (३) ए. कृ. को.-विधि । ( ४ ) को. कृ. नर, ए.-मर । (१) ए. कृ..दुजन ।

११३८ पृथ्वीराजरासो। [उन्तालीसवां समय १० काल कलह संग्रह्यौ। मोह पंजर आरुचौ ॥ "मुगति मग्ग सुमझ न । ग्यान अंतह किन सुधौ ॥ प्रतिव्यंब अंब अंबह जुगति । भुगति क्रम्म सह उद्यरै ॥ केवल सु धम्म षित्रिय तनह । कर कंक जौ सुद्धरै॥ छं० ॥ ६ ॥ दूहा ॥ बौर गज्जि गज्जिय विदुष । * नर निरदोष सदोष ॥ संभरवै 'समर सुमति । टप लगि सुमत जमोष ॥ छं० ॥६१ ॥ कन्ह की आंखों की पट्टी खुलना । कवित्त ॥ सजिय सकल सन्नाह । दाह जनु दंगल पट्टिय ॥ सुमरि साह इक देव । द्रुवन दल देषि 'दपट्टिय ॥ छुट्टिय पट्टिय नयन । भइ दुंदभी गयन्ना ॥ तेग वेग झम झमिय । मच्च आरोठ भयन्ना ॥ फूलह सु धार धर कंन्ह वर । कर पर छुट्टिय छह घरिय ॥ पग सहि नहि भौमंग दल । बल अभूत कन्हा करिय छं०॥६॥ दोनों हिंदू सेनाओं की परस्पर ओजस्विता का वर्णन । दूहा ॥ काल चंपि बर चंपि कल । नर निर्घोष निसान ॥ सुबर बौर हिंदुअ सयन । बर बीरा रस पान ॥ छं० ॥ ६३ ॥ कन्हराय के युद्ध का पराक्रम वर्णन । + कलाकल ॥ कलहंतय केलि सु कन्ह कियं । जु अनंदिय नंदिय ईस बियं ॥ नचि 'नौ रसमं इक कन्द भरं। मय मंचि भयानक अंत करं ॥ छं० ॥ ६४॥ झमकंत सु दंतन अस्सि झरौ । जनु विजुलि पष्षत मेघ परी ॥ उड़िधुंधरियं निय छाइ जनं। जनु सज्जिय जुग्ग जुगद्दि पनं ॥छ०॥६५॥ ( १ ) कृ. को.-मुकात, ए.-सकति । २) ए. कृ. को.-छत्री । (३) ए.-संभर । * ए. कृ. को.-नर निर षोस दोष । ( ४ ) ए.-दुयट्टिय, मो. को.-लपट्टिय । (५) मो.-नौ रस में। (६ ) मो.-सज्जि । + इस छंद को "को" प्रति में मधुराकल करके लिखा है और “मो” प्रति में भ्रमरावली करके लिखा है परंतु भ्रभरावली छंद यह है नहीं भ्रमरावली अथवा नलिनी छन्द ५ सगन का होता है पर इस छंद में केवल चारही सगन हैं।

उन्तालीसवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो। ११३६ बजि 'डौरुष डक निसान घुरं। जनु बौर जगावत बौर उरं॥ दुत्र सेन बलं असियो बरषौ । नचि जुग्गनि पप्पर लै हरषी छं० ॥ ६६ ॥ 'जिनके सिर मार दुझार करै । वहु-यौ नन पंजर आय परै ॥ छं० ॥ ६॥ कवित्त ॥ कहर भगर जिम ल । ठेल सेलन मम ठिल्लहि ॥ इक धुकत धर तुट्टि। इक वल्लन गल मिल्लहि। इक्क कमंध उठंत । इक्क अंतन आलुभमहिं । इक्क हथ्य पग झरहिं । टिक्कि पग पग बिन मुभमहिं ॥ 'तरफरत इक धर मौन जनु । रन रवन्न छित्रिन झयौ । घन घाइ घुम्मि घट धुक्ति धर । इम सु जुड़ कन्हह "भिन्यौ ॥ छं० ॥ ६८॥ कन्ह राय का कोप। किन्न दंति बिन दंत । सुभट सोसन बिन किन्निय ॥ हय किनिय बिन नरनि । सेन भीमह करि झिन्द्रिय ॥ 'घुडा बिन किय काल । बाल बर बिगरिन दिष्षिय । पल हारिय पल पूर । सूर कन्ता भय भिब्षिय ॥ कौनौ सुकित्ति भूमी अचल । सचल सस्त्र सह झंझरिय ॥ मदमत्त गंध महियों दुरिय । मनों वाय इच्छह गुरिय ॥ छं० ॥ ६ ॥ दूहा ॥ सत्तहाराधिय सुमहि । हरि दाढा ग्रन जान ॥ १ सो संभरि सोमेस बर । सो कौनी पहिचान ॥ छं० ॥ ७० ॥ (१) ए. कृ. को.-डरुअ । (२) मो.-जिनं । * मो.-इक्क वल भग्गल मिल्लहि । ( ३ ) ए. कृ. को.-पग । (४) मो.-ग। (५) ए. कृ. को.-तरफत । (६) ए. कृ. को.-छत्री। (७) ए. कृ. को.-लन्यौ। (८) ए.. षुधा, कृ.-षुदया । (९) मो.-दुरत । (१०) ए. कृ. को.-आधारिय । (११) ए. कृ. को.से भरिव सोमेम वर ।

पृथ्वीराजरासो। [ उन्तालीसवां समय १२ १ अपनी सेना को छितर बितर देख कर भीम देव का रोस में आकर स्वयं युद्ध करना । कवित्त ॥ मध्य रूप मध्यंत । मध्य 'धम्मन तन मोचन ॥ सिद्ध सुरध अनुरड्न । वृद्ध वय कामति सोचन ॥ पुत्र बिना बिन बंध । बल सु बंध्यौ भौमंदे ॥ सार सुक्रत आरड । सुष्प लष्पं तमंदे ॥ बंभनिय बिनै सद्धौ सयन । * नय तरत्त रत्ती सुगति ॥ सोमेस सूर सोमेस सों। सार लग्गि बौरह सुभति ॥ छं० ॥ ७१ ॥ कन्ह और भीम देव का परस्पर घोर युद्ध होना । रसाक्ला ॥ रसं बौर मत्ते, लरै लोह तत्त । धुरा कन्द मत्त, रनं रोस पत्ते ॥ छं० ॥ ७२ ॥ मनों काल 'दंते, रसं रुद्र रत्त । झरै फुल्ल पत्ते, विमानं विहत्ते ॥ छं० ॥ ७३॥ षगंगे विहत्ती, उड़े गज्ज मुत्तौ । असं मंस कत्ती, रुधौ धार रत्तौ । छं० ॥ ७४॥ उमा हाथ कत्ती, उछारंत छत्ती। महा भीम मत्ती, इसौ रुद्र रत्ती॥ छं० ॥ ७५ ॥ तजै मोह वंसं, मिलै हंस हंसं । झरै अंत झमी, मनों मेघ भूमौ ॥ छं० ॥ ७६॥ कवि की उक्ति। कवित्त ॥ सघन घाय विधाइ । म यौ को मरन अहुट्टिय ॥ सूरबौर संग्राम । धौर भारथ्य स जुहिय ॥ कोन षेत तजि गयौ । कोन हान्यौ को जित्तौ ॥ लिषं अंक बिन कंक। कोन माया रस वित्तौ॥ (१) मो.-धम्मं । (२) ए. कृ. को.-पुत्रि । * मो.-"नयन तरत तरती सुगति" । ( ३ ) मो.-सोम। ( ४. ए. कृ. को.-मत्ते । + मो. "मुन्यो कौमर आहुट्टिय" ।

उन्तालीसवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासो। ११४१ छह घरौ श्रीन असिवर उद्यौ । धार मार रुधि धार चलि ॥ संजुत्त अग्गि धूमह स जुत। 'छलि बलि बौर बलिष्ट बलि ॥ छं॥७७ ॥ युद्ध स्थल की उपमा वर्णन । सिद्धि रिद्ध विष्टथुरिय । लुथ्थि पर स्नुथ्यि अहुट्टिय ॥ श्रोन सलिल बढ़ि चलिय। मरन मन किंकन जुट्टिय ॥ कलमल सिर वहि गुरिय। नयन अलि वास सु वासिय ॥ जंघ 'मगर कर मौन । कच्छ चुप्परि घग चासिय ॥ पोइनौ अंत सेवाल कच । अंगुलि पग करि झिंग झरि ॥ सोमेस सूर चहुआन रन । भौम भयानक जुद करि ॥ छं ॥७८॥ दूहा ॥ हय गय जुद्ध अनुद्द परि । बहत सार असरार ॥ *मानों जालुग अंत कौ । आनि सँ पत्तौ पार ॥ छं० ॥ ७ ॥ कन्हराय का भीम देव के हाथी को मार गिरना। कवित्त ॥ सोमेसर अरि सूर । ढाहि दोनै बरि वान नल कूवर मनि ग्रीव । जमल भग्गा "तरु कान्ह वे सराप नारद प्रमान । दरसन हर लविय ॥ इन तमंग उत्तरै । सार कड़े बर बढिय ॥ विघ्घात घात मत्तौ कलह ।असुर सुरन मत्तौ महन ॥ क? सुरत्त कित्तिय सुभट । सु कविचंद "कित्तौ कहन ॥छ॥८॥ दोनों सेनाओं में परस्पर घोर युद्ध । भुजंगौ ॥ बजे बौर बौरं सु सारं षनकै । महा मुक्ति बत्ते सु बौरं रनक गजे बौर बद करनाल सह। सनाहं ससूरं बहै सार ह॥छं॥८॥ नचै जंग रंगं ततथ्य तथंगं। लच रंक चित्तं मनं सूर पंगं ॥ बढे बंक ककं ससंको धरानं । नगं नग्ग जुट्टे अमग्ग परानं ॥छ॥२॥ १) ए. कृ. को.-बलि । (२) ए. कृ. को. मकर । * ए. क. को. मनो जोग जुगत्ति को । (३) ए. कृ. को.-दीनौ । ( ४ ) ए. कृ. को.-वर । (५) मो.तर । (६ ) ए.-सहन । (७) मो. कीरति । ८) ए. कृ. को.-जंग। (२) ए. कृ. को.-चले। ।

[उन्तालीसवां समय १२ ११४२ पृथ्वीराजरासो। उनकत घंटे रनके नफेरौ । मया मोह दोषन्न सूरन्न'नेरी ॥ धरं धार दौरै ढंढोरें सु ढालं । मनों चक्र फेरै कि पंकं कुलालं ॥ छं ॥८३॥ जामराय यदव और उसके सम्मुख खंगार का युद्ध करना, दोनों की मतवाले हाथियों से उपमा वर्णन । कवित्त ॥ समर समुद भौमंग । मध्य वड़वानल राजं ॥ चाहुान चालुक्क । रोस जुट्टे बल साजं ॥ दल दष्पिन जदु जाम । कलप अंती कर कुप्पौ ॥ 'ता मुष्षह षंगार । झार अग्गी भर रुप्पौ ॥ बिरचे कि 'महिष बलबंड बल । दल चमूह चवदंत हुअ ॥ वप काम जाम इक जहर भर । बहर रूप पिष्षति दुव ॥ छं० ॥८४॥ रसावला ॥ जदू जाम जोधं, षंगारं सरोधं । भरं भार क्रुद्धं, रमै रोस उड्च ॥ छं० ॥८५॥ करें केलि कंकी, षुते लज्ज पंको । करुरं करारे, मनों मत्तवारे ॥ छं० ॥८६॥ पियें लोह छक्क, बकै मार हक । धरा धौर धूनें, फिरं अश्व सूनें ॥ छं० ॥८७॥ विना दंत दंती, किए ऋद्धवंतौ । गिरें कूट कारे, भरै रत्त धारे ॥ छं० ॥८८॥ परै "सार मारे, भयानं निनारे । हयं पाइ एक, फिरै षेत केक ॥ छं० ॥८६॥ दुयं मुष्ष लग्नं, डिगै नाति डिग्गै । परै लीह पूर, गिनै नाति सूरं ॥ छं० ॥१०॥ वहै श्रोन धारं, अरें "भिन्न सारं। छं० ॥ ६१॥ उक्त दोनों वीरों की मदान्ध बैल से उपमा वर्णन । - .... .... (१) ए. कृ. को.-मेरी । (२) मो.-तसु । ( ३) ए. कृ. को.-वलष । (४) ए. कृ. को.-समूह । (५) मो.-मार । (६) ए.-फिरन, कृ. को. मो.-झिरन ।

उन्तालीसवां समय १५ ] पृथ्वीराजरासो। ११४३ गाथा ॥ यों लग्ग रन सूरं । ज्यों मत्त 'वृषभ रोस रंगाई। गरज धर षुर घुदे । तक घाइ अप्य अंगाई॥ छं० ॥ १२ ॥ इन वीरों का युद्ध देख कर देवताओं का विस्मित होना और पुष्प दृष्टि करना । दूहा ॥ अमर धर पन्नग असुर । पिषि सह रष्पित नैन । सुमन ससंभ्रम पिष्पि क्रम । सुमन स 'दृष्टिय गैन ॥ छं० ॥ १३ ॥ सघन घाइ घूमत विघट । षिले कि पन्नग मंत्र । विस भोर डंविस सबल । सगति नहीं जुग 'जंत्र ॥ छं० ॥ ६४ ॥ सोमेश्वर जी के वाम सेनाध्यक्ष बलभद्र का पराक्रम वर्णन । कवित्त ॥ वाम अंग सजि संग । बलिय बलिभद्र विरचि रन ॥ सेत चमर गज सेत । सेत गज झप करनि गन ॥ सेत हयन गज गाह । घंट घूघर घनघोरं ।। वष्षर पष्षर जौन । सार दडुर दल रोरं ॥ गज गाज बाजि नौसान धुनि । अति उम्भर दल जोर वर ।। बजि लाग राग सिंधूस धुनि । करन सु उथल्ल पत्थल्लधर ॥छं०॥६५॥ भीम देव की सेना का भी मावस की रात्रि के समान जुट कर आगे बढ़ना। दूहा ॥ पावस मावस निसि धुनिय। सजि सारंगी आइ । षिभिर षेत घन घाइ मिलि । जानिक लग्गी लाइ॥ छं० ॥१६॥ सोमेश्वर जी की तरफ के बहुत से *कछवाहे वीरों का मारा जाना (१) मो.-मनयं रोसं । (२) मो.-द्रष्टिय । ( ३ ) मो. सकति,। ( ४ ) ए.-तंत्र । (५) मो.-पथ्थ । * कछवाहा क्षत्रियों की एक जाति विशेष को कहते हैं । वर्तमान जैपुर राज्य उसी वंश में है। कवि ने इस कछवाहा शब्द के लिये प्रायः कूरंभ शब्द प्रयोग किया है जो कि कूर्म (कच्छप, कछुवा) शब्द का अपभ्रंस है।

