Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shri Harivansh Purana Saral Bhashanuvad Khand-1
Front matter
प्रकाशक:
संस्कृति संस्थान
ख्वाजा कुतुब (वेद नगर) बरेलो
(उत्तर प्रदेश)
सम्पादक:
प० श्रीराम शर्मा आचार्य
8
सर्वाधिकार सुरक्षित
.
प्रथम सस्करण
१६६८
मुद्रक :
जगदीश प्रसाद भरतिया
बम्बई भूपण प्रेस, मथुरा
मूल्य-सात रुपया
भूमिका पौराणिक साहित्य में 'श्री हरिवपुराण' कई दृप्टियो से एक विशेप पान रखता है। सामान्यत इसे 'महाभारत' का 'सिल' (एपेंडिक्म) कहा या है । अर्थात् 'महाभारत' मे अपूर्ण रह गई कुछ घटनाओ की पूर्ति के लिय हि एक 'टपसहार-भाग' की तरह लिखा गया है। स्वय इस ग्रन्थ वे बारम्भ राजा जन्मेजय इसी भावना से इमरे सुनने की इच्छा प्रदर्शित करते हैं । महाभारत' की कथा सुन लेने के बाद उन्होंने वैशम्पायन जी से वहा था- "आपके द्वारा कही गई अयंगाभीर्यपूर्ण, श्रुति-मम्मत तया विस्तारयुक्त महाभारत की क्या मैंने श्रवण की है । उममे आपन प्रद्युम्न आदि अनेक दृष्णि एव अन्धश्वशी महारथियों के नामों का उल्लेख रिया है और उनका कुछ वृत्तान्त भी सुनाया है । उन पुरातन पुरषों को उतने चरित्र-श्रवण से मेरी तृप्ति नहीं हो सकी । आप पहले से यह भी विदित हुआ कि पाण्टय तथा वृष्णिवशियी था कुल एक ही था। अतएव हे महामुने! आप भली प्रकार विचारपूर्वक प्रजापति से वृष्णिवशिया तव का पूर्वापर वृत्तान्त मुझे मुनाइये कि किन पिन का वहाँ जन्म हुआ और उन्होंने कौन स महान कार्य विय?" इस कथन स प्रकट होता है कि परिवा' की रचना आरम्भ में भगवाा पीकृष्ण के पारिवारिक तथा महतारी व्यक्तियों ये चरियों का वर्णन बरन व उद्देश्य से ही की गई थी। महाभारत निस्मन्देह एक बहुत विशाल और महत्त्व. पूर्ण अन्य है, पर कुरक्षेत्र में होने वाले कोरव-पाण्डव मग्राम की मुग्यता हो वारण उसमें भगवान कृष्ण के 'यादव-वश' का (जिसकी सभ्या उम समय i६ रोड यतलाई गई थी ।) और जो वाम्नव में पिगी समय वटा शक्तिशाली इन गया था, वर्णन बहुत कम दिया गया है । 'महाभाग्न' के अन्त में दिये से 'मोमल-पर्व' में यदुवंश वे पारस्परिव महार का वर्णन अवश्य किया गया पर उन महारयियो ने कहां-वहाँ कमी दोरता दिवाई इसकी कोई चर्चा उसमे नहीं पाई जाती । इसी कमी को पूरा परने के लिये 'श्री । वश' की रचना की गई है । इसके रचयिता 'महाभारत' के पश्चात् हुए थे। महाभारतकार मे पूर्ण श्रद्धा रखते थे, यह भी उनकी लेखनी से ही सिद्ध । है । ग्रथ को आरम्भ करते हुए वे कहते हैं-'. "भगवान व्यासजी के मुखारविन्द से निकले हुए अद्भुत, पवित्र,' नाशक एव सुखदायक 'महाभारत' को जो मनुष्य सुनता हा उसे पुष्करादि । मे स्नान करने की क्या आवश्यक्ता है ? पराशर नदिन एक सत्यवती के । को आनन्द देने वाले उन भगवान व्यासदेव की जय हो जिनके पुण्य-मुवारी से नि सृत क्यामृत का पान यह सम्पूर्ण विश्व करता है । जो मनुप्य स्वर्णम सीगो वाली सो गायें किसी बहुश्रुत एव वेदज्ञाता ब्राह्मण को दान देता है अ जो परम पवित्र महाभारत की कथा श्रवण करता है, तो उन दोनो का समान ही होता है ।" सभव है हरिवश का आरभिक रूप केवल 'महाभारत' के उपसहार 'खिल' की तरह रहा हो, पर अन्य पुराणो की तरह कथावाचक विद्वानो। उसका भी विस्तार होता गया और वर्तमान समय मे पुराणो के र लक्षण-सर्ग, प्रतिसर्ग, वश, मन्वन्तर तथा वशानुचरित उसमे अच्छे । पाये जाते है । अदिसृष्टि का उद्भव, स्वायम्भुव मनु तथा दक्ष से जगत नि। की प्रक्रिया का आरम्भ, पृथु द्वारा पृथ्वी पर मानव सभ्यता की स्थापना, स्वत मनु और उनका वश, सूर्य तथा चन्द्रवश का वर्णन आदि विषयो का पुराण मे उत्तम रूप से प्रतिपादन किया गया है । इतना ही नहीं इसका अध्य करने पर पाठको को विदित होगा कि 'पुराण' होने पर भी इसमे वास्त तथ्यो के समावेश करने की अन्य पुराणो की अपेक्षा अधिक चेष्टा की गई इसीलिये हरिवशवर्ता ने एक स्थान पर इसे इतिहास समन्वित घोषित किया है उक्ताय हरिवशस्ते पर्वाणि निखिलानि च । यथा पुरोक्तानि तथा व्यास शिष्येणधीमता। तत्वथ्यमानाममितमितिहास-समन्वितम् । प्रोणत्यस्मानमृतवत्सर्व पापविनाशनम् ।। (३.२.१.२) "शौनक ने कहा कि पूर्वकाल में व्यास शिप्य बुद्धिमान वैशम्पायन जी जिस प्रकार हरिवश का वृतान्त सुनाया था उसी प्रकार आपने भी कहा है। पापनाशक, इतिहास समन्वित अमृत तुल्य हरिवश-वर्णन सुन कर हम पधिक आनन्दित हुए हैं।" यद्यपि पुराणो का मुख्य उद्देश्य धार्मिक तत्त्वो को उपदेशात्मक कथाओ रूप में वर्णन करके पाटों को मनोरजन के माथ नैतिक और चारितिक क्षायें देना है, इसलिये उनमे ऐतिहासिक तथ्यो को वास्तविक रूप मे ढूढना पया उनकी प्रत्येक वात को यथार्थ घटना मान लेना अनावश्यक है। फिर । प्राचीन राग्यवंशो और राजाओ को नामावली का पता लगाने में देशी और देशी इतिहास लेखको ने 'हरिवश' को अन्य कितने ही पुराणों की अपेक्षा । अधिक मान्यता दी है। इसी प्रकार भारतीय संस्कृति, कला, रहन-सहन, सुपा आदि के लिये भी 'हरिवश' के वर्णन अपेक्षाकृत अधिक सारयुक्त माने हैं। इसका स्वाध्याय करते हुए पाटक वो स्वतः ही ऐसा अनुभव होने पता है कि विविध विपयो का वर्णन करने में इसके रचयिता ने स्वाभाविक्ता । विशेष ध्यान रखा है और लेंगन-कला का अच्छा परिचय दिया है । हरिवंश का कृष्ण-चरित्र- यद्यपि भारतीय-साहित्य के सभी प्राचीन क्या-ग्रन्यो मे भगवान कृष्ण । चरित्र वर्णन किया गया है, पर 'हरिवश', "भागवत', 'ब्रह्मवैवर्त' यादि वा मुग्य विषय वृष्ण चरित्र का वर्णन और महत्त्व प्रदर्शित करना ही है । पर हो 'भागवन' में कृष्ण के बाल-चरित्र को प्रधानता दी है और गोकुल तथा भवन की घटनाओ के वर्णन को ही अधिवाधिक स्यान दिया है, वहाँ 'हरि- रा' में कृष्ण के प्रौढावस्या के चरित्रो का विशेष स्प मे वर्णन किया गया और उनके द्वारयापुरी के जीवन पर विस्तृत रूप में प्रकाश डालने की चेप्टा । है । पर इन दोनो ही ग्रन्यो मे कृष्ण की महाभारत सम्बन्धी घटनाओ का मा भी नहीं दिया गया। इसी से अनेक विद्वान् महाभारत के कृष्ण और गरत' तया 'हरिवश' के कृष्ण को पृथा व्यक्ति मानने की कल्पना रते रहते हैं। वास्तव में भारतीय-गाहित्य में भगवान कृष्ण वा चीरत्र दाना - अधिक व्यापक और विविधतापूर्ण है कि उपनिषदो से लेकर पुराणो तर में व विभिन्न भावो को लेकर विकसित हुआ है। इसके विस्तृत रूप पर दिन करते हुए एक शोध ग्रन्थ मे कहा गया है- "कृष्ण चरित्र एक प्राचीन वृतान्त है । अनेर ग्रन्थ कृष्ण के चरित्र र किसी न किसी प्रकार परिचय की सूचना देते हैं । 'महाभारत' कृष्ण-चरित्र परिचित ही नहीं, वरन् उसे एक महत्त्वपूर्ण विषय सामग्री के म्प में करता है । इस विशाल ग्रन्थ वे अन्तर्गत वृष्ण के व्यक्तित्व के विविध है देखे जा सकते है। 'महाभारत' के आरम्भ में ही कृष्ण को 'युधिष्ठिर ह धर्म वृक्ष का मूल' कहकर कौरव और पाण्डवो ये वृतान्त मे उनके स्वतन व्यक्तित्व को प्रस्तुत किया गया है। उसके 'वनपर्व' मे मार्कण्डेय ऋपि प्रल काल मे जगत को आत्मसात् करके वट-वृक्ष के पत्र मे शयन करने वाले वि. को 'कृष्ण रूप' बतलाते हैं । 'शातिपर्व' का नारायणीय-वृतान्त' कृष्ण के परवः स्वरूप पर सबसे अधिक प्रकाश डालता है। इसमे नर-नारायण, कृष्ण अं हरि पो सनातन नारायण के चार अवतार कहा गया है। शाति पर्व के 'भीर स्तवराज' के अन्तर्गत कृष्ण के विष्णु स्वरूप की स्तुति की गई है । सभापर्व राजसूय यज्ञ के अवसर पर कृष्ण की अग्र पूजा मे शिशुपाल आदि राजाओ विरोध करने पर भी भीष्म कृष्ण के विष्णुस्वरूप पर जोर देते हैं।" "महाभारत के कुछ स्थलो पर कृष्ण के देवस्वरूप को छोडकर उन मानव रूप को ही प्रस्तुत किया गया है । पाण्डवो के सलाहकार के रूप मे कृत के ईश्वरन्च पर विश्वास न करने वाले ब्राह्मण उनवी सीमित शक्ति की अं सकेत करते हैं । अश्वमेघ पर्व के अनुमीता-भाग मे उत्तक ऋपि का कृष्ण : शाप देने को उद्यत होना भी उनके मानय चरित्र की ओर सकेत करता है सभापर्व, वनपर्व तथा शातिपर्व में कृष्ण के गोपाल रूप का वर्णन भी पार जाता है।" "पतजर का'महाभाप्य' कृष्ण के व्यक्तित्व पर पर्याप्त प्रकाश डालद है । इसमें वासुदेव को क्स का निहन्ता कहा गया है । क्स की घटना प्रस्तु घरने २ वारण 'वासुदेव' कृष्ण का ही नाम ज्ञात होता है। पाणिनि च 'अष्टाध्यायी' मे भी यामुदेव वा उल्लेख है। पाणिनि स वा समय विद्वान मगभग ढाई हजार वर्ष प्राचीन माना है । इस प्रमाण में कृष्णमूजा पापिनि से गहुन अधिक पुरानी मिद्ध होती है । वासुदेव का नाशय वृष्ण मे ही है, यह 'गीता' के दसवें अध्याय के इस श्लोक में भी सिद्ध होता है- "वृष्णीना वासुदेवोऽम्मि पाण्डवाना धनजय" 'छान्दोग्योपनिषद्' मे देवकी-पुत्र कृष्ण को गुर घोर-आगिरम में ब्रह्म- विद्या मीसते हुए वर्णित किया गया है । छान्दोग्य की प्राचीनता सर्वमान्य है । अधिकाग विद्वान उसे बौद्ध-पान के पहले का प्रमाणित करने हैं।" हरिवंश में कृष्ण विष्णु के अवतार हैं- यधिकार पुराणों में कृष्ण को विष्णु का यशावतार अथवा पूर्णावतार बताया गया है । 'हरिवश' में भी पृथ्वी के कष्टों को मिटाने के लिये विष्णु के कृष्णप में अवतरित होने का वर्णन किया है- "ह राजन् । जलीय मेघो के मदृश्य वाम वर्ष भगवान श्री विष्णु बोने-ऐमा ही हो तया ममम्त देवगणों सहित वे मेर शिखर की और चन दिये । पद समस्त सदम्य मभा मे मानिपूर्व बैठ गये तो पृथ्वी शोरपूर्ण और कम्पाजना गन्दी में विष्णु जी से कहें लगी है भगवन् । यह ममन्त ममार, समस्त प्राणी और मैं म्वयम् भी आप मे ही ममाविष्ट हैं। आप अपने तेज और भक्ति मे जिनको धारण करते हैं आपकी महत्ता मे में भी उनका भार सहन करती हूँ। अगर थाप उनको धारण न करें दो में भी उनका बोझ नहीं दो मानी। आप ही हर एक युग में मेरा भार हलका करने आये हैं । हे देवादिदेव । मैं आपरी गरा मे आई हूँ अब आप मेरी रक्षा कर मुये निर्मच नीजिये। जब-जब दुष्ट दैत्यों तया रासमों ने मुझे पीड़ा पहुंचाई है तर-नव में आपकी गरा आई हूँ। हे प्रभो ! समार के हित के लिये वेदर जाप ही युद्धक्षेत्र में वीर तया निडर यात्रिय राजाओं का विनाम पर मरत है । इन गजानो का अस्पन्न बोस बदन परने के कारण कष्ट मे पोहित होकर आपकी मरण में बाई है। आप अतिरिक्त कोई बोर मेरा महायर नहीं है।" पृथ्वी दाग प्रार्थना की जाने के पश्चात् ब्रह्माजी ने भी निवेदन किया- हे भगवन् । एमा कोई कार्य कीजिये किममे रि पप्पी का वट दूर हो । न ।
तीनो लोको की रनता आपने ही है तथा आप ही इनवे स्वामी हैं। अब ह समस्त देवगण इन्द्र, यम, वरुण, कुवेर, चन्द्र, सूर्य, वायु, आदित्यगण, आर घसु, रद्रगण, अश्निीकुमार, साध्यगण, वृहस्पति, शुक्र, स्वामि-वातिय, या गन्धर्व, सिद्ध, चारण, पर्वत, सागर, गगादि नदियां आदि को क्या करना चाहि यह विस्तार से बतला दीजिये । अगर आप राजाओ म परस्पर युद्ध परा पृथ्वी का भार हलका करना चाहते हैं तो हम लोगो वो पतलाइये कि है क्या-क्या करना है " इस योजना के अनुसार जब देवताओ के अशो ने अनेक वीरो के रू मे पृथ्वी पर जन्म ग्रहण कर लिया पर भगवात् विष्णु अपने लोक मे ही बै रहे तो नारद जी उनको फिर से याद दिलाने को पहुंचे और कुछ नाराज होक कहने लगे-' हे विष्णु समस्त देवगणो ने उन अनेको राजाओ का सहा परने के लिये नाना प्रकार के अवतार धारण किये है। पर यह सब व्यर्थ है जब तक नर-नागयण दोनो ही पृथ्वी पर अवतीण न हो तब तक कुछ नह हो सकता। आप ही इन राजाओ का परस्पर सघर्ष कराके सहार कर सक हैं । आप सभी तत्त्वो के देखने व जानने वाले हैं, फिर भी आपकी यह योजन उत्तम नही है । जव सभी देवगणो ने पृथ्वी का कष्ट दूर करने के लिये अवता धारण कर लिया तो फिर अभी तक आपने अवतार क्यो नहीं लिया ? देवगण जा अवतार धारण कर चुके हैं तभी अपने अभीष्ट को पूर्ण कर सकें जब आप उनको सहायता तथा प्रोत्साहन देंगे। आपके अवतीर्ण होन से पाप क्स का सहार होकर पृथ्वी का भार हलवा हो सकेगा । भारत का यह अभी८ पार्य आप ही सिद्ध कर सकते हैं, अत भारतभूमि पर शीघ्र अवतार लीजिये। महामानव कृष्ण- इन वर्णनो से प्रकट होता है कि श्रीकृष्ण की मान्यता और भगवान् * रूप में उनकी पूजा उपासना पिछले दो-तीन हजार वर्षों से भारतवर्ष अनेव भागा म प्रमरित थी और पुराणवारो न अपनी अपनी भावना के अनुसार अगावतार अथवा पूर्णावतार वे रूप मे उनका चरित्र चित्रिण किया है । 'हरिः वाम भी उनाा वर्णन विष्णु के एक महत्वपूर्ण अवतार के रूप में वियः समस an गया है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण के चरित्र को अधिकाग घटनाएं चमलारी और देवी ही वही जा सकती हैं। तो भी 'हरिवंश पुराण' में जगह जगह उनका वर्णन और वार्तालाप ऐसे ढग में किया गया है जिसमे वे एक महामानव और जननायक अयना राजनीतिक कार्यकर्ता के म्प मे प्रकट होी हैं। छोटी अवस्या गे ही जब वे गोकुन में रह कर गोपान करले थे, तभी से उनमे जनहित की गही भावना पाई जाती थी और वे उसके लिये समयानुकून प्रयत्न करने मे किमो प्रकार का मोच नहीं करते थे। जब उन्होन देगा कि मथुरा नगर वे ममीप होने से गोकुन की भूमि और वन-मम्पत्ति का क्षय तीव्रता मे हो रहा है तो उन्होंने उस स्थान को बदलने की योजना बनाई और उसे प्रकट करते हुए वलराम जी मे कहा- "हे थामे ! अब इस वन में गोप-वालको साय सेरना उचित नहीं, क्योंकि हम इसका उपयोग भली प्रकार कर चुके हैं । अब यहाँ पाम और पाठ प्राप्त करने लाया वृक्ष भी कम रह गये हैं गरि गोरों ने वृक्षो का काट हाता है । पहले यह वन वृक्षों में इनना परिपूर्ण था कि और कुछ भी दिखाई नहीं देता था, परन्तु अब उन वृक्षो के बट जाने पर सरनता मे दूर ता देवा जा सकता है । गोशाला और उसकी प्राचीर पर स्थित वृक्ष ब्रज की अग्नि मे दग्य होरर प्रभाहीन हो गये हैं। जो घाम अयदा याप्ठ पते गावुल के समीप था और वह यहुन दूर हो गया है तथा यत्नपूर्वर उगती सीम करनी पड़ती है। इम वन में पाम, जल और विश्रामस्थल मिलना अव वटिन हो गया है। यहां में गभी वृक्ष बैवार हो चुरे हैं. इसलिये वनवामी पक्षियों ने इह त्याग दिया है । यहाँ के निवामियो न वृक्षों को पाट डाना है, इगतिय अव दन वन में यायु के मुगद ही उपलब्ध नहीं होने । पक्षियो वे चले जाने गे वय यह धन शारादि से हीन भोजा ये ममान निरानन्द हो गया है । "बन में उत्पन्न वनस्पतियों और पाठ या विक्रय होने मे यहा इन यस्तुओ का अभाव होता गया है । पर्वता या गोमा ग्राम हैं, ग्रामोवी गोमा वन रुपा पनी की गोभा गोएं है, यही हमारी परम गति है। इनिये इम स्थान पोछोड पर हमे वही चरना चाहिये जहाँ पाम और पाठ भरपूर मित मरे, (१०) वयोयि गौएं नवीन तृण घरना चाहती है। हम अजवासियो के लिये वो भी निश्चित घर, क्षेत्र अथवा द्वार आदि का बन्धन नहीं है। हम तो हमनगारग आदि पक्षियो के समान जहाँ वही भी जाबर रहने लगे, वही स्थान ब्रज बन जाता है । यहाँ की घास मे गोबर और मन-मूत्रादि ये मिश्रित हो जान मे एक प्रकार का क्षार उत्पन्न हो गया है, इगलिये गौएं उसे चिपूर्वक नही परती और उससे उनका दूध भी उतना हितकारी नहीं होता। इपनिये हमे नवीन तृणयुक्त समतल वन्य-प्रदेश में अपनी गौआ सहित चन देना चाहिये।" इस प्रकार भगवान कृष्ण के हृदय मे बाल्यावस्था से ही लोरहित की सामूहिक भावना पाई जाती थी । वे यह भी समझते थे वि गौपालन करने वाले मानव समुदाय को किसी एक स्थान में बंध पर रहने की आवश्यकता नहीं वरन् जव नहीं चारा और जलघायु उत्तम मिले वही जाकर निवास परना चाहिये । पर अधिकाश मनुष्य स्वभाव से रूढिवादी और परम्पराप्रिय होते हैं इसलिये अनेक असुविधाओ और हानियो को सहन परके भी नवीन परिवर्तन को अपनाने के लिये तैयार नही होते । इसलिये श्रीकृष्ण ने उनको युक्ति का अवलम्बन करके आतकित किया और गोकुल से हटा कर वृन्दावन के नये और मारन मम्पन्न प्रदेश मे ले गये। जन-सेवा की भावना- वृन्दावन पहुंच कर उन्होने लोगो को सुरक्षा और सुस सुविधा की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न किया और वहां जितनी विघ्न बाधायें तथा सक्ट सामने आ उसका निराकरण किया। उनके द्वारा कालिय नाग, नुकासुर, अरिष्टा- सुर, केशी आदि का विनाश किया जाना इसी उद्देश्य को पूर्ति के लिये था। उन्होने अनुभव कर लिया था कि जब तक जन जीवन को सुरक्षित और निष्क- टक' न बनाया जायगा तब तक उसका अच्छी तरह विकास और वृद्धि होना सभव नहीं। इसलिये उन्होंने गोप युवको मे तरह तरह के क्रीडा आयोजनो द्वारा सामूहिकता को भावना उत्पन्न की और सम्मिनित प्रयत्नो द्वारा बडी से वडी वाधा का निराकरण करके वृन्दावन को सब प्रकार से एक आदर्श उपनि वेश बना कर दिखा दिया।
श्रीकृष्ण द्वारा इन्द्रोत्सव के स्थान पर गोवर्धन-पूजा का प्रचलन भी इमी मनोवृति का द्योतक था । इन्द्रोत्सव विशेष रूप मे कृपिदार्य पर आधार रखने वाले जागगी वी परम्पग थी, जो इन्द्र-योग आदि के द्वारा यथोचित वर्षा होने की कामना रखते थे जिमसे अन्न की उपज ठीक हो म । पर वृन्दा- वन का गोप-समुदाय मुम्य स्प से पशुपालर समुदाय था जिसका मुन्य उद्देश्य उत्तम गोचर-भूमि और किंचित शुष्क वातावरण प्राप्त करना होता है। ऐसी परिस्थितियाँ पर्वतो वी तलहटी मे अधिक होती हैं और वह भूमि कृषि की अपेक्षा पशु सम्बद्धन के लिये ही विशेप उपयुक्त मानी जाती है। इमलिये श्रीकृष्ण ने अपने नये उपनिवेश की सीमा गोवर्धन पर्वत क समीप तक बढ़ाई और लोगो को यह प्रेरणा दी कि उस क्षेत्र को ही अधिकाधिक विकसित करने की ओर ध्यान दें। उन्होंने इस आन्त को गोप जाति के मुखियाओं को समझाते हुए कहा- "हमारी जीविका तो गोधन से चलती है और हमारे देवता भी पर्वत, वन और गौएँ ही हैं। कृपको की जीविका येतो से और वैश्यों को जीविका व्यापार से है, वैसे ही हमारी जीविका का साधक गोधन है। विद्या-साधन का थाराध्य विद्या ही होती है और वह सरस्वती का ही पूजन करता है । इसके विपरीत जो लोग किसी एक देवता द्वारा जीविका प्राप्त करते हुए अन्य देवता का पूजन करते हैं, उन्हे इह लोक और परलोक दोनो मे ही सुख नहीं मिलता। कृषि की सीमा सेत है, खेत की सीमा वन हैं और वन की सीमा पर्वत हैं। वे पर्वत ही विविध रूप धारण कर बनो की रक्षा करते हैं। वे वनो मे विघ्न उपस्थित करने वाले दुराचारियों को नष्ट कर देते हैं ! ब्राह्मण लोग मन-यज्ञ और कृपक हलके अग्रभाग से कृपिन्यज्ञ करते हैं, उसी प्रकार हम गोपो को गिरि यज्ञ करना चाहिये, क्योकि हमारा हित उसीसे सम्बन्धित है। अव वर्षा समाप्त होकर शरद ऋतु आगई है, सेतो मे अन्न परिपक्व हो गये हैं, पर्वत पर वृक्षो की शाखायें घर के समान विस्तृत होकर भुक् गई हैं, इसलिये हम भी गोआ को सजा कर इस पर्वत-देवता का पूजन करना उचित ही है।" इम प्रकार श्रीकृष्ण ने पशु-पालक ममुदाय को अर्थ-व्यवस्था पर यथार्थ काश डाल कर उनका सच्चा माग-दर्शन किया और उनको इन्द्र-यन के स्थान पर गोवर्द्धन-उत्सव की प्रेरणा दी जो उनके लिये अधिक हितपर थी। गोवर्द्धन- उत्सव का आशय वेवल पर्वत की पूजा ही नही था, पर गो वश की उन्नति तथा विकास सम्बन्धी सभी विषयो पर विचार पर लाभकारी योजना बनाना तथा उनको वार्यान्वित करने की विधियो को सोचना भी था। जिस प्रकार आज-कल उद्योग धन्धो तथा राष्ट्रीय सपत्ति की वृद्धि के लिये विभिन्न योजना- आयोग बनाये जाते हैं और समय-समय पर उनकी बैठकें होकर विभिन्न कार्य- क्रमो पर तिचार किया जाता है उसी प्रकार उस गुग मे सामूहिक उत्सव और मेले ही सार्वजनिक हित की योजनाओ को निश्चित करने और आगे बढाने में सहायक होते थे। भगवान कृष्ण ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये जो उपाय निकाला वह पूर्णत कल्याण री सिद्ध हुआ और किसी रूप में अभी तक प्रच- लित रह कर गो वश की महिमा को प्रकट कर रहा है। राजनीतिक दोषो का निराकरण- जिस प्रकार भगवान कृष्ण ने लोकहितकारी, बुद्धिसगत दृष्टिकोण अपना कर सामाजिक और आर्थिक सुधारो का प्रयत्न किया, उसी प्रकार राज- गीतिक क्षेत्र मे भी उन्होने सर्वोत्कृष्ठ सूझ-बूझ और समयानुकूल गतिविधि का परिचय दिया। उनके समय मे कस का दूषित और निरकुश साम्राज्यवाद चल रहा था। वह एक नीच स्वभाव का महत्त्वाकाक्षी व्यक्ति था, जिसने राज्य की लालसा से अपने पिता को सिंहासन से उतार कर उस पर जबर्दस्ती अधिकार कर लिया था । अपनो स्वार्थपूर्ण नीतिका विरोधी होने के कारण अपने बहनोई वसुदेव जी को बन्दीगृह मे व द कर दिया था । वह अपनी सामान्य प्रजा पर करो का भार भी बढा रहा था, जिससे एक बडी सेना खडी करवे राज्य का अधिकाधिक विस्तार कर सके । वह वन्य प्रदेश में रहने वाली गोप जैसी अन्प-साधन सम्पन्न जाति पर भी दूध-धी देने का टैक्स लगा रह था। इस सब कारणो से उसकी समस्त प्रजा तथा अधिकाश राज्य कर्मचारी भी उरासे असतुष्ट थे । पर उसकी क्रूरता और दमन नीति के कारश विमी का गाहम प्रस्ट रूप से उसका विरोध करन का नहीं होता था। श्रीकृष्ण को क्स का यह अनीतिपूर्ण शासन और अनियत्रित सनिक्वाद ।
-- देश और समाज के लिये घातक जान पडा और वे वृन्दावन के वन्य-प्रदेश में हो उसके विरोध मे जन-सगठन करने लगे। जब अपन गुप्तचरो द्वारा क्स को इस रहस्य का भेद ज्ञात हुआ तो उसने कृष्ण-बलराम को गुप्त रूप से मरवा डालने के अनेक प्रयत्न किये, पर श्रीकृष्ण को जागरस्ता और शक्ति सम्पन्नता के कारण उसकी कोई दुरभिसपि सफल न हो सकी। तब उसने पहलवानो के दगल के बहाने श्रीकृष्ण को अपनी राजधानी मे बुलवा बर उनकी हत्या कराने का पडयत्र रचा । इस पर श्रीकृष्ण ने भी खुल कर पका मुकाबला करना तथा उसके पापपूर्ण शामन का अन्त कर डालने का निश्चय किया । उन्होने अपनी बुद्धिमत्ता और नीतिज्ञता से क्स के बडे-बड़े अधिकारियो तथा घरेलू नौकरों ता को अपनी तरफ मिला लिया और क्स की बडी-बडी तैया- रियो तथा घातक योजनाओ को चकनाचूर करने अचानक ही उसे यमलोक पठा दिया । उनका यह कार्य विस प्रकार लोकहित की दृष्टि से किया गया था, इसका परिचय 'हरिवश' के उस अध्याय से मिलता है जिसमे सबध के पश्चात् क्स के पिता उग्रसेन और श्रीकृष्ण का क्योपकथन दिया गया है । जव उग्रसेन कृष्ण की महान शक्ति और सगठन-योग्यता द्वारा कुछ ही घण्टी घे भीतर कस को पराभूत और नष्ट हुआ देखते हैं तो तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार वे उनसे राज्य-अविकार और शामन-मत्ता ग्रहण करने को कहते हैं । वे श्रीकृष्ण को एक विजयो राजा के रूप में मानते हैं और उनरे सम्मुस दीनता और वश्यता का भाव प्रपट करते हैं । इस पर श्रीकृष्ण ने उनको स्पष्ट स्प से अपना उद्देश्य और मन्तव्य समझाते हुए कहा- नहि राज्ये न मे कार्य नाप्यह नृप वाक्षित. । न चाहि राज्य लुब्धे न मया क्सौ निपातित ॥ कि तु लोकहितार्थाय कीत्ययं च सुतस्तव । व्यगभूत कुलस्यास्य सानुजो विनिपातित. ।। "मुझे राज्याधिकार से कोई सम्बन्ध नही है, न मुझे राजा बनने की अलावा है, और न मैने. राज्य के लोम. से क्स को मारा है । वरन् जब मैंने यह देखा कि वह अनुचित और अपने वश यो कल क्ति करने वाले वार्य कर रहा है तब 'लोकाल्याण' की दृष्टि से ही मैंने उसका और उसके छोटे भाई के जीवन का अन्त किया है।" उन्होने उग्रसेन जी को विश्वास दिलाया रि मुझे यस रा काई शता नही थी, पर वह राज्य-मद मै अन्धा होकर प्रजा तथा अपने सम्बन्धियो के साय जो दुर्व्यवहार कर रहा था और प्रजा को साम्राज्यवाद के पजे मे जबड रहा था इसी कारण मैंने उसके विरुद्ध विद्रोह का झण्डा ऊंचा किया। अब वह उद्देश्य पूरा हो गया, इसलिये मैं तो उसी वन्य-प्रदेश मे जाकर गौएँ चराना ही सबसे अधिक पसन्द करता हूँ। इस रिक्त राज्य सिंहासन पर आप ही विराजमान हो, आप ही इसके न्यायोचित अधिकारी हैं, मैं तो एक देश-सेवक' तथा समाज-सेवक के नाते आपकी जितनी भी सेवा और सहायता हो सकेगी उतनी किया करूंगा। सामाजिक अवस्था का दिग्दर्शन- प्रत्येक पुराण मे कलियुग-वर्णन का एक प्रसग पाया जाता है, जिसके विषय मे विद्वानो का मत है कि वह उस काल की सामाजिक दशा का द्योतक है, जिसमें उस पुराण की रचना अथवा विस्तार किया गया था। हरिवश के 'भविष्य-पर्व' मे भी आरम्भ मे ही यह प्रसग उठाया गया है और कहा है- "कलियुग मे राजा अपनी इन्द्रियो के दास बनकर प्रजा-रक्षण से परा- मुख हो जायेंगे । वास्तविक क्षत्रियो का राजसिंहासन पर अधिकार नहीं रहेगा और ब्राह्मण शूद्रो की जीविवा अपनायेगे । पक्ति भेद का नाम न रहेगा और सब लोग एक साथ बैठ कर भोजन करेंगे (जैसा होटलो मे देखा जाता है ) । नोकर अपने मालिको से प्रतिस्पर्धा करने लगेंगे और उनका सर्वस्व अपहरण कर लेन में भी सकोच नहीं करेंगे । उस समय धन की ही पूजा होगी । सज्जन उपेक्षणीय समझे जायेंगे और पतितो की कही निन्दा नहीं की जायगी। और- अट णूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुप्पथा। प्रमदा केश शूलाश्च भविष्यति युगक्षये ॥ 'सभी लोग अन्त को बेचने लगेगे, ब्राह्मण धर्म को बेचने वाले हो जायेंगे और स्त्रिया अपने रूप-सौन्दर्य का विक्रय परने लगेंगी-उस युग के अन्त मे सर्वत्र यही दशा दिखाई पटेगी।" पामर जनो से लेकर साधारण लोग ता ब्रह्मवाद के बहाने कर्मभ्रप्ट हो जायेंगे। पलियुग में ग्राह्मण तपस्या और यमो के पल को बचेंगे और समस्त ऋतुएं समय विरुद्ध प्रवर्तित होगी। शूद्रगण मद्य-मांस त्याग कर श्वेतदन्त, सूक्ष्मदर्शी मुण्डितमुण्ड या कापाय वेप धारो होकर बौद्ध अथवा जन-मत को मान र वेद विरद्ध आचरण करेंगे। पृथ्वी पर हिंसक जीवो की अधिकता हो जायगी और गौओ का ह्रास होने लगेगा। सभी वस्तुओ का स्वाद घट जायगा । उस समय म्लेच्छगण मध्यदेश में और मध्यदेश निवासी म्लेच्छदेशो में जाकर रहने लगेंगे। समार के सभी लोग चौर्य वृत्ति अवलम्बन करके परस्पर एक दूमरे या धन अपहरण करते हुये अल्प आयास से ही धनी बन जायेंगे और तरह-तरह के व्यसनो मे फॅम कर दुर्दशाग्रस्त होन लगेंगे-- सर्वे वाणिज्यकाश्चैव भविष्यन्ति कलीयुगे । कलियुग में सभी लोग वाणिज्य-वृत्ति का अवलम्बन करके उदरपालन करने वाले होंगे । समस्त पृथ्वी वृथा रूप-गविता एव दुश्चरित्रा नारियों से भर जायगी और उनकी संख्या पुरुषो से अधिक हो जायगी । ब्राह्मण लोग बिना विचारे सभी वर्गों वा दान लेते फिरेंगे । ससार के सभी लोग राज-दण्ड, चोर- दण्ड और अग्नि-दण्ड से नितान्त दुखी होकर नष्ट होने लगेंगे। खेतो मे बोया हुआ बीज भी नष्ट हो जायगा। तरुण पुरुप वृद्ध जैसे दीखेंगे। ब्राह्मणो मे केवल क्रोधमात्र की निपुणता शेप रह जायगी। क्षत्रियगण वैश्यो के समान धन-धान्य का क्रय-विक्रय करके जीविकायापन करेंगे। अनावश्यक होने पर भी लोग झूठी प्रतिज्ञा करेंगे और शपथ लेंगे । नीच प्रकृति वाले ही नहीं, उच्च कहलाने वाले भी ऋण लेकर हडप कर जायेंगे। गोधन की कमी होने पर लोग दूध के लिये बकरियां पालेंगे । शास्त्रज्ञान विहीन लोग इच्छानुसार शास्त्रीय नियमो का प्रतिपादन करेंगे और अनुभवी वृद्धो से उपदेश प्राप्त किये बिना ही सब कोई अपने को सर्वज्ञ और विज्ञ समझने लगेधे । इतना ही नहीं- न कश्चिद् कवि म युगान्ते समुपस्थिते । उस कलियुग मे कोई मनुष्य 'अकवि' म रह जायगा, अर्थात् सभी साहित्य के ज्ञाता होने वा दावा करेंगे । पुत्र पिता से और स्त्रिया अपनी मार्गा से सेवा कार्य लेगी, गुर के प्रति शिष्य वा गर्जन-तजन भीषण हा टंगा।" आजकल इन बाता में से अधिवाश प्रत्यक्ष होती दिपलाई पड़ रही हैं और इससे लोग बात बात मे वर्तमान युग को निन्दा परते हैं। पर हरिवश फे इस प्रसग से अनुमान किया जा सकता है कि इस प्रकार की दुष्प्रवृतियाँ आज से दो डेढ हजार वर्ष पहले भी पाई जाती थीं, चाहे उग समय उनका विस्तार अधिक न हुआ होगा। उस समय सर्वसाधारण मे इन दूपित मनोवृत्तिया के लक्षण देखकर ही पुराणकार ने भविष्य वा अनुमान करके यह चित्र खीचा है। 'विष्णु पुराण' मे भी कलियुग का वर्णन करते हुसे लोगो को बढनी हुई स्वार्थमयी मनोवृत्ति को देख कर जग के परिवर्तनो का जो वर्णन किया गया है वह इससे मिलता-जुलता ही है । उसमे पराशर जी ने कहा है- "कलियुग में मनुष्यो की प्रवृत्ति वर्णाश्रम धर्म और वेदत्रयी युक्त नहीं होती । उस समय धर्म-विवाह, गुरु शिष्य सम्बन्ध, दाम्पत्य जीवन का क्रम और अन्य धर्मानुष्ठानो का लोप हो जाता है । जिसके मुख से जी निकल जाय वह शास्त्र मान लिया जाता है । भूतगग देवता बन जाते हैं और सभी के लिये सब आश्रम खुले होते हैं । स्त्रियाँ धनहीन पति का त्याग करंगी और धन को ही पति बनायेंगी । अधिक धन देने वाला ही स्वामी होगा, कुलीनता तया सज्जनता का कोई महत्त्व नही होगा। सभी व्यक्ति अन्यायपूर्वक धन ग्रहण करवाने ५ इच्छा करेंगे । शूद्र ब्राह्मणो की समानता करेंगे और दूध दने के आधार पर ही गौओ का सम्मान किया जायगा। भूस से व्याकुल हुई प्रजा अनावृष्टि के भय से आकाश की ओर ताकती रहेगी। ब्रह्मचारी व्रतादि न करने वाले गृहस्थ सत्सान को दान न देने वाले, वानप्रस्थ नगर का भोजन पसन्द करने वाले और सन्यासी अपने परिवार वालो के प्रेम मे फंसे रहने वाले होगे। कतियुग मे राजागण कर लेने के बहाने प्रजा को लूटने वाले होगे । अधम लोग सन्यासी के वैप म भिक्षावृत्ति करेंगे और सम्मानित हो पाखड की वृद्धि करेगे।
मंडेय जी | जमे-जैमें धर्म की हानि होती हुई दिखाई दे, वैसे-वैसे ही कलि- का वढना हुआ समझन।" वास्तव में कलियुग अथवा पाप-युग का मुध्य लक्षण यही है । जव भी धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती दिसलाई दे तभी कलियुग समझ उया जाय । अन्य सब बुराश्यां उमी के अन्तर्गत आ जाती हैं। ऐसी परिस्थि- नयाँ प्रत्यक युग मे वीच-बीच में पैदा होती रहती हैं। बस और कालयवन सो का शासन किसी युग में पपो न हो उसे कलियुग ही समझना चाहिये । र इतना अवश्य है कि इसकी अधिक वृद्धि तभी होगी जब धन की अधिक द्धि होगी क्या मनुष्य नैतिकता तया धार्मिक्ता की अपेक्षा उसे अधिक महत्त्व गि। जब कभी साम्राज्यवाद और पूजीवाद की प्रवृत्तियाँ बढ़ेगी सर्वसाधारण र अनेक प्रकार के दोष उत्पन्न होंगे और दुगुणी की वृद्धि होने लगेगी। साम्प्रदायिक समन्वय की प्रवृत्ति- अनेक विदेशी विद्वानो का कथन है कि अधिकाश पुराण साम्प्रदायिक- भावना से रच गये हैं और उनके कारण विभिन्न सम्प्रदाय वालो के बीच दुर्भावना उत्पन्न होती है । इस फ्यन को कुछ अशो में ठीक मानते हुये भी सब पुराणों को सम्प्रदायवादी अयवा विभिन्न सम्प्रदायो में वैमनस्य उत्पन्न करने वाला मानना उचित नही जान पहता। दो चार पुराणो मे यन्य देवो की निन्दान्मा बातें मिल सकती हैं, पर अधिकांश पुराणकारों ने शेव-वैष्णव- शाक्त इन तीनो मतो मे सामजस्य स्थापित करने का ही प्रयत्न किया है। इसका एक स्पष्ट उदाहरण शिवपुराण और रामचरितमानस की तुलना करने से मिल सकता है। शिवपुराण में शिव को सर्वोपरि मान कर विष्णु और ब्रह्मा को उन कृपापात्र के रूप में दिखलाया है । इसके विपरीत रामायण में जो पिपई पुराणों के आधार पर लिखी गई है ) राम ही सर्वेश्वर हैं और शिव उनके सबसे बडे भान हैं । इस तरह एक दूसरे के सबंया विपरीत दृष्टि- गौण रखते हुए भी दोनो रचनाओ मे समन्वयात्मक दृष्टिकोण ही अपनाया पपा है। 'हरिवंश' यद्यपि एक वैष्णव-पुराण है और उसका मुन्य उद्देश्य कृष्ण है परित्र पा उपपं और उरावा विस्तार करना है, तो भी उगमें शिव को। ऊँचा स्थान दिया गया । 'भागवत' 'ब्रह्मवयतं', और ' विगण' आदि जहाँ श्रीकृष्ण को सर्वोपरि तथा सर्वेश्वर यतलाया गया है यहाँ 'हरियम शिव कोही ऊचा स्थान दिया गया है । यद्यपि शिव भी श्रीकृष्ण का राम फरते है, पर मृष्टि मे ऊँचा स्पान उन्हीं का है। इस दृष्टि से 'पारिजात लिये श्रीकृष्ण और इन्द्र के संघर्ष पे अवसर पर श्रीकृष्ण द्वारा शिव यो र विशेष महत्त्व की है। वे शिवजी की आराधना परत हुए पहते हैं- "हे देव । आपने रदन करते हुए द्रावण दिया इमी कारण 'र' पहे। हो । आप नित्य अपने ही प्रकाश प्रवाशित होते रहते हैं, आप भवतवरमल यसएय मुझे यशस्वी बनाइये । आप गृहस्थ म रह्ने वाले ससारी और ससार विरक्त सन्यासी रूपी पशुओ ( जीवो ) के स्वामी हैं, अतएव लोग आर 'पशुपति' कहते हैं । आप सर्ववर्मा हैं, आपसे बढकर श्रेष्ठ देवता और कोई नहीं है । आप जगत्पति तथा देव-शत्रुओ के नाशक हैं। आप ईश्वरो के ईश्वर हैं, आप आद्य, प्रीतिप्रद और प्राणप्रद हैं। आप साघुओ का कल्ल करते हैं इसी से लोग आपको 'शवं' कहते हैं। आप ही "ईशान' हैं, आ तेज सूर्य से भी अधिक है । आप अपने भक्तो को सदा शान्ति तथा पापा को दण्ड देते हैं, इसी से धर्मात्मा व्यक्ति आपको 'शवर' कहते हैं । हे सो बाप ससार मे स्त्री-चिह्न, पुरुष-चिह्न, स्थावर और जगम सब के सर्वस्व जो विप्रगण आपके वास्तविक तत्त्व से परिचित हैं, वे लोधात्री पार्वती । तथा आपको गुणात्मक कहते हैं । वेदो मे इन उमा देवी को मायास्वरूपा व गया है । इस मायास्वरूपा भगवती से ही महत्तत्त्व की उत्पत्ति होती है । यज्ञ में दीक्षित योगियो के यज्ञस्वरूप हैं । भूत, भविष्य तथा वर्तमान मे वि भी समय आपके तुल्य कुछ भी नही है । हे देवादिदेव मैं (विष्णु), ब्रह कपिल, शेष भगवान आदि सब आपके द्वारा ही उत्पन्न किये गये हैं। ज के सभी पदार्थ, वस्तुएं आपके द्वारा ही उत्पन्न होती है । इससे आप सर स्तुत्य हैं।" शिवजी भी श्रीकृष्ण के महत्त्व को स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं- ( १६ ) "हे गुग्मत्तम ! आपकी कामना अवश्य पूर्ण होगी । बाप अवघ्य, अजेय तथा मुझ से भी अधिक बलवान होंगे। जब मापने मनाक पर्वत पर सपस्या की थी तभी मैंने आपको वरदान दे दिया था। मेरा वरदान कमी ध्यर्थ न होगा । आज से मैं विल्वोदकेश्वर के नाम से विग्यात हूंगा और आप जहाँ मुझे स्थापित कर देंगे यही रहता हुआ सद लोगों की कामना पूर्ण करता - ये सर वर्णन साम्प्रदायिक द्वेप से कितने पृयक और समन्वय की भावना की वृद्धि करने वाले हैं, यह पाठक सहज में अनुभव कर सकते हैं । हरिवश मे मर्वत्र ऐमी ही समन्वयात्मक नीति से काम लिया गया है और किसी भी देवता को नीचे गिराने की देष्टा नहीं की गई है। विश्व और मानव की वकता- भगवान भी लीला-पयायो के उपरान्त जहाँ 'हरिवश में विश्व और मानव के वास्तविक स्वरूप पर विचार किया है, वहाँ दर्शन तथा योग सम्बन्धी उदृष्ट तत्त्वो का निरूपण एक निराले ही ढम से किया गया है । उसमे मानव- पारीर में ही ब्रह्माण्ड की स्थिति सिद्ध की गई है और कहा है कि मनुष्य उचित साधन द्वारा सहन में ही इस चराचर जगत का स्वामी और नियंत्रक बन सकता है । 'हरिवश' का यह दिवेचन अनेक दृष्टियो से विलक्षण और विशेष महत्त्वपूर्ण है । इसमे योग का बहुत मूक्ष्म वर्णन करते हुये उसके प्रचलित अष्टाङ्गो का नामोल्लेख नहीं किया है, पर उसकी विधियो तथा उनके परिणामो पर भली भांति प्रकाश डाला गया है। 'हरिवश' में मधु-कंटम के उपाख्यान वा अन्य पुराणो की तरह वर्णन घरते हुए यह भी प्रकट क्यिा है कि इस क्या मे विवेक स्पी विष्णु मोह रूपी मधु दैत्य पर विजय प्राप्त करके उसको नष्ट करते हैं। सृष्टि-रचना में जब विष्णु और मधु का भीषण सग्राम होता सो सिद्धग्ण आवाया में प्रस्ट र उनकी स्तुति करते हैं- "हे नारायण इस पातु विनिर्मित भौतिक शरीर में जो निलिप्त भाव से वेतन बन कर विराजमान रहता है, वह चेतन ही चिन्मय सनातन ( २० ) ग्राह्य और देहेन्द्रिय सयुक्त जीव के नाम से प्रसिद्ध होता है । यह पांच भौतिम उपादान प्रलयकाल मे सूक्ष्म होपर नारायण में विलीन हो जाता है। फिर जब समय आता है तब वही सूक्ष्म रूपधारी उपादान विभिन्न रूपो में जीवी को उत्पन्न करके अपने मायाजाल में फंसा कर मानस-शरीर धारण मरफ विभिन्न लोको मे विचरण करता रहता है। वे योगात्मा भगवान शिष्टो का पालन और दुष्टो का निग्रह करने के लिये विभिन्न रूप धारण करने पृथ्वी पर अवतीर्ण होते हैं । वे ही भूतधात्री पृथ्वी, शेप नाम वाले अनन्तदेव, स्वर्ग- लोक के धारक है और वे ही पचभूत है। इस प्रकार वे ही धार्य और धारव हैं । वे ही वेद रूप से ब्राह्मणो को, युद्ध रूप से क्षत्रियो को, दान रूप से वैश्यों को और सेवा रूप से शूद्रो को पालते है । वे दुग्ध रूप से गो, यज्ञीय प्रोक्षण रूप से अश्व, ऊष्मा रूप से पितर, हवि रूप से देवता, सप्तविध-अन्नरूप से पितृगणो और समस्त त्रिलोकी का पालन करते हैं । आप कभी तेजोमूर्ति धारण कर विश्व को प्रकाशित करते हैं और कभी तमोमूर्ति होकर सब कुछ अन्धकारपूर्ण कर देते है। हे भगवान आप ही आकाशादि पचभूत आप ही अहकारादि पचतन्मात्रास्वरूप हैं । आपसे ही ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई है । आप सबके मूल कारण हैं । इसलिये अग्नि, वायु प्रभृति आप से ही तेज प्राप्त करते हैं । प्रलयकाल उपस्थित होने पर रुद्र स्वरूप होकर आप सब कुछ भस्म करके मात्मसात् कर लेते हैं।" इस प्रकार पुराणकार ने कथा और रूपक के साथ विश्व के वास्त- विक स्वरूप और उसके मूल आधार पर भी पूरा प्रकाश डाला है। इसका आशय यही है कि पुराण साधारण और विशेप सब श्रेणियो के व्यक्तियो के लिये उपयोगी हैं। साधारण व्यक्ति दृश्य-जगत को ही देखता और समझता है, इसलिये उसके मार्ग-दर्शन के लिये भगवान के लीला-प्रसग यो मनोरजक रूप में उपस्थित किया गया है । पर ज्ञानीजन इसके मूल स्वरूप को जानने के अभिलापी होते हैं, इसलिये परमात्मा के सत्स्वरूप और जह प्रकृति से नाना प्रकार के अद्भुत और आश्चर्यजनक रचना के प्रकट होने का रहस्य भी बतलाया गया है। रचयिता का यह प्रयत्न निस्सन्देह प्रशसनीय है।
( २१ ) 'हरिवंश' की योग-पद्धति की विशेषता- शास्त्रो मे अध्यात्म-मागं में प्रगति होने का मुस्य उपाय योग बतलाया गया है । भक्ति और ज्ञान मार्ग अधिकाश मे भावना-प्रधान हैं। यदि हमारी भावनाएँ शुद्ध होगी, उनमे प्रखरता होगी मनोवल सुदृढ होगा, तभी हम भक्ति और शान-मार्ग की साधना को प्रभावयुक्त बना सकते हैं। पर योग अधिकाश मे व्यावहारिक और क्रियात्मक होता है और उसका प्रतिफल यपने को और दूसरो को भी बहुत कुछ स्पष्ट दिखलाई दिया करता है। इसलिये सभी धर्म- शास्त्री ने उसका महत्त्व स्वीकार किया है और उसका मार्ग भी बतलाया है । 'हरिवश' मे योग-मार्ग या जो विवेचन किया गया है, उसमे यम-नियम, आसन, प्रत्याहार आदि आठ अङ्गो का नाम नही आया है, वेवल उनके स्वरूप और विधि का वर्णन एक स्वतन्त्र रूप में ही दिया गया है। उससे पूछ विद्वान् यह अनुमान करते हैं कि हरि-वशीय योग-पद्धति अन्य ग्रन्यो की अपेक्षा अधिक प्राचीन समय की द्योतक है। उदाहरण के लिए उसकी कुछ बातें निम्न प्रकार हैं "भगवान ईश्वर, ऐश्वर्य प्राप्ति के साथ ब्रह्मरूप में अवतीर्ण होकर योगासवत चित्त से स्थाणु ( खूटे ) की तरह अचल भाव से रहते हैं। उनके रजोगुण की ओर आकृष्ट होने पर जीव सृष्टि की बहुलता होती है । मोक्ष पद प्राप्ति में जिस प्रकार विविध बाधायें रहती हैं, उसी प्रकार ज्ञान पद की प्राप्ति में भी अनेक विघ्न रहते हैं । किन्तु भगवान मोक्ष पद के समान ज्ञान-पद म भी सहायक होते हैं और ज्ञान पद से साधन करने मे हजारो पद उत्पन्न कर देते हैं। जो ब्रह्म सदृश्य ब्राह्मण साधक विकारहीन कार्य मे प्रवृत्त होते हैं, उनमें सर्व प्रथम आकाश रूपी ऐश्वयं का उदय होता है। यह आवारा-ज्ञान ही विशुद्ध ब्रह्म है । वेदो की भली भाँति आलोचना करने से ज्ञात होता है कि ब्रह्मवादी योगी, देहधारी व अन्यान्य सभी पदार्थ ब्रह्म में ही विलीन रहते हैं। ब्रह्म-योग का अनुष्ठान करने से परब्रह्म म आकाश रूपी ऐश्वयं का ज्ञान होने पर योगीगण उन्हे वायु स्वरूप कहने लगते हैं। इसी प्रकार क्रमश तेज आदि (अग्नि तत्व आदि ) विकारो का भी प्रादुर्भाव होता है। इस प्रकार सय .
( २२ ) विकारों से उत्तीर्ण हो जाने पर जव साधर मे ध्रुव ऐश्वयं स्वरूप परब्रह्म में शान का उदय होता है, तब वह सिद्ध पुस्प कहा जाता है। वह सिद्ध पारीर से निरालम्ब हो वायु आदि महाभूता के सहारे अदृश्य भाव से आताश में विचरण करता है । इहलोव के मनुष्य इन्द्र के सदृश्य हजारो नेत्र पाकर भी उसको नहीं देख सकते।" इसके पश्चात् 'ओकार-योग' का महत्त्व दर्शाते हुए कहा है-"विद्वान् ब्राह्मणो के लिये यह कार ही ब्रह्म स्वरूप रहता है । यह वार चतन्य परमात्मा के साथ सब जीवो के अन्तरात्मा में विचरण करता रहता है । श्रेष्ठ साधको का क्यन है कि इस 'ॐ' शब्द और ब्रह्म मे तनिक भी भेद नही है। यह नित्य, सर्व वर्ण प्रकाशक और वायु स्वरूप है। यही वैखरी रूप को प्राप्त हो जाता है। यद्यपि ॐकार रूप रहित है, पर नाना प्रकार के तत्वो से मिल फर जीवो के शरीर मे वैखरी स्वरूप हो जाता है । यह कार रूपी ब्रह्म सूक्ष्म रूप से सब जीवो मे विचरण करता रहता है, किन्तु किसी मे लिप्त नहीं होता। जो उदार मनीषी ब्रह्म मे तन्मय जाते हैं वे ही इस ओकार रूपी ब्रह्म का चिन्तन कर सकते हैं। उत्कृष्ट पद प्राप्त करने के लिये ही प्राणपण से विविध प्रकार के वर्म करते हैं।" भागे चलकर ज्ञान और भक्ति का समन्वय करने के उद्देश्य से कहा गया है- “वे योगी तीन बार प्रदत्त पुष्प-माला की तरह ज्ञानोपहार अर्पण करके सत्य पराक्रम विष्णु की आराधना करते हैं । वेद ही जिनका एकमात्र अवारम्वा होता है, ऐसे वेदज्ञ साधर वेदो के प्रमाणानुसार योग और विष्णु- पूजा दोनो प्रकार के कर्मों का अनुष्ठान करते हैं । उनको यह दृढ विश्वास हो जाता है कि ब्रह्म और विष्णु अभिन । निर्मल अन्त करण के साधक मोक्ष के अधिकारी बनकर जिस महात्मा का साक्षालार करते हैं वही ब्रह्मा, विष्णु, रस, ऐश्वर्य तथा परम आश्चर्यमय पदार्थ है। किन्तु वायु आदि विरोवे शान्त न होने तक उसका दर्शन अति दुसह होता है ।" इस प्रकार के ब्रह्म-योग और विष्णु-योग मे जो 'विकार' या विघ्न याने हैं उनका वर्णन भा पुराणकार ने बडी स्पष्टता से किया है । पहले ( २३ ) - राजस' योगोपसगों का वर्णन करते हुए कहा है--नेत्र, वर्ण आदि पांच इंद्रियो को सिद्ध कर लेने से ही दूर-दर्शन तथा दूर-श्रवण आदि का ज्ञान अनायास प्राप्त हो जाता है। अतएव जो पचेन्द्रियों में स्थित रूप और प्रामाशादि गुणा को त्याग कर सनातन ब्रह्म के विषय में मनन करते हैं, वह उत्कृष्ट वैराग्य-भाव प्राप्त होने के पहले ही योग-मिद्धि के दिपय मे नाना प्रकार के विघ्न घेर लेते हैं। नव-द्वार युक्न इस शरीर में काम, क्रोध, लोम, मोह प्रभृति अनक उपमर्ग विद्यमान रहते हैं। अपनी बुद्धि शक्ति की सहायता से उन उपमो वा ज्ञान प्राप्त कर लेने पर शरीर में एक प्रकार के तेज पा प्रादुर्भाव होता है। वह तेन जव मस्तर से निकलता है तो भयानक म्प से धुआं-मा उठता जान पडता है । वह घुओं नील, रक्त-वर्ण, पीत, श्वेत, मजिष्ठ, वपोत ग्रीव, वैदूर्प, पाराग, सटिक यादि मणियो और इन्द्र-अनुष में समान विविध वगों का होता है। वह विविध वर्ण का घुआं मेघ के ममान एक साथ समस्त भावाश ( व्यक्तिगत ) म छा जाता है। तदनन्तर जब वह धून घनीभूत होकर मेघ म्प में परिणित हो जाता है तो उमसे 'वर्षा' होने लगती है । उस यर्पा या सारा जन पृथ्वी म ममा जाता है। "इस प्रकार उस धुएँ के शान्त हो जाने पर संबडो लपटी से युक्त भयकर अग्नि जल उठनी है। उस समय उस योगी के शरीर से बनगिनती चिनगारियां निक ने लगती हैं। उधर मेघ में जिनना जल वरमता है इधर योगी के शरीर से उतनी ही अग्नि शिवाय उत्पन होती हैं। तदनन्तर वह समस्त 'जनधारा' प्रत्यक' 'अग्नि शिवा' म प्रविष्ट होरर ज्याला को शान्त पर देती है। इन दोनो उपसगों म शान्त होरर चित्त का उलर्ष होन पर घोरतर 'वायु' चलन लगता है । उसका वेग बहुत ही प्रबल होता है, सन्द अत्यन्त भयकर होता है। इस प्रकार ये अग्नि, वाय, जन, प्रनि तत्त्व एपषित होर संबडा और हजारो रूप ग्रहण कर लेते हैं। पर वास्तव में यह प्रह्म ही इस प्रकार के सपोग का कारण होता है। उस समय योगी के दानों शो में जो ब्रह्म नाम की वस्तु लक्षित होती है, यह अनिसय सूक्ष्म तथा frराट ये नाम से विख्यात है। अतएव उस समय वह योगी ही स्यून मूक्ष्म.
। २४ ) - भूत, समस्त विद्याओ का आधार एवं प्रलयकर्ता भगवान विष्णू या रूप जाता है । इस प्रकार यह योगी सर्वभूत समष्टि रूप हो उठता है। यह अपना स्थूल शरीर त्याग कर भगवान का सारूप्य प्राप्त कर लेता है । ऐमे | योगीगण कम-बन्धा से मुक्त होकर ही इन्द्रियो के बन्धन से मुक्त होते हैं । अतएव अन्त मे वे जिस प्रकृति को प्राप्त करते हैं, वह प्रकृति यज्ञादि यों में लगे हुए व्यक्तियों के लिये बहुत दूर की वात रहती है। वे यदि अग्निहोनादि पज्ञ तथा कष्ट-साध्य बान्द्रायणादि व्रतो का अनुष्ठान करते हैं, तो उन्हे अपने सत्कार्यों का फल भोगने फिर ससार मे आना पडता है।" 'तामस विघ्नों का वर्णन करते हुए कहा गया है--"योग साधन के समय विविध विकार उत्पन्न होकर योगियो के मन मे शका उपस्थित करके उसे दु ख देते हैं। कभी योगी को ऐसा मालूम देता है कि वह जल में डूब रहा है । कभी ऐसा लगता है कि अतिशय शीतल तथा अति उष्ण तरग माला ने आकर उसे सर्वथा ढक लिया है। कभी ऐसा जान पडता है कि वह महा- समुद्र में निमग्न हो गया है और उसके सब अग भस्म हुए जा रहे हैं । कभी मालूम पड़ता कि नदी का तट ढह गया है और वह जल में गिर कर डूबा जारहा है । कभी-कभी ऐसा भान होता है कि उसके अन्न-वस्त्र का भी सहारा टूट गया है। कभी ऐसा लगता है कि पोत तथा श्वेत वर्ण की बिजली के समान तेजस्विनी ज्योति उसके मस्तक पर पड़ रही है। योग साधन के समर मे ये सब उपद्रव उपस्थित होते हैं । जो योगी इन विभीपिकाओ को तुच्छ समझ पर अपना साधन करने में समर्थ होते है, वे ही ईश्वरत्व प्राप्त करके सिर पुरष हो जाते हैं। "मोक्ष प्राप्ति के साधन स्वरूप योगावलम्बन के समय ब्रह्मवेत्ता व्यकि पापित स्वभावत मुस्थिर हो जाता है। विन्तु सहसा उसमे कहाँ से विघ्न 'नित विविध विकार तथा तंजस ऐश्वर्य का उदय हो उठता है, यह निश्चित नहीं है । उस समय उन्ह ऐसा मालूम पडता है कि विक्टाकार, पिंगल नेः तथा गम्भीर रूपधारी कुछ पुरुप दण्ड तान कर प्रहार करने को उग्रत हैं ऐमा लगता है मानो वे विक्ट पुरष आँखें निकाल लेंगे और जीभ के संकर ( २ ) टुक्डे पर डालेंगे। एक बार वे अपना मुम फ्ला कर नीषण म्प मे चीत्कार परते हैं और तत्लान म्प बदन कर नृत्य गीत द्वारा साधक में मन को मन्तीप देने लगते हैं। कुछ ही क्षणो वाद वे प्राणी मुन्दर म्यी प धारण करो माघर' के को पर हाय रण देते हैं । तदनन्तर हम-हम बातें करते हुए विविध प्रकार ये प्रलोभन उपस्थित वग्न हैं। कुछ देर बाद जैसे दया की भीख मोगते हए व माधक के पैरा पर गिर पहन हैं और नाना प्रकार की भाव-भगी पे साय नृत्य करते हुए उमका मन अपनी ओर आकृष्ट करते हैं।" उपरोक्त वर्णन में प्रकट होता है कि 'हग्विा' में योग का स्वम्प मुग्यत तत्वों की साधना करवं उन पर विजय प्राप्त करना माना है । क्योंकि यह जगन् पच तत्वो का ही विकार अयवा सेन । जी तत्वों पर पूर्ण नियन्त्रण ग्म माता है, वह निश्चय ही ईश्वरत्व के निकट पहुंच जायगा, क्योंकि मनुष्यों को ईश्वर का परिचय उमरी पच तवमय रचना के माध्यम से ही मिलता है। "जो साधन पच तत्वो की माया द्वारा उपस्थित किये गये इन विघ्नी को तुच्छ समझ कर अपने समय की ओर बढ़ते चले जाते हैं वे अपि- नाशी ऐश्वयं प्राप्त पर मिट बन जाते है। पर जो योग-मापर रजोगुण तथा तमोगुण के विकार से उत्पन्न पार्थिव ऐश्वयं में लुभा जाता है उमवा योग मार्ग से पनन हो जाता है और फिर उसकी निन्दा का ठिकाना नहीं रहता । बार-बार पानी निन्दा मुनकर उमरी ऐगी इच्छा होन लगती है कि वह धरती मे ममा जाय । मिन्नु यह गोत्र ही नाना प्रकार ये भौतिर तथा अन्यान्य रिपय कपी रगो की और आकृष्ट हो जाता है और तव ममारी माप्य उमे बलपूर्वक विदीर्ण वर टाने है।" योग का लक्ष्य सदैव उच्च ही रहे- इससे हम सहन ही इस निष्कर्ष पर पटच मरते हैं रि योग एर बहुत ऊंची और पवित्र वस्नु है और उमरा सस्य मदय आरमोरर तपा परोपकार ही होना पाहिए । जो लोग ताविरोरी तरह उमरा उपयोग मारण-मोहन-बीररस मी निरप म्यापंपूर्ण वियानी में घरते है अपवा ( २६ ) हठ-योगियो की तरह उसे प्रदर्शन को चीज यना डालते हैं, वे वास्तविक योग से वोसो दूर हैं 1 'हरिवश' ने इस सम्बन्ध में बिल्कुल ठीय कहा है- ब्रह्मयज्ञ तु यजतं योगद्वेदान्मक सदा । ब्रह्मणो विपुल ज्ञानमैश्वयं च प्रवर्तते ।। ततः प्रथममैश्वर्य युजानेन प्रवर्तितम् । ब्रह्मणा ब्रह्मभूतेन भूताना हित मिच्छता ।। "जो सच्चे ब्राह्मण वेदानुकून ब्रह्म-यन का अनुष्ठान करते हैं, उससे उनको विपुल ज्ञान और ऐश्वर्य प्राप्त होता है। उस प्राप्त ऐश्वर्य को स्वार्थ मे व्यय न करके परोपकार में लगा देना ब्राह्मण का आवश्यक कर्तव्य है।" धर्म का सबसे बडा लक्षण परोपकार और पर-सेवा ही है। मनुष्य चाहे छोटा हो या बडा, गृहस्थी हो मा सन्यासी, भोगी हो या योगी, उसका क्र्तव्य है कि अपनी शक्ति और साधनों के अनुसार परोपकार सदा करता रहे । जो इस क्तव्य का सचाई के साथ पालन करता रहता है, उसका जीवन सार्थक माना जाता है। केवल अपने लाभ को हो चिन्ता रखने वाला अथवा अपनी शक्तिया से दूसरो का अपकार करने वाला चाहे कितना भी बड़ा योगी, तपस्वी, ज्ञानी, ध्यानी क्यो न हो उसको नष्ट जीवन ही समझना चाहिये । ऐसे ही लोगो की असुर, दैत्य, दानव, राक्षस आदि सज्ञा होती है । वास्तव मे महत्व योग, तप, ध्यान अथवा जप का नहीं है, वरन् इनको किस लक्ष्य की पूर्ति के लिये किया जाता है, उसी आधार पर इनकी प्रशसा या निन्दा की जाती है 1 पुराणा म जगह-जगह यही बतलाया गया है कि हिरण्याक्ष, हिराकुश कोर्सयोर्य अर्जुन, रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद शुम्भ- निशुम्भ, तारकासुर आदि ने भी घोर तपस्यायें की थी, रावण को वेद-शास्त्रो पा अपूर्व पण्डित और शिव-योग का अभ्यासी बतलाया गया है, पर ये मब जगत् पे अभिशाप स्वरूप ही सिद्ध हुए । इसलिये 'हरिवश' न यदि योग का मध्य परोपकार बतलाया है तो यह कथन सोलह आने सत्य है । .
१७ ) प की महिमा- "हरिवश पुराण' में विगु तया अन्य सभी देवताओं की शति तथा पर्प का माधार तप को बतलाया है। कहा गया है कि "विष्णु ने उत्तर शा में एक पैर से सडे होकर दस हजार वर्षो तक तप किया। नौ सहन तक भस्म से आच्छादित होकर तप किया। विष्णु के साय अन्य अनक ता भी तप में लीन हो गये । देवता सोम और वृष रूपवारी महेश्वर थे, 'ठ सहा वर्ष तक महेश्वर के तप के फन स्वम्प वायु घनीभूत होकर उनके त करण में प्रविष्ट हो गया। यह वायु उद्गार के द्वारा फेन रूप में बाहर क्ला । वायु के समर्ग से वह फेन निराधार आकाश मे वाद न बन गया । पेट की इस प्रक्रिया के बाद वायु, अग्नि, वामुनि और पृथ्वी न तप किया। के अतिरिक्त आदित्य, वसु, मस्त, अश्विन, गन्धर्ष, किन्नर, नाग और इण न तप किया। इन प्रसग में तपोशीन शेप यो बालकूट विप का रण बताया गया है । पृथ्वी के तप का फन भी शेप के तप की भांति प्टि में परिवर्तन का कारण बतलाया गया है। सूर्य ने अपनी किरणो के रा तपोशील पृथ्वी का रस ग्रहण किया । यह रम वादलो द्वारा मेघ- ल के प मे पुन वापस आपा तथा इससे नदियो की मृष्टि हुई। मूर्य । किरणो से समन्वित स्वर्णमय पातुमो पाली नदिमा स्फटिक मणि की ।ति शोभित हुई।" इसमे सन्देह नहीं दि सृष्टि में प्रत्येव श्रेष्ठ पसार्य के मिलने, पिक महान् सफलता के प्राप्त होने का मूलाधार 'तप' ही है। तप या धं वेयल धूती तप लेना या पिती कटिन आमन पर बैठे रहकर न्यूनाधिक जप र लेना नहीं है। वरन् इसका आशय यह है कि यदि मनुष्य को पोई हासोवोत्तर पार्य करना हो तो उसके लिये सयम-नियम, ब्रह्मचर्य, आहार, अपरिग्रह, मानसित और शारीरिक सतुनन, सहनशक्ति आदि का प्यारमर रप से पूरा अम्पाम विपा जाप । प्राचीन पाल पे व्यक्ति इम प्य को समारते थे और इसलिये जब कोई महत्वपूर्ण समस्पा-कोई म्भीर प्रश्न सामने आता पा तो उसके लिये पहले से हर प्रकार र ( २८ ) प्रयत्न, परिश्रम, आत्म-सयम, कष्ट-सहिष्णुता आदि का जीवन व्यती करके उसके योग्य बनने की चेष्टा करते थे। तभी 'देव-शक्तियाँ' उससे प्रसन होकर 'वरदान' देती थी। गोस्वामी तुलसीदासजी ने तो यहां तक कहा है- तप चल रचइ प्रपच विधाता । तप बल विष्णु सकल जग नाता तप बल शम्भु करहिं सहारा । तप वल शेष धरइ महि भारा सासारिक कार्य ही नहीं, वरन् सृष्टि-सचालन के मूलभूत पार्यों लिये भी किसी न किसी प्रकार के 'तप' की आवश्यकता पड़ती है । जव र हम अपने लक्ष्य मे पूर्णत तल्लीन न हो जायेगे, उसके लिये बड़े से बडा क सपट, थम सहन करने को प्रस्तुत न होगे, तब तक कार्य-सिद्धि की आ नहीं की जा सकती। इनके अतिरिक्त 'हरिदश' में और भी कई ऐसी विशेषताएं पाई जा है,जिनके आधार पर पौराणिक साहित्य मे उसका दर्जा काफी ऊँचा मा जायगा । उसमे भारतीय लनित-कलाओ का जो वर्णन मिलता है उसमे दो- हजार वर्ष पूर्ववर्ती भारत की अच्छी लग पाई जाती है । उसमे नगर-निम वस्तु-कला, गृह-सजा, चित्रकला, नाट्य-कला आदि के सम्बन्ध में का महत्वपूर्ण सूचनाये मिलती हैं। श्रीकृष्ण ने द्वारका नगरी को उस समय पर क्ला विशारदो (इ जीनियरों) की सहायता से कितना अधिक सुख-सुविधा पनापा, इमरा वर्णन पढ़ने योग्य है। गन्धर्व-क्ला के सम्बन्ध मे अनेक पातें इसमे देखने को मिलती हैं । ऐतिहासिक दृष्टि से कई राज-वशों का का इसमें अधिक प्रामाणिर रूप में पाया जाता है। पृष्ण चरित्र प्राचीन और मध्य-वासी भारतीय-साहित्य का एक वि महत्वपूर्ण अंग है । भागवत, ब्रह्मवैवर्त पुराण, पद्म पुराण, विष्णु पुराण त महाभारत आदि में उनकी वापी चर्चा की गई है। पर हिन्दी मे सूरद मोरन्य परियो ने भी अपनी रचनायो से उनको धढ़त लोकप्रिय बना दि है । 'हरिव' द्वारा वृष्ण-धरित्र पर जो एक नया प्रवाश पडता है. उस ह से उसरा पटन-पाठन निश्चय ही महत्वपूर्ण है।
श्री हरिवंश पुराण
यो
विषयानुक्रमणिका
.
पृष्ठ
३-२०
विषय
भूमिका
१-हरियश श्रवण माहात्म्य
। हरिवंश माहात्म्य ॥
२-हरिया श्रवण विधि सपा पल
--वाह व्रती में पालरे योग्य नियम
सन्तान गोपास स्तोत्र
। हरिवंश पर्व ।।
-गौनर-उपयवा सवार-महाभारत पपा का महत्व
मोर मादि-गृष्टि पपन
मायामुय नागदा की उपत्ति
-रा द्वारा मानों पी उत्पत्ति
-प-उपायाा
--मनमा पिनाग-पृका जन्म
-2 मारा पी-नोन
--मवार-या
--पात मासामी उत्ति, समानी या मोर
७६
६७
विषय
१३---वैवस्वत मनु के वंशज
१४--धुन्धु का वध
१५----महर्षि गानव की उत्पत्ति
१६--निशकु की कथा
१७--सगर की उत्पत्ति और सागर बनना
१८-सूर्य वंश का वर्णन
१६-वाराह, नृसिंह आदि अवतार
२०-- भगवान विष्णु के अवतार-तीन मूर्तियो का रहस्य
पुष्करावतार, वाराहवार, नृसिंहावतार, धामन, पत्त
परशुराम, राम, कृष्ण, करिक आदि अवतारो का चा...
२१-भगवान वा ईश्वरत्व और तारकामय सग्राम
२२-देवासुर संग्राम
३-देवनाओ का दैत्यो को विफन करना
२४-कालनेमि के साथ देवताओ का युद्ध
२५-विष्णु द्वारा देवताओ को आश्वासन ,
२६-विष्णु भगवान विषयक प्रश्न
२७ अपियो की ब्रह्मलोक यात्रा
२८-विष्णु का देवताओ से वार्तालाप
२६-पृथ्वी का दुख वर्णन
३०-देवताओं वा अंशावतार लेना।
३१-नारद-विष्ण संवाद
२२-पितामह ब्रह्मा की योजना
ग
॥ विष्णु पर्न॥
१३- नारद-स संवाद
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पृष्ठ २५६ २०५ २८० २८५ विषय ३५--बग द्वारा देवी के नवजात गिगुनी की हत्या-योगमाया पा यौदा से गर्म में सन्न होना और वृष्णजी ये यदने पग द्वारा गिरा पर पटा जाना-उमराम की माप देना २६-पोरा पो यज-यात्रा ३७-श्रीन द्वारा माटामुग्ध ३.-भगवान द्वारा प्राना-वय --पनलानुन मग होने की पथा -श्रीपायी वाल-नीरा ४१-श्रीण मा वृदावन गमन ४२-शानिय नाग दमन ४३-धेन मुर-यप ४- तम्बामुर-यप ४५ोपों द्वारा इन्दोरपन ४- श्रीाग या गोवद्धनौलव ४७-गोपी द्वारा गोवदंन गूजन -श्रीरामा गोग्टन-पारण ४६-श्रीजा गोवर्दन पर अभिपेर ५०-भगरान द्वारा अरिष्टामुर-यप ५१-धीमा को लाने की मरारा प्रस्थान ५२-भीमरागीयप ५३-पत्र में पररा आगमन १४-अरद्वारा माग-नरयन ५५--ग्री और बसयम रा मयुग-न-चारी रामारा जाना-गुम्बा दारा श्रीगण को अनुन प्रदान- समरे पर रामोहना ११-रिवार पप १०४ ४०७ ४१३ विषय ५७--श्रीकृष्ण द्वारा वरा-वध ५८--उग्रसेन अभिषेक वर्णन ५६-मथुरा पर जरासन्ध को चढ़ाई ६०-जरास.धवा पलायन ६१-श्रीकृष्ण द्वारा कालयवन-वध ६२-द्वारकापुरी का निर्माण ६३-रुक्मिणी-हरण ६४-धीकृष्ण-रुक्मिणी का विवाह ६५-रुक्मी-वध वृत्तान्त ६६-पारिजात-हरण कथा ६७-भगवान का सत्यभामा को आश्वासन ६५-श्रीकृष्ण का सात्यकि तथा प्रद्युम्न को लेकर स्वर्ग जाना और बलपूर्वक पारिजात को ग्रहण करना-इन्द्र और उसके सहायको से भगवान कृष्ण का तुमुल सग्राम ६६-श्रीकृष्ण द्वारा शिवजी की स्तुति ७०-पारिजात का द्वारका लाया जाना ७१-पटपुर का वध ७२-श्रीकृष्ण का पटपुर को प्रस्थान ७३–पटपुर युद्ध मे राजाओ का बन्दी होना ७४-पटपुर का वध ७५-अन्धकासुर का वध ७६-भगवान शकर द्वारा अन्धक का अन्त ४३७ ४४६ ४५७ ४६६ ४८१ ४६० ४६६
श्री हरिवंश पुराण
व्यास 1
हरिवंश माहात्म्य
॥ हरिगश श्रवण माहात्म्य ।।
नारायण नमम्पत्य नर चैव नरोत्तमम् ।
देवी सरस्वती चव ततो जयमुदीरयेत् ॥१
जयनि पराशरगूनु मत्यरतीहृदयनन्दनो
पम्याम्पकमलगरिन वाइ ममममृत जगम्पियति ।।२
अमानतिमिरान्धम्य ज्ञानाञ्जनशलारया।
सन्मोलिन येन तम्मै श्रीगुरये नम ॥३
अगण्टमडनाकार व्याप्त येन पराचरम् ।
ननाद दशित पेन तम्मं श्रीगुरी नम ॥४
त्वया में मगनन्नीरतो भारतभरणे निधि ।
श्रवणे हरियशस्य विनेपाहद में विधिम् ॥५
ग्रामिहेगाना हरियस जगुपु ।
मन्दरामय विदिहरिण मनातनम् ॥
যা সুণি বিলােপ সয়াবিবি।
सरियापुगणे नुते ये राजगनम !"
पाशियारि पाप मनगा गमुसि।
नानमायानि तम गोंदर यया ॥
प्याप्त है, उन। [ श्री हरिया पुराए का सम्पूर्ण विश्व पान परता है ॥२॥ में अज्ञान रूप तिमिर से अधा हो र था, तभी जिन्होने ज्ञानाञ्जन की सलाई से मेरे बुद्धि रूपी नेत्रों को खोल । उनमे ज्ञान का प्रकाश भर दिया है, उन गुरदेव को नमस्कार करता हूँ ॥ यह अखण्ड मण्डलाकार चराचर विश्व जिस परमात्मा का साक्षात् कराने वाले गुरदेव को नमस्कार है ॥४॥ जनमेजय ने कहा- भगवन् । आपने मुझे महाभारत की कथा सुनने की विधि बतायी थी, कृपा करके हरिवश-श्रवण की विधि को विशेष रूप से मेरे प्रति वहिये ।। वैशम्पायनजी ने कहा-~-ज्ञानियो ने हरिवंश को ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी स्वरूप कहा है । इसलिये इसे सनातन शब्द ब्रह्म मय समझो, इसम निष्ण पुरुष परब्रह्म को प्राप्त होता है ॥६॥ हे नृपोत्तम । जैसे सूर्योदय के होने भधकार का नाश हो जाता है, वैसे ही हरिवंश पुराण के सुनने से वाणी और देह के द्वारा सचित हुए सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते ॥७॥ अष्टादशपुराणाना श्रवणाद्यत्फल लभेत् । तत्फल समवाप्नोति वैष्णवो नान सशय ॥ स्त्रियश्च पुरुषाश्च व वैष्णव पदमाप्नुयु । जम्बूद्वीप समाश्रित्य श्रोतारो दुर्लभा कलौ ॥१० भविष्यन्ति नरा राजन्सत्य सत्य वदाम्यहम् । स्त्रीभिश्च पुत्रकामाभि श्रोतव्य वैष्णव यश ।।११ बालघाती च पुरुषो मृतवत्स प्रजायते । श्रवण हरिवंशस्य कर्तव्य च यथाविधि ॥१२ गुरुचन्द्राग्निसूर्याणा सम्मुखे मेहते च य । वीजमुत्सृज्यते तेन त्यक्तरेता नरो भवेत् ॥१३ योपित्पुष्पफ्लाना च वालाना घातिनी तथा। फ्लाना वर्तनकरी मातापितृवियोगिनी ॥१४ स्राविणी परगर्भाणा तृत्तत्प्रायोपजोषिणी। ईटग्विधा भविष्य दिव्य ॥१५ . - हरिवश श्रवण माहात्म्य । अपुष्पा मृतवत्साश्च काकवन्ध्यास्तथैव च । कन्याप्रजात्व च तथा स्रावयुक्ता स्वपातक. ।।१६ तासा दोषापहारार्थ हरिवशोऽभिगर्जति । मदीयश्रवणात्सद्यो दोपा नश्यन्ति सत्वरम् ॥१७ जो फल अठारह पुराणो के श्रवण से प्राप्त होता है, उतना ही फल विष्णुभक्त को हरिवंश के सुनने से मिल जाता है इसमे सदेह नहीं है ॥६॥ इसे सुनने वाले स्त्री पुरुष भगवान् विष्णु के धाम को प्राप्त होते हैं। हे राजन मैं सत्य कहता हूं कि कलिकाल मे जम्बूद्वीप के आश्रय में निवास करने वालो मे इस प्रथ के सुनने वाले दुलंम हो जायगे ॥१०॥ पुत्राकाक्षिणी स्त्रियों को भगवान् विष्णु के इस यश को अवश्य सुनना चाहिये । जिन बाल हत्यारे पुरुपो की सन्तान हो-हो कर मृत्यु को प्राप्त होती है, यह विधि पूर्वक इस हरिवश को श्रवण करें ।।११-१२११ गुरु, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि की ओर मुख करके मल- मूत्र का त्याग करने वाला पुरुष जन्म जन्मान्तर मे पु सत्व हीन होता है ॥१३॥ फल फून तोड़ने और बाल हत्या करने वाली, माता पिता से उनकी सन्तान का विरोध करा देने वाली, दूसरी स्नियो के गर्भ नष्ट करने वाली अथवा इसी प्रकार के बुरे कार्य करने वाली स्त्रियाँ अपुप्पा, मृतवत्सा, काक वध्या, कन्याप्रजा तथा सावयुक्त आदि दोपो वाली होती है, उन सव दोषों पोशात करने के लिये हरिवंश सदा गर्जता हुया कहता है कि मेरे सुनने मात्र से सम्पूर्ण दोय तत्काल ही नाश को प्राप्त होते हैं ११४-१७॥ ॥ हरिवश श्रगण विधि तथा फल ।। अथ ते सप्रवक्ष्यामि नवाझवणे विधिम् । सहायर्बहुभिश्च व प्राय साध्यो विधिस्त्व दैवज्ञ तु समाहूय मुहूर्त पृच्छय यत्लत विवाहे यादृश वित्त तादृश परिकल्प्य च नभरयश्चाश्विनोजौ च मार्गशीर्ष शुचिर्न एते मासा कयारम्भे श्रोतृणा कामसूचक ३६ ] श्री हरिवश पुराण सहायाश्च त एवान कर्तव्याः सोद्यमाश्च ये। देशे देशे तथा सेय वार्ता प्रोच्या प्रयत्नतः ।।४ भविष्यति कथा चात्र आगन्तव्य कुटुम्बिभिः । देशे देशे विरक्ता ये वैष्णवा. कीर्तनोत्सुका. १५ तेष्वेव पत्र प्रेष्यं च तल्लेखनमितीरितम् । सता समाजो भविता नवरात्र सुदुर्लभ ॥६ वैशम्पायनजी बोले-हे राजन् । अब मैं हरिवंश के नवाहू-श्रवण ' विधि कहता हूँ। यह अनेक प्रकार के सहायको से साध्य होती है ।।१।। प्रथम यत्न-पूर्वक ज्योतिषी को बुलाकर मुहूर्त निकलवावे तथा जितना धन विवा कार्य के लिये आवश्यक होता है, उतने ही धन की व्यवस्था इसके लिये करे ॥२॥ भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ और धावण इन महीनों मे क्य का आरम्भ करना श्रोताओ को अभीष्ट सिद्धि का सूचक है ॥३॥ इस कार्य के उद्योगी व्यक्ति ही सहायक हो। प्रयत्नपूर्वक कथा होने का सन्देश सर्वत्र विज्ञा पित करे और कहलादे कि आप सब सभी सज्जन सपरिवार पधारे ॥४॥ विभिन्न स्थानो मे निवास करने वाले हरिकीर्तन को उत्सुक विरक्त वैष्णव जनं को अवश्य निमत्रित करे, निमश्रण पत्र मे यह भी लिखे-महानुभावो ! न दिनो तक यहां सत्पुरुष समागम और सत्सग का परम दुर्लभ सुअवसर 11५-६॥ आगन्तुकाना सर्वेषा वासस्थानानि कल्पयेत् । तीयें वापि वने वापि गृहे वा श्रवण स्मृतम् ॥७ विशाला वसुधा यस वर्तव्य तत्कथास्थलम् । शोधनं मार्जन भूमेलेपन धातुमण्डनम् ।।८ गृहोपस्वरमुद्धृत्य गृहकोणे निवेशयेत् । पर्तव्यो मण्डप प्रोच्च पदलीस्तम्भमण्डित. ॥६ फलपुष्पदल विप्वग्वितानेन विराजितः । चतुदिक्षु ध्वजारोपस्तोरणेन निराजित ॥१.
। हरिवश श्रवण-विधि तथा फन ] [ ३७ कर्च सप्तव लोकाश्च सप्ताध: परिकल्पयेत् । तेपु विप्रा विरक्ताश्च स्थापनीया: प्रवोध्य वै ।।११ पूर्व तेपामासनानि कर्तव्यानि ययोत्तरम् । वक्तुश्चापि तथा दिव्यमासनं परिकल्पयेत् ॥१२ यागत जनों के ठहरने का समुचित प्रबन्ध करे । क्या सुनने का स्थान कोई तीर्य, वन वयवा अपना घर हो श्रेष्ठ माना गया है ॥७॥ लम्बे चौड़े दान में कथा स्थल बनाये, उस स्थान का शोचन, मार्जन और लेपन करके रग- वरंगी धानुओं से चौक पूरना चाहिये ।।८। घर की मब वस्तुप्रो को किसी एक होने में रसदे तथा कथा के निमित केले के खम्भो मे युक्त एक ऊँचा मण्डर नावे 10 उमे सब ओर मे फल, फूल, पत्र तया चैटो यादि से भले प्रकार रमाने, सय दिशाओं में या फराचे चौर माडल म सुन्दर फाटक लगा कर उसकी गोमा वृद्धि करे ।।१०।। मण्डप में कुछ ऊंचाई पर सात लोक बना कर टनमें विरक्त ब्राह्मणादि को तथा नीचे के सात लोकशे में उन साधारण को वंटाये ॥११॥ विरक्त ब्राह्मणों के लिये श्रेठ आसन की और कथा वाचक के लिये दिव्य आसन की व्यवस्था करे ।।१२।। उदड मुखो भवेद्वक्ता श्रोता वै प्राट मुखस्तया । प्राट मुखोऽय भत्रेद्वक्ता श्रीना चोदद मुखम्तथा ॥१३ विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेदशास्त्रविगारदः। दृष्टान्तकुगलौ धौरो वक्ता कार्यों दयान्वितः १४ वेदवेदान्ततत्वगुरभिब्रह्मवादिमिः । नृणां कृतोपदेशानां सद्यः मिद्धिहि जायते ।।१५ अथान्यजनसामान्यगुरुभिर्नीतिकोविदः । नृणां कृतोपदेशानां मिद्धिर्भवति कीदृशी ॥१६ अनेकधर्मविभ्रान्ताः स्तनाः पाखण्डवादिनः । धर्मशास्त्रकथोच्चारस्त्याज्यास्ते यदि पण्डिता. ११७ वक्तुः पाव सहायार्थमन्यः स्याप्यस्तथाविधः ।
[ श्री हरिवश पुराण पण्डित सशयत्ता लोकवोधनततर ॥१८ वना क्षौर प्रकर्तव्य दिनादग्विताप्तये । वक्तु श्रोतुश्चन्द्रशुद्धी दम्पत्यो शुभतारके ॥१६ अरुणोदये विनिर्वयं शौच स्नान समाचरेत् । नित्य सक्षेपत कृत्वा सध्याद्य प्रयतस्तत ॥२० सुक्षालितपाणिपाद स्वस्तिवाचनपूर्वकम् । गोमयोपलिप्तदेशे सर्वतोभद्रकल्पनम् ॥२१ स्वीयशक्त्यनुपारेण पूजन सर्वमाचरेत् । क्थाविघ्नविनाशाथ गणनाथ प्रपूजयेत् ।।२२ यदि वक्ता का मुख उत्तर की ओर हो तो श्रोताओ का मुख पूर्व की ओर रहे और यदि वना का पूर्वाभिमुख हो तो श्रोतागण उत्तर की ओर मुख करखे बैठे ॥१३॥ विरक्त, विष्णुभक्त, वेदशास्त्रो का ज्ञाना, मथ के भाव को हृदयङ्गम कराने म दुशल, धीर एव दयाल ब्राह्मण वो वक्ता बनावे ॥१४॥ वेद वेदाङ्ग ये तस्वज्ञ एव ब्रह्मवादी गुरुपो से जिन्होने उपदेश ग्रहण किया है, उन्हें मिद्धि को मुलभना उमो समय होती है ॥१५।। परन्तु जो गुर जनसाधारण के समान ही नीति वाला है उसमे उपदेश प्राप्त करने वाले मनुष्यो दो सिद्धि- माम रिस प्रार सभव है ? ॥१६॥ अनेर मतमतान्तरो मे पड कर भ्रान्त हुए, पोरी करन वाले, सम्पद एव पासण्डो पुरेप, परिव हा तो भी धर्मशास्त्र की पया बहने के पिये योग्य पदी है रहें पता न बनाये ॥१७॥ दाता को राहा. यता के लिय गोही योग्यता वा ए विद्वान और रहना चाहिये, यह भी पहिल, भ्रम निवारण में ममय और वन-गाथारण पोरामशान में चतुर होना पारिप ॥१८॥ या दो, चारभ मे ए दिन पूर्व धौर करा लेना चाहिये । माता और थोता ही पहर सपा थवणरने वाले दम्पति ये ग्रह एवं नाम प्रारम हो तभी पपा बारनपरे ॥१६॥ श्रोता को मरणोदय रगर में सिrtanहन हार मान करना पारिप प्रतिदिन मन को या गर मारनादि रातों में स्पम्ति याचा पराव, पिर गोयर
r
हरिवश श्रवण-विधि तथा फल ]
[ ३६
लिपे हुए स्थान पर सर्वतोभद्र मण्डल बनावे और सामर्थ्यानुसार पूजन कर्म को
उम्पन्न करे । विघ्नो को शाति के निमित्त श्रीगणेश जी का पूजन करे ।।२०-
२२॥
सलक्ष्मीपुत्रसहितं गोपालं स्थापयेत्ततः।
निर्विघ्नेनैव सिद्धयर्य देवपूजनपूर्वकम् ।।२३
अद्य हेत्यादि देघेकालो स्मृत्वा अमुकगोनस्यामुकप्रवरस्यामुक-
शर्मणो मम जन्मनि जन्मनि सञ्चितमहापातकपटलनाशपूर्वक
तेन पापमञ्चयेन कृतसन्तानबाधकताविनाशपूर्वकमिह जन्मनि
सतानोत्पत्तिहेतवे तस्य सतानस्य शरदा शमायुपो वृद्ध यर्थ-
मात्मनश्च सकलसुखाप्तिहेतवे इह शरी शुद्ध्यर्थं परन-
(चेन्द्रादिलोकातिक्रमणपूर्वक श्रीमद्विष्णभक्त्यु द्रेक जनितकल्पा
वधितल्लोकगमनतरवासपूर्वक्तत्स्वस्पावाप्ति हेतवे )
श्री.
मदरिवशपुराणश्रवण करिप्यावहे । अन्यतरकर्तृत्वे करिप्ये
इत्येवं मकल्पः ।। इति कृत्वा तु संकल्प वक्तार वृणुयात्ततः ।।
थु नाध्ययनसंपन्न पूजयित्वा ययाविधि ॥२४
फिर लक्ष्मी और पुत्री के सहित गोपाल श्रीकृष्ण की म्यापना करे और
कथा की निविघ्न रूप से सम्पूर्णता के लिये देव पूजन करके पत्नी-पुत, सहित
भगवान् श्रीकृष्ण को पूजे ॥२३॥ फिर निम्न प्रगर मकल्प करे -मुझ यमुक
गोत्र, अमुक प्रवर, अमुक नाम और जाति वाले, पत्नी युक्त यजमान के
जन्म जन्मान्तरो में एकत्र हुए महापाप समूहो का नाश होकर सन्तति बाघा का
शमन हो । इस जन्म मे शतायु सन्तति लाभ और सम्पूर्ण मुख लाभ की कामना
से, इहलोक में शरीर-शुद्धि और परलोक मे इन्द्रादि लोको के पार भगवान् विष्णु
की भक्ति के उद्रेक से उपलब्ध विष्णुलोक मे गमन और वहाँ एक कल्प सक
निवास तथा इस प्रकार भगवत्स्वप वी प्राप्ति के निमित्त हम दम्पति यज्ञकर्ता
होते हुए हरिवश पुराण को सुनेंगे ! यदि एक ही व्यक्ति श्रोता हो तो करेंगे के
स्थान पर 'करंगा' कहै । इस प्रकार सक्ला करके वेद शास्त्रो के पारगत वक्ता
का पूजनपूर्वक वरण करे ॥२४॥
४० ) [ श्री हरिपशपुराण सुवर्ण मुद्रिका गृह्य कुण्डले च विशेषत । धोतवस्त्र सोत्तरीय चोष्णीपेण समन्वितम् ।।२५ सुवर्णपोडशपल पुष्पताम्बूलसयुतम् । पूगीफल चाक्षताग्वै गृहीत्वा शुद्धमानम ॥२६ (सकल्प ) अद्य हेत्यादि अमुक्गोत्रममुक्शर्माण ब्राह्मणमेभि- श्चन्दन ताम्बूलसुवर्णवस्त्रादिभिरिवश श्रवणे याचकत्वेनावा दम्पती त्वा वृणीवहे । वृतोऽस्मीति तेनोक्त ॥ व्रतेन दीक्षा- माप्नोतीति मन्त्रेण वक्तुर्दक्षिणकरमूले रक्षावन्धन कार्यम् ।। ब्राह्मणेन श्रोतृ णा रक्षाबन्धन कार्यम् । चन्दनाधुरचारस्तु वस्त्रपुष्पाक्षतैस्तथा। हेमालकरण पूर्ण फलमंतुसमुद्भवै ॥२७ पुराणपूजन प्रोक्त विधिना पोडशेन तु । पूजयित्वा द्विज- श्रेष्ठा श्रवण फलद स्मृतम् ।।२८ तस्मात्सर्वप्रयत्तेन श्रोतव्य विधिपूर्वकम् । अथ व्यास नमस्कुर्यमन्त्रमेतमुदीरयेत् ॥२६ नमस्ते भगवव्यास सर्वशास्त्रार्थकोविद । ब्रह्मविष्णुमहेशानमूर्ते सत्यवतीसुत ।।३० इति व्यास नमस्कृत्य शुभे देशे कुशासने। उपविश्य प्रतिदिनमुल्लसत्प्रीतमानस ॥३१ स्वर्ण की मुद्रिका, दो स्वर्णमय कुण्डल सोलह पल स्वर्ण, धोती, चादर, पगडी, पुष्प, ताम्बूल, सुपारी और अक्षत हाय मे लेकर निम्न सकल्पपूर्वक परता का वरण करे ॥२५ २६॥ हम दम्पति अमुक गोत्र, अमुक शर्मा का इन चदन, ताम्बूल, स्वर्ण, वस्त्रादि से हरिवश की कथा कहने के लिये व्यास रूप से वरण करते हैं। तब वाचक कहे कि 'मेरा वरण हो गया' फिर यजमान 'प्रतेन दीक्षामाप्नोति' इत्यादि मत्र से वानक के दक्षिण हाथ है मूल घाँधे। फिर वह ग्राह्मण भी श्रोताओ के रक्षा वधेि । फिर चन्दनादि उपधार पूर्वक, , पुष्प, अक्षत, स्वर्णाभूषण, सुपारी और अतुल आदि से पोडशोपचार - मे रक्षा श्रवण निधे तथा फल ] [ ४१ वैघि के द्वारा पुराण का पूजन करे ॥२॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो का पूजन करके हरि- बरा का सुनना अभीष्ट फल देने वाला माना गया है, इसलिये सावधानी से विधिपूर्वक ही इसका श्रवण करना उचित है ।।२८। फिर सभी श्रोता वाचक को नमस्कार करें, उस समय यजमान कह frहे सर्व शास्त्रो के अर्थ के ज्ञाता । ब्रह्मा, विष्णु, शिव रबरप, सत्यवतीपुत्र भगवान् व्याम जो हम आपको नमस्कार करते हैं ॥२६-३०।। इस प्रकार वाचा को नमस्कार करके श्रेष्ठ पवित्र स्थान पर कुश के आसन पर बैठ कर उल्लासपूर्वक एव प्रमन्न मन से प्रतिदिन कथा सुने ॥३१॥ वालो युवाऽय वृद्धो वा दरिद्रो दुर्वलोऽपि वा। पुराणज्ञ सदा वन्द्य पूज्यश्व सुनाथिमि ॥३२ नीचबुद्धि न कुर्वीत पुराणज्ञे कदाचन । यस्य वक्त्रोद्गता वाणी कामधेनु शरीरिणाम् ।।३३ गुरव सन्ति लोकस्य जन्मतो गुणतश्व ये । लैपामपि च सर्वेपा पुराणज्ञ परो गुर ॥३४ भवकोटिसहस्रपु भूत्वा भूत्वा च सीदति । यो ददाति पुण्पत्ति कोऽन्यस्तस्मात्परो गुरु ||३५ पुराण का नाता बालक, युवा, वृद्ध, दरिद्र अथवा दुर्वल ही क्यो न हो, पुण्याकाक्षी मनुष्यो लिये वह सदा ही बदनीय एव पूज्य है ॥३२। जिसके मुख से निकलने वाली वाणी देहधारियो के लिये कामधेनु के समान है, उस पुराण के जानने वाले विज्ञ के प्रति बुरे विचार कभी न रखे ॥३३।। जो मनुष्यों के लिये जन्म तथा गुणो से गुरु हैं, पुराणवेत्ता उन सबका भी परम गुरु है ॥३४॥ लेकर कष्ट को प्राप्त होने वाने प्राणी को पुराण कथा सुना कर पुण्यवृत्ति प्रदान करने वाले से थेष्ठ अन्य गुरु कौन हो सकता है ? ॥३५॥ ॥ नवाह व्रती के पालने योग्य नियम ।। नवाहवतिना पु सा नियमाञ्छृणु सत्तम। एक्कालाशन व अध शायी भवेन्नर ॥१ करोडो हजार जन
४२ ]
[ श्री हरिवरापुराण
स्थातव्य ब्रह्मचर्येण यावनय समाप्यते ।
हरिवशे तथा राजन्पायस चरभोजनम् ।।२
पारणे पारणे यात यथावद्भरतपंप ।
मलमूनजयार्थ हि लघ्वाहार सुखावह ॥३
हविष्यान्नेन वर्तव्यमेकवार कथार्थिना ।
उपोष्य नवरात्र वा शक्तिश्च च्छृणुयात्तदा ॥४
घृतपान पय पान कृत्वा वा श्रृणुयात्सुखम् ।
फला हारेण वा श्राव्यमे कभुक्नेन वा पुन ॥५
सुखसाध्य भवेद्यत्तु कर्त-य श्रवणाय तत् ।
भोजन तु वर मन्ये कथाश्रवणकारकम् ॥६
नोवासो वर प्रोक्तो कयाविघ्नकरो यदि ।
शृणुयाद्य शुचिस्तिष्ठन्नेकचित्ततया सदा । ७
प्रात म्नानादिक कृत्वा पुनदारसमन्वित ।
पुराणथरण कुर्यात्कृष्णपूजनपूर्वकम् ॥८
वैशम्पायनजी बोदे- हे साधु श्रेष्ठ । नवाह कथा श्रवण का वन लेने
थालो वे आवश्यक नियम रहता हूँ। व्रत का पालक श्रोता एक समय भोजन
और पृथिवी पर शयन करे ॥११॥ ग्रन्थ की समाप्ति पर्य-त ब्रह्मचय व्रत का
पाउन परे । हे राजन् ! हरिवश के प्रत्येक पारण मे खीर अथवा चरु का भोजन
करे। २।। कथा के समय मलमूत्रादि के वेग पर नियत्रण रखने के लिये हला
भोजन उचित है, इलिये हविष्यान्न का भोजन वरे । शक्ति हो तो उपवास परे
या वर दूध या घी का पान करे अथवा फलाहार करे या एक समय भोजन
पर क्या थषण परे ॥३-५|| जिससे जिस नियम का निर्वाह हो सके वैसा ही
परे, मैं तो उपवास की अपेक्षा भोजन करना ही टी समझता हूँ ।।६।। क्योकि
।
वाह व्रती के पालने योग्य नियम ] [ ४३ पुष्पधूपफले सम्यड नैवेद्यं श्रद्वयोद्धृत । गुरो. शुथ पण तेन कर्तव्य फलकाडक्षिणा 16 श्रुत्वा यथेच्छया शौच कार्य पुण्येन वर्त्मना। सायकाले गुरुश्रेष्ठ तोपयित्वा सवान्धव ॥१० स्वपरिग्रहसनैन सुख स्वपिति वै तदा । नियमादि प्रकर्तव्य पापाना विनिवर्तने ॥११ यथासुख व्यवहरेन्नित्य विष्णुपरायण । शुचि शुद्वमनास्तिष्ठन्पत्रावल्या च भोजनम् ।।१२ इच्छित फन को कामना वाला श्रोता पुष्प धूप, फत्र तथा श्रेष्ठ नैवेद्य के द्वारा गुरु सेवा करे।। क्या श्रवण के पश्चात् सायकालीन कर्मों से निवृत्त होकर बघु-बांधवों सहित गुरु श्रेष्ठ व्याम को सेवा मे उपस्थित होकर उन्हें सन्तुष्ट करे और पत्नी सहित घर जाकर पृथक् पृथव शयन करे। पाप शमनार्थ यम-नियमा का पालन दृढतापूर्वक करे और भगवान् विष्णु के चिन्तन म निरन्तर लगा रहकर पूर्वोक्त नियमो को पाले । १०-११॥ क्या वती पुम्प पवित्र एव ने शुद्ध चित्त मे कथा श्रवण करें और क्या समाप्ति पर प्रतिदिन पत्तल म ही भोजन बरे ॥१२॥ ॥ सन्तान गोपाल स्तोत्र ।। ॐनमो भगवते वासुदेवाय 1,श्रीश कमलपनाक्ष देवकीनन्दन हरिम् । सुतसम्प्राप्तये कृष्ण नमामि मधुसूदनम् ॥१ नमाम्यह वासुदेव सुतसम्प्राप्तये हरिम् । यशोदागत वाल गोपाल नन्दनन्दनम् ।।२ अस्माक पुतलाभाय गोविन्द मुनिवन्दितम् । नमाम्यह वासुदेव देवकीनन्दन सदा ॥३ गोपाल डिम्भर वन्दे कमलापतिमच्युतम् । पुत्रमम्प्राप्तये कृष्ण नमामि यदुपुङ्गवम् ।।४
४४ ]
[ श्री विशपुराण
पुत्रकामेष्टिफलदं कजाक्ष कमलापतिम् ।
देवकीनन्दन वन्दे सुतसम्प्राप्तये मम ॥५
पद्मापते पद्मनेत्र पद्मनाभ जनार्दन ।
देहि मे तनय श्रीश वासुदेव जगत्पते ।।६
यशोदाङ्कगत वाल गोविन्द मुनिवन्दितम् ।
अस्माक पुत्रलाभाय नमामि श्रीशमच्युतम् ॥७
श्रीपते देवदेवेश दीनातिहरणाच्युत ।
गोविन्द मे सुत देहि नमामि त्वां जनार्दन ।।८
भक्तकामद गोविन्द भक्तं रक्ष शुभप्रद ।
देहि मे तनय कृष्ण रुक्मिणी-वल्लभ प्रभो ॥
रुक्मिणीनाथ सर्वेश देहि मे तनय सदा।
भक्तमन्दार पद्माक्ष त्वामहं शरणं गतः ॥१०
पुत्र प्राप्ति के निमित्त मैं लक्ष्मी के पति, पद्मनयन, देवकी पुत्र, मधुसूदन
भगवान् श्रीकृष्ण को नमस्कार करता हूँ ॥१२॥ पुत्र की प्राप्ति के निमित्त यशोदा
के अङ्क, मे बाल गोपाल रूप से स्थित एव नन्द को आनन्द देने वाले वासुदेव
श्री हरि को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२।। पुत्र-लाभ के निमित्त देवकी-वसुदेव के
पुत्र, मुनियो द्वारा वन्दना किये हुए गोविन्द को मैं नमस्कार करता हूँ ।।
पुत्र-लाभ की कामना से साक्षात् लक्ष्मी के पति, अच्युत होकर भी गोप बालक
के रूप मे गौत्रो की रक्षा मे तत्सर यदुकुल तिलक भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम
करता हूँ ॥४॥ पुत्र की कामना से पुत्रेष्टि यज्ञ के फलदाता कमलाक्ष कमलापति
देवकी सुन श्रीकृष्ण को मैं नमस्कार करता हूं ॥५॥ हे कमलापते ! हे कमल
नयन ! हे कमलनाभ ' हे जनादन ! हे जगदीश्वर वासुदेव ! मुझे पुत्र दीजिये
॥६॥ यशोदा की गोदी में विराजमान रहने वाले, अपनी महिमा से कभी विलग
न होने मुनियो द्वारा वादना दिये हुए भगवान् गोविन्द को मैं नमस्कार
परता है, मेरे इस धर्म के फल से मुझे पुत्र-लाम हो ॥७॥ हे भक्तो की कामना
पूर्ण परने वाले गोविन्द मुश भक्त की रक्षा करिये । हे शुभप्रद ' हे रुक्मिणी-
4 हे प्रभो । है श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये।॥६॥ हे रुक्मिणी पने ! हे सर्वेश्वर!
।
सन्तान गोपान स्तोत्र ]
[ ४५
मुझे पुत्र दीजिये। मक्तों के समीप्ट को पूरा करने में कल्पवृक्ष म्वरूप नगवान्
श्रीकृष्ण I में आपका शरणागत है ॥१०॥
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनय कृष्ण लामह शरण गत ॥११
वासुदेव जगद्वन्द्य श्रीपते पुम्पोत्तम ।
देहि मे तनय कृष्ण त्वामह शरण गत ।।१२
कज्जाक्ष कमलानाथ परकारणिकोत्तम ।
देहि मे तनय कृष्ण त्वामह शरण गत ॥
लक्ष्मीपते पदनाम मुकुन्द मुनिवन्दित ।
देहि मे तनय कृष्ण लामह शरण गत. ॥१४
कार्यकारणल्याय वासुदेवाय ते सदा ।
नमामि पुवलामाथे सुखदाय बुदाय ते ॥१५
राजीवनेत्र श्रीराम रावणारे हरे क्वे।
तुभ्य नमामि देवेश तनयं देहि मै हरे॥१६
अस्माक पुनलाभाय भजामि त्वा जगत्पते ।
देहि मे तनय कृष्ण वासुदेव रमापते ॥१७
श्रीमानिनीमानचोर गोपीवानापहारक ।
देहि मे तनय कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥१८३
मम्माक पुनमम्प्राप्ति कुरुष्व यदुनन्दन ।
रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ॥१६
वासुदेव सुत देहि तनय देहि माधव ।
पुन मे देहि श्रीकृष्ण वत्म देह महाप्रभो ।।२०
है देवकीनन्दन । हे गोविन्द । हे वासुदेव । हे जगन्नाय 1 है श्रीकृष्ण
मुझे पुत्र प्रदान कोचिये, मैं आपकी पारण में आया हूँ ॥११॥ है विश्ववद्य ।
है वासुदेव । हे श्रीपते । हे पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण। मुझे पुत्र प्रदान कीजिये, मैं
आपकी गरण में उपस्थित हूं ॥१२॥ है कमलाक्ष । है वमलापत्रे | हे दया करने
बालों में सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्ण मैं आपको शरण में आया हूं, मु पुत्र दीरिये ॥१३॥
| श्री हरियमपुरा । हे जमीपते । हे मुनिवदित मुकुद | ह श्रीकृष्ण ! में बापी शरण में उपरि हूँ मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ||१४|| आप वार्य कारण हर, सुख देन पार विज्ञ हैं पुत्र की प्राप्ति के निमित्त मैं आप वासुदेव को सदा प्रणाम परत ॥ १५ ॥ है कमलनयन । है रावणार । हहर। हे पवे ! ह द विष्णो । आपको नमस्कार है मुझे पुत्र दीजिय । १६॥ हे विश्वेश्वर प्राप्ति की कामना से मैं आपकी आराधना कर रहा हूँ। ह रमापते । हवा! श्रीकृष्ण 1 मुझ पुत्र प्रदान करिये ॥१७॥ हे मानिनी राधा के मान भ श्रीकृष्ण । हे वासुदेव । हे जगनाथ मुझे पुत्र प्रदान करिये ॥१८॥ है यदुन ह लक्ष्मीपति वासुदेव । हे मुनिवदित मुकुन्द । हमें पुत्र लाग कराइये ।' हे वासुदेव । मुझे पुत्र दीजिये, हे माघ । मुझे तनय दीजिये हे श्रीकृष् मुझे पुत्र दीजिय, हे महाप्रभो । मुझे वत्स प्रदान कीजिये ॥२०॥ चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव । अस्माक मप्रसापुन देहि देव जगताते ।।२१ कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमचित । देहि मे तनय कृष्ण देवकीनन्दनन्दन १२२ देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते । समस्तकामफलद दहि मे तनय सदा ॥२३ भक्तमन्दार गम्भीर शङ्कराच्युत माधव । देहि मे तनय गोपबालवत्सल श्रीपते ।।२४ श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन । भक्तमन्नार मे दहि तनय जगता प्रभो ॥२५ जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे । वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनय प्रमो ॥२६ श्रीनाय कमलपनाक्ष वासुदेव जगत्पते । देहि मे तनयं कृष्ण त्वामह पारण गत ॥२७ दासमन्दार गोविन्द भत्तचिन्तामणे प्रगो। देहि मे तनय तृष्ण त्वामह शरण ग7 ॥२८ [ ४७ सन्तान गोपाल स्तोत्र ] गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो । देहि मे तनय कृष्ण त्वामह शरण गत ॥२६ श्रीनाथ कमलपनाक्ष गोविन्द मधुसूदन । मत्पुनफलसिद्धचथं भजामि त्वा जनार्दन ॥३० . हे चन्द्र सूर्य रूप नेत्रधारी गोविन्द । हे पद्मनयन माधव । हे जगदीश्वर। हमे भाग्यवान पुत्र दीजिये ॥२१॥ है परणामय ' ह पदपनयन है पद्मनाम । है विष्णु-मम्मानित दवकीपुत्र श्रीकृष्ण ! हम पुत्र प्रदान गरिय ॥२२॥ ह देवकी. नन्दन । हे लक्ष्मीपते । है जगत्सति वासुदेव । हे यभीष्ट पनदाता श्रीकृष्ण मुझे सदा तनय प्रदान कीजिये ॥२३॥ हे भक्तो की कामना पूर्ति के लिये बल. वृक्ष स्वरूप । हे गम्भीर स्वभाव वाले अच्युत । हे मगलगरी माघव , हे ग्वाल- बालो पर स्नेह करने वाले लक्ष्मीनाय | मुझे पुत्र प्रदान करिय ॥२४॥ हे श्रीपते । हे वसुदेवपुत्र ' हे देवकीनन्दन ईश्वर | आप भवतो के लिय कल्पवृक्ष स्प हो, हे जगदीश्वर । मुझे पुत्र प्रदान करिये ॥२५॥ हे जगन्नाय । हे लक्ष्मीनाथ । हे रमानाय ' हे दयानिधे । हे वासुदेव, ईश्वर एव सर्वेश्वर प्रभो । मुझे पुत्र दीजिये ॥२६॥ हे कमलनाथ | हे कमलनयन वासुदेव । हे जगतानि श्रीकृष्ण । मैं आपकी शरण में आया है, मुये पुत्र प्रदान करिये ॥२७॥ हे अपने सेवको की पामना सिद्धि के लिये कल्पवृक्ष स्वर गोविद | भक्तो की इच्छा पूनि के निमित्त चिन्तामणि रूप श्रीकृष्ण । मैं आपरा शरणागत हूँ, मुके पुत्र दीजिये ॥२८॥ हे पुण्डरीकाक्ष गोविन्द ! हे लक्ष्मीपति श्रीरण । हे महाप्रभो । मुझे पुत्र प्रदान वीमिये, मैं आपरे आश्रय में उपस्थित हूं ॥२६॥ हे कमलापते । हे कमललोचन । हे मधुगूदन गं विन्द ' है जनार्दन पुत्र रूप पन की प्राप्ति के लिये में आपको धाराधना करता है ॥३०॥ भवदीयपदाम्भोजे चिन्तयामि निरन्तरम् । देहि मे तनय सीताप्राणवल्लभ राघन ॥३१ राम मकाम्यवरद पुत्रोत्पत्तिफलप्रद । देहि मे तनय श्रीग कमलासनवन्दित ॥३२
४८ ]
[ श्री हरिवशपुराण
राम राघव सीतेश लक्ष्मणानुज देहि मे।
भाग्यवत्पुत्रसतान दशरथात्मज श्रीपते ।।३३
देवकीगभसजात यशोदाप्रियनन्दन ।
देहि मे तनय राम कृष्ण गोपाल माधव ।।३४
कृष्ण माधव गोविन्द वामनाच्युत शङ्कर ।
देहि मे तनय श्रीश गोरबालकनायक ॥३५
गोपबाल महाधन्य गोविन्दाच्युत माधव ।
देहि मे तनय कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।। ६
दिशतु दिशा पुन देवकीनन्दनोऽय दिशतु दिशतु शीघ्र
भाग्यवत्पुत्रलाभम्
दिशतु दिशतु श्रीशो राधवो रामचन्द्रो दिशतु दिशतु पुर
वशविस्तारहेतो ॥३
दीयता वासुदेवेन तनयो मप्रिय सुत ।
कुमारो नन्दन सोत नायकेन सदा मम ॥३८
राम राघव गोविन्द देवकीसुत माधव ।
देहि मे तनय श्रीश गोपबालवनायक ॥३६
वविस्तारव पुत्र देहि मे मधुसूदन ।
मुत देहि सुत देहि त्वामह शरण गत ॥४०
हे रापद । र सीताजी के प्राणवल्लभ ! मैं आपके चरणारवि
पे नि म रत हूँ आप मुभ पुत्र दीजिये ॥ ३१॥ मुझे अभिला
पर और पुत्रोत्पत्ति रूप पत्र देने वाले हे श्रीराम । ब्रह्माजी पेद
परिवह थोपना बाप मुभ पुत्र प्रदान कीनिये ॥३२॥ हे १मण के 2
भाताह गीतानी में प्राणपते । ह दशरप मुवन ! है रघुन दन श्रीराम ।
श्रीपत | बार मुग भाग्य ती पुत्र दीजिये ॥३३॥ ह दवमी के उदर से अ
घोरण होवारे गोराम! पणोदा गुवन धोकृष्ण! ह मापद ! हे रा
मु पुत्र प्रामाश्यि 120 माधव गोविदाह यामन ! अध्यु
HTTणारी समाते हगो अधिनाया । हश्रोरण | गुश
।
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५० ]
[ श्री हरिवंशपुराण
यः पठेत् पुत्रस्तोत्र सोऽपि सत्पुत्रवान् भवेत् ।
श्रोवासुदेवकथित स्तोत्ररत्न सुखायच ॥५०
काले पठेन्नित्य पुत्रलाभ धन श्रियम् ।
ऐश्चयं राजसम्पन्न सद्यो याति न संशय. ॥५१
पुत्र तथा सम्पत्ति के देने वाले, पुत्र-लाभ कराने वाले और देवताओ द्वा
पूजित गोविन्द श्रीकृष्ण का हम सदैव वन्दन करते हैं ॥४१॥ हे प्रभो ! अ
करुणा के निधि गोपियो के प्राणवल्लभ एव मुर नामक दैत्य के शत्रु हैं, आप
पुत्र-लाभ के निमित्त मेरा नमस्कार हैं, आप मुझे पुत्र दीजिये ॥४२॥
लक्ष्मीपते । हे रुक्मिणी के प्राणनाथ | हे भगवान् श्रीकृष्ण ! आपको नमस्क
है । हे गोपबालको के नायक श्रीपते । मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥४३॥ स
लक्ष्मीजी की इच्छा रखने वाले आप वासुदेव को मैं प्रणाम करता हूं। म
पुत्र प्रदान करने वाले एव सर्पेन्द्र शेप की शय्या पर शयन करते है, आप श्रीरगश
भगवान् को मेरा नमस्कार है ॥४४॥ हे रगशायी रमापते ! हे मगल के
वाले माधव ! हे गोबालकों के नायक | हे लक्ष्मीनाथ ! आप मुझे ।
दीजिये ॥४५॥ हे दोनो कल्पवृक्ष ' हे राघव ! मुझ दास को पुत्र प्रदान करि
हे रमापते ! मुझे पुत्र प्रदान करिये, मुझे पुत्र दीजिये, पुत्र दीजिये ।।४६।।
यशोदानन्दन ! हे मनोभिलपित पुत्र प्रदान में तत्पर श्रीकृष्ण ! मैं आपको शर
आया हूं, मुझे पुत्र प्रदान करिये ॥ ४७ ॥ हे मेरे इष्टदेव गोविन्द ! हे वासुदेव
हे जनार्दन श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान करिये, मैं आपकी शरण में आया हूँ ॥४॥
है भगवन ! हे इन्द्र द्वारा पूजित वासुदेव ! आपकी कृपा से नीतिमान्, धनद
और विद्यावान पुत्र उत्पन्न होता है ॥४८॥ श्री वासुदेव कथित इस पुन स्त'
पाजो पाठरता है, वह धेष्ठ पुत्र से युक्त होता है। यह स्तोत्र-रत्न सु
प्राप्त राने वाला भी है ॥५०॥ इसका प्रतिदिन पाट करने वाले को तत्का
पुत्र-लाभ होता है और वह शीघ्र ही धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्य एव राज से सम्पर
होता है, गमे सन्देह नहीं है ॥५१॥
हरिवंश पर्व । आदि-सृष्टि का वर्णन ।। नारायण नमस्कृत्य नर चव नरोत्तमम् । देवी सरस्वती चव ततो जयमुदीरयेत् ।।१ द्वैपायनोष्टपुटनि सृतमप्रमेय पुण्य पवित्रमथ पापहर शिव च । यो भारत समधिगच्छति वाच्यमान किं तस्य पुजरजलैरभिपेच- नेन ॥२ जयति पराशरसूनु सत्यवतीहृदयनन्दनो व्यास । यस्याम्यकमलगलित वाडमयममृत जगत्पिवति ॥३ यो गोशत कनक् गमय ददाति विप्राय वेदविदुपे बहुविध - ताया पुण्या च भारताथा शृणुयाच्च तद्वत्तुल्य पल भवति तस्य च तस्य च व ॥४ शताश्वमेधस्य यदन पुण्य चतु सहस्रस्य शतक्रतोश्च । भवेदनन हरिवशदानात्प्रकीर्तित व्यासमहर्पिणा च ॥५ यद्वाजपेयन तु राजसूयाद् दृष्ट पत्र हस्तिरथेन चान्यन् । तल्लभ्यते व्यासवच प्रमाण गीत च वाल्मीरिमपिणा च १६ यो हरिवश लेखयति यथाविधिना महातपा सपदि । स जयति हरिपदकमल मधुपा हि यथा रसेन सलुब्ध ७ पितामहाद्य प्रवर्दा त पप्ठ महर्पिमक्षय्यविभूतियुक्नम् । नारायणस्याशजमेक्पुस द्वैपायन वेदमहानिधानम् ।। श्री नारायण एव नरा म मी नरोत्तम भगवान् क तत्व ज्ञान को प्रसारित परो यानी भगवती सरस्वती को नमसार बरसे ही जय या रवाध्याय बरे ॥१॥ भगयान य्यामती ये ओष्ठा से निगल हुए, अद्भुन, पवित्र पाप नाशा ५२ ] [ श्री हरिवंशपुराण एवं सुखदायक महाभारत को जो मनुष्य सुनता हो, उसे पुष्करादि तीर्थों में स्नान करने की क्या आवश्यकता है ? ॥२॥ पराशर नन्दन एवं सत्यवती में हृदय को आनन्द देने वाले उन भगवान व्यासदेव की जय हो, जिनके पुग्ध मुखारविन्द से निःसृत कथामृत का पान यह सम्पूर्ण विश्व करता है ॥३॥ जो मनुष्य स्वर्ण मडिन सीगी वाली सो गायें किसी बहुश्रुत एव वेदज्ञाता ब्राह्मण को दान देता है अथवा जो परम पवित्र महाभारत की कथा श्रवण करता है उन दोनो का पुण्य समान ही है ॥४॥ जो मनुष्य सौ अश्वमेध यज्ञ करके यज्ञ मागत चार सहर अतिथियों को भोजन कराता अथवा जो इन्द्रपद की प्रापि कराने वाले शतन्तु कर्म का अनुष्ठान करता है, उन दोनो से भी अनन्त गुए अधिक की प्राप्ति उसे होती है जो महर्षि व्यास कृत हरिवश का दान करता । ॥५॥ जो फा वाजपेय यज्ञ से अथवा राजसूय यज्ञ से या हाथी युक्त रथ क दान करने से होता है, वही फल मद्दपि वेद व्यास अथवा वाल्मीकिजी कर कथा के क्यन-श्रवण से प्राप्त हो जाता है ॥६॥ वो विधिवत् हरिवश लिख धाता है, वह परमतपस्वी रस के लोभी भौरे के समान हरि चरसो को शीघ्र ही प्राप्त होता है 10 जिन महर्षि को पितामह से भी महान समझा जाता था, जो बारिमित योग री ऐश्वयं से युवा थे, जो साक्षात् भगवान श्री नारायण के अश से उत्पन्न हुए थे, जिनके येवल एक पुत्र थे, उन टैपायन भगवान् पागजी नमार है॥ आद्य पुरषमीशान पुरहून पुरुष्टुतम् । प्राममेकाक्षर ग्रा व्यक्ताव्यक्त सनातनम् ॥ अगन्य मदमच्चर यद्विश्व सदमत्परम् । पगयराणा याटार पुगण परमव्ययम् ॥१० मात्य महल विवरणमनप गुपिम् । नमात्य दुपारनं परावरगर हरिम् ॥११ नमिण प बुनानि शानपातु महामुनि । गौनि पाय धर्मामा गवंशापविशारदः ॥१२ गोने गुमरहा पान भवना परिकीर्तितम् ।
आदि सृष्टि का वर्णन ] भरताना च सर्वेषां पार्थिवानां तथैव च ॥१३ देवाना दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् । दैत्यानामथ सिद्धानां गुह्यकानां तथैव च ॥१४ अत्यद्भुतानि कर्माणि विक्रमा धर्मनिश्चयाः । विचित्राश्च कथायोगा जन्म चाग्रयमनुत्तमम् ।।१५ कथितं भवता पुण्यं पुराण श्लक्ष्णया गिरा। मनःकर्णसुखं सोते प्रीणात्यमृतसमितम् ॥१६ जो शुद्ध चैतन्य स्वरूप एव आदि पुरुप थे, जो ईशान, पुरुहूत, पुरुष्टुत, इत, एक, अक्षर, ब्रह्म, व्यक्त एव अव्या, सनातन हैं ॥६॥ जो अमन् एव त हैं, अथवा जो सत् और असत् दोनो से परे हैं, जो विश्वरूप हैं, जो पर और वर के सृष्टा तया परम अविनाशी हैं ॥१०॥ जो मगल के देने वाले, मगल प, सर्वव्याप्त, वरेण्य और दोप-रहित हैं, जो स्वभावतः शुद्ध, इन्द्रियो के वर्तक, अम्बिल जगत के उपदेष्टा और सभी पापो के नाशक हैं, उन भगवान पिकेश को नमस्कार करके अपने प्रतिपाद्य विषय को कहता हूं ॥११॥ नमिपा- व्य मे कुलपति महामुनि एव सम्पूर्ण शास्त्रो के पारगत धर्मात्मा शौनव जी ने तजी से प्रश्न किया ॥१२॥ शौनक बोले-हे सूतजी ! आपने अत्यन्त श्रेष्ठ व महान् आख्यान सुनाया, उसमे अनेक भरतवशी भूपालो, देवताओ, दानवों, धों, सर्पो, राक्षसो, दरगे, मिद्धो और यक्षो के अद्भुत कर्म तथा धर्म का तिपादन करने वाले सामर्य तथा अत्यन्त श्रेष्ठ जीवन चरिको का वर्णन हुआ ॥१३-१५।। अपनी मधुर वाणी में आपने अनेक पुराण भी कहे, आमी सुधा. यो वागी हृदय और वातों को अत्यन्त मानन्द देने वाली है ॥१६॥ तन जन्म कुरूणां वै क्योक्तं लोमहर्पणे। न तु वृष्ण्यन्धकाना च तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥१७ जनमेजयेन यत्पृष्ट शिष्रो व्यासस्य धर्मवित् । तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि वृष्णीनां वंशमादित ॥१८ श्रुत्वेतिहासं कात्स्न्येन भरताना स भारत.। जनमेजयो महाप्राज्ञो वैशम्पायनमरवीत् ॥१६ " ५२ ] [ श्री हरिवशपुराण एव मुमदायक महाभारत को जो मनुष्य सुनता हो, उसे पुष्करादि तीर्थो मे स्नान करने की क्रा आवश्यकता है ? ॥२॥ पराशर नन्दन एव सत्यवती के हृदय को आनन्द देने वाले उन भगवान व्यासदेव की जय हो, जिनके पुण्य मुखारविन्द से नि मृत कथामृत का पान यह सम्पूर्ण विश्व करता है ||३|| जो मनुष्य स्वर्ण मडिन सींगो वाली सो गायें क्सिी बहुश्रुत एव वेदज्ञाता ब्राह्मण को दान देता है अथवा जो परम पवित्र महाभारत की कथा श्रवण करता है, उन दोना का पुण्य समान ही है ॥४॥ जो मनुष्य सो अश्वमेव यज्ञ करके यज्ञ मे भागत चार सहर अतिपिरो को भोजन कराता अथवा जो इन्द्रपद की प्राप्ति कराने वाले शतरतु कर्म का अनुष्ठान करता है, उन दोनो से भी अनन्त गुण अधिक की प्राप्ति उमे होती है जो महपि व्यास कृत हरिवश का दान करता है ॥५॥ जो न वाजपेय यज्ञ से अयवा राजसूय यज्ञ से या हाथी युक्त रथ का दान करने से होता है, वही फल महर्षि वेद व्यास अपवा वाल्मीकिजी कृत स्था के पयन-श्रवण से प्राप्त हो जाता है ॥६॥ जो विधिवत् हरिवश लिख- याता है, पद परमनपस्वी रस ये लोमी भौरे के समान हरि परमो को शीघ्र ही प्राप्त होता है 150 जिन महर्षि को पितामह से भी महान समझा जाता था, जो शारिमिठ योग की ऐश्वयं से युक्त थे, जो साक्षात् भगवान् श्री नारायण के बाग में उत्तम हुए थे, जिनो पेवर एक पुत्र थे, उन द्वैपायन भगवान् म्यागजी को नमसार है॥८॥ आद्य पुग्पमीशान पुरहून पुरुष्टुतम् । मामेराक्षर ग्राम व्यवसाध्यक्त सनातनम् ॥ धमय गदगद यद्विश्व सदरात्परम् । पगयराणा याटार पुराण परमव्ययम् ।।१० माय महा विष्ण वरेण्यमनप शुचिम् । गमगत्य एपीम नगर हरिम् ।।११ मंमित पतानि मौनवग्नु महामुनि । गार पर धर्मामा गयंगाविशारद. १२ गौ गुमरमा गन' भरता परिषौतितम् ।
आदि मृष्टि का वर्णन ] [ ५३ भरतानाच सर्वेषां पायवाना तथैव च ॥१३ देवाना दानवाना च गन्धर्वोरगरक्षसाम् । दैत्यानामथ सिद्धाना गुह्यकानां तथैव च ।।१४ अत्यद्भुतानि कर्माणि विक्रमा धर्मनिश्चयाः । विचित्राश्च कथायोगा जन्म चानचमनुत्तमम् ॥१५ कयित भवता पुण्यं पुराण इलक्षणया गिरा । मन.कर्णसुगं सौते प्रीणात्यमृतसमितम् ॥१६ जो गुद्ध चतन्य स्वरूप एव आदि पुस्प थे, जो ईशान, पुष्टूत, पुरष्टुत, ऋत, एक, यक्षर, ब्रह्म, व्यक्त एव अन्यका, सनातन हैं | जो समन् एव सत् हैं, अथवा जो सत और अमत् दोनों से परे हैं, जो विश्वरूप हैं, जो पर और अवर के मृष्टा तया परम अविनाशी हैं ॥१०॥ जो मगल के देने वाले, मगल रूप, सर्वव्याप्त, वरेण्य और दोप-रहित हैं, जो स्वभावत. शुद्ध, इन्द्रियो के प्रवर्तक, अग्विल जगत के उपदेष्टा और मभी पापो के नाशक हैं, उन भगवान हृषिकेश को नमस्कार करके अपने प्रतिपाद्य विषय को कहता हूँ ॥११॥ नमिपा- रण्य में कुलपति महामुनि एव सम्पूर्ण शास्त्रो के पारगत धर्मात्मा गौनव जी ने सूनजी से प्रश्न किया ||१२|| शौनक वोले-हे मूतजी ' आपने अत्यन्त श्रेष्ठ एव महान् याम्यान सुनाया, उसमे अनेक भरतवनी भूपात्रो, देवताओ, दानवों, गघों, साँ, राक्षसो, दंगे, मिद्धो और यक्षो के अद्भुत कर्म तथा धर्म का प्रतिपादन करने वाले मामयं तथा अत्यन्त श्रेष्ठ जीवन चरित्रों का वर्णन हुआ है ॥१३-१शा अपनी मधुर वाणी मे आपने अनेक पुराण भी वह, आपकी सुधा. मयी वागी हृदय और कानो को अत्यन्त अानन्द देने वाली है ॥१६॥ तन जन्म कुरणा वै त्रयोक्त लोमहर्षणे । न तु वृष्ण्यन्धकाना च तद्भवान्वक्तुमर्हति ।।१७ जनमेजयेन यत्पृष्ट शिप्यो च्यासस्य धर्मवित् । तत्तेह सम्प्रवक्ष्यामि वृष्णोना वशमादित १८ श्रुत्वेतिहासं कास्न्येन भरताना स भारत । जनमेजयो मतानो वेटाम्पायनमवीत :
५४ ] [ श्री हरिवशपुराण महाभारतमाख्यान बह्वथं ध्रुतिविस्तरम् । कायत भवता पूर्व विस्तरेण मया थ तम् ।।२० तल शूरा समाय्याता बहव पुरुषर्षभा । नाममि कर्मभिश्चैव वृष्ण्यन्धकमहारथा ॥२१ तेषा कर्मावदातानि त्वयोक्तानि द्विजोत्तम । तत्र तत्र समासेन विस्तरेणैव मे प्रभो ॥२२ न च मे तृप्निरस्तीह कथ्यमाने पुरातने । एकश्चैव मतो राशिर्वृष्णय पाण्डवास्तथा ।।२३ भवाश्च वशकुशलस्तेषा प्रत्यक्षदर्शिवान् । कथयस्व कुल तेषा विस्तरेण तपोधन ॥२४ उन पुराणो मे कुरुवशियो का जन्म भी कहा गया, परन्तु वृष्णि और अधकवशियो के विषय मे कुछ भी नहीं बताया गया । अब आप कृपापूर्वक वही कहिये ॥१७॥ सूतजी बोले- हे शौनक | व्यासजी के शिष्य धर्मात्मा जन- मेजय ने जो प्रश्न वृष्णिवश के विषय मे किये थे, उन्ही के अनुसार वृष्णिवश की पपा कहता हूँ ॥१८॥ अत्यन्त मेधावी भरतवशी राजा जनमेजय ने भरत- दश के रतिहास को पूर्ण रूप से श्रवण कर वैशम्पायनजी के प्रति कहा था ॥१६॥ जनमेजय बोले-हे भगवन् ! आपके द्वारा कहे गये अर्थ गाभीर्यपूर्ण, श्रुतिसम्मत तथा विस्तृत महाभारत की कथा मैंने श्रवण की है ॥२०।। उसमे आपने प्रद्य म्न आदि अनेक नाम तथा कर्म द्वारा महान् वृष्णि एव अधकवशी महारपियो के श्रेष्ठ चरित सक्षेप मे तथा विस्तार में भी कहे ॥२१-२२।। उन पुरातन पुरुषो के चरित्र के श्रवण से मेरी तृप्ति नहीं हो सकी। आपके कहने से प्रतीत हुआ वि पाण्डव और वृष्णिवशियो वा कुल एक ही था ॥२३॥ हे तपोधन | आप वशावलि वर्णन मे निपुण तया प्रत्यक्षदर्शी भी हैं,इसलिये वृष्णिवश का सम्पूर्ण वृतान्त विस्तार सहित मेरे प्रति कहिये ॥२४॥ यस्य यस्यान्वये ये ये तास्तानिच्छामि वेदितुम् । सत्व सर्वमशेषेण क्ययस्व महामुने ।
आदि सृष्टि का वर्णन 1 तेपा पूर्वविसृष्टि च विचिन्त्येमा प्रजापते ॥२५ सत्कृत्य परिपृष्टस्तु स महात्मा महाता । विस्तरेणानुपूर्या च कथयामास ता कथाम ॥२६ शृणु राजन् क्था दिव्या पुण्या पापप्रमोचनीम् । कथ्यमाना मया चित्रा वह्वर्थाथ तिसम्मिताम् ॥२७ यश्चेमा धारयेत्तात शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णश । स्ववशधारण करवा स्वर्गलोके महीयते ॥२८ अव्यक्त कारण यत्तन्नित्य सदसदात्मकम प्रधान पुरुष तस्मान्निर्ममे विश्वमीश्वरम् 108 त वै विद्धि महाराज ब्रह्माणममितोजसम् । सप्टार सर्वभूताना नारायणपरावणम ॥३० अहवारस्तु महतस्तम्माद्भूतानि जज्ञिरे। भूतभेदाश्च भूतेम्य इति सर्ग सनातन ३१ विम्नरावयव चव यथाप्रज्ञ यथाथ तम् ।। कीर्त्यमान शृणु मया पूर्वेपा कीर्तिवर्द्धनम् ।।३२ हे महामुने । आप भले प्रकार विचारपूर्वक प्रजापति से वृष्णियों तक के पूर्व जन्म के वृत्तान्तों के सहित, जिस जिस बरा मे जिसका उन्म हुआ, वह सब मुझे सुनाइये ॥२५॥ सूतजी वोरे--महातप वशम्पायन न उनमेजय के प्रश्न की सराहना करके वृष्णिवग के चरित्रो को विस्त रपूर्वक कहना प्रारम्भ क्यिा ॥२९॥ वैशम्पायन ने कहा-ह राजन् । अब आपको मैं दिव्य, पवित्र, पाप नष्ट करने वाली, अदभुत, अनेक अर्थ युक्त एव श्रुति सम्मत क्या सुनाता हूं ॥२७॥ जो मनुष्य इस क्था को बारगार श्रवण कर हृदयगम कर लेता है, वह अपने वश को अटल कर लेता तथा स्वर्ग पाकर वहाँ पूजिन होता है ॥२८॥ जो अव्यक्त कारण, नित्य, सदसदात्मक एव प्रधान पम्प है, उसी से इस ईश्वर- मय जगत की उत्पत्ति हुई है ।।२६ । हे राउन् । उन्हीं अव्यक्त पुरुष को अमित तेज सम्पन्न, सब जीवा का मृष्टा और नारायणपरायण समझो ॥३०॥ उमी [ श्री हरिवंशपुराण हान् ब्रह्मा से अहकार उत्पन्न हुआ अहकार से आवाशादि सूक्ष्मजीव हुए, * सूक्ष्मजीदी से पचतत्व और जरामुज आदि चार प्रकार के जीवों की उत्पत्ति हुई, इसी को सनातन सृष्टि कहते हैं ॥३१॥ सब अपनी बुद्धि के अनुमार उस सृष्टि का वह वृत्तान्त विस्तार सहित कहूँगा, जिसको जान लेने पर यश वृद्धि होती है ॥३२॥ धन्य यशस्य शत्रुघ्न स्वर्यमायु प्रवर्द्धनम् । कीर्तन स्थिरकीर्तीना सर्वेषा पुण्यकर्मणाम् ॥३३ तस्माललाय ते कल्प समग्र शुचये शुचि । आवृष्णिवशाद्वक्ष्यामि भूतसर्गमनुत्तमम् ॥३४ तत स्थयभूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधा प्रजा । अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत् ॥३५ आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनव । बयन तम्य ता पूर्व तेन नारायण स्मृत ॥३६ हिरण्यवर्णममवत्तदण्डमुदरेशयम् । तन जसे स्वय ब्रह्मा स्वयम्भूरिति न च तम् ॥३७ हिरण्यगर्मो भगरानुपित्या परिवत्सरम् । पदमारोवध दिप भुवमथापि च ॥३८ तयो शवयोमध्ये आकाशमसृजत्प्रभु । या पारिजया पृथ्वी दिशन दशधा दधे ॥३६ तर बाा मगो बार पाम मोध मनोरतिम् । मम मृष्टि नगा सप्तमिच्छन्प्रजापतीन् ॥४० गरागारो और भवण से सपा तथा यी वृद्धि होती है, गनुओं सगा होना है आयु मदनी है और मन में स्वर्ग की प्राप्ति होती १॥३॥ बार गुजर और एमपी में समर्थ है इसलिये में आपको किस सहित पार प्रा बी बीव गरिरा वृतात गुनाउंगा 17 भगवान सपनाको प्रारपसे घोर प्रसार ही भोशित प्रजा उसनराये पार गगग पहिारको रमना की, तिर उगम अपना धीर डाला आदि सटि का वर्णन ] [ ५७ १३५|| जल को 'नार' भी कहा गया है तथा वह जल नर का उत्सत्ति स्थान है, इसलिए नर स्पी भगवान को नारायरा कहा गया है ॥३६॥ भगवान् द्वारा नल म डाला गया वीर्य हिरण्य वर्ण का अण्ड होगया, उस अण्ड स स्वयम्भू व्हे जाने वाले ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई ॥२७॥ अण्ड में एक वर्ष रह कर ब्रह्माजी । उसके दो सण्ड कर दिये, उन्होन एक खण्ड में पृथिवी और दूसरे सण्ड से देवलोक की रचना की ॥३८॥ उन दोनो सगे के अन्तराल से आशश की रचना करके पृथिवी को जन पर स्थापित किया फिर सूर्य और दशो दिशाओ ही रचना की १३६|| उमी अण्ड म उन्होन रति विषयक नीति के सहित पिण्ड सृष्टि की रचना के विचार मे काल, मन, वचन, काम, बोध एव अनुराग की सृष्टि की ॥०॥ मगेचिमयगिरस पुलस्त्य पुलह क्तुम् । दसिष्ठ च महातेजा सोऽमृनत्मप्त मानमान् ११ सप्त ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चय गता । नाग-णात्माना वै मप्ताना हाजन्मनाम् ॥८२ ततोऽसृजत्पुन ह्या रद्र रोपात्मसम्भवम् । सनत्वमार च विभु पूर्वेषामपि पूर्वजम् ।।४३ सप्तैते जनयन्ति स्म प्रजा रुद्रश्च भारत । समन्द सनत्कुमारश्च तेज सक्षिप्य तिष्ठत ॥४४ तेपा सप्न महावशा दिव्या देवगणान्विता । नियावन्त प्रजावन्तो महपिभिरतरता ॥८५ विद्य तोऽशनिमेघाश्च रोहितेन्द्रधनू पि च । वयासि च ससर्जादी पर्जन्य च ससर्ज ह ।।४६ चो यजू पि सामानि निर्ममे यज्ञसिद्धये । साव्यास्तरयजन् देवानित्येवमनुशुश्रु म । मुणा वानजनयत्पितृ, श्चेशोऽपि वक्षम १४७ प्रजनाच्च मनुष्याचे जघनान्निमंमेसुरान् । साध्यानजनय यानित्यवमनशधम ॥४८ ५८ ] [ श्री हरिवंशपुराण फिर उहोने अपने मन से मरीचि, अत्रि, अगिरा, पुतस्त्य, पुलह, तु एव वसिष्ठ इन सप्तपियो को प्रकट किया ॥४१॥ इन सप्तपियों ने अपन को गृहस्थ ब्राह्मण मान कर ब्रह्माजी के द्वाग ही प्रक्ट सनकादि ऋषियो के तिरस्कार पूर्वक इन्होंने वेद मार्ग को ही श्रेष्ठ समझा ॥४२॥ फिर ब्रह्माजी ने परम क्रोधी रुद्र को उतान्न किया तथा मरीचि आदि के भी पूर्वज सनत्कुमार को उत्तत्ति की ॥४३॥ उपरोक्त सप्तर्षि और रुद्र सन्तानोत्पादन कर्म में लगे, परन्तु सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, नारद और सन्द ने अपने तेज को नियत्रित कर ब्रह्मचर्य पालन किया ॥४४॥ सप्तर्षि और रद्र इन आठो ब्रह्म- पुत्रों ने दिन, महान्, कर्मवान् तथा सन्तानवान् सात वशो की उत्पत्ति की, जिनमे यक्ष, आदित्यादि सुर और कश्यपादि महषि थे ॥४५॥ फिर उन्होंने विध त, वज्र, मेघ, रोहित इन्द्र धनुष तथा गगनचर खगो की रचना की ।।४।। फिर यज्ञ कार्य की सम्पन्नता के लिए ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद की रचना की। इन्ही वेद मत्रो से देवताओ की प्रीति के लिये यज्ञ किया था, ऐसा सुनते हैं । फिर ब्रह्मा ने अपने मुख से देवगण, वक्ष स्थल से पितरगण, उपस्थ से मनुष्य- गण और जघन भाग से असुररण की रचना करके साध्यो की रचना की।।४७ ४६।। उच्चावचानि भूतानि गानेभ्यस्तस्य जज्ञिरे । आपवस्य प्रजासर्ग सृजतो हि प्रजापते ॥४६ सज्यमाना प्रजा नव विवर्द्धन्ते यदा तदा। द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् ॥५० अर्धेन नारी तस्या स ससृजे विविधा प्रजा । दिव च पृथिवी चैव महिम्ना व्याप्य तिष्ठत ॥५१ विराजमसृजद्विष्णु सोऽसृजत्पुरप विराट् । पुरुष त मनु विद्धि तद्वै मन्वन्तर स्मृतम् ।।५२ द्वितीयमापवस्यतन्मनोरन्तरमुच्यते । स वैराज प्रजासगं ससर्ज पुरुष प्रभु । नारायणविसर्ग स प्रजास्तस्याप्योनिजा ॥५३ आयुष्मायोतिमान्धन्य प्रजावान्छुतवास्तथा। आदि सर्ग विदित्वेम यथेष्टा प्राप्न याद्गतिम ॥५४
आदि मृष्टि का वर्णन ]
उस समय ब्रह्माजी के अन्यान्य अंगों से अन्य अनेक प्रकार के प्राणी
उत्पन्न हुए, उसी अवसर मे वसिष्ठ नामक प्रजापति की सृष्टि की ॥४६।। इस
प्रकार विभिन्न सन्ततियों को मन से उत्पन करके भी जब ब्रह्मा ने प्रजा की
वृद्धि होते हुए नहीं देखी, तो अपने देह के दो भाग करके एक से पुरप, दूसरे से
स्त्री हुए और विभिन्न प्राणियों की रचना की तथा अपने प्रभाव से ही पृयिवी
और देवलोक को व्याप्त कर बैठे ॥५०-५१।। इस प्रकार विष्णु भगवान् ने
विराट् रचना की और विराट ने पुरुष को रचा, पुरुप मनु थे, जिन्होंने मन्वन्तर
का क्रम चलाया ॥५२॥ भगवान् विष्णु द्वारा हिरण्यगर्भ से उत्पन्न मृष्टि आपद
वही गयी, आपद से उत्पन्न होने वाली प्रजा अयोनिज थी, इसके पश्चात् विष्णु
ने ही मनु के द्वारा योनिज सृष्टि की रचना की। इसलिये आपव और योनिन
मृष्टि मे स्त्री संज्ञक दूसरा अन्तर उपस्थित हो गया, इमीसे मन्वन्तर शब्द चल
पडा ॥५३।। आदि मृष्टि विषयक इन बातो को जो मनुष्य जान लेता है, वह
आयुष्मान, कीर्तिमान, धनवान, पुत्रवान और विद्वान हो जाता है तथा उसे मनो-
भिलापित गति की प्राप्ति होती है ॥५४]]
।। स्वायम्भुव का वंश-दक्ष को उत्पत्ति ।।
सुप्टासु प्रजास्वेवमापवो वै प्रजापतिः ।
सेभे वै पुरपः पत्नी शतरूपामयोनिजाम् ॥१
यापवस्य महिम्ना तु दिवमावृत्य तिष्ठतः ।
धर्मेणव महाराज शतपाव्यजायत ॥२
सा तु वर्षायुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम् ।
भर्तारं दीप्ततपसं पुरपं प्रत्यपद्यत ॥३
स व स्वायम्भुवस्तात पुरपो मनुरुच्यते ।
तस्यैक्मप्ततियुगं मन्वन्तरमिहोच्यते ।।४
वैजात्पुरुषाद्वीरं शतरपां व्यजायत ।
प्रियग्रतोतानपादी वीरात्वाम्या व्यजायत ॥५
६० [ श्री हरिवशपुराण काम्या नाम महागाहो यमस्य प्रजापते । काम्यापुत्रास्तु चत्वार सम्राट कुक्षिविराट प्रमु । प्रियव्रत समासाद्य पति सा सुपुवे सुतान् ॥६ उत्तानपाद जग्राह पुत्रमसि प्रजापति । उत्तानपादाच्चतुर सूनृताऽजनयत्सुतान् ॥७ वैशम्पायन जी ने कहा-इस प्रकार अयोनिज और योनिज दोनो प्रकार की सृष्टि उस न करने के पश्चात् आपत्र प्रजापति हुए, अयोनिजा शतहा नाम की कन्या उनकी पत्नी हुई ॥१॥ सर्वव्यापी आपव की महिमा और धर्म के प्रभाव से शतरूपा अनेक रूप वाली हुई ॥ ॥ दस हजार वप तक उसने घोर तपस्या की और फिर सतान की कामना से वह अपने तेजस्वी पति के समीप पहुंची ॥॥ हे जनमेजय । स्वायम्भुव मनु को विराट् पुरप बहा गया है, उनके कार्यकाल की इकहत्तर चतुर्युगी व्यतीत होने पर एक मव तर होता है ॥७॥ शतरण ने उन विराट पुरप के ससग से वीर नामक एक पुत्र उत्पन्न किया, जिससे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र तथा काम्या नाम की पुत्री उत्पन्न हुई ॥५॥ हे महाबाहो । प्रियव्रत के ससर्ग से काम्या के चार पुत्र हुए, जिनके नाम सम्राट् कुक्षि, विराट और प्रभु थे ॥६॥ प्रजापति अनि ने उत्तानपाद को अपना उत्तराधिकारी बनाया और उत्तानपाद ने अपनी पत्नी सुनृता से चार पुत्र उत्पन्न किये ॥७॥ धर्मस्य कन्या सुश्रोणी सूनृता नाम विथ ता । उत्पन्ना वाजिमेधेन ध्र वस्य जननी शुभा ॥८ धव च कीमित च शिव शान्तमयस्पतिम् । उत्तानपादोऽजनयत्सूनृताया प्रजापति ।। ध्र वो वर्षसहस्राणि त्रीणि दिव्यानि भारत । तपस्तेपे महाराज प्रार्थयन्सुमहद्यश 1॥१० तस्मै ब्रह्मा ददी प्रीत स्थानमप्रतिम भुवि । अचल चैव पुरते सप्तर्षीणा प्रजापति ११ स्वायम्भुव का वश-दक्ष को उत्सत्ति ] [ ६१ तस्यातिमात्रामृद्धिं च महिमान निरीक्ष्य च । देवामुराणामाचार्य श्लोक प्रागुशना जगी ।।१२ अहोऽस्य तपसो वीर्यमहो श्रुतमहो वलम् । यदेन पुरत वृत्वा ध्रुव सप्नर्पय स्थिता ॥१३ तस्माक्लिष्टि च भव्य च ध्र वाच्छम्भुळजायत । श्लिप्ट राघत्त सुच्छाया पञ्चा पुनानकल्मपान् ॥१४ ध्रुव की माता मूढता धर्म की पुत्री थी, उसका जन्म अश्वमेव यज्ञ के द्वारा हुआ था ||८॥ सून्ना के चार पुत्र ध्रुव, कीर्तिमान, शिव और अयस्पति नामक थे ॥६।। है भारत । महान् यश की प्राप्ति के निमित्त ध्रुव ने तीन हजार दिव्य वर्ष तक घोर तपस्या की थी ॥१०॥ उन पर प्रसन्न होकर भगवान् ब्रह्माजी ने उन्ह सप्तपियो से भी उच्च, अचल एव श्रेष्ठ लोक प्रदान किया था, जिसकी समता नहीं हो सकती ॥११॥ ध्रुब की समृद्धि और महिमा की महानता देख कर सुरामुर गुरु शुक्राचार्य जी ने कहा या ॥१२॥ महा घुव वा तप, पराक्रम, बल तथा ज्ञान वितना ऊंचा है कि सप्तपि भी इसे अपने से आगे का स्थान देकर स्थित हैं ।।१३॥ ध्रुव के तीन पुत्र हुए-दिलप्टि ने सुच्चाया नाम की भार्या से पांच पुण्यारमा पुत्री की उत्पत्ति की ॥१४॥ रिपु रिपु जय पुष्य वृकल वृक्तेजसम् । रिपोरापत्त बृहती चाक्षुप सवतेजसम् ।।१५ अजीजनत्पुप्परिण्या बोलण्या चाक्ष पो मनुम् । प्रजापतेरात्मजायामरण्यस्य महात्मन ॥१६ मनोरजायन्त दश नड्वलाया महौजस । न्यायामभवन्छे प्ठा वैराजस्य प्रजापते ॥१७ ऊरपूर शनद्य म्नस्तपम्वी मत्यवान्कवि । अग्निप्टुदतिरामश्च सुद्य म्नश्च ति ते नव ।। १८ अभिमन्युश्च दशमो नड्वलाया सुता स्मृता । कगेरजनयत्पुत्रान्पडाग्नेयो महाप्रमान् । अन मुमनम प्याति ऋतुमङ्गिरस गयम् ॥१५ - [ श्री हरिवंशपुराण अङ्गात्सुनीथापत्य वै वेनमेक्मजायन । अपचारातु वेतस्य प्रकोप सुमहानभूत ॥२० प्रजार्थमृषयो यस्य ममन्थुर्दक्षिण करम् । वेनस्य पाणी मथिते वभूव मुनिभि पृथु ॥२१ उन पुत्रो के नाम रिपु, रिपुञ्जय, पुण्य, वृक्ल और वृक्तेजस् थे। पाँचो मे श्रेष्ठ रिपु की पत्नी वृहती हुई, जिसने सब देवताजो के तेज से सस चाक्षुष नाम का पुत्र उत्पन्न किया ॥१५॥ चाक्षप ने वीरण सुता पुष्परिणी भार्या बना कर उसके गभ से मनु की उत्पत्ति की ॥१६॥ मनु ने अरण्य प्र पति की पुत्री नड्वला के गर्भ से दस पुन उत्पन्न किये, जिनके नाम ऊरु, शतद्युम्न, तपस्वी सत्यवान, कवि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र, सुयुग्न और अभिर थे। करु ने आग्नेयी के गभ से अङ्ग सुमनस, रयाति, तु, अगिरा और नामक महातेजस्वी छ पुत्र उत्पन किये । १७ १९॥ अग में यम की पुत्री सुन के गर्भ से वेन न मक एक ही पुत्र को जन्म दिया। वेन देवताओ का द्रोही हु जिससे क्रोधित हुए ऋषियो ने उसको दक्षिण भुजा का म थन किया, हि पृथु मामक एक पुत्र की उत्पत्ति हुई ॥२० २१॥ त दृष्ट्वा कृपय प्राहुरेप वै मुदिता प्रजा । करिष्यति महातेजा यशश्च प्राप्स्यते महत् ।।२२ स धन्वी कवची खङ्गी तेजसा निर्दहन्निव । पृथुर्वेन्यस्तदा चेमा ररक्ष क्षनपूर्वज ॥२३ राजसूयाभिषिक्तानामाद्य स वसुधाधिप । तस्माच्चैव समुत्सन्नी नियुणो सूतमागधौ ।।२४ तेनेय गौमहाराज दुग्या सस्यानि भारत । प्रजाना वृत्तिकामेन देव सपिंगण सह ।।२५ पितृभिर्दानवैश्च व गन्धर्व साप्सरोगणे । सर्प पुण्य जनश्च व वीरुद्धि पर्वतैस्तथा ॥२६ तेषु तेषु च पाये दुह्यमाना वसुन्धरा । प्रादाद्यप्मित क्षीर तेन प्राणानधारयन् ॥२७ स्वायम्भुव का वश-दक्ष की उत्पत्ति ] [ ६३ पृथुपुनो तु धर्मज्ञो जज्ञातेऽन्तद्धिपालिती। शिखण्डिनीहविर्धानमन्तर्वानाद्वयजायना ॥२८ उसे देखकर वे पि अत्यन्त प्रसन्न होते हुए वाले यह पृथु प्रजाजन को प्रसन्न करने वाला तथा अत्यन्त यश वाला होगा ॥२२।। इसके अनुसार उस अत्यन्त तेज वाले वेन पुत्र पृथु ने धनुष, क्वच एव खङ्ग धारण करके पृथिवी की चिरकाल तक रक्षा की । २३।। वह पृथु राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले प्रथम राजा हुए और उनके यज्ञ मे अग्नि के द्वारा सून और मागध की उत्पत्ति हुई ॥२४॥ उ हाने प्राणिया को जीवन देने के लिये दवता, ऋषि, पितर, दानव, गन्धर्व, अप्सरा, सर्प, यक्ष, सता, पर्वतादि से मिलकर और पुराणातरो मे देवादि ने अपने सजातीयो को बटडा बना कर गो रूप धारिणी पृथिवी का दोहन किया । तब पृथिवी ने उन्हें अन्नादि दुग्ध प्रदान किया जाकि उनकी जीविका हुई ॥२५-२७॥ राजा पृथु के अन्तर्धान और पाली नाम के दो पुत्र हुए। उनमें से अतर्धान के द्वारा शिखण्डिनी के गर्भ से हविर्धान नामक पुन को उत्पत्ति हुई ॥२८॥ हविर्धानात्यहाग्नेयी धिपणाऽजनयत्सुनान् । प्राचीनवहिंप शुक्ल गय कृष्ण प्रजाजिनी ॥२६ प्राचीनहिमगवान्महानासीत्प्रजापति । हविर्घानान्महाराज येन सद्धिता प्रजा ॥३० प्राचीनाना कुशास्तस्य पृथिव्या जनमेजय । प्राचीनहिभगवान्पृथिवीतलचारिण ॥३१ समुद्रतनयाया तु कृतदारोऽभवत्प्रभु । महतस्नपस पारे सवर्णाया महीपति ॥३२ सुवर्णाऽऽत्त सामुद्री दश प्राचीनवहिप । सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगा ॥३३ अपृयग्धर्मचरणास्तेऽनप्यन्त महत्तप । दशवर्षसहस्राणि समुद्रमलिलेशया ||३४ । । राजा प्राचीन ६४ ] [ श्री हग्विशपुराण तपश्चरत्सु पृथिवी प्रचेत सु महीरहा । अरक्ष्यमाणामाववर्बभूवाथ प्रजाक्षय ॥३५ हविर्धान ने अग्नि की पुत्री विपणा के गर्भ से छ पुत्र उत्पन्न किये जिनके नाम प्राचीन बहि, शुक्ल, गय, कृष्ण, ब्रज और अजिन थे ॥२६॥ राउन् । प्राचीनहि अपने पिता से भी अधिक सामर्थ्यवान् हुए, इसलिये उनवे शासनकाल मे प्रजा की बहुत वृद्धि हुई ॥३०॥ हे जनमेजय यहि के द्वारा किये गये यज्ञो से पूर्व को अग्र भाग करके बिछे हुए कुशो से सम्पूएं पृथिवी आवृत्त हो गयी थी इसलिये भूतल मे वे प्राचीन बहि नाम से प्रसिद हुए । उनके प्रचेता नाम वाले दस पुत्र समुद्र में सोते हुए दस हजार वर्ष ठक घोर ता करते रहे ॥ ३१-३४ 11 11 कारण पृथिवी रक्षक-रहि हो गई और दन के रूप मे दिखायी देने लगी तथा प्रजा नष्ट हो गई ॥३५॥ नाशकन्गारतो वातु वृत खममवद् द्रमै । दशवर्षसहस्राणि न शेकुश्चेष्टितु प्रजा ॥३६ सदुपथ त्य तपसा युक्त मर्वे प्रचेतस । मुग्रेभ्यो वायुमग्रिं च तेऽसृजजातमन्यव ।।३७ उन्मूलानथ तान्मृत्वा वृक्षान्वायुरशोपयत् । तानगिरदहतोर एवमासीव मक्षय ॥३८ द्र मक्षगसयो बुद्ध्वा विचिच्छिष्टे पु शाखिपु । उपगम्यानवीदेतान् राजा सोम प्रजापतीन् ॥३६ पोप यच्छा राजान सर्वे प्राचीनवहिप । वृक्षगून्या वृता पृथ्वी शाम्येतामग्निमारती ॥४० रनमा च वन्येय वृक्षाणा वरवणिनी। भविष्य जानता तत्त्व धृता गर्भेण वै मया ।।४१ मारिपा नाम यन्येय वृक्षाणामिति निर्मिता। भार्या योऽस्तु महाभागा सोमवशविधिनी ॥४२ उतन गमय तर वायुपा प्रवाहित होना पा रहा और आगरा प गरपप",गप्रसार या हार या साप्रा भी निश्चेष्ट पड़ी रही ॥३६ स्वायम्भुव का वश -दक्ष को उतात्ति ] जब उन तपस्वी प्रचेताओ को यह वृत्तान्त विदित हुआ तो उहोंने क्रोध करके अपने मुख से अग्नि और वायु को उत्पन्न क्यिा ॥३७॥ उम वायु न पृथिवी के वृक्षा को सुखा दिया और अग्नि उह भस्म करने लगा ॥३८॥ जब कुछ वृक्ष मस्म होने से बचे थे तभी वृक्षो के अधिपति सोम प्रजापति ने उन प्रचेतामा के पास जाकर उनसे वहा ||३६ हे प्रचेताओ! अपने क्रोध का निवारण कीजिये, समस्त पृथिवी वृक्षा से रहित हो गई है, इसलिय अब आप अपने द्वारा उसन्न विगे हुए अग्नि और वायु को शान्त कर दोजिय ॥४०॥ भविष्य की इन घट- ना को जान कर मैंन वृक्षो की रल स्पा मारिपा नाम की कन्या सुरक्षित रखी थी, इसका आप पाणिग्रहण कीजिय, इस कन्या के द्वारा हो च द्रवश की वृद्धि होगी ॥४१४॥ युप्माक तेजामोद्धन मम चान तेजस । अम्यामुन्पस्यते पुनो दक्षो नाम प्रजापति ॥४३ य इमा दग्धभूयिष्ठा युप्मत्तेजोमयेन वै । अग्निनाऽग्निसमो भूय प्रजा सवदयिष्यति ॥४४ तत सोमस्य वचनाजगृहस्ते प्रचतस । सहृत्य कोप वृशेभ्य पत्नीधर्मेण मारिपाम् ॥४५ मारिपाया ततस्ते वै मनसा गर्भमादयु । दशम्यस्तु प्रत्तोम्यो मारिपाया प्रजापति । दक्षो जज्ञे महातेजा सोमस्याशैन भारत ॥४६ पुत्रानुत्पादयामास सोमवशविवर्द्धनान् । अचराश्च चराश्चैव द्विपदोऽयचतुप्पद । स दृष्ट्वा मनसा दक्ष पश्चदप्यसृजत्रिय ४७ ददो स दश धर्माय कश्यपाय योदश । शिष्टा सोमाय राज्ञऽथ नक्षताच्या ददी प्रभु 1105 तासु देवा यगा नागा गावो दितिजदानवा । गन्धर्वाप्मरसव जज्ञिरेन्याश्च जातय ॥४६ तत. प्रभृति राजेन्द्र प्रजा मैथुनसमवा ! सक्लाद्दर्शनाल्परिपूर्वा सुधिरच्यते १५० [ श्री हरियशपुराण आपके माधे तपोबल तथा मेरे याधे तेज के मिश्रित होने से दक्ष प्र पति की उत्पत्ति होगी ॥४३ । हमारे तपोमल पे कारण वह पुत्र अग्नि ये स तेज वाला होकर इस दग्ध प्राय पृथिवी और प्रजा पी वृद्धि घरेगा । चन्द्रदेव की बात से प्रसन्न होकर प्रचेतागण छोर से तिवृत्त हुए और उ. मारिपा को भार्या के रूप में स्वीकार किया ॥४शा फिर उनके द्वारा मा मे गर्भाधान किये जाने पर उन दशो प्रचेताओ और चद्रमा के अश से दक्षः पति उत्पन्न हुए ॥४६॥ उन दक्ष प्रजापति ने चन्द्रवश का विस्तार परना अनेक पुत्री तथा दो पात्र और चार पांव वाले स्थावर जगम प्राणियो की र की और इसके पश्चात् कुछ कन्याओ को भी उत्पन्न विया ॥४७॥ उन्होने : से दस पुनियो का विवाह धर्म के साथ, तेरह का कश्यप के साथ एव नक्षत्र की कन्यायें चन्द्रमा को दे दी ॥४८|| उन कन्याओ से देवना, पक्षी, गौ, दत्य, गर्व, अप्सरा एवं अन्य की उत्पत्ति हुई ॥४ इसके मनन, दर्शन और स्पर्श द्वारा ही प्रजोत्पत्ति हो जाती थी, दक्ष प्रज की उत्पत्ति के पश्चात् मैथुनी सृष्टि होन लगी ॥५०॥ देवाना दानवाना च गन्धर्वोरगरक्षसाम् । सभव दथित पूर्व दक्षस्य च महात्मन ॥५१ अ गुष्ठाद्ब्रह्मणो जातो दक्ष प्रोक्तम्त्वयाऽनघ। वामागुष्ठात्तथा चैव तस्य पत्नीव्यजायत ॥५२ कथ प्राचेतसत्व स पुनर्लेभे महातपा । एतन्मे सशय विप्र सम्यगाख्या तुमर्हसि । दौहितश्चैव सोमस्य कथ श्वशुरता गत ॥५३ उत्पत्तिश्च निरोधश्च नित्यौ भूतेषु पार्थिव । ऋपयोऽत्र न मुह्यन्ति विद्वासश्चैव ये जना ॥५४ युगे युगे भवन्त्येते सर्वे दक्षादयो नृपा । पुनश्चैव निरुध्यन्ते विद्वास्तत्र न मुह्यति ॥५५ ज्येष्ठय कानिष्ठयमप्येपा पूर्व नासीजनाधिप । तप एव गरीयोऽभूत्प्रभावश्चव वारणम् ॥५६
दक्ष द्वारा मस्ती की उत्पत्ति ]
-[ ६७
इमा विसृष्टि दक्षम्य यो विद्यात्मत्रराचगम् ।
प्रजावानायुरुत्तीर्ण स्वर्गलोके महीयते ।।५७
जनमेजय ने कहा-हे द्विजयेष्ठ | आपने पहिले देवता, दैत्य, गधर्व, सर्प, राक्षम
और दक्ष को उत्तत्ति का वृत्तान्त कहते समय बताया था कि ब्रह्माजी के दक्षिण और
चाय बगूटों से दक्ष व उनकी भार्या उत्पन्न हुये थे ।।५१-५२।। वे अव इन प्रचेतामो
पुन विस प्रकार हुए तथा दक्ष प्रजापति चन्द्रमा के धैवते होर भी उनके
श्वसुर कैसे हो गये इममें मुझे अत्यन्त मदाय हो रहा है, इस विषय को भली
प्रकार समझा कर कहने की कृपा पीजिये ॥५३॥ वैशम्पायन ने कहा है राजन् ।
इम विश्व मे उत्पत्ति और सहार नित्य वा क्रम है, इम लय ऋपियो और विद्वानों
को इस विषय में कुछ मराय नहीं होना चाहिए ॥५४॥ युग-युग दक्षादि की
उत्पत्ति और नाश होता रहता है, इसलिय विद्वानों को इन बातो में साय नहीं
होता ॥५५।। उनमें लघुता एव गुरुता नही होती, तपोबल के न्यूनाधिक्य से ही
इनमें छोटाई-बहाई मानी गयी है ॥५६।। दक्ष प्रजापति वी चराचर भृष्टि को
जो जानता है, वह पुत्र-युक्त होकर अन्त मे स्वर्गलोक को प्राप्त होता है ।।५७ ।
॥ दक्ष द्वारा मरुतो की उत्पत्ति ।।
देवाना दानवाना व गन्धवॉरंगरक्षसाम् ।
उत्पति विन्तरेणेमा वैशम्पायन कीर्तय ।।१
प्रजा मृजेति व्यादिष्ट पूर्व दक्ष स्वयम्भुवा ।
यया ससर्ज भूतानि तथा शृशु महीपते ।।२
मानमान्येव भूतानि पूर्वमेनामृजत्यम् ।
पीन्देवासगावनिमुरानष राक्षमान् ।
पक्षभूतपिणाचाश्च वय पशुमरीमपान् ।'
यदाऽस्य ताम्तु मानस्थो न व्यवर्द्धन वै प्रजा'।
अध्याता भगवता महादेवेन धीमता ॥४
तदा सचिन्त्य तु पुन प्रजाहेतो प्रजापति ।
स मथुनेन धर्मेण सिमृधिविधा प्रजा II
६८ ] [ श्री हरिवशपुरार असिक्नीमावहत्पली वीरणस्य प्रजापते । सुता सुतपसा युक्ता महती लोकधारिणीम् ॥६ अथ पुत्रसहस्राणि वीरण्या पञ्च वीर्यवान् । असिकन्या जनयामास दक्ष एव प्रजापति ।। जनमेजय बाते हे वैशम्पायनजी | आप देवता, दैत्य, गधर्व, नाग: राक्षसो की उत्पत्ति का वृत्तान्त विस्तार सहित कहने की कृपा करें ॥१॥ वैश- यन ने कहा है राजन् । स्वयभू भगवान् ब्रह्माजी के द्वारा मृष्टि कार्य आदेश प्राप्त कर जैसे जीवो की सृष्टि की थी, वह कहता हूँ, श्रवण कीजिये । दक्ष प्रजापति ने प्रथम ऋपि, देवता, गधर्व, असुर, राक्षस, यक्ष, भूत, पिश पक्षी, पशु और सर्पो की मानस सृष्टि की तो उ हे प्रतीत हुआ कि उन मा जीवो की वृद्धि नहीं हो रही है ॥३-४॥ तर मथुनी सृष्टि की उत्पत्ति को उन्होंने ठीक समझा ॥५। फिर उन्होने वीरण प्रजापति की तपस्विनी । असिवनी का पाणिग्रहण किया ॥६॥ उन यसिक्ती के गर्भ से दक्ष ने पांच ह पुत्रो की उत्पत्ति की ॥७॥ तास्तु दृष्ट्वा महाभागान्सविवर्धयिषून्प्रजा । देवपि प्रियसवादो नारद प्राब्रवीदिदम् । नाशाय वचन तेपा शापायवात्मनस्तथा ।। य कश्यप सुतवर परमेष्ठी व्यजीजनत् । दक्षस्य व दुहितरि दक्षशापभयान्मुनि || पूर्व स हि समुत्पन्नो नारद परमेष्ठिना। असिक्न्यामय वैरिण्या भूयो देवर्पिसत्तम । त भूयो जनयामास पितेव मुनिपुङ्गवम् ।।१० तेन दक्षस्य पुता वै हर्यश्वा इति विश्रुता । निर्मथ्य नाशिता सर्वे विधिना च न सशय ।।११ तस्योद्यतस्तदा दक्षो नाशायामितविक्रम । मीन्युरत कृत्वा याचित परमेष्ठिना ।।१२ [ ६६ दक्ष द्वारा महलों की उत्पत्ति ] तनोऽभिसन्धि चक्रम्ते दक्षस्तु परमेष्ठिना। कन्याया नारदो मह्यं तव पुत्रो भवेदिति ॥१३ ततो दक्षस्तु ता प्रादालन्या वै परमेटिने । स तम्या नारदो जने दक्षशापभयापि ॥१४ नारद जी ने उन पुत्रों को प्रजा की वृद्धि करने की इच्छा वाला समझा उन्हें कुछ इस प्रकार समयाया कि जिसके कारण दश के शाप से उनके साथ (द जो भी नष्ट हो गये ॥८॥ प्रारीनकाल में पितामह ब्रह्माजी ने प्रथम द जो को उत्पन्न किया था, परन्तु दक्ष प्रजापति के अमाघारण पराक्रम वाले श्व और शवलाइव नामक पुत्रो को उहीने शास्त्रोपदेश द्वारा विरक्त कर , इममे वे गृह त्याग कर वनवामी हुए। इस बात को सुन कर दक्ष प्रजा- को अत्यन्त क्रोष हुआ और उन्होंने शाप देव र नारद का नष्ट कर डाला । । ब्रह्माजी मरीधादि ऋपियों के माय दक्ष के पास पहुंचे और उहीने उनसे र जी को पुनर्जीवित करने का निवेदन किया ॥ १२तर दक्ष प्रजापति ने महपियों के साथ विचार-विमर्ष कर एक वन्या प्रदान करन का निश्चय ग, जिम द्वारा नारद जी की उत्पत्ति होगी ॥१३॥ ऐमा विचार कर दक्ष पति ने कश्यप के निमित्त वह वन्या ब्रह्माजी को दे दी। दक्ष के शाप-मय कारण महर्षि कश्यप ने दक्ष द्वारा दी गयी वह कन्या स्वीकार कर ली और 1 से ना द जी का पुनजम हुआ ॥१४॥ पथ विनाशिता पत्रा नारदेन महपिणा। प्रजापद्विजश्रेष्ठ श्रोतुमिन्छामि तत्त्वन ॥१५ दक्षस्य पुत्रा हयंमा विवयिषव प्रजा । समागता महावीर्या नारदन्नानुवाच ह । १६ वालिशावत यूय वै नाम्या जानीय व भुव । प्रमाग यष्टकामा म्य प्रजा प्रावेतमाम्मना । अन्नम्माश्व वय अध्यय व प्रजा १७ ते तु तद्वचन थला प्रयाना मवंतो दिशम् । प्रमाण द्रप्ट्यामास्तै गना. प्राचेनमात्मजा ||15 वायोरनशन प्राप्य गतारते ये पराभवम् । अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रेग्य वापगा ॥१६ हाश्वप्वय नष्टपु दक्ष प्राचेतग पुन । वैरिण्यामेव पुवाणा सहनमसृजत्प्रभु ॥२० विवर्द्धयिषवस्ते तु शवलाश्या प्रजास्तदा । पूर्वोक्त वचन तात नारदेनैव नोदिता ॥२१ जनमेजय ने कहा-हे द्विजवर । मैं यह बात अच्छी प्रकार जानना चाहता हूँ कि महर्षि नारद ने वक्ष के पुत्रोपा विनाश यो विपापा ? ॥५॥ वैशम्पायनजी धोले-हे राजन् ' जब दक्ष पुत्र हर्यश्यादि प्रजा की वृद्धि के उद्देश्य से नारद के पास गये, तब नारद ने उनसे कहा था॥१६॥ हे हर्यश्वगण । तुम अत्यन्त मूर्ख हो क्योकि तुम्हे इस पृथिवी के उच्च, मध्य और निम्न भाग के विस्तार, परिमार का ज्ञान नहीं है, तब तुम प्रजोत्पत्ति किस प्रकार कर सकोगे ? ॥१७॥ नारदज की बात सुन कर हयश्वगण पृथिवी का विस्तार परिणाम जानने के हेतु स दिशाओ मे चल पडे ॥१८॥ जैसे समुद्र मे मिल कर नदिया पुन नही लौट पार्ट वैसे ही हयश्वगरण पुन नहीं लौटे, क्योकि वे ऐसे स्थान पर पहुंच गये, जहां वायु उपलब्ध न होने से श्वास रुक गया था ।।१६। इस प्रकार हर्यश्वो के चले जा पर दक्ष प्रजापति ने अपनी पत्नी अविसनी के द्वारा एक हजार पुत्र उत्पन्न कि ॥२०॥ उनका नाम भावलाव हुआ, जब उन्होने प्रजोत्पत्ति की इच्छा की त नारद जी ने उनसे भी उसी प्रकार कहा, जो हर्यश्वो से कहा था ॥२१॥ अन्योन्यमूचुस्ते सर्वे मम्यगाह महामुनि । भ्रातणा पदवी ज्ञातु गन्तव्य नात्र संशय ॥२२ ज्ञात्वा प्रमाण पृथ्व्याश्च सुख स्रक्ष्यामहे प्रजा । एकाना स्वस्थमनसा यथावदनुपूर्वश ॥२३ तेऽपि नेनैव मार्गेण प्रयाता सर्वतो दिशम् । अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रादिव सिन्धव ।।२४ दक्ष द्वारा मस्ती की उत्पत्ति ] [ ७१ नप्ट पु शवलाश्वेपु दक्ष ऋद्धोऽवढच. 1 नारद नाशमेहीति गर्भवास वसेति च ।।२५ तदाप्रभृति वै भ्राता भ्रातुरन्वेपण नृप । प्रयातो नश्यति क्षिप्र तन्न कार्य विपश्चिता ।।२६ ताश्चापि नष्टान्विज्ञाय पुनान्दक्ष प्रजापति. । पष्टि भूयोऽमृजत्वन्या चैरिण्यामिति न श्रुतम् ॥२७ तास्तदा प्रतिजग्राह भार्यार्थे कश्यप. प्रभु । सोमो धर्मश्च कौरव्य तवैवान्ये महर्पय ॥२८ उनकी बात सुन कर शवलाश्वो ने परस्पर मत्रणा की और कहने लगे कि महामुनि का कथन सत्य ही है, हमे अपने भाइयो के मार्ग को अवश्य ही जानना चाहिये ।।२२।। पृथिवी के परिमाण का ज्ञान होने पर हम एकाग्र तथा स्वस्थ मन से प्रजोत्पत्ति का कार्य पूर्ण कर सकेंग ।।२३। इस प्रकार विचार कर शवलावगण भी सब दिशाओ को चले गये और समुद्र मे मिली हुई नदियों के पुनरावर्तन न होने के समान शवलाश्वगण भी फिर नहीं लौटे ||२४|| जब शव- लाश्वगण भी चले गये, तर दक्ष ने क्रोध पूर्वक नारद जी से कहा- हे नारद तुम इसी समय नाश को प्राप्त होओ और गर्भ मे रहने के दुसो का भोग करो ॥२।। हे राजन् । उसी समय से भाई की खोज मे जाने वाला भाई नाश को प्राप्त होने लगा, इसलिये विद्वानो को उचित है कि भाई की खोज के लिए भाई को कदापि न भेजे ॥२६॥ दक्ष प्रजापति ने शवलाग्दो वे एट होन के पश्चात् अपनी भार्या वरिणी के गर्भ से माठ पुत्रियो को उत्पन्न किया ॥२७॥ उन पुत्रियो का विवाह कश्यप, चन्द्रमा, धर्म तथा अन्यान्य मृपियो के साथ किया गया ॥२८॥ ददी स दश धर्माय कश्यपाय योदश। सप्तविंशति सोमाय चतम्रोऽरिष्टनेमिने ।।२६ द्वे चैत्र भृगुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे तया। दे कृशाश्वाय विदुषे तासा नामानि मे शृणु ॥३० ७२ [ श्री हरियशपुराण अरुन्धती वसुर्यामी लम्बा भानुर्मरत्वती। सकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भारत । धर्मपल्यो दश त्वेतास्तास्वपत्यानि मे शृणु ॥३१ विश्वेदेवाश्च विश्वाया साध्यान्साध्या व्यजायत । मरुत्वत्या मरुन्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा ॥३२ भानोस्तु भानवस्तात मुहूर्ताया मुहूर्तजा ॥३३ लम्बायाश्च व घोषोऽथ नागवीथी च यामिजा। पृथिवीविषय सर्वमरुन्धत्या व्यजायत ॥३४ सकल्पायास्तु सर्वात्मा जज्ञे सकल्प एव हि । नागवीथ्याश्च जामिन्या वृषलम्बा व्यजायत ।।३५ उनमे से दस पुनियां धर्म को, तेरह कश्यप को, मताईस चन्द्रमा को, चार अरिष्टनेमि को, दो भृगु पुत्र को, दो अगिरा को तथा दो कृशाश्व को व्याही गयी । अब उन पुनियों के नाम कहते हैं ॥२६ ३०॥ उनमे जो धर्म की भार्याएँ हुई उनके नाम अरुन्धती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, मरत्वती सक्ल्पा, मुहूर्ता, साध्या और विश्वा थे । अत्र इनको सन्तान सुरो-॥१॥ विश्वा से विश्वेदेव उत्पन्न हुए, साध्या से साध्यगण ने जन्म लिया मरत्यती से मरत्वान् हुए, वसु से वसुगण उत्सन्न हुए ॥३२॥ भानु से भानुगण, मुहूर्ता से मुहूत्तगण, लम्बा से धोप, यामी से नागवीथी तथा अरुन्धती से पृथिवी की सभी वस्तुएँ उत्पन्न हुई ॥३३-३४॥ सकल्पा से सभी मे निवास करने वाला सकल्प हुआ, यामी की पन्या नागवीथी से वृपलम्बा उत्पन्न हुई ॥३॥ या राजन्सोमपल्यस्तु दक्ष प्राचेतसो ददौ । सर्वा नक्षननाम्न्यस्ता ज्योति परिकीर्तिता ॥३६ ये त्वन्ये ख्यातिमन्तो वै देवा ज्योति पुरोगमा । वसवोऽप्टी समाख्यातास्तेपा वक्ष्यामि विस्तरम् ॥३७ आपो ध्र वश्च सोमश्च धरश्चवानिलानली । प्रन्यूपश्च प्रभासश्च वसवो नामभि स्मृता ॥३८ दक्ष द्वारा मरतो को उत्पत्ति ] [ ७३ आपस्य पुत्रो वैतण्डयः श्रमः शान्तो मुनिस्तथा । ध्रुवस्य पुत्रो भगवान्कालो लोकप्रकालनः ॥३६ सोमस्य भगवान्वच्ची वर्चस्वी येन जायते । घरस्य पुत्री द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा । मनोहरायाः शिशिरः प्राणोऽय रमणस्तथा।।४० अनिलस्य शिवा भार्या यस्याः पुत्रो मनोजवः । अविज्ञातगतिश्चैव द्वौ पुत्रावनिलस्य तु ॥४१ अग्निपुत्र. कुमारस्तु शरस्तम्वे श्रियान्वितः । तस्य शाखो विशायश्च नैगमेयश्च पृष्ठजाः । ४२ अपत्यं कृत्तिकानां तु कार्तिकेय इति स्मृतः । स्कन्दः सनत्कुमारश्च सृष्टः पादेन तेजसः ।।४३ हे जन् । प्रचेतापुत्र दक्ष ने चन्द्रमा को जो न्याएं दी थी, वह सभी ज्योतिप्रद नक्षत्रों के नाम से विन्यात हुई ॥३६॥ इनके अतिरिक्त अत्यन्त तेजस्वी एव प्रसिद्ध देवता अष्टवसु हुए, आप, ध्रुव, मोम, घर, अनल, अनिल, प्रत्यूप और प्रभात यह उनके नाम हुए ॥३७-३८॥ वनइय, शान्त और मुनि यह चारी पुत्र आप मामा वसु के हुए । ध्रुव का पुत्र लोक नाशक काल हुआ॥३६॥ चन्द्रमा के पुत्र भगवान् वर्चा हुए, इनके पिता होने से ही चन्द्रमा की वर्चस्वी नाम से प्रसिद्धि हुई । द्रविण, हुतहव्यवह तथा मनोहरा के गर्भ से धर के शिशिर, प्राए और रमण नामक पुत्र हुए ॥४०॥ शिवा के गर्भ से अनिल ने मनोजव और अविज्ञानगति नामक दो पुत्र उत्पन्न विये ॥४१॥ अग्नि के पुत्र कुमार हुए, उनका पालन कृत्तिकाओ के द्वारा हुमा, इमलिये उन्हें कातिय भी कहा गया । शाख, विशाय और नेगमेय यह तीनो उन कार्तिकेय के छोटे भाई हुए। स्वन्द और सनत्कुमार इन दोनो की उत्पत्ति अग्नि के चतुर्याश से हुई थी, इसलिये यह कानिदेय के नाम भेद ही हैं ।।१२-४३॥ प्रत्यूपस्य विदुः पुश्मृप्टि नाम्ना च देवलम् । दो पुत्री देवलम्यापि दामावन्नौ तपस्विनी ॥४४ ७४ ] रेवशपुराण प्रत्युप के पुत्र देवल बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मचारिणी। योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता विचाचार ह ॥४५ प्रभासस्य च सा भार्या वसूनामप्टमस्थ च । विश्वकर्मा महाभागस्तस्या जज्ञे प्रजापति ।४५ कर्ता शिल्पसहस्राणा निदशाना च बद्धकि । भूषणाना च सर्वेपा कर्ता शिल्पवता वर ।।४७ य सर्वाता विसानानि देवताना चकार ह । मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्प ॥४८ सुरभी कश्यपाद्र द्रानेकादश विनिर्ममे । महादेवप्रसादेन तपस भाविता सती ||४६ अजंकपादहिर्बुध्न्यस्त्वष्टा रुद्राश्च भारत । त्वष्ट श्चैवात्मज श्रीमाविश्वरूपो महायशा ॥५० उन महर्षि देवल के दो पुत्र हुए, जो तपर और क्षमाशील थे ॥४४॥ देवताओ के गुरु वृहस्पति जी की बहिन योगसि. एव ब्रह्मचारिणी नाम की थी, वह आसक्ति रहित भाव से ससार में भ्रमण कर थी, वह आठवें वमु प्रभास की भार्या थी, प्रजापति विश्वकर्मा की उत्पत्ति उ के गर्भ से हुई थी ।।४५-४६।। उन विश्वकर्मा ने विश्व मे सहस्रो प्रकार के शिल का आविष्कार किया था, उन्ही ने सब प्रकार के आभूपण और देवताओ के रि विमास की रचना की वर्तमान काल में भी उन्ही की शिल्पकला के अनुसर द्वारा असरय मनुष्य जीविकोपार्जन करते हैं ॥४७-४८॥ सुरभी ने अपनी तपस के प्रभाव से भगवान् शकर को प्रसन्न किया और कश्यप के द्वारा ग्यारह रु! को पुत्र रूप में प्राप्त किया 11४11 वे अजैकपाद, अहिर्बुध्य, त्वष्टा और र नाम से प्रसिद्ध थे, त्वष्टा का पुत्र महातप विश्वरूप हुआ ॥५०॥ हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजित । वृषाकपिश्च शम्भुश्च पदी रेवतस्तथा ॥५१ मृगव्याधश्च सर्पश्च कपाली च विशापते । एकादशैते कथिता रद्रास्त्रिभुवनेश्चरा ॥५२
दक्ष द्वारा ममता की उत्पत्ति ]
[ ७५
शत त्वैवं ममान्यात रुद्राणाममितौजसाम् ।
पुराणे भरतश्रेष्ठ याप्ना सचराचरा ॥५३
लोका भरतशार्दूल कश्यपम्य निवोध मे।
अदितिदितिदनुचव अरिष्टा सुरमा सशा ५४
सुरमिविनता चव ताम्रा क्रोधवशा इरा।
कद्रु मुनिश्च राजेन्द्र तास्वपत्यानि मे शृण ।।५५.