११४४ पृथ्वीराजरासो। [उन्तालीसवां समय १६ %D भुजंगौ ॥ मिले सेन 'सूरं करुरं करारे । छुटै बान कम्मान करि बार धारे। परै कत्तियं घात निरघात बौरं । फिर रुंड मुंडं तनं तच्छ नौरं॥ छं० ॥१७॥ उड़े दंत सुंडं भसुंडं निनारे । मनों कजल कूट अहि चंद दारे॥ उड़े टोप टूक गुरज्ज प्रहारे। मनों सूर सौसं बसे चंद तारे ॥ छं० ॥१८॥ भई तौरयं भौर अप्रेव मानं । सरं पंजरं पथ्य पंडेव जानं ॥ मिले सेल भेल भएक भयंती। कुटे धान मानों धनं कूटकंती ॥ छं० ॥१६॥ रजं रज्ज रज्ज सुरज्ज अनूपं । रमैं जानि वासंत भूपाल भूपं ॥ जिनं कच्छ वच्चं धरंध्रम्म धारै। तिनं झल्लियं घग्ग अरि सस्त्र भारी छं० ॥ १० ॥ जिते काछवाचं जितं ध्रम्म धारी। तिनं ठिल्लियंभार भर भौर फारी॥ धरं धुक्कियं धार करंभदेवं । सुभै सस्त्र सज्या मनों संत नेवं ॥ छं० ॥ १०१ ॥ भीमदेव की सेना का चारों ओर से सोमेश्वर को घेर लेना। दूहा ॥ दच्छिन पच्छिम वाम दल । वृत्त अनुद्धिय सार ॥ गोल गहर गाजी अनी। सोमेसर अरि भार ॥ छं० ॥ १०२ ॥ उस समय चहुआन बीरों का जीवन की आशा छोड़ कर युद्ध करना। गाथा ॥ बज्ज रन रनतूरं । गज्जे गहर सूर षल चूरं ॥ मंडे निजर करुरं। छंडे मरन मोह सासूरं ॥ छं० ॥ १०३ ॥ सोमेश्वर और भीमदेव का परस्पर साम्हना होना। साटक ॥ पिष्ये यं सोमेस गुज्जर धनौ, मचकंदु निद्रा तयं ।। जलधेयं गंजाल कोपित वलं, हालाहल नैनयं ॥ - ॥ (१) ए. कृ. को.-सार । (२) मो.-तीरं ।

उन्तालीसवां समय १७ ] पृथ्वीराजरासो। जो वंडं करवान कर्णित दलं, अज्ज न आयातयं ॥ श्री बोरं चहुबान वानति बलं, चाल क संघातयं ॥ छं० ॥ १०४ ॥ भीमदेव और सोमेश्वर दोनों की सेनाओं का परस्पर युद्ध करना। भुजंगौ ॥ बढ़े बान चहुआन चालुक्क घेतं । महा मंत्र विद्या गुरं सुक जेतं॥ घने घोर नौसान गज्जे गहारं । उठे जानि प्रासाद बर्षा 'प्रहारं ॥ छं० ॥ १०५ ॥ बजी भेरि भंकार नफ्फेरि नादं । तड़कत बिज्ज करनाल सादं ॥ छुटौ बान जंत्री उड़ी गेन अग्गी । महादेव बोरं चषं निद्र भग्गी॥ छं० ॥ १०६॥ सहन्नाइ सिंधू सुरं हर्ष वौरं । नचे ताल संमाल वेताल श्रीरं ॥ नचें त्रत्य नौसान नारद घाई। चढ़ी व्योम विम्मान अपछरि सुहाई॥ छं० ॥ १०७॥ जके जष्य गंधर्व कौतिग्ग हारी। प्रलैकालयं ष्याल 'प्यालं विचारी॥ दुवं दिग्गपाल दुवं छत्रधारौ । दुवं ढाल ढिंचाल मलं करारौ ॥ छं० ॥ १०८॥ दुअं 'तबल दारं दुवं बिरद वानं । दुअं भूमि संघार हिंदू हदानं ॥ दुअं सूर पूतं दुचं कस्य पाए । दुअं दंद दारुन बाजे बजार ॥ छं० ॥ १०६॥ दुलं लोह मेवाड़ मंडूर मानं । दुअं हंकि हंकार बढे ब रानं ॥ दुवं सैन स्याही जल बद्दलानं । दुषं गज्ज गुम्मानयं तेज भानं ॥ छं० ॥ ११० ॥ रची चचरी लोह डंडं डरारौ। प्रहत्तीय वेरा अचंती करारी॥ सरं जाल भाल भिदै जंत्र जौवं । हयं हौस मंडे गरज्जे करीवं ॥ छं० ॥१११ ॥ ( १ ) मो.-पहारं । ( ३ ) को.-पत्री, ए. कृ. को.-क्षत्री । (५) को.-अस्व, ए. कृ.-अस्य । (२) ए. कृ. को.-महाबीर देव । ( ४ ) ए.-तन्न, क. को.-तत्व । ६) ए. कृ. को.-रसं। mernmommission १९४६ पृथ्वीराजरासो। [ उन्तालीसवां समय १८ तुटै हड्ड मंसं धरंग अभंती । गहै अंत गिड्डौ गयंनं भमंती॥ उW छौछ तारं अपारं उतंगं । सुरं दृष्ट बंधूक पूजं 'जुतंगं ॥ छं० ॥ ११२॥ छटें मझझ समझ नरं केक कच्चे । लरें जंग हथ्य बिना केक रक्ष। उड़े पुण्यरौ पन्ग झार करारी । मनों चंद सूरं दधौ पूज धारौ ॥ छं० ॥ ११३॥ किते घाइ अध्याइ घट घूम लु है । तिनं जम्म मनं क्रमं बंध छुट्ट। किते लोह छक्के रनं भूमि घूमें। तिनं वास वैकुंठ कै ठाम धूमै ॥ छं० ॥ ० ॥ ११४॥ जिते अंग अंग परे टूटि न्यारे । तिनं उप्पजै मुक्ति कै भूम त्यारे॥ कहै कब्धि वष्यान किं वर्नि तेनं । फलै कृषि पच्छं मरनं जितेन। छं० ० ॥ ११५॥ कवित्त ॥ हालाहल वित्तयौ। सार मत्तौ झोलाहल ॥ जुग्गिनि जय जय जपहि। पस्म, पंषिन कोलाहल ॥ धर परंत दुरि धरनि । उत्त मंगतिहि कारहि ॥ भर भरंत घग्गाह । बौर डंकिनि ढकारहि ॥ महि मच्चि महरत मरन रन । सह जाइ जय सुर करिय ॥ चहुबान सूर सोमेस रन । पंड पंड तन झरि परिय ॥छं०॥११६॥ अपना मरण निश्चय जान कर सोमेश्वर का अतुलित वीरता से युद्ध करना और उसका मारा जाना । हय गय नर भर परिय । भिरिय भारथ सम्मानं ॥ सोमेसर संचयौ । मरन निहचै उनमानं॥ रत्त रंग सवरंग । जंग सारह उभभारै॥ इक्कि मार धकि सार । झुम्मि झग सार 'सु रारै ॥ कलहंत कंक अनभूत हुअ । उड़हि हंस हंसन मिलहि ॥ तन तुट्टि रुधिर पल हड्ड सन । कै कमंध उठि रन पिलहि ॥छं०॥११७॥ (१) ए. कृ. को. भुतंगें । ( २ ) मो.-तनं । (३) ए.-ऋषि । ( ४ ) मो.-सुसारै ।

उन्तालीसवां समय १६ ] पृथ्वीराजरासो। ११४७ सोमेश्वर के साथ मारे गए हाथी घोड़े पदाती एवं रावत सामंतों की संख्या कथन । बाजि नंषि सोमेस । सहस बर इक प्रमानं ॥ तिन मध कहि पंचास । बौर भारथ भरि पानं ॥ तीन तौस घट परे । पन्यौ सोमेसर घेतं ॥ गिद्धि सिद्धि वेताल । कंक बंध्यौ सिर नेतं ॥ लम्भौ सु मुगति अदभुत जुगति । हंस हंकि हंसह मिल्यौ ॥ सोमेस करी सोमेस गति । पंच तत्त पंचह मिल्यौ ॥ छं० ॥ ११८ ॥ सोमेश्वर का मरना और भीमदेव का घायल होकर मूर्छित होना। दूहा ॥ जुभिभ प-यौ सोमेस धर । डोला चालक राय ॥ दुहूं सेन झरि धर परे । बजी बत्त पग चाइ ॥ छं० ॥ ११६ ॥ नए मृत्य वप रिष्षि के । ज्यों फिरि करिहैं झुझम ॥ चतुरानन चिंता भई । नर भारथ्य अबुभम ॥ छं० ॥ १२० ॥ सोमेश्वर को मुक्ति सहज ही मिली। गाथा ॥ जा 'मुक्किं जोगिंद । कालं काह मम्म भ्रमाई॥ सा मुक्ती सोमेसं । इक्क छिने लम्भियं राजा ॥ छं० ॥ १२१ ॥ भूमौ भरंत भरयं । कलयं कर कथ्यि कथ्य वं । जै जै जंपि जगत्तं । है है नम्भ सद्द सुर यायं ॥ छं० ॥ १२२ ॥ पृथ्वीराज का सोमेश्वर की मृत्यु सुन कर भूमि शय्या धारण करना और षोड़सी आदि मृत्युकर्म करना । कवित्त ॥ सुन्यौ राज प्रथिराज । भूमि सिज्जा अवधारिय ।। तात काज तिन पिंड । दान षोडस विचारिय ॥ भह मद सद्दयौ । राज गति श्रब्ब प्रकारं ॥ ( १ )मो.-तिन मध्य सु पंचास । (२) १. कृ. को.-मुक्ति, मुक्तिं ।

११४८ पृथ्वीराजरासो। [ उन्तालीसवां समय २० हादस दिन प्रथिराज । भूमि सज्या संथारं ॥ विन भोग भोज इक टंक करि । सुहथ दान दिय राज बर ॥ दिन्नौ न कोइ दैहै न कोइ । इतौ दान जनमंत नर ॥छं० ॥ १२३॥ पृथ्वीराज का भूमि गो स्वर्णादि दान करना और पण करना कि जब तक भोराराय को न मार लूंगा न पाग बाधूंगा न घी खाऊंगा। अठ्ठ सहस दिय धेन ।। तब प्रथ्यो विधि धारिय॥ हेम शृंग षुर हेम । तौल हादस हिमसारिय ॥ जुगति जुगति विधि नान । दान घोड़स विस्तारं॥ तात वैर संग्रहन । लेन प्रथिराज विचारं॥ छुत मुकि पाघ बंधन तजिय। सुश्त बौर लौनौ विषम ॥ चालु क भौम भर गंजिके । कढ़ौ तात उदरह सुषम ॥ छं० ॥ १२४ ॥ अरिल्ल ॥ धिग ताहि ताहि जीवन प्रमान । सध्यौ न तात बैरह बिनान ॥ राजिंदु दृष्टि रग तेत नेन । बन्यौ सु रोसु उर उमडि गेन ॥ छं॥१२५॥ पृथ्वीराज का भोराराय पर चढ़ाई करने की इच्छा करना परन्तु मंत्रियों का पृथ्वीराज को अजमेर की गद्दी पर बैठाने का मंत्र देना । दूहा ॥ सजन सेन चाहै बपति । बैर तात प्रथिराज ॥ पाठ पुच बैठन मतौ । पच्छ सु जुद्धह काज ॥ छं० ॥ १२६ ॥ पृथ्वीराज का राज्याभिषेक । कवित्त ॥ बोलि बिप्र प्रथिराज । तत्त बुद्धी अधिकारिय ॥ राज कम सब जान । धम्म क्रममह तन धारिय ॥ जग्य जाप मति जोग । क्रम्म बंधन बल बंधन ॥ दिषत 'मुष्प जनु 'ब्रह्म । पाप भंजन जन सज्जन ॥ * मो.-"तब प्रथिराज सुधारिय” पाठ है । (१) मो.-सुष्य । (२) मो.-ब्रिम्म ।

उन्तालीसवां समय २१] पृथ्वीराजरासो। ११४६ जोगिंद जोग पुज्ज नहीं । काल बिदस जानै सुमति ॥ सासाति सूर सोमह करन । सुविधि सूर मंडौ सुभति॥ छं० ॥१२७॥ दूहा ॥ राज विप्र बोले सुत । जजन सुजग्य पवित्र ॥ तत्र कोइ पुज्ज नहै। क्रम बारन बर मित्र ॥ छं० ॥ १२८ ॥ पृथ्वीराज का दरवार में बैठना और विनों का स्वस्तयन पढ़ कर तिलक करना। पडरौ॥ आरसु विप्र दरबार बार । 'साधंत जोग मति सिद्ध 'सार ॥ मतिवंत रत्ति प्रथमौत जोग । जुग जगति सेव तिन देन भोग ॥ छं० ॥ १२६ ॥ पूजै प्रकार साधन अनेव । तिन प्रसन होइ तन मद्धि देव ॥ देषेति बिन इन विधि प्रकार । जानंत बुधि तत्तौ प्रचार ॥ छं० ॥ १३०॥ महि मगन मंडि नहिं निकट फंद । दिष्यंत देह आनंद कंद ॥ प्रथिराज इंद्र राजिंद जोग । अप्प सु मुक्ति अरु भुक्ति भोग ॥ छं० ॥ १३१ ॥ धर धरनि भिरन दै दान राज । सोवन भूमि मंडी विराज ॥ पद सहस सहस बर हेम इक्क । अप्प सु दान मानह विसिक ॥ छं० ॥ १३२ ॥ जोगिंद मत्ति प्रथिराज किन्न । बर बौर धौर साधंत भिन्न ॥ छं० ॥ १३३ ॥ पृथ्वीराज का ब्राह्मणों को दान देना और दरवार नृत्य गान होना। दूहा ॥ विविध दान परिमान करि । निगमबोध सुभ थान ॥ लिय दिया जहां ध्रम्म सुत । करि अभिषेक नपान ॥ छं॥१३४ ॥ में (१) कृ.-साबधन । (३) ए. कृ. को.-रत्त । (६) ए. कृ. को.-जोगिंद्र । (२) ए. क. को.-चार। (४) कृ. ए.-नैन । (७ ) मो.-मंति। (५) को. मो.-राजन ।