पूर्वमन्वन्तरे श्रेष्ठा द्वादशासन्युरोत्तमा ।
तुपिता नाम तेऽन्योन्यमूचुर्ववस्त्रतेऽन्तरे ॥५६
उपस्थितेऽतियशमि चाक्षुपस्यान्तरे मनो ।
हितार्य,सर्वमत्त्वाना ममागम्य परस्परम् ।।५०
आगच्छन द्रत देवा अदिति मप्रविश्य वै ।
मन्वन्तरे प्रमुयामम्नन्न. श्रेयो भविष्यति ॥५८
ग्यारह रुद्र हर, बहुस्प, अम्बक, अपराजिन, वृषाकपि, यम्भु, कपर्दी,
रंवत, मृगगगन, मां और कपाली नामक थे, यह तीनो नुवन के यधीवर धे
॥५१-५२॥ है भरत श्रेष्ठ | इन रुद्रा में पुराणो सैक्टो नाम कहे गये हैं तथा
यह समस्त चराचर विश्व में अमन्य रूपों में विद्यमान रहते हैं ॥५३॥ हे भरत
शार्दूल ' अब कश्या की भार्याओ बौर उनकी सन्तान के पामो को श्रवण करो-
अदिति, दिति, दनु अरिप्टा, मुरमा, खशा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा,
इरा, कद्र और मुनि ॥५४-५५।। चाक्षुप मन्वन्तर में जो तुपित नाम वारह
प्रमुख देवता हुए थे, उन्होंने वैवस्वत मन्द तर में कहा था ॥५६॥ यह चाक्षुप
मन्वन्तर अत्यन्त यशस्वी पाया है, इसलिये हम सब एक साय चलकर प्राणियों
के कल्याण के लिए अदिति के गर्भ द्वारा जन्म ग्रहण करें, इसमें हमारा भी हित
निहित है ॥५७-५८॥
एवमुक्त्वा तु ते मर्वे चासुपस्यान्तरे मनो ।
मारीचात्कश्यपाजाताम्तेऽदित्या दक्षकन्यया ॥५६
ता विष्णुश्च शश्च जज्ञात पुनरेव हि ।
अर्यमा चैत्र धाता च त्वष्टा पूपा च भारत ॥६०
-
[ श्री हरिवंशपुराण विवस्वान्सविता चव मित्रो वरण एव च । अंशो भगश्चानितेजा आदित्या द्वादश स्मृता ॥६१ चाक्षुषस्यान्तरे पूर्वमासन्ये तुपिना सुरा । वैवस्वतेऽन्तरे ते वै आदित्या द्वादश स्मृता । ६२ सप्तविंशति या प्रोक्ना सोमाल्योऽथ सुव्रता । तासामपत्यान्यभवन्दीप्तान्यमिततेजसाम् ।।६३ अरिष्टनेमिपत्नोनामपत्यानीह पोडश । बहुपुनस्य विदुपश्चतस्रो विद्य न स्मृता ।६४ प्रत्यगिरसजा श्रेष्ठा ऋचो ब्रह्मर्षिसत्कृता । कृशाश्चस्य तु राजर्देवप्रहरणानि च ॥६५ एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव ह। सर्वदेवगणास्तात स्त्रिंशत्त कामजा ॥६६ वैशायन जी बोले-यह कहकर वे सब देवता ववस्वत मन्वन्तर मे मरीचि पुत्र कश्यप के द्वारा अदिति के गर्भ से प्रकट हुए ॥५६इस प्रकार इन्द्र, विष्णु, अर्य मा, धाता, त्वष्टा, पूषा, विवस्वान् सविता, मित्र, वरुण, अश और भग नामक बारह आदित्य उत्पन्न हुए ॥ ६० ६१ ।। चाक्षुष मन्वन्तर के तुषित नामक देवगण ही वैवस्वत म वन्तर मे इस प्रकार के नाम वाले द्वादश आदित्य हुए ॥६२॥ चण्द्रमा की जो सत्ताईस भार्याए हुइ उनके गर्भ से भी बहुत सी सन्तानोत्पत्ति हुई ॥६३॥ अरिष्टनेमि की भार्याा के सोलह सन्ताने हुई बच मेघ, इन्द्र धनुप और विद्युत की उत्पत्ति अत्यन्त ज्ञानी और तेजस्वी बहुपुत्र से हुई ॥६॥ ब्रह्मषियो द्वारा सम्मानित सभी ऋक् प्रत्यगिरा के पुत्र थे। देवपि कुशाश्व के सभी पुत्र दिव्यशास्त्रो के नामो से विख्यात हुए ॥६५॥ सहस्र युग चे व्यतीत होने पर देवगण पुनर्जन्म धारण करते हैं, वसु आदि जो तेतीस देवता हैं, वे कामज कहे गये हैं ॥६६॥ दित्या पुसद्वय जज्ञे कश्यपादिति न थुतम् । हिरण्यकशिपुचव हिरण्याक्षश्च वीर्यवान् १६७ दक्ष द्वारा मरता की उसत्ति ] [ . सिंहिका चामवत्कन्या विप्रचित्तः परिग्रहः । सहिकेया इति ख्यातास्तस्याः पुत्रा महाबलाः। गणश्च सह राजेन्द्र दशसाहस्रमुच्यते ॥६८ तेषां पुत्राश्च पौनाश्च शतशोऽथ सहस्रगः। बसद ख्याता महाबाहो हिरण्यकशिपोः शृणु ॥६६ हिरण्यकशिपो पुत्राश्चत्वार. प्रयितौजसः । अनुहादश्च हादश्च प्रहादश्चैव वीर्यवान् 110 संहादश्च चतुर्थोऽभूद्मादपुनो ह्रदस्तथा । सहादपुन. सुन्दञ्च निमुन्दम्तावुभौ स्मृतौ ।।७१ अनुहादसुतो ह्यायु शिविः कालस्तथैव च । विरोचनश्च प्राहदिलिर्जने विरोचनात् ।।७२ बलेः पुत्रशतं त्वासीद् वाणज्येष्ठं नराधिप । धृतराष्ट्रश्न सूर्यञ्च चन्द्रमाश्चेन्द्रतापनः ॥७३ कुम्मनाभो गर्दनाक्ष कुक्षिरित्येवमादयः । वाणस्तेपामतिवलो ज्येष्ठ. पशुपते. प्रियः ।।७४ सुना गया है कि दिति के गर्भ से कश्यप ने अत्यत बलवान दो पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष हुए तथा मिहिका नाम को एक कन्या भी उत्पन्न की, जिसका विवाह विप्रचित्ति के साय हुआ। दम मिहिका के गर्भ से दस हजार अत्यत बलवान पुत्रों की पत्ति हुई, वे मनी से हिडेय कहे गये हैं ॥६७.५८। उनके अमस्य पुत्र-पौत्र उत्पन्न हुए । अब हिरण्य- कशिपु की सतति के विषय में कहता हूं ॥६६॥ हिरण्यकशिपु वे चार पुत्र हुए, उन तेजस्वियों के नाम अनुहाद, ह्राद, प्रह्लाद और महाद थे। हाद का पुत्र हद और सहाद के दो पुन सुन्दनिमुन्द दूर ॥७०-७१॥ अनुहाद के तीन पुत्र हुए, जिनका नाम वायु, शिवि और काल हा प्रहाद के एक ही पुत्र विरो- चन नाम का टापन्न हुआ ॥७२।। उस विरोचन का पुत्र वलि हुआ, जिसके वाण, घृतराष्ट्र, मूर्य, चन्द्र, इन्द्रतापन, कुम्मनाम, गर्दभास और दुक्षि आदि मौ पुत्र हुए। उनमें वाम सबसे बड़ा था, जो शिवत्री का प्रिय मस्त हुआ ।।७३-७४।
७८ ]
[ श्री हरिवशपुराण
बाणस्य चेन्द्रदमनो लोहित्यामुदपद्यत ।
गणास्तथासुरा राजञ्छतसाहससम्मिता ॥७५
हिरण्याक्षसुना पञ्च विद्वास सुमहाबला ।
झर्भर शकुनिश्चैव भूनसन्तापनस्तथा ॥७६
महानाभश्च विक्रान्त कालनाभस्तथैव च ।
अभवन्दनुपुत्राश्च शत तीवपराक्रमा ।
तपस्विनो महावीर्या प्राधान्येन निवोध तान् ॥७७
द्विमूर्द्धा शकुनिश्चैव तथा शकुशिरा विभु ।
शकुकर्णो विराधश्च गवेष्ठी दुन्दुभिस्तथा।
अपोमुख शम्बरश्च कपिलो वामनस्तथा ।।७८
मरीचिर्मघवाश्च व इरा शव शिरा वृक ।
विक्षोभणश्च केतुश्च केतुवीर्यगतह्रदौ ७६
इन्द्रजित्सत्यजिच्चैव वज्रनाभस्तथैव च ।
महानामश्च विक्रान्त कालनाभस्तथैव च ।।६०
एकचक्रो महाबाहुस्तारकश्च महाबल ।
वैश्वानर पुलोमा च विद्रावणमहासुरौ॥८१
स्वर्भानुवृषपर्वा च तुहुण्डश्च महासुर ।
सूक्ष्मश्चैवातिचन्द्रश्च ऊर्णनाभो महागिरि ॥२
एते सर्वे दनो पुना कश्यपादभिजज्ञिरे ।
विप्रचित्तिप्रधानास्ते दानवा सुमहाबला ॥८३
एतेपा यदपत्य तु तन्न शक्य नराधिप।
प्रसड्यातु महीपाल पुत्रपौत्राद्यनन्तकम् ॥८४
उस वाणासुर की भार्या लोहिती के इन्द्रदमन नामक एक पुत्र उत्पन्न
हुआ, इस प्रकार हिरण्यकशिपु के सतति रूप मे असरय असुरो को वृद्धि हुई
१७५१। इसी प्रकार हिरण्याक्ष के भी पांच पुत्र अत्यत पराक्रमी हुए, वे झझर,
माधुनि, भूत सन्तापन, महानाम और कालनाभ नाम से प्रसिद्ध हुए। कश्यप की
.
पृथ-उपास्यान ]
[ ७६
मार्या दनु से भी अत्यत तेजस्वी एव पराक्रमी सौ पुत्र हुए, उनमें जो प्रमुख
थे
उनके नाम कहता हूं ॥७६-s-1 हिभूर्घा शकुनि, शकुशिरा शकुवणं, विराध,
विष्ठी, दुन्दुभ, अयोमुस, शम्बर, कपिल, वामन, मरीचि, मघवान्, इरा,
गर्गशिरा, वृक, विक्षोमन, केतु, केतुवीर्य, शत हृद, इन्द्रजित, सर्वजित, वज्रनाम,
विक्रान्त, महानाम, कालनाभ, महाबाहु, एकचक्र, तारक, वैश्वानर, पुलोमा,
विद्रावण, महाशिरा, स्वर्भानु, वृषपर्वा तुहुण्ड, सूक्ष्म, अतिचद्र, उगनाभ, महा-
गरि आदि ॥७८ ५२।। ये सभी दनु पुत्र, कश्यप वै वशधर थे, जिनम विप्रचित्ति
सर्वश्रेष्ठ था, यह सभी दैत्य अत्यन्त बली थेn पुत्र-नौनादि के क्रम से
इन दैत्यो को वश वृद्धि की गणना नहीं की जा सकती ॥४॥
॥ पृयु-उपाख्यान ॥
अभिपिच्याधिराज्ये तु पृथु वैन्य पितामह ।
तत क्रमेण राज्यानि व्यादेष्टुमुपचक्रमे ।।१
द्विजाना वीरुधा चैव नक्षतग्रयोस्तथा ।
यज्ञाना तपसा चैव सोम राज्येऽभ्यपेचयत् ।।२
अपा तु वरुण राज्ये राज्ञा वैश्रवण प्रभुम् ।
वृहस्पति तु विश्वेषा ददावाङ्गिरस पतिम् ।।३
भृगूणामधिप चंव काव्य राज्येऽभ्यपेचयत् ।
आदित्याना तथा विष्णु वसूनामथ पावकम् ॥४
प्रजापतीना दक्ष तु मस्तामथ वासवम् ।
दैत्याना दानवाना च प्रह्लादममितौजसम् ॥५
वैवस्वत च पितृ णा यम राज्येऽम्यपेचयत् ।
मारणा च व्रताना च मन्ताणा च तथा गवाम् ॥६
यक्षाणा राक्षसाना च पार्थिवाना तथव च ।
नारायण तु साध्याना रुद्राणा वृपभध्वजम् ॥७
वैशम्पायनजी बोले- हे राजन् । ब्रह्माजी ने वेन पुत्र राजा पृथु को
ज्य देवर, अन्यान्य पुरषो को भोजो कार्य सौंपा उसे तुमसे कहता हूं ॥१॥
- ८० - वान् [ श्री हरिव पुराण ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को सब ग्राह्मणो, वृक्ष , नक्षत्रो, ग्रहो, यहों भी, तपस्याओ का अधिपति बनाया ॥२॥ वरुण को जल पा राजा, कुवेर को धनाधिपति तया बृहस्पति को सम्पूर्ण विश्व का अधिपति नियुक्त किया ॥३॥ भृगुवशियो के अध्यक्ष शुक्राचाय बनाये गये, आदित्यों के अधिपति विष्णु, और वसुओ वे भध्यक्ष अग्नि बनाये गये ।।४। प्रजापनियो के अधिपति दक्ष, मरती के अधिपति इद्र और दैत्यों के अधिपति प्रसाद बनाये ॥५॥ सूर्य पुत्र यम पितरों के अधिपति तथा पोडश मातृकाओ प्रतो, मत्रो, गौओ, यक्षो, राक्षसो, राजाओं तथा साध्यो के अधिपति भगवान् विष्णु को बनाया तथा रुद्रा के अधिपति भग- शिव को किया । ६-७॥ विप्रचित्ति तु राजान दानवानामथादिशत् । सर्वभूतपिशाचाना गिरिश शूलपाणिनम् ॥८ शैलाना हिमवन्त च नदीनामथ सागरम् । गन्धाना मरुता चैव भूतानामशरीरिणाम । शब्दाकाशवता चव वायु च बलिना वरम् ॥६ गन्धर्वाणामधिपति चक्रे चित्ररथ प्रभुम् । नागाना वासुकिं चक्रे सणामथ तक्षकम् ।।१० वारणाना च राजानमैरावतमथादिशत् । उच्चै श्रवसमश्वाना गरुड चव पक्षिणाम् ॥११ मृगाणामथ शार्दूल गोवृष च गवा पतिम् । वनस्पतीना राजान नक्षमेवादिश प्रभुम् ॥१२ सागराणा नदीना च मेघाना वर्षणस्य च । आदित्यानामधिपति पर्जन्यमभिषिक्तवान् ।।१३ सर्वेषा दष्ट्रिणा शेष राजानमभ्यषेचयत् । सरीसृपाणा सर्पाणा राजान चंव तक्षम ॥१४ इसी प्रकार विधित्ति दानवो के और शिवजी सब भूत पिशाचा । स्वामी हुए ॥राब पर्वतो का राजा हिमवान, नदियो का अधिपति पृथु उपान्यान ] [ १ धो, वायुओं, अशरीरी प्राणियो और शब्दो का राजा प्रबल पराक्रम वाले वायु बनाया HE गयों का राजा चित्ररथ नागो का राजा वासुकी और सों राजा तक्षक किया गया ||१0 हाथियों का राजा ऐरावत, घोडो का राजा च्च.श्रवा और पक्षियों का राजा गरड हुआ ॥११॥ मृगो का राम सिंह, मओ का राजा पम और सब वृक्षो का राजा पीपल वृक्ष को बनाया ॥१२॥ र समुद्रो, नदियो, मेघो और आदित्यो का अधिपति पर्जन्य हुआ ॥१३॥ सत्र त वाले प्राणियो का राजा शेप और रेंग पर चलने वाले सर्पो का राजा क्षिक हुआ ।।१४॥ गन्धर्वाप्मरसा चैव कामदेव तथा प्रमुम् । मृतूनामथ मामाना दिवसाना तथैव च ।।१५ पक्षाणा च क्षपाणा च मुहूर्ततिथिपर्वणाम् । कलाकाष्टाप्रमाणानामृतोरयनयोस्तथा ॥१६ गणितम्याय योगस्य चक्रे सवत्सर प्रभुम । एव विभज्य राज्यानि क्रमेण म पितामह ॥१७ दिशापालानथ तत स्यापयामास भारत । पूर्वस्या दिशि पुन तु राजस्य प्रजापते ॥१८ दिशापाल सुधन्वान राजान चाम्यपेचयत् । दक्षिणस्या महात्मान पई मस्य प्रजापते।।१६ पुन शरापद नाम राजान सोऽभ्यपेचयत् । पश्चिमाया दिशि तथा राजम पुनमच्युतम् ।।२० केतुमन्त महात्मान राजान सोऽभ्यपेचयत् । तथा हिरण्यरोमाण पर्जन्यस्य प्रजापते ॥२१ उदीच्या दिशि दुर्द पं राजग्न सोऽभ्यपेचयन् । तैरिय पृथिवी सर्वा मप्तद्वीपा सपर्वता ।।२२ यथाप्रदेशमद्यापि धर्मेण परिपाल्यने । राजसूयाभिषिक्तस्तु पृयुरेभिर्नराधिप । वेददृप्टेन विधिना राजराज्ये नगधिप ॥२३ ६२ ] [ श्री हरिवशपु ततो मन्वन्तरेऽतीते चाक्षुपेऽमिततेजसि । वैवस्वताय मनवे ब्रह्मा राज्यमथादिशत् । तस्य विस्तरमाख्यास्ये मनोवैवस्वतस्य ह ।।२४ गधों और अप्सराओ का राजा कामदेव तथा ऋतु, मास पक्ष, दिन, रात, मुहूर्त, तिथि, पर्व, कला, काष्ठा, ऋतु अयन, योग एव गणित का अधि. पति सवत्सर हुआ इस प्रकार कार्य विभाग करके ब्रह्माजी ने दिक्पालो को नियुक्त किया। वराज प्रजापति के पुत्र सुधन्वा को पूर्व दिशा का, कर्दम के पुत्र पखपद्म को दक्षिण का रजपुत्र अच्युत केतुमान को पश्चिम का और पर्जन्य प्रजापति के पुत्र दुधं हिरण्य रोमा को उत्तर दिशा का दिवपाल बनाया। उसी समय से यह सभी यज्ञाभिषिक्त महाराज पृथु की आधीनता स्वीकार कर अपने-अपने कार्य-मार को वहन करते तथा ग्रामो, नगरो और द्वीपो युक्त पृथियो पा धर्म पूवर पालन करते आरहे हैं ॥१५-२३।। इस प्रकार चाक्षुप मन्वन्तर के ध्यतीत होन पर वैवस्वत मनु को कार्य-भार सौंपा, अब मैं उसी वैवस्वत मन्वातर पावणन करता है ॥२४॥ विस्तरेण पृथोर्ज•म वैशम्पायन कीर्तय । यथा महात्मना तेन दुग्धा चेय वसुन्धरा ॥२५ हत ते क्यप्यामि पृथोर्वेन्यस्य विस्तरम । एकाग्र प्रयतश्चय गणुप्व जनमेजय ॥२६ नाशुचे क्षुद्रमनस मुशिप्यायाग्रताय च । योतनीयमिद राजन्वृतघ्नायाहिताय वा ॥२७ स्वयं यशस्यमायुष्य धम्यं मैदेन सम्मितम । रद्रयमृतिभिः प्रोक्त मणु राजन्यथातथम ॥२८ पाचन पययेन्नित्य पृथोयन्यस्य विस्तरम.। ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य न रा शोनेत्कृताय ते ॥२६ सममाय ने कहा- सापायनत्री ! महाराज पृषसे जन्म और उनके पृथु उपायान ] रा पृथिवी का दोहन किये जाने वाले वृत्तान्त को आप मेरे प्रति विस्तार- वंक कहिये ॥२५॥ वैशम्पायनजी बोले-है राजन् । चैनपुत्र राजा पृथु का चरित्र विस्तार से कहता है, तुम एकाग्र चित्र से श्रवण करो ॥२६॥ यह नाख्यान अपवित्र, क्षुद्र कुशिष्य, व्रत से हीन, कृतघ्न और अहितकर मनुष्य को भी न सुनावे ॥२७॥ ऋपि द्वारा कहा गया यह वेद के समान गूढ तत्व है, इसके श्रवण से स्वर्ग, यश एव दीर्घायु मिलती है, इसलिये अव में राजा पृथु का चरित्र कहता हूँ ॥२८॥ इस चरित्र को जो मनुष्प ब्राह्मणा को नमस्कार करके श्रवण करता है, उसे अपने द्वारा दिये हुए बच्चे या बुरे कर्म के लिये पचाताप नही करना पडना ॥२६॥ ।। वेन का विनाश-पृय का जन्म ।। आमीद्धर्मस्य गोप्ता वै पूर्वमसिम प्रभु । अतिवशममुत्पन्नस्त्वङ्गो नाम प्रजापति ॥ तस्य पुतोऽभव नो नात्यर्थ धर्मकोविद जातो मृत्युसुताया वै मुनीयाया प्रजाति १२ स मातामहदोपेण वैन कालाजात्मज । स्वधर्म पृष्ठन कृत्वा कामाल्लोभेप्ववर्तत ॥३ मर्यादा स्थापयामास धमपिता स पार्थिव । वैदधर्मानतिक्रम्य सोऽधर्मनिरतोऽभवत् ।।४ नि स्वाध्यायवपट्कारास्तस्मिन्राजनि शासति । प्रवृत्त न पपु सोम हुत यज्ञपु देता ॥५ न यष्टन्य न होतव्यमिति तस्य प्रजापते । आमीत्पतिज्ञा क रेय विनाशे प्रत्युपस्यिते ॥६ अहमिज्यश्च यप्टा च यज्ञश्चेति कुम्हह । मयि यज्ञो विधात्तन्यो मयि होतव्यमित्यपि ७ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् । प्राचीनकान की बात है, पतिवश । अग नामक एक प्रजापति हुए थे। वे महर्षि अत्रि के समान ही सामथ्र्यवान ८४ ] [ श्री हरिवशपुराण और धर्म रक्षा मे त पर रहते थे ॥१॥ मृत्यु मुता सुनीया के गर्भ से उनके थे। मामक एक पुत्र हुआ वह धर्म-नत्व से अनभिज्ञ था ॥२। वह अपने मामा के दोप से धर्मच्युत होकर अपनी कुसित वृत्तियो को तृप्त करने के लिये अत्यन्त चचल हो उठा था। ३॥ उसने वैदिक धर्म को त्याग दिया और धर्म-रहित होवर उसने अधार्मिक शासन चलाया ॥४॥ उसके शामन मे वेदाध्ययन और ओकार का उच्चारण सभव नहीं था, इसलिये यज्ञ मे देवताओ का सोमपान रुक गया ॥५उसने अपनी मृत्यु को शीघ्र वरण करने के लिये यज्ञ और हवन न करने की आज्ञा प्रमारित की॥६॥ मैं ही यज्ञ हूँ मैं ही यज्ञार्ता एव सव वा साध्य देवता हूं, इसलिये आज से सभी मनुष्य मेरे निमित्त ही यज्ञ तथा हवन करें॥७॥ तमतिकान्तमर्यादमाददानमसाम्प्रतम् । ऊचुमहर्पय सर्वे मरीचिप्रमुखास्तदा ।।८ वय दीक्षा प्रवेक्ष्याम सवत्सरगणावहून् । अध्मं कुरु मा वेन नेष धर्म सनातन IME निबनेऽते प्रसुतस्त्व प्रजापतिरसशयम् । प्रजाश्च पालयिष्येऽहमिति ते समय कृत ॥१० तास्तदा युवत सर्वान्महीनयवोत्तद।। वेन प्रहस्य दुर्बुद्धिरिममर्थमनर्थवित् ॥११ स्रष्टा धर्मस्य कश्चान्य श्रोतव्य कस्य वै मया। थ तवीर्यतप सत्यैर्मया वा क समो भुवि ॥१२ प्रभव सर्वभूताना धर्माणा च विशेषत । समूढा न विदु न भवन्तो मामचेतस ।।१३ इच्छन्दहेय पृथिवी प्लावयेय तथा जलै । ख भुव चैव रुन्धेय नान कार्या विचारणा ।।१४ इस प्रकार सर्वथा मर्यादा-रहित हुआ राजा वेन लोग निन्दित कार्यों को परने लगा, तब मरीच्यादि सृपियों ने उसके पास जाकर कहा ।।८हे राजन हे वन । हम बहुत वर्षों तक चलने वाले यज्ञ की दक्षा लेने को हैं, इसलिए तुम मा त्याग वरो, यही सनातन धर्म है ॥६॥ हे राजन् । तुम महर्षि अनि वेन का विनाश-पृथु का जन्म ] [ ८५ दशधर हो और तुमने राजधर्म तथा प्रजापालन की प्रतिज्ञा भी ले रखी है ॥१०॥ उन ऋपियो की बात सुन कर दुर्मति वेन हैम पडा और बोला कि धर्म का सप्टा मेरे अतिरिक्त अन्य कौन है ? में किसकी बातों पर ध्यान दूं? इस भूतल पर मेरे अतिरिक्त अन्य कौन व्यक्ति साम्रज्ञ, पराक्रमी तथा तपस्वी है ? ॥११- १२।। तुम परिस्थितियो को नहीं जानते इसलिये अत्यन्त मूर्ख हो, तुम्हें ज्ञात नही है कि मैं ही सव जीवो के धर्म को उत्पन्न करने वाला हूँ ॥१३।। मैं पृथिवी को भस्म कर देने अथवा जल में प्रवाहित करने मे समयं हूं, मैं आकाश और पृथिवी को अवरुद्ध कर सकता हूँ, इसमें सन्देह नहीं है ।।१४।। यदा न शक्यते मोहादवलेपाच्च पार्थिवः । अनुनेयं तदा वेनस्तत ऋदा महर्पय ।।१५ निगृह्य त महात्मानो विम्फुग्न्त महाबलम् । ततोऽस्य सव्यमूर ते ममन्यू तिम-यव. 11१६ तस्मिस्तुमथ्यमाने वै गज्ञ ऊरी प्रजज्ञिवान् । ह्रस्वोऽतिमानः पुरुप कृष्णश्चातिबभूव ह ।।१७ स भीत: प्राञ्जलिभ त्वा स्थितवाञ्जनमेजय । तमत्रिविलुलं दृष्ट्वा निपोदेत्यब्रवीत्तदा ॥१८ निपादवंशकर्तासी व व वदता वर । धीवपानसृजच्चाय वेनकल्मपमम्मवान् ॥१६ ये चान्ये विन्व्यनिलयास्तुपागम्तुम्बुरास्तथा। अधर्मरुचयो ये च विद्धि तान्वेनसम्मवान् ॥२० ततः पुनमहात्मानः पाणि वेनम्य दक्षिगम् । अरणीमिव सरव्या ममन्युस्ते महर्षय ॥२१ हे राजन् । जब मोह और अहकार के वशीभूत हुआ राजा वेन उन दुनियों के प्रति शिष्टाचार भी प्रशित न कर सका तो वे सभी मुनि अत्यन्त कोधित हुए ॥१५॥ तथा वे राजा वेन को पपड कर उ को दक्षिए जाप को अपने लगे, इस कारण वह बहुत छटपट या ।।१६।। इस प्रकार कुछ देर तक जांघ का मन्यन करने पर उसकी जांघ से एक बौना और काले वर्ण का पुरुष 1 [ श्री हरिवंशपुराण उतान्न हुआ ॥१७॥ वह पुरुष उत्पन्न होते ही उन मुनियो के सामने हाथ जोड - कर भयपूर्वक खडा हो गया। उसे अत्यन्त भयभीत देख पर महपि अत्रि 'निपोद' अर्थात् बैठ जाओ कहा ॥१॥ उस निषीद शब्द के कारण ही वह पुरुष निपाद वश का कर्ता हुआ। गजा देन के पाप से उसी के द्वारा धीवर जाति उत्पन्न हुई ॥१६॥ उसी के द्वारा तुपार-तुम्वर आदि अधार्मिक एव असभ्य जाडियां उत्सन्न होकर विन्ध्य पर्वत पर निवास करने लगी ॥२०॥ इसके पश्चात् क्रोधित वे ऋषि वेन की दक्षिण भुजा को अरणी के समान मथने लगे ॥२१॥ पृथुस्तस्मात्समुत्तस्यो कराज्ज्वलनसन्निभ. दीप्यमान स्ववपुपा साक्षादग्निरिव ज्वलन् ।।२२ स धन्वी कवची जात पृथुरेव महायशा । आयमाजगव नाम धनगृह्म महारवम् । शराश्व दिव्यान्रक्षार्थ कवच च महाप्रभम् ॥२३ तस्मिजातेऽय भूतानि सम्प्रहृष्टानि सर्वश । समापेतुमहाराज वेनश्च त्रिदिव गत ॥२४ समुत्पन्नेन कौरव्य सत्तुस्रेण महात्मना । सात स पुरपव्याघ्र पुनाम्नो नरकात्तदा ॥२५ त ममुद्राश्च नद्यश्व रत्नान्यादाय सवश । तोयानि चाभिषेकाय सर्व एवोपतस्थिरे ॥२६ पितामहरच भगान्देवगङ्गिरम सह । स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च ।। २७ समागम्घनता वैन्यमभ्यपिचन्नराधिपम् । महता राजगजेन प्रजापाल महाद्य तिम् ।।२८ उगमे अनि ये गमान अरयात तेज वाला एक पुरप प्राट हुमा ।।२२। यह प्रमा की रक्षा के लिये धनुष, बाग और बच पारण किये हुए ही उत्पन हुभा , उमा नाम पृथ हवा ॥२॥सरा पृथु से जन्म का समाचार मु कर भी मान गर और बा-आर यह एकत्र हए और राजा येन स्या मागी होगा ॥२॥हे गौरव । उमरगुण महारमा पृथु रे उरत होने वेन का विनाश-गृथु का जन्म ] [ ८७ कारण ही वेन पु नामक नरक को प्राप्त होने से यच मका ॥२५।। उस समय समस्त नदियाँ और समुद्र विभिन्न प्रकार के रल और अभिषेक के लिये जल ले-लेकर वहां आगये और तमी देवताओं के लोक पितामह ब्रह्माजी भी वहां आ पहुंचे और सब चराचर प्राणी मी यावर एकत्र हा गए ॥२५ २७॥ इस प्रकार सब प्राणिया ने एकत्रित होकर बलात तेजस्वी राजा पृथु को प्रजा का पालन करने के लिय पृथिवी के गग्य पद पर अभिषिक्त क्यिा ॥२८॥ सोऽभिषिक्तो नहातेजा विधिवद्धर्मकोविदै । आदिराज्ये तदा राना पृयुर्वन्य प्रतापवान् ॥२६ पिनाऽपरन्जितास्तम्य प्रजाम्नेनानुरन्जिता । अनुरागाततस्तम्य नाम राजेन्यजायत ॥30 आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियाम्यत । पर्वताश्च ददुार्ग ध्वसभङ्गरव नामवत् ॥३१ अकृष्टपच्या पृथिवी सिद्धवन्त्यन्नानि चिन्तया। सर्वकामदुधा गाव पुट पुटके मधु ।।३२ एतस्मिन्नेव काले तु या पैतामहे शुभे । सृत मूत्वा ममुत्पन्न मौत्येऽहनि मगमति ॥३३ तस्मिन्नेव महायज्ञ जज्ञ प्रानोऽप मागध । पृयो स्तवार्थे तो तन ममाहूती मुपिभि ॥३४ तावूचुपय सर्वे स्तूयतामेष पावि । कमस्तदनुम्प वा पात्र चाय नराधिप ॥३५ ताबूचनुस्तदा सर्वाम्नानृपोन्मूतमागतो। आवा देवानपीश्चैव प्रोणयाव स्वकर्मभि ॥३६ न चाम्प विद्वो व कर्म न तथा लक्षण यश । स्तोत्र येनाम्य कुर्भाव राजम्नेजस्विनो हिजा ||३. इस प्रकार विद्वाना ट रा राज पद पर अभिपिक्स टा अ यन्त परामी महाराज पृथु अपन पिना स असन्तुप हुद प्रजा को प्रसन्न करन के यत्न म लगे और प्रजा रजन के कारण यथाय म राजा हुए । २६३७॥ उद महाराज
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[ श्री हरिवंशपुराण
पृथु रणक्षेत्र में जाने वा उद्यत होते थे, तब समुद्र, पर्वत और वृक्षादि उन्हें रयय
ही मार्ग दे देते थे, इस प्रकार महाराज पृथु वे रथ की ध्वजा युद्ध के मार्ग में
कभी भी नत नही हुई ॥३१॥ उनके राज्यकाल में पृथिवी जोने चोये पिना ही
अन्न से परिपूर्ण रहती थी, गायें कामनु बन गयी और वृक्षो के पते पत्ते से
मधु धार प्रवाहित होती थी ॥३२।। ऐसे ही समय मे राजा पृथु ने ब्रह्म या का
प्रारम्भ किया उस यज्ञ मे जो कुण्ड सोम ररा से भरा हुआ था, उससे अत्यन्त
मेधावी सूत मागध उत्पन्न हुए ॥३३।। ऋपियो ने उन मूत-मागध को बुला कर
कहा--तुम दोनो स्तुति के योग्य महाराज पृथु की स्तुति करो, तुम इस वार्य
के सर्वथा योग्य हो ॥३८-३॥ सूत मागध बोले- हे भगवन् । हम अपने श्रेष्ठ
धर्म से सब देवताओ और ऋषियो को तो प्रसन्न कर सकते हैं, परन्तु इन महा-
राज के यश, कार्य और लक्षण से अनभिज्ञ होने के कारण इनकी स्तुति करने में
समर्थ नहीं हैं ॥३६ ३७ ।
ऋपिभिस्ती नियुक्तौ च भविष्य स्तूयतामिति ।
यानि कर्माणि कृतवा पृथु पश्चान्महावल ॥३८
सत्यवाग्दानशीलोऽय सत्यसन्चो नरेश्वर ।
श्रीमान्जा क्षमा शीलो विकान्तो दुष्टशासन ॥३६
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च दयावाप्रियभाषण ।
मायो मानयिता यज्वा ब्रह्मण्य सत्सङ्गर ॥४०
शम शान्तश्च निरतो व्यवहारस्थितो नृप ।
तत प्रभृति लोकेषु स्तवेषु जनमेजय ।
आशीर्वादा प्रयुज्य ते सूतमागधवन्दिभि ॥ ४१
तयो स्तवन्तै सुप्रीत पृथु प्रादात्प्रजेश्वर ।
अनूपदेश सूताय मगधान्मागधाय च ॥४२
त दृष्ट्वा परमप्रीता प्रजाश्चाहुमहर्पय ।
वृत्तीनामेप वो दाता भविष्यति जनेश्वर ॥४३
ततो वन्य महाराज प्रजा समभिदुद्रुवु ।
न्य नो वृत्ति विधत्स्वेति महपिवचनात्तदा ॥४४
वेन का विनाश-पृथु का जन्म ] ऋषियों ने यहा-इहोंने जो कार्य पूर्व क्रस पिये थे, वही इस वल्प करेंगे, इसलिये तुम इनके भविष्य के गुणों को कहते हुए स्तुति करो ।।३८।। वि वे दोनो बन्दीजन राजा पृथु नो लक्ष्य कर कहने लगे-हे अत्यन्त पराक्रम सम्पन्न वेन पुन महाराज पृथु । सापक ममान सत्यवक्ता, सत्यप्रतिन और दान- पील अन्य कोई नहीं है, आप श्रीमान्, विजययुवत, क्षमाशील, पराक्रमी तथा दुप्टो पर शासन करने वाले हैं ॥३६॥ आप धर्म के ज्ञाता, कृतज्ञ, दयालु, प्रिय गोलने वाले, माननीय, मान देने वाले, यज्ञशील, ब्राह्मणभक्त एव सत्य प्रतिज्ञ है ॥४०॥ आप शान्त, व्यवहार कुशल तया अपने कर्म में तत्पर रहने वाले हैं हे राजन हे जन जमेय । मूत मागध ने इस प्रकार स्तुति की, इसलिये यह बन्दी- जन कहे गये और तभी से इन्हें भाशीर्वाद देन का अधिकार प्राप्त हुआ ॥४१॥ उनके द्वारा की गई स्तुनि से प्रसन्न होकर राजा पृथु ने मूत को अनूप देश तथा मागध को मगध देश प्रदान किया ४२ । राजा पृथु को देख कर अत्यन्त प्रमान हुए ऋपियो ने उपस्थित जनता से कहा-देवो । यह महाराज पृथु नब तुम्हारी जीविका का प्रबन्ध करेंगे ॥४३॥ मृपियों की बात मुनत ही मव लोग दौड पटे और महाराज को घर पर बोले कि हे महाराज | आप हमारे लिये जीविका का प्रवन्ध नीजिये ॥४॥ सोऽमिद्रुन प्रजामिस्तु प्रजाहितचिकीर्पया। धनुगृह्य पत्ताश्च पृथिवीमाई यद्वली ||४५ ततो वेन्यभयतना गोवा प्राद्रवन्मही । ता पृथुधनुरादाय द्रवन्तीमन्वधावत १४६ सा लोकान्ब्रह्मलोकादीगया वैन्यमयात्तदा । प्रददर्शाग्रतो वैन्य प्रगृहीतशरासनम् ॥४७ ज्यलद्भिनिशितैवणिर्दीप्ततेजसमच्युतम् । महायोग महात्मान दुधममरैरपि ॥४८ अनमनी तु सा ताण वैन्यमेवान्वपद्यन । कृतान्जलिपुटा भूत्वा पूज्या लोकस्त्रिमि सदा ॥2 १० ] [ श्री हरिदापुराण उवाच वैन्य नाधम्यं स्त्रीवध कर्तुमर्हसि । कथ धारयिता चासि प्रजा राजन्विना मया ॥५० मयि लोका स्थिता राजन्मयेद धार्यते जगत् । मद्विनाशे विनश्येयु प्रजा पार्थिव रिद्धि तत् ॥५१ यह सुन कर महागज पृथु ने प्रजा वे मगलार्थ धनुप याण धारण किया और पृथिवी को पीडित करने लगे ।।४५।। तब पृथिवी महाराज पृथु से भयभीत होकर गौ का रूप धारण करके भागने लगी और महाराज उसका पीछा करने लगे ।।४६ । इस प्रवार भय से भागती हुई पृथिवी भूलोक आदि समस्त लोको को लाँघती हुई ब्रह्मलोक मे जा पहुंची परन्तु उसे वहाँ भी धनुष-बाण धारी महाराज पृथु सामने खडे दिखाई दिये ॥४७॥ महायोगी महात्मा और देवताओ से भी न जीते जाने वाले महाराज पृथु के हाथो मे चमकते हुए तीक्ष्ण बाण लगे हुए थे ॥४८॥ जब तीनो लोको मे पूज्या पृथिवी को वही भी शरण नहीं मिल सकी तब वह महाराज पृथु की ही शरण मे जाकर करबद्ध निवेदन करने लगी ॥४६॥ हे राजन् । आप स्त्री-हत्या स्पो पाप कर्म न करिये, यदि मैं ही नष्ट हो जाऊंगी तो आप अपनी प्रजा को किस स्थान पर रग्वेंगे? ॥५०॥ सभी लोक मुझ पर आधारित हैं, क्योकि मैं सम्पूर्ण विश्व को अपने ऊपर धारण किये हुए हूं, यदि मेरा नाश होगा तो सश्पूर्ण प्रजा का ही नाश हो जायगा ॥५१॥ न त्वमर्हसि मा हन्तु श्रेयश्च व चिकीर्षसि । प्रजाना पृथिवीपाल शृणु चेद वचो मम ॥५२ उपायत समारब्धा सर्वे सिद्धयन्त्युपत्र मा । उपाय पश्य येन व धारयेया प्रजा नृप ॥५३ हत्वाऽपि मा न शक्तस्त्व प्रजा धारयितु नृप । अनुभूता भविष्यामि यच्छ कोप महाद्य ते ॥५४ अवध्या च घिय प्रास्तिर्यम्योनिगतेष्वपि । सत्वेषु पृथिवीपालन धर्म त्यक्तुमर्हसि १५५ एव बहुविध वाक्य श्रुत्वा राजा महामना । वोप निगृह्म धर्मात्मा वसुधामिदमब्रवीत् ।।५६ पृथु द्वारा पृथ्वी वाहन ] इमलिये हे भूपाल ! यदि आप अपनी प्रजा का हित चाहते हो तो मेरा वचन अवग करिये ॥५२॥ भली प्रकार विचार कर दिया जाने वाला कार्य ही सफल होता है, इसलिये आप अपनी प्रजा की रक्षा का उपाय सोचिये ॥५३॥ मेरा वध करके भी आप अपनी प्रजा की रक्षा करने में समर्थ न होंगे और फिर मेरी याद करके पश्चात्ताप करेंगे, इसलिये अपने क्नोर को शान्त करिये ॥५४॥ फिर पशु-पक्षी योनि वाली स्त्री का वध भी निपिद्ध है, यत हे राइन् । आप अपने धर्म का त्याग मत करिये ॥५५।। पृथिवी के वचन सुन कर मनस्वी पृथु ने अपने को स्वस्थ क्यिा और पृथिवी से कहने लगे ॥१६॥ ॥ पृथु द्वारा पृथ्वी-दोहन ॥ . एकस्यार्थाय यो हन्यादात्मनो वा परस्य वा। वहून प्राणिनोऽयक भवेत्तस्यैह पातरम् ॥१ सुमेधन्ति बहवो यस्मिस्तु निहते सति । तम्मिन्नास्ति हते भद्रे पातर चोपपातकम् ॥२ एकस्मिन्यत्र निधन प्रापिते दुप्टकारिणि । यहना भवति क्षेम तन पुण्यप्रदो वध ॥३ साह प्रजानिमित्त त्वा हनिष्यामि वसु पुरे। यदि मे वचन नाद्य करिष्यपि जगदितम् ।।४ त्वा निहत्याद्य वाणेन मच्यासनाराडमुखीम् । आत्मान प्रथायित्वाऽह प्रजा धारयिता स्वयम् ॥५ सा त्ल शासनमाम्याय मम धर्मभृता करे। सजीवय प्रजा सर्वा समर्या ह्यसि धारणे ॥६ दुहितृत्व च मे गच्छ एनमह शरम् । नियच्डेय त्वद्वधार्थमुद्यत घोरदर्शनम् ॥७ पृथु ने कहा- हे वसुन्धरे । अपने या पराये उपकार के लिये जो एक अनेक जीवो की ह या करता है, वह अवश्य ही पापी होता है ॥१॥ परन्तु, ६२ ] [ श्री हरिवशपुराण यदि किसी एक की हत्या से बहुत से लोगो को सुख प्राप्त होता हो तो उसे मार डालने पर कोई पाप अथवा उपपाप नहीं लगना ।।२।। यदि किसी एव दुष्ट की मृत्यु से अनेक व्यक्तियो को सुख हो तो उसे मारन में पुण्य ही होगा ॥३॥ इस. लिये,यदि तुम मेरी बात न मानोगी तो मैं तुम्हारा वध अवश्य कर डालूगा ॥४॥ मेरे आदेश को न मानने पर तुम्हे अपने बाण से सहार पर समस्त प्रजा की रक्षा करूगा ||५|| तुम धर्मात्मा तथा सब लोको के धारण मे सामर्थ्य वाली हो, इमलिये तुम्हे मेरी आज्ञा का पालन करके मरी प्रजा की रक्षा करनी चाहिये ॥६॥ तुम मेरी क्या बनो तो तुम्हारे मारने के लिये जो वाण मैंने ग्रहण किया है, उसे तूणीर मे रख सकूगा ।। ।। सर्वमेतदह वीर विधास्यामि न सशय । उपायत समारब्धा सर्वे सिद्धचन्त्युपत्रमा 115 उपाय पश्य येन त्व धारयेया प्रजा इमा । वत्स तु मम सम्पश्य क्षरेय येन वत्सला ॥६ समा च कुरु सर्वत्र मा त्व धर्मभृता वर । यथा विस्पन्दमान मे क्षीर सर्वत्र भावयेत् ।।१० तन उत्सारयामास शैलाञ्छतसहस्रश । धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला विद्धिना ॥११ पृथुर्वन्यस्तदा राजा मही चक्रे समा तत । मन्वन्तरेष्वतीतेषु विषमाऽऽसीद्वसुन्धरा ॥१२ स्वभावेनाभवन्धस्या समानि विषमाणि च । चाक्षुपस्यान्तरे पूर्वमासोदेव तदा किल ।।१३ न हि पूर्व विसर्गे वै विषमे पृथिवीतले । प्रविभाग पुराणा च ग्रामाणा वा तदाऽभवत ।।१४ न सस्यानि न गोरक्षा न कृषिन वणिक्पथ । नव सत्यानृत तत न लोमो न च मत्सर ।।१५ पृथिवी ने वहा~हे महीपाल ' तुमने जो पहा है, वह मैं करूंगी, परतु आय वे अपनपन पूर्वक शिनाने वाला कार्य सफन होता है, इसलिये आप - पृथु द्वारा पृथ्वी-दोहन ] पहिले प्रजा रक्षण वाले कार्य को स्थिर करिये । सरस पहिले एक एसा बछडा बनाइये, जिसे देख कर मेर हृदय मे स्नह उमड पडे और स्तनो में दूध उत्पन्न हो ॥८-६। इसके पश्चात् आप मुझे ममतल करें, जिससे मेरे स्तन से निकलने वाला दूघ समान भाग स सब और पंज जाय ॥१०॥ वैगम्पायनजी बाल-हे राजन् पृथिवी के वचन सुन कर वेन पुत्र पृथु ने भूपृष्ठ को समतल करने के निमित्त अपने धनुष के अग्रभाग से यत-सहन वंतों को उठा उठा कर नीचे कार के क्रम से पृयव रख दिया, जिससे वे पयत अत्यन्त ऊँचे हो गय ॥११॥ इस प्रकार उन महाराज ने पृथिवी को समतल क्यिा । चाक्षुष मन्वन्तर म पृथिवी के ऊंची-नीची होन व वारण उम समय नगर तथा ग्राम का विभाग नही था, एव गोरक्षा, कृषि, वाणिज्य, मार्ग, सत्य, मिथ्या, लोम, मात्सर्य कुछ भी नहीं था ।१२-१॥ वैवस्वतेऽन्नरे चाम्मिन्साम्प्रत समुपस्थिते । वन्यात्प्रभृति राजेन्द्र सर्वस्य॑तस्य सम्मव ॥१६ यन यन सम त्वस्या भूमेरामीदिहानघ । तन तन प्रजा सर्वा सशस समरोचयन् ॥१७ आहार फलमूलानि प्रजानामभवत्तदा । पृच्छ्रण महता युक्त इत्येवमनुशुश्रुम ॥१८ सरपयित्वा वत्स तु मनु स्वायम्भुव प्रभुम् । स्वपाणी पुरुपश्रेष्ठ दुदोह पृथिवी तत । सस्यजातानि सर्वाणि पृथुबन्ध प्रतापवान् ॥१६ तेनालेन प्रजास्तात वर्तन्तेऽद्यापि नित्यश । सपिभि श्रूयते चापि पुनर्दुग्धा वसुन्धरा। वत्स सोमोऽभवत्तेपा दोग्धा चाङ्गिरस सुन ॥२० वृहस्पतिर्महातेजा पात्र छन्दामि भारत । क्षीरमासीदनुपम तपो ब्रह्म च शाश्वतम् ॥२१ पुनर्देवगण सर्व पुरन्दरपुरोगर्म । कान्चन पासमादाय दुग्धेय श्रूयते मही ।।२२ - ६४ ] [ श्री हरिवश पुराण वैवस्वत मन्वन्तर में भी पृथु वे राज्यपाल रा इन सब की उपलब्धि हुई थी ॥१६॥ इम समय समतल हुए उस भाग पर प्रजाजन अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार जापर रहने लगे ॥१७॥ इससे पहिल फल मूल के अतिरिक्त अन्य काई साधन आहार के लिये नहीं था, इसरिये अत्यन्त कष्ट पूर्वलोगों का जीवन चल पाता था। १८ । पृथिवी के परामर्श से राजा पृथु ने स्वायभुव मनु को बछडा बनाया और स्वय पृथिवी से सब प्रकार के अन्न रूप दूध का दोहन किया ॥१६11 उसी काल से उन अन्नो के द्वारा प्रजा अपना जीवन-यापन करती चली आरही है । ऋपियों का कहना है कि पृथु के पश्चात् जब ऋपियो ने पृथिवी का दोहन किया तब अगिरापुत्र बृहस्पति दुहने वाले, चन्द्रमा बछडा, चारी वेद दोहन-पात्र और तप रूप शाश्वत ब्रह्म दूध बना ॥२०-२१॥ इसके पश्चात् इन्द्रादि देवताओ ने स्वर्णपात्र लेकर पृथिवी का दोहन किया ॥२२॥ वत्सस्तु मघवानासीद्दोग्धा च सविता प्रभु । क्षीरमूर्जस्कर चैव वर्तन्ते येन देवता ॥२३ पितृभि श्रू यते चापि पुनर्दुग्धा वसुन्धरा । राजत पात्रमादाय स्वधाममितविक्रम ॥२४ यमो वैवस्वतस्तेषामासीद्वत्स प्रतापवान् । अन्तकश्चाभवद्दोग्धा कालो लोकप्रकालन ॥२५ नागश्च श्रूयते दुग्धा वत्स कृत्वा तु तक्षकम् । अलाबु पात्रमादाय विष क्षीर नरोत्तम ॥२६ तेषामरावतो दोग्धा धृतराष्ट्र प्रतापवान् । नागाना भरतश्रेष्ठ साणा च महीपते ॥२७ तेनैव वर्तयन्त्युग्रा महाकाया विषोल्वणा । तदाहारास्तदाचारास्तद्वीर्यास्तदुपाश्रया ॥२८ असुरै श्रूयते चापि पुनर्दुग्धा वसुन्धरा । आयस पाउमादाय माया शनिबहिणीम् ॥२६ विरोचनस्तु प्राह्रादिवत्सस्तेषामभूत्तदा । ऋत्विन्द्विमा दैत्याना मधुर्दोग्धा महावल ॥३०
-
पृथु द्वारा पृथ्वी-दोन ]
उम समय मूर्य दोगा और इन्द्र वठहा हुए, उन्होंने उमने देवताओं के
जीविका रूप यज्ञीय हवि स्वस्त दुग्ध का दोहन क्यिा ॥२४ २५।। इसके बाद
जब पृथिवी का दोहन किया गया तब नागों ने तक्षक को वडा बनाया और
ऐरावत एव घृतराष्ट्र ने दुहने वाला बन कर तुम्त्री-पात्र में विष म्पो दृध की
दुहा ॥२६-२७॥ उनी विप के प्रभाव से सपों का स्वभाव अत्युग्र होगया,
क्योंकि उनका आहार, व्यवहार, बल और आयय सभी कुछ विप या ॥२८||
इसके पश्चात् असुरों ने पृथिवी-दोहन किया तो उन्होंने लौह पात्र लेकर विरो-
चन को वत्स बनाया और दैत्य-पुरोहित द्विमूर्धा भघु दैत्य उसमें दोया हुआ,
जिसने पृथिवी से माया म्पी दूध का दोहन किया ॥२६-३०॥
तयते माययाऽद्यापि सर्वे मायाविनोमुरा ।
वर्तयन्त्यमितप्रज्ञास्तदेपाममित वलम् ॥३१
यक्ष श्च श्रूयते तात पुनदुग्धा वसुन्धरा ।
आमपाने महाराज पुराऽन्त नमक्षयम् ॥३२
वत्म वैयवण कृत्वा यक्ष पुण्यजनस्तदा।
दोग्धा रजतनामस्तु पिता मणिवरस्य य ॥३३
यक्षानुजो महातेजानिमीपं सुमहातपा ।
तेन ते वर्तयन्तीति परमपिरवाच है ॥३४
राक्षसंश्च पिशाचश्च पुनटुंग्या वसुधरा।
शाव कपालमादाय प्रजा भोवतु नरर्पम ।।३५
दोग्धा रजतनामस्तु तेपामासीत्कुरदह ।
वत्स सुमाली कारव्य क्षीर रधिरमेव च ॥३६
तेन क्षीरेण यक्षाश्च राक्षसाश्च.मरोमा ।
वर्तयन्ति पिशाचाश्च भूतमद्धास्तथैव च ।।३७
उसी के प्रभाव से असुरगण मायावी तया अत्यन्त पराक्रमी होकर
"जीवन-यापन करते हैं ॥३१॥ इसके पश्चात् यनों ने पृथिदी को दुहा और
द्रहने को कच्चा पात्र निया, उममें कुरर बदडा और मणिवर के पिता रजतनाम
[ श्री हरियशपुराण दोग्धा हुए, उन्होने अविनागी दुग्ध वा दोहन किया । उस अतर्धान विद्या " प्रभाव से ही यक्षगए पर-देह मे अप्रत्यक्ष रूप से प्रविष्ट होकर स्वच्छद स्प से रहते हैं ॥३२-३४। इसके बाद राक्षसो और पिशाचो ने मृतक वे यपाल में रुधिर रूप दूध का दोहन क्यिा उस समय सुमात्री बछडा और रजतनाम दोग्धा हुआ ॥३५ ३६।। इस प्रकार रुधिर के प्रभाव से ही यक्ष, राक्षस, भूत और पिशाच सब देवताआ के समान सुखी रहते है ॥३७॥ पद्मपत्रे पुनर्दुग्धा गन्धर्व साप्सरोगण । वत्स चित्ररथ कृत्वा शुचीन्गन्धा-नरर्पभ ।।३८ तेषा च सुरुचिस्त्वासीद्दोग्धा भरतसत्तम । गन्धर्वराजोऽतिबलो महात्मा सूर्यसन्निभ ॥३६ शैलैश्च श्रूयते राजन्पुनर्दुग्धा वसुन्धरा। औषधी मूर्तिमती रत्नानि विविधानि च ॥१० वत्सस्तु हिमवानासी-मेरुर्दोग्धा महागिरि । पाल तु शै नमेवासीत्तेन शैला प्रतिष्ठिता ॥४१ वीरुद्भि श्रूयते राजन्पुनर्दुग्धा वसुन्धरा ! पालाश पात्रमादाय दग्धच्छिन्नप्ररोहणम् ॥४२ दुदोह पुष्पित सालो वत्स प्लक्षोऽभवत्तदा । सेय धात्री विधात्री च पावनी च वसुन्धरा ।।४३ फिर गधों और अप्सराओ ने पद्म पत्र रूपी पात्र मे अत्यन्त पवित्र गध द्रव्य रूपी दुग्ध का दोहन किया, उस समय सूय के समान तेजस्वी गन्धर्व- राज सुरुचि दोग्धा और चित्ररथ वत्स वने ॥३८-३६।। फिर जब पर्वतो ने शिला को पात्र बना कर पृथिवी को दुहा, तब हिमात्रय बछड़ा और सुमेरु दोग्धा बने, उन्होंने विभिन्न प्रकार औषधियो और रलो को प्राप्त किया ॥४०-४१।। पिर वृक्षो ने पलाश पत्र म पृथिवी का दोहन पिया तो शालवृक्ष दोग्धा और प्लक्ष वृक्ष बछड़ा बना, इसस पृथिवी से छि न-दग्धापुर रूपी दुग्य की उत्पत्ति हुई । हे राजन् यह पृथिवी के समान ही सब की पोषक अत्यन्त पविन है। IV.४३॥
मन्वन्तर वर्णन ]
चराचरस्य सर्वस्य प्रतिष्ठा योनिरेव च ।
सर्वकामदुधा दोग्घी सर्वसस्यप्ररोहिणी ॥४४
आसीदिय समुद्राना मेदिनीति परिश्रु ता ।
ययुकटभयो कृत्स्ना मेदसामिपरिप्लुता।
तेनेय मेदिनी देवी प्रोच्यते ब्रह्मवादिभि ॥४५
ततोऽभ्युपगमाद्राज्ञ पृथोवेन्यस्य भारत ।
दुहितृत्वमनुप्राप्ता देवी पृथ्वीति चोच्यते ।
पृथुना प्रविभक्ता च शोधिता च वसुन्धरा ॥४६
सस्याकरवती स्फीता पुरपत्तनमालिनी।
एवप्रभावी वैन्य स राजाऽऽसीद्राजसत्तम ॥४७
यह चराचरमय जगत की आश्रयरूपा है, अन्नादि सभी पुष्ट करने
चाले द्रव्य इससे उत्पन्न होते हैं, यह कामधनु के समान सभी की कामनाओ यो
पूर्ण करने म समय है ॥४४॥ यह पृथिवी समुद्र तक विस्तार वाली है, किसी
एक समय यह मधु कंटम के मेद से व्याप्त हुई थी, इसलिये ब्रह्मवादी मुनियो
द्वारा मेदिनी कही जाने लगी ॥४५॥ राजा पृथु द्वारा इसे अपनी कन्या भान लेने
के कारण ही इसका नाम पृथिवी हुआ। उन राजा ने इस पृथिवी का यथाविधि
विभाग कर इसकी सार-सभार की, तब से यह अन्न उत्तन करने लगी और
तभी इस पर खानो, नगरो और राजधानियो की रचना हुई, राजा पृथु पा
इतना भारी प्रभाव था ॥४६ ४७
॥ मन्वन्तर-वर्णन ॥
मन्वन्तराणि सर्वाणि विस्तरेण तपोधन ।
तेपा पूर्वविसृष्टिं च वैशम्पायन कीर्तय ॥१
यावन्तो मनवश्चन यावन्त कालमेव च ।।
मन्वन्तरमह ब्रह्मायोतुमिच्छामि तत्त्वत ॥२
न शक्यो विस्तरस्तात वक्तु वर्षातरपि ।
मन्वन्तराणा कौरव्य सक्षेप त्वैव मे शृगु ॥३
६८ ] [ श्री हरिवशपुराण स्वायम्भुवो मनुस्तात मनु स्वारोचिपस्तथा। औत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्ष पस्तथा ॥४ वैवस्वतश्च कौरव्य साम्प्रतो मनुरुच्यते । सावणिश्च मनुस्तात भौत्यो रोच्यस्तथैव च 11५ तथंव मेरुसावर्णाश्चत्वारो मनव स्मृता । अतीता वर्तमानाश्च तथवानागताश्च ये ।।६ कीर्तिता मनवस्तात मयते तु यथाथ तम् । सपीस्तेपा प्रवक्ष्यामि पुनान्देवगणास्तथा ।।७ जनमेजय बोले-हे तपोधन । अव मैं सब मनुओं और मन्वन्तरों पा काल परिमाण और सृष्टि क्रम सुनना चाहता हूँ इसलिये आप इसका विस्तार से वणन करिये ॥१२॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् । सब मन्वन्तरी का विस्तृत वणन तो सौ वर्षों मे भी पूर्ण नहीं हो सकेगा, इसलिये सक्षेप में ही राब कहता हूँ ॥३॥ स्वायम्भुव, स्वारोचिप औत्तम, तामस, रेवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावणि, भोत्य, रोच्य, ब्रह्मसावणि, रुद्रसावरिण, मेरुसावरिण तथा दक्ष सावणि इस प्रकार चौदह मनु हैं। इनमे से छ मनुओ का कार्यकाल व्यतीत हो चुका, अब सातवा वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है और शेष सात आगे होगे इन मनुओ के पुत्रो, तत्कालीन मृपियो और देवताओ को तुम्हे बताता हूँ ॥४७॥ मरीचिरनिर्भगवानगिरा पुलह ऋतु । पुलस्त्यश्च वसिष्ठश्च सप्तते ब्रह्मण सुता ॥ उत्तरस्या दिशि तणा राजन्सप्तर्पयोऽपरे । यामा नाम तथा देवा आसन्स्वायम्भुवेऽन्तरे ॥६ आग्नीघ्रश्वाग्निबाहुश्च मेधा मेधातिथिर्वसु । ज्योतिष्मान्द्युतिमान्हव्य सवन पुन एव च ।।१० मनो स्वायम्भुवस्यते दश पुना महौजस । एतत्ते प्रथम राजन्मन्वन्तरमुदाहृतम् ।।११
.
मन्वन्तर वर्णन ]
और्वो वसिष्ठपुत्रश्च स्तम्भ काश्यप एव च ।
प्राणो बृहस्पतिश्चैव दत्तोऽनिश्च्यवनस्तथा ॥१२
एते महर्पयस्तात वायुप्रोक्ता महाव्रता ।
देवाश्च तुपिता नाम स्मृता स्वारोचिपेऽन्तरे १३
हविध सुतिर्योतिरापोमूतिरयस्मय ।
प्रथितश्न नभस्यश्च नम ऊर्जस्तथैव च ॥१४
स्वारोचिपस्य पुत्रास्ते मनोस्तात महात्मन ।
कीर्तिता पृथिवीपाल महावीर्यपराक्रमा १५
स्वायभुव मन्वन्तर मे मरीचि, अनि, अगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्तु और
वसिष्ठ यह सातो ब्रह्मपुत्र ऋषि थे 151 उत्तर म सप्तर्षि स्थित हैं, वे इनसे
भिन्न हैं, इस मन्वन्तर म याम नामव देवता होते हैं haln स्वायभुव मनु के
'श्राग्नीध्र, अग्निवाह, मेधा, मेघातिथि, वसु, ज्योतिष्मान्, घुतिमान, हव्य सवन
और पुत्र यह पुत्र होते हैं, इस प्रकार यह प्रथम म वन्तर का वणन हुआ जो
मैंने तुमसे कहा है ॥१०-११॥ स्वारोचिप मन्वन्तर मे और्व, स्तम्भ, काश्यप,
प्राण, वृहस्पति, दत, अति और च्यवन मृपि होते हैं तथा तुपित नामक दवता
रहते हैं । स्वारोचिप मनु के पुन हविध्र, सुकृति, ज्योति, आप, मूर्ति, अय, स्म,
मथित, नभस्य, नभ और कर्ज होते हैं ॥१२-१५॥
द्वितीयमेतत्वयित तव मन्वन्तर मया ।
इद तृतीय वक्ष्यामि तन्निवोध नराधिप ।।१६
वसिष्ठपुना सप्तासन्वासिष्ठा इति विथ ता ।
हिरण्यगर्भस्य सुता ऊर्जा नाम महाजस ।।१७
ऋपयोज मया प्रोक्ता वीय॑मानान्निवोध मे।
ओत्तमेयान् महाराज दश पुत्रान्मनोरमान् ।।१८
ईप ऊर्जस्तनूजश्च मधुर्माधव एव च ।
शुचि शुक्र सहश्चैव नभस्यो नम एव च ॥१६
मानवस्तन देवाश्च मन्वन्तरमुदाहृतम् ।
मन्वन्तर चतुर्थ ते कथयिष्यामि तच्छणु ॥२०
[ श्री हरिवंशपुराण काव्य पृथुस्तथैवाग्निर्जनुर्धाता च भारत । कपीवानकपीवाश्च तत्र सप्तर्षयोऽपरे ॥२१ युराणे कथितास्तात पुत्रा पौत्राश्च भारत । सत्या देवगणाश्चव तामसस्यान्तरे मनो ॥२२ इस प्रकार यह दूसरे मन्वन्तर का विवरण हुआ, अब तीसरे मन्वन्तर का वर्णन कहता हूं, उसे सुनो ॥१६॥ हे राजन् । वसिष्ठ के जो सात पुत्र रहे गये हैं, वे ही ब्रह्मा के द्वारा उत्पन्न होकर ऊज नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त होते हैं ।।१७।। इस मवन्तर के ऋषि यही हैं, अब उत्तम मनु के पुत्रो को बताता हूँ---ईप, ऊजं तनूज, मधु माधव, शुचि, शुक्र, सह, नभस्य और नम यह उत्तम मनु के पुत्र हैं ॥१८-१६॥ इस मन्वन्तर के देवता भानुगण होते हैं, यह तीसरे मन्वन्तर का वणन किया, अब चौधे का करता हूं ॥२०॥ इसमे सात ऋषि काव्य, पृथु अग्नि, जह्न. घाता, कपिवान् एव अकपिवान नामक होते हैं ॥२१॥ इनके अतिरिक्त पुराणो मे इनके अनेकों पुत्र तथा पौत्र कहे गये हैं, इस मन्य तर मे सत्य देवता रहते हैं ॥२२॥ पुत्राश्चव प्रवक्ष्यामि तामसस्य मनोनृप । धे तिस्तपस्य सुतपास्तपोमूलस्तपोधन ॥२३ तपोरतिरकल्मापस्तन्वी धन्वी परन्तप । तामसस्य मनोरेते दश पुत्रा महावला ॥२४ वायुप्रोक्ता महाराज पञ्चम तदनन्तरम् । वेदवाहुयंदुघ्नश्च मुनिर्वेदशिरास्तथा ॥२५ हिरण्यरोमा पर्जन्य ऊर्ववाहुश्च सोमज । सत्यने त्रस्तथाऽऽनेय एते सप्तर्पयोऽपरे ॥२६ देवाश्च भूतरजसम्तया प्रकृतयोऽपरे । पारिप्लवश्च रम्यश्व मनोरन्तरमुच्यते ॥२७ अथ पुत्रानिमास्तस्य निबोध गदतो मम । धतिमानव्ययो युक्तम्तत्त्वदशी निरुत्गुव ॥२८
.
मन्वन्तर वर्णन ]
अरण्यश्च प्रकाशश्च निर्मोह मत्ययात् कृती।
रवतस्य मनो पुत्रा पञ्चम चंतदन्तरम् ॥२६
पष्ठ ते सप्रवक्ष्यामि तन्निवोध नराधिप ।
भृगुनंभो विवस्वाश्च सुग्रामा विरजास्तया ॥३०
अतिनामा सहिगुश्च मप्तते वै महर्पय ।
चाशुपस्यान्तरे तात मनोवानिमान्छृणु ॥३१
इन तामस मनु के छ ति, तपस्य, सुनपा, तपोमून तपोधन, तपोरति,
आल्माप, तन्वी, धन्वी और परन्तप नाम के पुत्र होन हैं ।।२३-२४.1 पांचवे
मन्वन्तर में वेदशाह, यदुघ्न वेदशिरा, हिरण्यरोमा, पजन्य, चंबाह और
सत्यना यह सात ऋपि होउ हैं ॥२५-२६।। इस मवन्तर म सभी देवता रजो.
गुणी होत हैं । इनका नाम पारिपत्य और रम्य होता है ॥२७॥ पांचवे रवत
मनु के धृतिमान, अव्यय युक्त, तत्वदर्शी, निग्मुर, अरण्य, प्रााग, निर्मोह,
सत्यवाद और कृती नाम पुत्र होते हैं ॥२८ २९। अब छठवें मन्वन्तर का
वृतान्त सुनो । भृगु नम, विवस्वान् सुधामा, विरजा, अतिनामा और सहिष्णु
यह साव पि होते हैं । अब चाक्षुप स अगले मन्वन्तर के दवतामा क नाम मुनो
॥३०-३१॥
आद्या प्रमूता सम पृयामावा दिवौकम ।
लेखाश्च नाम राजेन्द्र पच देवगणा स्मृता ।
सपेरगिरस पुना महात्मानो महौजस ॥३२
नावलेया महाराज दश पुनाश्च विथ ना ।
ऊरप्रभृतयो राजन्पष्ठ मन्वन्तर स्मृतम् ॥३३
अनिर्वसिष्ठो भगवान्कश्यपश्च महानृपि ।
गौतमोऽथ भरद्वाजो विश्वामित्रस्तथैव च ॥३४
तथैव पुत्रो भगवानृचीकस्य महात्मन ।
सप्तमो जगदग्निश्च कृपय साम्प्रत दिवि ॥३५
साध्या रुद्राश्च विश्वे च मरतो वमवस्तथा ।
आदित्याश्वाश्विनी चामि देवी वैवस्वती स्मृती ॥३६
. १०२ ] [ श्री हरिवंशपुराण मनोवैवस्वतस्य॑ते वर्तते साम्प्रतेऽन्तरे । इक्ष्वाकुप्रमुखाश्चैव दश पुत्रा महात्मन ॥३७ एतेषा कीर्तिताना तु महर्षीणा महौजसाम् । राज-पुताश्च पौत्राश्च दिक्षु सर्वासु भारत ॥३८ मन्यन्तरेपु सर्वेषु प्राग्दिश सप्तसप्तका.। स्थिता लोकव्यवस्यार्थ लोकसरक्षणाय च ॥३६ आद्य, प्रभूत, ऋषि, मृपभ और लेखा यह पांच देवता होते हैं, महर्षि अगिरा के ऊरू आदि दस पुत्र ही छठवें मनु के पुत्र कहे जाते हैं, इस प्रकार छठवें मन्वन्तर का वृत्तान्त पूर्ण हुआ ॥३२-३३।। अब सातवें मन्वन्तर का वर्णन सुनो--अलि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज विश्वामित्र और जमदग्नि इस मन्वन्तर के सप्नपि हैं ॥३४-३५।। साध्यगण, विश्वेदेवगण, रुद्रगण, वसुगण, मरुगण, आदित्यगण, और अश्विद्वय देवता हैं तथा वैवस्वत मनु के इक्ष्वाकु । आदि दस पुत्र हैं ॥३६-३७॥ हे राजन् ! जिन परम प्रतापी महपियो के विषय में मैंने कहा है, उनके पुन पौवादि वशधर सब दिशाओ मे व्याप्त हैं ॥३८॥ उपरोक्त सभी मन्वन्तरी मे लोकों की व्यवस्था और रक्षा के लिये उनचास वायु स्थित रहते हैं ॥३॥ मन्यनरे व्यतिक्रान्ते चत्वार सप्तका गणा' । कृत्वा कर्म दिव यान्ति ब्रह्मलोकमनामयम् ।।४० ततोऽन्ये तपसा युक्ता स्थानमापूरयन्त्युन । अतीता वर्तमानाश्च क्रमेणतेन भारत ।।४१ एतान्युक्तानि कौरव्य सप्तातीतानि भारत । मन्वन्तराणि पट् चापि निबोघानागतानि मे ॥४२ सावर्णा मनवस्तात पचाताश्च निबोध मे। एको वैवस्वतस्तेषा चत्वारस्तु प्रजापतेः।।४३ परमेष्टिमुनास्तात मेरमावर्णता गता. । दक्षस्यैते हि दौहिला. प्रियायास्तनया नृप । महान्तस्तपसा युक्ता मेरठे महौजसः ।।४४ मन्वन्तर वर्णन 1 [ १०३ रुचेः प्रजापतेः पुत्रो रोच्यो नाम मनुः स्मृतः। भूत्यां चोत्पादितो देव्यां भौत्यो नाम स्वेः सुतः ।।४५ अनागताश्च सप्तते स्मृता दिवि महर्षय. । मनोरन्तरमासाद्य सावर्णस्य ह तान्छृणु ॥४६ रामो व्यासस्तथानेयो दीप्तिमानिति विश्रुतः । भारद्वाजस्तथा द्रौणिरश्वत्थामा महाद्युतिः ॥४७ गौतमस्यात्मजश्चव शरद्वान्नाम गौतमः । कौशिको गालवश्व ररुः काश्यप एव च ॥४८ एक मन्वन्तर के समाप्त होने पर चतुःप्तक अपने-अपने कार्य का पूर्ण निर्वाह करके अक्षय ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं ॥४०॥ उनके चले जाने पर अन्यान्य महापुरुप अपने-अपने तपोबल के द्वारा उनके रिक्त स्थान की पूर्ति करते हैं। इस प्रकार सर मावन्तरों का चक्र चलता रहता है ॥४१॥ इस रकार सात मन्वन्तरो का विषय-वर्णन हुआ, अब अन्य मन्वन्तरी को भी बताता ई ॥४२।। सावरिण मनु पाँच कहे गये हैं, इनमें प्रथम वैवस्वत सायरिंग सूर्यपुल माने गये हैं, शेष चारों सावरिण ब्रह्माजी के पुत्र हैं । सुमेर पर्वत पर तप करने के कारण मे सागि के नाम से इनकी प्रसिद्धि हुई । यह दक्ष सुता प्रिया के पुन होने से दक्ष के दौहित हुए, यह अत्यन्त तेजस्वी और तपस्वी थे ॥४३- ४४॥ रुचि प्रजापति के पुत्र रोच्य और भूति प्रजापति के पुत्र भौत्य, यह भी मनु हुए, शेप मनुओ की उत्पत्ति भूति के गर्भ से हुई इसलिये उनकी प्रसिद्धि मौत्य रूप में हुई |४|| अब आमी आठवें सादणि मे होने वाले ऋपियो का वृत्तान्त कहता हूं ॥४६ | राम, व्यास, दीप्तिमान्, भारद्वाज, अश्वत्थामा, शरद्वान्, गालव, र नामक ब्रह्म के समान तेजस्वी ऋषि होगे ।।४७-४८।। वरीयांश्चावरीयांश्च संमतो धृतिमान्यसुः । चरिष्णुरप्यधृष्णुश्च वाज. सुमतिरेव च । सावर्णस्य मनोः पुत्रा भविप्या दश भारत १४६ प्रयमे भेरुसावणे प्रवक्ष्यामि मुनोञ्णु । मेधातिथिस्तु पौलस्त्यो वसु काश्यप एव च ।।५०
१०४ ]
[ श्री हरिवंशपुराण
ज्योतिष्मान्भार्गवश्चैव द्युतिमानगिरास्तथा ।
सवनश्चैव वासिष्ठ आनेयो हव्यवाहन ॥५१
पौलह सप्त इत्येते मुनयो रोहितेऽन्तरे ।
देवताना गणास्तव लय एव नराधिप ॥५२
दक्षपुत्रस्य पुत्रास्ते रोहितस्य प्रजापते ।
मनो पुनो धृष्टकेतु पचहोतो निराकृति ॥५३
पृथु श्रवा भूरिधामा मृर्वाकोष्टहतो गय ।
प्रथमस्य तु सावर्णेर्नव पुता महौजस ॥५४
वरीयान्, अवरीयान्, सम्मत, धृतिमान्, वसु, चरिष्णु, अधष्णू, आर्य
वाज और सुमति यह दस सावणि मनु के पुत्र होगे ।।४६।। अब प्रथम सावएि
के मुनियों के नाम सुनो-मेगातिथि, वसु, ज्योतिष्मान अगिरा, सवन, हव्य
वाहन और पोलह यह सप्नपि होगे। इस मन्वन्तर मे देवना तीन होगे ।।५०
५२॥ वे तीनो दक्ष तनय रोहित के पुत्र होगे । प्रथम साणि के धृष्टकेतु
पचहोत्र, निराकृति, पृथु, श्रवा, भूरिघामा, ऋचोक, बृहत् और गय यह नौ पुर
होगे ।।५३-५४॥
दशमे त्वथ पर्याये द्वितीयास्थातरे मनो ।
हविष्मान्पौलहश्चैव सुकृतिश्चैव भार्गव ।
अयोमूर्तिस्तथाऽयो वसिष्ठश्चाष्टम स्मृत ॥५५
पौलस्त्य प्रमितिश्चैव नभगश्चैव काश्यप ।
अगिरा नभम सत्य सप्तैते परमर्षय ५६
देवताना गणो द्वौ तौ ऋषिमत्राश्च ये स्मृता ।
मनो सुतौ तमौजाश्च निकुषजश्च वीर्यवान् ।।५७
शतानीको निर। मिनौ वृषसेनो जयद्रथ ।
भूरिद्युम्न सुवर्चाश्च दश त्वेते मनो सुना ॥५८
एकादशेऽथ पर्याय तृतीयस्यान्तरे मनो ।
तस्य सप्त ऋषीश्चापि कीर्त्यमानान्निबोध मे रह
.
मन्वन्तर वर्णन ]
[ १०५
हविष्मान्याश्यपश्चात हविष्माभ्यश्च भार्गव ।
तरणश्च तथाणे वासिष्ठस्त्वनघस्तया ॥६०
अगिरामचोदधिरायपच पौलस्त्यो निश्चरस्तथा।
पुलहश्चाग्नितेजाश्च भाज्या सप्त महर्पय ॥६१
दस मन्वन्तर में हविष्मान, सुकृति, अयोमूर्ति, बप्टम, प्रमति, नभोग
योर सत्य यह अपि होंगे, इम मन्वन्तर म दक्षिण तथा उत्तर पय के अमिमानी
दो ही देवता होग, यह देवता मन्त्र प्रतिपाद्य माने जायगे । दक्ष सावरिण के दस
पुत्र सुत, उत्तमौजा, निकृपज, वीर्यवान्, शतानीक, निरमित्र, वृपसेन, जयद्रय,
भूरिद्युम्न एव सुवर्चा होग १६५-५८। अब तोर सावणि के ग्यारहवें मन्वन्तर
म जो ऋषि हुए उनके नामों को मुनों--कश्यप पुत्र हदिप्मान्, भृगुपुत्र हविष्मान्,
आय तरुण, मनद्य, उदधिष्य, निश्चर और अग्न्तेिजा नाम के मात ऋषि
होंगे ॥५६-६१॥
ब्रह्मणस्तु सुता देवा गणास्नेपा नय स्मृता ।
सवर्तमुशर्मा च देवानीक पुम्द्वह ॥६२
क्षेमधन्वा दृढायुश्च आदर्श पण्डका मनु ।
सावर्णस्य तु पुना व तृतीयस्य नव स्मृता ॥६३
चतुर्यम्य तु सावर्णेम्पोन्मप्त निबोध मे।
धुतिर्वसिष्ठपुतश्च आय. सुतपास्तथा ॥६४
अगिरास्तपसो मूर्तिस्तपस्वी काश्यपस्तथा।
तपोशनश्च पौलस्त्य पोलहश्च तमो रवि ॥६५
भार्गव सप्तमस्नेपा विक्षेपस्तु तपो धृति ।
पचदेवगणा प्रोक्ता मानसा ब्रह्मणश्च ते॥६६
देववायुरदूरश्च देवष्ठो विदूरथ ।
मिनवान्मिनदेवश्च मित्रसेनश्च मिनकृत् ।
मिनबाहु सुवर्चाश्च द्वादशस्य मनो सुता ॥६७
त्रयोदशेश्य पर्याये भान्ये मन्वन्तरे मनो ।
अगिराश्च तिमापौलस्त्यो हव्यपस्तु य ।।६८
ब्रह्मा के [ श्री हरिवशपुराण पौलहस्तत्त्वदर्शी च भार्गवश्च निरत्सुक । निष्प्रकम्नस्तथाऽऽयो निर्मोह कश्यपस्तथा ।।६५ सुतपाश्चव वासिष्ठ सप्तैते तु महर्षय । त्रय एव गणा प्रोक्ता देवताना स्वयभुवा 11७० इसमन्वन्तर में पुन तीन सम्प्रदायो में बंद कर देवता बनेंगे तथा सवर्तक, सुशर्मा, देवानीक, पुरुटह, क्षेमधन्वा, दृढायु, आदर्श, पण्डक और मनु यह इस तीसरे रुद्र साणि के नौ पुत्र होगे ॥६२-६३) अब चौथे सावरिण के ऋषि सुनो-द्युति, सुतपा, अगिरा, तपस्वी, तपोशन, तपोरवि और विक्षेप नामक सप्तपि होगे तथा पांच भागो में विभक्त ब्रह्माजी के मानस पुत्र इस मन्वन्तर में देवता होगे ॥६४-६६॥ द्वादश सावरिण के पुत्र देवबाहु, अदूर, देव- श्रेष्ठ, विदूरथ, मित्रवान्, मित्रदेव, मित्रसेन, मित्रवृत्, मिनबाहु और सुवर्चा होगे ॥६७।। तेरहवें रोच्च मन्वन्तर मे धृतिमान् हव्यप, तत्वदर्शी, निरुत्सुक, निष्ट कम्प, निमोह और सुतपा स पि होगे तया ब्रह्माजी के तीन पुत्र देवता होग ॥६८-७०11 बयोदशस्य पुत्रास्ते विज्ञेयास्तु रुचे सुता । चित्रसेनो विचितश्च नयो धर्मभृतो धृत ॥७१ सुनेस क्षतवृदिश्च सुतमा निर्भयो दृढ । रोच्यस्यते मनो पुत्रा अन्तरे तु त्रयोदशे १९७२ चतुर्दशेऽथ पर्याये मोत्यस्यैवान्तरे मनो । भार्गवो ह्यतिवाहुश्च शुचिरागिरसस्तथा १७३ युक्तरचंय तथाऽऽसयो शुनो वासिष्ठ एव च । अजित पोलहश्व अन्त्या सप्तर्पयश्च ते ।।७४ एतेषा पल्पमुत्याय कीर्तनारसुखमे प्रते। पाश्चाप्नोति गुमहदायुश्चव भवेत्तथा ।।७५ अनीतानागताना ये महर्षीणा रादा नरः । देवनाना गणा. प्रोक्ता पन्य व भरतर्षभ ।।७६ वैवस्वत मनु और यम की उत्पत्ति ] [ १०७ तरगभीरर्वप्रश्च तरस्वानुय एव च । अभिमानी प्रवीणश्च जिष्णु सक्रन्दनस्तथा 139 तेजस्वी सपलश्चैव भौत्यस्यैते मनो सुना । भौत्यस्येवाधिकारे तु पूर्णे कल्पस्तु पूर्यते ।।७८ इत्येते नामतोऽतीता मनव कीर्तिता मया । तैरिय पृथिवी तात समुद्रान्ता सपत्तना । ७८ पूर्ण युगसहस्त्र तु परिपात्या नराधिप । प्रजामिश्चंव तपसा सहारस्तेपु नित्यश ।।१० वित्रसेन, विचित्र, नय, धर्मभूत, धूर, सुनेत्र, क्षत्रवृद्धि, मुतपा, निर्भय और दृढ यह रोच्य मनु के पुन होगे ॥७१-७२।। चौदहवं मन्वन्तर में बग्नीघ्र, भार्गव, अतिबाह, शुचि, युक्त, शुक, और नित सप्प होग ॥७३-७४।। इन मनुओ, सप्तपियो और मनु पुत्रो का नित्य प्रति प्रात काल नाम-चीनन करने वाना सुगे होता है तथा दीर्घायु की प्राप्ति होती है ॥७॥ इस प्रकार भूत- कार में हुए तथा आग होने वाले मापिनों और देवताओं का वृत्तान्त मैंने कहा है ।।७।। श्रत्य मनु के पुत्र तरग, भीर, वप्र, तरस्वान्, उग्र, अभिमानी, प्रदीश, जिष्णु, सकन्दन, तेजस्वी और सदल नाम वाले हागे । भौत्य मनु के कार्य काल वो समाप्त होने पर एक कल्प की पूर्ति हो जायगी ॥७७ ७६।। है राजन् । हे जनमेजय । इस प्रकार चौदह मनुओ का नामावलि युक्त वृत्तान्त मैंने तुम्हारे प्रति कहा है । ये मनु ही तप तथा प्रजा सृजन करते हुए नगर, ग्राम, सागर मादि से परिपूर्ण पृथिवी का पालन करते हैं, तया उन्ही को उपस्थिति म लोक- सहार भी हो जाता है ॥७९-८०॥ ।। वैवस्वत मनु और यम को उत्पत्ति ।। विवस्वान्कश्यपाज्जज्ञ दाक्षायण्यामरिंदम । तस्य भार्याऽभवत्सज्ञा त्वाप्ट्री देवी विवस्वत ॥१ सुरीरीत विरवाता निपु लोपु मिनी । सा व भार्या भगवतो मार्तण्डस्य महात्मन ॥२ १०८ ] [ श्री हरिवंशपुरा भतृरूपेण नातुष्यद्रू पयौवनशालिनी । सज्ञा नाम सुतपसा दीप्तनेह समन्विता ॥३ आदित्यस्य हि तद्प मण्डलस्थस्य तेजसा । गानेषु परिदग्ध वै नातिमान्तमिवाभवत् ॥४ न खल्वय मृतोऽण्डस्थ इति स्नेहादभापत । अज्ञानात्कश्यपस्तस्मान्मार्तण्ड चोच्यते ॥५ नेजस्त्वभ्यधिक तात नित्यमेव विवस्वत । येनातितापयामास त्रील्लोकान्नश्यणत्मज ॥६ लोण्यपत्यानि कौरव्य सज्ञाया तरता वर । आदित्यो जनयामास कन्या द्वौ च प्रजाती। ७ देशम्पायन जी ने कहा- हे राजन् । कश्यप की भार्या दाक्षायणी के गर्भ के मूप की उत्पत्ति हुई, जिनका विवाह विश्वकर्मा की पुत्री सज्ञा के साथ सम्पन हुआ ॥१॥ोगी स्वभाव वाली सज्ञा सुरेणु के नाम से प्रसिद्ध यो को वह अत्यन्त रूप-यौवन सम्पन्न होने के कारण भगवान सूय के ताप से अस तुष्ट यी ॥२३॥ सूर्य के तेज से उसका समस्त शरीर दग्ध होने के कारण लावण्म न हो गया ॥४॥ एर समय की बात है भिक्षार्थ बुध पश्यप के आश्रम पर गये, परतु गर्भवती अदिति ने आलस्य के कारण उहे भिक्षा नहीं दी, मारण कुपित होकर बुध ने उनको गर्भ नष्ट होने का शाप दे डाला। शाप सु पर अदिति रोने लगी, यह देख कर कश्यप ने स्नेहपूर्वक कहा कि तुम्हारे । वा शिशु नए नहीं हुआ है, वह अण्ड मे सुरक्षित बैठा है कश्यप पे इस प्रका बहने ये वारण सूर्य मार्तण्ड नाम से प्रमिद हुए ॥५॥ शनं -शनं सूर्य के ते में इतनी वृद्धि हुई कि उसके कारण सम्पूर्ण त्रैलोक्य परितप्त हो गया ॥६॥ सुमा के गर्भ से मूर्य के द्वारा एक कन्या और दो पुत्रो की उत्पत्ति हुई ॥७॥ मनुवैवस्वत पूर्व थाद्धदेव प्रजापति । यमश्च यमुना चव यमजी सम्बभूवतु ॥ सा विवर्णतु तद्रप दृष्ट्वा सज्ञा विवस्वत । असहन्ती र स्वा छाया सवर्णा निमंमे तत ॥६ वस्वत मनु और यम की उत्पत्ति ] [ १०६ मायामयी तु सा मजा तस्याश्छाया समुत्यिता। प्रान्जलि प्रणता भूत्वा छाया सज्ञा नरेश्वर ॥१० उवाच वि मया कार्य कथयस्व शुचिस्मिते । स्थिताऽस्मि तव निर्देशे शाघि मा वरणिनि ॥११ अह यास्यामि भद्र ते स्वमेव भवन पितु । त्वयेह भवने मह्य वस्तव्य निर्विकारया ॥१२ इमौ च वालको मह्य कन्या चेय सुमध्यमा । सम्माव्यास्ते न चाम्येयमिद भगवते क्वचित् ॥१३ आकचग्रहणाद्देवि आशापान व कहिचित् । मास्यास्यामि मत तुभ्य गच्छ देविय थासुखम् ।।१४ उनमें कन्या का नाम यमुना हुआ और पुत्रों का श्राद्धदेव तथा यम हुमा, रही श्राद्धदेव वैवस्वत मनु हुए । यम और यमुना यमन रूप से अर्थात् एक साथ उत्पन्न हुए थे ॥८॥ सूर्य के तेज को सहन न करने के कारण सना ने अपने ही समान रप लावण्य, वयादि युक्त एक छाया की रचना की, तब वह छाया उसके सामने हाय जोह पर स्थित हुई ॥६-१०॥ छाया ने कहा- मैं आपकी याज्ञाकारिणी हूँ, मुझ क्या करना है, इस विषय में आना परिय ॥११॥ सणा न कहा-मैं अपने पिता के यहां जा रही हूँ इमलिए तुम्ह यहाँ निर्विकार चित्त से मेरे दोनों पुत्रों और इस कन्या का परिपालन करना है। किंतु यह भेद सूय भगवान को कभी न बताना ॥१२ १३॥ छाया बोली-ह देवि । जब तक मरे पेश पकड़ कर कोई मुझे शाप न देगा, तब तक यह बात किसी पर प्रकट नहीं मरूगी, इसलिए आप सुखपूर्वक जाइय ॥१४॥ समादिश्य सवर्णा तु तथेत्युक्ता च सा तया । त्वष्टु समीपमगमद्वीडितेव तपस्वनी ॥१५ पितु समीपगा सा तु पिना निर्मात्सता तदा। भर्तुं समीप गच्छेति नियुक्ता च पुन पुन १६ अगच्छडका भूत्वाऽच्छाध रूपमनिन्दिता । कुरुनथोत्तरान्गत्वा तृणान्येव चचार ह ॥१७ ११० ] [ श्री हरिवशपुराण द्वितीयाया तु सज्ञाया सज्ञेयमिति चिन्तयन् । आदित्यो जनयामास पुनमात्मसमं तदा ॥१८ पूर्वजस्य मनोस्तात सदृशोऽयमिति प्रभु । सवर्णत्वान्मनोभूय सावर्ण इति चोक्तवान् ॥१६ मनुरेवाभवन्नाम्ना सावर्ण इति चोच्यते । द्वितीयो य सुतस्तस्या स विज्ञ य शनैश्चर ॥२० सज्ञा तु पार्थिवी तात स्वस्य पुत्रस्य वै तदा । चकाराभ्यविक स्नेह न तथा पूर्वजेषु वै ।।२१ वैशम्पायन जी ने कहा-~-हे राजन् । छापा को समझा कर सजा इस प्रकार बरने पिता के घर पहुंची, परन्तु उसके पिता विश्वकर्मा ने सज्ञा को अपने पति के पास चले जाने को कहा ।।१५-१६।। तब पिता के बहुत बार आग्रह करने पर सना ने घोडी वा रूप धारण किया और वहां से उत्तर कुरु प्रदेश । जापर घूमने लगी ॥१७॥ इधर सूर्य ने छाया को सज्ञा ही समझा और उसरे, अपने समान तेजस्वी एक पुत्र उत्पन्न किया, वह पुत्र वैवस्वत मनु के समान माकार-प्रकार वाला ही हुआ, इसलिए उसकी प्रसिद्धि स वर्ग नाम से हुई। सूर्य द्वारा धाया के गर्भ से शनैश्चर नाम द्वितीय पुत्र उत्पन्न हुआ। १८ २०॥ अव धाया का संह अपने पुत्रों पर अधिक हो गया, सना को सतानि पर उसका वैसा स्नेह नही रहा ॥२१॥ मनुतस्या क्षमत्तत्तु यमस्तस्या न चक्षमे । ता सरोपाच्च बात्याच्च भाविनोऽर्थस्य वै बलात् । तदा मतर्जयामास सज्ञा वैवस्वतो यम ।।२२ त शशाप तत भोगत्मावणं जननी नृप । चरण प्नतामेप तयेति भृशदु खिता ॥२३ यमस्तु तपितु सर्व प्रालि प्रत्यवेदयत् । भृग शापभयोद्विग्न मजापाक्यप्रतादित ॥४ शालोम विनितत प्रोवाच पितर तदा। मात्रा है। गपु वर्तितव्य गुतेषु च ।।२५
वैवस्वत मनु और यम की उत्पत्ति ]
[ १११
सेयमस्मानपाहाय यवीयास बुभूपति ।
तस्या भयोद्यत पादो न तु देहे निपातित २६
वाल्याद्वा यदि वा मोहात्तद्भवान्क्षन्तुमर्हति ।
यस्मात्ते पूजनीयाऽह लघिताऽस्मि त्वया सुत ॥२७
तस्मात्तवैप चरण पतिष्यति न संशय ।
अपत्य दुरपत्य स्यान्नाम्बा कुजननी भवेत् ॥२८
अपनी विमाता का यह व्यवहार वैवस्वत मनु ने तो सहन कर लिया,
परन्तु यम इसे सहन नहीं कर सके । वह बालसुलभ चचलता और रोप के कारण
छाया को लात मारने को तत्पर हो यये ।।२२।। छाया को यम का यह व्यवहार
दुखप्रद लगा और उसने उसे शाप दिया कि तुम्हारा पर इसी समय कट पर
पिए पास छापा की माता से व्यापात र शापा से भयातुल पम ने अपने
पिता के पास जाकर कहा कि पिताजी | शाप निवृत्ति का कुछ उपाय कीजिये,
माता को अपने सभी पुत्रो पर समान स्नेह रखना चाहिये ॥२४-२५॥ परन्तु
हमारी माता अपने छोटे पुत्र का अधिक आदर और हमारी उपेक्षा करती है,
इसलिए मैंने अपना पर उठाया था, परन्तु पदाधान नही किया ॥२६॥ मेरे द्वारा
यह अनर्थ बाल-स्वभाव वश ही हो गया था, इसे क्षमा कीजिये । माता ने मुझसे
क्षोभ मे कहा था कि मैं तुम्हारी माता हूँ, पूजन के योग्य हूँ, तुमने मुझे मारने
के लिये अपना पांव उठा कर मर्यादा भग की है, इसलिये धुम्हारा वह पांव गिर
जायगा । परन्तु है पिताजी | पुन तो कुपुत्र हो जाता है, परन्तु माता कभी भी
घुमाता होती नही देखी गई ॥२७-२८॥
-
शप्तोऽहमस्मि लोकेश जनन्या तपता वर ।
तव प्रसादाच्चरणो न पतेन्मम गोपते ॥२६
असशय पुल महद्भविष्यत्यत्र कारणम् ।
येन त्वामाविशनोधो धर्मज्ञ सत्यवादिनम् ।।३०
न शक्यमन्यथा कर्तुं मया मातुर्वचस्तव ।
कृमयो मासमादाय यास्यन्ति धरणीतलम् ॥३१
११२ ] [ श्री हरिवंशपुराण तव पादान्महाप्राज्ञ ततस्त्व प्राप्स्यसे सुखम् । कृतमेव वचस्तथ्य मातुस्तव भविष्यति ॥३२ शापस्य परिहारेण त्व च बातो भविष्यसि । आदित्योऽयात्रवीत्सज्ञा किमर्थं तनयेपु वै ।।३३ तुल्येष्वभ्यधिक स्नेहः क्रियतेति पुन. पुनः । सा तत्परिहरन्ती तु नाचचक्षे विवस्वते ।।३४ आत्मान सुसमाधाय योगातथ्यमपश्यत । ता शप्नुकामो भगवान्नाशाय कुरुनन्दन ॥६५ मुझे माता ने शाप दिया है, परन्तु यदि आप मुझ पर प्रसन्न हो जायें और मेरा अपराध क्षमा कर दें तो मेरा पांव गिरने से बच जायगा ॥२६॥ भगवान सूर्य ने कहा-हे पुत्र । निस्सन्देह किसी महान कारण से तुम्हारे जैसे सत्यवक्ता और धर्मात्मा को क्रोध की प्राप्ति हुई होगी, परन्तु मैं तुम्हारी मातो, के शाप को अन्यथा नहीं कर सकता, अनेको कीट तुम्हारे पाँव का मांस लेकर पृथिवी तल मे समा जायंगे, ऐसा होने से तुम्हारी माता के वचन की भी रक्षा होगी और तुम भी शाप से मुक्त हो जाओगे ॥३०-३१। इसके पश्चात् सूर्य ने सज्ञा रूपिणी छाया से कहा-माता का स्नेह सभी बालको के प्रति समान होना चाहिये, फिर तुम छोटे बालक पर ही अत्यधिक स्नेह रखती हो, इसका क्या कारण है ? पर तु छाया ने अपना अभिप्राय प्रकट न करके, बात को आई-गई कर दिया ॥३२.३४ । तब भगवान सूर्य ने योग के बल से सब भेद जान लिया और छाया को नष्ट करने के लिए तत्पर हुए ॥३!! मूद्ध जेषु च जग्राह समयेऽतिगतेऽपि च। सा तत्सर्वं यथावृत्तमाचचक्षे विवस्वते ॥३६ विवस्वानथ तच्छत्वा क्रुद्धस्त्वष्टारमभ्यगात् त्वष्टा तु त ययान्यायमर्चयित्वा विभावसुम् । निर्दग्धुकाम रोपेण सान्त्वयामास व तदा ॥३७ तवातितेजसाऽऽविष्टमिदं रूप न शोभते। असहन्ती च तत्सज्ञा बने चरति शाहले ॥३८ - संवम्वत मनु और यम की रसत्ति ] [ ११३ द्रष्टा हि ता भवानद्य स्वा भार्या शुभचारिणीम । नित्य तपम्यभिरता बढवानपधारिणीम् ॥ पाहारा यगा दीना जटिला ब्रह्मचारिणीम् । निहनपरिलिप्टा व्याजा पचिनीमिव । पलाध्या योगरलोपना योगमाम्याय गोरते ॥20 अनयूल तु ते देव यदि म्यान्मम तन्मतम् । मप नियाभ्यद्य तव कान्तमरिन्दम ॥४१ म्पं विवम्वनन्चासीत्तियंगूर्वघ्मम तु वै । तेनागी ममतो देवापे तु विभावमु ॥२ तम्मात्यष्टु म व याश्य यह मेने प्रजापति.। गमनुमानवाचन सप्टार म्पमिद्धये ॥४३ मुरित होरर उन्होंने धाया के देश पर निये, गरो नसा प्रतिटो गो वपन दिया था, वह पूर्ण हो गया और उसने मव वृत्तान्न यह गुनाया ॥३३॥ पापा की बात पर कोधित हुए मृपं विश्वकर्मा पे पाग पर, वियर र्मा ने उनका वेपियन् पूजन परोधान्त किया जाये यो-यापरवरपिरततो. ग्य स्वरूप में गित १ मा पोरी में, यन में विचरण परती काग भा करनी है ॥३८॥ श्राप पनी उम मुनापारा यानी ना हो ग्यास गिये, यह यकाय पारिणी सजा दाया-परायण होरर या पत्तो माहार रतीरा, दीन, बटन, हपीनी में महित मिनी Tमान प्यायम होती है। सपा ग गमय पधारिणी पोल पम में गम्पन्न :॥२६.४.।।रदेश ६ मा मेरी सम्मति माने मो में बायो माया गुन्दर एक शान्तिमय बना 7 ममता पूर्व बीमाात गुन मगर नगमान पी, गमिए गुर के पहले गे मुदरमा दाल बरने लिए गहना गए मोर तिमोरोपंगा रानीप्रति दी.call गोन्पामायटा मान्य यियम्यतः । प्रोगमागेच तनेज गातयामा भारत me
११४ ]
[ मी हरिवशपुराण
ततो निर्भासित रूप तेजसा सहृतेन वै ।
कान्तात्कान्ततर द्रुष्टुमधिक शुशुभे तदा ॥४५
मुखे निर्वर्तित रूप तस्य देवस्य गोपते ।
तत प्रभृति देवस्य मुखमासीतु लोहितम् ।
मुखराग तु यत्पूर्व मार्तण्डस्य मुखच्युतम् ।।४६
आदित्या द्वादशैवेह सम्भता मुखसम्भवा
धातार्यमा च मिनश्च वरुणोऽशो भगस्तथा ॥१७
इन्द्रो विवस्वान्पूपा च पर्जन्यो दशमस्तथा ।
ततस्त्वष्टा ततो विष्णुरजघन्यो जघन्यज ॥४८
हर्ष लेभे ततो देवो दृष्ट्वाऽऽदित्यानम्वदेहजान् ।
गन्धै पुष्परलकारैस्विता मुकुटेन च ॥४६
एव सम्पूजयामास त्वष्टा वाक्यमुवाच ह ।
गच्छ देव निजा भार्या कुरू श्चरति सोत्तरान् ।।५०
वडवारूपमास्थाय वने चरति शाद्वले ।
स तयारूपमास्थाय स्वभार्यारूपलीलया ।।५१
ददर्श योगमास्थाय स्वा भार्या वडवा तत ।
अधृप्या सर्वभूताना तेजसा नियमेन च ॥५२
तव विश्वकर्मा ने उन्हे सान पर चढा कर घिसना आरम्भ
प्रकार घर्पण करने से सूर्य की उग्रता कम होने लगी और उपका र
पर मुख पर चमकने लगा। तभी से उनके मुख का वर्ण लाल हो गया। उनके
मुल से निकलने वाले पहिले तेज से धाता, अर्थमा, मित्रावरुण, अश, भग,
विवस्वान्, पूपा, पर्जन्य, अजघन्य, स्वष्टा और अजधन्य विष्णु नामक बारह
मादित्य उत्पन्न हुए ॥४४-४८।। अपने ही देह से अविर्भूत हुए उन आदित्यो को
देस पर मूर्य को अत्यन्त प्रसन्नता हुई । तब विश्वरर्मा ने पुष्प, चन्दन, अलकार,
बाभूपण आदि से उनका सत्कार करके कहा-हे आदित्य | आप अपनी भार्या
के पास जाइये, इस समय वह वडवा रूप मे उत्तर कुरु प्रदेश में, वन मे चर रही
दे। तर सूर्य ने भी मश्व का रूप धारण दिया और वहाँ जाकर सज्ञा को अपने
म्वत मनु और यम की उसति ]
लि मे सम्पन्न होरर सभी प्राणियों के लिए दुपिं होते हुए पहषा ११ मे
रण करते हुए देमा ४९-५२||
वडयावपुषा गजश्चरन्तीमकुतोभयाम् ।
सोऽश्यम्पेण भगवान्नां मुखे ममनावयत् ।।५३
मथनाय विचेष्टन्ती परपुमोपगदया।
सा तन्निरयमच्छुक नामिकाया वियस्थतः ॥५४
देवी तम्यामजायतामश्विनी भिपजा वरी।
नागत्यञ्चय दयश्च स्मृती द्वावश्विनाविति ॥५५
मातंण्टगूग्यात्मजावेनायप्टमस्य प्रजापतेः ।
तातुपेण कालेन दगंयामान भास्करः । ५६
सा च दृष्ट्वंय भारं नुतोप जनमेजय ।
यमन्तु कमंगातेन मा पीडितमानमः ।।५७
धर्मप रजयामाम धर्मराज इमाः प्रजाः।
संभ नामंगा तेन परमेण महाद्य तिः ।।५८
पितृणामाधिपन्यं च लोकपालत्वमेव च ।
मनुः प्रजारनिस्वामीनमारण : स तपोधनः ॥५८
मायः मोनागते फाले मनुः सावनिरन्तरे ।
मरहट तपो पोरमयापि परति प्रभुः ।।६०
मग गपं उगरी ओर यत्पनि मारपिठ हुए, परन्तु यरया ने पर पुष
मर पर उनी को भरने नपुनों में दार निभान लिा, जिससे दो
पिनीमार उपग्नप, उमरा नाम दर और नामर पा ॥५३.४॥ मरे
पार मू ने अपना पापं स मनी मार्मा गानो गिाया और तनी में
मुमारों का मोर माता सनी दुई नम्बर परने
बिन ने गा अपत प्रगान पर छापा मार सेपित पम
भाग पर गागर मो, गमे पे नि अपिली और मोह.
तर तपन मनु सर पर पर पोर टमार, पं मार्शल
PATTE-कारनाममान॥11॥
[ श्री हिरवशायर
भ्राता शनैश्चरश्चास्य ग्रहत्वमुपलव्धवान् ।
नासत्यौ यो समाप्याती स्ववैद्यौ तो बभूवतु ॥६१
सेवतोऽपि तथा राजन्नश्वाना शान्तिदोऽभवत् ।
त्वष्टा तु तेजसा तेन विष्णोश्चक्रमकल्पयत् ।।६२
तदप्रतिहत युद्धे दानवान्तचिकीर्पया ।
यवीयसी तयोर्या तु यमी कन्या यशस्विनी ॥६३
अभवत्सा सरिच्छष्ठा यमुना लोकभाविनी।
मनुरित्युच्यते लोके सावर्ण इति चोच्यते ।।६४
यमराज का भाई शनैश्चर ग्रह वने और दोनो अश्विनीकुमार वैद्य हुए
हे राजन् । वे घोडो को स्वस्थ करते हैं । विश्वकर्मा ने सूर्य का जो तेज का
किया था, उस निकले हुए तेज से भगवान् विष्णु का चक्र बनाया, उसी चक!
विष्णु ने असख्य असुरो का नाश किया। यम और श्राद्धदेव की बहिन मई
यमुना नदी बन गई, श्राद्धदेव मनु और सावरिण नाम से प्रसिद्ध हुए ॥६१-६४॥'
॥ वैवस्वत मनु के वंशज ।।
मनोवैवस्वतस्यासम्पुत्रा वै नव तत्समा ।
इक्ष्वाकुश्चैव नाभागो धृष्णु शर्यातिरेव च ॥१
नरिप्यश्च तथा प्राशू नाभागारिष्टसप्तमा. ।
करूपश्च पृपध्रश्च नवैते भरतर्षभ ।।२
अकरोत्पुत्रकामस्तु मनुरिष्टि प्रजापति ।
मित्रावरुणयोस्तात पूर्वमेव विशापते ॥३
अनुत्पन्नेषु नवसु पुष्वेतेपु भारत ।
तस्या तु वर्तमानायामिप्टया भरतसत्तम ।।४
मित्रावरुणयोरशे मुनिराहुतिमाजुहोत् ।
आहुत्या हूयमानाया देवगन्धर्वमानुपा ॥५
तुष्टि तु परमा जग्मुर्मुनयश्च तपोधना ।
अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य श्रुतमद्भुतम् ॥६
वैवस्वत मनु के वंशज ]
[ ११७
तत्र दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता।
दिव्यसंहनना चैव इडा जज्ञे इति श्रुतिः ॥७
तामिडेत्येव होवाच मनुर्दण्डधरस्तदा।
अनुगच्छस्व मां भद्रे तामिडामित्युवाच ह ।
धर्मयुक्तमिदं वाक्यं पुत्रकामं प्रजापतिम् ॥
वैशम्पायन जी ने कहा-हे जनमेजय ! विवस्वत मनु के नो पुत्र थे,
उनका नाम इक्ष्वाकु, नाभाग, घृष्णु, नरिष्यन्, प्राशु, नाभागारिष्ट, करूप और
पृषध्र था ।।१-२॥ जब वैवस्वत के कोई पुत्र उत्पन्न नही हुआ था, तब उन्होने
मित्र और वरुण की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए पुष्टि यज्ञ किया, जिसमें
मित्रावरुण के निमित्त मुनियो ने जब आहुति दी तो सब देवताओं, गधों और
मुनियो को अत्यन्त प्रसन्नता हुई, वे बोले-इन महाराज मनु का तप, पराक्रम
और शास्त्रज्ञान अद्भुत है ॥३.६॥ सुनते हैं कि उस यज्ञ मे इडा नाम की एक
न्या उत्पन्न हुई, वह दिव्य वस्त्रालकारो और दिव्य अस्त्रों से सम्पन्न थी। मनु
उसका नाम इडा रखा और धर्मयुक्त बात उसके प्रति कही-हे पुत्री ! मुझ
पुत्र की कामना वाले प्रजापति की बातों का तुम अनुसरण करो ॥७.८।।
मित्रावरुणयोरंशे जातोऽस्मि वदतांवर ।
तयो. सकाशं यास्यामि न मां धर्मो हतोऽवधीत् ।।
सैवमुक्त्वा मर्नु देवं मित्रावरुणयोरिडा ।
गत्वान्तिकं वरारोहा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।।१०
अंशेऽस्मि युवयोर्जाता देवो किं करवाणि वाम् ।
मनुना चाहमुक्ता वै अनुगच्छस्व मामिति ॥११
तां तयावादिनों साम्बी इडां धर्मपरायणाम् ।
मितश्च वरणश्चोभावूचतुर्यन्निबोध तत् ॥१२
अनेन तव धर्मण प्रश्रयेण दमेन च ।
सत्येन चैव सुश्रोणि प्रीतो स्वो वरवणिनि ।।१३
आवयोस्त्वं महाभागे स्याति कन्येति यास्यसि ।
मनोवंशधरः पुरस्त्वमेव च भविष्यसि ॥१४
ने
११८ ] [ श्री हरिवंशपुराण सुधम्न इति विरयातलिपु शोभने । जगत्प्रियो धर्मशीलो मनोवंशविवढेन ॥१५ इडा बोली- मित्रावरण के अस से अवित होने के कारण उनके पास हो जाऊँगी, ऐसा न करन से मेरा धर्म नष्ट हो जायगा और मैं भी ना को प्राप्त हूंगी ।।६। इस प्रकार कह कर इडा मित्रावरण के पास जाकर करवा कहने लगी-हे देव । मैं आप दोना ये अश से उत्पन्न हुई हूं, इसलिये आप मुझे मेरे कर्तव्य का निर्देश पर महाराज मनु अपनी आज्ञा का पालन करने को कहते हैं ॥१०-११॥ इडा की बात सुन कर मित्रावरुण ने उस धर्मपरायण से जो कहा उसे सुनो ॥१२॥ मित्रावरण बोले-है वरवणिनि तुम्हारे इस प्रकार के धम, सत्य और दम आदि गुणो को देख पर हम दोनो ही अत्यत प्रसन्न हैं ॥१३॥ हे महाभागे । तुम सम्पूण त्रैलोक्य मे हमारी कन्या और महाराज मनु के वशघर के पुत्र रूप से विख्यात होरी ॥१४॥ तुम ससार के लिये श्यि और धर्मात्मा होगी तथा सुद्युम्न नाम से वैवस्वत मनु के वश को विस्तृत फरोगी ॥१५॥ निवृत्ता सा तु तच्छ त्या गच्छन्ती पितुरतिकम् । बुधेनातरमासाद्य मैथुनायोपमत्रिता ॥१६ सोमपुतावुधाद्राजस्तस्या जज्ञे पुरूरवा । जनयित्वा तत सा तमिडा सुधम्नता गता ।।१७ सुद्य म्नस्य तु दायादात्रय परमधार्मिका । उत्कलश्च गयश्चैव विनताश्वश्च भारत ॥१८ उत्कलस्योत्कला राजधिनताश्वस्य पश्चिमा । दिक्पूर्वा भरतश्रेष्ठ गयस्य तु गयापुरी॥१६ प्रविष्ट तु मनो तात दिवाकरमरिंदमम् । दशधा तद्दधत्क्षश्वमक्रोत्पृथिवीमिमाम् ॥२० पूयाङ्किता वसुमती यस्येय सवनाकरा । इक्ष्वाकुज्येष्ठदायादो मध्यदेशमवाप्नवान् ॥२१ वन्याभावाच्च सुद्य म्नो नैन गुणमवाप्तवान् । वसिष्ठवचनाच्चासीत्प्रतिष्ठान महा सन ॥२२ वैवस्वत मनु के वचन ] [ ११६ उन देवताओ के वचन मुन पर इडा अपने पिता मनु के पास जा रही यो, तभी मार्ग में चन्द्रमा का पुत्र बुध मिला बोर उसने इडा को अपने पास बुलाया ॥१६।। तब बुध से उसने पुरखा नामक एक पुन उत्पन्न किया । पुरु- रवा को जन्म देने के पश्चात् इडा का स्त्रीत्व नष्ट हो गया और वह पुस्य होकर मुधम्न नाम से प्रसिद्ध हुई ॥१७॥ और उसके तीन पुत्र उत्तल, गया और विनीताश्व नामक हुए यह तीनो धर्मात्मा थे ॥१८॥ उत्तल को उत्तर का राज्य मिला, विनिताश्व को पश्चिम का तथा गय को पूर्व का राज्य प्राप्त हुआ। गया । को राजधानी का नाम गया हुआ ||१| प्रजापति मनु के इवा नादि दस पुत्रो के उसन्न होने के पश्चात् जब मनु मूर्य में प्रविष्ट हो गये थे, तब उनके पुयो ने वन, मान बादि युक्त पृथिवी के दम विभाग कर लिये, जिसमें से मध्य- प्रदेश का राज्य इशा को प्राप्त हुआ ॥२०-२१॥ मुद्य म्न में कन्या भाव के विद्यमान रहने से उसे मध्य प्रदेश प्राप्त नहीं हुआ। उमने गुर वसिष्ठ के निर्देश से प्रतिष्ठानपुर का राज्य शासन संभाला ।।२२।। प्रतिष्ठा धर्मराजस्य मुद्य म्नस्य कुरुद्वह। तत्तुरूरवसे प्रादाद्राज्य प्राप्य महायशाः ।।२३ सुद्य म्नः कारयामास प्रतिष्ठाने नृपक्रियाम् । उत्कलस्य श्रय. पुनास्त्रिषु लोकेषु विश्रू ताः । धृष्टकश्चाम्बरीपश्च दण्डरचे ति मुनास्त्रयः ।।२४ यश्चकार महात्मा ने दंडकारण्यमुत्तमम् । वनं तल्लोकविख्यातं तारसानामनुत्तमम् ॥२५ तम प्रविष्टमावस्तु नरः पापात्प्रमुच्यते । मुद्य म्नश्च दिवं यात ऐलमुत्पाद्य भारत ॥२६ मानवेयो महाराज स्त्रीप सोलंक्षणयुतः । धतवान्य इलेत्येव सुद्युम्नश्चेति विश्रुतः ॥२७ नरिप्यतः शकाः पुत्रा नाभागस्य तु भारत । अम्बरीपोऽभवत्पुत्रः पार्थिवर्षभमत्तमः ।।२८ महापा मुधम्न ने प्रतिष्ठानपुर या राज्य बुध गमय ही किया पोर १२० ] [ श्री हरिवशपुराण पुरूरवा को राज्य देकर उसी से शासन कराने लगा । उत्तल के तीन पुर घृष्टक, अम्बरीप और दण्ड तीनो लोको में प्रसिद्ध थे ॥२३-२४॥ हे राजन् । दण्ड• कारण्य नामक जिस प्रसिद्ध वन मे तपस्वीगण स्वच्छन्द तपस्या करते हैं और जिसमे जाने से ही प्राणी पवित्र हो जाते हैं वह दण्डकारण्य इन्ही राजा दण्ड के नाम पर विरयात हुआ है । इस प्रकार पुरूरवा को उत्पन्न करके सुधम्न स्वर्ग लोर को प्राप्त हुआ ॥२५-२६।। हे राजन् । मनु पुत्र सुद्य म्न मे स्त्रीत्व और पुरुषत्व दोनों भाव विद्यमान थे और वह सुधम्न और इला दोनो ही नाम स प्रसिद्ध था ॥२७१ नरिष्यत के पुत्र शक और नाभाग के पुन अम्बरोप हुए ॥२॥ धृष्णोस्तु धार्ट क क्षत्र रणधृष्ट बभूव ह। शर्यातेमिथुन चासीदानत्ततॊ नाम विश्रुत ॥२६ पुत्र कन्या सुक्न्या च या पत्नी च्यवनस्य ह । आनर्तस्य तु दायादो रेवो नाम महाद्युति ।।३० आनर्तविषयश्चासीत्पुरी वास्य कुशस्थली। रेवस्य रैवत पत्र ककुयी नाम धार्मिक ॥३१ ज्येष्ठ पुत्रशतस्यासीद्राज्य प्राप्य कुशस्थलीम् । स कन्यासहित श्रुत्वा गाधर्व ब्रह्मणोऽन्तिके ॥३२ मुहूर्तभूत देवस्य गत वहुयुग प्रभो । आजगाम युवैवाथ स्वा पुरी यादवैर्वृताम् ॥३३ वृता द्वारवती नाम्ना बहुद्वारा मनोरमाम् । भोजवृष्ण्यन्धगुप्ता वासुदेवपुरोगमै ॥३४ तत स रैवतो ज्ञात्वा ययातत्वरि दम । कन्या ता बलदेवाय सुनता नाम रेवतीम् ॥३५ दत्त्वा जगाच शिखर मेरोस्तपसि सस्थित । रेमे रामोऽपि धर्मात्मा रेवत्या सहित सुपी ॥३६ धष्णु पुत्र युद्ध मे न जीते जाने वाले धाप्टक हुए, शर्यानि ये आनतं मामर पुत्र और सुरक्या नाम की पुत्री हुई, वहीं महर्षि व्ययन की भार्या हुई। धान का पुत्र आपन्त हेज वाला रेप हुआ ॥२६-३०॥ यह मानत देशमा 2 धुन्ध का वध ] [ १२१ जा हुआ और उसकी राजधानी कुरास्थली हुई, उस राजा के सौ पुत्र हुए, जिनमें सबसे बडा क्षुद्मी हुआ। कुछ समय पश्चात् रयत (क्कुमो) पुत्री को साथ लेकर सगीत सुनने के लिये ब्रह्मलोक म गया, वहाँ वे ब्रह्मा के एक मुहत तक व्हरे, परन्तु गत्यलोक मे इतने समय में कई युग व्यतीत हो गये, जब वह अपनी राजधानी द्वारका को लौट तब वह यादवो से परिपूर्ण थी। उन्होंने दवा कि उस नगरी में यादा न अनेक फाटक लगा कर उस अत्यन्त सुन्दर बना लिया है और उसका नाम द्वारावती रख लिया है वासुदेव आदि वृष्णि, भोज और अधक वशीय वीर उसकी रक्षा में तत्पर हैं ॥३१-३४॥ महाराज रेवत ने उस समय की परिस्थिति को मली प्रकार समझ कर अपनी श्रेष्ठ व्रत वाली पुत्री रेवती बलराम जी के साथ विवाह दी और स्वयं सुमेरु पर्वत पर तप करने के लिये चले गये । इघर रेवती को प्राप्त कर वलराम अत्यन्त आनन्दपूर्वक रहने, ॥३५३६॥ ॥ धुन्धु का वध ॥ कथ वहुयुगे काले समतीते द्विजोत्तम । न जरा रेवती प्राप्ता रेवत च कनुमिनम् ।।१ मेरु गतस्य तस्य शयति सतति कथम् । स्थिता पृथिव्यामद्यापि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत २ न जरा क्षुत्पिपासे वा न मृत्युभरतपम । ऋतुचक्र न भवति ब्रह्मलोके सदाऽनघ ।।३ कबुमिनस्तु त लोक रैवतम्य गतस्य ह । हता पुण्य जनस्तात राक्षमैश्च कुशम्यली ।।४ तस्य भ्रातृशत चासीद्धामिक्स्य महात्मन । तद्वध्यमान रक्षोमिदिश प्राद्रवदच्युतम् ॥५ विद्रुतम्य तु राजेन्द्र तम्य भ्रातृगतस्य वै। तेपातु ते भयाक्रान्ता क्षत्रियास्तन तन ह ॥६ अस्वकारस्तु सुम्हास्तरन्तर दिशाप्ले: येपामेते महाराज शार्याता इति विश्रुता ॥७ - । ? १२२ श्री हरिवशपुराण जनमेजय ने कहा-हे द्विजोत्तम । रेवत और रेवती कई युग तक ब्रह्मलोक में रहे तो भी वृद्धावस्था ने उनका स्पर्श भी नहीं किया ऐसा कैसे हुआ ।। १।। जब राग रैवत सुमेरु पर्वत पर तप करने को चले गये तब पृथिवी पर उनका वश अब भी कैसे स्थित है। यह बात में भली प्रकार जानने को उत्सुक हूँ ॥२६वंशम्पायन जी बोले-हे अनघ । ब्रह्म लोक मे भूख, प्यास, जरा, मृत्यु और मृतुपरिवर्तन आदि कुछ भी नहीं होता ॥३।। ककुद्मान रैवत जब ब्रह्मलोक चले गये थे तब पुण्यजन नामक राक्षसोने उनकी राजधानी कुशस्थली को उजाड दिया ॥४॥ राजा रैवत सौ भाई थे, है राक्षसो के विनाश से डर कर चारो दिशाओ मे भाग निकले ॥५॥ यह भा जहाँ जाकर बस गये, वही उनकी सन्तान-वृद्धि हुई और शर्याति के वशज कहा लगे ॥६७॥ क्षत्रिया भरतश्रेष्ठ दिक्षु सर्वासु विश्रु ता । सर्वंश पर्वतगणान्प्रविष्टा कुरुनन्दन ।। नाभागारिष्टपुनी द्वौ श्यो ब्राह्मणता गती। रूपस्य च कारूपा क्षत्रिया युद्धदुर्मदा ॥ प्राशोरेकोऽभवत्पुत्र प्रजातिरिति न थ तम् । पृपध्रो हिंसयित्वा तु गुरोगा जनमेजय ।।१० शापाच्द्रत्वमापन्नो नवते परिकीर्तिता । वैवस्वतस्य तनया मनोर्वे भरतर्षभ ॥११ क्षुवतश्च मनोस्तात इक्ष्वाकुरभवत्सुत । तस्य पुत्रशत त्वासीदिवाकोभूरिदक्षिणम् ॥१२ तेपा विकुक्षिज्येष्ठस्तु विकुक्षित्वादयोधताम् । प्राप्त परमधर्मज्ञ सोऽयोध्याधिपति प्रभु ।।१३ शनिप्रमुखास्तस्य पुत्रा पञ्चाशदुत्तमा । उत्तरापथदेशस्था रक्षितारो महीपते ॥१४ चत्वारिंशदथाष्टौ च दक्षिणस्या तथा दिशि । शशादप्रमुखाश्चान्ये रक्षितारो विशापते ॥१५ . । धुन्ध का वध ] [ १२३ हे राजन् । वे सभी क्षत्रिय दिशाओ मे भ्रमते हुए पर्वतो पर जाकर बस गये ।।८।। नाभागारिष्ट के दो पुत्र वैश्य पत्नी से उत्सन्न हुए थे वे ब्रह्म मे लीन हो गये । करूप के सद पुत्र युद्ध कुशल क्षत्रिय थे उनकी कारूप नाम से प्रसिद्धि हुई ॥६॥ प्राशु के प्रजाति नामक एक ही पुन हुआ । पृपध्र ने अपन गुरु की गाय की हत्या कर दी, इसलिये गुरु शाप के कारण उसे शूद्रत्व की प्राप्ति हुई। हे जनमेजय । इस प्रकार मनु के नौनी पुत्रो का वृत्तान्त मैं तुमसे कह चुका ॥१०-११।। एक समय की बात है--मनु को छीक आने से एक और पुत्र उत्पन्न हुआ, इस इक्ष्वाकु के सौ पुत्र उत्पन्न हुए ॥१२॥ उन सौ पुत्रो में विकुक्षि सबसे वडा था, उसका पेट बहुत बढा हुआ था, इसलिये वह वीर नहीं बन सका, परन्तु सामाग्य धर्मात्मा होने के कारण वह अयोध्या का राजा हुआ ॥१३॥ उसके शकुनि आदि पचास पुन हुए, वे सब उत्तरापथ मे, देश मे रह कर वहां की रक्षा करने लगे ।।१४।। उनके शशाद आदि अडतालीस भाइयो ने दक्षिण दिशा मे रह 'कर उधर के प्रदेशो का रक्षा-कार्य किया ।।१।। शशादस्य तु दायाद ककुत्स्थो नाम वीर्यवान् । इन्द्रस्य वृपभूतस्य ककुत्स्थोऽजयतासुरान् ॥१६ पूर्व माडीवके युद्ध ककुत्स्थस्तेन हि स्मृत । अनेनास्तु ककुत्स्थस्य पृथुरानेनस स्मृत ||१७ विष्टराश्व पृथो पुतस्तस्मादास्त्वजायत । आर्द्रस्य युवनाश्वस्तु श्रावस्तस्य तु चात्मज ॥१८ जज्ञ श्रावस्तको राजा श्रावस्ती येन निर्मिता । श्रावस्तस्य तु दायादो वृहदश्वो महायशा ||१६ कुवलाश्व सुतस्तस्य राजा परमधार्मिक । य स धुन्धुवधाद्राजा धुन्धुमारत्वमागत ॥२० 'धुन्धोर्वधमह ब्रह्मन्छोतुमिच्छामि तत्त्वत । यदर्थ कुबलाश्व सन्धुन्धुमारत्वमागत ॥२१ शशाद के पुत्र कुरस्थ ने एक बार देवासुर सग्राम मे वृप रूपधारी इन्द्र के ऊपर बैठ कर असुरो को जीता था, इसीलिये उसका नाम ककुत्स्थ हुआ।
. मारा, १२४ ] [ श्री हरिवशपुराण उसका पुत्र अनेना, अनेना का पुत्र पृथु का पुत्र विराश्व का आई का युवनाश्व और युवनाश्व का पुत्र श्रावस्त हुआ ।।१६-१८। इसी थावस्त द्वारा श्रावस्तपुरी का निर्माण हुआ था । श्रावस्त के पुत्र वृहदश्व हुए तथा वृहदश्व के पुत्र राजा कुबलाश्व हुए, जिन्होने धू-धु को मारा था, इसलिये उनका नाम घुन्धुमार भी हो गया ।। १६-२० ॥ जनमेजय ने कहा-हे ब्रह्मन् ! राजा कुबलाश्व ने धुन्धु को क्यों जिससे उन्ह धु घुमार नाम की प्राप्ति हुई, वह वृत्तान्त जानने की मेरी इच्छा है ॥२१॥ कुबलाश्चस्य पुत्राणा शतमुत्तमधन्विनाम् । सर्वविद्यासु निपुणा वलवन्तो दुरासदा ॥२२ बभूवुर्धार्मिका सर्वे यज्वानो भूरिदक्षिणा । कुबलाश्व सुत राज्ये वृहदश्चो न्ययोजयत् ।।२३ पुत्रसकामितथीस्तु वन राजा समाविशत् । तमुत्तकोऽय विपि प्रयात प्रत्यवारयत् ॥२४ भवता रक्षण कार्य तत्तावत्कतुमर्हसि । निरुद्विग्नस्तप कतुन हि शक्नोषि पार्थिव ॥२५ त्वया हि पृथिवी राजद्रक्षमाणा महात्मना । भविष्यति निरुद्विग्ना नारण्य गन्तुमर्हसि ॥२६ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् । कुवलाश्व के सौ पुत्र हुए थे, ये सभी धार्मिक, याज्ञिर, विद्वान्, दानी तथा धनुर्वेद में पारगत थे। जब राजा वृहदश्व कुबलाश्व को राज्य सौप कर वानप्रस्थी हो गये थे, तभी ब्रह्मपि उत्तडू ने आकर उन्हें वैमा न करने को कहा ।।२२-२४।। उत्तई बोले-हे राजन् । हमारी रक्षा परना आपका प्रमुख कम है, इसलिये आप यही कार्य कीजिये, अन्यथा आप धान- प्रत्यायम ग्रहण करके भी निद भाव से तपस्या में लीन नहीं हो सकेंगे ॥२५॥ चार जगे महारमा से यह पृथिवी सुरक्षित एव उद्वेग शूप रह सकती है, इसलिये थाप वनको गम मत कीजिये। २६॥ ममाश्रमसमीपे हि समेपु मरधन्वसु । ममुद्रो यानुवापूर्ण उज्जानव इति श्रुत । देवनानामवघ्यश्च महाकायो महावल ॥२७ न्यू का वध ] [ १२५ अन्तभूमिगतम्तन वालुकालहितो महान् । राक्षसस्य मधो पुनो धुन्धुनामा महामुर । शेने लोकविनाशाय तप आस्थाय दारणम् ।।२८ भवत्मरस्य पयन्ते स नि श्वास प्रमुञ्चति । यदा तदा भूश्चलति सर्शलवनकानना ॥२६ तस्य नि श्वासवातेन रज उधूयते महत् । आदित्यपथमावृत्य माताह भूमिकम्पनम् ।।३० सविस्फुलिङ्ग साङ्गार सधूममतिदारुणम् । तेन तात न शक्नोमि तस्मिन्स्थातु स्वकाश्रमे ॥३१ त मारय महाकाय लोकाना हितकाम्यया । लोका स्वम्था भवन्त्यद्य तस्मिन्विनिहतेऽसुरे ॥३२ मेरे याश्रम के पास बात युक्त ममतत मर-भूमि है, वहीं बालू से भरा उग्जानक नामक एक समुद्र है, जिसम देवताओ द्वारा न मारा जाने वाला, महा- पाय तथा अत्यत बलवान मधु पुत्र धुन्ध पृथिवी तल मे वातू के भीतर दिप कर रहता हुआ लोर के विनाशायं घोर तपस्या कर रहा है ।।२७ २८।। वह वर्ष में एक बार ही जब सांस लेता है, तव वनो और पर्वतो से युक्त यह पृथिवी हिलने लगती हैं । ।।२६॥ उमके श्वास से जो धूल उडती है, उसकी भीषणता से मूर्य छिप जाता योर एक सप्ताह तक भूगम्प होता रहता है ॥३०॥ उसके दाम से भयानक चिंगारियां, अगार और गगनचुम्बी धूम्र निक्लता है, इसीलिये मुयसे आश्रम पर नही रहा जाता ॥३१।। इसलिए लोकहितार्थ उम महाकाय यमुर को तुम मार डालो क्योंकि उसके मरत ही वहां के सब प्राणी स्वस्थ हो जायेंगे ॥३२॥ स एवमुक्तो राजपित्तवेन महात्मना । कुवल सुत प्रादात्तम्मै धुन्धुनिवारणे ॥३३ भगवन्यस्तरास्त्रोहमय तु तनयो मम । भविष्यति द्विश्रेष्ठ धुन्गुनारो न संशय ॥३४ स त व्यादिश्य तनय राजपिर्युन्युमारणे । जगाम पर्वतापय तपसे मशिनत ॥५ १२६ ] [ श्री हरिवंशपुरार कुबलाश्वस्तु पुत्राणां शतेन सह पार्थिव । प्रायादुत्तङ्कसहितो धु घोस्तस्य विनिग्रहे ।।३६ तमाविशत्तदा विष्णुर्भगवास्तेजसा प्रभुः । उत्तङ्कस्य नियोगाद्वै लोकस्य हितकाम्यया ॥३७ तस्मिन्प्रयाते दुर्द्धर्षे दिवि शब्दो महानभूत् । एप श्रीमानवध्योऽद्य धुन्धुमारोभविष्यति ।।३८ दिव्यर्माल्यैश्च त देवा. समतात्ममवाकिरन् । देवदुंदुभयश्चापि प्रणेदुर्भरतर्षभ ॥३६ महात्मा उत्तर द्वारा ऐसा कहे जाने पर राजपि वृहदश्व ने धुन्धु को मारने के लिये अपना पुन कुबलाश्व उन्हे सोपते हुए कहा- भगवन् । मैंने शस्त्र का त्याग कर दिया है, इसलिये इस पुत्र को दे रहा हूँ, यही धुन्धु को मारेगा। यह कह कर राजर्षि वृहदश्व तप करने के लिये पर्वत शिखर पर चले गये ।।३३ ३५।। इधर कुबलाश्व अपने सो पुत्रो के सहित महात्मा उत्तङ्क के साथ धुन को मारने के लिये चल दिये ॥३६।। तभी उत्त के प्रार्थना करने पर भगवान विष्णु ने कुबलाश्व के देह में प्रवेश किया ॥३७॥ उस समय अत्यन्त गडगडाहट के साथ आकाशवाणी हुई कि आज कुबलाश्व धुन्धुमार बन जायेंगे ॥३८॥ उस समय देवताओ ने दिव्य पुष्पमालाओ को वृष्टि की और इंदुभियां बजने लगी ॥३॥ स गत्वा जयता श्रेष्ठम्तनय सह वीर्यवान् । समुद्रं खानयामास वालुकार्णवमव्ययम् ॥४० नारायणेन कौरव्य तेजसा व्यापितः स । यभूव स महातेजा भूयो बलसमन्वित. ॥४१ तस्य पुत्रैः पनद्भिस्तु वालुकाहितस्तदा । धुरामादितो राजन्दिशमावृत्य पश्चिमाम् ॥४२ मुगजेनाग्निना मोघाल्लोकानुद्वतंयलिय । पारि मुयाव वेगेन महोदधिरिवोदये ॥४३ का वध ] [ १२७ सोमस्य भरतश्रेष्ठ धारोमिकलिल महत् । स्य पुत्रगत दग्ध लिमिस्न तु रक्षमा ॥४४ तत स राजा कौरव्य राक्षम त महाबलम् । आसमाद महातेजा धु घुधुनिर्वहण ॥४५ तम्य वारिमय वेगमपिवत् स नराधिप.। योगी योगेन वह्नि च शमयामाम वारिणा ।।४६ निहत्य त महानाय वलेनोदकराक्षमम् । उत्तक दर्शयामाम नकर्मा नराधिप. ॥४७ उत्तवन्नु वर प्रादात्तम्म राज्ञे महात्मने। ददी तम्याक्षय वित्त गभिञ्चापराजयम् ॥४८ धर्म रतिं च सतत म्वर्गवाम तथाक्षयम् । पुनाणा चाक्षयां लोकानम्वर्ग ये रक्षमा हता ॥४६ कुबलाइव ने वहां पहुंचते ही अपने पुत्रों से उन बालू के समुद्र को खुद- । बारम्न क्यिा ।।४०।। उस समय कुबलाख वितु तेज से अत्यन्त तेजस्वी ( पराक्रमी हो गये ये ॥४१॥ उन पुनो ने वानू सोदते हुए देखा कि पन्धु श्चम की ओर के म्यान पर लेटा है, उन राजकुमारों को देवठे ही धुन्धु को याग्नि प्रदीप्त हो गई, जिससे कुवनाश्व के मत्तानवे पुत्र भस्म हो गये, देवल न पुत्र शेप रह । इसके पश्चात् चन्द्रोदय होने पर समुद्र को अत्यन्त वेग-वृद्धि ने के समान, घुन्यु का क्रोध अघि वढन पर उसकी देह से अत्यन्त वेग सहित तियार प्रवाहित होने लगी, उस समय वह मम्पूर्ण पृथिवी को जलमग्न करने लिए कृत माल्प-सा प्रतीत होन लगा ॥४-४४॥ हे कुम्नन्दन ' इसके पश्चात् पजा कुवलाश्व ने उसके पास जाकर सब बलधारा वा पान कर लिया और परन यो वा से जल की वपां करके उसका अग्नि बल भी समाप्त कर दिया १४५-४६॥ फिर उन्होंने बलपूर्वर उसे मार डाला और उसका मृतदेह महर्षि त्ति को दिखाया ॥४७॥ उनके ऐसे पराक्रम से प्रसन्न हुए महपि उत्सह ने जनाब को असम धन, विजय, धर्मानुराग, स्वर्ग प्राप्ति तथा उनके मरे हुए तुषों को भी समय लोगों की प्राप्ति का वर दिया ।।४८-४६॥
।
२२८ ]
[ श्री हरिवः
॥ महर्षि गालव की उत्पत्ति ।।
तस्य पुत्रास्त्रय शिष्टा दृढाश्वो ज्येष्ठ उच्यते ।
चन्द्राश्चकपिलाश्वौ तु कुमारौ द्वौ कनीयसौ ॥१
धौन्धुमारिहं ढाश्वस्तु हर्यश्वस्तस्य चात्मज ।
हर्यश्वस्य निकुम्भोऽभूत्क्षनधर्मरत सदा ॥२
सहताश्वो निकुम्भस्य पुत्रो रणविशारद ।
अकृशाश्व कृशाश्वश्च सहताश्वसुतौ नृप ॥३
तस्य हैमवती कन्या सता माता दृपद्वती।
विख्याता त्रिषु लोकेपु पुनश्चास्या प्रसेनजित् ।।४
लेभे प्रसेनजिद्भार्यां गौरी नाम प्रतिव्रताम् ।
अभिशप्ता तु सा भर्ना नदी वै बाहुदाऽभवत् ॥५
तम्या पुत्रो महानासीयु वनाश्वो महीपति ।
मान्धाता युवनाश्वस्य निलोकविजयी सुत ॥६
तस्य चैनरथी भार्या शशबिन्दो सुताऽभवत् ।
साध्वी विन्दुमती नाम रूपेणासदृशी भुवि ॥७
वैशम्पायनजी बोले-हे राजन्
। राजा कुबलाश्व से बचे
पुत्रो मे दृढाश्व ज्येष्ठ था तथा चन्द्राश्व और कपिलाश्व छोटे थे ॥१
का पुत्र हर्यश्व और हर्यश्व का पुत्र निकुम्भ हुआ, जो सदा क्षात्रधर्म पालन
तरपर रहता था ॥२॥ निकुम्भ का पुत्र सहतारव हुआ, वह अत्यत युद्ध पुराल
था, उसके अकृशाश्व और कृशाश्व नामक दो पुत्र हुए ॥३॥ सहताश्व के पदती
नाम की एक कन्या हुई, उस विश्व विख्यात पुत्री का प्रसेनजित् नाम पुत्र
हुआ ॥४॥ प्रसेनजित् की गौरी नाम की पतिव्रता भार्या थी, वह पति रे शाप
या बाहदा नाम की नही होगई थी ॥५॥ गौरी के गर्भ से उत्पन्न पुत्र युवना)
एक महान राजा पा तथा उस युवनाश्व का पुत्र लोक्य विजयी राजा मान्धात
हमा ॥६उमा विवाह सशबिन्दु की मन्या चघरपी के साथ हुआ,
जो
अपने नाम गुण से विश्वात साध्वी स्त्री पी ॥७॥
इपि गालव की उत्पत्ति ]
[ १२६
पनिव्रता च ज्येष्ठा व भ्रातृणामयुतन्य सा।
तस्यामुत्पादयामास मान्धाता द्वा सुतौ नृप ।।८
पुरुकुम च धर्मज्ञ मुचुकुन्द च धार्मिकम् ।
पुरनुत्सनुतश्वासीत्यमद्दम्युमहीपति ॥६
नर्मदायामयोत्पन्न मभूतम्तस्प चात्मज !