१९५० पृथ्वीराजरालो। [ उन्तालीसवां समय २२ भ्रमरावली ॥ नव बौर नवं रस बौर नच्यौ । भ्रमरावलि छंद सु चंद रचौ ॥ सिधि बुद्धिय विप्र समान धरं । मति जानत तत्त सुमत्ति गुरं ॥ छं० ॥ १३५ ॥ .... .... गुर जानन गो विध तत्त सुरं। मनु बिंब सु बिंबर रंभ डरं ॥ त्रिय दिष्षिय रंभति रंभ गती। ॥ छं० ॥ १३६ ॥ वय स्याम सषौ गुन गौर धरं। कविचंद सु बनन कित्ति करं॥ तमको तम तेज किरन 'रजं । तिन देषत चंद कलाति लजं॥ छं० ॥ १३७॥ गुर सत्त वुधं गुरमत्त असं । तिन कै उर काम ककन्न नसं ॥ बहके नग ज्यों गज मग्ग फिरें । तुटि वार प्रहारत धार धरै ॥ छं० ॥ १३८॥ .... । मनु तारक तेज ससौ उचारै छलकै छिति मत्ति जराइ जसं । झलकै जनु मुत्तिय मुत्ति गसं ॥ छं० ॥ १३ ॥ गुर च्यार ग्रहं गुरु जीव रवी । प्रगटी जनु जोति सु तेज हवी ॥ ॥ छं० ॥ १४० ॥ दार में सब सामंतों सहित बैठे हुए पृथ्वीराज की शोभा वर्णन । कवित्त ॥ प्रगटि राज दर जोति । रंग रवनी रस गावहिं॥ पाट बैठि प्रथिराज । सब्ब सामंत सु भावहिं॥ दधि तंदुल हरि दूब । सुभ्भ रोचन कसमौरं ॥ मनों भान में भान । प्रगटि कल किरन सरोरं । दिष्षियै बाल गावत सरन । सपत सुरस घट राग 'मति ॥ संसार भेद आभेद रत। पत्ति प्रकृति साधत सुरति ॥छ०॥१४॥ (१) ए.-जरं । ४ ) ए. कृ. को.-गति । (७) मो.-सुरनि । (२) ९. कृ. को.-किरति । (३) ए. क. को.-घट । (५) मो.-रन । (६) ए. कृ. को.-प्रगति ।

उन्तालीसवां समय २३ ] पृथ्वीराजरासो। भुजंगी। कुरंगी मु चंगों द्रपंगौति वाले । इक मोल अंमोल लोलंत भाले॥ गरे पुप्फ माला विसालाति धारें । मयंका मुषो कठ कलयंठ सा । छं० ॥ १४२ ॥ दूहा ॥ वित मति गति सारंत विधि । वप जै जै प्रथिराज ॥ मनों इंदु सुरपुर गहन । उदै करै मनु साज ॥ छं० ॥ १४३ ॥ लोइ स पते तिन महल । जहँ सामंत नरिंद इच्छिनि अंचल गंठ जुरि । मनों इंद्रानौ इंद्र ॥ छं० ॥ १४४ ॥ भुजंगौ ॥ नृपं इच्छिनौ गंठि बंधी प्रकारे। मनों कामता काम की बुद्धि तारें। दुहूं रंग रंगी सु रंगीति साधौ । मनों जीव गुर राह एकंत बाधी। छं० ॥ १४५॥ सही सत्त मंतं प्रकारे निनारे । मनों मेनिका रंभ आषे अपारे । बरं देषि असमान अभिमान जानै। बने कोन वृन्नत ता बुद्धि दाने॥ छं० ॥ १४६॥ दूहा ॥ चौअग्गानौ लच्छि दै। सब सामंतन सथ्य ॥ जस जा हथ्थन बिप्प के । भौ कामिनिति समथ्थ ॥छं०॥१४॥ गाथा ॥ उभै राम बर सूरं। सामंतं सत्त षट दूनं ॥ ता अप्पन प्रथिराज। चौ अग्गा लच्छि संग्राम ॥ छं. ॥१४८ ॥ ईच्छनी से गठवन्धन हो कर पृथ्वीराज का कुलाचर संबन्धी पूजन विधान करना । भुजंगी ॥ भई कामना काम कामित्त राज। दियौ कन्ह चहुबान हथ्यो विराज॥ उभे राज राजंग जोगिंदु मित्त । मनो देवता जीव के जग्य जत्तं ॥ छं० • ॥ १४९ ॥ पृथ्वीराज का राज गद्दी पर बैठना। पहिले कन्ह का और तिस पीछे क्रमानुसार अन्य सब सामंतों का टीका करना। दूहा ॥ प्रथम तिलक सिर कन्र किय । दुत्तिय निडर रठौर ॥ इन अग्गह सुभ संत करि । तापछ सुम्भर और ॥ छं० ॥ १५ ॥ (१) मो.-कलकंक।

[ उन्तालीसवां समय २४
१९५२
पृथ्वीराजरासो।
कवित्त ॥ कियौ तिलक बर कन्ट । पाट प्रथिराज विराजहि ॥
मनो इंद्र अरधंग । हथ्थ इंदीवर राजहि ॥
चमर सेत सोभंत । ढुरत चावहिसि सौसं ॥
मनों भान पर धरिय। किरनि ससि को प्रति रोसं ॥
अवनौस इंद्र लग्यौ तपन । धुअ सुतेज तप उद्धरन ॥
सुरतान गहन मोषन करन । बहु बौरां रस संविधन ॥ छं० ॥१५१ ॥
पृथ्वीराज की शोभा का वर्णन ।
कनक दंड सिर छच । सुभत चौहान सौस पर ॥
कै तरत्त ससि भान । तेज मंगल जंगल गुर ॥
ग्रह सुसंत संग्रहन । पंच पंचौ अधिकारिय ॥
चावदिसि चहुआन । दिष्टि नवग्रह बल टारिय ॥
प्रज मिलिय आनि बढ्यौ अनँद। चंद छंद चातिग रटहि ॥
प्रथिराज सु बर दुजन मनह । काल व्याल कारन ठटहि ॥छं० १५२ ॥
इति श्री कबिचंद विरचिते प्रथिराज रासके भोला भीम विजय
सोमेस बंधनो नाम उनचालिसमों प्रस्ताव सम्पूर्णम्॥३९॥

अथ पज्जून छोंगा नाम प्रस्ताव लिष्यते*। (चालीसवां समय।) पृथ्वीराज का पिता की मृत्यु पर दिल्ली आना। दूहा ॥ सुनि कगद प्रथिराज जब । बध्यौ भौम सोमेस ॥ आतुर परि आयौ जहां । दिल्लि देस नरेस ॥ छं ॥१॥ पज्जुन राय कछवाहे की पट्टन के संग्राम में वीरत वर्णन । दूहा ॥ कित्ति कला कूरंभ वल । कहत चंद बरदाय ॥ ज्यों पट्टन संग्राम किय । जाइ सु भोरा राइ ॥ छं० ॥२॥ सुनौ राज प्रथिराज ने। झाला रानिग सूय ॥ विरद बुलावै महबली । छोंगा सज्यौ सधूय ॥ ० ॥ ३ ॥ पृथ्वीराज का पज्जून राय के सिर पर छौंगा बांध कर लड़ाई पर जाने की आज्ञा देना। कवित ॥ छोगाला सिर छत्र । सौस बंध्यौ पज्जनं जस जयपत्त जु आनि । करै परसन सह 'जनं ॥ अप्पातें घर रैठि । रौस कौनौ चालुक्का । होय घटक साल । बात संभरि बालुका ॥ पुच्छैव पल्ह करंभ कों। अप्पानौ दल टारियो । पज्ज न मलयसौ बौर वर। करन कूच उच्चारयौ ॥ छं० ॥ ४ ॥ । * मो.प्रति में "पज्जून कछवाहा छोगा नाम प्रस्ताव" ऐसा पाठ है । + यह दोहा मो.-प्रति में नहीं है और पाठ से भी क्षेपक ज्ञात होता है। (१) ए. कृ. को.-दून । 28 एक प्रकार का राजसी या सरदारी चिन्ह जो पगड़ी के ऊपर बांधा जाता है जिसे झांगी भी कहते हैं । सरपंच, कलगी तुर्रा, इत्यादि का एक भेद है ।

पृथ्वीराजरासो! [चालीसवां समय २ दूत का पृथ्वीराज को समाचार देना कि भोलाराय इस समय सोनिंगर के किले में है और यहां पर पज्जूनराय का चढ़ाई करना । दल भोला भीमंग। साल चिंतिउ सोनिंगर ॥ किये कूच पर कूच । काल घेयौ कि कूट गिर । चंद मंडि ओपन्न । सरद राका परिमानं । उदधि मद्धि जिम अनिल । जलधि लंका गढ़ जानं ॥ दल दूत राज पिथ्यह कहिय । हक्कायौ पन्ज न बल ॥ तुम जाइ जुरौ 'जपम करौ। हनौ राज भौमंग दल ॥ छं० ॥५॥ दूहा ॥ सकल सूर कूरंभ बर । सथ लिन्नौ अप 'जत्ति । समर धौर बौरत सबर । लज्जी पर न भत्ति ॥ छं० ॥ ६॥ पज्जनराय की चढ़ाई की शोभा वर्णन । पडरौ ॥ चन्यौ बौर पज्ज न कूरंभ सथ्यं । मनों कच्छियं जोग जोगी समय दुअं तोन बंधे दुअं लै कमानं। * मनों उत्तरा पथ्य पारथ्थ जानं ॥ छं० ॥७॥ दुचं असं बंसं रचे रथ्य जोरं । लगे पाइ छचौ उठी भोमि भोरं ॥ कियौ पट्टनं कूच चालक थानं । अपं सथ्य बोरं सु लौर जुवानं ॥ छं० ॥८॥ पुछ पंथ पंथी तनं सञ्च अँपै । सुनै दुष्ट बैरी तिनं तेज कंपै ॥ इक चित्त इष्ट "निजा साइ मानें। इसे बौर कूरंभ रैवान जानै छं० ॥६॥ तहा घेरियं ग्राम चालु करायं । अचानक बोरं दरब्बार आयं । ॥ छं० ॥१०॥ (१) ए. कृ. को. ऊपर। (३) ए. क. को.मित्ति । ( ४ ) ए. कृ. को.-जिन । (२) ए. क. को.-जित्ति। * मो.-मनों उत्त पारथ्य जानं | चालीसवां समय ३] पृथ्वीराजरासो। ११५५ * चौकी भौमानौ च । भाला रानिंग सथ्थ ॥ छोंगा और महाबलौ । बर बौरा रस कथ्थ ॥ छं० ॥ ११ ॥ पज्जून राय का घेरा डालना।मलय सिंह का मुकाबला करना। कवित्त ॥ चंपि काल पन्ज न । बौर भोरा भौमंदे ॥ कै आयौ उप्पर । फुट्टि पायाल सबद्दे ॥ सकल सेन चमक्यौ । बौर भोरा उठि जग्यौ ॥ मल सौह मुष काल । हाल सम 'व्याल सुभग्यौ । बकार बौर छौंगा गयौ। सिर मंडन लिय हथ्य धरि ॥ पार सु सौस पज्ज न करि । समर बाल बोरं सुबरि ॥ छं० ॥१२॥ पज्जूनराय का चाबुक भुल जाना और फिर सात कोस से लौट कर चालुक की भरी सेना में से चाबुक ले जान । दूहा ॥ लै छोंगा बर 'बौर चलि । चावक भूल्यौ हथ्थ ॥ सात कोस ते बाहुन्यौ । बर वीरा रस कथ्य ॥ छं० ॥ १३ ॥ पट्टन हट्टन माझ ते । लै आयौ फिरि धौर ॥ ता पाछे बाहर चल्यो । दल चालुको बौर ॥ छं० ॥ १४ ॥ चालुक सेना का पीछा करना और का उसे परास्त करना । भुजंगी। चढ़े पच्छ चास्लुक सो सज्जि सेनं । हकारे नरिंदं सु करंभ तेनं॥ सुने सद्द कन फिरे तथ्य बौरं । छुटै तौर तोरं मनों सिंधु नौरं । । पज्जन राय छं० ॥ १५ ॥ बजै घाइ अध्याइ गज हवाई । बजै श्रावधं मभभ भाव भाई॥ मिले बौर बोरं स्वयं सूर भारे। परे रंग जंगं मनों मत्तवारे ॥ छं० ॥ १६ ॥ झरै सार सारं चिनंगौस उठे । मनो भिंगनं भद्दवं रेंनि वुढे ॥ घनं रत्त घंटै उमा बौर रत्तं । परै अठ्ठदह बौर करंभ पत्त ॥छं०॥१७॥ * ए. कृ. को.-"षिझ्झी विमान चिढ्ढयो" । (१) ए. कृ. को. व्यालह । (२) ए. कृ. को.-लग्यो (३) ए.-चक्कार। (४) ए.-वाले ।

पृथ्वीराजरासो। [चालीसवां समय ४ परे सहस चालुक्क हैवान बौरं । तहां इत्तनैं भान अस्तंम नौरं ॥ छं॥ १८॥ छौंगा देकर भीमदेव का पट्टन को जाना और मलय सिंह और पज्जून राय की कीर्ति का स्थापित होना। दूहा ॥ मल सौह पज्ज न रा । दस दिसि कित्ति अवाज ॥ दै छौंगा भोरा फिल्यौ । गयौ सुपट्टन राज ॥ छं० ॥ १६ ॥ पज्जून राय का पृथ्वीराज को छौंगा नजर करना । गयौ सुचाल क ग्रेह तजि । रही कनै गिरि 'लाज ॥ शेगा करंभ रावल । 'कर दोनौ प्रथिराज ॥ छं० ॥ २० ॥ पृथ्वीराज का पज्जून राय को ही छौंगा दे देना और एक घोड़ा और देना। राज सु छोगा फेरि दिय । बर है वर आरोहि ॥ घटि चालु क बढ़ि करमा । अयुत पराक्रम सोह ॥ छं० ॥ २१ ॥ मलसिंह रानिंग सुत । सुभ्भर भोरा राज ॥ कूर्म अचानक यों प-यौ । ज्यों तीतर पर बाज ॥ छं० ॥ २२ ॥ * पज्ज न राइ महाबली । मल सिंह धर पारि ॥ छोंगा लै पाछे फियौ । सुनि चालु क पुकार ॥ छं० ॥ २३ ॥ चन्द कवि की उक्ति से पज्जून राय के वीर शिरोमणि होने की प्रशंसा । बहुत जुड़ कौनौ सुबर । सुभर तेज प्रथिराज ॥ भट्ट चंद कौरति "तवै । करंभह सिरताज ॥ छं० ॥ २४ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराज रासके पजून कछ वाहा छोंगा नाम च्यालीसमो प्रस्ताव सम्पूणर्म ॥४०॥ (१) ए. कृ. को.-लज्ज । ( २ ) मो. कर दोनौ । ( ३.) ए. कृ. को. प्रथु हथ्थ । (४) मो.-वधि। (५) ए. क. और में नहीं है । इन छन्दों में पुनरुक्ति है इस से इनके क्षेपक होने का भी सन्देह हो सकता है। को. तवी। * छन्द २१ मो.-प्रति २२ - अथ पज्जून चालुक नाम प्रस्ताव लिष्यते। (एकतालीसवां समय ।) जै चंद के उभाड़ने से बालुका राय सौलंकी और शहाबुद्दीन की सेना का दिल्ली पर आक्रमण करना । दूहा ॥ 'बालु का हिंदू कमध । और सु गोरी साहि ॥ साम भेद जैचंद किय । पति दोलौ सम ताहि ॥ छं० ॥ १ ॥ दूत का पृथ्वीराज को यह खबर देना। कवित्त ॥ आइ षबरि चहुबान । 'सु दल बालु कराइ सजि ॥ आइस पंग नरेस । साह साहाब बैर कजि ॥ लष्य दोइ भर दोइ । पुरह घोषंद सुभाइय ॥ दिषि है गै अनमत्त । दृत ढिल्लो दिसि धाइय ॥ प्रथिराज रुधिरु कारौ कढ़िय । समह राम प्रोहित रढ़िय ॥ सुरतान समध बालु क कमध । 'कहें कोन चम्म चढ़िय ॥ छं० ॥२॥ पृथ्वीराज का विचार करना की पज्जून राय से यह कार्य होना संभव है चालु का परि राइ । बौर बज्ज नौसानं ॥ सकल सूर सामंत । षग्ग मग्गं किय पानं ॥ सबर सेन सुरतान । राज प्रथिराज विचारिय ॥ विन करभ को दल । नृपति इह तथ्य उच्चारिय । जो चियन बस्य नन द्रव्य बसि । मरनसु तिन जिम तन मनैं । सिर धरै काम चहुआन कौ। वियौ काम चित्त न गनै ॥ छं० ॥३॥ (१) मो.-चालुक्का । (३) ए. कृ. को.-प्रोहि । (२) मो.-"सुबर चालुक्का राह सजं । ( ४ ) मो. कही कान चढ़े।

पृथ्वीराजरासो। [ एकतालीसवां समय २ बुलाना। पृथ्वीराज का पज्जूनराय को दूहा ॥ बोलि राज प्रथिराज तब । पान हथ्थ दिय 'साज ॥ कहौ जाइ करंभ 'कौं । इह किज्ज हम काज ॥ छं० ॥ ४ ॥ पृथ्वीराज का सभा में बीड़ा रखना और किसी का बीड़ा न उठाना सबका पज्जुनराय की पशंसा करना । कवित्त ॥ सुनि सुबत्त कूरंभ। कोइ भिल्ल न पान बर ॥ बड़गुज्जर दाहिम्म । चूर चालक चंपि धर ॥ परमारह कमधज्ज । बौर परिहारय भट्ठिय ॥ सकल सूर बर नटे। काल च पै मति घट्टिय ॥ पज्ज नराइ पग अग्गरौ । करै नाम निरमल सु धर ॥ इन सम न कोइ रजपूत रन । डरहि काल 'दिष्षिय 'निजर ॥ छं० ॥५॥ पज्जूनराय का भरी सभा में बीड़ा उठा कर दोनों शत्रुओं का ध्वंस करने की प्रतिज्ञा करना । र कूरंभह बौर । धौर आहत धनुडर ॥ * जो मह नह पूजंत । जोग पल पंडन सब्बर ॥ इनह अप्प बल दौरि । जाइ असि असि अरि झारिय । एकल पज्ज न सिंघ । परि पिसुन पछारिय ॥ लै पान सौस कूरंभ धरि । सकल सूर सामंत नटि । चाल कराइ हिंदू दुसह । विषम काल व्यालह सु. जुटि ॥ई॥६॥ सुलतान और कमधुज्ज के दल की सर्प और अफीम से उपमा और पज्जूनराय की और ऊँट से उपमा वर्णन । की गरुड़ (१) ए. कृ. को. बाज । ( ४ ) ए. कृ. को..नजरि । (२) ए. कृ. को.-सौं। ३) ए. कृ. को.-दिष्षै। * मो.-प्रति-जोगन पुज्जै जोग षल षंडन बीर ।

एकतालीसवां समय३] पृथ्वीराजरासो। दूहा ॥ कालव्याल सुरतान दल । कमध सु पंषय कूट ॥ हरि वाहन पज्ज न दल । ते सजि धार 'ऊँट ॥ छं० ॥ ७ ॥ पज्जूनराय के बीड़ा उठाने पर सभा में आनन्द ध्वनि होना। भुजंगौ ॥ लियौ पान पज्जून करभराई। स्वयं जानते सोइ कौनौ सु भाई॥ मिलि अग्गि करंभ सोचित्त जानं । गई दृढ़ चहुआन सुरतान मानं॥ छं०॥८॥ बजे दुंदुभी देव देवं सु थानं । भयौ मुष्प करंभ चितं स भानं ॥ ॥ छं० ॥६॥ पृथ्वीराज का पज्जूनराय को घोड़ा देना। दूहा ॥ लरन हथ्थ लिय तेग बर । बगसि राज तब बाज ॥ लिय कूरभ कुल उज्जले । सौस नवाइ समाज ॥ छं० ॥ १० ॥ चढ़ाई के लिये तय्यार हो कर पज्जूनराय का अपने कुटुम्ब से मिलना और उसके पांचों भाइयों का साथ होना । कवित्त ॥ 'घग्ग बंधि करंभ। आइ पज्ज न अप्पन भर ॥ सुबर बौर बलिभद्र । तात पज्ज न सथ्य वर ॥ कन्ह बौर बर बौर । सिंघ पाल्हन्न सुधारं ॥ मलयसिंह सब हथ्थ । संग लौने भर सारं॥ चित स्वामिभ्रंम सो अरि भिरन । लरन मरन तकसौर नन ॥ सुनि राग बौर काइर धरकि। बजिग बौर नौसान घन ॥ छं० ॥११॥ पज्जून राय की चढ़ाई की शोभा वर्णन । दूहा ॥ बजिग बौर नौसान धन । पावस सक्र समोर ॥ चढिग जोध पज्ज न भर । सज्जि हयग्गय बौर ॥ छं० ॥१२॥ भुजंगी॥ चव्यौ बौर बलिभद्र कूरंभ रायं । कला पथ्य कोटं सुजोटं दिषायं ॥ छबी तेज मुष्पं सु सोभंत बोरं। मनों केवल अंग बोरं सरीरं॥ छं० ॥१३॥ (१) ए. कृ. को. जूटं । (२) कृ. को.-षगा। (३) मो.-परि १९६० पृथ्वीराजरासो। [एकतालीसवां समय ४ चन्यौ बौर संगं नरं सिंग रायं । दिठी दिछु दिछी मनों बेद गायं ॥ चढ्यौ राइ पज्ज न छत्र सुधारे । बदै जाहि स्वामी रवी रत्त भारे॥ छं० ॥१४॥ द्रुमं सौस फेरै पजूनं सहेतं । मनों बाज राज परं बंधि नेतं ॥ चढ़े सेत बंधौ सयं सज्जि सारं। तिथं पंचमी पूर आदीत वारं ॥ छं० ॥१५॥ . पज्जून राय के कूच की तिथि वर्णन। दूहा ॥ तिथि पंचमि रवि बार बर । छडि पंच भर आस ॥ चढ़ जोध है गै परिय। 'मुगति सुलू टन रासि ॥ छं० ॥ १६ ॥ पज्जून राय का कृत वीरताओं का.वर्णन । साटक ॥ धौरंजं धर धौर करम बली, पज्ज न रायं बरं ॥ जित्ते तं सुरतान मान सरसं, भारत बानं विषं ॥ भूयो बाल भुषाल भारथ क्रतं, कृष्णो धरा धट्टियं ॥ तं काजं बर बौर धौर धरयं, संसार मुक्तं बरं ॥ छं० ॥ १७ ॥ पज्जून राय की चढ़ाई का आतंक वर्णन । पवरी ॥ चढ़ि चल्यौ सेन कूरंभ बौर । डपटौय जानि साइर गंभौर ।। बंधिय सुतीन कूरंभ मंत। जाने कि जोग जोगाधि अंत ॥ छं ॥१८॥ तहाँ हुए सगुन र सुभ्र रूप । दाहारसिंघ रवि रथ्थ जूप ॥ दाहिने पूठ मम मृगिय जाय । बामह सुबौय सारस सुभाय ॥ छं० ॥१६॥ उत्तरै तार देवौति वार । डहकंत सह जुग्गिनिय भार ॥ मृगराज मिल्यौ दंतह प्रमान। बंदे सुराज पज्ज न जान ॥ई०॥२०॥ पज्जून राय का यवन सेना के मुकाबिले पर पहुंचना। दूहा ॥ सकल सूर करंभ बर । भान भयग मुष बौर ॥ राइ चालक बर । भाइ सँ पत्तौ तौर ॥ छं० ॥ २१॥ (१) ए. कृ. को.-मुकति । (२) ए. को.-धीरज्जं । (३) ए.-वढे, कृ.-वैदै। (४) ए. कृ. को.-संपनौ । तब र. कृ.

एकतालीसवां समय ५] पृथ्वीराजरासो। कमधुज्ज और यवन सेना से पज्जून राय का साम्हना होना। आइ सँ पत्ते खर भर । सुरताना कमधज्ज ॥ करंभह पज्जून सम । चढ़े जोध गुर गज्ज ॥ छं० ॥ २२ ॥ दोनो प्रतिपक्षी सेनाओं का अतंक वर्णन । पडरौ ॥ दुअ दौन हिंदु संमुह प्रमान । चालुक राइ अरि मलन भान । चहुबान सूर रबि जेम बौर । पट्टन सु राइ अरि ग्रसन धौर ॥ छं० ॥ २३॥ करम्म दान पग रूप दोन । अस्नान जान रज रूप कौन ॥ छं० ॥ २४॥ दूहा ॥ करिग सेन संमुष सुबर । गरूड़ व्यूह किय बौर ॥ लरन मरन भारथ्य क्रत । जज्जर करन सरीर ॥ छं० ॥२५॥ 'ग्रिड्ड व्यूह कूरंभ करि । नाग व्यूह सुरतान ॥ षा ततार पुरसान पति । मंडि फौज मैदान ॥ छं० ॥ २६ ॥ पज्जून सेना के व्यूहवध्य होने का स्वपष्टीकरण । कवित्त ॥ पग जद्दव परिहार । पुच्छ पामार सुधारिय ॥ भट्टी सेन विषम्म । पिंड पावं अधिकारिय जानु होइ पुंडौर । नष्ष उर मंस अंस करि ॥ चंच अंष सुभ जीह । बौर करंभ पयवरि ॥ 'ग्रीवा सुजोति गज गाह गहि। "लहि लोहानौ ठौर बर ॥ छत्रह “मुजीक पज्जून सह । दौरि पन्यौ बलिभद्र बर ॥ छं० ॥२७॥ युद्ध की तिथि। घरिय सत्त दिन रह्यौ । बार नौमीति सुक्र बर ॥ पंच बौस आवट्टि । * थट्टि लोथं सुबंधि थर ॥ १) मो.-गरुड़। (२) मो.-पंग। (३) ए. कृ. को.-राइ धरि । (४) ए. कृ. को.-ग्रीवह । (५) ए. लरि । (६) मो.-मीठि । (७) मो.-मुनीक । * ए. क.- को.-"लुध्यि पर लुध्धि वंधि थर"। पE-Peter- १९६२ पृथ्वीराजरामो। [एकतालीमचा ममय है कूरम्मह घग भारि । सार भारथ्य सु किन्नौ । सार बज्ज घरयार । टोप टंकार सु मिन्नौ । आचार चारु राजन बरे । मरे बौर रजपूत वर ॥ संग्राम सूर कूरंभ सम । नर न नाग दानव्व 'सुर ॥ छं० ॥ २८ ॥ श्लोक ॥ मानवं दानवं नैवें । देवांनां कुरु पांडवो ॥ करम्म राइ समो बोरं । न भूतो न भविष्यते ॥ छ० ॥ २६ ॥ पज्जून राय की सेना का बड़ी वीरता से युद्ध करना। कवित्त ॥ हाइ हाइ कहि पृष्ट । इ बलिभद्र अंमरिय। बलिय तप्प करम । सार साहित्त घुम्मरिय ॥ यो पजून दल मल्यो । सोइ अोपम कवि भाइय ॥ कमल पंति गजराज । सरित मममह झु कि ग्राहिय ॥ घन घाइ अघाइ सुघाइ घट । करिय एम कूरंभ घट ॥ सुघ्घाट बाइ कुघाट किय । सुभट घाइ भारथ्य 'थट ॥ छं॥३०॥ दूहा ॥ सुभट घाइ भारथ्य भिरि । ते अंगन दिष्पाइ ॥ रुधि सुक्क कम हुए। हय तरंग सुम्भाइ ॥ छं ॥ ३१ ॥ इस युद्ध में पज्जन राय के भाइयों का मारा जाना। जुद्ध सुचालक राइ तहँ । च्यार बंध परि षेत ॥ पंच भ्रात करंभ बर । उप्पारे सु अचेत ॥ छं० ॥ ३२ ॥ पज्जून राय की जीत होना और शव सेना का माल मता लूटा जाना। कवित्त ॥ उप्पारिग पञ्ज्ञ न । बौर बलिभद्र उपारिग ॥ उप्पारिग पाल्हन नरिंदु । घाव 'सतन धारिग ॥ परि पंचाइन कर । जैत जैसिंह जुवानं ॥ हिंदु बौर दमझान । मेच्छ गड्डन परिमानं ॥ (२) ए.-तट । ( १ ) मो.-अमर 1 ( ३ ) ए. कृ. को.-सढे । Hemamartronwurwww.harrain एकतालीसवां ममय ७ ] पृथ्वीराजरामों। * लु? दरब्ब गज बाजि रथ । रिंध राव उप्पारयौ ॥ जस जैत लियौ करंभ रन । जीवन अवनि सु धारयौ ॥ छ॥३३॥ पृथ्वीराज के प्रताप की प्रशंशा। अाज भाग चहान घर । आज भाग हिंदवान ॥ इन जौवत दिल्लौ धरा। गंज न सक आनि ॥ छं० ॥ ३४ ॥ पज्जन राय का भाइयों की क्रिया करना और २५ दिन गमी मना कर दान देना। कोस घट्ट चहुआन बर । संमुष गय बर बौर ॥ उभै बौस अरु पंच दिन । हाइ दान दिय धौर ॥ छं० ॥ ३५ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराज रासाके चालुक समागम पज्जून विजय नामइकतालीसमो प्रस्ताव सम्पूर्णम्॥४१॥ (१) ए. कृ. को.-नर । * छन्द ३४ मो.-प्रति में नहीं है। Pution-