मभूतम्य तु दायाद मुधन्वा नाम पार्थिव ॥१०
सुधन्वन सुनश्वासीलियन्वा रिपुमईन ।
राज्ञनियन्वनस्वामीट्टिद्वाम्नग्यारण सुत ॥११
तस्य सत्यत्रता नाम कुमारामून्महागल ।
पाणिग्रहणमन्त्राणा विघ्न चक्रे मुदुर्मनि ॥१२
येन भार्याऽहृता पूर्व कृताद्वाहा परम्य वै ।
वाल्यात्यामाच्च मोहाच्च सहच्चिापलेन च ॥१३
जहार कन्या कामातन कम्यचित्रवासिन ।
अधमंशकुना तेन राजा अय्यारणोऽत्यजत् ।।१४
अपध्वसेति वहृया वदन्कोधसमन्वित ।
पितर सोनवीत्यक्त क्व गच्छामीति वै मुहु १५
वह भी महान् पतियता अपन दस हतार भाइयों की सबस वही अकेली
हेन थी, उसर गभ स मा चाता न दो पुत्र उत्पन किय ॥८॥ प्रथम पुत्र का
म पुत्त और दूमर का नाम मुचुाद हुआ पुरत का पुत्र राजा ग्रनहस्यु
HT III सद्दस्यु न अपनी माया नमदा म सम्भून नामद पुत्र नलन किया,
प सम्भून या पुत्र मुध वा हुना ॥१०॥ मुघ वा के विधवा नार पुत्र हुआ,
'ध वा क जो पुत्र हुआ, वह प्रसारण नामव' अत्यन विद्वान था ॥१२॥ उसमें
पवत नामा एक अत्यत यावान पुत्र हुमा उमन एक नागरिक दवाहित
प में विघ्न उपयित दिया था ॥१२॥ एक समय की बात है-एक नागरिक
विवाह में वर वधू सप्तपदी बोल रहे थे, मत्र बनी पूरा नहीं हुआ था, तभी
तम चचलता, बुदिहीनता और कामुकता व वणीभूत टए सत्यवत न उस
ज्या का माहरण दिरा और उस अपनी नापा बना लिया । उसको उच्छ ।
।
१३० ]
[ श्री हरिवशपुराण
खलता से कुपित हुए महाराज तय्यारण ने उससे कहा-अरे पातकी । दू
हो। इस बात को महाराज ने अनेक बार दुहरा कर उसे त्याग दिया तब सत्य
व्रत ने बारवार अपने पिता से कहा कि आपने मुझे त्याग दिया है तो मैं व
जाऊ ॥१३-१५॥
पिता त्वेनमथोवाच श्वपाकै सह वर्तय ।
नाह पुत्रेण पुत्रार्थी त्वयाऽद्य कुलपासन ॥१६
इत्युक्त स निराकामन्नगराद्वचनापितु ।
न च त वारयामास वसिष्ठो भगवानृषि ॥१७
स तु सत्यव्रतस्तात श्वपाकावसथान्तिके ।
पिना त्यक्तोऽवसद्धीर पिता तस्य वन ययौ ॥१८
ततस्तस्मिस्तु विषये नावर्प पाकशासन ।
समा द्वादश राजेन्द्र तेनाधर्मेण वै तदा १६
दारास्तु विपये विश्वामित्रो महातपा ।
सन्यस्य सागरानूपे चचार विपुल तप ॥२०
तस्य पत्नी गले बद्ध्वा मध्यम पुसमौरसम् ।
शेपस्य भरणार्थाय व्यत्रीणाद्गोशतेन वै ॥२१
त तु बद्ध गले दृष्ट्वा विक्रीयन्त नृपात्मज ।
मर्जािपुर धर्मात्मा मोचयामास भारत ।।२२
सत्यवतो महावाहुर्भरण तस्य चाप रोत् ।
विश्वामिसस्य तुष्टयर्थमनुकम्पार्थमेव च ।।२३
सोऽभवद्गालको नाम गलयन्धान्महातपा ।
महर्षि पौशिवस्तात तेन वीरेण मोक्षित ॥२४
हम पर पिता ने कहा- मैं सुश मोषरा पिता पहलवाना उचित नहीं समाता
इगसिप तु घर चाण्डालो वे माप निवारा बर ॥१६॥ पिता की बात गुन र
परमात मगर छोड़कर बाहर होगया, महीप वशिष्ठ ने भी उसे निवारण ना
लिया ॥१॥ तरसम्वत पाण्डालोरीबस्ती में रहो सगा और पर प्रयाग
पम्प याग र वन में पले गये ॥१८॥ एष विवाह मे विप्न सामने
को पिशकु कथा ] [ १३१ पि के कारण इन्द्र ने उस राज्य में वर्षा नही की ॥१९॥ इसी समय विश्वा- रत्र अपनी भार्या को त्याग कर समुद्र के एक जत्त रहित स्थान म जाकर और तपस्या करन लगे ॥२०॥ तब विश्वामित्र की भार्या ने अपने बीच के पुत्र कठ म रस्मी वाँधी और कुटुम्ब को जीविका के लिये उसे सौ गौआ के मूल्य वचने के लिए चल पडी ॥२१॥ राजपुत्र सत्यव्रत ने मुनिपुत्र को इस प्रकार वक्ते देख कर उसे ले लिया और विश्वामित्रजी की कृपा प्राप्त करने के लिये 'सका भरण पापण करने लग ॥२२ २३ उस बालक के गले मे रस्सी बंधने के कारण उसका नाम गालव हुआ ॥२४॥ ।। त्रिशकु की कथा ॥ सत्यव्रतस्तु भक्त्या च कृपया च प्रतिज्ञया। विश्वामित्रकलन तद्वभार विपये स्थित ॥१ उपाशुव्रतमास्याय दीक्षा द्वादशवापिकीम् । पितुनियोगादवसस्मिन्वनगते नृपे ॥२ अयोध्या चैव राष्ट्र च तथैवान्त पुर मुनि । याज्योपाध्यायसवन्धाद्वसिष्ठ पर्यरक्षत ॥३ सत्यव्रतस्तु वाल्याद्वा भाविनोऽर्थस्य वा वलात् । वसिष्ठेऽम्यधिक मन्यु धारयामास वै तदा ॥४ पिता तु त तदा राज्य त्यज्यमान स्वमात्मजम् । न वारयामास मुनिर्वसिष्ठ कारणेन ह ॥५ पाणिग्रहणमन्त्राणा निष्ठा स्यात्सप्तमे पदे । न च सत्यप्रतस्तस्य तमुपाशुमबुध्यत ॥६ जानन्धर्म वसिष्टस्तु न मा वातीति भारत । सत्यव्रतस्तदा रोप वसिष्ठे मनसाऽकरोत् ॥७ गुणवुद्धधा तु भगवान्वसिष्ठ कृतवास्तथा । न च सत्यव्रतस्तस्य तमुपाशुमवुध्यत 15 वंशम्पायनजी न रहा है राजन् । विश्वामित्रजी के प्रति भक्ति और नकी कृपा प्राप्ति से वसिष्ठजी का महत्व दूर करन के लिये विश्वामित्र- १३२ ] [ श्री हरियापुराण पत्नी का स्वय ही भरण-पोषण करने लगे ॥१॥ पिता द्वारा वन-गमन सिं जाने पर भी राजा सत्यव्रत ने यारह वर्षो तक जनहीन वन में नियासपूर्व प्रतादि नियमो का पालन किया ॥२॥ इस समय में यसिप्टजी ने पुरोहित और आचार्य होने के कारण अयोध्या के राज्य एव अत पुर का रक्षण-कार्य विर ॥३॥ राजा सत्यव्रत दाल चपलता यश भावी अनयं वा वारण वसिष्ठ के मानकर उनसे अत्यन्त रुष्ट थे ॥४॥ क्योदि जब उनके पिता ने उनका त्या किया था, तब वसिष्ठजी ने उन्ह वैसा करने से नहीं रोका, अन्यथा कुछ सम. में उनके पाप का प्रायश्चित्त हो जाता ॥५॥ पाणिग्रहण की पूर्णता सप्तपद होने पर ही सिद्ध होती है, उसके बिना नहीं होती, इसलिये सत्यवत ने परनारं हरण नही, परकन्या हरण किया, जिसका पाप बारह वर्षों तक वनवास पर से दूर हो जायगा, तब सत्यव्रत को पुन राज्य पद पर अभिपिक्त कर दिय जायगा, वसिष्ठ के इन मनोभावो को उन्होने नही समझा ॥६।। उनका को इसी लिये था कि इस प्रकार का दण्ड देते हुए पिताजी को महर्षि ने रोका नह 1७11 तस्मिन्नारितोपो य पितुरासीन्महात्मन । तेन द्वादश वर्षाणि नावपत्पाकशासन ॥ई तेन त्विदानी वहता दीक्षा ता दुर्वहा भुवि । कुलस्य निष्कृतिस्तात कृता सा वैभवेदिति ॥१० न त वसिष्टो भगवान्पित्रा त्यक्त न वारयत् । अभिषेक्ष्याम्यह पुत्रमस्येत्येव मतिर्मुने ।।११ स तु द्वादश वर्षाणि दीक्षा तामुदहबली। उपाशुव्रतमास्याय महत्सत्यवतो नृप ।।१२ अविद्यमाने मासे तु वसिष्ठस्य महात्मन । सर्वकामदुधा दोग्ध्री ददर्श स नृपात्मज ॥१३ ता वै क्रोधाच्च मोहाच्च श्रमाच्चैव क्षुधादित । दशधर्मान्गतो राजा जपान जनमेजय ॥१४ मत्त प्रमत उन्मत्त श्रान्त ऋद्धो बुभुक्षित । त्वरमाणश्व भीरश्च लुब्ध कामी च ते दश ॥१५ 1
त्रिशंकु को कथा ]
[ १३३
तच्च मांसं स्वयं चैव विश्वामित्रस्य चात्मजान् ।
भोजयामास तच्छु त्वा वसिष्टोऽप्यस्य चुक्रुधे ।
क्रुद्धस्तु भगवान्वाक्यमिदमाह नृपात्मजम् ।।१६
पातयेयमहं क्रूर तब शंकुमसंशयम् ।
यदि ते द्वाविमो शंकू न स्याता वकृती पुनः ।।१७
पितुश्चापरितोयेण गुरोदोग्ध्रीवधेन च ।
अप्रोक्षितोपयोगाच्च विविधस्ते व्यतिक्रमः ॥१८
एवं त्रीण्यस्य शंकूनि तानि दृष्ट्वा महातपाः ।
त्रिशंकुरिति होवाच स त्रिशंकुरिति स्मृतः ।।१६
है राजन् ! सत्यव्रत के उम दुष्कर्म से उसके पिता को जो दुःखानुभूति
हुई, उसके कारण इन्द्र ने बारह वर्ष तक उनके राज्य में जल वृष्टि नहीं की
॥ इधर सत्यव्रत को वनवास करते हुए बारह वर्ष होरहे थे, तभी उनके
आश्रम मे बन्न नहीं रहा, देव-वशान् तमी वसिष्ठ को दुधारू गाय को उन्होंने
परते हुए देखा ॥१०-१३॥ तब है जनमनय ! क्रोध, मोह, श्रम से मत्त,
उन्मत्त, प्रमत्त और क्षुधात होने के कारण सत्यव्रत ने उस गौ का बघ कर दिया
और उसका मास स्वयं भक्षण किया और विश्वामित्र के पुत्रों को भी मक्षण
कराया । यह सुन कर अत्यन्त क्रोवपूर्वक महपि वमिष्ठ ने सत्यद्रत से कहा-
यदि तूने पुन: यह पाप न किया होता तो तेरे पहिले पाप को क्षमा कर दिया
जाता, परन्तु अव तो तूने तीन पाप किये है-पिता का संतोप, गुरु की गौ
की हत्या और असस्कृत मास भक्षरण । इन तीन राकुओ (पापों) के कारण
वसिष्ठ ने सत्यव्रत का नाम विश रख दिया, तब से उसकी इस नाम से
प्रसिद्धि होगई ॥१४-१६॥
विश्वामिनस्तु दाराणामागतो भरणे कृते ।
स तु तस्मै वरं प्रादान्मुनिः प्रीतस्त्रिशकवे ॥२०
छन्द्यमानो वरेणाय वरं वत्रे नृपात्मजः ।
सशरीरो बजे स्वर्गमित्येवं याचितो मुनिः ।।२१
१३४ ] [ श्री हरिवंशपुराण अनावृष्टिभये तस्मिन्गते द्वादशवापिके । राज्येऽभिपिच्य पित्र्ये तु याजयामास तं मुनिः ॥२२ मिपता देवताना च वसिष्ठस्य च कौशिकः। सशरीर तदा तं तु दिवमारोपयत्प्रभुः ।।२३ तस्य सत्यरथा नाम भार्या कैकयवंशजा। कुमार जनयामास हरिश्चन्द्रमकरमपम् ॥२४ स वै राजा हरिश्चन्द्रस्त्र शव इति स्मृतः । आहर्ता राजसूयस्य स सम्राडिति विश्रुत. ॥१५ तपस्या पूर्ण करके जब विश्वामित्रजी अपने घर याये तब उन्हें सत्य. व्रत के द्वारा परिवार के भरण-पोषण की बात ज्ञात हुई, जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने सत्यव्रत से वर मांगने को कहा और उनके अनुरोध पर त्रिशकु ने इसी देह से स्वयं प्राप्ति का वर मांगा ०-२१॥ अयोध्या में जद अनावृष्टि साय होगई, तब विश्वामित्र ने उसको राज्य पर अभिपिक्त किया और फिर उस यज्ञ का अनुष्ठान कराया ॥२२॥ अनुष्ठान के पूर्ण होने पर विश्वामित्र ने वसिष्ठजी तया सब देवताओ के देखते-देखते त्रिशकु को स्वर्ग मे भेज दिया ॥२३॥ केकय नरेश के वंश मे उत्पन्न हुई सत्यरथा त्रिशंकु की भार्या हुई, उससे हरिश्चन्द्र वत्पन्न हुए ॥२४॥ हरिश्चन्द्र त्रिशकु के पुत्र होने से बेशकब भी कहे गये और राजसूय यज्ञ करने के कारण सम्राट् बन गये ॥२॥ हरिश्चन्द्रस्य पुत्रोऽभूद्रोहितो नाम वीर्यवान् । येनेद रोहितपुर कारित राज्यसिद्धये ॥२६ कृत्वा राज्यं स राषिः पालयित्वा त्वथ प्रजाः । ससारासारता ज्ञात्वा द्विजेभ्यस्तत्पुर ददौ ।।२७ हरितो रोहिनस्याथ चन्चुर्हारीत उच्यते । विजयश्च सुदेवश्च चन्चुपुत्रौ वभूवतु ॥२८ जेता क्षत्यस्य सर्वस्य विजयस्तेन संस्मृतः । रुरुकस्तनयस्तस्य राजा धर्मार्थकोविदः ॥२६ सगर की उत्पत्ति और सागर बनना ] [ १३५ रुरुकस्य वृक पुनो वृकाद्वाहुस्तु जज्ञिदान् । शकर्यवनकाम्बोज पारदै पह्लव सह ॥३० हैहयास्तालजधान निरस्यन्ति स्म त नृपम् । नात्यर्थं धर्मिकस्तात स हि धर्मयुगेऽभवत् ॥३१ सगरस्तु सुतो वाहोर्जज्ञे सह गरेण च । और्वस्याथममागम्य भार्गवेणाभिरक्षित ॥३२ आग्नेयमस्त्र लब्ध्वा च भार्गवात्सगरो नृप । जिगाय पृथिवी हत्वा तालजद्धान्सहैहयान् ॥३३ शकाना पलवाना च धर्म निरसदच्युत । क्षत्रियाणा कुरुश्रेष्ठ पारदाना म धर्मवित् ॥३४ हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित हुए, जिन्होंने रोहितपुर नामक नगर वसाया १२६॥ राजपि रोहित चिरकाल तक राज-कार्य और प्रजा-पालन करते रहे । कर उन्होंने वह नगर ब्राह्मणों को दान कर दिया ॥२७॥ रोहित के पुत्र हरित ए, हरित के चञ्चु और चञ्चु के विजय तथा मुदेव नामक दो पुत्र हुए ॥२८॥ डे पुन विजय ने समस्त क्षनिय जाति पर विजय प्राप्त की थी, इसीलिये उसे संजय कहा गया । विजय के जो पुत्र हुआ, वह धर्म अर्य का उत्वज्ञाता रुरक IT ॥२६॥ रुक के वृक और वृक के बाहु नामक पुत्र को उत्तति हुई। यह हु अत्यन्त अधार्मिक राजा हुआ, इसलिये वह शक, यवन, काम्बोज, पारद, वि, हैम एव तालाप आदि म्लेच्छ राजाओं के द्वारा राज्यच्युत किया गया ॥३०-३१।। बाहु के सगर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, वह विष (गर) के साथ उत्पन्न होने से सगर कहलाया, उसका पालन भृगुवशी महर्षि और्व के आश्रम में आ पा 1॥३२॥ कुछ समय बाद सगर ने महपि मौर्व से आग्नेयास्त्र प्राप्त करके बालगंध, हैहय आदि राजाओं को मार वर भूमि पर विजय प्राप्त की और शक, पह्नव तथा पारदादि राजाओ को क्षात्र-धर्म से होन कर दिया ।।३३-३४।। । सगर की उत्पत्ति और सागर वनना ॥ क्थ स सगरो जातो गरेणव सहाच्युत । किमयं च शकादीना क्षत्रियाणा महोजसाम् ॥१ १३६ ] [ श्री हरिवयपुराण धर्म कुलोचित मदो राजा निरसदच्युत । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण तपोधन ॥२ बाहोर्व्यसनिनस्तात हृत राज्यमभूक्लि । हैययस्तालजघश्च शकै साद्धं विशाम्पते ॥३ यवना पारदाश्चैव काम्बोजा पहवा खशा । एते ह्यपि गणा पञ्च हैहयार्थे पराक्रमन् ॥४ हतराज्यस्तदा राजा स वै बाहुर्वन ययो। पल्या चानुगतो दुखी स वै प्राणानवामृजत् ॥५ पत्नी तु यादवो तस्य सगर्भा पृष्ठतोऽन्वगात् । सपल्या च गरस्तस्यै दत्त पूर्वमभूत्किल ॥६ सा तु भतु श्चिता कृत्वा वने तामध्यरोहत । और्वस्ता भार्गवस्तात कारुण्यात्समवारयत् ।।७ जनमजय ने कहा--महाराज सगर की उत्पत्ति विप के साथ हुई तो है किस प्रकार जीवित रहे और उन्होंने शक आदि के क्षत्रियोचित धर्म को क्यो, नष्ट किया ? यह मुझे विस्तार सहित बताइये ॥१२॥ वैशम्पायनजी बोले-है राजन् । जब राजा बाहु दुव्यसनो में लिप्त होगया था तब शक, यवनादि ने उसे जीत कर उसका राज्य छीन लिया था और राज्य से भ्रष्ट होने के कारण दु खित होकर वह भार्या सहित वन को चला गया वही उसकी मृत्यु हुई ॥३५॥ जब बाहु की भार्या अपने स्वामी के साथ वन को चली तभी उसकी सौत ने उसे विप पान करा दिया ॥६॥ जर उसका पति मर गया तब वह उसके साथ सती होना चाहती थी परतु महर्षि और्व ने उसे वैसा नही करने दिया ॥७॥ तस्याश्रमे च न गर्भ गरेणैव सहाच्युत । व्यजायत महावाहु सगर नाम पार्थिवम् ।।८ और्वस्तु जातकर्मादि तस्य कृत्वा महात्मन । अध्याप्य वेदशास्त्राणि ततोऽस्त्र प्रत्यपादयत् ॥ई आग्नेय त महावाहुरमरैरपि दुसहम् । स तनास्त्रवलेनाजी बलेन च समन्वित ॥१० ?
सगर की उत्पत्ति और सागर वनना ] [ १३७ हैहयान्निजघानाशु क दो रुद्र पशूनिव । आजहार च लोकेषु कीति कोतिमता वर ॥११ तन शकान्सयवनान्काम्बोजान्पारदाम्तया । पह्नवाश्चैव नि शेपान्क्तुं व्यवमितस्तदा ॥१२ ते वध्यमाना वीरेण मगरेण महात्मना । वसिष्ठ गरण गत्वा प्रणिपेतुर्मनीपिणम् ॥१३ वसिष्ठम्त्वय तान्दृष्ट्वा समयेन महाद्य ति । सगर वारयामाम तेपा दत्वाऽभय तदा ।।१४ उन्ही के आश्रम में उसने विप स्राव के माय सगर को उत्पन्न किया ॥८॥ महपि औवं ने सगर का जात-मं सवारादि करके वेद विद्या और युद्ध पद्या को शिक्षा देकर याग्नेयास्त्र प्रदान दिया। उस अस्त्र के बल से सगर ने हयो को वैसे ही नष्ट कर डाला जैसे रष्ट हुए भगवान शकर ने पशुओ को प्ट कर डाला था। इस कारण सगर को महान यश की प्राप्ति हुई ॥६-११॥ कर उन्होंने भर, यवन, काम्बोज, पारद और पह्नव आदि के नष्ट करने का चार विया ॥१२॥ परन्तु वह राजागरण वसिष्ठजी वो शरण में जाकर रक्षा- विना करने लगे ॥१३॥ वसिष्ठजी ने उन्हें समयदान देकर राजा सगर से नराहार न करने को कहा ॥१४॥ सगर स्वा प्रतिज्ञा च गुरोर्वाक्य निगम्य च । धर्म जघान तेपा वं वैपान्यत्व चकार ह ।।१५ मदं शकाना शिरमो मुण्ड कृत्या व्यमर्जयत् । यवनाना शिर सर्व याम्बोजाना तयव च ॥१६ पारदा मुक्तकेशारचा पह्नवा श्मथ धारिण । नि म्वाध्यायवपट्कारा पृनाम्तेन महारया. ॥१७ स धर्मविजयी राजा विजित्येमा वमुन्धराम् । अब प्रेरयामास वाजिमेधाय दीक्षित ॥१८ तस्य चारयन सोश्व समुद्र पूर्वदलिगे। येलाममीपे पढ्तो भूमि चैव प्रवेशिन ॥
१३८ ] [ श्री हरिदापुराण स त देश तदा पुर्व खानयामास पाथिय । आसेदुस्ते ततस्तत्र खन्यमाने महार्णवे ॥२० तमादिपुरष देव हरि कृष्ण प्रजापतिम् । विष्णु कपिलरूपेण स्वपन्त पुरुपोत्तमम् ।।२१ तव राजा सगर ने गुरु को वात रखने और अपनी प्रतिमा की रण करने के लिये उन राजाओ का वध न करके उनके धर्म और देश में परिवतन कर दिया ॥१५॥ उसके अनुसार शको को अर्द्ध मुण्डित किया, यवनो ओ काम्बोजो को पूर्ण मुण्डित, पारदो को देश-रहित तथा पहवों को मूधार बनाया, और सभी को वेदाध्ययन के अधिकार से च्युत कर दिया ॥१६ १७॥ इस प्रकार राजा सगर ने सम्पूर्ण पृथिवी पर विजय प्राप्त कर अश्वमेघ ५ दीक्षा ली और यज्ञ का घोडा छोड कर उसकी रक्षा के लिये स्वय उसके पो चले ॥१८॥ जब वह अश्व समुद्र तट पर जारहा था, तभी इन्द्र ने उसका अप हरण कर लिया और भूतल मे समा गये ॥१॥ तब राजा सगर ने अपने पुरे से पृथिवी को खुदवाना प्रारभ किया और खोदते-खोदते उनके पुनो ने भगवा विष्णु को महर्षि कपिल के रूप मे योगमग्न बैठे देखा ॥२०-२१॥ तस्य चक्षु समुत्थेन तेजसा प्रतिवुध्यत । दग्धास्ते वै महाराज चत्वारस्त्ववशेपिता ॥२२ बहकेतु सुकेतुश्च तथा धर्मरथो नृप । शूर पञ्चजनो नाम तस्य वशकरो नृप ॥२३ प्रादाच्च तस्मै भगवान्हरिर्नारायणो वरान् । अक्षय वशमिक्ष्वाको कीर्ति चाप्यनिवर्तनीम् ॥२४ पुन समुद्र च विभु स्वर्गवास तथाऽक्षयम् । पुत्राणा चाक्षयाँल्लोकास्तस्य ये चक्षुषा हता ॥२५ समुद्रश्चार्घमादाय ववन्दे त महीपतिम् । सागरत्व च लेभे स कर्मणा तेन तस्य वै ॥२६ त चाश्वमेधिक सोऽश्व समुद्रादुपलब्धवान् । आजहाराश्वमेधाना शत स सुमहायशा । पुलाणा च सहस्राणि पष्टिस्तस्येति न श्रुतम् ॥२७ सूर्यवश का वर्णन ] [ १३६ उन्हें देखते ही सब सगर-पुत्रो ने वहां जाकर उनको योग-निद्रा भग कर , तब नेत्र खोलते ही कपिल भगवान् रे नेत्रो से अग्नि निकलने लगी, जिसमें गिर पुत्र भस्म होगए । परन्तु, उनमें से चार पुत्र बहके, सुवेतु, धर्मरथ और चजन भस्म होने से बच रहे ॥२२-२३।। तभी भगवान ने प्रकट होकर सगर वर दिया--तुम्हारा वरा अक्षय तथा यश स्थायी होगा, यह समुद्र तुम्हारा व होगा और अन्त मे तुम्हें तथा तुम्हारे सभी पुत्रों को अविनाशी लोर को प्ति होगी ।।२४-२५॥ इस प्रकार का वर देते ही समुह दोनो हाथो मे अर्घ्य पत्र लेकर राजा के समक्ष उपस्थित हुआ, महाराज ने उसे तभी से अपना पुत्र Imना और उसका नाम सागर हो गया ॥२६॥ उसी समुद्र में महाराज को अपना श्व प्राप्त होगया, जिससे अश्वमेध यज्ञ की निविघ्न रूप से समाप्ति हुई सुना गया है कि राजा सगर साठ हजार पुत्र थे ।॥२७॥ ।। सूर्य-वरंश का वर्णन ॥ सगरस्यात्मजा वीरा कथं जाता महात्मनः । विक्रान्ता पप्टिसाहस्रा विधिना केन वा द्विज ॥१ द्वेभायें सगरस्यास्ता तपसा दग्धकिल्विपे । ज्येष्ठा विदर्भदुहिता केशिनी नाम विथ ता ।।२ कनीयसी तु या तस्य पत्नी परमर्मिणी। अरिष्टनेमिदुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥३ और्वस्ताभ्या वर प्रादात निवोध जनाधिप । पष्टि पुत्रसहवाणि गृह्णात्वेका तपस्विनी ॥४ एकं वशधर त्वेका यथेष्ट वरयत्विति । तसेका जगृहे पुयाल्लुन्या शूरान्वस्तिया ॥५ एक वंशधर त्वेका तथेत्याह च ता मुनिः । केशिन्यमूत सगरादसमन्जसमात्मजम् ॥६ राजा पञ्चजनो नाम बभूव सुमहाबलः । इतरा मुपुर्व तुम्बी वीजपूर्णामिति ध्रुतिः ॥७ जनमेजय मोने है ब्रह्मन् ! महाराज सगर के सार हजार पुत्र रिस १४० ] [ श्री हरिवंशपुराण प्रकार हुए । ॥१॥ वैशम्पायनजी ने कहा है राजन् । महाराज सगर ये दो रानियां थी, उनमे विदर्भराज पुत्री केशिनी बडी थी ॥२॥ छोटी रानी बरिष्ट नेमि की अत्यन्त सुन्दरी कन्या थी ॥३॥ एक दिन महपि ओवं ने उन्हें बुलाकर कहा-तुम मे से एक रानी साठ हजार पुत्र का, और दूसरी वेवल एव हो पुर होने का वर मांगे ॥४॥ छोटी रानी ने साठ हमार और वही ने एक पुत्र वं याचना की, इसके अनुसार केशिनी ने असमजस नामक एक पुत्र उत्पन्न किय ॥५-६॥ असमजस को पचजन भी कहते थे, वह असामान्य वीर था और छोर्ट रानी के गर्भ से एक तूम्वे की उत्पत्ति हुई ॥७॥ तर पष्टिसहस्राणि गर्भास्ते तिलसमिता । सबभूवुर्यथाकाल ववृधुश्च यथाक्रमम् ।।८ घृतपूर्णेषु कुम्भेपु तान्गर्भान्निदधे पिता। धात्रीश्चकैकश प्रादात्तावतीरेव पोषणे ।। ततो दशसु मासेषु समुत्तस्थुर्यथासुखम् । फुमारास्ते यथाकाल सगरप्रीतिवर्धना ॥१० पष्टिपुत्रसहस्राणि तस्यैवभवन्नृप । गर्भादलाबुमध्याद जातानि पृथिवीपते ॥११ तेपा नारायण तेज प्रविष्टाना महात्मनाम् । एक पञ्चजनो नाम पुत्रो राजा बभूव ह ।।१२ स्त पञ्चजनस्यासीदशुमान्नाम वीर्यवान् । दिलीपस्तनयस्तस्य खट्वाङ्ग इति विश्रुत ।।१३ येन स्वर्गादिहागत्य मुहूर्त प्राप्य जोवितम् । प्रयोऽनुसधिता लोका बुद्धया सत्येन चानघ ।।१४ उस तूम्बे से तिल के बराबर साठ हजार पुत्र हुए, वे धीरे-धीरे वृद्धि व माप्त होने लगे ।।८।। सगर ने एक-एक पुत्र को एक एक घृत-घट में रखवा १ प्रत्येक पुत्र के लिये एक पाय की नियुक्ति करदो ॥६॥ दस महीने व्यतीत हो पर सभी बालक परिपुष्ट होकर राजा सगर को सुख वृद्धि करने लगे ॥१० सूर्यवंश का वर्णन ] [ १४१ है जनमेजय ! इस प्रकार तूम्बे से राजा सगर के साठ हजार पुत्रो की उत्पत्ति हुई ॥११॥ उन सब राजपुत्रों में नारायण का तेज था, परन्तु राज्यपद पर संचजन का ही अभिपक हुआ था॥१२॥ उम पंचजन का पुत्र मंशुमान हुआ, अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए, इन्हें मट्याग भी कहा गया है ॥१३॥ ये सट्दाग स्वर्ग से पृथियो तल पर केवल एप मुहूर्त के लिये बाये थे और इतने ही समय में उन्होंने अपने घ्यान वल से सम्पूर्ण त्रैलोक्य को ब्रह्ममय जान लिया ॥१४॥ दिलीपस्य तु दायादो महाराजो भगीरयः । यः स गङ्गा सरिच्छेष्ठामवतारयत प्रभुः ॥१५ कीर्तिमान्स महाभागः शक्रतुल्यपराक्रमः । समुद्रमानयञ्चनां दुहितृत्वेन कल्पयत् । तस्माद्भागीरथी गङ्गाः कथ्यते वंचिंतकः ॥१६ भागीरथसुतो राजा थुत इत्यभिविश्रुतः । नाभागस्तु श्रुतस्यासीत्पुतः परमधार्मिकः ।।१७ अम्बरीपस्तु नामागिः सिंधुदीपपिताऽभवत् । अयुताजित्त दायादः सिंधुद्वीपस्य वीर्यवान् ॥१८ अयुताजित्सुतस्त्यासीहतुपर्णो महायशाः । दिव्याक्षहृदयज्ञो चै राजा नलसखो बली ॥१६ ऋतुपर्णसुतस्त्वासीदातु पणिमहीपतिः । सुदासस्तस्य तनयो राजा त्चिन्द्रमसोमवत् ।।२० सुदासस्य सुतम्त्वासीत्सौदासो नाम पार्थिवः । स्यातः कल्माषपादो वै नाम्ना मित्तमहस्तया ॥२१ दिलीप के पुत्र भगीरप हुए, उन्होंने ही पिषी पर गगाजी को अवत- रित रिया ॥१५॥ यशस्वी भगीरथ ने गगाजी को पुत्री म्प में प्राप्त परफे उसे समुद्र तक पहुंचा दिया, इसीलिये गंगा मागीरपी पे नाम से प्रमिद हुई ॥१६॥ भगीरथ ये पुन धृत और प्रत वा पुत्र नाभाग हा ॥१७॥ नामाग के पुत्र अम्बरोप, अम्बरोप में मिन्धद्वीप और निन्द्वीप के ययुतानि हुभा ॥१अयु- १४२ ] [ श्री हरिवशपुराण ताजित का पुत्र ऋतुपर्ण हुआ वह धूत क्रीडा के मर्म का ज्ञाता और परम यशस्वी था, राजा नल के साथ उसका अत्यन्त सख्य भाव था ॥१६॥ ऋतुपर्ण के आतु पणि हुआ, आतु पणि का पुत्र सुदास हुआ वह इन्द्र का सखा था ।।२०। सुदास का पुन सौदास था, उसे कल्मापपाद और मियसह भी कहते थे ॥२१॥ कल्माषपादस्य सुत सर्वकर्मेति विश्रु त । अनरण्यस्तु पुनोऽभूद्विश्रु त सर्वकर्मण ॥२२ अनरण्यसुतो निघ्नो निधनपुत्री बभूवतु । अनमितो रघुश्चैव पार्थिवर्षभसत्तमौ ॥२३ अनमितस्य धर्मात्मा विद्वान्दुलिदुहोऽभवत् । दिलीपस्तनयस्तस्य रामस्य प्रपितामह ॥२४ दीर्घवादिलीपस्य रघुनर्नाम्नाऽभवत्सुत । अयोध्याया महाराजो रघुश्चासीन्महाबल ॥२५ अजस्तु रघुतो जज्ञे अजाद्दशरथोऽभवत् । रामो दशरथाज्जज्ञे धर्मात्मा सुमहायशा ॥२६ रामस्य तनयो जज्ञे कुश इत्यभिविश्रु त । अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निपधस्तस्य चात्मज ॥२७ निपधस्य नल पुत्रो नभ पुतो नलस्य तु । नभस्य पुण्डरीपस्तु क्षेमधन्वा तत स्मृत ॥२८ पल्माएपाद का पुत्र सर्वधर्मा हुआ तया सवर्मा का पुत्र अनरण्य हुआ ।।२२।। अनरण्य का पुत्र निघ्न हुआ, उस निघ्न ये अनमित्र और रघु नामक दो पुष हुए ॥२३॥ अनमित्र ये दुनिनुह और दुलिदुह के दिलीप हुए, यही श्री रामचन्द्रजी के प्रपितामह घे ॥२४॥ दिलीप के पुत्र रघु हुए, इन्ह अयोध्या के राग्यासन पर मभिपिषत दिया गया ॥२५॥ रघु के पुत्र अज और अन के पुत्र पारप हुए, इन्हीं दयरपये परम यगवान एव धर्मारमा भगवान् राम ने सम्म सिपा पा ॥२९॥ राम पुत्र दुश हुए, कुरा के पुत्र अतिथि, अतिपिरे पुत्र विश का वर्णन ] [ १४३ हुए ॥२७॥ निषध दे नल, नल के पुत्र नम, नम वे पुण्डरीन ठपा पुइ- पुत्र क्षेमपन्वा ?ए ॥२॥ क्षेमधन्वसुनस्वामीदे॒वानीक प्रतापवान् । बामीदहीनगुर्नाम देवानोक्नुत प्रभुः ॥२६ अहीनगोम्नु दायाद नुसन्या नाम पार्थिव. । सुधन्वनः मुतश्वव ततो जनेऽनलो नृप. ॥३० उक्यो नाम म धर्मात्माऽनलपुतो वमूव ह । वज्रनामः सुतस्तस्य क्यम्य च महात्मन. ॥३१ शंखम्तस्य मुतो विद्वान्च्युपिनाच इति श्रुत.। पुप्यम्नस्य सुनो निद्वानयंमिदिम्नु तत्सुत. ॥३२ सुदर्शन. मुतस्तन्य अग्निवर्ण मुदर्शनात् । अग्निवणंम्य शोघ्रस्तु शीघ्रस्य तु मर मुत. ॥३३ मरम्नु योगमाम्याय कलापीपमास्थित.। तस्यासीद्विथु तवत. पुतो राजा वृहद्वलः ।।३४ नलो द्वावेव विख्याती पुराणे मरतपंन । वीरसेनात्मजञ्चव यश्चक्ष्वाकुकुलोद्बह ॥३५ इक्ष्वाकुवंशप्रभवा. प्रधान्यनेह कोनिता. । एते विवस्वतो वशे राजानो भूरितेजस ॥३६ पटन्सम्यगिमा सृष्टिमादित्यस्य विवम्वतः । याददेवस्य देवम्य प्रजाना पुष्टिदम्य च ॥३७ प्रजावानेति मायुज्यमादित्यस्य विवम्वन. । विपाप्मा विरजाश्चैव आयुप्माश्च भवत्युन ॥३८ क्षेमपन्या रे पुत्र देवानीर, देवानी में यहाँनगृहा के मुघन्वा तपा धन्वारे पुत्र अनल हुए ।।२६-३०॥ यनल का पुत्र सपा, अप का वय. म और पसनाम का पुत्रास हा, घरा को मुश्तिाव भी कहे पेशग पुत्र पुरा और पुत्र का पुत्र अमिट हा ॥३१.३२॥ अमिट का पुर सांन, मुदन अग्निवर्ग, अग्निवरा जोन और गोत्र पुत्र मर हुआ,
१४४ ]
[ श्री हरिवशपुराण
उसने कलापद्वीप मे जाकर योगाभ्यास किया,उसका पुत्र बृहदन हुआ ।।३३३४॥
'पुराणो मे नल नाम पे दो राजाओ का वृत्तात उपलब्ध है, उनमे एक वीरसन
का पुत्र हुआ और दूसरा इक्ष्वावु वश म उत्सन्न हुआ था ॥३५॥ म प्रमा
सब प्रधान इक्ष्वाकु वशीय राजाआ क नाम मैंन तुम्ह कह दिय हैं। यह सभी
राजागण सूयवश मे उत्तन हुए थ ॥३६॥ जो लोग प्रजाजना के लिय पुस्टिकर
श्राद्धदेव की वशावली का पाठ करत हैं ये पाप रहित तया आयुष्मान और पुत्र
चान होकर अ त मे आदित्य लोक को प्राप्त होते हैं ।।३७-३८॥
॥ वराह, नृसिंह आदि अवतार ।।
प्रादुर्भावान्पुराणेषु विष्णोरमिततेजस ।
सता क्थयतामेव वाराह इति न श्रु तम् ।।१
न जाने तस्य चरित न विधि नैव विस्तरम् ।
न कर्मगुणसतान न हेतु न मनीषितम् ।।२
विस्तरेणव कर्माणि सर्वाणि रिपुघातिन ।
श्रोतुमिच्छाम्यशेषेण हरे कृष्णस्य धीमत ॥३
कर्मणामानुपूर्व्याच्च प्रादुर्भावाच्च या विभो ।
या चास्य प्रकृतिब्रह्म स्ता च व्याख्यातुमर्हसि ॥४
क्थ च भगवान्विष्णु सुरशत्रु निषूदन ।
वसुदेवकुले धीमान्वासुदेवत्वमागत ॥५
अमररावृत पुण्य पुण्यकृद्भिनिपेवितम् ।
देवलोक समुत्सृज्य मर्यलोकमिहागत ॥६
देवभानुपयोर्नेता यो भुव प्रभवो विभु ।
किमर्थ दिव्यमात्मान मानुष्ये सन्ययोजयद ॥७
यश्चन वतयत्येको मानुपाणामनामयम् ।
मानुये स क्थ बुद्धि चक्र चक्रभृता वर ॥८
गोपायन य कुरते जगत सर्वलोक्किम् ।
सपथ गा गतो देयो विष्णुर्गोपत्वमागत (IN६
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[ श्री हरियशपुरा स्र क्सोम शूर्पमुशल प्रोक्षण दक्षिणायनम् । अध्वयु सामग विप्र सदस्य सदन सद ॥६ यूप समित्कुश दवी चमसोलुखलानि च । प्राग्वश यज्ञभूमि च होतार चयन च यत् ॥७ हत्वान्यतिप्रमाणानि चराणि स्थावराणि च । प्रायश्चित्तानि चार्थ च स्थण्डिलानि कुशास्तथा ।।८ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन । तुमने मुझ पर कठिनाई से ढोए जाने वाला प्रश्न भार लाद दिया है। आज आपने सौभाग्यवश श्रीकृष्ण की कथ सुनने की इच्छा की है, इसलिये मैं उनकी कथा तुम्हारे प्रति कहता हूँ, मुनो ।।१-२॥ वेद वे जानने वाले ब्राह्मण जिसे सहस्राक्ष, सहस्रास्य सहस्रभुज, अव्यय सहस्रशिर, सहस्रकर, सहस्रजिह्व, सहस्रमुकुट, सहसदत, सहस्रादि आदि कहते हैं ॥३.४।। जो अक्षय सवन, हवन, हव्य, होता, पवित्र पान, यज्ञवेदी, दीक्षा- सव, सोम, सूर्य, मुसल प्रोक्षणी पात्र तथा दक्षिणायन हैं, जो सामगान करने वाले विष, यज्ञ के सदस्य, यज्ञ सदन सभा, यूप, समिधा, कुश, चमस, उलूसल, प्राग्वश, यज्ञभूमि, ऋत्विज्, स्थण्डिल, शकट इत्यादि हैं तथा जो सोमक्रयार्थ स्थावर, जगम, प्रायश्चित, अर्घ और कुश हैं ॥५॥ मन्त यज्ञवह वह्नि भाग भागवह च यद । अग्रेभुज सोमभुज धृताविषमुदायुधम् ।।६ आहुदविदो विप्रा य यज्ञ शाश्वत विभुम् । तस्य विष्णो सुरेशस्य श्रीवत्साकस्य धीमत ११० प्रादुर्भावसहस्राणि अतीता न सशय । भूयश्चैव भविष्यन्तीत्येवमाह प्रजापति ॥११ यत्पृन्दसि महाराज पुण्या दिव्या कथा शुभाम् । यदर्थ भगवान्विष्णु सुरेशो रिपुसूदन । देवलोव समुत्सृज्य वसुदेववुलेऽभवत् ॥१२ यत्तऽह सप्रवक्ष्यामि शृणु सर्वमशेपत । वासुदेवस्य माहात्म्य चरित च महाद्यते ॥१३ [ १४३ भगयान् विष्णु के अवतार ] हितार्य मुरमत्यांना लोकाना प्रभवाय च । बहुग सर्वभूतात्मा प्रादुर्भवति कार्यत ॥१४ प्रादुर्भावाश्च वदयानि पृथ्यान्दिन्यगुणयु तान् । छान्दसीमिरदाराभि श्रुतिमि समलतान् ॥१५ शुचि प्रयतगरभूत्वा नियाध जनमेजय । इद पुराण परम पुप्य वेदनममितम् ॥१६ हल ते पथपियामि विष्णोदिव्या क्या गृण । यदायदा हि धमन्य ग्लानिर्भवति भारत। धर्मसम्पापनार्थाय तदा सम्भवति प्रभु ॥१७ जो मत्र, यरह, वलि भाग, नागवह, अप्रेमुन, सोनमुन, हतापि, उपायुप, एक झायत मिनु हैं, उन प्रोपागापित भगवान् देवदेव श्री नारापरा सरा अवतार मा यार हो पा है और सभी प्रजापति के द्वारा मुना है निवे पुन मरवार धारण करेंगे ।।१-११॥ हे महाराज । भगवान् विष्णु उग निम्म देह और देवलोर को मोड पर वमुदारे यहाँ यों अवतीहए, तुम्हारा यह प्रश्न अस्पना प्ठ है ॥१२॥ इम प्रश्न के समाधान स्वार मैं तुम्हें उना माहा एक चलि आदिम यन्त हर गुनाता हूँ, तुम उ मन , प्रत परो॥१३॥ ये भगवान सभी भूतों के बारमा है सपा देवनासा और मनुष्यों के पत्याए के निमित पारगर पाती होउ हैं ॥१४॥ भगवान् विष्णुक पित्र परित सामनना पुरा और यररे समान पृमरत का देने वाता है, इसतिरे तुम सा कपूर समय बित्त से इस माम्शन का मनो, मावान् रा अवतार यमी होग! परन्तु में प रा हाम होग। उस समय ये पमा पुन स्पारन पठ॥१५.१७॥ तम्य होया महाराज मूर्तिमंयनि सत्तमा । नित्य दियिष्ठा या राजगमारी दुग्धम् ॥१८ दिलीपा पाम्प सपने निहायोगमुपायो। प्रजागहारमा निममारमपिपिनाम् ॥
१४८ ] [ श्री हरिवंशपुराण सुप्त्वा युगसहस्र स प्रादुर्भवति कार्यतः । पूर्णे युगसहसू तु देवदेवो जगत्पतिः ॥२० पितामहो लोकपालाश्चन्द्रादित्यो हुताशनः । ब्रह्मा च कपिलश्चैव परमेष्ठी तथैव च ||२१ देवा. स्प्तर्षयश्चैव त्र्यम्बकश्च महायशाः । वायु समुद्रा. शैलाश्च तस्य देह समाश्रिताः ॥२२ सनत्कुमारश्च महानुभावो मनुर्महात्मा भगवान्प्रजाकरः । पुराणदेवोऽय पुराणि चक्र प्रदीप्तवैश्वानरतुल्यतेजाः ।।२३ येन चार्णवमध्यस्थी नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्ट देवासुरगणे प्रनष्टोरगराक्षसे ॥२४ योद्ध कामौ सुदुर्धर्षों दानवौं मधुकैटभौ । हती प्रभवता तेन तयोर्दत्त्वाऽमित वरम् ॥२५ धर्म के पुनस्र्थापन के लिये भगवान की जो मूर्ति प्रादुर्भूत होती है वह उनको राजसी मूर्ति कही जाती है और जो श्रेष्ठ मूर्ति देवलोक में स्थित रह कर सदा सप-रत रहती है, वह सात्विक कहलाती है ॥१८॥ उनकी जो मूर्ति सृष्टि के सहारार्थ सदा योगनिद्रा का अवलम्बन किये रहती है, वह तामसी मूर्ति है ॥१६॥ योगनिद्रा के आश्रय मे वे भगवान् एक हजार युग तक शयन करते रहते हैं। इसके पश्चात् पुन मृष्टि-रचना मे लग जाते हैं ।।२०।। उस समय ब्रह्माजी, सभी लोकपाल, सूर्य-चन्द्र, अग्नि, कपिलमुनि, सप्तर्पि, यम्बक, वायु, समुद्र, सनत्कुमार और प्रजापालक मनु उन भगवान् से ही उत्पन्न होते हैं, तभी प्रदीप्त अग्नि के समान अत्यन्त तेज वाले वे पुराण पुरुप ग्राम, नगर आदि की भी रचना घरते हैं ॥२१-२३॥ जब एक हजार युग प्यतीत हो जाते हैं, उव सम्पूर्ण सृष्टि उन्ही के देह में विलीन हो जाती है। इस प्रकार सभी स्थावर- जगम जीव, देवता, अमुर, राक्षस, उरग आदि के नारा को प्राप्त होने पर अब दो दुर्दान्त दैरय मधु पेटम भगवान् श्री विष्णु से युद्ध करने के लिये उपस्थित हए, तब उन्होंने उन दानवो को मोक्ष प्राप्त कराने धाला दर देकर समुद्र में ह मप्टकर दिया ।२४-२५॥ चारो
मगगन रितु के अवतार ]
[ १४३
पुरा पमनामन्य स्त्रपत. सागराम्मति
पुष्परे यत्र मनूना देवा सपिगा. पुरा ॥२६
एप पौरको नाम प्रादुर्भावो महात्मन. ।
पुराणे पस्यते यत्र देव श्रुतिममाहित ॥२३
वाराहम्तु थतिनु: प्रादुर्भावो महान्मन. ।
यस विष्णु.मुरयष्टो वाराह स्पमास्थित.।
मही सागरपन्ना मगंलवनकाननाम् ।।२८
वैदपादो यूपदष्टः मनुदन्तश्विनीमुरः ।
अग्रिजिह्वो दर्मरोमानह्मगीर्पो महातपाः ।।२६
महोरायणो दिव्यो वेदाङ्गविभूषण ।
आग्पनाम. च वतुण्ठ सामघोपवनी महान् ॥३०
एर एमय पर भगवान् योगनिहारे यार में पोरगि में घो रहे थे,
भी उनरी नानि से एप पमन उन हुआ, विमर्म मह्मादि देवताओं और
लियोनी उपसि। इसलिए भगवान रे उग बपवार को पुरातार
परत ॥२९.२७॥ है रारन् ! नारापारा वाययवार मुनने में रामपुर
राम अवतार में नारापन ने वारद र पात पिया पर और इन्दनि ममुर
में होगर उस में ही हुई दन पत्रों में पुरस दिवी से करने दामों में
बिना पा पाराश्यकार र पारों वे नर पर पे,पूर ,
पर हाप, ति मुग, अग्नि गिरोन, हिसा-रापि मैत्र, वेदान सानों
में मामूल्य पर नानिमा, ए.पानुग मोर गामान उन पन्ट पर पा
॥२१.३011
पर्ममत्वमर श्रीमान्समविस्ममात.।
मापतितनयो पोर. गुजान महामुन.॥३१
उदगामनोहमतिमा पनीरमहोपधि ।
यापनरामा मन्यपिपिरा. मोगाग्नि, ॥१२
पोपोविनयरिंगवान् ।
प्रापारापोनिमान्नानाशाभिरापिठ. ॥३३
१५० ]
[ श्री हरिवंशपुराए
दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान् ।
उपाकर्मोष्ठरुचक प्रवर्यावर्तभूषण ॥३४
नानाछन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासन ।
छायापत्नीसहायो वै मेरुशृङ्ग इवोच्छ्रित ॥३५
मही सागरपर्यन्ता सशलवनकाननाम् ।
एकार्णवजले भ्रष्टा मेकार्णवगता प्रभु ॥३६
दष्ट्रया समुद्धृत्य लोकाना हितकाम्यया।
सहस्रशीर्षों देवादिश्चमार पृथिवी पुन ||३७
एव यज्ञवराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना ।
उद्धृता पृथिवी सर्वा सागराम्बुधरा पुरा ॥३८
धर्म और सत्य श्री थे, पशु दोनो जघा, कार्य विक्रम सक्रिय, प्रायश्चि
अत्यन्त घोर नख,उद्गाता अर, होम उपस्थ, सब थोपधियां वीर्य, वायु अतरात्म
मत्र स्फिक्, विकृत सोम रवत, वेदी स्कध; हवि गध, हव्य-कव्य वेग, प्रा वश देह
दक्षिण हृदय, स्वाध्याय स्वीकार, ओष्ठ भूषण तथा धर्म स्थापना के लिये महा-
पौर रूप मे परिणति हो उनके आभूषण थे ॥३१-३४॥ विविध छन्द मार्ग हुए,
गुप्त उपनिषद भासन, छाया पत्नी रूपा हुई। उस समय इस प्रकार का यज्ञ वाराह
रूप धारण करने वाले दोक्षाचित, योगी, सत्यधर्ममयात्मक सहस्र
घोपं भगवान विष्णु ऐसे देह को धारण करके सुमेरु शृङ्ग के समान भत्यन्त
के हो गए, फिर उन देवादिदेव भगवान् ने लोककल्याणार्थ जल में प्रवेश करके
पर्वतो और धनो से परिपूर्ण पृथिवी को समुद्र से निकाला ॥३५-३८।।
चाराह एप पथितो नारसिंहमत शृणु ।
यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुहंत ॥३६
पुरा कृतयुगे राजन्सुरारिवंलदर्पित ।
दैत्यानामादिपुरपश्चचार तप उत्तमम् ॥४.
दश वर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च।
जलोपवासनिरत स्थानमोनदृढव्रत ॥४१
भगवान् विष्णु के अवतार ]
[ १५१
तनः गमदमान्यां च ब्रह्मचर्यण चानघ ।
ब्रह्मा प्रोतोऽभवत्तम्य तपसा नियमेन च ॥२
तं च म्वयंभूमंगवाल्ययमागन्य भूपते ।
विमानेनावणेन हंसयुक्तेन भास्वता ॥४३
आदित्यवमुमिः साध्यमद्भिवतः मह ।
रविधमहामंत्र यक्षराक्षमकिन्नरः ।।४४
दिशाभिरिदिगाभिन्च नदीभिः सागरम्तया।
नक्षत्रश्च मुहनश्व चरेश्च महाग्रहः ॥४५
देवपिभिन्नपोवृद्ध : मिद : मपिभिस्तया।
राजपिभिः पुग्यतमगन्धर्वश्चाप्मरोगः ॥४६
चराचरगुरुः श्रीमान्वृतः नर्वः मुरंम्तया।
ब्रह्मा ब्रह्मविद प्रेतो दन्यं वचनमग्रवीत् ॥४७
यह भगगन के वाराहावार का पान हमा, यव उम ननिहावतारा
नाभि पारण कर भगवान् विष्णु ने हरिप्पमिका महार
या या प्रायोनार की यात है, मादुग में देररात्र हिराशि ने
स समान महारे पाहतार वर्षों तक गरमपूर्वक धार तपस्मा को पो
१०.४१॥ उमाम-मामि गुण, महापर्व
,, तर मालिकों में प्रल्लाती
का प्रसन्न हुए। ४२॥ रियादित, यगु, गाय, मात्र, ए, सा, पण,
मरा, पिलर, दिर, विनि, नदी, ममुर, नात्र, मुर्ग, पर, महामहा देशनि,
समान, रातिएप मप विदेरीपमान मानी अनि ममम रिमान
पर हिरमातुरे 7 बार पाने को 18X10
प्रीग्नि तब मन पमपमान गुन ।
पर यग्य भर से पपेट नाममातुः ॥४
नगनुरगगन गगना।
नमानुगःविापान निहायुमा मपंचन ॥
सपनो दान माला नोरतामर ।
गानी गोपन
[ श्री हरिवा नशस्त्रेण न चास्त्रण गिरिणा पादपेन वा। न शुष्केण न चाण स्यान्न चान्येन मे वध ॥५१ पाणिप्रहारेणकेन सभृत्यबलवाहनम् । यो मा नायितु शक्त स मे मृत्युभविष्यति ॥५२ भवेयमहमेवार्क सोमो वायुई ताशन । सलिल चान्तरिक्ष च नक्षत्राणि दिशो दश ।।५३ अह क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यम । धनदश्च धनाध्यक्षो यक्ष दिपुरुपाधिप ॥५४ . हे श्रेष्ठ व्रत वाले ! मैं तुम्हारे तप से अत्यन्त प्रसन्न हूँ, तुम इच्छित मांगो, तुम्हारी कामना अवश्य पूरी होगी ॥४८॥ हिरण्यकशिपु ने कहा-हे ह पितामह । मुये ऐसे वर की कामना है, जिससे देवता, गधर्व, असुर, यक्ष, उरग, राक्षस, पिशाच और मनुष्य मे से कोई भी मेरा वध न कर सके ॥४६तपोभूर से युक्त मृपि भी रुष्ट हो जाये तो मुझे शाप न दे सकें और शस्त्रास्त्र, पर्व वृक्ष या शुष्क अथवा आद्र कोई भी पदार्थ मेरी मृत्यु का कारण न हो ॥५०-५१॥ जो एक थप्पड मार कर ही भृत्य सेना, वाहनादि के सहित मुझे नष्ट कर सके, मैं उसी के हाथ से मृत्यु को प्राप्त होऊ, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकार, नक्षत्र, दसो दिशाएँ, काम, क्रोध, वरुण, इन्द्र, यम, कुबेर, यक्ष और किम्पुरुषो का अधीश्वर भी मैं ही हो जाऊं ॥५३ ५४॥ एवमुक्तस्तु दैत्येन स्वयभूभगवास्तदा। उवाच दैत्यराज त प्रसन्नृपसत्तम ।।५५ एते दिव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुता । सर्वान्कामानिमास्तात प्राप्स्यसि व न सशय ॥५६ एवमुक्त्वा तु भगवाजगामाकाशमेव हि । वैराज ब्रह्मसदन ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥५७ थु त्वा देवा वर त च दत्त सलिलयोनिना। विभु विनापयामासुर्देवा शपुरोगमा ॥५८
भगवान् विष्णु के अवतार ]
[ १५३
ततो देवाश्च नागारच गया मुनयन्नया ।
वरप्रदान धन्वा ते पितामहमुपस्थिना ॥५६
वरेणानेन भगवन्वधिप्पनि म नोमुर ।
तत प्रसीद भगवन्वघोऽप्यस्य विचिन्त्यताम् ।।६०
भगवान्मवंभूताना स्वयंभूरादिवृद्विभु ।
चप्टा च हव्यन्यनामव्यक्त प्रकृतिघ्रव ॥१
सर्वलोरहिन वाक्य शुत्वा देव प्रजापनि ।
प्रोगाच भगवान्वाक्य सर्वान्देवगणाम्नदा ॥
अवश्य दिशाम्तेन प्राप्नय तरस फ्लम् ।
तपमोन्म्य भगवान्वर वि' वरिप्यति ॥६३
एव त्वामुरा सव वाश्य पकजसमवान् ।
म्यानि म्यानानि दिव्यानि जग्मुन्ते व मुदान्विता ॥
हिरपशि के इस प्रकार वहन पर रदयभू ब्रह्मानी में हमने हुए कहा
५५॥ ब्रह्माजी बोले- मैं तुम्हें यह अद्भुत यर देता है, तुम्हारी सब इन्चार्य
होगी, मना नहीं है ॥५६॥ यह कह कर ब्रह्माजी आगगा मार्ग से
इन पिचों द्वारा मेदितु ब्रह्मलोरको घर ग 1401 ब्रह्मारी द्वारा दिये
र यरतान की बात मुन कर हादि दवता, नाग, पव और मनिरा ब्रह्मामी
पाम पर ।।५८-५६॥ रहाने रहा-7 नगपम् | आग्न उदत्य की जो
र हिप है रे मनार में दस हमे नए परदा, लिए यब पार
पार कार प्रसन्न होर उमर महारा कोई जाप कोरिय॥६॥ हे प्रमो।
स्वपन है जग जीय भाग हो उतन हुए है, मद हसनन
प्रय बार ही है, प्रातिपको जानन में कोई मन नहीं है ॥६॥
व सोसालिरन वानी हम बाट पोनरनिदानी न पहा-
दा!हिरदरन्पुिरो उमरी तान्या वापर ठा सवार ही मिनना पा,
रन्तु पन मानिस भावाद विपर ही उसरा महार करेंगे ॥१२.
मारी गगरापान र ममी मा देव.
दाद मान-पान मोर रोमनवा ॥६॥
१५४ ]
[ श्री हरिवंशपुराण
लब्धमाने वरे चापि सर्वा सोऽबाधत प्रजा ।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पित ॥६५
आश्रमेपु महाभागान्मुनीन्वं शसितव्रतान् ।
सत्यधर्मरतान्दान्तापुरा धर्षितवास्तु स ॥६६
देवास्त्रिभुवनस्थान्तास्तु पराजित्य महासुरः।
लोक्य वशमानीय स्वर्गे वसति दानव ॥६७
यदा वरमदोन्मत्तो न्यवसद्दानवो भुवि ।
यज्ञियान्कृतवान्दैत्यान्देवाश्चवाप्ययज्ञियान् ।।६८
आदित्याश्च ततो रुद्रा विश्वे च मरुतस्तथा ।
शरण्य शरण विष्णु मुपाजग्मुर्महाबलम् ॥६६
वेदयज्ञमय ब्रह्म ब्रह्मदेव सनातनम् ।
भूत भव्य भविष्य च प्रभु लोकनमस्कृतम् ।
नारायण विभु देवा शरण शरणागता ।।७०
सायस्व नोऽद्य देवेश हिरण्यकशिपोर्भयात् ।
स्वहि न परमो धाता ब्रह्मादीना सुरोत्तम ॥७१
त्व हि न. परमो देवस्त्व हि न परमो गुरु ।
उत्फुल्लाम्बुजपत्राक्ष शत्रु पक्षभयकर ॥७२
क्षयाय दितिवशस्य शरण त्व भवस्व न ॥७३
देवराज हिरण्यकशिपु वरदान प्राप्त होते ही मदान्ध हो गया और उसने
अतपरायण सत्य धर्म रत आश्रमवासी मुनियों को सतप्त करना आरम्भ किया
॥६५६६।। फिर लाक्याधिपति देवतामो को परास्त कर लिया तथा स्वर्ग को
जीत कर, उसी में निवास वरने लगा ॥६७॥ तव उसने देवताओ को यज्ञ भाग
से च्युत घरपे त्यों को पज्ञ भागाधिधारी बनाया ॥६॥ यह देख कर आदित्य,
रुद्र, विश्वदेवा, मरदगण आदि तीनों लोको के पूजनीय भगवान् विष्णु की शरण
में जाकर निवेदन करने लगे है देवेश | आपने ही हमको रचा है, आप ही
हमारे परमदेव तपा परमगुरु हैं, हम हिरण्यकशिपु से डर पर आपकी पारण में
निगान् विष्णु के अवतार ] [ १५५ स्थित हुए हैं, आर उसका सहार कीजिये, जिस प्रकार भी सभव हो, उसके रियानारों से हमारी रक्षा परिये ॥७६-७३|| भयं त्यजध्वममरा ह्यमयं वो ददाम्यहम् । तथैव सिदिवं देवाः प्रतिपस्वय मा चिरम् ।।७४ एप तं मगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् । अवध्यममरेन्द्राणां दानवं तं निहन्म्यहम् ॥७५ एवमुक्त्वा स नगयान्विमृग्य दिशेखरान् । हिरण्यकशिमो राजन्नाजगाम हरिः सभाम् ।।७६ नरस्य मृत्वाधंतनु सिंहम्याधंतनुप्रमः। नारमिहेण वपुषा पाणि मंस्पृश्य पाणिना ॥3 जीमूतघनमंकाशो जीमूतघननिःम्बनः। जीमूतघनदीप्तीगा जोमूत इव वेगवान् ।।७८ दैत्यं सोऽतियलं दीप्त हप्तगार्दूलविक्रम । हप्तदैत्यगणेगुंत हतवानेकपाणिना ७९ नृसिंह एपः कपिनो भूयोऽयं वामनोऽपरः। यस वामनमाश्रित्य स्पं दंत्यविनामकृत् ॥८० बलेवापती यो बलिना विष्णुना पुरा । विक्रमन्त्रिभिरयोम्यः घोमितान्ने महामुराः ॥८१ भगवान् विष्णु ने कहा है देवगर ! नय पा रसाग करो, तुम मरो - मैं पर देता है, तुम्हें पीनही स्वगं ये राम्र थी पुनः प्राप्ति होगी ॥४॥ पानदाधि दिर पर प्राण परे तुम्हारे द्वारा मारा नहीं गा मरता, - मगे बहकावन्त अमिमानी हो गया है, परन्तु में उमरे गर यनुपापियों का परमा॥७॥ यंगमापन से बोरे- पद यह माग्यापन देकर भान ने देयवाको दि पिया और स्यब माग में मनुष्य और मन । भाग में हर पारस परिसीमना में ग, टग समर स्तरा । देशमा मेंप मापा । मेरे गमान होनरी पत्रा पो, मेंगा होगा।
१५६ ] [ श्री हरिवशपुराष वहाँ उन्होंने बल पे दर्ष से परिपूर्ण दस्यों से पिर हुए सिंह पे समार परान तथा दुर्धपं वीर हिरण्यकशिपु को एक ही पप्पड़ मार पर समाप्त कर दिर ॥७६-७६। यह नृसिंहावतार की क्या हुई, अव यामनावतार का वर्णन करता जिसमे वामन रूप धारण करके भगवान ने दया का सहार किया था 1140 पूर्वकाल की बात है। -राजा बलि के कारण उन्होंने वामन रूप पारण पर अप तीन पगो से दैत्यो में अत्यन्त क्षोभ उपस्थित कर दिया ॥१॥ नानाप्रहरणा घोरा नानावेपा महाजवा । कूर्मकुक्कुटक्वाश्च शशोलूक्मुखास्तथा ।।६२ खरोष्ट्रवदनाश्चैव वराहवदनास्तथा । भीमा मकरवक्ताश्च क्रोष्टुवनाश्च दानवा । आखुदर्दु रवक्ताश्च घोरा वृकमुखास्तथा ॥८३ मारिगजवक्त्राश्च महावक्त्रास्तयाऽपरे । नक्रमेषानना शूरा गोजाविमहिपानना ॥८४ गोधाशल्यकवक्त्राश्च क्रौञ्चवक्त्राश्च दानवा । गरुडानना खनमुखा मयूरवदनास्तथा ।।८५ गजेन्द्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनाम्बरा । चीरसवृतदेहाश्च तथा वल्कलवासस । उष्णोषिणो मुकुटिनस्तथा कुण्डलिनोऽसुरा ८६ किरीटिनो लम्बशिखा कम्बुग्रीवा सुवर्चस । नानावेषधरा दैत्य नानामाल्यानुलेपना ।।८७ स्वान्यायुधानि सगृह्य प्रदीप्तान्यतितेजसा । क्रममाण हृषीकेशमुपावर्तन्त सर्वश ।।८८ उन दैत्यो के पास विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्र थे और वेशभूषा अत्यन भयानक थी, उनमे भारी उत्साह था, उनमे से कोई मुर्गे के मुख वाला, को कछुए जैसा, कोई खरगोश जैसा और कोई उल्लू जैसे मुख वाला था ॥२॥ कोई गधे जैसा, कोई सूअर से मुख का, कोई मगर, सियार, चूहा, मेढक, भेडिय जैसा पा तो कोई बिलाव, हाथी अथवा बडे मुख का था। कोई मक्र, भेड, गाय, भगवान् विष्णु के अवतार ] [ १५७ री.या भर मे मुग वाला पा दो कोई गौह वपदा हाच पक्षी के मुमान ३-४॥ किमी ने और दो साल बोट रखी थी, कोई कारे मृग का चनं रिश दिये हुए पा, पिनी ने बकल ही पहन गया पा, :दिनी के सिर पर पाग तो किमी पैर पर मुटट पा बोर कानों मटन सटक रहे थे ।।८६॥ कोई रीटधारी था, रिमी को मिला दल दी यो, विमी का रठ यस संसा था, प्रकार ये दरप मापन लगद, उनी विभिन्न प्रकार की वैग- थी और ये अनेक प्रकार ये गन्यादि पारप दिये हए से 11८311 कपने अन्न- मो में मुमन्जित हुए दे देय मत्यन्त तेजस्वी दिमाई देते थे, उन्होंने वामन गवान से यहा नवते ही उने मय बोर में पेर रिया ॥८॥ प्रमथ्य मन्दिनेयान्पादनतले प्रनु । म्प कृत्वा महाभीम जहारागु स मेदिनीम् ॥ तम्य विक्रमतो भूमि चन्द्रादिन्यो म्नान्तरे । नम प्रकममापन्य नान्या किन ममान्यितो ई० पर प्रक्रममाणन्य जानुदेशे स्थितानुमौ । विष्णोरतु नवीन्य वदन्येव द्विजातय ॥६१ दला ग पृधियो ना जिल्या चासुरपुगवान् । ददी गकाय मिदिन विष्णुदं वना वरः॥२ एप ते वामनो नाम प्रातुर्मामो महामन । यविधिद्विजय पप्पते परम ॥ भूयो भूता विष्णी प्रादुर्भावो महात्मन । दत्तात्रेय इनि ग्यान क्षमया परया पुता. 18 तेन नाप्पु वेदेषु प्रस्सिामु मयेषु च । चानुमन् नु गरीण धर्म गिपिलग गते ॥१५ अभियदंति नाम मन्द नटेनते स्पिते । प्रमागु गायमालागु धर्म चापुरता गते ॥६६ हमी यमन देश ने बालो मारो सिरान बना कर और रि- मारी उन लोगोपियो पर राि हिमा और स प्रार -- १५८ ] पृथिवी का भार दूर हुआ El वेदविद ब्राह्मणों या पहना है कि जब वे नग वान् अपना पराक्रम दिखाते हुए पृथिवी पर रहते थे तर उनपे वक्षस्थल सूर्य और चन्द्रमा दिखाई देते थे । जब ये आवाश में स्थित रहते तव मूर्य- नाभि मे होते थे तथा साधारण ऊँचाई पर स्थित होते तो गूर्य-चन्द्र उनके जा प्रदेश में देखे जाते थे 11६०-६१॥ इस प्रकार वामन भगवान ने भीषण अमुरांव सहार फरवे पृथिवी का नार हरण किया और स्वर्ग राज्य इन्द्र को पुन' दिया । वेद विद् ब्राह्मण पा गुणानुवाद इसी प्रकार से आये हैं, यह भगवा: वामन देव की कथा तुम्हें सुनायी है ॥६२-६३।। अब मैं उनके दत्तात्रेय अवता का वृत्तान्त बहता हूँ ॥१४॥ हे राजन् । जव वेद और वेदोक्त पमों का लो हो गया और चारो वर्ण के मनुष्यो के विचार सकीर्ण हो गये तथा धर्म ३ शिथिल होने से अधर्म को बुद्धि हो गई, सत्य के स्थान पर असत्य आ गया । प्रजा छिन्न भिन्न होन लगी और धर्म भी अत्रत व्याकुल हो गया ||६५-FEIN सहयज्ञक्रिया वेदा प्रत्यानीता हि तेन वै। चातुर्वर्ण्यमसकीर्ण कृत तेन महात्मना ।।६७ तेन हैहयराजस्य कार्तवीर्यस्य धीमत । वरदेन वरो दत्तो दत्तात्रेयेण धीमता ॥ एतदाहुद्वय यत्ते मृधे मम कृतेऽनघ । शतानि दश बाहूना भविष्यन्ति न सशय ॥ पालयिष्यसि कृत्स्ना च वसुधा वसुधाधिप । दुनिरीक्षोऽरिवृन्दाना धर्मज्ञश्च भविष्यसि १ एष ते वैष्णव श्रीमान्प्रादुर्भावोद्भूत शुभ । कथितो वे महाराज यथाश्रतमरिन्दम । भूयश्च जामदग्न्योऽय प्रादुर्भावो महात्मन ॥१ यत्र बाहुसहस्रण विस्मित दुर्जय रणे । रामोऽर्जुनमनीवस्थ जघान नृपति प्रभु ॥१० रथस्थ पार्थिव राम पातयित्वाऽर्जुन युधि । धर्ययित्वा यथाकाम कोशमान च मेघवद ॥१ भगवान् विष्णु के अवतार ] [ १५६ ऐसे समय में भगवान दत्तात्रेय ने अवतार लेकर पुनः वेदोक्त कर्म, यज्ञानुप्ठान, विचार-विस्तार एव चारो आश्रमो को व्यवस्थित किया ॥७॥ श्री दत्तात्रेय जी ने कार्तवीर्य को वर दिया कि समय-समय पर तुम्हारे यह दो हाथ ही सहन हाथ हो जाया करेंगे ||६-६६॥ हे कार्तवीर्य ! तुम समस्त पृथिवी का पालन करोगे, तुम धर्म के ज्ञाता होगे और शत्रुओं की दृष्टि तुम्हारी ओर कभी न उठ सकेगी ॥१००। जिस प्रकार सुना था, वैसे ही तुम्हे दतालेय जी का वृत्तान्त सुना दिया, अव परशुराम जी का वृत्तान्त सुनो ॥१०१॥ इस अव. तार मे भगवान् ने परशुराम रूप से युद्ध मे अजेय सहस्रभु कार्तवीर्य का सहार किया था ॥१०२।। उन्होने रथारूढ कार्तवीर्य को पृथिवी पर गिरा दिया और पकड़ कर घसीटा, तब वह मेघ के समान गर्जने और चीत्कार करने लगा ॥१०३।। कृत्स्नं वाहुसहस्रच चिच्छेद भृगुनन्दनः । परश्वधेन दीप्तेन ज्ञातिभिः सहितस्य वै ॥१०४ कीर्णा क्षत्रियकोटोभिर्मेरुमन्दरभूपणा। त्रि.सप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ११०५ कृत्वा निःक्षत्रिया चैव भार्गवः सुमहातपाः । सर्वपापविनाशाय वाजिमेधेन चेप्टवान् ।।१०६ तस्मिन्यज्ञे महादाने दक्षिणां भ गुनन्दनः । मारीचाय ददौ प्रीतः कश्यपाय वसुधराम् ।।१०७ वारणांस्तुरगाछीघ्रान्रथं च रथिनां वरः । हिरण्यमक्षयं धेनूर्गजेन्द्रांश्च महामनाः । ददौ तस्मिन्महायज्ञे वाजिमेधे महायशाः ।।१०८ अद्यापि च हितार्थाय लोकानां भृगुनन्दनः । चरमाणस्तपो दीप्तं जामदग्न्यः पुन.पुन । तिष्ठते देववीमान्महेन्द्र पर्वतोत्तमे ।।१०६ एप विष्णोः सुरेशस्य शाश्वतस्याव्ययस्य च । जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावो महात्मनः ॥११० इस अवस्था में ही परसुराम ने अपने फरसे से उसकी हजारो मुजाएं
१६० ]
[ श्री हरिवंशपुराण
काट कर उसके साथियों को भी मार डाला ॥१०४॥ उन्होंने अपने एक परसे
से ही करोडो करोड क्षनियो से युक्त इम पृथिवी को इक्कीस बार क्षत्रिय-विहीन
कर दिया ॥१०५।। इस प्रकार क्षत्रिय विहीन करने के पश्चात् उन्होंने उस पाप
को निवृत्ति के लिए अश्वमेघ यज्ञ किया ॥१०६।। जिसमे उन्होने हाथी, घोडे,
रथ, अपरिमित स्वण, गौ आदि विविध दक्षिणायें दी और फिर मरीचिपुत्र
कश्यप को सम्पूर्ण पृथिवी दान कर दी ।।१०७-१०८।। वे अब भी लोक कल्याणार्य
घोर तपस्या करते हुए देवताओ के समान, महेन्द्र पर्वत पर निवास करते।
॥१०६॥ हे राजन् । यह शाश्वत और अव्यय भगवान् विष्णु के परशुरामावता
की क्या मैंने कही है ॥११०।।
चतुर्विशे युगे चापि विश्वामित्रपुर सर ।
राज्ञो दशरथस्मार्थ पुत्र पद्मायतेक्षण ॥१११
कृत्वाऽऽत्मान महायाश्चतुर्धा प्रभुरीश्वर ।
लोके राम इति प्यातस्तेजसा भास्करोपम ॥११२
प्रसादनार्थ लोकस्य रक्षसा निधनाय च ।
धर्मस्य च विवृदयर्थ जज्ञे तन महायशा ||११३
तमप्याहुमनुष्येन्द्र सर्वभ तपतेस्तनुम् ।
यस्म दत्तानि चास्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता ॥११४
वधार्थ देवशस्तूणा दुर्धराणि सुरैरपि ।
यज्ञविघ्नवरो येन मुनीना भावितात्मनाम् ॥११५
मारीचश्च सुवाहुश्च वलेन बलिनां वरो।
निहती च निराशो च वृतो तेन महात्मना ।।११६
वर्तमाने मये येन जनकम्य महात्मन ।
भग्न माहेश्वर पाप प्रोडता लीलया पुरा॥११७
चौबीराव
युग
में भगवान् विष्णु ने महामुनि रिश्वामित्र को आगे पर
अपने को पार भाग में विभक्त रिया और राजा दशरपये पर अवतरित हुए।
गरे पमान तेजस्वी भगवान राम ने रा अवतार में सोर रंजन, राक्षसोन्मूलन
भगवान् विष्णु के अवतार ] [ १६१ या धर्म-वृद्धि साधन किया था ।।१११-११२॥ ससारी व्यक्ति उन्हें राजा कहते 'देवताओं के शत्रु राक्षसा को मारने के लिये विश्वामित्र जो न उन्हें देवताओं मे भी दुलम महान मस्त्र प्रदान किया, उन यस्त्रा के प्रभाव स उन्हान यज्ञ- विध्वसक मारीच-मुबाहु नामक रायसा को अपने वाणों की मार से दूर फेंका ११४ ११३॥ राजा जनक द्वारा किये गये यज्ञ म सम्मिलित होकर उन्होंने भीडापूर्वक ही शिव धनुष को तोड दिया ॥११७॥ य समा सर्वधर्मज्ञश्चतुर्दश वनेऽवसत् । लक्ष्मणानुचरो राम सवभूतहिते रत ॥११८ रूरिणी यस्य पार्श्वस्था सोतेति प्रथिता जने । पूर्वोचिता तस्य लक्ष्मीभतारमनुगच्छति ॥११६ चतुर्दश तपस्तप्त्वा वने वर्षाणि राधव । जनस्थाने वसन्कायं निदशाना चकार ह । सीताया पदमन्विच्छल्लक्ष्मणानुचरो विभु ॥१२० विराध च करध च राक्षसी भीमविक्रमी । जघान पुरपव्याघी गधवौं शापवीक्षिती ॥१२१ हुताशनार्केन्दुतडिद्धनाम प्रतप्नजाम्बूनदचित्रपुरा। महेन्द्रवज्रागनितुल्पसार शरै शपोरेण वियोजिती वलात् ।।१२२ सुग्रीवस्य कृते येन वानरेन्द्रो महावल । वाली विनिहतो युद्ध सुग्रीवश्चाभिषेचित ॥१२३ देवासुरगणाना हि यक्षगधर्वभोगिनाम् । अवध्य राक्षसेन्द्र त रावण युधि दुर्जयम् ॥१२४ युक्त राक्षसकोटीभिर्नीलाजनचयोपमम् । प्रलोक्यरावण घोर रावण राक्षसेश्वरम् ॥१२५ दुर्जय दुधर हप्त शार्दूलसमविक्रमम् । दुनिरीक्ष्य सुरगण वरदानेन दर्पितम् ।।१२६ जधान सचिव सादं ससैन्य रावण युधि । महानधनसकाश महाकाय महावलम् ॥१२७ १६२ ] [ श्री हरिवंशपुराण . तमागस्कारिण घोर पौलस्त्य युधि दुर्जयम् । सम्रातृपुत्रसचिवं ससैन्य क्रूरनिश्चयम् ॥१२८ रावण निजघानाशु रामो भूतपति. पुरा । मधोश्च तनयो दृप्तो लवणो नाम दानव. ॥१२६ हतो मधुवने वीरो वरहप्तो महासुरः । समरे युद्धशौण्डेन तथा चान्येऽपि राक्षसा ॥१३० एतानि कृत्वा कर्माणि रामो धर्मभृता वरः। दशाश्वमेधाजास्थ्यानाजहार निरर्गलान् ।।१३१ फिर सब प्राणियो के कल्याण कर्म में लगे हुए श्रीराम ने, लक्ष्मण सहि चौदह वर्ष वनवास किया ॥११८॥ भगवती लक्ष्मी सीता के रूप में अवता ग्रहण कर राम की भार्या हुई और वनवास के समय रनके साथ ही गई ॥११६ चौदह वर्ष तक वन मे रह कर श्रीराम ने देव-कार्य पूर्ण किया। सीताजी शोज में लक्ष्मण के सहित जाते हुए उन्होने विराध, और क्बन्ध नामक राक्ष को अपने अमोष बापो से नष्ट कर दिया, जिससे उन राक्षसो को गंधर्व दी पुनः प्राप्ति हुई ॥१२०.. .२२॥ अत्यन्त बनी बालिका वध करके राम उसरे भाई मुरीद राय पर अभिपित किया ॥१२३॥ जो राक्षस रा दत्य, यक्ष, राक्षस धौर गधयों द्वारा भी नहीं मारा जा सकता दो राक्षस जिसकी रक्षा मे सदा तत्पर रहते थे, जो वर प्राप्ति में कार भदोन्मत्त हो गया था और जो सिंह के समान पराक्रमी तथा नीलाजन में नीए मेय में समान विशालकाय पा उस वरदय, दुराचारी, अपराधी अजेय रावण को उमरे माई, पुत्र, मत्री और सेना सहित श्रीराम नेग पर दिया। उन्हीं राम ने मपृतनय सवरणागुर एव अम्याग्य रापासोमो भी हपा इन महान पार्यों को पूर्ण पर उन्होंने अयोध्या जाार दरा अश्वमेध १२४.१३॥ नाथ पन्ताशुगा पापो नापुल मारतो ययो। न पिनहाण त्वामोदामे राग्यं प्रशाराति ११३२ .. रावण देता . दया गवान विष्णु के अवतार ] [ १६३ पर्यदेवन्न विधवा नानाश्चाभवस्तदा । सर्वमासीज्जगद्दान्त राम राज्य प्रशासति ।।१३३ न प्राणिना भय चापि जलानिलनिघातजम् । न च स्म वृद्धा वालाना प्रेतकार्याणि कुर्वते॥१३४ ब्रह्म पर्यचरत्क्षन विश क्षत्रमनुव्रता । नार्यो नात्यचरस्मर्तृन्मायर्या नात्यचरत्पति ।।१३५ मर्वमामीज्जगद्दान्त निर्दम्युरभवन्मही । राम एकोऽभवद्भर्ती राम पालयिताऽभवत् ।।१३६ . मायुर्वपंसहस्राणि तया पुत्रमहसिण । अरोगा प्राणिनश्चासन्रामे राज्य प्रशासति ।।१३७ ह राजन् ! उस रामराज्य में कभी कोई अशुभ बात सुनन को नहीं ती थी, ममीर सदैव अनुकूल प्रवाहित होती थी, कभी कोई स्त्री विषवा नही ki और चोरी का नाम भी न था, कभी क्मिी को जल या वायु से कष्ट नहीं जा, कभी किमी वृद्ध को अपनी सन्तान का प्रेत-कार्य नहीं करना पडता था, निय ब्राह्मणों की सेवा करते, वैश्य क्षत्रियो को और शूद्र तीनों वर्गों को सेवा । तत्पर थे, पति-पत्नी में भी कभी कोई किसी पर परस्पर अत्याचार नहीं करता ।।१३२-१३५॥ एकमात्र राम ही सबके राजा और पालक थे, इसलिये सम्पूर्ण व सुखी तथा दस्युओ से हीन था ॥१३६।। मनुष्यों की परमायु हमार वर्ष का थी, एक एक मनुप के हजार-हजार पुत्र होते थे, रामराज्य में सभी रोग- हत रहते थे ।।१३७॥ देवतानामृपीणा च मनुष्याणा च सर्वश । पृथिव्या समदायोऽभूद्रामे राज्य प्रशासति ॥१३८ गाथा अप्पन गायन्ति ये पुराणविदो जना । । रामे निवद्वतत्वार्या माहात्म्य तस्य धीमत. ॥१३६ श्यामो युवा लोहिताक्षो दीप्तास्यो मितभापिता। आजानुबाहु सुमुख. सिंहस्कन्धो महाभुज. ॥१४० -
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-- भगवान् विष्णु के अवतार ] [ १६५ छिन्नं बाहुसहस्रच वाणस्याद्भुतकर्मणः । नरकश्च हतः संप्ये यवनश्च महावलः ॥१४६ हुतानि च महीपानां सर्वरत्नानि तेजसा । दुराचाराश्च निहताः पार्थिवाश्च महीतले ॥१५० नवमे द्वापरे विष्णुरप्टाविंशे पुराऽभवत् । वेदव्यासस्तथा जज्ञे जातूकर्ण्यपुरःसरः ।।१५१ एको वेदश्चतुर्घा तु कृतस्तेन महात्मना । जनिती भारतो वंश सत्यवत्याः सुतेन च ॥१५२ एते लोकहितार्थाय प्रादुर्भावा महात्मनः । अतीता. कथिता राजन्कय्यन्ते चाप्यनागताः ।।१५३ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् ! भगवान् ने माथुर कल्प मे लोक .कल्याणार्य अवतार ग्रहण कर महात्मा श्रीकृष्ण के रूप में जो कार्य किये, का वर्णन करता हूँ ॥१४६॥ वृष्णावतार में उन्होने शाल्व, मन्द, द्विविद, "स, मरिष्ट, वृषभ, केशी, पूतना, कुवलयापीड हाथी, चाणूर, मुष्टिक आदि नेक मनुष्य रूपधारी दैत्यो का सहार किया था। उन्होने बाणासुर की हजार जाएं काट डाली और अत्यन्त बली यवनराज और नरकासुर को भी मारा था (१४७-१४६। उन्होंने अनेक दुराचारी नरेशो का वध करके उनका धन, रलादि शान लिया ॥१५०।। अट्ठाईसवें द्वापर युग में भगवान् नारायण का नौवां अव- रहुआ था, उस समय वे जातकर्ण्य के साथ वेदव्यास के रूप मे अवतीर्ण हुए ११५१। उन सत्यवती-पुत्र ने वेद को चार भागो में विमक्त किया तथा मरत- हा को उत्पन्न किया था ॥१५२॥ है राजन् ! मैंने इस प्रकार तुम्हें भगवान् 'अतीत मे हुए अवतारो का वृत्तान्त सुनाया, अब आगे होने वाले अवतारो वर्णन कर रहा हूँ ॥१५॥ कल्किविष्णुयशा नाम शम्भलग्रामके द्विजः। सर्वलोकहितार्थाय भूयश्चोत्पत्स्यते प्रभः॥१५४ दशमो भाव्यसंपन्नो याज्ञवल्क्यपुर.सरः। क्षपयित्वाच तान्सर्वान्भाविनाऽर्थेन चोदितान् ॥१५५ ---
[ श्री हरिकापुरा
दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च ।
अयोध्याधिपतिभूत्वा रामो राज्यमकारयत् ॥१४१
ऋक्सामयजुषा घोपो ज्याधोपश्च महात्मन ।
अव्युच्छिन्नोऽभवद्राज्ये दीयता भुज्यतामिति ।।१४२
सत्त्ववान्गुणसपन्नो दीप्यमान स्वतेजसा ।
अतिचन्द्र च सूर्यं च रामो दाशरथिर्वभौ ॥१४३
ईजे ऋतुशत पुण्यै समाप्नवरदक्षिण ।
हित्वाऽयोध्या दिव यातो राघव स महावल ॥१४४
एवमेष महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलनन्दन ।
रावण सगण हत्वा दिवमाचक्रमे प्रभ ॥१४५
उस समय देवता, मनुष्य और ऋषि सब एक ही सभा मे साथ-साथ
बैठते थे । पुराणवेत्ताओ ने उनका यशगान करते हुए कहा है कि राम में
यथार्थ तत्वो का समावेश था । उनका श्याम वर्ण, लाल नेत्र और मुख तेज
था, वे मितभापी और लम्बी भुजाओं वाले थे, उनका स्कन्ध प्रदेश सिंह के समय
उन्नत था, चे युवा, बलवान और गुणवान थे, उन्होंने ग्यारह हजार वर्ष ।
अयोध्या पर राज्य किया था ।।१३८॥ उनके राज्य में प्रत्यचा की कार त
ऋक्, साम और यजुर्वेद की ध्वनि सदा होती रहती थी, सर्वत्र दान दो की
भोग करो की ध्वनि पर्णगोचर होती थी, राम के शौर्य के समक्ष सूर्य-चन्द्र
लजाते थे ॥१४२-१४३॥ हे राजन् । इस प्रकार राघवेन्द्र राम ने अनुचरो सहि
रावण को मारा और प्रचुर दक्षिणा वाले सौ पझो को करके वे परम प"
पधारे ॥१४४-१४५॥
अपर केशवस्याय प्रादुर्भावो महात्मनः ।
विस्यातो माथुरे कल्पे सर्वलोकहिताय वै ।।१४६
यत्र शात्व च मन्द च द्विविद कसमेव च ।
अरिष्टमपम केशि पूतना दैत्यदारिकाम् ॥१४७
नाग पुदलयापीड चाणूर मुष्टिक तथा।
दैत्यान्मानुपदेहस्यान्सूदयामास वीर्यवान् ।।१४८
भगवान् विष्णु के अवतार ] [ १६५ छिन्नं बाहुसहस्रच वाणस्याद्भुतकर्मणः । नरकश्च हतः संप्ये यवनश्च महाबलः ।।१४६ हतानि च महीपानां सर्वरत्नानि तेजसा। दुराचाराश्च निहताः पार्थिवाश्च महीतले ॥१५० नवमे द्वापरे विष्णुरप्टाविंशे पुराऽभवत् । वेदव्यासस्तथा जज्ञे जातुकर्ण्यपुर:सरः ।।१५१ एको वेदश्चतुर्था तु कृतस्तेन महात्मना । जनितो भारतो वंश सत्यवत्याः सुतेन च ॥१५२ एते लोकहितार्थाय प्रादुर्भावा महात्मनः । अतीताः कथिता राजन्कय्यन्ते चाप्यनागताः ॥१५३ वैशम्पायन जी ने कहा है राजन् ! भगवान् नै माथुर कल्प मे लोक ल्याणार्य अवतार ग्रहण कर महात्मा श्रीकृष्ण के रूप मे जो कार्य किये, का वर्णन करता हूँ ॥१४६॥ कृष्णावतार में उन्होंने शाल्व, मैन्द, द्विविद, अरिष्ट, वृपम, केशी, पूतना, कुवलयापीड हाथी, चाणूर, मुष्टिक आदि 3 मनुष्य रूपधारी दैत्यों का सहार किया था। उन्होंने वाणासुर को हजार एं काट डाली और अत्यन्त बली यवनराज और नरकासुर को भी मारा था ४७-१४६॥ उन्होंने अनेक दुराचारी नरेशो का वध करके उनका धन, रत्नादि लिया ।।१५०।। मट्ठाईसवें द्वापर युग मे भगवान् नारायण का नौवां अव. हुआ था, उस समय वे जातूवयं के साथ वेदव्यास के रूप में अवतीर्ण हुए ५१॥ उन सत्यवती-पुत्र ने वेद को चार भागों में विभक्त किया तथा भरत- को उत्पन्न किया था ॥१५२।। हे राजन् ! मैंने इस प्रकार तुम्हें भगवान् तीत में हुए अवतारों का वृत्तान्त सुनाया, यव आगे होने वाले अवतारों वर्णन कर रहा हूँ ॥१५॥ कल्किविष्णुयशा नाम शम्भलग्रामके द्विजः । सर्वलोकहितार्थाय भूयश्चोत्पत्स्यते प्रमः ।।१५४ दशमो भाव्यसंपन्नो याज्ञवल्क्यपुरःसरः । क्षपयित्वाच तान्सर्वान्भादिनाऽर्थेन चोदितान् ।११५५
[ श्री हरिवशपुराण
गङ्गायमुनयोर्मध्ये निष्ठा प्राप्स्यति सानुग ।
तत कुले व्यतीते तु सामात्ये सहसैनिके ॥१५६
नपेष्वथ प्रनष्टेषु तदा त्वग्रहा प्रजा ।
क्षगेन निवृते चैव हत्वा चान्योन्यमाहवे ॥१५७
परस्परहृतस्वाश्च निराकन्दा सुदु खिता ।
एव कष्टमनुप्राप्त कलिसध्याशके तदा।
प्रजा क्षय प्रयास्यन्ति साद्धं कलियुगेन ह ।।१५८
क्षीणे कलियुगे तस्मिस्तत कृतयुग पुन ।
प्रपत्स्यते यथान्याय रवभावादेव नान्यथा ॥१५६
एते चान्ये च बहवो दिव्या देवगुण र्युता ।
प्रादुर्भावा पुराणेषु गोयन्ते ब्रह्मवादिभि ॥१६०
यत्र देवापि मुह्यन्ति प्रादुर्भावान कीर्तने ।
पुराण वर्तते यत्र वेदश्र तिसमाहितम् ॥१६१
एतदुद्देशमात्रेण प्रादुर्भावानुकीर्तनम् ।
पीर्तित कीर्तनीयस्य सर्वलोकगुरो प्रभु ॥१६२
प्रीयन्ते पितरस्तस्य प्रादुर्भावानुकीर्तनात् ।
विष्णोरतुलवीर्यस्प य शृणोति कृतान्जलि ॥१६३
एतास्तु योगेश्वरयोगमाया श्रुत्वा नरो मुच्यति सर्वपापं ।
ऋद्धि समृद्धि विपुलाश्च भोगान्प्राप्नोति सर्व भगवत्प्रसादाद।
दसवें अवतार का कार्यकाल पूर्ण होने पर भगवान् लोक बल्या
धमल प्रामम विष्णुयशा नामक ब्राह्मण पर बल्ली नाम से अवतीर्ण होगे ।'
उस समय व याशवत्वप ये साय क्षणिकवादी यादों को पहिले शास्त्रार्थ में
युट में जीतगे और भावी कार्यों को सम्पन्न बरन ये निये गगा-यमुना
के
वाले प्रदेश में भान्ति-साम करेंगे । पिर नारी आदिघे अपहरण जैसे ।
में पर कर उस समय के राजा, मत्री और निष यादि परस्पर युटर
पागे तब विश्व में बराबरता का सामाग्य हो जायगा, । इसलिये प्र
परपर महेंगे और पो बलवान हाँगे वे नियंसों रो शरव घोर संगे। वा
भगवान् का ईश्वरत्व और तारकामय सग्राम ]
[ १६७
मलिकाल के सच्याश का होगा, इसलिये उपाय हीन, अत्यन्त दुध और क्तह
ममतप्त हुई प्रजा कलियुग की समाप्ति के माथ ही समाप्त हो जायगी ॥१५५-
१५८।। इस प्रकार कलियुग के ममाप्त होने पर सत्ययुग का पुन आरम्म होगा
और प्रजाजन स्वभाव से ही न्यायप्रिय हो जायंगे, इसमे सराय नहीं है ।।१५।।
ब्रह्मवादी सपियो ने भगवान् विष्णु के ऐमे बनेक अवतारों का पुराणो मे वर्णन
किया है, जिन्हें सुन कर देवगण भी चकित हो जायंगे तथा वेद सम्मत पुराणों
का अधिकाधिक प्रसार होगा ॥१६०-१६१।। सव के गुर एव कीर्तन के योग्य
भगवान् विष्णु के अवतारो को यहाँ मन सक्षेप में कहा है ॥१६२।। जो मनुष्य
इन असीमित पराक्रम वाले विष्णु की अवठार गायायों को विनीत भाव से प्रवण
करता है, उसके पितरगण प्रसन्न होते हैं ॥१६३।। जो हाथ जोड कर श्रद्धा-
पूर्वक भगवान् की योगमाया का वृतान्त श्रवण करते हैं, वे सभी पापो से छूट
जाते हैं और भगवत्कृपा से उन्हें विपुन समृद्धि की प्राप्ति होती तथा सब प्रकार
काम्य भोग सुलभ होते हैं ॥१६४||
।। भगवान का ईश्वरत्व और तारकामय संग्राम ।।
विश्वत्व शृणु मे विष्णोहरित्व च कृते युगे।
वैकुण्ठत्व च देवेपु कृष्णात्व मानुपेषु च ॥१
ईश्वरल च तस्येद च तम्येद गहना कर्मणा गतिम् ।
सप्रत्यतीता भाव्या च शृणु राजन्ययातयम् ॥२
अव्यस्तो व्यक्तलिनस्थो यत्रेप भगवान्प्रभुः।
नारायणो ह्यनतात्मा प्रभवोऽयय एव च ॥३
एप नारायणो भूत्वा हरिरासीत्कृते युगे।
ब्रह्मा शक्रश्च सोमश्च धर्म शुको वृहस्पति ।।४
अदितेरपि पुनत्यमेत्य यादवनन्दन ।
एप विष्णुरिति स्यात इन्द्रादवरजोऽभवत् ॥५
वृत्ते वृत्रपधे तात वत्तं माने कृते युगे ।
यासोवलोक्यविख्यात सग्रामस्तारकाम्य ॥६
में
१६८ ]
[ श्री हरियशपुराण
तत्रासन्दानवा घोरा सर्वे संग्रामपिताः ।
घ्नन्ति देवगणान्सन्सियक्षोरगराक्षसान् ॥७
वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् । अब भगवान् विष्णु के सत्ययु.. :
विश्वस्व, देवलोक में वैकुण्ठत्व और मर्त्यलोक मे कृष्णत्व तथा विभिन्न युगो में
किये गये उनके कार्यों का वर्णन करता हूं ॥१-२॥ वही अविनाशी भगवान्
विश्व के सप्टा, अनन्तात्मा एव अध्यक्त है, देह धारण करके वही हरि' कहे
गये, ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, धर्मराज, शुक्र, और बृहस्पति यह सब उन्ही के रूप
हैं, वहीं अदिति के गर्भ से उत्पन्न इन्द्रानुज विष्णु हुए थे ॥३-५।। सत्ययुग
वृत्रासुर वध के पश्चात् विश्वविख्यात एक तारकामय सग्राम हुआ था, उनमें
दानवो ने रणोन्मत्त होकर देवता, गधर्व, यक्ष, रक्ष और नागादि का वध करता
भारम्भ किया ॥६-७॥
ते वध्यमाना विमुखा क्षीणप्रहरणा रणे ।
लातार मनसा जग्मुर्देव नारायण हरिम् ॥
एतस्मिन्नन्तरे मेघा निर्वाणाङ्गारवर्षिण ।
सार्कचन्द्रग्रहगण छादयन्तो नभस्तलम् ॥
चञ्चद्विद्य द्गणाविद्धा घोरा निर्हादकारिण ।
अन्योन्यवेगाभिहता. प्रवत् सप्त मारुता ॥१०
दीप्ततोयाशनीपार्वज्रवेगानिलाकुलै. ।
ररास घोरस्त्पातैर्दह्यमानमिवाम्वरम् ॥११
पेतुरुल्कासहस्राणि मुहुराकाशगान्यपि ।
न्युटजानि च विमानानि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च ॥१२
तान्धनौघान्सतिमिरान्दोामुक्षिप्य स. प्रभुः ।
वपुः सदर्शयामास दिव्यं कृष्णवपुर्हरि. १३
यवरथमयुक्ते सुपर्णध्वजशोभिते ।
चन्द्राचारचिते मन्दराक्षघृतान्तरे ॥१४
उन देयो के प्रयार प्रहारो से व्याकुल एव निरस्त्र हुए देवता, गण
शादि युदधोत्र को मोड़ पर भाग पडे और भगवान् विष्णु को शरण में पहुंचे 15
भगवान् का ईश्वरत्व और तारकामय सग्राम ]
[ १६६
उस समय आकाश में काले काले बादल छा गये जिसमे ग्रहों में महित सूर्य-चन्द्र
मी आच्छादित हो गये 11 सप्तवायु अत्यन्त वेग से प्रवाहमान् हुए, मेघों के
पारस्परिक सघर्ष से भयानक विद्युत चमकने लगी और घोर गर्जन होने लगा
॥१०॥ ए साथ ही बज्रपाठ एव उल्लापात होन लगा, तप्त जल की वर्षा होने
बगी, इन उत्सातों से प्रतीत होता था कि भावाश जल रहा है और पिघल-पिपल
कर नीचे आ रहा है, आकाश में उडते हुए विमान डांवाडोल होने लगे ॥११-१२॥
ऐसे समय में ही भगवान विष्णु उस अन्धकार राशि दो चीर कर दिव्य रूप में
प्रकट हुए ।।१३९ वे दिव्य रथ पर आन्दु थे, उन रथ मे हरे रंग के पोडे युक्त
थे, ध्वजा पर गरट विराजमान थे, चन्द्रमा और सूर्य उम रय के चक्र थे, मंदरा-
चल पर्वत उसका धुरा था ।।१४१५
मनन्तरश्मिसयुक्ते ददृशे मेरुकवरे ।
तारुकाचिनकुमुमे ग्रहनक्षसबन्धुरे ।।१५
भयेप्वभयद व्योम्नि देवा दैत्यपराजिता ।
दहशुस्ते स्थित देव दिव्यत्रोक्मये रथे ।।१६
ते कृतान्जलय सर्वे देवा शक्रपुरोगमा ।
जयशन्द पुरस्कृत्य शरप्य शरण गता ॥१७
स तेया ता गिर श्रुत्वा विष्णुर्दयितदेवत ।
मनश्चक्रे विनाशाय दानवाना महामृधे ।।१८
आकाशे तु म्यितो विष्ण, मोत्तमे पुरषोत्तम ।
उवाच देवता सर्वा सप्रतिजमिद वच ११६
शान्ति भजत भद्र वो मा भैप्ट मरुता गणा ।
जिता मै दानवा सर्वे बलोक्य प्रतिगृह्यताम् ॥२०
ते तस्य सत्यसत्यम्य विष्णोवाक्येन तोपिता ।
देवा प्रीति परा जग्मु प्राप्येवामृनमुत्थितम् ॥२१
ततस्तम सह्रियते विनेशुश्च वलाहका ।
प्रववुश्च शिवा वाता प्रसन्नाश्च दिशो दश ।।२२
१७० } [ श्री हरिवशपुराण भगवान् शेष अश्वो की रास पे, सुमेरु पर्वत धूबर था, तारागण उसके अद्भुत बेल बूटे थे, ग्रह-नक्षत्र वधन थे ॥१५॥ दैत्या से हारे हुए देवता ने जब उन अभयदाता प्रभु को देखा तभी उच्च स्वर से जय-जयकार करते हुए शरण मे गये ॥१६ १७६ उन सब को आतवाणी सुन कर भगवान् ने युद्ध में दैत्यो का वध करने की प्रतिज्ञा करते हुए कहा ॥१८.१६}} है देवगण । भय मत करो, इन दैत्यो को मैं अभी हरा दूंगा, तब तुम त्रैलोक्य के राज्य पर पुन अधिकार करोगे ॥२०॥ भगवान् की वाणी सुन कर देवगण को वैसा ही आनद प्राप्त हुआ जैसा क्षीरसागर से अमृत प्राप्त करने पर हुआ था ॥२१॥ इसके पश्चात् अधकार दूर हुआ मेघ छिन भिन्न हो गये, मुखदायक वायु प्रवा हित होने लगा और दशो दिशायें स्वच्छ हो गयी ॥२२॥ ॥ देवासुर-सग्राम ॥ ताभ्या वलाभ्या सजज्ञे तुमुलो विग्रहस्तदा । सुराणामसुराणा च परस्परजयषिणाम् ॥१ दानवा दैवत साई नानाप्रहरणोद्यता । समीयुयुध्यमाना वै पर्वता पर्वतैरिव ॥२ तत्सुरासुरसयुक्त युद्धमत्यद्भुत बभौ। धर्माधर्मसमायुक्त दर्पण विनयेन च ॥३ ततो रथं प्रजविनर्वाहनश्च प्रचोदित । उत्पद्भिश्च गगन सासिहस्तै समन्तत ॥४ विक्षिप्यमाणे मुंशले सप्रेष्यद्भिश्च सायकं । चाविस्फार्यमाण श्व पात्यमानैश्च मुद्गर ॥५ तद्य दममवद्घोर देवदानवसकुलम् । जगतस्त्रासजनन युगसवर्तकोपमम् ॥६ स्वहस्तमुवतै परिप क्षिप्यमाणश्च पर्वते । दानवा समरे जघ्नुर्देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥७ ते वध्यमाना वलिभिर्दानजितकाशिमि । विषण्णमालो या जमुसति ५७ मृधे ।
देवासुर संग्राम ]
[ १७१
वैशम्पायनत्री ने कहा-है राजन । इसके पश्चात् देवताओ और दैत्यो
मे घोर युद्ध हुआ ॥१॥ जैसे पर्वत पर पर्वत टूट रहा हो, उस प्ररार देवताओ
पर दैत्यगए विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्र धारण कर टूट पडे ॥२॥ स धर्म
और अधर्म म अथवा दपं और विनय मे द्वन्द्व होता है, उमी प्रकार देवता-दत्यो
में भीपण गौर यद्भुत युद्ध होन लगा 11-11 वेगदन रय, दौडते हुए वाहन, हाय
में तलवार लेकर उछलने हुए वीर फेक हुए मूगल, छोटे हुए वाण तथा गिरते
हुए मुद्गर आदि सर्वत्र दिखाई दे रह ये, सम्पूर्ण विश्व में प्रलय जैसा मानक या
गया, दानवो ने परियो तथा शिलावण्डा से भी दवताओ पर प्रहार किये। विजयो-
मुक दैत्यों द्वारा पीडित हुए देवता युद्ध स्थल मे दिपपणमुख खडे हो गये ॥४-८॥
तेऽस्त्रजाल प्रमथिता परिमिन्नमस्तका ।
भिन्नोरस्या दितिसुतैर्वेमू रवत व्रण मुह ॥
स्यन्दिता पाशजालश्च निर्यनाश्च शरं कृता ।
प्रविष्टा दानवी माया न शेकुस्ते विचेष्टितुम् ।।१०
सस्तम्भितमिवाभाति निष्प्राणसदृशाकृति ।
वल सुराणामसुरनिष्प्रयत्नायुध कृतम् ।।११
मायापाशान्दिकर्पश्च भिन्दन्वण ताज्यरान् ।
शाको दैत्यवल घोर विवेश बहुलोचन ॥१२
स दैत्याप्रमुखे हत्वा तद्दानवबल महत् ।
तामसेनास्लजालेन तमोभूतमथाक्रोत् ।।१३
तेऽन्योन्य नाववुध्यन्त देवास्तादानवानपि ।
घोरेण तमसाविष्टा पुरुहूतस्य तेजसा ।।१४
मायापार्शविमुक्ताश्च यत्नवन्त सुरोत्तमा ।
वपू पि दैत्यसघाना तमो भूतान्यपातयन् ॥१५
अपघ्नस्ता विसज्ञाश्च तमसा नीलवर्चस ।
पेतुस्तै दानवगणाश्छिन्नपक्षा इवाचला ॥१६
दानवो के परिष-प्रहार से अनेक देवताओ के मस्तक पट गए बहुतो
के हृदय विदीयं होगये जिससे रक्त की धारा प्रवाहित हो चली, देच सेना
१७२ ] [ श्री हरिवंशपुराण दानवो के पाशजालो में बंध कर चेष्टाहीन हो गई और दानवी माया के प्रभाव-, वश यह नितान्त अशक्त होगये ॥ १०॥ मृतक के समान निश्चेष्ट भाव से खडे हुए देवताओ के सभी शस्त्रास्त्र व्यर्थ होगये, दैत्यो ने उनका सभी पराक्रम हर लिया ॥११॥ यह देख कर इन्द्र अपने वन को लेकर दैत्य-सेना पर टूट पड़े, जो उनके सामने आया उसी को मार दिया और फिर तामस अस्त्र समूह से उन्होंने घोर अधकार कर दिया, जिसके कारण यह पता लगना ही कठिन था कि कौन देवता और कौन दैत्य है २ ॥१२-१४॥ इस प्रकार दानवी मापा से मुक्त होकर पूर्ण प्रयत्न पूर्वक देवगण दैत्यों को नष्ट करने लगे, उस घोर अन्ध- कार कारण भयभीत हुए राक्षस धराशायी होगये ॥१५-१६।। तद्घनीभूतदैत्यानामन्धकारमहार्णवम् । प्रविष्ट बलमुत्रस्त तमोभूतमिवावभौ ।।१७ तदाऽसृजन्महामाया मयस्ता तामसी दहन् । युगान्ताग्निमिवात्युग्रा सृष्टामौर्वेण वह्निना ॥१८ सा ददाह तम सर्व माया मयविकल्पिता। दैत्याश्च दीप्तवपुष सय उतस्थुराहवे ॥१६ मायामौर्वी समासाद्य दह्यमाना दिवौकस । भेजिरे चन्द्रविषय शीताशुसलिलेशयात् ॥२० ते दह्यमाना ह्योर्वेण तेजसा भ्रष्टतेजस । शशसुर्वचिणो देवा सतना शरणैषिण ॥२१ सतप्ते मायया सैन्ये दह्यमाने च दानवे । चोदितो देवराजेन वरुणो वाक्यमववीत् ॥२२ यस्पद भयभीत दानवो के अधार में विलीन होने पर सर्वत्र अधकार धागमा और प्रलयकाल उपस्थित होने पर औवं अग्नि जिस लोक-दाहिनी माया पो उत्पल परता है, उसी माया की मय दानव ने रचना की ॥१७-१८॥ सके प्रभाव से सम्पूर्ण बन्धकार मिट गया और दैत्यों ने तुरन्त आक्रमण कर दिया। सा मापामयो अग्नि से रक्षा पाने लिये देवगण ने चन्द्रमा की शरण ली १६-२०॥ उस और्व अग्नि से देवगण निस्तेज और सन्तप्त होगये थे। शरण देवताओ का दैत्यो को विफल करना ] [ १७३ गाप्ति के लिये उन्होंने इन्द्र से उसका वर्णन किया ॥२१|| इस प्रकार जब उस पाया से देवसेना व्याकुल हो उठी, तब इन्द्र के सब बात कहने पर जलपति वरुण उनसे बोले ॥२२॥ सपा दुर्विपहा माया देऔरपि दुरासदा । और्वेण निर्मिता पूर्व पावकेनोवंमूनुना ॥२३ तस्मिस्तु व्युत्थिते दैत्ये निर्वीर्येपा न सशय । शापो ह्यस्या पुरा दत्त सृप्टा येनैव तेजसा ।।२४ यद्य पा प्रतिहन्तव्या कर्तव्यो भगवान्सुखी । दीयता मे सखा शक तोययोनिनिशाकर ॥२५ तेनाह सह सगम्य यादोभिश्च समावृत । मायामेता हनिप्यामि त्वत्प्रसादान्न सशय ॥२६ वरुण ने कहा-हे देवराज ' पूर्वकाल मे ऊर्व पुत्र अग्नि ने जिस माया को रचा था, यह वही दुर्लम भाया है ।।२३।। इस माया के रचयिता और्व अग्नि का कथन है कि यह माया जीवन पर्यन्त अक्षुण्ण प्रभाव वाली होकर हरिण्य- कशिपु के पास रहेगी ॥२४॥ यदि इस माया को नष्ट करके सब को सुखी करना है तो जल से उत्पन्न हुए चन्द्रमा को मेरे साथ करिये, तव चन्द्रमा और सभी जल जन्तुओ को साथ लेकर में इस माया को निःसन्देह नष्ट कर दूंगा ।।२५- २६॥ ।। देवताओ का दैत्यो को विफल करना ।। एवमस्त्विति सहृष्ट शक्रस्त्रिदशवर्द्धन । सदिदेशाग्रत सोम युद्धाय शिशिरायुधम् ।।१ गच्छ सोम सहायत्व कुरु पाशधरस्य वै। असुराणा विनाशाय जयाय च दिवौकसाम् ॥२ खमप्रतिमवीर्यश्च ज्योतिपा चेश्वरेश्वर । वन्मय सर्वलोकाना रस रसविदो विदु ॥३ क्षयवृद्धी तवाव्यक्ते सागरस्येव मण्डले । परिवर्तस्यहोरात काल जगति योजयन् ॥४ १७४ ] [ श्री हरिवशपुराण श्वेतभानुहिमतनुयोतिपामधिप. शशी। अब्दकृत्कालयोगात्मा इज्यो यज्ञरसोऽव्यय ॥५ ओषधीश क्रियायोनिरम्भोयोनिरनुष्णभाक् । शीताशुरमृताधारश्चपल श्वेतवाहन ॥६ त्व कान्ति कान्तवपुषा त्व सोम सोमवृत्तिनाम् । सौम्यस्त्व सर्वभूताना तिमिरघ्नस्त्वमृक्षराट ७ तद्गच्छत्व सहानेन वरुणेन वरूथिना। शमयस्वासुरी माया यया दह्याम सगरे । यन्मा वदसि युद्धार्थे देवराज जगत्पते । एप वर्षामि शिशिर दैत्यमायापकर्षणम् ।। एतान्मच्छीतनिर्दग्धान्पश्य स्व हिमवेष्टितान् । विमायान्विमदाश्चैव दानवास्त्व महामृधे ॥१० वैशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् । देवताओ के आनन्द की वृद्धि कर वाले इन्द्र न वरण को बात सुन कर चन्द्रमा से कहा ॥१॥ इन्द्र बोले- चन्द्र । तुम अमुरी के विनाश और देवनामो की जीत के लिये युद्ध में वरुण के सहायता करो ॥२॥ क्योति तुम महाबली और प्रकाशदाताओ के अधीश्वर है रसशो ने तुम्हें सम्पूर्ण प्राणियों का रस कहा है ॥३॥ समुद्र के समान तुम्हार धाय और वृद्धि दुप है, तुम विश्व में दिन-रात्रि को प्रकट करते हुए अपने है महल मे भ्रमण करते हो ॥४॥ तुम श्वेत, भानु तथा हिमज्योति हो, तुम नक्षत्र स्वामी तथा सरसर के प्रवर्तन हो, तुप काल योगात्मक, पश, यशरा औषधियों के स्वामी, शीतल, गीतांशु, अमृताधार, पन्दोयोनि, श्वेतवाहा, पाम, गोमरामो को साम रम तथा जगत में प्राणियो को सौम्य रूप हो, तुम अन्यार के नागर और मात्रओं ये अधिपति हो ॥५-७॥ अन• तुम सेनाध्यक्ष रण। पाप गमा परी, जिममे हम शीघ्र ही हम दग्य परने यासो बागुरी माया से गुरुत हो यो ।।८॥ पदमा ने कहा-हे देवेन्द्र । मैं युट स्थल में जार शोध हिमपी वर्षा करता है, जिसरे प्रभार से आपरे देखते देखते ही यह रहो पाणी या न बदयों को भी हिमाच्छादित तपाग-सरित माया REnt-९ [ १७५ जाओ का दैत्यो को विफल करना ] ततो हिमकरोत्सृष्टा. सबाप्पा हिमवृष्टायः। वेष्टयन्ति स्म तान्योरान्दत्यान्मेघगणा इव ॥११ तौ पाशशुक्लाशुधरी वरुणेन्दु महारणे। जघ्नतुहिमपातश्च पाशघातश्च दानवान् ॥१२ द्वावम्वुनाथी समरे तो पाशहिमयोधिनी । मृधे चेरतुरम्भोभि क्ष याविव महार्णवौ १३ ताभ्यामाप्लावितं सैन्य तद्दानवमदृश्यत । जगत्सवतकाम्भोदः प्रवृप्टैरिव सवृतम् ।।१४ तावुद्यताशुपाशी द्वौ शशाकवरणो रणे। शमयामामतुर्माया देवी दैतेयनिर्मिताम् ॥१५ शीताशुजलनिर्दग्या पाशश्च प्रसिता रणे । न शेकुश्चलितु दैत्या विशिरस्का इवाद्रय. ॥१६ शीताशु निहतास्ते तु पेतुर्दैत्या हिमादिता. । हिमप्रावृतसर्वाङ्गा निरुप्माण इवाग्नय ॥१७ वंशम्पायनजी ने कहा है राजन् । इसके पश्चात् चन्द्रमा ने हिम वर्षा 1, जिससे मेघ के समान वे दुर्दान्त दैत्य देव गये ॥११॥ इस प्रकार पाशधारण ग्ने वाले वरुण और हिम की वर्षा करने वाले चन्द्रमा, दोनों ही अपने प्रास्त्रो प्रहार करते हुए उमडते हुए समुद्र के समान युद्ध स्थल मे घूमने लगे ॥१२- ३॥ सवर्तक मेघ द्वारा जल वृष्टि होन से जैसे सम्पूर्ण विश्व जल में बहने 'गता है, वैसे ही उनको अस्त्र वर्षा से सम्पूर्ण दैत्य-सेना प्लावित होगई और म प्रकार वरण ने पाश से और चन्द्रमा ने हिम से दानवी माया को छिन्न: मन्न कर दिया ॥१४-१५।। इस स्थिति में दैत्यगण दिन्न मस्तक के समान लने की शक्ति से हीन होकर निष्क्रिय होगये ॥१६॥ चन्द्रमा द्वारा हिम वर्षा रने से वे ठडे हुए अगारो के समान घराशायी होगये ॥१७॥ तेपातु दिदि दैत्याना विपरीतप्रमाणि च ! विमानानि विचित्राणि निपतन्त्युत्पतन्ति च ॥१८ १७६ ] [ थी हरिवंशपुरा तान्पाशहस्तग्रथिताञ्च्छादितान्हिमरश्मिना । मयो ददर्श माया वै दानवान्दिवि दानवः ॥१६ स शिलाजालवितता गण्डशलाट्टहासिनीम् । पादपोत्कट कूटाना कन्दराकीर्णकाननाम् ॥२० सिंहव्याघ्रगजाकीर्णा नदन्तीमिव यूथपैः । ईहामृगगणाकीर्णा पवनाधूणित माम् ॥२१ निर्मिता स्वेन पुत्रेण क्रौञ्चेन दिवि कामगाम् । प्रसृता पार्वती माया ससृजे दानवोत्तमः ॥२२ साश्मशब्दै शिलाव. सपतद्भिश्च पादपैः । निजघ्ने देवसघांस्तान्दानवांश्चाप्यजीवयत् ॥२३ नेशाकरी वारणी च मायेऽन्तर्दधतुस्ततः । अश्मभिश्चायसघन किरन्देवगणान्रणे ॥२४ उस समय दैत्यों के सब विमान नीचे गिरने लगे ।।१८।। जब मय दान ने दैत्यों यो वरणपाश में बद और चन्द्रमा द्वारा किये गये हिमपात से भाया- दित देखा तो उसने अपने पुत्र प्रौंच द्वारा बनाये हुए मायामय पर्वतास्त्र का प्रयोग किया। उस अस्त्र पर शिसाय, पाटियां, सिंहो और न्यानो के समूह स्थित थे। उस पर्यंत या अगला भाग वृक्षो और बन्दराओ वाले वनों से प्राप्त पा, उगमे वृक्ष वायु थे यंग गे हिल रहे थे ॥१६-२२॥ उस माया के प्रयुक्त होते ही पर्वत से बट्टी दही मिलायो और वृक्षों की वर्षा होने लगी, जिसके पाए देव-गेना द्वारा संतप्त दरय सेना में जीवन आगया और पन्द्रमा तपावरण से मापा मष्ट होगई तपा शिसा सण्डो की वर्षा ऐ देव-रोना आधारित होगई ॥२१.२४॥ माग्मसपानविषमा दुमपर्वतगंपटा। अभवदीरमंचाग पृथिवी पर्वतरिय ॥२५ गानाइतोमभि. पश्चिच्छियामिश्याप ताष्टितः । गानिरलो.मगणयोग्यत गयुगे ।।२६
किा दैत्यो को विफल करना ]
[ १७७
तदाघ्रष्टयनुप भग्नप्रहरणाविलम् ।
नि प्रयल सुरानोक वर्जयित्वा गदाधरम् ॥२७
स हि युद्धगत श्रीमानीशो न स्म व्यकम्पत ।
सहिष्णुत्वाज्जगत्स्वामी न चुलोप गदाधर ॥२८
कालज्ञ कालमेघाम समक्षत्कालमाहवे।
देवासुरविमदं स द्रष्टुकार्मो जनार्दन ॥
ततो भगवताऽऽदिष्टौ रणे पावकमारुतो ।
शमनार्थ प्रवृद्धाया मायाया मयसृष्टया ।।३०
तत प्रवृद्धावन्योन्य प्रवृद्धी ज्वालवाहिनौ ।
चोदितो विष्णु वाक्येन ता माया व्यापंताम् ॥३१
नाभ्यामुभ्रान्तवेगाभ्या प्रवृद्धाभ्या महाहवे।
दग्या सा पार्वतीमाया भस्मीभूता ननाश ह ॥३२
(सोऽनिलोऽनलसयुक्त सोऽनलश्चानिलाकुल ।
देत्यसेना ददहतुयुगान्त इव मूछिनी ॥३३
पर्वतीय स्थान के ऊँचा-नीचा होने के समान ही पृथिवी भी शिला खडौं
से दुर्गम होगयी १२५|| कुछ देवता शिनाखडो और चट्टानो को मार
विक्षत होगये, कोई भी देवता कुशलपूर्वक न बच सका ॥२६॥ विष्णु के
न सभी देवगण निराश हो रह थे ॥२७॥ परतु भगवान् विष्णु तनिक
वलित नहीं हुए, उनको किचित् क्रोच भी नही आया ॥२८॥ वे युद्ध का
ग करते हुए आक्रमण के लिये उपयुक्त अवसर देख रहे थे ॥२६॥ मय
की उस भाषा की दृद्धि होते हुए देख कर भगवान् ने वायु और अग्नि को
कने वा सकेत किया ॥३०॥ उनकी याज्ञा पाते ही वायु और अग्नि दानवी
को समाप्त करने म जुट गय । तव अग्नि और वायु के सयाग से प्रनय के
वृद्धि को प्राप्त होती हुई दैत्य सेना न होने लगी थोर दानवो द्वारा
विनीय माया का मत होगया ॥३१ ३३।।
वायु प्रघावितस्तन पश्चादग्निश्च मारुतात् ।
चेरतुर्दानवानीके क्रोड बननानिलो ॥३४
१८० ]
[ श्री, हरियशपुराण
धूम्रकेशो हरिन्छमथ दंष्ट्रालोष्टपुटानन ।
लोक्यान्तरविस्तारो धारयन्विपुल वपु ५०
बाहुभिस्तुलयन्व्योम क्षिप-पद्भया महीधरान् ।
ईरयन्मुखश्विासर्वृष्टिमन्तो वलाहकान् ॥५१
तिर्यगायतरक्ताक्ष मन्दरोदयवर्चसम् ।
दिधक्षन्तमिवायात सर्वान्देवगणान्मृधे ॥५२
तर्जयन्त सुरगणाश्छादयन्त दिशो दश ।
सवर्तकाले क्षुधित दृप्त मृत्युमिवोत्थितम् ॥५३
सुतलेनोच्छितवता विपुलागुलिपर्वणा ।
माल्याभरणपूर्णेन किञ्चिच्चलितवर्मणा ॥५४
उच्छितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता ।
दानवान्देवनिहता
ध्वमिति व वन् ॥५५
त कालनेमि समरे द्विषता कालसलिभम् ।
वीक्षन्ति स्म सुरा सर्व भयविक्लवलोचना ॥५६
त स्म वीक्षन्ति भूतानि क्रमन्त कालनेमिनम् ।
त्रिविक्रम विक्रमन्त नारायणमिवापरम् ।।५७
HTTLE आमतातार ।
वालिनेम के साथ देवताओ का युद्ध ] [ ११ रव देवताओ को युद्ध मे मस्न कर डालेगा ॥५०-५२।। वह देवताओं को भय- मीत करता और दसा दिशाओ को अवरुद्ध करता चलता हुआ ऐसा प्रतीत होता था, जैसे प्रलयकाल म क्षुधात मृत्यु सामने से आरही हो ॥५३॥ देवताओ के हाय से जो दैत्य मारे गये ५ उह बालनमि ने उठाने का सकेत किया ॥५४५५१ उस समप शत्रुओं के लिये काल के समान उस कालनेमि को देख कर देवगण अत्यन्त भयभीत हुए और सासारिक प्राणियों ने समझा कि यह द्वितीय त्रिवि- क्रम भगवान् रण क्षेत्र में विचरण कर रहे हैं ॥५६ ५०।। जब उस असुर ने अपना दक्षिण पग बढाया तब देवगण व्याकुल हो उठे और उनके शस्त्रास्त्र वायु से हिल उठ । उसी समय दानवराज मद ने वहां आकर कालनेमि को कठ से नगा लिया उस समय वह मन्दर पर्वत जैसा लगने लगा ॥५८५६॥ यम के पमान घोर भयानक कालनेमि को युद्ध क्षेत्र में उतरता देख कर इद्रादि देवता प्रत्य त भयभीत और व्यथित हो गय ॥६०॥ ॥ कालनेमि के साथ देवताओ का युद्ध । दानवाश्चापि पिप्रीपु कालनेमिर्महासुर । व्यवर्धत महातेजास्तपान्ते जलदो यथा||१ त्रैलोक्यान्तर्गत स तु दृष्ट्वा ते दानवेश्वरा । उत्तस्युरपरिश्रान्ता प्राप्येवामृतमुतमम् ।।२ ते भीता भयसन्तस्ता मयतारपुरोगमा । तारकामयसग्रामे सतत जयकाइ क्षिण । रेजुरायोधनगता दानवा युद्धकाक्षिण १३ अनमभ्यस्यता तेंपा व्यूह च परिधावताम् । प्रेक्षता चाभवत्प्रीतिर्दानव कालनेमिनम् ॥४ ये तु तल मयस्यासन्मुख्या युद्धपुर मरा । तेऽपि सर्वे भय त्यक्त्वा हृष्टा योद्धमुपस्थिता ।५ वंशम्पायन ने कहा- हे राजन् ! महा अमुर कालनेमि दानवो को प्रसन रने के लिए नवीन मेघ के समान वृद्धि को प्राप्त होने लगा ११॥ तीनों लोको १८२ ] [ श्री हरिवंशपुराण में प्रसिद्ध कालनेमि को अपने मध्य देख कर दानवगण प्रसन्नचित्त से उठ खड़े होगए, मानो उन्हे श्रेष्ठ अमृत की प्राप्ति होगई हो ॥२॥ मय तथा शार.... दानवों का भय दूर होगया। 22 मय तथा तारादि के युद्ध में सभी दानव विजय से प्रसन्न हो उठे ॥३॥ सेना के सभी सैनिक, जो युद्धाभ्याम तथा व्यूह निर्माण यादि मे ध्यस्त थे, वे टकटकी वाधकर,कालनेमि को देखने लगे तथा उन्हें अत्यन्त प्रसन्नता हुई ॥४॥ मय दानव के युद्ध मे निपुण सैनिक भय छोडकर उत्साह- पूर्वक तथा प्रसन्नचित से युद्ध के लिए एकत्र होगए ॥५॥ मयस्तारो वराहश्च ह्यग्रीवश्च वीर्यवान् । विप्रचित्तिसुतः श्वेत खरलम्बावुभावपि ॥६ अरिष्टो बलिपुत्रस्तु किशोरोष्ट्री तथैव च । स्वर्भानुश्चामरप्रख्यो वक्रयोधी महाबलः ।।७ एतेऽस्त्रविदुष सर्वे सर्वे तपसि सुव्रताः । दानवाः कृतिनो जग्मुः कालनेमिनमुत्तमम् ॥८ ते गदाभिश्च गुर्वीभिश्चक्रश्च सपरश्वधैः । अश्मभिश्चाद्रिसदृशेर्गण्डशैलश्च दशित. 18 पट्टिभिन्दिपालैश्च परिघश्चोत्तमायुधः । घातिनीभिश्च गुर्वीभिः शतघ्नीभिस्तथैव च ॥१० कालकल्पैश्च मुसलैः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः । युगैर्यन्त्र श्च निर्मुक्तरर्गलेश्चाग्रताडितः ।।११ दोभिश्चायतपीनासः पार्शः प्रासश्च मूच्छिते. । सपैलेंलिह्यमानश्च विसर्पद्भिश्च सायकैः ।।१२ वर्च: प्रहरणीयश्च दीप्यमानश्च तोमरः । विकोश श्चासिभिस्तीक्ष्णः शूलैश्च शितनिर्मलैः ॥१३ ते वै सन्दीप्तमनसः प्रगृहीतत्तोमायुधाः । कालनेमि पुरस्कृत्य तस्यु. सड ग्राममूर्धनि ॥१४ मय, सार, घराह, हयग्रीव, विप्रवित्ति-पुत्र प्वेत, खर, लम्य, बलि बरिष्ट, विशोर, उष्ट्र, देवताओं में प्रत्यात पक्रयोधी बया महान शा
गरिनेमि के माप देवताओं का पुट ]
[ १८६
राह एव यहा से यात्रनुगम ठपा मोनिष्ठ दानव भारी गा, पर,
गा, गृप गूगल, सेरणास्त्र, मुदगर, यंतागे वृहर यार की गिना,
पण देने पनि गागर, पहिल, मिसार, उत्तम मोहे पी पनी हुई
प, गगार का नाम बग्ने यानी मानी, युग, पात्रपात गदिमान अर्गन, पास,
I, TANT जीम याने गों के समान पान पर पहुए तीर, प्रसार,
योग पय, पमपमाती सोमर, पान गे निरनी मगी सया तीरा
पार और गून गे गर्ने हए भाो मादि नाना प्रकार से मात्र मन्त्र पारी
य-गनिर पालनेमिमी मागे पर पुरयम में था उपरित हुए ॥६.१४॥
मा दोनशम्यरा दैत्यानां गुगुभे चमः ।
चौनिमोनिानाया गयनेयाम्बुदागमे ।।१५
देवनानामपि पम् गाये समानिता।
दोना नीतोपोगाम्यां पन्द्रमाम्बरवचंगा ॥१६
यामुगसी गौम्या तारागगनाशिनी ।
सोपविदरगना प्रानसमामिनी ।।
यमेन्द्रपनगुंना यरन प धीमता।
गंप्रदीप्ताग्नि पपना नारायणपरायणा ॥१८
मा गगुद्रीपमहगी दिव्या देवमहानमः ।
रगजापानी भीमा पक्षपांगामिनी
गदीपमोगदा तप यभूय म गमागमः ।
पाराधियो. गंयोगी यदा म्याद गपचे ॥२०
गरममयलोर. देशानयनम् ।
मारगमरमणिय प॥२॥
१८४ ]
[ श्री हरिव
सेना अनेको प्रकार के अस्त्रो को धारण किए हुए यक्षो तथा गन्धर्वो सहित)
के वेग के समान सुशोभित हुई ॥१५-१६॥ जैसे प्रलय के समय पृथिवीर
आकारा मिल कर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार दोनो ओर की सेनाओ के नि
ही भीषण युद्ध आरम्भ हो गया। देवगणो ने प्रारम्भ मे तो इन हारे हुए।
के साथ शिथिलता दिखलाई, किंतु बाद म महान् पराक्रम सहित उनको ।
लगे । इसके विपरीत दानवो ने नग्न देवगणो के साथ प्रारम्भ में पराक्रम
लाया, किन्तु बाद मे शिथिलता से युद्ध करने लगे ॥२०-२१॥
निश्चक्रमुर्बलाभ्या तु भीमा सुरासुरा ।
पूर्वापराभ्या सरब्धा सागराभ्यामिवाम्बुदा. ॥२२
ताभ्या बलाम्या सहृष्टाश्चेरुस्ते देवदानवा ।
वनाभ्या पार्वतीयाभ्या पुष्पिताभ्या यथा गजा ॥२३
समाजग्मुस्ततो भेरी शङ्खान्दध्मुश्च नैक्श ।
स शब्दो द्या भुव चैव दिशश्च समपूरयत् ।।२४
ज्याघाततलनिर्घोषो धनुषा कूजितानि च ।
दुन्दुभीना निनदता दैत्याना निर्दधु स्वनान् ।।२५
तेऽन्योन्यमभिसपेतु पातयन्त परस्परम् ।
वभञ्जुब मिर्वाहून्द्वन्द्वमन्ये युयुत्सव ॥२६
देवतास्त्वशनी?रा परिघाश्चोत्तमायसान् ।
ससर्जु राजो निस्त्रिशान्गदा गुर्वीश्च दानवः ॥२७
गदानिपातर्भग्नाङ्गा वाणश्च शकलीकृता ।
परिपेतुर्मुश पेचिन्युजा केचित्ससजिरे ॥२८
समुद्र की पूर्व तथा पश्चिम दिशाओं से उठे हुए मेघो के समान उन
सेनाओं में से दोनो ओर के निडर तथा यहादुर सैनिक निक्लने लगे
पुषों से परिपूर्ण तया पर्वतो वाले जगलो मे जिस प्रकार हाथी घूमते
उसी प्रकार दोनों ओर वे योसा दोनो शिवरी में घूमते हुए युद्ध करने लगे
बचाना पारों दिशामो में मेरी घने लगी तथा शह का शब्द गूजने
पासनेमिरे गाय देवठात्री का युद्ध ] [ ११ उनभरी तपामा प्रदिप्यनि में तीनो मार जगए ॥२॥यचा की धोर, पनुको सो रकार सपा दुन्दुभी को पनि में दानयां का मारा र माह ठग पर गया ॥२४॥ पर दोनो मी मोटा आरम में मापान में हुए एक दूसरे को मारने मर्ग । एप योस परपर इन्दरते हुए एक दूसरे की बार तोरने मगादेगा मोहे वो नी भोपारिप रुपा दरारा बीपी सपा भारी मा और जिस से मापात परो ॥२७॥ उनमे गत से पोखरामा मग गानों के पार रे मग हो गए और बहुत से पोसामोरे शरीर गोरों मे रहो पर लिए गयो वेदम हारपियो पर गिर गए पापुलर गरेर६ गए ॥२८॥ मनो र गनुरगरिमानंरनारगामिभिः । समीयन्ते तु मरव्या रोपादन्योन्यमारखे ॥२६ मंयमाना. ममरे रिक्तंन्नन्नवापरे । रपा रनिग्यले पदानाभ पनातिभि ॥३० तेगा पाना तुमनः ममद गमवाहिनाम् । यगाय प्रगरताना नमीय पोन गाम् ॥३१ बजिरे रपारेचिमदिता रपं.। गया मेरे गमापन भनिनु रया ॥३२ अन्योन्यम्याभिगमरे दोर्याम रिक्षप्य पिता. । महारमानामग्मा जानुम्मवासियमिन ॥ मार विनिभिन्ना सा माना यधि। भरग्नाना गागा उमाना गपागमे ।। मरतापदिन निमारिनन् । देवनागरमा सगरम पदमारमो.
-- १८६ ] . [ श्री हरिवंशपुराण तथा पैदल योद्धाओ द्वारा पंदल योद्धाओं के मार्ग रुक गए ॥३०॥ आकार में बादलो की गर्जन-ध्वनि के समान रयो से भीषण ध्वनि होने लगी। किसी-क्सिी' पा रथ ध्वस्त हो गया तो कुछ रयो से कुचल कर ही मर गए । बहुत से रथियो को इस भीड मे रथ आगे बढ़ाना ही दूभर हो गया ॥३१-३२॥ बहुत से ढाल तथा तलवारो को धारण करने वाले योद्धा अपने दोनो हाथो से गर्वपूर्वक तल- वार चलाने लगे। उस समय उसके सभी हथियार तथा आभूपण ध्वनि करने लगे ॥३३॥ बहुत से घायल योद्धाओ के शरीर से रक्त इस प्रकार बढे लगा जिस प्रकार जलवर्षी मेघो से जल बरसता है ॥३४॥ इसी प्रकार दोनो ओर के योद्धाओ के शस्त्रो के आघात से बहुत भीषण युद्ध होने मेगा ॥३॥ तहानवमहामेघ देवायुधतडित्प्रभम् । अन्योन्यबाणवपं तयुद्ध दुर्दिनमावभौ ॥३६ एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धः कालनेमिर्महासुरः । व्यवढं ते. समुद्रोघः पूर्यमाण इवाम्बुद. ॥३७ तस्य विद्युञ्चलापीडा. प्रदीप्ताशनिवषिणः । गा। नगशिरःप्रख्या विनिप्पेपुर्वलाहका. ॥३८ क्रोधान्ति श्वसतस्तस्य भ्रभेदस्वेदपिणः । साग्निनिप्पेपपवना सुखान्निश्चेरुचिपः ॥३६ तिर्यगूवं च गगने ववृधुस्तस्य वाहवः । पञ्चास्याः कृष्णवपुपो लेलिहाना इवोरगाः ॥ सोऽस्मजालबहुविधधनुभि. परिपरपि । दिव्यरावाशमाव पर्वतरुद्रितैरिव ॥४१ सोऽनिलोद तवसनस्तस्थी सग्राममूद्ध नि । सन्ध्याऽनपग्रस्तशियः साक्षान्मेररिवाचलः ॥१२ दस्यो रूपो मेघों पर देवगणों पे शस्त्रो रूपी विधन तपा दोनों ओर की तीरों के पादान-प्रदान रूपी वर्षा एक हो जाने से पुरयल में भीषण दृश्य उपस्थित हो गया ॥३६॥ तभी महान् देस्य गासनेमि, समुद्र के जल से भरे हुए मादमारे समान, भोप में भर गया ॥३७॥ विद्युत् पी माला से अलत, वय लिनेमि के साग देवताओं का युद्ध ] [ १८७ समान बरसने दाला, पवंठो शिवरों के समान मेघ उसके स्पर्श से टुरहे. हे हो गए ॥३८॥ प्रोप ये वशीभूत वालनेमि की दोनो भौहों से पसीना ने लगा। उसका स्यांग जोर परदने लगा। उस समय वचवी यग्नि शिसा उहश उसके मुंह से उष्ण श्वान निकलने लगा ॥३६॥ उसरी समी बाहु लपाती जीम वाले तथा पांच मुंह वाले सपों के महम टंडी होकर कार की र उठ गई ॥४०॥ चे गिवरो वारे पवंतो के समान उसके घनुप, परिष । अन्य बहुत से अस्त्र-शस्त्रों से सारा आकाश ढंक गया ॥४१॥ जिम समय न असुर कालनेमि युद्ध स्थल में आया तो उसके वस्त्र वायु के वेग से उड थे। उस समय वह दानव शाम के मूर्य के प्रकार मे चमकते हुए कचे खरों वाले मुमेह पवंत के समान दिखलाई दे रहा था ॥४२॥ करवेगप्रतिक्षिप्तः शैलशृङ्गाप्रपादपः । अपातयद्दे वगणान्वजेणेव महागिरीन् ।॥४३ बाहुभिः शस्त्रनिस्तिशं श्छिन्नभिन्न शिरोरसः । न शेकुलितु देवाः कालनेमिहता युधि ।।४४ मुष्टिमिनिहताः केचित्केचिच्च विदलीकृताः । यक्षगन्धपतयः पेतुः सह महोरगः ॥४५ तेन विनामिता देवा: ममर कालनेमिना। न शेकुर्यत्नवन्नोऽपि प्रतिक्तु विचेतसः ।। तेन शक्र: महताक्ष. स्तम्मित: शरबन्धनः । ऐरावतगतः मख्ये चलितुन शनाक 11८. निर्जलाम्मोदमहशो निर्जलार्णवमत्रमः। निर्व्यापारः कृतस्तेन दिपागो दो रण वैधवणस्तेन परिधः कालनि! व्यलपल्लोकपालेशस्त्याग्दिी १८८ ] [ श्री हरिवापर खङ्ग के आघात से उनके वक्ष-स्थल तथा मस्तक मण्ड-खण्ड हो गए। आघात से उनमें हिलने-डुलने को सावित भी नहीं रही ॥४४॥ ालनेमि । मुष्टि की चोट से बहुत से गन्धर्व तथा यक्ष मर गए और बहुतेरे पीडित होर धराशायी हो गए ॥४५॥ इसी तरह कालनेमि द्वारा पीडित देवगए अपनी इच्छा के रहते हुए भी बुद्धि सो वैठे तथा वे प्रतिघात न कर सके ॥४६॥ सहस्रों मे घाले इन्द्र कालनेमि के तीरो से पीडित होकर अपने ऐरावत हाथी पर अज्ञानी जैसे बैठे रह गए ॥४७॥ वरुण अपने अस्त्र पाश के नष्ट होने के कारण हिना जल वाले बादल तथा सूखे हुए समुद्र के सदृश उदासीन हो गए ॥४८॥ कालनेमि मृत्यु समान परिधो के प्रहार से पीडित होकर लोकपाल कुबेर की जैसे बुद्धि समाप्त हो गई ॥४६॥ यम सर्वहरस्तेन दण्डाहरणो रणे । याम्यामवस्था समरे नीत स्वा दिशमाविशत् ।।५० स लोकपालानुत्साद्य कृत्वा तेपा च कर्म तत् । दिक्षुसर्वासु देह स्व चतुर्धा विदधे तदा ॥५१ स नक्षत्रपथ ग्रत्वा दिव्य स्वर्मानुदर्शितम् । जहार लक्ष्मी सोमस्य त चास्य विषय महत् ।।५२ चालयामास शीताशु स्वर्गद्वाराच्च भास्करम् । सायन चास्य विषय जहार दिनकर्म च ।।५३ सोऽग्नि देवमुखे दृष्ट्वा चकारात्ममुखे स्वयम् । वायु च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम् ॥५४ स समुद्रात्समानीय सर्वाश्च सरितो बलात् । चकारात्मवशे वीर्यादेहभूताश्च सिन्धव ॥५५ अप स्ववशगा कृत्वा दिविजा याश्च भमिजा । स्थापयामास जगती सुगुप्ता धरणीधरै ॥५६ यमराज जिनमें सभी को अचेत करने की शक्ति थी, स्वय ही कालने' के आघात से अचेत हो गए उनके योद्धा उन्हें दक्षिण दिशा की ओर ले । 11०॥ हे राजन् जनमेजय ! इस प्रकार उस महान् दैत्य कालनेमि ने लोकपा प्णु द्वारा देवता को आश्वासन ] [ १८६ मुद्ध में हराकर अपने शरीर के चार खण्ड किए और चतुहिक में स्वय वरुण, द्रि आदि लोकपालो के कार्य करने लगा ॥५१॥ वह महादातव कालनेमि राहू रा निर्देशित नक्षत्रों के पथ पर गया। उसने चन्द्रदेव का सारा ऐश्वर्य अपने 'धिकार में लेकर उन राज्य पर भी अविकार कर लिया ।।५२।। उसके भय - सूर्यदेव स्वर्ग द्वारा विमुम्द होकर अपन रात्रि तथा दिन करने के कार्य से भी प्रमुख हो गए ॥५३॥ अग्निदव को देवगणो के मुंह म देख कर उसने अपन "ह में स्थान दिया तया पवनदेव को अपन बाहुबल से हरा कर अपना आज्ञा- 'लव सेवक बना लिया ॥५४॥ उसके शौयं से सभी नदियां आदि समुद्र से कर पुन पूर्ण रूप से बहने लगी तथा उसके अधिकार मे हो गई ॥५५।। सिने पृथिवी तथा स्वर्ग में बहने वाली सभी जल धाराएँ पर्वतो से रक्षित भूमि तल पर स्थापित कर दी ॥५६।। रू स्वपभूरिकामाक्ति महाभूपतिर्महान् । सर्वलोकमयो दैत्य. सर्वलोकभयावह ॥५७ स लोक्पालकवपुश्चन्द्रसूर्यग्रहात्मवान् । पावकानिलसघातो रराज युधि दानव ॥५८ पारमेष्ठ्ये स्थित स्थाने लोकाना प्रभवात्यये। तुष्टुवुस्त दैत्यगणा देवा इव पितामहम् ॥५६ तब सभी लोकों मे भयकर तथा सभी लोको का राजा वह महान् दत्य पति भगवान् ब्रह्मा के सदृश शोमा को प्राप्त हुआ ॥५०॥ अन्त मे सभी क्पाल, चन्द्रदेव, सूर्यदेव, वायुदेव और अग्निदेव पर उसका अधिकार हो गया ५८। जब कालनमि ने इस प्रकार सृष्टि-रचियता ब्रह्मा के पद पर अधिकार र लिया, तो, जैसे देवगण सोक्पति भगवान् ब्रह्मा को स्तुति करते थे, वैसे ही त्य-गरण दानव-राज पालनमि की स्तुति करने लगे ॥५६।। ।। विष्णु द्वारा देवताओ को आश्वासन ॥ पञ्च त नाभ्यवत्तंन्त विपरीतेन कर्मणा । वेदो धर्म क्षमा सत्य श्रीश्च नारायणाश्रया ॥१
१६२ ।
[ श्री हरियशपुराण
यास्याम्यपचिति दिष्ट्या पूर्वेपामथ सयुगे।
इम नारायण हत्वा दानवाना भयावहम् ।।१६
क्षिप्रमेव वधिष्यामि रण नारायणाश्रितान् ।
जात्यन्तरगतोऽप्येप मृधे बाधति दानवान् ॥१७
एपोऽनन्त पुरा भूत्वा पद्मनाभ इति स्मृत ।
जघानेकार्ण वे घोरे तावुभौ मधुकैटभौ।
विनिवेश्य स्वके ऊरौ निहितो दानवेश्वरौ ॥१८
द्विधाभूत वपु कृत्वा सिंहार्द्ध नरसस्थितम् ।
पितर मे जघानको हिरण्यकशिपु पुरा ॥१६
शुभ गर्भमधत्तेममदितिर्देवतारणि ।
यज्ञकाले बलेर्यो वै कृत्वा वामनरूपताम् ।
त्रील्लोकानाजहारक क्रममाणस्त्रिभि क्रम ॥२०
भू यस्त्विदानी समरे सप्राप्ते तारकामये ।
मया सह समागम्य सह देवविनक्ष्यति ॥२१
आज यह मेरे सामने भाग्य से ही आ गया है। मेरे तीरी से पीडित
होकर अभी यह मेरे समक्ष झुक जायगा ||१५॥ आज मेरा सौभाग्य है कि मैं
इसका वध करके अपने पूर्वजो के ऋण से मुक्त होऊंगा। दानवो के लिए भया-
नर इस नारायण का नाश कर दूंगा तथा नारायण के आथित देवगणो का भी
पघ कर दूंगा । यह सभव है कि फिर कभी कोई अवतार धारण परके दामवो
को षष्ट दे ॥१६-१७॥ क्योरि पहले भी इसी अनन्त ने पद्मनाभ रूप धारण
करके मधु तथा इंटम दैत्यो को अपनी जॉप पर रख कर चौर पर वध किया
था ॥१८॥ इसी विष्णु ने नृसिंहदेव का अवतार लेकर मेरे पिता हिरण्यप शिपु
वो अपनी जांघ पर चौर पर वध पिया या ॥१६॥ इसने शुभ समय मे देव.