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अथ चंद द्वारका समयौ लिप्यते । (बयालीसवां समय।) कविचंन्द का द्वारिका को जाना। दूहा ॥ चलन 'चिंत चंदह कयौ। चलि हारिका सु चित्त ॥ मंगि सौष प्रथिराज पहु । सजिय सकल अप सथ्थ ॥ छं० ॥ १॥ कविचंद का यात्रा समय का साज सामन और उसके साथियों का वर्णन । कवित्त ॥ दोइ सहस है बर बिसाल । सत वारुन "सथ्यह ॥ सत गयंद रथ रूढ़। साज आसन प्रथि रज्जह ॥ पखक बेद जोजन प्रमान । थटे * संघल क्रत पाइय ॥ साज लष्य तन लष्य । सकल बल कोरि सजाइय॥ धानुक धार सत अठ्ठ चलि । करन तिथ्य जावह चलिय। सत सुभट दान दिय तुरिय गज । मनहु जमन सागर मिलिय । छं० ॥२॥ चन्द का चित्तौर के पास पहुंचना । "गज घंटन चंबाल । मेरि सहनाइय बज्जिय ॥ चलत श्राइ चिचकोट । पुरन त्रियलोक सुरज्जिय ॥ कन्द मान लेय न कविंद । जोजन दु दिष्षिय ॥ शृंगारिय गढ़ हट्ट । मनों इंद्रासन पिष्षिय ॥ (३) ए. कृ. को.-विलास । (१) मो.-चित्त । (२) मो.-पैं। (४) ए. कृ. को.-बारुनह । (५) मो.-समथ्यह । * पाठ अधिक है (७) मो.-घज । (९) मो.-मनों इन्द्र थान विसिध्धिय । (८) ए. कृ. को.-पराष्षिय ।

१९६६ [ बयालीसवां समय २ पृथ्वीगजरासो। बजि चंब बंब वज्जन बहुल । मन उच्छाह भिष दान दिय ॥ गढ़ मड्डि धाम मनु राम पुर । कवि सु तथ्य डेरा करिय ॥छं ॥३॥ चित्तौर गढ़ की स्थापना का वर्णन । *दूहा ॥ गिरवर झंगर गहर बन । प्रबल पेषि जल ठौर ॥ चिचंगद मोरी बसिय । दै गढ़ नाम चितौर ॥ छं० ॥ ४ ॥ चित्रकोट गढ़ की पूर्व कथा। कवित्त ॥ चित्रकोट दिय नाम । बंधि चित्रंगद सर बर ॥ पंषि असंघ निवास । सघन छाया तट तरवर ॥ बुरज कोट कंगुरा । गौष जारी चित्रसारौ ॥ महलायत चहबचा। झिरन कारंज किनारी ॥ पागार पोरि आगार करि । थान सदेवत पिष्षयौ ॥ छतीस बंस महिचंद कहि । मोरौ नाम सु रष्षयौ ॥ छं० ॥ ५ ॥ उक्त मोरी का गोमुष कुंड बनवाना । अरिल्ल ॥ गोमुष कुंड बंधि फुनि मोरिय । सुर पति विपन सोभ सब चोरिय भार अठार उगी बन राइब । देषि के रोझ रह्यौ बरदाइय॥छ०॥६॥ एक सिंहनी का ऋषि के शिष्ष को खालेना। कोरि कट्टि पाषान महि । गिरि कंदर इक रिष्य ॥ मुहु अग्ग सिंघनि भषत । हनि बालक तिहि सिष्य ॥ छ० ॥ ७॥ सिंहनी की पूर्व कथा। कवित्त ॥ नगर अजोध्या नृपति । नाम कौरत्ति धवल्लं॥ सर जसुरि तातट्ट । रमत सिकार सयल्ल। तानि वान कम्मान । हनिय हिरनी ग्रभ वंतिय ॥ तरफंरत अवलोकि । श्रोन घन धार अवंतिय ॥ उतपन्न ग्यान बैराग लिय । कंवर स कोसल संजुगत ॥ अड़ सहि करे तौरथ अटन । चित्रकोट महि तप तपत ॥ छं० ॥८॥ (१) ए. कृ. को.-सध्य । *-छन्द ४ से ले कर छन्द १५ पर्यंत मो.-प्रति में नहीं है और पाठ से भी यह अंश क्षेपक मालूम होता है।

बयालीम्नवां समय ३ पृथ्वीगजरामो। ११६७ पद्धरी ॥ तप तपत आइ चित्रकोट मद्धि । सहचरिय जाइ इह करिय सुद्धि॥ सूनि कान बानि रानौ प्रफुल्लि । उतरन महल्ल सोपानि भुल्लि ॥ छं० ॥६॥ अनुराग सुत्तपति को हरष्प । उठि चलिय मिलन मारग गवष्य ॥ चकचूर भइय परि पहुमि आइ । तड़िता कि तेज तारक दिषा ॥ छं० ॥ १० ॥ जल जलनि विष्प गिरि झप पात। पावहि न गत्ति इह सत्ति बात॥ जप तप्प तिथ्य अस्नान दान । कोटिक्क पढह पंडित पुरान॥ छं०॥११॥ अंतह सुमत्ति गति होइ सोइ । अहंकार उअर जिन करहु कोई ॥ छं० ॥१२॥ कवित्त ॥ बघिनि होइ विकराल । अाइ गिरि कंदर प्यासिय ॥ प्रगटि पुब्ब तामस्त । भंजि अग जंगल ग्रासिय ॥ दंत कंति चमकत । जरित कुंदन मय मेषं ॥ ईहा 'मोह करंत । जनम पछिलो संपेष॥ असराल चष्प अंसू ढरत । पंसूरहि तुच मंस गलि ॥ इक मास लग्गि अनसन्न करि। गय नंगन उड़ि हंस चलि ॥छं०॥१६॥ दूहा ॥ कित्ति धवल धौरज्ज धरि । श्रवन आइ उपकंठ ॥ राम नाम सभलाइ सुर । कुंअर पाइ बैकंठ ॥ छं० ॥ १४ ॥ रघुवंसौ राजिंद नें । मन हटक्कि रषि तब्ब ॥ ग्रभवंती हिरनी हनौ । तिहि वदलो लिय अब ॥ छं० ॥ १५ ॥ कविचंद का आना सुन कर पृथाकुमारी का कवि के डेरे पर जाना । कवित्त ॥ कवि सु सथ्य मति प्रबल । बोलि सहचरी मत्ति बर ॥ नव नव रस भोइन । अनंत इंद्रानि इंद्र घर ॥ रुप माल सु विसाल । मेघ माला सुभ मंजरि ॥ मदन बेलि मालति । विसाल सत अट्ट अनंबर ॥ । ( १ ) कृ.-पोह ।

. [ बयालीसवां समय ४ ११६८ पृथ्वीराजरासो। नरकंध रथ्य के आरुहिय । ढंकि छवि मनों अब जल ॥ प्रति चलिय भट्ट कट्टन दरिद । मोघ निरषि मनुराज थल ॥ छं० ॥१६॥ कितक छब्बि वस्त्रंग । मड्डि माला मुत्तिय मनि ॥ सौतारामौ सहस । कनक थारी सत बोजनि ॥ अगर पान अड़सठ्ठ । रजक पालिका पठाइय ॥ सुवन इक पुत्तरिय । कर सु सारँग 'मुह गाइय ॥ मुक्कलिय प्रथा कबि थान कह। भरन भार अभ्रन भरिय ॥ प्रति प्रति सु दान मानह प्रबल । कवि सषियन आदर करिय ॥ छं० ॥१७॥ कवि का चित्तौर जाना। दूहा ॥ दिय बहोरि वप नगर कों। मिथ आसौस पढ़ाई ॥ प्रति सुनंत मति दति प्रबल । करिस 'कूप कल नाइ ॥छ०॥१८॥ नौल कंठ सिव दरस करि । मात भवानी भेटि ॥ फुनि नरिंद चिचंग मिलि । चंद दंद तन मेटि ॥ छं० ॥ १६ ॥ कवि का किले में भोजन करने जाना। पृथा का उसे भोजन परोसना । अरिल्ल ॥ प्रतिहारन रावन पधराइय । बोलि मंत्र भोजन बुलवाइय ॥ करन प्रथा जेवन परिमानं । उड़ि घुम्मर अम्मर सु प्रमानं ॥ छं० ॥ २० ॥ 'लोह कंड रच्चे सुर सच्ची । कुरछन भारि दियंत सु षिच्ची ॥ मनों ओपमा में छबि रचौ । जेबै बरन अठारह जच्ची ॥छ ॥२१॥ एकलिंग अवतार सुधारिय । नारि केल पुज्ज नर नारिय॥ कस्लिनि कलंक काल कटि भारिय । जेबै सब परिगह परिवारिय ॥ छ० ॥२२॥ १) ए. सुह । ( ३ ) मो..लहा । (२) ए. क. को.-कूष, कुंर । ( ४ ) मो.-मेछ ते रंची।

f बयालीसवां समय ५ ] .! पृथ्वीराजरासो। १२६६ केसर अगर पौरि सब किञ्चिय । पान सुपारि कपूर प्रसिड्डिय ॥ हथ्थी है मोती नग विडिय । दान मान रावर कर दिविय । छं० ॥२३॥ कन्ह अमरसिंहादि सामंतों का पृथा कुमारी को उपहार देना। कनक साज है तुरौ पठाइय । कन्ह एक गज मुत्तिय गाहिय ॥ अमरसिंघ गज मुत्ति सुभाइय । जो चित्रंग भ्रत्य सम राइय ॥ छं० ॥२४॥ मोरो रामप्रताप महाभर । सुष्पासन आरोहिय उप्पर ।। मोती जिरित मोल घन सज्जर । दीय सु दान मान अपरंपर ॥ छं० ॥२५॥ चन्द का चित्तौर से चलना। दूहा ॥ चलिय चंद पट्टन पुरह । अहि सिर पर धरि पौर ॥ पंथ एक पष्षह चलिय । द्रिग सागर दिषि नौर ॥ छं० ॥ २६ ॥ द्वारिकापुरी में पहुंच कर श्रद्धा भक्ति से दर्शन और यथाशक्ति दान करना। कवित्त ॥ उत्तरि हथ्थिय बाजि । * पाइ प्रति मिले सु मंगन ॥ दिठ्ठिय देवल धज्ज । पाप परहरि अँग अंगन ॥ गजत पिठ्ठ गोमतिय । भान तप तेज विराजिय ॥ सागर जल उच्छल । पाप भंजन पाराजिय ॥ रिनछोर राइ दरसन करिय । परिय मोह मानुष्ष पर । सुरथान मान इतनी सुचित । देवलोक कैलास दर ॥ छं० ॥२७॥ दूहा ॥ हाटक मंडप छच लहि । मुत्तिय 'पंतिन माल ॥ मनों चंद बहु भान मम । कल मष कट्टत काल ॥ छं० ॥ २८ ॥ फिरि परदछ दरसन करिय । हुअ परतष्षि प्रमान ॥ तब अस्तुति सु प्रनाम करि । प्रभा विराजिय भान ॥ छं० ॥२६॥ * मो.-पाइ प्रति चले सु मंगल । (२) ए. वंतिय, पंतिय ।

बयालीसवा समय ११७० पृथ्वीराजरासो। कविचंद कृत रणछोड़ जी की स्तुति । रसावला ॥ तुअंदेह हट्टी, तुमान वट्टी। तुअंबौर दट्टी, तुअंथान थट्टी। छं० ॥ ३०॥ तु लोक पालं, तुजालमाले। तुभाल भालं, तुअंद्रिग्गपालं ॥ छं ॥३१॥ तु देस दष्षी, तुअंभौर भष्षौ । तुद्रोप रष्यो, तुअंसर्ग सष्यो। छं० ॥ ३२॥ तुतीन रष्षी, तुझं ब्रह्म लष्यो। तुष रोही, तुअंगोप मोहौ। छं० ॥३३॥ तुझं सत्रु दोहो, तुझं सग्र सोही। तुअ सिद्धि तूंही, तुरिति सोही छं० ॥३४॥ तु सर्व अंडं, तु तीन कुंडं। तुषित्त 'पंडं, तुअं थार मुंडं छं० ॥ ३५॥ तु ग्यान गहूँ, तुरंभ थट्ट, कवीचंद पट्ट, गयौ दूर हड्॥छं०॥३६॥ दूहा ॥ हरिहर वच सच वारि बर । पुर धरि सिर पर इंद॥ मनु गुर तरु फर भार नमि । झलमलि हलि गोविंद छ॥३७॥ देवी की स्तुति । भुजंगौ ॥ नमो नमो नमो तु कुमारौ। नमो नमो तुज संसार सारी॥ नमो तुअभष्यो नमो बौज भष्पौ। नमो रिष्य पूजत सज्जंत सष्यो॥ छं० ॥३८॥ नमो तुरटै राज राजं रजाई । नमो 'तुज संसार तें सिद्ध पाई नमो तंत जालं विकालंत राई । नमो विश्वथानं गिरंजा गिराई॥ छं० ॥३६॥ *नमो सस्सिपास्नं अकालंअभयौ। नमो कालजन्मन कालं न सष्यो। नमो एक भग्नी भरत्तार पंचं। नमो कोरि कोरं करत्तार संचं ॥ छं० ॥ ४० ॥ ( १ ) ए. कृ. को. पंडं । (२) ए. कृ. को.-तूझ, तुझ्झ, तुझे । ( ३ ) ए. क. का. गिरज्जा। * मो. नमो सस्सि पालं अकालंत राई । नमो काल जमन्न कालं नसाई ॥