माता अदिति के गर्भ में जन्म धारण किया था। इसने असुरराज बसि के यस
समय में यामन अवतार धारण रिया तथा तीनों सोरों को तीन ही डग मे नाप
लिया था ।।२०।। परतु भर इस समय तारादि समाग में सभी देवगणों सहित
यद मेरे द्वारा मृत्यु को प्राप्त होगा ॥२१॥
विष्णु द्वारा देवताओं को आश्वासन ] [ १६३ स एवमुक्त्वा वहुधा क्षिपन्नारायण रणे।। वाग्मिरप्रतिहाभियुद्धमेवाम्यरोचयत् ॥२२ क्षिप्यमाणोऽमुरेन्द्रेण न चुकोप गदापरः। क्षमावलेन महता सस्मित वाक्यमद्रवीत् ।।२३ अल्पदपंबलो दैत्य. स्थित क्रोधादमद्वदन् । हतमत्वमात्मनो दोप. क्षमा योनीत्य भापसे ।।२४ अधमरत्व मम मतो धिगेतत्तव वाग्वलम् । न तर पुष्पा. सन्ति यत्र गर्जन्ति योपित. १२५ अह त्वा दैत्य पश्यामि पूर्वेपा मागंगामिनाम् । प्रजापतिकृत सेतुको भित्त्वा स्वस्तिमान्मवेत् ।।२६ अद्य त्वा नाशयिष्यामि देवव्यापारकारकम् । स्वेपु स्वेषु च स्थानेषु स्यापयिष्यामि देवता ॥3 हे राजन् । इस प्रकार दानबराज नाना प्रकार में नगवान को अपमान चरता हुआ युद्ध करने को उद्यत हो गया ॥२२॥ उस दैत्य के द्वारा इवना अपमान होने पर भी देवरात्र भगवान विष्णु क्रोधित नहीं हुए। अपितु धैर्य के साय मन्द मुस्कान सहित कहने लगे-॥२३॥ है दामद ! गर्व अयन्त तुच्छ होता है । वीर वही होता है जिसे वि दशक्ति रहते हुए भी क्रोर न पाए। इसलिए तुम घंचं खोकर, गर्व के दौप से कही गई दावों से ही मर चुके हो ॥२४॥ मैं तो तुमको वहा ही पापी जीव समझता हूं । तुम्हारे वाह-बल के गर्व के लिए तुम्हें विचार है। जहां पुरुष नहीं होते दही नारियां गरजती पिरती है ॥२५॥ मुझे दिखलाई देता है, जिन मार्ग पर तुम्हारे पूर्वज गए हैं, वही तुम जाना चाहते हो । प्रजापति मृष्टिकर्ता स विमुख होकर कोन प्रमन्नचित्त रह सकता है ॥२६॥ मात्र में तुम्हारा बर वर दूंगा क्योंकि तुमने देवगणो से टनके कार्यों को अपने अधिकार में ले लिया है। मैं सभी देवगणो को पुनः अपने-अपने पदासीन कर दूंगा ॥२७॥ एव वति तद्वावयं मृधे श्रीवत्सधारिणि । जहास दानव तोषाद-वाचक्रे च सायुधान् ।।२८
१६४ ]
[ श्री हरिवशपुराए
स बाहुशतमुद्यम्य सस्त्रिग्रहण रणे ।
क्रोधाद्विगुणरक्ताक्षो विष्णु वक्षस्यताडयत् ॥२६
दानवाश्चापि समरे मयतारपुरोगमा ।
उद्यतायुधनिस्त्रिशा दृष्ट्वा विष्णुमयाद्रवन् ॥३०
स ताड्यमामानोऽतिबलेदत्य सर्वायुधोद्यते ।
न चचाल हरियुद्ध ऽकम्प्यमान इवाचल ३१
ससक्तश्च सुहर्णेन कालनेमी महासुर ।
सर्वप्राणेन महती गदामुद्यम्य बाहुभि ॥३२
मुमोच तुलिता घोरा सरधो गरुडोपरि ।
कर्मणा तेन दैत्यस्य विष्णुविस्मयमागत ॥३३
यदा तस्य सुपर्णस्य पतिता मूर्टिन सा गदा।
तदाऽऽगमत्वदा भूमि पक्षी व्यथितविग्रह ॥३४
सुपर्ण व्यथित दृष्ट्वा क्षत च वपुरात्मन ।
कोधात्सरक्तनयनो वैकुण्ठश्चक्रमाददे ॥३५
वैशम्पायन बोले-हे महाराज | इस प्रकार योताम्बरधारी भगवान
विष्णु के रहने पर वह दानव क्रोष के साथ जोर से हंसा तथा उसने अपने
सभी शस्थ गम्हाल लिये ॥२८॥ इसके पश्चात् उस दैत्य ने सक्रोध सभी वस्त्र
शस्त्र अपन सौ बाहुओ मे लेकर भगवान विष्णु की छाती पर आघात
पहुँचाया ॥२६॥ तारकामय इत्यादि दैत्य भी निस्त्रिशिका आदि शस्त्र लेकर
विष्ण, भगवान पर आक्रमण करने को उद्यत हुए ॥३०॥ अत्यन्त वीर तथा
नाना प्रकार के शस्त्रो से शोभित दंत्यो के आघात करने पर भी भगवान
विचलित नहीं हुए तथा युद्ध स्थल के मध्य अकम्पित पर्वत के समान खडे
रहे ॥३१॥ इसके पश्चात् दानवराज कालनेमि ने अपनी भयकर गदा से गरा
के मस्तक पर प्रहार किया। उस दैत्य के इस कार्य को देखकर विष्णु भगवान
विस्मय मै पह गए ॥३२-३३।। उस गदा के प्रहार से पक्षिराज गरण बहुत
पीटित हुए तथा भूमि पर उतर आए ॥३४॥ पब भगवान विष्णु ने अपना तन।
सपा पक्षिराज गएड को घायल देखा तो उनके नेत्र कोप से लाल हो उठे।
तय उन्होंने अपना सुदर्शन चक हाथ में ले लिया ॥३॥
विष्णु द्वारो देवताओं को याश्वासन ]
[ १९५
व्यवद्धत च वेगेन सुपर्णेन समं प्रभुः ।
भुजाश्चास्य व्यवर्धन्त व्याप्नुवन्तो दिशो दश ॥३६
स दिशः प्रदिशश्चव खं च गां चंव पूरयन् ।
ववृधे स पुनर्लोकान्क्रान्तुकाम इवौजसा ॥३७
त जयाय सुरेन्द्राणां वर्द्धमानो नभस्तले ।
ऋषयः सह गन्धर्वस्तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ।।३८
स द्यां किरीटेन लिखन्सानमम्बरमम्वरः ।
पद्भ यामाक्रम्य वसुधा दिश: प्रच्छाद्य बाहुभिः ॥३६
सूर्यस्य रश्मितुल्याम महनारमरिक्षयम् ।
दीप्ताग्निसदृशं घोरं दर्शनीयं सुदर्शनम् ॥४०
सुवर्णनेमिपर्यन्तं वज्रनामं भयावहम् ।
मैदोमज्जास्थिरुधिरंदिग्धं दानवसंभवैः ४१
अद्वितीयं प्रहारेपु क्षुरपर्यन्तमण्डलम् ।
नग्दाममालाविततं कामगं कामरूपिणम् ॥४२
विष्णु भगवान तथा पक्षिराज गहड का शरीर विस्तार को प्राप्त होने
गा । भगवान् विष्णु की भुजाओं ने बढकर दसों दिशाओ को ढक
नया ॥३६|| उनके शरीर के विस्तार से दिशा, विदिगा, पृथ्वी तथा आकाश
सभी टैंक गए । ऐसा मालूम पड़ने लगा जैसे तीनों लोकों को आक्रान्त करने के
पाए उनका शरीर विस्तार को प्राप्त हो रहा है ॥३७॥ देवगणो के कल्याण
लिए विस्तारित शरीर को देखकर नभ-स्थित ऋपि तथा गन्धर्व जन भगवान
णु की स्तुति करने लगे ॥३८॥ इस शुम समय में उनके मस्तक मे स्वर्ग,
हानो मे अम्बर से बान्यादित आकाश, चरणों में वसुधा तथा भुजाओ मे दसों
पाऐं व्याप्त थी ॥३६॥ सूर्य की किरणों के समान चमकता हुआ, हजारों
र वाला, तीव्र भड़कती हुई अग्नि के समान, तीक्ष्ण तया भीषण सुददांन चक्र
के हाथों में सुशोभित हो रहा था ॥४०॥ उस भयानक चक्र को घार
को थी तथा नाभि धन के सदृश्य थी। उस पर दैत्यो का मेद, मज्जा,
यि तया रुधिर लगा हुआ पा || वह प्रहार करने में अद्वितीय पा। उसके
[ श्री हरिवंशपुरा किनारे हारो के समान और पुरे की धार जैसे तेज थे। वह भगवान विष्ण, साथ साथ विविध आकार धारण कर सकता था तथा सभी जगह मे समर्थ था ॥४२॥ स्वय स्वयभुवा सृष्ट भयद सर्वविद्विपाम् । महपिरोपराविष्ट नित्यमाहवदर्पितम् ।।५३ क्षेपणाद्यस्य मुह्यन्ति लोका सस्थाणुजङ्गमा। व्यादानि च भूतानि तृप्ति यान्ति महाहवे ॥४४ तमप्रतिमकर्माण समान सूर्यवर्चसा । चक्रमुद्यम्य समरे क्रोधदीप्तो गदाधर ॥४५ समुष्णन्दानव तेज समरे स्वेन तेजसा । चिच्छेद बाहु चक्रेण श्रीधर कालनेमिन ॥४६ तच्च वक्त्रशत घोर साग्निचूर्णाट्टहासिनम् । तस्य दैत्यस्य चक्रण प्रममाथ बलाद्धरि ॥४७ स छिन्नवाहुविशिरा न प्राकम्पत दानव । कबन्धावस्थित सय्ये विशाख इव पादप ॥४८ त वितत्य महापक्षी वायो कृत्वा सम जवम् । उरसा पातयामास गरुड कालनेमिनम् ॥४६ । उस चक्र का निर्माण भगवान ने स्वय दिया था तथा उससे सभी भय। थे। उसमें पिजनाका शोध समाविष्ट पा था यह नित्य रण दर्प से पूर्ण पा ॥४३॥ इमका दुष्टों पर प्रहार करने पर सीनो लोक पुलकित हो उठते उसमे प्रहार परने पर युद्ध-स्थल में मृत योद्धाओ का मांस खाने वाले जीवो हृदय प्रसरता से भर उठता था ! तय भगवान विष्णु ने कोच में भ उस भयर प्रलय स्वरूप चक्र को लेकर अपने तेज से दरयो वा सारा एमाप्त परते हुए महान् अमुर वारनेमि भी सो चाह तथा भयानर हाह सौ मस्तकों को काट दिया ॥४५.४॥ यह देस्य अपने बाहु भरतों रेपट जाने पर भी सम्पित नहीं हा अपितु समय अपरया में ही विष्णु द्वारा देवताओं को याश्वासन ] रवाने वृक्ष के समान सहा रहा ॥४८॥ तनी विनता पुत्र पक्षिराज गाह नों पख फैलाकर उहने लगे तथा वायु के समान बैग से अपने वक्ष का सुरराज कालनेमि पर प्रहार कर उसे गिरा दिया ॥४॥ स तस्य देहो विमुमो विशाख: सालरिघ्रमन् । निपपान दिव त्यक्त्वा शोभयन्धरणीतलम् ॥५० तस्मिन्निपतिते देत्ये देवा सपिंगणास्तदा । साधु साध्विति वैकुण्ठं समेता. प्रत्यपूजयन् ।।५१ अपरे ये तु देत्या व युद्धे दुष्टपराक्रमा. । ते सर्वे वाहुमियाना न शेकुश्चलितु रणे ॥५२ काश्चित्वेगेषु जग्राह काश्चित्कण्ठेऽम्यपीडयत् । पाटयत्कस्यचिद्वका मध्ये काश्चिदयाग्रहीत् ।।५३ ते गदाचनिर्दग्पा गतसत्वा गतामव. । गगनाभ्रष्टमांगा निपेतुर्धरणीतले ५४ तेपु मर्वेषु दैत्येपु हतेषु पुरुषोत्तम । तस्थौ गक्रप्रियं कृत्वा कृतकर्मा गदाधरः ॥५५ इस प्रहार से दालनेमि का बाहु तथा मस्तरहीन गरीर लुढकने लगा या आकाग से गिरकर पृथ्वी को यकृत करने लगा ॥५०॥ उस भयर दैन्य का नाश होने पर देवगण तया ऋपिजन साधुवाद देते हुए भगवान् श्री विष्णु की स्तुति करने लगे ॥५१॥ और भी जो दंन्य युद्ध-म्यत्र में पराक्रम के साय [द कर रहे थे, वे सभी भगवान् विष्णु को वाहुओं से भिचकर मृत्यु को प्राप्त हो गए |॥५२॥ अन्य कुध दस्यों को वाल तथा कुर दयों को कण्ठ मरोडवर गवान ने मार डाला। बहुतों को उन्होंने अपने गदा तया चक्र से मार डाला या सभी दैत्य मृत्यु को प्राप्त होकर आकारा से धरती पर आ गिरे ॥५३-५४॥ म तरह भगवान् विष्णु देवराज इन्द्र में प्रिय कार्य दैत्यों का सहार करते हुए पन्त प्रसग्नचित्त में बड़े हो गए ।।५।। तस्मिन्विम निर्वृत्ते सग्रामे तारकामये । त देशमाजगामाशु ब्रह्मा लोकपितामह ॥५६
१९८ ]
[ यो हरिव शपुराण
सर्वब्रह्मर्षिभि साधं गन्धर्वे साप्सरोगण ।
देवदेवो हरिं देव पूजयन्वाक्यमब्रवीत् ॥५७
कृत देव महत्कर्म सुराणा शल्यमुद्धतम् ।
वधेनानेन दैत्याना वय हि परितोषिता ॥५८
योऽय हतस्त्वया विष्णो कालनेमी महासुर ।
त्वमेकोऽस्य मृधे हन्ता नान्य कश्चन विद्यते ॥५६
एष देवान्परिभवल्लोकारच सचराचरान् ।
ऋषीणा कदन कृत्वा मामपि प्रतिगर्जति ॥६०
तदनेन तवोग्रेण परितुप्टोऽस्मि कर्मणा ।
यदय कालतुल्याम कालनेमी निपातित ॥६१
तदागच्छस्व भद्र' ते गच्छाम दिवमुत्तमाम् ।
ब्रह्मर्पयस्त्वा ततस्था प्रतीक्षन्ते सदोगता ॥६२
अह महर्पयश्चैव तत्र त्वा वदता वर ।
विधिवच्चार्चयिष्यामि गीभिदिव्याभिरच्युत ॥६३
हे राजन् । इस प्रकार सग्राम का अन्त होने पर लोकपितामह ब्रह
सभी ब्रह्मर्पि, साधुजन, गन्धर्व तथा अप्सराओ सहित शीघ्र ही वहां पहुंचे ता
देवो के देव भगवान विष्णु की सराहना करते हुए कहने लगे-॥५६-५७।।
देव । बापने इन दैत्यो के विनाश स्वरूप जटिल कार्य को करके सभी देवगा
पा भय दूर कर दिया। इससे हम सभी बहुत प्रसन्नचित्त हैं ॥५८॥ हे विष्ण
आपने महान् असुर कालनेमि का नाश किया है, इसको सिवाय आपके के
और नहीं मार सकता था ॥५६॥ यह सभी देवगणो तथा लोको को जीत
पिजनी पो सतप्त करता हुआ मुझ पर भी गरजने लगा पा ॥६०11 आ
मृत्य रूपी पालनेमि थे सहार सदृश यह जटिल कार्य किया है इससे हम स
को अत्यन्त प्रसन्नता हुई ॥६१॥ अब हम सब लोग स्वगं चलते हैं, यहाँ'
सभी प्रापि एकत्रित हुए भापकी प्रतीक्षा में रेटे हुए है १६२॥ इलिए
यहाँ पलिए। वहाँ सभी महर्षि सपा मैं विविध प्रकार से आपकी स्तुति
पूजन पगे ॥६॥
विष्णु द्वारा देवताओ को वाइवासन ] [ १६६ कि चाहं तव दास्यामि वरं वरभृतां वर । सुरेप्वपि सदत्येपु वराणा वरदो भवान् ।।६४ निर्यातयतलेलोक्य स्फीतं निहतकण्टकम् । अस्मिन्नेव मृधे विष्णो शक्राय सुमहात्मने ।।६५ एवमुक्तो भगवता ब्रह्मणा हरिरव्यय. । देवान्छरमुखान्सर्वानुवाच शुभया गिरा ।।६६ श्रू यता त्रिदशा सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः । श्रवणावहितदेहैः पुरस्कृत्य पुरंदरम् ॥६७ अस्मिन्न समरे सर्वे कालनेमिमुखा हताः । दानवा विक्रमोपेता. शक्रादपि महत्तरा ॥६८ तस्मिन्महति सक्रन्दे द्वावेव तु विनि सृतौ । वैरोचनश्च दैत्येन्द्र. स्वर्भानुश्च महाग्रह ॥६ तदिष्टा भजता शको दिश वरुण एव च। याम्या यम पालयतामुत्तरा च धनाधिप ७० वैसे हम आपको वर तो क्या दे सफ्ते हैं क्योंकि आप तो स्वय ही सभी देवगणो तया दैत्यगणो को वर देते हो ॥६४॥ यब तीनो लोक में कोई भी कण्टक न होने से आनन्दमग्न हैं । अतः आप स्वय देवराज इन्द्र को तीनों लोकों का स्वामित्व दीजिए ॥६५॥ इस प्रकार भगवान विष्णु पितामह ब्रह्माजी के कहने पर इन्द्र आदि सभी देवगणो से यह शुभ सवाद कहने लगे ॥६६।। भगवान विष्णु वोले-यहाँ इन्द्रादि जो भी देवगण हैं, सभी ध्यानपूर्वक मेरी बात को मुनें ॥६७॥ इस महायुद्ध मे इन्द्र से भी अधिर शूरवीर कालनेमि आदि दैत्यो, का मैंने नारा कर दिया है ॥६८|| इस भयानक मग्राम में दो दानव बच गए हैं---एक विरोचन का पुन वलि और दूसरा राहु ॥६६॥ र देवराज इन्द्र तथा वरुण अपनी अपनी दिशाआ पर राज्य करें। दक्षिण दिशा पर यमराज तथा उत्तर दिशा पर कुवेर राज्य करें ॥७॥ ऋक्षे. सह यथायोग काले चरतु चन्द्रमा । अब्द ऋतुमुख सूर्यो भजतामयनै सह ।।७१ [ श्री हरिवशपुराण आज्यभागा प्रवन्तिा सदस्यरभिपूजिता । हूयन्तामग्नयो विप्रददृप्टेन कर्मणा ।।७२ देवाश्च वलिहोमेन स्वाध्यायेन महर्पय । श्राद्धन पितरश्चंव तृप्ति यान्तु यथासुखम् ।।७३ वायुश्चरतु मार्गस्थस्विधा दीप्यतु पावक यो वर्णाश्च लोकास्त्रीन्वर्द्ध यन्त्वात्मजगुण ७४ बतव सप्रवर्त्तन्ता दक्षिणीयद्विजातिभि । दक्षिणाश्चोपवर्त्तन्ता यथार्ह सर्वसविणाम् ।।७५ गाश्च सूर्यो रसान्सोमो वायु प्राणाश्च प्राणिषु । तपंयन्त प्रवर्त्तन्ता शिव सोम्यैश्च कर्मभि ॥७६ यथावदनुपूर्येण महेन्द्रसलिलोद्भवा । रैलोक्यमातर सर्वा सागर यान्तु निम्नगा ॥७७ नक्षत्री सहित चन्द्रमा अपने समय के अनुसार भ्रमण करे तथा अपने अपन मे बैठकर सूर्य ऋतुओ का ध्यान करते हुए अपने कार्य मे सलग्न हो ॥७॥ ब्रह्मजन यज्ञ मे विधानानुसार सभी सदस्यो द्वारा पूजित हवि तथा आहुति तीनों अग्नियो को प्रदान वरें ॥७२॥ देवगण बलि-होम द्वारा, ऋपिजन स्वाध्याय द्वारा तथा पितृगण श्राद्ध द्वारा प्रस नतापूर्वक पूर्ण रूप से तृप्त हो ॥७३॥ वायु थपने माग पर अग्रसर होते रहे अग्नि यज्ञ कुण्ड मे गाहपत्य से सन्तुष्ट होकर दीप्यमान हो तथा त्रिलोको वासी तीनो वर्णो के अनुसार अपने अपने गुणो का पालन करें ।।७४।। दीक्षा ग्रहण करने के लिए द्विजाति यज्ञ प्रारम्भ कराऐ । या का आयोजन कराने वाले जितनी दक्षिणा देने को कहे, उतनी दक्षिणा ही घाटी जाय 11७५॥ सूर्य अपने शुभ कार्य से प्राणियो के नेत्रो, चन्द्र अन्न आदि रसो तथा वायु सभी प्राणियो के श्वास को तृप्त करें ॥७६॥ इन्द्र द्वारा वर्षित से निकली हुई तीनो लोको की प्राणदायिनी नदिया पुन पूर्व समय की तरह बहती हुई सागर में गिरें ॥७७॥ दैत्येभ्यस्त्यज्यता भीश्च शान्ति व्रजत देवता । स्वस्ति योऽम्नु गमिप्यामि ब्रह्मलोक सनातनम् ।।७८ विष्ण, भगवान विषयक प्रश्न ] [ २०१ स्वगृहे सर्व तोके वा मग्रामे वा विशेपत.। विधम्मो हि न मन्तव्यो नित्य क्षुद्रा हि दानवाः || छिद्रे पु प्रहन्त्येते न चंपा सम्यितिघ्रवा । सौम्यानामृजुभावाना नवता चार्जवे मति. ॥६० अह नु दुष्टभावाना युप्मामु सुदुरात्मनाम् । बमभ्यग्वर्तमानाना मोह दाम्यामि देवना. १ यदा च सुदुराधपं दानवेभ्यो भय भवेत् । तदा समुपगम्याशु विधास्ये वस्ततोऽभयम् ।।२ एवमुक्त्वा सुरगणान्विष्णु सत्यपराक्रमः । जगाम ब्रह्मणा साधं ब्रह्मलोक महायशा ॥८३ एतदाश्चर्यमभवत्मग्रामे तारकामये। दानवाना च विष्णोश्च यन्मा व परिपृच्छसि ।।१४ हे देवगणो | अब दानवों का भय छोटकर शान्तिपूर्वक जीवनयापन स, तुम्हारा कल्याण होगा। तया में अपने सनातन ब्रह्मलोक को जाता 11७11 दैत्याए अत्यन्त नीच होते है, अत इनके घर, स्वर्ग तथा विशेषतया दम्यल में इन पर कभी विश्वाम नहीं करना ॥७६।। तनिक रास्ता मिलते । ये दैत्य उपद्रव शुरू कर देते हैं। मर्यादा का पालन करना तो ये जानते ही ही । तुम मनी अत्यन मृदु तया शान्त प्रकृति के हो ॥०॥ जब-जब ये दुष्ट या पानी दत्य तुमको सताऐ ग तथा तुम इनसे अत्यन्त भय-बन होगे, तब र मैं शीघ्र वापर तुम्हारा मय दूर कर दूंगा ॥८१-८॥ वंशायन ने कहा- राजन् इस प्रकार देवगणो से कह कर मत्यपराक्रम तया तेजम्बी भगवान् विष्णु पितामह ब्रह्मा के ब्रह्मलोर को चले गए ॥८३॥ मय तया दारादि 'ग्राम में दग्यो तथा भगवान वारे में जानने की यापने मुझसे इच्छा प्रकट यो, उसी विस्मयमरी क्या का वर्णन मैंन आपने किया ॥४॥ ॥ विष्णु भगवान विषयक प्रश्न ॥ ब्रह्मणा. देवदेवेन. साई सलिलयोनिना। ब्रह्मलोक गतो ब्रह्मन्वकुण्ठ किं चकार ह ॥१ .
२०२ ] [ श्री हरिवगावरा किमयं चादिदेवेन नीत. कमलयोनिना। विष्णुदत्यवधे वृत्त देवश्च कृतसस्क्रिय. ॥२ ब्रह्मलोके च कि स्थान व वा योगमुपास्त सः । क वा दधार नियमं स विभुभूतभावनः ॥३ कथ तस्यासतस्तत्र विश्व जगदिद महत् । थियमाप्नोति विपुला सुरासुरनराचिंताम् ॥४ कथ स्वपिति धर्मान्ते युध्यते चाम्बुदप्लवे। कथ च ब्रह्मलोकस्थो धुर वहति लौकिकीम् ॥५ चरित तस्य विप्रेन्द्र दिव्य भगवतो दिवि । विस्तरेण यथातत्व सर्वमिच्छामि वैदितुम् ॥६ महाराज जनमेजय ने कहा-हे ब्राह्मणदेव । दानव सहार के परचा पितामह ब्रह्माजी के साथ ब्रह्मलोक जाकर भगवान श्रीविष्णु ने क्या-क्या किये ॥१॥ कमलयोनि ब्रह्मा उन्हे ब्रह्मलोक किस प्रयोजन से ले गए ?। विष्णु भगवान ब्रह्मलोक के किस भाग मे गए, वहां उन्होंने किस योग । उपासना की तथा किन नियमो का पालन किया ? ॥२॥ वहां रहते हुए त्रिलो को देवगण, दैत्यगण तथा मनुष्य-जनों द्वारा पूज्य लक्ष्मी जी किस प्रकार मिली ।।४। भगवान् क्यो ग्रीष्म ऋतु के अन्त सोते हैं तथा बरसात के बाद उठते है ब्रह्मलोक में रहकर तीनो लोको का पालन किस प्रकार करते हैं? ॥५॥ विप्रवर में भगवान् विष्णु को इन दि-य लीलाओ का वर्णन विस्तारपूर आरम्भ से अन्त तक सुनना चाहता हूँ ॥६॥ शृणु नारायणस्यादौ विस्तरेण प्रवृत्तय । ब्रह्मलोकपथारूढो ब्रह्मणा सह मोदते ७ काम तस्य गति सूक्ष्मा देवैरपि दुरासदा। यत्तु वक्ष्याम्यह राजस्तन्मे निगदत शृणु ॥८ एप लोकमयो देवो तोकाश्चैतन्मयास्त्रय.। एप देवमयश्चंव देवाश्चंतन्मया दिवि ॥६ २
विरा नगवान विषयक प्रश्न ]
[ २०३
तम्य पार न पश्यन्ति वह्न पारचिन्तुका ।
तत् पार पर चंव लोगना वेद माधव ॥१०
यम्य देवाधिकारस्य मागितन्यस्य देवन ।
शृणु वै यत्तदा वृन ब्रह्मलोके पुरातनम् ।।११
म गत्वा ब्रह्मणो लोक दृष्ट्वा पतामह पदम् ।
ववन्दै तानृपीन्नर्वान्विष्णुगज पर्मना ॥१९
सोऽग्नि प्राक्सवने दृष्ट्वा हूयमान महर्षिनि ।
अवन्दत महातेजा कृत्वा पोवानिकी क्रियाम् ॥१३
स ददर्श मवाज्यरिज्यमान महर्षिभि ।
भाग यज्ञियमन्नान म्ददेहमपर स्थितम् ॥१४
वैगम्मायन ने दहा-महारानावन् पो दिने रितामह ब्रह्माजी
के साथ ब्रह्मलोक में जो कार्य किया, मुनिए, विस्तारपूर्वक पहर में उसी का
(वर्णन कर रहा है । परन्तु उनकी लीलाओं का आगार बयत गहन है।
उनकी लीलाओं को देवगा भी नहीं जान पान । अपितु में यथास्ति आपको
बता रहा हूँ, मुनिए ॥६॥ देवों के देव नगदान दिन में तीनों लोक समाये
हुए हैं तया तीनों लोका में भावान व्याप्त हैं। इसी तरह म्वर्ग नगवान में
समाया हुआ है तथा भगवान् स्वर्ग म व्याप्त हैं 1 बनकों बोगी महापुरुष
वहृत प्रपन वग्न पर नी मावान् का पार न पा मरे । परन्तु नगवान् तीनों
लोगों का बोर-छोर तथा टम मम का नली नांनि समयत हैं ॥१०॥ वे महा-
प्रभु हैं, हृदय तथा ववन में दूर हैं । देवगा नियति उनकी डोर करते
रहढे हैं । मैं अब नगवान् के मनाउन ब्रह्मलोक का दर्शन करता हूँ मुनिए
॥११॥ ब्रह्मलोर में पटुंचकर मदस पहन उन्होंने उसको नली-भांति देवा ।
तत्पश्चात् नगवान् न वहाँ रहन वाल ऋपिजनों को विधिवत् धन्यर्थना की।
वहाँ नगवान् न दवा कि पावला में वहां रहने रहने वाले महषि हवन में
आदति दे रहा है। प्रात क्रिया के ममाप्त होन पर नगवान विष्णु न अनि
ठा का नमसा किया ऋषिनों द्वारा आह्वान पर पर गाहप यदि
ग्रहण करने वाले यग्नि ददता नगदाद के ही अन्य प हैं ॥१४॥
२०४ ] [ श्री हरियापुराण अभिवाद्याभिवाद्यानामृपीणा ग्रह्मवर्चसाम् । परिचक्राम सोऽचिन्त्यो ब्रह्मलो सनातनम् ॥१५ स ददर्शोच्छितान्यूपाश्चपालाद्मविभूषितान् । मखेषु च ब्रह्मपिभि शतश कृतलक्षणान् ।।१६ आज्यधूम समानाय शृण्वन्वेदान्टिजेरितान् । यज्ञ रिज्य तमात्मान पश्यस्तत्र चचार ह॥१७ ऊचुस्तमृषयो देवा सदस्या सदसि स्थिता । अर्पोद्यतभुजा सर्वे पवित्रान्तरपाणय ॥१८ देवेषु वर्तते यद्वं तद्धि सर्व जनाईनात् । यत्प्रवृत्त च देवेभ्यस्तद्विद्धि मधुसूदनात् ॥१६ अग्नीषोममय लोक य विदुर्विदुषो जना । त सोमग्नि लोक च वेद विष्णु सनातनम् ॥२० चिन्ता रहित भगवान् विष्णु पूज्य तथा ब्रह्मवर्चस्वी ऋपिजनो की अभ्यर्थना करके सनातन ब्रह्मलोक मे घूमने लगे ॥१५॥ उन्होंने देखा कि वहाँ / पर रहने वाले ब्रह्मर्षियो द्वारा चिन्तित करके बडे बडे उच्च यज्ञ स्तम्भ स्थित किये हुए हैं ॥१६॥ शुद्ध घी को सुगन्ध आ रही है ब्राह्मगजन वेदो का उच्चारण कर रहे हैं तथा भगवान की प्रार्थना के लिए यज्ञो का आयोजन हो रहा है । यह सब देखते हुए वे फिर घूमने लगे ॥१७॥ वहाँ रहने वाले ऋपिजन तथा देवगण आदि शुद्ध मनोभावना के साथ अपने शुभ हाथो में अर्ध्य लिए हुए कहने लगे ॥१८॥ हे भगवन् । हम सभी जो भी कार्य कर रहे हैं तथा जो जो कार्य कर चुके हैं, उसमें आपकी सहायता को अत्य त आवश्यकता है ॥१६॥ सभी विद्वानगण इस ससार की सृष्टि अग्नि तथा चन्द्र से हुई मानते हैं, अत अग्निदेव, चन्द्रदेव और यह ससार आपके द्वारा रचित है ॥२०॥ स्वागत ते सुरश्रेष्ठ पद्मनाभ महाधु ते । इद यज्ञियमातिथ्य मन्त्रत प्रतिगृह्यताम् ॥२१ स्वमस्य यज्ञपूतस्य पाल पाद्यस्य पावन । अतिथिस्त्व हि मन्त्रोक्त सदृष्ट सतत मत ॥२२ - अषियों को ब्रह्मलोक यात्रा ] [ २०५ लयि योद्ध गते विष्णो न प्रावर्तन्त न क्रिया । अवैष्णवस्य यज्ञस्य न हि कर्म विधीयते ।।२३ सदक्षिणस्य यज्ञस्य त्वत्प्रसूति फल भवेत् । अद्यात्मानमिहास्माभिरिज्यमान निरीक्ष्यसे ॥२४ एवमस्त्विति तान्मन्मगवान्प्रत्यपूजयत् । मुमुदे ब्रह्मलोक्भ्यो ब्रह्मा लोकपितामह ॥२५ ह महाराज । इस प्रकार स्वागत प्रार्थना यादि के अत में देवादिदेव भगवान् श्रीविष्णु की ओर उन्मुख होकर मुनिजन कहने लग है नगवन् आप हमारे विधिवत् पूर्ण इस यज्ञ के अतिथि बनें ॥२१॥ बाप ही हमार यज्ञपूत के पात्र ठया पाद्य को ग्रहण करने योग्य हैं । हमें ज्ञात है कि आप ही हमारे मन्त्रा द्वारा ध्यान वाग्य अतिथि हैं ॥२२॥ आपके सपाम भूमि में चले जाने कारण हमारे सभी काय रुक गए । क्योंकि हम जानते हैं कि बिना आपके भी यज्ञ-मं व्यर्म सिद्ध हात है ।।२३।। यत के दक्षिणा आदि कार्यों के पूरे ने पर आप ही पन का लाभ वितरित करत हैं। मत हम लोग याज यापकी पस्थिति में ही यन का अनुष्ठान करना चाहत हैं ॥२४॥ ह राजन् । ऋपिजनों रा ऐमा पहने पर भगवान् श्री विष्णु न उनको एसा ही हो' कहकर सम्मान स्या तथा उस ब्रह्मलोर में अत्यन्त प्रसन्नता से ब्रह्माजी के साथ रहने गे ॥२५॥ । भूपियों की ब्रह्मलोक याना ॥ ऋपिभि पूजितस्तस्तु विवेश हरिरीश्वर । पौराण ब्रह्ममदन दिव्य नारायणाथमम् ।।१ स तद्विवेश द्दष्टात्मा तानामन्थ्य सदोगतान् । प्रणम्य चादिदेवाय ब्रह्मणे पद्मयोनये ॥२ म्वेन नाम्ना परिक्षात म त नारायणाथमम् । प्रविमन्नेव भगवानायुधानि व्यसजयत् ॥३ स तत्राम्बुपतिप्रग्य ददर्शालयमात्मन । स्वघिहित देवगणे शास्वतंत्र महर्षिभि ॥४ २०६ ] [ श्री हरिवशपुराण संवतकाम्बुदोपेत नक्षत्रस्थानसंकुलम् । तिमिरौघपरिक्षिप्तमप्रधृष्य सुरासुरै ॥५ न तत्र विषयो वायोर्नेन्दोन च विवस्वत.। वपुप. पद्मनाभस्य स देशस्तेशसाऽऽवृत ॥६ स तत्र प्रविशन्नेव जटाभार समुद्वहन् । सहस्रशीर्षो भूत्वा तु शयनायोपचक्रमे ।।७ लोकानामन्तकालज्ञा काली नयनशालिनी । उपतस्थे महात्मानं निद्रा तं कालरूपिणी ।। वैशम्पायन कहने लगे हे राजन् । इस तरह भगवान् श्री विष्णु ब्रह्म- लोक मे रहने वाले ऋपिजनो से सम्मान पाकर, उस स्थान पर उपस्थित सर्म से विदा हो तथा पितामह ब्रह्माजी को प्रणाम करके प्रसन्नचित्त से पुरा द्वारा स्तुत्य तथा अपने नाम के लिए प्रसिद्ध अपने दिव्य लोक को चल दिए ॥१-२॥ अपने लोक पहुंचने पर और शस्त्रास्त्रो को यथास्थान रखते हो' भगवान नारायण ने देखा कि समस्त देवगण तथा ऋषिगण समुद्र के समान उमडते हुए उनके आश्रम पर आए हुए है ॥३-४॥ उनका आश्रम प्रलय काल के सदृश घने बादलों से ढका हुआ, नक्षत्रो से भरा हुआ, पोरतम तिमिरो से आच्छादित तथा देवगणो और दैत्यगणो के लिए भी अगम्य था ॥५॥ उस स्थान पर सूर्य देव, चन्द्रदेव तथा वायुदेव का कोई प्रभाव नहीं था । वह स्थान भगवान् पद्मनाभ के तेज से चमचमा रहा था ॥६॥ वहां जाकर भगवान ने केश भार धारण किया, उनके हजारो मस्तक होगए तथा वे सोने के प्रयास में लग गए ॥७॥ ऐसे समय में ही त्रिलोकी का अन्न समय जानकर नयनशालिनी कालस्वरूप निद्रा देवादिदेव भगवान् श्री विष्णु की स्तुति करने लगी। स शिश्ये शयने दिव्ये समुद्राम्मोदशीतले । हरिरेकार्णवोक्तेन व्रतेन प्रतिनां वर.1 तं शयानं महात्मानं भवाय जगतः प्रभुम् । उपासांचकिरे विष्णुदेवाः सपिंगणास्तथा ।।१० पियो की ब्रह्मलोक यात्रा ] [ २०७ तस्य सुप्तस्य शुशुभे नाभिमध्यात्समुत्थितम् । आद्य तस्यासन पद्म ब्रह्मणः सूर्यवर्चसम् । सहस्रपत्र वर्णाढय सुकुमार विभूषितम् ।।११ ब्रह्मसूनोद्यतकरः स्वपन्नेव महामुनिः । आवत्तर्यति लोकाना सर्वेपा कालपर्ययम् ।।१२ विवृतात्तस्य वदनान्निः श्वासपवनेरिता. । प्रजाना पड़ क्तयो [चैनिप्पतन्त्युत्पतन्ति च ।।१३ ते सृष्टाः प्राणिनो मेध्या विभक्ता ब्रह्मणा स्वयम् । चतुर्दा स्वा गतिं जग्मुः कृतान्तोक्तेन कर्मणा ॥१४ न तं वेद स्वयं ब्रह्मा नापि ब्रह्मर्पयोऽव्यया. । विष्णोनिद्रामय योग प्रविष्ट तमसाऽऽवृतम् ।।१५ प्रतधारियो मे श्रेष्ठ भगवान् श्रीविष्णु एकार्णव विधि से समुद्रीय मेय हमान शीतल तथा दिव्य शय्या पर लेट गए 10 उस समय सभी देवगण ऋपिजन ससार यो सृष्टि के लिए लेटे हुए महात्माओ मे श्रेष्ठ भगवान् विष्णु की सराहना करने लगे ॥१०॥ इसी शयनावस्था में ही भगवान् की इली मे सूर्य के महरा तेजवाला, हजारों पत्र सहित तया कई वर्षों वाले एक लषी उत्पत्ति हुई ॥११॥ यही कमल ब्रह्माजी की उत्पत्ति का द्योतक था। वान् श्रीविष्णु उसी स्वप्नावस्था में ही ब्रह्मसूत्र द्वारा अपने हाथ उठाए हुए । लोकों में भ्रमण करने लगे ॥१२॥ जैसे भगवान् ने ब्रह्माजी की उत्पत्ति . वैसे ही ब्रह्माजी के मुंह से निकली हुई श्वास से इस संसार की सृष्टि हो ॥१३॥ इसके पश्चात् प्रजापति ब्रह्मा द्वारा रचित प्रजाजन ब्रह्मा द्वारा ही :गए पार वर्गों में वेदो बतलाए गए कर्मों के अनुसार अपने-अपने धर्म तपा वरभक्ति में सलग्न हो गये ॥१४॥ स्वप ग्रह्मा तथा कोई भी ऋपिजन उन तिमिर युक्त तथा दिव्य स्वप्नावस्थित भगवान् श्रीविष्ण के रूप को नहीं पाए ॥१५॥ स तया निद्रयाच्छनस्तस्मिन्नारायणाश्रमे। शेते विभुः सदा विष्णुर्मोहयजगदम्ययः ॥१६ २०८ ] [ श्री हरिवशपुराण तस्य वर्पसहस्राणि शयानस्य महात्मन । जग्मु कृतयुग चैव नेता चव युगोत्तमम् ॥१७ स तु द्वापरपर्यन्ते ज्ञात्वा लोकान्सुदु खितान् । प्राबुध्यत महातेजा स्तूयमानो महर्षिभि ।।१८ जहीहि निद्रा सहजा भुक्तपूर्वामिव स्रजम् । इमे ने ब्रह्मणा सार्द्ध देवा दर्शनकाक्षिण ||१६ इमे त्वा ब्रह्मविद्वासो ब्रह्मसस्तववादिन । वर्द्धयन्ति हषीकेश ऋषय सशितव्रता १२० एतेषामात्मभूताना भूताना भूतभावन । शृणु विष्णो शुभा वाचो भूव्योमान्यनिलाम्भसाम् ॥२१ इसी प्रकार वे विनाशहीन भगवान श्रीविष्णु अपने आश्रम में इस निद्रावस्था मे ही ससार को मोहित करते हुए शयन-सलग्न रहे । तथा उनको शयन करते करते सतयुग और त्रेतायुग अर्थात् एक दिव्य स वप बीत गए ॥१७॥ द्वापर युग के अन्त समय मे समस्त संसार के जीवात्मा के अत्यन्त पीडित होने पर तथा सभी ऋषिजनों द्वारा सराहना करने भगव जागे ॥१८॥ ऋषिजन कहने लगे हे भगवन् । अव आप भुक्तपूर्व भाला समान इस निद्रा को त्याग कर देखिए-सभी ब्रह्मजन, सत्यवादी तथा व्रतधा ऋषिगण एव देवगण प्रजापति ब्रह्मा सहित आपके दर्शनो की अभिलाषा आपकी प्रार्थना कर रहे हैं ॥१६-२०॥ हे भगवन् । अपने रूपा तर आवाश, अग्नि, वायु एव जल के अधिष्ठाता सदृश देवगणो को प्राप सुनें ॥२१॥ इमे त्वा सप्त मुनय सहिता मुनिमण्डल । स्तुवन्ति देवा दिव्याभिर्गेयाभिर्गीमिरज्जसा ॥२२ उत्तिष्ठ शतपसाक्ष पद्मनाभ महाद्य ते । कारण विचिदुत्पन्न देवाना वार्यगौरवात् ॥२३ स सक्षिप्य जल सर्व तिमिरोष विदारयन् । उदतिष्टदहपीपेश श्रिया परमयाज्वलन् ।।२४ . विष्णु का देवताओ से वार्तालाप ] । २०६ स ददर्श सुरान्सर्वान्समेतान्सपितामहान् । विवक्षत. प्रक्षुभिताजगदर्थे समागतान् ॥२५ तानुवाच हरिदेवो निद्राविधान्तलोचन । तत्वदृष्टार्थया वाचा धर्महेत्वर्थयुक्तया ॥२६ कुतो वो विग्रहो देवा. कुतो वो भयमागतम् । कस्य वा केन वा कार्य किं वा मयि न वर्तते ॥२७ किं खल्बकुशले लोके वर्तते दानवोत्यितम् । नृणामायासजननं शीघ्रमिच्छामि वेदितुम् ।।२८ एप ब्रह्मविदा मध्ये विहाय शयनोत्तमम् । शिवाय भवतामथं स्थित कि करवाणि व. ॥२६ इधर सप्तमुनियों सहित यह सम्पूर्ण मुनिमण्डली दिव्य वाक्यो तथा .वत् छन्दो द्वारा ' आपकी सराहना कर रहे हैं ॥२२॥ हे शतपत्राक्ष । हे हाद्युते । अव आप उठिए किसी विशेष कार्य के उत्पन्न होने कारण ही ये रास्त देवगण यहां पर एकत्रित हुए हैं ॥२३॥ वैशम्पायन ने कहा है हाराज | इस प्रसार सभी देवगणो तथा ऋषिजनी द्वारा स्तुति करने पर 'गवान् श्री विष्णु ने उम विस्तृत जलराशि को सूक्ष्म दिया तथा तेज से अन्धकार नाश करते हुए दिव्य-शय्या से उठ बैठे ॥२४॥ निद्रा से जागर भगवान in विष्णु ने देखा कि समस्त देवगणो सहित ब्रह्माजी ससार की भलाई हेतु छ कहने को मौन धारण किए हुए खडे है ॥२५॥ उन सभी को उपस्पित खकर निद्वारहित चक्षुवाले भगवान् उनको सम्बोधित करते हुए धर्म तथा पंपूर्ण शन्द रहने लगे ॥२६॥ भगवान् श्री विष्णु बोले-है देवगणो । अब प लोगो को पिसके साथ कलह हो गई तया आप लोग किससे भयभीत है ? पिके शत्रु दैत्यों ने फिर कोई विनाशकारी वार्य तो नहीं दिया। यह सब मुझे घि बतलाओ ॥२७-२८॥ आपकी सहायता हेतु मैं अपनी दिव्य शय्या त्याग का हूँ । बतलाओ अब मुझे क्या कार्य करना है ? ॥२६॥ ।। विष्णु का देवताओ से वार्तालाप ॥ त्छ यात्मिशुदित महानोत्पपितामह । उवाच परम वाक्य हित सर्वदिवोकमाम् ॥१ २१० ) [ यी हरिवशपुराण नास्ति किंचिद्भय विष्णो सुराणामसुरान्तक । येषा भवानभयद कर्णधारो रणे रणे ॥२ शके जयति देवेशे त्वयि चासुरसूदन । धर्मे प्रयतमानाना मानवाना कुतो भयम् ॥३ सत्ये धर्मे च निरतान्मानवान्विगतज्वरान् । नाकाले मिणो मृत्यु शक्नोति प्रसमीक्षितुम् ॥४ मानवाना च पतय पार्थिवाश्च परस्परम् । षड्भागमुपभुजाना न भेद कुर्वते मिथ ॥५ ते प्रजाना शुभकरा करदैरवहिता ] सुकरविप्रयुक्तार्था शोकाना पूरयन्त्युत ।। स्फीताञ्जनपदान्सन्पिालयन्त क्षमापरा । अतीक्ष्णदण्डाश्चतुरो वर्णाजुगुपुरजसा ॥७ नो जनीया भूतानां सचिव साधुपूजिता । चतुरङ्गबलैर्गुप्ता षड्गुणानुपभुञ्जते ॥८ वैशम्पायन ने कहा-हे महाराज सुनकर लोकपितामह ब्रह्माजी सभी देवगणो के कल्याणार्थ शुभ वचन कहने लगे ॥१॥ ब्रह्माजी बोले-हे असुर विनाशी भगवन् । जब हमारे पास आ जैसे कर्णधार का बल है तो युद्ध स्थल मे हमे किसका भय है ? ॥२॥ जर देवेन्द्र हमारे राजा हैं तथा आप सभी शत्रुओ को मारकर हमे भयमुक्त रहते हैं तो किस बात का भय है । ऐसे समय मे तो बिना काल मृत्यु हमारी ओर नहीं देख सकती ॥३-४॥ मनुष्यों पर राज्य करने वाले सभी राजा प्रजाजनों से प्राप्त होने वाले करके छठवें हिस्से का उपभोग करते हुए आपस में नही लरते ॥५॥ अपितु सभी राजा अपने एकत्रित धन से राज्य के सजाने की कमी को पूरा तथा प्रजा को प्रसन्नता और उन्नति का प्रयल करत रहते हैं ॥६॥ ये क्षमाशील राजा लोग अपने-अपने राज्यों के सुख, उन्नति जनतापी सुरक्षा करते किसी को भी पटा दण्ड नहीं देते तथा धारों व मा.दानुसार गलन.पाते हैं ॥राजाजतों में से.निमी.को भी किसी प्रक . भगवान् श्री विष्णु के ऐसे शब्द करते भी
विष्णु का देवताओं से वार्तालाप ]
[ २११
पष्ट नहीं है । प्रजाजन अपन राज्य के मत्रियो के उच्च विचार सद्व्यवहार
सयो चारो प्रकार की सेवा में सुरक्षित भयमुक्त होकर पदगुणों से जीवननिवर्हि
घर रह हैं |
धनुर्वेदपरा सर्वे सर्वे वदेषु निष्ठिना ।
यजन्त च यथाकाल यविपुलदक्षिणे ॥
वेदानवीत्य दीक्षाभिर्महीन्द्रह्मचर्यया ।
थाद्धश्च मेध्ये शतशस्तर्पयलि पितामहान् ।।१०
नेपामविदिन विविलिविध मुवि दृश्यते ।
वैदिक लौकिक चत्र धर्मशास्त्रोक्तमेव च ॥११
ते परावरदृष्टायर्या महपिसमतेजस ।
भूय कृतयुग वर्तु मुत्सहन्ते नराधिपा ॥१२
तेपामेव प्रमावेण शिव वर्पति वासव ।
ययायं च वर्वाता विरजम्या दिशो दश ।।१३
निरताता च वसुधा सुप्रचाराश्च से ग्रहा ।
चन्द्रमाश्च सनक्षल सौम्य चरति योगत ॥१४
अनुलोमकर सूर्यस्त्वयने व चचार ह ।
हव्यश्च विविधस्तृप्त शुभगन्धो हुताशन ॥१५
एव सम्यक्प्रवृत्तेप विवृद्ध पु मखादिपु ।
तर्पयत्सु मही कृत्स्ना नृणा कालभय कुत ॥१६
इस समय समस्त मानव जन धनुर्वेद विद्वान, सभी वेदो के ज्ञाता
रपया समय यशो में पूर्ण दक्षिणा देने वाले हैं Men समस्त मानव वेदा के
ययन से ऋषिजनों को, विधिवत् पिए गए यज्ञों द्वारा देवगणों को तया
डों पवित्र यादों को करके अपने पूर्वजों से प्रसन्न परते हैं ॥१०॥ ऐसा
भी पापं नहीं जिसको दे सोग न जानते हो तया ये वैदिक, मौवित्र बोर
स्त्र युव मभी कार्यों को करते है ॥११॥ विधिवत् सभी कार्य रखे हुए
लोग नौ पि-गों के समान तेजवान होर पृथ्वी पर फिर से
ग माने मे प्रयत्नशील है ॥१२॥ उन राजा के इन गुभ कार्यों के मरने
२१२ ] 1 श्री हरिवशपुराण से जलधर समय पर बरसते हैं तथा वायु भी अपने पथ पर यथारूप बहती, जिससे चतुर्दिक मे कही भी धूल के गुब्बारे आदि नही उडते ॥१३॥ पृथ्वीर इस समय किसी प्रकार के उपद्रव नहीं होते । सभी ग्रह अपने चक्क पर घूमने हैं । चन्द्रमा सभी नक्षत्रो सहित शात भाव से विचरता है। सूर्य नियमानुसार अपने दोनों अयनो तथा अग्नि नाना प्रकार के यज्ञो से प्रस न होकर चर्दिक में मुगन्ध का सचार करते हैं ॥१४ १५॥ भगवन् । जब विधिवत् यज्ञ तथा अप सभी कार्यों के आयोजित होने से भूमि तृप्त तथा प्रस न रहती है तो समस्त मानवो को मृत्यु का भय क्यो होगा ॥१६॥ तेषा ज्वलितकीर्तीनामन्योन्यवशवर्तिनम् । राज्ञा बलैबलवता पीड्यते वसुधातलम् ॥१७ सेय भारपरिश्रान्ता पोड्यमाना नराधिप । पृथिवी समनुप्राप्ता नौरिवासन्नविप्लवा ॥१८ युगान्तसदृशं रूपं शैलोच्चलिलबन्धना । जलोत्पीडाकुला स्वेद धारयन्ती मुहुर्मुहु ॥१६ क्षत्रियाणा वपुर्भिश्च तेजसा च बलेन च । नृणा च राष्ट्र विस्तीर्णं श्राम्यतीव वसुन्धरा ॥२० पुरे पुरे नरपति कोटिसप्यबलैर्वृत । राष्ट्र राष्ट्रे च बहवो ग्रामा शतसहस्रश ॥२१ भूमिपाना सहस्रश्च तेपा च बलिना वल । ग्रामायुताद्य राष्ट्र श्च भूमिनिर्विवरा कृता ॥२२ सेय निरामय वृत्वा निश्चेष्टा कालमग्रत । प्राप्ता ममालय विष्णो भवाश्वास्या परा गति ॥२३ पर्मभूमनुष्याणा भूमिरेषा व्यथा गता । यथा न सीदेत्तत्वार्य जगत्येपा हि शाश्वती ॥२४ परतु इन अग्नि के समान प्रसिद्ध पशयुक्त राजाओं की ऐना के भार से पृथ्वी को यहा पष्ट हो रहा है | इन बढती हुई।
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विष्णु का देवताओं से वार्तालाप ]
[ २१३
भार से दगे हुई पृथ्वी इस प्रकार पीहित है जिस प्रकार शीघ्र डूबने वाली
लझिल नाव होती है ॥१८॥ समुद्र के बीच में जो पर्वत पृथ्वी को रोकने का
काम कर रहे थे, अब वे भी धीरे-धीरे कटते जा रहे हैं। सागरीय लहरो से
त्यन्त पीडित होकर कभी-कभी पृथ्वी को पसीना आने लगता हैं ॥१६॥ राजा
तोगो के शरीर, तेज, वल तया विस्तार से पंले राज्यो का बोझ ढोने मे वसुधा
समयं हो चुकी है ॥२०॥ आजकल नगर-नगर मे एक राजा है जिनके पास
करोडो की संख्या मे सैनिक हैं। एक एक नगर में संकहो तथा हजारो गांव
हैं ॥२१॥ तथा ऐसे सहस्रो चीर राजाओ की बढती हुई सेना, ग्राम तथा नगरो
से वसुधा सास तक लेने में असमर्थ होगई हैं ।।२२।। हे विष्णु | इस तरह
गीडित वसुघा काल सहित मेरे समक्ष उपस्थित हुई है। प्रत अब आप ही
इसका कोई उपाय कीजिए ॥२३॥ अब आप कोई सत्कार्य कीजिए जिससे समस्त
मानवों की कर्म भूमि यह वसुधा और अधिक बोझ से न दवे ॥२४॥
एव जगति वर्तन्ते मनुष्या धर्मकारणात् ।
पथा धर्मवयो न स्यात्तथा मन्त्र प्रवर्त्यताम् ।।२५
सता गतिरिय नान्या धर्मश्चास्या सुसाधनम् ।
राज्ञा चैव वध कार्यो धरण्या भारनिर्णये ।।
तदागच्छ महाभाग सह वै मन्तकारणात् ।
बजामो मेरुशियर पुरस्कृत्य वसुन्धराम् ।।२६
एतावदुक्त्वा राजेन्द्र ब्रह्मा लोकपितामह ।
पृथिव्या सह विश्वात्मा विरराम महाद्य ति ॥२७
इस समय ससार में समस्त मानव धर्म के कार्यों में सलग्न हैं । इसलिए
गोई ऐसा उपाय होना चाहिए जिससे धर्म का नाश न हो सके ॥२५॥
ध्वी मी धर्म की अपेक्षा कोई और दशा नहीं तया मानव-जनो को वसुधा के
तिरिक्त कोई और दशा नहीं है । इसलिये यही उत्तम है कि पृथ्वी का कोश
ना करने के लिए राजाओ का सहार किया जाय ॥२६॥ हे भगवन् ! इस
स्या के निश्चित विचार हेतु मेरु पर्वत की चोटी पर पलें-हे राजन् ! इस
हर हर महा वेजवान् पितामह ब्रह्मा मौन हो गए ॥२७॥
[ श्री हरिवंशपुराण
॥ पृथिवी का दु ख वर्णन ॥
बाढमित्येव सह तैर्दुदिनोम्भोदनि म्वन ।
प्रतस्थे दुर्दिनाकार सदुद्दिन इवाचल ॥१
नातिदीर्घेण कालेन सप्राप्ता रस्नपर्वतम् ।
ददृशुर्देवतास्तत्र ता सभा कामरूपिणीम् ॥२
मेरो शिखरविन्यस्ता सयुक्ता सूर्यवर्चसा।
काञ्चनस्तम्भरचिता वज्रसधानतोरणाम ॥३
मनोनिर्माणचित्राट्या विमानशतमालिनीम् ।
रत्नजालान्तरवतो कामगा रलभूषिताम् ॥४
सर्वरत्नसमाकीर्णा सर्वतु कुसुमोत्कराम् ।
देवमायाधरा दिव्या विहिता विश्वकर्मणा ॥५
ता हृष्टमनस सयथास्थान यथाविधि।।
यथानिदेश विदशा विविशुस्ते सभा शुभाम् ॥६
ते निपेदुर्यथोक्तेषु विमानेष्वासनेषु च ।
भद्रासनेषु पीठेषु कुथास्वास्तरणेषु च ॥७
तत प्रभजनो वायुम्रह्मणा साधु चोदित ।
मा शब्दमिति सर्वत्र प्रचक्रामाथ ता सभाम् ।।८
वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् । जलीय मेघो के. सहश ३
भगवान् श्री विष्णु शब्दो स्वरूप मेषों से आच्छन्न पर्वत के सदृश गहन
"ऐसा ही हो' बोले तथा उन समस्त देवगणों सहित मेरु शिखर की ...
दिए ॥१॥ यथाशीघ्र पे उस सुमेरु पर्वत पर पहुंचे तथा वहाँ उन समस्त
देवगणों ने सूर्य रश्मि से देदीप्यमान काम रवरूप देव सभा देखी ॥२॥ १६
देव सभा मेरु सिर पर स्थित पो तथा वह सदा मूर्य की किरणो से प्रकाशित
रहती थी। उसके स्तम्न स्वणं थे बने थे तथा तोरण हीरे का और-द्वार र
पे ॥३॥ उसके मध्य में मनोबल पे द्वारा नाना प्रकार के रनो!
पित्रारी हो रही थी। संवड़ों विमान उस पर हमेशा उडान करते थे।
पृथ्वी का दुख वर्णन ] [ २१५ देव सभा'ये बाग में सभी मृतुओ के पुष्प सिल रहे । उसमें देवगणो की शिल्पफ्ला को निपुणता स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी। तथा वह विश्वकर्मा द्वारा निर्मित थी ॥४-५।। सभी देवगण उस देवसभा का निरीक्षण करते हुए प्रसन्न- चित्त मे उसके अदर समाविष्ट हुए तथा विधिवत् विमान, आसन, भद्रासन, पीठासन, तथा कुशासन पर बैठे ॥६.७। इसके पश्चात् पितामह ब्रह्माजी ने वायुदेव को दैवममा में किसी प्रकार का शोर-गुल न होने के लिए निर्देशित किया तथा अपने कार्य में व्यस्त हो गए ॥८॥ नि शब्दस्तिमिते तस्मिन्समाजे निदिवौकसाम् । बमापे धरणी वाक्य सेदात्करुणमापिणी ॥६ त्वया धार्या यह देव त्वया वै धार्यते जगत् । त्व धारयसि भूतानि भुवनानि विपि च ।।१० यत्त्वया धार्यते विञ्चितेजसा च वलेन च । ततस्तव प्रसादेन मया यत्लाच्च धार्यते ।।११ त्वया धृत धारयामि नाधृत धारयाम्यहम् । न हि तद्विद्यते भूत यत्वया नानुधार्यते ।।१२ त्वमेव कुरुपे देव नारायण युगे युगे ।' मम भारावतरण जगतो हितकाम्यया ॥१३ तवैव तेजसा बान्ता रसातलतल गताम् । प्रायस्व मा सुरश्रेष्ठ तव शरण गताम् ।।१४ दानव पीड्यमानाऽह राक्षसंश्च दुरात्मभि । त्यामेव शरण नित्यमुपयास्ये सनातनम् ।।१५ तावन्मेऽस्ति भय भूया यावन्न त्या पकुमिनम् । शरण यामि मनसा शतशो त्युपलक्षये ॥१६ जर समस्त समा गदस्य शान्तिपूवव उस सभा म बैठ गए तो शोष-प्रस्त परुणाजना यचनो से गिवान् श्री विष्णु को सम्बोधन रखे पृथ्वी बहने HEN पृथ्वी ने कहा- हे भगवन् । माप में, समस्त ससार, समस्त प्रालि समाविष्ट हैं ॥१०॥ पाप माने तेज तपा अपनी शक्ति से पिन-जिन रा
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[ २१७ देवताओ का यशावतार लेना ] भगवन्हियतामस्या धरण्या भारमतनि । शरीरकर्ता लोकाना व हि लोकस्य चेश्वर ॥२ यत्वतंव्य महेन्द्र ण यमेन वरुणेन च । यद्वा कायं धनेशेन स्वय नारायणेन च ॥३ यद्वा चन्द्रममा कार्य भाम्बरेणानिलेन वा । आदित्यर्वसुभिर्वापि रद्रा लोरभावने ॥४ अश्विभ्या देववद्याभ्या साध्या सिदशालय। बृहस्पत्युशनोम्या वा कालेन कलिनापि वा ।। महेश्वरेण वा ब्रह्मन्विशासन गुहेन वा। यक्षराक्षसगन्धर्वश्चारणा महोरगं ॥६ पतग पर्वतश्चापि सागर महर्पिमि । गगामुदाभिर्दिव्याभि सरिदिर्ता सुरेश्वर ॥ क्षिप्रमाज्ञापय विभो क्यमरा प्रयुज्यताम् । यदि ते पार्थिव कार्य कार्य पार्थिवविग्रहे 11 वैशम्पायन ने कहा है राजन् ! इस प्रकार पृथ्वी के वहन पर उमा १. दूर परने के उद्देश्य से ममस्त देवगए पितामह ब्रह्माजी से बोले-॥१॥ भगवन् । ऐमा कोई कार्य कीजिए, जिममे कि पृथ्वी का कर दूर हो । इन जो सोनी की आपने ही रचना की है तया आप ही इन लोगों के स्वामी हैं ।।। हम समस्त देवगण देवराज इद, यम, वरुण, कुवेर, देवादिदेव भगवान । विषण चर, मूर्य, वायु आदित्यगण याटो वनु, न्द्र गण, दानी अश्विनी- हार, साम्यगण, वृहस्पति, शुरु, कार, कति, भगवान् गार, गिपिवाहन मि कातिकेय, यक्ष, राम, गवं, मिद चाररा, पर्वत, उत्तात तरगयुक्त तथा गगादि नदी को क्या कार्य करना चाहिए यह विस्तारपूर्वर पए ॥३७॥गर राजाओं में पामार यद करार पृथ्वी का भार हलका चाहते हैं, तो फिर हम लोगों को दनपाइए कि हमें क्या-नया कार्य यौरवशपुराण २१६ ] धारण करते हैं, आपकी महत्ता से मैं भी प्रयत्नपूर्वक उनका बोझ जब उनको आप धारण करते हैं तो मुझे भी उन सबका बोश अगर आप धारण न करें तो मैं भी नहीं कर सकती। तथा इ. भी ऐसी वस्तु नहीं जो कि आपमे समाविष्ट न हो ॥१२॥ के मे यथा समय मेरा भार हलवा करते रहते है ॥१३॥ आपये रसातल पहुंची हूँ। हे देवादिदेव । मैं आपकी शरण में आई क्षा करके मुझे निभय कीजिए ॥१४॥ जब-जब दुष्ट दैत्य से पीडा पहुचाई तब तब मैं आपकी गरण मे आई हूँ । क मैं शुद्ध मन से आपको शरणागत नही आती, डर लगे रहते हैं तथा मैं भयभस्त रहती हूँ॥१६॥ दाताष्मत्प्रवृत्तेन दैवेन परिपाल्यते । तद्धितार्थ कुरुत राज्ञा हेतु रण क्षये ॥१७ गम्ति मयि वारण्य भारशैथिल्यकारणात भग ॥१५-१६॥ क्षिप्रमाज्ञा व मयारशप्तः समुद्रः सह गंगया। का मंशावतार लेना ] [ २१९ देवताबो कई नाना प्रसंगों को क्या पर विचार करते हुए समय ध्यतीत कर शरीकुर्वतस्तु कथास्तास्ताः सह गंगया। यत्वपमीपमाजगामाशु युक्तस्तोयदमारुतः ।।१७. यद्वान वोचिविषमां कुर्वन्गति वेगतरगिणीम् । यद्वागदोगणविचित्रेण संच्छन्नस्तोयवाससा ॥१८ आदिःखमुक्तामलतनुः प्रवालद्रुमभूषणः ।। अश्विकश्चन्द्रमसा पूर्ण उग्रगम्भीरनिःस्वनः ॥१६॥ वृहस्पमा परिभवन्नेव स्वां वेला समतिकमन् । दयामास चपलेलावणरम्वुविस्रवैः ।।२०. महेश्वरे देश व्यवसितः समुद्रोऽद्भिविदितुम् । यक्षरार संरब्धया वाचा शान्तोऽसीति मया तदा ।।२१ सीत्युक्तमातस्तु तनुत्वं सागसें गतः ।' गगामुखाििमतरंगोधः स्थितो राजश्रिया ज्वलन् ।।२२ यदि ते पा मति कृत्वा युष्माकं हितकाम्यया ॥२३ 'राजतुल्येन वपुपा समुपस्थितः । वैशम्पापन ने महीपालो राजव त्व भविष्यसि ॥२४ मे गगा, जलधर तथा( मारुति सहित सागर मेरे समक्ष मय सागर के यथावेग ही उसमें लहरें भी उठ रही थी। वो के कारण उसका वस्त्रमा लग रहा था तथा उसका पानी १८॥ सागर का तन शम तया मोतियों सदृश साफ था । गा मणि थे और उसकी गम्भीर जलघर के सदृश वाणी कुमार, साध्यगण, बृहस्पति, शुसे अचानक उफान साता हुआ अपनी सीमा स्वामि कार्तिकेय, पक्ष, राक्षम, गर्व, मिया । तथा अपने अत्यधिक खारी जल से समुद्र, तथा गंगादि नदी को क्या RANDR. ममा, वह मुझे सिर्फ मन जित. पाए ॥३-७॥ अगर राजाओं में पानी में अत्यन्त गहन वाणों में उसमें बोला-- पतगैः पर्व प कर दूर करने के उद्देश है भगवन् । ऐसा कोई तीनो लोकों को मापने अव हम समस्त देवगण श्री विष्णु, चन्द्र, सूर्य, या रना चाहते हैं, तो फिर हम लोगें जा है।
या २१६ ] धारण करते हैं, आपकी महत्ता से मैं भी प्रयत्नपूर्वक उनका बोझ ढोती हूँ ॥११॥ जब उनको आप धारण करते हैं, तो मुझे भी उन सबका बोझ ढोना पडता है। अगर आप धारण न करें तो मैं भी नही कर सकती। तथा इस ससार में का भी ऐसी वस्तु नही जो कि आपमे समाविष्ट न हो ॥१२॥ केवल आप हा युप मे यथा समय मेरा भार हलवा करते रहते हैं ॥१३॥ आपके तेज से होई रसातल पहुंची हूँ। हे देवादिदेव ! मैं आपकी शरण में आई हूँ अब आए मेर क्षा करके मुझे निर्भय कीजिए ॥१४॥ जब-जब दुष्ट दैत्यो तथा राक्षसों ने ने पीडा पहुंचाई तब तब मैं आपकी शरण मे आई हूं, ॥१५।। हे भगवन नक मैं शुद्ध मन से आपको शरणागत नही आती, तब-तब भने माई के डर लगे रहते हैं तथा मैं भयनस्त रहती हूँ ॥१६॥ दे तारताष्मत्प्रवृत्तेन देवेन परिपाल्यते । द्वितार्थ कुरुत राज्ञा हेतु रण क्षये ॥१७ यथा। स्त मयि कारुण्य भारशैथिल्यकारणात् । भद्रासनेषु क्रधर श्रीमानभय मे प्रयच्छतु ॥१८ तत प्रभारसतप्ता सम्प्राप्ता शरणार्थिनी। मा शब्दविरोप्तव्यो विष्णुरेष ब्रवीतु माम् १६ ते निपेड देवाबोर वृहम्पनी मि कातिकेय, यश, रासम, गत्पत्र, मिया । तथा अपने अत्यधिक सारी ज रों का संशावतार सेना ] . नाना प्रसंगों को क्या पर विचार करते हुए समय व्यतीत कर ॥१५-१६॥ गरोदुर्वतस्तु कथास्तास्ता: सह गंगया। पनपमीपमाजगामाशु युक्तम्तोयदमारतः ॥१७ पदाा वीचिविषमां कुर्वन्गति वेगतरगिणीम् । पहागदोगणविचिश्रेण संच्छन्नस्तोयवाससा 11१८ यादिःखमुक्तामलतनुः प्रवालद्रुमभूषणः । यधिकश्चन्द्रमसा पूर्ण उग्रगम्भीरनिःस्वनः ।।१६ सां परिभवन्नेव'स्वां वेलां समतिक्रमन् ।' दयामास चपललावणरम्युविनवैः ॥२० महेश्वरी देशं व्यवसितः समुद्रोऽद्भिपिद्दितुम् । संरब्धया वाचा शान्तोऽसीति मया तदा ।।२१ मीत्युक्तमानस्तु तनुत्वं सागसे गतः ।। गंगामुगामितरंगीयः स्थितो राजश्रिया ज्वलन् ॥२२' शिप्रमानाव मया शप्तः रामुद्रः सह गंगया। यदि ते पात्र मतिं कृत्वा युप्मा हितकाम्यया ॥२३ राजतुल्येन वपुपा समुपस्थितः । वैशम्पायन ने (महीपालो राजैव त्वं भविष्यसि ।।२४ में गगा, जलयर तथा भारति सहित सागर मेरे समक मय मागर के ययावेग ही उसमें लहरें भी उठ रही थी। वीपे कारण उसका वनमालग रहा था तथा उसका पानी १८॥ सागर का वन शय तथा मोतियों सहश साफ था। शुक, से अचानक उफान खाता हुआ अपनी सीमा यक्षरास. पता: पर्व 'ए दूर करने के उददेश नों लोकों की बापने ही अहम समन देवगए विष्ण, चन्द्र, मूर्य, वा . पार, गायगण, या मणि थे और उसकी गम्भीर जलघर के सदृश वाणी तया गगादि नदी को क्या उस समय वह मुझे सिर्फ 5ए ।३.७६ अगर राजारों में पदी में अत्यन्त गहन बाणी मे उससे २२० ] [ श्री हरिवशपुर 'शान्त हो जाओं ॥२१॥ मेरे ऐसा कहते ही सागर शान्त होकर अपनी सीमा में चला गया। इस समय उसका वेग, उसकी लहरें समाप्त हो गई तथा वह पुन. राज्यश्री से शोभित दिखलाई देने लगा ॥२२॥ इसके पश्चात् मैं आप समस्त देवगणो के हित को ध्यान में रखते हुए गगा तथा सागर को श्राप देकर बोला-हे सागर | क्योकि तुम मेरे समक्ष राजा के समान आए, इसलिए जाओ अब तुम राजा ही बनो ॥२३-२४॥
- देवताओं का अशावतार लेना ] [ २२१ ऐसे वचन सुन बर सागर अत्यन्त दोष में वोला-हे भगवन् । हे देवादिदेव । मेरा आपरे अतिरिक्त कोई और नहीं है तथा मैं आपका आज्ञा-परापण पुत्र हूं पापने मेरे लिए ऐसे अशुम वचनों में पाप क्यो दिया ? ॥२६-३०॥ आपके द्वारा नर्धारित में प्रत्येक पूणिमा को बढय-पालन की दृष्टि से बहता हूं, इसमे मेरा कोई दोष नहीं है ।।३०॥ पूर्णिमा के दिन कर्त्तव्य-पालन करते हुए वायु के वेग से उटल वर अगर मैंन आपका स्पर्श कर लिया तो मैं पापका अपराधी नहीं हूँ॥३१॥ आज वायुवेग, याच्यादित मेप Bथा पूर्ण चन्द्र रश्मि युक्त पूर्णिमा से ही में इस प्रकार अचानव उद्विग्न हो गया पा॥३२॥ एवं यद्यपरादोऽह कारण म्त्वत्प्रकल्पित क्षन्तुमर्हसि मे ब्रह्मन्छापोऽय विनिवत्य॑ताम्।।३३ एव मयि निरालम्बे शापाच्छिथिलता । यारण्य कुरु देवेश प्रमाण यद्यवेक्ष्यसे ।।३४ अस्यास्तु देवगङ्गाया गा गतायास्त्वदाज्ञेया। मम दोपाददोपाया प्रमाद क्तुमर्हसि ॥३५ तमह श्लक्ष्णया वाचा महार्णवमयात्रुतम् । अकारणन देवाना अस्त शापानलेन तम् ॥३६ शान्ति व्रज न भेतव्य प्रसन्नोऽस्मि महोदधे । शापेऽस्मिन्सरिता नाय भविष्य शृणु कारणम् ॥३७ त्व तात भारते वशे स्वदेह स्वेन तेजसा । आधत्स्व सरिता नाथ त्यक्त्वेमा सागरी तनुम् ॥३८ महोदधे महीपालस्तम राजश्रिया वृत । पालयश्चतुरो वर्णानरम्यसे सलिलेश्वर ॥३६ इस प्रगर यापये निर्धारित वर्तव्य पालन में अगर मैं विमी प्रकार दोपी तो मेरा दोप भूल जाइए तथा मुझे पाप-मुक्त कीजिए ॥३३॥ अगर आपको नपर विश्याम न हो तो श्राप त्रस्त निपट गरीर पाले मुस यमागे पर कृपा बिए ॥३४॥ गगा नतो निदोष है इसको मेरे मारण थाप नहीं मिलना चाहिए : बार इसको भी पाप मुक्त कीजिए ॥३५॥ ब्रह्माजी बोते दि है देवगणो !
२२२ ] [ श्री हरिवंशपुराण समुद्र के ऐसा कहने पर मैं उससे बोला-हे समुद्र तुम्हे देवगणो का विचा. भात नहीं है । तुम धैर्य रखो तया मेरे श्राप से भय न खाओ, तुमको थोड़ा भी । मपत्रस्त नहीं होना चाहिए । हे समुद्र ! मैं तुमसे कुपित नहीं हूं तथा मैंने तुमको याप किस लिए दिया इसका कारण बतलाता है ॥३६-३७॥ तुम अपने इस समुद्र-शरीर को छोड कर पृथिवी पर भरतवश में जन्म लो। हे समुद्र । तुम अपने तेज से प्रभावित होकर चक्रवर्ती राजा बनोगे तया चारो वर्षों का वर्णा- नुसार पालन करते हुए आनन्द से जीवन-निर्वाह करोगे ॥३८-३६॥
देवतामाका अशावतार लेना ] [ २२३ सहित तुम नाना प्रकार के आनन्द उपभोगो से अपने 'मानव रूप के दुखको एक्दम भुला दोगे ।।४१॥ जैसा मैं तुमसे कह रहा है, उसी प्रकार तुम गगा सहित अपनी प्रजा का विधिवत् पालन करते हुए राज्य करो ॥४२॥ इस समय अष्ट-वसु स्वर्ग से विमुख होरर पाताल बने गए हैं अत उनको फिर से जन्म देने के प्रयोजन से ही तुमको मैंने यह श्राप दिया है ॥४३॥ यह गगा अष्टवसुओं की अपन गर्म से फिर से जन्म देगी। अग्नि के समान तेजवान् अष्टवसुओं के पुनर्जन्म से देवगण अत्यन्त आनन्दित होंगे ॥४४॥ हे समुद्र इस प्रकार तुम अप्टवसुओं को जन्म देकर तथा कुरकुल को विस्तृत करने के पश्चात् पुन. सागर- शरीर धारण करोग ॥४६॥ ब्रह्माजी बोले-है देवगणो' मैं पहले ही जानता था कि पृथिवी का भार बढेगा बत तुम्हार धाण हेतु मैंने पूर्व समय में ही शान्तनुवश की उत्पत्ति कर दी है । ह देवगणो। इस शान्तनुवश में पुनर्जन्म पाकर सात वसु तो स्वर्ग पहुंच गए, किन्तु गगा के पुन मोम भी एक वसु हैं, वे अभी पृथियो पर हो हैं ॥४६-४८॥ द्वितीयाया च सृष्टाया द्वितीया शन्तनोस्तनु । विचित्रवीर्यो | तिमानासीद्राजा प्रतापवान् ॥४६ वैचित्रयवीयों द्वावेव पार्थिवी भुवि साम्प्रतम् । धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च विख्याती पुश्पर्पभो ५० तत्र पाण्डो श्रिया जुप्टे द्वे मार्ये सबभूवतुः । शुभे कुन्ती च माद्री च देवयोपोपमे तु ते ॥५१ धृतराष्ट्रस्य राज्ञस्तु भार्यका तुल्यचारिणी। गान्धारी भुवि विख्याता भतुं नित्य व्रते स्थिता ॥५२ तन वशी विभज्यन्ता विपक्षा पक्ष एव च । पुताणा हि तयो राज्ञो विना विग्रहो महान् ।।५३ तेपा विमर्दै दायाद्य नृपाणा भविता क्षय. । युगान्तप्रतिम चैव भविष्यति महद्भयम् ॥५४ सबलेषु नरेन्द्र पु शातयरिस्वतरेतरम् । विविक्तपुरराष्ट्रीधा क्षिीत शीथल्यमयीन ॥५५ २२४ ] [ श्री हरिवशपुराण द्वापरस्य युगस्यान्ते मया दृष्ट पुरातनम् । क्षय यास्यन्ति शस्त्रेण मानव सह पार्थिवा ॥५६ महाराज शान्तनु और शान्तनु की दूसरी पत्नी से विचित्रवीर्य नामक पुत्र हुआ । तथा विचित्रवीर्य का ही राजा के पद पर अभिषेक हुआ था ४६॥ इस समय उनके ससार मे प्रसिद्ध राजा पाण्डु तथा वृतराष्ट्र दोनो पुत्र भूमि पर रह रहे हैं ॥५०॥ महाराज पाण्डु की दो पत्नियां थी-अत्यन्त सौन्दर्यशालिनी देव पत्नियो के समान तथा यौवना कुन्ती और माद्री ॥५१॥ महाराज धृतराष्ट्र की पत्नी गान्धारी थी ओ कि सर्व गुण सम्पन्न तथा तीनो लोको मे अपने पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध थो ॥५२॥ अत हे देवगणो | अब तुम समस्त जन शान्तनु- वश मे जन्म धारण करो। कुछ महाराज पाण्डु के तथा कुछ महाराज धृतराष्ट्र के यहाँ क्योकि कुछ समय पश्चात् दोनो के पुत्रो मे भीषण सयाम होगा ॥५३॥ इस संग्राम मे अनेको राजा लोग मृत्यु को प्राप्त होकर यमलोक पहुंच जाएँगे तथा यह युद्ध प्रलय के सदृश भयकर होगा ॥५४॥ इस सग्राम मे सभी राजा महाराजा आपस मे संघर्ष करते हुए अपने-अपने वाहनों सहित मृत्यु को प्राप्त होगे तथा ग्रामो से भरी पृथिवी का भार कम हो जाएगा ॥५५॥ मुझे अपने ज्ञानचक्षुओ द्वारा दिखलाई दे चुका है कि द्वापर के अन्त तक समस्त राजा आपस मे संघर्ष द्वारा अपनी सम्पूर्ण सेना तया वाहनो सहित मृत्यु को प्राप्त हो जायेंगे ॥५६॥ ततावशिष्टात्मतुजान्सुप्ताग्निशि विचेतस । धक्ष्यते शकरस्यांश पावकेनास्त्रतेसा (१५७ अन्तकप्रतिमे तस्मिलिवृत्ते क्रूरकर्मणि । समाप्तमिदमाख्यास्ये तृतीय द्वापर युगम् ॥५८ । महेश्वराशेपमृते ततो माहेश्वर युगम् । तिष्य प्रवर्तते पश्चाधग दारणदर्शनम् ॥५६ अधर्मप्रायपुरप स्वल्लधर्मप्रतिग्रहम् । उत्सनसत्सयोग धितानृतसचयम् ॥६० महेश्वर मुमार च द्वौ च देयो समाश्रिता । भविष्यन्ति नरा सर्वे लोके न स्थविरायुप. ॥६१ देवताओं का संशावतार लेना ] [ २२५ तदेप निर्णयः श्रेष्ठः पृथिव्यां पार्थिवान्तकः । अंगावतरण सर्वे सुराः कुरुत मा चिरम् ॥६२ धर्मस्वांशस्तु कुन्त्या व माद्राया च विनियुज्यताम् । विग्रहस्य कलिलं गान्धायाँ विनियुज्यताम् ॥६३ एतो पक्षो भविष्यन्ति राजानः कालचोदिताः । जातरागाः पृथिव्यर्थे सर्वे संग्रामलालसाः ।।६४ जो भी राजा उस संघर्ष मे जिन्दा बचेंगे, उनको रात्रि के गयन-ममय में भगवान श्री दाकर के अश रूप अश्वत्यामा अपनी शास्त्री अग्नि में दह्न कर मृत्यु लोक पहुंचा देगा ।।५७॥ प्रलय के समान इस भीषण संघर्ष के अन्त तक तृतीय द्वापर युग भी समाप्त हो जाएगा ॥५८।। देवादिदेव भगवान् श्रीकृष्या के निधन होते ही अत्यन्त मयंकर कलियुग का प्रारम हो जाएगा ॥५६॥ कलि- युग मे समस्त प्राणी-जन अवर्मों हो जायेगे। कोई-कोई ही धर्म-कार्य करेगा। सत्य का नाश होते हुए बमत्य का उत्यान हो जायगा ।।६०॥ उप युग में समस्त राणी भगवान् श्री शकर तया कार्तिकेय की भक्ति-पूजा करेंगे तथा मभी वृद्धा- वस्या से पहले ही मृत्यु को प्राप्त होते रहेंगे ॥१॥ इमलिए मैंने राजाओं को नष्ट करने के लिए यही उपाय सबमे उत्तम मान कर निश्चित किया है। पत्र तुम लोग बिना कार्य के समय नष्ट न करो तथा अपने-अपने तेज से प्रभावित होकर अवतार ग्रहण करो ॥६२।। तुम लोग जाकर पुन्ती तथा माद्री के गर्भ धारण से धर्म स्वरूप तथा गान्धारी के गर्म से कलि के अश स्वम्म तया सघर्ष की जड़ को उत्पत्ति करो ॥६३।। इस तरह दोनों प्रकार के अवतार धारण करने से पक्षो की स्थापना हो जायगी तथा भूमि के समस्त राबा समय के प्रभाव से वर्ष-लालायिन होकर दोना पनो में बँट जायेंगे ॥६॥ - गच्छत्वियं वसुमतो स्वा योनि लोकधारिणीम् । सृष्टोऽध्या नैष्ठिको राज्ञामुपायो लोकविथतः ॥६५ श्रुत्वा पितामहवचः सा जगाम ययागतम् । पृथिवी सह कालेन वधावपृथिवीक्षिताम् ॥६६ २२६ ] [ श्री हरिवंशपुराण देवानचोदयद्ब्रह्मा निग्रहार्थे सुरद्विपाम् । नर चैव पुराणपि शेप च धरणीधरम् ॥६७ सनत्कुमार साध्याश्च सुराश्चाग्निपुरोगमान् । वरुण च यम चैव सूर्याचन्द्रमसौ तदा ॥६८ गन्धर्वाप्सरसश्चैव रुद्रादित्यास्तयाश्विनी। ततोऽशानवनि देवा सर्व एवावतारयन् ॥६६ यथा ते कथित पूर्वमशावतरण मया। अयोनिजो योनिजाश्च ते देवा पृथिवीतले ।।७० दैत्यदानवहन्तारः सभूता पुरुषेश्वरा । क्षीरिकावृक्षसकाशा वनसहननास्तथा ॥७१ नागायुतवला केचित्केचिदोघबलान्विता । गदापरिघशक्तीना सघा परिघवाहव ।।७२ अब पृथिवो वापस जाकर लोकधारी स्वरूपधारी हो। पृथिवी पर राम करने वाले समस्त राजाओ को नष्ट करने के लिए यह योजना मैंने बहुत समय- पूर्व ही निश्चित करली थी ॥६५॥ पितामह ब्रह्माजी के इस प्रकार कहने पर पृथिवी अपने भूलोक पहुंच कर समस्त संसार के नष्ट होने की प्रतीक्षा करने लगी ॥६६॥ इस प्रकार अपनी योजना समझाते हुए ब्रह्माजी ने पृथिवी ने भार को हल्का करने के लिये प्रोत्साहन देते हुए भगवान् श्री विष्णु, पृथिवी को धारण करने वाले भगवान् शेषनाग, सनत्कुमार, साध्यगण, वसुगण, चन्द्रमा, सूर्य, वरण, अग्नि आदि समस्त देवगणों, गन्धर्वो, अप्सराओ, रुद्रो, मादित्यो तथा दोनो अश्विनीकुमारो को अपने-अपने तेज से प्रभावित होकर अवतार ग्रहण करने को यहा ॥६७.६६॥ ब्रह्माजी द्वारा निर्देशानुसार समस्त देवगणो ने पृथिवी पर अब सार ग्रहण किए । पहले मैंने आदि पर्व में अशावतारो का वर्णन विस्तृत रूप से पर दिया है । इस प्रकार समस्त अयोनिज तथा योनिज देवगणस्यो तया राक्षसों का नाश करने पो भूमण्डल पर अवतारित हुए। सभी अश्यत्य वृक्ष में सहरा भरे शरीर वाले वया वस के समान कठोर अगोपाले ॥७०-७१॥ उनमें से बहुतो मा पारीरिख बल दस हजार हाथियों के बराबर था तथा बहुत देवताओं का वंशावतार लेना ] । शरीर समुद्र के समान वेगवान् या । गदा, परिघ तथा शक्ति का प्रहार करते सभी निपुण थे और उनकी भुजाएं परिघ के समान कठोर थी ॥७२॥ गिरिशृङ्गप्रहारः सर्वे परिघयोधिनः । वृष्णिवंशसमुत्पन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥७३ कुरुवंशे च ते देवाः पन्चालेपु च पार्थिवाः । याज्ञिकानां समृद्वानां ब्राह्मणानां च योनिषु ।।७४ सर्वास्त्रज्ञा महेप्वासा वेदव्रतपरायणाः । सर्वद्धिगुणसंपन्ना यज्वानः पुण्यकर्मिणः ।।७५ आचालयेयुर्य शैलान्क्रद्धा भिन्ध महीतलम् । उत्पतेयुरथाकाश क्षोभयेयुर्महोदधिम् ।।७६ एवमादिश्य तान्ब्रह्मा भूतभव्यभवत्प्रभुः । नारायणे समावेश्य लोकाशान्तिमुपागमत् ॥७७ भूयः शृगु यथा विष्णुरवतीणों महीतले । प्रजानां वै हितार्याय प्रभु. प्राणहितेश्वरः ।।७८ ययातिवशजस्याथ वसुदेवस्य धीमतः । कुले पूज्ये यशस्कर्मा जज्ञे नारायण. प्रभुः ।।७६ पर्वतो की चट्टानो को चूर्ण करने तथा परिघ आदि शस्त्रो से युद्ध करने वे सभी योग्य थे । उन सभी ने इस प्रकार वृष्णिवंश, कुरुवश, पाडववश तया नहोत्री ब्राह्मण वशो में जन्म लिया ।।७३-७४।। ये सभी अवतारित देवगण अ निपुण, महान धनुर्वीर, वेद तथा धर्मपरायण, सभी प्रकार से सम्पन्न तथा कर्ता थे तया सदैव पुण्य-कार्यों का आयोजन करने के लिए उद्यत रहते थे ५।। वे क्रोधित होकर पर्वतो को कम्पावमान कर देते थे, पृथिवी को नष्ट : सकते थे, आकाश में उडने समर्थ थे तथा उनके डर से समुद्र मे हलचल | जाती थी॥७६॥ हे राजन् ! इस प्रकार कमलयोनि पितामह ब्रह्माजी ने स्त देवगणो को आदेश देकर तया सारा उत्तराद यित्व भगवान् श्री विष्णु पर कर मौन धारण कर लिया ॥७७॥ इसके पश्चात् देवादिदेव भगवान विष्णु ने समस्त प्राणियों के कल्याणा भूमण्डल पर अवतार धारण किया, " २२८ ] [ श्री हरिवंशपुराण यह कथा मैं पुनः सुना रहा हूँ ॥७८॥ अपने यश के लिए त्रिलोकी मे प्रसिद्ध तथा पुण्यात्मा भगवान् श्री विष्णु ने ययातिवश के विद्वान्वसुदेव जी के यहाँ धारण किया ॥७॥ ।। नारद-विष्णु संवाद ॥ कृतकार्य गते काले जगत्या च यथानयम् । अंशावतरणे वृत्ते सुराणा भारते कुले ॥१ भागेऽवती धर्मस्य शक्रस्य पवनस्य पवनस्य च । अश्विनोदेवभिपजोर्भागे वै भास्करस्य च ॥२ पूर्वमेवावनिगते भागे देवपुरोधसः । वसूनामष्टमे भागे प्रागेव धरणी ॥३ मृत्योर्भागे क्षितिगते कलेर्भागे तथैव च । भागे शुक्रस्य सोमस्य वरुणस्य च गा गते ॥४ शकरस्य गते भागे मित्रस्य धनदस्य च। गन्धर्वोरगयक्षाणा भागाशेपु गतेषु च ॥५ भागेप्नेतेपु गगनादवतीर्ण पु मेदिनीम् । तिष्ठन्नारायणस्याशे नारदः समदृश्यत ॥६ स नारदोऽय ब्रह्मपिर्वह्मलोकचरोऽव्ययः । स्थितो देवसभामध्ये सरब्धो विष्णुमब्रवीत् ॥७ चशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् ! योजनानुसार यथासमय सम देवगणों ने अपने तेज से प्रभावित होकर भरतवंश में जन्म धारण दिया । यो प्ठिर धर्म रे, अर्जुन इन्द्र के, भीमसेन वायु के, नकुल तया सहदेव दोनो अश्विन पुमारो , कर्ण मूर्य , प्रोणाचार्य गुरगुर बृहस्पति के, आठवें वसु भीष्म यमु के, विदुर यमरान के, दुर्योधन कलि के, अभिमन्यु चन्द्रमा के, भूरिश्रवा पुक्र शुतायुष दरण के, अश्वत्या कर भगवान् रे, पणिक मित्र के, धृतराष्ट्र यु' के तपा देवय, अस्वरोन, दु,शामन आदि योद्धा यक्षो, गन्धयों तथा सों के से अतरित....मामास्त. देपा, रभस. परी ।
रद-विष्णु सवाद ] [ २२६ ग्रहण करने के पश्चात् देवपक्ष मे शामिल होते हुए देवर्षि नारद भगवान विष्णु को उस समा में पहुंच गए ॥६॥ समस्त लोको में भ्रमण करने वाले अमर वे ब्रह्मपि नारद देव सभा में पहुंच कर कुपित वाणी मे भगवान् वष्णु से कहने लगे ॥७॥ अशावतरण विष्णोर्यदिदं लिदशै कृतम् । क्षयायं पृथिवीन्द्राणा सर्वमेतदकारणम् ।।८ यदेतत्पार्थिव क्षतं स्थित त्वयि यदीश्वर । ननारायणयुक्तोऽय कार्यार्थ प्रतिभाति मे !! न युक्तं जानता देव त्वया तत्त्वार्थदशिना । भूदैवत पृथिव्यर्थे प्रयोक्तु कार्यमीदृशम् ।।१० त्व हि चक्षुष्मता चक्षुः श्लाघ्य प्रभवता प्रमः । श्रेष्ठो योगवता योगी गतिर्गतिमतामपि ॥१२ देवभागान्गतान्दृष्ट्वा कि त्व सर्वाथयो विमुः। वसुधराया साह्यार्थमश स्त्र नानुयुञ्जसे ॥१२ त्वया सनाथा देवाशास्त्वन्मयास्त्वत्परायणा । जगत्या संचरिष्यन्ति कार्याकार्यान्तरं गता ॥१३ मूर्तयो हि तवाव्यक्ता दृश्याश्या मुरोत्तमैः । तासु सृष्टास्त्वया देवा समविष्यवन्ति भूतले ।।१४ तवावतरणे विष्णो कस स विनशिष्यति । सेत्स्यते तव कार्यो यस्यार्थे भूमिरागता ।।१५ त्व भारते कार्यगुरुम्त्व चक्षत्व परायणम् । तदागच्छ पोकेश क्षितो ताजहि दानवान् ।।१६ हे विष्णु समस्त देवगणों ने उन अनेकों राजाओं का सहार करने के नाना प्रकार के अवतार धारण किए हैं, यह सब निर्मूल है ॥८॥ जब तक रायण दोनों ही पृथिवी पर अवतीर्ण न हों तव तक कुछ नहीं हो सकता प ही इन राजा लोगो का परस्पर सधपं कराके सहार कर सकते हैं ।। भी तत्वो के देखने तथा जानने वाले हैं फिर भी आपकी यह योजना उत्तम २३० ] [ श्री हरिवंशपुराण नहीं है ॥१०॥ हे भगवन् ! आप सभी प्राणियो के नेत्र, देवगणो के देवता, पर के पूज्य, योगियों के योग तथा वेगयानो के उत्तम गति हैं ॥११॥ इसलिए जब समस्त देवगणो ने पृथिवी का बष्ट दूर करने के लिए अवतार धारण कर लिए तो फिर अभी तक आपने अवतार धारण क्यो नहीं किया ? समस्त देवगण को कि अवतार धारण कर चुके हैं, उनको जब आप सहायता तथा प्रोत्साहन दे रहेंगे तभी वे अपने उस अभीष्ट को सिद्ध कर सकेंगे ।।१२-१३।। आपके रूपों की कोई ब्याख्या नहीं है । ब्रह्मा आदि देवगण भी आपके रूपो को नहीं जान पाउँ । समस्त देवगण प्रत्यक्षदर्शी नाना प्रकार के स्वरूपो मे भूमण्डल पर अवत ग्रहण कर चुके हैं अत आपको भी शीघ्र ही अवतार धारण करना चाहि ॥१४) आपके अवतीर्ण होने से पापी कस का सहार होकर पृथिवी का, हलका हो जाएगा ॥१५॥ भारत का यह अभीष्ट कार्य आप सिद्ध कर सो अतः हे भगवन् ! भारतभूमि पर अवतरित होकर आप उन पापी राक्षसों विनाश कोजिए ॥१६॥ ॥ पितामह ब्रह्मा की योजना ॥ नारदस्य वच. श्रुत्वा सस्मित मधुसूदन. । प्रत्युवाच शुभ वाक्यं वरेण्यः प्रभुरोश्वरः॥१ लोक्यस्य हितार्थाय यन्मां वदसि 'नारद । तस्य सम्यक्प्रवृत्तस्य श्रयतामुत्तर वच. ॥२ विदिता देहिनो जाता मयते भुवि दानवा. । यां च यस्तनुमादाय देत्य. पुष्यति विग्रहम् ॥३ जगत्यर्थे कृतो योऽयमशोत्सर्गो दिवौकसः । सुरदेवर्षिगन्धर्वरितश्चानुमते मम ॥४ विनिश्चयो हि प्रागेव नारदाय कृतो मया । निवासं ननु मे ब्रह्मन्विदधातु पितामहः ॥५ यत्र देशे यथा जाता येन वेपेण वा वसन् । तानहं समरे हन्या तन्मे व्र.हि पितामह ॥६ पितामह ब्रह्मा की योजना ] [ २३१ वैशम्पायन जी ने कहा है राजन् ! देवादिदेव भगवान् श्री विष्णु महर्षि नारद के ऐसे वचन सुन कर मुस्कान सहित वोरे॥१॥ हे नारद ! तुमने तीनो लोकों के लाभ हेतु जो वचन कहे । मुनो ! मैं उनका उत्तर देता ॥२॥ दैत्य-गणों ने पृथिवी मण्डल पर जाकर जो भी शरीर धारण किए हैं, वह सभी मुझे ज्ञान हैं ॥३॥ देवगण, देवर्षि तथा गन्धर्व सभी इम जगत् के लाभ हेतु इस बमार मे, ससार में मेरी ही आना से जिस प्रकार अवतरित हुए हैं वह आपके सामने मैंने पहले ही निश्चय कर दिया था । यव पितामह ब्रह्माजी मुझे आदेश दें कि मैं किम वश में तथा क्या अवतार लेकर इन बमुरी का सहार रू? ४-५-६॥ नारायणेमं सिद्धार्थमुपायं शृणु मे विभो। भुवि यस्ते जनयिता जननी च भविष्यति ।।७ यत्र त्वं च महाबाहो जातः कुलकरो भुवि । यादवानां महद शमखिलं धारयिप्यसि 15 तांश्चासुरान्समुत्पाट्य वंशं कृत्वाऽन्मनो महत् । स्थापयिप्यसि मर्यादा नृणां तन्मे निशामय ॥६ पुरा हि कश्यपो विष्णो वरुणस्य महात्मनः । जहार यशिया गा वै पयोदास्तु महामखे ॥१० यदितिः सुरभिश्चते द्वे भार्य कश्यपस्य तु । प्रदीयमाना गास्तास्तु नच्छेतां वरुणस्य वै ॥११ ततो मा वरणोऽभ्येत्य प्रणम्य शिरसा ततः। उवाच भगवन्गावो गुरुणा मे हृता इति ॥१२ कृतकार्यों हि गास्तास्तु नानुजानाति मे गुरुः। अन्ववर्तत भाये हे अदिति सुरभि तथा ।।१३ पितामह ब्रह्माजो कहने लगे है भगवन् ! इस भूमण्डस पर वारके ता-पिता कौन होंगे? आप किस वश में जन्म धारण करके उन महावलपारी .यों का सहार करेंगे तया अपने कुल को विस्तृत करके अपनी मर्यादा को सुर- उत रखेंगे, इसके लिए में लापको एक सरल प्रयोजन बतलाता हूं ॥७-८-६॥
२३२ । [ थी रियशपुराण महात्मा वरण । पे पास यज्ञ-काल के लिए कुछ दूध देने योग्य गायें थी। एक चार प्रजापति भगवान् पश्यप उन गायों को महात्मा वास से मांग कर ले गए। सो उनकी भार्याओ अदिति, सुरभी ने गायें वरण को लौटाने के लिए अनिच्छा प्रक्ट को ॥१०-११॥ एक बार वरुण मेरे यहाँ आकर तथा मुझे प्रणाम करके बोले-है भगवन् | मरी समस्त गायें मेरे पिता भगवान् कश्यप ने ले ली है। यद्यपि उन्का थार्य सम्पन्न हो चुका है, किन्तु उन्होंने मेरी गायें नही लौटाई हैं और अपनी दोनो पत्नियो अदिति तथा सुरभी की इच्छा का ही समर्थन कर रहे हैं ।।१२-१३॥ मम ता अक्षया गावो दिव्या कामदुधा प्रभो। चरन्ति सागरान्सर्वान्रक्षिता स्वेन तेजसा ।।१४ कस्ता धर्षयितु शक्तो मम गा कश्यपाहते। अक्षय या क्षरन्त्यग्रच पयो देवामृतोपमम् ।।१५ प्रभुर्वा व्युत्यितो ब्रह्मन्गुरुवा यदि वेतर । त्वया नियम्या सर्वे वै व हि न परमा गति ॥१६' यदि प्रभवता दण्डो लोके कार्यमजानताम् । न विद्यते लोकगुरोर्न स्युर्वं लोकसेतव ॥१७ यथा वाऽस्तु तथा कर्तव्ये भगवान्प्रभु । मम गाव प्रदीयन्ता ततो गन्ताऽस्मि सागरम् ।।१८ या आत्मदेवता गावो या गाव सत्वमव्ययम् । लोकाना त्वत्प्रवृत्तानामेक गोब्राह्मण स्मृतम् ।।१६ सातव्या प्रथम गावस्त्रातास्त्रायन्ति ता द्विजान् । गोब्राह्मणपरिमाण परिपात जगद्भवेत् ॥२० उन कामधेनुओ को नष्ट करना असम्भव है। वे अपने तेज से प्रभा होकर सुरक्षित हैं तथा सागरीय तटो पर विचरतो फिर रही है ॥१४॥ वो और मेरी उन गायों को प्रजापति कश्यप के अलावा अन्य कोई स्पर्श नहीं कर सकता है। उन गायो का दुध अत्यन्त लाभदायक अमृत के र
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१ २३२ ] [ श्री हरिवशपुराण महात्मा वरण | के पास यज्ञ-काल के लिए कुछ दूध देने योग्य गायें थी। बार प्रजापति भगवान् कश्यप उन गायो को महात्मा वरण से मांग कर ले गए, तो उनकी भाय'यो अदिति, सुरभी ने गाये वरण को लौटाने के लिए अनिच्छः प्रकट की ॥१० ११॥ एक बार वरुण मेरे यहां आकर तथा मुझे प्रणाम करके बोले-ह भगवन् । मेरी समस्त गायें मेरे पिता भगवान् कश्यप ने ले ली हैं । यद्यपि उनका कार्य सम्पन्न हो चुका है, किन्तु उन्होने मेरी गायें नहीं लौटाई हैं और अपनी दोनो पलियो अदिति तथा सुरभी की इच्छा का ही समर्थन कर रहे हैं ॥१२-१३॥ मम ता अक्षया गावो दिव्या कामदुधा प्रभो। चरन्ति सागरान्सन्रिक्षिता स्वेन तेजसा ॥१४ कस्ता धर्पयितु शक्तो मम गा कश्यपाहते। अक्षय या क्षरन्त्यग्र पयो देवामृतोपमम् ॥१५ प्रभुर्वा व्युत्थितो ब्रह्मन्गुरवा यदि वेतर । त्वया नियम्या सर्वे वै त्व हि न परमा गति ॥१६ यदि प्रभवता दण्डो लोके कार्यमजानताम् । न विद्यते लोकगुरोनं स्युर्वे लोकसेतव ॥१७ यथा वाऽस्तु तथा यतंव्ये भगवान्प्रमु. । मम गाव प्रदीयन्ता ततो गन्ताऽस्मि सागरम् ॥१८ या आत्मदेवता गावो या गाव. सत्यमव्ययम् । सोवाना त्यत्प्रवृत्तानामेर गोग्राह्मण स्मृतम् ।।१६ सातय्या प्रथम गावखातानायन्ति ता द्विजान् । गोग्राह्मणपरित्राण परित्रात जगद्भवेत् ।।२० उसकामो मो नष्ट गरमा असम्भव है। ये अपने क्षेत्र से प्रम होपर गुरमित है तथा मागगैप तटो पर विपरती पिर रही है ॥१४॥ वो और गरी उन गायों को प्रजापति र असावा भापकोई पर नही रगरता है। उन गायोरा दुप भरया भाभदायर अमृत पितामह ब्रह्मा को योजना ]] [ २३३ तथा नाशरहित है ।।१५ है पितामह ! चाहे कोई स्वामी हो, गुरु हो अथवा कोई भी हो, सभी को निर्धारित सीमा का उल्लघन करने पर आप उसको दण्डित करते हैं । आपके अलावा मेरा कोई भी सहायक नही क्योकि आप ही मेरे अत्यन्त हतपी हैं। अगर इस जगत् मे अपराधी अपने अपराध के लिए नियमित रूप में दण्डित न हो तो इग समस्त समार का विनाश हो जायगा तथा इसकी मर्यादा-भग हो जायगी ।।१६-१७॥ हे ब्रह्मन् ! इस सन्दर्भ मे मैं और कुछ नहीं, सिर्फ अपनी गायें वापिस चाहता हूं वह आप मुझे अवश्य दिलवाइए । इसके पश्चात् मैं सागर की ओर पहुंच जाऊँगा। उन गायों से ही मेरा जीवन तथा बल है। आरने सृष्टि-रचना के समय सर्व प्रथम गाय तथा ब्राह्मणों की उत्पत्ति की थी। इसलिए गायो की रक्षा ही आपना सर्वप्रधान कर्तव्य है । आपके द्वारा बन्धन मुक्त तथा सुरक्षित घे गायें ही हम समस्त पाह्मणो की रक्षा कर मकती हैं। तथा इसी तरह इन दोनो को रक्षा करने से 'समरत जगत की रक्षा सम्भव होगी ॥१८-१९-२०॥ . इत्यम्वुपतिना प्रोक्तो वरणेनाहमच्युत । गवा कारणतत्त्वज्ञः कश्यपे शापमुत्सृजन् ॥२॥ येनाशेन हृता गावः कश्यपेन महर्षिणा । स तेनांशेन जगती गत्वा गोपस्वमेष्यति ॥२२ या च सा सुरभि म अदितिश्च सुरारणिः । तेऽप्युभे तस्य भायें वै तेनैव सह याम्यतः ॥२३ ताभ्या च मह गोपत्वे कश्यपो भुवि रंस्यते । स तस्य कश्यपम्यांशस्तेजसा कश्यपोपम ।।२४ वसुदेव इति स्यातो गोपु तिष्ठति भूतले । गिरिर्गोवर्धनो नाम मथुरायास्त्वदूरतः ।।२५ तमासौ गोषु निरत. कंसस्य करदायकः । तस्य भार्याद्वयं जातमदितिः सुरभिश्च ते ।।२६ देवको सोहा चव वसुदेवस्य धीमतः। मुरभी रोहिणी देवी चारितिदेवकी त्वभूत् ॥२७ २३४ ] [ यो हिरवशपुराण हे विष्णु | महात्मा वरुण के ऐसे वचनो को सुनकर इस सदमं समस्त ज्ञान प्राप्त करके भगवान् ने कश्यप को श्राप दे दिया तथा वहा ॥२१॥ भगवान् कश्यप ने अपने जिस तेज से प्रभावित होकर उन गायो को अपहृत किया है, उसी के प्रभाववश वे भूमण्डल पर ग्वाला का जन्म धारण करें ॥२२॥ तथा दोनो देवमाता अदिति तथा सुरभी उनकी पलियो के स्वरूप पृथ्वी पर उनके साथ जन्म धारण करेंगी ॥२३॥ इस पृथ्वी पर ग्वाला का जन्म धारण कर महर्षि कश्यप अपनी दोनो भार्याा सहित आनन्दपूर्वक जीवन यापन करते रहेगे। इसी के अनुसार वर्तमान समय मे भगवाद कश्यप के तेज स्वरूप वसुदेव नाम से प्रसिद्ध होकर पृथ्वी पर गायो को सेवा करते हुए जीवन यापन करे रहे हैं । मथुरा के हो समीप गोवर्धन पर्वत है। उसी स्थान पर पापी कर के आधीन होकर गोकुल पर राज्य कर रहे है। महात्मा कश्यप की दोन पलिया अदिति और सुरभि वसुदेव की दोनो पलियाँ देवको तया रोहिणी रूप में अवतीर्ण हुई हैं ॥२४-२७॥ तर त्व शिशुरेवादी गोपालकृतलक्षण । वर्द्धयस्व महाबाहो पुरा विक्रमे यथा ॥२८ छादयित्वात्मनात्मान मायया योगरूपया। तत्रावतर लोकाना भवाय मधुसूदन ॥२६ जयाशीर्वचनस्त्वेते वर्द्धयन्ति दिवौकस । आत्मानमात्मना हि त्वमवतीर्य महीतले ॥३० देवकी रोहिणी च व गर्भाभ्या परितोपय । गोपन्यासहस्राणि रमय श्चर मेदिनीम् ॥३१ गाश्च ते रक्षतो विष्णो वनानि परिधावत । वनमालापरिक्षिप्त धन्या द्रक्ष्यन्ति ते वपु ॥३२ विष्णो पद्मपलाशाक्ष गोपालवसति गते । बाले त्वयि महावाहो सोको वालत्वमेष्यति ॥३३ स्वक्ता पुण्डरीकाक्ष तव चित्तवशानुगा । बने चारयतो गाश्च गोप्ठेषु परिधावत ॥३४ पितामह ब्रह्मा की योजना } [ २३५ मजतो यमुनाया च रति प्राप्स्यन्ति ते त्वयि । जीवित वसुदेवस्य भविष्यति सुजीवितम् ॥३५ हे देवादिदेव भगवान् श्री विष्णु । अब आप ससार के लाभार्थ वसुदैव जी के यहां ग्वाले के रूप में अवतार धारण करो। पहले भी आपने अपने माया- जाल से वामन रूप धारण करके अपना शरीर विस्तृत कर लिया था, तो अब भी उसी तरह ग्वाल बाल के वेष मे अपने शरीर को विस्तृत कीजिए ।।२८ २६॥ ये इन्द्र सहित ये सभी देवगण आपको महिमा गाते हुए सराहना कर रहे हैं। इसलिए आप भी पृथ्वी पर वसुदेंव के यहाँ देवकी तथा रोहिणी के गर्भ मे जन्म धारण करके सभी को सन्तुष्ट करें। पृथ्वी पर जन्म धारण करने के पश्चात् आपके लिए सभी गोपियां आपके मनोरजन का साधन बनेंगी ॥३०-३१॥ आपको गायो को चराते हुए वन मे भ्रमण करते समय आपके वनमाला से शोभित सुदर शरीर को निहारकर समस्त प्राणीजन स्वय को धन्य समझेंगे ॥३२॥ हे कमलनयन भगवान् श्री विष्णु । आपके द्वारा बाल रूप धारण करने पर जगत् के समस्त प्राणी आपकी माया से ज्ञान रहित होकर बच्चो के समान ममता में बंध जाऐगे ॥३३॥ सभी बाले आपके सच्चे आज्ञाकारी बनकर जगलो तथा गौशालाओ मे आपको सहायक होगे । मापको जल-क्रीडा के लिए यमुना नदी में कूदेंगे तो उन लोगो को अत्यन्त प्रसन्नता होगी। तथा वसुदेवजी तो आपको प्राणो से भी अधिक चाहगे ॥३४-३५॥ यस्त्वया तात इत्युक्त स पुत्र इति वक्ष्यति । अथवा कस्य पुत्रत्व गच्छेया कश्यपाहते ॥३६ का च धारयितु शक्ता त्वा विष्णो अदिति विना। योगेनात्मसमुत्थेन गच्छ त्व विजयाय वै। वयमप्यालयान्स्वान्स्वानाच्छामो मधुसूदन ।।३७ सदेवानभ्यनुज्ञाय विविक्त तिदिवालये। जगाम विष्णु स्व देश क्षीरोदस्योत्तरा दिशम् ॥३८ तत्र व पार्वती नाम गुहा मेरो सुदुर्गमा।
२३६ ] { श्री हरिवंशपुराग त्रिभिस्तस्यैव विक्रान्तनित्य पर्वसु पूजिता ॥३६ पुराण तन विन्यस्य देह हरिरुदारधी । आत्मान योजयामास वसुदेवगृहे प्रभु ॥४० जिनको अभी तक आपने पिता तुल्य माना है, पृथ्वी पर वे ही तुम्हारे पिता होगे आप सिर्फ महात्मा कश्यप के ही पुत्र बनेगे तथा देवमाता आदिति के ही गर्भ से जन्म ग्रहण करोगे । हे भगवन् । अब आप अपने माया जाल से समस्त राजाओ को हराने के लिए पृथ्वीमण्डल मे अवतार धारण कीजिए। तथा हम लोग भी अपने धाम को जाते हैं ॥३६.३७॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् । भगवान् श्री विष्णु ने देवगण के पृथ्वी पर अवतीर्ण होने के कारण उन्हे रिक्त देवलोक मे जाने की आज्ञा दी तथा स्वय क्षीर सागर के उत्तर दिशा मे स्थित अपने स्थान को चल दिए ॥३८॥ वही मेरु पर्वत की पार्वती नामक भयकर गुफा थी, जिस पर भगवान् वामन के पदचिह्न थे, तथा प्रत्येक वर्ष उसकी पूजा होती रही थी, वहीं शान्तचित्त भगवान् श्री विष्णु ने अपनी उस दिव्य देह को छोडकर पृथ्वी पर वसुदेवजी के यहाँ जन्म ग्रहण किया था।॥३६-४०॥
विष्णु पर्व
॥ नारद कस सवाद ।
ज्ञात्वा विष्णु क्षितिगत भागाश्च त्रिदिवौकसाम् ।
विनाशशमी कसम्य नारदो मथुरा ययौ ।।१
त्रिविष्टपादापतितौ मथुरोपवने स्थित ।
प्रेपयामास क्सस्य उग्रसेनसुतस्य वै ॥२
स दूत क्थयामास मुनेरागमन वने ।
स नारदस्यागमन श्रुत्वा त्वरितविक्रम ॥३
निजंगामासुर कस स्वपुर्या पद्मलोचन !
स ददर्शातिथि श्लाघ्य देवपि वीतकल्मपम् ।।४
तेजसा ज्वलनाकार वपुषा सूर्यवर्चमम् ।
सोऽभिवाद्यर्पये तम्मै पूजा चक्रे ययाविधि ॥५
आसन चाग्निवर्णाभ विसृज्योपजहार स ।
निपसादासन तस्मिन्स वै शत्रमखो मुनि ॥६
वैशम्पायन न कहा-ह महीप । जव सम्पूर्ण देवगण एव स्वय भगवान्
विष्णु भी अपने अपन अशा सहित पृथ्वी पर अवतरित हो गये, तब इमका
सवाद सुनाने महर्षि नारद क्स के समीप मथरा आये । इसलिए कि उनकी भी
यही माकाक्षा थी कि क् को तुरतम किया जाय ॥१॥ सुरलोक से प्रस्थान
कर देवर्षि नारद मधुरा म स्थित ए उपवन म आये जहां से उन्होंने एक दूठ
उग्रसेन के पुत्र क्स के पास भेजा ॥२॥ नारदजी के सदेश वाहक ने दवपि
नारद के पधारने की सूचना दी। जिसको मुनते ही कस तुरत मिलने को चल
पहा ॥३॥ महीपाल क्स अपनी नगर के बाहर निर्दिष्ट स्थान पर जा पहुंचा
और उसने देखा कि अग्नि जैस तेजवान् देहधारो, पवित्र आत्मा एव सूर्य की
भांति चमकने वाल देवमुनि नारद सामने खड़े हैं। 'राजा कसने देवपि को
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२४० ]
[ यो हरिवंशपुराम
इत्युक्त्वा नारदे याते तस्य वाक्य विचिन्तयन् ।
जहासोच्चस्तत कस. प्रकाशदशनश्चिरम् ॥२१
सस्मित चव प्रोवाच भृत्यानामग्रत स्थितः ।
हास्य खलु स सर्वेषु नारदो न विशारद ॥२२
नाह भीषयितु शक्यो देवैरपि सवासवै ।
आसनस्थ शयानो वा प्रमत्तो मत्त एव च ।।२३
योऽह दोामुदाराभ्या क्षोभयेय धरामिमाम् ।
कोऽस्ति मा मानुपे लोके य क्षोभयितुमुत्सहेत् ॥२४
अद्यप्रभृति भूतानामह देवानुवर्तिनाम् ।
नृपक्षिपशुसधाना करोमि कदन महत् ॥२५
आज्ञाप्यता हय केशी प्रलम्बो धेनुकस्तथा ।
अरिष्टो वृषभश्चैव पूतना कालियस्तथा ॥२६
अटध्य पृथिवी कृत्स्ना यथेष्ट कामरूपिणे ।
प्रहरध्व च सर्वेषु येऽस्माक पक्षदूषका ॥२७
गर्भस्थानामपि गतिविज्ञेया चव देहिनाम् ।
नारदेन हि गर्भेभ्यो भय न. समुदाहृतम् ॥२८
देवर्षि नारद के इस प्रकार कहकर वापिस प्रस्थान कर जाने पर विचार
वर कस दांत निपोरकर बहुत समय तक हंसता रहा ॥२१॥ फिर हंसता हुआ
अपने भृत्यो से दोला-हे सेवको । मुनि नारद की बाते सदैव हसी के समान
हैं । उनकी बाते योग्य बुद्धिमानो जैसी नही है ॥२२॥ इसलिए कि यदि मैं युर
में, सोते समय, मत्त या प्रमत्त किसी भी अवस्था में ही होऊ, फिर भी ।
आदि सुर मुझे कदापि भयभीत नहीं कर सकते ॥२३॥ मैं अपनी भुजाओ
शक्ति से सम्पूर्ण भूतल को क्षुब्ध कर सकता है। फिर पृथ्वी पर ऐसा शकि
शाली कौन है जो मुझसे अटके और मुये कोधित करने का दुस्साहस करे ॥२१
देवसाबों ये अनुयायी समस्त मनुष्यो, पशु पक्षियो व अन्य प्राणियो को
समय में हो नष्ट पर दूंगा ॥२शा हयग्रोव केशी, प्रलम्ब, धेनुक, अरिष्ट, -
पूतना य वालिया नाग को मेरा निर्देश भेजा जाय कि ये स्वेच्छापूर्वक स्वा
"योगनिद्रा-विष्णु वार्तालाप ] [ २४१ वर्तन कर समस्त भूतल पर भ्रमण करें और जिस स्थान पर भी मेरे विपक्षी 1, उन्हें वध कर डालें ॥२७॥ देव मुनि नारद जिस गर्भस्य वालक के बारे में ह गये हैं, इस कारण हयग्रीव व केशी नामक गए गर्भस्थ वालको पर निगरानी वें ॥२॥ भवन्तो हि यथाकाम मोदन्ता विगतज्वराः । मां च वो नाथमाश्रित्य नास्ति देवकृतं भयम् ।।२८ स तु केलिकिलो विप्रो भेदशीलश्च नारदः । सुश्लिष्टानपि लोकेऽस्मिन्भेदयेल्लमते रतिम् ।।३० कण्डूयमानः सततं लोकानटति चञ्चलः । घटमानो नरेन्द्राणां तत्राणि चव हि ।।३१ एवं स विलपन्नेव वाङ्मानेणव केवलम् । विवेश कंसो भवन दह्यमानेन चेतमा ।।३२ फिर अपने सभाजनो की ओर इ गित कर कहा-"तुम सभी लोग भय और घबडाहट को त्याग कर पूर्ण आनन्द से रहो। मेरे जैसे स्वामी के होते हुए न्हें देवलोक मे कोई भय नही करना चाहिए ॥२६॥ देवमुनि नारद कौतुक रने वाले और कलह कराने व मतमेद उत्पन्न करने में बटे चतुर हैं । आपस घनिष्ठ दो मनुष्यो मे गतिरोध उत्पन्न कराकर वे हर्ष का अनुभव करते ॥३०॥ मनुष्यो में इस प्रकार उत्तेजना उत्पन्न करना और विचरण करना नका कार्य है । वे अपनी कूटनीतियो से भूपतियो के बीच शत्रुता की अग्नि ज्ज्वलित करते रहते हैं ॥३१॥ लेकिन फिर भी चिन्ता रूपी अग्नि क्स के न्तिर्मन को जला रही थी और इमी अवस्था में ही वह अपने निवास-गृह की मोर चल दिया ॥३२॥ ॥ योगनिद्रा-विष्णु वार्तालाप ॥ सोज्ञापयत सरन्यः सचिवानात्मनो हितान् । यत्ता भवत सर्वे वै देवक्या गर्भकृन्तने ॥१ २४२ ] [ श्री हरियार प्रथमादेव हलच्या गर्भात सर्व एव हि । मूलादेव तु हन्तव्य सोनों यस मंशयः ।।२ देवकी च गृहे गुप्ता प्रच्चनरभिरक्षिता। स्वर चरतु विश्रब्धा गर्भकाले तु रक्ष्यताम् ॥ मासान्वं पुप्यमासादीगण यन्तु मग स्त्रिय । परिणामे तु गर्भस्य शेष ज्ञास्यामहे वयम् ॥४ वसुदेवस्तु सरक्ष्य स्त्रीसनाथासु भूमिपु । अप्रमत्तर्मम हिते रामावहनि चैव हि । स्त्रीभिर्वर्पवरैश्च व वत्तव्य ग तु पारणम् ॥५ एप मानुष्यको यत्नो मानुपैरेव साध्यते । श्रू यता येन देव हि मद्विध प्रतिहन्यते ।।६ मन्त्रग्राम सुविहित रोपधश्च सुयोजिते । यत्नेन चानुकूल्येन दैवमप्यनुलोम्यते ।।७ वैशम्पायन ने कहा-हे राजन मरिंगण से कहने लगा---मत्रियो । देवकी बहिन का गर्भ समाप्त करने के तुम लोग सदैव तत्परतापूर्वक सावधान रहना ॥१॥ प्रारम्भ से ही देवा समस्त गर्भ नष्ट करते रहो । क्योकि नीति के अनुसार जिससे हो, उसे वह पूर्ण रूपेण शमन करदे । देवकी वी देख-रेख मेर गुप्तचर कर है । इसलिए आठवें गर्भ के उत्पन्न होने तक, उसे औषधि आदि देकर 3 गर्भो का नाश करतें चलो, जिससे कि कोई सन्देह भी न रहे ॥२॥ देवकी महलो में तब तक विश्वासपूर्ण चित्त सहित स्वेच्छाचारितापूर्वक रहेगी। अन्त पुर को सेविकाएं उसकी सावधानीपूर्वक रक्षा करेंगी ॥३॥ जब भी दे के गर्भ धारण का अवसर हो, उस समय विशेष सावधानी रहे, उस कार मेरी पत्नियाँ उचित ढग से महोनो की गणना करेंगी। उसके परिणाम । गणना द्वारा मैं उसके गर्भो के विषय मे निश्चित रूप से जान सकू।) विशेष विश्वासी सेवक प्रत्येव क्षण मेरे महलो में रहने वाले वसुदेव की रक्ष सावधानीपूर्वक सलग्न रहकर उस पर विशेप देख रेख रखें। इस बात का इस प्रकार नस कोच से आवेश मेह मनुष्य : योगनिद्रा-विष्णु वार्तालाप ] [ २४३ भी विशेष ध्यान रखें कि अन्त. पुर के सेवक वसुदेव और इस नगर की स्त्रियो को इस विशेप रक्षा एव देख रेख प्रवन्ध के विपमे मे न बतावें ॥५॥ मेरे बताये सभी कार्य मनुष्य साध्य हैं एव मनुष्य उन्हे पूरा कर सकते हैं ।।६।। मन, औषधि, यत्न और समय की अनुकूलता का उचित रूप में पालन किया जाय तो मेरे समान मनुष्य अवश्य ही भाग्य को भी अपनी इच्छानुसार परिवर्तित कर सकते हैं और उसे अपने अनुकूल बना सकते हैं 1॥७॥ एवं स यत्नवान्कसो देवकीगर्भकृन्तने । भयेन मन्त्रयामास थुतार्थो नारदात्स वै ।।८ एव थ त्वा प्रयत्न दै कंसस्यारिष्टसंज्ञितम् । अन्तद्वान गतो विशुश्चिन्तयामास वीर्यवान् ।। सप्तेमान्देवकीगर्मान्भोजपुत्रो वधिष्यति । अष्टमे च मया गर्ने कार्यमाधानमात्मनः तस्य चिन्तयतस्त्वेव पातालमगमन्मनः । यन ने गर्भशयना. पड्गर्भा नाम दानवा. ।।११ विक्रान्तवपुपो दीप्तास्तेऽमृतप्राशनोपमा. । अमरप्रतिमा युद्ध पुवा वै कालनेमिनः ॥१२ ते ताततात संत्यज्य हिरण्यकशिपु पुरा । उपासाचक्रिरे दैत्या: पुरा लोकपितामहम् ।।१३ तप्यमानास्तपस्तीबजटामण्डलधारिणः । तेपा प्रीतोऽभवद्ब्रह्मा पड्गर्भाणा वरं ददौ ॥१४ वैशम्पायन जी बोले-हे नप! घोर असुरराज कस देव मुनि नारद द्वारा अपने विनाश का वर्णन सुनकर एकदम भयभीत हो गया और तभी से देवकी के गर्मों को नष्ट करने के विषय में विचार विमर्श करने लगा ॥८भगवान् विष्णु ने भी अपने ध्यान-योग की शक्ति द्वारा कस का गर्भ नष्ट करने सबधी द्देश्य जान लिया और वे भी मन में विचार करने लगे कि यह भोजपुत्र कस अपनी बहिन देवकी के सात गर्मों को तो समाप्त कर देगा और फिर आठवें गर्म मे झे जन्म लेकर अपना उद्देश्य पूर्ण करना होगा ॥६१०॥ भगवान् विष्णु समान महावीर्यवान् शक्तिशाली कालनेमि के छ पुत्र है और वे महान तपसी २४४ ] [ श्री हरिवंशपुराण इस पर विचार कर रहे थे, तभी उन्हें स्मरण हुआ कि भूगर्भ तल मे देवताओं तथा अमृत-पान किये हुए सुरो के सदृश दीर्घायु हैं ॥११-१२॥ आदिकाल में रे अपने पितामह हिरण्यकशिपु का विरोध और अपमान करके जगत्पिता ब्रह्माजी सी आराधना मे लग गये ॥१३॥ उन्होने जटाएं भी धारण की और फिर तपस्या न हो गये, जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हे वरदान दिया ॥१४॥ मुत्तममवशार्दूलास्तपसाऽह सुतोषित.। करोम्यहम् ॥१५ वन् । रः ।।१६ मे तल्लीसा भो भो वर्षवरश्न व वक्तव्य नतु व्रत वो कामस्तस्य त त मानुषैरेव साध्य ते तु सर्या दैत्या ब्रह्माणध प्रतिहन्यू यदि नोमोतो दीयता नो धिश्च अवा शागबन्दैवत. समहाभिः ॥१७ यक्ष विपत परमविचारणमानवैः । मा भूक नगवन्ददासि यदि नो वरम् ॥१८ तानुवातो ब्रह्मा सुप्रीतेनान्तरात्मना । भवद्भिर्यदिदं प्रोक्त सर्वमेतद्भविष्यति ॥१६ पड्गर्भाणा वरं दत्त्वा स्वयंभूस्त्रिदिव गत. । ततो हिरण्यकशिपुः सरोपो'क्यमब्रवीत् ।।२० मामुत्सृज्य वरो यस्माद्बतो व पद्मसभवात् । तस्माद्वस्त्याजित. स्नेहः शव भूतास्त्यजाम्यहम् ॥२१ ब्रह्माजी ने कहा-हे दानव शार्दूल I मैं तुम्हारी आराधना से अत्यधि प्रसन्न हूँ। तुम अपनी-अपनी इच्छा कहो, मैं वह पूर्ण करूंगा ॥१५॥ इस ' वे सर एकमत होपर सगे-हे जगपालक ! यदि आर वास्तव में हम प्रसन्न हैं तो आप हमे यह वरदान दीजिए कि हम देवता, विशाल सपो, देने वाले मुनियों, पक्ष, मिट, गन्धर्व, पारण और किसी भी मनुष्य के हाय मर सकें। तब ब्रह्माजी ने उन्हें वरदान दिया-तुम्हारी आरक्षा पूर्ण है ॥१५-१६॥ ब्रह्माजी उन दो वरदान प्रदान पर अपने लोक चले गये । 3. 1 -
योगनिद्रा-विष्णु वार्तालाप ]
[ २४५
से जाने के पश्चात् हिरण्यकशिपु बहुत क्रोधित हुआ उनसे कहने लगा- -तुमने
माजी से वरदान प्राप्त कर मेरो अवहेलना की है और इसलिए तुम से मेरा
ई सवध नही और तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह सदैव के लिए समाप्त हो गया।
व तुम मेरे शन्न हो ।।२०-२१॥
पड्गर्भा इति योऽयं वः शब्दः पिनाऽभिवधितः ।
स एव वो गर्मगतान्पिता सन्विधिप्यति ॥२२
पडेव देवकीगर्भाः पड्गर्भा वै महासुराः ।
भविष्मथ ततः कंसो गर्भस्थान्वो वधिष्यति ॥२३
जगामाय ततो विष्णुः पातालं यत्र तेऽसुराः।
पड्गर्भाः संयताः सन्ति जले गर्भगृहेशयाः ॥२४
संददर्श जले गुप्तान्पड्गर्भान्गर्भसस्थितान् ।
निद्रया कालरूपिण्या सर्वानन्तहितान्स वै ॥२५
स्वप्नरूपेण तेणं वै विष्णुदेहानथाविशत् ।
प्राणेश्वराश्च निष्कृप्य निद्रायै प्रददौ तदा ॥२६ ।
तां चोवाच ततो निद्रा विष्णुः सत्यपराक्रमः ।
गच्छ निद्र मयोत्सृष्टा देवकीभवनान्तिकम् ॥२७
इमान्प्राणेश्वरान्गृह्य पड्गर्भान्दानवोत्तमान् ।
सर्वप्राणेश्वरांश्चंव पड्गन्निाम देहिनः ।
पड्गर्भान्देवकीगर्भे योजयस्व यथाक्रनम् ॥२८
उसने शाप दिया-तुम्हारे जिम पिता ने तुम्हारा नामकरण पगर्म
कया है, वही तुम्हारा शमन भी करेगा ॥२२॥ तुम सभी देवकी के गर्भ से जन्म
प्त करोगे और कस एक-एक करके तुम यहो का गर्भ के समय ही वध कर
लेगा ।।२३॥ वैशम्पायन बोले-हे नृप ! कालनेमि के उन छ पुत्रो का स्मरण
आते ही भगवान् विष्णु ने तुरन्त ही भूतल लोक को प्रस्यान किया, जहां पर वे
असुर जलपूर्ण शंया पर एक साथ सो रहे थे ॥२४॥ भगवान् विष्णु ने यह
इकर कि वे छहो कालरूपिणी निद्रा मे मोहित होकर जलमय शंया पर निद्रित
ड़े हैं ।।२५।। तो भगवान् विष्णु ने अपनी माया-शक्ति द्वारा स्वप्न की भांति
२४६ ] [ श्री हरिवंशपुराण उनकी देहो में प्रवेश किया और उनके प्राणो को लेकर निद्रा देवी को दे दिद ॥२५।। उन्होने निद्रा देवी से कहा-हे निद्र । तुम यहाँ से प्रस्थान कर देवो के मत.पुर मे पहुंचो ॥२७॥ वहाँ इन पड्गर्मों के प्राणो को एक एक कर देवको के गर्भ मे प्रस्थापित कर दो ॥२८॥ जातेष्वेतेपु गर्भपु नीतेपु च यमक्षयम् । कसस्य विफ्ले यत्ने देवक्या सफले श्रमे ॥र्स प्रसाद ते करिष्यामि मन्प्रभावसम भुवि । येन सर्वस्य लोक्स्य देवि देवी भविष्यसि ॥३० सप्तमो देवकीगर्मो योऽश सौम्यो ममाग्रज । स सक्रामयितव्यस्ते सप्तमे मासि रोहिणीम् ॥३१ सकर्षणात्त गभस्य म तु सकर्षणो युवा। भविष्यत्यनजो भ्राता मम शीताशुदर्शन ॥३२ पतितो देवकीगर्भ सप्तमोऽय भयादिति । अष्टमे मयि गर्भस्थे कसो यल करिष्यति ॥३३ या तु सा नन्दगोपस्य दयिता भुवि विथु ता। यशोदा नाम भद्र ते भार्या गोपकुलोद्वहा ॥३४ तस्यास्त्व नवमो गर्भ कुलेऽस्याक भविष्यसि । नवम्यामेव संजाता कृष्णपक्षस्य वै तिथौ ।।३५ देवकी के गर्भ से उत्पन्न होकर ये सर इस द्वारा एक-एक करके वध दिये जायेंगे । इस प्रकार क्स का प्रयत्न तो असपल होगा और देवकी याद भी सफल होगा ।।२६।। उस पालम मेरी प्रसन्नता पा कारण बनोगी में मैरी प्रम नवा व वृपा ये पारण सम्मान प्राप्त करके सभी मनुष्यो य प्राणि दारा गम्मानित होयागी ॥३०॥ इमरे उपरान्त देवकी ये सातवें गर्भ में चन्द्र का जा अश प्रवेश करेगा, यह भग बहा भाई होगा । सातवें महीने में यह सब गर्न दयको ये गर्भ स परिवतित पर रोहिणी पे गर्भ मे प्रस्थापित कर ॥३१॥ इस प्रसार गर्भ गरण से उत्पन्न उग याला नाम गुपए होगा। • fणु जो मेरा यहा भाई होगा, यह पन्द्रमा थे सदृश परयन्त सुन्दर है गोगनिद्रा-विष्णु वातालाप ] [ २४७ ३२॥ इम गर्भ मकर्षण का परिणाम यह होगा कि यह ममाचार फैन जायगा भय के कारण देवकी का गर्भ गिर गया। इसके पश्चात् देवकी के आठवें 4 मे मैं स्वयं प्रवेश कम्गा और तब मेरा क्व करन के लिए क्स विभिन्न पत्न करेगा ॥३३१ वमुदेव के अभिन्न मिन नन्द गोपराज की पत्नी यशोदा के उ गर्भ मे तुम प्रवेश करो और कृष्णपक्ष की नवमी जन्म लो ॥३४-३५॥ मह त्वमिजितो योगे निशाया यौवने स्थिते । अराने करिष्यामि गर्भमोक्ष यथासुखम् ।।३६ अष्टमस्य तु मासस्य जातावावा तत ममम् । प्राप्स्यावो गर्भयत्याम प्राप्ते कमस्य नाशने ॥३७ अह यशोदा यास्यामि त्व देवि भज देवकीम् । आवयोर्गर्भव्यत्यासे कमो गच्छतु मूढताम् ।।२८ ततस्वा गृह्य चरणे शिलाया पातयिष्यति । निरम्यमाना गगने स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम् ।।३६ मच्छवीमहशो कृप्या सकपणसमानना। विनती विपुली वाहू मम वाहूपमौ दिवि ।।४० लिशिख शूलमुद्यम्य सङ्गं च कनकत्सरुम् । पात्री च पूर्णी लघुना पङ्कज च सुनिर्मलम् ॥४१ नीलकौशेयसवीता पीतेनोत्तरवाससा। शशिरश्मिप्रसाशेन हारेगोरसि राजता ।।४२ उसी समय में भी अरात्रि काल मे अभिजित् नक्षत्र के, योग के समय जन्म लूगा ।।३६।। अष्टम मान मे हम एक माय जन्म लेंगे, जिसमे गर्भ परिवर्तन होगा वोर उसे कर के वध करने में सफलता मिलगी ॥ ३७॥ गभं परिवर्तन के द्वारा में यशोदा के पास पहुंच जागा और तुम देवकी के पास आ जाओगे। .ऐसी परिस्थिति मे उस घोर असुरराज कम की मनि भ्रष्ट हो जायगी ॥३८॥ ताटवें गभं को नष्ट करन के लिए कम तुम्हारा पैर पक्ह वर तुम्हें उस समय शला पर दे मारेगा और तुमको आकाग में स्थित होकर भास्वत स्थान प्राप्त होगा ॥३६॥ उस समय तुम्हारी देह की आमा मेर सहा कृष्णा वर्ग, मेरो मुजाओं २४८ ] [ श्री हरिवशपुर के समान विशाल भुजाएं और तुम्हारा मुख तेरे, ज्येष्ठ भ्राता बलराम के साथ अति सुन्दर होगा ॥४०॥ उस समय तुम्हारे हाथो मे त्रिशूल, सोने की मूठ वाद तलवार, मदिरापूर्ण पान और अत्यन्त स्वच्छ कमल होगा ॥४१॥ तुम्हारी दह पर नीलवर्ण का रेशमी वस्त्र और पीतवमन का उत्तरीय शोमायमान होगा। चन्द्रमा की किरणो के सदृश अत्यन्त स्वच्छ हार तुम्हारे वक्षस्थल पर सुशोभित होगा ।।४२॥ दिव्यकुण्डलपूर्णाभ्या श्रवणाम्या विभूषिता । चन्द्रसापत्नभूतेन मुखेन त्व विराजिता ॥४३ मुकुटेन विचित्रेण केशबन्धेन शोभिना। भुजङ्गार्भुजैर्भीमीषयन्ती दिशो दश ॥४४ ध्वजेन शिखिबहेण उच्छ्रितेन विराजिता । अङ्गजेन मयूराणामङ्गदेन च भास्वता ॥४५ कीर्णा भूतगणोरैमन्नियोगानुवर्तिनी। कौमार व्रतमास्थाय त्रिदिव व गमिष्यसि ।।४६ तत्र त्वा शतदृक्छको मत्प्रदिष्टेन कर्मणा। अभिपेकेण दिव्येन देवतै सह योक्ष्यते ॥४७ अत्र व त्वा भगिन्यर्थे गृहीष्यति स वासव । कुशिकस्य तु गोनेण कौशिकी त्व भविष्यसि ॥४८ स ते विन्ध्ये नगश्रेष्ठ स्थान दास्यति शाश्वतम् । तत स्थानसहस्र स्त्व पृथिवी शोभयिष्यसि ॥४६ श्रेप्ट अलकृत दो वुडल तुम्हारे दोनो कानो मे लटके होगे । तुम्हा अपूर्व मुख-आभा को विलोक कर चन्द्रमा को भी ईर्या होने लगेगी । बलौषिक मुकुट एवं अनुपम केशराशि से तुम्हारा मरतक अत्यन्त शोभावान उठेगा । भयानक विपघरो जैसी तुम्हारी भुजाओ को देखकर सम्पूर्ण दिशा भयातुर हो जायेंगी ॥४४॥ इसके अतिरिक्त तुम्हारी शोभा उस समय असी होगी, जब तुम मोर पस लगी उच्च पताका और तेजस्वी अगद धारण करो ॥ ४५ ॥ उग दाल तुम प्रमथगणों से घिरी हुई होगी और कोम प्रत का पालन एवं मरी आशाओ वा पालन परती हुई स्वर्गले
योगनिद्रा-विष्णु वार्तालाप ]
[ २४०
में स्थित होओगी ।।४६|| जहाँ सहन नेत्र धारी इन्द्र मेरी याज्ञा के पालनस्वरूप
तुम्हें अभिपिक्त करेगा और अपने देवगण मे मिला लेंग ॥४७॥ और वह इन्द्र
तुम्हें अपनी वहिन का स्थान देंगे। चू कि गुम बुशिक गोत्रीया हो, इस कारण
तुम्हारा नाम कौशिकी होगा ॥४८॥ विध्याचल पर देवेश्वर इन्द्र तुम्हें शाश्वत
स्थान प्रदान करेंगे। फिर तुम अपनी अलौकिक आभा से सहस्रो स्यानो को
अलौक्ति क्रोगी ॥४६॥
व लोक्यचारिणी सा त्व भुवि सत्योपयाचना।
चरिष्यसि महाभागे वरदा कामरूपिणी ।।५०
तत्र शुम्भनिशुम्मो द्वौ दानवौ नगचारिणी।
तौ च कृत्वा मनमि मा सानुगो नाशयिष्यसि ॥५१
कृत्वाऽनुयाना भूतस्त्व सुरामासवलिप्रिया।
तिथौ नवम्या पूजा त्व प्राप्स्यसे सपशुक्रियाम् ।।५२
ये च त्वा मत्प्रभावशा प्रणमिप्यन्ति मानवा ।
तेपा न दुर्लभ किञ्चित्पुरतो घनतोऽपि वा ।।५३
कान्तारेपरसन्नाना मग्नाना च महार्णवे।
दस्युभिर्वा निरताना त्व गति परमा नृणाम् ।।५४
तुम्हारे वरदान से प्राणियो की मनेच्छाएं पूर्ण होगी और मनेच्चित रूप
परिवर्तन करके समस्त लोगो में विचरण करोगी ॥५०॥ विध्याचल पर निवास
करने वाले शुम्म-निशुम्म नामक दो विकराल असुरों को तुम मेरा ध्यान करके
समूल समन कर दोगी ॥५१॥ तत्पश्चात् अमिप और यलि तुम्हें प्रिय लगेंगी और
भूत प्रेतो को रग लेकर विचरण करोगो एव मनुष्य प्रत्येक नवमी को तुम्हें
बलि समर्पित करके तुम्हारी वर्चना परेंगे ॥५२॥ मेरे प्रभाव को जानने वाले
जो मनुप्य तुम्हारी पूजा करेंगे, वे धन सम्पत्ति एव पुनादि सर्व सुख प्राप्त करेंगे
॥६३।। कोई भी मनुष्य किमी भी विपत्ति म क्यों न हो, चाहे वन में रास्ता
भूल गया हो, विशाल समुद्र की लहरो में फंस गया हो अथवा दत्त्युओ के कब्जे
में हो, वह जैसे ही तुम्हारा ध्यान करेगा, तुरन्त उसका सक्ट दूर हो
जायगा ॥५४॥
२५० ] [ श्री हरिवरा । भगवान् कृष्ण का जन्म ।। कृते गर्भविधाने तु देवकी देवतोपमा । जग्राह सप्त तान्ग न्ययावत्समुदाहृतान् ।।१ षड्गर्भान्नि सृतान्कसस्ताजघान शिलातले । आपन्न सप्तम गर्भ सा निनायाथ रोहिणीम् ॥२ सार्द्धरात्रे स्थित गर्भ पातयन्ती रजस्वला । निद्रया सहसाऽऽविष्टा पपात धरणीतले । ३ सा स्वप्नमिव त दृष्ट्वा स्वे गर्भे गर्भमादधत् । अपश्यन्ती च त गर्भ मुहूर्त व्यथिताऽभवत् ॥४ तामाह निद्रासविग्ना नैशे तमसि रोहिणीम् । रोहिणीमिव सोमस्य वसुदेवस्य धीमत. ॥५ कर्पणेनास्थ गर्भस्य स्वगर्भे चाहितस्य वै । सकर्षणो नाम सुत शुभे तव भविष्यति ॥६ सा त पुत्रमवाप्यव हृष्टा किञ्चिदवाड्मुखी। विवेश रोहिणी वेश्म सुप्रभा रोहिणी यथा ७ तस्य गर्भस्य मार्गेण गर्भमाधत्त देवकी। यदर्थ सप्त ते गर्भा क्सेन विनिपातिता ।। वैशम्पायन जी ने कहा-ह नृप । जैसा मैंने पहले वर्णन किया, उस प्रकार देवको के गर्भ स्थिति प्रारम हुई और जैसे-जैसे उसके गर्भ से शिशु जन्म लेते थे, वैसे-वैसे क्स इन्ह पृपिवी पर पटक-पटर पर वध वर देता था। इस प्रभार देवको घे जन सातवी वार गर्भ स्थिति हुई उ7 रामय योगमाग ने अपनी मापाशक्ति द्वारा देसी र गर्भ को रोहिणी वे गर्भ में स्थित कर दिया ॥१२॥ इसमे अचं रात्रि पान में रजस्वला देययी वा गभपात हो गया। देववी निद्रा से मोहित होरर पृथिवी पर लेट गयी ॥३॥ और योगमायरा को माया पा उन्हें मान न हो गया। उन्ह एक स्वप्नमात्र अनुभूति हुई कि उन्होंने गर्भ धारण किया धौर वह गिर भी गया । इस कारण वुद समय उरे वेदना अवश्य हुई ॥४॥ उम पोर माधाामयी रात्रि में पन्द पत्नी रोहिणी के सहा मुन्दर रोहितो से भगवान् कृष्ण का जन्म ] [ २५१ योगमाया बोली, मैंने देवकी का गर्भ तुम्हारे गर्भ में प्रविष्ट कर दिया है, अनुएव इस गर्भ सदमरण से जो पुत्र तुम्हारे जन्म लेगा, उमका नाम सकर्षण होगा ।।६।। इस प्रकार कुछ समय व्यतीत होने पर रोहिणी के पुत्र-जन्म हुआ। रोहिणी को पुत्र-प्राप्ति के कारण बहुत हर्ष या और हपित होती हुई रोहिणी ने जन अपने शिशु सहित अपने गृह मे प्रविष्ट हुई, उस समय उमकी शोमा ऐसी लग रही थी कि मानो चन्द्र-पत्नी रोहिणी अपने पुत्र दुध को लेकर प्रविष्ट हुई हो ॥७॥ इधर कस ने देवकी के सप्तम गर्भ की खोज प्रारम्भ पराई और इसी अवधि में देवकी को पुन बाठवी बार गर्भ स्थिति हो गई ।। तु गर्भ प्रयत्नेन ररक्षुस्तस्य मन्त्रिण । सोऽप्यन गर्भवसती वसत्यात्मेच्छया हरि ।। यशोदाऽपि समाधत्त गर्भ तदहरेव तु । विष्णो शरीरजा निद्रा विष्णुनिर्देशकारिणीम् ।।१० गर्भकाले त्वमपूर्णे जप्टमे मासि ते स्त्रियो। देवकी च यशोदा च मुपुवाते सम तत ॥११ यामेव रजनी कृष्णो जज्ञे वृष्णिकुलोद्यह. । तामेव रजनी कन्या यशोदापि व्यजायत ।।१२ नन्दगोपस्य भार्यका वसुदेवस्य चापरा । तुल्यकाल च गर्मिण्यो यशोदा देवकी तथा ॥१३ देवक्यजनयद्विष्णु यशोदा ता तु दारिकाम् । मुर्तेऽभिजिति प्राप्ते सार्द्ध राने विभूपिते ।।१४ भर तक देवकी के सात गर्भो को नष्ट किया जा चुका था। उसी उद्देश्य को पूर्ति के लिए क्स के मन्त्री व रासेवको द्वारा देवकी के अप्टम गर्भ की देख-रेख की जा रही थी। गिर स्वय भगवान् विष्णु स्वेच्छा से देवकी के गर्भ मे आये ॥६॥ और उधर भगवान् विष्णु की शरीर निद्रादेवी भगवान विष्णु के निर्देश के अनुमार यशोदा के गर्भ में प्रवेश कर गई ॥१०॥ इस प्रकार प्रसव की अवधि पूर्ण होने पर आठवें महीने म इधर देवकी ने पुत्र और यगोदा ने कन्या को एक साथ जन्म दिया ॥११॥ इम पकार जिस रात्रि मे भगवान् विष्णु ने २५२ ] [ श्री हरिवंश पुराण वृष्णिकुल मे जन्म लिया, उसी रात्रि गोपराज नन्द की पत्नी यशोदा ने भी एके कन्या को जन्म दिया ॥१२॥ चूकि नन्द गोप की भार्या यशोदा और वसुदेव की भार्या देवकी एक साथ गर्भवती हुई थी ॥१३॥ इसलिए उस अभिजित् नक्षत्र में अर्धरात्रि काल मे उन दोनो के पुत्र एव कन्या उत्पन्न हुए ॥१४॥ सागराः समकम्पन्त चेलुश्च धरणीधरा । जज्वलुश्चाग्नयः शान्ता जायमाने जनार्दने ॥१५ शिवाश्च प्रवर्वाताः प्रशान्तमभवद्रजः । ज्योतीष्यतिव्यकाशन्त जायमाने जनार्दने ॥१६ अभिजिन्नाम नक्षतं जायन्ती नाम शर्वरी। मुहूर्तो विजयो नाम यत्र जातो जनार्दन । अव्यक्त. शाश्वत सूक्ष्मो हरिनारायण प्रभु. ॥१७ जायमानो हि भगवान्नयनर्मोहयन्प्रभुः । अनाहता दुन्दुभयो देवानां प्राणदन्दिवि ॥१८ आकाशात्पुप्पवृष्टि च ववर्ष त्रिदशेश्वरः । गीभिमंगलयुक्ताभिः स्तुवन्तो मधुसूदनम् ॥१६ महपंय. सगन्धर्वा उपतस्थु सहाप्सराः । जायमाने हृषीकेशे प्रहृष्टमभवज्जगत् ॥२० इन्द्रश्च निदर्शः साद तुष्टाव मधुसूदनम् । वसुदेवश्च त राम्रो जात पुसमधोक्षजम् ।।२१ श्रीवत्सलक्षण दृष्ट्वा युतं दिव्यश्च लक्षणे । उवाच वसुदेवस्तु रूप संहर वै प्रभो ॥२२ गीतोन्ह देव पासस्य तस्मादेव प्रवीम्यहम् । मम पुत्रा हतास्तेन तव ज्येष्ठाम्बुजेक्षण ॥२३ भगवान् गा से ही जन्म हुआ वैसे गमरत भूमण्डल में उथल-गुपत होने मगी, समुद्र उपहने एगा, पर हिसने लगे और अग्नि भी पपाने सगी ॥१॥ बानन्ददायक बात वेगवती हो गई, भूम गुम्बार शान्त हो गये और मात्र एकसम पारने पो ॥१॥ मगवान् रे जन्म के समय अभिनित मात्र, जगातीनामर भगवान् कृष्ण का जन्म ] [ २५३ रात्रि और विजय नामक मुर्त था । उन अन्यक्त, शाश्वत और सूक्ष्म हरि- रायण प्रभु ॥१७॥ के जन्म लत ही दवताओ ने स्वर्ग वाद्य बजाने प्रारम्भ र दिये ।।१८। सुररान इन्द्र अपने लोग स उन पर पुष्प वरसाने लगे । मगल- रय वाक्यों के उच्चारण द्वारा मुरगण, मुनिगण, गन्धर्व व उप्सराए उनकी पाराधना करने लगे। उनम पान नही समस्त भूनल वानन्दित हो उठा ।।१६- २०॥ देवश्वर इन्द्र भी अपन दवताओ महित भगवान् की स्तुति करन लगे। उस अधकारमयी रात्रि के समय श्रीवत्पुलक्षण एव उत्तम लक्षण युक्त उन भगवान् के रूप को विलोक् वमुदेव वोन-हे प्रभो ! आप अपने इस रूप को उपरित कीलिए । मुथे क्स से बहुत मय है। उसन आपसे बढे मेरे कई पुत्रा का वध कर डाला है ॥२१२३।। वसुदेववच थु त्वा स्प चाहरदच्युत । अनुज्ञाप्य पितृत्वेन नन्दगोपगृह नय ॥२४ वसुदेवस्तु सगृह्य दारक क्षिप्रमेव च । यशोदाया गृह रात्री विवेश सुतवत्सल ॥२५ यशोदायाम्त्वविज्ञातम्तन निक्षिप्य दारकम् । प्रगृह्य दारिका चैव देवत्रीशयने न्यमत् ॥२६ परिवर्ते कृते ताभ्या गर्माभ्या भयविक्लव । वसुदेव कृतार्यों के निर्जगाम निवेशनात् ।।२७ उग्रसेनसुतायाय कमायानकदुन्दुभि । निवेदयामाम तदा ता कन्या वरवणिनीम् ॥१८ वैगम्पायन जी दोन-हे महाराज | वसुदव की प्रार्थना पर भगवान् ने अपना वह अनौवित्र स्प सवरित कर लिया और फिर उन्होंने वसुदेव से कहा- है पिताजी । आप यहां से मुये गोपरान नद वे यहाँ ले चलिये ॥२४॥ भगवान् को ऐमी गाना सुन वमुदव तुरन्त ही दालक को लेकर रात्रि में ही यशोदा के पर पहुंचे ॥२॥ दवको को इस सब बात का ज्ञान भी नहीं था और वे अपने बालक को यशोदा र निकट लिटाबर और यशोदा की कन्या को लेकर चल पडे।
२५४ ] [ श्री हरिवंशपुराण यद्यपि देवकी और यशोदा के गर्भो मा परिवर्तन करके वसुदेव भयभीत थे फिर भी अपने को कृतार्थ मानकर ये न द भवन वे बाहर आये और मथुरा पहुंचे ॥२६-२७।। फिर वसुदेव ने उग्रसेन तनय कस देवकी के कन्या उत्पन्न होने का सन्देश भेजा ॥२८॥ तच्छ् त्वा त्वरित कसो रक्षिभि सह वेगिभि. 1 आजगाम गृहद्वार वसुदेवस्य वीर्यवान् ।।२६ स तन लरित द्वारि कि जातमिति चाब्रवीत् । दीयता शीघ्रमित्येव वाग्भि समभितर्जयन् ॥३० ततो हाहाकृता सर्वा देवकोभवने स्त्रिय । उवाच देवकी दीना वागद्गदया गिरा ॥३१ दारिका तु प्रजातेति कस सममियाचती। श्रीमन्तो मे हता सप्त पुत्रगर्भास्त्वया विभो ॥३२ दारिकेय हतैवैषा पश्यस्व यदि मन्यसे । दृष्ट्वा कसस्तु ता कन्यामाकृष्य तामुदायत ॥३३ हतवैषा यदा कन्या जातेत्युक्त्वा वृथामति । सा गर्भशयने क्लिष्टा गर्भाम्बुक्लिन्नमूर्द्ध जा ॥३४ कसस्य पुरतो न्यस्ता पृथिव्या पृथिवीसमा। स चैना गृह्य पुरुष समाविध्यावधूय च ॥३५ उद्यच्छन्नेव सहसा शिलाया समपोथयत् । सावऽधूता शिलापृष्ठेऽनिपिप्टा दिवमुत्पतत् ॥३६ जन्म का समाचार मुनते ही कस अपन सेवयो सहित तेजी से वहां पहुंच ॥२६॥ वसुदेव और देवकी को डराकर उसने कहा--जो कुछ उत्पन्न हुआ है उसे तुरन्त मेरे पास लामो ॥३०॥स के ऐसे आदेश को सुनकर देवकी में अत पुर यी स्त्रियाँ चीरवार कर उठी और देवको ने विदारक स्वर वहा ॥३१॥ राजन् ! अव मेरे पन्या उत्पन्न हुई है। अब तक तुमने मेरे सा पुत्रों का वध कर डाला तो यह पन्या सो वैसे ही मरी-मी है। स्वय तुम दे। लो ॥३३.३३॥ ऐशह देवकी ने उस गर्भविलप्टा कन्या को पस मे भा i भगवान कृष्ण का जन्म ] [ २५५ सृथिवी पर लाकर लिटा दिया। फिर हर्षित होत हुए कस ने कहा-“वाउद में यह पन्या तो मर ही चुकी है" और यह कर उसने कन्या के पैर पक्ड कर, घुमा कर उन पृथिवी पर द मारा ||३४ ३६॥ हित्वा गर्भतनु सा तु मला मुक्तमूर्द्धजा। जगाम ममादिश्य दिवनगनुलेपना ।।३७ हारशोभितमर्वाही मुकुटोज्ज्वलपिता। क्वंव माऽभवन्नित्य दिव्या देवैरमिष्टुता ॥३८ नीलपीताम्बरधरा गजकुम्नोपमम्ननी । रथविस्तीर्णजयना चन्द्रवक्ता चतुर्भुजा ॥३६ विद्यु द्विस्सष्टयामा वाला महशेक्षगा । पयोधरम्तनवती सध्येव नपयोग ॥४० साव निशि तमोग्रस्त वमी भूतगणाकुले । नृत्यती हमती चव विपरीतेन भास्वती ॥४१ विहायमि गता रौद्रा पपी पानमनुतमम् । जहास च महाहास कम च पिताजवीत् ॥४२ जैम ही कन ने कन्या का पृथिवी पर पटका, दम ही वह कन्या अपना कलवर त्याग कर आकाश मे उह गई। इस ममय उसके केश फैले हुए और उमकी दह श्रेप्ट हार एव दिर चन्दन स मुशोभित यी ॥३७॥ उसके सम्पूर्ण अगों पर मालाए मुशोभित थी । अदभुत मुकुट मस्तक पर धारण था। ऐसा देख समस्त मुरगरा उसकी प्रार्थना करने लगे ॥३८॥ उस कन्या ने नील एव पीत वरण के परिधान धारण कर रहे थे। हायी के मस्तक महा उमरे हुए उसके रतन ये और रय जैसा विशाल उमरा जघन प्रदेश था। उसका मुख चन्द्रमा के समान स्पवान था एव उमकी चार भुजाए यी ॥३३॥ उसक शरीर की आमा दमकती विद्युत् के सदृश थी एव उपावातीन सूर्य के समान रक्त वर्ण उसक नेत्र थे । सायकाल की मेघयुक्त सध्या के समान उसके पयोपर ये ॥४०॥ भूत प्रेता सहित उस घोर अधकारमया यात्र में वह बारबार नावठी, हसता २५६ ] [ श्री हरिवशपुराण और आकाश मे विचरती हुई मदिरा पान करने लगी। फिर भयानक अदास सहित क्रोधित स्वर मे कस मे उसने कहा ।।४१-४२।। कस क्स विनाशाय यदह धातिता त्वया । सहसा च समुत्क्षिप्य शिलायामभिपोथिता ।।४३ तस्मात्तवान्तकालेऽह कृष्यमाणस्य शत्रुणा। पाटयित्वा करैदेहमुष्ण पास्यामि शोणितम् ।।४४ एवमुक्त्वा वचो घोर सा यथेष्टेन वर्मना। ख सा देवालय देवी सगणा विचचार ह ॥४५ सा कन्या ववृधे तन वृष्णिसघसुपूजिता । पुत्रवत्पाल्यमाना सा वसुदेवाज्ञया तदा ॥४६ विद्धि चैनामथो पन्नामशाद्देवी प्रजापते । एकानशा योगकन्या रक्षार्थ केशवस्य तु ॥४७ ता वै सर्वे सुमनस पूजयन्ति स्म यादवा । देववद्दिव्यवपुषा कुष्ण सरक्षितो यया ॥४८ तस्या गताया कसस्तु ता मेने मृत्युमात्मन । विविक्ते देवकी चैव वीडित समभाषत ॥४६ मृत्यो स्वसु कृतो यलस्तव गर्भा मया हता । अन्य एवान्यतो देवि मम मृत्युरुपस्थित ॥५० हे पापी कस ' मेरा वध करने हेतु तूने मुझे पृथिवी पर पटका ॥४३॥ जब तेरा मृत्युकाल आयेगा, उस समय तेरे शत्रु तुझे पकड कर घसीटेंगे और उस समय में अपने हाथो से तेरे शरीर को चीरकर तेरा रुधिर पान करूंगी ॥४४॥ हे नृप ! वस से इस प्रकार क्रोधपूर्वक वचन कहकर वह पन्या अपने भूत प्रेता सहित आकार मडल म विचरने लगी ॥४५॥ इसके पश्चात् भगवान् विष्णु के निर्देशानुगार वृष्णिवशियो के घर म पुत्र समान बडे प्रयल के साथ उसका पालन पोषण हुआ तो वह बढने लगी ॥४६॥ वह व या भगवान् प्रजा. पति के 7 से उत्पन्न थी। इसलिए सभी यादव लोग भगवान कृष्ण की xिaxe HinBHो ..... गाय मात मद्भुत -- .
r भगवान कृष्ण का जन्म ] [ २५७ देहधारिशी वह कन्या जब कृष्ण भगवान् की रक्षा करके चली गई, तव कस वडा लज्जित हुआ और अकेले मे देवकी से बोला-"देवकी वहिन | मैंने अपनी मृत्यु के भय मे तुम्हारे अनेक पुत्रा का वध कर डाला, लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी मृत्यु का कारण कोई अन्य ध्यक्ति ही बोगा ।।४८-५०॥ नैराश्येन कृतो यल स्वजने प्रहृन मया । देव पुरुषकारेण न चातिक्रान्तवानहम् ॥५१ त्यज गर्भकृता चिन्ता सताप पुनज त्यज । हेतुभूतस्त्वह तेपा सति कालविपर्यये ।।५२ काल एव नृणा शनु कालश्च परिणामक । कालो नयति सर्वं वै हेतुभूतस्तु मद्विध ॥५३ आगमिष्यन्ति वैदेवि यथाभाममुपद्रवा । इद तु कष्ट यज्जन्तु कर्ताऽहमिति मन्यते ।।५४ मा कार्की पुनजा चिन्ता विलाप शोज त्यज । एव प्रायो नृणा योनिर्नास्ति कालस्य सस्थिति ॥५५ एप ते पादयो । पुत्रवत्तव देवकि । मद्गतस्त्यज्यता रोपो जानाम्यपकृत त्वयि ॥५६ दुख प्रकट करते हुए कहा-मैं बडा निर्दयी हूं और मैंने अपने प्रियो का ही शमन रिया, फिर भी विधि ने जो भाग्य म लिख दिया उसे मैं विसी प्रकार भी परिवर्तित नहीं कर सका ॥५१॥ हे सती ! तुम्ह अब पुत्रों के वध के विषय मे सभी चिन्ना और स ताप त्याग देना चाहिए । विधि के विधान के कारण ही मैंने उनका वध विया ॥५२॥ यदि तुम इस पर गहन विचार करो तो तुम्हे प्रतीत होगा कि मैं तो विधि र विधान का निमित्त मात्र है। समय ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और वही उमका बिनाशक है ॥५३॥ जो होना होता है, वह अवश्य होता है । लेकिन सनाप तो यह है कि देव के विधान का मनुष्य स्वय ही कर्ता बन जाता है ॥५४॥ इसलिए तुम्हें पुत्रों सपी चिन्ता त्यागार यह शोरपूर्ण रदन बन्द कर देना चाहिए । मनुष्यों की गति कसने ।
J
[ श्री हरिवशपुराण
ही ऐसी है, वह काल को जीत नहीं सकता ||५|| हे बहिन ! एव पुत्रवन में/
तुम्हारे चरणों मे शीश नवाता हूँ, तुम्हे मेरे ऊपर से क्रोध का त्यागकर देना
चाहिए । मैंने तुम्हारा वडा अपकार किया है ।।५६।।
इत्युक्तवन्त कस सा देवकी वाक्यमब्रवीत् ।
साधु पूर्णमुखा दीना भर्तारमुपवीक्षती
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्सेति कस मातेर जल्पती ।।५७
ममाग्रतो हता गर्भा ये वया कालरूपिणा।
कारण तत्र वै पुत्र कृतान्तान्नोऽप्यन कारणम् ।।१८
गर्भ कृन्तनमेतन्मे सहनीय त्वया कृतम् ।
पादयो पतता मूर्ना स्व च कर्म जुगुप्सता ॥५८
गर्भे तु नियतो मृत्यु ल्येऽपि न निवर्तते ।
युवाऽपि मृत्योर्वशग स्थविरो मृत एव तु ॥६०
कालभूतमिद सर्व हेतुभूतस्तु त्वद्विध ।
अजाते दर्शन नास्ति यया वायुस्तथैव च ॥६१
जातोऽप्यजातता याति विधाना यत्र नीयते ।
तद्गच्छ पुप्त मा ते भून्मद्गत मृत्युकारणम् ॥६२
मृत्युनाऽपहृते पूर्व शेषो हेतु प्रवर्तते ।
विधिना पूर्वदृष्टेन प्रजासर्गेण तत्त्वत ॥६३
मातापित्रोस्तु कार्येण जन्मतस्तूपपद्यते ।
निशम्य देवकीवाक्य स कस स्व निवेशनम् ॥६४
प्रविवेश स सरब्धो दह्यमानेन चेतसा ।
कृत्ये प्रतिहते दोनो जगाम विमना भृशम् ॥६५
पर को अपने घरणों म पहा इस प्रभार सताए बरते देखकर देवकी री
आखों में और उमड आय, वह अपने पति वसुदेव की ओर विलोपवर एक
पो माति दवित हदप से पा से बोली-हे वरस ! उठो । तुमने जो मेरे पुत्र,
मावरिया, उपके कारण तुम नहीं हो, इसका प्रमुग कारण दास हो ।
॥५७ ५८॥ र जयदि हमरे लिए तुम मेरे परणों में गापा टेकार इस प्रकार
श्रीकृष्ण की ब्रज-यात्रा ] [ २५६ क्षेत्र होकर खेद प्रकट कर रहे हो, इसलिए मैं तुम्हें क्षमा करती हूँ ॥५६ भ, बाल्यावस्था, यौवनावस्था अथवा वार्धक्य कोई भी स्थिति क्यों न हो, किन काल की गति नहीं रुकती ॥६०॥ देवको ने पुन: कहा- ऐसा समय वल काल के वशीभूत होकर ही आता है । काल का जो कार्य होना था, 'सके तुम निमित्त मात्र हो । पुन का जन्म न हो तो यह सन्तोष रहता है कि त्पन्न हो नहीं हुआ, किन्तु जन्म हो और उसके पश्चात् वह न रह पाये तो हि ईश्वर की कृपा पर आधारित है। विधाता प्राणी को अपनी इच्छा के नुमार जहाँ चाहता है, ले जाता है। इसलिए है वत्स ! अब तुम जानो और रह भूल जाओ कि मुझे तुम पर कोई कोप है ॥६१-६२।। जिमको जाना होता । वह मृत्यु को अवश्य प्राप्त करता है, उसके पश्चात् उसका केवल अवशिष्ट PP रह जाता है ।।६३।। अनेक जन्मो के पाप-दोप, मां-बाप के दोष और जन्म पो के कारण जीव को मृत्यु प्राप्त होती है । इसमे तुम्हारा कोई दोष नहीं 11 इस प्रकार देवकी के सात्वनापूर्ण वचन सुनकर कम अपने अन्त.पुर वला या ॥६४॥ किन्तु उसके मतेचिटक उद्देश्य की पूर्ति मे जो वाधा पड़ गई थी, 'ससे उसे चिन्ता रूपी अग्नि जला रही थी ॥६५॥ ॥ श्रीकृष्ण की ब्रज-यात्रा ।। प्रागेव वसुदेवस्तु बजे शुधाव रोहिणीम् । जिाता पुत्रमेवाग्ने चन्द्राकान्ततराननम् ॥१ निन्दगोपं त्वरितः प्रोवाच शुभया गिरा। गच्छानया सहैव त्व अजमेव यशोदया ॥२ तत्र तो दारको गत्वा जातकर्मादिभिर्गुण. । योजयित्वा वजे तात सवर्द्ध य यथासुखम् ॥३ रोहिणेयं च पुत्र मे परिरक्ष शिशुव्रजे । अह वाच्यो भविष्यामि पितृपक्षेषु पुषिणाम् ॥४ योऽहमेकस्य पुत्रस्य न पश्यामि शिशोमुखम् । हियते हि वलात्प्रज्ञा प्राज्ञस्यापि सतो मम ॥५
२६. ]
[ श्री हरिवशपुरान
अस्मादि मे भयं कंसान्निघृणाद्वं शिशोवंधे।
तद्यथा रोहिणेय त्व नन्दगोप ममात्मजम् । ६
गोपायसि यथा तात तत्त्वान्वेपो तथा दुरु।
विघ्ना हि वहवो लोके वालानुप्रासयन्ति हि १७
वैशम्पायन ने कहा हे नृप । देवकी द्वारा जन्म दिये जाने से पूर्व ही
वसुदेव ने अपनी दूसरी पली रोहिणी को गोपराज नन्द के यहाँ भेज दिया था।
ततश्चात् उनको समाचार मिला था कि रोहिणी की कोख से चन्द्रमा के सदृश
सुन्दर मुख वाले बालक ने जन्म लिया है ।॥१॥ गोरराज नन्द माना वार्षिक कर
चुकाने के लिये अपने पुत्र व परती सहित मथुरा आये थे, तब यह सुनकर वसुदेव
उनसे भेट करने पहुंचे और नन्द से उन्होने कहा---गोपराज ! व्रज में तुरन्त
वापिस पहुँचकर आप उन दोनो बालको का जातकर्म सस्कार आदि सम्प
करके उनका पोषण करें ॥२-३॥ जिस प्रकार यशोदा के पुत्र का पालन हो
ठीक उसी प्रकार रोहिणी के पुत्र का पालन होना चाहिए, क्योकि रोहिणी
पुत्र से ही मैं संसार की दृष्टि में पुषवान् कहलाऊंगा ॥४॥ मैंने अभी तक अप
पुत्र का मुख भी नहीं देखा है। कम की निर्दयता और उसके द्वारा निरन्त
शिशुओ का वध किये जाने से मैं विज्ञ होकर भी मन्द बुद्धि हो गया है। इसलिए
विशेष सावधानी सहित यशोदा व रोहिणी दोनों के बालको की रक्षा करें जो
उनका पालन करें। चूकि उन बालको पर अनेकों प्रकार के सकर आ रहे है
॥५-६-७॥
स च पुत्रो मम ज्यायान्कनीयाश्च तवाप्ययम् ।
उमावपि सम नाम्ना निरीक्षस्व यथासुखम् ॥
वर्द्ध मानावुभावेतो समानवयसो यथा।
शोभेता गोबजे तस्मिन्नन्दगोप तथा कुरु ॥६
बाल्ये केलिकिल. सर्वो बाल्ये मुह्यति मानवः ।
बाल्ये चण्डतमः सर्वस्तत्र यलपरी भव ||१०
न च वृन्दावने कार्यों गवा घोप: क्थवन ।
भेतव्य तम वसता फेशिन, पापदशिन ॥११
श्रीगण को व्रज-याया ]
[ २६१
सरीसृपेन्य कोटेम्य शकुनिम्यस्तथैव च ।
गोप्ठेषु गोभ्यो वत्सेभ्यो रक्ष्या ते द्वाविमो शिगू॥१२
नन्दगोप गता रात्रि शीघ्रयानो व्रजाशुग ।
इमे त्वा व्याहरन्तीव पक्षिण सव्यदक्षिणम् ।।१३
रहस्य वसुदेवेन सोऽनुज्ञातो महात्मना ।
यान यशोदया सार्द्ध मारुरोह मुदाचित ॥१४
कुमारस्कन्यवाह्याया शिपिकाया समाहित ।
सवेशयामास शिशु शयनीय महामति. ॥१५
आपका पुन ज्येष्ठ है और मेरा पुत्र छोटा है। फिर भी उन दोनों को
गमग बरायर की आयु है, उसी प्रकार उनके नामवरण का प्रयत्न करिएगा
८॥ हे सखे । आप ऐसा प्रपल हो कि ये दोनो समान आयु वाले बालक
गायो के शुण्ड साय लेकर क्रीडा करें और विचरें | बाल्यकाल मे अधिकतर
भी प्राणी स्वेच्छाचारी व उद्दण्ड स्वभाव के होते हैं, इस विषय में आप विशेप
तक रहें ।।१०।। दृदावन मे गोपो का निवास स्थान न बनवाइवेगा । योनि
रेशी नामक राक्षस, अनेर प्रकार सर्प और हिमर पशु पक्षियो का वा भय है।
अपने गोप्ठ में भी गायों और उनके बछडो को बचाते रहे ॥११ १२।। वसुदेव
ने कहा-मये नन्द । रानि समाप्त हो चुकी है, प्रम्यान को शीघ्रता करिये।
एमा प्रतीत होता है कि बहुतेरे पक्षी आपने इपर-उधर चकार लगा लगा रहे
हो ॥१॥ हे भूपते । महान् आत्मा वसुदेव के मुप से ऐमे रहस्यपूर्ण वरन
मुनपर नद गोपराज सायपान हो गये और फिर नन्द ने वसुदेव से विदा मांगी,
तत्पश्चात् यशोदा सहित अपनी पालकी मे बैठ गये और साथ उन्होंने अपने पुत्र
को भी उसमे विटा लिया ॥१४-१५॥
जगाम च विविक्नेन शीतलानिनमपिणा।
बहदकेन मार्गेण यमुनातीग्गामिना ।।१६
सन्ददर्श शुभे देशे गोवर्द्धनसमोरगे।
यमुनातीरमवद्धनीतमारतीयतम् ।
२६२ ] [ श्री हरिवरपुराण विस्तश्वापद रम्यं लतावल्लीमहाद्रुमम् । गोभिस्तृणविलग्नाभिः स्यन्दतीभिरलड्कृतम् ।।१८ समप्रचार च गवां समतीर्थजलाशयम् । वृषाणा स्कन्धधातश्च विपाणोद्धृष्टपादपम् ।।१६ भामामिपादानुसृत श्येनश्चामिपगृध्नुभिः । शृगालमृगसिहैश्च वसामेदाशिमिवृतम् ॥२० शार्दूलशब्दाभिरुत कानापक्षिसमाकुनम् । स्वादुवृक्षफल रम्य पर्याप्ततृणवीरुधम् ॥२१ इसके उपरान्त वे यमुना के किनारे-किनारे एकान्त एवं अधिक जलपूर्ण मार्ग से चले । उम काल प्रभातकालीन मन्द शीतल बायु बह रहा था ॥१६॥ आगे बढने पर उन्हें गो व्रज दिखाई पड़ने लगा, जो कि हिमक पशुओ से श था । यह मनोरम प्रदेश गोवर्धन पर्वत के निकट एव यमुना के किनारे स्थि था और उस स्थान पर शीतल व मन्द वायु बह रहा था ॥१७ : उम मनोर प्रदेश की शोभा विभिन्न प्रकार के लता, कुज और वृक्ष समूहो से थो । अर्ने दुधार गौएँ वहाँ घाम चर रही थी ॥१८॥ वह एक समतल भूमि थी ज गौए सुविधापूर्वक चर सकती थी और वहाँ अत्यन्त सुन्दर तालाब भी थे साड़ी के कन्धो को रगड तथा सीगो के प्रहार से अनेक वृक्षो की छाल छि गई थी ॥१६॥ ऐसा मनोरम वन प्रदेश गृह, बाज, शृगाल, मृग और सिंह आ मांसाहारी वन पशुओं को शरण दिये हुए था ॥२०॥ वहां हर समय सिंहो। गर्जन का घोर शब्द होता रहता था। अनेक प्रकार के पखेरू वहाँ सद विवरण करते रहते थे। स्वादिष्ट व मधुर फलो पा बाहुल्य या । घास यहुत थी ॥२१॥ गोवजं गोस्त रम्य गोपनारीभिरावृतम् । हम्भारवंश्च यत्मानां सर्वत. वृतनिस्वनम् ॥२२ शाटावर्तविपुल कण्टकोवाटसंकुलम् । पर्यन्तेष्वायत वन्यहदि पतितहूँ मैः ।।२३
श्रीकृष्ण को ग्रज-यात्रा ]
[ २६३
वत्साना रोपित कोलैर्दामभिश्च विभूपितम् ।
करोपाकीगंवसुध कटच्छन्नमुटीमठम् ॥२४
क्षेम्यप्रचारवहुल हृष्टपुष्ट जनावृतम् ।
दामनीपाश बहुल गर्गरोद्गारनिस्वनम् ॥२५
तकनि मावबहुल दधिमण्डा मृत्तिाम् ।
मन्यानवलयोद्गारंगोपीना जनितस्पनम् ॥२६
काकपक्षधरैलिंर्गोपाल कीटनाकुलम् ।
सार्गलद्वारगोवाटमध्ये गोस्थानसकुलम् ।।२७
सपिपा पच्यमानेन सुरभीकृतमात्तम् ।
नीलपीताम्बराभिश्च तरुणोमिरलवृतम् ।।२८
वहाँ मनगिनत गोपियाँ दिखाई पडनी थी और हर दिशा में गोओ का
पद गजना था । और हर तरफ से गोमो के बछडो की हम्मा मन्द ध्वनि
गूजती थी ।।२२।। अनेनों बैलगाडियां गोलाकार करके खडी थी। जगह-जगह
पर बांटो मे या मार्ग स्थित था, जिनके किनारे अनेक जङ्गली वृक्ष भी गिरे
पडे थे ॥२३।। कई स्थानो पर बछडो के बारने के लिए रस्मी सहित खूटे गढ़े
पटे थे। कई स्थानो पर उपले का चूरा फंना पहा था । और उस स्थान के
राभी पर और मठ पूम मे छाये हुए थे ॥२४॥ अवमर उम स्थान पर अच्छे-
यच्छे सनिा आया जाया करते थे। उस स्थान के सभी प्राणी स्वस्थ और
हृष्ट-पुष्ट थे । किमी किमी स्थान पर मोरी रस्मियां भी पड़ी हुई थी और
कही-कही गोपियो द्वारा दही मथने ममय उनके हाथो के आभूषणो की ध्वनि
मुनाई देती थी ।२५।। स्थान स्थान पर दही व मटठा गिरने के कारण वहां की
मिट्टी जमीन पर गीली हो गई ॥२६॥ जो गोपो के बालक वहां सेल रहे थे
उनकी बडी-बडी शिखायें थी। गायो के सभी बाहो का द्वार बन्द था और
उनमे गोओ को रखने के लिए सभी प्रकार की सुविधाएं विद्यमान थी॥२७।।
वहाँ वातावरण मे चारो तरफ से परे हुए घी की सुगन्धि आ रही थी । समी
तरफ नीते-पीले रङ्ग की पोशाक धारण करके युवा स्नियाँ दृष्टिगत हो रही
।
-
थो ॥२८॥
२६४ ] [ श्री हरिवशपुराण वन्यपुष्पारतसाभिर्गापक-याभिरावृतम् । शिरोभिधृतकुम्भाभिवंर्तरग्रस्तनाम्बरं ॥२६ यमुनातीरमार्गेण जलहारीभिरावृतम् । स तत्र प्रविशन्हृष्टो गोग्रज गोपनादितम् ॥३० प्रत्युद्गती गोपवृद्ध स्त्रीभिर्वृद्धाभिरेव च । निवेश रोचयामास परिवृत्त सुखाश्रये ॥३१ सा यत्र रोहिणी देवी वसुदेवसुखावहा । तत्र त बालसूर्याभ कृष्ण गूढ न्यवेशयत् ॥३२ वे गोपियाँ अगिया और साडी पहने हुए और पुष्पो के आभूषण पहनकर जलपूर्ण घडे को अपने सिर पर रखकर एक पक्ति में चल रही थी। उस गो-व्रज मे प्रवेश करते ही गोपराज नद अपने गोपगणों के साथ मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥२६-३०॥ गोपरा नद को आता देखकर उस तरफ बढे कर बूढी गोपियो और वृद्ध गोपो ने स्वागत किया। इसके उपरान नद को शक्ट आदि से परिवृत करके एक सुखदायी और सुविधापूर्ण स्थान पर बैठाया ॥३१॥ तत्पश्चात् नन्द वसुदेव की पत्नी राहिणी के निकट गये, जहाँ पहुँच कर उन्होने रोहिणी को नवोदित सूर्य के सदृश तेजस्वी कृष्ण को दे दिया ॥३२॥ ।। श्रीकृष्ण द्वारा शकटासुर-वध ।। तत्र तस्यासत काल सुमहानत्यवत्तंत । गोयजे नन्दगोपस्य बल्लयत्व प्रार्वत ॥१ दारको वृतनामानी ववृधाते सुरा च तो। ज्येष्ठ मपंणो नाम क्नीयान्वृष्ण एव तु ॥२ मेघष्णस्तु रणोऽभूदेहान्तरगतो हरि । व्यवधंत गवा मध्ये सागरस्य इवायुद ||३ भक्टस्य वध सुप्न पदाचित्पुत्रदिनी। मशीदा त समुत्मज्य जगाम यमुना नदीम ॥४ श्रीकृष्ण द्वारा शकासुर-वध ] [ २६५ शिशुलीला तत कुर्वन्स हस्तचरणौ क्षिपन् । रुरोद मधुर कृष्ण पादाबूध्वं प्रमारयन् ॥५ स तकेन पादेन शकट पर्यवर्तयत् । न्युज पयोधराकाक्षा चकार च रुरोद च ॥६ एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता यशोदा शीघ्रगामिनी। स्नाता प्रनवदिग्याङ्गी वद्धवत्सेव सौरभी ॥७ सा ददश विपर्यस्त शक्ट वायुना विना। हाहेति कृत्वा त्वरिता दारक जगृहे.तदा ।।८ वैशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् । गोपो को सुग्द-मुविधा का ध्यान 'खते हुए नद को वहां रहत हुए कुछ काल बीत गया ॥१॥ उनके दोनों पुत्रा जर नामकरण हुआ, तव वरे पुत्र का नाम सर्पग्ग और घाटे का कृष्ण मा।।२।। देहातर को प्राप्त हुए तया मय के समान श्याम शरीर वाने कृष्ण आ के बीच निवास करत हुए समुद्र के जन के ममान सुवपूर्वक वृद्धि को माप्त होन लग ॥३॥ एक दिन कृष्ण को निद्रा प्राप्त होन पर गोपरानी यशोदा । उन्हें एक छकडे क नीचे शयन क्राया और स्वय स्नानार्थ यमु तट पर गयी ।।४। इधर कृष्ण की निद्रा भग हागई और वह हाथ-पंव चनाता हुआ पुर स्वर म रोने लगा और स्तनपान की इच्छा करते हुए उमने अपना पांव जैसे ही ऊपर की योर चलाया वैसे ही उसके आघात स बह छाडा उलट गया ।५ ६।। उसी समय यशोदा भी भीगे वस्त्र पहिन हुए ही शीघ्रता से स्नान पर आगई और उन्होने दवा कि छाडा उलटा हुआ पहा है, इसके व्याकुत होकर उ होने पुत्र को अपनी गोद म ले लिया ॥७८॥ न सा दुबोध तत्केन शकट परिवर्तितम् । स्वस्ति मे दारकायेति प्रीता भीता च साऽभवत् ।। किं तु वक्ष्यति ते पुन पिता परमकोपन । त्वय्यघ सकटे सुप्ते अकस्माच्च विलोडिते ।।१० किंमे स्नानन दुस्लाम फि बने नमरने नदीमा । पर्यस्ते शक्टे पुत्र य त्वा पश्याम्यपावृतम् ॥११ [ श्री हरिवशपुरा एतस्मिन्नन्तरे गोभिराजगाम वनेचरः । कापायवाससी बिभ्रन्नन्दगोपो व्रजान्तिकम् ॥१२ स ददर्श विपर्यस्त भिन्नभाण्डघटोघटम् । अपास्तधूविभिन्नाक्ष शकट चक्रमौलिनम् ॥१३ भीतस्त्वरितमागत्य सहसा साश्रु लोचन. । अपि मे स्वस्ति पुत्रायेत्यसकृद्वचन वदन् ।।१४ पिबन्त स्तनमालक्ष्य पुत्र स्वस्थोऽब्रवीत्पुन । वृपयुद्ध विना केन पयस्त शकट मम ॥१५ परन्तु वह यह नही जान सकी कि छकडे को किसने उलट दिया अपने शिशु को सकुशल देखकर कहने लगी-हे लाल ! तुम्हारे पिता बडे को हैं, जब वे सुनेंगे कि मैं तुम्हें छकडे के नीचे शयन कराकर यमुना-स्नान चली गयी थी और इसी गमय मे छकदा उलट गया तो न जाने क्या के 11६-१०|| मुझे इस प्रकार स्नान के लिये यमुनाजी पर त्यो जाना चाहिये थ मेरे अच्छे भाग्य थे, जिसमे छकडे के उलट जाने पर भी तुम्हें बुशलपूर्वा सकी हूँ ॥११॥ यशोदाजी इस प्रकार कह ही रही थी, तभी कापाय वस्त्रो, धारण किये हुए नन्दगय भी गौओ के महित वन मे लौट आये और देता। इकडे या प्रत्येक नाग टूटा पडा है, प हये वाला धुरा टूट गया और जुमा एक जा गिरा है ।।१२-१३॥ यह देखकर नन्दजी अत्यन्त भय-पूर्वक नेत्रो में या भरकर घर मे तेजी से पुस आये और पूछने लगे कि मेरा लाल तो ठीक है ।।१४। फिर चारक को स्तनपान करते देवकर शान्त हुए और बोले कि पर घंस भी तो नहीं लड़े, फिर यह छाडा बसे उलट गया ? ॥१५॥ प्रत्युवाच तं भीता गद्गदमापिणी । न विजानाम्यह केन शाट परिवर्तितम् ।।१६ यह नदी गता सौम्य चलप्रक्षालनायिनी। आगना च विपर्यस्तमपश्यं शकट भुवि ।।१७ तयो: काययतोरेवमय बस्तत्र दारफाः । अनेन गिशुना यानमेतत्पादेन लोडितम् ।।१८
भगवान द्वारा पूतना-वध ]
[ २६७
अस्मामि मपद्भिश्च दृष्टमेतद्यदृच्छया ।
नन्दगोपस्तु तच्छ त्वा विस्मय परम ययौ ॥१६
प्रहृष्टश्चत्र भीतश्च किमेतदिति चिन्तयन् ।
न च ते श्रद्दधुर्गोपा सर्वे मानुपवुदय ॥२०
बाश्चर्यमिति ते सर्वे विस्मयोत्फुरलोचना ।
स्वे स्थाने शकट चैव चक्रवन्धमकारयन् ।।२१
नन्दजी का प्रश्न मुनकर यशोदा का कण्ठ गद्गद हो गया, वह भयपूर्वक
स्वर मे बोली कि छक्डा किसने गिराया, यह मैं नही जानती ।।१६।। मैं तो कपडे
धोने के लिये यमुना तीर पर गयी थी और जब वहाँ से आई तो इन छक्डे को इस
प्रकार उलटा पडा हुआ पाया ।।१७। जब नन्द यशोदा म यह बातें हो रही थी
तभी वहाँ पर इकट्ठे हुए वाला आकर बोले-यह छक्हा इसी ने अपन पांव
गे उनट दिया है, हमने यह बात अपने नेत्रों से देखी है, यह सुनकर नन्द
यत्यन्त चकित हुए ॥१८-१६ । नाराय हपित हुए और भयभीत भी, वह
बारम्बार सोचत थे कि ऐसा कैसे हो गया ? परन्तु साधारण मति वाले गोपा
ने वालको की बात को ययाय नहीं माना ॥२०॥ वे विस्मयपूर्वक यही कहते
रहे कि प्रत्यन आश्चर्य की बात हुई है, फिर उहोने उम टूटे हुए छकडे को
जोडकर पुन ठीक कर दिया ।।२१।।
॥ भगदान द्वारा पूतना-वध ।।
कस्यचित्त्वथ कालस्य शकुनीवेपधारिणी।
धात्री क्सस्य भोजस्य पूतनेति परिश्रु ता ॥१
पूतना नाम शकुनी घोरा प्राणमय करी।
आजगामाखराने वै पक्षी क्रोधाद्विधुन्वती ॥२
ततोऽर्द्ध रानसमये पूतना प्रत्यदृश्यत ।
व्याघ्रगम्भीरनिर्घोप व्याहरन्ती पुन पुन ॥३
निलिल्ये शकटाक्षे सा प्रसवोत्पीडयपिणी।
ददी स्तन च कृष्णाय तस्मिन्सुप्ते जने निशि ॥४
1 [ श्री हरियापुराण तस्या स्तन पपौ कृष्ण. प्राण सह विनद्य च । छिन्नस्तनी तु सहसा पपात शकुनी भुवि ॥५ तेन शब्देन वित्रस्तास्ततो बुबुधिरे भयात् । स नन्दगोपो गोपा व यशोदा च सुविक्लवा ॥६ ते तामपश्यन्पतिता विसज्ञा विपयोधराम् । पूतना पतिता भूमी वज्रणेव विदारिताम् ॥७ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् ! इस बात को कुछ समय व्यतीत । गया तब कम की पाय पूतना पक्षिणी का रूप धारण कर पखो से भयान शब्द करती हुई, आधी रात के समय नन्दजी के घर पर क्रोधपूर्वक पहुंच ॥१-२ । सिंह के समान भीषण गर्जना करने वाली वह पूतना बारम्बार घो याद करती और दूध की वर्षा करती हुई एक छकडे के धुरे पर जाकर ई गपो । जब सब लोग निद्रामग्न हो गये तब उसने कृष्ण के पास जाकर अप स्तनपान कराया ॥३-४॥ कृष्ण ने उसका स्तनपान करते-करते उसके प्राणो भी पान कर लिया, तब अत्यन्त व्याकुल होती हुई पूतना घोर चोक परती हुई पृथिवी पर लेट गयो ॥५५॥ उसके चीत्कार को सुनकर नन्दादि तथा यशोदा आदि स्त्रियां अत्यन्त शकित और भीत होते हुए उठ पडे १६ तब उन्होंने देखा कि वञ से फटे हुए पर्वत के समान निष्प्राण पूतना पृथिवी' पडी है, तथा उसके स्तन भी वट गये है ॥७॥ इद किंस्विति मसस्ता कस्येद वर्म चेत्यपि । नन्दगोप पुरस्कृत्य गोपास्ते पर्यवारयन् ।।८ नाध्यगच्छन्त च तदा हेतु तप्त कदाचन । आश्चर्यमाश्चर्यमिति वन्तोऽनुययु हान् ।।६ गतेपु तेषु गोपेपु विस्मितेषु यथागृहम् । यशोदा नन्दगोपस्तु पप्रच्छागतमभ्रमाम् ॥१० योग्य विधिन जानामि विस्मयो मे महानयम् । पुदम्य मे भय ती भोगत्वं गगुपागतम् ॥११ यमलार्जुन भग होने की क्या ] [ २६६ यशोदा त्वद्रवीद्भीता नार्य जानामि किं त्विदम् । दारकेण सहानेन सुप्ना शब्देन वोधिता ।।१२ यशोदायामजानन्या नन्दगोप. सबान्धवः । क्साद्भय चकाराग्र विस्मय च जगाम ह ॥१३ उसे देवकर सभी अत्यन्त आश्चर्य चकित हुए और नन्द को घेर कर खडे हो गये और यह वायं विमने दिया? इमी चिन्ता करने लगे ॥८॥ बहुत विचार करने पर भी उसका कोई कारण उनकी समझ में नहीं आया और विस्मय है' ऐसा कहते हुए अपने-अपने घर को गये | जब वे गोप आश्चर्य मे भरे हुए अपने-अपने घर चले गये तब नन्द ने अत्यन्त घबराहट भरे स्वर मे यशोदा से पूया कि यह कमी घटना हुई है, इसे देखकर तो मुझे अपने बालक के लिये अस्य त भय दिखाई देने लगा है ॥१०-११॥ इस पर यशोदा ने भी भय पूर्वक कहा- मुझे भी कुछ नहीं मालुम कि यह सब क्या और हुआ ? मैं तो अपने बालक को साथ लेकर सो गई थी और इस भयकर शब्द को मुनकर ही जग पडी हूँ ॥१२॥ यशोदा द्वारा अनभिज्ञता प्रकट करने पर नन्दादि गोप कम से ही इस भय की उपस्थिति मानते हुए विस्मय मे पड़ गये ॥१३॥ ॥ यमलार्जुन भग होने की कथा ॥ काले गच्छति तो सौम्यो दारको कृतनामको। कृष्णसकर्पणौ चोभी रिङ्गिणी समपद्यताम् ॥1 तावन्योन्यगतौ वाली वाल्यादेवकता गतौ । एकमूर्तिधरौ कान्ती बालचन्द्रार्कवर्चसौ ॥२ एफनिर्माणनिर्मुक्तावेकशय्यासनाशनौ । एकवेषधरावेक पुष्यमाणो शिशुव्रतम् ॥३ एककार्यान्तरगतावैक्देही द्विधाकृता । एककायो महावीविकस्य शिशता गती ॥४ २७० ] [ श्री हरिवशपुराव एकप्रमाणौ लोकाना देववृत्तान्तमानुषो । कृत्स्नस्य जगतो गोपी सवृत्तौ गोपदारको ॥५ अन्योन्यव्यतिषक्ताभि क्रीडाभिरभिशोभितो। अन्योन्यकिरणग्रस्ती चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ॥६ विसर्पन्तौ तु सर्वत्र सर्पभोगभुजावुभौ । रेजतु पासुदिग्धाङ्गौ हप्तौ कलभकाविव ॥७ वैशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् । नामकरण होने के पश्चात् जैसे-जैसे समय व्यतीत होने लगा, वैसे वैसे ही सौम्य दर्शन कृष्ण सकर्षण वृद्धि को प्राप्त होते हुए घुटनो के बल चल पडे ।।११। उन दोनो की आकृति, प्रकृति, भोजन, वसन, भूपण, शयन, कार्य, बल एक समान थे तथा वे समान रूप वाले बालक नवोदित चन्द्र और प्रात काल के सूर्य के समान तेज वाले थे ॥२॥ उन्हें देखक ऐसा लगता था कि एक ही शरीर के दो भाग हैं, क्योकि उनके सभी कार्यों समानता थी तथा उनकी शय्या, आसन, शिशुलोलायें वेश तथा उद्देश्य भे में अन्तर नहीं था ॥३-४॥ दोनों समान कद के थे तथा लोक रक्षणार्थ दोनो ही समान वेश-गोप रूप धारण किया था ॥५॥ उनकी अलौरिक लीलायें और तेजस्विता से प्रतीत होता था कि चन्द्रमा सूर्य रश्मियो को और सूर्य चना किरणो वा पास कर रहा है ।।६।। नाग के समान लम्बी भुजाओं वाले वे दोन गोप-गुम अपन देह को मूल धूसरित किय हुए हायी के बच्चो के समान इधर उपर विचरने लगे ॥७॥ क्वचिद्भस्मप्रदीप्ताङ्गी वरीपप्रोक्षितौ क्वचित् । तो तन्न पर्यधावेता कुमाराविव पावकी ॥ क्वचिज्जानुभिरघृष्ट सर्पमाणो विरेजतु । मीडन्तौ वत्सशालासु शद्दिग्याङ्गमूद्ध जो ॥६ शुशुभाते श्रिया जुष्टावानन्दजननी पितु । जन च विप्रकुर्वाणो विहसन्ती ववचित्ववचित् ।।१० तो तस पोतूर लिनो मूर्द जव्याकुलेक्षणौ । रेजतुश्रन्द्रवदनी दारको मुगुमारयो ॥११ मलार्जुन भग होने की क्या ] [ २७१ अतिप्रसक्ती तो दृष्ट्वा सर्वव्रजविचारिणी। नाशरत्तो वारयितु नन्दगोप सुदुई मौ ॥१२ ततो यशादा सदा कृष्ण कमललोचनम् । आनाय्य शकटीमूले भर्मयन्ती पुन पुन ।।१३ दाम्ना चैवोदरे बद्ध्वा प्रत्यवन्धदुखले । यदि शक्नोपि गति तमुक्त्वा कर्म साऽकरोत् ।।१४ वे दोना वालक स्वामि कार्तिीय के ममान अत्य न सु दर थे । वे अपने है म कभी भस्म, कभी उपतो का चूरा और कभी गोपर लपेट हुए मब स्थानो र घुटना के बर चलते थे 1८६ उह दबकर मद सत्य त यानदित थे, वे नों बालक अन्याय व्यक्तियो को चिढाते और हंमत हुए इधर-उधर घूमते ॥१०॥ व अत्यत सुकुमार तथा चचन नेत्र वाने दोनो वानक इतने हठी हो थे कि नन्द उनको अधिक वा मे न रख सके ।।११ १२।। एक दिन अत्य त धित हुई यशोदा कमननयन श्रीकरण को पकड कर छाडे के पास ले गई और उनकी कटि में रस्मी बांध कर उह उलूखल स वाँध दिया और यह हकर कि ताकत हो तो इसमे छूटकर भाग जा वह अपने कार्य म लग ३ ।।१३ १४॥ व्यग्राया तु यशोदाया निजंगाम ततोऽङ्गणात् । शिशुलीला तत कुर्वन्कृष्णो विस्मापयन्व्रजम् ॥१५ साङ्गणान्नि सृत कृष्ण कर्पमाण उलूख तम् । यम नाभ्या प्रवृद्धाभ्यामर्जुनाभ्या चरन्बने । मध्यानिश्चक्राम तयो कर्षमाण उलूखलम् ।।१६ तत्तस्य कर्पतो बद्ध तिर्यगतमुलूखलम् । लग्न ताभ्या समूलाभ्यामर्जुनाम्या चकर्प च ।।१७ तावर्जुनौ कृप्यमाणो तेन बालेन रहसा। समूलविटपौ भग्नी स तु मध्ये जहास वै ॥१८ निदर्शनार्थ गोपाना दिव्य स्ववलमास्थित । तद्दाम तस्य वालस्य प्रभावादभवदृढम् ।।१६ २७२ ] [ श्री हरिवंशपुराण यमुनातीरमार्गस्या गोप्यस्तं ददृशु. शिशुम् । क्रन्दन्त्यो विम्मयन्त्यश्च यशोदा ययुरङ्गनाः ।।२० तास्तु सभ्रान्तवदना यशोदामूचुरगना. । एह्यागच्छ यशोदे त्वयभ्रमात्कि विलम्बसे ॥२१ इधर माता अपने कार्य में लगी उपर बाल-लीला करते हुए पूर उलूखल से बंधे हुए धीरे-धीरे रेंग कर आँगन के बाहर निकले और सब विस्मित करते हुए यमलार्जुन वृक्षो के मात्र जा पहुंचे ॥१५-१६॥ वहाँ उलूब टेढा होकर वृक्षो में फंस गया, तब वह उसे जोर लगाकर खीचने लगे ॥१॥ इस प्रकार खीचने से दोनो वृक्ष समूल उखड पर पृथिवी पर गिर गये और उनके मध्य स्थित होकर हंसने लगे ॥१८॥ व्रज गोरों पर अपना परा प्रदर्शित करने के लिए ही, उन्होने यह लीला की थी, यशोदा के द्वारा गयी वह साधारण रस्सी भी उनके प्रभाव से अत्यन्त हड हो गयी थी ॥१ यमुना किनारे के मार्ग से जाने वाली गोपियो ने उनकी यह लीला देखी तं अत्यन्त आश्चर्य प्रकट करती हुई यशोदाजी के पास गई ॥२०॥ वहाँ जाकर बोली- हे ब्रजरानी । विलम्ब मत करो, शीघ्रता से चलो, अरे तुम दिन क्यो कर रही हो? ॥२१॥ यौ तावर्जुनवृक्षौ तु व्रजे सत्योपयाचनौ । पुतस्योपरि तावेतौ पतितो ते महीरुही ॥२२ दृढेन दाम्ना तत्रैव बद्धी वत्स इवोदरे । जहास वृक्षोंमध्ये तव पुत्र स बालक ।।२३ उत्तिष्ठ गच्छ दुमेधे मूढे पण्डितमानिनि । पुसमानय जीवन्तं मुक्त मृत्युमुखादिव ॥ ४ स भीता सहमोत्थाय हाहाकार प्रकुर्वती। त देशमगमद्यत्र पावितो तावुभौ द्रु मी ॥२५ सा ददर्श तयोमध्ये द्रुमयोरात्मजं शिशुम् । दाम्ना नियद्धमुदरे कपमाणमुलूपलम् ॥२६ 1 मिलार्जुन भग होने की कथा ] [ २७३ सा गोपी गोपवृद्धश्च समुवाच प्रजस्तदा । पर्यागच्छन्त ते द्रष्टु गोपेषु महदद्भुतम् । २७ जजल्पुस्ते यथाकाम गोपा वनविचारिण । केनेमो पातिती वृक्षौ घोपस्यायतनोपमी ॥२८ विना वात विना वर्ष विद्य त्प्रपतन विना । विना हस्तिकृत दोप केनेमो पातिती द्रुमौ ॥२६ जिन यमलार्जुन वृक्षो की पूजा हम अपनी कामना पूर्ति के लिये परती थी, वे वृक्ष तुम्हारे बालक पर गिरे हुए धरती पर पडे है ।।२२।। और देखो वह पालक दृढ रस्सी से बंधा हुआ उनके बीच मे खडा हुआ हंस रहा है ॥२३॥ तुम अपने को अत्यन्त बुद्धिमती मानती हो, परन्तु तुम्हारे जैसी मतिहीना कौन होगी ? वालक मृत्यु के मुख से बचा है, शीघ्रतापूर्वक वहाँ जाकर यपने बालक को ले आओ ॥२४॥ यह सुनते ही यशोदा अत्यन्त व्याकुल होकर दौड पड़ी और शीघ्र ही घटनास्थल पर जा पहुंची ।।२५।। उन्होने वहाँ देखा कि दोनो धरती पर गिरे पडे हैं और वहां उनके बीच से उलग्यल को खीचते हुए हष्ण हंस रहे हैं और वह रस्मी अब भी उनकी कमर से बँधी हुई है ॥२६॥ स घटना का समाचार समूचे ब्रज मे शीघ्रता से फैल गया और सभी ब्रजवासी उस कौतूहल उत्पन्न करने वाली घटना को देखने के लिए यहाँ मा गये ॥२७॥ रस्पर में वे सब गोप कहने लगे-अहो । ग्राम पे ममान विशाल यह वृक्ष गर पटे, इस समय वायु, वर्षा, विजली या हाथियो वा भी कोई उपद्रव नही तब यह कैसे गिरे ॥२८-२६॥ अहो वत न शोभेता विमूलावर्जुनाविमो। भूमी निरतितो वृक्षी वितोयौ जलदावि । यदीमौ घोपरचिती घोपकरयाणकारिणी ।।३० नन्दगोप प्रसन्नौ ते द्रुमावेव गतावपि । यच्च ते दारको मुक्तो विपुलाभ्यामपि क्षिती ॥३१ : औत्तातिकमिद घोपे तृतीय वर्तते विह। पूतनाया विनाशश्च द्रु मयो शकटस्य च ॥३२ यशोदा पर क्रोध करते हुए अपने घर गये तथा अन्यान्य उपस्थित गोरगण, २७४ ] i श्री हरिवरापुराण अस्मिन्स्थाने च वासोऽयं घोपस्यास्य न युज्यते । उत्पाता ह्यत्र दृश्यन्ते कथयन्तो न शोमनम् ॥३३ नन्दगोपस्तु सहसा मुक्त्वा कृष्णमुलूपलात् । निवेश्य चाङ्क सुचिर मृत पुनरिवागतम् ॥३४ नातृप्यत्प्रेक्षमाणो वै कृष्ण कमललोचनम् । ततो यशोदा गर्हन्बै नन्दगोपो विवेश ह । स च गोपजनः सर्वो वजमेव जगाम ह ॥३५ स च तेनैवे नाम्ना तु कृष्णो वै दामबन्धनात् । गोष्ठे दामोदर इति गोपीभिः परिगीयते ॥३६ एतदाश्चर्यभूत हि बालस्यासीद्विचेष्टितम् । कृष्णस्य भरतश्रेष्ठ घोपे निवसतस्तदा ॥३० जल विहीन मेघ जैसे शोभा-रहित हो जाता कर शोभा हीन हो गये हैं, ब्रज-वासियों द्वारा लगाये हुए यह वृक्ष यज-बालाओं के लिये अत्यन्त उपकारी थे॥३०॥ हे गोप घेष्ठ नन्द । इस दशा वो मार होकर भी यह वृक्ष आप पर अत्यन्त प्रसन्न प्रतीत होते हैं, इसीलिए इन्होंने आपके बालक को कोई हानि नही पहुंचाई है ॥३१॥ छकडे का टूटना और पूतना का मरना यह दो उत्तात पहिले ही हो चुके थे, अब इन वृक्षों का गिरना तीसरा उत्पात हुआ समझो ॥३२॥ अब हमारा यहां रहना ठीक नहीं है, क्योंकि बारम्बार ऐसे उत्पातो का होना शुभ-सूचक कदापि नहीं है ॥३३॥ इसी समय नन्द शोघ्रता पूर्वक दौडे और वे कृष्णा को उलूखल से खोलकर इस प्रकार दुलारने लगे जैसे लोभी मनुष्य का खोया हुआ धन मिल गया हो ॥३४॥ फिर वे अपने पद्मनयन बालक के मुख को टकटको समाकर देखने लगे और कि भी अपने-अपने घर चले गये ॥३५॥ भगवान कृष्ण के उदर में दाम (र के पने से गोपियों ने उन्हे दामोदर नाम दिया ॥३६॥ वैशम्पायन जी महा-हे राजन् ! जय श्रीकृष्ण प्रज में रहते थे, तब यह उनवी बाल-संग विषयक एक अरपन्त विस्मयजनक घटना हुई थी ॥३७॥ वैसे ही यह सम्न उपडे,
बोकृष्ण वाल लीला ]
[ २७५
।। श्रीकृष्ण वाल लीला ॥
एव तो वाल्यमुत्तोणी कृष्णसपणावुभौ ।
तस्मिन्नेव द्रजस्थाने सप्तवपी वभूवतु ॥१
नीलपीताम्बरधरी पीतश्वेतानुलेपनी ।
वभूवतुर्वत्मपालो काकपक्षधरावूमौ ॥२
पणवाद्य श्रुतिसुख वादयन्ती वराननौ ।
शुशुभातै वनगतो निशीविव पन्नगौ ।।३
मयूराङ्गदरणी तु पल्लवापीडधारिणौ।
चनमालाकुलस्कन्धौ द्रुमपोताविवोद्गती ॥४
अरविन्दकृतापीडो रज्जुयज्ञोपवीतिनौ ।
सशिक्यतुम्बकरको गोपवेणुप्रवादको ॥५
क्वचिद्धसन्तावन्योन्य नोडमानी क्वचित्क्वचित् ।
पणशय्यासु ससुप्ती क्वचिन्निद्रान्तरेक्षणी ॥६
एव वत्सान्पालयन्ती शोभयन्ती महावनम् ।
चन्चूर्यन्तो रमन्ती स्म विशोराविव चञ्चलो ॥७
वैशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् । इस प्रकार कृष्ण और समर्पण
पनी शैशवावस्था को पार करने सात वर्ष की अवस्था के हो गय ॥१॥
पण नीले वस्त्र और कृष्ण पील वस्त्र धारण करके श्वत चदन लगाकर वे
नो शिखायारी वालक वराहो के पालक हो गय ॥२॥ दानो बाला पणवाय
। सुनने मे मधुर ध्वनि करते हुए वनों में विचरण करत हुए तीन शिर के
सर्प के समान मुन्दर प्रतीत होते थे ॥३। उनले कानो में मोरपसी का कुण्डल,
में
मस्तर पर पल्लव युक्त कमलपुरप का मुकुट, मठ
बनमाल, वये पर रस्मी
का जनेऊ, हाप में तुम्बो और चौदा लिये हुए रहते तथा वशी वजाया करते
से ॥४-५॥ वे कमी परस्पर हास-परिहास करते और कभी पत्ता का विद्यौना
नाकर उस पर शयन करते थे ॥६॥ इस प्रकार वे दोनो भाई वनों म गायो
की चराते और विविध क्रीमा करते हुए चबल बछेगे के समान शोभा
ते थे ॥७॥
२७६ ] श्री हरिवशपुर अथ दामोदर श्रीमान्सरर्पणमुवाच ह । आर्य नास्मिन्वने शक्य गोपाल सह क्रीडितुम् १८ अवगीतमिद सर्वमावाभ्या भुक्तमाननम् । प्रक्षीणतृणकाष्ठ च गोपर्मश्रितपादपम् १६ घनीभूतानि यान्यासन्काननानि वनानि च । तान्याकाशनिकाशानि दृश्यन्तेऽद्य यथासुखम् ॥१० गोवाटेप्वपि ये वृक्षा परिवृत्तार्गलेषु च । सर्वे गोठामिषु गता क्षयमक्षयवर्चस ॥११ सनिकृष्टानि यान्यासन्काशनि च तृणानि च । तानि दूरावकृष्टासु मागितव्यानि भमिपु ॥१२ अरण्यमिदमल्पोदमल्पकक्ष निराश्रयम् । अन्वेषितव्य विश्राम दारुण विरलद्र मम् ॥१३ अकर्मण्येय वृक्षेपु स्थितविप्र स्थितद्विजम् । सवासस्यास्य महतो जनेनोत्सादितद्र मम् ॥१४ निरानन्द निरास्वाद निष्प्रयोजनमारुतम् । निविहङ्गमिद शून्य नियंजनमिवाशनम् ।।१५ एक दिन कृष्ण ने अपने भाई सकर्षण से कहा-~हे आयं । अब वन मे गोप वालका के साथ खेलना उचित नही है | क्योकि हम इस वर का भले प्रकार उपभोग कर चुके हैं, अब यहां पास भी नहीं रही और काय तथा वृक्ष भी थोडे ही रह गए हैं क्योंकि गोपी ने वृक्षो को काट डाला है ॥९॥ पहिले यह वन वृक्षो मे इतना परिपूण था कि और कुछ भी दिखाई नहीं देता था, परन्तु अब उन वृक्षों के क्ट जाने अथवा पत्र विहीन हो जाने पर सरलता से दूर तर देखा जा सकता है ॥१०॥ गोशाला और उसकी प्राचीर पर स्थित वृक्ष, मन की अग्नि मे दग्ध होर प्रमाहोन हा गए हैं ॥११॥ जो पास, ययवा काष्ठ पहले धन के समीप था, अब वह बहुत दूर है तथा यत्नपूर्व उमदी खोर परनी होती हैं ॥१२॥ इरा पन मे पास, जल और विश्राम स्थल मिलना अब कठिन हो गया है, वृक्ष यहुत दूर दूर पर रह गये हैं. टि यो
श्रीकृष्ण बाल लीला ]
[ २८
ोग न करेंगे तो भविष्य में हमे खेलने और बैंक वर विग्राम घरन को भी
यान न मिलेगा ॥१३॥ यहाँ दे सभी इन अब वकार हो चुके हैं, इसीलिये
निवासी पक्षियों ने इन्ह त्याग दिया है । यहाँ के निवामिया नै वृक्षो को काद
ला है, इसलिए इस वन म अब वायु क वह मुदद झोंक उपल र नहीं होत ।
'क्षियों के चने जान मे यह वन शाकादि महीन भोजन के समान निरानन्द हो
या है ॥१४-१५
विक्रीयमाण काप्ठंश्च शाश्च वनममव ।
उच्छिन्नमचयतृणधोपोज्य नगरायते ।।१६
शैलाना भूपण घोपो घोपाणा भूपण वनम् ।
वनाना भूषण गावस्ताबास्मा परमा गति ॥१७
तस्मादन्यद्वन याम प्रत्यग्रयवसेन्धनम् ।
इच्छन्त्यनुपमुक्तानि गावो भोक्नु तृणानि च ॥१८
तस्माद्वन नवतृण गच्छन्तु धनिनी व्रजा ।
न द्वारवन्धावरणा न गृहक्षेतिणस्तथा ।
प्रशम्ना वै ब्रजा लोके यया व चरचारिण ॥१६
राकृन्मूनेषु तेप्वेय जातक्षाररसायनम् ।
न तृण भुजते गावो नापि तत्पयसे तिम् ॥२०
स्थलीमाया रथ्यामु नवामु वनराजिपु।
चराग सहितौ गोमि क्षिप्र सवाह्यता व्रज ॥२१
बन में उत्पन्न दशाको और काप्टो व विक्रय होन के कारण काष्ठ और
घाम यहीं नहीं रही, इमलिये यह प्रज अब गांव न रह कर नगर जमा हा गया
है ॥१६॥ पर्वतो की शोमा ग्राम हैं, ग्रामो की शोमा वन तथा वनो की शोमा
गौएं हैं, यही हमारे लिय परमगति हैं ॥१७॥ इसलिये इन दन को छोड़ कर
एमे वहीं चलना चाह्येि जहां तृण बोर वाट प्रचुर मात्रा में उपलन हो सके,
योति गौए नवीन तृण को चरना चाहती हैं ॥१८॥ इमलियै धनिक प्रवासियो
नवीन तृणादि से परिपूर्ण वन में चलना चाहिये, क्योकि ब्रजवामियों के लिये
सभी कोई निश्चित गृह, क्षेत्र अथवा द्वार श्रादि का बन्धन नहीं है । वे तो
२७६ ]
[ श्री हरिवरापुराण
अथ दामोदर श्रीमान्सपर्पणमुवाच ह ।
आर्य नास्मिन्वने शक्य गोपाल सह क्रीडितुम् ॥८
अवगीतमिद सर्वमावाभ्या भुक्तमाननम् ।
प्रक्षीणतृणकाष्ठ च गोपैथितपादपम् ।
घनीभूतानि यान्यासवाननानि वनानि च ।
तान्याकाशनिकाशानि दृश्यन्तेऽद्य यथासुखम् ॥१०
गोवाटेष्वपि ये वृक्षा परिवृत्तार्गलेषु च ।
सर्वे गोष्ठामिषु गता क्षयमक्षयवर्चस ॥११
सनिकृष्टानि यान्यासन्काष्ठानि च तृणानि च ।
तानि दूरावकृष्टासु मागितव्यानि भमिपु॥१२
अरण्पमिदमल्पोदमल्पकक्ष निराश्रयम् ।
अन्वेषितव्य विश्राम दारुण विरल मम् ॥१३
अकर्मण्येपू वृक्षेषु स्थितविप्र स्थितद्विजम् ।
सवासस्यास्य महतो जनेनोत्सादितद् मम् ।।१४
निरानन्द निरास्वाद निष्प्रयोजनमारुतम् ।
निविहङ्गमिद शून्य नियंजनमिवाशनम् ।।१५
एक दिन कृष्ण ने अपने भाई सकर्षण से कहा-है आर्य ' अब इस
वन मे गोप बालको के साथ खेलना उचित नहीं है 10 क्योकि हम इस वन
का भले प्रकार उपभोग कर चुके हैं, अब यहाँ घास भी नहीं रही और काष्ठ
तथा वृक्ष भी थोडे ही रह गए हैं, क्योकि गोपी ने वृक्षो को काट डाला है ।।
पहिले यह वन वृक्षो मे इतना परिपूर्ण था कि और कुछ भी दिखाई नहीं देठा
था, परन्तु अब उन वृक्षों वे कट जाने अथवा पत्र-विहीन हो जाने पर सरनता
से दूर तक देखा जा सकता है ॥१०॥ गोशाला और उसकी प्राचीर पर स्थित
वृक्ष, प्रम की अग्नि मे दग्ध होर प्रभाहीन हो गए हैं ॥११॥ जो पास,
वयवा पाठ पहले प्रज के समीप था, अब वह बहुत दूर है तथा यत्नपूर्व
उमवी सोम यरनी होती हैं ॥१२॥ इरा वन मे घास, जल और विश्राम स्थान
मिलना अब कठिन हो गया है, वृक्ष बहुत दूर दूर पर रह गये हैं, यदि असे
श्रीकृष्ण बाल लीला 1
[ २३
*घोज न करेंगे तो भविष्य में हमें खेलने और पर वियाम करन को भी
म्मान न मिलेगा ॥१३॥ यहाँ के ममी वृक्ष यब बेकार हो चुई है, इसीलिय
वनवासी पक्षिया ने इह त्याग दिया है । यहां के निवासियों न वृक्षों को काट
डाला है, इसलिए इस वन म अत्र दायु व वह मुदद झोंक उपल र नहीं होत !
पक्षियों के चने चान मे यह वन शाकादि मे होन भाजन के समान निरानन्द हो
गया है ॥१-१५॥
विक्री यमाण काश्च शाश्च वनमम ।
उच्छिन्नमचयतृणघोंपोय नगरायते ॥१६
शंलाना भूपण घोपो घोपामा भूपण वनम् ।
वनाना भूपण गावस्ताश्चास्मा परमा गति ॥१७
तम्मादन्वद्वन याम प्रत्यग्रयवसेन्धनम् ।
इच्छन्त्यनुपमुक्तानि गावो भोक्नु तृणानि च ।।१८
तस्माद्वन नवतृण गच्छन्तु घनिनो वजा ।
न द्वारवन्धावरणा न गृहक्षेतिणस्तथा ।
प्रशम्ना वै बजा लोके यया व चाचारिण ॥१६
शकृन्मूषु तेप्वेव जातक्षाररमायनम् ।
न तृण भुजते गादो नापि तत्पयसे हितम् ।।२०
स्थलीमायामु रय्यासु नवामु वनराजिषु ।
चरान सहितौ गोमि क्षिप्र सवाह्यता ब्रज ॥२१
बन में उत्पन्न शायरों और काष्ठी व विक्य होन के कारण काठ और
पाम यहां नहीं रहीं, इमलिये यह ब्रज अब गांव न रह कर नगर जैमा हा गया
है ॥१६॥ पर्वों को शोमा ग्राम हैं, ग्रामों की शोमा वन तथा दनों की गोमा
औए हैं, यही हमार लिये परमाति हैं ॥१७॥ इसलिये इन दन को छोड पर
मे वही चलना चाहिये जहां तृण और काष्ठ प्रचुर मात्रा में पलव हो सरे,
योरि गौर नवीन तृण को चरना चाहती हैं ॥१८॥ इसलिये घनिक प्रवामियों
को नवीन तृणादि से परिपूर्ण वन में चलना चाहिये, क्योंकि प्रजवामियों के लिए
स भी कोई निश्चित गृह, क्षेत्र अथवा द्वार आदि का बन्धन नहीं है । वे तो
२७८ ] [ श्री हरिवशपुराण हस सारस आदि पक्षियों के समान जहाँ कहीं भी जाकर रहने लगें, वही स्थान व्रज बन जाता है ।।१६। यहां को घासो में गोवर और मल मूत्रादि के मिश्रित हो जाने से एक प्रकार का क्षार उत्पन्न हो गया है, इसीलिए गौवें इस घास को नही चरती और जो घर लेती हैं उनका दूध हितकारी नहीं होता ॥२०॥ इन लिये हमे नवीन तृण युक्त समतल वन्य प्रदेश मे अपनी गोमो के सहित चल देना चाहिये, जहाँ तक सम्भव हो इस स्थान को त्यागकर हम यहाँ से कहीं अन्यत्र चल दें ॥२१॥ श्रूयते हि वन रम्य पर्याप्त तृणसंस्तरम् । नाम्ना वृन्दावन नाम स्वादुवृक्षफलोदकम् ॥२२ अझिल्लिकण्ट कवन सर्वेनगुणयुतम् । कदम्वपादपप्राय यमुनातीरसश्रितम् ॥२३ स्निग्धशीतानिलवन सर्वतुं निलयं शुभम् । गोपीना सुरसचार चारुचितवनान्तरम् ॥२४ तत्र गोवर्द्धनो नाम नातिदूरे गिरिमहान् । प्राजते दीपशिखरो नन्दनस्येव मन्दरः ॥२५ मध्ये चास्य महाशाखोन्यग्रोधो योजनोच्छित.। भाण्डीरो नाम शुशुभे नीलमेघ श्वाम्बरे ॥२६ मध्येन चास्य कालिन्दी सीमन्तमिव युवंती। प्रयाता नन्दनस्येव नलिनी सरिता परा ॥२७ तय गोवर्टन व भाण्डीर च वनस्पतिम् । मालिन्दी च नदी रम्या द्रक्ष्यावश्चरत सुयम, ॥२८ मुना है शि.यमुगा के तीर पर ही वृन्दावन नाम का एक पन है श्रेष्ट गो, गुरयाटु पर्पो चौर गधुर जालो की यहतायत है ॥२२॥ सरसा से परिपूर्ण है, यह सिलियो और टों के दर्शन नहीं तथा उग वन में घंष्ठ वन वे गभी गुण ६ ॥२॥ वही था पसता अनु एर गाप रही हैवहां गीतिए' भापत मागे बिहार ती ॥२॥ उगरे नि मानसा में मादर पर्वत थे सगान व
श्रीकृष्ण वाट लीला 1
[ २७६
शिखर वाला गोवर्धन नामक पर्वत विद्यमान है ॥२५॥ उस पर्वत के पर नील
घि के समान सघन तथा एक योजन विम्नार वाला भाण्डोर नाम का एक वट
[क्ष स्थित है ॥२६॥ जैसे इन्द्र के नन्दन वानन में मन्दाक्निी वहती है, वैसे ही
उम पर्वत के सीमन्त की भाँति यमुनाजी प्रवाहित हैं ॥२७॥ वहीं विचरण करते
इए हम दोनो ही गिरि गोवर्धन, भाण्डीर वृक्ष बौर परम रमणीय यमुना को
पवते हुए आनन्दित होग। २८॥
तनाय कल्पता घोपम्त्यजना निर्गुण वनम् ।
सदासयावो भद्र ते विञ्चिदुत्पाद्य कारणम ॥२८
एव कययतस्तस्य वासुदेवस्य धीमत ।
प्रादुर्बभूव शतशो रक्तमामवसाशना ॥३०
घोराश्चिन्तयनस्तस्य स्वतनूरहजास्तदा ।
विनिष्पेतुर्भयकरा. सर्वश शतशो वृका ॥३१
निप्पतन्ति स्म वह्वो ब्रजस्योत्सादनाय वै।
वृशान्निप्पतितान्दृष्ट्वा गोवत्सेवथो नषु ॥३२
गोपीषु च यथाकाम बजे बासोऽभवन्महान् ।
ने वृका पञ्चवद्धाश्च दशवतास्तथा परे ॥३३
निशद्विशतिवद्धाश्च शतवद्धास्तथा परे ।
निश्चेमस्तस्य गाभ्य श्रीवन्मात-क्षणा ।।३४
कृष्णम्य कृष्णवदना गोपाना भयवर्धनाः।
भक्षयद्मिश्च तवत्सास्त्रासयद्मिश्च गोव्रजान् ।।३५
निशि वालान्हरद्भिश्च वृकत्साद्यते व्रज ।
न वने शक्यते गन्तु न गाश्च परिरक्षितुम् ॥३६
न वनात्किचिदाहन च वा तरितु नदीम् ।
वस्ताह्य द्विग्नमनसोऽगताम्नस्मिन्बनेऽवसन् ॥३७
एवः वृफरदीर्णस्तु व्याघ्रतुल्यपराक्रम ।
प्रजो निस्पन्दचेप्ठस्य एक्स्यानचर कृत ॥३८
इसलिये हे भया मे इस धन को त्याग कर वृन्दावन में निगन परता
-
[ श्री हरिवंशपुराण २८० ] उचित है, इसलिये यहाँ कोई विशेप मय उपस्थित करखे व्रजवासियों को डर देना चाहिये। ॥२६॥ भगवान् कृष्ण के इतना कहते ही उनके देह से सहस हजारो भीषण आकार वाले भेडिये उत्पन्न हो गये ॥३०-३१।। व सब भेडिये व्रजवासी गोपो, गौओ, बछडो गोपियो आदि पर आक्रमण करके उन्हे व्यथित करने लगे, इमसे सम्पूण व्रज मण्डल आनक्ति हो उठा। वे भेडिया पांच, दम पचास आदि के समूहो मे घूमते फिरते थे। भगवान कृष्ण के देह से उसनहा 'उन काले मुख वाले भेडियो ने बहुत से बदडो को मार डाला और रात्रिका में गोप वालको को उठाकर ले जाने लगे। इसलिये उन भेडियो का आरन इतना बढ गया कि कोई भी व्यक्ति वन से कुछ लाने, गाय पराने या यमुन किनारे जाने का साहम नही कर पाता था। उन भेडियो के भय से सभी द्र वासी अस्त हो गये थे और कोई भी बाहर नहीं निकलना चाहता था ॥३२ ३५ उन सिंह के समान पराक्रमी भेडियो के भय से बचने के लिये सब ब्रजवा एकत्रित होकर एक स्थान पर रहने लगे थे ॥३८॥ ॥ श्रीकृष्ण का वृन्दावन-गमन । एव वृवाश्च तान्दृष्ट्वा वर्धमानान्दुरासदान् । सस्तीपुमान्स घोषो वै समस्तोऽमन्त्रयत्तदा ॥१ स्थानेनेह न न कार्य व्रजामोऽन्यन्महद्वनम यच्छिव च सुपोप्य च गवा चंव सुखावहम, ॥२ अद्यैव किं चिरेण स्म व्रजाम सह गोधन । यावदृर्वध घोरे न न सर्वो व्रजो व्रजेत् ॥३ एपा,धूम्रारुणागाना'दष्ट्रिणा नखकपिणाम । वृक्षाणा कृष्णवक्त्राणा विभीमो निशि गर्जताम् ॥४ मम पुत्रो मम भ्राता मम वत्सोऽथ गोर्मम । वृक्षापादिता ह्य व अन्दन्ति स्म गृहे गृहे ।।५ तासा रदितशब्देन गवा हमारर्वण च । अजस्योत्यापन चा पोपवृद्धा समागता ॥६ श्रीकृष्ण का वृदावन गमन ] [ २८१ तेपा मतमथाज्ञाय गन्तु वृन्दावन प्रति । व्रजस्य विनिवेशाय गवा चव हिताय च ।।७ वृन्दावननिवासाय ताज्ञात्वा कृतनिश्चयान् । नन्दगोपो वृहद्वाक्य वृहस्पतिरिवाददे ।। वंशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् ! जब वे भेडिये अत्यत उद्दण्ड हो गये तब सब ब्रजवासियो ने एकत्रित होकर परस्पर मत्रणा की और बोले कि अब हमे इस स्थान से क्या काय है ? हम यहां से किसी अन्य वन मे चल देना चाहिये, जो कि सुग्वपूवक निवास के योग्य तथा गौओ के लिये भी सुग्वदायी हा ॥१-२॥ अव विलम्ब से क्या लाभ है ? हम अपनी गोमा और बछडो के सहित आज ही यहा से चल द जिससे उन भयाना भेडिगो द्वारा होने वाले सबनाश से बचा जा सके 111 यह पील देह वाने कृष्णमुपी एव नखकर्षी भेटिये रात के समय घोर गजना करते हुए घूमते हैं जिनमें हम बडा डर लगता है 11४11 प्रत्येक घर के ब्रजवासी प्रतिदिन प्रात काल रदन करते दिखाई इते हैं कोई कहता है कि मेरे भाई पुत्र बरडा अयवा गाय का भेडियो ने मार डाला है 10 इस प्रकार व्रजनारियो के रदन और गोत्रो के बदन से अथित हुए वृद्ध पुरुपो ने उस ब्रज का छाड कर चरने का दृढ विचार किया ॥६॥ उन वृद्ध गोपों के विचार तथा व्रज त्याग कर व दावन गमन के निश्चय को सुन कर बुद्धिमान न द ने उनसे कहा ॥७॥ अद्यैव निश्चयप्राप्तिर्यदि गन्तव्यमेव न । शोत्रमाज्ञाप्यता घोष सज्जीभवत मा चिरम् ।। ततोऽवघुष्यत तदा घोपे तत्प्राकृतर्जने । शीघ्र गाव प्रकाल्यन्ता भाण्ड समभिरोप्यताम् ॥१० वत्सयूथानि काल्यन्ता पूर्यता शकटानि च । वृन्दावनमित स्यानान्निर्वेशाय च गम्यताम् ॥११ तच्छ वा नन्दगोपस्य वचन साधु भापितम् । उदतिष्ठद्वज सर्द शीघ्र गमनलालस ॥१२ प्रयाह्य तिष्ठ गच्छाम किं शेपे साधु योजय । उत्तिष्ठति बजे तस्मिन्नासीत्कोलाहलो महान् ।।१३ २८२ ] [ श्री हरिवश पु उत्तिष्ठमान शुशुभे शकटीशाकटस्तु सः । व्याघ्रघोपमहाघोषो घोष. सागरघोपवान् ।।१४ गोपीना गर्गरीभिश्च मूनि चोतम्भितर्घटैः । निष्पपात व्रजात्पड क्तिस्तारापड क्तिरिवाम्बरात् ॥१५ -- हे गोपगण | यदि आपने इस स्थान को त्याग कर वृतान पलने निश्चय ही कर लिया है तो अब विलम्ब न करके सभी प्रवामियो को शोज तैयार होने की आज्ञा दीजिये ॥६॥ इसके अनुगार नन्द ने वन घोपणा करादी कि सर गौओ को इकट्ठी कर लो और गृहस्थ के सब सामान वर्तन-वस्त्रादि बैल गाडियों पर लाद दो ॥१०॥ छकडों तथा बछडो को एक परके यहाँ से वृन्दावन चलने को तैयार हो जाओ। नंद की यह बात सुनकर शीघ्र ही चलने के लिये उत्सुक समस्त ग्रज उसी समय उठ चला ॥११-२५ उस समप ये परसर बोले-चलो, जल्दी यहां से निकल चलें, तुप अभी ययो सो रहे हो, उठो, अपनी बैल गाडी को जोतो, इस प्रकार की बातचीत एक प्रकार का मोवाहन-सा होने लगा ॥१३॥ उस कोलाहल के साथ एक स गर्जन, सिंहगर्जन या विद्युत गर्जन जैसा पोर शब्द हुआ, जिससे सम्पूर्ण मण्डल गूंज उठा और गोप गोपी पाकुल हो गये। जब गोपिकाए सिर पडे और बगल मे गगरी दयाये पंक्ति बद्ध होर धज से पली सब ऐसा होो लगा जैसे आगश की वारिवायें पृथिवी पर उतर पडी हों ।।१४.१५॥ नीलपीतारणस्तासां वस्त्रंरग्रस्तनोति । शकचापायते पड वितर्गोपीना मार्गगामिनी ॥१६ दामनी दामभारश्च कश्चित्कायावलम्विभिः । गोपा मार्गगता भान्ति सावरोहा इव दमाः ।।१७ ग जो प्रजना भाति शरटोपन भास्पता। पौॉ. पवनयिक्षिप्तनिष्पतद्धिरियाणंय. ॥१८ क्षगेन सदबजरथानमीरण मगपद्यत । ट्रम्पावयनित योग वायगमण्डलः श्रीकृष्ण का वृन्दावन गमन ] [ २८३ तत क्रमेण घोपः स प्राप्तो वृन्दावन वनम् । निवेश विपुल चक्रे गवा चैव हिताय च ।।२० शकटावतपर्यन्त चन्द्रार्दाकारसस्थितम् । मध्ये योजनविस्तीणं तावद्विगुणमायतम् ।।२१ कण्टकीभि. प्रवृद्धाभिस्तथा कण्टकित मै । निखातान्छितशाखारभिगुप्त समन्ततः ।।२२ उनकी चोलियां नीले, पीने या लाल रंग की थी, इससे उनके पक्ति बद्ध होकर चलने से इन्द्र घनुप के उदित होने जंसी शोमा होने लगी ॥१६॥ पथ- गामी गोषों के अघो पर जो रस्सियां लटकी हुई थी, वे वटवृक्ष की जटायो जसी प्रतीत होने लगी ।।१७। व्रज से चमचमाते हुए रयो के समूह ऐसे लगने लगे जैसे अनेकों नायें वायु के झोके के साथ समुद्र मे उड रही हो ॥१८उन गोपो के द्रज से चल देने पर वह भूमि मरभूमि जैसी प्रतीत होती थी, वहाँ के घरों मे पड़े हुए अन्नपणी और वडे आदि पर पाए मंडराने लगे थे ॥१६॥ वहाँ से चलकर गोपी का यह समूह वृन्दावन जा पहुंचा और वहाँ उन सबने पहिले । गौओ के लिये अनेक गौशालाओ का निर्माण क्यिा ॥२०॥ सभी छकडे अद्ध. चन्द्राकार धेरे के रूप में खड़े किये गये 1 वह स्थान एक योजन लम्बा और एक । योजना चौडा था ॥२१॥ जिसे ऊँचे-ऊंचे काटेदार वृक्ष लगाकर चारों ओर से धेर दिया तथा छतनार की शाखाओं ने उस वृन्दावन को सब थोर से सुरक्षित किया ॥२२॥ मन्थरारोप्यमाणश्च मन्थवन्धानुकर्षणः। मद्भिः प्रक्षाल्यमानाभिगंगरीभि. समन्तत ।।२३ कीरारोप्यमाण श्च दामनीपाशपाशित.। स्तम्भनीभिधुताभिश्च शक्टः परिवत्तिते. ॥२४ नियोगपाशरासक्तैगर्गरीस्तम्भमूर्द सु । छादनार्थ प्रकीर्णश्च कटकस्तृणसकटः ।।२५ शाखा विटङ्घवृक्षाणा क्रियमाणैरितस्ततः । शोध्यमानर्गवा स्थानः स्थाप्यमानरुलूखलः ॥२६
२८४ ]
[धी हरिवार
प्राड मुग सिच्यमानश्च सदोद्भिश्च पाय ।
सदस्यचर्मास्तरण पर्यश्चावरोपित ७
तोयमुत्तारयन्तीभि प्रेक्षनीमिश्च तद्वनम् ।
CHHINTANTN तर
वालिय नांग दमन ] [ २८५ र्चक काटना आरम किया ॥२६॥ इस प्रकार स्वादिष्ट जल और उत्तम फल नूल से युक्त वृन्दावन के उम उपनिवेश की शोमा अनीमित होगई ॥३०॥ पक्षियो के क्लरव से युक्त न दन कानन वे समान सुरम्य वृन्दावन में पहुंच कर गए इच्छित दूध देने लगी ॥३१॥ गौओ का शुभ चाहने वाले भगवान् ब्रज-वन में विचरण करते समय ही वृन्दावन में रहने का निश्चय कर चुके थे ॥३२॥ वह नितान्त सूची तथा रूखी ग्रीष्म ऋतु मे वहां आये थे, परन्तु उनके वहाँ हवते ही जैसे देव ने अमृत-वर्षा आरम्भ कर दी हो, जिससे तृण गये थे ॥३३॥ इस पर भी जहां स्वय मधुसूदन श्रीकृष्ण लोकहित के लिये वराजमान हो, उस स्थान पर मनुष्यो, गोमो और बछड़ों को किस प्रकार कोई द हो सकता या ? ॥३४॥ उम वृत्दावन मे सभी गोएं, गोप तया सकर्षण मादि सब श्रीकृष्ण के साथ आनन्द सहित निवास करने लगे ।।३।। बढ़ने लग | कालिय नाग दमन ।। सोपसृत्य नदीतीरं वद्ध या परिकरं दृढम् । आरोहच्वपल कृष्ण: कदंबशिवरं मुदा ।।१ कृष्णः कदंबशिखराल्लम्बमानो घनाकृतिः । हृदमध्येऽकरोच्छन्दं निपतन्नम्बुजेक्षणः ।।२ कुष्णेन तन्त्र पतता क्षुभितो यमुनाह्रद. । समामिच्यत वेगेन भिद्यमान इवांवुदः ॥३ तेन शब्देन मान्ध सर्पस्य भवनं महत् । उनिउज्जलात्सर्यों रोपपर्याकुलेक्षणः ॥४ स चोगपति: दो मेघराशिसमप्रभः । ततो रस्तान्तनयनः कालियः समदृश्यत ।।५. पञ्चास्त्रः पावकोच्यासरचलज्जिह्वोऽनलाननः । पृथुभिः पञ्चमिर्पोरः शिरोमिः परिवारितः ॥६ पूरपित्या ह्रदं सर्व भोगेनानलवर्चसा। स्फुरन्नित्र च रोपेण ज्यन्निव च तेजना ॥७ . २८६ ] [ श्री हरिवंशपुरा क्रोधेन तज्जल तस्य सर्व शृतमिवाभवत् । प्रतिस्रोताश्च भीतेव जगाम यमुना नदी 11 वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् । फिर श्रीकृष्ण न दह के पार जाकर अपनी कमर को सा और कदम्ब वृक्ष पर पढ़ गये ॥१॥ फिर उस कदम्ब के ऊपर से दह में कूद पडे और उच्च स्वर करने लगे ॥२॥ इस प्रकार कूदने से उस दह में क्षोभ उठा और वह चारो ओर जल फेंकने लगा ।। ३ ।। उनके कूदने का शब्द जब कालिय नाग के स्थान एक पहुंचा तब सम्पूर्ण दह काप उठा और वह नाग लाल लाल ने किये हुए जल से बाहर आया ॥४५॥ उसक भीषण पाच मुषो से ज्वालाए निकल रही थी और वह अपनी जिह्वा को लपलपाता था ॥६॥ क्रोध के कारण उसका देह फूल गया और तेज के बहुत बढ़ने से अग्नि के समान दिखाई देने लगा । सम्पूण जल उसके क्राप से खलबला उठा और उसके भय से यमुन धारा भी विपरीत दिशा मे बहने लगी ॥७॥ तस्य क्रोधाग्निपूर्णेभ्योवक्नेभ्योऽभूच्च मारुत । दृष्ट्वा कृष्ण हृदगद क्रीडन्त शिशुलीलया 16 सचूमा पन्नगेन्द्रस्य मुखान्निश्चेरुरचिष । सृजता तेन रोपाग्नि समीपे तौरजा द्रमा ॥१० क्षगेन भस्मसान्नीता युगालप्रतिमेन वै। तस्य पुनाश्च दाराश्च भृत्याश्चान्ये महोरगा ॥११ वमन्त पावक घोर वक्तेभ्यो विषसभवम् । सधूम पन्लगेन्द्रास्ते निपेतुरमितौजस ॥१२ प्रवेशितश्च ते सर्प स कृष्णो भोगबन्धनम् । निर्यलचरणावारस्तस्थौ गिरिरिवाचल ।।१३ भदशन्दशनस्तीक्ष्ण विषोत्पीडजलाविले । ते पृष्ण सर्पपतयो न ममार च वीर्यवान् ।।१४ एव वाला ये समान उस दह में कोडा परते हुए श्रीरय पो देर उमा मुम से उष्ण वास और यूप्रयुक्त ज्वालाएँ जोयता से निपटने ।
कालिप नाग दमन ]
[ २८७
सके कोप से किनारे के मर वृक्ष मम्म हो गये । उना पुन, स्त्री, सेवकादि भी
और सप थे। वे भी अपन मुव स धुए सहित अग्नि उगल रहे थे 18-१२॥
म प्रकार अनुचरी सहित आक्र कालिग्नाग ने श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण देह को
अपने से लपट कर जबर लिया, तब भगवान् हरि पर्वन के समान स्थिर एव
प्रचल बडे रह ।।१३।। फिर वह महामपं उन्हें सब ओर से काटने लगे, परन्तु
ता भी भगवान का गल-बगवा भी न हो सका ॥१॥
एतस्मिन्नन्तरे भीता गोपाला सर्व एव ते ।
बन्दमाना ब्रज जन्मप्पिगद्गदया गिरा १५
एप मोह गत कृष्णा मग्नो हि कालिये ह्रदे।
भक्ष्यते सर्पराजेन तदागच्छन मा चिरम् ।।१६
नन्दगापाय वैक्षित्र मवलाय निवेद्यताम् ।
एप ते कृष्यते कृष्ण सणेति महाहदे ।।१७
नन्दगोपस्तु तच्छ त्वा वचपातोपम वच ।
या स्पलितविक्रान्तस्त जगाम हदोत्तमम् ।।९८
सवालयुवतीवृद्ध स च सकपणो युवा ।
आकीड पन्नगेन्द्रम्य जलस्थ समुपागमम् 11६
नन्दगोपमुण गोपास्ते सर्वे साथ लोचना ।
हाहाकार प्रकुर्वन्नस्तस्युम्तीरे हदम्य वै ॥२०
पह देव पर कृष्ण-मया गोप-वाला भयपूर्वक अश्रुपात परते हए ब्रज
मे गये और गद्गद् म्वर में गोरों से वो-गण कालीदद में गिर कर अचेत
हो गया है, बालियनाग उमे हम रहा है, यब आर सर तुरन्त वहां च और
बलराम को भी इसकी सूचना दे दें॥१५-१७॥ नन्दजी ने जब वय गिरने के
पमान इम माचार को मुना तब वे बरयान शोर-सतप्त होते हुए गिरते-पहले
हकी ओर दौड पडे ॥१८॥ फिर बराम जी के महित सय गोर-गोती, पालक,
मालीदह पर जा पहुँचे ।।१६।। नादि सभी प्रवासी नेत्रों मे आँसुओ की
करते हुए रिनारे पर ही गरे रहे ॥२०॥
व्रजवासी तुम्हें सामा य मनुष्ध जान कर करुणापूर्वक रुदन कर रहे हैं ॥२३॥ २८८ ] [ श्री हरिवरपुराल एकभावशरीरश एक्देहो द्विधा पुन । सर्पमस्तु सक्दो बभापे प्णमव्ययम् ॥२१ कृष्ण कृष्ण महाबाहो गोपालान्दवर्द्धन । दम्यतामेप ये क्षिप्र सर्पराजो विषायुध ॥२२ इमे नो वान्धवास्तात त्वा मत्वा मानुप विभो। परिदेवन्ति क्रुण सर्वेमानुपबुद्धय ।।२३ तच्छ त्वा रोहिगेयस्य वाक्य सज्ञासमीरितम् । विक्रीड या स्फोटयद्वाहु मित्त्वा तन्नागबन्धनम् ॥२ तस्य पद्भ्यामथाक्रम्य भोगराशि जलोत्यितम् । शिरस्तु वृष्णो जग्राह सहस्तेनावनाम्य च ।।२५ तस्यारुरोह सहसा मध्यम तन्महच्छिर । सोऽस्य मूर्टिन स्थित कृष्णो ननतं रुचिरागद ॥२६ मृद्यमान स कृष्णेन श्रान्तमूर्दा भुजगम । आस्यै सरुधिरोद्गार कातरो वाक्यमनवीत् ॥२७ अविज्ञानान्मया कृष्ण रोषोऽय सप्रदर्शित । दमितोऽह हतविपो वशगस्ते वरानन ॥२८ तभी एक भाव और एक देह के ही भिन्न स्वरूप बलराम जी ने क्रोध पूर्वक श्रीकृष्ण से कहा-हे कृष्ण । हे महाबाहो। इस विष रूप शस्त्र वाने नागराज को शोब ही नष्ट कर डालो ॥२१ २२॥ क्योकि यह मनुष्य बुद्धि पाने बलराम जी की बात सुन कर भगवान कृष्ण झटका देवर नागपात से निकल आय ॥२४॥ फिर जल से बाहर निकले हुए कालिय के शिर पर उन्होने एक ला मारी और उसके शिर को नीवा करके उस पर चढ कर नृत्य करने लगे ॥२१ २६॥ इस प्रकार मस्तक पर नाचते हुए उसका मर्दन करने के कारण वालि नाग सतन होरर मुख से रक्त डालता हुआ आत्त स्वर में रहने लगा--हे पण मैं आपको जान नही सका था, इसलिए क्रोध किया था, अब आपके द्वारा दर किया जाने पर मैं विप रहित होकर आपकी शरण में हूँ ॥२७-२८॥
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[ श्री। २६० ] ऊचु. सर्वे च संप्रीता नन्दगोपं यनेचरा.। धन्योऽस्यनुगृहीतोऽसि यस्य ते पुस ईदृशः ॥३७ अद्यप्रभृति गोपाना गवा गोष्ठस्य चानघ । आपत्सु शरण कृष्ण. प्रभुश्चायतलोचनः ।।३८ एव वै विस्मिता. सर्वे स्तुवन्ति कृष्णमव्ययम् । जग्मुर्गोपगणा घोप देवाश्चैत्ररथ यथा ॥३६ इस प्रकार कालियनाग का दमन करके श्रीकृष्ण किनारे पर आगये में सब गोपो ने उन्हें घेर कर उनकी स्तुति की और परिक्रमा करने लगे ॥३' तब हर्ष से विस्मित हुए गोपराज नद से कहने लगे हे गोपराज ' तुम्हारा' इतना महान है, इसलिये तुम कृत्य कृत्य हो ॥३७॥ अब गोपो, गौओ तथा सब ब्रजवासियो को जो सकट उपस्थित होगा, उससे विशाल नेत्र वाले थे हमे मुक्त करेंगे ॥ ३८ ॥ फिर वे सभी व्रजवासी भगवान कृष्ण की ६ करते हुए व्रज मे इस प्रकार पहुंचे, जिस प्रकार देवगण चैत्ररथ वन को प्रर करते हैं ॥३॥ ॥ धेनुकासुर-वध ॥ दमिते सर्पराजे तु कृष्णे तु यमुनाहदे । तमेव चेरतुदेश सहितौ रामकेशवौ ॥१ आजग्मतुस्तौ सहितौ गोधन. सहगामिनी । गिरि गोवद्धन रम्य वसुदेवसुतावुभौ ॥२ गौवद्धं नस्योतरतो यमुनातीरमाश्रितम् । ददृशाते च तौ वीरौ रम्य तालवन महत् ॥३ तो तालपर्णप्रतते रम्ये तालवने रती। चेरतु. परमप्रीतौ वृषपोताविवोढतौ ॥४ स तु देश. सदा स्निा दभप्रायस्थलीभूतः सु कासुर-वध ] [ २६१ तालस्तविपुलस्कन्धरुच्छितः श्यामपर्वभिः। फलाग्नशायामि ति नागहस्तरिवोच्छितः ॥ तय दामोदरो वाक्यमुवाच वदता वरः । अहो तालफलैः पश्वर्वासितेय वनस्थली ।।७ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् ! कालीदह मे उस सर्पराज का दमन हो जाने पर कृष्ण-बलराम दोनो ही आनन्दपूर्वक विचरने लगे ॥१॥ एक दिन वे गौओ को चराते हुए अत्यन्त रमणीक गिरि गोवर्धन पर जा पहुंचे ॥२॥ तय गोवर्धन के उत्तरीय यमुना किनारे पर उन्हे अत्यन्त रमणीफ सरोवर दिखाई दिया ॥३॥ उद्धत गोवत्स के समान अत्यन्त सुन्दर वे दोनो भाई ताल- पत्रो से आवृत्त उस तालवन मे विचरण करने लगे ।।४॥ वह स्थान समतल, स्वच्छ और कुशाओ से युक्त था, वहां की काली मिट्टी यो और परड-पत्थर राकही नाम नहीं था ॥५५काली गांठो वाले अत्यन्त ऊंचे तालवृक्ष हारियो की सूड जैसे लम्बे थे और उन पर ताल फल लद रहे थे ॥६॥ वाक् चतुर श्रीकृष्ण ने बलराम जी से वहा- इन पके हुए फलो की सुगन्ध सम्पूर्ण वन मे फल रही है ॥७॥ स्वादून्यार्य सुगन्धीनि श्यामानि रसवन्ति च । पक्वतालानि सहितौ पातयावो लघुक्रमी ।। यद्यपामीदृशो गन्धो माधुर्यघ्राणतर्पणः । सेनामृकल्पेन भवितव्य च मे मनि. ॥ दामोदरवच. श्रुत्वा रोहिणेयो हसन्निव । तयन्पक्कतालानि चालयामास तास्तरून् ॥१० त्तुि तालवन नृणामसेव्य दुरतिक्रमम् । नर्माणभूतमिरिण पुरपादालयोपमम् ।।११ तारुणो धेनुको नाम दैत्यो गर्दभरूपवान् । परयूथेन महता वृतः समनुसेवते ।।१२ 1 तु तालवन घोरं गर्दभ. परिरक्षति । पक्षिश्वापदगणा यासयान: सुदुर्मत्ति. ॥१३ २६२ } [ श्री हरिवशपुरान तालशब्द स त श्रुत्वा सघुष्ट फलपातनात् । नामर्पयत्स सक दस्तालस्वनमिव द्विप ११४ जब इनकी सुगध से ही नासिका तृप्त हो रही है, तो यह भी उ समान अत्यन्त स्वादिष्ठ होंगे। इसलिये हम इन अत्यन्त स्वानि सुगाड़ सुरम्य फ्लो को वृक्षों से झडा लें ॥८६॥ श्रीकृष्ण को आत सुन कर मुस्कराने हुए बलराम जी ने उन वृक्षो को हिला हिला कर बहुत-से पके हुए ताल पर परिवी पर गिरा लिये 1 उस वन में मनायो को जाना भी समय नहीं वह प्रलम्बासुर-वध ] [ २६३ सा भूर्गदभदेहेश्च तालः पक्वश्च पातितः । वभासे छन्नजलदा द्यौरिवाव्यक्तशारदी ॥२२ जिधर में फलो के गिरने की ध्वनि हुई थो, वह उधर ही अत्यन्त वेग- पूर्वक दौड़ा । उसकी रोमावली खड़ी हो गयी और नेत्र स्तब्ध हो गये, अपने बुरो से पृथिवी को कुरेदता हुआ बारम्बार चीत्कार कर रहा या ॥१॥ उसने पमराज के समान मुख फैला रखा था और वह पूछ उठाये हुए वही जा पहुंचा जहाँ बलराम जी तालवृक्ष के नीचे खडे थे। वहां पहुंचते ही वह उन्हें दांतों से पाटने लगा ।।१६-१७॥ फिर उसने बलराम जी पर दुलत्ती झाडने के लिये जैसे ही पर उठाये, उन्होने उस परों को पकड कर घुमाया और तालवृक्ष के ऊपर दे मारा॥१८-१६। जिससे उम्, कटि, ग्रीवा, पीठ आदि भग्न हो गये, उसका मुख वैकृत हो गया और वह अनेको तालफ्लो के सहित घराशायी हो गया ॥२०॥ जव धेनुकासुर मर कर चेप्टाहीन हो गया, तव उसके आक्रमणकारी साथियो की ही बलराम जी ने उसी के समान गति वनाई ॥२॥ मरे हुए गपों और झड़े हुए फलो से वह स्थान मेघमय शरलालीन आकाश जैसा प्रतीत होने लगा ॥२२॥ ॥ प्रलम्बासुर-वध ॥ अथ तो जातहों तु वसुदेवसुतावुभौ । तत्तालवनमुत्सृज्य भयो भाण्डीरमागतौ ॥१ चारयन्तौ विवृद्धानि गोधनानि शुभानि च । स्फीतसस्यप्रटानि वीक्षमाणौ वनानि च ॥२ क्ष्वेडयन्तौ प्रगायन्ती प्रचिन्वन्तौ च पादपान् । नामभिाहरन्ती च सवत्सा गाः परंतपो ॥३ नियोगपाश रासक्तैः स्कन्धाभ्यां शुभलक्षणौ । वनमालाऽऽकुलोरस्को बालशृङ्गाविवर्षभो ॥४ सुवर्णाजनचूर्णाभावन्योन्यसदृशाम्बरौ । महेन्द्रायुधसंयुक्तो शुक्लकृष्णाविवाम्बुदो ॥५ कुशाग्रकुसुमानां च कर्णपूरी मनोरमौ । वनमार्गेपु कुर्वाणो वन्यपधरावुभौ ॥६ ! २६४ ] [ श्री हरिवरापुराम गोवर्द्धनस्यानुचरौ वने सानुचरौ तु तो। चेरतुलॊकसिद्धाभिः क्रीडाभिरपराजितौ ॥७ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् ! फिर कृष्ण-बलराम प्रसन्न होकर उस वन से भाण्डीर बन मे जा पहुंचे ॥१॥ वहां से गायों को पराते, वन को शोमा देखते, हाथ झटकते, गीत गाते, पुष्प चुनते और कभी गौओ और बदों का नाम ले-लेकर पुकारते थे ॥२-३॥ उनके हृदय पर वनमालाएं पडी थी और कन्यो पर छींके रखे हुए थे, इसलिए वे सींग उठते हुए नये बछडों के समान लग रहे थे ॥४॥ उनमे से एक पीताम्बर धारण किये और दूसरा नीलाम्बर धारण किये था, उन दोनों को देह पर वे वस्त्र अत्यन्त आकर्षक प्रतीत होते थे। उस समय वे काले और श्वेत वर्ण के मेघो के समान तथा कुश-पुष्पों के आभू पण धारण किये हुए वनवासी-वेश मे सुशोभित थे ।।५-६॥ सभी ग्वाल बाल को साथ लिये हुए वे दोनों भाई इस प्रकार क्रीडा करते हुए समय व्यतीत कर लगे ॥७॥ तयो रमयतोरेवं तल्लिप्सुरसुरोत्तमः । प्रलम्बो द्यागमत्तत्र च्छिद्रान्वेषी तयोस्तदा ॥ गोपालवेषमास्याय वन्यपुष्पविभूपित. । लोभयान. स तौ वीरौ हास्य क्रीडनकस्तथा [14] सोऽवगाहत नि शकस्तेषा मध्यममानुष. । मानुष वपुरास्थाय प्रलम्बो दानवोत्तमः ॥१० प्रक्रीडिताश्च ते सर्वेसह तेनामरारिणा । गोपालवपुप गोपा मन्यमानाः स्वबान्धवम् ॥११ सतु च्छिद्रान्तरप्रेप्सुः प्रलम्बो गोपतां गतः । दृष्टि प्रणिदधे कृष्णे रोहिणेये च दारुणाम् ।।१२ अविपह्य ततो मत्वा कृष्णमद्भुतविक्रमम् । रोहिणेयवधे यलमकरोद्दानवोत्तमः ।।१३ हरिणाक्रीडितं नाम वालक्रीडनकं ततः । प्रक्रीडितास्तु ते सर्वे द्वौ द्वो युगपदुत्पतन् ॥१४ प्रलम्बासुर वध ] [ २६५ वमी दैत्य-श्रेष्ठ प्रलम्ब वन-पुप्प धारण किये गोप-वेश में उनके पास या और अनेक प्रकार के हास-परिहास युक्त कौनुकों से उन्हें हपित करने गा। इस प्रकार वह शीघ्र ही उन ग्वाल-बालो में मिल गया, क्योंकि प-वालको ने उसे भी अपने जैसे वेश में देखकर ग्वाला ही समझा था ॥१०. • १॥ घर दस्य श्रीकृष्ण-बलराम पर दृष्टि जमाये हुए ववसर की प्रतीक्षा करने लगा, परन्तु कृष्ण को अपने सामथ्यं से बाहर देस कर उसने बलराम को मारने का इच्छा को ।।१२-१३।। फिर हरिणाद्रीड नामक खेल करते हुए हा-दो ग्यानबाल एक साथ मटे हुए ॥१४॥ कृष्ण थीदामसहित पुप्लुवे गोरमुन्ना। सकर्यणस्तु प्लुतवान्प्रलम्येन सहानघ ।।१५ गोतालास्त्वपरे द्वन्द्वं गोपालरपरैः सह । प्रद्रता लंघयन्तो वै तेऽयोन्य लघुविक्रमाः ॥१६ श्रीदाममजयकृष्ण. प्रलम्ब रोहिणीसुतः । गोपाल कृष्णपक्षीयर्गोपालास्त्वपरे जिताः ॥१७ ते वाहयन्तस्त्वन्योन्य महोत्सहमा द्रुताः। भाण्डीग्स्कन्वमुद्दिश्य मर्यादा पुनरागमन् ॥१८ सक्रर्पण तु स्कन्धेन शोनमुत्क्षिप्य दानवः । द्रुत जगाम विमुख सचन्द्र इव नोयदः ॥१६ स भारममहम्नस्य रोहिणेयम्य धीमत. । ववृधे सुमहामाय. शक्राकान्त इवाम्बुदः ॥२० स भाण्डीरवटप्रव्य दग्धाजनगिरिप्रभम् । स्व वपुर्दर्शयामास प्रलम्बो दानवोत्तम. ॥२१ पञ्चस्तबकयुक्तेन मुफुटेनाकंवर्चसा। दीप्यमानाननो दैत्यः सूर्याक्रान्त इवाम्बुदः ।।२२ महाननो महाग्रीवः सुमहानन्तकोपम । रौद्राः शकटचक्राक्षो नमयंश्चरण महीम् ॥२३ उममें कृष्ण श्रीदामा के माय बलराम प्रलम्ब के साथ और अन्याय [ श्री हरियाणा दण्ड दूर ॥२६॥ श्रीकृष्ण उनके पराक्रम को भली प्रकार जानते थे, इसरिये दातर अपनी अपनी बोट बना पर एक दूसरे से हराने की इच्छा से अना हुए ॥१५-१६। इसमें कृष्ण ने सुदामा को, बलराम ने प्रलम्ब का और दूसर न अपने विपतियों को हरा दिया ॥१७॥ फिर वे एक के क्रम से लदे हुए च' पर उस विशाल वटवृक्ष के नीचे या गये ॥१८॥ सब प्रलम्ब अपन क्धे पर दर राम को चढाये हुए दूतगति से चन्द्रमा युक्त बादल में समान विपरीत दिया । जाने लगा ॥१६॥ फिर वनराम जी के भार को सहने में असमर्थ होकर उपने अपने शरीर को बहाया ॥२०॥ तव उसका शरीर भाण्डीर वट और नौन पवंत समान बहुत विस्तृत हो गया ॥२२॥ अब उस शिर पर सूर्य के समान तेजोमय मुकुट विशार मुख, लम्बी-चौडी ग्रोवा और गाडी के पहिये के समान विशाल नेत्र दिखाई देने लगे जिनके कारण वह साक्षात् यमराज जैसा भय हो गया तथा उसके चरने से पृथिवी नीचे को घसकन लगी ॥२२ २३॥ स सदिग्धमिवात्मान मेने सकर्पणस्तदा । दैत्यस्कन्धगत श्रीमान्कृष्ण चेदमुवाच ह ॥२४ ह्रियेऽह कृष्ण दैत्यन पवतोदग्रवर्मणा । प्रदशयित्वा महती माया मानुपरूपिणीम् ॥२५ कथमस्य मया कार्य शासन दुष्टचेतस । प्रलम्बस्य अनुदस्य दद्विगुणवर्चस ॥२६ तमाह सस्मित कृ ण साम्ना हाकुलेन च। अभिज्ञो रोहिणेयस्य वृत्तस्य च बलस्य च ॥२७ महोऽय मानुपो भावो व्यक्तमेवानुपाल्यते । यस्त्व जणन्मय देव गुह्याद्गुह्यतर गत ॥२८ स्मर नारायणात्मान लोकाना त्व विपर्यये । अवगच्छात्मनात्मान समुद्राणा समागमे ॥२६ यह देख कर उसके कंधे पर बैठे हुए बलराम जी ने श्रीकृष्ण से कहा हे कृष्ण । यह पर्वत के समान दैत्य मनुष्य रूप में आकर मुझे लिये जा रहा है। ॥२४-२५।। इसका शरीर भी दप से द्विगुणित हो गया है, अब इसे किस प्रकार लम्बासुर वध [ २६७ ने मन्द मुमकान के सहित बहा है थायं । आप यह मानव-माय क्यो संत कर रहे हैं ? यथार्य मे तो बाप जगदीश्वर यौर विश्वमय मूक्ष्म से भी परमात्मा हैं ॥२७-२८॥ प्रलयकाल के उपस्थित होने पर आप समुद्र । हैं, अपने उसी नारायण रूप की याद करिये ॥२६॥ पुरातनाना देवाना ब्रह्मण सलिलस्प च । आत्मवृत्तप्रमावाणा सस्मराद्य च वै पुन. ॥३० ययाऽहमपि लोकाना तथा त्व तच्च मे मतम् । उभावकारीरी स्वी जगदथें द्विधा कृती॥३१ लोकाना शाश्वतो देवस्त्व हि शेप सनातन । आवयोःहमारेण द्विधेद धार्यते जगत् ।।३२ यह य स भवानेव यस्त्व सोऽह सनातन । द्वावेव विहितो हावामेक देही महारलौ ११३३ ददास्से मूढवत्त्व कि प्राणेन जहि दानवम् । मूनि देवरिपु देव वज्जकल्पेन मुष्ठिना ॥३४ सभी देवगण, ब्रह्माजी तथा जलादि पदार्थ मापने ही रूप हैं, इस बात । मत भूलिये ॥३०॥ ससारी मनुष्यों के लिये मैं और आप एक ही हैं, हम नौ भिन्न नहीं हैं विश्व का कल्याण करने के लिये ही हमने दो शरीर धारण ये हैं ॥३१॥ आप सभी लोकों के समान देव शेप हैं और हमने एक ही देह दो माग करके इम विश्व को धारण किया हुआ है ॥३२॥ जो बाप हैं, दही हूँ, हम दोनों एक शरीर के ही दो अग हैं ॥३३॥ ऐमा स्मरण करके आप पनी वच्च के समान मुपिका के प्रहार से इस पापो का मस्तक तोह दीजिये ॥३४॥ संस्मारितस्तु कृष्णेन रोहिणेय पुरातनम् बलेनापूर्यत तदा लोक्यान्तरचारिणा ॥३५ तत प्रलम्ब दुवृत्त वुवुधे स महाभुज । मुष्टिना वज्रकल्पपेत मूनि चन समाहनत् ।।३६ । तस्योत्तमाङ्ग स्वे काये विक्पाल विवेश ह। जानुभ्या चाहत शेते गतासुर्दानवोतम ॥३७ । २६८ ] [ यो हरिवपुराण जगत्या प्रितीर्णस्य तस्य रूपमभूत्तदा । प्रलम्स्याम्घरस्थस्य मेघस्यव विदीयंत १३८ सनिहत्य प्रलम्व तु सह य वलमात्मन पयष्वजत व कृ ण रोहिणेय प्रतापवान् ॥३६ त तु कृष्णश्च गोपाश्च दिविस्थाश्च दिवौरस । तष्ठ वुनिहते दैत्ये जयाशीभिर्मावलम् ॥४० बलेनाय हतो दैत्यो वालेनाक्लिष्ठक्रमणा। विवदन्त्यशरीरिण्यो वाच सुरसमीरिता ॥४१ बलदेवेति नामास्य देवरुक्त दिवि स्यिते । बल तु बलदेवस्य तदा भुवि जना विदु । प्रनम्वे निहते दैत्ये देवैरपि दुरासदे ॥४२ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् । श्रीकृष्ण द्वारा स्मरण कराये जाने पर बलराम जी की देह मे महान बल वृद्धि हो गई ॥३५॥ फिर बलराम जी ने प्रलम्ब के गिर पर अपनी वज्र के समान कठोर मुष्टिका से प्रहार किया ॥३६५ मुक्का लगने ही उमका मस्तक शरीर के भीतर घुस गया और उनकी सात के प्रहार से उसका जीवन समाप्त हो गया ॥३७॥ उस समय पृथियो पर लेटा हुआ वह दैत्य आकाशस्थ मेघ जैसा सुशोभित हो रहा या ॥३२॥ इस प्रकार प्रलम्ब को मार कर प्रतापो दलराम जी श्रीकृष्ण के पाम आये। उस समय श्रीकृष्ण ने उनका आलिंगन किया और सभी गोप तथा आकाश मे स्थित देवता उनकी जर बोलते हुए स्तुति करने लगे ॥३६ ४०॥ असाधारणकर्मा बबरामजी ने दैत्यों को मार डाला इस प्रकार को चर्च देवगण परस्पर कर रहे थे ॥४१॥ देवताओं द्वारा न मारा जा सकने वाला वह देरय बलराम जी के द्वारा मारा गया था इसीलिये देवताओं ने बलदेव' नाम से प्रति किया और तभी से सभी ससारीजन उन बल और प्रभाव को जान गये ॥४२॥ ॥ गोपो द्वारा इन्द्रोत्सव कथन ॥ तयो प्रवृत्तयोरेव कृष्णस्य च वलस्य च । वने वचरतार्मासो व्यतियाती स्म वापिको ॥१ गोप! द्वारा इद्रोरमव कथन ] [ २६६ व्रजमाजग्मतुस्ती तु व्रजे शुथ वतुस्तदा । प्राप्त शक्रमह वीरौ गोगश्चोत्सवलारासान् ।।२ कौतूहलादिद वाक्य कृष्ण प्रोवाच तर तान् । कोऽय शक्रमहो नाम येन वो हर्प आगत ॥३ तन वृद्धतमस्त्वेको गोपो वाक्यमुवाच ह । श्र यता तात शक्रस्य यदर्थ ध्वज इज्यते ॥४ देवानामीश्वर शक्रो मेघाना चारिसूदन । तस्य चाय मख कृष्णलोकनाथस्य शाश्वत ॥५ तेन सचोदिता मेघास्तस्य चायुधभूपिता । तस्यैवाज्ञाकरा सस्य जनयन्ति नवाम्बुभि ॥६ वैशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् । इस प्रकार वन मे विचरण करते ए कृष्ण बलराम के वलीन दो मास व्यतीत हो गये ॥१॥ फिर उहोंने ज मे आर सभी गोपो को इन्द्र पूजन महात्मद की तैयारी करते हुए देखा |२|| तब श्रीकृष्ण ने उनसे पूछा-आप जिस इन्द्र पूजन के लिये इतने त्साहित हो रहे हैं. वह इन्द्र पूजन कैसा है ? ॥३॥ यह सुनकर एक वृद्ध प ने कहा-इन्द्र-पूजन का विधान सिलिये है यह बात तुम्हें बताता हूँ नो ॥४॥ इन्द्र सभी देवताओ और मेघो के अधिपति हैं, उन्ही के पूजन 'नये यह उत्सव हो रहा है ।१५।। उन्हीं की प्रेरणा से मेघ जल वृष्टि करते हुए न्न को बढाते हैं ।।६।। मेघस्य पयसो दाता पुरुहूत पुरदर । सप्रहृष्टस्य भगवान्प्रीणयत्यखिल जगत् ।।७ तेन सम्पादित सस्य वयमन्ये च मानवा । महोत्सव प्रयुज्जानास्तर्पयामश्च देवता ॥ मण्डयतीव देवेन्द्रो विश्वमेव नभो घने । क्वचिच्छीकरमुक्ताभ कुरुते गगन घन ॥६ एवमेतत्पयो दुग्ध गोभि सूर्यस्य वारिद । पर्जन्य सर्वभूताना भवाय भुवि वर्षति ।।१० - । यो हरिवशपुरा यस्मात्प्रावृडियं कृष्ण शक्रस्य भुवि भाविनी । तस्मात्प्रावृषि राजानः सर्वे शक मुदा युताः । महै. सुरेशमर्चन्ति वयमन्ये च मानवाः ।।११ वे मेघ इन्द्र के आज्ञाकारी होकर उन्ही से जल प्राप्त करते हैं । जब इन्द्र प्रसन्न हो जाते हैं तब वे सब ब्रह्माण्ड को तृप्त करते हैं ॥७॥ उन्ही कसे कृपा से अन्न उपजता है और हम सभी देहधारी उमी के द्वारा जीवन धारण करते हैं, इसी लिये इस महोत्सव द्वारा हम उन्हे प्रसन्न किया करते हैं ॥८॥ उन्ही इन्द्र के प्रभाव से आकाश मण्डल मेघो से आच्छादित होकर जलरूपी दुग्ध से पृथिवी को सम्पन्न करता है ॥६-१०॥ इन्द्र द्वारा वृष्टि करने के कारण ही सब राजागरण आनन्दपूर्वक इन्द्रोत्सव मनाते हैं, हम भी उसी परमरा के कारण इसका आयोजन कर रहे हैं ॥११॥ ।। श्रीकृष्ण का गोवर्धनोत्सव ॥ गोपवृदस्य वचन श्रुत्वा शक्रपरिग्रहे । प्रभावज्ञोऽपि शकम्य वाक्य दामोदरोऽग्रवीत् ॥१ वयं वनचरा गोपा. सदा गोधनजीविनः । गावोऽस्मद्देवतं विद्धि गिरयश्च वनानि च ॥२ पपंयाणा कृषिवृत्ति. पण्यं विपणिजीविनाम् । गावोऽस्माकं परा वृत्तिरेतत्त्रविद्यमुच्यते ॥३ विद्यया यो यया युक्तस्तस्य सा देयत परम् । संव पूज्याऽचनीया प संव तस्योपकारिणी । योग्यस्य फलमश्नानः करोत्यन्यस्य सस्कियाम् ॥४ दावनधी स लभते प्रेत्य चेह घ मानवः । पृप्यन्ता प्रथिता सीमा सीमान्त प्रथित वनम् ॥५ यनान्ता गिरयः सर्वे सा पास्मान गतिघ्रंथा। धू यन्ते गिरयश्यापि पने स्मियामरूपिणः ॥ प्रविश्य सारनाम्तनयो रमन्ते स्वेषु सानुपु ॥६ श्रीकृष्ण का गोवधनो सव ] ३०१ ] भूत्वा केसरिण सिंहा व्याघ्राश्च नसिना वरा । वनानि स्वानि रक्षन्ति पासयन्तो वनच्छिद ॥ यदा चपा विकुर्वन्ति ते वनालयजीविन । घ्नन्ति तानेव दुर्वृत्तान्योरपादेन कर्मणा ॥८ वंशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् इद्र के प्रभाव को श्रीकृष्ण मी मले प्रकार जानते थे, परन्तु उस वृद्ध की बात सुनकर उहोंने कहा-हमारी जीविका तो गोधन से चलती है, इसलिये हमार देवता भी पवत, वन चौर गौर ही हैं ॥१२॥ यको की जीविका सेतो से और वैश्यों की जीविका व्यापार से है वैसे हा हमारी जीविका का साधन गोधन है। विद्या-साधक का विद्याही आराध्य है और वह उसी का पूजन करता है । अथवा जो लोग किसी एक देवता के द्वारा जीविका गप्त करक अन्य देवता का पूजन करते हैं, उह इहलोक और परलोक दोनों म ही सुख नही मिलता । कृपि की सीमा खेत है, खेत की सीमा वन योर वन की सीमा पवत है, इसलिये पवंत ही हमारी गति है । व पवंत ही इच्छानुसार विविध एपों को धारण कर व दराओ म विचरते रहत हैं ॥३६॥ वे कभी सिंह और भी व्याघ्र का रूप धारण कर वनों को नष्ट करन वाले जीवों को हराते हुए नों की रक्षा करते हैं ॥७॥ वनों मे विघ्न उपस्थित करने वाले दुराचारिया को राक्षस के समान कर वन फर समाप्त कर देत है ।।८॥ मन्तयज्ञपरा विप्रा सीतायज्ञाश्च कर्पका । गिरियज्ञास्तथा गोपा इज्योऽस्माभिगिरिवने 18 तन्मह्य रोचते गोपा गिरियज्ञ प्रवर्तताम् । कर्म कृत्वा सुखस्याने पादपेप्वथ वा गिरी ॥१० तत हत्वा पशून्मेध्यान्वितत्यायतने शुभे । सर्वघोपस्य सदोह क्रियता किं विचार्यते ।।११ त शरत्कुसुमापीडा परिवार्य प्रदक्षिणम् । गावो गिरिवर सस्तितो यान्तु पुनव्रजम् ।।१२ प्राप्ता किलेय हि गवा स्वादुतोयतृणा गण । शरत्प्रमुदिता रम्या गतमेघजलाशया ॥१३
३०२ ]
[ श्री हरिवंशपुराण
प्रियक पुष्पितगौर श्याम वाणासन क्वचित् ।
कठोरतृणमाभ नि निर्मययूररुत वनम् ॥१४
विजला विमला व्योम्नि विवलाका विविध त ।
विवर्द्धन्ते जलधरा विदन्ता इव कुञ्जरा ॥१५
पटुना मेघनादेन नवतोयानुकर्षिणा ।
पर्णोत्करघना सर्वे प्रसाद यान्ति पाटपा ॥१६
सितवर्णाम्बुदोष्णीष हसचामरवीजितम् ।
पूर्णचन्द्रामलच्छत्र साभिषेकमिवाम्बरम् ||१७
ब्राह्मण म त्रयज्ञ और कृपक हल के अग्रभाग से कृषि यज्ञ करते हैं तथा
हम गोपो को गिरियज्ञ का विधान है, इसलिये हमे वही करना चाहिये ।
मेरे मत मे तो गिरियज्ञ का आयोजन कर पवित्र वलि आदि के द्वारा पर
फा पूजन करिये व्यर्थ समय व्यतीत नही करना चाहिये कहिये आपका कर
विचार है | ॥१० ११॥ शरद ऋतु के पुष्पो की माला से सुशोभित गौओं
द्वारा गिरिराज की परिक्रमा करके उन्हें वनों मे घरने के लिये छोड दीजिये
॥१२॥ अब शरद् ऋतु आगई है जल, तृण आदि स्वादिष्ट होगये, आकार
स्वच्छ होगया और धरती का जल सूखने लगा है ॥१३॥ वनस्थली भी कद
म्बादि पुष्प गुच्छो से परिपूर्ण हैं घास परिपक्व होगई हैं और वनो में मोरे
की बोली सुनाई नही देती है ॥१४॥ जल, वन और बिजली से विहीन मे
विना दांत के हाथी के समान आकाश मे घूम रहे हैं ॥१५॥ नवीन जल ।
शोषण करने वाले वृक्ष पत्तो से लद कर फूल उठे है और ऐसा लगता है।
थाकाश बादलो का मुकुट, हसो का चैवर तथा स्वच्च च द्रमा का छत्र धार
करके राज सिंहासन पर बैठा हो ॥१६-१७॥
नून विदशभूयिष्ठ मेघवालसुखोपितम् ।
पतत्यिकेतन देव बोधयन्ति दिवौकस ॥१८
शरद्य व सुसस्याया प्राप्ताया प्रावृप क्षपे ।
नीलचन्द्राक्वर्णश्च रचित बहुभिद्विज ॥१६
[ १०३
श्रीकृष्ण का गोवधनोत्सव ]
फल प्रवालश्च घनमिन्द्रचापधनोपमम् ।
भवनाकारविटप लतापरममण्डितम् ॥२०
विशालमूलावनत पवनाभोगमण्डितम् ।
अर्चयामो गिरि देव गाश्चैव सविशेषत ॥२१
सावतसविपाणश्च वहाँपीडैश्च दशितै ।
घण्टामिश्च प्रलम्बामि पुष्पः शारदिवस्तथा ।।२२
शिवाय गाव पूज्यन्ता गिरियज प्रवर्त्यताम् ।
पूज्यना तिदशै शको गिरिरस्मामिरिज्यताम् ॥२३
कारयिष्यामि गोयज्ञ वलादपि न सशय ।
यद्यस्ति मयि व प्रीतिर्यदि वा सुहृदो वयम् ॥२४
गावा हि पूज्या सतत सर्वेपा नात्र संशय ।
यदि साम्ना भवेत्तीनिर्भवता वैभवाय च ।
एतन्मम दचस्तथ्य क्रियतामविचारितम् ॥२५
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वर्षाकाल में सोये हुए भगवान् विष्णु को सव देवता एकत्रित होकर इसी
समय जगाते हैं ।।१८।। वर्षा समाप्त होकर शरद् ऋतु आगई है, सेतों में अन्न
परिपक्व होगये हैं, विविध वणं के पक्षियों और पुष्पा से सुशोमित पर्वत
इन्द्र धनुप युक्त वादल जैसे दिखाई दे रहे हैं । पर्वत पर वृक्षो की शाखें घर के
समान विस्तृत होकर नीचे तक झुग गई हैं, इसलिये हमे गौओं को सजा कर
! इन पांत देवता का पूजन करना ही उचित है ।।३६-४१॥ अब आप गौओं का
सर्वांग मे विभूषित कर, कठ में घटा आदि धारण करा कर गिरिराज का पूजन
बारम्भ करें। देवता अपने इन्द्र को पूजें और हम रस पर्वत का पूजन करें
1॥१६-२३॥ यदि आप मुझ पर स्नेह करते और मुझे अपना शुभ चिन्तक मानते
हैं तो मेरे आग्रह से आपको यह गोयज्ञ करना होगा ॥२४॥ गौए सदा ही सव
को पूजनीय हैं, यदि आपके मन में कोई सशय न हो तो लोक हित के लिये इस
या को बारम कीजिये ॥२॥
तुम हमारी गति, भक्ति, मति, पर्म और शुभाशुभ जाता, अभयदाता विशिष्ट पराक्रम को देख-देख कर हमे आश्चर्य होता है ॥४॥ देवताको मनुष्यों में बंट हो ।।६।। जैसे दीप्ति, पूर्णता और प्रताप में सूर्य पर सेय। ३०४ ] [ श्री हरिवशपुराण ॥ गोपों द्वारा गोवर्धन पूजन ॥ दामोदरवच श्रुत्वा हृष्टास्ते गोषु जीविन । तद्वागमृतमश्नाना प्रत्यूचुरविशङ्कया ॥१ तवैषा बाल महती गोपाना हर्षवढिनी । प्रोणयत्येव न सर्वान्बुद्धिवं द्धिकरी नृणाम् ॥२ त्व गतिस्त्व रतिश्चैव त्व वेत्ता त्व परायणम् । भयेष्वभयदस्त्व नस्त्वमेव सुहृदा सुहृत् ।।३ त्वत्कृते कृष्ण घोषोऽय क्षेमी मुदितगोकुल । कृत्स्नो वसति शान्तारिर्यथा स्वगं गतस्तथा ।।४ जन्मप्रभृति कर्मेतद्देवरसुकर भुवि । बोद्धव्याच्चाभिमानाच्च विस्मितानि मनासि न ॥५ बलेन च परायेंन यशसा विक्रमेण च । उत्तमस्त्व च मत्ापु देवेष्विव पुरदर ॥६ प्रतापेन च तीक्ष्णेन दीप्त्या पूर्णतयाऽपि च । उत्तमस्त्व च मत्र्येषु देवेष्विव दिवाकर ॥७ वैशम्पायनजी ने कहा- हे राजन् । श्रीकृष्ण के ऐसा रहने पर गोपएन ने पुलक्ति और नि स चित्त से पहा ॥१॥ हे वत्स ! तुम्हारे पथन से । अत्यन्त आनन्दित हुए हैं, तुम्हारे अनुसार चलने पर हमारी वृद्धि ही होगी ।।२। उपकारी गुहृद हो ॥३॥ तुम्हारे ही प्रताप से यह गोपमा और प्रास्व गुप्तो पो भोग रहा है । तुम्हारे दुष्पर कार्यों, असीमित यत, स्वपद वीति हो र घेष्ठ होने के समान ही तुम अपने पराम, यश और वियत स माने पाते हैं, कम ही मनुष्यों में तुम गश्रेष्ठ हो ॥७॥ त्वयामिहित पापय गिरिमन प्रति प्रभो। 'रतन्लवयितुंपत्तो बेलामिव महोदधि ॥
गोपो द्वारा गोवर्धन पूजन ]
[ ३०५
स्थितः शक्रमहस्तात श्रीमागिरिमहस्त्वयम् ।
त्वत्प्रणीतोऽद्य गोपानां गवां हेतो प्रवर्त्यताम् ॥६
भोजनान्युपकल्प्यन्तां पयसः पेशलानि च ।
कुम्भाश्च विनिवेश्यन्तामुदणनेषु शोभनाः ।।१०
पूर्यन्तां पयसा नद्यो द्रोण्यश्च विपुलायताः ।
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च तत्सर्वमुपनीयताम् ।।११
आनन्दजननो घोपो महान्मुदितगोकुलः ।
त्र्यप्रणादघोपैश्च वृपभाणां च गजितैः ॥१२
हम्भारवंश्च वत्सानां गोपाना हर्पवद्ध नः ।
दघ्नो हृदो घृतावतः पय कुल्यासमाकुलः ।।१३
संप्रावर्तत यज्ञोऽस्य गिरेगोभिः समाकुलः ।।१४
हे प्रभो ! तुम्हारा आदेश कभी भी उल्लघन करने योग्य नहीं रहा तो
गिरियज्ञ के तुम्हारे अनुरोध को कोन स्वीकार न करेगा? ।।८। इसलिये,
न्द्र महोत्सव न करने और गोप तथा गोजों के कल्याणार्थ तुमने जिस गिरियक्ष
करने का निर्देश दिया है, वहीं अब आरंभ होगा HEI दूध से भोजन तैयार
रके पीने का श्रेष्ठ जल क्लशों में भर कर रखा जाय ॥१०॥ कल्पित नदियों
के दूध से परिपूर्ण करके सब प्रकार के भक्ष्य, भोज्य और पेय पदार्थ एकत्र
क्ये जाय ॥११॥ ऐसा करने से गोपो और गोओ मे आनन्द छा जायगा और
रही तथा बलो के गर्जन और बछडों के निनाद से व्रजभूमि हपित हो उठेगी ।
ही के सरोवर, घृत के कुए और दूध की कृत्रिम नदियां भर कर अन्नादि का
रु पर्वत बनाया जाय । हे राजन् ! इसके अनुसार सब सामान एकत्र होगया
और गिरियज्ञ का आरम हुआ। कुछ देर में ही वहाँ गोप, गोपियां और गौओं
विशाल समाज दिखाई देने लगा ॥१२-१३-१४॥
तुष्टगोपसमाकीर्णो गोपनारीमनोहरः ।
भक्ष्याणां राशयस्तत्र शतशश्चौपकल्पिताः ।
गन्धमाल्यश्च विविध परच्चावचस्तथा ॥१५
-
[ श्री हरिवरपुर अयाधिशृतपर्यन्ते सप्राप्ते यज्ञसविधो । यज्ञ गिरे स्थिती सौम्ये च गोपा द्विज सह ।।१६ यजनान्ते तदन्न तु पत्पयो दधि चौतमम् । पद्य च मायया कृष्णो गिरिभूत्वा समश्नुते ।।१७ तपिताश्चापि विप्राधास्तुष्टा सपर्णमानसा । उत्तस्थु प्रीतमनस स्वस्ति वाच्य यथासुखम् ॥१८ भुक्त्वा चावभृथे कृष्ण पय पीत्वा च कामत । सतृप्तोऽस्मीति दिव्येन स्पेण प्रजहास वै ॥१६ त गोपा पर्वताकार दिव्यस्रगनुलेपनम् । गिरिमूनि स्थित दृष्ट्वा कृष्ण जग्मु प्रधानत ॥२० भगवानपि तेनैव रूपेणाच्छादित प्रभु । सहित प्रणतो गोपर्ववन्दात्मानमात्मना ॥२१ यज्ञ स्थल के पास ही अग्नि स्थाली, चरम्याली विविध प्रकार के भ६ सुगधित द्रव्य पुष्पमाला और धूप आदि सामग्री एकत्र कर रहदी गई ॥१५॥ फिर शुभ मुहर्त मे गिरियज्ञ आरभ किया गया ॥१६॥ जब यज्ञ काय सम्पन्न होगया तब श्रीकृष्ण ने अपनी माया से गोवर्धन रूप धारण किया और सभी अपित सामग्री का भोग लगाने लगे ॥१७॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो ने भोजन से तृप्त होकर स्वस्ति वाचन किया और गोवधन रूप धारी कृष्ण भी इच्छानुसार भोजन करके दिव्य हँसो हसने लगे ॥१८ गिरिराज रूप धारी कृष्ण को गोपो ने प्रणाम किया तथा कृष्ण रूप से उन्होने भी अपने गिरि रूप को प्रणाम विया ॥२०२१॥ तुमूचुर्विस्मता गोपा देव गिरिवर स्थितम् । भगवस्त्वद्वशे युक्ता दासा कि कुर्म किंकरा ॥२२ स उवाच ततो गोपागिरिप्रभवया गिरा। अद्यप्रभृति ज्योऽह गोषु यद्यस्ति वा दया ॥२३ अह व प्रथमो देव सवकामकर शुभ । मम प्रभावाच्च गवामयुतान्येव भोक्ष्यथ ॥२४ [ ३०० गोपो द्वारा गोवर्धन-पूजन ] शिवश्च दो भविष्यामि मद्भक्ताना वने वने । रस्ये च सह युष्माभिर्यथा दिविगतस्तथा ।।२५ ये चेमे प्रथिता गोपा नन्दगोपपुरोगमा । एपा प्रीत प्रयच्छामि गोपाना विपुल धनम् ॥२६ पर्याप्नुवन्तु क्षिप्र मा गावो वत्ससमाकुला । एव मम परा प्रीतिर्भविष्यति न सशय ॥२७ कया- -हे भगवन ? उस समय विस्मित हुए गोपो ने पवन पर विराजमान देव से निवेदन हम आपके आज्ञाकारी सवक हैं, हम अव क्या करें सो शा फरिये ॥२२॥ तय पर्वत रूपधारी भगवान् बोते-है गोपो । यदि तुम अपनी गौओं के प्रति दया रखते हो तो आज से मेरा ही पूजन करना ॥२३॥ योकि मैं ही तुम्हारे मनोरथो को पूर्ण करने वाला हूँ, मेरी ही कृपा से तुम सख्य गौओ वाले होकर वनो मे विचरोगे ॥२४॥ मैं ही तुम्हारा सब प्रकार से हत करूंगा और स्वर्ग के समान ही यहाँ भी तुम्हारे साय निवास करता हुआ जब गोपो को बहुत सा धन दूंगा ॥२५-२६॥ अव शीघ्र ही मेरे सामने सभी प्रवत्सर गौएँ लाई जायें, जिन्हें देख कर मुथे अत्यन्त आन द होगा ॥२७॥ ततो नीराजनायं हि वृन्दशो गोकुलानि तम् । परिवन गिरिवर सवृपाणि समन्तत ॥२८ ता गाव प्रद्र ता हृष्टा सानोडस्तवकागदा, सस्रजापीडशृङ्गाग्रा शतशोऽथ सहनश .' अनुजग्मुश्च गोपाला कालयन्तो धनानि च। भक्तिच्छेदानुलिप्ताङ्गा रक्तपीतसिताम्बरा ||३० मयूरचित्राङ्गदिनो भुज प्रहरणावृतं । मयूरपत्रवताना केशवन्चे सुयोजितं ।।३१ वभ्राजुरधिक गोपा समवाये तदाऽद्भुते । अन्ये वृपानारुरुहुनु त्यन्ति सतरे मुदा ।।३२ गोपालास्त्वपरे गाश्च जगृहुर्वेगगामिन । तस्मिन्पर्यायनिवृत्तं गवा नीराजनोत्सवे ॥५३ ३०८ ] । यो हरिवर. अन्तर्धान जगामाशु तेन देहेन सोऽचल । कृष्णोऽपि गोपसहितो विवेश वजमेव ह ।।३४ गिरियज्ञप्रवृत्त न तेनाश्चर्येण विस्मिता । गोपा सबालवृद्धा वै तुष्टुवुमधुसूदनम् ॥३५ तदनन्तर भगवान की प्रसन्नता के लिये बैलो सहित सख्य गायें वहाँला गई। उन्होने उस गिरि गोदधन को सब योर से घेर लिया ॥२८॥ दे सकडों हजर सख्यक गोए वनमाला आदि से विभूषित हो रही थी ॥२६॥ उन गौओं को वश में रखने के लिये गोपगण उनक पीछे-पीछे दौडते थे। वे गोप भी सुति द्रव्यों और रग विरगे वस्त्रो से सुसज्जित थे ॥३०॥ वे अपने हाथों में मोर पर्छ के बाभूपण और शस्त्रास्त्र धारण किये थे और उन्होंने अपने देशों में से मोर पस लगा रखे थे ॥३१॥ इस प्रकार असख्य गोपो की उपस्थिति से गए, विजिरासा हो रही थी, 'तो बैलों क जाट गये से बुध मान रहे मौर कुछ भागती हुई गौओ को रोक रहे थे। इस प्रकार गोवधन की परिका कार्य पूण हो जाने पर गिरिराज को वह साक्षात् मूर्ति अन्तर्धान हो गई है। फिर श्रीकृष्ण भी सब गो के साथ व्रज मे लौट आये॥३२ ३३ ३४॥ गिरिया के उस अद्भुत समारोह स आश्चर्यचकित हुए सभी ब्रजवासी भगवान् मधुसून का स्तुति करने लगे ॥३५॥ ॥श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन धारण ॥ महे प्रतिहते जैक सक्रोधस्त्रिदशेश्वर । सावर्तक नाम गण तोयदानामथाब्रवीत् ।।१ भो बलाहकमातङ्गा श्रूयता मम भापितम् । यदि वो मत्प्रिय कार्य राजभक्तिपुरस्कृतम् ॥ एत वृन्दावनगता दामोदरपरायणा । नन्दगापादयो गोपा विद्विपन्ति ममोत्सवम् ॥३ आजीवो य परस्तेपा गोपत्व च यत स्मृतम् । ता गाव सप्तरात्रेण पोड्यन्ता वर्षमास्तै ।
श्रीकृष्ण द्वारा गोवन धारण ] एरावतगतश्चाह स्वयमेवाम्बु दारुणम् । स्रक्ष्यामि वृष्टिं वात च वज्राशनिसमप्रभम् ।।५ भवद्भिश्चण्डवण चरता मारुतेन च । हतास्ता मवजा गावस्त्यक्ष्यन्ति भुवि जीवितम् ॥६ एवमाज्ञापयामास सजिलधरान्प्रभु । प्रत्याहते वै कृष्णेन शासने पाकशासन ॥७ वैशम्पायन जी ने कहा-ह राजन् ! इस प्रकार श्रीकृष्ण द्वारा इद्र ज्ञ के रोग दने से कुपित हुए इन्द्र न सवतकादि मुरय मुम्य मेों को अपने स बुला कर कहा ।।१।। ह मेघगरण | यदि तुममे राजभक्ति हो और मेरी ज्ञा का पालन करन वाले हो तो मरे वचन को सुनो ॥२॥ कृष्णभक्न गोपों वृन्दावन म जाकर मरे यज्ञ नहीं किया है |॥३॥ इसलिये उनके जीवन हिप गौ को सत रात्रि तक जल और आंधी के वग से महा सतप्त करो ४॥ मैं भी अपने ऐरावत पर चढ कर वहीं आ रहा हूं और उस गजनल रोपण वायु तथा वर्षा का भली प्रकार सचालन करंगा ॥५॥ इस प्रकार वर्षां र वायु के प्रकोप से वे सवत्सा गौए विनाश को प्राप्त होंगी ॥६॥ कृष्ण द्वारा न्द्र-यज्ञ न करने पर कुपित हुए देवराज न यह आज्ञा दी ॥७॥ ततस्ते जलदा कृष्णा घोरनादा भयावहा । आकाश छादयामासु सर्वत पर्वतोपमा । विद्य त्सपातजनना शक्र चापविभूपिता तिमिरावृतमाकाश चक्रुस्ते जलदास्तदा ।। गजा इवान्चसयुक्ता केचिन्मकरवर्चस नागा इवान्ये गगने चेरुजलदपुङ्गवा ॥१० तेऽन्योऽन्य वपुपा बद्धा नागयूयायुतोपमा । दुर्दिन विपुल चक्रुश्छादयन्तो नभस्तलम् ॥११ नहस्तनागहस्ताभ्या वेणूना चैव सर्वत । धाराभिस्तुल्यरूपाभिवंयपुस्ते वलाहका १२ बिजली गिरने लगी वे ३१. ] [ श्री हरिवंशपुर समुद्र मेनिरे तं हि खमारूढं नृचक्ष पः । दुर्विगाह्यमपर्यन्तमगाधं दुद्दिनं महत् ।।१३ नवापतन्वै खगमा दुद्र वुमृगजातयः । पर्वताभेषु मेघेषु खे नदत्सु समन्तत ।।१४ तभी वे पर्वताकार भीपण मेघ घोर गर्जन करते हुए आकाश में था गये ॥८॥ तभी सहसा आकाश मे इन्द्र धनुष प्रकट हो गया, और घोर अघकार छा गया ॥६॥ हाथियों के यूथ जैसे, मकराकृति वाले एद सर्प की तरह लहराते हुए मेघ आकाश मे मंडराने लगे ॥१०॥ दस हजार हायियों के झुण्ड के समान एक दूसरे से भिडे हुए मेघ भयकर रूप से बरसने लगे ॥११॥ मनुष्य के हाथ के समान हाथी की सूड जैसी तथा बांस जितनी मोटी जल- धाराओ को गिराने लगे ॥१२॥ उस समय ऐसा प्रतीत होने लगा कि अगाध पर वाला महासागर ही आकाश पर पहुंच गया हो ॥१३।। सब ओर भीषण गर्ज ही सुनाई पडने लगा, आकाश मे एक भी पक्षी दिखाई नहीं देता था और मृर के समूह भयभीत होकर इधर-उधर भाग रहे थे ॥१४॥ नष्टसूर्येन्दुसदृशमधर्नभसि दारुण । अतिवृष्टेन लोकस्य विरूपमभवद्वपु ।।१५ मेघौघनिष्प्रभाकारमदृश्यग्रहतारकम् । चन्द्रसूर्याशुरहितं ख वभूवातिनिष्प्रभम् ॥१६ वारिणा मेयमुक्तेन मुच्यमानेन चासकृत् । आवभौ सर्वतस्तत्र भूतिस्तोयमयी यथा ॥१७ विनेदुर्वहिणस्तत्र तोकवल्परता खगाः !! विवृद्धि निम्नगा याता: प्लवगा. सप्लवं गताः ।।१८ गवा तत्कदन दृष्ट्वा दुर्दिनागमज महत् । गोपाश्चासन्ननिधनान्कृष्ण: कोपं समादधे ॥१६ स चिन्तयित्वा संरब्यो दृष्टोपापो मयेति च । मात्मानमात्मना वाक्पमिद मूचे प्रियंवदः ॥२०
श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन धारण ]
अद्याहमिममुत्पाट्य सकाननवनं गिरिम् ।
कल्पयेयं गवां स्थानं वर्षत्राणाय दुद्धरम् ॥२१
सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्रो के दर्शन भी नहीं थे, इस प्रकार भीषण वर्षा
मे सभी मलीन हो गये ।।१५।। सूर्य, चन्द्रादि के लुप्त होने से आकाश मे अधकार
छा गया ॥१६॥ निरन्तर मूसलाधार वृष्टि होने से पृथिवी सव और जलमयी
दिखाई देने लगी ॥१७॥ नदियो मे वाढ आ गई, सरोवर उमड पड़े और जल
के वेग से नदी किनारे के वृक्ष उखड-उखड कर बह गये ॥१८ वर्षा के कारण
गौओं और गोपो को नष्ट होते देख कर श्रीकृष्ण ने मन ही मन विचार पिया
कि 'वनी के सहित गोवर्धन पर्वत को उखाड़ कर इन सबको इसके नीचे शरण
दी जाय ॥१६.२०-२२॥
अय धृतो मया शैलः पृथ्वीगृहनिभोपमः ।
त्रास्यते सव्रजा गा वै मदृश्यश्च भविष्यति ।।२२
एव सञ्चिन्तयित्वा तु कृष्णः सत्यपराक्रमः ।
बाह्वोर्बल दर्शयिष्यन्समीप तं महीधरम् ।।२४
दो मुसाटयामास कृष्णो गिरिरिवापरः ।
स धृतः सङ्गतो मेगिरिः सव्येन पाणिना 1
गृहमावं गतस्तन गृहाकारेण वर्चसा ॥२४
भूमेरुत्साट्यमानस्य तस्य शैलस्य सानुषु ।
शिलाः प्रशिथिलाश्वेलुविनिप्पेनुश्च पादपाः ।।२५
शिखरघूर्णीमानश्च सीदमानैरच पादपै. ।
विधूतैश्चोच्छितः शृङ्गगम खगमोऽभवत् ॥२६
इस विशाल पर्वत को दूसरी पृथिवी के समान उठा लेने से गौ, गोप,
गोपियां, ग्वाल-वाल आदि सभी सुरक्षित होगे और यह पर्व भी मेरे आधीन
हो जायगा ।।२२॥ हे राजन् ! ऐमा विचार स्थिर कर श्रीकृष्ण ने उस पर्वत को
उखाड़ कर अपने बाए हाथ पर धारण कर लिया, उस समय उसकी सभी गुफाएँ
पर के रूप में हो गई ॥२३-२४ र यो उखाड़ने के समय उसकी शिलाओं के
३१२ ] [ श्री हरिदापुर वधन शिथिल हो जाने के कारण उससे वडी-बडी शिलाएं गिर कर पृथिवी पर छे. लगी ॥२५॥ उसके सब शिखर गिरने लगे तव वह पर्वत श्रीकृष्ण के हाथ में स्थि होकर आकाशगामी पक्षी के समान दिखाई पड़ने लगा ॥२६॥ स मेघनिचयस्तस्थौ गिरि त परिवार्य ह । पुर पुरस्कृत्य यथा स्फीतो जनपदो महान् ॥२७ निवेश्य त करै शैल तोलयित्वा च सस्मितम् । प्रोवाच गोप्ता गोपाना प्रजापतिरिव स्थित ।।२८ एतद्देवैरसभाव्य दिव्येन विधिना मया। कृत गिरिगृह गोपा निर्वात शरण गवाम् ।।२६ क्षिप्र विशन्तु यूथानि गवामिह हि शान्तये । नितेिषु च देशेषु निवसन्तु यथासुखम् । यथाश्रेष्ठ यथायूथ यथासार यथासुखम् ॥३० विभज्यतामय देश कृत वर्षनिवारणम् । शैलोत्पाटनभूरेषा महती निर्मिता मया ॥३१ पञ्चक्रोशप्रमाणेन क्रोशकविस्तरो महान् । बैलोक्यमप्युत्सहते 'रक्षितु कि पुनव्रजम् ॥३२ तत किलकिलाशब्दो गवा हम्भारवै सह । गोपाना तुमुलो जज्ञ मेघनादश्च बाह्यत ॥३३ जिस प्रकार कोई नगर जनपद से घिरा होता है, उसी प्रकार वह पर मेषो से घिरा हुआ था ॥२७।। उस समय पर्वत को हाथ पर रखे श्रीकृष्ण ने मुस्करा कर गोपों से वहा-हे गोपो । मैंने इस पर्वत को गौओ को रक्षा के लिये ही पर के समान बना दिया है। इस कार्य से करने में देवता भी समर्थ नहीं है ॥२८ २६॥ अब तुम दीघ्र ही सब के लिये यथा योग्य स्थान निर्दिष्ट करो इस पर्वत को उखाट पर मैंने बोस भर पौडा और पांच पोत सम्या स्थान बना दिया है । इसमें ब्रज तो या तीनों लोकोमो रक्षा भी निहित है ॥३०-३१-३२।। भगवान् की बात सुन कर गोपो और गौओं ने हपंप्वनि को गुन पर मेप भी भीपण एप से गर्जने लगे ॥३३॥ सर्व रस
वृष्ण द्वारा गोरधन धारण ]
[ ३१३
प्राविशन्त ततो गावो गोप'थप्रकल्पिता ।
तम्य श नम्य विपुल प्रदर गह्वरोदरम् ।।३४
कृष्णोऽपि मूले शैलम्य शैलस्नम्म इवोन्ति ।
दवारकेन हम्तेन शैल प्रियमिवातिथिम् ।।३५
ततो व्रजम्य भाण्टानि युक्तानि शक्टानि च ।
विविशुर्वपमीनानि तद्गृह गिरिनिर्मितम् ॥६
अनिदेव तु कृष्णम्य दृष्ट्वा तत्कर्म वतनन् ।
मिथ्याप्रतिज्ञो जलदान्वाग्यामाम वै विभु ॥३७
सप्तराने तु निवृत्ते धरण्या विगतोन्सव ।
जगाम सवृतो मेघवहा स्वर्गमुत्तमम् ॥३८
निवत्ते सप्नग तु निष्प्रयत्ने शतकती।
गता विमले व्योम्नि दिवसे दीप्नभाम्बरे ॥३६
गावस्तेनैव मार्गेण परिजग्मुर्गतश्रमा ।
म्य च स्यान ततो घोप प्रत्ययान्पुनरेव स ॥४०
कृगोऽपि त गिरियष्ठ स्वम्याने स्थावरात्मवान् ।
प्रीतो निवेशयामाम शिवाय वरदो विभु ॥४१
पिर उस पर्वत के नीचे गौओंके धुण्ड के घुण्ड सहे कर दिये गये ।।३४॥
पापाण निर्मित स्वम के समान उन अत्यन्त चे याकार वाले भगवान् ने उस
पर्वत को प्रिय अतिथि के ममान ऊँचा उठा लिया ॥३५॥ उसी पदंत के नीचे
गोगों के वर्तनादि से लदे हुए छक्हे खरे कर दिय गये ॥३६।। जब इद्र की
प्रतिना ध्यर्थ हो गई और उमन कृष्ण के असम्भव कार्य को देना तो मेघों को
जल-वृष्टि से रोक दिया ॥३७॥ एक सप्ताह पूरा होन पर विफल मनोरय हुए
इन्द्र मेघों को साथ लेकर अपने लोक को गय ॥१८॥ मेघों के हटन से आकाश
स्वच्छ हो गया यौर भगवान्.मावर प्रकाशित होन लगे। गौओं का सरट दूर
हुआ और वे पर्वत के नीचे से निकल वाई । जब गोपों न देखा कि सस्ट टल
गया है, तब व अपन अपन स्थान पर जा पहुँचे ।।३६.४०॥ तदन तर भगवान्
श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर गोवर्धन पर्वत को फिर री म्यान पर स्थापित कर
दिया ॥४॥
३१४ ]
[ थी हरिवंशपुरास
शक
।। श्रीकृष्ण का गोविन्द पद पर अभिषेक ।।
धृत गोवर्द्धन दृष्ट्वा परित्रात गोकुलम् ।
कृष्णस्य दर्शन शो रोचयामास विस्मित ॥१
स निर्जलाम्बुदाकार मत मदजलोक्षितम् ।
आरुह्य रावत नागमाजगाम महीतलम् ।।२
स ददर्शोपविष्ट व गोवर्द्ध नशिलातले।
कृष्णमक्लिष्टकर्माण पुरुहूत पुरदर ॥३
त वोक्ष्य वाल महता तेजपा दीप्तमव्ययम् ।
गोपवेषधर विष्णु प्रीति लेभे पुरन्दर ॥४
त साम्बुजलदश्याम कृष्णा श्रीवत्सलक्षणम् ।
पर्याप्तनयन
सर्व त्रैरुदक्षत ॥५
दृष्ट्वा चन श्रिया जुष्ट मत्यलोकेऽमरोपमम् ।
साविष्ट शिलापृष्ठे शक्र स वीडितोऽभवत् ।।६
तस्योपविष्टस्य मुख पक्षाभ्या पक्षिपुङ्गव ।
अन्तर्दान गतश्छाया चकारोरगभोजन ॥७
वैगम्पायन जी ने कहा-हे राजन् । श्रीकृष्ण द्वारा गोवधन धारण और
व्रज रक्षण होने के काम स विस्मित हुए इद्र ने उनके दशन करने की इच्छा
को फिर वे अपने मत ऐवत पर आड होकर पृथिवी लोक में
आ पहुचे ॥२॥ वहां जाकर उ होने देखा गोर बालक ये वेश मे अत्य त तेजस्वी
श्रीकृष्ण गिरि गोवधन में एक निजन प्रदेश म विराजमान हैं ।।३।। उन अत्यन्त
सेजस्वी ग्वाल बालक रूप वाले श्रीकृष्ण को देखकर इन्द्र को बडा पान
हुआ ॥४॥ जलयुक्त मेघ के समान श्याम और हृदय पर धीवत्स चिह्न धारण
यि श्रीकृष्ण में उहोंने अपने सहस्र नेत्रों से दशन दिये ॥५पृथिवी के एक
गिला-तण्ड पर विराजमान उन अत्य त शोभा सम्पन को देखकर अस्यत
सजित हो उठ | उन सय अदा पो दोना पर फैसा ।
धीकृष्णक मस्तर पर छाया री हुई थी॥७॥
[ ३१५
श्रीकृष्ण का गोविन्द पद पर अभिषेक ]
स विविक्ते वनगतं लोकवृत्तान्ततत्परम् ।
उपतस्थे गज हित्वा कृष्ण बलनिपूदनः ।।
स समीपगतस्तस्य दिव्यनगनुलेपनः ।
रराज देवराजो 4 वज्रपूर्णकरः प्रभुः ।।
किरीटेनाकंतुल्येन विधुदुद्योतकारिणा।
कुण्डलाभ्यां स दिव्याभ्या सततं शोमिताननः ।।१०
पञ्चस्तवकलम्बेन हारेणोरसि भूपितः ।
सहस्रपत्रकान्तेन देहभूपणकारिणा ।
ईक्षमाणः सहस्रण नेत्राणां कामरूपिणाम् ।।११
त्रिदशज्ञापनार्थेन मेघनिर्घोपकारिणा ।
अय दिव्येन मधुरं व्याजहार स्वरेण तम् ॥१२
कृष्ण कृष्ण महावाही ज्ञातीनां नन्दिवर्द्धन ।
अतिदिव्यं कृतं कर्म त्वया प्रीतिमता गवाम् ।।१३
मयोत्मृप्टेपु मेघेषु युगान्तावर्तकारिपु ।
यत्वया रक्षिता गावस्तेनास्मि परितोपितः ।।१४
लोक-रल्याण में लगे हुए भगवान् को एकान्त मे बैठे देखकर वनमाल
धारण किये, अनुलेपन लगाये, हाथ में बच्च ग्रहण क्येि, शीश पर विद्युत का
मुकुट पहिने, कानो में कुण्डल और हृदय पर हार से विभूपित हुए इन्द्र ने
भगवान् के पास जाकर बस्पात मधुर वाणी मे उनसे कहा ।।८-१२।। है कृष्ण !