बयालीसवां समय ७.] पृथ्वीराजरासो। ११७१ नमो सिद्ध तु रिड तुदद्धि पानौ । नमो काल तुभाल तुसाल रानौ। नमो कित्ति तुं मंत्र तं गौतगामौ । नमो आदितं अंत तुंजोग जानौ । छं० ॥ ४१ ॥ नमो विश्व तुं भिस्त तुंभार भारौ। नमो जोग तुं जीव तुं जुग्ग चारौं। नमो भूमि तुं धूम तुं अंब पानी । नमो तप्प तुं ताप तुं अरानी॥ छं० ॥ ४२ ॥ नमो बाल तुं हड्व तूं हाल चालौं । नमो भान तुं मान तुंमुक्ति माली॥ नमो व्याघ्र तुं सार तुं वाग वह । नमो भुंड मुंडं तुहौं पारि सह ॥ छं॥४३॥ नमो पत्र तुं छच तुं छित्ति धारौ । नमो व तुंवृक्ष तुंअध्य हारी॥ नमो रूपतु रंग तुंराग 'रत्तो। नमो भौल तु भाव तुसौल सत्ती॥ छं०॥४४॥ नमो भ्रत्त तुं वृत्त वारु बानी । नमो चंद चंडी सदा चारु मानी। छं०॥४५॥ कवि का होम कर के ब्राह्मण भोजनादि कराना। दूहा ॥ करि असतुति ससतुति सुबर । होम हवन हरि नाम ॥ सीवन तुला सु साज बर । करि सुभट्ट मुचि काम ॥ छं० ॥ ४६ ॥ हय हथ्यौ सत दान दिय । रथ रथ्थिय 'द्रब दिल ॥ हाटक चौर 'वसुंधरा । कवि घर दौन सु निद्ध ॥ छं० ॥ ४७॥ हारिकापुरि में छाप लगवाने का महात्म्य । कवित्त ॥ * जे हारामति जाइ। छाप भुज नाहिं दिवावहिं॥ ते दरवारह चडि । न्याय व्य पिळू दगावहिं ॥ हरि चरन्त्र करि सेव । रहि न उम्मै जुरि करि वर ॥ ते वागुरि अवतरे । अधोमुष “झूलत तर वर ॥ दीनी न जिनहि परदच्छिना । दंडवृत्त करि सुद्ध उर ॥ (१) ए. कृ. को.-रंगी। (२) ए. कृ. को.-संगी। ३) ए. क. को.-धर। ( ४ ) ९. कृ. को.-अनत अनि । * छन्द ४८ और ४९ दोनें मो.-अति. में नहीं है तथा क्षेपक जान पड़ते हैं। ( ५ ) ए.-झूमत, को.-भूलत ।

पृथ्वीराजरासो। [ बयालीसवां समय ८ ११७२ में आना। * कविचंद कहत ते वृषभ होइ । अरहट जु'पेरिरंत नर ॥छ॥४८॥ भद्र भेषनह हुए । जाइ गोमत्ति न न्हावै ॥ तजैन ध्रम सेवरा । होइ करि केस लुचावै ॥ मुष पावन हन करै। वस्त्र धोवै न विवेकं ॥ प्रास्तू अंष परंत। करत उपवास अनेकं ॥ दरसन्न देव मानै नहीं। गंगा गया न श्राद्ध क्रम ॥ कविचंद कहत इन कहा गति । किहि मारग लग्ग सु भ्रम ॥ छं० ॥ ४६॥ द्वारिकापुरी से लौट कर चन्द का भीमदेव की राजधानी पट्टनपुर बंदि देव द्वारिका । करिय अति दान अचग्गल ॥ पट्टन पति भौमंग । मनो चंदन मिलि अग्गर ॥ वास भट्ट गरलंत । लपटि लग्गा मन 'डाहर ॥ तिन सेवर बदि बद्द। चंद मावस उग्गा बर ॥ तिन नगर पहुच्ची चंद कवि । मनों कैलास समाष लहि ॥ उपकंठ महल सागर प्रवल । सघन साह 'चाहन चलहि ॥छं०॥५०॥ पट्टनपुर के नगर एवं धन धान्य की शोभा वर्णन । सहर दिष्षि अंषियन । मनहु बद्दर वाहनु दुति ॥ इक चलंत आवंत । इक ठलवंत नवनि भति ॥ मन दंतन दंतियन । इला उप्पर इल भारं॥ बिप भारथ परि दंति । किए एकठ व्यापारं॥ रजकंब लष दस बीस बहु । दोइ गंजन बादह पन्यौ ॥ अन्नक चौर सूपरु फिरंग । मनों मेर कंठ भन्यौ ॥ छं० ॥ ५१ ॥ (१) ए. कृ. को.-फिरत । (२) ए. कृ. को.-दारह । * "कविचंन्द कहत" ऐसा पाठ कहीं भी नहीं पाया गया है कथाक्रम, काब्य, भाषा आदि ४८ और ४१. छन्दो की बहुत कुछ भिन्न है अत एव इन दोनों छन्दों के क्षेपक होने का सन्देह है । (३) ए. कृ. को.-बाहन ।

बयालीसवां समय ९] पृथ्वीराजरासो। १२७३ .... पलक बिबिध घन भार । रतन मुत्तिय द्रिग रंजत ॥ गज भरि लिज्ज कोरि । दान चुकत मति मंजत ॥ मनों गुल फूलिय धरनि । किड नवग्रह ताराइन ॥ लेय न इव हिम दान। रज्ज साला हिम भाइन ॥ भाषन सु भाष कढ मुषह । सिर स्वानह तरु धरु धवल ॥ प्रतिबिंब बसहु द्रय मानि मन। कबि मोहन दिष्पीय बल ॥छ॥५२॥ पट्टनपुर के आनन्दमय नगर और वहां की सुन्दरी स्त्रियों की शोभा वर्णन । अईनराच ॥ बजान बज्जयं घनं । सुरा सुरं अनंगनं ॥ सदान सद्द सागरं । समुद्दयं पटा झरं॥ छं० ॥ ५३॥ 'नग्यद कै गजं बरं। हलं मलं हयं गयं । नरा नरं नरिंदयं ॥ छं० ॥ ५४॥ गिरं वरं 'सुरा धरं । सबद्द सागरं पुरं। अनेक रिवि भानयं । नवं निधं सु जानयं ॥ छं० ॥ ५५ ॥ भरे जु कुंभयं धनं । इला सु पानि गंगनं ॥ असा अनेक कुंडनं। .... ॥ छं० ॥५६॥ सरोवरं समानयं । परोस रंभ जानयं ॥ बतक सार संमयं । अनेक हंस क्रम्मयं ॥ छं० ॥ ५७॥ भरै सु नौर कुंभयं । अरुढ़ काम रथ्ययं । सु उत्तरी समध्ययं ॥ छं० ॥ ५८ ॥ राज्य उपवन में चन्द का डेरा दिया जाना। दूहा ॥ दिय डेरा कुंदन सुढिग । जे लौने सुरतान ॥ तर ते वर तंबू तनिय । मन हु कलस कै भान ॥ छं० ॥ ५६ ॥ गज बंधे गज साल में। हय बंधे हयसाल ॥ अव कोस विस्तार अति । भई भौर भर चाल ॥ छं० ॥६० ॥ .... .... .... ( १ ) ए. कृ. को.-मूगदं कगाज गरं । २) मो.-सुधा।

पृथ्वीगजरासो। [ बयालीसवां समय १० किनक जान भोरा कह्यो। दिल्लीपति दानेस ॥ अंबाई बर दान इन । नाम चंद ब्रह्म बेस ॥ छं० ॥ ६१ ॥ भीमदेव का कविचन्द के पास अपने भाट जगदेव को भेजना। कवित्त ॥ कहै भौम जगदेव । जाहु तुम चन्द 'समष्पन ॥ नग मनि मुत्तिय माल । परसपर बाद सपष्पन । दियौ सु हथ्थिय एक । सत्त हय इक ऐराकिय ॥ लै सु जाहु तुम लच्छि । भट्ट पुच्छौ मनुहाकिय ॥ पल दुष्ट भट्ट आयौ वरै । करि अभभौ मंत्रह सुपरि ॥ आरंम डंभ सुनिये बहुत । कर पिछानि मन षेद करि ॥ छं० ॥६२ ॥ जगदेव का कविचन्द से मिलना। दूहा ॥ चर लग्गा दिसि कवि चरा । आयौ भोरा भट्ट ॥ करिय अनूपम रूप दुरि । बेस अचंभम 'नट्ट ॥ छं० ॥ ६३ ॥ दौवी जाल कुदाल ढिग । अंकुस पैरौ हय्य ॥ पूछे भोरा भट्ट इह । किन समान इह कथ्थ ॥ छं० ॥ ६४ ॥ जगदेव का अपने स्वामी भीमदेव के बल वैभव की प्रशंसा करना । कवित्त ॥ सोमेसर किन बधिय । चद. जानौ वह गत्तिय ॥ आबू गढ़ किन लौन । भीम चालुक जुध मत्तिय ॥ इह दरिया को राव । सिद्ध पट्टनवै नंदन ॥ इह सु जुद्द तें बड़ौ। गाम धामह गति गंमन ॥ कवि जुगति जानि अधिकौ कहों । बुझ्भौ नाहिन मरम गति ॥ इह पंच दौह में जानिहौ । इह तुम इह हम जुद्द मति ॥छं०॥६५॥ दूहा ॥ मिलिय परसपर रसन रहि । मिलि नाहर इक ठौर ॥ बत्त घत्त भर सब मिलि । 'सह अष्षिय द्रब कौर ॥ छं० ॥६६ ॥ (१) मो. सलप्पन । (३) ए. के. को.-मन भट्ट, भट्ट । (२) मो.-मनुहारिय । (४) मा.-"सह अप्पिय इव कोर" बयालीसवां समय ११ ] पृथ्वीगजगमो। १९७५ कज्जिय॥ साज बाज सब फेरि दिए । प्रथु किय कित्ति अपार ॥ जगदेवह भोरा भनिय । 'काह सु कक्त्ति उचार ॥ छं० ॥६७॥ कविचन्द का पृथ्वीराज की कीर्ति का उच्चार करना। सोमेसर किन बधिय । सार संमुह किन सज्जिय ॥ कन्र पौर क्यों सहिय । किद्ध किन बाबू इह गुज्जरी नरेस । वह सु दिल्ली विरदा मै कूष पौर आदरै। शाम उदरे वृत धामै ॥ वागुरिन वृत्त अवतार गनि । भिरि भुग भोरा सुबर ॥ अवतार लियौ कलि उप्परौ । कलि प्रगटिय मनु सहस कर ॥ छं० ॥ ६८॥ पुहमि राइ हस्तिनौ । च्यार हंडी रंधानिय॥ इक गज्जनौ सहाब । सुइ सूंपो तुर तानिय ॥ इक राइ परमार । सधर सिर वानग जित्यौ। करन मंद चालुक्क । दई तिहुवार विधुत्तौ ॥ मेल्ही जु तीन तिहु राइ घर । सु इह बत्त जुग सब क य॥ इम चन्द कहै जगदेव सुनि । एक राइ तुम उड्वरिय ॥ छ ॥ ६ ॥ दूहा ॥ दस लष्पन भष्यन करै । प्रथु सामंत कुमार ॥ भोरा उठि गोरा गयन । तब सिर छच उभार ॥ छं०॥ ७० ॥ चढ़ि भोरा तुम उप्परें । दरियापति दम लष्प ॥ "षग्ग साहि भंजै सुभर । सित्त सूर पति भष्ष ॥ छं० ॥ ७१ ॥ जगदेव का कहना कि अच्छा तो तुम अपने पृथ्वीराज को लिवा लाओ। कवित्त ॥ दइय सौष जगदेव । जाहु तुम लै आऔ प्रभु ॥ जदिन सूर सामंत । तदिन पिष्यौ सुरत्ति सुभ ॥ ताम करिग तुम सुथिर । पाव चंचल होइ जैहैं । (२) ए. कृ. को.-रंधानिग । (३) ए. कृ. को.-सुरतानिग । (१) को.-कवि । ४) ए. कृ. मग ।

[ बयालीसवां समय १२ १९७६ पृथ्वीराजरासो। मेछ मिल घट पंड । परम 'उतम ग जुध जुरहैं ॥ रन षुध संपूरन भरिगहै । जब महिमानी हम करै ॥ जगदेव भट्ट संची चवै । चंद भट्ट इम उच्चरै ॥ छं० ॥ ७२ ॥ भोराराय भीमदेव का चन्द के डेरे पर आना। दूहा ॥ आइ सु भोर चंद थह । हय गय नर भर भार । सथ्य सपन्नौ तथ्य सब । बज्जा बज्जिय सार ॥ छं० ॥ ७३ ॥ देषिय डेरा भौम नृप । उच्चै थह आवास ॥ गौष पट्टिका बनि गरुन । देषिय बादर 'रास ॥ छं ॥ ७४ ॥ कविचंद का भीमदेव को अगवानी देकर मिलना। आदर करि आसौस दिय । भुत्र भोरा भौमंग ॥ सिद्ध दिड जै सिंघ तुअ । तिन पहु पुजि पवंग ॥ छं० ॥ ७५ ॥ कविचन्द का भोराराय भीमदेव को आशीर्वाद देना। पद्धरी ॥ जिन सिद्ध दिव लिखी विषंड । अन्न के दीप वाहन उतंड ॥ जिन धर मनुष्य पहिरे न चौर । कलि कूट रूप देषंत बौर ॥छ०॥७६॥ गिर धरै कंध उप्पारि नंष । पहिरे सु एक अोटं सुपंष ॥ प्रति तिरें मच्छ सागर पयाल । बहु लिए रतन अन्ने क माल ॥ छं० ॥ ७७॥ तिन जौति लिए बहु रिद्धि देस । सब दौप समझ गुज्जर नरेस ।। मझि दीप रोम राहब कुसाब । संजाल दीप प्रति काल आव ॥ छं॥७८॥ गिरवान दीप कंचन गुहौर। तिन झमझ दझिझ आसिष्य बौर ॥ हय मुष्प ग्राह चर अंब एक । तिन जौति लिए जल जानि 'देक॥ छं० ॥ ७९ ॥ (१) ए. कृ. को.-उतकंठ । (३) ए. कृ. को.-जिन । २) को.-राव, ए.-रात । ( ४ ) ए. कृ. को.-टेक ।

बयालीसवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासी। ११७७ वाहन अरोहि लोने असंघ । प्रति पान पुरातन लड़ पंथ ॥ अवतार सेस लोनौ अवन्नि । इन भंत चंद्र कवि करि तबन्नि ॥ छ० ॥८॥ कविचन्द और अमर सिंह सेवरा का परस्पर वाद होना और कविचन्द का जीतना। कवित्त ॥ तब पुछिय भौमंग । तुम बरदान सु दिच्चिय ॥ बाद 'बदि देवंग । सुपन पिष्षिय मन सिद्धिय ॥ चंद देव किय सेव । तिन सु अमरा बुलाइय ॥ थूल रथ्य आरूढ़। चंद असमान चलाइय ॥ तरवर सुपत्त बैठौ तिनह । फिरि न वाद कौनौ बलिय ॥ नट्टी जु सषी उपजी अनल । सुरस बंचि नंचौ कलिय ॥ छं० ॥८१॥ अरिल्ल ॥ जीता वे जीता चंदानं । परि पिष्पिय रष्षिय रंभानं ॥ मुष बुल्लै जै जै चहुआनं । नाटिक करि नंचै निरवानं ॥ छं० ॥२॥ हल हलंत तंबू हल हिलियं । बंदि प्रत्त है मैं पति चलियं ॥ चंद मंत्र पट्टन चल चलियं । मनों अंब ताराइन तुलियं ॥ छं० ॥८३॥ भीमदेव का अपने महल को लौट जाना। दूहा ॥ आरोहिय असु उप्परह । उड़ी रेन षुर देह ॥ भोरा चढ़ि सोरा भयौ । गयौ अप्पने ग्रेह ॥ छं० ॥८४ ॥ कविचन्द का सुरतान की चढ़ाई की खबर सुनकर दिल्ली को प्रस्थान करना। प्रथु कागद चंदह पदिय । आयौ परि गजनेस कूच कूच मग चंद परि। पहुंच्यौ घर दानेस ॥ छ० ॥५॥ इति श्री कविचन्द विरचिते प्रथिराज रासके चंद द्वारिकागमन देव मिलन परस्पर वादजरन नाम बयालीसमो प्रस्ताव सम्पूर्णम् ॥४२॥ (१) मो.-छंद ।

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अथ कैमास जुद्ध लिष्यते। (तेंतालीसवां समय।) एक समय शहाबुद्दीन का तत्तार खां से पृथ्वीराज के विषय में चर्चा करना । गाथा ॥ इक दिन साहि सहाब । अष्षिय समह पान तत्तारं॥ अरु षुरसान विचारं । संमर समुष राज प्रथिराजं ॥ छं० ॥ १॥ तत्तार खां का वचन । उच्चरि ताम तत्तारं। अरि अति जोर सूर सम रारं ॥ सम कैमास विचारं । षट्ट दिसि मंत साह साहाबं ॥ छं० ॥ २ ॥ कैमास युद्ध समय की कथा का खुलासा या अनुक्रमणिका और शाह की फौजकशी का वर्णन। हनूफाल ॥ बर मंत्र किय सुरतान। कैमास दिसि परवान ॥ चहुआन दिल्लिय चिंत । षट्ट अदिसि मन पंति ॥ छं० ॥३॥ संवत्त हर च्यालौस । बदि चैत एकमि दौस ॥ रवि वार पुष्प प्रमान । साहाब दिय मेलान ॥ छं० ॥ ४॥ चय लष्ष 'अस असवार । बानैत सहस चिनार ॥ पयदल सु लष्ष प्रचंड । त्रय सहस मद गल झंड ॥ छं० ॥ ५॥ चलि फौज इंदभि बज्जि । भद्दव कि अंबर गजि ॥ बाने सु गज्जि सिरज्जि । सुर राज विपन विरज्ज ॥ छं० ॥ ६ ॥ दस कोस दिय मेलान । षह षेह रुधिग भान ॥ छं० ॥ ७ ॥ (१) मो..लष ।

न दिसि पति । चर्चा
रु मालवै । सब र्दाि
समाचार पाकर
इम दूत मुष । भय
सब बोलिकै । बैठे।

तेंतालीसवां समय ३] पृथ्वीराजरासो। ११८१ जीति ॥ परी ॥ साहाब कहै तात्तार पान । उपजै सुमंत्र अध्यौ सवान ॥ ढिल्लोय तें ज प्रथिराज आय। कैमास आन कोनी सहाय ॥ छं० ॥१८॥ 'फिरि गये लाज घट्ट अनंत । अभभंत हारि तो सेंन अंत ॥ आषूव तम्मि आपैति वार । सम लालपान हस्सन हकार ॥छं०॥१६॥ हम च्यारि षान बंधव सु प्रौति । साहाब साहि आने सु कै जियत करें घोरह प्रवेस । कै गहैं पथ्य मक्का विदेस ॥छं०॥२०॥ सामंत कितक बल स्तर कौन । लग्ग सु एम जिम चन लौन च्यारों सु बंध हम बल अछेह । देही सु प्रथक जिय एक एह ॥ छं० ॥२१॥ जीवंत बंध आने सु राज । हम जुद्ध करै साहाब काज ॥छं॥२२॥ दूहा ॥ सुनिय मंत्र सब पान मुष । बंध्या जोर सहाब ॥ रह घट्ट दिसि चल्लिौं । उलट कि साइर आब ॥ छं० ॥ २३ ॥ शहाबुद्दीन का आगे बढ़ना और पृथ्वीराज के पास समाचार पहुंचाना। कवित्त ॥ ग्यारह से च्यालौस । चत विदि सस्सिय दूजौ ॥ चढ्यौ साहि साहाब । आनि पंजाबह पूज्यौ । लप तीन असवार । तीन सहसं मय “मत्तह ॥ चल्यौ साहि दर कूच । “फटिय जुग्गिनि घुर वत्तह ॥ सामंत सूर विकसे उअर । काइर कंपे कलह सुनि ॥ कैमास मत्रि मंत्रह दियौ । ढिंग बैठे चामुंड 'फुनि ॥ छं० ॥२४ ॥ पृथ्वीराज का कैमास सहित सामंतों से सलाह करना । दूहा ॥ कह्यौ मंत कैमास तहँ । सजि आयौ सुरतान ॥ अब विलंब किज्ज नहीं । दल सज्जौ चहुआन ॥ छं० ॥ २५ ॥ ( १ ) मो.-"दिल्लीय तेज पृथिराज आय”। ( २ ) मो.-परि गए। ( ३ ) ए. कृ. को.-अछेक । ४) ए. कृ. को.-मेक । ( ५ ) मो.-आय पंजाब सु पुज्यो । (६) मा. सत्तह । (७) मो. पटिय। (८) मो.-युनि ।

-
वर कमधज्ज राय।
ना की चढ़ाई है
के पुरसान साहाब
त्तिार पुरसान पानं
नि 'आषब मानं।
जो किधौं समद प

तेंतालीसवां समय ५] पृथ्वीराजरासो। १२८३ दिपै षान दरियाव दरिया समान। लुप्यौ अश्व 'पुर षेह रवि आसमान॥ चन्यौ पष्परं धार पति पान पानं । उभै सोर सिंगो चली पंति बान। छं० ॥ ३५॥ चन्यौ मलिक मंमार षां ताजषानं। फतेषान पाहारषां बंध ज्वानं॥ अलूषान 'बालम ते अग्ग बानं । सुभै गष्परं पान कम्माल पानं ॥ छं० ॥३६॥ चव्ययौ पतिक मारुफषां सोअमानं। चल्यौ पहिलवानं सु गाजी पठानं॥ चल्यौ हब्बसौ एक हब्बौबषानं । चल्यौ समसदोषान रुम्मी अपानं ॥ छं० ॥ ३७॥ चल्यो ग्यास दौचस्त गरुअत्त पानं । चल्यौ चित्र पानं गुरंबीर दानं ॥ छं० ॥ ३८॥ दोनों सेनाओं का चार कोस के फासले पर डेरा पड़ना। दूहा ॥ चारि कोस चौगिरद रन । दोज समद समान ॥ उत साहिब षुरसान को । इत संभरि चहुआन ॥ छं० ॥ ३६ ॥ पृथ्वीराज की सेना का आतंक वर्णन । भुजंगौ॥ च ब्यौ साहि साहाब करि जुव साजं । करी पंच फौज सुभं तथ्य राजा बरं मह वारे अकारे गजानं। हलै रत्त चौंसट्ट बैरत्त बानं ॥छ०॥४०॥ घरौ फौज में सौस सुविहान छ । तिनं देषतें कंपई चित्त सबं॥ तहां धारि हथनारि कमनेत पर्च। ॥ छं० ॥४१॥ तहां लष्प पाइक पंती सपेषं । तहां रत्त वैरष्य को बनिय रेषं ॥ तहां तीन पाहार मै मत्त जोरं । तिनं गज्जतें मंद मघवान सोरं॥ छं० ॥ ४२ ॥ तहां सत्त उमराव सुरतान जोटं । मनों पेषियै मध्य साहाब कोटं। इमं सज्जि सुरतान रिन चढि अप्प। बिना राइ चहुआन को सहै तप्पं ॥ छं० ॥४३॥ (१) मो..पुर हेवरं । (२) ए. कृ. को.-आगंम । (३) ए.कृ.को.-मलिक | ( ४ ) ए.को.-प्रमानं । (५) ए.कृ.को.-"हले रत्त चौरं सवै रत्तवान"। (६ ) मो.-चट्ठीय अप्पं ।

का चावंडराय की
ठ होते ही तय्या
थराज । राइ चामंड
बर लज्ज । लज्ज मो
हे लज्ज । बधि आने

तेंतालीसवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो। में शाह का मुकाम लाडून सुन कर पृथ्वीराज का पंचोसर में डेरा डालना। दूहा ॥ किय मुकाम चहुआन दल । पुर पांचो'सर नाम ॥ सुनी षवरि सुरतान को । लषि लाडून मुकाम ॥ छं० ॥४८॥ कैमास को शाह के प्रातः काल पहुंचने की खबर मिलना। दूत आइ पहरेक निसि । कही घबर कैमास ॥ पहर एक पतिसाह कौ । मो पच्छे दिषि पास ॥ छं० ॥ ४६॥ पृथ्वीराज की सेना की तय्यारी होना और कन्ह का हरावल बाँधना। कवित्त ॥ राज पास कैमास । घबरि सुरतान कही अप ॥ सजौ सेन अप्पान । जाइ सनमुष मंडै वप ॥ पंच फौज साहाब । करिय भर पंच सु अग्गर ॥ सजौ फौज अप्पान । नाम लिषि लिषि तहां सुभ्भर ॥ मन्त्री सु बत्त सामंत मिलि । पंच फौज राजन करिय ॥ अन भंग जंग प नाह नर। कन्ह कंक अग्गे धरिय ॥छं०॥५०॥ पृथ्वीराज की पंचअनी सेना का वर्णन । भुजंगी ॥ सजौ मंत्रि कैमास की फौज टूजी। सथे पंच हज्जार है अनिय पूजी ॥ सुभै पंच हज्जार कमनैत पाले । बरं पंच में मंत मै मत्त वाले ॥ छं० ॥ ५१॥ तहां कंन्ह चहुबान सामंत साजे । तब तीसरी फौज बाजिच बाजे॥ सहस पंच असवार गैहै सु पंचं । सहस पंच "माले सहै लोह अंचं॥ छं० ॥५२॥ सज्यौ गरुत्र गहिस्लौत गोई दराज। चली फौज चौथी करै लोह साजं॥ (१) ए. क. को.-रस, रस नाम । मो.-करी। (६ ) मो.-तीस करि। (४) (२) मो.-पब । ( ३ ) मो. नर नाह नृय । (५) ए. कृ. को.-चाले । ७) ए. कृ. को.-वाले थाले ।

ननैत हथनारि हथ्य
बौधी चढ्यो पान षा
सवार पल्ले दुलष्यं ।
असवार करव लह
नं सुतं लाल पानं

तेंतालीसवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो। ११८७ । सजी पंचमी फौज बनि ब्रन एवं । गुरं गष्परं घग्ग कळे रनेवें ॥ बली मरद कमाल पा बधं सथ्य। लियै सकत मनसातको गुर्ज हथ्य। छं० ॥ ६२ ॥ सजे लष्ष है सुभट करि लोह सारं। तहां देघि पाइद्दलं दुष्य जारं। तहा पंच हज्जार गढ़ गयन्न । सजी पंचयं फौज साइंद्र बन्न ॥ छं० ॥ ३॥ रणक्षेत्र में दोनों फौजों का बचि में दो कोस का मैदान देकर डटना और व्यूह रचना । दूहा ॥ ६ दल बीच सकोस । प्रथौराज कहि बात ॥ चौकी चढ़ि चक्रह कटक । दल अरियन करि घात ॥ छं० ॥ ६४ ॥ चौपाई ॥ चढ़िय सुचक्र सेन चहुबानं । सुबर सूर जोधा परिमानं ॥ उत सज्ज्यौ चक्रह सुरतानं । दौस फौज मनों दधि पानं ॥ छं०॥६५॥ कटक चक्र रच्यो सुरतानं । प्रथौराज सजिग तिहि थानं ॥ परी षबरि कहियौ परिमानं । पंच फौज पंचौ चहुआनं॥छं०॥६६॥ डामर ॥ चढ्यौ सुरतान, सुन्यौ चहुआन, तमंकि कटौ किरवान कसौ । मय मत्त सुमंत, पढ़े बर पंत । सहस सूर, सहस्स असो॥ दस सठ्ठि हजार, चले पयदाज, जमाति सु जुग्गिनि जानि हसौ । बर बान कमान, छयौ असमान, अरौ मुष संमुह, फौज धसौ ॥ छं० ॥ ६७ ॥ युद्ध सम्बन्धी तिथिवार वर्णन । कवित्त ॥ ग्यारह सै च्यालौस । सोम ग्यारसि बदि चतह ॥ भए साह चहुआन। "लरन ठाढ़ बनि तह ॥ पंच फौज सुरतान । पंच चहुान बनाइय ॥ दानव देव समान । ज्वान लरनं रिन धाइय॥ है (१) मो.-सावून्न इन्दं । (३) मो.-सुरतानं । (२) ए. कृ.. को.द्वै दल कोसह बीच है। ( ४ ) मो.-पयदार । ( ५ ) मो.-मरन ।

कादसी । होत दाद
तम है लरें। हिंदू
घारे परै रुंड मुंडं।
लं करं कट्टि तेगं।
थयार बिन लात घार
ध्यान अस्तिमिति