हे महावाहो ! हे स्वायदो के आनन्दवर्धक घनश्याम ! जब मेरे आदेश पर
मेघो ने जल प्रलय को, तब तुमने असाधारण कार्य कर दिखाया, जिमके कारण
में तुम पर बहुत प्रसन्न हुमा हूँ॥१३-१४॥
स्वायंभुवेन योगेन यश्चायं पवंतोत्तमः ।
धृतो वेश्मवदाकाशे को ह्य तेन न विस्मयेत् ॥१५
प्रतिपिद्ध मम महे मयेयं रुपितेन वै ।
सीतवृष्टिः कृता कृष्ण गवां व साजरात्रिको १६
7 ३१६ ] [ श्री हरिवशपुराण सा त्वया प्रतिषिद्धेय मेघवृष्टिर्दुरासदा । देव सदानवगणैर्दु निवार्या मयि स्थिते ।।१७ अहो मे सुप्रिय कृष्ण यत्त्व मानुपदेहवान् । समग्र वैष्णव तेजो विनिर्गु हसि रोषित ॥१८ साधित देवताना हि मन्येऽह कार्यममव्ययम् । त्वयि मानुष्यमापन्ने युक्ते चव स्वतेजसा ।।१६ सेत्स्यत सर्वकार्यार्थो न किंचित्परिहास्यते । देवाना यद्भवान्नेता सव कार्यपुरोगम ॥२० अपन स्वय उत्पन्न किय हुए योग से पर्वत को उठाकर उसके नीचे पर बनाने के कार्य को देख किसे विस्मय न होगा। ॥१५॥ जब तुमने मेरे पूजन पा उत्सव का दिया, तब मैंने ही क्रोध करके सात रानि तक यह घोर वृदि की है ॥१६॥ कोई भी देवता या दानव इस वृदिर को शेरने में समयं नहीं था, परन्तु तुमने मानव देह से भुप पर रोप करवे भी अपनी पूर्णता का प्रकार नहीं किया इसप मा अस्य त हित साधन हा है ।।१७ १९॥ अब मैं समपता है। रि सुम मनुष्य का में ऐसे शसि ममन हो तो देवयं होने म कोई बाधा नहीं है, क्यो क तुम ही देवताओ के पय प्रदशन और नेता हो ॥१६२०॥ एव क्षान्तमना वृष्ण स्वेन सौम्येन तेजसा । ब्रह्मण शृणु मे वाक्य गवा च गजविक्रम ॥२१ आह त्वा भगवान्ब्रह्मा गायनातासगा दिदि । पर्मभिस्तोपिता दिध्यस्तव सरक्षणादिभि ॥२२ भवता रक्षिता गावो गोगोषत्र महानयम् । यदय पुनर्व सादं वाम प्रसवंस्तथा ।।२३ पर्युपायुर्वाध मध्येन हविषा सुरान् । घिय महरप्रवृत्तंन तपपिप्याम पामगा ॥२४ सदरमार गुगरव हि प्राणदा महावन । अपप्रभृति गो राजा स्वमिन्द्रो भय प्रभो ॥२५ श्रीकृष्ण का गोविन्द पद पर अमिपेर ] [ ३१७ तस्मात्त्व काञ्चन. पूर्णदिव्यम्य पयमो घट. । एमिरद्याभिपिञ्चस्व मया हस्तावनामितः ॥२६ अह किलेन्द्रो देवाना त्वं गवामिन्द्रता गत.। गोविन्द इनि लोकास्त्वा स्नोप्यन्ति मुवि शाश्वतम् ।।२७ है कृष्ण ' तुम यपने मन को क्षमायुक्त करके ब्रह्माजी योर गौओ के वचन को मुझसे सुनो ।।२।। उनका कहना है कि तुम्हारे इन गो-रक्षण मादि कार्यों को देखकर हमे अत्यन्त प्रसन्नता हुई है ॥२२॥ तुमने अपने प्रभाव से गौओं को और गोनोक को भी रक्षा की है, अब हम गौएं अपनी कुल वृद्धि करने मे भय-रहित होगी ।।२३।। अब लो के कार्यों से कृषकों को, पवित्र माग्याहुतियाँ से देवताओं को और प्राणदाता होने के कारण आज से हमारे इन्द्र हो जामो ॥२५॥ हे कृष्ण ! दिव्य जल से परिपूर्ण क्लरा मेरे साय है, इसलिये तुम इसी समय से इन्द्र पद पर स्थित प्रतिष्टित हो जाओ ।।२६॥ में देवताओं का इन्द्र हूँ और तुम गौओं के इन्द्र हो, इसलिये यात्र से तुम्हारी 'गोविन्द' नाम से 'प्रसिदि होगी ॥२७॥ तत शक्रस्तु तान्गृह्य घटान्दिव्यपयोधरान् । अभिपेकेण गोविन्द योजयामास योगवित् ॥२८ दृष्ट्वा तमभिषिक्त तु गावस्ता. सह यूयपं. ! स्तन. प्रनवयुक्तश्च सिपिचु कृष्णमव्ययम् ॥२६ मेघाश्च दिवि युक्ताभिः सामृतामि. समन्तत.। सिपिचुम्तोयधाराभिरभिपिच्य तमव्ययम् ॥३० वनस्पतीना सर्वपा सुवावेन्दुनिभ पय । वव': पुष्पवर्ष च नेदुस्तूर्याणि चाम्बरे ॥३१ अभिषिक्त तु त गोमि. गको गोविन्दमव्ययम् । दिव्यमाल्याम्बरधर देवदेवोऽब्रवीदिदम् ॥३२ एप ते प्रथम. कृष्ण नियोगो गोषु य. कृत.। श्रूयतामपरं कृष्ण ममागमनकारणम् ॥३३ फिर देवराज इन्द्र ने मन्दाकिनी के जल से भरे हुए क्लरा को उठाकर ३१८ ] [ श्री हरिवंशपुरा श्रीकृष्ण का गोविन्द पद पर अभिषेक रिया ॥२८॥ उस समय स्वगं की गो ने उन पर दुग्ध-धारो की वर्षा की ॥२६॥ सब ओर से एकत्रित हुए मेयो और वनस्पतियो ने चन्द्रमा की किरणो के समान स्वच्छ अमृतमय जल की दृष्टि की और तब देवता पुष्प बरसाने और बाजों से सुमधुर घोप करने लगे ॥३॥ ३१॥ उस समय सम्पूर्ण पृथिवी स्वर्ग के समान अमृत रस से तृप्त हो गई थी, क्योकि श्रीकृष्ण का अभिषेक हो रहा था। इस प्रकार मन्दाकिनी के जल से अभिषिक्त हुए गोविन्द से देवराज इन्द्र ने कहा-हे गोविन्द । तुमने गौओं के प्रति अपना जो कर्तव्य पालन किया है, उसका मैं अनुमोदन करता हूँ। अब मैं आपसे उस कार्य को भी कहता हूं, जिसके लिये यहाँ आया हूँ ॥३२ ३३।। स क्षिप्र प्रसाध्यता कस केशी च तुरगाधम । अरिष्टश्च मदाविष्टो राजराज तत कुरु ।।३४ पितृष्वसरि जातस्ते ममाशोऽहमिव स्थित । रक्ष्यश्च मान्यश्च सख्ये च विनियुज्यताम् ॥३५ त्वया ह्यनुगृहीत सन्तव वृत्तानुवर्तक । त्वद्वशे वर्तमानश्च प्राप्स्यते विपुल यश ॥३६ भारतस्य च वशस्य स वरिष्ठो धनुर्धर । भविष्यत्यनुरूपश्च त्वदृते न च रस्यते ॥३७ अर्जुन विद्धि मा कृष्ण मा चैवात्मनमात्मना । आत्मा तेऽह यथा शश्वत्तथैव तव सोऽर्जुन ॥३८ शक्रस्य वचन श्रुत्वा कृष्णो गोविन्दता गत । प्रीतेन मनसा युक्त प्रतिवाक्य जगाद ह ॥३६ प्रीतोऽस्मि दर्शनादेव तव शन शचीपते । यत्त्वयाऽभिहित चेद न विचित्परिहास्यते ॥४० तुम्हे क्स, वेशी और वरिष्ट को शीघ्र ही मारना है, फिर तुम सुख पूर्व राज्य करना ॥ ३४ ॥ तुम्हारी बुआ कु ती ने मेरे अदा से अर्जु नामर जो पुत्र प्राप्त क्यिा है, तुम उसो साय मित्रता रखना और और उसके रक्षा बने रहना । वह तुम्हारी सहायता से
।
श्रीकृष्ण का गोविन्द पद पर अभिषेक ]
[ ३१६
श्व में महान यश को प्राप्त करेगा । ३५-३६।। भरतवश में उसके जैसा महान्
अनुर्धारी अन्य कोई नहीं होगा और तुम्ह छोडकर वह एक क्षण को भी कहीं
न रह सकेगा ॥३७॥ हे कृष्ण ' तुम अर्जुन को मुझे ही समझना । जिस प्रकार
में तुम्हारी यात्मा हूँ, उसी प्रकार अर्जुन भी है ॥३८॥ हे राजन् । गोविन्द
रद पर अभिषिक्त हुए श्रीकृष्ण को इद्र की बात सुनकर बड़ा हपं हुआ और
के कहने लगे हे इन्द्र । आपके दशन करके मैं अत्यन्त यानदित हुआ हूँ।
मापने जो कहा है, मैं उसे यथासम्भव पूर्ण करूंगा ।।३६४०।।
जानामि भवतो भाव जानाम्यर्जुनसभवम् ।
जाने पितृप्वसार च पाडोर्दद्या महात्मन ॥४१
युधिष्ठिर च जानामि कुमार धर्मनिर्मितम् ।
भीमसेन च जानामि वायो सतानज सुतम् ।।४२
अश्विभ्या साधु जानामि सृप्ट पुनद्वय शुभम् ।
नकुल सहदेव च माद्रीवुक्षिगतावुभौ ॥४३
कानीन चापि जानामि सवितु प्रथम सुतम् ।
पितृप्वसरि पुत्र व प्रसूत मूतता गतम् ॥४४
धार्तराष्ट्राश्च मे सर्वे विदिता युद्धकाक्षिण ।
पाण्डोरपरम चव शापाशनिनिपातजम् ॥४५
तद्गच्छ त्रिदिव शक्र सुखाय त्रिदिवौकसाम् ।
नार्जुनस्य रिपु कश्चिन्ममाग्रे प्रभविष्यति ॥४६
अर्जुनार्थे च तान्सर्वान्पाण्डवानक्षतान्युधि ।
कुन्त्या निर्यातयिष्यामि निवृत्ते भारते मृधे ॥४७
यच्च वक्ष्यति मा शक्र तनूजस्तव सोऽर्जुन ।
भृत्यरत्तत्करिप्यामि तव स्नेहेन यनित ॥४८
सत्यसन्यस्य तच्छत्वा प्रिय प्रीतस्य भापितम् ।
कृष्णस्य साक्षानिदिव जगाम त्रिदशेश्वर ॥४६
मैं इस बात को जानता हूं कि मेरी बुआ कुती पाण्ड को न्याही गई
पी, उनके आपके द्वारा अर्जुन हुआ ॥४१॥ धर्म के द्वारा युधिष्ठिर, पवन के
३२० ] [ श्री हरिवशपुर द्वारा भीम और अश्विनीकुमारों के द्वारा उनको सहपली माद्री से नकुल-सह हुए हैं ।।४२-४३॥ कुन्ती का कानीन पुत्र कर्ण था, जो अब सूतपुत्र हो । ॥४४॥ शाप के कारण महात्मा पाण्डु को तटस्थ बैठना पडा । उधर घृतरा पुत्र दुर्योधन आदि युद्ध करना चाहते हैं ॥४५॥ इसलिये हे इन्द्र ! अब स्वर्ग जाकर देवताओ का पालन करिये, जब तक मैं पृथिवी पर रहूंगा, तब अर्जुन को कोई भी तिरस्कृत न कर सकेगा ।।४६।। सब पाण्डव भी अर्जुन लिये ही रणभूमि मे अक्षत देह से टिक्ने वाले होगे । जब महाभारत युद्ध समा हो जायगा तब मैं अर्जुन को कुन्ती को सौंप दूंगा ॥४७॥ आपके पुत्र अर्जु की प्रत्येक इच्छा को मैं सदा सेवक समान पूर्ण करने के प्रयत्न मे रहूंगा ।।८। सत्य-प्रतिज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण के इस प्रकार मधुर वचनो को सुनकर देवरा इन्द्र स्वधाम को पधारे ॥४॥ ॥ भगवान द्वारा अरिष्टासुर-वध ।। प्रदोपार्दै कदाचित्तु कृष्णे रतिपरायणे । श्रासयन्समदो गोष्ठमरिष्ट प्रत्यदृश्यत ।।१ निर्वाणागारमेघाभस्तीक्ष्णशृङ्गोऽकलोचनः । सुरतीक्ष्णाग्रचरण. कालः काल इवापरः ।।२ लोलिहानः स निष्पेपं जिह्वयोछो पुनः पुन. । गवितो विद्धलागूलः कठिनस्कन्धबन्धन. :।३ काकुदोदप्रनिर्माण प्रमाणादुरतिक्रम. । शन्मूत्रोपलिप्तागो गवामुद्वेजनो भृशम् ।।४ शृङ्गाहरणो रोद्रः प्रहरन्गोपु दुर्मद. । गोप्टेषु न रति सेभे विना युद्धन गोवृष ॥५ पस्यचित्त्वथ पारास्य स वृपः फेशवाग्रतः । आजगाम यलोदनो ववस्वतवशे स्थित. ॥६ स तत्र गास्तु प्रगम वाघमानो मदोत्कटः । पवार निधूप गोष्ठ निवरसशिशुपुङ्गवम् ।।७ एतस्मिन्नेव वाले तु गावः पृष्णममीपगाः । पागमागास दुष्टारमा बस्सनक्शे स्थितः ॥८
.
(भगवान द्वारा अरिष्टासुर-वध ]
[ ३२१
सेन्द्राशनिरिवाम्भोदो नर्दमानो महासुरः।
तालशब्देन तं कृष्णः सिंहनादेश्च मोहयन् ।।६
वैशम्पायनजी ने कहा है राजन् ! एक दिन गो-धूलि के समय जब
कृष्ण क्रीडा रत थे, तब गौओ को भयभीत करता हुआ मयकर अरिष्टासुर
ज मे आया ॥१॥ उसके देह का वर्ण बुझे हुए अङ्गार के समान काला या,
नो सीगें अत्यन्त तीक्ष्ण, नेत्र सूर्य के समान लाल, सामने के पांव छुरे के समान
ककुद अत्यन्त ऊंचा और पूंछ द से घूमती हुई थी। उसका सम्पूर्ण देह
बर में सना था | उसने आघात करके ही अनेक घरो के छप्पर आदि गिरा
ये थे । उसे देखते ही सब गोएं भय के कारण कांपने लगी थी ॥२-४॥ सीग
उसने गौओं, बछडों और बलों को मार-मार कर गोष्ठ मूने कर दिये तब
ची हुई गोएं श्रीकृष्ण की शरण में गई । तब वह दैत्य भगवान् से अभय
इप्त उन गौओ को डराता हुआ पोर गर्जन करने लगा और धीरे-धीरे कृष्ण
ही और चला । उन्होंने ताली बजाते हुए सिंहनाद किया, जिससे वह मोहित
गया ।।५-६॥
म कुक्षौ वृपभो दृष्टि प्रणिधाय धृताननः ।
कृष्णस्य निधनाकांक्षी तूर्णमभ्युत्पपात ह ।।१०
तमापतन्तं प्रमुख प्रतिजग्राह दुर्द्धरम् ।
कृष्णः कृष्णाजननिभी वृप प्रतिवृपोपम. ॥११
स ससक्तस्तु कृष्णो वै वृपेणेव महावृप.।
मुमोच वक्त्रज फेन नस्तश्चाय सशब्दवत् ॥१२
तावन्योन्यावरुद्धाङ्गी युद्ध कृष्णवृपावुभौ ।
रेजतुर्मेघसमये ससक्ताविव तोयदी ।।१३
तस्य दपं बल हत्वा कृत्वा शृगान्तरे पदम् ।
आपोडयदरिष्टस्य कण्ठ क्लिन्नमिवावरम् ।।१४
शृग चास्य पुनः सम्यमुत्पाटम यमदण्डवत् ।
तेनैव प्राहरद्वक्त्रे स ममार भृश हत. ॥१५
उन गदगोगे ने देवतात्रीद्वारा इन्द्रास्तदाने समानीधीपण ३२२ ] [ श्री हरिवशपुराण स भिन्नगो भग्नास्यो भग्नस्कन्धश्च दानव । पपात रुधिरोद्गारी साम्बुधारी इवाम्बुदः ।।१६ गोविन्देन हतं दृष्ट्वा हप्त वृषभदानवम् । साधु साध्विति भूतानि तत्कर्मास्याभितुष्टुवु ॥१७ स चोपेन्द्रो वृप हत्वा कान्तचन्द्र निशामुखे। अरविन्दाभनयन. पुनरेव ररास ह 114 तेऽपि गोवृत्तयः सर्वे कृष्ण कमललोचनम् । उप.साचिरे हृष्टा. सर्वे शक्रमिवामरा ।।१६ तद श्रीकृष्ण का वध करने की कामना करता हुआ वह दैत्य । में उन पर झपटा, परन्तु उन्होंने उसके मुख का अगला भाग एकड दिन जिससे उसकी नासिका और मुख से साव होने लगा ॥१०-११-२२॥ पार एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे, उस समय प्रतीत होता था कि दो बादल अर में टकरा गये हैं ॥१३॥ इस प्रकार कुछ समय में ही उसके बल को नष्ट कर भगवान ने उसके सीगो में अपना धरण फैमा कर गीले वस्त्र की तरह निचोड साला ॥१४॥ फिर उन्होंने उमका दीया सोग उखाड़ कर उसी से " मारा तब वह सोग, मुख और बन्धा आदि के क्षत-विक्षत होने पर मुख से घमन करता मा पृपियो पर गिरवर समाप्त हो गया ॥१५-१६।। उसे को प्राप्त हुमा देवार समी प्रवासी भगवान धोरण यो प्रशसा करने में ॥१७॥ उस समय शायरल मतीत होर प्रोदय हो गया था।' पदममोपन भगवान् वन में मार रास प्रौड़ा करने लगे ॥१८॥ रतुदिनी ॥१॥ ॥ श्रीकृष्ण को खाने को अफर का प्रस्थान ।। कृष्ण यजगत थरका वधमानमिवानलम् । उगमगलगः शमानस्ततो भयम् । पूतनाथा हतापाप पालिये य पराजिते । धे प्रलय गीते प्रत्याचे परिणानित ॥२
करण को लाने को यकर का प्रस्थान ]
[ ३२३
घृते गोवर्धने शैले विफले शशासने ।
गोषु वातासु च तया स्पृहणीयेन कर्मणा ॥३
कुधिनि हतेऽरिष्टे गोपेषु मुदितेषु च ।
दृश्यमाने विनाशे च सनिकृप्टे महाभये ।।४
पपणे वृक्षयोश्चंव वाल्येनावालक्मणा।
अचिन्त्य कर्म तन्द्र त्या वदमानेपु शत्रुपु ॥५
प्राप्तारिष्टमिवात्मान मेने म मयुरेश्वर ।
विमजेन्द्रियभूतात्मा गतासुप्रतिमो बभौ ॥६
वैशम्पायनजी ने कहा है राजन् । श्रीकृत री विजय और उत्कर
मुनकर बस को वही प्याकुलता हुई ॥१॥ पूतता का वध, कालियनाग का
'दमन प्रलम्ब का सहार, धेनु को मृत्यु, गिरि गावधन धारण, मद को
पलता, गोरक्षा, यमलान वृना का पतन यौर पम म्पो अरिष्टामुर का
न आदि को सुनकर मपुरेग वम ने अपनी मृत्यु को निकट जानार मानी
गंवा दी और यह सितंय विमूढ हो गया ।।२-६।।
ततो ज्ञातीन्समानाय्य तिर चोग्रशामन ।
निशि स्तिमितमूकाया मथुराया जनाधिप ।।७
वसुदेव च देवाम र चाहूय यादवम् ।
सत्यक दाम पवावरजमेव च ॥
मोज वंतरण व विक्दु च महावलम् ।
गयमा च धर्मन पिपृथु च पृथुश्रियम् ।।
यघ्र दानपनि चैव कृतवर्माणमेन च ।
भूरितजगमक्षोम्य भूग्निममेव च ॥१०
एनान्ग यादवान्सर्वानामान्य शृणुतनि च ।
उग्रसेनसतो राजा प्रोवाय मयुरेश्वर ॥११
भवन्त सयंगामा वैदेपु परिनिहिता ।
न्यायवृतानगलास्त्रियगंम्य प्रवतंगा ॥१२
तस्पिासो महावृते निष्पम्पा इव पर्वताः ॥१३ रात्रिका समय था, मथुरा की जनता सो रही थी, ऐसे में बात पिता, गधुगरण, बमुदेव, कक, सत्यक, दाख, पतरण, भोज, विरह, वियु, अकरकृतवर्मा और अत्यन्त तेजस्वी भूरिथवा आदि को अपने पास कुरा कर उनसे कहने लगा।।७.११॥ आप सभी कार्य कुशल, वेदों में पारगतपर का आचरण करने वाले तथा धर्म, अर्थ, काम रूपी त्रिवर्ग के प्रवर्तक है ॥१२॥ बाप सदंबपने कर्तव्यो को देवताओं की तरह निभाते रहे और पता। समान अविचल रूप से सदाचरण रत रहे हैं ॥१३॥ आपने अभिमान-रहित कर गुरुकुलबास किया है तथा आप मत्रणा-कुशल और पतुविद्या के विशेद १२४ । पराग्यानां प पारो सोरस्य पियुधोपमाः । अदम्भवृत्तय गये सर्व गुरुकुलोपिताः। राजामन्यधरा सर्वे सर्वे धनुपि पारगा. ॥१४ भरेख, . एव भवत्सु युक्तेषु मम चित्तानुवतिषु । वर्द्ध मानो ममानर्थो भवद्भिः किमुपेक्षित ॥१५ एष कृष्ण इति ख्यातो नन्दगोपसुतो व्रजे । वर्द्ध मान इवाम्मोधो मूल न परिकृन्तति ।।१६ अनमात्यस्य शून्यस्य चारान्धस्य ममैव तु । कारणान्नन्दगोपस्य स सुतो गोपितो गृहे ॥१७ उपेक्षित इव व्याधि. पूर्यमाण इवाम्बुदः । नन्दमेघ इवोष्णान्ते स दुरात्मा विवढे ते ॥१८ प्रबन्धः कर्मणामेव तस्य गोत्रजवासिनः । सन्निकृष्ट भय चैव केशिनो मम च ध्रुवम् ॥ भूतपूर्वश्च मे मृत्यु स नून पूर्वदैहिक. । युद्धाकाक्षो च स यथा तिष्ठतीह ममाग्रतः ॥२. क्व च गोपत्वमशुभं मानुष्यं मृत्युदुर्बलम् । पक च देवप्रभावेण क्रीडितव्य बजे मया ॥२१ -- W . - कृष्ण को लाने को बकर का प्रस्थान ] [ ३२५ • अहो नीचेन वपुषा च्छादयित्वाऽऽत्मनो वपुः । प्येप रमते देव. श्मशानस्थ इवानलः ॥२२ म प्रकार के आप जैसे मेरे अनुवतियो के रहते हुए भो मेरा शत्रु वृद्धि होता जा रहा है, फिर आप उसकी उपेक्षा क्यो कर रहे हैं ? ॥१॥ वैरी नन्द गोप का पुत्र समुद्र के समान दिनोदिन वृद्धि को प्राप्त होता | मेरे मूल को ही नष्ट करने में लगा है ॥१६॥ मैं मन्त्रियों से और गुप्तचरों रिहित हूँ इस प्रकार मेरी हो असावधानी से वसुदेव ने अपने उस पुत्र को नन्द- 'गोप के घर मे भेज दिया था ॥१७॥ वह दुरात्मा कृष्ण दिना चिकित्सा के रोग, मुग्ध समुद्र और ग्रीष्मकाल को समाप्ति पर गर्जना करने वाले बादलो के समान ही बढता जा रहा है ॥१८ । उत गोप-बालक के कार्यों को देख-देख कर मुझे अपने और केशी के लिये भय उपस्थित हुआ दिखाई पड रहा है ॥१॥ जब यह मेरे साथ युद्ध करने में तत्पर है तो वह अवश्य ही मेरे पहिले जन्म का काल fy होगा ॥२०॥ यदि यह दाव न होती तो वह इस नाशवान मनुष्य देह को गरण करके साधारण गोप ही को बनता? और क्यो वह मेरे व्रज में देव- भाव से क्रोडा करता? इसलिये मैं समझता हूँ कि श्मशान में जैसे अग्नि छिपी प्हती है, वैसे ही कोई देवता अपने यथार्य स्वरूप को छिपा कर छद्मवेश मे विच- रण कर रहा है ? ॥२१-२२।। तदेप नून विष्णुर्वाशको वा मरुता पति.। मत्साधनेच्छया प्राप्तो नारदो मा प्रयुक्तवान् ॥२३ अत्र मे शङ्कने बुद्धिर्वमुदेवं प्रति ध्र वा । अस्य बुद्धिविशेषेण वयं कातरता गता ॥२४ मह हि खट्वागवने नारदेन समागतः। द्वितीयं स हि मा विप्रः पुनरेवाब्रवीद्वचः ।।२५ यस्त्वया हि कृतो यल कंस गर्भकृते महान् । वसुदेवेन ते रातो तत्कर्म विफलीकृतम् ॥२६ दारिका या त्वया रानी शिलाया कास पातिता। ता स्मारदासुता विद्धि वप्पा च इस्टेहज़म १५२७०
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प्रीकृष्ण को लाने को अबर का प्रस्थान ] [ ३०७ वाच्यश्च नन्दगोपो वै करमादाय वार्षिकम् । शीघ्रमागच्छ नगर गोप सह समन्वित ॥३५ कृष्णसकपणी चैव वसुदेवसुतावुभो । द्रप्टुमिच्छति वै क्स सभृत्य सपुरोहित ॥३६ इस प्रकार नारद जी ने उस वृष्ण के अत्यन्त पराक्रम का वर्णन करते रह भी कहा था बलराम के अतिरिक्त कृष्ण भी वसुदेव का ही पुत्र है 1३०॥ वह वसुदेव तुम्हारा स्वाभाविक बाघव होते हुए भी तुम्हारा काल होगा। जस प्रकार कोया जिसके सिर पर बैठता है, उसके नेत्रो को निकाल लेता है, इसी प्रकार यह वसुदेव मेरे ही अन से पालित होकर मेरे ही सपरिवार मूलो- छेदन में तत्पर है ॥३१-३२ । हे दानपते । हे अकर | अब तुम्ही उठो और प्ण बलराम के सहित नन्दादि कर दाता गोपों को शीघ्र हो यहाँ लिया लामो १३४॥ नन्द से कहना कि वार्षिक कर लेकर अन्यान्य गोपगण के सहित शीघ्र ही मथुरा चला आवे ॥ ५॥ क्याकि महाराज बस अपने सेवको और पुरोहितों के सहित वसुदेव के दोनो पुत्रो को देखने की इच्छा कर रह हैं ।।३६।। एतो युद्धविदो रङ्ग कालनिर्माणयोधिनी। दृढी च कृतिनो चैव शृणोमि व्यायतोद्यमी ॥३७ अस्माकमपि मल्लो द्वौ सज्जो युद्धकृतोत्सवी । ताभ्या सह नियोत्स्येते तो युद्धकुशलावुभौ ॥३८ द्रष्टव्यौ च मयाऽवश्य बाली तावमरोपमो। पितृष्वसु सुतौ मुप्यो व्रजवासी वनेचरी ||३६ वक्तव्य च बजे तस्मिन्समीपे व्रजवासिनाम् । राजा धनुख नाम कारयिष्यति वै सुखी ॥४० सन्निकृष्ट वने ते तु निवसन्तु यथासुखम् । जनस्यामन्त्रितस्यार्थे यया स्यात्मवमव्ययम् ॥४॥ पयस सर्पिपश्चव दध्नो दध्युत्तरस्य च । पापपप्रधानपाचारियप्पापा ११५ ३२६ ] [ श्री हरिवंशपुराण रात्रौ व्यावतितावेतौ गर्भो तव वधाय वै । बसुदेवेन सधाय मित्ररूपेण शत्रणा ॥२८ सातु कन्या यशोदाया विन्ध्ये पवंतसत्तमे। हत्या शुम्भनिशुम्भौ द्वौ दानवो नगचारिणी ॥२६ इससे जान पडता है कि नारद जी का कथन सत्य है, वही मेज पुण पात्र निष्णु या इन्द्र मुझे मारने के लिये भूतल पर अवतरित हुया है ॥२॥ इस विषय मे मैं वसुदेव के प्रति अत्यन्त शकावान हूँ, इसी ने किसी प्रकार अपने धूर्तता का प्रयोग करके मुझे इस सकट में डाल दिया है ।।२४॥ एक दिन हर वाग वन मे नारद जी ने मुझे बताया था कि तुम देवकी की सतानो को नए करने का जो उपाय करते थे, उसे एक रात्रि मे वसुदेव ने विफल कर दिए ॥२५-२६॥ उस रात्रि मे तुमने जिस कन्या को पछाडा था वह यशोदा शेर वसुदेव का पुत्र तो कृष्ण है ॥२७॥ तुम्हारे मित्र बने हुए वसुदेव ने ही पर में पड्यन्त्र करके तुम्हारी हत्या के लिये दोनो गर्भो को परिवर्तित कर दि या ॥२८॥ यशोदा को उस वन्या ने भी शुम्भ निशुम्भ की हत्या कर डालोज इस समय भी वह प्रमथ गणो के साथ विन्ध्याचल पर रह रही है ॥२६॥ अत्र मे नारद प्राह सुमहत्कर्मकारणम् । द्वितीयो वसुदेवाढ वासुदेवो भविष्यति ॥३० स हि ते सहजो मृत्युबन्धिवश्च भविष्यति । स एव वासुदेवो वै वसुदेवसुतो बली ॥३१ बान्धवो धर्मतो मह्य हृदयेनान्तको रिपु । यया हि वायसो मूनि पद्भया यस्यावतिष्ठति ।।३२ ने तुदति तस्यैव वक्रणामिपगृद्धिना। वसुदेवस्तथवाय सपुसज्ञातिबान्धव । छिनत्ति मम मूलानि भुड्क्ते च मम पाश्वत ॥३३ गच्छ दानपते क्षिप्त ताविहानयितु प्रजाद । नन्दगोप च गोरात्र परदा-मम बासनात् ॥३४ प्रीकृष्ण को लाने को बार का प्रस्थान ] [ ३२७ वाच्यच नन्दगोपो वै करमादाय वार्षिकम् । शीप्रमागच्छ नगर गोप सह समन्वित ॥३५ कृष्णसकर्षणी चव वसुदेवसुतावुभौ । द्रष्टुमिच्चति वै क्स सभृत्य सपुरोहित ॥३६ इस प्रकार नारद जी ने उस कृष्ण के अत्यन्त पराक्रम का वर्णन करते यह भी कहा था बलराम के अतिरिक्त कृष्ण भी वसुदेव का ही पुत्र है ।३०। वह वसुदेव तुम्हारा स्वाभाविक वाघव होते हुए भी तुम्हारा काल होगा। इस प्रकार को मा जिमके सिर पर बैठता है, उसके नेत्रों को निकाल लेता है, मी प्रकार यह वसुदेव मेरे ही अन से पालित होकर मेरे ही सपरिवार मूलो- छेदन में तसर है ॥३१.०1 है दानपते । हे अकर। यद तुम्ही उठो और प्ण-बलराम के सहित नन्दादि कर दाता गोपों को शीघ्र ही यहाँ लिया लामो ३४॥ मन्द से कहना कि वार्षिक कर लेकर अन्यान्य गोपगण के सहित शीघ्र । मथुरा चला आवे ||२५|| क्याकि महाराज कस अपने सेवकों और पुरोहितों सहित वमुदव के दोनों पुत्रा को देखने की इच्छा कर रह हैं ।।३।। एती युद्धविदो रङ्गे कालनिर्माणयोधिनी । दृढी च कृतिनी चव शृणोमि व्यायतोद्यमौ ॥३७ अम्माक्मपि मल्ली द्वौ सज्जो युद्धकृतोत्मवो । ताम्या सह नियोत्स्येते तो युद्धकुशलावुभौ ।।३८ द्रष्टव्यौ च मयावश्य वालो तावमरोपमो। पितृप्वसु सुतो मुख्यो ब्रजवासी वनेचरी || वक्तव्य च व्रजे तस्मिन्समीपे व्रजवासिनाम् । राजा घनुमख नाम कारयिष्यति व मुखी ॥१० सग्निकृष्ट वने ते तु निवसन्तु यथासुखम् । जनम्यामन्त्रितस्यार्थे यया स्यात्सर्वमव्ययम् ॥४॥ पयस सर्पिपश्चैव दन्नो दध्युत्तरस्य च । पथावायप्रदानाय भोज्याथियणाय च ॥१२ १२० ] [ श्री हरिदशपुराण अकर गच्छ शीघ्रत्व तावानय ममाज्ञया। सकर्षण च कृष्ण च द्रष्टु कौतूहल हि मे ॥४३ सुना है कि वे दोनो वालक युद्ध क्रीडा मे अत्यन्त धतुर, दृढ शरीर वमा अत्यन्त कौतुक करने वाले हैं ॥३७॥ मेरे यहां भी दो मल्ल अत्यन्त निरा हैं, जब वे बालक यहां आजायेगे तब मैं अपने मल्लो से उनकी कुश्ती कराऊ ॥३८॥ मैं उन देवताओं के समान सुन्दर बालको को अपनी चचेरी बहिन के पुत्र होने के कारण भी देखने के लिये उत्सुक हूँ ॥३९॥ उन गोपो से यह भी कहना कि राजा ने धनुर्यज्ञ का आयोजन किया है ॥४०॥वे यहां आकर नगर के निकट धर्ती वन में ठहरें और यज्ञ मे आये हुए अतिथियो को किसी वस्तु की कमी र पड जाय, इसको देख रेख भी उन्हे करनी है। इसलिये सभी पदार्थों को लेकर वे शीघ्र ही यहाँ उपस्थित हो ॥४१-४२।। हे अफर ! तुम शीघ्रता पूर्वक उन वालको को यहाँ ले आओ, क्योकि मुझे उन्हे देखने का अत्यन्त दुतहत रहा है ॥४३॥ तयोरागमने प्रीति परमा मत्कृता भवेत् । दृष्ट्वा तु तो महावीयौं तद्विधास्यामि यदितम् ॥४४ शासन यदि वा थ त्वा मम तो परिभापितम् । नागच्छेता यथाकाल निग्राह्यावपि तो मम ॥४५ सान्त्वमेव तु वालेपु प्रधान प्रथमो नय. । मधुरेणव तो मन्दी स्वयमेवानयाशु वै ॥४६ मकर कुरु मे प्रोतिमेता परमदुर्लभाम् । यदि वा नोपजप्तोऽसि वसुदेवेन सुयत ।।४७ तथा कर्तव्यमेतद्धि यथा तावागमिष्यत.। एवमाक्षिप्यमाणोऽपि वसुदेवो यसूपम. ॥४ सागराकारमात्मान निष्प्रकापमधारयत्। वाक्छ स्यैताडपमानस्तु परोनादीघंदशिना। क्षमा मनसि राधाय नोत्तर प्रत्यभापत ।।४६ श्रीकृष्ण द्वारा देशी-वध ] . [ ३२६ ये तु तं ददृशुस्तत्र क्षिप्यमाणमनेकधा । विग्विगित्यसकृत्त व शनैरूवुरवाड्मुखाः ।।५० अक्र रस्तु महातेजा जानन्दिव्येन चक्ष पा। जल दृष्ट्वैव तृपितः प्रोतिमानभूत् ।।५१ तस्मिन्नेव मुहूर्ते तु मथुरायाः स निर्ययो। प्रीतिमान्पुण्डरीकाक्ष द्रष्टुंदानपतिः स्वयम् ।।५२ उनके आने से मुझे परम हपं होगा और तब मैं उन दोनो के प्रति जैसा उचित समगा, वैसा ही करूंगा ॥४४॥ यदि मेरी आज्ञा पाकर भी यहाँ न पाये तो उन्हें दण्डित किया जायगा ॥४५॥ वैसे वालको को सामनीति से ही समझाना चाहिये, इसलिये मधुर वचनो से फुमला कर उन्हें ले आओ।।४६।। यदि तुम वसुदेव के पक्ष में न होगये हो तो मेरे इस प्रिय कार्य को शीघ्र ही सम्पन्न करो ॥४७॥ जिस उपाय से वे यहाँ आजाये, वही तुम्हें करना है । कस के ऐसे आक्षेप युक्त वचनो को सुन कर भी वसुदेव मौन रहे ॥४८.४६॥ परन्तु, वहाँ उपस्थित व्यक्तियो ने कस को इस प्रकार विक्षिप्तता पूर्वक प्रलाप करता देख कर सिर झुका लिया और अस्फुट शब्दो मे कस की निन्दा करने लगे ॥५०॥ दिव्य द्रष्टा अक र भविष्य को जान कर अत्यन्त हपित हुए और जैसे प्यासा जीव जन को देख कर उतावला हो उठता है, वैसे ही ब्रज को प्रस्थान करने के लिये उतावले हो गये ॥५१।। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन की अभिलापा करते हुए दानपति अकर ने उसी समय व्रज के लिये प्रस्थान किया ॥५२॥ ॥ श्रीकृष्ण द्वारा केशी-वध ॥ अक्रूरोऽपि यथाऽऽज्ञप्तः कृष्णदर्शनलालसः । जगाम रथमुख्येन मनसा तुल्यगामिना ॥१ कृष्णस्यापि निमित्तानि शुभान्यङ्गगतानि वै। पितृतुल्येन शंसन्ति बान्धवेन समागमम् ।।२ प्रागेव च नरेन्द्रण माथुरेणीग्रसेनिना। केशिनःप्रेषितो दूतो वधायोपेन्द्रकारणात् ॥३ । दशन की दिखाई दिये ॥२॥ उनसे पहिले ही मथुरापति कस ने श्रीकृष्ण को मारने सुन कर केशी दैत्य शीघ्र ही वृदावन जाकर गोगो और सघ व्रजवासियों ३३० ] [ श्री हरिवंशपुराज स च दूतवच थ त्वा पेशी क्लेशकरो नृणाम् । वृन्दावनगतो गोपान्वाधते स्म दुरासद ॥४ तेन दुष्टप्रचारेण दूपित तद्वन महत् । न नृभिर्गोधनैर्वाऽपि सेव्यते वनवृत्तिभि ॥५ नि सपात वृत पन्यास्तेन तद्विषयाश्रय । मदाच्चलितवृत्त न नृमासान्यश्नता भृशम् ॥६ श्री वैशम्पायन जी ने कहा-इधर भगवान् कृष्ण करते हुए अक र जी मन के समान दूतगामा रथ पर चढ कर चले ॥१॥ इन पिता के समान बाधव के मिलने की सम्भावना से श्रीकृष्ण को सभी शुभ आज्ञा देने के लिये अपने को केशी दैत्य के पास भेजा ॥३॥ राजा की जा विविध प्रकार से सताने लगा ॥४॥ उस दुष्ट ने समस्त वन को नष्ट कर दि जिससे मनुष्यो और गौमओ ने वहाँ जाना-आना छोड दिया। वह गर्यो मत प मनुष्य का मास खाता फिरता था। ५-६॥ नृशन्दानुसर क्रुद्ध स कदाचिद्वनागमे । जगाम घोपसवास चोदित कालधर्मणा।७ त दृष्ट्वा दुद्रुवुर्गोपा स्त्रियश्च शिशुभि सह । मन्दमाना जगन्नाथ कृष्ण नाथमुपाश्रिता ॥ तासा रुदितशब्देन गोपाना क्रन्दितेन च । दत्त्वाऽभय तु कृष्णो वै केशिन सोऽभिदुद्रवे । केशी चाप्युन्नतग्रीव प्रकाशदशनेक्षण । हेपमाणो जवोदग्रो गोविन्दाभिमुखो ययौ ।।१० तमापतन्त सप्रेक्ष्य केशिन हयदानवम् । प्रत्युज्जगाम गोविन्दस्तोयद शशिन यथा ॥११ स ससक्तस्तु कृष्णेन केशी तुरगसत्तम । पूर्वाभ्या चरणाम्या वै कृष्ण वक्षस्यताडयत् ।।१२
श्रीकृष्ण द्वारा केशी-वध ]
[ ३३१
पुनः पुन. म च वली प्राहिणोत्सार्श्वत. युरान् ।
कृष्णस्य दानवो घोरं प्रहारममितौजसः ।।१३
वक्रेण चास्य घोरेण तोदणदप्ट्रायुधेन वै ।
अदशद्वाहुशिखर कृष्णस्य रुपितो ह्य.॥१४
काल की प्रेरणा से वह मनुष्यो के शब्द को सुनता हुआ उसी के लक्ष्य
र ब्रज मे जा पहुंचा ||७|| उसे देखते ही रोती-चीखती हुई गोपियां अपने-अपने
लकों को लेकर शीघ्रतापूर्वक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के शरणदाता श्रीहरि को शरण
गई 1.1 गोपियो का क्रन्दन और गोपी की चीत्कार सुन कर भगवान ने
न्हें अभय प्रदान किया और केशी की ओर अग्रसर हुए || उसने भी जैसे ही
उन्हें अपनी ओर आता हुआ देखा, वैसे ही वह नेत्र फाडे हुए घोर नाद करता
आ उनकी ओर शीघ्रता से झपटा ॥१०॥ श्रीकृष्ण ने उसे अपनी ओर आता
ख कर मेघ के चन्द्रमा के पास तेजी से जाने के समान छनाग लगाई और
रन्त उनक सामने जा पहुंचे ॥११॥ जैसे ही दोनो का सामना हुआ, वैसे ही
शो ने अपने अगले पांव उठा कर श्रीकृष्ण के हृदय पर आघात किया। फिर
वह उनके पावं में बारम्बार प्रहार करने लगा और अवसर पाकर अपने तीक्ष्ण
दांतो से उनके हाथ को कार खाया ।।१२-१३-१४॥
उरस्तस्योरसा हन्तुमियेप बलवान्हय. ।
वेगेन वासुदेवस्य क्रोधाद्विगुणविक्रमः ॥१५
तस्योतिस्वस्य बलवान्वृष्णोऽप्यमितविक्रम :
बाहुमामोगिनं कृत्वा मुखे ऋ द्वः समादयत् ।।१६
सतं बाहुमसक्तो वै खादितु भेत्तु मेव च ।
दशनमूलनिमुक्तः सफेनं रुधिर वमन् ।।१७
विपाटिनाभ्यामोष्ठाभ्यां क्टाम्यां विदलीकृत.।
अक्षिणी विकृते चक्रे विस्तृते मुक्तपन्धने १८
निरस्तहनुराविष्ट शोणितास्तविलोचन. ।
•उत्कणों नप्टचेतस्तु स केशी चक्रवद्ममन् ॥१९
३३२ ] [ श्री हरिव पुराण उत्पतलसकृत्पाद शवृन्मून समुत्सृजन् । खिन्नाङ्गगेमा थान्तस्तु निर्यलचरणोऽभवत् ॥२० उस समय अत्यन्त रोप के कारण उमा बल बहुत बढ गया ओ. उसने श्रीकृष्ण का हृदय विदीर्ण करने की इच्छा की ॥१५॥ तब महापरात भगवान् ने अपनी भुजा उसके मुख मे घुमा दी, जिसे न तो वह चबा सका ! और विदीर्ण कर सका । उल्टे उमी के दांत मसूडे तक चिर गये और मुख मे फेन मिति रक्त प्रवाहित होने लगा ।।१६ १७॥ उसके ओष्ठ फट गये, कटि विदीण हो गई उसके नेत्र विकृत हो गये ॥१८॥ठोडी फट गई, नेत्र लोहितमय हो गया, चेतना हो गई और अग अग तडपने लगे ॥१फिर उठने की चेष्टा करके भी उठने मे सफल न हुआ, मल मूत्र निकलने से लिप्त हो गया, रोमावलि हि हो गई, पसीने से लथ पथ होकर नितान्त क्लान्त हो गया और उसके पाँवों हिलना डुलना भी बन्द हो यया ॥२०॥ व्यादितास्यो महारौद्र साऽसुर कृष्णबाहुना निपपात यया कृत्तो नागो हि द्विदलीकृत ।।२१ बाहुना कृत्तदेहस्य केशिनो रूपमावभौ । पशोरिव महाघोर निहतस्प पिनाकिना ॥२२ द्विपादपृष्ठपुच्छाढे श्रवणकाक्षिनासिके । पेशिनस्तद्विधाभूते द्वे चार्द्ध रेजतु क्षिती ।।२३ केशिदन्तक्षतस्यापि कृष्णस्य शुशुभे भुज । वृद्धस्ताल इवारण्ये गजेन्द्रदशनाङ्कित ॥२४ त हत्या केशिन युद्ध कल्पयित्वा च भागश । कृष्ण पद्मपलाशाक्षो हसस्तव तस्थिवान् ॥२५ त हत मेशिन दृष्ट्वा गोपा गोपनियस्तथा । बभवुमुदिता सर्वे हतविघ्ना हतक्लमा ॥२६ दामोदर तु श्रीमन्त यथास्थान यथावय । अध्यनन्दन्प्रियर्याक्य पूजयन्त पुन पुन ॥२७
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अकर द्वारा नाग लोक-वर्णन ]
[ ३३५
॥ अक्रूर द्वारा नाग लोक-वर्णन ॥
स नन्दगोपस्य गृह प्रविष्ट: सहकेशवः ।
गोपवृद्धान्समानीय प्रोवाच मितदक्षिणः ।।१
कृष्णं चैवाब्रवीत्प्रीत्या रोहिणेयेन सगतम् ।
श्व: पुरी मथुरा तात गमिप्यामः सुखाय वै ॥२
यास्यन्ति च प्रजाः सर्वे गोपाला' सपरिग्रहाः ।
कंसाज्ञया समुचित करमादार वार्षिकम् ॥३
समृद्धस्तन कसस्य भविष्यति धनुर्महः ।
तद्रक्ष्यय समृद्ध च स्वजनंश्च समेष्यथ ।।४
पितर वसुदेव च सतत दुखभाजनम् ।
दीन पुत्रवधधान्त युवामद्य समेष्यथ ॥५
सतत पीड्यमान च कसेनाशुभबुद्धिना ।
दशान्ते शोपित वृद्ध दुखै. शिथिलता गतम् ॥६
कसस्य भयसत्रस्त भवद्गमा च विनाशकृत् ।
दह्यमान दिवा रात्री सोत्कण्ठेनान्तरात्मना ७
ता च द्रक्ष्यसि गोविन्द पुनरमृदितस्तनीम् ।
देवकी देवसकाशा सीदन्ती विहतप्रभाम् ।।८
वैशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् । गोपी और श्रीकृष्ण के साथ बक्र रवी
नन्दजी के घर पहुंचे और श्रीकृष्ण बलराम से प्रीतिपूर्वक बोले-हम कल मथुरा
चलेंगे, वहाँ अत्यन्त आनन्द रहेगा । कस की वाज्ञा से सभी गोपजन उपहार
सहित वापिक कर ले-लेकर हमारे साप ही वहां पहुंचेंगे ॥१-३॥ वहाँ धनुर्यज्ञ
महोत्सव होगा, इस बहाने से तुम अपने अन्य दाधवो से मिल लोगे | वही
तुम्हे तुम्हारे अत्यन्त दुखित हृदय पिठा वसुदेवजी भी मिल जायगे ॥५॥ दुष्ट
रुस उन्हें निरन्तर दु.ख देता है, इससे वे और भी सतप्त होते हुए नितान्त दुर्बल
गये हैं ॥६॥ वे कस के भय से सदा भीत रहते और तुम्हें न देखने से और
सो चिन्ता ग्रस्त रहते हैं 100 तुम्हारी देव-नारियो जैसी अत्यन्त सुकुमारी माता
३३४ ]
[ श्री हरिवशपुर
होगया ॥१॥ पथिको को उनके वाधवो के मिलन का सन्देश देते हुए पक्षिग
जब अपने निवास के लिये जाने लगे तभी दानपति अक र ब्रज में पहुंच ग
॥२॥ और वहाँ कृष्ण, बलराम और नन्द गोप के विषय मे उन्होने जानका
प्राप्त की ॥३॥ उस समय उनका मुख खिला हुआ था और नेत्र अश्रुओ के
परिपूर्ण थे ।।३।। नन्द के घर मे जाकर उन्होंने देखा कि गौओ के दोहन-भार
पर बछडो के मध्य मे श्रीकृष्ण स्थित है । उन्हे देखते ही अत्यन्त आनदित होते
हुए अक्र र ने उनसे कहा ।।४-५-६॥
एहि केशव तातेति प्रव्याहरत धर्मवित् ।।
उत्तानशायिन दृष्ट्वा पुनदृष्ट्वा थिया वृतम् ॥७
अव्यक्तयौवन कृष्णमकर प्रशशस है।
अप स पुण्डरीकाक्ष सिंहशार्दूलविक्रम.॥
सपूर्णजलमेघाभ पर्वतप्रवराकृतिः ।
मृधेप्वधर्पणीयेन सश्रीवत्सेन वक्षसा ।
द्विपन्निधनदक्षाम्या भुजाभ्या साधु भूपित ॥
मूर्तिमान्सरहस्यात्मा जगतोऽग्रयस्य भाजनम् ।
गोपवेषधरो विष्णुरुदनाग्रयतनूरहः ॥१०
किरीटलान्छनेनापि शिरसा छसवर्चसा ।
कुण्डलोत्तमयोग्याच्या श्रवणा-या विभूपितः ॥११
हे वेगर । यहाँ यानी। फिर उन वट के पत्तो पर राज करने बारे
थपिल ब्रह्माण्ड के गोदाधय एक युवावस्था पो प्राप्त होते हुए भगवान के
देख कर विचार करने लगे कि यही साक्षात् विष्णु है, इनसा पर शिह के रामान
पणं सबर मेप गा और नागर यात पत तुल्य है तथा
*या पर धोवरस पिक प्रतिष्ठित है और यह रिया को मारो से ste
है mscell जिन्हें पम्पय पुरुष हा वाता है, यह वही हैं, गम्पूर्ण सर ।
ही का पूरन किया करता है। यही शोध पर गुट और परत
कानों में प्ठ पुपाल पारण यि रहते है ॥१.११॥
अक्रर द्वारा नाग लोक-वर्णन ]
[ ३३५
॥ अव र द्वारा नाग लोक-वर्णन ॥
स नन्दगोपस्य गृह प्रविष्ट: सहकेशवः ।
गोपवृद्धान्समानीय प्रोवाच मितदक्षिण. 11
कृष्ण चैवाब्रवीत्प्रीत्या रोहिणेयेन सगतम् ।
श्व: पुरी मथुरा तात गमिप्याम. सुखाय वै ॥२
यास्यन्ति च प्रजा. सर्वे गोपाला सपरिग्रहा. ।
कंसाया समुचित करमादार वापिकम् ॥३
समृद्धस्तत कसस्य भविष्यति धनुर्महः ।
तद्रक्ष्यय समृद्ध च स्वजनंश्च समेप्यथ ।।४
पितर वसुदेव च सतत दुखभाजनम् ।
दीन पुत्रवधथान्त युवामद्य समेष्यथ ।।५
सतत पोड्यमानच कसेनाशुभवुद्धिना ।
दशान्ते शोपित वृद्ध दुःखै. शिथिलता गतम् ॥६
कसस्य भयसनस्त भवद्या च विनाशकृत् ।
दह्यमान दिवा रातो सोत्कण्ठेनान्तरात्मना ।।७
ता च द्रक्ष्यसि गोविन्द पुरमृदितस्तनीम् ।
देवकी देवसकाशा सीदन्ती विहतप्रभाम् ।।
वैशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् । गोपा और श्रीकृष्ण के साथ बक्र रबी
नन्दजी के घर पहुंचे और श्रीकृष्ण बलराम से प्रीतिपूर्वक वोले-हम कल मथुरा
वलेंगे, वहाँ अत्यन्त आनन्द रहेगा । कस की वाज्ञा से सभी गोपजन उपहार
सहित वार्षिक कर ले-लेकर हमारे साप ही वहां पहुंचेंगे ॥१-३॥ वहाँ धनुर्यज्ञ
महोत्सव होगा, इस बहाने से तुम अपने अन्य वाधवों से मिल लोग वही
म्हे तुम्हारे अत्यन्त दुखित हृदय पिता वसुदेवत्री भी मिल जायगे ॥५॥ दुष्ट
इस उन्हें निरन्तर दु.स देता है, इससे वे और भी सतप्त होते हुए नितान्त दुर्बल
गये हैं ॥६॥ वे कस के भय से सदा भीत रहते और तुम्हें न देखने से और
तो चिन्ता यस्त रहते हैं ॥७॥ तुम्हारी देव-नारियो जैसी अत्यन्त सुकुमारी माता
३३६ ] [ श्री हरिवंशपुरा देवकी अपने किसी बालक को आज तक दूध न पिला सको, इससे वह दर हृदया अत्यन्त कान्तिहीन प्रतीत होती है ।।। पुत्रशोकेन शुष्यन्ती त्वदृर्शनपरायणाम् । वियोगशोकसतप्ता विवत्सामिव सौरभीम् ॥ उपप्लुतेक्षणा दीना नित्य मलिनवाससम् । स्वर्भानुवदनग्रस्ता शशाकस्य प्रभामिव ।।१० त्वदर्शनपरा नित्य तवागमनकाक्षिणीम् । त्वत्प्रवृत्तेन शोकेन सीदन्ती व तपस्विनीम् ॥११ कृष्ण सुविदिताओं वै तमाहामितविक्रमम । वाढमित्येव तेजस्वी न च क्रोधवश गत ॥१२ ते च गोपा समागम्य नन्दगोपपुरोगमा । अक रवचन श्रुत्वा चेलु कसस्य शासनात् ।।१३ गमनाय च ते सज्जा वभूवुव्रजवासिन । सज्ज चोपायन कृत्वा गोपवृद्धा प्रतस्थिरे ।।१४ कर चानडुह सपिमहिपाश्चोपनायकान् । यथासार यथायूथमुपानीय पयो घृतम् ॥१५ त सज्जयित्वा कसस्य कर चोपायनानि च । ते सर्वे गोपपतयो गमनायोपतस्थिरे ॥१६ वह तुम्हारे वियोग-दुख म सदा नथ पात परती रहती है और दियोग वाली गो समान पोaa malsसके वस्त्र गदा मेसे पो और पहप पसी हुई पानी में समान प्रभार से मलीन रहती है ॥१॥ वह तपस्विनी तुम्हारे चोर में शीण होती हुई तुम्ह देखने को लातापित है वो तुम्हारे बाने कीमतीक्षा परती रहती है | वशयनी नहा- राजन् ! पर भी गातों को मल प्रभार मार भगवार श्रीरण ने उन धनुमान III नन्दादि भी गोपों के बार मुख महाराज रोभा गुत ही मधुरा पनामा पार किया ॥१३॥ तुक
वक्र र द्वारा नाग लोक-वर्णन ।
[ २३०
हो, घृत, महिप, बैल आदि के सहित वार्षिक र लेकर मधुरा चल्ने को उद्या
हए ॥१४-१५-१६॥
जळू रस्य कयाभिश्च सह कृष्णेन जाग्रतः ।
रोहिणेयतृतीयस्य सा निशा व्यत्यवर्तत ॥१७
ततः प्रभाते विमले पक्षिव्याहारसकुले ।
नशाकरे रस्मिजाले क्षपदाक्षयसहृत्ते ॥१८
नभस्यरुणमम्तीर्ने पर्यस्ते ज्योतिषा गणे।
प्रत्यूपपवनामार. क्लेदिते।धरणोतले ॥१६
सोणाकारासु तारामु सुप्तनिष्प्रतिभानु च ।
नैशमन्तर्दधे समुद्गच्छति दिवाकरे ।।२०
शीताशु शान्तकिरणो निष्प्रम समपद्यत ।
एको नाशयते रूपमेको चर्दयते वपु ॥२१
गोनि- समवकीर्णासु बजनिर्याण भूमिपु ।
मन्यानावर्तपूर्णपु गर्गरेषु नदत्सु च ।।२२
दामभिर्दम्यमानेषु वत्सेषु तरुणेषु च ।
गोपरापूर्यमाणासु घोपरय्यासु सर्वश ॥२३
तव गुरुक भाण्डं शक्टारोपित नहु ।
त्वरिता. पृटत कृत्वा जग्मु. स्यन्दनराहनाः २४
कृष्णोऽय रोहिणेयश्च स चामितदक्षिनः ।
यो रथमता जमुनितोकपतयो यथा ॥२५
अथाह कृष्णम रो यमुनातीरमाथिन ।
स्यन्दन चात्र रक्षाब यल च कुरु वानिपु ।।२६
हयेभ्यो ववस दत्त्वा हयभाण्डे रपे तया।
प्रगाढ यलमास्याय क्षण तात प्रतीक्ष्यताम् ।।२७
यमुनाया हदे ह्यस्मिन्स्तोप्यानि भुजगेश्वरम् ।
दिव्यमगिवतमन्र. सर्वलोकप्रभु यत. ॥२८
रपौर घोडों की रक्षा करो, घोटोवो घास डाल देना और उनके बाभूपर ३३८ ] [ श्री हरिवंशपुरा आस्तामा. समुदीक्षन्ती भवन्तौ सगतावुभौ । निष्कृष्टो भुजगेन्द्रस्य यावदस्मि ह्रदोत्तमात् ॥२६ उपर कृष्ण, बलराम और अङ्क र तीनो ही ने विविध वार्तालाप करते हुए रात्रि-जागरण किया ॥१७॥ जब प्रात.काल हो गया तव पक्षियों को क्लए ध्वनि आरम्भ हुई और चन्द्रमा की किरणें प्रभाहीन होगई ॥१८आकाश में अरुणोदय की लाली छा गयी, तारागण छिप गये और शीत समीर प्रवाहित होने लगा ॥१६॥ कुछ नक्षत्र छिप गये और कुछ निष्प्रभ हो गये, चन्द्रमा रे अपनी चाँदनी समेटी और सूर्य किरणें विस्तृत हो उठी ॥२०-२१॥ व्रज के इधर उधर जाकर गौए चरने लगी और मथानी का शब्द सुनाई पडने लगा ॥२२॥ युवावस्था वाले बछडे सूटो से बांध दिये गये और व्रज के सब मार्गों पर गोपन चलते हुए दिखाई पड़ने लगे ॥२३॥ उस समय भारी वर्तनो में विविध साम्झने भर वर और उन्हें शकटो पर लाद कर गोपगण मथुरा की ओर चल दि ॥२॥ बलराम, कृष्ण अक र के रप पर लोकगालो के समान जारूढ हो। चले ॥२५तब यमुना के किनारे पहुंच कर अक्रूर ने कहा-- तुम यहाँ रह को भी देखते रहना ॥२६-२७॥ क्योकि मैं यमुना बल मे जाकर सपेश्वरम भगवान् का पूजन करूगा ॥२८॥ इसलिये जब तक मैं यहाँ सौटकर बाऊ तक तुम यही रह पर मेरी प्रतीक्षा करना ॥२६॥ तमाह पप्णः सहृष्टो गच्छ धर्मिष्ठ मा चिरम् । जावा रालु न शक्तो स्पस्त्वया हीनावुपासितुम् ॥३० स हदे यमुनायास्तु ममज्जामितदक्षिणः । रमातले स दहशे नागलोवमिम यथा ॥३१ तस्य मध्ये राहतास्य हेमतालोतिध्वजम् । साजलासमतहस्ताय मुगलोपाश्रितोदरम् ॥३२ असिताम्रसीत पाण्डर पाण्डुरासनम् । पुण्डलकपर मत्त गुप्तमम्युम्हेक्षणम ॥३३ सक र द्वारा नाग लोक-वर्णन ] भोगोत्कगसने शुक्रे स्वेन देहेन कल्पिते । स्वासीन स्वस्तिकाम्या च वराहाभ्या महीधरम् ।।३४ किंचित्सव्यापवृत्तेन मालिना हेमचूलिना । जातरूपमयः पद्मालयाऽच्छन्नवक्षसम् ॥३५ स्तचन्दनदिग्वाङ्ग दीर्घवाहमरिंदमम् । पद्मनाभ मिताभ्रामं भामिज्वलिततेजसम् ॥३६ ददर्श भोगिना नाथ स्थितमेकार्णवेश्वरम् । पज्यमान द्विजिह्वेन्द्र वासुकिप्रमुखै. प्रभुम् ।।३७ यकर की बात सुनकर भगवान् कृष्ण ने प्रसन्नतापूर्वक पहा-अच्छा, प जाइये, परन्तु अधिक विलम्ब न करना ॥३०॥ तव बकर ने यमुना तट र जाकर जल मे स्नान किया । उन्होंने देखा कि वे नागलोक में पहुंच गये १॥३१॥ वहाँ हजार मस्तक वाले उन्नत ध्वजा युक्त, हल-मूसल धारण किये 'ए, नीलाम्बर ओढ़े, एक कुण्डल से सुशोभित, पाण्डुर वर्ग बाले, मद से मत्त, घिसिले कमल जैसे नेर वाले, स्वस्तिक चिह्न घारी अनन्त भगवान अपने तक पर सम्पूर्ण पृथिवी को धारण किये हुए एक उज्वल आमन पर प्रतिष्ठित ३२-३३-३४॥ उनका मुकुट बाई और को कुछ-कुछ झुका या समा उनके क्षिःस्थल पर सोने के कमल की माला सुशोभित थी ॥३५।। उनके शरीर पर रक्त न्दन लगा था, उनकी विशाल नुजाएं, कमल के समान नानि और जल रहित ध के समान अत्यन्त शुभ्र देह कान्ति यो ॥३६॥ वासुकि महा सर्प उन एकान- वर भगवान का निरतर पूजन कर रहे थे ॥३७॥ कम्बलाश्वतरौ नागी ती चामरकरावुनी । अवीजयेता त देव धर्मासनगत प्रनुम् ॥३८ तस्याभ्याशगतो भाति वासुकिः पन्नगेश्वरः । । वृतोऽन्यः सचिवः सर्वः कर्कोटकपुर सर ।। तय कास्यमादिप्या पद्धज्मपरस्तक। राजान स्नापयामासु. स्नातमकाणंवाम्वभिः ॥४० । को उपत हुए बनी उनको वाशक्ति स्तभित हो गई ॥४३॥ सबको बसराम और पप्ण को रप पर बंट रह पर एक-दूसरे पोबारा ३४० ] [ श्री हरिवंशपूर तस्योत्सङ्गे घनश्याम श्रीवत्साच्छादितोरसम् । पीताम्बरधर विष्णु सूपविष्ट ददर्श ह ॥४१ अपर चैव सोमेन तुल्यसहनन प्रभुम् । सकर्पणमिवासीन त दिव्य विष्टर विना ॥४२ स कृष्ण तत्र सहसा व्याहतु मुपचक्रमे । तस्य सस्तम्भयामास वाक्य कृष्ण स्वतेजसा ।।४३ सोऽनुभूय भुजगाना त भागवतमव्ययम् । उदतिष्ठत्पुनस्तोयाद्विस्मितोऽमितदक्षिण ॥४४ स तौ रथस्थावासीनी तवैव बलकेशवो। निरोक्ष्यमाणावन्योन्य ददर्शाद्भुतरूपिणौ ॥४५ कम्पल और अश्वतर दो नाग-बन्धु उन पर चवर डुला रहे थे । वासुकी और कोटक आदि नाग-सचिव उनके चारो ओर बैठे थे ॥३६॥ समुद्र के जल स नरे और पद्म पुष्प से सजे हुए स्वणं घट से उन भगवान् का अभिषक हा ।।४०॥ तदनन्तर अकूर ने देखा कि उन भगर निकट ही पीताम्बर धारी, मेघ-वर्ण, श्रीवत्स से अलकृत श्रीकृष्ण के समान एक अन्य पुरुष विराजमान है ।।४१-४२॥ उस देसत ही अकर उससे कुछ पूछने श्रीहरि को ही नागरान अन ठ समझा और आश्चय पक्ति मन स यमुना में स निकल ॥४॥ तब उन्होन रथ रो ओर दृष्टि डाल पर देखा तो है पाया॥५॥ पामग्जत्नस्तस तदाका कुतूहलात् । इग्यत यस देवोऽसौ नौलवासा सिताननः ।।१६ तवासीनमुत्सों सहसास्यधरस्य । ददर्भ वृष्णमकर. पूग्यमान तदा प्रभुम् ॥४७ भूयश्च महमात्याय मन्त्र मनसा जपन् । रथ नंब मामन गामामितदक्षिण ॥
[ ३१
बन र द्वारा नाग लोक वर्णन ]
तमाह केशवो हृष्टः स्थितमक्रूरमागतम् ।
कीदृश नागलोकस्य वृत्त भागवते हृदे ॥४६
चिर च भवता कालो व्याक्षेपेण विलम्बितः ।
मन्ये दृष्ट त्वयाऽऽश्चयं हृदय ते यथा चलम् ।।५०
प्रत्युवाच स तं कृष्णमाश्चयं भवत्ता विना।
कि भविष्यति लोकेषु स्थावरेपु चरेषु च ॥५१
तनाश्चयं माया दृष्ट कृष्ण यद्भुवि दुर्लभम् ।
तदिहापि यथा तन पश्यामि च रमामि च ।।५२
सगतश्चापि लोकानामाश्चर्येणेह रूपिणा।
अतः परतर कृष्ण नाश्चर्य द्रप्टुमुत्सहे ॥५३
तदा गच्छ गमिष्यामः कंसराजपुरी प्रभो।
यावन्नास्त बजत्येपस्तमोहर्ता दिवाकरः ॥५४
इससे उनका विस्मय और भी बढ़ गया और उन्होने जल में पुनः गोता
या तो जल में जहां सहस्र मस्तक वाले अनन्त भगवान् विराजमान थे, वहाँ
अब श्रीकृष्ण को ही विराजमान देखा।।४६-४७॥ तब वे पुन. जल से निकले
मत्र-जप करते हुए रथ के पास आगये ।।४८|| उन्हें देख कर श्रीकृष्ण ने
-यमुना-जल मे आपने ऐसा क्या देखा है जिससे आपके हृदय की चचलता
बता रही है कि आपने कोई आश्चर्यजनक घटना देयी है ? फिर आपको
विलम्ब भी बहुत हो गग ॥४६-५०॥ इस पर अक्र र ने कहा-हे वत्स !
विश्व में तुम्हारे अतिरिक्त कोई अन्य आश्चर्य है ही नही ॥५१॥ वहाँ जिस
वर्यमयी घटना को मैंने वहाँ देखा था, उसे में इस समय भी यहाँ देख रहा
५२।। मैं उस वि मयजनक वस्तु को मूर्त रूप में देख कर इतना तन्मय हो
पा कि अब उससे अधिक किसी भी वाश्चयं को देखन वो मुझे इच्छा
हो रही है ५ ५३ ॥ बच्छा अब हमको चलना चाहिये, क्योकि सूर्य के
हुए ही हमे मधुरापुरी में पहुंच जाना है ॥५४॥
मथुरापुरी में जा पहुंचे ।।१.२७ मूर्य के समान अत्यन्त तेजस्वी उन दोनों बान
को साथ लिये हुए अक्रर अपने घर में घुसे ॥३॥ वहाँ उन दोनोकोवा
कर उन्होंने कहा-अभी अपने पिता वसुदेव जी के यहाँ मत जाओ, क्योकि
उचित नहीं होगा ॥४-५॥ इसलिये, उनको मुम की प्राप्ति हो, सामान
यह मुन कर श्रीकृष्ण बोले कि यदि आपपीबनुभा हो तो हम राजमायाका
३४२
[ श्री हरिवरापुटर
॥ श्रीकृष्ण द्वारा कंस के धनुष का टूटना ।
ते तु युडक्त्वा रथवर सर्व एवामितौजसः ।
कृष्णन सहिता. प्रायंस्तथा सकपणेन च ॥१
आसेदुस्ते पुरी रम्या मथुरा कंसपालिताम् ।
विविशस्ते पुरी रम्या काले रक्तदिवाकरे ॥र
तौ तु स्वभवन वीरौ कृष्णसकर्षणावुभौ ।
प्रवेशितो बुद्धिमता ह्यरेणार्कवर्चसौ ॥३
तावाह वरवर्णाभौं भीतो दानपतिस्तदा।
त्यक्तव्या तात गमने वसुदेवगृहे स्पृहा ॥४
युवयोहि कते वृद्ध' कंसेन स निरस्यते ।
भर्त्यते च दिवा रातो नेह स्थातव्यमित्यपि ॥५
तद्य वाभ्या हि कर्तव्य पित्रय सुखमुत्तमम् ।
यथा सुखमवाप्नोति तद्वं कार्य हितान्वितम् ॥६
तमुवाच तत कृष्णो यास्यावावामतकिती।
प्रेक्षन्तौ मथुरा वीर राजमार्ग च धार्मिकम् ।
तस्यैव तु गृहं साधौ गच्छावो यदि मन्यसे ।।७
वैशम्पायन जी ने कहा-फिर रथ वो जोड कर अक्रूर बलर
के सहित उस पर बैठ कर वहां से चले और सूर्यास्त होते-हाते कम द्वारा ".
तुम्हारे लिये ही कंस की ताना सहन कर रहे हैं, इसलिये तुम्हारा बहाण
मधुरानगरी पो देखते हुए महाराज म के भवन में ही चले जायें ॥६.५
अनुशिष्टौ च ती वीरो प्रस्थिती प्रेक्षकायुभी
आनानाध्यामिया मातोगजगदक्षिणी ।
श्रीकृष्ण द्वारा कस के धनुष का टूटना ] [ ३४३ तो तु मार्गगतं दृष्टा रजक रङ्गकारकम् । अयावेता ततस्तौ तु वासामि रुचिराणि वाई रजकः स तु ती प्राह युवा कस्य वनेचरी। राजवामासि यो मौढ्याद्याचेता निर्भयावुभौ ॥१० अहं कंसस्य वामामि नानादेशोद्भवानि वै। कामरागाणि शतशो रज्जयामि विशेषतः॥११ युवा कस्य वने जाती मृगैः सह विद्धिती। जातरागाविदं दृष्ट्वा रक्तमाच्छादन बहु ।।१२ अहो वा जीवित त्यक्तं यो भवन्ताविहागतो। मूर्बो प्राकृतविज्ञानी वामो याचितुमिच्छयः ॥१३ तस्मै चुकोप वै कृष्णो रजकायालमे से। प्राप्तारिष्टाय मूर्खाय मृजते वाड्मय विषम् ।।१४ तलेनामनि कल्पेन स तं मूर्टन्यताडयत् । स गतासुः पपातोन्या रजको व्यस्तमस्तकः ॥१५ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् ! जैसे खभे से बंधा हुआ युद्धेच्छुक थो धवन से छूटता है, वैसे ही कृष्ण और बलराम अक र से थाना लेकर नगरी देखने की इच्छा से चल दिये 1। फिर कुछ ही दूर जान पर उन्हें एक स्त्र धोने वाला दिखाई दिया, जिससे उन्होंने सुन्दर वस्त्रों की मांग की। नके द्वारा वस्त्र मांग जाने पर धोवो बोला कि तुम वर वनचर प्रतीत ति हो, जो मूबंता ने राजा के वस्त्रो को मांगते हुए भी नहीं डर रहे हो ॥१०॥ ना देशो में निमिा हुए विभिन्न प्रकार के वस्त्रो को महाराज कस की रुचि अनुसार रंगना ही मेरा कार्य है ॥११॥ तुम वन मे उत्पन्न होकर मृगो के ग्य सेलते हुए ही वृद्धि को प्राप्त हए हो, इसीलिये इन रंग-विरगे वस्त्रों को ख कर इन पर मोहित हो गये हो ॥१२॥ तुम इतने मूर्व और नानी हो नि राजा के वस्त्रों को मांग कर तुमने अपने जीवन को भोग बना विग है ॥१३॥ स न्यून बुद्धि दाले धोवो ने कालाश ही भगवान् कृप्न के प्रति ऐन विनय चन बहे, जिससे रुष्ट होकर उन्होंने एक पप्पर उसके मुग पर मारा रा [ श्री हरिक्शन प्रहार से उसका मस्तक विदीर्ण हो यया और प्राण-रहित होकर पृथिवी पर । गिरा ॥१४-१५॥ त हत परिदेवन्त्यो भार्यास्तस्य विचुक्रुशु । खरित मुक्तकेश्यश्च जम्मु कसनिवेशनम् ॥१६ तावप्युभौ सुवसनो जग्मतुर्माल्यकारणात् । वीथी माल्यापणाना वै गन्धाघ्रातौ द्विपाविव ।।१७ गुणको नाम ततासीन्माल्यवृत्ति प्रियवदः । प्रभूतमाल्यापणवाल्लक्ष्मीवाप्रियदर्शन ॥१८ त कृष्ण श्लक्ष्णया वाचा माल्यार्थमभिसृष्टया । देहीत्युवाच तत्काले मालाकारमकातरम् ।।१६ ताभ्या प्रीतो ददो माल्य प्रभूत माल्यजीवन । भवतो स्वमिद चेति प्रोवाच प्रियदर्शनी ।।२० प्रोत सुमनसा द्रष्णो गुणकाय वर ददौ । श्रीस्त्वा मत्सभवा सौम्य धनौघरभिपत्स्यते ॥२१ इस प्रकार जब वह रजक मर गया, तब उसकी स्त्रियों कश सोल प्रन्दन करती हुई महाराज यस वे भवन म गई ॥१६॥ उपर श्रीकृष्ण का मानी रुचि के अनुसार उन मुन्दर वस्त्रो को पहिन र जहाँ माली रहने वहाँ एक मुगधित माला यी इच्छा स गये ॥ १७॥ यही गुणक नामक सौभाग्यशाली माली नियाम वरता था ॥१८॥ उस पास जापर उहाने । मपुर स्वर में माला देन प लिय वहा । माली ने कहा कि यह मासा लिय ही बनाई गई है, जो बच्यो सगे ले सीजिये । यह पहपर उसन । मालाएं उन हाप में दे दी ॥१६-२०॥ तर भगवान ने प्रसन्न होते हुए उसे से रहा-ह सौम्य । तुम्हारे यहा पा सदैव भरा रहेगा और लक्ष्मी हुए पराभी स्पागन परगी ॥२१॥ ग सन्ना यग्मव्यग्रो मायातिरधोमुगः । पणस्य पशि मूर्ना प्रतिजग्राहस परम ॥२२ श्रीकृप्य द्वारा कत्र के धनुप का टूटना .] I ६४५ यक्षाविमाविति तदास मेने माल्यजीवकः । स भृश भयमविग्ना नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥२३ वमुदेवमुतो तो च राजमार्गगतावुनी। कुन्जा ददृशतुर्भूयः सानुलेपनमाजनाम् ॥२४ तामाह कृप्य. कुन्नेति कस्येदमनुलेपनम् । नयसन्युजपत्राक्षि क्षिप्रमाझ्यातुमर्हसि ॥२५ सस्मिता समुन्बीभूत्वा प्रत्युवाचाम्बुजेक्षणम् । कृष्ण जलदगम्भीर विद्युत्कुटिलगामिनी ||२६ राज्ञः स्नानगृहं यामि तद्गृहाणानुलेपनम् । स्थितास्म्यागच्छ भद्र ते हृदयस्यामि मे प्रियः ॥२३ कुतश्चागम्यते सौम्य यन्मा व नावबुध्यसे । महाराजस्य दयिता नियुक्तामनुलेपने ॥२८ वरदान प्राप्त कर माती ने सिर झुका कर और उनके घरों में पढ़ र प्रण म किया, परन्तु उसने उन दोनों को यक्ष समझ कर भय के कारण उन्हें ई उत्तर नहीं दिया ॥२२-२३।। तदनन्तर वे दोनों वमुदेव-पुत्र उसी राजमार्ग बाग चले तो उन्ह एक दुदही दिवाई दी, जिसके हाय में चन्दन से परिपूर्ण के बर्तन या ॥२॥ उसन श्रीकृष्ण ने कहा-है पद्मपत्राक्षि यह बनुलेपन सके लिये ले जा रही हो ॥२५॥ इन पर विद्युत् के समान कुटिल गति लो दुजा ने मुम्करा कर उलधर के समान गनीर श्रीकृष्ण ने कहा-यह उपेलन गजा कस के स्नानागार में लिये जा रही हूँ, परन्तु तुम्हें देख कर मेरा 7 तुम्हागे ओर बापित हो उठा है, इसलिये तुम्हें जितना चदन चाहिये, उना इसमें से ग्रहण करलो ।।२।। में महाराज के लिये धेठ यनुलेपन बनाने 'कार्य पर नियुक्त हूँ, मेरा चदन उन्हें बहुत प्रिय है, तुम मुझे नहीं जान पाये बतायो कि वहाँ से चने आई हो? ॥२८॥ बामुगान हसन्ती तु उष्ण: कुज्ञामवस्थिताम् । आवयोगानसदृशं दीरतामनुलेपनम् ।।२९ - ।
३४६ ] [ श्री हरिक्यपुर श्रीकृष्ण की बात सुन कर कुबडी ने कहा-तुम्हे देख कर मेरा देह हपित। रहा है, इसलिए राता के योग्य इस चदन को मैं तुम्हे दे रही हूँ ॥३॥ अपनी दो अंगुलियो से कुब्जा के कूबड़ को दवा दिया जिससे उसका बडकर वय हि देशातिययो मल्ला प्राप्ता वरानने। द्रष्टु धनुर्मह दिव्य राष्ट्र चैव महर्विमत् ।।३० प्रत्युवाचाथ सा कृष्ण प्रियोऽमि मम दर्शने । राजाहमिदमव्यग्र तद्गृहाणानुलेपनम् ॥३१ तावुभावनुलिप्ताङ्गो चारुगात्री विरेजतु । तीर्थगौ पङ्कदिग्धाङ्गो यमुनाया यथा वृपो ।।३२ ता च कुब्जा स्थगोर्मध्ये द्वरङ्ग लेनाग्रपाणिना। शनै सपीडयामास कृष्णो लीलाविधावित् ॥३३ सा च मग्न स्यगु मत्वा स्वायताङ्गी शुचिस्मिता । जहासौच्च स्तनतटा ऋजुयष्टिलता यथा 11३४ प्रणयाच्चापि कृष्ण सा वभाषे मत्तक शिनी । क्व यास्यसि मया रुद्ध कान्त तिष्ठ गृहाण माम् ॥३५ तब श्रीकृष्ण बोले कि तुम हमारे प्रयोग के योग्य ही अनुलेपन हमें दो। हम यहाँ प्रथम बार आने वाले मल्ल है और राजा कस के इस अल वैभवशाली राज्य और धनुयज्ञ को देखने के निमित्त ही यहाँ आये हैं ॥२६३ के समान शोभा पाने लगे ॥३२॥ तक देह विमान को जानने वाले भगय न हो गया और वह सीधी फैलने वाली लता के समान सुडौन अग याली हो उच्च स्वर रो हाम करती हुई श्रीकृष्ण का मार्ग शेक कर बोनी- अब में किधर जाते हैं ? हे कान्त । अब तो मुझे ग्रहण कर लीजिये ॥३३-३५।। तो जातहासावन्योन्य सतलाक्षेपमव्ययौ । वीक्षमाणी प्रहसितो कुन्जाया थ तिविस्तरौ ॥३६ वृष्णस्तु कुजा कामाता सस्मित विससर्ज ह । नतम्नी कुब्जया मुक्ती प्रवित्रौ राजससदम् ॥३७ . श्रीकृष्ण द्वारा कस के धनुप का टूटना ] [ ३४० तावुभौ बजसवृद्धौ गोपवैपविभूपितो । गूढचेष्टाननो भूत्वा प्रविष्टौ नृपवेश्म तत् ॥३८ धनु शाला गतौ तन वालावपरितकिती। हिमवद्वमसभूतो सिंहाविव मदोत्कटौ ॥३६ दिदृक्षन्ती महत्तन धनुरायागभूपितम् । पप्रच्छतुश्च तो वोरावायुधागारिक तदा ॥४० भो कसधनुपा पाल श्रू यतामा तयोर्वच । कतरत्तद्धनु. सीम्य महोऽय यस्य वर्तते । ४१ आयोगभूत कंसस्य दर्शयस्व यदी छसि । स तयोर्दर्शयामास तदनु स्तम्भसन्निभम् ।।४२ उसके वचन सुन कर दोनो भाइयो को बडा आनन्द मिला और वे ताली बजा कर उसे देखने और उसकी प्रशसा करने लग ॥३६ । इसके पश्चात् उन्होने हस कर कुञा को विदा किया बोर स्वय वहाँ से चल कर राजभवन मे घुसे ॥३७ । वहां पहुंच कर वे दोना भाई गोपवेश मे ही जहां घनुप-यज्ञ होने को था, । उस यज्ञशाला मे धनुप को देखने को इच्छा से गये और वहाँ जाकर यज्ञशाला के रक्षक से पूछने लगे कि हे महाराज कम के धनुपपाल | जिस धनुप के लिये { इम महोत्सव का आयोजन किया गया है, वह घनुप कौन-सा है ? ॥३७.४१॥ यदि आपको किसी प्रकार की नापत्ति न हो तो उस प्रसिद्ध धनुप के दर्शन हमें भी करा दीजिये । इस पर धनुप रक्षक ने वह खम्भे के समान मोटा घनुप उन्हे दिखला दिया । ४२॥ अनारोप्यमसभेद्य देवरपि सवासवै । तद्गृहीत्वा तदा कृष्णस्तौलयामास वीर्यवान् ।।४३ दोभ्यां कमलपनाक्ष प्रहप्नान्टेतरात्मना । तोलयित्वा यथाकाम तदनुर्दत्यपूजितम् ॥४४ आरोपयामास तदा नामयामा चासकृत् । आनाम्यमान कागेन प्रादुरगापमम ।।५५
सम्पूणे अन्त पुर थरों गया॥४७॥ बलराम और कृष्ण वहाँ से चल कर नन्दादि
बोता कि हे महाराज | अभी कुछ देर पहिले ही यज्ञशाला मे एक विस्मित करने
३४८ ]
[ श्री हरियमपुरा
द्विधाभूतमभूमध्ये धनुरायोगभूपितम् ।
भक्त्वा तु तदनु श्रेष्ठ कृष्णस्त्वरितविक्रमः ।
निश्चक्राम महावेग स च मकर्पणो युवा ।।४६
धनुपो भङ्गनादेन वायनिर्णोपकारिणा ।
चचालान्त पुर सर्व दिशश्च पुपूरिरे ।।४७
निर्गत्य त्वायुधागाराज्जग्मतुर्गोपसन्निधौ ।
वेगेनायुधपालस्तु गच्छन् भ्रन्तमानस । ४८
समीप नृपतेर्गत्वा काकोन्छासोऽम्यभापत ।
थ यता मम विज्ञाप्यमाश्वर्य धनुपो गृहे ।।४
उस धनुष को झुका कर उस पर प्रत्यचा चढाने म इन्द्रादि देवता भी
समर्थ नही थे, परन्तु पद्मलोचन गवान् श्रीकृष्ण ने हपित होकर उस सस
के समान धनुप को उठा कर उस पर प्रत्यमा चढा दी और उसे बारम्बार खींचने
लगे ॥४३-४५।। परन्तु जैसे ही उस धनुप को निरित् जोर लगा कर खींचा
घेसे ही वह बीच में से दो टूक हो गया। तब श्रीकृष्ण तत्काल ही अपने पर
वलराम जी के सहित यज्ञशाला से बाहर निकल आये ॥४६॥ उस धनुष के
टूटने का जो भीषण शब्द हुआ, दसो दिशाएँ कम्पित हो उठी तथा राजा का
गोषो के पास पहुंचे । इधर धनुष रक्षक भयभीत होता हुआ कस के पास जाकर
।
वाली घटना हुई है, उसे सुनिये ॥४८-४६।।
निर्वृत्तमस्मिन्काले यज्जगत सभ्रमोपमम् ।
नरौ कस्पायसदृशी शिखाविततमूर्द्धजौ ॥५०
नीलपीताम्बरधरौ पीतश्वेतानुलेपनौ ।
तावन्न पुरमज्ञातो प्रविष्टी कामवेपिणौ ।
देवपुयोपमी वीरो वालाविव हुताशनी ॥५१
स्थितो धनुगह सीम्यो ससा पादिवागती।
मया दृप्टो परिव्यवत रुचिरच्छादनस्रजी ॥५२
श्रीकृष्ण द्वारा कस के धनुप का टूटना ] [ ३४६ तयोरेकस्तु पद्माक्षः श्याम. पीताम्बरस्रजः । जग्राह तद्धतरत्न दुर्ग्राह्य देवतैरपि ॥५३ तच्च वालो महच्चाप बलाद्यन्नमिवायसम् । आरोपयित्वा वेगेन नामयामास लीलया ॥५४ आकृप्यमाण तत्तेन विवाण वाहुशालिना। मुप्टिदेशे विकूजित्वा द्विधाभूतमभज्यत ॥५५ ततः प्रज्वलिता भूमि व भाति च भास्करः । धनुपो भङ्गनादेन भ्रमतीव नभस्तलम् ।।५६ नीले और पीले वस्त्रो को धारण किये हुए, श्वेत तथा पीला चन्दन ये, सिर पर लम्बी चुटिया रखे देवतायो के समान दो बालक न जाने किस पर यज्ञशाला मे घुस गये ।।५०-४१।। उस समय यही लगता था कि वे स्वर्ग सीधे ही यज्ञशाला में आ गये हो । उनको देह पर दिव्य वस्त्र तथा कठ में य मालाएँ सुशोभित थी ।।१२।। उन दोनो में से जो एक बालक श्याम वर्ण पीताम्बरधारी और कमल दल जैसे नेत्र दाला या, उसने देवताओ के द्वारा न उठाये जाने योग्य उस भीपण धनुप को उठा कर लीलापूर्वक ही उस पर चा चढा दी ॥५३-५४॥ फिर उस वाण को चढाकर उसमें वैसे ही खींच : देखा तभी वह धनुप भीपण शब्द करता हुआ टूट गया ॥५५॥ उस समय रवी कम्पायमान हो उठी, आकाश घूमने लगा और सूर्य का प्रकाश भी क्षीण गया ॥५६॥ तदद्भुत महदृष्ट्वा विस्मयं परम गतः । भयाद्भयद शत्रूणा तदिहास्यातुमागत. । न जानामि महाराज को तावमितविक्रमो ॥५७ एक: कैलाससकाश एकोऽजनगिरिप्रभः । स तु तच्चापरत्न व भड्क्त्वा स्तम्भमिव द्विपः ।।५८ निष्पपाताभितगति. सानुगोऽमितविक्रमः । अगमत्त द्विधा कृत्वा न जाने कोऽप्यसो नृप ॥५६ ३५० ] [ श्री हरिदशपुण्य श्रु त्वैव धनुपो भङ्ग क्सो विदितविस्तर । विसृज्यायुधपाल वै प्रविवेश गृहोत्तमम् ।।६० इस विचित्र घटना से मुझे अत्यत विस्मय हुआ है, मैं नहीं जानता कि ऐसे अद्भुत पराक्रम वाल कौन थे यही सब निवदन करने के लिये मैं यह उपस्थित हुआ हूँ ॥५७।। उनमे से एक तो कैलाश के समान उज्ज्वल और दूसरा अजन के समान काला था । हे महाराज | जैसे हाथी किसी खम्भे को चीर कर चला जाय, वैसे ही वह श्याम वरण वाला वालक धनुष तोड कर अपने साथी के साथ न जाने कहां गया ॥५८-५६॥ धनुष रक्षक से धनुष के टूटने का समाचार सुनकर कस उस जाने को कह कर अपने श्रेष्ठ भवन में प्रविष्ट हो गया ॥६॥ ।। कुवलियापोड का वध ॥ तस्मिन्नहनि निवृत्ते द्वितीये समुपस्थिते । आपूर्यत महारग पौरैयुद्धदिक्षु भि ॥१ सचिनाष्टात्रिचरणा सार्गलद्वारवेदिका । सगवाक्षार्द्ध चन्द्राश्च सुतल्पोत्तमभूपिता ॥२ प्राड्मुखैश्चारुनिमुक्तर्माल्यदामावतसितै । अलकृतविराजद्भि शारदैरिव तोयदै ॥३ मञ्चागार सुनियुक्तैर्युद्धाय सुविभुपिते । समाजवाट शुशुभे समेघौघ इवार्णव ॥४ स्वकर्मद्रव्ययुक्नाभि पताकाभिनिरन्तरम् । श्रेणीना च गणाना च मञ्चा भान्त्यचलोपमा ॥५ अन्त पुरचराणा च प्रक्षागाराण्यनेकश । रेजु वाचनचिसाणि रत्नज्वालाकुलानि च ॥६ तानि रत्नोपक्लुप्तानि ससानुप्रग्रहाणि च । रेजुर्जवनिमाक्षेपै सपक्षा इव ध नगा ॥७ तत्र चामरहारैश्च भूषणाना च सिन्जित । मणीना च चिचियाणा विचित्राश्चाधिप ।।
५ कुवलियापीड का वध ] [ ३५१ थी वैशम्पायन जी ने कहा--हे राजन् । प्रात काल महोत्सव देखने के नये सम्पूण रगभूमि दर्शको से पपिपूण हो गई ॥१॥ सभा मच विभिन्न चिन- टा, स्तम्भो, वेदियो, अद्धं च द्र के आकार वाले झरोखो आदि के द्वारा सज र मेघो से युक्त सागर क समान प्रतीत हाता था। माला आदि से अलकत र सूक्ष्म वस्त्रो स सुशोभित गनियो और श्रेष्ठ पहलवानो से परिपूर्ण रगशाला ‘रदकाल के स्वच्छ आकाश जैसी लग रही थी ॥२-४॥ शिल्पकार द्वारा अक्ति काओ से सुशोभित रग मच पवत के समान प्रतीत होता था |॥५॥ अन्त पुर "वासिनी महिलाओ के लिय बनाये गये रलमय पतावाओं वाले स्थानो पर 'पिडे होने से वे आकाश म उडते हुए पखधारी परतो जैस लगते थे ॥६॥ उन यो म चंवर, हार और विभिन्न आभूपणी के हिलने का ध्वनि और उज्ज्वल FI सुशोभित थी॥७॥ सौवर्णा पानकुम्भाश्च पानभूम्यश्च शोभिता । फलावदशपूर्णाश्च चागेर्य पानयोजिता ॥६ अन्ये च मञ्चा वहव काष्ठसचयवन्धना । रेजु प्रस्तरणास्तत्र शतशोऽथ सहस्रश ।।१० उत्तमागारिकाश्चैव सूक्ष्मजालावलोकिन । स्त्रीणा प्रेक्षागृहा भान्ति राजहसा इवावरे ।।११ प्राड्मुखश्चारुनियुक्तो मेरु गसमप्रभ । रुक्मपनसनिभस्तम्भश्चितनिर्योगशोभित ॥१२ प्रेक्षागार स कसस्य प्रकाशेऽधिक थिया। शोभिता मात्यदामश्च निवासकृतलक्षण ॥१३ तस्मिन्नानाजनाकीर्ण जनौघप्रतिनादिते। समाजवाटे सस्तब्धे कम्पमानार्णवप्रभे ॥१४ मदिरा, जल और फनो के रसो से परिपूण पाय सब ओर रखे थे | कडो हजार पाषाण और काष्ठयुक्त मच थे, जिनकी गणना करना अस. ||१०|| बने हुए सभा भवन के ऊपरी भाग मे स्त्रियो के देखने के लिये, म हस-सग्रहो के समान, झरोखो से युक्त कक्ष वन हुए थे ॥११॥ उन ३५२ ] [ श्री हरिवरपुरा सभी मचो के बीच मे जो कस का मच था, वह सूक्ष्म वस्त्रो, स्वर्ण स्वभो अं अनेक प्रकार को मालाओ से सज कर पूर्व दिशा को प्रकाशित कर रहा ॥१२-१३॥ इस प्रकार असख्य जन-समूह के कोलाहल के कारण वह रंगशान क्षुभित समुद्र के समान प्रतीत हो रहा था ॥१४॥ राजा कुवलयापीड समाजद्वारि कुञ्जरः । तिष्ठत्विति समाज्ञाप्य प्रेक्षागारमुपाययौ ॥१५ स शुक्ले वाससी विभ्रच्छ्वेतव्यजनचामरः । शुश भे श्वेतमुकुटः श्वेताभ्र इव चन्द्रमा. ॥१६ तस्य सिंहासानस्यस्य सुखासीनस्य धीमतः । रूपमप्रतिम दृष्ट्वा पोराः प्रोचुर्जयाशिषः ।।१७ तत प्रविदि गुमल्ला रंगमावलिताबराः । तित्रश्च भागश कक्षा प्राविशन्बलशालिन. ॥१८ ततस्तूर्यनिनादेन क्ष्वेडितास्फोटितेन च । वसुदेवसुतो हृष्टौ रगद्वारमुपस्थितौ ॥१६ बल्लवी वस्त्रमवीती सुरचन्दनभूपितो। ऊर्धापीडी सगापीडी बाहुशस्वकृती यमौ । आस्फोटयन्तावन्योऽन्य वाहू वार्गलोपमो ॥२० तावापतन्तौ त्वरिती प्रतिपिती वराननौ। तेन मत्तेन नागेन चोद्यमानेन वै भृशम् ॥२१ स मत्सहस्ती दुष्टात्मा कृत्वा कुण्डलिन करम् । चकार चोदितो यल निहन्तु वलकेशवो ॥२२ तभी राजा कस ने कुपलियापीड हाथी को रगशाला के द्वार पर निल पिया और स्वय अपने मप में आया ॥१॥ उस समय उसन श्वेत वस्त्र से घे और वह श्वेत मुकुट, ट्वेत चतर और श्वेत ही पां स एवा होने कारण, उम्पल मेपो में उदित हुए पन्द्रमा के समान लग रहा था ॥१९॥ पंप बपने सिंहागन पर विराजमान हो गया तर सभी हए थानी देने जा फिर स्वर्ण जटित पात्रों को पहिने हुए . पुरजन उसकी जय
चुवलियापीड का वध
[ ३५३
तीन कक्षों को पार करके रगशाला में आ गये ॥१८॥ उस समय तुरही आदि
बाजे बजने लगे और मल्लो का ताल ठोरने का शब्द सुनायी पडने लगा। तभी
वसुदेव-पुत्र श्रीकृष्ण-बलराम भी हर्षित होते हुए रगशाला के द्वार पर आ गये
||१|| उस समय वे सुन्दर वस्त्रो को धारण किये और सुगन्धिप्त अनुलेपन लगाये
हुए थे। उनके सिर पर मुकुट, कठ मे हार और हाथो में शस्त्र थे और अगल
के समान अपनी भुजाओ से ताल ठोकते थे ॥२०॥ उनके द्वार पर आते ही महा-
वत ने हाथी को प्रेरित किया तब उसने उन दोनो भाइयों को याये बढ़ने से रोका
और मारने के लिये उद्यत हुआ ॥२१-२२।।
तत प्रहसितः कृष्णनास्यमानो गजेन वै।
कसस्य तन्मत चैव जगहें स दुरात्मनः ।।२३
त्वरते खलु क सोऽय गन्तु वैवस्वतक्षयम् ।
यो मामनेन नागेन प्रधयितुमिच्छति ॥२४
सन्निकृष्टे ततो नागे गजमाने यथा घने।
सहसोत्पत्य गोविन्दश्चक्रे तालस्वन प्रभुः ॥२५
वेडितास्फोटितरवे कृत्वा नागस्य चाग्रतः ।
कर ससीकर तस्य प्रतिजग्राह वक्षसा ॥२६
विपाणान्तरगो मूत्वा पुनश्चरणमध्यगः ।
ववाधे त गज कृष्ण. पवनस्तोयद यया ॥२७
सहस्ताग्राद्विनिष्क्रान्तो विपाणाग्राच्च दन्तिन. ।
विमुक्तः पादमध्याच्च कृष्णो द्विपमपोययत् ॥२८
यह देखकर श्रीकृष्ण ने हंमते हुए सोचा कि यह पापी कस अपन हाथो
के द्वारा ही हमे मरवा देना चाहता है, तो अब उसका भी अतिम समय आ ही
गया समझो ॥२३-२४। इस प्रकार विचार करते हुए कृष्ण के सिक्ट आत हुए
हाथी ने मेघ के समान गर्जना की, तव कृष्ण ने उसके आक्रमण में बनकर ताल
ठोकी ॥२५॥ फिर उन्होने सिंहनाद कर ताली बजाई और उसके सामने जाकर
सूड पकड़ ली ।।२६।। उसके पश्चात् उसके दांतो और पांवों के बीच में जाकर
'उन्होने हाथी को इस प्रकार पोठित किया, जैसे वायु के द्वारा बादल पीडित होत
३५४ ] I श्रीहरिवशपुराण है ॥२८॥ इस प्रकार वे कभी उसकी सूड पकड़ते, कभी दांत को पीडित कर और कभी उसके पांवो मे घुस कर प्रहार करते ॥२८॥ सोऽतिकायस्तु संमूढो हन्तुं कृष्णमशक्नुवन् । गज. स्वेष्वेव गात्रेषु मथ्यमानो ररास ह ।।२६ पपात भूभौ जानुम्या दशनाभ्या तुतोद च । मद सुनाव रोपाच्च धर्मापाये यथा धन. ॥३० कृष्णस्तु तेन नागेन क्रीडित्वा शिशुलीलया। निधनाय मति चक्र कसद्विष्टेन चेतसा ॥३१ स तस्य प्रमुखे पाद कृत्वा कुम्भादनन्तरम् । दो विपाणमुत्पाट्य तेन व प्राहरत्तदा ॥३२ स तेन वज्रकल्पेन स्वेन दन्तेन कुञ्जरः । हन्यमान. शकृन्मून मुमोचातों रगस ह ॥३३ कृष्णजर्जरितागस्य कुञ्जरस्यातवेतस । फटाभ्यामति सुस्राव वेगवद्भरि शोणितम् ॥३४ लागूल चास्य वेगेन निश्चकर्प हलायुध । शैलपृष्ठासलीन वैनतेय इवोरगम् । ।३५ यह देखकर यह हापो अपने ही शरीर वी पीडा से व्याकुल होता। चिपाडने लगा और वृष्ण को मारने की आशा को पोड बैठा ॥२६॥ तर घुटनो के बल बैट पर पियो को दांतों से पुरेदने लगा, उस समय उसके । मुप से मदनिएसो समा, रा वर्षा में मेधो से जल निकलता है । प्रभार श्रीकृष्ण ने उस हाथी के साथ कुछ समय तक होगको और फिर परको स्मरण र उसे मारने को तत्पर हुए ॥३१॥ तब उन्होंने अपना एक पण उमा माता पर और दूसरा मुम पर रख कर बलपूक दोनों द' IN Grahaaris A याम आ यह हाथी पोपताना मल-मूत्र ने भी MAIT द्वारा उहापोह पारा प्रकारका वलियापीड का य ] [ ३५५ लगा ॥३४॥ तभी गरुड़ द्वारा सर्प को सोचने के समान दलरामजी उसका पकह कर पृथिवी पर घसीटने लगे ॥३५॥ तेनैव गजदन्तेन कृष्णो हत्वा तु दन्तिनम् । जधानकप्रहारेण गजारोहणमुल्वणम् ॥३६ आर्तनाद महत्कृत्वा विदन्तो दन्तिना वरः । पपात स महामात्रो वज्रभिन्न इवाचलः ॥३७ ततस्तो तोरणाङ्गानि प्रगृह्य रणकर्कशी। गजस्य पादरक्षाश्च जघ्नतु पुरुपर्पभो ॥३८ ताश्च हत्वा विविशतुर्मध्य रङ्गस्य तावुमौ । नासत्यावश्विनी स्वर्गादवतीर्णाविवेच्छया ॥३६ वृष्ण्यन्धकाश्च भोजाश्च ददृशुर्वनमालिनी। वेडितोत्कृष्टानादेन वाह्वोरास्फोटितेन च सिंहनादं श्च तालश्च हर्पयामासतुर्जनम् ।।४० तौ दृष्ट्वा भोजराजस्तु विपसाद वृथामतिः। पौराणामनुरागच हपं चालक्ष्य भारत ॥४१ त हत्वा पुण्डरीकाक्षो नदन्त दन्तिना वरम् । अवतीर्णोऽर्ण वाकार समाज सहपूर्वज. ॥४२ इस प्रकार हाथी को उनी के दांत से अर्द्धमृत करके भगवान ने उसके 'त का भी वध कर दिया ॥३६॥ इन्द्र के वच स पिसी पवंत के छिन्न-भिन्न के समान ही दन्तविहीन कुवलयापीड अपने महावत के सहित चीत्कार करता मृत्यु को प्राप्त हुमा ॥३७॥ तदनन्तर कृष्ण-बलराम न वोरण-खण्डो के उस हाथी के समस्त रक्षको को भी मार डाला ॥२२॥ फिर ने दोनो रग- के भीतर प्रविष्ट हुए, उस समय वे ऐस प्रतीत होते थे जैसे दोनो यश्विनी- रही पृथिवी पर वा गये ही ॥३६।। सभी यादवों ने रगशाला मे आये हुए वनमालाघारी दोनो बालको के दर्शन किये और उनके वहनाद, करतल- । तथा ताल ठोक्न के शब्द से सबको आनन्द हुआ। परन्तु उन दालको 'ति नागरिको की ऐमी सहानुभूति देखकर राजा कम को अत्यत दुख उमा
[ यो हरिव
॥४१॥ इस प्रकार अपने ज्येष्ठ भ्राता के साथ श्रीकृष्ण उस हाथो को म
समुद्र के समान उमडती हुई भीड वाले उस सभा भवन मे पहुंच गये ॥४
॥ श्रीकृष्ण द्वारा कस का वध ॥
प्रविशन्त तु वेगेन मारतावल्लिताबरम् ।
पूर्वज पुरत कृत्वा कृष्ण कमललोचनम् ॥१
गजदन्तकृतोल्लेख सुभुज देवकीसुतम् ।
युद्धसमर्दयोगेन मदेन रुधिरेण च ॥२
वल्गमान यथा सिंह व्यूहमान यथा धनम् ।
वाहुशब्दप्रहारेण चालयन्त वसु धराम् ।।३
औरसेनि समालोक्य दन्तिदन्तोद्यतायुधम् ।
वृष्ण भूशायस्तमुख सरोप समुदक्षत ॥
भुजासक्तेन शुशुभे गजदन्तेन शयः ।
चन्द्राविम्बससक्तो याशिवरो गिरिः ॥५
वल्गमाने तु गोविन्दे स त्यो रगसागर ।
जनोधप्रतिनादेन पूर्यमाण दवावभौ ॥६
तत काधानितानाक्षा पस परमगोपनः ।
चावरमादिशद्यस्य समाचलम ॥
- . कृपय द्वारा कम का वध ] [ ३५७ प्रकले कृष्ण ही सिंहनाद करते हुए फिर रहे थे, तो भी समस्त जन-समूह ही पहल करता-सा प्रतीत हो रहा था ॥६॥ तव क्रोध से रक्त नयन किए हुए : ने महावल यौर पराक्रम युक्त तथा छल कुशल चाणूर को कृष्ण से और आकार वाले मुप्टिक को बलराम से मल्ल युद्ध करने की आज्ञा दी ।।७-८॥ कंसेनापि समासप्तश्चाणूरः पूर्वमेव तु । योद्धव्यं सह कृष्णेन त्वया यत्नवतेति वै ॥ स रोपेण तु चाणूरः कपायीकृतलोचनः । अभ्यावर्तत युद्धार्थमपा पूर्णो यथा घनः ॥१० अवघुप्टे समाजे तु नि.शस्तिमिते जने । यादवाः सहितास्तत्र इदं वचनम वन् ॥१ वाहुयुद्धमिदं रंगे सप्राश्निकमकातरम् । क्रियावलसमाज्ञातमशस्त्र निर्मित पुरा ॥१२ अद्भिश्चातिश्रमा नित्य विनेय कालदशिभिः । करीवेण च मल्लस्य सतत सक्रिया स्मृता ।।१३ स्थितो भूमिगतेनैव यो यया मार्गतः स्थितः। सयुज्यतश्च पर्यायः प्राश्निक : समुदाहृत. ।।१४ वालो वा यदि वा वृद्धो मध्यो वाऽपि कृशोऽपि वा। वलस्यो वा स्फितो रगे शेय. कक्षान्तरेण वै ।।१५ पहिले से ही कृष्ण का वव करने विषयक आदेश को पाये हुए चाणूर ने उधानी से युद्ध करने की, राजाज्ञा को सुनते ही रोपपूर्वक जलयुक्त मेघ के सान वेग से आगे बढ कर कृष्ण को चुनौती दी ॥१०॥ परन्तु, कम की माना कर सम्पूर्ण जन-समूह के स्तम्घ हो जाने पर सभी यादवो ने एक साथ -इस सभा में सभी के सामने किसी प्रकार का शल वल प्रयोग किये बिना केवल मल्ल-कौशल से बातु युद्ध करने की बात है ।।११-१२॥ कुश्ती लहने की थकान मिटाने के लिये बीच-बीच में जल और देह में उपलो का बुरादा की भी व्यवस्था है ।।१३॥ युद्ध के सही रूप में सचालन और निर्णय की या बैठे हुओ की, खडा दत्रा बरे हो की, बालक-चालको की, द ३५८ ] [ श्री हरिवार बीच का बीच वाला को, निर्वल निर्बलो की, वली बलवानों को और वृद्ध की देख-भाल करेगा ॥१४-१५॥ वलतश्च क्रियातश्च वायुद्धविशारदै । निपातानन्तर किञ्चिन्न कर्तव्य विजानता ॥१६ तदिद प्रस्तुत रगे युद्ध कृष्णान्ध्रमल्लयो । बाल कृष्णो महानन्ध्र कथ न स्याद्विचारणा ॥१७ तत किलकिलाशब्द समाजे समवर्तत । प्रावल्गत च गोविन्दो वाक्य चेदमुवाच ह ॥१८ अह वालो महानन्ध्रो वपुषा पर्वतोपम । युद्ध ममानेन सह रोचते बाहुशालिना ॥१६ युद्धव्यतिक्रम कश्चिन्न भविष्यति मत्कृत । न ह्यह वाहुयोधाना दूपयिष्यामि यन्मतम् ॥२० रल और कौशल का प्रदर्शन ही इसका प्रधान उद्देश्य है, इसम होकर पृथिवी पर गिरे मल्ल पर प्रहार नहीं किया जायगा ॥१६॥ कृष्ण पाणर का जो युद्ध उपस्थित हुआ है, उसमे वृष्ण बालक और चाणूर । देह वाला मल्ल है, इसलिये हम इस विषय म विचारपूर्वक कार्य करना ॥१७॥ इस प्रकार उस सभा मे अत्यन्त कोलाहल मचने लगा, तभी वहाँ हए श्रीकृष्ण ने उच्च स्वर से कहा- यद्यपि मैं वाला और चाणूर पर मल्ल है, फिर भी मैंन इसपे साथ युद्ध वरना स्वीकार दिया है । मल्ल युर ने रिसी भी नियम को नही तोडगा और मेरे द्वारा बाई सिदान्त वीरचित् भी उपसा नही होगी ॥२०॥ एव सजल्पतामेव ताश्या युद्ध सुदारुणम् । उभाभ्याममवढोर वारणास्या यथा वने ॥२१ मृतप्रतिवृतश्चिाहभिश्च सपण्वं । सन्निरातावधूतश्च प्रमायोन्मयनस्तथा ॥२२ ताउभारपि सनिधी यया शंलगयो तथा। अपर्णप्टिमिश्र वराहाद ननिस्वने ॥
श्रीकृष्ण द्वारा कम का वर ] [ ३५९ कोलवज्रनिपातश्च प्रसृष्टाभिस्तथैव च । शलाकनखपातः पादोद्ध तश्च दारुणः २४ जानुभिश्चाश्मनि? पैः शिरोमिश्चावटितः । तद्युद्धमभवयोरमशस्त्र वाहुतेजसा ॥२५ वाहुघ्राणेन शूराणा समाजोत्सवसन्निधौ । सरज्यत जनः सर्वः सोत्कृष्टनिनदोत्थितः ।।२६ साधुवादाश्च मचेपु घोपयन्त्यपरे जना.। ततः प्रस्विन्नवदनः कृष्णे प्रणिहितेक्षणः । न्यवारयत तूर्याणि कसः सव्येन पाणिना ॥२७ प्रतिपिद्धपु तूर्येषु मृदगादिपु तेषु वै । खे सगतान्यवाद्यन्त देवतूर्याण्वनेकशः ॥२८ युदयमाने हृपाकेगे पुण्डरीकनिभेक्षगे । स्वयमेव प्रवाद्यन्ते तूर्यघोपास्तुसर्वश. ॥२६ इस प्रकार की वार्ता के पश्चात् जैसे वन के मध्य दो हाथी भिड जाते हैं, वैसे ही कृष्ण और चाणूर के मध्य भयकर युद्ध आरम्भ हुआ ॥२१॥ पर- स्पर प्रहार और बचाव करते हुए कभी कोई नीचे गिरता कभी कोई मुक्का मारता, कभी छाती भिडा कर लडता, कभी पांवो के बीच में पीडित करता और कभी कोई जोर से चीत्कार कर उठता ॥२२-२३॥ कभी कोई जानु प्रदेश को और कभी कोई पेट को पीडित करता, कभी कोई ललकारता और कभी कोई दूर फेंक देता ॥२४॥ यद्यपि उस समय शस्त्र का प्रयोग नहीं होरहा था, फिर भी ताल ठोकने का नाद वरात जैसा प्रतीत होता था ॥२५॥ उन दोनो के इस प्रकार के कौशल को देखने के लिये दर्शक गए उठ-उठ कर खडे होते और उनके भुजबल को देख कर प्रसन्नता व्यक्त करत थे ॥२६।। मचों पर बैठे हुए दर्शक उन दोनो की प्रशसा कर रहे थे, उमी समय कम ने कृष्ण की ओर देख कर वाजे वालो को बाजे दन्द कर देने का संकेत दिया ॥२७॥ जब रगशाला में वाहो का बजना बन्द होगा, तब याकाश मे सब ओर स्थित हुए देवता दिव्य वाजे बजाने लगे ॥२८-२६।।
पियो ने श्रीकृष्ण से कहा-हे कृष्ण । अब इस मल्ल रूप धारी चाएर नाम: दैत्य को परास्त करो॥३१॥ तब श्रीकृष्ण ने बहुत देर से बाल क्रीडा करने ।।३२।। उस समय पृथिवी कोप उठी, रगभूमि के सभी मच हिलने लगे औ हदय को घुटनो से मदित किया और मस्तक पर कठोर मुक्का मारा ३६० [ श्री हरिवथपुराण अन्तर्धानगता देवा विमान कामरूपिभि । चेरुविद्याधर साई कृष्णस्य जयकादक्षिण ॥३० जयस्व कृष्ण चाणूर दानव मल्लरूपिणम् । इति सप्तर्षय सर्वे ऊचुश्चैव नभोगता ॥३१ चाणूरेण चिर काल क्रीडित्वा देवकीसुत । वलमाहारयामास कसस्याभावशिवान् ॥३२ ततश्चचाल वसुधा मचाश्चैव जुघूणिरे । मुकुटाच्चापि कसस्य पपात मणिरुत्तम ॥३३ दोभ्यामानम्य कृष्णस्तु चाणूर शीर्णजीवितम् । प्राहरन्मुष्टिना मूनि वक्षस्याहत्य जानुना ॥३४ नि सृते साधु रुधिरे तस्य नेत्रे सवन्धने । तापनीये यथा घण्टे कक्षोपरि विलविते ॥३५ स्वेच्छानुसार रूप को धारण करने वाले देवगण श्रीकृष्ण की बीत व कामना करते हुए अप्रकट भाव से विचरण करने लगे ॥३०॥ उसी समय सप्त उपरान्त अपने यथार्थ बल को प्रकट करके धाणूर का बल क्षीण कर दिए कस के सिर पर स्थित हुए मुकुट का एक मरिण उसमे से निकल पडा ।।३३ सभी श्रीकृष्ण ने चाणूर को अपनी भुजाओ से नीचे की ओर झुका कर इस इस प्रहार से तोरण पर लटके हुए स्वणिम घन्टो के समान उसके अश्रुओं में रधिर से भरे हुए दोनो नेन बाहर निकल आय ॥३५॥ पपात स तु रगस्य मध्ये निसृतलोचन । चाणूरो विगतप्राणो जीवितान्ते महीतले ।।३६ देहेन तस्य मल्लस्य चाणूरस्य गतायुप । सन्निरूद्धो महारग स शैलेनेव लक्ष्यते ॥३७ हाय द्वारा कस का वर ] [ ४६१ रोहिणेयो हते तस्मिश्चागूरे बलदर्पिते । जग्राह मुष्टिकरणे कृष्णस्तोगलक पुनः ।।३८ सन्निपाते तु तो मल्ली प्रथमे कोषमूच्छितो। समेयाता रामवृष्णो कालस्य वगवतिनी ।। निर्वातावनती भूत्वा रगमध्ये वदलातुः । कृष्णस्तोशलमुद्यम्य गिरिशृंगोपन वली । भ्रामयित्वा शतगुण निष्पिपेप महीतले ।।४० तस्य कृष्णाभिपन्नस्य पीडितस्य वलीयमः । मुखाधिरमत्यर्थमुज्जगाम मुमूर्पन: १४१ सकर्षणस्तु सुचिरं योधयित्वा महाबलः । अन्ध्रमल्ल महामल्लो मंडलानि व्यदर्शवत् ॥४२ ऐसा होने पर चाणूर के प्राण उड गये और उसके पर्वताकार मृतदेह खाड़ा भर गया ।।३६-३॥ इस प्रकार चाणूर मर गया वलराम मुष्टिक भड़े हुए ये योर कृपा भी तोगल से युद्ध करने नगे (३८|| काल के वा डे हुए वे दोनों मल्ल अत्यन्त उलाह प्रदर्शित करते हुए ताल टोंक कर : बदलते थे ॥३॥ फिर श्रीकृष्ण ने पर्वत मिखर के महान वाकार वाले ल के पैर पकड कर उो नो वार घुमा कर जोर से पृपिदो पर दे मारा ol इस प्रकार कृष्ण द्वारा दे मारने पर तोगल अपने मुन से रुधिर-वमन ने लगा ॥४१॥ मुष्टिक के साथ युद्ध करते हुए बलरामजी ने भी बहुत देर उसके साथ बाल-क्रीडा की ॥४२॥ मुष्टि केन तेजस्वी साशनिस्तनचिलुना । शिरस्यभ्यहनद्वोरो वज्रणेव महागिरिम् ॥४३ स निप्पतितमप्तिको विन्नस्तनयनो महान् । पपात निहतस्तेन ततो नादो महानभूत् ॥४४ बन्धसोसालको हत्य कृष्णसंकर्षणावुभौ । क्रोधसरक्तनयनी रगमध्ये ववल्मतुः ॥४५ ३६२ ] [ श्री हरिदात समाजबाटो निर्मल्न: सोऽभवद्भीमदर्शन. । अन्धे तदा महामल्ले मुप्टिके च निपातिते ॥४६ ये च सप्रेक्षका गोपा नन्दगोपपुरोगमाः । भयक्षोभितसर्वांगा: सर्वे तनावस्थिरे ।।४७ हर्पज वारि नेताम्या वर्षमाणा प्रवेाती। प्रस्रवोत्पीडिता कृष्ण देवकी समुदक्षत ।।४८ कृष्णदर्शनजातेन वाष्पेणाकुलितेक्षणा । वसुदेवो जरा त्यक्त्वा स्नेहेन तरुणायते ॥४६ फिर जैसे वज्र के प्रहार से पर्वत विदीर्ण हो जाता है, वैसे ही उन धूसे का भीषण प्रहार का मुष्टिक का मस्तक चूर-चूर कर दिया ॥४३॥ उसका मस्तिष्क बाहर निकल पडा, ग्रीवा एक और को लुढ़क गई. निकल आई और वह एक भीषण धमाके के शब्द के साथ मर कर ए पर गिर गया ॥४४॥ इस प्रकार कृष्ण बलराम तोशल और मुष्टिक का करके उसी रगशाला मे घूमने लगे ॥४५॥ महामल्ल मुष्टिक और तोशल मृत्यु होने पर सब पहलवान भाग गये और वह अखाडा भयकर प्रतीन लगा ॥४६॥ नन्दादि सब गोप उस मल्ल युद्ध को देख कर भयभीत हुए, के अवलम्बन पूर्वक अपने-अपने स्थान पर बैठे रहे ॥४७॥ उस समय देवक नेत्रो से आंसुओ की धारा निकलने लगी और वह कम्पित देह से कृष्ण को । रने लगी ॥४॥ वसुदेव की भी आंखें भर आई और उस समय वे वृद्धावस्था मे भी तरुणाई का अनुभव करने लगे ॥४॥ वारभुख्यश्च ताः सर्वाः कृष्णस्य मुखपंकजम् । पपुहि नेत्रभ्रमनिमेपान्तरगामिभिः ॥५० कसस्याथ मुखे स्वेदो भ्रू भेदान्तरगोचरः । अभयद्रोपनिर्यासः कृष्णसदर्शनेरित: ५१ केशवायसधूमेन रोपनिश्वासवायुना दीप्तमन्तर्गत तस्य हृदयं मानसाग्निना ॥५२
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३६४ ] । श्री हरिवमपुर क्षिप्ते पितरि चुक्रोध नन्दगोपे च केशव: । ज्ञातीना च व्यथा दृष्ट्वा विसज्ञा चैत्र देवकीम् ।।६१ स सिंह इव वेगेन केशवो जातविक्रमः । आरुरुक्षुर्महावाहुः कंसनाशार्थमच्युतः ॥६२ रङ्गमध्यादुत्पपात कृष्ण: कसासनान्तिकम् । असज्जद्वायुनाक्षिप्तो यथा खस्थो धनाधनः ॥६३ मेरे अनिष्टचिंतक नंद गोप को पकड कर इसके पांवो मे लोहे । जजीरें कस दो ॥५७॥ यह दुवृत्ति वाला वसुदेव भी मेरे अहित की काम करता है, इसतिये इसे भी पकड कर दण्डित करो ॥५८॥ कृष्ण के अनुयार जो भी गोपभार हैं, उन सभी के गवादि धन और रत्नादि सम्पत्ति को छो लो IIT अपने सेवको को इस प्रकार आज्ञा दे हो रहा था, तभी श्र कृष्ण हल आई दोनो नेत्रो से कस की ओर देखते हुए उसे पूरा ॥६० उन्होने जब याकार पिता वसुदेवजी तथा नन्द गोप को तिरस्कृन, बाँध को व्यथित और शशा देवकी को निश्चेष्ट होते हुए देखा तो वे अत्यन्त को मे भर गये ॥६॥ तर वे महावाहु और सिंह के समान पराक्रमी कृष्ण के को मारने के लिये उतावले हो गये ॥६२॥ जैसे वायु की प्रेरणा से मेघ ३ पूर्वक चलता है, वैसे ही वेग से उछलते हुए श्रीकृष्ण कस के पास जा पहुँ ॥६३ ॥ ददृशुर्न हि त सर्वे रङ्गमध्यादवप्लुनम् । केवल कसपार्श्वस्य ददृशुः पुरवासिनः ॥६४ सोऽपि व सस्तथाऽऽयस्तः परीत; कालधर्मणा । आकाशादिव गोविन्द मेने ततागत प्रभुम् ॥६५ स कृष्णेनायत कृत्वा बाहु परिघसन्निभम् । मूर्दजेपु परामृष्टः कसौ व रङ्गससदि ॥६६ मुकुटश्चापतत्तस्य काम्चनो वचभूषितः । शिरसम्तस्य कृष्णेन परामृष्टस्य पाणिना ॥६७
कृष्णद्वारा कस का वध ]
स हस्तग्रस्तकेशश्च कसो निर्यन्ता गन. ।
तथैव च विसमूढो वैकल्य समपद्यत ॥६८
निगृहीतश्च केशेषु गतासुरिव निःश्वसन् ।
न शशाक मुख द्रष्टु कस कृष्णस्य वै तदा ॥६६
विकुण्डलाभ्या कर्णाभ्या छिन्नहारेण वक्षसा ।
प्रलम्वाभ्या च वाहुभ्या गाविसृत भूषण. ॥७०
भ्र शितेनोत्तरीयेण सहसावलितानन· ।
चेप्टमान समाक्षिप्त' कस काणेन तेजसा ॥७१
चकर्प च महारगे मञ्चान्निकम्य केशव ।
केशेषु त बलाद्गृह्य कस क्लेशार्हता गतम् ।।७२
कुष्यमाण स कृष्णेन भोजराजो महाध ति ।
समाजवाटे परिखा देहकृष्टा चकार ह ।।७३
समाजवाटे क्रीडित्वा विकृष्य च गतायुपम् ।
कृष्णो विसर्जयामास कसदेहमदूरत ॥७४
दर्शको ने उन्हें वहां जाते हुए तो नही देखा, परन्तु जब वे कस के पास
जा पहुंचे तभी उन्हे देस सके ।।६४।। कम ने भी उस समय व्याकुल और शक्ति
हृदय से श्रीकृष्ण को विष्णु के ही साक्षात् रूप मे आना समझा ॥६५॥ फिर
श्रीकृष्ण ने परिघ के समान अपने बाहुओ को फैला कर तुरन्त ही कस के केश
पकड कर उसे खीच लिया ॥६६॥ इस प्रकार खीचे जाने से उसके मस्तक का
हीरो का मुकुट पृथिवी पर जा गिरा ॥६७।। केशमात्र खिंचने पर ही मरणा-
सन्न हुआ का चेष्टा-रहिन, विमूढ और विह्वल होकर दीर्घ नि श्वास छोड़ने
लगा । उस समय कृष्ण के मुख को जोर देखने मे भी वह असमर्थ रहा ॥६८.
६६।। उसके कानो से कुण्डल उतर गये, हृदय का हार टूट गया और सभी
आभूपण शरीर से गिर गये तथा दोनो भुजाएं भी पृथिवी की ओर लटक पडी
॥७०॥ तभी श्रीकृष्ण ने उसके कठ मे उत्तरीय डाल कर उसे मच से खीच
लिया और पृथिवी पर पटक कर घसीटने लगे ॥७१-७२।। इस प्रकार देह के
घसीटे जाने से पृथिवी पर खाई जसी रेखा बन गई ॥७३॥ श्रीकृष्ण ने इस
।।७४ ॥ वंशम्पायन जी ने वहा--हे राजन् ! पुत्रशोक से सन्तप्त हुए उससेनयो विपपान किये हुए के रामान लड़पहाते और दीर्घ श्वास घोड़ते हुए धोमो और धसाधारण यस पावरबपने यो विस्यात कर लिया है ॥३-४गा साधुमार ३६६ ] [ श्री हरिवंशपुर प्रकार लीलापूर्वक ही कस को मार कर उसके देह को वही पटक दि ।।उग्रसेन अभिषेक वर्णन ॥ उग्रसेनस्तु कृष्णस्थ समीपं दुःखितो ययौ । पुत्रशोकाभिसतप्नो विपपीत इव श्वसन् ।।१ स ददर्श गृहे कृष्ण यादवै परिवारितम् । पश्चानुतापादधायन्त के सस्य निधनाविलम् ॥२ स कृष्ण पुण्डरीकाक्षमुवाच यदुससदि । वाष्पस दिग्धया वाचा दीनया सज्जमानया ॥३ पुरो निर्यातितः क्रोधान्नीतो याम्यां दिशरिपुः । स्वधर्माधिगता कीर्ति म विश्रावित भुवि ॥४ स्थापित सत्सु माहात्म्य शङ्किता रिपवः कृता. । स्थापितो यादवो वशो गर्विता. सुहृदः कृताः ॥५ सामन्तेषु नरेन्द्र पु प्रतापस्ते प्रकाशितः। मिताणि त्वा भजिष्यान्ति सश्रयिष्यन्ति पार्थिवाः ॥६ प्रकृतयाऽनुयास्यन्लि स्तोष्यन्ति त्वा द्विजातयः । सधिविग्रहमुख्यास्त्वा प्रणमिष्यन्ति मन्त्रिणः ॥७ पास पहुंचे ॥१॥ वहाँ जाकर उन्होन श्रीरप्ण को यादवों से घिरे हुए और यह की मृत्यु पर पश्चात्ताप प्रपट परते हुए देखा ॥ २॥ उस समय उग्रसेन जीने पाने के का, भरापार और कार को मम्मोपित करते हुए वहा-हे या ! तुमने मरे पुत्र को मारकर जाना फोर उतार लिया और * अब तुम प्रतिष्ठित होग और शव भी तुम भयभीत रहगे । तुमने अपना पायंगे पो परा लिया है, इससे तुम्हारे वधुना को गर्व भी होगा ॥३॥ राम राजामो को नाहार पराक्रममा जान से गया और और सभी ! बधुन बम । लिन अनिषेक वर्णन ] [ ३६७ गण तुम्हारे वश मे हो जायेंगे ॥६॥ प्रजाजन तुम्हारे बाजावर्ती और ब्राह्मण ॥ होंगे । मयि और कलहविषयक मरणाओं के ज्ञाता अमात्यगण तुम्हें क झुकाएंगे ॥७॥ हस्त्यश्वरयसपूर्ण पदातिगणसंकुलम् । प्रतिगृहाण कृष्णेद कंसस्य वलमव्ययम् ।। धन धान्य च यत्किञ्चिद्रलान्याच्छादनानि च । प्रतीच्छन्नु नियुक्ता व त्वदीयाः कृष्ण पूरुपाः ।। स्त्रियो हिरण्य यानानि यदन्यद्वमु किंचन । एव हि विहिते योगे पर्याप्ते कृष्ण विग्रहे ॥१० प्रतिष्ठिताया मेदिन्या यदूना शनु सूदनः । त्व गतिश्चागतिश्चैव यदूना यदुनन्दन ।।११ शृणुष्व वदता वीर कृपणानामिद वचः । अस्य त्वाकोपदग्धस्य कंसस्याशुभकर्मणः ॥१२ तव प्रसादाद्गोविन्द प्रेतकार्य क्रियेत ह । तस्य कृत्वा नरेन्द्रस्य विपन्नस्योर्ध्वदेहिकम् ॥१३ सस्नुपोऽहं सभार्यश्च चरिष्यामि मृगः सह । प्रेतसत्कारमात्रेण कृते वान्धवकर्मणि १४ आनृण्य लौकिक कृष्ण गताः किल भवन्ति हि। तस्यान्गि पश्चिम कृत्वा चितिस्थाने विधानत. । तोयप्रदानमात्रेण कसस्यानृण्यमाप्नुयाम् ॥१५ अब कस की इस हाथी, घोडे, रथ, पैदल आदि से सम्पन्न सम्पूर्ण सेना अपना अधिकार परिये । तुम्हारे द्वारा नियुक्त्त अधिकारी धन, धान्य स्वर्ण वाहन आदि सभी की उचित व्यवस्था करें क्योकि यह ववसर अब या है ॥८-१०॥ हे शतमूदन | अब तुम्ही यदुवा की गति और कुगति हो, के यादवों के राज्य पर मन तुम्हारा ही अधिकार है ॥ ११ ।। परन्तु अभी कार्य शेप है-तुम्हारी कोवाग्नि में दग्य हुए पापी कस का आवंदैहिक पर होना उचित है । ऐसा होने के पश्चात् में अपने वधू-वधियो और मार्यानों ।
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[ श्री हरित
आदि के साथ मृगो से आवृत वन में निवास वरूंगा। क्योकि वधुजनों
कर्म की समाप्ति पर ही, लौकिक ऋण छूटता है । इसलिये कस का दाह..
करके और उसे जलाञ्जलि देकर ही मैं अपने को ऋण से मुक्त हुआ ।
॥१२-१५॥
एतत्ते कृष्ण विज्ञाप्यं स्नेहोऽन मयि युज्यताम् ।
प्राप्नोति सुगति तत्र कृपणः पश्चिमा क्रियाम् ॥१६
एतच्छ्र, त्वा वचस्तस्य कृष्णः परमविस्मितः ।
प्रत्युवाचोग्रसेन वै सान्त्वपूर्वमिदं वचः ।। १७
कालयुक्तमिदं तात तवैतद्यत्प्रभाषितम् ।
सदृश राजशार्दूल वृत्तस्य च कुलस्य च ॥१८
यत्त्वमेवविधो पे गतेऽर्थे दुरतिक्रमे ।
प्राप्स्यते नृपसत्कार कस प्रेतगतोऽपि सन् 14
कुले महति ते जन्म वेदान्विदितवानसि ।
कथ न ज्ञायते तात नियतिर्दु रतिकमा ।।२०
स्थावराणा च भूताना जगमाना च पार्थिव ।
पूर्वजन्मकृत कर्म कालेन परिपच्यते ॥२१
हे वरस
अब आप मुझ पर कृपा करके इसकी उचित व्यवस्था र
आपकी कृपा होने पर ही यस को राद्गति हो सकेगी ॥१६॥ यह सुनकर
वान् श्रीरपण यो अत्यन्त आश्चर्य हुमा धौर ये सान्त्वनापूर्ण शब्दों में उस
गोरे हे तात ! यापपा रहना ममयानुकूल है, जिस |ष्ठ वश में आए
हुए हैं और जैसा उदार माया चरित्र रहा है, वैसे ही आपली यानी भी
मृतु है ॥१७-१८॥ जय यापने इस प्रकार कहा है तो परलोरयासी हाने
कायो राज-गम्मान मिलेगा | आप अयत धेष्ठ बुल में उत्पन्न
इसलिए पापके लिये वो कुछ भी पाप नहीं है, फिर भी आप विधाता
गे अनशन पर्यो है ॥२०॥ समय यो प्राप्ति पर गगारमपूर्ण
को भान पूर्व कमों में लिए गो पा फल प्रयास गोगना होता है।
उपसेन अभिषेक वर्णन ] [ ३६६ थतवन्तोऽर्थवन्तश्च दातार: प्रियदर्शनाः । ब्रह्मण्या नयसंपन्ना दीनानुग्रहकारिणः ।।२२ लोकपालसमास्तात महेन्द्रनमविक्रमाः । क्षितिपालाः कृतान्तेन नीयन्ते नृपसत्तम ।।२३ धार्मिकाः सर्वभावज्ञा: प्रजापालनतत्पराः। क्षत्रधर्मपरा दान्ताः कालेन निधनं गताः ॥२४ स्वयमात्सकृतं कर्म शुभ वा यदि वाऽशुभम् । प्राप्ते काले तु तत्कर्म दृश्यते सर्वदेहिनाम् ।।२५ कालस्तु बलवान्राजन्दुविज्ञेया हि सा गतिः । परावरविशेषज्ञा या यान्ति समदर्शिनः ।।२६ गतिः कालस्य सा येन सर्व कालस्य गोचरम् । प्रवीमि यदहं तात तदनुष्टीयता बचः॥२७ नदि राज्येन मे कार्य नाप्यहं नृप काक्षित: । न चापि राज्यलुब्धेन मया क सौ निपातितः ॥२८ विद्वान, निक, रूप-सम्पन्न, दानशील, ब्रह्मवादी, नीतिज्ञ, दयावन्त लोकपालों और इन्द्र के समान महान् पराक्रम वाले राजगए भी काल के गुन से निकल नही पाते ॥२२-२३॥ संक्हो ही धर्मकर्मा, सर्वज्ञाता, प्रजा के लन में तत्पर, युद्ध विद्यारद्र और उदारचेता भूपाल काल के हाथों पड़ कर 'लोकरी मे चले गये ॥२३॥ शुभकर्मी, पापकर्मी कसा भी हो, उसे कालान्तर अपने कर्म का फल अवश्य भोगना होगा ।।२।। काल को गति किसी प्रकार नी नहीं जाती, इससे काल ही बलवान है । केवल मोक्ष तत्व के ज्ञाता, ज्ञानी, 'रदशी और सिद्ध पुरुष ही काल की महिमा को जानते हैं। यव में जो कहता याप उसके अनुसार कीजिये ॥२६-२७॥ राज्य की मुझे किचिन् नी इच्या है और न मैंने राज्य के लोन से क्स को मारा ही है ॥२८॥ कि तु लोकहितार्थाय कीर्त्यर्थं च सुतस्तक । व्यङ्गभूतः कुलस्यास्य सानुजो विनिपातितः ।।२६ ३७. ] [ श्री हरिवरपुराण अह स एव गोमध्ये गोप सह पनेचर । प्रोतिमान्विचरिप्यामि कामचारी यथा गज ॥३० एतावच्छतशोऽप्येव सत्येनंतद्ब्रवीमि ते । न मे कार्य नृपत्वेन विज्ञाप्य क्रियतामिदम् ॥३१ भवानराजाऽस्तु मान्यो मे यदूनामग्रणी प्रभु । विजयायाभिपिच्यस्व स्वराज्ये नृपसत्तम ॥३२ यदि ते मत्प्रिय कार्य यदि वा नास्ति ते व्यथा । मया निसृष्ट राज्य स्व चिराय प्रतिगृह्यताम् ॥३३ एतच्छु त्वा तु वचन नोत्तर प्रत्यभापत । बोडिताधोमुख त तु राजान यदुससदि ।।३४ अभिषेकेण गोविन्दो योजयामास धर्मवित् । स बद्धमुकुट श्रीमानुग्रसेनो महाद्य ति । चकार सह कृष्णेन क सस्य निधनक्रियाम् ॥३५ मैंने तो लोक-कल्याण के ही अनुयायियो के सहित कस का वध किया है ॥२६॥ मैं तो अब पुन उसी वन मे जाकर गोओ और गोपो के साथ मत हाथी की तरह विचरण करना चाहता हूँ ॥३०॥ हे महाराज ! मैं सत्य को संकडो वार सौगध खाकर निवेदन करता हूं कि मैं राजा नहीं होना चाहता इसलिये आप मेरे कहने के अनुसार कार्य कीजिये ॥३१॥ आप श्रेष्ठ और पूजनीय हैं, यदि आप मेरी इच्छा को रखना चाहे और आपके मन म किसी प्रकार की व्यथा न हो तो निसकोच भाव से आप इसे स्वीकार कर राज्यपद पर स्वय अभिषिक्त हो जायें। इस प्रकार आप आनद पूर्वक चिरकाल तक राज्य शासन करें ॥३२ ३३॥ राजा उग्रसेन जी ने श्रीकृष्ण सी बात का लज्जावरा कोई उत्तर नहीं दिया और वे नीचा Manu गोविन्द SARHATIसन जी का राज्यपी र अभिषक दिया और फिर वह राजा उग्रसेन श्रीकृष्ण के साथ जाकर करत ग मृतक सवार करन के काय में लग गये ॥३५॥ । यदुवंशियो में करके वही बंद ग्रिसेन यभिषेक वर्णन ] [ ३७१ तसर्वे यादवा मुख्या राजान कृष्णशासनात् । अनुजग्मुः पुरीमार्गे देवा इव शतक्रतुम् ॥३६ रजन्या तु निवृत्ताया तत. सूर्ये विराजिते । पश्चिम क ससस्कार चक्रुस्ते यदुपुङ्गवाः ।।३७ शिविकायामयारोप्य क सदेह ययाक्रमम् । नैष्ठिकेन विधानेन चक्रुस्ते क ससक्रियाम् ॥३८ स नीतो यमुनातीरमुत्तम नृपतेः सुतः । सत्कृतश्च यथान्याय न धनेन चिताग्निना ॥३६ तथैव भ्रातर चास्य सुनामान महाभूजम् । सस्कार लभ्मयामासुः सहकृष्णेन यादवा. ॥४० ताम्या ते सलिल चक्र प्णयन्धकपुरोगमाः । अक्षय वास्तु प्रेतेम्यो भाषमाणाः पुन पुन. ॥४१ हिरण्यस्य सुवर्णस्य दश कोटीस्तया हरि। गावो रत्नानि वातासि ग्रामान्लागरममतान् ।।४२ ददो कंस समुद्दिश्य ब्राह्मणेभ्यो नृपोत्तमः । अक्षय चापि विप्रेभ्यो भापमाणाः पुनः पुन.॥४३ तयोस्ते सलिल दत्त्वा यादवा दीनमानसाः । पुरस्कृत्योग्रसेन वे विविशुर्मयुरा पुरीम् ॥४४ जैसे इन्द्र को आना के अनुवर्ती सब देवगण हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण की के अनुवर्ती हुए सब यादव महाराज उग्रसेन के पीछ चले ॥३६॥ रात्रि तीत होने तथा प्रात काल का प्रकाश फैलने पर सब यादव कब के संस्कार- मे लग गये ॥३७॥ उन्होंने कस और उसके भाई के शवो को पालकी में और यमुना-तट पर ले जाकर शास्त्र-विधि से चिना बना कर उनका दाह- सम्पन्न क्यिा ॥३८.४०॥ फिर वृष्णि और वधक वशीय सव यादवो ने भाओं को स्वर्ग मिले' रहते हुए गरवार जलाञ्जलि दो ॥४१फिर श्रीकृपए करोंड स्वर्ण मुद्रा, गोए, रत्न, वस्त्र और ग्रामादि का ब्राह्मणो को दान और जलान्जलि देह के पश्चात् उदास चित्त हुए ममी यादव महाराज को आगे करके मधुरा नगरी म नोट आये ॥४२-४४॥
३७२ ]
वैशम्पायन जी ने पहा-हे राजन् । महाबली वृष्ण-बलराम राई
[ श्री हरिवंशपुर
॥ मथुरा पर जरासन्ध की चढाई।।
स कृष्णस्तन सहितो रोहिणेयेन सगत ।
मथुरा यादवाकीणां पुरी ता सुखमावसत् ॥१
प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया विभु ।
चचार मथुरा प्रीत सवनाकरभूषणाम् ॥२
कस्यचित्त्वय कालस्य राजा राजगृहेश्वर ।
शुश्राव निहत क स दुहितृभ्या महीपति ॥३
ततो नातिचिराकालाज्जरासध प्रतापवान् ।
आजगाम पडङ्गन बनेन महता वृत ॥४
जिघासुहि यदू-क्रुद्ध क सस्यापचिति स्मरन् ।
अस्ति प्राप्तिश्च नाम्ना ते मागधस्य सुते नृप ॥५
जरासन्धस्य कल्याण्यौ पीनश्रोणिपयोधरे ।
उभे क सस्य ते भार्ये प्रादाद्वाहद्रथो नृप ॥६
स ताभ्या मुमुदे राजा बद्ध्वा पितरमाहुकम् ।
समाश्रित्य जरासन्धमनादृत्य च यादवान् ।
शूरसेनेवरो राजा यथा ते बहुश श्रुत ॥७
जातिकार्यार्थाढयर्थमुग्रसेनहिते रत ।
वसुदेवोऽभवन्नित्य क सो न ममृपे च तम् ।।
रामकृष्णो समाश्रित्य हते क से दुरात्मनि ।
उग्रसेनोऽभवद्राजा भोजवृष्ण्यन्धक वृत्त ।
दुहितम्या जरासन्ध प्रियाभ्या बलवान्नप ।
नोदितो वीरपलीभ्यामुपायान्मधुरा तत ॥१०
पोर यादवों स युक्त होकर नो और साना वाली मथुरापुरी म रहते हुए।
पूर्वर विहार करने सन ॥१-२॥ युछ कालोपरान्त जरासन्ध की पुषियों के
थपन पति प माया समापार दिया, बिसय उस बस्य ठ दुख हुआ।
फिर यह प्रसारी राजा जरासप अपनी छ ॥ स सम्म न विशान इन
परासन्ध का पलायन ] [ ३७३ र कर शीघ्र ही उसके साथ चत्र दिया ॥४॥ उसने क्रोध मे भरकर सभी वो का सहार करने का निश्चय कर लिया था, क्योकि उसकी अस्ति-प्राप्ति की दोनो सुन्दर पुत्रियाँ क्स के साथ विवाही गई थी और विवाह के वाद सिध की सहायता से कस ने अपने पिता उग्रसेन को बन्दी बना लिया था यादवो का तिरस्कार करता हुआ सुखपूर्वक विहार करता था १५ ७॥ अपने त-वधुओ का पक्ष लेने वाने वसुदेव जी उग्रसेन के हित मे सश तत्पर रहते और कस उनकी इस बात से भी हर था ॥८॥ फिर कृष्ण बलराम के द्वारा और उसके राज्य का अस हुआ तथा वृष्णि, अथक और भोजवशी यादवो घिरे हुए उग्रसेन पुन राज्यपद पर अभिपित हुए ॥६॥ उसके बाद जरासष क याजो ने उसे कस की मृत्यु का समाचार दिया, जिस सुनकर उसने यादवो नष्ट करने का विचार स्थिर किया और अपनी पुत्रियो के आग्रह पर उसने रा पर चढाई कर दी॥१०॥ । जरासन्ध का पलायन । सतो युद्धानि वृष्णीना वभूदु सुमहान्त्यथ । मागधस्य महामालनपश्च वानुयायिभि ॥१ रुक्मिणा वासुदेवस्य भीष्मकणाहुकस्य च । क्रथस्य वसुदेवेन के शिकस्य तु वभ्र णा ॥२ गदेन चेदिराजस्य दन्तवक्त्रस्य शकुना । तथान्यैर्वृष्णिवीराणा नपाणा च महात्मनाम् ॥३ युद्धमासीद्धि सैन्याना सैनिक भरतर्षभ । अहानि पञ्च च क च पद सप्ताष्टी च दारुणम् ।।४ गजैगजा हयैरश्वा पदाताश्च पदातिभि । रथ रथा विमिश्राश्च योधा युयुधिरे नृप ।।५ जरासन्धल्य नृपते रामेणासीत्समागम । महेन्द्रस्येव वृत्रेण दारुणो रोमहर्पण ॥६ अवेक्ष्य रुक्मिणी कृष्णो रुक्मिण न व्यपोथयत् । ज्वलनाकाँशुसकाशानाशीविपविपोपमान् ।।७
और यादवो मे घोर युद्ध होने लगा ॥१॥ रुक्मी से श्रीकृष्ण, भीष्मक स उग्रसेन
३७४ ]
[ श्री हरिवगपुरान
वारयामास कृष्णो वै शरास्तस्य तु शिसया।
इत्येपा सुमहानासीद्वलौघाना परिक्षय' ।।८
वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् । फिर जरासब के पक्ष के राज
क्रथ से वसुदेव, वध्रु से कंशिक, चदिराज से गद, शकु से द तवक्र और अन्य
वीर अपने विपक्षियों से भिठे हुए थे। इस प्रकार दोनो पक्षा मे सत्ताईस
तक घोर युद्ध चलता रहा ॥२-४॥ उस युद्ध मे गजो से गज, अश्वो से अगर
रथो से रथ और पैदलो से पैदल भिडे हुए थे । वृत्रासुर और इन्द्र के मध्य
भयकर युद्ध के समान ही जरासध और बलराम के मध्य अत्यन्त धोर युद्ध
रहा था ॥५-६॥ श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी के सम्बन्ध को जानते हुए रखमी कार
नहीं किया, किन्तु अपने कौशल से ही अग्नि और सपों के समान दुधष रुक्मी
बाणो को विफल कर रहे थे, इससे उनकी अय सेना का नाश हाने लगा ॥
उभयो सेनयो राजन्मासशोणितकर्दम ।
कवन्धानि समुत्तस्थु सुवहूनि समन्तत ॥
तस्मिन्विम योधाना सख्यावृत्तिकराणि च ।
रथी रामो जरासध शरैराशीविषोपमै ॥१०
आवृण्वन्नभ्ययाद्वीरस्त च राजा स मागध ।
अभ्यवर्तत वेगेन गन्दनेनाशुगामिना ।।११
अन्योन्य विविधैरस्त्रविद् वा विद्ध्वा विनेदतु ।
तो क्षीणशस्त्री विरथी हताश्वौ हतसारथी ।
गदे गृहीत्वा विक्रान्तावन्योन्यमभिधावताम् ॥१२
कम्पयन्ती भुव वीरौ तावुद्यतगदावुभौ ।
ददर्शाते महात्मानौ गिरी सशिखराविव ।।१३
व्युपारमन्त युद्धानि पश्यता तो महाभुजी।
सरब्धावभिशवन्तौ गदायुद्ध पु विश्रुतौ ॥१४
दोनों पक्ष के भीपण सहार स युद्ध क्षेत्र म रक्त मांस की बीच ।
थोर सब तरफ असरूप शव दिखाई दने लगा जरासप पर अपने भीपणा
- जरासन्ध का पलायन ] [ ३७५ विर्षा करते हुए बलरामजी आगे बड़े तब क्षपने वेगवन्त रथ पर चढ़ा हुआ जरासन्ध भी तेजी से उनकी ओर दौडा ॥६-१०-११॥ सामना होने पर दोनो ही अपने-अपने शस्त्रो से एक दूसरे को वीचने लगे । युद्ध करते-करने जब दोनो के ही शस्त्र समाप्त हो गये और रय, घोडे तथा सारथी आदि मे से भी कोई न रहा, तव गदा-युद्ध करने लगे ॥१२।। उन दोनो को देख कर ऐसा प्रतीत होता , था, जैसे दो पर्वत ही साक्षात् खडे होकर परस्पर युद कर रहे हैं तथा पृथिवी भी उस युद्ध की भीषणता से काँप उठी ।।१३।। वे दोनो गदा-युद्ध विशारद अब सब के समाने केवल गदाओं से ही युद्ध कर रहे थे ॥१४॥ उभी तो परमाचार्यो लोके ख्याती महावलो। मत्ताविव गजी युद्ध तावन्योन्यमयुध्यताम् ॥१५ ततो देवा सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्पय. । समन्ततश्चान्सरसः समाजग्मुः सहस्रशः।।१६ तद्देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलकृतम्। शुशुभेऽभ्यधिक राजन्गण ज्योतिर्गगरिव ।।१७ अभिदुद्राव राम तु जरासन्धो महाबलः । सव्य मण्डलमाश्रित्य बलदेवस्तु दक्षिणम् ॥१८ प्रहरन्ती ततोऽन्योऽन्य गदायुद्धविशारदो। दन्ताभ्यामिव मातङ्गो नादयन्तौ दिशो दश ॥१६ गदानिपातो रामस्य शुश्रु वेऽशनिनिःस्वन. । जरासन्धस्य चरणे पर्वतस्येव दीर्यत. ॥२० न स्म कम्पयते राम जरासन्धकरच्युना। गदा गाभृता श्रेष्ठ विन्ध्य गिरिमिवानिलः ॥२१ जसे दो मदमत्त हाथी परस्पर लडते हैं, वैसे ही उन दोनो में धमासाम संग्राम चल रहा था ॥१५।। उस समय देवता, यक्ष, गधर्व, सिद्ध, महापि आदि ने भी वहाँ उपस्थित होकर वलराम और जरासन्धादि के युद्ध वो देखा था।॥१६॥ युद्ध-भूमि मे इधर से उधर दौड़ते हुए वे आकाश में चमकते हुए नक्षत्रो के समान
उपर जरासन्ध भी बलराम जी के प्रहारोको सहन करता हुआ, जनर
[ श्री हरिवयपुराण
३७६ ]
लगते
॥१७॥ बलराम जी दाहिनी ओर रह कर परस्पर प्रहार कर रहे
॥१८॥ वे दोनो ही बडे-बड़े दांतो वाले भीमकाय हाथियो जैसे लग रहे थे
जिनकी गदाओ के भिडने से जो शब्द हो रहा था, उससे दसो दिशाए गूर
उठती थी ॥१६॥ जैसे कैसा भी भीषण पवन विन्ध्याचल पर्वत को विचलित करने
में समर्थ नहीं हो सकता, वैसे ही जरासन्ध की गदा के भीषण प्रहारो से भी
बलराम जी विचलित नही हो सके ॥२०-२१॥
रामस्य तु गदावेगं वीर्यात्स मगधेश्वरः।
सेहे धैर्येण महता शिक्षया च व्यपोहयत् ।।२२
एव तो तत्र सग्रामे विचरन्तौ महाबलौ ।
मण्डलानि विचित्राणि विचेरतुररिन्दमौ ॥२३
व्यायच्छन्तौ चिरकाल परिश्रान्तौ च तस्यतु
समाश्वास्य मुहूतं तु पुनरन्योन्यमाहताम् । २४
एवं तौ योधमुख्यौ तु समयुयुधतुश्चिरम् ।
न च तो युद्धवमुख्यमुभावेव प्रजग्मतुः ।।२५
अथापश्यद्गदायुद्ध विशेष तस्य वीर्यवान् ।
रामः ऋद्धो गदा त्यक्त्वा जग्राह मुसलोत्तमम् ॥२६
तमुद्यन्त तदा दृष्ट्वा मुसल घोरदर्शनम् ।
अमोघ वलदेवेन ऋद्ध न तु महारणे ॥२७
ततोऽन्तरिक्ष वागासीत्सुस्वरा लोकसाक्षिणि ।
उवाच बलदेव त समुद्यतहलायुधम् ॥२८
न त्वया राम वध्योऽयमलाखेदेन मागधेत।
विहितोऽस्य मया मृत्युस्तस्मात्साधु व्युपारम।
अचिरेणव कालेन प्राणास्त्यक्ष्यति मागधः ।।
अपना बचाव करता रहा ।।२२।। इस प्रकार वे दोनो ही महाबली विचित्रमा
पा म्यूह बनाएर परस्पर में पैतरे बदलते हुए युद्ध पर रहे थे ॥२॥ दोनों ।
यामर और फिर उसी प्रबार भिक जाते ।
रासन्ध का पलायन ]
[ ३७७
,
पर बहुत समय तक युद्ध करने भी उनमे से कोई किसी को हराने में सफल
। हो सका ॥२४-२५॥ तव वलराम जी ने जरासघ को गदा-युद्ध में अधिक
र देखकर गदा छोटकर मूमल ग्रहण कर लिया ॥ २६ ॥ यह देखकर उसी
'यपाकाशवाणी ने धीर स कहा-ह बलराम ! जरासंध की मृत्यु तुम्हारे
। से नहीं है, इसलिए तुम अपन विशेष क्रोध का त्याग करो। इसकी मृत्यु
जो समय निश्चित हुआ है, उसी में इसका अन्त होगा। इसलिये तुम शान्ति
एण करो ॥२७-२६॥
जरासन्धस्तु तच्छ, त्वा विमना समपद्यत ।
न प्रजह ततस्तस्मै पुनरेव हलायुध ।।३०
तो व्युपारमता युद्धे वृष्णयस्ते च पार्थिवा.।
असक्तमभवद्यद तेषामेव सुदारुणम् ॥३१
दीर्घकाल महाराज निघ्नताभितरेतरम् ।
पराजिते त्वपक्रान्ते राजसन्धे महीपती ॥३२
अस्त याते दिनकरे नानुस स्तदा निशि ।
समानीय स्वक सैन्यं लब्धलक्ष्या महावला: ॥३३
पुरी प्रविविशुईटा केशवेनामिपालिता. !