तेतालसिवां समय ११] पृथ्वीराजरासो। ११८६ इक बौर बर बौर बैठे 'विमानं । इक सूर हरं निरष्यत पानं ॥ इमं जाम है जुद करि रहे ठाढ़े। गुरे बाज गजराज नरराज गाढ़े ॥ छं० ॥ ७७॥ पृथ्वीराज का यवन सेना में अकेले घिर जाना और चामंडराय का पराक्रम । कवित्त ॥ घे-यौ नृप चहुआन । संग सब सथ्थिय छुट्टौ ॥ जंग करै चामंड । परिग गज मुंडन जुट्टौ ॥ बाग लेइ बगमेलि । सेल मैंगल सिर फुटौ ॥ करन कढि करिवार । दंत सम भसुड सु तुट्टौ ॥ तुट्टौ सु दंत सम सुंड मुष । रुष किन्निय सुरतानं तन ॥ दल दंत करत दाहर सुतन । मद वारुन दारुन दलन ॥ छं० ॥ ७८॥ दूहा ॥ कलह राइ चामंड करि । इह मायौ गजराज॥ साह गहन को मन कन्यौ । चढ्यौ "हांस ले बाज ॥ छं० ॥ ७६ ॥ कवित्त ॥ गुरि गयंद गोरी नरिंद। चतुरंग दल सज्जिग ॥ उर निसान घुमरिग । आइ उप्पर सिर तज्जिग ॥ जहां हक्यौ तहां भिन्यौ । तिनह घर नदी पलट्टिय ॥ घग्ग ताल बाजंत । सौव तरवर बन तुट्टिय ॥ कतरीय पुरष गय घर मुरिग । चंद बरहिय इम भन्यौ ॥ भाजत भौर तुष्पार चढ़ि । चौंडराव चाबक हन्यौ ॥ छं० ॥८०॥ चार यवन सरदारों का मिलकर चामंड राय पर आक्रमण करना। दूहा ॥ लाल पान मारुफ षां । हसन पान आकूब ॥ च्यार लरे चामंड सौं। घग्ग गहौ तुम घूब ॥ छं० ॥८१ ॥ (१) ए. कृ. को. गुमानं । (३) मो.-नन । ( ५ ) मो. हस । (२) मो. राज । ( ४ ) ए. ल. को.-काहि । (६) ए. कृ. को.-कसरी

कब । घूब जस लिये
कट्टारि । पारि मारू
उछ-यौ हसन । अ
न चहुआन किय ।
ल खां का वर्ण
ढंचाल दिग। लाल

तेंतालीसवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासो। ११६१ कवित्त ॥ लाल बरन वानैत । घग्ग कढि आन जुद्द किय ॥ पान पान किय घाउ । कंध कटि गियौ तास हय ॥ निरषि राइ चामंड। बिरचि फिरि बौर पचायौ ॥ गहिय तेग षां लाल । अग्ग बप धरनि पछायौ धर डारि रिदय पर पाव दिय । केस गहै बंकुरि करहि ॥ एकथ्य सुनौ हिंदू तुरक । जै जै सुर नारद 'करहि ॥ छं० ॥ ८७ ॥ लाल खां का मारा जाना । दूहा ॥ लाल पान के केस गहि । सिर धरि करि दुअ षंड ॥ दूसासन ज्यों भौम बल । रन ठट्टौ चामंड ॥ छं० ॥८८॥ कैमास और चामंड राय का वार्तालाप । कवित्त ॥ रन ठडौ चामंड । मंत्रि कैमास पहुत्तौ ॥ हयह चढ़ायौ आइ। बहुरि मुष बचन कहतौ ॥ तूं मेरौ लघु बंध । इतौ कौन सहंतौ॥ तो बिन जग सब धंध । अंध हुअ अवनि रहतौ ॥ चढ़ि बाज आज संग्राम में । राज लाज मो मुजनि पर ॥ हठि हसन पान आकूब से । पल पंडे ते अंग बर ॥ छं० ॥८६॥ दूहा ॥ षल घंडे तुम अंग बर। रगत बरन किय अंग ॥ रहि ठट्ठौ इक षिनक रन । करौं निरिषि हौ जंग ॥ छं० ॥ १० ॥ कुंडलिया ॥ कहै राइ चामंड तब । तुम मेरे बड़ भात ॥ क्यों पित्री देषै घरै । कलि न अमर इह "गात ॥ कलि न अमर इह गात । बान मो मति तिम किन्न । हम तुम हय हकारि । बंधि सुरतानह लिज्ज ॥ बिरचि मार मच्चाइ । तबहि गज्जन पति 'ग्रहिहै ॥ लरत कित्ति होइ तुरत । तुरक हिंदू सब कहिहै ॥ छं० ॥ ६१ ॥ (१) मो.-कहिय । (२) मो.-हयानि । ३) मो.-"तौ बिन जग जनु धंध अब हुअ अवनि परंतौ ।" (५) मो.-घात । (६) ए. क. को. ग्रहिये । ( ४ ) ए. कृ. को.-रकत । (७) ए. कृ. को.-कहिये ।

बरं जुड़ बानं। धक
मान कम्मान बानं ।
सु घावं क्रपानं । इ
ध्यानं जोगिंद बानं
सु ठड्ढे गुमानं। तहा

तेंतालीसवां समय १५]] पृथ्वीराजरासो। ११६३ .... .... धनं घाव बज्जत सो है समानं । जुरे बाज सो बाज सम जुद्द ठानं ॥ छं० ॥१८॥ जुरे च्यार षानं सु चावंड 'मानं । जुरै अंग अंगं करै अप्प 'मानं ॥ भजे काइरं कलह देषे कपानं । छं० ॥१६॥ रुप्पो मंत्र महबूब दुअ जुद्द थट्टं। तिनं बाहियं उअर नह तेग तुटुं॥ तबै थरहरे काइरं कंपि नढुं। तहां ताज षां पान रात पुढ छं० ॥ १० ॥ दलं देवता जुद्ध देषे विमानं । तहां देव निवरंत अछरीय गानं ॥ तहां चौसठी करत भरि पत्र चल्ली। तहां रंभ घालंत गर माल भल्ली। छं० ॥ १०१॥ तहां स्वामि कामं लरै हिंदु मौरं । इमं सस्त्र वस्त्र पुटे तौर तौरं ॥ तहां मल्ल जिम लरै बलवंत श्रीरं । छं० ॥१०२॥ तहां लसत धंसतं सुवानं घतानं । जिसे मत्त आमत्त मत्ते मतानं॥ तिसे दरसियं सूर दंतं दैतानं । तहां हथ्थजोरं सु हस्ती हतानं ॥ छं० ॥१०३॥ सुभै ठाम ठामं परे तुरक झंडं । तहां हद हिंदू भये पंड पंडं ॥ तहां करत सरितान में मगर तुंड । छं० ॥ १०४॥ तहां कच्छ सिर मच्छ फरके भुजानं। तहां केस कुस दंत बगपंति मानं॥ तहां भोर ज्यों भंवर हथ्य करारं। तहां कंज कर धार उरधार धारं॥ छं० ॥ १०५॥ तहां चक्क चक्की सु सोभंत नैनं । तहां तीसरौ नदिय बहिपाद्य ऐनं॥ तहां श्रोन को सरित जल पूर भल्लौ । तहां चौसठी पत्र भरि कुंभ चल्ली ॥ छं. ॥१०६॥ द्वादसी का युद्ध वर्णन। दूहा ॥ चैत प्रथम उज्जास पष । मंगल बारसि सुद्ध ॥ कैमासह चामंड सम । किय सहाब बर जु ॥ छं० ॥ १०७ ॥ (१) ए. क. को.-समान । (२) ए. के. को.-पानं । ( ३ ) मो.-लहै षग्ग बीरं ।

वरी, मेछ दाहिम्मरी
जुन देषे डरी। जेन
है, सस्त्र कट्टे अरी।
1, "ग्रम्म जालंधरौं।

ततीलासवां समय १७ ] पृथ्वीराजरासो ११९५ तेग लग्गौ तरौ, मेच्छ गम्भं टरौ। मौर छुढे धरौ, साहि ढिल्ल्यौ करी॥ छं० ॥११४ ॥ शाह के आगे बढ़ने पर यवन सेना का उत्साह बढ़ना कवित्त ॥ करिय साहि ठेलंत । मौर हक्कत प्रबल दल ॥ पांततार रुस्तम्म । मौर मंगोल सबल बल ॥ चक्रसेन चहुआन। लोहा बाहंत आय पल ॥ नर हय गय गुंजार । लोह लग्गंत हयद्दल ॥ असि मार धार आकास उड़ि । उठ्ठि जुरंत कमंध रिन ॥ चहुबान चक्र सुरतान लगि। तन तिषंड घंडे 'करिन॥ छं० ॥ ११५॥ शहाबुद्दीन का बान बर्षा करके सामंतों को घायल करना। तब सहाब सुरतानः । बान कंमान कोपि धरि ॥ अलूषान आलं म । सार बहि 'कही सुषुप्परि ॥ चक्रसेन सिर पंडि । कियौ दह भरे लोह लरि ॥ षां ततार रुस्तम । षांन पुरसान रहै डरि ॥ उर डरपि धरकि हिंदू तुरक । सूर नूर सामंत मुष ॥ कविचन्द देषि कौरति करत । लरत अप्प अपनी सुरुष ॥छं०॥११६॥ दूहा ॥ अप्प अपानी रुष लरत । करत अंग अंग मार॥ चक्र सेन चहुआन कौ । भरनि सह्यौ भुज भार ॥ छं० ॥ ११७॥ कवित्त ॥ भरनि सह्यौ भुज भार। साह सकवान प्रहारिय ॥ एक बान चामंड। लम्गि भुज दंड मुहारिय ॥ दुतिय बान सिर बहिग । चक्रसेनह सिर संधे ॥ सुकर कट्टि अप बान । पंचि बसतर सम संधे ॥ बर बंधि घायक घग्ग गहि । बिजलपान बगसौ बह्यौ ॥ कैमास राइ चामंड मिलि । धन्य दुअन जै जै कह्यौ ॥ छं० ॥११८॥ (२) ए. मो.-कढि । .) मो. किरन, करन । (३) ए. कृ.-सस ।

हग सज्जि । बाज सि
पन्न । राय बाहर के
विस्तरिय । बहुरि
ध करिवार गहि ।।
जइव मलिक । बोर
धवार को पृथ्वीर

तेंतालीसवां समय १९ ] पृथ्वीराजरासो। ११६७ दूहा ॥ त्रयोदसी सुदि चैत की । गयौ लरत बुधबार ॥ समर साह चहुआन सम । भर भारथ किय सार ॥ छं० ॥ १२२ ॥ भुजंगी ॥ भरं भारथं कौय तिन बेर बौरं । जुरे संभरी साहि सिरदार श्रीरं॥ नरं काइरं क्लम्मले भग्ग भौरं। चढ़ौ मौर मारूफ मुष नौर धौरं ॥ छं० ॥ १२३ ॥ तहां च्यारि बंधौ भए एक सूरं । लगे मंत्र कैमास दिष्प करूरं ॥ लगे बान कमान फुट्ट परारं। कियं छिन्न सन्नाह देहौ विहारं ॥ छं० ॥ १२४॥ तहां राग मारू बजे तबल तूरं । घुरै घोर नौसान ईसान दूरं । तहां पान हिंदवान भए चक्र चूरं । तहां हर रंभा बरै बरह सूरं॥ छं० ॥ १२५ ॥ तहां मेछ भग्ग भए प्रात तारे। तहां मंचि कमास जित्यौ अपारे॥ छं० ॥ १२६॥ दूहा ॥ जित्ति मंत्रि सुरतान घर । बंधव चोंड हजूर ॥ उभै लष्प असुरान के । मेटि प्रबल दल पूर ॥ छं० ॥ १२७ ॥ कैमास और चामंडराय का शहाबुद्दीन को दो तरफ से दबाना और उसके हाथी को मार गिराना। कवित्त ॥ मेटि प्रबल दल पूर । साह संमुह गज पिल्ल्यौ ॥ बाज राज चामंड। मंत्रि बंधव मिलि ठिल्ल्यौ संगि बाहि कैमास । पौत बाने बिच थट्टिय ॥ गहिय समर चामंड। तुंड पर करिय निहट्टिय ॥ कट्टिय सु सुंड गज दंत सम । गिरत गज्ज साहाब धर ॥ दाहिम्म गह्यौ गज्जन असुर । जय जय सुर सद्दे अमर ॥छं०॥२८॥ चौपाई॥ प्रथौराज जित्यौ परगासं। साह सहाब ग्रह्यौ कैमासं ॥ सत्रह षान परे चिहु पासं । जै जै सबद भयौ अायासं॥छ॥१२६॥ दोनों भाइयों का शाह को पकड़ कर पृथ्वीराज के पास लेजाना। कवित्त ॥ अमर सद्द जयकार । डारि साहाब कंध हय ॥ ल मंत्री सुरतान । बंधि बिय राज पास गय ॥

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अथ भीम बध समयौ लिष्यते । (चौवालिसवां समय।) पृथ्वीराज का पिता की मृत्यु पर शोक करना और सिंघ प्रमार का वीर वाक्यों से धैर्य देना। दूहा ॥ उर अड्डौ भौमंग नृप । नित्त घटक घाइ॥ अगनि रूप प्रगटै उरह । सिंचे सत्रु, बुझाइ ॥ छं० ॥ १॥ पिता बैर सिर संसहै। अरु रमनी रस रंग ॥ दिन दिन सो जल श्रोन सम । पियै सत्रु अनभंग ॥ छं० ॥ २ ॥ कवित्त ॥ सुनिय बत्त प्रथिराज । भीम सोमेस सद्धि रन ॥ हरि हरि मुष उच्चार । किन्न प्रथिराज सुभट गन ॥ करत दुष्प चहुआन । बरजि पंमार सिंघ तहां ॥ आदि ध्रम 'षित्रीय । करे संताप तात कहां ॥ घग धार पंडि तन मंडि जस । तब सुर लोकह संचरै॥ आजानबाह अवनीस सम । आबू वै इम उच्चरै॥ छं० ॥ ३॥ पृथ्वीराज प्रति सिंह प्रमार के बचन । कहै सिंघ पामार । बत्त चहुबान चित्त धरि ॥ गुज्जर घर उज्जार । पारि प्रज्जारि छार करि ॥ सोमेसर सुरलोक । तोहि संभरिय लज्ज भुत्र॥ कितक बत्त चालुक्क । किम सु अंगमय जुद्द तुअ ॥ सुरतान भूमि कंकर जहां । तह थानौ मंडौ भलौ ॥ तुछ सुभट संग करि विकट घट । पुन अप्पन ग्रहां चलौ । छं० ॥ ४॥ (१) मो.-छत्रिय ।

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Nagari Pracharini Granthamala Series No. 4-10

Author
Chand Baradai
Title
Nagari Pracharini Granthamala Series No. 4-10
File name
Nagari Pracharini Granthamala Series No. 4-10
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2004/20/11
Publisher
Sagar Pracharini Sabha, Delhi
Language
Sanskrit
Pages
131
Library
Hindustani Academy, Allahabad
Classification
Literature
DLI number
383053
Barcode
5990010042544.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
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Not Available
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