खाच्च्युतान्यायुधान्येव तान्येवान्तर्दघुस्तदा ॥३४
जरासन्धोऽपि नृपतिविमना. स्वपुरी ययौ।
राजानश्चानुगा येऽस्य स्वराष्ट्राण्येव ते ययु. ।।३५
थाकाशवाणी सुनकर जरासन्ध को भी सताप हुआ और बलराम जी भी
(र प्रहार करने से रुक गये ॥३०॥ उन दोनों पक्षो न युद्ध समाप्त कर
और जरासध भी विजय प्राप्त न करके वहां स लौट गया ।। ३१.३२ ।।
प्रमय मूर्य छिप गया दौर रानि का समय हो जाने के कारण किसी ने भी
सिन्य का पीछा नहीं किया और श्रीकृष्ण द्वारा सेनाओं को लेकर सभी हपित
हुए मधुरापुरी में लौट आये युद्ध के यारम्भ में आकाश से आये हुए मभी
यास्त्र अन्तर्धान हो गये ॥३३-३४॥ जरासन्ध अत्यन्त पिन्न होता हुना यपने
को गया और उसके सार्थी राजागण भी अपने-अपने स्थान को चले गये ॥३॥
३७५ ]
[ श्री हरिवशपुर
जरासन्ध तु ते जित्वा मेनिरे नव निजितम् ।
वृष्णय कुरुशार्दूल राजा ह्यतिवन स वै ॥३६
दश चाष्टौ च सग्रामाजरासन्यस्मयादवा ।
ददुनं च न समरे हन्तु शेकुर्महावला ॥३७
अक्षौहिण्यश्च तस्यासन्विशतिश्च महामते ।
जरासधस्य नृपतेस्तदर्थ या समागता ॥३८
अल्पत्वादभिभूतास्तु वृष्णयो मरतर्षभ ।
वार्हद्रयेन राजेन्द्र राजभि सहिनेन वै ॥३६
भूय कृत्वोद्यम प्रायावादवान्कृष्णपालितान् ।
जित्वा तु मागध सय्ये जरासध महीपतिम् ।
विहरन्ति स्म सुखिनो दृष्णिसिंहा महारथा ॥४०
मह पराक्रमी वृष्णियो ने जरामन्ध को हरा कर भी अपने को
हुआ नही माना, क्योकि जरासन्ध का बल इस युद्ध मे प्रकट हो चुका था।
उन यादवो को जरास ध से अठारह बार लडना पडा, फिर भी वे उसे ।
मे समर्थ नहीं हुए ॥३७॥ जरासन्ध की सहायता के लिये बीस अक्षौहिणी
युद्ध-भूमि मे आई थी ॥३८॥ यादवो की सेना को अल्प सख्यक देख कर
सन्ध ने वृष्णियो पर बारम्बार आक्रमण किया और प्रत्येक बार उसे
पराजय का सामना करना पड़ा । इस प्रकार उसे रण मे हरा कर याद
निभय होकर मथुरा मे रहने लगे | ॥
॥ श्रीकृष्ण द्वारा कालयवन-वध ॥
भगवन्योतुमिच्छामि विस्तरेण महात्मन ।
चरित वासुदेवस्य यदु श्रेष्ठस्य धीमत ॥१
किमर्थं च परित्यज्प मथुरा मधुसूदन ।
मध्यदेशस्य काद धाम लक्ष्म्याश्च वेवलम् ॥२
शन पृथिव्या स्वालक्ष्य प्रभूतधनधान्यवत् ।
आर्याढ्यगनभूयिष्ठमधिष्ठानवरोत्तमम् ॥३
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श्रीकृष्ण वद्वारा कालयवन-वर ) [ ३७६ अयुद्ध नैव दाशाहस्त्यक्तवान्द्विजसत्तम । स कालयवनश्चापि कृष्णे कि प्रत्यपद्यत ।।४ द्वारकां च समासाद्य वारिदुर्गा जनार्दनः । किं चकार महाबाहुर्महायोगी महातपाः ।।५ किवीयः कालयवनः केन जातश्च वीर्यवान् । यमसह्य समालक्ष्य व्यपयातो जनार्दन. ॥६ जनमेजय ने कहा-हे महात्मन् ! मैं यादवोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के परिन को विस्तार पूर्वक सुनना चाहता हूँ॥ १॥ मध्यदेश मे मथुरा नगरी अलंकार स्वरूप एव अत्यन्त मनोहर थी, लक्ष्मीजी का वहाँ नित्य निवाम था ॥२॥ वह स्थान पृथिवी का शिवा स्वरूप था, वहाँ धन-वन्य की प्रचुरता थी, धनवानो का वह निवास स्थान था, इसीलिये उसकी गणना पृथिवी के सर्वोत्तम स्थानो मे थी ।। ३ ॥ ऐा होने पर भी श्रीकृष्ण ने उम नगरी का त्याग क्यो किया? कालयवन ने श्रीकृष्ण के साथ कैसा व्यवहार किया? ॥ ४॥ चारो ओर से समुद्र से घिरी हुई द्वारावती नगरी मे जाकर उन्होने क्या कार्य किये ? ॥ ५॥ जिस कालपयन के असह्य पराक्रम से उन्हे भागना पड़ा, वह कालयवन किसका पुत्र और क्तिना बली था?॥६॥ वृष्णीनामन्धकाना च गुरुर्गार्यो महामनाः । ब्रह्मचारी पुग भूत्वा न स्म दारान्स विन्दति ॥७ तथा हि वर्तमान तमूर्ध्वरेतसमव्ययम् । श्यालोऽभिशस्तवान्गायेमपुमानिति राजनि ।। सोऽभिशस्तस्तदा राजन्नगरे त्वजितंजये । अलिप्सस्तु स्त्रियं चैव तपस्तेपे सुदारुणम् ।। ततो द्वादशवर्षाणि सोऽयश्चूर्णञ्च भक्षयन् । आराधयन्महादेवमचिन्त्यं शूलपाणिनम् ।।१० रुद्रस्तस्मै वरं प्रादात्समयं युधि निग्रहे । वृष्णीनामन्धकाना च सर्वतेजोमयं सुतम् ।।११ ने प्रसन्न होकर उन्हे वर दिया-हे मुने । तुम्हे शीघ्र ही एक अत्यन्त तेजस्खा ३८० ] [ थी हरिवरापुरम तत शुथाव त राजा यवनाधिपतिवरम् । पुत्रप्रसवज देवादपुत्र पुनकामिता ॥१२ स नृपस्तमुपानाय्य सान्त्वयित्वा द्विजोत्तमम् । त धोपमध्ये यवनो गोपस्नोपु समासृजत् ।।१३ गोपाली त्वप्सरास्तत्र गोपस्त्रीवेपधारिणी। धारयामास गाय॑स्य गर्भ दुर्धरमच्युतम् ।।१४ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् । वृष्णि और अ धक वशी यादवों के महर्षि गाग्य गुरु थे, उन्होने अपनी पत्नी के होते हुए भी अखण्ड ब्रह्मचय का पालन किया था ।। ७ ।। इस प्रकार ने ऊर्ध्वरेता होकर जीवन यापन करते थे तभी एक दिन उनके साले ने सभा में उनको नपु सक कह कर हंसी उडा थी ॥ ८॥ जिससे वे क्षाम मे भर गये और पुत्र की अभिलापा करके नि तञ्जय नगर को गये, वहा उन्होने बारह वर्ष तक केवल लोहचूर्ण भक्षण पूर्व भगवान् शकर की आराधना की ।। ६-१०॥ उनके घोर तप को देखकर शाक पुत्र को प्राप्ति होगी, जो रणक्षेत्र में वृष्णियो और अधको पर विजय प्राप्त करेगा ॥ ११ ॥ इसके पश्चात् जब यवराज ने सुना कि महपि गार्ग्य ने शिवजी से पुत्र होने का वर प्राप्त किया है, तो उसने उन्हे बुलवाकर विनय के साथ खान-वस्ती म लियो के समीप ही ठहरा दिया ।। १२-१३ ॥ वहाँ गोप-नारी के वश में रहने वाली गोपाली नाम की एक अप्सरा ने उनसे गर्भ धारण किया ॥ १४ ॥ मानुष्या गार्यभार्याया नियोगाच्ठूलपाणिन । स कालयवनो नाम जने शूरो महाबलः ।।१५ अपुनस्याथ राज्ञस्तु ववृधेऽन्त पुरे शिशुः तस्मिन्नुपरते राजन्स कालयवनो नृपः ।।१६ युद्धाभिकामो नृपति पर्यपृच्छद्विजोत्तमान् । वृष्ण्यन्धानुल तस्य नारदेन निवेदितम् ।।१७ अनेक अनुनयः - । श्रीकृष्ण द्वारा कालयवन-वध ] [ ३८१ ज्ञात्वा तु वरदान तन्नारदान्मधुसूदनः । उपप्रक्षत तेजस्वी वदन्त यवनेपु तम् ॥१८ समृद्वो हि यदा राजा यवनाना महाबलः । तत एव नृपा म्लेच्छाः सथित्यानुययुस्तदा १६ शकास्तुपारा दरदा: पारदाः शृङ्गलाः खशाः । पलवाः शतशश्चान्ये म्लेच्छा हैमवतास्तथा ॥२० स ते. परिवृतो राजा दस्युभिः शलभरिव । नानावेषायुर्धर्भाममथुरामम्यवर्तत ॥२१ भगवान् शकर के वरदान स्वरूप उसके गर्भ ने एक महावली पुत्र की उत्पत्ति हुई, जिसका नाम कालयवन रहा ॥ १५ ॥ पुत्रहीन यवनराज के भवन वह बालक दिनो दिन वृद्धि को प्राप्त होता रहा और कुछ कालोपगठ जव पवनराज को मृत्यु हुई, तब वही कालयवन राजपद पर अनिपिक्त हुआ ॥१६॥ इसके पश्चात् उसने युद्ध की कामना से ब्राह्मणो से प्रश्न किया कि मैं इस समय 'कस वश के राजा से सग्राम करूं ? इस पर नारदजी न उसे वृष्णि और बधक 'शी यादवो को सब बात सुनायो ।। १७ ॥ व्या नारदजी न हो भगवान् श्रीकृष्ण के पास आकर कालयवन के जन्म लेने का वृत्तान्त वहा, इसलिये प्रीकृष्ण उस कालयवन की प्रतीक्षा करने लगे ॥ १८ ॥ जब कालयवन अत्यन्त | पराक्रमी हो गया, तब शक, तुपार, दरद, पारद, श्रङ्गला, संश, पल्लव आदि नेक पर्वतीय राजा उसके आधीन हो गये ।। १९-२० ।। इसक पश्चात् वह कालयवन टिड्डी दल के समान अवस्य सेना लेकर मथुरा की ओर 'पल पडा ।।२१।। गजवाजिखरोष्ट्राणामयुतरवुदैरपि । पृथिवी कमपामात मन्येन महता वृतः ॥२२ रेणुना मूर्यमागं तु समवच्छाद्य पार्थिवः । मूत्रेण शकृता चैव संन्येन समृजे नदीम् ॥२३ मश्वोष्ट्रशकृतां राशेनि.मृतेति जनाधिप । ततोश्वशकृदित्येव नाम नद्या वभूव ह ॥२४
३८२ ]
[ यो हरिवरपुरा
तत्सन्यं महदायाद्वै थ त्या वृष्ण्यन्धकाग्रणीः ।
वासुदेव: समाभाष्य ज्ञातीनिदमुवाच ह ।।२५
इद समुत्थित घोर वृष्ण्यन्धभव महत्
अवध्यश्चापि नः शतुर्वरदानापिनाकिनः ।।२६
सामादयोऽम्युपायाश्च विहितास्तस्य सर्वश. ।
मत्तो मदवलाभ्यां तु युद्धमेव चिकीर्षति ॥२७
एतावानिह वासश्च कथितो नारदेन मे ।
एतावति च वक्तव्यं सामंव परम मतम् ॥२८
उमके साथ के असख्य हाथी, घोडे, गधे, ऊंट एव अन्यान्य भार वाहको
और सैन्य समूहो के भार से पृथिवी कम्पित हो उठी ॥ २२ ॥ संनिको आदि
को पग-धूलि के उडने से सम्पूर्ण आकाश आच्छादित हो गया, अश्वादि के मार
मूत्र को नदी प्रवाहित होने लगी, उत्पात अश्व के मल से हुई यो
उसका नाम 'अश्वशकृत' हो गया ॥ २६-२४। जब भगवान् श्रीकृष्ण ने ससैन्न
वालयवन का आगमन सुना तो अपने जाति-बन्धुओ को बुला कर उन्होने कहा
कि अब हम लोगो पर घोर विपत्ति आ पडी है, क्योकि यह कालयवन भगवाद
शकर के वरदान से हमारा न मारा जाने योग्य शत्रु है ॥ २५-२६ ॥ वह अपने
बल और मद से उन्मत्त होकर अनेक उपायो का अवलम्वन करके यहाँ आ पहुंचा
है और हमसे युद्ध करने की उसकी इच्छा है ।। २७-२८ ॥
जरासन्धश्च नो राजा नित्यमेव न मृष्यते ।
तथाऽन्ये पृथिवीपाला वृष्णि चक्रप्रतापिताः ।।२६
केचित्कसवधाच्चापि विरक्तास्तद्गता नृपाः।
समाश्रित्य जरासन्धमस्मानिच्छन्ति बाधितुम् ।।३०
वहवो ज्ञातयश्चैव यदूना निहता नृपः ।
वदितु नैव शक्ष्याम पुरेऽस्मिन्निति केशवः ॥३१
अपयाने मतिं कृत्वा दूत तस्मै ससर्ज ह ।
ततः कुम्भे महासपं भिन्नाजनचयोपमम् ॥३२
कृष्ण द्वारा कालयवन-वध ]
[ १८३
घोरमाशीविष कृष्ण कृष्ण. प्राक्षेपयत्तदा ।
ततस्तं मुद्रयित्वा तु स्वेन दूतेन हारयत् ।।३३
निदर्शनार्थ गोविन्दो भोपयामास त नृपम् ।
स दूतः कालयवन दर्शयामास त घटम् ॥३४
कालसर्पोपमः कृष्ण इत्युक्त्वा भरतपन ।
तत्काल यवनों वुवा वासनं यादवः कृतम् ॥३५
देर्गप नारद ने मुझे बताया था कि अब हमारे मथुरा में रहने को मधि
हो चुकी है। उधर जरासय हमारा अमावारण शत्रु है ही तया अन्यान्य
मो में भी बहुत से राजागरण हमारे प्रभाव को देख कर ईयां करते हैं, वे
कम के मरने से बच जरामर के वयवर्ती हो गये हैं तथा बरामघ की
पता प्राप्त करके वह हमें मनाना चाहते हैं ।। २६-३० ॥ उन राजाओं के
हमारे बहुत-से वन्धु-बांधवों का सहार भी किया जा चुका है, इस दशा में
हम इस नगरी में रहेंगे तो हमारा विकास सभव नहीं है, इसलिये यहाँ से
देना ही श्रेयस्कर होगा। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने मथुरा से पलापन का
पय करके एक मृहद् घट में एक काला रूपं वन्द किया और अपने दूत के
कालयवन के पास भेजा। दूत ने उस घड़े को काल यवन के सामने रखते
रहा कि कृपण इस काले नाग के समान भयंकर हैं। उम घडे को देखते ही
'यवन ने समझ लिया कि यह मुझे डराने का उपक्रम है ।। ३१-३५ ।।
पिपीलिकाना चण्डानां पूरयामाम त घटम् ।
स सर्पो बहुभिस्तीक्ष्णः सर्वतस्तैः पिपीलिकः ॥३६
भक्ष्यमाण किलाङ्गेपु भस्मीभूतोऽभवत्तदा ।
तं मुद्रयित्वा तु घटं तयंव यवनाधिपः ।
प्रेषयामास कृष्णाय वाहुल्यमुपवर्णयन् ॥३७
वासुदेवस्तु त दृष्ट्वा योग विहतमात्मनः ।
उत्सृज्य मथुरामांशु द्वारकामभिजन्मिवान् ॥३८
वरस्यान्त विधित्सस्तु वासुदेवो महायशाः ।
निवेश्य द्वारका राजन्वृष्णीनाश्वास्य चैव ह ॥३८
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३८४ ] [ श्री हरियशन पदातिः पुरुषव्याघ्रो वाहुप्रहरणस्तदा । आजगाम महायोगी मथुरा मधुसूदनः ॥४० तं दृष्ट्वा निर्ययौ हृष्टः स कालयवनो रखा । प्रेक्षापूर्व च कृष्णोऽपि निश्चकर्प महावलः ।।४१ अथान्वगच्छद्गोविन्द जिघृक्षुर्यवनेश्वरः । न चैनमशकद्राजा ग्रहीतुं योगधर्मिणम् ॥४२ इसके पश्चात् कालयवन ने तीक्ष्ण दांतो वाली भयकर चीटियां मंगदा उस घडे के मुख मे डलवा दी, तब उन चीटियो ने उस सर्प का भक्षण कर वि और तब उस घड़े को बन्द करके कालयवन ने कृष्ण के पास भेज नि ।। ३६-३७ ।। उसे देख कर श्रीकृष्ण ने समझ लिया कि डराने का उपन ध्यर्थ हुआ और तब वह उसी समय मथुरा छोडकर द्वारका के लिये च ॥ ३८ ॥ वहाँ उन्होने वृष्णियो की आवास-व्यवस्था करने का आश्वासन और स्वय पथिक का वेश धारण करके, शत्रु का नाश करने के विचार से हो मथुरा जा पहुंचे ॥ ३९-४० ॥ वैसे ही वह क्रोध पूर्वक युद्ध करने के लिये उनकी ओर झपटा, यह देख अत्यन्त बली श्रीकृष्ण वहाँ से भाग चले ॥४१॥ तव कालयवन भी। पकडने के लिये पीछे-पीछे भागा, परन्तु उन्हे पकड़ने मे नितान्त अर रहा ॥४२॥ काल यवन ने जैसे ही उन्हें दे मान्धातुस्तु सुतो राजा मुचुकुन्दो महायशाः । पुरा देवासुरे युद्ध कृतकर्मा महावलः ।।४३ वरेण छन्दितो देवैनिद्रामेव गृहीतवान् । धान्तस्य तस्य वागेवं तदा प्रादुरभूत्किल ।।४४ प्रसुप्त वोधयेद्यो मा त दहेयमह सुराः । चक्षुपा क्रोधदीप्तेन एवमाह पुनः पुनः ॥४५ एवमस्त्विति त शक्र उवाच त्रिदशैः सह । स सुरैरभ्यनुनातो लोफ मानुपमागमत् ॥४६ थोकृप द्वारा कालयवन-वव ] [ स पर्वतगुहा काचित्प्रविश्य श्रमकगित । सुप्वाप कालमत वं यावत्कृप्णस्य दर्शनम् ॥८७ तत्सर्व वासुदेवाय नारदन निवदितम् । वरदान च दवभ्यस्नेजस्तस्य चम्पत ॥४८ कृष्णोऽनुगम्यमानश्च तेन म्लेच्छेन शत्रुणा। ता गुहा मुकुन्दम्प प्रविवेश विनीतवत् । ४६ वैशम्पायन जी नकद राइन् । प्राचीन कार को बात है कि महाराज मान्याता पुन मुचुकुन्द दवानुर संग्राम में विजयी हुए थे, तब दवन उनन र मान को कहा था। उस समय उन्हान सुख पूर्वक सोत रहन का वर माँग । बधिर थक हुए हानक कारण उनक मुख से निकला कि ‘जा कोइ मुझे मात साय, वह मर प्रायन बत दुए नवा के द्वारा उसी इसमय नस्म हा जाय ॥ ४.०४५॥ इद्रादि दवा न 'एजा ही होगा' कह कर उन्हें वर प्रदान किया, और उन्हें हिमामय पदव पर जाकर सान का आदा दया, तदनुसार द हिमालय की एक गुफा म आकर को गप और जब तक जावान् प्राकृष्ण साक्षात्कार नहीं हुआ, तब तक बानद पूर्वक प्रायन करत दह ।। ४६-४७ ।। उसी समय देवर्षि नारद नावान् ऋण के पास बार और हान मुन्द को वर प्राप्ति का पूर वृत्तात उनस वर्णन किया ॥ ८ ॥ वह मुनकर श्रीकृष्ण मुचुकुन्द को गुफा म घुस गय, उस समय भी कारयत्न का पीछा कर रहा था ॥ ४६॥ गिर स्थान तु राज, कुन्दस्य केशव । सदर्शनपथ त्यक्त्वा तस्यो वुद्धिमता वर. 10 अनुपविश्य यवना ददश पृथिवीपतिम् । स त सुप्त कृतान्नाभमासवाद सुदुर्मति ॥५॥ वासुदव तु त मत्वा घट्टयामात पार्थिवम् । पादनालविनामाघ शलम पादक या १२ मुचुकुन्दस्तु राजर्षि पादसर्शप्रवाधित । निद्वान्टेदन चुनाव पादस्पर्शन तन च ॥५३ ४ ६ [ श्री हरिवशपुराल ३८६ ] सस्मृत्य स वर शक्रादवक्षत तमग्रतः । स दृष्टमात्र क्रोधेन सप्रजज्वाल सर्वश. ॥५४ ददाह पावकस्तौंतु शुष्क वृक्षमिवानिः क्षणेन कालयवन नेसतेजोविनिर्गतः ॥५५ त वासुदेव श्रीमन्त चिरगुप्त नराधिपम् । कृतकार्योऽब्रवीदीमानिद वचनमुत्तमम् ॥५६ भगवान् श्रीकृष्ण मुचुकुन्द की दृष्टि को बचाते हुए धीरे-धीरे उन सिरहाने की ओर जाकर खडे हो गए ।। ५० ॥ उसी समय कालयवन भी गुफा में घुसा और उसने यम स्वरूप मुचुकुन्द को वहां सोते देखा ।। ५१॥ समय, जैसे शलभ अपने आत्मोत्सर्ग के लिये अग्नि से सघर्ष करता है, वैसे कालयवन ने सोते हुए मुचुकुन्द को कृष्ण समझ कर उसको लात मारी॥ लात के लगते ही मुचुकुन्द की नीद टूट गई जिससे वह अत्यन्त क्रोध में गये ॥ ५३ ।" उन्हे इन्द्र ने वर दिया था, इस बात का ध्यान आने पर मुच ने अपने दोनो नेत्र खोल दिये, जिनसे अग्नि की लपटें निकलने लगी ।। 4 फिर जैसे सूखे वृक्ष को अग्नि भस्म कर देती है, वैसे ही मुचुकुन्द की नेत्र, ने कालयवन को देखते देखते ही भस्म कर डाला ॥ ५५ ॥ इसके पश्चात् मनोरथ हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने बहुत समय से सोते हुए राजा मुचुछ कहा ॥५६॥ राजश्चिरप्रसुप्तोऽसि कथितो नारदेन मे । कृत मे सुमहत्कार्य स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ।।५७ वासुदेवमुपालक्ष्य राजा ह्रस्व प्रमाणतः । परिष्कृत युग मेने कालेन महता तदा ॥५८ उवाच राजा गोविन्द को भवान्किमिहागतः । कश्च काल प्रसुप्तस्य यदि जानासि कथ्यताम् ॥५६ सोमवशोद्भवो राजा ययाति म नाहुपः । तस्य पुसो यदुर्येष्ठश्चत्वारोऽन्ये यवीयसः ॥६० श्रीकृष्ण द्वारा कालयवन-वध । यदुवशात्समुत्पन्न वसुदेवात्मज विभो। चासुदेव विजानीहि नृपते त्वामिहागतम् ॥६१ श्रेतायुगे प्रसुप्तोऽसि विदित्तो मेऽसि नारदात् । इद कलियुग विद्धि किमन्यत्करवाणि ते ॥६२ मम शत्तुस्त्वया दग्धो देवदत्तवरो नृप । अवध्यो यो मया सख्ये भवेद्वर्पशतैरपि ॥६३ श्रीकृष्ण बोले-हे राजन् । मर्षि नारद से मुझे ज्ञात हुवा था कि आप यहाँ चिरकाल से शयन किये हुए हैं । इस समय आपके द्वारा मेरा बहुत वडा कार्य सम्पन्न हुआ है, अब मैं जाता हूँ तुम्हारा कल्याण हो ।। ५७ ।। वंशम्पारन बोले-हे राजन भगवान् श्रीकृष्ण को उस छोटी आकृति म देख कर सोचा कि मुझे सोते हुए, इतना समय हो गया कि युग ही परिवर्तित हो एया है ॥ ५॥ ऐसा विचार कर उन्होने श्रीकृष्ण से कहा-आप कौन हैं ? यहाँ क्यो आये हैं ? यदि आपको ज्ञात हो तो मुझे बताने की कृपा करिये कि मुझे जहाँ सोते हुए कितना समय व्यतीत हो चुका है ? ।। ५६ 11 श्रीकृष्ण ने कहा--- नहुप पुत्र राजपि मुचुकुन्द । ययाति के पांच पुत्र हुए थे-यदु, तुर्वसु, द्रा, और यदु सबसे बड़े थे । ६० ।। उसी यदुवंश मे उत्पन्न वसुदेव है की मैं पुत्र हूँ, मेरा नाम वासुदेव है ॥ ६१ ॥ देवर्षि नारद ने मुझ से कहा कि आप त्रेता युग से यहाँ सो रहे हैं और अब कलियुग आगया है, वताइये, आपका कौन सा वार्य ॥ ६२॥ भावान् शकर के वरदान से मेरा शलु अवघ्य था, मैं उसे सौ वप में भी नहीं मार सकता था, आपने उसे म करके हमारा बहुत बड़ा काय किया है ॥ ६॥ इत्युक्त स तु कृष्णेन निर्जगाम गुहामुखात् । अन्वीयमान कृष्णेन कृतकार्येण धीमता ॥६४ ततो ददर्श पृथिवीमावृता ह्रस्ववर्नर । स्वलोत्साहैरल्पवलेरल्पवीर्यपराक्रम । परेणाधिष्ठित चैव राज्य केवलमात्मन ॥६५
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[ ३९ थोकृष्ण द्वारा कालयवन-वध ] हक्षया। यदुवंशात्समुत्पन्न वसुदेवातदुनन्दनम् ।।२ चासुदेव विजानीहि नृपते त्वाच्य द्विजोत्तमान् । ग्रेतायुगे प्रसुप्तोऽसि विदितो" शान्क्रियाम् ॥३ इदं कलियुगं विद्धि किमन्यामूदनः । मम शत्रुस्त्वया दग्धो देवद, रेपुर्यया ॥४ विसावत् । अवध्यो यो मया सस्ये भवे यदुपास्यति ॥५ ! श्रीकृष्ण बोले-हे राजन् ! महाना मया। आप यहाँ चि काल से शयन किये हुए हैं रावती ॥६ चहा कार्य सम्पन्न हुआ है, अब मैं जातायतनानि च । विंसम्पायन बोले-हे राजन् ! भगवान् श्रीपुराणि च ।।७ कर सोचा कि मुझे सोठे हुए, इतना समय, पश्चात् जब राति व्यठीत एया है ।। ५८ ॥ ऐसा विचार कर उन्होंने यहाँ क्यों आये हैं ? यदि आपको नात हो तो ये गये, उनके माय उनके प्रमुख प्रातः कर्मों ने निवृत्त होकर दुर्ग हाँ सोते हुए किठना समय व्यतीत हो चुका निर्णय हो गया तब शुभ दिन नहुप पुत्र राजपि मुचुकुन्द ! ययाति के पाँच वंक दुर्ग का निर्माण कार्य प्रारम्भ 'नु, और पूरु, इनमे यदु सबसे बड़े थे ।। ६० । आदेश देते हैं, वैसे ही भगवान् तो की मैं पुत्र हूं, मेरा नाम वासुदेव है ।। ६१ हे यादवो ! इस स्वर्ग के समान 'T कि आप नेता युग से यहाँ सो रहे हैं और बार नाम भी रख लिया है । यह आपका कौन-सा कार्य करूं? ।। ६२ ।। मामान रमणीय होगी ॥५-६।। इशत अवध्य था, मैं उसे सौ वर्ष में भी नहभाग आदि अमरावती में हैं, 'म करके हमारा बहुत बड़ा कार्य किया है ।। ६ इत्युक्तः स तु कृष्णेन निजंगाम गुहाः। अन्वीयमानः कृष्णेन कृतकार्येण धीमत ततो ददर्श पृथिवीमावृता ह्रस्ववनस्वराः। स्वलोत्साहैरल्पवलरल्पवीर्यपराक्रमः गतिः ।। परेणाधिष्ठित चव राज्य केवलमात्मन आने दपूवक रहेगे। प्रथम अपने भवन स्थान निश्चित कर गली माग तथा चौगा इधर भगवान् वासुदेव द्वारावती नगरी के शीघ्रतापूर्वक बसाये जाने पर विचा उत्तन हुई। १२॥ उससे यादवों की उत्साह वृद्धि हुई और पुर निर्माण कार्य ३६७ ] [ श्री हरिवशपुराण प्रेष्यन्ता शिल्पिमुख्याना युक्ताना वैश्मकर्पसु । नियुज्यन्ता च देशेषु प्रेप्यकमारा जना ॥१० एवमुक्ते तु यदवो गृहसग्रहतसरा । यथानिवेश सहृष्टाश्चक र्वास्तुपरिग्रहम् ।।११ पुर्या क्षिप्र निवेशार्थ चिन्तय मास माधव । तस्य देवोत्थिता बुद्धिविमला क्षिप्रकारिणी ॥१२ पुर्या प्रियकरी सा वै यदूनामभिर्दिनी । शिल्पिमुख्यस्तु देवाना प्रजापतिसुत प्रभु । १३ विश्वकर्मा स्वसामर्थ्यात्पुरी सस्थापयिष्यति । मनसा समनुध्याय तस्यागमनकारणात् । निदशाभिमुख कृष्णो विविक्ते समपद्यत ।।१४ इस उपद्रव रहित नगरी मे आर सब भी देवताओ के ही समान अत्यन्त युक्त राज माग के दोनों ओर भवनो का निर्माण करने के लिये भूमि की ना करावें ॥८६॥ गृह निर्माणाथ चतुर शिल्पियो को बुलाने के लिये को विभि न स्थानो पर भेजा जाय ॥१०॥ भगवान् वासुदेव की बात सुनक सभी यादव प्रस न हुए और गृह निर्माण काय मे तत्परता से लग गये ॥१९॥ त मय हो गये । भगवान ने सोचा कि देवताओ के शिल्पी प्रजापति के पुत्र कर्मा हैं यदि वे अपने हाथ मे इस काय को ले लें तो ठीक रहे ऐसा विचा करके वे विश्वकर्मा के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए स्वग की ओर मुख कर बैठ गये।।१३ १४॥ व्यक्ति विध तस्मिन्नेन तत काले शिल्पाचार्यो महामति । विश्वकर्मा सुरश्रष्ट कृष्णस्य प्रमुखे स्थित ॥१५ द्वारकापुरी का निर्माण ] शक्रेण प्रेपितः क्षिप्रं तव विष्णो धृतव्रत। किंकरः समनुप्राप्तः शाघि मा किं करोमि ते ॥१६ यथाऽसौ देवदेवो मे शंकरश्च यथाऽव्ययः । तथा त्व देवमान्यो मे विशेपो नास्ति व. प्रभो॥१७ लोक्यज्ञापिका वाचमुत्सृजस्व महाभुज । एपोऽस्मि परिदृष्टार्थः किं करोमि प्रशाधि माम् ॥१८ थ त्वा विनीत वचन केशवो विश्वकर्मणः। प्रत्युवाच यदुश्रेष्ठः कसारिरतुलं वचः 11१६ श्रृतार्थो देवगुह्यस्य भवान्यन वय स्थिताः । अवश्यं विह कर्तव्य सदन मे सुरोत्तम ।।२० तदियं पू: प्रकाशायं निवेश्या मयि सुबत । मत्प्रभावानुम्पैश्च गृहैश्चेयं समन्ततः ।।२१ कुछ क्षणों में ही शिल्पाचार्य विश्वकर्मा उनके समक्ष वा पहुंचे ॥१५॥ भगवान वासुदेव से कहा- हे तव्रत ! हे विष्णा ! मुझे इन्द्र ने आपकी । भेजा है, मैं आपका दास हूं, जिस प्रकार सुरराज और शिवजी मेरे स्वामी ही आप भी मेरे प्रभु हैं, आप मे और उनमे कोई भेद नही है ।।१६-१७॥ कार आप तीनों लोको को आज्ञा देते हैं, उसी प्रकार मुझे भी आज्ञा 'कि मुझे आपका कौन-सा कार्य करता है ? ॥१८॥ हे राजन् ! विश्वकर्मा नो से प्रमन्न होते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने उनसे कहा--देवताओ का सब य आप भले प्रकार जानते हैं । मेरे लोक में जिस प्रकार का मेरा स्थान भी आपको ज्ञात है, आपको वैसा ही स्थान मेरे लिये यहाँ भी बनाना है २०॥ इस पुरी की रचना करके आप अपनी महिमा दिखाइये, मेरे प्रभा• के अनुरूप ही नगर एव भवनो का निर्माण होना चाहिये ॥२१॥ एवमुक्तस्ततः प्राह विश्वकर्मा मतीश्वरः। कृष्णमक्लिष्टकर्माणं देवामिविनाशनम् ॥२३ सर्वमेतत्करिष्यामि यत्त्वयाभिहित प्रभो। पुरी त्वियं जनस्यास्य न पर्याता भविष्यति ॥२४
/
भगवान् श्रीकृष्ण की आज्ञा सुनकर सुमति विश्वकर्मा ने उनके प्रति
३६२ ]
[ श्री हरिवशपुराण
भविष्यति च विस्तीर्णा वृद्धिस्स्यास्तु शोभना ।
चत्वारः सागरा ह्यस्या विचरिष्यन्ति रूपिणः ॥२४
यदीच्छेत्सागरः किंचिदुत्स्रप्टुमपि तोयराट् ।
तत. स्वायतलक्षण्या पुरी स्यात्पुरुषोतम ॥२५
एवमुक्तस्तत कृष्ण प्रागेव कृतनिश्चयः ।
सागर सरिता नायमुवाच वदता वरः ॥२६
समुद्र दश च द्वे च योजनानि जलाशये ।
प्रतिसह्रियतामात्मा यद्यस्ति मयि मान्यता ।।२७
अवकाशे त्वया दत्त पुरीयं मामक बलम् ।
पर्याप्तविपया रम्या समग्र विसहिष्यति ॥२८
कहा-हे प्रभो ! मैं आपको आज्ञानुसार ही करू गा, परन्तु यह नगरी सब याद
के निवास के लिये पर्याप्त नहीं होगा ॥२२-२३॥ यदि समुद्र कुछ स्थान दे स
तो कार्य ठीक होगा, उस समय उसमे इतना स्थान हो जायगा कि धारो समु
भी साकार रूप से इसमे विचरण कर सकेंगे ॥२४-२५।। यह सुन कर भगवा
श्रीकृष्ण ने नदियों के स्वामी समुद्र से स्थान देने के लिये अनुरोध किया-
हे समुद्र । मुझे बारह योजन विस्तार वाले स्थान की आवश्यक्ता है, तुम इत
स्थान दे सको तो मेरे नगर मे स्थान की कमी नहीं रहेगी और मेरी सेना आ
के लिये भी सुविधा हो जायगी, इसलिये तुम मेरी बात मान कर अपने स्थ
से बारह योजन पीछे हट जाओ ॥२६-२८॥
ततः कृष्णस्य वचन श्रुत्वा नदनदीपतिः ।
स मारतेन योगेन उत्ससर्ज जलाशयम् ॥२६
विश्वकर्मा ततः प्रीतः पुर्याः सलक्ष्य वास्तु तत् ।
गोविंदे चंव सम्मान कृतवान्सागरस्तदा ॥३०
विश्वकर्मा ततः कृष्णमुवाच यदुनन्दनम् ।
अद्यप्रभृति गोविंद सर्वे समधिरोहत ॥३१
द्वारकापुरी का निर्माग ]
[ ३६३
मनसा निर्मिता चेयं मया पू: प्रवरा विभो ।
अचिरेण व कालेन गृहसवाधमालिनी ॥३२
भविष्यति पुरी रम्या सुद्वारा प्राग्रचतोरणा ।
चयाटालककेयूरा पृथिव्या ककुदोपमा ।।३३
अन्त पुरंच कृष्णस्य परिचर्याक्षयं महत् ।
चकार तस्या पुर्या व देशे त्रिदशपूजिते ॥३४
तत. स निर्मिता कान्ता पुरी द्वारवती तदा।
मानसेन प्रयत्नेन वैष्णवी विश्वकर्मणा ॥३५
यह सुन कर नदी पति समुद्र वायु की सहायता से तुरन्त ही बारह योजन
छे हट गया । यह देख कर विश्वकर्मा ने कहा- अब आप नगर प्रवेश का कार्य
परभ करें और मैं भी अपने मनोयोग सहित भवनादि से परिपूर्ण इस सुरम्य
रावती नगरी की रचना क्येि देता हूं ॥२६-३०-३१॥ इसके द्वार, तोरण,
ट्टालिकायें नादि सभी अत्यन्त उत्कृष्ट होगे और पृथिवी पर स्थित हुई यह
गरी पर्वत शिखर के समान ऊंची प्रतीत होगी ।।३३।। हे राजन् ! यह कह कर
वश्वकर्मा ने मनोयोगपूर्वक उस नगरी की रचना आरम्भ की और भगवान्
कृपए के लिये अत्यन्त विस्तृत अन्त.पुर और स्नानागार का निर्माण किया
।३४।। देखते-देखते ही विश्वकर्मा ने अपने मनोयोग से उस परम वैष्णवी द्वारा-
ती नगरी की रचना कर डाली ॥३
स्य
विधानविहितद्वारा प्रस्यरवरशोभिता ।
परियाचयसगुप्ता सादृप्राकारतोरणा ॥३६
कान्तनारीनरगणा वणिग्मिरुपशोभिता।
नानापण्यगणाकीर्णायचरीव च गा गता ।।३७
प्राकारेणावर्णेन शातकोम्भेन सवृता ।
हिरण्यप्रतिवर्णश्च गृहैर्गम्भीरनि.स्वनः ॥२८
शुभ्रमेघप्रतीकाशं रिं सौधश्च शोमिता।
क्वचित्क्वचिदुदनाग्ररुपावृतमहापा ॥३६
.८
। ३६४ ] [ श्री हरिवशपुराण तामावसत्पुरी कृष्णः सर्वे यादवनन्दना । अभिप्रेतजनाकीणी सोमः खमिव भासयन् 1४० विश्वकर्मा च ता कृत्वा पुरी शक्रपुरीमिव । जगाम त्रिदिव देवो गोविन्देनाभिपूजित. ॥४१ उसके द्वार, प्राचीर, परिखा आदि अत्यन शोभामान बने थे । शीघ्र वह नगरी स्त्री, पुरुष, वणिक् तथा विभिन्न द्रव्यादि से परिपूर्ण हो गयी । ऐसा प्रतीत होने लगा कि आकाश के कोई अप्सरा ही भूतल पर उतर कर खडी हुई है ।।३८-३७॥ स्वणिम प्राचीरो, कोलाहल से परिपूर्ण भवनो, श्वेत के समान शुध द्वागे, अालिकाओ एव अत्यन्त उन्नत प्रासादो की छा। युक्त राजमार्गों से उस नगरी की शोभावृद्धि अत्यन्त अधिक हो गई थी ।।३८.३६ यादवो के आनन्द की वृद्धि करने वाले भगवान् आकाश में स्थित चन्द्रमा के समान द्वारावती नगरी को देदीप्यमान करने के लिए अत्यन्त अ न दपूर्वक निवार करने लगे ॥४०॥ नगरी की रचना के पश्चात् विश्वकर्मा नी भगवान के द्वारा सम्मान को प्राप्त होकर अपने लोक को गये ॥४१॥ भूयश्च बुद्धिरभवत्वष्णस्य विदितात्मनः । जनानिमान्धनौघंश्च तर्पयेयमहं यदि ॥४२ स वैश्रवणसस्पृष्ट निधीनामुत्तः निधिम् । शवमाह्वयतोपेन्द्रो निशि स्व भी प्रभुः ॥४३ स शवः केशवाह्यान ज्ञात्वा हि ! मेराट् स्वयम् । आजगाम समीप व तस्य द्वारावतीपतेः ॥४४ स शहःप्राञ्जलिर्भूत्वा विनयादनि नत । कृष्ण विज्ञापयामास यया वैश्रवण तथा ॥४५ भगवन्कि मया कार्य सुराणा वित्तरक्षिणा । नियोजय महाबाहो यत्कार्य यदुनन्दन ।।४६ समुवाच हृषीकेशः शहगुह्यकमुत्तमम् । जना: शधना येऽस्मिस्तान्धनेनाभिपूरय ॥४७ द्वारकापुरी का निर्माण ] [ ३६५ नेच्छाम्यनशित द्रष्टु कृश मलिनमेव च । देहीति चैव याचन्तनगयाँ निर्दन नरम् ॥४८ फिर भगवान ने द्वारका के नागरिको को धन प्राप्त कराने के उद्देश्य । एक रात्रि मे कुवेर के अनुचर निधिपति सप को बुलाया ।।४२-४३।। उनके Tरा आह्वान किया जाते ही निधिपति उनके समक्ष आकर उपस्थित हो गये । 'न्होंने सिर झुका कर भगवान् को प्रणाम किंचा गौर अत्यन्त आदरपूर्वक हाथ गोड कर उनसे बोले ।।४४.४५।। हे प्रभो । हे यदुनन्दन | मैं देवगण का वित्त- क्षक आपकी सेवा में उपस्थित हूँ, मुझे क्या करना है, सो आदेश दीजिये ।।४६।। घि उस यक्ष से थीकृष्ण ने कहा- हमारी द्वारावती नगरी में रहने वाले जिन यक्तियों के पास धन की कमी है, उन्हें धनवान् बना दो।। ४७ ।। क्योकि मैं स्पनी इस नगरी मे किमी को वुभुक्षित, कृश, मलिन, निर्धन अथवा भिखारी नही रहने दूंगा ॥८॥ गृहीत्वा शासन मूर्ना निविराट् केशवस्य ह । निधिनाज्ञापयामान द्वारवत्या गृहे गृहे ।।४६ धनीघरभिवर्पव्वं च सर्व तथा च ते । नाधनो विद्यते तत्र क्षीणभाग्योऽपि वा नर. ॥५० कृशो वा मलिनो वाऽपि द्वारवत्या कयन्चन । द्वारवत्या पुरि पुग केशवस्य महात्मन. १५१ चकार.वायोराह्वान भूयश्च पुरुषोत्तमः । ततस्थ एव भगवान्यादवाना प्रियङ्कर. ॥५२ प्राणयोनिस्तु भूतानामुपतस्थे गदाधरम् । एकमासीनमेकान्ते देवगुह्यधर प्रभुम् ।।५३ कि मया देव कर्तव्यं सर्वगेनाशुगामिना । यथैव दूतो देवाना तथैवास्मि तवानघ ॥५४ तमाच ततः कृष्णो रहस्यं पुरुपो हरिः। मारुतं जगत. प्राणरूपिण समुपस्थितम् ॥५५ 1 ३६६ ] [ श्री हरिवशपुरा गच्छ मारुत देवेशमनु मान्य सहामरै । सभा सुधर्मामादाय देवेभ्यस्वमिहानय ||५६ वैशम्पायन जी ने कहा- हे राजन् । भगवान् की आज्ञा प्राप्त कर उस यक्ष शख ने अपनी निधियो को बुला कर उन्ह आदेश दिया--हे निधियो तुम इस द्वारावती नगरी के प्रत्येक गृह में धन की वर्षा कगे। यह सुन की निधियो ने सभी घरो मे धन की वर्षा करके उन्हे परिपूर्ण कर दिया। इसनि द्वारावती मे कोई भी घर धनहीन नही रहा, कृग, मलिन अथवा अभागा को भी व्यक्ति नी रह गया, सभी धनवान् हो गये थे। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण वायुदेवता को द्वारका वासियो के कल्याणाथ आहूत किया ॥४६-५२।। आह्वा करते ही वायु देवता एकान्त मे बैठे हुए भगवान् वासुदेव की सेवा में उपस्थिर होकर बोले- हे देव । मैं देवताओ का दृत और आपका दास हूं, मुझे आ दीजिये कि आपकी क्ग सेवा करनी है ? ॥५३.५४ ।। उस दिव्य देहधारी या से भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- हे वायो। तुम जाओ और देवताओ से अनुमति लेकर उनकी सुधर्मा नाम की देव-सभा ' लेकर यहां लौट आओ ।।५५-५६।। सगृह्य वचन तस्य कृष्णस्याक्लिष्टकर्मण । वायुरात्मोपमगतिर्जगाम निदिवालयम १५७ सोऽनुमान्य सुरान्सन्वृिष्णवाक्य निवेद्य च । सभा सुधर्मामादाय पुनरायान्महीतलम् ।।५८ सुधर्माय मुधर्मा ता कृष्णायाक्लिष्टकारिणे । देवो देवसभा दत्त्या वायुरन्तरधीयत ।।५६ द्वारवत्यास्तु स म-ये केशवेन निवेशिता । सुधर्मा यदुमुग्याना देवाना त्रिदिवे यया ॥६० एव दिव्यश्च भोगश्च जलजेश्चाव्ययो हरि । द्रव्यरल करोति स्म पुरी स्वा प्रमदामि ॥६१ मर्याचश्य सचक्रे श्रेणीश्च प्रतीस्तथा। बलाध्यक्षाव युक्ताश्च प्रतीशास्तथैव च ॥६२ 'स्वर्ग की देव-सभा मे शीघ्रतापूर्व
.
द्वारकपुरी का निर्माण ]
[ ३१७
भगवान के वचन मुन कर वायुदेव अत्यन्त वेगपूर्वक वहाँ से चल कर
स्वर्ग की देव-म नाम शीघ्र ही पहुंच गय 11७11 वहाँ उहीन नगान का बादेश
स्वताना को मुनाया और उनको अनुमति से सुधर्मा नाम की देव-ममा को लेकर
कुन पृथिवी पर लौट आय वोर उस भगवान् के समक्ष रख कर, उनकी बाज्ञा
अपन लोक को गय ।।५८-५३। इसके पश्चात् द्वारकावासियों के कल्याणार्य
उन्होन स्वर्ग के समान द्वारका नगरी के मध्य मुघर्मा को स्थापित किया ।।६।।
इस प्रकार उन्हान स्वर्गीय, पार्थिव, जलज सर प्रार की विविध वस्तुनों को
वीरे धीरे सचित किया और एक मुसज्जित सुन्दरी के समान द्वारावती का सजाया
॥६१॥ फिर श्रेणी विभाग, प्रकृति विभाग बोर शासन विभागों की पृथक
स्थापना की।॥६॥
उग्रसेन नरपति काश्य चापि पुरोहितम् ।
सेनापतिमनाधृष्ठिं विन्द्र, मन्त्रिपुङ्गवम् ॥६३
यादवाना कुलकरान्स्यविरान्दश तत्र के।
मतिमान्स्यापयामास सर्वकार्येप्वनन्तरान् ।।६४
रथेप्वतिरयो यन्ता दारुफ केशवस्य वै ।
योधमुस्यश्च योगाना प्रवर सात्यकि कृत ॥६५
विधानमेव कृत्वाऽथ कृष्ण पुर्यामनिन्दित ।
मुमुदे यदुभि साद लोक्सटा महीतले ॥६६
रेवतस्वाथ कन्या च रेवती शीलसम्मताम् ।
प्राप्तवाचलदेवस्तु कृष्णस्यानुमते तदा ॥६७
महाराज उग्रसन को राजा, काशी नरेग को पुरोहित, अनावृष्टि को
सेनापति, विकद्र को नत्री, वृद्ध और प्रमुख दम यादवा को सर्वाध्यक्ष, मुनिपुण
और अतिरय को सारयी एव युद्धकुशल नात्यात को सेनाध्यक्ष पद सौंपा गया
॥६३-६४-६५। इस प्रकार समुचित व्यवस्था करके भगवान् वासुदव यादवों
के सहिन उस नगरी म आनन्द विहार करन लगे ॥६६॥ इसके कुछ कालाप-
रान्त श्रीकृष्ण की अनुमति से बलराम जी ने रेवत को पुत्री रेवती का पाणिग्रहण
कर लिया ॥७॥
सोहिणीरति पर मुटव, एमय का बागीपुर, पायरा ३६८ ] [ थो हरिदसपुर ॥ रुक्मिणी हरण ॥ एतस्मिन्नेव काले तु जरासध प्रतापवान् । नृपानुद्योजयामास चेदिराजप्रियेप्सया ॥१ सुताया भीष्मकस्याथ रुक्मिण्या रुक्मभूषण । शिशुपालस्य नृपतेर्विवाहो भविता किल ॥२ दन्तवक्त्रस्य तनय सुवक्रममितौजसम् । सहस्राक्षसम युद्ध मायाशतविशारदम् ।।३ पाण्डस्य वासुदेवस्य तथा पुत्र महावलम् । सुदेव वीर्यसम्पन्न पृथगक्षौहिणीपतिम् ।।४ एकलव्यस्य पुत्र च वीर्यवन्त महाबलम् । पुत्र च पाण्ड्यराजस्य कलिङ्गाधिपति तथा ॥५ कृताप्रिय च प्णेन वेणुदारि नराधिपम् । अशमन्त तथा प्राय श्रतधर्माणमेव च ॥६ निवृत्तपत्र कालिङ्ग गान्धाराधिपति तथा। प्रमय च महावीय कौशाम्ब्यधिपमय च ॥७ भगदत्ता महासेन शल शाल्वो महावल । भूरिश्रया महासेन गुन्तिवीर्यश्च वीर्यवान् । स्वयवरार्थ समाप्ता भोजराजनिवेशने ॥ पायन जोन महा- गन् । पदिराज दमपोप मारिए की राम शिशुपा म साप नीष्मक पुगी विमणी पावाद हाल, पारणा प्रतापी मास मार दी ॥ १.२॥ एण विमा और गमान II गुवार भरत नहाती विधान सभा 1 त, सल, गाय, भूरिया और पुतियो frur HTTARAaftar कमगरका विमियो-हररा ] कस्मिन्देशे नृपो जज्ञे कमी वेदविदां वरः । कस्यान्ववाय द्युतिमान्तभूती द्विजसत्तम । राजपर्यादवस्यासीद्विदनी नाम व नुतः । विन्ध्यत्व दक्षिणे पात्र विदर्भागां न्यवेशयत् ।।१० क्रयकशिकमुन्यास्तु पुत्रास्तत्व महाबलाः। वभूवुर्वीर्यसम्पन्नाः पृथग्वशकरा नृपाः ।।११ तस्यान्त्रवाये भीमस्य बक्षिरे वृष्णयो नृपाः । ऋयस्य त्वंगुमान्वये भीष्मकः कशिकस्य तु ॥१२ हिण्वमित्याहु दाक्षिणात्येश्नरं नृपाः । अगस्त्यगुप्तामाशां यः कुण्डिनस्योऽन्वज्ञान्नृपः ॥१३ कमी तस्यामवत्पुनो रुक्मिणी च विशापते । रुक्मी चाखाणि दिव्यानि द्रुमात्यार महाबलः ।।१४ जामदग्न्यात्तथा रामाब्राह्मास्त्रमवाप्तवान् । प्रास्पद्धत स कृष्णेन नित्यमद्भ तकर्मणा ॥१५ यह मुन कर राजा जननेज्य ने कहा है दिन श्रेष्ठ ! वेद का ज्ञाता राजा खमी किस कर में और किम प्रदेश में उत्पन्न हुमा या? | वैशम्पायन जी कहा-हे राजन् ! यजपि यादव का विदर्भ नामक पुत्र लोक विन्यात या, जिसने विन्ध्य पर्वत के दक्षिण में विदर्भा नाम की एक नगरी को बनाया ॥१०॥ क्रय कशिक वादि उपके बनेक पुत्र हुए थे, उन सब का व सर्वया पृयक पा ॥११॥ उनी वश में भीम के द्वारा वृष्णिगरण उत्पन्न हुए ये बोर य के वश मे भीमक की उत्पत्ति हुई थी ॥१२॥ वह नीप्मक ही हिरम्परोमा नाम से प्रसिद्ध हुए तथा वह कुण्डिन नगर के राजा हुए और वगस्त्र द्वारा रक्षित दक्षिण के प्रदेशों पर राज्य करने लगे ॥१६॥ इन्हीं नीमक का पुन मी बौर पुनी रश्मिणी हुई। उन सभी ने परम प्रतापी दूम ने वनेक दिया और परशुराम से ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया और बहुत विक्रम वाले भगवान से वर करने लगा ॥१४-१५॥
४०० ] [ थो हरिवंशपुर रुक्मिणी त्वमवद्राजन् रूपेणासदृशी भुवि । चक्रमे वासुदेवस्ता श्रवादेव महाद्युतिः ॥१६ स तया चाभिलपित श्रवादेव जनार्दन.. तेजोवीर्यवलोपेत. स मे भर्ता भवेदिति ॥१७ ता ददौ न च कृष्णाय द्वषाद्रुक्मी महावल.। कंसस्य वधसतापात्कृष्णायामिततेजसे । याचमानाय क सस्य द्वेष्योऽयमिति चिन्तयन् ।।१८ चैद्यस्यार्थे सुनीथस्य जरासन्धस्तु भूमिप. । वरयामास ता राज भीष्मक भीमविक्रमम् ॥१६ चेदिराजस्य तु वसोरासीत्पुत्रो वृहद्रथः । मगधेपु पुरा येन निर्मितोऽसौ गिरिवज. ॥२० तस्यान्ववाये जनेऽसो जरासधो महावल. । वसोरेव तदा वशे दमघोपोऽपि चेदिराट् ॥२१ रुपिमणी अद्वितीय सुन्दरी थी, यह बात पर भगवान् धा उसका पाणिग्रहण परले पा चार यि १६ रुपिमणी ने भी यो गोही पति रूप में वरण करने पीठ प्रतिमा पर सी यो॥ १७॥१ वस-रप रा मतपत तथा गृष्ण के प्रति स्वाभाविक विज्ञपी रम्मी अपनी पापिराह भगवान् दागुर फे साय करा लिये किसी प्रभार पहाय ॥१८॥ इसका परचा बसवली और पानी राजा राम ने भीष्म शिशुपाल के नियमिणी को माया ॥ उमा पाकिरियर वकीप नामा तपा, Enfi नाम: एक मारी पोरपना कोपा ॥ २० ॥ utv • Saritt in 4 गई और पnि R. भी उसी पञ्च में उसी पूार मे ए॥२१॥ दमपापस्य गुमाग्तु पञ्च भीमपरामगाः । nfo यसरप पगि तिर । २२ रक्मिणी-हरण ] [ ४०१ शिशुपालो दशग्रीवो रेभ्योऽथोपदिशो वली। सर्वास्त्रकुशला वीरा वोर्यवन्तो महावला: ।।२३ ज्ञातेः समानवशस्य सुनीथः प्रददौ सुतम् । जरासधस्तु सुतवदर्शन ज गोप च ।।२४ जरासघं पुरस्कृत्य वृष्णिशमहावलम् । कृतान्यागासि चंद्य न वृष्णीना वाप्रियपिणा ॥२५ जामाता त्वभवत्तस्य कसस्तस्मिन्हते युधि । कृष्णार्थं वरमभवज्जरासधस्य वृष्णिभिः ॥२६ भीष्मफ वरयामास सुनीथार्थे च रुक्मिणीम् । ता ददौ भीष्मकश्चापि शिशुपालाय वीर्यवान् ।।२७ वसुदेवजी की बहन श्रुतध्रुवा के गर्भ से दमघोप ने शिशुपाल, दशग्रीव, य, उपदिश और बली इन पांच पुत्रो को उत्पन्न किया, जो कि सर्वशास्त्रो के और अत्यन्त पराक्रमी हुए ॥ २२-२३ ॥ जरासव और दमघोप दोनो के ही वश मे उत्पन्न होने के कारण दमघोप ने अपने ज्येष्ठ पुत्र शिशुपाल को सप की सहायता के लिये उसे दे दिया था, इसलिये जरासप उसे अपने के समान ही पालने लगा था ॥ २४ ॥ इसीलिये वृष्णियो के शत् राजा संघ का प्रिय करने के लिये शिशुपाल ने वृष्णियो के बहुत से अप्रिय कार्य धे ॥ २५ ॥ परम बली, कस राजा जरासय का जमाई था, इसलिये कृष्ण a कप का वध होने के कारण जरासंध की प्रीति के निमित्त वृष्णियों से का वर-भाव हद हो गया ॥२६ ॥ इसीलिए जरासघ ने राजा भीमक से 'गुपाल के लिये रुक्मिणी को याचना को, जिसे भीष्मक ने भी स्वीकार कर या था ।। २७ ॥ ततश्चद्यमुपादाय जरासधो नराधिपः । ययौ विदर्भान्सहितो दन्तवक्त्रेण यायिना ॥२८ अनुज्ञातश्च पोण्डण वासुदेवेन धीमता । अङ्गवङ्गकलिङ्गानामीश्वरः स महाबलः ।।२६ मानयिप्यरच तान्रुक्मी प्रत्युद्गम्य नराधिपान् । वरया पूजयोपेतास्तान्निनाय पुरी प्रति ॥३०
[ यो हरिमामुरार
४०२ ]
पितृप्वसु प्रिया च रामकृष्णायुभावपि ।
प्रययुर्वृष्णयश्चान्ये रथस्तम बलान्विताः ॥३१
मयकशिकभर्ता तान्प्रतिगृह्य यथाविधि ।
पूजयामास पूजान्विहिश्चव न्यवेशयत् ॥३२
श्यो भाविनि विवाहे च रक्मिणी निर्ययो पहिः ।
चतुयुजा रथेनंन्द्र देवतायतने शुभे ॥३३
इन्द्राणीमयिष्यन्ती गृतकोतुकमजला ।
दीप्यमानेन वपुषा बलेन महताऽऽपता ॥३४
ता ददशं तदा प्णो लक्ष्मी साक्षादिव स्पितान ।
रूपेणापण सपन्ना देवतायतनान्तिके ॥३५
रुक्मिणी-हरण ]
[ ४०३
रामेण सह निश्चित्य केशवस्तु महावलः ।
तत्प्रमाणेऽकरोबुद्धि वृष्णिभिः प्रणिधाय च ॥३८
कृते तु देवताकार्ये निष्कामन्ती सुरालयात् ।
उन्मथ्य सहसा कृष्णः स्व निनाय रथोत्तमम् ॥३६
वृक्षमुत्पाट्य रामोऽपि जघानापततः परान् ।
समनह्यन्त दाशाहस्तिदाज्ञप्ताश्च सर्वशः ॥४०
ते रविविधाकारैः समुच्छ्रितमहाध्वजः ।
वाजिभिरिणश्चैव परिवत्रुहलायुधम् ।।४१
रूप, सौभाग्य तथा यश में कोई भी स्त्री उनकी समानता करने में
समर्थ नहीं है, श्वेत दुकूल वारिणी उन रुक्मिणीजी को देखकर थीकृष्ण के मन
मे उनके प्रति आशा जाग्रत हुई और उनका आवेश आज्याहुति प्राप्त अग्नि के
उमान प्रवृद्ध होने लगा ॥३६.३७॥ तव उन्होंने बलरामजी तथा बन्यान्य प्रमुख
वृष्णियो से परामर्श करके रुक्मिणी का हरण करने का निश्चय किया और जब
रुक्मिणी देव पूजन करके मन्दिर से बाहर निकली, तभी श्रीकृष्ण ने सहसा उन्हें
पकडकर अपने रथ पर चढा दिया ॥३८-३९।। उस समय जो पुरुप उन्हें रोक्ने
के लिये आगे आये, वह बलराम द्वारा वृक्षो को उखाड़ कर उनसे प्रहार करने के
कारण भाग गये । यह देखते ही विविध प्रकार के रय, हाथी, घोडे मादि पर
सवार तथा पैदल वृष्णिगण उनकी रक्षा के लिये वलरामजी के चारो ओर
एकत्र हो गये ॥४०.४१।
आदाय रुक्मिणी कृष्णो जगामाशु पुरी प्रति ।
रामे भारतमासज्य युयुधाने च वीर्यवान् ॥४२
अक्रूरे विपृथौ चव गदे च कृतवर्मणि ।
चक्रदेवे सुदेवे च सारणे च महावले ॥४३
निवृत्तशती विक्रान्ते भङ्गाकारे विदूरथे ।
उग्रसेनात्मजे कङ्के शतद्य म्ने च केशवः ।।४४
राजाधिदेवे मृदुरे प्रसेने चिनके तथा ।
अतिदान्ते वृहदुर्गेश्वफल्के सत्यके पृथौ ॥४५
४०४ ] ['श्री हरिवंशपुरा वृष्ण्यन्धकेषु चान्येषु मुख्येषु मधुसूदनः । गुरुमासज्य त भार ययौ द्वारवती प्रति ॥४६ दन्तवक्त्रो जरासध शिशुपालश्च वीर्यवान् । सन्नद्धा निर्ययु क्रुद्धा जिघासन्तो जनार्दनम् ॥४७ अङ्गवङ्गकलिङ्गश्च साद्ध पौण्ड श्च वीर्यवान् । निर्ययो चेदिराजस्तु भ्रातृभिः स महारथैः ।।४८ तान्प्रत्यगृह्णन्सरब्धा वृष्णिवीरा महारथा'। सकर्पण पुरस्कृत्य वासव मरतो यथा ॥४६ तय भगवान् श्रीकृष्ण ने बलराम, युयुधान, सात्यकि, बकर, विध गद, कृतवर्मा, चक्रदेव, सुदेव, सारण, विदूरथ, उग्रसेन-पुत्र कक, शवयन मृदुर, प्रसेन, चित्रक, अरिदा-त, बृहदुर्ग, श्वफल्क, सत्यक, पृथु तथा अन्यार वृष्णियो और अधो पर वहाँ का भार छोडा और स्वय रुक्मिणी को लेर द्वारावती के लिए चल दिये ॥४२-४६॥ यह समाचार सुनते ही दन्तका शिशुपाल, जरासघ बादि विपक्षी राजागण अत्यन्त कोधित हुए और सपणा वध करने का विचार करते हुए उनके पीछे दौड़ पड़े ॥४७॥ दियज दमघोर भी अपने महारथी भाइयो तथा अग, यग, कलिंग और पौण्ड आदि राजाओं को माप लेकर युर परने के लिये चल पडा ॥४८॥ यह देखकर बलरामजी । नेतृत्व म वृष्णिवश के महारथी शूरवीर युद्ध के लिये उन सब पालुओं के सामने जा पहुंचे ॥६॥ थापतन्त हि वेगेन जरासध महायलम् । पििपय्याध नाराचं युयुधानो महामृधे ॥५. बकरो दन्तयत्र तु चिथ्याध नवभिः शरैः । न प्रत्यापिय यर सारूपो वाणदंशभिरागुगः ।।५१ विष: शिशुपाल तु गरविव्याध सप्तभिः । अनि. प्रत्यदिन यत्त शिशुपालः प्रतापवान् ।।५२ गरेपपस्तु पंच इभिविम्याप मार्गणः । प्रविमान्तस्तथाप्टानिहाय पञ्चमः ।।५३
विमणी हरण ]
[ ४०५
प्रनिविव्याध ताश्च द्य पञ्चमि पञ्चभि शरै ।
जघानाश्वाश्च चतुरश्चतुर्मिविपृथा शरं ॥५४
वृहदुर्गस्य मल्लन शिरश्चिच्छेट चारिहा ।
गवेपणस्य सूत तु प्राहिणोद्यमसादनम् ।
हताश्व तु स त्यक्त्वा विपृथुस्तु महाग्ल ।
भारुरोह रय शोघ्र वृहदुर्गम्य वीयवान् ।।५६
विपृथो सारथिश्चापि गवेपणरथ द्रुतम् ।
मारुह्य जवनानरवान्नियन्तुमुपवक्रम ॥५७
युयुधान और सात्यकि न जब उरासर को अत्यन्त वेग पूर्वक अपनी
र बढता दखा तो उस छ वारसा से वींध डाला ॥५०॥ तभी यक र न दन्त.
को नो वाणो स और दावक ने अनर को दस वाणा स वींध दिया ॥५१॥
पृथु न शिशुपाल को मात वाण मारे और शिशुपाल न विपृथु पर याठ वाण
वाय ॥५२॥ इसके बाद गवयग न छ,
यतिदन्त न आठ और बृहद् दाने
च वाणा म शिशुगर को वीचा ॥५३॥ तव कुपित होकर शिपात न प्रत्यक
र पर पाच पाच ब ग चलाकर प्रहार क्यिा ॥५॥ फिर उसन विपृथु क
र घोडा को मार डाला और एक भल्लास्त्र स वृद्दा का शीश छेदन कर
या तथा गवेषण के मारथी को यमसदन भेज दिया । अश्वा क मरन पर
पृथु, वृद्गं के रथ र आरूढ हुआ और विपृयु का सारथी भी गवपण
क रप पर पढ़च कर उन चनाने लगा ।।५६ ५७।।
ते
मुद्धा
शव तुनीथ रामवाकिग्न् ।
नृत्यन्त रथमार्गप चापहना कलानि ॥५८
चक्रदेवो दन्तवक्त्र विभदारसि पनिणा।
पड़थ पञ्चभिश्चव विव्याध युधि मार्गणे ॥५६
त निसृष्टद्र मेणाजी वङ्गराजस्य कुभारम् ।
जधान राम सक्दो वङ्गराज च सयुगे ॥६०
त हत्वा रथमारुल धनुगदाय वीयवान् ।
सकर्षणो जधानोग्राराचं कैशिकान्वहून ॥६॥
और फिर वगराज का भी वध कर दिया ॥६०॥ इस प्रकार बलराम दरार
अपनी योर आता हुआ देखकर जरासंध ने उन पर तीन बान चलाये॥२-11
देशीय वीरो का सहार किया ।।६१॥ अपने छ: माणो से कारूप धनुर्धारियो।
फिर वह वलरामजी अत्यन्त पराक्रमी जरासघ की ओर बढ़े, उस समय
[ श्री हरिवशपुरा
पभिनिहत्य कारूपान्महेष्वासान्स वीर्यवान् ।
शत जघान सफद्धो मागधाना महाबले ॥६२
निहत्य तान्महाबाहुर्जरासध ततोऽभ्ययात् ।
तमापतन्त विव्याध नाराचैर्मागधस्तिभिः ॥६३
इसके पश्चात् धनुष-बाण ग्रहण किये और अत्यन्त कुपित हुए उन की
ने शिशुपाल को चारो ओर से घेर लिया ॥५॥ चक्रदेव न एक गण से द
वक्र का हृदय और पांच बाणो से पडरथ को बीध डाला ॥५६॥ इसी स
वलराम ने क्रोधपूर्वक एक वृक्ष उखाड कर उससे वगराज के हाथो को मा
को मार कर रथारूढ हुए और अपने उन बाणो से उन्होने अनेकानेक गौर
वध पिया और सौ वाणों से मगध देशीय अत्यन्त बली सैनिको को मार
त विभेदाष्टभि. ऋद्धो नाराचमुसलायुधः ।
चिच्छेद चास्य भल्लेन ध्वज हेमपरिष्कृतम् ।।६४
तद्य दमभवद्घोर तेपा देवासुरोपमम् ।
मृजता शरवर्षाणि निघ्नतामितरेतरम् ॥६५
गर्गमा हि सक्र दाः सनिपेतुः सहस्रशः।
रथं रपारच सरब्धाः सादिनश्चापि सादिभिः ॥६६
पदातयः पदातीश्च शक्तिवर्मासिपाणयः ।
छिदन्तश्चोत्तमागानि,पिनेरु धि ते पृथक् ॥६०
नगीना पात्यमानाना कपु महास्वनः ।
शराणा पतना शब्दः पक्षिणामिप शुधये ॥६८
भेरीगन मृदनाना वेणूनां च गृधे,ध्यानम् ।
जुग्रह पोष. भरथापा ज्याघोपय महात्मनाम् ॥६८
२१ " 1. पसार - 1 इसमे कुपित हुए वलराम ने उस पर पाठ बामो से प्रहार किया और पल्लास्त से उनके रय का ध्वज पाट डाला ॥६४|| तब उन दोनो अत्यन्त वीरो मे घोर युद्ध होने लगा, और वे दोनो ही ययाति एक दूसरे पर भीषण वाण- वर्षा करने लगे ॥६५॥ उस समय दोनों पक्ष के हाथियो से हाथी, घोडी से घोडे, रयो से रव भिड रहे थे और भयानक मारकाट हो रही थी ॥६६॥ हाथो में शाक्ति, ढाल, तलवार बादि शस्त्रास्त्र धारी पैदल पदलों का सिर काटते हुए धूम रहे थे॥६७।। क्वचो पर चोट करती हुई तलवारो को झनझनाहट और गिरते हुए बाणो के शब्द मुनाई दे रहे थे ।।६८ युद्ध स्थल में भेरी, शस और मृदा बज रहे थे, उनको धनि शास्त्रो और प्रत्यचाओ की ध्वनि में विलीन हो रही थी ।।६।। ।। श्रीकृष्ण रूक्मिणी का विवाह ॥ कृष्णेन हिमाणा ता लमी श्रुत्वा तु रुक्मिणीम् । प्रतिज्ञामकरोत्क्रुद्रः समक्ष भीमकस्य ह ॥१ अहत्वा युधि गोविन्दमनानीय च रुक्मिणीम् । कुण्डिन न प्रपेक्ष्यामि सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम् ॥२ आस्थाय स रथ वीर: समुदग्रायघध्वजम् । जवेन प्रययौ ऋद्धो बलेन महता वृत. ॥३ तमन्वयु पाश्चंव दक्षिणापथवर्तिन. । काथोऽशुमान्छ तर्वा च वेणुदारिश्च वीर्यवान् ॥४ भीष्मकस्य सुताश्चान्ये रथेन रथिना वराः । क्रय शिक्मुख्याश्च सर्व एव महारथाः ॥५ ते गत्वा दूरमध्वान सरित नर्मदामनु । गोविन्दं ददृशुः क्रूदा सहैव प्रियया स्थितम् ॥६ अवस्थाप्य च तत्सैन्य स्क्मी मदवलान्वित । चिकीर्षुद्वैरथ युद्धमभ्ययान्मसदनम् ।।७ वैशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् ! रुक्मिणी-हरण का वृत्तान्त सुनकर तो अत्यन्त कुपित हुआ और उसने अपने पिता भीष्मक के समक्ष प्रतिज्ञा की ४०८ ] वहां पहुंच कर उसने श्रीकृष्ण पर चौसठ घारगो को धनुष पर एक साय! [ श्री हरिवयपुराण कि युद्ध मे कृष्ण का वध निये विना तथा क्मिणी को लौटाये बिना मैं कुचित पुर मे लौट कर नहीं आऊँगा। मेरा यह वचन सत्य समझिये ॥१-२॥ ऐर प्रतिज्ञा करके वह शस्त्रास्त्रो से सुसज्जित होकर ऊंची ध्वजा से युक्त रथ । चढ़ कर अपनी विशाल सेना के सहित चल दिया ॥३|| काथ, अशुमान, श्रुता और वेणुदारी आदि दक्षिण की ओर के राजागरण, भीष्मक पुत्र गण तथा कम कैशिक के प्रमुख महारथीगण उसके पीछे चले ॥४-५॥ बहुत दूर चलने पर नर्मदा नदी के तट पर अपनी प्रियतमा रुक्मिणी के साथ बैठ हुए भगवर वासुदेव उन्हे दिखाई पडे ॥६॥ उन्हे दिखते ही रुक्मी का क्रोध भभक उठा और अपनी सेना को पीछे ही छोड कर संग्राम करने के लिये श्रीकृष्ण को और द्र तगति से दौड पड़ा ॥७॥ स विव्याध चतु षष्टया गोविन्द निशितैः शरैः । त प्रत्यविध्यत्सप्तत्या वाणयुधि जनार्दनः ।।८ पतमानस्य चिच्छेद ध्वज चास्य महावल' । जहार च शिर कायात्सारथेस्तस्य वीर्यवान् ।। त कृच्छ्रगतमानाय परिवQर्जनार्दनम् । दाक्षिणात्या जिघासन्तो राजान सर्व एव हि ॥१० तमशुमान्महावाहुविव्याध दशभि. शरैः । श्रु तर्वा पचभि ऋद्धो वेणुदारिश्च सप्तभिः ।।।११ ततोऽशुमन्त गोविन्दो बिभेदोरसि वीर्यवान् । निषसाद रथोपस्थे व्यथित. स नराधिपः ॥१२ श्रु तर्वणो जघानाश्वाश्चतुभिश्चतुर, शर. । वेणुदारेर्वजछित्त्वा भुज विव्याध दक्षिणम् ।।१३ तथैव च श्रुतर्वाण शरविव्याध पञ्चभिः । शिश्रियेस ध्वज शान्तो न्यपीदच्च व्यथान्वितः ॥१४ पढाकर पार किया, जिसके उत्तर में श्रीकृष्ण ने सत्तर बाण एक साय चलाये। ॥८॥ इसके साथ ही उसके रथ को ध्वजा काट दी और उसके सारथी मा मस्तक । थोरपण रुक्मिणी का विवाह ] काट कर पृथिवी पर गिरा दिया I उसो समय दक्षिणापथ के राजा वहाँ पहुंचे और रुक्मी का सफ्टग्रस्त देखकर श्रीकृष्ण को मार डालने की च्छिा से उन्होंने घेर लिया ॥१०॥ तभी अशुमान ने नौ, श्रुतवा ने पांच और णुिदारि ने सात गणो से भावान् श्रीकृष्ण पर प्रहार किये ॥११॥ तब उन्होन पने वालो से अशुमान का हृदय चौर दिया, जिसस वह मूच्छित तथा घरा- गायी हो गया ॥१२॥ फिर चार वाणा स उन्हाने श्रुता के चारों घोडे मार दये और येणुदारि की ध्वजा और उसका दक्षिण हस्त काट कर गिरा दिया ११३॥ फिर उन्होन थ वर्वा पर पांच वारणा से प्रहार किया, परन्तु अधिक थक गाने के कारण ये रथ की ध्वजा का महारा लकर लट गये ॥१४॥ मुञ्चन्त शरवर्षाणि वासुदेव ततोऽभ्ययु । क्रयकैशिकमुख्याश्च सर्व एव महारथा ||१५ वाणर्वाणाश्च चिच्छेद तेपा युधि जनादन । जधान पा सरह पतमानश्च तान्छगन् ।।१६ पुनरन्याश्चतु पप्ट्या जघान निशितै शरे । ऋद्वानापततो वीरानद्रवत्स महावल ॥१७ विद्रुत स्वरल दृष्ट्वा रुक्मी क्रोधवशगत । पञ्चभिनिशिवणिविव्याधोरसि केशवम् ।।१८ सारथि चास्य विव्याध सायकनिशितविभि । आजघान शरेणास्य ध्वज च नतपर्वणा ॥१६ केशवस्त्वरित दृष्ट्वा को विव्याध मागणे । धनुश्चिच्छेद चाप्यस्य पतमानस्य रक्मिण ॥२० अथान्यनुरादाय रुक्मी कृष्णजिघामया । प्रादुश्चकार चान्यानि दिव्यान्यस्त्राणि वीर्यवान् ।।२१ तनी क्रय-शिक के वीर वाण वपा करते हुए तेजी से श्रीकृष्ण की और बड़े, परतु उन्हाने उनको उस बाण-वर्षा को यपन वाणों स विफल कर या ॥१५-१६॥ इसी समय अपनी ओर बढ़त हुए ययान्य वीरो को श्रीकृष्ण चौसठ बाणो के प्रहार स मार डाला ॥१७॥ यह देख कर कमी की सेना हो गया, उसके गिरने के शब्द से पिवी प्रतिध्वनित हो गई राशि: फिर तीन बाण मार कर उसका धनुप बोर रथ तोड़ डाला ॥२२॥ पनुप और रथ के नष्ट हो जाने पर हाथो मे ढाल तलवार ग्रहण करके गएड के समान वेग से रथ से वूद पड़ा ॥२३॥ उसे अत्यन्त वेग से अपनी धावे देस कर उन्होंने उसकी तलवार के दो टुकड़े कर दिये और तीन गाण वसम्पल पर मारे ॥२४॥। जिससे वह महाबाहु खमी मन्दिर होकर परा ४१० ] [ श्री हरिवतपुराण भाग खड़ी हुई तब रुक्मी ने श्रीकृष्ण की छाती पर अपने बाणो से प्रहार ग ॥१८॥ फिर उसने अपने तीक्ष्ण वाणो से कृष्ण के सारथी और ध्वजा पर च को ॥१६॥ उसका यह कार्य देख कर भगवान् ने अत्यन्त क्रोधपूर्वक धनुप । साठ बाण चढाये और उनके प्रहार से उसके धनुष को काट दिया 100 रुक्मी ने कृष्ण को मारने का विचार करके दूपरा धनुप ग्रहण किया और को पर अत्यन्त श्रेष्ठ वाणो का प्रयोग करने लगा ॥२१॥ अस्त्ररस्त्राणि सवार्य तस्य कृष्णो महाबलः । पुनश्चिच्छेद तच्चाप रथिना च त्रिभिः शरैः ॥२२ स छिन्नधन्वा विरथ खड्गमादाय चर्म च । उत्पात रथाद्वीरो गरुत्मानिव वीर्यवान् ॥२३ तस्थाभिपततः खड्ग चिच्छेद युधि केशवः । नाराचैश्च त्रिभिः कुतो विभेदैनमथोरसि ॥२४ स पपात महाबाहुर्वसुधामनुनादयन् । विसज्ञो मूठितो राजा वज्रणेव महासुरः।।२५ तःश्च राज्ञ शरै सर्वान्पुनर्विव्याध माधव. । रुक्मिण पतित दृष्ट्वा व्यद्रवन्त नराधिपाः ॥२६ विचेष्टमान तभूमौ भ्रातर वीक्ष्य रुक्मिणी । पादयोर्यपतद्विष्णो_तुर्जीवितकाक्षिणी ॥२७ तामुत्यार परिष्वज्य सान्त्वयामास केशवः । अभय रुक्मिणे दत्त्वा प्रययौ स्वपुरी ततः ।।२८ उनके अस्त्रों को भगवान वासुदेव ने अपने अस्त्रो से पाट श्रीकृष्ण रुक्मिणी का विवाह ] [ ४११ उसके पक्ष के न्याम्य रामाश्री पर भीपण वाण वर्षा की तथा रक्मी को गिरा हुना देखकर सभी राजा नागने लगे ॥२६॥ तव अपन भाई रूकमी को युद्ध स्थल मे रटपटाता हुआ देख कर रुक्मिणो व्याकुल होकर उसकी प्राण-रक्षा करने के लिये भगवान के चरणों में गिर पढी ॥२७॥ तब उन्होंने रुक्मिणी को सारखना देकर रुक्मी को अभयदान दिया और रुक्मिणी सहित द्वारादती की ओर चल पडे ॥२८॥ वृष्णयोऽपि जरासंधं भक्त्वा ताश्च व पायिवान् । प्रययुरिका हृष्टाः पुरस्कृत्य हलायुधम् ।।२६ प्रयाते पुण्डरीकाक्षे थुतर्वाभ्येत्य सगरे। रुक्मिण रथमारोप्य प्रययो स्वा पुरी प्रति ॥३० बनानीय स्वसार तु रुक्मी मानमदान्वितः । हीनप्रतिज्ञो नैच्छत्स प्रवेष्टुं कुटिन पुरम् ॥३१ विदर्भपु निवासार्थ निर्ममेऽन्यत्पुर महत् । तद्भोजस्टमित्येव वभूत्र मुवि विश्रुतम् ॥ २ तनोजमा महानेजा दक्षिणा दिशमन्वगात् । भीप्मक कुण्डिने चं व राजोवास महाभुजः ॥३३ द्वारका वापि सप्राप्ते रामे वृष्णिबलान्विते । रुक्मिण्या: केशव: पाणि जग्राह विधिवत्प्रभुः ॥३४ ततः मह तया रेमे प्रियया प्रीयमाणया । सीतयेव पुरा राम. पौलोम्येव पुरन्दरः ॥३५ इधर वीर यादवो ने जरासघ यादि राजाओं को पराजित किया और प्रसन्न मन से वलरामजी के सहित द्वारका को चल पडे ॥२६।। जब नगवान् चले गये तव श्रतर्वा रण स्थल मे गया और रुक्मी को रथ में लिटा कर अपने नगर वो लौटा ले गया ॥३०॥ रुखमी ने युद्ध मे जाते समय रुक्मिणी के विना कुण्डिनपुर मे न लौटने को जो प्रतिज्ञा, की थी, उसके विफल होने के कारण उसने कुण्डिनपुर लौटने की इच्छा नहीं की ॥३१॥ तव उमो समय विदर्भ में अन्य सुन्दर नगर भोजकट के नाम से बसाया गया ॥३०॥ अत्यन्त तेजस्वी १२ ] [ श्री हरिवनपुराव रुक्मी ने उमी भोवाट के दक्षिण नाग में निवास किया और उसके पिता भीम बुण्डिनपुर में ही रहते रहे ॥३३॥ उपर जब याददो के सहित सराम द्वारावती पहुंच गये, तव श्रीकृष्ण ने रक्मिणी के साथ विधिपूर्वक विवाह कि ॥३४॥ इसके पश्चात् वे आनन्दपूर्वक रविमणो के साथ रहते हुए राम-सीता इन्द्र-राची के समान विहार करन नगे ॥३५॥ सा हि तस्याभवम्म्येष्ठा पली कृष्णस्य भामिनी । पतिव्रता गुणोपेता रूपगीलगुणान्विता ॥३६ तस्यामुयादयामास पुमान्दश महारथान् । चारदेष्ण मुदेष्ण च प्रद्य न च महापलम् ॥३॥ मुपेण चारगुप्त च चारमाहुं च वीर्यवान् । चारविन्द मुच र च भद्रवाम तथंव च । ३८ पार पवपिना थे मुना चारमनी तथा । धर्मापंगतात नु तास्था गलामंशः ३६ रुवमी-वध वृतान्त ] [ ४१३ पराय॑वस्त्राभरणा: कामः सर्वे. मुखोचिताः । जज्ञिरे तामु पुनाश्च तस्य वीराः सहस्रशः ४४ शास्त्रार्थ कुशला सर्वे वलवन्तो महारथाः। यज्वानः पुण्यकर्माणो महाभागा महावला: ॥४५ रुक्मिणी जी के अतिरिक्त उन्होंने अन्य सात सर्व गुण सम्पन्न कन्याओं विवाह किया था, जो मूर्यपुनी कालिन्दी, राजाधिदेव पुत्री मिनविन्दा, योध्या नरेश नग्नजित की कन्या सत्या, जाम्बवान् पुत्री जाम्बवती, केकय श की पुत्री रोहिणी, मदराज की कन्या लक्ष्मणा, सत्राजितु की कन्या सत्य- मा गोर राजा शव्य की पुत्री तन्वी थीं । इनके अतिरिक्त मोलह हजार अन्यान्य 'याओं के साथ भी उन्होने विवाह किया और सब के साथ विहार-रत रहते : द्वारका में निवास करते थे ।।४१-४३।। उनको सब पत्नियां बहुमूल्य वस्त्रा- शो और इच्छित भोगो को प्राप्त करती हुई सदा तृप्त रहती थी, उनके गर्भ हजारो पुत्रो को उत्पत्ति हुई थी, जो सर्व शास्त्रज्ञ, बली, महारयी, याज्ञिक, क्र्मोिं के अनुष्ठाता तथा अमामान्य भाग्य से सम्पन्न थे ॥४४-४५॥ .. ॥ रुक्मी-वध वृतान्त ॥ ततः काले व्यतोते तु रुक्मो महति वीर्यवान् । दुहितु. कारयामास स्वयवरमरिन्दम || तत्राहूता पि राजानो राजपुत्राश्च रुक्मिणा। समाजग्मुर्महावीर्या नानादिग्भ्यः श्रियाऽन्विताः ॥र तनाजगाम प्रद्युम्नः कुमारैरपरंवृतः। सा हि त चकमे कन्या स च ता शुभलोचनाम् ॥३ शुभाङ्गी नाम वैदर्भी कान्तिा तिसमन्विता। पृथिव्यामभवल्याता रुक्मिणस्तनया तदा ॥४ उपविष्टेषु सर्वेषु पार्थिवेषु महात्मसु । वैदर्भी वरयामास प्रद्युम्नमरिसूदनम् ॥५ - [ । शृङ्गार सहित उस विदर्भ नगर मे एकत्रित हुए ॥१-२॥ अन्यान्य कुमारों शुभागो ने राजकुमार प्रधुम्न के कठ में वरमाला डाल दी॥शा श्रीकृष्ण प्रद्युम्न जिस प्रकार सर्वशास्त्रविद् तथा सिंह के समान सुदृढ अग वाले थे, उनके समान थी। उस चन्द्रसेना के समान सुन्दरी शुभागीका प्रद्य म्न पर ४१४ ] श्री हरिवंशपुर स हि सर्वास्त्रकुशल. सिंहसंहननो युवा रूपेणाप्रतिमो लोके केशवस्यात्मजोऽभवत् ॥६ वयोरूपगणोपेता राजपुती च साऽभवत् । नारायणी चन्द्रसेना जातकामा च त प्रति ।।७ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् ! कुछ कालोपरान्त शत्रु कान करने में समर्थ रुक्मी ने अपनी कन्या का स्वयंवर किया, जिसमे विविध देशों महाराजो तथा राजकुमारो को आमत्रित किया गया, जो कि अपने-अपने सा साथ लेकर श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न भी उसम सम्मिलित होने के लिये में रुक्मी को वह कन्या अत्यन्त रूप-लावण्यमयी तथा शुभाङ्गी नाम से प्रसिद्ध में प्रद्युम्न का शुभाङ्गी पर और शुभाङ्गी का मन प्रद्युम्न पर आसक्त था । जिस समय स्वयंवर सभा म सभी राजा और राजकुमार उपस्थित थे. प्रकार राजकुमारी शुभागी भी अत्यन्त सौन्दर्यमयी तथा रूप, और गुण अनुराग था ॥६७॥ वृत्ते स्वयवरे जग्मू राजान. स्वपुराणि ते । उपादाय च वैदर्भी प्रद्य म्नो द्वारका ययो ।। रेमे सह तया वीरो दमयन्त्या नलो यथा । स तस्या जनयामास देवगर्मोपम सुनम् ।। अनिरुदमिति ख्यात कर्मणाऽप्रतिम भुपि । घर्वेदे च वेदे च नीतिशास्त्रे च पारगम् ।।१० बमवत्म यदा राजन्ननिरखो पयोऽन्वित. । तदास्य रविमण. पौत्री श्रीमती रुखमसन्निभाम् । पल्य परयामास नाम्ना रामरतीति सा ॥११ मी-वध वृतान्त ] [ ४१५ अनिरुद्ध गुणतु वृत्तबुदिपस्ततः । प्रीत्या हि रोक्मिणेयस्य रुक्मिण्याश्चाप्युपग्रहाद ।।१२ विसर्द्धन्नपि कृष्णेन वैरत्यज्य महायशाः । ददामीत्यब्रवीद्राजा प्रोतिमाजनमेजय ॥१३ केशवः सह रुक्मिण्या पुन: सकपंगेन च । अन्यैश्च दृष्णिभिः साद विदन्सिवलो ययौ ।।१४ जब स्वयवर का मं पूर्ण हो गया, तब सब राजा और राजकुमार बपने. पने घरो को गये तथा प्रद्य म्न भी रुक्मी-नुता शुभागो को साथ लेकर द्वारका हुंचे ॥८॥ वहाँ नल-दमयती के विहार के समान प्रद्युम्न और मुभागी विहार रने लगे ॥९कुक काल चतोड होने पर शुभागो के गर्न से अत्यन्त सुन्दर और पराक्रमी जनिरद्ध नामक एक पुत्र हुआ, वह वृद्धि को प्राप्त होता हुआ नुविद्या, वेद विद्या और नीति शास्त्र का भी उलट विद्वान हो गया ॥१०॥ त्रिी राजा रक्मो के एक अत्यन्त सुन्दरी पौती रुक्मवती हुई, जब वह वयस्क हो गई, तब श्रीकृष्ण ने पन पौत्र अनिरुद्ध के लिये उन कन्या को कमी ३ मांगा, परन्तु स्क्मी का उनके प्रति वर-भाव होने के कारण वह सहमत न था। को भी प्रद्युम्न के उद्योग और रुक्मिणी के आग्रह से तथा अनिरुद्ध को गुणवान देख कर रुक्मी अपनी पौत्री देने को तैयार हो गया ॥११-१३।। तब श्रीकृष्ण अपने भ्राता बलराम, अपने पुनो और वृष्णियो तया सेनाओं के सहित रुक्मिणी को भी साथ लेकर विदर्भ नगर में जा पहुंचे ॥१४॥ सयुक्ता ज्ञातयश्चव रुक्मिण. सुहृदश्च ये। आहूता रुक्मिणा तेऽपि तनाजग्मुर्नराधिपाः ।।१५ शुभे तियों महाराज नझने चाभिपूजिते । विवाहः सोऽनिरुद्धस्य वभूव परमोत्सवः ।।१६ पाणी गृहीते वैदास्वनिरद्धन तन वै। वैदर्भयादवाना च वभूव परमोत्सव. ॥१७ रेमिरे वृष्णयस्तत्र पूज्यमाना क्यामराः । अधाश्मकानामधिपो वेणुदारिरुदारधीः ।।१८ لا श्री हरियशपुरा सस्कार सम्पन्न अक्षः श्रुतर्वा चाणूर: क्राथश्चवांशुमानपि । जयत्सेन. कलिङ्गानामधिपश्च महाबलः ।।१६ पाण्ड्याश्च नृपति. श्रीमानृपीकाधिपतिस्तथा । एते समय राजानो दाक्षिणात्या महद्ध यः ॥२० अभिगम्याव वन्सर्वे रुक्मिण रहसि प्रभुम् । भवानक्षेपु कुशलो वय चापि रिरसवः । प्रिया तश्च रामोऽसावक्षेप्वनिपुणोऽपि च ॥२१ इधर रुक्मी के निमश्रण पर उसके जाति-वधु तथा अन्यान्य राजागण भी उस उत्सव मे सम्मिलित होने के लिये वहाँ आये ॥१५॥ फिर शुभ तिथि, नक्षत्र एव लग्न मे अत्यन्त आनन्दपूर्वक खमी की पौत्री और अनिरुद्ध का विवाह- गया ॥१६॥ इस प्रकार अनिरुद्ध और रुक्मवती का विवाह हो। जाने पर विदर्भ वासियो और यादवो को अत्यन्त हर्ष हुआ ॥१७॥ यादवग कन्यापक्ष की ओर से देवताओ के समान सत्कारित एव पूजित होकर अत्यन्त आनन्द मे भर गये । इसी अवसर पर राज वेणुदार, श्रुतर्वा, चाणूर, अशुमान, जयत्सेन, पाण्ड्य और ऋषीकाधिपति आदि सब राजाओ ने परस्पर मे मन्त्रणा करके कमी के पास जाकर कहा-हे राजन् । आप धूत खेलना चाहते हैं, बलराम जी भी इसे बहुत पसद करते है, परन्तु वे धूत- क्रीड़ा में निपुण नही हैं ॥१८-२१॥ ते भवन्त पुरस्कृत्य जेतुमिच्छाम त वयम् । इत्युक्तो रोचयामास रुक्मी चूत महारथः ॥२२ ते शुभां काञ्चनस्तम्भा कुसुमैर्भूषिताजिराम् । सभामाविविशुहूं टाः सिक्ता चन्दनवारिणा ॥२३ ता प्रविश्य ततः सर्वे शुभ्रस्रगनुलेपनाः । सौवणेप्वासनेप्वासाचकिरे विजिगीपवः ।।२४ आहुतो बलदेवस्नु कितवैपक्षकोविदः । वाढमित्यावीद्धष्ट सह दीव्याम पण्यताम् ।।२५. द्युत-विद्या-विशारद हैं, हम स्वमी-वध वृतान्त ] . निकृत्या विजिगीपन्तो दाक्षिणात्या नराधिपाः । मणिमुक्ताः सुवणं च तवानिन्युः सहन्नशः ॥२६ तत प्रावर्तत द्यूत तेपा रतिविनाशनम् । कलहस्यास्पद घोरं दुर्मतीना क्षयावहम् ॥२७ निष्काणा च सहस्राणि सुवर्णस्य दशादित. । रुक्मिणा सह सपाते वलदेवो ग्लह ददौ ॥२८ इसीलिये हम उन्हें यू त-क्रीडा म आपकी सहायता से जीतना चाहते हैं । उन राजाओं की बात नुन कर महारथी लमी ने जुआ खेलना स्वीकार कर लिया ।।२२।। तब वे सब राजा शुभ्र मालाएं और चन्दनादि से असरत होकर स्वर्णमय स्तम्मो से विभूपित, पुष्पमालाओ से सुसज्जित और चदन के जल से सिंचित सभा- भवन में गये और विजय की इच्छा करत हुए प्रसन्न चित्त से स्वर्णमय बासनो जाकर बैठ गये ।।२२-२४। इसके पश्चात् बलराम जी को छूत-क्रीडा के * यामत्रित किया गया । तव वलराम ने उस सभा में पहुंच कर कहा कि मैं मापके साय चूत-क्रीडा करन के लिये तैयार हूं ॥२५॥ रुक्मीपक्ष के दक्षिणात्य राजाओं ने बलराम जी को परास्त करने के विचार से सहन सख्यक मणि, मुक्ता और स्वरणं-मुद्रायें मंगवा कर वहाँ रख ली ॥२६॥ इसके पश्चात् प्रीति-भग का बल, कलह का भवन और मूसों का सर्वम्ब दिनासक चुन कर्म प्रारम्न हुआ ॥२०॥ सर्वप्रथम रुक्मी और बलराम में क्रीडा प्रारम्भ हुई, उस समय बलरामजी सहन निष्क और सहस्र स्वर्ण-मुद्राएं दांव पर लगाई ॥२८॥ त जिगाय ततो रुक्मी यतमान महावलम् । तावदेवापर भूयो वलदेव जिगाय स. ॥२६ असकृज्जीयमानस्तु रुक्मिणा केशवाग्रज । सुवर्णकोटोर्जग्राह ग्लह तस्य महात्मन ||३० जितमित्येव हृटोऽय तमाह्वतिरभाषत । श्लाघ्यमानश्च चिक्षेप प्रहसन्मुसलायुधम् ॥३१ अविद्यो दुर्वन थीमान्हिरण्यममिन मया । अजेयो वलदेवोऽधमक्षा ते पराजित ||३२
४२.]
[ श्री हरिवंशपुराण
खङ्गमुद्यम्य तान्सर्वांनासयामास पार्थिवान् ।
स्तम्भ समाया सौवर्णमुत्पाटय वलिना वर. ॥४८
गजेन्द्र इव त स्तम्भ कपंन्सफर्पणस्तत ।
निर्जगाम सभाद्वारालासयामास कैशिकान् ।।४६
रुक्मिण निकृतिप्रज्ञ स हत्वा यादवपंम ।
वित्रास्य विद्विष सर्वान्सिह क्षुद्रमृगानिव ॥५०
जगाम शिविर राम स्वयमेव जनवृत ।
न्यवेदयत्स कृष्णाय तत्र सर्व यथाऽभवत् ।।५१
आकाशवाणी कहती रही-यद्यपि यह चुप हैं, फिर भी जीत इनकी हुई
है, इसलिये दाँव की सभी स्वर्ण मुद्राओ पर इनका अधिकार है । सभी उपस्थित
जन जानते हैं कि जीत इनकी ही हुई है, परन्तु सत्य बात कोई नही कहता, यह
कितना अन्याय है ॥४४॥ आकाशवाणी को यथार्थ बातें सुन कर बलराम जी
क्रोध से भभक उठे और उन्होने एक स्वर्णमय तथा अत्यन्त भारी अटपार
उठा कर उस कर, कपटी रुक्मी को मार डाला।।४५-४६॥ और उसी क्रोधावेश
में उन्होंने कलिंगराज जयसेन के दांत तोड दिये तथा सिंह के समान भयकर
गर्जना की ॥४७॥ और हाथ मे खड्ग लेकर उन्होने सब उपस्थित राजाओ को
भयभीत कर सभा के स्वण स्तभ को उखाड कर मत्त हाथी के समान उसे खीचने
लगे तब कैशिक देशीय वीरो म हाहाकार मच गया ।। ४८-४६ ।। हे राजन्
जैसे सिंह से क्षुद्र मृग भयभीत हो जाते हैं, वैसे ही बलराम जी द्वारा रुक्मी का
वष होने से राजागण भयभीत हो गये और बलराम जी अपने शिविर को लौट
भाये तथा उन्होने श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना दिया ॥५०-५१॥
नोवाच स तदा कृष्ण किंचिद्राम महाद्य ति ।
निगृह्य च तदात्मान कृच्छादण्यवर्तयत् ॥५२
न हतो वासुदेवेन य पूर्व परवीरहा ।
ज्येष्टी प्राताऽथ रुक्मिण्या रुक्मिणीस्नेहकारणात् ॥५३
स रामकरमुक्तेन निहतो द्यूतमण्डले।
अष्टापदेन हलवानाजा वचधरोपम ॥५४
।
पारिजात-हरण कया ]
[ ४२१
तस्मिन्हते महावीर्ये नृपती भीष्मकात्मजे ।
द्रुममार्गवतुल्ये वै द्रुमभार्गवशिक्षिते ॥५५
कृतोच युद्धकुशले नित्ययाजिनिपातिते ।
वृष्णयश्चान्धकाश्चंव सर्वे विमनसोऽभवन् ॥५६
रुक्मिणी च महाभागा विलपन्त्यातया गिरा।
विलपन्ती तथा दृष्ट्वा सान्त्वयामाम केशवः ।।५७
एतत्ते सर्वमाख्यात रुक्मिणो निधन यथा ।
वरस्य च समुत्थान वृष्णिभिर्भरतर्षभ ॥५८
वृष्णयोऽपि महाराज धनान्यादाय सर्वश ।
रामकृष्णो समाथित्य ययुरिवती प्रति ॥५६
यह सुन कर भगवान् कृष्ण चुप ही रह जाये तथा अत्यन्त कठिनता ने
अपने आँसुओ को रोक सके ।।५२।। वे सोचने लगे कि जिस रुक्मी को मैंने
रामपी के परम स्नेह वश नहीं मारा, उसे द्यूत-क्रीडा के अवसर पर बलराम
जी ने यष्टपाद प्रहार द्वारा मार डाला ॥५३-५४॥ ह राजन् | उस समय, उस
अत्यन्त पराक्रमी, युद्ध विशारद, नित्य, यज्ञशाली भीष्मक पुत्र रुक्मी का वध होन
में वृष्णियों और अघको को अत्यन्त दुम्ब हुआ ॥५५ ५६॥ वैशम्पायन जी बोले-
हे राजन् रुक्मी की मृत्यु का समाचार सुन कर महाभाग्यवती रुक्मिणी मार्स
स्वर में रोने लगी, उन्हे भगवान् श्रीकृष्ण ने सान्त्वना देवर शान्त किया ।।५७॥
इस प्रकार यह रकमी और यादवो क वर तथा रुक्मी के मरण का वृत्तान्त मैंन
तुम्हें सुनाया है ॥५८। इसके पश्चात् कृष्ण बलराम दोनो भाई यहां स प्रचुर
रन लेकर द्वारावती को चल दिए ||५||
।। पारिजात-हरण कथा ॥
प्रादुर्भाव मुनिथेष्ठ माथुरे चरित शुमम् ।
शृण्पन्न वाधिगच्छामि तृप्ति कृष्णस्य धीमत ॥१
द्वारकाया निवसत. कृतदारस्य पद्गुणम् ।
चरित बहि कृष्णस्य सवं हि विदित तव ॥२
४२२ ]
[ श्री हरिवनपुरार
जनमेजय कृष्णस्य कतदारस्य भारत।
निवोध चरित चिन तस्यैव सदृश प्रभो ॥३
प्राप्तदारो महातेजा वासुदेव प्रतापवान् ।
रुक्मिण्या सहितो देव्या ययौ रैवतक ना ।।४
उपवासो वसान हि रुक्मिण्याः प्रतिपूजयन् ।
तर्पयिष्यन्स्वयं विप्राञ्जगाम मधुसूदनः ॥५
कुमाराः प्रययुस्तन पुत्रभ्रातर एव च ।
प्रेपिता वासुदेवेन नारदस्याभ्यनुज्ञया ॥६
षोडश स्त्रीसहस्राणि जग्मुरेव च धीमत.।
ऋद्धया परमया राजन्विष्णोरेवोनुरूपया ॥७
जनमेजय ने कहा-हे मुनियर ! अत्यन्त मेधावी श्रीकृष्ण के मथुरा
लीलावृत्तो को सुन कर ही सन्तोप नही है, इसलिए आप कृपया उनके विर
के पश्चात् द्वारका मे हुई लीलाओ को विस्तारपूर्वक मुझे सुनाइये क्योंकि ।
पूर्ण वृतान्त के ज्ञाता हैं ॥१-२॥ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् । विवा
परान्त उन्होंने जो कार्य किये, वह सब तुम्हारे प्रति कहता हूँ, श्रवण करो।'
अत्यन्त प्रतापी श्रीकृष्ण, विवाह के पश्चात् रुविमणी जी को साथ लेकर रेष
पर्वत पर पधारे। उस समय रक्मिणो भी अपने उपवास के परायण
उपलक्ष्य में ब्राह्मणो को तृप्ति के लिये उस पर्वत पर गयी थी। नारद जी
कहने से श्रीगण ने अपने भाइयो और पुत्रो को पहिले ही उस स्थान पर
दिया था तथा उनकी अन्यान्य सोलह हमार रानियां भी वहां पहुंच पुको
॥५-७॥
ततस्तम द्विजातीना फामान्प्रादादधोक्षजः ।
अर्थिना धर्मनित्याना वन्दितामिष्टवादिनाम् ।।
कल्याणनामगोसाणां महता पुण्यकर्मणाम् ।
योन: श्रोतश्च माश्च गुढाना कुरुनन्दन ।
तयित्वा द्विजामामरिष्टोरियः सता गतिः ।
मातीन्सतपंथामारा यथाहं भयतवत्सलः ।।१०
। पारिजात हरण कथा ] '[ ४२३ उपवासावसानेऽय भगवान्स विशेषत: । वहु मेने प्रिया भार्यां रुक्मिणी भीष्मकात्मजाम् ।।११ वसतस्तस्य कृष्णस्य सदारस्यामितौजसः । सहासीनस्य रुक्मिण्या नारदोऽभ्याययो मुनिः ।।१२ थागत चाप्रमेयात्मा मुनिमिन्द्रानुजस्तदा। शास्त्रदृष्टेन विधिना अचंयामास केशवः ॥१३ सोऽचितो वासुदेवेन मुनिरर्च्यतमः सताम् । पारिजाततरोः पुष्प ददी कृष्णाय भारत ॥१४ वहाँ जाकर उन्होंने पारण के दिन श्रेष्ठ वशोत्पन्न, विद्वान्, । प्रधान, धर्म मे रत, स्तुति परायण, लोकहित में लगे हुए, धनंचमुक म को उनकी इच्छा के अनुसार धन प्रदान किया, इसके पश्चात् जाति-व जन से भले प्रकार तृप्त किया ॥८-१०॥ इस प्रकार मीप्मक सुता रुवि उपवास का पारण विधान सम्पन्न हो जाने पर श्रीकृष्ण ने अपनी । गहना को ॥११॥ हे राजन् ! फिर जब श्रीकृष्ण रुक्मिणी जी के साथ सुख- क जीवनयापन कर रहे थे, तब एक दिन देवर्षि नारद जी उनके पास पहुंचे १२।। भगवान् वासुदेव ने उनका विधिपूर्वक पूजन किया और उसके पश्चात् रद जी ने भगवान् के हाथ पर पारिजात का एक पुष्प रख दिया ।।१३-१॥ तवृक्षराजकुसुमं रुक्मिण्य प्रददी हरिः। पार्श्वस्था सा हि कृष्णस्य भोज्या नरवराभवत् ।।१५ प्रतिगृह्य तु तत्पुष्पं कामारगिरनिन्दिता। शिरस्यमलपत्राक्षी ददौ कृष्णेङ्गितानुगा।।१६ त्रैलोक्यरूपसर्वस्वं नारायणमनोहरा । शुशुभे देवपुष्पेण द्विगुण भष्मकी तदा ।।१७ ता नारदस्तथोवाच मुनि ह्मसुतस्तदा। तवैवोपथिक पुष्पमेकौं देवि पतिव्रते ॥१८ वलंकृत पुष्पमेतत्समर्गात्तव सर्वथा। अत्यहाँ च मतां मे त्वमेतत्पुष्पाद्धृतव्रते ॥१६ व ४२४ [ श्री हरिवंशपुराण कल्याणगुणसंपन्ने सततं भर्तृवत्सले । अम्लानमेतत्सतत पुष भवति कामिनि ॥२० सवत्सरपर काल कालज्ञ गुणसमते । ईप्सितानपि गन्धाश्च ददाति वदतां वरे ॥२१ वह पुष्प उन्होने रुक्मिणी जी को दे दिया, जिन्होंने उसे लेकर और का सकेत प्राप्त कर अपने जूडे मे लगा लिया । उस पुष्पक के धारण करते ही भगवान् वासुदेव की परम प्रियतमा भार्या रुक्मिणी जी की शोभा बहुत बढ गयी, क्योकि वह पुष्प भी सम्पूर्ण त्रैलोक्य के सौन्दर्य का आश्रय स्वरूप था ॥१५-१७॥ इसी अवसर पर देवर्षि नारद जी से कहा-हे पतिव्रते ! यह पुष्प आपके ही अनुरूप है, क्योकि आपको समीपता को प्राप्त हुआ यह पुष्प अव पहले से भी अधिक सुन्दर हो गया है, यह कभी भी कुम्हलायेगा नही तथा इसकी सुगन्धि भी पूरे एक वर्ष तक यथावत् बनी रहेगी, उसमे कुछ न्यूनता नहीं आवेगी ॥१८-२१॥ शीतोष्णे चेच्छिते देवि पुष्पमेतत्प्रयच्छति । स्रवत्यपि रसान्देवि मनसा काक्षितान्वरान् ॥२२ सेव्यमानच सौभाग्य ददाति वरवणिनि । स्रवत्यपि तथा गन्धानीप्सितान्प्रोतिवर्द्धनान् ॥२३ यानि यानि च पुष्पाणि त्व देव्यभिलपिष्यसि । कुसुमं वृक्षराजस्य तानि तानि प्रदास्यति ॥२४ एतदेव भगाधान धर्मिष्ठे पुनद तया । मतिं च नाशुभेधत्ते धार्यमाण सदा शुभे ॥२५ यद्यदिच्छसि वणं च तत्सर्व धारयिष्यति । स्वल्प वा यदि वा स्यूलं छन्दतस्ते भविष्यति ॥२६ अनिष्टगन्धहरण तत्समं गन्धवर्द्धनम् । प्रदीपकर्म रानी च करोति कमलेक्षणे ॥२७ सतानकलजो माला पुष्पवस्तादि वाऽच्युतम् । ji पमुम्यानि चिन्तितेन प्रदास्यति ॥२८ पारिजात-हरण कया ] [ ४२५ वुभुक्षा वा पिपासा वा ग्लानिर्वाऽप्यय वा जरा। देववद्धारयन्यास्ते स्वच्छन्देन भविष्यति ॥ जब आप इससे शीतलता चाहेंगी तव यह शीतलता प्रदान करेगा और ना चाहने पर उप्णता देगा तथा पूजन द्वारा सन्तुष्ट होने पर आपको इच्छित सी दे सकेगा ।।२२।। हे वरवणिनि ! इसकी सेवा करने से यह सौभाग्य प्रदान करने में समर्थ है, यह मन को प्रसन्न करने वाली सौरभ सदा देता है, इसके द्वारा अन्यान्य पुप्पो में जिस पुप्प की भी आपको इच्छा होगी, वही पुष्प प्राप्त हो जायगा ॥२३-२४॥ यह ऐश्वयों का ऐश्वर्य और धार्मिको के लिये साक्षात् धर्म है, इसके धारण क्येि रहने पर मन में कभी कोई अशुभ भाव उत्पन्न नहीं होगा ॥२५॥ बाप जब जिस वर्ण को देखने की इच्या करेंगी, उस समय वही वणं आपको दिखायी पडेगा। इसके धारण से स्यूल या मूक्ष्म कैसा की स्वरूप धारण किया जा सकता है ॥२६॥ यह सदैव सुगन्धि देता रहता है, इसके स रहते हुए दुर्गंध का नाम भी नहीं रहता तथा इसके सामने दीपक की बावश्यकता नहीं रहती, क्योंकि यह रात्रि के समय सदा प्रकाशमान रहता है ॥२७॥ यह पुष्प याचना करने पर सततिवृक्ष की माला, स्वच्छ पुष्प वस्त्र तथा पुष्प मडा भी प्राप्त कराता है ॥२८॥ इसके साथ र,ने पर भूख, प्यास, वृद्धा- स्थायौर ग्लानि से उत्सन्न कोई भी कष्ट पास नही फटकता, आप इसे धारण करके मदैव स्वच्छन्द एव आनन्दित रहेगी ॥२६॥ अद्याहमवगच्चमि सर्वथा सर्वशोभने । मात्मा द्वितीयः कृष्णस्य भोजे त्वमिति भासिनि ॥३. प्रैलोक्यरत्नसर्वस्वमददाद्यत्तवाच्युतः। जीवितातिशयस्तेन त्वया प्राप्तो हरिप्रिये ॥३१ नारदेनैवमुक्तं तु तथ्य वाक्यं नराधिपः । ततस्थाः शुश्र वु: प्रेप्याः प्रेपिताः सत्यभामया ॥३२ देवोंनां च तथाऽन्वासा पलीना च विशांपते । दृष्ट्वा ताः सविशेपं च नारदेनाभ्युदाहृतम् ॥३३ [ थी हरिवंशपुराण तच्च श्रुत्वा सुनिखिलं प्रेष्यामि. स्त्रीस्वभावतः । प्रकाशीकृतमेवासीद्विष्णोरन्त.पुरे तदा ॥३४ कर्णाकर्णि ततो देव्यः कोलीनमिव सघश.। मन्त्रयाचक्रिरे हृा रुक्मिण्यतिगुणोदयम् ।।३५ अर्हेति पुत्रमातेति ज्येष्ठेति च समागता. । प्रायेण प्रवदन्ति स्म हृष्टा दामोदर स्त्रियः ॥३६ हे सर्वशोभने । इस समय ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान श्रीकृष्ण को प्राणस्वरूपी बाप ही हैं। आज जब उन्होन आपको यह तीनो लोको के रलस्वरूप पुष्प भेंट कर दिया है, तब इममे सदेह नहीं है कि इन्होंने अपने प्राण से भी अधिक प्रिय वस्तु आपको प्रदान कर डाली है ॥३०० ३१॥ हे राजन् ! जब देव नारद इन वचनो से रुक्मिणी जी की प्रशसा कर रहे थे, उस समय वहाँ श्रीकृष्ण को रानी सत्यभामा तथा अन्याय रानियो को परिचारिकायें भी उपस्थित थी और उन सभी ने नारद जी के वह मुने थे, जो उ होने रुक्मिणी जी की प्रासा में वहे थे। ३२-३३।। उन परिचारि- काओ न बन्त पुर में पहुंच कर वह सभी बातें सब रानियो से कह दो ॥३४॥ उब सब रानियां क्मिणी जी के सौभाग्य की बात सुन कर प्रसन्नतापूर्वr बातें करती हुई कहने लगी-रुक्मिणी जी को भाग्यवती होना ही चाहिये। वे हमसर में यही तथा पुत्रवतो भी हैं, ये उस सौभाग्य प्राप्ति की उपपुरस अधिकारियो हैं ॥३५.१६॥ मषे न सपल्यास्तु तत्सौभाग्य गुणोदयम् । सत्यमामा प्रिया नित्य विष्णोरतुलतेजस. ।।३७ हार्यावनमान्ना स्वसौभाग्येन गर्विता। अभिमानयतो देवीथ ववेक्षिा गता ॥३८ समुत्गृजन्ती वमन सकु कुम शुचिस्मिता मुक्लतमंगमंशु राम्। जग्राह रोपाालितेन पेतमा वहस्तदा थीरिव पद्धितेन्धना ददायमाता ज्वलनेन गवंता दप्यांसमुत्येन गतप्रमेय । मोधान्विता को गहं विविक्त विश तारेय पन रातोयम् ॥४ ॥
रिजात-हरण क्या ] [ ४२७ । यद वा ललाटे हिमचन्द्रशुक्लं दुकूलपट प्रियरोपचिह्नम् । पर्यन्तदेश सरसेन देवी विलिप्य सा लोहितचन्दनेन ॥४१ संस्मृत्य संस्मृत्य शिरः सरोपंप्रकम्पमाना समुपोपविष्टा । दीर्घोपधान शयनेऽपनीय विभूषणान्येव निबद्धवेणी ॥४२ परन्तु म यौवन से युक्त और अपने सौभाग्य से गविता रानी सत्य- भामा को वह वा अच्छी न लगी, क्योकि वह भगवान् वासुदेव की सब से यधिक प्रियतमा भार्या थी, इसलिये उन्हें अत्यन्त अभिमान था । परिचारिकारी की बातें सुन कर सत्यनामा को रुक्मिणी ने ईप्या होने लगी ॥३७-३८॥ जिस प्रकार आहुति प्राप्त करके अग्नि की प्राप्ति में वृद्धि हो जाती है, उसी प्रकार राना सत्यमामा की कोराग्नि नमक उठी। उन्होंने कुदुमी रग की साड़ी उतार कर दवेत वस्त्र धारण कर लिये और जैसे तारिका जल युक्त मेघ मे दिख जाती है, वैसे ही यह कोप-भवन में जा रिपी, ईयाग्नि मे दग्ध होने क कारण उनके देह की कान्ति भी म्लान हो गई ॥३६-४०|| अपना क्रोध प्रदर्शित करने के लिये उन्होंने अपने मस्तक पर सफेद वस्त्र वाघ कर तम पर लाल चन्दन लगा लिया तथा शय्या पर बैठ कर देश खोल कर फंसा दिये और बानूपण उतार कर फेंक दिये । बपनी सौत के सोनाग्य को याद कर-करके उनका मस्तक प्रोय से कम्पित होने लगा ॥४१.०२।। उपविष्ट मुनि ज्ञात्वा रुक्मिया सह केशव । निश्चकामाप्रमेयात्मा व्यपदेशेन सर्ववित्॥४३ जगाम त्वरितश्चैव सत्यभामागृहं महत् । रम्ये रैवतकोद्देशे निर्मित विश्वकर्मणा ।।४४ अभिमानवतीमिष्टा प्राणरपि गरीयसीम् । जानन्साताजिती विष्णुविवेश शनकरिव ॥४५ रुपितामिव ता देवी स्नेहात्संकल्पयन्निव । भीततीतः स शनकविवेश मधुसूदनः ॥४५ सेवकं द्वारदेशे तु तिष्ठेत्यक्त्वा विवेश ह. नारदस्योपचारार्थ प्रद्युम्न विनियुज्य सः ॥४७
४२८ ]
[ श्री हरिवशपुराए
स ददर्श प्रिया दूरानोधागारगता तदा ।
प्रेष्यामिव स्यिता कोपान्नि श्वसन्ती मुहुर्मुहु ॥४८
करजाग्रावलीढ तु पङ्कज मुखपङ्कजे ।
सश्लेपयित्वा नि श्वस्य विहसन्ती पुन पुन ||४६
वंशम्पायन जी ने कहा- हे राजन् । जव देवपि नारद और रुक्मिणी
जी के मध्य वार्तालाप हो रहा था तव वहां की सेवा का भार प्रद्युम्न पर छोड
कर भगवान् श्रीकृष्ण वहा से चल दिये । फिर उन्होन सत्राजित-पुत्री सत्यभामा
के क्रोष का समाचार सुना और तुरन्त ही विश्वकर्मा रचित अत्यन्त रमणीय
सत्यभामा के भवन में जा पहुंचे ॥४३.४४।। सारथी को द्वार पर खडे रहने का
आदेश देकर अपनी प्रियतमा सत्यभामा के क्रोध की बात को स्मरण करते हुए
सशा भाव से वह उनके भवन मे घुसे । वहाँ जाकर उन्होने देखा कि परिचारि
पाओ से घिरी हुई सत्यनामा कोप भान म स्थित दुई दोष श्वांसें ले रही हैं ।
कभी कभी अपने नाखूनो द्वारा नीचे गये कमल पटा को अपने मुखारविन्द पर
धीर पोरे घुमाती और कभी-कभी विक्षिप्त के समान ठा पर हमती है
॥४५-४६॥
॥ भगवान् का सत्यभामा को आश्वासन ।
नारायण सत्यभामा पुनरेवैप भारत ।
प्रोवाच प्रणयात्क्रानिमानवती सतीम् ।।
दहतीव ममाङ्गानि शोक कमललोचने ।
किमु तत्कारण येन त्वमेवमतिविनया । २
शापिताऽसि मम प्राणराचक्ष्वानत्ययो यदि ।
धातव्य यदि भक्तेन भसर्वाङ्गशामने ॥३
तव प्रोपराच भर्तार सत्या सत्याते स्थितम् ।
वाजगद्गदया वाचा तयवायोमुग्रीस्थिता ॥४
त्वयव स्थापित पूर्व सौभाग्य मम मानद ।
नगरपालपत्राक्ष यस्यात रेशिनाशन ॥५
भगवान् का सत्यभामा को आश्वासन ] [ ४२६ शिरो वहामि चेष्टत्वात्तवाहं देव गविता। सर्वसीमन्तिनीमध्ये स्पृहणीयाऽस्मि सर्वथा ॥६. वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् ! उस प्रणय-कोप से कुपित हुई मान- ती सत्यभामा से भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा ॥१॥ भगवान् बोले-हे कमललोचने ! अम्हारे दु.ख को देख कर मेरा देह दग्ध हो रहा है, यदि तुम्हारे कोप की बात मेरे सुनने के योग्य हो और तुम्हें उसके कहने मे कोई वाधा न हो तो तुम्हें मेरे प्राण की शपथ है, उसे मुझे अवश्य बताओ ।।१-३॥ यह सुन कर पूर्ववत् मुख को नीचा किये और अथ वहाते हुए सत्यभामा ने कहा-आपने स्वयं ही अप मुख से मेरे सौभाग्य को श्रेष्ठ बताया था, इसीलिये सव समार मुझे परम गौभाग्यवती मानता है ।।४-५शा में आपकी सर्वाधिक प्रियतमा हूँ, यही सोच कर पने सौभाग्य-पर्व का भार मस्तक पर वहन कर रही हूं और इसीलिये मेरा त्यधिक बादर होता है ।।६।। साऽहमद्यावहास्यामि सपलीनां जनस्य च । इति प्रेष्याभिराख्यातं श्रुत्वा तथ्य ततस्ततः ।।७ यत्पारिजातकुसुम दत्तवान्नारदस्तव । तत्किलेप्टजने दत्त त्वयाऽहं परिवजिता (१८ रत्नातिशयदाने नतस्यामभ्यधिक; किल । स्नेहश्च बहुमानश्च प्रकाश गमतस्त्वया ।। तामस्तोपीत्समक्ष ते प्रिया स फिल नारदः । तमश्रौपीश्च हृष्टस्त्व प्रियायाः सस्तव किल ।।१ स्तोतव्यो यदि तावत्स नारदेन तवाग्रतः। दुर्भगोऽयं जनस्तत्र किमर्थमनुशब्दितः ॥११ प्रणयस्य रस दत्त्वा पश्चात्तापः प्रभो यदि। अनुज्ञां मे प्रयच्छस्य तपः कतुं प्रसीद मे ॥१२ स्वप्नेनापि न दृष्ट्वाऽहं श्रद्दध्या पुष्करेक्षण । यदन्यदेव निवृत्तमीप पश्यतस्तव ॥१३
४३० ]
[ श्री हरिवशपुराण
कामं कामोऽस्तु तस्यैव मुनेरतुलतेजसः ।
अत्र मन्युस्तु मे देव सानिध्य तव तन यत् ।।१४
परन्तु आज मैं अपनी अन्यान्य सौतो और जन-साधारण के लिये उपहास
के योग्य बन गयी हूं। मुझे दासियो से ज्ञात हुआ है कि नारद जी ने आपको
पारिजात का एक पुष्प दिया था, वह पुष्प रत्न आपने मुझे त्याग कर अपनी
प्रिय भार्या रुक्मिणी को प्रदान कर दिया, इससे मैं समझती हूं कि आपका यल
अथवा स्नेह अधिक से अधिक रुक्मिणी पर ही है ॥७-६।। देवर्षि नारद जी ने
रुक्मिणी की प्रशसा आपके ही सामने की और आप उसे प्रसन्न हो-हो कर सुनते
रहे, इस वृत्तान्त से बढ कर और कौन-सी बात मेरे लिये दुर्भाग्य सूचक हो
सकती है ।।१०-११॥ पहिले प्रणय-रस से अभिषिक्त करना और फिर सन्तप्त
करना ही यदि आप ठीक समझते हैं तो आप अब मुझे तप करने की आज्ञा
दीजिये ।।१२।। मैं तो स्वप्न मे भी कभी अपने से अधिक किसी अन्य को आपकी
प्रेमपानी नहीं समझती थी, नारद जी ने ही हक्मिणी की सराहना की होती तो
उससे मुझे क्षोभ नहीं होता, परन्तु आपके उपस्थित रहते हुए ऐसा होने से मुझे
अत्यन्त दुःख होता है ॥१३-१४।।
सानाजिति प्रिया नान्या त्वत्तो मेऽस्तीति विद्धि माम्
यदवोच का तद्यातमथ वा कः स्मरिष्यति ॥१५
यदद्राक्षीदि मा श्वथ बहुमानेन नन्दिनी।
अवज्ञाता त्वया राज्ञी नून दीर्भाग्यकशिताम् ।।१६
कि नु गूटेन मे प्रेम्णा सुस्निग्धेनापि मानद ।
यत्समाना जनर्देवो मा न पश्यति नित्यदा ॥१७
नाह त्वा कितव धूर्तमज्ञासिपमरिंदम ।
अध ज्ञातोऽसि तत्लक्षचञ्चलो जनवञ्चकः ॥१८
स्मरवणेगिताकारनिगूढो देव यत्नतः।
चोर ज्ञातोऽसि तत्पक्षवाङ्माणमधुरः शठः ।।१३
एवमीविश प्राप्ता देवी सासाजिती हरिः ।
अभिमानवती देवः सान्त्वपूर्वमथाब्रवीत ॥२०
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भगवान् का सत्यभामा को आश्वासन ] [ ४३१ मैव पद्मालाशाक्षि प्राणेश्वरि वद प्रिये। किमत्र वहुनोक्तेन त्वदीयमवगच्छ माम् ।।२१ आप तो कहा करते थे कि हे सत्राजित सुते ! विर में तुम्हारे अतिरिक्त मन्य कोई भी मेरे लिये प्रिय नहीं है । आपकी वह बातें अब कहां हैं ? अथवा जब मेरी मृत्यु हो जायगी, तब उन बातो की आपको कौन याद करायेगा? ॥१५॥ मेरी नास मुझे कितने स्नेह-भाव से देखती थीं, अब आपके द्वारा सम्मान प्राप्त न होने पर क्या वह मुझे उसी प्रकार स्नेह से देखेंगी ।।१६।। जब बापने मुझे सामान्य व्यक्ति के भो तुल्य नही माना है, तो फिर मुन्न से मधुर वातें करने और मिथ्या प्रेम प्रदर्शित करने से क्या लान है ? ॥१७॥ मैं आज तक आपको एसा कपटी और घूतं नहीं समझती थी, परन्तु अब मुझे ज्ञात हो गया है कि आप सामान्य जनवचक तथा रुक्मिणी का पक्ष लेने वाले हैं ॥१८॥ आएको स्वर, याकार अथवा भाव-भगिमा आदि के द्वारा नहीं जाना जा सकता, परन्तु गज वो थाप प्रकारान्तर से चोर, शठ और वाणी-मात्र से मधुर दिखाई दे रहे हैं ।।१६। तब सत्यभामा को अत्यन्त ईर्ष्यापररायण बोर अभिमानिनी देख भग- वान् ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा है प्रिये ! हे पद्मपत्र जैसे नेत्र वाली प्राणेश्वरी ! अपने मुख से ऐमा मत कहो, तुम मेरी सर्वस्व हो और मैं सब प्रकार से तुम्हारा ही हूँ ॥२०-२१॥ तत्पारिजातकुमुमं तस्या देवि ममाग्रतः । नारदो मत्प्रिय कुर्वन्मुनिरक्लिष्टकर्मकृत् ।।२२ दाक्षिण्यादानुरोधाच्च दत्तवान्नात्र संशयः । प्रसीदकापराधं मे मर्पयस्व शुचिस्मिते ॥२३ पारिजातकपुष्पाणि यदीच्छस्यतिकोपने। तदा दातास्मि सुप्रोणि सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥२४ स्वर्गास्पदादानयित्वा पारिजातं द्र मेश्वरम् । गृहे ते स्यापयिष्यामि यावत्कालं त्वमिच्छसि ।।२५ एवमुक्ता तु हरिणा प्रोवाच हरिवल्लभा। यद्यव स द्रम: शक्यस्त्विहानयितुमच्युत ॥२६ ४३२ ] [ श्री हरिवशपुराण मन्युरेष प्रसृष्टो हि भवेद्बहुगुणं मम । सीमन्तिनीनां सर्वासामधिका स्यामधोक्षज ॥२७ तथाऽस्तु प्रथमः कल्प इति तां मधुसूदनः । प्रोवाचाप्रतिमो देवो जगतः प्रभवाप्ययः ॥२८ तथेत्युक्तेति कृष्णेन तुतोष समिविजयः । सत्यभामा सतामिष्टा कंसनाशनवल्लभा ॥२६ नारद जी ने रुक्मिणी को पारिजात पुष्प प्रदान किया है, उसमें उनका उद्देश्य मेरा प्रिय करना मात्र था । हे मुहासिनी ! यह मेरा प्रथम अपराध है, इसे क्षमा कर देना चाहिये २२-२३॥ यदि तुम भी पारिजात पुष्प की इच्छा करती हो तो मैं तुम से यह सत्य ही कहता हूं कि मैं तुम्हें वह पुष्प अवश्य ही लाकर दूंगा ॥२४॥ स्वर्ग में स्थित उस पारिजात वृक्ष को ही मैं ले आऊंगा और तुम्हारे भवन मे ही उसे स्थापित कर दूंगा, फिर जब तक तुम पाहो, तब तक उसे अपने ही यहां रखना ॥२५॥ श्रीकृष्ण की बात से आश्वस्त होती हुई सत्य- भामा ने कहा-हे प्रभो ! यदि आप पारिजात को ही यहाँ ला देंगे तो फिर मेरा क्षोभ ही क्यो रहेगा ? इससे हमारी कामना ही पूर्ण होगी तथा मैं सभी नारियो में सर्वश्रेष्ठ कही जाकर प्रशंसा को प्राप्त हूँगो ॥२६-२७॥ हे राजन् ! ससार को मृष्टि और प्रलय के मूल कारण भगवान् कृष्ण ने 'तथास्तु' कह कर सत्यभामा को मतुष्ट किया, तब वह अत्यन्त प्रसन्न हो गई ॥२८-२६॥ ततः स्नातो जगन्नाथः सर्वेश: सर्वभावनः । चारावश्यक सर्व सर्वकामप्रदः सताम् ॥३० दध्यो च नारदं देवः स्नातो देवमुनिन् । अन्याजगाम स्नानान्ते मुनिश्रटी महोदधौ ॥३१ सभागत नरपते सतां गतिरधोक्षजः । सत्यपा सह धर्मात्मा यथाविधि अपूजयत् ।।३२ पादो प्रक्षालयांवके मनेः सामाजिती स्वयम् । जसं देवः स्वयं नमो भजारेण दो तदा ॥३३ भगवान का सत्यभामा को आश्वामन ] [ ४३३ जयोपकल्पयामास मुखासीनाय केगवः । परमान्न स मुनये प्रयतात्मा जगद्गुरुः ॥३४ तल्लोकको सत्कृत्य दत्त मुनिरुदारधीः । वुभुजे वदता श्रेष्ठः यद्वया परया युतः ।।३५ इसके पश्चात् सर्वात्मा भगवान् वासुदेव न स्नानादि कर्मों से निवृत्त होकर देवर्षि नारद का ध्यान किया और तभी वह जल मे स्नान करके भगवान् के समक्ष का सड़े हुए ॥३०-३१॥ उनके नाते ही श्रीकृष्ण और सत्यभामा ने उनका यथाविधि स्वागत और पूजन विया ॥३२॥ भगवान् झारी लेकर जल ढालने लगे और सत्यभामा उनके पाँव घोने लगी ।। ३३ ।। जब नारद जी मुखपूर्वक धैष्ठ बासन पर बैठ गये तव भगवान् ने उन्ह खीर का भोजन अपने हाथों से परोसा ।।३४॥ भगवान् द्वारा इस प्रकार सरकार को प्राप्त होत हुए वाग्मिवर एव तपोवन नारद जी अत्यन्त तृप्तिपूर्वक भोजन करने लगे ॥३५॥ उपस्पृश्य ततस्तृप्तः प्रददो चामिपः प्रभो । ताश्च प्रीतेन मनसा प्रतिजग्राह केशवः ।।३६ ततः सानाजिती देवी प्रणता नारदोऽब्रवीत् । प्रसार्य दक्षिण हस्तं सजल जलजेक्षणाम् ।।३७ ययेदानी तथैव व भव देवि पतिव्रता । सविशेप च सुभगा भव मत्तपसो वलात् ॥३८ इत्युक्ता मुनिमुन्येन सत्यभामा हरिप्रिया । उत्तस्थो महता युक्ता हर्पण तु नराधिप ।।३६ स कृष्णोऽप्यन्यनुना तु लब्ध्वा मुनिवरात्तदा । बुभुजे विघस धीमानप्रमेयपराक्रम ॥४० ततस्त्वावश्यकं कृत्वा सत्यभामाऽपि भारत । अनुज्ञया तदा भतु विवेशान्तर्गृह मुदा ।।४१ ततो विनिर्गता देवी कृष्णस्यवाभ्यनुज्ञया । स्थिता पाव च कृष्णस्य नमस्कृत्वा महात्मने ।।४२ इस प्रकार दिन भोजन से लाभ करके नारदजी ने आचमन किया और ४३४ ] [ यो हरिदशपुराण हाथ धोये । फिर हाथ मे जल ग्रहण करके भगवान को आशीर्वाद दिया, जिसे उन्होंने अदा सहित ग्रहण किया तथा सररभामा उनके समक्ष मस्तक झुकाया 1 नारदजी ने जल ग्रहण करके सत्यभामा को भी आशीर्वाद दिया ॥३६.६७ नारदजी बोले-हे देवि ! आप इस समय जैसी पति-परायणा हैं, वैसे ही भविष्य मे भी पति की प्रियतमा और पति परायणा बनी रहें, मेरे तपोबल से आपकी अधिकाधिक सौभाग्य-वृद्धि हो ॥३८॥ नारदजी के यह आशीर्वचन सुन कर सत्यभामाजी अत्यन्त आनन्दित हो उठी और तभी देवपि की आज्ञा पाकर भगवान् भी भोजन करने लगे। उनके भोजन कर लेने के पश्चात् भगवान् की अनुमति प्राप्त कर सत्यभामा भी अन्य आवश्यक कार्यों को सम्पन्न करके भोजन करने के लिये अन्दर गई ।।३६-३६-४०-४१॥ भोजन के पश्चात् सत्यभामा ने बाहर आकर नारदजी को नमस्कार किया और भगवान् की बगल में जा बैठी ॥४२॥ ततो मुहूर्तमासित्वा नारद. कृष्णमब्रवीत् । आपृच्छे त्वा गमिष्यामि शक्रलोकमधोक्षज ॥४३ तत्राद्य देवमीशान नमस्कृत्य महेश्वरम् । गास्यन्ति देवगन्धर्वास्तथैवाप्सरसा गणा.॥४४ मासि मास्युचितं ह्य तन्महेन्द्रसदने प्रभो। पूजार्थं देवदेवस्य गान्धर्व नृत्यमेव च ॥४५ अन्तहितो देवदेव सोम. सप्रवरो विभुः । पश्यत्यमरमुख्येन कृत भक्त्याऽद्रिघातिना ॥४६ निमन्त्रितोऽह पूर्वेद्य : पुष्प दत्त महाधु ते । पारिजातस्य भद्र ते तरुराज्ञो महात्मनः ।।४७ यदेतदाहृत स्वर्गात्त्वदर्थ तु मया विभो । देवोपभोग्यमेतद्धि तरुराजसमुद्भवम् ॥४८ इष्टः स वृक्षः सततं शच्याः पुष्करलोचन । सौभाग्यमावहत्येव पूज्यमानोऽपि नित्यशः ॥४E इसके पश्चात् नारदजी ने भगवान से कहा-~हे अधोक्षज!
भगमन का सत्यभामा को आश्वासन ] [ ४३५ अनुमति दें तो मैं इद्रलोक के लिये प्रस्थान करूं ॥४३॥ वहां देवता, गर्व और अप्सरागण भगवान् शिवजी को नमस्कार करके संगीत का आयोजन करेंगे ॥४४॥ भगवान् शकर के पूजनोपलक्ष्य मे देवराज इन्द्र के भवन में प्रतिन मास नृत्य-गायन का आयोजन हुआ करता है ।।४५॥ भगवान् शिवजी, और पार्वती अपने गणों के सहित अन्तहित भाव से इन्द्र द्वारा अनुष्ठित उस पूजन समारोह को देवा करते हैं ॥४६॥ मुझे कल ही सुरपति इन्द्र ने एक पारिजात पुष्प देकर निमनित किया है ॥४७॥ हे विभो ! मैं उस पुष्प को आपके लिये ही यहां लाया हूं, यह पुष्प तरुराज की सम्पत्ति और देवताओ के उपभोग करने योग्य धन है ॥४८॥ हे पद्मलोचन ! देवी इन्द्राणी उस वृक्ष का अत्यन्त आदर करती हैं, क्योकि उसका नियमित रूप से पूजन करने पर सदा सौभाग्यवृद्धि होती है ॥४६॥ पुण्यं कतु तदा सृष्टः परिजातो महाद्रुमः । आदित्या धर्मनित्येन कश्यपेन महात्मना ।।५० पुराऽदित्या महातेजास्तोपितः किल कश्यपः । वरेण च्छन्दयामास मारीचस्तपसो निधिः ॥५१ सोवाच सुभगा येन भवेय मुनिसत्तम । स्वलंकृता कामतश्च सर्व रेव विभूषणैः ॥५२ ईप्सित गीतनृत्यं च भवेन्मम तपोधन । कुमारी नित्यदा चैव भवेयं तपसो निधे ।।५३ विरजा शोकरहिता भवेयमिति नित्यदा । पतिमक्तिमती चैव धर्मशीला तथैव च ॥५४ पारिजात ततोऽस्साक्षीददित्याः प्रियकाम्यया । सर्वकामप्रदेः पुष्परावृत नित्यगन्धदः ॥५५ त्रिशाख सर्वदा दृश्य सर्वभूतमनोहरम् । सर्वपुष्पाणि दृश्यन्ते तस्मिन्नेव महाद्र मे ।।५६ अत्यन्त धार्मिक महात्मा कश्यपजी ने अदिति के पुण्यवृठ के साधन प उस पारिजात की रचना की थी ॥५०॥ प्राचीन काल मे तपोनिधि
[ हरिवशपुराण
कश्यपजी को प्रसन्न करते हुए देवमाता अदिति ने उन से निवेदन किया था-
हे प्रभो ! मैं इच्छित आभूपणो से विभूषित हो सकू, मेरी सौभाग्य लक्ष्मी
सदा वृद्धि होती रहे, मेरे इच्छा करते ही नृत्य-संगीत आदि के कार्यक्रम हो
लगें, में चिरकाल तक यौवन से सम्पन्न रहूँ, मैं सदैव धर्म परायणा और पतिद्रन
रहूं, जिससे किसी रोग, शोक आदि का मुझसे स्पर्श न हो सके, इसके लिये शी।
ही कोई उपाय करिये । ५१-५४।। अदिति के वचन सुन कर तपोषन कश्यप
अपनी भार्या की इच्छा पूर्ण करने के लिये, सब के मन का हरण करने वाले
विशाखा मुक्त पारिजात वृक्ष की रचना की और उसी महावृक्ष मे उन्होने नि
सुगध देने वाले सब प्रकार के पुष्प प्रफुल्लित होने की शक्ति भर दी ।।५५-५६
• ईदृशान्यपि पुष्पाणि विभ]कापि रूपिणी ।
वहुरूपाणि चाप्यन्या पद्मानि च ततोऽपरा ॥५७
मन्दारादपि वृक्षाच्च सारमुद्धृत्य कश्यपः ।
तस्मादेष तरुश्रेष्ठ. सर्वेपा श्रेष्ठता गतः ॥५८
ततस्तत्र निवध्याथ कश्यप प्रददौ शुभे ।
अदितिर्मम पुण्यार्थं सौभाग्याथं तथैव च ॥५६
अदित्या कश्यपो दत्त. पुण्यार्थं च तथा मम ।
पुष्पदाम्ना वेष्टयित्वा कण्ठे पुण्यार्थमात्मवान् ॥६०
निष्क्रयेण मया मुक्तः कश्यपस्तु तपोधनः ।
इन्द्रो दत्तस्तथेन्द्राण्या सौभाग्याथ ततो मम ॥६१
सोमश्चाप्यथ रोहिण्या ऋचा च धनदस्तथा ।
एवं सौभाग्यदो वृक्षः पारिजातो न संशयः ॥६२
पारिजातो विष्णुपद्याः पारिजातेतिशब्दितः ।
मन्दारपुष्पर्यद्य तो मन्दारस्तेन कथ्यते ॥६३
फोऽप्यय दारुरित्याहुरजानन्तो यतो जनाः ।
कोविदार इति स्यातस्ततः स सुमहातरुः ॥६४
मन्दारः कोविदारश्च पारिजातश्च नामभिः ।
स वृक्षोभायते दिव्यो यस्यैतत्कुसुमोत्तमम् ॥६५
श्रीकृष्ण और इन्द्र का युद्ध ] [ ४३७ उसकी एक शाखा में एक प्रकार के, दूसरी भासा में दूसरे प्रकार के तथा तीसरी शाखा में विभिन्न प्रकार के अन्यान्य पुष्प खिलते हैं ।।५७|| महर्षि कश्यप ने मन्दार के सारयुक्त ऐसे उम पारिजात तरु की रचना की थी, जिससे वह वृक्ष सर्व श्रेष्ठ माना गया ॥५८॥ इसके कुछ समय पश्चात् बदिति ने अपने पुण्य बोर सौभाग्य की वृद्धि-कामना से उस वृक्ष को जड मे पुष्पमाला से महात्मा कश्यप को वाँध कर मुझे दान किया, तब मैंन कुछ द्रन्य लेकर कश्यप को छोड दिया । इसो प्रकार इन्द्राणी ने भी अपने पुण्य और सौभाग्य-वृद्धि के उद्देश्य से इन्द्र को तथा रोहिणी ने चन्द्रमा को और मृद्धि ने कुवेर को इसी उद्देश्य से बाँध कर मुझे दान में दिया, इस लिये वह पारिजात वृक्ष अत्यन्त सौभाग्य का देने वाला है, इसमे समय नहीं है ॥५६-६२॥ वह गगा से उत्पन्न होने के कारण पारिजात सज्ञक हुवा है, उसमे मदार-पुप्पो के खिलने से मदार भी कहा जाता है ।।६३।। उक्त नामों को जो नहीं जानते, वे उसे 'दारु' कह देते हैं, इस धारण उसका कोविदार नाम पड गया ॥६४|| जिम वृक्ष की सम्पत्ति यह पुष्प रत्ल है. उस वृक्ष को मन्दार, कोविदार और पारिजात इन तीनो नामों से जाना जाता है ॥६॥ ॥ श्रीकृष्ण और इन्द्र का युद्ध। अथ विष्णुमहातेजा मुहूर्ताभ्युदिते रवी । मृगयाव्यपदेशेन ययौ रंवतकं गिरिम् ॥१ आरोप्यकरथे देवः मात्यकि नरपुङ्गवम् । प्रद्युम्नमनुगच्छेति प्राक्त्वा कुरुकुलोहह ॥२ रंवत च गिरि देवो गत्वा दारुकमब्रवीत् । मदीय रथमेन त्व ग्रहायेहैव दारुक ॥३ प्रतिपालय मासौम्य दिनादं वारयन्द्रीन् । रथेनैव प्रवेप्टाऽह द्वारका मूतमत्तम ॥४ । इति सदिश्य भगवानारुरोह जयोद्यतः । ताक्ष्यं ससात्यको धीमानप्रमेयपराक्रम. ॥५ . ४३८ ] । श्री हरिदशपुराण पृथग्रथेन कौरव्य प्रद्युम्नः शनुसूदनः । आकाशगामिना राजन्पृष्ठतः कृष्णमन्वयात् ॥६ निमेपान्तरमाण नन्दन कानन हरिः । देवोद्यान ययौ धीमान्पारिजातजिहीर्पया ।।७ वैशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् । प्रातः काल होने पर सूर्योदय हुआ और मृगया के मिस से भगवान् श्रीकृष्ण रैवतक पर्वत की ओर गये ॥१॥ उस समय उन्होंने सात्यांक को अपने साथ ले लिया और प्रद्य म्न से भी अपने पीछे- पीछे,आने को कहा ॥२॥ रवतक पर्वत पर पहुंच कर उन्होंने अपने सारथी दारुक को आदेश दिया कि रथ को यहाँ रोक दो और घोडो को भी विश्राम कराओ ॥३॥ तथा दोपहर तक मेरे यहां आने की प्रतीक्षा करो मुझे लौट कर द्वारका हो जाना है ॥४॥ दारुक को इस प्रकार का आदेश देकर भगवान् श्रीकृष्ण विजय की इच्छा करते हुए सात्यकि सहित गरुड पर आरूढ हुए ॥५॥ उनका पुत्र प्रद्युम्न भी एक अन्य आकाशगामी रथ पर चढ कर भगवान् के पीछे-पी चल पडा ।।६। इस प्रकार पारिजात को लेने की इच्छा से भगवान् अद्ध निमेष मे ही देवोद्यान में पहुँच बरे ॥७॥ ददर्श तत्र भगवान्देवयोधान्दुरासदान् । नानायुधधरान्वीरान्नन्दनस्थानधोक्षज.॥ तेपासपश्यतामेव पारिजात महाबल. । उत्पाट्यारोपयामास पारिजात सता गतिः॥६ गरुड पक्षिराजानमयलेनैव भारत । उपस्थितो विग्रवान्पारिजातः स केशवम् ।।१० सान्त्वितो वासुदेवेन पारिजातश्च भारत । उक्तश्च वृक्ष मा भस्त्व केशवेन महात्मना ||११ त प्रस्थित तर दृष्ट्वा पारिजातमधोक्षजः । अमरावती पुरी श्रेष्ठा ततश्चक प्रदक्षिणाम् ॥१२ ते तु नन्दनगोप्तारः पारिजातो मोत्तमः । हियतीति महेन्द्राय गत्या न्प शशसिरे ॥१३
यीकृष्ण और इन्द्र का युद्ध ]
४३६
अर्थरावतमारुह्य निर्ययो पाकशासनः ।
जयन्तेन रथस्थेन पृष्ठतोऽनुगतः प्रभुः ।।१४
वहां पहुंच कर उन्होंने विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्रों को धारण किये हुए
देवयोषाओं को उसकी सुरक्षा में तत्पर देखा || उनकी उपस्थिति में
गवान् ने क्रीडा पूर्वक पारिजात वृक्ष को उखाड़ कर गरुड को पीठ पर
रख लिया || ठभी पारिजात मूर्तिमान होकर हर के कारण कम्पायमान होता
हमा भगवान् के समक्ष स्थित हुआ ॥१०॥ उन्होंने उसे सारत्वना दी कि हे वृक्ष
श्रेष्ठ ! तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो॥११॥ उनकी वात सुन कर वह
वाश्वस्त हुआ और तब श्रीकृष्ण उस सर्व प्रधान अमरावती पुरी की प्रदक्षिणा
करने लगे॥१२॥ है राजन् ! तभी उम नन्दन कानन के रक्षको ने इन्द्र को
सूचना दी कि हे मुरराज ! श्रीकृष्ण पारिजात को ले जारहे हैं ॥१३।। यह सुनते
₹ इन्द्र अपने ऐरावत पर चढ कर नगरी से बाहर चले तमा उसका पुत्र जयन्त
भी रथ पर चढ़ कर उनके पीछे-पीछे चल पड़ा ।।१४।।
पूर्वमम्यागतं द्वार केशव शनुनाशनम् ।
दृष्ट्वीवाच प्रवृत्त भोः किमिदं मधुसूदन ।। १५
प्रणम्य गरुडस्योऽथ केशवः शक्रमब्रवीत् ।
वध्वास्ते पुण्यकार्याय नीयतेऽयं वरद्रुमः ।।१६
तमुवाच ततः शक्रो मा मैवं पुष्करेक्षण !
अयोधयित्वा न तरुनयितव्यस्त्वयाऽच्युत ॥१६
प्रहरस्व महावाहो प्रयम मयि केशव ।
प्रतिज्ञा सफला तेऽस्तु मुक्त्वा कौमोदकी मयि ॥१८
ततः कृष्णः शरैस्तीक्ष्णदेवराजगजोत्तमम् ।
विभेदाशनिसंकाशः प्रहसन्निव भारत ||१६
विव्याध गरुड वञी दिव्यः शरवरंस्तथा।
वाणाश्चिच्छेद महसा केशवस्य तरस्विनः ॥२०
यान्यान्मुमोच देवेन्द्रस्तास्ताश्चिच्छेद माधवः ।
माधवेन प्रयुक्तांश्च चिच्छेद बलवृतहा ॥२१
४४. ] [ श्री हरिवशपुराण जब वह नगरी के पूर्व द्वार पर पहुंचे तब उन्होने श्रीकृष्ण को वहाँ दे और उनसे बोले कि हे मधुसूदन ! आपने यह कार्य क्यो किया है ? ॥१५॥ श्रीकृष्ण ने इन्द्र को प्रणाम करके कहा-हे सुरेन्द्र ! आपको भ्रातृवधू का पुष्प कार्य सम्पन्न करने के निमित्त इस पारिजात की आवश्यकता है, इसीलिये इसे लेना रहा हूँ॥१६॥ तब इन्द्र ने कहा-हे पद्माक्ष ! इस पारिजात को आप युद्ध करके ही यहां से ले जा सकते हैं । १७॥ इसलिये हे महावाहो ! आप मुझ पर प्रथम प्रहार कीजिये, और मेरे वक्षस्थल पर अपनी गदा चला कर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करिये ॥१८॥ तब श्रीकृष्ण ने हंस कर अपने वन के समान बारा से इन्द्र के ऐरावत हाथी को घायल कर दिया ॥१६॥ फिर इन्द्र ने अपने बारा से पक्षिराज गरुड को वोध डाला और भगवान के तीक्ष्ण वेग याने बाणो को भी काट दिया ॥२०॥ श्रीकृष्ण ने भी इन्द्र के बारणों को काट दिया, इस प्रकार वे परस्पर एक दूसरे के बालो को काटने मे प्रयत्नशील थे ॥२१॥ महेन्द्रस्य च शब्देन धनुप कुरुनन्दन । शाङ्गस्य च निनादेन मुमुंहु. स्वर्गवासिनः ।।२२ तयोर्वर्तति सग्रामे गरुडस्थो महाबलः । पारिजात जयन्तोज्य हतुंमभ्युद्यतो बली ॥२३ प्रद्य म्नमय कसघ्नो वारयेति तदाऽब्रवीत् । ततस्त वारयामास रोक्मिणेषः प्रतापवान् ॥२४ जयन्तो जयता श्रेष्ठो रीमियगदेपुभिः । सवंगापु विहसन्नागपान रथे स्थितः ।।२५ रपस्थ एप रथिन कामस्तु कमलेक्षणः ऐन्द्रिमन्पदयामास वाणरासीदिपोपमः ॥२६ स सन्निपातस्तुमुलो यभुव कुरुनन्दन । जयन्तस्य च वीरस्य रोधिमणेयस्य चीभयोः ॥२७ कृतप्रतित युद्ध पातस्तो महावनी । महेन्द्रोपेन्द्रतनयो जगरपस्सनता परी ॥२८ है पतु पीरपण चार पनप सपा इन्द्र पनुप को स्वोर श्रीकृष्ण और इन्द्र का युद्ध ] वर्ग के सभी निवासी व्याकुल हो उठे ॥२२॥ श्रीकृष्ण और देवराज में अब भयकर युद्ध होने लगा था जयन्त भी गरुड़ की पीठ से पारिजात उठाने को बढा ।।२३।। तभी श्रीकृष्ण ने प्रद्य म्न मे उसे रोकने को कहा, जिससे प्रद्युम्न पुन को रोकने के लिये उद्यत हुआ ॥२४॥ इसके पश्चात् विजयी श्रेष्ठ चयन्त अपने रथ पर चढ़ कर विकराल वारण-वर्पा से प्रद्युम्न के बगो को बीधने लगा ।।२।। उसी प्रकार प्रद्युम्न भी अपने सर्प के समान वाणो के प्रहार से चयन्त को घायल करन लगा ॥२६|| इस प्रकार इन दोनो म भी घोर सग्राम होने लगा और एक-दूसरे के प्रयल से दोनो के ही शस्त्रास्त्र निष्फल होने सगे ॥२७-२८॥ देवाश्च मुनयश्च व ददृशुविस्मयान्विताः । त संग्राम महाघोर सिद्धाश्च व सचारणाः ॥२६ ततस्तु प्रवरो नाम देवदूतो महावलः । पारिजात पुनहत्तुं मियेप कुलनन्दन ॥३० सखा स देवराजस्य महास्त्रविदरिन्दमः । अवध्यो वरदानेन ब्रह्मणः कुरुनन्दन ॥१ ब्राह्मणस्तपसा सिद्धो जम्बुद्वीपादिव गतः । स्वशक्त्या नृप संयात. सखित्व वलघातिना ॥३२ तमापतन्त सप्रक्ष्य कृष्णः सात्यकिमब्रवीत् । अवस्थ एव प्रवर शररिय सात्यके ॥३३ न त्वत्त निदेय वाणा मोक्तव्याः सात्यके त्वया । बस्य ब्राह्मणचापल्य सोढव्यं खलु सर्वथा ॥३४ ततः पष्ट्या रथेपूणा गरुडस्थ द्विजस्तदा । आजधान महावाहो सात्यकि प्रवरो भृशम् ।।३५ उस समय सभी देवता, मुनि, सिद्ध तथा चारणों को उनका युद्ध देखकर अत्यन्त आश्चर्य हुआ ॥२६॥ तमी प्रवर नामक एक अत्यन्त वलशाली देवदूत गरुड़ की पीठ से उस पारिजात को हरण करने की चेष्टा करने लगा ॥३०॥ ब्रह्माजी के वरदान से वह देवदूत सभी प्राणियों के द्वारा अवघ्य था, शस्त्र विद्या ४४२ ] 1 श्री हरिवंशपुराण मे पूर्ण कुशल और इन्द्र के अभिन्न मित्रो मे था ॥३१॥ वह अपने श्रेष्ठ तपोव से ही स्वर्ग को प्राप्त हुआ था और तभी इन्द्र के साथ उसकी मित्रता स्थापि हुई थी ॥३२॥ उसे आता हुआ देस कर श्रीकृष्ण ने सात्यकि से कहा-है सात्यके ! उस देवदूत प्रवर को तुम वाणं वर्षा करके रोको ।।३३।। परन्तु, यह ध्यान रखना कि इस ब्राह्मण के देह पर तुम्हारे वाणों का प्रहार न हो, यद्यपि तुम्हें इसकी चपलता सहन करनी ही पडेगी ॥३४॥ सात्यकि से श्रीकृष्ण अभी इतना ही कह पाये थे, कि तभी उस प्रवर नामक देवदूत ने सात्यकि को लक्ष्य करके साठ बाणो से प्रहार किया ॥३३॥ शिनेर्नप्ता धनुस्तस्य क्षिपत: सायकान्नृप । चिच्छेद पुरुषव्याघ्रो वचन चेदमब्रवीत् ॥३६ ब्राह्मणो नाभिहन्तव्यस्तिष्ठ तिष्ठ स्ववर्त्मनि । अवध्या यादवाना हि स्वापराधेऽपि हि द्विजा ॥३७ प्रवरस्तु प्रहस्यैनमुवाच कुरनन्दन । अल क्षान्त्या नृणा शूर युद्ध य सत्मिना रणे ॥३८ जामदग्न्यस्य रामस्य शिष्योऽहमपि यादव । नामतः प्रवरो नाम सखा शक्रस्य धीमत. ॥३६ न देवा योद्ध मिच्छन्ति मन्यन्तो मधुसूदनम् । आनण्यं सौहृदस्याहमधिगन्तास्मि माधव ॥४० ततस्तयोस्तदा रौद्रः सग्रामो ववृधे नृप । अस्नैदिव्यैर्नरव्याघ्र शैनेयद्विजमुख्ययोः ॥४१ द्योश्चचाल तदा राजन्ह्यचलाश्च सहस्रशः । तस्मिन्वर्त्तति सनामे तेषामतिमहात्मनाम् ।।४२ तब सात्यकि ने उसका धनुप काट डाला और उससे कहा--तुम ब्राह्मण हो, सहस्र अपराध करने पर भी यादवगरण ब्राह्मणो को नहीं मारते, इसलिये तुम्हें भी अपने ब्रह्म मार्ग पर चलना चाहिये ॥३७-३७॥ सात्यकि की बात सुनकार प्रवर ने हंसते हुए कहा-हे धीर! युद्ध मे क्षमा या कोई अस्तित्व नहीं होता तुम मुझ पर अपनी पूर्ण शक्ति लगाकर प्रहार करो ॥३८॥ मैं जमदग्नि पुष श्रीकृष्ण और इन्द्र का युद्ध ] [ ४३ रामजी का शिष्य हूँ, मैं इन्द्र का मित्र हूं तथा मेरा नाम प्रवर है ॥३६॥ गंवान् श्रीकृष्ण के सम्मानवस देवगण युद्ध करने की इच्छा नही करते, परन्तु, आज मित्र ऋण से उमण होने के लिये तत्पर हूं ॥४०॥ हे राजन् ! इसके श्चात् सात्यकि और प्रवर मे भीपण सग्राम छिड़ गया, जिसस स्वर्ग तया भूमण्डन के अमम्य पर्वत विचलित हो गये ॥४२॥ नातिशिष्ये रणे काप्णिरैन्द्रिमस्त्रमृता वरम् । ऐन्द्रिः काणि महात्मान मायिन शूरसत्तमम् ॥४३ हन्त गृह्ण प्रतीच्छेति तावुभौ योधसत्तमौ । युयुधाते नरश्रेष्ठ परस्परजय पिणी । ४४ ततो नादः समुत्सृष्टी ह्यमरः पुण्यकर्मभिः । दृष्ट्वा स्थयं च शैघ्रय च प्रद्युम्नस्य महात्मनः ।।४५ प्रवरस्यापि वाणेन शितेन शिनिपुङ्गा । चिच्छेदेष्वासन वीरो हस्तावाप च भारत ॥४६ ततोऽन्यत्स तु जग्राह महत्तढनुरुत्तमम् । महेन्द्रदत्त प्रवरो महाशनिसमस्वनम् ॥४७ स येन वीरो महता धनुपा विप्रसत्तमः । शरान्मुमोच विविधान रश्मिनिभास्तदा ॥४८ चकर्त च धनुश्चिन शैनेयस्यामितौजसः । विव्याध सर्वगालेपु वाणरपि च सात्यकिम् ।।४६ उधर प्रद्युम्न और जयन में से किसी को भी हार नहीं हुई, वे दोनो ही परसर कहते थे कि शस्त्र लेकर मुझ पर प्रहार करो, इस प्रकार वे दोनों ही विजय की इच्छा से परस्पर घोर युद्ध कर रहे थे ॥४३-४४। उस समय स्वर्ग में रहने वाले सभी पुण्यात्मा पुरुष प्रद्य म्न की कुशलता देख कर उसकी प्रासा करने लगे, जिससे युद्ध भूमि में एक अद्भुत ध्वनि गूंज उठो ॥४५-४६॥ इपर सात्यकि ने भी अपने तीक्षण बाणो की वर्षा से प्रवर के धनुष और अ गुलि को काट दिया ॥४७॥ तव प्रवर ने इन्द्र के दिये हुए एक वच के समान धनुप को ग्रहण किया और सूर्य किरणों के समान चमकते हुए वारणो की वर्षा करने लगा ४४४ ] [ श्री हरिवशपुराण ॥४८।। प्रवर द्वारा की गई उस भीषण बाण वर्षा मे सात्यवि वे धनुप टुकडे गये और उसके भ ग प्रत्यग आहत हो गय ॥४६॥ धनुरादाय शैनेयस्ततोऽन्यत्कुरुनन्दन । दृढ भारसह धीमान्विव्याध प्रवर रणे ॥५० उच्चक्ततुरन्योन्यवमणी तो शितं शरै । गानभ्यश्च व मासानि मर्मभिद्भि शरोद्यमै ॥५१ अथाष्टधारबाणेन पुनरिष्वासन द्विधा । चिच्छेद प्रवरो वीर स्त्रिभिश्च नमताडयत् ।।२२ अन्यदिष्वासन त तु ग्रहीतुमनस द्विज । गदया ताडयामास क्षेप्यया लघुहस्तवान् ।।५३ सोऽसि चर्म च जग्राह सात्यकि प्रहसन्निव । न जग्राह धनुर्धीमान्गदयाभिहतो भृशम् । तत शरशतान्येव मुमोच प्रवरस्तदा ॥५४ विहस्तमिव विज्ञाय सायकि यदुनन्दनम् । प्रद्युम्नोऽस्य ददौ खङ्ग निमलाकाशसन्निभम् ॥५५ तस्य चिच्छेद भल्लेन निस्त्रिश प्रवरस्तदा । सरुदेशेऽपातयच्च प्रवर प्रहसन्निव । ५६ इसके पश्चात् सात्यकि ने अन्य धनुप लेकर प्रवर पर भीषण बाण वष| बारम्भ की १०॥ परस्पर मे दोनो की घनघोर बाण वर्षा से दोनो के ही कवर टूट गये देह आहत हो गए तथा मांस निक्ल आया, तभी प्रवर ने अपने अष्टधार युक्त वाण ये प्रहार से सात्यवि का धनुप काट दिया और तीन बाण सारयार से देह पर भी मारे ॥५१-५२॥ जब तक सात्यकि दूसरा धनुप भी न सम्भार पाये, घर तक प्रवर ने उन पर गदा दे मारी ॥५॥ जिसकी भीषण चोट धाहव होने पर भी सात्यकि ने हाथ मे तलवार ग्रहण को, परन्तु इमी बरीच प्रवर ने उन पर संदमें वाणों की वर्षा यी ॥५४॥ सारयति को निहत्था है। प्रद्य म्न ने नीलाकार के समान एक खड्ग उनके हाथ में दिया ।।५।। परन्तर प्रसर न उस पग के हाथ मे आते ही अपने मस्तास्त्र से उसके टुकड़े पर दिय i
श्रीकृष्ण और इन्द्र का युद्ध ]
[ ४४५
और गणों के प्रहार से खड्ग मुष्टि भी काट दी और कवच भी दिन्न-भिन्न
र डाला ॥५६॥
व्यघमच्च तथा चर्म शिवणिरजिह्मगं।
आजघान च शक्त्यैन हृदि विप्रो ननाद च ॥५७
तं विक्लवमिव ज्ञात्वा पारिजातजिहीर्पया।
तााभ्याशे रथेन व स तस्थौ प्रवरस्तदा ॥५८
त पक्षपुटवेगेन चिक्षेप गरुडस्तथा।
गव्यूतिमेका सरयः स पपात मुमोह च ॥५६
त जयन्तो निपत्याय पतित ब्राह्मण नृप।
समाश्वास्य रथ शीघ्र समारोपितवास्तदा ॥६०
शैनेयमपि मुह्यन्त पतन्त च मुहुर्मुहुः ।
आश्वासयानः प्रद्युम्नः पितृव्य परिपस्वजे ॥६१
त हि पस्पर्श हस्तेन सव्येन मधुसूदनः ।
विरुजः स्पर्श मात्रेण सात्यकि. समपद्यत ॥६२
प्रद्य म्नो दक्षिणे पार्वे वामे तु शिनिपुङ्गवः ।
तस्थतु. पारिजातस्य युद्धशौण्डतरावुभौ ॥६३
फिर प्रवर न सात्यकि के हाथ पर शक्ति से भीपण प्रहार करके गर्जना
की ॥५७॥ सात्यकि को बुरी तरह घायल हुआ देख कर पारिजात को लेने के
लिये जैसे ही गरुड के पास गया, वैसे ही गरुड ने उस पर अपने पख से ऐसा
प्रहार किया कि प्रवर दो कोस दूर जाकर गिरा और उसे मूर्छा आगई ॥५८.
५६॥ प्रवर को इस प्रकार गिरा हुआ देख कर जयन्त ने अपने रथ से उतर कर
प्रवर को उठाया और अपने रथ पर बैठा लिया ॥६०॥ उघर अपने चाचा
सात्यकि को बारबार गिरते और मूच्छित होते हुए देखा तो प्रद्य म्न ने उसे
संभाला ॥६१॥ उसी समय श्रीकृष्ण ने सात्यकि के पास आकर उनके देह पर
अपना हाथ फेरा, जिससे उनकी वेदना नष्ट हो गई और वह स्वस्थ हो गये
WAII तब प्रद्य म्न उस पारिजात के दक्षिण और तथा सात्यकि उसके बाएँ
र खडे होकर उसकी रक्षा करने लगे ॥६॥
[ श्री हरिवशपाए जयन्त प्रवरश्चंव रथेन केन भारत । समतन्तौ महेन्द्रण प्रहस्योक्तौ महात्मना ॥६४ नासन्नमभिगनव्य गरुडस्य कथचन । बलवानेप पतता राजा च विनतासुतः ॥६५ दक्षिणे चैव सव्ये च पार्वे मम धृतायुधौ। उभौ स्थितौ युद्वधमान मामेव हि प्रपश्यतम् ॥६६ एवमुक्ती स्थितौ वीरौ तत. शक्रस्य पार्श्वयो । ददृशाते युद्धयमानौ देवराजजनार्दनौ ।६७ अथेन्द्रो गरुड वाणर्महाशनिसमस्वनः । विव्याध सर्वगातेपु महारप्रवरस्तथा :०६८ ताम्वाणानगणयन्वनतेय. प्रतापवान् । ससाराभिमुखो वीर. शक्रनागमरिन्दम. ॥६६ उभौ तो सहसा राजन्वलिनी गजपक्षिणी। प्रयुद्धो वीर्यसपन्नो महाप्राणी दुरासदी ।।७० तमी जयन्त और प्रवर एक साय एक हो रथ पर चढ़ पर गड़ पोरगे, यह देख कर इन्द्र ने हंस कर कहा कि तुम गरुड़ के निकट मत जान षयोंकि वह असाधारण धीर है ।।६४-६५।। अब तुम शस्त्र पारणपूर्वक मेरे दोन थोर स्पित हो जाओ और मेरा और धीवृष्ण वा सग्राम देसो ॥६॥ पाउ मुन कर अपन्न और प्रवर दोनो ही उनके दोनो ओर सड़े होकर दी धौषण के मध्य होने वाले युद्ध को देखने सगे ॥६५॥ व पथपात के रामा भीषण धम्म याने पापों रे प्रहार से एक ने पक्षिगर गरे सम्पूर्ण देह । बीपना प्रारम्भ किया ॥१८॥ परन्तु गएफ ने उनके नाणों की चिन्ता न कर पसऐपत हावी पर बारमण कर दिया भरगत जलयान पर तपा ऐपत म भयकर सपाम हो मगा, दोरोही प्रयन्त परामी, दुई एवं पुर में कुल 3.0 रदाः पन्नगरिपु करेण गिरगा सका। ऐराव हो गवानिराजधान नदस्तुवा 111
योकृष्ण और इन्द्र का युद्ध ।
[ ४०
तथा नखाकुगस्तीक्षण वैनतेयो वलोत्कटः।
तथा पक्षनिपातश्च शक्रनाग जघान ह ।।७२
मुहूत्तं सुमहानासीत्सपातो गजपक्षिणो.।
विस्मापनीयो जगतः प्रेक्षितणा भयावहः ।।७३
मूध्ययरावत तापस्ताडयामास भारत।
नखाकुशकरालेन चरणन महाबलः ॥७४
संग्रहाराभिसंतप्तो निपपात निविष्ठपात् ।
पारियाने गिरिश्र द्वीपेऽस्मिन्जनमेजय ॥७५
पतन्तमपि त दाक्रो न मुमोच महाबलः ।
कारुण्यादय सौहार्दात्पूर्वाभ्युपगमादपि ॥७६
कृष्णोऽप्यन्वगमच्चन पृष्ठतः प्रभवाव्ययः।
पारिजातवता धीमानगरुडेन महावलः ॥७७
उस समय भीपण गर्जन करता हुआ ऐरावत अपने दांत, मूट बोर
स्तक से प्रहार करता हुआ गरुड पर टूट पड़ा ।।७१॥ तव महावली गरुह भी
..पने नों और पवों के प्रहार द्वारा ऐरावत को बाहत करने लगे। ७२ ।।
ऐरावत और गरुड़ के इस युद्ध ने कुछ क्षणों म हो वहाँ उपस्थित दर्शकों को
विस्मित कर दिया । क्योकि उनका युद्ध यत्यत भीषण हो उठा पा 1७३|| उसी
समय ऐरावत पर गरुह ने अपने नस रूपी अकुश तथा चरणों की भीषण मार
की, जिसमें अत्यत व्याकुल होकर ऐरावत स्वर्ग से गिरने लगा तया वह जम्बू-
द्वीप के पारिपात्र नामक पर्वत पर वाकर स्का ।। ७४-७५ ॥ महाबली इन्ट ने
करणा, सौहाद्रं तथा उसके पहिले उपकारी को याद करके स्वर्ग से गिरे हुए
ऐरावत को घाड़ा नहीं ॥७६॥ उत्पत्ति और प्रलय के कारण रूप भगवान् भी
पारिजात और गरुड के सहित देवराज इन्द्र के पोटे-पीछे चले ७७॥
स वस्यो पर्वत पारियाने तु वृसहा ।
ऐरावते समाश्वस्ते सग्रामो ववृधे पुनः ||
शरराशीविपप्रय रलयुक्तः सुजितः।
अन्योन्यं कुरुशार्दूल शक्रकेशवयोमहान् IISE
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४४८ ] [ श्री हरिवंशपुराण ततो वज्रायुधो वज्रमशनिं च पुनः-पुनः । मुमोच गरुडे राजन्न रावतरिपो नृप । वज्राशनिनिपातांस्तान्सेहे शक्रस्य पक्षिराट् । अवध्यो इलिना श्रेष्ठो निसर्गेण ततो बलात् ।।८१ मुमोच पक्षमेकैक मानयन्ननि सदा । वज च देवराज्ञोऽथ भ्रातु. कश्यपसभवः ॥८२ आक्रम्यमाणस्तायेण न्यमज्जन्नृपते गिरिः । विवेश धरणी राजञ्छीर्यमाणः समन्ततः ।।८३ चुकज बहुमानेन कृष्णस्य स तु पर्वतः । त चाद्राक्षीत्तत. कृष्ण. किंचिच्छेपमधोक्षजः ॥८४ फिर वृत्र-हता इन्द्र ने पारियात्र पर्वत पर जाकर ऐरावत को स्वस्थ किया और इसके पश्चात् कृष्ण और इन्द्र मे पुन. युद्ध छिड गया ॥७॥ दोनों ही एक दूसरे पर सपं के समान भयकर बाणो की वर्षा करने लगे 190 तथा इन्द्र ने ऐरावत के शत्रु गरुड पर वर और अशनि से अनेक प्रहार किये ॥०॥ गए स्वभावत बली तथा तपोबल से अवघ्य थे, इसलिये इन्द्र द्वारा किये गरे प्रहाणे को उन्होंने सहन कर लिया ॥८॥ इसके साथ ही अपने भाई इन और उनके वय को सम्मान-रक्षा हेतु उनके द्वारा होने वाले प्रत्येक प्रहार पर अपना एक पर परियाग कर रहे थे ॥२॥ इसी समय गएड और श्रीकृष्ण फे भार से पचित हुभा पारियान पर्वत सहसा भयबर पीत्कार करता हुआ पपियो मे सरने लगा। उसके कुछ भाग के क्षेप रहने तक गार के सहित धाण उस पर्व को पोस कर आगरा पले गये ॥८३.६४॥ त मुला गपडेनाथ तस्थौ देवो पिहायपि । प्रद्युम्न' च तदोवाच सगल्लोरुभावनः ।।८५ इटो द्वारवती गत्वा रथमानय मा चिरम् । साका महाबाहो मत्तेजोपसमाश्रितः ।।८६ पसतम्मो वसभरप राजा पराधिपः । सो निरन्न लागमिष्यमारतामितिमानत ॥८० श्रीकृष्ण द्वारा शिवजी की स्तुति ] [ ४४६ तथेत्युक्त्वा तु धर्मात्मा प्रद्य म्नः पितर विभुः । गत्वा यथोक्तमुक्त्वा च यादवेन्द्रवलावुभौ ।। नाडिकान्तरमाण पुनस्त देशमाययो । दारुकेण समायुक्त रथमास्थाय भारत ।।८६ तव वै प्रद्युम्न से वो कि हे वास । तुम मेरे प्रभाव से पूर्ण सम्पन्न हो, अब शीघ्र ही द्वारका जाकर रथ सहित दारुक को यहाँ ले माओ ॥८५-८६॥ वहां बलराम जी और महागज उग्रसेन से कहना कि मैं को जीत कर कल द्वारका पहुंचूगा ॥७॥ पिता की आज्ञा स्वीकार करके पद्य म्न शीघ्र ही द्वारका पहुंचे तथा वहाँ वलरामजी और राजा उग्रसेन को स्वर्ग का सम्पूर्ण वृत्तान्त मुनाया वथा तुरन्त ही दारुक के साथ रथारूढ होकर वह भगवान् श्रीकृष्ण के पास जा उपस्थित हुए ।।८८-८६॥ ।। श्रीकृष्ण द्वारा शिवजी की स्तुति ।। तमारुह्य रथं कृष्णः पारियान गिरि ययौ। यरावतमास्याय स्थितः सुरपतिः प्रभुः ।।१ पारियातो गिरिष्ठो दृष्ट्वा यान्त जनार्दनम् । शाणपादसमो भूत्वा प्रविवेश वसुंधराम् ।।२ प्रियार्थं वासुदेवस्य प्रभावज्ञो महात्मनः । तस्य प्रीतो हुपीकेशः पर्वतस्य जनाधिप ॥३ ततः प्रयात युद्धार्थमच्युत कुरुनन्दन । सपारिजातो गरुडः पृष्ठतोऽनुययो उदा॥४ प्रद्युम्नः सात्यकिश्चापि गरुडस्यो महावलो। गतावुभौ रक्षणार्थ पारिजातमरिंदमो॥५ ततस्त्यस्त गत. सूर्य प्रवृत्ता रजनी नृप । उपस्थित पुनयुद्धं शक्रकेशवयोरिह ।।६ सुप्रहाराहत दृष्ट्वा विष्णुर रावत गजम् । नातिकल्प महातेजा देवराजानमब्रवीत् ।।७ ४५० ] [ श्री हरिवंशपुराण वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् ! तब भगवान् श्रीकृष्ण रथारूढ होव पारियात्र पर्वत पर पहुंचे, जहां देवराज इन्द्र ऐरावत के सहित विद्यमान थे । पर्वत श्रेष्ठ पारियात्र भगवान् की महिमा को जानता था, इसलिये उन्हे आते दे कर वह शाणपाद ( चौथाई मारो ) का रूप धारण करके पृथिवी के विवर प्रविष्ट हो गया, यह देख कर भगवान् उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥२-३॥ ज भगवान् रथारूढ होकर युद्ध के लिये चले तब गरुड भी अपनी पीठ पर पारिजा वृक्ष को लिये हुए उनके पीछे-पीछे चले ॥४।। उस समय प्रद्युम्न और सात्यान भी गरुड की पीठ पर ही बैठ कर पारिजात की रक्षा मे तत्पर थे ॥५॥ उस समय भगवान् भास्कर के अस्त होने पर रात्रि का आगमन हुआ तथा इन्द्र ओ कृष्ण के मध्य सग्राम की पुनरावृत्ति हुई ॥६॥ ऐरावत को बहुत घायल हुआ देख कर थीकृष्ण ने इन्द्र से कहा ॥७॥ गरुडाभिहतः पूर्व नातिकल्पो गजोत्तमः । ऐरावतो महावाहो रातिश्च समुपोह्यते ।। श्व. प्रभाते यथाकाम प्रवर्तस्व यथेच्छसि । एवमस्त्विति कृष्ण तु देवराजोऽग्रवीत्प्रभुः ।। उवास पुष्कराभ्याशे देवराजः पुरदरः । वर्च गिरिमय वृत्वा धर्मात्मः नृपसत्तम ।।१० ब्रह्मा ततो जगामाथ कश्यपश्च महानपिः । अदितिश्चैव सर्वे च देवा मुनय एव च ।।११ साध्या विश्वे च कौरव्य नासत्यावश्विनी तथा । आदित्याश्चव रद्राश्च पसवरच जनेश्वर ॥१२ नारायणश्च पुत्रेण सत्यपेन प भारत । सहोवास गिरी रम्ये पारियाने प्रष्टवत् ॥१३ थोरपण दोले-हे महाराहो ! थापरा ऐरावत गएको प्रहार प्यापित हो गया है और यदि भी हो गई है, इसलिये इए समय पाम रोकदोषिय या प्रा.भाउ पुनः पुरर सेना । यह गुन र ने एपमस्तु सहा और श्रीकृष्ण द्वारा शिवजी को स्तुति ] [ ४५१ पुष्कर तीयं के निकट जाकर एक गिलामय आवरण स्थान निर्मित कर वहाँ त्रि-निवास किया ॥१०॥ उस समय ब्रह्मा, कश्यप, अदिति, सब देवता, मुनि, साध्य, विश्वेदेवा, अश्विद्वय, आदित्यगण, रुद्रगण तया वसुगरण वहां वा गये ॥११-१२।। इधर श्रीकृष्ण अपने पुत्र प्रद्युम्न बोर भाई सात्यकि के सहित अत्यन मुखपूर्वक उस पारियार पर्वत पर ही ठहर गये ।।१३।। यत्स शाणप्रमाणोऽस्य भक्त्या समभवन्नृप । वरं प्रादात्ततस्तस्य पर्वतस्य महाद्युतिः ।।१४ शागपाद इति ज्यातो भविष्यसि महागिरे। पुण्येनार्दन तुल्यो हि पुण्यो हिमवतः शुभः ॥१५ एवमेव च भूयिष्ठो भव पर्वतसत्तम । मेरुणा सर्व मानो हि वहुचितमृगैर्युतः ॥१६ तया दत्त्वा वरं तस्य पर्वतस्य तु केशवः । दव्यो गङ्गा सरिटा नमस्कृत्वा वृपध्वजम् ।।१७ अयाययो विष्णुपदी स्मृता कृष्णेन भारत । संपूज्य ता ततः कृष्णः कृत्वा स्नानमधोक्षजः ।।१८ उदकं च गुहायाय विल्वं च हरिरव्ययः । देवमावाहयामास रुद्र नर्वेश्वरेश्वरम् ॥१६ ततः प्राप्तो महादेवः सोमः सप्रवरो विभुः । तस्यापरि विल्वस्य तथा गमोदकस्य च ॥२० त पारिजातकुसुमेरचंयामास केशवः । तुष्टाव वाग्मिरीशे सर्वकारमीश्वरम् ॥२१ उस समय उन्होंने उस शारापाद र धारण कर सेने वाले पर्वत के प्रति प्रसन्न होकर रहा है गिरिष्ठ ! तुमने मारणपाद प पारण किया, इसलिये जगत में इसी नाम से प्रसिट होंगे क्या अपने पुण्य के रत से हिमालय और मुमेक के समान महान होकर अनेक प्रकार के मृगों से परिपूर्ण होगे ॥१४.१६॥ राजन् ! उस पपंत को इस प्रकार का वर देकर श्रीकृष्ण ने भगवान् शहर ४५२ ] [ श्री हरिवशपुराण को नमस्कारपूर्वक सरिताओ मे श्रेष्ठ गगाजी का ध्यान किया ॥ १७ ॥ समय विष्णुपदी भगवती गगाजी उनके सम्मुख उपस्थित हुई। उब उन्होने उड़ पूजन कर स्नान किया ॥१८॥ फिर उन्होने गगाजल और विल्वपत्र ग्रहण कर भगवान् शकर का आह्वान किया और सौम्यमूर्ति भगवान् शकर वहाँ प्रव होकर उसो गगाजल और विस्वपत्र पर प्रतिष्ठित हो गये ॥ १९-२० । इस पश्चात् पारिजात के पुष्पो से भगवान् ने शिवजी का पूजन किया और वे : सर्वकर्ता सर्वेश्वर शकर की स्तुति करने लगे ॥२१॥ रुद्रो देवस्त्वं रुदनाद्रावणाच्च रोख्यमाणो द्रावणाच्चातिदेवः । भक्तं भक्ताना वत्सलं वत्सलानां कीा युड्क्ष्वेशाद्य प्रभवाम्यन्तरेण । ग्राम्यारण्याना त्व पतिस्त्व पशुना ख्यातो देवः पशुपतिः सर्वकर्मा । नान्यस्त्वत्त परमो देवदेव जगत्पतिः सुरवीरारिहन्ता ॥२३ यस्मादीशो महत्तामीश्वराणा भवानायः प्रीतिदः प्राणदश्च । तस्मादि त्वामीश्वर प्राहुरीशं सन्तो विद्वासः सर्वेशास्त्रार्थतज्ज्ञाः ।।२ भूत यस्माज्जगदत्यन्त धीर त्वत्तोऽव्यक्तादक्षरादक्षरेश । तस्मात्त्वामाहुर्भव इत्येवभूत सर्वेश्वराणा महतामप्युदारम् ।।२५ यस्माग्जितैरभिषिक्तोऽसि सर्देवासुरैः सर्वभूतश्च देव । महेश्वर विश्वकर्माणमाहुस्त्वा वै सर्वे तेन देवातिदेवम् ॥२६ पूज्यो देवः पूज्यसे नित्यदा व शश्वच्छ यः काक्षिभिर्वरदामोधवीर्यः । तस्माद्विख्यातो भगवान्देवदेवः सतामिष्टः सर्वभूतात्मभावी ॥२७ भूमितयाणा देव यस्मात्प्रतिष्ठा पुनर्लोकाना भावनामेयकोतिः । त्र्यम्बकेति प्रथम तेन नाम तवाप्रमेय विदशेशनाथ ॥२८ श्रीकृष्ण बोले-हे देव ! आप रुदन करते-करते दौडे थे इसलिए आपका नाम दहा है, बाप सदा अपने ही प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, आप भक्तो के भात, वरनलो के वस्मल हैं, इसलिए आज मुझे यश से सम्पन्न करिये ॥२२।। आप भोगो में आसक्त समारो और ससार से विरक्त हुए सन्यासी स्पी जीवो के अधिपति है.इसलिये पशुपति कहलाते हैं। आप सर्वकर्मा से श्रेष्ठ कोई भी देवता नहीं ।
श्रीकृष्ण द्वारा शिवजी की स्तुति ] [ ४५३ जगत्पति तथा देवताओ के शत्रुओ का नाश करने वाले हैं ॥ २३ ॥ आप ईश्वरो के ईश्वर, आद्य, प्रीतिप्रद तथा प्राणप्रद हैं, इसलिये सब शास्त्रो के ज्ञाता और विज्ञ साधुजन आपको ईश्वर कहते हैं ॥२४॥ हे बुद्धि प्रवर्तक । हे जीव- नियामक | आप ही अव्यक्त एव अक्षर हैं, आप से ही यह विश्व उत्पन्न हुआ है, इसलिये आप भव कहे जाते हैं ॥२५॥ हे देव । सभी वेवता, असुर तथा प्राणियो न आपसे पराजित होकर आपको ईश्वर पद पर प्रतिष्ठित किया है, आपको ही विश्व- कर्मा तथा महेश्वर कहते हैं ॥२६॥ आप सब के पूजनीय हैं, इसलिये सभी देवता आपको पूजा नियमित रूप से करते हैं, आप असीम शक्ति वाले और सभी प्राणियो की सृष्टि करने मे स्वय समर्थ हैं, इसलिये आपको 'देवदेव' कहा जाता है ॥२७॥ हे त्रिदशेशनाथ | स्वर्ग, मत्यं और पाताल आप से ही उत्पन्न हुए हैं, आप ही प्राण आदि वायु, सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदि की रचना, पालन और सहार करते हैं। इन तीनो कार्यों के सम्पन्न कर्ता होने के कारण ही त्र्यम्बक नाम से आपको प्रसिद्धि लोको म हुई है ॥२८॥ से शत्रूणा शासनादप्रमेयस्तया भूय शासनाच्चेश्वरेण । सर्वव्यापित्वाच्छकरत्वाच्च सद्धि शब्दस्येशान श्रीकरार्काग्रयतेजा ॥२६ ससक्ताना नित्यदा यत्करोपि शम भ्रातृव्यान्यद्वयनपी समस्तान् । तस्माद्देव शकरोऽप्रमेयस्य सद्भिर्द्धर्मज्ञ कथ्यते सवनाथ ॥३० दत्त प्रहार कुलिशेन पूर्व तवेशान सुरराज्ञाऽतिवीर्य । कण्ठे नल्य तेन ते यत्प्रवृत्त तस्मात्यातस्त्व नीलकण्ठेति कल्प ॥३१ यल्लिङ्गा यच्च लोके भगाङ्क सर्व सोम त्व स्थावर जङ्गम च । प्राविप्रास्त्वा गुणिन तत्त्वविज्ञास्तथा ध्येयामम्विका लोकधानीम् ॥३२ वेदैर्गीता सा हि तत्त्व प्रसूता यज्ञो दीक्षाणा योगिना चातिरूप । नात्यद्भुतत्वत्सम देव भूत भूत भव्य भवदेवाथ नास्ति ॥३३ अह ब्रह्मा कपिलो योऽप्यनन्त पुता सर्वे ब्रह्मणश्चातिवीरा । त्वत्त सर्वे देवदेव प्रसूता एव सर्वेश कारणात्मा त्वमीडच ॥३४ इति सस्तूयमानस्तु भगवान्गोवृपध्वज । प्रसार्य दक्षिण हस्त नारायणमधाब्रवीत् ।।३५ हे श्रीकर | शत्रु आपको कभी भी परास्त नही कर सकते, आप सर्व बाह्या म्यवरतथा सभी अवस्याओ में अपने प्रभु धर्म पर स्थित रह कर ४५४ 1 [ श्री हरिवशपुराण सव प्राणियों पर शासन तथा साधुओं का कल्याण करते हैं, इसीलिये आ शवं कहा गया है । आप शब्द के ईशान तथा सूर्य से भी अधिक तेजस्व ॥ २६ ॥ हे सर्वनाथ ! याप अपने भक्तो को सदा शान्ति तथा असुरो को दण्ड देने वाले हैं, इसलिये धर्मात्मा थोर साधुजनो ने आपका नाम शकर रखा है ॥ ३० ॥ हे ईशान | पूर्वकाल मे जब इन्द्र ने आप पर वज प्रहार किया, तब उसके प्रतिकार में समय होने पर भी आपने भातृवात्सल्य के कारण वह आघात सह लिया, जिससे मापके कठ का नीता वर्ण होगया, इसीलिये आपका नीलकठ नाम हुआ ॥३१॥ हे सोम | आप जात् मे स्त्रीत्व एव पुरुषत्व युक्त प्यावर जगम सभी प्राणियो के स्वस्व हैं इसीलिये आपके यथार्थ तत्व के ज्ञाता जन यापको और लोक धात्री पार्वतीजी को गुणात्मक कहते हैं ॥३२॥ वेदों ने उन भगवती पार्वती को माया स्वरूपा बताया है, जिनसे महत्तत्व की उत्पत्ति हुई है। आप यज्ञ मे दीक्षित योगियो के यश स्वरूप हैं तथा भूत, भविष्य, वतमान में यापके समान अद्भुत अन्य कुछ नही रहता ॥३३॥ हे देवादिदेव ! मैं, ब्रह कपिन, शेप तया ब्रह्मा के अत्यन्त वीर पुत्र न पके द्वारा ही उत्पन्न हुए हैं । विश्व की सभी दिखाई देने वाली वस्तुएं आप से ही प्रकट हुई हैं, इसलिये आप सभी के द्वारा स्तुति के योग्य हैं ।। ३४॥ हे राजन् । भगवान कृष्ण द्वारा इस प्रकार स्तुति दिये जाने पर नगवान् शकर ने अपना दक्षिण हाय उठा कर थी. पृष्ण से कहा ॥ ३५॥ मनीषितानामर्थाना प्राप्तिस्ते सुरसत्तम । पारिजात प हर्ताऽसि मा भूत्ते मनसो व्यथा ॥३६ यया मैनाकमाश्रित्य तपस्त्वमफरो प्रभो। तथा मम पर कृष्ण सस्मृत्य स्थर्यमाप्नुहि ॥३७ अवध्यस्थमजेयश्च मत्त शूरतरस्तथा। भविताऽसीत्यवोच यत्तत्तथा न तस्यया ॥३८ पर स्तन मा भयस्या स्तोप्यतेऽमरसत्तम। स्वया वेन धर्मश धर्मभाक्राभविष्यति । मरेप परिष्णां प्राप्य पूजा तथोतमामद श्रीकृष्ण द्वारा शिवजी की स्तुति ] [ ४५५ विल्वोदकेश्वरो नाम भविताऽहमिहानघ । देवेश्वर त्वयाऽस्थापि देवसिद्धोपयाचनः ।।४० इहस्योपोपितो विद्वान्भक्तिमान्मम केशव । विरामीप्सिताल्लोकान्गमिप्यति जनार्दन ॥४१ अविघ्या नाम देशेऽस्मिन्गङ्गा च व भविष्यति । गङ्गास्नानसम स्नान मन्नतो भविता तथा।।४२ शिवजी वोले-हे सुरसत्तम ! आपकी अभिलापा पूर्ण होगी और बाप इस पारिजात तरु को ले जाने में समर्थ होंगे, इस विषय में अव आप चिन्ता न करें ।। ३६ ।। जव आपने मनाक पर्वत पर जाकर तप किया था तभी मैंने वारको वर दे दिया था, इसलिये आप धर्य रखें ।। ३७ ॥ आप अवध्य, अजेय तथा अत्यन्त वली होंगे, मेरा यह वचन व्यर्थ नहीं होगा ॥ ३८ ॥ आपने जिस स्तोम से अभी मेरा स्तव किया है उस स्तोत्र का पाठक धर्म लाभ करेगा और विश्व मे सम्मान तथा युद्ध मे विजयी होगा ।। ३६ ।। आज से मैं भी विल्वोद- केश्वर कहा जाऊँगा और आप जहाँ मुझे स्थापित करेंगे, वही प्रतिष्टित होकर सब की अभिलापा पूर्ण करूंगा ॥ ४० ॥ रात्रि उपवास पूर्वक जो मनुष्य इस स्थान पर भक्ति सहित मेरी उपासना करेंगे, वे अवश्य ही इच्छित लोको को प्राप्त हाग ।। ४१॥ यह गगा भी यहाँ अविन्ध्या नाम से प्रसिद्ध होगी तया जो मन पाठ करके गगाजी का स्मरण करेगा, उसे उसी समय गगा-स्नान का पुण्य प्राप्त होगा ।। ४२॥ पटपुर नाम नगरं दानवाना जनार्दन । अनान्तद्धरणोदेशे पराक्रम्य महावलाः ।।४३ दैत्या दुरात्मानो जगतो देवकण्टकाः । छन्ना वसन्ति गोविन्द सानावस्य महागिरे ॥४४ अवघ्या देवदेवाना वरेण ब्रह्मणोऽनघ । मानुपान्तरितस्तस्मात्त्वमेताजहि केशव ॥४५ ततो याते महादेवे प्रभाताया नराधिपः । तस्या निशाया गोविन्द. स्तूप पर्वतमप्रवीत् ॥४६ [ श्री हरिवरापुराण तवाध पर्वतश्रेष्ठ निवसन्ति महासुरा । अवध्या देवदेवाना वरेण ब्रह्मण पुरा ॥४७ निर्गमिष्यन्ति ते नव मया रुद्धा महावला । द्वारे निरुद्ध तत्रैव विन क्ष्यन्ति ममाज्ञया ।।४८ इस पवत के नीचे पटपुर नामक प्रसिद्ध दानवो का एक नगर स्थित है। वहाँ ससार के लिये कण्टक स्वरूप, हिंसक एव दुरात्मा दैत्य क्पट वेश मे निवास करते हैं ।। ४३ ४४ । उन दैत्यो ने ब्रह्माजी से वर प्राप्त किया है, इसलिये वे किसी के भी द्वारा नही मारे जा सकते । आप इस समय मनुष्य रूप में अवत- रित हुए हैं अत उन दानवो का शीघ्र ही सहार करिये ॥ ४५ ॥ हे राजन तब भगवान् शकर ने श्रीकृष्ण को हृदय से लगाया और फिर वही अन्तर्धान होगये । जब प्रात काल होगया, तब श्रीकृष्ण ने उस पवत से कहा-हे गिरि- श्रेष्ठ । तुम्हारे नीचे जो असुर निवास करते हैं वे ब्रह्माजी के वरदान से अवध्य होगये हैं, इसलिये लोक कल्याणाथ मैं तुम्हारा अवरोध करूँगा, इससे वे देल बाहर न निकल सकगे और मैं उनका सहार कर डागा ।। ४८।। त्वयि सन्निहितश्चाह भविष्यामि महागिरे । अधिष्ठाय महाघोरान्निवत्स्यामि च पर्वत ।।४६ आरुह्य मूर्टिन मद्र प दृष्ट्वा पर्वतसत्तम । गोसहस्रप्रदानस्य फल प्राप्स्यति शाश्वतम् ।।५० त्वत्तोऽश्मभिश्च प्रतिमा कारयित्वा हि भक्तित । शुश्रू पयन्ति ये नित्य मम यास्यन्ति ते गतिम् ॥५१ इति त पर्वत कृष्णो वरदोऽनुगृहीतवान् । तदाप्रभृति देवेशस्तन सन्निहितोऽच्युत ।।५२ पापाण प्रतिमा तात कारयित्वा च कौरव । शुथूपन्तिकृतात्माना विष्णुलोकाभिकाक्षिण ॥५३ उन घोर अमुरो को मार कर मैं इसी स्थान पर निवास करूंगा इससे हमारा-तुम्हारा सम्पर भी चिरस्थायी होगा ॥ ४६ ॥ हे गिरिश्रष्ठ । जं पाउका द्वारा साया बाना ] २ नुवा अंची करके तुम पर पड़ेगा, उसे हमार गौत्रों के दान सा फन हामा ।। ५.॥ जो तुम्हारे पापाण को लेकर उममें मरो प्रतिमा स्नायेंग भात माहित मुझे पूगे, ये मेरे गालोरर को प्राप्त होग ।। ५५ ॥ हं परन् ! परदा भगवान श्रीकृष्ण उम पर्वत पर IT कर हुए निरस यहीं निगम कर लगे ।। ५२ ॥ इमोनिय विधा माफ की कामना गाने मनुष्य उग परंव के पापा प्रतिमा बना कर सक्षा मारापना में ना रहा है ।। ५३ ।। ।। पारिजात का द्वारका लाया जाना ।।
४५८ ] • [ श्री हरिवंशपुराण युद्ध आरम्भ होगया ॥४॥ श्रीकृष्ण ने भीषण वाण वर्षा करके देवराजक की सेना को सत्रस्त करना प्रारभ किया ॥ ५॥ इन्द्र और श्रीकृष्ण दोनों ने प्रहार करने में समर्थ होकर भी परस्पर में किसी पर प्रहार नहीं किया ॥६॥ श्रीकृष्ण ने उस समय दस-दस वाण एक साथ चला कर देवपक्ष के एक-एक अश्व को आहत किया ।। ७ ॥ शैव्याद्यानपि देवेन्द्रः शरैरमरसत्तमः । छादयामास राजेन्द्र घोरैरस्त्राभिमन्तितः ॥८ स च वाणसहस्र श्च कृष्णो गजमवाकिरत् । गरुड च महातेजा बलभिदरिवाहनम् ॥६ भूयिष्ठाभ्या रथाभ्या तो तदहः शनुदारणी । युयुधाते महात्मानौ नारायणसुराधिपौ ।।१० चकम्पे वसुधा कृत्स्ना नौलस्थेव भारत । दिशा दाहेन दिग्देशाः सवृताश्च समन्ततः ॥११ चेलुगिरिवराश्चैव तुश्च शतशो द्रमाः । पेतुश्च धरणीपृष्ठे मां धर्मगुणान्विता ॥१२ निर्घाताः शतशश्चान्ये पेतुस्त नराधिप । हुश्च सरितः सर्वाः प्रतिस्रोतो विशापते ॥१३ विष्वग्याता ववुश्चव पेतुरुल्काश्च निष्प्रभाः ।। मुहमुंहभूतमना रथनादेन मोहिताः ॥१४ इन्द्र ने भी श्रीकृष्ण के पश्वों पर भीषण बस्त्र वर्षा की जिससे ये बाच्छा दित होगये ।। ८ ।। इस प्रकार इन्द्र और कृष्ण दोनो ही अपने-अपने रपोप बंटे रहर दिन नरनिरतर सामरत रहे ॥१०॥ उस युरोकार सृषिको यार में पलने वासी नाव के समान डगमग करने लगी और दसोदित बस्ती ईठी ॥११॥ परंतु पापा मग, पृपियो पर गिरे हुए कदर सगरे, योर मनुष्प गम पृपियो पर सेट गये ।। १२॥ संरको पर राए८ साप धाभास रान मा और नत-नदिया प्रवाह बदल गये ।। १३ पारिजात का द्वारका लाया जाना ] [ ४५६ बायु बवडर बन कर चक्कर काटने लगा, उल्काओं की प्रभा नष्ट होगई तथा रथ-चक्रों के भीपण शब्द से ससार के सभी प्राणी चेष्टा हीन होकर पृथिवी पर गरने लगे ।। १४ ॥ . प्रजज्वाल जले चैव वह्विर्जनपदेश्वर । युयुधुश्च ग्रहः साद ग्रहा नमसि सर्वतः ॥१५ ज्योतीपि शतशः पेतुः स्वर्गाच्च धरणीतलम् । दिशा गजाः प्रकुपिता नागाश्च धरणीतले ॥१६ गर्दभारुणसंस्थान श्छिन्नाभ्रंश्चावृत नभः । विनदद्भिर्महारावानरूक्षशोणितपिभिः ।।१७ न भून द्यौन गगनं नरेन्द्रवृपभाभवन् । खस्थानि सुरवीरौ तु दृष्ट्वा युद्धगतो तदा ॥१८ जेपुमुनिगणा मन्साञ्जगतो हितकाम्यया । ब्राह्मणाश्च महात्मानो ह्यतिष्ठस्तेषु सत्वराः ।।१६ ततो ब्रह्मा महातेजाः कश्यप वाक्यमब्रवीद । गच्छ वध्वा सहादित्या पुती वारय सुव्रत ॥२० स तथेति तदा देवमुक्त्वा पद्मभव मुनिः । जगाम रथमास्थाय नस्थी नरवरान्तिके ।।२१ अपनी-अपनी पुरो पर घूमते हुए ग्रहों मे परस्पर भिडंत होगई और जल में आग लगती हुई दिखाई दो॥ १५॥ आकाश से असख्य नक्षत्र टुट-टूट कर पृपिवी पर गिरने लगे। नाग और दिग्गज भी इस युद्ध से क्षुब्ध हो उठे ॥१६॥ वरुणवणं के हिन्न-भिन्न हुए बादलो से बाकाश भर गया, उनसे भयकर बन्द होने सगा, उल्ला-पात के साथ रुधिर की वर्षा होने लगी ॥१७॥ उस समय भूमि, बाकारा और स्वयं का भी पता न लगता या, विश्व-कल्याण की कामना नाले महपि तथा विप्रगए मत्रो यो अपने लगे ॥१८-१६। इसके पश्चात ब्रह्माजी ने महर्षि कश्यप को अपने पास बुलाया और उनसे बोले-दे सुयत ! आप अपनी अदिति को अपने पुत्रो के पास लेजाइये और उन्हें युद्ध रो में निवारण कीविय ।
४६० ] [ श्री हरिवपुराण ॥ २० ॥ ब्रह्माजी का आदेश सुन कर कश्यपजी अपनी नायर्या अदिति के साथ रथ पर चढ़ कर अपने पुत्रो के पास पहुंचे ॥ २१ ॥ स्थित तु कश्यप दृष्ट्वा सहादित्या तदाऽन्तरा। उभी रथाभ्या धरणीमवतीणों महावलो ।।२२ न्यस्तशस्तौ च तौ वीरौ ववन्दतुररिंदमौ । पितरौ धर्मतत्त्वज्ञो सर्वभूतहिते रती ।।२३ उभौ गृहीत्वा हस्ताभ्यामदितिस्त्वववीद्वच । असोदराविवैव किमन्योय हन्तुमिच्छन ॥२४ स्वल्पमर्थं पुरस्कृत्य प्रवृत्तमतिदारुणम् । सदृश नेति पश्यामि सर्वथा मम पुनयो ॥२५ श्रोतव्य यदि मातुश्च पिनुश्चैव प्रजापते । न्यस्तशस्त्रो स्थितौ भूत्वा कुरुत वचन मम ।।२६ तथेत्युक्त्वा च तौ देवौ स्नातुकामो महावलौ । गगा जग्मतुरेवाथ प्रजल्पन्तौ परस्परम् ।।२७ अत्यन्त प्रतापी दोनो पुत्रों ने जैसे ही माता पिता को सम्मुख देखा, वैसे ही अपने-अपने शस्त्रो को त्याग कर रथ से उतरे और धर्मतत्वज्ञ तथा लोकहित में तत्पर उन दोनो के चरणो मे प्रणाम किया ॥ २२-२३ ॥ तभी देवमाता अदिति ने इन्द्र और कृष्ण दोनो के मस्तक पर हाथ फेर कर कहा-पुत्रो । तुम दोनो विमाता से उत्पन्न भाइयो के समान परस्पर मे एक दूसरे की हत्या करने मे क्यो उद्यत हो ? ॥ २४ ॥ यह कार्य मेरे पुत्रो के अनुरूप नहीं हैं फिर तुम ऐसे सामान्य कार्य के लिये यह भयानक कर्म क्यो कर रहे हो? ॥२५॥ यदि तुम माता पिता को आज्ञा मानना अपना कर्तव्य समझते हो तो तुरन्त ही हमारी बात पर ध्यान देते हुए युद्ध बन्द कर दो ॥ २६ ।। इस प्रकार माता- पिता की आज्ञा मान कर इन्द्र और कृष्ण ने युद्ध बन्द कर दिया तथा गगा स्नान को चलते हुए परस्पर प्रेमपूर्वक वार्तालाप करने लगे ॥ २७ ।। त्व प्रभुलॊककृत्कृत्स्नराज्येऽह स्थापितस्त्वया । स्थापयित्वा कथ नाम पुनर्मामवमत्त्यसे. ॥२ पारिजात का द्वारका लाया जाना ] [ ४६१ भ्रातृत्वमुपगम्यव ज्येष्ठत्व चाप्यपोह्य च । कथं कमलपत्राक्ष निर्वाण कर्तुमिच्छसि ॥२५ स्नाती तु जाह्नवीतोये पुनरभ्यागती नृव । यतादिति: कश्यपश्च महात्मानौ दृढतो ॥३० प्रियसगमन नाम त देश मुनयोऽवदन् । यत्र तो सगती चोमो पितृम्या कमलेक्षणी ॥३१ ततः शक्रस्य कोरव्य दत्त्वा वाचाऽभय तदा । यत देवगणा सर्वे समेता धर्मचारिणः ॥३२ ततो ययुर्विमानस्तु देवाः सर्वे रिविष्ठपम् । दया परमया युक्तास्तेषामेवानुरूपया ||३३ कश्यपश्चादितिश्चंव तथा शकजनार्दनी । विमानमेकमारुह्य गता राज त्रिविष्टपम् ॥३४ मी इन्द्र बोले-हे कृष्ण ! आप तीनोसको के अधीश्वर हैं, आपने ही से स्वर्ग का राज्य दिया है, तब आप मेरे अपमान करने मे क्यों उत्तर हुए ? २८॥ आपने मुझे अपना बड़ा भाई मान लिया तो मातृत्व के उस पवित्र नाते क्यों तोडना चाहते हैं ? ॥ २६ ॥ इन्द्र यह कह कर घुप होगये और दोनो ठा गगा स्नान करने महपि रश्यप और अदिति के पास वागये ॥३०॥ जिस स्थान पर इन्द्र और कृष्ण ने अपने माता-पिता से भेंट को पी, वह स्थान "प्रिय सगम' नाम से विस्मात हुआ ।। ३१ ।। इसके पश्वान् श्रीकृष्ण ने इन्द्र को अभय प्रदान किया और उनके साप स्वर्ग पतने को उद्यत हुए ।। ३२ ।। इसी समय सनी देवगण यया योग्य दिमानो पर आरूप होकर स्वयं की ओर चले ।। ३३ ।। कम्पप, अदिति, कृष्ण और इन्ट ने एकही विमान पर बैठ कर स्वर्ग को प्रापान किया ॥३॥ ते शकमदन प्राप्ता रम्यं सर्वगुणान्वितम अपुरेकल कौरव्य मुदिता धर्मचारिणः ।।३५ भची तु'कश्यपं पल्या सहित धमंवत्सला। उपाचरत्महात्मान' सर्वभूतहिते रतम् ॥१६ ४६२ ] [ श्री हरिवंशपुराण ततस्तस्या प्रभाताया रजन्यामनवीदरिम् । अदितिर्धर्मतत्त्वज्ञा सर्वभूतहित वच. ।।३७ उपेन्द्र द्वारका गच्छ पारिजात नयस्य च । वध्वा सप्रापयस्वेश पुण्यक हृदये स्थितम् ।।३८ पण्यके सत्यया प्राप्ते पुनरेष त्वया तरु । नन्दने पुरुषश्रेष्ठ स्थाप्य स्थाने यथोचिते ॥३६ एवमस्त्विति कृष्णेन देवमाता यशस्विनी। उक्ता धर्मगुणयुक्ता नारदेन महात्मना ।।४० ततोऽभिवाद्य पितर मायर च जनार्दन । महेन्द्र सह शच्याऽथ प्रतस्थे द्वारका प्रति ॥४१ वहाँ जाकर सब एक ही स्थान पर बैठे और इन्द्राणी ने परम उपकार करने वाले सास श्वसुर का पूजन किया ।। ३५-३६ ॥ फिर रात्रि के व्यतीत होने पर प्रभाव हुआ तव धर्म-तत्व के जानने वाली माता अदिति ने भगवान् श्रीकृष्ण से कहा कि हे उपन्द्र | हे कृष्ण । अब तुम द्वारका जाओ और अपनी पत्नी को इस पुण्य के कारण रूप पारिजात को दे दो ॥ ३७-३८॥ वहाँ का कार्य पूर्ण होने पर इसे पुन यही नन्दनकानन मे लाकर स्थापित कर देना ॥३६॥ देवर्षि नारद ने अदिति को बात का अनुमोदन किया तब श्रीकृष्ण अदिति, कश्यप, इन्द्र और इन्द्राणी आदि को नमस्कार कर पारिजात सहित द्वारका को चल दिये ॥ ४०-४१ ॥ ॥ पट्पुर का वध ॥ वंशम्पायन धर्मज्ञ व्यासशिष्य तपोधन । पारिजातस्य हरणे षट्पुर परिकीर्तितम् ॥१ निवासोऽसुरमुख्याना दारुणाना तपोधन । तेपा वध मुनिश्रेष्ठ कोतपस्वान्धकस्य च २ त्रिपुरे निहते वोरे कद्रेणाक्लिष्टकर्मणा। सस प्रधाना यहवो बभूवुरसुरोतमा. ॥३ पद्पुर का वव ] [ ४६३ शराग्निना न दग्धास्ते रुद्रेण त्रिपुरालयाः । पष्ठिः शतसहस्राणि न न्यूनान्यधिकानि च ॥४ ते शातिवधसतप्ताश्चक वीराः पुरा तपः । जम्बूमार्गे सतामिष्ट महपिंगणसेविते ॥५ आदित्याभिमुवा वीराः सहस्राणा शत समाः । वायुभक्षा नृपयेष्ठ स्तुवन्त: पद्मसंभवम् ॥६ उस वृतान्त के उपरान्त जनमेजय ने वैशम्पायनजी से कहा-हे व्यास- शिष्य वैशम्पायनजी ! हे तोरन ! आप सब वृत्तान्तो के ज्ञाता हैं । बापने पारि- पात-हरण के प्रसग में पट्पुर के विषय में कहा था, इसलिये आप कृपया उन पटपुर वासी दैत्यो और अचकापुर के मारे जाने की कया कहिये ॥१२॥ वैशम्पायनजो ने कहा है राजन् ! जब भगवान् शकर और त्रिपुरासुर के मध्य सग्राम हुआ था, उस समय अनेको दानव युद्ध में उपस्थित हुए थे ।।३।। परन्तु, जी ने त्रिपुरासुर के अतिरिक्त अन्य किसी भी दानव को अपनी शराग्नि से दग्ध नहीं किया। उस समय वहां साठ लाख से अधिक दानव नहीं थे ॥४॥ समी दानव अपने वाधव त्रिपुरामुर के मारे जाने से अत्यन्त सतप्त होते हुए ऋषियो द्वारा सेवित जम्बू मार्ग पर निवास करने लगे और वहां उन्होंने ब्रह्माजी की स्तुति करते हुए केवल वायु नक्षण पूर्वक सूर्य की ओर मुख करके एक सहन वर्ष तक कठिन तपस्या की ।।५-६॥ तेपामुदुम्बरं राजन्गण एकः समाश्रितः । वृक्ष ततावसन्वीरास्ते कुर्वन्तो महत्तमः ॥७ कपित्यवृक्षमाश्रित्य केचित्त तोपिताः पुरा । शृगालवाटीस्त्वपरे वेरुरुग्रं तथा तपः।। वटमूले तथा चेरुस्तपः कोरवनन्दन । अघीयन्तो परं ब्रह्म वटं गत्वाऽमुरात्मजा: 6 तेषां तुष्टः प्रजाकर्ता नरदेवपितामहः । वरं दातुं सुरश्रेष्ठ: प्राप्तो धर्मभृतां वरः ॥१० ४६४ ] [ श्री हरिदशपुराण वर वरयतेत्युक्तास्ते राजन्पायोनिना । नेपुस्तद्वरदानं तु द्विपतस्त्र्यंबक विभुम् ॥११ इच्छन्तोऽपचिति गन्तुज्ञानिना कुरुनन्दन । तानुवाच ततो ब्रह्मा सर्वज्ञः कुरुनन्दन ।।१२ विश्वस्य जगत कतुं : सहतुश्च महात्मनः । क शक्तोऽपचितिं गन्तु माऽस्तु वोऽत्र वृथा श्रमः ॥१३ उनमे से कोई गूलर के नीचे बैठ कर ठप कर रहे थे, कोई शृगालवाटो वृक्ष की छाया मे बैठ कर उपासना रत थे और कोई वट वृक्ष के मूल पर बैठ कर वेद मत्रो के उच्चारण पूर्वक ब्रह्माजी की उपासना कर रहे थे ॥७-६।। तर उनके तप से ब्रह्माजी अत्यन्त प्रसन्न हुए उन्हे वर देने के लिये वहां पहुंचे ॥१॥ वे बोले-हे दानवो | मैं तुम्हारे तप से अत्यन्त प्रसन्न हुआ हूं, इसलिये तुम इच्छित वर मांगो । दानवो ने कहा-हे प्रभो शिवजी ने हमारा जो अहित किया है, उनसे अपना बदला चुका कर हम अपने वधुओं के ऋण से उन होना चाहते हैं, यही हमारी इच्छा है इस पर ब्रह्माजी बोले-हे दानवो ! भग- चान् शकर तो इस ससार के रचयिता और सहारक हैं, उन्हे भला कौन मार सकता है ? इसलिये तुम्हारा यह विचार सफल नहीं हो सकता ॥११-१३॥ अनादिमध्यनिधनः सोमो देवो महेश्वरः। तमसूय सुख स्वर्गे वस्तुमिच्छन्ति ये सुराः ॥१४ ते नेपुस्तत्र केचित्तु दुरात्मानो महासुरा. । अथेपुरपरे राजन्नसुरा भव्यभावना. ।।१५ नेपुर्य सुदुरात्मानस्तानुवाच पितामह । वरयध्व वर वीरा रुद्रक्रोधमृतेऽसुराः ।।१६ त ऊचु सर्वदेवानामवध्याः स्याम हे विभो। पुराणि षट् च नो देव भवन्त्वन्तर्महीतले॥१७ सर्वकामसमृदार्थ पट्पुर चास्तु न. प्रभो । वय च पटप र गत्वा वसेम च सुख विभो ॥१८ पटपुर का वध ] [ ४६५ रुद्रादुन भय न स्याद्यन नो ज्ञातयो हता । निहत त्रिपुर दृष्ट्वा भीता स्म तपसा निधे ॥१९ असुरा भवतावध्या देवाना शङ्करस्य च । न वाधिष्यथ चेद्विप्रान्सत्पथस्थान्सता प्रियान् ।।२० विप्रोपघात मोहाच्चेकरिष्यथ कथ चन । नाश यास्यथ विप्रा हि जगत परमा गति ॥२१ ब्रह्माजी की यह बात सुन कर जो दानव शिवजी के पराक्रम को जानते थे, वे तो सहमत होगये, परन्तु जो शिवजी से विरोध करके स्वग म सुख से रहना चाहत थे, उहाने ब्रह्माजी की बात नहीं मानी । इसलिय ब्रह्माजी न उनसे कहा-हे दानवो । शिवजी की क्रोध-वृद्धि करने वाले वर के अतिरिक्त तुम्हें कोइ अन्य वर मांग लना चाहिय ॥१४ १६॥ तब उन दुष्टों ने कहा-हे प्रभो । देवाण हमे न मार सके और हमारे निवास के लिय पृथिवी के नोच छ पुर वन य ॥१७॥ यह छहो पुर सुख, सम्पत्ति और ऐश्वय से परिपूरण हो, जिससे के हम उन पुरों में जाकर सुख से निवास कर सकें ॥१८॥ शिवजी न हमारे अन्य बांधवा के साथ विपुगसुर को भी मार दिया है, जिससे हम बहुत मय उपस्थित हुआ है । इसलिय आप हमारे लिय एसा यल करें जिसमे हम उनके भय से मुक्त हो जाये ॥१३॥ इस पर ब्रह्माजी ने कहा-ह दानवा | यदि तुम सत्य माग के अनुपायो ब्राह्मणो को दु स न दागे तो तुम शिवजी अथवा अन्य किसी भी देता द्वारा नही मारे जा सकोग ॥२०॥ इमफ विपरीत यदि तुमने किसी ब्राह्मण का अपकार किया तो तुम्हारा नाश हो जायगा ॥२१॥ नारायणाद्विभेतव्य कुवद्भिाह्मणाहितम् । सर्वभूतेषु भगवान्हित धत्ते जनार्दन ॥२२ ते गता असुरा राजन्ब्रह्मणा ये विसजिता । येऽपि भक्ता महादेवमसुरा धर्मचारिण ॥२३ स्वय हि दर्शन तेपा ददो लिपुरनाशन । । श्वेत वृपभमारुह्य सोम सप्रवर प्रभु । उवाचेद च भगवानसुरान्स सता गति ॥२४ - ४६६ ] [ श्री हरिवंशपुराण वैरमुत्सृज्य दम्भं च हिंसां चासुरसत्तमाः । मामेव चाथितास्तस्मातर साधु ददामि वः ॥२५ यैर्दीक्षिताः स्थ मुनिभिः सक्रियापरमद्विजः । सह तैर्गभ्यता स्वर्गः प्रीतोऽहं वः सुकर्मणा ॥२६ इह ये चव वत्स्यन्ति तापसा ब्रह्मवादिनः । अपि कापिस्थिका वृक्ष तेपा लोको यथा मम ॥२७ क्योकि इस विश्व की परम गति ब्राह्मण हैं, इसलिये उनके अपकार करने से विष्णु रुष्ट होगे ॥२२।। हे राजन् ! इस प्रकार वर पाकर दैत्ययण विदा हुए। उनमें से जो शिव-भक्त थे उनके सम्मुख वृषभवाहन भगवान शिवजी स्वय प्रकट होकर उनसे बोले-हे दानवो । तुम्हारे वैर, दम्भ और विद्वेप को छोड़ कर मेरे शरण मे थाने से मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ हूँ और तुम्हें वर देता हूं कि जिन सत्य- निष्ठ ब्राह्मणो से तुमने सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा ली है, उनके साथ तुम भी स्वर्ग लोक को प्राप्त होगे, क्योकि मैं तुम्हारे सदाचरण से बहुत सतुष्ट हुअर हूँ ॥२३-२६।। जो इस गूलर के नीचे बैठ कर तप करेंगे, वे मेरे सालोक्य के' अधिकारी होगे ।।२७॥ ॥ श्रीकृष्ण का षट्पुर को प्रस्थान । एतस्मिन्नेव काले तु चतुर्वेदषडङ्गवित् । ब्राह्मणो याज्ञवल्क्यस्य शिष्यो धर्मगुणान्वितः॥१ ब्रह्मदत्त ति विख्यातो विप्रो वाजसनेयिवान् । अश्वमेधः कृतस्तेन वसुदेवस्य धीमतः ॥२ स सवत्सरदीक्षाया दीक्षितः पटपुरालयः। आवर्तायाः शुभे तीरे सुनद्या मुनिजुष्टया ॥३ सखा च वसुदेवस्य सहाध्यायी द्विजोत्तमः। उपाध्यायश्च कौरव्य क्षीरहोता महात्मनः ॥४ वसुदेवस्तत्र यातो,देवक्या सहितः प्रभो। जयमान पट पुरस्थं यथाशको बृहस्पतिम् ॥
... श्रीकृष्ण का पट्पुर को प्रस्थान ] [ ४६७ तत्सतं ब्रह्मदत्तस्य वह्वन्न बहुदक्षिणम् । उपासन्ति मुनिश्रेष्ठा महात्मानो दृटवता. ६ व्यासोऽह याज्ञवल्क्यश्च सुमन्तुजैमिनिस्तयः । धृतिमाजावलिश्चव देवलाद्याश्च भारत ॥७ वंशम्पायनजी ने कहा ह राजन् ! इसी समय में चार वेद और यहाँ बगो के ज्ञाता याज्ञवल्क्य के शिष्य ब्रह्मदत्त ने पट्पुर मे वावर्ती नदी के किनारे वसुदेवजी के लिए एक वर्ष तक चलने वाला बश्वमेध यज्ञ किया ॥१-३॥ ब्रह्म- दत्त वनुदेवजी के सहपाठी, उपाध्याय, अव्वयु के नाथ ही उनके परम मित्र भी थे.॥४॥ इन्द्र के वृहस्पतिजी के पास जाने के समान देवकी के सहित वसुदेवजी ने यज्ञ को दीक्षा ली और ब्राह्मण श्रेष्ठ ब्रह्मदत के पान पद्पुर जा पहुंचे ॥२॥ जिस प्रकार उस यज्ञ मे बन्न दान दिया जाता था, उसी प्रकार प्रचुर दक्षिणा देने की भी व्यवस्था थी। यज्ञशाला मे बहुत-से दृढव्रती महारमामय पधारे हुए ॥६॥ मैं, वेदव्यास, यानवलय, सुमन्तु, जैमिनी, बागलि और देवल आदि बहुत से पि, महर्षि उपस्थित थे॥७॥ ऋद्धयाऽनुरूपया युक्त वसुदेवस्य धीमतः । योप्सितान्ददी कामान्देवको घर्मचारिणी ॥ वासुदेवप्रमावेण जगत्त्रप्टुमहीतले । तस्मिन्सने वर्तमाने देत्या पट पुरवासिनः ॥६ निकुम्भाद्याः समागम्य तमूचुर्वरदर्पिता.। कार्यता यज्ञमागो न. सोम पास्यामहे वयम् । कन्याश्च ब्रह्मदत्तो नो यजमानः प्रयच्छतु ।।१० वह्वधः सन्त्यस्य कन्याश्च ल्पवत्यो महात्मनः । आहूय ताः प्रदातव्याः सर्वथैव हि नः श्रुतम् ।।११ रलानि च ब्रह्मदत्तो विशिष्टानि ददातु नः । अन्यया तु न यष्टव्यं वयमाज्ञापयामहे ।।१२ एतद्र, त्या ब्रह्मदत्तस्तानुवाच महासुराद। यज्ञमागो न विहितः पुरागेऽसुरसत्तमाः ।।१३
"
४६८ ]
[ श्री हरिवशपुराण
कथं सो सोमपान शक्य दातुं मया हि कः ।
पृच्छतेह मुनिश्रेष्ठान्वेदभाष्यार्थकोविदान् ।।१४
वसुदेवजी को श्रद्धा के अनुसार धर्म का आचरण करने वाली देवकी आये
हुए व्यक्तियो का सत्कार कर रही थी।८॥ इन सब कार्यों में भगवान कृष्ण
की महिमा ही दिखाई दे रही थी, यज्ञ का अनुष्ठान ठीक प्रकार से चल रहा था,
तभी पट्पुर मे रहने वाले निकुम्भादि दानवो ने वहां आकर गर्वयुक्त वाणी मे
कहा-हे यजमान् । तुम हमारे लिये यज्ञ-भाग दो, हम भी सोम-पान की इच्छा
करते हैं । हमे ज्ञात हुआ है कि ब्रह्मदत्त की बहुत-सी सुन्दरी कन्याएं हैं, उन
सभी को हमे दे दो ॥६-११॥ इसके अतिरिक्त यहाँ जो भी श्रेष्ठ रत्न हैं, वे
सब भी हमे सौप दो, अन्यथा तुम्हारा यह यज्ञ कभी भी पूर्ण नहीं हो सकेगा
॥१२॥ यह सुन कर ब्रह्मदत्त बोले-हे असुरश्रेष्ठ ) वेदो में आपके लिये यज्ञ-
भाग की कहीं व्यवस्था नहीं है तो हम आपके लिये पक्ष-भाग और सोमरस !
किस प्रकार दे सकते हैं ? यहाँ वेदभाष्य के ज्ञाता अनेकों मुनिजन उपस्थित हैं,
आप चाहें तो उनसे पूछ लें ।।१३-१४॥
कन्या हि मम या देयास्ताश्च सकल्पिता मया।
अन्तर्वेद्यां प्रदातव्याः सदृशानामसरायम् ॥१५
रत्नानि तु प्रयच्छामि सान्त्वेनाह विचिन्त्यताम् ।
बलान्नव प्रदास्यामि देवकीपुलमाश्रितः ।।१६
निकुम्भाद्यास्तु रुपिता: पापा: पट पुरवासिनः ।
यज्ञवाट विलुलुपुर्जह्र. कन्याश्च तास्तथा ॥१७
तदृष्ट्वा सप्रवृत्ता तु दध्यावानकदुन्दुभिः ।
वासुदेव महात्मान बलभद्रगदं तथा ॥१८
विदितार्थस्तत. कृष्णः प्रद्य म्नमिदमत्रवीद ।
गच्छ कन्यापरित्राणं कुरु पुत्राशु मायया ॥१६
पावधादवसन्येन पट पुर याम्यहं प्रभो।
स ययौ पट पुरं वीरः पितुरानाकरस्तदा ॥२०॥
. श्रीकृष्ण का पटुपुर को प्रस्थान ] [ ४६० निमेपान्तरमानण गत्वा कामो महावलः । कन्यास्ता मायया धीमानुपजह्न महावलः ।।२१ मायामयोश्च कृत्वाऽन्या न्यस्तवान्तक्मिणीसुतः । मा भैरिति च धर्मात्मा देवकीमुक्तवास्तदा ॥२२ बापने कन्यानो के देने की जो बात कही है, उस विषय में मेरे पूर्व निश्चयानुसार वे बन्तर्वेद प्रदेश ने अपने अनुरूप पतियों को प्राप्त होगी ॥१५॥ हां, रलों के विषय में यह है कि मैं यापको रत्न मी दे सकता हूं जव याप शातिपूर्ण ढंग से लेना चाहें, अन्यया हम श्रीकृष्ण के अनुयायी बल-प्रयोग द्वारा दो वह भी कभी नहीं दे सकते ॥१६॥ इन पर इष्ट होकर निकुम्नादि पापी दानवों ने यज्ञ को भा कर दिया और ब्रह्मदत की कन्याओं को बसान उठा कर ले गये ॥१७॥ यह देख कर वमुदेवजी ने कृष्ण, वलराम बोर गद को याद किया ॥१८॥ वनी श्रीकृष्ण को सव वा मालुम होगई और उन्होंने प्रद्युम्न को यात्रा दी हे पुत्र ! तुम शीघ्र ही पट्पुर को प्रस्यान करो और अपनी माता के प्रभाव ने ब्रह्मदत की कन्याओ को यचायो |॥१९॥ यह सुन कर प्रद्य म्न ने उत्तर दिया -हे ठाउ ! मैं अभी अपनी सेना के माय वहाँ जाठा हूं । यह कह कर प्रद्युम्न वहां से तुरन्न हो चल दिये ।।२०॥ निमेप मात्र में ही वहां पहुंच कर प्रद्युम्न ने उन दानवों को माया से निर्मित कन्याए देकर ब्रह्मदत को कन्यानो को उनसे छीन लिया और देवकी ने दोने कि नाप भय न करें ।।२१-२२॥ मापमयोस्तो हृत्वा मुता ह्यस्य दुरासदाः। पट पुर विविशुदैत्याः परितुष्टा नराधिर ॥२३ कर्मचासार्यते तव विधिदृष्टेन कर्मणा। यद्विशिट बहुगुण तदभूच्च नराधिप ।।२४ एतस्मिन्नन्तरं प्राप्ता राजानस्तत्र भारत । सनिमन्त्रिताः पूर्व ब्रह्मदत्तेन धीमता ॥२५ जरासन्धो दन्तवक्तः शिरा पालस्तयंव च । मण्डला धाराष्ट्रपच मलप्ता उमणालयास !
४७० ]
[ यो हरिदशपुराण
रुक्मी चैवाह तिश्चैव नीलो वा धर्म एव च ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यो शल्यः शकुनिरेव च ॥२७
राजानश्चापरे वीरा महात्मानो दृढायुधाः
आवासिता नातिदूरे पट पुरस्य च भारत ॥२८
उधर वे दानव उन मायामी कन्याओ को लेकर अत्यन्त हर्षित होते
हुए अपनी पुरी मे गये ॥२३॥ इधर यज्ञ का शेप रहा कार्य भी विधि विधान
सहित निर्विघ्न पूर्ण होगया ॥२४॥ तभी ब्राह्मण श्रेष्ठ ब्रह्मदत्त द्वारा निमनित
किये गये राजागण सब ओर से आ-आकर वहाँ एकत्रित होगये ॥२५॥ जरासन्ध
दन्तवक्त्र, शिशुपाल, पाण्डवगण, धृतराष्ट्र-पुत्रगण, मालवगण, रुक्मी, आवृति
नोल, धर्म, विन्द, अनुविन्द, आवस्य, शन्य, शकुनि तथा अन्यान्य अनेकों राजाने
ने वहां आकर अपने अपने डेरे लगा लिये ॥२६-२८॥
तान्दृष्टा नारद श्रोमानचिन्तयदनिन्दितः।
क्षत्रस्य यादवाना च भविष्यति समागमः ॥२६
अत्र हेतुरह युद्ध तस्मात्तत्प्रयताम्यहम् ।
एव सचिन्तयित्वा स निकुम्भभवन गतः । ३०
पूजित. स निकुम्भेन दानवैश्च तथाऽपरै।
सपविष्टः स धर्मात्मा निकुम्भमिदमब्रवीत् ॥३१
कथ विरोध यदुभि कृत्वा स्वस्थैरिहास्यते ।
यो ब्रह्मदत स हरिः स हि तस्य विभुः सखा ॥३२
शतानि पञ्च भार्याणा ब्रह्मदत्तस्य धीमत ।
आनीता वसुदेवस्य सुतस्य प्रियकाम्यया !!३३
शतद्वय ब्राह्मणीनां राजन्याना शत तथा ।
वैश्याना शतमेकं च शूद्राणा शतमेव च ॥३४
देवपि नारदजी ने जब उन सब राजाओ को इकट्ठे हुए देखा
सोचने लगे कि अब कोई ऐसा उपाय करना चाहिये जिससे युद्ध छिड जाय
ऐसा निश्चय करके महर्षि नारद निशुम्भ के भवन मे जा पहुंचे ॥२६-३०॥ उन्ह
श्रीकृष्ण का पदपुर को प्रस्थान ] [ ४७१ देखते ही निकुम्भादि दानव उनका स्वागत करते हुए उठे ठया उनसे समुचित सत्कृत हुए मृपि ने आसन पर बैठ कर उनसे कहा ॥३१॥ हे दानवो ! यादवो से वैर करके भी तुम ऐसे निश्चिन्त क्यो होरहे हो ? देखो कृष्ण और ब्रह्मदत्त मे अत्यन्त मैत्री है ॥३२॥ भगवान कृष्ण के अनुग्रह से ही ब्रह्मदत्त ने पांच सौ सुन्दर नारियां प्राप्त की हैं ॥३३॥ उनमे दो सौ ब्राह्मणी, सौ गाणी, सो वैश्याएं और सौ सूदाएं हैं ॥३४॥ ताभिः शुश्रूपितो धीमान्दुर्वासा धर्मवित्तमः। तेन तासा वरो दत्तो मुनिना पुण्यकर्मणा ।।३५ एककस्तनयो राजन्नेकका दुहिता तथा । रूपेणानुपमाः सर्वा वरदानेन धोमतः ॥३६ कन्या भवन्ति तनयास्तस्यासुर पुनः पुनः । सङ्गमे सङ्गमे वीर भर्तृ मिः शयने सह ॥३७ सर्वपुष्पमय गन्ध प्रस्रवन्ति वराङ्गनाः । सर्वदा यौवने न्यस्ताः सर्वाश्चैव पतिव्रताः ॥३८ सर्वा गुणैरप्सरसा गीतनृत्यगुणोदयम् । जानन्ति सर्वा देतेय वरदानेन धीमतः॥३६ पुनाश्च रूपसपन्नाः शास्त्रार्थकुशलास्तथा। स्वे स्वे स्थिता वर्णधर्मे यथावदनुपूर्वशः ॥४० ताः कन्या भममुख्याना दताः प्राणेन धीमता। अधशेप शत त्वेक यदानीत किल त्वया ॥४१ तदर्थे यादवान्वीर योधयिष्यसि सर्वथा। सहायार्थ तु राजानो वियन्तां हेतुपूर्वकम् ॥४२ उन सभी ने महषि दुर्वासा को सेवा-सुश्रपा को घी और तव महपि ने होकर उन्हें वर दिया था कि तुम प्रत्येक वार के पति-सहवास में एक- पुत्र और एक-एक कन्या प्राप्त करोगो ॥३५-३७॥ वे कन्याएं सुन्दर अग, सो गप, स्थिर यौवन बाती राया नृत्य-गान-कुशला और पति-परायणा होगी ४७२ ] [ श्री हरिवशपुराण ॥३८-३६॥ पुत्र भी अत्यन्त सुन्दर, शास्त्रार्थ के ज्ञाता तथा अपने अपने वर्ण- के मानने वाले होग ॥ ४० ॥ इस प्रकार दुर्वासा के वर से प्राप्त हुई उन कन्याओ को ब्रह्मदत्त ने यादवो को दे दिया है । उनमे से केवल एक सौ बची थी, उन्हें ही तुम ला सके हो ॥ ४१ ) इसलिये शेप कन्याओ को प्राप्ति के लिये तुम्हें यहाँ आये हुए राजाओ से सधि करके यादवो से युद्ध फरना उचित है ॥ ४२॥ ब्रह्मदत्तसुतार्थं च रत्नानि विविधानि च । दीयन्ता भूमिपालाना सहायार्थ महात्मनाम् ।।४३ आतिथ्य क्रियता चैव ये समेष्यन्ति वै नृपाः । एवमुक्ते तथा चक्र रसुरास्तेऽतिहष्टवत् ॥४४ लब्ध्वा पञ्चशत कन्या रत्नानि विविधानि च । यथार्हेण नरेन्द्र स्ता विभक्ता भक्तवत्सला ॥४५ ते पाण्डुसुतान्वीरान्वारिता नारदेन ते । निमेपान्तरमाण तन गत्वा महात्मना ॥४६ तुष्टस्तैरसुरा ह्य क्ता राजन्भूमिपसत्तमै । सर्वकामसमृद्धार्थभवद्धि यगर्म स्वयम् ॥४७ अचिंता स्म यथान्याय क्षय किं व प्रयच्छतु । क्षन चाचिंतपूर्व हि दिव्यैर्वीरैर्भवद्विधै १४८ निकुम्भोऽयाब्रवीद्धृष्ट क्षत्र सुररिपुस्तदा । अनुवर्णयित्वा क्षरस्य माहात्म्य सत्यमेव च ॥४६ यदि रत्नादि वे प्रदान द्वारा भी वन्यायो की प्राप्ति के लिये तुम्हें आगत नरेशीम की सहायता प्राप्त हो सके तो लाभ हो है ॥ ४३ ।। इसमिय यहाँ जितने राजा आप हैं, उन्ह सत्यारादि पर अपनी ओर मिला लो। यह मुन पर दानयगण बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने राजाओ का धन रत्नादि पत्यार पर पाप सौ कन्याएं भी भेंट में दी। इससे प्रसन्न हुए राजाया रान और कन्याओं को परसार में सेंट लिया ॥ ४.४५ ॥ परन्तु, नाई श्रीकृष्ण का पटपुर को प्रस्थान ] [ ४७३ जी के कहने से पाण्डवों ने उस वटवारे में कोई सहयोग नहीं दिया ॥४६॥ जिन राजाओ ने धन-रल और कन्यादि को प्राप्त श्यिा या, उन्होंने दानवों से कहा कि आप ठो वंभवादि मे देवताओं के समान हैं, कोकि आपके पास किसी भी वस्तु की न्यूनता नहीं है ॥४७॥ आपने हमारा जैसा आतिथ्य-सत्कार एवं यभ्यर्थना की है, वैसी कभी किसी के द्वारा नहीं हुई । इसलिये हम सब आप लोगो का उपकार करने में तत्पर है ॥४८॥ यह मुन कर देवताओ के गनु निकुम्भ ने हर्षपूर्वक उन राजानों के बल-वीर्य की प्रशसा की ॥६॥ युद्ध नो रिपमिः साद्धं भविप्यति नृपोतमाः । साहाय्य दातुमिच्छामो भवद्भिस्तत सर्वया ।।५० एवमस्त्विति तानूचुः क्षन्निया: क्षीणकिल्विपाः । पाण्डवेयानृते वीरा तार्यान्नारदाद्विभो ॥५१ क्षत्रियाः सन्निविष्टास्ते युद्धायं कुरुनन्दन । पल्यस्तु ब्रह्मदत्तस्य यज्ञवाटगता अपि ॥५२ कृष्णोऽपि सेनया साई प्रययो पट पुरं विभुः। महादेवस्य वचनमुदहन्मनसा नृप ।।५३ स्थापयित्वा द्वारवत्यामाहुक पार्थिव तदा । स तया सेनया नार्द्ध पौराणा हितकाम्यया ॥५४ यज्ञवाटस्याविदूरे देवो निविविवे विभुः । देशे प्रवरकल्याणे वमुदेवप्रचोदित. ॥५५ दत्तगुल्मप्रतिसरं कृत्वा त विधिवत्प्रभुः । प्रद्युम्नमटने श्रीमान्रक्षाय विनियुज्य च ॥५६ है नरेगगए ! गला से हमारा शीघ्र ही युद्ध होन वाला है, उसमे पिको महापडा अपेक्षित है ॥५०॥ पाण्डवों के अतिरिक्त अन्य सभी रामागे निकुम्भ की बात स्वीकार को ॥५१॥ उन रागात्री ने पजगाला में ब्रह्म- त को पलिपो के उपम्पित होते हुए भी युट प्रारम्भ कर दिया ।। ५२ ।। पर श्रीान ने भी उन को शासन-नार वार कर बहव-नों सेना के
४७४ ]
[ श्री हरिवपुराण
सहित षट्पुर को प्रस्थान किया ॥५३॥ वहाँ जाकर उन्होंने वसुदेवजी के परा
मर्श से यज्ञशाला के निकट ही अपने डेरे डाल दिये ॥५४]] शिविर के सद
ओर रक्षक-चौकियां बना कर और प्रद्युम्न को उनकी रक्षा का भार देका
स्वय सब प्रकार को सावधानी को वर्तते हुए घूमन लगे ।।५५-५६।।
॥ षट्पुर युद्ध मे राजाओ का बन्द होना ।
मुहूर्ताभ्युदिते सूर्ये जनचक्षुपि निर्मले ।
वल कृष्ण सात्यकिश्च नार्यमारुहुस्तदा ।।१
बद्धगोधाइ गुलिताणा दशिता युद्धकाक्षिण ।
विल्वोदकेश्वर देव नमस्कृत्य सुरोत्तमम् ॥२
आवर्ताया जले स्नात्वा रुद्रण वरदत्तया।
गङ्गाया कुरुशार्दूल रुद्रवाक्येन पुण्यया ॥३
प्रद्य म्नमग्रे सैन्यस्य वियति स्थाप्य मानद ।
रक्षार्थ यज्ञवाटस्य पाण्डवान्विनियुज्य च ॥४
शेषा सेना गुहाद्वारि भगवान्विनियुज्य च ।
जयन्तमथ सस्मार प्रवर च सता गति ॥५
तावापेततुरेवाथ स्वय चापश्यता तया ।
वियत्येव नियुक्तौ तौ प्रद्युम्न इव भारत ।।६
तत कृष्णस्य वचनादाहतो रणदुन्दुभि ।
जलजा मुरजाश्चैव वाद्यान्येवापराणि च ॥७
वैशम्पायनजी ने कहा-हे राजन् । सूर्योदय होने पर वलराम, कृष्ण,
सात्यकि आदि शस्त्रास्त्रो से सुसज्जित होकर और गरुड पर चढ पर अपने
शिविरा से निरले एव शिवजी के वर से गगाजी के समान हुई आवर्ता नदी
में स्नान तथा बिल्वोदकेश्वर नगवान् का उन्होने दर्शन किया ॥१-३॥ सेना
के
बन भाग में प्रद्युम्न यो तथा यज्ञशाला की रक्षा के लिये पाण्डवो को नियुक्त
किस गया ॥४॥ को हुई सेना को गुफा के द्वार पर लगा कर श्रीकृष्ण ने इन्द्र
पटुपुर युद्ध में राजायों का बन्द होना ] [ ४७५ 5 पुत्र जयन्त बौर प्रवर नामक ब्राह्मण का स्मरण किया ॥५॥ इस पर वे दोनों पुरन्त ही उनके समक्ष आगये, तव उन दोनों को आकार्य मार्ग की रक्षा का भार पा गया ॥६॥ फिर श्रीकृष्ण के कहने पर सव और युद्ध के बाजे बजने लगे, जनमे दुदुनि, जलज, मुरज आदि वाजे विशेष उल्लेखनीय थे ॥७॥ माकरो रचितो व्यूहः साम्वेन च गदेन च । मारणश्चोदवश्चैव भोजो वंतरणस्तथा । अनाधृष्टिश्च धर्मात्मा पृथुविपृथुरेव च । कृतवर्मा च दष्ट्रश्च विचक्ष ररिमर्दनः ।। मनत्कुमारो धर्मात्मा चारुदेष्णश्च भारत । अनिरुद्धसहायौ तौ पृष्ठानीक ररक्षतुः।।१० शेपा यादवसेना तु व्यूहमध्ये व्यवस्थिता। रथरश्वन रैनांगराकुला कुलवर्द्धन ॥११ पट पुरादपि नितान्ता दानवा युद्धदुर्मदाः। बारह मेघनादांश्च गर्दभानपि हस्तिनः ।।१२ मकरान्छिशुमाराश्च द्रुतानपि च भारत । महिपानपि खङ्गाश्च उप्ट्रानपि च कच्छपान् ।।१३ एतरेव रथयुक्ता विविधायुधपाणयः । किरीटापीडमुकुटरगदरपि मण्डिताः ।।१४ साम्ब और गद ने मकर व्यूह बनाया । सारण, उदव, मोज, ववरण, अनावृष्टि, पृथु, विपृषु, पतवर्मा, मुदष्ट्र, और विचक्ष व्यूह के बीच में नियुक्त हुए ॥८- ननत्कुमार बोर चारदेष्ण बनिस्ट की सहायता से व्यूह के पिछले भाग को रक्षा में नियुक्त हुए ॥१०॥ रय, घोडे, हायी और पैदलो से युक्त सम्पूर्ण सेना मकर व्यूह के मध्य में रखी गई ॥११।। उपर युद्ध के लिये व्याकुल हुए दानय भी पदार से बाहर आये । उनमे से कुछ हापियों पर, बुध गयो कुछ मररों पर, बुध पोरों पर, कुछ नमो पर, कुब निगुमार पर, युद गंडा र, पुष ऊँटों पर बोर कुछ रखों पर बैठे हुए थे। उन सभी के मम्नरों पर मिट-पुकुट और हाथों में विविध प्रसार के स्वादि विधनान ये ॥१२-१॥
४७६ ]
[ श्री हरिवंशपुराण
नानर्दमान विविधस्तूर्येर्ने मिस्वनाकुलै ।
प्रध्मायमानै शङ्खश्च महाम्बुदसमस्वनै ।।१५
तासामसुरसेनानामुद्यताना जनेश्वर ।
निकुम्भो निर्ययावग्रे देवानामिव वासव ।।१६
भूमि द्या च ववृधिरे दानवास्ते बलोत्कटा ।
नदन्तो विविधान्नादान्क्ष्वेडन्तश्च पुन पुन ॥१७
राजसेनाऽपि सयत्ता चेदिराजपुरोगमा ।
असुराणा सहायार्थ निश्चिता जनमेजय ॥१८
दुर्योधन भ्रातृशत चेदिराजानुजाग्रगम् ।
स्थित रथेनरव्यत्र गन्धर्वनगरोपमै ।।१६
कठिना नादिनो वीरा द्रुपदस्यन्दनास्तया।
रुक्मी चैवाव तिश्चैव तस्यतुनिश्चिती रणे।
तालवृक्षप्रतीकाशे धुन्वानौ धनुषी शुभे ॥२०
शल्यश्च शकुनिश्चोभी भगदत्तश्च पार्थिव ।
जरासन्धस्त्रिगर्तश्च विराटश्च सहोत्तर ॥२१
युद्धार्थमुद्यता वीरा निकुम्भाधा जयैषिण ।
युयुत्समानायदुभिर्देवैरिव महासुरा ॥२२
यही तुरही बज रही थीं, वही रथ व पहियो का शब्द हो रहा था और
कहो नीपण मप गर्जना क समान शख ध्वनि हो रही थी ॥१५॥ देव-सेना के
आग इन्द्र व चलने क समान ही दानव श्रेष्ठ नियुम्भ दैत्य सेना के आगे आग
पसा ॥१६॥ प्रसाधारण बल वान व दानय अनर प्रकार स सिंहनाद करते हुए
सम्पूर्ण पृथिवी और आराम छा गये ॥१७॥ ह जनमजप । पेदिराब बस
पागण भी उन दयों की सहायता के लिये अपनी गना साप निकल पड़े
॥१८॥ दुर्योपन कसो नाईनी विशाल रखो पर पद पर अपनी सेनाओ
थाग पर ॥१६उस समय वीरों की गमाा ये साथ राजा पद बसपा
राम बहा नपानक प्रतीत होरहा था। ममी और पास्मृति उनी पुरा
विषार स्थिर पर तासभर समान प्रपा विशास धनुषाको टोर
पट्पर युद्ध में राजाओ का वन्द होना ] [ ४७७ १०॥ शल्य, शकुनी, भगदत्त, जरासघ, त्रिगत, विराट और उत्तर-इन सभी वोरो ने निकुम्भ का साथ दिया। इसके पश्चात् दैत्यो ने यादवो को चुनौती दी ॥२१-२२॥ ततो निकुम्भः समरे शरैराशीविपोपमैः । ममर्द समरे सेना भंमाना भीमदर्शनाम् ॥२३ सेनापतिरनाप्टिममृपे तन यादवः । ममर्द घोरैर्वाणोधश्चिनपुढे शिलाशित.॥२४ न रथोऽसुरमुख्यस्य ददृशे न च वाजिनः । न ध्वजो न निकुम्भस्तु सर्वे वाणाभिसवृताः ॥२५ स परीत्य ततो वीरो निकुम्मो मायिना वरः। अस्तम्भयदनाधष्टि मायया भमसत्तमम् ।।२६ स्तम्भवित्वाऽनयद्वीर गुहा पट पुरसतिताम् । सद वा चाम्यगमद्वीरो मायावलमुपाश्रितः ।।२७ पुनरेव निकुम्भस्तु कृतवर्माणमाहवे। अनयच्चारुदेष्ण च भोज वैतरण तथा ॥२८ सनत्कुमारमृा च तथैव निशठोल्मुको। बहू श्चवापरान्मोजान्मायावलसमाश्रितः ॥२६ इसके पश्चात् दानवराज निकुम्भ रणक्षेत्र में अग्रसर हुवा और सपों के समान लहराते हुए भीषण वाणो से यादवों की सेना को नष्ट करने लगा ॥२३॥ तब उस वारण-वर्षा को निष्फल करने के लिये यादवो के सेनापति अनाधुष्टि ने अपने बाणो का प्रयोग किया वोर निकुम्भ की सेना को मारने लगा ॥ २४ ॥ अनापुष्टि द्वारा को गयो वाण वर्षा से रथ, घोडे, प्वर आदि के सहित निम्न भी तक गया । २५॥ सब निकुम्भ ने अपनी माया के प्रभाव से अनापष्टि को मूचित कर दिया ॥२६॥ फिर वह स्वयं अप्रकट रहता हुवा बनायष्टि को उठा म अपनी कादरा मे ले गया और उम यही रस कर स्वयं फिर सुर में आइटा और रतवर्मा, चारदेण, तरए, सनत्कुमार, सुक्षपुत्र, निशठ, उन्मुक वादि ४७८ ] [ श्री हरिवंशपुराण अनेक यादवो को उसी प्रकार चेतना हीन कर करक कन्दरा में उठा ले गय ॥२७२६॥ न तस्य ददृशे देहो मायाच्छन्नो जनेश्वर । नयतो यादवान्योरान्गुहा पट पुरसज्ञिताम् ॥३० तदृष्ट्वा कदन घोर भमाना भयवद्धन । चुकोप भगवान्कृष्णो बल सत्यक एव च ॥३१ सविशेप तथा काम साम्बश्च परवीरहा । अनिरुद्धश्च दुर्धर्षो भमाश्च बहवोऽपरे ।।३२ तत शाायुध शाङ्ग कृत्वा सज्य नरेश्वर । दानवेषु प्रवृत्तपु तृणेष्विव हुताशन ॥३३ त दृष्ट्वा दानवा देवमभिदुद्र वुरीश्वरम् । शलभा कालपाशार्ता प्रदीप्तमिव पावकम् ॥३४ समुत्सृज्य शतघ्नीश्च परिघाश्च सहस्रश । शूलानि चाग्नितुल्यानि प्रदीप्ताश्च परश्वधान् ॥३५ पवताग्राणि वृक्षांश्च घोराश्च विपुला शिला । उत्क्षिप्य च गजान्मत्तान्रथानपि हयानपि ॥३६ इस प्रकार वह बारबार आकर एक-एक यादव को उठा ले जावा, उस समय वह अपने माया बल के कारण किसी को दिखाई नहीं देता था ।। ३० ॥ पादयों को सी दशा देस पर कृष्ण, बलराम, सात्यकि, प्रयुम्न और माम्म आदि सो बारत कोप हुया ।।३१-३२॥ फिर श्रीकृष्ण अपने पनुप को प्रत्या युक्त पर नृप म स्थित अग्नि के रामान दानवो के मध्य जा पहुंचे ॥३३॥ से मृत्यु के मभीए पहुंभ हुए पतग अग्नि की ओर भागते हैं, वैसे ही सर दानव धी. प्म को देखते हो उसी चोर दौर ॥३॥ उस ममय ये दानव अग्नि-वार क प्रमान पूल, फरस और पापर फेक फेंक कर यादवा के घोड़े, रथ, हार्य बारियो मार रह ॥५-१६॥ नारायणाग्निस्तान्मदिवाइ प्रहसन्निए । ध्यापिका महामान्याममोहर पटपुर युद्ध मे राजाओ का वन्द होना ) [ ४७६ शारदश्वर्पण यद्वत्सेहे धोरो गवा पति । तद्वद्यदुवृप. सेहे वाणवर्पमरिन्दम ॥३८ न सेहिरेऽसुरा वाणान्नारायणधनुश्च्युतान् । वर्ष पर्जन्यविहित वालुकासेतवो यथा ॥३६ न शेकु प्रमुख स्थातु कृष्णस्यासुरसत्तमा. । व्यादितास्यस्य सिंहस्य वृपभा इव भारत १४० ते वध्यमाना कृष्णेन दिवमाचक्रमुस्तदा। जीविताशा वहन्तस्तु नारायणमयोंदिता ॥४१ तानाकाशगतान न्द्रियन्तः प्रवरस्तथा । निजघ्नतु शरयों रज्वलितार्चिसमै प्रभो ॥४२ जैसे व क जल को बैल सहन करता है, वैसे ही वे शत्रुपक्ष के बागो को सहन कर रह थे । परन्तु श्रीकृष्ण ने जो वाण-वर्षा को, उसे वे सहन न कर सके और जल वर्षा से बालू के पुल के ढहने के समान ही दैत्यगण मृत्यु को प्राप्त होगये १३७-३६॥ जैसे मुख फैला कर आते हुए सिंह का सामना बैल नहीं कर सक्ता, वैसे ही श्रीकृष्ण के सामने दानवगण नही ठहर पाये ॥४०॥ और अपने प्राण नष्ट होने के भय से व्याकुल होकर आकाश मार्ग में उडने लग ॥ ४१ ।। परन्तु, वहीं जयन्त और प्रवर के होने से उनकी रक्षा नहीं हो सकी, क्योकि उन्होन बग्नि-शिखा के समान अपने वाणो की वर्षा करके म्ह नष्ट कर दिया ॥४२॥ तत. पाशसहस्राणि जग्राह प्रवरोत्तम । शैलादिरप्रवीद्वार रोक्मिणेय महावलम् ॥४३ विल्वोदकेश्वरो देव. प्राह त्वा यदुनन्दन । सव कुरु तथा राश्या चोक्तस्त्व मो यथा मया ॥४४ कन्यापं रत्ललुब्धास्तु बद वा चेमान्नराधिपान् । पास्त्वमेव मोक्तुच प्रमाण यदुनन्दन ॥४२ असुरस्तुि महावाहो नि.शेपाकतुं महंसि। एवमेव च वक्तव्यस्त्वया पोर जनार्दनः ।।४६
४८० ]
[ थो हरिवशपुराण
.
तत स भगदत्त च शिशुपाल च भूमिप ।
आढति व रुक्मि च शेषाश्चान्यान्नराधिपान् ॥४७
बबन्ध हरदत्तस्तै पाशरुत्तमवीर्यधृक ।
मायामयी गुहा चैवमानयत्कुरुनन्दन ॥४८
बद्ध वा च रौक्मिणेयोऽय नि श्वसन्त इवोरगान् ।
अनिरुद्ध चकाराथ रक्षितार स्वमात्मजम् ॥४६
तेपा निरवशेषेण बन्ध यदुनन्दन ।
सेनापतीक्षालयाश्च कोशाध्यक्षाश्च भारत ।।५०
हस्त्यश्वरथवृन्दाश्च चकार च तथात्मसात् ।
अव्यग्रस्तु ततो हन्तुमसुरानुद्यत प्रभो ॥५१
इसी अवसर पर भगवान् रुद्र के प्रधान पार्षद नन्दी सहयो पाशास्त्रो को
ग्रहण किये हुए वहाँ आये और उन्होने प्रद्युम्न से कहा ।। ४३ ॥ हे यदुनन्दन
भगवान् विल्वोदकेश्वर का कहना है कि मेरे द्वारा बतायी गई योजना के ब
सार चल कर आप इन लोभी राजाओ को पाशास्त्रो से बांध लें, फिर यह बा
की इच्छा होने पर ही मुक्त हो सकेंगे ॥४४.४५॥ देवदेव ने भगवान कृष्ण
प्रति भी यह कहा है कि वे दानवा को शीघ्र ही मार डालें ॥४६॥ तब प्रद्य
भगवान् शकर ये भेज हुए पाशास्त्र को नन्दीश्वर से लेकर सपों के सम
फुबार पेरत हुए भगदत्त, शिशुपाल, आति, रुयमी आदि राजाओ को उ
स बांध कर अपने द्वारा निर्मित मायामयी गुफा में बन्द कर दिया। फिर अप
पुत्र अनिस्ट को उनकी चौकसी पर नियुक्त कर प्रद्य म्न ने उन राजाओ के सेन
पतियों, सैनिकों, कोपाध्यक्षों, हापियो, घोड़ों और रथो आदि पर अपना ओ
पार कर लिया। इसके पश्चात् वे उन बचे हुए दानयो को मारने के लिये अ
ने
सन्नद एव चोवाच ब्रह्मदत्त द्विजोत्तमम् ।
विपन्ध वर्तता कर्म मा में मश्य धनञ्जयम् ।।५२
न देवभ्यो नामुरम्यो नागम्यो द्विजसत्तम ।
भयं हि विद्यते तस्य गोप्तारी यस्य पाण्डवाः ।।५३
-
-
पदपुर का वध ]
[
न चामुरैस्तव सुताः स्पृष्टाः सत्यपि चेतसा ।
यसवाटे निरीक्ष्यन्ता मायया निहिता मया ॥५४
उससे भी पहिले उन्होंने ब्राह्मण श्रेष्ठ ब्रह्मदत्त को यह आवासन देदिया
था कि जब आपके सामने धनजय अर्जुन उपस्थित हैं, तब आपको क्या आशका
है ? ॥५२॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! जिसकी रक्षा में पाण्डवयप नियुक्त हैं, उन्हें देवता,
दत्य, नाग आदि किसी से भी भय नही है दैत्यगण यापकी कन्यानो को छू भी
नहीं सकते, मैंने अपनी माया के प्रभाव से उनकी रक्षा का पूर्ण प्रध कर दिया
है ॥५३-५४॥
१ पटपुर का वध ॥
रुद्ध पु भूमिपालेषु सानुगेषु विशाम्पत्ते ।
आविवेशासुरांश्वाथ कश्मलं जनमेजय Int
दिशः प्रतस्थुस्ते वीरा वध्यमानाः समन्ततः।
कृरणानन्तप्रभृतिभिर्यु दुभिर्यु ढदुर्मदैः॥२
निकुम्मस्तानथोवाच रुपितो दानवोत्तमः ।
मित्वा प्रतिज्ञा कि मोहाद्भयार्ता यात विह्वलाः ॥३
होनप्रतिज्ञाः काल्लोकान्प्रयास्यथ पलायिताः।
अगत्वाऽपचितिं युद्ध मातीना कृतनिश्चयाः ॥४
फल जित्वव मोक्तव्यं रिपून्समरकर्कशान् ।
हतेन चापि शूरेण वस्तव्यं निदिवे मुखम् ।।५
पलायित्वा गृह मत्वा कस्य द्रव्यय हे सुखम् ।
दारान्वक्ष्यय किं चापि धिधिषिक कि लग्जय ॥६
एवमुक्ता निवृत्तास्ते लग्जमाना नृपासुराः ।
द्विगणेन च धेगेन युयुधुपंदुभिः राह ।।७
पंचमायनवी ने रहा है पवन ! पर अपने यनुगतों के सहित सब
राबागम बंदी हाय तव दरवास अत्यत सुबइए तपायोपालराम आदि
पसायनान रोप्राप्त होवे हा त्य-मनिक सभी दिता मापनापन करन सो
४५२ ] [ श्री हरिवशपुराण ॥१-२॥ यह देख कर दंत्यो के राजा निकुम्भ ने यत्यच क्रोध पूर्वक उन भारत वालो से कहा-अरे दानवो! तुम अपने निश्चय से फिर कर इस प्रकार क्यो भाग रहे हो ? वताओ, प्रतिज्ञा-भग करके युद्ध क्षेत्र से भागने वाले को किस लोक में स्थान मिलता है ? ॥४॥ युद्ध मे घोर शत्रु को हराने पर ही विजय श्री की प्राप्ति अथवा मर जाने पर स्वर्ग की उपलब्धि होती है ॥५॥ इस प्रकार भागने पर तुम्हे घर मे ही कौन-सा सुख मिलेगा ? तुम अपनी स्त्रियो को क्या उत्तर दोगे ? अरे क्या तुममे लज्जा का कुछ अंश भी नहीं बचा है ? ||६|| निकुम्भ की लल- कार सुन कर बचे हुए राजा और दैत्य लज्जित होकर सग्राम मे पहिले से भी दुगुने उत्साह से जुट पड़े ॥७॥ उत्सवे युद्धशौण्डानां नानाप्रहरणैर्नृप । ये यान्ति यज्ञवाट त तानिहन्ति धनञ्जयः ।। यमी भीमश्च राजा च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । द्या प्रयाताजघान न्द्रिः प्रवरश्च द्विजोत्तमः ।। अथासुरासृक्तोयाढ्या केशवलशाड्वला। चक्रकर्मरथावर्ता गजरी लानुशोभिनी ।।१० ध्वजकुन्ततरुच्छन्ना स्तनितोत्कष्टनादिनी। गोविन्दशैलप्रभवा भीरुचित्तप्रमाथिनी ॥११ अमृग्बुबुदफेनाढ्या असिमत्स्यतरङ्गिणी। सुधाव शोणितनदी नदीव जलदागमे ॥१२ जो भी युद्ध कुशल कोर शस्त्रास्त्र ग्रहण करके यज्ञ शाला में गये, वे युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव आदि के द्वारा मारे गये और जो प्राण- रक्षा के लिये बाकाश मार्ग मे उडे ये जयन्त और प्रवर के हाप से समाप्त होगये ॥८-६। उस समय युद्ध क्षेत्र में वर्षा काल की नदी के समान ही रक्त की नदी प्रवाहित होगई, जिसमे रप के चक्र कपुश्री के समान, हाथी पर्वत के समान, और वाण वृक्ष के समान, तलवारादि मछलियों के समान तथा पीकार का पाद कालोल के समान पुगने लगा। उस नदी का उद्गम स्थल श्रीगण रूपी
उट्पुर का वध ]
[ ४६३
त पा । उस नदी को देख कर कायरों का तो हृदय भी कांप रहा था
१०-१२॥
ददर्शाथ निकुम्भस्तु केशवं रणदुर्जयम् ।
अर्जुनेन स्थितं साद यज्ञवाटाविदूरतः ।।१३
स नाद सुमहान्कृत्वा पक्षिराजमताडयत् ।
परिघेण सुघोरेण वल सत्यकमेव च ॥१४
नारायणं चार्जुनं च भीमं चाय युधिष्ठिरम् ।
यमौ च वासुदेव च साम्ब काम च वीर्यवान् ।।१५
युयुधे मायया दंत्यः शीघ्रकारी च भारत ।
न चन ददृशुः सर्वे सर्वशस्त्रविशारदाः ।।१६
यदा तु न वापश्यस्त तदा विल्बोदकेश्वरम् ।
दध्यो देव डेपोकेशः प्रमयाना गणेश्वरम् ।।१७
ततस्ते सदृशु सर्वे प्रभावादतितेजसः ।
वित्खोदकेश्वरस्याशु निकुम्भ मायिना वरम् ॥१८
कैलासशिनराकारं ग्रसन्तमिव धिष्ठितम् ।
आह्वयन्तं रणे कृष्ण वैरिण नातिनाशनम् ।।१६
सज्यगाण्डीवमेवाथ पार्थस्तस्य रथेषुभिः ।
परिघं चैव गानेषु विव्याधनमयासकृत् ॥२०
ते वाणास्तस्य गावपु परिघ च जनाधिप।
भग्नाः शिलाशिताः सर्वे निपेतुः कुन्चिताः क्षिती ।।२१
फिर निकुम्न युद्ध में दुबंध थोष्ण के पास गया तो उसने उन्हें अर्जुन
के साथ यनशाला के निकट देखा ।।१३।। तब उसने भीषण सिंहनाद करके गरुड़,
बलराम, सात्यकि, ण, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, यमुदेव, साम्ब
और प्रद्युम्न पर अपने परिपो से प्रहार किया ॥१४.१५॥ फिर यह अपने माया.
गुल से बश्य होकर बड़े-बड़े औरो को नौ दिसाई नहीं देता या ॥१६॥ इससे
उमे मारने में कोई भी गमर्प नहीं हुआ, यह देख कर श्रीकृष्ण ने भगवान्
बिल्कोटकोपराधान किया ॥१७॥ उभी नगगन करकीकपा से सबको
४८४ ] [ श्री हरिवंशपुराण दिव्य दृष्टि मिल गयी और मायावी निकुम्भ उन्ह दिखाई देने लगा ॥१८॥ उसः का कैलास शिखर जैसा आकार था, जिससे ऐसा प्रतीत होता था कि वह सब को अपने पेट म रख लेगा। इस प्रकार युद्ध के लिये ललकारता हुआ वह दैत्य श्रीकृष्ण के सामने आया । तभी अर्जुन ने अपने गाडीव पर प्रत्यचा चढ़ा कर निकुभ और उसके परिघ पर बाण वर्षा आरभ को ॥१६२१॥ विफलानस्त्रयुक्तास्तान्दृष्ट्वा वाणान्धन जय । पप्रच्छ केशव वीर किमेतदिति भारत ॥२२ पर्वतानापि भिन्दन्ति मम वज्रोपमा शरा । किमिद देवकीपुत्र विस्मयोऽत्र महान्मम ॥२३ तमुवाच तत कृष्ण प्रहसन्निव भारत । महद्भूत निकुम्भोऽय कौन्तेय शृणु विस्तरात् ॥२४ पुरा गत्वोत्तरकुरू स्तपश्चक्र महासुर । शत वर्पसहस्राणा देवलनुर्दुरासद ॥२५ अथैन छन्दयामास वरेण भगवान्हर । स वने त्रीणि रूपाणि न वध्यानि सुरासुरै २६ तमुवाच महादेवो भगवान्वृपभध्वज । मम वा ब्राह्मणाना वा विष्णोर्वाऽप्रियमाचरन् ॥२७ परन्तु उनके छोडे हुए सभी वाण निकुभ का और उसके परिघ का स्पर्श होते ही टूट टूट कर पृथिवी पर गिर गये ॥२२॥ हे राजन् । यह देख कर यर्जुन बोला-हे प्रभो | यह कैसे विस्मय की बात है कि मेरे जिन बाणों से बडे बडे पवत तक ढह जाते हैं, वे सब इस समय व्यर्थ क्यो होरहे हैं ? ॥२३-२४॥ तब श्रीकृष्ण ने विचित् मुसकान के साथ कहा-हे अर्जुन । निकुम्भ मे जित अलौकिक शक्ति का समावेश हुआ है, उसका कारण मैं तुम्हे विस्तार से बतात हूँ. सुनो ॥२शा इस महायली दानव ने पहिले पुरुक्षेत्र मे एक लाख वर्ष ता पोर तपस्या की थी। तब इस पर प्रसन्न होकर भगवान शकर ने इससे व मांगने को कहा और इसने उनसे देववाआ या दैत्यो द्वारा न मारे जाने का विरू पर मांगा ॥२६-२७॥ ।
पटपुर का वध ] भविष्यसि हरेवंध्यो न लन्धस्य महासुर । ब्रह्मण्योऽह च विष्णुश्च विप्राणा परमा गतिः ।।२८ स एप सर्वशस्त्राणामवध्यः पाडुनन्दन । निदेहोऽतिप्रमायी च वरमत्तश्च दानवः ।।२९ भानुमत्यापहरणे देहोस्यको हतो मया । अवध्य पट्पुर देहमिदमस्य दुरात्मनः ।।३० दिति शुथ पति त्वेको देहोऽस्य तपसान्वितः । अन्यस्तु देहो घोरोस्य येनावसति पट्पुरम् ॥३॥ एतत्तु सर्वमान्यात निकु भचरित मया । त्वरयास्य वधे वीर कया पश्चाद्भविष्यति ॥३२ तयोः कवयतोरे कृष्णयोग्नुरस्सदा। गुहा पट पुरसज्ञा ता विवेश रणदुर्जयः॥३३ अन्विप्य तस्य भगवान्विवेश मधुसूदनः । ता पट पुरगुहा घोरा दुई कुरुनन्दन ॥३४ चन्द्रमूर्यत्रमाहीना चलन्ती स्वन तेजसा । नुगदु गोप्णगीतानि प्रयच्छन्ती ययेप्सितम् ॥३५ इस पर शिवजी ने घर देते हुए कहा था कि मेरा, बाह्मणों का पावितु पा पार करने पर पिके द्वारा मृत्यु को प्राप्त होंगे। उनके अतिरिक्त घऔर कोई भी तुम्हारा वप करने में समयं न हंगा क्योकि में और पितु दोनो ही अपने प्रधान आयर स्वरूप ब्राह्मणो सहित करन वाले हैं ।।२८। इस प्रकार यह महानुर गिरती की गम तीन र प्राप्त करके देव-दानवों के सभी मस्त्रों में मारा जाने योग्य नहीं रहा है ॥२३॥ नानुमती हरण के समय मन ससी एक मूर्ति तो गमाप्त कर दी पो, वह गो पदपुर पूर्ति कहलाती है ॥३०॥तिरिसोग मूति दिदिको सेश में स्थिर रहर भरकर रूप में पदार में स्थित है ॥३१॥ इस प्रकार निकुम्भ प तान्न मन नुमो रहा द.म.पा.को मारने ..wी..अपगंग सोस गन ! और प्रगर गा कर ही रहे, नमा मन ४८६ ] [ थी हरिवंशपुराण दैत्य अपनी पट्पुर नाम की गुफा में प्रविष्ट होगया ॥३३॥ तव भगवान् श्रीकृष्ण भी उसके पीछे-पीछे चलते हुए उसी भयकर कन्दरा में जा घुपे ॥३४॥ उसर्वे भीतर सूर्य-चन्द्रमा की ज्योति नहीं पहुंचती थी, अपना ही प्रकारा उसे प्रकाशित करता रहता था। उसमे सुख-दुःख, शीत-उष्ण की प्राप्ति भी अपनी इच्छा अनुसार होती रहती थी ॥३५॥ तत्र प्रविश्य भगवानपश्यत जनाधिपान् । युयुधे सह घोरेण निकुम्भेन जनाधिप ॥३६ कृष्णस्यानुप्रविष्टास्तु बलाद्या यादवास्तदा। प्रविष्टाश्च तथा सर्वे पाण्डवास्ते महात्मनः ।।३७ समेतास्तु प्रविष्टास्ते कृष्णस्यानुमतेन । युयुधे स तु कृष्णेन रौक्मिणेयः प्रचोदितः । अनयद्यादवान्सर्वान्यानय वद्धवान्पुरा ॥३८ ते मुक्ता रौविमणेयेन प्राप्ता यत्र जनार्दनः । प्रहृष्टमनसः सर्वे निकुम्भवधकाक्षिणः ॥३५ राजानो वीर मुञ्चेति पुन: काम यथाऽब्रवीत् । मुमोच चाथ तान्वीरो रौक्मिणेय प्रतापवान् ॥४० अधोमुखमुखाः सर्वे बद्धमौना नराधिपाः । लज्जयाभिप्लुता वीरास्तस्थुन ष्टश्रियस्तदा ॥४१ निकुम्भमपि गोविन्दः प्रययन्त जय प्रति । योधयामास भगवान्पोरमात्मरि हरिः।।४२ भगवान् कृष्ण ने उस गुफा में जाकर देखा कि निकुम्भ ने जिन यादवों का हरण किया था, वे सब यहाँ स्थित हैं । तभी निकुम्भ का और कृष्ण का युट होने लगा ॥३६॥ कृष्ण के पीछे-पीछे बलराम आदि यादव और युधिष्ठि- यदि पाण्डव भी उस गुफा मे जा पहुंचे ॥३७॥ वहाँ को यादवगण बदी बनाये हुए थे, वे सभी श्रीकृष्ण ने प्रद्य म्न से वह कर मुक्त करा दिये, तब वे बन्धन से पूटे हुए यादव श्रीगण के पास आये। फिर श्रीकृष्ण के आदेश पर प्रद्य उम्म
पदपुर का वध ]
[ ४८७
प्रतिपक्षी राजाओ को भी मुक्त कर दिया, तब वे सब भी लज्जा से मस्तक
माये हुए तथा स्तब्ध और मलीन होकर श्रीकृष्ण के सामने जाकर खडे होगये
॥३८.४१।। तभी श्रीकृष्ण और निकुभ मे भयकर युद्ध छिह गया ॥४२।।
परिघेणाहतः कृष्णो निकुम्भेन भृशं विभो।
गदया चापि कृष्णेन निकुम्भस्ताडितो भृशम् ॥४३
तावुभौ मोहमापन्नौ सुप्रहारहती तदा ।
ततः प्रव्यथितान्हप्ट्वा पाण्डवाश्चाथ यादवान् ॥४४
जेपुमुनिगणास्तव कृष्णस्य हितकाम्यया ।
तुष्टुवुश्च महात्मान वेदप्रोक स्तथा स्तवः ।।४५
ततःप्रत्यागदप्राणो भगवान्केशवस्तदा ।
दानवश्च पुसर्वीरावुद्यतो समर प्रति ।।४६
वृपभाविव नदन्ती गजाविव च भारत ।
शालाकाविव कदी प्रहरन्ती रणोत्कटो ।।८७
अथ कृष्ण तदोवाच नप वागशारीरिणी ।
चक्रण शमयस्वन देवत्राह्मण कण्टकम् ॥४८
इति होवाच भगवान्देवो विल्वोदकेश्वरः ।
धर्म यशश्च विपुल प्राप्नुहि त्व महाबलम् ।।४६
तभी निकुम ने परिप से प्ण पर और कृष्ण ने निकम पर गदा से
मामात किया ॥४३॥ इस प्रकार परस्पर भीपण प्रहार होने से कप्ण और
निरम दोनो ही मूचित होगये। यह देख कर यादको और पासवो में भारी भय
यागया । उस समय श्रीकृष्ण को कुशलता के लिये मुनियों ने वेद-मत्रो के जप
पूर्वक उनरी रक्षा को 10.४५॥ फिर उन दोनों के पुन. चेष्टायान होने पर
पुन कर भगासो के ममान प्रहार युति युर प्रस्तुत हुआ॥६-४॥ तभी
काकामयापी हुई-हे कष्ण ! देवताओं और ग्राह्मणों के लिये मूलस इस
दरप को आप अपने पक से शीघ्र मार दीजिये l इमसे आपनो महान धर्म
तथा भारी गुपन गरी प्राति होगी। प्रसार उनसे नगरान् गकर ने आमारा-
'चागी म कहा
४८८ [ श्री हरिक्शसुराल तथेत्युक्त्वा नमस्कृत्वा लोकनाथ सता गति । सुदर्शन मुमोचाथ चक्र दैत्यकुलान्तकम् ।।५० तन्निकुम्भस्य चिच्छेद शिर प्रवरपुण्डलम् । नारायणभुजोत्सृष्ट सूर्यमण्डलवर्चसम् ॥५१ उत्पपात शिरत्तस्य भूमी ज्वलितकुण्डलम् । मेधमत्तो गिरे शृङ्गान्मयूर इव भूतले ५२ निकुम्भे निहते तस्मिन्देवो विल्वोदकेश्वर । तुतोप च नरव्याघ्र जगलासकरौ विभु ॥५३ पपात पुष्पवृष्टिश्च शक्रसृष्टा नभस्तलात् । देवदुन्दुभयश्चैव प्रणेदुररिनाशने ॥५४ नननद च जगत्कृत्स्न मुनयश्च विशेषत । दैत्यकन्याश्च भगवान्यदुभ्य शतशो ददौं ॥५५ तियाणा च भगवान्सान्त्वयित्वा पुन पुन । रत्नानि च विचिनाणि वासासि प्रवराणि च ।।५६ रथाना वाजियुक्ताना पट सहस्राणि केशव । अददत्पाण्डवेभ्यश्च प्रीतात्मा गदपूर्वज ॥५७ तदेव चाथ प्रवर पट पुर पुरवर्द्धन । द्विजाय ब्रह्मदत्ताय ददो तायवरध्वज ॥५८ श्रीकृष्ण ने देववाणी को स्वीकार कर और शिवजी को नमस्कार करके अपने सुदर्शन चक्र का प्ररित किया ॥५०॥ इस प्रकार उस मूर्य के समान तेज- स्वी चक्र से नियम का यण्डको से विभूपित मस्तक कट कर पृथिवी पर गिर गया ॥५१॥ स जसपर को देख कर उमत्त हुआ मोर पवत स पृथिवी पर बा गिरता है, वैसे ही निरभ का पटा हुया मस्तक धरती पर आगिरा ॥५२।। है राजन् । नियम्भ की मृत्यु से चिल्वोदकेश्वर अत्यात प्रसन हुए और ससार फो नी मान्ति-लाभ हुआ ||३|| उस समय स्थय इन्द्र ने बाराश रो पुष्प-वृष्टि पो, दुनिया ने लगी, सम्पूर्ण विश्व और मुनिगण यान द विभोर हो उठे और मह धोरण ने यह रोडरों देर रयाएं पानी । हो। पांवों पटपुर का वध 1 [ ४८६ घोडों के सहित छः हजार रय, विभिन्न अपियों को विविध प्रकार के विपुल नव्या गह्मणश्रेष्ठ ब्रह्मदत को पट्पुर नगर ही दे दिया ॥५८-५८।। सो समाप्ने च तदा शमुवऋगदाधरः। विमजयित्वा तत्क्ष पाण्डवाश्च महाबलः ।।१६ विल्बोदकेश्वरस्याथ समाजमारोत्रभुः । मासत्पसमाफीगं वहन्न व्यजनाकुलम् ॥६० नियुद्धमुगलान्मल्लान्देवो मन्मप्रियस्तदा। योगयित्वा ददौ नृरि वित्त वस्त्राणि चात्मवान् ।।६१ मातापितृभ्यां सहितो यदुभिश्च महाबलः। अभिवाय ब्रह्मदत्तं पयो द्वारदती पुरीम् ।।६२ स विवेश पुरी रम्या हष्टपुटजनाकुलम् । पुप्पचिसपया वीरो वन्द्यमानो नरैः पथि ॥६३ या के सम्मन्न होने पर भगवान श्रीरा ने इन प्रकार अन्याय रामाओं पारि के महिन मरसारित हुए पात्रों को विदा पिया फिर उन्होंने वत्योदकेश्वर के निमित्त एक महोत्सव का आयोजन किया जिसमें विभिन्न प्रकार क स्वादिष्ट भोजनों को पार करा र मर को संतुष्ट किया ॥३०॥हिर युन दुशल मल्लो का मल मुर देगा और उन्हें बनेक प्रकार के पन, वस्त्र यादि दिसे ॥६॥ फिर ब्राह्मण कोजाम करके अपने माता-स्नाक सहित श्रीरान यहाँ से द्वारिका के सिर पर दिये ॥६॥ जिम ममर वनस्पती उस पुरी में उनरा नागमन हमा, उन ममय उसके गुमी रार मार्गों को पुष्प मालारों से सजाया गया और उसके दोनो ओर मोदए स्त्रीगुरती ने उन चर-पसार रिया ॥६॥ दम यः पट पुरसर्थ विजयं चक्रपानिनः । नुपाढा पठेद्वारि युदे जयमानुगात ६४ यात्री नभने पुवनानी नमते धनन् । साधिनो मुच्चने रोगी वस्त्राप्यय बनान् ॥६॥ पाठ के ४६० ] [ श्री हरिवंशपुराण इद पुंसवन प्रोक्त गर्भाधन च भारत । श्राद्ध पु पठितं सम्यगक्षय्यकरण स्मृतम् ॥६६ इदममरवरस्य भारते प्रथितवलम्य जय महात्मनः । सततमिद य. पठेन्नर सुगतिमितो व्रजते गतज्वरः ।।६७ मणिकनकविचित्रपाणिपादो निरतिशयार्क गुणोऽरिहादिनाथः । चतुरुदाधिशयश्चतुर्विधात्मा जयति जगत्पुरुषः सहस्रनामा ॥६८ हे जनमेजय । भगवान् की इस विजय और पार वध के वृत्तान्त में जो मनुष्य पडते अथवा सुनते हैं, उनकी युद्ध मे जीत होती है ॥६४॥ तथा जिन पुत्र नहीं होता, वे पुत्रवान्, धनहीन धनवान् रोगी निरोग और बन्धन पडे हुओ को छुटकारा मिलता है । ६५।। पु सवन, गर्भाधान अथवा श्रद्धादि समय तो यह क्षय-रहित महामन ही हो जाता है ॥६६॥ जो मनुष्य देवश्रेष् परम प्रसिद्ध महात्मा श्रीकृष्ण के इस विजय-वृत्त का पाठ करते हैं, वे सासारि व्य थियों से छूट कर श्रेष्ठ गति को प्राप्त होते हैं ।।६७ा हाथ-पावो मे मणि जटित स्वर्ण-आभूषणो के धारण करने वाले, सूर्य से भी अधिक तेजस्वी, सर्वेश्वर, चतु समुद्रशायी, चतुर्विध रमा, शत्रुओ के नाशक, सहस्रो नाम वाले जगत्पति भग- वान् श्रीकृष्ण को जय हो ॥६॥ ॥ अन्धकामुर का वध । श्रु तोऽय पट पुरवधो रम्यो मुनिवरोत्तम । पुरोक्तमन्धकवध वैशम्पायन कीर्तय ॥१ भानुमत्याश्च हरण निकुम्भस्य वधं तथा । प्रव्र हि वदता श्रेष्ठ पर कौतूहलं हि मे ॥२ दितिहते पुरेपु विष्णुना प्रमविष्णुना। तपसाऽऽराधयामास मारीच कश्यप पुरो ॥३ तपसा कालयुक्तेन तथा शुश्र पया मुनेः । आनुक्ल्येन च तथा माधुर्येण च भारत ॥४
बन्धकासुर का वध ]
[ ४६१
परितुष्टः कश्यपस्तु तामुवाच तपोधनः ।
परितुष्टोऽस्मि ते भद्र वरं वरय सुव्रते ॥५
हतपुत्राऽस्मि भगवन्देववर्मभता वर ।
अवध्यं पुवमिच्छामि देवरमितविक्रमम् ।।६
अवध्यस्ते मुनो देवि दाक्षायणि भवेदिति ।
देवाना सशयो नान कश्चित्कमललोचने ७
देवदेवमृते रुद्रतस्य न प्रभवाम्यहम ।
आत्मा ततस्ते पुत्रेण रक्षितत्र्यो हि सर्वथा ।।८
राजा जनमेजय ने कहा-है मुनिवर ! आपसे यट्पुर वध का वृत्तान्त
न लिया, परन्तु अब अन्धक वर की कथा कहने की कृपा करें। मैं बन्धक
चौर निकुम्भ के वध और भानमती के अपहरण की कथा सुनने को अत्यन्त
लालायित हूं, इसलिये आप उसे मेरे प्रति कहिये ।।१-२॥ वंशम्पायनजी ने कहा
हे राजन् ! जब भगवान विष्णु बहुत-से दानवों को मार चुके, तब दैत्यों की
माता दिति ने अपने पति महर्षि कश्यप को प्रसन्न किया ॥३॥ महर्षि कश्यप
उसकी सेवा मुथूपा से अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले-हे भो ! मैं तुम पर प्रसन्न
होगया हूं, अब तुम जो चाहो, वर मांगलो ॥४॥ इस पर दिति ने कहा है
भगवन् ! देवताओं ने मेरे सभी पुत्रों का वध कर दिया है, अब आप मुझे ऐसा
पुत्र प्रदान करें जो विशेष पराक्रम वाला हो तया देवताओ के द्वारा न मारा जा
सके ।।५-६।। तव कश्यपजी वोले-हे दाक्षायरिण ! हे पद्मलोचने ! तुम्हे अब
जिस पुत्र की प्राप्ति होगी. उसे भगवान् रुद्र के अतिरिक्त अन्य कोई देवता नहीं
मार सकेगा, इसलिये उसे उन्ही से सावधान रहना पड़ेगा ॥७-८॥
अन्वालमत ता देवी कश्यपः सत्यवागय ।
अंगुल्योदरदेशे तु सापुत्रं सुपुर्व ततः ॥
सहस्रगहुँ कोख्य सहनशिरसं तथा ।
द्विसहन क्षण चैव तावच्चरणमेव च ॥१०
स व्रजत्यन्धवद्यस्मादनन्धोऽपि हि भारत ।
तमन्धकोज्यं नाम्नेति प्रोयुस्तम निवामिनः ।।११
४६२ ] [ थी हरियशपुराण अवध्योऽस्मीति लोकान्स सर्वान्वाधति भारत । हरत्यपि च रत्नानि सर्वाण्यात्मालाश्रयात् ।।१२ वासयत्यात्मवीर्येण निगृह्याप्सरसा गणान् । स वेश्मन्य जितोऽत्यर्थं सर्वलोकमयकरः ॥१३ परदारापहरण पररत्नविलोपनम् । चकार सतत मोहादन्धक पापनिश्चयः ।।१४ इतना कह कर कश्यपत्री ने अपनी अंगुली से दिति के उदर का पर्व किया, जिससे कुछ कालोपरान्त उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई ।।६। उसके एक सहस्र हाथ, सहस्र शिर तथा दो सहस्र पांव और दो ही सहस्र नेत्र थे ॥१०॥ दो हजार आँखो के होते हुए भी वह दैत्य अहकार के कारण अन्धे के समान चलता इसीलिये वह अघक नाम से प्रसिद्ध हुआ । ११ वह अपने को तीनों लोकों मे अवघ्य मान कर सब प्राणियो को दुख देता रहता और सब के धन, रलादि को छीन लेता॥१२॥ उमने अनेगो अप्सराओं को पकड़ पकड कर अपने घर में लाकर रख लिया ।।१३॥ वह अत्य-न भयकर एव पापी महासुर पर-नारी, पर- धन और पर-रत्न को लूटने आदि दुष्कर्मों मे सदा ही लगा रहता था ॥१॥ त्रैलोक्यविजय कर्तु मुद्यत स तु भारत । सहायरसुरै सार्द्ध बहुभि सर्वपिभि ॥१५ तच्छु त्वा भगवाञ्छक कश्यप पितर ब्रवीत् । अन्यकेनेदमारब्धमीदृश मुनिसत्तम ॥१६ आज्ञापय विभो कार्यमस्माक समनन्तरम् । यवीयस कय नाम सोढव्य स्यान्मुने मया ॥१७ इष्टपुत्र प्रहर्तव्य कथ नाम मया विभो। इहानभवती कुन्मिन्यु मयि हते सुते ॥१८ देवेन्द्रवचन श्रुत्वा कश्यपोऽयाक्वीन्मुनि । वारयिष्यामि देवेन्द्र सर्वया भद्रमस्तु ते ।।१६ अन्धक वारयामास दित्या सह तु कश्यप । लोक्यविजयाद्वीर कृच्छकुच्छेण भारत ॥२० अन्यकासुर का वध ] [ ४६३ वारितोऽपि स दुष्टात्मा वाधत्येव दिवाकरः । तैस्तस्पायर्दुष्टात्मा प्रमथ्य च तथाऽमरान् ॥२१ कुछ कालोपरान्त उसने अन्यान्य दैत्यो से मेन किया और उनके सहयोग से समस्त दैलोक्य को जीतने की तैयारी करने लगा ॥१५यह बात जान कर देवराज इन्द्र ने महर्षि कश्यप की सेवा में उपस्थित होकर कहा-हे प्रभो । अन्धकासुर के ऐसे कुत्सित कर्मों से बचने के लिये हमे क्या करना चाहिये ? यह आप हमारे प्रति कहें । छोटे भाई द्वारा को जाने वाली ऐसी उच्छृखलता अब असह्य हो उठी है ।१६-१७।। माता दिति का उन पर अत्यन्त स्नेह है और यदि मैं अन्धक को मार दूंगा तो वे ऋद्ध हो जायगी ॥१८॥ इन्द्र को वान सुन कर महर्षि कश्यप ने कहा-इन्द्र ! तुम चिन्ता न करो, मैं उसे रोकने का यत्न करूंगा ॥१६॥ यह कह कर महर्षि कश्यप दिति के पास पहुंचे और तव दिति ने और उन्होंने बन्धक को समझाया कि ह वेटा ! तुम तीनो लोकों को जीतने इच्छा का परित्याग करो ॥२०॥ परन्तु, उमने माता-पिता की भी बात नहीं मानी तथा अब वह देवताओं और अन्यान्य जीवो को पहिले से भी अधिक सताने लगा ॥२१॥ वाज कानने वृक्षानुद्यानानि च दुर्मतिः। उच्च.व.मुतानश्वान्चलादप्यानयहिवः ॥२२ नागान्दिशागजसुतान्दिव्यानपि च भारत । बलाद्धरति देवाना पश्यता वरदर्पितः ।।२३ देवानाप्यायपन्ते तु वे यज्ञस्तपसा तथा । तेपा चकार विघ्नस दुष्टात्मा देवकण्टकः ॥२४ नेजुयज्ञ स्तयो वर्णास्तेपुश्च न तपास्यपि । अन्धकस्य भयाद्राजन्यज्ञविघ्नानि कुर्वतः ॥२५ तस्येच्छया वाति वायुरादित्यश्च तपत्युत । चन्द्रमा वा सनक्षनो दृश्यते नव वा पुनः ॥२६ नवजीन्तवमाननि पहायम भयात्प्रमे।। मन्धकस्यातिघोरस्थ चलहप्तस्य दुर्मते.॥२७ ४६४ ] [ श्री हरिपशपुराए निरोकारवपट्कार' जगद्वीर तथाऽभवत् । अन्धकस्यातिघोरस्य भयाकुरुकुलोढह ॥२८ कुरू स्तथोत्तरान्पापो द्रावयामास भारत । भद्राश्वान्केतुमालाश्च जम्बुद्वीरास्तथैव च ॥२६ मानयन्ति च त देवा दानवाश्च दुरासदाः । भूतानि च तथान्यानि समर्थान्यपि सर्वया ।।३० उसने इन्द्र के नन्दन कानन के वृक्षो को उखाड कर उसे वोरान कर दि और इन्द्र के उच्च श्रवा घोडे के बालको का अपहरण कर लिया ।।२२।। दिग्गजो के बालको को देवताओ के देखते-देखते उठा ले गया ।।२३।। देवता की तृप्ति के लिये जो पुरुप यज्ञ अथवा तप करता, उसके कार्य मे सदा वि डाल देता ॥२४॥ उसके डर से तीनो वर्ण वालो मे से कोई भी यज्ञ या तप क के लिये प्रयत्नवान नही होता था ॥२५।। वायु उसकी इच्छा से चलता था, उसी के सकेत पर प्रकाशित होता था, चन्द्रमा और नक्षत्र भी उसकी इन बिना प्रकट नहीं होते थे ॥२६॥ उस दुर्बुद्धि वाले भयानकाकार अन्धक के से आकाश मे विमानो का उडना रुक गया ॥२७॥ उसी की उद्दण्डता के का ओकार तथा वषटकार के उच्चारण का भी कोई साहस नहीं करता था ॥२ उसने उत्तरकुरु, भद्राश्व, केतुमाल और जम्बूद्वीप आदि मे अपने पाप कर्मों द्वारा हाहाकार मचा दिया था ॥२६॥ देवता, दैत्य तथा अन्यान्य बली पुरुष .. उस दानव को सदैव सम्मान प्रदान करते रहते थे ॥३०॥ पयो वध्यमानास्तु समेमा ब्रह्मवादिन । अचिन्तयन्नन्धकस्य वध धर्मभृता वर ॥३१ तेषा वृहस्पतिमध्ये धीमानिदमथाब्रवीत् । नास्य रद्राइते मृत्युर्विद्यते च कवचन ॥३२ तया वरेदीयमाने कश्यपेनापि शब्दित.। नाह रुद्रात्परिवातुशक्त इत्येव धीमतः ॥३३ तमुपाय चिन्तयाम. शर्वो येन सनातनः । जानीयात्सर्वभूतानि पीड्यमानानि शकर.॥३४ -- अधनामुर का वध ] विदितार्यो हि भगवानपश्य जगत प्रभु । अथ प्रमाजा देव करिष्यति सता गति ॥३५ व्रत हि देवदवस्य भवस्य जगता गुरो। सन्तोऽसद्यो रक्षितव्या ब्राह्मणास्तु विशेपत ॥३६ ते वय नारद सर्वे प्रयाम शरण द्विजम् । उपाय वेत्स्यते तत्र वयस्यो हि भवस्य स ॥३७ इस प्रकार ससार के उपद्रव प्रस्त होने पर सभी पिगण उसके मारने में एकमत होकर उपाय सोचने लगे ॥३१॥ तभी सब महर्पियो के मध्य म स्थित देवगुरु बृहस्पतिजी ने कहा- भगवान् शिवजी क अतिरिक्त और कोई भी उस दानव' क वध म समय नहीं है ॥३२॥ वर दत ममय कश्यपजी ने उसस कहा पा कि शिवजी के अतिरिक्त अय सभी प्राणियो स तुम्हारा अवध्य रहना निश्चित है ॥३३|| इसनिय अब ऐसा ही कुछ उपाय हो जिससे भग्वान उसके द्वारा होने वात अत्याचारा से अवगत हो जाय । एमा होने पर व साधुजना, परिवाता अवश्य ही उस मारन या प्रयल करेंगे। क्योकि व ब्राह्मणो पर तो बस भी विशप या रयते हैं ॥३४ ३६॥ इमतिय पर हम दवदेव भगवान पार के परम मित्र महर्षि नारद के पास करना चाहिय उहीं से इस विपत्ति से मुक्य होने का उपाय शान हो सकेगा ॥३॥ वृहस्पतिवच श्रुत्वा सर्वेऽप्यथ तपोधना । तावद्ददृशुराको प्राप्त देवपिसत्तमम् ॥३८ पूजयित्वा यथान्याय सत्तत्य विवियन्मुनिम् । देव भयवन्माधो लास व्रज सत्वरम् ॥३६ विज्ञप्तु महसे देशमन्धकस्य वधे हरम् । प्राणार्थ नारद प्रोनुस्तास्तयेति स चोक्तवान् ।।४० पिप्वय प्रयातेपु तत्वार्य नारदो मुनि । विधायं मनमा रिद्वानिति कार्य स दृष्टवान् ।। स देवदव भगवान्द्रष्टु मुनिरयाययो। मदारवनमध्यस्था यस नित्यो पध्वज ॥४२
दिये । चलते समय मन्दार के पूष्पो की एक माला वहाँ से ले आये ॥४१-४५॥
[ थी हरियापुराण
४६६ ]
स तब रजनीमेकामुपित्वा मुनिसत्तमः ।
मन्दाराणा वने रम्ये दयित. शूलपाणिन. १४३
आजगाम पुन स्वर्ग लब्ध्वाऽनुज्ञा वृपध्वजात् ।
मन्दारपुष्प सुकृता मालामावध्य भारत । ४४
ग्रथिता सविशेपा ता सर्वगन्धोत्तमोत्तमाम् ।
सन्तानमाल्वदाम च तैरेव कुमुमै कृतम् । ४५
मुनिगणो मे इस प्रकार का विचार चल ही रहा था, तभी महर्षि नारद
को आकाश मार्ग से आते हुए उन्होने देखा ॥३८॥ तुरन्त ही उनका स्वागत
सत्कार किया गया और फिर उन्हे सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना कर ऋपियों ने कहा-
हे देवपि । आप शीघ्र ही कैलाश के लिये गमन कहें।। ३६ ॥ वहाँ आप सभी
वातें यथावत बता कर भगवान् शकर को लोक कल्याणार्थ अन्धकासुर को मारने
के लिये प्रेरित करिये । यह सुन कर नारदजी ने वैसा करना स्वारा
॥४०॥ वे तुरन्त ही कैलास पर्वत के लिये चल दिय । मार्ग म उन्होंने बहुत
विचार करने के पश्चात् एक श्रेष्ठ उपाय स्थिर किया। भगवान् शकर मन्दार
वन मे रहते थे, नारदजी ने उस वन मे पहुँच कर एक राति निवास किया और
दूसरे दिन सवेरा होते ही शिवजी की आज्ञा लेकर वहां से स्वर्ग लोक को चल
तच्च कण्ठे समासज्य महागन्ध नराधिप ।
आययावन्वको यत्र दुरात्मा वलदर्पित ॥४६
अन्धकस्त्वथ त दृष्टा गन्धमाघ्राय चोत्तमम् ।
सन्तानकाना स्रड्माला महागन्या महामुने ॥४७
कुत्राय पुष्पजातिर्वा कमनीया तपोधन ।
गन्धान्वर्णाशुभास्तान्हि भो पुष्पति मुहुर्मुहु. ।
स्वर्गे सन्तानकुसुमान्यतिवर्तति सर्वथा ॥४८
क. प्रमुस्तस्य वृक्षस्य शक्य वाऽऽनयितुं मुने ।
जाचक्ष्य यद्यनुग्राह्या वय ते देवतातिये ॥४६
अन्धकासुर का वध ] तदनन्तर उस माला को पहिने हुए ही नारदजी उस वल के अहकार में मत्त दुरात्मा अन्धकासुर के पास पहुंचे ॥४६अन्धक के नासिका रन्ध्रो मे जब उस मन्दर-माला की सुगघ पहुंची, तब वह उसे देख कर बोला-हे मुनिधेष्ठ ! इस माला के सुन्दर रग और मन को मोह लेने वाली सुगध से मेरा चित्त वार- वार आकर्षित होरहा है, इसकी सुगन्ध तो स्वर्ग के पारिजात से भी अत्यन्त श्रेष्ठ हैं, यह आपको कहां से प्राप्त हुई ? ॥४७-४८॥ यह पुप्प कहाँ का है ? उस स्थान का स्वामी कौन है ? यह किसके द्वारा प्राप्त हो सकता है ? यदि आपकी मुझ पर कृपा हो तो बताने का कष्ट करें ॥४६॥ तमुवाच मुनिष्ट प्रहसन्निव भारत । आदाय दक्षिणे हस्ते महतस्तपसो निधिः ।।५० मन्दरे पर्वतश्रेष्ठे वीर कामगम वनम् । तर चैवविध पुप्प भोः सृष्टिः शूलपाणिनः ।।५१ न तु तत्र वन कश्चिदच्छन्देन महात्मनः । प्रवेष्ट् लभते तद्धि रक्षन्ति प्रवरोत्तमाः ।।५२ नानाप्रहरणा घोरा नानावेपा दुरासदाः । अवघ्या सर्वभूताना महादेवाभिरक्षिताः ॥५३ नित्य प्रक्रीडते तत्र सोमः सप्रवरो हरः । मन्दारद मखण्डेपु सर्वात्मा सर्वभावनः ॥५४ तपोविशेषराराध्य हर विभुवनेश्वरम् । शक्य मन्दारपुष्पाणि प्राप्तु कश्यपवशनः ।।५५ हे राजन् ! नारदजी ने उसकी बात सुनी तो कुछ हम कर उससे कहने लगे ॥५०॥ मन्दार पर्वत पर कामगम नामक एक श्रेष्ठ उपवन है, यह पुष्प-रल वहाँ का है । यह उपवन भगवान सकर द्वारा निर्मित हुआ है ॥५१शिवजी पी वाना के बिना वहां कोई नहीं जा सरता, क्योंकि यनक प्रकार का वेध पारण करने वाले और विविष शम्पो में मुस्विट प्रमयगा उनको रक्षा में नियुक्त हैं। शिवत्री मी कृपा से उन प्रमयगण को कोई नी नहीं मार सकता
}]
[ श्री हरिवशपुराण
॥५२-५३।। वहां अपने गणो के साथ चन्द्रमा नित्य विराजमान रहते हुए मन्दार
वृक्षो म विचरण करते रहते हैं । इसलिय जब तक उन सर्वात्मा भगवान् शिवत्री
को तप के द्वारा प्रसन्न न कर लिया जाय, तब तक मन्दार-पुष्प का प्राप्त होना
नितान्त असभव है ॥५४५५।।
स्त्रीरत्नमणिरत्लानि यानि चान्यानि चाप्यथ ।
काक्षितानि फलन्ति स्म ते द्रुमा हरवल्लभा ॥५६
न तत्र सूर्य सोमोऽथ तपस्यतुलविक्रम ।
स्वयप्रभ तरुवन तद्भो दुखविजितम् ॥५७
तत्र गन्धात्रवन्त्यन्ये नीराण्यन्ये महाद्रुमा ।
वासासि विविधात्यन्ये सुगन्धीनि महाबल ॥५८
भक्ष्य भोज्य च पेय च चोष्य लेह्य तथैव च ।
तरुभ्य स्रवते तेभ्यो विविध मनसेप्सिम् १५६
पिपासा वा बुभुक्षा वा ग्लानिश्चिन्ताऽपि चाऽनघ ।
न मन्दारवने वीर भवतीत्युपधायताम् ।।६०
न ते वर्णयितु शक्या गुणा वर्षशतैरपि ।
गुणा ये तन व ते स्वर्गाद्वहुगुणोत्तरा ॥६१
अतीव हि जयेल्लोका-स महेन्द्रान्न सशय ।
एकाहमपि यस्तत्र वसेच्च दितिजोत्तम ॥६२
स्वर्गस्यापि हि तत्स्वग सुखानामपि तत्सुखम् ।
वभूव जगत सर्वमिति मे धीयते मन ॥६३
उस मन्दार वृक्ष की ऐसी महिमा है कि स्त्री, मणि अथवा अयान्य कोई
भी वस्तु मांगने पर वह तुरन्त प्रदान करने वाला होता है ।।५६।। यद्यपि वहाँ
पूर्य-चन्द्रमा का प्रकारा नहीं पहुंचता, फिर भी वह वन अपने ही प्रकाश से सदा
प्रकाशित रहता है ।।५७॥ वहाँ किसी वृक्ष से सुगधियाँ, किसी से वसन, किसी
से पव्यं, किसी स चोष्य, तथा विविध प्रकार के लेह, पेय आदि पकवान भी प्राप्त
हो जाते हैं ॥५५॥ वहां भूख, प्यास, चिन्ता अथवा ग्लानि जैसी बाधाए'
भगवान शकर द्वारा अन्धक वध ] [ ४६६ उपस्थित नहीं होती ।।६०॥ उस महावन के महान् गुणो को तो सौ वर्ष म भी 'नहीं कहा जा सकता। इतना ही समय लो कि उस कामगम नामक वन के सामन स्वर्ग का नन्दन कानन भी तुच्छ है ।।६१।। हे दैत्यश्रेष्ठ । उस उपवन म एक दिन भी निवास कर लन वाले क लिय इन्द्र सहित सव लोकों का जीत लेना भी एक साधारण काय है ॥६२।। इस प्रकार वह स्थान स्वर्ग का भी स्वर्ग है और मैं तो एमा समझता हूं कि वैसा सुख और किसी भी स्थान में उपलब्ध नहीं हो सत्ता ॥६॥ । भगवान शकरद्वारा जन्धक वध ॥ अन्धको नारदवच श्रुत्वा तत्त्वन भारत । मन्दर पर्वत गन्तु मनो दधे महासुर ॥1 सोऽसुरान्सुमहातेजा समानीय महावल । जगाम मन्दर क्रुद्धो महादेवालय तदा ॥२ त महाघ्रप्रतिच्छन्न महीपधिममाकुलम् । नानामिदममाकीणं महर्षिगणसवितम् ॥३ चन्दनागुरुवृक्षाढ्य सरलद्र मसकुलम् । किन्नरोद्गीतरम्य च बहुनागकुलाकुलम् ।।४ वातोद तैर्वन फुल्ल त्यन्तमिव च क्वचित । प्रस्नु तैयातुभिश्चिविलिप्तमिव च कचित् ॥५ पक्षिस्वनं सुमधुरैर्नदन्तमिव च क्वचित् । हस शुचिपद कीणं सपद्भिरितस्तत ॥६ महावलेश्च महिपश्चद्भिदत्यनाशनं । चन्द्राशुविमले सिहेपित हेमसचयम् ।।७ मृगराजसमाकीण मृगवृन्दनिपेवितम्। स मन्दर गिरि प्राह रू पण वलदर्पित ८ वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजन् । देवर्षि नारद के मुख स कामगम को
स्थित थे
[ श्री हरियशपुराण
ऐसी महिमा सुन कर अन्धकासुर नै मन्दर पर्वत पर जाने का विचार स्थिर किर
और वह अपने साथ बहुत से दैत्यो को लेकर शिवजी के निवास स्थान की ओ
वेगपूर्वक चल दिया ॥१२॥ वह पर्वत सदा ही मेघो द्वारा आच्छादित रहत
था, उस पर अख्य सिद्ध और महपि निवास किया करते थे ॥३॥ उस पर स
बोर चन्दन, अगर साल तथा विभिन्न प्रकार की औपधियो के
वृक्ष
वहाँ कही किन्नरो का गान चलता रहता और कही सपों का समूह घूमता
दिखाई देता ॥४॥ किसी स्थान पर वायु के झोको से वह वन नृत्य करता हुआ
सा प्रतीत होता और कही सु दर पांवो वाले श्रेष्ठ हस विचरण करते देखे जाते
॥५-६॥ कही दंत्यो को मारने वाले पराक्रमी भैसे, कहीं चन्द्रमा के समान उज्वल
सिंह और कही दल के दल मृगो के झुण्ड विचरते रहते । उस अहकारी अन्यक
ने वहां जाकर मूर्त रूप से उपस्थित हुए मदर पर्वत से कहा ॥७-८॥
वेत्सि त्व हि यथाऽवध्यो वरदानादह पितु ।
मम चैव वशे सर्व लोक्य सचराचरम् ।।
प्रतियोधु न मा कश्चिदिच्छत्यपि गिरे भयात् ।
पारिजातवन चास्ति तव सानो महागिरे ।
सर्वकामप्रदै पुष्पभूपित रत्नमुत्तमम् ॥१०
तदाचक्ष्वोपभाक्ष्यामि तद्वन तव सानुजम् ।
किं करिष्यसि युद्धस्त्व मनो हि त्वरते मम ।।११
पातार नानुपश्यामि मया राल्वदितस्य ते ।
इत्युक्तो मन्दरस्तेन तवान्तरधीयत ।।१२
ततोन्धयोतिरुपितो वरदानेन दर्पित ।
मुमोच नाद सुमहदिद वचनमप्रवीत् ।।१३
मया व त्वयाच्यमानो यस्मान्न बहु मन्यसे ।
मह पुर्णीपरोमि त्वा चल पर्वत पश्य मे ॥१४
घरे परत | तुम जानते हो कि मैं अपने पिता से रिसी द्वारा भी **
गोगने का वर प्राप्त कर पुरा और तीनों लोग प गर प्राणी भरे ही
. भगवान शकर द्वारा अन्धक-वध ] [ ५०१ आश्रित हैं || डर के कारण मुझसे कोई भी युद्ध करने के लिये अग्रसर नही होता । मुझे ज्ञात हुआ है कि तुम्हारे शिखर पर पारिजात वन विद्यमान है, जिसके पुष्प अभिलषित फल के देन वाते हैं ॥१०॥ इसलिय यदि तुम्हारी सह- मनि हो तो मैं उस अपन घर पर ले जाऊं। मैं इस कार्य में देर करना उचित नहीं समझता । यदि तुम सहमत न होगे तो मेरा कुछ विगाट भी न सकोगे ॥११॥ क्याकि मुझे यहाँ तुम्हारा कोई रक्षक भी दिखाई नहीं दता । हे राजन् ! अन्य- कासुर की बात सुन कर मन्दर पवत उमी समय बदृश्य होगया ॥१२॥ तर वर के बहकार म भर हुए अन्धकासुर ने अत्यन्त क्रोधपूर्वक गर्जना की और उच्च स्वर से वोला-ह मन्दर ! मैंने तुमसे निवेदन किया था, जिस तुमने ठुकरा दिया। परन्तु, यव तुम्ह कहीं भी ठिकाना नही मिलेगा, मैं तुम्ह अभी चूण वि डालता हूँ, अब तुम मेरे पराक्रम को देखो ।।१३-१४॥ एवमुक्त्वा गिरे शृनमुत्याटर बहुयोजनम् । निष्पपेप गिरेस्तस्य शृङ्गेष्वन्यन वीर्ययान् ।।१५ रा हतैरसुरै सर्वरदानेन दर्पित. । त प्रच्छन्ननदीजाल भज्यमानौं महागिरिम् ।।१६ विदित्वा भगवान् रुद्रश्चकारानुग्रह गिरेः । सविशपतर वीर मत्तद्विपमृगायुतम् ॥१७ नदीगालबहतरराचित चित्रकाननम् । नभश्च्युत पुग यद्वत्तद्वदेव विराजते ॥१८ अथ देवप्रभावण शृङ्गाण्युत्पाटितानि तु । क्षिप्तानि चामुरानेव घ्नन्ति वीराणि भारत क्षिप्त्वा ये प्रपलायन्ले शृङ्गाणि तु महासुरा । शृङ्गस्तस्तै स्म वयन्ति पर्वतस्य जनाधिर ॥२० ये स्वम्यास्त्वसुरास्तन तिष्टन्ति गिरिसानुपु । शृङ्ग स्तेन स्म वध्यन्ते मन्दरस्य महागिरेः ॥२१ उसने यह कह कर पवंत का एक शिखर उखाडा और वही फें कर पूर-चूर कर दिया । उन समय उसके साथी दानवगण भी उसके इस कार्य मे ५०२ ] [ श्री हरिवंशपुराण सहायक हुए। उस पर्वत पर अनेक नदिया प्रवाहमाना थी '1१५-१६! पर्वत यह दशा देख कर भगवान् रुद्र दो दया आगई और उनके अनुग्रह को प्राप्त हरि वह मत्त मातग, अद्भुत वनस्थली और स्वर्गीय नदियो से युक्त पवंत पहले जैसा ही होगया ॥१७-१८।। अब वे दानव पवत के जिस शिखर को उखाड़ कर फोने, वह उन दानवो पर ही गिर कर उन्ह नष्ट करने लगा ॥१६॥ इस प्रकार पर- शिखर उठा कर फैकना उन दैत्यो के लिये मृत्यु स्वरूप होगया ॥२०॥ जो देश किसी कन्दरा मे जा छिपते, वे भी किसी अन्य शिखर के गिरने पर नष्ट हो जाते ॥२१॥ ततोऽन्धकस्तदा दृष्ट्वा सेनां तां मर्दिता तया । रुपित. सुमहानाद नदित्वैव तदाऽत्रवीत् ।।२२ आह्वये त वन यस्य युद्धार्थमुपतिष्ठतु । कि त्वयाऽचल युद्ध न हता स्म छद्मना रणे ॥२३ एवमुक्ते त्वन्धकेन वृषभेण महेश्वरः । सप्राप्त. शूलमुद्यम्य देवोऽन्धकजिघांसया .॥२४ प्रमथाना गग/मान्वृतो वै बहु नोचनः । तथा भूतगणेश्चैव धीमान्भूतगणेश्वरः ।।२५ प्रचकम्मे तत. कृत्स्न त लोक्य रुपिते हुरे । सिन्धवश्च प्रतिस्रोतमू हुः प्रज्वलितोदकाः ।।२६ जग्मुर्दिशोऽग्निदाहाश्च सर्वे ते हरतेजसा । युयुधुश्च ग्रहाः सर्वे विपरीता जनाधिप ।।२७ चेलुश्च गिरयस्तर काले कुरुकुलोद्वह । प्रववर्षाय पर्जन्यः सधूमाङ्गारवृष्टयः ।।२८ इस प्रकार अपने अनुचरो की दशा देख कर अन्धकार हा चोर उसने बड़ा भीषण गर्जन करते हुए कहा-हे पर्वतधेप्ट प्रकार पल करते हुए मेरे अनुगतों को नूणं पयों किये डालते हो ? उस वन के स्वामी का युद्ध के लिये आहान कर रहा है, वह तुरन्त गागने आवे ।।२२-२३।। यह मुा कर भूनेश्वर भगवान् रुद्र अपने नन्दी भगवान शंकर द्वारा अन्यक वघ ] [ ५०३ सुहाथ मे त्रिशूल धारण किये अन्धकासुर को मारने के लिये प्रमयगणो और नगणो के सहित उसके सामने बागय ॥२४-२५॥ भगवान् शकर के क्रोधित होने से तीनो लोक कम्पायमान हो उठे, नदियो का जल विपरीत दिशाओं में हता हुमा सोलने लगा ॥२६॥ दसो दिशाएं उनके तेज से प्रज्ज्वलित हो उठी, हो का मार्ग परिवतित होगया और वह परसर टकराने लगे ॥२७॥ सभी पर्वत हेल उठे, माकाश पर अग्निमय मेष छागये और धुएं बाले अगार बरसने संगे ॥२८॥ उप्णभाश्चन्द्रमाश्चासीत्सूर्यः शीतप्रभस्तथा । न ब्रह्म विविदुस्तन मुनयो ब्रह्मवादिनः ।।२६ वडवाः सुपुवुर्गाश्च गावोऽन्वानपि चानघ । पेतुर्वृक्षाश्च मेदिन्यामच्छिन्ना भस्मसात्कृताः ॥३० वाधन्ते वृपभा गाश्च गावश्चारुरुपान् । राक्षसा यातुधानाश्च पिशाचाश्चापि सर्वशः ॥३१ विपरीत जगदृष्ट्वा महादेवस्तथागतम् । मुमोच भगवान्लं प्रदीप्ताग्निसमप्रभम् ॥३२ तत्पपात रहोत्सृष्टमन्धकोरसि दुद्धरम् । भस्मसाच्चाकारोद्रौद्रम धक साधुकण्टकम् ॥३३ ततो देवगणाः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः। शकर तुष्टुवुश्चैव जगच्छनौ निहिले ।।३४ देवदुन्दुभयो नेदु पुष्पवृष्टिः पपात ह । लोक्य निवृत चासीरेंद्र विगतज्वरम् ॥३५ सूर्य-रश्मियो मे उष्णता न रही, चन्द्रमा की चाँदनी गर्म होगई तथा ब्रह्मकादियो को ब्रह्म ही विस्मृत होगया ॥२६॥ थोडी गो का बछड़ा उत्पन्न करने लगी और गो के घोड़ा उत्पन्न होने लगे । वृक्ष बिना काटे ही पृथिवी पर गिर 'कर सम्म होगये ॥३०॥ बल और गो विपरीत आचरण काने लोडशोर स, भूत, पिशाचादि फेरी लगाने लगे ।।३१।। जब भगवान रुद्र ने ससार में
५०४ ]
[ श्री हरिवशपुर
इस प्रकार का विपरीत प्रभाव उपस्थित देवा तर उन्होने अाने अग्नि मद्द
विशूल को अन्धकासुर पर चलाया जो कि तेजी से जाता हुना उस दानवराज
हृदय पर बैठा । उस ग्रिशूल के आघात से सन्तजनो का वैरी अन्धकासुर ज
कर भस्म होगया ॥३२-३३॥ ससार के उस शत्रु के मर जाने पर सभी देव
और मुनिजन भगवान् शकर की स्तुति करने लगे ॥३४॥ आकाश से पुष्प
हुई, दु दुभि आदि बाजे बज उठे, तीनो लको का वास नष्ट होगया और व
सुख छागया ॥३५
प्रजगुर्देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
जेपुश्च ब्राह्मणा वेदानीजुश्च क्रतुभिस्तदा ।।३६
ग्रहा प्रकृतिमापेदुरूहुर्नद्यो यथा पुरा ।
न जज्वाल जले वह्निराशाः सर्वाः प्रसेदिरे ।।३७
मन्दर. पर्वतश्रेष्ठ. पुनरेव रराज ह ।
श्रिया परमया जुष्ट. सर्वतेज.समुच्छयात् ॥३८
रेमे सोमश्च भगवान्पारिजातवने हरः ।
सुप्रचारासुरान्कृत्वा शकादीन्धर्मतः प्रभु ॥३६
देवता और गधर्व गाने लगे, अप्सराए नृत्य करने लगी और ग्राह
वेदाध्ययन एव यज्ञानुष्ठानो मे लग गये ॥३६।। ग्रहगण, नदियां, जल और अनि
सभी प्रवृतिस्थ होगये और सब दिशाएं स्वच्छ होगई ॥३७॥ मन्दराचल
गई हुई शोभा पुन: लौट आई, इससे वह पूर्ववत् आकर्षक होगया ॥३८॥
प्रकार भगवान् शकर ने इन्द्रादि सब देवताओ को सकट मुक्त किया और
अपने उसी वन में जाकर विराजमान होगये ॥३९॥
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